Rणव कुमार
मैिथली कथामे gVी
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ejournal 'िवदेह ' २५२ म अंक १५ जून २०१८ (वषᭅ ११ मास १२६ अंक २५२ )
मानुषीिमह सं᭭कृताम्ISSN 2229 -547X VIDEHA
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उपरोत िवषय पर चचW केनाय एेक ह¯लुक बात नै अिछ, तथािप हम जे िकछु लेखक केर रचना
पढलहु◌ঁ अिछ ओय माÃक िकछ gVी पाV वा नाियका क भूिमका के िववेचना के RयÄ क रहल िछ।
सव;Rथम हम याVी बाबा के उपIयास ’पारो’ के नाियका पाव;ती उफ़; पारो केर चचW कय रहल छी। पारो के
पिहल पिरचय पा◌ঁच छ: विष;य, °याम विण;य बुिचया के प मे कैल गेल अिछ, आ कथा के मािम;क अIत
१७-१८ वष;क पारो के अकाल म◌ृQयु क घटना के संदभ; स ◌ঁ होय अिछ। मैिथली कथा मे gVी पाV सब मे
पारो के चिरV एकटा एहन चिरV अिछ जे पाठक के हृ्दय gथली मo भावना के तीवÇ Rवाह त लैए आबै
अिछ संगिह िमिथला ेV मo ७०-८०-९०के दशक मo(आ संभवत: िकछु एखनो) gVी जीवन के दशा के
कैएक टा परत खोिल के रािख दैत अिछ। २-४ घंटा मo पारो सन नाियका के नेIपन केर खेलौर स ◌ঁ ल के
िकशोरी पारो के चमQकृ्त क दै बला बुि¸, िववेक, मयWदा के िनभाब वाली िधया आ अंतत: समाजक दोष
के कारणे अपिरपब अवgथा मo अकाल मृ्Qयु के वरण करैत पारो के झलक कोनो चलिचV जेका◌ঁ पाठक
के आ ◌ঁिख के आगा एक के बाद एक क के िनकिल जाय अिछ।
पारो नेनपने स चंचल छलीह आ िकशोरावgथा मo पहु◌ঁचैत पहु◌ঁचैत लोक iयवहार आ ¤यान मे पारंगत भ
गेिल। कथावाचक कहै छैथ जे ओ पारो से १-२ वष;क जेठ छलाह मुदा तैयो लोक iयवहार के जे बात
हुनका इंटर मo गेला पर बुझ एलैन से पारो ओिह बयस मo बुझै छलीह जखन कथावाचक आठमी मo छलाह।
ऐ Rकारे याVीजी ई बात के इंिगत करै छैथ जे िमिथला के नारी मo मानिसक पिरपवता बहुत ज¯दी आिब
जाय अिछ। पारो पÉबा िलखबा, कथा-किवता मo सेहो बेस तेज छलीह, gवाईत िहनकर िपताजी िहनका खूब
पढैबा के इ¥छा रखै छलाह, मुदा से िहनकर माय के पिसµ नै छल। ई मैिथल समाज के एकटा आर
चिरV िचVण अिछ जेकरा याVीजी ऐ कथा मo खोिल क देखेलिथIह अिछ। ई चिरV कमोबेस आजुक मैिथल
समाज मo सेहो iयाÊत अिछ, gवाइत िमिथला ेV मo gVी सारता दर कदािचत सगर देश मo सभस ◌ঁ िनË
gतर पर अिछ। औपचािरक िशा नैहो भoटला पर पारो रामायण, गीता, अमरकोष, िहतोपदेश आिद ²ंथ के
घोिष लैत छिथन।
Rेम िववाह आ िववाह स ◌ঁ पूव; अपन िजवनसंगी के िनक से जािन लै के इ¥छा आ ऐ से जुडल िदवाgवÌ
सेहो पारो के मोन मे उचरै छैIह आ एकरा ओ कथावाचक के जािहर सेहो कर छिथन जे “िबरजू भैया,
भाइये-बिहन मo ज ◌ঁिबआह दान होयतैक त कतेक िदव होयतै। कत’ कहा◌ঁदन अनिठया के जे लोक उठा ल
अबै अिछ से कोन बुिधयारी!” िकशोरी पारो के मोन मे पु·ष जाित के Rित जे आशंका छल से ओकर
िलखल किवता के ऐ लाइन मo सेहो iयत होय अिछ:
सखी हम करमहीन
कोन िविध खेपब िदन
कोन िविध खेपब राित
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िनÎुर पुख क जाित
कोन िविध काटभ काल
हैत हमर की हाल।
पिरिgथित के मारल पारो के िववाह िकशोरावसथे मo अपना सं दुना उिमर के दुि वर स ◌ঁ भ जाय अिछ।
कथा के अंत होय अिछ शािरिरक प स ◌ঁ अपिरपव पारो के Rसव के कारण भेल अकाल मृQयु स ◌ঁ। इ
भाग पढैत काल पाठक के कॲरह फ़ािट जाय से gवभािवक अिछ। ऐ Rकारे देखल जाय त पारो एकटा
तेजिgविन िमिथलानी छिथ जे मैिथल समाज मo iयाÊत दोष के कारण िजबैत अपन अिभलाषा के समेट क
रखै छिथन आ अंतत: अकाल मृ्Qयु के RाÊत हौय छिथन।
आब अबै छी Rो० हिरमोहन झा के रचना पर। ओना त िहनकर कथा-उपIयास सब मo नाना Rकार के gVी
पाV सब भरल परल अिछ, मुदा हम एतय िहनकर उपIयास कIयादान आ िÏरागमन के पाV बु¥ची दाई आ
िमस िबजली बोस के चचW क रहल िछ। बु¥ची दाई के चिरV जत अपन समय के मैिथल समाजक gVी
क वाgतिवकता अिछ त िमस िबजली कदािचत ओ चिरV अिछ जेहन लेखक मैिथल gVी के भिव´य देखय
चाहै छलाह। बु¥ची दाई एकटा एहन अबोध बािलका के चिरV अिछ िजनका मानिसक आ शािरिरक
पिरपवता से पिहनेहे िबआह क देल जाय छैIह आ तािह कारणे ऐ संबंध के बुझ आ िनभाब मे ओ अम
छलीह। मुदा प आ गुण स ◌ঁ पूण; बुिचया समय िबतला पर आ िसखौला पढौला पर आधुिनकता के िलबास
ओिढ लै अिछ। िमस िबजली बोस काशी िवrिवDालय मo पढै वाली ओ कIया छलीह जे कुशा² बुि¸ के संगे
ठा◌ঁय पर ठा◌ঁय बाजय के कौशल सेहो राखै छलीह आ एिह कौशल के बले सीसी िमf के दप; चुड-चुड
करै छिथन आ हुनका हुनकर गलित के एहसाह िदयाबै छिथन।
दू टा पुष लेखक के बाद दू टा gVी लेखक के रचना मo gVी पाVक चचW करै चाहै छी। सव;Rथम िलली
रे के कथा उपसंहार के नाियका ’अपणW’ के चचW क रहल छी। िलली रे अपन िविभµ रचना मo gVी पाV
के माफ़;त ऐ बात के उ¯लेख कएने छिथ जे मैिथल समाज gVी के िववाह, Rेम-संबंध आिद के ल क
अनुदार रहल अिछ आ औखन तक अनुदार अिछ। जे मिहला वग; िपतृ्साQमक समाज मे युग युग
स◌ঁ सीिदत आ Rतािड.त होइत रहल छिथ, सेहो वग; अपन समाजक दोसर सदgय के Rित अनुदार बनल
रहलीह, सहानुभुित के अभाव रहलिन। िशित आ आधुिनक मानल जाय बला समाजक पुष वग;क
मानिसकता मo पिरवत;न नै आयल। ’अपणW’ के चिरV एिह अIतरिवरोधक मम;gपशÁ उÐाटन अिछ। अपणW के
Rित हुनक बिहनोइ िवनयक आचरण भावनाQमक निह, शोषणाQमक छैन। ओ डाटरी के Rवेश परीाक
माग;दश;नक नाaपर अपणWके अपन मोह जाल मo फ़ा◌ঁिस लैत छिथ। अपणW के बिहन वसुधा के आचरण
इ´यWभाव स ◌ঁ भरल अिछ ओ अपन पित के लंपटता के दोष नै दैत अिछ, अपणW के दोषी मानैत अिछ। ओ
अपणW के तेज से जरैत अिछ। िपि लग िशकायत क अपन छोट बिहन के Rित घरक सदgय मo घृणा
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घिनभूत क दैत अिछ। घौल भेल िपता अपणW के दंिडत करबाक हेतु कठोरतम िनण;य करैत हुनकर पढाई
छोरा एकटा मजदूर संगे सािह दैत छिथन। अपणW डाटर नै बिन सकिल मुदा अपन पिरfम आ िवDा के
बल पर सासुर के खूब सुखी-सaपµ बना दैत छिथन। मुदा िवडंबना अिछ जे अपण;िहक पिरfम
स◌ঁ िगरथाइिन बनिल ननिद सब सब सेहो हुनकर कुचे¢ा करै अिछ। अपणW Qयागमिय छिथ, सेवाभािव छिथ,
सहानुभूितशील छिथ, अपन मोनक iयथा कौखन Rकट नै होमय दै छिथन। सबस ◌ঁ बिढ के धैय; आ
gवािभमान छैक। इ gवािभमान पितक देहावसानक िज¤यासा मे आएल िपता के◌ঁ कहल वचन मo (’एिहठाम
हमरा सब मानैत अिछ। अहा◌ঁस बहुत बेसी!’) सेहो gप¢ अिछ।
अंितम gVी चिरV जेकर हम चचW एखन क रहल िछ ओ अिछ डा० शेफ़ािलका वमW के कथा ’मुित’ के
नाियका ’मेहा’। मेहा कोमल सदृ्°य भाव वाली तेजिgवनी कIया छिथन िजनका समाजक देखावटी उQथान आ
इिळटनेश नै पिसµ छैIह। ओ अपन मा◌ঁ के मिहला-मुित आंदोलन आ ओय स ◌ঁ जुड.ल सदgया सब के
आलोचक छिथन जे मिहला-मुित के नाम पर बड.का बड.का जुलूस त िनकालै छिथन मुदा ई बात के
अIतबÒध नै छैन जे मिहला के मुित चािह किथ स ◌ঁ। ओ अब अपनिह जानैत या अIजान मे नारी के
Rतारणा के बढावा दै बला काज करै छिथन। एिह ¡म मे मेहा के िववाह एकटा Rोफ़ेसर साहब से होय
बला रहै छैन जे वाgतव मे पकरौआ िववाह छल आ तेकर बदला लै लेल Rोफ़ेसर साहब मेहा संग हुनक
पpच टा सिख के िसनुरदान क दैत छिथन। मुदा तेजिgविन मेहा ऐ िवकट पिरिgथित के अपन कुशा²ता आ
तेज से gaहािर लैत छिथन, ओ ऐ िववाह के अमाIय सािबत क दैत छिथन आ Rोफ़ेसर साहब के मुत
करैत बजै छिथन जे “हम एिह िववाह के नै मानैत छी आ नै हमर संगी मानत। हम सब एेक गेल-गुजरल
नै छी । नारी के िनयित माV िववाह छैक मुदा हम एकरा नै मानैत छी। िववाह gVी पुषक समप;ण
िथक। जे बलजोरी देल जाय आ जे ए¹िह संगे पा◌ঁच गोटे के देल जाय ओ िसIदूर धम;क दृ्ि¢ए मान भ
जाए मुदा हम किहयो नै मनब।
Rोफ़ेसर साहब मेहा के ऐ तक;-िवतक; से अवाक भ गेल। ओ एकटा अ¤यात सaमोहन स ◌ঁ आिव¢ भ मेहा से
अपन अपराध लेल मा मpगैत छिथन आ हुनका अपन जीवन संिगिन बनाब के वचन दैथ छिथन।
एिह Rकारे हम देखैत िछ जे जत पुष लेखक सब gVी पाV के Ïारा समाज मे gVी के अवgथा आ
हुनका Rित iयाÊत कुRथा पर चोट करै छिथन ओतय मिहला लेिखका gVी समाजुक िgथित के सु£म
िववेचना करैत छिथन।
एकटा जIमेजय कथा (iयं¤य )
ओना त महाभारतsक सबटा कथा सब युग के लेल Rासंिगक रहल अिछ, एिह ¡म मo राजा जIमेजयक एकटा कथा सेहो
आजुक
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समय के िहसाब सं खूब Rासंिगक अिछ.राजा जIमेजय अजु;न के पोता आ राजा परीित के बेटा आ उरािधकारी छलाह.
एक बेर राजा परीित कलयुगक Rभाव सं ²gत
भs मरल सpप केर माला बनाय ऋिष शमीक के गर मo धs क हुनकर अपमान कदेलिखन. ऐ अपमान सं ऋिष के बेटा fृंगी
िपिया गेलाह. ओ िपे आिमल िपने छलाह आ अपन बाबू के अपमानक
बदला लेबय के ठािन नेने छलाह. एिह के लेल ओ नागराज तक के बजाय, राजा परीित केिठकाना लगाबय के सुपारी द
देलिखन.
बस तखन की अजु;न सं परािजत आ अपमािनत तक एहने मौक़ा के बाट जोहैत छलाह, gवाइत ओ ऐ सुपारी उठब मo को
नो कौताही
नै रखलाह आ सही मौक़ा पािब ओपरीित के 'मड;र' क देलाह.
परीित केर मड;र के बाद हुनकर बेटा जIमेजय गÔी पर बैसलाह. बापक ÃQया के सभटा िपहानी जानलाक बाद िहनका मो
न मo
बदलाक भावना RÕÕविलत भ गेलैन आ ओ तकसिहत सभटा नाग के समूल न¢ करै के ठािन लेलैथ आ ऐ के लेल सप; य
Ö करेलैथ
मुदा ऐ 'मड;र' के माgटरमाइंड यानी ऋिष fृंगी के छोिड़ देलिखन.
"आब एकटा 'बाबा' से के पंगा लै! बदले लै के छैक त तके सं ल लैत छी आ ओकर समूल नाश क दैत छी."
(भ सकै अिछ एहने िकछु िवचार हुनका मोन मo आयल हेतैन, यDिप ऐ तरहक बात महाभारत मoआिधकािरक प सं कतौ ने
देखलहुँ पढ़लहुँ अिछ).हं त भेल एना की सप; यÖ मo एक
एक क के सभटा िनदÒष सpप सब खिस खिस क भgम होमय लागल.
ओकरा सब के पतो नै छल जे ओकर सब के दोष की छैक जेकर सजा ओकरा सब के भoट रहल छल. खैर.हजारोलाख सp
प के मुइला के
बाद जखन तक केर पािर एलै तखन पता नै ओ कुन देवता िपर से सेिटंग क के आिgतक नामक एकटा ×ाaहण के
भेज के सप; यÖ ·कवा देलक आ तक केर जान बिच गेल.कहल जाय छैक जे एकर बाद जIमेजय आ तक दुनू बषÒ-
बरख िजबैत रहलाह आ अपन-अपन राज पाट के भोग केलाह. कहcदैन कहल जायिछ जे तक केर बाद मo इIKक
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दरबार मo सेहो बØड िनक पैठ बिन गेलछल. आ ऐ तरहे देखल जाय त माgटरमाइंड ऋिष fृंगी, एसीयूटर तक आ बद
ला लै पर
उता जIमेजय के त िकछु नै भेल मुदा ऐ सब Rि¡या मo मारल गेल बेचारा हजारोलाख िनदÒष सpप सभ जेकर एकमाVअप
राध
जे ओ तक के समुदाय से छलाह.
उपसंहार : आजुक समय मo एिह कथा के Rासंिगता िचिIहयौ आ िवचार किरयौ, अहc बुि¸जीवी छी