गजेन्द्र
ठाकुर
कुणाल-कृत
नाट्य-समीक्षा शृंखला · षष्ठ नाटक
प्रेमक विस्तार उर्फ श्वेताक
आविष्कार
एक चतुर्भुज नाट्य-समीक्षा : भारतीय · पाश्चात्य · चीनी ·
इजरायली परिप्रेक्ष्यमे
प्रकाशन : अंतिका, जुलाई-सितंबर २०१४ · स्थान : राज परिसर → वन · पात्र
: उद्घोषक + बहु-भूमिका
१. परिचय, कथा-स्थापत्य आ रचना-वैशिष्ट्य
प्रेम-चतुष्टयक तृतीय नाटिका ‘प्रेमक विस्तार उर्फ श्वेताक आविष्कार’
चतुष्टयक सर्वाधिक मौलिक आ वैचारिक रूपसँ साहसिक कृति थिक। एहि नाटिकाक
कथा-वस्तु कोनो परम्परागत पौराणिक स्रोतसँ नहि आएल—ई कुणालक स्वतंत्र
कल्पना थिक। राजनर्तकी श्वेता आ ‘निरपेक्ष’ राजा अतिरथ—दुनू काल्पनिक
पात्र छथि, मुदा हुनकर द्वन्द्व एक चिरन्तन दार्शनिक-नाट्य प्रश्नकेँ
मूर्त करैत अछि।
नाटककार एकटा अत्यंत धाहक (daring) विरोधाभास रचैत छथि—राजा अतिरथ कलाक महान
संरक्षक, संगीत-नृत्यक पारखी, प्रजावत्सल, संत-सदृश—मुदा ओ ‘निरपेक्ष’
छथि—“प्रेम करब तँ नितांत मूर्खता थिक, एक टा अकाजक काज!” ओकर विरुद्ध
ठाढ़ छथि श्वेता—एक नर्तकी जे सात वर्षक साधनाक बाद ७-वर्षीया अनुरागसँ
आन्दोलित छथि, जे हठपूर्वक माँग करैत छथि जे ‘कलाकारकेँ देखबिनु कलाकेँ
देखब असम्भव थिक’।
नाटकक छह नाट्य-क्रम—(१) उद्घोषकक परिचय + श्वेताक नृत्य-अभ्यास + अतिरथक
निरपेक्षता-दर्शन; (२) मंदिर-भेंट आ दरबारमे श्वेताक नृत्य-त्याग; (३)
एकांत-माँग आ अतिरथक क्रोध-निष्कासन; (४) श्वेताक कथित जल-समाधि +
अतिरथक व्याकुलता; (५) अरण्यमे भेंट, श्वेताक परिवर्तन—“कामना आ याचना
हमर अतीत अछि”; (६) अतिरथक मुकुट-त्याग आ प्रकृतिमे एकमएक।
२. भारतीय नाट्य-सिद्धांत
२.१ शास्त्रीय नाट्यशास्त्रक नायिका-भेद आ श्वेता
भरतमुनिक नाट्यशास्त्रक अष्टनायिका-वर्गीकरणमे श्वेता एक विशेष स्थान रखैत
छथि। ओ ‘अभिसारिका’ (प्रियतमसँ मिलनक लेल स्वयं जएवाली) नहि,
‘स्वाधीनपतिका’ (पतिकेँ वशमे रखएवाली) नहि—ओ एक ऐसी नायिका थिकाह जेकर
निकटतम भारतीय नाट्य-समकक्ष ‘उत्कंठिता’ (प्रतीक्षारत) आ
‘विरहोत्कंठिता’ दुनू थिकाह, मुदा अंततः ओ दुनूसँ परे जाइत छथि। भरतक
आठो नायिका-प्रकार प्रेमकेँ दोसर व्यक्तिक सापेक्षमे परिभाषित करैत
अछि; श्वेता नाटकक अंतमे प्रेमकेँ ‘परम-पुरुष’ (प्रकृति-परमात्मा)मे
विलीन कर’ लैत छथि।
ई विलीनीकरण भारतीय भक्ति-परम्पराक ‘विरहिणी-भक्त’क आदर्शसँ समरूप
अछि—मीराबाईक ‘बावरी’ आ राधाक ‘पागलपन’—जाहिमे सांसारिक प्रेमक
असम्भावना भक्ति-प्रेमक उदात्तताक रूपान्तरण बनि जाइत अछि। श्वेताक
अन्तिम उद्घोषणा—“एत’ चर-गोचर-अगोचर सब हमरासँ प्रेम करत छथि, हम सबसँ
प्रेम करत छी”—यैह भक्ति-परम्पराक ‘विश्व-प्रेम’क घोषणा थिक।
२.२ रस-विचार : शृंगारसँ शान्तक विकास-यात्रा
एहि नाटिकाक सर्वाधिक उल्लेखनीय रस-विशेषता थिक—एकहि पात्रमे (श्वेता)
शृंगार-रसक तीव्र अनुभव आ तकर शान्त-रसमे रूपान्तरण। अभिनवगुप्त
शान्त-रसकेँ सर्वोच्च रस मानैत छथि—जाहिमे समस्त अनुराग-विराग शमित भ’
एक ‘निर्वैयक्तिक सौन्दर्य-अनुभव’ उत्पन्न होइत अछि। श्वेताक
अरण्य-जीवन एहि ‘शान्त-रस’क अवतरण थिक।
एहि यात्राक विडम्बना सुन्दर थिक—अतिरथ जे सदासँ ‘निरपेक्ष’ (शान्त-रसक पात्र
जेकाँ लगैत छलाह) ओ नाटकक अंतमे श्वेताक प्रेमसँ ‘सपेक्ष’ (अनुरक्त) भ’
जाइत छथि; आ श्वेता जे ‘अनुरक्त’ छलीह ओ ‘निरपेक्ष’ (प्रकृति-विलीन) भ’
जाइत छथि। एहि रस-उलटफेरमे नाटकक नाट्य-कुशलता थिक।
२.३ ध्वनि-विचार : ‘आविष्कार’ शब्दक बहु-अर्थता
आनन्दवर्धनक ध्वन्यालोकक परिप्रेक्ष्यमे शीर्षकक ‘आविष्कार’ शब्द एहि नाटकक
सर्वाधिक ध्वनि-सम्पन्न पद थिक। संस्कृतमे ‘आविष्कार’—अभिधातः
‘प्रकटीकरण/खोज’; लक्षणातः ‘स्वयंकेँ प्रकट करनाइ’ (श्वेताक
अतिरथ-समक्ष आत्म-प्रकटन); व्यंजनातः ‘स्वयंकेँ आविष्कृत करनाइ’
(श्वेताक स्वयं अपन परम-प्रेमकेँ आविष्कार करनाइ)।
एहि तृतीय अर्थमे ‘आविष्कार’ एक ज्ञानमीमांसीय घटना बनि जाइत अछि। श्वेता
अतिरथ-प्राप्तिक असफलतासँ प्रेमक एक उच्चतर रूप ‘आविष्कृत’ करैत
छथि—“आब हमरा प्रेमक असली स्वरूप सँ परिचय भेल अछि”। ‘कुसमा-सलहेस’क
टेक—“कुसुम बिना मकरंद तहिना प्रेम बिना की जीवन”—एहि नाटकमे श्वेताक
मुँहसँ उद्धृत होइत अछि, आ नाटकक अंतमे ओ यैह ‘मकरंद’ प्रकृतिमे पाबैत
छथि।
२.४ नाट्यशिल्प : कला-कलाकार-दर्शकक त्रिकोण
अतिरथक दर्शन—“शरीरक महत्त्व एतबे जे ओ संवाहक छी कलाक”—भारतीय
सौन्दर्यशास्त्रक एक महत्त्वपूर्ण विवाद उठाबैत अछि। अभिनवगुप्त अपन
‘अभिनवभारती’मे कहलाह जे रस-निष्पत्ति तखने होइत अछि जखन दर्शक ‘सहृदय’
होएथि—कलाकारक व्यक्तित्वसँ ‘तादात्म्य’ (identification) नहि मुदा
कलाक अनुभव—एहि अर्थमे अतिरथक दृष्टि अभिनवगुप्तक सहृदय-सिद्धांतक एक
चरम रूप थिक।
मुदा श्वेता एकर सीमा प्रकट करैत छथि—कला आ कलाकारकेँ विभाजित करबाक प्रयास
एक ‘कृत्रिम नीर-क्षीर विवेक’ थिक। कलाकारक भावना, शरीर, जीवन-अनुभव सभ
कलामे विलीन होइत अछि—हुनकर ‘देहसँ फराक’ कला नहि होइत अछि। ई
नाट्य-दार्शनिक विवाद सौन्दर्यशास्त्रक एक जीवित प्रश्न थिक।
३. पाश्चात्य नाट्य-सिद्धांत
३.१ इब्सेन आ नोरा : प्रेम-अस्वीकारक बाद स्वतंत्रता
नार्वेजियन नाटककार हेनरिक इब्सेन (Henrik Ibsen, १८२८–1९०६) अपन ‘ए डॉल्स
हाउस’ (A Doll’s House, १८७९)मे नोरा हेल्मेरक कथा लिखलनि—एक स्त्री जे
समाज, पति आ परिवारक अपेक्षाकेँ तोड़ि क’ स्वातंत्र्यक दिस प्रस्थान
करैत अछि। नोराक प्रस्थान समाजक तथाकथित ‘दायित्व’सँ पलायन नहि, अपन
अस्मिताक खोजमे प्रस्थान थिक।
श्वेताक अरण्य-प्रस्थान इब्सेनक नोराक समानांतर थिक—मुदा एक महत्त्वपूर्ण
उलटफेरक संग। नोरा ‘दरवाजा बन्द कर’ जाइत छथि (ओ अस्वीकृत समाजसँ विदा
लैत छथि); श्वेता ‘बाँहि पसारल’ प्रकृतिक ओर जाइत छथि (ओ एक नव
सम्बन्धक ओर बढ़ैत छथि)। नोराक प्रस्थान एकाकी; श्वेताक प्रस्थान
अतिरथसँ जुड़ल—राजा मुकुट उतारि ओकर अनुगमन करैत छथि। ई इब्सेनसँ आगाँक
एक नव रंगमंचीय कदम थिक।
३.२ सार्त्र आ कामू : विद्रोह-दर्शन आ ‘अब्सर्ड’
फ्रांसीसी अस्तित्ववादी अल्बेर कामू (Albert Camus, १९१३–1९६०) अपन ‘द मिथ ऑफ
सिसिफस’ (The Myth of Sisyphus, १९४२)मे ‘अब्सर्ड’ (absurd /
निरर्थकता)क अनुभवकेँ विश्लेषित कएलनि—जखन मानवक अर्थ-खोजक इच्छा आ
संसारक मूकता/प्रतिरोधक बीच टकराहट होइत अछि। एहि टकराहटक उत्तरमे कामू
कहलनि—‘एक सिसिफस केँ सुखी कल्पित करबाक चाही’।
अतिरथक ‘निरपेक्षता’ कामूक अर्थमे एक ‘अब्सर्ड’ स्थिति थिक—एक सुन्दर, रसिक,
कला-पारखी व्यक्ति जे प्रेमकेँ ‘अकाजक काज’ घोषित करैत अछि। श्वेता एहि
‘अब्सर्डिटी’क विरुद्ध विद्रोह करैत छथि—ओ दरबारमे नृत्य रोकि दैत छथि,
मंदिरमे पयरमे माला रखैत छथि, एकांत-याचना करैत छथि। कामूक ‘विद्रोही
मानव’ (l’homme révolté)क एक स्त्री-नाट्य-संस्करण थिकाह श्वेता।
नाटकक अन्तिम उलटफेर—जखन अतिरथ मुकुट उतारि क’ अरण्यमे प्रवेश करैत छथि—कामूक
‘सिसिफस-आनन्द’क एक रूप थिक। भार (राज-सिंहासन)केँ छोड़ि क’ हुलास—ई
कामूक दर्शनक नाट्य-प्रतिरूप थिक।
३.३ एरिक फ्रॉम : ‘प्रेम कला थिक’
अमेरिकी-जर्मन मनोविश्लेषक एरिक फ्रॉम (Erich Fromm, १९०० –1९८०) अपन ‘द आर्ट
ऑफ लविंग’ (The Art of Loving, १९५६)मे घोषणा कएलनि—“प्रेम एक कला थिक।
कला जेकाँ ओकर सेहो सीखनाइ, अभ्यास आ समर्पण चाही।” फ्रॉम तर्क देलनि
जे अधिकांश लोक प्रेमकेँ एक ‘वस्तु’ मानैत अछि जे ‘भेटैत’ अछि;
वास्तवमे ओ एक ‘क्षमता’ थिक जकरा ‘विकसित’ करबाक चाही।
श्वेताक सात-वर्षीय साधना—नृत्यक नहि, प्रेमक सेहो—फ्रॉमक अर्थमे
‘प्रेम-कला’क अभ्यास थिक। मुदा फ्रॉमक दृष्टिसँ श्वेताक वैचारिक
यात्राक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्षण ओ थिक जखन ओ घोषणा करैत छथि—“आब
हमरा प्रेमक असली स्वरूप सँ परिचय भेल अछि।” एहि ‘असली स्वरूप’मे प्रेम
एक व्यक्ति-केन्द्रित वासना नहि, एक ‘सर्वव्यापी भाव’ बनि जाइत अछि।
फ्रॉमक भाषामे—‘mature love’ (परिपक्व प्रेम)।
३.४ एगॉन वील्ड आ ‘एपिफैनी’ : नाट्य-क्षणक चरमोत्कर्ष
आयरिश लेखक जेम्स जॉयस (James Joyce, १८८२–1९४१) अपन साहित्यिक सिद्धांतमे
‘एपिफैनी’ (epiphany / साक्षात्कार-क्षण)क अवधारणा दैत छलाह—एक साधारण
क्षणमे अचानक सम्पूर्ण सत्यक प्रकटन। एहि सिद्धांतकेँ नाट्य-समीक्षक
एगॉन वेल्ड (Egon Wellesz) आ अन्यक रंगमंचीय एपिफैनीक सिद्धांतमे
विकसित भेल।
श्वेताक नदी-तट पर तारागण-दर्शन एक ‘नाट्य-एपिफैनी’ थिक—“हजारो-हजार तारावलि
सँ भरल आकाश। केना स्नेह सँ देखि रहल छथि हमरा दिस!” ई साधारण
वन-तट-दृश्य एकाएक एक विराट ‘अर्थ-प्रकटन’मे बदलि जाइत अछि—“ई विचार
हमरा मोन मे पहिने किएक नहि आएल?”। एहि क्षणमे श्वेताक वैचारिक
रूपान्तरण होइत अछि। ई जॉयस-वेल्डक ‘एपिफैनी’क एक मैथिली-नाट्य संस्करण
थिक।
४. चीनी नाट्य-सिद्धांत
४.१ 无为 (वूवेई) : अतिरथक निरपेक्षता आ दाओवादी निष्क्रियता
दाओवादी दार्शनिक परम्परामे (लाओज़ी, ६ठी शती ई.पू.) ‘वूवेई’ (无为, non-action
/ निष्क्रिय-क्रिया) एक केन्द्रीय अवधारणा थिक—“दाओ क' कऽ नहि करैत
अछि, तथापि सब कछ होइत अछि।” ‘वूवेई’क अर्थ निष्क्रियता नहि, अपितु
‘कृत्रिम हस्तक्षेपसँ मुक्त’ क्रिया थिक।
अतिरथक निरपेक्षता ‘वूवेई’क एक विकृत रूप थिक—ओ कलाक स्वाभाविक प्रवाहमे
हस्तक्षेप नहि करैत छथि (उचित), मुदा मानवीय भावना-प्रवाहमे सेहो
‘हस्तक्षेप नहि’ करैत छथि (अस्वाभाविक)। दाओवादी दृष्टिसँ ओ ‘वूवेई’क
नहि, ‘स्ट्रेन्ड इनएक्शन’ (जबरदस्ती बनाओल निष्क्रियता)क शिकार छथि।
श्वेताक आरोप—“अपना चारू भर फुसिक मर्यादाक शीश महल ठाढ़ केने छी
अहाँ”—यैह दाओवादी आलोचना थिक।
४.२ 自然 (ज़ीरान) : प्रकृति-तादात्म्य आ श्वेताक अरण्य-जीवन
दाओवादी-बौद्ध परम्परामे ‘ज़ीरान’ (自然, naturalness / स्वाभाविकता) एक उच्च
आदर्श थिक—मानव-निर्मित बाधाकेँ तोड़ि ‘प्राकृतिक प्रवाह’मे एकाकार
होएब। चीनी ‘शानशुई’ (山水, mountain-water / पर्वत-नदी)
चित्रकला-परम्परामे मानव एक छोट आकृति थिकाह, विराट प्रकृतिमे विलीन
होइत।
श्वेताक अरण्य-जीवन ‘ज़ीरान’क एक नाट्य-उदाहरण थिक। राजमहल, रंगमहल, आभूषण,
सिंहासन सभ त्यागि क’ ‘गाछ-वृक्ष, फल आ फूल, निरंतर प्रवाहित निर्रिणी,
उन्मुक्त आकाश’मे जीवन—एहिमे दाओवादी ‘ज़ीरान’क प्रतिध्वनि अछि।
उद्घोषकक अंतिम वाक्य—“ओ लोकनि प्रकृतिक संगीत मे मिलि गेलाह, एकमएक भ’
गेलाह”—यैह ‘ज़ीरान’क पराकाष्ठा थिक।
४.३ 变 (बियान) : परिवर्तन आ ‘आई-चिंग’क नाट्य-विश्लेषण
‘आई-चिंग’ (易经, Book of Changes / परिवर्तनक पुस्तक) चीनी दर्शनक एक मूलभूत
ग्रन्थ थिक जे ‘बियान’ (变, change / परिवर्तन)केँ सृष्टिक मूल-सिद्धांत
मानैत अछि। एहिमे कहल गेल—परिवर्तन अनिवार्य थिक; यैह जे एकरा स्वीकार
करैत अछि ओ मुक्त होइत अछि; जे एकरा रोकैत अछि ओ कष्ट पाबैत अछि।
एहि नाटकमे दू प्रकारक परिवर्तन-प्रतिक्रिया अछि। अतिरथ—परिवर्तनसँ भागैत छथि
(निरपेक्षता ओकर रक्षा-कवच थिक); श्वेता—परिवर्तनकेँ स्वीकार करैत छथि
(अस्वीकार भेलाक बाद सेहो, नदी-तट पर परिवर्तन)। आई-चिंगक दृष्टिसँ
श्वेता एक ‘junzi’ (君子, superior person / श्रेष्ठ व्यक्ति)क जेकाँ
व्यवहार करैत छथि—परिवर्तनक धाराक संग बहैत छथि।
४.४ 艺术 आ 生活 (यीशू आ शेंगहुओ) : कला आ जीवनक द्वन्द्व
चीनी सौन्दर्यशास्त्री लियू झियुआन (Liu Zhiyuan) जेकाँ विद्वान लोकनि ‘यीशू’
(艺术, art) आ ‘शेंगहुओ’ (生活, life)क सम्बन्धक विश्लेषण कएलनि। ओ तर्क
देलनि जे उत्कृष्ट कला जीवनसँ उत्पन्न होइत अछि, मुदा जीवनसँ ‘फराक’
कला एक खाली आकार मात्र थिक।
अतिरथक दर्शन—“शरीर मात्र संवाहक छी कलाक”—यैह ‘यीशू’केँ ‘शेंगहुओ’सँ विच्छेद
करबाक प्रयास थिक। श्वेताक विरोध—“कलाकार सँ निरपेक्षता केना संभव भ’
सकैए”—यैह लियू-परम्पराक तर्क थिक। चीनी सौन्दर्यशास्त्रमे ‘क्वी’ (气,
vital energy / प्राण-शक्ति)क सिद्धांत कहैत अछि जे कलामे कलाकारक
‘क्वी’ (जीवन-ऊर्जा) अनिवार्यतः प्रवाहित होइत अछि—बिना ओकर ‘क्वी’क
कला मृत होइत अछि।
५. इजरायली नाट्य-सिद्धांत
५.१ हनोख लेविन : राजसत्ताक मर्यादा आ मानव-विद्रोह
हनोख लेविन अपन ‘द पेशेन्स ऑफ स्टोन’ (Patience of Stone) जेकाँ नाटकमे
बेर-बेर ओहि व्यक्तिक कथा कहलाह जे सत्ता-संरचनाक विरुद्ध व्यक्तिगत
स्तर पर विद्रोह करैत अछि। लेविन एक विशेष नाट्य-तकनीक प्रयोग करैत
छलाह—व्यक्तिक ‘छोट विद्रोह’ (small rebellion) जे सत्ताक भारी
संरचनाकेँ हिला दैत अछि।
श्वेताक दरबारमे नृत्य रोकनाइ लेविनक ‘छोट विद्रोह’क एक उत्कृष्ट उदाहरण
थिक—ओ न हथियार उठाबैत छथि, न क्रान्ति घोषित करैत छथि; मात्र नृत्य
रोकि दैत छथि। ई एकटा सटीक, व्यक्तिगत, सांकेतिक विद्रोह थिक जे
राज-दरबारक सम्पूर्ण नाट्य-संरचनाकेँ एक क्षणक लेल स्तब्ध कर’ दैत अछि।
लेविनक भाषामे—‘एक छोट मनुष्य, एकटा पैघ ‘नहि’।’
५.२ एली रोज़िक : ‘ऑफ-स्टेज’ क्षण आ प्रतिमा-अनुपस्थिति
एली रोज़िक अपन ‘थिएट्रिकल इमेज’ ग्रन्थमे ‘ऑफ-स्टेज’ (off-stage / मंचेतर)
क्षणक प्रतिमात्मक महत्त्व विश्लेषित कएलनि। जे रंगमंच पर नहि देखाइत
अछि मुदा दर्शकक कल्पनामे उपस्थित अछि, ओकर नाट्य-शक्ति बहुधा मंचीय
दृश्यसँ अधिक होइत अछि।
एहि नाटकमे श्वेताक ‘जल-समाधि’ एकटा ‘ऑफ-स्टेज’ क्षण थिक—दर्शक ओ देखैत नहि,
मात्र कंचुकीक वाक्यमे सुनैत अछि। रोज़िकक परिप्रेक्ष्यमे ई
‘प्रतिमा-अनुपस्थिति’ (iconic absence) सर्वाधिक नाट्य-शक्तिशाली क्षण
थिक—अतिरथक प्रतिक्रिया (“एत्तहु भ’ सकैत अछि जे जल-धारामे भसिया क’
कतहु कछेर लागि गेल होधि”) एहि ‘अनुपस्थिति’क शक्तिकेँ मापैत अछि।
५.३ इजरायली थिएटर आ वनवास : निर्वासन-परम्परा
इजरायली रंगमंचक एक केन्द्रीय विषयवस्तु रहल अछि—‘गलुत’ (גָּלוּת, galut /
exile / निर्वासन)। एहि निर्वासन-परम्परामे घर छोड़नाइ कोनो पतन नहि—ओ
एक ‘अपरिहार्य यात्रा’ थिक जाहिमे नवीन अर्थ-निर्माण होइत अछि।
श्वेताक रंगमहलसँ निष्कासन एक ‘गलुत’ (निर्वासन) थिक जे एक ‘तिशुवा’
(teshuvah / घर-वापसी, मुदा आत्मिक घर)क रूपमे समाप्त होइत अछि।
वन-निर्वासनमे श्वेता एक ‘नव घर’ पाबैत छथि—प्रकृतिक संग एकमएक। अतिरथक
मुकुट-त्याग आ अरण्य-प्रवेश एहि यात्राक ‘reverse galut’ थिक—राजा अपन
‘घर’ (सिंहासन)छोड़ि श्वेताक ‘घर’ (अरण्य)मे आबैत छथि।
५.४ इज़राइली पर्यावरण-रंगमंच : प्रकृतिमे एकमएकक राजनीति
समकालीन इजरायली रंगमंचमे ‘पर्यावरण-रंगमंच’ (environmental theatre) आ
‘प्रकृति-नाट्य’ (site-specific theatre)क प्रवृत्ति प्रबल भेल
अछि—जाहिमे मानव-प्रकृति सम्बन्धकेँ रंगमंचीय विषय बनाओल जाइत अछि। एहि
परिप्रेक्ष्यमे नाटककार योसी माया (Yossi Maya) जेकाँ कलाकार लोकनि
‘मानव बनाम प्रकृति’क राजनीतिकेँ रंगमंच पर अनलाह।
श्वेताक समापन-वाक्य—“एत’ चर-गोचर-अगोचर सब हमरासँ प्रेम करत छथि, हम सबसँ
प्रेम करत छी”—एहि पर्यावरण-नाट्य-दृष्टिसँ एक ‘इकोलॉजिकल लव’
(पारिस्थितिक प्रेम)क घोषणा थिक। मानवीय सम्बन्धक विफलता (अतिरथसँ
प्रेम-अस्वीकार) एक ‘बायोफिलिक’ (जीव-प्रेम) पारिस्थितिकीय विस्तारमे
पर्यवसित होइत अछि।
६. चतुर्भुज-संश्लेषण : प्रेमक ‘विस्तार’ केहन होइत अछि?
शीर्षकक ‘विस्तार’ शब्द एहि नाटकक मूल-प्रश्न थिक—प्रेम ‘विस्तृत’ होइत अछि,
अर्थात ओ एक व्यक्तिसँ प्रारम्भ होइत अछि आ समग्र अस्तित्वक ओर बढ़ैत
अछि। चारू नाट्य-परम्परा एहि ‘विस्तार’केँ भिन्न-भिन्न कोणसँ देखैत
अछि।
भारतीय दृष्टि— भक्ति-परम्पराक विरहिणी-नायिकाक ‘शान्त-रस’मे
रूपान्तरण; अभिनवगुप्तक शान्त-रस (श्वेता बनाम अतिरथक रस-उलटफेर);
‘आविष्कार’क त्रि-स्तरीय ध्वनि; कला-कलाकार-दर्शनक नाट्य-विवाद।
पाश्चात्य दृष्टि— इब्सेनक नोरासँ परे प्रस्थान (विच्छेद नहि, नव
सम्बन्ध); कामूक अब्सर्ड-विद्रोह; फ्रॉमक ‘mature love’ (सर्वव्यापी
प्रेम); जॉयसक एपिफैनी (तारागण-दर्शन = रूपान्तरण-क्षण)।
चीनी दृष्टि— अतिरथक विकृत वूवेई (无为); श्वेताक ज़ीरान (自然) =
प्रकृति-तादात्म्य; आई-चिंगक बियान (变) = परिवर्तन-स्वीकार;
यीशू-शेंगहुओ विवाद (कला बनाम जीवन)।
इजरायली दृष्टि— लेविनक ‘छोट विद्रोह’ (दरबारमे नृत्य-त्याग); रोज़िकक
iconic absence (जल-समाधि); गलुत-तिशुवा (निर्वासन→आत्मिक घर-वापसी);
पर्यावरण-रंगमंचक इकोलॉजिकल लव।
चारू परम्पराक साझा निष्कर्ष—प्रेमक ‘विस्तार’ एक व्यक्ति (अतिरथ)क सीमासँ
मुक्त होइत प्रकृति, ब्रह्माण्ड आ समग्र सत्तामे विलीन होएब थिक। एहि
अर्थमे एहि नाटकक शीर्षक सम्पूर्ण प्रेम-चतुष्टयक सर्वाधिक
महत्त्वाकांक्षी दार्शनिक घोषणा थिक।
अतिरथक मुकुट-त्याग आ अरण्य-प्रवेश—एहि नाटिकाक अंतिम रंगमंचीय छवि—एक
विडम्बना-पूर्ण आनन्दक क्षण थिक। जे ‘निरपेक्ष’ बनल रहल, ओ अन्ततः
‘सपेक्ष’ भेल; आ जे ‘सपेक्ष’ छलीह ओ ‘निरपेक्ष’ भेलीह—यैह प्रेमक
विस्तारक नाट्य-सत्य थिक।
॥ षष्ठ नाटकक समीक्षा समाप्त ॥ ·
अगिला : प्रेमक परीक्षा उर्फ सुप्रभा आ अष्टावक्र