VIDEHA ISSN 2229-547X · First Maithili Fortnightly eJournal · Since 2000 · www.videha.co.in
विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१८

हितनाथ झा · 2026-04-01 · अंक 439 · पृष्ठ 12–36

हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१८
हितनाथ झा
(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
'प्रभात'मे प्रकाशित मैथिली कविता

विदेहक पछिला अंकमे प्रभातमे प्रकाशित दस कविता प्रस्तुत कयने रही आ एहि अंकमे बाँकी अधिकांश कविता प्रस्तुत अछि। धारावाहिक कविता एहिमे नहि अछि। चूँकि सभ अंक उपलब्ध नहि अछि, तेँ बहुत एहन मूल आ अनुवाद कविता अछि जे सम्पूर्ण नहि अछि, तथापि प्रयास करब, जतेक तक सम्भव भ' सकत,अग्रिम अंकमे प्रस्तुत करब। एक निवेदन जे चूँकि पत्रिका हस्तलिखित छैक आ 93-94 वर्ष पुरान तेँ कतौ कतौ अस्पष्टताक कारण उतारबामे गलत होयबाक सम्भावना ओ हमर अल्पज्ञता जानि क्षमा करब, मूलमे अशुद्धिक कम सम्भावना।कविता सभपर जखन दृष्टिपात करैत छी तँ अनेक विषयक कविता लिखल गेल छैक, से सभ युवा द्वारा। जखन कविक गाम देखैत छी तँ ओ लोकनि कोइलखे टाक नहि छथि, अनेक गामक छथि, जेना मंगरौनी, राजग्राम, रानीटोल, चपाही, राजनगर, मंगरपट्टी आदि।
मोहन भारद्वाज 'प्रभात'मे प्रकाशित कविताक विषयमे कहैत छथि- संख्याक हिसाबें रानीटोलक रामचन्द्र झा 'चन्द्र'क सर्वाधिक कविता प्रभातमे प्रकाशित अछि। ई मधुप आ किरण तँ नहि भेलाह, मुदा मैथिली काव्य-संसारक परिचित नाम अवश्य थिक। भारत चीन युद्धक पृष्ठिभूमिमे रचित हिनक 'विजयगान' काव्य पुस्तक मैथिलीक प्रसिद्ध कृति थिक।' उमाशंकर गीत पुष्पंज' हिनक अन्य प्रकाशित पोथी थिक। एकर अतिरिक्त मेघदूत, आ कुमार सम्भवक पद्यानुवाद सेहो छपल छनि। एहि प्रकारक लगभग पन्द्रह टा प्रकाशित-अप्रकाशित पोथीक प्रणेता रामचन्द्र झा 'चन्द्र' प्रभातक नियमित लेखक छलाह। काली कुमार दास, जयदेव मिश्र, उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास' तथा योगानन्द झाक एक्के-दू टा रचना प्रकाशित अछि, मुदा ओ सभ ऐतिहासिक महत्वक अछि।
प्रभातक साहित्यिक रचनाक लेखक लोकनिकेँ दू कोटिमे विभाजित कs सकैत छी। किछु एहन रचनाकार छथि जे प्रभातक रचनाक आधारपर अपना दिस ध्यान आकृष्ट करैत छथि, किन्तु कालान्तरमे ओ साहित्यकारक रूपमे स्थापित नहि भs सकलाह। संगहि किछु एहनो रचना भेटैत अछि जकर रचनाकार आइ मैथिली साहित्य संसारमे बेस प्रतिष्ठित छथि। पहिल कोटिक कवि-कथाकारमे उल्लेखनीय छथि- ब्रजमोहन ठाकुर 'मोहन', केदारमणि झा, श्याम सुन्दर झा, अयोध्यानाथ सिंह ठाकुर, मदनानन्द झा, बलदत्त झा तथा हृषिकेश झा। चपाही ग्रामवासी श्री ब्रजमोहन ठाकुर ' मोहन' मैथिलीक वयोवृद्ध साहित्यकार छलाह। हिनक 'सावित्री-चरित' नामक कथाकाव्य प्रकाशित अछि। विभूतिमे सेहो हिनक रचना छपल अछि। प्रभातक ऊर्जावान रचनाकारमे ई अग्रणी छलाह। मंगरौनीक केदारमणि झा अत्यन्त प्रतिभावान रचनाकार रहथि। हिनक काफी रचना प्रभातमे प्रकाशित अछि। अयोध्यानाथ सिंह ठाकुरक पैतृक रहनि राजग्राम आ सासुर कोइलख। सासुरसँ निकलैत पत्रिकाक भरिपोख उपयोग ई कयने छथि। युवावस्थाक उमंग आ रसिक स्वभावक तरंगक संगम थिक प्रभातमे प्रकाशित हिनक रचना। (स्रोत: कोइलख: -लेखक हितनाथ झा)

कवित्त
श्री रामचन्द्र झा, रानीटोल

उपमा अनूप रूप कलाधर नाम जाहि,
सिन्धु सँ वहार भै शोभित गगन कैल जे।
जाहि तेज पुंज प्रभा व्योम विस्तीर्ण अछि,
शंकर उमंग भरि निज शीश धारि लेल जे।।
छारि व्योम सूनसान सूनि मिथिलाक तान,
क्वैलख सुभद ग्राम आबि जन्म लेल से।
'रामचन्द्र' ख्यात राज धर्म ध्वजा जाहि छाज,
वनैली सुशोभित कै ' चन्द्रावति ' नाम धैल से।।

(प्रभात, वर्ष-2, अंक-4,अप्रैल 1934,)

प्रभात
श्री ब्रजमोहन ठाकुर 'मोहन '
चपाही
01
अयउ परभात,
कियऊँ अलसात।
सजग अब होहु,
करम नित जोहु।।
02
उठहु प्रिय तात !
सुनहु कछु बात।
धरहु मन माँहि,
सुभग अति आँहि॥
03
लखत परभात,
भ्रमहु बिन बात।
गहहु कछु मर्म,
करहु तव कर्म।।
04
करम असनान,
धरम अवसान।
पठत शुभ पाठ,
वनइ तब ठाठ।।
05
करहु अधियैन,
मिलइ सुख चैन।
अवसि अवलोकु,
मिटइ सव शोक।।
06
सुबह जस लाल,
बनिहहु गु वाल।
सुभग वर थाल,
सदृश तम काल।।
(प्रभात, वर्ष-2, अंक-4,अप्रैल 1934,)

गर्विता
केदार मणि झा, मंगरौनी।
हम नहि काटब टकुरी तकुरी
हम नहि धूनब बाड�।
नोकर चाकर राखि लिय जे
पीसै सभ दिन भाड़�।
काज करैत करैत इह सभ दिन
चढ़ल जाइए जांघ।
अहूँ ततबे दिन तक पूछब
यावत तक्क समाड�।
व्याह कैल की भानस करवेवा
घर बढ़ाड़बा हेतु।
माँ के एइ बेर निश्चय कहबइ
नहि तँ आबहु चेत।
टिकुली मडि�यनु सिन्दुर मडि�यनु
लेता मुँह केर फेरि।
जाउ-जाउ नहि काज कोनो अछि
आओत हमरो बेरि।।
केदार मणि झा
मंगरौनी।

(प्रभात, वर्ष~2,अंक~4, अप्रिल1934 ई.)

अनुरोध
श्री केदारमणि झा, मंगरौनी।

राति अंधार मशान मे छोड़ि के
सौतिन संग मे रहली से रहली।
पहिल सिनेहक वंचन-वद्ध
सुपल्लवपान जे चहली से चहली।।
"रहु अहँ शीघ्र पुनः हम आएब"
ठगि-ठगि बातहुँ कहली से कहली।
जीवन स्वयं अपन सभ घातिके
अपन सहब हम सहली से सहली।।

(प्रभात, वर्ष~2,अंक~5, मइ1934 ई.)

आधुनिक-विवाह
श्री रामचन्द्र झा 'चन्द्र', रानीटोल।
तावत पढ़बा मे उत्साह।
जावत बाकी रहल विवाह।।
----0----
घटक एला होइत छल पाठ।
पाठ छोड़ि भेला मठोमाठ।।
गुदरी धोती फाटल पाग।
देखि कहल जागल मम भाग।।
कन्यागत के कहल बुझाय।
छथि ई करबा योग जमाय।।
इको यणचि पाठ होइ छैन।
पढ़बा स नै रहै छैन चैन।।
आदि मे तावत वर के पस्य।
छारू शंका करू अवश्य।।
कन्यागत पोटि कैलनि ठीक।
विलारिक भागे टूटल सीक।।
भेल सिद्धान्त एला पजियार
होम लागल दिनक नेआर।।
अगहन सूदि पाँच बुध दीन।
वस्तु ठीक राखव सव कीन।।
नित नित नूतन मङ्गल गीत।
सखि सव गाबि होथि तिरपीत।।
आवि पहूचल नीयत दीन।
साजि बरियाति चलल दस तीन।।
लागल सव बरियाती द्वार।
होमै लागल मंगल चार।।
झट्ट विधकरी धैलनि नाक।
तैखन कलसी फुटल धराक।।
मन मन कहल असगुन ई भेल।
तखन वेदी लग लय गेल।।
मुट्ठी एक कन्या छलि ऊंच।
देखि होश तैखन कयल कूच।।
विवाह भेल कोबर गेलाह।
रातुक उजगी खुब सुतलाह।।
चारू दीन बितल विन नोन।
तनिक दशा भेल हैत को।।
सकला कुना चतुर्थि पछार।
पाठक मनमे करू विचार।।
टका देल दुइ हाथ उठाय।
देखितहि कामिनि फेकल घुमाय।।
बाजब बरु रुपैया बीन।
राखू अही लाडु खैब कीन।।
प्रेम विनोद बाढ़ल तैखन।
देखितहि हुनकर जौबन धन।।
भ्रमर भुलल रहला दस दीन।
बिन रस पौनहि भेला खीन।।
भेल बरियाती वरक विदाई।
सवै पहुँचला गाम झमाई।।
ललका धोती थकरल ठीक।
उनटल झुलफी सोभैछ नीक।।
कौखन तिरहुति योगक चर्च।
तरुणी मेल मिलापक खर्च।।
पढ़बाक वेर मन ऊठल बाढ़ि।
आँगुर धै छथि कामिनि ठाढ़ि।।
चूटिक चालि तिरहुतिक तान।
कहल न जाइछ तखनुक सान।।
गुरु पुछलैन भेल पाठक ज्ञान।
रहलहुँ आँगन माँझे ठाम।।
जाहौ वूरि भेलह वुरियाह।
पढ़ब की आब हैब बताह।।
सद्यह कलियुग आबिये गेल।
कहिनी ई सदर्थ कै देल।।
तावत पढ़बा मे उत्साह।
जावत बाकी रहल विवाह।।

(प्रभात, वर्ष~2,अंक~5-6, मइ-जून1934 ई.)

" मखौल "
अयोध्या नाथसिंह ठाकुर " अवधेश "
राजग्राम।

बनू दूध वाली अहँ प्रेयसि
हम बनि जायब श्याम।
करब उपद्रब रोकब पथ
लेबय न देब विश्राम।।
एहि गोपि के पयमे छनि जल
यथा ब्रह्म मे माया।
एहि दूध मे सकल विश्व के
गूढ़ रहस्यक छाया।।
� � � �
ताहि समय लज्जा सँ नागरि
पानि पानि अहँ होयब।
हम तँ होयब दूध प्रियतमे
किन्तु, पानि अहँ होयब।।

( ' प्रभात ',वर्ष: 2, संख्या7 जुलाइ1934)

स्वच्छन्दमत
तेजनारायण झा
(प्राइमरी स्कूल, कोइलखक शिक्षक छलाह)

( 01)
बूढ़-सूढ़ तौं सड़ल-पचल छथि, हुनक कथा की मानब।
धर्म सनातन थीक सड़ातन, तकरा लय की कानब।।
जाति रहैक की जाय एकता, सकता विश्व मे थापब।
ब्राह्मण डोम चमार सबहि मिलि, नूतन राग अलापब।।
(02)
थिकहुँ हमहि कलियुगी सुधारक, लै नवीन अवतार।
खान-पान-सम्मान आदि सौं, करब अछूतोद्धार।।
यैह हमर कलयुगी धर्म थिक, एकरा जे नहि मानथि।
से समस्त सुख सौं वञ्चित रहि, माथ हाथ धै कानथि।।
(03)
गहि कर कमल नवल रमणी केँ,संगहि संग घुमाएब।
हृदय विकासक हेतु प्रेम सौं, 'गार्डेन' सैर कराएब।।
अपना पहिरन पेन्ट बूट, रमणी अहुँकेँ पहिरायब।
सबल बनयबाले हुनका हम कसरत खूब करायब।।
(04)
जाति-पाति केँ कात राखि हम अमेरिका पढ़ै जायब।
पति-पत्नी मिलि कला-कुशलता सीख सफल भै आयब।।
जाय विलायत ठाट-बाट सौं बैरिष्टर बनि आयब।
महा-महा अन्यायी केँ संकट सौं तुरत बचायब।।
********
(तेजूगुरूजी नामे प्रसिद्ध)

( ' प्रभात ',वर्ष: 2, संख्या8, अगस्त1934)
.
"आइ नहि काल्हि"
अयोध्यानाथ सिंह ठाकुर बी.ए.ऑनर्स

' विदा '
'एतेक शीघ्र?'
'कर्तव्य विवश छी'
'निठुर'
'प्रियतमे !'
..................
'कनैत छी'
...................
'शीघ्रे आयब'
..............�...
'एक चुम्बन'
.....................
' प्रेमक स्मारक रूप'
....................
'एक और'
..........................
'श्रावण मास'
........................
'मधुर पावस'
.....................
'दारुण वियोग'
.......................
'असह्य'
......................
'आइ नहि जाउ'
'प्रिये' !
मानि जाउ... (आलिंगन)
'कार्य क्षति होएत'

������������

'पावस पुनः आओत'
'परन्तु ई यौवन उन्माद नहि'
'प्रिय'
'हम नहि जाए देव्'
......................
'काल्हि चल जाएब' ... (चुम्बन)
'जे श्रीमती जीक आज्ञा'

(आलिंगन, चुम्बन तखन दुनू प्रेम विभोर)

~ अयोध्यानाथ सिंह ठाकुर बी.ए. ऑनर्स
'अवधेश'
(साभार: प्रभात वर्ष-2,अंक-09 सिंतबर1934)

(प्रयोगवादी कविता अछि। कवि छथि राजग्राम गामक स्व.अयोध्यानाथ सिंह ठाकुर, जनिक आरो कवितासभ 'प्रभात' पत्रिकामे प्रकाशित भेल अछि।)

तपोभूमि मिथिला
ले. अज्ञात
महा मनोहारिणी-शान्ति दायिनी,
विचारशीला- तपोभूमि जे छली।
अहा ! अहा !! से मिथिला मनोरमा,
विकासहीना मिथिला धुना महा।।

सनेह-भूपेन्द्र-विदेह-पालिता,
विनोद धारा मधुरा प्रवर्षिणी।
प्रफुल्लिता-शीतलता- प्रदा सदा,
महा सशोकादय विदग्धकारिणी।।

जतै महाज्ञानवती- सुलक्षणा,
सती शिरोरत्न-अमूल्य 'भारती'।
प्रसिद्ध 'गार्गी' सम भागिनी जतै,
समस्त शास्त्रार्थ रता पवित्रता।।

जतै सुवेदान्त विवेचना मथी,
शुकांगना पिंजर-वद्ध सारिका।
महा सुधन्या 'मिथिला मही' छली,
प्रभावती गौरव ज्ञान -शालिनी।।

जतै 'अयाची'क प्रगाढ़ विद्वत्ता,
प्रकाशमाना प्रति देश देश मे।
महामना ' मंडन मिश्र ' पूजिता,
महा पवित्रा मिथिला मही छली।।

रसौज पूर्ण कविता मनोहरा,
जनीक आनन्द अपूर्व दायिनी।
निधान सतकाव्य कलाति निर्मल,
कवीन्द्र ' विद्यापति ' से छला कतै।।

विकास माना ' कमला ' कतै छली,
समोद वीणायुत ' शारदा ' कतै।
छली कतै से रघुनाथ- सत्प्रिया,
पवित्रतादर्श विशाल ' जानकी'।।

विचार गाम्भीर्य सुधर्म निष्ठता,
दयार्द्रता-सद्गुण सौं अलंकृता।।
विशेष सौंदर्य कला - प्रसारिणी,
विभवासमाना ' मिथिला' मही छली।।

अहा ! अहा !! से मिथिला प्रभावती,
प्रभावहीना - मलिनाम्बरा धुना।
समस्त श्रृंगार-हता कुशाङ्गिनी,
महा सशोकाहृदि -ताप कारिणी।।

ततै कतै आव विचारशीलता,
महा पवित्रा तप निष्ठता कतै।
विज्ञान गाम्भीर्य कतै दयार्द्रता,
विनष्ट हा ! हा !! सभ सद्गुणावली।।

प्रवाद्रता आव ततै दरिद्रता,
सु मूर्खता-द्वेष-विशाल-क्षुद्रता।
तथा महालोलुपता- विलासिता,
कुभाषिता लम्पटता लतासमा।।

न हेरती की करुणा-कटाक्षौ,
विदेह जा ई मिथिलाक दुर्दशा।
सदा महाधोगति-गर्तमे अहो,
निमग्न हा ! की रहते तपो महो।।
(कोनो-कोनो शब्द अस्पष्टक कारणसँ उतारबा मेअशुद्धिक सम्भावना।)

(साभार: प्रभात वर्ष-2,अंक-09 सिंतबर1934)

.ईश-विनय
~ श्री भवनाथ मिश्र

हरि हो, भारत कृषकक कष्ट महान।

दिन-दिन मरी क्षुधा - पीड़ासँ दैछ न केओ दान।
कठिन परिश्रम करी तदपि हा! हमर कण्ठगत प्रान।।

बैसले बाबू मौज उड़ाबथि करथि सिका ओ शान।
रक्त चूसि हमरा सबहक ओ देशक वासी आन।।

शरणागत भय करी प्रार्थना करह हमर कल्यान।
नहि त कहब व्यर्थ तोरा थिक 'दीनबन्धु 'भगवान।।

( ' प्रभात ' वर्ष -02,अंक -11 (नवम्बर-1934)

ईश-विनय
श्री भवनाथ मिश्र

भज मन दीनबन्धु सियराम।
जनिक पवित्र नाम केँ भजि क' गेला कते सुरधाम।
जनिक चरणरज लगितहिं प्रस्थर बाजि उठल जयराम।
योगी कते शरीर अन्त कय भजल जनिक शुभनाम।
से अवश्य हमरा सभहिक दुख हरि देता विश्राम।
मिथिला दुःख अवर्णनीय अछि, कलहयुक्त सवठाम।
उद्धारी श्री रामचन्द्रकेँ भज मन आठो याम।।
भज मन ...

( ' प्रभात ' वर्ष -02,अंक -12 (दिसम्बर-1934)

मैथिलीक आर्तनाद
आद्यादत्त झा (कोइलख,पुबारि टोल)

की अपराध हमर अछि कहु-कहु ?
हे मिथिलाक सुजान महान !
भै रहलहुँ अछि पतन दृष्टिसँ,
जे अछि आइ अहँक शुभथान।।

चूमि-चूमि मुँह हमहि सिखावल,
बाजब मायबाप इत्यादि।
तखन किए बिसरै छी हा? कहु ?
हमर अहाँ लोकनि प्रेमादि।।

ताकू आँखि उठाय कनेको,
थिकहुँ मैथिली मातु अहीँक।
कोन अवस्था मध्य पड़ल छी,
की ई शोचनीय नहि थीक ??

खैने लात फिरै छी घर-घर,
कोनो विधिसँ जीवन राखि।
किन्तु करू की मरइत छी नहि,
केवल अहँक शुभाषा ताकि।।

लाख अहाँ केहनो छी नहि अछि दया,
हृदय अछि पूर्ण परवान।.
तैयो अहीं लेब सुधि कहियो,
हे प्रिय सुत? ताकत के आन ??

(प्रभात, अंक-12, दिसम्बर-1934 ई.)

(जहिया उपेन्द्रनाथ झा "व्यास" राजनगर हाइ स्कूलमे पढ़ैत रहथि, ओही समयक लिखल कविता।)

मिथिला

उपेन्द्रनाथ झा "व्यास"

हिमिगिरि उत्तर दिशि मे राजित जनिक उच्चतम श्रृंगे।

जगदम्बा पति,पितु सिर बहयित दक्षिण दिशि छथि गङ्गे।।

पूर्व दिशा अतितीव्र गामिनी नदी कौशिकी प्रवहित।

गंडक पुनि पर्वत सँ निकसित पश्चिम बहयित जनहित।।1।।

मिथिल नाम महाराज नाम पर अछि तुअ नाम प्रसिद्धे।

जनक आदि अमरोपन मुनिगण बहुत भेला अरु सिद्धे।।

जनक तनूजा लक्ष्मी आदिक छली देवि अवतारे।

नाम जनिक स्मरण होइत मनु जाइत अछि भवपारे।।2।।

किन्तु पूर्व शुभ युग सब बीतल आब न छथि ओ मिथिला।

कर्म्म- धर्म्म - वंचित निज जनसँ भय गेली अछि शिथिला।।

जतय मदन अरु कालिदास छल शंकर झा सन वीरे।

ओतय मूर्ख महिषी चरवाही मे अछि पड़ल अधीरे।।3।।

मैथिल ! आबहुँ उठु एहि जगमे सब क्यो काज करै अछि।

पूर्वोपार्जित यशक ध्यान कयला सँ लाज अबै अछि।।

दुर्दिन अपन देखि कय, आबहु पढ़ु निज वेद विचारू।

देशक उन्नति करू सुचित भय, भाषा अपन प्रचारू।।4।।

(एच. ई.स्कूल, राजनगर।)
(प्रभात, अंक-12, दिसम्बर-1934 ई.)
व्यासजीक कवितापर आलोचक मोहन भारद्वाजक मन्तव्य-

(स्रोत:-कोइलख पुस्तक:लेखक हितनाथ झा, पृष्ठ: 164~65) आचार्य रमानाथ झाक अनुसार ओहि कालक मैथिली कविताक दुइए टा विषय छल - देश-दशा आ मातृभाषा। व्यासजीक उक्त कविताक प्रतिपाद्य विषय यैह थिक। एतावता प्रमाणित होइत अछि जे व्यासजी ओहू आयुमे, छात्रावस्थोमे, मैथिली काव्यक केन्द्रीय धाराक संग छलाह। दोसर बात,व्यासजी अपन जाहि मानसिकताक लेल आइ जानल-मानल जाइत छथि ताहिसँ भिन्न हुनक ओहू दिनक विचार नहिँ छलनि। तात्पर्य ई जे व्यास जी स्कूलिए जीवनमे व्यास बनि गेल छलाह, आ से केवल उपनामे मे नहिँ, वैचारिकतामे सेहो।

~मोहन भारद्वाज
स्वप्न-दृश्य
श्री रमानन्द झा

एक जन छथि अत्यन्त सुडौल
खोलै छी सभ हुनकर पोल।
जाति पाँजि छन्हि सभ टा धोल
हुनकर छन्हि दू कौड़ीक मोल।।
रासभ सन छन्हि जनिकर बोल
बात बजै छथि से अनमोल।
भोजनमे एक केवल कोल
रमणिक छन्हि अति दुनू कपोल।।
जँ किछु पावथि आनक जोर
तँ ओ करताह पातक घोर।
सुन्दर रूप देह अति सारिल,
सुरासुरक ओ छथि वराहिल।।
भोरहि भाड� अरु पान चवाबथि,
छड़ी हाथ लै, ग्राम पधारथि।।
आनक झगड़ा कान्ह लगावथि,
दुर्जन मे अग्रगण्य कहाबथि।
लोक लोक केँ खूब लड़ाबथि
अपने ओ अति मौज उड़ाबथि।
भोज्य समय मे लोक जुटाबथि,
ब्राह्मण मे छड़ीदार कहाबथि।
रामनाम क्षण भरि नहि बाजथि।
गप्प- सप्पमे दीन बिताबथि।।
छनि प्रख्यात अनेको नाम
बसथि सदा ओ मिथिलाधाम।
रहथि कुसंग मे आठो याम
आबथि जाथि सतत सभठाम।।
दूगोलाक करथि गुणगान।
नहि ओ बूझथि निज अपमान।
परक समुन्नति सुनि सन्ताप
ओतहि होथि हर्षमे। व्याप।।
धर्म्म काजकेँ बूझथि पाप।
पावथि ओ सज्जन सँ शाप।
दुखी न होथि ओ आनक दुख सौं।
सुखी होथि पुनि अपनहि सुख सौं।
निज गुण गान उदधि मे मज्जन।
पर उपकार करै नहि दुर्जन।।
जँ ओ राखथि सत्य गुमान
तँ गुणिजन करथिन्ह सन्मान।
जँ नहि भखितथि अपन प्रलाप
तँ नहि पवितथि अति सन्ताप।
जँ नहि रहितथि छिन्न मती।
तँ नहि होइतथि खिन्न अती।।
जँ ओ रहितथि किछु सुमती।
तँ नहि कटितथि अति विपती।।
अपन अभीष्ट करब मे दक्ष।
नहि ओ करताह ककरो पक्ष।।
मन मलीन तन नहि छन्हि स्वच्छ।
ओ छथि गामक मल प्रत्यक्ष।।
गारिक फज्झति नहि छनि लाज
छनि सब टा नीचक सन काज।।
जँ मिलितथि पुनि संग समाज।
तँ ओ करितथि अपन स्वराज।।
लेखक: (शिशु)
(प्रभात, अंक-12, दिसम्बर-1934 ई.)
पहिल चित्र व्यासजीक हस्तलिखित छनि
दोसर चित्र बुद्धि परीक्षा प्रभात-वर्ष 2, अंक -4 अप्रैल 1934क थिक।
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-12
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-13
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-14
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-15
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-16
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-17

Suggested citation: हितनाथ झा. “मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१८.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 439, pp. 12–36, 2026-04-01. https://www.videha.co.in/research/2026/439/मैथिली-साहित्यमे-तारानाथ-झा-एवं-हुनक-परिवारक-योगदान-१८.htm

मूल विदेह अंक / Original issue

Videha Digital Research Archives — preserved releases

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