मैथिलानी पर विमर्श क अधिकारी के?
मैथिलानी अथवा मिथिला में स्त्री केर स्थिति पर चर्चा करक अधिकारी के: स्त्री? पुरुष? अथवा दूनू? आजुक सन्दर्भ में जखन स्त्री विमर्श पर महिला; दलितवर्ग पर दलित; कला पर कलाकार काज क रहल छथि, लिख रहल छथि; ओहेन स्थिति में ई एक बहुत महत्वपूर्ण बिंदु बुझना जैत अछि। हमहु स्त्री पर आ कखनो काल मिथिलाक स्त्री पर हुनक जीवन के विभिन्न आयाम पर लिखैत रहैत छी।जे ओहि वर्ग सं छथि सैह लिखता अथवा व्यक्त करता किछु एहेन सन अवस्था अछि जे हमरा थोरेक परेशान करैत अछि। लगैत अछि “जेना हम दोसरक अधिकार क्षेत्र में अधिक्रमण क रहल होई?” बातमे कनि उलझन छैक। मैथिलानी जं अपना पर नहि लिखती त आन के लिखतनि? जे अनुभव छैक तकर सटीक वर्णन आ व्यख्या वैह क सकैत छथि! लेकिन फेर एक दोसर बात मोन में अबैत अछि। हमरा लोकनि नृतत्वशास्त्र आ समाजशास्त्र में दोसरक संस्कृति (other cultures) के बारे में पढैत छी। दोसरक संस्कृति पर काज करैत छी। अहू दुनु विधा में स्थानीयया मूल (native) आ दोसर केर बीच द्वन्द छैक। एक के कहब छैक जे स्थानीय अथवा नेटिव चूँकि ओहि समाज आ संस्कृति केर हिस्सा छैक ताहि ओ ओकरा निक सं बुझैत छैक, ओहि में जीबैत छैक आ ओकर अक्षरसः व्यख्या क सकैत छैक।एकर विपरीत दोसर संस्कृति पर आन द्वारा अध्ययन कर बला के ई मानब छनि जे वैश्विक बात त आने कहत। से कोना? कखनो काल जं बाहरी दुनिया के मापदण्ड नेटिव विद्वान के नहि बुझल होनि त ओ बहुत बात के चर्च करब छोडि देता।
अपन शोध आ फिल्डवर्क केर एक सत्य उदाहरण दैत छी जे आंखि सं देखल आ कान सं सूनल अछि। हम मुसहर जाति पर एक विस्तृत परियोजना पर काज करैत रही। परियोजना केर उद्देश्य एहि समाजक लोक के शिक्षा, स्वास्थ, आर्थिक आ सामाजिक उन्नति के दिशा में प्रयत्न रहैक. शिक्षा संग संग सांस्कृतिक धरोहर केर रक्षा सेहो मूल रहैक.विषय के गंभीरता के देखैत आ अपन पूर्व में अहि समाज पर कुनो तरहक काजक अनुभव नहि होबाक कारने एक मुसहर समुदाय के पढ़ल युवक के साथ लय हम मुसहरटोलीमें गेलौं।स्थिति देखि द्रवित भेलौं. भेल, “आजुक जुग में ई सब मुसहर जातिक लोक कतेक दुखक जीवन जी रहल अछि?ककरो घर दढ़ नहि. ककरो भरि देह वस्त्र नहि. भेल,फेर कुन तरहक विकास अपन देश अर्थात भारत क रहल अछि?सब के पुछ्लियैक: “अहाँ सब के की चाही?” झट दनि एक माईनजन उठला आ कहलनि: “हमरा सबके माटि काटक काज आ घर के मरम्मत भ जै त हम सब धन्य भ जैब।” हमर दोसर प्रश्न छल: “कतेक पाई में घरक मरम्मत भ जैत?” हुनकर जवाब तहिना भेटल: “मालिक, हम सब फुसही झोपडी में रहैत छी। २००० टाका भेट जेतैक त सब समस्याक समाधान।”
आब देखू, ओ सब कियोक ढंग सं वस्त्र नहि पहिरने छल। सबहक पीठ उघार। मैल-फाटल धोती, ५-६ वर्ष केर बच्चा सब नंगटे। तथापि ओकर मांग मात्र २००० टका घर ठीक करेबाक हेतु आ माटि काटक काज नोन रोटी खेबाक लेल। नहि शिक्षा, नहि स्वास्थ, नहि आरो कोनो वस्तु केर अभिलाषा।ओहि समुदाय केर पढल युवक अर्थात हमर सहयोगी सेहो कुनो निक व्योंत बतेबा में अपन असमर्थता व्यक्त केलनि।ओ कहलनि: “सर, हम सब भोजन, वस्त्र, आवास मात्र तीन वस्तु जनैत छी. अतेक भेट गेला सं सब मस्त. ने शिकबा ने शिकायत.” अहि तरहक बात आदिवासी आ अन्य समाज में सेहो देखना जैत अछि।हम आब अपन विषय केर दोसर बात जे“सत्य वैह नहि होइत छैक जे लोक कहैत अछि, सत्य ओहो होइत छैक जे अहाँक आंखि देखैत अछि, आत्मा, आ विवेक कहैत अछि”, के मूल मानि अपन प्रतिवेदन लिखलौं.
उपरोक्त उदाहरण देबाक तात्पर्य ई अछि जे जखन कुनो समुदाय अथवा वर्ग अपन समस्या तक व्यक्त करबा में असमर्थ अछि त ओकरा समस्या के के बुझत? दोसर. तहिना मैथिलानी के समस्या मैथिलानी लिखथि से निक बात मुदा पुरुख सेहो लिखथि. समस्या के तह में जाथि आ ओकर समाधान तकथि आ लिखथि.
जखन महिला के बात करैत छी त अतेक जानब अनिवार्य भ जैत अछि जे महिला समाज पुरुष या पित्रसत्तात्मक व्यवस्था में ऐना मिल गेल अछि जे ओकर अपन स्वरूप जेना हेरा गेल होइक? के स्त्री पुत्र जन्म देलाक बाद अपना के भगवंत नहि बुझैत छथि? कथी लेल सासु पुतहु झगरेतछथि? कथी लेल महिला अपन पुत्री के पुत्र जकां स्वतंत्रता नहि दैत छथि? मुदा एहि में हुनक गलती नहि, पुरुष के बनाएल संरचना के गलती अछि।अपन गलती के भान पुरुष करथु। पुरुष जखन स्त्री विमर्श करथि त अपन अंतरात्मा में एक स्त्री केर भाव आनथि। किछु एहेन भाव जे स्त्रिग्न नहि कहि सकैत छथि सेहो निर्विकार आ बिना कुनो अहम के बाजथि।ई समस्या अहि हेतु उत्पन्न भेल अछि जे एक के कम आ दोसर के अधिक महत्त्व देल जैएत अछि. प्रयोजन ई होबाक चाही जे मातृभाव आ पितृभाव बराबर हो. एकर सर्वोत्तम उदाहरण अफ्रिका के घाना देशक असन्ति (Ashanti) जनजातिक परिवार आ संस्कृति केर संकल्पना में देखल जा सकैत अछि. असन्ति केर संस्कार में परिवार आ माताक गोत्रबहुत पैघ स्थान रखैत छैक. एहेन मान्यता छैक जे शिशु अपन पिता सं आत्मा, प्राण आ साँस लैत अछि आ माता सं माँस (देह) आ शोनित. बच्चा ओना त दुनु पक्ष सं जुड़ल छैक परन्तु मातृपक्ष सं ओकर लगाव शोनितक लगाव, भावनाक लगाव, कहियो समाप्त नहि होबबला लगाव छैक. पूर्वोत्तर भारत केर मेघालय राज्य में खासी जनजाति में माता के सर्वोपरि मानबक परंपरा एखनो अछि. एकर तात्पर्य ई भेल जे संस्कृति में संस्कार एहेन हो जे स्त्रीगन के सम्मान करय. कतेक लोक संस्कृति के रक्षा केर नाम पर नारी अधिकार, सम्मान, बराबरी, स्वतंत्रता आदि के विरोध करैत छथि. हुनका डर होइत छनि जे सब किछु समाप्त भ जैएत. मिथिलाक पतन भ जैत. लिंग आ वर्ग संघर्ष शुरू भ जैत. सम्मान, परम्पराक ह्रास भ जैत. एकर मतलब की जे स्त्री के घेंट दबाक मारि दी? स्त्री के विकासक सहगामिनी नहि बन दी? स्त्री के हुनक सुविधाक अनुसारक वस्त्र, गहना, पहिरक स्वतंत्रता नहि दी? हुनका आत्मसम्मान नहि दी? संस्कृति आ संस्कार बचेबाक लेल स्त्री मात्रक बध, ई कहेन बात? पुरुख बहुत दिन पहिने पेन्ट पहिर लेला, संस्कृति नहि मरल; स्त्री पेन्ट, सलवार पहिर लेती त संस्कार खत्म भ जैत! बेटी माता पिताके सम्पति के मांग करती त कोर्ट कचहरी शुरू भ जैत, आदि-आदि. ई सडल-गलल मानशिकता अछि. एकरा त्याग करक चाही. अगर भाई-भाई में मुक़दमा चलैत अछि त समाज कहाँ समाप्त भ जैत अछि? अगर बेटा आ बेटी दूनू के पता लागि जेतनि जे माता –पिता केर सम्पति सं जवावदेही धरि हुनकर सामान अधिकार छनि त नहु-नहु ई अहं समाप्त भ जैत.
मैथिलानी सेहो समग्रता में पुरुष पर ओहिना लिखथि जेना पुरुष हुनका पर लिखैत छथि। महिला आ पुरुष सं पैघ बात ई जे समाज, ओकर परिवेश, ओकर संस्कृति, ओकर संस्कार, ओकर इतिहास, ओकर लोक व्यवहार पर जिनका रूचि होनि, जिनका जिज्ञासा होनि, जिनका किछु करबाक उत्साह होनि से लिखथि।मुदा सब सं पैघ बात ई जे पुरुख मैथिलानी के मनोदशा के बुझथि, ओहि पर मनन करथि आ तटस्थ भाव सं लिखथि. विकास लेल लिखथि. समानता के भाव लेल लिखथि.
दिल्ली में एक कार्यक्रम में साहित्य अकादेमी पुरुस्कार सं सम्मानित तीन मैथिलानी: डॉ. नीरजा रेणु, डॉ. शेफालिका वर्मा आ डॉ. उषा किरण खान बजली जे अधिकांश लोकगीत केर रचना मैथिलानी केने छथि। हुनकर सबहक बात के सीधे कटबाक हिम्मत हमरा नहि अछि। ओ सब साहित्य केर हस्ताक्षर छथि। बहुत अनुभव, मनन के बाद एहि निष्कर्ष पर ऐल हेती। मुदा नारीवाद के घमर्थन जखन सामाजिक विज्ञान के शोध छात्रक रुपें करैत छी त किछु आरे बात सब बुझना जैत अछि।महिला त केवल गबैत छली। हुनका अपन बारे में सोचबक स्वतंत्रता कहाँ छलनि? आ समय सेहो नहि।ओ त पुरुष रचित व्यवस्था में मशीन जकां काज करैत छली। हमरा होइत अछि अधिकांश गीत पुरुष लिखलनि। मुदा जखन ओ गीत केर रचना कर’ लगला त अपन मोन, ह्रदय सब में एक स्त्रिग्न के भाव आनि लेलनि। अतेक निक जे स्त्रिग्न सब ओहि भाव में मस्त भ गेली। ओकरा अपन मानि लेलनि। पुरुष रचनाकार ओहि गीतक देवकी आ स्त्रिग्न सब ओकर यशोदा भ गेली। एक एहेन हरिजन स्त्री जकर पति अर्थोपार्जन लेल दूर देस गेल छैक, सासु, ससुर बुढ छैक आ सासु ससुर केर आंखि में रतौंधी छैक, कान बहिर छैक। छैक त हरिजन, अछूत मुदा सुन्दरता के खान, कामायनी. वैह पुरुष जे छुआछूत केर बात, वर्ग विभेद केर बात, जाति-पातिक बात करैत छथि, सैह सब ओहि महिला के गसल देह, यौवन के सुख प्राप्त कर’ चाहैत छथि। आब ओ अछूत महिला अपन यौवन आ गसल देह के कारण पाण्डित्य कला में निपुण पुरुष के सजाति बुझना जैत छनि। ओकरा अपन बाहुपाश में लेबाक लेल उद्यत छथि। राति में चोरी सं ओकर घर में घुसि सब अक्षम्य काज आ कर्म कर’ लेल परेशान छथि. बेचारी महिला लाचार अछि। ओकर वेदना के सुनतै? मुदा एक पुरुष जे महाकवि विद्यापति छथि से सुनैत छथि आ द्रवित होइत अपन कलम उठा ओहि वेदना के लिखैत छथि:
हम जुवती पति गेला बिदेस। लग नहि बसए पड़ोसिया देस।।
सासु दोसर किछुओ नहि जान। आंखि रतौन्धी सुनए नहि कान।।
जागह पथिक जाह जनु भोर। राति अन्हार गाम बड़ चोर।।
भरमहु भोर ने देअ कोतबार। कहुक कियोक न करए विचार।।
अधियन कर अपराधहु साति। पुरख महत सब हमर सजाति।।
भनहि विद्यापति एहि रस गाब। उकुतिहि अबला भाव जनाब।।
सब सं पैघ बात ई जे विद्यापति पीड़िता के दुःख सं केवल द्रवित नहि होइत छथि, ओकर मनःस्थिति के वर्णन आखर-आखर करैत छथि। नारी भाव के ऐना अपना भीतर आत्मसात क लैत छथि जे गीतक अंत में ई तक घोषणा क दैत छथि जे हिनकर गीतक रस मात्र अबला के भाव के जगब’ बला रस छनि। ओ अपन गीत अही रस में लिखैत छथि। विद्यापति के अनेको गीत नारी भाव, श्रृंगार, मनोदशा के अक्षरसः वर्णन अछि। अतेक निक जे मैथिलानी ओकरा अपन बना लैत छथि। गीत के कंठाग्र क लैत छथि। गीतक पोर-पोर सं कनेक्ट भ जैत छथि।
किछु पुरुष गीत लिखनहार त एहेन छथि जे नारी भावना के तह तक घुसबा लेल समस्त नारी मनोदशा के संग-संग अपन नाम, व्यवहार तक नारी जकां क लैत छथि। एक बहुत प्रचलित भक्ति गीत जे मिथिला आ मैथिलानी द्वारा मिथिलाक गुणगान करैत अछि ओकर दू पांति देखी:
साग पात खोंटि खोंटि दिवस गमेबै हे हम मिथिले में रहबै।
अपना किशोरीजी के टहल बजेबै हे हम मिथिले में रहबै।।
एहि गीतक रचैता छथि कपिलदेव ठाकुर। ई राम आ सीता सं आ कृष्ण आ राधा सं सम्बंधित मधुर भक्ति गीत रचैत छथि। विष्णु भक्ति में ततेक तल्लीन भ जैत छथि जे अपन अस्तित्व महिलाक अस्तित्व में परिणत क लैत छथि। अपन नाम तक बदलि लैत छथि। कपिलदेव ठाकुर सं स्नेहलता भ जैत छथि। नारी मनोदशा के लिखैत छथि आ ओही मनोदशा में जीबैत छथि। हिनकर रचित अनेक गीत नारी भाव, भक्ति, श्रृंगार आ मनोदशा के व्यक्त करैत अछि।
“पत्रहीन नग्नगाछ” में जे नारी मनोदशा केर वर्णन यात्रीजी केलनि अछि तकर कुनो जवाब अछि? “पारो”, “घसल अठन्नी” आदि केर नायिका के बेदना मैथिलानी वर्दाश्त क सकैत छली मुदा ओकरा हु-बहु उकेरब बला काज त दोसर (other) अर्थात यात्री आ मधुप सनहक पुरुष नारी ह्रदय के अपना में आनिक क’ सकैत छल! गरीबीक बिपत्तिसँ मारलि आ असहाय विधवा कंद मूल आ कुअन्न बांसक ओधिसँ अपना टूटल मडैयामे नीक जेकाँ नीपल-पोतल चुलहामे पका रहल अछि। बांसक ओधि धुआंक घर होइत अछि। फटने ने फटैत अछि। जरने नञ जरैत अछि। तकर जे भाव यात्री व्यक्त केलनि से कुनो समान्य बात अछि?
तीनू महिला विदुषी अर्थात डॉ. नीरजा रेणु, डॉ. उषाकिरण खान आ डॉ. शेफालिका वर्मा एक बात अंत में बड्ड निक बजली: “साहित्यकार के सत्य लिखक चाही, मानव पर लिखक चाही, स्त्री-पुरुष केर बन्धन सं उठि क लिखक चाही। स्त्रिग्न केवल मैथिलानी पर नहि लिखथि पुरुषो पर लिखथि. तहिना पुरुष सेहो स्त्रीगण पर सेहो लिखथु। कुनो वाद अथवा लिंग केर बन्धन उचित नहि।” हमरा ई निचोड़ कथन बड्ड सोहनगर लागल।
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मुन्ना जी