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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२६

हितनाथ झा · 2026-08-01 · अंक 447 · पृष्ठ 27–32

हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२६
हितनाथ झा
(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
विरोध परिहार
श्री जनकदेव झा
पूर्वोक्त कथनसँ इएह सिद्ध होइत अछि जे विरोध कयने कल्याण नहि! कारण जे, विरोधक आदि कारण थिक क्रोध। श्री गोस्वामीजी लिखैत छथि जे क्रोध पापक मूल, परन्तु आइ-काल्हि विरोध उपकारक बुझना जाइछ। तकर हेतु एक मात्र लाभ-लोभक हेतु ओ पड़ैत छैक, पूर्वक झगड़ा गाम-गाम पंचैती द्वारा फरिछाइत छल। आधुनिक विरोध तँ बिना भागीरथीक जल पीने फरिछैबाक कथा कोन। तेँ होइत अछि की तँ झगड़ा उठितहिं मधुबनीक रास्ता पकड़ैत छी।
जहाँ गामसँ विदा होमय लगलहुँ की साक्षी ओरिआउ, तुरन्त साक्षी लोकनि मोछ,-पर हाथ फेरैत संग भेलाह।मधुबनी पहुँचतहि फरमाइश। औ की कहू ! हमरा तँ वायु बिगड़ि गेल अछि, अहाँ नहि मानल तेँ अयलहुँ, देखब ! आलू कोबीमे मारिचाइ नहि पड़तैक, शरीरक समाचार सुनाइये देल अछि। तखन हम थाकल सेहो अत्यन्त छी, कनेक सुतै छी, भानस भय जाय तँ उठा देब।
आलू कोबी बिना घिउ देने घरहुमे मुँह मे देबाक योग्य नहि होइत अछि। यदि घिउ मे अनठा देबैक तँ तेहेन थाकनि अछि जे एकोग्रास कंठक पार नहि होयत। हँ, एकटा बात बिसरि गेलहुँ भाड• पीबक विशेष अभ्यास पड़ि गेल अछि । दाम दिअ, हम चीनी लबैत छी, ताबत भाड• पीसि राखू, नहि तँ काल्हि इजलाश पर ठाढ़ो नहि भय सकब, ठेही सँ देह सोझे ने हैत, इत्यादि धमकी दय दिमाग ठंढा करैत छथि।
जाबत न्यायकर्ताक सोझाँ साक्षी लोकनिक मिथ्या आडम्बर नहि झारल गेल अछि तावत देवतहुँ सँ बेसी प्रसाद चढ़बैत रहू नहि तँ देवता गोटेक अपराध क्षमो करताह, ई साक्षीरूप देवता बड़ अनटाह, चट घर मुँहा डेग उठौताह, पयर पकड़ैत-पकड़ैत विपत्ति। तेँ हेतु विरोध केनिहार लोकनि व्यक्तिसँ सविनय प्रार्थना जे विरोध जनु करी। यदि दिनक दोषे पड़ि जाय तँ गामहिमे पञ्चैती द्वारा फड़िछाउ, नहि तँ साक्षी लोकनिक बिना कर्म दक्षिणा लेने जान नहि छोड़ताह।।
(अंक~4, अप्रैल 1933)
नवकी कनियाँ
केदारमणि झा, मंगरौनी
आजुक दिन बड़ सुन्दर! कनियाँ एकादशी व्रत कैने छथि। बौआ लै रोटिये वाटीक इंतजाम कए देलथिन्ह।तुरन्ते सभकेँ खुआ- पिआ कै पछवारिया घर गेले टा छलीहि। चूल्हा सै दू टुकड़ी कोइला लए आचमन कुरूड़ कए विदा भेलीहि।तावत बढ़नियाँ चंगेराक भार सँ अकसक भेल अवैत देखल गेलि।चट कनियाँ दू टा कुरूड़ फेकि नैहरक कुशल क्षेम मे व्यस्त भए गेलीहि।।
" गे, भाइ कहिया तक औताह ? "
" लै हे, कहै छीय से बुझै नै छहक ? "
'की ?'
"की? हमरा आगू विदा कैलन्हि, अपने पौं गाड़ी पर पाछू सँ अबै छथुन।
ई कथा भामो सुनैत छलीहि।ओ आव भुइयाँ मे पैरे ने रोपै छथि।
कोठलीमे दुहू दियौर-भाउज गप्प करैत छलाह।
बौआ- एं यै भौजी ! एखन यदि अहाँक घर कोनो मनसा पैसे तँ अहाँ की करब ?
कनियाँ - करब की ? अहाँ केँ सोर करब।
वो. - आ जँ हमहीं रही ।
कनियाँ - अहाँ तँ छी हे ।
ई गप्प होइते छल कि भागलपुर सँ भीम बाबूक तार पहुँचल। बौआ पढ़ि तुरत एक आदमी केँ घोघड़ड़िया. स्टेशन पर पठौलथीन कारण गाड़ी ऐवा मे विलम्ब नहि छलैक।
भुसकौल कोनो तेहन खराब गाम नहि थीक। नीको-नीको लोक बहुत छथि।
भीमबाबू गंगानाथक बहिनोइ और गंगानाथ भीमबाबूक। हिनका लोकनिक पिता मे अगाध मैत्री छलैन्हि। दुनू गोटे लंगौटिया यार छलाह तैं हेतु आपसमे ई गोलटक लेल।
कनियाँ तँ दिनाहिसँ नंदोसिक छ' तीमनमे बेहाल छलीह। फलाहार करती सेहो छुट्टी नहि । भाँटाक साना, भटबर, कुटबी, भाँटा अदौरी और दालि लगा क' पाँच टा तँ तीमन ओरिएलैन्हि, छठम किछु भेटिते नहि छलैन्हि। तावत ननदि कहलथिन्ह- आहि बा-बा ओही भाँटा के सौसें-सौँसे भुजबी क' ने दियौ! कनियाँ ननदिक सहायतासँ गदगद भए गेलीह।
एक छैनी काट थारीमे सवा सेर तुलसी फूल चाउरक भात एहि रूपकेँ साँठल अछि जेना कि सागरमे स्वेत कमल फुलाएल हो बड़का बट्टामे थाल सन राहड़ीक दालि, ताहिपर कमलक पातक पानि जकाँ घी दहाइत छ' बाटी मे छ' तरकारी, दही अचार प्रभृति साँठि कनियाँ स्त्रीगण सभमे मिलि कए कोबरा घरक ओसारा पर गाव' लगलीहि कारण वरक ई तेसरे यात्रा थिकैन्हि।
सभकेँ जूड़ सुस्त कए कयनहुँ फलहार कैलैन्हि। एक खिली पान खा चन्द्रकान्ता पढ़' लगलीह। तावत भीमबाबू ऐलाह।
भीमबाबू - पढ़िते रहब की सुतबो करब ।
कनियाँ- पढ़ै कहाँ छी, ध्यान करै छी।
भीमबाबू - ककर ?
कनियाँ - अहाँक।
कारण आइए एकादशी थिकैक।
(अंक-4, वर्ष 1933)
आश्चर्य-विचार
देव नारायण चौधरी, कोइलख
डॉक्टर दयाक तलाशमे वृद्ध, लांगड़, रोगी हाथमे फराठी लेने विकल मोनसँ द्वारवाजा पर पहुँचलाह। हमरा कहलैन्हि जे हम निम्नलिखित स्थानमे दया केर तलाश कैल अछि।
प्रथम स्थान
देवनगर ग्राममे एक आस्तिक धनी ब्राह्मण छथि। जनिक नाम श्री ब्रजमोहन थिकैन्ह। पता लागल जे ओत डा. दया छथि। हम ओत पहुँचलहुँ। देखी त ब्रजमोहन पूजापर सँ उठि आध सेरक करीब खोआ, पा भरिक करीब मिसरी लय जलपान करै छलाह। ओसारा पर एक सुन्दर कुकुरो बैसल छलैन्ह। कनियें-कनियें क' दैत छलथिन्ह। ओसारासँ नीचा दरिद्रता देवीक सतावल पाँच मनुष्य ठाढ़ छलैन्ह। जाहिमे एक गोटासँ एहि तरहेँ बातचीत होइत छलैन्ह- ब्रजमोहनकेँ कहलैन्ह-मालिक ! एकादशीक दिन अहाँकेँ चारि आनाक सारुक द' गेलहुँ, से दाम हमरा नहि भेटल अछि,से भेटैत। अन्न बिना हमरा परिवारकेँ तीन संध्या भय गेल अछि।एक दुखिताह घरमे काहि कटैत अछि।पाइ दिअ, उत्तर- आज हमारे पास में पैसा नहीं है। जाओ, पन्द्रह रोज के बाद आना। ओ बेचारा ओत सँ कनैत-खिझैत आँगनकेँ विदा भेल।
दोसर गोटासँ-
ब्रजमोहन केँ कहैत छलैन्ह जे सरकार ! हमरा घीवक दाम भेटैत तँ हम मड़ुआ लितहुँ। एक टा बेटा से चारि माससँ दुःखित अछि।वैद्य कहने छलाह जे एक सेर घी ला।मोदक बना देबौक। से नहि कैल।पेट जरैत छल। अपनेक हाथे बेचल।दू मास भ' गेल, नहि भेटल अछि। भेटैत।
उत्तर ब्रजमोहनक- (ललकारि क') एखन जो। तीन मास औरो नहि भेटतौक। ओ बेचारा हताश भय घर गेल।
तेसर-( प. ब्रजमोहन सँ)
मालिक ! अपनेक ओत' श्री सत्यनारायणक पूजा छल। जाहिमे अपनेकेँ हम नेना सभक मुँहसँ एक घरि केरा पाकल छीनि क' देलहुँ- तेकर बारह आना दाम नहि भेटल, से दिअ। हमरा मायकेँ कानमे घाव भ' गेल छैक। डॉक्टर केँ देबैक। विकल मोनसँ धोखामे पड़ि पण्डितजीक ओसाराक खाम्ही छुलकै। ओ जातिक मुसहर छल। पण्डित ब्रजमोहन मुसहरसँ (क्रोधमे,) रौ, तों घर कियैक छुइलें। मुसहर - (पण्डितजीसँ डेराइत- डेराइत) सरकार, अपनेक आसनपर कुकुर बैसल आ से त' कोनो दोष नहि। हम धोखा सँ कनिएक खाम्ही मे भीरि गेलहुँ त' घर छुइत गेल।
प. ब्रजमोहन मुसहर सँ-
जो तोहर दाम एहिमे मोजर भ' गेलौक।
चारिम - एक डोम ब्रजमोहन सँ।
मालिक । बैसाखमे श्री बच्चा बाबूक उपनयन छलैन्ह। ओहिमे हमरासँ तीन रुपैयाक बासन अयलैक। ताहिमे एक रुपैया भेटल और वांकिये रहल। भेटैत।
प. ब्रजमोहनक उत्तर - ओकर सफाइ तँ ओही दिन भय गेलैक। तों कोन तरहक अपराध केने छलहीक से मोन नहि छौक।
डोम- सरकार ! हम तँ जानि क' अपराध नहि कैल। कुकुर मालक हाड़ सोनितैल नेने घर चल गेलैक।ओकरा हम ओसारा पर धोखामे जा क' बैला देलियैक। कुकुर सोनितैल गायक हाड़ सँ घर नै छूतै , हमरासँ घर छूतैक !
प. ब्रजमोहनक उत्तर- बदमाश ! मारि जूतासँ कपार फोड़ि देब। एत' सँ भाग। ओ बेचारा ईश्वर केँ गबाही रखैत अपना खोपड़ी दिशक मुँह कैलक।
पाँचम-
मेहिया चमाइन गुदरी-गुदरी नूआ पहिरने ओसाराक नीचाँ सँ एक नेनाकेँ ( ब्रजमोहन केँ सुनबैत) बच्चा, मालिक केँ कहियौन जे यशोदा दाइक जन्मकेर हमर कमाइ(बियौट केर) हमर पौने दू रुपैया हैत। से बरोबरि कहैत छलाह जर रुपैया आओत तखन देबौक। से सुनैत छी जे काल्हि तीन बीस(६0) रु. मनीऑर्डर आयल छैन्ह। आब देथु ने।
उत्तर-पण्डितजी
गै, पछबरिया घरक ओसारापर प्रसूति केर नेना जन्मकालक नूआ धोबीक ओहिठाम जैबाक हेतु राखल छलैक। से सुनैत छी जे तोहीं ऊपरसँ खींचि धोबीके देलहीक। ओहिसँ घर छूति गेलैक। ओहिमे डेढ़ रुपैयाक बासन छुतलैक से काटि क' बाँकी चारि आना रहलौक। जो परसू देबौक। ओ बेचारी बाजल जे ओतेक नूआमे तीन दिनका (वियौर केर) लहू लागलसँ घर नहि छूतै। हमरासँ घर छुतलैन्ह। एकरा उत्तरमे ओहि बेचारीकेँ तीन लात भेटलैक। ओ अबला उचित अवस्था लय अपना आँगन गेल। प्रथम स्थानक ई दृश्य देखि रोग वृद्धिये भेल। दया कहाँ !
आब दोसर स्थान----
(अंक-11, नवम्बर-1933) क्रमश:
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3
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मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7
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मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11
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मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-15
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-16
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मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-24
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-25

Suggested citation: हितनाथ झा. “मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२६.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 447, pp. 27–32, 2026-08-01. https://www.videha.co.in/research/2026/447/मैथिली-साहित्यमे-तारानाथ-झा-एवं-हुनक-परिवारक-योगदान-२६.htm

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