प्रणव कुमार झा
परिसीमनक आड़ि पर भारतीय लोकतंत्र
भारतीय लोकतंत्र अपन संविधान निर्माणक पश्चात् विश्वक सभसँ पैघ आ जीवंत
लोकतांत्रिक व्यवस्थामे अपन विशिष्ट स्थान बनौने अछि। विविधता ,
विशाल जनसंख्या , बहुभाषिकता ,
बहुधार्मिकता आ सामाजिक विषमताक बीच सार्वभौमिक वयस्क
मताधिकारपर आधारित संसदात्मक शासन प्रणालीकेँ सफलतापूर्वक चलायब अपनेमे
कोनो सामान्य उपलब्धि नहि अछि। एहि लोकतांत्रिक व्यवस्थामे जनप्रतिनिधित्व
मेरुदण्डक काज करैत अछि। नागरिक अपन प्रतिनिधि चुनैत छथि आ ओ प्रतिनिधि
संसद/विधानसभा मे हुनकर आवाज , हित आ आकांक्षाकेँ
स्थान देबाक प्रयास करैत छथि। मुदा आब भारतक लोकतंत्रक सामने एकटा एहन
प्रश्न ठाढ़ भऽ रहल अछि , जकर प्रभाव खाली आगामी
चुनावपर नहि , बल्कि देशक संघीय संरचना ,
संसदीय कार्यप्रणाली , राजकोषीय
प्राथमिकता आ उत्तर-दक्षिणक राजनीतिक सम्बन्धपर सेहो पड़ि सकैत अछि। ई
प्रश्न अछि परिसीमनक।
आगामी परिसीमनक सम्भावना आ तकर बाद लोकसभाक सदस्य संख्या वर्तमान
543
सँ बढ़ि कऽ लगभग 850 करबाक
प्रस्तावसँ भारतीय राजनीतिमे एकटा नवीन विमर्श जन्म लेने अछि।
The Indian Express मे प्रकाशित अपन चर्चित आलेख
“Why an 850-seat Lok Sabha threatens Indian democracy”
मे डॉ. शशि थरूर एहि सम्भावित परिवर्तनपर अत्यन्त गम्भीर
प्रश्न उठौने छथि। हुनकर मूल चिन्ता ई अछि जे यदि लोकसभाक आकार एतेक विशाल
भऽ जाइत अछि , तऽ की प्रत्येक सांसदकेँ संसदमे अपन
विचार रखबाक पर्याप्त अवसर भेटत ? की विधेयक सभपर
सार्थक बहस होयत ? की संसदीय समितिसभ प्रभावी रहत ?
आ की एतेक विशाल सदन वास्तवमे सरकारक जवाबदेही बढ़ाओत ,
अथवा सांसदक व्यक्तिगत आवाज आ संसदीय निगरानीक क्षमता
कमजोर कऽ देत ?
मुदा एहि बहसमे खाली संसदक आकारक प्रश्न नहि अछि। एकर संग जनता आ राजकोषपर
पड़ैवला आर्थिक भार ,
जनसंख्या आ भौगोलिक प्रतिनिधित्वक सम्बन्ध ,
जनसंख्या नियन्त्रणमे सफल राज्यसभक सम्भावित राजनीतिक
क्षति , उत्तर-दक्षिणक बीच बढ़ैत अविश्वास ,
आ प्रतिनिधित्वक वैकल्पिक स्वरूप सभपर सेहो गम्भीरतापूर्वक
विचार आवश्यक अछि। एहि कारणेँ परिसीमनकेँ खाली निर्वाचन क्षेत्रक सीमा
पुनर्निर्धारणक तकनीकी प्रक्रिया मानब शायद एहि ऐतिहासिक प्रश्नक महत्वकेँ
बहुत छोट कऽ देब होयत।
भारतमे स्वतंत्रताक बाद परिसीमनक प्रक्रिया जनसंख्या परिवर्तनक संग
निर्वाचन क्षेत्र सभक पुनर्गठन लेल अपनाओल गेल। मुदा
1970 क
दशकमे देशक जनसंख्या नीति आ संघीय संतुलनक एकटा महत्वपूर्ण प्रश्न एहि
प्रक्रियामे हस्तक्षेप करैत अछि। 1976 केर
42 म संविधान संशोधन द्वारा लोकसभा आ राज्य विधानसभामे सीट
सभक पुनर्समायोजनकेँ 1971 केर जनगणनाक आधारपर
स्थगित कऽ देल गेल। एहि निर्णयक पाछाँ एकटा स्पष्ट नीति-तर्क छल जे ,
जे राज्य परिवार नियोजन आ जनसंख्या नियन्त्रणमे सफल छथि ,
हुनका जनसंख्या कम रखबाक कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्वक हानि
नहि होय। बादमे 2001 केर 84 म
संविधान संशोधन द्वारा एहि स्थगनकेँ 2026 के बाद
होमयवला पहिल जनगणना धरि बढ़ा देल गेल। एहि व्यवस्थाक परिणाम ई भेल जे देशक
जनसंख्या आ जनसांख्यिकीय संरचना अत्यधिक बदलि गेल ,
मुदा राज्यसभक लोकसभा प्रतिनिधित्वक मूल अनुपात बहुत हद धरि पुरान आधारपर
स्थिर रहल। आब परिसीमनक सम्भावित प्रक्रिया एहि पुरान संतुलनकेँ चुनौती
देत।
एहि ठाम सभसँ पहिल आ अत्यन्त व्यावहारिक प्रश्न जनता आ राजकोषपर पड़ैवला
आर्थिक भारक अछि। यदि लोकसभाक सदस्य संख्या
543
सँ बढ़ि कऽ लगभग 850 होइत अछि ,
तऽ तीन सयसँ अधिक अतिरिक्त संसदीय क्षेत्र आ तदनुसार तीन
सयसँ अधिक नवीन जनप्रतिनिधिक व्यवस्था करय पड़त। एहि अतिरिक्त सांसद सभक
वेतन , भत्ता , यात्रा ,
कार्यालय , आवास ,
कर्मचारी , संचार ,
सुरक्षा , संसदीय सुविधा आ कार्यकाल
समाप्त भेलाक बाद पेंशनपर सार्वजनिक कोषसँ खर्च होयत। एकटा सांसदक लागत
खाली हुनकर मासिक वेतन धरि सीमित नहि रहैत अछि ;
पूरा संसदीय संस्थाक प्रशासनिक आ आधारभूत संरचनाक लागत सेहो तकर संग बढ़ैत
अछि। यदि संसदक आकारमे एकहि बेर सैकड़ोंक वृद्धि होइत अछि ,
तऽ ई अतिरिक्त खर्च नगण्य नहि होयत। अन्ततः एहि खर्चक भार
देशक करदाताक ऊपर पड़त। जकरा हम विकास , स्वास्थ्य ,
शिक्षा , रोजगार ,
आधारभूत संरचना , सामाजिक सुरक्षा
अथवा गरीबी उन्मूलन लेल खर्च कऽ सकैत छी , ओकर एकटा
अतिरिक्त हिस्सा प्रतिनिधित्वक विस्तारित संरचनापर खर्च होयत। एहि लेल
परिसीमनक निर्णयसँ पहिने एकटा पारदर्शी आ सार्वजनिक राजकोषीय प्रभाव
मूल्यांकन होयबाक चाही। कतेक अतिरिक्त सांसद , कतेक
अतिरिक्त वेतन-भत्ता , कतेक अतिरिक्त प्रशासनिक व्यय
आ आगामी बीस-पचीस वर्षमे कुल राजकोषीय भार कतेक होयत।
ई प्रश्न सांसद सभक उचित वेतन आ सुविधा पर प्रश्नचिह्न नहि लगबैत अछि।
जनप्रतिनिधिकेँ सम्मानजनक संसदीय सुविधा भेटब लोकतंत्रक आवश्यक अंग अछि।
मुदा जँ प्रतिनिधित्व बढ़ेबाक कोनो एहन विकल्प उपलब्ध भऽ सकैत अछि जे कम
अतिरिक्त खर्चमे अधिक नागरिकक राजनीतिक आवाजकेँ संस्थागत रूप दऽ सकय ,
तऽ ओकर तुलना किएक नहि कएल जाए ?
लोकतंत्रमे प्रत्येक सार्वजनिक खर्चक औचित्य ओकर अपेक्षित सार्वजनिक लाभसँ
निर्धारित होबाक चाही।
एहि बहसमे एकटा आओर मौलिक प्रश्न अछि जे की सांसदक कार्यभार वास्तवमे
जनसंख्याक सीधा अनुपातमे बढ़ैत अछि ?
सामान्य तर्क ई अछि जे जनसंख्या बढ़त तँ प्रतिनिधित्व सेहो
बढ़बाक चाही। एहि तर्कमे लोकतांत्रिक आधार अवश्य अछि ,
कारण समान मताधिकार लेल निर्वाचन क्षेत्रसभमे अत्यधिक
जनसंख्यात्मक असमानता उचित नहि मानल जा सकैत अछि। मुदा सांसदक कार्यक
प्रकृति देखल जाए तँ तस्वीर किछु अलग देखाइत अछि। सांसदक मुख्य कार्य अपन
क्षेत्रक जनताक समस्या संसदमे उठेनाइ , राष्ट्रीय
नीति-निर्माणमे योगदान देनाइ , विधेयकपर विचार करनाइ ,
सरकारसँ प्रश्न पूछनाइ , संसदीय
समितिमे काज करनाइ आ जनताक आवाजकेँ राष्ट्रीय मंच धरि पहुँचेनाइ अछि। एहि
कार्यक मात्रा खाली मतदाताक संख्या बढ़लासँ ओहि अनुपातमे नहि बढ़ैत छैक।
एकटा सांसदक निर्वाचन क्षेत्रमे बीस लाख लोक छथि अथवा तीस लाख ,
संसदमे विधेयकपर बहस करबाक समय समान रहत। सरकारसँ प्रश्न
पूछबाक समय समान रहत। संसदीय समितिमे उपलब्ध समय समान रहत। सांसदक दिन
चौबीस घंटाक अछि , चाहे हुनकर निर्वाचन क्षेत्रमे
जनसंख्या कतेक हो। एहि दृष्टिसँ देखल जाए तँ जनसंख्या प्रतिनिधित्वक
महत्वपूर्ण आधार अवश्य अछि , मुदा सांसदक सम्पूर्ण
कार्यभारक एकमात्र निर्धारक नहि। एकरा अतिरिक्त निर्वाचन क्षेत्रक भौगोलिक
विस्तार , दुर्गमता , सड़क आ
संचार व्यवस्था , सामाजिक विविधता ,
सीमावर्ती स्थिति , बाढ़ अथवा
पहाड़ी भूगोल आ प्रशासनिक पहुँच सेहो सांसदक वास्तविक क्षेत्रीय
कार्यभारकेँ प्रभावित करैत अछि।
एकटा घन आबादीवला महानगरीय निर्वाचन क्षेत्र आ एकटा विशाल ग्रामीण अथवा
दुर्गम निर्वाचन क्षेत्रमे समान जनसंख्या रहितो सांसदक क्षेत्रीय
जिम्मेदारी समान नहि होयत। पहिल क्षेत्रमे मतदाता किछु किलोमीटरक दायरामे
केन्द्रित भऽ सकैत छथि ,
जखन कि दोसर क्षेत्रमे हजारों वर्ग किलोमीटरमे पसरल गाँव ,
नदी , वन ,
पहाड़ अथवा खराब सड़कक बीच जनतासँ सम्पर्क बनौने रखब अपनेमे पैघ चुनौती
होइत अछि। एहि कारणेँ खाली जनसंख्याक आधारपर प्रतिनिधित्व निर्धारित करब
पूर्णतः तार्किक नहीं अछि। प्रतिनिधित्वक भविष्यक सूत्रमे जनसंख्यासंग
भूगोल आ क्षेत्रीय कठिनाइक उचित वजनपर सेहो विचार होबाक चाही।
परिसीमनक दोसर पैघ प्रश्न क्षेत्रीय असंतुलनक अछि। भारतक जनसांख्यिकीय
विकास समान नहि रहल अछि। दक्षिण भारतक कतेको राज्य विशेषतः केरल ,
तमिलनाडु , आंध्र प्रदेश ,
तेलंगाना आ कर्नाटक शिक्षा , महिला
साक्षरता , स्वास्थ्य आ परिवार नियोजनक क्षेत्रमे
उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल कऽ जनसंख्या वृद्धिकेँ नियंत्रित करबाक दिशा मे
बहुत आगाँ बढ़ल। दोसर दिस उत्तर आ मध्य भारतक किछु राज्यसभमे जनसंख्या
वृद्धि तुलनात्मक रूपसँ तेज रहल। ई अन्तर प्राकृतिक नहि ,
बल्कि सामाजिक-आर्थिक नीति , शिक्षा ,
स्वास्थ्य आ जनसंख्या नियन्त्रणक दशक-दशकक प्रयासक परिणाम
सेहो अछि।
एखन जँ लोकसभाक सीट मुख्यतः वर्तमान जनसंख्याक अनुपातमे फेर बाँटल जाइत ,
तँ उत्तर प्रदेश , बिहार ,
राजस्थान आ मध्य प्रदेश सन बेसी जनसंख्यावला राज्यसभक
सीटमे उल्लेखनीय वृद्धि होयबाक सम्भावना अछि , जखन
कि दक्षिणक किछु राज्यसभक लोकसभा मे सापेक्ष हिस्सेदारी घटि सकैत अछि। एहि
परिस्थिति केँ दक्षिण भारतक राज्यसभ स्वाभाविक रूपसँ एक प्रकारक
जनसांख्यिकीय दण्ड ( Demographic Penalty)
केर रूपमे देखैत अछि। प्रश्न ई अछि जे जँ देश स्वयं जनसंख्या नियन्त्रणकेँ
राष्ट्रीय प्राथमिकता बनौलक आ किछु राज्यसभ एहि नीतिमे सफल भेल ,
तँ की ओहि सफलताक राजनीतिक मूल्य सीट कम भऽ चुकायब होएबाक
चाही ?
दोसर दिस उत्तर भारतक नागरिकक प्रश्न सेहो समान रूपसँ वैध अछि। जँ करोड़ों
नागरिक अपन जनसंख्याक अनुपातमे प्रतिनिधित्व नहि पाबि रहल छथि ,
तँ हुनकर राजनीतिक आवाजकेँ स्थायी रूपसँ सीमित राखब सेहो
एक व्यक्ति , एक मत केर लोकतांत्रिक आदर्शसँ पूर्णतः
मेल नहि खाइत। तेँ एहि बहसकेँ उत्तर बनाम दक्षिण केर संघर्षमे बदलि देब
खतरनाक होयत। दक्षिणक प्रश्न जनसंख्या नियन्त्रणमे सफलताक सम्मानक अछि ,
तँ उत्तरक प्रश्न समान राजनीतिक प्रतिनिधित्वक। भारतीय
संघवादक परिपक्वता एहि मे अछि जे हम दुनू प्रश्नकेँ एकहि समय स्वीकार करी।
एहि संदर्भमे कर योगदान आ राजनीतिक प्रतिनिधित्वक सम्बन्धपर सेहो विचार भऽ
सकाय अछि। भारतक आर्थिक गतिविधिक पैघ भागक भार दक्षिण आ पश्चिमक औद्योगिक आ
सेवा-प्रधान राज्यसभ वहन करैत छथि। यदि जनसंख्या-आधारित परिसीमनक कारणेँ
ओहि राज्यसभक सापेक्ष राजनीतिक प्रभाव कम होइत अछि ,
तँ ई धारणा पैदा भऽ सकैत अछि जे आर्थिक योगदान आ राजनीतिक
शक्ति दू अलग दिशामे चलि रहल अछि। मुदा एकर अर्थ ई नहि जे बेसी जनसंख्यावला
राज्यक नागरिकक मतक मूल्य कम कएल जाए। समाधान एहि विरोधाभासकेँ समझि कऽ एहन
संघीय संरचना बनाबब अछि जाहिमे जनसंख्या , आर्थिक
योगदान , जनसंख्या नियन्त्रण आ संघीय संतुलन सभकेँ
उचित महत्व भेटय।
डॉ. शशि थरूरक चिन्ताक दोसर महत्वपूर्ण पहलू लोकसभाक सम्भावित
850
सदस्यक आकार अछि। लोकतंत्रमे संसद खाली मतगणनाक संस्था नहि ,
बल्कि विचार-विमर्शक संस्था सेहो अछि। संसदमे विधेयक सभपर
बहस होइत अछि , सरकारक नीतिपर प्रश्न उठैत अछि ,
विपक्ष अपन आलोचना प्रस्तुत करैत अछि आ संसदीय समितिसभ
कानूनक सूक्ष्म समीक्षा करैत अछि। मुदा समय सीमित अछि। यदि 850
सदस्यक सदनमे प्रत्येक विधेयकपर सीमित समय उपलब्ध होयत ,
तँ प्रत्येक सांसदकेँ अपन विचार व्यक्त करबाक अवसर
स्वाभाविक रूपसँ कम होयत। थरूरक चिन्ता एहि बातपर अछि जे विशाल सदनमे बहुतो
सांसदक भाषणक समय अत्यन्त सीमित भऽ सकैत अछि ,
जाहिसँ संसदीय बहस वास्तविक विचार-विमर्शक बदला औपचारिकता ,
पार्टीगत अनुशासन अथवा खाली डेस्क थपथपाबय धरि सीमित
होएबाक खतरा रहत।
ई आशंका अतिशयोक्ति मात्र नहि मानल जा सकैत अछि। लोकतंत्रक शक्ति खाली
सदनमे उपस्थित सांसदक संख्यासँ नहि ,
बल्कि हुनकर सार्थक भागीदारीसँ निर्धारित होइत अछि। जँ
850 सांसद छथि , मुदा बहस
लेल समय नहि , विधायी शोधक पर्याप्त व्यवस्था नहि ,
संसदीय समितिसभक क्षमता सीमित अछि आ प्रत्येक सांसदकेँ
सरकारसँ जवाब मांगबाक अवसर नहि भेटैत अछि , तँ पैघ
संसद स्वतः पैघ लोकतंत्र नहि बनि जाएत। संख्या बढ़ेनाइ प्रतिनिधित्वक
मात्रात्मक विस्तार भऽ सकैत अछि , मुदा लोकतंत्रक
गुणात्मक विस्तार लेल संस्थागत क्षमता सेहो ओहि अनुपातमे बढ़ेबाक आवश्यकता
होयत।
एहि संदर्भमे अमेरिका जका उदाहरण सेहो बहसमे अबैत अछि। अमेरिकी
House of Representatives मे 1929
केर Permanent Apportionment Act पछाति सदस्य
संख्याक सीमा 435 पर स्थिर अछि ,
जखन कि एहि बीच अमेरिकाक जनसंख्या बहुत बढ़ि चुकल अछि। एकर
अर्थ ई नहि जे अमेरिकी मॉडल भारत लेल ज्योंक-त्यों अपनाओल जाए। भारतक
सामाजिक विविधता , जनसंख्या ,
संघीय संरचना आ निर्वाचन व्यवस्था सर्वथा भिन्न अछि। मुदा एहि उदाहरणसँ
कम-सँ-कम ई प्रश्न उठैत अछि जे जनसंख्या बढ़लाक प्रत्येक चरणपर संसदक सदस्य
संख्या ओहि अनुपातमे बढ़ेनाइ अनिवार्य किएक मानल जाए ?
प्रतिनिधित्वक प्रभावी साधन सभमे संसदीय कार्यालय ,
शोध-सहायता , डिजिटल सम्पर्क ,
निर्वाचन क्षेत्रमे नागरिक सुविधा आ स्थानीय लोकतंत्रक
मजबूतीक सेहो उपयोग भऽ सकैत अछि।
यूरोपीय संघक
Degressive Proportionality केर अवधारणा सेहो एहि बहसमे
विचारणीय अछि। एहि व्यवस्थाक मूल भाव ई अछि जे जनसंख्या बेसी होमयवला
इकाईकेँ अधिक प्रतिनिधि भेटैत अछि , मुदा
प्रतिनिधित्व पूर्णतः जनसंख्याक अनुपातमे नहि बढ़ैत ;
छोट इकाईकेँ तुलनात्मक रूपसँ अधिक प्रतिनिधित्व भेटैत अछि।
भारतक लेल ई मॉडल ज्योंक-त्यों लागू होय , ई आवश्यक
नहि ; मुदा संघीय संतुलन बनौने रखबाक लेल जनसंख्या
अधिक तँ सीट ओहि अनुपातमे अधिक केर सरल सूत्रक अतिरिक्त किछु मध्यम मार्ग
खोजबाक सम्भावना जरूर अछि। विशेषतः ओहि राज्यसभक राजनीतिक हिस्सेदारीक
सुरक्षा लेल , जे जनसंख्या नियन्त्रणमे सफल रहल अछि।
मुदा प्रश्न ई अछि जे जँ प्रतिनिधित्वक वास्तविक उद्देश्य अधिक-से-अधिक
नागरिकक आवाजकेँ राजनीतिक व्यवस्था मे स्थान देनाइ अछि ,
तँ की एहि लेल खाली लोकसभाक सीट बढ़ेनाइ आवश्यक अछि ?
एहि ठाम आनुपातिक प्रतिनिधित्वक अवधारणा एकटा वैकल्पिक
दिशा देखबैत अछि। भारतमे लोकसभाक चुनाव मुख्यतः First-Past-the-Post
प्रणालीपर आधारित अछि। एहि व्यवस्थामे कोनो निर्वाचन
क्षेत्रमे सभसँ बेसी मत पाबयवला उम्मीदवार विजेता घोषित होइत छथि ,
भले हुनका कुल मतक आधासँ कम मत भेटल होय। परिणामस्वरूप ,
दोसर स्थानपर रहल उम्मीदवारकेँ भेटल हजारों अथवा लाखों मत
चुनाव परिणामक बाद संस्थागत प्रतिनिधित्वमे कोनो रूप नहि पाबैत अछि।
एकटा प्रयोगधर्मी विचार एहि ठाम विकसित कएल जा सकैत अछि। जँ निर्वाचन
क्षेत्रमे पहिल उम्मीदवार
42
प्रतिशत मत पाबि सांसद बनैत छथि आ दोसर उम्मीदवार
38 प्रतिशत मत प्राप्त करैत छथि ,
तँ वर्तमान व्यवस्थामे 38 प्रतिशत मतदाताक
प्रतिनिधि चुनाव परिणामक बाद लगभग पूर्णतः बाहर भऽ जाइत छथि। की एहन कोनो
व्यवस्था सम्भव अछि जाहिमे पहिल उम्मीदवार पूर्ण संसदीय प्रतिनिधि रहथि आ
दोसर स्थानपर रहल उम्मीदवारकेँ द्वितीय प्रतिनिधि केर सीमित संस्थागत
भूमिका भेटय ?
एहि द्वितीय प्रतिनिधिकेँ लोकसभाक सदनमे मतदान अथवा सरकार बनाबय-बिगाड़य
जका पूर्ण संसदीय अधिकार नहि देल जाए। मुदा हुनका अपन निर्वाचन क्षेत्रक
जनताक समस्या उठेबाक ,
स्थानीय विकासक निगरानी करबाक ,
सम्बन्धित सरकारी विभागसँ जवाब मांगबाक अथवा निर्धारित विकास कोषक उपयोगमे
भूमिका देल जा सकैत अछि। एहि तरहें एकटा निर्वाचन क्षेत्रमे एकटा पूर्ण
संसदीय प्रतिनिधि आ एकटा सीमित नागरिक प्रतिनिधिक अवधारणा विकसित भऽ सकैत
अछि , जे एक दोसार के पूरक होयत आ क्षेत्र के
अधिकांश नागरिक के प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करत।
एहि विचारक सभसँ पैघ लाभ ई भऽ सकैत अछि जे चुनावमे पराजित मतसभ पूर्णतः
निष्प्रभावी नहि रहत। लाखों मतदाता जे दोसर उम्मीदवारकेँ समर्थन कऽ चुकल
छथि ,
हुनकर आवाजक कोनो संस्थागत माध्यम रहत। एकरा लेल लोकसभाक
सैकड़ों नवीन सीट बनाबय , नवीन सांसद नियुक्त करय आ
स्थायी राजकोषीय भार बढ़ेबाक आवश्यकता सेहो नहि होयत। मुदा एहि मॉडलसँ अनेक
प्रश्न सेहो उठत। जेना द्वितीय प्रतिनिधिक संवैधानिक स्थिति की होयत ,
अधिकारक सीमा कोना तय होयत , सरकारी
धनक उपयोगमे जवाबदेही कोना सुनिश्चित होयत आ मुख्य तथा द्वितीय प्रतिनिधिक
बीच विवाद भेल तँ अन्तिम निर्णय ककर होयत। एहि कारणेँ हमर एहि सुझाव के
समाधानक अन्तिम रूप नहि , अपितु भारतमे
प्रतिनिधित्वक वैकल्पिक प्रयोगपर विचार करबाक एकटा आमंत्रण मानल जाए।
आनुपातिक प्रतिनिधित्वक व्यापक मॉडल सेहो एहि सन्दर्भमे विचारणीय अछि।
लोकसभाक किछु सीट प्रत्यक्ष निर्वाचन क्षेत्रसँ आ किछु सीट दलसभक कुल मत
प्रतिशतक आधारपर भरबाक मिश्रित प्रणाली विकसित कएल जा सकैत अछि। एहि सँ
स्थानीय प्रतिनिधित्वक सम्बन्ध जनता आ भूभागसँ बनल रहत ,
संगहि देशभरिमे प्राप्त मतक अनुपात सेहो संसदक संरचनामे
किछु हद धरि परिलक्षित होयत। मुदा एहि प्रणालीमे पार्टी सूची ,
आन्तरिक लोकतंत्र , क्षेत्रीय
संतुलन , महिला प्रतिनिधित्व आ उम्मीदवार चयनक
प्रश्न जटिल होयत। तेँ एहि पर व्यापक संवैधानिक आ सार्वजनिक विमर्श आवश्यक
अछि।
परिसीमनक बहसमे बिहारक प्रश्न स्वाभाविक रूपसँ विशेष महत्व रखैत अछि।
बिहारक जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत अधिक रहल अछि आ संभावित परिसीमनमे ओकर
लोकसभा सीट बढ़बाक सम्भावना व्यापक रूपसँ चर्चामे अछि। यदि बिहारक राजनीतिक
प्रतिनिधित्व बढ़ैत अछि ,
तँ ई राज्य लेल एकटा महत्वपूर्ण अवसर भऽ सकैत अछि। मुदा
इहो एकटा स्थापित सत्या अछि जे खाली सीट बढ़लासँ विकास अपने नहि होयत। असली
प्रश्न ई छैक जे बिहारक सांसद अपन बढ़ल राजनीतिक वजनक उपयोग कथि लेल करताह।
किएकि वर्तमान आ रिसेंट पास्ट देखल जाय तऽ बिहारक बेसी सांसद विधायक अपन
भूमिका बस हेड काउंट आ डेस्क थपथपायब आ अंट-शंट के बयानबाजी आ राजनीति मे
करय छथि। बेरोजगारी , पलायन ,
बाढ़ , कृषि संकट ,
शिक्षा , स्वास्थ्य ,
उद्योग , आधारभूत संरचना आ मानव
पूँजीक प्रश्नकेँ राष्ट्रीय नीतिक केन्द्रमे कोना आनल जाएत ऐ पर ई सांसद
विधायक लोक कै तरहे कार्य करय छथि ई हुनक असली परीक्षा होयत।
मैथिल समाज लेल एहि बहसक महत्व आओर बेसी अछि। मिथिलाक बाढ़ ,
कृषि , रोजगार ,
पलायन , औद्योगिक पिछड़ापन ,
शिक्षा , स्वास्थ्य ,
आधारभूत संरचना आ सांस्कृतिक पहचानक प्रश्न दशकसँ अपन
समाधानक बाट ताकैत अछि। यदि बिहारक लोकसभा सीट बढ़ैत अछि ,
तँ मैथिल समाजकेँ खाली “हमरा कतेक सीट भेटत” पर नहि ,
बल्कि “हमर क्षेत्रक कोन मुद्दा राष्ट्रीय मुद्दा बनत आ
ओहि पर की नीति बनत , ओ कोना लागू हेतइक” पर ध्यान
देबाक चाही। प्रतिनिधित्वक वास्तविक सफलता सीट संख्यामे नहि ,
बल्कि एहि बातमे होयत जे मिथिलाक प्रश्न संसदक विमर्शमे
कतेक प्रभावी ढंगसँ उपस्थित होइत अछि।
एहि सभक बीच स्थानीय लोकतंत्रक प्रश्न सेहो उपेक्षित नहि होबाक चाही।
भारतमे पंचायत आ नगर निकायकेँ संवैधानिक दर्जा भेटल अछि ,
मुदा व्यवहारमे बहुतो ठाम हुनकर वित्तीय आ प्रशासनिक
क्षमता सीमित अछि। यदि सड़क , नाला ,
स्थानीय विद्यालय , प्राथमिक
स्वास्थ्य केन्द्र , स्थानीय जल-निकासी जका समस्या
लेल नागरि के सदिखन सांसदक दरवाजा खटखटायब पड़त , तँ
सांसदक संख्या बढ़लासँ सेहो मूल समस्या हल नहि होयत। स्थानीय सरकारकेँ
वास्तविक अधिकार , वित्त आ प्रशासनिक क्षमता देल जाए
तँ सांसद राष्ट्रीय नीति , विधायी समीक्षा आ सरकारक
जवाबदेहीपर अधिक ध्यान दऽ सकताह। एहि दृष्टिसँ परिसीमनक बहस स्थानीय
लोकतंत्रक पुनर्निर्माणक अवसर सेहो बनि सकैत अछि।
परिसीमनक भविष्यक सूत्र बनबैत समय एकटा बहुआयामी दृष्टिकोणक आवश्यकता अछि।
जनसंख्या निस्सन्देह महत्वपूर्ण आधार रहत ,
मुदा ओकर संग भौगोलिक विस्तार ,
दुर्गमता , प्रशासनिक सुविधा ,
जनसंख्या नियन्त्रणमे राज्यक दीर्घकालीन प्रदर्शन ,
विकासक स्तर आ संघीय संतुलनपर सेहो विचार होएबाके चाही।
एकर उद्देश्य कोनो राज्यकेँ विशेषाधिकार देनाइ नहि ,
बल्कि भारतक संघीय ढाँचामे एहन संतुलन बनौने रखनाइ होएबाक चाही जाहिमे कोनो
राज्य अपनाकेँ राजनीतिक रूपसँ दण्डित अथवा स्थायी रूपसँ उपेक्षित महसूस नहि
करय।
एहि प्रक्रिया मे सर्वदलीय आ सर्वराज्यीय सहमति अत्यन्त आवश्यक अछि।
परिसीमन एहन विषय नहि जे खाली सत्तापक्ष आ विपक्ष अपन-अपन संख्याक आधारपर
तय कऽ दै। ई देशक राजनीतिक भूगोलकेँ दशको तक प्रभावित करयवला निर्णय अछि।
निर्वाचन क्षेत्रक प्रस्तावित नक्शा ,
जनसंख्या गणनाक सूत्र , राज्यवार
प्रभाव आ राजकोषीय लागत सभ सार्वजनिक होबाक चाही। आपत्ति आ सुझाव लेल
पर्याप्त समय भेटबाक चाही। संवैधानिक विशेषज्ञ ,
निर्वाचन विशेषज्ञ , जनसांख्यिकीविद् ,
राज्य सरकार , क्षेत्रीय दल आ
नागरिक समाजक आवाज सेहो एहि विमर्शमे शामिल होबाक चाही।
अन्ततः परिसीमनक मूल प्रश्न “कतेक सीट ?”
नहि , बल्कि “कतेक प्रभावी
प्रतिनिधित्व ?” होएबाक चाहिए। लोकसभाक कुर्सी
बढ़ेबासँ लोकतंत्र जरूरी नहि जे मजबूत होय। सांसदक संख्या बढ़ेबासँ जनता
जरूरी नहि जे बेसी प्रतिनिधित्व पाओत। प्रतिनिधित्वक असली कसौटी ई अछि जे
नागरिकक आवाज कतेक प्रभावी ढंगसँ सत्ता धरि पहुँचैत अछि ,
सरकार ओकरा कतेक गम्भीरतासँ सुनैत अछि आ जनप्रतिनिधि अपन
संवैधानिक भूमिका कतेक ईमानदारीसँ निभबैत छथि। तेँ भारतक नागरिक के खाली ई
नहि पूछबाक चाही जे लोकसभामे कतेक सांसद हेबाक चाहिए ?
भारतकेँ ई पूछबाक चाही जे कतेक नागरिकक आवाज वास्तव मे संसदमे सुनल जा रहल
अछि ? शायद परिसीमनक सम्पूर्ण बहसक सार एहि एकटा
प्रश्नमे निहित अछि। जनसंख्या लोकतंत्रक गणित अछि ,
मुदा लोकतंत्र खाली गणित नहि। भूगोल ओकर धरातल अछि ,
प्रतिनिधित्व ओकर माध्यम , संसद ओकर मंच आ जनताक
आवाज ओकर प्राण। भारतक अगिला परिसीमन तखने सफल मानल जाएत ,
जखन ई चारू तत्वक बीच एहन संतुलन स्थापित होय जे देशक कोनो
भागकेँ अपन राजनीतिक भविष्यसँ भयभीत नहि होमय पड़य आ कोनो नागरिककेँ अपन
आवाज संसद धरि पहुँचाबय लेल खाली चुनावी संख्याक भरोसापर निर्भर नहि रहय
पड़य।
सन्दर्भ:
1.
Shashi Tharoor, “Why an 850-seat Lok Sabha threatens Indian
democracy” , The Indian Express, 2026.
2.
Constitution of India, विशेषतः अनुच्छेद
81, 82 तथा निर्वाचन क्षेत्रक पुनर्समायोजनसँ सम्बन्धित
प्रावधान।
3.
Constitution (Forty-Second Amendment) Act, 1976.
4.
Constitution (Eighty-Fourth Amendment) Act, 2001.
5.
Constitution (One Hundred and Sixth Amendment) Act, 2023.
6.
Election Commission of India, Delimitation of Parliamentary
and Assembly Constituencies सम्बन्धी आधिकारिक
सामग्री।
7.
PRS Legislative Research
8.
Fourteenth & Fifteenth Finance Commission
Report
9.
Sarkaria Commission, Report on Centre-State Relations .
10.
U.S. House of Representatives, historical material relating to
the Permanent Apportionment Act of 1929.
11.
European Parliament, material relating to the principle of
Degressive Proportionality.
- प्रणव
कुमार झा ,
ग्राम गोरापुर जिला बेगूसराय | संप्रति: एनबीईएमएस ,
नई दिल्ली