िव_ापितकालीन िमिथलाक कृिष
जािह समयमे िव_ापितक आिव>भाव िमिथलामे भेल छल ओ संमणक काल छल। सामािजक
िवkृंखलताक कारणT िकछु लेाक काज-ध`धा करबासँ मुँह मोड़ने छल। जे केओ काजुल, पिरkमी छलो ओहो
.......मे पिर क>}यहीन जीवन िबतेिनहार भऽ गेल छल। िमिथलामे खेती आ पशुपालनक िसवाय दोसर
जीिवकाक साधनो तँ निह छलैक। सीिमत साधनो अछैत खेती करनाइ असौकज> बुिझ िदनानुिदन आिथ>क
दुव>लताक िशकार होइत रहल। इएह कारण भेलै जे एतुका लोकक आिथ>क अवxथा लचिड़ गेलैक। एतबे
निह, िकछु लोक कृिषक उमेJा कऽ भीख मगब kेयxकर बुझए लागल। एहन लोककT समाज घृणाक दृिµसँ
देखैत छल। तT एिह Eवृितक लोकक Åयान खेतीक ओर आकृµ करबाक िनिमत कहबी चिरताथ> भेल-
“उम खेती मÅयम वाण,
िनिषË चाकरी भीख िनदान।”
तापय> ई जे खेती करब सभसँ उम मानल गेल। }यवसाय करब मÅयम। नौकरी करब अधम मानल
गेल। सभसँ अधलाह- भीख मगब बुझल गेल। जहy तक नौकरीक गप छैक, आजुक समयमे नौकिरयेकT
Eाथिमकता भेटल छैक। ओ भलT सप पिरवारक िकएक ने होिथ, नौकरी हेतु अपxयॉंत देखल जाइछ।
एहनो समय छलैक जखन नौकरी कएिनहारकT समाजमे कुचच होइत रहैक। एिहसँ ईहो Âात होइछ जे आम
िनभ>रताक िशJा देल जाइत छल।
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ejournal 'िवदेह ' २५४ म अंक १५ जुलाइ २०१८ (वषᭅ ११ मास १२७ अंक २५४ )
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महा किव िव_ापित अपन रचना ‘िलखनावली’ आ ‘वष>कृय’मे िमिथलाक कृिषक बहुिविधवणत कहल
अिछ। संगिह कृिषकT उपेJाक दृिµसँ देखिनहारकT एिह ओर आकिष>त करबा लेल अपना रचनामे िशव आ
गौरीक माÅयमसँ उपदेश देल अिछ। िव_ापितक माL उ×ेeय अकम>{यताक अ`मूलन करब छल।
“बेिर-बेिर अरे िशव मो तोय बोलो,
िकिरणी किरअ मनलाई,
िभिख मिगए पर गुण गौरव दूिरजाय,
िनध>न जन बोिल सबे उपहासे,
निह आद। अनुकपा।
तोहg िशव पाओल आक-धतूर,
एिह पाओल फूल चपा।।”
भूिमक अिधकता आ जन सं¿याक `यूनताक कारण खेती अदिल-बदिल कऽ होइत छलैक। जािह खेतमे
एिह वष> धान गृहxथ करैत छल, ओकरा परती छोड़ैत छल। ई करलासँ साल भिरमे खेतक ऊपज शि±त
बिढ़ जाइत छलैक। भूिम तीन kेणीक मानल गेल छल।
िव_ापितक समयमे पिहल kेणीमे गोचर, दोसर kेणीमे ऊपजाउ आ तेसर kेणीक वंजर।
गोचर भूिममे अनेक Eकारक घास लगाओल जाइत छल जे पशुपालनक हेतु Eमुख छल। ई गोचर भूिम
साधारण गाममे एक सय दंड, पैघ गाममे दुई सय दंड एवम् नगरमे चािर सय दंड छोड़ल जाइत छल। वंजर
भूिमकT तोिड़ कऽ खेतीक योºय बनाओल जाइत छल। एहन भूिमकT िव_ापित खील भूिम कहलिख`ह। एहन
Eकारक भूिममे खेती कएिनहार भू-xवामीकT सात वष> धिर ऊपजक आठम भाग दैत छल। तप¢ात् भू-
xवामीक अनुसार उपजक xवामीवमे पिरव>न भऽ जाइत छलैक। एखनहुँ परती जमीनमे खेती कएिनहारकT
सुिवधा देल जाइत छैक। एिह सुिवधाक समय िनधिरत निह छैक। जगह-जगहपर अ`तर देखल जाइत
अिछ।
ओिह समयक समाज दू वग>मे बँटल छल। एक वग> राजा महाराजाक साम`तािदक छल। एहन वग>क
लोकक खेती-पथारी दूर-दूर धिर होइत छलिन। ओतए ओ लोकिनक खेती करबाक....... कमि`तक अथत्
कमितयाकT रखैत छलाह। एकर अितिर±त आरो अिधकारी वग> ओकर काजक िनरीJण करबाक लेल राखल
जाइत छल।
समाजक दोसर वग> दिलत वग> छल जे xवयं अपन खेती करैत छल। एहन वग>कT खेतीमे अपन प¾ीसँ
सेहो सहयोग भेटैत छलिन। खास कऽपशुक हेतु सभ Eकारक }यवxथा xLीगणे ¥ारा होइत छल। महादेवकT
मैिथल होएबाक Eमाण कहक ईहो भऽ सकैछ। हुनक सासु मैना xपµ ´पसँ कहैत छिथ`ह-
“हमर िधया जखन सासुर जयतीह तखन ओ घास कािट लौती आ बसहा चरौती।”
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खेती-परती हर एवम् कोदािरसँ ओहू समयमे कएल जाइत छल। हरक }यवहार िव_ापित सािहयक
संगिह तकालीन सािहयमे सेहो कतेको xथलपर कएने छिथ। िव_ापित अपन वष> कृयमे हरक मुहु>क
उ²लेख कएने छिथ। ओिह िदन बरदक िसंहमे म±खन गूड़ आिद रगड़ल जाइत छल। Eाय: ओिह िदन धनी-
मनी }यि±त हरक-फारक आगूमे सोना लगबैत छल। िव_ापित कहैत छिथ सोन लगायब एक िवधान छल।
एक तरहक कहबी छैक वा लोक धारणा जे पंचमीक मुहु>मे हर जोतबा काल जॱ बरद िचकार करए
वा मेिमया तँ चािर गुणा उपज होएबाक संकेत भेटैछ। ओिह िदन पॉंच िसरोर जोतबाक िवधान छलैक।
िव_ापितक िलखनावलीक एक पLमे हरक हेतु धुर`धर बरदक चच आयल अिछ। खगौट भेलापर
गृहxथ एहन धुर`धर बरदकT ब`हकी रखैत छल। एिहसँ ओिह समयक समाजक लचरल अवxथाक पिरचय
भेटैत अिछ। सप गृहxथ हरबाह खेत जोतबाक िनिमत रखैत छल। हरवाहीक अलाबा अ`यो काज
हरबाहसँ करबैत छलाह।
िव_ापितक एक प_मे उ²लेख आएल अिछ जे गौरी िशवसँ खेती करबाक लेल कहैत छिथ`ह, तखनुक
ई पॉंित अिछ-
“खटंग कािट हर हर जे बनािवअ,
Lीशूल तोिड़ क´ फार।
बसहा धुर`धर हर लए जोतीय,
खेत खोला पहाड़।”
धनी-मनी }यि±तक ओिहठाम कमितयाक ऊपर महम होइत छल जकरा िनरीJक समान पद होइत
छलैक। कामत परक खेती-पथारीक सभ Eकारक खबिर कमितयासँ लैत रहैत छल। कोन खेतमे कोन
तरहक अ उपजाओल जाय संगिह खेत कोना जोतल जाय, कोन खेतमे आिर ऊँच कए बा`हल जाय संगिह
कोन खेतमे कतेक लागत लगाओल जाय इयािद इयािद तकर िजÂासा महतम कमितयासँ करैत छल।
िव_ापितसँ पूव> मैिथली डाक आ घाघ भेल छलाह जिनका िमिथलाक कृिष काय>क उÚगेता कहल
जाइछ। मै. डाककT Eकृितक गहन अÅयययन छलि`ह। एखनहुँ डाक वचनावलीक अनुसार िमिथलाक गृहxथ
कृिष काय>क समीJा कऽ समेत भऽ जाइत छिथ। डाकक कहब छल- गृहxथ छोट-Jीण बरद निहयÛ राखिथ
माL दुई गोट धुर`धर बरद कीिन खेती करिथ। अपन खेती भेलापर अनको खेतीक हेतु मंगनी देिथ। हुनक
श»दमे-
“नाटा बरद बेिच कए, दुई धुर`धर कीन,
अपन खेती किर कए आनकT मंगनी दीन।”
एतबे निह, ओ कहने छिथ खेतक उपजा जोतपर िनभ>र करैत अिछ।
थोड़ के जोितए अिधक मइ अिवए,
ऊँच के बाि`हए आिर।
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जॱ खेत तैयो निह उपजए तँ
डाक के पिरएह गािर।
एिह लेल िव_ापितकालीन ममहम कमितयाकT सलाह दैत छलाह जे हरसँ तैयार कएला बाद खेतकT
कोदािरसँ साधब उम होइछ।
िमिथलाक कृिषमे पयत वषक अभाव Eाग ऐितहािसक कालिहसँ रहल अिछ। मानसून एतुका हेतु
जुआवाजी कहल गेल अिछ। िकएक तँ अित वृिµ अनावृिµ आ दुिभ>Jक िशकार एतुका गृहxथ होइत रहलाह
अिछ। तT पटौनीक Eभाव समय-समय पर होइत छलैक।
िव_ापित सािहयमे सेहो पटौनीक उ²लेख भेटैत अिछ। पटेबाक एक यंL िवशेषक चच कएने छिथ।
यथा- रहट संxकृत अरधदृ आ Eाकृितक अरहÜ। एिह मंLसँ अहुखन इनारवा कूपसँ पािन बहार कएल
जाइछ। एकर अितिर±त चर, चॉंचर, डबरा, खा आ पोखिरसँ करीन ¥ारा पटौनीक काज लेल जाइत छल।
तकालीन राजा ¥ारा बड़का-बड़का पोखिर खुनाओल गेल छल।। िमिथलामे एहन अनेको पोखिर िव_मान
अिछ, जकर सकल आब बदिल गेल छैक। एिह तरहक पोखिर रजोखोिर कहबैत छल। िकवदि`त छल जे
दैय ¥ारा एहन िवशाल पोखिर खुनल गेल छल।
िव_ापित तँ भाव नदीक उ²लेख कएने छिथ- गौरी जखन िशवसँ खेती करबाक आ¦ह कएलिन तँ िशव
कहलिथ`ह-
“सभ बात मानल मुदा पािनक अभाव भेलापर की होयत?तखन खेती तँ करब असौकज> होएत।”
एिहपर गौरी उर देलिन-
“पाटय सुसिर धारा।”
एिहसँ Âात होइत अिछ जे तयुगीन िमिथलामे पटौनीक काज गंगानदीसँ कएल जाइत छल।
ओिह समयक कृषकमे Eगाढ़ Eेम होइत छलिन। एक-दोसरक िहत िच`तनक संग अित आदरक भाव
रखैत छलाह। खेतसँ उपज िनिव>Í ..... आब तT बाधक हेतु रखवार राखल जाइत छल। अहुखन िमिथलाक
गाममे रखवार रखबाक Eथा अिछ। रखवारकT िवशेष अिधकार गृहxथक ¥ारा देल गेल छल। कहुखन ई
रखवार खेतक पूण> उपजकT हिथया लैत छल जे िव_ापितक पदसँ Âात होइछ-
“खेत कएल रखवारे, लूटल ठाकुर सेवा भोर।”
यदा-कदा एहनो होइत छलैक जखन खेतीक समय बीित जाइत छल तखन वष होइत छल। जेकर
िव_ापितक पदसँ पुिµ होइछ-
“समय गेले मेघे विरसब,
की दहु तT जलधार।”
एहना िxथितमे वषक पािनकT रोकबाक हेतु खेतमे ऊँच आिर बा`हल जाइत छल तािक खेतसँ पािन
ससिर निह जाय। िव_ापितक प_सँ संकेत भेटैछ-
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“गेला पीड़ िपरोधक की फल।”
पुन: िव_ापित अपन रचनामे Eेम ´पी फूलक हेतु शीलक आिर बाि`ह मयदाक रJा कएने छिथ-
“फूल एक फूलवािर लगाओल मुरािर,
जतने पटओलि`ह सुवयन वािर।
चौिदस वॉधिल सीलक आिर,
जीव अवलवन क´ अवधािर।”
एिहसँ ईहो Âात होइछ जे लोक भूिमकT छोट-छोट टुकड़ीमे बyिट खेती योºय बनबैत छल। िव_ापितक
समयक कृषकक समxत उपजाक अक उ²लेख कतहु एकठाम निह भेटैत अिछ। तखन एतए
मसूरी, राहिड़, सिरसो, ितल जौ आिदक अवeय उपादन होइत छलैक। जतेक Eकारक अक उ²लेख भेल
अिछ ओ सभ अ िविभ अवसरपर िमिथलामे िविभ देवी देवताक Eसताक हेतु दान कएल जाइत छल।
एकर सगोपग वण>न िव_ापितक ‘वष>कृय’मे भेटैत अिछ।
अनुकूल समयसँ यथेµ उपज होइत छलैक। गृहxथी नीक हालतमे भेलासँ िमिथलाक लोक बाहर निह
जा कऽ घरिह रहैत छल। कहबी छलै-
“कर खेती घरही भला।”
इएह कारण छल जे एतुका जनमानस वाÝ पिरवेशक अनुभवसँ वंिचत रहक। िव_ापितक पूव> जिहना
गृहxथीसँ उदास लोक छल तिहना किवक रचनाक Eभावसँ गृहxथीक ओर झुकाव भेल छल। खेतीसँ उप
अक उपयोग मोला }यवxथा ¥ारा चलैत छल। मोलाक अ`तग>त य-िवयक िवधान छल। एकरो उ²लेख
िव_पितक िलखनावलीमे आयल अिछ। तौल-नापक }यवxथामे टंक और मानी पथी चलैत छल। 4 मानी एक
टंक होइत छलैक। ओिह समयक 1 मानी आजुक 16 सेरक बरा-बर होइत छलैक।
खेतसँ पयत धानक Eाि¦क Eमाण छलैक जे पैघ गृहxथ डेिढ़या वा सवाईपर कज लगबैत छलाह।
कजक अदायगी अगहन मासमे नवका धान भेलापर होइत छलैक। िव_ापितक िलखनावलीमे कृिष सब`धी
चच िवलJण ढंगसँ कएल गेल अिछ।
अxतु...!