विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-४) सन्दर्भ- कुणाल-कृत बिदापत

गजेन्द्र ठाकुर · 2026-06-15 · अंक 444 · पृष्ठ 104–112

कुणाल-कृत नाट्य-समीक्षा शृंखला · द्वितीय नाटक
बिदापत
[लोकनाट्य शिल्प-आधारित नाटिका]
एक चतुर्भुज नाट्य-समीक्षा : भारतीय · पाश्चात्य · चीनी · इजरायली परिप्रेक्ष्यमे
पहिल प्रदर्शन : ३० सितंबर २००२, विद्यापति भवन, पटना · प्रकाशन : अंतिका, जनवरी-मार्च २००३
१. परिचय आ कथा-स्थापत्य
कुणालक द्वितीय नाटक ‘बिदापत’ (= विद्यापतिक लोकोच्चरित रूप) अपन शिल्प-वैविध्यमे संग्रहक सर्वाधिक परिष्कृत कृति थिक। ‘बिदापत नाच’ -मिथिला-बंगालक प्रसिद्ध लोक-रंगमंच-परम्पराक -शिल्पमे लिखल एहि नाटिकाक समय-सीमा नाटककार स्वयं स्पष्ट करैत छथि -ई.सं. १४००–१४५० । मुदा कुणालक महत्त्वाकांक्षा ऐ सँ बेसी अछि- ओ एक जीवनीपरक नाटक (biography-play) मात्र नहि लिखैत छथि, अपितु विद्यापतिक काव्यक रंगमंचीय भाष्य रचैत छथि।
नाटकक स्थापत्य (architecture) तीन स्तर पर काज करैत अछि। बाहरी स्तर -सूत्रधार-नटीक संवाद-चौखट, विदूषक-सदृश विपटाक व्याघात (interruption), पूर्वरंगक शास्त्रीय प्रदर्शन। मध्य स्तर -कथा-वस्तुक अभिनय (विद्यापति, शिवसिंह, लखिमा, उगना, मंदाकिनी, कालिंदी, अमियकर आ दरबारी पात्र)। भीतरी स्तर - विद्यापतिक स्वयं पदक अंतर्गायन (embedded performance) जे कथाक भावात्मक धुरी थिक। एहि तीनू स्तरक अन्योन्य-क्रियामे नाटकक रंगमंचीय ऊर्जा उत्पन्न होइत अछि।
कथाक पाँच मुख्य अक्ष -(१) विद्यापति आ शिवसिंहक मित्रता, (२) जौनपुर-सुलतानक न्यायालयमे विद्यापतिक काव्य-बल द्वारा शिवसिंहक मुक्ति, (३) उगना-महादेवक अन्तर्कथा, (४) लखिमाक षड्यंत्र-प्रतिरोध आ शिवसिंहक अन्तर्धान, (५) विद्यापतिक ३२-वर्षीय शोक आ काव्य-अमरत्वक उद्घोषणा। एहि पाँचू अक्षकेँ सूत्रधार-नटी-विपटाक त्रिभुज नाटकक बाहरी समापन (frame) दैत अछि।
२. भारतीय नाट्य-सिद्धांत
२.१ पूर्वरंग आ दशरूपक-परम्परा
भरतमुनिक नाट्यशास्त्र (अनुमानित द्वितीय शती ई.पू.–द्वितीय शती ई.सं.) नाटकक आरम्भमे ‘पूर्वरंग’ (preliminary entertainment) अनिवार्य मानैत अछि - जाहिमे नांदी (auspicious verse), सूत्रधार-प्रवेश आ प्रस्तावना सम्मिलित होइत अछि। कुणाल एहि शास्त्रीय संरचनाकेँ ने मात्र अपनाबैत छथि, अपितु ओकर लोकनाट्य-रूपांतरण प्रस्तुत करैत छथि। देवी-वंदना, भैरवी-स्तुति, तखन सूत्रधारक प्रस्तावना -ई क्रम नाट्यशास्त्रक अनुगामी अछि।
दशरूपकक दृष्टिसँ धनञ्जयक ‘दशरूपक’ (दशम शती) नाटकक दस विभेद करैत अछि। ‘बिदापत’ क शीर्षक-पृष्ठ एकरा ‘नाटिका’ कहैत अछि- जे दशरूपकक एक प्रकार थिक, हास्य-प्रधान, लघु, वियोगान्त, नायक-नायिका दुनूक व्यथा-भोग। ‘बिदापत’ एहि परिभाषामे आंशिक रूपे बैसैत अछि - वियोग आ दुखान्त मुदा हास्यक स्थानमे करुण। अभिनवगुप्त जखन दशरूपकमे ‘नाटिका’क व्याख्या करैत छथि, कहैत छथि जे एतय नायक ‘विलक्षण’ होएबाक चाही - विद्यापति यएह थिकाह।
२.२ रस-निष्पत्ति : करुण, शृंगार आ शान्तक त्रिवेणी
एहि नाटकक प्रधान रस ‘करुण’ थिक - शिवसिंहक अन्तर्धान, लखिमाक ३२-वर्षीय प्रतीक्षा, विद्यापतिक जीवनक अंतिम एकाकी स्थिति। भरत करुण-रसक ‘स्थायी भाव’ शोक मानैत छथि, आ एकर विभाव (उद्दीपन) अप्रियक स्मरण। किन्तु एहि नाटकमे करुणक तल अभिनवगुप्तक ‘शान्त-रस’ दिस घुरैत अछि -समाजीक समापन-गायन जे विद्यापति, शिवसिंह, लखिमा, विपटा सभकेँ ‘काव्य-पदमे अमर’ घोषित करैत अछि, ओ शान्त-रसक आत्मविश्राम थिक।
अभिनवगुप्त (९५०–१०२० ई.सं.) अपन ‘अभिनवभारती’ (नाट्यशास्त्रक टीका) मे रस-सिद्धांतक व्याख्या करैत कहलनि जे रस ‘अभिव्यक्त’ होइत अछि, ‘उत्पन्न’ नहि -ओ दर्शकक चेतनामे पहिनहियेसँ विद्यमान छल, नाटक ओकरा जागृत करैत अछि। ‘बिदापत’मे विद्यापतिक वास्तविक पदक प्रयोग एहि ‘अभिव्यक्ति’केँ शक्तिशाली बना दैत अछि - दर्शकक सुप्त काव्य-स्मृति नाट्य-प्रदर्शनसँ जागि उठैत अछि।
शृंगार-रस विद्यापतिक पदक माध्यमसँ - विशेषतः “नव वृन्दावन, नव-नव तरुगण, विहरइ नवल किशोर” आ “चाँद सार लए मुख घटना करू” - प्रवाहित होइत अछि। मुदा ई शृंगार लौकिक नहि, भक्ति-शृंगार थिक, जकर लक्ष्य राधा-कृष्ण-लीलाक माध्यमसँ सार्वभौम प्रेम थिक। एहि तरहे शृंगार आ भक्ति एकठाम विलीन भ’ जाइत अछि - ई संस्कृत अलंकारशास्त्रक ‘शृंगार-भक्ति-योग’ थिक।
२.३ ध्वनि-सिद्धांत : ‘बिदापत’ शब्दमे तीन अर्थक संकुचन
‘बिदापत’ शब्दक ध्वनि-व्यंजना असाधारण थिक। आनन्दवर्धनक ध्वन्यालोकक परिप्रेक्ष्यमे एहि एक शब्दमे कमसँ-कम तीन अर्थ-स्तर संकुचित अछि -(क) विद्यापति (अभिधा/वाच्यार्थ), (ख) बिदापत नाच -लोकनाट्य-परम्पराक नाम (लक्षणा/लक्ष्यार्थ)- पूर्व ज्योतिरीश्वर बला विद्यापति ई.सं. १४००–१४५० सँ बहुत पाछाँ, (ग) ‘बिदा’+‘पत’ अर्थात ‘विदायक प्रभु’ वा ‘विदा लेएवाला’ (व्यंजना) -जे नाटकक करुण अंत (शिवसिंहक अन्तर्धान, काल-विदाइ) क सूचना दैत अछि। ई त्रि-स्तरीय ध्वनि नाटककारक भाषिक-चेतनाक प्रमाण थिक।
नाम-वक्रोक्ति -“विद्यापति, विद्यापति!” बनाम “बिदापत तँ बिदापते छथ!” - एहि दुनूक टकराहटमे कुन्तकोक्त वक्रोक्ति थिक। सूत्रधार शास्त्रीय नाम पर आग्रह करैत रहैत छथि; विपटा लोकोच्चरित नाम पर अड़ल रहैत अछि। ई वाद-विवाद वास्तवमे ‘शास्त्र बनाम लोक’क सांस्कृतिक द्वन्द्वक एक हास्यात्मक रूपान्तरण थिक -आ दुनूमे एक्के व्यक्तित्व छथि।
२.४ अन्तर्नाट्य (नाटकक भीतर नाटक)
नाट्यशास्त्रमे ‘अन्तर्नाट्य’ (play-within-a-play) कोनो अलग विधा नहि, परंतु संस्कृत नाटकमे एकर उदाहरण अछि (जेना भासक नाटकमे स्वप्नदृश्य वा रत्नावलीमे अभिनय)। ‘बिदापत’मे दू टा अन्तर्नाट्य उपस्थित अछि। प्रथम -अमियकरक ‘स्वाँग’ (dramatic imitation), जाहिमे ओ विद्यापति आ सुलतानक भेटकेँ स्वयं नाट्य-रूप दैत छथि; मिष्ठान खाइत-खाइत ओ पात्र बदलैत जाइत छथि -ई अभिनयक एक देशज रूप थिक। द्वितीय -गौरा-महादेव-नटुआक अन्तर्दृश्य, जाहिमे शिवक निर्धनताक विषयमे गौराक विलाप अभिनीत होइत अछि -ई उगनाक महादेव-पहचान हेतु प्रस्तुति थिक।
३. पाश्चात्य नाट्य-सिद्धांत
३.१ जॉर्ज लुकाच : ऐतिहासिक नाटक आ विश्व-ऐतिहासिक व्यक्तित्व
हंगरीक मार्क्सवादी आलोचक जॉर्ज लुकाच (Georg Lukács, १८८५–१९७१) अपन निबंधमे ऐतिहासिक नाटकक लेल एक मानदण्ड प्रस्तुत कएलनि - नायक एक ‘विश्व-ऐतिहासिक व्यक्तित्व’ (welthistorisches Individuum) होएबाक चाही, जे अपन युगक ऐतिहासिक अंतर्विरोधकेँ अपन शरीरमे जीबैत अछि। विद्यापति ठीक एहन व्यक्तित्व थिकाह - ओ एक दिस निर्भर राज्यमे जीबैत छथि (तिरहुतक जौनपुर-अधीनता), दोसर दिस काव्य-शक्तिमे विश्वास रखैत छथि जे राजनीतिसँ उत्कृष्ट अछि। हुनकर जीवन एहि अंतर्विरोधक मूर्त रूप थिक।
मुदा कुणालक विद्यापति लुकाचक ‘विजयी नायक’ नहि - ओ एक ‘शोकाकुल साक्षी’ थिकाह। शिवसिंहक अन्तर्धान ओहि मैत्री-बन्धनक अंत थिक जे कविक जीवनकेँ अर्थपूर्ण बनेने छल। ३२ वर्षक प्रतीक्षाक बाद जे शान्त-भाव प्राप्त होइत अछि, ओ लुकाचक त्रासदी-नायकसँ भिन्न - ओ एक पूर्वीय, ध्यानमग्न नायकक त्रासदी थिक।
३.२ नारीवादी पाठ : लखिमाक नायिका
पाश्चात्य नारीवादी नाट्य-आलोचना (केट मिलेट, एलेन मॉर्टन, शारोन फ्रेडमैन आदि) ओहि नाट्य-पाठक पुनर्पाठमे रुचि रखैत अछि जाहिमे ऐतिहासिक महापुरुषक छायामे स्त्री-पात्र गौण भ’ जाइत अछि। कुणाल एहि प्रवृत्तिकेँ सचेत रूपसँ उलटैत छथि।
लखिमाक पात्र तीन कारणसँ नारीवादी दृष्टिसँ उल्लेखनीय अछि। प्रथम - ओ मंत्री-संरक्षण अस्वीकार करैत स्वयं षड्यंत्रक ‘पाठ’ करैत छथि -“..लोकनि महाराज-महारानी-महाकविक त्रिमूर्तिकेँ खण्डित करबाक सुअवसर बुझि रहल छथि।” द्वितीय - हुनकर प्रतीक्षा परम्परागत पतिव्रताक निष्क्रियता नहि, अपितु एक स्वेच्छापूर्ण दृढ़-संकल्प थिक। तृतीय - परम्परागत आख्यानमे लखिमा बहुधा सती-गाथाक केन्द्रमे छथि; कुणाल एहिसँ बाहर निकलि हुनकर जीवन-प्रतीक्षाकेँ केन्द्रमे रखैत छथि।
३.३ पियर नोरा : स्मृति-स्थल (Lieux de Mémoire)
फ्रांसीसी इतिहासकार पियर नोरा (Pierre Nora, जन्म १९३१) अपन ‘लियो दे मेमोयर’ (Lieux de mémoire) ग्रन्थमे ‘स्मृति-स्थल’ (memory site) क सिद्धांत प्रस्तुत कएलनि - ओ स्थल, वस्तु वा पाठ जाहिमे सामूहिक ऐतिहासिक स्मृति संग्रहित आ क्रियाशील होइत अछि।
विद्यापतिक पद एहि नाटकमे एक प्रमुख ‘स्मृति-स्थल’ थिक। जखन समाजी “नव वृन्दावन, नव-नव तरुगण, विहरइ नवल किशोर” गाबैत अछि, वा जखन लखिमाक स्मृतिमे शिवसिंहक पद “आरे-आरे भमरा, तोहे हित हमरा” उभरैत अछि -ओ क्षण एकहि संग इतिहासक स्मृति आ वर्तमानक जीवन-अनुभव थिक। नाट्य-प्रदर्शन एहि ६०० वर्षक दूरीकेँ ‘वर्तमान क्षण’ मे परिणत करैत अछि। एहि अर्थमे ‘बिदापत’ केवल विद्यापतिक नाटक नहि, मैथिली भाषा-समाजक सामूहिक स्मृतिक नाट्य-प्रस्तुति थिक।
३.४ ब्रेख्त आ आत्म-दूरी : विपटाक भूमिका
प्रथम नाटकक भाँट-त्रयीक भूमिका ‘बिदापत’मे सूत्रधार-नटी-विपटाक त्रिभुज द्वारा निभाओल जाइत अछि। विपटाक ‘गड़ी आगाँ बढ़ाउ’क अनवरत आग्रह ब्रेख्तीय विरचन-प्रभावक एक सटीक देशज रूपान्तरण थिक - ओ दर्शककेँ कथामे पूर्णतः विलीन हुअएसँ रोकैत अछि, सदा मोन पाड़ैत रहैत अछि जे ई एक ‘निर्माण’ थिक।
मुदा ब्रेख्तसँ एक महत्त्वपूर्ण भेद अछि - ब्रेख्त चाहैत छलाह जे विरचन-प्रभाव दर्शकक ‘आलोचनात्मक बुद्धि’ जगाबए। विपटाक व्याघात एहिसँ भिन्न - ओ बुद्धि नहि, उल्लास जगाबैत अछि। विपटा एक ‘लोक-विरचनकारी’ (folk-alienator) थिकाह जे कलाक अभिजन-गरिमाकेँ ‘गड़ी’ (बैलगाड़ी) आ ‘खिस्सा’ (कथा)क स्तर पर ल’ अनैत अछि। ई एक सौन्दर्यशास्त्रीय भेद थिक जे पाश्चात्य नाट्य-सिद्धांतसँ एहि नाटकक मौलिकता स्थापित करैत अछि।
४. चीनी नाट्य-सिद्धांत
४.१ साइजी-चियारेन: कवि-प्रतिभा आ प्रेम-कथाक परम्परा
चीनी शास्त्रीय नाट्य-परम्पराक -विशेषतः मिंग-किंग कालीन कुनछू (Kunqu opera) क -एक प्रमुख नाट्य-ढाँचा ‘साइजी-चियारेन’ (brilliant scholar meets beautiful lady) थिक। एहिमे एक कवि-विद्वान आ एक सौंदर्यवती नायिकाक प्रेम-कथाक माध्यमसँ काव्य-शक्ति आ प्रेम-मूल्यक प्रतिष्ठा होइत अछि।
‘बिदापत’ एहि परम्पराक एक विस्थापित (displaced) संस्करण थिक। विद्यापति ‘साइजी’ छथि -तर्कशास्त्री नहि, काव्यशक्तिसम्पन्न; लखिमा ‘चियारेन’ नहि, अपितु एक स्वाभिमानी राजमहिषी। मुदा दुनूक सम्बन्धमे ओ गहींर विश्वास आ मैत्री-प्रेम अछि जे ‘साइजी-चियारेन’ परम्पराक मूल तत्त्व थिक। शिवसिंहक अन्तर्धान ऐ परम्पराकेँ एक त्रिकोणमे बदलि दैत अछि - दुनूक मिलनक केन्द्रमे एक तेसर उपस्थित छल जे अनुपस्थित भ’ गेलाह।
४.२ झी-यिन: परम-सम्वाद आ तकर अनुपस्थिति
चीनी सांस्कृतिक परम्परामे ‘झी-यिन’ (one who truly hears/understands) एक गहन सम्बन्ध थिक - ओ व्यक्ति जे कलाकारक कलाकेँ ओकर सम्पूर्ण गहराईमे बुझैत अछि। प्रसिद्ध किंवदन्ती अछि जे वीणावादक ‘बो-या’ अपन एकमात्र ‘झी-यिन’ ‘झोंग-जिछी’ क मृत्युक बाद अपन वीणा तोड़ि देलनि -“जे सुनि सकैत छल से नहि रहल, वाद्य किएक बजाउ।”
विद्यापति-शिवसिंहक सम्बन्ध ठीक एहि ‘झी-यिन’ आदर्शक अवतरण थिक। शिवसिंह विद्यापतिक कविताक परम-श्रोता, परम-रसिक आ परम-संरक्षक छलाह। हुनकर अन्तर्धानसँ विद्यापतिक काव्य-जीवन एक प्रकारे अनाथ भ’ जाइत अछि -“उगना रे मोर कतए गेलाह” -ई एहि ‘झी-यिन-वियोग’क विलाप थिक। बो-याक वीणा तोड़ल जेकाँ विद्यापतिक पदक स्वर शोक-गर्भित भ’ जाइत अछि।
४.३ झेजीशी आ बहु-स्तरीय प्रदर्शन
चीनी लोक-रंगमंचमे ‘झेज़ीशी’ (excerpt-play) परम्परा प्रसिद्ध थिक -एक विस्तृत महाकाव्यात्मक नाट्य-चक्रसँ एक स्वतंत्र, आत्म-निहित अंश चुनि क’ खेलल जाइत अछि। एहि नाटकमे तीन टा ‘झेजीशी’ स्पष्टतः उपस्थित अछि -(क) अमियकरक स्वाँग (सुलतान-दरबार प्रसंग), (ख) गौरा-महादेव-नटुआक अन्तर्नाट्य (उगना-उद्घाटनक पूर्व-तैयारी), (ग) सूत्रधार-नटीक कृष्ण-राधा-रास (पूर्वरंग)।
ई स्तरित प्रदर्शन (layered performance) एकहि रंगमंच पर अनेक कथा-भूमि एकहि संग सक्रिय रखैत अछि। चीनी नाट्य-सिद्धांत एहि बहुस्तरीयताकेँ (xìzhōngxì, play within play) कहैत अछि। भारतीय परम्परामे एकर अनुरूप ‘नाट्यमे अभिनय-प्रसंग’ थिक, मुदा चीनी अवधारणा एकर स्तर-विमर्शकेँ अधिक सटीकतासँ परिभाषित करैत अछि।
४.४ बेई-हुआन-ली-हे: चारिटा मौलिक नाट्य-दशा
चीनी नाट्य-परम्परामे मानल जाइत अछि जे प्रत्येक उत्तम नाटकमे चारि मौलिक भावावस्था अवश्य उपस्थित होएबाक चाही -‘बेई’ (शोक), ‘हुआन’ (आनन्द), ‘ली’ (विछोह), ‘हे’ (पुनर्मिलन)। उत्कृष्ट नाटक एहि चारूकेँ एकहि आख्यान-प्रवाहमे रखैत अछि।
‘बिदापत’मे यएह चारू उपस्थित अछि -‘हुआन’ (ओइनीक विजय, उत्सव), ‘ली’ (शिवसिंहक अन्तर्धान), ‘बेई’ (विद्यापति आ लखिमाक ३२-वर्षीय शोक), ‘हे’ (काव्यमे पुनर्मिलन -एक आध्यात्मिक, अदृश्य पुनर्मिलन जाहिमे विद्यापति घोषणा करैत छथि जे शिवसिंह अपन पदमे अमर रहताह)। ई ‘हे’ लौकिक नहि, आत्मिक थिक - एहि अर्थमे ई चीनी आदर्शक अतिक्रमण करैत एक नव सम्भावना उद्घाटित करैत अछि।
५. इजरायली नाट्य-सिद्धांत
५.१ एस. आन्स्कीक ‘दिब्बूक’ : मृत प्रेमक रंगमंचीय उपस्थिति
यहूदी-रूसी नाटककार एस. आन्स्की (S. Ansky, १८६३–१९२०) केर ‘दिब्बूक’ (The Dybbuk, ‘Between Two Worlds’ / ‘दू संसारक बीचमे’, १९२०) इब्रानी आ यिद्दिश रंगमंचक आधार-ग्रन्थ मानल जाइत अछि। एहिमे एक मृत प्रेमीक आत्मा अपन प्रेमिकाक शरीरमे प्रवेश क’ रंगमंचीय उपस्थिति बनाबैत अछि। प्रेम मृत्युसँ बलवान - यएह एकर मर्म थिक।
‘बिदापत’ मे शिवसिंह रंगमंच पर शारीरिक रूपसँ अन्तर्धान होइत छथि, मुदा लखिमाक स्मृतिमे हुनकर उपस्थिति एक ‘दिब्बूकीय’ (dybbuk-like) रंगमंचीय सत्ता बनि जाइत अछि - जखन शिवसिंहक पद “आरे-आरे भमरा, तोहे हित हमरा” गाबैत हुनकर छाया-रूप प्रकट होइत अछि, ओ क्षण ‘दिब्बूक’क रंगमंचीय तर्कसँ समरूप अछि। दुनू नाटकमे प्रेमक भावात्मक सत्य मृत्युक सीमाकेँ तोड़ैत अछि।
५.२ एली रोजिक : ‘काव्य-पद’क प्रतिमात्मक सत्ता
एली रोजिक (Eli Rozik) अपन iconicity सिद्धांतमे कहलनि जे रंगमंचक प्रतिमा केवल अभिनेता-शरीरसँ नहि, ध्वनिसँ सेहो उत्पन्न होइत अछि। जखन विद्यापतिक पद समाजी द्वारा गाओल जाइत अछि, तखन ओ पद एक ‘ध्वनि-प्रतिमा’ (sound-icon) बनि जाइत अछि -ओ केवल संगीत नहि, विद्यापतिक समग्र जीवन-संसारक रंगमंचीय प्रतिरूप थिक।
रोजिकक एक विशिष्ट बिन्दु एतय प्रासंगिक अछि - ओ ‘theatrical image’ आ ‘dramatic text’ क बीच अंतर करैत छथि। नाट्य-पाठ (कुणालक लिखित नाटिका) आ रंगमंचीय छवि (विद्यापतिक पद गाबैत अभिनेताक समग्र देह-स्वर-गति) दुनू स्वतंत्र सत्ता थिकाह। एहि नाटकमे ई दुनू सत्ता एक विशेष तनावमे अछि - कुणालक पाठ विद्यापतिक पदकेँ अपन भीतर समाबैत अछि, परंतु पद सदा पाठक नियंत्रण तोड़ि अपन स्वतंत्र काव्य-जीवन जीबैत रहैत अछि।
५.३ हबीमाक भाषा-राजनीतिसँ आगाँ : ‘काव्य-भाषाक पुनर्जन्म’
पूर्वक नाटकक समीक्षामे हम हबीमा (Habima Theatre) सँ भंगिमाक भाषा-राजनीतिक समानांतर देखलहुँ। ‘बिदापत’मे ई समानांतर एक अतिरिक्त स्तर ग्रहण करैत अछि - केवल भाषाक जीवन नहि, ‘काव्य-भाषा’क (poetic language) जीवन। हबीमाक परम्पराक निरन्तरता इजरायलमे हिब्रू काव्य-परम्पराकेँ रंगमंच पर जीवित रखबाक प्रयाससँ सेहो जुड़ल अछि।
‘बिदापत’क मंचन २००२ (पटना, विद्यापति भवन) विद्यापतिक पदकेँ रंगमंचीय माध्यमसँ पुनर्जीवित कएलक - ओहि पदकेँ जे बहुधा पुस्तकालयक वस्तु बनि रहल छल। एहि अर्थमे भंगिमाक यएह नाट्य-कर्म एक ‘काव्य-भाषाक रंगमंचीय पुनर्जन्म’ थिक, जे हिब्रू काव्यक इजरायली रंगमंचीय पुनर्जन्मक समानांतर चलैत अछि।
५.४ उपनिवेश-परोत्तर दृष्टि : कविताक राजनयिक शक्ति
इजरायली रंगमंच-विद्वान अव्राहाम ओज (Avraham Oz) आ अन्यक उपनिवेश-परोत्तर नाट्य-चिन्तन (postcolonial theatre studies) मे ओहि नाट्य-प्रयोगक विशेष स्थान अछि जाहिमे ‘सांस्कृतिक शक्ति’ (cultural power) राजनीतिक वा सैन्य शक्तिकेँ परास्त करैत अछि।
‘बिदापत’क सुलतान-दरबार प्रसंग एहि दृष्टिसँ उत्कृष्ट अछि। जौनपुर-सुलतान राजनीतिक सत्ता थिकाह; विद्यापति सांस्कृतिक शक्ति। विद्यापति राजनयिक माध्यमसँ नहि, अपितु काव्य-प्रदर्शनक माध्यमसँ शिवसिंहकेँ मुक्त करबैत छथि -आन्हर रहैत स्नान-दृश्यक पद रचि क’। सुलतानक ‘जे माँगो’क उत्तरमे विद्यापति मित्रक मुक्ति माँगैत छथि, राजसिंहासन नहि। मंत्री टिप्पणी करैत अछि -“जैँ तिरहुतक राज माँगि लितथिन!”; विद्यापतिक उत्तर -“हमरा तँ सरिपहुँ राज भेटि गेल!” -यएह काव्यशक्तिक उपनिवेश-परोत्तर विजय-घोषणा थिक।
६. चतुर्भुज-संश्लेषण
चारू परम्पराक दृष्टि एकठाम आनला पर ‘बिदापत’क केन्द्रीय प्रश्न स्पष्ट होइत अछि - ‘काव्य-शक्ति की थिक, आ ओ कोन-कोन रूपमे अपन अस्तित्व सिद्ध करैत अछि?’ प्रत्येक परम्परा एकर उत्तर भिन्न-भिन्न कोणसँ दैत अछि।
भारतीय दृष्टि -काव्य-शक्ति = रस-निष्पत्ति। पद अभिव्यक्त करैत अछि विद्यमान रस। शान्त-रसक चरम अवस्थामे काव्य मृत्युंजयी बनैत अछि।
पाश्चात्य दृष्टि -काव्य-शक्ति = स्मृति-स्थल (Nora) + विश्व-ऐतिहासिक व्यक्तित्वक (Lukács) अभिव्यक्ति + नारीवादी पुनर्पाठ (लखिमा-केन्द्रित)।
चीनी दृष्टि -काव्य-शक्ति = झी-यिन (परम-सम्वाद)क कला। बेई-हुआन-ली-हेक आध्यात्मिक पुनर्मिलन।
इजरायली दृष्टि -काव्य-शक्ति = ध्वनि-प्रतिमाक स्वतंत्र सत्ता (Rozik)। उपनिवेशी-सत्ताकेँ काव्यसँ परास्त करबाक सांस्कृतिक-राजनयिक विजय।
चारू दृष्टिकोण एकटा साझी गप पर सहमत छथि - विद्यापतिक पद केवल साहित्यिक कलाकृति नहि, एक जीवित सांस्कृतिक-राजनीतिक शक्ति थिक। कुणाल एहि शक्तिकेँ रंगमंचक माध्यमसँ एक बेर फेर ‘जीवित’ करैत छथि। एहि अर्थमे ‘बिदापत’ केवल विद्यापतिक नाटक नहि - ई स्वयं मैथिली रंगमंचक अपन ‘अस्तित्व-घोषणा’ थिक।
अगिला अंकमे : कुसमा-सलहेस
[सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर]

Suggested citation: गजेन्द्र ठाकुर. “मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-४) सन्दर्भ- कुणाल-कृत बिदापत.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 444, pp. 104–112, 2026-06-15. https://www.videha.co.in/research/2026/444/मैथिली-नाट्यमंच-नाटक-लेल-एकटा-समीक्षा-सिद्धान्त-भाग-४-सन्दर-3881d7a12e.htm

मूल विदेह अंक / Original issue