गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल वृषेश चन्द्र लाल
Videha Issue 451 · Research article continuation 2
ग. छन्द आ पंक्ति-संयम
कवि लोकलयपर भरोसा करैत छथि; ई सबलता अछि। तथापि कतेको ठाम पंक्तिक लम्बाइ, यति आ ध्वनि-भार एकरूप नहि रहैत अछि। यदि गीत रूपमे अभिप्रेत रचनासभक स्वरलिपि/ताल-संकेत वा स्पष्ट आवर्त-पंक्ति विन्यास देल जाए, पाठक लय बेहतर पकड़ि सकत।
घ. दृश्य-सामग्रीक एकरूपता
चित्र बहु उपयोगी, मुदा कलात्मक शैलीक असमानता पुस्तकक समेकित दृश्य-परिचय कमजोर करैत अछि। मौलिक मिथिला-चित्रांकन वा एकरूप कृष्ण-श्वेत रेखांकनक नवीकरणीय सम्भावना अछि।
ङ. टंकण आ वर्तनी
पुस्तकमे संपादकीय प्रूफ-पठनक आर एक चक्र आवश्यक बुझाइत अछि। खास कऽ मात्रा, संयुक्ताक्षर, विस्मय/प्रश्नचिह्न, शब्द-विराम, शीर्षक-रूप, अंकीय संकेत आदि एकरूप कएल जाए।
च. सामाजिक विषयक बहुस्वरता
वंचित, स्त्री, मजदूर, गरीब आदिक पक्षधरता स्पष्ट अछि; अगिला चरणमे एहि पात्रसभकेँ कविक दया वा आक्रोशक विषय नहि, अपन स्वतंत्र आवाज, स्मृति, हास्य, इच्छा आ विरोध सहित बहुआयामी व्यक्ति बनाओल जा सकैत अछि।
भाषा-शैली आ शिल्प-विधान
वृषेश चन्द्र लालक भाषा लोकमूलक, मुहावरात्मक आ सीधा-सादा छथि। संस्कृतनिष्ठ शब्दाडम्बरकेँ स्थान नहि देत, ओ लोकोक्ति, मुहावरा, सरल छन्द-स्थापना आ पुनरुक्ति (repetition/refrain)क प्रभावकेँ आधार बनबैत छथि, जेना लोकगीत, होरी-जोगिरा आ मंगल-गीतक परम्परासँ चलि आएल अछि। भूमिकामे सेहो एहि बातक पुष्टि भेटैत अछि, जे पहिल मैथिली टेलीफिल्ममे प्रयुक्त गीत ‘कत्तसँ शुरू हम करू’ जेना भ्रष्टाचार-विरोधी रचनासँ कवि पहिनहिसँ संबद्ध रहलाह।
दोसर विशेषता थिक स्थानीय प्रतीकक बहुल प्रयोग — सीता, दुर्गा, महिषासुर, शिव आदिकेँ आधुनिक सामाजिक यथार्थ बुझएबाक लेल प्रतीकक रूपमे ग्रहण कएल गेल अछि। भूमिकाकार परमेश्वर कापड़िक शब्दमे, कविक रचनासंसारक आयाम बहुत विस्तृत अछि आ एकर परिधि, परिदृश्य बहुत व्यापक अछि।
डा. राजेन्द्र विमलक भाषामे कहल जाए त, संग्रहक भाषिक विशेषता एहि बातमे अछि जे ई रचना नेपालमे अनवरत् चलि रहल विभेद-अन्तक युद्धक मैदानमे युद्धरत् कविहृदय सेनानी-स्रष्टाद्वारा भेल अछि — एहि लेल इमहर पाठक जेना श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्रक बीचमे ठाढ़ भ’ गीता सुना रहल होथि तहिना अनुभव करैत छथि।
प्रतीक-विधान : प्राचीन आ आधुनिकक संगम
एहि संग्रहक एकटा उल्लेख्य लक्षण थिक वैदिक/पौराणिक प्रतीकक समकालीन पुनर्व्याख्यान। भूमिकामे सेहो ऋग्वेद (१०/१२९/५) आ मुण्डकोपनिषद्क उद्धृति ‘प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता’ उद्धृत क’ ‘शुभे हो शुभे’ शीर्षक मंगल-गानमे नव समाजवादी-रूपान्तरणकारी अर्थ भरल गेल अछि। एहि प्रकारे, कवि परम्पराकेँ अस्वीकार नहि करैत छथि, अपितु ओकरा नव-राजनीतिक-सामाजिक चेतनासँ पुनःसंयोजित करैत छथि — जे मैथिली साहित्यक एकटा सशक्त परम्परा (लोकगीत आ भक्ति-काव्यक पुनर्व्याख्या)क विस्तार सेहो थिक।
समालोचनात्मक मूल्यांकन
शक्ति
• प्रत्यक्ष अनुभवसिद्धता : रचना राजनीतिक खोखलापनमे नहि बैसल अछि, बल्कि संघर्षक मैदानमे बनल थिक, एहि लेल स्वरमे एकटा एहन सीधापन अछि जे नकली साहित्यमे दुर्लभ अछि।
• बहुआयामी विस्तार : बाल-साहित्यसँ लऽ कऽ राजनीतिक व्यंग्य, लोकगीतसँ लऽ कऽ प्रेम-गीत, दार्शनिक स्फुटनसँ लऽ कऽ सामाजिक यथार्थवाद — एकहि संग्रहमे विधागत विविध रंग देखाइ परैत अछि।
• सामाजिक सरोकार : मुसहर समुदाय, नारी उत्पीड़न, गरीबी आदिपर लिखल कवितामे सहानुभूतिपरक प्रामाणिकता भेटैत अछि, जे बाह्य-दृष्टान्त नहि, बल्कि भीतरसँ जानल यथार्थ लागैत अछि।
सीमा
• स्थान-स्थानपर कथ्यक सीधापन एतेक स्पष्टवादी अछि जे कतोक ठाम प्रतीकात्मकताक सूक्ष्म बुनावट कम बैसि सीधा उद्घोषणा बनि जाइत छैक; मुदा ई कमजोरी अनचोके नहि छैक, बल्कि सचेत आन्दोलनकारी शैलीक मांग थिक।
• तीन खण्ड आ बहुत रास उप-विषयक कारणे संग्रहमे स्वर बेरा-बेर बदलैत अछि — बाल्यसुलभ कोमलतासँ राजनीतिक तीखापन धरि — जे एकसंग पढ़लापर कखनो-कखनो अचानक लागैत अछि।
९. समालोचक लोकनिक दृष्टिक विवेचन
पोथीक प्रारम्भमे देल गेल विद्वान् भूमिकाकार लोकनिक मन्तव्य कविक काव्य-संसारक कुञ्जी प्रदान करैत अछि, जाहिसँ कविक वैचारिक धरातलकेँ बुझबामे सहायता भेटैत अछि।
वरिष्ठ समालोचक डा. राजेन्द्र विमल कविक काव्य-चेतनाकेँ 'मानवकेन्द्रित दर्शन' (Anthropocentric philosophy) क संज्ञा दैत लिखने छथि जे कवि वृषेश चन्द्र लाल अपन मैथिली कवितासभमे नेपालीय मिथिलाभूमिक संघर्ष, सफलता-असफलता, वेदना आ उल्लासक सूक्ष्मातिसूक्ष्म चित्र नव-नव बिम्ब आ प्रतीकक माध्यमे प्रस्तुत करैत छथि। ई जीवनके ओकर सम्पूर्णतामे देखैत छथि आ अशिव-तत्वकँ शिव-तत्वमे परिवर्तित करबाक मार्गचित्र सेहो दैत छथि। डा. विमलक अनुसार, हिनक कवितासभमे कुण्ठाग्रस्तताक स्थानपर धरातलीय यथार्थक उद्दाम अभिव्यक्ति अछि, जेना श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्रक बीचमे ठाढ़ भ' गीता सुना रहल होथि।
दोसर दिस, वरिष्ठ साहित्यकार परमेश्वर कापड़ि वृषेशजीक दर्शनक व्याख्या करैत लिखैत छथि जे वैदिक उद्घोष अछि 'ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या'; मुदा वृषेशीय हुमचल आवाज अछि- 'जगत् सत्य, लोक-ब्रह्म !' कापड़िजीक अनुसार वृषेशजीक रचनागत आवाज नव-संरचनावादी, लोक-संवेगित आ रूपान्तरणकारी आन्दोलनक पक्षधर अछि। ओ हिनका बाल-गीत आ पप-गीतक ऐतिहासिकताक सेहो बखान करैत छथि। ई दुनू मन्तव्य सिद्ध करैत अछि जे वृषेश चन्द्र लालक कविता यथास्थितिवाद (Status quo) क समर्थक नहि, अपितु प्रगतिशील क्रान्तिक संवाहक थिक।
“ढोलक” आ समकालीन मैथिली काव्यपरम्परा
मैथिली कविता दीर्घकाल धरि गीत, पद, लोकधुन, भक्ति, प्रेम, ऋतु आ सामाजिक जीवनसँ पोषित रहल अछि। आधुनिक कालमे मुक्तछन्द, सामाजिक यथार्थ, राजनीतिक प्रतिरोध, व्यंग्य, शहरी अनुभव, दलित-वंचित प्रश्न, नारी-विमर्श आ व्यक्तिगत अस्तित्व-बोधक विस्तार भेल। “ढोलक” एहि दुनू धाराकेँ जोड़ैत अछि: ओकर काव्य-देह लोकलयक अछि, मुदा विषय आधुनिक नागरिक जीवनक।
देवकान्त झाक आधुनिक मैथिली साहित्यक इतिहास आधुनिक कविता मे सामाजिक चेतना, यथार्थ, प्रयोग आ मानवीय संघर्षक बढ़ैत उपस्थिति दिस संकेत करैत अछि। “ढोलक” एहि प्रवृत्तिक एक महत्त्वपूर्ण नेपाल-केन्द्रित उदाहरण अछि। संग्रहक भाषा आ राजनीतिक भूगोल भारतीय मिथिलाक केन्द्रसभसँ अलग अनुभव आनैत अछि; तें एकरा समकालीन मैथिली साहित्यक सीमा-पार चरित्रक साक्ष्यक रूपमे सेहो पढ़बाक चाही।
अंग्रेजी “Varied Verses”मे “The Musical Drum”क समावेश “ढोलक”क अन्तरभाषिक सम्भावना देखबैत अछि। मैथिली कविता जँ वैश्विक पाठक धरि पहुँचे चाहैत अछि तँ एहन सरल, सांस्कृतिक रूपेँ विशिष्ट मुदा सार्वभौमिक रूपकवाली कविता अत्यन्त उपयुक्त अछि।
१०. निष्कर्ष
समग्र रूपेँ, वृषेश चन्द्र लालक कविता-संग्रह 'ढोलक' समकालीन मैथिली काव्य-साहित्यक एकटा युगप्रवर्तक आ कालजयी कृति थिक। ई पोथी एहि बातक अकाट्य प्रमाण थिक जे राजनीति आ साहित्य जखन एकहि प्रखर हृदयमे समन्वित होइत अछि, तखन ओतए कोनो दलगत संकीर्णता नहि, अपितु समाजक अन्तिम जन (Subaltern) प्रति अगाध करुणा, मानवीय मूल्यक अन्वेषण आ न्यायप्रियताक जन्म होइत अछि। कविक राजनीतिक बन्दी-जीवन, लोकतान्त्रिक संघर्ष आ मिथिला-मधेशक अधिकारक लेल कएल गेल हुनक त्याग एहि पोथीक प्रत्येक शब्दमे ऊर्जा बनि क' धड़कि रहल अछि।
'ढोलक'क बाल-गीत जतए शिशु-मनकेँ नव युगक चुनौतीसभसँ संस्कारित करैत अछि आ ओकरा भीतर स्वतन्त्रता आ समताक बीआ बोवैत अछि, ताल-गीत लोक-हृदयकेँ अपन माटिक सांस्कृतिक सुगन्ध, विद्यापति परम्पराक शृंगार आ नव-युगीन व्यंग्यसँ आह्लादित करैत अछि। ततहीं, नाल-खण्डक गम्भीर कवितासभ शोषक सत्ता, पाखण्डी बौद्धिक वर्ग, एनजीओ संस्कृति आ दिशाहीन आधुनिकताकेँ थरथरा दैत अछि। कविक भाषाक अकृत्रिमता, ठेट मैथिली शब्दावलीक सुमधुर प्रयोग, आ बिम्ब-विधानक सजीवता एहि पोथीकेँ साहित्यिक दृष्टिें अत्यन्त समृद्ध आ जनमुखी बनावैत अछि।
नेपालक मधेश आन्दोलन, लोकतान्त्रिक चेतना आ सीमान्तीकृत वर्गक मुक्तिक जे वैचारिक पदचाप कविक राजनीतिक जीवनमे अछि, वैह पदचाप हिनकर कवितासभमे 'ढोलक'क थाप बनि क' गूञ्जि रहल अछि। आधुनिक मैथिली साहित्यक श्रीवृद्धिमे 'ढोलक' निश्चित रूपसँ एकटा अमूल्य धरोहरि आ मील-क-पाथर (Milestone) सिद्ध हएत। ई मात्र कविता-संग्रह नहि, अपितु वर्तमान युगक करेजक स्पन्दनक एकटा इमानदार, साहसिक आ ऐतिहासिक दस्तावेज थिक। एहि पोथीक पठन-पाठन आ शोध नहि केवल साहित्यक विद्यार्थीक लेल, अपितु समाजशास्त्र आ राजनीतिका अध्येताक लेल सेहो समान रूपेँ उपादेय सिद्ध हएत।
समग्र मूल्यांकन
“ढोलक”क मूल्यांकन केवल “सुन्दर कविता” वा “राजनीतिक कविता”क द्वैतमे नहि हो सकैत अछि। ई एकटा नागरिक-कवि द्वारा रचल बहुस्तरीय सार्वजनिक काव्य-पुस्तक अछि। बालकक खेल-ध्वनि, लोकगीतक ताल, मधेशक संघर्ष, जनकपुरक शहर, गरीबक पेट, स्त्रीक गरिमा, रक्तक प्रश्न, रुपैयाक व्यंग्य, आत्माक चुप्पी आ भगवानक सामने मनुष्यक असहायता—ई सभ एकहि ढोलकक अलग-अलग थाप अछि।
संग्रहक श्रेष्ठ उपलब्धि ई अछि जे ओ मैथिली कविता केँ उच्च साहित्यिक कक्षाक सीमामे बन्द नहि करैत अछि। कविता एतए गली, घर, खेत, पोखरि, स्कूल, उत्सव, सभा, आन्दोलन, अस्पताल, बाजार आ मनक अन्हार कोन धरि जाइत अछि। एहि लोकतान्त्रिक विस्तारमे कतेको रचना काव्यात्मक रूपेँ कच्चा रहि जाइत अछि, मुदा समूचा पुस्तक जीवनक ध्वनिसँ भरल अछि।
यदि एकटा चयनित “श्रेष्ठ ढोलक” संस्करण बनाओल जाए—जाहिमे लगभग ४०–५० सर्वाधिक सघन कविता, शुद्ध पाठ, एकरूप चित्रांकन, रचनाकाल/प्रसंग, शब्द-सूची, गीतक ताल-संकेत, अंग्रेजी/नेपाली अनुवाद आ आलोचनात्मक भूमिका हो—तऽ ई पुस्तक मैथिली साहित्यक सीमा-पार अध्यापन आ अनुवाद दुनू लेल अधिक प्रभावी बनि सकैत अछि। तथापि मूल ९६-रचनाक संस्करणक दस्तावेजी महत्व अलग अछि; ओकरा संक्षिप्त संस्करणसँ प्रतिस्थापित नहि, संग-संग सुरक्षित राखब उचित होयत।
निष्कर्ष
“ढोलक”क केन्द्रीय प्रश्न अछि—समाज ध्वनि केकर सुनैत अछि, कखन सुनैत अछि, आ काज समाप्त भेलापर ओकरा कोनमे किएक टाँगि दैत अछि? बाल-खण्ड एहि प्रश्नक पूर्वकथा अछि: मनुष्य जन्मतः ध्वनि, खेल आ आश्चर्यसँ भरल अछि। ताल-खण्ड बतबैत अछि जे ओ ध्वनि समुदायमे लय बनैत अछि। नाल-खण्ड देखबैत अछि जे ओहि समुदायमे असमानता, रक्त, भूख, सत्ता, प्रेम, धर्म, बाजार आ मृत्यु सभ एकहि जीवन-नालसँ जुड़ल अछि।
एहि दृष्टिसँ “ढोलक” नाम अत्यन्त सार्थक अछि। ढोलक लोकवाद्य मात्र नहि; ई समाजक देह, कविक कंठ, नागरिकक प्रतिरोध, श्रमिकक उपयोगिताक पीड़ा आ सामूहिक स्मृतिक धड़कन अछि। पोथीक काव्य-गुणवत्ता असमान रहितो ओकर सांस्कृतिक ऊर्जा प्रबल अछि। समकालीन मैथिली कविता विशेषतः नेपालक मैथिली रचनाशीलताक अध्ययनमे एहि संग्रहकेँ गम्भीरतासँ स्थान देबाक चाही।
‘ढोलक’ मात्र एकटा मैथिली कविता-संग्रह नहि, अपितु एकटा पूरा युगक ध्वनि-चित्र थिक — जाहिमे बाल्यकालक निर्दोष खेल, प्रेम-मिलनक कोमलता, आ समाजक सभसँ दबल-कुचल — मुसहर, दलित, नारी — क आर्तनाद एकसंगे गूंजैत अछि। शीर्षकमे निहित रूपकक सार्थकता — आनक लेल बाजब, अपन खुदक्क लेल मूक रहब, प्रयोगक बाद फेर कोन्हामे बान्हल रहब — सम्पूर्ण संग्रहकेँ एकटा सार्थक रूपक प्रदान करैत अछि।
कविक स्वयंक राजनीतिक आ सामाजिक संघर्षमे भोगल जीवन एहि संग्रहकेँ केवल एकटा साहित्यिक रचना नहि, अपितु एकटा सामाजिक-राजनीतिक दस्तावेज सेहो बना दैत अछि, जे मैथिली साहित्यमे प्रतिबद्ध/जन-कविताक परम्पराकेँ एकटा नवीन आ समकालीन कड़ी प्रदान करैत अछि। सामाजिक न्याय, दलित-चेतना, स्त्री-विमर्श आ भ्रष्टाचारपर राजनीतिक टीका-टिप्पणी — सभ आइक मैथिली-मिथिलांचल समाजक लेल एकरसाँ प्रासंगिक सेहो छथि।
सम्पूर्णतामे, ‘ढोलक’ मैथिली कविता-परिदृश्यमे एकटा एहन कण्ठ थिक जे उत्सवक ढोल-नाद आ संघर्षक चेतावनी-घोष दुनू एकही चामसँ बजबैत अछि — तखने चुप होइत अछि, जखन कोन्हामे बान्हल जाइत अछि, आ फेर सँ बाजबाक लेल तैयार रहैत अछि।
ग्रन्थसूची
लाल, वृषेश चन्द्र। ढोलक (मैथिली कविता-संग्रह)। सुदामा प्रकाशन, जनकपुरधाम।
मिश्र, जयकान्त। History of Maithili Literature। साहित्य अकादेमी, १९७६।
झा, देवकान्त। A History of Modern Maithili Literature: Post-Independence Period। साहित्य अकादेमी, २००४।
चौधरी, आयोध्यानाथ (सम्पा./अनु.)। Varied Verses: Representative Anthology of Contemporary Maithili Poetry।
3. गोलबा
१. साहित्यिक सन्दर्भ, लेखकक वैचारिक पृष्ठभूमि आ कृतिक महत्त्व
मैथिली कथा-साहित्यक विकास-क्रममे समकालीन समय विविध वैचारिक, मनोवैज्ञानिक आ शिल्पगत प्रयोगक साक्षी रहल अछि। राजकमल चौधरीक मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद, ललितक आञ्चलिकता, आ सुधांशु शेखर चौधरीक सामाजिक चेतनाक परम्परासँ आगाँ बढ़ैत समकालीन कथाकारसभ नव-नव विषयवस्तु, महानगरीय संत्रास आ बदलि रहल गामक समाजशास्त्रीय विखण्डनकें कथाक मुख्य विषय बनेलन्हि अछि। एहि ऐतिहासिक विकास-क्रममे नेपालक लोकतान्त्रिक आन्दोलनक शीर्षस्थ चिन्तक, प्रखर राजनीतिकर्मी आ विशिष्ट साहित्यकार वृषेश चन्द्र लालक कथा संग्रह 'गोलबा' एकटा युगान्तकारी आ गम्भीर साहित्यिक हस्तक्षेप थिक।
वृषेश चन्द्र लालक जन्म २९ मार्च १९५५ ई. केँ नेपालक महोत्तरी जिलाक सुगा-भवानीपट्टी गाममे भेलन्हि। हिनकर मूल परिचय एकटा सिद्धान्तनिष्ठ राजनीतिक योद्धाक रहल अछि, मुदा हिनकर राजनीतिक दर्शन आ साहित्यिक चेतना एक दोसरसँ अभिन्न रूपें जुड़ल अछि। नेपालमे लोकतन्त्रक स्थापनाक लेल निरन्तर संघर्ष करैत ओ १७ बेर गिरफ्तार भेलाह आ लगभग ८ वर्षक कठोर जेल जीवन व्यतीत कएलन्हि। तराई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक संस्थापक आ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहबाक सँग-सँगे ओ राष्ट्रीय सभाक सदस्य (२०१७-२०१९) आ जनकपुरक मेयरक रूपमे सेहो अपन सेवा देलन्हि। हिनकर एहि प्रखर आ संघर्षशील राजनीतिक व्यक्तित्वक पाछाँ एकटा अत्यन्त संवेदनशील, मानवीय आ दार्शनिक साहित्यकारक हृदय नुकाएल अछि, जे समाजक शोषित, उपेक्षित आ मूक प्राणीक क्रन्दनकें शब्द देबामे पूर्णतः सक्षम अछि। विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक विश्वप्रसिद्ध नेपाली लघु उपन्यास 'सुम्निमा' आ 'मोदिआइन'क मैथिली रूपान्तरण कऽ हिनका द्वारा जे भाषायी प्राञ्जलता, ऐतिहासिक अन्तर्दृष्टि आ दार्शनिक गाम्भीर्य प्रस्तुत कएल गेल, तकर स्पष्ट छाप हिनकर मौलिक कथासभमे सेहो दृष्टिगोचर होइत अछि।
'गोलबा', 'डीप डिप्रेशन' आ 'चौकपरक मौगी' मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्रीय, अस्तित्ववादी आ शिल्पगत स्तरपर परस्पर सम्बद्ध कथा छथि। लेखकक गद्यमे एकटा निस्पृह दार्शनिकता छैक; ओ घटनाकें मात्र वर्णित नहि करैत छथि, बल्कि ओकर भीतर नुकाएल मनोवैज्ञानिक ग्रन्थि, शक्ति-संरचना आ समाजशास्त्रीय यथार्थपरक सूक्ष्म शल्यक्रिया करैत छथि।
‘गोलबा’ आकारमे छोट, मुदा अर्थ-संभावनामे बहुपरत कथा-संग्रह अछि। पहिल कथा ‘गोलबा’ पशु-शिशुक दृष्टि सँ परिवार, स्नेह आ बलिक हिंसा देखबैत अछि; दोसर कथा ‘डीप डिप्रेशन’ एक अनाम पुरुषक भीतर चलैत भय, सन्देह, आत्म-निगरानी आ न कहल जा सकैत सत्यक चक्र रचैत अछि; तेसर कथा ‘चौकपरक मौगी’ तीव्र शहरीकरण, नवधनाढ्यता, भाषिक हीनताबोध, सामाजिक उदासीनता आ स्त्रीक असुरक्षित सार्वजनिक अस्तित्वक कथा बनैत अछि। बाहरी विषय तीनू मे भिन्न अछि, मुदा गहिर स्तरपर संग्रह एके प्रश्न पुछैत अछि—जखन कोनो जीव अथवा मनुष्य पीड़ामे अछि, तखन ओकर पीड़ाकेँ देखनिहारक नैतिक कर्तव्य की अछि?
एहि कारणेँ संग्रहक केन्द्रीय शब्द ‘करुणा’ मात्र नहि, ‘उत्तरदायित्व’ सेहो अछि। पहिल कथा मे परिवार गोलबाकेँ सन्तान जकाँ पोसैत अछि, मुदा अन्ततः ओकर देहक उपयोग संस्कारिक भोज्य वस्तु जकाँ करैत अछि। दोसर कथा मे पात्र अपन पीड़ाकेँ स्वयं बुझैत अछि, डॉक्टर सेहो संकेत पकड़ैत अछि, मुदा सत्यक उद्घाटन नहि होइत अछि। तेसर कथा मे पूरा चौक एक स्त्रीकेँ देखैत अछि, पुलिस, स्थानीय प्रभावशाली युवक, कथावाचक आ मित्र सभ ओकर उपस्थिति सँ परिचित अछि, तथापि सक्रिय हस्तक्षेप नहि होइत अछि। एहि त्रयीमे ‘देखब’ आ ’करब’क बीच दूरी साहित्यिक आ नैतिक तनावक मुख्य स्रोत अछि।
कथाशास्त्रीय दृष्टि सँ संग्रह विशेष रूपेँ दृष्टिकोणक प्रयोगक कारण उल्लेखनीय अछि। जेरार जेनेट कथात्मक ‘फोकलाइजेशन’ द्वारा ई भेद स्पष्ट करैत छथि जे कथा के बजैत अछि आ अनुभव के दृष्टिसँ देखाओल जाइत अछि—ई दुनू एक नहि। ‘गोलबा’ मे कथावाचक मनुष्यक भाषा मे कथा कहैत छथि, मुदा अनुभवक केन्द्र पशु अछि; ‘डीप डिप्रेशन’ मे कथन तेसर पुरुषमे अछि, मुदा पाठ लगभग पूरा पात्रक मनक भीतर बन्हल रहैत अछि; ‘चौकपरक मौगी’ मे पहिल पुरुषक कथावाचक स्वयं देखनिहार, निर्णय स्थगित करनिहार आ अन्ततः अपराध-बोध सँ भरल सहभागी बनि जाइत अछि। एतए दृष्टि कथानकक मात्र तकनीक नहि, नैतिक परीक्षा अछि।
2. पोथीक संरचना आ एकसूत्रता
संग्रहक तीनू कथा क्रमशः पशु, मन आ समाज पर केन्द्रित अछि। ई क्रम संयोग मात्र नहि बुझाइत अछि। ‘गोलबा’ देहक बाह्य हिंसा देखबैत अछि; ‘डीप डिप्रेशन’ मनक आन्तरिक क्षरण; ‘चौकपरक मौगी’ सामाजिक संरचना द्वारा उत्पन्न उपेक्षा आ हिंसा। एहि तरहें कथा-संग्रह हिंसाक तीन रूप प्रस्तुत करैत अछि—संस्कारिक हिंसा, मानसिक हिंसा आ सामाजिक/लैंगिक हिंसा।
एहि त्रयीकेँ एक दोसर सूत्र सेहो जोड़ैत अछि—मौन। गोलबा मनुष्यक सहज भाषा नहि बजि सकैत अछि; ओकर असहमति, घुँघरू सँ असुविधा, भय अथवा जीवित रहबाक चाह केवल देहक संकेतमे व्यक्त होइत अछि। ‘डीप डिप्रेशन’क पात्र बोलि सकैत अछि, मुदा निर्णायक बात नुका लैत अछि; ओकर मौन स्वयं निर्मित कारागार बनैत अछि। ’चौकपरक मौगी’ प्रायः कथा भरि चुप अछि; अन्त मे ओकर चीख पहिल वास्तविक सार्वजनिक वक्तव्य बनैत अछि। एहि क्रममे मौन जैविक सीमा सँ मनोवैज्ञानिक दमन आ सामाजिक अदृश्यताधरि बढ़ैत अछि।
तेसर साझा सूत्र ‘दृष्टि’ अछि। गोलबा मानवीय क्रिया देखैत अछि, मुदा ओकर अर्थ नहि बुझि पबैत अछि; अवसादग्रस्त पुरुष हर संकेत—गन्ध, बन्द खिड़की, छोड़ा गेल चाय, कौआक लोल—केँ अर्थ देबाक विवशता मे फँसैत अछि; ‘चौकपरक मौगी’क कथावाचक प्रतिदिन स्त्रीकेँ देखैत अछि, परन्तु ’लोक की कहत’क भय सँ दृष्टि के क्रियामे नहि बदलि पबैत अछि। एहि कारण संग्रहक गहिर संरचना ज्ञानमीमांसक सेहो अछि—हम जे देखैत छी, से कतेक बुझैत छी? आ जँ पूर्ण ज्ञान नहि अछि, तखन नैतिक हस्तक्षेप स्थगित क’ देब उचित अछि की नहि?
‘गोलबा’ वृषेश चन्द्र लालक कथा-संग्रह थिक, जाहिमे तीन गोट दीर्घ कथा संकलित छथि — ‘गोलबा’, ‘डीप डिप्रेशन’ आ ‘चौकपरक मौगी’। पहिल दृष्टिमे ई तीनू कथा भिन्न-भिन्न विषय आ पात्रपर आधारित बुझना जाइत अछि — एकटा बकरीक जीवन-कथा, एकटा मानसिक स्वास्थ्य-संकटमे फंसल पुरुषक अन्तर्द्वन्द्व, आ एकटा सड़क-किनारे बैसल रहस्यमयी स्त्रीक करुण गाथा। मुदा गहींरसँ पढ़लापर स्पष्ट होइत अछि जे तीनू कथा एकटा साझा वैचारिक सूत्रसँ बान्हल छथि — निरीह, वाणीहीन वा अवहेलित प्राणी/व्यक्तिपर समाज (परिवार सहित) द्वारा कएल गेल अन्याय, आ ओहि अन्यायमे मौन दर्शक बनल रहनिहार सभक सामूहिक दोष। एहि अर्थमे ‘गोलबा’ एकटा एकसूत्रीय (thematically unified) कथा-संग्रह थिक, जतय प्रत्येक कथा एकटा भिन्न रूपमे एकहि प्रश्नकेँ उठबैत अछि — निरीहताक सोझाँ मनुख कोन आचरण करैत अछि ?
२. ‘गोलबा’: पशु-दृष्टि, निर्दोषता, स्नेह आ बलिदान
संग्रहक शीर्षक कथा 'गोलबा' मैथिली कथा-साहित्यमे मानवेतर दृष्टिकोण (Anthropomorphic Perspective) आ ब्रूनो बेट्टेलहाइमक पशु-प्रतीक (Animal Symbolism) क सिद्धान्तक एकटा अत्यन्त मौलिक आ दुर्लभ प्रयोग अछि। कथाक केन्द्रबिन्दु एकटा खस्सी (बोका) अछि जकर नाम 'गोलबा' थिक। लेखक एहि कथाक माध्यमसँ पशु आ मनुष्यक सम्बन्धक छद्म, मानवीय स्वार्थ, आ धार्मिक अनुष्ठानक नामपर होइबला क्रूरताकें अत्यन्त मार्मिक आ विडम्बनापूर्ण ढङ्ग सँ अनावृत कएने छथि।
कथाक प्रारम्भ गोलबाक जन्मसँ होइत अछि, जतए लेखक तत्काल एकटा भ्रमजाल (Illusion) क निर्माण करैत छथि। गोलबाक माय चितकबरी अछि, मुदा घरक मालकिन 'बड़कीमाइ' ओकरा जनमते धरतीपर खसऽ नहि दैत छथि आ कोरामे उठा लैत छथि। पशु जाति गन्धसँ लोककें चिन्हैत अछि, आ गोलबा अपनाकें बड़कीमाइक सन्तान—सोनी, मोनी आ बब्बूक भाई—बुझए लगैत अछि। बड़कीमाइ ओकरा साड़ीक कोंचामे नुकाबैत छथि, सोनी-मोनी ओकरा लेल ओछाओन आ मिरजईक प्रबन्ध करैत छथि, आ गेरुका मेलासँ लाल, हरियर आ कारी फुदना आनि कऽ ओकर गरमे बान्हि दैत छथि जाहिसँ ओकरा ककरो नजरि नहि लगै। ई फुदनाक रङ्ग सेहो प्रतीकात्मक अछि—लाल शक्तिलेल, हरियर तन्दुरुस्तीलेल, आ कारी कुदृष्टिसँ बचाबक लेल।
एहि ठाम लेखक एकटा गम्भीर मनोवैज्ञानिक विडम्बना सृजित करैत छथि। गोलबाकें कहियो ई बुझल नहि भेलैक जे ओ एकटा पशु अछि आ ओकर नियति भानसघरक कड़ाहीमे वा भगवतीक वेदीपर समाप्त होमएबला अछि। ओ मनुष्यक भाषा नहि बुझि सकैत अछि, मुदा प्रेम आ चोटक स्पर्श बुझैत अछि। बड़कीमाइ ओकरा लेल "ममताक समुद्र" जकाँ लागैत छथि। ई भ्रान्ति मात्र एकटा पशुक नहि अछि, ई सम्पूर्ण शोषित वर्गक वैचारिक भ्रान्ति (False Consciousness) अछि जे शासक वर्गक द्वारा थोपल गेल सनेह आ संरक्षणकें अपन रक्षा-कवच मानि लैत अछि।
जेना-जेना गोलबा पैघ होइत अछि, बब्बू ओकर रक्षकसँ ओकर शोषक आ प्रशिक्षक बनि जाइत अछि। बब्बू ओकर गरमे घुंघरूबला पट्टा बान्हि दैत अछि जकर कर्कश आवाज गोलबाकें नीक नहि लगैत छैक, मुदा ओ विवश अछि आ मुड़ी हिलाकऽ पट्टा निकालक प्रयत्न कएलक मुदा ओ निकालि नहि सकल। बब्बू ओकरा लड़ाका बोका बना दैत अछि आ गाछीमे दोसर बोकासभ सँग लड़ाबैत अछि। ई शक्ति-संरचनाक प्रतीक थिक जतए शोषित वर्गकें आपसमे लड़ाओल जाइत अछि जाहिसँ शासक वर्ग (बब्बू) मनोरञ्जन कऽ सकए आ अपन वर्चस्व स्थापित राखि सकए।
अन्ततः ओ त्रासद दिन अबैत अछि जकर प्रतीक्षा सम्पूर्ण परिवार (गोलबाकें छोड़ि) कऽ रहल छल। घरमे पण्डितजी अबैत छथि, दर-देआदसभक जमघट होइत अछि, ढोल-पिपही बजैत छैक, आ गोलबाकें माघ महीनाक ठढ़ल पोखरिमे नहबा कऽ गोसाउनि-घर अनल जाइत अछि। जाड़ें थरथराइत गोलबा एखनो बब्बूक स्मरण करैत अछि जे "एखन बब्बू रहितैक तँ एना होइतैक ?!"। ई विश्वासघातक चरम बिन्दु थिक, जतए एकटा मूक प्राणीक अगाध विश्वासकें धर्मक आवरणमे हत्या कएल जा रहल अछि।
कथाक चरमोत्कर्ष अत्यन्त मार्मिक आ बीभत्स रससँ भरल अछि। जखन पण्डितजी मन्त्र पढ़ैत "जय भगवती ! जय माते !!" चिचिआइत छथि आ खड्ग चलैत अछि—"छपाक !"—तखन कथाक धरातल भौतिक यथार्थसँ उठि कऽ पूर्णतः आध्यात्मिक, अतियथार्थवादी (Surreal) आ दार्शनिक भऽ जाइत अछि। गोलबाक मुड़ी धड़सँ अलग भऽ जाइत अछि। एहि ठाम लेखक एकटा "आउट-अफ-बडी एक्सपेरियन्स" (Out-of-Body Experience) वा विदेह-दर्शनक सृजन करैत छथि। गोलबा अपन अलग भेल मुड़ीक मुआयना करैत अछि जतए असह्य पीड़ाक प्रतिविम्व छैक, उनटल आँखि आ दाँत तर दने निकलक जीभ अछि जाहिसँ आधा जीभ कटाइए गेल छैक।
गोलबाक चेतना अन्तरिक्षमे उधियाइत अछि आ नीचाँ अपन शरीरकें भोजलेल तैयार होइत देखैत अछि। सोनी-मोनी पानि गरम कऽ रहलि छथि, छौंड़ासभ धर छोलबाक प्रबन्ध कऽ रहल अछि, बड़कीमाइ मसल्ला ओरिआ रहलि छथि, आ जे बब्बू ओकर सभसँ प्रिय छल, ओ हँसि-हँसि कऽ लोकसभ सँग बतिआ रहल अछि। ओकर असली माय चितकबरी असहाय भावें नोर खसाबैत टुकुर-टुकुर ताकि रहलि अछि। लेखक कथाक अन्त एकटा अनुत्तरित प्रश्नसँ करैत छथि—"आब ओ गोलबा कहाँ अछि ?!"। ई प्रश्न केवल एकटा पशु जीवक मृत्युसँ सम्बन्धित नहि अछि, बल्कि ई सम्पूर्ण मानव जातिक पाखण्ड, धर्मक नामपर होइबला क्रूरता, आ प्रेम-ममताक आवरणमे नुकाएल स्वार्थक पर्दाफाश करैत अछि।
नीचाँ देल गेल तालिका 'गोलबा' कथाक प्रमुख चरित्रसभक मनोवैज्ञानिक आ प्रतीकात्मक भूमिकामे निहित अन्तर्विरोधकें स्पष्ट करैत अछि।
कथा गोलबाक जन्म सँ आरम्भ होइत अछि। बड़कीमाइ ओकरा धरती पर नहि खसबैत छथि; सोनी-मोनी नामकरण करैत अछि; बब्बू ओकर मित्र बनैत अछि; ओकरा दूध, ओछाओन, मिरजई, विशेष भोजन, फुदना आ घुँघरू भेटैत अछि। गोलबा अपनाकेँ पशु नहि, परिवारक सन्तान बुझैत अछि। कथाक आरम्भिक अंश मे एतेक आत्मीयता रचल गेल अछि जे पाठक गोलबाकेँ ‘पालल पशु’ नहि, पारिवारिक जीवित सदस्यक रूपमे ग्रहण करए लगैत अछि। एहि आत्मीयता बिना अन्तक बलि मात्र घटना रहि जाइत; लेखक पहिने स्नेहक पूंजी रचैत छथि, तखन ओकर नैतिक विडम्बना खोलैत छथि।
गोलबाक देहक प्रति परिवारक अत्यधिक लाड़ दू अर्थ एकसाथ धारण करैत अछि। एक दिस ओ प्रेमक चिह्न अछि; दोसर दिस कथाक अन्त जानलाक बाद ई ‘देह तैयार करबाक’ प्रक्रिया जकाँ भयावह पुनर्पाठ आमन्त्रित करैत अछि। जे भोजन गोलबाकेँ ‘मोट आ कसगर’ बनेबाक लेल देल जाइत अछि, जे सजावट ओकरा प्यारा बनबैत अछि, से सभ बाद मे एक निर्दोष जीवक वस्तुकरणक प्रस्तावना जकाँ देखाइत अछि। एहि दोहरे अर्थमे कथा अपन सबल ध्वनि रचैत अछि।
3.2 फोकलाइजेशन: पाठककेँ पशु-मनक भीतर राखब
’गोलबा’क सभसँ पैघ कलात्मक उपलब्धि अछि—पशुकेँ मानवीय नकल बना देने बिना ओकर अनुभवक केन्द्र बनायब। कथाकार गोलबाकेँ जटिल दार्शनिक भाषामे नहि बजबैत छथि; ओकर दुनिया गन्ध, स्पर्श, भूख, दौड़, स्नेह, डर, देहक असुविधा आ परिचित मनुष्यक निकटता सँ बनैत अछि। घुँघरू बान्हल गेलापर ओकर असहजता, माथ पर सींग फूटबाक अनुभूति, पोखरिमे जबर्दस्ती नहाओल जायबाक भय—ई सभ संवेदना कथा के देहधर्मी विश्वसनीयता दैत अछि।
जाक देरिदा मानव-पशु सीमा पर विचार करैत मानव द्वारा ‘पशु’ नामक एक विशाल समरूप श्रेणी बनायब पर प्रश्न उठबैत छथि। ‘गोलबा’ सैद्धान्तिक भाषामे ई तर्क नहि करैत अछि, मुदा कथा-पद्धति द्वारा ओहि सीमा के अस्थिर करैत अछि। गोलबा स्मरण करैत अछि, स्नेह पहचानैत अछि, आदेश मानैत अछि, असुविधा अनुभव करैत अछि, भयभीत होइत अछि आ बब्बूक उपस्थिति मे सुरक्षा पबैत अछि। तखन प्रश्न उठैत अछि—जँ भावानुभूतिक एतेक निरन्तरता अछि, तँ केवल प्रजातिगत भेद हिंसाकेँ नैतिक रूपेँ स्वीकृत कोना बना दैत अछि?
3.3 बलि-दृश्य: करुण, भयानक आ बीभत्सक संधि
माघक जाड़मे गोलबाकेँ पोखरिमे नहा देब, पूजा-स्थल पर आनब, अक्षत-फूल माथ पर देब आ तत्पश्चात् अचानक गरदनि काटि देब—एहि क्रममे संस्कारक उल्लास आ जीवक भय एके फ्रेम मे रखल गेल अछि। पाठक पहिने बब्बूक समारोहक रमनगर वातावरण देखैत अछि; गोलबा सेहो एहि आयोजनकेँ बब्बूक प्रसन्नता सँ जोड़ि क’ देखैत अछि। तें ’छपाक’क क्षण केवल वध नहि, भरोसाक विघटन सेहो अछि।
भारतीय रस-दृष्टि सँ एहि दृश्यक स्थायी भाव करुण अछि, मुदा ओकरा भयानक आ बीभत्स रसक संस्पर्श तीक्ष्ण बनबैत अछि। गोलबाक कटि गेल मुड़ी द्वारा अपन देहक मुआयना करब एक प्रकारक विलक्षण दृश्य-रचना अछि। ई यथार्थवादी नहि, भावानुभूतिक अतियथार्थ अछि—मृत्युकेँ बाहर सँ नहि, ‘अभी-अभी जीवित छल’ एहन चेतना सँ देखाओल गेल अछि। एहि बिन्दुपर कथा पाठककेँ आरामदायक दूरी नहि दैत अछि।
3.4 मृत्योत्तर दार्शनिकता: शक्ति आ सीमा
वधक बाद गोलबाक ‘अनन्त अन्तरिक्षक यात्रा’क कल्पना कथाकेँ क्षणिक आध्यात्मिक विस्तार दैत अछि। एक अर्थमे ई देहगत पीड़ाकेँ व्यापक जीवन-चक्रक भीतर रखैत अछि; दोसर अर्थमे ई कटु दृश्यक नैतिक चोटकेँ कनेक नरम सेहो करैत अछि। कथा जँ ’आब ओ गोलबा कहाँ अछि?’ पर समापित होइत अछि तँ ई प्रश्न शोक, अनित्यता आ पहचान तीनू पर खुलल रहैत अछि। तथापि आलोचनात्मक दृष्टि सँ कहल जा सकैत अछि जे मृत्योत्तर व्याख्याक किछु वाक्य पाठकक स्वतन्त्र व्याख्या पर लेखकक दार्शनिक कथन थोपी दैत अछि। करुणा जे ठाम अपने बोलि रहल अछि, ओतए कनेक अधिक मौन कथाकेँ आरो तीक्ष्ण बना सकैत छल।
शीर्षक-कथा ‘गोलबा’ एकटा बकरीक जीवन-कथा थिक, जकरा बड़कीमाइ (घरक बूढ़ी माताजी) आ बच्चासभ (सोनी, मोनी, बब्बू) पोसने छथि। कथाक कथन-शैली अत्यन्त सूक्ष्म आ सशक्त थिक — कथाकार गोलबाक चेतना आ अनुभवकेँ केन्द्रमे राखि कथा कहैत छथि, जाहिसँ पाठक धीरे-धीरे गोलबाक संगे भावनात्मक रूपे जुड़ि जाइत छथि। गोलबाकेँ अपनाकेँ पशु होएबाक बोध सेहो नहि छैक — ‘ओकरा कहियो नहि बुझएलैक जे ओ पशु अछि। ओ अपनाकेँ सोनी, मोनी आ बब्बूये जकाँ बड़कीमाइक सन्तान बुझैत रहल।’ एहि निर्दोष आत्म-भ्रमपर सम्पूर्ण कथाक त्रासदी टिकल अछि।
कथाकार अत्यन्त धैर्यपूर्वक गोलबाक बाल्यकाल, बड़कीमाइक स्नेह, बब्बूसंगक कुश्ती-अभ्यास, सोनी-मोनीक देखभाल — सभटा विस्तारसँ चित्रित करैत छथि, जाहिसँ पाठकक मोनमे गोलबाक प्रति ममता आ आत्मीयता गहींर होइत जाइत अछि। एहि दीर्घ, स्नेहसिक्त विवरणक बाद अचानक घरमे ‘भीड़-भाड़’, पुरोहितक आगमन, ढोल-पिपही — ई सभ संकेत पाठककेँ किछु आशंकित त करैत अछि, मुदा गोलबाकेँ (आ कतेको भोर पाठककेँ सेहो) एकर वास्तविक अर्थ बुझबामे नहि अबैत। ई नाटकीय विडम्बना (dramatic irony) कथाक सभसँ शक्तिशाली शिल्पगत उपकरण थिक — पाठक जनैत अछि (वा जल्दिये बुझि जाइत अछि) जे की होयबला अछि, मुदा गोलबा स्वयं एकरा एकटा उत्सव, एकटा सम्मान बुझैत अछि — ‘बुझएलैक, ओकरो एहि समारोहमे सहभागी बनाओल जा रहल छैक।’
बलिक दृश्य कथाक चरम बिन्दु थिक, जकरा कथाकार अत्यन्त साहसिक शैलीमे लिखने छथि — मृत्युक क्षणकेँ गोलबाक्के चेतनासँ, ओकर शरीर आ आत्माक विभाजनक रूपमे वर्णित कएल गेल अछि —
आहिरो ! ई की भेलैक ?! ओ तँ अपन धरसँ अलग भ’ गेल अछि !!!
अनन्त अन्तरिक्षक यात्राक हड़बड़ी भ’ गेल छैक
एहि अनन्त यात्राक कतहु कोनो पड़ावपर ओकरा दोसर शरीर धारण करक छैक।
एहि आध्यात्मिक-दार्शनिक वर्णनक ठीक बाद कथाकार तुरत्ते कथाकेँ अत्यन्त शीत, व्यावहारिक विवरणमे मोड़ि दैत छथि — सोनी-मोनी पानि गरम कऽ रहल छथि, छौंड़ासभ खाल छोलबाक लेल ओजार तेज कऽ रहल छथि, भन्सियासभ कराही-भट्ठीक प्रबन्ध कऽ रहल छथि, बब्बू अपन दोस्तसभसँ हँसि-हँसि गप्प कऽ रहल अछि। एहि दूनू दृश्यक (गोलबाक आध्यात्मिक यात्रा आ परिवारक भोज-तैयारी) संगहि प्रस्तुतिसँ जे विडम्बनात्मक तीव्रता उत्पन्न होइत अछि, से एहि कथाक सभसँ बड़का साहित्यिक उपलब्धि थिक। कथाक अन्तिम पंक्ति — ‘आब ओ गोलबा कहाँ अछि ?!’ — एकटा प्रश्नक रूपमे समाप्त होइत, पाठककेँ स्वयं उत्तर खोजबाक लेल छोड़ि दैत अछि।
३. ‘डीप डिप्रेशन’: सन्देह, मौन आ मनक कारागार
सभ्य समाजमे मनुष्य जेना-जेना भौतिक सम्पन्नता दिस बढ़ि रहल अछि, ओकर आन्तरिक जीवन ओतबे खोखला, छद्म आ अवसादग्रस्त होइत जा रहल अछि। कथा 'डीप डिप्रेशन' आधुनिक दाम्पत्य जीवनक अविश्वास, मौन घुटन, आ पुरुष-मनोविज्ञानक एकटा सूक्ष्म चीरफाड़ थिक। एहि कथाक माध्यमसँ वृषेश चन्द्र लाल मानसिक स्वास्थ्य जेहन गम्भीर विषयकें समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्यमे प्रस्तुत कएने छथि।
कथाक प्रारम्भ एकटा डाक्टरक क्लिनिकसँ होइत अछि। कथानायक बाहरसँ एकटा निडर, साहसी आ जुझारू पुरुष अछि, जकरा समाज मजबूत हृदयक मानैत अछि आ ओ कहियो ककरोसँ डेराएल नहि अछि। मुदा भीतरसँ ओ भयानक प्यानिक अट्याक (Panic Attack) आ एन्जायटी (Anxiety) सँ ग्रस्त अछि। ओकर छाती घड़फड़ाइत छैक, साँस फूलि जाइत छैक, छाती कुहरए लगैत छैक, आ ओ कहियो-काल बीसो मिनट धरि टकटकी लगौने गतिहीन बनि जाइत अछि। डाक्टर ओकरा "डीप डिप्रेशन" (Deep Depression) क रोगी बताबैत अछि आ एकरा "आधुनिकताक देन" आ "विकासक संगी" कहैत अछि।
मुदा नायककें डाक्टरक डाइग्नोसिसपर विश्वास नहि छैक। ओ जनैत अछि जे ओकर रोग कोनो सामान्य शारीरिक वा आधुनिकताक तनाब नहि अछि; एकर जड़ि कतहुँ आओर अछि। ओ अवसादक मूल कारण अपना पत्नीक वैवाहिक निष्ठापर जागल शंका आ अविश्वासकें मानैत अछि। कथानायकक स्मृतिमे एकटा घटना बार-बार अबैत अछि। एक दिन आफिससँ अचानक सबेरे अएलापर ओ अपन पत्नीकें ओकर कलेज सहपाठी सँग भेटैत अछि। ओ पुरुष बहुत जल्दीमे रहैत अछि आ जाइत-जाइत तुलसीक पुड़िया खैत अछि जाहिसँ ओकर मुँहसँ 'तुलसी खैनी पत्ती' क गन्ध अबैत रहैत छैक। जखन नायक घरक भीतर जाइत अछि तँ देखैत अछि जे खिड़कीसभ बन्द छैक आ पर्दा लागल अछि। रातिमे जखन ओ ओछानपर सुतए जाइत अछि, तँ ओकरा बिछौनापर सेहो ओएह तुलसी खैनीक गन्ध महसुस होइत अछि।
ई एकटा घटना नायकक मानसपटलपर स्वचालित सिनेमाक रील जकाँ घुमैत रहैत अछि। 'तुलसी खैनीक गन्ध' एहि ठाम एकटा अत्यन्त शक्तिशाली मनोवैज्ञानिक बिम्ब (Olfactory Motif) थिक जे नायककें बार-बार आघात पहुँचाबैत अछि। ई गन्ध ओकर घरक पवित्रतामे एकटा बाह्य पुरुषक अतिक्रमणक मौन साक्ष्य बनि जाइत अछि। ओ कौआकें गाछपर बैसल देखैत अछि तँ ओकरा लगैत छैक जे कौआ सेहो किछु नुका रहल अछि, जे ओकर चरम प्यारानोइया (Paranoia) क स्थिति अछि।
कथाक सभसँ सशक्त आ त्रासद पक्ष ई अछि जे नायक अपन शंका ककरो सँग साझा नहि कऽ सकैत अछि। डाक्टर ओकरा स्पष्ट कहैत छैक जे "डाक्टर आ वकीलसँ झूठ नहि बाजी" आ आग्रह करैत छैक जे कोनो भितरिया बात अछि तँ बताउ। मुदा नायक मौन रहैत अछि। ओ सोचैत अछि जे जँ ओ सत्य बाजि देत तँ ओकर परिवार बिखरि जएतैक, पत्नीपर लांछन लगतैक, आ ओकर सामाजिक इज्जत धूलमे मिलि जएतैक।
एहि ठाम वृषेश चन्द्र लाल मध्यवर्गीय नैतिकता आ पितृसत्तात्मक समाजमे पुरुषकें होमएबला घुटनक यथार्थपरक चित्रण करैत छथि। समाज पुरुषकें सदिखन साहसी आ नियन्त्रक मानैत अछि, जाहि कारणें पुरुष अपन भावात्मक कमजोरी वा मानसिक पीड़ा ककरो देखा नहि सकैत अछि। नायक अपन सर्वस्व गला कऽ, भीतर-भीतर मरि कऽ सेहो चुप्पी साधि लैत अछि। डाक्टरक कोठरीक केबार जखन "ढ़प्प द’ बन्द भ’ गेलैक" आ कानमे "डीप डिप्रेशन" शब्द गूँजलैक, तँ ई केवल क्लिनिकक केबार बन्द होमएबला नहि, बल्कि नायककें जीवन-भरिक लेल मानसिक काल-कोठरीमे बन्द करबाक प्रतीक थिक।
दोसर कथा आरम्भहि डॉक्टरक ‘डीप डिप्रेशन’ शब्द सँ होइत अछि। पात्र तुरन्त एहि निदानकेँ नकारैत अछि—ओ अपनाकेँ साहसी, जुझारू आ संकटमे धैर्यवान मानैत आएल अछि। एतए शीर्षक मात्र रोगनाम नहि, ‘स्व-छवि’ आ ’भीतरी अनुभव’क टकरावक चिह्न अछि। पात्रक मूल समस्या ई नहि जे ओकरा किछु महसूस नहि होइत अछि; उलटे ओ अत्यधिक महसूस करैत अछि, मुदा अपन अनुभूतिक नाम स्वीकारए सँ डरैत अछि।
कथा मानसिक रोगक चिकित्सकीय दस्तावेज नहि अछि, तें एकरा नैदानिक मानदण्ड सँ परखब सीमित होयत। तथापि साहित्यिक दृष्टि सँ महत्त्वपूर्ण ई अछि जे देह आ मनक बीच तनाव कथा-रूप बनि जाइत अछि। छाती धड़कब, घाम, साँसक बेचैनी, नाड़ी जाँचब, रक्तचाप देखबाक इच्छा, बारम्बार छाती पकड़ब—पात्रक अव्यक्त मानसिक असुरक्षा देहक भाषामे बजैत अछि। एलेन स्कैरी पीड़ाक कठिन अभिव्यक्तिसम्बन्धी जे प्रश्न उठबैत छथि, तकर साहित्यिक समान्तर एतए देखल जा सकैत अछि: जे बात मुँह नहि कहि पबैत अछि, देह ओकर संकेत देइत अछि।
4.2 पुनरावृत्तिशील विचारक औपचारिक अनुकरण
एहि कथाक संरचना रैखिक घटनाक्रम सँ अधिक ‘रुमिनेशन’ अर्थात् बारम्बार लौटैत विचार पर आधारित अछि। पात्र स्वयं निश्चय करैत अछि जे आब नहि सोचत, मुदा छोट संकेतहि सँ पूरा स्मृति ‘सिनेमाक रील’ जकाँ घूमए लगैत अछि। पाठक सेहो ओही चक्र मे घुमाओल जाइत अछि—धड़कन, आत्म-समझाइश, झूठक स्मृति, सन्देह, भय, आध्यात्मिक तर्क, फेर देहक लक्षण। एहि पुनरावृत्तिक कारण कथा कखनो धीमी बुझा सकैत अछि, मुदा ई धीमापन विषयक रूपात्मक समकक्ष सेहो अछि: मन जखन फँसल अछि, कथा सेहो आगाँ नहि बढ़ि पबैत अछि।
कथाकार संकेतसभक जाल रचैत छथि—अचानक घर घुरब, पत्नी/घरमे एक पुरान परिचितक भेट, न पिअल चाय, तुलसी-खैनीक गन्ध, बन्द खिड़की-पर्दा, राति मे फेर गन्धक अनुभव। ई सभ प्रमाण नहि, संकेत अछि। पात्र सेहो एहि भेदकेँ जानैत अछि; तें ओ आरोप नहि लगबैत अछि। एहि नैतिक संकोच मे ओकर मानवीय गरिमा अछि, मुदा एही संकोचकेँ वहन करैत-करैत ओकर मन विघटित होइत अछि। कथा सन्देहकेँ सत्य घोषित नहि करैत; सैह ओकर साहित्यिक ईमानदारी अछि।
4.3 मौनक नैतिकता: आरोप नहि लगाब, मुदा सत्यो नहि कहब
डॉक्टर जखन आग्रह करैत अछि जे इलाज लेल ‘सभ बात’ कहू, पात्रक दुविधा गहिर होइत अछि। ओकर भय केवल निजी अपमानक नहि, परिवार बिखरबाक, निराधार लांछन लगबाक, दोसरक जीवन उजड़बाक सेहो अछि। एहि कारण ओकर मौन केवळ कायरता नहि; ओ न्याय-चेतना आ भयक मिश्रण अछि। मुदा कथाक त्रासदी ई जे नैतिक सावधानी आत्म-विनाशक गोपनीयता बनि जाइत अछि। एतए संग्रहक एक केंद्रीय सूत्र पुनः उपस्थित अछि—अन्याय न करबाक इच्छा कखनो-कखनो सहायता माँगबाक सामर्थ्य सेहो छीनि लैत अछि।
वेयन सी. बूथक नैतिक आलोचना प्रश्न करैत अछि जे कथा पढ़ैत काल पाठक केहन प्रकारक व्यक्ति बनबाक आमन्त्रण पबैत अछि। ‘डीप डिप्रेशन’ पाठककेँ ’ककर गलती?’क त्वरित निर्णय नहि दैत; उलटे सन्देह, प्रमाण, गरिमा, परिवार, चिकित्सा आ आत्म-सुरक्षाक बीच कठिन संतुलन मे राखैत अछि। एहि कारण कथा नैतिक रूपेँ उपयोगी अछि—ई समाधान नहि, निर्णयक जटिलता अनुभव करबैत अछि।
4.4 गुरुजीक दार्शनिक प्रसंग: मनोवैज्ञानिक कथा मे आध्यात्मिक प्रतिपक्ष
गुरुजी द्वारा जीवनकेँ अनुभूतिक यात्रा, आत्मा-परिष्कार आ मनकेँ असली गुरु मानबाक प्रसंग कथा के स्थानीय दार्शनिक आधार दैत अछि। पात्र आधुनिक चिकित्सकीय शब्दावली आ पारम्परिक आध्यात्मिक व्याख्या दुनू मे अर्थ खोजैत अछि। एहि द्वैत सँ कथा समकालीन मिथिलाक मानसिक संसारक बहुलता पकड़ैत अछि—डॉक्टर, रक्तचाप, दवा, ‘डिप्रेशन’ एक दिस; गुरुजी, आत्मा, परायात्रा, पितरक संरक्षण दोसर दिस।
मुदा शिल्पगत सीमा सेहो एतए प्रकट होइत अछि। किछु दार्शनिक अनुच्छेद पात्रक बेचैनीक तात्कालिकता सँ दीर्घ विचलन करैत अछि। जँ ई अंश कनेक संक्षिप्त रहित तँ कथाक मनोवैज्ञानिक दबाव निरन्तर अधिक तीव्र रहैत। तथापि ई अंश पूर्णतः बाहरी नहि, कारण पात्र स्वयं अनिश्चितता सँ लड़बाक लेल उपलब्ध सांस्कृतिक भाषा खोजि रहल अछि।
दोसर कथा ‘डीप डिप्रेशन’ पूर्णतः भिन्न शैली आ विषयक्षेत्रमे प्रवेश करैत अछि — ई एकटा गहींर मनोवैज्ञानिक आख्यान थिक, जे एकटा एहन पुरुष पात्रक अन्तर्जगत्केँ उद्घाटित करैत अछि, जे डाक्टरद्वारा ‘डिप्रेशन’ निदान कएल जेबाक बावजूद अपन बिमारीकेँ स्वीकार करबासँ इनकार करैत अछि। कथाक कथन-शैली सतत् आन्तरिक एकालाप (interior monologue) क रूपमे आगू बढ़ैत अछि, जाहिमे पात्रक तर्क, आत्म-प्रवंचना आ बेचैनी क्रमशः उजागर होइत जाइत अछि।
कथाक केन्द्रीय द्वन्द्व अछि — पात्रकेँ अपन पत्नीक प्रति सन्देह अछि (शायद विश्वासघातक), मुदा ओ एहि सन्देहकेँ न त डाक्टरकेँ बता सकैत अछि, न स्वयं अपनासँ खुलिकऽ स्वीकार कऽ सकैत अछि। तुलसीक गन्ध, एकटा अपरिचित व्यक्तिक भेँट, पत्नीक असामान्य व्यवहार — ई सभ संकेत ओकरा तंग करैत रहैत छैक, मुदा कथाकार कहियो सेहो स्पष्ट नहि करैत छथि जे संदेह सत्य अछि वा मात्र पात्रक कल्पना — ई अनिश्चितता स्वयं कथाक मनोवैज्ञानिक यथार्थताक प्रमाण थिक। कथाक केन्द्रीय विडम्बना अछि ‘लोक की कहत ?’ वाला सामाजिक भयक मानसिकता, जे पात्रकेँ आफ्नो जीवनसंगिनीसँ, आफ्नो डाक्टरसँ, आ अन्ततः आफ्नोसँ सेहो सत्य बोलबासँ रोकैत छैक —
ककरो नहि कितै । कहिओ क’ करतैक की ? आ कहबो की करौक ? ओ नियतिकेँ स्वीकारि नेने रहए।
कथाक अन्त अत्यन्त संक्षिप्त, मुदा प्रहारकारी अछि — डाक्टरक अन्तिम शब्द ‘डीप डिप्रेशन !’ दरवज्जाक बन्द होएबाक ध्वनिक संगहि गूँजैत अछि, जे रोगक निदान त कऽ दैत अछि, मुदा रोगक वास्तविक कारण (सामाजिक लाज-भय आ संवादहीनताक संस्कृति) पर कोनो प्रकाश नहि दैत। एहि अर्थमे ई कथा पुरुष-मानसिकतामे व्याप्त भावनात्मक अभिव्यक्तिहीनताक एकटा तीखा आलोचना थिक — जतय ‘सहनशीलता’ आ ‘साहस’ केर सामाजिक अपेक्षा वास्तविक पीड़ाकेँ स्वीकार करबामे सभसँ पैग बाधा बनि जाइत अछि।
४. ‘चौकपरक मौगी’: शहरीकरण, सामूहिक मौनता आ स्त्री-अस्मिता
'चौकपरक मौगी' कथा समकालीन विकासक अन्हार यथार्थ, भाषा-संस्कृतिक ह्रास, आ एकटा असहाय, विक्षिप्त स्त्रीक प्रति समाजक चरम संवेदनहीनताक रोंगटे ठाढ़ कऽ देनिहार दस्तावेज अछि। ई कथा नव-पूँजीवादी विकास आ पितृसत्ताक क्रूर गठबन्धनकें उघाड़ैत अछि।
कथाक प्रारम्भ महानगरीय विस्तार आ 'मेगा चौक' क निर्माणसँ होइत अछि। लेखक एकर माध्यमसँ तीव्र शहरीकरणक सांस्कृतिक आ सामाजिक प्रभावकें अनावृत करैत छथि। बाध आ चओर जे काल्हि धरि धान-गहूमक खेतीसँ लहलहाइत छल, ततए आब कंकरीटक महल, बंगला, आ शपिङ्ग कम्प्लेक्स ठाढ़ भऽ गेल अछि। पुरान खेतिहरसभ जमीन बेचि कऽ रातो-राति नव-धनाढ्य बनि गेलाह अछि। ओकर सन्तान (नवतुरिया पीढ़ि) कानमे कुण्डल पहिरि, फुटानीमे बर्बाद भऽ चिया-दुकानपर दादागिरी करैत अछि। ई युवा पीढ़ि समाजक सुरक्षाक ठेकेदार बनल अछि, मुदा वास्तविकता ई अछि जे ओ सभ भाइ-भतिजावाद आ गुन्डागर्दीक प्रतिरूप थिक।
लेखक भाषा आ संस्कृतिक ह्रासपर सेहो तीक्ष्ण व्यंग्य करैत छथि। लोक अपनाकें विदेशी देखाबक लेल केश रंगि लैत अछि जकरा गामघरमे लोक "भटरंगा" कहैत छैक। अङ्ग्रेजी आ लैटिन शब्दक कृत्रिम प्रयोगसँ लोक अपन मातृभाषाप्रति हीनताबोधक शिकार अछि। ई 'मेगा चौक' केवल एकटा भौगोलिक स्थान नहि, बल्कि एकटा एहन उपभोक्तावादी समाजक प्रतीक अछि जतए संवेदना, नैतिकता आ मानवताक मृत्यु भऽ चुकल अछि। कथावाचक अतीतकेँ मोन पाड़ैत बाटा कम्पनीक 'एम्बेसडर साहुजी' क चर्चा करैत छथि, जे परदेसमे मिथिलाक लोककें अपन डेरामे ठौर दैत छलाह, मुदा आब ओ परोपकारी युग समाप्त भऽ चुकल अछि।
एहि चकाचौंध आ भौतिक विकासक बीच एकटा खाली घराड़ीक कम्पाउण्डवालपर एकटा अज्ञात स्त्री भोरेसँ रातिधरि बैसि रहैत अछि। ओ अत्यन्त सुन्दरि अछि, मुदा ओकर कपड़ा मैल-झेल अछि, केश जटाएल अछि, आ माङमे गाढ़ सिन्दूर थोपने अछि। ई स्त्री एहि कथाक मूक केन्द्र थिक। ओ ककरोसँ किछु बजैत नहि अछि। कथावाचक (जे वन विभागक कर्मचारी छथि) ओकरा देखि विचलित होइत छथि। हुनका भीतर मानवीय संवेदना जागैत छन्हि आ ओ ओकरा मद्दति करए चाहैत छथि, मुदा हुनकर मित्र राजेशजी हुनका "भावनामे बहि जाइत छी" कहि कऽ रोकैत छथिन्ह। "कहुँ खराब मौगी हएति तँ लोक की कहत ?"—ई सामाजिक भय कथावाचककें अपन डेग पाछाँ घीचबापर विवश कऽ दैत अछि।
पुलिसक सब-इन्सपेक्टर राम दयाल यादव आ चौकक दादा 'रबी' सेहो ओहि स्त्रीकें केवल एकटा मानसिक विक्षिप्त ('पागल') मानि कऽ अपन दायित्वसँ पल्ला झाड़ि लैत छथि। समाजक ई तटस्थता आ उपेक्षा (Bystander Effect) वस्तुतः एकटा गम्भीर अपराधक पूर्वपीठिका थिक।
कथाक अन्त अत्यन्त कारुणिक आ झकझोरि देनिहार अछि। किछु महीना बाद एक दिन चौकपर भारी भीड़ लागल अछि। ओ स्त्री घाम-पसीनामे लथपथ, अपन कपड़ा-केश नोचैत, आर्तनाद कऽ रहल अछि। ओकरा सँग सामूहिक दुराचारक स्पष्ट संकेत कथा मे अछि। ओकर चीत्कार मैथिली साहित्यक एकटा अत्यन्त शक्तिशाली स्त्री-विमर्शक (Feminist Discourse) प्रकटीकरण थिक, जतए ओ पुरुषत्वक अहङ्कारपर सोझे प्रहार करैत अछि:
"हँ, हम चौकपरक मौगी छी !... अही योग्य !!... सभ भोगू !... तागत देखाऊ !! चौकपरक मौगीपर... जे निरीह अछि... आ ने जकर केओ रक्षक छैक... तकरापर जोरजुलुम करू, पुरुषत्व देखाऊ ! बाप रे ! हम आब चौकपर मौगी छी !!"
ई केवल एकटा विक्षिप्त स्त्रीक प्रलाप नहि अछि; ई सम्पूर्ण सभ्य, नव-धनाढ्य आ पितृसत्तात्मक समाजक मुँहपर एकटा करारा तमाचा अछि। ओ समाज जे कमजोर आ असहायक रक्षा करबाक बदला ओकरा अपन वासनाक शिकार बनबैत अछि। जखन कोनो स्त्री असहाय, विक्षिप्त वा बेसहारा भऽ चौकपर आबि जाइत अछि, तँ तथाकथित सभ्य समाज ओकर रक्षक बनबाक बदला ओकरा 'भोग्य वस्तु' आ 'चौकपरक मौगी' बना दैत अछि।
कथावाचककें तीव्र आत्मग्लानि होइत छैक। ओ आफिस नहि जा सकैत छथि आ घर आबि ओछाओनपर पसरि जाइत छथि। हुनका आत्मबोध होइत छन्हि जे ओ स्वयं, ओकर मित्र राजेश, पुलिस अधिकारी यादव आ सम्पूर्ण समाज एहि जघन्य अपराधक दोषी अछि। "लोक की कहत" क कायरताक कारणें जे अकर्मण्यता ओ अपनेलन्हि, सएह एहि अनर्थक मूल कारण बनल।
तालिकाक माध्यमसँ 'चौकपरक मौगी' कथाक पात्रसभक सामाजिक दृष्टिक तुलनात्मक विश्लेषण कएल जा सकैत अछि:
तेसर कथा स्त्री सँ तुरन्त आरम्भ नहि होइत अछि; पहिने पूरा चौकक सामाजिक भूगोल रचल जाइत अछि। ‘मेगा चौक’क अङरेजिया नाम, भाषामे अंग्रेजी शब्दक चढ़ाइ, खेतीक हरित क्षेत्र पर घर-बंगला-शॉपिंग अट्टालिका, जमीनक महँगाई सँ अचानक धन, युवकसभक फुहड़ धन-प्रदर्शन, बाजार, कॉस्मेटिक दुकान, रॉक संगीत आ इलेक्ट्रॉनिक इश्तहार—ई सभ मिलि क’ विकासक दृश्य बनबैत अछि।
जॉर्ज सिमेल महानगरीय जीवनमे तीव्र उत्तेजना, धन-आधारित गणना आ आत्म-सुरक्षार्थ विकसित उदासीन/संरक्षित मनोवृत्तिक चर्चा करैत छथि। ’चौकपरक मौगी’क नगर पूर्ण महानगर नहियो हो, मुदा तीव्र शहरीकरणक संक्रमण-क्षेत्र अवश्य अछि। कथा खास बात पकड़ैत अछि—भौतिक परिवर्तन तीव्र अछि, नैतिक संस्थानक परिवर्तन असमान। पुल, सड़क, दुकान, मोबाइल, पुलिस-नेटवर्क आ स्थानीय शक्ति उपस्थित अछि; तैओ एक असहाय स्त्रीक स्थायी उपस्थिति सामाजिक प्रश्न नहि बनैत अछि।
5.2 नामहीन स्त्री आ ‘चौक’ द्वारा पहचान
कथाक शीर्षक स्वयं आलोचना अछि। स्त्रीक नाम नहि—ओ ‘चौकपरक मौगी’ अछि, अर्थात् ओकर पहचान ओकर जन्म, काम, इच्छा, इतिहास वा सम्बन्ध सँ नहि, सार्वजनिक ठामपर ओकर बैठल देह सँ बनैत अछि। भाषिक रूपेँ ’मौगी’क रोजमर्रा प्रयोग कथाक स्थानीयता दैत अछि, मुदा शीर्षक मे ओकर पुनरावृत्ति स्त्रीक वस्तुकरणक कटुता सेहो उजागर करैत अछि। समाज ओकरा व्यक्ति नहि, दृश्य मानि रहल अछि।
कथावाचक ओकर सौन्दर्य, वक्ष, वर्ण, केस, सिन्दूर, कपड़ा आदि पर सूक्ष्म दृष्टि राखैत अछि। ई वर्णन एक ओर करुण दृश्यता रचैत अछि; दोसर ओर पुरुष-दृष्टिक समस्या पुनरुत्पन्न करैत अछि। कथाक उपलब्धि ई जे स्वयं कथावाचक निर्दोष नैतिक नायक नहि बनैत। ओकर मन मे ‘खराब मौगी’ होयबाक डर, लोकक कहबाक चिन्ता, पत्नी की सोचतीह, स्त्रीप्रति आकर्षणक सम्भावना—ई सभ पूर्वग्रह सक्रिय अछि। अन्तक अपराध-बोध एहि आरम्भिक दृष्टिक पुनर्मूल्यांकन करबैत अछि।
5.3 दर्शक-निष्क्रियता: ‘सभ देखलक, केओ नहि कएलक’
कथावाचक बारम्बार सोचैत अछि जे स्त्री सँ पूछी; मित्र राजेश कहैत छथि—‘एहन बहुत छैक’, ‘पहिने अपन समस्या देखू’; पुलिसक सब-इन्स्पेक्टर ओकरा मानसिक रूपेँ बीमार मानि छोड़ि दैत छथि; स्थानीय ‘दादा’ रबी सेहो पहिने पूछने रहैत अछि, उत्तर नहि भेटलापर हटि जाइत अछि। एतए जिम्मेदारी एक व्यक्ति सँ दोसर व्यक्ति दिस सरकैत रहैत अछि। बिब लाताने आ जॉन डार्लीक ‘दर्शक प्रभाव’ तथा ’उत्तरदायित्वक प्रसरण’क अवधारणा एहि कथा पर विशेष रूपेँ लागू होइत अछि—जतेक अधिक संभावित सहायक, ओतेक व्यक्ति अपन कर्तव्य कम निजी बुझि सकैत अछि।
मुदा कथा सामाजिक मनोविज्ञानक उदाहरण बनि क’ सीमित नहि रहैत। लेखक स्थानीय कारण जोड़ैत छथि—‘लोक की कहत’, स्त्रीक चरित्र पर संशय, अनावश्यक कानूनी झंझट, पुरुष-स्त्री सम्बन्धक सामाजिक निगरानी, पुलिसक रूटीन उदासीनता, स्थानीय शक्तिक सीमित पितृसत्तात्मक न्याय। एहि कारण निष्क्रियता केवल भीड़क संख्या सँ नहि, प्रतिष्ठा-भय आ लैंगिक पूर्वग्रह सँ सेहो बनैत अछि।
5.4 अन्तिम चीख: मौन स्त्रीक भाषिक विस्फोट
कथा भरि जे स्त्री लगभग नहि बजैत अछि, अन्तमे ओकर भाषा ‘नीक’ आ स्पष्ट निकलैत अछि। ओ चिचियाकए अपनाकेँ ‘चौकपरक मौगी’ कहैत अछि आ पुरुषत्वक हिंसक प्रदर्शन पर कटाक्ष करैत अछि। कथा स्पष्ट घटनावृत्तान्त नहि दैत—ओकर संग ठीक की भेल, के कएलक, कखन कएलक—ई सब अनकहल रहैत अछि। एहि रिक्ति सँ कथा कखनो अपूर्ण रहस्य जकाँ नहि, बल्कि सामाजिक आरोप जकाँ काम करैत अछि: प्रश्न अपराधीक नाम मात्र नहि, ओहि सम्पूर्ण वातावरणक अछि जतए निरक्षरित, असहाय, निरुपाय स्त्रीकेँ सभ देखैत रहल।
अन्त मे कथावाचकक स्वीकार—‘हम अपराधी छी’—कथा के नैतिक उपदेश सँ आत्म-आरोप दिस मोड़ि दैत अछि। ई महत्त्वपूर्ण शिल्पात्मक निर्णय अछि। जँ कथा केवल पुलिस, गुंडा वा ‘समाज’केँ दोष द’ समाप्त होइत, तँ पाठक बाहर ठाढ़ रहि सकैत छल। कथावाचक स्वयं दोष मे सम्मिलित होइत अछि, फलतः पाठको स्वतः पुछैत अछि—हम कतेक बेर केवल देखलहुँ, चिन्ता कएलहुँ, चर्चा कएलहुँ, मुदा कएलहुँ किछु नहि? मार्था नुसबाम साहित्यिक कल्पनाशक्तिक सम्बन्ध सहानुभूति आ सार्वजनिक न्याय सँ जोड़ैत छथि; एहि अर्थमे कथा पाठकक सहानुभूति के निष्क्रिय भावना सँ सक्रिय नैतिक प्रश्नमे बदलए चाहैत अछि।
तेसर आ संग्रहक सभसँ राजनीतिक-सामाजिक रूपे प्रहारकारी कथा ‘चौकपरक मौगी’ एकटा शहरीकरणरत गामक पृष्ठभूमिमे आरम्भ होइत अछि — जतय परम्परागत हाट-बजार अब ‘मेगा चौक’ जेहन आधुनिक नामसँ पुनर्नामित भऽ गेल अछि, आ पुरान कृषक परिवारसभ धरतीक मोलक कारणे अकस्मात् धनाढ्य भऽ गेल छथि। एहि परिवर्तनशील परिवेशक वर्णनमे कथाकार शहरीकरणक सांस्कृतिक क्षतिपर सूक्ष्म टिप्पणी सेहो करैत छथि — भाषाक अंग्रेजीकरण, परम्पराक क्षरण आ नव-धनाढ्यताक चकाचौंधपर।
एहि चौकपर कथाक कथावाचक (प्रथम-पुरुष कथावाचक) रोज एकटा मौन, अस्तव्यस्त मुदा स्पष्टतः सुशिक्षित बुझाइत स्त्रीकेँ बैसल देखैत छथि — सिन्दूरधारी, अकेली, भोकासीयुक्त, केओसँ नहि बजैत। कथावाचकक मोनमे ओकरा प्रति करुणा जगैत अछि, मुदा जखनहि ओ ओकरासँ बात करबाक विचार करैत छथि, तखनहि हुनकर मित्र राजेशजी हुनका सचेत करैत छथिन्ह —
छोड़ू ! कहूँ कोनो एहन-तेहन बात हएत तँ अनावश्यक फँसि जाएब।
आ कहूँ खराब मौगी हएछत तँ लोक की कहत ?
ई ‘लोक की कहत’ वाला सूत्र — जे ‘डीप डिप्रेशन’मे सेहो केन्द्रीय भूमिकामे छल — एतय आरो व्यापक सामाजिक स्तरपर संचालित होइत अछि। कथावाचक पुलिस उप-निरीक्षक (राम दयाल यादव) आ स्थानीय ’दादा’ रबीसँ सेहो ओहि स्त्रीक बारेमे पुछताछ करैत छथि, मुदा दुनू संस्था (पुलिस आ अनौपचारिक स्थानीय सत्ता) ओकरा ‘मानसिक रूपे बीमार’ करार दऽ अपन जिम्मेदारीसँ पल्ला झाड़ि लैत छथि। एहि प्रकारे कथाकार संस्थागत उदासीनताक बहुस्तरीय चित्रण प्रस्तुत करैत छथि — परिवार, मित्र-मण्डली, पुलिस, आ स्थानीय समाज — सभ अपन-अपन तर्कसँ हस्तक्षेप नहि करबाक औचित्य ठहरबैत छथि।
कथाक चरम क्षणमे ओ स्त्री, जकरा सभ ‘पागल’ बुझैत रहल छथि, अत्यन्त स्पष्ट, तार्किक आ करुण भाषामे अपन यथार्थ चिकड़िकऽ उजागर करैत छथि —
हँ, हम चौकपरक मौगी छी ! ... अही योग्य !! ... सभ भोगू ! ... तागत देखाऊ !!
चौकपरक मौगीपर ... जे निरीह अछि ... आ ने जकर केओ रक्षक छैक ...
तकरापर जोरजुलुम करू, पुरुषत्व देखाऊ ! ... बाप रे ! ... हम आब चौकपर मौगी छी !!
एहि विस्फोटक स्वीकारोक्तिसँ स्पष्ट होइत अछि जे ओ स्त्री कहियो ‘पागल’ नहि छलीह — ओ बेर-बेर यौन-शोषणक शिकार बनैत रहलीह, आ ओकर आघात-जनित मौनता आ असामान्य व्यवहारकेँ समाज ‘पागलपन’ बुझि, ओकर वास्तविक पीड़ाकेँ अनदेखी करैत रहल। कथा एकटा अत्यन्त प्रत्यक्ष नैतिक निर्णयसँ समाप्त होइत अछि, जे कथावाचक स्वयंपर आ पाठकपर सेहो लागू होइत अछि —
हम अपराधी छी ! चारूभरक लोक अपराधी अछि !!
ई अन्त कथाकेँ केवल एकटा करुण-कथासँ आगू बढ़ाकऽ एकटा नैतिक अभियोग-पत्र बना दैत अछि — पाठक स्वयं सेहो एहि ’चारूभरक लोक’मे शामिल होएबाक अपराध-बोधसँ बाँचि नहि सकैत छथि।
५. तीनू कथाक साझा सूत्र: देह, मौन, दृष्टि आ उत्तरदायित्व
तीनू कथामे देह कथा-अर्थक प्रमुख स्थल अछि। ‘गोलबा’ मे देहकेँ पहिने चुमल, सहलाओल, सजाओल, खिलाओल जाइत अछि; अन्ततः ओही देह काटल, छोलल आ पकाओल जायबाक वस्तु बनैत अछि। ‘डीप डिप्रेशन’ मे मनक अनकहल पीड़ा छाती, नाड़ी, घाम, साँस, रक्तचाप आ स्तब्धताक रूपमे देह पर लिखाइत अछि। ‘चौकपरक मौगी’ मे स्त्रीक देह समाजक निगाह, सौन्दर्य-वर्णन, असुरक्षा आ सम्भावित हिंसाक केन्द्र अछि।
एहि क्रमकेँ ’देह पर अधिकार’क त्रयी कहल जा सकैत अछि। गोलबाक देह पर परिवारक स्वामित्व अछि; अवसादग्रस्त पात्र अपन देह पर नियंत्रण चाहैत अछि, मुदा मनक भय देहकेँ काबू करैत अछि; चौकपरक स्त्रीक देह पर समाजक दृष्टि आ पुरुष-शक्ति आक्रमणकारी अधिकार जतबैत अछि। कथा-संग्रह एतए एक सार्वभौमिक प्रश्न तक पहुँचैत अछि—जीवित देह केकर? प्रेम, परिवार, परम्परा, विवाह, समाज, राज्य, पुलिस, बाजार—ई सभ संस्था देह पर दावा करैत अछि; व्यक्ति वा जीवक स्वत्व कतए अछि?
7. मौन, भाषा आ सत्य
संग्रहक अर्को महत्त्वपूर्ण पक्ष भाषा आ मौनक द्वन्द्व अछि। ‘गोलबा’ मनुष्यक भाषा नहि बजि सकैत अछि, तें ओकर असहमति मनुष्यक सुविधा अनुसार अनुवादित होइत रहैत अछि। ‘डीप डिप्रेशन’क पात्र भाषा रहितो सत्य नहि कहैत; शब्द उपलब्ध अछि, साहस आ प्रमाण अनुपलब्ध। ’चौकपरक मौगी’ सामाजिक संवाद सँ बाहर अछि; अन्तिम चीख साबित करैत अछि जे समस्या भाषिक अक्षमता नहि, ओकर आवाज सुनबाक सामाजिक इच्छा नहि छल।
एहि दृष्टि सँ तीनू कथा ‘कथनक नैतिकता’ पर विचार करैत अछि। कोन पीड़ा के कहल जाय? केकर शब्द विश्वसनीय मानल जाय? जखन पीड़ित नहि बजैत अछि, तखन दर्शकक जिम्मेदारी समाप्त भ’ जाइत अछि की अधिक बढ़ैत अछि? कथाकार बारम्बार पाठककेँ अधूरा संकेत दैत छथि आ पूर्ण प्रमाणक सुविधा नहि दैत छथि। ई ध्वनि-सिद्धान्तक आधुनिक कथात्मक रूप जकाँ बुझल जा सकैत अछि—मुख्य अर्थ अक्सर ओहि ठाम अछि जतए कथा साफ-साफ नहि कहैत।
(क) निरीहताक शोषण
तीनू कथाक केन्द्रीय पात्र — गोलबा (बकरी), डिप्रेशनग्रस्त पुरुष, आ चौकपरक मौगी — तीनू भिन्न-भिन्न प्रकारेँ ‘वाणीहीन’ वा ‘अश्रुतवाणी’ छथि। गोलबाकेँ मनुष्यक भाषा नहि अबैत छैक, डिप्रेशनग्रस्त पुरुष सामाजिक लाजक कारणे अपन सत्य बजबासँ इनकार करैत छथि, आ चौकपरक मौगीक सत्य वाणी सभकेँ ‘पागलपन’ बुझि अनसुनल कएल जाइत छैक। तीनू स्थितिमे, पीड़ितक निजी ‘आवाज’ अस्तित्वमे रहितो समाजद्वारा या त सुनल नहि जाइत छैक, या सुनिकऽ अनसुनल कएल जाइत छैक।
(ख) ‘लोक की कहत’ — सामाजिक मौनताक तर्क
‘डीप डिप्रेशन’ आ ‘चौकपरक मौगी’ दुनूमे ‘लोक की कहत’ वाला भय बेर-बेर आबि, पात्रसभकेँ सही आचरण करबासँ रोकैत अछि। ई सामाजिक-मनोवैज्ञानिक सूत्र कथाकारक एकटा सचेत आलोचनात्मक अवलोकन थिक — समाजमे व्याप्त भय-आधारित शालीनताक संस्कृति, जे वास्तविक करुणा आ न्यायसँ बेसी ‘इज्जत’ आ ’प्रतिष्ठा’क रक्षाकेँ प्राथमिकता दैत अछि।
(ग) आख्यानात्मक विडम्बना (Dramatic Irony)क कुशल प्रयोग
तीनू कथामे कथाकार विडम्बनाक प्रविधिकेँ भिन्न-भिन्न रूपमे प्रयोग करैत छथि। ‘गोलबा’मे पाठक आ चरित्रक ज्ञानक बीचक अन्तर त्रासदीकेँ तीव्र करैत अछि। ’डीप डिप्रेशन’मे पाठककेँ धीरे-धीरे बुझना जाइत अछि जे पात्रक ’सामान्य’ होएबाक दाबी स्वयं ओकर बिमारीक लक्षण थिक। ‘चौकपरक मौगी’मे ’पागल’ समझल गेल स्त्री वास्तवमे सभसँ बेसी स्पष्टवादी आ सचेत निकलैत छथि। एहि त्रिविध विडम्बना-प्रयोगसँ स्पष्ट होइत अछि जे कथाकारक कथा-शिल्पपर गहींर पकड़ अछि।
६. कथा-शिल्प, बिम्ब-विधान आ भाषा-शैली
वृषेश चन्द्र लालक साहित्यिक शिल्पमे एकटा परिपक्व गाम्भीर्य आ बहुआयामी दृष्टिकोण अछि। ओ विषयवस्तुक अनुकूल कथा-शिल्प (Narrative Techniques) क चयन करबामे सिद्धहस्त छथि, जे हुनकर रचनासभकें समकालीन साहित्यमे विशिष्ट स्थान दियबैत अछि।
'गोलबा' मे लेखक मानवेतर दृष्टिकोण (Anthropomorphic Perspective) अपनाबैत छथि, जाहिमे कथाक प्रवाह पशु-इन्द्रियक अनुभूतिक संग आगाँ बढ़ैत अछि आ अन्तमे विदेह-दर्शनमे विलीन भऽ जाइत अछि। ई शिल्प यथार्थकें एकटा भिन्न आ धारदार कोणसँ प्रस्तुत करैत अछि, जतए मनुष्यक क्रूरताकें एकटा अबोध पशुक दृष्टिसँ देखल जाइत अछि।
'डीप डिप्रेशन' मे चेतना-प्रवाह (Stream of Consciousness) आ आन्तरिक एकालाप (Interior Monologue) क उत्कृष्ट प्रयोग अछि। कथाक भीतर कोनो पैघ बाह्य घटना नहि घटैत अछि, मुदा नायकक अवचेतन मनक शंका आ तनाब सिनेमाक रील जकाँ घुमैत अछि, जे पाठककें मानसिक घुटनक साक्षात् अनुभव करबैत अछि।
'चौकपरक मौगी' मे सामाजिक वृत्तचित्र शैली (Social Realism Documentary Style) क सँग प्रथम-पुरुष दृष्टिकोणीय आत्मस्वीकारोक्ति (First-Person Confessional Narrative) अछि जे पाठककें झकझोरि कऽ रखि दैत अछि। कथावाचक एकटा क्यामराक जेना चौकक परिवर्तन, लोकक मानसिकता आ अन्तिम त्रासदीकें रेकर्ड करैत अछि।
भाषा आ बिम्ब-विधानक दृष्टिसँ, वृषेश चन्द्र लालक भाषा ठेठ मैथिलीक रस, लोकोक्ति आ मुहावरासँ समृद्ध अछि। हिनकर भाषामे मिथिलाक माटिक सोंधाई छैक तँ आधुनिक संत्रासकें व्यक्त करबाक लेल धारदार व्यंग्य सेहो। ठेठ मैथिली मुहावरेदार प्रयोग, जेना "कहाँ दोन" (कथाहिक), "चभकि-चभकि कऽ", "ओरिआओन", "कोरिअइनी", "भटरंगा", "चोकटल मुँह-कान", "घेओना पसारए", आ "भाथी जकाँ" कथाकें अतीव जीवन्त आ प्रामाणिक बनाबैत अछि।
बिम्ब-विधान (Imagery) क प्रयोग एहि कथासभक प्राण थिक। 'गोलबा' मे रक्ताभ खड्ग, छटपटाइत धड़, आ अन्तरिक्षमे उधियाइत आत्माक बिम्ब क्रूरता आ निस्पृहताक कन्ट्रास्ट (Contrast) प्रस्तुत करैत अछि। 'डीप डिप्रेशन' मे खिड़की-पर्दा बन्द कोठरी आ 'तुलसी खैनीक गन्ध' एकटा मनोवैज्ञानिक आघात (Trauma Triggers) क सघन बिम्ब थिक जे नायककें विक्षिप्त करैत अछि। 'चौकपरक मौगी' मे कंक्रीट महल आ कम्पाउण्डवालपर मैल-झेल वस्त्रमे मोटगर सिन्दूर थोपने स्त्री—ई भौतिक विकास बनाम मानवीय पतनक एकटा सशक्त विषमतावादी बिम्ब थिक जे समाजक अन्तर्विरोधकें मूर्त रूप दैत अछि।
जेनेट द्वारा प्रतिपादित दृष्टि-नियमनक अवधारणा एहि संग्रहक शिल्प बुझबाक लेल खास उपयोगी अछि। ‘गोलबा’ मे आन्तरिक फोकलाइजेशन पशु अनुभवक अनोखा माध्यम बनैत अछि। ‘डीप डिप्रेशन’ मे तेसर पुरुषक कथन लगभग मुक्त अप्रत्यक्ष शैलीक निकट पहुँचैत अछि—कथावाचक आ पात्रक विचारक सीमा बारम्बार धुँधला जाइत अछि। ‘चौकपरक मौगी’ मे पहिल पुरुषक कथावाचक एक साथ दर्शक, व्याख्याकार आ नैतिक अभियुक्त अछि।
समय-व्यवस्था सेहो भिन्न अछि। ‘गोलबा’ जन्म सँ वधधरि अपेक्षाकृत रैखिक गति राखैत अछि। ‘डीप डिप्रेशन’ स्मृतिमूलक वृत्ताकार समयमे अछि—वर्तमानक छोट संकेत अतीतक सन्देहकेँ पुनः सक्रिय करैत अछि। ‘चौकपरक मौगी’ दैनिक दिनचर्याक पुनरावृत्ति—आफिस जाइकाल देखब, घुरतिकाल देखब—द्वारा स्त्रीक स्थायित्व आ समाजक निष्क्रियता स्थापित करैत अछि; अन्तिम दिन एहि दिनचर्या के तोड़ि दैत अछि।
रीता फेल्स्की साहित्यक चार उपयोग—पहचान, मोहितता, ज्ञान आ आघात—पर बल दैत छथि। ‘गोलबा’ पाठककेँ पशु-स्नेहमे पहचान आ अन्तमे आघात दैत अछि; ‘डीप डिप्रेशन’ मनक अस्थिरताक ज्ञान/पहचान दैत अछि; ‘चौकपरक मौगी’ सामाजिक निष्क्रियता पर ज्ञानक संग आत्म-आघात उत्पन्न करैत अछि। एहि दृष्टि सँ संग्रहक प्रभाव केवल ‘कथा नीक लगल’ नहि, आत्म-परीक्षण अछि।
10. भाषा आ शैली
10.1 बोलचालक मैथिली आ स्थानीय संवेदना
संग्रहक भाषा मूलतः बोलचाल-आधारित मैथिली अछि। ‘गोलबा’ मे घरेलू शब्दावली—बड़कीमाइ, सोनी-मोनी, बब्बू, घास-कोराइ, दूबि, ओछाओन, फुदना, पोखरि, गोसाउनि-घर—कथा के सांस्कृतिक देह दैत अछि। ‘डीप डिप्रेशन’ मे डॉक्टरक बातचीत, आत्म-संवाद आ घरेलू शंका मिलि क’ मिश्रित मनोवैज्ञानिक रजिस्टर बनबैत अछि। ‘चौकपरक मौगी’ मे चौक, बाजार, पुलिस, दादा, मोबाइल, शॉपिंग आ आधुनिक उपभोक्ता-संस्कृति सँ जुड़ल शब्द रजिस्टर बदलि दैत अछि।
एहि बहु-रजिस्टरक लाभ ई जे तीनू कथा एके भाषिक सांचे मे नहि ढलैत। गाम-घरक संवेदना, शिक्षित मध्यवर्गक चिकित्सा-शब्दावली आ नवशहरी बाजारक मिश्र भाषा अलग-अलग सामाजिक संसार रचैत अछि। विशेषकर ‘चौकपरक मौगी’ मे अंग्रेजी-प्रभाव पर कथावाचक स्वयं व्यंग्य करैत अछि; कथा जखन बाद मे ‘शॉपिंग’, ‘कॉस्मेटिक’, ‘स्टाइलिश’, ‘रॉक’, ‘इलेक्ट्रॉनिक’ आदि शब्दक संसार देखबैत अछि, तँ भाषिक मिश्रण स्वयं विषय बनि जाइत अछि।
10.2 व्यंग्य, विस्मयादिबोधकता आ आत्म-व्यंजना
लेखक विस्मयादिबोधक चिह्न, प्रश्न, स्वतःसंवाद, स्थानीय मुहावरा आ कथावाचकीय टिप्पणीक खूब उपयोग करैत छथि। एहि सँ भाषा जीवित आ मुखर बनैत अछि, मुदा किछु ठाम अत्यधिक विस्मयादिबोधकता भावकेँ पाठक पर जोर सँ थोपबाक जोखिम लैत अछि। खासकर जखन घटना अपने पर्याप्त तीव्र अछि, शिल्पक संयम प्रभाव बढ़ा सकैत अछि।
व्यंग्य विशेष रूपेँ तेसर कथा मे सफल अछि। ‘मेगा चौक’क नाम, विदेशीपनक आकर्षण, राताराती जमीन-संपन्नता, नवधनाढ्य व्यवहार, स्थानीय दादागिरी आ ’आधुनिक’ बाजारक चमक—ई सभ पर कथावाचकक टिप्पणी मात्र हास्य नहि; विकासक असंतुलित नैतिक अर्थ पर आलोचना अछि।
वृषेश चन्द्र लालक गद्य-शैली विवरणात्मक विस्तार आ मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मताक अद्भुत सन्तुलन प्रस्तुत करैत अछि। ‘गोलबा’मे ग्राम्य-पारिवारिक जीवनक बारीक विवरण (भोजन, खेल, पर्व-त्योहार) एकटा समृद्ध सांस्कृतिक पृष्ठभूमि बनबैत अछि, जाहिसँ कथाक अन्तिम त्रासदी आरो प्रभावकारी बनि जाइत अछि। ’डीप डिप्रेशन’मे कथाकार आन्तरिक एकालापक तकनीकक प्रयोगसँ पाठककेँ सीधा पात्रक मानसिक उथल-पुथलमे प्रवेश करबैत छथि, जाहिमे प्रश्नवाचक वाक्यसभक बहुल प्रयोग (’तँ कोना ओकरा भ’ जएतैक डिप्रेशन ?‘, ’एकर डाइग्नोसिस ठीक नहि छैक ?’) पात्रक आत्म-सन्देह आ आत्म-प्रवंचनाकेँ जीवन्त बनबैत अछि। ’चौकपरक मौगी’मे संवाद-प्रधान शैली (राजेशजीसँ बातचीत, पुलिससँ, दादासँ) कथाकेँ एकटा सामाजिक-अन्वेषणात्मक (investigative) चरित्र दैत अछि, जे धीरे-धीरे सत्यक उद्घाटन दिस बढ़ैत अछि।
भाषिक स्तरपर, तीनू कथामे ठेठ मैथिली मुहावरा आ लोकोक्तिक स्वाभाविक प्रयोग भेटैत अछि, जे कथासभकेँ प्रामाणिक सांस्कृतिक जमीनपर स्थापित करैत अछि। संवादसभ पात्रानुकूल आ यथार्थवादी छथि — ’चौकपरक मौगी’क अन्तिम विस्फोटक संवाद विशेष रूपे नाटकीय तीव्रतासँ भरल अछि, जे पढ़ितकाल पाठकक हृदय हलचला दैत अछि।
७. भारतीय काव्यशास्त्र आ आधुनिक कथाशास्त्रक आलोक
एहि कथासभमे भारतीय काव्यशास्त्रक विविध रसक अनुपम परिपाक देखल जा सकैत अछि। 'गोलबा' क बाल्यकालमे बड़कीमाइक ममता आ सोनी-मोनीक दुलारमे वात्सल्य रसक प्रस्फुटन होइत अछि। गोलबाक बलिक समय आ 'चौकपरक मौगी' क अन्तिम चीत्कारमे करुण आ भयानक रसक चरम परिणति अछि। मुड़ी कटलाक बाद जीभ कटब, धरक फड़फड़ाबब आ चौकपर मौगी संग भेल पाशविक दुराचारक संकेत वीभत्स आ रौद्र रसकें उद्घाटित करैत अछि। आ अन्ततः, गोलबाक आत्माक अन्तरिक्षमे निस्पृह भावें उधियाएब शान्त रस आ दार्शनिक उच्चताक द्योतक अछि।
भरतमुनिक रस-विचारक आधुनिक कथा पर यांत्रिक अनुप्रयोग उचित नहि, तथापि भाव-संरचनाक अध्ययन लेल रस-दृष्टि उपयोगी अछि। तीनू कथाक केन्द्र करुणा अछि। ‘गोलबा’ मे असहाय जीवक वध, ‘डीप डिप्रेशन’ मे आत्म-सन्देह सँ विघटित मन, ‘चौकपरक मौगी’ मे सार्वजनिक उपेक्षा आ हिंसा—तीनू पाठकमे शोक, दया आ नैतिक बेचैनी उत्पन्न करैत अछि। मुदा ई भावुकतामात्र नहि; प्रत्येक कथामे करुणक संग भयानक, बीभत्स, रौद्र वा शान्त भावक मिश्रण अछि।
‘गोलबा’क अन्त मे भयानक-बीभत्स सँ शान्त/अतीन्द्रिय स्वर दिस गति अछि। ’डीप डिप्रेशन’ मे भय आ करुणा एक-दोसरमे घुलल अछि—पात्र बाह्य शत्रु सँ नहि, सम्भावित सत्य सँ डेराइत अछि। ’चौकपरक मौगी’क अन्तिम चीख करुण सँ रौद्र दिस परिवर्तन अछि; मौन पीड़िता क्षणभर लेल आरोपकर्त्री बनैत अछि। एहि रस-परिवर्तनक कारण संग्रह एकरस करुण कहानी नहि बनैत।
8.2 ध्वनि आ अनकहल अर्थ
आनन्दवर्धनक ध्वनि-विचार अनुसार काव्यक महत्त्वपूर्ण अर्थ प्रायः प्रत्यक्ष कथनक पार्श्वमे प्रकट होइत अछि। एहि संग्रह मे तीन प्रमुख ध्वनि-क्षेत्र अछि। पहिल, गोलबाकेँ असाधारण प्रेम सँ पोसब अन्ततः बलिक तैयारी सेहो भ’ सकैत अछि—कथा आरम्भ मे ई नहि कहैत। दोसर, ’डीप डिप्रेशन’क सन्देह सत्य अछि की नहि, लेखक निर्णायक उत्तर नहि दैत; तें कथा ईर्ष्या वा व्यभिचार पर नहि, सन्देहक अनुभव पर केन्द्रित रहैत अछि। तेसर, चौकपरक स्त्रीक जीवनक पूरा इतिहास अनुपस्थित अछि; ओकर मौन आ अन्तिम भाषिक विस्फोट पाठक सँ रिक्ति भरबाक नैतिक श्रम माँगैत अछि।
8.3 औचित्यक प्रश्न
मम्मटक औचित्य-विचारक व्यापक अर्थ ल’ कहब तँ कथाक प्रत्येक अंशक विषय, पात्र आ भावक संग उचित अनुपात महत्त्वपूर्ण अछि। ‘गोलबा’क आरम्भिक लाड़-प्यार अन्तक हिंसाकेँ आवश्यक गहराई दैत अछि—अतएव विस्तार औचित्यपूर्ण अछि। ’चौकपरक मौगी’ मे चौकक सामाजिक रूपान्तरणक दीर्घ वर्णन सेहो अन्तक उदासीन समाज बुझबाक जमीन बनबैत अछि, यद्यपि संपादकीय कसावट सँ किछु अंश संक्षिप्त भ’ सकैत छल। ‘डीप डिप्रेशन’ मे गुरुजीक दार्शनिक प्रवचन कथा-वातावरणक अंग तँ अछि, मुदा किछु ठाम मनोवैज्ञानिक तात्कालिकता पर भारी पड़ैत अछि।
जेनेट द्वारा प्रतिपादित दृष्टि-नियमनक अवधारणा एहि संग्रहक शिल्प बुझबाक लेल खास उपयोगी अछि। ‘गोलबा’ मे आन्तरिक फोकलाइजेशन पशु अनुभवक अनोखा माध्यम बनैत अछि। ‘डीप डिप्रेशन’ मे तेसर पुरुषक कथन लगभग मुक्त अप्रत्यक्ष शैलीक निकट पहुँचैत अछि—कथावाचक आ पात्रक विचारक सीमा बारम्बार धुँधला जाइत अछि। ‘चौकपरक मौगी’ मे पहिल पुरुषक कथावाचक एक साथ दर्शक, व्याख्याकार आ नैतिक अभियुक्त अछि।
समय-व्यवस्था सेहो भिन्न अछि। ‘गोलबा’ जन्म सँ वधधरि अपेक्षाकृत रैखिक गति राखैत अछि। ‘डीप डिप्रेशन’ स्मृतिमूलक वृत्ताकार समयमे अछि—वर्तमानक छोट संकेत अतीतक सन्देहकेँ पुनः सक्रिय करैत अछि। ‘चौकपरक मौगी’ दैनिक दिनचर्याक पुनरावृत्ति—आफिस जाइकाल देखब, घुरतिकाल देखब—द्वारा स्त्रीक स्थायित्व आ समाजक निष्क्रियता स्थापित करैत अछि; अन्तिम दिन एहि दिनचर्या के तोड़ि दैत अछि।
रीता फेल्स्की साहित्यक चार उपयोग—पहचान, मोहितता, ज्ञान आ आघात—पर बल दैत छथि। ‘गोलबा’ पाठककेँ पशु-स्नेहमे पहचान आ अन्तमे आघात दैत अछि; ‘डीप डिप्रेशन’ मनक अस्थिरताक ज्ञान/पहचान दैत अछि; ‘चौकपरक मौगी’ सामाजिक निष्क्रियता पर ज्ञानक संग आत्म-आघात उत्पन्न करैत अछि। एहि दृष्टि सँ संग्रहक प्रभाव केवल ‘कथा नीक लगल’ नहि, आत्म-परीक्षण अछि।
८. आवरणक परिपाठ
पोथीक आवरण पर आकाश/बादल, परिदृश्य आ अग्रभागमे एक बकरा/पशु-आकृति प्रमुख अछि; शीर्षक ‘गोलबा’ तथा ‘कथा संग्रह’ स्पष्ट लिखल अछि। आवरण संग्रहक पहिल आ शीर्षक-कथा के दृश्य रूपेँ केन्द्रित करैत अछि। परिपाठक दृष्टि सँ ई पाठककेँ पशु-कथा पढ़बाक अपेक्षा दैत अछि, जखन कि संग्रहक दोसर दू कथा मनोवैज्ञानिक आ शहरी-सामाजिक विषय पर अछि। ई असमानता एक ओर शीर्षक-कथाक प्रतीकात्मक प्रधानता स्थापित करैत अछि; दोसर ओर समूचा संग्रहक विस्तृत विषय-विस्तार आवरण सँ तुरन्त अनुमानित नहि होइत।
९. साहित्यिक उपलब्धि आ सीमा
पशु-अनुभूतिक विश्वसनीय आ करुण फोकलाइजेशन: ‘गोलबा’ पाठककेँ मनुष्यक सुविधा-केन्द्रित दृष्टि सँ बाहर ल’ जाइत अछि।
मनोवैज्ञानिक पुनरावृत्तिक रूपात्मक प्रस्तुति: ‘डीप डिप्रेशन’ मे विचारक चक्र कथा-रूप बनि जाइत अछि।
तीव्र शहरीकरणक सामाजिक भूगोल: ‘चौकपरक मौगी’ जमीन, बाजार, भाषा, पुलिस, स्थानीय शक्ति आ स्त्री-सुरक्षाकेँ एके कथा-क्षेत्रमे जोड़ैत अछि।
नैतिक अनिश्चितता: लेखक कई निर्णायक तथ्य स्पष्ट नहि करैत छथि; पाठककेँ निर्णयक जोखिम उठाबए पड़ैत अछि।
मौनक बहुस्तरीय रूप: पशु-वाणीहीनता, मनुष्यक आत्म-गोपन आ स्त्रीक सामाजिक अनसुनेपन तीनू कथा जोड़ैत अछि।
देहक पुनरावृत्त प्रतीक: पोसल/काटल देह, चिन्तासँ काँपैत देह, सार्वजनिक दृष्टि आ हिंसाक अधीन स्त्री-देह—ई संग्रहक गहनतम विषयगत एकता अछि।
अन्तक स्मरणीयता: तीनू कथा अन्तमे पाठकक पूर्ववर्ती पाठ बदलि दैत अछि—बलि, निदान, चीख/अपराध-बोध।
13. आलोचनात्मक सीमा आ सुधारक सम्भावना
एहि संग्रहक किछु सीमा ओकर महत्त्व कम नहि करैत, बल्कि शिल्पक अगिला सम्भावना स्पष्ट करैत अछि।
किछु ठाम कथावाचकीय व्याख्या दृश्य सँ अधिक बोलए लगैत अछि। विशेषकर ’गोलबा’क मृत्योत्तर दर्शन आ ’डीप डिप्रेशन’क गुरुजी-प्रसंग मे संक्षेप कथाक ध्वन्यात्मक शक्ति बढ़ा सकैत छल।
‘डीप डिप्रेशन’ शीर्षक चिकित्सकीय शब्दक निश्चितता दैत अछि, जखन कथा मे प्रस्तुत अनुभव चिन्ता, भय, सन्देह, पुनरावृत्त विचार आ शारीरिक घबराहटसँ मिश्रित अछि। साहित्यिक अस्पष्टता शक्ति अछि, मुदा शीर्षकक नैदानिक कठोरता पाठककेँ एक दिशा मे सीमित करैत अछि।
‘चौकपरक मौगी’ मे स्त्रीक प्रारम्भिक सौन्दर्य-वर्णन लम्बा अछि। जँ लेखकक उद्देश्य पुरुष-दृष्टिक आलोचना अछि तँ अन्त मे ओकर आत्म-आरोप एहि वर्णनकेँ पुनर्पाठ करबैत अछि; तथापि किछु पाठक लेल ई वस्तुकरणक पुनरुत्पादन जकाँ लगि सकैत अछि।
तेसर कथाक नगर-वर्णन अत्यन्त समृद्ध अछि, मुदा कथा-कसावट लेल चुनल अंशमे कतर-ब्योंत सम्भव छल। फेरो ई विस्तारक उपयोग ई अछि जे अन्तिम घटना ‘अचानक अपराध’ नहि, समूचा सामाजिक वातावरणक फल बुझाइत अछि।
विराम-चिह्न आ विस्मयादिबोधक चिह्नक अधिकता किछु ठाम भावनात्मक संकेत स्पष्ट करैत अछि, मुदा सूक्ष्मता घटा सकैत अछि।
तीनू कथा मे स्त्री पात्रक आत्म-वाणी सीमित अछि—तेसर कथा मे ई जानबूझि क’ मौनक विषय बनैत अछि, मुदा भविष्यक लेखनमे पीड़ित स्त्रीक आन्तरिक दृष्टि सेहो कथा-जगतक महत्त्वपूर्ण विस्तार भ’ सकैत अछि।
• विषयगत साहस : तीनू कथा एहन विषयपर लिखल गेल छथि, जकरा मैथिली कथा-साहित्यमे बहुत कम स्पर्श कएल गेल छैक — पशु-बलिक नैतिकता, पुरुष मानसिक स्वास्थ्य, आ यौन-हिंसाक सामाजिक अनदेखी। ई विषय-चयन स्वयं एकटा साहित्यिक साहसक परिचायक थिक।
• दृष्टिकोणक विविधता : पशु-चेतना (गोलबा), पुरुष-अन्तर्द्वन्द्व (डीप डिप्रेशन), आ सामाजिक-अन्वेषण (चौकपरक मौगी) — तीनू भिन्न कथन-कोणक कुशल प्रयोगसँ संग्रहमे शिल्पगत विविधता भेटैत अछि।
• नैतिक स्पष्टता बिनु उपदेशात्मकता : तीनू कथा पाठकमे गहींर नैतिक प्रश्न उठबैत छथि, मुदा कतहु सीधा उपदेश नहि दैत — ई कार्य कथाक संरचना आ विडम्बनाद्वारा स्वयं भऽ जाइत अछि, जे परिपक्व कथा-लेखनक प्रमाण थिक।
सीमा
• ’डीप डिप्रेशन’मे पत्नीक कथित विश्वासघातक आरोप कहियो प्रत्यक्ष रूपे पुष्ट वा खण्डित नहि होइत अछि, जे यद्यपि जानबूझिकऽ अस्पष्ट राखल गेल बुझना जाइत अछि (कथाक मूल विषय पुरुषक मानसिक स्थिति थिक, पत्नीक अपराध वा निर्दोषिता नहि), तथापि एहि अस्पष्टतासँ पत्नी-पात्र स्वयं एकटा बिनु आवाजक संदिग्ध वस्तु बनिकऽ रहि जाइत छथि, जे कथाक अपन केन्द्रीय विषय (आवाजहीनताक आलोचना) सँ किछु विरोधाभासी बुझा सकैत अछि।
• ’गोलबा’क अन्त्येष्टि-वर्णनक तीव्रता तुलनामे कथाक आरम्भिक भाग बेसी विस्तृत अछि, जाहिसँ किछु पाठकलेल कथाक गति (pacing) असन्तुलित बुझा सकैत अछि — यद्यपि ई दीर्घ आरम्भ स्वयं कथाक भावनात्मक निवेशकेँ पुष्ट करबाक सचेत रणनीति सेहो भऽ सकैत अछि।
१०. समकालीन मैथिली कथा-सन्दर्भमे महत्त्व
एहि संग्रहक महत्त्वक दावा व्यापक इतिहासक प्रतिनिधित्वक आधार पर नहि, ओकर विशिष्ट कथात्मक साहस पर कएल जा सकैत अछि। ई घरेलू पशु, मानसिक स्वास्थ्य आ सार्वजनिक स्त्री-सुरक्षा—तीन एहन विषयकेँ कथा मे लैत अछि जाहि पर नैतिक संवेदना अक्सर रूढ़ सामाजिक भाषा सँ ढँकि जाइत अछि। कथा-संग्रह पाठककेँ सीधे सुधारवादी भाषण नहि दैत; ओ पहिने स्नेह करबैत अछि, चिन्ता करबैत अछि, देखबैत अछि, अनिश्चित करैत अछि, तखन अपराध-बोध वा प्रश्नक ठाम छोड़ैत अछि।
मैथिली कथा-लेखनक एक प्रमुख शक्ति सदैव स्थानीय जीवनक सूक्ष्म स्पर्श रहल अछि; एहि संग्रह मे स्थानीयता केवल परिवेश नहि, विचारक माध्यम बनैत अछि। बड़कीमाइक साड़ी, पोखरिक जाड़, गोसाउनि-घर, डॉक्टरक क्लिनिक, तुलसी-खैनीक गन्ध, नव बनल चौक, मकै ओरहा, स्थानीय दादा, पुलिस चौकी—ई सभ वस्तु/स्थान कथा के अवतारी बनबैत अछि। आधुनिक प्रश्न विदेशी शब्दावली सँ नहि, स्थानीय अनुभव सँ उठैत अछि।
११. निष्कर्ष
वृषेश चन्द्र लालक साहित्यिक चिन्तनमे एकटा एहन लोकतान्त्रिक चेतना अछि जे समाजक अन्तिम पाँतीमे ठाढ़ व्यक्ति (वा पशु) क पीड़ाकें आत्मसात करैत अछि। हिनकर राजनीतिक जीवन जतए प्रत्यक्षतः सत्ता आ व्यवस्थामे लोकतान्त्रिक सुधारक लेल समर्पित रहल अछि, ओतए हिनकर साहित्य सामाजिक आ मनोवैज्ञानिक लोकतन्त्रक वकालत करैत अछि। हिनका द्वारा अनुदित नेपाली उपन्यास 'सुम्निमा' आ 'मोदिआइन' जतए ऐतिहासिक आ पौराणिक आख्यानक माध्यमसँ मानव स्वभावक विश्लेषण करैत अछि, ओतए हिनकर मौलिक कथा संग्रह 'गोलबा' पूर्णतः समकालीन यथार्थक धरातलपर ठाढ़ अछि।
समग्र रूपें कहल जाए तँ वृषेश चन्द्र लाल रचित कथा संग्रह 'गोलबा' मैथिली गद्य-साहित्यक आधुनिक कालखण्डक एकटा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण, वैचारिक रूपें प्रखर आ कालजयी उपलब्धि अछि। ई पोथी केवल मनोरञ्जनक साधन नहि अछि, बल्कि ई पाठकक संवेदनाकें झकझोरि कऽ ओकरा आत्ममंथन लेल विवश करनिहार एकटा मनोवैज्ञानिक आ समाजशास्त्रीय दस्तावेज अछि।
जहाँ 'गोलबा' कथा मानवीय स्वार्थ, प्रेम छद्म, आ धर्मक नामपर होइबला अमानवीय हिंसापर कठोर प्रहार करैत अछि, ओतए 'डीप डिप्रेशन' आधुनिक जीवनक अन्हार कोनामे पसरल अवसाद, वैवाहिक रिक्तता आ पुरुष-मनोविज्ञानक घुटनकें स्वर दैत अछि। 'चौकपरक मौगी' कथा हमरासभक तथाकथित सभ्य, शहरीकृत आ आधुनिक समाजक ओहि अमानवीय अनुहारकें बेनकाब करैत अछि, जतए मानवीय संवेदना कंकरीटक मल तरें दबिकऽ मरि चुकल अछि आ असहाय स्त्री-अस्मिता पुरुषत्वक अहङ्कारक शिकार बनि रहल अछि।
हिनकर कथासभ कोनो आदर्शवादी समाधान वा उपदेश नहि दैत अछि। ओ केवल यथार्थपरक शल्यक्रिया कऽ समाजक घावकें उघाड़ि कऽ पाठकक समक्ष राखि दैत छथि, जाहिसँ पाठक स्वयं चिन्तन करबाक लेल विवश हुअए। ई शैली विश्व साहित्यक महान मनोवैज्ञानिक यथार्थवादी रचनाकारसभक सम्मुख हुनका स्थापित करैत अछि। भाषायी प्राञ्जलता, सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, अस्तित्ववादी दर्शन आ सामाजिक यथार्थवादक जे दुर्लभ समन्वय एहि कथासभमे भेटैत अछि, तकर लेल वृषेश चन्द्र लालक ई पोथी मैथिली साहित्यक इतिहासमे सदैव उच्च आदरक सँग स्मरण कएल जाएत। समकालीन समाजक विखण्डन, स्त्री-विमर्श, नव-पूँजीवादी शहरीकरणक त्रासदी, आ नव-मनोविज्ञानक अध्येतासभक लेल 'गोलबा' एकटा अनिवार्य आ महत्त्वपूर्ण सन्दर्भ ग्रन्थक रूपमे स्थापित होमएबाक पूर्ण योग्यता रखैत अछि।
’गोलबा’क तीनू कथा पढ़लाक बाद सबसे स्थायी अनुभूति ई रहैत अछि जे पीड़ा प्रायः सभक सामने होइत अछि, मुदा ओकर अर्थ बुझब आ ओकर प्रति उत्तरदायी बनब कठिन अछि। गोलबाक प्रति प्रेम छल, तथापि ओकर जीवन पर ओकर अधिकार नहि छल। ’डीप डिप्रेशन’क पात्रक परिवार आ डॉक्टर उपस्थित छथि, तथापि निर्णायक सत्य अनकहल अछि। चौकपरक स्त्री रोज सभक आँखिक सामने अछि, तथापि ओकर स्थिति निजी/सामाजिक जिम्मेदारीक बीच छूटैत रहैत अछि।
संग्रह एहि नैतिक विरोधाभासकेँ तीन स्तरपर खोलैत अछि: प्रेम हिंसाकेँ हमेशा रोकैत नहि; ज्ञान प्रमाणक अभावमे पक्षाघात बनि सकैत अछि; सहानुभूति क्रिया बिना आत्म-सन्तोष बनि सकैत अछि। एहि कारण ‘गोलबा’ केवल तीन करुण कथा नहि, करुणाक परीक्षा अछि। पाठककेँ पुछल जाइत अछि—हम जकरा प्रेम करैत छी, तकर स्वतन्त्रता मानैत छी की केवल अपन स्नेहक वस्तु बनबैत छी? हम जखन सन्देह/पीड़ा मे छी, सत्य कहबाक नैतिक साहस कतेक रखैत छी? आ हम जखन दोसरक दुःख देखैत छी, ’लोक की कहत’क भय सँ कतेक देर धरि चुप रहैत छी?
कला-दृष्टि सँ संग्रहक सर्वोत्तम क्षण ओहि ठाम अछि जतए लेखक उत्तर नहि दैत छथि—गोलबाक अन्तिम अस्तित्वक प्रश्न, ’डीप डिप्रेशन’क सन्देहक अनिश्चित सत्य, आ चौकपरक स्त्रीक अनकहल जीवनक इतिहास। एहि रिक्तिसभमे पाठकक विवेक सक्रिय होइत अछि। जँ किछु ठाम व्याख्या कम आ मौन अधिक रहित, तखन संग्रह आरो तीक्ष्ण बनैत; मुदा वर्तमान रूपमे सेहो ई कथा-संग्रह संवेदना, मनोविज्ञान आ सामाजिक नैतिकताक उल्लेखनीय संगम प्रस्तुत करैत अछि।
‘गोलबा’ मैथिली कथा-साहित्यमे एकटा उल्लेखनीय योगदान थिक, जे तीन भिन्न-भिन्न आख्यानिक कोणसँ एकहि मौलिक नैतिक प्रश्नकेँ बेर-बेर उठबैत अछि — निरीह, वाणीहीन प्राणी वा व्यक्तिक प्रति समाजक कर्तव्य की थिक, आ ओहि कर्तव्यक उल्लंघनमे ‘मौन दर्शक’ केर भूमिका केहन अपराधपूर्ण होइत अछि। बकरी गोलबाक विश्वासघाती बलिदानसँ लऽ कऽ, डिप्रेशनग्रस्त पुरुषक सामाजिक-लज्जाजनित मौनता धरि, आ चौकपरक मौगीक अनसुनल चीत्कार धरि — तीनू कथा एकटा साझा सत्यक उद्घाटन करैत छथि : निरीहताक शोषण तखने सम्भव होइत अछि, जखन आसपासक लोक चुप रहबाक चयन करैत अछि।
वृषेश चन्द्र लालक कवितासभमे (जेना ‘ढोलक’ आ ‘आन्दोलन’मे) जे सामाजिक न्यायक प्रत्यक्ष, नारात्मक स्वर भेटैत अछि, ’गोलबा’क कथासभमे ओहि स्वरक एकटा बेसी सूक्ष्म, संरचनात्मक रूप देखबामे अबैत अछि — जतय नैतिक आक्रोश सीधा उद्घोषणाक बदला कथाक शिल्प आ विडम्बनाद्वारा व्यक्त होइत अछि। एहि दृष्टिसँ, ’गोलबा’ कथाकारक साहित्यिक व्यक्तित्वक एकटा आरो परिपक्व, आरो बहुआयामी पक्ष उजागर करैत अछि, जतय राजनीतिक-सामाजिक प्रतिबद्धता आ कथा-कलाक सूक्ष्म शिल्प एक-दोसरकेँ प्रभावी ढंगे पूरा करैत छथि।
१२. कथानुसार मुख्य आलोचनात्मक संकेत
१३. ग्रन्थसूची
लाल, वृजेश चन्द्र. गोलबा: कथा संग्रह.
भरतमुनि. नाट्यशास्त्र. विभिन्न मानक संस्करण.
आनन्दवर्धन. ध्वन्यालोक. विभिन्न मानक संस्करण.
मम्मट. काव्यप्रकाश. विभिन्न मानक संस्करण.
Genette, Gérard. Narrative Discourse: An Essay in Method. Cornell University Press, 1980.
Derrida, Jacques. The Animal That Therefore I Am. Fordham University Press, 2008.
Booth, Wayne C. The Company We Keep: An Ethics of Fiction. University of California Press, 1988.
Nussbaum, Martha C. Poetic Justice: The Literary Imagination and Public Life. Beacon Press, 1995/1997 editions.
Felski, Rita. Uses of Literature. Blackwell, 2008.
Scarry, Elaine. The Body in Pain: The Making and Unmaking of the World. Oxford University Press, 1985.
Latané, Bibb and John M. Darley. The Unresponsive Bystander: Why Doesn’t He Help? Appleton-Century-Crofts, 1970.
Williams, Raymond. The Country and the City. Chatto & Windus, 1973.
4. माल्हो
नारी-विमर्श • दलित-अधस्तन दृष्टि • राजनीतिक-नैतिक पाठ • स्मृति-अध्ययन • आख्यानशास्त्रीय विवेचन
१. प्रस्तावना : मुख्य प्रतिपाद्य आ साहित्यिक महत्त्व
‘माल्हो’ केँ केवल सामाजिक यथार्थपर लिखल नौ गोट कथाक संग्रह बुझब त ओकर साहित्यिक अर्थक एकटा पैघ भाग छूटि जाएत। ई संग्रह ग्राम्य स्मृति, नारीक मौन पीड़ा, जातिगत अपमान, लोकतान्त्रिक संघर्ष, दल-बदल, राज्य-हिंसा, युद्ध, प्रेम, मातृत्व, शिक्षा, इतिहास आ सार्वजनिक नैतिकताक एहन अन्तःसम्बद्ध संसार रचैत अछि जतय सत्ता प्रायः सभ रूपमे उपस्थित अछि—घरक भीतर पतिक वचनक सत्ता, जातिक सत्ता, पुलिसक सत्ता, दलक सत्ता, राज्यक सत्ता, परम्पराक सत्ता आ पुरुष-दृष्टिक सत्ता। एहि सभक सम्मुख लेखक बारम्बार एके प्रश्न ठाढ़ करैत छथि : मनुष्यक गरिमा कतय अछि, आ ओकर रक्षण के करत?
संग्रहक विशेषता ई अछि जे लेखक सिद्धान्तक नारा मात्र नहि लिखैत छथि। हुनक कथा अपन चरित्रसभक देह, प्रतीक्षा, लाज, भूख, अपमान, नोर, स्मृति आ छोट-छोट घरेलू क्रियाक भीतर सामाजिक संरचनाक असर देखबैत अछि। देपुरवाली काकीक जीवनभरि प्रतीक्षा, माल्होक कुमुदिनी, सिकन्दर डोमक बच्चाक विद्यालयी अपमान, फुलियाक लाल वैवाहिक साड़ी, आ इन्द्रकुमारीक एकदन्त हाथी-नौलखा हार—ई सभ सामान्य वस्तु नहि रहि जाइत अछि; ई मानवीय अस्मिता आ ऐतिहासिक हिंसाक प्रतीक बनि उठैत अछि।
फणीश्वरनाथ रेणु, राजकमल चौधरी, लिली रे आ गंगेश गुंजन जकाँ सिद्धहस्त कथाकारसभक परम्पराकेँ आगाँ बढ़बैत लालजी मिथिला-मधेशक माटि, संघर्ष आ राजनीतिक चेतनाकेँ यथार्थवादी ढङ्गसँ प्रस्तुत करैत छथि। आधुनिक साहित्यमे जतय रोमानियत आ अमूर्तताक प्रभाव बढ़ल, ओतय ‘माल्हो’ यथार्थवादक कठोर धरातलपर समाजक असुविधाजनक सत्य खोलैत अछि।
एक आलोचनात्मक दृष्टि ई सेहो रेखांकित करैत अछि जे अङ्ग्रेजी आ अन्य पाश्चात्य भाषाक प्रभावक बीच लालजीक ठेठ, प्राञ्जल मैथिली भाषाकेँ नव ऊर्जा दैत अछि; दोसर दिस संग्रहक वास्तविक भाषिक बनावट सीमा-प्रदेशक बहुभाषिक जीवनकेँ सेहो आत्मसात् करैत अछि।
वृषेश चन्द्र लालक कथा-संग्रह “माल्हो” मैथिली कथा-साहित्यक ओहि धारक प्रतिनिधित्व करैत अछि जे नेपालक मधेश-तराई क्षेत्रक सामाजिक-राजनीतिक यथार्थकेँ मैथिली भाषाक माध्यमसँ अभिव्यक्ति दैत अछि। नअटा कथाक ई संग्रह विषयवस्तुक दृष्टिएँ बड़ विस्तृत अछि — एकटा दिस गामक आङ्गन-दलानक पारिवारिक आत्मीयता आ बाल्यकालीन प्रेमक कोमल स्मृति अछि, त दोसर दिस पञ्चायती व्यवस्था, प्रजातन्त्र आन्दोलन, दलबदल, जातिगत भेदभाव, नक्सलवादी/जनयुद्धक हिंसा आ ऐतिहासिक सेन-वंशीय गाथा धरिक विस्तृत फलक अछि। एहि दृष्टिएँ ई संग्रह मात्र कथा-संग्रह नहि, बल्कि नेपाली मधेशक विगत पचास-साठि वर्षक सामाजिक-राजनीतिक संक्रमणकाल — राणा-पञ्चायत सँ प्रजातन्त्र, प्रजातन्त्रसँ जनआन्दोलन आ जनआन्दोलनसँ सशस्त्र द्वन्द्वधरिक — एकटा साहित्यिक दस्तावेज सेहो बनि गेल अछि।
शीर्षक-कथा “माल्हो” केर चयन अपने-आपमे अर्थपूर्ण अछि। माल्हो एकटा साधारण, हाशियाकृत वर्गक ग्रामीण किशोरीक नाम थिक जे बाल्यकालीन सहज प्रेमक प्रतीक बनि कथाकारक स्मृतिपटलपर सदिखनलेल अंकित भऽ जाइत छथि। एहि नामकेँ शीर्षक बनेनाइ लेखकक ओहि सम्वेदनाक संकेत करैत अछि जे संग्रहक भीतर सभठाम प्रवाहित अछि — सामान्य, उपेक्षित, हाशियापर पड़ल पात्र-पात्रीक भीतरी संसारकेँ केन्द्रमे राखब।
‘माल्हो’ सुदामा प्रकाशन, जनकपुरधामसँ प्रकाशित कथा-संग्रह अछि।
२. सर्जकक वैचारिक धरातल, साहित्यिक यात्रा आ कथा-परिवेश
कोनो सेहो साहित्यकारक कृतिम ओकर निज जीवनक संघर्ष आ ओकर वैचारिक धरातलक प्रतिच्छाया अवश्य रहैत छैक। वृषेश चन्द्र लालक जन्म २९ मार्च १९५५ ई. मे भेलन्हि। हिनकर पिता स्व. उदितनारायण लाल आ माता श्रीमती भुवनेश्वरी देवी छलीह। हिनकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छलन्हि। हिनकर पारिवारिक आ वैचारिक पृष्ठभूमि नेपालक प्रजातान्त्रिक आन्दोलन, बी.पी. कोइराला (विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला) क लोकतान्त्रिक समाजवाद, नेपालक पञ्चायत-विरोधी जनआन्दोलन, आ मधेसक स्वाभिमान-आन्दोलनसँ गहिरगर रूपेँ सम्बद्ध रहल अछि। ओ एकटा वरिष्ठ राजनीतिज्ञ, पूर्व राष्ट्रिय सभा सदस्य आ नेपालक प्रजातान्त्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि, जे अपन वैचारिक स्पष्टताक लेल जानल जाइत छथि। राष्ट्रिय राजनीतिमे ओ तराई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी (तमलोपा) आ जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) सँ जुड़ल रहलाह अछि।
साहित्यिक क्षेत्रमे हिनकर योगदान आख्यान धरि सीमित नहि अछि। बी.पी. कोइरालाक ‘मोदिआइन’ आ ‘सुम्निमा’क मैथिली रूपान्तरण, मौलिक कविता-संग्रह ’आन्दोलन’, बाल-कविता-संग्रह ‘ढोलक’, आ कथा-संग्रह ‘माल्हो’ तथा ‘गोलबा’ हुनकर बहुविध साहित्यिक व्यक्तित्वक संकेत दैत अछि।
वृषेश चन्द्र लाल जनकपुरक पूर्व नगरप्रमुख आ मधेश-आधारित राजनीतिक नेतृत्वक महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व सेहो रहल छथि। ई पृष्ठभूमि ‘बलिदानी’, ‘पाथरसनक लोक .… !’ आ ’ढहलेल दलबदलू !’क राजनीतिक संसार केँ अनुभवजन्य विश्वसनीयता दैत अछि; मुदा जीवनी कथा-कथ्यक कुंजी भऽ सकैत अछि, कथा केँ जीवनीक प्रतिलिपि नहि मानल जा सकैत अछि।
कवितासँ कथा, बाल-साहित्यसँ अनुवाद, आ राजनीतिसँ साहित्य धरि बहुविध अनुभव संग्रहमे शिल्पगत रूपेँ सेहो देखाइत अछि—राजनीतिक कथा भाषण, स्मरण आ आत्मसंवादक सहारा लैत अछि, जखन कि ‘माल्हो’ वा ‘देपुरवाली काकी’ सूक्ष्म संकेत, देह-भाषा, घरेलू स्मृति आ मौनक माध्यमसँ अर्थ खोलैत अछि।
लेखकक जनकपुर-मधेश केन्द्रित अनुभव संग्रहक स्थानिक संवेदनाकेँ महत्त्वपूर्ण बनबैत अछि। नेपालक २०४६ सालक जनआन्दोलन, पंचायती व्यवस्था, लोकतन्त्रक बादक दलगत अवसरवाद, मधेशीय ग्राम-समाज, जाति-संरचना, सीमा-पार भारतक तुलना, राज्यक दमन, आ माओवादी ’जनयुद्ध’क छाया—ई सभ कथा-परिस्थिति केवल पृष्ठभूमि नहि, चरित्रक नैतिक निर्णयक निर्णायक अंश अछि।
लालजी अपन प्रत्यक्ष भोगायल यथार्थ, जेल-यातना, भूमिगत आन्दोलन, सत्ता-लोलुपताक पाखण्ड आ ग्रामीण तराई-मधेशक सीमान्तकृत जीवन-सङ्घर्षकेँ काल्पनिक रोमानियतसँ दूर राखैत छथि। कथा-भूमि जनकपुरधामक गल्ली, मिथिलाक चौड़ी-चाँचर, सिन्धुली-जलेश्वरक जेलक कालकोठरी, काठमाण्डूक सत्ता-गलियारा आ अन्तर्राष्ट्रिय गोष्ठीसभधरि विस्तृत अछि।
३. संग्रहक संरचना आ विषयगत यात्रा
ई क्रम अपनेमे अर्थपूर्ण अछि। आरम्भक ‘देपुरवाली काकी’ निजी-स्मृति आ घरेलू अन्यायसँ प्रवेश करैत अछि; बीचमे राजनीतिक कथा व्यक्तिगत अनुभव केँ राज्य, दल आ लोकतन्त्रक विस्तृत धरातलपर लऽ जाइत अछि; ‘सिकन्दर डोम’ आ ‘आ ओ मारलि गेलि !’ समाजक सीमान्तक आवाज केँ केन्द्रमे अनैत अछि; अन्तिम कथा इतिहासक एक प्रसंग केँ वर्तमान नारी-चेतनाक भीतर पुनःरचैत अछि। एहि तरहें संग्रह घरक ओसारा सँ आरम्भ भऽ राज्य, युद्ध आ इतिहास धरि फैलैत अछि, मुदा हर जगह ‘मनुष्य’ ओकर मूल इकाई रहैत अछि।
संग्रहमे कुल नअटा कथा सङ्कलित अछि — देपुराबाली काकी, बलिदानी बलिदानी, पाथरसनक लोक, माल्हो, ढहलेल दलबदलू, करी कोब्हाम, सिकन्दर डोम, आ ओ मारलि गेलि, आ एकदन्त हाथी आ नौलखा हार। एहि क्रमकेँ ध्यानसँ देखलासँ बुझना जाइत अछि जे लेखक जानिबूझिकय एकटा वृत्ताकार संरचना रचने छथि — संग्रहक आरम्भ आ अन्त दुनू ठाम स्त्री-चरित्रक त्याग आ मौन संघर्षकेँ केन्द्रमे राखल गेल अछि (देपुराबाली काकी आ इन्द्रकुमारी), बीचमे राजनीतिक-सामाजिक कथासभक त्रयी अछि, आ बीच्चोबीच शीर्षक-कथा “माल्हो” कोमल, वैयक्तिक स्मृतिक रूपमे ठाढ़ अछि। एहि संरचनात्मक सन्तुलनसँ संग्रह मात्र प्रकीर्ण कथासभक संकलन नहि बुझाइत अछि, बल्कि एकटा सोचल-समझल विषयगत यात्रा बुझना जाइत अछि।
४. कथा-दर-कथा गहन पाठ
४.१ ‘देपुरवाली काकी’ : स्मृतिक पर्दापर पितृसत्ताक दीर्घ छाया
संग्रहक पहिल कथा एकदम आधुनिक दृश्यसँ शुरू होइत अछि—टेलिभिजन, फिल्म ‘तीसरी कसम’, वहीदा रहमानक छवि, कम्प्यूटर आ फोटो-संशोधन। ई आधुनिक तकनीकी संसार अचानक कथावाचक केँ ग्राम्य अतीतक एक स्त्रीक चेहरा लग पहुँचा दैत अछि। एहि शिल्पगत युक्तिसँ लेखक देखबैत छथि जे स्मृति रेखीय नहि होइत अछि; कोनो छवि, गन्ध, स्वर वा चेहराक समानता वर्तमानक पर्दा फाड़ि अतीत केँ सजीव कऽ सकैत अछि।
देपुरवाली काकी कथावाचकक बाल्यकालमे दुलार, सेवा आ सुरक्षा देनिहार स्त्री छथि। हुनक सौन्दर्यक चर्चा अछि, मुदा कथा धीरे-धीरे बाह्य सौन्दर्यसँ हटि हुनक निःशब्द जीवन-यातनाक भीतर जाइत अछि। मिसरी काका, रीगावाली आ बाल-विवाहक प्रसंग खुलैत गेलापर स्पष्ट होइत अछि जे काकीक त्रासदी कोनो दैविक ‘पूर्वजन्मक पाप’ नहि, पुरुषक अहंकार, असंगत प्रतिज्ञा आ परिवार-समाजक मौन स्वीकृतिक परिणाम अछि। ई महत्त्वपूर्ण नैतिक उलटफेर अछि : कथा लोकविश्वासक ‘भाग्य’ व्याख्या केँ प्रस्तुत करैत अछि, फेर घरक स्त्री-स्वरक माध्यमसँ ओकर प्रतिवाद करैत अछि।
मधुक आक्रोश कथा भीतर आलोचकक काज करैत अछि। ओ पुरुषक ओहि प्रवृत्तिपर चोट करैत अछि जाहिमे एक स्त्रीक कारण दोसर स्त्रीपर जीवनभरि अन्याय कएल जाइत अछि, आ ‘वचन’ पुरुषक नैतिकता बनि जाइत अछि जबकि ओकर दाम स्त्री चुकबैत अछि। एहि कारण ‘देपुरवाली काकी’ मात्र करुण कथा नहि, पितृसत्ताक नैतिक शब्दावली—धर्म, वचन, सहनशीलता, पतिव्रत—क पुनर्परीक्षण अछि।
कथाक चरम विडम्बना अत्यन्त प्रभावकारी अछि। मिसरी काका पछताइत घर नहि छोड़बाक प्रतिज्ञा करैत छथि; काकी प्रतीक्षित क्षण पाबि उन्मत्त आनन्दमे समस्त गामक संग खुशी बाँटैत छथि; मुदा ओहि राति हुनक मृत्यु भऽ जाइत अछि। जिनगीभरि प्रतीक्षा कएल मिलनकेँ समय मात्र किछु घण्टा दैत अछि। ई पितृसत्ताक विलम्बित पश्चात्तापक नैतिक निष्फलता देखबैत अछि—क्षमा आवश्यक होइतहुँ नष्ट समय लौटा नहि सकैत अछि।
शिल्पगत उपलब्धि
फोटो-स्मृतिसँ शुरू भऽ पारिवारिक मौखिक कथा आ बाल-स्मृतिमे उतरनाइ, फेर वर्तमानमे भावात्मक प्रतिक्रिया—ई बहुस्तरीय आख्यान कथा केँ सामान्य पारिवारिक संस्मरणसँ ऊपर उठबैत अछि। काकीक मौन, आँगन-दलान, भोजन, पंखा झोंकब, द्वारपर बाट ताकब—छोट घरेलू बिम्ब स्त्रीक अदृश्य श्रम आ दमनक बड़ा इतिहास लिखैत अछि।
मिसरी काकाक ‘रीगाबाली’ नामक दोसर महिलासँ सम्पर्कक चर्चा फैललापर पारिवारिक कलह होइत अछि। अपन गल्ती सुधारबाक बदला ओ प्रतिज्ञा लैत छथि जे जीवनभरि देपुरवाली काकीसँ नहि बतियाओताह आ घरमे नहि सुतताह; रामननक दलान हुनकर स्थायी शयन-ठाम बनि जाइत अछि।
काकी बिना उजुर-शिकायत पतिक वस्त्र धोवन, भोजन आ सेवा-सुश्रूषा करैत रहैत छथि। बहुत बाद मिसरी काका भोकासी पाड़ि कानैत क्षमा माँगैत छथि; काकी प्रतीक्षित मिलनक आनन्दमे गामभरि खुशी बाँटैत छथि, मुदा ओही राति हृदयघातसँ मरि जाइत छथि। दू मासक बाद मिसरी काका सेहो प्रायश्चित्तक आगिमे जरैत प्राण त्यागि दैत छथि।
“भीष्म जकाँ अधलाह प्रतिज्ञा”क बिम्ब पुरुष-अहंकारक निरर्थक कठोरता खोलैत अछि। वहीदा रहमानक बाह्य फिल्मी सौन्दर्यक विपरीत देपुरवाली काकीक आन्तरिक, त्रासद सौन्दर्य कथा केँ अलग गाम्भीर्य दैत अछि।
कथाक अन्तमे दुइये पीढ़ी बाद काकीक नाम आ पहचान बिसरा जयबाक चित्रण—“कोन देपुराबाली काकी?”—समयक निर्ममताकेँ आरो तीक्ष्ण करैत अछि।
४.२ ‘बलिदानी’ : शहादतक स्मृति केकर सम्पत्ति?
‘बलिदानी’ लोकतन्त्र प्राप्तिक बाद राजनीति द्वारा आन्दोलनक स्मृतिक हरणक कथा अछि। कार्यक्रमक समयपालन, मंचीय व्यवहार, आयोजनक दिखावा, आ आन्दोलनक स्वघोषित नायकसभक उपस्थिति—आरम्भे लेखक सार्वजनिक राजनीतिक संस्कृतिक सूक्ष्म व्यंग्यचित्र बनबैत छथि। २०४६ सालक जनआन्दोलनक सन्दर्भ कथा केँ ठोस इतिहासक भूमि दैत अछि, मुदा प्रश्न व्यापक अछि : क्रान्तिक सफलता बाद ओकर स्मृति पर अधिकार केकर होइत अछि?
कथाक केन्द्रीय व्यक्ति ओहि पीढ़ीक प्रतिनिधि अछि जे दमन, जेल, चोट आ व्यक्तिगत क्षति भोगलक, मुदा लोकतन्त्रक बाद सत्ता-व्यवस्थामे किनार कऽ देल गेल। पीड़ित-सहायता, राजनीतिक कैदीक सूची, सिफारिश आ सम्मानक प्रक्रियामे अवसरवादी, जातीय गुट वा अपराधी घुसि जाइत छथि। एहि बिन्दुपर कथा संस्थागत स्मृतिक राजनीति खोलैत अछि : अभिलेख जेकर हाथमे, इतिहासो ओकरे हाथमे।
तथापि कथा निराशावादी निष्कर्षपर नहि रुकैत अछि। नायक वर्तमान लोकतन्त्रक विकृति देखि क्षुब्ध अछि, मुदा पंचायती दमनक स्मृति ओकरा प्रतिगमनक विरुद्ध ठाढ़ करैत अछि। लेखक लोकतन्त्र केँ देवत्व नहि दैत छथि; ओकरे भीतर भ्रष्टाचार आ स्मृति-हरण देखबैत छथि, परन्तु तानाशाहीक तुलनामे सुधारयोग्य लोकतान्त्रिक क्षेत्रक नैतिक महत्त्व स्वीकारैत छथि। ई राजनीतिक परिपक्वता कथाकेँ दलगत प्रचारसँ बचबैत अछि।
एहि पुनर्परिभाषासँ शहादत पुरुष-वीरक एकल गाथा नहि रहैत अछि; परिवार, विशेषतः स्त्री आ बच्चाक दीर्घकालीन दुःख राजनीतिक स्मृतिक केन्द्रमे आबैत अछि। सार्वजनिक मंचपर माल्यार्पण आ नारा एक क्षणक क्रिया अछि, किन्तु विधवाक एकाकी जीवन दीर्घ बलिदान। कथा राष्ट्रवादी वीरगाथाक अदृश्य घरेलू मूल्य केँ उजागर करैत अछि।
कथाक स्मृति-सभा दुर्गानन्द झाक शहादतसँ जुड़ल अछि—ओ पञ्चायत कालमे जनकपुरमे राजा महेन्द्रपर बम प्रहारक बाद फाँसी चुमने छलाह। ‘चैते’ शब्द प्रजातन्त्र अएलाक बाद अचानक क्रान्तिकारी बनि पार्टीमे पद आ लाभ बटोरयवला अवसरवादी प्रवृत्तिक व्यंग्यात्मक नाम बनैत अछि।
मञ्चपर शहीदक अन्तिम समयक गीता-रामायण पाठक कथा सुनाओल जा रहल अछि, मुदा मुख्य पात्रक मनमे प्रश्न उठैत अछि जे वास्तविक “बलिदानी” शहीदसँ बेसी हुनक नवयौवना विधवा पत्नी, वृद्धा माय आ परिवार नहि छथि, जे जीवनभरि नोर, अभाव आ संत्रासमे तिल-तिल कऽ जरैत रहल?
कथा लोकतन्त्रक विकृतिसँ मोहभङ्ग व्यक्त करैतहुँ प्रतिगमनक समर्थन नहि करैत; “पञ्चायतसँ तँ बूड़बकहो प्रजातन्त्र हजार गुणा नीक” वाली भावना प्रतिकारक स्वतन्त्रताकेँ मूल नैतिक कसौटी बनबैत अछि।
४.३ ‘पाथरसनक लोक .… !’ : नैतिक साहस, आदर्शवाद आ अभिभावकीय भय
ई कथा राजनीति-विमुख होमय चाहैत परिवारक भीतर राजनीति फेर कोना प्रवेश करैत अछि, तकर मार्मिक आख्यान अछि। पिता स्वयं पुरान राजनीतिक संघर्षक यातना भोगने छथि; पत्नी मधु परिवारकेँ राजनीति सँ बचा कऽ राखय चाहैत छथि; मुदा बेटा पुलिस द्वारा पीटल एक विद्यालयी बच्चाकेँ बचाबय जाइत अछि आ स्वयं लाठी खाइत अछि। प्रश्न ई नहि रहि जाइत जे ‘राजनीतिमे जएबाक’ निर्णय के लेलक; प्रश्न बनैत अछि—अन्याय आँखिक आगा हो त मौन रहब की राजनीतिक क्रिया नहि थिक?
पिताक अन्तर्द्वन्द्व कथाक प्राण अछि। एक दिस ओ बेटाक साहसपर गर्वित छथि, दोसर दिस अपन अनुभवक कारण राजनीति सँ दूर रहबाक उपदेश दैत छथि। एहि विरोधाभासमे लेखक एक पीढ़ीक ऐतिहासिक थकान पकड़ैत छथि। आदर्शक लागि जेल-लाठी खएने लोक लोकतन्त्र बाद जे अवसरवाद, जातीयता आ धनबल देखैत अछि, से अपन सन्तान केँ ओहि चक्रसँ बचाबय चाहैत अछि; मुदा ओहिना नैतिक संवेदना सन्तानमे देल गेल अछि जे ओकरा अन्याय देखिते हस्तक्षेप करबैत अछि।
शीर्षक ‘पाथरसनक लोक .… !’ केवल पुलिस वा राज्यक कठोरताक व्यंजना नहि, सामाजिक संवेदनहीनताक प्रश्नोत्तर सेहो अछि। बालकक पिटाई देखिकय दर्शक ठाढ़ रहि सकैत छथि; व्यवस्था ’नियम’क नामपर हिंसा करैत अछि; राजनीतिक दल पीड़ा केँ अवसरमे बदलैत अछि। एहन संसारमे जँ कोनो युवक दौड़ि कऽ पीड़ित केँ बचबैत अछि, त ओकरे असावधान कहब स्वयं पाथरपनक संकेत भऽ जाइत अछि।
मधु अपन पतिक राजनीति-साधनाक पारिवारिक मूल्यक कठोर हिसाब करैत कहैत छथि जे राजनीति या तँ “शमशेरे सनक धनवान”क विषय थिक वा “भट्टराईये सनक फकीर”क। बेटामे पतिके देखैत ओ “पाथरसनक लोक” कहैत छथि—एहन निस्वार्थ लोक, जकर बलिदान समाज कतेको बेर “बकलेलपन” बुझि उपहास करैत अछि।
४.४ ‘माल्हो’ : कुमुदिनी, असमान प्रेम, वर्ग-दूरी आ स्त्री-गरिमा
शीर्षक कथा ‘माल्हो’ संग्रहक सौन्दर्यात्मक केन्द्र अछि। आरम्भमे कथावाचक गाम लौटैत अछि आ मायकेँ दुरखापर बाट तकैत देखैत अछि; ई दृश्य ओकरा दाइ, पुरान गाम, साइकिल, कच्चा बाट, रेडियो-दहेज, खेत आ बचपनक संसारमे लौटा दैत अछि। समयक परिवर्तन—कच्चा बाटसँ मोटरगाड़ी धरि—कथा भीतर केवल दृश्यपरिवर्तन नहि; ई स्मृति आ सामाजिक दूरीक विस्तार अछि। कथावाचक आब प्रतिष्ठित, शहरिया आ प्रशासनिक-सार्वजनिक मान-सम्मानसँ घेरल व्यक्ति अछि, जबकि माल्हो अपन संघर्षक कठोर धरातल पर रहि गेलि अछि।
युवा माल्हो आ कथावाचकक सम्बन्ध केँ लेखक स्पष्ट प्रेम-घोषणा द्वारा नहि, कुमुदिनी, कनखिआनाइ, सकुचायल मुस्की, खेत आ डबरा किनारक छोट घटनासँ रचैत छथि। माल्हो पानिमे पैसि कुमुदिनीक फूल तोड़ि ‘ई अहाँक लेल’ कहैत अछि। विवाहक पहिने अन्तिम भेटमे फेर ओ फूल दैत ‘लोकधर्मक पालन’ करबाक बात कहैत अछि। कुमुदिनी एहि कथा मे प्रेमक चिन्ह मात्र नहि; ओ एहन सौन्दर्य अछि जे कीचड़-पानि बीच खिलैत अछि, छूअय कठिन अछि, आ तोड़ल गेलापर क्षणभंगुर भऽ जाइत अछि।
कथा बीस-पच्चीस वर्ष बाद माल्होक बेटा सुन्दर सहनीक रूपमे अतीतक नैतिक ऋण केँ वर्तमानमे अनैत अछि। बेटा एसएलसी पास कएने अछि। कथावाचक ओकरा पढ़बाक सलाह दैत अछि, पर माल्होक सरल प्रश्न—‘आओर पढ़ओतैक के?’—ओकर आत्मविश्वासकेँ तुरन्त असुविधामे बदलि दैत अछि। राति ओकरा भय होइत अछि जे माल्हो किछु एहन ने माँगि बैठत जाहिसँ ओकर प्रतिष्ठा, सामाजिक पद वा प्रशासनिक छवि संकटमे पड़ि जाय। लेखक एतय पुरुष-मनक वर्गीय आत्मरक्षा केँ सूक्ष्मता सँ खोलैत छथि।
माल्हो मुदा धन, नौकरी वा निजी अधिकारक माँग नहि करैत अछि। अपन पति द्वारा छोड़ल/निकालल गेलाक बाद ओ श्रम करैत अपन बेटाकेँ पोसैत आ पढ़बैत अछि। अन्ततः ओकर आग्रह बेटाक शिक्षा भरि रहि जाइत अछि। एहि क्षण माल्होक नैतिक कद कथावाचकक सामाजिक कदसँ पैघ देखाइत अछि। ओ अपन पुरान प्रेमक बदला नहि माँगैत अछि; न दया। ओ भविष्यक एक अवसर माँगैत अछि—अपन बेटाकेँ पढ़बाक।
अन्तिम दृश्य फेर कुमुदिनीपर लौटैत अछि। माल्हो कथावाचककेँ फूल दैत दूर चलि जाइत अछि; ‘ई अहाँक लेल’ कानमे गूँजैत रहैत अछि। ई वृत्ताकार संरचना कथाक अतीत आ वर्तमान केँ एक प्रतीकमे बाँधि दैत अछि। फूल एक्के बेर प्रेम, क्षमा, दूरी, स्मृति आ असम्भव मिलनक संकेत बनैत अछि। ’माल्हो’क उपलब्धि ई अछि जे ओ प्रेमक अधूरापन केँ भावुक प्रणय-विलाप नहि बनबैत; ओकर भीतर वर्ग, लिंग, विवाह-व्यवस्था, लोकधर्म आ पुरुषक आत्मदोषबोधक जटिलता राखैत अछि।
एक आलोचनात्मक प्रश्न
कथावाचकक दृष्टि माल्होक देह आ सौन्दर्यपर बारम्बार लौटैत अछि। समकालीन स्त्रीवादी पाठ एहि ‘पुरुष-दृष्टि’ पर प्रश्न उठा सकैत अछि। मुदा कथा अपन भीतर एहि दृष्टिक आलोचनाक साधन सेहो बनबैत अछि : कथावाचक जतेक अपन प्रतिष्ठा आ इच्छा केँ केन्द्रमे राखैत अछि, माल्हो ओतेक अपन निर्णय, श्रम, मातृत्व आ आत्मसंयम द्वारा स्वतंत्र नैतिक व्यक्तित्व बनि उठैत अछि। एहि तनावक कारण कथा अधिक जटिल आ आधुनिक बनैत अछि।
माल्हो मल्लाह जातिक गरीब लड़की अछि; अपन पति द्वारा छोड़ल गेलाक बाद ओ एसगरे मजदूरी कऽ बेटा सुन्दर सहनीकेँ पढ़बैत अछि, जे द्वितीय श्रेणीमे एस.एल.सी. उत्तीर्ण करैत अछि। एहि तथ्यसँ प्रेमक कथा वर्गीय आ जातीय दूरीक ठोस धरातल पबैत अछि।
वर्षौँ बाद रातिक अन्हारमे भेटक समय कथावाचक पुरान अधिकार-बोधमे ओकर हाथ पकड़य चाहैत अछि; माल्हो ओकरा रोकैत अपन संघर्षक केन्द्र बेटाक भविष्य कहैत अछि। कुमुदिनीक फूल फेर दऽ ओ कामुक अधिकार-बोधकेँ नैतिक धरातलपर पराजित करैत अछि।
एहि वर्गीय अवरोधक मार्मिक अभिव्यक्ति “हम जानकी नहि भऽ सकब” वाक्यमे भेटैत अछि; एहिमे अनुत्तरित प्रेमक करुणता, आत्मत्याग आ सामाजिक दूरी एक्केसाथ उभरैत अछि।
४.५ ‘ढहलेल दलबदलू !’ : दल-बदलसँ बेसी, नैतिक विवशताक व्यंग्य
शीर्षक पहिल दृष्टिमे राजनीतिक व्यंग्यक संकेत दैत अछि, मुदा चन्दरक कथा पढ़लापर बुझाइत अछि जे लेखक ‘दलबदलू’ शब्दक जनप्रिय अर्थकेँ उलटि दैत छथि। चन्दरक बाउ राणा-पश्चात् लोकतान्त्रिक परिवर्तनक समर्थक छथि; पहाड़ी सामन्तक गोठ सस्तामे भेटबाक निजी लाभ होइतहुँ हुनक लोकतन्त्र-समर्थन केवल स्वार्थ नहि, बैठ-बेगारी आ सामन्ती भय सँ मुक्तिक अनुभवसँ जुड़ल अछि। चन्दर एहि नैतिक उत्तराधिकार केँ अपन विश्वास बनबैत अछि।
२०४६ सालक बाद पुरान संघर्षकारी नेतासभ सत्ता-गौरवमे दूर भऽ जाइत छथि। चन्दर सात-आठ वर्ष पार्टीक सक्रियता छोड़ि केवल मत देबाक निर्णय लेत अछि। मुदा छोट भाइ ललचनमा एक भूखल बच्चाकेँ सहारा दैत अछि, आ स्थानीय ‘चैतहा’ नेता ओकरा अपहरणक झूठ मुद्दामे फँसा दैत अछि। पुलिस यातना आ राजनीतिक षड्यन्त्रक सम्मुख चन्दर राजधानीमे पुरान नेता-मन्त्रीलग न्याय माँगय जाइत अछि; ओतय ओकर अपमान होइत अछि। ई दृश्य लोकतन्त्रक बाद सत्ता द्वारा जनस्मृतिक विस्मरणक कटु चित्र अछि।
विडम्बना गाढ़ होइत अछि : भाइकेँ छुड़ाबय ओ पुराने पंच-परिवारक प्रभावशाली डॉक्टर रामप्रसादक सहायता लैत अछि, जे सहायता बदला अपन पार्टीमे आबयक शर्त रखैत अछि। चन्दर भाईक जीवनक खातिर स्वीकार करैत अछि। समाज तत्काल ओकरा ‘दलबदलू’ कहैत अछि। लेखक पाठक केँ पूछबैत छथि—जखन न्याय संस्था द्वारा नहि, सम्पर्क आ दलगत संरक्षण द्वारा भेटैत हो, त दोष केवल सहायता माँगनिहारक अछि कि सम्पूर्ण संरचनाक?
पछिला मोड़मे राजतन्त्र फेर लोकतन्त्रकेँ दबबैत अछि। चन्दरक भीतर बाउक सीख आ अपन समझौताक पश्चात्ताप जागैत अछि; ओ प्रजातन्त्रक पक्षक जुलूसमे कूदि पड़ैत अछि। गाम फेर ओकरा ‘दलबदलू’ कहैत अछि—ई बेर उल्टा कारणेँ। शीर्षकक ‘ढहलेल’ शब्द व्यंग्यात्मक अछि : लोकक दृष्टिमे चन्दर राजनीतिक गणित बुझयमे ढहलेल अछि, कारण सत्ता जता, ओ ताहिसँ उलट नैतिक दिशा पकड़ैत अछि। अन्तमे ओकर ‘प्रजातन्त्र जिन्दाबाद’ व्यक्तिगत प्रतिष्ठा पर सार्वजनिक मूल्यक विजय अछि।
कथाक सबसँ पैघ शक्ति संस्थागत आलोचना अछि—दल, पुलिस, मन्त्री, सिफारिश, राजनीतिक संरक्षण, ग्राम्य अफवाह, सभ एकटा जाल बनैत अछि। सीमा ई जे किछु भागमे राजनीतिक पृष्ठभूमिक व्याख्या कथात्मक गतिसँ बेसी निबन्धात्मक भऽ जाइत अछि; मुदा चन्दरक व्यक्तिगत संकट एहि विचारात्मक विस्तारकेँ भावात्मक धरातल दैत रहैत अछि।
चन्दरक गोठ पञ्चायत कालमे भूमिगत प्रजातान्त्रिक सेनानीसभक गुप्त शरणस्थली रहल छल—एहि स्मृतिक कारण काठमाण्डूक मन्त्रीक उपेक्षा आरो कटु बनैत अछि। भाईक मुक्तिक लेल प्रभावशाली डा. रामप्रसादक सहारा लेबाक विवशता निजी चरित्रदोषसँ बेसी संस्थागत न्याय-विफलताक परिणाम देखाइत अछि।
एक आलोचनात्मक पाठ एहि कथाकेँ मार्क्सवादी यथार्थवादक निकट देखैत अछि, कारण राज्य-तन्त्र आ संरक्षणवादी राजनीति सामान्य जनकेँ एहन समझौतामे धकेलैत अछि जाहिक नैतिक दोष अन्ततः पीड़ित व्यक्तिक माथे मढ़ल जाइत अछि।
४.६ ‘करी कोबहाम’ : देह-दृष्टिसँ महीन पीड़ा आ अस्तित्वगत संकट धरि
‘करी कोबहाम’ संग्रहक भौगोलिक परिधि अचानक विस्तृत कऽ दैत अछि। अन्तरराष्ट्रीय कार्यशाला, अफ्रीकी मूलक कारी महिला सहजकर्ता, प्रशिक्षण, नृत्य, पार्टी आ बहुसांस्कृतिक संवाद—ई परिवेश ग्राम-मिथिला केन्द्रित कथा-संसारमे नया हवा अनैत अछि। आरम्भमे कथावाचक करीक देहक आकार, रंग, केश-सज्जा आ सौन्दर्यक मानदण्डपर विशेष दृष्टि दैत अछि। आधुनिक आलोचना एतय देह-दृष्टि आ पुरुष-दृष्टिक पूर्वग्रह देखत।
कथा स्वयं एहि पूर्वग्रहकेँ स्थिर नहि रहने दैत अछि। किछुए क्षणमे करीक जीवंतता, बुद्धि, प्रशिक्षण-कौशल आ हास्य ओकर देहसम्बन्धी पहिल निर्णय केँ पछाड़ि दैत अछि। कथावाचक हुनक शैली अपनाबय चाहैत अछि। अर्थात् चरित्र शरीरक वस्तु नहि, प्रभावकारी पेशेवर व्यक्तित्व बनि उठैत अछि। तैयो विवाहक चर्चा आबिते कथावाचक फेर सांस्कृतिक सामान्यीकरण करैत अछि—विवाह ’पूर्णता’क शर्त मानैत अछि।
करीक उत्तर कथा केँ असहज गहराइ दैत अछि। ओ अपन उम्र, मातृत्वक जैविक सीमा आ जीवनसाथी खोजबक कठिनाइ सँ जुड़ल पीड़ा बतबैत अछि। कथावाचक समाधान देबय चाहैत रहि जाइत अछि, मुदा अन्तमे ’महीन पीड़ा’मे धकेलल जाइत अछि—अर्थात् ओ पहिल बेर उत्तर देनिहार नहि, सुननिहार बनैत अछि। कथा एही परिवर्तनक कारण सार्थक अछि।
समकालीन आलोचनाक आरक्षण
करी स्वयं मातृत्व नहि भेटला पर विवाहक अर्थपर प्रश्न करैत अछि; ई ओकर अनुभवक स्वर अछि। समीक्षा एहि कथन केँ सार्वभौम सत्य नहि मानि सकैत। नारीक पूर्णता केँ विवाह वा मातृत्वसँ बाँधब आजुक स्त्रीवादी दृष्टिसँ विवादास्पद अछि। कथा मूल्यवान तैं अछि जे एहि विवादास्पद मान्यतासभकेँ संवादक रूपमे सामने अनैत अछि, आ कथावाचकक सुनिश्चित उत्तर धीरे-धीरे विघटित करैत अछि।
करीक देह-वर्णनमे लगभग ११० किलो वजनक बावजूद अत्यन्त ऊर्जावान व्यक्तित्व उभरैत अछि। ४०–४५ वर्षक उमेरक आसपास मातृत्वक जैविक सीमासँ जुड़ल करीक पीड़ा कथा केँ आधुनिक करियर आ बाह्य उल्लासक पाछाँ नुकायल अस्तित्वगत एकाकीपनक प्रश्न धरि लऽ जाइत अछि।
एहि जैविक अनुभवकेँ कथा व्यक्तिगत पीड़ा रूपमे रखैत अछि; एकरा सार्वभौम स्त्री-सत्य मानब उचित नहि, मुदा देह, आयु, विवाह, मातृत्व आ स्वावलम्बनक बीचक जटिल तनावक कारण कथा मिथिलाक आञ्चलिकता सँ बाहर वैश्विक नारी-संवेदनाक क्षेत्रमे प्रवेश करैत अछि।
४.७ ‘सिकन्दर डोम’ : शिक्षा, अस्पृश्यता आ सुधारवादक कठोर परीक्षा
‘सिकन्दर डोम’ संग्रहक सर्वाधिक स्पष्ट जाति-विमर्शक कथा अछि। वर्माजी प्रगतिशील शिक्षक छथि, जे सिकन्दर केँ घरमे प्रवेश दऽ सामाजिक बहिष्कार सहने छथि। सिकन्दर पढ़ल-लिखल अछि, वर्माजीक प्रयासक जीवित प्रमाण जकाँ प्रस्तुत होइत अछि। आरम्भे पाठक केँ लगैत अछि जे कथा शिक्षा आ प्रगतिशील शिक्षकक सफलता-गाथा बनत; मुदा लेखक शीघ्र एहि आत्मसन्तोष केँ तोड़ि दैत छथि।
सिकन्दरक अनुभव बतबैत अछि जे अक्षरज्ञान जातिक संरचना अपने नहि मिटा दैत अछि। विद्यालयमे डोम बच्चा अलग बैसैत अछि, छूअनाइ वर्जित, कॉपी देबाक ढंग अलग, दण्डक व्यवहार अलग; अपमानक दीर्घ अनुभव पढ़ाई केँ मुक्ति नहि, पीड़ा बनबैत अछि। सिकन्दर स्वयं शिक्षा पाबि रोजगारमे भेदभाव झेलैत अछि—पानी छूअक प्रश्न शिक्षक वा चपरासी जेहन साधारण नौकरीक मार्ग रोकि दैत अछि। एहि तरहें कथा ‘शिक्षा अपने सामाजिक उन्नति देत’ वाली सरल प्रगतिशील धारणा पर ठोस प्रश्न उठबैत अछि।
बाल-विवाह, कन्या-मूल्य, जातिगत भोज आ ‘डोमक घरक अन्न’ न खएबाक प्रसंग सामाजिक उत्पीड़नक बहुस्तरीयता खोलैत अछि। सिकन्दरक प्रश्न—डोम जाति कतय साफ आ पवित्र होएत?—धार्मिक शुद्धता-अशुद्धताक तर्ककेँ उलटि दैत अछि। अशुद्ध शरीर नहि, समाजक दृष्टि अछि।
अन्तमे सिकन्दर समाज धीरे-धीरे बदलत कहैत अछि आ वर्माजीक पत्नी औषधिक खोराकवला उपमा दैत छथि—एक्के बेर पूरा खुराक विष भऽ सकैत अछि। ई अन्त जानबूझि असुविधाजनक अछि। एक दृष्टिसँ ई सामाजिक परिवर्तनक व्यवहारिक गति स्वीकारैत अछि; दोसर दृष्टिसँ ई प्रश्न छोड़ैत अछि जे जाहि हिंसा रोज घटैत अछि, ओकर शिकारक लेल ‘धीरे-धीरे’ कतेक न्यायसंगत उत्तर अछि? कथा एहने खुलल नैतिक बेचैनीक कारण प्रभावशाली बनैत अछि।
सिकन्दर डोम जातिक पहिल एस.एल.सी. उत्तीर्ण युवक रूपमे प्रस्तुत अछि, मुदा समाज ओकरा पिउनक नोकरियो नहि दैत—प्रश्न ई जे “हुनक हाथक पानि के पिबि सकैत छल?” अन्ततः ओ रात्रिकालीन चौकीदार बनि जीवन काटैत अछि।
अपन बेटाक विवाहमे उच्चजातीय शिक्षकसभकेँ भोजन कराबय लेल सिकन्दर अपन घरक बदला “कुम्हारक कुटी”मे हलुवाईसँ भोजन बनबैत अछि, जाहिसँ ब्राह्मण-राजपूत अतिथि खा सकथि। ई दृश्य अस्पृश्यताक संरचनात्मक गहराईक अत्यन्त तीक्ष्ण प्रमाण बनैत अछि।
४.८ ‘आ ओ मारलि गेलि !’ : युद्धक बीच स्त्री-देह, प्रेम, राज्य-हिंसा आ सत्यक हत्या
फुलियाक कथा संग्रहक सर्वाधिक तीव्र आ हिंसक आख्यान अछि। ’जनयुद्ध’क छाया, छापामार प्रेमी पूर्णे, पुलिस, चिया-दोकान, ग्राम्य गरीबी, स्त्रीक अशिक्षा आ विवाहक दबाव—सभ एकत्र होइत अछि। फुलिया प्रेमक प्रतीक्षामे घर छोड़ैत अछि, मुदा ओ राजनीतिक योद्धा नहि। ओ हिंसक संघर्षक बीच फँसल एहन स्त्री अछि जकर निजी जीवन युद्ध द्वारा लगातार अधिगृहीत होइत अछि।
पूर्णेक चरित्र सेहो एकरेखीय क्रान्तिकारी नहि। ओ धीरे-धीरे हिंसक ‘मुक्ति’क सीमा पर प्रश्न करैत अछि—हत्या आ भयद्वारा समाज मुक्त होएत कि शिक्षा, संवाद आ जनसहमति द्वारा? ई आत्मसन्देह कथा केँ विद्रोही बनाम राज्यक सरल द्वैतसँ बचबैत अछि। फुलियाक अपना अशिक्षित रहि गेलाक कारणेँ जीवनक सीमित विकल्पक पीड़ा—माय-बाप द्वारा ’बेटी पढ़िकय की करत’ वाली धारणा—युद्धक समानान्तर सामाजिक हिंसा देखबैत अछि।
पूर्णेक मृत्यु बाद लाल वैवाहिक साड़ी अत्यन्त शक्तिशाली प्रतीक बनैत अछि। जे साड़ी सम्भावित विवाह, घर, मिलन आ भविष्यक संकेत छल, सहए पुलिस हवल्दार भूलोटनक हाथमे भयादोहनक साधन बनैत अछि। ओ फुलियाकेँ बचबाक सूचना बदला देह माँगैत अछि। राज्यक प्रतिनिधि एतय कानूनक रक्षक नहि, स्त्रीक असुरक्षा केँ भोगबक अवसर खोजैत शिकारी बनैत अछि।
फुलियाक प्रतिरोध—छुरी उठाकय भूलोटनपर वार—एक असहाय स्त्रीक कर्तृत्वक चरम क्षण अछि, मुदा ओकरा तत्काल गोली भेटैत अछि। दोसर दिन समाचारपत्र घटनाकेँ दू विरोधी राजनीतिक आख्यानमे बदलि दैत अछि : कतहु फुलिया ‘छापामार वीरांगना’, कतहु हवल्दार ‘शहीद’। वास्तविक कथा—प्रेम, यौन दबाव, भय, आत्मरक्षा, निजी इतिहास—समाचारक राजनीतिक भाषामे गायब भऽ जाइत अछि। शीर्षक ‘आ ओ मारलि गेलि !’ एहि दोहरी हत्या पर लागू होइत अछि : फुलियाक देह मारल जाइत अछि, आ ओकर सत्यो।
एहि कथा मे लेखकक सर्वश्रेष्ठ राजनीतिक कला देखाइत अछि। ओ पाठक केँ कोनो दलक घोषणा-पत्र नहि दैत छथि; ओ दिखबैत छथि जे युद्धक आधिकारिक भाषा व्यक्तिगत दुःख केँ कोना निगलि जाइत अछि। स्त्रीवादी, युद्ध-विरोधी आ मीडिया-आलोचनात्मक तीनू पाठ एक्केसाथ सम्भव होइत अछि।
फुलियाक पारिवारिक पृष्ठभूमिमे पहड़िया कार्की सामन्तक षड्यन्त्रसँ परिवारक बेघर-दरिद्र होयब, बापक शराबक लतमे मृत्यु, आ प्रेमी पूर्णे मगरक माओवादी आन्दोलनमे प्रवेश शामिल अछि। बादमे पूर्णे हिंसक क्रान्तिसँ मोहभङ्ग अनुभव करैत भागय चाहैत अछि, मुदा पुलिसक हाथे मारल जाइत अछि।
हवल्दार भूलोटन पूर्णेक लाशपर भेटल बिआहक लाल साड़ी देखबैत फुलियासँ “हमरा भोगए देबए पडतौक!” कहि शीलभङ्गक प्रयास करैत अछि। फुलिया छुरीसँ प्रतिकार करैत अछि; भूलोटन गोली चलबैत अछि, आ दुनू मरि जाइत अछि। एहि निजी सत्यकेँ दोसर दिनक राजनीतिक समाचार अपन-अपन पक्षक आख्यानमे बदलि दैत अछि।
४.९ ‘एकदन्त हाथी आ नौलखा हार’ : इतिहासक स्त्रीवादी पुनर्पाठ
अन्तिम कथा समकालीन मणिक बेचैनीसँ खुलैत अछि। मकवानपुर सेनगढ़ी देखलाक बाद चौदह वर्षीया राजकुमारी इन्द्रकुमारी ओकर मानसपटलपर छा जाइत अछि। रातिक सपना आ कल्पना भीतर कथा दरबारी नाट्यरूप धारण करैत अछि। एहि फ्रेम-संरचनासँ लेखक स्पष्ट करैत छथि जे इतिहास सीधे पुनरुत्पादित नहि भऽ रहल, वर्तमान चेतना ओकर पुनःकल्पना कऽ रहल अछि। तैं कथा केँ दस्तावेजी इतिहासक स्थानपर साहित्यिक-ऐतिहासिक पुनर्पाठ रूपमे पढ़ब अधिक उचित अछि।
एकदन्त हाथी आ नौलखा हार दहेजक वस्तु मात्र नहि; इन्द्रकुमारी ओकरा राज्यक सम्पत्ति आ जनताक धरोहर कहैत अछि। एहि तर्कमे निजी विवाह आ सार्वजनिक सम्पत्तिक सीमा स्पष्ट होइत अछि। राजा अपन बेटी-विवाहक प्रतिष्ठाक खातिर जनताक धरोहर दऽ सकैत छथि कि नहि? कथा सामन्ती राजकीय व्यवस्थाक भीतर आधुनिक सार्वजनिक नैतिकता प्रवेश करबैत अछि।
इन्द्रकुमारी गोरखाक माँग केँ केवल वैवाहिक अनबन नहि, सम्भावित सांस्कृतिक-राजनीतिक विस्तारक संकेत रूपमे पढ़ैत अछि। ओ भाय दिगबन्धन केँ भावना सँ ऊपर मातृभूमिक कर्त्तव्य देखबाक आग्रह करैत अछि। अन्ततः भाय हुनक तर्क स्वीकारैत अछि। सपना टूटैत अछि; मणिक मुठि कसले अछि, मुदा घरक भौजी ओकर तनबाक कारण दैहिक पीड़ा बुझैत छथि। एहि अन्तिम विडम्बनामे वर्तमान समाज सेहो नारीक राजनीतिक-ऐतिहासिक बेचैनी केँ देहमे अनुवाद करि दैत अछि।
आलोचनात्मक सावधानी
इन्द्रकुमारीक संवादमे ‘पवित्रता’, ‘नारीत्व’ आ ’त्याग’क परम्परागत शब्दावली बलपूर्वक उपस्थित अछि। स्त्रीवादी दृष्टि एहि शब्दसभपर प्रश्न उठा सकैत अछि, कारण नारी-अस्मिता केवल यौन-पवित्रता वा त्यागमे सीमित नहि। तथापि कथा एहि परम्परागत शब्दावलीक भीतर सँ स्त्रीकेँ वस्तु नहि, निर्णयकारी राजनीतिक व्यक्ति बनाबयक प्रयत्न करैत अछि। एही द्वंद्वकेँ पहचानब कथा प्रति न्यायपूर्ण आलोचना हएत।
ऐतिहासिक प्रसंग मकवानपुरक सेन राजा हेमकर्ण सेनक चौदह वर्षीया पुत्री इन्द्रकुमारी आ गोरखा नरेश पृथ्वीनारायण शाहक विवाहसँ जुड़ल अछि। द्विरागमन/गौना लेल “एकदन्त हाथी” आ “नौलखा हार” दहेजमे माँगबाक प्रसंग निजी विवाह, जनधरोहर आ राज्य-सम्मानक टकराव रचैत अछि।
इन्द्रकुमारीक घोष—“नारी चीज नहि, सृष्टिक बीज अछि। मानक माथ आ त्यागक शिर्ष अछि”—सामन्ती दहेज-लोलुपता आ विस्तारवादी दबावक विरुद्ध स्त्रीक राजनीतिक आवाज बनैत अछि। इतिहास प्रायः विजेताकेँ केन्द्रमे रखैत अछि; कथा पराजित राज्यक किशोरी राजकुमारीक नैतिक साहसकेँ केन्द्रमे आनैत इतिहासक वैकल्पिक पुनर्पाठ रचैत अछि।
५. समाजशास्त्रीय, दार्शनिक आ राजनीतिक अन्तर्दृष्टि
५.१ नारी : सहनशील प्रतिमा नहि, नैतिक केन्द्र
संग्रहमे स्त्रीसभ प्रायः पीड़ा भोगैत छथि, मुदा ओसभ मात्र पीड़िता नहि। देपुरवाली काकीक मौन कथा पुरुष-अहंकारक अपराधकेँ उजागर करैत अछि; मधु प्रत्यक्ष प्रतिवाद करैत अछि; माल्हो पुरान प्रेमक बावजूद आत्मसम्मान आ बेटाक भविष्यकेँ प्राथमिकता दैत अछि; करी पुरुष-दृष्टिक सहज निर्णय केँ महीन पीड़ाक सामना करबैत अछि; फुलिया यौन शोषणक धमकीक प्रतिरोधमे हथियार उठबैत अछि; इन्द्रकुमारी राज्य-धरोहर आ नारी-अस्मिताक राजनीतिक भाषा रचैत अछि। एहि विविध स्त्री-चरित्रक कारण संग्रह नारीक त्यागक एकरूप महिमा-मण्डन नहि रहि जाइत।
तैयो संग्रहक स्त्री-प्रतिनिधित्वमे परम्परागत मूल्यक छाया अछि—सौन्दर्य-वर्णन, मातृत्व, पतिव्रत, पवित्रता, त्याग। एहि द्वैतकेँ दोष वा गुण कहिकय सरल निर्णय देनाइ उचित नहि। साहित्यिक महत्त्व ई अछि जे रचना संक्रमणशील समाजक वैचारिक संघर्षकेँ अपने भीतर वहन करैत अछि : पुरान नारी-आदर्शक भाषा उपस्थित अछि, आ तकर भीतर सँ प्रतिरोधक नया स्वर सेहो जन्म लैत अछि।
५.२ लोकतन्त्र : उत्सव नहि, सतत नैतिक अभ्यास
‘बलिदानी’, ‘पाथरसनक लोक .… !’ आ ‘ढहलेल दलबदलू !’ तीनू मिलिकय लोकतन्त्रक त्रयी जकाँ पढ़ल जा सकैत अछि। पहिल कथा आन्दोलनक स्मृति आ शहादतक हरण देखबैत अछि; दोसर पुलिस हिंसा आ दलगत पतनक कारण पुरान कार्यकर्ताक पीढ़ीगत थकान; तेसर न्यायक संस्थागत विफलता आ राजतान्त्रिक प्रतिगमनक विरुद्ध नैतिक पुनरागमन। लेखक लोकतन्त्रक आलोचना लोकतन्त्र-विरोधसँ नहि, ओकर मूल मूल्यक पक्षसँ करैत छथि।
एहि कथासभमे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्व अनुभवक स्मृति अछि। जे जेल, लाठी, भय आ निरंकुशता देखलक, से लोकतन्त्रक भ्रष्ट रूपसँ क्षुब्ध होइतहुँ प्रतिगमन केँ सहज स्वीकार नहि करैत। राजनीतिक विचार एतय पुस्तकक सिद्धान्त नहि, देहपर पड़ल चोटक स्मृति अछि। एहि कारण पात्रसभक नैतिक निर्णय विश्वसनीय लगैत अछि।
५.३ जाति आ अधस्तन अनुभव
‘सिकन्दर डोम’ प्रत्यक्ष जाति-कथा अछि, मुदा अधस्तन अनुभव ‘माल्हो’ आ ’आ ओ मारलि गेलि !’मे सेहो गहींर अछि। माल्हो आर्थिक-सामाजिक दूरीक बीच अपन स्वाभिमान बचबैत अछि; फुलिया शिक्षा, वर्ग, लिंग आ युद्धक अनेक वंचनासँ एक्केसाथ घेरल अछि। संग्रहक दृष्टि बारम्बार ओहि लोकदिस फिरैत अछि जकर नाम आधिकारिक इतिहासमे कम लिखल जाइत अछि—विधवा, बच्चा, डोम, त्यक्त स्त्री, पुलिसक झूठ मुद्दामे फँसल गरीब, युद्धक बीचक प्रेमिका।
‘सिकन्दर डोम’ विशेष रूपसँ देखबैत अछि जे उदार व्यक्तिक सदिच्छा संरचनात्मक जातिवाद हटाबक लेल पर्याप्त नहि। वर्माजी महत्त्वपूर्ण छथि, मुदा कथा हुनक आत्मगौरवक सीमासँ आगे जाइत अछि। अधस्तन व्यक्तिक अनुभव ज्ञानक मूल स्रोत बनैत अछि—सुधारक गुरुसँ शिष्य सिकन्दर अधिक कठोर सामाजिक सत्य कहि सकैत अछि।
५.४ स्मृति : निजी कथा सँ सामाजिक इतिहास धरि
‘देपुरवाली काकी’ आ ’माल्हो’मे स्मृति कथा-यन्त्रक आधार अछि। वर्तमानक एक दृश्य—फिल्मी फोटो, दुरखापर बाट तकैत माय—अतीत खोलैत अछि। स्मृति एतय केवल अतीत-मोह नहि। कथावाचक जखन अतीत याद करैत अछि त अपन वर्तमान नैतिक स्थितिक सेहो परीक्षा करैत अछि। माल्होकेँ याद करब पुरान प्रेम याद करब मात्र नहि; अपन सामाजिक चढ़ान, दूरी आ दायित्वक हिसाब करब अछि।
एही प्रकार ‘बलिदानी’ आ ‘ढहलेल दलबदलू !’ राजनीतिक स्मृतिपर आधारित अछि। यदि आन्दोलनक असली स्मृति मिटि जाए, त अवसरवादी इतिहास लिखत। तैं संग्रहमे स्मृति प्रतिरोधक साधन अछि। निजी कथा इतिहासक सीमान्तपर लिखल वैकल्पिक अभिलेख बनैत अछि।
५.५ शिक्षा : मुक्ति, अवसर आ असफल वादा
शिक्षा अनेक कथामे दोहराइत अछि। माल्हो अपन बेटा सुन्दरकेँ पढ़बय चाहैत अछि; सिकन्दरक जीवन शिक्षा आ जातिक टकरावक परीक्षा अछि; फुलिया अपन अशिक्षित रहि गेलाक कारणेँ जीवनक सीमित विकल्पक पीड़ा अनुभव करैत अछि। ई पुनरावृत्ति संग्रहक सामाजिक दृष्टिमे शिक्षा केँ महत्त्वपूर्ण मुक्ति-साधन बनबैत अछि, मुदा लेखक भोला आशावाद नहि रखैत छथि। संस्थागत भेदभाव रहत त विद्यालय सेहो अपमानक स्थान बनि सकैत अछि।
५.६ हिंसा : घर, जाति, पुलिस, युद्ध आ भाषा
संग्रहमे हिंसा केवल गोली वा लाठी नहि। देपुरवाली काकीक जीवनभरि मौन दाम्पत्य मानसिक हिंसा अछि; सिकन्दरक बच्चाक अलग बैसाओन जातीय हिंसा; ललचनमाक झूठ गिरफ्तारी राज्य-हिंसा; फुलियापर यौन दबाव लैंगिक-राजकीय हिंसा; मीडिया द्वारा ओकर निजी सत्यक राजनीतिक लेबलिंग भाषिक हिंसा। लेखक हिंसाक एतबा रूप देखबैत छथि जे शान्त देखाइत समाजक भीतर सेहो अत्याचारक निरन्तरता स्पष्ट भऽ जाइत अछि।
५.७ पारिवारिक सम्बन्धक सूक्ष्म राजनीति आ वृहत् सत्ता-संरचना