विदेह शोध-सूची · मूल PDF

गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल कुणाल

Videha Issue 451 · Research article continuation 2

शिल्प आ आलोचनात्मक निरीक्षण। अन्तिम स्थान सम्पादकीय रचना-कौशलक हिस्सा थिक: विरह–सौन्दर्यसँ चलि संग्रह जीवन-दर्शन दिस पहुँचैत अछि; एहि क्रमकेँ विद्यापतिक स्वयं रचल मूल अनुक्रम मानबाक प्रमाण नहि।

अन्तर्पाठीय सम्बन्ध। पद ७क स्त्री-जन्मक दुःख आ पद ९४क अनित्यबोध जोड़ि देखला पर संग्रहक आरम्भ आ उपसंहार बीच जीवन-दर्शनक संवाद सम्भव अछि।

६. नायिकाक अभिव्यक्ति : अधिकार, संकोच आ प्रतिरोध

६.१ ‘स्त्री-मोन’क एकरूपता नहि, अनेकता

प्रेमिकाक वाणी आ विद्यापतिक कवि-वाणी सदिखन एक नहि। पद १–३क अभिमान, पद ९–१८क परदेश-विरह, पद २०–२४क घनिष्ठ भेंट, पद ३५क गृह-निगरानी तथा पद ५७क निषेधक स्वर एकहि ‘स्त्री’क अपूर्ण विविध रूप नहि, अपितु अनुभूतिक अनेक ठाम अछि। एहि चयनक आलोचनात्मक उपलब्धि स्त्रीक भाषा केन्द्रमे आनब अछि; सीमा ई जे खण्ड-नामक कारण पाठक स्त्रीकेँ मुख्यतः वेदना द्वारा परिभाषित करबाक जोखिम लऽ सकैत छथि।

६.२ सखी केवल श्रोता नहि

‘सखि’क सम्बोधन स्त्रीक एकल मनकेँ सामुदायिक संवादमे रूपान्तरित करैत अछि। सखी गोपनीयता, परामर्श, सन्देश, आत्मपरीक्षा आ मिलनक सहयोगक सम्भावित माध्यम अछि। पद १५, २५, ३१, ३३, ३४ आ ८९क तुलनासँ सखी-सम्बोधनक भाषिक कार्यक भिन्नता देखाइत अछि। एहि पदसभकेँ केवल प्रेमिकाक विलाप कहनाइ सामाजिक संवादक सूक्ष्म संरचना उपेक्षित करब थिक।

६.३ लोकाचारक दाब

कुल-गौरव (१९), घरक अँगना (२३), सासु-पहरा (३५), परिवार-संकोच (५७) तथा शिव–गौरीक विवाहक व्यंग्य (५९–६३) प्रेमक निजी क्षेत्र पर लोकाचारक नियंत्रण देखबैत अछि। जे समाज ‘मान’ कहैत अछि, स्त्रीक आवाज ओकर भीतर अपन चाह पर विमर्श करैत अछि। तथापि पदक पात्रक स्वरक आधुनिक सिद्धान्तक सीधा घोषणापत्र बनाओल नहि जाय; वाणीमे संकोच, अनुरोध, अनुराग आ प्रतिरोध एकसंग चलैत अछि।

७. रस-संरचना, बिम्ब आ ध्वनि

७.१ विप्रलम्भ-शृंगार आ करुण

परदेशक दुःख (९, १८, ३४), विषम राति (५०), असफल प्रतीक्षा (४३, ५४), अग्निताप (४७) आ पवनक उद्दीपन (५५) विप्रलम्भक अनेक रूप उपस्थित करैत अछि। मुख्य बात ई जे विरह केवल अनुपस्थिति नहि, समय आ देहक अनुभूतिक पुनर्संरचना थिक: राति लम्बा, घर सून्न, प्रकृति प्रतिकूल आ आत्मसंवाद बेचैन भऽ जाइत अछि। करुण भाव शृंगारक भीतर सँ उत्पन्न होइत अछि, ताहि लेल प्रत्येक पदकेँ एक रसक खाँचामे बाँधनाइ उपयुक्त नहि।

७.२ संयोग, संकोच आ नायिकाक दृष्टि

पद २०, २३, ४१, ४२, ७७ आ ९३ प्रेमक दृष्टि, स्पर्शक संकेत, हाव-भाव, लज्जा आ लुकायल संवादक अनेक दृश्य बनबैत अछि। संयोगक रस एतय खुलेआम उद्घोषणा नहि, सामाजिक जोखिममे साधल सम्बन्धक पल-पल गतिमे प्रकट अछि। एहि पदसभक रचनामे कथात्मकता आ चित्रात्मकता एक-दोसरकेँ बल देइत अछि।

७.३ हास्य, व्यंग्य, स्तुति

शिव–गौरी सम्बन्धी पद ५९–६६ (विशेषतः ५९, ६२, ६३, ६६) प्रेमक गंभीरता बीच हास्यक अनूठ स्थान खोलैत अछि। देवताक विचित्र वेश, बरद आ वैवाहिक व्यवस्था लोक-स्त्रीक निगाहसँ नव अर्थ ग्रहण करैत अछि। ई भक्ति-विरोधी विडम्बना नहि, लोकक धार्मिक निकटताक एक प्रतीक सेहो भऽ सकैत अछि।

७.४ ध्वन्यात्मकता आ गान

गीतक जीवन पदक अर्थसँ बढ़ि ओकर उच्चारणमे अछि। ‘ए हरि’क पुनरुक्ति (२९), ‘अहे सखि’क पुकार (२५), ‘नव’क क्रमिक उच्चारण (८०), नृत्यक ध्वन्यात्मक बोल (८१), ‘थिर नहि’क आवर्तन (९४) ध्वनिकेँ अर्थ-वहनक सक्रिय अंग बनबैत अछि। पाठ-अर्थक गद्य रूप एहन ताल, विराम, अनुरणन आ पुकारक प्रभाव सम्पूर्ण रूपेँ सँभालि नहि सकैत अछि।

७.५ बिम्बक अर्थ-परिवार

मधुकर–पिक (१०, १६), चन्द्र–अँधार (२१), सरोवर–कमल (१२, ५६, ७६), पवन–वर्षा (३०, ५५, ८५), चन्दन–ताप (७०), पुष्प–कुञ्ज–वृन्दावन (७२, ७९, ८०, ८२) पुनरावृत्त बिम्बसभ अछि। एकहि प्राकृतिक वस्तु कखनो आशाक, कखनो विरहक चिह्न बनैत अछि। सन्दर्भ बदलला पर बिम्बक रस बदलैत अछि—ई विद्यापतिक काव्य-शिल्पक विशेष ताकत रूपेँ एहि चयनमे चिन्हित होइत अछि।

८. भाषा, लोकबोध, संवाद आ गेयता

मूल मैथिली पदमे ध्वनि-संक्षेप, रूपान्तरण आ क्षेत्रीय प्रयोगक स्वतंत्र इतिहास होय सकैत अछि। ताहि लेल संकलनक किछु पाठकेँ आधुनिक मानक वर्तनीक आधार पर ‘सुधारि’ देबाक बदला तकर मौलिकता जोगेनाइ उपयुक्त। ‘शुद्ध मैथिली’मे समीक्षा लिखबाक अर्थ ई नहि जे उद्धृत पुरान पदक रूप जबरदस्ती बदलि देल जाय। पदक मौलिक वाक्यरूप स्रोत-रूपेँ सुरक्षित रहबाक चाही।

संवादक स्वर पदक काव्यगत अस्तित्व अछि: सखी, माए, प्रिय, हरि, माधव, शिव अथवा कवि स्वयं—सब सम्बोधनक अलग सामाजिक-भावात्मक प्रसंग अछि। पाठ-अर्थमे ‘ओ कहैत छथि’ जोड़ल जाए तऽ ई व्याख्याकारक प्रस्तावना होइत अछि, मूल पदक शाब्दिक पाठ नहि। समीक्षामे ताहि भेदक दृढ़ता राखल गेल अछि।

९. शैव, वैष्णव, लौकिक आ नीतिपरक स्वर

विद्यापतिक एहि संग्रहक भीतर विषयक बहुलता वास्तविक अछि। शैव-लोकपरम्पराक हास्यगीत पद ५९–६६, वृन्दावन आ राधा-माधवक काव्य पद ७९–८२, आध्यात्मिक आ प्रेमिक पुकारक मिलन पद २९, ९०, ९७, रामसम्बन्धी सन्दर्भ पद ८८, आ अनित्यबोध पद ११, ७३, ९४, १०० एकही चयनमे स्थान पबैत अछि। एहि भिन्न स्वरकेँ पाठसाक्ष्य बिना एक संप्रदायक कठोर घोषणामे बाँधब विद्यापतिक कवि-संसारकेँ छोट करब होएत।

माधवक नामक संग प्रेम आ भक्ति एक-दोसरमे प्रवेश करैत अछि। एकठाम प्रियक विलम्बित आगमन (३२), दोसर ठाम ‘अहे माधव’क पुकार (९०) धार्मिक आसरे लगैत अछि। आलोचनात्मक पढ़ाइमे देव-सम्बोधन, कथकक स्थिति, प्रेमक देहात्मकता आ समर्पणक स्वरक अलग-अलग संकेतक आधार पर अर्थ केनाइ उचित।

कवि-छाप आ राजाश्रयक संकेत पद ६४ आ ८६मे ध्यान आकर्षित करैत अछि। मुदा एहि मुद्रासँ ऐतिहासिक तिथि, विशिष्ट राजदरबार अथवा कविक निजी जीवन निश्चित केनाइ सम्भव नहि। आधुनिक शोधमे आन्तरिक पाठसाक्ष्यकेँ पाण्डुलिपि, प्राचीन टीका, राजकीय लेख तथा अन्य सम्पादित पाठक साक्ष्यसँ मिलान करबाक आवश्यकता रहत।

१०. सम्पादकीय शब्दार्थक गुण-दोष आ पाठ-समस्या

१०.१ सम्पादकीय संरचनाक उपयोगिता

सम्पादक प्रायः पदक बाद स्रोत-संकेत आ कठिन शब्दक अर्थ, तकर बाद ‘पाठ-अर्थ’ देल छथि (उदाहरण: पद १, मूल पृ. ९–१०; पद १२, पृ. २३; पद ३६, पृ. ५२–५३; पद ८८, पृ. ११३–११४)। एहि त्रिस्तरीय व्यवस्था सँ पाठक शब्द, कथ्य आ संदर्भक बीच जा सकैत छथि। चयन, अनुक्रमणिका आ अन्तिम स्रोत-सूची (पृ. १२८) पुस्तककेँ सामान्य लोकप्रिय संग्रहसँ अधिक उपयोगी अध्ययन-सामग्री बनबैत अछि।

१०.२ शब्दार्थ आ अर्थ-निर्णय

एक शब्दक अनेक प्रसंगानुकूल अर्थ होइत अछि। मधुकर, हरि, बरद, गाम, मान, सखि, सर, थिर, अग्नि सरीख पदावलीमे केवल कोशार्थ पर्याप्त नहि। शोधार्थी लेल उपयोगी प्रक्रिया ई अछि—पहिने मूल पंक्तिक व्याकरण आ वक्ता बुझू; दोसर, शब्दार्थ पढ़ू; तेसर, पाठ-अर्थमे जुड़ल नब कथात्मक विवरणक पहिचान करू; चारिम, वैकल्पिक अर्थक सम्भावना दर्ज करू।

१०.३ मुद्रित स्रोत-संकेत आ आलोचनात्मक संस्करणक अन्तर

कतेको पदक नीचाँ संक्षेपमे अन्य पुस्तक/पदावलीक सन्दर्भ देल अछि। पृ. १२८ पर संकेतनामक सूची सेहो अछि। ई आभारयोग्य सन्दर्भ-दर्शन थिक; मुदा मात्र ई सूचना हर पदक हस्तलिपि-पाठ, पाठान्तर, प्रामाणिकता आ हस्तक्षेपक विस्तृत आलोचनात्मक उपकरण नहि। विशेषतः पद ८८ जेहन लम्बा पाठ आ पद ८१ जेहन ध्वन्यात्मक पदक अक्षरानुक्रमक निर्धारण अन्य संस्करणसँ मिलान कएल बिना अन्तिम नहि मानल जा सकैत अछि।

१०.४ व्याख्याक सम्भावित विस्तार

‘पाठ-अर्थ’ कखनो मूल संक्षिप्त पदकेँ घटना, पात्रक कारण वा मनोवृत्तिक अधिक विस्तार देइत अछि। ई व्याख्याक एक परम्परागत पद्धति अछि, अनिवार्यतः त्रुटि नहि; मुदा पाठक लेल ई बोध आवश्यक जे ‘सखी ई सोचलक’ जेहन विस्तार मूल वचनसँ स्पष्ट अछि कि सम्पादकक अनुमान, से अलग प्रश्न थिक। ई शोध एहि भेदकेँ पुनःपुनः रेखांकित करैत अछि।

१०.५ स्त्री-स्वरक सम्पादकीय प्रस्तुति

संकलकक स्त्री-केंद्रित दृष्टि संग्रहक महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक हस्तक्षेप अछि। एकरा मूल्याङ्कित करैत एकसंग दू सावधानी चाही: (१) नायिकाक आवाजकेँ गौण नहि कएल जाय; (२) सभ पदकेँ स्त्री-सशक्तिकरण अथवा स्त्री-पीड़ाक एक रंगमे बदलि नहि देल जाय। शिव–गौरी हास्य, राधा–माधव प्रेम, कवि-नीति आ राज-सन्दर्भ एहि जटिलताक प्रमाण अछि।

११. समग्र निष्कर्ष आ आगाँक शोधकार्य

कुणाल-सम्पादित ई चयन विद्यापति-काव्यकेँ पाठक समक्ष स्त्री-अनुभवक तीव्रता सँ प्रस्तुत करैत अछि। संग्रहक प्रथम सत्तरि पद प्रेमिका, सखी, गृहस्थी, नैतिक अपेक्षा, विरह आ देवीक मानवीय संसारेँ विस्तृत अछि; अन्तिम तीस पदमे कविक आत्मस्वर, सौन्दर्य, नृत्य, वृन्दावन, भक्ति आ अनित्यबोधक विवेचन प्रखर होइत अछि। किन्तु खण्डक सीमा पार करैत भावसभक आवाजाही एकर वास्तविक सौन्दर्य अछि।

एहि शोधक एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष ई अछि जे विद्यापतिक कथक-स्वर बहुवचनात्मक अछि: कखनो नायिका स्वयं बोलैत छथि, कखनो सखी माध्यम छथि, कखनो कवि स्वर बदलैत छथि, कखनो हरि-माधव वा शिव-गौरीक मिथकीय क्षेत्र खोलैत छथि। ताहि लेल ‘प्रेमगीत’ कहि सभ एकरूप बनाओल नहि जाय। प्रकृति परस्पर विरोधी रस वहन करैत अछि, लोकभाषा उच्च काव्यगत अर्थ रचैत अछि, आ गीतक उच्चारण स्वयं अर्थक हिस्सा अछि।

सम्पादकीय अवदानकेँ सराहैतहुँ आलोचनात्मक समस्या स्पष्ट अछि: पाठ-अर्थक व्याख्यात्मक विस्तार आ मूल पदक साक्ष्य बीच अन्तरक सजगता आवश्यक। ई पोथी महत्वपूर्ण पाठ-प्रवेशद्वार अछि; अलग स्रोतक संग पाठान्तर-सूची बनलापर ई स्त्री-काव्य, रस-मीमांसा आ मध्यकालीन मैथिली भाषिक इतिहासक अधिक ठोस शोधक आधार भऽ सकत।

पाठभेदक विस्तृत अध्ययन लेल अलग-अलग सम्पादित पदावली आ पाण्डुलिपि-परम्पराक तुलनासँ नव प्रश्न उठैत अछि। छन्द, गायन-परम्परा, लोकप्रयोग आ स्त्री-वाणी पर केन्द्रित अध्ययन सेहो एहि चयनक अर्थकेँ विस्तार दए सकैत अछि।

१२. पदवार पृष्ठ-सूची आ आधार-सामग्री

एहि तालिकामे सभ १०० पदक मूल मुद्रित पृष्ठ-संख्या देल अछि, जाहिसँ पाठक मूल पोथी आ समीक्षा बीच तुरन्त मिलान कऽ सकथि। मुद्रित पृष्ठ ९–१२७मे कतेको पृष्ठ पर एके पदक शब्दार्थ/पाठ-अर्थ आगाँ बढ़ैत अछि; तालिका पदक आरम्भ-पृष्ठ बतबैत अछि।

अध्याय २

रंगायन : मैथिली रंगचेतनाक आलोचनात्मक अध्ययन

लोकनाट्य, प्रदर्शन, भाषिक अस्मिता आ रंग-इतिहास

रंगायन : कुणाल

मूल ग्रन्थ : रंगायन (नाट्य आलोचना) | लेखक : कुणाल | प्रथम संस्करण : २०२३ | प्रकाशक : अंकिता प्रकाशन प्रा. लि. | ISBN : 978-93-91925-67-3

अध्ययनक प्रस्तावना

कुणालक ‘रंगायन’ मैथिली रंगमंचक बहुपक्षीय विमर्शकेँ एक ठाम अनबाक प्रयत्न अछि। पोथीमे नाच, लोकनाट्य, कीर्तनिया, सलेहेस, समकालीन भारतीय रंगचेतना, जननाट्य, लेखन, कथ्य, शिल्प, निर्देशक, दर्शक, संस्था, साहित्य आ रंगमंचक परस्पर सम्बन्ध विषयक आलेख संकलित अछि। अन्तिम भागमे बातचीत आ व्यक्ति-केन्द्रित लेख सेहो अछि। एहि संकलनक मूल महत्त्व ई अछि जे मैथिली रंगमंचकेँ केवल मुद्रित नाटकक इतिहासमे नहि, प्रदर्शन आ लोकजीवनक संगतिमे रखबाक प्रश्न बारम्बार सोझाँ अबैत अछि।

ग्रन्थक भूमिका, लेख-शीर्षक आ विषय-विन्यास एकरे भीतर रंगपरम्परा, आधुनिकता, भाषा आ रंगकर्मक परस्पर सम्बन्धक प्रश्न उठबैत अछि। अनुक्रमणिकाक क्रमक अनुसार प्रत्येक आलेखक विषयगत पक्ष आ ताहिसँ उपजैत आलोचनात्मक जिज्ञासाकेँ समेटल गेल अछि।

ग्रन्थ-विन्यास आ अध्ययन-पद्धति

अनुक्रमणिकामे मुख्य चार खण्ड अछि—‘नाच आ लोक नाट्य’, ‘समकालीन मैथिल रंगमंच’, ‘रंगमंच’, ‘बातचीत’। एहि चारू खण्डक सभ सूचीबद्ध उपशीर्षककेँ नीचे स्वतंत्र प्रविष्टि देल गेल अछि। आरम्भमे लेखकक भूमिका (मुद्रित पृष्ठ VII–VIII) आ अन्तमे मैथिली रंगमंचक भविष्य विषयक प्रविष्टि अछि। शीर्षक-सूचीमे छोट-छोट कविता आ प्रश्नात्मक शीर्षक सेहो अछि; ताहि लेल सभ गद्यकेँ एके विधाक रूपमे नहि पढ़ल गेल अछि।

भूमिका : लेखकक रंगधारणा

भूमिकामे लेखक रंगकर्मक दीर्घ अनुभव आ रंगचिन्तनक अविच्छिन्न सम्बन्धक विषय उठबैत छथि। नाटककेँ मंच-प्रक्रिया, अभिनय, लोकभाषा, संगठन आ समाजक सन्दर्भमे देखबाक आग्रह भूमिका आ आरम्भिक आलेखक बीच तन्तु बनबैत अछि। लेखक अपन अनुभवजनित प्रतिबद्धता स्वीकारैत छथि; आलोचकक दृष्टिसँ एहि आत्मस्थितिक शक्ति आ सीमा दुनू देखबाक चाही। अनुभव लेखनकेँ जीवन्त करैत अछि, मुदा इतिहास-संबन्धी सर्वसाधारण दावाक प्रमाण अलगसँ चाही।

चारू खण्डक सभ विषयक आलोचनात्मक विवेचन

नाच आ लोक नाट्य

01. मिथिलाक संस्कृति आ लोक नाट्य [मुद्रित पृ. 13]

विषय : लोक नाट्यकेँ सामुदायिक जीवन, भाषा, संस्कार आ उत्सवक अन्तर्सम्बन्धमे देखबाक आग्रह एहि आलेखक केन्द्र अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : लोकविधाक अध्ययनमे प्रदर्शनस्थल, सामाजिक सहभागिता आ मौखिक परम्पराकेँ पाठसँ पृथक् नहि कएल जा सकैत अछि।

02. नाच आ किरतनिया : स्वरूप आ संभावना [मुद्रित पृ. 21]

विषय : नाच आ कीर्तनिया परम्पराक सौन्दर्य आ रंगमंचीय सम्भावना विषय बनैत अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : कथा, गायन, अभिनय, संवाद आ सामूहिक अनुष्ठानक परस्परता एहि विधाक रूपक परीक्षणक प्रमुख आधार अछि।

03. लोक गाथाक नाट्य रूप [मुद्रित पृ. 25]

विषय : लोकगाथाक कथा-शिल्प आ नाट्यरूपान्तरणक प्रश्न उठाओल गेल अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : लोकगाथाकेँ नाटकमे फेरबा समय कथावाचक, गायक, पात्र, समय-परिवर्तन आ दर्शकीय सहभागिताक पुनर्संयोजन आवश्यक बनैत अछि।

04. संक्रमणक क्रम मे एक टा लोक नाट्य : सलेहेस नाच [मुद्रित पृ. 31]

विषय : सलेहेस नाचक रूपान्तरणकेँ सामाजिक-सांस्कृतिक संक्रमणक उदाहरण बनाओल गेल अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : लोकनायकक कथा, जातीय-सामाजिक स्मृति आ प्रदर्शनक बदलैत परिस्थिति बीच सम्बन्ध देखल जा सकैत अछि।

05. किरतनिया नाट्य [मुद्रित पृ. 36]

विषय : कीर्तनिया नाट्यक ऐतिहासिक परम्परा आ रंगात्मक स्वरूपक विवेचना अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : गीत, अभिनय, काव्य आ भक्तिक संगमक संग ऐतिहासिक दावाक स्रोत-परीक्षण आवश्यक अछि।

06. किरतनियाक अवयव [मुद्रित पृ. 40]

विषय : कीर्तनिया रूपक घटककेँ नामकरण, दल-संरचना, भाषा, प्रवेश आ प्रस्तुति आदि आधार पर वर्गीकृत कएल गेल अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : ई अंश अन्य सामान्य निबन्धसँ भिन्न; रंगप्रयोगक विशिष्ट अंग बुझबाक उपयोगी विश्लेषणात्मक ढाँचा दैत अछि।

समकालीन मैथिल रंगमंच

07. समकालीन भारतीय रंगमंच आ मैथिली [मुद्रित पृ. 47]

विषय : भारतीय रंगमंचक विविध आन्दोलनसँ मैथिली रंगमंचक सम्बन्ध आ अन्तर पर चर्चा अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : मुख्यधारा आ क्षेत्रीयताक सरल विरोधक स्थान पर प्रयोग, संस्थान, भाषा आ दर्शकक सम्बन्ध देखब उपयोगी अछि।

08. समकालीन मैथिली रंगमंच : स्थिति आ अपेक्षा (निर्देशक दृष्टि मे) [मुद्रित पृ. 50]

विषय : समकालीन रंगकर्मक अवस्था आ निर्देशकक अपेक्षासम्बन्धी प्रश्न अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : निर्देशकक कलात्मक स्वायत्तता, समूह-अनुशासन, अभ्यास आ संसाधनक सम्बन्ध आलोचनाक आधार अछि।

09. निजत्व आ मैथिली रंगमंच [मुद्रित पृ. 54]

विषय : मैथिली रंगमंचक निजत्व, अस्मिता आ अन्य रंगपरम्परासँ सम्बन्ध पर विमर्श अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : निजत्वकेँ केवल वेशभूषा अथवा उच्चारणमे नहि, सामाजिक अनुभव आ रंगभाषाक निर्माणमे देखबाक जरूरत अछि।

10. मैथिली रंगमंचक स्वरूप निर्धारण : संदर्भ जननाट्य [मुद्रित पृ. 59]

विषय : जननाट्यक परिप्रेक्ष्यमे रंगमंचक रूप आ सार्वजनिक उत्तरदायित्वक प्रश्न प्रस्तुत अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : जन-संवाद आ जनपक्षधरता संग कलाकारक स्वतन्त्रता आ नाट्यशिल्पक समन्वय महत्वपूर्ण अछि।

11. रंगमंच : साध्य, साधन आ धर्म [मुद्रित पृ. 64]

विषय : रंगमंचकेँ कला, संप्रेषण आ सामाजिक दायित्वक अनेक स्तर पर राखि विचार कएल गेल अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : साधन आ साध्यक भेदकेँ रंगप्रयोग, दर्शकक प्रत्युत्तर आ कलात्मक अनुशासनसँ जोड़ि देखब उचित अछि।

12. मैथिलीक नाटकक मैथिल प्रदर्शन हेबाक चाही [मुद्रित पृ. 73]

विषय : भाषायी रंगसत्ता आ स्थानीय अनुभवक प्रतिनिधित्वक प्रश्न उठैत अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : मैथिल प्रदर्शनक अर्थ रूढ़ संस्कृतिक चिह्नक प्रदर्शन नहि; जीवन-संवेदना आ भिन्न सामाजिक स्वरक सर्जनात्मक उपस्थिति होएबाक चाही।

13. नाट्य-प्रवृत्ति आ भाषाक रंगमंच [मुद्रित पृ. 77]

विषय : भाषायी रंगमंच आ नाट्यप्रवृत्तिक अन्तर्सम्बन्ध प्रमुख विषय अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : उच्चारित भाषा, देहभाषा, मंचीय लय आ स्थानीय बोलीक बहुलता पर ध्यान देब आवश्यक अछि।

14. रंगमंच : सत्य आ शिल्प [मुद्रित पृ. 80]

विषय : सत्यक रंगप्रतिनिधित्व आ शिल्पक स्वायत्तता बीच सम्बन्ध विषय बनैत अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : मंचक सत्य यथार्थक सीधा नकल नहि; नाट्यविन्यास आ अभिनयक माध्यमसँ निर्मित अनुभव अछि।

15. मैथिली नाट्यलेखन मे समाज-चेतना : 1960–1990 [मुद्रित पृ. 85]

विषय : निर्दिष्ट कालखण्डक नाट्यलेखन आ समाज-चेतनाक ऐतिहासिक सम्बन्धक अध्ययन अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : ऐतिहासिक निष्कर्ष लेल नाटक, प्रकाशन-वर्ष, प्रस्तुति आ आलोचनात्मक प्रतिक्रियाक अलग प्रमाण अपेक्षित अछि।

16. लेखन अभाव [मुद्रित पृ. 91]

विषय : नाट्यलेखनक अभाव अथवा अपर्याप्तताक समस्या पर प्रश्न अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : रचनाक संख्या, प्रस्तुतियोग्यता, प्रशिक्षण आ प्रकाशन-अवसरक अन्तर स्पष्ट केने बिना अभावक कारण तय नहि होइत अछि।

17. मैथिली रंगमंच पर कथ्यक प्रस्तुति [मुद्रित पृ. 96]

विषय : कथ्यक मंचानुकूल रचना आ प्रस्तुति विषय अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : पाठमे कथ्यक उपस्थितिसँ प्रदर्शनक प्रभाव सिद्ध नहि होइत; दृश्यगत क्रिया, समय, लय आ दर्शकक ग्रहणशीलता सेहो देखबाक चाही।

18. आधुनिक मिथिला मे रंगमंचक दशा-दिशा [मुद्रित पृ. 100]

विषय : आधुनिक मिथिलाक रंगपरिस्थिति आ भविष्यक दिशासम्बन्धी विमर्श अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : अभ्यास-स्थल, प्रशिक्षण, आर्थिक संरचना, दर्शक-निर्माण आ स्थानीय संस्था सभक प्रश्नकेँ कलात्मक बहससँ जोड़ब आवश्यक अछि।

19. कला आ मिथिला के कथा : विमर्श-भूमिका [मुद्रित पृ. 112]

विषय : मिथिलाक सांस्कृतिक स्थितिसँ कलाक सम्बन्ध पर विमर्शक भूमिका प्रस्तुत अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : कलाक सामाजिक जीवनसँ सम्बन्धकेँ केवल गौरवक भाषणक रूपमे नहि, आलोचनात्मक अनुसन्धानक विषय बनाओल जाय।

20. संदर्भ कथा : संस्कृति, अपसंस्कृति आ प्रबुद्ध लोक [मुद्रित पृ. 118]

विषय : संस्कृति आ अपसंस्कृतिक नैतिक विभाजन तथा प्रबुद्ध लोकक भूमिकापर तर्क अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : संस्कृतिक मूल्यांकनमे वर्ग, लोकसम्बन्ध, कलाक स्वतन्त्रता आ नैतिक अधिकारक दावाक आलोचनात्मक परीक्षण जरूरी अछि।

रंगमंच

21. मैथिली नाटक मे जन-जीवनक अभिव्यक्ति [मुद्रित पृ. 127]

विषय : जनजीवनक रंगमंचीय प्रतिनिधित्वक प्रश्न अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : लोकजीवनक मंचनकेँ लोकसामग्रीक संग्रह मात्र नहि; सामाजिक संघर्ष आ स्वरक जीवन्त पुनर्रचना बुझबाक चाही।

22. मैथिली पत्रकारिता, साहित्य आ रंगमंच [मुद्रित पृ. 133]

विषय : साहित्य, पत्रकारिता आ प्रस्तुति बीच बौद्धिक संवादक सम्बन्ध अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : नाट्यसमालोचना आ समाचार-लेखनक भिन्न भूमिका रंगआन्दोलनक अभिलेखीकरणमे कतेक महत्वपूर्ण अछि, से प्रश्न उठैत अछि।

23. रंगमंच आ साहित्य : एक [मुद्रित पृ. 135]

विषय : नाट्यपाठ आ मंचीय कृतिक भिन्नता-साम्यक प्रश्न उठैत अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : नाटक साहित्यिक विधा सेहो अछि, मुदा रंगप्रयोगमे दृश्य, ध्वनि आ अभिनेता स्वतंत्र अर्थनिर्माण करैत छथि।

24. रंगमंच आ साहित्य : दू [मुद्रित पृ. 138]

विषय : पूर्ववर्ती बहसक दोसर पक्ष रंगविधा आ साहित्यक सम्बन्धकेँ विस्तारित करैत अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : दूनू लेखकेँ संयुक्त बहसक रूपमे पढ़बा संग अलग-अलग तर्कक परीक्षण अपेक्षित अछि।

25. रंगमंच आ साहित्य : रंगमंच [मुद्रित पृ. 140]

विषय : रंगमंचक स्वतन्त्र कलात्मक अस्तित्वकेँ केन्द्रमे रखैत चर्चा अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : मंचीय अर्थ-उत्पादनक सामूहिकता—लेखक, निर्देशक, अभिनेता, तकनीकी सहयोगी आ दर्शक—विशेष ध्यान माँगैत अछि।

26. नाट्य-प्रतियोगिता [मुद्रित पृ. 142]

विषय : प्रतियोगिताक भूमिका आ सम्भावित सीमा रंगसंगठनसँ जोड़ि देखल जा सकैत अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : पुरस्कारकेँ गुणात्मक मूल्यांकनक एकमात्र कसौटी नहि मानि दीर्घकालीन अभ्यास आ प्रयोगक मूल्य देखबाक जरूरत अछि।

27. पहिचानक प्रक्रिया [मुद्रित पृ. 145]

विषय : कलात्मक पहिचानक निर्माण एक दीर्घ प्रक्रिया होएबाक प्रश्न विषय अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : अस्मिता आ प्रयोगक बीच सहयोग अथवा तनावक सूक्ष्म परीक्षण आवश्यक अछि।

28. के? [मुद्रित पृ. 148]

विषय : लघु प्रश्नात्मक शीर्षक रंगसमीक्षामे कर्ता, पहचान वा उत्तरदायित्वक सम्भावित बहस खोलैत अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : शीर्षक मात्रसँ विशिष्ट कथ्य निश्चित नहि कएल जा सकैत; पूर्ण पाठक पंक्ति-स्तरीय मिलान एहि अंश लेल विशेष आवश्यक अछि।

29. नाट्य-स्वप्न आ विकल्प [मुद्रित पृ. 151]

विषय : रंगभविष्य, आकांक्षा आ व्यवहार्य विकल्पक सम्बन्ध विषय अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : आदर्शवादी संकल्पक सँग ओकर कार्यान्वयनक सामाजिक एवं संस्थागत शर्त देखल जाय।

30. नाटकक बहाने किछु ‘नाटक’ [मुद्रित पृ. 154]

विषय : नाट्यप्रयोग आ रंगसंस्कृतिक अंतर्विरोध पर विडम्बनात्मक आलोचनाक सम्भावना अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : शीर्षकक व्यंग्यार्थकेँ लेखकीय तर्कक विकल्प बनबैत निष्कर्ष नहि देबाक चाही।

31. मैथिली रंगमंच सँ अपेक्षा [मुद्रित पृ. 158]

विषय : रंगकर्मसँ अपेक्षा आ आवश्यक परिवर्तन विषय बनैत अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : अपेक्षाकेँ स्पष्ट कसौटी—लेखन, प्रस्तुति, दर्शक, संस्थान, प्रशिक्षण—मे बाँटि देखब फलदायी अछि।

32. रंगमंच-रंगत्व, मैथिली रंगमंच [मुद्रित पृ. 161]

विषय : रंगत्वक सौन्दर्यात्मक आ मैथिली रंगमंचक विशिष्ट प्रश्न आमने-सामने अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : रंगत्वक अर्थ अभिनय, मंच-समय, दृश्य-सम्बन्ध आ सामूहिक अनुभवक जटिल संयोजनसँ व्याख्यायित होइत अछि।

33. अपना रंग कथा [मुद्रित पृ. 166]

विषय : आत्मपरक रंगअनुभव आ रंगकर्मक कथा शीर्षकसँ संकेतित अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : अनुभवक व्यक्तिगत साक्ष्यकेँ सामान्य इतिहासक प्रत्यक्ष पर्याय नहि मानल जाय।

34. पमार : प्रत्येक समुदाय पारम्परिक नाट्य [मुद्रित पृ. 169]

विषय : समुदायविशेषक पारम्परिक रंगविधा विषयसूचीमे उल्लिखित अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : नाम आ पाठक सटीक वाचनक बादे सामाजिक उत्पत्ति अथवा विधागत विशेषतापर निश्चित दावा देब उचित होयत।

35. बुलेटिन भेट : रंगमंचक कविता–१ [मुद्रित पृ. 171]

विषय : रंगविषयक रचनात्मक काव्यात्मक उच्चारणक प्रथम शृंखला अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : एहि सामग्रीकेँ नाट्यनिबन्धक रूपमे नहि, कविता/लघु रचनाक अलंकार, स्वर आ रंगबिम्बक दृष्टिसँ देखबाक चाही।

36. बुलेटिन भेट : रंगमंचक कविता–२ [मुद्रित पृ. 176]

विषय : रंगविषयक काव्यात्मक शृंखलाक दोसर अंश अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : पूर्ववर्ती कवितासँ विषयगत सम्बन्धक संग स्वतंत्र पाठरूपक सावधानी जरूरी अछि।

37. बुलेटिन भेट : रंगमंचक कविता–३ [मुद्रित पृ. 185]

विषय : रंगकविताक तेसर अंश अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : प्रस्तुतिक सांकेतिक भाषा आ कविता बीच विधागत सीमा ध्यानमे राखल जाय।

38. बुलेटिन भेट : रंगमंचक कविता–४ [मुद्रित पृ. 193]

विषय : रंगकविताक चारिम अंश अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : हर अंशक अलग पाठ-अध्ययनसँ आवृत्ति, बदलाव आ अभिव्यक्तिक लय पकड़ल जा सकैत अछि।

39. बुलेटिन भेट : रंगमंचक कविता–५ [मुद्रित पृ. 202]

विषय : शृंखलाक पाँचम अंश अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : पाँचो रचनाकेँ गिना कऽ अध्ययनमे स्थान देब जरूरी; श्रृंखलाक अन्तिम संरचनाक निष्कर्ष लेल मूल पाठ मिलान अपेक्षित अछि।

बातचीत

40. सुधांशु शेखर चौधरीक नाटक [मुद्रित पृ. 213]

विषय : नाटक आ रंगकर्मसँ सम्बद्ध व्यक्तित्वपर केन्द्रित बातचीत अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : बातचीतक मत आ जीवनीगत तथ्यक बीच भेद रखैत वक्ता, प्रसंग आ प्रश्नोत्तरक रूपक परीक्षण उचित अछि।

41. जीवन–रंगमंच अपना : प्रकाश नाटकक जिनगी [मुद्रित पृ. 219]

विषय : जीवन-अनुभव आ रंगअनुभवक आपसी सम्बन्धक बातचीत अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : जीवनवृत्तात्मक कथनक ऐतिहासिक सत्यापनक लेल बाहरी अभिलेख स्वतंत्र देखबाक आवश्यकता अछि।

42. ओहो! श्रीकान्त जी! [मुद्रित पृ. 226]

विषय : श्रीकान्तजी विषयक स्मरण अथवा संवादात्मक सामग्री अनुक्रमणिकामे अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : संवादक आत्मीय स्वरकेँ सूचना, मूल्यांकन आ स्मृतिक अन्तरक संग पढ़बाक चाही।

43. पं. गोविन्द झाक नाटक मे लोक तत्व [मुद्रित पृ. 230]

विषय : पं. गोविन्द झाक नाटकमे लोक तत्त्वक उपस्थिति विचाराधीन अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : लोकतत्त्वक मूल्यांकन लेल कथानक, गीत, भाषा, पात्र आ रंगगत प्रयोगमे ओकर भूमिका अलग-अलग देखबाक चाही।

44. खेल आ नाच : रंगमंचिक नाट्य [मुद्रित पृ. 234]

विषय : खेल, नाच आ रंगमंचक सम्बन्धक प्रश्न पर अन्तर्विमर्श अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : खेलक स्वतःस्फूर्तता आ नाट्यरचनाक अनुशासन बीच पारस्परिकता उपयोगी आलोचनात्मक प्रश्न अछि।

45. मैथिली रंगमंचक भविष्य [मुद्रित पृ. 251]

विषय : ग्रन्थक अन्तिम विषय मैथिली रंगमंचक भावी सम्भावनासँ जुड़ल अछि।

आलोचनात्मक विवेचन : अन्तिम अंशकेँ समग्र पोथीक रंगदृष्टिसँ जोड़ि संस्थागत तथा सर्जनात्मक सम्भावनाक कसौटीपर देखल जाय।

समेकित मूल्यांकन : कृति जे प्रश्न उठबैत अछि

लोकनाट्य आ आधुनिक नाट्यरूप

ग्रन्थक पहिल खण्ड लोकाभिनयकेँ किनारक मनोरंजन नहि मानि मैथिली रंगपरम्पराक मूल स्रोतक रूपमे बुझबाक अवसर दैत अछि। कीर्तनिया आ सलेहेस जकाँ रूपमाध्यमक सम्बन्ध मौखिक स्मृति, संगीत, भूमिका-निर्माण, सामाजिक संरचना आ दर्शकक सामूहिक सहभागितासँ अछि। ई सामग्री रंगइतिहासक एकरेखीय, केवल मुद्रित साहित्य-आधारित आख्यानकेँ प्रश्नांकित करैत अछि।

भाषिक अस्मिता आ रंगकर्म

मैथिली रंगमंचक विशिष्टताक खोजमे भाषिक अस्मिता केन्द्रीय विषय अछि। तथापि रंगमंचक भाषा केवल संवाद-भाषा नहि; मंचीय गति, ध्वनि, गीत, विराम, उच्चारण आ दर्शक-सम्बन्ध सेहो अछि। ‘निजत्व’क आग्रहकेँ सामाजिक विविधतासँ जोड़ल नहि गेल तँ अस्मिताक धारणा संकीर्ण भऽ सकैत अछि।

नाट्यपाठ आ प्रस्तुति

लेखकीय पाठ एकटा सम्भावना अछि; अभिनेता, निर्देशक, मंच-सज्जा, प्रकाश, ध्वनि, रिहर्सल आ दर्शकक समक्ष ओकर सम्पूर्ण रंगरूप बनैत अछि। साहित्यिक मापदण्डकेँ मंच-प्रक्रियाक स्वतन्त्र कसौटीक संग राखि देखब एहि संग्रहक बहसकेँ अधिक सुसंगत करैत अछि।

इतिहासक प्रमाण आ अनुभवक स्थान

ग्रन्थमे विभिन्न समयमे लिखल आलेख संकलित होएबाक कारण तत्कालीन सांस्कृतिक प्रश्नक परत उपस्थित अछि। अनुभवक प्राथमिक साक्ष्य मूल्यवान होइत अछि, मुदा पात्र, संस्था, तिथि आ प्रस्तुतिक दावाक निष्पक्ष इतिहास लिखबा लेल प्रदर्शन-सूची, पत्रिका, समीक्षा, नाट्यपाठ आ साक्षात्कारक मिलान आवश्यक अछि।

रंगसंस्था, प्रशिक्षण आ दर्शक

कला-संस्थाक अभाव वा सामर्थ्यक प्रश्नकेँ केवल कलाकारक इच्छाशक्तिसँ नहि समझल जा सकैत। अभ्यास-स्थल, आर्थिक संसाधन, दर्शक-संवाद, महिला आ नवोदित कलाकारक सहभागिता, नाट्यलेखनक प्रसार आ आलोचनात्मक अभिलेखसम्पदा सेहो ध्यानक विषय छथि।

आलोचनात्मक स्वर आ शैली

पुस्तकक आरम्भिक आलेख सभमे विचारप्रधान, प्रतिप्रश्नमूलक आ रंगकर्मक पक्षधर भाषिक स्वर देखाइत अछि। लोक आ शास्त्र, परम्परा आ आधुनिकता, कलाक सत्य आ प्रदर्शनक शिल्पक द्वन्द्वसँ आलोचनाक ऊर्जा बनैत अछि। मुदा मूल्यनिर्णयक प्रामाणिकताक लेल स्पष्ट उदाहरण आ विमर्शक प्रतिपक्षकेँ समान गंभीरतासँ राखब उपयोगी होयत।

संकलन-विधाक सीमा

विभिन्न समय आ प्रसंगक लेखकेँ एक जिल्दमे आनब सामग्रीक बहुलता दैत अछि, मुदा आवृत्ति, स्वरभेद आ अवधारणात्मक असंगति सम्भव अछि। एहि बिन्दुपर लेख सभक पूर्व-प्रकाशन-विवरण, रचनाक कालक्रम आ पाठभेदक तालिका तैयार कएने भविष्यक संस्करणक अकादमिक उपयोगिता बढ़त।

ग्रन्थक आलेख-सूची

मूल पोथीमे संकलित सभ ४५ आलेख आ विषयक नाम तथा हुनकर आरम्भिक मुद्रित पृष्ठाङ्क एहि सूचीमे देल गेल अछि।

उपसंहार

‘रंगायन’क आलोचनात्मक महत्त्व ओकर विविध सामग्री आ प्रश्नोन्मुख रंगदृष्टिमे निहित अछि। लोकनाट्यक स्रोतसँ आधुनिक रंगमंचक अपेक्षा धरि, ई संग्रह मैथिली रंगकर्मकेँ कला, भाषा, समुदाय आ सार्वजनिक चिन्तनक संयुक्त क्षेत्रमे राखैत अछि। पाठक लेल ई विमर्श-मानचित्रक समान उपयोगी अछि; शोधकर्ता लेल ई प्राथमिक सामग्रीक मार्गदर्शक सेहो।

पद्य Poetry

२.१. अशोक कुमार ठाकुर-बिहारक बाढ़िक पुकार

२.२. राम शंकर झा"मैथिल"-हे कान्हा

२.३. संतोष कुमार राय 'बटोही'- जंतर- मंतर

२.४. आशीष अनचिन्हार- दू टा गजल

२.५.तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड १२]

२.१. अशोक कुमार ठाकुर-बिहारक बाढ़िक पुकार

अशोक कुमार ठाकुर

बिहारक बाढ़िक पुकार नेपाल दिससँ बरखा बरसल, नदिया भेल विकराल। गंडकक धार बढ़ैत गेल, मचल गेल हाहाकार॥ वाल्मीकिनगर, बगहा दिस, पानिक भेल प्रहार। टूटल बाँधक धारसँ बहि, डूबल गाम हाट-बजार॥ ककरो आँगन, ककरो खेत, ककरो सपना बहि गेल। मायक कोरामे बच्चा काँपय, नयनक नोर बहि गेल॥ कोसी गरजल, कमला उमड़ल, बलान भेल बेहाल। उत्तर बिहारक धरती पूछय— कखन थमत ई ज्वाल? मुजफ्फरपुर दिस बढ़ैत पानि, चहुँदिस हाहाकार। लखीसराय, भागलपुर दिस, मड़राय संकट-भार॥ जँ नदी सभ एक संग उमड़ल, बढ़ि सकैत जलधार। पूरब-पच्छिम, उत्तर-दक्खिन, डगमग होय बिहार॥ नहि केवल घर-आँगन डूबय, डूबय लोकक आस। रोटी, छप्पर, खेत-बधारक, टूटि रहल विश्वास॥ एहन घड़ीमे हाथ बढ़ाबी, दुखियाक बनू सहारा। बाढ़ि बहुत किछु लऽ जायत, हिम्मत नहि हारय लोकक मन प्यारा॥ हे शासन आ हे समाज, दुखियाक पुकार सुनू। फँसल लोकक हाथ पकड़ि कऽ, राहत शीघ्र पहुँचाउ॥ पाईन घटत, फेर धूप खिलत, फेर हरियर होयत खेत। बिहारक माटि फेर मुस्कायत, फेर सजत जीवनक रीत॥ -अशोक कुमार ठाकुर; ग्राम–करमौली, पोस्ट–करमौली,थाना–खजौली, जिला–मधुबनी (बिहार)मोबाइल नंबर:-8709568993,जनसेवा:-एस.डी.आर.एफ,मे कार्यरत सिपाही।

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२.२. राम शंकर झा"मैथिल"-हे कान्हा

राम शंकर झा"मैथिल" हे कान्हा हे कान्हा अहाँ तऽ चलि गेलहूँ मुदा कि हअमरा मअन सँ गेलहूँ कान्हा आन्हाँ जतह कतौह जायब हअम अन्हाँ कें प्रिय ओतैय भेटव हे कान्हा अहाँ .....! आन्हाँ कें जतेक रोंआंक छिद्र अछि ओहि सब छिद्र मे हअमर नोर अछि टुकुर टुकुर अन्हाँक डेग निहोरैत छि ज्यों विश्वास नहिं तऽ उधो सँ पूछि लेब हे कान्हा अहाँ ......! सुतल रहि जागल रहि अन्हाँक छवि आहाँक वियोग मे हअमर वज्र सन हृदय मरूथल भेल मुदा अन्हाँक पैजनियाक रुनूर झुनूर ई रुनूर झुनूर ऐना उड़ा रहल जेना हृदय सिमैर क रुई अन्हाँक वेणुक माधुर्य रति सावन सन हअमर वक्षस्थल हिय टीस पअर टीस हे कान्हा अहाँ ...! मुदा कि हअमरा मअन सँ गेलहूँ हे कान्हा आन्हाँ तअ चलि गेलहूँ......! अंघोळ मचल अछि सर समांग सङ्ग गाछी वृक्षी कौआ मैना सुग्गा सब कें बकौर लागल सभ के सभ निशब्द एक दोसरां सँ कहि रहल हे कान्हा अहाँ ...! हमरो आन अछि हमरो गुमान अछि ओहि यमुना के किछेर जतह हमर छाति पर आन्हाँक माथा हमर केश ओझराएल अहाँक बेणु अहाँक मोरक पँखि हमरा वक्ष ऐना गड़ेआ जेना बाँग रुईया बंगौरि लोक समांगक जीनगीक रक्षाक लेल गोबर्धन उठेलहूँ अहाँक पाणि गोबर्धन ताहि मे लागल अहाँक केहूनिक सोंगर से सोंगर हमर उरस्थल हे कान्हा अहाँ..! मुदा अहाँके धनि सन गोबर्धनो सँ बेसी भारि की हम बेसी भारि आ की गोबर्धन लिअ हमहूँ गाँठि बन्हि लेलहूँ एक दू तीन लगाउ बाजि ज्यों जा सकि तऽ हमरा मन सँ जाउ ज्यों जा सकि तऽ हमरा तऽन जाउ तखन साबित होइत अहाँ के पुरुखारऽत हमरो आन अछि हमरो गुमान अछि मुदा कि हअमरा मऽन सँ गेलहूँ मुदा कि हअमरा रोम सँ गेलहूँ मुदा कि हअमरा हृदय सँ गेलहूँ हे कान्हा अहाँ तऽ चलि गेलहूँ चलि गेलहूँ...!! -राम शंकर झा"मैथिल", उघरा, दरभंगा

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२.३. संतोष कुमार राय 'बटोही'- जंतर- मंतर

संतोष कुमार राय 'बटोही' जंतर- मंतर

जे चुप छथि ओ मरि गेल छथि डरपोक मानल जेताह सत्ताक केर अन्याय, दमन, शोषण आओर मनमानी केँ सहनिहार जनता इतिहास हंता कहल जेताह । सत्ता मे छी तैं अहाँ अमर छी से नहि बुझियौ मनुक्ख अमृत नहि पीने अछि अहं खतम एक दिन होयत औंघेला सँ आब नहि होयत सब मिलि 'जन-मन-गण' गाउ । कतेक दिन धरि मुँह मे जाबी लागल रहतै ? साँस कतेक दिन धरि रोकने रहबै ? आब दम घुटि रहल अछि अहाँक हाथ-पर-हाथ धरने नहि होयत क्रांति करय पड़त आब हिटलर केँ अपदस्थ करय पड़तै । बाढ़ि मे घर भसिया गेलै महँगाई सँ माय दवाई बेगैर मरि गेलै टाकाक बिना पढ़ैवाला घर बैठल छै न्याय लेल बाबा दर-दर भटैक रहल छै सभ दफ्तर मे सुरसा बैठल अछि सभ योजना चुल्ही मे जरि गेलै । पेपर लीक ! शिक्षा के दफ्तर मे घुन लगलै मंतरी-संतरी भेलै डकैत भाई-भतीजावाद पुख्ता भेलै मेहनतिया सभ बगुला जकाँ तकैत रहि गेलै 'सीट' तँ पहिनहि बिका गेलै । हुंकार भरि रहल अछि जवनका सभ जंतर-मंतर बनल छै आखाड़ा सुदि-मुरक सभ हिसाब हेतै अई बेर नहि मानतै जनता पै-पै केर जोड़-घटाव हेबे करतै सत्ता अई बेर हिलबे करतै ।

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२.४. आशीष अनचिन्हार- दू टा गजल

आशीष अनचिन्हार दू टा गजल १ ई बात बुझले रहै ई बात जनले रहै जे दुश्मनक भीड़मे किछु लोक अपने रहै आएल जहिया जखन आँगन अचानक कियो किछु नोर पोछल रहै किछु नोर बचले रहै मजबूर जीहो रहल मजबूर ठोरो रहल किछु बात संगे रहै किछु बात अलगे रहै ईहो तमाशा बहुत भेलै हमर देशमे किछु लोक जागल रहै किछु लोक सुतले रहै खरिहानमे खेतमे आँगन दलानो बुझू किछु जीह कटले रहै किछु मूँह दबले रहै सभ पाँतिमे 2212-212-2212-212 मात्राक्रम अछि।

२ बसबिट्टी सन घनगर दुख बाँसे सन छै नमहर दुख गोपी बनि ललचाबै सभकेँ ई टिकुला ई मज्जर दुख हुनका हिस्सा सीसो सभ हमरा हिस्सा पीपर दुख हारल दुख हमरा भेटल जीतल जीतल हुनकर दुख बहुते दिन सुख लग रहितो रहिए गेलै असगर दुख सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि।

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२.५.तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड १२]

तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम' केर लेखक छथि नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव)]

मूल तेलुगु लेखक

नग्नमुनि एक परिचय

नाम: मानेपल्लि हृषीकेशवराव

जन्म: 15 मई 1940

जन्म स्थान: शहर- तेनाली, जिला- गुंटूर (आंध्र प्रदेश)

वृत्ति: चीफ ऑडिटर, आंध्र प्रदेश विधान सभा, तकर बाद डिप्टी सेक्रेटरी, ओतहि

लिंक: पहिने साम्यवादी (कम्युनिस्ट), बादमे राष्ट्रवादी (नेशनलिस्ट)

संस्था: अविभाज्यक जनतंत्र, 1990

आंदोलन: दिगम्बर कविता आन्दोलन 1965

लक्ष्य: नंगट, भूखल, दीन, दरिद्रक हित

कृति:

उदयिंचनि उदयलु (ओ उदय जे उदित नहि भेल)

पूर्वा हवा

जम्मि चेट्ट

विशेष: 1977 ई. मे बहुचर्चित काव्य- 'कोय्या गुर्रम' (KOYA-GURRAM), जकर अर्थ अछि- 'काठक घोड़ा', भाव- 'नकली सरकार'। 19 नवम्बर 1977, शनि दिन बंगालक खाड़ीमे पचास-साठि फुट ऊँच लहड़ि उमड़ि कऽ कृष्णा जिलाक दिविसीमा क्षेत्रकेँ डुबा कऽ नष्ट कऽ देलक। हजारो लोक मारल गेलाह। ई घटना काव्यक वस्तु बनल। विषय आ परिस्थितिसँ उपजल ई काव्य हिन्दी कवि मुक्तिबोधक 'अंधेरे में' क बराबरीक अछि।

मैथिली अनुवादक

नाम: मानेश्वर मनुज

जन्म: गाम- गम्हरिया (बेनीपट्टी) मधुबनी। जनवरी 1958 (प्रमाण पत्रक अनुसार)।

वृत्ति: भारतीय नौसेनामे तकनीकी सहायक, तकर बाद भारतीय रेलक वाणिज्य विभाग सँ (रिटायर्ड)।

कृति:

'सम्बन्ध', कथा संग्रह (मैथिली) 2007

'कि', कविता संग्रह (मैथिली) 2011

'परिवर्तन', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2019

'बेघर', कविता संग्रह (हिन्दी) 2022

'तालाब', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2024

अनुभव: विभिन्न भाषा सँ हिन्दी आ मैथिलीमे अनुवाद। हिन्दी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे लेख, कविता, कथा, कहानी इत्यादि प्रकाशित।

अनुवादकक टिप्पणी: अनेक तेलुगुमित्र, स्वयं नग्नमुनि जी, हिन्दी तथा अंग्रेजी मे अनुदित पुस्तकक मदति सँ दीर्घ काल तक मंथन कयलाक बाद अनुवाद कयल गेल अछि। ई नग्नमुनिक प्रसिद्ध कविता अछि। नग्नमुनि सँ लगातार हमर पत्राचार होइत छल। ओ अंग्रेजी आ तेलुगुक विद्वान छलथि। हुनक किछु पत्र देसिल-बयना, हैदराबाद मे छपल अछि। -मानेश्वर मनुज

सम्पादकीय टिप्पणी (खण्ड-१२)

ई कविता आधुनिक सभ्यताक विरुद्ध एकटा गंभीर आत्मस्वीकृति आ आत्ममंथनक स्वर लऽ कऽ अबैत अछि। एहि मे पीड़ा अछि, प्रश्न अछि, आ संगहि एकटा नव आरंभक संकल्प सेहो अछि। आरंभिक पंक्तिक व्यंजना: कविताक प्रारंभ इसा मसीहक प्रसंगसँ होइत अछि। "अंतिम आमंत्रण" मे विश्वासघातक संकेत स्पष्ट अछि, मुदा कवि एकरा मात्र धार्मिक आख्यान नहि रहऽ दैत छथि। धोखा देनिहार के छल, ई प्रश्न एतऽ समयक सीमा तोड़ि कऽ सार्वकालिक भऽ जाइत अछि। दोसर पदमे "असली हत्यारा के?" ई प्रश्न जतबे व्यक्तिगत अछि ततबे सामूहिक सेहो। "दोख हम अपने पर मढ़ि लैत छी" पंक्ति कविताक नैतिक केन्द्र बनि जाइत अछि। एतऽ कवि अपराधबोधकेँ व्यक्तिक नहि, समस्त मानवताक दायित्वक रूपमे ग्रहण करैत छथि। नकारक स्वर: मध्य खण्डमे "हमरा नैइ चाही" केर आवृत्ति एकटा मंत्रवत् लय रचैत अछि। रॉकेट, हवाई जहाज, रेल, मोटर गाड़ी, ई सभ प्रगतिक प्रतीक अछि, मुदा कविक दृष्टि मे ई जीवनक शान्ति आ मनुक्खक अंतर्मनसँ दूर लऽ जाइत अछि। "राजनीतिक तंतर-मंतर" आ "नागरिकताक भागमदौड़" मे समकालीन व्यवस्थाक प्रति तीक्ष्ण व्यंग्य अछि। ई नकार प्रगतिक विरोध नहि, प्रगतिक नामपर भेल मानवीय क्षरणक विरोध अछि। प्रतीक-योजना: "पाषाण युगक हथौड़ा" आ "इतिहासक अन्हार गुफा" मे वापसीक आकांक्षा अछि, मुदा ई पलायन नहि, पुनर्जन्मक लेल आवश्यक अवरोहण अछि। "काठक घोड़ा" निश्चित रूपसँ ट्रॉयक घोड़ाक स्मरण करबैत अछि, अर्थात् ओ छल जे सभ्यताक भीतर बैसल अछि आ ओकरा भीतरसँ नष्ट करैत अछि। ओकरा जरा कऽ भस्म करबाक संकल्प कविताक सभसँ सशक्त बिम्ब अछि। समापनक आशा: अंतिम खण्डमे कविता ध्वंससँ सृजन दिस घुरैत अछि। "नव ईंधन," "नव सपना," "नव मूल्य," "नव विश्वास," ई सभ एकटा वैकल्पिक सभ्यताक रूपरेखा थिक। "सम्पूर्ण विश्व मे समाएवला चद्दैर" बुनि दीनहीन केँ ओढ़ा देबाक कल्पना करुणा आ सार्वभौमिक बन्धुत्वक सुन्दर प्रतीक अछि। एतऽ चद्दैर आश्रय, सम्मान आ समताक रूप धारण कऽ लैत अछि। शिल्प-विषयक टिप्पणी: अनुवादक भाषा सहज, प्रवाहमय आ बोलचालक निकट अछि, जे एकर प्रभावकेँ बढ़बैत अछि। मुक्त छन्दक प्रयोग विषयक अनुरूप अछि। निष्कर्ष: एहि कविता मे नैतिक चिन्ता, सभ्यता-समीक्षा आ मानवीय आशा तीनूक सुन्दर संतुलन अछि। इसा मसीहक संदर्भसँ आरंभ भऽ कऽ ट्रॉयक घोड़ा धरि पहुँचल एकर बिम्ब-यात्रा पाठककेँ सोचबाक लेल विवश करैत अछि। ई रचना विदेहक पाठकक लेल निश्चय मननीय सिद्ध होएत। - गजेन्द्र ठाकुर

नग्नमुनिक तेलुगु काव्य

'काठक घोड़ा' (कोया गुर्रम)

खण्ड-१२

इसा मसीह केँ बुझल छलनि कि

अंतिम आमंत्रण मे आखिर

हुनका धोखा के देलकनि।

हमरा बुझल अछि जे असली हत्यारा के?

मुदा दोख हम अपने पर मढ़ि लैत छी।

हमरा नैइ चाही रॉकेट

हमरा नैइ चाही हवाई जहाज

हमरा नैइ चाही जीवन केँ

भ्रष्ट करऽवला राजनीतिक तंतर-मंतर

नैइ चाही रेल आ मोटर गाड़ी

नैइ चाही नागरिकताक भागमदौड़

पुरनका पाषाण युगक हथौड़ा लऽ

इतिहासक अन्हार गुफा मे जाएव

मनुक्खक लाश आ पशुक

अपने आप मे दफना लेव

काठक एहि घोड़ा केँ जरा कऽ

भष्म कऽ देवऽवला

नव ईंधनक आविष्कार करव

नव सपना नव मूल्य

आ नव विश्वासक जन्म देव।

सम्पूर्ण विश्व मे समाएवला चद्दैर बुनि

सम्पूर्ण दिशाक दीनहीन केँ

ओढ़ा देव

नव चद्दैर ओढ़ा देबै।

-मानेश्वर मनुज आदर्श नगर कॉलोनी गोशाला रोड मधुबनी पिन - 847211 मो. - 9920674861 / 7464077106

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