विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

‘निनाद’ (मैथिली नाट्यालोचना): सैद्धान्तिक, रंगमंचीय, नव्य-न्यायिक आ समानान्तर-इतिहासपरक समालोचनात्मक पुनरावलोकन

गजेन्द्र ठाकुर · 2026-09-01 · अंक 449

Keywords: Maithili drama, theatre criticism, Navya-Nyaya, comparative theatre

गजेन्द्र ठाकुर

‘निनाद’ (मैथिली नाट्यालोचना): सैद्धान्तिक, रंगमंचीय, नव्य-न्यायिक आ

समानान्तर-इतिहासपरक समालोचनात्मक पुनरावलोकन

कृति:

Ninad — Dramatic Cricism in Maithili | लेखक: कमल मोहन चुन्नू |

संस्करण: 2017 | नवारम्भ प्रकाशन, पटना

आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्य आ ग्रन्थक दाबी

मैथिली

साहित्यमे नाटकक वाचिक आ दृश्य-परम्परा सहस्राब्द पुरान अछि। ज्योतिरीश्वर

ठाकुरक धूर्तसमागम, विद्यापतिक गोरक्षविजय व मणिमंजरी आ उमापतिक पारिजातहरण

सँ ल' क' आधुनिक कालक कीर्तनिया आ सामाजिक नाटक धरि ई धारा अपन भाषिक

स्वायत्तता आ लोक-सम्पृक्तताकेँ अक्षुण्ण रखने अछि। नाटकक एहि सुदीर्घ

ऐतिहासिक विकासक वस्तुनिष्ठ, तार्किक आ मंचीय विश्लेषण मैथिली आलोचना-जगतक

प्राथमिक अपेक्षा रहल अछि। एही पृष्ठभूमिसँ कमल मोहन चुन्नू द्वारा रचित आ

नवारम्भ प्रकाशन, पटना/मधुबनीसँ 2017 मे प्रकाशित पोथी निनाद (मैथिली

नाट्यालोचना) स्वयंकेँ एकटा युगान्तकारी कृतिक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि।

पोथीक भूमिकामे लेखक ई आक्रामक दाबी करैत छथि जे मैथिलीमे नाटकक साहित्यिक

आ मंचीय दुनू मूल्यकेँ एक संग राखि विचार करयबला ई पहिल अथवा सर्वथा विरल

प्रयास थिक।

मुदा जखन

एहि कृतिक अन्तर्वस्तुक परीक्षण भारतीय नाट्यशास्त्र, पाश्चात्य

रंग-सिद्धान्त, नव्य-न्यायक तर्क-पद्धति, आ 'विदेह' समानान्तर

साहित्य-इतिहासक मानदण्डपर कयल जाइत अछि, तखन एकर दाबी सर्वथा भ्रामक सिद्ध

होइत अछि। ई पोथी वस्तुपरक नाट्यालोचनाक ठाम व्यक्तिगत यात्रा-वृत्तान्त,

अनौपचारिक दैनन्दिनी, नाट्य-संस्था सभक एकपक्षीय प्रशस्ति आ मुख्यधाराक

सुखाएल रिपोर्टिंगक संकलन बनि क' रहि गेल अछि। संगहि, केन्द्रीय भारतीय

भाषा संस्थान (CIIL) जकाँ संस्थाक थोक पुस्तक-खरीद योजनाक व्यावसायिक

लाभकेँ ताकि छापल गेल एहि प्रकारक पोथी राष्ट्रिय स्तरपर मैथिलीक अकादमिक

मान-मर्यादाकेँ अपूरणीय क्षति पहुँचाबैत अछि।

पोथीक

शीर्षक-पंक्ति स्वयं एकटा दावा करैत अछि — "मैथिली नाट्यालोचना।" मुदा

भूमिका ('निनादक संग') मे लेखक स्वयं स्वीकार करैत छथि जे एहि मे "नाटकक

आलोचना, नाट्य-मंचनक समीक्षा, रंगयात्रा-वृत्तांत आदि" तीनू अछि। ई

स्वीकृति निष्पाप नहि अछि — ई एकटा वर्गीकरण-सम्बन्धी समस्याक स्वीकृति थिक

जकरा लेखक विधागत सतर्कताक अभावमे "एक ठाम एक संग" राखि देने छथि।

नाट्यालोचना (dramatic criticism), नाट्य-इतिहास-लेखन (theatre

historiography), आ रंगयात्रा-वृत्तांत (travelogue/memoir) — तीनू भिन्न

ज्ञानमीमांसीय अनुशासन थिक, जकर साक्ष्य-मानक (evidentiary standard),

विश्लेषण-पद्धति, आ पाठकीय अपेक्षा सर्वथा भिन्न होइत अछि। एहि तीनूकेँ

अभेद मानब — जेना पोथीमे बेर-बेर होइत अछि (जेना 'मैलोरंगक विलाप' आ

'मैथिली रंगकर्मक नमहर आ सुखद घटना' शीर्षक अध्याय, जे शुद्ध

रिपोर्ताज-वृत्तांत छैक, नाट्यालोचना नहि) — से ओहि मौलिक भ्रमक प्रमाण थिक

जे लेखक स्वयं भूमिकामे इंगित कयने छथि जखन ओ कहैत छथि जे "रंगमंचीय आलोचना

स्वाभाविक रूपेँ नाट्य-मंचनक आलोचना बेसी अछि, नाट्य-साहित्यिक आलोचना कम।"

ई स्वीकारोक्ति एकटा गम्भीर संरचनात्मक कमजोरीक स्व-निदान थिक, मुदा एहि

निदानक बादो पोथीक अधिकांश भाग एहि दोषकेँ सुधारबाक बदला ओहि मे आओर धसैत

जाइत अछि।

प्रस्तावना: नाट्यालोचना आ रंग-वृत्तान्तक बीचक सीमा

‘निनाद’

मैथिली रंगकर्म, नाटक, अभिनेता, निर्देशक, संस्था, प्रस्तुति, संगीत,

एकल-नाट्य, शहरी रंगकर्म आ समकालीन रंग-विमर्शसँ सम्बन्धित लेखसभक संकलन

अछि। पोथीक घोषित पहचान नाट्यालोचनाक अछि; तें एकर मूल्यांकन केवल एहि आधार

पर नहि भऽ सकैत अछि जे एहिमे मैथिली रंगमंच सम्बन्धी कतेक सूचना संचित अछि।

मूल प्रश्न ई अछि जे सूचना, स्मृति, प्रशंसा, घटना-वर्णन, पुस्तक-परिचय आ

यात्रा-वृत्तान्त आलोचनात्मक ज्ञानमे कोना रूपान्तरित भेल अछि। नाट्यालोचना

तखन आरम्भ होइत अछि जखन आलोचक प्रदर्शन अथवा नाट्यपाठक विशिष्ट संरचना,

भाषा, अभिनय, दृश्य-विधान, संगीत, दर्शक-संबन्ध, ऐतिहासिक स्थिति आ वैचारिक

अन्तर्विरोध केँ स्पष्ट कसौटी पर जाँचैत अछि।

एहि

बिन्दु पर ‘निनाद’क सभसँ उल्लेखनीय विरोधाभास सोझाँ अबैत अछि। आरम्भिक लेख

‘मैथिली नाट्यालोचनाक वस्तु-स्थिति’मे लेखक स्वयं बुझैत छथि जे नाटक केँ

कथा, उपन्यास वा सामान्य पुस्तक-समीक्षाक औजारसँ मात्र नापल नहि जा सकैत

अछि; अभिनय, प्रस्तुति, तकनीक, मंचीयता, निर्देशक-दृष्टि आ बदलैत रंगभाषा

लेल स्वतंत्र आलोचनात्मक संवेदना आवश्यक अछि। मुदा पोथीक अनेक बादक लेख एहि

उद्घोषणाक अनुरूप पद्धति विकसित नहि करैत अछि। ई आत्म-विरोध पुस्तकक

आलोचनात्मक समस्याक केन्द्र अछि: सिद्धान्तक आवश्यकता स्वीकृत अछि, किन्तु

सिद्धान्तक अनुप्रयोग असंगत अछि।

पोथीमे

बहुमूल्य तथ्यात्मक सामग्री अछि। अनेक रंगकर्मी, नाटक, संस्था, तिथि, मंचीय

प्रसंग, प्रदर्शनक स्मृति आ साहित्यिक स्रोतक उल्लेख भविष्यक शोध लेल

उपयोगी भऽ सकैत अछि। मुदा दस्तावेजी उपयोगिता आ नाट्यालोचनात्मक सिद्धि एक

वस्तु नहि। जे सामग्री रंग-इतिहासक प्राथमिक स्रोत बनि सकैत अछि, से

अनिवार्य रूपेँ विकसित आलोचना नहि बनैत अछि। एहि अन्तरक पहचान बिना

‘निनाद’क गुण-दोष दुनू ठीकसँ देखल नहि जा सकैत अछि।

निनादक

आन्तरिक संरचनाक अवलोकन कयलापर ई स्पष्ट भ' जाइत अछि जे ग्रन्थक मूल ढाँचा

कोनो पूर्व-नियोजित, व्यवस्थित आलोचनात्मक अनुसन्धानक प्रतिफल नहि थिक।

पोथी कुल १०४ पृष्ठमे समेटल गेल अछि, जकर मूल्य ३०० टका राखल गेल अछि।

ग्रन्थक आरम्भमे 'मैथिली नाट्यालोचनाक वस्तु-स्थिति' शीर्षक सँ एकटा

विस्तृत भूमिका (पृष्ठ ५-१६) देल गेल अछि, जकर उपरान्त दसटा अध्याय संयोजित

अछि। भूमिकामे लेखक अकादमिक जगतक आलोचक सभपर 'नाट्येतर' आ 'अपारदर्शी'

हेबाक आरोप लगबैत ई प्रतिज्ञा करैत छथि जे प्रस्तुत पोथी नाटकक मंचीय आ

आलेखीय दुनू पक्षक सन्तुलित इतिहास प्रस्तुत करत। मुदा, अध्याय सभक

वास्तविक पाठ देखलापर ई दाबी खण्ड-खण्ड भ' जाइत अछि। पोथीमे संकलित सामग्री

वस्तुतः विभिन्न स्मारिका, अभिनन्दन-ग्रन्थ, स्थानीय गोष्ठी आ अखबारी आलेखक

असंपादित कतरन मात्र अछि, जकर विधागत स्वरूप आलोचनात्मक नहि भ' क'

संस्मरणात्मक आ विवरणात्मक अछि।

तालिकासँ

ई स्पष्ट होइत अछि जे पोथीक दसमे सँ कम सँ कम चारि अध्याय (अध्याय ६, ७, ८

आ १०) सोझे यात्रा-संस्मरण आ नाट्य-दलक आन्तरिक दैनन्दिनीक श्रेणीमे अबैत

अछि। उदाहरणार्थ, दसम अध्यायमे लेखक दिल्लीमे यात्रीजीक कवितापर आधारित

नाटक देखबाक लेल यात्रा-वृत्तान्त प्रस्तुत करैत छथि, जाहिमे जाड़क कनकनी,

कुहेसक कारणे ट्रेनक लेट होयबाक आशंका, नई दिल्ली स्टेशनपर उतरि गान्धी

शान्ति प्रतिष्ठानमे चाह-पान करब, श्रीराम सेन्टर पहुँचि रंगकर्मी सभ

द्वारा झाड़ू लगायब आ मंच सजायब, प्रेमलता मिश्रकेँ पुरस्कार भेटब आ अन्तमे

लक्ष्मीनगरमे अपन पितियौतक डेरापर जा क' सुतब—एहि सभक व्यर्थ विवरण भरल

पड़ल अछि।

तहिना

आठम अध्यायमे 'जल डमरू बाजे'क पटना मंचनक काल भारतीय नृत्यकला मन्दिरक

बुकिंगक झंझट, हॉलक गन्दगी, आयोजकक उदासीनता आ अगिला दिन विद्यापति भवनमे

रंगकर्मी सभक संग बैसि क' खाएल गेल 'मधुर' (मिठाई) क उल्लेख आलोचनाक नामपर

कयल गेल अछि। कोनो गम्भीर नाट्य-समीक्षकक दायित्व अभिनेताक आंगिक गति,

वाचिक आरोह-अवरोह, प्रकाश-परिकल्पना आ दर्शकपर पड़यबला रसात्मक वा वैचारिक

प्रभावक अन्वेषण करब होइत अछि। निनादमे ई विश्लेषणात्मक दृष्टि पूर्णतः

लुप्त अछि; एकर बदला लेखक अपन आत्मीय रंगकर्मी सभक "मोटामोटा गदगदी

समीक्षा" प्रस्तुत करैत छथि, जतय आलोचना मात्र व्यक्तिगत सम्बन्ध निर्वाह

करबाक औजार बनि जाइत अछि।

पोथीक अध्याय-संरचना, विधागत यथार्थ आ आलोचनात्मक उपादेयता

अध्याय संख्या आ शीर्षक

पृष्ठ संख्या

मूल प्रकाशन सन्दर्भ आ वर्ष

विधागत यथार्थ

आलोचनात्मक उपादेयता आ स्वरूप

भूमिका: मैथिली

नाट्यालोचनाक वस्तु-स्थिति

5–16

2017 (गुरु

पूर्णिमा)

परिचयात्मक

घोषणापत्र

आक्रामक दाबीक

बादहु सैद्धान्तिक मानदण्डक अभाव।

1. विद्यापतिक

मणिमंजरी

17–25

कर्णामृत,

कोलकाता, 2013

पाठ-परिचय आ

शो-समीक्षा

सामान्य

कथा-विवरण तथा 'मैलोरंग'क प्रस्तुतिक सतही ब्योरा।

2. कविवर जीवन

झाक नाटकक काव्यतत्व

26–33

साहित्य अकादेमी

संगोष्ठी, पटना, 2014

पारम्परिक

काव्यशास्त्रीय आलेख

छन्द, रस आ

अलंकारक प्राथमिक गणना; मंचीय विश्लेषण शून्य।

3. एकल-नाट्य आ

मैथिली रंगकर्म

34–46

गोष्ठी प्रपत्र,

पटना, 2015

नाट्य-प्रारूप

परिचर्चा

केरलक 'कुत्तू'क

सन्दर्भ द' क' स्थानीय 'भंगिमा' दलक अभिनेताक स्तुति।

4. नाट्य-संगीत

आ मैथिली रंगमंच

47–53

आधुनिक मैथिली

नाटक: पहिल शताब्दी, 2006

स्मारिका आलेख

भरतक प्राथमिक

उद्धरणक बाद स्थानीय निर्देशकसभपर आक्षेप।

5.

नाट्य-निर्देश आ मलंगियाजीक पक्ष

54–61

महेन्द्र

मलंगिया: जीवन एवं सृजन, 2015

अभिनन्दन

ग्रन्थक आलेख

महेन्द्र

मलंगियाक रंग-निर्देशनक एकपक्षीय, अतिरंजित प्रशंसा।

6. शहरी

रंगकर्म: मैथिल सन्दर्भ

62–68

सांध्य गोष्ठी,

पटना, 2012

संस्थागत

वक्तव्य

पटनाक रंगकर्मी

सभक आपसी गतिरोध आ आर्थिक संकटपर विलाप।

7. भंगिमा:

सक्रिय रंगकर्मक समर्थ प्रतिमान

69–80

भंगिमा, अंक-52,

पटना, 2012

संस्थागत

स्मारिका रिपोर्ट

'भंगिमा'

संस्थाक नाटक, निर्देशक आ अभिनेता सभक नामावली।

8. मैथिली

रंगकर्मक नमहर आ सुखद घटना

81–86

मिथिला सृजन,

अंक-03, 2010

अखबारी

रिपोर्ताज

'जल डमरू बाजे'क

मंचनक अव्यवस्था आ ग्रीनरूमक गपशप।

9. अमरजीक

रंगदृष्टि

87–99

अप्रकाशित

समीक्षा, 2011

पुस्तक-समीक्षा

आ आक्षेप

साहित्य

अकादेमीक पोथीक सम्पादनपर व्यक्तिगत क्षोभ।

10. मैलोरंगक

विलाप: रंगयात्रा-प्रसंग

100–104

सांध्य गोष्ठी,

पटना, 2011

यात्रा-संस्मरण

आ डायरी

पटना सँ दिल्लीक

रेल यात्रा, जलपान, पुरस्कार आ पाटीदारक घरक विवरण।

१. नाट्यालोचनाक मूल कसौटी: पाठ नहि, घटना सेहो

नाटक

साहित्य सेहो अछि, मुदा रंगमंच केवल साहित्य नहि। लिखित नाट्यपाठ सम्भावित

प्रदर्शनक एक आधार अछि; वास्तविक प्रस्तुति अभिनेता, निर्देशक, शरीर, स्वर,

मौन, प्रकाश, वस्त्र, मंच-संरचना, संगीत, लय, समय, दूरी, प्रवेश-निर्गमन,

दर्शक आ स्थानक संयुक्त घटना अछि। तें नाट्यालोचना यदि केवल कथा-सार,

विषय-वस्तु, पात्रक सामान्य परिचय आ लेखकक उद्देश्य धरि सीमित रहैत अछि तँ

ओ साहित्यिक पुस्तक-समीक्षाक सीमा पार नहि करैत अछि।

‘निनाद’क

लेखनमे अनेक बेर नाट्यकर्मक विषय अवश्य उपस्थित अछि, मुदा

प्रस्तुति-विश्लेषणक सूक्ष्मता अभावग्रस्त देखाइत अछि। कोनो प्रस्तुति

‘प्रभावशाली’, ‘सफल’, ‘महत्त्वपूर्ण’, ‘सुखद’ वा ‘स्मरणीय’ कहल गेल—ई

मूल्यनिर्णय तखन आलोचनात्मक वजन पबैत अछि जखन ओकर कारण दृश्य-दर-दृश्य वा

अभिनय-दर-अभिनय स्पष्ट हो। अभिनेता कोन क्षणमे देहक केन्द्र बदललक? संवादक

अर्थ विरामसँ कोना फिरल? प्रकाश पात्रक नैतिक स्थिति केँ कोना चिन्हित

कएलक? मंच पर दूरी सम्बन्धक शक्ति-संतुलन कोना बनबैत अछि? गीत कथा रोकैत

अछि कि ओकर अन्तराल खोलैत अछि? दर्शकक प्रतिक्रिया प्रदर्शनक लय बदलैत अछि

कि नहि? एहन प्रश्न पोथीक सामान्य लेखन-विधिमे नियमित रूपेँ प्रवेश नहि

करैत अछि।

फलतः

अनेक ठाम आलोचनात्मक विशेषण प्रमाणक स्थान लऽ लैत अछि। साहित्यिक आलोचनामे

विशेषण निषिद्ध नहि, परन्तु विशेषणक पाछाँ विश्लेषण चाही। ‘श्रेष्ठ’ कहबाक

अर्थ अछि—कुन संरचनात्मक वा सौन्दर्यात्मक कारणसँ श्रेष्ठ? ‘प्रयोगधर्मी’

कहबाक अर्थ अछि—कुन प्रचलित रंग-व्याकरण तोड़ल गेल? ‘लोकधर्मी’ कहबाक अर्थ

अछि—लोकक कोन प्रदर्शन-परम्परा, कोन लय, कोन सामाजिक प्रसंग, कोन

दर्शक-संबन्ध? ‘आधुनिक’ कहबाक अर्थ अछि—समयबोध, रूप, अभिनय-शैली, संरचना वा

वैचारिकीमे कोन आधुनिकता? एहन परिभाषात्मक कठोरता बिना आलोचना प्रशंसा वा

निन्दाक भाषामे ढलि जाइत अछि।

२. भरत, रस आ अभिनय: भारतीय नाट्यदृष्टिक कसौटी

भारतीय

नाट्यपरम्परामे भरतमुनिक ‘नाट्यशास्त्र’ नाटक केँ केवल लिखित पाठक रूपमे

नहि देखैत अछि। रस, भाव, अभिनय, वृत्ति, प्रवृत्ति, धर्मी, गीत, वाद्य,

रंगपीठ, वेश, गति, आङ्गिक-वाचिक-आहार्य-सात्त्विक अभिव्यक्ति—ई सभ मिलि

नाट्य बनबैत अछि। एहि दृष्टिसँ कोनो मैथिली प्रस्तुति पर आलोचना करैत समय

कथा-सारसँ पहिने अथवा ओकर संग ई देखबाक आवश्यकता अछि जे नाट्य-अर्थ शरीर आ

मंच पर कोना मूर्त भेल।

‘निनाद’मे नाट्यशास्त्रीय शब्द, संदर्भ आ संगीत-सम्बन्धी परम्पराक उल्लेख

भेटैत अछि, मुदा रस-निष्पत्ति आ अभिनय-विन्यासक ठोस विश्लेषण विरल अछि।

उदाहरणार्थ, करुण प्रसंग केँ ‘करुण’ कहि देब रस-विश्लेषण नहि। विभाव कोन?

आलम्बन-विभाव आ उद्दीपन-विभाव कोना उपस्थित भेल? अनुभाव शरीर, नेत्र, स्वर,

गति वा मौनमे कोना अभिव्यक्त भेल? संचारी भाव कोना चलायमान रहल? स्थायीभाव

रसत्व धरि कोन प्रक्रिया सँ पहुँचल? एहि प्रश्नसभक उत्तर बिना ‘रस’ केवल

नाम बनि रहि जाइत अछि।

अभिनवगुप्तक व्याख्या एहि आलोचनात्मक कमी केँ आरो स्पष्ट करैत अछि। रंगमंच

पर निजी दुःख अथवा व्यक्तिगत प्रसंग सार्वजनीन अनुभूति बनेबाक प्रक्रिया

साधारणीकरणसँ जुड़ैत अछि। सफल अभिनय दर्शक केँ पात्रक अपन जीवनीमे कैद नहि

करैत अछि, वरन् अनुभवक विशिष्टता सँ सार्वभौम संवेदनाक बाट खोलैत अछि।

‘निनाद’ यदि एहि कसौटी केँ अपनबैत तँ कलाकारक प्रशंसासँ आगू बढ़ि ई जाँचि

सकैत छल जे अभिनय दर्शकक अनुभवमे कोन रूपान्तरण उत्पन्न करैत अछि।

आङ्गिक,

वाचिक, आहार्य आ सात्त्विक अभिनयक चारि स्तर मैथिली रंगमंचक विश्लेषण लेल

विशेष रूपेँ उपयुक्त छल। मैथिली भाषाक स्वर-लय, क्षेत्रीय उच्चारण,

देह-भंगिमा, लोक-संस्कारित संकेत, पाग-पोशाक, ग्रामीण-शहरी वेशभूषा,

स्त्री-पुरुषक शरीर-व्याकरण, मंचीय मौन—ऐ सभकेँ एहि वर्गीकरणक सहायता सँ

सूक्ष्म रूपेँ पढ़ल जा सकैत छल। पोथी एहि सम्भावना केँ छूबैत अछि, परन्तु

आलोचनात्मक प्रणाली नहि बनबैत अछि।

'कविवर

जीवन झाक नाटकक काव्यतत्व' अध्यायमे लेखक भरतक नाट्यशास्त्र, अभिनवगुप्त,

विश्वनाथ (साहित्यदर्पण), आ जगन्नाथ (रसगंगाधर) केँ उद्धृत करैत काव्य आ

नाट्यक सम्बन्ध पर विचार करैत छथि — ई पोथीक सैद्धान्तिक दृष्टिएँ सभसँ सबल

अंश थिक। मुदा एतहु एकटा मौलिक असंगति देखल जाइत अछि: लेखक एक दिस मानैत

छथि जे "नाटकक मंच-मूल्य ओकर प्रधान तत्व अछि आ साहित्य-मूल्य ओकर सहयोगी

तत्व," मुदा दोसर दिस समग्र पोथीक विश्लेषण-पद्धति (शब्दालंकार,

अर्थालंकार, छन्द-विधान, अनुप्रासक गणना आदि) विशुद्ध काव्यशास्त्रीय अछि,

मंचीय नहि। रस-निष्पत्तिक चर्चा (शृंगार, वीर, भयानक, अद्भुत आदिक

उदाहरण-सूची) भरतमुनिक विभाव-अनुभाव-व्यभिचारिभाव सिद्धान्तक यांत्रिक

प्रयोग मात्र अछि — रसक केना मंचपर, अभिनेताक शरीर आ दर्शकक सहृदयतासँ,

"निष्पत्ति" होइत अछि, ताहि प्रक्रियापर कोनो विचार नहि अछि। दोसर शब्दमे,

लेखक अपनहि स्थापित सिद्धान्त ('नाट्यक मंच-मूल्य प्रधान') केँ अपन

प्रयुक्त पद्धतिमे (कविताक जकाँ पाठ-केन्द्रित विश्लेषण) खण्डित करैत छथि।

ई भरतमुनिक 'दृश्यकाव्य' अवधारणाकेँ आधा बुझबाक परिणाम थिक — दृश्यकाव्यमे

'दृश्य' पक्षकेँ सैद्धान्तिक स्तरपर स्वीकार क' प्रायोगिक स्तरपर पूर्णतः

त्यागि देल गेल अछि।

नाट्य-सिद्धान्तक दृष्टिसँ निनादक विश्लेषण कयलापर लेखकक सैद्धान्तिक

बुझबाक खोखलापन स्पष्ट भ' जाइत अछि। लेखक पाण्डित्य-प्रदर्शनक लेल भरतमुनिक

नाट्यशास्त्र, संस्कृत काव्यशास्त्र आ पाश्चात्य विचारक सभक नाम त' अनैत

छथि, मुदा हुनकर व्यावहारिक प्रयोग सर्वथा दोषपूर्ण अछि।

भारतीय

परम्परामे भरतमुनि नाट्यकेँ आंगिक, वाचिक, सात्त्विक आ आहार्य—एहि चारि

अभिनयक समन्वित रस-निष्पत्ति व्यापारक रूपमे परिभाषित कयने छथि। नाटक मात्र

पाठ्य-काव्य नहि अछि, अपितु प्रेक्षागृहमे उपस्थित सामाजिक (दर्शक) क

चित्तमे स्थायी भावकेँ जगा क' रस-दशा धरि पहुँचाबयबला दृश्य-प्रक्रिया थिक।

निनादक दोसर अध्यायमे जखन लेखक कविवर जीवन झाक नाटकक काव्य-मूल्यांकन करैत

छथि, तखन हुनकर सम्पूर्ण विवेचन पारम्परिक पाठशाला-शैलीक पद्य-व्याख्या धरि

सीमित रहि जाइत अछि। लेखक जीवन झाक नाटकसँ अनुप्रास, उपमा, रूपक आ

दोहा-चौपाइक छन्दक पाँति चुनिकय उद्धृत करैत छथि आ शृंगार व करुण रसक

उपस्थिति देखा क' अपन कर्तव्यक इतिश्री मानि लैत छथि।

ओ ई

विश्लेषण करबामे असमर्थ रहैत छथि जे जीवन झाक संस्कृतनिष्ठ प्रांजल भाषा

रंगमंचपर अभिनेताक वाचिक सम्प्रेषणकेँ कोना प्रभावित करैत अछि। तहिना,

विद्यापतिक मणिमंजरी अध्यायमे लेखक मात्र एहि बाह्य तथ्यपर मुग्ध छथि जे

नाटिकामे 23 पात्र अछि जाहिमे 13 महिला पात्र आ 84टा गीत अछि, जकरा ओ कोनो

ऐतिहासिक-सैद्धान्तिक आधारक बिना विद्यापतिक 'नारीवादी चेतना' घोषित क' दैत

छथि। शास्त्रीय नाटिकाक रूप-संरचना—जाहिमे अन्तःपुरक शृंगारिक क्रीड़ा,

ललिताभिनय आ स्त्री-पात्रक पारम्परिक बाहुल्य विधागत अनिवार्यता होइत

अछि—तकर ज्ञान नहि रहबाक कारणे लेखक एहन सतही निष्कर्ष निकालैत छथि।

३. ध्वनि, वक्रोक्ति आ औचित्य: नाट्यभाषाक अनकहल अर्थ

आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्त नाट्यालोचना लेल महत्त्वपूर्ण अछि, कारण मंच

पर अर्थ केवल कहल गेल वाक्यमे नहि रहैत अछि। विराम, कटाक्ष, अनुपस्थित

वस्तु, मौन, असम्पूर्ण वाक्य, प्रकाशक परिवर्तन, पात्रक पीठ फेरब, दूर ठाढ़

रहब, असंगत हँसी—ई सभ ध्वन्यार्थ बना सकैत अछि। ‘निनाद’क सामान्य पद्धति

संवादक विषय वा कथ्य पर अधिक ठहरैत अछि; उपपाठ आ संकेत-व्यवस्था पर विस्तार

कम अछि।

कुन्तकक

वक्रोक्ति-दृष्टिसँ प्रश्न होइत जे नाटकीय भाषा साधारण कथनसँ कोना भिन्न

अछि। पात्र यदि सीधा कथन छोड़ि टेढ़, बहुअर्थी, व्यंग्यात्मक,

विडम्बनापूर्ण अथवा रूपकात्मक भाषा अपनबैत अछि तँ ओकर नाटकीय कार्य की?

वक्रता केवल अलंकार नहि, पात्रक मानसिकता, सामाजिक दबाव आ सत्ता-संबन्धक

रूप सेहो भऽ सकैत अछि। एहन भाषिक विश्लेषण पोथीक नाटक-विवेचन केँ गहराइ दऽ

सकैत छल।

क्षेमेन्द्रक औचित्य-दृष्टि मंचीय आलोचनाक एक शक्तिशाली भारतीय औजार भऽ

सकैत अछि। पात्रक भाषा ओकर सामाजिक स्थिति अनुकूल अछि कि नहि? संगीत

दृश्य-भावक अनुकूल अछि कि सजावटी? पोशाक समय, वर्ग आ चरित्र-संरचनासँ मेल

खाइत अछि कि नहि? हास्य गम्भीर प्रसंग केँ तोड़ैत अछि कि अर्थपूर्ण

विरोधाभास बनबैत अछि? प्रकाश, गति, दृश्य, संवाद, गीत आ अभिनय एक-दोसरक

अनुकूल सम्बन्धमे अछि कि नहि? ‘निनाद’मे एहन कसौटी व्यवस्थित रूपेँ लागू

नहि भेल अछि; फलतः मूल्यांकन अनेक ठाम सामान्य विशेषणक भरोसे रहि जाइत अछि।

४. अरस्तू सँ रंगसंकेत-विज्ञान धरि: पाश्चात्य सिद्धान्तसँ आवश्यक संवाद

अरस्तूक

‘Poetics’ नाटकीय क्रिया, कथानक-संरचना, चरित्र, विचार, भाषा, दृश्य आ

संगीतक परस्पर सम्बन्ध पर जोर दैत अछि। मैथिली नाटकक आलोचना करैत समय

कथानकक आरम्भ-मध्य-अन्त मात्र नहि, कारण-कार्य सम्बन्ध, उलटफेर, पहचान,

संकट, निर्णय आ क्रियाक अनिवार्यता जाँचल जा सकैत अछि। ‘निनाद’मे कथा वा

विषयक चर्चा होइत अछि, मुदा dramatic action केँ एक स्वतंत्र संरचनात्मक

समस्या मानि नियमित विश्लेषण कम भेटैत अछि।

स्टानिस्लाव्स्की अभिनयक आन्तरिक प्रेरणा केँ क्रियासँ जोड़ैत छथि। पात्र

की चाहैत अछि? ओकर बाधा की? दृश्य-दर-दृश्य उद्देश्य कोना बदलैत अछि?

अभिनेता निजी भावुकता नहि, कार्यशील उद्देश्य द्वारा चरित्र रचैत अछि।

‘नाट्य-निर्देश आ मनोवैज्ञानिक पक्ष’ सन शीर्षक एहन विश्लेषणक अपेक्षा

जगबैत अछि; मुदा मनोविज्ञानक प्रयोग यदि केवल सामान्य ‘भाव’, ‘मनःस्थिति’

वा निर्देशकक संवेदनशीलता धरि सीमित रहैत अछि तँ आधुनिक अभिनयशास्त्रक

प्रश्न अपूर्ण रहि जाइत अछि।

ब्रेख्त

नाट्यालोचना केँ एकदम दोसर प्रश्न दैत छथि: दर्शक खाली भाव-विलीन हो कि

सामाजिक सम्बन्धक आलोचक बनय? अभिनय पात्रसँ पूर्ण तादात्म्य करैत अछि कि

पात्रक व्यवहार पर टिप्पणी सेहो करैत अछि? गीत कथा केँ भावुक बनबैत अछि कि

विचारक विराम पैदा करैत अछि? ऐतिहासिक घटना वर्तमान सामाजिक संरचना पर

प्रश्न उठबैत अछि कि नहि? मैथिली रंगमंचमे जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र,

पलायन, लैंगिक असमानता, ग्रामीण संकट, प्रशासनिक संरचना आ सांस्कृतिक सत्ता

उपस्थित रहल अछि; मुदा ‘निनाद’क मुख्यधारात्मक लेखन एहि सामाजिक

अन्तर्विरोध केँ केन्द्रिय आलोचनात्मक श्रेणीमे कम बदलैत अछि।

ग्रोटोव्स्की अभिनेता-दर्शक सम्बन्ध केँ रंगमंचक मूल सन धरैत छथि; पीटर

ब्रुक ‘रिक्त स्थान’क अवधारणा द्वारा न्यूनतम परिस्थिति मे रंगकर्मक

सम्भावना देखैत छथि; ऑगुस्तो बोआल दर्शक केँ निष्क्रिय उपभोक्तासँ सहभागी

नागरिकक दिशामे धकेलैत छथि। एकल-नाट्य, लघु रंगमंच, नुक्कड़, अस्थायी मंच,

गामक प्रस्तुति आ प्रवासी समूहक मैथिली रंगकर्म पर ई सभ दृष्टि अत्यन्त

उपयोगी छल। ‘निनाद’क एकल-नाट्य सम्बन्धी लेख सामग्री दैत अछि, मुदा

actor-spectator relation, spatial economy आ participation क गम्भीर

सिद्धान्त विकसित नहि करैत अछि।

आधुनिक

रंग संकेत-विज्ञान—केइर एलाम, पैट्रिस पाविस आदि—एहि बात पर जोर दैत अछि जे

मंचक प्रत्येक तत्व संकेत बनि सकैत अछि। कुर्सी केवल कुर्सी नहि; ओकर स्थान

सत्ता सूचित कऽ सकैत अछि। प्रकाश केवल देखबाक साधन नहि; स्मृति, खतरा,

एकाकीपन वा विभाजन चिन्हित कऽ सकैत अछि। पोशाक, वस्तु, रंग, ध्वनि, दूरी,

स्तर, दिशा—सभ अर्थ उत्पन्न करैत अछि। ‘निनाद’क प्रदर्शन-वर्णनमे ई

संकेत-व्यवस्था प्रायः विश्लेषित नहि होइत अछि, फलतः मंचीय अर्थक बड़

हिस्सा आलोचनाक बाहर रहि जाइत अछि।

पाश्चात्य नाट्यालोचना-परम्परामे (अरस्तूसँ ल' क' ब्रेख्त, ग्रोटोवस्की,

आर्तो धरि) आलोचनाक एकटा केन्द्रीय अपेक्षा अछि — close reading, यानी

प्रस्तुतिक ठोस विवरण (mise-en-scène, अभिनय-शैली, दर्शक-अनुभव) केर

विश्लेषणात्मक विच्छेदन, ने कि सामान्यीकृत प्रशंसा वा निन्दा। एहि कसौटीपर

'निनाद'क बहुसंख्य अध्याय असफल होइत अछि। जेना 'मैथिली रंगकर्मक नमहर आ

सुखद घटना' मे मैलोरंगक 'जल डमरू बाजे' नाटकक प्रस्तुतिक विवरण अछि, मुदा

ओहिमे मंचीय विश्लेषण (blocking, अभिनयक बारीकी, प्रकाश-योजनाक विशिष्ट

प्रयोग) नगण्य अछि; बेसी भाग यात्रा-वृत्तांत, स्वागत-सत्कार, आ रंगकर्मीक

पारस्परिक भेँट-घाँटपर केन्द्रित अछि। ई ब्रेख्तीय 'Verfremdungseffekt' वा

आर्तोक 'Theatre of Cruelty' जकाँ कोनो विश्लेषणात्मक श्रेणीक अनुपस्थितिमे

लिखल एकटा impressionistic account अछि, criticism नहि। लेखक स्वयं एक ठाम

स्वीकार करैत छथि जे "एतहुक निदेर्शकीय कौशल एतबे जे पात्रकेँ मंचपर

यत्र-तत्र टहला दी, उठा-बैसा दी" — ई अवलोकन तीक्ष्ण अछि, मुदा एहि

तीक्ष्णताकेँ एकटा व्यवस्थित मंचीय-विश्लेषण-प्रणाली (जेना semiotic अथवा

phenomenological approach) मे विकसित नहि कएल गेल अछि; ई प्रायः

एकल-पंक्तिक निर्णय बनि रहि जाइत अछि।

एकटा आओर

पाश्चात्य कसौटी — historiography बनाम criticismक भेद — सेहो एतय

प्रासंगिक अछि। पश्चिमी नाट्य-इतिहास लेखनमे (जेना Marvin Carlson, Oscar

Brockett) तथ्य-सत्यापन (fact-checking), स्रोत-समीक्षा (source

criticism), आ archival rigor अनिवार्य मानल जाइत अछि। 'विद्यापतिक

मणिमंजरी' अध्यायमे लेखक स्वयं मानैत छथि जे मणिमंजरीक प्रथम मंचनक तिथिक

"कोनो ठोस प्रमाण उपलब्ध नहि" अछि, आ मैलोरंगक 2013 ई.क प्रस्तुतिकेँ "पहिल

मंचन" मानबाक लेल बाध्य होइत छथि "जाधरि कोनो नव आ ठोस प्रमाण-सूचना उपलब्ध

नहि होइछ" कहिकय। ई पद्धतिगत ईमानदारी प्रशंसनीय अछि, मुदा ई अपवाद थिक,

नियम नहि — पोथीक अन्य ठाम एहन सतर्कता प्रायः अनुपस्थित अछि, विशेषतः जखन

लेखक अपन समकालीन/परिचित रंगकर्मी समूह (जेना भंगिमा, मैलोरंग) केर

मूल्यांकन करैत छथि, तखन साक्ष्य-मानक शिथिल भ' जाइत अछि आ प्रशस्ति-भाव

प्रबल भ' जाइत अछि।

पाश्चात्य नाट्य-सिद्धान्तक सन्दर्भमे लेखकक विचलन आरो गम्भीर अछि। अरस्तू

अपन काव्यशास्त्र (Poetics) मे त्रासदीक छह अनिवार्य अंग निर्धारित कयने

छथि: कथानक (Mythos), चरित्र (Ethos), विचार (Dianoia), पद-विन्यास

(Lexis), दृश्य-विधान (Opsis) आ गीत (Melos)। अरस्तूक अनुसार नाटक

कार्य-व्यापार केर अनुकरण अछि, जतय कथावस्तुक सुगठित विन्यास दर्शकमे भय आ

करुणा जगा क' विरेचन (Catharsis) निष्पन्न करैत अछि। निनादमे

कार्य-व्यापारक अन्विति, नाट्य-द्वन्द्व अथवा विरेचनक प्रक्रियापर कोनो

सैद्धान्तिक विमर्श नहि भेटैत अछि।

एकरासँ

आगू बढ़ि जखन लेखक आधुनिक पाश्चात्य रंग-सिद्धान्तक नाम लैत छथि, त' ओ

बर्तोल्त ब्रेख्त (Bertolt Brecht) क महाकाव्यात्मक रंगमंच (Epic Theatre)

केर उल्लेख मात्र एकटा सजावटी मुहावराक रूपमे करैत छथि। ब्रेख्तक

नाट्य-दर्शन दर्शकक भावनात्मक सम्मोहनकेँ तोड़बाक आ अनचिन्हार प्रभाव

(Verfremdungseffekt) द्वारा ओकरा एकटा सक्रिय, राजनीतिक चिन्तक बनेबाक

सिद्धान्तपर आधारित अछि। एकर विपरीत, निनादमे लेखक जिनकर प्रशंसा करैत छथि,

ओ सभ विशुद्ध रूपेँ मध्यवर्गीय, भावुकतावादी आ यथार्थवादी भ्रम उत्पन्न

करयबला मंचन अछि। लेखक ब्रेख्तक सिद्धान्तकेँ बुझने बिना ओकरा मात्र 'शहरी

रंगमंचक धमक'क पर्याय मानि लैत छथि।

तहिना

कोन्स्तान्तिन स्तानिस्लावस्की (Stanislavski) क चरित्र-प्रवेशक यथार्थवादी

पद्धति वा अन्तोन चेखव (Anton Chekhov) क आन्तरिक उपपाठ (Subtext) क कोनो

सार्थक आ प्रायोगिक विश्लेषण लेखकक समीक्षा सभमे नहि भेटैत अछि। विदेशी

सिद्धान्तकारक नाम मात्र रौब जमाबय लेल टांगल गेल बुझाइत अछि, जकर पोथीक

आन्तरिक विश्लेषणसँ कोनो संरचनात्मक सम्बन्ध नहि अछि।

५. नव्य-न्याय: दावा, प्रमाण आ आलोचनात्मक अनुशासन

मिथिलाक

बौद्धिक परम्परामे नव्य-न्याय केवल दर्शनक इतिहास नहि, सूक्ष्म

विचार-पद्धति अछि। नाट्यालोचना ओकर शब्दावली हूबहू ग्रहण करय, ई आवश्यक

नहि; मुदा ओकर तार्किक अनुशासन अत्यन्त उपयोगी अछि। कोनो आलोचनात्मक

प्रतिज्ञा—‘ई प्रस्तुति आधुनिक अछि’, ‘ई नाटक श्रेष्ठ अछि’, ‘ई कलाकार

महत्त्वपूर्ण अछि’, ‘ई घटना मैथिली रंगमंचक मोड़ अछि’—तखन विश्वसनीय होइत

अछि जखन हेतु स्पष्ट हो, उदाहरण उचित हो, अपवाद जाँचल जाए, प्रमाणक स्रोत

चिन्हित हो आ निष्कर्ष प्रस्तावित सामग्रीसँ अधिक नहि हो।

‘निनाद’क

अनेक सामान्यीकरण एहि कठोरता सँ वंचित देखाइत अछि। कोनो कलाकारक प्रसिद्धि,

संस्थागत प्रतिष्ठा, आयोजनक आकार, दर्शक-संख्या वा प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया

कलात्मक श्रेष्ठताक पर्याप्त हेतु नहि। नव्य-न्यायक भाषामे एहन हेतु

अनैकान्तिक भऽ सकैत अछि—कारण प्रसिद्ध व्यक्ति कमजोर प्रस्तुति दऽ सकैत छथि

आ अपरिचित कलाकार असाधारण। संस्थागत मान्यता सौन्दर्य-मूल्यक व्याप्ति

सिद्ध नहि करैत अछि।

लक्षण-निर्माणक प्रश्न सेहो महत्त्वपूर्ण अछि। यदि ‘नाट्यालोचना’क लक्षण

केवल ‘नाटक वा रंगमंच पर लिखल लेख’ मानल जाए तँ अतिव्याप्ति होयत: समाचार,

यात्रा-वृत्तान्त, श्रद्धांजलि, कार्यक्रम-रिपोर्ट, जीवनी, सूची सभ आलोचना

बनि जाएत। यदि केवल लिखित नाटकक साहित्यिक गुण पर टिप्पणी केँ नाट्यालोचना

मानल जाए तँ अव्याप्ति होयत: अभिनय, निर्देशन, संगीत, दृश्य, दर्शक,

मंच-स्थान, rehearsal, लोक-प्रदर्शन आ डिजिटल रंगमंच बाहर पड़ि जाएत।

‘निनाद’क विधागत संकट मूलतः एहि लक्षण-दोषसँ जुड़ल अछि।

नव्य-न्याय प्रमाणक पृथक्करण सिखबैत अछि। प्रत्यक्षतः देखल प्रदर्शन,

कलाकारक कथन, समाचारपत्रक रिपोर्ट, पुस्तकक प्रकाशित दावा, स्मृति,

कहल-सुनल सूचना—सभ समान प्रमाण-मूल्य नहि रखैत अछि। रंग-इतिहास लिखैत समय ई

बतायब आवश्यक होइत अछि जे कोन निष्कर्ष प्रत्यक्ष अवलोकन पर, कोन दस्तावेज

पर, कोन व्यक्ति-साक्ष्य पर आ कोन अनुमान पर आधारित अछि। ‘निनाद’मे एहि

स्तरक स्रोत-भेद नियमित नहि रहैत अछि।

पूर्वपक्ष-उत्तरपक्षक संस्कार सेहो आलोचनाक मेरुदण्ड होयत। विरोधी मत केँ

कमजोर रूपमे प्रस्तुत कऽ हराएब आलोचना नहि। मजबूत पूर्वपक्ष निर्माण कऽ,

ओकर प्रमाण मानि, फेर तर्कसँ सीमा देखेनाइ आवश्यक अछि। ‘अमरजीक रंगदृष्टि’

जकाँ लेखमे प्रश्नाकुलता अवश्य अछि, मुदा बहस केँ पूर्ण

पूर्वपक्ष-उत्तरपक्ष संरचनामे ढालल जा सकैत छल। एहि सम्भावनाकेँ पुस्तक

आंशिक रूपेँ खोलैत अछि, पूर्ण नहि करैत अछि।

नव्य-न्यायक केन्द्रीय अवधारणा — प्रमाण (सम्यक् ज्ञानक साधन) आ प्रमेय

(ज्ञेय वस्तु) केर भेद — एहि पोथीक दावाकेँ जाँचबाक लेल एकटा उपयोगी उपकरण

अछि। न्यायशास्त्रमे कोनो प्रत्यक्ष-कथनकेँ (प्रत्यक्ष प्रमाण) आ

अनुमान/शब्द-प्रमाण (testimony) केँ भिन्न-भिन्न स्तरक विश्वसनीयता देल

जाइत अछि, आ व्याप्ति (invariable concomitance) केर अभावमे कोनो अनुमान

दोषपूर्ण ('हेत्वाभास') मानल जाइत अछि। एहि कसौटीपर 'निनाद'क बहुत रास दावा

हेत्वाभासक शिकार अछि:

'निनाद'

कोनो एकल लेखक द्वारा मैथिलीक प्रथम नाट्यालोचना-पोथी अछि — ई दावा

(भूमिकामे) अन्वय-व्यतिरेक पद्धतिसँ सत्यापित नहि अछि; ई मात्र लेखकक

व्यक्तिगत जानकारीक सीमा (एकटा अज्ञान-प्रमाण, absence of counter-evidence

known to author) पर आधारित अछि, ने कि समग्र मैथिली प्रकाशन-जगतक ठोस

सर्वेक्षणपर। 'नहि जानब' आ 'नहि अस्तित्वमे रहब' केर बीचक भेद — जे स्वयं

न्यायशास्त्रक अभाव-प्रमाण केर सूक्ष्म विवेचनाक विषय अछि — एतय उपेक्षित

अछि।

भंगिमाक

"८७ टा नाटकक २५० टा प्रदर्शन" जकाँ आँकड़ा शब्द-प्रमाण (testimony) रूपेँ

स्वीकार कएल गेल अछि, बिना कोनो स्वतंत्र सत्यापन-स्रोतक उल्लेखक।

न्यायदर्शनमे शब्द-प्रमाणक विश्वसनीयता वक्ताक आप्तता

(trustworthiness/authority) पर निर्भर करैत अछि; एतय वक्ता आ विषय

(भंगिमा) क बीच एकटा घनिष्ठ सम्बन्ध (लेखक स्वयं भंगिमासँ जुड़ल रहलाह)

अछि, जे आप्तताक तटस्थताकेँ संदिग्ध बनबैत अछि — ई एकटा interested

testimony थिक, जकर मूल्यांकन-मानक स्वतंत्र स्रोतसँ भिन्न होयबाक चाही,

मुदा पोथीमे एहि भेदक कोनो संकेत नहि अछि।

लेखक

स्वयं एतबा आत्म-सजग छथि जे किछु ठाम "रेडीमेड स्थापना सभकेँ यथातथ्य ऊघय

सँ परहेज" केर दावा करैत छथि — मुदा एहि दावाक बादो, मलंगियाजी, कुणालजी

आदिक मूल्यांकनमे प्रायः शब्द-प्रमाण (अन्यक प्रशस्ति उद्धृत करब) आ अनुमान

(सीमित उदाहरणसँ सामान्यीकरण) केर मिश्रण भेटैत अछि, जकर व्याप्ति स्पष्ट

नहि कएल गेल अछि — जेना "मलंगियाजी अभिजात वर्गक हो कि अनभिजात वर्गक, सभक

लेल समान निर्देश गढ़ब" जकाँ व्यापक सामान्यीकरण मात्र किछु नाटकक (ओकरा

आङनक बारहमासा, गाम नइ सुतै) उदाहरणसँ कएल गेल अछि, जे पूर्ण

corpus-विश्लेषण नहि अछि।

संक्षेपमे, पोथी अपनाकेँ आलोचना (मूल्यांकनात्मक विवेचना, जकर आधार तर्क आ

प्रमाण होइत अछि) रूपेँ प्रस्तुत करैत अछि, मुदा एकर पद्धति बेसी भाग

स्तुति (praise, जकर आधार सम्बन्ध आ भावना होइत अछि) केर लगीच अछि।

नव्य-न्यायक भाषामे कहल जाय त' एतय प्रमाण आ उपमान (comparison-based

judgment, "जेहन देखल तेहन कहल") केर बीच घालमेल अछि।

मिथिलाक

बौद्धिक आ दार्शनिक अस्मिता गंगेश उपाध्याय द्वारा प्रवर्तित नव्य-न्यायक

वस्तुनिष्ठ तर्क-पद्धतिपर प्रतिष्ठित अछि। न्याय दर्शन कोनो विषयक यथार्थ

ज्ञान लेल प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव आ

तर्कक सूक्ष्म परीक्षणक मांग करैत अछि। अनुमिति ज्ञानमे पक्ष, साध्य आ

हेतुक बीच 'अविनाभाव सम्बन्ध' अथवा निर्दोष 'व्याप्ति'क भेनाइ अनिवार्य

अछि। जँ हेतुमे व्याप्ति नहि रहत, त' ओ हेत्वाभास बनि क' स्थापनाकेँ अमान्य

क' दैत अछि। निनादमे प्रस्तुत प्रमुख स्थापना सभक नव्य-न्यायक आधारपर

परीक्षण कयलापर लेखकक सम्पूर्ण तर्क-तन्त्र हेत्वाभास आ आत्म-विरोधसँ

ग्रस्त भेटैत अछि।

पहिल

तार्किक विसंगति लेखक द्वारा कविवर जीवन झाक नाटक सुन्दर संयोग (१९०४) केँ

आधुनिकताक इतिहाससँ बाहर करब आ आधुनिक मैथिली नाटकक प्रारम्भ पण्डित

गोविन्द झाक बसात (१९५४) सँ मानबाक हठमे देखाइ दैत अछि। लेखकक प्रतिज्ञा

अछि जे सुन्दर संयोग आधुनिक नाटक नहि अछि, आ एकर समर्थनमे ओ हेतु दैत छथि

जे समाजक आधुनिकता आ नाटकक आधुनिकता दू बात अछि तथा ई मात्र प्राध्यापकीय

स्थापना थिक। नव्य-न्यायक दृष्टिसँ ई हेतु 'स्वरूपासिद्ध' आ 'साध्य-सम'

(Petitio Principii) दोषसँ दूषित अछि। लेखक पूरा पोथीमे कतहु

'नाट्य-आधुनिकता'क लक्षण, परिधि वा नियामक व्याप्ति तय नहि करैत छथि। बिना

कोनो निश्चित लक्षणक १९०४ सँ १९५४ केर पचास वर्षक नाट्य-विकासकेँ मात्र अपन

वैयक्तिक अरुचिक आधारपर खारिज क' देब न्याय-शास्त्रक अनुसार पक्षाभास आ

साध्य-सम हेत्वाभासक प्रत्यक्ष उदाहरण थिक।

दोसर

तार्किक विसंगति 'व्याघात' अथवा आत्म-विरोधक दोष अछि। लेखक पोथीक आरम्भिक

भूमिकामे परम्परागत प्राध्यापकीय आलोचनापर ई प्रहार करैत छथि जे ओ

अतीत-मुग्ध, शास्त्र-सम्मत आ नवता-विरोधी अछि। मुदा जखन ओ स्वयं जीवन झाक

नाटकक मूल्यांकन करैत छथि, तखन ओ रस, अलंकार, छन्द आ शब्द-शक्तिक एहन शुष्क

तालिका प्रस्तुत करैत छथि जे कोनो रूढ़िवादी शास्त्रीय टीकासँ भिन्न नहि

अछि। जाहि पद्धतिक लेखक सैद्धान्तिक स्तरपर विरोध करैत छथि, व्यावहारिक

आलोचनामे तकरे अनुकरण करब नव्य-न्यायमे व्याघात दोष कहबैत अछि।

तेसर

तार्किक विसंगति 'सव्यभिचार' आ 'बाधित' हेत्वाभाससँ जुड़ल अछि। लेखक ई

एकांगी व्याप्ति स्थापित करबाक प्रयास करैत छथि जे गम्भीर आ सार्थक रंगकर्म

मात्र चारिटा शहर—पटना, कोलकाता, दिल्ली आ जनकपुर—मे सम्भव अछि, आ ग्रामीण

रंगमंच निस्तेज अछि आ दरभंगाक आधुनिक मैथिली रंगमंचमे कोनो अस्तित्त्वे नहि

अछि। ई स्थापना प्रत्यक्षतः बाधित अछि। रंगमंचक जीवन्तता सभागारक भव्यता वा

महानगरीय सुविधासँ नहि, अपितु ओकर सामाजिक सम्प्रेषणीयता आ जन-सरोकारसँ तय

होइत अछि। क्षेत्रीय पूर्वाग्रहक कारणे दरभंगा, मधुबनी आ ग्रामीण अंचलक

समृद्ध लोकरंगकेँ मात्र एहि लेल शून्य घोषित क' देब कियाक त' ओ लेखकक गुटीय

प्रभाव-क्षेत्रसँ बाहर अछि, न्याय-पद्धतिक निष्पक्षताक पूर्ण उल्लंघन थिक।

प्रमुख स्थापना सभक नव्य-न्यायिक परीक्षण

लेखकक स्थापना (पक्ष आ साध्य)

लेखक द्वारा प्रस्तुत हेतु

नव्य-न्याय सम्मत तार्किक दोष

आलोचनात्मक आ दार्शनिक परिणाम

सुन्दर संयोग

(१९०४) मैथिलीक प्रथम आधुनिक नाटक नहि थिक।

समाज आ नाटकक

आधुनिकता भिन्न अछि; ई पूर्व आलोचकक अन्ध-परम्परा अछि।

स्वरूपासिद्ध /

साध्य-सम

पचास वर्षक

मैथिली नाट्य-इतिहासक मनमानी विलोपन; आधुनिकताक लक्षणक अभाव।

प्राध्यापकीय

आलोचना अतीतगामी आ शास्त्र-मुग्ध अछि।

प्राध्यापक

मात्र साहित्यिक मूल्य देखैत छथि, मंचीय तकनीक नहि।

व्याघात दोष

(Self-Contradiction)

स्वयं जीवन झाक

पाठपर पारम्परिक रसालंकारिक शुष्क टीका लिखब।

महेन्द्र

मलंगियाक नाट्य-निर्देश सर्वश्रेष्ठ आ क्रान्तिकारी अछि।

ओ उच्च-निम्न सभ

पात्रक लेल 'बैसैत अछि' जकाँ तटस्थ क्रियापद लिखैत छथि।

अनुपसंहारी /

एकांगी व्याप्ति

सतही व्याकरणिक

समताकेँ वैचारिक क्रान्ति मानब, जखन कि आन्तरिक पाठ जातिवादी

अछि।

दरभंगासँ आधुनिक

रंगमंचक कोनो अध्याय विकसित नहि भेल।

ओतयक महंथ

साहित्यकार रंगमंचीय ज्ञानमे शून्य छथि।

बाधित /

प्रत्यक्ष-विरुद्ध

ऐतिहासिक तथ्यक

क्षेत्रीय विद्वेषक कारणे दमन; गैर-महानगरीय रंग-प्रयासक दमन।

एकल-नाट्य

उच्चतर बौद्धिक रंगमंचक एकमात्र पैमाना थिक।

एकहि पात्र

बहुविध चरित्रक कायिक-वाचिक निर्वाह करैत अछि।

अव्याप्ति दोष

(Over-restriction)

नाटकक सामूहिक आ

लोक-धर्मी प्रकृतिक उपेक्षा; मध्यवर्गीय एकालापकेँ सर्वोच्च

मानब।

६. समानान्तर इतिहास-दृष्टि: रंगमंचक अदृश्य अभिलेख

समानान्तर साहित्य-इतिहासक मूल प्रश्न अछि: इतिहास केवल ओहि चीजक नहि जे

छपल, पुरस्कृत, संस्थागत, विश्वविद्यालयीय वा राजधानी-केंद्रित अछि; इतिहास

ओहि अनुपस्थित सामग्रीक सेहो अछि जे अभिलेखमे प्रवेश नहि पाबि सकल। मैथिली

रंगमंचक सन्दर्भमे ई प्रश्न आरो तीक्ष्ण अछि, कारण प्रदर्शन क्षणभंगुर होइत

अछि। गामक अस्थायी मंच, लोक-नाट्य, स्त्रीक घरेलू प्रदर्शन,

जातीय-सामुदायिक अभिनय, श्रमिक-प्रवासी समूह, नेपालक मैथिली क्षेत्र,

सीमावर्ती भाषिक रूप, बाल-रंगमंच, नुक्कड़, ऑडियो-नाटक, रेडियो, डिजिटल

मंच, कम-संसाधनक समूह—ई सभ सहजहि मुख्य संस्थागत इतिहाससँ बाहर रहि सकैत

अछि।

‘निनाद’मे ग्रामीण-शहरी, एकल-नाट्य, लोक-संगीत, आधुनिक रंगकर्म, संस्थागत

गतिविधि आ अनेक कलाकारक चर्चा होइत अछि; ई एक उपयोगी सामग्री-क्षेत्र अछि।

तथापि समानान्तर इतिहासक कसौटी पर प्रश्न उठैत अछि जे चयनक सिद्धान्त की

अछि। कोन समूह भीतर आयल, कोन बाहर रहल? कोन नगर बारम्बार दृश्य अछि, कोन

भूगोल अनुपस्थित? स्त्री रंगकर्मी केवल नाम वा पात्रक रूपमे उपस्थित छथि कि

स्वतंत्र सर्जक, निर्देशक, आयोजक, दर्शक आ समीक्षकक रूपमे? जाति-वर्गक

संरचना रंगसंस्थाक अवसर-वितरण पर कोना असर करैत अछि? भाषिक विविधता—मानक,

क्षेत्रीय, शहरी मिश्रित, प्रवासी—अभिनय आ दर्शक-संबन्ध पर कोना प्रभाव

छोड़ैत अछि?

समानान्तर इतिहासक दृष्टिसँ मुख्यधारा एक प्राकृतिक सत्य नहि, चयनक परिणाम

अछि। पत्रिका, अकादमी, खरीद-योजना, संगोष्ठी, विश्वविद्यालय, पुरस्कार,

प्रकाशक, राजधानीक मंच आ मीडिया—ई सभ दृश्यता निर्मित करैत अछि। कोनो पोथीक

संस्थागत स्वीकृति ओकर आलोचनात्मक श्रेष्ठताक स्वतः प्रमाण नहि; एही तरहे

संस्थागत उपेक्षा कलात्मक महत्वक अभाव सिद्ध नहि करैत अछि। आलोचकक दायित्व

अछि संस्थागत दृश्यता आ सौन्दर्य-मूल्य केँ अलग-अलग जाँचब।

‘निनाद’क

महत्त्वपूर्ण सीमा ई अछि जे ई अनेक संस्थागत-प्रसिद्ध रंगप्रसंगक दस्तावेज

तऽ बनैत अछि, मुदा दृश्यताक राजनीति केँ स्वयं अध्ययन-विषय कम बनबैत अछि।

फलतः जे चीज सोझाँ अछि, ओहि पर लेख अछि; जे अनुपस्थित अछि, ओकर अनुपस्थिति

इतिहासक प्रश्न बनि नहि पबैत अछि। समानान्तर आलोचना एहि मौन केँ पढ़ैत अछि।

विदेहक

साहित्यिक-आलोचनात्मक परियोजनाक एकटा केन्द्रीय अभिप्राय रहल अछि —

मुख्यधाराक संस्थागत साहित्य-इतिहाससँ बाहर रहल, उपेक्षित, वा

सत्ता-संरचनासँ बाहरक स्वर आ प्रयोगकेँ समानान्तर इतिहासक रूपमे

दस्तावेजीकरण करब। एहि दृष्टिकोणसँ देखलापर 'निनाद'क सभसँ गम्भीर सीमा

उजागर होइत अछि — ई पोथी प्रायः 'शहरी', संस्थात्मक, आ अपन परिचित-वृत्तक

(चेतना समिति, अरिपन, आंगन, भंगिमा, मैलोरंग) रंगकर्मकेँ केन्द्रमे राखि

लिखल गेल अछि, आ ग्रामीण/परिधीय/असंस्थागत रंगकर्मकेँ प्रायः वर्णनात्मक

स्तरपर (चर्चाक विषय बनाकय) राखल गेल अछि, विश्लेषणक विषय बनाकय नहि। 'शहरी

रंगकर्म: मैथिल सन्दर्भ' अध्यायमे लेखक स्वयं स्वीकार करैत छथि जे ओ

"ग्रामीण रंगमंचक पक्षधर" छथि मुदा "एहि रंगमंचक चिन्ता-भूमि पर ठाढ़ भ' क'

नहि" — यानी लेखक अपन संरचनात्मक स्थिति (शहरी, संस्थागत) आ अपन घोषित

सहानुभूति (ग्रामीण, परिधीय) केर बीचक अंतर्विरोधकेँ पहिचानि तँ लैत छथि,

मुदा एहि अंतर्विरोधकेँ सुलझेबाक कोनो पद्धतिगत प्रयास (जेना ग्रामीण

रंगकर्मीक साक्षात्कार, फील्ड-वर्क, वैकल्पिक स्रोत-संकलन) नहि करैत छथि। ई

ठीक वएह समस्या थिक जे विदेहक समानान्तर-इतिहास दृष्टिकोण बेर-बेर चिन्हित

करैत अछि — केन्द्रक स्वीकृति सँ परिधिक अस्तित्व सिद्ध नहि होइत अछि, आ

केन्द्रीय संस्थाक आत्म-मूल्यांकन (भंगिमाक आत्म-प्रस्तुति, कुणालजीक

आत्म-घोषणा) केँ स्वतंत्र समीक्षाक बिना 'इतिहास' मानि लेब एकटा पद्धतिगत

त्रुटि थिक।

एहि

अंतर्विरोधक एकटा आओर आयाम अछि — चैम्बर नाटक आ एकल-नाट्य जकाँ प्रयोगवादी

रूपसभकेँ पोथीमे विस्तृत स्थान देल गेल अछि (कुणालजीक "टर्निंग प्वाइंट"

रूपमे प्रतिष्ठा), मुदा एहि प्रयोगवादक राजनीतिक-सामाजिक निहितार्थपर कोनो

विचार नहि अछि। एहि नव रूपसभक दर्शक-वर्ग के छल? कोन सामाजिक-आर्थिक तबका

एहि 'चैम्बर' अनुभवसँ बहिष्कृत रहल (शीर्षक स्वयं 'chamber' यानी सीमित,

कुलीन स्थानकेँ इंगित करैत अछि)? ई प्रश्न, जे किनको पाश्चात्य

'avant-garde theatre' आलोचनामे (जेना Peter Bürger क Theory of the

Avant-Garde) केन्द्रीय अछि, पोथीमे उठले नहि अछि। विदेहक समानान्तर

दृष्टिकोणसँ ई एकटा गंभीर त्रुटि थिक — प्रयोगकेँ प्रगति मानि लेब, बिना ई

पूछने जे प्रयोग केकर लेल आ केकरा बहिष्करण पर आधारित अछि।

अंततः,

पोथीक स्वयंक स्वीकृति अछि जे "मैथिलीओमे नाटकक आलोचनाक नाम पर मारिते रास

पोथी प्रकाशित अछि... तेकर मैथिलीमे अभाव अछि" — ई विरोधाभासी अछि, कारण जँ

मैथिलीक नाट्यालोचना 'गप' मात्र अछि (जेना लेखक अन्यत्र मलंगियाजी,

कुणालजीक कृतनियाँ नाटकपर लिखल आलोचनाकेँ "गप" कहैत छथि), त' 'निनाद' स्वयं

एहि 'गप'-परम्पराक निरंतरता सँ कतेक बचल अछि, से पोथी स्वयं स्पष्ट नहि

करैत अछि।

मैथिली

साहित्य आ रंगमंचक आधिकारिक इतिहास-लेखनपर सदति संस्थागत अकादेमी,

पुरस्कार-समिति आ संभ्रान्त वर्गक एकाधिकार रहल अछि। एकर विपरीत, 'विदेह'

(प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका आ समानान्तर आन्दोलन) मैथिलीक एकटा एहन

'समानान्तर इतिहास' आ समानान्तर आलोचनात्मक प्रतिमान स्थापित कयने अछि, जे

राज्याश्रित आ दरबारी अभिजात्यवादकेँ खारिज करैत अछि। 'विदेह' समानान्तर

इतिहास ई स्पष्ट करैत अछि जे मिथिलाक वास्तविक रंग-चेतना कोनो वातानुकूलित

सभागार वा उत्सवधर्मी सरकारी सम्मेलनक बन्धक नहि अछि, अपितु ओ सलहेस,

लोरिकायन, कारिख, दीना-भद्री, सामा-चकेवा, जट-जटिन आ 'बिदापत नाच' जकाँ

शताब्दि पुरान लोक-परम्परामे प्रवाहित अछि।

कमल मोहन

चुन्नूक पोथी निनाद एहि समानान्तर लोक-परम्पराक प्रति घोर उपेक्षा आ

संभ्रान्तवादी दृष्टिक परिचय दैत अछि। लेखक ग्रामीण रंगमंचकेँ 'अवशेष' आ

'अविकसित' मानैत ई सुझाव दैत छथि जे ओकरा शहरी रंगमंचक प्रविधिसभ अपनाबय

पड़त। ई वएह औपनिवेशिक मानसिकता अछि जे लोक-संस्कृति ताधरि अमान्य रखैत अछि

जाधरि पटना वा दिल्लीक कोनो संभ्रान्त निर्देशक ओकर 'परिष्कार' क' क' ओकरा

मध्यवर्गीय उपभोगक वस्तु नहि बना दैत अछि। लेखक चैम्बर ड्रामा (Chamber

Drama) जकाँ संकीर्ण, सीमित आ ड्राइंग-रूम शैलीकेँ मैथिली रंगमंचक 'टर्निंग

प्वाइंट' घोषित करैत छथि, जखनकि जन-साधारणक बीच खेलल जायबला मुक्त नुक्कड़

नाटक आ पारम्परिक लोक-नाट्यकेँ दोयम दर्जाक मानैत छथि।

एहि

वैचारिक अनभिज्ञताक सबसँ प्रमाणिक उदाहरण पोथीक पाँचम अध्याय

'नाट्य-निर्देश आ मलंगियाजीक पक्ष'मे भेटैत अछि। लेखक महेन्द्र मलंगियाक

नाटकक रंग-निर्देशनक प्रशंसा करैत ई दाबी करैत छथि जे मलंगिया सभ जाति,

वर्ग आ उमेरक पात्रक लेल कोष्ठकमे एक समान, आदर-रहित तटस्थ क्रियापदक

प्रयोग क' क' सामाजिक समताक ऐतिहासिक कार्य कयने छथि।

विश्लेषण कतेक सतही आ यथार्थसँ दूर अछि, एकर उद्घाटन हमरा द्वारा महेन्द्र

मलंगियाक नाटक छुतहा घैल (छुतहर घैल) क समानान्तर समीक्षामे विस्तारसँ कयल

गेल अछि। मलंगियाक नाटकक संरचनात्मक संकट कोष्ठकक क्रियापदमे नहि, अपितु

हुनकर गहीर आनुवंशिक जातीय श्रेष्ठता-बोधमे अछि। मलंगिया अपन नाटकमे

सत्रहमे सँ पन्द्रह दृश्य धरि वंचित आ शोषित जातिक पात्र सभक मुखसँ एकटा

विकृत, कृत्रिम मैथिली आ टूटल-फूटल हिन्दी बजबा क' सवर्ण दर्शकक मनोरंजन

लेल सस्ता आ छद्म हास्य उत्पन्न करैत छथि। नाटकक अन्तिम दृश्यमे अचानक एकटा

खोखला उपदेश जोड़ि देलासँ नाटक क्रान्तिकारी नहि बनि जाइत अछि, किएक त' ओकर

सम्पूर्ण संरचना समाजक दलित-शोषित वर्गकेँ उपहासक पात्र बनबैत अछि। कमल

मोहन चुन्नू निनाद मलंगियाक एहि जातिवादी भाषिक षड्यन्त्रकेँ पकड़बामे

पूर्णतः असमर्थ रहैत अछि आ मात्र कोष्ठकक क्रियापद गनि क' हुनका

युगान्तरकारी नाटककार सिद्ध करबामे लागल रहैत छथि।

समानान्तर आन्दोलनक अन्तर्गत विकसित स्वतन्त्र आ वैकल्पिक रंग-प्रयास,

मैथिली रेडियो नाटकक तकनीकी मार्गदर्शिका, आ डिजिटल माध्यमपर संचालित बिना

कोनो सरकारी अनुदानक संसार भरिक मैथिलकेँ नाटक आ रंगमंचसँ जोड़ल धारासँ ओ

अनभिज्ञ छथि। लेखकक आलोचनात्मक संसार मात्र ओही चारि-पाँच गोष्ठी-मित्र सभ

धरि सीमित अछि जे सरकारी सम्मेलन आ स्मारिकामे एक-दोसरक पीठ ठोकैत छथि। एहि

प्रकारें, निनाद समानान्तर जन-रंगमंच आ वैचारिक नाट्य-साहित्यक प्रति

सर्वथा आँखि मुनने रहैत अछि/ अनभिज्ञ छथि।

७. ‘मैथिली नाट्यालोचनाक वस्तु-स्थिति’: सही रोग-निदान, अपूर्ण उपचार

पोथीक

आरम्भिक लेख आलोचनात्मक दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण अछि, कारण लेखक मैथिली

नाट्यालोचनाक कमजोरी चिन्हैत छथि। नाटकक समीक्षा यदि कथा-सार, लेखक-परिचय आ

सामान्य साहित्यिक गुणक सूची मात्र रहि जाए, तँ मंचक जीवित स्वरूप लुप्त भऽ

जाइत अछि—एहि बोधसँ लेख प्रारम्भिक शक्ति पबैत अछि। आधुनिक रंगमंचक बदलैत

तकनीक, अभिनय, प्रयोग आ प्रस्तुति-विधान लेल बदलल आलोचनात्मक औजार चाही—ई

स्थापना उचित अछि।

मुदा

लेखक समस्या एकर बाद शुरू होइत अछि। नाट्यालोचनाक वस्तु-स्थिति बताबय लेल

एक सुव्यवस्थित corpus आवश्यक छल: अमुक दशकक अमुक पत्रिका, अमुक समीक्षकक

अमुक संख्या लेख, मंच-समीक्षा बनाम पुस्तक-समीक्षाक अनुपात, आलोचनात्मक

पद्धतिक वर्गीकरण, प्रमुख प्रवृत्ति, प्रमुख भूल, अपवादस्वरूप उत्कृष्ट

उदाहरण। एहि प्रकारक मानचित्र बिना स्थापना प्रभावशाली तऽ लगैत अछि, परन्तु

शोध-सिद्ध इतिहास नहि बनैत अछि।

लेखमे

नाम आ सन्दर्भक पर्याप्त उपस्थिति अछि, मुदा नाम-संचयन आ इतिहास-निर्माण

अलग क्रिया अछि। इतिहासमे कालक्रम, प्रभाव-संबंध, विवाद, परम्परा, विच्छेद,

वैकल्पिक धारा, पद्धति-परिवर्तन आ स्रोत-समीक्षा चाही। यदि ई लेख अपन

उद्घोषित प्रश्नक अनुरूप मैथिली नाट्यालोचना केँ विभिन्न कालखण्ड आ

पद्धतिमे विभक्त करैत, तँ पोथीक आधारभूत सिद्धान्त बनि सकैत छल। वर्तमान

रूपमे ई महत्त्वपूर्ण प्रस्तावना अछि, पूर्ण अनुशासन नहि।

८. ‘विद्यापतिक मणिमंजरी’: साहित्येतिहास आ नाट्यविश्लेषणक बीच

‘विद्यापतिक मणिमंजरी’ सम्बन्धी लेख ऐतिहासिक-साहित्यिक सामग्री दैत अछि।

ग्रन्थ, काव्यपरम्परा, संस्कृत-मैथिली सम्बन्ध आ नाट्यरूपक सन्दर्भ पाठक

लेल उपयोगी अछि। मुदा नाट्यालोचनाक दृष्टिसँ प्रश्न ई अछि जे ‘मणिमंजरी’क

dramatic structure कोना पढ़ल गेल। पात्रक प्रवेश-निर्गमन, संवादक

क्रियात्मकता, दृश्य-संरचना, हास्य अथवा शृंगारक मंचीय सम्भावना, भाषिक

register, प्रदर्शन-संकेत आ सम्भावित दर्शक—ऐ सभ पर अधिक गहिराइ अपेक्षित

छल।

ऐतिहासिक

नाट्यपाठक आलोचना केवल रचनाक प्राचीनता वा साहित्यिक महत्त्व सिद्ध करब

नहि। पाठक performance potential जाँचब सेहो आवश्यक अछि। पाठ मंच पर कोन

समस्या उत्पन्न करैत अछि? आइक निर्देशक कोन अंश केँ रूपान्तरित करत?

संस्कृत-प्रभावित वाक्यरचना दर्शक-संबन्ध पर की प्रभाव देत? शास्त्रीय

रूपकक श्रेणी आधुनिक मंचपर्यन्त कतेक उपयोगी अछि? एहन प्रश्नक अनुपस्थितिमे

लेख साहित्येतिहासक निकट अधिक अछि, प्रदर्शन-आलोचनाक निकट कम।

९. कविवर जीवन झाक नाटकक ‘काव्यतत्त्व’: नाटक केँ फेर कवितामे सीमित करबाक

जोखिम

जीवन झाक

नाटकक ‘काव्यतत्त्व’ पर लेख एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक विषय उठबैत अछि।

भाषा, भाव, छन्द, काव्यगुण, चरित्रचित्रण आ सौन्दर्यक विवेचन नाट्यपाठक

अध्ययनमे आवश्यक भऽ सकैत अछि। परन्तु शीर्षकक ‘काव्यतत्त्व’ स्वयं आलोचक

केँ सावधान करबाक चाही: नाटकक काव्यात्मकता ओकर नाटकीयताक स्थानापन्न नहि।

सुन्दर पंक्ति मंच पर मृत भऽ सकैत अछि, आ साधारण वाक्य अभिनेता, परिस्थिति

आ मौनक कारण असाधारण नाटकीय प्रभाव उत्पन्न कऽ सकैत अछि।

एहि

लेखमे यदि काव्यतत्त्व आ नाट्यतत्त्वक अन्तर्सम्बन्ध स्पष्ट कएल

जाइत—काव्यात्मक भाषा action केँ रोकैत अछि कि तीव्र करैत अछि? रूपक पात्रक

उद्देश्य झाँपैत अछि कि खोलैत अछि? गीत दृश्य-परिवर्तनक साधन अछि कि

भाव-विस्तार? छन्द अभिनेता केँ लय देत कि प्राकृतिक संवादसँ दूरी बनाओत?—तँ

अध्ययन अधिक नाट्यालोचनात्मक बनैत अछि। वर्तमान अभिमुखता पाठीय सौन्दर्यक

दिस अधिक झुकैत अछि।

१०. ‘एकल-नाट्य आ मैथिली रंगकर्मी’: महत्त्वपूर्ण क्षेत्र, अपूर्ण

प्रदर्शन-मीमांसा

एकल-नाट्य मैथिली रंगचिन्ताक लेल अत्यन्त उपयोगी क्षेत्र अछि, कारण एतय

रंगमंचक अधिकांश भार एक शरीर, एक स्वर आ सीमित साधन पर आबि जाइत अछि।

अभिनेता कथावाचक, पात्र, दृश्य-निर्माता, समय-संयोजक आ दर्शक-संबन्धक

केन्द्र बनैत अछि। ‘निनाद’ एहि पर सामग्री संकलित करैत अछि, विभिन्न कलाकार

आ प्रस्तुति-सन्दर्भ सोझाँ आनैत अछि—ई पुस्तकक उपयोगी योगदान अछि।

मुदा

एकल-नाटकक विशिष्ट व्याकरण अधिक माँगैत अछि। एक अभिनेता अनेक पात्रक बीच

शरीरक परिवर्तन कोना करैत अछि? स्वरक pitch, गति, दिशा, दृष्टि आ posture

सँ चरित्र-भेद कोना बनैत अछि? खाली मंच पर काल्पनिक वस्तु कोना सृजित होइत

अछि? दर्शकसँ प्रत्यक्ष सम्बोधन अभिनयक ओ देबाल तोड़ैत अछि कि नहि? असगर

भेनाइ विषय मात्र अछि कि मंचीय संरचना? स्मृति आ वर्तमानक समय-परिवर्तन

कोना चिन्हित होइत अछि? एहि प्रश्नसभक आधार पर विशिष्ट मैथिली

एकल-नाट्यशास्त्र बनि सकैत छल।

ग्रोटोव्स्की, ब्रुक आ प्रदर्शन-अध्ययनक सहायता सँ एकल-नाट्यक साधनहीनता

केँ कमजोरी नहि, सौन्दर्यात्मक चुनावक रूपमे पढ़ल जा सकैत अछि। ‘निनाद’क

लेख एहि दिशाक द्वार खोलैत अछि, परन्तु भीतर बहुत दूर नहि जाइत अछि।

११. ‘नाट्य-संगीत आ मैथिली रंगमंच’: सूचीसँ ध्वनि-नाट्यशास्त्र धरि जे दूरी

बचल

मैथिली

रंगमंच संगीत बिना बुझल नहि जा सकैत अछि। लोकधुन, विवाहगीत, संस्कारगीत,

भक्ति, कीर्तन, ऋतुगीत, कथागीत, आधुनिक गीत, वाद्य, ताल आ मौन—ई सभ सामूहिक

स्मृति आ मंचीय अर्थक स्रोत अछि। ‘निनाद’मे नाट्य-संगीतक परम्परा, प्रयोग आ

उदाहरणक उल्लेख महत्त्वपूर्ण अछि।

मुदा

संगीतक आलोचना गीतक उपस्थिति गनब नहि। प्रश्न होयत: गीत कथाक भीतर diegetic

अछि कि बाहरी टिप्पणी? पात्र स्वयं गाबैत अछि कि पार्श्वसंगीत चलैत अछि?

संगीत दृश्य बदलैत अछि कि भाव दोहरबैत? लोकधुन अपन सामाजिक इतिहास लऽ कऽ

अबैत अछि कि केवल ‘मिथिला-रंग’क सजावट बनैत अछि? स्त्री-गीत

पुरुष-निर्देशित मंच पर अपन मूल सामाजिक अर्थ बचबैत अछि कि नव अर्थ ग्रहण

करैत अछि? मौन संगीतक विरोधी नहि, ओकर संरचनात्मक संगी कोना बनैत अछि?

ब्रेख्तीय गीत कथा केँ रोकि दर्शक केँ विचारक दूरी दऽ सकैत अछि;

रस-दृष्टिसँ संगीत भावक उद्दीपन बनि सकैत अछि; संकेत-विज्ञानमे ध्वनि

दृश्यकेँ विरोधी अर्थ दऽ सकैत अछि। एहन बहुस्तरीय पठन बिना संगीतक अध्याय

सूचना-समृद्ध तऽ रहैत अछि, परन्तु ध्वनि-नाट्यशास्त्र विकसित नहि करैत अछि।

१२. ‘नाट्य-निर्देश आ मनोवैज्ञानिक पक्ष’: निर्देशक-दृष्टिक सैद्धान्तिक

अभाव

निर्देशनक मनोवैज्ञानिक पक्ष पर लिखब कठिन काज अछि, कारण ‘मनोविज्ञान’ शब्द

अत्यन्त सामान्य भऽ सकैत अछि। निर्देशक पात्रक इच्छा, भय, स्मृति, संघर्ष आ

अवचेतन बुझैत छथि—एतबे कहब पर्याप्त नहि। मंच पर मनोवैज्ञानिक अर्थ

दृश्य-क्रियामे बदलब जरूरी अछि। actor objective, obstacle, action, beat,

tempo-rhythm, subtext, spatial relation—ई सभ निर्देशकक कार्यक ठोस इकाइ

बनि सकैत अछि।

‘निनाद’

एहि विषय पर निर्देशकक भूमिका आ नाट्य-प्रक्रियाक चर्चा करैत अछि, परन्तु

मनोवैज्ञानिक विश्लेषणक स्पष्ट मॉडल नहि बनबैत अछि। यदि स्टानिस्लाव्स्की,

मेयरहोल्ड, ब्रेख्त अथवा भारतीय अभिनय-सिद्धान्तक अन्तर देखाओल जाइत तँ

प्रश्न स्पष्ट होइत: निर्देशक अभिनेताक भीतरक भाव खोजैत अछि कि बाहरी

शरीर-रचना द्वारा भाव उत्पन्न करैत अछि? तादात्म्य चाहैत अछि कि आलोचनात्मक

दूरी? improvisationक स्थान की? Rehearsal मे पाठ कोना बदलैत अछि?

निर्देशन

मूलतः चयनक कला अछि। मंच पर प्रत्येक क्षण अनेक सम्भावना रहैत अछि;

निर्देशक एक विकल्प चुनैत अछि। आलोचकक काज एहि चयनक कारण आ परिणाम पढ़ब।

‘निनाद’मे निर्देशकक सम्मान अछि, मुदा निर्देशनक निर्णय-व्याकरणक विश्लेषण

कम अछि।

१३. ‘शहरी रंगकर्म: मैथिल सन्दर्भ’: नगरक समाजशास्त्र अपूर्ण

शहरी

मैथिली रंगकर्म केवल शहरमे खेलल नाटक नहि। ई प्रवास, रोजगार, छात्र-जीवन,

भाषा-संरक्षण, जातीय-सांस्कृतिक संस्था, किराया, rehearsal-space, टिकट,

प्रायोजन, सभागार, महानगरीय दर्शक, बहुभाषिकता आ सांस्कृतिक प्रतिष्ठासँ

बनैत अछि। शहरी मंच पर मैथिली बाजब स्वयं पहचानक राजनीतिक-सांस्कृतिक

क्रिया भऽ सकैत अछि।

‘निनाद’

शहरी रंगकर्मक अनेक प्रसंग सोझाँ आनैत अछि, परन्तु शहर केँ संरचनात्मक

शक्ति-क्षेत्रक रूपमे कम पढ़ैत अछि। दिल्ली, पटना, कोलकाता अथवा अन्य नगरमे

मंचनक अर्थ केवल स्थान-परिवर्तन नहि; दर्शक-वर्ग बदलैत अछि, उच्चारण बदलि

सकैत अछि, कलाकारक पेशागत समय बदलैत अछि, संस्थागत अनुदानक जरूरत बदलैत

अछि, मंच-तकनीकक पहुँच बदलैत अछि। एहि सामाजिक भिन्नता बिना ‘शहरी’ शब्द

भूगोल रहि जाइत अछि, समाजशास्त्रीय श्रेणी नहि।

समानान्तर दृष्टिसँ एतय ई प्रश्न सेहो महत्त्वपूर्ण अछि जे नगरमे कोन मैथिल

समूहक सांस्कृतिक पूँजी अधिक अछि। सभागार कोन संस्था बुक करैत अछि? कोन

समूहक कलाकार नेटवर्क दृश्यता पबैत अछि? स्त्रीक भागीदारी पर परिवार, नौकरी

आ रातिक rehearsal क प्रभाव की? नवप्रवासी आ पुरान संस्थागत वर्गक बीच

सम्बन्ध की? पोथी एहि संरचनात्मक प्रश्नक अपेक्षा व्यक्ति-घटना केन्द्रित

अधिक अछि।

१४. रंगकर्मक ‘संघर्ष-प्रतिमान’: इतिहासक शक्ति आ सीमा

पोथीक एक

विस्तृत खण्ड मैथिली रंगकर्मक संघर्ष, संस्थागत विकास, कलाकार, नाटक,

रंगसंस्था आ बदलैत समयक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करैत अछि। सामग्रीक घनत्व

एतय उल्लेखनीय अछि। नाम, वर्ष, मंच, संस्था आ सांस्कृतिक घटनाक संचयन

मैथिली रंगइतिहासक स्रोत-सामग्री बनि सकैत अछि।

मुदा

‘संघर्ष’ केँ आलोचनात्मक श्रेणी बनाबय लेल संघर्षक संरचना चिन्हित होयब

आवश्यक अछि। संघर्ष कोन शक्तिक बीच? भाषा बनाम राज्य? क्षेत्रीयता बनाम

राजधानी? कला बनाम बाजार? पेशेवर बनाम शौकिया? स्त्री बनाम पितृसत्तात्मक

मंच-संरचना? जातीय पदानुक्रम? ग्रामीण बनाम शहरी संसाधन? साहित्यिक नाटक

बनाम प्रदर्शन-आधारित रंगकर्म? यदि संघर्षक पक्ष स्पष्ट नहि, तँ ‘संघर्ष’

प्रेरणादायी शब्द रहि जाइत अछि, इतिहास-विश्लेषण नहि।

एहि

खण्डमे कालक्रमक संग-संग कारणात्मक इतिहास आवश्यक छल। अमुक दशकमे अमुक

संस्था कियैक उभरल? आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि की छल? विश्वविद्यालय आ

सरकारी संस्थाक भूमिका की? रेडियो, टेलीविजन, प्रवास, सड़क, सभागार, डिजिटल

माध्यम, आर्थिक उदारीकरण वा भाषिक राजनीति रंगकर्मक रूप बदललक कि नहि?

समानान्तर इतिहासक पद्धति घटना-सूची केँ एहि संरचनात्मक कारणसँ जोड़ैत अछि।

१५. ‘मैथिली रंगकर्मक नमहर आ सुखद घटना’: समाचार, संस्मरण आ आलोचनाक सीमा

एहि

लेखमे तिथि, यात्रा, समूहक आगमन, कलाकार, आयोजन, रहन-सहन, मंचीय परिस्थिति,

व्यवधान, दर्शक आ प्रस्तुति-स्मरणक विस्तृत विवरण अछि। ई सब भविष्यक

रंगइतिहास लेल उपयोगी प्रत्यक्ष-साक्ष्य भऽ सकैत अछि। रंगकर्मक अस्थायी

प्रकृतिक कारण एहन विवरणक अभिलेखीय महत्त्व कम नहि आँकल जा सकैत अछि।

तथापि

विधागत प्रश्न स्पष्ट अछि। बिजली गेल, मंच छोट छल, कलाकार अमुक ठामसँ आयल,

अमुक व्यवस्था भेल—ई घटना-विवरण अछि। नाट्यालोचना तखन बनैत अछि जखन ई

देखाओल जाए जे विद्युत-विघ्न प्रस्तुति-लय केँ कोना तोड़लक अथवा कलाकार

improvised adaptation द्वारा ओकरा नाटकीय अवसरमे बदललक; छोट मंच blocking,

proxemics आ actor-audience relation केँ कोना बदललक; दर्शकक निकटता अभिनयक

वाचिक अथवा आङ्गिक शैली पर की प्रभाव देलक।

एहि

रूपान्तरणक अभावमे लेख रंग-संस्मरण अथवा सांस्कृतिक रिपोर्टक रूपमे अधिक

सफल अछि। समस्या रिपोर्टिंग नहि; समस्या तखन अछि जखन रिपोर्टिंग केँ

आलोचनात्मक परीक्षणक समकक्ष मानि लेल जाए। विधाक स्पष्ट नामकरण पुस्तकक

मूल्य घटबैत नहि, उलटे ओकर उपयोगिता ठीक ठाम स्थापित करैत।

१६. ‘अमरजीक रंगदृष्टि’: पुस्तकक भीतर आलोचनात्मक सम्भावनाक सभसँ स्पष्ट

क्षण

‘अमरजीक

रंगदृष्टि’ पोथीक अधिक प्रश्नाकुल लेखसभमे अछि। एतय लेखक स्थापित मत, चयन,

मंचीय उपलब्धि, साहित्यिक मूल्य आ रंगमंचीय उपयोगिता पर प्रश्न उठबैत छथि।

एहि कारण ई लेख प्रमाणित करैत अछि जे पोथी पूर्णतः प्रशस्तिपरक नहि; लेखकक

भीतर आलोचनात्मक असहमति आ मूल्यनिर्णयक क्षमता अछि।

मुदा एहि

लेखक सम्भावना पूर्ण विकसित नहि होइत अछि। प्रश्न उठलाक बाद एक व्यवस्थित

analytical matrix चाही छल: दावा की? प्रमाण की? counter-example की? चयनक

मानदण्ड की? कोन नाटक साहित्यिक रूपेँ महत्त्वपूर्ण मुदा मंचीय रूपेँ

कमजोर, आ कियैक? कोन प्रस्तुति पाठक सीमा तोड़ैत अछि? कोन इतिहासलेखन अमुक

धारा केँ बढ़ा-चढ़ा देखबैत अछि? एहि पद्धतिसँ लेख व्यक्तिगत असहमतिक

स्थानसँ आलोचनात्मक प्रतिमान धरि पहुँचि सकैत छल।

तथापि ई

खण्ड ‘निनाद’क मूल्यांकनमे संतुलन रखैत अछि। लेखकक समस्या आलोचनात्मक

चेतनाक पूर्ण अभाव नहि; समस्या चेतना केँ पद्धति, परिभाषा, प्रमाण आ

तुलनात्मक ढाँचामे लगातार रूपान्तरित नहि कऽ पाएब अछि।

१७. ‘मैलोरंगक विलाप: रंगयात्रा-प्रसंग’: रंग-नृवंशविज्ञानक अवसर गमाएल

अन्तिम

खण्ड यात्रा, रंगदल, भेटघाट, प्रस्तुति, आवास, कलाकार, कार्यक्रम, निजी

स्मृति आ वापसीक घटनासँ बनल अछि। एहि अर्थमे ई रंगयात्रा-वृत्तान्त अछि।

विधा अपने आपमे गौण नहि। रंगकर्मी कतेक कठिन परिस्थिति मे यात्रा करैत छथि,

कतऽ ठहरैत छथि, कोन साधन जुटबैत छथि, शहरक सांस्कृतिक नेटवर्क कोना काज

करैत अछि—ई सब performance ecology बुझबाक महत्त्वपूर्ण स्रोत अछि।

आधुनिक

performance studies एहन सामग्री केँ field-note, participant observation,

backstage ethnography आ cultural mapping मे बदलि सकैत अछि। तखन लेखक केँ

अपन observer-position स्पष्ट करऽ पड़ैत अछि: की स्वयं देखल? की सुनल?

कलाकारसँ बातचीत कोन परिस्थिति मे भेल? स्मृति आ तत्क्षण लिखल नोटमे अन्तर

की? मंचक आगू आ backstageक व्यवहारमे की विरोधाभास? दर्शकक सामाजिक संरचना

की? यात्रा आर्थिक रूपेँ कोना सम्भव भेल?

‘मैलोरंगक विलाप’ एहन गम्भीर रंग-नृवंशविज्ञानक बीज रखैत अछि, मुदा निजी

यात्रा-वर्णनसँ आगू methodological self-reflexivity तक नहि पहुँचैत अछि।

एतय पोथीक कमजोरीक संग एक भविष्यक सम्भावना सेहो स्पष्ट अछि: मैथिली

रंगइतिहास लेल यात्रा-संस्मरण केँ प्रमाण-समीक्षित field documentation मे

रूपान्तरित कएल जा सकैत अछि।

१८. भाषा आ आलोचनात्मक शैली: विशेषणक अधिकता, अवधारणाक कमी

‘निनाद’क

गद्यक एक विशेषता आत्मीयता अछि। लेखक रंगकर्मक भीतरक व्यक्ति जकाँ लिखैत

छथि; कलाकार, संस्था आ आयोजनसँ निकट परिचय स्पष्ट अछि। एहि निकटता सँ तथ्य,

प्रसंग आ स्मृति बाँचि जाइत अछि। मुदा आलोचना लेल निकटता दोधारी तलवार अछि।

अत्यधिक आत्मीयता आलोचनात्मक दूरी केँ कम कऽ सकैत अछि, खास कऽ जखन

प्रशंसात्मक विशेषण, परिचयात्मक वाक्य आ व्यक्तिक प्रतिष्ठा मूल्यांकनक

आधार बनि जाए।

गम्भीर

नाट्यालोचनाक भाषा अवधारणात्मक होयब चाही, परन्तु कृत्रिम जार्गनसँ भरल

नहि। ‘अभिनय नीक छल’क बदला ‘अभिनेता स्वरक तीव्रता घटा कऽ मौनक पैघ अन्तराल

द्वारा पात्रक दमन व्यक्त कएलनि’ अधिक विश्लेषणात्मक अछि। ‘निर्देशन

प्रभावशाली छल’क बदला ‘निर्देशक पात्रसभ केँ अकासक ऊँचाइ पर रखि

सत्ता-संबन्ध दृश्य बनौलनि’ प्रमाणयोग्य वाक्य अछि। ‘लोकधर्मी’क बदला कोन

लोक-रूपक गति, वेश, धुन, कथन-पद्धति अथवा दर्शक-संबोधन अपनाओल गेल—ई बतायब

आवश्यक अछि।

पोथीक

अनेक लेखमे नाम-सूची, कृति-सूची, आयोजन-विवरण आ प्रशंसा बीच आलोचनात्मक

तर्कक प्रवाह टूटैत अछि। सूची उपयोगी संदर्भ बनि सकैत अछि, मुदा मुख्य गद्य

तखन आलोचनात्मक बनत जखन सूची सँ पैटर्न निकालल जाए। कोन दशकमे कोन रूप

अधिक? कोन संस्था द्वारा? कोन भाषा? कोन दर्शक? कोन सौन्दर्य-विचार? कतेक

स्त्री निर्देशक? कतेक ग्रामीण समूह? एहि सांख्यिक अथवा तुलनात्मक प्रश्न

बिना सूची इतिहासक कच्चा माल रहैत अछि।

१९. संस्थागत स्वीकृति आ साहित्यिक मूल्य: दुनू केँ अलग राखबाक आवश्यकता

कोनो

पुस्तकक सरकारी, शैक्षिक वा सांस्कृतिक संस्था द्वारा खरीद, वितरण,

सूचीकरण, संगोष्ठीमे चर्चा अथवा पुस्तकालयमे प्रवेश ओकर प्रसारक इतिहासक

तथ्य अछि। मुदा ई तथ्य अपनामे आलोचनात्मक गुणवत्ता प्रमाणित नहि करैत अछि।

संस्थागत प्रणालीक उद्देश्य अनेक भऽ सकैत अछि—भाषिक पुस्तकक प्रसार,

पुस्तकालय निर्माण, लेखक-प्रोत्साहन, क्षेत्रीय साहित्यक उपलब्धता।

सौन्दर्यात्मक मूल्यांकन अलग प्रक्रिया अछि।

तें

‘निनाद’क मूल्यांकनमे संस्थागत दृश्यता केँ प्रमाणक रूपमे उपयोग करबाक बदला

अध्ययनक विषय बनायब उचित अछि। कोन प्रकारक पुस्तक संस्थागत खरीदमे पहुँचैत

अछि? चयनक मानदण्ड की? आलोचनात्मक peer review आ प्रशासनिक eligibility मे

अन्तर की? खरीद-संख्या canonical prestige बनबैत अछि कि नहि? एहन प्रश्न

समानान्तर साहित्य-इतिहास लेल महत्त्वपूर्ण अछि।

कोनो

संस्थागत खरीद कार्यक्रमक अस्तित्वसँ ई निष्कर्ष निकालब जे पुस्तक केवल

खरीद लेल लिखल वा छपल, पर्याप्त प्रकाशकीय प्रमाण बिना उचित नहि।

आलोचनात्मक कठोरता एतय सेहो ओतबे जरूरी अछि जतबे पुस्तकक भीतरक दावाक

परीक्षणमे। परन्तु एकरा संग ई स्पष्ट रहबाक चाही जे संस्थागत खरीद

साहित्यिक गुणवत्ता, नाट्यसिद्धान्तक गहराइ वा शोध-पद्धतिक प्रमाणपत्र नहि।

पोथीक

भाषिक-संस्थागत सन्दर्भ सेहो समीक्षाक विषय अछि। भारत सरकारक भाषा-संस्थान

(CIIL) जकाँ केन्द्रक क्रय-योजना, जे अल्पसंसाधन भाषाक

प्रकाशन-अर्थतंत्रकेँ टिकौने रखबाक लेल बनल अछि, ओकर एकटा अनिवार्य

दुष्परिणाम अछि — प्रकाशन आ पाठकीय माँग केर बीचक सम्बन्ध कमजोर भ' जाइत

अछि। जखन कोनो पोथीक 'बजार' मूलतः संस्थागत क्रय होइत अछि, ने कि व्यक्तिगत

पाठक-रुचि, तखन सम्पादकीय कठोरता (rigorous peer review, विषय-वस्तुक

स्वतंत्र मूल्यांकन) केर प्रोत्साहन घटि जाइत अछि — कारण पोथीक 'सफलता'

पाठक-स्वीकृतिपर नहि, प्रशासनिक स्वीकृतिपर निर्भर भ' जाइत अछि। एहि

अर्थतंत्रक अन्तर्गत लिखल पोथीमे प्रायः वएह लक्षण भेटैत अछि जे 'निनाद'मे

भेटैत अछि — आत्म-उद्धरणक बहुलता (धन्यवाद-सूचीमे मारिते रास नाम),

संस्थागत सम्बन्ध-नेटवर्कक प्रति उदारता (सभटा समकालीनकेँ किछु ने किछु

प्रशंसा), आ स्वतंत्र, कठोर तुलनात्मक मानदंडक अभाव। ई एकटा व्यापक

संरचनात्मक समस्याक लक्षण थिक — अल्पसंसाधन भाषाक आलोचना-परम्पराक कमजोरी

लेखकक व्यक्तिगत सीमा मात्र नहि, अपितु ओहि प्रकाशन-पारिस्थितिकीक

(publishing ecosystem) परिणाम सेहो थिक जे स्वतंत्र समीक्षक-वर्गकेँ

आर्थिक रूपेँ असंभव बना दैत अछि — एहि तथ्यकेँ लेखक स्वयं ('मैथिली

नाट्यालोचनाक वस्तु-स्थिति' अध्यायमे) चिन्हित करैत छथि जखन ओ कहैत छथि जे

"एतय एकटा नियमित आलोचना आ आलोचकक खगता छलैक जकरा नाटकक समस्त प्रधान आ गौण

अंगोपांगक जानकारी हो आ ओ मात्र एकटा समर्थ प्रेक्षकक भूमिका मे रहय, ओकरा

पर अन्य कोनहु भार नहि हो" — मुदा ई निदान स्वयं पोथीक अपन सीमापर लागू

होयबाक चाही, जे नहि भेल अछि।

निनाद

जकाँ पोथीक मुद्रण, मूल्य आ प्रचारक पाछाँ काज क' रहल संस्थागत अर्थशास्त्र

आ रंग-समाजशास्त्रकेँ देखलाक बाद एकर समीक्षा पूर्ण होइत अछि। पोथीक

आन्तरिक विवरणसँ ई तथ्य स्पष्ट होइत अछि जे एकर प्रकाशन 'नवारम्भ'

(पटना/मधुबनी) सँ भेल अछि, जकर सम्पर्क सूत्रमे अजित आजादक व्यक्तिगत ईमेल

अङ्कित अछि। लेखक अपन भूमिकामे स्वयं ई स्वीकार करैत छथि जे "मित्र अजितजीक

सत्प्रयास सँ ई पोथी एकटा मजगुत आकार ग्रहण कयलक अछि"। ई सम्बन्ध मैथिली

साहित्यमे दीर्घकालसँ सक्रिय ओही गुटीय सिंडिकेट दिस संकेत करैत अछि, जतय

व्यक्तिगत लाभ आ पुरस्कारक राजनीतिक तहत रचना सभक निर्माण आ व्यापार कयल

जाइत अछि।

केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान (Central Institute of Indian Languages -

CIIL), मैसूरु, भारत सरकारक शिक्षा मन्त्रालयक अधीन एकटा प्रतिष्ठित

संस्थान अछि, जे भारतीय भाषा सभक संवर्धन लेल पुस्तक-खरीद योजना (Bulk

Purchase Scheme) आ वित्तीय अनुदान संचालित करैत अछि। आठम अनुसूचीमे

मैथिलीक समावेशनक बाद केन्द्रीय पुस्तकालय आ शोध-संस्थान सभ लेल मैथिली

पोथीक सरकारी खरीदमे व्यापक वृद्धि भेल अछि। एहि योजनाक अनुचित लाभ उठाबय

लेल एकटा सुनियोजित कार्य-प्रणाली विकसित भ' चुकल अछि। प्रकाशक आ लेखक मिलि

क' एहन पोथी तैयार करैत छथि जे सामान्य बजारमे पाठक लेल नहि, अपितु सोझे

सरकारी गोदाममे आपूर्ति लेल लक्षित होइत अछि।

निनादक

मूल्य मात्र १०४ पृष्ठ लेल ३०० टका राखल गेनाइ अही व्यावसायिक युक्तिक

परिणाम थिक। सरकारी खरीदमे संस्थागत कमीशन काटलाक बादहु प्रकाशक आ लेखककेँ

अनुचित मुनाफा प्राप्त होइत अछि। संगहि, सरकारी खरीदक नियममे सामान्य कविता

वा कथा-संग्रहक तुलनामे 'शोध', 'भाषा-विज्ञान' आ 'नाट्यालोचना' सन अकादमिक

विधाकेँ प्राथमिकता देल जाइत अछि। अही कारणे किछु पुरान गोष्ठी-प्रपत्र,

अभिनन्दन-आलेख आ यात्रा-डायरीक पन्नाकेँ एक संग नत्थी क' क' ओकरापर 'मैथिली

नाट्यालोचना'क भ्रामक लेबल लगाओल गेल ताकि ओ चयन-समितिक आँखिमे एकटा गम्भीर

शोध-ग्रन्थ बुझना जाय।

एहि

संस्थागत प्रकृतिक सबसँ घातक प्रभाव मैथिली भाषा आ साहित्यक प्रतिष्ठापर

पड़ैत अछि। जखन सी.आइ.आइ.एल. आ राष्ट्रिय विश्वविद्यालय सभक पुस्तकालयमे आन

भारतीय भाषा (यथा कन्नड़, तमिल, बाङ्ला, मराठी) क विद्वान आ शोधार्थी

मैथिलीक 'प्रतिनिधि नाट्यालोचना'क रूपमे निनादकेँ पढ़ताह, तखन ओ मैथिलीक

आलोचनात्मक चेतनाक सम्बन्धमे की धारणा बनौताह? जाहि पोथीमे आलोचनाक नामपर ई

लिखल हो जे लेखक स्टेशनपर उतरि चाह पीलनि, झाड़ू लगबाक दृश्य देखलनि, आ

पटनाक रंगकर्मीक आलस्यपर विलाप कयलनि, ओ आन भाषा-भाषीक सोझाँ मैथिलीक

बौद्धिक दरिद्रताक प्रदर्शन करत। ई स्थिति ओहि सत्य रंगकर्मी आ निष्ठावान

शोधार्थी सभक प्रति घोर अन्याय थिक जे संसाधनक अभावमे सेहो गम्भीर वैचारिक

रंगकर्म क' रहल छथि। सरकारी खरीदक लोभमे घटिया आ असम्बद्ध सामग्रीकेँ

आलोचना बता क' छपायब मैथिलीक गरिमाकेँ राष्ट्रिय स्तरपर कलंकित करबाक बराबर

अछि।

२०. जे प्रश्न पोथी बारम्बार छोड़ि दैत अछि

मैथिली

रंगमंचक गम्भीर आलोचना लेल किछु प्रश्न अनिवार्य अछि, जे ‘निनाद’मे आंशिक

रूपेँ उठैत अछि मुदा व्यवस्थित उत्तर नहि पबैत अछि: नाटकक पाठ आ प्रदर्शनक

बीच रूपान्तरण कोना भेल? निर्देशक मूल पाठमे की काट-छाँट वा पुनर्संरचना

कएलनि? अभिनेता लिखित संवादक अतिरिक्त की अर्थ रचलनि? दर्शकक सामाजिक

संरचना की छल? भाषा आ उच्चारण दर्शकक पहुँच पर की असर कएलक? स्त्री आ

हाशियाक समुदाय रंगमंचक निर्णय-स्थल पर कतेक उपस्थित छथि? अर्थसंकट,

rehearsal-space आ तकनीकी साधन कलात्मक शैली पर की प्रभाव दैत अछि?

एहि

प्रश्नक अनुपस्थितिमे रंगइतिहास महापुरुष, प्रसिद्ध नाटक, संस्था आ यादगार

आयोजनक इतिहास बनि जाइत अछि। समानान्तर इतिहास एहि संरचनाकेँ उलटैत अछि:

असफल प्रस्तुति सेहो महत्त्वपूर्ण भऽ सकैत अछि; छोट समूह सेहो नव रूप

उत्पन्न कऽ सकैत अछि; दस्तावेजहीन लोकप्रदर्शन canonical प्रकाशित नाटकसँ

अधिक दर्शक-संपर्क राखि सकैत अछि; महिला कलाकारक backstage श्रम मंचक

दृश्यता सँ अधिक भऽ सकैत अछि; आर्थिक बाधा सौन्दर्य-रूपक कारण बनि सकैत

अछि।

‘निनाद’क

सामग्री एहि प्रश्नसभ लेल कच्चा आधार दैत अछि। तें पोथी केँ खारिज करब

इतिहासक सामग्री नष्ट करब होयत; मुदा ओकरा नाट्यालोचनाक पूर्ण मानक मानब

आलोचनात्मक पद्धतिक सीमा घटाएब होयत।

२१. मैथिली नाट्यालोचनाक अपेक्षित नव प्रतिमान

एक

आधुनिक मैथिली नाट्यालोचना कम-से-कम पाँच स्तर पर एक संग काज करबाक चाही।

पहिल, पाठीय स्तर—कथानक, पात्र, संवाद, भाषा, संरचना, प्रतीक, मौन। दोसर,

प्रदर्शन स्तर—अभिनय, निर्देशन, गति, मंच, प्रकाश, संगीत, वेश, वस्तु,

दृश्य-संकेत। तेसर, दर्शक स्तर—प्रतिक्रिया, सामाजिक संरचना, भाषा-बोध,

भागीदारी, स्मृति। चारिम, संस्थागत स्तर—समूह, अर्थ, सभागार, अनुदान,

प्रशिक्षण, प्रकाशन, मीडिया। पाँचम, इतिहास-स्तर—मुख्यधारा आ समानान्तर

धारा, अभिलेख आ विस्मरण, क्षेत्रीयता, प्रवास, जाति-वर्ग-लिंग, नेपाल-भारतक

अन्तरसंबंध, डिजिटल संक्रमण।

एहि पाँच

स्तर केँ भारतीय आ पाश्चात्य सिद्धान्तसँ संवाद कराओल जा सकैत अछि।

रस-अभिनय दर्शक-अनुभूति पढ़त; ध्वनि आ वक्रोक्ति उपपाठ; औचित्य विभिन्न

मंचीय तत्वक सुसंगति; नव्य-न्याय दावा-प्रमाण; अरस्तू dramatic action;

स्टानिस्लाव्स्की अभिनेता-उद्देश्य; ब्रेख्त आलोचनात्मक दर्शक;

ग्रोटोव्स्की अभिनेता-दर्शक निकटता; बोआल सहभागिता; संकेत-विज्ञान मंचीय

चिह्न; performance studies घटना, शरीर, स्थान आ सामाजिक क्रियाक व्यापक

अर्थ।

आलोचना

मे प्रत्यक्ष दृश्य-साक्ष्य अनिवार्य हो। उदाहरणार्थ: ‘दोसरा दृश्यक अन्तमे

अभिनेता पाँच सेकण्डक मौन राखैत अछि; एहि मौनक समय प्रकाश केवल दाहिना

चेहरा पर रहैत अछि; संवादक पूर्ववर्ती आत्मविश्वास एतय असुरक्षामे बदलैत

अछि।’ एहन वाक्य आलोचना केँ प्रमाण दैत अछि। एकर बाद सिद्धान्त अर्थ खोलि

सकैत अछि। सिद्धान्त दृश्यक स्थानापन्न नहि, दृश्यक व्याख्याकार होयत।

इतिहासलेखनमे data table, production chronology, oral history, poster,

programme booklet, review, photograph, audio-video record,

कलाकार-साक्षात्कार, rehearsal note, ticket, venue record आ संस्था-अभिलेख

सभ जुटाओल जाय। जँ स्रोत विरोधी हो, विरोध लिखल जाय। जँ तिथि अनिश्चित हो,

अनिश्चितता स्वीकारल जाय। जँ स्मृति एकमात्र स्रोत हो, ओकरा स्मृति कहि

प्रस्तुत कएल जाय। ई पद्धति मैथिली रंगइतिहास केँ विश्वसनीय बनाओत।

२२. समग्र निर्णय

‘निनाद’क

सबसँ पैघ उपलब्धि ई अछि जे ई मैथिली रंगकर्मक अनेक बिखरल प्रसंग, कलाकार,

कृति, बहस, संस्था आ घटनाकेँ एक ठाम संचित करैत अछि। लेखक रंगजगतसँ दूरी पर

ठाढ़ दर्शक नहि; भीतरक सहभागिता आ आत्मीयता लिखना-लिखबामे स्पष्ट अछि। एहि

कारण पोथी भविष्यक शोधार्थी लेल दस्तावेजी भण्डारक काज कऽ सकैत अछि।

विशेषतः जँ एकरा अन्य पत्रिका, कार्यक्रम-पुस्तिका, समाचार,

कलाकार-साक्षात्कार आ दृश्य-अभिलेखसँ मिलान कएल जाए, तँ मैथिली रंगइतिहासक

अनेक सूत्र प्राप्त होयत।

मुदा

घोषित नाट्यालोचनात्मक दावाक कसौटी पर पोथी असमान अछि। आरम्भमे जे

सैद्धान्तिक आवश्यकता लेखक स्वयं चिन्हैत छथि—पुस्तक-समीक्षासँ बाहर आबि

अभिनय, मंच, तकनीक, आधुनिक रंगदृष्टि आ प्रस्तुति-कला पर विचार—ओही

आवश्यकता पुस्तकक अपन लेखनमे नियमित रूपेँ पूर्ण नहि होइत अछि। अनेक लेख

साहित्येतिहास, नाटक-परिचय, रंग-संस्मरण, आयोजन-रिपोर्ट, यात्रा-वृत्तान्त

आ व्यक्ति केन्द्रित मूल्यांकनक रूपमे अधिक सफल अछि।

भारतीय

नाट्यशास्त्रक दृष्टिसँ रस-अभिनयक गहींर विश्लेषण कम;

ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्यक पद्धतिगत उपयोग कम; पाश्चात्य नाट्यचिन्ताक सुसंगत

संवाद सीमित; नव्य-न्यायसदृश दावा-प्रमाणक कठोरता असमान; समानान्तर इतिहासक

दृष्टिसँ अदृश्य, गैर-संस्थागत आ हाशियाक रंगअभिलेखक खोज अपूर्ण। एहि कारण

पुस्तक मैथिली नाट्यालोचनाक अन्तिम प्रतिमान नहि, बल्कि एहन संक्रमणकालीन

दस्तावेज अछि जतय आलोचनाक आकांक्षा, रंग-स्मृति आ मुख्यधारात्मक रिपोर्टिंग

एकहि ग्रन्थमे संग-संग चलैत अछि।

एहि

निष्कर्षक अर्थ ई नहि जे पोथीक अस्तित्व मैथिली लेल निरर्थक अछि। उलटे, एकर

सीमा देखेनाइ मैथिली आलोचनाक मानदण्ड ऊँच करबाक आवश्यक क्रिया अछि। भाषा आ

साहित्यक प्रतिष्ठा कमजोर पुस्तक नुका कऽ नहि, कठोर आत्मालोचनासँ बढ़ैत

अछि। मैथिलीमे एहन नाट्यालोचना चाही जे अपन रंगपरम्पराक सम्मान करय, मुदा

सम्मानक कारण आलोचनात्मक प्रश्न छोड़ि नहि दय; जे मुख्यधाराक दस्तावेज

राखय, मुदा समानान्तर स्मृति खोजय; जे कलाकारक श्रमक आदर करय, मुदा

प्रदर्शनक कमजोरी स्पष्ट लिखय; जे भारतीय शास्त्रसँ जुड़य, मुदा शास्त्रक

नामक अढ़मे विश्लेषण टारय नहि; जे पाश्चात्य सिद्धान्त ग्रहण करय, मुदा

स्थानीय मंच पर ओकर यान्त्रिक आरोपण नहि करय।

एहि

कसौटी पर ‘निनाद’क उपयुक्त विधागत परिचय ‘मैथिली रंग-संस्मरण, नाट्य-विमर्श

आ रंगइतिहासक सामग्री-संकलन’क अधिक निकट अछि। एकरा ‘मैथिली नाट्यालोचनाक

प्रतिनिधि मानक’ बनाबय लेल जे सूक्ष्म प्रदर्शन-विश्लेषण, प्रमाण-पद्धति,

सैद्धान्तिक निरन्तरता, तुलनात्मक दृष्टि आ समानान्तर अभिलेख-बोध आवश्यक

अछि, से पुस्तकमे पूर्ण रूपेँ विकसित नहि अछि। ठीक एहि कारण पोथीक पुनर्पाठ

महत्त्वपूर्ण अछि—किएक तँ ई मैथिली रंगालोचनाकेँ बतबैत अछि जे अगिला चरणमे

केवल अधिक लेख नहि, अधिक कठोर पद्धति चाही।

'निनाद'

एकटा उपयोगी दस्तावेज अछि — बिहार-दिल्लीक मैथिली रंगकर्मक संस्थागत

गतिविधि (चेतना समिति, अरिपन, भंगिमा, मैलोरंग) केर कालक्रमिक विवरण एहिमे

भेटैत अछि, आ किछु अध्याय (विशेषतः 'विद्यापतिक मणिमंजरी' आ 'कविवर जीवन

झाक नाटकक काव्यतत्व') मे साक्ष्य-सजगता आ काव्यशास्त्रीय ज्ञानक प्रमाण

सेहो अछि। मुदा ई पोथी नाट्यालोचना क अनुशासनगत मानदंड — व्यवस्थित

मंचीय-विश्लेषण, स्वतंत्र तथ्य-सत्यापन, तटस्थ मूल्यांकन-मानदंड, आ (सभसँ

महत्वपूर्ण) परिधीय/असंस्थागत रंगकर्मक समानान्तर इतिहासक सन्धान — एहि

सभपर खरा नहि उतरैत अछि। लेखक स्वयं अपन सीमाकेँ बेर-बेर चिन्हित करैत छथि

(एकटा दुर्लभ आ प्रशंसनीय गुण), मुदा एहि आत्म-सजगताकेँ एकटा व्यवस्थित

समीक्षा-पद्धतिमे रूपान्तरित नहि कयल गेल अछि। परिणामतः 'निनाद'

नाट्यालोचनाक वादा करैत अछि आ रंगयात्रा-वृत्तांतक सामग्री दैत अछि — आ एहि

द्वैधकेँ अनठाओल जाय त' मैथिली नाट्यालोचनाक अनुशासनगत विकासक बाधा आओर

सुदृढ़ भ' सकैत अछि, ने कि दूर।

कमल मोहन

चुन्नू कृत निनाद (मैथिली नाट्यालोचना) केर समग्र, बहुआयामी अध्ययन ई सिद्ध

करैत अछि जे ई कृति अपन आवरण-पृष्ठपर कयल गेल गम्भीर दाबीक ठीक विपरीत अछि।

संरचनात्मक धरातलपर ई पोथी कोनो व्यवस्थित आलोचनात्मक चिन्तनक परिणाम नहि

भ' क' स्मारिका, गोष्ठी-प्रपत्र, शो-रिपोर्ट आ व्यक्तिगत यात्रा-वृत्तान्तक

संकलन मात्र अछि। सैद्धान्तिक धरातलपर एहिमे नहि त' भरतक नाट्यशास्त्र आ

रस-सिद्धान्तक कोनो प्रामाणिक प्रयोग भेटैत अछि आ नहि अरस्तू अथवा ब्रेख्तक

पाश्चात्य नाट्य-सिद्धान्तक सुसंगत बुझबाक प्रमाण; एतय मात्र नाम-उल्लेख

द्वारा छद्म-आधुनिकताक चोला पहिरबाक प्रयास कयल गेल अछि।

नव्य-न्यायक तर्क-पद्धतिपर लेखकक प्रमुख स्थापना सभ—विशेष रूपेँ सुन्दर

संयोगक बहिष्करण, दरभंगाक निषेध आ ग्रामीण रंगमंचक उपेक्षा—स्वरूपासिद्ध,

साध्य-सम, व्याघात आ बाधित हेत्वाभासक कारणे पूर्णतः अविश्वसनीय सिद्ध होइत

अछि। 'विदेह' समानान्तर इतिहासक परिप्रेक्ष्यमे ई ग्रन्थ लोक-परम्पराक

उपेक्षा करयबला आ महेन्द्र मलंगिया सन नाटककारक जातिवादी विसंगतिपर पर्दा

दैत मुख्यधाराक मध्यवर्गीय संभ्रान्तवादक पोषण करैत अछि। अन्ततः,

सी.आइ.आइ.एल. केर पुस्तक-खरीद योजना आ नवारम्भ प्रकाशनक गुटीय सिंडिकेटक

सन्दर्भमे ई पोथी मात्र एकटा व्यावसायिक उत्पाद बनि क' रहि जाइत अछि,

जाहिसँ मैथिलीक अकादमिक साखकेँ गम्भीर ठेस पहुँचल अछि। मैथिली

रंग-समीक्षाकेँ एहि प्रकारक व्यक्तिगत आत्ममुग्धता, शुष्क रिपोर्टिंग आ

संस्थागत दलालीसँ मुक्त क' क' एकटा वैज्ञानिक, समावेशी आ वस्तुनिष्ठ

आलोचनात्मक स्वरूप देब आवश्यक अछि।

२३. संक्षिप्त आलोचनात्मक सारणी

कसौटी

मूल्यांकन

विधागत पहचान

नाट्यालोचना,

रंग-संस्मरण, साहित्येतिहास, आयोजन-रिपोर्ट आ

यात्रा-वृत्तान्तक मिश्रण

मुख्य शक्ति

मैथिली रंगकर्म

सम्बन्धी व्यक्ति, कृति, संस्था, घटना आ स्मृतिक दस्तावेजी

संचयन

मुख्य कमजोरी

प्रदर्शनक

दृश्य-दर-दृश्य विश्लेषण, स्पष्ट कसौटी, प्रमाण-भेद आ

सैद्धान्तिक निरन्तरताक कमी

भारतीय

नाट्यशास्त्रीय स्तर

रस, अभिनय,

ध्वनि, औचित्य आदि क व्यवस्थित अनुप्रयोगक अपेक्षा अछि

पाश्चात्य

रंगसिद्धान्त

dramatic

action, actor training, alienation, actor-spectator

relation, semiotics आदि सँ सीमित संवाद

नव्य-न्याय

दावा-हेतु-प्रमाण, अव्याप्ति-अतिव्याप्ति, अपवाद आ स्रोत-भेदक

कठोरता अपेक्षित

समानान्तर

इतिहास

असंस्थागत,

ग्रामीण, सीमावर्ती, स्त्री, हाशियाक, प्रवासी आ डिजिटल

रंगअभिलेखक अधिक खोज आवश्यक

सबसँ उपयोगी रूप

मैथिली

रंगइतिहासक प्राथमिक सामग्री आ समकालीन रंग-बहसक दस्तावेज

मानक

नाट्यालोचना रूपेँ स्थिति

महत्त्वपूर्ण

आरम्भिक/संक्रमणकालीन प्रयास; पूर्ण विकसित आलोचनात्मक

प्रतिमान नहि

बिबलियोग्राफी / सन्दर्भ-ग्रन्थसूची

1. कमल

मोहन चुन्नू। निनाद : Dramatic Cricism in Maithili। 2017।

2.

भरतमुनि। नाट्यशास्त्र। विभिन्न प्रामाणिक संस्करण।

3.

अभिनवगुप्त। अभिनवभारती (नाट्यशास्त्र पर टीका)।

4.

आनन्दवर्धन। ध्वन्यालोक।

5.

कुन्तक। वक्रोक्तिजीवित।

6.

क्षेमेन्द्र। औचित्यविचारचर्चा।

7.

गङ्गेश उपाध्याय। तत्त्वचिन्तामणि।

8.

Aristotle. Poetics.

9.

Konstantin Stanislavski. An Actor Prepares; Building a Character;

Creating a Role.

10.

Bertolt Brecht. Brecht on Theatre.

11.

Jerzy Grotowski. Towards a Poor Theatre.

12.

Peter Brook. The Empty Space.

13.

Augusto Boal. Theatre of the Oppressed.

14. Keir

Elam. The Semiotics of Theatre and Drama.

15.

Patrice Pavis. Analyzing Performance; Dictionary of the Theatre.

16.

Richard Schechner. Performance Studies: An Introduction.

17.

Erika Fischer-Lichte. The Transformative Power of Performance.

18. B.

K. Matilal. Perception: An Essay on Classical Indian Theories of

Knowledge.

19.

गजेन्द्र ठाकुर। विदेह समानान्तर इतिहास तथा मैथिली साहित्य-समीक्षा

सम्बन्धी लेखन।

Suggested citation: गजेन्द्र ठाकुर. “‘निनाद’ (मैथिली नाट्यालोचना): सैद्धान्तिक, रंगमंचीय, नव्य-न्यायिक आ समानान्तर-इतिहासपरक समालोचनात्मक पुनरावलोकन.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 449, 2026-09-01. https://www.videha.co.in/research/2026/449/निनाद-मैथिली-नाट्यालोचना.htm

मूल विदेह अंक / Original issue

Videha Digital Research Archives — preserved releases

All eight archive releases are published and their DOIs are minted.