गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल योगानन्द झा
Videha Issue 451 · Research article continuation 2
एहि पाठमे समीक्षा दुइ स्तरपर चलैत अछि। पहिल स्तर पुस्तकक भीतर लेखक जे प्रतिपादन करैत छथि, तकर यथासम्भव सटीक पुनर्निर्माण अछि। दोसर स्तरमे जाँचल गेल अछि जे उदाहरण ओ प्रतिपादनक बीच सम्बन्ध कतेक मजबूत अछि, श्रेणीकरण कतय उपयोगी आ कतय अपर्याप्त अछि, सामाजिक दृष्टि कतय खुलैत अथवा संकुचित होइत अछि, आ आजुक शोधकर्ता कतेक हद धरि एहि अध्यायकेँ स्रोत अथवा तर्कक रूपमे उपयोग कऽ सकैत छथि। एहि दू स्तरक पृथक्करण बिना कोनो शोध-समीक्षा अथवा प्रशंसात्मक परिचयमे बदलि सकैत अछि, अथवा वर्तमानक मान्यता लेखकपर पूर्वव्यापी रूपे आरोपित करबाक दोषमे पड़ि सकैत अछि।
१. ‘मैथिलीक लोकसाहित्य’: मौखिक परम्पराक स्वरूप आ वर्गीकरण (पृ. १३–३०)
‘लोक’ आ ‘लोकसाहित्य’क मूल अवधारणा
एहि दीर्घ आलेखक आरम्भ लेखक ‘लोक’ शब्दक सामाजिक व्याख्यासँ करैत छथि। हिनका लेल लोकसाहित्य मूलतः सामान्य जनक अनुभव, स्मृति, विश्वास, आचार-विचार आ सामूहिक अभिव्यक्तिक क्षेत्र थिक। लिखित अथवा शास्त्रीय साहित्यसँ एकर अन्तर केवल लिपिक नहि, सर्जकक सामूहिकता, प्रसारणक मौखिकता, प्रस्तुतीकरणक अवसर आ रीति-रिवाजक संग जीवन्त सम्बन्धक अछि। लेखक ‘रस’, ‘ध्वनि’, ‘अलंकार’, ‘रीति’ आदि काव्यशास्त्रीय पदक चर्चा करैत ई संकेत दैत छथि जे लोकसाहित्यक निर्माणकेँ संस्कृत काव्यशास्त्रक नियमित अनुशासनमे नापल नहि जा सकैत अछि। एतय लोकसाहित्यक स्वतन्त्र कलात्मकता स्वीकार करबाक महत्त्वपूर्ण आग्रह अछि। (पृ. १३–१४)
मुदा एहि आरम्भक एकटा सीमा सेहो अछि। शास्त्रीय परिपाटीसँ पृथकता देखेबाक क्रममे लेखक मौखिक साहित्यकेँ कतहु-कतहु ‘स्वतःस्फूर्त’ आ अकृत्रिम मानि लेलनि अछि। लोकगीतक छन्द, धुन, पुनरावृत्ति, गायन-क्रम आ समारोहजन्य नियम सेहो अपन कठोर संरचना रखैत अछि। अतः लोक आ शास्त्रक अन्तरकेँ नियम आ नियमहीनताक विरोधक रूपमे नहि, दू भिन्न प्रकारक परम्परागत अनुशासनक रूपमे बुझब अधिक उपयुक्त अछि। ई आपत्ति पुस्तकक उदाहरणसभसँ उत्पन्न होइत अछि; कतोक गीतक निश्चित पाँतिक्रम आ प्रस्तुतिक अवसर स्वयं एहिमे उल्लिखित अछि।
वर्गीकरणक मौलिक योगदान
पुस्तकक पृ. १४–१५ पर लेखक पूर्ववर्ती वर्गीकरणसभक चर्चा कऽ अपन समेकित रूपरेखा दैत छथि। प्रस्तुत आलेखक सर्वाधिक उपयोगी अंश ओहिठामक आलेखीय वर्गीकरण अछि, जाहिमे मैथिली लोकसाहित्यकेँ दृश्य-विधा आ श्रव्य-विधाक सम्बन्धमे रखबाक प्रयास अछि। दृश्य पक्षमे लोकनृत्य आ लोकनाट्य तथा श्रव्य पक्षमे गेय आ कथ्य सामग्रीक भेद दर्शाओल गेल अछि। गेय विधामे लोकगाथा, गाथागीत आ लोकगीत; कथ्य पक्षमे लोककथा, लोकोक्ति, मुहावरा, लोकश्रुति-किंवदन्ती, फकड़ा, वचन, लोकमन्त्र आ बुझौअलि-जकाँ रूपकेँ राखल गेल अछि। वर्गीकरणक एहि क्रमसँ गीत मात्रकेँ लोकसाहित्यक पर्याय मानबाक प्रवृत्ति समाप्त होइत अछि। (विशेषतः पृ. १४–१५ पर मुद्रित वर्गीकरण-चित्र)
एहि वर्गीकरणक आलोचनात्मक परीक्षा करैत ध्यान देबाक चाही जे लोकनाट्य बहुधा गेय, कथ्य आ दृश्य तीनू होइत अछि। लोकगाथा कथा सेहो अछि आ गायन सेहो; गाथागीतक संग लोकगीतक सीमा स्थिर नहि; बुझौअलिक उच्चारण प्रदर्शनात्मक अवसर बनि सकैत अछि। अतः लेखकक नक्शा संग्रह आ पाठ्यक्रम-निर्माणक लेल उपयोगी अछि, मुदा एकरा अन्तिम वैज्ञानिक सीमांकन मानलापर विधासभक परस्पर मिश्रण छूटि जाइत अछि। अधिक सटीक सूचीकरणमे ‘रूप’, ‘प्रस्तुति-माध्यम’, ‘कार्य’, ‘अवसर’ आ ‘प्रदर्शक समुदाय’ अलग-अलग विवरणात्मक क्षेत्र बनयबाक चाही।
लोकगीतसँ लोकगाथा धरि: पाठक सामाजिक सन्दर्भ
आलेखमे संस्कार-संलग्न गीत, विवाह-विधि, ग्रामजीवन, अनुष्ठान, मौसमी अवसर आ जाति-समुदायक विशिष्ट गायनक चर्चा अछि। लोकगीतकेँ भक्तिपरक, संस्कारपरक आ सामयिक सन्दर्भक आधार पर बुझबाक प्रयास लेखक करैत छथि। एहि सूत्रमे गीत केवल शब्द-पाठ नहि, जीवनक क्रियाक संग जुड़ल अभिव्यक्ति बनि अबैत अछि। ‘कखन गाओल गेल’ आ ‘केकरा द्वारा गाओल गेल’—ई प्रश्न अर्थक अभिन्न अङ्ग होइत अछि। पुस्तकमे गीतक पाँति आ तकर सामाजिक सन्दर्भ एक संग देबाक कारण पाठक दूनू स्तरक बोध प्राप्त करैत छथि। (पृ. १६–२१)
लोकगाथाक विवेचनमे कथात्मक विस्तार आ गेय रूपक अन्तर्सम्बन्ध लेखकक ध्यानमे अछि। गीतमे कथा प्रवेश करैत अछि, आ कथामे स्थानीय नायक, समुदाय, प्रेम, वीरता अथवा लोकविश्वास प्रवेश करैत अछि। लोकगाथाक उदाहरणक उपयोगसँ मैथिली परम्पराक मौखिक इतिहासक आंशिक झलक भेटैत अछि; मुदा एहि उदाहरणकेँ घटनाक यथार्थ ऐतिहासिक अभिलेख समझब उचित नहि। लोकगाथा ऐतिहासिक स्मृति, कल्पना आ सामाजिक मूल्यक मिश्रित निर्माण होइत अछि। लेखकक सामग्री एहि तीनू पर अलग अध्ययनक आधार देबामे सक्षम अछि। (पृ. १८–२०)
कथा, कहबी, वचन, मन्त्र आ बुझौअलिक विस्तार
लोककथाक प्रसंगमे लेखक कथानक आ कथन-विन्यासक उदाहरण दैत छथि; लोकश्रुति आ किंवदन्तीमे कथा-विश्वासक सामाजिक स्वीकार्यता महत्त्व पबैत अछि। लोकोक्ति, मुहावरा आ फकड़ाक चर्चा लोकक लघु-वाक्यात्मक ज्ञानक रूपमे भेल अछि। कहबीक अल्प शब्दमे अर्थक विस्तार, व्यंग्य, व्यवहारिक चेतावनी आ मानवीय सम्बन्धक अनुभव संचित रहैत अछि। ई विशेषता लेखकक संकलनकेँ केवल साहित्यिक नहि, समाजभाषावैज्ञानिक दृष्टिएँ सेहो उपयोगी बनबैत अछि। (पृ. २२–२६)
लोकमन्त्र आ बुझौअलिक चर्चासँ पुस्तकक विषयपरिधि आरो विस्तृत होइत अछि। मन्त्रमे विश्वास, रोग-भय अथवा संकटसँ रक्षाक आकांक्षा भाषा द्वारा प्रकट होइत अछि; बुझौअलिमे कल्पना आ बौद्धिक खेलक रूप सोझाँ अबैत अछि। एहि दुनू विधाक समीक्षा करैत ई भेद महत्त्वपूर्ण अछि जे मन्त्रक सांस्कृतिक भूमिका ओकर चिकित्सकीय प्रभावशीलताक प्रमाण नहि, आ बुझौअलिक उत्तर ओकर शब्द-रचनाक संयोगपर निर्भर करैत अछि। ग्रन्थक भाषिक उदाहरण अध्ययनयोग्य अछि, किन्तु वैद्यकीय, धार्मिक अथवा ऐतिहासिक दावाक स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक रहत। (पृ. २६–२८)
संकलनक इतिहास आ आलोचनात्मक सीमा
आलेखक अन्तिम भागमे लेखक मैथिली लोकसाहित्यक पूर्ववर्ती संकलन-प्रयास, अनुसन्धानक कठिनाइ आ सामग्री-संरक्षणक आवश्यकता पर विचार करैत छथि। एतय लोकवस्तुक नष्ट होइत मौखिक परम्पराकेँ लिखित रूपमे सुरक्षित करबाक चिन्ता प्रमुख अछि। ई विषय २००२क पुस्तकक एकटा जीवित प्रश्न बनल रहैत अछि: लोकगीतक शब्द लिखि लेब मात्रसँ धुन, गायक-शैली, प्रस्तुति-अवसर, श्रोता-प्रतिक्रिया आ एकरे अनेक पाठान्तर सुरक्षित नहि होइत अछि। एहि कारण सँ पृ. १३–३० पर प्रस्तुत वर्गीकरणकेँ क्षेत्रीय अभिलेखनक अग्रिम रूपरेखा मानल जा सकैत अछि, सम्पूर्ण अभिलेख नहि।
आलेखक समेकित उपलब्धि मैथिली लोकवृत्तक विवेचनमे गीत, कथा, कहबी, लोकमन्त्र आ नाटकक परस्पर सम्बन्ध स्थापित करब अछि। किन्तु संग्रहक प्रत्येक उदाहरण लेल स्थान, सूचनादाता, संकलन-तिथि आ पाठान्तरक पृथक साक्ष्य देल रहितय तँ ई सामग्री आजुक लोकसाहित्य-अनुसन्धानमे आरो अधिक जाँचयोग्य होइत। ई आलोचना पुस्तकमे प्रस्तुत उदाहरणक महत्व घटबैत नहि, अपितु ओकरा भविष्यक अभिलेख-निर्माणक उपयुक्त आरम्भिक आधारक रूपमे देखैत अछि।
२. ‘लोकोक्तिमे मलाह जाति’: व्यवसाय आ कहबीक अन्तर्सम्बन्ध (पृ. ३१–३५)
सामाजिक जीवनक पेशागत शब्द-संसार
एहि आलेखमे लेखक मलाह समुदायसँ सम्बद्ध कहबी-लोकोक्तिक माध्यमे मिथिलाक नदीप्रधान जीवनक परिचय दैत छथि। माछ, मखान, सिंघाड़ा, नाव, जाल, बंसी, डेली, माछक जाति आ जलचरसँ जुड़ल शब्द-सम्पदाकेँ लेखक सामाजिक व्यवहारक कथनक संग जोड़ैत छथि। एहि सम्बन्धमे लेखकक मुख्य प्रतिपादन ई अछि जे व्यवसाय मात्र आर्थिक गतिविधि नहि, लोकसमाजक अनुभवक भाषा बनबैत अछि। जल-व्यवसायमे प्रयुक्त उपकरण आ क्रियासँ उत्पन्न अभिव्यक्ति कालान्तरमे अन्य सामाजिक प्रसंगक लेल उपमा, व्यंग्य अथवा चेतावनी बनि जाइत अछि। (पृ. ३१–३२)
लेखक समुदायसम्बद्ध उपनाम आ उपजातिक उल्लेख करैत पेशागत पहचानक व्यापक सामाजिक पृष्ठभूमि बनबैत छथि। मुदा एहि जानकारीकेँ वर्तमानक सम्पूर्ण समुदाय-वर्गीकरण मानब अनुचित होयत; ई पोथीमे प्रस्तुत विवरण थिक, सर्वेक्षणसँ प्रमाणित नवीन जनसांख्यिकीय आँकड़ा नहि। एहि अन्तरक ध्यान रखैत पढ़लापर आलेख सामाजिक इतिहासक शब्दप्रधान स्रोत बनैत अछि। (पृ. ३१)
उपकरणक अर्थसँ रूपकक अर्थ धरि
‘जाल पसरब’, नाव चलायब, ‘खेबा’, बंसी आ माछक उल्लेख लेखक अनेक लोकोक्तिमे देखबैत छथि। जालक वास्तविक उपयोग क्षेत्र-प्रसारक बिम्ब बनैत अछि; बंसीमे फँसल माछ अनुभवक कारण फेर सावधान होयबाक संकेत बनि सकैत अछि; नावक खेवनिहारक कुशलता सामाजिक नेतृत्व अथवा कार्य-संचालनक रूपक बनि सकैत अछि। एहि उदाहरणसभमे प्रत्यक्ष व्यवसायगत क्रिया आ अप्रत्यक्ष सामाजिक अर्थक बीच अर्थान्तरणक प्रक्रिया देखाइत अछि। एहि दृष्टिएँ आलेख शब्दार्थक अध्ययनसँ आगाँ बढ़ि लोक-रूपक-विज्ञानक सामग्री उपलब्ध करबैत अछि। (पृ. ३१–३३)
माछक भिन्न-भिन्न नाम, ओकर स्वाद, मूल्य आ व्यवहारक सम्बन्धमे प्रचलित कहबीसभक संग लेखक भोजन-संस्कृति आ बाजार-विनिमयक वर्णन करैत छथि। ‘सुकठी’क व्यापार आ पशुपतिनाथ-दर्शनक संयोगजकाँ प्रसंग व्यवसायसँ धार्मिक यात्रा धरि एकहि कथनमे अनेक सामाजिक अर्थ जोड़ैत अछि। एहि प्रकारक उदाहरण अध्ययनक लेल उपयोगी अछि, मुदा कहबीमे वर्णित व्यापारिक व्यवहार सभ दिन एकहि रूपमे उपस्थित छल, एकर स्वतन्त्र अभिलेख एहि आलेखक भीतर उपलब्ध नहि। अतः लोकोक्तिक सामाजिक कल्पना आ दस्तावेजी इतिहासकेँ पृथक रखबाक आवश्यकता अछि। (पृ. ३३)
हास्य, व्यंग्य आ पूर्वाग्रहक विश्लेषण
एहि कहबीसभमे बुद्धि, आलस्य, लोभ, कंजूसी, अतिथि-व्यवहार, लाभ आ दुर्भाग्य पर तीक्ष्ण टिप्पणी अछि। बगुलाक कथित तपस्या, माछक स्वभाव, कछुआ अथवा केकड़ाक व्यवहार लोकनीतिक प्रसंग बनैत अछि। लेखक एहि मुहावरासभक आशय अलग-अलग खोलैत छथि, जाहिसँ सामान्य पाठक केँ सन्दर्भ बुझबाक सुविधा होइत अछि। ई व्याख्यात्मक परिश्रम आलेखक एकटा स्पष्ट उपलब्धि अछि। (पृ. ३३–३५)
तथापि हास्य आ कहबीक प्रयोगकेँ निरपेक्ष लोकबुद्धिक प्रमाण मानब सन्देहास्पद अछि। व्यवसाय आ जातिक प्रति उपहास, किछु खाद्य-पदार्थक दर्जाक निर्धारण, अथवा समुदायपर आरोपित स्वभाव सामाजिक शक्ति-सम्बन्धक चिन्ह सेहो भऽ सकैत अछि। कहबी कहनिहार समुदाय आ ओकर लक्ष्य समूह जखन अलग होइत अछि, तखन अर्थमे व्यंग्यक संग प्रभुत्वक भाषा सेहो समाहित भऽ सकैत अछि। एहि दृष्टिकोणसँ अगिला अनुसन्धानकेँ ई देखबाक चाही जे मलाह समाज अपन विषयमे प्रचलित कहबीकेँ स्वयं कोना बुझैत अछि। लेखकक संकलन एहन प्रश्न उठेबाक प्रेरणा दैत अछि, यद्यपि ओ स्वयं एहि विमर्शकेँ प्रमुख विषय नहि बनबैत छथि।
आलेखक निष्पत्ति
पाँच पृष्ठक एहि आलेखक वास्तविक मूल्य कहबीक संख्या मात्र नहि, ओकर व्यावसायिक शब्द-संरचना आ सामाजिक अर्थक सम्बन्ध उजागर करब अछि। आरम्भक लेखक कथनमे जल-व्यवसायकेँ मिथिलाक प्राचीन जीवनक एकटा महत्त्वपूर्ण आधार बताओल गेल अछि, आ अन्तमे लोकोक्तिक विस्तारकेँ एहि पृष्ठभूमिक प्रमाण मानल गेल अछि। परन्तु ‘कहबीक व्यापकता’सँ ‘सर्वाधिक प्राचीन व्यवसाय’क ऐतिहासिक निष्कर्ष सीधे निकालब पर्याप्त नहि। ताहि लेल पुरातात्त्विक, आर्थिक आ अभिलेखीय स्रोत आवश्यक होयत। एतय लेखकक निष्कर्षकेँ लोकसाहित्यसँ उत्पन्न ऐतिहासिक परिकल्पनाक रूपमे ग्रहण करब अधिक प्रमाणसम्मत अछि।
३. ‘विद्यापतिक राधाक स्वरूप’: भक्ति, काम आ काव्यक बहुव्याख्या (पृ. ३६–४२)
एकहि राधाक अनेक पाठ
आलेखक प्रारम्भमे राधा भारतीय साहित्य आ धार्मिक कल्पनाक ओहन पात्रक रूपमे प्रस्तुत छथि, जिनकामे प्रेम, अनुराग, दैहिक सौन्दर्य, समर्पण आ आध्यात्मिकता अनेक भिन्न अर्थ प्राप्त करैत अछि। योगानन्द झा राधाकेँ एकटा निश्चित धार्मिक प्रतीकमे सीमित नहि करैत, तीनटा व्याख्यात्मक क्षेत्र—वैष्णवी, कामशास्त्रीय आ काव्यशास्त्रीय—क माध्यमे विद्यापतिक पदावली देखैत छथि। एकरे कारण आलेख प्रचलित मतक पुनरावृत्ति मात्र नहि रहि पाठ-व्याख्याक पद्धति सम्बन्धी विमर्श बनि जाइत अछि। (पृ. ३६–३७)
वैष्णवी स्वरूपक समीक्षा
राधाक वैष्णवी स्वरूप वर्णित करैत लेखक पुराण-परम्परा, कृष्णप्रेम, नदिया आ सहजिया वैष्णव परम्पराक धारणा, तथा जीवात्मा-परमात्माक रूपकक चर्चा करैत छथि। ई भेद स्पष्ट अछि जे भावात्मक प्रेमक पदकेँ धार्मिक अनुभवक रूपमे पढ़ल जाय अथवा लौकिक विरहक रूपमे—दूनू सम्भावना पाठक समक्ष रहैत अछि। लेखक अनेक आलोचकक मतान्तर उपस्थित कऽ ई देखबैत छथि जे बंगीय वैष्णव सन्दर्भमे स्थापित राधाभावक व्याख्या विद्यापतिक प्रत्येक पदपर समान रूपसँ लागू कएल नहि जा सकैत अछि। (पृ. ३७–३९)
एहि तर्कक विशेषता एकार्थवादी पाठक प्रतिरोध अछि। राधाक विरहकेँ केवल आध्यात्मिक प्रतीक मानला पर शरीर, सामाजिक जोखिम, लोकलाज आ प्रेमक पीड़ा अनदेखल रहि सकैत अछि; केवल लौकिक शृंगार मानला पर भक्ति-परम्परामे पदसभक ग्रहण आ पुनर्पाठक इतिहास अदृश्य भऽ सकैत अछि। लेखकक विवेचन एहि दूनू अतिशयताकेँ आलोचनात्मक रूपे देखबाक अवसर दैत अछि। मुदा विद्यापतिक रचनाक मूल काल-सन्दर्भ आ उत्तरवर्ती वैष्णव पाठक ग्रहण-इतिहास स्पष्ट पृथक खण्डमे देल गेल रहितय तँ कालक्रमक स्तर पर तर्क आरो मजबूत होइत।
कामशास्त्रीय स्वरूप आ नैतिक निर्णयक प्रश्न
आलेखक दोसर पक्ष राधाक कामशास्त्रीय निरूपण अछि। एतय नारी-सौन्दर्य, प्रणयोपचार, रतिक अवस्था, अंगवर्णन, विलास-प्रसंग आ देहगत अनुभवकेँ लेखक पाठक प्रमाणसँ जोड़ैत छथि। राधाकेँ केवल पूजा-अर्चनाक अलौकिक मूर्ति मानबाक बदलामे कवि द्वारा सृजित अनुभवशील नायिका मानबाक ई एकटा उपाय अछि। एहि प्रसंगमे लेखक विद्यापति पर लगैत अश्लीलताक आरोपक चर्चा कऽ विरहिणी राधाक वेदनाक कलात्मक संवेदनाकेँ ओहि आरोपक विरुद्ध महत्वपूर्ण मानैत छथि। (पृ. ३९–४०)
एकर आलोचनात्मक उपलब्धि यौन-अभिव्यक्तिक कलात्मक प्रश्नकेँ नैतिक लांछनसँ अलग करबाक प्रयास अछि। परन्तु कामशास्त्रीय वर्गमे प्रत्येक सौन्दर्यबिम्बकेँ रखबाक जोखिम सेहो छैक: पदक भाव, बोलनिहारक स्थिति, सखी-संवाद, हास्य, संकोच आ प्रतीकात्मकता सभकेँ केवल कामशास्त्रक सूचीमे बदलि देलापर कविताक मौलिक नाटकीयता घटि सकैत अछि। आलेखक अन्दर साक्ष्यक विस्तार देखाइत अछि, मुदा पाठान्तर आ गीतक संगीत-सन्दर्भक प्रत्यक्ष चर्चा अपेक्षाकृत कम अछि। एहि दूनू क्षेत्रक समावेश राधा-व्याख्याक बहुपरतीयता आरो बढ़ा सकैत अछि।
काव्यशास्त्रीय वर्गीकरणक उपयोगिता
तेसर प्रमुख भागमे राधा शृंगार-रसक आलम्बन, नायिका-भेद आ अनुभाव-व्यभिचारी भावक अनुषंगमे विवेचित छथि। लेखक स्वकीया-परकीया, मुग्धा-मध्या-प्रौढ़ा, अभिसारिका, खण्डिता, मानिनी आ विरहिणी-जकाँ अनेक नायिका-अवस्थाक चर्चा करैत छथि। एहि सूचीक उपयोगिता ई अछि जे राधाक रूप गतिहीन प्रतिमा नहि रहि परिस्थिति-विशेषमे बदलैत पात्रक रूपमे देखाइत अछि। एकहि नायिका प्रेमक अलग-अलग अवसरमे भिन्न सामाजिक आ भावनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करैत छथि। (पृ. ४०–४१)
एहि वर्गीकरणक सीमा सेहो कविता आ काव्यशास्त्रक बीच सम्बन्धमे अछि। आलोचनाक उद्देश्य केवल ई प्रमाणित करब नहि जे अमुक पद अमुक नायिका-भेदमे समाहित अछि; मुख्य प्रश्न ई अछि जे ओहि पदमे विद्यापतिक काव्यभाषा पारम्परिक भेदकेँ कोना परिवर्तित करैत अछि। पुस्तकक अन्तिम निष्कर्षमे राधाक एकरे अनेक रूपकेँ समेकित देखबाक आग्रह एहि सीमाक समाधान दिस संकेत करैत अछि। लेखक एकाङ्गी विद्वत्-व्याख्याक आलोचना करैत राधाकेँ रस, साधना, सौन्दर्य आ अनुभूतिक संगम मानैत छथि। (पृ. ४१–४२)
समग्र निर्णय
ई आलेखक केन्द्रवर्ती योगदान कोनो एकटा ‘अन्तिम राधा’ घोषित करब नहि, वरन् राधा-विवेचनमे प्रयुक्त भिन्न-भिन्न व्याख्यात्मक उपकरणक सीमा स्पष्ट करब अछि। अहिना विद्यापति अध्ययनमे सम्प्रदायगत ग्रहण, साहित्यशास्त्र आ लौकिक अनुभूतिक स्तर परस्पर संवाद करैत अछि। आलोचकक दृष्टिमे ई बहुविधता स्वयं साहित्यक समृद्धि थिक; शोधार्थीक लेल शिक्षा ई जे पदक प्रसंग, भाषा, भाव, पाठान्तर आ उत्तरवर्ती व्याख्या अलग-अलग प्रमाण-वर्गमे रखि तखन समेकित निष्कर्ष निकालल जाय।
४. ‘विद्यापतिक पार्वतीक स्वरूप’: शाक्त अवधारणा आ गृहस्थ जीवनक यथार्थ (पृ. ४३–५२)
पौराणिक पात्रसँ मैथिल नारीक अनुभव धरि
लेखक पार्वतीक अध्ययनक आरम्भ नारीक कन्या, भार्या आ माता—एहि तीन सामाजिक अवस्थाक उल्लेखसँ करैत छथि। गौरी, उमा, भवानी आ माहेश्वरीक पौराणिक पहचान उपस्थित करैत ओ मिथिलामे गौरीपूजनक वैवाहिक प्रसंगसँ विद्यापतिक पदावली धरि पहुँचैत छथि। ई पद्धति पाठककेँ बुझबैत अछि जे शिव-पार्वतीक कथा स्थानीय सांस्कृतिक अर्थ प्राप्त करैत कोना पारिवारिक जीवनक कथा बनि जाइत अछि। गौरीक पूजा केवल देवपूजन नहि, मनोवाञ्छित वर, सौभाग्य, दाम्पत्य-सहयोग आ घरेलू स्थिरतासँ जोड़ल लोकविश्वासक एकटा सामाजिक रूप सेहो अछि। (पृ. ४३–४४)
एहि आरम्भमे संस्कृति आ साहित्यक सम्बन्ध सघन अछि। पार्वतीक पौराणिक श्रेष्ठता आ सामान्य कन्याक वैवाहिक विवशता बीच दूरी रहितो लेखक पदावलीमे हुनक पारस्परिक प्रविष्टि देखैत छथि। एहि कारण आलेखकेँ केवल शिव-पार्वतीक चरित्र-परिचय मानब उचित नहि; एकरा पढ़ैत काल विवाह-संस्था, स्त्रीक निर्णयाधिकार, आर्थिक विपन्नता आ पारिवारिक मान-अपमान जकाँ सामाजिक प्रश्न लगातार सोझाँ अबैत अछि।
पराशक्ति आ घरेलू चरित्रक द्वैत
आलेखमे देवीमाहात्म्यक सन्दर्भसँ गौरीक पराशक्ति-स्वरूपक विवेचन अछि। ब्रह्मा, विष्णु आ शिवक शक्तिरूपक समेकन, सृष्टि-पालन-संहारक अवधारणा आ देवीक विविध रूपक वर्णनसँ लेखक शाक्त साहित्यिक पृष्ठभूमि स्थापित करैत छथि। ई पृष्ठभूमि आवश्यक अछि कारण विद्यापतिक पदावलीमे शिवपत्नीक घरेलू व्यवहारक संगहि शक्तिस्वरूपिणी देवीक महिमा उपस्थित अछि। लौकिक आ अलौकिक दूनू स्तर बिना पाठक गौरीक चित्र अपूर्ण रहि सकैत अछि। (पृ. ४४–४५)
एहि द्वैतक व्याख्या लेखकक श्रेष्ठ आलोचनात्मक कार्यसभमे अछि। एक दिस पार्वती जगत्शक्ति छथि; दोसर दिस ओ कम आय, भिक्षाटन, अस्थिर भोजन-व्यवस्था आ पतिक नशाक कारण दुखी स्त्रीक रूपमे चित्रित छथि। एहि दुइ रूपकेँ विरोध नहि, काव्यक अर्थोत्पादक तनाव मानल जा सकैत अछि। जखन देवी साधारण गृहिणीक चिन्तामे बोलैत छथि, तखन लोकपाठक धार्मिक पात्र अपन परिचित परिवेशमे उतारि अनैत अछि। एहि रूपान्तरणमे विद्यापतिक हास्य आ करुणा एक दोसरकेँ सबल करैत अछि। (पृ. ४७–५१)
पूर्वराग, परिणय आ अनमेल विवाह
पार्वतीक पूर्वरागक चर्चा करैत लेखक तपस्वी शिवकेँ देखलाक बाद गौरीक आकृष्ट होयब, मेनाक सन्देह, वरक रूप-रङ्ग, उम्र, धनहीनता आ विवाहक सामाजिक दबावक प्रसंग प्रस्तुत करैत छथि। शिवक कुरूपता आ निर्धनता पर हँसी केनिहार लोकसमुदायक समक्ष मेनाक क्रोधक अन्तर्गत मातृत्वक भय अछि। लेखक एहि प्रसंगकेँ मैथिल समाजमे अनमेल विवाहक अनुभूतिसँ जोड़ैत छथि। एहि जोड़सँ पौराणिक कथा सामाजिक आलोचनाक रूप पबैत अछि। (पृ. ४५–४६)
महत्त्वपूर्ण प्रश्न ई अछि जे विवाहमे कन्याक अभिलाषा आ परिवारक निर्णयक सम्बन्ध केना बनैत अछि। लेखक कतोक पदक आधार पर गौरीक प्रेमनिष्ठा आ परिवारक विवशताकेँ एकहि कथामे पहचानैत छथि। मुदा जखन विवश स्वीकृतिकेँ आदर्श स्त्रीधर्म मानबाक पुरातन दृष्टि प्रमुख बनैत अछि, तखन नारीक स्वतन्त्र इच्छा पाछाँ छूटि सकैत अछि। आलेखक सामग्री स्वयं एहि तनाबकेँ उजागर करैत अछि: गौरी प्रेम करैत छथि, विरोध अथवा असन्तोषक परिवेश देखैत छथि, आ तकर बाद सामाजिक मर्यादा भीतर अपन स्थान निर्माण करैत छथि। एतय आलोचनात्मक पाठकेँ समर्पण आ प्रतिरोध दूनू पढ़बाक चाही।
पतिनिष्ठा, नैहरक उपेक्षा आ आर्थिक असुरक्षा
लेखक विवाहित गौरीक पतिनिष्ठाक अनेक पद उद्धृत करैत छथि। शिवक अपमान होयब, सासुर-नैहरक सम्बन्धमे तकर प्रभाव पड़ब, आर्थिक रूपसँ असमर्थ पतिक उपेक्षा सहब—ई उदाहरण मिथिलाक दाम्पत्य जीवनक वर्गीय आ सामाजिक यथार्थ सोझाँ अनैत अछि। विशेषतः नैहरमे शिवक अनादर आ पार्वतीक मौन ग्लानि-वेदना वाला प्रसंग नायिकाक गुप्त मनःस्थिति प्रकट करैत अछि। लेखक एहि मौनकेँ लज्जा, स्नेह, मान आ मर्यादाक बीच संघर्षक रूपमे व्याख्यायित करैत छथि। (पृ. ४६–४८)
आर्थिक अभावक अंशमे शिवक भिक्षाटन आ घरक दैन्य मुख्य कारण बनैत अछि। गौरीक चिन्ता महज धनलोभ नहि, भोजन, घर, वस्त्र आ परिवारक जीवनयापनक व्यावहारिक समस्या थिक। एहि बिन्दुपर लेख आलोचनासँ अधिक समाजार्थिक पाठ बनि जाइत अछि। शैव पदावलीमे स्त्रीक श्रम आ गृहस्थी पर पड़ैत आर्थिक दबावकेँ लेखक पहचानैत छथि। ई दृष्टि विद्यापतिक शैव गीतकेँ केवल भक्तिपरक पाठसँ अलग सामाजिक दस्तावेजक काव्यात्मक रूपमे देखबाक अवसर दैत अछि। (पृ. ४८–४९)
साचिव्य, व्यसन-विरोध आ दाम्पत्यक सक्रिय नारी
पार्वतीक ‘साचिव्य’क व्याख्या एहि आलेखक महत्त्वपूर्ण मौलिक पक्ष अछि। गौरी शिवकेँ श्रम आ कृषि-कर्म करबाक सलाह दैत छथि, भिक्षाटनसँ प्रतिष्ठाक हानि पर विचार रखैत छथि आ भाङ-प्रसंगक परिणामपर चिन्तित होइत छथि। ई नारी मात्र पतिक अनुगामिनी नहि; ओ घरेलू अर्थनीति आ आचरणमे विवेकशील हस्तक्षेप करैत छथि। लेखक एहि सलाहकेँ पत्नी-सुलभ करुणा, स्नेह आ सुधारक सक्रियताक परिचायक मानैत छथि। (पृ. ५०–५१)
एतय आधुनिक आलोचनाक लेल सूक्ष्म अन्तर राखब आवश्यक अछि। ‘पतिनिष्ठा’क आदर्शक अन्तर्गत पत्नीकेँ पतिक सुधारक बनाओल गेल अछि, मुदा पतिक व्यसन, काम-विभाजन आ संसाधन-वितरणपर प्रश्न उठायब स्त्रीक आलोचनात्मक चेतनाक साक्ष्य सेहो अछि। पार्वतीक कथनमे केवल त्याग नहि, पारिवारिक निर्णयक प्रश्न सेहो उपस्थित अछि। लेखकक उदाहरणसभक एहि पुनर्पाठसँ गीतक सामाजिक गम्भीरता आरो स्पष्ट होइत अछि।
मुख्य आलोचनात्मक उपलब्धि
एहि आलेखमे विद्यापतिक पार्वती शाक्त उपासनाक मूर्ति, प्रेममे आकुल कन्या, विवाहक तनावमे फँसल नारी, अपमान सहनिहार पत्नी आ गृहस्थीक व्यावहारिक सलाहकार—सभ रूपमे अबैत छथि। लेखकक विश्लेषणक सार्थकता एहि बहुस्तरीय चरित्र-निर्माणमे अछि। तथापि लोकक विवाहगीत आ विद्यापतिक मूल पदक पाठ-परम्परा अलग-अलग स्रोतमे तुलना कएल जाए तँ कोन मोटिफ पदावलीक निजी सर्जना अछि आ कोन व्यापक मिथिला-लोकपरम्पराक अंश, से आरो स्पष्ट होयत। एहि सम्भावनाकेँ पुस्तकक सामग्री पर्याप्त आधार दैत अछि।
५. ‘सुमनजीक मुक्तककाव्यमे नारी’: परम्परा, प्रकृति आ सामाजिक नारी-रूप (पृ. ५३–६४)
आलोचनाक चारि प्रमुख कोटि
सुमनजीक कविता सम्बन्धी आलेख चारि प्रमुख कोटिमे नारी-चित्रणक विवेचन करैत अछि: पौराणिक स्वरूप, प्रकृतिमे आरोपित स्वरूप, काव्यशास्त्रीय स्वरूप आ लौकिक स्वरूप। ई कोटि सरल शीर्षक नहि; प्रत्येकक संग नारीक स्थान, रूपायनक विधि आ कविक भावनात्मक अभिप्रायक अन्तर बदलैत अछि। लेखक पहिले भारतीय सांस्कृतिक दृष्टिमे नारीक महिमा प्रस्तुत करैत छथि, तखन सुमनजीक अनेक काव्य-रचनाक आधार पर एहि चारि रूपक विस्तार करैत छथि। (पृ. ५३–५४)
एहि वर्गीकरणक एकटा मुख्य लाभ ई अछि जे नारीकेँ मात्र शृंगारक पात्रक रूपमे सीमित नहि कएल गेल अछि। देवीक शक्ति, प्रकृतिक जीवित प्रतिमा, काव्यक नायिका आ घर-समाजक व्यक्ति—प्रत्येक रूपक अलग सांस्कृतिक प्रयोजन अछि। मुदा एहि कोटिसभक बीच सम्बन्ध प्रश्नातीत नहि। मातृत्व पौराणिक आ लौकिक दूनूमे अबैत अछि; प्रकृतिमे आरोपित स्त्री सेहो शृंगारशास्त्रीय प्रतिमासँ निर्मित भऽ सकैत अछि; अतः वर्गीकरण अध्ययनक सुविधा दैत अछि, सर्वथा पृथक वस्तुस्थितिक दावा नहि।
पौराणिक देवी आ घरक श्रम
पौराणिक कोटिमे लेखक शक्तिरूपिणी नारी, देवीक अनेक अभिधान, सृष्टि-पालनक कल्पना आ सुमनजीक शक्तिस्तुति-साहित्यक चर्चा करैत छथि। विशेष बात ई जे देवीक उच्च शास्त्रीय रूपक बाद लेख घरेलू स्त्रीक दैनिक श्रमक सजीव चित्र दिस मुड़ैत अछि। घर, द्वार, बाल-बच्चा, साफ-सफाइ आ परिवारक व्यवस्थामे व्यस्त स्त्रीकेँ शक्तिक सामाजिक रूपक रूपमे देखाओल गेल अछि। एहि प्रसंगमे कविताक घरेलू क्रियासभ नारीक कार्यदक्षता आ सामाजिक अदृश्य श्रमक बिम्ब बनि अबैत अछि। (पृ. ५४–५५)
एतय एकटा द्वन्द्व अछि। घरक नारीकेँ देवी कहब सम्मानक भाषिक रूप थिक, मुदा एहि सम्मानक आड़मे ओकर श्रमक असमान वितरण, शिक्षा-अवसरक अभाव आ स्वायत्तताक सीमा ओझरायल नहि रहबाक चाही। पुस्तकक आलेख सुमनजीक संवेदनशील चित्रणक प्रशंसा करैत अछि, किन्तु घरेलू शक्तिरूपक अन्तर्गत स्त्रीपर पड़ैत सामाजिक दायित्वक आलोचनात्मक परीक्षण अपेक्षाकृत कम करैत अछि। आजुक पाठक एहि कवितासभमे आदर्शीकरण आ यथार्थ—दूनू प्रश्न देखब।
प्रकृतिक नारीकरण: बिम्ब-विधानक कार्य
प्रकृतिमे आरोपित स्वरूपवाला खण्डमे चान, इजोरिया, लता, किसलय, ऋतु, नदी आ मौसमक मानवीकरण उपस्थित अछि। लेखक नारीक रूप, वयःस्थिति, स्वर, भाव आ वात्सल्यकेँ प्रकृतिक दृश्य आ अनुभवक संग जोड़ैत सुमनजीक काव्यक सौन्दर्य-विन्यास बुझबैत छथि। ‘इजोरिया’केँ स्त्रीक रूपमे देखब प्रकृति-वर्णनक एकटा विशिष्ट कल्पनाशील उपाय अछि; एतय बाहरी संसारकेँ मानवीय सम्बन्धसँ अर्थवान बनाओल जाइत अछि। (पृ. ५५–५७)
लेखकक एक महत्त्वपूर्ण अवलोकन ई अछि जे प्रकृतिक सौन्दर्यक संग नारीक भीतरी वेदना, करुणा आ मातृत्व सेहो जुड़ल अछि। शरदक वृद्धा-माताक स्वरूप होअय अथवा वर्षाक वात्सल्यपूर्ण प्रकृति—एहि चित्रसभसँ नारीक जीवनकेँ केवल युवती-सौन्दर्यक संकीर्ण दायरासँ बाहर अनबाक प्रयास देखाइत अछि। एहि उदाहरणसभक बल पर प्रकृति-काव्यक समीक्षा केवल अलंकारक सूची नहि रहि भावक इतिहास बनैत अछि। (पृ. ५७–५८)
तथापि प्रकृतिक नारीकरणक सांस्कृतिक राजनीति पर प्रश्न उठेब आवश्यक अछि। स्त्रीकेँ ‘स्वाभाविक रूपसँ’ ममतामयी, त्यागमयी आ सौन्दर्यमयी मानबाक रूढ़ि सामाजिक भूमिकाकेँ प्राकृतिक सत्यजकाँ प्रस्तुत करि सकैत अछि। सुमनजीक काव्यबिम्बक कलात्मकता स्वीकार करैत ई सेहो देखल जाय जे कोन सामाजिक अपेक्षा एहन रूपकद्वारा पुष्ट होइत अछि आ कोन जीवनानुभव अदृश्य रहि जाइत अछि। एहि स्तरपर लेखकक आलोचनात्मक सामग्री पुनर्विचारक लेल उपयोगी अछि।
नायिका-भेद, ‘ललना-लहरी’ आ परम्परागत शिल्प
काव्यशास्त्रीय खण्डमे लेखक नख-शिख वर्णन, नायिका-भेद, वयःसन्धि, अलंकार, देशभेद, रस आ वृत्तिक आधार पर कवितासभ पढ़ैत छथि। ‘ललना-लहरी’जकाँ रचनामे क्षेत्रानुसार नारीक सौन्दर्य आ प्रवृत्तिक काव्यात्मक वर्गीकरण तथा संस्कृत काव्यशास्त्रक भेदसभक प्रयोग चिन्हित कएल गेल अछि। लेखक ईहो स्वीकार करैत छथि जे कतिपय नारी-चित्र पुरातन परम्पराक पुनरावृत्ति बनि जाइत अछि आ ताहिमे नूतनता सीमित रहैत अछि। ई आत्मसचेत आलोचना आलेखक गुण थिक; लेखक केवल प्रशंसात्मक निर्णय नहि देैत छथि। (पृ. ५८–६१)
एहि खण्डमे काव्यशास्त्रीय शब्दसंग्रहक प्राचुर्यसँ आलोचनाक ज्ञानपरकता बढ़ैत अछि, मुदा नारी-चित्रक स्वयं बोलबाक स्थानक परीक्षण कम होइत अछि। नायिका-भेदक सूचीमे पात्र प्रायः बाह्यदृष्टिसँ निरूपित होइत छथि। एखन शोधक प्रश्न होयत जे सुमनजीक रचनामे स्त्रीक निजी कथन, संवाद, निर्णय आ प्रतिरोध कतेक भेटैत अछि। केवल रूप-वर्गीकरणसँ ई प्रश्नक उत्तर नहि भेटि सकैत अछि।
लौकिक नारी: प्रेमिका, पत्नी, कन्या, माता
लौकिक स्वरूपक अन्तर्गत लेखक पारिवारिक सम्बन्धक अनेक अवस्था देखैत छथि। कन्याक विदाइ, प्रियाक आशा, विवाहित जीवनक सहचर्य, माँक वात्सल्य आ विधवाक वेदनाक चर्चा नारी-अनुभवक भावात्मक विस्तार दैत अछि। सुमनजीक रचनामे राष्ट्रबोध आ कर्मप्रेरणाक प्रसंगमे नारी शक्तिरूपमे आवाहन कएल जाइत छथि। लेखक एहि बहुविध रूपकेँ कविक सामाजिक चेतना आ करुणाशीलताक साक्ष्य मानैत छथि। (पृ. ६१–६४)
एहि विवेचनक सशक्त पक्ष नारीक सौन्दर्यबोधसँ सामाजिक संवेदना धरि क्रमिक विस्तार अछि। मुदा ‘माता, पत्नी, बहिन, कन्या’ एहन सम्बन्ध-सूची नारीक स्वायत्त नागरिक व्यक्तित्वक सम्पूर्ण परिभाषा नहि। लेखिका, श्रमिक, शिक्षार्थिनी अथवा निर्णय लेनिहार स्त्रीक व्यक्तिगत चेतनाक अनुपस्थिति स्वयं अध्ययनक विषय बनि सकैत अछि। लेखकक काल-सन्दर्भक भीतर एहि कमीकेँ देखैत ‘सुमनजीक नारी-चित्रण’केँ कविक संवेदनशीलता आ परम्परागत लिंग-भूमिकाक द्वैतक रूपमे समझब अधिक न्यायसंगत होयत।
समग्र मूल्यांकन
बारह पृष्ठक एहि आलेखक महत्त्व ई जे लेखक नारीक साहित्यिक कल्पनाक सम्बन्ध पुराण, प्रकृति, शास्त्र आ परिवारसँ एक संग जोड़ैत छथि। काव्यक परम्परागत चमत्कार आ नारीक घरेलू जीवनक यथार्थक बीच आलोचनात्मक अन्तर देखबाक आधार तैयार होइत अछि। जँ एहि आलेखकेँ अगिला अनुसन्धानक आधार बनाओल जाय, तँ सुमनजीक मूल कविता-प्रकाशनक काल, संग्रहानुसार भिन्नता आ स्त्रीक स्वतन्त्र वाणीकेँ अलग विश्लेषणात्मक स्तम्भ बनायब उपयोगी होयत।
६. ‘अमरजी ओ हुनक मैथिली पत्रकारिताक इतिहास’: साहित्यकारक रचनात्मकता आ इतिहासलेखनक समीक्षा (पृ. ६५–७८)
व्यक्तित्वपरक आलेखसँ पुस्तक-समीक्षा धरि
एहि आलेखमे डॉ. योगानन्द झा पहिले चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’क शिक्षण, साहित्यसेवा, कविता, हास्य-व्यंग्य, नाटक, कथा आ पत्रकारितासँ जुड़ल गतिविधिक विवरण प्रस्तुत करैत छथि। तखन अमरजीक ‘मैथिली पत्रकारिताक इतिहास’क उद्देश्य, सामग्री, कालविभाजन, पत्र-पत्रिकाक विश्लेषण आ निष्कर्षपर विवेचन करैत छथि। ई रचना साधारण जीवनपरिचय अथवा प्रशंसापरक पुस्तक-समीक्षा नहि; एकटा इतिहासकारक जीवनानुभव आ हुनक लिखल इतिहासक पद्धति बीच सम्बन्ध स्थापित करबाक प्रयत्न अछि। (पृ. ६५–७३)
आलेखमे अमरजीक अनेक काव्यसंग्रह, हास्य-व्यंग्यक रचनाशीलता, साहित्यिक पत्रिकासँ जुड़ाव आ सामाजिक रूढ़ि-विरोधी दृष्टिक परिचय देल गेल अछि। लेखकक मान्यता अछि जे सामाजिक विसंगति पर सतत दृष्टि रखनिहार साहित्यकार पत्रकारिता-इतिहासमे सेहो जीवित सामाजिक प्रक्रियाकेँ पहचानि सकैत छथि। ई सम्बन्ध सम्भावनापूर्ण अछि, मुदा रचनात्मक साहित्यक प्रतिभा अपने-आप इतिहासलेखनक प्रमाणिकता नहि बनबैत। इतिहासक दावाक जाँच मूल पत्रिका, अङ्क, सम्पादकीय, कालक्रम आ दस्तावेजसँ करब पड़ैत अछि। सौभाग्यसँ आलेखक उत्तरार्द्ध एहि स्रोतगत प्रश्न दिस बढ़ैत अछि।
पत्रकारितामे सक्रिय सहभागिताक महत्त्व
अमरजीक पत्र-सम्पादन, स्तम्भ-लेखन आ मैथिली भाषाक सार्वजनिक प्रसारमे सक्रिय भूमिकाकेँ लेखक महत्वपूर्ण मानैत छथि। पत्र-पत्रिकाक व्यवहारिक कठिनाइ—सामग्री संकलन, सम्पादन, प्रकाशन, पाठकवर्ग आ वितरण—सम्बन्धी अनुभव इतिहासकारकेँ संस्थागत पक्ष बुझबामे सहायता करैत अछि। आलेखमे ‘वैदेही’, ‘स्वदेश’ आ अन्य पत्रिकासँ सम्बन्धित गतिविधिक उल्लेख एहि सन्दर्भमे कएल गेल अछि। (पृ. ७१–७३)
परन्तु एतय आलोचनाक मूल प्रश्न ई अछि जे स्वयं आन्दोलनक सहभागी इतिहासकारक मूल्यांकनमे आत्मीयता कतेक प्रवेश करैत अछि। नजदीकी अनुभव दुर्लभ सामग्री उपलब्ध करबैत अछि, संगहि पक्षधरता सेहो आन सकैत अछि। योगानन्द झा अमरजीक अनुभवकेँ महत्वपूर्ण योग्यता मानैत छथि; शोधार्थीकेँ एहि महत्त्वकेँ स्वीकार करैत वैकल्पिक स्रोतक मदति सँ कथनक परीक्षण करबाक चाही। प्रत्यक्ष अनुभव आ अभिलेखीय निष्पक्षता पूरक होइत अछि, स्वतः एकरूप नहि।
‘मैथिली पत्रकारिताक इतिहास’क संरचना
लेखकक विवरण अनुसार इतिहासग्रन्थमे पत्रकारिताक सिद्धान्त, पत्र-पत्रिकाक सामाजिक भूमिका, प्रकाशक-सम्पादकक दायित्व आ मैथिली पत्रकारिताक विकासक चर्चा अछि। पृ. ७४ पर विवेच्य पत्र-पत्रिकाक समय-सीमा १९०५ सँ १९७९ धरि आ पत्र-पत्रिकाक संख्या ८७ बताओल गेल अछि। ई संख्या अमरजीक इतिहासग्रन्थक संदर्भमे योगानन्द झा द्वारा उद्धृत विवरण थिक; एकरा मैथिली पत्रकारिताक सार्वकालिक अन्तिम गणना नहि मानल जाय। आलेख पत्रिकाक प्रकाशन-अवधि, प्रकार आ भाषिक-सांस्कृतिक योगदानक अनुसार खण्ड-विभाजनक विवेचन करैत अछि। (पृ. ७३–७५)
एहि स्वरूपक बल पत्र-पत्रिकाकेँ मात्र शीर्षक-सूची मानबाक बदला संस्थागत इतिहासक वाहक बनायब अछि। कोन पत्र शिक्षा-प्रसारमे योगदान देलक, कोन भाषा-आन्दोलनक स्वर बनल, कोन सामाजिक प्रश्न उठेलक, आ कोन आर्थिक वा सम्पादकीय कारणसँ स्थिर नहि रहि सकल—एहन प्रश्न इतिहासकेँ सामाजिक इतिहासमे विस्तृत करैत अछि। लेखक अमरजीक पत्रिका-विश्लेषणमे राजनीतिक, शैक्षणिक, भाषिक आ सांस्कृतिक योगदानक समेकित मूल्यांकनक प्रशंसा करैत छथि।
कालक्रम, सुधार आ प्रामाणिकताक परीक्षण
आलेखमे भिन्न इतिहासकारक कथनमे पत्रिकाक प्रारम्भ-वर्ष, सम्पादक अथवा पुनर्प्रकाशन सम्बन्धी मतभेदक चर्चा अछि। अमरजी कतोक पूर्ववर्ती भ्रान्तिक संशोधन करबाक प्रयास कयने छथि—ई योगानन्द झाक प्रमुख मूल्यांकन अछि। एहि प्रसंगमे लेखक ग्रन्थक कालक्रमकेँ महत्त्व दैत छथि आ पत्रकारिताक लगभग तीन चरणक संकेतक चर्चा करैत छथि। (पृ. ७६–७७)
ई तुलना इतिहासलेखनक प्रामाणिकताक दृष्टिएँ महत्त्वपूर्ण अछि। तथापि ‘अमुक पूर्ववर्ती मत गलत छल’ एहन निर्णायक टिप्पणी आन्तरिक विवेचनक आधार पर तखनहि मान्य होयत जखन सम्बन्धित मूल अङ्क अथवा दस्तावेज देखल जाय। एहि समीक्षामे उक्त सुधारसभकेँ मूल पुस्तकक ऐतिहासिक दावा मानल गेल अछि, स्वतन्त्र रूपे प्रमाणित तथ्य नहि। एही सावधानीसँ आलेखक उपयोगिता सुरक्षित रहैत अछि आ अनुसन्धानक उत्तरदायित्व सेहो स्पष्ट होइत अछि।
ग्रन्थक अपूर्णता आ नामकरण-विवाद
योगानन्द झा अमरजीक इतिहासग्रन्थक अपूर्णता सेहो स्वीकार करैत छथि: सभ पत्र-पत्रिकाक सभ अङ्क उपलब्ध नहि छल, ताहि कारण कतोक विवेचन उपलब्ध सामग्री अथवा पूर्वमत पर निर्भर रहल। इतिहासग्रन्थक नाम ‘पत्रकारिताक इतिहास’ हेबाक औचित्य पर उठाओल आलोचनाक चर्चा करैत लेखक पत्रकारिताकेँ केवल दैनिक समाचारपत्रक संचालन धरि सीमित करबाक विरुद्ध तर्क दैत छथि। पत्रिका, विचार-विनिमय, जनचेतना, सम्पादकीय हस्तक्षेप आ सामाजिक आन्दोलन सेहो पत्रकारिताक व्यापक अर्थमे अबैत अछि—ई लेखकक पक्ष अछि। (पृ. ७७–७८)
नामकरण-विवादमे लेखकक तर्क सशक्त अछि। जँ पत्रकारिताकेँ केवल दैनिकता-सापेक्ष मानल जाय तँ साप्ताहिक, पाक्षिक आ मासिक पत्रक सार्वजनिक हस्तक्षेपक इतिहास उपेक्षित भऽ सकैत अछि। तथापि पत्रकारिता-इतिहास, पत्रिका-सूची आ सम्पादकीय-सांस्कृतिक इतिहासक बीच कार्यपद्धतिक अन्तर स्पष्ट राखब आवश्यक अछि। लेखक नामकरणक प्रतिरक्षा करैत छथि; भावी अनुसन्धानमे प्रत्येक विधाक स्रोतसम्पदा आ विश्लेषणात्मक प्रश्न अलग रूपे निश्चित करब सम्भव अछि।
बाहरी अभिलेखसँ पुष्ट भऽ सकल तथ्य
साहित्य अकादेमीक आधिकारिक पुरस्कार-सूची चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’केँ ‘Maithili Patrakaritaka Ithihas’ लेल १९८३क मैथिली साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्तकर्ता बतबैत अछि। पुस्तकक प्रकाशन-सूची सम्बन्धमे जापानक CiNii पुस्तकालयीय अभिलेख ग्रन्थक लेखक चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’, प्रकाशक मैथिली अकादमी, पटना, प्रकाशन-वर्ष १९८१ आ मुख्य ग्रन्थक ४०५ पृष्ठक विवरण दैत अछि। ई दू तथ्य बाहरी सन्दर्भसँ पुष्ट अछि; योगानन्द झाक आलेखमे उल्लिखित अन्य पत्रिका-वर्ष आ सम्पादकीय विवरणक समुच्चयक एहन स्वतन्त्र जाँच एहि अध्यायमे कएल नहि गेल अछि। (बाहरी स्रोत: साहित्य अकादेमी पुरस्कार-सूची; CiNii, BA83217091)
समग्र निर्णय
एहि आलेखक सर्वाधिक महत्त्व ई जे एकटा साहित्यकारक जीवनीक माध्यमे मैथिली पत्रकारिताक ऐतिहासिक साक्ष्य, सम्पादकीय-परम्परा आ भाषा-आन्दोलनक अन्तर्सम्बन्ध उजागर होइत अछि। साथे इतिहासग्रन्थक अपूर्णता स्वीकार करबाक कारण समीक्षा केवल स्तुति नहि रहैत अछि। तदपि पुस्तकमे देखाओल सुधारसभक मूल अभिलेख-आधारित पुनःपरीक्षण, पत्रिका-विशेषक सम्पूर्ण डिजिटल सूची आ संस्थागत आर्थिक विवरण अगिला आवश्यक कार्य अछि। ई प्रश्न उठेब स्वयं लेखकक शोधभावनाक विस्तार थिक।
७. ‘मैथिली कथा साहित्यमे वर्णन, संवाद ओ भाषा’: कथा-शिल्पक ऐतिहासिक विवेचन (पृ. ७९–९३)
कथाक अङ्ग आ रूपक प्रश्न
लेखक कथा-विधाक छओ प्रमुख तत्त्वक उल्लेख कऽ वर्णन, संवाद आ भाषाकेँ कथानक आ चरित्रक प्रभावकारी सम्प्रेषणक उपकरण मानैत छथि। कथा साहित्यक लक्ष्य मात्र घटना कहल नहि, अपितु पात्रक अन्तरमन, परिवेशक दबाव, घटनाक गति आ पाठकक अनुभूति धरि पहुँचनाइ अछि। एहि दृष्टिएँ लेखक वस्तु आ चरित्रक संग शिल्पक सम्बन्ध जोड़ैत छथि। शिल्पकेँ बाहरी सजावट मानबाक बदलामे कथ्यकेँ अर्थवान बनयबाक सक्रिय प्रक्रिया बुझब एहि आलेखक मूल पद्धति अछि। (पृ. ७९–८०)
आलेखक प्रवेशमे ‘आधुनिक कथा’क अनेक गुणक चर्चा भेटैत अछि—संगठन, औत्सुक्य, संक्षिप्तता, मनोवैज्ञानिकता, अनुकूल संवाद आ प्रभावपूर्ण भाषा। ई कसौटी कथा-पठनक लेल उपयोगी अछि, किन्तु आधुनिक कथाक सभ प्रयोग एकहि प्रकारक संगठन वा उत्कर्षबिन्दुक अनुसरण नहि करैत अछि। खण्डित संरचना, अविश्वसनीय कथावाचक आ जानि-बुझिक अवसादपूर्ण अन्त सेहो समकालीन कथा-शिल्पक साधन भऽ सकैत अछि। ताहि लेल लेखकक प्रस्तावित गुणकेँ वर्णनात्मक मानदण्ड मानल जाय, अनिवार्य शास्त्रीय नियम नहि।
मैथिली कथाक विकास-यात्रा
लेखक आरम्भिक अनुवाद, आख्यान-आख्यायिका, नैतिक उपदेशप्रधान गद्य आ आधुनिक मौलिक कथा बीच ऐतिहासिक अन्तर देखैत छथि। मुद्रण, भाषासम्पर्क आ बंगला कथा-साहित्यक प्रभावक उल्लेखक बाद ओ सामाजिक कुरीति-विरोध, कथानकक संक्षिप्तीकरण आ चरित्रक मनोविज्ञान दिस मैथिली कथाक विकासक रेखा खींचैत छथि। आरम्भिक लेखकसभक संग हरिमोहन झा आ अनेक उत्तरवर्ती कथाकारक उल्लेख एहि विवेचनकेँ केवल सिद्धान्त-चर्चा नहि रहि साहित्येतिहाससँ जोड़ैत अछि। (पृ. ८०–८१)
एतय इतिहास-लेखनक एकटा आवश्यक सावधानी अछि। ‘अनुवाद’सँ ‘मौलिकता’ आ ‘उपदेश’सँ ‘मनोवैज्ञानिकता’ दिस विकासक एकरेखीय यात्रा बनाओलापर समान कालमे उपस्थित भिन्न कथा-शैलिक विविधता अनदेखल रहि सकैत अछि। अनुवादित कथामे सेहो सर्जनात्मक रूपान्तरण सम्भव अछि; लोकआख्यान आ आधुनिक लघुकथा एक दोसरसँ विच्छिन्न नहि। लेखकक विकासक्रम उपयोगी परिचय दैत अछि, मुदा एहि क्रमक वैकल्पिक शाखासभकेँ स्रोत-आधारित पृथक इतिहासमे देखबाक चाही।
वर्णन-वैशद्य आ संक्षिप्त कथाभाषा
वर्णन-विषयक खण्डमे लेखक आरम्भिक गद्यक अलंकारबहुल, दीर्घ आ काव्यात्मक चित्रणकेँ आधुनिक कथाक अपेक्षाक संग तुलना करैत छथि। पात्र, दृश्य आ घटना स्पष्ट करबाक वर्णन-शक्ति आवश्यक अछि, किन्तु अत्यधिक अलंकार कथाक गति रोकि सकैत अछि। लेखक ‘गागरमे सागर’क संक्षिप्तता दिस झुकावकेँ आधुनिक कथाक शिल्पगत उपलब्धि मानैत छथि। एहि आधार पर ओ आवश्यक विवरण आ अनावश्यक विस्तारक बीच भेद करैत छथि। (पृ. ८२–८४)
एहि तर्कक लाभ व्यावहारिक अछि। कथा लिखैत समय दृश्य-वर्णनक प्रत्येक वाक्यसँ पूछल जा सकैत अछि—ई घटना, पात्र अथवा भावकेँ की नव अर्थ दैत अछि? किन्तु अलंकारबहुल गद्य स्वतः दोष नहि; सामाजिक विडम्बना, कथावाचकक व्यक्तित्व, भाषिक स्मृति अथवा स्थानीय परिवेशक सघनता हेतु दीर्घ वर्णन आवश्यक भऽ सकैत अछि। अतः ‘कम शब्द’केँ ‘श्रेष्ठ कथा’क सार्वभौम कसौटी नहि बनायब उचित। लेखकक उद्धृत उदाहरणसभकेँ शैलीक कार्य-विश्लेषणक माध्यमे बुझब अधिक सम्यक् होयत।
पात्रक चित्रण, समाजचित्र आ अन्तःस्थितिक विस्तार
वर्णनक अन्य रूपमे लेखक पात्रक वेश-भूषा, शारीरिक रूप, मनोभाव, सामाजिक परिस्थिति आ समयविशेषक वर्णनक चर्चा करैत छथि। एहि विवरणक माध्यमे कथा एकटा अमूर्त नैतिक कथनसँ मूर्त सामाजिक संसारमे प्रवेश करैत अछि। वर्ग-संघर्ष, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, शोषण आ विस्थापनसँ सम्बन्धित उदाहरण देखबैत अछि जे सामाजिक यथार्थ कथाक प्रारम्भिक दृश्यसँ प्रकट होयब सम्भव अछि। वर्णन कथानकक गति रोकैत नहि; ओ आगाँक घटना लेल पाठकक अपेक्षा निर्मित सेहो करैत अछि। (पृ. ८३–८५)
लेखकक विश्लेषणमे मनोवैज्ञानिक कथाक विकासक चर्चा सेहो महत्त्वपूर्ण अछि। बाह्य क्रियाक वर्णनसँ पात्रक भीतरक आशंका, हीनभाव, क्रोध, प्रेम वा भ्रमक चित्रण दिस बदलाव कथाक अनुभूति गाढ़ करैत अछि। मुदा ‘भीतर’ आ ‘बाहर’ स्वतः अलग नहि; देहभाषा, सामाजिक सम्बोधन, घरेलू वस्तु आ मौन सेहो मनःस्थितिक संकेत बनैत अछि। एहू दृष्टिएँ आलेखक उदाहरणसभक पुनर्पाठ कएल जाए तँ सामाजिक आ मनोवैज्ञानिक कथाक बीच कृत्रिम विरोध कम होयत।
संवादक नाटकीयता आ चरित्र-निर्माण
आलेखमे संवादकेँ कथाक गति आ पात्रक स्वभाव उद्घाटित करबाक महत्त्वपूर्ण साधन मानल गेल अछि। लेखक नाटकीय संवाद, कथन-चिह्नसँ रहित संवाद आ स्वाभाविक लोकसंवादजकाँ रूपक विवेचन करैत छथि। संवाद कतय कथाकारक बाहरी टिप्पणी कम करैत अछि, कतय पात्रक वर्गीय भाषा परिचित करबैत अछि आ कतय केवल बातचीतक सहारे कथा-वस्तु आगाँ बढ़ैत अछि—ई भेद उदाहरणसभक संग सोझाँ अबैत अछि। (पृ. ८५–८७)
लेखक संवादक मात्रा आ कार्यक चर्चा करैत जखन संवादप्रधान कथा दिस संकेत करैत छथि, तखन कथा-विधाक सीमासभपर महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठैत अछि। नाटकजकाँ बातचीत प्रधान होइतो कथा अपना कथन-संरचनाकेँ सुरक्षित रखि सकैत अछि। प्रश्न ई नहि जे संवाद कतेक पाँति अछि; प्रश्न ई जे ओकर भीतर पाठक पात्रक बीच अव्यक्त तनाव, कथानकक अन्तराल आ कथनक अर्थसँ केना परिचित होइत अछि। एहि दृष्टिकोणसँ संवादक स्वाभाविकता केवल बोलीक नकल नहि, कलात्मक चयनक परिणाम अछि।
संस्कृतनिष्ठ, साहित्यिक आ लोकचलित भाषा
भाषा-विषयक खण्डमे लेखक मैथिली कथागद्यक परिवर्तित स्वरूपक विवेचन करैत छथि। प्रारम्भिक संस्कृतनिष्ठ शब्द-विन्यासक बाद सरस साहित्यिक मैथिली, सामान्य बोलचाल, वर्गविशेषक बोली आ क्षेत्रीय उच्चारणक प्रयोगकेँ साहित्यिक संवेदनाक विस्तारक रूपमे प्रस्तुत कएल गेल अछि। हरिमोहन झाक भाषा-संरचनाकेँ लेखक विशेष महत्त्व दैत छथि। एतय कथाक भाषिक लोकतन्त्रीकरणक संकेत अछि: जे भाषा पहिने ‘ग्राम्य’ बुझल जाइत छल, ओ पात्र आ कथ्यक आवश्यकताक कारण साहित्यिक अभिव्यक्तिक केन्द्रमे आबि सकैत अछि। (पृ. ८७–९०)
लेखक पात्रक जातीय, पेशागत आ क्षेत्रीय अनुभव अनुरूप भाषा-प्रयोगक प्रशंसा करैत छथि। एहि स्थानपर ई आलेख पुस्तकक प्रथम लोकसाहित्य-विषयक लेखसँ संवाद करैत अछि। पहिल आलेखमे जे लोकक मौखिक अभिव्यक्ति साहित्यिक अध्ययनक स्वतन्त्र वस्तु छल, सातम आलेखमे सएह लोक-भाषा आधुनिक रचनाक औजार बनैत अछि। दूनूकेँ जोड़ि देखलापर योगानन्द झाक भाषिक दृष्टिक व्यापकता स्पष्ट होइत अछि।
कृत्रिम बोली आ अन्य भाषाक प्रयोगपर आपत्ति
आलेखक एकटा तीक्ष्ण पक्ष ओहि कथाकारसभक आलोचना अछि जे निम्नवर्ग वा ग्रामीण पात्रक संग पर्याप्त सम्पर्क बिना ओकर भाषा बनायबाक प्रयास करैत छथि। लेखक एहन प्रयोगकेँ कृत्रिम भाषा मानैत छथि। एहि आपत्तिक सार्थकता स्पष्ट अछि: सामाजिक अनुभवक अभाव केवल भाषा-दोष नहि, प्रतिनिधित्वक त्रुटि बनि सकैत अछि। बोलीकेँ विचित्र अथवा हास्यास्पद बनाक प्रस्तुत करब पात्रक गरिमाक हानि पहुँचा सकैत अछि। (पृ. ९०–९१)
लेखक हिन्दी, उर्दू, बंगला, भोजपुरी, अंग्रेजी आदि भाषाक प्रयोगक सन्दर्भमे पात्रानुकूल स्वाभाविक मिश्रण आ अप्रासंगिक आरोपणक बीच भेद करैत छथि। ई भेद उचित अछि, मुदा ‘विजातीय भाषा’क संज्ञाकेँ आजुक बहुभाषी परिवेशक तथ्यसँ जाँचबाक आवश्यकता अछि। नगर, प्रवासन, शिक्षा, बाजार, डिजिटल संवाद आ सीमा-पार सम्बन्धक कारण मिश्रित भाषा स्वयं पात्रक यथार्थ होइत अछि। ताहि लेल केवल शब्दक अन्य भाषासँ उत्पत्ति दूषणक प्रमाण नहि; ओकर प्रसंगगत सत्यता आ कलात्मक कार्यक परीक्षण अधिक उचित अछि। (पृ. ९१–९२)
आलोचनात्मक निर्णय
पन्द्रह पृष्ठक ई आलेख कथा-विधाक व्याकरण प्रस्तुत करबाक संग मैथिली गद्यक भाषिक इतिहासक एकटा रूपरेखा दैत अछि। एतय वर्णन, संवाद आ भाषाक चर्चा अलग-अलग होइतो तीनू कथाक अर्थ-निर्माणमे परस्पर निर्भर अछि। पुस्तकक अन्य अध्यायसँ तुलना करैत ई स्पष्ट होइत अछि जे लेखक लोकभाषाक सामर्थ्यक प्रबल समर्थक छथि, किन्तु अभिव्यक्तिक सहजता आ शुद्धताक सन्दर्भमे कतहु मानकीकरणक कड़ा आग्रह सेहो रखैत छथि। ई द्वन्द्व मैथिली भाषा-चर्चाक अध्ययन लेल विशेष मूल्यवान अछि।
८. ‘देशी शब्दक अवधारणा’: व्युत्पत्तिक सीमा आ शब्द-वर्गीकरण (पृ. ९४–९८)
‘देशी’ शब्दक समस्या केवल ‘ठेठ’ शब्द नहि
आलेखक आरम्भमे तत्सम, तद्भव, गृहीत आ देशी शब्दसभक भेद उपस्थित अछि। सामान्य अनुभवमे जे शब्दक संस्कृत अथवा अन्य ज्ञात मूल स्पष्ट नहि, ओकरा ‘देशी’, ‘देशज’ अथवा ‘ठेठ’ कहल जाइत अछि। लेखक मैथिलीमे प्रचलित एहन अनेक शब्दक उदाहरण दैत छथि आ ई चेतबैत छथि जे ‘अज्ञात व्युत्पत्ति’ अपने-आप ‘संस्कृतसँ असम्बद्ध उत्पत्ति’क निर्णायक प्रमाण नहि। जखन भाषाज्ञान बदलैत अछि, शब्दक वर्गीकरण सेहो बदलि सकैत अछि। एहि आलेखक सभसँ महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त यैह अछि। (पृ. ९४)
व्युत्पत्ति जाँचबाक प्रक्रिया बहुस्तरीय होइत अछि। शब्दक ध्वनि, अर्थ, ऐतिहासिक प्रयोग, पड़ोसी भाषामे उपलब्ध रूप, ध्वनि-परिवर्तनक नियम आ सम्भावित उधार—सभ पक्ष जोड़लापर मात्र उत्पत्तिक निष्कर्ष निकलैत अछि। लेखक एतय मुख्यतः पूर्ववर्ती सिद्धान्तकारक मत विवेचित करैत छथि; एहि विवेचनक मूल शिक्षा ई अछि जे शब्दक स्रोत नहि भेटब आ स्रोत कखनो छलैहि नहि—दूनू एक बात नहि।
प्राचीन आचार्यक धारणाक अन्तर
भरत, दण्डी, रुद्रट आ हेमचन्द्रक सन्दर्भ उपस्थित करैत लेखक शब्दवर्गीकरणक ऐतिहासिक विकास देखबैत छथि। एहि प्रवाहमे ‘देशी’ शब्दक अर्थ लेखक आ कालानुसार बदलैत अछि: कतहु संस्कृत-विनिर्मित रूपसँ पृथक जनप्रयोग, कतहु अज्ञात व्युत्पत्तिक शब्द, कतहु प्राकृत साहित्यक व्यवहारगत शब्द। एतय परिभाषाक स्थिरता नहि, बल्कि विद्वत्-परम्पराक प्रश्नोत्तर महत्त्वपूर्ण अछि। (पृ. ९४–९५)
हेमचन्द्रक परिभाषाक विवेचनमे ग्रन्थ अज्ञात उद्गम, व्याकरणसँ सिद्ध नहि होयबाक प्रश्न, संस्कृत कोशमे अर्थान्तर आ प्राकृत साहित्यक दीर्घ प्रयोगक सम्बन्ध रेखाङ्कित करैत अछि। देशी शब्दकेँ संस्कृतक एकटा ठोस विपरीत खेमामे राखब एहि इतिहासक जटिलता घटा दैत अछि। लेखकक प्रस्तुति स्पष्ट करैत अछि जे मध्यकालीन शब्दकोशकारक वर्गीकरण स्वयं निश्चित व्याकरणिक-कोशीय प्रयोजनक अन्तर्गत बनल छल। (पृ. ९५)
आधुनिक भाषावैज्ञानिकक पुनर्विचार
आलेखमे पिशेल, ग्रियर्सन, सुनीतिकुमार चटर्जी आ अन्य विद्वानक मतान्तरक विवेचन अछि। किछु दृष्टिकोण देशी शब्दक भण्डारमे प्राचीन आर्यभाषाक अप्रत्याशित अथवा अप्रत्यक्ष विकसित रूप देखैत अछि; किछु द्रविड़, मुण्डा आ अन्य भाषासम्पर्कक सम्भावनाक चर्चा करैत अछि; किछु शब्दक अज्ञात उद्गमकेँ भाषाशास्त्रीक ज्ञान-सीमासँ जोड़ैत अछि। लेखकक निष्कर्ष एहन नहि जे सभ मत समान रूपे सत्य अछि, अपितु ‘देशी’ वर्गक निश्चितता एतेक सहज नहि जतेक साधारण कोशीय सूची देखैत समय बुझना जाइत अछि। (पृ. ९६–९७)
एतय लेखकक सावधानी आधुनिक ऐतिहासिक भाषाविज्ञानसँ अनुरूप प्रश्न उठबैत अछि। ध्वनि-साम्य वा अर्थ-साम्य मात्र व्युत्पत्ति प्रमाणित नहि करैत अछि; नियमित ध्वनि-संगति, ऐतिहासिक कालक्रम आ भाषासम्पर्कक दिशा जाँचल जेनाइ आवश्यक अछि। केवल ‘संस्कृतमे नहि भेटल’ कहि कोनो शब्दकेँ अनार्य स्रोतक घोषित करब अथवा उल्टा सभ शब्दक संस्कृत-मूल प्रस्तावित करब—दूनू अतिशयता समुचित नहि। एतय पुस्तकक तर्कक पद्धतिगत महत्त्व व्यापक अछि।
‘अज्ञात’ आ ‘अनुसन्धानाधीन’क बीच अन्तर
आलेखक अन्तिम निष्कर्षमे देशी शब्दक अवधारणाकेँ अनिश्चित आ भाषाज्ञानक सीमा-सापेक्ष मानल गेल अछि। शब्दक मूलस्रोत स्पष्ट होयबाक पूर्व ओकरा देशी कहल जा सकैत अछि; नव प्रमाण भेटलापर वर्गीकरण बदलि सकैत अछि। भाषावैज्ञानिक शोधक लेल ई निष्कर्ष उपयोगी अछि, कारण एतय कोशीय लेबल स्थायी जातिगत पहचान नहि, शोधक वर्तमान स्थितिक संकेत बनैत अछि। (पृ. ९७)
मुदा व्यावहारिक क्षेत्रमे ‘देशी’ शब्दक दोसर अर्थ सेहो अछि—स्थानीय बोली, शैली, आत्मीयता आ लोक-समुदायक पहचान। ऐतिहासिक व्युत्पत्ति स्पष्ट भेला बादो कोनो शब्द समुदाय लेल ‘ठेठ’ रहि सकैत अछि। एहि कारण व्युत्पत्तिगत ‘देशी’ आ समाजभाषावैज्ञानिक ‘देशी’क पृथक विवरण उपयोगी होयत। लेखकक लेख मुख्यतः पहिल प्रश्नपर केन्द्रित अछि; दोसर प्रश्न पुस्तकक लोकसाहित्य-सम्बन्धी आलेखसभसँ जोड़लापर उभरैत अछि।
९. ‘देशीनाममाला ओ मैथिली’: ध्वनि आ अर्थपरिवर्तनक तुलनात्मक अध्ययन (पृ. ९९–१०४)
ऐतिहासिक कोशक मैथिलीसँ सम्बन्ध
अन्तिम आलेखमे लेखक हेमचन्द्रक ‘देशीनाममाला’मे संकलित शब्दक संग मैथिली शब्दावलीक रूप आ अर्थक तुलना करैत छथि। मूल तर्क ई अछि जे प्राकृत कोशमे सुरक्षित कतोक शब्दक समान अथवा समीपस्थ रूप मैथिलीमे भेटैत अछि; एहि निरन्तरताकेँ ध्वनि आ अर्थक परिवर्तन-सहित देखला पर भाषाक ऐतिहासिक विकास बुझबाक सामग्री प्राप्त होइत अछि। लेखकक पद्धति केवल ‘दूनू शब्द एक-जकाँ लगैत अछि’ पर आधारित नहि, अपितु आगम, रूपविकार, समीकरण, अर्थसङ्कोच आ अर्थविस्तारजकाँ विश्लेषणात्मक वर्गक उपयोग करैत अछि। (पृ. ९९–१०४)
ई आलेख पूर्ववर्ती ‘देशी शब्दक अवधारणा’क स्वाभाविक विस्तार अछि। आठम आलेख वर्गीकरणक सिद्धान्त पूछैत अछि; नवम आलेख किछु वास्तविक शब्दपर तुलना लागू करैत अछि। ई क्रम संग्रहक रचनात्मक गठनक एकटा बल अछि। सिद्धान्तकेँ शब्द-उदाहरणसँ जाँचल गेल अछि आ उदाहरणकेँ भाषावैज्ञानिक वर्गमे रखल गेल अछि।
जीवित शब्दक ऐतिहासिक स्तर
पृ. ९९–१०१ पर लेखक कतोक शब्द-युग्मक प्रस्तुति करैत छथि। ‘ओढ़ना’, ‘कोसिआ’, ‘कसौनी’, ‘खाली’, ‘झंखार’, ‘बुलबुल्ला’, ‘ओस’ आदि मैथिली रूपक संग ऐतिहासिक कोशरूपक तुलना देखाओल गेल अछि। ई शब्द वस्तु, परिधान, भोजन, मौसम आ दैनिक व्यवहारसँ सम्बन्धित अछि। एहि चयनक महत्त्व ई जे ऐतिहासिक भाषाविज्ञानकेँ राजकीय अभिलेख अथवा केवल साहित्यिक शब्दसँ बाहर साधारण घरेलू शब्दावली धरि पहुँचाओल गेल अछि। (पृ. ९९–१०१)
एहि तुलनासभक प्रकाशमे भाषा-संरक्षणक एकटा महत्त्वपूर्ण तथ्य देखाइत अछि: लिखित उच्च साहित्यक इतिहाससँ अलग घर-आँगनक शब्दावली पुरान रूपक अंश सुरक्षित राखि सकैत अछि। मुदा दूनू युगक शब्दमे ध्वनि-साम्य भेटब अपने-आप सीधा वंशानुक्रम सिद्ध नहि करैत अछि। मध्यवर्ती प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट, पड़ोसी भाषाक सम्पर्क अथवा समानान्तर विकासक सम्भावना परीक्षा करबाक चाही। लेखकक रूपतुलना भविष्यक पूर्ण व्युत्पत्ति-अध्ययनक प्रारम्भिक प्रमाण थिक, समस्त शब्दक अन्तिम व्युत्पत्तिक निर्णय नहि।
ध्वनि-परिवर्तनक वर्गीकरण
लेखकक सूचीमे आगम, विभिन्न ध्वनि-विकार आ अन्य रूपान्तरणक उदाहरण पृथक कएल गेल अछि। ‘ओढ़ना’ अथवा ‘कोसिआ’जकाँ शब्दक रूपान्तरक चर्चा भाषाक ध्वनि-इतिहास पढ़बाक अवसर दैत अछि। एकर महत्व केवल रूपपरिवर्तनक नामकरण नहि; ई देखब सेहो अछि जे परिवर्तनक फलस्वरूप स्थानीय उच्चारण आ अर्थक प्रयोग कोना निश्चित होइत अछि। (पृ. ९९–१०२)
तथापि तुलनात्मक पद्धतिक कड़ाईक दृष्टिएँ प्रत्येक शब्द लेल स्रोतक निश्चित पाठ, कोशक क्रमाङ्क, मूल अर्थ, मैथिली उच्चारणक क्षेत्र, प्रमाणित प्रयोग, सम्भावित मध्यवर्ती रूप आ नियमित ध्वनि-नियमक उल्लेख आवश्यक होयत। पुस्तकमे उदाहरणक पर्याप्त आधार अछि, मुदा शब्द-दर-शब्द एहि सभ विवरणक समान विस्तार नहि। एहि सीमा ओ उपयोगिता—दूनू स्वीकार करबाक चाही। एकटा भावी अनुसन्धानमे एहि युग्मसभकेँ प्रमाण, सम्भावना आ अनिर्णीत—तीन श्रेणीमे विभाजित कएल जा सकैत अछि।
अर्थसङ्कोच: सामान्यसँ विशिष्ट धरि
पृ. १०३ पर अर्थसङ्कोचक उदाहरण देैत लेखक ‘कसौनी’, ‘काल्हि’, ‘कबाड़’ आदि शब्दक वर्तमान अथवा सीमित मैथिली प्रयोगक तुलना पुरान कोशार्थसँ करैत छथि। विशेषतः ‘कसौनी’केँ काँच आमसँ बनल विशिष्ट व्यंजनक सन्दर्भमे व्याख्यायित करब भोजन-संस्कृतिक इतिहासक दृष्टिएँ उपयोगी अछि। ‘काल्हि’जकाँ समयबोधक शब्दमे अवधिक सीमा आ उपयोगक भिन्नता देखब भाषा-अर्थक सूक्ष्म परिवर्तनकेँ समझबैत अछि। एहि उदाहरणसभसँ अर्थशास्त्र आ लोकसंस्कृति बीच सम्बन्ध स्पष्ट होइत अछि।
एहि उदाहरणक तर्कपर प्रश्न करैत सावधानी रखब आवश्यक अछि: ‘पुरान शब्दक अर्थ व्यापक छल आ आधुनिक अर्थ संकुचित’ एहन निर्णय लेल पुरान कोशमे सभ अर्थक वास्तविक सीमा तथा आजुक मैथिलीमे सम्भावित अनेक स्थानीय अर्थक जाँच आवश्यक अछि। कोनो शब्द मैथिलीक एकटा बोलीमे संकुचित आ दोसरमे व्यापक अर्थमे बचल होय, ई सम्भावना खुलल रहैत अछि। ताहि लेल लेखकक उदाहरणसभकेँ समकालीन क्षेत्रीय शब्दकोश आ बोलचालक दस्तावेजसँ पूरक बनायब उचित।
अर्थविस्तार: दैनिक तकनीक आ नूतन उपयोग
‘कोल्हु’, ‘गाँठ’ आ ‘रोट’क उदाहरणमे लेखक अर्थविस्तारक विवेचन करैत छथि। कोल्हुकेँ केवल एकटा वस्तु-प्रकारक यन्त्रक अर्थमे नहि, अलग-अलग पदार्थ पेरबाक उपकरणक विस्तृत अर्थमे बुझल जा सकैत अछि। गाँठक अर्थ वस्त्रक विशिष्ट बन्धनसँ व्यापक गँठानक अर्थ धरि पहुँचेबाक चर्चा अछि। रोट शब्दक विशेष खाद्यरूपसँ व्यापक प्रयोगक तुलना सेहो महत्त्वपूर्ण अछि। एहि उदाहरणसभमे अर्थ-बदलाव वस्तुक उपयोग, तकनीक आ दैनिक जीवनक परिवर्तनसँ जुड़ैत अछि। (पृ. १०३–१०४)
एहि अध्ययनक विशेष सामर्थ्य अर्थशास्त्रकेँ सामाजिक वस्तुसंसारसँ जोड़ब अछि। शब्दक अर्थ शब्दकोशक निर्जीव परिभाषा मात्र नहि; वस्तुक आकार, बनानेक तरकीब, भोजन-पद्धति आ आर्थिक तकनीकक संग बदलैत अछि। लेखकक उदाहरण भोजन-सम्बन्धी शब्दावली, कृषियन्त्र आ घरेलू शब्दक पृथक ऐतिहासिक कोश बनयबाक प्रेरणा देबैत अछि।
आधुनिक अनुसन्धानसँ संवादक सीमा
हेमचन्द्रक ‘देशीनाममाला’ विषयक नवीन भाषावैज्ञानिक अनुसन्धानमें ‘देशी’ वर्गक आन्तरिक विषमता तथा तत्सम-तद्भव-देशी विभाजनक ऐतिहासिक प्रयोजनपर पुनर्विचार कएल जा रहल अछि। आन्द्रेआ द्रोक्कोक अनुसन्धान एहि कोशीय वर्गीकरणकेँ मध्यकालीन प्राकृत-शिक्षण आ शब्दार्थ-बोधक सन्दर्भमे देखैत अछि। एहि नवीन परिप्रेक्ष्यक उपयोग योगानन्द झाक मूल लेख बदलबाक हेतु नहि, बल्कि ओकर प्रश्नक आजुक प्रासंगिकता बुझबाक हेतु अछि। पुरान शब्दक आधुनिक मैथिली रूपसँ तुलना करब महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा कोशक ‘देशी’ लेबलकेँ एकल ऐतिहासिक भाषाक जन्मप्रमाणपत्र मानब उचित नहि। (बाहरी अनुसन्धान: Andrea Drocco, Kervan, DOI 10.13135/1825-263X/11454)
एहि सन्दर्भमे एकटा अतिरिक्त सावधानी अछि: मूल कोशक प्रकाशित सम्पादनसभ, पाण्डुलिपि-पाठ आ अलग-अलग सम्पादकक पाठनिर्णय एके समान नहि मानल जा सकैत अछि। समकालीन सम्पादनक सहायतासँ प्रत्येक शब्दयुग्मक पुनःमिलान भविष्यक समुचित कार्य होयत। प्रस्तुत समीक्षामेक अस्पष्ट कोश-संख्या वा अपाठ्य रूप अनुमानसँ सुधारि नहि देल गेल अछि।
समग्र निर्णय
अन्तिम आलेखमे पुस्तकक अनुसन्धानधर्मिता अपन अत्यन्त मूर्त रूप पबैत अछि। वर्गीकृत शब्दकोशक ऐतिहासिक सामग्रीकेँ मैथिलीक जीवित शब्दसभसँ मिलायब एकटा बहुमूल्य पद्धतिगत पहल थिक। तथापि एहन तुलनाक सफलता शब्द-साम्यक संख्या पर नहि, प्रत्येक युग्मक ऐतिहासिक परीक्षणक गुणवत्ता पर निर्भर करैत अछि। एहि आधार पर ‘देशीनाममाला ओ मैथिली’केँ विस्तृत प्रमाणसूची बनयबाक आरम्भिक अनुसन्धान-नक्शाक रूपमे पढ़ल जाय—आगाँक व्यवस्थित व्युत्पत्तिकोश निर्माणक प्रेरणा एहि आलेखक सर्वाधिक स्थायी उपलब्धि अछि।
संग्रहक समेकित आलोचनात्मक मूल्यांकन
लोकसाहित्यसँ भाषाविज्ञान धरि एकटा अन्तर्धारा
नौटा आलेखकेँ क्रमानुसार पढ़लापर एकटा विचारधारा स्पष्ट होइत अछि। लोकसाहित्य-विषयक पहिल अध्याय सामूहिक मौखिक अभिव्यक्तिक रूप चिन्हित करैत अछि; मलाहसम्बद्ध आलेख विशेष पेशागत भाषामे संचित जीवनानुभव खोलैत अछि; राधा-पार्वती-सुमन-विषयक आलेख साहित्यिक रूपमे सांस्कृतिक अर्थक निर्माण देखैत अछि; कथा-विषयक आलेख बोलचालक भाषाकेँ आधुनिक कलात्मक गद्यसँ जोड़ैत अछि; अन्तिम शब्दविषयक आलेख भाषिक रूपक कालक्रमक परीक्षण करैत अछि। एहि तरहेँ संग्रहक तीन क्षेत्रक बीच ‘भाषा सामाजिक स्मृति कतेक सुरक्षित रखैत अछि’ ई एकटा साझा अनुसन्धानीय प्रश्न निरन्तर उपस्थित रहैत अछि।
लोकसाहित्यक आधारपर कहल जाय तँ लेखक साहित्यक ‘लोक’ घटककेँ स्वतन्त्र मान्यता देबाक पक्षधर छथि। मुदा काव्यक मूल्यांकनमे ओ पारम्परिक रसशास्त्र आ नायिका-भेदक उपकरण सेहो अपनबैत छथि। ई द्विविधता विरोधाभास मात्र नहि; मिथिलाक बहुस्तरीय साहित्यक सन्दर्भमे दू प्रकारक ज्ञान-परम्पराकेँ एक संग उपयोग करबाक प्रयास सेहो अछि। हँ, जखन लोकसाहित्य शास्त्रीय बन्धनसँ स्वतन्त्र घोषित होइत अछि आ नारीक साहित्यिक विवेचन पूर्णतः शास्त्रीय श्रेणीमे बन्हि जाइत अछि, तखन आलोचनाक पद्धतिमे असमानता स्पष्ट देखाइत अछि। पाठकक लेल एहि असमानताकेँ चिन्हित करब आवश्यक अछि।
क्षेत्राधारित साक्ष्य आ ग्रन्थाधारित साक्ष्य
दू आरम्भिक आलेखमे मौखिक सामग्री, सामाजिक शब्दावली आ कहबीक प्रयोग प्रमुख अछि। काव्य-विषयक तीन आलेखमे पाठ-उद्धरण, आचार्यक मत आ अलंकार-रसक तर्क प्रधान अछि। अमरजी सम्बन्धी आलेख ऐतिहासिक अभिलेखनक प्रश्न उठबैत अछि। अन्तिम दू आलेख शब्दकोश, व्युत्पत्ति आ तुलनात्मक भाषाविज्ञानकेँ केन्द्रमे रखैत अछि। एतेक भिन्न प्रकारक सामग्रीक प्रयोगसँ लेखकक शोध-रुचिक विस्तार सिद्ध होइत अछि; एकरे संग साक्ष्यक पद्धतिक अन्तरक सावधानी सेहो जरूरी अछि। मौखिक कहबी, साहित्यिक पद, प्रकाशन-वर्ष आ कोशीय शब्द—चारि वस्तु समान प्रकारक सत्यापनीय तथ्य नहि।
विशेषतः जतय लेखक कहबीकेँ प्राचीन व्यवसायक प्रमाण, नायिका-भेदकेँ कविता-चरित्रक अन्तिम रूप अथवा शब्द-साम्यकेँ ऐतिहासिक निरन्तरताक आधार बनबैत छथि, ओतय तर्कक एक अतिरिक्त कड़ी अपेक्षित अछि। एहि समीक्षाक आलोचनात्मक आपत्ति लेखकक मूल सामग्रीपर नहि, सामग्रीसँ निश्चयात्मक निष्कर्ष धरि जायबाक छलाँगपर अछि। एहि सूक्ष्म भेदकेँ सुरक्षित राखलापर संग्रहक मूल्य न्यायपूर्ण रूपमे निर्धारित कएल जा सकैत अछि।
सामाजिक आलोचनाक उपलब्धि
मलाह समुदाय, अनमेल विवाह, निर्धन घरक गृहस्थी, नारीक श्रम, पत्रकारिताक वर्गीय पक्ष, दलित पात्रक भाषा आ बोलचालक स्वीकृति—ई सभ प्रसंग संकेत करैत अछि जे लेखकक साहित्य-दृष्टि पूर्णतः सौन्दर्यशास्त्रीय नहि। ओ साहित्यकेँ सामाजिक सम्बन्धक अभिलेखक रूपमे सेहो देखैत छथि। पार्वतीक आर्थिक कष्ट, अमरजीक पत्रकारिताक समाजोपयोगिता आ कथाक पात्रानुकूल बोलीपर आग्रहक बीच स्पष्ट बौद्धिक सम्बन्ध अछि। ई संग्रहक एकटा विशेष गुण अछि।
दोसरा दिस नारीकेँ त्यागमयी, पतिव्रता अथवा आदर्श माताक रूपमे उन्नत करबाक प्रवृत्ति किछु आलेखमे प्रश्नातीत रहि जाइत अछि। जाति-आधारित लोकोक्तिमे निहित उपहास आ भाषिक शुद्धताक नामपर वास्तविक बहुभाषी अनुभवक उपेक्षा सम्भावनाकेँ सेहो अधिक आलोचनात्मक ध्यान देल जा सकैत छल। लेखकक सामग्री एहि सभ प्रश्नक लेल पर्याप्त आधार उपलब्ध करबैत अछि; वर्तमानक दृष्टिसँ ओकर पुनर्पाठ मूल पुस्तकक विरोध नहि, ओकर अध्ययनक विस्तार अछि।
भाषाशैली आ आलोचनाक स्वर
लेखकक भाषा मूलतः संस्कृतपदसम्पन्न शोधात्मक मैथिली अछि। स्थान-स्थानपर लोकपद, मुहावरा, गीतांश आ स्थानीय शब्दक उपयोग एहि शास्त्रीय प्रवाहमे जीवंत हस्तक्षेप करैत अछि। वाक्य-रचनामे परिभाषा, उदाहरण, पूर्वमत, तुलना आ निष्कर्षक क्रम प्रमुख अछि। एहि कारण आलोचनात्मक तर्कक दिशा प्रायः स्पष्ट रहैत अछि। किछु ठाम उद्धरण आ शास्त्रीय पदावलीक बहुलतासँ पाठककेँ मूल निष्कर्ष धरि पहुँचबाक लेल विशेष सावधानी चाही। तथापि लेखकक पाठकसँ अपेक्षा गंभीर अध्ययनक अछि; ओ लोकप्रिय परिचयक स्थान पर अनुसन्धानात्मक विवेचन प्रस्तुत करैत छथि।
एहि पुस्तकक रूप-रचना सेहो आलोचनाक विषय अछि। प्रस्तावना एकर आलेखसभकेँ विषयगत तीन कोटिमे बाँटि बोधगम्य बनबैत अछि। विषय-सूचीक क्रम लोकजीवनसँ साहित्यिक काव्य आ तकर बाद शब्दभाषाक अध्ययन दिस बढ़ैत अछि। किन्तु नव अध्यायकेँ जोड़निहार स्वतन्त्र सम्पादकीय उपसंहार नहि रहबाक कारण पाठककेँ अन्तर्धाराक पुनर्निर्माण स्वयं करब पड़ैत अछि। एहि समीक्षामे प्रस्तुत समेकित तुलनाक प्रयोजन मूल पुस्तकक खाली स्थानमे कल्पित तर्क ठूसब नहि, बल्कि लेखकक उपस्थित उदाहरणसभक अन्तर्सम्बन्ध स्पष्ट करब अछि।
उपलब्धिक क्रमित मूल्यांकन
‘मैथिलीक लोकसाहित्य’क बड़ उपलब्धि मौखिक विधासभक व्यापक रूपरेखा अछि; ‘लोकोक्तिमे मलाह जाति’ पेशागत जीवनसँ भाषा-रूपकक सम्बन्ध खोलैत अछि; ‘राधाक स्वरूप’ बहुस्तरीय व्याख्याक आग्रह रखैत अछि; ‘पार्वतीक स्वरूप’ पौराणिक पात्रमे मैथिल गृहस्थ जीवनक वास्तविकता पहचानैत अछि; ‘सुमनजीक मुक्तककाव्यमे नारी’ काव्य-रूप आ स्त्री-प्रतिमाक वर्गीकृत पाठ दैत अछि; ‘अमरजी’क समीक्षा पत्रकारिता-इतिहासक पद्धति आ दस्तावेजक समस्या चिन्हित करैत अछि; कथा-विषयक आलेख भाषा आ शिल्पक विकासक रूपरेखा बनबैत अछि; ‘देशी शब्द’क आलेख व्युत्पत्तिगत निश्चयक सीमा सिखबैत अछि; ‘देशीनाममाला’क अध्ययन शब्दकोशीय प्रमाणकेँ मैथिलीक जीवित रूपसँ जोड़ैत अछि। ई प्रत्येक दावा उक्त-उक्त मूल आलेखक प्रतिपादन अथवा एकर आलोचनात्मक पुनर्मूल्यांकन पर आधारित अछि।
भावी शोधक उपयुक्त दिशा
एहि संग्रहक आधारपर चारि स्पष्ट अनुसन्धान-कार्य सम्भव अछि। प्रथम, लोकगीत, लोकगाथा आ कहबीक प्रत्येक संकलित पाठक स्थान, सूचनादाता, प्रस्तुति-अवसर, पाठान्तर आ ध्वनि-रिकॉर्ड सहित नूतन अभिलेखन। द्वितीय, विद्यापति आ सुमनजीक उद्धृत काव्यांशक मूल पाठ, पाठभेद आ सामाजिक सन्दर्भक अलग-अलग तुलनात्मक सूची। तृतीय, अमरजी द्वारा वर्णित पत्रकारिताक प्रत्येक पत्र-पत्रिकाक उपलब्ध मूल अङ्क, सम्पादकीय विवरण, प्रकाशन-अवधि आ पुस्तकालयीय सन्दर्भक पुनःसत्यापन। चतुर्थ, ‘देशीनाममाला’क कोशपाठ आ आधुनिक मैथिली भाषिक रूपक शब्द-दर-शब्द बहु-स्रोत परीक्षा। एहि चारू दिशाक जड़ पुस्तकक प्रत्यक्ष सामग्रीमे अछि; कोनो अज्ञात अथवा कल्पित अध्यायक अनुमानपर निर्भर नहि।
अन्तिम निष्कर्ष
‘आलेख सञ्चयन’क विशिष्टता एकटा निर्णायक सिद्धान्त देबामे नहि, अपितु मैथिली भाषा-साहित्यक अनेक अनुसन्धानीय क्षेत्रमे प्रमाण जुटेबाक लगन आ विवेचनक पद्धति विकसित करबामे अछि। पुस्तकक विस्तार विषयगत अछि, किन्तु अन्तर्निहित आग्रह एकटा: मैथिलीक साहित्यिक आ सामाजिक अनुभवकेँ व्यवस्थित अध्ययनयोग्य सामग्रीक रूपमे स्वीकार कएल जाय। लोकसाहित्यक विधासूची, लोकोक्तिक पेशागत सन्दर्भ, विद्यापतिक पात्र-विवेचन, सुमनजीक नारी-परिकल्पना, पत्रकारिताक इतिहास, कथागद्यक शैली-विकास आ शब्दक ऐतिहासिक परिवर्तन—सभ मिलि मैथिली अध्ययनक बहुआयामी चित्र बनबैत अछि।
एहि व्यापकताक संग सीमा सेहो स्पष्ट अछि: लोकस्रोतक क्षेत्रीय विवरणक अभाव, किछु इतिहासगत दावाक स्वतन्त्र अभिलेखीय सत्यापनक आवश्यकता, नारीक परम्परागत आदर्शीकरण आ कोशीय रूप-साम्यक निष्कर्षमे अतिरिक्त ध्वनि-नियमक अपेक्षा। एहि सीमा देखाउब पुस्तककेँ कमतर करब नहि; एकर यथार्थ अकादमिक महत्त्व निर्धारित करब अछि। शोध-पुस्तकक स्थायी शक्ति केवल अपन समयमे देल उत्तरमे नहि, बल्कि ओहिसँ उत्पन्न अगिला प्रश्नसभमे सेहो होइत अछि। ‘आलेख सञ्चयन’ एहि अर्थमे उपयोगी सन्दर्भग्रन्थ आ पुनर्पाठक योग्य आलोचनात्मक दस्तावेज दूनू थिक।
अध्याय 04 / दोसर संस्करण २००२
मैथिली शाक्त साहित्य
डॉ. योगानन्द झाक कृतिक आलोचनात्मक विवेचन
१. ग्रन्थ-परिचय आ प्रमाणक स्थिति
मूल शीर्षक — मैथिली शाक्त साहित्य (शास्त्रीय भगवती गीत)।
सम्पादन — डॉ. योगानन्द झा; शीर्षक-पृष्ठ पर सम्पादकक नामक संग कविलपुर, दरभंगाक उल्लेख भेटैत अछि।
प्रकाशन — उर्वशी प्रकाशन, १३ एम.आइ.जी., हनुमान नगर, कंकड़बाग, पटना–२०। मूल प्रकाशन-विवरणमे वर्ष २००२ ई., प्रति ५०० आ मूल्य १५.०० अंकित अछि -पृष्ठ ३, बायाँ फलक)।
संस्करण — भूमिकाक अन्तमे “दोसर संस्करण” आ ०७–११–२००२ दिनांक स्पष्ट अछि -पृष्ठ ४, बायाँ फलक)।
आरम्भिक आवरण, शीर्षकपृष्ठ, प्रकाशन-विवरण, भूमिका, गीतसूची आ मुद्रित पृष्ठ १० सँ ७२ धरि गीत-पाठ समाहित अछि; अन्तिम-पृष्ठ पर ग्रन्थक समाप्ति-चिह्न सेहो देखाइत अछि।
दुइ भिन्न क्रम — गीतसूचीमे ७६ रचनाकार-प्रविष्टि अछि -पृष्ठ ४–६)। मूल गीत-पाठक भीतर स्वतंत्र गीतक अंकन (१) सँ (१९१) धरि अछि; अन्तिम गीत जगतचन्द्रक अछि -पृष्ठ ३८)। अतएव “७६ गीत” कहल तथ्यात्मक रूपसँ अशुद्ध होयत; सूचीमे ७६ प्रविष्टि, पाठमे १९१ क्रमांकित गीत अछि।
अध्ययनक पद्धति: प्रत्येक रचनाकार-प्रविष्टिक शीर्षक/आरम्भिक पाँति आ मुद्रित पृष्ठ-स्थान केँ मूल गीतसूचीसँ मिलाओल गेल अछि। प्रतिनिधि गीतक निकट-पाठमे मूल पाठक विशिष्ट सम्बोधन, बिम्ब, तात्त्विक पदावली, विनय, करुणा आ सामाजिक प्रश्न पर ध्यान देल गेल अछि। गीतक पाठ जतय कठिन अथवा धुँधल अछि, ओतय शब्दशः उद्धरणसँ परहेज कएल गेल अछि।
२. भूमिका: सम्पादकक वैचारिक प्रस्तावना
पहिल संस्करणक भूमिकामे “शक्ति उपासना” केँ भारतीय जीवन-पद्धतिक महत्त्वपूर्ण अङ्ग मानल गेल अछि। सम्पादकक अनुसार मातृभाव, दया, सर्जकता, पालन आ संहार-जेकाँ पृथक् अनुभूतिक साहित्यिक परिणति देवीक विभिन्न स्वरूपमे होइत अछि -पृष्ठ ३–४)। ई भूमिका केवल धार्मिक अनुमोदन नहि; शाक्त काव्यक अध्ययन लेल ओ एकटा सौन्दर्यात्मक आधार सेहो दैत अछि, कारण देवीक रूप-विविधता सँ रूपक, प्रतीक आ रसानुभूतिक विविधता निकलैत अछि।
भूमिकामे विद्या, दुर्गा, काली, चण्डी, तारा, भुवनेश्वरी, कमला, षोडशी, भैरवी, सीता, छिन्नमस्ता, धूमावती, बंगला, मातङ्गी आ सरस्वती आदि स्वरूपक उल्लेख देखाइत अछि। एहि सूचीसँ बुझाइत अछि जे सम्पादक “शाक्त” केँ केवल दुर्गा-स्तोत्रक संकुचित अर्थमे नहि, व्यापक देवी-परम्पराक रूपमे बुझैत छथि। मुदा एही विस्तारक कारण संकलनमे गङ्गा, भारती, वीणावादिनी आ शिव-संबद्ध छविक प्रवेशकेँ अलग सँ परखबाक आवश्यकता बनैत अछि।
मध्यकालीन कविसभक नामक पश्चात् सम्पादक आधुनिक कवि-गीतकारसभक एकटा दीर्घ सूची दैत छथि। भूमिका स्वयं एहि दीर्घकालिक साहित्यिक निरन्तरताक दावा करैत अछि; तैयो एहि संग्रहमे कवि-क्रमक कालनिर्धारण, पाण्डुलिपिक रचनातिथि अथवा पाठान्तरक व्यवस्थित प्रमाण-तालिका नहि देखाइत अछि। एकरा साहित्येतिहासक उपयोगी पाठ-संकलन मानब उचित अछि, मुदा निर्णायक कालक्रमक स्थानापन्न नहि।
दोसर संस्करणक टिप्पणीमे सम्पादक पुनर्प्रकाशनक उद्देश्य “मैथिली शाक्त साहित्य”क उपलब्धता बढ़ेबा आ अधिक लोक धरि पहुँचेबामे देखैत छथि। एहि आत्मविवरणसँ संकलनक संरक्षणात्मक अभिप्राय स्पष्ट होइत अछि। प्रकाशक प्रति आ वर्षक मुद्रित तथ्य सँ पृथक्, पुनर्प्रकाशनक प्रेरणा भूमिकाक प्रत्यक्ष कथन अछि।
३. सम्पादकीय बनावट: ७६ प्रविष्टि आ १९१ गीत
एहि पोथीक केन्द्रीय संरचनागत विशेषता अछि जे गीतसूची “रचनाकार आ गीत”क अनुसार बनल अछि, जखनकि मूल गीत-पाठ अपन स्वतंत्र क्रमांक रखैत अछि। उदाहरणार्थ, विद्यापतिक नाम एकटा सूची-प्रविष्टि अछि, मुदा हुनक अन्तर्गत पृष्ठ १०–१३ पर अनेक पृथक् रचना क्रमांक (१) आदिसँ छपल अछि। पुस्तकक पहिल विद्यापति-गीतमे भैरवीक आवाहन अछि, तकर बाद अन्य देवी-रूपक गीत अछि। एहि व्यवस्थासँ कविक एकाधिक शाक्त अभिव्यक्ति एक ठाम पढ़बाक सुविधा भेटैत अछि।
संकलनक अन्तिम अंश विशेष अर्थवान अछि: जगज्ज्योतिमल्ल, जगत्प्रकाशमल्ल, जितामित्रमल्ल, भूपतीन्द्रमल्ल, प्रतापमल्ल आ जगतचन्द्र सन नाम एक संग अबैत छथि (गीतसूची ७१–७६; मुद्रित पृ. ६७–७२)। एहि कारण मिथिलाक शाक्त गीतक अध्ययनमे नेपाल-संबद्ध दरबारी-साहित्यिक परम्पराक पाठ सेहो समाहित होइत अछि। मुदा केवल उपनाम “मल्ल” देखि प्रत्येक रचनाकारक विस्तृत राजकीय जीवनी, काल वा परस्पर सम्बन्ध निश्चित करब उचित नहि; ताहि लेल स्वतंत्र ऐतिहासिक स्रोत चाही।
गीत-पाठक नीचाँ कतहु “प्राचीन गीत”, कतहु “मैथिल भक्त प्रकाश”, “मैथिली शैव साहित्य”, “मैथिली नाटकक उद्भव आ विकास” अथवा आन ग्रन्थ-संकेत अंकित अछि। ई महत्वपूर्ण स्रोत-चिह्न अछि; मुदा सम्पूर्ण संग्रहक प्रत्येक गीत लेल समान रूपमे सम्पादकीय पाठ-परम्परा, मूल प्रति, संस्करण-सङ्ख्या आ पाठभेद नहि देल गेल अछि। समीक्षा एहि अन्तर केँ विधिसम्मत सम्पादनक भविष्यगत काजक रूपमे चिन्हित करैत अछि।
४. प्रतिनिधि गीतक सूक्ष्म पाठ-परीक्षण
४.१ विद्यापति: भैरवीक विभीषिका आ मातृरक्षा (मुद्रित पृ. १०–१३)
आरम्भिक गीत “जय-जय भैरवि असुर-भयाउनि” मे देवीक भयङ्कर रूपक सम्बोधनक संग भक्तक निर्भयताक आकांक्षा जुड़ैत अछि। श्मशान, खप्पर, रुधिर आ असुर-विनाशक बिम्ब देवीक अघोर स्वरूप जगबैत अछि; गीतक अन्त दिस कविक अपन रक्षाक माँग ई भयङ्करताकेँ करुणामय आश्रयमे बदलैत अछि। देवी ‘असुर-भयाउनि’ छथि, भक्तक लेल अभय-दायिनी। एहि विपरीतार्थी संयोजनक कारण रचना केवल गुणगान नहि, भीति आ विश्वासक नाटकीय अनुभव बनैत अछि।
४.२ विद्यापति: एक देवी, अनेक नाम (पृ. १०–१३)
विद्यापति-समूहमे भैरवी, गायत्री, भगवती, काली, दुर्गा, कालिका आदि सम्बोधन-परम्परा देखाइत अछि (प्रथमक गीत-पृष्ठसभ)। एके कवि-सूत्रक भीतर विध्वंसिनी आ पालनकर्त्री, मन्त्रात्मक आ आत्मीय सम्बोधनक क्रमिक फेर-बदल होइत अछि। शीर्षकक “शास्त्रीय” विशेषणक ठोस आधार एतय संस्कृतनिष्ठ नाम-परम्परा आ देव्या नामावली अछि; मुदा लोक-सुलभ विनती ओकर भाषा केँ स्तोत्र-मात्रक जड़ता सँ बचबैत अछि।
४.३ सदानन्द: दुःख-निवारणक सीधा प्रार्थना (पृ. १४)
गीत “जय जय दुर्गे दुर्गति हारिणि”क पहिल पाँतिमे ‘दुर्गा’ आ ‘दुर्गति’क ध्वन्यात्मक सम्बन्ध स्पष्ट अछि। देवीक नामे भक्तक दुःख-हर्ता रूपक अर्थसंग्रह बनि जाइत अछि। भाषाक विन्यास ठामे-ठाम शास्त्रीय, मुदा अनुभूतिक केन्द्र दैनन्दिन संकटसँ मुक्ति अछि; एही रूपमे शाक्त साहित्य दार्शनिक तत्त्वसँ लोकजीवनक व्यथा दिस बढ़ैत अछि।
४.४ महेश ठाकुर: उग्रता आ कृपाक तान (पृ. १५–१६)
“जय जय जय भय भञ्जनि” सँ शुरू होइत गीतमे भयक अपहर्ता रूप प्रमुख अछि। एही रचनाकारक अन्य गीतक शाब्दिक परिवेशमे असुर-वध, भयानक आविर्भाव आ शरणागतक उद्धार एकहि स्तुतिमे जुड़ैत अछि। शाक्त स्तुति एतय एकतरफा हिंसात्मक चित्रण नहि बनि भक्त-केन्द्रित करुणा-दर्शनक रूप लैत अछि।
४.५ कृष्णपति आ जीवदत्त: शरणागतिक व्याकरण (पृ. १७, १९)
“शंकरी शरणं धयल हम तोर” आ “जय-जय शंकरि” जेकाँ आरम्भिक पाँति देखबैत अछि जे शाक्त गीतमे ‘हम’ आ ‘तोर’क सम्बन्ध सर्वाधिक कार्यकारी होइत अछि। उपासक अपन दुर्बलता प्रकट करैत अछि, देवीकेँ संरक्षणक दायित्व सँ सम्बोधित करैत अछि। सामीप्यक एहि भाषा मे शास्त्रीय देवी साधारण लोकक विश्वासक केन्द्र बनि जाइत छथि।
४.६ रत्नपाणि: नाम-सङ्कीर्तनक विस्तृत शृङ्खला (पृ. २६–३१)
रत्नपाणिक प्रविष्टि पाँचसँ अधिक मुद्रित पृष्ठमे पसरल अछि। गीतसूचीमे “जय जगजननि”, “जय शिशुधानु”, “जय भुवनेशि”, “जय जगज्जननि” आदिक पुनरुक्त ध्वनि आ देवीक बहुरूपक उल्लेख भेटैत अछि। आन-आन लघु स्तुतिक अपेक्षा ई खण्ड विस्तारित भक्ति-संहति जेकाँ भासैत अछि। दोहराओल “जय” शब्द गीतक लयक संकेत अवश्य अछि, मुदा वास्तविक गायन-तालक निर्धारण बिनु स्वर-साक्ष्य सम्भव नहि।
४.७ चन्दा झा: शरणागति आ जीवन-संकट (पृ. ३४–३८)
“जय देवि महेश-पुत्रि”, “रहु देवि दासी”, “जय गिरिवर मैया” आदि अनेक आरम्भिक पाँतिक कारण चन्दा झाक खण्ड व्यक्तिपरक भक्ति आ देव्या स्तुति दुनूक संगम बनैत अछि। पृ. ३४–३५ पर “से कर देवि दयामयि” सन विनय आ ‘मन’क अवस्था उल्लेखनीय अछि। भक्त आत्मसमर्पण करैत अछि, मुदा अपन दुःखक भाषा नहि छोड़ैत; शास्त्रीय देवीनाम आ निकटवर्ती सम्बोधनक एहि मेलमे कवित्वक विशेष शक्ति अछि।
४.८ आदिनाथ: देवी-नामावलीक विस्तार (पृ. ४०–५०)
आदिनाथक प्रविष्टि एकटा लम्बा पाठ-समूह अछि। सूचीमे “नहि जगबहार हम”, “भगवति पद पंकज”, “काली तारिणि”, “महिम वसन अरुण” आदि भिन्न आरम्भ-सूत्र एकत्र देल गेल अछि। देह, जगत, असुर, कमला आ त्रिभुवन सम्बन्धी पदावली अनेक धार्मिक स्तरक समन्वय करैत अछि। केवल शब्द-सूचीक विस्तारसँ ओतबे धार्मिक सिद्धान्त सिद्ध नहि होइत; शब्द कोन प्रसङ्गमे आबि रहल अछि, ई समझब जरूरी अछि।
४.९ तेजनाथ झा: नैतिक प्रश्न आ शास्त्रीय भक्ति (पृ. ५२–५४)
“जननि पद”, “जय जय काली”, “गंगे विनति सुनिय दय कान” आदि आरम्भ-संकेत तेजनाथ झाक रचनासभमे मातृकृपा आ नैतिक विवशताक सह-अस्तित्व देखबैत अछि। पृ. ५४ पर सामाजिक दम्भ आ ज्ञानक अभावक प्रश्न उठैत अछि; एहि कारण ई रचना केवल देवी-वन्दना नहि, आत्मपरीक्षणक भाषा सेहो अछि। समर्पणक बीच प्रश्न करबाक क्षमता एकरा आलोचनात्मक रूपसँ महत्त्वपूर्ण बनबैत अछि।
४.१० सूरदास, दामोदर आ लक्ष्मीपति: अपराधबोधसँ क्षमाधर्म धरि (पृ. ५४–५५)
सूरदासक “जगदम्बा भवानी हे”, दामोदरक “जाग जननि हे” आ लक्ष्मीपतिक “क्षमा समुद्र क्षमिय अब जननी”क निकट स्थान एक अर्थपूर्ण लघु-क्रम बनबैत अछि। पहिलमे भगवतीक लोकमातृ रूप, दोसरमे दुर्दशित भक्तक पुकार, तेसरमे क्षमा-दायिनी देवीक आश्रय देखाइत अछि। अल्पाक्षर गीतमे अपराध-स्वीकार आ अपेक्षित उद्धारक बीचक दूरी भावनात्मक घनत्व रचैत अछि।
४.११ ललितेश्वरी देवी आ नन्दनी देवी: स्त्री-स्वरक उपस्थिति (पृ. ५५–५६)
सूचीमे ललितेश्वरी देवीक “जयति जगदम्बिके काली” आ नन्दनी देवीक “जय काली कलि कलुष” छपल अछि। ललितेश्वरीक गीतमे जगदम्बिकाक पूजाक संग ‘हम जननी नहि पूजा पाठ गुरु सेवा’ जेकाँ आत्मालोचनक स्वर भेटैत अछि -पृष्ठ २९, दहिना फलक)। स्त्री-रचनाकारक उपस्थिति देखबैत अछि जे ई परम्परा केवल पुरुषक कविकर्म धरि सीमित नहि; मुदा एहिसँ सम्पूर्ण युगक स्त्री-साक्षरताक अनुपात निकालब असंगत होयत।
४.१२ सुरेन्द्र झा सुमन आ मधुप: रूपायनक प्रभाव (पृ. ५६, ५८)
सुरेन्द्र झा सुमनक प्रविष्टिमे “धयल मुण्डमयी श्यामा”क छवि उग्र देवीक मूर्तिकल्पना दैत अछि। मधुपक “सम्प्रति सहस-सूर्य, राजय जगमग माँ”क प्रकाश-बिम्ब उद्भासित शक्तिक अनुभूति करबैत अछि। एक ओर रौद्र दृश्य, दोसर ओर दीप्ति; दुनू देवीक असीम सामर्थ्यकेँ भिन्न संवेदनात्मक साधनसँ उपस्थित करैत अछि।
४.१३ राजलक्ष्मी आ त्रिलोचन झा: पूजा आ मिथिला-बोध (पृ. ६२–६३)
राजलक्ष्मीक “श्यामा चरण कमल हम पूजब”मे चरणपूजाक आत्मीयता साफ अछि। त्रिलोचन झाक “चण्डी तोहर मिथिला देश, आब करू जजु देरी” देवीकेँ स्पष्ट स्थानीय भूगोलक भीतर सम्बोधित करैत अछि। इएह स्थानीयकरण शास्त्रीय देवीकेँ मैथिली भाषाक सामाजिक परिदृश्यमे लबैत अछि; मिथिला एतय भौगोलिक नाम मात्र नहि, संकट आ आशाक अनुभव-क्षेत्र बनैत अछि।
४.१४ आरसी प्रसाद सिंह: सरस्वती-छविक पुनर्संयोजन (पृ. ६४)
“जननि वीणा-वादिनी!”क सम्बोधनमे सरस्वतीक वाद्य, वाणी आ विद्याक रूप आगाँ अबैत अछि। ई उदाहरण ‘शाक्त साहित्य’क परिधिक प्रश्न उठबैत अछि: संग्रहक शक्ति-कल्पना केवल युद्धमयी देवीमे सीमित नहि, वाणी, ज्ञान आ सर्जनात्मक ऊर्जा धरि पसरल अछि। एहि कारण ग्रन्थकेँ विशुद्ध दुर्गा-गीत-संग्रह कहब अपर्याप्त अछि।
४.१५ प्रभु नारायण ‘प्रदीप’: प्रश्नक नाटकीय प्रयोग (पृ. ६५)
“जगदम्ब अही बिनु आश्रय ककर?”क पुनरावृत्त प्रश्न देव्या स्तुतिक संग निर्बल मनुष्यक आश्रयहीनताकेँ रखैत अछि। कवि ‘हम’क दैन्यकेँ देवी पर निर्भरता बनबैत छथि; “ककर?” एतय सीधा तथ्य-प्रश्न नहि, भक्ति-नाटकीयता उत्पन्न करयबला अलङ्कारिक प्रश्न अछि।
४.१६ अन्तिम मल्ल-समूह: राजनीतिक भूगोलसँ पारक पाठ-परम्परा (पृ. ६७–७२)
जगज्ज्योतिमल्लसँ जगतचन्द्र धरि संग्रह अपन अन्तिम खण्डमे नेपाल-संबद्ध नामसभक गीत रखैत अछि। भूपतीन्द्रमल्लक गीत “जय हिमालय नन्दिनी” हिमालयक स्थानबिम्बसँ देवीकेँ सम्बोधित करैत अछि; प्रतापमल्लक “किदहु करम मोर हीन रे” आत्मग्लानिक स्वर खोलैत अछि; जगतचन्द्रक अन्तिम गीत “जयति जगदम्बे काली” छोट आ संक्षिप्त स्तुति अछि। अन्तिम रचनाक स्रोत-टिप्पणी “मैथिली नाटकक उद्भव आ विकास” उल्लेखनीय अछि, मुदा स्वतः एकर रचनातिथि स्थापित नहि करैत।
५. भाषिक रचना, छवि, लय आ भक्तिक वक्तृता
एहि गीतसभक सबसँ स्पष्ट अलङ्कारिक साधन सम्बोधनक पुनरावृत्ति अछि: “जय जय”, “जननि”, “माँ”, “हे देवी”, “भवानी”, “काली”, “दुर्गा”। एहिसँ स्थायी गेयता आ सामूहिक उच्चारणक सम्भावना बनैत अछि। मुदा संग्रहमे व्यवस्थित राग-ताल, धुन-संकेत अथवा प्रस्तुति-साक्ष्य नहि देखाइत; ताहि लेल केओ गीतकेँ अमुक रागमे निश्चित रूपसँ गाओल जाइत छल, एहन दावा स्रोत-समर्थित नहि होयत।
शब्दक एक स्तर पर संस्कृतनिष्ठ समास अछि—“त्रिभुवनतारिणि”, “महिषासुरमर्दिनि”, “भयभञ्जनि”, “जगज्जननि”, “कमलासिनि”; दोसर स्तर पर आत्मीय मैथिली सर्वनाम आ क्रिया अछि—“हम”, “तोर”, “दिअ”, “करू”, “अहाँ”, “मैया”। तेसर स्तर पर तान्त्रिक आ पुराणसम्मत संज्ञा अछि—शूल, खड्ग, खप्पर, त्रिशूल, रक्त, मुण्ड, सिंह, महिष। ई स्तर एक-दोसराक विरोधी नहि, बल्कि संकलनक भाषिक वास्तुक रचैत अछि।
रूपक-प्रणालीमे त्रिशूल, सिंह, कमल, रुधिर, शिरमाला आ अभय-हस्तक छवि प्रमुख अछि। उज्ज्वल/भयावह, करुण/दण्डदात्री, जननी/युद्धमयी—एहि विरोधाभास सभक संग कवि देवीक सम्पूर्णता प्रस्तुत करैत छथि। रौद्र-छविक वर्णनकेँ वास्तविक हिंसाक ऐतिहासिक विवरण मानब अनुचित अछि; ई धार्मिक प्रतीकक काव्यमूल्य अछि।
कविताक वक्ता बहुधा असहाय शरणागत अछि, मुदा किछु रचनामे ओ प्रश्न सेहो करैत अछि—किएक दुःख, कखन उद्धार, कोन शरण? एहि प्रश्नक कारण स्तुति खालि आदेश/गुणक पुनरावृत्ति नहि रहि संवाद बनैत अछि। “अपराध”, “दुख”, “क्षमा”, “शरण” आ “चरण”क पद-परिवार एहि मानवीय नाटकक केन्द्रमे अछि।
६. समाज, स्त्री, स्थानीयता आ भक्तिक द्वन्द्व
लोकमाता आ देवी-महिमा: माता-केंद्रित भक्ति शक्तिक एगो विशेष नैतिक कल्पना अछि। एहि कल्पनामे सर्वशक्तिमान देवीक सँगे अबोध सन्तान-जेकाँ भक्त उपस्थित अछि। ताहि लेल देवीक आदेशक अपेक्षा कृपाक अपील अधिक सुनबामे अबैत अछि। जखन कवि अपन अपराध स्वीकार करैत अछि, तखन ओ धार्मिक आत्मग्लानि मात्र नहि, सामाजिक दीनताक भाषा सेहो बनि सकैत अछि—ई पाठाधारित व्याख्या अछि, प्रत्येक कविक निजी जीवनक तथ्य नहि।
स्त्री-उपस्थिति: सूचीमे “भैरनी देवी”, “ललितेश्वरी देवी”, “नन्दनी देवी” आ “राजलक्ष्मी” सन रचनाकार-नाम भेटैत अछि। महिला-नामक एहि उपस्थिति केँ चिन्हित कएनाइ जरूरी अछि, कारण शाक्त कविता केवल स्त्री-देवता पर पुरुष-दृष्टिक आख्यान नहि रहि स्त्री-कविस्वरक स्थान सेहो खोलैत अछि। तैयो नाम-साक्ष्य मात्रसँ कविसभक सामाजिक जीवन, शिक्षा, अधिकार आ ऐतिहासिक सम्बन्धक पूर्ण चित्र नहि बनैत अछि; एहि पर जीवनीगत खोज अलग चाही।
स्थानीयता: त्रिलोचन झाक “मिथिला देश”, चन्दा झाक “मैया”, तेजनाथ झाक “गंगे” आ अनेक कविक “जननि”क एक संग पठनसँ स्पष्ट होइत अछि जे ई देवी भौगोलिक, भाषिक आ घरेलू संसारसँ अलग नहि छथि। यद्यपि संग्रहक व्यापक स्वरूप शास्त्रीय अछि, ओकर काव्य-ऊर्जा स्थानीय बोलचाल आ क्षेत्रीय अनुभवसँ निरन्तर पुष्ट होइत अछि।
सामाजिक आलोचनाक सम्भावना: जखन भक्त ज्ञानविहीनता, दम्भ, पाप, विपत्ति आ आश्रयहीनता स्वीकार करैत अछि, एही पदमे व्यवहार-नीति आ आत्मालोचनक संकेत भेटैत अछि। मुदा प्रत्येक पदकेँ राजनीतिक प्रतिरोध अथवा निश्चित सामाजिक आन्दोलनक घोषणापत्र कहब मूल स्रोतक अपेक्षा बहुत आगाँ बढ़ब होयत। आलोचनाक उचित पद्धति अछि—जे पद खुलैत अछि, ओतबे कहब।
७. संकलनक उपलब्धि आ सम्पादकीय सीमासभ
प्रथम उपलब्धि — मैथिली शाक्त पद-परम्पराक बहुविस्तृत, कवि-आधारित पाठ एक संक्षिप्त संग्रहमे उपलब्ध करेनाइ। ७६ सूची-प्रविष्टि आ १९१ आन्तरिक गीतक्रमक संग ई पठनीय पाठ-संहति बनैत अछि।
दोसर उपलब्धि — विद्यापति-जेकाँ प्रसिद्ध नामक संग कम चर्चा भेल रचनाकारक नामक उपस्थिति; शोधार्थी लेल पाठ-चयन आ तुलनात्मक अध्ययनक आधार।
तेसर उपलब्धि — देवीक अनेक स्वरूप—भैरवी, दुर्गा, काली, कमला, गङ्गा, सरस्वती/वीणावादिनी—केँ एकहि व्यापक शाक्त आस्वादक अन्तर्गत रखनाइ।
चारिम उपलब्धि — अनेक गीतक अन्तमे पुरान स्रोतग्रन्थक संकेत; यद्यपि अपूर्ण, पाठक इतिहास खोजबाक दिशामे ई उपयोगी सुराक दैत अछि।
पाठालोचनक सीमा — पाण्डुलिपिक क्रम, मूल स्रोतक संस्करण, वैकल्पिक पाठ, विराम-व्यवस्थाक सिद्धान्त, कविक तिथिक प्रमाण आ संशोधन-नीति क्रमबद्ध रूपेँ संग्रहमे स्पष्ट नहि कएल गेल अछि।
सङ्गीत-अध्ययनक सीमा — गीतक बोल उपलब्ध अछि, मुदा राग, ताल, गायकी, प्रस्तुति-प्रसंग, गायन-परम्परा आ ध्वनि-अभिलेखक अभावमे निष्कर्ष सीमित राखब आवश्यक अछि।
प्रविष्टि-विधानक सीमा — गीतसूची रचनाकार-केन्द्रित अछि; गीत-विशिष्ट सूचीक अभावसँ १९१ पदमे कोन गीत कोन पृष्ठ पर आरम्भ होइत अछि, तकर तत्काल खोज कठिन होइत अछि।
ऐतिहासिक सीमा — पहिल संस्करणक सटीक वर्ष, गीत-स्रोतक काल, नेपाल-मिथिला सम्पर्कक प्रकृति, महिला कविसभक जीवनी आ हस्तलिखित प्रतिक परस्पर सम्बन्ध पर अनुसंधान करबाक आवश्यकतानि अछि।
ई सीमासभ गिनेनाइ पोथीक महत्त्व घटेबाक प्रयत्न नहि। साहित्यिक संरक्षणक पहिले चरणमे पाठसम्पादन आ उपलब्धता, आ दोसर चरणमे वैज्ञानिक पाठभेद, टिप्पणी, राग-ताल, शब्दकोश आ कालक्रम—दुनू अलग कार्य अछि। ई पुस्तक पहिल प्रकारक उल्लेखनीय प्रयत्न अछि; दोसर प्रकारक आलोचनात्मक संस्करण भविष्यक अनुसन्धानक विषय बनैत अछि।
८. गीतसूचीक ७६ प्रविष्टिक क्रमबद्ध पाठ-संकेत
निम्नलिखित सूची मूल “गीत सूची” -पृष्ठ ४–६)क क्रमपर आधारित अछि। “आरम्भ/सङ्केत” स्तम्भमे रचनाक पहिल पाँति अथवा गीत-समूहक पहिचान मात्र देल गेल अछि; ई सभ गीतक स्वतन्त्र संख्या नहि अछि। प्रत्येक टिप्पणी पाठमे देखाएल शीर्षक, आरम्भिक शब्द अथवा सम्बन्धित रचनाक अवलोकनपर आधारित संक्षिप्त आलोचनात्मक संकेत अछि। गीत-सूचीमे जतय एक रचनाकारक अनेक गीत अछि, ओतय पहिल अथवा प्रतिनिधि गीत देल गेल अछि।
01. विद्यापति (मुद्रित पृ. १०–१३) — «जय-जय भैरवि»। भैरवीसँ आरम्भ करैत गायत्री, काली, दुर्गा आदिक बहुरूपक स्तोत्रपरम्परा; रौद्रता आ अभयक तनाव प्रमुख अछि।
02. लखनचन्द (मुद्रित पृ. १४) — «नमो नमो चण्डी»। प्रणामात्मक पुनरुक्तिसँ गीतक मन्त्रोच्चार-सदृश आरम्भ; देवीक चरण शरणस्थल बनैत अछि।
03. चतुरानन (मुद्रित पृ. १४) — «जयमण्डला जयमण्डला»। मण्डलात्मक स्तुतिमे दुर्गाक विजय-प्रतिमा; आवृत्तिक लय महत्त्वपूर्ण अछि।
04. सदानन्द (मुद्रित पृ. १४) — «जय जय दुर्गे दुर्गति»। नाम आ कार्यक ध्वनि-साम्यसँ दुःख-निवारणक देवी उभरैत छथि।
05. महाराज महेश ठाकुर (मुद्रित पृ. १५–१६) — «जय जय जय भय भञ्जनि»। भय-भञ्जन, महिष-वध आ भक्त-रक्षाक समवेत प्रतिमा।
06. महाराज महिनाथ ठाकुर (मुद्रित पृ. १६) — «वदन भयान कान»। देवीक उग्र मुखरूप आ भक्तक विस्मय बीच वर्णनक गति।
07. लोचन (मुद्रित पृ. १६) — «जय जय जय नत सतत»। नत मस्तकक भावभूमि आ सतत वन्दनाक लघु विन्यास।
08. कृष्णपति (मुद्रित पृ. १७) — «शंकरी शरणं धयल हम तोर»। “हम तोर” सम्बोधन शरणागतिसँ उपजल निजी सम्बन्ध रचैत अछि।
09. मंगनीराम (मुद्रित पृ. १७) — «तोही धरनी तोही करनी»। सृष्टि आ क्रियाशक्तिक एके देवीमे आरोपण।
10. शम्भुदत्त (मुद्रित पृ. १७) — «जय जय आदि शक्ति»। संसारक मूल शक्तिक संक्षिप्त दार्शनिक स्वीकृति।
11. शंकर (मुद्रित पृ. १८) — «गिरिनन्दिनी शुभ दिन»। पर्वत-सुताक प्रतिमा आ शुभ-प्रार्थनाक सह-अस्तित्व।
12. जीवदत्त (मुद्रित पृ. १९) — «जय-जय शङ्करि»। शंकर-संबद्ध देवीक स्तुति; ध्वन्यात्मक पुनरुक्ति प्रभावी।
13. वांगीश्वर (मुद्रित पृ. १९–२०) — «जय जय त्रिगुण»। त्रिगुणक तत्त्व-संकेत देवीक विश्वव्यापी रूप खोलैत अछि।
14. श्रीकान्तगणक (मुद्रित पृ. २०) — «जय जय भगवति जय»। सीधा देवी-संबोधन आ गुणपरक आवृत्तिक गेय विन्यास।
15. रामनाथ (मुद्रित पृ. २१) — «जे जे जे भवसागर तारिणि»। संसार-सागर सँ उद्धारक वैष्णवी-शाक्त प्रतीक-साम्य।
16. देवनाथ (मुद्रित पृ. २१) — «नील वसनी शम्भु धरनी»। वस्त्र-वर्ण आ शिव-सहचर्यसँ प्रतिमाक दृश्यात्मक रूप।
17. जयकृष्ण (मुद्रित पृ. २२) — «जै कालिके स्वर्गधारिणि»। कालीक उग्रता आ ऊर्ध्वलोकक पालन-दायित्वक मेल।
18. रामदास (मुद्रित पृ. २२) — «प्रणमओ प्रणत कलपतरु»। कल्पतरु-रूपक देवीकेँ अभिलाषापूर्तिक केन्द्र बनबैत अछि।
19. साहेब रामदास (मुद्रित पृ. २२) — «जनकल्लोलि महिमा»। चञ्चल मनमे स्मरण आ महिमाक सम्बन्धक आग्रह।
20. गोविन्ददास (मुद्रित पृ. २३) — «जयति जय वृषभानु»। वृषभ-सम्बद्ध प्रतीक स्तोत्रक देवपारिवारिक पृष्ठभूमि खोलैत अछि।
21. उमापति (मुद्रित पृ. २३) — «जय जय मधुकेटभ मर्दिनि»। मधु-कैटभ-वधक स्मृति सृष्टि-रक्षिणी देवीक परम्परासँ जुड़ैत अछि।
22. रमापति (मुद्रित पृ. २४) — «जय जय त्रिभुवनतारिणि»। त्रिभुवनक उद्धारकर्त्री देवीक विराट विस्तार।
23. लालकवि (मुद्रित पृ. २५) — «जय हरिरमनी»। हरि-संबद्ध नामक प्रयोगसँ सम्प्रदायगत सीमाक लचीली भाषा।
24. देवानन्द (मुद्रित पृ. २५) — «जय जय दुर्गा»। लघु स्तुतिमे दुर्गाक नामे लय आ श्रद्धाक केन्द्र।
25. गोकुलानन्द (मुद्रित पृ. २५) — «जय जय भारति भगवति»। भारतीक वाणी-शक्ति सेहो शाक्त परिधिक अङ्ग बनैत अछि।
26. काहाराम (मुद्रित पृ. २६) — «जय जय दुर्गा दुर्गि, जै जै कमला»। दुर्गा आ कमलाक युग्म-आवाहन रूप-विविधता देखबैत अछि।
27. रत्नपाणि (मुद्रित पृ. २६–३१) — «जय जगजननि»। बहुगीतात्मक विस्तृत खण्ड; जननी, भुवनेशि, कमला आ दुर्गाक स्तोत्र-शृङ्खला।
28. भानुनाथ (मुद्रित पृ. ३२) — «जय जय त्रिभुवन»। त्रिभुवन-व्यापी देव्या सामर्थ्यक उद्घोष।
29. हर्षनाथ (मुद्रित पृ. ३२–३३) — «जय जय कुमति विनाशिनि»। दुःखक संग कुमतिक निवारण—शक्ति आ विवेकक सम्बन्ध।
30. चन्दा झा (मुद्रित पृ. ३४–३८) — «जय देवि महेश-पुत्रि»। दीर्घ खण्डमे दास्य, करुणा, मातृसंबोधन आ कल्याणक व्याकुल विनती।
31. कान्हदास (मुद्रित पृ. ३८) — «जय गंगाजी»। गङ्गाक देवी-स्वरूप जोड़ि शाक्त परिभाषाकेँ नदी-पूजा धरि बढ़ेनाइ।
32. जलधरदास (मुद्रित पृ. ३८) — «जननि ! अब जानु»। समय-सापेक्ष पुकार आ अपन कष्ट देखबाक अनुरोध।
33. दास (मुद्रित पृ. ३९) — «जा के पीर हरे»। पीड़ा-हरणक अनुभूति गीतक केन्द्रीय प्रत्याशा बनैत अछि।
34. चिरंजीव (मुद्रित पृ. ३९) — «जय काली जय तारा»। काली आ ताराक समानान्तर सम्बोधन तान्त्रिक देवी-बहुलता देखबैत अछि।
35. नरसिंहदत्त (मुद्रित पृ. ३९) — «दुर्गी लेखा दय-दय तोर»। कृपाक पुनःपुनः याचना दीन वक्ताक स्वरकेँ प्रधान करैत अछि।
36. श्रवण सिंह (मुद्रित पृ. ४०) — «जय कमलनयनी कमल»। कमल-प्रतिमाक सौम्यता देवीक रौद्र छविक प्रतिपक्ष रचैत अछि।
37. भैरनी देवी (मुद्रित पृ. ४०) — «जय जय दुर्गा अनुपम रूपे»। नामानुसार स्त्री-कविस्वर आ सौन्दर्यमयी दुर्गाक आवाहन।
38. आदिनाथ (मुद्रित पृ. ४०–५०) — «नहि जगबहार हम»। दीर्घतम खण्डसभमे सँ एक; अनेक नाम, रूपक आ शरणागतिपरक गीत।
39. दुर्गादत्त सिंह (मुद्रित पृ. ५०) — «तुअ पदे कमल संतत»। देवीक चरण-कमलमे मनक निरन्तर निबद्धता।
40. दीनबन्धु झा (मुद्रित पृ. ५१) — «जयति भगवति भक्त-तारिणि»। भक्त-तारण, दारुण वेष आ करुणाशक्तिक द्वैध।
41. जीवन झा (मुद्रित पृ. ५२) — «दिन पुन फेरहु भुवनेशि»। बदलि गेल जीवन-स्थिति सुधरेबाक तात्कालिक अपेक्षा।
42. तेजनाथ झा (मुद्रित पृ. ५२–५४) — «जगत जननि पद»। जगत-जननीक चरण, काली आ गङ्गा समेटैत नैतिक आत्मपरीक्षण।
43. सूरदास (मुद्रित पृ. ५४) — «जगदम्बा भवानी हे»। मातृभावक सरल आवाहनक केन्द्रमे दैन्य आ आशा।
44. दामोदर (मुद्रित पृ. ५४) — «जाग जननि हे»। जागरणक पुकार देव्या ध्यान प्राप्त करबाक भावभङ्गिमा।
45. लक्ष्मीपति (मुद्रित पृ. ५४) — «क्षमा समुद्र क्षमिय अब जननी»। क्षमा-समुद्रक उपमा आत्मस्वीकृत अपराधबोधकेँ शान्त करैत अछि।
46. यदुनाथ मिश्र (मुद्रित पृ. ५५) — «दैत्यों दमन»। असुर-दमनक आख्या संग उग्ररूपक स्मृति।
47. ललितेश्वरी देवी (मुद्रित पृ. ५५) — «जयति जगदम्बिके काली»। पूजा-अपर्याप्तताक आत्मालोचनक संग करुणामयी कालीकेँ स्मरण।
48. नन्दनी देवी (मुद्रित पृ. ५५) — «जय काली कलि कलुष»। कलियुगक कलुष आ कालीक शुद्धिकारी सामर्थ्यक ध्वनि।
49. जीवानन्द (मुद्रित पृ. ५६) — «जय जय भवजननि»। अस्तित्वक मूल मातृरूप आ सम्बोधनक ऊर्जस्विता।
50. सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ (मुद्रित पृ. ५६) — «धयल मुण्डमयी श्यामा»। उग्र प्रतिमा रचनाक दृश्यात्मक आकर्षण बनैत अछि।
51. ईशनाथ झा (मुद्रित पृ. ५७) — «जय जय दुर्गे दलनि»। दलनक क्रियाशक्ति आ भक्त-सम्बोधनक सहमेल।
52. मधुप (मुद्रित पृ. ५८) — «सम्प्रति सहस-सूर्य राजय जगमग माँ»। असीम तेजक हजार-सूर्य बिम्ब देवीक ज्योति-रूपक विस्तार करैत अछि।
53. श्रीकृष्ण (मुद्रित पृ. ५९) — «जय जय जननि»। मातृ-स्तुतिक लघु, आवृत्ति-आधारित विधान।
54. विश्वनाथ (मुद्रित पृ. ६०) — «जय जय सकल असुर»। विजय-गाथाक स्मृतिसँ देवीक पराक्रम स्थापित होइत अछि।
55. महाराज रामेश्वर सिंह (मुद्रित पृ. ६०) — «जय जय जगजननि, कि कहब जननि»। कथनीयताक अपर्याप्तता बतबैत महिमाक असीमता प्रकट होइत अछि।
56. शिवदत्त (मुद्रित पृ. ६१) — «ब्रह्मशक्ति जे चहिय आइली»। ब्रह्मशक्ति शब्दसँ उपासनाक दार्शनिक क्षितिज।
57. तन्नाथ झा (मुद्रित पृ. ६१) — «सिंह चढ़ल माता»। सिंहवाहिनी प्रतिमाक लोकदृश्य आ भय-निवारणक भाव।
58. यदुनाथ झा ‘यदुवर’ (मुद्रित पृ. ६२) — «मण्डलमय मैथिल»। मैथिली सांस्कृतिक शब्द-संयोगक संग देव्या सामर्थ्य।
59. ऋषिनाथ झा (मुद्रित पृ. ६२) — «जननी तनय विनय»। माता-पुत्र सम्बन्धक माध्यमसँ क्षमाक विनती।
60. राजलक्ष्मी (मुद्रित पृ. ६२) — «श्यामा चरण कमल हम पूजब»। चरणसेवा आ भक्तिक आत्मीय कृत्य एकठाम।
61. त्रिलोचन झा (मुद्रित पृ. ६२–६३) — «चण्डी तोहर मिथिला देश»। देवीकेँ सीधे मिथिलाक समाज आ भूगोलमे आमन्त्रित करबाक विरल स्वर।
62. गणनाथ (मुद्रित पृ. ६३) — «अकथ तत्त्व तुअ तारिणि»। अनिर्वचनीय शक्ति आ उद्धारक सम्बद्ध अवधारणा।
63. श्यामानन्द झा (मुद्रित पृ. ६४) — «जय कमलासिनि»। कमलासनक सौम्य रूप देवीक तत्त्व-विविधता बढ़बैत अछि।
64. आरसी प्रसाद सिंह (मुद्रित पृ. ६४) — «जननि, वीणा-वादिनी!»। विद्या, वाणी आ वीणाक सरस्वती-संकेतसँ व्यापक शाक्त अर्थ।
65. काञ्चीनाथ झा ‘किरण’ (मुद्रित पृ. ६४) — «जननी ! लिअ आब सुधि»। स्मरणक प्रतीक्षामे पीड़ित भक्तक तात्कालिक सम्बोधन।
66. चन्द्रभानु सिंह (मुद्रित पृ. ६५) — «जननि तोहर चरण»। चरणक निकटता भक्तिक लक्ष्य आ मनोवैज्ञानिक आश्वासन।
67. प्रभु नारायण ‘प्रदीप’ (मुद्रित पृ. ६५) — «जगदम्ब अही»। “अहाँ बिनु आश्रय ककर?” प्रश्नक पुनरावृत्ति स्तुतिमे नाटकीयता लबैत अछि।
68. चन्द्रमणि (मुद्रित पृ. ६५) — «जयति भवानी»। संक्षिप्त जयघोषक भीतर रक्षाक अभिलाषा।
69. चन्द्रकान्त झा (मुद्रित पृ. ६६) — «जागु जागु मैया»। निद्रा-विपर्ययक रूपक—देवीकेँ जागयबाक आग्रह दरअसल लोक-दुःख पर दृष्टि देबाक आग्रह।
70. अज्ञात कवि (मुद्रित पृ. ६७) — «गीत-पाठ (नाम अनिर्दिष्ट)»। रचनाकार अज्ञात रखल गेल अछि; स्रोत-अभावकेँ कल्पित जीवनीसँ भरब अनुचित।
71. जगज्ज्योतिमल्ल (मुद्रित पृ. ६७–६८) — «मधुकैटभ महिषासुर मारल»। पुराणिक असुर-वध आ मातृ-शक्तिक युग्म-स्वरूपक स्तुति।
72. जगत्प्रकाशमल्ल (मुद्रित पृ. ६९–७०) — «नहि आन गति हमरा»। आश्रयक एकमात्र आधार देवी, अपराध-स्वीकृति आ करुणा-याचनाक अनुक्रम।
73. जितामित्रमल्ल (मुद्रित पृ. ७०) — «नमो रुद्रानी गिरितनया»। शिव-संबद्ध रुद्राणी आ गिरितनयाक द्विनाम-आवाहन।
74. भूपतीन्द्रमल्ल (मुद्रित पृ. ७१) — «जय हिमालय नन्दिनी»। हिमालय-विम्ब देवीक उर्ध्वगौरव आ सांस्कृतिक भूगोलक संकेत।
75. प्रतापमल्ल (मुद्रित पृ. ७२) — «किदहु करम मोर हीन रे»। आत्मग्लानि, कर्म आ कृपाक विनय-पद्य; जपसँ बेसी आत्मस्वीकार।
76. जगतचन्द्र (मुद्रित पृ. ७२) — «जयति जगदम्बे काली»। अन्तिम गीतमे कालिकाक विजय आ शरणक संक्षिप्त समापन।
९. आलोचनात्मक निष्कर्ष
मैथिली शाक्त साहित्यक मूल्य केवल एहि बातमे नहि अछि जे ई देवीगीतक संकलन अछि; ओकर विशेषता अलग-अलग समय, शैली आ भाषिक स्तरक रचनाकारसभक संहति अछि। ७६ रचनाकार-प्रविष्टि आ १९१ गीतक भीतर देवी कखन असुर-विनाशिनी, कखन क्षमा-समुद्र, कखन ज्ञानदात्री, कखन मिथिलाक लोकमाता बनि उपस्थित होइत छथि। एही बहुरूपताक कारण पोथी मिथिलाक धार्मिक कल्पना, स्तोत्र-विन्यास, काव्य-भाषा आ सामाजिक संवेदनाक संयुक्त अध्ययनक आधार बनैत अछि।
सम्पादकक पहिल संस्करणक भूमिका शाक्त साहित्यक सांस्कृतिक-दार्शनिक क्षितिज दैत अछि आ दोसर संस्करणक टिप्पणी पाठ-प्रसारक अभिप्राय स्पष्ट करैत अछि। संग्रहक कवि-आधारित क्रम शोधक सहज आरम्भबिन्दु अछि, मुदा भविष्यक आलोचनात्मक संस्करणमे १९१ गीतक स्वतंत्र अनुक्रमणिका, समग्र स्रोत-सूची, पाठभेद, रचनाक कालनिर्धारणक प्रमाण, कठिन शब्दक कोश आ गायनपरम्पराक साक्ष्य जोड़ला सँ एकर उपयोगिता बहुत बढ़त।
ग्रन्थक समग्र मूल्याङ्कन: ई संरक्षित शाक्त काव्य-सम्पदाक महत्त्वपूर्ण पाठ-संकलन अछि, अन्तिम पाठ-निर्णायक संस्करण नहि। एकर अपूरणीय पक्ष अछि मैथिलीमे देवीक अनेक रूप, अनेक कविक आवाज आ अनेक प्रकारक विनय-गीत एकठाम देखबाक अवसर। एकर पढ़ाइमे पाठक केँ न आस्था छोड़बाक आवश्यकता अछि, न आलोचनात्मक विवेक; दुनूकेँ पृथक् विधि मानि एक-संग राखलासँ ई संग्रह आरो अर्थवान होइत अछि।
अध्याय 05 / २००६
मैथिली पत्रकारिता के सौ वर्ष
डॉ. योगानन्द झाक कृतिक आलोचनात्मक विवेचन
ग्रन्थमे आरम्भक ‘भव्य ओ दिव्य प्रभा’ शीर्षक भूमिका मैथिलीमे अछि, मुदा मुद्रित पृष्ठ १७ सँ मुख्य इतिहास-विवेचन प्रायः हिन्दीमे लिखल गेल अछि। ई भाषिक भेद शोधक प्रमुख तथ्य अछि। एहि समीक्षा मे मूल कथनकेँ मैथिलीमे विवेचित कएल गेल अछि, किन्तु मूलक भाषा केँ मैथिली बताकऽ प्रस्तुत नहि कएल गेल अछि। लेखकक हिन्दी विवेचन, मैथिली उद्धरण, पत्रिकाक नाम आ तिथिकेँ परस्पर अलग पहचान देल गेल अछि। मूल पाठमे आन्तरिक असंगति अथवा बाहरी स्रोतसँ भिन्नता भेटला पर ओकर उल्लेख ‘जाँचबाक विषय’क रूपमे अछि, अन्तिम सत्यक रूपमे नहि।
२. पोथीक मूल प्रतिपाद्य: शताब्दी उपलब्धिक संग अधूरा सार्वजनिक जीवन
योगानन्द झाक प्रतिपाद्य दुटा विपरीत तथ्यक बीच विकसित होइत अछि। पहिल, मैथिली पत्रकारिताक सौ वर्षमे असंख्य साहित्यिक पत्रिका, मासिक, साप्ताहिक, हस्तलिखित पत्र, बालपत्रिका, शोधपत्र, स्मारिका आ दैनिक प्रकाशित भेल; हिनका सभक माध्यमे आधुनिक मैथिली साहित्य, भाषा-चेतना, लिपि, वर्तनी, नाटक, कथा, कविता आ आलोचनाकेँ महत्वपूर्ण आधार भेटल। दोसर, पत्रिकाक ई विस्तार टिकाउ समाचार-व्यवस्था, व्यापक पाठकवर्ग, नियमित वितरण, व्यावसायिक आमदनी आ लोकजीवन सँ प्रत्यक्ष सम्बन्धमे समान अनुपातमे नहि बदलि सकल। लेखकक अन्तिम मूल्यांकनक केन्द्र ‘साहित्यकारिता’ आ ‘पत्रकारिता’क बीचक अन्तर अछि। (मुद्रित पृ. १८–१९, ६२–६४।)
एहि द्वन्द्वकेँ पोथीक मुख्य वैचारिक उपलब्धि मानल जा सकैत अछि। लेखक केवल पत्रिकाक सूची नहि देबैत छथि; ओ प्रश्न उठबैत छथि जे पत्रिका समाजक दैनन्दिन समस्या, सूचना, शिक्षा, अर्थव्यवस्था आ सार्वजनिक विमर्शक वाहक बनि सकल कि नहि। तथापि ‘सफल पत्रकारिता’ लेल दैनिक पत्रकेँ लगभग सर्वोच्च कसौटी मानबाक कारण ओ साहित्यिक, वैचारिक, सामुदायिक आ लघुपत्रिका सभक उपलब्धिकेँ कखनो-कखनो कम आँकैत छथि। समीक्षाक आगामी भागमे एहि तनावक परीक्षण कएल गेल अछि।
३. ग्रन्थक रचना-विन्यास आ लेखकीय स्वर
पोथी पारम्परिक क्रमाङ्कित अध्यायमे विभाजित नहि अछि; विषयगत शीर्षकक आधार पर एकटा दीर्घ इतिहास-निबन्धक रूपमे विकसित अछि। मुद्रित पृ. ५–१६ मे आत्मीय मैथिली भूमिका, साहित्यिक सम्बन्धक स्मृति, पं. सुरेन्द्र झा ‘सुमन’क प्रतिदान आ भाषा-आन्दोलनक प्रसंग अछि। पृ. १७–१९ मे पत्रकारिताक ऐतिहासिक आरम्भ आ समग्र मूल्यांकन; पृ. १९–२३ मे ‘दैनिक पत्र’ अन्तर्गत ‘स्वदेश’ आ ‘मिथिला मिहिर दैनिक’; पृ. २३–५४ मे ‘अन्य पत्र-पत्रिकायें’ अन्तर्गत प्रकाशनक विस्तृत परिचय; पृ. ५४–५५ मे ‘नेपालीय मैथिली पत्रिकायें’; पृ. ५५–५६ मे ‘हस्तलिखित पत्र-पत्रिकायें’; पृ. ५६–६२ मे ‘वर्तमान मैथिली पत्र-पत्रिकायें’; आ पृ. ६२–६४ मे निष्कर्ष देल गेल अछि।
आरम्भक भूमिकामे लेखक अपन संस्मरण, संगोष्ठीक अनुभव, सुमनजीक सान्निध्य, दैनिक ‘स्वदेश’क अङ्क देखबाक अवसर, आ विभिन्न सम्पादक–शोधकर्ताक सहयोगक स्मरण करैत छथि। ई विवरण ग्रन्थकेँ केवल द्वितीयक पुस्तक-समीक्षाक स्थानपर साक्षात् पत्रकारिता-जगतसँ सम्बद्ध सहभागी शोधक रूप दैत अछि। लेखक स्वयं स्वीकार करैत छथि जे उपलब्ध पत्रिकाक आधार पर चयन भेल अछि आ किछु दुर्लभ अथवा अनियमित पत्र छूटि सकैत अछि। एहि आत्मस्वीकृतिकेँ इतिहासलेखनक ईमानदार सीमा मानल चाही, नहि जे एकर सूची सर्वसमावेशी अछि। (मुद्रित पृ. १०–१४।)
शुभाशंसा, समर्पण, व्यक्तिगत कृतज्ञता आ संस्मरणक विस्तृतता पुस्तकक सांस्कृतिक वातावरणक साक्ष्य तऽ अछि; मुदा इतिहास-निबन्धक समीक्षात्मक अध्येता लेल ई पृष्ठ स्रोत-सामग्रीक वर्गीकरण सँ पृथक् पढ़ल जाय। व्यक्तिक प्रति कृतज्ञता, तथ्यक स्वतन्त्र प्रमाण नहि बनैत अछि।
४. १९०५ सँ पूर्व पत्रकारिताक कल्पना: योजना आ प्रकाशनक अन्तर
मुख्य विवेचनक आरम्भमे लेखक अयोध्या प्रसाद खत्रीक ‘तिरहुत’ शीर्षक पत्रक योजना आ १९०१ क पत्राचारक उल्लेख करैत छथि। हुनक कथन अनुसार योजना वास्तविक पत्र-प्रकाशनमे नहि बदलि सकल। एहि ठाम लेखक ‘प्रस्तावित पत्र’ आ ‘प्रकाशित पत्रिका’क बीच आवश्यक भेद स्थापित करैत छथि। ओ ‘अयोध्या प्रसाद खत्री स्मारक ग्रन्थ’ आ ‘अमरजीक परिचय संसार ओ पत्राचार’क उल्लेख कऽ पुरान पत्राचारक प्रमाण दिस संकेत करैत छथि। (मुद्रित पृ. १७।)
एहि प्रसंगक उपयोग इतिहासक प्रारम्भ-वर्षकेँ विवेकपूर्वक परिभाषित करबाक लेल उपयुक्त अछि। कोनो विचार, घोषणा अथवा छापाखानाक तैयारी पत्रकारिता-संस्थाक इतिहासक अङ्ग भऽ सकैत अछि; मुदा प्रथम प्रकाशित अंकक प्रमाण बिना ओकरा नियमित पत्रिका मानि लेब अशुद्ध होयत। योगानन्द झाक १९०५क चुनाव एहि अर्थमे प्रकाशित पत्रक परम्पराक आरम्भ-बिन्दु अछि। खत्रीक योजना सम्बन्धी मूल पत्राचार एहि संलग्न पोथीक भीतर उद्धृत स्रोतक माध्यमे ज्ञात होइत अछि; मूल पत्रक प्रतिलिपि एहि समीक्षा लेल स्वतन्त्र रूपसँ प्राप्त नहि भेल।
५. ‘मैथिल हित साधन’: जयपुर, प्रवास आ मुद्रित सार्वजनिकताक जन्म
लेखक जयपुरसँ प्रकाशित ‘मैथिल हित साधन’केँ मैथिली पत्रकारिताक प्रारम्भिक पत्रिका मानैत छथि आ विद्यावाचस्पति मधुसूदन झाकेँ अग्रणी प्रवर्तकक रूपमे स्थापित करैत छथि। पोथीमे एहि पत्रक उद्देश्यक केन्द्र शिक्षा-विस्तार, मैथिल समाजक हित, सामाजिक कुरीति पर विचार, तथा व्याकरण, गणित, भूगोल, इतिहास आ दर्शनसँ जुड़ल पुस्तक-प्रकाशनक उल्लेख अछि। एकर संग ‘मैथिल चारुचर्या’क प्रकाशनक प्रसंग सेहो अछि। (मुद्रित पृ. १७–१८, २४।)
एहि विवरणक ऐतिहासिक अर्थ ई अछि जे मैथिली पत्रकारिताक संस्था भौगोलिक मिथिलाक केन्द्रमे नहि, प्रवासी बुद्धिजीवीक संयोजनसँ सुदूर जयपुरमे प्रारम्भ भेल। भाषा-समुदायक निर्मिति लेल पत्रिका केवल समाचारक माध्यम नहि, लेखक, पाठक, विद्यालय, संघ आ प्रकाशक केँ एक सूत्रमे जोड़बाक साधन छल। राजस्थानक मैथिल प्रवास आ ज्ञान-विनिमयपर रिपुञ्जय कुमार ठाकुरक स्वतन्त्र शोध-सार सेहो १९०५क जयपुर प्रकाशन, मधुसूदन झा आ अन्तरक्षेत्रीय सम्पर्कक व्याख्या करैत अछि। ई बाहरी मिलान पोथीक व्यापक प्रसंगकेँ बल दैत अछि; तथापि एहि समीक्षामे पत्रिकाक प्रथम अंकक मूल आवरणक स्वतन्त्र परीक्षण नहि भेल।