िमिथलाक िवभूित आयाची िम᮰
िमिथलाक भूिम एहन अिछ जािहठाम अदौसँ माँ मैिथलीक कोिखसँ िव ᳒ा भा᭭कर लोकिन ज᭠म ᮕहण
करैत रहलाह अिछ।
एिह सᳯरसबक माᳯटमे माँ मैिथलीक कोिखसँ एक एहन सूयᭅक उदय भ ेल जे ज᭠म-ᮕहण कᳯरतिह अपन
रि᭫मसँ िमिथला, मैिथल आ मैिथलीक ᭃेᮢक े ँ आलोᳰकत कएल। िव᳒ा᭟ययन कऽ कौिलक मयाᭅदाक रᭃा
कएलि᭠ह। एहन ᮧात: ᭭मरणीय संतोषी, तप᭭वी, िनलᲃभी एवम् िन रासᲦ ᳞िᲦ भवनाथ िम᮰ छलाह।
िहनकासँ पूवᭅ आ पछाितयो अनेक सर᭭वतीक वरद पुᮢ लोकिनक नाम लेल जा सक ै छ जे िमिथलाक रिहतᱟ
िमिथलेᱫर ᮧा᭠तोमे अपन नामो᭔वल कएने छलाह ओ लोकिन िथकाह-
“गौᱫम, कणाद, या᭄व᭨य, उदयनाचायᭅ, पᭃधर, म᭛डन िम᮰, व ाच᭭पित, जय क ृ ᭬णा, ᮢीलोचन, हᳯर
िम᮰, गंगेश, िव᳒ापित, च᭠दा झा,भारती, गागᱮ, ल᭯मीनाथ ᮧभ ृित।” एᱠमे अिधकांश सᳯरवसक माᳯटमे उ᭜प᳖
भेिनहार छलाह। तप: पूत, परम ᭄ानी, शाᳫानुसार चलिनहार एव म् नव᭠यायक िन᭬णात भवनाथ िम᮰
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ejournal 'िवदेह ' २६० म अंक १५ अ टूबर २०१८ (वषᭅ ११ मास १३० अंक २६० )
मानुषीिमह सं᭭क ृ ताम्ISSN 2229 -547X VIDEHA
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आजीवन ककरोसँ ᳰकछु याचना निह कयल ते ँ
ई अयाचीक नामसँ बᱟ चᳶचत भऽ गेलाह। अपन उपनाम अयाची
सँ जगत िवयात भेलाह। अभाव ओ असंतोषक े ँ अपना लग किहयो फटक े निह देलि᭠ह। माᮢ सवा कᲶा बाड़ी
जगह खेत ओ खᳯरहानक काज करैत छलि᭠ह। एहीसँ जीिवका चलैत छ लि᭠ह। दुवाᭅसा दूिभक रस खाय रहैत
छलाह। तेँ
अयाची साग-पात खाय काया ठाढ़ रखने छलाह। भव नाथक ‘अयाच ी’ टेक तोड़बा लए दैिवक आ
लौᳰकक ᮧलोभवन सभ आएल मुदा ई टस-सँ-मस निह भेलाह।
एिह तरह संक᭨पक पालनमे िहनक धमᭅ प᳀ी भवानीक सेहो सराहनीय सहयोग रहल। एहन आि᭭तक
द᭥पितक कोिखसँ अ᭞भुत सं᭭कारी पुᮢक ज᭠म भेल कहबी छैक ‘बाढ़े पूत िपता क े धमᱷ’ बालकक नाम शंकर िम᮰
राखल गेल। शंकर शंकरे समान छल। ᭜यागसँ अमर᭜वक ᮧाि᳙ होइछ। असली सुख ᭜यागेसँ भेटैछ। ᭜यागी लोकक
तुलना ककरोसँ निह कएल जा सक ै छ। अयाची ᳇ारा सांसाᳯरक सुखक ᭜याग एक ᮧेरणा पुंजक ᱨपमे अिछ।
वा᭭तिवक ओ िविश᳥ आन᭠दक अनुभूित ᭜यागीक े ँ होइछ। िबना संकोच कहल जा सक ै छ जे अयाची पारखी
छलाह तेँ
ने ओ ᭜याग मय जीवन जीबाक आदशᭅ उपि᭭थत कएल। एिह स᭠दभᭅमे किवक उिᲦ अिछ-
“ध᭠य-ध᭠य मातृभूिम, सकल ᭄ान-गुणक खान
कतᱟ सबा कᲶा माᮢ बाड़ीक साग-पात,
औखन चमक ै त अिछ अयाचीक ᭭वािभमान।।”
पूजा-पाठमे लीन रहिनहार अयाची पलखित भेलापर िव᳒ा िवलासमे लीन होिथ। ᱟनक याित सवᭅᮢ
पसᳯर गेल छल। जखन दूर-दूरसँ िज᭄ासू छाᮢ लोकिन शंकाक समाधा नाथᭅ िहनका लग अबैत छल तँ ई अपन
बालकक ेँ िभड़ा देिथ। आग᭠तुक छाᮢक े ँ झुझुआइत देिख अयाची बुिझ जािथ जे बालक शंकरक वयस कम ते ँ ई
लोकिन अपन अपमान बूझैत छिथ तखन ओ किह देिथ᭠ह जे शंकरक वयस निह देखू।
बालक शंकरक ᮧखड़ िव᳇ताक थाह पािब ओ लोकिन ᭭वीकारैत छला ह जे िमिथलाक जतेक नाम सुनल
तािहसँ बेसी एिहठामक िवशेषता अिछ। अयाची पुᮢ शंकरक सं᭭कार देिख मुᲦ क᭛ठसँ िहनक भायक भूᳯर-भूᳯर
ᮧशंसा करिथ। भवनाथ जᲅ महादेव तᲅ भवानी स᳒: पावᭅती ᮧतीक छ लीह। िनधᭅन पितक अनुगािमनी,सती
सा᭟वी ओ परम सिह᭬णु छलीह। टक ु रीसँ सूत काᳯट वᳫ अपन आ पित क हेतु ओᳯरआउन कऽ लैत छलीह।
अभावी घर रिहतो आित᭝य भावमे अᮕगणी छलीह। जन᮰ुित अिछ एक समय अितिथ-स᭜कारक हेतु घरमे
ओᳯरआउन निह भेलापर लोटा ब᭠धकᳱ रािख भोजन सामᮕी जुटाए बा ड़ीसँ ख᭥हाᱨ उपाड़ैत छलीह ᳰक एक
तमघैल ᭭वणᭅ मुᮤा ᮧा᳙ भेलि᭠ह। भवानी पुलᳰकत भऽ गेलीह जे आब दᳯरᮤीक अ᭠त भऽ जाएत। मुदा अयाची
लोिह ᭭वणᭅ मुᮤाक तमघैलक ेँ अपन पुᮢ शंकरक ᳇ारा राजाक कोषमे जमा करा देलि᭠ह ᳰकएक तँ म ाᳯटक धन
राजकोष िथक। एिहपर ᱟनक प᳀ी िवचिलत रिह गेलीह। एकरा दैव ी ᮧलोभन किह सक ै त छी।
िमिथलाक स᭤यता ओ सं᭭क ृ ित संसारक स᭤यता ओ सं᭭क ृ ितसँ ᮰े᳧ अि छ। िविभ᳖ ठामक िव᳇ान एिहठाम
वषᱷ रिह अपन ᭄ान िपपासाक े ँ शा᭠त करैत छलाह। एिहठामसँ स᭤य ओ सुसं᭭क ृ त भऽ जाइत छलाह। अपन
सं᭭कारक पᳯरचय लग-भग पाँचे वषᭅक अव᭭थामे अयाची पुᮢ शंकर िम िथलेशक ेँ जखन देल तँ ओ अवाक ् रिह
गेलाह आ अयाचीक तप᭫ययाक ᮧसादात् बालक बुिझ नतम᭭तक भऽ अिभ न᭠दन कएलि᭠ह- शकरक उिᲦ :
“वालोहं जगदान᭠द, नमे बाला सर᭭वती,
अपूणᱷ पंचमे वषᱷ वणᱷयाम जगᮢयम्।”
भवनाथ ओ भवानी दुᱟक कमᭅ-कमलसँ धमᭅक जे पराग झड़ल तािहसँ िमिथलाक माᳯट अपलिखत अिछ।
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अयाचीक िनलᲃभता ᮧ᭭ट ᮧमाण तखन भेटैछ जखन िमिथलेश बालक शंक रक सं᭭कारसँ संतु᳥ भऽ अपन
वेश कᳱमती र᳀क माला दगᭅिन उताᳯर शंकरक गरामे पिहरा देल आ ए क मोटरी ᭭वणᭅ मुᮤाक संग ᭭वयं हाथीपर
बालक शंकरक ेँ अयाचीक डीहक माᳯट माथमे लगएबाक हेतु नेने एलाह। िमिथलो िचत ढंगसँ त᭜कालीन
महाराजक स᭥मान कएल। महाराज िहनक दै᭠य दशा देिख खोᳯरस हेतु ᮧयाᭅ᳙ धन ᮧदान करबाक ई᭒छा ᮧगट
कएल तँ अयाची करव कहल-
“अपने हमर टेकक ेँ निह तोड़ू। हमरा कोनो व᭭तुक ᮧयोजन निह अिछ। ई ᮯत िनमिह जाय इएह हमर
आक ं ᭃा।”
िमिथलेश ᱟनक चरण रज लऽ अपना कए ध᭠य मानल। बादमे भवानी बालक शंकरक कमाइ पुर᭭कारसँ
िभ᭄ करोलि᭠ह तँ ᮧस᳖ भेला जे आब दᳯरᮤता भािग जाएत मुदा त᭜ ᭃणिह बालक शंकरक ज᭠मक समय मरनी
चमैनक ेँ िनछाउर ᳰकछु निह देने छलीह से मोन पिड़ गेलि᭠ह।
तािह समय सहषᭅ कहल जे ई सभटा र᳀ ᭭वणᭅ मरनीक ेँ बाजा कए देल जाय। दुनू ᮧाणीक मतैयसँ मरनी
डरीनक ेँ दऽ देल गेल। ओहो एिह ᮧा᳙ धनक े ँ धमᭅ काज बुिझ पैघ पोखᳯर खुनाए देलक। जे मधुबनी िजला᭠तगᭅत
िव᳒मान अिछ, मुदा काल-ᮓमे ई पोखᳯर िवक ृ त ओ भथन भऽ गेल अि छ जे औखन चमिनया-डावर नामसँ
जानल जाइछ।
एखनᱟँ ई ᳣ोक अयाची िम᮰ पुᮢ शंकर आ पᭃधर िम᮰क ᮧित अिछ-
“शंकर वाच᭭पितयो:
शंकर वाच᭭पित सदृशी,
पᭃधर ᮧित पᭃी भूतो
न भवित।”
अथाᭅत् शंकर ओ वाच᭭पित तँ महादेव आ वृह᭭पितये छलाह। कहल जाइ छ जे अयाचीक शंकर पᭃधर
िम᮰क बाद भेल छलाह। ईहो अनुमान अिछ जे िम᮰ उपािध- ओिह सम यमे िव᳇ान लोकिनक होइत छल। खेदक
िवषय अिछ जे एहन उट ᭠यायक पि᭛डत अयाचीक कᳱᳶᱫ गाथाक को नोटा ᮧमािणक पोथी- आ िहनक ज᭠म
स᭥ब᭠धी ई. सनक पᳯरचय- ठोस ᱨपमे निह ᮧा᳙ अिछ।
अयाचीक िनमाᭅउल भूिम सᳯरसब अ᳒ाविध म.म. सर गंगा नाथ झा ए वम् ᱟनक पुᮢ लोकिन सन
िवभूितक ज᭠म देने अिछ। किव सेहो अयाचीक डीहक माᳯट माथमे लगबैत किह उठैत छिथ-
“हे डीह!अमर कᳱᳶᱫक िनधान
जकरा कण-कणमे ᭭वािभमान।
िथक िवᮧ अयाचीक वᱫᭅमान
से माᳯट िथक च᭠दन समान।
सबा कᲶा बाड़ीक साग
रखने छल अयाचीक पाग।।”
अ᭠तमे ᮰ा सुमन चढ़बैत एिह िमिथलाक िवभूितक े ँ नमन करैत छी।
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