िव_ापितक रचनामे िवरह वण>न
िव_ापित अपन वहुमुखी Eितभाक पिरचय अपन रचनामे देलि`ह अिछ, मुदा का}य Eितमाक वाxतिवक
पिरचय सुनक िवरह गीतसँ होइत अिछ। Eेमक Eगाढ़ता संयोगमे निह िवयोगेमे होइत छैक। महाकिव राधाक
िवरह-वेदनाक सजीव आ मम>xपश® वण>न कएलि`ह अिछ। जॱ सूर िवEलभ kृंगारमे गोपीक वेदनाक टीसकT
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ejournal 'िवदेह ' २५४ म अंक १५ जुलाइ २०१८ (वषᭅ ११ मास १२७ अंक २५४ )
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Ñमर गीतक अ`तग>त उजागर कएलि`ह तँ िव_ापित सू³म दृिµसँ राधाक मनोदशाक िवछोहावxथाकT िवरह गीत
´पमे उजागर कएल अिछ।
समयानुकूल िवरिहणीक िxथितक xवाभािवक वण>नमे िव_ापितक कलम माजल छि`ह।
सािहय शाxLमे kृंगार रसकT रस राजक संÂा देल गेलैक अिछ। कमनीयताक कारणT अ`य सभ
रससँ एकर xथान उच मानल गेलैक अिछ। किवक वण>नमे सयता रहबाक ....... ई सयता Eेम वण>नमे
सविधक पाओल जाइत अिछ।
Eेमक िचLणमे ‘िवरह’कT महवपूण> xथान देल जाइत छैक। िवरहक ¥ारा Eेमक Eगाढ़ताक पूण> पिरचय
भेटैत छैक। िवरह ओ कसौटी िथक जािहपर Eेम सुवण>क परीJा होइत अिछ। एकर अिधकतामे Eेमी एवम्
EेिमकाकT एक दोसराक Eित वाxतिवक भावावेश एवम् त`मयता होइत अिछ। िवरह Eेम जीवक एक मम>xपश®
घटना िथक। एिहसँ Eेमक पिरपुिµ होइत अिछ। िवरह एक Eकारक पुट िथक। िबनु पुटे वxLपर रंग निह
चढ़ैछ।
सािहय-दप>णमे उ²लेख अिछ-
“न िबना िवEलभेन संयोग: सुखमुते, कषािमते िह वxLादो भूयान राग: Eव¶त।”
अथत् िबनु िवरहक Eेमक xवतंL सा निह। एही ´पT िबनु Eेमक िवरहक अिxतव निह। Eेमक
अिºनकT Eजविलत करैछ िवरह-पवन, Eेमक अंकुरकT बढ़बैछ िवरह जल, Eेम दीपक वि>काकT उस कबैछ
िवEलभ। िवरह-वेदना मधुममी होइछ। एिहमे ´दन एवम् आमोद सामने मािलत होइछ। संयोगक अवxथामे
हृदयमे आशा एवम् िनराशाक ओतेक ¥`¥ निह होइत अिछ जतेक िवरहक अवxथामे। वरहमे वासनाक
अ`धकार Eाय: लुत भए जाइत अिछ तथा Eेमक िवशुË अनुभूितमे िवरही डूिब जाइत अिछ।
kृंगार तथा िवरहक एतेक महवकT जनैत िव_ापित अपनाकT ओिहसँ फराक कोना रिखतिथ? एिह िवरह
वण>नक हेतु िव_ापितक लेखनी सेहो चलल आ चलबेटा निह कएल अिपतु अपना रचना शि±तक भाव एवम्
अनुभूितक बलसँ सxत भारत वष>कT भाव-िवभोर कए देलक।
िवरह-वण>नमे िव_ापित हृदयक अनेक भावकT िनरलंकािरक भाषामे रिख सरलतासँ िचिLत कएल अिछ
जे ओ भाव सभ हृदय पटलपर xवभावत: अपन अिधकार xथािपत कए लैछ।
िव_ापितकT महाकिव कहएबाक एक Eधन कारण ईहो िथक जे िवरह एवम् िवरहक प¢ात् िमलनक
वण>नमे िहनकर xथान उचम रहल अिछ। एिह िमलनमे ओ जे अपन xवाभािवकता भवुकता सु`दर क²पना
तथा प_ योजनामे कमनीयता देखाओल अिछ से एक महान किवए सँ सभव भए सकैछ। Eेम सूLमे ¦िथत
नायक लोकिनक िचL हुनक का}यमे सहसा जीवनक ययलय Eदिश>त कए देलक।
पं. जगाथ सािहय दप>णमे िवरह अथवा काम दशाक दश अवxथा कएल गेल अिछ-
अिभलाषाि¢`ता xमृित गुण कथनो ¥ंग संEलाप उ`मादो }यािधज>ड़ता मृित िरित दशाLeय कामदशा
अथत् xमरण, गुण-कथन, अिभलाषा, मूछ,}यािध, उ¥ेग, Eलाप, जड़ता, उ`माद एवम् मरण। एिह दस अवxथाक
अितिर±तो अनेक भावक िचLण िव_ापितक कएलि`ह अिछ। िवरहक महवपर दृिµपात करैत िव_ापित
िलखैत छिथ-
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“जेहन िवरह हो तेहन िसनेह।”
Eेमक असली xवादक अनुभव िवरहेक अवxथामे वाxतिवक ´पसँ भेटैत अिछ। िव_ापितक िवरह
}यिथता रािधका अनिभÂ छिथ। हुनका समीपमे निह छिथ`ह। राधा हुनक िवयोगमे शु¤ शीष सुमनक
सदृeय धाराशािलनी छिथ। हुनक अkुEवाहसँ भूिम कद>मचु±त भए गेल अिछ। राधा ओिह थालबला भूिमपर
लेटा रहली अिछ। हुनक सखी सभ कृ°णक आगमनक आsासन दैत छिथ`ह पर`तु ई आsासन िवरहिºनमे
घीक काज करैत छि`ह। िहनक यौवन िवरहक वेदनासँ िदनानुिदन Jीण भए रहलि`ह अिछ। ..... हुनक
}यथा अिधकतर भए जाइत छि`ह।
िव_ापित राधाक हृदयक मनोवैÂािनक वण>न करैत छिथ-
“अंकुर तपन ताप यिद जारब, िक करब वािरदमेहे,
ई नव यौवन िवरह गमाएब िक करब से िपया ने हे।
हिर हिर की इए दैव दुराशा,
िस`धु िनकट यिद कंठ सुखाएब के दूर करत िपया सा।।”
एिहठाम दृµा`त दए रािधका जे अपन हृदयक दुख रखलि`ह अिछ से सहृदय संवेध िथक। सहसा
भावावेशमे आिब िवधाताकT ‘हिर-हिर की दए वैव दुराला’किह भस>ना करैत अिछ। एतए मधुमणी वेदनाक िचLण
कएल गेल अिछ।
सखीक सवादसँ जखन काज निह चलैत छि`ह तखन राधा xवम कृ°णकT रोकबाक Eयास करैत छिथ-
“माधव तोहे जनु जाए िवदेशे
हमरो रंग रभस लए जएबए लएवह कोन संदेशे,
बनिह गमज क´ होइत दोसर मित िवसिर जएवए पित मोरा।
हीरा मिण मािणक एको निह मगव फेर
मगव पहु तोरा।।”
एतए राधाक Eेमक अलौिकक रसाxवाद अिछ। तक>क अनुसार आदान-Eदान सेहो होएबाक चाही। रंग-
रभसक Eित बदल की दए सकताह? ओ िथक कृ°णक Eेम। राधाक याचना। फेर मगव पहु तोरा, िन:xवाथ>
Eेमक भाव xपµ ´पसँ Eदिश>त भेल अिछ।
कृ°ण मथुरा Exथानक वातसँ सपूण> गोकुल शोका कुल भए गेल अिछ। सव>L अkुक Eवाह एवम्
क´ण चीकार Eारभ भए गेल-
अव मथुरापुर माधव गेल, गोकुल
गोकुले उछलला क´णाक रोल नयन जले
देख बहए िहलोल।
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राधा बहुत िदनसँ आशा लगौने छलीह जे कृ°ण औताह। अविधक अवसान भऽ गेल। बाट तकैत-तकैत
........... भए गेलि`ह। अ`तमे िनराश भऽ िवलाप करए लगलीह।
लोचन धाम फेदायल हिर निह आएल रे,
िशव-िशव िजवओ ने जाए आस अ´ झाएल रे।
पिहने रािधका कृ°णक Eेमक के`h िव`दु छलीह। एखन सभटा िवपरीत भए गेलि`ह अिछ। तखन
अपनाकT सॉंझक तारा बुझैत छिथ। जकर दश>न अशुभ होइछ, संगिह भादवक चौठीक चान अपन मुखकT
बुझैत छिथ जकर द>न अशुभकारी मानल जाइछ- िवरहािºनमे दºध रािधकाक लेल ई जतबा आ¢चय>क िवषय
भेल ओतबए लाजोक। िवरहािºनसँ जज>िरत राधाक हृदयक टीस xपµ अिछ-
“की हम सॉंझक एकसिर तारा, भादवचौठीक शशी,
इिथ दुहु झझ कओन मोर आना जे पदुहँिख न हेरिल।।”
कािलदासक िeत अपना िवलापमे कहैत छि`ह-
“मदनेन िवना कृतारित: Jण माL िकल जीिवतेितमे,
वचनीय िमदं }यविxथतं रमणxवा मनुयािम।”
य_िप।
एतएव देखैत छी जे िव_ापित कािलदासहुक िवरह-वण>नसँ टिप जाइत छिथ। एतए िवरह वण>नमे किवक
क²पनाक चातुयदश>नीय अिछ-
“लोचन नीर तटिन िमर माने, ततिह कलामुिख करए सनाने।
सरस मृणाल करहजप माली, अएिनस जप हिरनाम तो´नी।।”
अथत् िवरिहणी रािधका नयनक अkुसँ नदीक िनमण कए ओहीमे xनान कए रहल अिछ, तापय> जे
ततेक अkुपात भेलि`ह अिछ जे ओ नारीक ´पधारण कए लेलक अिछ।
कृ°णक िमलनक आशा समात भए गेलापर नाियका राधा अपन सौ`दय>क याग करए लगलीह अिछ।
माL शरीर एवम् xनेह बिच गेल छि`ह-
“सरदक रसधार मुख ´िच सोपलक हिरन के लोचन लीला।
केसपाल लए भामिर के सोपलक पाए मनोभव पीला।।”
पावसकालीन िवरहो¥ेगक एकसँ एक उम प_ पदावलीमे पाओल जाइत अिछ। दु:खािभभूत राधाक
क´ण `दन हृदय िवदारक एवम् क´णोपादक अिछ। एिह समयक Eयेक वxतु जे संयोगक अवxथामे
आन`द दायक अिछ राधाक हृदयकT िवदीण> कए रहलि`ह अिछ। िEयतमक िवरहमे ओ सभ वxतु कµदायक
छि`ह।
सिख हे हमर दुखक निह ओर...।
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िव_ापित कह..... िदन राितया।।
एिह पदक अJर अJरसँ मºन हृदयक हाहाकार Eित Åविनत भए रहल अिछ। दुखक आिग वालामुखी
बिन फूिट पड़ल अिछ। हिर िबनु केसे गमाओल िदन राितयाक भावक किवता रवी`hनाथ सेहो िलखलि`ह
अिछ-
तुिम यिद नादाओ, करो अमाम हेला।
केमन करे कारबे आमार एमन बादल बेला।।
संxकृत सािहयमे एिह Eकारक अनेक वण>न अिछ-
“इतो िवधु¥²ली िवलिसत िमत: केतिकतरो,
xफुरÚग`ध Eोधजलद िननाद xफूिज>तिमत:
इत: केिलीड़ा कलकलख: प³मल¥श
कथं भाxय`तेते िवरह िदवसा: संमृतरसा:।।”
राधाक Eेमक त`मयता एतेक बिढ़ गेल अिछ जे ओकर वश`त निह भए सकैत अिछ। ओ कृ°णक
नाम लैत-लैत एतेक त`मय भए गेल छिथ जे ओ अपनाकT xवयं कृ°ण मानए लगैत छिथन तथा राधा-राधा
जपए लगैत छिथ। तJणिह हुनका अपन वाxतिवक दशाक Âान भऽ जाइत छि`ह। तथा िवरहक तीवß
वेदनासँ ओ आुल भए उठैत छिथ।
अहुखन माधव-माधव रटइत राधा भेिल मधाई।
भेल स`देह।।
एतए Eेम पराकाRापर पहुँिच गेल अिछ। नाियका राधाक ´पमे सेहो तथा कृ°णक ´पमे सेहो दुनू
अवxथामे मम>}यथा सहैत छिथ। एिह पदमे िव_ापित Eेमक त`मयताक एहन िचL उपिxथत करैत छिथ जे
संसारक सपूण> सािहयमे अपन सभता निह रखैत अिछ। इिह Eकारसँ िवरहमे िमलन एवम् िमलनमे िवरहक
वण>न िव_ापितिहक उकृ°ता िथक।
िव_ापितक िवरह वण>न कएक िवशेषता ई अिछ जे हुनक नाियका िवरहमे रिहतहु अपन भाºयक दोष
दैत छिथ नायकक निह। िहनक रािधका कुलवती ललना छिथ तT Eेममे जतेक बाधा, यातना आर जतेक
}यथा सहैत जाइत छिथ हुनक Eेम सोना जकy ओतेक चमकैत जाइत छि`ह। xवàोमे ओ कृ°णकT कटुि±त
निह कहैत छिथ। अपन कम>क दोष तथा िक करत नाए दैव भेलवाम।
एिह Eकारे अिछ-
“सिख किह कहब अपतोष, हमर अभाग िपयाक निह दोष।।”
अ`तमे युग-युग जीवथु लख कोष हमर अभाग हुनक निह दोष।।
िवरिहणीक िचLण कािलदासक श»दमे-
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“क²याण वुËैरथवा तवाणं न कामचारी मिमशंक नीय:।
ममैव ज`मा`तर पातकान िवपाक िनxफूज>थुर: Eस³य।।”
सीता सेहो पूण> ज`म पापकT अपन दुखक कारण मानैत छिथ। एक xथलपर तँ राधा िनराश लऽ
मृयुक अिभलाषा करैत छिथ जे भावोपूण> अिछ-
“आन करह िहय िविह कएल आन,
अवहु न िनक सभ किठन परान।।”
िव_ापितक िवरहमे Eकृितक उ×ीपन, ´पक िचLण kृंगार रसक xथायी भाव रितकT जा¦ह करबामे
सफल भेल अिछ। जा¦तावxथामे तँ कृ°णसँ िमलन असभव अिछए, xवàहुमे नाियकाकT कृ°णसँ िमलन निह
भऽ पबैत छि`ह। तT नीन निह होइत छि`ह-
“सपनहुँ संगम पाओल, रंग बढ़ाओल रे
से मोर िविह िवधटाओल नी`दओ हेरायल रे।।”
िन`द होइति`ह कोना? ओ तँ िEयतक संग िवदेश चल गेलि`ह-
“सपनेहु ितलाएक त`ह सॲ रंगे,
िन`द िवदेसल ति`ह िपआ संगे।।”
कािलदासक मिणी- ‘वंिहतxम िEयेित’किह कऽ पितक िवरहकT ........... करैत छिथ। िक`तु एतए
काकक भाषासँ िEयतमक आगमनक EतीJा एवम् आकुलताकT नव जीवन देल गेल अिछ-
“काक भाष िनज भाषहु रे, िपय आओत मोरा
Jीर खीर........................ कनक कटोरा
सोमे चलु.................. िपआ आओत मोरा।।”
जखन िवरहक कµ असहय भऽ जाइत छि`ह तँ स`देश पाठवए चाहैत छिथ-
“के पितया ले जाओत रे...। पास भेल साओन मास।”
िव_ापित िवरहक सू³मसँ सू³म दशाकT देखलि`ह तथा ओिहसँ अपन हृदयक सब`ध xथािपत कएलि`ह।
ई िवरहक Eयेक दशाक वण>नमे अनुभूित पJ सव>था ऊँच xतरक एवम् मनो¦ाही रहल अिछ। िव_ापित
नायक-नाियका दुनूक िवरहक िचLण कएलि`ह मुदा xमरणीय जेहन आकष>क राधाक िवरह वण>न भेल अिछ
तेहन कृ°णक निह यथा-
“अइसन नागर अइसन नव नागिर अइसन सप मोर,
राधा िबनु सब बाधा मािनए नयन तेिजअ नोर।।”
वाxतवमे राधा एवम् कृ°णक Eेम ‘सागर सागरोपम्’िथक।
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िवरहमे सजनक Eेम आओरो अिधक िनखिर जा उठैत अिछ। िव_ापित xवयं िलखैत छिथ-
“सुजनक Eेम हेम समतूल,
द´इते कनक दुगुन होए मूल।।
टुटइते निह टुट Eेम अáुत,
ये सन बढ़ए मृणालक सूत।।”
िव_ापितक िवरह वण>न िवs सािहयमे अपन xथान मूघ>`य बनौने अिछ। िहनक भाव Eारभमे लौिकक
xतरक तथा वैयि±तक रहैत अिछ, िक`तु जखन गभीरताकT Eात करैत अिछ तखन अलौिकक, समिµ सूचक
एवम् िवsक िनिध भए जाइत अिछ।
भाव पJक संगिह संग िवरह वण>नमे िहनक कला पJक समावेश सेहो पूण> ´पसँ भेल अिछ।
कलामकता कृिLम निह अिपतु xवाभािवक अिछ। अनुभूित }य±त करबामे सरलता अपनाओल गेल अिछ।
श»द चयन, वाºवैदºध, एवम् सु`दर उि±तसँ िहनक वण>न अलंकृत एवम् िवभूिषत अिछ। कलापJक रसक
पिरपाकमे सव>L सहायक भेल अिछ।
एिह EकारT देखैत छी जे िव_ापित अ`य भाषाक िवरह-वण>नसँ अिधक उकृµ वण>न कएने छिथ। अ`य
िवशेषताक संग भाव पJ kेR रिहतहु कलापJक उपेJा निह भेल अिछ। भावक गभीरताक अिभ}यि±तक
मनो वैÂािनक ढंगसँ कएल गेल अिछ। िमिथलाक संxकृितक अनुपालन सव>L करैत िवरिहणीक श»द-श»दसँ
वेदना िन:kृत भेल अिछ।