बयानक संदभ;मे मैिथली गजल
हरेक भाषा सािहियक हरेक िवधासँ संबंिधत बयान अबैत रहैत छै आ ई iवाभािवक छै। बयान दूनू तरहँक
मने सकारामक ओ नकारामक रहैत छै। मैिथली गजल लेल सेहो समय- समयपर बयान अबैत रहलैक
अिछ। जँ छोट-मोट बयानक छोिड़ देल जाए तँ मैिथली गजलमे मु×यतः तीन-चािर टा बयान अिछ जे िक
अपना समयमे मैिथली गजलक आZदोिलत केलक। पिहल Sो. आनंद िमhजीक बयान, दोसर रमानंद झा
रमणजीक बयान, तेसर रामदेव झाजीक बयान आ चािरम मायानंद िमhजीक बयान, हम एिहठाम चा गोटाक
बयान राखब आ ओकर िवलेषण करब एिह िवलेषणसँ पिहने किह दी जे ई सभ बयान ओहन-ओहन रचना
वा पोथीपर आधािरत अिछ जे िक Sकािशत भेल। बहुत रास एहन शाइर जे िक Sकाशनमे िच ने छलिन
वा िजनका संपादक कात कऽ दै छलिखन (जेना िवजयनाथ झा ओ योगानंद हीराजीक गजलक संपादक
सायास नै छापै छलिखन ितनकर सभहँक गजलक एिह बयान देबा कालमे धेआन नै राखल गेल अिछ)। ईहो
बात धेआनमे राखब जरी जे ई बयान सभ मधुपजी, किववर सीताराम झाजीक वा पं.जीवन झाजीक
गजलक िबना oयाकरणपर नपने देल गेल अिछ। जँ ई सभ बयान देबासँ पिहने मधुपजी, किववर सीताराम
झाजीक, पं.जीवन झाजीक, िवजयनाथ झाजी वा योगानंद हीराजीक गजलक oयाकरणक िहसाब¹ देखने रिहतिथ
तँ संभवतः िहनक बयान सभ िकछु अलग रहैत। तँइ एिह बयान सभक समq तँ नै मानल जा सकैए मुदा
ओिह अिधक£श गजलक Sितिनिधव तँ किरते अिछ जे ओिह कालखंडमे अिधक£श गजलकार ारा िलखल
गेल। एिह बयान सभहँक िवलेषणक हम ओिह कालखंडसँ जोिड़ कऽ देिख रहल छी जािहकालमे ई बयान
देल गेल रहै। वiतुतः इएह सही तरीका छै कोनो तÙयक जनबाक लेल। तँ देखी बयान आ ओकर
िवलेषण ------
1) Sो. आनंद िमhजीक िहसाब¹ मैिथलीमे गजल संभव निह (संदभ;- 2015 मे मोहन यादवजीक गजल संqह
"जे गेल निह िबसरल "मे उदयचंg झा िवनोदजीक भूिमका। संभवतः ई बयान 1980 -85 बीचक अिछ )--- एिह
बयानक मूल प हमरा लग नै अिछ। तँइ एिह बयानक दू पमे लऽ रहल छी। पिहल तँ जे देने छी मने
"मैिथलीमे गजल संभव नै"। ई बयान िनिÈत प¹ ओिह समयक जे गजलकार सभ सिWय छलाह जेना
सुध£शु शेखर चौधरी, गोपेश, मायानंद िमh, रवीZgनाथ ठाकुर, केदार नाथ लाभ, कलानंद भ, िसयाराम झा
सरस, महेZg, छा|ानंद िसंह झा, तारानंद िवयोगी, राम चैतZय धीरज, केदार कानन, रमेश, िवभूित आनंद
आिदक गजल सभक देिख कऽ देल गेल अिछ। जँ िहनकर सभहँक गजल देखल जाए तँ Sो. आनंद
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ejournal 'िवदेह ' २५१ म अंक ०१ जून २०१८ (वषᭅ ११ मास १२६ अंक २५१ )
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िमhजीक उित सौ Sितशत सच अिछ। किनयॲ झूठ नै। मािन िलअ जँ Sो. जी एहन नै कहने हेिथन तैयो
ई सच अिछ ओिह समयक सिWय गजलकार सभहँक गजल देिख िकयो ई बात किह सकैत छल। गजल
लेल बहर आ कािफया अिनवाय; छै (बहरमे िकछु छूटक संगे)। मुदा ओिह समयक सिWय कोनो गजलकार
(ओिहमेसँ एखनो िकछु सिWय छिथ) बहर आ कािफयाक पालन नै केने छिथ। िहनकर सभहँक कथन छिन
जे भाव मु×य हो मुदा जँ भावे मु×य मानल जाए तखन कोनो रचनाक गजल कहबाक बेगरते िकए? ओकरा
किवते िकए ने कहल जाए? आिखर कोनो एहन तव तँ हेतै जे किवता आ गजलक बीच अंतर आनैत
हेतै। कोनो गजलक नीक वा खराप हेबासँ पिहने ओकरा "गजल" होबए पड़ैत छै आ कोनो रचनाक गजल
हेबा लेल ओिहमे बहर ओ कािफया अिनवाय; छै। जँ बहर ओ कािफया नै छै तखन ओ गजले नै भेल भने
ओकरा नीक वा खराप गीत या किवता कहू से मंजूर मुदा िबना बहर ओ कािफयाक गजल नै हएत (रदीफ
कोनो गजलमे भैयो सकैए आ निहयो भऽ सकैए मुदा जािह गजलमे रदीफ लेल जाएत तािहमे अंत धिर पालन
हएत)।
एक दू गोटेसँ चचe केलापर पता चलल जे Sो. आनंदजी ई मानै छलाह जे मैिथलीमे हुiन-इक नै भऽ सकै
छै तँइ मैिथलीमे गजल संभव नै। जँ एहन बात तँ हम Sो. साहेबसँ असहमत छी कारण हमरा लग िवHापित
छिथ जे िक पूरा उदू; शाइरीसँ बेसी आ पिहने Sेमपर बात केलाह। िकछु िव ान ई किह सकै छिथ जे
िवHापितक Sेम पारलौिकक छल मुदा तखन ई SÒ उठै छै जे फेर उदू; शाइरीक Sेम पारलौिकक िकए नै भऽ
सकैए?
जे िकछु हो मुदा Sो. आनंदजीक बयान ओिह समयक गजलकार सभ लेल एकटा चुनौती छल जकरा लेबामे
और गलत सािबत करबामे ओिह समयक गजलकार सभ असफल भऽ गेलाह। जहY धिर एिह बयानक Sभाव
छै हमरा नै बुझाइए जे एिह बयानक कोनो बेसी असिर पड़लै कारण ओिह समयक किथत गजलकार सभ
अपन "गलत गजल"मे म¾न छलाह आ Sो. आनंद िमhजी अपन सहिवचारक संग Sोफेसरे टा बनल रहलाह।
दूनू पमेसँ िकनको ई जनबाक िचZता नै रहलिन जे आिखर गजलक असल प की छै।
2) रमानंद झा रमणजीक िहसाब¹ वत;मान गीत गजल मंचीय अथ;लाभक औजार िथक (िमिथला िमिहर फरवरी
1983 ई हमरा लोकवेद आ लालिकलामे िसयाराम झा सरसजीक लेखमे उ§लेिखत भेटल )-
जँ ओिह समयक सिWय गजलकारक गजल देखब तँ पता चलत जे ओ सभ गजलक गेबाक एकटा उपWम
मािन लेने छलाह। हुनका सभक बुझाइत छलिन (वा छिन) जे गाियकी गजल लेल अिनवाय; छै। जँ गाियकी
गजल लेल अिनवाय; रिहतै तँ उदू; गजलमे गािलब आ िफराक गोरखपुरीसँ बेसी महान सुदश;न फािकर
रिहतिथ। मुदा से नै भेलै कारण गाियकी गजल लेल अिनवाय; नै। हँ जँ गजलक सभ शत; पूरा करैत
गजलमे गाियकी छै तँ सोनमे सुगंध बला बात भेलै। ओिह समयक गजल सभ गाियकी लऽ कऽ कते
मोहqiत छलाह तकर दृ£त हमरा िवभूित आनंदजीक गजल संqह (उठा रहल घोघ ितिमर)मे हुनके भूिमका
आ तारानंद िवयोगीजीक गजल संqह (युÑक सा¡य) केर नव संiकरणक नव भूिमकासँ भेटल। िवभूित
आनंदजी ओिह भूिमकामे िलखै छिथ जे "एगो महवपूण; Sसंग.............। तण िकछुक iवरो देलिथन।"
उdहर िवयोगीजी अपन संqहक नव संiकरणक नव भूिमकामे िलखै छिथ जे "तखन मोन पड़ै छिथ जवाहर
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झा...........जे हमर छ£दस Sयोग सभहँक संगीत शाi|ीय oया×या करिथ।" ई अलग बात जे िवयोगीजीक
गजलमे कोनो छ£दस Sयोग नै अिछ। शाi|ीय संगीत केर बंिदश तँ कोनो रचनाक पYित भऽ सकै छै। एिह
दूक अितिरत आन गजलकार सभ सेहो गजलक गाियकीसँ अिनवाय;तः जोिड़ देने छिथ जािह कारणसँ ओिह
समयक गजल सभ गजल कम आ गीत बेसी लागै छै। अिधक£शतः सािहयकार ई बुझै छिथ जे मंचपर
गािब देलासँ जनता बेसी थपड़ी पीटत आ बहुत संदभ;मे ई बात सच छै। मुदा ओिह समयक गजल
िलखनाहर सभ मंचपर िहट हेबाक च¼रमे किथत गजलक गीतक भासमे गाबए लगलाह जािहमेसँ िकछु
लोकिSय सेहो भेल (जनता ारा गीत मािन आ सुनबामे चूँिक ओ गीतेक भास छलै तँइ) जेना िसयाराम झा
सरसजीक "एक िमिसया जे मुिiकया देिलयै," आ एहने सन आर। खास कऽ जे किथत सािहयकार गीत आ
गजल दूनू िलखै छलाह ितनकामे ई गाियकी बला बेमारी बहुत अिछ। कलानंद भ गजले िलखै छलाह तँइ
हुनक गजलमे एकटा iथाियव भेटत ओना ई बात अलग जे भजीक गजलमे सेहो बहर नै छिन आ बहुत
ठाम कािफया गलत छिन।ताकालीन किथत गजलकार सभ गजलक मंच छेकबाक हिथयार बना लेला जािह
कारणे ओिह समयक गजलमे कÙयक गंभीरता छैहे नै। एक बात iप कऽ दी खाली लाल झंडा, पसेना,
अमीर-गरीब लीिख देलासँ गजल की कोनो रचनामे गंभीरता नै अबै छै। जँ एिह वाiतिवकताक भीतर घुिस
कऽ देखल जाए तँ रमणजीक बयान बहुत हद धिर सही अिछ आ सटीक अिछ। रमणजीक एिह बयानक
असिर भेल आ गीत सन गजल िलखए बला सभ िछलिमला गेलाह। सरसजी अपन लेखमे एिह बयानक गैर
िजdमेदारी बला बयान मानै छिथ (लोकवेद आ लालिकलामे िसयाराम झा सरसजीक लेख) मुदा हम रमणजीक
एिह बयानक गजलक दृिएँ पूण; िजdमेदारी बला बयान मानै छी। जँ ओिह समयक ताकालीन गजलकार
सभ एिह बयानपर मंथन किरतिथ तँ आजुक मैिथली गजलक पिरदृय बहुत िनखरल आ िवiतृत नजिर
अबैत।
पुरने गजलकार नै बि§क एखनुक गजलकार सेहो (अनिचZहार आखरसँ संबंिधत िकछु गजलकार सेहो) मंच
छेकबाक लेल गजलमे गाियकीक अिनवाय; करए चाहै छिथ। जखन िक सच बात तँ ई छै जे मंचपर गजल
िहट होइत छै मुदा मंच लेल गजलक Sयोग असफल भऽ जाइत छै से कतेको उदू; मोशायरामे hोताक तौरपर
भाग लऽ कऽ हम देिख चुकल छी। उदू;क SिसÑ शाइर हसरत मोहानीक गजल "चुपके चुपके रात िदन"
1910-1930 मे िलखाएल छै मुदा एिह गजलक गुलाम अली भेटलै 1982मे। तेनािहते गािलब केर गजल
िलखेलै 1820क बाद मुदा ओकर गाियकी पमे लोकिSयता भेटलै जगजीत िसंह ारा गेलाक बाद
(जगजीतजीसँ पिहने सेहो गाएल जाइत छलै मुदा हम लोकिSयताक बात कऽ रहल छी)। गाियकी पमे
हरेक आधुिनक हसरत मोहानीक नसीबमे गुलाम अली आ हरेक आधुिनक गािलब केर नसीबमे जगजीत िसंह
िलखाएल रहै छै मुदा आजुक शाइर अपने गेबा लेल आ मंच छेकबा लेल तते उताहुल रहै छिथ जे ओ
गजलक मूल तवक िबसिर जाइ छिथ। हमर ई अनुभव अिछ जे गजल लेल बहरक अनुपयोगी कहए बला
लोक गजलक गेबाक च¼रमे रहै छिथ। अZयथा िकछु Sयासक बाद बहरक िनवeह केनाइ एकदम आसान
होइत छै।
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3) रामदेव झाजी मानै छिथ जे "साdSितक गजल रचनाक े|मे सुध£शु शेखर चौधरी, गोपेश , मायानंद िमh ,
रवीZgनाथ ठाकुर ,केदार नाथ लाभ , कलानंद भ , सरस , महेZg , छा|ानंद , िवयोगी, धीरज ,केदार कानन ,
रमेश ,अिनल इयािद नाम देखल जाइत अिछ। िहनका लोकिनक गजलमेसँ िकछुमे अवये गजलव अिछ।
परंतु अिधक£शक गजल शैलीमे रचल गीत मा| कहल जाए तँ अनुपयुत निह। (संदभ; “मैिथलीमे गजल ”
डा. रामदेव झा, रचना जून 1984 मे Sकािशत )" --
रामदेव जीक मत रमणजीक मतक िवiतािरत प अिछ। रमणजी मंचपर गजलक Sवृितपर बात केने छिथ
मुदा रामदेवजी गीत सन गजलक सेहो देखार केने छिथ जे अिधक£शतः गजलकार गजल नै गीत सन गजल
िलखै छिथ। रामदेव झाजी iप iवरमे ओिह समयक बहुत रास किथत W£ितकारी गजलकार सभहँक
गजलक खािरज करै छिथ जे िक ओिह समयक िहसाबसँ बड़का िवiफोट छल। ई आलेख ततेक Sभावकारी
भेल जे ओ समयक िबना oयाकरण बला गजलकार सभ िछलिमला गेलाह आ एिह आलेखक िवरोधमे िविभÇ
वतoय सभ देबए लगलाह। उदाहरण लेल िसयाराम झा सरस, तारानंद िवयोगी, रमेश ओ देवशंकर
नवीनजीक संपादनमे Sकािशत साझी गजल संकलन "लोकवेद आ लालिकला" (वष; 1990) केर कितपय लेख
सभ देखल जा सकैए जािहमे रामदेव झाजी ओ हुनक iथापनाक जिम कऽ आरोिपत कएल गेल अिछ। ओही
संकलनमे देवशंकर नवीन अपन आलेख "मैिथली गजलःiवप आ संभावना"मे िलखै छिथ जे "............पुनः
डा. रामदेव झाक आलेख आएल। एिह िनबZध मे दू टा बात अनग;ल ई भेल जे गजलक पंित लेल छंद
जकY मा|ा िनधeिरत करए लगलाह आ िकछु एहेन oयितक नाम मैिथली गजल मे जोिड़ देलिन जे किहयो
गजल नै िलखलिन"
आन लेख सभमे एहने बात सभ आन आन तरीकासँ कहल गेल अिछ। रामदेव झाजीक आलेखक बाद एहन
आलेख नै आएल जािहमे गजलक oयाकरण दृिसँ देखल गेल हो कारण तािह समयक गजलपर किथत
W£ितकारी गजलकार सभहँक कजा भऽ गेल छल।
4) मायानंद जी अपन पोथी “अवाZतर ” केर भूिमकाक (ई पोथी 1988 मे मैिथली चेतना पिरषद्, सहरसा
ारा Sकािशत भेल )। पृ 6 पर मायानंदजी िलखै छिथ “अवाZतरक आरdभ अिछ गीतलसँ। गीतं लातीित
गीतलम्ऽ अथeत गीत क आनऽ बला भेल गीतल। िकZतु गीतल परdपरागत गीत निह िथक , एिहमे एकटा
सुर गजल केर सेहो लगैत अिछ। गीतल गजल केर सब बंधन (सत;) क iवीकार निह करैत अिछ। कइयो
निह सकैत अिछ। भाषाक अपन -अपन िवशेषता होइत अिछ जे ओकर संiकृितक अनुप¹ िनिम;त होइत
अिछ। हमर उHेय अिछ िमhणसँ एकटा नवीन Sयोग। तÂ गीतल ने गीते िथक , ने गज ले िथक , गीतो
िथक आ गजलो िथक। िकZतु गीित तवक Sधानता अभी , तÂ गीतल। ”
उपरका उÜोषणामे अहY सभ देिख सकै िछऐ जे कतेक दोखाह iथापना अिछ। Sयोग हएब नीक ग¢प मुदा
अपन कमजोरीक भाषाक कमजोरी बना देब कतहुँसँ उिचत नै आ हमरा जनैत मायानंद जीक ई बड़का
अपराध छिन। जँ ओ अपन कमजोरीक आँकैत गीतल केर आरdभ करतिथ तँ कोनो बेजाए ग¢प नै मुदा
मायाजी पाठकक Õिमत करबाक Sयास केलाह जे िक ताकाल सफल सेहो भेल।
हम अपन पोथी "मैिथली गजलक oयाकरण ओ इितहास"मे बहुत रास एहन मैिथली कहबी केर उदाहरण देने
िछयै जकर दूनू पYितमे वण;वृत मने बहर छै। जािह भाषाक कहबी धिर बहरमे हो ओिह भाषामे गजल िलखब-
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कहब सभसँ आसान छै। मुदा हम जेना िक ओही पोथीमे िलखने छी जे माया बाबू लग मैिथल मािट-पािनक
परंपराक कोनो जानकारी ने रहिन ओ बस शद सजेबाक फेरमे अपन मजबूरीक भाषाक मजबूरी बना
देलाह। माया बाबूक एिह बयानक घोर िवरोध भेल सरसजी आ हुनक टीम ारा मुदा अफसोच जे सरसजी वा
हुनक टीम मायाजीक एिह बयानक गलत करबा लेल कोनो साथ;क डेग नै उठा सकल। माया बाबू जािह
फामÍटक गजल िलखै छलाह तही फामÍटमे सरसजी आ हुनक टीम िलखै छलाह । मने दूनू टीम िबना
बहरक बहर गजल िलखै छल आ एखनो िलखा रहल। मायानंद िमh बनाम िसयाराम झा
"सरस" बला लड़ाइ गजलक लेल नै ई िवशुÑ प¹ नाम आ स
ाक लड़ाइ छल। वत;मान
मैिथलीमे "बीहिन कथा" आ "लघुकथा" केर लड़ाइ सन छल ई।
वत;मान समयमे एिह बयान सभहँक साथ;कता
Sो.आनंद िमhजी आ मायानंद िमhजीक बयानक एखन कोनो साथ;कता नै अिछ। दूनू गोटाक बयान मैिथली
गजलक असल धाराक छोिड़ कऽ देल गेल छल। मैिथली गजलक असल धारा पं.जीवन झा, किववर
सीताराम झा, काशीक£त िमh "मधुप" िवजयनाथ झा, योगानंद हीरा, जगदीश चंg ठाकुर "अिनल" आिदक
छुबैत आगू बढ़ल अिछ। मुदा िहनकर सभहँक गजलक ताकालीन संपादक ओ आलोचक ारा बारल गेल।
जँ िहनकर सभहँक गजलक ओिह समयमे oयाकरणक िहसाबसँ oया×या भेल रहैत तँ मैिथली गजलक नकली
धाराक आगू बढ़बाक मौका नै भेटल रिहतै आ मैिथली गजल गZहेबासँ बिच गेल रहैत। मुदा दुिनयYक कोनो
काज बYचल नै रहै छै से आब मैिथली गजल आलोचनाक छूटल काज सभ भऽ रहल अिछ।
डा. रमानंद झा "रमण" ओ डा. रामदेव झाजीक बयानक एखनो साथ;कता अिछ कारण ई दूनू बयान गजलक
बाहरी पपर छलै। एहन नै छै जे गजल गाियकीसँ मोहqiत पिहनुके गजलकार छलाह। िकछु एखुनको
गजलकार एिह मोहमे बाZहल छिथ आ आगूक िकछु गजलकार सेहो बाZहल रहता। तँइ ई दूनू गोटाल बयान
भिव¤योमे साथ;क रहत।
(नोट---- गजलक वा अZय िवधाक संदभ;मे हम िकनको नीक िवचारक अपना सकै छी। मुदा गलत िवचारक
सिदखन हम आलोचना करैत रहब। एिह आलेखमे िजनकर मतक समथ;न कएल गेल अिछ जरी नै जे
हुनकर सभ मतसँ हम सहमत होइ आ हुनकर गलतो िवचारक नुकबैत रही। काि भेने फेर िकयो गजलक
असल पक िवपरीत जेता हुनकर हम आलोचना करबे करब। कोनो िवधामे Sयोग खराप नै मुदा अपन
कमजोरीक िवधा वा भाषाक कमजोरी बना देबए बला हमर िशकार होइत रहता।)