मिथिला भाषाक अध्ययन आ डॉ. ग्रिअर्सन कृत मैथिली व्याकरण
मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक परम्परा सुदीर्घ एवं अविच्छिन्न अछि। एक भाषाक रूपमे मैथिलीक अध्ययनक इतिहास सुदीर्घ नहि अछि। सन् 1801 ई. मे एच.टी. कोलब्रृूक भाषाक रूपमे ‘मैथिली’ शब्दक पहिले पहिल प्रयोग कएलनि। संगहि, ओ इहो लिखल जे व्यापक क्षेत्रामे मैथिलीक प्रयोग नहि अछि। कोनो महान कवि नहि भेलाह अछि। एहिसँ बेसी लिखब अनावश्यक अछि। जॉन बिम्स2(1872 ई.) एवं हॉर्नल3े3 (1880 ई.) भाषाक लेल मैथिली शब्दक प्रयोग करैत, हिन्दीक एक भाषिकाक रूपमे मैथिलीक विवेचन कएलनि। सर जॉर्ज कैम्पबेल, सन् 1874 ई. मे भारतक विभिन्न भाषा कुलक नमूनाक संकलन करैत बिहारक भाषा (Dialects of Behar)समूहमे Vernacular of Patna, vernacular of Gya,vernacular of Champaran, vernacular of West Tirhoot, vernacular of East Tirhoot, vernacular of West Purnea (Hindee), तथा vernacular of East Purnea (Bengali) 4 राखल। संकलित प्रत्येक शब्द एवं मोहाबराक अङरेजी पर्याय देखि प्रतीत होइछ जे हुनक लक्ष्य भारतक भाषाक अध्ययन नहि छल। अपितु, स्थानीय भाषासँ अपरिचित अङरेज पदाधिकारी सभके ँ दैनिक जीवनमे सुविधाक हेतु विभिन्न क्षेत्राीय भाषाक शब्द आ’ मोहाबरासँ
परिचय एवं अभ्यास कराएब छलनि। अतएव, कैम्पबेलक संकलनके ँभाषाक अध्ययन मानब उचित नहि होएत। बेसीसँ बेसी नमूना संकलन कहि सकैत छी। एस.एच. केलौग5 तिरहुतक भाषाक उल्लेख पूर्वी हिन्दीक एक बोलीक रूपमे प्रसंगात कएने छथि। ओ अपन व्याकरणमे मैथिलीक क्रियापद-रूपावली विस्तारपूर्वक देखऔने छथि।
हॉर्नले ई अनुभव कएल जे पश्चिमी एवं पूर्वी हिन्दी एक नहि थिक, दूनूमे पर्याप्त अन्तर छकै । हानॅ र्ल े पर्वू ी हिन्दीक आठ टा भाषिका मानल जाहिम े सातम स्थानपर मैि थली6 अछि। हुनक स्पष्ट मत अछि जे पूर्वी हिन्दीक अपेक्षा मैथिलीमे अपन पड़ोसी बंगला एवं नेपालीसँ बेसी समानता छैक, भूतकालक निर्माणमे मैथिली विशेषतः बंगलाक अत्यन्त सन्निकट अछि।7 एहि प्रकारसँ कहि सकैत छी जे मैथिली भाषाक अध्ययन कएनिहार पहिल व्यक्ति जॉन बिम्स आ’ दोसर हॉर्नले भेलाह अछि। जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन एक स्वतन्त्रा भाषाक रूपमे मैथिलीक विस्तृत अध्ययन एवं स्थापना कएलनि। मैथिलीक व्याकरण लिखल। एहिमे हिनका जॉन बिम्सक क्रियारूपाली पर्याप्त सहायक भेल छनि।मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक परम्परा सुदीर्घ एवं अविच्छिन्न रहितहु तिरहुतक भाषा, मिथिला भाषा वा मैथिलीक अध्ययन नहि होएबाक की कारण छल होएत, ओहि पर दृष्टिपात करबासँ पूर्व किछु अन्य भाषाक भेल अध्ययनक स्थिति पर नजरि देब अपेक्षित अछि। ए. एच. सेसीक8 अनुसार आधुनिक भारतीय आर्यभाषाक व्याकरण 1872 ई., बंगला भाषाक व्याकरण 1862 ई, ओड़िआ भाषाक व्याकरण 1831 ई., सिन्धी भाषाक व्याकरण 1872 ई., पंजाबी भाषाक व्याकरण 1851 ई., गुजरातीक व्याकरण 1867 ई., मराठीक व्याकरण 1868 ई. तथा हिन्दुस्तानीक व्याकरण 1845 ई. मे लिखल गेल। विश्वम्भर विद्यासागर 1841 ई. मे ओड़ियामे ओड़ियाक पहिल व्याकरण प्रकाशित कएल। BANGLAPEDIA: Grammar9 9 क अनुसार बंगलाक पहिल व्याकरण पुर्तगीज मिशनरी द्वारा पुर्तगालीमे1734 एवं 1742क बीच लिखाएल तथा लिबसनसँ प्रकाशित भेल। बंगलामे पहिल व्याकरण कलकत्ता स्कूल सोसाइटीक सदस्य राधाकान्त देव लिखल जकर दोसर संस्करण 1821 ई. मे भेलैक। असमीक पहिल व्याकरण मिशनरी नाथ ब्राउन 1848 ई. मे प्रकाशित कएलनि। पछाति असमी भाषा पर हुनक विस्तृत पोथी आएल। असमी भाषी पर राजकाजक भाषाक रूपमे थोपल गेल बंगलाक स्थान पर असमीके ँ कामकाजक भाषा होएबामे मिशनरी नाथ ब्राउनक उक्त पोथी बहुत सहायक भेल छलैक। भाषाक लेल ‘नेपाली’ शब्दक प्रयोग पहिले पहिल आयटोन ; (Ayton) 1820 ई. मे कएलनि आ’ । A Grammar of the Nepali Language लिखल। एहि परिप्रेक्षमे मैथिलीक व्याकरण-लेखनक इतिहास पर दृष्टिपात कएल जाए। यद्यपि मैथिलीक सान्दर्भिक चर्चा किछु-किछु रूपसँ पहिनहिसँ होइत छल, किन्तु एक स्वतन्त्रा भाषाक रूपमे मैथिलीक पहिल व्याकरण ; (An Introduction To The Maithili Dialect Of The Bihari Language As Spoken In North Bihar) एक विदेशी विद्वान जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन 1881 ई. मे लिखलनि। हली झा द्वारा मैथिली व्याकरण लिखल जएबाक जे उल्लेख अम्बिकादत्त व्यास कएने छथि, तकर कोनहु पता नहि अछि। मैथिली व्याकरण सम्बन्धी छिट-फुट लेख ‘मिथिलामोद’क किछु आरम्भिक अंकमे भेटैत अछि। पण्डित जीवनाथ रायक लिखल ‘मैथिलीक स्वरूप ओ लेख शैली’ ‘मिथिला मिहिर’ मे प्रकाशित होइत छल10 जे पछाति अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद द्वारा पुस्तकाकार भेल। मैथिलीक पहिल व्याकरण टंकनाथ मैथिली व्याख्याता गंगापति सिंह ‘बाल व्याकरण’ लिखि 1922 ई. मे प्रकाशित कएल जकर दोसर संस्करण मैथिली साहित्य परिषद द्वारा 1937 ई. मे भेलैक। एकर बाद हीरालाल झा ‘हेम’ लिखित ‘मैथिली भाषा व्याकरण भास्कर’ लिखल जएबाक उल्लेख भेटैत अछि जकर प्रकाशन 1926 ई. मे श्रीरमेश्वर प्रेस, दरभंगासँ भेल। एहि इतिवृत्तिसँ स्पष्ट अछि जे भारोपीय आर्यभाषाक मागधी अपभ्रंशक प्राच्य समूहक एक प्रमुख भाषा मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ परम्पराक पर्याप्त साक्ष्य रहितहु सबसँ पछाति एकर व्याकरण लिखल गेल। तकर कारण की? भाषा प्रयोजन सिद्धिक माध्यम थिक। अतएव, भाषाक महत्त्व एहि बात पर निर्भर अछि जे ओ कतेक प्रक्षेत्रामे समाजक प्रयोजनक सिद्धिक माध्यम अछि। एकर परिमापनक दू टा आधार अछि - कार्यभार ; (Functional load) आ’ कार्य पारदर्शिता, ; (Functional Transparency) अर्थात् कार्यमे अपेक्षित स्पष्ट अभिव्यक्ति-क्षमता। भाषाक कार्यभार कम अछि वा अधिक, तकर निर्धारण एहि बातपर होइछ जे ओ कतेक प्रक्षेत्रामे कार्यशील अछि। उदाहरणार्थ अङरेजीके ँ देखि सकैत छी। ओ प्रायः सभ पैघ सार्वजनिक प्रक्षेत्रा जेना व्यापार, शिक्षा, राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय संवाद, प्रौद्योगिकी, सरकार, कानून आदि मे पसरल अछि। अतएव, मिथिला भाषाक अध्ययन ध्1 मिथिला भाषाक अध्ययन- मिथिला भाषाक अध्ययन एवं डा. ग्रिअर्सनकृत मैथिली व्याकरण डा. रमानन्द झा ‘रमण’अङरेजीक कार्यभार बेसी मानल जाएत। कार्य पारदर्शिता एहि बात पर निर्भर अछि जे भाषाक खास प्रक्षेत्रामे ओकर स्वायत्तता आ’ नियन्त्राण छैक वा नहि। यदि एकभाषा दोसर भाषाक प्रयोगक आरि छंटैत अछि तँ ओहि भाषाक कार्यभार उच्च मानल जाइत छैक। दोसर शब्दमे, भाषा कार्यमे पारदर्शी बूझल जाइत अछि, यदि ओ अत्यधिक नीक जकाँ खास कार्य करैत अछि। जेना, संस्कृत भारतीय सस्ं कृि त एव ं हिन्दुत्वक व्याख्या करबाम े अत्यधिक पारदर्शी रूपे ँ कार्य करतै अछि। मुदा आधुनिकताक कार्यमे पारदर्शी नहि अछि। ओहिना मैथिलीक कतेको प्रक्षेत्रामे हिन्दी सन्हिआ गेल अछि, जाहिसँ मैथिलीक कार्यभार एवं पारदर्शिता - दूनू घटि गेलैक अछि। कमल जाइत अछि। कहि सकैत छी भाषा आ’ कार्यमे स्थिर साहचार्य छैक। पारदर्शिता घटल तँ कार्यभार कमल आ’ प्रक्षेत्राक संख्या बेसी, तँ कार्यभार उच्च। कार्यभार आ’ कार्यपारदर्शिताक दृष्टिसँ मैथिली पर विचार कएल जाए। ई अनेकहु अभिलेखसँ प्रमाणित अछि जे भारोपीय आर्यभाषाक मागधी अपभ्रंशक प्राच्य समूहक भाषामे अन्यतम स्थान प्राप्त मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ एवं अविच्छिन्न परम्परा छैक। सिम्रौनगढ़क कर्णाटवंशक सभ राजालोकनि मैथिली भाषाके ँप्रोत्साहन देलनि एवं ओहिठामक राजा रामसिंहदेवक समयक प्राप्त शिलालेखक आधार पर इतिहासज्ञ डा. हरिकान्त लाल दासक11 निष्कर्ष अछि जे कर्णाट शासन कालमे राजकाजक भाषा मैथिली छल। प्रो. दासक इहो निष्कर्ष अछि जे मोरंग, मकवानपुर, विजयपुर, पाल्पा आदि राजालोकनिक समयक अभिलेख, स्याहा मोहर, जमीनक हस्तान्तरण सम्बर्न्धी अिभलेखसँ सेन राजालोकनिक राजकाजक भाषा मैथिली होएब प्रमाणित हाइे छ।12 एहि एेि तहासिक तथ्यस ँ निष्पन्न हाइे छ ज े मैि थलीक पय्र ागे विभिन्न पक्ष््र ात्रे ाम े हाइे त छल।
साहित्य-सर्जना, दैनिक व्यावहारिक जीवन एवं राजकाजक भाषा रहने मैथिली उच्च कार्यभारक भाषा छल। किन्तु, नेपालमे राणाशाही स्थापित भेलाक बादसँ मैथिलीक प्रक्षेत्रा क्रमशः घटैत गेल। मिथिलामे तुर्क, अफगानक आक्रमण एवं आधिपत्यक बाद जखन मुगल बादशाहसँ खंडबला कुलके ँ मिथिलाक राज प्राप्त भेलनि तँ जैतुकमे अरबी, फारसी एवं उर्दू सेहो अएलैक। संगहि, लोकनि×ाा सभ सेहो मैथिली भाषीक्षेत्रामे बसय लागल। एहिसँ मैथिलीक प्रक्षेत्रापर संघातिक आघात भेलैक। मैथिलीक प्रयोगक प्रक्षेत्रा घोंकचए लागल। मैथिली भाषीक घनत्व तरल होइत गेल। कोलब्रूकक अभिमतसँ स्पष्टे अछि जे साहित्य-सर्जनाक क्षेत्रामे सक्रियता ठमकल छल। परिणामतः मैथिलीक प्रक्षेत्रा दैनिक जीवन आ’ मनोरंजक साहित्यक सर्जना धरि सीमित रहल।
अतएव, जखन ईस्ट इन्डिया कम्पनीक हाथमे तिरहुतक शासन-सूत्रा अएलैक, तँ कम्पनी सरकारक लेल मैथिली कोनो समस्या नहि बनल। तखन समाधानक चिन्ता ओ किएक करैत? जेना आन कतेको भारतीय भाषाक पढ़ौनीक व्यवस्था अपन कर्मचारी-अधिकारी वा सेना-सिपाही लेल ओ कएलक, से मैथिलीक लेल किएक करैत? लार्ड मेकाले (1835 ई.) प्रायः एहनहि स्थितिमे रिपोर्ट कएने छल होएताह जे जाहि भाषासँ (अरबी, फारसी एवं संस्कृतक सन्दर्भमे लिखल) ने हमर प्रशासनके ँकोनो लाभ छैक आ’ ने ओहि भाषाके ँ केओ बिना सरकारी पाइक पढ़ेबाक लेल तैआर छथि, ताहि भाषापर किएक खर्च कएल जाए?13
भारतक प्रथम स्वाधीनता संग्रामक असफलताक उपरान्त 1857 ई. मे भारतक शासन-सूत्र ईस्ट इंडिया कम्पनीक हाथसँ ब्रिटिश साम्राज्ञीक हाथमे आएल तँ ओ अपन उपनिवेशक लोक सभसँ सामीप्य स्थापित करबाक हेतु क्षेत्रा विशेषक भाषाक अध्ययन एवं विकासक प्रसंग नीतिगत निर्णय कएलनि। भारत सहित ब्रिटिशक विभिन्न उपनिवेशक भाषाक शिक्षणक व्यवस्था भेल। व्याकरण लिखाएल। शब्द एवं लोक-साहित्यक संग्रह आरम्भ भेल। अध्ययन तथा प्रकाशन होअए लागल तथा अधिकारी सभके ँ स्थानीय भाषामे प्रवीणता प्राप्त करबाक हेतु ओहिना प्रोत्साहित कएल गेलनि14, जेना भारत सरकार सम्प्रति अपन कर्मचारी-अधिकारीके ँ हिन्दीक कार्यसाधक ज्ञान अर्जित करेबाक लेल प्रोत्साहित करैत अछि। जाहि भाषाक कार्यभार बेसी छलैक, ओहि भाषामे काज पहिने आरम्भ भेल। मैथिलीक कार्यभार अल्पतम छल। ध्यान पछाति गेलैक। जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन मैथिलीके ँ भारोपीय आर्यभाषाक मागधी अपभ्रंशक प्राच्य समूहक एक भाषा मानैत छथि। हिनक प्राच्य समूहमे 1. ओड़िआ, 2. बिहारी (मैथिली, मगही एवं भोजपुरी), 3. बंगला, आ’ 4. असमिआ अछि। हॉर्नले उपयुक्त नामकरणक अभावमे संस्कृतसँ सवं द्ध भाषाक े सँ ुविधाक हते ु गाैि डअन 15 कहलनि। सम्भव थिक हानॅ र्ल के मागर्क अनुसरण करतै उपयुक्त नामकरणक अभावमे ग्रिअर्सन सेहो बिहारक भाषा मैथिली, मगही एवं भोजपुरीक लेल
‘बिहारी’ नामकरण कए देने होथि। ओना ओहिसँ पहिने राममोहन राय बंगलामे बंगलाक पूर्ण व्याकरण ‘गौड़ीय व्याकरण’ 1833 ई.मे लिखने छलाह। ग्रिअर्सनक ई वर्गीकरण, विशेषतः बिहारक भाषा मैथिली, मगही एवं भोजपुरीक लेल ‘बिहारी’ नामकरण, पर्याप्त विवादक कारण भेल अछि। ओना साम्प्रतिक राजनीतिक परिदृश्यमे जँ एकर विवेचन करी तँ कहि सकैत छी जे ‘बिहारी अस्मिता’क पहिल उद्भावक जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन भेलाह।
मैथिलीक औपभाषिक विभाजन सेहो विवादक कारण भेल अछि। जार्ज ग्रिअर्सन र्मैिथलीक औपभाषिक विभाजन छओ भागमे कएने छथि -1. मानक मैथिली, 2. दक्षिणी मानक मैथिली, 3. पूर्बी मैथिली वा गॅंवारी, 4. छिकाछिकी बोली, 5. पश्चिमी मैथिली एवं 6. जोलहा बोली। पण्डित गोविन्द झा16 वर्गीकरणक तीन आधार मानल अछि- 1. क्षेत्रा, 2. सामाजिक वा शैक्षणिक स्तर तथा 3. जाति। क्षेत्राक अनुसार ओ 1. पूर्वी( नव क्षेत्राीय नामकरण अंगिका, ग्रिअर्सन - छिकाछिकी एवं गँवारी), 2. दक्षिणी, पश्चिर्मी (नव क्षेत्राीय नामकरण बज्जिका, ग्रिअर्सन - पश्चिमी मैथिली), 4. उत्तरी वा नेपाल तथा 5. केन्द्रीय। एहि विभाजनक आधार अछि मैथिलीक भाषायिक चौहद्दी। पूर्बमे बंगला, पश्चिममे भोजपुरी, दक्षिणमे मगही आ’ उत्तरमे नेपाली। अभिसरण ; (Convergence) सिद्धान्तक अनुसार सम्पर्कसँ भाषा प्रभावित होइत छैक। एहि हेतु केन्द्रीय मैथिलीके ँछोड़ि चारू कातक मैथिली अपन समीपस्थ भाषा सभसँ प्रभावित भेल आ’ जे अप्रभावित रहल मानक मैथिली कहल गेल अछि। भाषा वैज्ञानिक तथ्यक आधार पर एहि तथ्यके ँ फरिछबैत डा. रामावतार यादव17 बिहारमे मधुबनी तथा नेपालमे राजबिराजमे बाजल जाइत मैथिलीके ँमानक मैथिली कहल अछि।
सामाजिक स्तरक अनुसार सभ क्षेत्रामे मैथिलीक दू स्वरूप गोविन्द झा मानैत छथि - शिक्षित एवं सुसंस्कृत उच्चवर्गक आ’ दोसर समाजक अशिक्षित एवं निम्नस्तरक लोकक भाषिका। शिक्षित वर्गक अभिरुचि मैथिलीक मानक स्वरूपक दिशि होइत छनि एवं परिष्कृत भाषा बजबामे ओ गौरवक अनुभव करैत छथि। अशिक्षित वा नीचला स्तरक लोकक भाषिकामे स्थानीय एवं जातीय विशेषता विशेष सुरक्षित रहैत अछि। जातिक अनुसार मैथिलीक तीन स्वरूप पण्डित मिथिला भाषाक अध्ययन ध्3 मिथिला भाषाक अध्ययन 4गोविन्द झा मानल अछि - 1. विद्याजीवीक भाषिका, 2. कृषिजीवी जातिक भाषिका तथा 3. व्यवसाय जीवीक भाषिका। कोन परिस्थितिमे विभिन्न भाषा-भाषी एवं सांस्कृतिक समुदायक लोकक स्थायी निवास मिथिला बनैत गेल तकर चर्च ऊपर कएलहुँ अछि। मिथिलाक प्रशासनिक क्षेत्रामे ओहि वर्गक वर्चस्व, सेहो घटैत-बढ़ैत रहल। भारतक कतेको प्रान्तमे भाषाक प्रयोगजन्य जे समरूपता देखैत छी एवं प्रयोगजन्य समरूपताक कारणे ँभाषाक नामपर जे एकजुटता अनुभव होइत अछि, तकर घोर अभाव मिथिलामे उक्त कारण सभसँ छल एवं अद्यावधि अछि। एहन कोनो केन्द्रीय राजनीतिक शक्ति वा सामाजिक संगठन नहि छलैक जे मैथिलीक प्रचार-प्रसार वा मैथिलीक पठन-पाठनक मार्गमे अबैत अवरोधक तत्त्वक निराकरण कए, सर्वव्यापी प्रभावकारी निर्णय लए सकैत छल।
मैथिलीक औपभाषिक विभाजन सर्वग्राह्य तँ नहिएं भेलैक, अपितु किछु अंश धरि दूरत्वक ओ कारण सेहो भए गेल। एहि दूरत्वके ँबढ़ेबामे बिहार विभाजनक अगुआ एवं पटना विश्वविद्यालयक पूर्व उपकुलपति डा. सच्चिदानन्द सिंहा सन लोकक मैथिली भाषा-संस्कृति विरोधी मानसिकता सहायक भेलैक। पटना विश्वविद्यालयक पाठ्यक्रममे मैथिलीक स्वीकृतिक प्रस्तावक समय ओ बाबू भोलालाल दासके ँकहने छलथिन्ह -‘बंगालसँ बिहारके ँअलग कएल हम अपना सभक निमित्त, अहाँलोकनिक लेल नहि। मैथिलीके ँस्वीकृत कएने मिथिला जीबि उठत। मिथिला जीबि उठत तँ हमरालोकनिके ँयू. पी. चल जाए पड़त। ते ँजावत हम जीअब मैथिलीके ँस्वीकृत नहि होअए देब।’18 जखन मैथिलीक अध्ययन-अध्यापने नहि, तखन व्याकरण कोना लिखाइत? प्रयोजनक दृष्टिसँ व्याकरणक दू कोटि अछि19 - पारम्परिक एवं शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण; (Traditional and Pedagogical Grammar)A। पारम्परिक व्याकरणक आधार साहित्य होइत अछि। ओ पोथी तथा अन्य उपलब्ध साहित्यक आधार पर भाषाक संरचनात्मक परिचय करबैत अछि। ओ इहो सुझबैत अछि जे कोना लिखी आ’ कोना नहि लिखी। कोना बाजी आ’ कोना नहि बाजी। तदनुसार, ई अनुशासनात्मक व्याकरण ; (Prescriptive) सेहो कहबैत अछि।
पारम्परिक व्याकरण वर्तमान एवं भविष्य - दूनूक लेल मार्ग-दर्शक होइत अछि।
एकर विपरीत, शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण मानक भाषिका एवं लिखित समकालीन भाषाक संरचनात्मक स्वरूपक परिचय करबैत अछि। मानक भाषा लिखब आ’ बाजबमे व्याकरणक कोन नियमक कखन प्रयोजन होइत छैक आ’ तकर अनुसरण कोना कएल जाए, शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण सीखबैत अछि। कहि सकैत छी जे भाषा विशेषक लोकक बीच उक्त समूहक भाषा कोना बाजल जाए, जाहिसँ वक्ताक अभिप्रायक सम्प्रेषण वाधित नहि रहए, वक्ता की कहैत छथि, से उक्त भाषा समूहक लोक बूझि जाथि। एकरा सम्वाद-भाषा सेहो कहि सकैत छी। पारम्परिक व्याकरणक नियम बेसी कठोर होइत अछि किन्तु शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण वा सम्वाद-भाषाक व्याकरणमे तारता होइत छैक। ओ भाषाक विभिन्न स्वरूपक प्रयोग सफल सम्वाद-स्थापन लेल करैत अछि। ठाम-ठाम जँ व्याकरणिक नियम भंगो होइत रहैछ तँ ओहि पर ध्यान नहि दैत अछि।
भाषाक परिचयमे शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण पाँच स्तर पर सहायक होइत अछि -
1. शब्द स्तर ; ( Vocabulary level) - एहि स्तरपर व्याकरण शिक्षार्थीके ँ शब्द एवं ओकर विभिन्न स्वरूपक परिचय करबैत अछि। ओकर प्रयोगके ँ तेना विश्लेषित करैछ जाहिसँ शिक्षार्थी पुरुष-वचन-लिंग प्रणालीसँ परिचित भए जाथि।
2. रूपात्मक स्तर ; ( Morphological level) - एहि स्तरपर व्याकरण शब्द निर्माण,एकवचनसँ बहुवचन, समास, रूपावली, विभक्ति आदिसँ परिचय करबैत अछि। कारक तथा ओकर प्रयोग कोना कएल जाए, से सिखबैत अछि।
3. रूपस्वनिमिकी स्तर; Morphophonemic level) - एहि स्तरपर व्याकरण सन्धि तथा
व्याकरणक कारणे ँ होइत स्वन-परिवर्तनसँ परिचय करबैत अछि।
4. वाक्य स्तरपर ; ( Syntactic level) - एहि स्तरपर व्याकरण वाक्य-निर्माण कोना कएल
जाए, से सिखबैत अछि। शिक्षार्थी जँ अन्य भाषा-भाषी रहैत छथि तँ हुनक भाषाक वाक्यसँ तुलना करैत विश्लेषण एहि प्रकारे ँकएल जाइछ जाहिसँ काल, वचन, संयुक्त वाक्य, वाक्य-बन्ध, वाक्य परिवर्तन, समास आदिक परिचय हुनका नीक जकाँ भए जाइन।
5. डिसकोर्स स्तरपर ;( Discourse level) - भाषामे विचार कोना उतरैत अछि तथा विभिन्न वाक्य कोना सम्वद्ध भए जाइत अछि, से एहि स्तरक व्याकरण सिखबैत अछि।
ग्रिअर्सनक प्रस्तुत मैथिली व्याकरणके ँजखन पारम्परिक एवं शिक्षा शास्त्राीय व्याकरणक दृष्टिसँ देखैत छी तँ दूनू व्याकरणक अधिकांश विशेषताक लाभ अध्येताके ँ एकहिठाम भेटल सन लगैत अछि।
अङरेज विद्वान तँ उचिते, पाश्चात्य शिक्षा-प्रणालीमे शिक्षित अधिकांश मैथिल विद्वान सेहो,जेना, डा. सुभद्र झा, डा. रामावतार यादव, डा. उदयनारायण सिंह ‘नचिकेता’, डा. योगेन्द्र प्रसाद यादव, डा. सुनील कुमार झा, डा. बालकृष्ण झा प्रभृति, मैथिलीक भाषाशास्त्राीय अध्ययन अङरेजी माध्यमे ँकएलनि अछि। एहिसँ मिथिला भाषाक विशेषताक व्यापक प्रचार-प्रसार अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर भेलैक अछि। हिनकालोकनिक विद्वता एवं परिश्रमसँ विद्वत् समाजमे मैथिलीक स्वीकार्यता बढ़ल एवं मिथिला भाषाक विशेषज्ञक रूपमे ई लोकनि प्रख्यात भेलाह अछि। ई सभक लेल गौरवक बात थिक। आह्लादकारी अछि। किन्तु भाषा विज्ञानक क्षेत्रामे नित प्रति होइत नव-नव सिद्धान्तक स्थापना तथा तदनुसार मिथिला भाषाक अध्ययन-विवेचनसँ मैथिलीक लोक वा मैथिलीक माध्यमे ँ अध्ययन-अध्यापन कएनिहार- वा करओनिहार मैथिलीक शिक्षार्थी, जे लाभक वास्तविक अधिकारी छथि एवं डेग-डेग पर प्रयोजन होइत छनि, लाभान्वित होएबासँ वंचित छथि। अतएव, मैथिली व्याकरण वा मैथिलीक भाषावैज्ञानिक अध्ययन सम्बन्धी सामग्री वा आकर ग्रन्थक मैथिलीमे अनुपलब्धिक स्थिति अवश्य आह्लादक नहि अछि। मैथिली लिखबामे सम्प्रति अनेकहु स्तर पर अस्तव्यस्तता अछि। ओ पसरि रहल अछि। एहि अस्तव्यस्तताक प्रमुख कारण पण्डित गोविन्द झा20 आजुक परम्परा भंजनी प्रवृत्तिके ँमानल अछि। ई परम्परा भंजनी प्रवृत्ति भाषाहुक क्षेत्रामे प्रवेश कए गेल अछि। दीर्घकालीन परिमार्जन, मिथिला भाषाक अध्ययन ध्5 मिथिला भाषाक अध्ययन ध्6परिष्करण ओ परिपोषणसँ जे स्तरीयता आएल छलैक तकरा ई स्वेच्छाचारी प्रवृत्ति अस्तव्यस्त करबामे मस्त अछि।
भारतक संविधानक आठम अनुसूचीमे मैथिलीके ँसम्मिलित कएल गेलाक बाद मैथिलीक प्रक्षेत्रामे व्याप्ति आएल अछि। भारत सरकार भिन्न भाषा-भाषीके ँ मैथिली पढ़बा रहल अछि। मैथिली भाषा साहित्यक प्रचार-प्रसार लेल अनेक प्रकारे ँ प्रोत्साहित कए रहल अछि तथा मैथिली केवल ‘बुच्ची दाइ’ लोकनिक भाषा नहि रहि, ज्ञान-विज्ञानक भाषा बनए, ताहि लेल प्रयासरत अछि। दोसर दिशि मैथिलीक माध्यमे ँप्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षाक अभाव तथा मैथिलीक भाषाक जे भूगोल छैक, ओहिसँ मैथिली भाषा-भाषीक पलायन एवं सम्पर्क क्रमशः कमल जएबाक कारणे ँमैथिलीक दृष्टिसँ अशिक्षित मैथिलक संख्या निरन्तर बढ़ल जाइत अछि। मैथिलीक
पारदर्शिताक क्षेत्राक आरिके ँ छपटबामे ई स्थिति सहायक अछि। एहना स्थितिमे व्याकरणक, जे भाषाक अस्तव्यस्तताके ँसरिअएबैत भाषामे अनुशासन अनैत अछि, प्रयोजन बेसी होइत छैक। भाषा-शिक्षण लेल सेहो व्याकरणक महत्त्व सर्वोपरि अछि। अङरेजीअहुमे आब दुर्लभ एवं सामान्यजनक लेल अबोधगम्य जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सनकृत मैथिली व्याकरणक पण्डित गोविन्द झा द्वारा भेल मैथिली अनुवाद एवं प्रकाशनसँ बेसी लाभक सम्भावना अछि। एहिसँ मिथिला भाषाक अध्ययनक क्षेत्रामे ग्रिअर्सनक की अवदान छनि, तकरहु मूल्यांकन भाषा अनुरागी सुधीसमाज कए सकताह।
सन्दर्भ -
1. H.T.Colebrooke - On the Sansktit and Prakrit Languages- Asiatic Researches,1801, Misc. Essays, P.No.225 - Mait'híla, or Tirhútia, is the language used in Mit'hílà, that is, in the Sircár of Tirhút, and in some adjoining districts, limited however by the river Cusí(Causící,) and Gandhac( Gandhací,) and by the mountains of Népál; it has great affinity with Bengálí; and the character in which it is written differs little from that which is employed throughout Bengal. In Tirhút, too, the learned write Sanscrít in the Tirhutíya character and pronounce it after their own inelegant manner. As the dialect of Mit'hilà has no existensive use, and does not appear to have been at any time cultivated by elegant poets, it is unnecessary to notice it further in this place.
2. Beames -A Comparative Grammar of the Modern Aryan Languages of India, 1872. - Introduction, page No. 96 - " Crossing the Kusi river, and going westwards, we come into the region of Maithila, the modern Tirhut, where the Language is Hindi in type, though in many of its phonetic details it leans towards Bengali."
3. A. F. Rudolf Hoernle- A Grammar of the Eastern Hindi Compared with the other Gaudian Languages,1880, Introduction page V.
4. Sir George Campbell - Languages of India, including those of the Aboriginal Tribes of Bengal,1874, Page No.60.
5. Rev. S.H.Kellogg, A Grammar of the Hindi Language, para 450, page No. 230,1876.- In the dialects of Bhojpur and Tirhut we have a still wider divergence; from High Hindi type conjugation and a close approximation, in the y of the perfect and, in Tirhut in the substantive verb Nh to the Bengali system.
6. A. F. Rudolf Hoernle, A Grammar of the Eastern Hindi Compared with the other Gaudian Languages,1880, page.V. - Seventhly, the Maithili or the dialect of the district of Tirhút, spoken about Muzaffarpur and Darbhanga. It is called so after the ancient city of Mithila, the capital of Videh or modern Tirhút((Tírabhukti).
7. A. F. Rudolf Hoernle, A Grammar of the Eastern Hindi Compared with the other Gaudian Languages,1880, Page No..VI.- the Maithili especially exhibits unmistakable similiarities to the neighbouring Bengali and Nepali. Indeed, I am doubtful, whether it is not more correct to class the Maithili as a Bengali dialect rather than as a E.H one. Thus in the formation of past tense, Maithili agrees very closely with Bengali, while it differ widely from E.H.
8.. A.H. Sayce, Introduction to the Science of Language, 4th Ed. 1900, page No. 39. - (I). Beames - A Comparative Grammar of the Modern Aryan ... ... Languages of India, 1872, (II). Forbes - A Grammar of the Bengali Language, 1862, (III). Sutton - An Introductory Grammar of the Oriya Language,1831, (IV.) Trumpp- Grammar of the Sindhi Language,1872, (V) Lodiana A Grammar of the Panjabi Language, 1851,( VI)), Yates- Introduction to the Hindustani Language, 1845, (VII) , Shapunji Edalji- A Grammar of the
Gujarati Lanugage, 1867, (VIII). do - The Student's Manual of Marathi Grammar, 1868.
9. BANGLAPEDIA: Grammar - first Bangla grammar, Vocabolario em idioma Bengalla, e Portuguez dividido emduas partes, written by Manoel da Assumpcam, a Portuguese missionary, in Portuguese. Assumpcam wrote this grammar between 1734 and 1742 while he was serving in Bhawal.One of the members of the calcutta school society was Radhakanta Deb who believed that without the knowledge of Sanskrit it was not possible to read, write or speak Bangla correctly. His Bangala Shiksagrantha (second edition, 1821) was essentially tied to Sanskrit grammar. Radhakanta was the first Bengali to write a Bangla grammar in Bangla.The first full-fledged Bangla grammar by a Bengali was Gaudiya Vyakaran (1833) by Rammohun Roy who wrote it in 1830 at the request of the School Society.
10ण् जीवनाथ राय, मैि थलीक स्वरूप आ े लख्े ा शलै ी, मिथिला मिहिर, 11 दिसम्बर 191र्5 इ.
11. डा. हरिकान्त लाल दास - नेपालमे मैथिली भाषा प्रति सेन राजालोकनिक दृष्टिकोण - सयपत्राी, राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान, काठमांडू, वर्ष 4, 2055 साल - मैथिली विशेषांक, पृ.सं. 69 - सिम्रौनगढ़क कर्णाटवंशक सभ राजालोकनि मैथिली भाषाके ँप्रोत्साहन देलनि। तकर प्रमाण ओतए एक खण्डहरसँ प्राप्त किछु खण्डित शिलालेख अछि। खण्डहर निरीक्षणक क्रममे एकटा शिक्षकके ँ राजा रामसिंहदेवक समयक Slab inscription भेटलनि जकर लिपि मैथिली अछि। गत वर्ष त्रिभुवन विश्वविद्यालयक इतिहास विषयक एकटा सेमिनार सिम्रौनगढ़मे भेल छल। ओतए इतिहास विषयक प्राध्यापक डा.तुलसी रामबैद्यक नेतृत्वमे अनुसन्ध्ाान टोलीके ँ एकटा खण्डित शिलालेख प्राप्त भेलनि जकर भाषा सेहो मैथिली अछि। एहि तरहे ँ अनुमान लगाएल जाइत अछि जे कर्णाट शासनकालमे मैथिली राजकाजक भाषा छल।’
12. डा. हरिकान्तलाल दास - ओएह, पृ.सं. 70 - कर्णाटकालमे मैथिली भाषाके ँ जे स्थान प्राप्त छलैक ताहिसँ कम महत्त्वपूर्ण सेन राजालोकनिक नहि छलैक। मोरङसँ मकवानपुर तक अभिलेखकक भाषा होएबाक अनेको कारण प्रमाण भेटैत अछि। एहि सम्बन्धमे पुरातत्त्वविद् जनकलाल शर्मा लिखैत छथि जे पूरबमे विजयपुर आ’ पश्चिममे पाल्पाक सेन राजालोकनिक स्याहा मोहर आ’ ताम्रपत्रा मैथिली भाषामे भेटब कोनो आश्चर्यक गप्प नहि थिक। मोरङ पदावलीसँ ज्ञात होइत अछि जे मैथिली भाषाक साहित्यकार सभके ँ मकवानपुर दरबारक अतिरिक्त विजयपुर आ’ पाल्पा दरबारमे सेहो निर्वाह होइत छलनि। विजयपुर राज्यक बोलचालक भाषा मैथिली छल। ते ँराजकाजक भाषा मैथिली बनाओल गेल होएत। दन्तकाली मन्दिरक पुजारीेके ँ विजयपुरक सेन राजा द्वारा देल गेल आदेश पत्राक भाषा प्रमाणित... ... करैत अछि जे ताहि समयमे मैथिली राजकाजक भाषा छल। पण्डित तुलारामके ँकोशी क्षेत्राक जमीन जागीरस्वरूपमे देल गेल छलनि, तकर भाषा सेहो मैथिली अछि। नेपालक एकटा इतिहासकार प्रेमबहादुर लिम्बूक कथन अछि जे सेनराजा लोहाग सेन किरात प्रदेश पर विजय कएलाक बाद ओहि क्षेत्रामे किराताक्षरक स्थानमे मिथिलाक्षरके ँ प्रचारित करौलनि। फलस्वरूप, किरात संस्कृतिमे मिथिलाक संस्कृतिक प्रभाव बहुत दिन धरि रहल। एहि सभ बातक अध्ययन कएलाक बाद कहल जा सकैछ, सेनराजा सभ द्वारा मैथिली भाषाके ँ नीक संरक्षण भेटलैक। ओलोकनि अपन काम कारबाइ तक मैथिली भाषामे कएलनि। ई बहुत महत्त्वपूर्ण बात छल।’
13. Qouted in Languages in India,p.n.71, Mysore,Vol. 2: 8 Nov., 2002
14. Minute by the Hon'ble Sir C.E.Travelyan K.C.B., on the tests to be passed in the Native Language by the Junior Civil Servants/ Military Officers in the Nothern India. Calcutta the 25th July, 1864. - Quoted - Languages in India, page No.95, Mysore,Vol. 2: 8 Nov., 2002 - 'If we wish to encourage our officers to become good practical lingiusts, we ought to make it as easy as possible to them, and to give them the same facilities as we have at home in learning French, Italian, or any other language in which there
are many dialects but only on standard.'
15. A. F. Rudolf Hoernle, A Grammar of the Eastern Hindi Compared with the others Gaudian Languages,1880, Introduction - I have adopted the term Gaudian to designate collectively all North-Indian vernaculars of Sanskrit affinity, for want of a word; not as
16. गोविन्द झा - मैथिली भाषा का विकास, 1974, पृ.सं. 50
17. Dr. Ramawatar Yadav- Maithili Lingiustic Research : State-of-the-Art -Contributions to Nepalese Studies, Vol. 27, No.1 - The standard of spoken Maithili is tacitly identified with the speech of the towns of Madhubani in Bihar and Rajbiraj in Nepal.
18. किरण समग्र, 2007, पृ. सं.266।
19. Kasturi Viswanatham - New Horizons in Language and Linguistics, page No.312, CIIL, Mysore
20. गोविन्द झा, घर बाहर, जनवरी-मार्च, 2005 - ‘आजुक परम्परा भंजनी प्रवृत्ति बड़ आयासे ँबान्हल ओहि पुरान घरके ँमानू धाराशायी करबा पर लागल अछि। की समाज, की संस्कृति, की भाषा सर्वत्रा दीर्घकालीन परिमार्जन, परिष्करण ओ परिपोषणसँ जे स्तरीयता प्राप्त भेल छल, आइ तकर भारी अवमूल्यन भए गेल अछि आ’ स्वेच्छाचार बढ़ैत गेल अछि। पण्डितक लेखनीसँ बहराएल भाषा निकृष्ट मानल जाइत अछि, निरक्षरक मुहसँ बहराएल भाषा श्रेष्ठ। एहि वैचारिक क्रान्तिक प्रभावमे पड़ि मैथिलीक बहुतो नबतुरिया लेखक ई मानि बैसलाह अछि जे सर्वसाधारणक मुहसँ जेना सुनैत छी तहिना लिखब शुद्ध थिक। एहि धारणाक कारणे ँ मैथिलीक वर्तनीमे जे किछु एकरूपता आएल छल, सेहो ध्वस्त भए रहल अछि। स्वच्छन्दतावादी लोकनिके ँई बुझबाक चाहिअनि जे उच्चारणक अनुरूप लिखब कोनो प्रचलित लिपिमे नहि छैक।’
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
बिपिन झा, IIT Bombay