कुसुम ठाकुर
अलग राज्यक माँग कतेक सार्थक?
ओना तs हमर स्वभाव अछि हम नहि लोक के उपदेश दैत छियैक आ नहि अपन मोनक भावना लोकक सोझां मे प्रकट होमय दैत छियैक । हम सुनय सबकेर छियैक मुदा हमरा मोन मे जे ठीक बुझाइत अछि ओतबा धरि करैत छियैक। एकर परिणाम इ होइत अछि जे हमरा सलाह देबय वाला केर कमी नहि छैक। सब के होइत छैन्ह जे ओ जे कहताह कहतिह से हम अवश्य मानि लेबैन्ह।अपन अपन भावना केर हमरा पर थोपय के कोशिश बहुत लोक करय छथि। परोपदेश देनाइयो आसान होइत छैक । मुदा हमर भलाई केर विषय मे के सोचि रहल छथि इ ज्ञान तs हमरा अछि । मुदा दोसराक विचार सुनालाक किछु फायदा सेहो छैक। लोकक विचार सुनि अपन विचार व्यक्त करय मे आसानी होइत छैक आ आत्म विशवास सेहो बढैत छैक। एकटा कहबी छैक "कोठा चढ़ी चढ़ी देखा सब घर एकहि लेखा " सब ठाम कमो बेसी एके स्थिति छैक, मुदा दोसरा केर विषय मे कम बुझय मे, आ देरी सs बुझय मे आबैत छैक, अपन तs लोक के सबटा बुझल रहैत छैक। पारिवारिक हो सामाजिक हो वा देशक, सब ठाम आपस मे विचार मे मतान्तर होइत रहैत छैक जे कि मनुष्य मात्र के लेल स्वाभाविक छैक आ हेबाक सेहो चाहि । जखैन्ह दस लोकक विचार होइत छैक तs ओहि मे किछु नीक किछु अधलाह सेहो विचार सोंझा मे आबैत छैक। मुदा आजु काल्हि सब ठाम स्वार्थ सर्वोपरि भs जाइत छैक । लोक के लेल देश समाज सs ऊपर अपन स्वार्थ भs गेल छैक। संस्था व न्यास केर स्थापना होइत छैक समाज आ संस्कृति केर उत्थानक लेल । मुदा संस्थाक स्थापना भेलैक नहि कि ओहि संस्थाक मुखिया पद आ कार्यकारणी मे सम्मिलित होयबाक लेल राजनीति शुरू भs जाइत छैक । एकटा संस्था मे कैयैक टा गुट बनि जाइत छैक । आ ओहि मे सदस्य ततेक नहि व्यस्त भs जाइत छथि कि हुनका लोकनि के सामाजिक कार्य आ संस्कृति के विषय मे सोचबाक फुर्सते कहाँ रहैत छैन्ह । आ ताहू सs जौं बेसी भेलैक आ बुझि जाय छथि जे आब हुनक ओहि ठाम चलय वाला नहि छैन्ह तs एक टा नव संस्था केर स्थापना कs लैत छथि। सामाजिक कार्य केर नाम पर साल मे एकटा वा दू टा सांस्कृतिक कार्यक्रम कs लैत छथि आ बुझैत छथि समाज केर उद्धार कs रहल छथि । ओहि कार्यक्रम मे पैघ पैघ हस्ती , नेता के बजा अपन डंका बजा लैत छथि।बाकि साल भरि गुट बाजी आ साबित करय मे बिता दैत छथि जे हुनक कार्यकाल मे कार्यक्रम बेसी नीक भेलैक। हम मानय छियैक जे कार्यक्रम अपन संस्कृति केर आइना होइत छैक, मुदा ओ तs स्थानीय कलाकार के मौक़ा दs कs सेहो करवायल जा सकैत छैक। इ कोन समाजक उत्थान भेलैक जे लोक सs मांगि कs कोष जमा कैल जाय आ मात्र कार्यक्रम मे खर्च कs देल जाय। बहुतो एहेन बच्चा शहर वा गाम मे छथि जे मेधावी रहितो पाई के अभाव मे आगू नहि पढि पाबय छथि। दवाई केर अभाव मे कतेक लोकक जान नहि बचा पाबय वाला परिवारक मददि केनाई समाजक उद्धार नहि भेलैक? आय काल्हि तs लाखक लाख खर्च करि कs एकटा कार्यक्रम कैल जाइत छैक। कहय लेल हम ओहि महान हस्ती केर पर्व मना रहल छी। कार्यक्रम करू मुदा कि अपन गाम शहर के भूखल के खाना खुआ तृप्त कs ओहि महान हस्ती के श्रद्धाँजलि नहि देल जा सकैत छैक। इ तs मात्र एक दू टा समाज के सहायतार्थ काज भेलैक ओहेन कैयैक टा सामाजिक काज छैक जे कैल जा सकय छैक । यदि सच मे लोक के अपन समाज आ संस्कृति सs लगाव छैन्ह तs जतेक कम संस्था रहतैक ततेक नीक काज आ समाजक उत्थान होयतैक। ओहि लेल मोन मे भावनाक काज छैक नहि कि दस टा संस्थाक । देश मे नित्य नव नव राज्यक माँग भs रहल अछि। ओहि मे मिथिलांचलक माँग सेहो छैक। हमरा सँ सेहो बहुत लोक पूछय छथि "अहाँ मिथिला राज्य अलग हेबाक के पक्ष मे छी कि नहि "? हम एकहि टा सवाल हुनका लोकनि सँ पूछय छियैंह "कि राज्य अलग भेला सँ मिथिलाक उत्थान भs जेतैक "? इ सुनतहि सब के होइत छैन्ह हम मैथिल आ मिथिलाक शुभ चिन्तक नहीं छी। बुझाई छैन्ह जे अलग राज्य बनि गेला सँ मिथिलांचलक काया पलट भs जेतैक । एक गोटे जे अपना के मिथिला के लेल समर्पित कहय छथि, साफ़ कहलाह "मैथिल के मोन मे मिथिला के लेल जे प्रेम हेतैक से दोसरा के नहि" । हमर हुनका सँ एकटा प्रश्न छल "कि पहिने बिहार मे मैथिल मुख्य मंत्री, मंत्री नहि भेल छथि "? जवाब भेंटल " ओ सब मैथिल छलथि मिथिलाक नहि"। अलग राज्य भेलाक बाद जे कीयो मुख्य मंत्री होयताह ओ मिथिलाक होयताह आ मात्र मिथिला के लेल सोचताह । हमरा इ बुझय मे नहि आबैत अछि जे लोकक मानसिकता के कोना बदलल जा सकैत छैक ? एखैंह ओ दरभंगा के छथि , ओ सहरसा के .....ओ मुंगेर के छथि ....कि अलग राज्य भेला सँ आदमी केर मानसिकता बदलि जेतैक .....कि दरभंगा , सहरसा आ कि मुंगेर वाला भेद भाव मोन मे नहि औतेक ? आ जौं इ भेद भावना रहतैक तs सम्पूर्ण राज्यक विकास कोनाक भs सकैत छैक ? कि मिथिलाक होइतो ओ सम्पूर्ण मिथिला केर विषय मे सोचताह ? छोट छोट राज्य नीक होइत छैक , ओकर पक्ष मे हमहू छी मुदा बिना राज्यक बंटवारा केने सेहो बहुत काज कैयल जा सकैत छैक, जौं करय चाहि तs । ओना सब अपन स्वार्थ सिद्धि मे लागल रहय छथि इ अलग गप्प छैक। कि नीक स्कूल कॉलेज कारखाना के लेल बिना राज्य अलग बनने प्रयास नहि कैयल जा सकैत छैक? कि मात्र मिथिला राज्य बनि गेला सँ मिथिलाक उद्धार भs जयतैक ? मिथिला राज्यक अलग हो ताहि आन्दोलन मे अनेको लोक सक्रीय छथि , मुदा हुनका लोकनि सs एकटा प्रश्न .......ओ सब आत्मा सs पुछथि कि ओ सब मात्र राज्य आ समाज के लेल सोचय छथि कि हुनका लोकनि के मोन मे लेस मात्र स्वार्थक भावना नहि छैन्ह ? कैयैक टा राज्य अलग भेलैक अछि मुदा बेसी केर स्थिति पहिने सs बेसी खराब भs गेल छैक, झारखण्ड ओकर उदाहरण अछि । खनिज संपदा सँ संपन्न राज्यक स्थिति बिहार सs अलग भेलाक बाद आओर खराब भs गेल छैक। एहि राज्य मे नौ साल के भीतर सात टा मुख्यमंत्री बनि चुकल छथि । लोक के उम्मीद छलैक जे १० साल के भीतर एहि राज्य केर उन्नति भs जयतैक। उन्नति भेलैक अछि, मुदा राज्य केर नहि नेता सब केर । चोर उचक्का खूनि सब नेता भs गेल छथि आ पैघ सs पैघ गाड़ी मे घुमि रहल छथि , देश आ जनता केर संपत्ति केर उपभोग कs रहल छथि इ कि उन्नति नहि छैक ?(विदेह पेटारसँ)
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डॉ विनीत उत्पल
लघु कथा- नागा फकीर
(डिस्क्लेमर: एहि खिस्साक सभटा पात्र आ तथ्य मनगढ़ंत अछि, समानता मात्र संयोग अछि-कथाकार)
पता नहि जे कि फुरायल जे आइ ओकर पुरना फेसबुक पोस्ट पढ़य लगलौं-
१४ नवम्बर: अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक संस्थाक युवा पुरस्कारक जूरी कोनो पोथीक मूल्यांकन नहि कऽ कय प्रतिभागीक उमरि देखैत अछि, जे अमुक लेखक केँ अगिला बरख पुरस्कार देल जा सकैत अछि वा नहि।
०२ अक्तूबर: ‘सगर राति दीप जरय’ जाहि दिन सँ सोलकन लग गेल, बभना आ रारी कायस्थ सभ गुरमौटी देने अछि, जे ई की भेल? ताहि देखादेखी ‘सगर दिन अन्हार रहय’ शुरू कयल गेल।
३१ अक्तूबर: मैथिलीक सम्मानित सबसँ युवा कथाकार आब ‘इस्स’ आ ‘भक्क’ नामसँ खिस्साक पोथी लिखने छथि आ दुनू पोथी केँ दुनियाक ‘बेस्ट सेलर’क खिताब भेटल अछि आ दुनियाक चालीस भाषामे तकर अनुवाद भेल अछि।
२६ जनवरी: बिहारमे मद्यपान निषेधक कारण ओतयसँ सबसऽ बेसी साहित्यकार हर दू दिन पर कोनो ने कोनो कार्यक्रमक बहन्ने दिल्ली आबैत छथि आ सोमरसक पान राजधानीक बीयर बारमे करैत छथि।
३० जनवरी: मैथिली-अंगिका-वज्जिका-मगही-भोजपुरी अकादमीक उपाध्यक्षक आगू सभ भाषाक कतेक रास कवि अप्पन नाम लेल निहोरा करैत छथि, जे पिछला दू बरख सँ हमरा कविता पाठ लेल नै बजेलहुँ।
१५ अगस्त: घोर कलयुग, कतेक रास आपराधिक प्रवृत्तिक लोक आब साहित्यकार बनि गेल अछि आ राज्य आ केन्द्र सरकारक संग अंतरराष्ट्रीय संस्थाक बहुत रास समितिक सम्मानित सदस्य भऽ गेल अछि।
बेसी पोस्ट तऽ ओकर फेसबुक वाल पर नहि छल, मुदा जे छल ओ साहित्यिक समाजक लेल बिख सँ कम नहि छल। हमरा सँ ओकर भेंट कहियो नहि छलै। ओकरा लऽ कऽ फेकुआ भाइ कहियो-कहियो हमरा लग चर्च करैत छला। ओ कहैत छला जे सत्ता आ साहित्यकेँ जँ बुझबाक अछि तँ ओकरासँ गप करू। ओकर फेसबुक पोस्ट पढ़ू। ओ अजुका ‘राजकमल चौधरी’ छिऐ, अजुका। सोशल मीडियाक ‘नागार्जुन’। की कही, एक बेर ओकर फेसबुक वाल पर गेलो रही, मुदा ओकर पोस्ट हमरा पसीन नहि आयल, तें हम फेर दोबारा नहिये तँ ओकर फेसबुक वाल पर गेलहुँ आ नहिये ओकरा फेसबुकक मित्रताक निमंत्रण देलहुँ।
हमरा लागैत छल जे फेकुआ भाइक गप जँ सत्य अछि, तँ ओ बड़ तार्किक हएत। सत्ताक समीकरण बुझैत हएत। साहित्यक समझ जँ ओकर नीक छै तँ फेर कोनो साहित्यकार ओकरा मोजर किए नहि देलाह। ओकरा मोजर तँ ओना हमहूँ नहि देलहुँ। एहि दिल्लीमे के केकरा पुछैत छै। रोज बिहार-यूपी सँ अल्लू-प्याजक बोड़ा जेना लोक-बेद ट्रेन, बस आ फ्लाइटसँ आबैत छथि। किछु लोक दिल्लीमे संघर्ष करैत छथि तऽ कियो नोएडा आ गुरुग्रामक कोनो फैक्ट्रीमे काज करैत-करैत अपन जिनगी गुजारि दैत छथि। ‘हाय पैसा-हाय पैसा’क चक्करमे साहित्य के पढ़त आ राजनीतिक गप के करत?
‘धौ महराज, अहाँकेँ कहबाक तँ नहि चाही, मुदा खिस्सा सुना रहल छी आकि फालतू गप? कथाक बाटसँ नहि भटकू’।
‘चलू भाइ, जे गलती-सलती भेल से माफ़ करब। आगू सँ हम एकर ख्याल राखब। एखन धरि जे गप कहलहुँ ओकरा बिसरि जाउ, माफ़ कऽ दिअ। एकरा सँ बेसी हम की कऽ सकैत छी’।
‘भाइ, तऽ हम सब कतय रही’?
हँ, ख्याल आयल। किछु दिन पहिने फेकुआ भाइ मधुबनीक मानकी पोथी भंडारक दोकान पर भेटल छल। हुनकर मन कनी सुस्त देखलियनि तँ पुछने रहियनि-
‘की भेल भाइ’?
पहिने तऽ कनि अनमनैलक, फेर बजलाह-
‘ख्याल अछि अहाँकेँ? एकबेर हम दिल्लीमे एगो लोकक चर्च केने रही, सत्ता आ साहित्य पर जिनकर बड़ रुचि छनि आ ओ नीक जानकार छथि।’
‘जी, जी’, हम बजलहुँ।
‘ओ पछिला कतेक माससँ नपत्ता अछि। नहिये ओकर दिल्लीमे कत्तौ पता लागल आ नहिये गामेमे। पुलिस लग रिपोर्ट लिखेलहुँ मुदा हाथमे किछु नहि आयल।’
‘सार’, जेहन नाम, तेहने करम।’
‘फकीर रहय, फकीर। एकदम नागा’
‘नहिये घरक चिंता, नहिये नौकरीक, बस चिंता तँ साहित्यक आ राजनीतिक। एना लागैत छल जे ओ नहिये तऽ ओ कोनो साहित्यकार अछि नहिये कोनो समीक्षक। बस महाभारतक अर्जुन जेना साहित्यक राजनीति पर ध्यान लगौने रहैत छल। ने कनियो टा इम्हर, ने उम्हर।
‘कहू तँें भाइ, एना कत्तो लोक होइत छै।’
सत्य कही तऽ आइ हमरा बड़ अफ़सोस भेल जे ओकरा सँ भेंट कऽ लैेतिऐे तऽ की भऽ जैतिऐ।
आब जतेक लोक, ओकर ओतेक खिस्सा। कियो कहय जे ओकरा दिल्लीमे रहय बला कोनो मौगीसँ प्रेम भऽ गेल छलै आ ओ मौगी ओकरा छोड़ि देलकै तऽ ओ बताह भऽ गेल। कियो कहय जे दिल्लीक कियो गोटे अप्पन संस्था चलाबैक लेल मधुबनीक ‘अरेर’ मे दू बीघा जमीन ओकरा रजिस्ट्री कऽ देने छल। ओ दिल्लीकेँ छोडिकऽ ‘अरेर’ मे रहय लागल छल आ अंतिम बेर कोनो ‘राष्ट्रीय दल’क लोकल नेताक संग देर राति ‘नागिन डांस पार्टी’मे ’देखल गेल छल। लोक तऽ ईहो कहैत छल जे कियो गोटे सहरसाक चैनपुरमे पुस्तकालय चलाबैक जिम्मेवारी ओकरा देने छल आ ओहि दिन भोरे-भोर दरवाजाक आगकू पोखरिमे जे ओ डुमकी लगौैलक, आइ धरि ओकर लाश नपत्ता अछि। कियो कहलक जे ओ तऽ वयोवृद्ध हिन्दी कथाकार कृष्ण ठाकुरक संग पांडवनगरमे रहैत छल, कोनो कैसेट कंपनीमे काज करैत छल आ ‘लाल पाइन’ पीबैक लेल इंडिया हैबिटेट सेंटर जाइत छल। ताहिसँ ओकर लीवर ख़राब भऽ गेल आ ओ सुरपुर धाम कहिया नहि चल गेल। ताज्जुब तऽ तखन भेल जखन कियो कहलक जे ओ जनउ तोड़िकऽ इस्लामी प्रसिद्ध विद्वान अकबरूदीन खानक संग रोजा राखैत छल आ पँाचो टाइम नमाज पढ़ैत छल। ‘सुब्हान्ल्लाहि वलहम्दु लिल्लाहि व ला इल्ललाहु वल्लाहु अकबर’’ केर जाप सेहो करैत छल। कियो तऽ बाजल जे ओ हिन्दू सँ बौद्ध बनि गेल। हल्ला ईहो छल जे ओ नक्सली बनिकऽ छत्तीसगढ़-आंध्र प्रदेश बॉर्डर पर स्थानीय पुलिसक हाथ लागल आ ढेर भऽ गेल। हल्ला तऽ छल जे ओ कश्मीर सेहो गेल आ ‘तैस-ए-मोहम्मद’ मे शामिल भऽ गेल छल आ सेनाक हाथ मारल गेल।
पूरा खिस्सा तऽ मधेपुरा जिलाक बराही गामक प्रकांड संस्कृत पंडितजी अस्सी बरखक अरुणाभ बाबूसँ पता लागल।
जँ विश्वास करी तँें पंडितजी अरुणाभ सत्य गप कहने छलाह। ओहि दिन तऽ गाम आयल छल ओ। घड़ी-पावैन मे। गामक भगवती थान पर दू दिनक बड़का मेला लागल छल। एहि पावैनमे साँपक विषकेँ उतारैक लेल लोक सिद्धि प्राप्त करैत छल आ ओहि बेर ओ सेहो मंतरिया बनि गेल छल। नागा तऽ घुमिते छल। माथमे केस छलै, मुदा सबटा पाकल। आँंखि लग झुर्री सेहो लखाह दैत छल। ओहि समयमे ओ सदिखन महिषी बला राजकमल चौधरीक एकटा पाँति दोहराबैत छल,
‘समय एकटा आन्हर साँप/ समय एकटा आन्हर रस्ता/ आ व्यक्ति अजगरक पेटमे छटपटाइत पक्षी।’
मुदा लोककेँ बुझयमे नहि आबैत छल जे ओकर मनमे की डाकै छै। घड़ी मेलाक दू दिन बादक गप छिऐ। ओ उदाकिशुनगंज कोर्टसँ घुरल छल। लोक कहैत छल जे जखन कहियो ओ गाम आबैत छल तऽ कोर्टमे मुक्तारीक काज सेहो करैत छल। साँझ खन दीप-बातीक काल ओ साइकिल पर चढ़ि कऽ घुरि रहल छल जे उदा पुल पर गामक रोहिता यादव भेट गेलै। ओ माल-जाल संग बाधसँ घुरि रहल छल। एकटा महीसक पीठ पर बैसल तमाकू चुना रहल छल।
ओ रोहिताकेँ टोकलक-
‘की रे रोहिता, की हाल?।’
‘रे बभना, ठीक सँ बोल। चिन्हय नै छेँ हमरा? ’
‘हे रे सार, हम की कहलियौ तोरा, जे एत्ते बमकै छेँ।’
एतबी कालमे नम्हर सींग बला महीसकेँ रोहिता यादव ओकरा दिस हुलकाय देलक। ओ सौंसे देह साइकिलक संग नहर दिस गिरल। नहरमे राति पाइन छोड़ल गेल छल। एक मरदसँ उपर पाइन छल। साइकिल तऽ एक दिस अटकि गेल मुदा ओ डूमय लागल। नहरक दुनु दिस लोक जमा भऽ गेल आ हो-हल्ला हुअए लागल। रोहिता भीड़ देखि अपन माल-जाल संग ठामसँ भागल। नहरमे पाइनक धार एतेक तेज छल जे ओकरा सम्हरहि कऽ मौका नहि भेटलै। सौ हाथ पाइनमे बहैक बाद ओकर देह एकटा बाँसमे अटकि गेलै। गामक लोक बेहोशी हालतमे ओकरा नहरसँ खींचि केँ बाहर निकाललक। कहुनो कऽ कय साइकिलकेँ सेहो निकालल गेल। ताधरि बभना टोल आ देवहैर टोलमे एहि लऽ कऽ हल्ला भऽ गेल छल जे रोहिता यादव कोनो बाभनकेँ नहरमे ठेल देने छै।
बराही गाममे दू टोल छल। एकटा ‘ब्राहमण टोल’, जेकरा आन टोलक लोक ‘बभन टोली’ कहैत छल आ दोसर ‘देवहैर टोली’, जे असलमे ‘देवहर टोल’ छल। देवहैर टोलमे पुरना लोक अप्पन नामक पाछू ‘देवहर’ लिखैत छल। बादमे सभ अप्पन टाइटिल ‘देवहर’केँ बदलिकऽ ‘यादव’ राखि लेलक आ नाम कहैत काल अप्पन नामसँ बेसी ‘यादव’ पर जोर दैत छल। तखन बाभन सभ ओहि टोलकेँ ‘ग्वरटोली’ कहिकऽ बजाबय लागल छल।
(ई खिस्सा ओहि कालक अछि जखन पूरा देश मंडल आ कमंडलमे जरि रहल छल। चूँकि बराही आ पास-पड़ोसमे कोनो मुस्लिम बस्ती नहि छल, तें सांप्रदायिक सौहार्द्र ओतुक्का समाजक लेल कोनो गप नहि छल। मुदा बिहारमे लालू यादवक मुख्यमंत्री बनलाक बाद समाजक मुख्य धारासँ फराक रहय बला लोक सजग भेल छल। फेर जाहि मंडल कमीशनक रिपोर्टकेँ विश्वनाथ प्रसाद सिंह लागू केने छल, ओहि मंडल कमीशनक अध्यक्ष बी. पी. मंडल मधेपुरा जिलाक छल।)
ओहि साँझक बाद तऽ दुनू टोलक लोक एक-दोसरा केँ देखहि नहि चाहैत छल। ब्राहमण टोलक चिड़ियो-चुनमुन, कुकुरो-बिलाय ओम्हर नहि जाइत छल। मनुखसँ बेसी वफादारी तऽ माल-जालमे पाओल जाइत अछि। तीन-चारि मास बीतल छल। ठार आबि गेल छल। एक राति दू-टा कुकुर मांगन भैयाक बँसबिट्टीमे आपसमे फरिआबय लागल। ओ दुनुटा जतेक जोरसँ एक-दोसरा पर भुकलक जे द्वार पर चचरी पर सुतल बड़का बाबा केँ भलै जे अजुका राति आर-पारक राति होयत। अप्पन चचरीसँ बौकू कक्का केँ शोर पारलखिन। अन्हरिया राति, हाथकेँ हाथ नहि सुझैत छल। मेघ चारू कातसँ घेरने छल। शीतलहरी सेहो अलगे।
मुदा कक्काक आवाज सुनि बौकू कक्का निन्दौसँ उठल आ तीर-फट्टा सीधे हाथमे लेने मांगन भैयाक बँंसबिट्टी दिस दौड़ल। बौकू कक्का एतेक जोरसँ चिकरलक जे सौंसे बभनटोलीक लोक जागि गेल। मारि तिरपित जेकरा जे भेटल, हाथमे लेने ओहि दिस दौगल। बँसबिट्टीसँ आठे-दस कदम बौकू भाय पाछू छलाह, तखने लोकक शोर सुनि, एक कऽ पाछाँ एक दुनु कुकुड़ हुनका बगलसँ एना दौगल जे एकटा कुकुर बौकू कक्काक धोतीमे ओझरा गेल। कक्का धरफरीमे बुझि नहि सकल जे ई कोनो कुकुड़ छै आकि मनुख। बौकू कक्का सौंसे चिंतांग धरती पर गिर पड़लाह। गिरल देहसँ दोसरो कुकुर भिर गेल। हुनकर मुँहसँ एतेक जोरसँ ‘बाप रौ बाप’ निकलल, लागल जे आइ ग्वरटोलीक यादव हुनको निशाना बना देलक। वातावरण किछु काल धरि स्तब्ध रहल। लोककेँ बुझयमे नहि आयल जे की भेल। ताधरि मांगन भैया सेहो बड़का टॉर्च लऽ कऽ आबि गेल। टॉर्चक इजोतमे पता लागल जे सबटा किरदानी कुकुरक छल।
गाममे दुनू जातिक बीच मनमुटाव बरक़रार छल। आन लोक सेहो एकर फायदा उठा रहल छल। गामक लोक कहैत अछि जे ओ एहन विकराल समय छल जे कल्लू यादवक नामसँ मधेपुराक धरती कांपैत छल। एक बेर एहन आयल जखन एक हफ्ता भरि कल्लू यादव गैंग मधेपुरामे लोकक देहकेँ उघारि-उघारि जनउ ताकैत छल आ जनउ पहिरय बला लोक केँ ‘गर्दनिया पासपोर्ट’ दऽ कऽ जुत्ता-चप्पल-लाठी सँ धुनैत करुण यादव मुखियाकेँ बजौने छल। ओ पुछने छल जे बराही गामक बाभन केँ की करल जाय?
अरुण मुखिया सीधे मुँह कहि देने छलाह कल्लू यादव केँ-
‘भाय, बराही पंचायतक मुखिया हम छी। हम सभ जाति सौ बरखसँ बेसीसँ संगे रहि रहल छी। दू भैयारीमे एहिना झगडा-झंझटि होइत रहैत छै। बाभन आ देवहैर एक्के छिऐ। ताहि सँ हुनका सबकेँ तंग करैक आवश्यकता नहि’।
भीड़सँ कियो कहनो छल-
‘एक बेर कहो ने मुखियाजी, एखने राति भरि मंे सबटा बभनाकेँ घर जरा देते हैं।’
लोक अखनो कहैत अछि जे ओहि अन्हरिया ठार रातिमे मुखियाजी गांधीजी जेना खुट्टा गाड़िकेँ ठाढ़ रहल आ केकरो हिम्मत नहि भेल जे गामक बाभन टोल दिस एक्को डेग आगू दैतिऐ। एकरे फल छल जे करुण मुखिया चालीस बरख धरि बराही पंचायतक निर्विरोध मुखिया चुनल गेल आ राज केलक।
मुखियाजी कल्लू यादवकेँ ओहि राति बुझा तऽ देलक आ गामक सीमान सँ भगा तऽ देलक मुदा दुनू जातिमे विश्वास नहि आनि सकल। कतेक बेर भगवती थान पर पंचायत बजाओल गेल, मुदा वएह ढाकक तीन पात। एक साँझ कहानीक पात्र ‘ओकरा’ आ रोहिता यादवमे सीधा लड़ाइ भऽ गेल। रवि दिन छल। उदामे साप्ताहिक हटिया लागैत छल। ओकरा माछ खाइक मन छलै। एक तऽ ओ माछ खाइ नहि छल मुदा खाइ छल तँ सवा किलो सँ एक कनमा कम माछ कीनैत नहि छल।
संजोगसँ रेहू माछ एक्के गोटेक लग छलै, सेहो एक किलो पचास ग्राम। पचहत्तर ग्राम माछक कमी सँ ओकरा तामस आबि गेलै। संजोग जे तखने रोहिता सेहो माछ लेल पहु्ँचल।
‘हे रे। एक किलो माछ तौल दही।’
‘मालिक, आब तऽ ई माछ बिक गेल।’
‘ओ की छियौ’।
‘नहि मालिक। सवा किलो मे पचहत्तर ग्राम कम अछि, तँे बहस भऽ रहल अछि। ई साहब कीन लेलक।’
‘हे रे धीचोदा। हमारा देभी की नै। देखभँय तू। चिन्है छी की नै?’
‘जी मालिक, चिन्हैत छी।।।’
ओकर गप ख़तमो नाहि भेल छल ताधरि रोहिता ओकरा दू थाप खींच देलक आ माछक टोकरी उठाकऽ चलि देलक। कहानीक पात्र ‘ओकरा’ ई बर्दास्त नहि भेल। ओ सेहो पाँजर कसलक आ रोहिताकेँ उठायकेँ पटकि देलक। उदा नहर बला घटना दिनसँ रोहिताक खून खौलले छल। रोहिता माथे भरे जमीन पर खसल। संयोगे या दुर्योगे कही, जाहि ठाम रोहिता खसल, ओहि ठाम एकटा नोकी बला पाथर छल। शोणित ओकर माथसँ बोकरय लागल। रोहिताक भीषणकाय देह जमीन पर गिरल, से गिरले रहि गेल। रोहिता यादवक प्राण जाइत देखि "ओ" भक्क भऽ गेल। ओकरा मुँहसँ ‘इस्स’ टा निकलल। दू सेकेँडक लेल ओकरो देह स्टेच्यू बनि गेल छल।
सम्पूर्ण हटियामे हो-हल्ला हुअए लागल।
भीड़ ‘मारो मादरचो... बभना केँ।’
‘हे रे बहिनचो... बभना, ग्वारक राजमे ग्वारकेँ मारि देभी।’
‘के छिऐे रे... ’।
जाधरि ओतय लोक जुटिकऽ ओकरा मारतिऐे, ताधरि ओ अचानकसँ भीड़मे भीड़क हिस्सा बनि गेल। केकरो पता नहि चलल जे ओ कतय गेल।
मुदा ओ माछ नहि छोड़लक। सभटा माछ लऽ कऽ भागि गेल।
जखन पुलिस इन्क्वायरी लेल पहुँचल तऽ किशुनगंज थानाक इंस्पेक्टर रामबाबू सिंह एक-एक गोटासँ पूछताछ केलक। दूटा बाभन टोलक छौड़ा समरनत्था आ मुनितबाकेँ ओहि हटियामे पुलिस लाठी सँ जतेक मारि मारलक, से कहि नहि सकैत छी। दुनू दू दिन पहिने दिल्लीसँ गाम आयल छल। दुनू अपराधी तऽ नहि छल, मुदा गाम आबैत छल तऽ पंचायतमे छिटपुट मारि-पीट कऽ लैत छल। मुदा, ‘ओकरा’ नहिये तँ पुलिस पकड़ि सकलै आ नहिये ओकर कोनो थाह ककरो लागलै।
ओहि साँझ एकटा आओर गप भेल।
पुलिस इन्क्वायरीक बाद नहरक काते-कात माछबला जखन घर जा रहल छल तऽ कियो साइकिलबला छौड़ा अन्हारमे ओकरा एक-एक सौ टाकाक दूटा नोट देलक आ कहलक-
‘हे हौ। जे तोहर माछ लऽ कऽ भागले छल ने, वएह ई टाका देने छौ।’
एतबे कहि कऽ ओ साइकिल बला छौड़ा फिरंट भऽ गेल।
गामक चार-चौहद्दीमे ‘ओकरा’ खोजल गेल। पुलिस आ सी.आइ.डी. लगातार ओकर घर पर ‘रेड’ केलक, मुदा ‘ओकर’ पता नहि लागल। बराही गामक ब्राहमण टोलक लोक बड चिंतित भेल, मुदा हाथमे शून्य।
ओना अहि घटनाक बाद आ बाभन टोलक दुनू छौड़ाक पुलिसक लाठी लगलाक बाद एतबे टा भेल जे दुनू टोलक लोक मामिलाकेँ शांत करयमे लागि गेल। रोहिताक स्त्री सेहो कोनो मोकदमा दर्ज करहिसँ मना कऽ देलक। लोक कहैत अछि जे रोहिताक स्त्री सेहो ओकरासँ तंग आबि गेल छल। रोहिता सभ दिन कत्तोसँ मारि-पीट कऽ आबैत छल। बिहारमे जहियासँ मद्य प्रतिबंधित भेल, तहियासँ ओ देशी ठर्रा या ताड़ी पीबिकेँ रातिमे घर घुरैत छल आ स्त्रीसँ मारि-पीट करैत छल। दुनूक ब्याहक बरख भेल छलै आ अखैन धरि कोनो संतान नहि भेल छलै। पुलिस जखन रोहिताकेँ पकड़ि कऽ लऽ जाइत छल तऽ ओकर स्त्रीकेँ सेहो लऽ गेल। भरि राति रोहिता हाजतमे आ ओकर स्त्री प्राणक डरसँ ओइ पुलिसक सिपाहीक बाँहिमे बंद रहल। रोहिताक स्त्रीक नाक-नक्श, ओठ, मांसल देह आ सुडौल उन्नत वक्ष कोनो विश्वामित्रक तपस्या भंग करहि लेल काफी छल। भोर धरि ओकर देह टूटि गेलै आ तकर बाद थानाक सिपाही दुनू प्राणीकेँ छोड़ि देलक। ‘गोंद’ सँ चिप-चिप करैत भरि नुआ पहिनने ओ रोहिताक संग गाम आयल। एहन तरहक गप कतेक दिन नुकाओल रहतिऐ। एक कानसँ दोसर कान जाइत-जाइत भरि गाममे गप हुअए लागल जे हर दू दिन बाद पुलिस रोहिता केँ बिन कारणो किए पकड़ि कऽ लऽ जाइत छै। नशा रोहिताकँे एहन बना देने छल जे काज तऽ ओ सभटा करैत छल, मुदा स्त्रीक संग की भऽ रहल छलै, ओकरा एकर परवाहि नहि छलै।
लोक कहैत अछि जे किछु दिनक गहमा-गहमीक बाद बराहीक दुनू टोलक वैमनस्यता ख़तम भऽ गेल। नहिये रोहिता यादव रहल आ नहिये कहानीक पात्र ‘ओकरा’। लोक कहैत अछि जे एहि घटनाक बादो पुलिसक सिपाही रोहिताक स्त्री केँ पूछताछक लेल बजाबैत छल आ भोर भेने पहुँचा दैत छल। रोहिताकँे मरलाक छह मास बाद ओकरा गर्भ सेहो रहि गेलै, जाहिसँ तंग आबिकऽ एक राति थानामे ओ अपन इहलीला समाप्त कऽ लेलक। पुलिस बला सेहो ओकर लाशकेँ केकरो हाथ नहि लागय देलक आ हरैली धारमे एहन नपत्ता कऽ देलक जे आइ धरि ओकर लाशक कोनो थाह नहि लागल अछि।
पिछला बेर जेखन अप्पन गाम गेलहुँ तखन गामक लोक सँ मालूम भेल जे कहानीक पात्र ‘ओकरा’ बारे मे बीस बरख बादो पता नहि चलल। कियो कहैत अछि जे ओ कोलकाता गेल छल अप्पन केस सुलझाबय लेल। जज शत्रुघ्न झा लग। कियो कहैत अछि जे ओ दिल्ली गेल छल इलाजक लेल एम्सक डॉक्टर ईश्वरशंकर लग। किछु दिन ओतय कोनो ड्रामा कंपनीमे काज केलक आ थियेटर कंपनी स्थापित केलक। कियो कहैत अछि जे ओ मुंबइ सेहो गेल छल। एक बेर कियो कहलक जे ओ बेंगलुरुमे एकटा कंपनीमे मैनेजर बनि गेल छल आ कतेक कर्मचारीकेँ मैथिलीमे कविता लिखय लेल सिखा देलक। ओहिमे एकटा ऑफिसर आ ओकर कनियाक कविताक धूम सभ दिस मचल अछि। कियो कहैत अछि जे ओ पोथी प्रकाशनसँ सेहो जुडल आ ‘पुरनांत प्रकाशन’ खोलि कऽ प्रकाशन जगतमे धूम मचा देलक। एकर कतेक रास लेखककेँ साहित्यक नोबेल पुरस्कार कतेक बरख भेटल।
जेना मैथिलीक प्रख्यात साहित्यकार जीवकांत नव लेखनक प्रसंगमे लिखने छलाह जे मैथिली नवलेखन बेकार युवक सभक ‘स्टेपिंग स्टोन’ थिक, ओ कोनो व्यक्तिक सम्पूर्ण जीवनक मिशन नहि थीक, ताहिना एहि कहानीक पात्र ‘ओकरा’ कँे सेहो गाममे रहबाक कोनो प्रयोजन नहि छलै। लोक कहैत अछि जे ओ घुमक्कड़ छल। पहिलुक बेर गाममे एहि तरहे समाजक रंगमे फँसल छल।
ओहि दिन दिल्लीक मंडी हॉउस मे मैथिली नाटक ‘ओरिजनल कामशास्त्र’ देखिकऽ निकलले रही जे प्रकाश भाइसँ भेंट भऽ गेल। वएह प्रकाश भाइ जे कहियो गाममे गीत गाबैत छल आ दिल्लीमे बड़का वकील भऽ गेल छल। कहानीक पात्र ‘ओकरा’ बारेमे चर्चा भेल तऽ ओ फेकुआ भाइक चर्च केलखिन। ‘भक्क’ सँ हमर नीन टूटल। फेकुआ भाइ ई की कहैत छलथि जे जहिना नाम, तहिना करम, फकीर रहय, एकदम नागा। आब हमर दिमाग जागल। चूँकि हमरा ओकरामे कोनो दिलचस्पी नहि छल, तें हम फेकुआ भाइक गपकेँ सुनिकऽ कानमे तूर-तेल दऽ कऽ सुति जाइत छलहुँ।
अहाँकेँ नै लागैत अछि जे कहानीक जे मुख्य पात्र अछि ओ देश-दुनियामे यात्री जेना भटकैत अछि, ओहिना जहिना मिथिलाक लोक देशक कोना-कोनामे भटकैत अछि। कखनो महाराष्ट्रसँ, कखनो गुजरातसँ, कखनो दिल्लीसँ भगाओल जाइत अछि। अहाँकेँ नहि लागैत अछि जे ओ नवयुवक आन कियो नहि, हम आ अहाँ छी, जे झट्ठोकेँ आन-शानमे केकरोसँ लड़ैत छी आ ‘माछ’क भोज लेल छुछुआयल जेना केकरोसँ मांगि लैेत छी आ कियो खुआबैत अछि तऽ खा लैत छी, की?
-डॉ विनीत उत्पल-सी-३२, मंडावली ऊँचे पर, आई. पी. एक्सटेंशन, नई दिल्ली-११००९२.
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