विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली नाटक आ ग्रामीण रंगमंच

आनन्द कुमार झा · 2020-11-15 · अंक 310

आनन्द कुमार झा
मैथिली नाटक आ ग्रामीण रंगमंच
मैथिली नाटकक बासडीह थिक ग्रामीण रंगमंच । हमरा लोकनिक इतिहास कहैत अछि जे प्राचीन समयमे ज्ञान, यज्ञ , तप करैक भूमि रहल अछि मिथिला । एतए सम्पूर्ण भारतक लोक ज्ञान अर्जित करबाक लेल अबैत छल । से कहबाक तात्पर्य हमर ई थिक जे पूर्वमे अहिठाम एतेक नवीनता छल जे एतुका लोक विरक्त भए आन आकर्षण दिश कहिओ आकर्षित नहि होइत छल । तेॅ पलायन नहि होइत छल । मिथिलाक सभसॅ पैघ खूबी छलैक जे जीविकोपार्जनक विधि-विधान आधुनिक रहितहुॅ , तकरा उपरान्तो ग्राम्य जीवनक स्वरूप कहिओ नहि बदलल । तेॅ हमरा ई कहैत कनिको असोकर्ज नहि भए पाबि रहल अछि जे मैथिली रंगमंचक विशुद्धरुपे ओकर जड़ि ग्रामीण रंगमंच थिक । बुझि सकैत छी जे ग्रामीण रंगमंच कतेक सशक्त छल जे विद्यापति जखन मैथिलीमे गोरख विजय नाटक लिखैत छथि तॅ तकर मंचन एकटा सुदूर ग्राम भैरव स्थानमे (वर्त्तमानमे रैयाम पूर्वी पंचायत ) करैत छथि । जकर मुख्य अतिथि महराज शिव सिंह होइत छथि । आब आहाॅ ग्रामीण रंगमंचक उत्कर्षक अन्दाजा लगा सकैत छी । बादमे ग्रामीण रंगमंच पूर्णरूपेण स्वतंत्र सेहो भेल । स्वतंत्र हम अहि अर्थमे कहैत छी । वर्तमान समयमे जे शहरी रंगमंच अछि ओ पूर्वग्रस्त रहैत छथि जे फल्ले नाटककारकेॅ नाटक हमरा करबाक अछि । चाहे ओ नाटक नीक होएक की बेजय होएक । तहिमे नाटककार सेहो अपन साहित्यक अपघात करैत रंगमंच पर कोना हमर नाटक हएत ताहि लेल साहित्यिक चिन्तनसॅ बेसी ओ रंगमंचक चिन्तन करैत देखाइत रहैत छथि । जखनकि रंगमंचक चिन्तन केनिहार रंगकर्मीक समूह अछि । खैर , से कहै लगलहुॅ - ग्रामीण रंगमंच पर जे नाटकक पोथी चयन करैक प्रक्रिया अछि ओ पूर्ण रुपसॅ पारदर्शी पूर्वक होइत अछि । पहिने नाटक होएबाक सुरसार सुरुह होइत अछि । फेर दू - चारि - पाॅच गोटएकेॅ ई भार देल जाइत छन्हि जे नाटकक पोथी कीनि आनथि । ओ लोकनि बजार जाकेॅ किताबक दोकानसॅ तत्कालमे जतेक पढि सकलाह से पढि पोथी कीनि लैत छथि । ओना कतेको गोटए तॅ भिन्सरसॅ साॅझ कए दैत छथिन पोथी पढैत - पढैत । कतेक बेर तॅ किताब दुकानदारसॅ कहा - सुनी सेहो होमए लगैत अछि । एकटा पोथी बिकएबाक हेतु ओ भरि दिन बरदएल नहिने रहत । जे से पोथी साॅझखनधरि आबि गेलैक । बड़का दलान पर पहिनेसॅ रंगकर्मी लोकनिकेॅ जमघट लागल रहैत अछि पोथीक अएबाक प्रतिक्षामे । आब तॅ हम पहिने पढब तॅ हम पहिने पढब । किछुकाल छिनाछिनी होइत अछि । एहन उत्सुकता नहि देखल जएह । कतेक बेर तॅ अहि छिनाछिनीमे पोथी सेहो फाटिचिट जाइत अछि । आब तॅ राति एक बजौ कि दू , भोरो भए जाउ , जाधरि सम्पूर्ण नाटकक पाठ नहि भए जाइत ता धरि केॅ ससरत । ताधरि तॅ सभक आंगनसॅ कतेको समाद आबि गेलैक भोजन करबाक लेल । कएगोटेक आंगनमे तॅ झगड़ा - झंझट सुरुह भए जाइत छैक । कतेक गोटएकेॅ भोजन झाॅपल राखल रहैत छल । घरमे सभ ठीक नहि रहलैक तॅ उपासलो सुतैत देखलियैक अछि । आब नाटकक सलेक्शन भए गेल । रिहर्सल सुरुह भए गेल । नाटककारकेॅ कोनो सूचना नहि छन्हि । जॅ सम्पूर्ण समाजक अगुआ लोकनिकेॅ रिहर्सलसॅ नाटक मंचनक परिणाम नीक बुझाइत छन्हि तहन बिचार होइत अछि जे अहि लेखककेॅ बजाआओल जएह । नाटककार अबै छथि । गामक लोकक संग नाटक देखैत छथि । मंच हुनका यथाशक्ति सम्मान करैत छथि । आब आहाॅ कहू कतेक स्वतंत्र छल हमर ग्रामीण रंगमंच । कतौ भेदभाव नहि चयन प्रक्रियामे । कि वर्तमान समयमे आकि अवैबला समयमे ई पारदर्शिता सम्भव अछि ? नाटककारकेॅ धर्म छी ओ साहित्यिक दृष्टिकोणसॅ समाजक हितमे नाटक लिखबाक चाही । नहि कि रंगमंच पर कोना नीक हएत । रंगमंच पर कोना नीक हएतैक ताहि लेल हमर रंगकर्मी लोकनि सतत प्रयासरत रहैत छथि । आधुनिक रंगमंच पर कोनो चीज देखएब आब असम्भव नहि रहलैक ।
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नबोनारायण मिश्र
एकटा पाकल आम

भाइमे एकसरे, परम दुलारू पाँच बर्षीय बालक ईश्वरजी अपन पिता द्वारा देल गेल मात्र एकटा पाकल आमपर प्रतिक्रियामे खिन्न होइत बाजि उठल-"पापा, एतेक रास आम किनलहँ अछि, एहिमे हमर हिस्सा एकहिटा भेल?" जँ सएह, तैयो शंकर भाइजी (खासे पितियौत) हमरा स बाछि कऽ एकहुटा वस्तु नहि खाइत छथि तँइ हेतु कमसँ कम एकहुटा आर आम हुनका लेल दिअ। एकसरे खेनाइ हमरा नीक नहि लगैए। पिताकें पुत्र द्वारा पूछल गेल एहन प्रश्नक आशा नहि छलन्हि । बारम्बार एकहि बातक आग्रहसँ तंग भऽ पिता पोलहबैत बाजि उठलाह - बेटा, जँ ओकरो सभक भार-चिन्ता हमहीं रखितहुँ तखन भिन्ने किएक होइतहँ? एही लेल ओकरा सभसँ भिन्न भेलहुँ जे अहाँकेँ सभ वस्तुक सुविधा ओकरासँ बेसी भेटय।। अहाँ बकलेल नेना जकाँ हठ पकरने छी। ओतेक जे हम ताकय लागब तखन आर दू किलो आम कीनय परत।
पिताक उत्तर सुनि ईश्वरजी निरास होइत बाजि उठल- ठीक छैक, हम अहाँकेँ आब कहियो तंग नहि करब, हमर चिन्ता छोड़ि दिअ। हम दूनू भाइ एकहिटा आममे आधा-आधा बाँटि कऽ खा लेब। ताहिमे नहि ने अहाँ आ माय हमरा रोकब?
(नबोनारायण मिश्रजीक ई रचना कर्णामृतक जुलाई-सितम्बर २००४ मे लघुकथा कहि प्रकाशित भेल छल)
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आशीष अनचिन्हार
घर
घर तीन प्रकारक होइत छैक। उच्च, मध्यम आ निम्न। एकर आरो भेद उपभेद भए सकैत छैक मुदा ताहिसँ हमरा कोनो बहस नहि। ओहिठाम हम जाहि घरक खेरहा कहब से भेल मध्यम। तँ आगा सुनू खेरहा मध्यम घरक। घरक मतलब मध्यम घर बुझल जाए।
प्रत्येक घर ओ जीव होइत छैक जे मनमानी कए सकए। तुच्छ आर्दशक संग। तानाशाहीक बिना कोनो घर, घर नहि होइत छैक, चाहे ओ हमर घर हो वा कि अहाँक। सत्त इएह थिक। घर काठ अथवा ईंटासँ नहि, हुक्मसँ बनैत छैक। घर भूकंप अथवा तोड़लासँ नहि, हुक्म तोड़लापर टुटैत छैक। घर ओ नहि जाहिमे केओ फरमाइश कए सकल। घर ओ छैक जाहिमे हाथ उठा कए दए दिऔक। जकरा भागमे जे होएतैक से भेटतैक।
घर अपना मोने किछु नहि होइत छैक। होइत छैक सभक मर्जीसँ मुदा ई घरे थिक जे अपन मर्जी के सभहक मर्जी बुझए लगैत अछि। ओकरा ईहो मोन नहि रहैत छैक जे हमर अस्तित्व कतएसँ अछि। ई घरे थिक जे जानि बुझि कए कोतबालक पदवी लैए प्रचुर योग्यता आ संभावनाक अछैतो प्रत्येक समय ओ कोतवालीक रुतबा देखबैत छैक अनेरो। ई घरे थिक जे कोतवाल बनि सूति रहैत अछि आ निन्नमे गबैत रहैए-'जगले रहिअह हो भाए। आ चोर चुप्पचाप माल निकालि लैत अछि ।घरकेँ दसटा आँखि होइत छैक दसटा दिशाक रूपें जे सदिखन लाल टरेस रहैत छैक। आ ई आँखि देखिते दोसरक आँखि झुकि जाइत छैक अनायास। घरक एकटा गरदनिमे एक लाख हाथीक आवाज रहैत छैक। कनिकतो खखसलापर लोकक पएर थकमका जाइत छैक। कान फाटि जाइत छैक। माथ दुखाए लगैत छैक अपने मने। लगही-नदी बंद भए जाइत छैक।
प्रारंभिक वाक्य-: घर हिटलर अछि वा हिटलरे घर अछि एकर खोज करब आवश्यक।
घर ओ जगह थिक जाहि ठामक घैलमे नोर भरल रहैत छैक आ चूल्हापर चढ़ाओल रहैत छैक हँसी। पिआस लगलापर लोक नोर पिबैत छैक आ भूख लगलापर हँसी चिबबैत छैक से अहाँ सभ बिनु लिखने बूझि गेल होएबैक। घरक लोक जखन लगही करैत होएतैक तखन नोर निकलेत होएतैक पोखरि दिस जाए कालमे हँसी। आ लोक जतए लगही करैत छैक ओहिठाम फुटि जाइत छैक मोनि। दिसा फिरलाहा जगहपर जनमि जाइत छैक गाछ। कथीक से सोचि लिअ। आ मोनि जतेक गहींर भेल चल जाइत छैक ओहि महक पानि ततबे सुखाएल जाइत छैक। गाछ जतेक नमहर होइत छैक, मनहूसी ओतबे नमहर भए जाइत छैक। गाछक डारि -पात नमरि जाइत छैक, सांसारिक समस्या जकाँ।
हँ, एकटा गप्प आरो होइत छैक। पाहुन-परक अएलापर घैलक नोर नहि देल जाइत छैक। रान्हल हँसी जरूर भेटैत छैक। पाहुनक जखन लगही करैत छथि तखन मोनि नहि फुटैत छैक। हँ, दिसा फिरलापर गाछ जरूर जनमि जाइत छैक। आ सहयोग देबए लगैत छैक पहिनेसँ जनमल गाछकें। मोनि फुटैत अछि, गाछ जनमि जाइत अछि घरो-चलैत रहैए।
भरत वाक्य - : नोर आ हँसीक माँझ घरक स्थान छैक।
घर ओ जगह थिक, जाहि ठामसँ दू टा बाट फुटैत छैक। एकटा आगू दने आ दोसर पाछू दने। बाम दहिनक प्रश्ने नहि। आगू महँक बाट पकड़ब तँ घंटा भरि लागत चौटिआपर पहुँचबामे। आ चौबटिओ तेहने। केन्द्र बिन्दुसँ चारि टा बाट निकलल आ फेर ओहि एक-एक बाटक शुरूआते में चौबटिआ फुटि गेल छैक आ क्रमश: प्रत्येक बाटमे एहनाहिते चौबटिआ फुटल छैक। आ अहाँ चौबटिआपर पहुँचि, थकमका जाएब। अथ-उथमे पड़ि जाएब। किछु नहि काज देत। कखनो सोचब जे ओहि बाटपर चलल जाए तँ कखने ओहिपर। घनचक्कर। किछु ने फुराएत। आ एहन समयमे बात अहाँ थाकि कए ओहि ठाम बैसि जाएब वा कोनो बाटपर चलि बिला जाएब वा पुनः घर घुरि जाए जहाजक चिड़ै जकाँ। आ जँ पाछूक बाट पकड़ब तँ पाँचो मिनटसँ बेसी नहि लागत चौबटिआपर पहुँचएमे। मुदा ओही चारि मिनटमे पाँच जुगक अनुभव भए जाएत। गोठुल्लासँ आगू बढ़ि पाएब जँ ओहि महँक निकलल बत्तीसँ आँखि माथ सही-सलामत बचि गेल तँ। आगू बढ़लापर दूगो घर बीचक एकटा गली भेटैत छैक। देहोसँ कम्म चौड़ा। कहिओ देबालमे लागि छिला जाएत। कहिओ किछु...। अगत्या पार कए जेबैक अहाँ कोनाहुतो ओहि गलीकेँ। आबि जएब चौबटिआपर। मुदा चौबटिआपर पाछूक बाटसँ पहुँचबाक पछातिओ अहाँक आगू में ओएह सनातन प्रश्न आबि ठाढ़ भए जाएत। कोन बाटपर बढ़ल जाए। निर्णय नहि कए सकब से हमरा बुझल अछि। आओर अंत में ओएह तीनटा उपाय-थाकि कए बैसि रहब वा अनचिन्हार बाटपर पएर बढ़ा देब वा घर घुरि आएब।
ई घरे थिक जे दू-दूटा बाट राखिओ कए ककरो आँगा नहि बढ़ए दैत छैक। बृहस्पतिओ ग्रहसँ बेसी आकर्षण शक्ति छैक एकरामे। जतेक प्रबल शक्तिसँ अहाँ बाटपर बढ़बाक प्रयास करब एकर शक्ति ओतबे बढ़ल जाइत छैक। रामक समकालीन बालि जकाँ। आ अंतमे नुकाइए लेत ओ अपना पेटमे। घोर अन्हरियामे। पटकैत रहू माथ एहि देबालसँ ओहि देबालपर। टूटत नहि। फूटत नहि।
निष्कर्ष वाक्य-: घर दू मूँहा अजगर थिक।
घर ओएह थिक जे युग-युगसँ दुर्गा बनबाक देखैत देखैत मरि जाइत अछि। घर कहिओ ने बनि पबैत अछि दुर्गा। दुर्गाक दसटा हाथ आ एकटा मूँह देखि घर सोचैत रहि जाइत अछि जे दुर्गे जकाँ हमरो दसटा हाथसँ अबितै आ एकटा मूँहमे जाइत से कतेक नीक होइतैक। मुदा ई सपना देखिते-देखिते ओ भए जाइत छैक रावण। अबैत छैक दूटा हाथसँ मुदा जाइत छैक दस टा मूँहमे। कखनो कऽ घर ब्रम्हा आ रावणक रक्तसंबंधक प्रसंगमे सोचए लगैत अछि। सत्ते चतुर्मुखीक संतान दसमुखी केना ने हो।
कहिओ-कहिओ घर सोचैत अछि जे दुर्गा नहि सही गणेश किएक नहि भए जाइत छी। पेट रहत मनुखक मूँह रहत जानवरक। जानवरक मूँहसँ दूभि-पात चिबाइए सकैत छी। सोहारी ओ भात तँ खएबामे कोनो दिक्कत नहि। मुदा घरक ईहो मनोकामना पूरा नहि भए पबैत छैक। आ रहि जाइत छैक ओ पहिनेहे जकाँ। कहिओ कए अधरतिआमे घर बिसुनाए लगैत अछि आ ओही कालमे ओकर बड़बड़ेनाइ चालू भए जाइत छैक। बड़बडेनाइमे ईहो मिलल रहैत छैक प्रार्थनाक रूपमे-हे भगवान वा तँ हमर मूँहे गाएब कए दिआ वा पेटे। ई दूनू बड़का गुंडा अछि। खास कए ई पेट। आ अंतमे ई प्रलाप सेहो बन्न भऽ जाइत छैक आँखिक संगे-संग।
निष्पति वाक्य -: घर बड्ड किछु सोचैत छैक मुदा ओ पूरा नहि भए पबैत छैक।
घरे एकटा एहन जीव होइत अछि जे अपना भीतर बाजल गेल हरेक शब्दकेँ रोकबाक लेल छोटोसँ छोट भुरकी बन्द कए दैत अछि। ई जनितो जे शब्दक दूत बसात होइत छैक। आ घरे तँ छैक जे दोसर ठामक गप्प सुनबाक लेल टाट की चारोकेँ हटा दैत छैक चाहे ओहिमे रहए बलापर पाथर खसौक वा पानि पड़ौक वा रौद लगौक। कोनो असरि नहि घरपर। आ एहन सामर्थ्य तँ घरे के हो जे घर में रहएबाला सभ पाथर, पानि रौदसँ भरि जाइत छैक मुदा ओ अपन काज कइएक निचैन होइए।
छोट वाक्य -: घर मने ओ व्यापारी भेल जे कनेक लाभ लेल बड़का हानि के मोजर नहि दैछ आ बुझैछ जे हमरा पौ बारह अछि।
कहिओ अहाँ सभ सोचलहुँ अछि जे आङनक घर आ दरबज्जाक घरमे की अंतर होइत छैक। नहि ने। प्रयासो नहि कएने होएबैक। ओना दरबाजापरक घरकेँ घर कहले. नहि जाइत छैक। तइओ...। आङनक घर मने घरबैआ केबाड़ लगा लेताह तँ चारू दिससँ सुरक्षित। दरबज्जाक घरमे अहाँ सुरक्षित भइओ .सकैत छी आ नहिओ भए सकैत छी। कतेको गोटाक घर आ दरबज्जामे मात्र एकटा टाटक अस्तित्व रहैत छैक। टाट हटा दिऔक कोन घर रहत कोन दरबज्जा से बुझि नहि पड़त। मुदा तैओ आङनक घर आ दरबज्जाक घरमे अंतर होइत छैक।
आङनक घरमे अहाँ ककरोपर खिसिआ कए हाथ छोड़ि देबैक मुदा दरबज्जाक घरमे चुप रहबाक अतिरिक्त आन कोनो उपाय नहि। कारण जे होइक। आङनक घरमे केओ नोर बहा कए टाटकेँ अपन कथा कहि सकैत छथि। मुदा दरबज्जाक घरमे नोर की बेसी हँसिओ नहि सकैत छी। बेसी हँसब तँ लोक बताहे बूझत। आङनक घरक कोनो कोनमे एकटा कापी आ एकटा कलम रहैत छैक जाहिसँ लिखाइत छैक करेजक गप्प। दरबज्जाक घर महँक काँपीपर लिखाइत छैक नून-तरकारीक हिसाब।
नमहर वाक्य-: आङनक घरमे सहजता होइत छैक। दरबज्जाक घरमे कृत्रिमता।
घर मने एकटा ओहन मंच जाहिपर होइत रहैत छैक हर समय रंग-बिरंगी चौकी तोड़ नाच। एही चौकी-तोड़ नाचकेँ लोक गँड़िघुम्मा नाच कहैत जाइ छथि। आ नाचमे नटुआक जे घूमै घरक मूँह जरूर घूमि जाइत छैक। नाच खत्म भेलापर चौकी टूटल ककरो भेटतै की नहि भेटतै। मुदा टूटल मंच, टूटल घर जरूर भेटैत छैक। नाच शुरू होइत छैक चौकीतोड़क नामे मुदा अंतमे ओकर नाम रखबाक इच्छा भए जाइत छैक घरतोड़। मुदा ईहो एकरा अजगुते गप्प छैक जे एहि नाचक नाम हरेक बेर शुरू में चौकीतोड़ आ अंतमे घरतोड़ रहिते छैक। लोककेँ दूनू नाम पसिन्न छैक। एकैटा नामसँ गुजर नहि चलतै। आ ई घरे अछि जे एहि नाचमे ओ स्वयं भूमिका लैए आ दोसरो घरकेँ भूमिका दैए। आ सभ मीलि कए खेलैए चौकीतोड़ उर्फ घरतोड़ नाच।
आप्त वाक्य - : घर एकटा मंच छैक जाहिपर नाच होइत छैक। सभ मीलि नाचैए आ खुश होइए। साँझ होइए, भोर होइए। इजोरिआ जाइए अन्हरिआ अबैए। देबाल ढहैए, चार टुटैए। नेओं पडैए, पीलर गड़ाइए। एस्वेस्टस किनाइए वा छत ठोकाए। सभ किछु होइए। एक घरसँ एकैस घर होइए। होइत जाइए। होइत जएबाक लेल बाध्य होइए।
अन्तिम वाक्य - : घर ओ घर नहि अछि जे पहिने छल। घर ओ घर नहि रहत जे एखन अछि।
(कथा विधाक ई हमर दोसर प्रकाशित लघुकथा अछि जे कि पटनासँ प्रकाशित घर-बाहर नामक पत्रिकामे अक्टूबर-दिसम्बर 2008 अंकमे प्रकाशित भेल छल। विदेहक पाठक एवं आन माध्यमक नव पाठक लेल हम एकरा एहिठाम दऽ रहल छी।- आशीष अनचिन्हार)
ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
ज्ञानवर्द्धन कंठ
लघुकथा
पचहीबाली काकीक यात्रा-वृत्तांत
उत्तिम काका बेसी दुखित भ' गेल रहथि।बेटा-पुतोहु इलाजक लेल ट्रेन सँ दिल्ली ल' गेलथिन।पचहीबाली काकी संगे रहबे करथिन।ओमहर सँ घुरती काल ट्रेनक टिकट नहि भेटि सकलैक।बेटा-पुतोहु केँ लंदन जेबाक रहनि।तेँ हिनका दुनू प्राणी केँ हवाइ जहाजक टिकट कटा एयरपोर्ट तक पहुँचाक' ओ लोकनि समुझा-बुझाक' चलि गेलथिन।सउँसे गाम इ समाचार पसरि गेलैक जे पचहीबाली काकी हवा-जहाज पर चढ़िक' दिल्ली सँ गाम अयलीह अछि।इ सुनि सउँसे गामक आइ-माइ सभ हुनका ओतय जुटय लगलीह।काकीक आँगन मे बड़का मेले लागि गेल।
काकी सिरागू घर सँ भगवती केँ प्रणाम क' बहराइत छथि।आँगन मे लोकक जुटान देखि बजलीह - "काका केँ देखबाक लेल जुटै गेल छें गै? एहि लेल एतेक हसेरी बान्हि क' अबै गेलें हन?काका आब निकेँ छथुन! गै, अबै गेलेंहें त' ब्रह्मक घोड़ा जकाँ किएक ठाढ़ छें सभ गोटे?असोरा पर पटिया - शीतलपाटी सभ मोड़ल राखल छौक,से आँखि मे रतौन्ही भेल छौक?सूझै नहि छौक?एक रत्ती ल' क' ओछा लेबें त' रोइयाँ भगन भ' जाइ जेतौह?सभ दिन भसन्नरि के भसन्नरिए रहि जाइ जेबें?हमर बेटा बियाह केने रहय,तँ कतेक घोल- फचक्का केने रहय लोक सभ?आइ ओकरे सभक परसादे हवा-जहाज पर चढ़िक' हमहीं ने एलियैक? आकि आन?बाज!" सभ गोटे बैसि जाइ गेलथिन।तखन दुलारपुरबाली कहलथिन - "बहिन,भैया आब पूरा निकेँ छथिन ने?" काकी बजलीह - "गै, बूढ़ देह भेलनि।दबाइ पर छथिन।तखन तैयो आब ठीके छथिन।एकटा भेल जे बेमारीक बहन्ने हमरो तीर्थ-बर्थ भ' गेल।गे मैया, की कहियौक?ओमहरक मौगी सभ बड्ड रभसल! केकरो माथ पर नूआँ नहि।हमहूँ कहलहुँ जे गाम पर सौतिन सभ हमरे पुतोहु केँ देखि-देखि नाक-मुँह चमकाबै छल।छुछुनरी सभ एत्त' अबितय तखन ने चकबिदोर लगितैक?गै, की कहियौक?ओत्ते-ओत्ते टा घर नहि देखने रहियैक! एकटा होटल मे ल' गेल बौआ हमर।गे मैया सभ! तेहन छलछलौआ रहैक जे चली त' कतेक बेरि पिछड़िक' मुँहे भरे खस' लागी।गै, अपना सभक दिसन लोक चलै छैक आ सीढ़ी रुकल रहै छैक।ओमहर देखलियैक जे सीढ़िये चलै छैक आ लोक सभ ओहि पर सवारी क' क' जाइ अछि,ठाढ़े-ठाढ़े।उतरै काल जँ कनियाँ हमरा पकड़ि नहि लेथि तँ तलमलाक कान- कपार फुटले-घर छल। गे दाइ, की कहियौक?होटल मे खाइ लेल भरि थारी द' गेल।बारीक सभ टोपा लगेने लागय जेना कोनो महराज साहेबक नातिए सभ हुए।एकटा बाटी मे गरम पानि आ नेबो काटि क' देने गेल।हम त' गद्दीबला कुरसी पर पलथी मारने बैसल रही।पानि मे नेबो गाड़ि पहिने पी लेलहुँ।गे मैया, लोक सभ हमरे दिस ताकि क' हँसय लागल।कहलियैक जोर सँ-'की हँसता है?हमरा कोनो घेघ लटकल है?' बेटा-पुतोहु बुझाब' लागल,नहि तँ हम नानीक बियाह मोन पाड़ि देने रहितियनि।
चल,हटा।हँ, इ भेल जे महरौली, झंडाबला आ कालका माइ मंदिल दर्शन करा देलक।
अबिती काल त' अजगुते खेला भ' गेल।हवा-जहाज पकड़ाब' ल' जाइ गेल।सर-सामान ल' लेलक।ओ एकटा घुमघुमौआ मशीन पर ध' देलकैक।ओ कत'- ने- कहाँ चलि गेलैक।बौआ कहलक जे पटना मे अपने द' देतौक।डिल्ली मे एकटा मजगूत सूप कीनि लेने रही।ओ हाथे मे रहय।ओ छीनि क' लागल मशीन सँ जाँच कर'।हम कहलियैक- 'अइ मे कथी ढूरता है?हुरिया?बड्ड सेहन्ता लगता है त' कोनो रोकता है।कीनि ने आनो आ दौ ने अपन बौह को।अनका समान पर कोन दाबी है केकरो?हल्ला केलहुँ त' आपस केलक।
भीतर हवा-जहाज देखै छी त' बूझ ने जे बड़का बसे बूझ।ओहिना लोक सभ सीटे-सीट बैसल।एक गोटा केँ कहलियैक जे यौ हमरा कनी खिड़की लग बैस' दिय'।मोन घूम' लगैए,जी ओकाय लगैए।मुदा ओ मनसा कथी लेल मानत?काका बीच मे बैसि गेलथुन आ हम कात मे।कनी काल मे दू गो लटकी छौड़ी आबि मारितेक बात इशारा सँ कसरत क' क' बताब' लगलैक।हमरा किछु बुझेबे नहि केलक।कहलियैक -' हे गे छौड़ी, इमहर आ!की बजलें,से की हम बुझलियौक?ओ किदन-किदन कहि हमरा एगो फीता सँ सीट मे बान्हि देलक।कहलियैक जे एना मे लोक निकास-बात केना जाएगा?मुदा ओ हमरे सिखाब' लागल।एकरे कहै छैक- नतिनी सिखाबय बुढ़ नानी केँ!'
गे मैया! खूब रेस क' क' एक्के बेरि अकास ठेका देलकैक जहाज।नीचाँबला घर सभ सलाइक डिब्बी जकाँ लागइ।मुदा हमरा ड'र नहि भेलहु।हँ, कान बहुत फरफराय लागल।एगो छौड़ी केँ हाक देलहुँ।कहलियैक जे कनी कम रेस मे जहाज हाँक' कहौ, कान बेसी फरफरा रहा है।तखन ओ दूनू कान मे तूर ठूसि देलक।पटना मे उतरै काल दूनू छौड़ी केँ एक-हकटा नमरी देलियैक जे किछु कीनि क' खा-पीबि लीहें।लेबे नहि करय।कहलियैक जे असिरबादी छियौक, राखि ले।कतेक हुज्जति केलियैक,तखन ओ सभ गोर लाग' लागल।बड्ड असिरबाद देलियैक।सभ सँ अजब तमाशा तँ समान लै काल भेल।सभक समान बेरा-बेरी मशीन पर नाचैए आ लोक हथोड़िया मारि ल' रहल अछि।एहि मे तँ केकरो समान केओ उचंगि पड़ा जेतैक।हमरो धोखा भ' गेल।पुतोहु नवका बैग कीनि देने रहथि,ललका।ओ दोसर उठा लेलक।बस, हम गछारलहुँ ओक्कर गट्टा।कहलियैक-' पचहीबाली के बैग आप किए लेते हैं?अपन समान सँ माने- मतलब रखिये।ओ किन्नहुँ मानबे नहि करय।धरा-पकड़ी हुअ' लागल।तखने काका बाजि उठलखुन- 'अपन बैग हइये आब आयल अछि।'तखन ओकरा छोड़लहुँ।बेमतलब सरकार झगड़ करबै छैक।
की कहियौक,कनियों चंसगर नहि रहितहुँ त' भारी बिपति मे पड़ि गेल रहितहुँ कैक बेरि।तों सभ एक बेरि हवा-जहाज पर चढ़िक' देखबही तखन ने बुझबही! गै जगदंबा,हइ कनी सभकेँ तेल-सिंदूर क' ने दहीक।" एकर उपरांत पचहीबाली काकी सभकेँ अपन मोटरी सँ निकालि परसादी- बद्धी सभ बाँट' लगलीह।बजलीह- "तों सभ जाइ जइहें त' भरोराबाली, हाबीबाली आ नरुआरबाली केँ सेहो पठा दीहें।सभ केओ हाल- चाल बूझ' आयल आ ओ तीनू बड़का महंथिन बनैए?कहि दिहैक,आबि क' परसादी ल' जाइ जायत,नहि त' सातो पुरखा केँ उकटि-पुकटि क' हाथ मे द' देबैक!"
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ज्ञानवर्द्धन कंठ
गहूमक रखबारी
फूदे पुछलथिन -"यौ लूटे, तखनि सँ हाक द' रहल छी।अकानैत नहि छियैक?कनियों उनमुनेबो नहि केलहुँ!कोन अनमनामे लागल छलहुँ?एना अनमनायल किएक छी?मुँह किएक भकुआयल अछि?"
लूटे कहलथिन- "की कहू भाय?इ गहूमक रखबारी लाहेब केलक। गहूम फटकायल असोरा पर धैल रहैक।काल्हि कनिकाल लेल झिसियाइ लगलैक।आध घंटाभरि फुँहिया गेलैक।केकरो धेयान नहि रहलैक।गहूम रहैक बोरामे। हमर नजरि गेल।हड़बड़ा गेलहुँ।फुरफुराक' उठलहुँ।तलमलाक' खसलहुँ।बासन सभ ढनमना गेलैक ।कछमछा गेलहुँ।तैयो ओरियाक' उठलहुँ।घिसियाक' बोरा भीतर ल' गेलहुँ।तैयो गहूम सिमसिमा गेलैक।की करितहुँ?मोन मारि ओछान पर ओंघरा गेलहुँ।भोरे तरफराक' उठलहुँ।देखलियैक,रौद मरियायल रहैक।अगुतायल रही, मुदा असोथकित भ' सुस्ताय लगलहुँ।फेर मोन भेल जे गहूम पसारि दैत छियैक।पक्के पर छिड़िया देलियैक।एम्हर गहूम पर कौआ सभ लुबुधायल रहैक।चुगै लेल लुसफुसायल रहैक।नंग-चंग क' देलक।बगिलमे सोंटा टेबियाक' धयने रही।जुमाक' चला देलियैक।ओम्हर सँ एकटा नेता लोक सभकेँ डोरिएने भोट माँग' आबि रहल रहैक।ओ सोंटा ओकरे कपार बजरि गेलैक।ओ डिरियाय लगलैक।चिचियाय लगलैक।हम सिटपिटा गेलहुँ।केबाड़ बन्नक' क' गबदी मारि पड़ि रहलहुँ।ओ सभ बड़ीकाल धरि केबाड़ पीटैत रहल।चिकरैत रहल।नेता कहलकैक -'छोड़ि दही, एखन भोटक टाइम छैक।' तखन सँ जीह हड़हड़ करैए।ताहिमे अहाँ खड़खड़ायल आबि गेलहुँ।ओ नेता बड्ड खबखबायल हेतैक,नहि यौ?कहूँ लोक जिता देलकैक, तखन यौ?बाप-रौ-बाप!"
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Suggested citation: आनन्द कुमार झा. “मैथिली नाटक आ ग्रामीण रंगमंच.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 310, 2020-11-15. https://www.videha.co.in/research/2020/310/मैथिली-नाटक-आ-ग्रामीण-रंगमंच.htm

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