आनन्द कुमार झा
मैथिलीक वर्तमान रंगमंच , धर्मिता आ स्वतन्त्रता
जखन हमर चिन्तन मैथिली रंगमंचक स्वतन्त्रता दिस जाइत अछि तॅ हम पबैत छी - बेसी नाटककार रंगमंचक पक्ष राखए लगैत छथि । जखन की हुनका अपन नाट्य लेखन आ ताहिमे आबि रहल अवरोधक तत्वकेॅ उजागर करबाक चाहिअनि । से ओ जानि - बुझिकेॅ तकरा झाॅपैत रहैत छथि । से मात्र अहि दुआरे जे हुनक नाटक रंगमंच पर प्रदर्शन हुअएह । हुनका एकरती चिन्ता नहि रहलन्हि आकि रहैत छन्हि जे हम एक साहित्यकार छी । हमर सफलता नीक साहित्य लेखनमे अछि । हम पहिनहुॅ कहलहुॅ अछि जे रंगमंच स्वतन्त्र विधा छी । ओकरोमे जहिना साहित्यमे विभिन्न विधा नाटक , कथा , उपन्यास , कविता सभ अछि । तहिना रंगमंचोक अनेक विधा छैक , जेना - नाटक , नृत्य , गायन , बाजन , एकल अभिनय इत्यादि । आब एतए प्रश्न उठैत अछि आ चिन्तन करैक अछि । जे हमरा लोकनि मैथिली भाषामे जखन जखन रंगमंचक चर्चा करैत छी तॅ मात्र नाटकक विमर्श ठार कएल जाइत अछि । से किएक एना जानि बुझिकेॅ कएल जाइत अछि ? से अहि दुआरे जे ओहिमे साहित्य पक्षक लोकक बोलबाला रहैत अछि । रंगमंचीय विभिन्न विधाक विशेषज्ञ लोकनिकेॅ कतियाएल जाइत रहलाह अछि । ओ दहोदिसिआ जे साहित्योमे अपन स्थान सुरक्षित कएने रहए चाहैत छथि आ रंगमंचहुॅ पर सफलताक सिरही चढए चाहैत छथि । मुदा से सम्भव नहि छैक ओ कतहुॅ भएकेॅ नहि रहैत छथि । मुदा अहि खेलमे सभसॅ बेसी नुकसान जॅ ककरो होइत अछि तॅ ओ छी मैथिलीक रंगमंच । जतए नाटककार तॅ ओतबहि रहैत छथि मुदा कलाकार स्थापित नहि भए पबैत छथि । कलाकारक फेर बदल होइत रहैत अछि ओकरा अपनहि मंच पर कतियाएल जएबाक अनुभव अवश्य होइत रहैत हेतैक । अन्ततोगत्वा ओ निरीह कलाकार हारि - थाकिकेॅ रोटिओ जुड़बैक योग्य ओ नहि रहि पबैत छथि तहन विधा छोड़ि परा जाइत छथि । आहाॅ गौड़ कएकेॅ देखिऔक मैथिली रंगमंचक कलाकार ओतबहि गोटए सुरक्षित स्थान कए सकलाह अछि जे कोनो ने कोनो मंचसॅ जुड़ल छथि मैथिलीमे एखनधरि बहुत कमे आदर्श कलाकार बनि सकलाह अछि ( हम तॅ कहब नहि बनि सकलाह अछि ।) जिनका सम्पूर्ण मिथिलाक लोक चिन्हैत हेतनि आकि स्वीकार करैत होएतनि । सम्पूर्ण मंच पर ओ अभिनय करताह से सपना सपनहि रहि जाइत छन्हि । अन्तमे जखन पीढ़ी परिवर्तन होइत अछि तॅ नाटकक कालजयी होएबाक चर्चा तॅ होइत अछि मुदा ओहिमे अपन खून-पसीना सुखेनिहार कलाकारक नामो - पता हरा दैत अछि । ई केहेन रंगमंचक स्वतंत्रता । विद्यापतिक नाटकक चर्चा तॅ गुमानसॅ करैत छी । फेर ओकर मंचन सभमे अभिनय केनिहार कलाकार लोकनिक नाम - गाम किएक बिला गेल । की एकर दायित्व रंगकर्मी, रंगमंचीय सत्ता भोगनाहर लोकनिक नहि बनैत अछि ।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
मुन्नाजी
बीहनि कथा-- मानकीकरण ओ तुलनात्मक पक्ष
मैथिली कथा साहित्य मूलत: संस्कृत भाषा साहित्य सं अनुदित भ'अपन पएर पसारने छल।एकर बीजारोपन चन्दा झा द्वारा विद्यापतिक 'पुरूष परीक्षा' सं भेल छल।कालान्तर मे मैथिली कथाकार बाङला कथा माध्यमे पाश्चात्य कथासाहित्य सं परिचित भेला।तत्पश्चात मैथिली कथा लेखनक कथ्य,शिल्प आ विषय परिमार्जित भ' मैथिली कथा साहित्य के नव दृष्टि देलक आ ओ संस्कृतक शब्द ,कथा/गल्प नामे लिखाइत रहल।पछाति प्रो. रमानाथ झा सदृश्य विद्वान/आलोचक ,अंग्रेजीक प्रभावे एकरा अंग्रेजी मे Short Story आ ओकर अनुवाद ' लघुकथा कहि संबोधित केलनि।तहिया सं इ कथा/ गल्प ,रचना त' ओही नामे होइत रहल मुदा विधागत ' लघुकथा ' (Short Story) विधाक अन्तर्गत मूल्यांकित होइत रहल।आ ताहि परिणामे मैथिलीक सब संग्रह पर अंग्रेजी मे Collection of Short Story अनिवार्य रूपें लिखल भेटत।
तकर पछाति मैथिली साहित्यक इतिहासकार लोकनि सेहो कथा/गल्प नामक रचना कें लघुकथा विधाक श्रेणी मे राखि व्याख्या . करैत रहलाह।" संप्रति गल्प वा लघुकथा,उपन्यास सं अधिक लोकप्रिय भेल जा रहल ऐछ।तकर प्रबल कारण पाठक वर्ग मे क्रय शक्तिक क्षीणता वा पलखतिक अभाव, से नै जानि।" --डॉ. जयकान्त मिश्र-मैथिली साहित्यक इतिहास(प्रकाशक- साहित्य अकादमी)ऐ फरिछओठक पछाति अंग्रेजी साहित्यक विधाक पृष्ठभूमि मे ओहि विधा परिवारक अंग भ' स्थापित भेल। आगू ओकरा आओर फरिछबैत दुर्गानाथ झा श्रीश लिखै छथि--" आइ मैथिली साहित्यक एक मात्र उपलब्घि थिक लघुकथा(Short Story) पूर्वक कथाकार लोकनि गल्प आ उपन्यासक बीच शिल्पगत अन्तर नै बुझैत छलाह।मुदा आब इ स्पष्ट ऐछ।जाहि सं लघुकथा(कथा/गल्प नामे) विधागत स्वतंत्र परिचिति बना पओलक ऐछ।"--मैथिली साहित्यक इतिहास-दुर्गानाथ झा श्रीश।"
हमरा मैथिली प्रतिष्ठा वर्गक छात्र रहने मैथिली साहित्यक इतिहासक अध्ययनक अनिवार्यता छल। एहि अध्ययनक क्रमे मैथिली कथा के विधागत ' लघुकथा( Short Story)बुझबाक अवगति भेल। हम आश्चर्य चकित रही अग्रज सबहक हिन्दी लघुकथा विधाक मैथिली अवतरणक रूपें अंधानुकरण पर, ई की ?पहिने सं जे विधा विद्यमान आ स्थापित ऐछ(कथा/गल्प नामे) ' लघुकथा(Short Story)।तहन ओइ विधाक दोहरीकरणक की खगता ?माने पिता आ पुत्रक एकहि नामे पुकार ! जहन की दुनूक चरित्र,प्रकृति आ क्रियाकलाप एक दोसराक विपरीत। फेर नकल वा मिझ्झरक अज्ञानता किएक ? ओही अज्ञानता वा अंधानुकरण सं पार पएबाक आ विधाक शुन्यता के भरवाक लेल अवतरित भेल बीहनि कथा विधा (1995)।
सहयात्री मंच ,लोहना (मधुबनी)द्वारा भेल साहित्यिक बैसार मे सामूहिक रूपें सर्वसम्मति सं एहि विधाक अवतरण भेल छल। ऐ विधाक नाम की राखल जए ताहि पर बहसक पछाति श्री राज द्वारा ताकल नाम-" बीहनिकथा" पर सर्व सम्मति सं स्वीकृति द'आगू बढ़ाओल गेल।आ तहिया सं मैथिली कथा साहित्यक दू गोट विधा-पहिल,लघुकथा(Short Story)आ दोसर " बीहनि कथा(Seed Story)चलन सारि मे रहि गेल।
25 बरख सं कछुआ चालि सं चलैत बीहनि कथा विधा साहित्यिक छद्म खरहा सं टपि अपना के विजेता कहेबाक पात्रता आब हासिल क' लेने ऐछ।जन्मक पछाति ठेहुनिया मे कतेको के सैद्धांतिक पटकनिया दैत डेगा डेगी बढ़' लागल। तकर पछाति एकरा दबेवा/माटि मे गोड़बा लेल किछु तथाकथित/स्वघोषित विद्वान सक्रिय भ' गेला। फलत:एकर चालि बाधित होइत ठमकि सन गेल। सोझां मे ' एकला चलो रे' के उघैत करीब एक दशकक यात्रा एकरा हेरेबा लेल वेश रहल।2010 मे पुन: इ कान्ह उठेलक।आ ताहि मे पछिला सं जेरगर समूह नव आँखि-पाँखिक संग अंगेज पुन: सोझां आनि थिर केलनि।' विदेह , इ पाक्षिक' बनल राजपथ आ सारथी भेलाह संपादक-.गजेन्द्र ठाकुर आ सहायक संपादक-उमेश मण्डल। ऐ एक दशकक भीठ पड़ल साहित्यिक जमीन पर श्री राजक ' बीहनि कथाक साहित्यक बीराड़क बीहनि सं रोपनि भेल।तकरा हरियरी अनलनि गाम-घर, पत्रिकाक संपादक - शःरी रामभरोस कापड़ि भ्रमर।आ ऐ तरहें श्री राज भेलाह' वात्सल्य ' बीहनि कथा(2003)सं एकर पहिल प्रकाशनक स्वामी।
बीहनि आ कथा शब्दक उत्पत्ति
-------------------- --------------------
संस्कृतक ' ब्रीही ' शब्दक अर्थ होइछ बीज आ मैथिली मे बीहनि/बीहन/बीहैन सेहो ओही शब्दक मूलार्थ मे निहित।--प. भवनाथ झा
कथा-संस्कृतक कथ् धातु सं बनल।जकर तात्पर्य होइछ- कहब वा वर्णन करब।
बीहनि कथाक अर्थ आ परिभाषा
----------------------------------------
बीज/बीजम संस्कृत शब्द थिक।यथा-यज बीजै:सहस्त्राक्ष -महाभारत
कथा सेहो संस्कृत शब्द थिक।यथा-कथासरित्सागर ।
कथाक मूलत: छ तत्त्व संग निर्मित होइछ।
01-कथावस्तु-कथाक संरचनात्मक रूप कथानक अथवा कथावस्तु कहाइछ।एकरा मे चारि प्रमुख स्थिति होइछ-आरम्भ, आरोह,चरम आओर अवरोह।
02-चरित्र चित्रण-उपपस्थित पात्रक गुण-दोषक वर्णन।रिजर्व चित्रण कहाइछ।
03-संवाद-पात्रक मनोदशाक वर्णन में प्रयुक्त शब्द।
04-देश काल-स्थितिक वास्तविक विवेचना लेल तैयार वातावरण।
05-उद्देश्य-कथा सृजन में उदघाटित मूल वा सार्थक पक्ष।
06-शैली-प्रस्तुतिकरणक कलात्मक विश्लेषण।
अर्थात् बीहनि कथा पूर्णत: संस्कृत शब्दक उत्पत्ति थिक। जेना- लघुकथा
मुदा साहित्यिक विधाक रूपें जाँची त' इ विधा मूलत:स्वतंत्र आ पूर्ण रूपे मैथिली साहित्य मात्रक विधा थिक।आयातित/ नकल नै।
बीहनि माने बीज/बीया।जाहि मे विकास करबाक गुण निहित होइछ।मुदा ओ अविकसित रहैत ऐछ।समय अएला पर विकसित होइत ऐछ।ओकरा मे एक सं अनेक होएबाक गुण रहबाक चाही।बीहनि कथा-एहेन कथा,जे अनेक कथा(कथा/उपन्यास)के जन्म देबाक क्षमता राखए ओ बीहनि कथा भेल/हएत।अन्यथा नै।
तें बीहनि कथा मे निष्कर्ष नै हेबाक चाही।---डॉ. भवनाथ झा
बीहनि कथा विधाक नामकरण कर्ता श्री राजक मतानुसार--
बीहनि कथा,ओइ बीयाक समान ऐछ जकरा मे झमटगर/पूर्ण गाछक संभावना हो।मुदा ओ गाछ पीपर/पाकैड़ नै,पौध रूप मे हो।परञ्च बोनसाइ नै।
पौध रूप सं तात्पर्य जे कथ्य/शिल्पें गसल मुदा शब्दक संख्ये सए सं डेढ़ सए धरि हुअए। मुदा बन्हन मे बान्हल नै। रचनान्त निकसगर ( निस्तार देने) नै हुअए। निष्कर्ष पाठक पर।
बीहनि कथाक चर्चित आ लोक प्रिय कथाकार, संपादक आदरणीय घनश्याम घनेरो ऐ विधा के परिभाषित करैत कहै छथि---
कोना बुझबै जे इ रचना बीहनि कथा भेलै:--
(क)शब्दक मानक औसत सव सौ हो
(ख) विषय मारक ,आ सोचबा पर विवश करैत हो।
(ग) कथ्य एहेन,जेना लगैत हो कथा/उपन्यास वा कोनो गद्यक सार हो।
(घ) कथा मे निष्कर्ष नै हो।
कथा साहित्यक सशक्त हस्ताक्षर श्री राजकुमार मिश्र जीक विचारें---
(क) आकारगत छोट सं छोट हो
(ख) कथ्ये फरिछएल आ गसल हो
(ग) संपूर्ण गद्यक संभावना निहित हो
(घ) ऐ सं इतर, अव्यवस्थित रचना फोंक हएत। ओ बीहनि कथा नै।
बीहनि कथा विधाक मानकीकरणक आधारभूत इकाइ
गद्य साहित्य, मूलत: कथा विधाक मानकता तयकरणक आधार अंग्रेजी साहित्य ऐछ।अंग्रेजी साहित्यक अनुसार विश्व भरिक कथा ,अंग्रेजीक Flash fictionक अन्तर्गत निहित ऐछ।इ फ्लैश फिक्सन छ: खण्ड मे विभाजित ऐछ जकर तेसर खण्ड टेलब्रा(Tellbra )क अन्तर्गत मैथिलीक बीहनि कथा विधाक नियामकता सन्निहित ऐछ।
फ्लैश फिक्सन(टेलब्रा)पर आधारित बीहनि कथा मापनक महत्वपूर्ण बिन्दू :-
01-कथ्य/शिल्पें पुष्ट जाहि कथाक न्यूनतम शब्द स. 20 आ अधिकतम 150 हो।
02-कथा साहित्यिक मानकताट परिपालक हो।यथा कोनो संस्मरण वा शब्द संग्रह मात्र बीहनि कथाक श्रेणी मे नै राखि सकैछ।
03-कथा,एकटा बीजक कथाक प्रतिदर्श हो।अर्थात एहेन कथा जाहि सं कथा/उपन्यास आदिक सर्जनाक संभावना प्रबल हो।
04कथा, निकस पर जा स्थिर नै हो। अन्त खूजल मुदा भावपूर्ण हो।
05-संपूर्ण कथा कोनो संदेशप्रद वा सकारात्म्क उद्देश्यक हो।शब्दक स्थूलकाय मात्र नै।
उपरोक्त मानकता पर ठाढ़ रचना बीहनि कथा विधाक रचनाक रूपें अपन जग्गह पेबा मे सक्षम भ' पाओत।तकर पहिल मूल्यांकन लेखकक,पछाति संपादक ओ आलोचकक हाथ ऐछ।
"कोनो नव सफलता हासिल करवा लेल पुरान मे पैस' पड़त।,खंघार'पड़त।तहन परिमार्जित फल सोझां आओत।जे भविष्यक नव बात गढ़ि मोकाम धरि ल' जएबा मे सक्षम बना पाओत।'
एहि तरहें मैथिलीक लघुकथा विधा(कथा/गल्प)नामे लिखाइतक पछाइत बीहनि कथा विधा वैश्विक कथा मापदण्डें एकटा नव प्रतिमान गढ़ि,मैथिली साहित्य मे मैथिलीक अपन एक मात्र विधाक रूप मे स्थापित भेल।इ कोनो आन आयातित/नकल,विधाक विधान्तरण वा नामान्तरण नै।स्वयं मे मानक स्वतंत्र विधा हेबाक परिचिति कायम केलक।
एहि प्रकारें मैथिली कथा साहित्यक दू टा स्वतंत्र विधा अपन अस्तित्व कायम क' रखने ऐछ।पहिल-लघुकथा (Short story)जे कथा/गल्प नामे लिखाइछ।ठीक ओहिना जेना कि अंग्रेजीक Poetry,मैथिली मे 'काव्य' नामक विधान्तर्गत-गीत,गजल,,कविता, हाइकु,क्षणिका आदि स्वतंत्र नामे/क्रियाकलापें/चारित्रिक गुणे अपन- अपन परिचिति बनौने ऐछ।मुदा विधागत सबटा काव्य परिवारक अंश वा अंग थिक।
दोसर-बीहनि कथा(Seed Story)
उपरोक्त दुनू विधा मध्यआओर कोनो वैध/अवैध विधाक लेल जग्गह वाँचल नै ऐछ। मुदा लघुकथा नामे बलधकेली मे हिन्दी लघुकथा विधाक नकल मैथिली अवतरण के घोसियेबाक असफल प्रयास ठाम ठीम क' मैथिली साहित्य के उकरू बनेबाक षडयंत्र जारी ऐछ।इ भ्रम वा द्वन्द ऐ द्वारे भेल जे किछु मैथिली रचनाकार लघु कथा माने आकारे छोट कथा बूझि नकल करैत रहलाह।ध्यातव्य महत्वपूर्ण बात जे लघुकथा एकटा शब्द मात्र नै,ओहि नामक एकटा स्वतंत्र विधा थिख।जे मैथिली मे अदौ काल सं कथा/गल्प नामे लीखाइत पहिने सं स्थापित ऐछ।आब तहन विचार करी मैथिली सं इतर हिन्दी भाषा साहित्यक अपन विधा " लघुकथा "क मैथिली अंधानुकरण पर।
कोनो व्यक्ति,विषय,बौस्तक गुणक अनुसरण/अनुकरण बेजए नै।मुदा अंधानुकरण कतेक उचित ?
मैथिली साहित्य मे विद्यमान " बीहनि कथा " विधा सं इतर सब विधा कोनो ने कोनो अन्य भाषाक विधा सं आयातित ऐछ।मुदा जत' सं आयातित भेल,ओइ मे आ मैथिली मे अपन मानकता वा प्रामाणिकता सिद्ध केने ऐछ। हिन्दीक लघुकथा विधा जे स्वयं मे आइयो मानक वा प्रामाणिक सिद्ध नै भ' पावि घड़ीक पेण्डूलम जकां डोलि रहल ऐछ।ओइ मे आइयो कते शब्दक वा कोन रचना ओइ विधाट रचना ऐछ की नै,तै पर मंथन चलिये रहल ऐछ।एते दशकक लेखनक पछातियो मूल्यांकन मे लघुकथाक जग्गह लघुकहानी सं जोइर व्याख्या होइछ।जतेक मुड़ी ततेक पीरी बला गप्प।एहेन अव्यवस्थित विषय/बौस्तक अंधानुकरण ,हास्यास्पद आ कि उठल्लूपन ? "अपने आँखिगर रहैत, अन्हरा के सहारे बाट ताकब कतेक उत्कीर्णा बला बात।"
हिन्दी लघुकथा विधाक अंधानुकरणक प्रबल पक्ष रहल हएत,हमर सबहक सामान्य शिक्षाक हिन्दी माध्यम।हम सब एकेडमिक शिक्षा ग्रहण सामान्यतया हिन्दी भाषा माध्यमे केलहुँ।किताब,पत्र/पत्रिका क पाठनक भाषा हिन्दी रहलाक कारणे हिन्दी साहित्यक विषय-वस्तु पर निर्भर स्वाभाविक छल।तें हिन्दी साहित्यक संतान(विधा)कें पोसपूतक रूप मेअवैध रूपें अंगेज लेब अस्वाभाविक नै।ओही देखाँउसे वा नकल क'मैथिली मे लघुकथा संग्रह नामे 1972 मे आयल पहिल पोथी-" जे की ने से "--डॉ. हँसराजक।आ ,1975 मे तत्कालीन नवतुरिया कथाकार डॉ. अमरनाथक " क्षणिका "।दुनू पोथीक रचनाकार(आमुख मे)ऐ संग्रहक एको टा रचना ,कोनो पत्र/पत्रिका मे प्रकाशित नै हेबाट बात स्वीकारने छथि।ऐ सं इ स्प्ष्ट ऐछ जे मैथिली मे एकर कोनो अस्तित्व नै रहै।इ तहिया के घटना/बात छैक जहिया मैथिली सं इतर अन्य भाषा मे कथ्य/शिल्पें मजगूत मुदा आकारगत छोट रचनाक एकटा स्वतंत्र विधाकरूपें/नामे सृजन भ' रहल छलै।यथा-संस्कृत -लघ्वी,हिन्दी-लघुकथा,पंजाबी-मिन्नी कहाणी/कथावां,उर्दु-अफसांचे,ओड़िया-क्षुद्रकथा......आदि।
मैथिली मे हिन्दी विधाक अंधानुकरण क शुभारंभ क' किछु मैथिली कथाकार स्वघोषित विद्वान हेबाक दंभ पोसलनि।तकर करीब पचीस बरख धरि अंधानुकरणित लेखन सेहो सुषुप्त वा शुन्य रहल।पुन: 1997 मे लघुकथा संग्रह नामे दू गोट पोथी,शिलालेख-तारानन्द वियोगी आ खण्ड-खण्ड जिनगी -प्रदीप बिहारीक आयल।से ताहि अवस्था मे जाहि सं दू वर्ष पहिने(1995 मे)मैथिलीक अपन एक मात्र विधा बीहनि कथा अवतरित भ' चूकल छल।ऐ विगत पचीस वर्षक नमहर अन्तराल मे अंधानुकरणित हिन्दी लघुकथा विधाक मैथिली अवतरण पर मैथिली मे कोनो मानकता तय नै भेल छल।(आइ एकैसम सदीक दोसर दशक धरि नै भेल)।जेना पहिने मिथिला मे सत्यनारायण भगवानक पूजन पर सुनता उपासक चलनि छल।तहिना मैथिली रचनाकार लघु कथा शब्द सुनि मात्र लघु कथा लिखबाक नकल करय लगलाह।जहन की हिन्दी मे लघु कथा शब्द मात्र नै,ओहि भाषाक एकटा स्वतंत्र विधा ऐछ।आ मैथिली मे कथा/गल्प नामे लिखाइत लघुकथा विधा पहिने सं विद्यमान छल।आब नकल क' लिखल जाइ बला रचना-जे बीस शब्द सं आठ सौ धरिक ऐछ।तखन प्रश्न उठैत जे कतेक लघु,ककरा सं लघु ?ऐ पर प्रकाशित कोनो तय मानकता नै छल(ऐछियो नै)जाहि सं इ सुनिश्चित कएल जए सकए जे कोन रचना लघुकथा विधान्तर्गत स्वीकार वा अस्वीकार कएल जा सकए।प्रसिद्ध कथाकार ओ इतिहासकार डॉ. मायानन्द मिश्र एकरा नकारैत लिखने छथि--" मैथिली मे लघुकथा नामे एक अन्य कथा लेखनक विकास भेल ऐछ जे समकालीन कथा/गल्प नै,अपितु चुटुक्काक निकट ऐछ।"--मैथिली कथाक विकास(संपादक- बासुकीनाथ झा)साहित्य अकादमी -2003
आधार हीन लेखने मठोमाठ हेबाक/कहेबाक परम्पराक निवहता मे किछु रचनाकार लीन रहलाह।जहन कि बेसुरा तान सं प्रसिद्धि पेनिहार गायक जकां बिना मानकताक लेखन मे लीन रहनिहार अपना के प्रयोगवादी आ प्रतिष्ठित बुझनिहारक रचना आ ओ तथाकथित विधा स्वय: खारिज ऐछ।ताहि लेल अदखोइ-वदखोइ आ माथा पच्चीक खगते कोन?
हिन्दी विधाक मैथिली अवतरण लघुकथा नामक रचना आइ धरि बसात मे बौआइत ऐछ।जमीन पर अनबाक कहियो कोनो निश्तुकी प्रयास नै भेल।ओ तथाकथित विधा/रचना स्वत: खारिज होइत चेतना शुन्य भ' गेल।किएक त' जहन जमीन पर उतरबाक प्रयास केलक तहन आधारहीन हेबाक कारणे सूपक भाटा सन ओंघराइत रहल किएक त' स्थिरताक आधार पहिने सं नदारद!किछु स्वघोषित वा परपोषित विद्वान सब--" डाँरि पारि के ओकरा लक्ष्मण रेखा बुझ' लगलखिन,मुदा डाँरि सोझ भेल की वक्र तकरा सं दूर धरि सरोकार नै।"प्रसिद्ध रंगकर्मी श्री कुणाल ,कथा प्रसंग लिखल अपन आलेखक अन्तिम अनुच्छेद मे लिखै छथि--"आब मैथिली मे लघुकथा नामे किछु रचना सेहो देखाइछ,जे मैथिली साहित्य मे आधार हीन ऐछ।तें ओकर चर्च करब व्यर्थ सन।"--अंतिका-रजतजयन्ती अंक(2008)संपादक- अनलकान्त।
लघुकथा नामित रचनाक भविष्य ?
जेना अंग्रेज़ी मे पोएट्री,मैथिली मे " काव्य ' विधा ऐछ।आ ऐ काव्य विधान्तर्गत--गीत,कविता ,गजल,क्षणिका, हाइकु आदि स्वतंत्र नामे आ स्वतंत्र अस्तित्वे छैक।मुदा विधागत सब एकहि परिवार "काव्य "क अंग छै।तहिना अंग्रेजी क शॉर्ट स्टोरी विधा छै ,आ कथा/गल्प ओकर अंग।
मैथिली मे लघुकथा सं इतर दोसर कथा विधा छै " बीहनि कथा "(Seed Story),हिन्दीक अंधानुकरणे लघुकथा नामे सृजित रचना बीहनि कथा विधान्तर्गत ग्राह्य ऐछ।परञ्च बीहनि कथाक तय मानकता पर ठाढ़ होइ बला रचना मात्र।से ओ लघु कथा नामे होइ वा बीहनि कथा नामे।
बानगी स्वरूप देखल जए डॉ. सत्येन्द्र झा जीक लघुकथा नामे दू टा रचना-
इसकूल--
ओहि गाम मे एकटा दोकान नै छलै।तीन किलोमीटर जाय पड़ै छलै छोटो छीन चीज किनबा लेल।जे कियो कहियो दोकान फोलबाक साहस केलक ओकरा दोकान मे दोसरे -तेसरे राति चोरि भ' जाय आ तकर बाद दोकान बन्न भ' जाय।चोरवा गामक नाम सं परोपट्टा मे जानल जाइत छल ओ गाम।मुदा नरेशक साहस कहू वा दु:साहस ओ बाहर सं आबि दोकान फोललक ओहि गाम मे।घर मे पिता आ पत्नी विरोध कयलनि मुदा ओ ककरो नै सुनलक।दोकानक स्टाफक रूप मे सभ सँ सेसर चोर के रखलक।ओ चोर सेहो निश्चिंत छल जे जखने बेशी समान जमा होयत कि चोराक सभ किछु ल' जायब।।नरेश तीन सए टाका ओहि चोरकेँ दै छल।शहर सँ समान अनबाक हेतु नरेश ओही चोरबाकेँ पठबै छल। क्रमशः चोरवा कोन समान मे कते लाभ होइत छल सेहो धरि बुझय लागल।
आइ ओहि दोकान मे समान भरल छल।आजुके राति चोरबा अपन संगी सभहक संग चोरिक योजना बनौलक।जखन दोकान बन्नक' नरेश चलि गेल तँ चोरबा अपन संगी सभहक संग दोकान मे घुसल।बोरा मे समान सब कसय लागल।एकटा संगी पुछलकै -" कते दामक समान हाथ लागल ?"
दोसर चोर कहलकै-"पांच हजार सँ कम के नै हेतै।"
"मुदा एहि पांच हजार मे तँ मालिक के पांच सयसँ बेशीक फयदा नै हेतै।साढ़े चारि हजार तँ मूलधन छै।"--चोरबा बाजल---फेर ओहिमे हमरो तीन सय के हिस्सा हेतै।" चोरबाक म़ोन तीत भ' गेलै।ओ अपन मित्र चोर सभके बुझबय लागल--चोरि त' तखने जायज होइछ जखन हमर हक छीनि क्यो अपन घर भरय,मुदा नरेश बाबू तँ ओतबे कमाइ छथि जतेक उचित अछि।ओ नाजायज लाभ कहाँ लै छथि ?"
चोरबा चोरि करबाक विचार बदलि लेने छल।संगी सभ ओकर निर्णय पर सहमति व्यक्त कयलक।बोरा खोलि चोरबा सभ सामान केँ पहिने जकाँ सैंतय लागल।नरेश एकटा कोन मे ठाढ़ भ' ई सभ देखैत रहल।ओकरा बचझना गेलै जे ओ कोनो दोकान नहि,एकटा इसकूल खोलने हो।
विश्लेषण--उपरोक्त रचना शब्द संख्ये नमहर ऐछ!माने टेलब्राक निर्धारित शब्द संख्या-150 सँ उपर।
कथ्य-प्रेरक,पंचतंत्रक कथा समकक्ष।प्रारम्भिक लेखनक करीब बाझल।
शैली- कथा बला,सेहो पूर्ण नै।छेंट सन।
तें बीहनिकथाक परिधि सं बाहर ऐछ।
दोसर बानगी
----------------
मौअति
ओ ईमानदार छल।तेँ लोकसभ ओकरा मारय छल।लोकसभ कहलकै- तोरा कुकुरक मौअति मारबौ।ओ चुप्प छल,मुदा प्रसन्न।कारण- ओ मनुक्खक मौअति नहि मरय चाहैत छल।
विश्लेषण-इ रचना निर्धारित शब्द संख्या मे बान्हल ऐछ।
मुदा कथ्य - भाषण वा आदेशक हिस्सा मात्र।
शैलीगत-निष्कर्ष पर पहुँचा देल गेल छैक।
तें इहो बीहनिकथाक हद मे नै रहि रहल।
उपरोक्त दुनू रचना- सत्येन्द्र कुमार झाक लघुकथा संग्रह-अहींकेँ कहै छी(2007)।पृष्ठ- 30/31 सँ उद्धृत।
आब अही लेखकक इ तेसर कथा क बानगी नीचाँ ऐछ जे हुनकर नवका संग्रह-"जँ अहाँ सुनितहुँ"(2020) सँ ऐछ ।
भेटब डूबब
" अहाँक जीवन मे सभ सँ नीक की लगैत अछि ?"
"अहाँके भेटब...."
"आ अहू सँ नीक.....?"
" हमरा हेरा जएब...?"
उपरोक्त रचना लिखल त' गेल ऐछ लघुकथा नामे मुदा बीहनिकथाक मानकताक करीब ऐछ।
यथा-निर्धारित शब्द संख्या(अधिकतम-150)क भीतर
कथ्य आ शिल्पें गसल। निस्तार विहीन।
तें इ रचना पूर्णत: बीहनि कथा विधाक अंग मानल जा सकैए।शेष निंघेस सदृश्य।ठीक ओहिना जेना कोनो एक कक्षा मे पढ़ैत सब विद्यार्थी परीक्षा समय समान प्रश्न हल करैछ।परिणाम मे न्यूनतम अंक 30% प्राप्ति बला विद्यार्थी मात्र सफल आ शेष असफल घोषित होइत ऐछ।
आब एहने बानगी बीहनि कथा नामे लिखल रचना सँ....
डागदर साहेब-- मिथिलेश सिन्हा
बड्ड दिन सँ पत्नी कहैत छलीह जे,हमरा पर किछु धियाने नै दैत छी।खाली मोबाइल मे खुटूर-पुटूर करैत कविता-कहानी रचैत रहैत छी.....जखन बेमारी बढ़त,पलंग पकड़ि लेब...तखन सबटा कविगिरि घुसरि जएत।
एहेन धमकी पर के नहि डरतै यौ?पत्नी केँ होमियोपैथिक दवाई पर पूर्ण विश्वास छैन्ह।पिछला मंगल दिन शहरक बड्ड पुरान एगो बंगाली डागडर ठाम हुनका ल' गेलहुँ।
सांझुक बेर,लगभग आठ-नौ गोट रोगी बैसल छलाह।डागदर साहेब बयस सँ लगभग अस्सी-पचासीक हेताह।एकटा रोगी पर आधा घंटा पूछताछ करैत,अपन डींग डांग सँ रोगी आओर परिजनकेँ अपन बड़प्पनक खिस्सा कहैत समय आगाँ खींचि रहल छलाह।हमर नम्बर दोसरे छल,मुदा घंटा भरि डागदर साहेब लागल रहलाह।
अगल-बगल मे बैसल आन रोगी अकछय लागल।आब हमर नम्बर आएल।
" किनको देखाना हाय ?"
" जी,हमर पत्नी केँ...।"
" हूँ,इधर आइए"
" हम हरि बाबूक बालक थिकहुँ.."
"ओहो,तुम इंजीनियर का बेटा है ।
ओ हमसे ही अपना इलाज कराता था..कैसा है ओ..?"--आन रोगी दीसन तकैत बजलाह।
" जी,ओ मरि गेलाह..."
" ओ गॉड...,तोमहारा माई कैसा है?"
"जी,ओहो मरि गेलीह...।"
हमर जवाब सुनि क' बेंच पर बैसल आन मरीज,बहन्ना बना ससरय लागल....।---डागडर साहेब,आश्चर्यचकित भाव सँ खन हमरा,खन रोगी सबकेँ ससरैत देखय लगलाह।
विश्लेषण:-
उपरोक्त रचना बीहनि कथाक मानक शब्द स. सँ बाहर ऐछ।
कथा मे उप कथाक समावेश।
कथ्य-शिल्पें कथाक छेंट सन लघु कथा।
----मिथिलांगन,अंक-38-39
निर्वहन--कल्पना झा
--माय गे! दादी त' हाथे सँ लपे लप तिल-चाउर परसै छलीह,मुदा तों त' चम्मच सँ परसै छें ?
--धुर्र ! ताहि सँ की हेतैक ?
--नहि हेतैक की...?हमरो सबकेँ नीक रस्ता भेटल।
--से की ?
--"इएह जे ' निर्वहन 'मे सेहो 'चम्मच ' लगाओल जा सकैछ।
मिथिलांगन---36-37
विश्लेषण:-
इ रचना कथ्य-शिल्प आ शब्द स.मादे पूर्ण मुदा कथा सारक संग बन्न भेल।माने निकस पर कसैत।तें इहो कथा विधागत झूस ऐछ।
बेटा निगम- घनश्याम घनेरो
लावारिस लहास पुछलकै :
-- बेटा! नगर निगम?
-- हम तोहर बेटा नहि, कर्मचारी छी।
-- हमरा लेखा तोहीं बेटा।
-- ठिक्के! लोक केँ लोक सँ मतलब नहि रहलै तँ...
-- पहिने हमरा घिसिएबह आ की कुकूर केँ?
-- तोरा।
-- पहिने हमरे किए?
-- एत्तेक मनुक्खता अखन छैक, तैं!
-- मनुक्खक लहास केँ बादमे आ कुकूर पहिने कहिया सँ घिसिएल जेतै?
-- ई काज हमर अगिला पीढ़ी करत।
घिसिया क' ठेलापर चढ़बैत काल लहासक आँखि कुकूर दिस छलैक।
इ रचना ऐ विधाक सब मानकता यथा- निर्धारित शब्दक भीतर।फरीछएल कथ्य आ गसल शिल्प मे निस्तार रहित पूर्ण ऐछ!
अन्तत:मैथिली साहित्यक दू भाग भेल -लघुकथा (SHORT STORY)आ बीहनि कथा ,(SEED STORY )इ दुनू निर्धारित रूपें निरन्तरता बनौने रहत।शेष फोंक मात्र।
--"पहिने बीहनि कथा,सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ैत रहल।
आ आब................पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ैत रहत।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
नारी शब्दक विवेचना
:: डॉ. अपर्णा
नारी- नारी शब्द नृ अथवा नरसँ बनल अछि। (नृ+अस+दीप= नारी। यास्क नारीकेँ ‘नृतू’सँ मानलनि अछि। एहि विशेषणक आधारपर स्त्रीकेँ नारी कहल गेल अछि, मुदा ऋग्वेदमे ‘नृ’क प्रयोग वीरताक काज करब दान देब तथा नेतृत्व करबाक अर्थमे भेल अछि आ नर शब्दक प्रयोग सेहो वीर दाता तथा नेताक अर्थमे प्रयुक्त भेल अछि। स्त्रीक नारी नाम सेहो एहि विशेषताक कारण पड़ल होएत। ब्राह्मण ग्रन्थमे कतहु कतहु ‘नारी:’पाठ भेटैत अछि मुदा सायणृक मतसँ नारिक भाव नरक उपकारकसँ अछि।[i]
वामा- स्त्री सौन्दर्यताक कारणेँ वाम कहबैत अछि। ‘वयति सौन्दर्यम’। प्रतिकूल बात कहलासँ सेहो ‘वामा’कहबैत अछि। जेना- हक बदल। नहीं, वामाक दुर्गनाम सेहो अछि।[ii]
अवला-‘अवला शब्द नारीक शारीरिक संरचनाक ध्यानमे राखि प्रयोग कएल गेल अछि। कारण पुरुष जकॉं स्त्रीमे बल नहि होइत अछि। यद्यपति नारीक मानसिक उड़ानकेँ लोहा वैदिक ऋषि सेहो मानैत छलाह आ ओकरा वशमे करब असाध्य मानैत छलाह।[iii]
सुन्दरी- सु+उन्द= गिल्लकरब+डीप= सौन्दर्यवती नारी एहि हेतु कहल जाइत अछि जे जकरा देखलासँ मात्र पुरुषक हृदय गिल्ल भऽजाइत अछि। चित्त द्रवित भऽ उठैत अछि अथवा ‘सुष्ठानुन्दयति इति नैरुक्ता:।[iv]
वस्तुत: ‘सुन्दरी’शब्द ऋग्वेदक ‘सुनरी’शब्दक विकसित रूप प्रतीत होइत अछि। ऋग्वेदमे उमाक लेल ‘सूनरी’शब्दक प्रयोग भेल अछि।[v]‘सुनरी’क तात्पर्य-शोभाशाली सुन्दी।
प्रमदा- प्रमदक भाव होइत अछि हर्षा ‘प्रमद समदौ हर्ष च।’अतवएब हर्षित, पुलकित स्वभाव होवाक कारणे सेहो स्त्रीकेँ ‘प्रमदा’कहल गेल अछि। अपन हाव-भावसँ पुरुषकेँ उत्तेजित कऽ देब नैसिर्गक विशेषता होएवाक कारणेँ ओ प्रमदा कहवैत अछि।
ललना- ई शब्द सेहो स्त्रीक एक मनोवैज्ञानिक पक्षकेँ प्रकट करैत अछि। ओ मान करबाक प्रिय होइत छथि- रूसैत छथि। अतएव मानिनी छथि। मानिनीक एकगोट आरो पक्ष होइत अछि- ओ अछि स्वाभिमान आत्म-सम्मानक भावना। ओकर सौन्दर्य गुण, कार्य आदि कोनोक प्रतिकूल आलोचना ओकरा वाण जकॉं बेध दैत अछि तेँ ओ मानिनी भेल।
महिला- पूज्या होएवाक कारणेँ स्त्रीक नाम महिला पड़ल। मह्+इलत+आ= महिला।मह्क अर्थ होइत अछि पूजा। उपर्युक्त शब्दक व्युत्पत्ति नारीक सामान्य स्वरूपक अभिव्यंजना करैत अछि। नारी सम्बन्ध विशेषक द्योतक शब्दक परिचय अधोलिखित अछि-
दूहिता- यास्कक अनुसार दुहिता शब्दक व्युत्पत्ति- ‘दुहिता दुर्हिती, दूरेहिता’।[vi] दुर्गाचार्य एकरा स्पष्ट करैत लिखैत छथि दुहिता कारण ओ जतय कतहु देल जाइत छथि ओकर स्वागत नहि होइत अछि, ओ सर्वत्र दुत्कारल जाइत छथि।[vii] अथवा बेटीकेँ दूर चलि गेलापर पिताकेँ चैन भेटैत अछि। यास्क दुहिता शब्दकेँ ‘दूह’धातुसँ सेहो बनौलनि अछि आ पिताकेँ प्रसन्न कए सदिखन किछु ने किछु धन लैत रहैत छथि तेँ दुहिता भेला। वस्तुत: दुहितृ शब्द दुह्-दुहना धातुसँ बनल अछि, सम्भवत: प्राचीनकालमे कन्या अपन पिताक घर गाय दुहल करैत छलीह। फलत: हुनक नाम दुहिता पड़ल।
जाया- स्त्री ‘पत्नी’रूपक लेल जाया शब्दक प्रयोग कएल गेल। ऐतरेय ब्रह्मणमे जायाक व्युत्पति एहि प्रकारेँ कयल गेल अछि ‘तंज्जया जाया भवति यदस्यां जायते पुन:’। जाया एहि हेतु अछि जे पुरुष स्वयं ओहिमे पुत्रक रूपमे जन्म लैत अछि। ऋग्वेदमे जायाक प्रति अत्यन्त मधुर उद्गार व्यक्त कयल गेल अछि।
माता- वैयाकरण मातृ शब्दकेँ मान+तृणसँ बनवैत छथि। आ मातृ शब्दक अर्थ ‘आदरणीय’अछि। यास्कक मतसँ मातृक भाव ‘निर्मातृ’निर्माण करयवाला जननी सेहो अछि। मुदा ‘आदि युगसँ लय आइ धरि मानव जकरा असीम श्रद्धा प्रकट करैत अछि आ जाहिसँ अजस्त्र अक्षय स्नेह पबैत रहैत अछि, ओ मात्र जन्मदात्री नहि, ओ एहिसँ बहुत पैघ अछि। ओकर स्थान स्वर्गसँ सेहो उच्च आ गुरुसँ अधिक पूज्य होइत अछि। माय सदैव माय होइत अछि।
वेदमे सेहो नारीक लेल कुलयानी, सम्राज्ञी कल्याणी पुरन्धि, कुलपा आदि शब्दक प्रचुर प्रयोग भेटैत अछि। इन्द्राणी, उषा, अदिति, इला, श्रद्धासिनी, वाली, भारती, पृश्नि, वरूणानि, आख्यानि वाक, दयावा पृथ्वी, राका आदि रूपमे वैदिक संहिताक नारीक दृष्टि पथमे अवतरित होइत छथि। स्त्रीक हेतु एक स्थानपर कहल गेल अछि। ‘शुद्धा:’पूसा योषितो यज्ञिया इमा:’तथा हुनका पुरुषक हेतु अश्व, गायक हेतु शिव होयवाक बात कहल गेल अछि। सहोत्तरंस्म पुरानारी, समनं चावगच्छति’अर्थात् पहिले स्त्री यज्ञ आयुद्धमे जाइत छलीह। हुनक पुत्र शत्रुहण छथि। एक गोट स्थानपर स्त्री कहैत छथि हमरासँ अधिक केओ सौभाग्यशालिनी नहि छथि वैदिक अक्ष सूक्तमे एकगोट जुआरीकेँ ओकर सासु डटैत अछि आ पत्नी रोकैत अछि। वेद कहैत अछि ‘अनवया पतिजुष्टेवनारी’अर्थात् सच्चरित्रस्त्री पतिकेँ प्रिय होइत छथि। अर्थवेद कहैत छथि ‘जायापत्नेमधुमतीवाचंवदति’।
वेदमे स्त्रीकेँ ब्रह्म सेहो कहल गेल अछि। तेँ वरदा वेदमाताकेँ वेदमे स्तुति कयल गेल अछि। आचार्य प्रियव्रत तँ सरस्वतीकेँ शिक्षाविभागक मंत्री कहलनि अछि। संहितामे वर्णित नारीक एहि उत्कृष्ट रूपक छाया हमरा सहितेतर वैदिक साहित्य (ब्राह्मण एवं उपनिषद्) मे प्रचुरतासँ उपलब्ध अछि।
ब्राह्मण साहित्यमे पत्नी तथा स्त्री विषयक अनेक सन्दर्भ प्राप्त होइत अछि जाहिसँ नारीलोकनिक गरिमा परिलक्षित होइत अछि। नारीकेँ सावित्रीक संज्ञासँ समलिंगीकृत कयल गेल अछि। स्त्री सावित्री (जैठव्रा., 4/27/17)। गृहपरिवारमे ओकर प्रधानताकेँ स्वीकार कयल गेल अछि। ऐतरेय ब्राह्मण जायाकेँ गाईपत्य अग्निकरुपमे स्वीकार करैत अछि- ‘जाया गार्हपत्योग्नि:’। (ए.ब्रा, 8/24) पत्नी पतिक अर्द्धांगिनी मानल गेल अछि।
संहिता एवं ब्राह्मण साहित्यक विपरीत उपनिषदकालीन नारीलोकनिक समुन्नत अवस्थाक परिचय भेटैत अछि।
केनोपनिषद् मे हेमवती उमाक आध्यात्मिक ज्ञान, ब्राह्मवादिनी, वाचकनवी गंर्गी आ मैत्रेयीक वर्णण ओकर आघ्यात्मिक ज्ञानक पराकाष्ठाकेँ सन्दर्भशित करैत अछि। मैत्रेयीक ई कथन जे ‘येनाहंनामृतास्याम किंकुर्याम्’हुनक ज्ञान पराकाष्ठाक दिग्दर्शन करैत अछि। एहि काल पिता सेहो पंडितापुत्रीक इच्छा करैत छलाह।
उपनिषद् साहित्यमे स्त्रीलोकनिक मातृत्व पक्षकेँ सेहो चित्रित कयल गेल अछि। ऐतरेय उपनिषद् मे गर्भ धारण करयवाली स्त्री व्यावयित्री एवं भावियितव्या कहल गेल अछि। एहिकालमे स्त्रीकेँ यद्यपि छायाधिकारक स्पष्ट रूपसँ वर्णन नहि कयल गेल अछि, मुदा वृहदारण्यक उपनिषद् मे सन्यास गमन करैत याज्ञवल्कय द्वारा अपन भार्याकेँ वित्त विवरण करब हुनक पतिक सम्पतिमे अधिकार होयवाक प्रमाण प्रस्तुत करैत अछि। स्वैनिणी नारीक उदाहरण हमरा छन्दोग्यमे (4/42/2) देखल जाइत अछि।
सूत्र साहित्यकेँ अवलोकन कयला पर एहि युगमे स्त्री लोकनिक स्थान प्रत्येक दृष्टिसँ समुन्नत अवस्थाकेँ प्राप्त दृष्टिगत होइत अछि। आ विद्या सम्पन्न होइत छलीह तथा विद्यालयमे उपाध्याय। आ आचार्यहुपर प्रतिष्ठित होइत छलीह। मैत्रेयी, बहवा, प्राचितेयी, गार्गी, वाचकनवी, सुलभा आदि ऋषिकाकेँ रूपमे उल्लिखित छथि। गोभिल गृहसूत्रमे स्त्रीलोकनिक उपनयन संस्कारक सेहो निर्देश अछि (2/1/19)
एतएव सूत्रकालमे स्त्री शिक्षा सुव्यवस्थित रूपमे छल।
- सम्पर्क-
बालूघाट, बॉंध रोड, मुजफ्फरपुर
[i]आचार्य सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ कविनवतिका, मैथिली मन्दिर, राजकुमारगंज, दरंभंगा, 1984
[ii]कर्णामृत (जुलाई-सितम्बर, स्मृति विशेषांक), 2000, कोलकाता
[iii]सम्पादक विजयनाथ ठाकुर, जयन्ती, पृ- 131, चेतना समिति, पटना, नवम्बर- 2004
[iv]तत्रैव
[v]लालदास- रमेश्वर चरित मिथिला रामायण (बालकाण्ड), पृ- 4, पंचायत प्रेस, लहेरियासराय, दरभंगा, सम्वत 2011
[vi]लालदास, रमेश्वर चरित मिथिला रामायण (पुष्करकाण्ड), पृ- 437, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 1999
[vii]डॉ. मुरलीधर झा- चन्दा झा ओ लालदास रामायण तुलनात्मक अध्ययन, पृ- 174, मिथिला रिसर्च सोसाइटी, लहेरियासराय, दरभंगा, 2006
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
लालदासक ‘कौशल्या’
:: डॉ. अपर्णा
कौशल्या एक आदर्श राजमहिषी तथा जननीक रूपमे चित्रित भेल छथि। कौशल्या हेतु राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्नमे कोनोटा अन्तर नहि बुझल जाइछ। राम हुनके पुत्र थिक। ओ सौतिनि लोकनिकेँ छोट बहिनिक दृष्टियेँ देखैत छथि।
हिनक सर्वप्रथम उल्लेख वाल्मीकि रामायणमे पुत्र-प्रेमक आकांक्षिणीक रूपमे भेटैत अछि। वाल्मीकिक परम्परामे रचित काव्य एवं नाटक सभमे कौशल्या सर्वत्र अग्र महिषीक रूपमे चित्रित छथि, मात्र आनन्द रामायणमे दशरथ एवं कौशल्याक विवाहक वर्णन विस्तारसँ भेल अछि। गुण भद्रकृत उत्तर-पुराणमे कौशल्याक मायक नाम सुवाला तथा पुष्पदत्त ‘पड़मचरित’ मे कौशल्याक दोसर नाम अपराजिता देल गेल अछि। राम कथामे अवतारक प्रभावक फलस्वरूप पुराणमे कश्यप आ अदितिकेँ दशरथ आ कौशल्याक रूपमे अवतारक वर्णन भेल अछि।[i]
लालदास रामक वन गमनक समयमे कौशल्याक मातृ हृदयक सफल चित्रण कयलनि अछि-
हम नहि विपिन जाय सतदेव।
अहा अपयश जग मे बरुलेव।।
नृपतिक हाथ देव वरु प्राण।
त्यागव नहि अहँ सन सन्तान।।
मुदा रामक वन गमनक उपरान्त भरतकेँ अयोध्या पहुँचलापर कौशल्याक मतृत्व ओ पत्नीत्वमे अत्यधिक संघर्षक स्थिति देखि पड़ैत अछि। रामक वन गमनक काल कौशल्याक मातृत्व उमड़ि पड़ैछ।
कौशल्या मूर्छित खसलीह।
शोकाकुल कानय लगलीह।।
व्याकुल पीटथि हृदय कपार।
कहथि कतय छथि प्राणाधार।।
एक बेरि सुतमुख देथु देखाय।
तखन प्राण तन रहिओ कि जाय।।[ii]
राम वनसँ आपस नहि अयलाह से समाचार सुनि कौशल्या शोकाकुल भऽ उठैछ।
कौशल्या सुनलनि परिणाम।
फिरि नहि अयला वन सौं राम।।
लगली पीटय हृदय कपार।
हाय वत्स की कयल विचार।
हमरा त्यागल ककर भरोस।
मरब आइ करितहि आक्रोश।।
हायबध दैलहु बड़ धन्ध।
कयल देल हमर दुहू दृग अन्ध।
अह बिनु हमर रहत नहि प्राण।
लगयिछ ऑंगन भवन भयान।।
स्त्रीधर्मक रक्षा करैत कौशल्या राजा दशरथसँ कहि उठैत छथि जे रामक वन गमनमे विधिक विधान अछि अपनेक कोन दोष नहि। कविक शब्दमे-
अछि चिन्ता सौं चित्त अचयन।
तैं कहलहु हम अनुचित वचन।।
चलयित कहलनि राम बुझाय।
किछु जनि कही पिता का माय।।
हमर सिनेहो अनुचित बात।
कहब तँ बड़ दु:ख पओता तात।।
एहि प्रकारक कहि बारम्बार।
वनगेला रघुनाथ उदार।।
से सुत ममते गेलहुँ भुलाय।
कहलहुँ पति रूषि वचन बजाय।।
कयो नहि हमर सनि अछि अधलाहि।
पतिकॉ कटु कहयित नहि आहि।।
सुन प्रणेश अहूँक नहि दोष।
कयल विधाता ई सभ रोष।
एहि प्रकारेँ देखैत छी जे लालदास कौशल्याक पत्नीत्वक मर्यादाकेँ संरक्षित कयलनि अदि मुदा हुनक विविध उत्कट वचन नारीत्वक मर्यादायक अनुकूल बुझना जाइछ।
राजा दशरथक मृत्युक पश्चात कौशल्याक कारूणिक दशा द्रवित भऽ उठैछ-
‘पति संग हमहु अनल समाय।
रहब सुखी भल सुरपुर जाय।।
सुनिसुनि कौशल्याक विलाप।
सभजनकेँ बाढ़ल बड़ताप।।
मनमे सभकेँ भेल सन्देह।
हिना प्राण रहत नहि देह।। अर्ते
कौशल्या कॉ दुखित ओहि देखल सकल समाज।
अन्त:पुर लय जाय पुनि बोधल कति ऋषि राज।।[iii]
नारी जीवनक पैघ उद्देश्य कुशलकरय वाली आ कुशल मानावय वाली जाधरि नारी सभक कुशल करब, कुशलक कामनाभावना नहि नहि राखत ताधरि ओ पूर्ण नहि कहा सकैत अछि। कौशल्या सातो गुण प्रधान नारी छलीह। मातृत्वक गम्भीरता, विश्वासक अडिगता, ममता तथा कुशल भावनापर कोना बाधा नहि आवय देलनि। जखन कैकई रामकेँ वन पठेवाक आदेश कौशल्या सुनलनि तँ मातृत्व आ कल्याणक भावनाक संघर्षमे हुनक अवस्थाक वर्णन गौस्वामीजी मात्र एक पांतिमे सुन्दर ढंगसँ कयलनि अछि-
‘सुनि प्रसंग रहि मूक जिमि वरनि नही जाई।’
कौशल्याक अवस्था गीताक साम्ययोगकेँ स्मरण करबैत अछि। कौशल्याक व्यापक रूपक दर्शनक प्रसंग मानसकार लिखैत छथि-
“व्यापक ब्रह्मा निरंजन निर्गुन विगत विनोद।
सो अज प्रेम भगति वस, कौशल्या को गोद।।”[iv]
प्रभुक व्यापक रूपक दर्शन होइत अछि साधककेँ-
“देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड।
रोमरोम प्रतिलागे कोटि कोटि ब्रह्मांड।।”[v]
एहि व्यापक रूपक दर्शन रामायणमे मात्र कौशल्याजीकेँ भेलनि।
सम्पर्क-
बालूघाट, बॉंध रोड, मुजफ्फरपुर
[i]रामचरित मानस (अयोध्याकाण्ड)
[ii]रमेश्वरचरित मिथिला रामायण (बालकाण्ड)
[iii]रमेश्वरचरित मिथिला रामायण (सा.अ.) पृ.- 166
[iv]रमेश्वरचरित मिथिला रामायण (अयोध्याकाण्ड)
[v]रमेश्वरचरित मिथिला रामायण (अरण्यकाण्ड) पृ.- 133
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
रमेश्वर चरित मिथिला रामायणमे पुष्कर काण्डक विशेषता
:: डॉ. अपर्णा
कविवर लालदासक प्रशस्तिमे आचार्य सुरेन्द्र झा ‘सुमन’कवि-नवतिकामे कहने छलाह-
“रमा रहित रामक अयन
नहि अशक्ति पुरुषत्व।
लालदास रचि ‘रमेश्वरचरित’,
बुझऔल तत्त्व।। ”
आ दामोदर लाल ‘विशारद’लिखैत छथि-
“लाल मधुप लखि लाल भव, किंशुक पर जनु मूल।
वैदेही पद कमल मधु, सेव सकल सुख मूल।।”[i]
रामायण रचनाक परम्परामे केओ एहन नहि होएत जे लालदासक नाम नहि जनैत हो वा रामायणक पद नहि सुनने हो।
देवी कामाख्याक प्रेरणासँ महाशक्ति जाग्रत भूमिमे एकर लेखन ग्रन्थरत्नकेँ विशिष्ट अर्थवत्ता दैत अछि। फलत: रामेश्वर चरित मिथिला रामायणक रचनाक उद्देश्य अछि सीता-चरित्रक सर्वोत्तर्ष महालक्ष्मी, महासरस्वती आ महाकालीक समवेत रूपमे आदिशक्ति ध्वजोत्तोलन। महाकाली आ रणचण्डी दुर्गाक सीताक चरितक प्रतिष्ठापन ओज आ गर्वक प्रतीक नारी शक्तिक आह्वान। शक्ति-शक्तिमानक समरसेतुमे जीवनक चरितार्थ निहित अछि। बिनु शक्तिक योग ब्रह्मा, विष्णु महेश शव छथि, बुढ़ियाक फुसि थिकाह। एकर प्रतिपादन-सम्पादन रामायणक अन्तिम काण्ड पुष्पकरकाण्डसँ भए जाइत अछि।
लालदासक सर्वश्रेष्ठ अवदान थिक जे नारीक अस्मिता-मनस्विता उद्वोधक अछि।[ii]
वीरांगनाक रूपमे सीताक अवतरण पुष्करकाण्डक भेँट थिक। सीताक चरित्रक सर्वातिशयता पुष्करकाण्डक अग्रणी भूमिका अछि। रामक रामत्व सीताक बिना शून्य अछि। सीता-परित्यागक मार्मिक अंशकेँ छोड़ब लालदासक बुद्धिमता थिक।
रमेश्वर चरित मिथिला रामायण रामक लोक नायत्वमे सीताक असीम सामर्थ्य आकलित करैत अछि। वैष्वमतपर शाक्त मतक उत्कर्ष प्रदर्शित करैत अछि। एतय सभ किछु शक्तिक दृष्टिए देखल गेल अछि। सीता साक्षात योगमाया थिकीह जनिक भू-भागपर सृष्टिक जय ओ क्षय नचैत अछि।[iii]
मूल प्रकृति लक्ष्मी जनिक, सीता रूप प्रधान।
तनिक नाम जपि पाबि नर, दुहु लोकक कल्याण।।
पुष्करकाण्डमे देखाओल गेल अछि जे रामक पराक्रम ओ विजयक सभटा श्रेय सीताकेँ छलनि, राम तँ निमित्त मात्र छलाह। जहीिना महाभारतमे देखाओल गेल अछि जे अर्जुनक विजयक श्रेय कृष्णकेँ छलनि, कृष्ण विहीन होइते अर्जुनक सभटा शौर्य निष्प्रभ भए जाइत अछि। तहिना लालदास देखओलनि अछि जे सीताक सहाय्यसँ विहीन रहने सहस्त्रमुख रावणक सम्मुख प्रभावहीन भए गेल छलाह। हुनक समस्त सैन्य ओकर वयव्यस्त्रसँ उधिया गेल छल। मुदा सीताक हेतु ओकर बध करब कठिन नहि छल। पुष्करकाण्डक आरम्भमे रामक सिंहासनारोहणक पश्चात् एक दिन जखन ऋषि महर्षि लोकनि रामक अभिनन्दन करबाक क्रममे रामवण वधक प्रशंसा करैत छथि तँ सीताकेँ हँसी लागि जाइत छनि। ई देखि राम जखन जिज्ञासा करैत छथि तँ हुनका सीतासँ ज्ञात होइत छनि जे श्वेत द्वीपपर एखनहुँ सहस्त्रमुख रावण वर्त्तमान अछि। सीताक मुखसँ ई सन्दर्भ सुनि रामकेँ बड़ क्षोभ होइत छनि। तत्क्षण चारू भाई मिलि श्वेत द्वीप दिस प्रस्थान करैत छथि। मार्गमे वायुक तेहन प्रचण्ड प्रवाह बसि रहल छल जे ओकर झोंकमे चारू भाई उधियाइत-उधिआइत पुन: अवध फेका जाइत छथि। तदुपरान्त सीता हुनका लोकनिक संग पुष्पक विमानपर चढ़ि सैन्य सहित प्रस्थान करैत छथि। सीताक प्रभावसँ सभ केओ श्वेत द्वीप पहुँचैत छथि। युद्धमे राम सहित सभ सैन्य संज्ञाहीन भए जाइत छथि। वशिष्ठ मुनिक कहलाक पश्चात् सीताकेँ बड़ रोष होइत छनि तथा ओ अपन सामान्य स्वरूप त्यागि कालीक रूप धारण कए शत्रुक संहार करय लगैत छथि। थोड़बे कालमे सहस्त्रमुख रामवणकेँ वध कऽ दैत छथि मुदा हुनक उग्ररूप रामकथामे ‘सहस्त्र स्कन्ध रावणक वध-कथा उपलब्ध अछि।
लालदास वैष्णव मतक प्रतिपादनक संगहि शाक्त सम्प्रदायक भावनाक अनुकूल वस्तु-विन्यास कयलनि अछि। भारतीय संस्कृतिक अनुरूप आदर्श पारिवारिक जीवन तथा भक्तिपक्षक अनुरूप आत्मनिवेदन ओ समर्पण भावक रामयण वस्तु-विधान दृष्टिगोचर होइछ।■
सम्पर्क-
बालूघाट, बॉंध रोड, मुजफ्फरपुर
[i]आचार्य सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ कविनवतिका, मैथिली मन्दिर, राजकुमारगंज, दरभंगा, 1984
[ii]कर्णामृत (जुलाई-सितम्बर, स्मृति विशेषांक) 2000, कोलकाता
[iii]सम्पादक विजयनाथ ठाकुर ‘जयन्ती’, पृ.- 131, चेतना समिति, पटना, नवम्बर- 2004
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
लालदासक रामायणमे विधि-व्यवहारक वर्णन
:: डॉ. अपर्णा
भावपक्षीकेँ कल्पनाक पॉंखि भेटलासँ साहित्यमे उड़वाक सामर्थ्य आबि जाइत छैक। कल्पनाक कमनीयता भावक सौन्दर्यकेँ अभिवृद्धि कए दैत अछि। इएह कारण अछि जे अभिव्यक्तिकेँ प्राणवान वोधगम्य चमत्कारी एवं अर्थसमृद्ध बनएवाक हेतु अन्य अनेक ‘साधन’क आवश्यकता पड़ैत छैक। भाव तत्व एवं विचार तत्वकेँ आकर प्रदान करएवला कल्पना तत्त्व होइत अछि। कल्पना सएह कोनो भाव एवं विचारकेँ अभिव्यजना दैत अछि।[1]
रमेश्वर चरित मिथिला रामायणमे मिथिलाक विधिव्यवहारक वर्णनसँ तात्पर्य ई अछि जे एहि रामायणक रचनाक्रममे मिथिलाक जीवनक केहन वर्णन कएने छथि। वालकाण्डमे लक्ष्मी अवतारक वर्णनक क्रममे पावन देश मिथिलाक वर्णन करैत कविवर कहैत छथि-
“सुरसरिधार उत्तरकूल
सुरमुनिसेक्ति भूमि अतूल।।
देवभूमि पर्वत हिमवान
तेाहिसौं दक्षिण धर्म निधान।।
मिथिला नामक पावन देश
जहॉं राजर्षि क्ज्ञथि मिथिलेश।।
जन्मभूमि नैहर सीताक
जतय स्वयं शिव रूप पिनाक।
शक्ति पीठ उत्तम असथान
उग्रभूमि सभ भॉंति महान।।
प्रियनिवास महि हरि लक्ष्मीक
तपथि जनक ऋषि तह वाल्मीकि
याज्ञवल्क्य गौतम हिमदाव
सिद्ध भेला मिथिलाक प्रभाव
शुक्राचार्य जनकक सतसंग
सिखलनि ज्ञान जतय भलरंग।।
मुनि मण्डलीक सुसिद्ध स्थान
यज्ञभूमि दायक कल्याण।।
सुरगन्धव यज्ञ समुदाय
नरतन मिथिला वसथि सदाय।”[2]
अभिप्राय जे वर्णाश्रम धर्मक प्रधानता छल सभ वर्ग धर्मावलम्बी छल। पुरुष वर्ग कर्त्तव्यनिष्ठ ओ महिला वर्ग सुशीला, सुलक्षणा ओ सुदृदय रहथि। सुख-सम्पदा ओ शान्ति सर्वत्र विद्यमान छल।[3]
विधि-व्यवहार वर्णनक दृष्टिसँ लालदासक रामायण अन्य रामायणक अपेक्षा कृर्त विशद कहल जा सकैत अछि। रामक जन्म ओ विविध संस्कार एहन अवसर सभ अछि जकर नीक जकॉं वर्ण लालदास कएने छथि। रामक जन्मक अवसरपर सोहर, सीताक गिरिजा पूजन तथा वाम अंग फड़कला सँ शुभ सूचनाक रूढ़िक वर्णन मिथिलाक व्यवहार पक्षक अन्यनिर्दशन अछि। मिथिलाक लोकाचारक विषयक विविध पक्षक नियोजित ओ उत्कृष्ट वर्ण भेल अछि। खास कए कविवर सीता रामक विवाह क्रममे मिथिलाक लोक व्यवहार केँ अत्यन्त स्फुट कएलनि अछि। वरियाती-सरियाती, जनवास- परिछन, कुशलाचार (पएर धोएवाक) विधि, गोत्रादया अग्नि स्थापन पाणिग्रहण, गीत-नृत्यादिक वर्णन भेल अछि। कविवरक रामायणमे मैथिल विपटाक कला प्रदर्शनक वर्णन अत्यन्त मनोहर भेल अछि-
“मैथिल विपटा लगवय ताल
कहय कृपण वड़ अवध भुआल।।
चारि वेरिरवैतहु जें भोज
पवितहुहान होइत नरि ओज।।
खर्चक डरे अवध महराज
कयल एकहि वेरि चारू काज।।
अपने लेताह चारि दहेज
याचक नर्तक पुरलक भोज।।”[4]
डहकन महुअक कोवर घरक उतरा-चौरी दहेज आदिक वर्णन सेहो हिनक लोक व्यवहार पक्षक ज्ञान तथा मैथिल रीति नीतिक प्रति गौरवमय आसक्तिक परिचय केलनि अछि।
देखू एक गोट वर्णन-
“कौतुक भवन गेला श्री राम।
अभिलिह नगरक नागरि वाम।।
कुच उत्तंग, अंगअभिराम
वयस किशोर विवशकृत काम।।”
परिधन भूषन-वसन लालाम।
वुझि पड़ सभजनि अमरक वाम।।
चन्द्रवदनि गजराज प्रचार
सभ मातलि यौवन मदभार।।
हास्य कला मय निपुण सुधीर
वैसलिह सभ जनि रामक तीर।।
लगलिह कहय कथापूत व्यंग्य
रस वश पुलकि उठय सभ अंग।।
विधिकरि लयलिह महुअक खीर
देल परसि लेलनि रघुवीर।।
जौं जौं भोजन रघुवर करथि
सखि मिलि हँसि करथि कतुकहथि।।
अहँक वंश केर अद्भुत कर्म
सुनल पुरुष कै प्रेसवक धर्म।।
पुनि सुनलहुँ पायसकेँ खाय
लै अछि नारि पुत्र जनमाय।।
राम अहॉं जनु पायस रवार
वैदेहीक उपहास वचाउ।[5]
एहि प्रकारेँ रमेश्वर चरित मिथिला रामायणमे विधि-वयवहारक वर्णन अप्रतीम भेल अछि। कविवर लाल दासकेँ जेना वर्णन करबमे मोननहि अधाइत छलनि। वर्णनक विन्यासमे लाल दास समस्त अवसरकेँ पूर्णतया उपयोग करबाक प्रयत्न कयलनि अछि।[6]एहिठाम हम सलीपुलक न्यायसँ किछु विवेचना कएल अछि।
■
सम्पर्क-
बालूघाट, बॉंध रोड, मुजफ्फरपुर
[1]जयनाथ नलिन विद्यापति एक तुलनात्मक समीक्षा पृ.- 233, रघुवीर शरण वंशल, 24 दरियागंज दिल्ली- 6, 1961 ई.
[2]लालदास- रमेश्वर चरित मिथिला रामायण, वालकाण्ड, पंचायत प्रेस, लहेरियासराय, सम्वत 2011
[3]चेतना समिति पटना- जयन्ती पृ- 124, संसकरण 2004
[4]लाल दास- रमेश्वर चरित मिथिला रामायण, पृ.- 95 साहित्य अकादेमी नई दिल्ली, 1999
[5]लाल दास- रमेश्वर चरित मिथिला रामायण, वालकाण्ड, पंचायत प्रेस, लहेरियासराय, सम्वत 1911
[6]डॉ. मुरलीधर झा- चन्दा झा ओ लाल दास रामायण तुलनात्मक अध्ययन पृ.- 200, मिथिला रिसर्च सोसाइटी- लहेरियासराय, 2007
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
३. पद्य
३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल
३.२. ज्ञानवर्द्धन कण्ठ- ३ टा कविता
३.३.डॉ आभा झा-चेतना
३.४.नबोनारायण मिश्र- नवगीत
आशीष अनचिन्हार
२ टा गजल
१
चानन टिक्का आर मसुआइ
अजगुत खेला भाइ रे भाइ
दुनियाँ माने अतबे बूझू
झूर झमेला लाइ लपटाइ
ई सभ भेलै लेकिन फेरो
की सभ हेतै दाइ गे दाइ
सुख के माने तिलबा हेतै
दुख के माने लाइ चुड़लाइ
हुनके जकाँ हम हाथ जोड़ल
हुनके जकाँ हमहूँ नितराइ
सभ पाँतिमे 22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि।
२
ईहो निकलत ओहो निकलत
जहरो निकलत अमृतो निकलत
अइ रंग बिरंगक दुनियाँमे
करियो निकलत उजरो निकलत
आँगनमे एहने फरमान
बुढ़ियो निकलत बुढ़बो निकलत
कहियो आधुनिकताक लिस्टसँ
गामो निकलत शहरो निकलत
कहियो ने कहियो पिंजड़ासँ
सुग्गो निकलत मैनो निकलत
सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि।