गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल वीरेन्द्र मल्लिक
Videha Issue 451 · Research article continuation 2
लघु, घोषणात्मक पाँति सभमे विचारक गति अछि। समय एतय नियतिक अपरिवर्तनीय चक्र नहि, मानवीय हस्तक्षेपक सम्भावना सेहो अछि। कविता ‘कर्मकांड’क प्रतिपक्ष गढ़ैत अछि: अनुष्ठानक बदला कर्म, अन्धमान्यताक बदला विवेक। यद्यपि तर्कशील कथनक कारण अर्थ बहुत सोझाँ अछि, युगचेतनाक स्तर पर ई रचना संग्रहक नैतिक केन्द्रकेँ व्यक्त करैत अछि।
१७. अथातो काव्य जिज्ञासा
मूल पृष्ठ : 55–57 | प्रधान विषय : कविता-दर्शन
शीर्षक कविता एक स्पष्ट प्रश्न करैत अछि—कविता कतऽ सँ सुनल जाइत अछि? उत्तर जीवनक लेल, भूखक लेल, भाषा आ शब्दक प्राण लेल, बेकारक लोक, मजदूर, किसान आ न्यायसँ वञ्चित मनुष्यक पक्षमे अछि। खेतक रंग, अन्न आ गहूमक सीस, अमीरक अँगर आ गरीबक चाल—विभिन्न सामाजिक बिम्ब एकहि रचनामे उपस्थित अछि।
‘अथातो’क दार्शनिक गम्भीरता आ ‘कविता’क जनपक्षी प्रतिज्ञा मिलि संग्रहक काव्य-सिद्धान्त बनबैत अछि। कविता स्वयं अपन परिभाषा देबाक प्रयत्न करैत अछि, मुदा शब्दक सार्थकता कविक निजी महत्त्वाकांक्षामे नहि, सामाजिक उपयोगितामे देखैत अछि। एहि रचनाकेँ ‘कविता बिकबा लए तैयार’ तथा ‘अथ कविता उवाच’क संग पढ़लासँ मूल्य बनाम विनिमय आ रचना बनाम प्रचारक द्वन्द्व विशेष स्पष्ट होइत अछि।
१८. हिसाब-किताब
मूल पृष्ठ : 58–60 | प्रधान विषय : विकास, जवाबदेही
विकासक सरकारी दाबी, शासनक गर्व, पुरस्कारक घोषणा, विकास-आँकड़ा आ सार्वजनिक प्रचारक पृष्ठभूमि रचनामे अछि। कवि चमकैत भाषण आ लोकजीवनक अनुभवक बीच हिसाब माँगैत छथि। ‘हिसाब-किताब’ साधारण लेखापद्धतिक शब्द नहि, लोकतांत्रिक उत्तरदायित्वक नैतिक कसौटी अछि।
कवितामे प्रशासकीय शब्दावलीक आवृत्ति उपहासमय बनैत अछि। जे उपलब्धि विज्ञापन आ सम्मानमे थिक, ओ जनताक जीवनमे कतेक उतरि रहल अछि—एहने मूल प्रश्न उठैत अछि। ‘शाइन इंडिया’क आशावादी प्रचार-छवि एहि कवितामे जाँचक विषय बनैत अछि। रचनाक शक्ति सरकारी भाषाक भीतरक विरोधाभास खोलब अछि; ओकर सीमा एतय अपेक्षाकृत कम दृश्यात्मक संयम भेटब अछि।
१९. एलेक्शन! एलेक्शन!
मूल पृष्ठ : 61–62 | प्रधान विषय : चुनाव, नारा
पाँच वर्षक बाद चुनावी बजार लगब, छोट डंठ पर बड़ नेता चढ़ब, गाँव-गाँव रंगबिरंगक वाहन, हाथ जोड़नाइ, घरे-घरे वचनक वर्षा आ भरोसाक अस्थायी व्यापार—ई सभ दृश्य लोकतंत्रक उत्सवक विडम्बना बनैत अछि। शीर्षकक दुहराओ चुनावी प्रचारक कोलाहलकेँ श्रव्य रूप दैत अछि।
कवितामे नेता आ मतदाता बीच क्षणिक समीपता आ दीर्घकालीन दूरीक अन्तर्विरोध भेटैत अछि। चुनावक पहिले जनताक महत्त्व बढ़ैत अछि, मुदा निर्णयक बाद ओकर अपेक्षा अनसुनी रहि सकैत अछि। लोकबोलीक लय, व्यंग्यात्मक सूची आ नाटकीय पदबन्ध एहि रचनाकेँ मंचीय प्रभाव दैत अछि। ई लोकतंत्रक सम्पूर्ण निषेध नहि, ओकरा सार्थक बनाबय लेल प्रश्न अछि।
२०. भाषा ठाढ़ बजार मे
मूल पृष्ठ : 63–64 | प्रधान विषय : भाषा, बजार
भाषा विज्ञापनक साधन आ मुनाफाक वस्तु बनबाक खतरा एहि कवितामे स्पष्ट कहल गेल अछि। शब्द-व्यवहारक आत्मीयता घटैत अछि, संचारक माध्यम व्यापारक संकेतमे परिणत होइत अछि, आ आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक/प्रिण्ट माध्यमक भूमिका विवादास्पद बनि जाइत अछि। शीर्षक भाषाकेँ बजारमे ठाढ़ मनुष्य जकाँ देखबैत अछि—मानवीकरणक एहि रूपमे असुरक्षा गहन अछि।
‘मातृभाषा’ तथा ‘वैश्वीकरण’क संग तुलनामे ई कविता भाषिक अर्थनीतिक प्रश्न बनैत अछि। भाषा ककर हाथमे अछि, ओकरा सँ के लाभ उठबैत अछि, आ ओकर रचनात्मक मूल्य कतय बनल रहत? कवि एहि समस्त प्रश्नक उत्तर पूर्णतः नहि दैत छथि, मुदा लोक-भाषाक स्वतन्त्र महत्त्वक पक्ष लैत छथि। शब्दक क्रय-विक्रयक रूपक अत्यन्त अर्थपूर्ण अछि।
२१. ओ करत मौज! ओ करत राज!!
मूल पृष्ठ : 65–66 | प्रधान विषय : शासन, संसदीयता
राजनीतिक वर्गक निर्लज्ज स्वार्थ, कथित धर्मनिरपेक्षताक ओट, सत्ता-सुख, संसदक आत्मकेंद्रित व्यवहार आ सामान्य जनताक अपमान एहि कविताक चिन्ताक केन्द्र अछि। शीर्षकमे दोहरल ‘ओ’ सत्ताधारी वर्ग दिस संकेत करैत अछि; विरोधमे ‘हम’ वा जनता मौन मुदा उपस्थित अछि।
कविता आरोपात्मक लहजामे लिखल गेल अछि, जाहिमे आवृत्ति आ तुक-ध्वनि जनाक्रोशक गति बढ़बैत अछि। संसदीय क्रियाकलापक नकारात्मक प्रतिरूप जनतंत्रक मूल्यसँ टकराइत अछि। कवि देशहितक नामपर स्वार्थसिद्धिक विडम्बना उद्घाटित करैत छथि। आलोचनामे एतबा याद राखब आवश्यक अछि जे रचना विशिष्ट काव्य-स्वरक राजनीतिक प्रतिक्रिया अछि, समस्त सांसद वा संस्थाक प्रमाणित सामाजिक प्रतिवेदन नहि।
२२. रेल! रेल!!
मूल पृष्ठ : 67–68 | प्रधान विषय : लोकतंत्र, प्रदर्शन
संसदक भीतर दलगत प्रतिस्पर्धा, सत्ता-लिप्सा, भ्रष्टाचार, नारी-अधिकार पर नारा, नीतिक प्रश्न आ जनताक आशाभंगक चित्र एहि कविताक मुख्य सामग्री अछि। ‘रेल’ शीर्षक शाब्दिक रेलगाड़ीक सामान्य दृश्यसँ भिन्न संसदक भाग-दौड़, धक्का-मुक्की आ निरन्तर हलचलक ध्वनि बनैत अछि।
पाँति-पाँतिमे सार्वजनिक मुद्दाक अनियमित जमघट अछि। ई शिल्प उद्देश्यपूर्वक राजनीतिक भीड़-भाड़क अनुकरण करैत अछि। ‘एलेक्शन! एलेक्शन!’ चुनावी मंचक दृश्य प्रस्तुत करैत अछि तँ ‘रेल! रेल!!’ प्रतिनिधिक संस्थाक भीतरक विघटन पर केन्द्रित अछि। कविता जनहितक वास्तविक कामक अपेक्षा करैत अछि, मुदा कतेको आरोप सीधे कहबाक कारण रूपकक विस्तार सीमित रहि जाइत अछि।
२३. नेता-पुराण
मूल पृष्ठ : 69–70 | प्रधान विषय : व्यंग्य, नेता
‘मंत्री तंत्री नेता चोर’ जकाँ छोट, प्रहारक पाँति सभ रचनाक केन्द्रीय लय बनबैत अछि। भ्रष्ट अफसर, पुलिस, वोटक अवसरवाद, शोषण, महिला-उत्पीड़न आ अपराधी-प्रभुत्वक छोट-छोट खण्ड ‘पुराण’ शब्दक व्यंग्यात्मक नवअर्थ रचैत अछि। परम्परागत महागाथाक बदला आधुनिक राजनीतिक दुर्गुणक संग्रह एतय उपस्थित अछि।
रूपक आ काव्य-व्यवस्था दुनू विशेष अछि: दू-दू पाँतिक खण्ड लोककहनी वा तिखट सुभाषित जकाँ लगैत अछि। प्रत्येक खण्ड स्वतन्त्र चोट करैत अछि, मुदा समग्र रूपेँ सत्ता-व्यवस्थाक निरन्तर व्यर्थता देखबैत अछि। संक्षिप्तता ‘महानायकक अरण्य-यात्रा’क विस्तारसँ एकदम अलग अछि। पाठक पर तात्कालिक व्यंग्यात्मक प्रभाव पैघ अछि, यद्यपि सामाजिक जटिलताक सूक्ष्म विभाजन अपेक्षाकृत कम अछि।
२४. कविता बिकबा लए तैयार
मूल पृष्ठ : 71–72 | प्रधान विषय : साहित्य, वस्तुकरण
‘कविता बिकऽ रहल मण्डी मे’क आधार पर ई रचना रचनात्मकताक वस्तुकरणक तीव्र आलोचना करैत अछि। विभिन्न रंग, आकार आ भावक कविता जखन बाजारू माल बनि जाइत अछि, तखन साहित्यिक संवेदना आ प्रतिष्ठाक सम्बन्ध बदलि जाइत अछि। कविता जकरा मनुष्यक दुख-सुखक सत्य बाजबाक चाही, ओ स्वयं उपभोक्ता समाजक प्रदर्शनीक वस्तु बनबाक संकटमे अछि।
एहि कविताक सर्वाधिक प्रभावकारी बिम्ब कविता-मण्डी अछि। ‘अथातो काव्य जिज्ञासा’मे स्थापित आदर्शक ई प्रतिलोम कथा थिक। प्रश्न अछि: जनसमाजक पीड़ाकेँ स्वर देनिहार रचनाकार जँ प्रकाशनक रेट, प्रशंसा आ लेन-देनमे फँसि जाए तँ कविता अपन मूल प्रयोजन कतेक बचा पायत? कवि श्रोता आ पाठककेँ एहि प्रश्नक उत्तर सोचबाक लेल बाध्य करैत छथि। व्यंग्य सहज अछि आ आत्मालोचनात्मक सम्भावना सेहो व्यापक अछि।
२५. एक पयर हो सदा माटि पर
मूल पृष्ठ : 73–74 | प्रधान विषय : माटि, आडम्बर
पोसाक, चर्चित जन, फिल्मी नायक, अवास्तविक तमाशा, व्यर्थक चमक, विवाह-समारोहक अपव्यय आ समाजक जीवनशैलीक विसंगति एहि कवितामे भेटैत अछि। शीर्षक जीवनक जमीनसँ सम्बन्ध नहि तोड़बाक नैतिक अनुरोध अछि। ‘माटि’ एतय केवल भूगोल नहि, श्रम, व्यवहारिक विवेक आ सामान्य लोकक वास्तविकताक रूपक अछि।
रचनामे आडम्बरक आलोचना कखनो प्रसंगसँ प्रसंग दिस छलाँग लगबैत अछि। ई विखण्डित संरचना आधुनिक सार्वजनिक जीवनक अनेक असंगत दृश्यकेँ एक साथ रखैत अछि। सशक्त सन्देश ई जे महत्वाकांक्षा वा प्रतिष्ठाक संग मानवीय धरातल जोड़ल रहबाक चाही। आलोचनात्मक रूपेँ विभिन्न उदाहरणक बीच तर्कगत सेतु कतहु कम भेटैत अछि, मुदा शीर्षकक एकता सबकेँ एक नैतिक केन्द्र दैत अछि।
२६. बीच सड़क पर
मूल पृष्ठ : 75 | प्रधान विषय : आम आदमी, भूख
बीच सड़क पर ठाढ़ आम आदमी, चारूकात उठैत धुआँ, भूख, बेरोजगारी, अभिनयमय सार्वजनिक जीवन आ राजनीतिक गहमा-गहमी एहि कवितामे केन्द्रित अछि। सड़क सार्वजनिक लोकतांत्रिक स्थानक प्रतीक अछि; बीचोबीच ठाढ़ मनुष्यक असहायता समूच जनताक उपेक्षाक बिम्ब बनि जाइत अछि।
कविता मनुष्यक भौतिक अभाव आ सार्वजनिक संस्थाक दूरावक सम्बन्ध देखबैत अछि। दिशासूचक शब्द—उत्तर, दक्षिण, पूब, पच्छिम—समस्या सर्वत्र व्याप्त हेबाक बोध दैत अछि। छोट पाँति आ प्रत्यक्ष कथन रचनाकेँ सहज संप्रेष्य बनबैत अछि। काव्य-पाठक लेल बड़ प्रश्न ई अछि जे सड़क पर स्थित मनुष्यक स्वरसँ जनतंत्रक असली मूल्य कतेक मापल जाइत अछि।
२७. डांस! डेमोक्रेसी डांस!
मूल पृष्ठ : 76 | प्रधान विषय : जनतंत्र, तमाशा
‘डांस’क बारम्बार आह्वान लोकतंत्रक नाटक बनि गेल सार्वजनिक जीवनक व्यंग्यात्मक श्रव्य बिम्ब अछि। अन्याय, सरकारी शक्तिक प्रदर्शन, स्त्री-शोषण, भ्रष्टाचार आ जनसमुदायक शोरक बीच लोकतंत्र नाच करैत दिसैत अछि। अंग्रेजी शब्द ‘डेमोक्रेसी’क संग मैथिली आ हिन्दी मिश्रित कथन सभ आधुनिक राजनीतिक भाषाक विडम्बना खोलैत अछि।
गीतक टेक जकाँ दुहराओ अपन व्यंग्यक तीव्रता बढ़बैत अछि। एतय लोकतंत्र आदर्श नहि, मंच पर बिक रहल प्रदर्शन बनि गेल अछि। अन्य समान राजनीतिक कवितासँ अलग रचना ध्वन्यात्मक तमाशाक रूप ग्रहण करैत अछि; सत्ता स्वयं नाटक बनि जाइत अछि। कविक असहमति जनतंत्रक मूल्यक प्रति उदासीनता नहि, ओकर वास्तविक लोकतांत्रिक चरित्रक माँग अछि।
२८. विकल्प नहि आर कोनो
मूल पृष्ठ : 77–78 | प्रधान विषय : राजनीतिक विकल्प
देशक जर्जरता, गरीब-गुरबाक छटपटाहट, भूख-प्यास, कमजोर नेतृत्व, भ्रष्ट व्यवस्था आ राजनीतिक दलक अवसरवादक बीच जनताक स्थिति अभावग्रस्त अछि। शीर्षक निराशाक कथन जकाँ सुनाइत अछि, मुदा कविता भीतर व्यवस्था-परिवर्तनक आवश्यकताक आग्रह सेहो अछि। ‘विकल्प’क अनुपस्थिति राजनीतिक भाषणक बनौटी बाध्यताक आलोचना बनि सकैत अछि।
रचनामे नैतिक क्षोभक स्वर प्रधान अछि। जनसमुदाय अपन आशा-अभिलाषा सँ ठगायल अछि, तँ ई निष्क्रिय रहबाक समय नहि—एहि तरहक निहित प्रश्न पाठक धरि पहुँचैत अछि। ‘एलेक्शन!’ आ ‘डांस! डेमोक्रेसी डांस!’क बाद ई कविता संकटकेँ चुनावी दृश्यसँ अलग करि सामाजिक विकल्पक स्तर पर राखैत अछि।
२९. आइ-क्यू
मूल पृष्ठ : 79 | प्रधान विषय : शिक्षा, समाज
गरीबी, भूखे बच्चा, शिक्षा-व्यवस्था, लोकक नैतिक दिशा आ शिक्षित वर्गक उत्तरदायित्व एहि कवितामे उपस्थित अछि। आधुनिक बुद्धिलब्धि (‘आइ-क्यू’)क शीर्षक आम लोकक व्यावहारिक संकटसँ टकराइत अछि। पढ़ाइ यदि भूख आ मानवीय अन्यायक प्रश्न नहि बुझि सकय तँ ज्ञानक सामाजिक प्रयोजन की रहि जाए—कविताक आधारभूत प्रश्न एतबे अछि।
शीर्षक अंग्रेजी ज्ञान-मापनक प्रतीक अछि, जखनकि कथ्य प्राथमिक जीवनगत मूल्यक चर्चा करैत अछि। एहि द्वन्द्वसँ व्यंग्य बनैत अछि। कवि तकनीकी दक्षताक मात्र अस्वीकार नहि, ज्ञानक सामाजिक दायित्वक पक्षधर छथि। रचनामे गुरु, शिक्षक आ युवकसँ सम्बद्ध पाँति सभ शैक्षिक विचारकेँ नैतिक धरातल पर आनैत अछि।
३०. पार्टनर
मूल पृष्ठ : 80 | प्रधान विषय : साझेदारी, सत्ता
मित्रता आ साझेदारीक सहज सम्बोधन धीरे-धीरे वैश्विक शक्ति-संबन्धक व्यंग्य बनि जाइत अछि। ‘कमासुतक बेड-पार्टनर’, अमेरिका आ अवसरवादक उल्लेखसँ कविता सम्बन्धक बाजारू अर्थपर चोट करैत अछि। ‘पार्टनर’ शब्द निजी जीवनसँ उठि राजनैतिक अर्थनीतिक गठजोड़क सूचक बनैत अछि।
रचनाक शैली संवादात्मक, कटाक्षपूर्ण आ बहुस्तरीय अछि। सामाजिक संकटमे मनुष्य ककर संग ठाढ़ होयत, आ ककरो संगक समझौता कतय धरि नैतिक अछि—कविताक गूढ़ प्रश्न अछि। ‘शाइन इंडिया’ आ ‘वैश्वीकरण’ संग ओकर अन्तर्सम्बन्ध अछि, कारण तीनू ठाम बाजारक अन्तःप्रवेशक चिन्ता उपस्थित अछि।
३१. अपन दुलरुआक नाम
मूल पृष्ठ : 81–82 | प्रधान विषय : वंशवाद, परिवार
आदित्य, आनन्द, सर्वानन्द, दीपित, दिनेश आदि नामक एक शृङ्खला बनबैत कवि ‘अपन दुलरुआ’क मोह, सन्तान-पक्षपात आ यश-धनक आकांक्षा पर प्रश्न उठबैत छथि। नामक बहुलता एक प्रकारक खेलसँ आरम्भ होइत अछि, मुदा आगाँ परिवारक महत्त्वाकांक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा आ संसाधनक बँटवारा देखाओल जाइत अछि।
एहि कविताक शिल्प सूचीविधान अछि। सामान्य घर-परिवारक नामक श्रृंखला सामाजिक पूर्वाग्रह आ वंशवृत्तिक राजनीतिक छाया उजागर करैत अछि। ‘ओ करत मौज!’ आ ‘घर-बाहर’मे जे परिवारवादी राजनैतिक संरचना भेटैत अछि, ओकर सूक्ष्म निजी रूप एतय देखब सम्भव अछि। किछु नामक सहायतासँ सामान्यीकरण होएबाक खतरा अछि, मुदा शीर्षकक घरेलूपन व्यंग्यकेँ चुभन दैत अछि।
३२. इनटॉलरेंस
मूल पृष्ठ : 83–84 | प्रधान विषय : सहनशीलता, समाज
पुरान आ नव पीढ़ी, समाजक बदलैत आचरण, बोल-बेबहार, वस्त्रक प्रदर्शन, विरोधक नामपर नवा रूढ़ि, अन्याय आ धैर्यक लोप एहि कविताक विषय अछि। ‘इनटॉलरेंस’ शीर्षक बहसक आधुनिक अंग्रेजी पदकेँ अपनबैत अछि, मुदा कवि प्रश्न करैत छथि जे सहनशीलता केवल नारा अछि वा दैनिक जीवनक मूल्य?
कविता असहमति, सामाजिक अनुशासन आ मानवीय सम्मान बीचक तनाव छूबैत अछि। पाँतिक प्रवाह बतबैत अछि जे एक-दोसराक बात सुनबाक क्षमता घटैत अछि, आ बाहरी रूप-रंग पर राजनीतिक निर्णय लेल जाइत अछि। बदलैत फैशन वा नवपीढ़ीक व्यवहारकेँ अपने-आप नैतिक पतन मानि लेनाइ तर्कसंगत नहि; कविताक बल असहिष्णुताक अनुभव पर अछि, जे व्यापक विचारक योग्य अछि।
३३. बुलेट बन्दूक
मूल पृष्ठ : 85 | प्रधान विषय : हिंसा, बंदूक
गाम-शहरक धुआँ, गोली-बन्दूक, हरित वृक्षक संकट, संसदक शोक, पुलिसक असहायता आ युवकक विचलित स्थिति हिंसाक सामान्यीकरण देखबैत अछि। शीर्षकमे उपकरणक सीधे नामसँ भयक वातावरण बनैत अछि। जीवनक सुरक्षा आ लोकतंत्रक संस्थामे जे दूरी अछि, कविता ओही अंतर पर चोट करैत अछि।
ई अत्यन्त संक्षिप्त रचना अछि। बहुत कम शब्दमे जनजीवनक आतंक, राज्यक अकार्यक्षमता आ भविष्यक पीढ़ीक असुरक्षाकेँ जोड़ल गेल अछि। ‘बारूदक ढेरी पर कविताक संग खेलाइत’क व्यापक भय एतय एक तीक्ष्ण सूक्तिपूर्ण वक्तव्यमे सिमटि गेल अछि। शिल्पक अर्थव्यवस्था एहि कविताकेँ अन्य दीर्घ राजनीतिक कविता सभसँ अलग करैत अछि।
३४. मातृभाषा
मूल पृष्ठ : 86 | प्रधान विषय : मातृभाषा, शिक्षा
पुस्तक-कॉपीक बोझ, शिक्षा-व्यवस्थाक दबाव, अंग्रेजीक वर्चस्व, क्षेत्रीय भाषाक उपेक्षा आ सांस्कृतिक विनाशक भय ‘मातृभाषा’क मुख्य समस्या अछि। कविता कहैत अछि जे शिक्षा जँ अपन भाषाक भाव-संसारसँ कटि जाए, तँ आत्मीय ज्ञानक आधार कमजोर पड़ैत अछि। मातृभाषा केवल एक विषय नहि, परिवार, संस्कृति आ स्मृतिक मूल भूमि थिक।
कवि भाषाक रक्षा लेल शिक्षा आ व्यवहार दुनूमे परिवर्तनक आग्रह करैत छथि। प्रादेशिक भाषाकेँ पछाड़िकेँ एक भाषा मात्रक श्रेष्ठता स्थापित करबाक प्रवृत्तिक आलोचना अछि। ‘भाषा ठाढ़ बजार मे’मे बाजारक दाब, ‘भोला बाबू’मे भाषिक आन्दोलनक सकारात्मक इतिहास, आ एहि कवितामे शिक्षाक व्यावहारिक समस्या—तीनू मिलि भाषायी विमर्शक परिपूर्ण त्रिकोण बनबैत अछि।
३५. किरायाक मकान
मूल पृष्ठ : 87 | प्रधान विषय : जीवन, अनित्यता
संसार किरायाक मकान, लोक किरायेदार, सभ किछु अस्थायी आ मालिक अन्तिम रूपेँ सर्वव्यापक—एहने संक्षिप्त रूपक एहि कविताक सर्वस्व अछि। राजनीतिक व्यंग्यक शोरसँ दूर कवि जीवनक क्षणभंगुरता आ स्वामित्वक मिथ्याक प्रश्न रखैत छथि।
कविताक पैघ विशेषता ओकर लघुतम आकार अछि। एके ठाम रहि किछु स्थायी नहि—एहि भावकेँ वाक्यक सादगी समग्र अर्थ दैत अछि। ई रचना व्यापक सामाजिक आलोचनामे आध्यात्मिक-सांकेतिक विराम जकाँ काज करैत अछि। अनेक कविता जे सम्पत्ति आ सत्ता पर प्रश्न करैत अछि, ताहि परिप्रेक्ष्यमे ‘मकान मालिक’क रूपक अधिक जटिल अर्थ सेहो ग्रहण करैत अछि।
३६. बजार
मूल पृष्ठ : 88 | प्रधान विषय : बाजार, पूँजी
भारतकेँ पैघ बजार, लोककेँ खरीदार, विदेशी कम्पनीकेँ शक्तिशाली व्यापारी आ लोकसमुदायकेँ बँधुआ कर्ता रूपमे देखाओल गेल अछि। वस्तु आ इच्छा दुनू विनिमयक तर्कमे फँसल अछि। बजारक अधिकार केवल सामानपर नहि, मनुष्यक जीवन-निर्णयपर सेहो पड़ि रहल अछि।
लघु आकारक ई कविता संग्रहक आर्थिक व्यंग्यक एक केन्द्रीय सूत्र अछि। बहुतेर कविता जे विस्तृत उदाहरणसँ कहैत अछि, ‘बजार’ ओहि विचारकेँ लगभग सूत्र-वाक्यमे समेटैत अछि। ‘शाइन इंडिया’, ‘भाषा ठाढ़ बजार मे’ आ ‘वैश्वीकरण’ एकर विस्तार बनि जाइत अछि। तकर संग ‘कविता बिकबा लए तैयार’ संस्कृति पर एही विनिमयक प्रभाव देखबैत अछि।
३७. वैश्वीकरण
मूल पृष्ठ : 89–91 | प्रधान विषय : भूमण्डलीकरण
भूमण्डलीकरण, ‘ग्लोबलाइजेशन’, उद्योग, व्यापार, आचार, खान-पान आ नवी पीढ़ीक जीवन-शैलीमे तीव्र बदलाव एहि कविताक मुख्य सामग्री अछि। एक देशक वस्तु-संस्कृति आन देशक भीतर पैसैत अछि, आ स्थानीय जीवनक चिह्न बदलैत अछि। भाषा आ व्यवहारक मिश्रण एहि ऐतिहासिक प्रक्रियाक दृश्यमान रूप अछि।
रचनामे आधुनिक शब्दावली स्वयं आलोचनाक सामग्री बनि जाइत अछि। कवि वैश्विक सम्बन्धकेँ समृद्धिक एकमात्र पर्याय नहि मानैत छथि; सत्ता-सन्तुलन, स्थानीय उत्पादन, संस्कृति आ सामाजिक समानताक दृष्टिसँ प्रश्न उठबैत छथि। तथापि विश्वसम्पर्कक सभ रूप असमान होयत, एहन निष्कर्ष कविता स्पष्ट प्रमाणसँ नहि दैत; एकर लक्ष्य वैश्वीकरणक वर्चस्ववादी पक्षक आलोचना अछि।
३८. युग-संदेश
मूल पृष्ठ : 92 | प्रधान विषय : युगचेतना, संघर्ष
बीति गेल समयक स्मरणसँ आगाँ वर्तमानकेँ चुनौतिपूर्ण भविष्य-दिशा देबाक प्रयत्न रचनामे अछि। जनता दुखी, समाज दिशाहीन आ इतिहासक पुनरावृत्तिसँ त्रस्त अछि; एहन दशामे सबकेँ मिलि लडबाक आ सामाजिक परिवर्तनक संकल्प आवश्यक ठहराओल गेल अछि।
कविता उपदेशात्मक मात्र नहि, सामूहिक क्रियाशीलताक प्रेरणा अछि। ‘हमर भूमि बंजर नहि, मनोबलपूर्ण बुझू’ जकाँ आशय निराशाक बदला संभावना जगबैत अछि। ई रचना ‘कालचक्र’क समय-चेतनाक रचनात्मक उत्तर अछि: अतीतक विवेचन तबे अर्थवान् होयत जखन भविष्यक दिशामे कर्म हो। मुक्तछन्दक अपेक्षाकृत सोझा शैलीक बावजूद उद्बोधन स्वर असरदार अछि।
३९. टा-टा! बाइ-बाइ!!
मूल पृष्ठ : 93–95 | प्रधान विषय : स्त्री, आधुनिकता
समाजमे स्त्री-पुरुषक सम्बन्ध, शिक्षाक प्रसार, बाह्य आधुनिकता, पितृसत्तात्मक दबाव आ नारी-सम्मानक प्रश्न एहि कवितामे उपस्थित अछि। ‘टा-टा! बाइ-बाइ!!’ देखिते लागैत अछि जे वक्ता कोनो समाप्त होइत सम्बन्ध वा समयकेँ विदा करैत छथि; आगाँक पाँति सभ दर्शबैत अछि जे पुरातन मूल्य आ आधुनिक आडम्बर बीच संघर्ष चलि रहल अछि।
कविता स्त्रीक सम्मानक पक्ष लैत अछि, मुदा एकहि समय समाजक नवा जीवन-प्रदर्शन पर सन्देह सेहो करैत अछि। एही कारण पाठ जटिल अछि: स्त्रीक स्वतन्त्रता, सामाजिक मर्यादा आ आधुनिकता के एकहि तुलापर राखि नहि सकैत छी। रचनाक योगदान ई जे नारी-अनुभवक प्रश्नकेँ सार्वजनिक बहसमे अनैत अछि; ओकर कतिपय संस्कारगत मान्यताक विवेचन आलोचककेँ खुला रखबाक चाही।
४०. भोला बाबू
मूल पृष्ठ : 96–97 | प्रधान विषय : मैथिलीसेवा
मातृभाषाक प्रचारक, सामाजिक चेतनाक समर्थक, मिथिला-मैथिलीक जनजागरणकर्ता आ साहित्यिक संस्थासँ जुड़ल व्यक्तित्वक प्रशस्ति ‘भोला बाबू’मे अछि। व्यक्ति-विशेषक माध्यमसँ भाषिक आन्दोलनक स्मृति आ सामूहिक श्रमक महत्त्व स्पष्ट होइत अछि।
एहि रचनाक स्वर अन्य तीख राजनीतिक कवितासँ अलग अछि—एतय सम्मान, कृतज्ञता आ सांस्कृतिक ऋणबोध प्रमुख अछि। ‘मातृभाषा’ जखन संकट देखबैत अछि, ‘भोला बाबू’ लोकक कर्मसँ ओकर रक्षाक सम्भावना दर्शबैत अछि। जीवनीपरक काव्यक विशेषता नाम आ कार्यक सूची अछि; तथ्यात्मक जीवनीक पुष्टि लेल स्वतंत्र स्रोत आवश्यक होयत, मुदा कवितामे ई व्यक्तित्व मैथिलीसेवाक प्रतीक रूपेँ प्रस्तुत अछि।
४१. कलम सिपाही : राजकमल
मूल पृष्ठ : 98 | प्रधान विषय : साहित्यिक स्मृति
राजकमल चौधरीक प्रति ई कविता श्रद्धा आ वैचारिक आत्मीयताक स्मरण अछि। विद्रोही रचनाकार, नारी-पीड़ाक चित्रकार, कथा-कविताक प्रयोगशील कलाकार आ निर्भीक काव्यस्वरक रूपमे हुनकर स्मृति उपस्थित अछि। शीर्षकक ‘कलम सिपाही’ लेखकीय कर्मकेँ संघर्षक नैतिक स्वरूप दैत अछि।
कवितामे राजकमलक कृतिक नामक संकेत आ विरोधी जीवन-मूल्यक उदाहरण स्मृति-रचना बनबैत अछि। ई तथ्यात्मक जीवनीक स्थाने एक कविक दोसर कविप्रति काव्यात्मक मूल्यांकन अछि। ‘अथातो काव्य जिज्ञासा’क रचनात्मक प्रतिबद्धता एहि स्मरणक माध्यमसँ मैथिलीक आधुनिक विद्रोही साहित्यिक परम्परासँ जुड़ैत अछि। सम्मानमय स्वरक संग आलोचनात्मक पाठ राजकमलक जटिल लेखकीय संसारकेँ एहि एक कविता धरि सीमित नहि करैत अछि।
४२. वाक्-विमर्श
मूल पृष्ठ : 99–100 | प्रधान विषय : शब्द, साहित्य
कविता-संग्रह, शब्द, भाषाक अर्थ, संवेदना आ आधुनिक समाजमे रचनाक स्थानक प्रसंग एहि कवितामे केन्द्रीय अछि। कवि कलाकृति पर विचार करैत शब्दक भीतरक अर्थ-परिवर्तन देखैत छथि। ‘वाक्’क शास्त्रीय शब्द आ ‘विमर्श’क आधुनिक आलोचनात्मक अर्थक संगम शीर्षकमे स्वयं रचना-दर्शन प्रस्तुत करैत अछि।
एहि कविताक अपनपक्ष आलोचनात्मक संवाद अछि। पूर्वज रचनाक आशा, समकालीन शब्दक विकास आ समाजक बदलैत जरूरतक सम्बन्ध देखाओल गेल अछि। ‘कविता बिकबा लए तैयार’मे बाजारक संकट अछि, तँ ‘वाक्-विमर्श’मे शब्दक स्वतन्त्र संवेदनशील सत्ता बचाबयक प्रयास। एहि काव्य-श्रृङ्खलासँ पाठक बुझैत छथि जे कवि साहित्यपर साहित्यक भीतरसँ सोचैत छथि।
४३. अथ कविता उवाच
मूल पृष्ठ : 101–104 | प्रधान विषय : कविता, विश्व
कविता स्वयं बाजैत अछि—विशाल आकाश, जन-मनक रंग, नगर आ गाम, वर्ग आ जाति, अलग-अलग देश, प्रकृति आ इतिहास सभ एकहि काव्यदृष्टिमे आबि रहल अछि। ‘उवाच’क शास्त्रीय स्वर आधुनिक वैश्विक बहुलताकेँ अभिव्यक्त करैत अछि। मनुष्यता, पृथ्वी, जीवनक विस्तार आ संकट अनेक पाँतिमे संलग्न अछि।
शीर्षक कविता ‘अथातो काव्य जिज्ञासा’मे उठल प्रश्नक एतय उत्तरक विस्तार भेटैत अछि: कविता केवल अभावक विवरण नहि, सम्पूर्ण जगतक संवेदी पाठ अछि। रचनाक सूचीगत विस्तार विश्व-मानचित्र बनबैत अछि। प्रश्न ई अछि जे एहि व्यापकता सँ ठोस मानवक आवाज कतेक स्पष्ट रहैत अछि; किछु ठाम सूचीक वेग अनुभूतिक गहराइकेँ ढाँकि सकैत अछि। तथापि कविता-चेतनाक वैश्विक आकांक्षा महत्त्वपूर्ण अछि।
४४. घर-बाहर
मूल पृष्ठ : 105–107 | प्रधान विषय : घर-बाहर, राजनीति
अफीमक कारोबार, पुलिस-अफसर, ठेकेदारी, नेतागिरी, मकान-व्यापार आ सम्पत्ति-संग्रहक बीच सार्वजनिक सत्ता आ निजी लाभक रेखा धुँधला पड़ैत अछि। ‘घर-बाहर’ शीर्षक सत्ता-द्वारा निजीकरणक व्यंग्यक आधार बनैत अछि: सार्वजनिक कर्तव्यक रूपमे जे होएबाक चाही, ओ घरपरिवारक हितक साधन बनि जाइत अछि।
कविताक भाषामे जकाँ-जकाँ भिन्न पदनाम जुड़ैत अछि, ओ एक राजनीतिक जालक रूप लैत अछि। ‘अपन दुलरुआक नाम’ आ ‘ओ करत मौज! ओ करत राज!!’क संग पढ़लासँ परिवारवाद आ संस्थागत भ्रष्टाचारक अन्तरसम्बन्ध देखाइत अछि। रचनाक नैतिक प्रश्न तीख अछि; काव्यात्मक बिम्बक अपेक्षा सामाजिक प्रहार प्रमुख रहल अछि।
४५. जय हो मानव जातिक जय हो
मूल पृष्ठ : 108–109 | प्रधान विषय : मानवता, शान्ति
मानवेतिहासमे विनाशकारी प्रयास, रावणक प्रतिरूप, आतंक, नर-संहारक अस्त्र आ पृथ्वीक भविष्यक भय उत्पन्न करैत कविता अन्ततः मानवजातिक जीवन-मूल्यक पक्ष लैत अछि। शीर्षक जयघोष अछि, मुदा ओ उत्साहक सहज नारा नहि; सभ विनाशकारी शक्तिक बाद मनुष्यक गरिमा बचबाक आग्रह अछि।
कविता मिथकीय आ आधुनिक भयकेँ एक साथ राखैत अछि। भू-मण्डल, रक्त-मांस, अस्त्र आ मानवसभ्यताक बिम्ब एक साझा संकट बनबैत अछि। ‘बुलेट बन्दूक’मे जे भय सीमित दृश्य अछि, एतय ओ वैश्विक मानव-विनाशक समस्या बनि जाइत अछि। ‘जय हो’क पुनरुक्ति सम्भावनाक अन्तिम रक्षाबन्धन जकाँ काज करैत अछि।
४६. बन्न करू ड्रामा श्रीमान
मूल पृष्ठ : 110–111 | प्रधान विषय : नागरिक व्यंग्य
पोथी-कपड़ा-मकानक महँगाइ, शिक्षाक व्यापारीकरण, स्त्री-असम्मान, भ्रष्टाचारी दलाल, परिवारवाद, प्रशासनक निष्क्रियता आ नेताक दिखावा—सभ पर कविता अन्तिम सार्वजनिक हस्तक्षेप करैत अछि। ‘बन्न करू ड्रामा श्रीमान’ नाटकीय सम्बोधन अछि; कवि सत्ताधारीक भाषा आ कर्मक विच्छेद देखैत छथि।
संग्रहक अन्तिम कविता रूपेँ ई रचना उपसंहारक शक्ति रखैत अछि। आरम्भक ‘अशोक वृक्ष’क संयत सौन्दर्य-चित्रसँ चलल यात्रा अंतमे कठोर नागरिक सम्बोधन धरि पहुँचल अछि। ‘ड्रामा’ शब्द प्रचारात्मक राजनीति आ लोकजीवनक संकट बीचक अन्तर उद्घाटित करैत अछि। भावात्मक अर्थ एतबा अछि: मनुष्यक दैनन्दिन आवश्यकताकेँ नैतिक प्राथमिकता देल बिना अधिकारक अभिनय शून्य अछि।
समेकित शोध-निष्कर्ष
रचनाक आन्तरिक प्रवाह
संग्रहक ४६ कवितामे प्रकृतिक लघु दृश्यसँ शहरी-ग्रामीण असमानताक विस्तृत आख्यान, ओतयसँ सत्ता-बजारक तीख व्यंग्य, फेर भाषा-साहित्यक आत्मपरीक्षण आ अन्तमे मनुष्यता-सम्मानक आह्वान धरि एक अर्थपूर्ण प्रवाह अछि। कविता सभ कठोर विषयाधारित खण्डमे अलग-अलग नहि रहल अछि; प्रकृति, भाषा, सत्ता आ स्मृतिक रेखा अनेक स्थाने एक-दोसरामे मिलैत अछि। एही परस्परता संग्रहक वास्तविक एकता अछि।
काव्यभाषाक उपलब्धि
मूलपाठमे प्रचलित मैथिली पद, ध्वनि आ क्रियाप्रयोगक संग आधुनिक राजनीतिक आ वैश्विक शब्दाभिधान अछि। शास्त्रीय पदविन्यास (‘अथातो’, ‘उवाच’, ‘कालचक्र’) आ समकालीन लोकप्रिय शब्द (‘डेमोक्रेसी’, ‘एलेक्शन’, ‘इनटॉलरेंस’) सँ बनल तनाव कविताकेँ अपन समयक बहुभाषी अनुभव दैत अछि। लघु छन्दहीन दृश्य, क्रमांकित क्षणचित्र, जनसभामुखी वक्तव्य, व्यंग्यात्मक दोहऱाव आ दीर्घ मुक्तछन्द—सभ अपन-अपन सामाजिक प्रभाव लैत अछि।
सामाजिक मूल्य आ समीक्षा-दृष्टि
जनपक्षधरता संग्रहक प्रमुख नैतिक शक्ति अछि। तैओ सामाजिक आलोचना आ साहित्यिक मूल्यांकन एके वस्तु नहि: अति प्रत्यक्ष वक्तव्य कतहु सूक्ष्म बिम्बकेँ रोकैत अछि; कतहु विषयक विस्तार अनुपस्थित सामाजिक पात्रक प्रत्यक्ष आवाज ढाँकि दैत अछि; आ कतहु रूढ़ि-विरोधक संग नवजीवनप्रति आशंका सेहो भेटैत अछि। एही अन्तर्विरोध सहित पढ़लासँ कविता सभक जीवन्तता देखाइत अछि। पढ़निहारक काज कविक प्रत्येक घोषणासँ सहमत होएब नहि, कविक सवालक सामाजिक आधार जाँचब अछि।
अन्तिम स्थापना
‘अथातो काव्य जिज्ञासा’ कविता-कर्मक उत्तरदायित्व पर केन्द्रित जनोन्मुख मैथिली काव्य-संग्रह अछि। एकर काव्यजगतक मूल धुरी ई प्रश्न अछि—मनुष्य, माटि, भाषा आ श्रम बिनु कथित प्रगतियात्राक की अर्थ? कविता भरल बजार आ सत्ता-प्रदर्शनक बीच जीवित संवेदनाक स्थान खोजैत अछि। सभ ४६ कविता एकहि स्वरमे नहि बजैत अछि; एहि विभिन्नताक भीतर लोकजीवनक सांस्कृतिक मानवीय अधिकारक आग्रह ओकर सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक उपलब्धि अछि।
परिशिष्ट : अन्तःसम्बन्धक अध्ययन-सूत्र
काव्यक आत्मप्रश्न
सन्दर्भ-कविता : अथातो काव्य जिज्ञासा; कविता बिकबा लए तैयार; वाक्-विमर्श; अथ कविता उवाच
शोध-प्रश्न : कविता सामाजिक दायित्व आ बजारक बीच कोना अपन स्वतन्त्रता सुरक्षित करैत अछि?
प्रकृति सँ समाज दिस
सन्दर्भ-कविता : अशोक वृक्ष; बबूर गाछ; आदिवासीक घर; धन्य थिक ब्रह्माणी नदीक जल; एक टा छल गाम हमर
शोध-प्रश्न : प्रकृतिक दृश्य कहिया विस्थापन आ अधिकारक प्रश्न बनि जाइत अछि?
भाषा, शिक्षा आ समाज
सन्दर्भ-कविता : मैथिली बरनी; भाषा ठाढ़ बजार मे; मातृभाषा; भोला बाबू
शोध-प्रश्न : मातृभाषाक स्मृति आ संस्थागत प्रतिष्ठाक बीच कोन अन्तर अछि?
लोकतंत्रक नाटकीयता
सन्दर्भ-कविता : एलेक्शन! एलेक्शन!; रेल! रेल!!; नेता-पुराण; डांस! डेमोक्रेसी डांस!; बन्न करू ड्रामा श्रीमान
शोध-प्रश्न : लोकतंत्रक सार्वजनिक भाषा आ जनताक जीवनानुभवक दूरी कोना बनैत अछि?
बजारक बहुस्तरीय प्रभाव
सन्दर्भ-कविता : शाइन इंडिया; महानायकक अरण्य-यात्रा; हिसाब-किताब; बजार; वैश्वीकरण; पार्टनर
शोध-प्रश्न : आर्थिक शक्ति भाषाक अर्थ, सांस्कृतिक व्यवहार आ लोकजीवनकेँ कोना प्रभावित करैत अछि?
हिंसा आ मानवीय भविष्य
सन्दर्भ-कविता : बारूदक ढेरी पर कविताक संग खेलाइत; बुलेट बन्दूक; जय हो मानव जातिक जय हो
शोध-प्रश्न : समयक हिंसा सँ उबरबाक लेल कविता कोन मानवीय विकल्प प्रस्तुत करैत अछि?
अध्याय ३ • वीरेन्द्र मल्लिकक साहित्य
प्रथम पुरुष
आठ निबन्ध आ एक अन्तरङ्ग वार्ता • परम्परा, प्रयोग, बिम्ब आ आलोचनात्मक विवेक
१. परम्परा : प्रयोग एवं आधुनिक बोधक कविता (पृ. ९–२७)
केन्द्रीय प्रतिपाद्य
आरम्भिक निबन्धमे परम्परा आ नवीन प्रयोगकेँ परस्पर विरोधी मानबाक प्रवृत्तिक पुनर्विचार कएल गेल अछि। साहित्यिक नवता शून्यसँ उत्पन्न नहि होइत अछि; पूर्ववर्ती काव्य-चेतना, जनजीवन, संस्कार आ अभिव्यक्तिक विरासतसँ संवाद करैत नव रूप ग्रहण करैत अछि। अतएव ‘आधुनिक बोध’ केवल कालगत नवीनता नहि, बदलैत जीवन-जगतक नूतन अनुभूति आ ओकर अनुरूप कलात्मक संरचनाक नाम अछि।
निबन्धमे काव्यधाराक भिन्न प्रवृत्ति, छन्द आ मुक्त अभिव्यक्ति, बिम्ब आ प्रतीक, यथार्थबोध, समाजाभिमुखता तथा पाश्चात्य साहित्यिक प्रवाहक सन्दर्भ एकहि विमर्शमे उपस्थित होइत अछि। एहि बहुविध सन्दर्भसँ लेखक काव्यक आधुनिक रूपक बोधगम्य ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तैयार करैत छथि।
परम्परा, यथार्थ आ प्रयोग
परम्पराकेँ रूढ़िक समानार्थी मानल जाए तऽ आधुनिक प्रयोगक उत्पत्ति अस्पष्ट भऽ जाइत अछि। लेखकक विश्लेषणक केन्द्र ई अछि जे रचनाकार परम्परासँ भाषा, संवेदना आ सांस्कृतिक स्मृति ग्रहण करैत छथि, मुदा ओकर यान्त्रिक अनुकरण नहि करैत छथि। चयन, अस्वीकार आ पुनर्सृजनक प्रक्रिया आधुनिक काव्यक रचनाशीलता निर्धारित करैत अछि।
यथार्थवाद आ अतियथार्थवादी संकेत, रोमानी आग्रह आ सामाजिक चेतना, काव्यक आत्मगतता आ वस्तुगत जीवनक उपस्थिति—एहि सभक चर्चा काव्य-आधुनिकताक एकरेखीय परिभाषाकेँ जटिल बनबैत अछि। मनुष्यक एकाकीपन, द्वन्द्व, स्वप्न, संघर्ष आ बदलैत सामाजिक परिस्थिति कविता मे नूतन चित्रक गठन करैत अछि।
आलोचनात्मक मूल्याङ्कन
एहि निबन्धक सबसँ महत्त्वपूर्ण गुण ई अछि जे आधुनिकताकेँ केवल शैलीगत विचित्रता वा विदेशी अनुकरणक रूपमे नहि, अनुभूति आ अभिव्यक्तिक सम्बन्धक रूपमे समझबाक आग्रह करैत अछि। लेखक मैथिली कविताकेँ विस्तृत भारतीय आ विश्व-साहित्यिक चर्चासँ जोड़बाक प्रयास करैत छथि।
तथापि ‘आधुनिक’ आ ‘प्रयोग’क व्यापक प्रयोगक कारण अलग-अलग काव्यप्रवृत्तिक सीमा कखनहु अस्पष्ट भऽ सकैत अछि। एहि बिन्दुपर एकटा आलोचनात्मक प्रश्न उठैत अछि : कविता मे नवीन भाषिक गठन स्वयंमे उपलब्धि अछि, कि ओकर मानवीय संवेदना आ अर्थ-उत्पादनक सामर्थ्यसँ मूल्याङ्कन आवश्यक अछि? ग्रन्थक समग्र अभिमुखता दोसर विकल्पकेँ बल दैत अछि।
२. मैथिली काव्य मे वैभव भावधारा (पृ. २८–४६)
विषय-विस्तार
एहि निबन्धमे मैथिली काव्य-परम्पराक गौरव आ वैभवकेँ केवल प्रशस्तिक वस्तु नहि, काव्य-संवेदनाक दीर्घ विकास-यात्राक रूपमे देखबाक प्रयास अछि। विद्यापति आ उत्तरवर्ती काव्य-धाराक आलोकमे भावक विविध रूप—प्रेम, भक्ति, करुणा, सौन्दर्य, लोकजीवन आ आध्यात्मिक अनुभूति—काव्य-सृष्टिक अभिन्न अङ्ग रूपमे उभरैत अछि।
कवि-परम्पराक विवेचनक संग लेखक स्थान-स्थानपर मूल पद वा काव्यांश प्रस्तुत करैत छथि। उद्धरणक प्रयोजन ऐतिहासिक नामावली बनायब मात्र नहि, बरु भाषा आ भावक जीवित सम्बन्ध प्रदर्शित करब अछि। एहि कारण निबन्ध एकहि समय ऐतिहासिक सर्वेक्षण आ काव्य-सौन्दर्यक पाठ बनि जाइत अछि।
काव्यवैभवक अनेक स्तर
‘वैभव’क आशय केवल विपुल साहित्य-सृष्टि नहि; ताहिमे रागात्मकता, अनुभवक प्रौढ़ता, भाषिक माधुर्य, लय-संयोजन, पद-रचना आ काव्यचित्रक सघनता सम्मिलित अछि। मिथिलाक सांस्कृतिक परिवेश, धार्मिक-दार्शनिक विचार आ लोक-व्यवहारक धरातल काव्यक संवेदनात्मक शक्ति बढ़बैत अछि।
लेखकक चयनित उदाहरण सभ पढ़िते ई स्पष्ट होइत अछि जे भावधाराकेँ एक मात्र रसक सीमामे बाँधब उचित नहि। भक्ति आ शृङ्गार अनेक बेर एक-दोसराक अर्थ-विस्तार करैत अछि; लोकमूलक अभिव्यक्ति साहित्यिक ऊँचाइ प्राप्त करैत अछि। एहने सम्मिश्रण मैथिली काव्यक विशिष्ट शक्ति अछि।
विश्लेषणात्मक निष्कर्ष
एहि अध्यायक प्रमुख योगदान मैथिली साहित्यक मूल्याङ्कनमे आन्तरिक परम्पराक प्रतिष्ठापन अछि। तथापि ‘वैभव’क अवधारणाकेँ समकालीन सामाजिक असमानता, स्त्री-अनुभव आ उपेक्षित समुदाय सभक काव्य-स्वरक सन्दर्भमे फेरसँ पढ़ल जाए तऽ विमर्श आरो व्यापक भऽ सकैत अछि। ई प्रश्न ग्रन्थक कथनक खण्डन नहि, ओकर अनुसन्धानात्मक विस्तार अछि।
३. ‘सुभद्र-हरण’ मे बिम्ब-विधान (पृ. ४७–५८)
बिम्बक सैद्धान्तिक आधार
एहि अध्ययनक केन्द्र काव्य-बिम्ब अछि। लेखक बिम्बकेँ शब्दसँ उत्पन्न मानसिक दृश्य मात्र नहि मानि संवेदनात्मक अनुभवक कलात्मक मूर्तिकरण रूपमे ग्रहण करैत छथि। बिम्ब, कल्पना, अनुभूति, इन्द्रियबोध आ अर्थक सम्बन्ध पर विचार करैत अध्याय महत्त्वपूर्ण परिभाषा तथा काव्यशास्त्रीय सन्दर्भ प्रस्तुत करैत अछि।
काव्य-बिम्बक वर्गीकरणक प्रयत्नमे दृश्य, श्रव्य, स्पर्शादि इन्द्रियसम्बद्ध स्तर, वस्तुगत वा अमूर्त गुण, सरल आ जटिल विन्यास तथा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अभिव्यक्तिक भेद उपयोगी बनैत अछि। निबन्धमे प्रस्तुत वर्गीकरणक रूपरेखा आ रेखाचित्र विश्लेषणकेँ व्यवस्थित करबाक उपकरण अछि।
काव्यपाठमे बिम्बक क्रिया
‘सुभद्र-हरण’क उदाहरणक विवेचनसँ स्पष्ट होइत अछि जे बिम्ब कथा-प्रसङ्गक केवल सजावट नहि करैत; से नाटकीय तनाव, पात्रक भावावस्था, गति, दृश्य-परिवर्तन आ रसात्मक प्रभावकेँ मूर्त करैत अछि। क्रिया, रूप, ध्वनि आ अनुभूतिक शब्द-चयनसँ पाठकक चित्तमे दृश्य आ भावक संयुक्त अनुभव बनैत अछि।
कथात्मक काव्यमे बिम्ब-विधानक विशेषता ई जे घटना-सूत्र आ अनुभूति परस्पर जुड़ैत अछि। एकटा सफल बिम्ब कथा केँ रोकैत नहि, बरु कथ्यक गति आ भावानुभूतिक तीव्रता बढ़बैत अछि। लेखकक उदाहरणाधारित पद्धति एहि अन्तरकेँ देखाबय योग्य बनबैत अछि।
पद्धतिगत समीक्षा
एहि निबन्धक बौद्धिक महत्त्व सैद्धान्तिक काव्यशास्त्रकेँ मैथिली रचनाक समीप-पाठसँ जोड़बामे अछि। वर्गीकरण विश्लेषणमे सहायक अछि, मुदा कोनो एक बिम्ब अनेक इन्द्रियात्मक आ भावात्मक श्रेणीमे एकहि बेर प्रवेश कऽ सकैत अछि। ताहि कारण बिम्बकेँ स्थिर कोठरीमे सीमित नहि करि ओकर समग्र प्रसङ्ग, ध्वनि आ प्रभाव पढ़ब अधिक फलदायी होइत अछि।
४. रामकाव्यक परम्परा आ मैथिली रामायण (पृ. ५९–८०)
रामकथाक बहुविध परम्परा
एहि अध्यायमे रामकथा केँ भारतीय साहित्यक बहुभाषिक, बहुस्तरीय आ निरन्तर परिवर्तित होइत सांस्कृतिक आख्यानक रूपमे देखल गेल अछि। संस्कृत ग्रन्थ, भिन्न भाषाक रामकाव्य आ स्थानीय परम्पराक पारस्परिक सम्बन्धक विवेचनसँ मैथिली रामायणक ऐतिहासिक स्थान स्पष्ट करबाक प्रयास अछि।
महाकाव्यात्मक आख्यानक पुनर्लेखनक अर्थ केवल मूल कथाक स्थानान्तरण नहि। भाषा, लोकमानस, धार्मिक वृत्ति, सांस्कृतिक आचार, पात्रक स्वभाव आ कथा-कथनक विधि बदलला पर रामकथा नव साहित्यिक रूप ग्रहण करैत अछि। एहि दृष्टिसँ मैथिली रामायण मौलिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तिक महत्त्वपूर्ण अवसर बनैत अछि।
मैथिली काव्यक वैशिष्ट्य
लेखक मैथिलीमे रचित रामकथासम्बद्ध काव्यक चर्चा करैत परम्परा आ रूपान्तरक सम्बन्धपर बल दैत छथि। रामायणक पात्रगणक नैतिक-धार्मिक स्वरूपकेँ स्थानीय संवेदनासँ जोड़ल जा सकैत अछि; मैथिली भाषा संवाद, वर्णन आ लोकसम्बद्ध उपमानक माध्यम बनि कथाक नूतन निकटता रचैत अछि।
काव्य-परम्पराक व्याख्यामे ग्रन्थक तुलनात्मक दृष्टि विशेष उल्लेखनीय अछि। स्रोत-ग्रन्थ आ उपरान्तक मैथिली रूपक बीच कथात्मक समानता अवश्य होइत अछि, मुदा काव्यक स्वतंत्र पहचान कथानकक शब्दशः समानतामे नहि, रचनात्मक चयन आ भावगत पुनर्संयोजनमे निहित रहैत अछि।
शोधक प्रश्न
एहि अध्यायक आधारपर नव अनुसन्धान एहि विषय सभपर भऽ सकैत अछि : मैथिली रामायणमे लोकभाषाक उपयोग, स्त्री-पात्रक संवाद, सांस्कृतिक आचारक रूपान्तरण, भक्ति आ नीतिबोधक आपसी सम्बन्ध, तथा स्रोत-परम्परासँ भिन्न प्रसङ्गक कारण। ई सभ प्रश्न मूल निबन्धक ऐतिहासिक चर्चाकेँ पाठ-आधारित तुलनात्मक अनुसन्धान धरि विस्तारित करैत अछि।
५. मिथिलाभाषा रामायणक प्रेरणा स्रोत : अध्यात्मरामायण आ रामचरितमानस (पृ. ८१–८८)
प्रेरणा आ अनुकरणमे अन्तर
एहि निबन्धक विशिष्ट विषय मिथिलाभाषा रामायणक प्रेरणागत सम्बन्ध अछि। शीर्षकमे उल्लिखित अध्यात्मरामायण आ रामचरितमानसक प्रसङ्ग लेखककेँ स्रोत, प्रभाव, विषय-चयन आ काव्यात्मक पुनर्निर्माणक जटिल सम्बन्ध जाँचबाक अवसर दैत अछि। प्रेरणा-ग्रन्थक उपस्थिति रचनाक मौलिकताकेँ अनिवार्य रूपसँ समाप्त नहि करैत अछि।
ग्रन्थक पाठक अनुसार रामकथा-परम्पराक आध्यात्मिक अर्थ आ जनभाषिक अभिव्यक्ति—दूनू महत्त्वपूर्ण अछि। अध्यात्मरामायणक आध्यात्मिक प्रवृत्ति आ रामचरितमानसक भक्तिमूलक लोकव्याप्तिक आलोकमे मैथिली रूपान्तरक विशिष्टता पढ़बाक प्रयत्न कएल गेल अछि। तुलना करैत लेखकक आग्रह कथ्य आ भक्ति-भावना संग काव्यरूपक भिन्नता बुझब अछि।
तुलनात्मक पाठ-पद्धति
एकर समीचीन पद्धति एहि चारि स्तर पर आधारित होएबाक चाही : कथाक क्रम आ प्रसङ्ग, पात्रक उक्ति आ चरित्रांकन, दार्शनिक-धार्मिक आशय, तथा भाषा-लय-शैली। मूल निबन्ध एहि तुलनात्मक विमर्शक दिशामे स्रोतग्रन्थ सभकेँ आमने-सामने राखैत अछि।
अनुसन्धानमे ई अलग राखब जरूरी अछि जे कोन तथ्य सीधा पाठसाम्यसँ सिद्ध होइत अछि आ कोन बात काव्य-परम्पराक व्यापक प्रभावक रूपमे अनुमानित अछि। समस्त समानता केँ प्रत्यक्ष उधारी कहि देब साहित्यिक परम्पराक साझा संरचनाकेँ उपेक्षित करब होएत।
आलोचनात्मक मूल्य
अध्याय मैथिली रामकाव्यकेँ प्रादेशिक एकान्तसँ निकालि भारतीय महाकाव्य-परम्पराक गतिशील संवादमे रखैत अछि। विशेष मूल्य ई जे प्रेरणा आ सृजनात्मक स्वायत्तताक सम्बन्धपर विचार करबाक आधार तैयार करैत अछि।
६. आलोचनाक संकट आ संकट आलोचना (पृ. ८९–१०१)
आलोचनाक दायित्व
ई निबन्ध साहित्यिक मूल्याङ्कनक नीतिशास्त्र आ विवेकपर केन्द्रित अछि। आलोचनाक उद्देश्य केवल प्रशंसा, निन्दा, मित्रतापोषण वा समूहगत प्रतिष्ठाक रक्षा नहि; कृतिक गुण-दोषक तर्कसंगत विवेचन आ पाठकीय विवेकक विकास अछि। लेखक आलोचकक बौद्धिक तैयारी, व्यापक अध्ययन आ स्वतन्त्र निर्णयक महत्त्व रेखाङ्कित करैत छथि।
आलोचनामे ‘संकट’ दुइ स्तरपर उभरैत अछि : एक दिशि उचित मानदण्ड, सुसंगत पद्धति आ प्रमाणयुक्त व्याख्याक अभाव; दोसर दिशि संस्थागत आग्रह, वैयक्तिक पक्षपात आ साहित्यिक मूल्यक अस्थिरता। एहि संकटकेँ केवल व्यक्ति-विशेषक दोष कहि समाप्त नहि कएल जा सकैत; साहित्यिक संस्कृतिमे विवेकपूर्ण संवादक स्थिति सेहो आवश्यक अछि।
भारतीय आ पाश्चात्य सन्दर्भ
निबन्धमे शास्त्रीय आलोचना, आधुनिक सौन्दर्यविचार आ मार्क्सवादी आलोचनात्मक प्रवृत्तिक सन्दर्भ उपस्थित अछि। कलात्मक रूप, सामाजिक यथार्थ, विचारधारा, अनुभूति, भाषा आ कृतिक स्वायत्ततामे संतुलन स्थापित करब आलोचनाक मुख्य चुनौती अछि। अलग-अलग पद्धति पाठककेँ भिन्न प्रश्न पूछैत अछि; एकमात्र पद्धतिक सर्वाधिकार अर्थ-बोधकेँ संकुचित करि सकैत अछि।
एहि कारण लेखकक चर्चासँ आलोचनाक एकटा उत्तरदायी स्वरूप उभरैत अछि—पाठक समीपता, अवधारणाक स्पष्टता, मूल्याङ्कनमे निर्भीकता आ लेखक-आलोचक सम्बन्धमे अपेक्षित दूरी।
आजुक प्रासंगिकता
साहित्यिक गोष्ठी, पत्रिका, पुरस्कार-व्यवस्था आ डिजिटल माध्यममे त्वरित प्रतिक्रिया बढ़ला सँ एहि प्रश्नक महत्त्व आरो बढ़ल अछि। आलोचनात्मक मत प्रकाशित करैत समय पाठ-साक्ष्य, सन्दर्भ, मतभेदक शिष्टता आ पारदर्शी आधार आवश्यक अछि। ई समसामयिक विस्तार मूल निबन्धक आलोचना-विवेकक मर्मसँ मेल खाइत अछि।
७. मैथिली कविताक वर्तमान (पृ. १०२–११४)
वर्तमानक अर्थ
एहि निबन्धमे ‘वर्तमान’ केवल हालक प्रकाशन-वर्षक पर्याय नहि, बदलैत जीवन-चेतना, कथ्य, भाषा आ काव्यशिल्पक जीवित रूप अछि। आधुनिक मैथिली कविता परम्परागत भाव-विधानसँ संवाद करैत सामाजिक असुरक्षा, अस्तित्वगत बेचैनी, नैतिक प्रश्न, व्यक्तिक अकेलापन आ सामूहिक अनुभूतिक नूतन स्वर खोजैत अछि।
लेखक अनेक काव्यांशक माध्यमसँ अलग-अलग रचनात्मक स्वरक तुलना करैत छथि। कविता केँ केवल सिद्धान्तसँ नहिं, ओकर प्रयोगधर्मी भाषिक देहक समीप जाए पढ़ब एही अध्यायक आधारभूत पद्धति अछि।
शिल्प आ संवेदना
नव कविता मे मुक्त विन्यास, कथन-भङ्गिमा, बोलचालक भाषिक ऊर्जा, विसङ्गतिक अनुभूति, प्रतीकात्मक संकेत आ अन्तरंग आत्मालाप देखल जा सकैत अछि। मुदा नूतन शिल्पक सफलता तखनहि होइत अछि जखन से अनुभूतिक अनुरूप हो। कथ्य आ शिल्पक प्रामाणिक सम्बन्ध बिना प्रयोग यान्त्रिक बनि सकैत अछि।
समकालीनताक एक आवश्यक पक्ष कविता मे सामाजिक परिवेशक उपस्थिति अछि। प्रवास, संघर्ष, विस्थापन, सम्बन्धक परिवर्तन आ मानवीय आकांक्षा काव्यक चिन्ताकेँ गतिमान करैत अछि। एही सन्दर्भमे परम्परागत मिथिला-छविक रोमानी पुनरावृत्ति आ आधुनिक जीवनक जटिल यथार्थक बीच अन्तर पहिचानल जा सकैत अछि।
चयन आ सीमाक प्रश्न
काव्य-वर्तमानक कोनो आलोचनात्मक चित्र प्रतिनिधि रचनाक चयनपर निर्भर करैत अछि। अतएव एहन सर्वेक्षणमे कवयित्री, नव पीढ़ी, भिन्न सामाजिक अनुभव आ भाषिक प्रयोगक समावेशक प्रश्न उठब स्वाभाविक अछि। निबन्ध एहि व्यापक विमर्शक एकटा उपयोगी आरम्भिक मानचित्र प्रदान करैत अछि, अन्तिम आ पूर्ण सूची नहि।
८. कविता मे जीवनानन्द (पृ. ११५–१२२)
जीवन आ कविता
एहि अन्तिम मूल अध्यायमे कविता आ जीवनक सम्बन्ध अधिक आत्मीय, संवेदनापरक आ दार्शनिक रूप ग्रहण करैत अछि। जीवनानन्द केँ सतही उल्लास नहि बुझबाक चाही; दु:ख, अपूर्णता, आशा, स्मृति, प्रेम, प्रकृति, प्रतिकूलता आ मानवीय जिजीविषाक बीच जीवनक अर्थक खोज कविता मे रूपायित होइत अछि।
निबन्धक उद्धरण सभ संकेत करैत अछि जे सौन्दर्यक अनुभूति दुःखक अस्वीकार नहि, बरु ओकर मानवीय रूपान्तरण सम्भव करैत अछि। भाव आ विचारक सङ्गति कविताकेँ जीवनक साधारण क्षणमे असाधारण अर्थ देखबाक शक्ति दैत अछि।
काव्यक मानवीय पक्ष
जीवनानन्दक काव्यात्मक स्वरूप अनेक प्रकारेँ व्यक्त होइत अछि—भाषाक सहजता, प्रकृतिक नव अनुभूति, आन्तरिक उन्मुक्ति, सम्वेदना, निराशाक बीच आशाक उपस्थितिक रूपमे। जे कविता मनुष्यक अनुभवक गहराई पकड़ैत अछि, से पाठकक एकान्तमे सहचर बनि सकैत अछि।
एहि निबन्धकेँ पोथीक पहिल अध्यायक संग पढ़ला पर एकटा वैचारिक वृत्त पूरा होइत अछि : शुरुआतमे आधुनिक बोधक प्रश्न छल, अन्तमे मानवीय जीवनानुभवक प्रश्न। आधुनिकताक मूल्य केवल नूतन रूप-विन्यास नहि, मनुष्यक अनुभूतिक सार्थक विस्तारमे अछि।
समापनक महत्त्व
अन्तिम अध्याय ग्रन्थक आलोचनात्मक गाम्भीर्यकेँ संवेदनात्मक निष्कर्ष दैत अछि। बिम्ब, रूप, परम्परा आ आलोचनाक बहस अन्ततः जीवनक अनुभव सँ दूर नहि रहि सकैत—ई पोथीक समग्र अन्तर्धाराक रूपमे पढ़ल जा सकैत अछि।
परिशिष्ट : वीरेन्द्र मल्लिक सँ लक्ष्मण झा सागरक अन्तरङ्ग वार्ता (पृ. १२३–१४४)
परिशिष्टमे संवाद-रूप अपनाओल गेल अछि। प्रश्नकर्ता लक्ष्मण झा सागर आ उत्तरदाता वीरेन्द्र मल्लिकक बीच साहित्य, काव्यरचना, मैथिलीक स्थिति, आधुनिकता, आलोचना, साहित्य-साधना, अध्ययन आ मानवीय सरोकारपर विमर्श भेटैत अछि। ई वार्ता सिद्धान्तप्रधान मुख्य अध्याय सभकेँ लेखकक आत्मविचार आ साहित्यिक व्यक्तित्वक सन्दर्भ दैत अछि।
संवादमे साहित्यिक प्रतिष्ठासँ बेसी महत्त्व साधना, सतत अध्ययन आ कृतिक सच्चाईकेँ भेटैत अछि। साहित्य-सृजनक लेल अध्ययनक महत्त्व, भाषाक सांस्कृतिक शक्ति, समकालीन काव्यप्रवृत्ति आ संस्थागत उपाधिसँ भिन्न वास्तविक साहित्यिक कर्मक प्रश्न अनेक स्थानपर उभरैत अछि। वार्तामे भारतीय आ विश्वसाहित्यक प्रसङ्गक उल्लेख लेखकक व्यापक पाठकीय रुचिक संकेत अछि।
अन्तरङ्ग वार्ताकेँ निष्पक्ष इतिहासक एकमात्र प्रमाण नहि मानबाक चाही। ई लेखकक स्वयं प्रस्तुत कएल विचार, चयनित स्मृति आ मूल्यबोधक दस्तावेज अछि। ताहि कारण एहि सामग्रीकेँ स्वतन्त्र पुस्तक-सूची, कालक्रम आ बाह्य साक्ष्यसँ मिलान कएने बिना अंतिम जीवनी-सत्यक रूपमे प्रस्तुत करब उचित नहि। तथापि रचनाकारक आलोचनात्मक चिन्तन बुझबाक लेल परिशिष्ट विशेष उपयोगी अछि।
समेकित विवेचन : आठ अध्यायक वैचारिक सूत्र
१. परम्परा आ नवता
पहिल, दोसर, चारिम आ पाँचम निबन्ध एकटा साझा सिद्धान्तपर अवलम्बित बुझाइत अछि : साहित्य अपन पूर्वपरम्परासँ पोषण प्राप्त करैत अछि आ नूतन ऐतिहासिक परिस्थितिमे ओकर नव अर्थ रचैत अछि। काव्य-परम्परा आ रामकथाक पुनर्लेखन एहि प्रक्रियाक अलग-अलग उदाहरण अछि।
२. काव्यक रूप आ अनुभूति
तेसर आ आठम अध्याय रूपसौन्दर्य आ अनुभवक अन्तःसम्बन्ध स्पष्ट करैत अछि। बिम्ब-विधानक युक्ति तखन सजीव अछि जखन से मानसिक, भावात्मक अथवा सामाजिक अनुभवक मूर्त रूप हो। जीवनानन्दक प्रश्न अन्ततः काव्य-रूपक मानवीय प्रयोजनपर प्रकाश दैत अछि।
३. आलोचनाक आत्मपरीक्षण
छठम आ सातम अध्याय आलोचना आ समकालीन सृजनक आपसी निर्भरता देखबैत अछि। नूतन कविता केँ विवेकपूर्ण आलोचना चाही; आ आलोचनाकेँ नव कृतिक निकटसँ अध्ययन करैत स्वयं अपन मानदण्ड संशोधित करबाक तत्परता चाही।
४. मैथिली-केंद्रित, विश्व-संवादी दृष्टि
पोथीक अनेक निबन्धमे मैथिली पाठक सङ्ग संस्कृत, भारतीय आ पाश्चात्य काव्यविचारक संवाद जुड़ैत अछि। एहि दृष्टिक सबल पक्ष भाषिक आत्मविश्वास अछि : मैथिलीकेँ केवल क्षेत्रीय सांस्कृतिक वस्तुक रूपमे नहि, जटिल काव्यशास्त्रीय चर्चाक समर्थ माध्यमक रूपमे व्यवहृत कएल गेल अछि।
ग्रन्थक उपलब्धि आ अनुसन्धानक सम्भावित क्षेत्र
प्रमुख उपलब्धि : (क) मैथिली साहित्यक आन्तरिक मूल्यबोध आ व्यापक काव्यशास्त्रक समन्वय; (ख) सैद्धान्तिक प्रतिपादन संग कविता-पाठक प्रयोग; (ग) रामकाव्यक ऐतिहासिक आ तुलनात्मक सन्दर्भ; (घ) समकालीन आलोचनाक नैतिक प्रश्न; (ङ) रचनाकारक साक्षात्कार द्वारा विचारक आत्मपक्ष।
अग्रेतर अनुसन्धान : (क) ग्रन्थमे उद्धृत काव्यांश सभक प्रमाणिक मूल-संस्करणसँ पाठान्तर-मिलान; (ख) मैथिली काव्यक बिम्ब-विधानक तुलनात्मक कोष; (ग) रामकथाक मैथिली रूपान्तर सभक स्रोतसमीक्षा; (घ) आधुनिक मैथिली कवितामे स्त्री आ बहिष्कृत अनुभवक प्रतिनिधित्व; (ङ) आलोचना-पद्धतिक ऐतिहासिक विकास; (च) परिशिष्टमे उल्लिखित साहित्यिक तथ्यक स्वतन्त्र अभिलेखीय सत्यापन।
एकटा अनुसन्धानात्मक सावधानी अनिवार्य अछि : ग्रन्थमे उपस्थित लेखकक आलोचनात्मक निर्णयकेँ यथावत् उद्धृत करब आ ओकर सत्यापन करब दू अलग बौद्धिक प्रक्रिया छथि। ई समीक्षा मूल पोथीक विचार-संरचनाकेँ प्राथमिक मानि चलैत अछि; विस्तृत ग्रन्थ-सूची वा समीक्षकीय बाह्य प्रमाणक अभावमे अनावश्यक तथ्य-दाबी नहि करैत अछि।
समापन
‘प्रथम पुरुष’ मैथिली काव्य-चिन्तनक भिन्न क्षेत्रकेँ एकहि जिल्दमे आनयवला आलोचनात्मक संकलन अछि। परम्परा-विमर्शसँ शुरू भऽ काव्यवैभव, बिम्बशास्त्र, रामकाव्य, तुलनात्मक स्रोतचर्चा, आलोचनात्मक संकट, समकालीन कविता आ जीवनानन्द धरि एकर यात्रा विषयगत रूपसँ विस्तृत अछि। परिशिष्टक अन्तरङ्ग वार्ता एहि यात्राकेँ लेखकक वैचारिक व्यक्तित्वसँ जोड़ैत अछि।
पोथीक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संकेत ई अछि जे मैथिली साहित्यक अध्ययनक लेल भाषिक आत्मीयता पर्याप्त नहि; पाठक सूक्ष्म निरीक्षण, व्यापक सन्दर्भज्ञान, रूप-विवेक आ स्वतन्त्र आलोचनात्मक निर्णय समान रूपसँ आवश्यक अछि। एहि आधारपर ग्रन्थ मैथिली साहित्यिक अनुसन्धानमे नूतन प्रश्न उठेबाक आ विधिसम्मत पाठालोचनाक प्रेरणादायी सामग्री प्रदान करैत अछि।
अध्याय ४ • वीरेन्द्र मल्लिकक साहित्य
नाटक आ रंगमंच
नौ अध्याय आ दू परिशिष्ट • रंगशिल्प, एकांकी, लोकनाट्य आ मिथिलाक रंगपरम्परा
१. मैथिली नाटक आ रंगमंच : स्थिति आ भविष्य
एहि अध्यायमे भारतीय नाट्यपरम्पराक उद्गमसँ मैथिली नाटकक ऐतिहासिक विकास आ आधुनिक मैथिली रंगमंचक भविष्यधरि व्यापक सामग्री एकत्र कयल गेल अछि। लेखक नाट्यग्रन्थ, वास्तविक मंचन आ मैथिल समाजक सांस्कृतिक जीवनकेँ एक-दोसरसँ जोड़ि देखैत छथि।
१.१ नाटकक उत्पत्ति
अध्यायक आरम्भ नाटकक उत्पत्ति-प्रश्नसँ होइत अछि। नाट्यक उद्भवकेँ धार्मिक अनुष्ठान, सामूहिक अभिव्यक्ति, गीत-संगीत, अभिनय आ प्राचीन नाट्यविचारक पृष्ठभूमिमे राखल गेल अछि। नाट्यशास्त्रीय परम्पराक उल्लेख लेखकक प्रारम्भिक तर्ककेँ भारतीय सांस्कृतिक सन्दर्भ प्रदान करैत अछि।
कथाक लिखित रूप आ कथाक मंचीय रूपमे भिन्नता अछि। नाटकक उत्पत्तिक चर्चा करैत दूनूक सम्बन्ध स्थापित कयल जाय तँ नाट्यइतिहास अधिक समग्र बनैत अछि।
१.२ नाटकक समृद्ध परम्परा आ महत्त्व
भरतमुनिक नाट्यशास्त्र, भास, शूद्रक, कालिदास, भवभूति आ संस्कृत नाट्यशास्त्रीय परम्पराक उल्लेखसँ लेखक भारतीय नाटकक इतिहासक समृद्ध स्वरूप रेखांकित करैत छथि। अभिनय, रस, पात्र, कथावस्तु आ प्रेक्षक-संबन्धक महत्त्व एहि विमर्शमे अन्तर्निहित अछि।
भारतीय नाट्यपरम्परामे नाटक साहित्यक संग प्रदर्शन-कला सेहो रहल अछि; तेँ ओकर मूल्यांकन केवल लिखित संवादक सौन्दर्य धरि सीमित नहि होयबाक चाही।
१.३ मैथिली नाटकक उद्भव
मैथिली नाटकक उद्भवक प्रश्नमे भाषा, भूगोल, कालक्रम आ प्राचीन ग्रन्थपरम्परा सभ जोड़ल अछि। लेखक मैथिलीक आरम्भिक नाट्यरचनाकेँ व्यापक पूर्वभारतीय नाट्यपरम्पराक सन्दर्भमे देखैत छथि।
ऐतिहासिक अनुसन्धानमे नाटकक रचनाकाल, उपलब्ध पाण्डुलिपिक काल आ वास्तविक मंचनक प्रमाण तीनू पृथक् करबाक चाही। एहि भिन्नतासँ प्राचीनताक दावाक अधिक विश्वसनीय परीक्षण सम्भव होइत अछि।
१.४ आधुनिक भारतीय नाटकक विकास
एहि उपखण्डमे भारतीय नाटकक आधुनिक विकास, रचनात्मक परिवर्तन आ आधुनिक रंगमंचसँ ओकर सम्बन्धक विवेचन अछि। सामाजिक विषय, पात्र-निर्माण आ मंचन-पद्धतिक परिवर्तन आधुनिक नाट्यविकासक आवश्यक प्रसंग अछि।
मैथिली नाटकपर आधुनिक भारतीय रंगचेतनाक प्रभावकेँ स्थानीय सामाजिक परिस्थिति आ उपलब्ध रंग-साधनक सन्दर्भमे जाँचना उचित होयत।
१.५ प्राचीन मैथिली नाटक : मैथिली धूर्त समागम आ गोरक्ष-विजय
अनुक्रमणिकामे प्राचीन मैथिली नाटक अन्तर्गत ‘मैथिली धूर्त समागम’ आ ‘गोरक्ष-विजय’ विशेष रूपसँ उल्लिखित अछि। पहिल कृतिक चर्चामे व्यंग्य, सामाजिक आचरण आ नाट्य-संवादक प्रश्न महत्त्वपूर्ण होइत अछि; दोसरक सन्दर्भमे धार्मिक-आध्यात्मिक आख्यानक नाट्यरूप प्रमुख चर्चा थिक।
एहि रचनासभकेँ एकरस आधुनिक गद्यनाटकक संरचनामे परखब उचित नहि; प्राचीन नाटकक भाषा-मिश्रण, गीत, आख्यान आ मंचीय परम्परा स्वतंत्र कसौटी माँगैत अछि।
१.६ मध्यकालीन मिथिलामे विकसित नाटक : पारिजात हरण
मध्यकालीन मिथिलाक नाट्यविकासमे ‘पारिजात हरण’क विशिष्ट स्थान अछि। गीत, भक्ति, पौराणिक कथावस्तु आ प्रस्तुति-धर्मिता एकरा नाट्यइतिहासक महत्त्वपूर्ण सूत्र बनबैत अछि। कीर्तनिया नाटकक प्रसंग एहिठाम अनिवार्य रूपसँ उपस्थित होइत अछि।
गीतप्रधान कृतिक मंचनीयता आधुनिक संवादप्रधान नाटकसँ भिन्न होइत अछि। ताहि कारण मध्यकालीन नाटकक अध्ययनमे संगीतक स्थानकेँ मुख्य विवेचनसँ अलग नहि करबाक चाही।
१.७ नेपालमे विकसित नाटक
नेपालमे मैथिली नाटकक विकास, दरबारी संरक्षण आ भाषिक-सांस्कृतिक सम्पर्क पर लेखक विशेष ध्यान दैत छथि। मल्लकालीन परिवेशमे मैथिली नाट्यरचनाक इतिहास एक व्यापक भू-सांस्कृतिक परम्पराकेँ उद्घाटित करैत अछि।
आधुनिक राजनीतिक सीमाक आधारपर पुरान साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्पराकेँ बाँटब भ्रामक भऽ सकैत अछि। नेपालमे विकसित कृतिक मूल भाषा, लेखकीय सम्बन्ध आ प्रस्तुति-परिवेशक पृथक् परीक्षण अपेक्षित अछि।
१.८ नेपालमे विकसित नाटकक विशेषता
नेपालक मैथिली नाट्यपरम्परामे दरबारी वातावरण, गीत, धार्मिक आख्यान आ बहुभाषिक प्रयोगपर विमर्श कयल गेल अछि। एकरा केवल मैथिलीभाषी क्षेत्रक विस्तार नहि, बरु अभिनव नाट्य-परिवेशक रूपमे बुझबाक सम्भावना अछि।
नाटकक लिखित भाषा आ मंचपर प्रयुक्त गायन-भाषा प्रत्येक स्थितिमे समान होयब अनिवार्य नहि। एहि तथ्यपर विचार कयने बिना नेपालक मैथिली नाटकक मूल्यांकन अपूर्ण रहत।
१.९ आरम्भिक मैथिली नाटक आ अंकिया नाटक केर विशेषता
आरम्भिक मैथिली नाटकक चर्चा क्रममे लेखक ‘अंकिया नाट’ केर विशेषताक सेहो उल्लेख करैत छथि। गीत, नृत्य, धार्मिक कथावस्तु आ सामूहिक प्रस्तुति एकर तुलनात्मक अध्ययनक महत्त्वपूर्ण प्रसंग अछि।
पूर्वोत्तर भारतीय नाट्यपरम्परासँ मैथिली नाट्यसाहित्यक सम्बन्धक प्रश्नमे प्रभावक दिशा स्वतः निश्चित नहि मानल जाय; कालक्रम आ उपलब्ध पाठक तुलनात्मक प्रमाण आवश्यक अछि।
१.१० आधुनिक मैथिली नाटक
आधुनिक मैथिली नाटकमे सामाजिक समस्या, पारिवारिक सम्बन्ध, नैतिक प्रश्न, राजनीतिक चेतना आ व्यक्तिक संघर्ष नवीन कथ्यक रूपमे प्रवेश करैत अछि। उपन्यासक समान नाटक सेहो बदलैत मैथिल समाजक अनुभवकेँ अभिव्यक्ति दैत अछि; मुदा नाटकमे दृश्यात्मक संकेन्द्रण विशेष आवश्यक अछि।
आधुनिकता केवल नव तिथिक नाम नहि; नाटकक प्रश्न, संवाद, नाट्यसंरचना आ रंगप्रयोगक परिवर्तनक आधारपर ओकर विशेषता निर्धारित होइत अछि।
१.११ स्वातन्त्र्योत्तर मैथिली नाटक
स्वाधीनताक बाद मैथिली नाट्यलेखनमे सामाजिक परिवर्तन, शहरीकरण, ग्रामीण संकट, शिक्षा, परिवार आ व्यक्ति-संघर्षक विविध रूप देखल जाइत अछि। लेखक एहि कालखण्डक नाटक आ नाटककारसभक विस्तारपूर्वक चर्चा करैत छथि।
नाट्येतिहास लिखैत कृतिक प्रकाशन-वर्ष आ पहिल मंचन-वर्षकेँ अलग राखब आवश्यक अछि; कथ्यक नवता आ मंचीय नवता दुनू समानार्थक नहि।
१.१२ मैथिली रंगनाटक
लेखक ‘मैथिली रंगनाटक’क चर्चा करैत नाटकक रंगमंचीय संभावना, अभिनय-धर्मिता आ प्रेक्षकसम्बन्धी प्रश्न उघारैत छथि। लिखित ग्रन्थ आ रंगनाटकक सफल प्रस्तुति अपन-अपन प्रक्रिया माँगैत अछि।
रंगनाटकक अध्ययनमे दृश्य-क्रम, प्रवेश-निर्गमन, मंचीय वस्तु, रंग-संकेत आ अभिनयक व्यावहारिक अनुकूलता विशेष जाँचनीय अछि।
१.१३ रंगमंचक सुदीर्घ परम्परा
रंगमंचक विकासक्रम भारतीय आ पाश्चात्य दूनू सन्दर्भमे निरूपित अछि। प्रस्तुति-स्थान, दर्शक-व्यवस्था आ अभिनय-साधनक विकास रंगपरम्पराकेँ रूप प्रदान करैत अछि।
रंगमंचकेँ केवल भवन नहि, एक सामाजिक-सांस्कृतिक सम्बन्ध-व्यवस्था मानल जाय। रंगप्रयोगक समय दर्शक, अभिनेता आ स्थानक अन्तःक्रिया आवश्यक अछि।
१.१४ आधुनिक भारतीय रंगमंच
आधुनिक भारतीय रंगमंचमे प्रशिक्षण, प्रकाश, दृश्य-सज्जा, अभिनय-पद्धति आ नाट्य-निर्देशनक नूतन आयाम विकसित भेल। मैथिली रंगमंच एहि परिवेशसँ पूर्णतः पृथक् नहि छल।
मिथिलाक संसाधन, दर्शक-वर्ग आ भाषा-परिवेशक अनुरूप नव तकनीकक स्वीकार अधिक फलदायक होयत, न कि पाश्चात्य नमूनाक यान्त्रिक अनुकरण।
१.१५ समकालीन भारतीय रंगमंच
समकालीन रंगप्रयोगमे परम्परागत प्रस्तुति आ नवीन नाट्यभाषाक बीच निरन्तर संवाद चलैत अछि। लेखक एहि विकासक सन्दर्भमे मैथिली रंगमंचक अवस्थाक समीक्षा करैत छथि।
नव प्रयोगक मूल्यांकन केवल बाहरी कौतुकसँ नहि, कथ्यक अनुकूलता आ दर्शकक अनुभूतिसँ करबाक चाही।
१.१६ मैथिली रंगमंचक परम्परा
मैथिली रंगमंचक इतिहासमे लोकाभिनय, कीर्तनिया नाटक, धार्मिक प्रस्तुति, शौकिया मण्डली आ नगर-आधारित रंगसंस्था सभक योगदान रहल अछि। एहि विविध धाराक एक संयुक्त इतिहास लिखब लेखकक महत्त्वपूर्ण प्रयत्न अछि।
लेखित नाटकक इतिहास, प्रचलित लोकाभिनय आ अभिलेखित मंचन—तीन प्रकारक स्रोतक समान महत्त्व स्वीकार कयल जाय।
१.१७ आधुनिक मैथिली रंगमंच
आधुनिक मैथिली रंगमंचक प्रयत्नमे नाट्यसंस्था, कलाकार, निर्देशक, रंग-प्रशिक्षण आ आयोजकक भूमिका महत्त्वपूर्ण अछि। मंचनक नियमितता आ आर्थिक-संस्थागत समर्थनक प्रश्न निरन्तर उपस्थित रहैत अछि।
मौलिक मैथिली नाटकक मंचन बढ़ेबाक लेल नाट्य-कार्यशाला, पुस्तकालय, चलन्त रंगमंडली आ दृश्य-ध्वनि अभिलेखागार उपयोगी भऽ सकैत अछि।
१.१८ मैथिली नाटक एवं रंगमंचक भविष्य
अध्यायक अन्तिम भाग मैथिली नाट्यक भविष्य, मौलिक रचना आ रंगमंचीय संरचनाक समस्यापर केन्द्रित अछि। लेखक साहित्यिक सृजन आ सक्रिय रंगकर्मक परस्पर सहयोगक प्रश्नकेँ महत्त्व दैत छथि।
सजग आलोचना, नव नाटककारक प्रोत्साहन, नियमित प्रस्तुति, कलाकार-प्रशिक्षण आ विविध दर्शक-समुदायसँ संवाद मैथिली रंगमंचक विकास लेल व्यवहार्य दिशा अछि।
प्रथम अध्यायक समेकित निष्कर्ष
प्रथम अध्याय मैथिली नाटकक एक ऐतिहासिक मानचित्र प्रस्तुत करैत अछि। एकर प्रमुख विशेषता ई छैक जे लेखक प्राचीन आख्यान, नेपालक नाट्यपरम्परा, आधुनिक नाटक आ समकालीन रंगकर्मकेँ एके विस्तृत विमर्शमे राखैत छथि। तथापि कालक्रम, प्रभाव आ प्रस्तुति-इतिहासक प्रत्येक दावा लेल मूल अभिलेखक स्वतंत्र अध्ययनक आवश्यकता बनल रहैत अछि।
२. रंगमंच आ एकांकी नाटक : संबंध-सूत्रता
एहि अध्यायमे रंगमंचक परिभाषा, भारतीय-पाश्चात्य मंच-विधान, आधुनिक एकांकीक तत्त्व आ मैथिली प्रतिनिधि रंग-एकांकीक विवेचन अछि। साहित्यिक रचना आ मंचीय प्रस्तुति कतेक निकटता राखैत अछि—ई अध्यायक मूल प्रश्न थिक।
२.१ ‘रंगमंच’ आ ओकर सुदीर्घ परम्परा
लेखक रंगमंच शब्दक व्युत्पत्ति, उपयोग आ नाट्यप्रस्तुतिक स्थल-सम्बन्धी विविध अर्थक चर्चा करैत छथि। रंगमंचक अर्थ केवल भूमि अथवा भवन नहि, बरु क्रिया, कलाकार आ दर्शकक संयुक्त उपस्थिति अछि।
नाट्यग्रन्थक शब्द दर्शकक समक्ष प्रकाश, गति, ध्वनि आ अभिनयक रूपमे बदलैत अछि; एहि कारण रंगमंच नाटकक पुनःसृजनक क्षेत्र थिक।
२.२ भरतक रंगमंच : आकार आ प्रकार
नाट्यशास्त्रीय रंगमण्डप, मंचक आकार, दर्शकक स्थान, प्रदर्शनक अनुकूलता आ अभिनयसँ सम्बन्धित व्यवस्थाक उल्लेख भेटैत अछि।
वास्तु-विधानक चर्चा नाटकक सौन्दर्यक चर्चा सँ अलग नहि; दृश्यता, श्रवणक्षमता आ उपस्थितिक नाटकीय सम्बन्ध मंचरचनासँ प्रभावित होइत अछि।
२.३ पाश्चात्य रंगमंच
पाश्चात्य परम्पराक नाट्यगृह, दर्शकक विन्यास आ अभिनय-क्षेत्रक भिन्न रूपक परिचय देल गेल अछि। एतय मंचीय परम्पराक ऐतिहासिक परिवर्तन देखल जा सकैत अछि।
पाश्चात्य रंगरूपक तुलना करैत मैथिली रंगमंचक पारम्परिक खुला तथा सामुदायिक मंचीय रूपक अपने गुणकेँ नहिं बिसरबाक चाही।
२.४ आधुनिक रंगमंच : आकार-प्रकार
आधुनिक रंगमंचक चर्चा क्रममे मुक्ताकाशी, प्रोसीनियम, एरीना, बहुस्तरीय, बॉक्स-सेट, घूमनिहार आ अन्य मंचीय प्रयोगक परिचय अछि। एहि विविध रूपमे कलाकार-दर्शकक भौतिक दूरी आ दृश्य-सीमाक अन्तर नाटकीय अर्थक निर्माण करैत अछि।
मंचक चयन नाटकक कथा, पात्रक गति, उपलब्ध प्रकाश-साधन आ दर्शकवर्गक आवश्यकता अनुसार होयबाक चाही।
२.५ रंगमंचक सर्जक : अभिनेता, परिचालक आ अभिकल्पक
लेखक रंगमंचक सर्जकसभमे अभिनेता, परिचालक आ अभिकल्पकक भूमिका अलग-अलग चिन्हित करैत छथि। नाटककारक पाठ निर्देशकक योजना आ अभिनेताक क्रियाक माध्यमसँ मंचपर उपस्थित होइत अछि।
नाट्यप्रस्तुति सामूहिक सर्जना थिक। निर्देशक एकर समग्र विन्यास करैत छथि, मुदा अभिनेता आ अन्य सहयोगी स्वयं रचनात्मक भागीदार रहैत छथि।
२.६ हमर मैथिली रंगमंच
मैथिली रंगमंचक सामाजिक-भाषिक आधार, रंगसाधन आ संस्थागत विकासक प्रश्न एहि प्रसंगमे उठैत अछि। स्थानीय भाषा आ जीवनक परिचय नाट्यप्रस्तुतिक विशिष्ट शक्ति बनि सकैत अछि।
मैथिली रंगमंचक सफलता लेल स्थानीय बोलीक स्वाभाविकता, प्रेक्षकक सांस्कृतिक समझ आ आधुनिक रंगप्रयोगक सन्तुलन आवश्यक अछि।
२.७ एकांकी : स्वरूप, परिभाषा आ वर्गीकरण
एक अंकमे सीमित नाटककेँ एकांकी कहि सकैत छी; मुदा एकर मूल गुण संकेन्द्रित नाटकीय क्रिया, सीमित पात्र, समय-संयम आ तीव्र प्रभाव अछि। लेखक एकांकीक प्रकार आ रचनात्मक विशेषताक चर्चा करैत छथि।
लघु होयब मात्र एकांकीक पर्याप्त कसौटी नहि। एकता, तनाव आ एक केन्द्रक दिस घटनाक गति एकांकीक नाटकीय शक्ति प्रदान करैत अछि।
२.८ आधुनिक एकांकी : तत्त्व आ विशेषता
अनुक्रमणिकामे कथानक, पात्र, संवाद, देश-काल, भाषा-शैली, उद्देश्य, गति आ रंग-संकेत अलग-अलग तत्त्वक रूपमे उल्लिखित अछि। लेखक एहि सभक उपयोगिता सम्यक् रूपसँ विवेचित करैत छथि।
एकांकीमे प्रत्येक संवाद, प्रवेश आ दृश्य-संकेतक कथ्यसँ सम्बन्ध होयबाक चाही; अनावश्यक विस्तार एकर प्रभाव कम करैत अछि।
२.९ एकांकीक आठ प्रमुख तत्त्व
२.१० प्रतिनिधि मैथिली रंग एकांकी : सम्पूर्ण शीर्षक-सूची
मूल अनुक्रमणिकामे निम्नलिखित एकांकीसभक स्वतंत्र चर्चा अछि। ई सम्पूर्ण सूची एहि समेकित अध्ययनमे सुरक्षित राखल गेल अछि; प्रत्येक कृतिक पूर्ण कथासार मूल एकांकीक स्वतंत्र पाठक बिना गढ़ल नहि गेल अछि।
२.१०.1 अयाची मिश्र
एहि एकांकीक नाम मिथिलाक विद्या, त्याग आ सांस्कृतिक स्मृतिक प्रसंग उपस्थित करैत अछि। एकर आलोचनामे ऐतिहासिक व्यक्तित्वक नाट्यरूप, संवादक अनुकूलता आ दृश्य-परिवेशक प्रश्न मुख्य मानल जा सकैत अछि।
२.१०.2 जय जन्मभूमि
एहि शीर्षकमे जन्मभूमिसँ भावात्मक सम्बन्ध आ देशप्रेमक स्वर स्पष्ट अछि। नाटकीय प्रभावक परीक्षणमे आदर्श-वचन आ पात्रक जीवित अनुभवक सामञ्जस्य आवश्यक मानल जाय।
२.१०.3 जीवन संघर्ष
जीवनक संघर्षमूलक परिस्थिति एहि शीर्षकक मुख्य संकेत थिक। पात्रक स्थितिकरण, निर्णायक मोड़ आ नाटकीय संकेन्द्रणक आधारपर एकर अध्ययन उपयोगी अछि।
२.१०.4 ब्रह्म स्थान
एहि रचनाक प्रसंगमे लोकविश्वास, सामाजिक व्यवहार आ परम्परागत मान्यतासँ जुड़ल प्रश्नक आलोचना उपयुक्त अछि। पात्रक आचरणकेँ कथावस्तुक वास्तविक साक्ष्यसँ जोड़ि पढ़ब आवश्यक अछि।
२.१०.5 हथुट्टा कुर्सी
ग्रामीण परिवेश, शिक्षाक अवस्था अथवा सामाजिक संबंधक संकेतक जाँच एहि नाट्यशीर्षकक आलोचनामे अपेक्षित अछि। दृश्य आ वस्तु-प्रयोगक नाटकीय अर्थ विशेष ध्यानाकर्षक भऽ सकैत अछि।
२.१०.6 मिथिलाक प्रतिनिधि
एहि शीर्षकमे प्रतिनिधित्व आ सामाजिक दावाक प्रश्न उपस्थित अछि। संवाद, विडम्बना आ पात्रक कथनी-करनीक अन्तर नाट्यालोचनाक सम्भावित आधार अछि।
२.१०.7 मुनरीक मोल
मूल कृतिक नाम ‘मुनरीक मोल’ मूल्य, मानवीय सम्बन्ध अथवा सामाजिक व्यवहारक प्रश्न उठबैत अछि। एकर कथावस्तुक विशिष्ट घटना बिना मूल पाठक प्रमाणक अनुमानसँ निर्धारित नहि कयल गेल अछि।
२.१०.8 मुनिक मतिभ्रम