विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

विधवा विवाह

रवीन्द्र नारायण मिश्र · 2018-05-15 · अंक 250

िबधवा िववाह
समाजक माMयता, िविध-िवधान एवम् लोक ¯यवहार समय साेप अिछ। जे बात-िवचार पचास सय साल
पिहने अिनवाय: चलैत छल से आइ-काि¼ जँ लोक करय तऽ हaयाaपद भय जायत। पिहने बाल िववाह आम
बात छल। बेटीक– जनिमते जँ माय-बापक– कथुक िचMता होइक तऽ ओकर िववाहक। कहुना कऽ िववाह भऽ
जाइक आ माय-बाप गंगा नहा लेिथ। सोचल जा सकैत अिछ जे समाजमे बेटीक िaथित कतेक दायनीय
छल..!
ई बात सभ जनैत छैथ जे aVीक िबना पुrष कतयसँ आयत। जे आइ ककरो बेटी छैक सैह काि¼
ककरो aVी, केकरो माय बनतै। तथिप लोकमे अखनहुँ बेटाक gित मोह कम निह भय रहल अिछ। पिहने

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ejournal ‘'िवदेह ' २५० म अंक १५ मई २०१८ (वषᭅ ११ मास १२५ अंक २५० )
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कतेको गोटा बेटाक च³रमे आठ-नौ सMतान कय लैत छलाह। िलंग आधािरत एिह भेद-भावक– कम करबाक
िकंवा जिड़सँ दुraत करबाक िनरMतर gयास होइत रहल।
एक समय छल जखन पितक– मरलाक बाद ओकर प¾ीक– ओकरे संगे जरा देल जाइत छल िकंवा वो
aवयं जिर जाइत छल। समाज ओकरा सतीक ’पमे मिहमा मिhडत करैत छल। ओकर िचतापर सती मिMदर
बना देल जाइ छल। सोचल जा सकैत अिछ जे वो कतेक šूड़ gथा छल। एकटा aवaथ जीबMत ¯यि`तक–
जरा कऽ एिह लेल मािर देल जाइत छल वा वो aवयं मिर जाइत छल जे ओकर पितक देहावसान भय
गेल, जािह लेल वो कोनो gकारसँ दोषी निह छल। मरनाइ,िजलाइ ककरो हाथमे निह छैक। ई एकटा संयोग
होइत अिछ मुदा तकर एतेक दुखद् पिरणाम होइत छल से सोिचयो कऽ रॲआ ठाढ़ भय जाइत अिछ।
एकटा िवदेशी पय:टक जखन अपन देश घुमैत रहिथ तऽ संयोगसँ ´मसान घाटपर एकटा मुद^क– लऽ
जाइत देखलिथ। मुद^ संगे ओकर प¾ी िचकरैत-भोकरैत ´मसान धिर संगे गेल। लोक सभ तमासा देखैत
रहल आर वो पितक लाशक संगे जारिनसँ लािद देल गेल। जोर-जोरसँ ढोल बजा-बजा कीत:न करय लागल
जािहमे ओिह जीिवत मिहलाक क’ण šंदन दिब कऽ गुम रिह गेलैक आ थोड़बेकालमे ओहो पितक लाशक
संगे छाउर भय गेल। (ई स°कड़ो साल पूव:क िथक एवम् एकर वण:न Beyond the seas–माइकल एच.
फीसर “ारा सoपािदत–पुaतकमे अिछ) एिह तरहक घटना ओिह समयमे आम बात छल। aVीगण सभ अपन
िनयित बुिझ एकरा aवीकार करैत छलीह। gिसÂ समाज सुधारक राजाराम मोहन रायक एिहपर Ãयान गेल
आ वो ि²िटश सरकारसँ गोहार कय एिह सामािजक कुrितक– बMद करौलाह।
समाजमे िवधवाक िaथित बेटीक िaथितसँ जुड़ल अिछ। जँ बेटी पढ़तै, िलखतै, बेटा जकƒ ओकरो
अवसर भेटतै तऽ ओहो ककरोसँ पाछा निह रहत। आइ-काि¼ एिहमे िकछु पिरवत:न भेल अिछ। लोक बेटीक–
aकूल-कालेज पठा रहल अिछ। डा`टर, इिMजनीयर, अफसर सभ िकछु बेटीओ बिन रहल अिछ। कानूनमे
पिरबत:न भेल अिछ। पैिVक सoपिXमे बेटा ओ बेटीक हक बरोबिर भय गेल अिछ। घरेलू िहंसा कानूनक
तहक कोनो मिहलाक– शारीिरक, मानिसक यातना निह देल जाय सकैत अिछ। दहेज लेब देब गैर कानूनी भय
गेल अिछ। gÄ ई उठैत अिछ जे एतेक रास कानूनसँ लैस भारतीय मिहला की सभ तरह– अिधकार
सoप¸, सुरित ओ gितिªापूण: जीवन-यापन करबाक िaथितमे आिब गेल छैथ? ई सोिचये कऽ कलम ठाढ़ भय
जाइत अिछ।
समाजमे बेटीक िaथितमे सुधारसँ मूलत: शहरी ेVटाक सीिमत अिछ। गाम-घरक हालक मोटा-मोटी
ओहने अिछ। अपना ओिहठाम िशाक aतर तेहन गड़बड़ायल अिछ जे जँ `यो aकूल-कालेज जाइतो
छिथ, िकंवा िडuीओ हािसल कऽ लैत छिथ तैयो हुनका कोनो रोजगार भेिट सकत निह से संदेहाaपद। जँ
आिथ:क िनभ:रता बनल रहत, सoपिXक अिधकार माV कानूनक िकताबे तक सीिमत रिह गेल तऽ बेटी कोना
बढ़त?
जािह समाजमे बेटीक– िशाक समान अवसर भेटल, पैिVक सoपिXमे अिधकार भेटल ओिहठामक मिहला
िनिÆत ’पसँ सभ तरह· आगा भऽ गेलीह। एिहमे केरल राÇयक चच^ कयल जा सकैत अिछ। पुरना समयमे

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(आ िकछु हद तक अखनहुँ) िवधवा होइते जेना ओकरापर िवपिXक पहाड़ टुिट जाइत छल। त_कालीन
समाजक समaत माMयता, िबध, ¯यवहार ओकरा अपमािनते निह करैत छल, अिपतु अशुभ बुझैत छल। केस
कटा िलय, नीक नीकुत खाउ निह, साधारण कपड़ा पिह’, उपास-पर-उपास करैत रहू। तेतबे निह, कोनो
शुभकाजमे आगा निह रहू। आिखर ओकर की दोष रहैक जकर दhड ओकरा समाज दैत छलैक?
लगैत अिछ, समाजक पुरोधा सभ असुरा भावसँ ततेक uaत रहिथ जे हुनका आगा-पाछा िकछु आओर
सोचेबे निह करिMह। कतेको ठाम तऽ नविलग िबधवा भय जाइत छिल आ आजीवन धोर क» एवम् िवपिXमे
जीवन-यापन करैत छलीह। गरीबी, सामािजक gताड़नासँ तंग भय कतेको िबधवा गाम-घर छोिड़ वृMदावन िकंवा
आन-आन तीथ: शरण धय लैत छलीह। अखनो हजारोक संÈयामे वृMदावनमे िबधवा सभ पड़ल छिथ। भारतक
उ¢चतम Mयायालय हुनका सभक िaथितपर िवचार केने छल। सुलभ इMटरनेशनल “ारा हुनका सभ लेल िकछु
कŽयाणकारी योजना सभ सुनबामे आयल छल। मुदा ई सभ ऊँटक मुँहमे जीरक फोरन िथक। ज’री तऽ ई
अिछ जे समaयाक जिड़मे जाय ओकरा समूल न» कयल जाय। आिखर पुrषिबधुर भेलापर िववाह करैत
छिथ की निह? तिहना मिहलोक– ई अिधकार समाज aवीकृत हेबाक चाही।
यFिप यV, तV सव:V मिहला सश`तीकरणक चच: होइत रहैत अिछ, तथािप ¯यवहािरकतामे संकट
अिछए। जँ दुभ^Éयवस `यो िबधवा भय जाइत छिथ तऽ अखनो हुनका नाना gकारक यातना सामािजक
gताड़नासँ गुजरय पड़ैछ। अaतु ई िवचारणीय िथक जे िबधवा लोकिनक िaथितमे गुणा_मक सुधार हेतु
हुनकर पुनिव:वाहक ¯यवaथा हो। एिहमे सभसँ बाधक िववाहसँ जुड़ल खच^ एवम् जातीय aवािभमान अिछ।
मुदा ई िवचारणीय gÄ िथक जे समाजक कोनो ¯यवaथा जँ एक िवदो्रष जीवनक– क»मय केने रहैत अिछ
तऽ ओकरामे संशोधन िकएक निह हेबाक चाही?
ओना, कतेको जाितमे िबधवा िववाह पिहनिहसँ चलनमे अिछ। कतेको मिहला एिहसँ एकटा नूतन जीवन
जीबाक अवसर gाlत करैत छिथ। मुदा िकछु जाित िवशेषमे अखनो एकरा पािरवािरक gितªासँ जोिड़ कय
देखल जाइत अिछ। आिखर, ओ gितªाक जे गित होइत अिछ, तािहपर चच^क आव´यकता निह अिछ। एहन
िबधवा जकरा सMतानो निह छैक, एकरा ¯यथ: िनªाक नामपर लगातार क» सहैत रहय, जीवनक समaत
सुख, सoपदासँ वंिचत रहय से कहƒ तक जायज अिछ?
कतेको समाजमे ई ¯यवaथा अिछ जे िबधवाक– ओही पिरवारक अिववािहत भाए िकंवा सम¯यaक
सoबMधीसँ िववाह कय देल जाइत अिछ। िनिÆत ’पसँ वो सभ बेसी ¯यवहािरक एवम् वुिधआर लोक छिथ।
मुदा जँ सेहो सoभव निह होइक तखन तऽ पिरवारक वयaक सदaयक– स¯यं आगा आिब ओिह मिहलाक
जीवनमे पुन: aथािपत करबामे सहयोग करिथ आ सुयोÉय, सही ¯यि`तसँ िववाह करबामे सहयोग करिथ।
जँ िबधवाक– सMतान छैक तखन पुनिव:वाहसँ िद³ित भय सकैत छैक मुदा एहनो पिरिaथितमे ओिह ब¢चा
सभक संगे िबधवाक– aवीकार करब सवÊXम समाधान भय सकैत अिछ। हम एकबेर यूरोप गेल रही तऽ हमर
सभक Ëाइभर अपन पिरवारक चच^ करैत कहय लगलाह जे हुनकर aVीक ई दोसर िववाह छिMह। पिहल
िववाहसँ दूटा सMतान छिMह। हुनकासँ िववादक बाद एकटा सMतान छिMह। एवम् gकारेण वो तीनटा सMतानक

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िपता छिथ आ सभक भरण-पोषण सहष: एवम् समाMय ’पसँ करैत छिथ। िवदेशमे ई आम बात अिछ।
ओिहठाम िववाह िव¢छेद जिहना होइत अिछ तिहना पुनिव:वाह सेहो भय जाइत अिछ। फेर अिधकŒश मिहला
पुrष ओिह िaथित हेतु तैयारो एिह मानेमे रहैत छिथ जे आिथ:क िनभ:रता सामाMयत: निह रहैत अिछ। ईहो
बुझय जोगर गlप अिछ जे ओकर सभक सामाजक मूŽय अिछ जे ओकर सभक समाजक एवम् पािरवािरक
संरचना अलग अिछ।
अपन भारतीय मूŽयक रा करैत एवम् पिरवारक संरचनाक– कोनो तरह· िबना दूबर केने िवशेष
पिरिaथितमे सामािजक सामंजaयक ¯यबaथा ज’री अिछ जािहसँ संयोगवश जँ `यो िबधवा भय जाइत अिछ
तऽ हुनका तरह तरहक क»सँ बचाऔल जा सकय आ हुनक भावी जीवनक– सुखद कयल जा सकय।
ओना अपने देशक कतेको राÇयमे िबधवा िववाह आम बात भय गेल अिछ। अपनो समाजमे िकछु जाित
िवशेषमे एकरा लोक अखनो ढो रहल अिछ जखन िक कतेको जाितमे पिहनहुँसँ ई ¯यबaथा रहल अिछ।
अaतु एिह कुgथाक कोनो मजगूत धािम:क प निह लगैत अिछ। ई एकटा जाित िवशेषक िकंवा वग: िवशेषक
अहंसँ पोिषत सामािजक अिभशाप िथक जकर सुधारपर सभक Ãयान जा रहल अिछ, मुदा ¯यबहारमे अखनो
aवीकाय: निह अिछ। एहन निह अिछ जे िबधवा िववाह होइते निह अिछ, गाहे-वगाहे उ¢च वगµय मैिथलोमे ई
भय जाइत अिछ मुदा अखनो ई एकटा aवभािवक, सव:माMय चलनक ’प निह लेने अिछ, जािह कारण· कतेको
कम ¯यसक कMया जीवनक समaत सुख, सुिबधासँ वंिचत रिह दुखमय जीवन बीतेबाक हेतु िववस छिथ।
िकछु एहन घटना सभ देखयमे आयल जतय पिरिaथितवश पितक देहाMत भय गेलाक बाद हुनके
पिरवारक लोक िववाहक ¯यबaथा केलाह आ आइ वो एकटा सुखी पिरवािरक जीवन जीिब रहल छिथ। पूव:
पितसँ जे सMतान छलैक ओकरो नीकसँ पालन-पोषण भय रहल अिछ। नव िववाहमे सेहो सMतान भेलैक।
हमर कहबाक ता_पय: अिछ जे सभ िकछुक– हठाते धम:-कम:सँ जोिड़ कय मनु`खक जीबन नक: कऽ देब
कतहुँसँ उिचत निह अिछ।
गाम-गाममे एहन दृ´य देखयमे अबैत रहल अिछ जे अपने लोक िबधवाक शोषण करैत छिथ।
कतेकठाम तऽ ओकर ह_या तक भऽ गेल। ओकर सoपिX अपने लोक लूिट लेलक वा ठिग लेलक आ
जखन ओकरा gयोजन भेलैक तऽ सभ कात भऽ गेल। तथाकिथत मय^दाक उŽलंघन जखन आम बात भऽ
गेल हो, तािह मय^दाक– ¯यथ: होइत रहब सव:था अनुिचत।
पािरवािरक जीवन हेतु, भारतीय मूŽयक रा हेतु, वैवािहक जीवनक मह_वक– कमतर निह आँकल जाय
सकैत अिछ। परMतु ओकर आधार मजगूत बनल रहैक तािह हेतु सोचमे पिरवत:न ज’री अिछ। पूरा दुिनयƒ
बदिल रहल अिछ। इMटरनेट, मोबाइल, टेलीवीजन, फूसबुक, Ìा­सअप सॱसे दुिनयƒक– एक आँगन (Global
Village) मे पिरवित:त कय देलक अिछ। एिह पिरवत:नसँ `यो बƒचल निह रिह सकैत अिछ। गाम-गाम वैह
टेलीवीजन, वैह गीत नाद, वैह सीनेमा चलैत अिछ। aवाभािवक अिछ जे गामोक िधया-पुतामे आधुिनकताक
मानिसकता उ_प¸ होइक। एकरा एकदमसँ छोड़लो निह जा सकैत अिछ। अaतु आधुिनकताक िबहािड़मे

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सभटा उिड़या जाय ओिहसँ पूवÎ हमरा लोकिन aवत: aवभािवक ’पसँ पिरिaथितजMय कारणसँ िबधवा भेल
मिहलाक– पुनव^स हेतु ओकर सoमानपूण: जीवन-यापन हेतु सोचबाक चाही।
समाज जे गितशील होइत अिछ, जे बदलैत पिरवेशसँ सामंजaय aथािपत करबाक हेतु gय¾शील रहैत
अिछ, सैह िटकैत अिछ। ओकरे िवकास होइत अिछ। जँ से निह भेल तऽ अपने बनाओल िनयम, कानून वो
मय^दाक बोझसँ aवत: चरमरा जाइत अिछ। तँए ज’री अिछ जे समयक संग तादाoय aथािपत कय हम
सभ नूतन िवचारक– सहष: aवीकार करी ओ gगितक पथपर आगा बढ़ी।

Suggested citation: रवीन्द्र नारायण मिश्र. “विधवा विवाह.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 250, 2018-05-15. https://www.videha.co.in/research/2018/250/विधवा-विवाह.htm

मूल विदेह अंक / Original issue