हितनाथ झा
( मैथिलीमे
ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार ,
पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क- 9430743070)
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान
२७
जयदेव कविक संगीत
शोभानन्द झा ,
बी.ए. ,
गाम- भराम।
आपरितोषाद् विदुषां न साधु मन्ये
प्रयोगविज्ञानम्।
बलवदपि शिक्षितानाम् आत्मन्यप्रत्ययं चेतः॥
राजा - " कविजी ,
आइ अहाँकेँ एकटा गीत गाबय पड़त। समय वसन्त थीक
तैं गीतहमे वसन्तहिक भाव उद्गत हो तँ उत्तम।"
जयदेव- जे श्रीमानक आज्ञा।
( कनेक काल धरि नाना-प्रकारक बाजाक कोलाहल भेल।
गवइयहु अपन रुद्ध स्वरसँ अपूर्व तान-क्रीड़ा करय लगलाह। तदनन्तर सूर-ताल- समन्वित
गीत आरम्भ भेल।)
ललित लवंग लता परिशीलन कोमल मलय समीरे।
मधुकर निकर करम्बित कोकिल कूजत कुंज कुटीरे॥१॥
[ ध्रुवपद]
विहरति हरिरिह सरस वसन्ते।
नृत्यति युवति जनेन समं सखि विरहि जनस्य
दुरन्ते॥
उन्मद मदन मनोरथ पथिक वधू जन जनित विलापे।
अलिकुल संकुल कुसुम समूह निराकुल बकुल कलापे॥२॥
मृगमद सौरभ रभस वशंवद नवदल माल तमाले।
युवजन हृदय विदारण मनसिज नख रुचि किंशुक
जाले॥३॥
मदन महीपति कनक दण्ड रुचि केसर कुसुम विकासे।
मिलित शिलीमुख पाटल पटल कृत स्मर तूण विलासे॥४॥
विगलित लज्जित जगदवलोकन तरुण करुण कृत हासे।
विरहि निकृन्तन कुन्त मुखाकृति केतक
दन्तुरिताशे॥५॥
माधविक परिमल ललिते नवमालिक जाति सुगन्धौ।
मुनि मनसामपि मोहन कारिणि तरुणा करण बन्धौ॥६॥
स्फुरदतिमुक्त लता परिरम्भण मुकुलित पुलकित
चूते।
वृन्दावन विपिने परिसर परिगत यमुना जल पूते॥७॥
श्री जयदेव भणितमिदमुदयति हरि चरण स्मृति
सारम्।
सरस वसन्त समय वन वर्णनमनुगत मदन विकारम्॥८॥
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प्रसंग- राधा कामातुर भै अपन समतुरिया लोकनि
काँ पुछइ छथि जे प्राणनाथ कत छथि। ताहिपर हुनक बालसँगी लोकनि उत्तर दइ छथिन।
उपर्युक्त गीत सूत्रमे तदेव उत्तर गाँथलअछि जे पाठक-पाठिका लोकनिक दृष्टिगत हयत।)
भगवान कृष्ण युवती गोपांगना लोकनिक संग
लताकुंजमे वसन्तक आगमन जानि विहार करइ छथि। से लताकुंज भँवरा और कोइलीक मधुर
संगीतसँ लवालव अछि। मलय पवन सुन्दर लवंगलताक रस पीने बुत्त भेल प्रवाहित भय रहल
अछि।बहिना हय ,
जाहि वसन्तमे विरही लोक कामव्यथासँ कोनहुना समय
काटि रहला हय ,
तेहना अवसरमे माधव गोपीक संग नाचि रहल छथि॥१॥
ई वसन्त ऋतु बड़ फसादी अछि। कामिनी सभ काँ कनाय
रहल अछि। जखनहिँ हुनका लोकनिक स्वामी छथिन तखनहिँ कामदेव महात्मा अपन कुसुमसरस
हुनका लोकनिकेँ मर्माहत कै रहला हय।कलोल कय रहली है। बकुलगाछपर फूल लादल देखि भँवरा
सभ उड़ि-उड़ि बइस ने ओहीपर। गुत्थमगुत्थ होमय लागल।बकुल बेचारे मूड़ी खसा लेल।॥२॥
तमालवृक्षमे नवे-नवे पात प्रादुर्भूत भेलय
जाहिसँ कस्तूरीक गन्ध निःसृत भय रहल अछि। पलाश त ओकरो टपल। युवक-युवतीक हृदयपट काँ
टुकड़ी-टुकड़ी कर वला कामदेवक नह सन लाल फूल जँ छैक तँ पलाशेकेँ॥३॥
नागकेशरि तँ कामदेवक स्वर्णमय दंड सम रूप धारण
कै लेलक अछि आओर पाटल(ओढ़ूल ?)
मधुकरसँ गलबहियाँ कैने कामदेवक तूण सन अपूर्व चमत्कार धारण कै लेलकय॥४॥
धरतीकेँ देह खसौने नङ्टी पड़लि देखि तरुण जे
करुण वृक्ष तनिकाँ बड़ हँसी लगलन्हि। हुनका मुँहसँ फूल झड़ि-झड़ि-नग्न धरती काँ झाँपय
लागल। विरहिनी लोकनिपर छूरी चलैबामे चोख भालाक आकारक केवड़ाक सौरभ दशोदिश व्याप्त भै
रहल॥५॥
वासन्तीक सुगन्धसँ मालती और जातिक सुगन्ध और
तेज भय गेलइ कय जैं हेतु मुनि लोकहुँकेँ मोह उत्पन्न भय जाइ छन्हि और तरुण-तरुणी
पतंग भय आत्मसमर्पण कै दइ छथि॥६॥
अतिमुक्त लताक आलिंगनसँ पुलकित ओ पुष्पित वसन्त
ऋतु जानि आमोद कय रहल अछि। यमुना-जल-सिंचित वृंदावनमे श्रीकृष्ण चन्द्रजी मुरली
टेरि रहलाहय।॥७॥
श्री जयदेव कविक ई संगीत प्रशस्त होवै जाहिमध्य
श्री भगवानक चरणारवृन्दक स्मरण प्रधान विषय छैक ओ जाहिमध्य वसन्तक वर्णन और मदनक
विकार निहित भेल छइक॥८॥
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राजा- गायनाचार्यजी ,
वसन्तरागपरक रूपक तालमे जे गीत अहाँ गौलहुँ
ताहिमे केवल वाह्य संसारक चित्र खींचल। फूल-पत्ती पर बेशी जोर देल। पात्रपर ध्यान
नहि गेल।
जयदेव-" श्रीमान जे कहल से बुझल।हमरा दिशसँ
श्रीमानकेँ एतवा बुझक थीक जे पहिने कला-शास्त्र वेत्तालोकनि रंगमंच ठाढ़ कय तखनि
पात्रक सन्निवेश करइ छथि।परम चतुर परमेश्वर संसारमे फूल-पत्ती लगा ,
अन्न-जल गढ़ि तखनि मनुष्यादिक रचना कैलन्हि।आब
हमहूँ दोसर गीतमे नायक-नायिकाक भाव-चित्रण कय कलाकेँ पूर्ण करब।"
राजा-" अवश्ये अहाँ चतुर कला- मर्मज्ञ छी। आब
दोसर आरम्भ करू।
( जयदेव प्रारम्भ करइ छथि):---
निभृत निकुञ्ज गृहं गतया निशि रहसि निलीय
वसन्तम्।
चकित विलोकित सकल दिशा रतिरभस भरेन हसन्तम्॥१॥
सखि हे केशि मथनमुदारम्।
रमय मया सह मदन मनोरथ भावितया सविकारम्॥ध्रु.॥
प्रथम समागम लज्जितया पटु चाटु शतैरनुकूलम्।
मृदु मधुर स्मित भाषितया शिथिलीकृत जघन
दुकूलम्॥२॥
किसलय शयन निवेशितया चिरमुरसि ममैव शयानम्।
कृत परिरम्भण चुम्बनया परिरभ्य कृताधर पानम्॥३॥
अलस निमीलित लोचनया पुलकावलि ललित कपोलम्।
श्रमजल सकल कलेवरया वरमदन मदादति लोलम्॥४॥
कोकिल कलरव कूजितया जित मनसिज तन्त्र विचारम्।
श्लथ कुसुमाकुल कुन्तलया नखलिखित घन स्तन
भारम्॥५॥
चरण रणित मणि नूपुरया परिपूरित सुरत वितानम्।
मुखर विशृंखल मेखलया सकच ग्रह चुम्बन दानम्॥६॥
रति सुख समय रसालसया दरमुकुलित नयन सरोजम्।
निःसह निपतित तनु लतया मधुसूदन मुदित मनोजम्॥७॥
श्री जयदेव भणितमिदम् अतिशय मधुरिपु निधुवन
शीलम्।
सुखमुत्कण्ठित गोपवधू कथितं वितनोतु सलीलम्॥८॥
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प्रसंग- मदनवाणविद्ध राधा अपना सखीसँ
नाभिकुंडस्थ बात कहइ छथि। कृष्ण कृत उपेक्षा सहन करितहु हुनकापर हुनक प्रेम कम
हैबाक कोन कथा क्रमहि बढ़ले जाइ छन्हि। आशा जे चितचोरसँ भेँट हैत और आनुसंगिक मधुर
फल चीखब हुनका जीवित रखने अछि।
सखी हय ,
हमरा केशिमथन(कृष्ण)सँ भेँट कराब '
त '
बूझिअओ। मदनक प्रेरणासँ एसकरि कुंज भवन जा क '
चेहैल चारूकात तकैत बइसल रहब ओ सुपरुष माधव
अन्हारमे डूबल रतिरभसक आधिक्यसँ हँसइत ,
विकारसँ भरल हमरहुसँ आगू हमर बाट तकैत रहताह॥१॥
प्रथमे समागम- तैं हम लजैलि रहब तखन ओ अनेक
बेरि चिक्कन-चुक्कन बात कहि हमरा पटियाब '
लगताह।हमरो कतहु रहना जाए। हमहूँ कोमल ओ मधुर हँसी हँसय लागब ओ उत्तर देमय लागब।
तावत प्राणनाथ अपना जाँघक वस्त्र ढील करताह॥२॥
बिछौन तँ कोमल पातहिक रहत(कुंजभवनमे पलंग कतय
?)
ताहिपर हमरा सुता देताह।कतू कालधरि ओहो
महापुरुष हमरे दूधू भरें पड़ल रहताह। भरि पाँज क '
हमहूँ हुनका धरब ओ चूमब ,
ओहो धरताह ओ चुमताह॥३॥
सुरतजनित हर्षसँ हम आँखि मुनि लेब ओ हमरा
प्राणनाथहुक गालपर पुलकावली भरि जएतन्हि। की कहू सखी ,
सुरतजनित परिश्रमसँ तँ हमर सगर देह भीज जैते प्राणनाथो कामदेवक उत्तापसँ अत्यन्त
चोख भै जयताह॥४॥
हुनक अत्याचारसँ हम कोइली जकाँ
' कू '
' कू '
करय लागब ,
केश फुजि जैत ओ फूल समस्त माथ अस्त-व्यस्त भै पसरि जाएत ,
भारी स्तन नह सँ क्षत-विक्षत भै जैत॥५॥
पैर महक मणिमय पाजेब झनझना उठत ,
डॉड़ाक घुघरू टनटन बाजय लागत ओ हमर प्राणनाथ
नाना तरहेँ काम-भोग करय लगताह यथा जूड़ा पकड़ि-पकड़ि चूमय लगताह॥६॥
रतिसुखकालक तृप्तिसँ जखनि अलसा क '
शरीर-लतीकेँ असमर्थ जकाँ खसाय लेब तखन हमरा
नाथहुकेँ काम-तृषाक तृप्तिसँ आँखि-कमल मुनाय जैतन्हि॥७॥**
श्री जयदेवक ई संगीत जाहिमे राधाकृष्णक
सुरत-चरित्रक वर्णन आओर उत्कंठित राधा कथित शृंगाररस क्रिया ठसमठस अछि। पारलौकिक
अथच ऐहिक सुख समुत्पादित करै॥८॥
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राजा-
' चावश ,
जयदेव। '
( जयदेव मूड़ी खसा कय बहुमान ग्रहण करइ छथि)
सभाविसर्जन
लेखक : श्री शोभानन्द झा ,
बी.ए. भराम
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प्रिय पाठक-पाठिका लोकनि ,
रति-शास्त्रक प्रारम्भिक शिक्षासँ लाभ उठौता से
आशा करइ छी। वात्सायन ऋषिक
' कामसूत्र '
प्रामाणिक ग्रन्थ थीक जेकर मान यूरोप इत्यादि
आन देशहुमे बढ़ि रहल अछि। शिक्षित समाजमे "मुरखाहाक लाठी माँझ कपाड़" वाला नीति
चरितार्थ हैब अयोग्य वा अयुक्त थीक।
सम्भोग-क्रम आलिंगन , चुम्बन , नख-क्षत ,
कामोद्वध
, सत्वर ,
मैथुन ओ तृप्ति ---बुझक चाही। प्रमाण---
" आश्लेषादनु चुम्बनादनुनखोल्लेखादनु
स्वान्तजात ,
प्रोद्बोधादनु सम्भ्रमादनुरतारम्भादनु
प्रीतयोः" इत्यादि...
जयदेवक गीतगोविन्दसँ उद्धृत
( ई श्लोक
` वराहमिहिरकृत
बृहत्संहिता केर
77 म
अध्याय - स्त्री-पुरुष समायोग `
आ
` कामशास्त्रीय
सुभाषित संग्रह `
दुनू मे एही भाव सँ अछि)
( प्रभात : वर्ष- 1,
अंक- 11,
नवम्बर
1933
ई.)
संगीत
(अनुवाद)
लेखक: श्याम सुन्दर ,
( कोइलख)
ईश्वर प्रदत्त गुणमे संगीतो एक विलक्षण और अनुपम गुण अछि जे सुतल के जगेवाक ,
कनैत के हँसेबाक ,
खसैत के उठेबाक ,
पछुआयल के अगुअयबाक ,
मरैत के बचेबाक शक्ति रखैत अछि। एकर प्रभावसँ कुभावो सद्भावमे परिणत होइछ। महानुभाव
पाठक लोकनि एकरा जतय आँखि उठा क '
देखताह ततय एकर अटल अधिकार देखताह। निर्जन वनमे ,
सघन उपवनमे ,
नगर भवनमे और सागर गगनहुमे एकर अपूर्व छटा देखि पड़ैछ। एहिमे अपूर्व्वे सम्मोहन गुण
अछि।एकरे प्रसादत मोहनकेँ मुरली पर श्रोता मुग्ध होइत छलाह।गाय चरब ,
पक्षी दाना बिछब बिसरि जाइत छल ,
ग्वार घर छोड़ि दौड़ैत छल ,
गोपी लोक लाज त्यागि दैत छल। एखनहुँ जत कतहु संगीतक सुधा- श्रावी गान-लहरी लहरैत
अछि ओतय जड़क जड़ता ,
चेतनक चेतनता दवि जाइछ। जखन केओ संगीत विशारद अपन कोमल आँगुरसँ वीणाक तारकेँ झझनबैत
मधुर तान छोड़ैत छथि तखन श्रोता पर जादूक असरि भय जाइत छैक।जतवा दूर धरि ओकर
गानध्वनि जाइत छैक ओतबा दूर धरि शान्तिमय भय जाइछ। वनक हिंसक जन्तु हिंसाक घात ,
वधिक शिकारी शिकारक बात विसरि जाइछ।विषधर सर्प विष उगिलव ओ मृगादि चौकड़ी भरब छोड़ि
दैछ।जीव मात्र मन्त्रमुग्ध भय गानक ध्वनिमे लीन होइछ।जखन केओ संगीत कला प्रवीण अपन
अलौकिक तानक वाणसँ ककरहु लक्ष्य करैत अछि तखन ओकर नोक सँ वाचन असम्भव भय जाइछ।
कहबाक तात्पर्य ई जे संगीत मे ओ अलौकिक गुण अछि जाहिसँ निवीशा दीप शिखा बरि उठैछ और
अनन्त आकाशमे मेघमाला जल बरसबैत अछि। जखन जड़ पदार्थमे एहि प्रकारक जीवन अबैछ तखन
औरक कोन कथा ?
मनुष्यक रोम-रोममे रमई जाइछ और ओहो एकरा पाछू सब किछु बिसरबालै विह्वल भय जाइछ।ओ
कखनहुँ वीणाक तारपर ,
कखनहुँ हारमोनियमक परदा पर कखनहुँ तबला पर ,
कखनहुँ जल तरँगपर
,
कखनहुँ परवाजपर
,
कखनहुँ एक तारा पर ,
कखनहुँ रशराज ,
सारंगी और सितारपर अनुपम आलाप संग संलाप करैछ। संगीतमे अपूर्व आकर्षण शक्ति छैक।राग
रागनी एकर सिद्ध सहचरी थीकैक ,
जहाँ कतौ चुटकी बजौलक ततहि अपन अखाड़ा जमा लैत अछि। जकरा दिश कनेक आँखि उठा क '
तकलक तकरे अपना अधीन कय लैछ। राही बटोहियोक पथमे पैर बढ़ेबाक साहस नहि रहैत छन्हि ,
मजबूरन अंटकि जाय पड़ैत छैन। जाहि भाग्यवान पर संगीतज्ञक स्नेह वा कृपा रहैत छैक
तकरा देवता गणों सम्मान करैत छथिन्ह। स्वयं परमात्मा वेदगान सँ वशीभूत भय जाइछ।
शूलपाणि शंकर काँ देव अरि दैत्य कोन गुण सँ अपना वशमे कय नेने छल।विश्वपिता ब्रह्मा
काँ दुर्दान्त दैत्य सब कोन मन्त्रसँ मुग्ध कय अजर-अमर हयबाक वर देवालै बाध्य कयने
छल।वीणापाणि वाणी काँ सम्मान काँ के एतेक ऊपर उठौने अछि
?
और के
?
यैह संगीत । स्वयं सुरेशो अपन नन्दन कानन मे प्रतिदिन एकर तलास मे व्यस्त रहैत
छथि।अपन अनुचरी अप्सराक करारपर एकर बहार देखि पूर्ण प्रेमसँ आदर करैत दिन राति
उद्वेलित ह्वैछ। जे कोनहुँ तरहेँ आधीनता स्वीकार नहि करै ओकरा वास्ते यैह अमोघ
मन्त्र थीक। यैह जादूक छड़ी थीक। जकरा पर फेकल गेल वैह पाछू- पाछू घूमय लागल। कट्टर
शत्रुओ मित्रक कार्य्य करबा लै तैयार भय जाइछ। गायकक आज्ञा मानवालै संसारक समस्त
प्राणी अछि।जाहि मृगक दौड़सँ हवो डरि जाइछ ओकर अमूल्य मद(कस्तूरी) संगीतक सहायतासँ
प्राप्त होइछ। वधिक निर्जन वनमे संगीतक शंख फूकैछ और मृग सब विस्मरण भय ओकरा आगू मे
ठाढ़ होइछ। विषधर नाग जकर फुफकारसँ अग्नि बरिसय लगैछ और ककरहु ओकरा आगूमे अस्त्र
चलेबाक लेल साहस नहि होइछ ओकरहु पर संगीत विजय करबैछ। एकर रागनीक तालपर सापो
निराकार भय शान्त भावसँ समीप आबि नाचय लगैछ। ओहि समयमे वधिक ओकरा नाथि मनक लालसा
पूर्ण करैछ। छोट-छोट बच्चा जखन कानय लगैछ उछलय लगैछ तखन माय एहि मयावीक शरण धय
हँसबैछ। यद्यपि संगीत कला विज्ञमे एकर आदर अछि। तथापि अपढ़ अबोधहुँ काँ एहिसँ विनोद
होइछ।
लेखक: श्याम सुन्दर ,
कोइलख।
(प्रभात : वर्ष-01 ,
अंक 08 ,
अगस्त-1933 ई.)
(ई अनुवाद अछि ,
लेखक श्याम सुन्दर ,
कोइलख अंकित अछि। ओ अनुवादक छथि कि मूल लेखक पत्रिकामे स्पष्ट नहि अछि। इहो नहि
लिखल अछि जे कोन भाषासँ अनुवाद भेल अछि। हमरा लगैत अछि ,
संस्कृतसँ अनुवाद भेल हैत।)
संपादकीय सूचना- एहि
सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
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