१
लालदासक रामायण चौपाइसँ सृजित अछि। बुझू जे ९५ प्रतिशत भाग चौपाइ, आ फेर बाँचल भागमे रूपमाला छन्द आ गीतिका।
मुदा हम एतऽ कुण्डलियाक चर्चा कऽ रहल छी, जे बहुत कम मात्रामे अछि मुदा हमरा ओ बहुत प्रभावित करैत अछि। कुण्डलियाक प्रकृति रुबाइसँ मिलैत अछि आ जँ अहाँ ओमर खय्यामक रुबाइ पढ़ब तँ कुण्डलियासँ प्रेम करऽ लागब।
कुण्डलिया अछि की? कुण्डलिया बुझै लेल अहाँकेँ दोहा आ रोला बुझऽ पड़त। लालदासक मिथिला रामायण मे कुण्डलियाक अलाबे रोला आ दोहा सेहो अहाँकेँ भेटत। मुदा एकर सम्मिलन अछि कुण्डलिया।
दोहा
दोहा मात्रिक छन्द अछि। दोहामे दू पाँती आ चारि चरण होइत अछि। पहिल चरणमे १३,दोसर चरणमे ११,तेसर चरणमे १३आ चारिम चरणमे ११ मात्रा होइत अछि। पहिल आ तेसर चरणक आरम्भ जगणसँ (जगण U। U) नै हएत आ दोसर आ चारिम चरण अन्त हएत दीर्घ-ह्रस्वसँ।
रोला
रोला सेहो मात्रिक छन्द अछि। रोलामे चारि पाँती आ आठ चरण होइत अछि। पहिल चरणमे ११, दोसर चरणमे १३, तेसर चरणमे ११ आ चारिम चरणमे १३ मात्रा, पाँचम चरणमे ११, छअम चरणमे १३ मात्रा होइत अछि। सभ पाँतीक पहिल चरणक अन्तमे दीर्घ-ह्रस्व, वा ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व होइत अछि। सभ पाँतीक दोसर चरणक अन्तमे चारिटा ह्रस्व, वा दूटा दीर्घ, वा दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व (भगण । U U), वा ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ (सगण U U ।) होइत अछि। रोलाक प्रारम्भ ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्वसँ नै करू।
कुण्डलिया
दोहा आ रोलाक कुण्डली (मिश्रण) भेल कुण्डलिया। दोहा लिख दियौ, फेर दोहाक अन्तिम चरणकेँ (११ मात्रा बला) रोलाक पहिल चरण बना दियौ (पुनरावृत्ति) आ फेर रोला जोड़ू। खाली ई ध्यान राखू जे दोहाक पहिल चरणक पहिल शब्द आ रोलाक अन्तिम चरणक अन्तिम शब्द एक्के रहए। कुण्डलियाक पहिल शब्द आ अन्तिम शब्द एक्के होइए। कुण्डलियाक चारिम आ पाँचम चरण सेहो एक्के होइए।
२
आब सोझे पहुँचि जाउ मिथिला रामायणक सुन्दर काण्डक अन्तमे जतऽ अहाँकेँ चारिटा कुण्डलिया भेटत।
कुण्डलिया दोहा (मैथिली अकादेमी)**
रघुनायक करुणायतन देखि विभीषण दीन।
देल प्रमाणहिं राज्य पद तनि पद रहु मन लीन॥
तनि पद रहु मन लीन हीन दीनक प्रतिपालक।
शरणागत वत्सल दयाल लालक दुख घालक॥
लोकपाल यमकाल डरथि लखि जनिक सुसायक।
सकल लोक निश्शोक करथि से विभु रघुनायक॥१॥
अधनाशिनी रघुपति कथा, सुनितहि हो दुख दूर।
तनिपर प्रभु अनुकूल रहि, करथि मनोरथ पूर॥
करथि मनोरथ पूर क्रूर सौं सदा बचाबथि।
धन जन विजय विभूति जूति सुख तनिक बढ़ाबथि॥
काम आदि सौं बचथि भक्ति पाबथि अविनाशिनि।
पापताप सभ तनिक हरथि गंगा अघयाशिनी॥२॥
चितचकोर की चाख नित, विषय विषम अंगार।
सीतारामक भजन भल, करफल अमिय अहार॥
करफल अमिय अहार भार संसारक छोड़ी।
लेल सकल पद ब्रह्म भक्त भव बन्धन तोड़ी॥
पतितहुँ काँ गति जतय ततय रहि लहु सुख समुचित।
हित निश्चित निज जानु अपर भव विषयक अनुचित॥३॥
मन विहङ्ग कति दुख सहह भवपिंजर मे आबि।
गहह लाल जौं सुख चहय श्रीपद तरुवर पाबि॥
श्रीपद तरुवर पाबि गाबि रहु रामकथा नित।
नहि तेहि सौं अछि अपर युक्ति कल्याण त्राण हित॥
कत पातकि भव सिन्धु तरल नहि रहल एक क्षण।
गाबि गाबि हरि कथा यथा मति लाबि एक मन॥४॥
उपरका पाठ मैथिली अकादेमीक पोथीसँ लेल गेल अछि।
३
मात्रिक गणना
मैथिलीक उच्चारण निर्देश आ ह्रस्व-दीर्घ विचारपर आउ।
शास्त्रमे प्रयुक्त 'गुर' आ 'लघ' छंदक परिचय प्राप्त करू।
तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ - ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ- दीर्घ स्वर अछि। ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ 'गुणिताक्षर' बनैत अछि।क्+अ= क, क्+आ=का । एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक 'अक्षर' कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना 'अवाक्' शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ, वा । १. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर 'लघ' मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि। २. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर 'गुर' मानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -।३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि।४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि।
जेना कहल गेल अछि जे अनुस्वार आ विसर्गयुक्त भेलासँ दीर्घ होएत तहिना आब कहल जा रहल अछि जे चन्द्रबिन्दु आ ह्रस्वक मेल ह्रस्व होएत।
माने चन्द्रबिन्दु+ह्रस्व स्वर= एक मात्रा
संयुक्ताक्षर: एतए मात्रा गानल जाएत एहि तरहेँ:-
क्ति= क् + त् + इ = ०+०+१= १
क्ती= क् + त् + ई = ०+०+२= २
क्ष= क् + ष= ०+१
त्र= त् + र= ०+१
ज्ञ= ज् + ञ= ०+१
श्र= श् + र= ०+१
स्र= स् +र= ०+१
शृ =श् +ऋ= ०+१
त्व= त् +व= ०+१
त्त्व= त् + त् + व= ० + ० + १
ह्रस्व + ऽ = १ + ०
अ वा दीर्घक बाद बिकारीक प्रयोग नहि होइत अछि जेना दिअऽ आऽ ओऽ (दोषपूर्ण प्रयोग)। हँ व्यंजन+अ गुणिताक्षरक बाद बिकारी दऽ सकै छी।
ह्रस्व + चन्द्रबिन्दु= १+०
दीर्घ+ चन्द्रबिन्दु= २+०
जेना हँसल= १+१+१
साँस= २+१
बिकारी आ चन्द्रबिन्दुक गणना शून्य होएत।
जा कऽ = २+१
क् =०
क= क् +अ= ०+१
किएक तँ क केँ क् पढ़बाक प्रवृत्ति मैथिलीमे आबि गेल तेँ बिकारी देबाक आवश्यकता पड़ल, दीर्घ स्वरमे एहन आवश्यकता नहि अछि।
U- ह्रस्वक चेन्ह
।- दीर्घक चेन्ह
एक दीर्घ । =दूटा ह्रस्व U
४
छन्दोभङ्ग
आब लालदासक मिथिला रामायणक चारू कुण्डलियापर आउ। अहाँकेँ स्पष्टरूपेँ छन्दोभङ्ग भेटि जायत। कवि लालदास तँ छन्दोभङ्ग कऽ नै सकैत छथि। एतऽ टाइपिंग मिस्टेक तँ स्पष्ट रूपेँ नै अछि। तखन ई मात्रिक गणनासँ अनभिज्ञ मैथिली अकादेमीक सम्पादक बा प्रूफरीडरक काज भऽ सकैए, जे वर्तनीक एकरूपता अनबा लेल छन्दोभङ्ग केलन्हि। मुदा साहित्य अकादेमीक लालादास रामायण (सम्पादक रामदेवझा)मे छन्दोभङ्ग नै भेटत, से रामदेव झा केर दावा छलन्हि आ हुनकापर मूलपाठकेँ परिवर्तित करबाक जे आरोप लगाओल गेलन्हि आ जे आरोप लगेलन्हि से मात्रिक गणनासँ अनभिज्ञ बुझाइत छथि, से हुनकर कहब छलन्हि अपन उत्तरमे। मूलपाठसँ अन्तर छन्दोभङ्ग ठीक करबाक उद्देश्यसँ ओ केलन्हि से हुनकर दावा छलन्हि। माने कुण्डलिया छन्द जँ लालदास लिखने छथि तँ सम्पादककेँ एतेक तँ ज्ञान हेबाके चाही जे ओ देखय जे खाली हेडिंग कुण्डलिया देने काज नै चलत। आ रामदेव झा जीक विचारे साहित्य अकादेमीक लालादास रामायणकेँ अन्तिम पाठ मानबाक चाही। आब देखू साहित्य अकादेमीक पाठ।
**रामादेव झा द्वारा सम्पादित लालदासक कुण्डलिया (साहित्य अकादेमी)
कुण्डलिया दोहा
रघुनायक करुणायतन देखि विभीषण दीन।
देल प्रमाणहिं राज्य पद तनि पद रहु मन लीन॥
तनि पद रहु मन लीन हीन दीनक प्रतिपालक।
शरणागत वत्सल दयाल लालक दुख घालक॥
लोकपाल यम काल डरथि लखि जनिक सुसायक।
सकल लोक निश्शोक करथि से विभु रघुनायक॥१॥
अधनाशिनी रघुपति कथा, सुनितहि हो दुख दूर।
तनिपर प्रभु अनुकूल रहि, करथि मनोरथ पूर॥
करथि मनोरथ पूर क्रूरसौं सदा बचाबथि।
धन जन विजय विभूति जूति सुख तनिक बढ़ाबथि॥
काम आदिसौं बचथि भक्ति पाबथि अविनाशिनि।
पापताप सभ तनिक हरथि गंगा अघनाशिनी॥२॥
चितचकोर की चाख नित, विषय विषम अंगार।
सीतारामक भजन भल, कर फल अमिय अहार॥
कर फल अमिय अहार भार संसारक छोड़ी।
लेल सकल पद ब्रह्म भक्त भव बन्धन तोड़ी॥
पतितहुँकाँ गति जतय ततय रहि लहु सुख समुचित।
हित निश्चित निज जानु अपर भवविषयक अनुचित॥३॥
मन विहङ्ग कति दुख सहह भवपिंजरमे आबि।
गहह लाल जौं सुख चहय श्रीपद तरुवर पाबि॥
श्रीपद तरुवर पाबि गाबि रहु रामकथा नित।
नहि तेहि सौं अछि अपर युक्ति कल्याण त्राण हित॥
कत पातकि भवसिन्धु तरल नहि रहल एक क्षण।
गाबि गाबि हरि कथा यथा मति लाबि एक मन॥४॥
ओना तँ मैथिली अकादेमीक पाठ आ ऐ पाठमे खास कोनो अन्तर नै अछि, मात्र विभक्ति आ दूटा शब्द कतै सटायल गेल अछि आ कतौ फराक कऽ देल गेल अछि। दोसर कुण्डलियाक अन्तिम शब्द अघयाशिनी केँ अघनाशिनी कऽ देल गेल अछि।
कर्णाटकक गोकर्ण गंगावली आ अधनाशिनी धारपर अछि आ 'पापताप सभ तनिक हरथि गंगा' माने पापनाशिनी गंगा माने 'अधनाशिनी' प्रयोग समुचित अछि, 'अघनासिनी' नै, प्रायः टाइपिंग मिस्टेक अछि।
ओना तँ छन्दोभङ्ग ठीक करबाक दावा तँ पुष्ट नै भेल, मुदा शब्दक उचित प्रयोगक प्रयास भेल अछि से मैथिली अकादेमीक पाठसँ साहित्य अकादेमीक पाठ हमरा श्रेयस्कर लागि रहल अछि।