‘अंगिका साहित्य केरौं इतिहास’
भारतीय आरू पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्त आरू विदेह समानान्तर परम्परा-दृष्टि केरौ आलोक मँ
विस्तृत आलोचनात्मक समीक्षा
समीक्ष्य ग्रन्थ: आमुख — डॉ. डोमन साहु ‘समीर’ • पद्य-खण्ड — डॉ. तेजनारायण कुशवाहा
• गद्य-खण्ड — डॉ. अमरेन्द्र • हिन्दी अकादमी, हैदराबाद प्र• थम संस्करण, १९९८ ई.
भूमिका
‘अंगिका साहित्य केरौं इतिहास’ अंगिका भाषा-साहित्य केरौ इतिहास-लेखन मँमहत्त्वपूर्ण
आधार-ग्रन्थ छै। एकरौ विशेष सामर्थ्य सामग्री-संग्रह, विस्मृत लेखक-रचना केरौ संरक्षण, लोक
आरू लिखित साहित्य केरौ संयुक्त प्रस्तुति, भाषिक रूपरेखा, साहित्यिक संस्था केरौ
दस्तावेजीकरण आरू व्यापक सांस्कृतिक मानचित्र बनेबा मँछै। एकरौ सीमा मुख्यतः ऊ जगह
देखाय छैजहाँप्राचीनता, भाषिक वंश, जन्मस्थान, लिपि-परम्परा वा साहित्यिक स्वामित्व केरौ
दाबी उपलब्ध प्रमाणसेंबेसी निश्चित रूप मँ प्रस्तुत होय छै। एही लेली पोथी केरौ अभिलेखीय
महत्त्व आरू ओकरौ दाबी सिनी केरौ प्रमाण-स्थिति—दुन्नो के पृथक् राखी क मूल्यांकन करना
आवश्यक छै।
1. ग्रन्थ केरौ स्वरूप, प्रकाशन-पृष्ठभूमि आरू सहलेखनक विन्यास
प्रस्तुत इतिहास-ग्रंथ केरौ प्रकाशन हिन्दी अकादमी, हैदराबाद (आन्ध्र प्रदेश) द्वारा श्रावणी
पूर्णिमा, संवत् २०५५ (१९९८ ई०) मँसंपन्न होलौ। पोथी केरौ मुद्रण स्वर्ण कम्प्यूटर प्रेस, टावर
चौक, देवघर (बिहार) मँकरल गेलौ छेलै, जेमँकुल २६० पृष्ठ समाहित छै। ग्रंथ केरौ प्रथम
संस्करण केरौ प्रसार संख्या एक सहस्र प्रति तथा मूल्य एक सौ पच्चीस टका निर्धारित करल
गेलौ छेलै। ई पोथी आन्ध्र प्रदेशक प्रसिद्ध उद्योगपति आरू साहित्य-प्रेमी पद्मश्री डॉ० बी० वी०
राजूकेंसादर समर्पित करल गेलौ छै, जेकरौ उदार आर्थिक संबल सें ई मुद्रण संभव होय सकल।
पोथी केरौ उत्पत्ति आरू पृष्ठभूमि पर दृष्टि देला सें स्पष्ट होय छैजे एकरौ मूल प्रेरणा हिन्दी प्रचार
सभा, हैदराबादक हीरक जयंती समारोह (अगस्त, १९९६ ई०) मँनिहित छेलै। हिन्दी अकादमी
केरौ तत्कालीन अध्यक्ष प्रो० डॉ० बैजनाथ चतुर्वेदी अपनो दिवंगता धर्मपत्नी वाणीमुक्ता प्रतिभा
मिश्र (जेमूलतः अंग-सवासिनि छेलथिन) क अंतिम इच्छाक पूर्तयेअंगिका भाषा केरौ एगो
सांगोपांग इतिहास प्रस्तुत करबाक संकल्प करनेछेलथिन। चतुर्वेदीजीक ई आग्रहेँतीनगो मूर्धन्य
विद्वानक एगो लेखक-मंडल गठित करल गेलौ, जेमँश्रम आरू विषयक सुस्पष्ट विभाजन करल
गेलौ।
लेखकत्रयक ई विभाजन पोथी केरौ विषय-सामग्रीकें एगो संतुलित स्वरूप प्रदान करैछै। डॉ०
डोमन साहु 'समीर' अपनो असाधारण भाषावैज्ञानिक अंतर्दृष्टि सेंअंगिका केरौ ध्वनि-व्यवस्था,
पद-रचना आरू व्याकरणिक स्वरूपक नियामक ढाँचा 'आमुख' मँनिर्मित करलथिन। डॉ०
तेजनारायण कुशवाहा पद्य-खंड मँसिद्ध-परंपरा सेंलैक करी आधुनिक मंचोत्तर काल धरिक
सहस्र वर्ष केरौ काव्य-प्रवृत्तिक विवेचन करलथिन। डॉ० अमरेन्द्र गद्य-खंड मँ अंग-भूमिक
सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि केरौ आलोक मँ उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा आरू पत्रपत्रिका केरौ ऐतिहासिक विकास-क्रमक सूक्ष्म प्रलेखीकरण करलथिन।
लेखक दायित्व आ विषय-विभाजन ग्रंथ मेपृष्ठ-विस्तार
डॉ० डोमन साहु 'समीर'
'आमुख' (अंगिका भाषा आ
व्याकरणक सांगोपांग
रूपरेखा)
पृष्ठ १ सँ १३
डॉ० तेजनारायण कुशवाहा
खंड-१: पद्य (प्रारंभिक, मध्य
आ आधुनिक युगक संपूर्ण
काव्य-इतिहास)
पृष्ठ १६ सँ १४६
लेखक दायित्व आ विषय-विभाजन ग्रंथ मेपृष्ठ-विस्तार
डॉ० अमरेन्द्र
खंड-२: गद्य (कथा,
उपन्यास, नाटक, निबंध,
आलोचना, पत्रकारिता
आदि)
पृष्ठ १४९ सँ २६०
ई विन्यास देखाबै छै जे ग्रन्थकार सिनी “साहित्य” के मात्र कविता-कहानीक संग्रह नै मानै
छथिन। भाषा, व्याकरण, लोकपरम्परा, इतिहास-भूगोल, पत्र-पत्रिका, रेडियो-नाटक,
आलोचना, संस्मरण, जीवनी, शब्दकोश, विज्ञान-लेखन, कृषि-लेखन आदि के भी साहित्यिक
सार्वजनिकता बनाबैवाला अवयव मानल गेलौ छै। ई कारण पोथी केमात्र साहित्येतिहास नै, एक
प्रकार केरौ सांस्कृतिक अभिलेख-निर्माण भी कहलौ जाय सकै छै।
1.1 साहित्यिक संस्था केरौ इतिहास केरौ रूप मँ “मंच-पूर्व पू–मंच–मंचोत्तर”
आधुनिक अंगिका साहित्य केरौ इतिहास के “मंच-पूर्व”, “मंच” आरू “मंचोत्तर” अवस्था रूप
मँ देखबाक प्रवृत्ति पोथी केरौ एक उल्लेखनीय आलोचनात्मक आविष्कार छै। ई सामान्य
राजवंशीय काल-विभाजनसेंपृथक् छै। हियाँसाहित्य केरौ परिवर्तन के लेखक-मंच, अधिवेशन,
पत्रिका, संगठन, आकाशवाणी, सार्वजनिक वाचन, प्रकाशन-संस्था आरू नूतन लेखक-पाठक
समुदायसेंजोड़ल जा रहलौ छै। पश्चिमी साहित्य-सामाजिकी आरू पाठक-स्वीकृति सिद्धान्त
केरौ दृष्टि सें ई अत्यन्त उपजाऊ सूत्र छै।
मगर ई वर्गीकरण केअधिक कठोर बनाबैलेली प्रत्येक अवस्थाक मापदण्ड स्पष्ट चाही—कतना
संस्था, कोन प्रकाशन-घटना, कोन भाषिक परिवर्तन, कोन पीढ़ीगत भेद, आरू कोन पाठक-वर्ग
परिवर्तनकारी मानल जैतै। अखनी ई अधिकतर वर्णनात्मक छै; एकरा विश्लेषणात्मक बनैलौ
जाय सकै छै।
2. भाषा-व्याकरण, अंग-लिपि, प्राचीनता आरू भाषिक इतिहास
पोथी केरौ 'आमुख' (पृष्ठ १-१३) मँडॉ० डोमन साहु 'समीर' अंगिका भाषा केरौ प्राचीनता,
क्षेत्रीय विस्तार आरू ओकरौ आंतरिक व्याकरणिक संरचनाक अत्यंत प्रामाणिक भाषावैज्ञानिक
विश्लेषण प्रस्तुत करनेछथिन। प्राचीन भारतीय वाङ्मय, विशेषतः अथर्ववेद, महाभारत, पुराण,
बौद्ध ग्रन्थ 'अंगुत्तरनिकाय' तथा जैन ग्रन्थ 'भगवती-सूत्र' मँ उल्लिखित षोडश महाजनपदक
साक्ष्य लैलेखक अंग-भूमिक ऐतिहासिक सत्ताक निरूपण करैछथिन। आधुनिक भूगोलक दृष्टि
सेंबिहारक भागलपुर, बाँका, मुंगेर, सहरसा, कटिहार, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, जमुई,
बेगूसराय तथा संताल परगनाक साहेबगंज, गोड्डा, पाकुड़, दुमका आरू देवघर जिलाक लोकभाषा केरौ रूप मँअंगिका केरौ प्रसार-क्षेत्र रेखांकित करल गेलौ छै।
लिपि आरू प्राचीन भाषा-संज्ञा केरौ संदर्भ मँबौद्ध ग्रन्थ 'ललितविस्तर' मँ उल्लिखित ६४ लिपि
सिनी मँब्राह्मी, खरोष्ठी आरू पुष्करसारीक उपरांत चतुर्थ स्थान पर परिगणित 'अंग-लिपि'क
आधार पर लेखक ई प्रतिपादित करै छथिन जेमिथिलाक्षर, वंगलिपि, असमिया आरू कैथी
लिपिक ऐतिहासिक प्रस्थान-बिंदु वस्तुतः अंग-लिपिये मँअंतर्निहित छेलै। ओहिना प्राचीन
भौगोलिक वर्गक प्राच्या भाषा केरौ अंतर्गत उद्धृत द्धृ वाक्य "आंगी वांगी पांचाली वैदर्भी मागधी
एतेप्राच्याः" क आधार पर 'आंगी' केंअंगिका केरौ मातृ-रूप मानल गेलौ छै, जेकरा सेंप्राकृत
आरू अपभ्रंश केरौ स्तर पार करी आधुनिक जनभाषा विकसित होलौ।
2.1 ध्वनितत्त्व
अंगिका केरौ ध्वनि-व्यवस्था भलेदेवनागरी लिपिक माध्यम सेंअभिव्यक्त होय छै, तैयो ई भाषा
मँ दूगो विशिष्ट स्वर-ध्वनि विद्यमान छैजेकरा लेली स्वतंत्र वर्ण-चिह्नक प्रस्ताव पोथी मँकरल
गेलौ छै। पहिल विशिष्ट ध्वनि छेकै 'प्रसृत ए-कार' ( / ऍ / ~), जेसामान्य ए-कार सेंअधिक
विवृत होय करी उच्चारित होय छै आरू जे'लें', 'दें', 'जमें', 'तबें', 'आबें' जइसन पद मँ
प्रयुक्त होय छै। ई ध्वनि मात्र उच्चारणेमँभिन्न नैछै, बल्कि अर्थ-भेदक नियामक भी छै; जेना
'ले' कहलासेंअवज्ञार्थक बोध होय छै मगर 'लें' आदरार्थक बनैछै। दोसर विशिष्ट ध्वनि छेकै
'प्रसृत अ-कार वा ऑ-कार' ( / ओं/ ^), जे'आबों', 'बैठों', 'पढ़ों', 'लिखों', 'हमरों', 'तोरों'
मँ समाहित छै। ई जगह 'हमरो' (समावेशी = हमहुँ) आरू 'हमरों' (संबंधार्थक = हमर) क
मध्यक अर्थ-परिवर्तन ई ध्वनिक सूक्ष्मताक अकाट्य प्रमाण छै। एकरौ अतिरिक्त न्, म्, य्, र्
आरू ल्क संग महाप्राण 'ह' क संयुक्त ध्वनि (कान्हो, हम्हें, ठाम्हें, ऐयूहों, कल्हे) अंगिका केरौ
उच्चारण-प्रवृत्तिकें एगो विशिष्ट झंकार प्रदान करैछै।
2.2 रूपतत्त्व आरू व्याकरणिक वैशिष्ट्य
अंगिका केरौ रूपतात्विक संरचना मँसंज्ञा केरौ द्विविध रूप अत्यंत मौलिक छै, जेमँसामान्य
आरू निश्चयार्थक (विशिष्ट) संज्ञा केरौ स्पष्ट विभाजन देखल जाय छै। सामान्यार्थक संज्ञा मँ'-
आ' प्रत्ययक योग भेला पर पूर्ववर्ती दीर्घ स्वर ह्रस्व होय जाय छै तथा मध्य मँ य अथवा व क
आगम होय करी निश्चयार्थक रूप बनैछै; जेना गाय सेंगैया, लोटा सेंलोटवा, धोती सेंधोतिया
आरू कुत्ता सेंकुतवा।
अंगिका केरौ क्रियापद मँ सर्वनामीकरण ( ) Pronominal Concord भाषावैज्ञानिक दृष्टि
सें सर्वाधिक जटिल आरू समृद्ध वैशिष्ट्य छै। ई प्रक्रिया मँ एकहि क्रियापदक भीतर संपूर्ण
वाक्यक अर्थ समाहित होय जाय छै, जहाँकर्ता आरू कर्मक पुरुष तथा आदर केरौ मात्रा क्रिया
केरौ प्रत्यय मँपूर्णतः एकाकार होय जाय छै। मागधी अपभ्रंश सें उद्भूत द्भू प्राच्य भाषा-समूह मँ ई
विशिष्टता अंगिका केरौ पद-रचनाकेंअत्यंत सशक्त आरू संश्लिष्ट रूप प्रदान करैछै।
व्याकरणिक कोटिसंरचनात्मक लक्षण पोथी मे प्रदत्त उदाहरण
कारक एवं परसर्ग
सकर्मक भूतकालिक क्रियाक
संग कर्ता मे अनुस्वार (वा
'नें') क विकार, अकर्मक मे
अविकारी। संबंध परसर्ग '-
कें', '-केरों', '-रों' तथा
संप्रदान '-लें', '-लेली', '-
बास्तें'।
'बरदा चरै छै' (अकर्मक)
मुदा 'बरदाँ खैलकै'
(सकर्मक)। तोरा लें/लेली,
ओकरा बास्तें।
लिंग आ वचन
प्राकृतिक लिंग-व्यवस्था;
व्याकरणिक लिंग-भेद
संकुचित। बहुवचनक लेल '-
सनी', '-सिनी' आ '-सब'
प्रत्यय।
बुतरू (ए०व०) बुतरूसनी /
बुतरूसिनी (ब०व०)। नूँगा
नूँगा-सब।
सर्वनाम
लिंग-भेद रहित, मुदा आदरक
त्रिविध स्तर:
अवज्ञार्थक/समतार्थक,
आदरार्थक आ परमआदरार्थक।
उत्तम: हम/हम्में/हमरासिनी;
मध्यम: तों, तोंय (अनादर),
तोहें/आपने (आदर); अन्य:
ऊ (अनादर), हुनी (आदर)।
व्याकरणिक कोटिसंरचनात्मक लक्षण पोथी मे प्रदत्त उदाहरण
मूल क्रिया
(Substantive
Verb)
सत्तासूचक 'छै' आ
विकारसूचक (स्वरूपतादात्म्य) 'छेकै' क मध्य
नित्य भेद।
'एकरा मे पानी छै'
(अस्तित्व) बनाम 'ऊ पानी
छेकै' (स्वरूप/परिचय)।
क्रियापदिक सर्वनामीकरण
समापक क्रियापद मे कर्ता,
कर्म अथवा संबोधी-संबंधी
सर्वनाम अंशक नीर-क्षीरवत
संश्लिष्ट संलयन।
'देखलियौ' (हम तोरा
देखलियौ), 'ऐल्हौं' (ऊ, जे
तोहर सगा छेकौ, से आएल)।
2.3 आधुनिधु क भाषावैज्ञानिक कसौटी
मगर आधुनिक भाषावैज्ञानिक कसौटीपर ई आमुख के वर्णनात्मक व्याकरण केरौ आरम्भिक
दस्तावेज मानना अधिक उचित होतै। व्यवस्थित ध्वन्यात्मक लिप्यन्तरण, क्षेत्रवार बोली-नमूना,
न्यूनतम युग्म, ध्वनि-परिवर्तन, वक्ताक सामाजिक विवरण, रूपिम-सारिणी, पाठ-संग्रह,
प्राकृतिक संवाद, सांख्यिकीय आवृत्ति आरू तुलनात्मक पूर्वी आर्यभाषिक विश्लेषण जोड़ल नै
छै। तें ई साहित्यिक-व्याकरणिक रूपरेखा छै, पूर्ण आधुनिक वर्णनात्मक व्याकरण नै।
पोथी अनेक ठाम भाषा केरौ प्राचीनता आरू साहित्य केरौ प्राचीनता एक-दोसरौक साक्ष्य रूप मँ
उपयोग करै छै। मगर “एहि भूगोलमेअमुक कवि रहलाह”, “ओहि पाठमेकिछु रूप आइक
अंगिकासँमिलैत अछि”, आरू “ओ पाठ पूर्णतः आधुनिक अर्थक अंगिका साहित्य अछि”—ई
तीन पृथक् दाबी छथिन। भाषिक इतिहास मँनियमित ध्वनि-परिवर्तन, व्याकरणिक नवाचार,
हस्तलिखित पाठक तिथि आरू तुलनात्मक प्रमाण आवश्यक छै।
नव संस्करण मँ “भाषा-इतिहास”, “साहित्यिक परम्परा”, “क्षेत्रीय सांस्कृतिक स्मृति” आरू
“आधुनिक भाषिक पहिचान” चार पृथक् उपखंड बनाओल जाए। ई सेंपरम्परा कमजोर नैहोतै;
उलटे प्रमाण केरौ स्तर स्पष्ट भेला सेंविश्वसनीयता बढ़तै।
2.4 “अंग-लिपि” सम्बन्धी दावा केरौ पुरा पु लिपिवैज्ञानिक परीक्षण
आमुख मँ ललितविस्तर केरौ चौंसठि लिपिक पाँति मँ “अंग-लिपि” उल्लेख के ऐतिहासिक
महत्त्व देलौ गेलौ छै। ग्रन्थ केरौ तर्क ई उल्लेखसें आगाँ बढ़ि मिथिलाक्षर, बंगला, असमिया
आदिक विकास-सूत्र तलक पहुँचबाक प्रयत्न करैछै।
ई जगह कठोर पुरालिपिवैज्ञानिक भेद आवश्यक छै—ककरो प्राचीन ग्रन्थ मँ “अंग-लिपि” नाम
भेटब एक तथ्य छै; मगर ऊ नामसेंजुड़ल अक्षररूप, दिनांकित अभिलेख, विकासक्रम आरू
उत्तरवर्ती लिपिक प्रत्यक्ष वंशपरम्परा सिद्ध होय गेलौ—ई दोसर बात छै।
Richard Salomonक भारतीय पुरालिपि-विषयक मानक विवेचन मँ दक्षिण एशियाक
अधिकांश देशज लिपिक प्रमाणित विकास-वृक्ष ब्राह्मीक अनेक क्षेत्रीय शाखासेंजोड़ल जाय छै।
ललितविस्तर केरौ चौंसठि लिपिक पाँतिक ऐतिहासिक मूल्य सीमित मानल गेलौ छै, कारण
ब्राह्मी आरू खरोष्ठी छोड़ि बहुत नाम के विशिष्ट पुरातात्त्विक अक्षरमालासेंनिश्चयपूर्वक मिला
सकब कठिन छै।
एही लेली पोथी केरौ “अंग-लिपि” प्रसंग के “प्राचीन ग्रन्थमेअंग-नामित लेखन-परम्पराक
स्मृति” कहना सुरक्षित छै; “एहि सँअमुक-अमुक आधुनिक लिपि सीधे उत्पन्न भेल” कहबाक
लेली अभिलेखीय मध्य-कड़ि चाही। ई अन्तर नव संस्करण मँअवश्य स्पष्ट करल जएबाक
चाही।
2.5 ऐतिहासिक आरू भाषावैज्ञानिक दाबा सिनी केरौ तुलतु नात्मक समालोचना
प्रस्तुत इतिहास-ग्रंथ केरौ सर्वाधिक विचारणीय आरू संवेदनशील पक्ष छेकै एकरौ कतिपय अति-
उत्साही ऐतिहासिक आरू भाषावैज्ञानिक दाबी, जे मँ क्षेत्रीय अस्मिता केरौ भावुकता
भाषावैज्ञानिक तटस्थता पर हावी देखाय छै।
ऋग्वेदक मंत्रद्रष्टा दीर्घतमस्, कक्षीवत आरू घोषा तथा पालकव्यक 'हस्त्यायुर्वेद'क भाषिक
प्रवृत्तिकेंअंगिका केरौ मूल रूप मानना भाषावैज्ञानिक दृष्टि सें सर्वथा असिद्ध छै। वैदिक संस्कृत
भारत-यूरोपीय भाषा-परिवारक आदिम रूप छेकै, जब कि नव्य भारतीय आर्य-भाषा (जेमँ
अंगिका, मैथिली, बँगला आदि सम्मिलित छै) मध्यकालीन प्राकृत आरू अपभ्रंश केरौ स्तर पार
करी दशमीं-एकादशीं शती केरौ आस-पास स्वतंत्र रूप ग्रहण करलकै। सहस्र वर्ष पूर्व होलौ
वैदिक ऋचाकेंकोनो आधुनिक बोली विशेषक आद्य रूप मानना कालदोष ( ) Anachronism
सें ग्रस्त छै।
विक्रमशिला महाविहार केरौ भौगोलिक अवस्थितिक आधार पर चौरासी सिद्ध केरौ चर्यापद आरू
दोहाकोश केरौ संपूर्ण वाङ्मयकें 'विशुद्ध प्राचीन अंगिका' घोषित करना एकांगी दृष्टि छै।
महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री, डॉ० सुनीतिकुमार चटर्जी, महापंडित राहुल सांकृत्यायन तथा
डॉ० सुभद्र झा सिद्ध-साहित्य केरौ भाषाकें 'अवहट्ठ' वा 'आदिम मागधी अपभ्रंश' मानैछथिन।
ई भाषा वस्तुतः आधुनिक मैथिली, बँगला, असमिया आरू ओड़िआक साझी पूर्वज ( - Proto
Eastern Indo Aryan - ) छेलै। ई मँ प्रयुक्त 'पइट्ठइ', 'सुण्ण', 'णदह' जइसन रूप कोनो
एक विशिष्ट भाषा केरौ नै होय समग्र प्राच्य प्राकृत-अपभ्रंश केरौ सामान्य संपत्ति छेकै। भले
सरहपा विक्रमशिला सेंसंबद्ध छेलथिन, तैयो ऊ साझी भाषा-परंपरा सेंमैथिली, बँगला वा
मगहीक दाबीकें सर्वथा खारिज करी मात्र अंगिका केरौ एकाधिकार सिद्ध करना न्यायसंगत नै
बुझाइत छै।
महाकवि विद्यापतिकें अंगिका केरौ कवि सिद्ध करबाक चेष्टा ऐतिहासिक आरू भाषावैज्ञानिक
साक्ष्यक दृष्टि सें सर्वथा निराधार छै। विद्यापति केरौ जन्म मिथिला केरौ मधुबनी जिलांतर्गत
बिसफी ग्राम मँ ओइनिवार राजवंशक छत्रछाया मँहोलौ छेलै, जहाँराजा शिवसिंह हुनका बिसफी
गाम ताम्रपत्र पर लिख करी दान देनेछेलथिन। विद्यापति केरौ घोषणा "देसिल बअना सब जन
मिट्ठा, तेंतैसन जम्पओ अवहट्ठा" तत्कालीन लोकभाषा अवहट्ठक संदर्भ मँछै। विद्यापति केरौ
पदावलीक क्रियापद (गेलनि, कहलन्हि, देखलहुँ) आरू सर्वनाम (हमार, तोहार, अहाँ, ऊ) मानक
मैथिली केरौ व्याकरणिक संरचना छेकै। अंगिका केरौ विशिष्ट क्रिया-प्रत्यय (यथा 'खैलकै',
'गेलै', 'छेकै') विद्यापति केरौ मूल पदोंमँपूर्णतः अनुपलब्ध छै। मात्र ई आधार पर जे हुनकरौ
नचारी अंग-क्षेत्र मँगाओल जाय छै, हुनका अंगिका केरौ कवि मानना भाषावैज्ञानिक दृष्टि सें
स्वीकार्य नैहोय सकै छै।
अंगिका आरू मैथिली केरौ अंतर्संबंधक भाषावैज्ञानिक यथार्थ ई र्थ छैजे सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन
अपनो 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' (खंड ५, भाग २) मँअंगिकाकें बिहारी भाषा-समूह केरौ
अंतर्गत 'मैथिलीक दक्षिणी-पूर्वी बोली' (छिका-छिकी) क रूप मँ वर्गीकृत करनेछेलथिन।
व्याकरणिक धरातल पर मैथिली आरू अंगिका दुन्नो मागधी अपभ्रंश केरौ अत्यंत निकटवर्ती
सहोदरा छथिन। क्रियापद मँ सर्वनामीकरणक संश्लिष्ट विन्यास, भूतकाल मँ सकर्मक कर्ताक
विकारी रूप, आदरार्थक सर्वनामक त्रिविध कोटि तथा बहुसंख्यक परसर्ग दुन् र्ग नो मँ एकसमान छै।
अंगिका केरौ अपनो विशिष्टता ओकरौ विवृत स्वर (प्रसृत ऍ आरू ओं), 'छै' आरू 'छेकै' क
रूपभेद तथा विशेषणक निश्चयार्थक प्रत्यय (-का/-की) मँनिहित छै। एही लेली अंगिकाकें एगो
स्वतंत्र भाषिक अस्मिता मानलौ जाय सकै छै, मगर मैथिलीसें ओकरौ संरचनात्मक संबंध केरौ
पूर्ण अपलाप करना भाषाविज्ञानक नियमक विरुद्ध छै।
3. साहित्यिक काल-विभाजन आरू ऐतिहासिक विकास
डॉ० तेजनारायण कुशवाहा पद्य-खंड मँअंगिका काव्य केरौ सुदीर्घ विकास-यात्राकें तीनगो
कालखंड मँविभक्त करनेछथिन:
कालखंड कालावधि प्रमुख साहित्यिक धारा आ
प्रतिनिधि काव्य
प्रारंभिक युग ५०० ई० सँ १२२० ई० धरि
अपभ्रंश ('सुदंसण चरिउ'),
सहजयानी सिद्ध-काव्य, नाथपंथ, लोक-गीति-गाथा,
लोकोक्ति-काव्य।
मध्य युग १२२० ई० सँ १८५० ई० धरि
पूर्व-मध्य युग (१२२०-१६५०
ई०): विद्यापतिक पदावली,
कबीर, साधु-काव्य, भृगुराम
मिश्र। उत्तर-मध्य युग (१६५०-
१८५० ई०): 'सती बिहुला'
महाकाव्य, रेशमा, सलेस
भगत, लोक-नृत्य।
आधुनिक युग १८५० ई० सँअद्यावधि
मंच-पूर्व युग (१८५०-१९५०
ई०): पंच कविरत्न। मंच-युग
(१९५०-१९८५ ई०): भाषा-
आंदोलन, 'सवर्णा'
महाकाव्य। मंचोत्तर युग
(१९८५ सँ आब धरि):
बृहत्त्रयी महाकाव्य,
विश्वविद्यालयीय प्रतिष्ठा।
3.1 प्रारम्भिक युगयु
प्रारंभिक युग केरौ विवेचन मँलेखक वैदिक संहिताक दीर्घतमस्, कक्षीवत आरू घोषाक ऋचा
तथा पालकव्य मुनिक 'हस्त्यायुर्वेद' मँ स्थानीय 'आंगी' प्रवृत्तिक बीजरूप देखैत छथिन।
तदुपरान्त जैन आरू बौद्ध आगमक पृष्ठभूमि मँअपभ्रंश चरित-काव्य 'सुदंसण चरिउ' मँ वर्णित
अंगदेशक प्राकृतिक सौन्दर्यकें रेखांकित करल गेलौ छै।
सहजयानी सिद्ध-साहित्य केरौ संदर्भ मँविक्रमशिला महाविहार केरौ अंग-क्षेत्र (कहलगाँव,
भागलपुर) मँअवस्थितिक कारणेँसिद्ध केरौ संपूर्ण चर्यापद आरू दोहाकोश केरौ भाषाकेंअंगिका
केरौ पूर्व-रूप घोषित करल गेलौ छै। सिद्ध सरहपा केरौ जन्म-स्थान 'राज्ञी' (भागलपुर केरौ
आधुनिक रानी दियारा अथवा बरारी) मानै हुनका अंगिका केरौ आदि-कवि स्वीकार करल गेलौ
छै। सरहपा केरौ अतिरिक्त शबरपा, लुइपा, दारिकपा, कण्हपा आरू शान्तिपाक पद उद्धृत द्धृ करी
ई बात पर बल देलौ गेलौ छैजे ई मँ प्रयुक्त 'जब्बे-तब्बे', 'नइ' (नाओ), 'अहणिसि' जइसन
शब्दरूप आधुनिक अंगिका केरौ स्वाभाविक पूर्वज छेकै। नाथ-पंथक विवेचन मँगोरखनाथ केरौ
वाणी "हँसिबा, खेलिबा, धरिबा ध्यान" कें अंगिका केरौ "हँसबों, खेलबों, धरबोंधियान" सें
समीकृत करी नाथ-काव्य मँअंगिका केरौ भाषिक प्रभाव प्रतिपादित करल गेलौ छै।
ई युग मँ आल्हा-ऊदल, लोरिकैन, शोभा नायक बनजारा, सोरठी-बृजाभार, कुँवर विजयमल,
राजा भरथरी, राजा मानिकचंद आरू गोपीचंद जइसन लोक-गीति-गाथा केरौ मौखिक परंपरा
पल्लवित होलौ। ई गीति-प्रबंध केरौ माध्यम सें तत्कालीन समाज केरौ वीरगाथा, तंत्र-मंत्र,
कौटुंबिक निष्ठा आरू वैराग्य-भावना अज्ञात लोक-कवि सिनी केरौ कं ठ मँसंरक्षित होलौ। संगे-
संग घाघ, भड्डरी आरू डाकक कृषि-लोकोक्ति तथा शिशु-मनोविनोदक 'फेंकड़ा' आरू 'लोरी'
केंभी प्रारंभिक काव्य-निधिक रूप मँ समाविष्ट करल गेलौ छै।
3.2 मध्य युगयु
मध्य युग केरौ अंतर्गत पूर्व-र्वमध्य काल मँमहाकवि विद्यापति केरौ 'पदावली' आरू 'कीर्तिलता'क
भाषाकें 'देसिल बअना' कहैपोथी मँ ई दाबी करल गेलौ छैजे तब 'मैथिली' शब्द केरौ प्रचलन
नै रहबाक कारणेँ ऊ वस्तुतः तत्कालीन 'आंगी' भाषा छेलै। विद्यापति केरौ नचारी उत्तरी अंगक्षेत्र मँ घर-घर मँगाओल जाय छै, ई आधार पर हुनका अंगिका केरौ कवि मानबाक आग्रह करल
गेलौ छै। साधु-काव्य केरौ प्रसंग मँसंत कबीर केरौ पूरबी भाषा ("भाषा हमरी पूरबी हमको लखै
न कोय") मँ प्रयुक्त निश्चयार्थक क्रियापदक साम्य देखाबै हुनका ज्ञानमार्गी शाखा मँराखल गेलौ
छै। मुंगेरक कवि भृगुराम मिश्र (१४वीं शती) क कृति 'रासबिहार', 'सुदामा चरित' आरू
'दानलीला' केंमध्यकालीन अंगिका केरौ अत्यंत महत्त्वपूर्ण उर्ण पलब्धि मानल गेलौ छै, जेविषय
मँफ्रांसिस बुकाननक सर्वेक्षण-विवरण केरौ साक्ष्य देलौ गेलौ छै।
उत्तर-मध्य युग मँशृंगारिक आरू पौराणिक लोक-प्रबंध केरौ विपुल सृष्टि होलौ। ई मँ १७वीं शती
मँचम्पावासी भीमसेनक समकालीन कवि केशो साव द्वारा रचित नौ खंडक महाकाव्य 'सती
बिहुला' (बिहुला-विषहरी) अंगिका केरौ प्रथम प्रबंध-काव्य मानल गेलौ छै, जे मँ मनसा
विषहरीक कोप आरू महासती बिहुलाक अनुपम पातिव्रतक चित्रण छै। एकरौ अतिरिक्त दलित
नायक वीर चूहरमल आरू रेशमाक आत्मोत्सर्गक कथा 'रेशमा', राजा सलेस (सहलेस) क
त्याग आरू शौर्यक गाथा 'सलेस भगत', तथा 'बाबा बिसूराउत', 'नेटुआ दयालऽ आ 'ज्योति
तपस्या' सन लोक-गाथा लोक-संस्कृतिक उच्चतम आदर्श स्थापित करैत अछि।
3.3 आधुनिधु क युगयु
आधुनिक युग केरौ प्रथम सोपान 'मंच-पूर्व युग' (१८५०-१९५० ई०) मँलोकवार्ताक संकलनक
संगहि शिष्ट काव्य-परंपराक विकास होलौ। ई काल मँ'पंच कविरत्न' उदित भेलाह:
पं० काली प्रसाद पाण्डेय अपनो लोक-प्रसिद्ध 'बारहमासा' लेली स्मरणीय छथिन।
पं० दर्शन दुबे (१८७६-१९१२ ई०) गोड्डाक वंदनवार निवासी छेलथिन, जेकरौ २७ छंदक
रीतिकालीन कृति 'कृष्ण-लीला' (सवैया आरू कवित्त मँ) ब्रजभाषाक शृंगार-काव्य केरौ
समकक्ष प्रतिभा प्रदर्शित करैछै।
पं० बाजितलाल मिश्र (जन्म १८९३ ई०) प्रतापपुर (गोड्डा) क लोक-कवि छेलथिन, जेकरौ शिवभक्तिपरक झूमर महिला-समाज मँअत्यंत समादृत छै।
सदुपाध्याय भवप्रीतानन्द ओझा (१८८६-१९७० ई०) देवघरक सरदार पंडा छेलथिन, जेझूमर
विधा केरौ अप्रतिम सम्राटभेलाह आरू राधा-कृष्णक प्रेम तथा शिव-भक्तिक अद्वितीय पद
रचलाह।
पं० भुवनेश्वर चौधरी 'भुवनेश' (१८९०-?) सुल्तानगंजक बाथ निवासी छेलथिन, जेअंगिका मँ
बाल-साहित्य, बुझौवल आरू अंतर्लापिकाक प्रवर्तन कएलाह तथा ९५१ पृष्ठक हस्तलिखित
पत्रिका 'भारती' (१९५७ ई०) क संपादन कएलाह।
'मंच-युग' (१९५०-१९८५ ई०) मँजनपदीय साहित्यिक चेतनाक संगठनात्मक रूप प्रकटहोलौ।
१९५६ ई० मँपटना मँडॉ० लक्ष्मीनारायण 'सुधांशु' आरू गदाधर प्रसाद अम्बष्ठ द्वारा 'अंगभाषा-
परिषद्' क नींव राखल गेलौ। १९६४ ई० मँडॉ० तेजनारायण कुशवाहा 'अंग प्रान्तीय साहित्यसम्मेलन' आरू १९७३ ई० मँ'अखिल भारतीय अंगिका भाषा सम्मेलन'क गठन कएलाह। ई
युगेँ सदानन्द मिश्र 'साहित्यिक साँढ़' क हास्य-व्यंग्य संग्रह 'खोंड़-पतार' (१९६५), डॉ०
तेजनारायण कुशवाहाक राजभाषा-पुरस्कृत सौर-महाकाव्य 'सवर्णा' (१९८४), डॉ० परमानन्द
पाण्डेय क 'पछिया बयार', उचितलाल सिंहक चार संकलन ('पंचरंग चोलऽ, 'माटी के चेत',
'रौदा के दूब', 'कानैछै लोर'), डॉ० भुवनेश्वर सिंह 'भुवन' क 'घैरकों' आ 'खोरना', तथा
प्रभातरंजन सरकार 'आनन्दमूर्ति' क 'प्रभात-संगीत' (५०१८ गीत) सन युगांतरकारी कृति
समाजक सोझाँ आयल।
'मंचोत्तर युग' (१९८५ ई० सें आब तलक) मँअंगिका केरौ अधिकार-यात्रा दिल्लीक गांधी शांति
प्रतिष्ठान (१० अप्रैल, १९९४ ई०) तलक पहुँचल, जेकरा सें १९ जून, १९९५ कें तिलकामांझी
भागलपुर विश्वविद्यालयक स्नातक स्तर पर अंगिका केरौ अध्ययन-अध्यापनक वैधानिक
स्वीकृति प्राप्त होलौ। ई युग मँअनिरुद्ध प्रसाद विमलक विरह-काव्य 'कागा की संदेश उचारै',
डॉ० नरेश पाण्डेय 'चकोर' क 'ययाति', डॉ० अमरेन्द्रक दलितोत्थानपरक महाकाव्य 'गेना'
तथा सुमन सूरोक भीष्म-चरितपरक महाकाव्य 'उर्ध्वरेता' आधुनिक अंगिका केरौ 'बृहत्त्रयी'
महाकाव्यक रूप मँ प्रतिष्ठित होलौ।
3.4 काल-विभाजनक उपयोगिता आरू सीमा
500–1220, 1220–1850, 1850 सें आधुनिक, फेर मंच-पूर्व, मंच आरू मंचोत्तर—ई ढाँचा
पाठक के स्पष्ट दिशा दैछै। साहित्यिक इतिहास मँ एहन कालरेखा आवश्यक होय छै। मगर हर
सीमा-वर्ष केरौ मापदण्ड समान नैदेखाय छै। किछु सीमा राजनीतिक-सांस्कृतिक, किछु भाषिक,
किछु संस्थागत, किछु लेखक-पीढ़ीपर आधारित प्रतीत होय छै।
आलोचनात्मक संस्करण मँ एक सारिणी चाही: “काल-नाम | आरम्भक कारण | अन्तक
कारण | प्रमुख भाषिक लक्षण | प्रमुख संस्था | प्रमुख विधा | प्रमुख स्रोत | अनिश्चितता।”
तब काल-विभाजन वर्णनात्मक सुविधासें आगाँशोधयोग्य प्रतिपादन बनतै।
4. पद्य-खण्डक गहिर समीक्षा
4.1 प्रारम्भिक आरू मध्यकाल: परम्परा केरौ पुनरुपु द्धार, प्रमाण केरौ सावधानी
पद्य-खंड सिद्ध, सहजयान, नाथ-पन्थ, साधु-परम्परा, गीत-गाथा, लोकगीत आरू लोकनृत्यक
माध्यमेँदीर्घ ऐतिहासिक निरन्तरता बनाबै छै। साहित्यिक इतिहास केरौ दृष्टि सें ई साहसी
परियोजना छै, कारण मौखिकता आरू सीमित लिखित साक्ष्यवाला परम्परा के इतिहास केरौ
भीतर स्थान देलौ गेलौ छै।
भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि सें ई खंडक विशालता रस, ध्वनि, छन्द, वक्रोक्ति आरू लोकप्रदर्शनक अध्ययन लेली बहुमूल्य छै। पश्चिमी मौखिकता-अध्ययन आरू सांस्कृतिक इतिहास
केरौ दृष्टि सेंभी ई महत्त्वपूर्ण अभिलेख छै। मगर प्राचीन कवि केरौ क्षेत्रीय भाषिक स्वामित्व,
जन्मस्थान आरू निश्चित तिथिक प्रश्न पर स्रोत-श्रेणी अनिवार्य छै। पोथी केरौ अपनो उपसंहार
ई सावधानीक पुष्टि करैछै।
4.2 लोकगीत आरू गीत-गाथा: साहित्य केरौ लोकाधार
पोथी लोकगीत के “नीच” वा “असाहित्य” कहि बाहर नै करै। विवाह, संस्कार, श्रम, प्रेम,
धार्मिक उत्सव, कथा-गाथा, लोकनृत्य आदि साहित्यिक इतिहास केरौ अवयव बनै छै। ई
भारतीय सहृदय-संस्कृति आरू बाख्तिनीय बहुध्वनिताक संग अनुकूल छै।
नव संस्करण मँहियाँ प्रदर्शन-सन्दर्भ आवश्यक होतै—के गबैत छथिन, ककरा आगाँ, कोन
अवसरपर, पुरुष/स्त्री भूमिका की, धुन आरू नृत्यक सम्बन्ध की, पाठक रूपान्तर कतना,
मौखिक संस्करण कतना। लोकगीत केरौ मात्र लिखित पाठ ओकरौ आधा जीवन छै; प्रदर्शन,
शरीर, संगीत आरू सामुदायिक स्मृति दोसर आधा।
4.3 आधुनिधु क पद्य: संस्थागत इतिहास केरौ मूल्यमू
आधुनिक पद्य-खंड मँकवि-परिचय, साहित्यिक मंच, अधिवेशन, पीढ़ी, प्रकाशन आरू सामाजिक
अभिव्यक्तिक सम्बन्ध अधिक स्पष्ट छै। ई भाग साहित्येतिहास केरौ दस्तावेजी चरित्र के मजबूत
करैछै। पृ. 165 क आसपास आधुनिकता, भक्ति-परम्परा, प्रकृति-लोकरीति, नव मंच आरू
नूतन पीढ़ी केरौ सन्दर्भ एकसंग मिलैछै।
मगर कवि-सूची विशाल भेला कारण मूल्यांकन कतेको बेर जीवन-वृत्त + काव्यांश +
प्रशंसात्मक टिप्पणी तलक सीमित रहि जाय छै। समीक्षात्मक इतिहास लेली चयन-पद्धति चाही:
प्रतिनिधि कवि कैन्हें? काव्य-प्रवृत्ति कोन? भाषिक नवाचार की? छन्द-परिवर्तन की? परम्परासें
विच्छेद वा संवाद केना? पाठक-स्वीकृति की? ई प्रश्नक उत्तर संरचनात्मक रूप मँदेलौ जाए।
4.4 ऐतिहासिक उपादेयता आरू मौलिकता
ऐतिहासिक आरू साहित्यिक उपादेयताक दृष्टि सें ई ग्रंथ अंगिका भाषा-आंदोलनक मील-स्तंभ
छेकै। ई सेंपूर्व डॉ० अभयकान्त चौधरी आरू डॉ० नरेश पाण्डेय 'चकोर' क इतिहास-ग्रंथ हिन्दी
भाषा मँछेलै, मगर प्रस्तुत पोथी स्वयं अंगिका भाषा मँ रचित अंगिका साहित्य केरौ प्रथम
सांगोपांग इतिहास छेकै। लोक-साहित्य केरौ क्षेत्र मँ'सती बिहुला', 'रेशमा', 'सलेस भगत'
आरू 'बाबा बिसूराउत' जइसन अमूल्य मौखिक प्रबंध-काव्य केरौ पाठ-संरक्षण आरू शास्त्रीय
विवेचन ई पोथी केरौ सर्वाधिक मौलिक उपलब्धि मानल जैतै। स्वातंत्र्योत्तर काल मँ'अंगभाषा-
परिषद्' सेंलै क करी विश्वविद्यालयक पाठ्यक्रम मँअंगिका केरौ प्रवेश धरिक संगठनात्मक
संघर्ष केरौ दस्तावेजीकरण भावी शोधार्थि सिनी लेली अमूल्य सामग्री छै।
5. गद्य-खण्डक स्वरूप, विधागत विकास आरू गहिर समीक्षा
डॉ० अमरेन्द्र द्वारा लिखित खंड-२: गद्य (पृष्ठ १४९-२६०) अंगिका गद्यक विविध विधा केरौ
प्रादुर्भाव, विकास आरू प्रवृत्तिक सांगोपांग इतिहास प्रस्तुत करै छै। लेखक अंग-जनपद केरौ
सांस्कृतिक अवनति आरू पुनर्जागरणक समाजशास्त्रीय विवेचन करै बीसमीं शती केरौ गद्यसाहित्य केरौ रूपरेखा निर्धारित करनेछथिन।
गद्य-विधा
प्रतिनिधि
साहित्यकार /
संपादक
प्रमुख कृति / मीलस्तंभ
विधागत वैशिष्ट्य आ
अंतर्वस्तु
कथा-साहित्य
(कहानी, व्यंग्य,
अणुकथा)
अनूपलाल मंडल,
डॉ० वचनदेव कुमार,
डॉ० कुमार विमल,
डॉ० मधुकर गंगाधर,
डॉ० अमरेन्द्र।
'फूल फूलैलै' (सं०
'चकोर'),
'दुपल्लो', 'अंगमाधुरी' आ 'आंगी'
मे प्रकाशित सैकड़ो
ग्रामीण शोषण,
कृषक-जीवनक
संत्रास, मध्यवर्गीय
पाखंड आ सामंती
अवशेषक विरुद्ध
गद्य-विधा
प्रतिनिधि
साहित्यकार /
संपादक
प्रमुख कृति / मीलस्तंभ
विधागत वैशिष्ट्य आ
अंतर्वस्तु
कथा। जनवादी आक्रोश।
उपन्यास
अनूपलाल मंडल,
डॉ० नरेश पाण्डेय
'चकोर', डॉ०
अमरेन्द्र।
'नया सूरज नया
चान' (मंडल,
१९९१), 'विशाखा'
('चकोर'), 'जटायु'
(अमरेन्द्र), 'छाहुर',
'सुभद्रांगी',
'परबतिया',
'अन्तहीन वैतरणी'।
सामाजिक चेतना,
लोक-गाथाक
औपन्यासिक
पुनर्सृजन, नारी-मुक्ति
आ आंचलकताक
सशक्त रूपायन।
नाटक एवं रंगमंच
डॉ० नरेश पाण्डेय
'चकोर', डॉ०
अमरेन्द्र, आचार्य
आनन्द शंकर
माधवन।
'किसान केंजगावों',
'सर्वोदय समाज',
'सिंहासन का
संन्यास', 'पूस की
रात' (रूपांतर),
'फूलवा कटोरवा'।
आकाशवाणी
भागलपुरसँ प्रसारित
रेडियो नाटक आ
पारसी-ग्रामीण
शैलीक रंगमंचीय
नाटक; कुरीति-
निवारण।
आत्मपरक
साहित्य (जीवनी,
संस्मरण)
डॉ० नरेश पाण्डेय
'चकोर', गुरेश मोहन
घोष 'सरलऽ।
'एक साहित्यकार
परिवार', 'हलधर
बाबा', 'साहित्य
सन्त: अभयकान्त',
'जो रे तहिया!'
('सरलऽ)।
स्वतंत्रता संग्रामक
संस्मरण, जनपदक
पूर्ववर्ती मनीषीक
आख्यान आ
आत्मानुभूतिक
जीवंत दस्तावेज।
निबंध आ
आलोचना
डॉ० डोमन साहु
'समीर', डॉ०
अभयकान्त चौधरी,
'समीक्षात्मक
निबंध' (समीर),
'अंगिका साहित्य का
भाषावैज्ञानिक
नियमन, ग्रंथमूल्यांकन, रस-
गद्य-विधा
प्रतिनिधि
साहित्यकार /
संपादक
प्रमुख कृति / मीलस्तंभ
विधागत वैशिष्ट्य आ
अंतर्वस्तु
डॉ० अमरेन्द्र।
इतिहास' (चौधरी
एवं चकोर), 'सृष्टि
आपकी दृष्टि मेरी'।
सिद्धांतक अनुप्रयोग
आ जनपदीय
विमर्शक सैद्धांतिकी।
अभिज्ञान-साहित्य
(कोश आ
व्याकरण)
डॉ० डोमन साहु
'समीर', डॉ०
परमानन्द पाण्डेय,
डॉ० अभयकान्त
चौधरी।
'अंगिका-हिंदी
शब्दकोश' (समीर),
'अंगिका व्याकरण'
(समीर), 'प्रथम
अंगिका व्याकरण'
(पाण्डेय)।
भाषाक स्तरीकरण,
मानक वर्तनी-विधान,
शब्द-संपदाक
संरक्षण आ
पुरातात्त्विक
अन्वेषण।
पत्र-पत्रिका-
साहित्य
डॉ० नरेश पाण्डेय
'चकोर', डॉ०
अमरेन्द्र, डॉ०
तेजनारायण
कुशवाहा।
'अंग-माधुरी'
(मासिक, सं०
चकोर, निरंतर ४६
वर्ष), 'आंगी' (सं०
अमरेन्द्र),
'अंगप्रिया',
'नवकल्प'।
जनपदीय अस्मिताक
संवाहक, नवोदित
प्रतिभाक उन्मेषक आ
समेकित साहित्यिक
मंच।
5.1 सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक भूमिभू का: साहित्य केरौ जमीन
डॉ॰ अमरेन्द्रक गद्य-खंड अंग-जनपद केरौ १८५७क विद्रोह, अंग्रेजी शासनक विरुद्ध महेन्द्र गोप
केरौ क्रांतिक बलिदान, विभाजनकालीन सांप्रदायिक हिंसा (तारापुर-भागलपुर), आरू
स्वतंत्रता-पश्चात राजनीतिक उपेक्षा के साहित्य केरौ पृष्ठभूमि केरौ रूप मँविस्तारसेंराखैछै।
"बिकौआ" जेना सामाजिक कुप्रथा केरौ चर्चा आरू जातीय महासभासिनीक उदयक विवेचन
साहित्येतर सामाजिक इतिहास के बुझबा मँ सहायक छै, भले ई अंश कतहु-कतहु साहित्यसमीक्षासेंबेसी समाजशास्त्रीय निबंध बनि जाय छै।
कथा-साहित्य केरौ खंड मँफादर एंतोनियोकरक "नामी गोस्पेल" (१८शती केरौ अंत) आरू
ग्रियर्सन केरौ भाषा-सर्वेक्षण मँसंकलित "उड़ाऊ पुत्र"क दृष्टांतक अंगिका रूपांतरण के आदि
गद्यक प्रमाण केरौ रूप मँ प्रस्तुत करना भाषावैज्ञानिक दृष्टि सेंमहत्वपूर्ण छै। कहानी, उपन्यास,
नाटक, आत्मकथा आदिक सूचीकरण विस्तृत छै, मगर समालोचनात्मक विश्लेषणसेंबेसी
सूचीकरण (नाम, कृति, संक्षिप्त परिचय) पर बल देलौ गेलौ बुझाय छै — ई ई प्रकार केरौ
"प्रारंभिक इतिहास"मँ स्वाभाविक सीमा छेकै।
गद्य-खंडक आरम्भिक पृष्ठ 149–162 साहित्यसें पहिने समाज, राजनीति, शिक्षा आरू
अर्थव्यवस्था पर केन्द्रित छै। पृ. 149 पर औपनिवेशिक शासन, विद्रोह, सामन्ती व्यवस्था आरू
स्थानीय राजनीति; पृ. 153 पर सामाजिक सुधार, जाति, शिक्षा, कन्या-विद्यालय आरू स्त्री-
सुधार; पृ. 157 पर शिक्षा-नीति आरू भाषिक प्रतिष्ठा; पृ. 161 पर उद्योग, रेशम, वन, कृषि
आरू आर्थिक संकटक चर्चा मिलैछै।
ई साहित्येतिहास केरौ बड़ी उपलब्धि छै, कारण साहित्य हवा मँजन्म नैलै। मगर ई पृष्ठभूमि
अगला साहित्यिक रूप सिनी सेंअधिक प्रत्यक्ष सम्बन्ध मांगैछै। उदाहरणार्थ, आर्थिक संकट
कथा केरौ विषय केना बनल? शिक्षा-विस्तार लेखक-वर्ग केना बदलकै? भाषा-राजनीति
कथा/नाटकक शब्द-चयनपर की प्रभाव देलकै? एहन कारण-सूत्र अधिक विकसित हो सकै
छेलै।
5.2 कथा-साहित्य: विषयगत विस्तार आरू निकट-पाठक आवश्यकता
कथा-खंड आधुनिक अंगिका कहानीक उद्भव, मुद्रित संग्रह, लेखक आरू प्रवृत्तिक विस्तृत परिचय
दैछै। पृ. 169 पर आरम्भिक कहानी-संग्रह आरू लेखक केरौ चर्चा, पृ. 177 पर सामाजिक
संघर्ष, नारी-जागृति, वातावरण, प्रेम, शैलीगत भेद आदि विषयगत समूह, आरू आगाँअनेक
कथाकार केरौ रचना केरौ परिचय मिलैछै।
कथा-इतिहास केरौ शक्ति—स्मृति-संरक्षण। सीमा—निकट-पाठ। पोथी विषयक आधारपर
समूह बनाबै छै, मगर कथन-दृष्टि, समय-संरचना, अविश्वसनीय कथाकार, संवाद, प्रतीक,
विडम्बना, अन्त, पात्र-निर्माण, लोकभाषिकता आरू पाठकीय तनावक सूक्ष्म विश्लेषण कम छै।
पाश्चात्य कथाविज्ञान आरू भारतीय ध्वनि-वक्रोक्ति मिलि ई भाग के बहुत समृद्ध करी सकै छै।
5.3 उपन्यास: विधागत आत्मबोध
पृ. 185 पर उपन्यास केरौ तत्व रूप मँकथावस्तु, पात्र, संवाद, देश-काल, शिल्प आरू उद्देश्यक
चर्चा छै; घटना-प्रधान, चरित्र-प्रधान, वातावरण-प्रधान आदि वर्गीकरण भी देलौ गेलौ छै। ई
दर्शबैत छैजे ग्रन्थकार विधागत सिद्धान्त केरौ आधारपर सामग्री व्यवस्थित करबाक प्रयत्न करै
छथिन।
पृ. 193 पर ‘अन्तहीन वैतरणी’क कथा-सार स्त्री केरौ जीवन-संघर्ष, विवाह, अपमान आरू
प्रतिरोध केरौ प्रश्न खोलैछै। एहन उपन्यासपर स्त्रीवादी, समाजशास्त्रीय, कथावैज्ञानिक आरू
ध्वनि-दृष्टि केरौ संयुक्त विश्लेषण सम्भव छै। पोथी कथा-सार दैछै; आलोचनात्मक संस्करण
ई पाठक रूप-शिल्प आरू दृष्टिकोण केरौ विश्लेषण जोड़ि सकै छै।
5.4 नाटक आरू रेडियो-नाटक: माध्यमिक इतिहास केरौ विशिष्ट उपलब्धि
नाट्य-खंडक विशेष महत्त्व रेडियो-नाटकक दस्तावेजीकरण मँछै। पृ. 209 पर प्रसारण-वर्ष,
लेखक, आकाशवाणी भागलपुर, रेडियो-नाटक, रूपान्तर आरू धारावाहिक प्रस्तुति सम्बन्धी
सामग्री छै। ई साहित्येतिहास के मुद्रित पुस्तक केरौ सीमा पार करबैत छै।
भारतीय नाट्यशास्त्रीय दृष्टि सेंहियाँअभिनय, वाचिकाभिनय, संगीत, संवाद, पात्र-विन्यास,
रस-निष्पत्ति आरू श्रोता-अनुभव केरौ चर्चा हो सकै छेलै। माध्यम-अध्ययनक दृष्टि सेंरेडियो
नाटकक ध्वनि, मौन, संगीत, प्रसारण समय आरू श्रोतृ-वर्ग महत्त्वपूर्ण छै। पोथी स्रोत-सूचना दै
छै; प्रदर्शन-विवेचन अगला शोधक विषय बनैछै।
5.5 आत्मपरक साहित्य: निजी जीवनसेंसार्वजनिक इतिहास
पृ. 215–227 क आत्मपरक खंड आत्मकथा, जीवनी, संस्मरण आदि रूप समेटैछै। पृ. 217
पर आत्मकथा-साहित्य केरौ सीमित उपलब्धता स्वीकार करल गेलौ छै आरू विशिष्ट
आत्मकथा/जीवनीक उल्लेख छै। ई रूपक साहित्येतिहास मँ समावेश महत्त्वपूर्ण छै, कारण
लेखक केरौ जीवन, संस्था, शिक्षा, पेशा, भाषा-चेतना आरू सामाजिक नेटवर्कक प्रत्यक्ष सामग्री
एतहि सेंमिलैछै।
मगर आत्मकथा तथ्यक पारदर्शी खिड़की नै। स्मृति चयन करै छै, आत्मछवि बनाबैछै, मौन
रखैत छै, पछिलका अनुभवसें पुरान घटना पुनर्लिखैत छै। तें आत्मपरक स्रोत के अन्य
अभिलेखसेंमिलान करना बहुप्रमाणीय पद्धतिक आवश्यक शर्त छै।
5.6 निबन्ध: विचार-जगतक विस्तार
निबन्ध-खंड साहित्यिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, अनूदित आरू विविध विषयक लेखनक चर्चा करै
छै। पृ. 225 पर निबन्धकार केरौ चिंतन, विवेचन, ललित निबन्ध, अनुवादित निबन्ध आरू
सामाजिक विषयक सूची देखाय छै। ई सें स्पष्ट छैजेअंगिका गद्य मात्र कथा-मनोरंजन तलक
सीमित नै, विचार-विमर्श केरौ माध्यम भी बनल।
निबन्ध केरौ आलोचना मँ पोथी विषय-विस्तारक मूल्यांकन करै छै; मगर तर्क-संरचना,
निबन्धकार केरौ आवाज, विडम्बना, आत्मपरकता, सार्वजनिक विवेक, भाषा-राजनीति आरू
गद्य-लयक सूक्ष्म परीक्षण सीमित छै। हियाँमॉन्तेनसें आधुनिक भारतीय निबन्ध-परम्परा तलक
तुलनात्मक विधा-अध्ययन सम्भव छै, मगर नव संस्करण मँबाहरी तुलना स्रोतसहित देलौ जाए।
5.7 आलोचना: आत्मचेतनाक आरम्भ
आलोचना-खंड (पृ. 228 सें) अंगिका साहित्य केरौ अपनो समीक्षा-परम्परा केरौ निर्माण केरौ
संकेत दैछै। पृ. 233 पर परिचयात्मक आलोचना, तुलनात्मक आलोचना, काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ
आरू छन्द-विवेचनक उल्लेख छै। पोथी ईहो कहैछैजेवैज्ञानिक आलोचना केरौ विकास सीमित
छै आरू नव पीढ़ी केरौ आवश्यकता छै। ई आत्मनिरूपण उल्लेखनीय छै।
ई खंडक आधारपर एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलैछै—साहित्यिक समुदाय परिपक्व तब होय
छै जब ऊ मात्र रचना नै, अपनो रचना केरौ मूल्यांकन-पद्धति भी विकसित करै छै। वर्तमान
समीक्षा ई ऐतिहासिक मागक उत्तर रूप मँभारतीय-पाश्चात्य-समानान्तर तीन स्तर केरौ संयुक्त
कसौटी प्रस्तावित करैछै।
5.8 लोकसाहित्य: मौखिकता केन्द्रीय, पर दस्तावेजी विधि आवश्यक
लोकसाहित्य केरौ स्वतंत्र खंड देना पोथी केरौ व्यापक दृष्टि केरौ प्रमाण छै। लोककथा,
लोकोक्ति, मुहावरा, गीत, गाथा आदि सामग्री क्षेत्रीय स्मृति आरू सामाजिक भाषा केरौ मुख्य
भंडार छथिन। साहित्य केरौ लिखित केन्द्रवाद के ई समावेशसेंचुनौती मिलैछै।
नव संस्करण मँलोकसाहित्य लेली क्षेत्रकार्यक मानक अपनाओल जाए: संग्रहक स्थान, तिथि,
कथक/गायकक नाम वा गोपनीय संकेत, आयु, लिंग, सामाजिक पृष्ठभूमि, प्रदर्शन प्रसंग, ध्वनि-
अभिलेख, पाठांतर, सम्पादकीय हस्तक्षेप। बिना ई विवरण केरौ मौखिक पाठ मुद्रित भेला पर
ओकरौ स्रोत-जीवन अस्पष्ट रहि जाय छै।
5.9 अभिज्ञान-साहित्य: साहित्य केरौ सीमाक विस्तार
पृ. 241 सें “अभिज्ञान-साहित्य” इतिहास, भूगोल, भाषा-शास्त्र, लिपि, कृषि, धर्म, चिकित्सा,
विज्ञान आदि विषयक लेखन समेटैछै। पृ. 249 पर कृषि-साहित्य, आध्यात्मिक लेखन, विज्ञानसंबंधी पुस्तक आदिक उल्लेख मिलैछै। ई वर्ग पारम्परिक “रचनात्मक साहित्य”क सीमा बहुत
व्यापक करैछै।
ई विस्तार सांस्कृतिक इतिहास लेली उपयोगी छै, मगर अवधारणात्मक स्पष्टता चाही। सिनी
ज्ञान-पुस्तक “साहित्य” कैन्हें? कसौटी भाषा-शैली छै, भाषिक योगदान, सामुदायिक ज्ञानपरम्परा, कि मात्र अंगिका मँलिखल होना? जोंअभिज्ञान-साहित्य केरौ परिभाषा स्पष्ट करल
जाए त ई पोथी केरौ मौलिक योगदान बनि सकै छै; अन्यथा विधागत सीमा धुँधली रहतै।
5.10 पत्र-साहित्य आरू पत्र-पत्रिका: सार्वजनिक क्षेत्र केरौ इतिहास
पत्र-साहित्य आरू पत्र-पत्रिका सम्बन्धी अन्तिम खंड साहित्यिक सार्वजनिकता केरौ संरचना
समझै लेली अनमोल छै। पृ. 257 पर दैनिक/साप्ताहिक स्तम्भ, समाचार-पत्र, अंगिका
कविता-कथा प्रकाशन, नियमित स्तम्भ, रिपोर्टाज आरू ललित निबन्ध केरौ चर्चा छै। ई सामग्री
देखाबैछैजेभाषा मात्र पुस्तक मँनै, आवधिक सार्वजनिक संवाद मँजीवित रहैछै।
हाबर्मासीय सार्वजनिक क्षेत्र, बाख्तिनीय बहुध्वनिता आरू पाठक-स्वीकृति तीनू दृष्टि सें ई खंड
गहिर शोधक आधार बनि सकै छै। नव संस्करण मँ प्रत्येक पत्र-पत्रिका केरौ प्रकाशन-काल,
सम्पादक, स्थान, आवृत्ति, उपलब्ध अंक, संग्रहालय/पुस्तकालय, डिजिटल प्रतिक ठिकाना,
प्रमुख बहस आरू पाठकीय पत्रक सूची देलौ जाए।
5.11 उपसंहार: पोथी केरौ आत्मसमीक्षात्मक आयाम
पृ. 259–260 क उपसंहार विशेष महत्त्व रखैत छै। हियाँपोथी साहित्य केसामाजिक, धार्मिक,
सांस्कृतिक, राजनीतिक आरू परिवेशीय प्रभावसें बदलैमानैछै; प्राचीन सिद्ध-कवि आरू कबीर
सम्बन्धी भ्रम केरौ सावधानी देत छै; आधुनिक गद्यक विविध विधा केरौ विकास स्वीकारैत छै;
आरू राजनीति द्वारा संस्कृति-साहित्य केरौ उपयोग पर चेतावनी दैछै।
ई कारण उपसंहार के मात्र समापन नै, पद्धतिक पुनर्जन्म मानलौ जाय सकै छै। जोंनव संस्करण
ई आत्मसमीक्षा के आरम्भिक नियम बनाय—प्रत्येक विवादित दाबी संग स्रोत, प्रतिपक्ष आरू
अनिश्चितता—त पोथी अभिलेखीय महत्त्वसें आलोचनात्मक प्रामाणिकताक अगला स्तरपर
पहुँचि सकै छै।
6. भारतीय काव्यशास्त्रीय आरू प्रमाणमीमांसात्मक समीक्षा
6.1 रस-सिद्धान्त
भरतमुनि आरू अभिनवगुप्तक परम्परा मँ रस साहित्यिक अनुभूति केरौ रूपान्तरित,
साधारणीकृत स्वरूप छै। ‘अंगिका साहित्य केरौं इतिहास’ लोकगीत, सिद्ध-पद, नाथ-पन्थ,
साधु-काव्य, प्रेमगीत, विवाहगीत, सामाजिक कविता, कथा, नाटक आरू अनेक लोकगाथाक
भरपूर सामग्री दैछै। ई कारण रस-विवेचन लेली पोथी अत्यन्त सम्पन्न सामग्री-संग्रह बनि सकै
छै।
मगर ग्रन्थकारक टिप्पणी प्रायः विषय, कवि केरौ जीवन, सामाजिक महत्त्व, भाषा, शैली वा
साहित्यिक स्थानपर केन्द्रित छै। स्थायीभाव, विभाव, अनुभाव, संचारीभाव, रसाभास,
भावान्तर वा रस-संक्रमणक पद्धतिगत विश्लेषण कम मिलैछै। उदाहरणार्थ लोकगाथा मँवीर,
करुण, भक्ति, शृंगार आरू अद्भुतक मिश्रित संभावना छै, कथा-खंड मँनारी-अन्तर्मन, दमन,
परिवार, प्रेम आरू सामाजिक संघर्ष केरौ प्रसंग छै (पृ. 177 आदि), मगर ई भाव-संरचनाक
रसात्मक गहिराई प्रायः खुलल नैछै।
ई आधार पर भारतीय रस-दृष्टि सेंनिर्णय ई होय छै—पोथी रस-समीक्षा नै, रस-समीक्षा लेली
विशाल प्राथमिक भंडार छै। नव संस्करण मँचुनल दस-पन्द्रह प्रतिनिधि पाठक सूक्ष्म रसविश्लेषण जोड़ला सेंसाहित्यिक इतिहास मात्र नाम-पाँजि नै रहतै, अनुभूति केरौ इतिहास भी
बनतै।
ग्रंथ मँ उद्धृत द्धृ पद्य-नमूनासिनी के रस-निष्पत्ति केरौ सूत्र (विभाव-अनुभाव-व्यभिचारिभावसंयोगसें रस केरौ आस्वाद) सेंजाँचला पर एगो रोचक चित्र उभरैछै। सिद्ध सरहपा केरौ दोहा
— "सहजे सहजहु बूझैजब्बे, अंतराल गतिटूटै तब्बें। जब्बेमणुअंथुमणुजाइ, तनुटुट्टइ
बन्धन..." — मँवैराग्य-भावक प्राधान्य छै, जेशांत-रस केरौ अन्तर्गत आबए योग्य छै; हियाँ
स्थायीभाव 'निर्वेद' शरीर-मन-बंधनक नश्वरताक विभावसेंपुष्ट होय छै। शांतिपा केरौ "भव
निर्वाणेपड़ह मादला..." पद भी भव-सागर पार करबाक रूपक-योजनासेंशांत-रस केरौ दिस
झुकल छै, भलेडोम्बी-विवाहक लौकिक बिम्ब-योजनासें ई मँशृंगारक छाया भी घुरल-मिझल
छै — जे सहजयानी साधना-काव्य केरौ चरित्र-लक्षण छेकै। आधुनिक युग मँश्रीनन्दन शास्त्री
केरौ गीत "केकरा देखैयो सखि..." मँ सखि-सम्बोधन-शैलीक माध्य मँकरुण रस केरौ उन्मेष
स्पष्ट छै — दुनियाँक आँख पाथर बनि गेलाक बिम्ब आलंबन-विभाव केरौ (देश-काल केरौ
विनाश) संग जुड़ि करुण के पुष्ट करैछै।
मगर ई रस-विश्लेषणसें एगो आलोचनात्मक निष्कर्ष भी निकलैछै, जकरा ग्रंथ स्वयं आपन
निष्कर्ष-खंड मँ(पृष्ठ १४३) स्वीकार करै छै — कविसिनीक आकर्षण "आंतरिक सौंदर्यक
अपेक्षा वाह्य सौंदर्य दिस बेसी" छै। भरतमुनि केरौ रस-सिद्धान्त केरौ दृष्टि सें ई अंतर "भावकाव्य" आरू "रस-सिद्ध काव्य" केरौ बीचक अंतर छेकै — भाव मात्र उदय होय सकै छै, रसचमत्कारक स्तर तलक पहुँचब सिनी रचना केरौ भाग्य मँनैहोय छै। ई ग्रंथ मँसंकलित बहुतांश
आधुनिक कविता, अपनो इतिवृत्तात्मकताक (आत्मकथात्मकताक) कारण सें, भावोदयक
स्तरपर रहि जाय छै, रस-निष्पत्ति केरौ चरम स्तर तलक विरलेपहुँचैत छै — ई अवलोकन ग्रंथ
केरौ स्वयं केरौ स्वीकृतिसेंभी पुष्ट होय छै।
6.2 ध्वनि-सिद्धान्त आरू व्यंजना-शक्ति
आनन्दवर्धन केरौ ध्वनि-सिद्धान्त काव्य केरौ श्रेष्ठता प्रत्यक्ष वाच्यार्थसें आगाँव्यंजित अर्थ मँ
देखैत छै। समीक्ष्य पोथी अक्सर कविताक विषय अथवा कथा केरौ सामाजिक संदेश बताबैछै;
मगर पाठक अनकहल सांस्कृतिक आशय, मौन, प्रतीक, विडम्बना, संकेत, निषेध, जातीयसामाजिक स्मृति, स्त्री केरौ अप्रकट प्रतिरोध, आरू भाषिक स्वाभिमानक सूक्ष्म व्यंजना पर कम
ठहरैछै।
विशेषतः पृ. 177 पर स्त्री-सम्मान, नारी-उत्पीड़न, नारी-जागृति आरू अन्तर्मनक कथा-प्रवृत्तिक
उल्लेख छै। एहन रचना मँ ध्वनि-दृष्टि पूछत—प्रत्यक्ष कथानकक पाछाँपितृसत्ता, मौन, शरीर,
प्रतिष्ठा, घर-बहिरक सीमा, सामाजिक भय आरू आत्मस्वर केना व्यंजित होय छै? पोथी विषयक
अस्तित्व दर्ज करैछै; ध्वनि-विश्लेषण ओकरौ साहित्यिक ऊर्जा खोलि सकै छेलै।
आनन्दवर्धन केरौ ध्वनि-सिद्धान्त — "काव्यस्यात्मा ध्वनिः" — केरौ कसौटीपर ग्रंथ केरौ एगो
पद्धतिगत प्रयोग विशेष रूप मँपरीक्षणीय छै। नाथ-पंथी काव्य केरौ अध्याय मँ (पृष्ठ २६)
गोरखनाथ केरौ मूल पद "हसिबा, खेलिबा धरिबा ध्यान, अहनिसि करिबा ब्रह्या गियान..." के
"हँसबों, खेलबों, धरबोंधियान..." रूप मँअंगिका व्याकरणिक रूप मँ रूपांतरित करी दुन्नो केरौ
भाषिक सामीप्य देखाओल गेलौ छै। मगर ध्वनि-सिद्धान्त केरौ दृष्टि सें ई प्रयोग एगो मौलिक
भ्रम पर आधारित छै — काव्य केरौ आत्मा शब्द केरौ व्याकरणिक रूप (रूपतत्व) मँनै, बल्कि
ऊ विशिष्ट शब्द-विन्यास द्वारा उत्पन्न व्यंजना (वस्तुध्वनि, अलंकारध्वनि आरू रसध्वनि) मँ
बसैत छै, जेमूल उच्चारणक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक सन्दर्भसेंअभिन्न रूप मँजुड़ल रहैछै।
एगो पद के आधुनिक भाषा केरौ रूपतत्व मँ"अनुवादित" करी पुनः प्रस्तुत करना — भले ऊ
अनुवाद व्याकरणिक दृष्टि सेंकतना निकटकैन्हेंनैहोउ — मूल रचयिताक भाषिक अस्मिता
केरौ प्रमाण नै बनि सकै छै, कैन्हेंकि शब्द-शक्ति (अभिधा-लक्षणा-व्यंजना) करी स्रोत हरदम
मूल उच्चारण छेकै, पश्चातवर्ती रूपांतरण नै। ई तर्क-पद्धति ऊ भ्रम केरौ निकटछै, जहाँ रूपसादृश्य के स्रोत-प्रमाण मानी लेलौ जाय छै।
6.3 वक्रोक्ति
कुन्तक केरौ वक्रोक्ति-सिद्धान्त अनुसार काव्यत्व साधारण कथन केरौ असाधारण अभिव्यक्ति
मँ उभरैछै। अंगिका साहित्य केरौ इतिहास मँलोकभाषा, देशज रूप, हास-व्यंग्य, कथोपकथन,
लोकछन्द, कहावत, गीत-गाथा, रेडियो-भाषा आरू कथा-शैलीक अनेक संकेत मिलैछै। पृ. 177
पर कहानीकार सिनी केरौ वर्णनात्मक, संस्मरणात्मक आरू अन्य शैलीगत भेदक चर्चा भी छै;
पृ. 260 पर गद्यक “शैली-शिल्प”क आधुनिकता केरौ उल्लेख छै।
मगर वक्रोक्ति-दृष्टि सेंशब्द-विन्यास, पद-वक्रता, वाक्य-वक्रता, प्रसंग-वक्रता आरू प्रबन्धवक्रताक उदाहरणात्मक परीक्षा कम छै। खास करी क्षेत्रीय भाषा केरौ साहित्येतिहास मँ ई
आवश्यक छै, कारण भाषा-विशिष्ट काव्यत्व मात्र “ई अंगिकामेलिखल अछि” सेंसिद्ध नैहोय;
भाषा केरौ विशेष अभिव्यक्ति-शक्ति पाठक सूक्ष्म बनावटमँदेखाबय पड़ैछै।
6.4 रीति, गुणगु , अलंकार आरू शैली
वामन केरौ रीति-दृष्टि आरू उत्तरवर्ती गुण-विवेचन साहित्यिक भाषा केरौ रचना-स्वभाव के केन्द्र
मँ आनै छै। पोथी अनेक ठाम “भाषा”, “शैली”, “शिल्प”, “वर्णन”, “संवाद”,
“धारावाहिकता” आदि शब्द केरौ प्रयोग करैछै। गद्य-खंड कथा आरू उपन्यास केरौ भेद करतै
समय कथावस्तु, पात्र, संवाद, देश-काल, शिल्प आरू उद्देश्य जइसन अवयवक उल्लेख करैछै
(पृ. 185)। ई भारतीय रीति-विचारक आधुनिक व्यावहारिक समकक्ष जेना पढ़लौ जाय सकै
छै।
सीमा ई जेशैलीक मूल्यांकन लेली स्थिर कसौटी नै बनैल गेलौ छै। कोनो लेखक “सरल”,
“प्रभावी”, “आधुनिक”, “वर्णनात्मक” कैन्हेंछथिन—ई निर्णयक भाषिक प्रमाण अधिक
चाही। नव संस्करण मँशब्दसंपदा, वाक्यलम्बाइ, संवाद-घनत्व, कथाकार केरौ दृष्टिबिन्दु,
अलंकारिकता, लोक-रूपक, विदेशी शब्द आरू क्षेत्रीय रूपक तुलनात्मक सारिणी उपयोगी होतै।
वामन केरौ रीति-सिद्धान्त — "रीतिरात्मा काव्यस्य" — गुण-त्रय (माधुर्य, ओज, प्रसाद) केरौ
आधारपर काव्य-शैलीक वर्गीकरण करैछै। ग्रंथ मँसंकलित लोक-छन्दाश्रित आधुनिक कविता
(जेना श्रीनन्दन शास्त्री केरौ गीत, जेलोक-रंग मँरँगल कहल गेलौ छै) प्रसाद-गुण-प्रधान शैली
देखाबैछै — सहज बोधगम्यता आरू लोक-प्रचलित शब्दावली एकरौ विशेषता छेकै, ओजगुणक गाम्भीर्य हियाँअपेक्षित भी नैछै। शांतिपा केरौ पद मँ"भव-निर्वाण", "मन-पवन-वेणी",
"करण्ड-कशाला" जेना रूपक-अलंकारक सघन प्रयोग देखल जाय छै, जकरा ग्रंथ स्वयं "रूपक
केरो योजना" कहि रेखांकित करैछै(पृष्ठ २५) — ई भाषिक-साहित्यिक अवलोकन प्रामाणिक
आरू स्वागतयोग्य छै। तैयो आधुनिक कवि-परिचय-खंड मँ(पृष्ठ ६२-१४१) अलंकार-विश्लेषण
प्रायः अनुपस्थित छै; कवि-परिचय जीवनी-आधारित रहि जाय छै, शैली-वैशिष्ट्यक सूक्ष्म
विवेचन दुर्लभ छै — ई एगो साहित्येतिहास केरौ अपेक्षा एगो जीवनी-कोशक बेसी निकटपहुँचि
जाय छै।
6.5 औचित्य
क्षेमेन्द्र केरौ औचित्य-सिद्धान्त साहित्य केरौ प्रत्येक अवयवक प्रसंगानुकूलता पर बल दै छै।
साहित्येतिहास लेली औचित्य केरौ आधुनिक रूप ई प्रश्न बनैछै—जेकवि, रचना वा भाषा-रूप
के जेकाल मँराखल गेलौ छै, ओकरौ तिथि, भाषिक अवस्था, सामाजिक संस्था आरू उपलब्ध
पाठ ऊ स्थानक अनुकूल छैकी नै?
ई कसौटी पर पोथी केरौ आधुनिक भाग प्रायः अधिक सुरक्षित देखाय छै, कारण पत्रिका,
प्रकाशन-वर्ष, अधिवेशन, आकाशवाणी, लेखक-परिचय आरू मुद्रित पुस्तक केरौ उल्लेख मिलै
छै। प्राचीन भाग मँजन्मस्थान, सिद्ध-परम्परा, भाषिक स्वामित्व, आरम्भिक तिथि आदि विषय
अधिक सावधानी मांगैछै। अन्तिम उपसंहारक आत्मस्वीकृति (पृ. 259) स्वयं देखाबैछै जे
किछु प्राचीन स्थान-सम्बन्धी निष्कर्ष पुनर्परीक्षणीय छथिन। औचित्य-दृष्टि ई कारण पोथी केरौ
निन्दा नै, ओकरौ आलोचनात्मक पुनर्संयोजनक साधन छै।
क्षेमेन्द्र केरौ औचित्य-सिद्धान्त — "औचित्यं रसासिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम्" — के
मात्र काव्य-रचना केरौ भीतर सीमित नैराखी क, ऐतिहासिक/समालोचनात्मक कथन केरौ
औचित्यपरो प्रसारित करलौ जाय सकै छै। ई दृष्टि सें, कोनो ऐतिहासिक प्रस्थापना तखने
"सानुचित" मानल जाय छै, जब ओकरा समुचित विभाव अर्थात् प्रमाण-सामग्रीक समर्थन प्राप्त
रहै। उपसंहार मँ(पृष्ठ २५९) प्रस्तुत ई दावा जेमहाकवि विद्यापति केरौ जन्म उत्तरी भागलपुर
केरौ एक भाग सहरसा मँहोलौ, आरू हुनकरौ पिता ओइनवार वंशक राजा गणेश्वरक सभासद
रहलथिन — ई एगो गुरुतर औचित्य-भंगक उदाहरण छेकै, कैन्हेंकि मैथिली साहित्य केरौ
सर्वाधिक प्रतिष्ठित आरू बहु-प्रमाणित कवि केरौ जन्मस्थान-सम्बन्धी ई क्रांतिकारी प्रस्थापना
केबिना कोनो प्रमाण-सामग्रीक उद्धरणक, मात्र एक्के वाक्य मँ प्रस्तुत करल गेलौ छै। औचित्यसिद्धान्त केरौ भाषा मँकहल जाय तँ, दावा केरौ "भार" (गुरुत्व) आरू ओकरा समर्थन देनिहार
विभाव केरौ "हल्कापन" (अभाव) केरौ बीच स्पष्ट असंतुलन छै — जे कोनो सुगठित
ऐतिहासिक तर्क के "रस-असिद्ध" अर्थात्अप्रतीतिकर बना दैछै।
6.6 सहृदय, साधारणीकरण आरू सामुदा मु यिक स्मृति
भारतीय काव्यशास्त्र मँ सहृदय मात्र निष्क्रिय पाठक नै; ऊ संस्कार, संवेदना आरू अर्थग्रहणक
सक्रिय सहभागी छै। अंगिका साहित्य केरौ इतिहास लोकगीत, कहावत, लोकनाटक, लोकगाथा,
पत्रिका, रेडियो आरू सार्वजनिक साहित्यिक मंच के समाविष्ट करैछै। ई कारण पोथी मँ सहृदयक
सामाजिक रूप निहित छै—गामक श्रोता, विवाहगीत गबनिहार स्त्री, रेडियो श्रोता, पत्रिका-
पाठक, अधिवेशनक सहभागी, स्थानीय शिक्षक, लेखक-मंडली।
मगर वास्तविक पाठक-अध्ययन, संस्करण-संख्या, प्रसार-क्षेत्र, पाठकीय पत्र, वाचन-परम्परा,
स्त्री-पुरुष पाठक अनुपात, ग्राम-नगर भेद आदि आँकड़ा प्रायः नै छै। फलतः सामुदायिक
स्वीकृतिक चित्र उपस्थित छै, परिमाणित पाठक-इतिहास नै।
6.7 नव्य-न्यायक प्रमाण-मीमांसा
मिथिला केरौ अपनो गौरवशाली नव्य-न्याय परम्परा (गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि आदि
मँ प्रतिष्ठित प्रमाण-मीमांसा) प्रमाण के चार कोटिमँबाँटैत छै — प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आरू
शब्द/आगम। ई कसौटी पर उपसंहार मँ प्रस्तुत व्युत्पत्तिमूलक तर्क — "काशी > कासड़ी
(भागलपुर)" आरू "मुद्गलपुर > मुद्गर > मगहर > मुंगेर" (पृष्ठ २५९) — द्वारा कबीर के अंगक्षेत्रसेंजोड़बाक प्रयास के जाँचल जाय तँ ई मात्र ध्वन्यात्मक सादृश्यपर आधारित छै, जकरा
नैयायिक भाषा मँ"साधर्म्य-वैधर्म्यमूलक हेत्वाभास" कहलौ जाय सकै छै। कोनो सामान्य
नियम (व्याप्ति) — जे"स्थान-नामक ध्वन्यात्मक सादृश्य सदिखन ऐतिहासिक तादात्म्यक
सूचक होइत अछि" — स्थापित नैकरल गेलौ छै, आरू बिना व्याप्ति-ग्रहणक कोनो एकल
दृष्टान्तसेंसामान्यीकरण करना अनुमान-प्रमाण केरौ मौलिक शर्तक उल्लंघन छेकै। यैह बात
"विद्यापति-सहरसा" दावापर भी लागूहोय छै — शब्द-प्रमाण (आगम) तखनेमान्य होय छै,
जब ऊ किओ विश्वसनीय मूल स्रोत (प्रामाणिक ग्रंथ, ताम्रपत्र, वंशावली) पर आधारित होइक;
हियाँ एहन कोनो शब्द-प्रमाण केरौ उद्धरण नैदेलौ गेलौ छै।
6.8 भारतीय इतिहास-लेखन-परम्परा: इतिवृत्त आरू समालोचनात्मक इतिहास
पौराणिक परम्परा मँ"इतिहास" पंच-लक्षणसें(सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानुचरित)
युक्त मानल जाय छै, जेमँवंशानुचरित (राजवंश आरू समाज केरौ निरंतरताक कथा) एगो
प्रमुख अंग छेकै। गद्य-खंडक प्रारंभिक अध्याय "अंग-जनपदोंके पिछलका स्थिति-परिस्थिति"
(पृष्ठ १४९-१६२) स्पष्ट रूप मँ ई वंशानुचरित-शैलीक अनुसरण करैछै — राजनीतिक इतिहास,
जातीय महासभाक उत्थान, सामाजिक कुप्रथा केरौ विवरण साहित्येतिहाससेंपहिनेविस्तारसें
राखल गेलौ छै। ई भारतीय इतिहास-लेखनक एगो जेनुइन देशज पद्धति छेकै, जेसाहित्य के
समाज-वंशसेंकाटिकरी नैदेखैत छै — ई दृष्टि सें ई ग्रंथ अपनो सांस्कृतिक जड़िसेंजुड़ल छै।
मगर एकरौ मूल्य ई भी छेकै जेविशुद्ध साहित्यिक विश्लेषण (काव्य-गुण-दोष विवेचन) कतोक
ठाम ई वंशानुचरितात्मक विस्तार मँ दबि जाय छै, जकरा आधुनिक समालोचना-पद्धतिक
कसौटीपर एगो सीमा मानलौ जाय सकै छै।
7. पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त केरौ दृष्टि सें समीक्षा
7.1 साहित्येतिहास केरौ सिद्धान्त
रेनेवेलेक केरौ प्रसिद्ध निबंध "द फॉल ऑफ लिटरेरी हिस्ट्री" मँ ई चेतावनी देलौ गेलौ छै जे
साहित्येतिहास प्रायः दू छोरपर जा फँसैत छै — वा तँशुद्ध सकारात्मकतावादी सूची-निर्माण
(नाम, तिथि, कृतिक गणना) वा फेर वैचारिक/राष्ट्रवादीटेलिओलॉजी (एगो पूर्वनिर्धारित गंतव्य
दिस अग्रसर होय कथा)। प्रस्तुत ग्रंथ मँ दुन्नो प्रवृत्ति स्पष्ट देखलौ जाय सकै छै — आधुनिक
कवि-परिचय-खंडक ८० पृष्ठ (६२-१४१) प्रायः पहिल छोर (सूचीकरण) दिस झुकल छै, जब कि
समग्र आख्यान (अंगक प्राचीन गौरव → राजनीतिक उपेक्षा → साहित्यिक क्षतिपूर्ति) दोसर
छोर (टेलिओलॉजिकल आख्यान) केरौ उदाहरण छेकै। वेलेक केरौ अनुसार, सच्चा
साहित्येतिहास ई दुन्नो के — कालक्रमबद्ध तथ्य आरू सौंदर्यशास्त्रीय मूल्यांकन — के एकठाम
गूंथने रहैछै; प्रस्तुत ग्रंथ मँ ई गुंथाव आंशिक रूपेण होलौ छै, पूर्ण रूपेण नै।
7.2 नव-इतिहासवाद
नव-इतिहासवादी दृष्टिकोण केरौ अनुसार पाठ आरू संदर्भ परस्पर-निर्मायक होय छै — साहित्य
मात्र इतिहास केरौ प्रतिबिम्ब नै, बल्कि शक्ति-संबंध केरौ उत्पादन मँ स्वयं सहभागी होय छै। ई
दृष्टि सें गद्य-खंडक ऊ अध्याय, जेमँ १८५७क विद्रोह, महेन्द्र गोप केरौ बलिदान, विभाजनकालीन
तारापुर-भागलपुर हिंसा, आरू स्वतंत्रता-पश्चात जातीय-महासभा-राजनीतिक उदय के साहित्य
केरौ पृष्ठभूमि केरौ रूप मँविस्तारसेंराखल गेलौ छै(पृष्ठ १५०-१५३) — नव-इतिहासवादक दृष्टि
सें एगो सराहनीय उपक्रम छेकै, कैन्हेंकि ई साहित्य के शक्ति-संरचनासेंकाटिकरी शुद्ध
सौंदर्यवस्तुनै बनाबैछै, बल्कि ओकरा राजनीतिक-सामाजिक इतिहास केरौ अभिन्न भागक
रूप मँ प्रस्तुत करैछै।
7.3 कल्पित समुदा मु य आरू आविष्कृत परम्परा
बेनेडिक्टएंडरसन केरौ प्रसिद्ध थीसिस — मुद्रण-पूँजीवाद (प्रिंट-कैपिटलिज्म) आरू स्थानीय
भाषा केरौ मुद्रित प्रसार एगो "कल्पित समुदाय" (इमैजिन्ड कम्युनिटी) करी निर्माण करैछै —
ई ग्रंथ केरौ अस्तित्वपर हूबहू लागूहोय छै। स्वयं ग्रंथ मँ उल्लिखित पत्रिका-परम्परा — 'भारती'
(१९५४, गाम बाथ, भागलपुर), 'अंगिकांचलऽ, 'आंगी', 'अंग-प्रिया', 'अंग-तरंगिनी' (पृष्ठ
१४३) — प्रिंट-आधारित ओ पूर्वापेक्षित अवसंरचना थिक, जकर माध्यमसँबिखरल अंगिका-
भाषी जनसमूह अपनाकेँ एकटा साझा भाषिक-सांस्कृतिक समुदायक रूपमे"कल्पित" करैत
अछि। सिद्ध-कविसिनी आ विद्यापति-कबीर जकाँप्राचीन/महान्नामसिनीकेँ"पूर्वज" घोषित
करब — एरिक हॉब्सबॉमक शब्दावलीमे — एकटा "इनवेंटेड ट्रेडिशन" (आविष्कृत परम्परा)
कऽ शास्त्रीय उदाहरण थिक, जाहिमेनवोदित पहचान-परियोजना अपनाकेँवैधता देबाक हेतु
प्राचीनताक आवरण ओढ़ैत अछि।
7.4 सांस्कृतिक पूँजी पूँ आरू साहित्यिक क्षेत्र
बोर्दियूक "साहित्यिक क्षेत्र" (फील्ड) सिद्धान्त अनुसार, कोनो साहित्यिक कृतिक मान्यता
ओकरौ आंतरिक गुणसेंजतेक नै, ओतेक बेसी संस्थागत "स्वीकृति-प्रदाता" (कन्सिक्रेटिंग
एजेंसी) — अकादमी, पुरस्कार, प्रकाशन-गृह — पर निर्भर करैछै। ई ग्रंथ केरौ प्रकाशन-कथा
(पृष्ठ ३, ८) एकरौ सटीक दृष्टान्त छेकै — ग्रंथ केरौ अस्तित्व एगो एकल औद्योगिक दानदाता
(पद्मश्री डॉ॰ बी॰ वी॰ राजू) आरू एगो अकादमी केरौ (हिंदी अकादमी, हैदराबाद — जेअंगिका-
भाषी क्षेत्रसेंबाहर, आंध्र प्रदेश मँस्थित छै) उदार सहयोगपर निर्भर रहल। ई तथ्य बोर्दियूक ऊ
अवधारणाक ठोस उदाहरण छेकै, जे मँ एगो प्रभुत्वहीन/परिधीय साहित्यिक क्षेत्र अपनो
प्रतीकात्मक पूँजी (सिंबॉलिक कैपिटल) स्वयं उत्पन्न नैकरी सकबाक कारण सेंबाहरी संस्था-
तंत्रपर निर्भर रहैछै।
7.5 उत्तर-औपनिवेशिक आरू निम्नवर्गीय इतिहास-लेखन
रणजित गुहा-प्रवर्तित सबाल्टर्न स्टडीज़क दृष्टि सें"नीचाँसँ इतिहास" लिखना — केन्द्रीकृत,
प्रभुत्वशाली (हियाँहिंदी-केंद्रित) आख्यान केरौ विरुद्ध एगो प्रतिरोधी उपक्रम छेकै। अंगिका केरौ
ई परियोजना संरचनात्मक रूपेण ई निम्नवर्गीय-इतिहासलेखनक ढाँचा मँफिटबैसैत छै —
बिहारक आंतरिक भाषिक बहुलता के "हिंदी-पट्टी" केरौ एकरूपी आख्यान केरौ विरुद्ध सामने
अनैत छै। मगर गायत्री स्पिवाक केरौ प्रसिद्ध प्रश्न — "कऽ सबाल्टर्न बाजि सकैत अछि?" —
हियाँभी प्रासंगिक छै। ई इतिहास डॉक्टरेट-उपाधिधारी, संस्थागत रूपेण प्रतिष्ठित (कुलमचिव,
अकादमी-अध्यक्ष जेना पद धारण कएनिहार) विद्वानसिनी द्वारा लिखल गेलौ छै, जेअपनो तर्कपद्धति आरू ऐतिहासिक ढाँचा प्रायः ऊ हिंदी/संस्कृतनिष्ठ अकादमिक मॉडलसें ग्रहण करैछथिन,
जेकरौ विरुद्ध ई परियोजना खड़ होलौ छै। ई विरोधाभास के चिन्हित करना आवश्यक छै —
निम्नवर्गीय पहचानक हेतु आवाज उठेनिहार स्वर स्वयं अभिजात्य संस्थागत भाषा मँ गठित छै।
7.6 अंतःपाठकता
क्रिस्तेवाक अंतःपाठकता-सिद्धान्त अनुसार प्रत्येक पाठ अन्य पाठसिनीक मोज़ाइक छेकै —
कोनो एकल, शुद्ध, एकल-स्वामित्वयुक्त उद्गम-बिंदु दुर्लभ होय छै। ई सिद्धान्त केरौ आलोक मँ
सिद्ध-नाथ-चर्यापद-परम्परा आरू कबीर-परम्परा के नव रूप मँबुझल जा सकै छै — ई साझा
पाठ-संपदा छेकै, जे आधुनिक मानकीकृत भाषिक सीमारेखा निर्धारित होएबासेंपूर्वेक मौखिकहस्तलिखित निरंतरता मँबंगला, असमिया, ओड़िआ, मैथिली आरू अंगिका — सभटा परवर्ती
परम्परा केरौ साझा पूर्वज-सामग्री छेकै। ई दृष्टि सें बहुविध भाषिक परम्परा द्वारा एकहि चर्यापदकोषपर दावा करना आवश्यक रूपेण "चोरी" नै, बल्कि पाठक अंतर्निहित बहुस्वामित्वशीलताक
स्वाभाविक परिणाम छेकै। मगर हियाँ समीक्षात्मक बिंदु ई छै — ग्रंथ ई साझा-विरासत के
"साझा संगम" केरौ रूप मँ प्रस्तुत नै करै, बल्कि "अंगिका केरो कवि" जेना अनन्यस्वामित्वसूचक भाषा मँ प्रस्तुत करैछै — जेअंतःपाठकता-सिद्धान्त केरौ भावनाक विपरीत,
प्रतिस्पर्धी-स्वामित्व केरौ भाषा मँबात करैछै।
7.7 रूपवाद आरू नव-समीक्षा: निकट-पाठक प्रश्न
रूसी रूपवाद आरू नव-समीक्षा साहित्यिक रचना केरौ बनावट, पुनरावृत्ति, बिम्ब, विरोध,
विडम्बना, कथन-रणनीति, ध्वनि-संरचना आरू शब्द-चयनपर निकट दृष्टि मांगैछै। समीक्ष्य पोथी
केरौ प्रधान प्रयोजन साहित्यिक इतिहास बनायब छै, एही लेली हजारो रचना मँ सभक निकटपाठ सम्भव नैछेलै। मगर किछु प्रतिनिधि पाठक विस्तृत विश्लेषण आवश्यक छेलै, जेकरा सें
“महत्त्वपूर्ण”, “श्रेष्ठ”, “आधुनिक”, “प्रभावी” जइसन मूल्य-निर्णय प्रमाणित होय।
गद्य-खंड कथा-विवेचन मँविषयगत समूह बनाबैछै—नारी-जागृति, वातावरण, प्रेम, सामाजिक
संघर्ष आर्ष दि (पृ. 177)—मगर एहन वर्गीकरण “की कहल गेल” बताबैछै; “कोना कहल गेल”
पर कम प्रकाश दैछै। रूपवादी कसौटीपर ई पोथी केरौ प्रमुख आलोचनात्मक कमी छै।
7.8 संरचनावाद: वर्गीकरण केरौ शक्ति आरू सीमा
संरचनावादी दृष्टि सेंपोथी केरौ काल-विभाजन, विधा-विभाजन, कविता–गद्य, लोक–लिखित,
मंच–मंचोत्तर, कथा–उपन्यास–नाटक–निबन्ध–आलोचना आदि वर्गीकरण एक अर्थ-व्यवस्था
बनाबैछै। ई संरचना पाठक केविशाल सामग्री मँदिशा दैछै। खास करी “मंच” केन्द्रीय संकेतक
बनि साहित्यिक संस्था केरौ नेटवर्क देखाबैछै।
मगर वर्गीकरण केरौ नियम सर्वत्र एकसमान नै। कतहु तिथि, कतहु संस्था, कतहु शैली, कतहु
धार्मिक सम्प्रदाय, कतहु माध्यम, कतहु पीढ़ी—पृथक्-पृथक् आधार एकहि स्तरपर प्रयुक्त छै।
संरचनावादी पुनर्लेखन मँ वर्गीकरण केरौ प्रत्येक अक्ष पृथक् चाही: काल, विधा, माध्यम, संस्था,
विचारधारा, भूगोल, भाषा-रूप। ई पाँच-सात अक्ष के एक दोसर मँनैमिलाओल जाए।
7.9 व्याख्याशास्त्र: परम्परा-निर्माण आरू पूर्व पूबोध
गाडामर केरौ व्याख्याशास्त्रीय दृष्टि कहैछै जे इतिहासकार परम्परासेंबाहर ठाढ़ नै होय; ऊ
अपनो समयक प्रश्नसेंअतीत पढ़ैत छै। ‘अंगिका साहित्य केरौं इतिहास’ भी 1990-दशकक
भाषिक-सांस्कृतिक आत्मपहिचान, संस्थागत प्रयास आरू साहित्यिक संगठनक क्षितिजसें
प्राचीन आरू आधुनिक सामग्री के पुनर्संयोजित करैछै। ई दोष मात्र नै; सिनी साहित्येतिहास
एहन क्षितिज-संवाद करैछै।
समस्या तब होय छैजब वर्तमान पहिचान केरौ आवश्यकता अतीतक अनिश्चित प्रमाण केनिश्चित
वंशावली मँ बदलि दैछै। व्याख्याशास्त्रीय ईमानदारी लेली इतिहासकार के अपनो पूर्वबोध स्पष्ट
करबाक चाही। पोथी केरौ प्रकाशकीय, प्राक्कथन आरू उपसंहार ई आत्मबोधक अनेक संकेत
दैछै; नव संस्करण मँ एक स्वतंत्र “पद्धति आ स्रोत” अध्याय ई बात के अधिक स्पष्ट करी सकै
छै।
7.10 बाख्तिन: बहुभाषिकता, बहुध्वनिता आरू माध्यम
बाख्तिन केरौ संवादिता आरू बहुध्वनिता-दृष्टि सेंपोथी विशेष रूप मँ सशक्त छै। हियाँमात्र उच्च
काव्य नै, लोककं ठ, गीत, गाथा, कथा, हास-व्यंग्य, रेडियो-नाटक, आत्मकथा, पत्र, पत्रिका,
आलोचना, इतिहास-भूगोल आरू विज्ञान-लेखन तलक अनेक सामाजिक स्वर एकहि साहित्यिक
क्षेत्र मँ प्रवेश करै छै। पृ. 209 पर रेडियो-नाटकक लेखक, प्रसारण आरू रूपान्तरक चर्चा ई
माध्यमिक बहुध्वनिताक ठोस उदाहरण छै।
ई दृष्टि सेंअंगिका साहित्य केरौ “एक शुद्ध आवाज” खोजना पोथी केरौ वास्तविक उपलब्धिक
विरुद्ध होतै। पोथी स्वयं देखाबैछैजेसाहित्य अनेक सामाजिक भाषा, संस्था आरू माध्यमक
मिलनबिन्दु छै। नव संस्करण मँ ई बहुध्वनिता केविश्लेषणात्मक रूप मँनाम देलौ जाए त पोथी
केरौ आधुनिक महत्त्व आरो बढ़तै।
7.11 मार्क्सवादी आरू सांस्कृतिक भौतिकवादी दृष्टि
गद्य-खंडक आरम्भ (पृ. 149–162) राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक आरू आर्थिक परिस्थिति
पर विस्तृत चर्चा करैछै। पृ. 153 पर सामाजिक सुधार, शिक्षा, स्त्री-सुधार, जातिगत संस्था
आरू गुलामी-प्रथाक अवशेष केरौ उल्लेख छै; पृ. 161 पर आर्थिक परिस्थिति, रेशम-उद्योग,
वन, कृषि आरू औद्योगिक संकटपर विचार छै। ई सामग्री साहित्य के सामाजिक आधारसें
जोड़बाक महत्त्वपूर्ण प्रयास छै।
मगर सांस्कृतिक भौतिकवाद पूछत—ई आर्थिक-सामाजिक परिवर्तन साहित्यिक रूप, प्रकाशन,
लेखक केरौ वर्ग-स्थिति, पाठक-वर्ग, विषय-चयन, भाषा-मानकीकरण वा पुस्तक-बाजार के
प्रत्यक्ष केना बदलकै? पोथी पृष्ठभूमि दैछै, मगर कारण-सम्बन्ध प्रायः अनुमानित रहि जाय छै।
अधिक अभिलेखीय प्रमाण—प्रकाशन संख्या, संस्थागत धन, शिक्षित वर्गक विस्तार, पत्रिका
केरौ वितरण, लेखक केरौ पेशा—ई कड़ी के मजबूत करतै।
7.12 उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि: भाषा, सत्ता आरू प्रत्याख्यान
पृ. 157 पर अंग्रेजी शिक्षा, स्थानीय भाषा, “मधुबनी-बोली”क संस्थागत प्रतिष्ठा आरू अंगिका
सम्बन्धी भाषिक-राजनीतिक असन्तोषक स्पष्ट वर्णन छै। ई अंश उत्तर-औपनिवेशिक समीक्षा
लेली अत्यन्त महत्त्वपूर्ण छै, कारण हियाँभाषा मात्र संचार नै, सत्ता, विद्यालय, विश्वविद्यालय,
अनुदान, प्रतिष्ठा आरू क्षेत्रीय पहिचान केरौ विषय बनैछै।
उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि पोथी केरौ प्रतिरोधी मूल्य स्वीकारैत छै—केन्द्रीय अथवा प्रतिष्ठित
भाषिक आख्यान केरौ बाहर स्थानीय साहित्यिक सार्वजनिकता दृश्यमान बनाओल गेलौ। मगर
समानान्तर इतिहास-दृष्टि एक अतिरिक्त सावधानी मांगैछै: केन्द्रीय आख्यान गलत होय सकै
छै, पर हाशिया केरौ आख्यान स्वतः सत्य नै। प्रतिरोधी इतिहास के भी स्रोत, तिथि, तुलनात्मक
भाषा-विज्ञान आरू बहुस्रोतक कसौटी पार करय पड़त।
7.13 स्त्रीवादी समीक्षा: उपस्थिति, विषय आरू प्रतिनिधित्व
पोथी स्त्री-अनुभव के पूर्णतः उपेक्षित नैकरै। सामाजिक पृष्ठभूमि मँ स्त्री-उत्थान आरू कन्या-
शिक्षाक चर्चा छै (पृ. 153)। कथा-खंड मँनारी-सम्मान, नारी-उत्पीड़न, नारी-जागृति, नारी-
अन्तर्मन आदि विषयक रचना केरौ उल्लेख छै (पृ. 177)। पृ. 193 पर आशा पूर्वेक उपन्यास
‘अन्तहीन वैतरणी’क विस्तृत परिचय मिलैछै। आत्मपरक साहित्य मँ स्त्री-लेखिका सम्बन्धी
सामग्री भी दर्ज छै (पृ. 217)।
मगर स्त्रीवादी इतिहास मात्र स्त्री-विषय खोजना नै; लेखकीय प्रतिनिधित्व, प्रकाशन-संस्था,
आलोचनात्मक स्वीकृति, घरेलूश्रम, देह, विवाह, उत्तराधिकार, शिक्षा, जाति-वर्ग आरू
भाषिक अधिकारक संग स्त्री-अनुभव केरौ सम्बन्ध जाँचना भी छै। पोथी समूचा लेखक-सूची मँ
स्त्री-पुरुष अनुपातक सांख्यिकीय पाँजि नै दैछै; तें प्रतिनिधित्व केरौ समता सम्बन्धी कठोर
निष्कर्ष बिना स्वतंत्र गणना देना उचित नै। नव संस्करण मँ ई गणना अनिवार्य होतै।
7.14 फूको आरू विमर्श-सत्ता: साहित्य केरौ इतिहास स्वयं सत्ता-कर्म
ककरा “पहिल कवि”, “श्रेष्ठ लेखक”, “आधुनिक”, “प्राचीन”, “लोक”, “सिद्ध”, “अंगिका”
अथवा “बाहर” कहल जाए—ई मात्र निर्दोष वर्गीकरण नै; ई साहित्यिक स्मृतिक सत्ता-विन्यास
बनाबैछै। पोथी अनेक विस्मृत नाम के दृश्य करैछै, जे एक प्रतिरोधी कॅनन-निर्माण छै। मगर
जब नव कॅनन बनैछै, तब ओकरौ चयन, मौन, अनुपस्थिति आरू प्राधिकार भी जाँचल जाए।
ई दृष्टि सें आलोचना पोथी केरौ उद्देश्य के नकारैत नै; उलटे ओकरौ ऐतिहासिक महत्त्व बढ़बैत
छै। 1998 ई.क ई पोथी अंगिका साहित्यिक सार्वजनिकता केरौ संस्थापना मँ स्वयं एक घटना
छै। तें एकरौ अध्ययन “पोथी अंगिका साहित्यकेँकोना वर्णित करैत अछि?” मात्र नै, “ई पोथी
अंगिका साहित्यिक कॅननकेँकोना बनबैत अछि?” भी होयबाक चाही।
7.15 पाठक-स्वीकृति सिद्धान्त
याउस आरू ईज़रक पाठक-स्वीकृति दृष्टि सें “मंच”, अधिवेशन, पत्रिका, आकाशवाणी,
धारावाहिक कथा, रेडियो-नाटक, स्तम्भ, समाचार-पत्र आरू साहित्यिक संस्था अत्यन्त उपयोगी
सामग्री छै। पृ. 209 पर रेडियो-नाटकक प्रसारण, पृ. 257 पर पत्र-पत्रिका केरौ स्तम्भ आरू
नियमित प्रकाशनक चर्चा देखाबैछैजेसाहित्य पाठक-श्रोता समुदाय बिना जीवित नै।
तैयो वास्तविक स्वीकृति-इतिहास लेली समीक्षा-लेख, पत्र, बिक्री, सदस्यता, प्रसार-संख्या,
श्रोता-प्रतिक्रिया, पुनर्मुद्रण, मंचीय प्रस्तुति संख्या, पाठ्यक्रम-समावेशन आदि चाही। पोथी
संस्था केरौ अस्तित्व बताबैछै; पाठकीय प्रतिक्रिया-संरचनाक पूर्ण इतिहास अखनी बाँकी छै।
8. विदेह समानान्तर परम्परा-दृष्टि
विदेह समानान्तर परम्परा-दृष्टि मुख्यधारा केरौ नकार नै, हाशिया केरौ स्वतः महिमामंडन भी नै।
एकरौ मूल आग्रह छै—स्रोत केरौ बहुलता, प्रमाण केरौ अनुशासन, केन्द्र आरू हाशिया दुन्नो पर
समान कसौटी, मानवीय गरिमा, बहुकेन्द्रिक सार्वजनिकता, परम्परासेंसंवाद आरू निरन्तर
आत्मसमीक्षा। ई समीक्षा मँ सात कसौटी लागूकरल गेलौ छै: बहुप्रमाणीय विवेकवाद,
सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद, गरिमा-आधारित नैतिकता, बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्र, धर्मक
विवेकपूर्ण बहुलता, समानान्तर इतिहास-दृष्टि, आरू आत्मसमीक्षा।
समानान्तर सूत्र: परम्परासें बाहर नै, परम्परा केरौ भीतर कैद नै; स्रोत केरौ
उत्तराधिकारी बनू, स्रोत केरौ प्रहरी नै; जेभेटल से ग्रहण करौ, जेअसत्य सेसंशोधित
करौ।
8.1 बहुप्रमाणीय विवेकवाद
समीक्ष्य पोथी केरौ निर्माण स्वयं बहुप्रमाणीय प्रयत्नक संकेत दै छै—मुद्रित रचना, लेखकपरिचय, पत्रिका, लोकगीत, जनश्रुति, भाषा-रूप, सामाजिक इतिहास, संस्था, रेडियो, पत्र आरू
आलोचना एकत्र करल गेलौ छै। ई एक पैघ शक्ति छै।
मगर सिनी प्रमाण समान दर्जाक नै। दिनांकित मुद्रित पुस्तक, लेखक केरौ आत्मकथा,
समकालीन समाचार, मौखिक जनश्रुति, पछिलका किंवदन्ती, भाषिक अनुमान आरू सम्पादकक
स्मृति पृथक्-पृथक् ज्ञान-स्रोत छथिन। बहुप्रमाणीय विवेकवादक माँग छैजेस्रोत बहुल हो, मगर
ओकरौ विश्वसनीयता-क्रम स्पष्ट हो। नव संस्करण मँ प्रत्येक प्रमुख दाबी संग स्रोत-श्रेणी देलौ
जाए: प्राथमिक पाठ, समकालीन अभिलेख, उत्तरवर्ती स्रोत, मौखिक साक्ष्य, भाषिक अनुमान,
अथवा सम्पादकीय निष्कर्ष।
8.2 सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद
अंगिका एक सामाजिक-भाषिक वास्तविकता रूप मँलोकक बोलचाल, साहित्य, संस्था,
पत्रिका आरू आत्मपहिचान मँ उपस्थित छै—पोथी केरौ विशाल सामग्री ई अस्तित्वक साक्ष्य
देत छै। मगर भाषिक सीमा, ऐतिहासिक वंश, उपभाषिक सम्बन्ध आरू नामकरण समयसें बदलि
सकै छै। सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद हियाँ दू अतिवादसें बचबैत छै: एक दिस “सब मात्र
राजनीतिक निर्माण अछि” कहि वास्तविक भाषिक समुदाय के नकारब; दोसर दिस वर्तमान
पहिचान के अतीत मँअपरिवर्तित रूप मँ आरोपित करना।
एही लेली समीक्षाक निष्कर्ष ई र्ष नैजेअंगिका अनिवार्यतः अमुक भाषा केरौ भीतर छैवा बाहर; ई
प्रश्न तुलनात्मक भाषाविज्ञान, ऐतिहासिक ध्वनि-विकास, व्याकरण, शब्दसंपदा, दस्तावेज आरू
आत्मपहिचान सभक संयुक्त परीक्षण मांगैछै। पोथी केरौ साहित्यिक सामग्री ई अनुसन्धानक
एक प्रमुख स्रोत होय सकै छै, अन्तिम निर्णय नै।
8.3 गरिमा-आधारित नैतिकता
क्षेत्रीय भाषा-साहित्य के अदृश्यता सेंबाहर आनब अपनेमँ गरिमाक कार्य छै। पोथी लोककं ठ,
कम प्रसिद्ध लेखक, स्थानीय पत्रिका, स्त्री-विषय, श्रम-जीवन, ग्राम्य संस्कृति, साधु-लोक,
रेडियो आरू गैर-महानगरीय साहित्यिक संस्था दर्ज करैछै। ई सांस्कृतिक गरिमाक पुनर्स्थापन
छै।
मगर गरिमा मात्र “हमर परम्परा महान” कहना नै। जोंजाति, लिंग, आर्थिक असमानता, श्रमिकअनुभव, धार्मिक अल्पता, ग्रामीण-शहरी विषमता वा भाषिक सीमा भीतर ककरो आवाज कम
छै, तेकरौ अभाव भी दर्ज होतै। पोथी किछु सामाजिक प्रश्न उठबैत छै; नव संस्करण मँ
प्रतिनिधित्व केरौ व्यवस्थित सूचकांक चाही।
8.4 बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्र
पोथी केरौ मूल सांस्कृतिक हस्तक्षेप बहुकेन्द्रिक छै: साहित्यिक वैधता मात्र महानगर,
विश्वविद्यालय वा प्रतिष्ठित भाषा-केंद्रक देन नै; भागलपुर, मुंगेर, स्थानीय मंच, पत्रिका, गाम,
रेडियो आरू लोकपरम्परा भी साहित्यिक केन्द्र बनि सकै छै। ई दृष्टि आधुनिक बहुकेन्द्रिक
सांस्कृतिक लोकतन्त्रसेंमेल खाइत छै।
मगर बहुकेन्द्रिकताक नैतिक कसौटी ई भी छै जेअंगिका-केंद्र स्वयं अपनो भीतरक बोली,
सीमावर्ती भाषारूप, जनजातीय वा स्थानीय उपरूपपर एकरूपता थोपय नै। “केन्द्रक
आलोचना” तब विश्वसनीय होय छैजब नव केन्द्र अपनो परिधिक स्वतंत्रता भी मानैछै।
8.5 धर्मक विवेकपूर्ण पू बहुलता
सिद्ध, नाथ, साधु, भक्ति, कबीर-परम्परा, लोकदेवता, धार्मिक गीत आरू विविध सांस्कृतिक
परम्परा केरौ समावेश पोथी केरौ एक विशेषता छै। विवेकपूर्ण बहुलता ई सामग्री के न त
धर्मविरोधी पूर्वाग्रहसेंपढ़त, न श्रद्धाक कारण ऐतिहासिक प्रश्न रोकत। धार्मिक साहित्य केरौ
आध्यात्मिक मूल्य, सामाजिक कार्य, भाषिक योगदान आरू ऐतिहासिक प्रमाण पृथक्-पृथक्
स्तरपर जाँचल जाए।
प्राचीन संत अथवा सिद्ध के वर्तमान भाषिक-क्षेत्रीय पहिचान केरौ प्रतीक बनाबय काल विशेष
सावधानी चाही। श्रद्धा एक प्रकार केरौ सांस्कृतिक सत्य हो सकै छै; जन्मस्थान आरू भाषिक
वर्गीकरण ऐतिहासिक दाबी छै। दुन्नो के एक नैमानना समानान्तर पद्धतिक अनिवार्य अनुशासन
छै।
8.6 समानान्तर इतिहास-दृष्टि
समानान्तर इतिहास-दृष्टि दुई विपरीत भूल अस्वीकारैत छै: “आधिकारिक स्रोत जेकहय से
स्वतः सत्य” आरू “हाशियाक स्मृति जेकहय से स्वतः सत्य।” पोथी मुख्यधारा केरौ उपेक्षा के
चुनौती दैछै—ई ओकरौ शक्ति। मगर तेकरौ प्रत्येक प्रतिदाबी पर भी समान प्रमाण-कसौटी
लागूहोतै।
ई कसौटी पर आधुनिक मुद्रित काल केरौ लेखक, पत्रिका, रेडियो, संस्था आरू प्रकाशन सम्बन्धी
हिस्सा अधिक परीक्षणयोग्य छै। प्राचीन काल केरौ दाबी, जन्मस्थान, भाषिक वंशावली, लिपि-
सम्बन्ध आरू कतेको तिथि पुनःस्रोत-परीक्षण मांगैछै। पोथी केरौ अन्तिम उपसंहार जे भ्रमसंशोधन केरौ आवश्यकता स्वीकारैत छै, ऊ समानान्तर इतिहास-दृष्टि केरौ दिशा स्वयं खोलैछै।
8.7 आत्मसमीक्षा
आत्मसमीक्षा समानान्तर परम्परा केरौ सुरक्षा-कवच छै। कोनो प्रतिरोधी इतिहास जों एक बेर
प्रतिष्ठित होय जाए, तकरो नूतन प्राधिकार बनबाक सम्भावना रहैछै। तेंपोथी केरौ संशोधन मात्र
बाहरी आलोचकक काम नै; पोथी केरौ अपनो परम्परा के समय-समय पर स्रोत, तिथि, भाषा-
विज्ञान, सामाजिक प्रतिनिधित्व आरू नूतन सामग्रीसें स्वयं जाँचबाक चाही।
पृ. 259–260 ई आत्मसमीक्षाक महत्त्वपूर्ण आन्तरिक आधार छै। ग्रन्थकार किछु भ्रम केरौ
उल्लेख करैछथिन, आधुनिक गद्यक विकास स्वीकारैत छथिन, आरू राजनीति द्वारा संस्कृति-
साहित्य केरौ उपयोगपर सावधानी व्यक्त करैछथिन। ई उपसंहार पोथी के बंद घोषणा नै, खुलल
परियोजना रूप मँपढ़बाक अवसर दैछै।
8.8 मैथिली साहित्येतिहास-लेखनक समानान्तर अनुभनु व
मैथिली साहित्येतिहास-लेखनक अपनो बीसम शताब्दीक अनुभव अंगिका केरौ वर्तमान संघर्ष
केरौ एगो जीवंत समानांतर दृष्टान्त प्रस्तुत करै छै। मैथिली के भी लंबा समय तलक हिंदीक
"बोली" मात्र मानल गेलौ, ग्रियर्सन केरौ भाषा-सर्वेक्षण मँ भलहिं स्वतंत्र भाषा केरौ रूप मँ
मान्यता भेटल, मगर राजनीतिक-प्रशासनिक मान्यता (अष्टम अनुसूची मँ समावेश) २००३ ईस्वी
तलक प्रतीक्षारत रहल। ई संघर्ष केरौ दौरान मैथिली केरौ साहित्येतिहासकारसिनी (कपिलेश्वर
झा, रमानाथ झा, जयकान्त मिश्र आदि) के भी प्राचीनता-सिद्धिक हेतु समान प्रलोभनक सामना
करय पड़ल छेलै — आदिकवि-खोज, चर्यापद-दावा, आरू भाषिक स्वतंत्रताक प्रमाणीकरणक
हेतु ऐतिहासिक व्याप्ति खिंचबाक प्रवृत्ति। ई समानांतर अनुभव केरौ आलोक मँ, अंगिका-
साहित्येतिहासकारसिनीक आग्रह — जे प्रथम दृष्टि मँअतिरंजित बुझाय छै — वस्तुतः एगो
सुपरिचित, संरचनात्मक रूपेण अनिवार्य चरण छेकै, जेकरा सेंप्रायः प्रत्येक उपेक्षित भाषा-
समुदाय के अपनो मान्यता-यात्रा मँगुजरय पड़ैछै।
8.9 विद्यापति-सम्बद्ध दावा केरौ प्रमाण-परीक्षण
मिथिला केरौ सामाजिक-ऐतिहासिक स्मृतिक वास्तविक दस्तावेजी रीढ़ पंजी-प्रबंध (वंशावली-
अभिलेख) परम्परा छेकै, जे शताब्दीसिनीसेंमैथिल कुलक जन्म, विवाह आरू वंशक्रमक
अभिलेख राखी क आयल छै। पंजी-आधारित आरू विद्यापति-स्वयं केरौ रचनासिनी मँ
उल्लिखित ताम्रपत्र/कोलोफोन-प्रमाणसेंपुष्ट प्रचलित विद्वत्-मान्यता विद्यापति केरौ वंश-मूल
सरिसब-बिसफी (आधुनिक मधुबनी) क्षेत्र मँराखैछै, आरू हुनकरौ राजाश्रय ओइनवार वंशक
मिथिला-स्थित राजा — विशेषतः राजा शिवसिंह आरू रानी लखिमा देवी — सेंजोड़ै छै।
उपसंहार मँ प्रस्तुत "सहरसा-जन्म, राजा गणेश्वरक सभासद-पिता" दावा (पृष्ठ २५९) ई प्रचलित
मान्यताक विरुद्ध एगो गुरुतर संशोधनवादी प्रस्थापना छेकै। "विदेह समानान्तर परम्परा" केरौ
कसौटी ई छै — कोनो प्रतिस्पर्धी दावा तखनेग्राह्य होय छै, जब ऊ ऊ प्रमाण-मानदंड (स्वतंत्र
पंजी-प्रविष्टि, समकालीन ताम्रपत्र, हस्तलिखित कोलोफोन) के पूर्ण करय, जकरा मिथिला-
परम्परा स्वयं अपनो दावा केरौ हेतुअनिवार्य मानैछै। समीक्षाधीन ग्रंथ केरौ जतेक अंश देखल
गेलौ, ओतेक मँ एहन कोनो स्वतंत्र दस्तावेजी प्रमाण केरौ उद्धरण नैभेटल — ई लेली ई दावा,
वर्तमान स्वरूप मँ, प्रामाणिक इतिहास केरौ अपेक्षा परिकल्पनाक स्तरपर रहि जाय छै।
8.10 मैथिली-अंगिका ऐतिहासिक अन्तर्सम्बन्ध आरू सीमा-क्षेत्र
तैयो ई भी स्वीकार्य छैजे सहरसा, पूर्णिया आरू कटिहारक किछु सीमावर्ती भूभाग ऐतिहासिक
रूपेण मैथिली-अंगिका-बज्जिका भाषिक सम्पर्क-क्षेत्र (कॉन्टैक्टज़ोन) रहलौ छै, जहाँभाषिक
सीमारेखा कहियो एकदम स्पष्ट-रेखांकित नै रहल। ग्रियर्सन केरौ भाषा-सर्वेक्षण आरू परवर्ती
बोली-सर्वेक्षणसिनी भी ई क्षेत्र के संक्रमण-क्षेत्र केरौ रूप मँदेखैत छथिन, नैकि पूर्णतः एक
अथवा दोसर भाषा केरौ अनन्य अधिकार-क्षेत्र केरौ रूप मँ। ई दृष्टि सें, "विद्यापति सहरसाक
छथि, अतः अंगिका छथि" जेना द्विआधारी (बाइनरी) दावा केरौ अपेक्षा — "सहरसा-क्षेत्र
भाषिक-सांस्कृतिक संक्रमण-क्षेत्र थिक, जतय मिथिला आ अंग दुनूक प्रभाव विद्यमान अछि"
— एहन सूक्ष्म, संक्रमण-क्षेत्र-संवेदनशील उपसंहार अधिक प्रामाणिक आरू रक्षणीय बुझाय
छै।
8.11 समानान्तर आग्रहक द्वन्द्व
मैथिली आरू अंगिका, दुन्नो साहित्येतिहास-लेखन एकहि "आदिकवि-खोज" केरौ चिंतासें ग्रस्त
देखबा मँ अबैत छै — दुन्नो परम्परा अपनो प्राचीनताक अधिकतम विस्तार आरू कोनो
सर्वस्वीकृत महान्नामक अनन्य स्वामित्व केरौ हेतु प्रतिस्पर्धारत बुझाय छै। "विदेह समानान्तर
परम्परा" अपनो कठिन दशकसिनीक अनुभवसें एगो उपयोगी पाठ प्रस्तुत करैछै — भाषिक
मान्यता आरू साहित्यिक गौरव अंततः प्रतिस्पर्धी-स्वामित्व-दावासेंनै, बल्कि कठोर स्रोतसमालोचना, सम्पूर्ण दस्तावेजीकरण, आरू आवश्यकता पड़ला पर "साझा विरासत" के साझे
रूप मँ स्वीकार करबाक उदारतासेंअधिक सुदृढ़ होय छै। भविष्यक अंगिका साहित्येतिहासलेखन, आरू सम्भवतः मिथिला-अंग सीमा-क्षेत्र केरौ संयुक्त, सम्पर्क-क्षेत्र-संवेदनशील
अध्ययन, ई दिशा मँ एगो उपयोगी अगला कदम होय सकै छै।
9. स्त्री, समाज, वर्ग, संस्था, माध्यम आरू पाठक
9.1 स्त्री
पोथी स्त्री-विषयक सामग्री दर्ज करैछै, मगर समेकित स्त्रीवादी अध्याय नैछै। सामाजिक सुधार,
कन्या-शिक्षा, नारी-जागृति, नारी-अन्तर्मन, स्त्री-उपन्यासकार आरू आत्मपरक लेखनक
उदाहरण उपलब्ध छै। ई सामग्री के पृथक् सूचकांक मँसंकलित करला सेंअंगिका साहित्य केरौ
स्त्री-इतिहास अधिक स्पष्ट होय सकै छै।
विशेष सावधानी: “स्त्री-विषय” आरू “स्त्री-दृष्टि” एक नै। पुरुष लेखक स्त्री-विषय लिखि सकै
छथिन; स्त्री लेखक भी पितृसत्तात्मक संरचना पुनरुत्पन्न करी सकै छथिन। आलोचना लेली
कथनकर्ता, दृष्टिकोण, निर्णय-अधिकार, देह, श्रम, संपत्ति, शिक्षा, विवाह, हिंसा, भाषा आरू
मौनक संरचना जाँचना आवश्यक छै।
9.2 जाति, श्रम आरू वर्ग
पृ. 153 क सामाजिक पृष्ठभूमि जातीय महासभा, शिक्षा, सामाजिक सुधार आरू गुलामी-प्रथाक
अवशेष केरौ चर्चा करै छै; पृ. 161 आर्थिक उद्योग, जंगल आरू जीवनयापनक प्रश्न उठबैत
छै। ई सामग्री वर्ग-जाती सम्बन्धी आलोचना केरौ द्वार खोलैछै।
मगर समूचा साहित्यिक चयन मँविभिन्न सामाजिक समूह केरौ प्रतिनिधित्व केरौ गणना नैछै।
तें “पोथी पूर्ण समावेशी” अथवा “पूर्ण बहिष्कारी” कहना बिना स्वतंत्र आँकड़ा अनुचित होतै।
उचित शोध-पद्धति छै—लेखक केरौ सामाजिक पृष्ठभूमि जहाँसार्वजनिक आरू प्रमाणित हो,
तेकरौ सावधानीपूर्वक सूची; विषयगत उपस्थिति; पात्र-प्रतिनिधित्व; भाषिक रजिस्टर;
प्रकाशन-अवसर; आलोचनात्मक स्वीकृति।
9.3 संस्था आरू माध्यम
हिन्दी अकादमी केरौ प्रकाशन, अंगिका साहित्यिक मंच, अधिवेशन, आकाशवाणी, पत्र-पत्रिका,
विद्यालय-विश्वविद्यालय, स्थानीय संगठन—ई सिनी पोथी केरौ इतिहास मँ सक्रिय छथिन। ई
कारण साहित्यिक इतिहास मात्र लेखक केरौ प्रतिभाक इतिहास नै रहै; संस्था, माध्यम आरू
वैधताक इतिहास बनैछै।
ई पोथी केरौ भविष्यक डिजिटल संस्करण लेली संस्थागत मानचित्र अत्यन्त उपयोगी होतै:
कोन संस्था कतय, कोन वर्ष, कोन लेखक, कोन पत्रिका, कोन कार्यक्रम, कोन प्रकाशन। एहन
नेटवर्क-मानचित्र साहित्यिक आधुनिकता केरौ वास्तविक संरचना देखाओत।
10. पूर्वपक्ष–उत्तरपक्ष
10.1 पूर्व पूपक्ष: “क्षेत्रीय साहित्येतिहासमेपहिलेसामग्री बचाउ, पाछाँ कठोर आलोचना”
ई पूर्वपक्ष मँपर्याप्त बल छै। जब रचना छितरायल हो, पत्रिका नष्ट होय हो, लेखक केरौ नाम
विस्मृत हो, लोकसाहित्य मौखिक हो, तब पहिल कर्तव्य सामग्री एकत्र करना हो सकै छै। 1998
ई.क पोथी ई आपात अभिलेखीय आवश्यकता पूरा करबाक साहसी प्रयत्न छै। हियाँ आधुनिक
स्रोत-मानकक अभाव के ऐतिहासिक परिस्थिति सेंपृथक् करी देखना न्यायपूर्ण नै।
उत्तरपक्ष
मगर सामग्री-संग्रह आरू इतिहास-दाबी पृथक् बात छथिन। जेहि क्षण पोथी “पहिल”,
“प्राचीन”, “जन्मस्थान”, “भाषा-वंश”, “काल-सीमा” आदि निर्णय दैछै, तेहि क्षण प्रमाणपद्धति आवश्यक होय जाय छै। तें1998 संस्करण केरौ अभिलेखीय मूल्य अक्षुण्ण राखी क
2026-स्तरीय आलोचनात्मक उपकरण जोड़ना सभसें न्यायपूर्ण मार्ग छै।
10.2 पूर्व पूपक्ष: “प्रत्येक रचनाक निकट-पाठ साहित्येतिहासमेसम्भव नहि”
ई आपत्ति ठीक छै। सैकड़ो कवि-कथा-नाटकक इतिहास लिखैत समय प्रत्येक रचनापर पूर्ण रसर्ण ,
ध्वनि, रूपवाद, स्त्रीवाद आरू समाजशास्त्रीय समीक्षा देना सम्भव नै।
उत्तरपक्ष
समाधान सभक निकट-पाठ नै, प्रतिनिधि निकट-पाठ छै। प्रत्येक प्रमुख काल/विधासें3–5 पाठ
चुनि स्पष्ट चयन-कसौटी सहित गहिर विश्लेषण जोड़ल जाए। बाकी सामग्री केसूची, सार, संदर्भ
आरू स्रोत-संकेत रूप मँराखल जाए। ई सेंविस्तार आरू आलोचनात्मक गहिराई दुन्नो बचत।
10.3 पूर्व पूपक्ष: “हाशियाक परम्पराकेँमुख्मुयधाराक प्रमाण-मानक पर जाँचब स्वयं अन्याय
हो सकैत अछि”
ई आपत्ति मँभी सत्य छै। अभिलेख-सत्ता असमान होय छै; प्रतिष्ठित भाषा/राज्य अधिक
दस्तावेज छोड़ैत छै, ग्रामीण वा मौखिक समुदाय कम। मात्र लिखित कागज के प्रमाण मानला
सेंहाशिया केरौ इतिहास मिटि सकै छै।
उत्तरपक्ष
समानान्तर बहुप्रमाणीय पद्धति लिखित दस्तावेजक एकाधिकार अस्वीकारैत छै, मगर प्रमाण
केरौ अनुशासन नैछोड़ैत। मौखिक इतिहास वैध छै, पर कथक, समय, पाठांतर, स्मृति-दूरी आरू
अन्य स्रोतसेंतुलना चाही। लोकगीत वैध छै, पर ओकरौ प्रदर्शन-सन्दर्भ चाही। पुरानी जनश्रुति
वैध शोध-स्रोत छै, पर ऊ स्वतः दिनांकित ऐतिहासिक घटना नै।
10.4 पूर्व पूपक्ष: “भाषिक स्वाभिमान लेल प्राचीन वंशावली आवश्यक”
भाषिक समुदाय अनेक बेर ऐतिहासिक गौरवक माध्यमेँसार्वजनिक अधिकार प्राप्त करै छै।
अतएव प्राचीनता-निर्माण केरौ सामाजिक कारण बुझल जा सकै छै।
उत्तरपक्ष
मगर सांस्कृतिक गरिमा सत्यताक शर्तपर निर्भर होयबाक आवश्यकता नै। अंगिका साहित्य केरौ
आधुनिक, लोक, पत्रिका, नाटक, कथा, कविता, रेडियो आरू संस्था-सम्पन्न जीवन अपनेमँ
गरिमायुक्त छै। अतिप्राचीन दाबी गलत सिद्ध भेलो आधुनिक साहित्य केरौ मूल्य कम नैहोतै। ई
कारण सत्यापित इतिहास सांस्कृतिक आत्मसम्मानक शत्रुनै, ओकरौ दीर्घजीवी आधार छै।
11. संशोधित आलोचनात्मक संस्करण केरौ ठोस रूपरेखा
मूल 1998 पाठ के हटाओल नैजाए। ओकरौ ऐतिहासिक रूप अक्षुण्ण राखी क प्रत्येक अध्याय
पाछाँ आधुनिक आलोचनात्मक उपकरण जोड़ल जाए। ई परियोजनाक उद्देश्य पुरान लेखक के
“गलत सिद्ध” करना नै, बल्कि हुनकरौ अभिलेखीय काज के अधिक टिकाउ, सत्यापनयोग्य
आरू बहुस्तरीय बनायब होतै।
11.1 प्रस्तावित समीक्षात्मक अध्याय-ढाँचा
प्रत्येक अध्याय लेली निम्न स्थिर क्रम अपनाओल जा सकै छै: समस्या → मूल पोथी केरौ
प्रतिपादन → उपलब्ध स्रोत → प्रमुख तर्क → पूर्वपक्ष → उत्तरपक्ष → भारतीय काव्यशास्त्रीय
संवाद → पाश्चात्य आलोचनात्मक संवाद → समानान्तर इतिहास-दृष्टि → प्रमाण-स्थिति →
अध्याय-निष्कर्ष → ग्रन्थसूची। ई स्थिर ढाँचासें प्रशंसा, आलोचना आरू स्रोत-परीक्षण एक
दोसरसेंपृथक् रहतै।
12. समेकित निर्णय
‘अंगिका साहित्य केरौं इतिहास’क स्थायी महत्त्व ओकरौ सामग्री-संग्रह, सांस्कृतिक
आत्मपहिचान, लोक आरू लिखित साहित्य केरौ संयुक्त मानचित्र, अनेक विधा केरौ समावेश,
साहित्यिक संस्था-माध्यमक दस्तावेजीकरण, आरू विस्मृत लेखक-रचना के इतिहास केरौ
भीतर स्थान देबा मँछै। 1998 ई.क सन्दर्भ मँ ई एक महत्त्वाकांक्षी आधार-ग्रन्थ छै।
भारतीय काव्यशास्त्रीय कसौटीपर पोथी केरौ सामग्री अत्यन्त समृद्ध, मगर रस–ध्वनि–
वक्रोक्ति–रीति–औचित्य केरौ व्यवस्थित निकट-पाठ सीमित छै। पाश्चात्य दृष्टि सें पोथी
सांस्कृतिक इतिहास, बहुध्वनिता, माध्यम, संस्था आरू उत्तर-औपनिवेशिक भाषिक
आत्मपहिचानक क्षेत्र मँ सशक्त छै; रूपवादी निकट-पाठ, पाठक-स्वीकृतिक आँकड़ा, स्रोतसमीक्षा आरू वर्गीकरण केरौ स्पष्ट पद्धति अधिक अपेक्षित छै।
विदेह समानान्तर परम्परा-दृष्टि सेंपोथी केरौ मूल आवेग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण छै: उपेक्षित
साहित्यिक क्षेत्र के दृश्य करना, केन्द्रीय वैधताक एकाधिकार प्रश्नांकित करना, लोक–पत्रिका–
रेडियो–गद्य–काव्य सिनी के एक विस्तृत साहित्यिक सार्वजनिकता मँ आनब। मगर समानान्तर
पद्धतिक निर्णायक नियम ई छैजेकेन्द्र आरू हाशिया दुन्नो पर प्रमाण केरौ समान कसौटी लागू
हो। प्रतिरोध केरौ नैतिक मूल्य ऐतिहासिक दाबी के स्वतः प्रमाणित नैकरै।
ई कारण अंतिम निर्णय द्विध्रुवीय नै। ई पोथी न त अस्वीकारयोग्य पुरान प्रयास छै, न प्रत्येक
दाबी मँअन्तिम प्रामाणिक इतिहास। एकरौ उचित स्थान छै—अंगिका साहित्य केरौ आधारभूत
अभिलेखीय इतिहास, जे आधुनिक आलोचनात्मक संस्करण, स्रोत-श्रेणीकरण, प्रतिनिधि
निकट-पाठ, तुलनात्मक भाषा-अध्ययन, सामाजिक प्रतिनिधित्व, डिजिटल अभिलेख आरू
आत्मसमीक्षासें आरो प्रामाणिक बनि सकै छै।
सर्वोत्तम पुनर्पाठक सूत्र: पोथी केरौ सामग्री के बचाबौ; पोथी केरौ दाबी के जाँचौ; जे
प्रमाणित से दृढ़ करौ; जेविवादित से स्पष्ट लिखौ; जेअसत्य सिद्ध हो सेसंशोधित
करौ; आरू जे स्वर पहिनेछूटल छै, ओकरा समान गरिमासें स्थान दियौ।
परिशिष्ट 1: संशोधन केरौ ठोस कार्य-सारिणी
कार्य ठोस सुधार
1. स्रोत-श्रेणी
प्रत्येक प्रमुख दाबी संग संकेत: प्राथमिक पाठ
/ समकालीन अभिलेख / उत्तरवर्ती स्रोत /
मौखिक साक्ष्य / भाषिक अनुमान /
कार्य ठोस सुधार
सम्पादकीय निष्कर्ष।
2. दाबी-स्थिति प्रमाणित / प्रबल सम्भावना / सम्भावित /
विवादित / अप्रमाणित—स्पष्ट शब्दावली।
3. काल-विभाजन सारिणी हर सीमा-वर्षक कारण, प्रमुख स्रोत, भाषिक
लक्षण, संस्था, विधा आ अनिश्चितता।
4. भाषा आ साहित्य पृथक्
भाषिक वंश, बोली-संबंध, साहित्यिक
पहिचान, भूगोल आ सांस्कृतिक स्मृति पृथक्
अध्याय।
5. प्रतिनिधि निकट-पाठ
प्रत्येक काल-विधासँ चुनल रचनापर रस,
ध्वनि, वक्रोक्ति, कथाविज्ञान, स्त्रीवादी आ
सामाजिक विश्लेषण।
6. लेखक–रचना सूचकांक
नाम, जन्म/मृत्यु जतय सत्यापित, प्रमुख
रचना, प्रथम प्रकाशन, विधा, स्रोत।
7. पत्र-पत्रिका अभिलेख
प्रकाशन-स्थल, अवधि, सम्पादक, उपलब्ध
अंक, पुस्तकालय/डिजिटल प्रति।
8. लोकसाहित्य क्षेत्रकार्य
स्थान, तिथि, कथक/गायक, प्रदर्शन-सन्दर्भ,
पाठांतर, ध्वनि/वीडियो संकेत।
9. प्रतिनिधित्व-अध्ययन
स्त्री, ग्रामीण-शहरी, सामाजिक समूह, पेशागत
पृष्ठभूमि आदि जतय सार्वजनिक प्रमाण
उपलब्ध, तकर सांख्यिकीय सार।
10. संस्था-माध्यम मानचित्र
मंच, अकादमी, विद्यालय, विश्वविद्यालय,
आकाशवाणी, प्रकाशक, पत्रिका, अधिवेशनक
नेटवर्क।
11. संशोधन-इतिहास
1998 मूल कथन जसक तस; नूतन टिप्पणीमे
की संशोधित, किएक, कोन स्रोतसँ—स्पष्ट।
12. डिजिटल पाठ-संग्रह खोजयोग्य पाठ, लेखक/विधा/वर्षटैग,
कार्य ठोस सुधार
स्कैनक संग सत्यापित पाठ, ध्वनि-सामग्री आ
दीर्घकालिक अभिलेख।
परिशिष्ट 2: प्रमाण-जोखिम सारिणी
दाबी/सामग्री जोखिम आवश्यक कसौटी
पोथीक विषय-पाँजि, अध्यायक्रम, मुद्रित पृष्ठ
न्यून प्रत्यक्ष मूल पाठसँजाँचयोग्य
आधुनिक मुद्रित
पुस्तक/पत्रिका/रेडियो प्रसंग
न्यून–मध्यम
जतय वर्ष/नाम देल अछि,
स्वतंत्र अभिलेखसँ सत्यापन
सम्भव
लेखक-जीवनवृत्त मध्यम
स्रोत-सूचना असमान;
जीवनी/अभिलेखसँ मिलान
चाही
लोकपरम्परा आ जनश्रुति मध्यम–उच्च
सांस्कृतिक स्रोत रूपेँ
महत्त्वपूर्ण; ऐतिहासिक घटना
रूपेँअतिरिक्त प्रमाण चाही
प्राचीन कविक
जन्मस्थान/क्षेत्रीय स्वामित्व
उच्च
पोथीक उपसंहार स्वयं किछु
भ्रमक सावधानी दैत अछि
भाषा-वंश आ अतिप्राचीन
भाषिक निरन्तरता
उच्च
तुलनात्मक ऐतिहासिक
भाषाविज्ञान, पाठ-तिथि आ
ध्वनि-नियम चाही
साहित्यिक मूल्य-निर्णय:
“श्रेष्ठ”, “आधुनिक”,
“प्रभावी”
मध्यम
स्पष्ट आलोचनात्मक कसौटी
आ प्रतिनिधि निकट-पाठ चाही
परिशिष्ट 3: कसौटी-अनुसार संक्षिप्त मूल्यांकन
क्षेत्र निर्णय कारण
सामग्री-संग्रह अत्यन्त सशक्त
विस्तृत लेखक, विधा, लोक,
पत्रिका, रेडियो, गद्य-पद्य
साहित्यिक संस्थाक
इतिहास
सशक्त
मंच, अधिवेशन,
आकाशवाणी, पत्र-पत्रिका
भारतीय सौन्दर्यशास्त्रीय
विश्लेषण
सीमित
रस, ध्वनि, वक्रोक्ति,
औचित्यक व्यवस्थित प्रयोग
कम
निकट-पाठ सीमित
विषय-सार अधिक, रूपविश्लेषण कम
स्रोत-विधान असमान
एकरूप उद्धरण/अभिलेखसंकेत आवश्यक
काल-विभाजन उपयोगी मुदा पुनर्परीक्षणीय मापदण्ड पृथक्-पृथक् स्तरक
स्त्री-विषयक उपस्थिति उपस्थित
समेकित प्रतिनिधित्वअध्ययन बाँकी
लोकसाहित्य विशेष सशक्त
मौखिकता समाविष्ट; क्षेत्रकार्य
विवरण चाही
माध्यम-अध्ययन उल्लेखनीय
रेडियो, पत्र-पत्रिका, स्तम्भ
आदिक दस्तावेज
आत्मसमीक्षा महत्त्वपूर्ण बीज
उपसंहारमे भ्रम-संशोधनक
स्वीकृति
विदेह समानान्तर कसौटी उच्च सम्भावना
प्रतिरोधी इतिहास + समान
प्रमाण-मानकक आवश्यकता
ग्रन्थसूची
नीचाँदेलौ सूची मँमात्र पुस्तक आरू पुस्तकाकार शास्त्रीय ग्रन्थ राखल गेलौ छै। पत्रिका-लेख,
वेबसाइट, वेब-पृष्ठ, ऑनलाइन लिंक आरू स्वतंत्र निबन्ध ई सूची मँ सम्मिलित नैछै।
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आनन्दवर्धन — ध्वन्यालोक.
अभिनवगुप्त — अभिनवभारती.
कुन्तक — वक्रोक्तिजीवित.
वामन — काव्यालंकारसूत्रवृत्ति.
क्षेमेन्द्र — औचित्यविचारचर्चा.
मम्मट — काव्यप्रकाश.
विश्वनाथ कविराज — साहित्यदर्पण.
गंगेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि.
पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त, इतिहास आरू संस्कृति
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गजेन्द्र ठाकुर — समानान्तर दर्शन.