तिरहुता लिपिक उद्भव आ विकास- गजेन्द्र ठाकुर
(भाग-१)
लिपि? आ लिपि छी की? लिपिक उद्भव।
एजिप्टक लोक कहै छथि जे हुनकर लिपिक आविष्कार टोथ देवता केलनि, मेसोपोटामियाक लोक कहै छथि जे हुनकर लिपि नीबो देलनि, ग्रीसक लोक ग्रीक लिपिक आविष्कारक हर्मीजकेँ मानै छथि आ भारतमे एकर श्रेय ब्रह्माकेँ जाइ छनि।
पाषाणकालक लोक मारते रास चित्र लिखलनि आ ओहीसँ चित्रलिपिक प्रेरणा भेटल। मुदा ई चित्र सभ चित्रलिपि नहि छल, कारण एकचित्रक सम्बन्ध दोसर सँ नहि छल आ सभटा चित्र फराक-फराक छल। मुदा ओहिसँ पाछाँ जा कऽ चित्रलिपिक प्रेरणा भेटले होएत।
पहिल-लिपि: चित्रलिपि
एखन धरिक खोजबीनसँ पता चलैए जे चित्रलिपिक विकास भेल- टिग्रिस-यूफ्रेट्सक कात- मेसोपोटामिया- (सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे), नील नदीक कात (एजिप्टमे) आ क्रीट (ग्रीस) मे।
उपरका खोह आ धारक कातक पाथरपर लिखल चित्र आ चित्रलिपिमे अन्तर बिकछेबाक खगता अछि। अहाँ हमरासँ प्रेम करै छी तँ हमर चित्र लिख देलहुँ, कोनो शिकार करै छी तँ से चित्र लिखलहुँ। से अहाँ भेलहुँ लिखिया। से भारतोमे बहुत ठाम छल, मुदा लिखिया लिपिकार चोट्टहि नहि बनि जाएत। लिपिकार जे चित्र बनेलक से कलकारी लेल नहि वरण् खगता लेल। से एतऽ सूर्य बनेबाक लेल वृत्त बना दियौ, पूरा चित्र बनेबाक खगता एतऽ नै अछि, फेर दूटा एहने चित्रक सम्बन्ध स्थापित करू, दूसँ तीन.. आ चित्र लिपि तैयार।
से चित्रकार चित्र लिखलक, आ लिपिकार बनेलक। लिपिकारकेँ लिखिया नहि कहि सकैत छिऐ। आ से भेल टिग्रिस-यूफ्रेट्सक कातक (असीरिया, बेबीलोन आ सुमेरमे), नील नदीक कातक (एजिप्टमे) आ क्रीट (ग्रीस) मे ईजियन आ मिनोअन सभयताक लोक।
चित्रलिपि: चित्रात्मक चित्रलिपि आ विचार/ भावनात्मक चित्रलिपि
बाहरसँ दुनू चित्रलिपि अछि मुदा चित्रात्मक चित्रलिपि चित्रक मात्र बोध करबैत अछि जेना वृत्त सूर्यक बोध करेलक। मुदा जखन एकर प्रयोग गुमार लेल होमए लागल तँ ई भऽ गेल विचार आकि भावनाक प्रतीक आ ओहि लिपिक नाम भेल विचार/ भावनात्मक चित्रलिपि। आब कलाकारीसँ बेशी खगता महत्त्वक भेल आ ताहि लेल चेन्हक आकार सेहो छोट भऽ गेल। आइयो चीन आ जापानमे विचार/ भावनात्मक चित्रलिपिक प्रयोग होइत अछि। मुदा पध-आधारित लिपि चीनमे खतम भऽ गेल, मुदा जापानमे ओ आइयो प्रयोगमे अछि।
चित्र-ध्वनि लिपि
भाषाक उद्भव आ विकास भेल। जेना ओतए ध्वनिसँ सम्बन्धित शब्द प्रवेश केलक तहिना लिपिमे सेहो भेल। आ चित्र-ध्वनि लिपिक विकास भेल। एहिमे विचार-भावनाक संग ध्वनिक प्रवेश सेहो भेल आ पाछाँ जा कऽ ओ ध्वन्यात्मक लिपि बनल।
ध्वन्यात्मक लिपि
ध्वन्यात्मक लिपिमे ध्वनि आ वस्तु-व्यक्तिक बीच सम्बन्ध स्थापित करैत चिन्ह बनल। ध्वन्यात्मक लिपिमे ध्वनि वा ध्वनि-समूह लेल चिन्ह बनल। ध्वन्यात्मक लिपिमे पोलीफोन (एक चिन्हक अनेकार्थ वा ध्वनि) आ होमोफोन (अनेक चिन्ह द्वारा एक ध्वनि वा अर्थ) मिला कऽ सेहो अर्थ/ ध्वनि-निर्णय नहि कऽ पबैत छल आ ताहि लेल तेसर ध्वनि-चिन्ह डिटरमिनेटिवक व्यवस्था भेल आ फेर अर्थ वा ध्वनि निर्णय सम्भव भेल।
एहि लिपिसँ पद-आधारित आ व्यंजन-प्रधान लिपि बनल।
स्थान-लाघव आ प्रयत्न लाघव
एतए प्रयत्न-लाघवक चर्च करब आवश्यक अछि। प्रयत्न लाघव लेल कम प्रयाससँ अपेक्षित परिणामक प्राप्ति। माने भाषाक सम्बन्धमे कम शब्दमे सुस्पष्ट विचार व्यक्त करब, पैघ-ध्वनि लेल छोट सर्वमान्य ध्वनिक प्रयोग करब आ ओही हिसाबसँ लिपिक सन्दर्भमे पैघ चेन्ह लेल छोट चेन्हक प्रयोग करब। ओहिना स्थान-लाघव लिपिमे स्थान-कटौती लेल प्रयुक्त होइत अछि। टॊपिक १२ मे शब्द विचारमे लिपि-उच्चारण सम्बन्धी विशेष जानकारी भेटत। से प्रयत्न लाघवसँ कखनो काल ध्वनि अनचिन्हार भऽ जाइत अछि, आ ओकर रूपान्तर लिपिमे प्रत्न-लाघव आ कखनो काल स्थान-लाघ्वक संग होइत अछि।
पद-आधारित लिपि
पद आधारित लिपिमे प्रयत्न-लाघव आ स्थान-लाघव नहि रहैत अछि। एकरा एना बुझू जे तमिल लिपि अछि सिलेबल आधारित लिपि, रोमन लिपि अछि अल्फाबेट लिपि आ तिरहुता आ देवनागरी अछि अल्फा-सिलेबिक लिपि। माने जतऽ संयुक्ताक्षर नहि अछि से भेल अल्फाबेट आधारित लिपि। माने अंग्रेजी, जे रोमन लिपिमे लिखल जाइत अछि, मे संयुक्ताक्षर नहि होइत अछि, मात्र २६ टा अल्फाबेट होइत अछि, से ओ भेल अल्फाबेट आधारित लिपि। तमिलमे सिलेबल आधारित लिपि अछि। से ओ भेल सिलेबल आधारित लिपि। तिरहुता आ देवनागरी लिपिमे दुनू तत्त्व अछि से ओ भेल अल्फा-सिलेबिक लिपि। एहि तीनूक तुलना मोटा-मोटी वार्णिक (अंग्रेजी), मात्रिक (तमिल) आ वार्णिक आ मात्रिक (तिरहुता आ देवनागरी) छन्दसँ कएल जा सकैत अछि। मुदा एतऽ एकटा पेंच अछि, अंग्रेजीमे वर्णक गणनासँ जे मीटर निर्माण करब तँ लय नहि बनत से ओतऽ सिलेबल आधारित गणना करए पड़ैत अछि, आ किएक तँ ध्वनिक सम्बन्ध मात्र सिलेबलसँ छै, शब्दकेँ सिलेबलमे तोड़ल जाइत अछि। जापानी लिपि पद-आधारित अछि से ओतऽ ई झमेल नहि अछि, आ ओतऽ ध्वनिक ईकाई लेल जे शब्द प्रयुक्त होइत अछि तकर अनुवाद मोटामोटी सिलेबलमे कएल जा सकैत अछि आ ओही आधारपर हाइकूमे १७ टा ध्वनि पुरेबा लेल गणना होइत अछि । तिरहुता, देवनागरी आ ब्राह्मीमे जे बाजल जाइए सएह लिखल जाइए, आ एतऽ पाणिनीपूर्व आ पणिनिक परम्परामे ध्वनि आधारित सन्धिक निअम बनल अछि। कर्मधारय समासक विग्रह पदात्मक होइत अछि, महादेव भेला महान् देव, आ जँ दूसँ बेशी पद अछि तँ से भेल बहुव्रीहि- जेना लम्बोदर (नमगर जिनकर उदर से, माने गणेश)। अंग्रेजी (रोमन लिपि) मे बजबा काल सन्धि होइत अछि मुदा लिखबा काल नहि, मुदा ओतहुओ दीर्घ लेल डबल ए, डबल बी आदि प्रयुक्त होइते अछि, पंकचुएशन सेहो ई काज करैत अछि, हँ ओतऽ ट्रिपल ए नहि होइत अछि, मुदा हमहूँ सभ तँ दीर्घक बाद प्लुतकेँ छोड़िये देने छी। आ तही कारणसँ मैथिलीमे विभक्ति सटा कऽ लिखल जाइत अछि। तिरहुता आ देवनागरी लिपिमे दुनू तत्त्व अछि से मात्रिक आ वार्णिक दुनू छन्द एहिमे गणना कएल जा सकैत अछि। टॊपिक १ मे पृष्ठ १८ सँ गणना (मात्रिक आ वार्णिक) सम्बन्धी विशेष जानकारी भेटत। सिलेबल जेना शब्दसँ सम्बन्धित अछि पद तहिना समाससँ पहिलमे ध्वनि प्रमुख अछि आ दोसरमे पद (अर्थ)। से वएह पद आधारित लिपि ध्वन्यात्मक लिपिक विकास छल। जकर प्रमाण ऐतिहासिक रूपसँ उपलब्ध अछि, आ जतऽ सँ लिपिक असली विवेचन सम्भव अछि। आ चित्र-लिपिक रूपमे जाहि तीन गोट लिपिक चर्च भेल माने टिग्रिस-यूफ्रेट्सक धारक कात (सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे), नील धारक कात (एजिप्टमे) आ क्रीट (ग्रीस) मे एहिमेसँ टिग्रिस-यूफ्रेट्सक धारक कातमे सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे जे सभ्यता सभ क्रमसँ आएल ओहिमे पहिने सुमेरमे क्यूनीफॊर्म लिपिक प्रारम्भ भेल ४००० शताब्दी बी.सी.ई. (बिफोर कॊमन एरा)मे। बेबीलोन लोकनि सुमेरसँ ई लिपि सिखलनि आ हुनकासँ असीरिया लोकनि। माटिक सानल आ लोथ बनाएल पट्टीपर सुखेलासँ पहिनहिये नोकबला स्टायलससँ, मोटा-मोटी ३५० टा अक्षरसँ, ई क्यूनीफॉर्म लिपि लिखल जाइ छल जखन आ फेर रौदमे सुखाएल वा चूल्हिमे पकाएल जाइत छल। आधुनिक कालमे एकरा पढ़बाकश्रेय एकटा अंग्रेज हेनरी रॊलिनसनकेँ जाइ छनि। तेसर चरणक बाद धरि ई पद-आधारित बनि गेल छल। एजिप्टमे हायरोग्लाइफिक (हायरोग्लिफिक, हायरेटिक आ डेमोटिक) लिपि क्यूनीफॉर्म लिपिक समकालीन छल। एहिमे २४ टा चिन्ह रहैक जाहिमे सभटा व्यंजन रहैक। स्वर रहबे नहि करैक, से बहुत रास झमेल आ अस्पष्टता आबि जाइ छलैक, से ओकर निवारणलेल ओ लोकनि आर विशेष चेन्ह आ चित्रक प्रयोग करैत छलाह। ओ सभ लाल मोशि-कलमसँ पेपीरस पातपर लिखैत छलाह, ओही पेपीरससँ पेपर बनल अछि। क्यूनीफॉर्म आ हाइरोग्लाइफिक ई दुनू लिपि दहिनसँ वाम दिश लिखल जाइत छल। एहि दुनू लिपिक समकालीन लिपि छल चीनक लिपि से ऊपरसँ नीचाँ लिखल जाइत छल। पहिने एकटा शब्द लेल एकटा चिन्ह छल, मुदा फेर एकटा विचार लेल एकटा शब्दक प्रयोग होमए लागल। चीनक लिपिमे कोनो अल्फाबेट नहि अछि, ४०,००० चिन्ह अछि। एकर अलाबे एलमाइट सभ पहिने देशज रेखात्मक आ चित्र-प्रचुर अक्षरक प्रयोग केलनि मुदा फेर ओ लोकनि सेहो क्यूनीफॉर्म लिपि पकड़ि लेलनि मुदा ओतऽ ११३ चेन्ह जाहिमे ८०सँ बेशी पद-आधारित चेन्ह छल, केर प्रयोग ओ केलनि।
से एजिप्टक बदला लिपिक आविष्कारक मेसोपोटामिया (सुमेर, बेबीलोन आ असीरिया) क लोक रहथि, जे लिखबाक कलाक आविष्कर्ता छथि। जेना ऊपर चर्च भेल अछि, ओ लोकनि पहिने चित्र लिखलन्हि, आ किएक तँ चित्र बनेबामे बेसी समयक नोकशानी होइत छलन्हि से ओ लोकनि प्रयत्न-लाघव आ स्थान-लाघवसँ चित्रकेँ चेन्ह बना देलन्हि, चेन्हमे समानता आ समरूपता आनि रेखात्मक पद्धतिक लिपि बनेलन्हि। फेर ई चेन्ह ध्वनिकेँ प्रदर्शित करए लागल, आ एहि तरहक मोटामोटी ३५० टा चेन्ह बनल।
सीरिया-साइप्रस आ फिलिस्तीनमे जे खाँटी वर्ण आधारित लिपि बनल ताहूमे, फेर मिनोअन सभ्यतामे जे लिपि आविष्कृत भेल ओहिमे पद-आधारित लिपिक प्रभाव पड़ल। पद-आधारित लिपिक दूटा रूप चीनमे छल मुदा तकर प्रयोग चीनमे बन्द भऽ गेल मुदा जापानमे ई प्रयोगमे अछि जकर किछु चर्च ऊपर आएल अछि।
व्यंजन प्रधान लिपि
एकरा वर्णमाला वा वर्ण आधारित लिपि सेहो कहि सकैत छी। आन लिपि सभमे चेन्ह सभक संख्या ततबा बढ़ि गेल जे शिशु लेल ओकर सीखब असम्भव भऽ गेल। एहि लिपिक विकासक कारण छल प्रयत्न लाघव। एक्के लिपिमे अनेक भाषा लिखब सम्भव भऽ गेल।
टिग्रिस-यूफ्रेट्सक कात- मेसोपोटामिया- (सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे)क क्यूनीफॉर्म लिपि वर्णमाला नहि बनि सकल। एहि लिपिक सम्बन्ध सेमेटिक भाषासँ हेबाक प्रमाण अछि। चित्रात्मक फेर विचारात्मक, फेर ध्वन्यात्मक लिपि ई बनि सकल। मुदा ध्वन्यात्मक लिपि सेहो संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया आ क्रिया-विशेषणक आवश्यकताकेँ किछु सुधारक संग पूर्ण कऽ सकल। फेर ई पद-आधारित बनल आ एतहि एकर विकास खतम भऽ गेलैक।
बादमे जा कऽ जुरुथ्रुष्टक अनुयायी लोकनि मेसोपोटामियामे अपन लिपिकेँ व्यंजन प्रधान बनेलन्हि जकरा अर्द्ध-वर्णमाला कहि सकैत छी। मुदा ओहिमे कृत्रिम हेबाक प्रवृत्ति बढ़ल, आ ई प्रवृत्ति ब्राह्मीमे सेहो भाषा-वैज्ञानिक लोकनिकेँ देखा पड़ैत छन्हि।
क्रीटमे सेहो चित्र-प्रचुर रेखाकृतिसँ आगाँ बढ़ि १३५ चेन्हबला भावना-प्रधान आ ध्वनि-प्रधान लिपि बनेलन्हि। हिनकर लिखब वामसँ दहिन आ दहिनसँ वाम दुनू छल।
उतरबरिया सेमेटिक वर्णमाला
सीरिया-साइप्रस आ फिलिस्तीनमे मूल वर्णमालाक आविष्कार दोसर शताब्दी बी.सी.ई. मे भेल जकर नाम उत्तरबरिया सेमेटिक वर्णमाला छल। आ तकर बाद आनो-आन मूल वर्णमाला आविष्कृत भेल जेना आरामाइक, फिनीशिअन, ग्रीक आ ब्राह्मी आ ई लिपि सभ अनचोक्के आविष्कृत नहि भेल होएत वरण ओतहु वएह प्रक्रिया भेल हएत जे मेसोपोटामियाक लिपि संग भेल छल। मुदा एक स्तरक बाद मेसोपोटामियाक क्यूनीफॉर्म लिपि पद-आधारित लिपि बनि अपन खिस्सा खतम केलक ई लिपि सभ पूर्ण वर्णमाला बनि गेल।
भारतमे लिपि आ लेखनकला
नागार्जुनकोण्डासँ प्राप्त दोसर शताब्दीक एकटा मूर्तिमे राजा शुद्धोधनक दरबारक दृश्य अंकित अछि जाहिमे तीनटा भविष्यवक्ता भगवान बुद्धक माता रानी मायाक स्वप्नक व्याख्या कऽ रहल छथि। हिनका सभक नीचाँ बैसल लिपिकार तकरा लिपिबद्ध कऽ रहल छथि। भारतमे लेखनकलाक ई आइ धरिक सभसँ पुरान चित्र आधारित प्रमाण अछि। एहिसँ अतिरिक्त पुरान प्रमाण हड़प्पा संस्कृति, अशोकक अभिलेख आदि तँ अछिये। अशोकक अभिलेख आ हड़प्पा संस्कृतिक बीचमे सेहो मारते रास अभिलेख भेटलाछि जेना सोहगौराक ताम-पत्र अभिलेख, पिपरहबाक बौद्ध-भीड़ अभिलेख, महास्थान आ बर्लीक पाथर अभिलेख, आ भट्टिप्रोलुक अभिलेख।
भारतमे हड़प्पा सभ्यतामे पहिल बेर लिपिक प्रयोग भेल मुदा ओ एखन धरि पढ़ल नहि जा सकल अछि। एकर अभिलेख सभ छोट-छोट छैक सभसँ पैघ अभिलेखमे २६ टा चेन्ह छैक। धोलावीर (गुजरात) मे नग्रक द्वारपर एकटा साइनबोर्ड हेबाक प्रमाण अछि जाहिमे ९ टा चेन्ह छैक।
ब्राह्मी आ खरोष्ठी
ब्राह्मी वामसँ दहिन आ खरोष्ठी दहिनसँ वाम दिशामे लिखल जाइत अछि। मुदा दुनू भारतक वर्णमाला पद्धतिक आधारपर विकसित भेल अछि। अशोकक अभिलेख ब्राह्मी आ खरोष्ठी (मानसेहरा आ शाहबाजगढ़ी) दुनूमे भेटल अछि आ एकरा एकटा अंग्रेज जेम्स प्रिंसेप १८३७ सी.ई. मे ब्राह्मी पढ़बामे सक्षम भेलाह। खरोष्ठी पढ़बाक श्रेय सम्मिलित रूपसँ कर्नल मसोन आ जेम्स प्रिंसेप केँ देल जाइत अछि। एहि अभिलेख सभमे अशोकक नाम पियदस्सी लिखल छैक आ किछुमे असोक (अशोकक पालि-प्राकृत रूप) सेहो। अशोकक अभिलेखमे लिपिकरक चर्च अछि।
ब्राह्मी लिपि बहुत दिन धरि विकसित आ परिष्कृत/ परिवर्द्धित होइत प्रयोगमे रहलाअ एहिसँ भारतक आन लिपि सभक उत्पत्ति भेल मुदा खरोष्ठी लिपि अपने संग खतम भऽ गेल। अशोकक अभिलेखक अतिरिक्त इण्डो-ग्रीक राजा सभ एकर प्रयोग अपन मुद्रापर केलन्हि जाहिमे तर आ ऊपरमे ग्रीक आ ्खरोष्ठी लिपिमे राजाक नाम लिखल रहैत छल।
नारद-स्मृतिमे लिपिकेँ उत्तम आँखि कहल गेल अछि आ एकर सृजन ब्रह्मा केलनि तकर चर्च अछि।
बृहस्पति स्मृतिमे चर्च अछि जे छह मासक बाद स्मृति धोखा देमऽ लगैत अछि से पातपर लिखल आखरक सृजन ब्रह्मा केलनि।
चीनक विश्वकोष फा-वां-शु-लिनमे सेहो चर्च अछि जे वामसँ दहिन लिखल जाएबला लिपिक सृजनकर्त्ता ब्रह्मा छथि।
एहि लिपिक नाम ब्रह्मी लिपि छल आ से पाणिनी पूर्व व्याकरणाचार्य द्वारा स्वीकृत छल, मुदा पाणिनी व्याकरणक अनुरूप ब्रह्मी अशुद्ध अछि। से एहि लिपिक नाम ब्राह्मी पड़ल। पाणिनी अष्टाध्या आ अमसिंह अमरकोषमे लिपि आ लिबिक चर्च करैत छथि। पाणिनी पूर्व आचार्य यास्क अपन निरुक्तमे बहुत रास पूर्व आ समकालीन व्याकरणाचार्यक नाम गणबैत छथि। वर्णक गणना आधारित छन्द आ व्याकरणाचर्य सभक उपस्थिति अपरोक्ष रूपसँ लेखनकलाक उपस्थितिक आभास करबैत अछि। तीन हजार वर्ष पूर्व झेलम आ चेनाबक बीच गांधार (अखन ओतऽ यूसुफजई पठान निवास करैत छथि) इलाकामे दक्षक संघराज्य छल, एहि इलाकामे काबुल धार पच्छिमसँ आबि कऽ सिन्धु धारमे संगम करैत अछि। ओहि संगमसँ चारि माइल उत्तर लहुर गाम, जे पाणिनीक नानी गाम छल, मे पाणिनीक जन्म भेल, ओइ गामक नाम ओइ कालमे शलातुर रहैक। चीनी यात्री ह्वेनसांग (युआन च्वांग), सातम शताब्दीमे. एहि गामक विद्वान ब्राहमण व्याकरणाचार्यक चर्च केने छथि। माने परम्परा आगाँ-पाछाँ काएम छल।
जैनक भगवती सूत्र एहि ब्राह्मी लिपिकेँ नमस्कार करैत अछि।
लिपिक आधार- अक्षर, वर्ण आ मात्रा आ तकर साक्ष्य
ऋगवैदिक ऋचा वर्णवृत्तमे अछि, मात्रिक छन्दमे नहि। वार्णिक छन्दमे अक्षरक गणना होइत अछि।
छान्दोग्य उपनिषदमे अक्षर शब्द उल्लेख अछि दीर्घ स्वरक सेहो।
तैत्तरीय उपनिषदमे वर्ण आ मात्रा दुनूक चर्चा अछि।
ऐतरेय आरण्यकमे स्वर आ व्यंजन दुनूक चर्चा अछि।
पंचविंश ब्राह्मणमे सभसँ छोट दक्षिणा १२ कृष्णल आ सभसँ पैघ दक्षिणा ३,९३,०१६ कृष्णल सुवर्णक
चर्चा अछि।
कौटिल्यक अर्थशास्त्र चूड़ाकर्म संस्कारक बाद लिपि आ अंकक प्रशिक्षणक निर्देश करैत अछि। राजाकेँ मन्त्रिपरिषदक संग पत्राचार आ गुप्तचरक कूटलिपिमे संदेश पठेबाक चर्च अछि। अर्थशास्त्र कहैत अछि जे लिपिकार तेजीसँ लिखबामे निपुण होथि, साफ-साफ लिखथि आ लेख पढ़बामे सेहो समर्थ होथि।
बौद्ध ग्रन्थ सुत्तंतमे अक्खरिका क्रीड़ाक चर्च अछि, जाहिमे अकासी अक्षर बनेबाक स्पर्धा रहैत अछि। बौद्ध भिक्षु लेल एहि क्रीड़ाक निषेध अछि मुदा विनय-पिटक लेखल-कला सिखबाक अनुमति बौद्ध-भिक्षुकेँ दैत अछि। कटाहक जातकमे जाली पत्र देखाकेँ ठकबाक चर्च अछि तँ महासुतसोम जातकमे तक्षशिलाक अध्यापक अपन पुरान शिष्यकेँ पत्र लिखै छथि। कण्ह जातक अक्खर (अक्षरक पालि-प्राकृत रूप) क प्रयोग करैत अछि। महावग्गमे अंक-शब्दक प्रशिक्षण आ कटाहक जातकमे शीतलपाटीक चर्चा अछि जाहिपर लिखब सिखाओल जाइत छल। ललितविस्तर बुद्धक लिपिशाला, हुनकर शिक्षक विश्वामित्र, चाननक शीतलपाटी आ सोनाक लेखनीक चर्चा करैत अछि, एतऽ ६४ टा लिपिक वर्णन अछि जतऽ राजनैतिक सीमाक हिसाबसँ अंगक लिपि, मगधक लिपि वङक लिपिक चर्च अछि मुदा विदेहक लिपिक स्थानपर पूर्व विदेह लिपि लिखल अछि। एकर कारण अछि जे वज्जि विदेहपर अधिकार कऽ लेने छल आ वज्जि आ विदेहक लिपि संयुक्त रूपसँ विदेह लिपि छल। अजातशत्रु तेसर शताब्दीमे वज्जिकेँ जीति मगधमे राजनैतिक रूपसँ मिला लेलन्हि, मुदा सांस्कृतिक रूपसँ ओ अपन अस्तित्व बचेने रहल। ललित विस्तर तेसर शताब्दीक ग्रंथ थिक आ ताहि द्वारे ओ मगध लिपिक संग पूर्व विदेह लिपिक वर्णन करैत अछि। ई प्रवृत्ति बादमे गुप्तकालक तीरभुक्ति (तिरहुत) प्रान्तमे सुदृढ़ रूपसँ सोझाँ आएल आ पूर्वविदेह लिपिक नामकरण भेल तिरहुता। ललितविस्तरमे बाल अवस्थामे बुद्ध-सिद्धार्थक वर्णमाला प्रशिक्षणक चर्च अछि आ ओहिमे वार्णिक अक्षरक काँति आ अलंकरणक योजनाक चर्च अछि जे ब्राह्मी लिपिक अछि।
उतरबरिया सेमेटिक वर्णमाला आ ब्राह्मीक बीचमे अलेफ् आ अ, बेथ् आ ब्, गिमेल् आ ग, दालेथ् आ द, हे आ ह, वाव् आ व, जाइन् आ ज, चेथ् आ घ, थेथ् आ थ, योध् आ य, काफ् आ क, लामेध् आ ल, मेम् आ म, नुन आ न, सामेख आ स, आइन् आ ए, फे आ प, साधे आ च, कॉफ् आ ख मे अद्भुत समानता अछि आ मानवक मस्तिष्क कोना दूर रहलोपर एक्के रङ अछि तकर द्योतक अछि। बूलरकेँ ब्रम भेलन्हि जे ब्राह्मी लिपि उतरबरिया सेमेटिक लिपिक अनुकरण केलक। ई ओ काल छल जखन हड़प्पा आ मोहनजोदाड़ोकेँ सेहो मेसोपोटामियाक आउटपोस्ट ताधरि मानल जाइत जाधरि भारतक आन भागमे उत्खनन नहि भऽ गेलै आ हड़प्पा संस्कृतिक देशज रूप प्रकट नहि भऽ गेलैक (हर्मन कुल्के आ दीतमार रोथरमण्ड, अ हिस्ट्री ऑफ इण्डिया, २००४, पृ. १९, मुदा ओ पृ.५४ पर अखनो भ्रममे छथि जे खरोष्ठी अरामेइक लिपिक आधारपर बनल जे तखन फारसक आधिकारिक लिपि छल। अरामाइकमे मात्र २२ टा अक्षर छैक, स्वरक अपूर्णता अछि, ह्रस्व-दीर्घक भेद नहि अछि, स्वरक मात्राक सेहो अभाव अछि से ओ भारतीय भाषा लेल अयोग्य अछि, खरोष्ठीमे ई सभ गुण अछि, संगे दीर्घ-गुण-वृद्धि ध्वनि लेल भेदक चिन्ह सेहो अछि, प्राकृत अभिलेख लेल ई ब्राह्मी सन सक्षम छल, मात्र दहिन-वाम रहने ई विदेशी नहि भऽ जाएत। खरोष्ठी दहिनसँ वाम लिखल जाइत अछि मुदा एकर वर्णमाला भारतीय अछि, दहिनसँ वाम लिखल जएबाक कारण किछु विद्वान लोकनिकेँ एहिमे फारसक प्रभाव देखाइ पड़ैत छनि, मुदा सत्य तँ यएह अछि जे ब्राह्मी आ खरोष्ठी लिपिमे एक्के वर्णमालाक प्रयोग भेल अछि।)। जेना सङीतमे भारतक सारेगामा क सात टा सुर आ पश्चिमी ऑक्टेव (ओत्तहु साते टा छैक, ऑक्टेव माने आठम सँ पुनः पुनरावृत्तिक मात्र ई प्रतीक अछि) ई सिद्ध करैत अछि जे भाषा कोनो हुअए कान वएह छैक मनुक्खबला। ब्रेल आ इण्टरनेशनल फोनेटिक अल्फाबेट ध्वनिक संग मस्तिष्क (ब्रेल) क सेहो संप्रेषण मोटामोटी एक्के हेबाक प्रमाण दैत अछि (देखू अनुलग्नक) से पहिने तँ किछु विद्वान एकरा बैक्ट्रो-पालि आ आरियानो-पालि विदेशी लिपि बुझि कऽ कहलन्हि, कनिंघम एकरा गांधारी कहलन्हि, मुदा ललितविस्तर आ चीनक विश्वकोष फा-वां-शु-लिनक प्रमाण अकाट्य छल आ ओतऽ वर्णित एकर नाम खरोष्ठी सर्वमान्य भेल। चीनी साक्ष्य ब्राह्मीक उद्भव ब्रह्मा द्वारा आ खरोष्ठीक सर्जन ब्राह्मण आचार्य खरोष्ठ द्वारा भेल मानलक अछि। तेसर शताब्दीक बाद अभिलेख संस्कृतमे लिखल जाए लागल, प्राकृतक प्रयोग बन्द भऽ गेल। प्राकृत लेल ब्राह्मी आ खरोष्ठी दुनू सक्षम छल मुदा संस्कृतक सन्धियुक्त अलंकृत क्लिष्ट शब्द, पद आ समास लेल मात्र ब्राह्मी। से एक बेर जे एकर प्रयोग बन्द भेल तँ प्राकृतसँ निकलल भाषा सभ लेल सेहो ब्राह्मीसँ निकलल लिपिक प्रयोग प्रारम्भ भऽ गेल।
ब्राह्मीक एरागुडीक अशोकक अभिलेख २६ पाँतीमे अछि। वाम दहिन लेखनक पूर्ण रूपसँ पालन नहि भेल अछि, ओना बेशी पाँती वाम-दहिन अछि। किछु वाम-दहिन पाँतीमे किछु अक्षर वाम-दहिन तँ किछि दहिन वाममे अंकित अछि, किछि ऊपर नीचाँ सेहो अछि। ८ पाँती दहिन-वाम अछि। एक पाँतीमे मात्र एक अक्षर अछि। से दहिन वाम रहने विदेशी प्रभाव सिद्ध नहि होइत अछि। खरोष्ठी सन जापानी सेहो दहिन वाम लिखल जाइत अछि।
ललितविस्तरक प्रसंग सेहो इशारा करैत अछि जे व्याकरणक विशेषताकेँ पूर्ण करब ब्राह्मीक उद्देश्य छल, मुदा ई आग्रह ऋगवेदसँ अर्थशास्त्र तक अछि, आ भारतीय परिप्रेक्ष्यमे ब्राह्मी आ ओहिसँ निकलल लिपि ओहि आग्रहकेँ पूर्ण करैत अछि, आ एकर परिष्कृत रूपकेँ कृत्रिम नहि वरण् स्वाभाविक मानल जेबाक चाही। से किछु विद्वान ब्राह्मीक व्याकरण सम्बन्धी आवश्यकताकेँ पूर्ण करए लेल भेल परिष्करणकेँ विदेशी अक्षरकेँ भारतीय प्रारूपमे आनब कहलन्हि अछि (बूलर, ऑन द ओरिजिन ऑफ द इण्डियन ब्राह्मी अल्फाबेट, १८९८), मुदा कनिंघम एकरा भरतीय चेन्ह सभसँ बहार भेल मानलन्हि अछि (कनिंघम, कोरपस इन्सक्रिप्शनम इण्डिकेरम, खण्ड-१)।
ब्राह्मी लिपिक अतिरिक्त ६३ टा आर लिपिक चर्च ललित विस्तरमे अछि। सम्पूर्ण यूरोपमे ग्रीस आ रसियन कॉमनवेल्थ छोड़ि कऽ (एहि दुनू ठाम अलग-अलग लिपि छैक) सम्पूर्ण यूरोपमे रोमन लिपिक प्रयोग होइत अछि। से सम्पूर्ण यूरोपमे आइ मात्र तीनेटा लिपि छैक। जँ रूसकेँ यूरोपसँ हटा दी तँ ओ भारतक बराबरे अछि। भारतमे सभ प्रान्तमे मोटामोटी अलग-अलग लिपि अछि, मुदा तमिलक अतिरिक्त सभमे अल्फा-सिलेबिक (अक्षर आ संयुक्ताक्षरक) निर्वहण मोटामोटी एके रङ होइत अछि। एकर कारण छापाखानाक देरीसँ आगमन मात्र अछि।
ब्राह्मीक मानक रूप आ ओकर क्षेत्रीय शैली
ब्राह्मीक मानक रूप छल आ तकर प्रमाण अछि अशोकक अभिलेख। अशोक १४म प्रस्तर-अभिलेखमे कहै छथि जे अभिलेख-आलेखनक गुण-दोष लिपिकरक जिम्मा अछि, आ सएह कारण छल जे अशोकक अभिलेखमे अक्षर आ ओकर आकारमे समरूपता अछि आ ईहो प्रमाणित होइत अछि जे अशोकक काल धरि ब्राह्मीक मानक रूप आबि गेल छल। जे भेद अछि से क्षेत्र अनुसार, लिपिकरक लेखनक अनुसार आ लेखन उपकरणक विविधताक अनुसार अछि, आजुक हिसाबेँ जँ असमतल पाथर, खोह आदिपर लिपिकार द्वारा पुरातन उपकरणसँ जतेक असमरूपता आएल अछि से मानक ब्राह्मीक स्थिति आर सुदृढ़ करैत अछि। पंकचुएशन संस्कृतमे रहबे नहि करए से प्राकृतमे सएह परम्परा आगाँ बढ़ल। विराम चिन्हक व्याकरणगत आवश्यकता ब्राह्मीक लिपिकारकेँ ओही कारणसँ आवश्यक नहि लगलन्हि।
कुटिल लिपि
कुटिल लिपि
;
उत्तर भारत ६अम शताब्दी सी.ई.
;
पच्छिम (शारदा) ; पूब (किराँत, रञ्जना, भुँजिमोल, तिरहुता, नेवारी, तिब्बती, नन्दीनागरी आ देवनागरी।
कुटिल लिपिक विशेषतासँ प्रेरित नामकरण- न्यूणकोण वर्णमाला (बूलर, इण्डियन पालियोग्राफी, प्.६८), नह शीर्ष वर्णमाला (टॊड, एनल्स ऒफ राजस्थान, पृ. ७००), भारयीय नाम सिद्ध मातृका,काश्मीर आ वाराणसीमे प्रचलित (अल-बेरुनी, भारत, पृ. १७३, सचाउ), देवल प्रशस्तिमे एकरा लेल कुटिलाक्षरणी प्रयुक्त भेल। आदित्यसेनक अफसड़ पाथर-अभिलेखमे एकर नाम विकटाक्षरणी अछि। विक्रमांकदेव चरितमे कुटिल लिपिमे सिद्धहस्त कायस्थ लोकनिक चर्च अछि।
जेम्स प्रिंसेप, जे १८३७ ई. मे अशोकक अभिलेखकेँ पढ़ने छलाह, एकरा लेल कुटिल लिपिक नामकरणक अनुशंसा केलन्हि (जर्नल ऒफ एशियाटिक सोशाइटी ऒफ बेन्गाल, पार्ट-५ पृ. ७७८)।
कुटिल लिपिक विकासक की कारण छल? पहिल तँ ई छल जे लिखबाक करची-कलम आ मोशिक प्रयोग संग नव उपकरण आ पुरान उपकरणक नव प्रयोगसँ अलंकरणयुक्त अभिलेख लेखनक इच्छा जागृत भेल, लटपटौआ लिखबाक आग्रह सेहो एहि लेल कारण बनल। एहिसँ उपरका भाग फन सन बनि गेल कारण मोशि ढबकि जाइ, पाछाँ नाङरि आ पद-चिन्ह सेहो सुस्पष्ट भेल। अलंकरणक प्रवृत्तिसँ वर्ण वृत्ताकार आ चिक्कन स्वरूप लेबऽ लागल। अलंकारक कारणसँ एकर नाम पड़ल सिद्धमातृका।
कुटिल लिपिक अभिलेख भेटल अछि, कौशाम्बीक माटिक सदण्ड सप्तदीपक (ई मोन पाड़ैए मौर्य कालक बौद्ध सप्ताक्षरी (प्रसिद्ध मंत्र) कूटाक्षरक), मंदसौरक यशोधर्मनक अभिलेख, ईशानवर्माक हरहा पाथर-अभिलेख, सर्ववर्मनक असीरगढ़ मोहर-अभिलेख, अनन्तवर्मनक बराबर आ नागार्जुनी खोह अभिलेख, ईश्वर वर्मनक जौनपुर पाथर-अभिलेख, शाहपुरक प्रतिमापर अभिलेख , मन्दागिरि अभिलेख, जीवितगुप्त द्वितीयक देववार्णार्क स्तम्भ अभिलेख, हर्षवर्धनक मधुबन आ बाँसखेड़ा ताम्रपत्र-अभिलेख, हर्षवर्धनक सोनीपत मोहर-अभिलेख।
तिरहुता
तिरहुता लिपिक खोजमे आब भारतक पूब भागमे आउ।
पूब भागक ब्राह्मीक बाद किराँत, रञ्जना, भुँजिमोल, तिरहुता, नेवारी, तिब्बती, नन्दीनागरी आ देवनागरीक प्रयोग भेटैए।
किराँत लिपिमे लिम्बू भाषा आदि लिखल गेल। ई सभ लिपि वामसँ दहिन दिश लिखल जाइए मुदा रञ्जना लिपि कूटाक्षरमे ऊपरसँ दक्षिण लिखल जाइए। नागरीक रूप नन्दीनागरीक प्रयोग मुदा बेशी मध्य दक्कन आ दक्षिण भारतमे भेल आ माध्वाचार्यक द्वैत दर्शनक संस्कृतमे लिखल पाण्डुलिपि नन्दीनागरीमे अछि।
विदेह, अंग, वज्जि आ नेपालक तराईमे संस्कृत आ मैथिली दुनू तिरहुतामे लिखल जाइ छल आ एहिमे सभ विषय, जेना साहित्य, गणित, धर्म, दर्शन लिखल जाइ छल आ पाता (सुख-दुख दुनुक) चलै छल आ चिट्ठी-पत्री अहीमे होइ छल। कैथीक प्रयोग हिसाब-किताब, खाता-खतियान लेल होइ छल आ मुख्य रूपसँ कायस्थ एकर प्रयोग करै छला। मुदा मिथिलाक कर्ण-कायस्थक पञ्जी मात्र तिरहुतामे लिखल गेल (मैथिल करण कायस्थक पाँजिक सर्वेक्षण- मेजर विनोद बिहारी वर्मा, १९७३)। एकर विपरीत मैथिल ब्राह्मणक पञ्जीक किछु फील्ड-वर्क आ पत्रचार कैथीमे भेल (अनुलग्नक) मुदा एतहु पञ्जी मात्र तिरहुतामे लिखल गेल। ई १४म शताब्दी सी. ई. (कॊमन एरा) सँ शुरू भऽ कऽ २०म शताब्दी सी.ई. धरि रहल जखन देवनागरीमे पञ्जी लिखब प्रारम्भ भऽ गेल।
किछु नव आविष्कृत लिपि
लिपिक अनुकरणसँ साइन (इशारा) भाषा वधिर लेल १८म शताब्दी सी.ई. (कॊमन एरा) मे वधिर स्कूलमे फ्रांसक चार्ल्स मिशेल देल एप्पे द्वारा आविष्कृत भेल। ई एहेन लिपि अछि जे कागतपर नहि वरण् वायु माने वातावरणमे बनाओल जाइत अछि। अन्ध-दिव्यांग लेल ब्रेल लिपि १९म शताब्दीमे फ्रांसक लुइ ब्रेल आविष्कृत केलनि। २०म शताब्दीमे रघुनाथ मुर्मू संथाली भाषा लेल ओल-चिकी लिपिक आविष्कृत केलनि।
अनुलग्नक १: कैथी लिपिमे मैथिलीक किछु उदाहरण (साभार जीनोम मैपिंग आ जीनियोलोजिकल मैपिंग, मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध भाग-१ आ २ , श्रुति प्रकाशन, २००८, २००९)
अनुलग्नक २: मिथिलाक कर्ण कायस्थक तिरहुता लिपिमे लिखल किछु पात (साभार मैथिल करण कायस्थक पाँजिक सर्वेक्षण- मेजर विनोद बिहारी वर्मा, १९७३)
अनुलग्नक ३: लर्न मिथिलाक्षर- गजेन्द्र ठाकुर
अनुलग्नक-१-२-३ लिंक
(भाग-२ अगिला अंकमे)
ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।