गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल वृषेश चन्द्र लाल
Videha Issue 451 · Research article continuation 3
पारिवारिक सम्बन्धपरक सूक्ष्म राजनीति (Micro-Politics of Relationships): लालजीक कथासभ ई प्रमाणित करैत अछि जे समाजक वृहत् राजनीति (Macro-politics) आ परिवारक सूक्ष्म राजनीति अन्तरसम्बन्धित अछि। 'देपुराबाली काकी' मे काकाक 'भीष्म-प्रतिज्ञा' वस्तुतः ओही सामन्ती अहङ्कारक पारिवारिक रूप थिक जेकरा विरुद्ध 'बलिदानी' वा 'पाथरसनक लोक' क पात्र सड़कपर लड़ि रहल छथि। सत्ताक केन्द्रीकरण जेना देशमे होइत अछि, तहिना परिवारमे पुरुष-अहङ्कारक रूपमे होइत अछि।
५.८ लोकतन्त्रक विडम्बना आ व्यवस्थागत हिंसा
लोकतन्त्रक विडम्बना आ व्यवस्थागत हिंसा (Irony of Democracy and Systemic Violence): 'ढहलेल दलबदलू' आ 'सिकन्दर डोम' स्पष्ट रूपेँ ई सन्देश दैत अछि जे लोकतन्त्र वा शिक्षाक प्रसार सँ मात्र समाजक संरचनात्मक हिंसा (Structural Violence) समाप्त नहि भऽ जाइत छैक। जतय व्यवस्था विमुख भऽ जाइत अछि, ओतय 'चन्दर' जकाँ सामान्य मानुखकें भ्रष्ट व्यवस्थाक संगे सम्झौता करय पड़ैत छैक। व्यवस्थाक विफलता व्यक्तिगत् नैतिक पतनक कारण बनैत अछि।
५.९ सशस्त्र क्रान्तिक मोहभङ्ग
सशस्त्र क्रान्तिक मोहभङ्ग (Disillusionment with Armed Revolution): 'आ ओ मारलि गेलि!' मे 'पूर्णे' क मोहभङ्ग आ 'बलिदानी' मे 'चैते' अवसरवादक उदय ई देखाबैत अछि जे क्रान्ति जखन संस्थागत भऽ जाइत अछि, तखन ओ अपन मूल आदर्शसँ भटकैत सीमान्तकृत वर्गकें आओर बेसी शोषित करैत अछि।
५.१० नारी-शरीर आ राज्य-सत्ताक समानान्तर शोषण
नारी-शरीर आ राज्य-सत्ताक समानान्तर शोषण: लालजीक कथासभमे नारी-शरीर युद्ध-क्षेत्र बनि जाइत अछि। हवल्दार भूलोटन द्वारा फुलियाकें 'भोगय' चाहब ('आ ओ मारलि गेलि') आ पृथ्वीनारायण शाह द्वारा इन्द्रकुमारीकें दहेजक सौदामे प्राप्त करय चाहब ('एकदन्त हाथी...') —दुनू घटना स्थापित करैत अछि जे राज्य-सत्ता आ पितृ-सत्ता दुनू नारीकें विजित प्रदेशक रूपमे देखैत अछि। एकर प्रतिरोध फुलियाक छुरी आ इन्द्रकुमारीक ओजस्वी वाणीसँ होइत अछि।
६. आख्यान-शिल्प, भाषा, प्रतीक आ चरित्र-संरचना
६.१ प्रथम-पुरुष कथावाचकक नैतिक अस्थिरता
कतेको कथामे ‘हम’ कथावाचक अछि, मुदा लेखक ओकरा सर्वज्ञ, सर्वथा सही व्यक्ति नहि बनबैत छथि। ’माल्हो’मे ओ अपन प्रतिष्ठाक चिन्ता करैत अछि; ’करी कोबहाम’मे देह आ विवाहक बारेमे पूर्वग्रह राखैत अछि; राजनीतिक कथामे पात्र अपन निर्णय पर पछताइत अछि। ई अपूर्णता साहित्यिक रूपसँ महत्त्वपूर्ण अछि, कारण पाठक केँ कथावाचकक शब्द मात्र स्वीकार नहि, ओकर सीमा सेहो देखबाक अवसर भेटैत अछि।
६.२ संवाद : विचार केँ जीवित बनाबयक साधन
वृषेश चन्द्र लालक कथा-शक्ति संवादमे खूब स्पष्ट अछि। माय-चाची-मधुक घरेलू गप्प, माल्हो-कथावाचकक संकोची संवाद, मन्त्रीक अपमानजनक भाषा, सिकन्दर-वर्माजीक गुरु-शिष्य वार्ता, करी-कथावाचकक सांस्कृतिक संवाद, इन्द्रकुमारी-दिगबन्धनक नाटकीय वाद—सभ ठाम विचार पात्रक आवाजमे अबैत अछि। एतय लेखकक निबन्धात्मक आग्रह सेहो अछि, मुदा सफल क्षणमे संवाद विचारकेँ देह, लय आ परिस्थिति दैत अछि।
६.३ मौन, विराम आ अधकहल बात
संग्रहक अनेक श्रेष्ठ क्षण ओ छथि जतय पात्र पूरा नहि बजैत। माल्हो कनखिआइत अछि, फूल दैत अछि, दूर चलि जाइत अछि; देपुरवाली काकी जिनगीभरि बहुत कम बोलैत छथि; चन्दर अपमान निगलि चुप्पे मन्त्रीक घरसँ निकलैत अछि; वर्माजी अन्तमे केवल माथ डोलबैत छथि। ई मौन पाठकक व्याख्याक जगह खोलैत अछि। मैथिली ग्राम्य जीवनक मौखिकता आ मौन—दुनू मिलिकय कथा केँ विशेष लय दैत अछि।
६.४ प्रतीक-संरचना
कुमुदिनी — प्रेम, दूरी, कीचड़-पानिमे खिलल गरिमा, अधूरा मिलन।
पुरान फोटो/फिल्मी चेहरा — स्मृति खोलक द्वार, स्त्री-छविक पुनर्पहिचान।
लाल वैवाहिक साड़ी — अपूर्ण विवाह, प्रेमक भविष्य, यौन शोषणक धमकी, रक्त।
एकदन्त हाथी आ नौलखा हार — जनधरोहर बनाम दहेज, राज्य आ निजी सत्ता।
दुरखा/द्वारपर प्रतीक्षा — प्रेम, परिवार, लौटबाक आशा, समय।
ई प्रतीक कथा केँ सन्देश मात्र होमयसँ बचबैत अछि। विशेषतः कुमुदिनी आ लाल साड़ी पाठकक मानसपटलपर कथा समाप्त भेलाक बादो रहि जाइत अछि। साहित्यिक स्थायित्व प्रायः एही दृश्य-चिन्हसँ बनैत अछि।
६.५ भाषा : ग्राम्य सहजता आ आधुनिक बहुभाषिक संसार
मूल पाठक भाषा मैथिली ग्राम्य बोलचाल, नेपाली राजनीतिक शब्दावली आ आधुनिक अंग्रेजी-मूलक शब्दसभक संयोगसँ बनल अछि। टी-टाइम, वर्कशप, एसपी, मन्त्री क्वार्टर, डिविजन, कम्प्यूटर जेहन शब्द कथाक आधुनिक जीवन-क्षेत्रक स्वाभाविक अंश छथि। दोसर दिस दुरखा, गोठ, बनिहार, नुआँ, डबरा, कुमुदिनी, भन्सिआ, दाइ, गिरहत जेहन शब्द कथाकेँ स्थानिक देह दैत अछि। एहि बहुभाषिकता केँ अशुद्धि कहब उचित नहि; ई सीमा-प्रदेश, राजनीति, प्रशासन, शिक्षा आ अन्तरराष्ट्रीय संपर्कसँ जुड़ल समाजक वास्तविक भाषिक बनावट अछि।
लेखक पात्रानुकूल भाषा बदलैत छथि। मन्त्रीक भाषा सत्ता-अहंकारक कटु मिश्रण, सिकन्दरक भाषा विनम्र लेकिन भीतरसँ तिक्त, करीक संवाद अन्तरराष्ट्रीय प्रशिक्षण-संस्कृतिक, इन्द्रकुमारीक भाषा नाटकीय आ संस्कृतनिष्ठ, माल्होक भाषा संक्षिप्त आ संकेतप्रधान अछि। एहि भाषिक-स्तर परिवर्तनसँ चरित्रसभ एके लेखकक मुखपात्र बनि जायसँ बचैत छथि, यद्यपि किछु राजनीतिक प्रसंगमे लेखकक विचारधारा प्रत्यक्ष सुनाइ पड़ैत अछि।
६.६ स्मृति-फ्रेम, फ्लैशबैक आ चेतना-प्रवाह
‘देपुरवाली काकी’, ‘माल्हो’ आ ’एकदन्त हाथी आ नौलखा हार’मे वर्त्तमानक साधारण घटना—फिल्मी फोटो, गाम पहुँचब, स्वप्न—अतीतक विस्तृत आख्यान खोलैत अछि। एहि स्मृति-फ्रेमक संग किछु कथा चेतना-प्रवाहक निकट जाइत अछि, जतय बाहरी घटना पात्रक भीतर स्मृति आ आत्मसंवादक श्रृंखला शुरू करैत अछि।
६.७ बिम्ब आ प्रतीक-विधानक विस्तार
कुमुदिनीक फूल, पुरान फोटो/टीवी-कम्प्यूटरक द्वैत, लाल वैवाहिक साड़ी, एकदन्त हाथी आ नौलखा हार—ई सभ बिम्ब कथाक भावनात्मक आ वैचारिक संरचनाकेँ बाँधैत अछि। ’पाथरसनक लोक’क “पाथर” केवल कठोरता नहि, सिद्धान्तक प्रति अडिगता आ वैराग्यक संकेत सेहो बनैत अछि।
६.८ भाषिक वैविध्य, ठेठ शब्दावली आ पात्रानुकूल रजिस्टर
लालजीक भाषा “शुद्ध, प्राञ्जल, ठेठ आ मुहावरेदार” स्वरूपमे दुरखा, असोरा, भानस, झोंटी, खोंछा, डगहर, गोठ, कतिया देब, ठकमुड़िया, ममोड़ि, औंनायब, ढहलेल, चैते, फुसियेक प्रण, भाङ्गठ आ सनेस जकाँ स्थानीय शब्दक समृद्ध संसार रचैत अछि। एहि ठेठ स्थानीय आधारक संग नेपाली प्रशासनिक शब्दावली आ आधुनिक अङ्ग्रेजी-मूलक शब्दक सहज सहअस्तित्व सीमा-प्रदेशक वास्तविक बहुभाषिकता प्रकट करैत अछि। भाषा-संसारक एहि द्वि-स्वरूपमे माटिसँ जुड़ल स्थानीयता आ आधुनिक सम्पर्कक बहुभाषिकता एक्केसाथ उपस्थित अछि।
संवाद-लेखनमे लेखक पात्रानुकूल भाषा-प्रयोगमे विशेष सजगता देखबैत छथि — गामक स्त्रीगणक बोलचाल, राजनीतिक कार्यकर्त्ताक नारा-प्रधान भाषा, अङ्ग्रेजी-मिश्रित अन्तर्राष्ट्रीय परिवेशक संवाद (करी कोब्हाम मे), आ ऐतिहासिक नाट्य-संवादक गरिमामय शैली — सभटा भिन्न-भिन्न रजिस्टरमे सफलतापूर्वक रचल गेल अछि। एहिसँ लेखकक भाषिक विविधताक क्षमता प्रमाणित होइत अछि।
मूल पुस्तकमे गोठ, खोपी, भारदार, एस.एल.सी. जकाँ विशिष्ट सांस्कृतिक वा प्रशासनिक शब्दक तळटीका द्वारा व्याख्या पाठकीय सुविधा बढ़बैत अछि।
६.९ चरित्र-चित्रण आ स्त्री-दृष्टि
स्त्री-चरित्रक विविधताक संग पुरुष-चरित्रसभ सेहो एकरूप नहि छथि। मिसरी काकाक अन्तिम पश्चाताप, चन्दरक वैचारिक द्वन्द्व, सिकन्दरक धैर्यवान संघर्ष आ दिगबन्धनक कर्तव्य-बोध—सभमे मनोवैज्ञानिक जटिलता अछि, जे पात्रसभकेँ श्वेत-श्याम प्रतिमा बनयसँ बचबैत अछि।
७. कृतित्वक उपलब्धि आ आलोचनात्मक सीमासभ
७.१ मुख्य उपलब्धि
पहिल उपलब्धि—मानवीय अनुभवक विश्वसनीयता। लेखकक पात्र यन्त्रवत् आदर्श नहि; ओसभ झिझकैत, डरैत, चूकैत, पछताइत, प्रेम करैत, अपमान सहैत आ निर्णय बदलैत छथि। ई नैतिक जटिलता राजनीतिक विषयक कथासभकेँ प्रचार-पत्र होमयसँ बचबैत अछि।
दोसर—स्त्री आ सीमान्तक लोककेँ इतिहासक केन्द्रमे आनब। विधवा आ बच्चाकेँ ‘बलिदानी’ कहब, माल्होकेँ संग्रहक शीर्षक बनाब, डोम चरित्रकेँ सुधारक शिक्षकक आत्मसन्तोषक परीक्षक बनाब, फुलियाक निजी सत्यकेँ आधिकारिक समाचारसँ श्रेष्ठ ठहराब—ई चयन अपनेमे साहित्यिक राजनीति अछि।
तेसर—व्यक्तिगत स्मृति आ सार्वजनिक इतिहासक संधान। घरक ओसारा, खेत, डबरा, चिया-दोकान, पुलिस कोठरी, राजनीतिक मंच, दरबार—स्थान अलग-अलग छैक, मुदा सभमें मनुष्यक गरिमा मूल कसौटी रहैत अछि। एहि एकात्म दृष्टिक कारण संग्रह विविध कथ्यक बावजूद विखण्डित नहि लगैत अछि।
चारिम—विडम्बना आ प्रतीकक सक्षम उपयोग। घर नहि छोड़बाक प्रतिज्ञा पूरा होइत-होइत काकीक मृत्यु, न्याय लेल पुरान लोकतान्त्रिक मन्त्रीक द्वार पर अपमान, चन्दरकेँ दुनू पक्षसँ दलबदलू कहल जाएब, फुलियाक लाल साड़ी, मणिक कस्सल मुठि—ई सभ कथाक स्मरणीय बिम्ब बनैत अछि।
७.२ आलोचनात्मक सीमासभ
किछु कथामे विचारक बोझ कथात्मक गति पर भारी पड़ैत अछि। विशेषतः राजनीतिक पृष्ठभूमि समझाबय काल दीर्घ व्याख्या वा भाषण कथा केँ निबन्धक निकट लऽ जाइत अछि। जँ एहि अंशसभमे किछु संक्षेप, दृश्यात्मकता आ संवादक सहारा बढ़ल रहित त कलात्मक घनत्व आरो बढ़ि सकैत छल।
दोसर, स्त्री-चरित्रक शक्तिशाली उपस्थिति होइतहुँ सौन्दर्य, मातृत्व, पवित्रता, सेवा आ त्यागक परम्परागत रूपक बारम्बार अबैत अछि। कथा स्वयं कतेको ठाम एहि रूपकक सीमा पार करैत अछि—फुलिया, करी, माल्हो, इन्द्रकुमारी—तैयो आधुनिक पाठक एहि तनावकेँ चिन्हत। ई संग्रहक असफलता भरि नहि; संक्रमणशील सामाजिक चेतनाक निशान सेहो अछि।
तेसर, ’सिकन्दर डोम’क अन्तक क्रमिक सुधारवाद असहज प्रश्न छोड़ैत अछि। औषधिक छोट खोराक समाजशास्त्रीय व्यवहारिकता हो सकैत अछि, मुदा अस्पृश्यताक प्रतिदिनक अपमान झेलैत बच्चाक दृष्टिसँ ई विलम्ब अपनेमे हिंसाक विस्तार बनि सकैत अछि। कथा एहि विरोधाभासकेँ पूर्णतः हल नहि करैत—आ शायद ओकर साहित्यिक ताकत एही अनहल प्रश्नमे अछि।
चारिम, इतिहासक पुनर्रचना करैत अन्तिम कथा मे राष्ट्र, पवित्रता आ नारीत्वक आदर्शीकरण अछि। एकरा इतिहासक प्रमाणित पुनर्निर्माण मानब गलत हएत; एकरा वर्तमान नारी-राष्ट्रीय चेतनाक कल्पनात्मक संवाद मानल जाए त ओकर साहित्यिक अर्थ अधिक स्वच्छ देखाइत अछि।
समालोचनात्मक दृष्टिएँ ई सेहो विचारणीय अछि जे किछु कथामे “देखाबय”क बदला “कहबय”क प्रवृत्ति बढ़ि जाइत अछि। ’एकदन्त हाथी आ नौलखा हार’मे फ्रेम-कथा आ भीतरी नाट्यकथाक सम्बन्ध आरो विकसित भऽ सकैत छल, आ ’करी कोबहाम’क अन्त कनेक अकस्मात् बुझना जाइत अछि। ई सीमासभ रचनाक समग्र प्रभावकेँ नष्ट नहि करैत, मुदा कलात्मक संरचनाक स्तरपर विचारक अवसर दैत अछि।
८. मैथिली कथा-साहित्यक परिप्रेक्ष्यमे ‘माल्हो’
’माल्हो’क महत्त्व ओकर विषय-सूची मात्रमे नहि, नेपाल-मिथिला अनुभवक विशिष्ट संगममे अछि। मैथिली कथा-परम्पराक ग्राम-जीवन, पारिवारिक सम्बन्ध, जाति, विवाह आ स्त्रीजीवनक परिचित धरातल एतय नेपालक लोकतान्त्रिक आन्दोलन, राजतन्त्र, मधेशीय राजनीतिक अनुभव, माओवादी हिंसा आ अन्तरराष्ट्रीय प्रशिक्षण-संस्कृति तक विस्तृत भऽ जाइत अछि। एहि कारण संग्रहक स्थानीयता संकुचित नहि, विश्वसनीय आधार बनैत अछि जाहिपर आधुनिक राजनीतिक प्रश्न ठाढ़ होइत अछि।
संग्रहक श्रेष्ठ कथा—विशेषतः ‘माल्हो’, ‘देपुरवाली काकी’, ‘आ ओ मारलि गेलि !’, ‘सिकन्दर डोम’ आ ‘बलिदानी’—एहन बिन्दुपर सफल होइत अछि जतय विचार दृश्य आ चरित्रक भीतर विलीन भऽ जाइत अछि। ’माल्हो’क फूल, काकीक प्रतीक्षा, सिकन्दरक बच्चाक विद्यालय, फुलियाक साड़ी वा शहीदक विधवाक मौन—एहि ठाम पाठक पहले मनुष्यकेँ अनुभव करैत अछि, तकर बाद विचार स्वतः खुलैत अछि।
राजनीतिक कथा-साहित्यक चुनौती प्रायः ई रहैत अछि जे पात्र विचारक कठपुतली भऽ जाए। वृषेश चन्द्र लाल एहि जोखिमसँ पूर्णतः मुक्त नहि, मुदा हुनक निजी-सामाजिक अनुभव, संवादक पकड़ आ नैतिक आत्मसंशयक कारण प्रमुख पात्र अनेक ठाम जीवित मनुष्य बनल रहैत छथि। विशेषतः चन्दर, जे पार्टी बदलैतहुँ अन्तमे सिद्धान्तक प्रति लौटैत अछि, राजनीतिक पहचान आ नैतिक निष्ठाक फर्क बुझाबयवला यादगार चरित्र अछि।
९. समग्र निष्कर्ष
’माल्हो’क मूल साहित्यिक उपलब्धि ई अछि जे ओ बड़ इतिहासकेँ छोट जीवनक भीतर पढ़ैत अछि। लोकतन्त्रक अर्थ शहीदक फोटोमे नहि, ओकर विधवाक वर्षोंक एकाकीपनमे देखाइत अछि; जाति-उन्मूलनक दावा सुधारक भाषणमे नहि, डोम बच्चाक स्कूलमे बैसबाक स्थानमे परखल जाइत अछि; क्रान्तिक सत्य समाचारपत्रक शीर्षकमे नहि, फुलियाक लाल साड़ी आ आत्मरक्षाक छुरीमे; प्रेमक सत्य घोषणा-पत्रमे नहि, कुमुदिनीक एक फूलमे।
संग्रह बारम्बार देखबैत अछि जे सत्ता अपन कथन गढ़ैत अछि—पति वचनक, दल इतिहासक, पुलिस कानूनक, मीडिया समाचारक, दरबार मर्यादाक। लेखक एहि कथनसभक सामने पीड़ित मनुष्यक अनुभव रखैत छथि। साहित्यक न्यायालयमे एहि अनुभवक गवाही अधिक विश्वसनीय ठहरैत अछि। एहि दृष्टिसँ ‘माल्हो’ मानवीय गरिमाक कथा-संग्रह अछि।
शीर्षक पात्र माल्हो एहि सम्पूर्ण संग्रहक उपयुक्त प्रतीक छथि। ओ इतिहासक महान नायिका नहि, ग्राम्य समाजक साधारण श्रमिक स्त्री छथि; तथापि हुनक मौन प्रेम, श्रम, आत्मसम्मान आ बेटाक शिक्षा लेल आग्रह कथावाचकक प्रतिष्ठा, समय आ सामाजिक दूरीसँ पैघ भऽ जाइत अछि। कुमुदिनीक फूल जकाँ ओ कीचड़-पानिक वास्तविकतामे खिलैत छथि, अपन सुगन्ध छोड़ैत छथि, मुदा स्वामित्व स्वीकार नहि करैत। संग्रहक बहुतो चरित्र—देपुरवाली काकी, शहीदक विधवा, सिकन्दर, फुलिया, इन्द्रकुमारी—अलग-अलग रूपमे एही गरिमाक विस्तार छथि।
साहित्यक सामाजिक भूमिका एतय “तीक्ष्ण शल्य-चिकित्सक”क औजार जकाँ देखाइत अछि—एहन औजार जे राजनीतिक पाखण्ड, सीमान्तकृतक क्रन्दन आ मानवीय सम्बन्धक सूक्ष्म त्रासदीक चीरफाड़ करैत अछि। एहि अर्थमे सबाल्टर्न परिप्रेक्ष्य, नारीवादी विमर्श आ लोकतान्त्रिक चेतनाक त्रिवेणी संग्रहक आलोचनात्मक ऊर्जा बनैत अछि।
शुद्ध-ठेठ स्थानीय शब्द-संसार आ बहुभाषिक आधुनिक जीवनक संगम, निजी स्मृति आ सार्वजनिक इतिहासक संधान, तथा ‘माल्हो’, ‘देपुरवाली काकी’, फुलिया, सिकन्दर आ चन्दर जकाँ पात्रक मानवीय जटिलता एहि कथा-संग्रहकेँ दीर्घ अध्ययन योग्य कृति बनबैत अछि।
१०. ग्रन्थसूची
लाल, वृषेश चन्द्र। माल्हो। जनकपुरधाम : सुदामा प्रकाशन।
5. मोदिआइन
मानवता, मिथक, स्मृति आ अनुवाद-सौन्दर्य
गहन अनुसन्धानपरक साहित्यिक समीक्षा — अनुवाद सिद्धान्त सहित
बी. पी. कोइराला कृत
मैथिली रूपान्तरण : वृषेश चन्द्र लाल
सुदामा प्रकाशन, जनकपुरधाम · २०६१ साल
◆ ◆ ◆
बीज-शब्द
मोदिआइन; बी. पी. कोइराला; वृषेश चन्द्र लाल; मैथिली रूपान्तरण; मानवतावाद; महाभारत; गीता; युद्धविरोध; स्त्री-अनुभव; स्मृति; मिथक; मौखिक आख्यान; अनुवाद सिद्धान्त; सांस्कृतिक पुनर्स्थापन।
१. कृति, संस्करण, ऐतिहासिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि आ कृतिकार-रूपान्तरकार परिचय
नेपाली तथा मैथिली आख्यान साहित्यक इतिहासमे ‘मोदिआइन’ एकटा कालजयी, विचारोत्तेजक, दार्शनिक आ मानवतावादी उपन्यासिकाक रूपमे प्रतिष्ठित अछि। मूल रूपसँ ई कृति नेपाली भाषामे नेपालक प्रथम जननिर्वाचित प्रधानमन्त्री, प्रजातान्त्रिक आन्दोलनक पुरोधा एवं मूर्धन्य साहित्यकार विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला (बी. पी. कोइराला) द्वारा रचल गेल छल। साहित्य आ राजनीतिकेँ दुनू कातसँ सन्तुलित करैत, कोइराला एहि उपन्यासिकामे अपन राजनीतिक दर्शन, युद्धक निरर्थकता आ मानवीय संवेदनाकेँ एकटा मिथकीय आवरणमे प्रस्तुत कएने छथि।
ऐतिहासिक सन्दर्भकें देखल जाए तँ नेपालमे २०१७ साल पुष १ गते (दिसम्बर १९६०) राजा महेन्द्र द्वारा लोकतान्त्रिक सरकार आ संसदक विघटन क' जननायक बी. पी. कोइराला सहित शीर्ष लोकतान्त्रिक नेतालोकनिकेँ बन्दी बना लेल गेल छल। काठमाण्डूक ‘सुन्दरीजल बन्दीगृह’क कठिन कारावास, राजनीतिक निराशा, एकांतवास आ दार्शनिक उद्वेलनक बीच बी. पी. कोइराला अपन अंतःप्रेरणासँ साहित्य सृजनमे प्रवृत्त भेलाह। एहि कारागारमे बी. पी. कोइरालाक अंतर्मनमे एकटा भीषण आत्मसंघर्ष चलि रहल छल— नेपालमे प्रजातन्त्रक पुनर्स्थापना लेल रक्तक्रान्ति एवं सशस्त्र विद्रोहक मार्ग चुनल जाए अथवा अहिंसक मेलमिलाप, करुणा आ शान्तिपूर्ण सत्याग्रहक मार्ग। एहि वैचारिक अन्तर्द्वन्द्वक दार्शनिक निष्पत्ति ’मोदिआइन’ उपन्यासिकामे प्रतिबिम्बित भेल अछि, जेकर रचना मात्र तीन दिनक बन्दी जीवनमे (२८, २९ आ ३० जनवरी १९६४ / माघ १५, १६, १७, २०२० वि.सं.) सम्पन्न भेल आ कालान्तरमे वि.सं. २०३६ (सन् १९८०) मे साझा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित भेल। ई हुनक सभसँ लघु उपन्यास छन्हि मुदा वैचारिक दृष्टिसँ ई अत्यन्त बृहत् आ गम्भीर अछि।
प्रस्तुत कृतिक मैथिली रूपान्तरण नेपालक प्रजातान्त्रिक आन्दोलनक वरिष्ठ नेता, विचारक एवं बौद्धिक व्यक्तित्व वृषेश चन्द्र लाल द्वारा कएल गेल, जकर प्रकाशन सुदामा प्रकाशन, जनकपुरधामद्वारा वि.सं. २०६१ (सन् २००४) मे भेल। एहि मैथिली संस्करणमे स्व. सुशील कोइराला (नेपालक पूर्व प्रधानमन्त्री) क ‘दुई शब्द’, रूपान्तरकार वृषेश चन्द्र लालक ‘कृतज्ञता’, आचार्य सोमदेवक ‘मोदिआइनक डीहपरसँ’ आ डा. राजेन्द्र प्रसाद ‘विमल’क ’मोदिआइनक देहरिसँ’ शीर्षक विद्वतापूर्ण आमुख सम्मिलित अछि जे एहि पोथीक गाम्भीर्य आ ऐतिहासिक महत्त्वकेँ प्रमाणित करैत अछि। बी. पी. कोइराला स्वयं कहैत छलाह जे राजनीतिमे ओ एकटा अन्तर्प्रेरणासँ लगलाह आ साहित्यमे ओकर ठीक विपरीत, कलाकेँ स्वतन्त्रता चाही आ ई भौतिक तृप्ति नहि अपितु दैवी असन्तोष अपनाबैत अछि।
विश्वेश्वरप्रसाद कोइरालाक जन्म ८ सितम्बर १९१४ (भाद्र २४, वि.सं. १९७२) केँ काशीमे भेल छल, जतय हुनक परिवार शरणार्थीक रूपमे रहैत छल। ओ नेपालक प्रजातान्त्रिक आन्दोलनक अग्रणी नेता आ नेपालक पहिल निर्वाचित प्रधानमन्त्री रहलाह, आ संगहि सिग्मुण्ड फ्रायडक मनोविश्लेषणात्मक दृष्टिकोणसँ प्रभावित नेपाली कथा-साहित्यक युगप्रवर्तक मानल जाइत छथि। हिनक उपन्याससभमे तीनघुम्ती, नरेन्द्र दाइ, सुम्निमा, मोदिआइन, हिटलर र यहुदी, बाबु आमा र छोरा आदि प्रमुख छथि।
वृषेश चन्द्र लालक जन्म २९ मार्च १९५५ ई.मे भेल छल। ओ स्वयं बी.पी. कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीतिक अनुयायी आ नेपालक प्रजातान्त्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि, जे नेपालक राजनीतिपर निरन्तर लिखैत रहैत छथि। प्रस्तुत रूपान्तरणक अतिरिक्त हिनक मैथिलीमे ‘आन्दोलन’ (कविता-संग्रह), ‘माल्हो’ (कथा-संग्रह), आ ‘संघीयताक सम्बन्धमे’ (अनुवाद) सेहो प्रकाशित छन्हि। एतय ई लक्ष्य करबाक जोग बात अछि जे अनुवादक स्वयं मूल लेखकक राजनीतिक-वैचारिक परम्पराक वाहक छथि — जे अनुवाद-कर्ममे एकटा सैद्धान्तिक आ भावनात्मक निकटता (‘शेयर्ड आइडियोलॉजी’) उत्पन्न करैत अछि, आ जकर प्रभाव पाठक भूमिका-लेखसभमे (आचार्य सोमदेव, डा. राजेन्द्र प्रसाद ‘विमल’ आदिक आमुखमे) स्पष्ट रूपेँ पाओल जाइत अछि।
ई सेहो उल्लेखनीय अछि जे ‘मोदिआइन’क ई एकमात्र मैथिली रूपान्तरण नहि थिक — डा. रामदयाल राकेश द्वारा सेहो एकर एकटा मैथिली रूपान्तरण (सोही शीर्षकसँ, वि.सं. २०५४, सफारी नेपाली प्रकाशन) आएल छल, आ हिन्दीमे रञ्जना शर्मा द्वारा ’मोही’ शीर्षकसँ अनूदित संस्करण सेहो अछि। एहि बहु-अनूदित परम्पराक बीच वृषेश चन्द्र लालक रूपान्तरण अपन मौलिक भाषिक प्रवाह आ आञ्चलिक (दरभंगा-केन्द्रित) पुनर्रचनाक कारणेँ अलग स्थान राखैत अछि, जकर विस्तृत चर्चा आगाँ अनुवाद-सिद्धान्तक खण्डमे कएल जाएत।
मैथिली संस्करणमे नेपाली मूलपाठ साथ-साथ नहि देल गेल अछि। तैं कोनो खास वाक्य मूलसँ कतेक अक्षरशः मेल खाइत अछि, कतय किछु घटाओल-बढ़ाओल गेल, वा कोन शब्दक प्रतिशब्द मूलतः की छल—एहि सभ पर निर्णायक दावा नहि कएल जा सकैत अछि। मुदा लक्ष्यपाठक स्वाभाविकता, शैलीगत सुसंगति, सांस्कृतिक अनुकूलन आ परिपाठीय उद्देश्यक विश्लेषण पूर्ण रूपेँ सम्भव अछि।
२. कथाक भीतर कथा : स्मृति, कल्पना आ बहुस्तरीय विन्यास
कृतिक पहिल महत्त्वपूर्ण कलात्मक निर्णय ई अछि जे लेखक स्मृति आ कल्पनाक सम्बन्ध सीधे स्वीकारैत छथि। बाल्यकालक घटना चालीस वर्ष बाद ‘स्मृतिक दूरबीन’ सँ देखल जा रहल अछि; अधूरा अतीत कल्पनाक सहायतासँ क्रम आ अर्थ पबैत अछि। फलतः आरम्भे पाठक कें बता देल जाइत अछि जे ई शुद्ध दस्तावेज नहि, नितान्त मनगढ़न्त कथा सेहो नहि—ई स्मृति, अनुभूति आ वर्तमान चेतनाक संयुक्त पुनर्निर्माण थिक। एहि आत्मस्वीकृत अनिश्चिततासँ कृतिक बादक स्वप्निल-मिथकीय विस्तार विश्वसनीय बनैत अछि।
‘स्मृतिक आधारपर कोनो पहिलुका घटनाकेँ क्रमबद्ध तथा अर्थयुक्त बनाबएहेतु कल्पनाक सहयोग आवश्यक भऽ जाइत छैक।’
‘मोदिआइन’ उपन्यासक कथा-संरचना ‘कथाक भीतर कथा’ (Frame Narrative) प्रविधिक एकटा अत्यन्त उत्कृष्ट आ मनोवैज्ञानिक उदाहरण थिक। एकर बाह्य कथा-आवरणमे लेखक अपन बाल्यकालक (प्रायः १९२०-३० क दशकक) एकटा संस्मरण प्रस्तुत करैत छथि, जतय ओ एकटा नौ-दश वर्षक जिज्ञासु बालकक रूपमे अपन परिवारक हितैषी गुमास्ता ’मिसरजी’क सङ्ग नेपालक सीमावर्ती क्षेत्रसँ रेलगाड़ी द्वारा दड़िभङ्गा (दरभंगा) नगर दर्शन लेल अबैत छथि।
स्टेशन, कुल्ली, रेल, राजदरबार, एक्का, धूलि, हलुवाइक दोकान, चूड़ा-दही, फूसक मोदी-दोकान, हड़ाहा पोखरि—ई सभ विवरण ‘स्थान’ कें मात्र पृष्ठभूमि नहि रहने दैत, ओकरा जीवित पात्र बना दैत अछि। दुपहरियाक चमक, साँझक अन्हार, पोखरिक बदलैत रंग, लालटेन, डिबियाक काँपैत लौ, किड़ा-पतंगक ध्वनि—दृश्य आ ध्वनि मिलि एकटा मनोवैज्ञानिक रंगभूमि रचैत अछि जतय सामान्य यथार्थ धीरे-धीरे लोकविश्वास आ स्वप्नमे प्रवेश करैत अछि।
मोदिआइन पहिने एकटा स्नेहमयी दोकानदार स्त्रीक रूपमे अबैत छथि। बच्चाक भूख, थकान आ डर तुरन्त बूझि लेबाक हुनकर क्षमता मातृसुलभ अछि। ओहि घरेलू स्नेहक भीतर हड़ाहा पोखरिक रहस्य खुलैत अछि। पहिने माछ बेचयवाली पुरातन मलाहिनक कथा, फेर रातिमे महाभारतक आख्यान, आ अन्ततः मोदिआइनक स्वरक ‘नारी’ नामक महाभारतकालीन स्त्रीमे गलि-पघिल जाना—एहि क्रमसँ कथा फ्रेम-दर-फ्रेम भीतर उतरैत अछि।
२.१ कथा-स्तरक बहुस्तरीय विन्यास
३. वृत्ताकार संरचना : “बड़का” सँ “नीक” धरि
कृतिक नैतिक सूत्र बहुत पहिने, भोजनक समय, एकदम सहज बातचीतमे देल जाइत अछि। बालक कहैत अछि जे पढ़ि-लिखि ‘बड़का आदमी’ बनत। मोदिआइन पूछैत छथि—बड़का आदमी केहन? बालक निस्तब्ध। तखन मोदिआइनक उत्तर कृतिक पूरा दर्शनक बीज बनि जाइत अछि: बड़का लोक अनेक प्रकारक भ’ सकैत अछि, मुदा नीक लोक सभठाम मूलतः एके प्रकारक; तैं बड़का नहि, नीक बनबाक कोशिश करू।
अन्तिम रेल-यात्रामे ई बीज फेर प्रतिध्वनित होइत अछि—बड़का वा वीर बनबाक आकांक्षा छोड़ि नीक लोक बनू। आरम्भक बाल-आकांक्षा आ अन्तक स्वप्न-स्वर एक-दोसराक उत्तर बनैत अछि। बीचक पूरा महाभारत-प्रसंग मानो एहि एक पंक्तिक विशाल नैतिक उदाहरण थिक: ‘वीरता’ जे नरसंहार करैत अछि, ‘महत्ता’ जे सत्ता, प्रतिशोध वा धर्मयुद्धक नामपर मनुष्यकेँ यन्त्र बना दैत अछि, ओ नैतिक श्रेष्ठता नहि। एहि वृत्ताकार रचनाक कारण लघु उपन्यासक ढाँचा अत्यन्त कसगर बनैत अछि।
एतय ‘नीक’ कोनो दार्शनिक परिभाषाक अमूर्त शब्द नहि; ओकर अर्थ प्रेम, करुणा, पारिवारिक निकटता, दया, अहिंसा, जीवित मनुष्यक दुखक प्रति संवेदनशीलता आ अपन महत्त्वाकांक्षा सँ आनक जीवनकेँ कम मूल्यवान नहि बुझनाइ अछि। ई नैतिकता कृतिक तर्कपूर्ण दार्शनिक खण्डसभसँ बेसी दीर्घजीवी एहि कारण बनैत अछि जे ओ घरेलू बोलीमे, एक स्त्रीक स्नेहपूर्ण उपदेशक रूपमे देल गेल अछि।
४. मिथकीय पुनराख्यान, पुनर्जन्म आ अस्तित्त्ववाद
‘मोदिआइन’ महाभारतक पुनर्कथन अवश्य अछि, मुदा ओकर मौलिकता ‘की भेल’ कहबामे नहि, ‘ककरा पर की बीतल’ पूछबामे अछि। महाकाव्यक केन्द्रमे धर्म, राज्य, न्याय, प्रतिज्ञा, वीरता, कुल, देव-अवतार आ विजय रहैत अछि। कोइराला एहि केन्द्रक चारू कात जे असंख्य अनाम जीवन अछि—खेतिहर, विस्थापित, सैनिकक पत्नी, माय, बहिन, बच्चा—तकरा कथा-केन्द्र बनबैत छथि। नारी नामक पात्र स्वयं महाभारतक प्रामाणिक पात्र नहि; ओकर अनामता ओकर शक्ति थिक। ओ एक व्यक्ति सेहो अछि आ युद्धमे उजड़ल लाखों सामान्य स्त्रीक प्रतिनिधि सेहो।
एहि उपन्यासक मिथकीय प्रयोगकेँ ‘प्रतिमिथक’ कहब पूर्णतः उचित तखने हएत जँ हम ई बूझी जे कृति महाभारतकेँ नष्ट नहि करैत, बल्कि ओकर भीतर दबिल दोसर आवाज निकालैत अछि। महाकाव्यक धर्मयुद्धक अर्थ सामान्य स्त्रीक शोकमे बदलि जाइत अछि। मिथक यथास्थिति कें पवित्र करबाक औजार नहि, वर्तमान नैतिक प्रश्न पूछबाक प्रयोगशाला बनैत अछि।
साहित्यिक अनुशीलनक दृष्टिसँ ‘मोदिआइन’ पारम्परिक रूपसँ महिमामण्डित महाभारत युद्धक इतिहासकेँ एकटा नव, अप्रत्याशित आ मनोवैज्ञानिक धरातलपर स्थापित करैत अछि, जाहिमे पुनर्जन्म आ आत्माक अमरताक सिद्धान्तकें एकटा भिन्न अस्तित्त्ववादी दृष्टिकोणसँ व्याख्यायित कएल गेल अछि। बी. पी. कोइरालाक अन्य उपन्यास जेना ’सुम्निमा’मे देहवाद आ आत्मवादक बीचक द्वन्द्वकें केन्द्रबिन्दु बनाएल गेल अछि, तहिना ’मोदिआइन’मे एकहि आत्माक तीनटा जन्मक कथा समेटल गेल अछि।
उपन्यासमे ई स्पष्ट रूपेँ ध्वनित होइत अछि जे आत्माक ई अनवरत यात्रा कोनो मोक्ष वा आध्यात्मिक प्राप्तिक लेल नहि, अपितु एकटा अपूर्ण मानवीय आकाङ्क्षा आ मानसिक आघात (Trauma) क कारणेँ अछि। महाभारत कालक ओहि अज्ञात ‘नारी’क आत्मा, जेकर पति कुरुक्षेत्रक नरसंहारमे मारल गेल छल, शान्ति नहि पाबि सकल। ओहि नारीक आत्मा कालान्तरमे एकटा ’मलाहिन’ (मछुवारिन) क रूपमे अवतरित भेल जे हड़ाहा खधियाक कातमे माछ बेचैत छलि आ जकर भेंन्ट दड़िभङ्गा महाराजक तान्त्रिकसँ भेल छल। तान्त्रिककें मलाहिन महाभारत कालक विशालकाय योद्धासभक वर्णन करैत अछि आ चील द्वारा खसाएल गेल लाशक कथा सुनबैत अछि। तदुपरान्त, ओही आत्मा वर्तमान कालमे ’मोदिआइन’क रूपमे अवतरित अछि जे अपन पतिक (जेकर साङ्केतिक उपस्थिति खोंखैत रोगी मोदीक रूपमे अछि मुदा वास्तविक प्रेम महाभारतक ओहि सैनिक पतिक प्रति अछि) बाट जोहि रहल अछि।
ई आत्मिक निरन्तरता प्रमाणित करैत अछि जे जखन धरि मानवीय न्याय आ पूर्णता प्राप्त नहि होइत अछि, आत्मा युग-युगान्तर धरि मृत्युलोकमे भटकैत रहैत अछि। मोदिआइन बालककें कहैत छथि जे कोनो न कोनो पिआस, कोनो अपूर्ण कामना आत्माकेँ मृत्युलोकमे बाँधि क' राखैत अछि। ई कोइरालाक नियतिवादी आ अस्तित्त्ववादी विमर्शक एकटा गम्भीर पक्ष थिक जतय मनुष्यक अदम्य आकाङ्क्षा आ प्रेम, मृत्युकें सेहो पराजित क' दैत अछि।
४.१ मलाहिन-मोदिआइन : लोकमिथक आ पौराणिक-सामाजिक द्वैत
कथाक दोसर स्तम्भ थिक मलाहिन-प्रसंग — जतय एकटा माछ बेचनिहारि नारी तान्त्रिककेँ अपन हाँसीक रहस्यमय व्याख्या दैत, चील द्वारा माछ लऽ जाएब आ महाभारतकालीन योद्धाक शव खण्डवप्रस्थ धरि घीचिकऽ आनब — दूनू घटनाकेँ जोड़ि एकटा लोकमिथक रचैत छथि। ई मिथक-निर्माणक प्रक्रिया स्वयं साहित्यिक-मानवशास्त्रीय दृष्टिएँ महत्त्वपूर्ण अछि: कोना एकटा स्थानीय जल-स्रोत (हड़ाहा पोखरि)क नामकरण महाभारत जकाँ विराट अखिल-भारतीय आख्यानसँ साँठ-गाँठ बनाकऽ आपन ‘पवित्रता’ आ ‘भयावहता’ अर्जित करैत अछि। मलाहिनक चरित्र आ मोदिआइन-नारीक चरित्र दूनू संरचनात्मक रूपेँ समान्तर छथि — दूनू ‘असामान्य’ ज्ञान राखनिहारि, समाजक हाशियापर स्थित, आ पुरुष-सत्ताक (तान्त्रिक/कृष्ण जकाँ) प्रश्नक समक्ष अबूझ रहस्यमय उत्तर दैनिहारि नारी छथि।
५. भुइँमानुष, विस्थापन आ स्त्री-दृष्टि
इतिहास सदैव विजेता, सत्ताधारी वर्ग आ पुरुषसत्ता द्वारा लिखल जाइत अछि, जतय सीमान्तकृत वर्ग आ स्त्रीक स्वर (आवाज) दबैल जाइत अछि। पारम्परिक महाभारतमे चक्रवर्ती राजा, महारथी, देवपुत्र, ब्राह्मण आ सामन्ती सत्ताक दृष्टिकोण मुख्य रहैत अछि। मुदा बी. पी. कोइराला एहि युद्धक विभीषिकाकेँ एकटा सर्वथा साधारण, अशिक्षित मुदा संवेदनशील महिला ‘मोदिआइन’ आ ओकर अंतरात्मामे अनुस्यूत महाभारत कालीन कुरुक्षेत्रक सामान्य क्षत्रिय युवती ’नारी’क दृष्टिसँ पुनर्व्याख्यायित करैत छथि।
बी. पी. कोइरालाक सम्पूर्ण आख्यान साहित्यमे स्त्री-पात्रसभ अत्यन्त सशक्त आ क्रान्तिकारी रूपमे उपस्थित भेल छथि। जेना 'तीन घुम्ती' मे इन्द्रमाया, 'सुम्निमा' मे सुम्निमा, 'बाबु आमा र छोरा' मे उमा, 'नरेन्द्र दाइ' मे गौरी आ मुनरिया, ठीक तहिना 'मोदिआइन' मे ई अज्ञात नारी सम्पूर्ण कथानकक केन्द्रबिन्दु थिक। ई सभ स्त्री पात्र पितृसत्तात्मक बन्धनकेँ तोड़ैत अपन स्वतन्त्र अस्तित्त्वक निर्माण करैत छथि।
कथामे वर्णित ‘नारी’ इन्द्रप्रस्थक स्थापनाक क्रममे विस्थापित भेल एकटा सामान्य कृषक-क्षत्रिय परिवारक कन्या थिक। खाण्डवप्रस्थक जङ्गल फाड़ि क' इन्द्रप्रस्थक स्थापना भेलासँ स्थानीय कृषक आ वनवासी परिवार विस्थापित आ दरिद्र भ' गेलाह। ई शहरीकरण आ साम्राज्यवादी विस्तारक कारणेँ विस्थापित भेल सर्वहारा वर्गक यथार्थ थिक। द्यूतक्रीड़ामे युधिष्ठिर द्वारा द्रौपदीक दावपर लगाओल जाएब आ चीरहरणक घटनाकेँ ई सीमान्तकृत नारी एकटा भिन्न दृष्टिसँ देखैत छथि। ओ कहैत छथि, “द्रौपदीक चीरहरण एकगोट नारीक अपमानेटा नहि अछि, ई बड़का अपरिहार्य अनिष्टक सूचक अछि!”। एतय नारीक मर्म द्रौपदीक राजकीय अपमानसँ बेसी ओहि आसन्न युद्धक त्रासदीक पूर्वाभाससँ त्रस्त अछि जे समस्त सामान्य जनजीवनकेँ भस्म क' देत।
नारी स्पष्ट करैत छथि जे पुरुषसभक राजनीतिक अहङ्कार (दुर्योधनक हठ आ भीम/द्रौपदीक प्रतिशोध) क लेल साधारण स्त्रीसभक जीवन आ हुनकर सिन्दूरकें दावपर लगाएल गेल। महिला शरीर युद्धमे सङ्घर्ष आ शोकक मुख्य केन्द्र (Site of violence and grief) बनि जाइत अछि। कुरुक्षेत्रक युद्धक समाप्तिपर जे चित्र उपस्थित होइत अछि, ओ नारी-त्रासदीक चरम बिन्दु थिक— “पृथ्वीपरसँ पुरुष शून्य भ' गेल। बस खाली विधवा नारीसभ अहि लोकमे बाँचएलेल रहि गेलि सनकलि... अपन छातीसँ असहाय अपन-अपन बाल सन्तानसभकें सटओने”। ई पितृसत्तात्मक युद्धक विरूद्ध मातृसत्ताक करुण आ मार्मिक विद्रोह थिक।
एहि अर्थमे ’मोदिआइन’केँ एकटा प्रोटो-फेमिनिस्ट (नारीवादी-पूर्व) पाठक रूपमे सेहो पढ़ल जा सकैत अछि, जतय कोइरालाजी फ्रायडीय मनोविश्लेषणसँ प्रभावित अपन सामान्य शैलीसँ आगू बढ़िकऽ सामूहिक स्त्री-वेदनाक आवाज देबाक प्रयास करैत छथि।
५.१ पारम्परिक महाभारत आ ’मोदिआइन’क दृष्टिक तुलनात्मक विन्यास
५.२ स्त्री-पक्षधरता भीतरक अन्तर्विरोध
मुदा एहि स्त्री-पक्षधरता भीतर एकटा महत्वपूर्ण तनाव सेहो अछि। नारी आ ओकर सखीसखी द्रौपदीक प्रतिशोध-कामना कें ‘स्वाभाविक नारित्व’ सँ विचलन जकाँ देखैत छथि। एतय करुणा-केन्द्रित नैतिकता स्त्रीक एक विशिष्ट ‘कोमल’ स्वरूपकेँ स्वाभाविक मानि लेबाक जोखिम लैत अछि। द्रौपदीक अपमान, न्याय-अधिकार आ राजनीतिक क्रोधकेँ यदि केवल युद्ध-उत्तेजना कहि अस्वीकार कएल जाए तँ स्त्रीक एजेंसीक दोसर रूप दबि सकैत अछि। अतः उपन्यास स्त्रीक पीड़ा कें असाधारण केन्द्र देता अछि, मुदा स्त्रीत्वक परिभाषामे पारम्परिक मर्यादा-कल्पना सँ पूर्ण मुक्त नहि। ई अन्तर्विरोध कृतिक कमजोरी मात्र नहि; ओकर समय, नैतिक आग्रह आ लैङ्गिक कल्पनाक जटिलता बुझबाक अवसर अछि।
’मोदिआइन’मे स्त्रीक आवश्यकता, दमन, अस्तित्व-रक्षा, समानता आ सशक्तीकरणक प्रश्न उपस्थित अछि। कृतिक स्त्रीवाद आधुनिक अधिकार-विमर्शक समरूप नहि; ई मुख्यतः अहिंसा, प्रेम, गृहस्थ जीवन आ मानवीय अस्तित्वक सम्मानसँ उपजैत स्त्री-दृष्टि अछि। तैं ओकर प्रगतिशीलता आ सीमाकेँ एक्के संग पढ़ब अधिक न्यायपूर्ण होएत।
६. गीता, अर्जुन आ “मानवता बनाम देवत्व”क तनाव
‘मोदिआइन’ उपन्यासक सर्वाधिक क्रान्तिकारी, दार्शनिक आ वैचारिक पक्ष थिक श्रीमद्भगवद्गीताक पारम्परिक कर्मयोग-दर्शनक मानवीय धरातलपर विखण्डन (Deconstruction)। भारतीय वाङ्मयमे गीताकेँ सर्वोच्च आध्यात्मिक उपदेशक रूपमे पूजल जाइत अछि, मुदा कोइराला एकरा नितान्त भिन्न, मानवतावादी चश्मासँ देखैत छथि। ई दृष्टिकोण गान्धीवादी शान्तिवाद आ अम्बेडकरक सामाजिक न्याय सँ सेहो मेल खाइत अछि जतय पारम्परिक ग्रन्थसभक पुनर्मूल्याङ्कनक आवश्यकतापर बल देल गेल अछि।
कुरुक्षेत्रक मध्यमे जखन अर्जुन अपन सगा-सम्बन्धी, गुरुजन आ भ्रातागणकेँ देखि विषादग्रस्त भ' गाण्डीव त्यागि दैत छथि, तखन उपन्यासकार ओहि विषादकेँ अर्जुनक दुर्बलता नहि, अपितु मानवताक सर्वोच्च शिखर मानैत छथि। अर्जुन करुणा, सहृदयता, स्वजन-स्नेह, मैत्री, वात्सल्य आ दया रूपी उदात्त मानवीय गुणक जीवन्त विग्रह छलाह। हुनक मुहसँ निकलल आर्तवाणी—“नहि, हम अपन कुटुम्बलोकनिक हत्या अपनहिं हाथें किन्नहु ने करब! हमरा राज्य नहि चाही”—वास्तविक मानव-हृदयक शाश्वत धर्म छल।
मुदा श्रीकृष्ण अपन सोरह-अध्यायी प्रखर, ओजस्वी आ दार्शनिक वाग्जाल (गीता) द्वारा अर्जुनक ओहि सहज मानवीय करुणाकेँ निर्ममतापूर्वक कुचलि दैत छथि। श्रीकृष्णक तर्क—देह पुरान वस्त्र अछि, आत्मा अमर अछि, निष्काम भावसँ बध करब धर्म थिक, जे देखाइत अछि से माया आ मिथ्या थिक—केँ ‘नारी/मोदिआइन’ कठोर चुनौती दैत छथि। उपन्यासक ई गद्यांश मानव-अस्तित्त्वक मार्मिक उद्घोष थिक जतय नारी कृष्णसँ प्रश्न करैत छथि जे की हुनक पतिक उष्म आलिङ्गन, हुनक मातृत्त्वक लालसा आ हुनक दुःख मिथ्या थिक? ओ कहैत छथि जे स्वर्गक उच्चतामे बैसल देवताक लेल मृत्युलोकक जीवन कीड़ा-मकोड़ाक समान अर्थहीन (मिथ्या) भ' सकैत अछि, मुदा एकटा मानव (स्त्री) क लेल ओकर जीवन आ प्रेम कोनो भी स्थितिमे अप्रासङ्गिक वा मिथ्या नहि भ' सकैत अछि।
उपन्यासकार स्पष्ट करैत छथि जे दैवत्त्व (Divinity) आ अति-विचारधारा (Hyper-ideology) मनुष्यकेँ भावनाहीन यन्त्र बना दैत अछि। गीता सुनलाक बाद अर्जुन “अर्जुन नहि रहि गेलाह, ईश्वरारूढ़ यन्त्र बनि गेलाह”। हुनक सम्पूर्ण मानवीय संवेदना मृत भ' गेल आ ओ युद्धोन्मादमे रत भ' गेलाह। परिणामतः लाखो नारी विधवा भेलि, गिद्ध-श्वान लाश नोचए लागल आ सम्पूर्ण मानवता पराजित भ' गेल।
“हे कृष्ण ई केहन कर्तव्यक प्रेरणा अछि अहाँक... कि मानवजीवन मृत्युकेर दुर्दमनीय साँध-सिमानसँ ओहिना घेराएल संकुचित नहि अछि?”
ई अंश आधुनिक अस्तित्ववादी (existentialist) चिन्तनक निकट अछि — जतय मनुष्यक परिमित, नश्वर अस्तित्वकेँ केन्द्रमे राखिकऽ किनको दैवी उदासीनताक विरुद्ध खड़ा कएल गेल अछि। भूमिका-लेखक आचार्य सोमदेवो एहि द्वन्द्वकेँ रेखांकित करैत लिखने छथि जे उपन्यासमे कोइरालाजीक ‘राजनीतिक व्यक्तित्व मानवतावादक नाउँमे रूपान्तरण भेल’ जकाँ प्रतीत होइत अछि — ई टिप्पणी सेहो उल्लेखनीय अछि जे राजनीतिक कैदी लेखकक व्यक्तिगत अनुभव (सत्याग्रह विरुद्ध सशस्त्र क्रान्ति, हिंसा विरुद्ध अहिंसा) कथाक दार्शनिक तानाबानामे कतेक गहराइसँ बुनल गेल अछि।
तथापि समालोचनात्मक न्याय लेल एकटा सूक्ष्म भेद जरूरी अछि। ‘मोदिआइन’ गीता-दर्शनक सम्पूर्ण दार्शनिक खण्डन नहि; ई एक साहित्यिक प्रतिवाद अछि। उपन्यास कृष्णक वाणीकेँ नारीक शोक आ मृत्यु-बोधक कसौटीपर जाँचैत अछि। अतः कृतिक सामर्थ्य ‘गीता गलत अछि’ सिद्ध करबामे नहि, बल्कि पाठककेँ एहि असुविधाजनक प्रश्नसँ जूझय देबामे अछि जे न्याय, धर्म वा कर्तव्यक नामपर मनुष्यक करुणा कतेक दूर स्थगित कएल जा सकैत अछि।
७. युद्ध-विरोध : रणभूमि नहि, घर-घरक प्रलय
महाभारतक युद्ध ‘मोदिआइन’मे वीरगाथा नहि, मृत्यु-यन्त्र अछि। अठारह दिनक नरसंहारक वर्णनमे ’कच...कच...’ ध्वनि बारम्बार लौटैत अछि। ई अनुकरणात्मक ध्वनि तलवारक महिमा नहि, गर्दनि-कटबाक यान्त्रिक भय पैदा करैत अछि। शवक पहाड़, रक्तक धार, गिद्ध, शृगाल, कुकुर, सड़ल देह आ अनगिनत विधवा—एहि बिम्बसँ युद्धक अलंकारिक तेज उतारि ओकर जैविक, दुर्गन्धमय यथार्थ सामने आनल गेल अछि।
सबसे मार्मिक तर्क सैन्य गणनासँ नहि, सम्बन्धक उलझनसँ अबैत अछि: नारीक पति आ देओर कौरव-दलमे, बाबू आ भाइ पाण्डव-दलमे। एतय जीत-हारक अर्थ भंग भ’ जाइत अछि। जँ अपना कुटुम्बक अलग-अलग पुरुष विपरीत सेनामे छथि, ‘विजय’ ककर? एहि प्रश्नसँ युद्धक सामूहिक पहचान—कौरव/पाण्डव—टुटि व्यक्ति-संबंधक नैतिकता सामने अबैत अछि।
युद्धोत्तर अंशमे नारी कहैत अछि जे पतिक मृत्युकेँ संग एक मृत्यु ओकर सेहो भ’ गेल, आ देहक मृत्यु बादो असंख्य विधवा-आत्मा अपन प्रियकेँ खोजैत बौआइत छथि। ई प्रेत-विम्ब केवल अलौकिकता नहि; ई अभिघातक रूपक अछि। युद्ध समाप्त भ’ सकैत अछि, मुदा शोकक समय समाप्त नहि होइत। एहि अर्थमे हड़ाहा पोखरि सामूहिक स्मृति-स्थल थिक—पानीक तलमे हड्डी, इतिहास, शोक आ अनुत्तरित प्रतीक्षा दबिल अछि। लैङ्गिक अभिघातपर भेल शोधक संग ई पाठ गहिर संवाद करैत अछि, कारण हिंसा रणभूमि पर पुरुष-देहकेँ मात्र नहि, परिवारक भावनात्मक संरचनाकेँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी घायल करैत अछि।
८. फ्रायडवादी मनोविज्ञान : इरोस बनाम थानाटोस
बी. पी. कोइराला नेपाली साहित्यमे मनोवैज्ञानिक यथार्थवादक प्रवर्तक छथि आ फ्रायडक मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्तसँ गहिरा रूपेँ प्रभावित छलाह। फ्रायडक सिद्धान्तमे मनुष्यक दूटा मूल प्रवृत्ति होइत अछि: ‘इरोस’ (Eros - जीवन, प्रेम, काम-ऊर्जा) आ ‘थानाटोस’ (Thanatos - मृत्यु-प्रवृत्ति, विनाश)। कोइराला स्वयं स्वीकार कएने छथि जे ओ फ्रायडक सिद्धान्तकेँ मानैत छथि मुदा सङ्गहि नैतिकता (Moralism) केँ सेहो प्रश्रय दैत छथि।
‘मोदिआइन’मे एहि दुनू प्रवृत्तिक भीषण सङ्घर्ष आ ओकर परिणामक सूक्ष्मतासँ अङ्कन भेल अछि। उपन्यासमे ’नारी’क शारीरिक सौन्दर्य, यौवनक उन्माद, अरण्यमे एकटा सैनिकसँ दृष्टिसँ भेल प्रेम आ गान्धर्व विवाह, पतिक आलिंगनक सुसुम स्पर्श, मातृत्त्वक तीव्र लालसा—ई सभ ’इरोस’ (Eros) क चरम अभिव्यक्ति थिक। नारी अपन नवविवाहित जीवनक अल्हड़ आनन्द आ सखी-मितिनसभक सङ्ग हास-परिहास (सूर्यकुण्डक कातमे स्नान आ क्रीड़ा) मे जीवनक चरम सार्थकता देखैत छलि।
दोसर दिस, युद्धक विनाश, राज्याधिकारक लेल सङ्घर्ष, कृष्णाक उद्बोधन, आ महाभारतक नरसंहार ‘थानाटोस’ (Thanatos) क भयावह ताण्डव थिक। युद्ध द्वारा ओहि काम-ऊर्जा आ जीवन-प्रवृत्तिक निर्दयतापूर्वक संहार देखायल गेल अछि। फ्रायडवादी दृष्टिसँ, गीताक उपदेश अर्जुनक ‘इरोस’ (कुटुम्ब-स्नेह, दया) केँ दमित क' ‘थानाटोस’ (विनाशकारी शक्ति) केँ जागृत करबाक एकटा तार्किक आवरण मात्र छल। नारीक ई विलाप जे ओ अपन पतिकेँ अखन धरि विदाई नहि द' सकल अछि, वास्तवमे जीवन-प्रवृत्तिक ओहि मृत्यु-प्रवृत्तिसँ भेल असामयिक आ अप्राकृतिक पराजयक शोक-गीत थिक।
९. मानसिक आघात, स्पेक्ट्रोलॉजी आ प्रदर्शन-अध्ययन
मोदिआइनक रूपमे ‘नारी’क आत्माक युग-युगान्तरसँ अपन पतिक प्रतीक्षा करब वस्तुतः युद्धोत्तर मानसिक आघात (Post-Traumatic Stress Disorder - PTSD) आ सामूहिक स्मृति (Collective Memory) क प्रतीकात्मक रूप थिक। ज्याक डेरिडा (Jacques Derrida) क ’स्पेक्ट्रोलॉजी’ वा 'Hauntology' क सिद्धान्तक अनुरूप, जे वस्तु वा घटना इतिहासमे पूर्णतया समाप्त वा समाधान नहि भ' पाबैत अछि, ओ भूत वा प्रेत (Specter) बनि क' वर्तमानकेँ सताबैत (Haunt) रहैत अछि। कार्ल मार्क्स सेहो 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो' मे 'Specter of Communism' क चर्चा कएने छथि जे युरोपकेँ सता रहल छल। एतय मोदिआइनकेँ सताबैत अछि महाभारत युद्धक स्पेक्ट्रर।
कुरुक्षेत्रक ओहि विधवा नारीक दुःख इतिहासक कालखण्डमे कहियो समाधान नहि भेल। ओ न्यायसँ वञ्चित रहि गेलि। ताहि लेल ओ ‘प्रेतात्मा’ (Revenant) बनि क' मोदिआइनक शरीरमे प्रवेश करैत अछि आ युग-युगान्तर धरि अपन पतिक प्रतीक्षा करैत अछि। ई ’स्पेक्ट्रोलॉजी’क सिद्धान्त प्रमाणित करैत अछि जे युद्धमे मारल गेल निर्दोष लोकक आत्मा इतिहास आ वर्तमानकेँ बेरि-बेरि झकझोरैत अछि जाधरि मानवता ओहि हिंसाक वास्तविक प्रायश्चित्त नहि क' लेत।
प्रदर्शन अध्ययन (Performance Studies) क परिप्रेक्ष्यसँ देखल जाए तँ मोदिआइन द्वारा ओहि न-दश वर्षक बालककें कथा सुनाएब एकटा ‘परफॉर्मेन्स’ थिक। ओहि परफॉर्मेन्सक माध्यमसँ मोदिआइन युद्धक विभीषिका, दर्द, अलगाव (estrangement) आ विधुरताक व्यथाकेँ नव पीढ़ि (बालक) क समक्ष सम्प्रेषित क' रहलि छथि। बालक एतय एकटा श्रोता आ दर्शक (Audience) अछि जे भविष्यक प्रतिनिधि थिक। जखन बालक निन्नमे जाइत अछि, तखन सेहो ओकर अवचेतनमे ई स्पेक्ट्रर प्रवेश क' जाइत अछि जतय ओ सपनामे "कच... कच... कच" मुण्ड कटैत देखैत अछि आ आकाशसँ एकटा ध्वनि सुनैत अछि जे ओकरा वीर नहि, नीक बनबाक प्रेरणा दैत अछि। ई पीढ़ि-दर-पीढ़ि (Intergenerational) ट्रमाक हस्तान्तरण आ निवारणक एकटा अद्भुत साहित्यिक प्रदर्शन थिक।
१०. बाल-दृष्टि, मौखिकता आ मनोवैज्ञानिक विश्वसनीयता
बालक कथावाचक कृतिक दार्शनिक भारकेँ हल्का नहि, बल्कि विश्वसनीय बनबैत अछि। बच्चा पहिने दरभंगा देखबाक कौतुकमे अछि; स्टेशनक भीड़, दरबारक लागत, कुल्ली, मिठाइ, पोखरि सभ ओकर आँखिमे विस्मयक वस्तु अछि। राति जखन अन्हार, डिबियाक लौ आ जलक ‘छपाक’ ओकर डर बढ़बैत अछि, तखन मोदिआइनक कथा सुननाइ मायसँ खिस्सा सुनैत-सुनैत सुतबाक घरेलू अनुभव जकाँ भ’ जाइत अछि। मिथक एहि कारण व्याख्यान नहि रहि स्वप्नक चलचित्त बनैत अछि।
मौखिक कथनक एकसुर लय, ‘बौआ’ सम्बोधन, प्रश्नोत्तर, कथा बीच ठहराव, नींदक आवागमन आ दृश्यसभक एक-दोसरामे विलयन—ई सभ तकनीक ‘विश्वसनीय अविश्वसनीयता’ रचैत अछि। पाठक निश्चित नहि करि सकैत अछि जे मोदिआइन वास्तवमे नारीक प्रेतरूप छथि, बच्चाक अर्द्धनिद्रा कल्पना अछि, वा स्मृति चालीस वर्ष बाद एहि रूपमे कथा बना रहल अछि। कृति एहि अस्पष्टताकेँ सुलझबैत नहि; तकरा सौन्दर्य-तत्त्व बनबैत अछि।
इएह कारण अछि जे अन्तमे परिवार पूछैत अछि—दरभंगामे की देखलह? उत्तर केवल ‘मोदिआइन’। राजदरबार, शहर, स्टेशन, सवारी सभ गौण भ’ गेल; एक स्त्रीक आवाज बच्चाक नैतिक चेतनामे स्थायी छाप छोड़ि गेल। बाल-दृष्टिक यात्रा बाहरी ‘देखबाक’ सँ भीतरी ‘बूझबाक’ यात्रा बनि जाइत अछि।
मूल पाठमे बेर-बेर ‘एकसुर’, ‘सम्मोहन’, ‘टपटप पड़ैत’ जकाँ शब्दावलीक प्रयोगसँ लेखक स्वयं अपन कथन-शैलीक स्वभावकेँ रेखांकित करैत छथि — मोदिआइनक कथा-वाचन एकटा लोरी वा मौखिक परम्पराक कथा-कथनक शैलीमे प्रस्तुत अछि, जे सुननिहार बालककेँ स्वप्न आ यथार्थक सीमारेखापर लऽ जाइत अछि। ई शैली-चयन जानि-बूझिकऽ कएल गेल अछि, कारण एहिसँ पाठक (आ श्रोता-बालक) सेहो ओहि ’देवत्व बनाम मानवता’क सम्मोहनकेँ प्रत्यक्ष अनुभव करैत छथि जकरा कथा वर्णन करैत अछि — अर्जुन कृष्णक वाणीक सम्मोहनमे पड़ैत छथि, बालक मोदिआइनक वाणीक सम्मोहनमे।
११. स्थान-स्मृति, मिथिला-परिवेश आ भाषा-शैली
हड़ाहा पोखरि (आइयो दरभंगामे विद्यमान) कथाक केन्द्रीय ‘क्रोनोटोप’ (काल-स्थान) थिक। ई एकटा वास्तविक भौगोलिक स्थान अछि, मुदा कथामे ई ऐतिहासिक (कुरुक्षेत्रीय उत्खनन), मिथकीय (मलाहिन-तान्त्रिक प्रसंग), आ व्यक्तिगत (बालकक भयातुर रात्रि-अनुभव) — तिनू स्तरक स्मृतिकेँ आत्मसात् करैत एकटा बहुअर्थी प्रतीकमे बदलि जाइत अछि। दरभंगाक भौतिक विवरण (नौलखा दरबार, स्टेशनक हलचल, कुली-हुलिक अफरातफरी, मोदीक दोकानसभ) यथार्थवादी बारीकीसँ अंकित अछि, जे कथाक मिथकीय-दार्शनिक उड़ानकेँ ‘जमीनी’ आधार दैत अछि — ई कोइरालाजीक विशिष्ट शैली-विशेषता थिक, जतय स्वच्छन्दतावाद (romanticism) आ यथार्थवाद (realism) एकाकार भऽ जाइत अछि।
दरभंगा एहि कृतिमे नक्शाक शहर नहि, स्मृति-नगर अछि। रेलस्टेशनक हल्ला, दरबारक लाल रंग, राजकीय फिटिन, हथि-सार, बजार, एक्का, फूसक दोकान, चूड़ा-दही-गुड़—ई सूक्ष्म दृश्य अतीत मिथिलाक सामाजिक बनावट बचा लैत अछि। रूपान्तरकार आ आमुखकार सभ एहि भूगोलक स्थानीय सम्बन्धपर विशेष बल दैत छथि; मैथिली पाठक लेल ई कथा ’विदेशी नेपाली कृति’क अनुवाद मात्र नहि रहि अपन सांस्कृतिक भूगोलक पुनर्प्राप्ति बनि जाइत अछि।
हड़ाहा पोखरि कृतिक सर्वोत्तम प्रतीक अछि। दिनमे स्नान-स्थल, साँझमे अन्हार जल, रातिमे भयक केन्द्र, लोककथामे हड्डीक इतिहास, महाभारतक शोकक भूगर्भ, आ अन्तमे गीता-पाठक धार्मिक स्थल—एके पोखरि पर अनेक अर्थक तह चढ़ल अछि। ‘पानी’ एतय विस्मरण नहि, स्मृति संचित करैत अछि। जलक तल जे नदेखाइत अछि, कथा ओही दबल इतिहासकेँ ऊपर आनैत अछि।
एहि अर्थमे कृति स्मारक-विरोधी स्मारक रचैत अछि। राजदरबार जकर लागत आ वैभव पर यात्री गौरव करैत छथि, समयक संग कथा मे गौण भ’ जाइत अछि; हड़ाहा पोखरि आ मोदिआइनक कण्ठ बचि रहैत अछि। सत्ता पाथरमे स्मारक बनबैत अछि; सामान्य लोक कथा आ स्मृतिमे। उपन्यास पछिला प्रकारक स्मृति कें अधिक टिकाउ प्रमाणित करैत अछि।
११.१ आञ्चलिक परिवेश, भोजन, वेशभूषा आ शब्द-संसार
उपन्यासक एकटा विशिष्ट आकर्षण थिक मिथिलाक हृदयस्थली ‘दड़िभङ्गा’ (दरभंगा) क वि.सं. १९८०-९० (१९२०-३० ई.) दशकक सजीव आञ्चलिक चित्रण, जे फणीश्वरनाथ रेणु वा नागार्जुनक आञ्चलिकताक स्मरण करबैत अछि।
उपन्यासिकामे दड़िभङ्गा रेलवे स्टेशनक पुरान स्वरूपक चित्रात्मक वर्णन अछि—पातर अलकतरा बिछाएल बड़का प्लेटफार्म, कलकत्ता-मोडलक कड्काले पुल, लाल मगजी लागल बेंतक पंखा घिचनिहार कुल्ली आ पसिंजरसभक कोलाहल। तदुपरान्त, दड़िभङ्गा महाराजक ‘नौलखा दरबार’ (राजनगर एवं दरभंगाक लाल दरबार), हथिसार, घोड़सार, कचहरी, आ हड़ाहा/हड़ाही पोखरिक घाटक विस्तृत अंकन पाठककेँ तत्कालीन मिथिलाक जीवन्त इतिहासमे ल' जाइत अछि। ऐतिहासिक ’हड़ाही पोखरि’कें महाभारतक खधियासँ जोड़ि मिथक आ यथार्थकेँ एकाकार क' देल गेल अछि।
मैथिली अनुवादमे मिथिलाक पारम्परिक भोजन आ आतिथ्यक सुगन्ध व्याप्त अछि। मोदिआइनक दोकानमे पातर पितरिया थारीमे फुलाएल चूड़ा, छाँछिक दही, गुड़, पेंड़ा-लड्डू, दूध-भात, आ चुल्हिपर ताजा तड़ल ‘भाँटाक तरुआ’क वर्णन अत्यन्त रसमय आ सांस्कृतिक यथार्थसँ परिपूर्ण अछि। मोदिआइनक शारीरिक सौन्दर्य आ वेशभूषाक वर्णन मिथिलाक ठेठ नारीक साक्षात रूप उपस्थित करैत अछि। ओकर पहिरन—ढोढ़ीसँ उपरेक बिना बटमबला बड़का गलाक ’छिटक बलाउज’, एगारह हाथक ‘नील साड़ी’, कान-गड़-पएरमे ‘चाकर-चाकर चानीक गहना’, बाँहिमे ‘बाजुबन्द’ आ बेर-बेर फुजैत ‘खोपा’—एहि उपन्यासकें एकटा दृश्य-काव्य जकाँ सजीव बना दैत अछि।
अनुवादक वृषेश चन्द्र लाल मैथिलीक अत्यन्त जीवन्त, प्रामाणिक आ समृद्ध देशज/ठेठ शब्दावलीक प्रयोग कएने छथि, जे अनुवादकेँ मौलिकता प्रदान करैत अछि। विशिष्ट शब्दावलीक प्रयोग जेना ‘गहिंकी’ (ग्राहक), ‘असोराक ओरीयानी’ (ओसाराक ओरी), ‘भानस’ (रसोई), ‘कोंचिया’ (धोतीक खोंछा), ‘बौअइनी’ (भ्रमण), ‘सुरआएल’ (लयबद्ध), ‘डबड़ा’ (छोट पोखरि), ‘खधिया’ (खाध/गड्ढा), ‘कवन्ध’ (बिना माथक धड़), ‘कचरमबध’ (नरसंहार), आ ‘झपलाइत’ (औंघानाय) एहि पोथीक साहित्यिक गरिमाकेँ आओर उच्च करैत अछि। भाषाक ई ठेठपन उपन्यासक ग्रामीण आ सीमान्तकृत परिवेशकेँ आओर बेसी प्रामाणिक बनबैत अछि।
११.२ ध्वनि-संरचना, दृश्यात्मकता आ वाक्य-लय
मैथिली रूपान्तरणक पाठ्य-सौन्दर्यक पहिल आधार बोलचालक सहजता अछि। ‘बौआ’, ‘मोटरी’, ‘ठेही’, ‘कात’, ‘गाम’, ‘मितिन’, ‘खिस्सा’, ‘चूरा-दही’, ‘भोर’, ‘घुरि’, ‘बौआइत’ सन शब्द मात्र स्थानीय रंग नहि देत; ई कथनक सामाजिक निकटता बनबैत अछि। बालक, मिसिरजी, मोदिआइन आ ग्रामीण स्त्रीसभक भाषा पुस्तक-प्रसूत औपचारिकता सँ मुक्त अछि। तकर विपरीत कृष्ण-अर्जुनक प्रसंगमे धर्म, निष्काम कर्म, स्थितप्रज्ञ, परमब्रह्म, ईश्वर, कर्तव्य सन तत्सम पद घन होइत अछि। एहि शैलीगत द्विस्वरताकेँ संयोग मात्र नहि मानल जा सकैत अछि: घरेलू मानवीय वाणी आ शास्त्रीय देववाणी स्वयं भाषिक स्तरपर आमने-सामने ठाढ़ भ’ जाइत अछि।
दृश्यात्मकता सेहो उल्लेखनीय अछि। रेलगाड़ी, स्टेशनक पुल, लाल दरबार, पोखरिक अन्हार, डिबियाक छाया, युद्धक चमकैत कवच, धूलि, रक्त, गिद्ध—लेखक कैमरा-जकाँ दूरी आ कोण बदलैत छथि। विशेषतः रात्रिक अंशमे प्रकाश-अन्हारक विरोध बच्चाक मनोस्थिति नियंत्रित करैत अछि। ध्वनि—‘छपाक’, शंख, नगाड़ा, खाँसी, रेल, ‘कच...कच...’—दृश्यकेँ देहधारी अनुभवमे बदलैत अछि।
वाक्य-विन्यासमे अनेक ठाम दीर्घ, आवेगपूर्ण, पुनरुक्तिपूर्ण प्रवाह अछि। युद्ध आ शोकक समय ई प्रवाह भावनात्मक अतिरेक रचैत अछि; बाल संवादमे वाक्य छोट आ द्रुत होइत अछि। शैली विषयानुरूप गति बदलैत अछि। कृतिक लघु आकार असून कथा-समय विशाल बनबाक मुख्य कारण इएह लय-विविधता थिक।
१२. अनुवाद-सिद्धान्तक आलोकमे वृषेश चन्द्र ललक रूपान्तरण
पोथी स्वयं ‘अनुवाद’क बदला ’मैथिली रूपान्तरण’ शब्द प्रयोग करैत अछि। ‘रूपान्तरण’ संकेत करैत अछि जे लक्ष्य केवल मूल वाक्यक शब्दगत प्रतिरूप नहि, बल्कि मैथिलीमे कृतिक पुनर्जीवन अछि। उपलब्ध संस्करणक परिपाठमे रूपान्तरकार अपन प्रेरणाक केन्द्र बी. पी.क गीता-दृष्टि, मानवत्व-देवत्वक भेद आ ‘नीक लोक’ बनबाक शिक्षा कें मानैत छथि। तैं लक्ष्यपाठक कार्य नैतिक-सांस्कृतिक संप्रेषण सेहो अछि।
१२.१ भाषिक निकटता आ ‘भगिनी-भाषिक स्थानान्तरण’
नेपाली आ मैथिली दूनू भारोपीय भाषा-परिवारक इन्डो-आर्य शाखाक निकटवर्ती सदस्य छथि, आ नेपाल-भारतक सीमावर्ती (विशेषतः जनकपुर-दरभंगा) क्षेत्रमे शताब्दीयोंसँ सांस्कृतिक-भाषिक आदान-प्रदान होइत रहल अछि — बी.पी. कोइराला स्वयं मिथिलाक्षेत्रसँ जुड़ल छथि आ हुनक बाल्यकालक स्मृति दरभंगा-जनकपुरक बीचक अछि, जे एहि पाठकेँ एकटा स्वाभाविक ‘घर-वापसी’क अनुवाद बनबैत अछि। एहि भाषिक-सांस्कृतिक निकटताक कारणेँ ई अनुवाद ओहन ’दूर-भाषिक अनुवाद’ (जेना अंग्रेजी-मैथिली) सन जटिल सांस्कृतिक-प्रतिस्थापनक समस्यासँ ग्रस्त नहि अछि, बल्कि एकटा ‘भगिनी-भाषिक स्थानान्तरण’ (sister-language transposition) क रूप लैत अछि — जतय कथावस्तु, प्रतीक, आ सांस्कृतिक कोड (महाभारत, गीता, हिन्दू कर्मकाण्ड, मिथिलाक्षेत्रीय भूगोल) दूनू भाषा-समुदायमे साझा छथि।
१२.२ देशीकरणक रणनीति आ अर्थ-केन्द्रित रूपान्तरण
भेनुतीक शब्दावलीमे कहल जाय तँ वृषेश चन्द्र लालक रूपान्तरण स्पष्ट रूपेँ ‘देशीकरण’क रणनीति अपनबैत अछि — अर्थात् स्रोत-पाठकेँ लक्ष्य-भाषाक पाठकक लेल एहन सहज बना देनाइ जे ओ अनूदित नहि, मौलिक कृति जकाँ प्रतीत होअय। भूमिका-लेखक डा. राजेन्द्र प्रसाद ’विमल’ स्वयं एहि तथ्यक साक्षी देैत लिखने छथि: ‘मूल उपन्यास हम दूबैसार पढ़ने रही, ई अनुवाद एक्किह साँसमे पढ़ने बिना नहि रहल गेल। मैथिली भाषाक प्रकृति अनुकूल भाषाशैलीक प्रयोगक कारणें ई अनुवाद जकाँ नहि, मौलिक कृति जकाँ रसाप्लावित करैत अछि।’ एहि कथनसँ स्पष्ट होइत अछि जे अनुवादकक लक्ष्य पठनीयता (readability) आ भावात्मक तादात्म्य (emotional immediacy) रहल, नहि कि शब्दशः निष्ठा।
देशीकरणक ठोस प्रमाणसभ पाठमे यत्र-तत्र भेटैत अछि — जेना संवादसभमे विशुद्ध मैथिली सम्बोधन-शैली (‘बौआ’, ‘हे रौ’, ‘कहाँदोन’), मैथिली लोकोक्तिक प्रयोग (‘देखनमे छोटन लगए, घाव करए गंभीर’ जकाँ शैली), आ आञ्चलिक क्रिया-रूपसभ (‘छैक’, ‘अछि’, ‘रहए’, ‘कएलन्हि’ आदि क्रिया-विभक्ति) क सहज प्रयोग — ई सभ मूल नेपाली वाक्य-रचनाकेँ मैथिली वाक्य-विन्यास आ मुहावराक साँचामे पूर्णतः ढारि देल गेल अछि। एहि क्रममे अनुवादक शाब्दिक अनुवाद (word-for-word) नहि, अपितु अर्थ-केन्द्रित अनुवाद (sense-for-sense) — जे सिसेरो आ सेण्ट जेरोमक शास्त्रीय द्वैधसँ लऽ कऽ नाइडाक ‘गतिशील तुल्यता’ (dynamic equivalence) धरि अनुवाद-सिद्धान्तक मूल आधार रहल अछि — केँ अपनौने छथि।
१२.३ नाइडा : गतिशील/कार्यात्मक समतुल्यता
यूजीन नाइडा ‘औपचारिक’ समतुल्यता सँ अलग लक्ष्यपाठक पर स्वाभाविक, तुलनीय प्रभाव उत्पन्न करबाक ‘गतिशील’ वा पछिला शब्दावलीमे ‘कार्यात्मक’ समतुल्यता पर बल दैत छथि। मैथिली पाठक लेल ‘मोदिआइन’क संवाद अत्यन्त सहज सुनाइत अछि; कथावाचकक बाल-बोली, स्त्रीसभक अपनापा, घरेलू भोजन, स्थानीय सम्बोधन आ ग्रामीण शब्द-संसार अनूदित वाक्यक काठिन्य नहि देत। डा. राजेन्द्र प्रसाद ’विमल’ आमुखमे एकरा एहि हद तक स्वाभाविक मानैत छथि जे अनुवाद-जकाँ नहि, मौलिक कृति-जकाँ रस देत। ई ग्रहण-साक्ष्य लक्ष्यपाठक स्वाभाविकताक मजबूत प्रमाण अछि।
१२.३.१ पाठीय उदाहरण
१२.४ न्यूमार्क : अर्थप्रधान आ संप्रेषणप्रधान अनुवादक संतुलन
पीटर न्यूमार्कक ‘semantic’ आ ‘communicative’ अनुवादक भेद एहि पाठमे उपयोगी अछि। घरेलू संवाद, दृश्यवर्णन आ लोककथात्मक अंश संप्रेषणप्रधान प्रतीत होइत अछि—मैथिली वाक्य ओहि रूपमे बहैत अछि जेना कथा आरम्भसँ मैथिलीमे कहल गेल हो। मुदा गीता, दार्शनिक पदावली आ संस्कृत श्लोकक निकट पहुँचैत लक्ष्यपाठ स्रोत-संस्कृतिक गम्भीरता आ पारिभाषिकता बचबैत अछि। एहि दोहरा रणनीतिसँ भावनिक निकटता आ दार्शनिक स्मृति दुनू सुरक्षित रहैत अछि।
१२.५ वेन्यूटी : घरेलूकरण, परकीकरण आ सांस्कृतिक प्रत्यावर्तन
लॉरेन्स वेन्यूटी अनुवादमे ‘domestication’ आ ’foreignization’क तनावक चर्चा करैत छथि। ’मोदिआइन’क मैथिली मामला सामान्य उदाहरणसँ भिन्न अछि, कारण मूल रचनाक मुख्य वर्तमान-फ्रेम स्वयं दरभंगा-मिथिलामे अछि। अतः मैथिलीमे स्थानीय शब्द-संसारक सक्रियता केवल विदेशी पाठकेँ घरेलू बनौनाइ नहि; ई कथाकेँ ओकर भौगोलिक-सांस्कृतिक ध्वनि फेर देनाइ—एक प्रकारक पुनर्स्थापन वा घर-वापसी—अछि। दोसरे दिस संस्कृत गीता-श्लोक, दार्शनिक पद आ महाभारतीय नाम-रूप ज्योंक-त्यों सांस्कृतिक दूरी/पवित्रता बचबैत अछि। तैं ई पाठ पूर्ण घरेलूकरण नहि, चयनात्मक घर-वापसी आ चयनात्मक परकीकरणक मिश्रित रूप थिक।
विशेष रूपेँ ध्यान देबाक जोग बात अछि जे मूल नेपाली कथाक भौगोलिक केन्द्र दरभंगा (भारतक मिथिलाक्षेत्र) मे स्थित अछि, अर्थात् मूल पाठ स्वयं मैथिली-भाषी क्षेत्रक विवरणसँ भरल अछि। एहन स्थितिमे अनुवादकक कार्य ‘विदेशी’ सांस्कृतिक तत्त्वकेँ आत्मसात् करब नहि, अपितु मूलतः मैथिली-सांस्कृतिक परिवेशमे नेपाली भाषामे लिखल एकटा वृत्तान्तकेँ पुनः ओकर ‘मूल भाषिक घर’ मे प्रत्यावर्तन (repatriation) कराएब छल। एहि दृष्टिएँ ‘मोदिआइन’क मैथिली रूपान्तरण अनुवाद-सिद्धान्तक एकटा विशिष्ट आ विरल उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि — जकरा हम ’सांस्कृतिक प्रत्यावर्तनात्मक अनुवाद’ (repatriative translation) क संज्ञा दऽ सकैत छी, जतय अनुवादक कार्य नव संस्कृतिक परिचय देनाइ नहि, अपितु मूलतः स्वदेशी सामग्रीकेँ ओकर सहज भाषिक अभिव्यक्ति वापस लौटाएब थिक।
संस्कृत गीता-श्लोक (‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि...’) केँ अनुवादक ज्यों-का-त्यों (untranslated, foreignized) रूपमे राखि देनाइ सेहो एकटा सचेत सैद्धान्तिक निर्णय अछि — ई भेनुतीक ‘विदेशीकरण’क एकटा नमूना थिक, जतय स्रोत-भाषाक (एतय संस्कृतक) प्रामाणिकता आ पवित्रताकेँ अक्षुण्ण राखल गेल अछि, कारण गीता-श्लोक हिन्दू सांस्कृतिक चेतनामे एकटा ’पवित्र मूल-पाठ’ (sacred original) क रूपमे स्थापित अछि जकर अनुवाद सांस्कृतिक रूपेँ अनुचित मानल जाइत। एहि प्रकारेँ अनुवादक एकहि कृतिमे देशीकरण (सामान्य आख्यान-भाग) आ विदेशीकरण (शास्त्रीय उद्धरण) दूनू रणनीतिकेँ सन्दर्भ-अनुसार व्यवहारमे आनि एकटा सन्तुलित (‘hybrid’) अनुवाद-नीति अपनौने छथि।
१२.६ टूरी : लक्ष्य-संस्कृतिक मानदण्ड
गिडियन टूरीक वर्णनात्मक अनुवाद-अध्ययन लक्ष्य-संस्कृतिमे स्वीकार्यता पर ध्यान दैत अछि। मैथिली रूपान्तरण बोलचाल, सम्बोधन, क्रिया-रूप, खाद्य-संस्कृति आ मिथिलाक स्थानीकृत शब्दावलीक माध्यमसँ लक्ष्यभाषाक मानदण्डकेँ प्राथमिकता दैत देखाइत अछि। एहि कारण कथाक ‘वाणी’ अनूदित नहि, घरेलू लगैत अछि। लक्ष्य-संस्कृतिक स्वीकार्यता विशेष रूपेँ आवश्यक छल, कारण कथा स्वयं मौखिक स्मृति आ बालकक सुननाइ पर निर्भर अछि; कृत्रिम भाषा कथा-कौशलकेँ तुरन्त नष्ट क’ दैत।
१२.७ स्कोपोस : अनुवादक उद्देश्य
स्कोपोस सिद्धान्त अनुसार अनुवादक रणनीति ओकर उद्देश्यसँ जाँचल जाए। परिपाठमे रूपान्तरकारक उद्देश्य स्पष्ट अछि: मैथिलीभाषी समाजकेँ बी. पी.क चर्चित कृतिक रसास्वादन करौनाइ, मिथिलासँ जुड़ल कथा कें मैथिलीमे उपलब्ध करौनाइ, आ ‘नीक’ मनुष्य बनबाक नैतिक शिक्षाकेँ पुनः संचारित करनाइ। एहि उद्देश्यक दृष्टि सँ स्थानीय, सहज, पाठ्य आ श्रव्य-संवेदनशील मैथिली चयन पूर्णतः युक्तिसंगत अछि।
१२.८ लेफेवेर आ पुनर्लेखन : अनुवादक संग परिपाठक शक्ति
आन्द्रे लेफेवेर अनुवादकेँ ‘rewriting’ अर्थात साहित्यिक प्रतिष्ठा, चयन, विचारधारा आ संरक्षक संस्थाक प्रभाव सँ जुड़ल पुनर्लेखन मानैत छथि। एहि संस्करणमे प्रकाशकीय मन्तव्य, आचार्य सोमदेव आ डा. ’विमल’क आमुख, रूपान्तरकारक कृतज्ञता, लेखक/रूपान्तरकार परिचय—ई सभ पाठककेँ पहिनेसँ बतबैत अछि जे कृतिकेँ मानवतावादी, युद्धविरोधी, मिथिला-संबद्ध आ ऐतिहासिक उपलब्धि जकाँ पढ़ू। अनुवादक कृति मात्र नहि लबैत छथि; हुनका संग एकटा ग्रहण-परिसर सेहो रचैत छथि। ई परिपाठ मैथिली साहित्यिक प्रणालीमे बी. पी.क पुनःस्थापन करैत अछि।
१२.९ बहुप्रणाली : नेपाली सँ मैथिली साहित्यिक परिसंचरण
इतामार इवन-जोहरक बहुप्रणाली दृष्टि अनुसार अनूदित साहित्य लक्ष्य साहित्यक विकास, विधागत प्रयोग आ अन्तर्भाषिक परिसंचरणमे सक्रिय भूमिका निभा सकैत अछि। ‘मोदिआइन’क मैथिली रूपान्तरण भारत-नेपाल सीमा पार करैत नेपाली साहित्यक एक प्रसिद्ध कृतिकेँ मैथिली साहित्यिक क्षेत्रमे प्रवेश करबैत अछि; संगहि कथा-भूगोल मिथिलामे भेलाक कारण ई एकतरफा ’आयात’ नहि, बल्कि साझा सांस्कृतिक क्षेत्रक पुनः परिसंचरण थिक। एहि दृष्टिसँ अनुवाद मैथिली पाठककेँ नेपाली आधुनिकताक दार्शनिक प्रयोगसँ जोड़ैत अछि आ नेपाली पाठपर मैथिली भूगोलक स्वामित्व-बोध सेहो पुनर्स्थापित करैत अछि।
१२.१० अनुवादकक दृश्यता, वैचारिक निकटता आ पाठालोचनात्मक सम्भावना
आमुख-लेखसभमे (आचार्य सोमदेव, डा. विमल) एहि तथ्यपर बल देल गेल अछि जे वृषेश चन्द्र लाल राजनीतिक रूपेँ बी.पी. कोइरालाक विचारधाराक अनुयायी छथि — ई तथ्य अनुवाद-अध्ययनक ‘अनुवादकक अदृश्यता बनाम दृश्यता’ (invisibility vs. visibility) क बहसमे प्रासंगिक अछि। यद्यपि भाषिक स्तरपर अनुवादक अपनाकेँ ‘अदृश्य’ बनेबाक (अर्थात् पाठ मौलिक जकाँ लागय एहन) सफल प्रयास कएने छथि, तथापि वैचारिक स्तरपर हुनक चयन (कोन-कोन अंशकेँ बल देल गेल, आमुखमे कोन व्याख्या प्रस्तुत कएल गेल) स्पष्टतः एकटा ‘दृश्य’, वैचारिक रूपेँ संलग्न अनुवादकक उपस्थिति देखबैत अछि — जे अनुवादकेँ तटस्थ भाषिक स्थानान्तरणसँ आगू बढ़िकऽ एकटा वैचारिक पुनर्पाठ (ideological re-reading) बनबैत अछि।
डा. रामदयाल राकेशक स्वतन्त्र मैथिली रूपान्तरण, वृषेश चन्द्र ललक मैथिली रूपान्तरण आ रञ्जना शर्माक हिन्दी ’मोही’क समानान्तर पाठालोचना भाषा-विशेष आ अनुवादक-विशेषक सांस्कृतिक निर्णय—जेना संवाद-शैली, सम्बोधन आ गीता-श्लोकक व्यवहार—केँ तुलनात्मक रूपेँ स्पष्ट कऽ सकैत अछि।
१२.११ सिद्धान्तीय समेकन-सार
१३. रूपान्तरणक प्रमुख उपलब्धि, सीमा आ पाठालोचनात्मक प्रश्न
मैथिली बोलीक स्वाभाविक प्रवाह: संवाद पढ़ैत समय “अनुवादित” वाक्यक कठोरता बहुत कम अनुभूत होइत अछि।
स्थानीय सांस्कृतिक पुनर्स्थापन: दरभंगा, हड़ाहा, चूड़ा-दही, एक्का, गाम-जीवन, सम्बोधन आ लोक-ध्वनि मैथिलीमे अपन स्वाभाविक गृह पबैत अछि।
मौखिकता संरक्षित: मोदिआइनक कथा-कहबाक लय, बालकक प्रश्न, “बौआ” सम्बोधन, भय आ नींदक क्रम सुचारु अछि।
दार्शनिक पदक गरिमा: गीता-संबंधी तत्सम पदावली आ संस्कृत श्लोककेँ अत्यधिक बोलचालमे घोइल नहि देल गेल अछि।
भावनिक टोनक विस्तृत व्याप्ति: हास्य, कौतुक, घरेलू स्नेह, भय, प्रणय, शोक, दार्शनिक प्रतिवाद आ युद्धक वीभत्सता—सभकेँ अलग भाषिक रंग भेटैत अछि।
लक्ष्य साहित्यक संपदा-वृद्धि: नेपाली आधुनिक लघु-उपन्यासक एक विशिष्ट मिथकीय-मानवतावादी प्रयोग मैथिली पाठक लेल उपलब्ध भ’ गेल।
पहिल सीमा तुलनात्मक अछि: नेपाली मूलपाठ बिना शब्दस्तरीय निष्ठा, वाक्य-विन्यासक बदलाब, रूपकक संरक्षण, विलोपन-परिवर्धन वा अर्थ-स्खलनक निर्णायक परीक्षण सम्भव नहि। अतः लक्ष्यपाठक सहजता कें ’पूर्ण निष्ठा’क पर्याय मानब अनुचित होएत। एकरा सफल लक्ष्यपाठ जरूर कहल जा सकैत अछि; स्रोतपाठीय सूक्ष्म निष्ठाक निष्कर्ष लेल समांतर नेपाली पाठ आवश्यक अछि।
दोसर, अत्यधिक स्थानीय सहजता—जे एहि रूपान्तरणक शक्ति अछि—कखनो स्रोतक ऐतिहासिक वा भाषिक दूरी कम क’ सकैत अछि। मुदा एहि कृतिक विशेष परिस्थिति मे ई जोखिम सीमित बुझाइत अछि, कारण कथाक वर्तमान-फ्रेम स्वयं मिथिलामे स्थित अछि। तेसर, परिपाठीय आमुख सभ कृतिक मानवतावादी/युद्धविरोधी अर्थ बहुत स्पष्ट रूपेँ पहिनेसँ घोषित करैत अछि। एहि सँ पाठक स्वतंत्र वैकल्पिक व्याख्याक पहिने एक प्रबल दिशा पबैत अछि। आलोचनात्मक संस्करणमे कृति आ परिपाठक बीच अधिक दूरी रखनाइ उपयोगी भ’ सकैत छल।
मैथिली रूपान्तरणकेँ केवल मूल नेपाली रचनाक माध्यमिक प्रतिलिपि जकाँ नहि पढ़ल जाउ। एहि संस्करणमे भाषा स्वयं अर्थ पैदा करैत अछि। दरभंगा-मिथिला जे मूलक कथाभूमि अछि, मैथिलीमे आबि स्थानीय ध्वनि, सम्बोधन, खाद्य-संस्कृति आ मौखिक लय फेर सक्रिय करैत अछि। तैं अनुवादक भूमिका ‘पुल’ मात्र नहि, सांस्कृतिक पुनर्ग्रहणक भूमिका सेहो अछि। एहि बिन्दुपर अनुवाद-अध्ययन ’मोदिआइन’क साहित्यिक आलोचनामे एक नवा प्रवेशद्वार खोलैत अछि।
१५. कृतिक मुख्य प्रतीक आ ओकर अर्थ
हड़ाहा पोखरि — दबिल इतिहास, हड्डी, सामूहिक स्मृति, शोक आ मिथकक जलाशय।
अन्हार/डिबिया — बाल भय आ चेतन-अचेतनक सीमा; यथार्थ सँ स्वप्नक प्रवेशद्वार।
रेल — बाहरी यात्रा संग आन्तरिक नैतिक परिवर्तन; दरभंगा सँ जयनगर वापसी पर बदलल चेतना।
गिद्ध/शृगाल/कुकुर — युद्धक ‘वीर’ भाषाकेँ शवक जैविक यथार्थमे उतारनिहार प्रतिविम्ब।
गाण्डीव — व्यक्तिगत विवेक आ वैचारिक आज्ञापालनक बीच बदलैत स्थिति।
गीता-ध्वनि — धर्मग्रन्थक प्रतिष्ठा आ नारीक मानवीय प्रतिप्रश्नक सतत तनाव।
“नीक लोक” — कृतिक आरम्भ-अन्त बाँधनिहार नैतिक सूत्र; महत्ता/वीरताक विकल्प।
१६. शैलीगत कसौटी पर समग्र मूल्यांकन
कथासंयोजनक दृष्टि सँ ‘मोदिआइन’ अत्यन्त सफल अछि। स्मृति-फ्रेम, यात्रा, स्थानीय यथार्थ, लोककथा, स्वप्न, महाभारत आ वापसी अलग-अलग टुकड़ा नहि, क्रमशः गहिराइ दिस उतरैत वृत्त जकाँ रचल गेल अछि। पात्र-संख्या महाभारतीय खण्डमे विशाल अछि, मुदा भावनात्मक केन्द्र मोदिआइन/नारी आ बालक पर स्थिर रहबाक कारण कथा बिखरैत नहि।
दार्शनिक दृष्टि सँ कृति जानि-बूझि एकपक्षीय भाव-तीव्रता अपनबैत अछि। कृष्णक तर्कक विरुद्ध नारीक करुणा कें अधिक नैतिक ऊँचाइ देल गेल अछि; एतय ‘निष्पक्ष दार्शनिक विमर्श’ नहि, कलात्मक नैतिक हस्तक्षेप अछि। साहित्यिक कृति लेल ई दोष अनिवार्य नहि; उलटे एहि पक्षधरता सँ प्रश्न तीखा होइत अछि। मुदा पाठककेँ बुझबाक चाही जे गीता-दर्शनक सम्पूर्ण बहस एहि लघु उपन्यासक लक्ष्य नहि।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि सँ बाल-स्मृति, भय, अर्द्धनिद्रा, आवाज आ दृश्य-विलयनक संयोजन उत्कृष्ट अछि। सामाजिक दृष्टि सँ इन्द्रप्रस्थ निर्माणक विस्थापन, बेरोजगारी, श्रम, स्त्री-जीवन आ युद्धक घरेलू लागत कृतिक आधुनिकता सिद्ध करैत अछि। लैङ्गिक दृष्टि सँ स्त्रीक अनुभवक केन्द्रीयकरण ऐतिहासिक महत्त्व रखैत अछि, यद्यपि ’स्वाभाविक नारित्व’क धारणा पर समकालीन आलोचना जरूरी अछि।
मैथिली रूपान्तरणक दृष्टि सँ पाठकक सबसे बड़ा लाभ ई अछि जे कृति अपन भूगोलक बोली-संवेदना पबैत अछि। एहि अर्थमे वृषेश चन्द्र ललक काम साहित्यिक अनुवादक ओहि उच्च कसौटी पर ठाढ़ देखाइत अछि जतय लक्ष्यभाषा मूलक छाया नहि, अपन जीवित साहित्यिक देह बनैत अछि। तथापि वैज्ञानिक स्रोत-लक्ष्य तुलना लेल नेपाली मूलक समांतर अध्ययन आगामी शोधक आवश्यक चरण रहत।
१७. निष्कर्ष एवं समकालीन सार्थकता
बी. पी. कोइराला कृत आ वृषेश चन्द्र लाल द्वारा मैथिलीमे अनूदित ‘मोदिआइन’ एकटा लघु कलेवरक (मात्र ४२ पृष्ठक) उपन्यासिका होइतो वैचारिक, दार्शनिक आ साहित्यिक दृष्टिसँ एकटा महाकाव्यात्मक गाम्भीर्य रखैत अछि। ई केवल एकटा पौराणिक कथाक पुनराख्यान नहि अछि, अपितु ई युद्धक विभीषिका, दैवत्त्वक नामपर मानवताक संहार आ सीमान्तकृत वर्ग (विशेषतः नारी) क त्रासदीक एकटा कठोर आ निर्मम मनोवैज्ञानिक दस्तावेजीकरण थिक।
‘मोदिआइन’क वास्तविक शक्ति ओकर वैचारिक साहसमे जतेक अछि, ततेक ओकर कथन-कौशलमे। जँ ई मात्र ’युद्ध खराब अछि’ कहैत, त कृति उपदेश बनि जाइत। जँ ई मात्र गीता-विरोधी तर्क रखैत, त दार्शनिक पर्चा बनि जाइत। मुदा कोइराला एक बच्चा, एक स्नेहमयी स्त्री, एक अन्हार पोखरि, एक रात्रिक खिस्सा, एक विस्थापित परिवार, एक प्रेमपूर्ण विवाह, एक भयभीत स्त्रीसमूह आ अन्ततः शवसँ भरल कुरुक्षेत्रक माध्यमसँ अमूर्त प्रश्नकेँ देह, आवाज, गन्ध आ स्मृति दैत छथि। एहि कारण विचार कथा सँ अलग नहि रहैत; कथा स्वयं विचार बनि जाइत अछि।
कृति महाभारतकेँ छोट करैत नहि; ओ ओकरा दोसर कोणसँ विशाल बनबैत अछि। राजा आ देवताक इतिहासक बगलमे अनाम लोकक इतिहास जोड़ैत अछि। अर्जुनक करुणा, नारीक भय, विधवाक प्रतीक्षा आ बच्चाक नैतिक शिक्षा मिलि कहल जाइत अछि जे मानवता धर्म, वीरता वा महत्ताक विरोधी नहि, बल्कि हुनका सभक अंतिम कसौटी थिक। जँ कोनो ‘महान’ कर्म लाखों सामान्य जीवनकेँ अर्थहीन करैत अछि, त ओकर महत्ता पुनः जाँचल जाए—ई कृतिक सबसे कठिन प्रश्न अछि।
मैथिली रूपान्तरण एहि प्रश्नकेँ मिथिलाक पाठक-संसारमे अत्यन्त स्वाभाविक आवाज देत अछि। वृषेश चन्द्र लाल लक्ष्यभाषाक घनिष्ठता, बोलचालक लय, स्थानीय सांस्कृतिक पदार्थ आ दार्शनिक पदावलीक गरिमा कें संतुलित करैत छथि। अनुवाद-सिद्धान्तक दृष्टि सँ ई कार्यात्मक समतुल्यता, संप्रेषणीयता, लक्ष्य-संस्कृतिक स्वीकार्यता, उद्देश्यपरकता आ साहित्यिक पुनर्लेखनक सफल उदाहरण बनैत अछि; साथहि दरभंगा-कथाभूमिक कारण एकरा ‘सांस्कृतिक घर-वापसी’ कहब विशेष रूपेँ सार्थक अछि।
समकालीन विश्वमे जखन विभिन्न क्षेत्रमे युद्ध, जातिसंहार आ अहङ्कारसँ भरल संहारक विभीषिका पसिरल अछि, तखन ’मोदिआइन’क मानवतावादी पुकार आओर बेसी प्रासंगिक भ' उठैत अछि। वृषेश चन्द्र लालक ई मैथिली अनुवाद नेपाली आ मैथिलीक सांस्कृतिक-साहित्यिक सेतुकेँ सुदृढ़ करबाक सङ्ग-सङ्ग मैथिली आख्यान साहित्यक एकटा अमूल्य निधि सिद्ध भेल अछि, जे अपन गत्यात्मक समतुल्यता आ आञ्चलिक भाषा-शैलीक लेल युग-युगान्तर धरि पढ़ल आ शोध कएल जाइत रहत।
उपन्यासक अन्तिम वाक्य—“बौआ, बड़का बनब, कहियो वीर बनक प्रयत्न नहि करब। नीकलोक बनब, नीक... बढ़ियाँ!”—सम्पूर्ण मानव जातिक लेल एकटा शाश्वत उपनिषदिक महावाक्य बनि जाइत अछि। ई गान्धीवादी शान्ति आ मानव कल्याणक मूल मन्त्र थिक।
ग्रन्थ-सूची
कोइराला, बी. पी. मोदिआइन। मैथिली रूपान्तरण: वृषेश चन्द्र लाल। जनकपुरधाम: सुदामा प्रकाशन, २०६१ साल।
नाइडा, यूजीन ए. Toward a Science of Translating. Leiden: E. J. Brill, 1964.
नाइडा, यूजीन ए., आ चार्ल्स आर. टेबर। The Theory and Practice of Translation. Leiden: E. J. Brill, 1969.
न्यूमार्क, पीटर। A Textbook of Translation. New York: Prentice Hall, 1988.
कैटफोर्ड, जे. सी. A Linguistic Theory of Translation. London: Oxford University Press, 1965.
बैसनेट, सुसान। Translation Studies. London/New York: Routledge, 1980; later editions.
टूरी, गिडियन। Descriptive Translation Studies and Beyond. Amsterdam/Philadelphia: John Benjamins, 1995.
वेन्यूटी, लॉरेन्स। The Translator’s Invisibility: A History of Translation. London/New York: Routledge, 1995.
लेफेवेर, आन्द्रे। Translation, Rewriting, and the Manipulation of Literary Fame. London/New York: Routledge, 1992.
6. सुम्निमा
विश्वेश्वरप्रसाद कोइरालाक “सुम्निमा”क मैथिली रूपान्तरणक गहन साहित्यिक आ अनुवाद-सैद्धान्तिक समीक्षा
मैथिली रूपान्तरण : वृषेश चन्द्र लाल
आलोचनात्मक अध्ययन : साहित्य · मनोविश्लेषण · संस्कृति · अनुवाद सिद्धान्त
◆ ◆ ◆
शोधपरक समीक्षा
अगस्त २०२६
सारांश
ई समीक्षा विश्वेश्वरप्रसाद कोइरालाक ‘सुम्निमा’क वृषेश चन्द्र लाल कृत मैथिली रूपान्तरणकेँ साहित्यिक, मनोविश्लेषणात्मक, समाजशास्त्रीय, जातीय, नारीवादी, पारिस्थितिक आ अनुवाद-सैद्धान्तिक दृष्टिसँ पढ़ैत अछि। अध्ययन देखबैत अछि जे कृतिक केन्द्रीय तनाव देह बनाम आत्माक साधारण द्वैत नहि, बल्कि सांस्कृतिक शुद्धता बनाम मानवीय सहअस्तित्वक प्रश्न अछि। सोमदत्तक देह-दमन, सुम्निमाक अनुभवजन्य जीवनबोध, पुलोमाक दाम्पत्यगत पीड़ा आ अगिला पीढ़ीक मिश्रित सांस्कृतिक सम्बन्ध मिलि ’शुद्ध’ पहचानक असम्भवताकेँ उद्घाटित करैत अछि। मैथिली रूपान्तरणक मूल्यांकन नाइडा, न्यूमार्क, वेनूटी, कैटफर्ड, बासनेट, टूरी आ स्कोपोसपरक दृष्टिसँ कएल गेल अछि। निष्कर्षतः ई रूपान्तरण भाव-संप्रेषण, पात्र-वाणी, लोक-लय आ सांस्कृतिक पंजीक स्तर पर अत्यन्त समर्थ अछि; संगहि भविष्यक आलोचनात्मक यूनिकोड संस्करण लेल शब्दकोश, स्रोत-संदर्भ आ अनुवादकीय टिप्पणी उपयोगी हएत।
कुँजी शब्द : सुम्निमा · बी. पी. कोइराला · वृषेश चन्द्र लाल · मैथिली अनुवाद · देह–आत्मा · आर्य–किरात · मनोविश्लेषण · पारिस्थितिक नारीवाद · जातीय चेतना · अनुवाद सिद्धान्त
पोथीक आधारभूत परिचय
१. प्रस्तावना : प्रेमक कथा सँ बेसी, सभ्यता-बोधक परीक्षा
विश्वेश्वरप्रसाद कोइरालाक ’सुम्निमा’केँ केवल प्रेमकथा, यौन-मनोवैज्ञानिक आख्यान अथवा आर्य–किरात द्वन्द्वक रूपमे पढ़ब ओकर रचनात्मक विस्तारकेँ छोट कऽ देब हएत। ई उपन्यास देह आ आत्मा, प्रकृति आ संस्कृति, मातृकेन्द्रित आ पितृकेन्द्रित सामाजिक बोध, सहज आनन्द आ अनुशासित तप, व्यक्तिगत इच्छा आ सामुदायिक मर्यादा, जातीय स्मृति आ साझा भविष्य—एहि सभक बीच चलैत दीर्घ बहस अछि। मैथिली रूपान्तरणमे ई बहस केवल कथ्यक स्तर पर नहि, भाषाक स्तर पर सेहो घटित होइत अछि। सोमदत्तक संस्कृतनिष्ठ, शास्त्रीय, अनुशासित वाणी आ सुम्निमाक सहज, लोकगन्धी, देहसँ लगल, प्रत्यक्ष वाणी दू भिन्न जीवन-दर्शनकेँ भाषिक शरीर दैत अछि।
एहि संस्करणक विशेषता ई अछि जे मैथिली अनुवाद स्वयं एक सांस्कृतिक घटना बनि जाइत अछि। नेपाली साहित्यक एक अत्यन्त चर्चित कृतिक मैथिली रूपान्तरण नेपालक बहुभाषिक साहित्यिक क्षेत्रमे केन्द्र आ परिधि, ‘राष्ट्रभाषा’ आ मातृभाषा, शास्त्रीयता आ लोकधर्मिता विषयक प्रश्नकेँ नव धरातल दैत अछि। प्रकाशकीय आ भूमिकासभमे एहि अनुवादकेँ भाषिक समानता, सांस्कृतिक बहुलता आ राष्ट्रीय सहअस्तित्वक परिप्रेक्ष्यसँ देखल गेल अछि। एहि कारण ई समीक्षा मूल आख्यानक साहित्यिक मूल्यक संगहि अनुवादक भाषिक-सांस्कृतिक रणनीतिको समान महत्त्व दैत अछि।
कृतिकारक साहित्यिक आ राजनीतिक पृष्ठभूमि
विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला (वि.सं. १९७१-२०३९) एक दिस नेपालक प्रथम जननिर्वाचित प्रधानमन्त्री रहथि त दोसर दिस नेपाली साहित्यमे मनोविश्लेषणात्मक यथार्थवादक सूत्रपात करनिहार युगप्रवर्तक स्रष्टा सेहो छलाह। ओ राजनीतिमे समाजवादी आ साहित्यमे अराजकतावादी व्यक्तिक रूपमे अपन परिचय देबए रुचाबैत छलाह। हुनकर खुला जीवन मूलतः राजनीतिमे समर्पित देखाइत अछि, जखन कि हुनकर बन्दी जीवन साहित्य सिर्जनामे। दोसर विश्वयुद्धक समयमे बेलायती सरकारद्वारा जबरजस्ती सैनिकमे भर्ना कएल जेबाक अनुभवसँ ल' क' वि.सं. २००३ मे नेपाली राष्ट्रिय काङ्ग्रेसक स्थापना आ वि.सं. २०१७ मे राजा महेन्द्रद्वारा अपदस्थ कएल जेबाक घटनाक्रम हुनकर चिन्तनकें गहिराई प्रदान कएलक।
साहित्यिक यात्राक प्रारम्भमे १९८७ मे 'हंस' पत्रिकामे 'वहाँ' नामक हिन्दी लघुकथा प्रकाशित कए कथायात्रा आरम्भ करनिहार कोइराला नेपाली आख्यानमे फ्रायड, जुङ्ग आ एडलर जकाँ मनोविश्लेषकसभक प्रभाव भित्रियाओलन्हि। तत्कालीन समयमे देशमे व्याप्त निरङ्कुश राजनीतिक व्यवस्थाक कारणें जे कठिनाइसभक सामना करए पड़लन्हि, ताहि कारणें ओ राजनीतिक तथा सामाजिक विषयवस्तुसँ हेट क' व्यक्तिमन आ मानव अवचेतनकें अपन साहित्यक मुख्य विषय बनौलन्हि। 'तीन घुम्ती', 'नरेन्द्र दाई', 'मोदिआइन', 'हिटलर र यहूदी', आ 'बाबु, आमा र छोरा' जकाँ कृतिसभमे ओ यौन मनोविज्ञान, गीता दर्शन, आ मानवतावादक वकालत कएलन्हि। मुदा, 'सुम्निमा' एहि सभसँ भिन्न प्रकृतिक अछि। जतए 'तीन घुम्ती' मे नारी जीवनक भवितव्यक व्याख्या अछि आ 'नरेन्द्र दाई' मे स्त्री-पुरुषक सम्बन्धक दुखान्तिका, ओतए 'सुम्निमा' मुख्यतः दू पृथक संस्कृतिक द्वन्द्वक पृष्ठभूमि पर ठाढ़ आख्यान अछि। सुन्दरीजल जेलमे गणेशमान सिंह, कृष्णप्रसाद भट्टराई, रामनारायण मिश्र आ देवान सिंह राईक सङ्गे बन्दी रहैत काल अध्यात्मवादी आ भौतिकवादी विचारसभक बीच होइत बहससँ प्रेरित भ' कोइराला ई कृति रचलन्हि।
हुनकर साहित्यिक सृजन—६ उपन्यास, २ कथा-संग्रह, आत्मकथा आ जेल-डायरी—हुनकर राजनीतिक जीवनसँ अभिन्न रूपे जुड़ल अछि। सुन्दरीजल कारागारक वैचारिक वातावरणमे देवान सिंह राई किराती भौतिकवादी दृष्टिक आ रामनारायण मिश्र धार्मिक-अध्यात्मवादी दृष्टिक प्रतिनिधि छलाह; हुनका दुनूक गरमागरम बहसक प्रभाव “सुम्निमा”क वैचारिक संरचनामे देखल जाइत अछि।
पद्धतिक दृष्टिसँ ई अध्ययन उपलब्ध मैथिली संस्करणक सम्पूर्ण पाठ, तकर प्रकाशकीय, अनुवादकीय निवेदन, प्रदीप गिरिक भूमिका, शेफालिका वर्माक टिप्पणी, आ ‘सुम्निमा’ पर प्रकाशित आधुनिक शोध—जातीय चेतना, समाजशास्त्र, देह-अध्ययन, मनोविश्लेषण आ पारिस्थितिक नारीवाद—केँ एक संग पढ़ैत अछि। अनुवाद-सिद्धान्तक खण्डमे नाइडा, न्यूमार्क, कैटफर्ड, वेनूटी, बासनेट, टूरी आ स्कोपोस-केन्द्रित विचारसभक सहायतासँ लक्ष्य-पाठक परीक्षण कएल गेल अछि। एक सीमा स्पष्ट रहबाक चाही: एहि समीक्षा लेल मूल नेपाली पाठक पंक्ति-दर-पंक्ति तुलनात्मक प्रति उपलब्ध नहि अछि; अतः ’स्रोत-सँग शाब्दिक समानता’क निर्णायक दावा नहि कएल गेल अछि। मूल्यांकन मैथिली लक्ष्य-पाठ, अनुवादकक घोषित नीति, कृतिक ज्ञात कथ्य-संरचना आ आलोचनात्मक शोधक आलोकमे कएल गेल अछि।
२. पोथीक पाठ-परिसर, रचनाकाल आ संस्करणक अर्थ
उपलब्ध संस्करणमे शीर्षक ‘सुम्निमा’, लेखक विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला आ ‘मैथिली रूपान्तरण—वृषेश चन्द्र लाल’ रूपमे अंकित अछि। प्रकाशक फिनिक्स बुक्स, बानेश्वर, काठमाण्डू अछि; प्रथम संस्करण २०७८ असोज (ईसवी २०२१) तथा ISBN 978-9937-705-59-2 देल गेल अछि। पोथीक अन्तमे लेखक स्वयं रचनास्थल ‘सुन्दरीजल, बन्दीगृह’ आ आठ दिनक तिथि—२१ सँ २८ जून १९६४—दैत छथि। ई तथ्य रचनाक संक्षिप्त कालावधि आ ओकर आन्तरिक तीव्रता बुझबाक लेल महत्त्वपूर्ण अछि: उपन्यासमे कथात्मक विस्तार अपेक्षाकृत छोट अछि, मुदा वैचारिक तनाव अत्यन्त घन।
बन्दीगृहक सन्दर्भकेँ यान्त्रिक रूपेँ राजनीतिक रूपक बना देब उचित नहि, तथापि ‘मुक्ति’ आ ‘बन्धन’क प्रश्न उपन्यासमे बारम्बार लौटैत अछि। सोमदत्त देहकेँ बन्धन मानि ओकरा दमन करैत अछि; पर अन्ततः ओ बुझैत अछि जे कठोर साधना सेहो एक दोसर बन्धन बनि सकैत अछि। सुम्निमा, जे सामाजिक रूपेँ तथाकथित ’अनार्य’ अथवा परिधिक समुदायसँ अछि, देह आ प्रकृतिक सहज स्वीकृतिमे एक वैकल्पिक मुक्ति-बोध प्रस्तुत करैत अछि। एहि तरह लेखकक राजनीतिक कारावास आ पात्रक आध्यात्मिक आत्म-बन्धन एक-दोसरक प्रत्यक्ष समांतर नहि, मुदा ’स्वाधीनता’क प्रश्नकेँ गहींर प्रतिध्वनि अवश्य दैत अछि।
मैथिली संस्करणक परिपाठ सेहो अर्थवान अछि। प्रकाशकीय नेपालक बहुभाषिक यथार्थमे खस नेपालीक वर्चस्व आ अन्य मातृभाषासभक उपेक्षाक प्रश्न उठबैत अछि। प्रदीप गिरि राष्ट्रीयता, मिथिला, किरात, मधेश आ सांस्कृतिक बहुलताक सन्दर्भमे एहि अनुवादकेँ पढ़ैत छथि। एहि परिपाठसँ पाठक उपन्यासमे आर्य–किरात द्वन्द्वकेँ केवल प्राचीन मिथकीय प्रसंग नहि, आधुनिक बहुभाषिक राष्ट्र-निर्माणक प्रश्नक रूपमे सेहो देखए लगैत अछि। ई परिपाठ समृद्धो करैत अछि, मुदा संगहि एक सावधानी आवश्यक अछि: राजनीतिक प्रस्तावना उपन्यासक बहुअर्थी साहित्यिक संरचनाकेँ कोनो एक विचारधारात्मक निष्कर्षमे बन्द नहि करए। ’सुम्निमा’क श्रेष्ठता एतबे अछि जे ओ सभ पक्षक आत्मविश्वासकेँ प्रश्नक कटघरामे ठाढ़ करैत अछि।
कथाभूमिक पौराणिक-भौगोलिक आधार
उपन्यासक कथा एकटा उपकथा (प्रस्तावना)सँ आरम्भ होइत अछि, जाहिमे कौशिकी नदी आ वराहक्षेत्रक भौगोलिक-पौराणिक वर्णनक माध्यमे कथाभूमि तैआर कएल जाइत अछि — विश्वामित्रक आश्रम, राम-लक्ष्मणक शिक्षा, आ सीता-स्वयंवरक सन्दर्भसँ जोड़ल एहि स्थलक ऐतिहासिक-पौराणिक गरिमाक स्थापना कएल जाइत अछि। एहि पृष्ठभूमिपर मुख्य कथा ठाढ़ होइत अछि — ब्राह्मण-पुत्र सोमदत्त आ किराती बालिका सुम्निमाक बाल्यसंगसँ शुरू भेल एकटा सम्बन्ध, जे क्रमशः आकर्षण-विकर्षणक जटिल यात्रामे बदलि जाइत अछि।
कथाक केन्द्रमे अछि दू सभ्यताक मौलिक द्वन्द्व — ब्राह्मण-आर्य संस्कृति, जे गायकेँ माता आ अवध्य मानैत अछि, आत्माकेँ महत्व दैत अछि आ शरीरकेँ मात्र साधन बुझैत अछि; आ किरात-भिल संस्कृति, जे गायकेँ भोज्य मानैत अछि आ शरीरकेँ आदि आ अन्त दुनू बुझैत अछि। ई द्वन्द्व वस्तुतः वैदिक दर्शन आ चार्वाक/लोकायत दर्शनक शास्त्रीय बहसक कथात्मक रूपान्तरण थिक — शास्त्र शुष्क होइत अछि, आ ओतहि जीवन हरियरीसँ भरल रहैत अछि।
३. आख्यान-संरचना : भेट, निषेध, दमन, पुनरागमन आ उत्तराधिकार
उपन्यासक संरचना वृत्ताकार अछि। आरम्भमे कौशिकी नदीक कछेर, शमीक गाछ आ वनप्रदेशमे बालक सोमदत्त तथा बालिका सुम्निमाक भेट होइत अछि। अन्तमे अगिला पीढ़ीक प्रेम सेहो ओही प्राकृतिक परिसरमे विकसित होइत अछि। ई पुनरावृत्ति मात्र कथानक-कौशल नहि; ई लेखकक मूल तर्क अछि—सभ्यता नियम बनबैत अछि, स्मृति ओकरा कठोर करैत अछि, मुदा प्रकृति नित्य नव सम्बन्धक सम्भावना रचैत रहैत अछि। पुरान आश्रम ध्वस्त भऽ जङ्गलमे समा जाइत अछि, जबकि प्रेम आ रक्तक नवल मिश्रण अगिला पीढ़ीमे जारी रहैत अछि।
पहिल भाग बाल्यकालीन जिज्ञासा सँ आरम्भ होइत अछि। मातृत्व–पितृत्वक प्राथमिकता, गाय, मांस, धर्म, नग्नता, भाषा, देवता, मनुष्य—सभ विषय पर सुम्निमा आ सोमदत्तक संवाद दार्शनिक बहसक रूप धारण करैत अछि, मुदा लेखक ओकरा बालसुलभ कौतुकमे रखैत छथि। एहि कारण विचार ‘उपदेश’ नहि बनैत; ओ चरित्रक स्वभावसँ निकलैत अछि। जेना सुम्निमा प्रश्न करैत अछि जे जन्म देनिहारि मायकेँ पहिने चिन्हबाक चाही कि पिताकेँ, तकर उत्तर सोमदत्त शास्त्रीय पितृवंशीय व्याख्यासँ दैत अछि। एहिमे पूरा उपन्यासक बीज अछि—अनुभव बनाम सिद्धान्त।
यौवनमे ई बहस देहक अनुभव बनि जाइत अछि। सोमदत्तक आकर्षण, भय आ दमन ओकर तपस्याकेँ उग्र बनबैत अछि। कृतिक छोट दोसर अध्याय, जाहिमे सोमदत्त आश्रम छोड़ैत अछि, आख्यानक दार्शनिक केन्द्र अछि। स्वयं भूमिकाकार सेहो एहि अध्यायकेँ ‘गुद्दी’ मानैत छथि। प्रश्न ई नहि जे तपस्या सत्य कि असत्य; प्रश्न ई जे जँ तपस्या अहंकारक सुरक्षाक साधन बनि जाए, तखन ओकर आध्यात्मिक मूल्य की बचैत अछि?
तेसर भागमे सोमदत्त कठोर तपसँ लौटि विवाह करैत अछि। पुलोमासँग विवाह, संतानोत्पत्तिक बाध्यता, देहकेँ केवल वंश-विस्तारक साधन बुझबाक मानसिकता आ सुम्निमाक मानस-प्रतिमा—ई सभ मिलि दाम्पत्यकेँ विषाक्त करैत अछि। शरीरक निषेध शरीरकेँ नष्ट नहि करैत; ओ रूप बदलि अवचेतनमे सक्रिय रहैत अछि। अन्ततः सोमदत्त आ पुलोमा दुनू अपन दाम्पत्यसँ बाहर मानसिक प्रतिरूपक सहायतासँ देह-सुखक अनुभव करैत छथि। एहिठाम उपन्यास मनोविश्लेषणात्मक गहनता प्राप्त करैत अछि।
उपसंहारमे पुलोमाक मृत्यु, सोमदत्तक अन्तिम पश्चात्ताप, सुम्निमाक मातृवत् अपनत्व, आ दुनू सन्तानक मिलन एक नवल सांस्कृतिक संश्लेषण रचैत अछि। मुदा ई सरल साधारण सुखान्त नहि। सुम्निमा स्वयं चिन्तित अछि जे बाभनक ‘हावाक’ प्रवृत्ति आ किराती ‘माटिक’ प्रवृत्तिक मेल कोना टिकत। ओकर आशीर्वादमे समन्वयक मूल शर्त देल अछि—दुनू एक-दोसरक बाट बुझथि, आवश्यकता पड़लापर अपन बाटमे परिवर्तन करथि। अतः उपन्यासक समाधान शुद्धता नहि, समायोजन अछि; विजेता कोनो एक संस्कृति नहि, संवादक्षम मिश्रित संस्कृति अछि।
४. सोमदत्त : तपस्वी, अहंकारी, पीड़ित आ अन्ततः अपूर्ण मनुष्य
सोमदत्तकेँ केवल ‘ब्राह्मणवादी खलनायक’ बनाकऽ पढ़ब उपन्यासक मनोवैज्ञानिक जटिलताकेँ नष्ट कऽ देत। ओ बाल्यकालसँ अनुशासन, यज्ञ, ब्रह्मचर्य, वेदपाठ, देह-दमन आ पितृवंशीय श्रेष्ठताक प्रशिक्षण पबैत अछि। तकर व्यक्तित्व स्वतन्त्र अनुभवक अपेक्षा उत्तराधिकारमे भेटल सिद्धान्तसभसँ निर्मित अछि। अतः ओकर कठोरता व्यक्तिगत दुष्टता मात्र नहि, सांस्कृतिक संस्कारक गहन आन्तरिकीकरण अछि। लेखक ओकरा दोषी बनबैत छथि, मुदा संगहि ओकर त्रासदीक कारणो देखबैत छथि।
सोमदत्तक भीतर मुख्य संघर्ष ‘इच्छा बनाम कर्तव्य’ नहि, ‘इच्छाक अस्तित्वकेँ मानब बनाम ओकरा नकारब’ अछि। जँ ओ आकर्षण स्वीकार कऽ कर्तव्यक सीमामे निर्णय लैत, त संघर्ष कम होइत। मुदा ओ इच्छाकेँ अपवित्र मानैत अछि, एहि कारण ओकर चेतना इच्छा-विरोधी युद्धभूमि बनि जाइत अछि। सुम्निमाक स्पर्श ओकरा लेल बाहरी प्रलोभनसँ बेसी आत्म-ज्ञानक आघात अछि—ओ पहिल बेर अनुभव करैत अछि जे शरीर ओकर सिद्धान्तक अधीन पूर्णतः नहि अछि। एहि पराजयकेँ ओ आत्म-संशोधन नहि, आत्म-दण्डमे बदलि दैत अछि।
मनोविश्लेषणात्मक पाठमे ई बिन्दु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। फ्रायडीय भाषामे कहि सकैत छी जे दमन कएल कामना समाप्त नहि होइत, प्रत्यावर्तन करैत अछि। आधुनिक शोधक प्रकाशचन्द्र खत्री ’सुम्निमा’केँ अवचेतन, यौन-आकांक्षा आ दमनक दृष्टिसँ पढ़ैत छथि। उपन्यासक घटनासभ एहि पाठकेँ पुष्ट करैत अछि: सोमदत्त कठोरतम तप करैत रहैत अछि, मुदा सुम्निमाक छवि मेटैत नहि; विवाहोपरान्त पुलोमासँग शारीरिक सम्बन्धमे मानसिक रूपेँ सुम्निमाकेँ उपस्थित करैत अछि; पुत्रकेँ देखितो ’मानस-गर्भ’क कल्पना सुम्निमासँ जोड़ैत अछि। देहक निषेध अन्ततः देहक सर्वव्यापक मानसिक छविमे परिणत होइत अछि।
सोमदत्तक त्रासदीक दोसर पक्ष अहं अछि। ओकर शास्त्रीय ज्ञान ओकरा विनय नहि, श्रेष्ठताबोध दैत अछि। सुम्निमाक समुदायकेँ ‘असंस्कृत’, ‘बर्बर’, ‘पाशविक’ बुझब ओकर ज्ञानक नैतिक विफलता अछि। कृतिक छोट दोसर अध्याय एहि बिन्दुपर स्वयं प्रश्न उठबैत अछि—की तपस्या ब्रह्मतेजक नामपर अहंकार अर्जित करबाक प्रक्रिया त नहि? एहि आत्म-प्रश्नशीलता कारण उपन्यास प्रचारक साहित्य नहि बनैत। लेखक अपन ब्राह्मण पात्रकेँ भीतरसँ विघटित करैत छथि।
तथापि सोमदत्तमे अन्ततः मानवीय करुणा अछि। पुत्रक प्रति ओकर स्नेह समय-समय पर फूटैत अछि; मृत्यु-शय्यापर ओ अपन जीवनकेँ मृगमरीचिकाक पाछाँ दौड़ मानैत अछि; सुम्निमाक स्वर ओकर अन्तिम चेतनामे सुखक अस्पष्ट लोक खोलैत अछि। ई पश्चात्ताप ओकर अपराध मेटबैत नहि, मुदा चरित्रकेँ जीवित मनुष्य बनबैत अछि। सोमदत्तक असफलता लेखकक तर्कक मूल प्रमाण अछि: मनुष्य जँ सिद्धान्तक रक्षा करबाक लेल मनुष्यत्वक मूल अनुभव—प्रेम, देह, स्नेह, सहचर्य—केँ नकारत, त अन्ततः सिद्धान्तो रिक्त भऽ जाएत।
सोमदत्तक चित्रणपर एक आलोचनात्मक प्रतिपक्ष
तुलनात्मक रूपे, भूमिकाकार स्वीकार करैत छथि जे कोइराला सोमदत्तक संग किछु अन्याय कएने छथि — ओकरा निरीह, अल्पशिक्षित आ दुराग्रही ब्राह्मण-पुत्रक रूपमे प्रस्तुत कएल गेल अछि। सोमदत्तक जीवन शुष्क आ दुर्वह कर्तव्यबोधसँ भरल अछि; ओ निराश जीबैत अछि आ निराश मरैत अछि। ई असन्तुलन उपन्यासक एकटा सीमाक रूपमे सेहो देखल जा सकैत अछि, मुदा साथहि ई लेखकक वैचारिक पक्षधरताक (शास्त्रीय अध्यात्मवाद विरुद्ध प्राकृतिक जीवन-दृष्टि) स्पष्ट संकेत सेहो थिक।
५. सुम्निमा : प्रकृतिक प्रतिमा नहि, वैकल्पिक ज्ञान-परम्पराक वाहिका
सुम्निमाकेँ ‘प्रकृति’, ‘देह’, ‘स्त्री’ अथवा ‘किरात’क सरल प्रतीक मानल जाए त ओकर व्यक्तित्वक सक्रिय बुद्धिमत्ता छूटि जाइत अछि। ओ प्रश्न करैत अछि, तर्क करैत अछि, चोट खाइत अछि, अपन स्वाभिमान बचबैत अछि, विवाह करैत अछि, मातृत्व निभबैत अछि, अन्तमे अगिला पीढ़ीकेँ जीवन-दर्शन दैत अछि। ओकर ज्ञान पुस्तकजन्य नहि, अनुभवजन्य अछि; मुदा लेखक अनुभवजन्य ज्ञानकेँ अज्ञान नहि मानैत छथि। उलटे, सोमदत्तक ’ज्ञान’ बारम्बार जीवनसँ हारैत अछि, जबकि सुम्निमाक सहज बुद्धि व्यवहारिक सत्य पकड़ैत अछि।
सुम्निमाक बाल्यकालीन प्रश्नसभ—माय-पिताक सम्बन्ध, मनुष्यकेँ मनुष्यक भाषा बजबाक आग्रह, धर्मक नामपर मनुष्यक विनाश नहि होय—ओकर वैचारिक परिपक्वताक बीज छथि। ई प्रश्नसभ आधुनिक उदारतावादी भाषामे नहि, लोक-बुद्धिक स्वाभाविक स्वरमे अबैत अछि। एहि कारण चरित्र विचारधाराक मुखपत्र नहि बनैत। ओ ’देह’केँ अपराध नहि बुझैत, नग्नता ओकरा लेल लज्जाक विषय नहि, शरीर जीवनक स्वाभाविक अंश अछि।
कमल प्रसाद फुयालक ‘देह-वियोजन/पुनःदेहधारण’ अध्ययन एहि उपन्यासकेँ देह-विहीन आत्मबोध आ पुनः-देहधारणक संघर्षक रूपमे पढ़ैत अछि। ई दृष्टि सुम्निमाकेँ मात्र काम-प्रेरक नारी मानबाक प्रवृत्तिक प्रतिवाद करैत अछि। ओ सोमदत्तक ’पुनःदेहधारण’क माध्यम बनैत अछि—अर्थात् ओकरा याद करबैत अछि जे आत्मा जँ मनुष्यक अनुभवसँ पूर्णतः कटि जाए त आध्यात्मिकता निर्जीव होइत अछि। तथापि सावधानी जरूरी अछि: सुम्निमाकेँ केवल पुरुषक आध्यात्मिक उपचारक उपकरण बनाओल जाए त ओकर स्वतंत्र अस्तित्व फेर हराएत। उपन्यासक अन्तिम भाग ओकरा मातृ, सामाजिक आ नैतिक व्यक्तित्व प्रदान कऽ एहि संकटकेँ बहुत हद तक टारैत अछि।
सुम्निमाक ‘माटि’क रूपक महत्त्वपूर्ण अछि। अन्तमे ओ अपन बेटीकेँ कहैत अछि जे किराती माटिक प्राणी अछि; जीवनक भोग, आनन्द आ देह ओकर लेल मूल अछि। एहि कथनकेँ जैविक जातीय नियति मानि लेब संकटपूर्ण हएत। साहित्यिक रूपेँ ई प्रतीक ’धरतीसँ जुड़ल जीवनबोध’ बनाम ’असीम शून्य दिस उड़ान’क द्वन्द्व रचैत अछि। स्वयं सुम्निमा मिश्रित विवाहक पक्षधर अछि, तैँ ओकर कथन कठोर नस्ली सिद्धान्त नहि, सांस्कृतिक प्रवृत्तिक काव्यमय रूपक अधिक अछि।
ओकर सभसँ पैघ नैतिक विजय प्रतिशोध-विहीनता अछि। सोमदत्त ओकर प्रेम अस्वीकार करैत अछि, बादमे जीवनभरि ओकर छवि ढोइत अछि; तैओ सुम्निमा मृत्युशय्यापर ओकरा भेटए अबैत अछि, ओकर अनाथ पुत्रकेँ अपन घर लऽ जाइत अछि, अपन बेटी संग ओकर मिलन स्वीकार करैत अछि। करुणा एतए ’प्रकृति’क निष्क्रिय गुण नहि, इतिहासक हिंसाकेँ तोड़बाक सक्रिय नैतिकता अछि।
भूमिकाकारक दृष्टिमे सुम्निमा
भूमिकाकार प्रदीप गिरीक शब्दमे, सुम्निमा कोइरालाक सभ पात्रमे सभसँ स्वाभाविक, सहज आ जीवन्त पात्र थिकी — स्त्री-पुरुषक आदिम आ अनिवार्य आकर्षणक उत्फुल्ल उदाहरण। सुम्निमाक चंचलता, वाचालता आ मोहिनी रूपकेँ संस्कृत काव्यक प्रसिद्ध शुक-रम्भा संवादसँ तुलना कएल गेल अछि। ओ प्रकृति-संस्कृतिक प्रतिनिधि छथि — शास्त्रविहीन, मुदा जीवन-दृष्टिसम्पन्न। विवाहोपरान्त ओकर दाम्पत्य जीवन प्राकृतिक प्रेमक अभावमे विपरीत छैक, तथापि ओ अपन कर्तव्य-सम्पादनसँ सन्तोष प्राप्त करैत छथि — जे ओकर चरित्रकेँ त्रासद नहि, अपितु सहनशील आ जीवनोन्मुख बनबैत अछि।
६. पुलोमा : उपन्यासक सभसँ पीड़ादायक मौन आ स्त्री-अधिकारक प्रश्न
‘सुम्निमा’ पर चर्चा प्रायः सुम्निमा–सोमदत्त पर केन्द्रित रहैत अछि, मुदा पुलोमा बिना कृतिक मनोवैज्ञानिक आ नारीवादी पाठ अधूरा अछि। पुलोमा सोमदत्तक सांस्कृतिक समुदायसँ छथि, अर्थात् सिद्धान्ततः ‘उपयुक्त’ पत्नी; तैओ दाम्पत्य विफल अछि। एहि विफलतासँ स्पष्ट होइत अछि जे समस्या केवल अन्तरजातीय आकर्षण नहि, देह आ प्रेमप्रति सोमदत्तक मूल दृष्टिमे अछि।
विवाह सोमदत्त लेल पितृऋणसँ उऋण होयबाक साधन अछि; पत्नी सहचरि नहि, संतानोत्पत्तिक ‘क्षेत्र’ बनि जाइत छथि। ई भाषा पितृसत्तात्मक देह-दृष्टिक क्रूर रूप उघारैत अछि। पुलोमाक कामना, भय, अपेक्षा, अपमान—सभकेँ धार्मिक कर्तव्यक पृष्ठभूमिमे छोट कएल जाइत अछि। जखन दम्पति संतान लेल संघर्ष करैत अछि त उनका दुनूक देह पर आध्यात्मिक अनुशासनक बोझ बढ़ैत अछि। फलतः कामना प्रेमक स्वाभाविक आदान-प्रदान नहि रहि मानसिक प्रतिरूप, अपराधबोध आ ईर्ष्याक क्षेत्र बनि जाइत अछि।
इन्दिरा आचार्य मिश्रक पारिस्थितिक-नारीवादी अध्ययन ‘सुम्निमा’मे स्त्री/प्रकृति आ पुरुष/संस्कृति, देह/आत्मा, भोग/संयम सन द्वैतसभक पितृसत्तात्मक पदानुक्रम देखैत अछि। पुलोमाक जीवन एहि संरचनाक भीतरी हिंसा देखबैत अछि। सुम्निमा बाहरी ’अन्य’ छथि, अतः प्रतिरोधक अवसर पबैत छथि; पुलोमा भीतरक ‘अपन’ छथि, अतः शास्त्रीय मर्यादाक नामपर अधिक बाँधल छथि। हुनकर दुःख एहि बातक प्रमाण अछि जे ‘समान संस्कृति’ स्वतः समानता नहि दैत।
पुलोमाक मनोवैज्ञानिक प्रसंग—मानसिक रूपेँ भिल्ल-पुरुषक छविसँ शारीरिक आनन्द पाबि गर्भधारण, फेर सोमदत्तक अपमान आ पारस्परिक घृणा—कृतिक सभसँ विवादास्पद आ साहसी अंश अछि। एकरा केवल सनसनी अथवा ‘व्यभिचार’ रूपमे पढ़ब अपर्याप्त अछि। लेखक देखबैत छथि जे दमनक संरचना अन्ततः कल्पनाक गुप्त क्षेत्र रचैत अछि, जतए व्यक्तित्व अपन निषिद्ध इच्छा पूरा करैत अछि। पुलोमाक मानसिक स्वायत्तता दाम्पत्यक विफलता पर कठोर टिप्पणी अछि।
तथापि कृतिक सीमा सेहो एतए देखाइत अछि। पुलोमाक आन्तरिक संसार सुम्निमाक अपेक्षा कम विस्तृत अछि; ओ कई बेर सोमदत्तक मनोवैज्ञानिक संकटकेँ तीव्र करबाक माध्यम बनि जाइत छथि। आधुनिक नारीवादी पाठ हुनकर स्वतंत्र कथा, प्रसवोत्तर उपेक्षा, श्रम, मानसिक स्वास्थ्य आ सामाजिक एकान्तकेँ अधिक विस्तारसँ देखबाक माँग करैत अछि। उपसंहारमे रोगी पुलोमाक धीरे-धीरे क्षीण होयब पितृसत्तात्मक दाम्पत्यक अवशेष सन बुझाइत अछि—जे स्त्रीक शरीरसँ वंश माँगैत अछि, मुदा ओकर देखभालक सामाजिक संरचना नहि बनबैत।
७. देह–आत्मा विमर्श : द्वैतक पराजय, संतुलनक खोज
उपन्यासक केन्द्रीय दार्शनिक प्रश्न ‘देह श्रेष्ठ कि आत्मा?’ नहि अछि। जँ लेखक केवल देहवादक विजय घोषित करैतथि त अन्तिम संश्लेषणक आवश्यकता नहि रहितैक। उपन्यासक वास्तविक प्रस्ताव ई अछि जे देह आ आत्मामे कोनो एककेँ पूर्ण सत्य मानलासँ मनुष्य अपूर्ण होइत अछि। सोमदत्त देहकेँ नकारि आत्माकेँ बचाबए चाहैत अछि; परिणाम—आत्मा अहंकार, दमन आ रिक्ततामे फँसैत अछि। सुम्निमा देह आ जीवनक सहजता स्वीकारैत अछि; मुदा अन्तमे ओ अपन बेटीकेँ सोमदत्तक पुत्रक ‘उड़ान’ बुझबाक उपदेश दैत अछि। अर्थात् सुम्निमा सेहो स्वीकारैत अछि जे मनुष्य केवल माटि नहि, आकांक्षा सेहो अछि।
फुयालक अध्ययन एहि संश्लेषणकेँ ‘देह-वियोजन’ आ ‘पुनःदेहधारण’क बीचक ’मध्य-संतुलन’ रूपमे चिन्हैत अछि। ई पाठ उपन्यासक अन्तिम दृश्यसभसँ मेल खाइत अछि। अगिला पीढ़ीक प्रेममे ब्राह्मण पुत्र किराती समाजमे पलैत अछि, पर आश्रमक भग्न अवशेष दिस आकृष्ट सेहो रहैत अछि। ओ पुरान संस्कृति नहि अपनबैत, पर स्मृति पूर्णतः मिटबैत सेहो नहि। ओकर व्यक्तित्व मिश्रित अछि—माटि पर पयर, आकाश दिस दृष्टि।
देहक भाषा उपन्यासमे बारम्बार ज्ञानक भाषा बनैत अछि। स्पर्श, नग्नता, पसीना, भूख, दूध, मांस, तपसँ क्षीण शरीर, गर्भ, प्रसव, रोग, आलिंगन—ई सभ मात्र शारीरिक विवरण नहि, विचारक प्रमाण अछि। सोमदत्तक शास्त्रीय वाक्य देहक प्रत्यक्ष अनुभवसँ टकराइत अछि। साहित्यिक दृष्टिसँ ई अत्यन्त सफल पद्धति अछि, कारण लेखक अमूर्त दर्शनकेँ देहधारी दृश्य बनबैत छथि।
यही कारण ’सुम्निमा’क कामुकता अश्लीलता नहि, ज्ञानमीमांसा अछि। प्रश्न अछि—मनुष्य सत्य कोना जानैत अछि? पुस्तक, परम्परा, मन्त्र आ तर्कसँ? कि स्पर्श, पीड़ा, प्रेम, असफलता आ शरीरक सीमा-सँ सेहो? उपन्यास उत्तर दैत अछि: दूनूसँ; मुदा जँ पहिल दोसरकेँ निषिद्ध कऽ देत त ज्ञान अधूरा रहत।
फ्रायडीय इड–इगो–सुपरइगो, दमन आ “सम्भोगसँ समाधि” विमर्श
विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला नेपाली साहित्यमे मनोविश्लेषणात्मक धारक प्रवर्द्धक मानल जाइत छथि। 'सुम्निमा' पूर्णतः फ्रायडीय मनोविज्ञानक नेओ पर ठाढ़ अछि जतए मानव मनक तीन गोट प्रमुख भाग— इड (Id), इगो (Ego), आ सुपर-इगो (Super-ego) कें पात्रसभक माध्यमसँ जीवन्त रूपमे प्रस्तुत कएल गेल अछि।
सुम्निमा 'इड' क प्रतिनिधित्व करैति छथि। फ्रायडक अनुसार 'इड' मानव मनक ओ भाग थिक जे प्राकृतिक इच्छा, कामवासना (Libido), आ आनन्द सिद्धान्त (Pleasure Principle) पर आधारित होइत अछि। सुम्निमाक सम्पूर्ण जीवन दर्शन एही आनन्द सिद्धान्त पर आधारित अछि। ओ निर्वस्त्र भ' कोशीमे स्नान करैति छथि, प्रकृतिक आनन्द लैति छथि, आ यौनिकताकें कोनो पापक रूपमे नहि देखैति छथि। दोसर दिस, सोमदत्तक पिता सूर्यदत्त, पुलोमा, आ समग्र आर्य धर्मग्रन्थ 'सुपर-इगो' (नैतिकता आ सामाजिक नियम) क प्रतीक थिक, जे इन्द्रिय दमनक कठोर आदेश दैत अछि। सोमदत्त स्वयम् 'इगो' अछि, जे निरन्तर प्राकृतिक इच्छा (सुम्निमाक आकर्षण) आ आध्यात्मिक दायित्व (तपस्या) क बीच सङ्घर्षरत अछि।
सोमदत्त अपन कामवासनाकें जबरजस्ती दबाबक (Repression) प्रयास करैत अछि। फ्रायडीय सिद्धान्त स्पष्ट करैत अछि जे दमित इच्छा कहिओ समाप्त नहि होइत छैक, बरु ई अवचेतनमे सञ्चित भ' मानसिक विकृति (Neurosis) क रूपमे प्रकट होइत छैक। सोमदत्त जखन तपस्याक चरमोत्कर्ष पर रहैत अछि, तखनो सुम्निमाक नग्न, काञ्चन-प्रभा शरीर ओकर ध्यान भङ्ग क' दैत छैक। ओ कहैत अछि, "तोहर ई शरीर पापरूप छौक, विष छौक, मैल छौक। एहि नर्ककें हमरा आगाँसँ हटा!"। ई ओकर 'सुपर-इगो' क आवाज थिक जे ओकर भीतरक 'इड' सँ भयभीत अछि।
जखन सोमदत्त अपन पत्नी पुलोमासँ सन्तान प्राप्तिक लेल 'पुत्रेष्टि यज्ञ' करैत अछि, तखन ओ यौन सम्बन्धकें पूर्णतया यन्त्रवत् आ भावनाशून्य बना दैत अछि। ओ स्पष्ट निर्देश दैत अछि जे "शरीर तत्वक बोधसँ शारीरिक सुखक अनुभव हुअए लागल त समागमक कर्तव्य हेतु लोप भ' जाइत छैक"। ई प्रेमबिनाक जबरजस्ती यौन मिलन पुलोमा आ सोमदत्त दुनूकें कुण्ठित क' दैत छैक। डा. शेफालिका वर्मा एहि उपन्यासकें व्लादिमिर नाबोकोवक 'लोलिता' वा भगवती चरण वर्माक 'चित्रलेखा' सँ आगाँ राखैत आचार्य रजनीश (ओशो) क 'सम्भोगसँ समाधि' क सिद्धान्तसँ जोड़ैति छथि। ओशो मानैत छथि जे वासनाक दमन नहि, बरु ओकर अतिक्रमण (Transcendence) करब आवश्यक अछि। सोमदत्त वासनाकें दमन करैत अछि आ मानसिक रूपसँ रोगी भ' जाइत अछि, जखन कि सुम्निमाक 'मनुवादह' मे वासनाक प्राकृतिक रूपेँ स्वीकार करलाक बाद सोमदत्तकें जे अवर्णनीय सन्तोष आ पूर्णता भेटैत छैक, से ओकरा जिन्दगी भरिक तपस्यासँ नहि भेटल छल।
आर्य आ किरात जीवन-दृष्टिक तुलनात्मक प्रतिमान
८. जातीय चेतना, आर्य–किरात द्वन्द्व आ ’अन्य’केँ देखबाक नैतिकता
भानुभक्त शर्मा कँडेल ‘सुम्निमा’केँ केवल फ्रायडीय आख्यान नहि, जातीय चेतना, सांस्कृतिक बहुलता, भाषा, भोजन, धर्म, लोकाचार आ अल्पसंख्यक अनुभवक महत्त्वपूर्ण पाठ मानैत छथि। ई दृष्टि उपन्यासक बाल्यकालीन संवादसभमे स्पष्ट अछि। गाय एक समुदाय लेल ’माता’ आ अवध्य अछि, दोसर लेल आहार; मातृत्व–पितृत्वक वंशानुक्रम भिन्न; नग्नता आ वस्त्रक अर्थ भिन्न; धर्मक संस्था भिन्न; प्रकृति, देवता, आहार, यौनाचार—सभक सांस्कृतिक अर्थ भिन्न। लेखक एहि भिन्नताकेँ ‘एक सही, दोसर गलत’ रूपमे स्थिर नहि करैत छथि। सोमदत्त शुरुआतमे अवश्य एकतरफा श्रेष्ठताबोध रखैत अछि, मुदा कथा ओकर निश्चितताकेँ क्रमशः भंग करैत अछि।
हरिप्रसाद सिलवालक समाजशास्त्रीय अध्ययन आर्य–अनार्य समाज, मूल्य आ पर्यावरणक सम-विषम संरचनासँ अन्ततः समन्वय उन्मुख युगचेतना देखैत अछि। उपसंहार एहि निष्कर्षक मुख्य आधार अछि। ब्राह्मणक आश्रम प्रकृतिमे लोप भऽ जाइत अछि, पर ब्राह्मण रक्त किराती समुदायमे मिलि जाइत अछि। प्रतीक स्पष्ट अछि: अलगाववादी शुद्धता टिकैत नहि; जीवित संस्कृति मिश्रण, विवाह, स्मृति आ विस्मृति द्वारा बदलैत रहैत अछि।
तथापि आधुनिक आलोचना एक असुविधाजनक प्रश्न उठबैत अछि: की उपन्यास स्वयं कतहु किराती समुदायकेँ ‘प्रकृति’, ‘देह’, ‘माटि’ आ ब्राह्मणकेँ ‘आत्मा’, ‘शास्त्र’, ‘आकाश’क स्थिर रूपकमेसँ बाँधि त नहि दैत? ई आवश्यक आलोचनात्मक सावधानी अछि। सांस्कृतिक द्वैत साहित्यिक रूपेँ शक्तिशाली अछि, मुदा वास्तविक समुदायसभ एकरासँ बेसी विविध आ जटिल होइत अछि। यदि पाठक ’किराती = केवल देहवादी’ अथवा ‘ब्राह्मण = केवल आध्यात्मिक’ मानि लेत त कृतिक सांस्कृतिक आलोचना फेर रूढ़िबद्धता बनि जाएत।
उपन्यास स्वयं एहि खतरा सँ आंशिक रूपेँ बाहर अबैत अछि। सुम्निमा नैतिक विवेक आ दूरदृष्टि रखैत अछि; सोमदत्त संवेदना-विहीन यन्त्र नहि; अगिला पीढ़ी जैविक/सांस्कृतिक मिश्रण अछि। अन्तिम आशीर्वादमे ’दुनू अपन-अपन बाट बुझू’क आग्रह सांस्कृतिक संवादक सिद्धान्त अछि। अतः कृतिक सर्वोत्तम पाठ जातीय सारतत्त्ववाद नहि, ’अन्य’केँ मनुष्य रूपमे देखबाक शिक्षा अछि।
सांस्कृतिक आधिपत्यक विनिर्माण
'सुम्निमा' क एकटा अत्यन्त महत्वपूर्ण आयाम सांस्कृतिक आधिपत्य (Cultural Hegemony) कें भङ्ग करब अछि। एन्टोनियो ग्राम्सी (Antonio Gramsci) क अवधारणा अनुसार वर्चस्वशाली समूह (आर्य) अपन विश्वदृष्टिकोणकें सार्वभौमिक सत्यक रूपमे थोपैत अछि। तत्कालीन समाजमे आर्य-ब्राह्मण संस्कृति अपनाकें उत्कृष्ट आ किरात-भिल्ल संस्कृतिकें 'बर्बर' वा 'असंस्कृत' मानैत छल। सोमदत्त बारम्बार सुम्निमाकें "असंस्कृता बालिके" आ हुनकर संस्कृतिकें "पाशविक वृत्ति" कहि सम्बोधित करैत अछि। ओ ज्ञानक अहङ्कारमे मानैत अछि जे ओकर संस्कृति सर्वोच्च अछि।
मुदा, ज्याक डेरिडा (Jacques Derrida) क विनिर्माण (Deconstruction) सिद्धान्तिक आधार पर बी.पी. कोइराला एहि पदानुक्रम (Hierarchy) कें उल्टबैत छथि। उपन्यासक विकासक्रममे ई प्रमाणित होइत अछि जे सोमदत्तक 'श्रेष्ठ' ज्ञान आ कठोर तपस्या ओकरा मात्र विक्षिप्त, क्रोधी, आ असन्तुष्ट बना दैत छैक। जखन ओ किरात गामक बिजुवा लग जा क' सन्तान प्राप्तिक याचना करैत अछि, तखन बिजुवा ओकरा बुझबैत अछि: "तोहर मनुवा तमसा गेल छह! ओकरा तपस्यासँ मारक प्रयत्न कएलह!!... शरीर यन्त्र नहि, माध्यम नहि, साधन सेहो नहि। ई अपने साध्य अछि, लक्ष्य अछि।"।
अन्ततः, सोमदत्तकें अपन ब्रह्मचर्य सङ्कल्पसँ पराजित भ' मनुवादहमे सुम्निमाक शरणमे जेबाक पड़ैत अछि। एतए आर्य संस्कृतिक वर्चस्ववादी आवरण खसि पड़ैत अछि। बी.पी. कोइराला ई प्रमाणित करैत छथि जे कोनो संस्कृति मात्र एकटा निश्चित समूहद्वारा अभ्यास कएलासँ श्रेष्ठ नहि भ' जाइत अछि, बरु प्राकृतिक यथार्थ आ मानवीयता सर्वोच्च होइत छैक। उपन्यासक अन्त्यमे आर्य आ किरात रक्तक मिलन (सोमदत्तक बेटा आ सुम्निमाक बेटीक विवाह) एकटा एहन विनिर्माण थिक जतए वर्चस्वशाली संस्कृतिक वंशावली सिमान्तकृत संस्कृतिक वंशावलीमे विलीन भ' जाइत अछि।
किरात-विवाद आ सामाजिक आलोचना
यद्यपि 'सुम्निमा' नेपाली साहित्यक एकटा अद्वितीय मणि थिक, तथापि एकरा ल' क' किरात धर्मावलम्बीसभक बीच विवाद सेहो उत्पन्न भेल छल। किरात समुदायक कतिपय आलोचकसभक आरोप छन्हि जे सुम्निमा आ पारोहाङ्ग किरात धर्मक पूजनीय देवता छथि, आ बी.पी. कोइराला हुनकासभकें एकटा साधारण मानवीक रूपमे प्रस्तुत कए यौनिक सन्दर्भमे प्रयोग कए हुनकर अपमान कएने छथि।
मुदा, साहित्यिक समालोचना आ पाठ्य-विश्लेषणक (Textual Analysis) दृष्टिसँ बी.पी. कोइराला सुम्निमाकें कोनो दुर्बल, तुच्छ वा नकारात्मक पात्रक रूपमे चित्रित नहि कएने छथि। बरु सुम्निमा सम्पूर्ण उपन्यासमे आर्य पुरुष सोमदत्तसँ अधिक तार्किक, मानवीय, करुणाशील आ स्वाभाविक पात्रक रूपमे स्थापित छथि। सम्पूर्ण वैचारिक सङ्घर्षमे अन्ततः किरात संस्कृतिकें जीवनदायिनी आ यथार्थवादी प्रमाणित कएल गेल अछि।
उपन्यासक उपसंहारमे जखन आर्य सोमदत्तक बेटा आ किरात सुम्निमाक बेटीक बीच प्रेम होइत अछि आ दुनू गान्धर्व विवाह करैत अछि, तखन कोशी नदीक अनवरत प्रवाहक बीच आर्य आ किरात रक्तक मिलनसँ उदित भेल नव सन्तति नेपालक साँचो पहिचान (True Identity) थिक। ई सन्देश उपन्यासक विवादकें एकटा मानवीय आ समन्वयवादी समाधान (Assimilation and Cultural Synthesis) प्रदान करैत अछि। किरातीसभक जातिक रक्तक महासमुद्रमे आर्य रक्तक बून्नक विलय, वास्तवमे नेपालक विविधातापूर्ण जनसांख्यिकीक यथार्थवादी आ दूरदर्शी चित्रण थिक।
९. प्रकृति, नदी, वन आ पारिस्थितिक अर्थ
’सुम्निमा’क तेसर मुख्य पात्र प्रकृति अछि। कौशिकी नदी केवल पृष्ठभूमि नहि; ओ समय, परिवर्तन, देह, स्मृति आ सभ्यताक अस्थिरताक प्रतीक अछि। पात्र जन्मैत छथि, प्रेम करैत छथि, तप करैत छथि, मरैत छथि; आश्रम बनैत आ मिटैत अछि; पर नदी बहैत रहैत अछि। अन्तिम वाक्यसभमे कोशीक अविरल प्रवाह आ विराट शान्ति मनुष्यक सांस्कृतिक दावाक सीमाकेँ उजागर करैत अछि।
वन सोमदत्त लेल शुरुआतमे तपोभूमि अछि—प्रकृतिपर अनुशासनक स्थान; सुम्निमा लेल वएह वन घर अछि—चलन, भोजन, शरीर, खेल, प्रेमक स्वाभाविक परिसर। एके प्रकृति दू संस्कृतिक दृष्टिसँ भिन्न अर्थ ग्रहण करैत अछि। धीरे-धीरे प्रकृति सोमदत्तक कठोर निर्माणकेँ पुनः अपना भीतर ले लैत अछि। आश्रमक खसि पड़ब, झाड़-झंखाड़सँ ढँकाएब, चिह्न मिटि जाएब—ई ’प्रकृतिक विजय’क रोमानी दृश्य मात्र नहि; ई स्मृति आ सत्ता-दावाक नश्वरता अछि।
पारिस्थितिक नारीवादी पाठ स्त्री आ प्रकृतिक समांतर उपेक्षाकेँ देखैत अछि। सोमदत्तक पितृसत्तात्मक शास्त्रीय दृष्टि शरीर आ प्रकृति दुनूकेँ साधन बनबैत अछि; सुम्निमा शरीर/धरतीक आत्म-मूल्य पुनर्स्थापित करैत अछि। मुदा एहि पाठमे एक सीमा याद राखब जरूरी अछि: स्त्रीकेँ प्रकृतिक ‘स्वाभाविक प्रतिनिधि’ बनाबो पितृसत्तात्मक रूढ़ि भऽ सकैत अछि। उपन्यासक मूल्य ओतए बढ़ैत अछि जतए सुम्निमा केवल प्राकृतिक देह नहि, विचारशील निर्णयकर्ता बनैत अछि।
नदीक लय मैथिली अनुवादक भाषामे सेहो प्रभावी अछि। वर्णनात्मक अंशसभमे दीर्घ वाक्य, ध्वन्यात्मक शब्द, हरिअरी, शमी, बालु, हवा, जल, कोशीक कलकल/गर्जन—ई सभ लक्ष्य-पाठकेँ दृश्यात्मक आ श्रव्य बनबैत अछि। एहि अर्थमे प्रकृति कथ्यक संग शैलीक लय सेहो निर्धारित करैत अछि।
प्रकृतिक नियम, हिंसा आ स्त्री-प्रकृति सम्बन्धक अतिरिक्त प्रसंग
एहि उपन्यासमे सोमदत्त पितृसत्ता आ संस्कृतिक प्रतीक थिक। ओ प्रकृतिकें (सुम्निमाकें) अपन नियन्त्रणमे रखबाक, ओकरा 'पापक खाधि', 'नर्क', वा 'विष' कहि तिरस्कृत करबाक प्रयास करैत अछि। सोमदत्तक लेल प्रकृति एकटा एहन वस्तु थिक जकरा पर विजय प्राप्त करब आवश्यक अछि। दोसर दिस, सुम्निमा पूर्ण रूपसँ प्रकृतिक अंश थिक। ओ कौशिकी नदी, जङ्गलक चिड़ै-चुनमुन, लालीगुराँसक फूल, आ मनुवादहक जलसँ एकाकार अछि। जखन एकटा बाज परबा (परेवा) पर आक्रमण करैत अछि, त सोमदत्त ओकरा बचाबक यत्न करैत अहिंसाक वकालत करैत अछि, मुदा सुम्निमा ओकरा बुझबैति छथि जे बाजक अपन आहार लेबाक प्राकृतिक नियम अछि, आ प्रकृतिक ढाँचाकें धर्मक नाम पर खलबलाएब स्वयंमे पैघ हिंसा थिक।
पुलोमाक पात्र पारिस्थितिक नारीवादक एकटा त्रासद उदाहरण अछि। पितृसत्ताक अधीन रहि ओ अपन स्त्रीत्व आ प्राकृतिक इच्छाक दमन करैति छथि। जखन ओकरा सोमदत्तक खोखलापनक ज्ञान होइत छैक, तखन ओकर भीतरक विद्रोही स्त्री जाग्रत होइत अछि, आ ओ निर्वस्त्र भ' सोमदत्तकें चुनौती दैति छथि। कोइराला स्पष्ट करैत छथि जे प्रकृतिसँ कटि कए वा ओकरा दमन कए क' मनुख कहिओ पूर्ण नहि भ' सकैत अछि।
१०. कथन-शिल्प, मिथकीय समय आ प्रतीक-संरचना
कृतिक आरम्भ ’बहुत पहिने’क कथा रूपमे होइत अछि, जे वर्तमान पाठक लेल पुराणक प्रतिध्वनि सन लगैत अछि। ई मिथकीय दूरी लेखककेँ इतिहासक ठोस कालखण्डसँ मुक्त करैत अछि आ संस्कृतिक आदिरूपसभ—ब्राह्मण आश्रम, किराती बस्ती, नदी, वन, तपस्या—केँ प्रतीकात्मक धरातल पर रखैत अछि। विश्वामित्रक स्मृति, आश्रमक टीला, वैदिक संस्कार, किराती जनश्रुति सभ मिलि इतिहास आ मिथकक सीमाकेँ जानबूझि धुँधला करैत अछि।
मिथकीय ढाँचा कथा केँ सार्वकालिक बनबैत अछि, पर संगहि लेखक आधुनिक प्रश्न पुछैत छथि—जातीय श्रेष्ठता, राष्ट्र, शरीर, स्त्री, विवाह, सामाजिक मिश्रण। पुराकालीन आवरणमे आधुनिकता एहि रचनाक महत्त्वपूर्ण शिल्पगत उपलब्धि अछि। पाठक एक ‘प्राचीन कथा’ पढ़ैत-पढ़ैत अपन वर्तमान समाजक कठोर सीमासभ पर प्रश्न करए लगैत अछि।
प्रमुख प्रतीकसभमे शमीक गाछ, आश्रम, नदी, हवा, माटि, लंगोट/जनऊ, नग्न देह आ रक्त उल्लेखनीय अछि। शमीक गाछ पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रेमक साक्षी बनैत अछि; आश्रम निर्मित संस्कृति आ अनुशासनक प्रतीक; नदी परिवर्तनक; हवा आत्मोर्ध्व आकांक्षा आ अस्थिरताक; माटि देहधारी जीवनक; जनऊ/कौपीन सांस्कृतिक पहचानक; नग्नता संस्कारपूर्व अथवा संस्कारातीत सहजताक; रक्त जैविक मिश्रण आ सांस्कृतिक शुद्धताक विघटनक प्रतीक बनैत अछि।
कथावाचक कई बेर प्रत्यक्ष दार्शनिक प्रश्न करैत अछि, विशेषतः दोसर अध्यायमे। आधुनिक ’कहबाक बदला दृश्य द्वारा देखाउ’क कठोर कसौटीसँ देखल जाए त ई निबन्धात्मक हस्तक्षेप लगि सकैत अछि। मुदा कृतिक प्रकृति ’दार्शनिक-मनौवैज्ञानिक उपन्यास’क अछि, तैँ ई हस्तक्षेप संरचनागत उद्देश्य पूरा करैत अछि। कमजोरी केवल ओतए सम्भव अछि जतए प्रश्नसभ चरित्रक अनुभवसँ अलग होय; ’सुम्निमा’मे अधिकांश प्रश्न तत्क्षण घटित मनोवैज्ञानिक संकटसँ उपजैत अछि, एहि कारण ओकर प्रभाव टिकैत अछि।
११. मैथिली रूपान्तरणक भाषिक सौन्दर्य : लोक-लय, पंजी, वाक्य-संगीत
वृषेश चन्द्र लालक अनुवादक सभसँ स्पष्ट उपलब्धि लक्ष्य-भाषाक जीवित लय अछि। भूमिकाकार प्रदीप गिरि विशेष रूपेँ ‘पतरसुट्टा’, ‘घोंघाउज’, ‘असगरे’, ‘चकुआइत’, ‘भोकासी पाड़ैत कनैत’, ‘तमसा कए’, ‘मुँहझप्पा’, ‘लत्ता’ सन शब्दसभक उदाहरण दैत कहैत छथि जे ई शब्द अनुवादकेँ मौलिक मैथिली स्वाद दैत अछि। ई अवलोकन लक्ष्य-पाठ पढ़िते पुष्ट होइत अछि। संवाद पुस्तकिया नहि, पात्र-विशिष्ट अछि; विशेषतः सुम्निमाक बोलीमे चपलता, निकटता, स्थानीयता आ शारीरिक प्रत्यक्षता अछि।
भाषिक पंजीक विरोधाभास अनुवादकक महत्वपूर्ण औजार अछि। सोमदत्तक वाक्यसभमे ‘उदात्त’, ‘दानमय सम्बन्ध’, ‘द्विज धर्म’, ‘ब्रह्मचर्य’, ‘तपस्या’, ‘कर्तव्य’, ‘आत्मा’, ‘क्षेत्रपति’ सन संस्कृतनिष्ठ पद अधिक; सुम्निमाक भाषामे ‘तोँ’, ‘यावा’, ‘माय’, ‘बाप’, ‘लत्ता’, ‘माटि’, ‘हावा’, ‘छुअए’ सन प्रत्यक्ष लोक-शब्द अधिक। एहि भिन्नतासँ पाठक बिना कथावाचकक टिप्पणीक पात्रक संस्कृतिक दूरी सुनि सकैत अछि। अनुवाद एतए ‘अर्थ’ मात्र नहि, सामाजिक आवाजक पुनर्सृजन करैत अछि।
वर्णनात्मक अंशसभमे मैथिली क्रियापदक प्रवाह—‘देखैत रहल’, ‘बिला गेलि’, ‘सटिआ गेल’, ‘निहारैत’, ‘बौआइत’, ‘पसरि जाइत’—दृश्यकेँ गतिशील करैत अछि। अनेक वाक्य मूलतः दीर्घ अछि, मुदा क्रियामालाक कारण लय बनल रहैत अछि। प्रकृति-वर्णनमे ध्वनि-अनुकरण आ संवेदनात्मक शब्दावली विशेष प्रभावी अछि।
एक उल्लेखनीय बात सम्बोधनक स्तर अछि। बाल्यकालीन सुम्निमा–सोमदत्त वार्तामे निकट/अनौपचारिक सर्वनाम सांस्कृतिक दूरीकेँ चुनौती दैत अछि; सोमदत्तक शास्त्रीयता आ सुम्निमाक ‘रे’/सीधा सम्बोधन सामाजिक औपचारिकताक भिन्न मानदण्ड दिखबैत अछि। मैथिलीमे सर्वनाम-सम्मानक विस्तृत तन्त्र अछि, अतः एहन चुनाव चरित्रनिर्माणमे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बनैत अछि।
तथापि किछु अंशमे अत्यधिक तत्सम पदावली पाठकक सहज प्रवाह रोकि सकैत अछि। ई प्रश्न अनुवादकक दोष मात्र नहि, स्रोत-पात्र सोमदत्तक शास्त्रीय पंजीक आवश्यकता सेहो हो सकैत अछि। लक्ष्य-पाठक दृष्टिसँ उत्तम संस्करणमे दुर्लभ वैदिक/दार्शनिक पदक छोट शब्दकोश देल जाए त पठनीयता बढ़त आ भाषिक भिन्नता नष्टो नहि हएत।
समाजभाषाविज्ञान आ पहिचान
उपन्यासमे भाषा मात्र संवादक माध्यम नहि अछि, बरु ई पात्रसभक सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक आ वैचारिक पहिचान (Identity Marker) स्पष्ट करैत अछि। अनुवादक वृषेश चन्द्र लालक मैथिली रूपान्तरण एहि भाषिक द्वन्द्वकें बहुत निकसँ संरक्षित कएने अछि।
उपन्यासक एकटा प्रतिनिधि दृश्यमे, जखन सोमदत्त अपन मायकेँ ‘देवभाषा’मे ’माता’ कहैत छथि, सुम्निमा तीखा प्रश्न करैत छथिन्ह —
“हँ, त तूँ आदमी भ’ क’ आदमीक भाषामे किएक ने बजैत छैं ? आदमी भ’ क’ देवताक चलन नहि करबाक चाही। आदमीकेँ आदमी रहक चाही, सोमदत्त !”
“हमरा तोहर कोनो बात बुझाएमे नहि अबैत अछि, सोमदत्त ! मुदा हमरा बुझाइत अछि, आदमीकेँ देवता बनक कोशिश करब निक नहि। आदमीक ई धर्म नहि छैक। आदमीकेँ अपने बानि-चालिमे रहबाक चाही। देवता बनि कए जखने केओ रहए चाहत, ओ आदमी नहि रहत।”
एहि संवादमे ‘माता’ (संस्कृतनिष्ठ, देवभाषाजनित, दूरी-सूचक) आ ‘माय’ (लोकभाषाजनित, सामीप्य-सूचक) शब्दद्वयक टकराव प्रतीकात्मक रूपे सम्पूर्ण उपन्यासक वैचारिक ढाँचाकेँ समेटि लैत अछि — कृत्रिम दैवीकरण विरुद्ध स्वाभाविक मानवीयता। एतय ई ध्यान देबऽ जोग अछि जे मैथिलीमे अनूदित करैत काल अनुवादकक सोझाँ स्वयं एहि भाषिक-सांस्कृतिक पदानुक्रम (देवभाषा बनाम लोकभाषा)केँ मैथिलीक अपने शब्द-भण्डारमे पुनःसृजित करबाक चुनौती छल — जकरा ओ सफलतापूर्वक निर्वाह कएने छथि।
सुम्निमाक जनभाषा यथार्थवादी, नग्न आ मानवीय उष्णतासँ भरल अछि; सोमदत्तक भाषा सैद्धान्तिक, शास्त्रीय आ यथार्थसँ पलायनशील रूप ग्रहण करैत अछि। समाजभाषाविज्ञानक दृष्टिसँ भाषा शक्ति आ पदानुक्रम निर्माणक साधन बनि सकैत अछि; एहि आख्यानमे जनभाषा आ देवभाषाक तनाव सामाजिक निकटता बनाम सांस्कृतिक दूरीक चिह्न बनैत अछि।
भाषिक विशेषताक तुलनात्मक सारिणी
१२. अनुवाद-सिद्धान्त : ’सुम्निमा’क मैथिली रूपान्तरणकेँ कोना पढ़ी
अनुवादक अपन निवेदनमे ’भावानुवाद’क महत्त्व आ संप्रेषणीय प्रवाहक आवश्यकता स्वीकारैत छथि। ई आत्मस्वीकृति अनुवाद-सिद्धान्तक दृष्टिसँ अत्यन्त उपयोगी अछि, कारण लक्ष्य-पाठमे देखाइत रणनीति ओकरा पुष्ट करैत अछि। निम्न सिद्धान्तसभक आलोकमे अनुवादक प्रकृति अधिक स्पष्ट होइत अछि।
साहित्यिक अनुवाद : सृजनात्मक कर्म
भूमिकाकार प्रदीप गिरी अनुवाद-सिद्धान्तपर एकटा महत्वपूर्ण स्थापना दैत छथि — साहित्यिक अनुवाद कतिपय दृष्टिसँ मौलिक लेखनसँ बेसी सृजनात्मक होइत छैक। ओ उदाहरणस्वरूप उमर खैयामक रुबाइयातक उल्लेख करैत छथि, जे विश्वप्रसिद्ध भेल, मुदा एडवर्ड फिट्जेराल्डक अनुवादक कारणे। एहिसँ अनुवाद-सिद्धान्तक एकटा केन्द्रीय प्रश्न उठैत अछि — अनुवाद की मूल कृतिक सेवक मात्र थिक, वा ओ स्वयं एकटा स्वतन्त्र सृजनात्मक कृति बनि सकैत अछि ? गिरीक स्थापना दोसर पक्षक समर्थन करैत अछि।
अनुवादकक दू आवश्यक योग्यता
गिरीक अनुसार, सफल अनुवादकलेल दू गोट योग्यता अनिवार्य अछि — पहिल, मूल कृतिक मर्म (आशय, आत्मा) बुझबाक क्षमता; आ दोसर, लक्ष्य-भाषाक सौष्ठव आ सौन्दर्यक आत्मसात। वृषेश चन्द्र लालमे ई दुनू योग्यता विद्यमान अछि — ओ बीपी कोइरालाक राजनीतिक-वैचारिक विरासतक अनुयायी होएबाक कारणे मूल कृतिक मर्मसँ परिचित छथि, आ मैथिली हुनकर मातृभाषा (“मायक कोखिसँ सिखल”) होएबाक कारणे लक्ष्य-भाषापर हुनकर अधिकार स्वाभाविक अछि। डा. शेफालिका वर्मा एहि गुणकेँ ‘भावानुवाद’ (सम्प्रेषणीयताक अविरल धारवाला अर्थ-केन्द्रित अनुवाद) क रूपमे चिन्हैत छथि, जकरा ओ शब्दानुवादसँ स्पष्ट रूपे उत्तम मानैत छथि।
(क) नाइडा : औपचारिक बनाम गतिशील समतुल्यता। यूजीन नाइडा १९६४ मे औपचारिक अनुरूपता आ गतिशील समतुल्यताक भेद स्थापित करैत छथि। गतिशील समतुल्यता लक्ष्य-पाठक पर स्वाभाविक, तुल्य प्रभाव उत्पन्न करबाक प्रयास करैत अछि। ‘सुम्निमा’क मैथिली रूपान्तरण शब्द-से-शब्द कठोरता सँ बेसी लक्ष्य-भाषाक स्वाभाविकता अपनबैत देखाइत अछि। ’पतरसुट्टा’ सन शब्द, मैथिली क्रियापद्धति, सम्बोधन आ लोक-मुहावरा एहि गतिशील समतुल्यताक प्रमाण बुझाएत। अनुवादक स्रोतक सांस्कृतिक कथा राखैत छथि, पर ओकर भाव-स्पन्दन मैथिली पाठकक कान लेल पुनर्गठित करैत छथि।
(ख) न्यूमार्क : अर्थनिष्ठ आ संप्रेषणनिष्ठ अनुवाद। पीटर न्यूमार्कक अर्थनिष्ठ अनुवाद स्रोत-पाठक सूक्ष्म अर्थ आ शैलीक नजदीक रहैत अछि, जखन संप्रेषणनिष्ठ अनुवाद लक्ष्य-पाठकक ग्रहणशीलता आ स्पष्टताकेँ प्राथमिकता दैत अछि। एहि अनुवादमे दूनूक संतुलन अछि। वैदिक पद, संस्कार, किरात नाम, आश्रम-संबंधी शब्द—अर्थनिष्ठ झुकाव; जबकि संवाद, गामघरक शब्द, भावनात्मक स्थितिक सहज मैथिली—संप्रेषणनिष्ठ झुकाव। एहन मिश्र रणनीति साहित्यिक अनुवाद लेल उपयुक्त अछि, कारण केवल संप्रेषण मूल कृतिक सांस्कृतिक अपरिचितता मिटा सकैत अछि आ केवल स्रोत-निष्ठता भाषा केँ जड़ बना सकैत अछि।
(ग) वेनूटी : घरेलूकरण आ विदेशीपन-संरक्षण। लॉरेन्स वेनूटीक शब्दावलीमे अनुवादक एकसाथ ‘घरेलूकरण’ आ ‘विदेशीपन-संरक्षण’ करैत छथि। मैथिली मुहावरा, मधेशी लोक-शब्द, परिचित वाक्यलय घरेलूकरण अछि—पाठ मैथिली घरक बनैत अछि। मुदा ‘किराती’, ‘कौशिकी’, ‘यज्ञ’, ‘ब्रह्मचर्य’, ‘भिल्ल’, संस्कार, आ सांस्कृतिक संघर्षकेँ स्थानीय मैथिली समकक्षमे विलीन नहि कएल गेल—ई विदेशीपन-संरक्षक अवशेष अछि। एहि द्वैध रणनीतिक कारण पाठ न पूर्णतः ‘नेपालीपन’ गुमबैत अछि, न लक्ष्य-भाषामे पराया बनि रहैत अछि।
(घ) कैटफर्ड : अनुवादीय संरचना-परिवर्तन। नेपाली सँ मैथिली जेहन निकट सम्बन्धित, पर पृथक व्याकरणिक-सामाजिक व्यवस्था वाली भाषामे शब्दक्रम, सर्वनाम, विभक्ति, क्रियापद, सम्मान-सूचकता, मुहावरा आ पद-चयनमे अनिवार्य संरचना-परिवर्तन होइत अछि। लक्ष्य-पाठमे मैथिली क्रियाप्रयोग—‘कएलक’, ‘कहलकि’, ‘भेलैक’, ‘रहल’, ‘छलि’—आ सम्बोधन प्रणाली स्रोत-संरचनाकेँ लक्ष्य-व्याकरणमे ढालबाक उदाहरण अछि। पूर्ण स्रोत-पाठ बिना विशिष्ट संरचना-परिवर्तनक सूची निर्णायक रूपेँ नहि बनाओल जा सकैत अछि, मुदा लक्ष्य-पाठ स्पष्ट रूपेँ नेपालीक यान्त्रिक अनुवर्तन नहि, स्वतंत्र मैथिली व्याकरणिक रूप ग्रहण कएने अछि।
(ङ) स्कोपोस : अनुवादक उद्देश्य। प्रकाशकीयसँ स्पष्ट अछि जे उद्देश्य केवल एक उपन्यास उपलब्ध कराएब नहि, मैथिली पाठक समुदायमे बीपी कोइरालाक रचनाकेँ प्रतिष्ठित करब आ नेपाली बहुभाषिक साहित्यिक संवादकेँ सघन करब सेहो अछि। स्कोपोस सिद्धान्तक अनुसार अनुवादक रणनीति लक्ष्य-उद्देश्यसँ जुड़ल होइत अछि। एहि दृष्टिसँ मैथिलीकरण, लोकशब्दक उपयोग आ पठनीयता आकस्मिक नहि, अनुवादक सामाजिक उद्देश्यक हिस्सा अछि।
(च) बासनेट आ सांस्कृतिक मोड़। सुसान बासनेटक अनुवाद अध्ययन भाषा-समानतासँ आगे संस्कृति, सत्ता, इतिहास आ साहित्यिक व्यवस्था पर बल दैत अछि। ’सुम्निमा’क मैथिली अनुवादक महत्त्व एतए विशेष रूपेँ बढ़ैत अछि: ई एक प्रमुख नेपाली लेखककेँ नेपालक दोसर व्यापक मातृभाषिक संसारमे स्थानान्तरित करैत अछि। अतः अनुवाद सांस्कृतिक पुनर्वितरण अछि—कौन कृति कोन भाषामे उपलब्ध हो, के पाठक राष्ट्रीय साहित्यक साझीदार बनथि, ई सत्ता-संबंधित प्रश्न अछि।
(छ) टूरी : लक्ष्य-संस्कृतिक मानक। गिडियन टूरीक वर्णनात्मक दृष्टि अनुवादकेँ लक्ष्य-संस्कृतिक ’मानक’क भीतर घटित व्यवहार मानैत अछि। एहि पाठमे मैथिली साहित्यिक शिष्टता आ बोलचालक मधुरता दुनूकेँ स्थान देल गेल अछि। अनुवाद न अत्यधिक मानकीकृत शुष्क मैथिली अछि, न पूर्ण स्थानीय बोली; ई व्यापक मैथिली पाठक लेल साहित्यिक मध्य-पंजी बनबैत अछि।
एहि सभ सिद्धान्तकेँ एकठाम रखला पर निष्कर्ष निकलैत अछि जे वृषेश चन्द्र लालक रणनीति ‘भाव-संप्रेषणमुखी, लक्ष्य-भाषा-सक्रिय, पर सांस्कृतिक अवशेष-संरक्षक’ अछि। एहि कारण अनुवादक स्वर दृश्य होइत अछि, पर लेखकक कथा पर हावी नहि होइत।
शब्द-स्तरक सृजनात्मक रूपान्तरण
अनुवादक लालद्वारा एहि ठाम 'दुब्लो/पातलो' (Nepali) कें 'पतरसुट्टा' (Maithili) तथा 'रोएर' (Nepali) कें 'भोकासी पाड़ैत कनैत' (Maithili) मे रूपान्तरित करब अनुवादक उच्चकोटिको सिर्जनात्मकता (Creativity in Translation) थिक। एकर अतिरिक्त, मैथिली व्याकरणक विशिष्ट क्रियापदसभ (जहिना: 'कहलकैक', 'छलैकि', 'बाजलि', 'देल्खिन्ह') क सटीक प्रयोगसँ पात्रसभक मनोभाव आ लैङ्गिक भिन्नताकें मैथिलीमे जीवन्त कएल गेल अछि।
१३. ’भावानुवाद’क उपलब्धि आ ओकर सम्भावित जोखिम
भावानुवादक मुख्य लाभ ई जे पात्रक भाव लक्ष्य-भाषामे जीवित रहैत अछि। जँ सुम्निमाक चञ्चल वाणी स्रोत भाषाक वाक्य-ढाँचा जसक तस रखि देल जाइत, त मैथिली पाठमे कृत्रिमता आबि सकैत छल। अनुवादक लोक-शब्द आ संवादक स्वाभाविकता द्वारा एहि संकटकेँ टारैत छथि। प्रेम, लज्जा, राग, तामस, विह्वलता, मातृस्नेह आ व्यंग्य लक्ष्य-पाठमे सहज संप्रेषित होइत अछि।
दोसर लाभ सांस्कृतिक निकटता अछि। मिथिला आ नेपालक सांस्कृतिक क्षेत्र ऐतिहासिक रूपेँ परस्पर सम्पर्कित रहल अछि; वैदिक पदावली, नदी-वनक सांस्कृतिक अर्थ, पारिवारिक सम्बोधन आदि मैथिली पाठक लेल पूर्णतः अपरिचित नहि। अनुवाद एहि साझा सांस्कृतिक पूँजीक उपयोग करैत अछि।
मुदा भावानुवादक जोखिम ‘अति-घरेलूकरण’ अछि। जँ लक्ष्य-भाषाक अत्यधिक स्थानीय शब्द स्रोत-समुदायक विशिष्टता पर पर्दा डालि देत, त पाठक किरात संसारकेँ मिथिलाक गामक विस्तार मानि सकैत अछि। एहि संस्करणमे अधिकांश सांस्कृतिक नाम आ चिह्न सुरक्षित रहबाक कारण ई जोखिम नियंत्रित अछि, मुदा आलोचनात्मक दृष्टिसँ ध्यान देब जरूरी अछि। विशेषतः ’मधेशी शब्द’क प्रशंसा करैत परिपाठ स्वयं बतबैत अछि जे लक्ष्य-संस्कृतिक स्वाद जानबूझि बढ़ाओल गेल अछि।
दोसर जोखिम दार्शनिक पदक पंजी-संतुलन अछि। सोमदत्तक संस्कृतनिष्ठ भाषा चरित्रोचित अछि, पर कतहु अतिशय तत्समता सुम्निमाक सहज जगतसँ दूरी एतेक बढ़ा सकैत अछि जे पाठ वैचारिक द्वैतकेँ भाषिक रूढ़ि बना दे। एक समर्थ सम्पादित संस्करण पंजीक भिन्नता राखैत दुर्लभ पदपर न्यूनतम टिप्पणी देत।
तेसर जोखिम अनुवादकक ‘अदृश्य’ होयबाक नहि, बल्कि परिपाठक अत्यधिक दृश्यता अछि। प्रकाशकीय आ भूमिकासभ राष्ट्रीयता, मधेश, भाषा-राजनीति आ समाजवादक विशिष्ट व्याख्या पाठककेँ आरम्भहि सँ एक व्याख्यात्मक बाट पर लगा दैत अछि। ई सामग्री ऐतिहासिक रूपेँ मूल्यवान अछि, मुदा साहित्यिक पाठक लेल उत्तम होएत जे अगिला संस्करणमे ‘अनुवादकीय टिप्पणी’ आ ‘आलोचनात्मक भूमिका’ स्पष्ट पृथक खण्डमे देल जाए, जाहिसँ पाठक उपन्यासक बहुअर्थता स्वतंत्र रूपेँ ग्रहण कऽ सके।
अनुवादकक सामाजिक-राजनीतिक एजेन्सी आ सांस्कृतिक भूगोल
अनुवादक स्वयम् शून्यमे काम नहि करैत अछि; ओकर एकटा वैचारिक एजेन्सी होइत छैक। वृषेश चन्द्र लाल स्वयं एक गोट मधेशीमूलक राजनीतिज्ञ आ लोकतान्त्रिक समाजवादी विचारक छथि। नेपालमे लामो समयधरि राजा महेन्द्रक पंचायतकालीन "एक राजा एक देश, एक भाषा एक भेष" क नीति अन्तर्गत खस भाषाक वर्चस्व रहल अछि, जकरा कारणें अन्य भाषासभ उपेक्षित रहल।
’सुम्निमा’क अनुवाद-चयन स्वयंमे एकटा सांस्कृतिक-राजनीतिक वक्तव्य थिक। भूमिकाकार प्रदीप गिरी एहि तथ्यपर विशेष जोर दैत छथि जे राजा महेन्द्र, जे ’एक राजा, एक देश, एक भाषा, एक भेष’क नारा दए नेपालक भाषिक विविधताकेँ दबेलन्हि, तिनकर शरीरमे सेहो मैथिल रक्तक अंश छल — मुदा पंचायत-कालमे मिथिला वा किरात संस्कृतिकेँ कहियो राजकीय सम्मान नहि भेटल। एहि सन्दर्भमे, मधेशी मूलक एकटा राजनीतिज्ञद्वारा बीपी कोइरालाक कृतिकेँ मैथिलीमे अनुवाद करब — जे स्वयं राष्ट्रियताक वैकल्पिक निर्माणक एकटा प्रयास थिक — गहींर अर्थ राखैत अछि।
भूमिकाकार ई सेहो स्मरण करबैत छथि जे बीपी कोइरालाक विभिन्न उपन्यासक पात्रसभ काठमान्डू, दरभंगा, बराहक्षेत्र आ भागलपुर धरि — नेपाल-मिथिला-बिहारक सम्पूर्ण सांस्कृतिक क्षेत्रमे विस्तारित छथि, जे कोइरालाक भौगोलिक-सांस्कृतिक दृष्टिक व्यापकताकेँ प्रमाणित करैत अछि। मिथिलाक पाण्डित्य-परम्परा (मण्डन मिश्र, वाचस्पति मिश्र, विद्यापति) आ शाहवंशोत्तर मिथिलाक राजनीतिक-सांस्कृतिक ह्रासक ऐतिहासिक सन्दर्भमे, ई अनुवाद साहित्यक माध्यमसँ राष्ट्रिय-सांस्कृतिक ऐक्यबद्धता सिंचित करबाक एकटा सार्थक प्रयास बनि जाइत अछि।
भूमिकाकार प्रदीप गिरी राजा महेन्द्रक शरीरमे मैथिल रक्तक अंशक उल्लेख करैत भाषिक-सांस्कृतिक विडम्बना रेखांकित करैत छथि: रक्त-सम्मिश्रणक ऐतिहासिक यथार्थ रहितो पंचायत-कालमे मिथिला वा किरात संस्कृतिकेँ अपेक्षित राजकीय सम्मान नहि भेटल। एहि सन्दर्भमे मैथिली अनुवाद स्वयं राष्ट्रीयता, भाषा आ सांस्कृतिक सहअस्तित्वक प्रश्नसँ जुड़ि जाइत अछि।
१४. कृतिक सीमा आ आलोचनात्मक आपत्ति
गहन समीक्षा केवल प्रशंसा नहि होइत। ’सुम्निमा’क रचनात्मक शक्ति अत्यन्त पैघ अछि, मुदा किछु प्रश्न आलोचना लेल खुलल अछि। पहिल—संस्कृति-द्वैतक सारतत्त्ववाद। ब्राह्मण = आत्मा/आकाश/शास्त्र आ किरात = देह/माटि/प्रकृतिक रूपक प्रभावी अछि, पर वास्तविक जातीय समुदायक आन्तरिक विविधताकेँ सरल बनबैत अछि। आधुनिक जातीय अध्ययन एहि द्वैतकेँ ऐतिहासिक सत्ता-संबंधक संग अधिक जटिल रूपमे देखबाक अपेक्षा करैत अछि।
दोसर—स्त्रीक प्रतीकीकरण। सुम्निमा प्रकृति आ देहक महान प्रतीक बनैत छथि, पुलोमा दमनक पीड़ा; पर पुरुष पात्रक आत्म-संकट कथाक केन्द्रीय दार्शनिक धुरी रहैत अछि। एहि कारण कखनो स्त्री पात्र पुरुषक आत्मज्ञानक माध्यम बनैत देखाइत छथि। उपन्यास एहि सीमा सँ पूर्णतः मुक्त नहि, यद्यपि सुम्निमाक सक्रिय नैतिक निर्णय आ अन्तिम सामाजिक भूमिका ओकर स्वतंत्रता मजबूत करैत अछि।
तेसर—मनोविश्लेषणक सांस्कृतिक अनुवाद। उपन्यासक यौन-मनोवैज्ञानिक संरचना अत्यन्त आधुनिक अछि, मुदा ओकरा वैदिक/किराती आदिरूपमे रखल गेल अछि। पाठक सावधान रहथि जे एहि मिथकीय कथा सँ वास्तविक ऐतिहासिक किरात अथवा वैदिक समाजक नृवंशशास्त्रीय तथ्य निष्कर्षित नहि कएल जाए। ई साहित्यिक रूपक अछि, इतिहास-पुस्तक नहि।
चारिम—कथावाचकक दार्शनिक हस्तक्षेप। छोट उपन्यासमे कतिपय ठाम प्रश्नाकुल निबन्धात्मकता कथा केँ क्षणभर रोकैत अछि। अनेक पाठक लेल ई गहनता अछि; किछु लेल प्रवाहक व्यवधान। ई शैलीगत चुनाव अछि, शुद्ध दोष नहि।
पाँचम—अनुवाद संस्करणक सम्पादकीय आवश्यकता। उपलब्ध पीडीएफमे पुरान फन्ट/कूटबद्धताक कारण डिजिटल पाठसुलभता घटैत अछि; भविष्यक यूनिकोड संस्करण, खोजयोग्य पाठ, शब्दकोश, व्यक्तिनाम-सूची, सांस्कृतिक टिप्पणी आ स्रोत-संस्करणक स्पष्ट विवरण बहुमूल्य हएत। ई साहित्यिक अनुवादक दीर्घजीविता आ शोधोपयोगिता दुनू बढ़ाओत।
१५. अनुवादकक विशिष्ट उपलब्धि : पाँच कसौटी पर मूल्यांकन