विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

आगाँ के देखलक अछि?

रवीन्द्र नारायण मिश्र · 2018-05-15 · अंक 250

आगƒ के देखलक अिछ ?

जखन मनु`खक जMम होइत अिछ तखन ओकरा संग ‘सƒस’ रहैत अिछ परMतु कोनो ‘नाम’ निह, मुदा
जखन ओकर मृ_यु होइ छै तखन ओकरा संग ‘नाम’ रहैत अिछ परMतु ‘सƒस’ निह। ‘सƒस’ आ ‘नाम’क बीचक
एिह याVाक नाम ‘जीवन’ िथक। आब सबाल अिछ जे एिह िजनगीक– अहƒ केना जीबै छी, एकर की उपयोग
करै छी...।
कतेको गोटे aविनिम:त अभावमे जीबैत रहै छिथ आ ताजMम ओकर gािl त हेतु सफल, असफल चे»ा
करैत रहै छिथ। कतेको गोटे ककरो चेला भऽ जाइ छिथ, ककरो समथ:क िकंवा अनुरागी भऽ जाइ
छिथ, आ आँिख मुिनकऽ पाछƒ-पाछƒ चलैत रहै छिथ। जाबे होश होइ छै ताबे बहुत देर भए गेल रहैत अिछ

समaत जीव-जMतुक– gकृितक वरदान aव’प जीवन भेटैत अिछ। छोट वा पैघ िजनगी जकर जे छै से
जीवैत अिछ आ चिल जाइत अिछ। एकटा मनु`खे अिछ जे नाना gकारक फसादमे पिड़ जीवनक आनMदसँ
कएक बेर विÏचत रिह जाइत अिछ।
जीवनक gादुभ^व एवम् ओकर िवकास याVा एकटा आÆय:जनक gिšया अिछ। छोटसँ छोट म¢छर सँ
लऽ कऽ हाथी-मगरम¢ छ सन-सन िवशालकाय जीव सब एिह िनम^ण एवम् िवकासक gिšयामे सहयोगी अिछ।
नािM हटा चुÐीक– देिखयौ- अनवरत चलैत रहैत अिछ। ओकर रaतामे ¯यवधान करबै तऽ, रaता बदिल लेत
मुदा ठाढ़ निह होएत। पंि`त वÂ हजारक हजार चुÐी चिलते जाइत अिछ। कतए जा रहल अिछ? gाय:

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जीवनक खोजमे िनरMतर gय¾शील रहैत अिछ। gकृितमे aवत: aवभािवक ’पसँ जीव माVक जीवन रा
एवम् आव´यकता पूित:क वै¶ािनक ¯यवaथा अिछ। जािह जीवक– जेहेन आव´यकता अिछ, तािह gकारक
शरीरक रचना भेल अिछ। ककरो पैघ दƒत अिछ तऽ ककरो पैघ सूढ़। ककरो शरीरपर कƒट सन-सन रॱआँ
लागल रहैत अिछ। gकृित माता अपन समaत सMतानक जीवन-राक गजब ¯यवaथा केने छिथ।
एिह संसारमे िनरMतर िकछु-िकछु घिटत होइत रहैत अिछ। सामाMयत: हमरा लोकिन िनरपे रहैत छी।
जे होइ छै से होइ छइ। बात तखन बदिल जाइत अिछ, जखन ओिह घटनाक सoबMध अपनासँ होइत अिछ।
नाना gकारक जीव-जMतु जM मैत अिछ, मरैत अिछ, मुदा हमरा लेल धन- सन। मुदा जॱ पिरवारमे खास
कऽ अपन लोकक– सMतानक जMम होइछ तऽ लोक उ_सािहत भऽ जाइत अिछ। आनMद मनबए लगैत अिछ।
नाच-गान करैत अिछ। वैह हाल मृ_युक संगे होइत अिछ। िदन-राित लोक मरैत अिछ। कोनो चच^ निह
होइत अिछ। जे मरलै से मरलै, हम थोड़े मरब। सबक– मिरतो देिख लोकक– अपन मृ_युक अM दाज निह भऽ
पबैत छइ। तािह मानिसकताक कारण जँ िनकटक ¯यि`तक मृ_यु भऽ जाइत अिछ तऽ लोक हतgभ भऽ
जाइत अिछ। लोक भगवानक– दोष देबए लगैत अिछ।
एकबेर हम डॉ. सुभs झाजीक संगे इलाहावाद पएरे कतौ जाइत रही। रaतामे पुछिलयिन-
“अहƒक िहसाबे भगवान छिथ िक निह?”
ओ कहला-
“हमरा िहसाबे तऽ भगवान निह छिथ आ जॱ छिथ तऽ बड़ बइमान छिथ।”
पुछिलयिन-
“से िकएक?”
ओ आगू कहला-
“पेटमे जे ब¢चा मिर जाइत अिछ, तकर कोन दोष? आ जँ दोष रिहते छै तऽ ओकर जMम होबए
िदतिथन आ तखन ओ अपन कम:क फल भोगैत। पेटेमे मिर जेबाक की औिच_य?”
मुदा मृ_यु तऽ होइते रहै छइ। ओिहपर ककरो बस निह रहल ।
लोक कतए-सँ आएल, कतए जाएत? ई शा›त gÄ अिछ। लोक िन_य-gित उठैत अिछ, एिह उमीदमे जे
ओ अिहना रहत, मुदा स_य तऽ यएह अिछ जे सƒझ धिर जीवनक एक िदन कम भऽ गेल रहैत अिछ।

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मृ_यु एक दुखद gसंग अिछ। िनकट सoबMधीसँ समािजक, पिरबािरक सoपक:क एकाएक पूण: िवराम
लािग जाइत अिछ। कएक बेर मृ_युक भयसँ िचMता,अवषाद वा िनराशाक भाव पसिर जाइत अिछ। िकछु
लोकक– मृ_युक बाद पूव: कम:क अनुसार aवग: वा नक: जेबाक िचMता सेहो uिसत केने रहैत अिछ।
मृ_युक कारण अनेको भऽ सकैत अिछ। दुघ:टना, िवमारी, ह_ या, आ_मह_ या आ से सब निह तऽ
वृÂावaथा। उÑक संग-संग जीवन रक त_व सब घिट जाइत अिछ। िवमारीसँ gितरोधक मता ीण भऽ
जाइत अिछ। शरीरक अंग g_ यंग šमश: काज केनाइ छोिड़ दैत अिछ, जकर पिरणित मृ_युमे भऽ जाइत
अिछ।
कहबी छै जे ‘िटटही टेकल पव:त।’ िचड़ै अपन टƒग उMटा आकाश िदिश कऽ कऽ सुतैत अिछ, जे जँ
आकाश खसत तऽ ओ रोिक लेत। यएह हाल मनु`खक अिछ। सॱसे िजनगी अपिसयƒत रहैत अिछ जे
ओकरा िबना दुिनयƒक काज निह चलत ओ रहत तखने कोनो काज होएत अMयथा दुिनयƒ ठामिह धँिस
जाएत। मुदा जीवनक स_य िकछु आर अिछ।
ककरो लेल ई दुिनयƒ ठाढ़ निह रहैत अिछ। जखन जवाहर लाल नेह’ gधान मंVी छलाह तऽ लोकमे
चच^ होइक जे नेह’जीक बाद देश केना चलत? मुदा ई िचMता ¯यथ: सािबत भेल। देश चिल रहल अिछ।
लोक अबैत अिछ, जाइत अिछ, परMतु संसारक चš िनरMतर गितमान रहैत अिछ। समय ककरो gतीा
निह करैत अिछ। भोर, सƒझ, इजोिरया, अM हिरया अनवरत होइत रहैत अिछ। जीवन-याVाक अMत तऽ
भेनाइए अिछ। कतेक बेर लोक aवयं थािक जाइ छिथ, ओ िवPामक िनरMतरता हेतु aवत: मृ_युक– आिलंगन
कए लैत छिथ। उदाहरण aव’प आ. िवनोव भावे अनशन कए gाणक _ याग कए देलिन
aवामी िववेकानMद, आिद शंकराचाय: सन-सन महान अÃयाि_ मक ¯यि`त सब कमे बयसमे चिल जाइत
रहलाह। महा_मा गƒधी सन _ यागी ओ िनªावान ¯यि`तक ह_ या कऽ देल गेल। तीन-तीन गोली लगलाक
बाबजूद ओ ‘राम-राम’ कहैत gाणक _ याग केलिन। अaतु मृ_यु कखन, ककरा केना होएत एवम् कोन
पिरिaथितमे होएत तकर कोनो ठेकान निह अिछ मुदा ई बात प³ा अिछ जे मृ_यु होएत, जखन हो, जेना
हो, जतए हो। गीतामे तऽ कहल गेल अिछ जे मृ_युक समय ओ aथान पूव: िनध^िरत अिछ।
िव¶ान एवम् तकनीकीक िवकाससँ जीवन एवम् मृ_यु सेहो gभािवत भेल अिछ। पिहने मामूली िवमारीसँ
लोक मिर जाइत छल। सुलबाई, मलेिरयाक कोनो इलाज निह छल। हैजा, तपेिदक सन संšामक िवमारीसँ
गामक-गाम सुडाह भऽ जाइत छल। šमश: तरह-तरह केर दबाइक अिवºकार भेल। लोकक आयुमे इजाफा
भेल। लेिकन नव-नव आर कतेको घातक िवमारी सब बाहर भऽ गेल, जकर तोड़ िव¶ानक पास निह
अिछ।
अaपतालक सुिवधा एवम् िचिक_साक बेहतर उपलि धसँ लोक कएबेर aवaथ भऽ दीघ: जीवनक– gाlत
केलक मुदा कतेको मामलामे िवमार ¯यि`त अaपतालेमे िघिसयौर कटैत रहै छिथ। अ_यMत बेमार ¯यि`तक–

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इ¢छा मृ_युक मŒगक चच^ होइत रहैत अिछ। कहक मतलब जे िव¶ानक पराकाªा मृ_युक पुrषाथ:क– कम
निह कऽ सकल।
समयक चपेट तेहन िनरMतर ओ gवल अिछ जे एकर पिरणामक कŽ पनो निह कएल जा सकैत अिछ।
जिहना परमाणु बमसँ िवÃ वंस होइत, आ गामक-गाम लुlत भऽ जाइत, तिहना समयक अचूक आघात/gितघात
कोनो बमसँ कम निह अिछ। सॱसे गामसँ घरे-धरे लोक िबला गेल। गिन कऽ देखल जाए तऽ साइदे `यो
पुरान लोक भेटता, कतए गेलाह सब गोटे? मुदा परमाणु बमक िवÃवंस माV अिन»कारी होइत अिछ, बाल-
ब¢चा, वृÂमे कोनो िवभेद निह कऽ पबैत अिछ। िवनाशक बाद दूर दूर धिर Pृजनक सoभावना निह रिह जाइत
अिछ।
gकृित gदX िवनाशक संगे Pृजन भाए-बिहन जकƒ संगे चलैत अिछ। जँ एकटा पात झड़ैत अिछ तऽ
दसटा हिरयर कंचन पŽलवसँ गाछ समृ भऽ जाइत अिछ। लोक बीतल बातक– िबसिर आगƒक तैयारीमे
लािग जाइत अिछ।
अ“ैतवादीक अनुसार आस् ित_व केवल अनMतक अिछ, शेष सब माया िथक। कोनो जड़ वaतुक
यथाथ: वÒÓ छिथ, एवम् gकारेण जीवन रहए निह रहए,ओकर आिa त_वपर अMतर निह होइत अिछ।
समं प´यन् सव:V समविaथतमी›रम्।
न िहनa _ या_मना_ यानं ततो याित परŒगितम्।।

(गीता १३/१८)

जे सव:V ई›रक– सब भावसँ सव:V अविaथत देिख ओ आ_मा “ारा आ_माक िहंसा निह करै छिथ, से
मु`त भऽ जाइ छिथ।
कहक माने जे मोनेक ऊपर सब बात िनभ:र करैत अिछ। घटनासँ बेसी ओिहपर हमर दृि»कोणसँ
ओकर मह_व कम बेसी भऽ जाइत अिछ। जीवनमे जिहना तरह-तरहक घटना घिटत होइत रहैत अिछ, तिहना
जMम ओ मृ_यु सेहो होइते रहैत अिछ। समaया घटनासँ निह अिपतु घटना िवशेषक लगावसँ होइत अिछ।
“इहैब तैिज:त सगÊ येषŒ साo ये िaथतं मन:
िनदÊष िह समं ²Ó तa मात् ²Óिण ते िaथत:”
गीता ५/१९

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िजनकर मन साo यभावमे अविaथत अिछ, ओ एिह ठाम जीवन मृ_युक संसार चšक– जीत लेलाह
अिछ, चूँिक ²Ó िनदÊष ओ सव:V सम छिथ, अaतु ओ ²Óमे अविaथत छिथ। कहक माने जे मोनमे नीक
भाव होइ तऽ मनु`खे जीवन-मरणक gभावसँ हिट ²Óलीन भऽ जाइत अिछ। जीवनमे gितपल पिरवत:न होइत
रहैत अिछ। लोकक सोच समयक संगे बदलैत रहैत अिछ। जािह बातक– लोक ब¢चाक समयमे नीक कहैत
अिछ, मुदा पैघ भऽ ओही बातपर ओकर िवचार बदिल जाइत अिछ।
वृÂक– युवावaथाक गlप-सlप सोिच हँसी लािग जाइत छइ। कहक माने जे मनु`खक िनरMतर बदिलते
रहैत अिछ। जँ कोनो उपायसँ मृ_युपर बस चिलतै तऽ कोनो बड़का आदमी निह मरैत। ध¸ा सेठ सब अमर
बुटी खा-खा कऽ अमर भऽ जाइत आ गरीब, गुरबा सब निह जीबैत। मुदा मृ_यु एकटा एहन gÄ िचM ह अिछ
जकर जवाब ककरो लग निह अिछ। राजा, रंक ,फकीर सब हतgभ भऽ एकरा aवीकार करैत अिछ, कोनो
िवकŽ पो निह छइ।
हम सब ब¢चामे सुिन -पुरान घर खसे, नव घर उठे। ई फकरा जीवन-मरणक चšपर पूण:त: लागू
होइत अिछ। जिहना बुढ़-पुरान लोक सब चिल जाइ छिथ,ओिहना िकंवा ओहूसँ बेसी तेजीसँ नव जीवनक
सृजन होइत अिछ। जिहना पतझड़क बाद नव पŽलवसँ गाछ वृ हिरयर भऽ जाइत अिछ, ओिहना गाम-घर
नवजात िशशुक जMमसँ हरल-भरल रहैत अिछ।
हािन-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश िविध हाथ। जे हेबाक छैक से होइत अिछ। एिहपर माथा-प¢ ची
¯यथ:। `यो जीिवते सुसoप¸ पिरवारक अंग भऽ जाइत अिछ, तऽ `यो रaता कातमे जM मेसँ समय िबतबै लेल
मजबूर भऽ जाइत अिछ। रामकृºण परमहंश सन महा_मा क°सरसँ पीिड़त भऽ असाÃय क» भोगलिथ।
महा_मा गƒधी सन शािM तक समथ:क िहंसाक िशकार भऽ गेलाह आ ह_ याराक गोलीसँ हुनक मृ_यु भेल।
ई सब देिख-सुिन मानए पड़त जे ए³े जMमक निह अिपतु अनेकानेक जMमक कम:फल मनु`खे पछोर
केने रहैत अिछ। कतेक मनु`ख साधारण gयास किरतिह लÔ य gाlत कए लइ छिथ तऽ `यो जीवन भिर
क»मे रिह कऽ दुिनयासँ चिल जाइ छिथ। ई सब केना आ िकएक होइत अिछ, तकर सटीक उXर देब
किठन अिछ। मुदा भाÉ यक कोनो जवाब निह ।
भाÉ यं फलित सव:V, न िवFा न च पौrष:।
पिछला-अिगला जMम `यो देखलक निह, माV अनुमाने लगाओल जा सकैत अिछ मुदा वत:मान जीवनमे
जे िकछु देिख-सुिन रहल छी से आÆय:सँ भरल अिछ।
जMमसँ gारoभ आ मृ_युसँ अMत होइत एिह जीवन-याVाक पुनरावृित होएत, निह होएत...। तािह पर तरह-
तरहक मत अिछ। मुदा ई तय अिछ जे एिह जीवनमे बहुत िकछु देखबा-सुनबामे अबैत अिछ, जािहसँ वत:मान
जीवनक– सुखी ओ शाMत कएल जा सकैत अिछ। अशाMतa य कुतो सुखम् !
अaतु हमर पूव:ज लोकिन शािM तक हेतु gाथ:ना करैत रहलाह।

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जे िकछु एिह जीवनमे gाlत अिछ, से अपना आपमे अÕुत अिछ, अि“तीय अिछ। आगƒ के देखलक
अिछ?

रबीMs नारायण िमP

Suggested citation: रवीन्द्र नारायण मिश्र. “आगाँ के देखलक अछि?.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 250, 2018-05-15. https://www.videha.co.in/research/2018/250/आगाँ-के-देखलक-अछि.htm

मूल विदेह अंक / Original issue