विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

गतिशील यथार्थक कथाकार अशोक: किछु टिपौत

श्रीधरम · 2023-05-01 · अंक 369 · पृष्ठ 146–155

अशोक खाँटी आधुनिक मैथिल-कथाकार छथि। मैथिली में खाँटी कथाकार त' बहुत छथि, मुदा कैक बेर हुनक दृष्टिक कोराँटी हुनक छद्म वैचारिकताक पोल खोलि दैत अछि। एहि दृष्टिएँ कथाकार अशोकक वैचारिकता आ प्रगतिशीलता मे कोनो झोल नहि छनि आ से हुनक कथा मे अनुस्यूत छनि। से बिना कोनो नारेबाजी आकि डफली बजेनहि। अशोक मिथिलाक जन-जीवनक कें अलग-अलग कोन आ दृष्टिकोण सँ देखैत छथि। ओ आम जीवन, जगत आ प्रकृतिक अनेक बिम्ब कें गतिशील चित्रकारी संग उतारि दैत छथि। हुनकर जे 'मैथिल आँखि' छनि तकर कैनवास बहुत विस्तृत छै, लोकल सँ ल' क' ग्लोबल धरि। हिनकर कथाक वितान मे मिथिलाक माटि-पानि, खेत-खरिहान, जातिक अनुसार बाँटल टोल-पड़ोस, दाम्पत्य जीवनक आशा-निराशा, राग-द्वेष सभ किछु व्याप्त अछि। बभनटोली सँ बाहर निकलि क' दलित-टोल आ मियां टोल धरि जाइत छथि आ एक दोसर टोलक बीचक राग द्वेष, छल-छद्म, तनावक संग आत्मीयताक सूत्र कें सेहो पकड़बाक प्रयास करैत छथि। सब सँ पैघ बात जे हिनकर कथा कहबाक शैली छनि से 'इस्स' ककरा नहि ठमका देत? कथ्यक अनुसारें 'कहन' कें साध' में माहिर छथि कथाकार अशोक।

'ओहि रातिक भोर' संग्रहक भूमिका मे प्रसिद्ध कवि-आलोचक कुलानन्द मिश्रक हिनका कथाक मादे टिप्पणी छनि जे "ई युगसत्य कें सामूहिक नजरि सँ बेसी व्यक्तिक नजरि सँ देखब सार्थक बुझैत छथि तें हिनकर कथा मे युगीन संघर्षक बात परोक्ष रूप सँ लक्षित होइत छै।" देखल जाय त' एहि कथन मे प्रश्नक संग उत्तर सेहो निहित छै। एत' कुलानन्द जीक कहबाक आशय यैह छनि जे अशोक अपन समकालीन समय, समाज आ जन-संकुलक यथार्थ कें अपन पात्रक नजरि सँ अकानैत छथि नै कि भीड़ आ नारेबाजी सँ। हिन्दी मे प्रेमचंद सँ अमरकांत धरिक कथा मे समाज आ समूह कें 'व्यक्तिक नजरि' सँ थाहबाक ई परंपरा देखल जा सकैत अछि। प्रश्न यैह हेबाक चाही जे व्यक्ति-चरित्र वर्गीय चरित्र बनैत अछि कि नहि। आलोचक मोहन भारद्वाजक उचिते कहब छनि जे "अशोक विकास कें पुनरावृत्तिक रूप से नहि देखैत छथि। विपरीत तत्त्वक एकताक रूप में विकास कें देखब हुनक विशेषता छनि।" भारद्वाज जी इहो लिखैत छथि जे हिनक "कथाक कथ्य सार्वभौम होइत अछि, मुदा ओकर बनाबटि मैथिल रहैत अछि। कथाक तानी-भरनी अर्थात संरचना मे मैथिल सुवास रहैत अछि।" निःसन्देह मोहन भारद्वाज अशोक कें एकटा एहन प्रगतिशील कथाकार रूपें देखैत छथि जे सामाजिक द्वंद्व कें वैश्विक आ वैज्ञानिक दृष्टिएँ मैथिल गंधक संग चित्रित करैत छथि। एहि प्रक्रिया मे कथाकार अशोक अपन पाठक आ पाठकीयता कें गसियौने रहैत छथि। जेनाकि युवा कथाकार-समीक्षक शुभेन्दु शेखर अशोक कें 'पाठकक कथाकार' कहैत लिखैत छथि जे "अशोकजी मिथिलाक जीवन-राग, ओकर छोट-पैघ आकांक्षा, ओकर उदात्त जीवनक नकारात्मक आ सकारात्मक विंदु सभ कें बहुत सूक्ष्मता सँ देखैत छथि।" शुभेन्दु अशोकक कथा-यात्राक एहि विशेषता कें सेहो रेखांकित करैत छथि जे कथ्य आ शिल्पक स्तर पर ई कथाकार लगातार ऊर्ध्वमुखी आ प्रयोगशील छथि। आ जकरा कैक बेर ठमकल मैथिल-नजरि नहि पकड़ि पबैत अछि। एवं प्रकारें कथाकार अशोकक जे थोड़-बहुत मूल्यांकन भेल से बहुत कम अछि। तें 'विदेह'क ई प्रयास एहि चर्चा-परिचर्चा कें आगाँ बढ़ाओत से विश्वास अछि।

अशोक 1980 के आसपास कथा लेखन आरंभ कैने छलाह। लगभग चारि दशक मे हुनका लग संख्या मे भने कथा कम हो, मुदा उत्कृष्टताक प्रतिशत हुनका लग बहुत अधिक छनि। निःसन्देह सृजनात्मक रचनाकारक भीतर सेहो एकटा आत्मालोचक हेबाक चाही, जाहि सँ साहित्य मे निंघेस नहि पसारि सकय। एहि सँ साहित्य आ पाठकक बहुत भलाइ होयत। अशोक पिछला शताब्दीक अवसानक संग मलकैत सांढ़ जकां आँखि मुनने भागल जाइत नव सदीक यथार्थ कें अपन कथा मे गूँथय मे माहिर छथि। पिछला सदीक अंतिम दू दशक भारतीय समाज आ राजनीति मे परिवर्तनक काल रहल, जकर समाज पर असरि बहुत बेसी पड़ल। यैह समय आवारा-पूंजीक वैश्विक आवागमनक सेहो थिक। पारंपरिक सामाजिक संरचनाक पुनर्रचना भेल आ एहि क्रम मे टकरावक संग सामंत केंद्रीय टोल सँ हाशियाक टोल दिस सेहो शिफ्ट भेल। एहि बदलावक प्रक्रिया कें अशोक बहुत महीन रुपें 'मातबर' कथा मे अभिव्यक्त करैत छथि। कथा मे आयल 'अंबेडकर-चौक' परिवर्तनक मेटाफर बनि जाइत अछि। निम्न वर्ग सँ मातबर बनबाक एहि प्रक्रिया मे जनता अपन राजनेते जकां दिशाहीन आ दिकभ्रमित अछि।

गोर्की चेखवक कहानी कलाक वर्णन करैत लिखने छथि - "चेखवक कथा पढ़ैत एना सन प्रतीत होइत अछि जेना कि मानि लिय' जे शरद ऋतुक उदास अवसानक दिन मे अहाँ टहलि रहल छी, जखन कि हवा एतेक पारदर्शी होइत अछि जे ओहि में झाड़-पात, गाछ-बिरिछ, संकीर्ण मकान आ धूमिल सन लोक सभकिछु एकदम स्पष्ट देखा पड़ैत अछि। सभकिछु एकदम विचित्र- एकांत, निश्चल आ निश्शक्त लगैत अछि। चारू भरि गहींर नील सँ बोरल असीमित दूरी पसरल रहैत अछि। आ जे फिक्का सन आसमान संगे जा मिलैत अछि। ठंड सँ जमल आ कादो सँ भरल धरती पर आसमान 'सर्द आह' भरैत अछि। लेखकक बुद्धि शरद ऋतुक सूर्य जकां निर्मम आ स्पष्ट रुपें ऊबड़-खाबड़ बाट, टेढ़-मेढ़ गली, संकीर्ण आ गंदा मकान सभ पर प्रकाश पसारैत अछि, एहि मकान सभ मे दीन-हीन तुच्छ लोक सभक विकलता आ काहिली सँ दम घुटैत जाइत छै। ओ सभ मूस जकां अपन निरर्थक, ओंघायल भागम-भाग मे लागल रहैत अछि ।" अशोकजीक कथा सभ कें पढ़ैत कैक बेर ई कथन सार्थक बुझना जाइत अछि। अशोक अपन निजी पेशा में सरकारी अधिकारी रहलाह। हुनका लग सरकारी तंत्रक बेस नीक-अधलाह अनुभव छनि, जकरा ओ अपन कथाक विषय बनौने छथि। सरकारी लालफीताशाही पर अशोकक कैक टा कथा छानि। 'दसखत' आ 'कोठा' कथा मे राजनितिक भ्रष्टाचार कें जाहि तरहें उघाड़ल गेल अछि से अपन कथ्य मे पुरान होइतो प्रस्तुति मे नव अछि। अनेक तथ्य आ पक्ष कें जोड़ैत। 'कोठा' मे 'सांप' मेटाफर के बहुत समुचित प्रयोग भेल अछि। पहिने 'अवर्ण' कें 'सवर्ण' लूटैत छला आ आब 'मंडल' लूटि रहल छथि। रामलाल मंडलक सांप सभ सीसाक घर सँ बाहर भ' गेल। "चारूकात गाम मे सरसराइत-सनसनाइत ससर' लागल। फुफकार सँ आसामर्द क' देलक समूचा वातावरण के।" अहिना 'जिनिस' कथा में भ्रष्टाचारक संग दाम्पत्य आ बदलैत स्त्री-पुरुष संबंधक सार्थक रेखाचित्र खींचल गेल अछि। 'स्त्री-पुरुखक दियाद नहि थिकैक।' एहि कथन सँ अनेक तथ्य ध्वनित होइत अछि। रूपाक एहि कथन 'मोन पाडू त' कत्तेक दिन भ' गेल हैत हमर देह छूना अहाँके?' कें आधुनिक स्त्री-विमर्शक दृष्टिएं सेहो देखल जा सकैत अछि।

अशोकक एकटा कथा छनि 'हरिसिंहदेवी'। आब इहो कोनो कथाक 'कथ्य' भ' सकैत अछि? मुदा एहन शोध आलेखक विषय कें लेखक जाहि तरहें बिखिया के बखान करैत छथि, से हुनकर 'किस्सागो'क प्रमाण थीक। कथाकार एत' जाति-पांतिक समाजशास्त्रीय विश्लेषणक संग मनोवैज्ञानिक 'स्कैन' सेहो करैत चलैत छथि। 'रागविराग' कथा एहि तथ्य कें रेखांकित करैत अछि, जे हजारो बर्ख सँ मारि-गारि सुन' बला दलित, मजदूर लेल सम्मान आ स्नेहक दू टा मीठ बोल कतेक आह्लादक होइत छै। हजार रुपैया कमेनिहार ड्राइवर अपन सेठानी कें माँ कहैत अछि। हजारो सालक सामंती गुलामी सँ बाहर निकलल ई वर्ग एक बेर फेर 'प्रेम लपेटे अटपटे बैन' मे फंसिक' शोषणक शिकार भ' जाइत अछि। अही कड़ीक विस्तार मे 'महतो' 'प्रतिलोम' आ 'सीवन रजकक हितचिन्तक' शीर्षक कथा कें देखल जा सकैत अछि। मुदा 'सीवन रजकक हितचिन्तक' कथाक अंत मे जे द्वंद्व हेबाक चाही ताहि सँ पात्र वंचित रहि जाइत अछि। बहुत आसानी सँ सीवन कें मुक्ति भेटि जाइत छै। एहि दृष्टि सँ 'प्रतिलोम' कथाक विकास आ उरूज स्वाभाविक अछि।

'मातबर' संग्रहक कथा ''बूढा जीबैत रहलाह' आ 'डैडीगाम' संग्रहक 'ऐना भ' क' कियो' कें एक संगे पढ़ल जेबाक चाही। भारतीय समाज मे सोलह-सत्रह बर्ख मे बियाह आ चालीस जाइत-जाइत वानप्रस्थी बनि जएबाक आग्रह रहल अछि। सभटा शास्त्र-पुराण मे ययाति आ देवब्रत सन अनेको उदहारण रहबाक अछैतो बूढ़क गंजन करबा मे 'विश्वगुरु' सेहो पाछाँ नहि रहल अछि। हमरा जनैत बूढ़क 'राग' पर मैथिली मे लीखल अन्यतम कथा थीक- बूढा जीबैत रहलाह। अहिना दाम्पत्य जीवन आ प्रेमक कथा- 'लाथ' कें सेहो देखल जा सकैत अछि। मध्यवर्गीय व्यक्ति अपन गृहस्थक गाड़ी कें खींचैत-खींचैत कहिया जवान सँ अधबयसू आ बूढ़ भ' जाइत अछि तकरा एकटा 'कुर्ता'क प्रतीकक माध्यम सँ कहल गेल अछि।

'मातबर' संग्रहक एकटा आरो विशेष उल्लेखनीय कथा थिक- 'रांड़'। ओना ई कथ्य आब मिथिलो लेल पुरान सन भ' रहल अछि, मुदा जं एहि विषय कें हटा दी त' मैथिली कथा-साहित्यक दू तिहाइ हिस्सा अप्रासंगिक भ' जायत। इतिहास समजशात्रीय अध्ययनक आधार होइत अछि। अस्तु, अशोक अपन कथा 'राँड़'क बहन्ने विधवाक लेल निर्धारित पारंपरिक मापदंड कें तोड़ैत छथि, ओहि पर प्रश्नचिन्ह लगबैत छथि। कथाक नैरेटर मनीषक आंखिये विधवा जीवन, ओकर संघर्ष आ विकसित चेतना कें समग्रता मे देखल गेल अछि। एत' विधवा स्त्रीक विकसित होइत स्वतंत्र व्यक्तित्व कें देखल जा सकैत अछि। विधवाक लेल जे ताना-बाना समाज द्वारा निर्धारित कैल गेल अछि, ओकरा ओ नकारैत अछि, जेना- उज्जर नुआ पहिरब, सिंऊथ से सिनूर धोई देब, चूड़ी फोड़ि देब, अनकर छूल नहि खैब, माछ-मांस नहि खैब, देह साधि के हड्डी बना लिय' जे मोन आ देहक बीच कोनो तार ने जुडी जाय। देहक राग ने बाजि उठय... आदि। मुदा पत्नी मरला पर पुरुषक लेल कोनो नियम-संयम नहि। मनीष कें मोन छै जे माय के मरला पर बाबू लाश सँ मांफी मांगने रहथिन-'जीवित मे अहाँ कें बड दुःख देलहुं। बड़ क्रोध केलहुं। मांफ क' देब हमरा।' मुदा पत्नीक मृत्युक करण हुनकर दिनचर्या मे कोनो अंतर नहि आयल। 'माछ-मासु खाइते रहलाह। सभटा काज ओहिना करैत रहलाह, जेना पहिने करथि।' मनीष कें अपन विधवा पितामही मोन पड़ैत छै जे उज्जर नुआ पहिरने, गोपी चनानक ठोप केने भगवतीक पूजाक बाद माटिक बासन मे अपने सँ भानस करथिन। ओही भगवतीक पूजा जे कहियो स्त्रीक पक्ष मे ठाढ़ नहि भ' सकलीह। विधवा जीवनक कष्ट कें कनेको कम नै क' सकलीह। कोना क' सकैत छलीह जत' धर्मराज सन महापुरुखक मुंहें महाभारत मे कहा देल गेल-"यदि कोनो पुरुष के सौ टा जीह (मुंह) होई, आ सौ बरख धरि ओ ज़िंदा रहय आ ओकरा जीवन भरि स्त्रीक दोषक बखान करबाक अलावा कोनो दोसर काज नहि देल जाई, तैयो ओ स्त्रीक दोष कें बिना बखान केने मरि जायत।" एहना मे विधवाक आर्तनाद शास्त्र पर चलानिहार कोन पुरुख सुनि सकैत छल?

मनीष अपन मामी कें विधवा रूप मे देखबाक कल्पनो नहि क' सकैत छल। किएक त' ओकर नेनपन काशी मे मामीक आँचरक छहारि मे बीतल रहै। ओ मामी, जे मैथिल द्वारा काशी-लाभ लेल (मरै लेल) छोड़ि दै बला बूढ़ माता-पिता कें मरै तक देख-भाल करथि। जीवन सँ मृत्यु धरी सेवा मे दू पाई कमा लेथि आ तकर बदला मे लोक सभ बिखिन बिखिनक खेरहा पसारनि। मुदा, मामी ककरो बात पर ध्यान देने बिना 'स्वान रूप संसार है भूकन दे झख मारि'क अंदाज मे अपन काज मे लागल रहलीह। आखिर काशी कबीरक सेहो नगरी थिक, जतबे आडम्बर-युक्त ततबे आडम्बर-मुक्त। आ से मामी जखन विधवा भ' गेलीह त' मनीष सोचैत अछि जे हुनकर उज्जर वस्त्र के ओ मूंगाक रंग-बला शाल सँ झाँपि देत। "मुदा मनीष जखन मामीक ओत' गेल त' हुनका आसमानी रंगक नुआ मे देखलक। आसमानी रंगक नुआ-ब्लाउज पहिरने मामी जेना सम्पूर्ण अकास के समेटने छलीह। हाथ मे घड़ी रहनि। सोनाक चूड़ी रहनि।" मामीक आसमानी रंगक साड़ी ओहि अकास कें अपना मे समेटने अछि, जाहि पर पुरुषक 'बपौती' रहल, स्त्रीक 'मैयौती' नहि। (एत' आसमानी रंग स्वतंत्रता ओ स्वच्छंदताक प्रतीक थिक।) ई देखि प्रगतिशील मनीष कें एक पल लेल ठकमका जायब स्वाभाविक छल। मामीक ई कथन जे 'हम राँड़ नहि भेलहुँ मनीष। हम राँड़ नहि छी।" आधुनिक मैथिलानीक उद्घोषणा थिक जे हजारो साल सँ जमल पितृसत्ताक शिला पर हथौराक चोट सन बुझइत अछि। आ मामीक अहि उक्ति कें सुनि मनीष कें अपन माताक मृत्युक बाद पिताक जीवन कें मोन पारब प्रतीक मे बहुत किछु कहि दैत अछि। (ओना ई कथाक अंत एतहिये भ' जैत त' हमरा जनतबे नीक।)

ई कथा अपन कलेवर मे छोट होइतो मिथिलाक विधवा-जीवनक अनेक रंग (सफ़ेद सँ आसमानी धरि) कें अपना मे समेटने अछि। मनीषक विधवा पितामही सँ विधवा मामी धरिक मिथिलांचलक वैधव्य-यात्रा मे बहुत किछु बदलि गेल अछि। बहुत किछु टूटि गेल अछि। बहुत किछु पाँछा छुटि गेल अछि। परंपरावादी पागक पाछां गन्हाइत दिमागक बिखपादे टा बचल अछि। अतीत-गायनक संग संग जखन अतीतक मूल्यांकन होइत अछि, तखने स्वस्थ भविष्यक कल्पना कैल जा सकैत अछि।

'डैडीगाम' धरि अबैत-अबैत अशोक कथ्य आ शिल्प, दुनू स्तर पर नव-नव प्रयोग करैत छथि। शीर्षक कथा डैडीगाम एक संग ढहैत सामंतवाद, पलायन, गामक प्रति नास्टेल्जिया, गामक राजनितिक-सामाजिक-आर्थिक बदलावक संग बदलैत चेतनाक कथा थीक। रघुवंश लंदन मे अनेको बर्ख धरि रहि डाक्टरी करबाक अछैतो गाम मे सीतारामक मंदिर बनाब' चाहैत छथि। गाम सँ पुनः जुड़बाक लेल मंदिर कें ओ कड़ी बनाब' चाहैत छथि। हुनकर बेटा सब एहि कार्य मे हुनकर सहयोग करैत छनि। मुदा गामक नवतुरिया ई बुझैत अछि जे मंदिरक निर्माण सँ शिक्षा, स्वास्थ्य आ बेरोजगारी दूर नहि भ' सकैत अछि। तें नवतुरिया मंदिरक बदला मे अस्पताल बनेबाक आग्रह पर अडिग भ' जाइत अछि। सवर्ण सँ अधिक अवर्ण समुदायक लोक शिक्षा आ स्वास्थक महत्त्व कें बूझ' लागल अछि। फेकनक ई कहब जे 'मिथिला मे सीताराम मंदिर बनेबाक परंपरा नहि रहल अछि' मिथिलाक सांस्कृतिक धरोहर पर सँ गर्दा झारैत वर्तमान मंदिरवादी राजनीति के पोल सेहो खोलि दैत अछि। रघुवंश गाम मरबाक लेल आयल छलाह, मुदा गाम अयलाक बाद हुनकर दृष्टि बदलि जाइत छनि- 'गाम-घर तं जीवाक लेल होइ छै। मरबाक लेल नहि।'

रचनाकारक दायित्व कमजोरक संग ठाढ़ हैब होइत अछि। घोर अमानवीय वातावरण मे मानवताक सूत्र खोजब होइत अछि। कोनो धर्म, जाति, वर्ग, अथवा क्षेत्र सँ राग-द्वेष अथवा पूर्वाग्रह रखनिहर लेखक कोनो राजनीतिक पार्टीक प्रचारक भ' सकैत छथि, लेखक नहि। अशोक सांप्रदायिक तनावक माहौल मे सांप्रदायिक-सौहार्दक कथा लिखैत छथि। अहि सन्दर्भ में 'छल', 'ओ दुनू साईकिल सीखैत अछि' आ 'राग' कथा विशेष उल्लेखनीय अछि। 'छल' कथा मे भोली झा जाहि तरहें इस्लाम कें गरियाब' बला हाकिम सँ लड़ि जाइत अछि, से ओकर अभिनय नहि, सैकड़ो वर्ष सँ सह अस्तित्वक संग हिन्दू-मुसलमानक संग रहबाक प्रमाण थिक। तहिना कैंची बला मुसलमान द्वारा रमेश आ सुधीर कें पिटाई सँ बचा लेब आ साइकिल मिस्त्रीक ई कहब जे 'अब कहिया आयब' साइकिल सिख' आश्वस्त करैत अछि जे मिथिले नहि भारतीय समाज बहुत अधिक दिन धरि धर्मक निशा मे बताह नहि रहि सकैत अछि। 'राग' कथा त' मैथिलक भोजन-प्रियताक समाज-मनोवैज्ञानिक पोस्टमार्टम थीक। गणेश बाबू आ मुजफ्फर साहेब एकटा सवर्ण हिन्दू दोसर सवर्ण मुसलमान 'अन्न-ब्रम्ह'क लेल अपन जातीय आ धार्मिक टैबू कें छोडि दैत छथि आ एक दोसराक घर अष्टमीक बलि आ बकरीदक कुर्बानीक मासु नाक डूबा क' खाइत छथि। मुदा दुनू कें अहि लेल सामान्य होब' मे समय लागलनि। हिन्दू आ मुसलमान दुनू एक गाम, एक ठाम रहितो कतेक दूर अछि। एक दोसरक लेल कतेक पूर्वाग्रह पोसने अछि तकर प्रमाण थिक ई कथा। कथाकार कें कोनो हड़बड़ी नहि छनि। ओ हिन्दू मुसलमानक एकता देखेबाक लेल कोनो नारेबाजी अथबा रूढ़ प्रतीकक आसरा नहि लैत छथि। एक दोसराक संग रहैत, एक-दोसरक दुख-सुख कें बंटैत ई सह-अस्तित्व कथा मे विकसित भेल अछि। गणेश बाबूक अहि कथन मे लेखकक दृष्टि सेहो समाहित छनि, " औ, अहाँक बदना हथहर बनि बैसल अछि। अदद सँ हौसला धरि अंगेजने छी हम सभ। दुनू गोटे कें अफ़सोस आ अंदेशा एके रंग होइये।" 'राग' मैथिली कथाक परिधिक विस्तार करैत अछि। गणेश्वर बाबू मुजफ्फर साहेब संग टूटल राग कें पुनः जोड़बाक प्रयास करैत छथि। एखनो गाम मे मियां-टोलक सामने हिन्दू टोल नहि बना सकल अछि राजनीति।

स्त्री स्वधीनाताक प्रश्न 'स्वाधीन' कथा मे देखल जा सकैत अछि। हमरा जनैत 'वैवाहिक-बलात्कार' पर भारतीय साहित्य मे कथा बहुत कम लीखल गेल अछि, खास क' पुरुष लेखक द्वारा। जया जाहि तरहें पति द्वारा बलात्कार सँ ठहरल बच्चाक गर्भपात करेबाक जिद पर अड़ल रहैत छथि से स्त्रीक बदलैत स्वाधीन चेतनाक प्रमाण थिक। कतेको ना-नुकुर करैत अजय कें सेहो तैयार हुअ' पड़ैत छै आ अपन गलतीक पश्चाताप ओकरा सेहो होइत छै, ई लेखकीय दृष्टिक परिचायक थीक। जखन स्त्री आर्थिक रूपें सबल हेतीह, अपना कें दान मे उत्सर्गक बदला अपन जीवनसाथीक चयन स्वयं करतीह त' फैसला सेहो लेतीह। मुदा, 'टीस' कथा अपन अंत सँ निराश करैत अछि। विमला कें पति कोपरेटिवक अध्यक्ष बना देलकनि आ हुनक नकली हस्ताक्षर क' गबन करैत रहल। एक राति पुलिस आबि क' विमला कें गिरफ्तार क' लैत छै, पति पहिनहि निपत्ता भ' गेल रहै। विमला पतिक तमाम फरेब कें अपन भीतर दबा क' ओहि नकली हस्ताक्षर कें अपन असली हस्ताक्षर मानि लैत अछि। जं विमला एत' नकारि जाइतय त' ई कथा स्त्री स्वाधीनताक सन्दर्भ मे एकटा विमर्श ठाढ़ करैत।

'मनसूबा' आ 'लेमन आइसक्रीम', दू पीढ़ीक द्वंद्वक संग शहरीकरण, नव पीढ़ीक मनोभावक मशीनीकरणक कथा थीक। "पापा एकटा बात अछि। गाम मे अहाँक लाबिंग बहुत तगड़ा अछि" बबलूक ई कथन नव टेक्नोक्रेट युवाक बदलैत मानसिकताक प्रमाण थीक। ई द्वंद्व 'मनसूबा' कथा मे आरो विस्तार लेलक अछि। पलायन मजबूरी थीक। शहर अपना भीतर हेंजक हेंज गाम कें पचौने जा रहल अछि। संस्कृतिक संक्रमण अपन स्वाभाविक गति सँ पसरि रहल अछि। मध्यवर्ग सुविधाभोगी आ इएमआइजीवी होइत अछि। मध्यवर्गक पुरनका पीढी में प्राचीनता आ आधुनिकताक द्वंद्व रहै, से नव पीढी मे समाप्त भ' रहल छै। रणजीत कंपनी मे पैघ ओहदा पर अछि। ओ अपन जिनगी अपने ढंगे जीब' चाहैत अछि। माता-पिताक कोनो हस्तक्षेपक बिना। दिल्ली अयला पर माय अपन हाथक भोजन बेटा कें कराब' लेल व्यग्र छथि मुदा बेटा कें होटलक व्यवस्था पर अभिमान छनि। पिता कें बुझाइत छनि जेना "ओ तथा रणजीत नदीक दू छोड़ पर ठाढ़ छथि। दू-टा फराक फराक द्वीप पर।" अहि कथाक ट्रीटमेंट किछु आरो शब्दक मांग करैत अछि।

'खुशीक नाम जीवन' कें 'मनसूबा' कथाक विस्तार मे देखल जा सकैत अछि। मंसूबाक रणजीत अपन कैरियरक प्रति एतेक लिप्सित अछि, जे बियाहे नहि कर' चाहैत अछि। मुदा, एत' संदीप अपन जीवनसाथीक रुपें दक्षिण भारतीय स्वजातीय सुभद्रा नायर कें चुनैत अछि। कन्हैया बाबू आ हुनक पत्नी जेना तैयारे बैसल रहथि ई सुनबाक लेल। बियाह भ' गेल। कनियाँ मैथिली सीखि लेलीह। कोनो द्वंद्व नहि। कोनो कुट्टीचालि नहि। सब बड़ नीक। मुदा 'छुट्टीक एक दिन' मे नवतुरिया वर्गक प्रेमविवाहक मादे चर्चा बहुत स्वाभाविक रूपें आयल अछि।
अशोक मूलतः गतिशील यथार्थक कथाकार छथि। हुनकर अधिकांश कथा 'हम' नैरेटर द्वारा संचालित होइत छनि। कथा कहबाक ई तकनीक अपन सरलताक अछैत बहुत कठिन होइत अछि। सबसँ पैघ बात जे एकरसता आ आत्मालापक शिकार हेबाक शंका प्रबल रहैत अछि। मुदा एहि चुनौती कें अशोक कथ्य संग निलिप्त भ' आ 'बतकही' मे पूर्णतः लिप्त भ' निबाहि लैत छथि। हुनक कथा मे 'प्रेम' सर्वत्र व्यप्त अछि। मनुक्ख-प्रेम हुनकर अभीष्ट छनि। दाम्पत्य प्रेमक कतेको बिंब हिनक कथा मे देखल जा सकैत अछि। पत्नी त' हर दोसर कथा मे अलग अलग रूपें ठाढ़ छथिन। एकटा कथाकार अपन बाहर-भीतर एक रंग रहिए क' अपन 'हम' कें 'सार्वभौम' बना सकैत अछि।
अंत मे ई कहब जे आलोचक अशोक जी पर विस्तार से विचार हेबाक चाही से फेर कहियो।

Suggested citation: श्रीधरम. “गतिशील यथार्थक कथाकार अशोक: किछु टिपौत.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 369, pp. 146–155, 2023-05-01. https://www.videha.co.in/research/2023/369/गतिशील-यथार्थक-कथाकार-अशोक-किछु-टिपौत.htm

मूल विदेह अंक / Original issue