विदेह शोध-सूची · मूल PDF

गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल योगानन्द झा

Videha Issue 451 · Research article continuation 4

६. तृतीय अध्याय: माटि-पानि व्यवसाय सम्बन्धी शब्दावली (पृ. १३३–१९४)

६.१ कुम्हार जाति सम्बन्धी शब्दावली

मूल विषय-सूचीमे कुम्हार-सम्बद्ध शब्दक वर्गीकरण “आधार सामग्री–आनुषंगिक आधार सामग्री–औजार–माटि तैयार करबाक औजार आ प्रयोग-वस्तु–पकबाक औजार–प्रयोग–बासन सम्बन्धी–पूजन सम्बन्धी–आवास सम्बन्धी–व्यवसायोपयोगी–यज्ञ, संस्कार आ पावनि-तिहार सम्बन्धी–अन्य सामग्री–बासनक गुण-दोष व्यंजक शब्दावली” रूपमे भेटैत अछि। एहि वर्गीकरणमे पदार्थक निर्माण-सँ लोक-आचारमे ओकर अन्तिम उपयोग धरि भाषिक यात्रा देखल जा सकैत अछि।

माटिक भेद, सानब, गढ़ब, सुखायब, पकायब आ रंगल अथवा सजायबाक क्रियामे तकनीकी शब्दक क्रम विकसित होइत अछि। पात्रक नाम केवल आकार नहि बतबैत, ओकरे सामाजिक उपयोग, अन्न-जल-संग्रह, पूजा वा संस्कारक सन्दर्भमे अर्थ बदलैत अछि। एतय शब्दावली मिथिलाक पदार्थ-संस्कृतिक महत्त्वपूर्ण साक्ष्य अछि। विशेष अध्ययनमे एकहि वस्तुक कच्चा, अधपाकल आ तैयार अवस्था लेल शब्दभेद अलग दर्ज करब उपयोगी रहत।

६.२ मल्लाह जाति सम्बन्धी शब्दावली

मल्लाह-सम्बद्ध उपखण्डमे आधार सामग्री, मल्लाहक औजार, नौ-परिवहनसँ सम्बन्धित, पारिभाषिक शब्द, मल्लाहक व्यवसायसँ सम्बद्ध, नावो-जाल-बनसो-बाँसक औजार, अन्य औजार, मल्लाहक उत्पाद, माछक प्रकार, माछक विभिन्न भाग, विक्रय-सहचर, शत्रु-प्रभेद, मखान-सिंघाड़ा चुनन आ निष्कर्षक उपविभाग अछि। ई विस्तार नदी-पोखरि-आधारित जीविका आ जलसंसाधनक स्थानीय वर्गीकरणक संकेत करैत अछि।

नाव, जाल आ माछक शब्द सामुदायिक अनुभवक तकनीकी सूक्ष्मता उघाड़ैत अछि। जल-मार्ग, जलक गति, माछ पकड़बाक पद्धति, माछक देह-भाग आ उत्पाद-वितरण—ई सभक शब्द केवल ‘मल्लाह’ नामक सामाजिक पहचान नहि, अपितु पर्यावरणक व्यावहारिक ज्ञान सेहो उपस्थित करैत अछि। मखान-सिंघाड़ाक समावेश सँ जल-जीविकाक बहुआयामी प्रकृति स्पष्ट होइत अछि। एहि खण्डकेँ पर्यावरणीय शब्दकोश आ मौखिक जीवन-इतिहाससँ जोड़ि पढ़ल जा सकैत अछि।

माटिकर्ममे पदार्थक अवस्था: माटिसँ बासन धरि

तृतीय अध्याय (पृ. १३३–१९४) के आरम्भमे लेखक माटि आ पानि आधारित काजक भूमिका विस्तारसँ रखैत छथि। पुस्तकक पृ. १३३ पर माटि/माटी/मिट्टी जेहन रूपसँ भाषिक भिन्नता आ कुम्हारक कार्यक प्रासंगिकता साथे उद्घाटित होइत अछि। 'माटि' एतय केवल प्राकृतिक पदार्थ नहि रहैत, अपन रूप बदलैत निर्माण-सामग्री थिक। पेषण, सानब, घोलब, आकार देब, सुखायब आ आगिमे पकायबाक क्रमक बीच ओकर व्यवहारिक नाम आ गुण बदलैत अछि।

पुस्तकक पृ. १४४–१४५ पर लेखक आवाँ अथवा बासन पकाबाक व्यवस्थाक चर्चा करैत छथि; आगि, ईंधन, बासन सजाबाक पद्धति, पकबाक अवस्था आ माटिक बासनक उपयोगसँ शब्दक सम्बन्ध जोड़ैत छथि। 'आवाँ' जँ भट्टाक विशेष संदर्भमे प्रयुक्त अछि, तँ ओकरा साधारण 'अग्नि' वा 'भट्ठी' कऽ छोड़ि देब विशेषार्थक हानि होयत। तकनीकी परिभाषामे कारीगरक दृष्टिसँ ताप देबाक व्यवस्थित स्थानक अर्थ उल्लेखनीय अछि।

बासनक नाममे पदार्थ आ अवसरक संगति

पोथीक विषय-सूची बासनक प्रयोग, भोजन, पूजा, संस्कार, पावनि-तिहार, अन्य सामग्री तथा बासनक गुण-दोष द्योतक शब्दक अलग श्रेणी दैत अछि। एहि योजना सँ स्पष्ट अछि जे एकहि आकारक पात्र सामाजिक प्रसंग बदलला पर भिन्न कार्य करि सकैत अछि। 'भण्डारणक पात्र', 'पकाबाक पात्र', 'पूजन-पात्र', 'उत्सव-पात्र'—एहिमे भिन्नता केवल वस्तुक भौतिक आकार नहि। नाममे उपयोगिताक अर्थ, निषेध, रीति आ सामुदायिक स्मृति सम्मिलित भऽ सकैत अछि।

स्रोत सँ प्रेरित एकटा महत्त्वपूर्ण विभेद इहो अछि जे वस्तुक 'अर्थ' आ 'काज' बराबर नहि। उदाहरणार्थ जल रखबाक पात्र धार्मिक क्रियामे प्रयोग होय तकर उपयोग-परिस्थिति बदलैत अछि, मुदा वस्तुक स्थायी नाम एक्के रहि सकैत अछि। दोसर दिशा मे समान पदार्थसँ बनल समान प्रकारक पात्र ओकर आकार वा उपयोगक कारण अलग नाम पाबि सकैत अछि। अतः शब्द-विश्लेषणमे पदार्थ, रूप, प्रयोजन आ अवसर चारू चिन्ह अलग देखबाक चाही।

पानिकर्ममे स्थान-नाम आ जल-परिवहन

मल्लाह-सम्बद्ध भागक पृ. १६२–१६३ पर लेखक नदी, पोखरि, गहिर स्थान, नाहर वा जलाशयक अनेक स्थानीय नाम प्रस्तुत करैत छथि। जलसंसाधनक शब्द केवल स्थलरूपकेँ चिन्हबाक लेल नहि, बल्कि यातायात, माछ पकड़ब, जाल लगायब आ जल-गहराइ बुझबाक व्यावहारिक मानचित्र थिक। कतेको शब्द आकार, गहिराइ, जलक उपलब्धता वा भौगोलिक स्थितिक आधार पर अलग होइत अछि। एहि अर्थ-वैविध्यक संकलन स्थानीय पर्यावरण-ज्ञानक दस्तावेज बनि सकैत अछि।

जलाशयक प्रकार आ मल्लाहक उपकरण अलग अर्थक्षेत्र छथि, तखनहुँ दुनूक सम्बन्ध व्यावहारिक अछि। नाव वा जालक रूप जलक वेग, गहिराइ अथवा किनारक बनावटसँ प्रभावित भऽ सकैत अछि। मुदा कोन औजार कोन जलाशय लेल निश्चित छल, से निरूपित करबाक लेल व्यवसायगत व्यवहारक विशेष साक्ष्य आवश्यक अछि।

माछक नाम, आकार, अवस्था आ विक्रय

पुस्तकक पृ. १८०–१८१ पर लेखक माछक नाम, सुकटीक उल्लेख, जलक व्यवस्था, पकड़बाक परिस्थिति, जाल चलाबाक क्रिया, माछ ताजा वा सड़ल होयबाक अवस्था, आ विक्रय-संबद्ध शब्दक चर्चा करैत छथि। एतय पदार्थ 'जीवित माछ' सँ 'खाद्य पदार्थ' बनेबाक प्रक्रिया सेहो शब्दार्थ बदलबैत अछि। सुकटी नाम जेहन रूपकेँ अर्थविज्ञानमे वस्तुक प्रसंस्कृत अवस्थासँ जोड़ि देखबाक आवश्यकता अछि।

माछक लोकनामकेँ प्राणी-विज्ञानक प्रजातिनामक पूर्ण समकक्ष मानब उपयुक्त नहि। एकहि लोकनाम अन्तर्गत अनेक जैविक प्रजाति सेहो होय सकैत अछि, अथवा एक प्रजाति अलग स्थानमे भिन्न नामसँ परिचित होय सकैत अछि। वैज्ञानिक नामक मिलान स्वतंत्र जीववैज्ञानिक प्रमाण बिना नहि करबाक चाही। मूल पोथी भाषिक प्रमाण दैत अछि; ई जैव-टैक्सोनोमीक सत्यापित सूची नहि।

मखान-सिंघाड़ा: जल-आधारित जीवनक विस्तार

विषय-सूचीमे मखान आ सिंघाड़ाक कामकेँ मल्लाह-संबद्ध शब्दावलीक भीतर स्थान भेटल अछि। एहि वर्गीकरण सँ संकेत भेटैत अछि जे लेखकीय 'पानि-व्यवसाय' केवल नाव वा माछधरनी नहि। जल-पारिस्थितिकी मे भोजनक उत्पादन, सङ्ग्रह, संसाधनक परिशोधन आ विक्रय सेहो समाहित अछि। मुदा प्रत्येक जल-उत्पादक सम्बन्ध एकहि समुदायसँ ऐतिहासिक रूपेँ स्थिर रहल, एहन निष्कर्ष निकालब अनुचित होयत।

तृतीय अध्यायक अन्तिम निष्कर्ष (पृ. १९४) मे लेखक कुम्हारक तुलनामे मल्लाहक शब्द-समूहमे क्षेत्रीय अन्तर आ शब्द-परिवर्तनक विशेष चर्चा करैत छथि। आलोचनात्मक अध्ययन लेल ई टिप्पणी कीमती अछि: स्थलीय माटिक बासन आ गतिशील जलकर्मक शब्दक प्रसार-स्थिति भिन्न रहि सकैत अछि। एहि अवलोकनक सांख्यिकीय परीक्षण भविष्यक कार्य होयत—केवल निष्कर्ष-वाक्यसँ भिन्नताक परिमाण नापल नहि जा सकैत।

७. चतुर्थ अध्याय: तूर-सूत व्यवसाय सम्बन्धी शब्दावली (पृ. १९५–२४२)

चतुर्थ अध्यायमे तूर-सूतक आधार सामग्री आ औजार, बाड़, चरखी, टकुरी, चरखा, सूतक ऐंठ-गुण, वस्त्र-जालिका, औजार आ प्रक्रिया, तानी-भरनी, पटबाक करघा, जोलाहक करघा, उत्पाद तथा अन्य व्यवसाय-सम्बद्ध शब्दावली आ निष्कर्षक स्थान अछि। एहि क्रममे सूत तैयार करब, सूत सँ ताना-बाना बनायब आ वस्त्र निर्माण करब—तीन चरणक तकनीकी शब्द-परम्परा एकत्र होइत अछि।

एहि अध्यायक विशिष्टता गति आ विन्यासक शब्द अछि: घूमब, ऐंठब, तानब, भरब, बुनब, किनार बनायब आ गुण-दोष चिन्हब। वस्त्र-निर्माणक अनेक शब्द पदार्थक नामक अपेक्षा प्रक्रियाक नाम होइत अछि। एकहि उत्पादन-प्रक्रियामे औजारक नाम, औजारक अङ्ग, कर्मी द्वारा प्रयुक्त क्रिया आ तैयार कपड़ाक प्रकार एक-दोसरक संग अर्थ-जाल बनबैत अछि। एहि शब्दजालक मानचित्र बनबैत समय क्रिया, करण आ परिणामक व्याकरणिक सम्बन्ध देखबाक चाही।

तूर-सूतक आरम्भ: सम्पूर्ण वस्त्र-श्रृंखला

पुस्तकक पृ. १९५ पर लेखक तूर-सूत व्यवसायमे जोलहा, पटवा, दर्जी, धुनिया, रंगरेज आ धोबीक भूमिका अलग करैत छथि। एकर अर्थ ई जे 'वस्त्रक शब्दावली' केवल करघाक तकनीकी कोश नहि, बल्कि रूई वा रेशासँ शुरु भऽ सूत बनब, बुनब, रँगब, सिलब आ धोबब धरि कतेको पड़ावक नाम-संग्रह अछि। 'वस्त्र उत्पादन' कर्ता-विशेषक एक क्षण नहि, बहुचरणीय सामाजिक उत्पादनक परिणाम अछि।

लेखक एतय बाड़क सामग्री आ ओकर सँ सूत तैयार करबाक विधिसँ शुरुआत करैत छथि (पृ. १९५)। बाड़क विभिन्न अवस्था, ओकर भंगुरता अथवा आकार, आ सूतक ऐंठन—ई सभ बुनकरीक बादक परिणाम प्रभावित करैत अछि। ताहि लेल सामग्रीक नाम आ तैयार कपड़ाक नाम बीच सूत-तैयारीक शब्दक स्वतंत्र स्थान अछि। यदि कोश बनाओल जाय तँ 'रेशा → सूत → तानी-भरनी → वस्त्र → परिष्करण' कड़ीकेँ परस्पर सम्बन्धित प्रविष्टि रूपमे रखबाक चाही।

करघाक अंगक शब्द वैज्ञानिक रूपसँ की बतबैत अछि?

पुस्तकक पृ. २०४–२०५ पर लेखक तास, खसखस, राछ, लरदी, पाछन आ धागा सँ सम्बद्ध कार्मिक क्रमक विवेचन करैत छथि। बहुतो शब्द बाह्य पाठक लेल अपरिचित होइत अछि, कारण ओ कोनो साधारण वस्तुक नाम नहि, करघाक विशेष भाग अथवा कामक ठिकना बतबैत अछि। करघाक रूपरेखा बिना केवल समानार्थी देलापर अर्थ आधा रहि जाएत। एहि लेलनवा अनुसन्धान-संस्करणमे मूल शब्दक संग निर्देशात्मक रेखाचित्र, साधनक आकार आ प्रयोगक क्षण जोड़ब आवश्यक अछि।

भाषिक दृष्टिएँ ई शब्द एक 'कार्यात्मक तन्त्र' बनबैत अछि। बुनकरीमे कोन अङ्ग स्थिर अछि, कोन घूमैत अछि, कोन सूत खींचैत अछि, कोन निचला वा ऊपरक अवस्था बनबैत अछि, आ कोन तैयार कपड़ाकेँ समेटैत अछि—एहि सम्बन्धक वर्णन बिना तकनीकी नाम याद रहि सकैत अछि, मुदा अर्थ नहि खुलत। लेखकक दीर्घ व्याख्या एहि कठिनाईकेँ किछु हद धरि दूर करैत अछि।

कपड़ाक बनावट, दोष आ सुधारक भाषा

पृ. २२२–२२३ पर कपड़ाकेँ सुखाबाक लेल तनाब करब, रँगक काम, किनार सम्हारब, दोष दूर करब आ कपड़ाक अन्तिम रूप देबाक बात अछि। उत्पादनक एहन अन्तिम चरणकेँ शब्द-संग्रहमे महत्त्व देल जाय, कारण 'बुनल वस्त्र' आ 'प्रयोग लेल तैयार वस्त्र' एक अवस्थाक वस्तु नहि। रंगरेजी, माड़, प्रसारण आ साज-सँवार शब्दक रूपमे प्रवेश करैत अछि।

एहि खण्डमे क्रियासँ बननिहार पद-परिवारो विचारणीय अछि। मूल क्रियासँ कर्ताक नाम, उपकरणक नाम, परिणामस्वरूप वस्तुक नाम अथवा गुण-दोष व्यक्त करनिहार विशेषणक सम्बन्ध बनि सकैत अछि। एहि प्रकारक रूपगत विश्लेषणमे शब्दक वास्तविक स्थानीय प्रयोग निर्णायक होइत अछि।

ई अध्याय आधुनिक शब्द-प्रयोगक आलोचनाक अवसर सेहो दैत अछि। मशीनद्वारा कातल सूत अथवा तैयार वस्त्रक शब्द ओहि कालक करघा-केंद्रित स्थानीय शब्दकेँ प्रतिस्थापित करैत हो, एहन संभावना लेखकक उपसंहारमे वर्णित सामान्य परिवर्तनसँ संगत अछि, मुदा कोन शब्द आइ लुप्त भेल तकर नामावली आधुनिक क्षेत्र-सर्वेक्षणसँ बनत।

८. पंचम अध्याय: धातु-व्यवसाय सम्बन्धी शब्दावली (पृ. २४३–३००)

८.१ लोहार

लोहार-उपखण्डक वर्गीकरण आधार सामग्री, औजार, गर्म करबाक, पकडबाक, पिटबाक, कटबाक आ छेद करबाक औजार, सहायक औजार, उत्पादन, सामान्योपयोगी, व्यवसायोपयोगी, शृंगार, अन्य विविध सामग्री धरि फैलल अछि। धातुक काममे ताप, बल, आकार आ धार सम्बन्धी तकनीकी क्रिया सघन होइत अछि। ताहि लेल औजार आ प्रक्रिया बीच भेद नहि बुझलापर बहुते अर्थ-संशय उत्पन्न भऽ सकैत अछि।

८.२ कसेरा

कसेरा सम्बन्धी उपखण्डमे आधार सामग्री, औजार, गर्म करबाक, पिटबाक, कटबाक, सहायक औजार, उत्पादन, धातु निर्मित पात्र-पात्रक सम्बन्धी, भोजन एवं पान सम्बन्धी, पूजाक बासन आ अन्य शब्दक विवेचनक योजना अछि। एहि वर्गीकरणक सांस्कृतिक पक्ष महत्त्वपूर्ण अछि—धातुक पात्र उत्पादन, भोजन-पद्धति आ अनुष्ठान तीनू क्षेत्रमे प्रवेश करैत अछि। पात्रक धातु, आकार, निर्माण-विधि आ प्रयोजनक पृथक नामक संकलन मैथिलीक पदार्थ-सम्पदा बुझबाक आधार प्रदान करैत अछि।

८.३ सोनार

सोनार उपखण्डमे आधार सामग्री, औजार, गर्म करबाक, पिटबाक, पकड़बाक, कटबाक, जोड़बाक, अन्य उपकरण, उत्पादन, गहना, माथ, नाक, कान, गर्दन, बाँहि-पहुँची, हाथ-पएर आदि शरीर-भागक आभूषण, दाँत-सम्बद्ध, औजार आ निष्कर्ष शामिल अछि। एहि खण्डमे वस्तु-आधारित नामकरण सँ अतिरिक्त शरीरक अङ्ग आ सामाजिक अवसरक आधार पर नामकरणक व्यवस्थित अध्ययन सम्भव अछि।

लोहार, कसेरा आ सोनार तीनू उपविभागमे ऊष्मा, पिटाइ, काटाइ, आकार-निर्माणक साझा प्रक्रिया भेटैत अछि, मुदा पदार्थक मूल्य, तैयार वस्तुक उपयोग आ सामाजिक प्रतीकात्मकता भिन्न अछि। तुलनात्मक शब्दावली तैयार कएला पर समान क्रिया लेल अलग कार्यसमुदायमे प्रयुक्त ध्वनि-रूपक अन्तर आ एकहि औजारक नामक अर्थ-विस्तार शोधक विषय बनैत अछि।

लोहारक मूल औजार-नाम: पृ. २४६–२४७

पृ. २४६–२४७ पर लेखक लोहारक पकड़बाक औजार, पिटबाक औजार, आधारक रूपमे प्रयोग होइत धातुक ठोस पाट, आगि जारि राखबाक उपाय, हावा देबाक व्यवस्था आ सामग्रीक आकार बदलाबाक क्रिया सँ जुड़ल शब्दक विस्तार करैत छथि। एहि वर्णनमे साधनक नाम शरीरगत क्रियाक निर्देश सेहो दैत अछि: पकड़निहार उपकरण हाथकेँ जरा सँ बचबैत अछि, पिटनिहार उपकरण बल पहुँचबैत अछि आ आधारक पाट प्रहारक प्रतिरोध करैत अछि। एकै 'औजार' वर्गक भीतर भिन्न कार्यव्यवस्था देखब महत्त्वपूर्ण अछि।

शिल्प-इतिहासमे तापसँ सम्बन्धित शब्दक तकनीकी अर्थ जनब आवश्यक अछि। लोहारक 'गरम करब' खण्डक सभ औजार अग्निक पर्याय नहि; कोनो ताप उत्पन्न करैत अछि, कोनो हावा पहुँचबैत अछि, कोनो गरम पदार्थकेँ पकड़ैत अछि, कोनो ओकर आकार बदलैत अछि। एहि कार्यगत भेद बिना शब्दक केवल हिन्दी/अंग्रेजी अनुवाद अधूरा भऽ जाएत।

लोहारक उत्पादक सामाजिक विस्तार

कृषिक उपकरण, घरक साधन, काठक काममे उपयोगी धातु-उपकरण, रसोईक सामग्री आ प्रतिरक्षात्मक अवयव—एहन अनेक उत्पादन-श्रेणी लोहारक कार्यकेँ अन्य व्यवसायसँ जोड़ैत अछि। मूल सूचीक आधार पर समस्त उपलब्ध उत्पादक नामक एकता सम्भव नहि, मुदा वर्गीकृत विश्लेषण स्पष्ट करैत अछि जे लोहारक शब्द-विधान व्यापक ग्रामीण अर्थव्यवस्थाक आधारभूत औजार-व्यवस्था सँ सम्बन्धित अछि। कोनो वस्तुक निर्माण-पक्ष आ ओकर ग्राहकक प्रयोग-पक्ष अलग-अलग अर्थक्षेत्र अछि।

कसेरा: पात्रक आकार आ धातुक अवस्था

पुस्तकक पृ. २७४–२७५ पर कसेराक अन्तिम उपादान, पात्रक रूप, थारी वा गोलाकार बासन, धार बनाबाक तथा धातुक सतहक कामक शब्दक विवरण अछि। एहिमे वस्तुक नाम आकार, धातु, उपयोग, गहिराइ अथवा धरिक बनावटसँ जुड़ल देखाइत अछि। कारीगर द्वारा देल नाम आ घरेलू प्रयोगकर्ता द्वारा कहल नाम समान होयबाक अपेक्षा नहि; जँ रूप भिन्न अछि तँ दुनू प्रकारक नाम दर्ज करब आवश्यक अछि।

बासनकेँ रसोई, भोजन, पूजाक अवसर आ सजावटक आधार पर अलग करब सांस्कृतिक शब्दार्थक अध्ययनक अवसर दैत अछि। एकहि पात्र भोजन परोसबाक सामान्य वस्तु सेहो भऽ सकैत अछि आ विशिष्ट संस्कारमे निश्चित प्रयोजनक रूप ग्रहण कऽ सकैत अछि। एहि द्विस्तरीय अर्थक परीक्षण लेल मूल सन्दर्भित प्रयोग जरूरी अछि; केवल वस्तुक चित्र देखिकेँ सर्वसामान्य सामाजिक अर्थ नहि बताओल जाय।

सोनार: धातुक शुद्धता, गढ़न आ अलंकरण

पृ. २७५ पर लेखक सोना-सँ सम्बन्धित धातु, गहना, मिश्रित धातु आ आधार-सामग्रीक चर्चा प्रारम्भ करैत छथि। सोनारक शब्दावलीमे धातुक शुद्धता, पिघलाब, तार बनाब, जोड़ब, सिकड़ी, गहना बँधब आ शरीर पर पहिरब—एकै पदार्थक अनेक व्यवहारिक अवस्था शामिल अछि। एहि कारण सोनारक व्यावसायिक शब्दकेँ केवल 'गहनाक सूची' मानब स्रोतक परिधि सीमित करब होयत।

पुस्तकक पृ. २९४–२९५ पर सिकड़ीक बनावट, कड़ी, गोट, शरीरक अङ्ग पर धार्य गहना आ विशेष आकारक विस्तारपूर्वक चर्चा अछि। समान रूपक छल्ला आ कड़ी अलग तकनीकी काममे भिन्न नाम पाबि सकैत अछि। सोनारक पृष्ठ सभ पर वस्तुक बारीक आकारक शब्दक प्रचुरता देखबैत अछि जे हस्तशिल्पक स्थानीय सूक्ष्म विज्ञानक अभिलेख तैयार होइत अछि।

शरीरांश आ अलंकार-नामक अर्थ-नक्शा

विषय-सूचीमे सोनारक उत्पादनकेँ माथ, नाक, कान, गर्दन, बाँहि-पहुँची, हाथ, पएर, कपड़ा आदि स्थानक क्रममे राखल गेल अछि। ई वर्गीकरण अर्थवैज्ञानिक दृष्टिएँ 'अवस्थिति-आधारित नामकरण' थिक। गहनाक नाम तकर पदार्थक कारणसँ होय सकैत अछि, आ शरीरक कोन अङ्ग पर धारण होइत अछि तकर कारणसँ सेहो। दुनू अर्थ-सम्बन्धक पाठ अलग करबाक चाही।

आभूषणक सामाजिक अवसर, विवाह-विधान अथवा क्षेत्रविशेषक पहिरावासँ जुड़ल प्रतीकात्मक अर्थ पृथक अध्ययनक विषय अछि। ग्रन्थक शब्दसम्पदा ताहि दिशामे महत्त्वपूर्ण आधार दैत अछि; मुदा प्रत्येक गहनाक सांस्कृतिक अर्थकेँ ओकर प्रसंग आ प्रचलनसँ जोड़ि जाँचब आवश्यक अछि।

तीन धातु-शिल्पक तुलनात्मक तत्त्व

लोहार, कसेरा आ सोनारक साझा क्रिया-धातु के आधार बनायब विश्लेषणक एक उपयोगी विधि अछि, मुदा 'पिटब' क्रियाक वस्तु, तीव्रता, ताप आ परिणाम तीनू शिल्पमे बदलि सकैत अछि। अतः समान ध्वनि बराबर समान कार्य नहि। लेखकक तीन अलग उपखण्ड एही अन्तरक सम्मान करैत अछि। एकटा भावी तुलनात्मक कोशमे 'उपकरण' आ 'उत्पाद' सँ अलग 'समान क्रियाक अलग शिल्पगत अर्थ' शीर्षक राखलापर पठन प्रभावी होयत।

९. षष्ठ अध्याय: अन्य पारम्परिक जातीय व्यवसाय सम्बन्धी शब्दावली (पृ. ३०१–३६२)

षष्ठ अध्याय (पृ. ३०१–३६२) मे कानू, हलुआइ, तेली, मोचिया, डोम/डोबर, कुरेढ़ी, बरई, पासी, सूड़ी, कलवार, लहेरी, चमार, माली आ अन्य कार्यसमुदायक शब्दावली समाहित अछि। “अन्य” कोटिक भीतर भिन्न आधार-सामग्री, औजार, क्रिया, उत्पाद आ सामाजिक उपयोगवला अनेक व्यवसाय छथि। हुनका सभकेँ एकरूप श्रेणी मानब उचित नहि; एहि खण्डक विविधतामे ग्रन्थक समाजभाषिक विस्तार प्रकट होइत अछि।

खाद्य-निर्माण, तेल निकालब, चमड़ा-सम्बद्ध कार्य, टोकरीकर्म, सेवा आ घरेलू उपयोगक अन्य वस्तु-विन्यासमे आधार-सामग्री, औजार, क्रिया, उत्पाद आ व्यवहारक नामक पृथक पृथक जाल अछि। ई अध्याय ग्रन्थक सामाजिक प्रसार देखबैत अछि। एहिमे प्रतिनिधित्वक प्रश्न सेहो उठैत अछि: कोन व्यवसाय अधिक विस्तार पओलक, कोन कम, आ एकर कारण स्रोत-सुलभता अछि कि ऐतिहासिक महत्त्व? उत्तरक लेल अध्यायवार प्रविष्टि-संख्या गनबाक स्वतंत्र काम आवश्यक अछि।

समुदाय-नामक आधार पर शब्दक सीमारेखा खींचबाक बदला एकहि शब्द विभिन्न समुदाय द्वारा कहल जाइत अछि कि नहि, ई परीक्षण अध्ययनक अगिला चरण होयबाक चाही। ‘जातीय’ पदकेँ अनिवार्यतः विशिष्ट पेशाक एकाधिकारक अर्थमे स्वीकार नहि कएल जा सकैत।

कानू, हलुआइ: खाद्यक तकनीकी भाषा

पुस्तकक पृ. ३०२–३०३ पर कानूक खाद्य-सामग्री, भुजला अन्नक रूप, चूल्हा, झाँझ, चलनी आ फरही वा लावाक विविध नामक विस्तार अछि। एतय 'खाद्य' शब्द कच्चा पदार्थ नहि, तापन, फुलाब, भुजाब, छानब, मिलाब आ परोसबाक परिणाम थिक। एकहि धान्यक रूप प्रक्रिया बदललासँ बदलैत अछि; एहि कारण अर्थक तकनीकी क्रम खाद्य-संस्कृति बुझबाक लेल अनिवार्य अछि।

पुस्तकक पृ. ३०३ पर 'भुजा', 'लावा', 'फरही', 'माड़' जेहन नामक चर्चासँ बुझल जा सकैत अछि जे भोजनक निर्माण-प्रक्रिया भिन्न रूपक नाम बनबैत अछि। मुदा प्रत्येक नामकेँ एकहि वनस्पति अथवा एकहि तापन-प्रक्रियाक सार्वत्रिक पर्याय नहि कहबाक चाही। क्षेत्रानुसार नाम-प्रयोग बदलि सकैत अछि। खाद्यविज्ञानक शब्दावली तैयार करैत समय अनाजक मूल रूप, तापन-विधि, तैयार खाद्यक बनावट आ खेबाक अवसर चारू तत्व दर्ज करब योग्य होयत।

हलुआइ-संबद्ध सामग्रीमे दुग्ध, दही, मिठाइक प्रसंस्करण, पाक-विधि, पात्र आ शुद्धता-संबद्ध पदक सन्दर्भ देखल जा सकैत अछि। पृ. ३२० पर लेखक दहीक अनेक स्थानीय नाम आ जमाबाक विधिक उल्लेख करैत छथि। एतय 'जोड़न', 'जमाब' अथवा भिन्न अवस्था—ई क्रियात्मक अर्थ खाद्य-प्रौद्योगिकीमे महत्त्वपूर्ण अछि। सामान्य भाषामे 'दही' कहि देब पर्याप्त हो, मुदा कारीगरक प्रयोगमे ओकर अवस्था भिन्न काजक अनुकूल रहि सकैत अछि।

तेली: कोल्हू, तिलहन आ तेलक उत्पाद

पुस्तकक पृ. ३२०–३२१ मे तेलीक व्यवसायकेँ आधार सामग्री, तिलहन, कोल्हू, तेल पेरबाक औजार आ पदार्थक अवशेषसँ जोड़ल गेल अछि। कोल्हूक अंगक नाम, तिलहनक भेद, तेल निकलाबाक क्रिया आ तैयार तेलक उपयोग ई चार स्तर मिलि एकटा अर्थक्षेत्र बनबैत अछि। खेत सँ आयल बीया आ तेल निष्कासनक बाद बचल सामग्रीकेँ समान पदार्थ-वर्गक अन्तर्गत रखबाय उपयोगी अछि, मुदा ओकर उपयोग-परिस्थिति भिन्न होइत अछि।

तेल-पेरनी कृषि आ घरेलू उत्पादनक बीच सेतुक काज करैत अछि। उपकरणक यंत्रीकृत रूप विकसित भेला पर पेरनीसँ सम्बन्धित पुरान शब्दक प्रयोग आ अर्थ दुनू बदलि सकैत अछि।

पासी: ताड़-खजूरक कार्यक शब्द

पुस्तकक पृ. ३३४–३३५ पर लेखक ताड़ आ खजूरक गाछ, कटल स्थान, रस जमा करबाक पात्र, उतरबाक साधन, गाछक अलग अङ्ग आ रस निकालबाक कार्यक नाम प्रस्तुत करैत छथि। एतय एक वनस्पतिक शरीर ही कार्यक्षेत्र बनैत अछि; गाछक भिन्न अंश जानल बिना प्रयोगक शब्दक अर्थ नहि खुलैत। 'ताड़', 'खजूर', 'खोल', चीरबाक क्रिया आ पात्रक विन्यासक भिन्नता स्थानिक वनस्पति-ज्ञान आ जीविका-दक्षताक संयुक्त अभिलेख अछि।

चमार: चर्म-शिल्पक प्रक्रम

पुस्तकक पृ. ३४४–३४५ पर चर्मसँ सम्बन्धित सामग्री, कातल अथवा तैयार चाम, शुद्धि, रँग, काटब, जोड़ब, सिलब आ तैयार चामक वस्तुक विवेचन अछि। एहि खण्डमे कच्चा जैविक पदार्थक शोधन आ टिकाउ वस्तुमे रूपान्तरणक चरण संज्ञा आ क्रियाक संग अलग-अलग दर्ज अछि। कारीगरक ज्ञानक मूल बिन्दु पदार्थक गुण बदलनाय थिक। चर्मक काम केवल उत्पादनक अन्तिम वस्तुक नामसँ बुझल नहि जा सकैत।

पृष्ठ ३४५ पर अन्य औजार आ चामक प्रकारक चर्चा भाषिक प्रमाण दैत अछि जे एहि व्यवसायमे सामग्रीक परिवर्तनक सूक्ष्म नाम छल। एहि साक्ष्यकेँ ऐतिहासिक शिल्पज्ञानक प्रमाणक रूपमे पढ़ब चाही। व्यवसायसँ जुड़े जातिगत पूर्वग्रहक आलोचनात्मक परीक्षण कएल जा सकैत अछि, मुदा मूल कारीगरक कौशलकेँ उपेक्षित नहि करबाक चाही।

मोचिया, कुरेढ़ी, लहेरी, बरई, माली आ शेष समूह

मोचिया, कुरेढ़ी, लहेरी, बरई आ मालीक कार्यक्षेत्र अलग-अलग आधार-सामग्री आ उत्पादक संग सम्बद्ध अछि—पादत्राण वा चमड़ा, टोकरी अथवा बेंत, शृंगारक सामग्री, पान-पत्ता आ पुष्प-संस्कृति। एहि विविधताक कारण एकहि अध्यायमे सामाजिक सेवा, घरेलू उपयोग आ हस्तशिल्पक अनेक अर्थक्षेत्र उपस्थित होइत अछि।

मूल लेखकीय परिधिक अनुसार ई खण्ड छोट-छोट पेशाक लोकव्यावसायिक तकनीक एक संग उपस्थित करैत अछि। आलोचनात्मक प्रश्न अछि जे कोन पेशा विस्तृत सामग्री पाबैत अछि आ कोन अपेक्षाकृत संक्षिप्त। ई असमानता जरुरी नहि महत्त्वक स्तर देखाबय; क्षेत्रीय साक्षात्कार, पुस्तकक रचनाक समय उपलब्ध विशेषज्ञ अथवा विशिष्ट कार्यक अभिलेखनक सुविधा सेहो कारण भऽ सकैत अछि। एखन एहि कारण सभ पर अनुमान मात्र सम्भव अछि।

छठम अध्यायक शब्दसंग्रहक मूल सिद्धि

मुख्य पदार्थ-केन्द्रित अध्याय सँ बाहर जे व्यावसायिक नाम छूटबाक खतरा छल, लेखक 'अन्य पारम्परिक व्यवसाय' मे ओकरा व्यापक रूपेँ समेटैत छथि। एहि खण्डक महत्त्व कारण ई अछि जे भाषा शुद्ध शिल्पशालामे नहि, रसोई, कृषिखेत, हाट, पोखरि, गाछ, घर आ उत्सवमे सेहो निर्माण होइत अछि। ई बहुकेंद्री शब्द-सम्पदा मिथिलाक रोजमर्रा उत्पादनक परिधि बढ़ा दैत अछि।

१०. सप्तम अध्याय: भाषातात्त्विक विचार (पृ. ३६३–३९३)

सप्तम अध्याय पोथीक संग्रहपरक सामग्रीकेँ भाषावैज्ञानिक विवेचनमे परिवर्तित करबाक प्रयास थिक। मूल विषय-सूचीमे व्युत्पत्तिक दृष्टिएँ शब्द, उद्गमक दृष्टिएँ शब्द, अर्थक दृष्टिएँ शब्द, अनेकार्थक शब्द, स्वार्थक शब्द, पर्यायवाची शब्द, शब्द-निर्माणक प्रक्रिया, वैकल्पिक शब्द, मानकीकरणक समस्या, संक्षिप्त शब्द, उपसर्ग-प्रत्यय, ध्वनि-विचार, स्वरध्वनि, ह्रस्वतर स्वर, व्यंजनध्वनि, संयुक्त व्यंजन, शब्दमे वर्ण-संख्या, ध्वनि परिवर्तन, अर्थ-परिवर्तन आ निष्कर्षक उल्लेख अछि।

१०.१ शब्दोत्पत्ति आ अर्थ-सम्बन्ध

व्यवसायिक शब्दमे देशज ध्वनि, पड़ोसी भाषा-संपर्क, प्राचीन शब्दक परिवर्तित रूप आ शिल्पक नवा व्यवहारसँ उत्पन्न नाम—सभ प्रकारक इकाई सम्भव अछि। मुदा कोनो शब्दकेँ केवल ध्वनि-साम्य पर संस्कृत, हिन्दी, बंगला अथवा फारसी-मूलक कहब पर्याप्त नहि। ऐतिहासिक साक्ष्य, पुरान प्रयोग आ क्षेत्रीय वितरण चाही। बहुअर्थकता आ पर्यायवाची सम्बन्धमे सेहो अर्थक सन्दर्भ निर्णायक अछि: एक औजारक नाम अलग क्षेत्रमे अलग वस्तु लेल प्रयोग होय सकैत अछि।

रूढ़, यौगिक आ योगरूढ़

पुस्तकक पृ. ३६३ पर लेखक रूढ़, यौगिक आ योगरूढ़ नामक त्रिविध वर्गीकरण प्रस्तुत करैत छथि। रूढ़क अर्थ सामान्य रूपेँ एहन शब्द जेकरा अपन समाज-प्रयोगमे स्वीकृत अर्थ अछि, यौगिकमे अङ्गरूपक संयुक्त अर्थक भूमिका आ योगरूढ़मे संयुक्त रूपसँ उत्पन्न विशेष अर्थक प्रश्न केन्द्रमे अछि। व्यावसायिक शब्दमे ई वर्गीकरण विशेष महत्त्व रखैत अछि, कारण साधनक आकार वा कार्य सँ बनल नाम कालक्रमेँ विशेष औजारक स्थिर नाम भऽ जाइत अछि।

समीक्षात्मक दृष्टिएँ कोनो शब्दकेँ यौगिक बताबैसँ ओकर ऐतिहासिक उत्पत्ति सिद्ध नहि होइत अछि। वर्तमान मैथिलीभाषीक दृष्टिसँ ओकर अङ्ग-भाग स्पष्ट अछि कि नहि, ई पृथक प्रश्न अछि। ई शब्दविज्ञानक जरूरी सावधानी अछि; लेखकक उदाहरणक सन्दर्भमे हर व्युत्पत्ति लेल कालिक प्रमाण अपेक्षित अछि।

पर्याय आ एकार्थता: पृ. ३७४–३७५

पुस्तकक पृ. ३७४–३७५ पर लेखक पर्याय-विचार करैत छथि आ अनेक शब्दसमूहक उदाहरण देैत छथि; तहिना शब्द-निर्माणक प्रक्रियाक वर्णन प्रारम्भ होइत अछि। 'एक वस्तुक अनेक नाम' देखिते 'पूर्ण समानार्थी' कहब उचित नहि, कारण अनेक पर्यायमे प्रसंग, क्षेत्र, कार्यगत विशेषता आ भावक अन्तर रहि सकैत अछि। लेखकक तकनीकी पर्यायक निबन्धन आरम्भिक सामग्री दैत अछि; नवा कोशमे क्षेत्र, वाचक समुदाय, औजारक रूप वा उपयोगक अंतर जोड़ि वर्गीकरण अधिक समर्थ बनत।

एहि प्रश्नक एक प्रायोगिक समाधान अछि जे मुख्य प्रविष्टि सँ सभ प्रचलित पर्यायक ओर संकेत देल जाय, मुदा प्रत्येक रूपकेँ बिनु विवेचन मुख्य रूपमे गुम नहि करल जाय। 'पर्याय' आ 'भिन्न रूप' सभ समय एक नहि: ध्वनिमात्राक फेर-बदल रूपान्तर हो सकैत अछि, जखन कि भिन्न पदार्थ वा उपयोगक अंतर पर्याय-सीमा कें चुनौती दैत अछि।

शब्द-निर्माण आ तकनीकी रूपक विस्तार

पृ. ३७५ पर लेखक अनेक शब्दक रचना औजारक आकृति, रङ्ग, दन्त, भाग, क्रिया वा पदार्थक विशेषतासँ जोड़ैत छथि। एकर शोधात्मक फल ई अछि जे व्यावसायिक नामकरण आकस्मिक नहि, मानवीय परिचयक वर्ग-निर्माण प्रक्रिया थिक। जे वस्तु दाँतसमान अछि, ओकर नाममे दाँतक समानता आबि सकैत अछि; जे औजारक क्रिया कटबाक अछि, ओहि क्रियासँ सम्बद्ध नाम बनि सकैत अछि। मुदा विशिष्ट शब्दक रचनाक सिद्धि केवल रूपक समानता सँ नहि, प्रचलित अर्थक स्वतंत्र जाँच सँ होएत।

प्रत्यय, लघुता आ बहुरूपता

पुस्तकक पृ. ३८२–३८३ पर लेखक शब्द-निर्माणक रूपांतर, संख्यावाची तथा अन्य बहुप्रयोज्य प्रत्ययक सूचीसँ उदाहरण दैत छथि। एहि अंशकेँ अध्ययनक समय एतबए ध्यान देबाक चाही जे एक प्रत्यय भिन्न-भिन्न शब्दमे समान अर्थ नहि रखि सकैत अछि। कोनो रूप लघुता देत, कोनो समूह-सूचक भऽ सकत, कोनो क्षेत्रीय बोलीक अनुकूल रूपनिर्माण होयत। भाषा-तत्त्वक विस्तारमे संभावित नियम आ विवेचित अपवादक अलग लेखाजोखा आवश्यक अछि।

ध्वनि-विचार आ मानकीकरण

लेखक भिन्न व्यावसायिक नामक क्षेत्रगत उच्चारण, स्वर-व्यञ्जन, संयोग आ ध्वनि-परिवर्तन पर विचार करैत छथि। पुस्तकक पृ. ३९२ पर ध्वन्यात्मक परिवर्तनक उदाहरणक संग अर्थपरिवर्तनक चर्चा अलग खुलैत अछि। संकलित रूपमे भिन्न-भिन्न नाम अछि, मुदा मानक शब्द लिखबाक उद्यममे जीवित उच्चारणकेँ विलोपित करब लोकसाक्ष्यकेँ क्षति पहुँचाओत। उपयुक्त कोशमे मूल लिखित रूपक संग उच्चारण-रूप, सम्भव हो तँ ध्वनिलिपि, आ क्षेत्र-कोड सुरक्षित रहबाक चाही।

प्रत्येक क्षेत्रीय रूपकेँ लेखनत्रुटि कहब उचित नहि। कतेको स्वर-परिवर्तन जीवित भाषिक परम्पराक नियत व्यवस्था दर्शाबि सकैत अछि। एकर जाँच लेल एक शब्दक भिन्न रूप मात्र नहि, समान ध्वनिक परिवर्तन अनेक शब्दमे नियमित रूपेँ होइत अछि कि नहि, तकर तुलनात्मक परीक्षण जरूरी अछि। लेखकक दृष्टिसँ संग्रहित उदाहरण ई परीक्षणक सामग्री बनैत अछि।

अर्थ-विस्तार, अर्थ-संकोच आ अर्थादेश

पुस्तकक पृ. ३९२–३९३ पर लेखक अर्थ-विस्तार, अर्थ-संकोच आ अर्थादेशक विवरण दैत छथि। पेशागत शब्द अर्थपरिवर्तनक सशक्त उदाहरणक क्षेत्र अछि, कारण औजारक नव बनावट, पुरान वस्तुक कम प्रयोग अथवा एकहि नामक नव उद्योगमे प्रयोग अर्थ-सीमा बदैल सकैत अछि। जखन शब्द पहिने व्यापक पदार्थ लेल प्रयुक्त हो आ बादमे मात्र विशेष उपकरण लेल, तँ अर्थ-संकोचक सम्भावना उठैत अछि; उलटा स्थितिमे अर्थ-विस्तारक। मूल उदाहरणक आन्तरिक कालक्रम सँ सत्यापन बिना ई प्रक्रिया प्रत्येक रूप पर लागू नहि करबाक चाही।

सातम अध्यायक मूल उपलब्धि ई जे ओ व्यवसायिक शब्दसम्पदाक सूचिकेँ भाषिक घटना बनाक पढ़ैत अछि। तथापि कोनो शब्दक व्युत्पत्ति, बहुअर्थता अथवा मानकीकरणक अन्तिम निर्णय लेल दिनांकित ऐतिहासिक प्रयोग आ क्षेत्रीय साक्ष्यक मिलान अनेक ठाम आवश्यक रहैत अछि।

११. उपसंहार (पृ. ३९४–३९७)

लेखकक स्वकीय निष्कर्षक सूक्ष्म पाठ

पुस्तकक पृ. ३९४–३९५ पर लेखक स्पष्ट करैत छथि जे विषयक विस्तार अत्यन्त व्यापक अछि आ प्रस्तुत पोथीमे सबै सम्भव पेशा, सबै शब्दक पूरा विस्तार समाहृत नहि भऽ सकल अछि। तकर बावजूद ओ विभिन्न व्यवसायीक आधार-सामग्री, औजार, उत्पादन, कार्य-विभाजन आ गुण-दोष बताबैवला शब्दक संकलनकेँ महत्त्वपूर्ण मानैत छथि। ई आत्ममूल्यांकन पढला पर पोथीक उचित प्रतिपादन 'अन्तिम सर्वसमावेशी कोश' नहि, 'प्रारम्भिक व्यवस्थित शोध-आधार' रूपमे करब चाही।

पृ. ३९५ पर लेखक श्रमक बदलैत साधन, यंत्रीकरण, पुरान औजारक घटैत उपयोग आ परम्परागत शब्दक लोपक आशंका उपस्थित करैत छथि। कतेको पेशामे नव उत्पादनक संग नवा शब्द आबि रहल अछि, एहन सामाजिक परिवर्तनक संकेत भेटैत अछि। एतय भाषिक परिवर्तन 'शब्दक गलती' नहि; श्रमक पदार्थ आ उपयुक्त साधन बदलनाय तकर एक कारण अछि। ई निष्कर्ष भाषा-इतिहासक अत्यन्त प्रासंगिक प्रश्न उठबैत अछि: जे पुरान पद तकनीकी ज्ञानक संग लुप्त होइत अछि, ओकरा पाठ-आधारित साक्ष्यमे कोना सुरक्षित राखल जाय?

१२. परिशिष्ट: समुदाय-सूची, लोकोक्ति आ ग्रन्थक सूची (पृ. ३९८ सँ)

परिशिष्टक प्रथम भाग “मिथिलाक पारम्परिक व्यवसायी जाति सम्बन्धी शब्द-सूची” (पृ. ३९८) अछि। दोसर “व्यवसायी जाति सम्बन्धी कतिपय लोकोक्ति” (पृ. ४०२) तथा तेसर “अधीत ग्रन्थक सूची” (पृ. ४०४) रूपेँ विषय-सूचीमे अंकित अछि। समुदायनामक सूची मुख्य लेखमे आएल सामाजिक श्रेणीक पारस्परिक सन्दर्भ लेल सहायक अछि, जखन कि लोकोक्ति व्यवहारक अर्थ-संकेत आ समाजक मूल्यांकनक अलग स्तर देखबैत अछि।

परिशिष्टक समाजभाषिक महत्त्व: नामसूची आ लोकवचन

पुस्तकक पृ. ३९८–४०१ पर व्यवसायी जातिसँ सम्बद्ध नामक सूचीमे स्त्रीलिंग, उपजाति अथवा स्थानीय उपाधि, मूल नाम, विशिष्ट देवता आदि क्षेत्रक संकेत देखल जा सकैत अछि। उदाहरणार्थ पृ. ३९८ पर कलवार, कसेरा, कानू, कुम्हार, कुरेढ़ी, गरेड़ी, चमार आ पृ. ४००–४०१ पर पटवा, पासी, बरई, बरही, मल्लाह, माली, लहेरी, लोहार, सूड़ी, सोनार, हलुआइ आदि नाम पाओल जाइत अछि। किछु प्रविष्टिमे एक नामक अनेक प्रचलित उपनाम दर्ज अछि। एहन तथ्य समुदाय-नामक सामाजिक विस्तार दर्शबैत अछि, मुदा प्रत्येक नाम वर्तमान सर्वमान्य सामाजिक आत्मपरिचय अछि, एहन निष्कर्ष नहि।

परिशिष्ट (ख) मे व्यावसायी जातिसँ सम्बद्ध लोकोक्तिक सामग्री (पृ. ४०२ सँ) समाजक व्यवहारिक दृष्टिक शब्दीय साक्ष्य अछि। लोकवचनमे प्रशंसा, व्यंग्य, आलोचना आ रूढ़ि एकहि संग समाहित भऽ सकैत अछि। लोकक कहबीकेँ बिना समीक्षा ऐतिहासिक तथ्य अथवा वर्तमान नीति बनायब उचित नहि; जे कथन लोकभाषामे भेटैत अछि ओ तत्कालीन मूल्यांकनक संकेत हो सकैत अछि, वास्तविक समुदायकेँ परिभाषित करबाक वैध आधार नहि।

“अधीत ग्रन्थक सूची” पृ. ४०४ सँ प्रारम्भ होइत अछि। पृ. ४०४–४०५ पर संस्कृत-प्राकृत, हिन्दी आ मैथिलीक सन्दर्भ भेटैत अछि; सूची तकर बादो जारी अछि। ई सन्दर्भ-विन्यास ग्रन्थक शब्दसंग्रहकेँ व्यापक भाषिक आ साहित्यिक परम्परासँ जोड़ैत अछि।

परिशिष्टक उपयुक्त नवा सम्पादकीय प्रस्तुति

भविष्यक संस्करणमे मुख्य कोशीय प्रविष्टि आ परिशिष्टक समुदाय-नाम बीच द्विदिशी संकेत देल जा सकैत अछि। उदाहरणार्थ एक कारीगर-नाम सँ सम्बन्धित औजार, पदार्थ, क्रिया आ उत्पाद धरि पहुँच हो; विपरीत दिशा मे कोनो औजार सँ हुनकर समस्त अलग-अलग प्रयोगकर्ता पेशाक नाम धरि पहुँचल जा सकय। एहि व्यवस्था सँ जाति-केंद्रित सीमाक पुनरुत्पादन कम होयत आ वस्तु-केंद्रित अध्ययन सहज बनत।

सन्दर्भित लोकोक्तिक समालोचनात्मक अनुक्रमणिका अलग सँ बनाओल जाय, जाहिमे अर्थ, प्रसंग, सम्भावित पक्षपात, भाषिक अलंकार आ स्रोत अंकित होय। लोकवचनक पुनर्प्रकाशन सामाजिक सम्मानक कसौटी पर जिम्मेदारी सँ करबाक चाही; बिना प्रसंगक अपमानजनक वाक्य पाठककेँ भ्रमित कऽ सकैत अछि।

१३. अध्यायवार तुलनात्मक सारणी

१४. ग्रन्थक समीक्षात्मक मूल्याङ्कन

ग्रन्थक तीन विशिष्ट उपलब्धि अछि: भिन्न उत्पादन-क्षेत्रक तकनीकी शब्दसम्पदाक व्यवस्थित संकलन, कारीगरक भाषाकेँ सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमिसँ जोड़बाक प्रयास आ एहि शब्दसंग्रहक भाषातात्त्विक विवेचन। एकर सीमासभ सेहो विचारणीय अछि: संग्रहक अपूर्णता लेखक स्वयं स्वीकार करैत छथि; स्थानीय रूपक प्रमाण आ प्रसार समान रूपसँ सुनिश्चित नहि; आ ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यक पुष्टिक लेल क्षेत्रीय आ कालिक तुलनात्मक अध्ययन चाही। एहि उपलब्धि आ सीमा दुनूकेँ संग देखला पर ग्रन्थक महत्त्व स्पष्ट होइत अछि।

आलोचनात्मक प्रश्न

कोन-कोन शब्दक संग भौगोलिक उपभाषा, वक्ता आ संकलन-वर्ष स्पष्ट रूपसँ उपलब्ध अछि?

शब्दक एकहि रूप विभिन्न व्यवसायमे समान अर्थमे प्रयुक्त अछि कि अर्थांतरित?

संकलित शब्दक सामाजिक वितरण कतबा व्यापक अछि, आ कतए केवल व्यक्तिगत/स्थानीय प्रचलन अछि?

मुख्य पदार्थ-आधारित अध्याय आ “अन्य व्यवसाय” अध्यायक असमान विस्तारकेँ कोना पढ़ल जाय?

वर्तमान कालमे व्यवसाय बदलबाक प्रक्रिया आ कारीगरक नवा उपकरणक शब्दक दस्तावेजीकरण कोना हो?

१५. अग्रिम अनुसन्धानक दिशा

एहि ग्रन्थपर आधारित समालोचनात्मक शब्दकोशमे प्रत्येक प्रविष्टिक संग मूल शब्द, उच्चारण, वैकल्पिक रूप, पद-भेद, अर्थ, व्यवसाय, वस्तु–औजार–क्रिया–उत्पादक वर्ग, क्षेत्र आ सूचनादाता, ग्रन्थक पृष्ठ-सन्दर्भ तथा वस्तु वा क्रियाक प्रमाणित दृश्य अथवा ध्वनि जोड़ल जाय तँ अर्थनिर्णयक अनेक कठिनाइ घटि सकैत अछि। ई व्यवस्थित प्रारूप संकलित शब्दक परस्पर सम्बन्ध स्पष्ट करबाक सम्भावना रखैत अछि।

अगिला चरणमे सामग्री-आधारित तुलनात्मक अनुक्रमणिका, प्रत्येक अध्यायक प्रविष्टि-गणना, स्त्री-पुरुष कार्य-विभाजनक क्षेत्रसर्वेक्षण, समान शब्दक अन्तरव्यावसायिक अर्थ तथा भाषासंपर्कक स्वतंत्र प्रमाण-समीक्षा कएल जाय। जाति-आधारित पूर्वनिर्धारित निष्कर्षक बदला स्वयं कारीगरक कथन, साधनक प्रत्यक्ष निरीक्षण आ स्थानिक आर्थिक इतिहासकेँ प्राथमिक साक्ष्य बनाओल जाय।

पर्याय आ भिन्न उच्चारणक निष्पक्ष सम्पादन

मूल अध्यायसभमे लेखक अनेक ठाम 'फलाँ/फलाँ' भिन्न रूप लिखैत छथि। ई रूप कखनो-कखनो केवल उच्चारण-भेद, कखनो पर्याय, कखनो वस्तुक भेद आ कखनो भौगोलिक रूपक अन्तर हो सकैत अछि। एक लेख्यरूप चुनि बाकी सभ हटायब भाषिक अपव्यय अछि। हर रूपक संग 'कहाँ', 'केँ', 'कोन अर्थमे' आ 'कोन औजार वा कामक संदर्भमे' चार प्रश्न अनिवार्य राखल जाए। अस्पष्ट प्रमाणक लेल 'असत्यापित' सूचक राखब अनुमानेँ अर्थ बना देबाक अपेक्षा वैज्ञानिक रूपेँ अधिक उचित अछि।

वस्तुक दृश्य अभिलेख आ मौखिक साक्ष्य

काठक रन्दा, कपड़ाक करघा, लोहारक पिटबाक औजार अथवा पासीक रस उतरबाक पात्रक बनावट देखनहि तकनीकी अर्थक सूक्ष्म भेद बुझब कठिन अछि। एकर विस्तारित अध्ययनमे वस्तुक माप, कारीगरक कथन, कामक क्रमक दृश्य अभिलेख आ स्थानीय उच्चारणक ध्वनि-संग्रह जोड़लापर शब्दक अर्थ आ कार्यक सम्बन्ध बेसी स्पष्ट भऽ सकैत अछि।

१६. निष्कर्ष

डॉ. योगानन्द झाक “मैथिलीक पारम्परिक जातीय व्यवसायिक शब्दावली” मैथिलीभाषी क्षेत्रक श्रम, पदार्थ, उत्पादन आ सामाजिक व्यवहारक बीच विकसित विशेष शब्द-संसारकेँ व्यवस्थित करबाक उल्लेखनीय प्रयत्न अछि। एकर मूल शक्ति शब्दकेँ लोकजीवनसँ पृथक नहि करबाक प्रवृत्तिमे अछि। काठ-बाँससँ माटि-पानि, सूत, धातु आ विविध पेशा धरि फैलल वर्गीकरण शब्दार्थक संग तकनीकी क्रिया-संरचना सेहो दर्ज करैत अछि। सप्तम अध्यायक भाषातात्त्विक चर्चा एहि सामग्रीकेँ व्यापक भाषा-अध्ययनसँ जोड़ैत अछि।

समालोचनात्मक दृष्टिएँ ग्रन्थकेँ स्थानीय ज्ञानक मूल स्रोत मानि, मुदा प्रत्येक समाजभाषिक सामान्यीकरणकेँ स्वतंत्र प्रमाणक कसौटी पर राखि, अध्ययन करबाक चाही। ई पुस्तक मैथिलीक व्यावसायिक शब्द-इतिहास, पारम्परिक शिल्पज्ञान आ शब्दकोश-विकास लेल आधारभूत सामग्री उपस्थित करैत अछि।

अध्याय 09 / २०१०

कथा–लोककथा

डॉ. योगानन्द झाक कृतिक आलोचनात्मक विवेचन

‘कथा–लोककथा’ डॉ. योगानन्द झाक मैथिली गद्यक एहन संग्रह थिक जाहिमे एकहि जिल्दक भीतर समकालीन सामाजिक-राजनीतिक कथा, भारतीय भाषाक साहित्यसँ अनूदित संक्षिप्त आख्यान आ लोकविश्वासपर आधारित कथा एकत्र भेल अछि। मूल प्रकाशकीय पृष्ठपर २०१० ई. प्रकाशन-वर्ष, प्रकाशक ‘मिथिला रिसर्च सोसाइटी’, कबिलपुर–लहेरियासराय, दरभंगा; पाँच सय प्रति; मूल्य एक सय टाका आ मुद्रक शेखर प्रकाशन, पटनाक उल्लेख भेटैत अछि। ई विवरण बाहरी अनुमान नहि, ग्रन्थक अपन प्रकाशकीय प्रमाण थिक। मूल पृ. ३०क लेखक-हस्ताक्षरित समापनमे २२ मई २०१०क तिथि अछि। [मूल आरम्भिक प्रकाशकीय पृष्ठ; पृ. ३०]

पुस्तकक कथाक्रम अपन वर्गीकरण स्पष्ट करैत अछि। ‘मौलिक’ अन्तर्गत ‘शास्त्र-चिन्ता’ (३५), ‘फैंसला’ (४१), ‘सपनाक डाक’ (५०); ‘अनूदित’ अन्तर्गत ‘स्वाभिमानक मार्ग’ (५७), ‘अपन-अपन पानि’ (५९), ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (६१), ‘अभिनन्दन ग्रन्थ’ (६२), ‘दुर्लभ सत्यनारायण पूजा’ (६३); आ ‘लोकवृत्तात्मक’ अन्तर्गत ‘धानक हड़ुड़ी’ (६५), ‘सात बहिन’ (७०) आ ‘बेनीराम’ (७७) अछि। अन्तमे ‘कबिलपुरक संक्षिप्त कुलीननामा’ पृ. ८९ सँ आरम्भ होइत अछि। एहि तरहें मूल पुस्तकक एगारहू कथाक अध्ययन एतय स्वतंत्र रूपसँ कएल गेल अछि। [मूल पृ. ३१, विषय-सूची]

मूल प्रति छायाप्रतिकृति अछि; ओकर कोनो खोजयोग्य पाठ-स्तर उपलब्ध नहि अछि। ताहि कारणेँ अध्ययन कथाक छविमे दृष्टिगोचर पाठ, शीर्षक, पादटिप्पणी आ अनुच्छेदक क्रम पर आधारित अछि। जकर सत्यापन केवल बाह्य प्रमाणसँ सम्भव होइत, तेकरा बाह्य प्रमाणक रूपमे पृथक् राखल गेल अछि। कथाक पात्र, समय, घटना वा रचनाक प्रेरणाक सम्बन्धमे एहन तथ्य नहि जोड़ल गेल अछि जकर साक्ष्य एहि स्रोतमे नहि भेटैत अछि। कथाक अर्थ-संकेत आ मूल्याङ्कन समीक्षकक व्याख्या छथि, मूल लेखकक प्रत्यक्ष कथन नहि।

‘कथा’ आ ‘लोककथा’क एकत्रीकरण पुस्तकक मूल आलोचनात्मक समस्या सेहो थिक। मौलिक कथा व्यक्तिगत अनुभव, संस्थागत दबाव आ समकालीन समाजक द्वन्द्वकेँ रूप दैत अछि; अनूदित लघुकथाक संरचना छोट, लक्ष्य स्पष्ट आ अन्त प्रायः सूक्ति-जकाँ अछि; लोकवृत्तात्मक कथा सामूहिक स्मृति, लोकनैतिकता आ आस्थाक प्रतीक पर निर्भर अछि। एकरे खातिर तीनू प्रकारक रचनाकेँ एकहि कलात्मक कसौटी पर नापब अनुचित होयत। एहि भिन्नताक सम्मान कएने बिना संग्रहक उपलब्धि आ सीमाक समुचित निर्णय सम्भव नहि।

२. प्रस्तावना, प्राक्कथन आ मैथिली कथा-आन्दोलनक अभिलेख

संग्रहक आरम्भमे ‘समर राति दीप जरय: मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति’ शीर्षक विस्तृत आलेख अछि। एकरा डॉ. योगानन्द झाक व्यक्तिगत रचनाकथा मानब गलत होयत; ई मैथिली कथाकारक सार्वजनिक भेटघाट, कथा-पाठ आ संवादक एक कार्यक्रमक क्रम-विकासक दस्तावेज सेहो थिक। लेखमे १९८९क अन्तक योजना, १९९०क प्रथम आयोजन, २००४क पचासम कार्यक्रम तथा बादक उपक्रम सभक चर्चा अछि। कार्यक्रमक साहित्यिक प्रयोजन—नव लेखककेँ कथा सुनयबाक अवसर, कथा पर तत्काल प्रतिक्रिया, साहित्यिक सम्पर्क आ भाषाक सार्वजनिक प्रयोग—स्पष्ट कएल गेल अछि। [मूल पृ. ५–१२]

एहि आयोजनक वैशिष्ट्य लेखक वा पाठकक नामक गिनती मात्र नहि; साहित्यक निर्माण-प्रक्रियामे श्रोताक भूमिका अछि। मञ्चपर लिखित कथाक वाचन, सामूहिक प्रतिक्रिया, विचार-विमर्श आ पुनःलेखनक सम्भावना, ई सभ गद्यक सामाजिक जीवनकेँ देखबैत अछि। मुदा मूल आलेखमे आयोजकक योगदानक प्रशंसात्मक स्वर प्रमुख अछि। ओकर आधारपर कार्यक्रमक समस्त ऐतिहासिक प्रभाव पूर्णरूपेँ प्रमाणित मानब उचित नहि; उपस्थिति-पञ्जी, मूल कार्यक्रम-पत्र, समकालीन समाचारपत्र आ प्रतिभागीक स्वतंत्र साक्ष्य जोड़ल गेलापर ई साहित्येतिहासक आरो ठोस सामग्री बनि सकैत अछि। संग्रहक भीतर उपलब्ध वृत्तान्तकेँ आयोजकीय साक्ष्यक रूपमे पढ़बाक चाही।

डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’क नामसँ प्रकाशित ‘प्राक्कथन’ मे लेखकक रचनाधर्मिताक परिचय लहेरियासराय आ कबिलपुरक साहित्यिक-भौगोलिक परिवेशसँ जुड़ैत अछि। ई प्राक्कथन कबिलपुरक प्राचीन स्थल, स्थानीय मन्दिर, सामुदायिक आयोजन, सार्वजनिक स्मृति आ कतेक लेखक-अध्येता पर रोशनी दैत अछि। कतहु ग्रन्थसूची-जकाँ नाम आ कृतिक क्रम भेटैत अछि, तँ कतहु लेखकक अनुभवसँ निर्मित सामाजिक चित्र। एहि भागक साहित्यिक महत्त्व ई अछि जे कथा-संग्रहकेँ ओ अपन लेखकीय समाज आ संस्थागत पृष्ठभूमिसँ जोड़ि दैत अछि। [मूल पृ. १३–३०]

प्राक्कथनक विस्तार एक गुण आ एक रचनात्मक असंगति दुनू अछि। गुण ई जे मैथिली साहित्यक संस्थागत आधार, स्त्री-शिक्षा, लोकगायन, पत्र-पत्रिका, नाटक, अनुवाद आ ग्राम्य सांस्कृतिक आयोजनक अनेक संकेत एकहि ठाम सुरक्षित छथि। असंगति ई जे कथाक मूल रचना धरि पहुँचबाक पहिने पाठककेँ दीर्घ क्षेत्रीय साहित्य-वृत्तान्त पढ़य पड़ैत अछि; एतयसँ पुस्तकक आरम्भिक गति कथाक अपेक्षा संस्थागत इतिहासक दिशामे मुड़ि जाइत अछि। तथापि अध्ययनक दृष्टिएँ ई सामग्री उपेक्षणीय नहि, कारण एहि सँ लेखकक लोकसाहित्य-संकलनक वैचारिक धरातल स्पष्ट होइत अछि।

पृष्ठ २४–२७क विवरणमे स्थानीय लेखक, पत्रिका, अनुवाद, शिक्षण-संस्था आ मैथिली साहित्यिक आन्दोलनक अनेक प्रसंग उल्लेखित अछि। ई सभ दावाक ऐतिहासिक सत्यापन लेल स्वतंत्र अभिलेख चाही; किन्तु संग्रहक आत्मप्रस्तुतिमे ई संकेत महत्त्वपूर्ण अछि। पुस्तक अपन पाठकसँ मात्र कथानक पढ़बाक आग्रह नहि करैत; ओ मैथिली गद्यक सृजन, संकलन, प्रचार आ संरक्षणक एक सामुदायिक प्रयत्नक भीतर अपन स्थान निश्चित करैत अछि। एही दृष्टिसँ ‘कथा–लोककथा’ केँ सृजनात्मक पुस्तकक संग-संग सीमित अर्थमे सांस्कृतिक दस्तावेज सेहो कहल जा सकैत अछि।

३. मौलिक कथा: व्यक्तिगत चेतना सँ सार्वजनिक संकट धरि

३.१ ‘शास्त्र-चिन्ता’: स्वप्न, ग्रन्थ आ राष्ट्रीय असुरक्षाक द्वन्द्व (मूल पृ. ३५–४०)

कथाक प्रारम्भ भयावह स्वप्नसँ होइत अछि। नायकक मनमे राष्ट्र, इतिहास, समाज आ अपन अस्तित्व सम्बन्धी आशंका बारम्बार लौटैत अछि। कथाकार ओकरा कोनो एक आकस्मिक राजनीतिक घटनाक समाचार-सारमे सीमित नहि रखैत छथि; स्वप्नक पृष्ठभूमिमे भौगोलिक सीमा, आन्तरिक विघटन, सामाजिक विभाजन आ सामूहिक सुरक्षा सम्बन्धी आशंका एक-दोसरासँ गुँथल छथि। स्वप्नक बाद नायकक दिनचर्यामे पुस्तक, पत्रिका, धार्मिक पाठ, राष्ट्रीय चिन्ता आ आत्मपरीक्षणक आवागमन देखाइत अछि। एहि मानसिक संरचनाक कारण कथा घटनाबहुल यथार्थवादी आख्यानसँ बेशी विचारप्रेरित आख्यान बनि जाइत अछि। [मूल पृ. ३५–३७]

नायकक आसपास पोथी, गीता, रामायण, शास्त्रीय उद्धरण आ लेखन-सामग्रीक उपस्थिति एक विशेष बौद्धिक व्यक्तित्व गढ़ैत अछि। ओ हिंसा आ अराजकतासँ व्यथित अछि, मुदा मात्र धार्मिक पाठ ओकर बेचैनी शान्त नहि करैत। एतय शास्त्रक ज्ञान, नागरिक कर्तव्य आ रक्षात्मक प्रतिरोध बीच प्रश्न उठैत अछि। मूल शीर्षक ‘शास्त्र-चिन्ता’क भीतर शास्त्र पढ़बाक क्रिया आ जनजीवनमे ओकर प्रयोजनक आलोचनात्मक सम्बन्ध देखल जा सकैत अछि। ई शीर्षक ‘शस्त्र’क प्रत्यक्ष समानार्थी नहि; तथापि कथा आगाँ चलि कए ज्ञानक चिन्ता सँ सुरक्षा-उपाय आ प्रतिरोधक चर्चा दिस मुड़ैत अछि।

अशोक नामक युवकक आगमन कथा लेल निर्णायक मोड़ अछि। प्रारम्भमे ओ गुरुक प्रति श्रद्धा व्यक्त करैत अछि, बादमे राष्ट्रक संकट, निर्बलता, शस्त्ररहित अवस्थाक जोखिम आ अन्याय-प्रतिरोधक प्रश्न उठबैत अछि। नायक अहिंसा, सत्य, संयम आ नैतिक मार्गक आश्रय लैत छथि, जखन कि अशोक केवल सद्भावना पर्याप्त होयबाक प्रश्न करैत अछि। संवादक भीतर गीता-सन्दर्भ, दण्ड, धर्मरक्षा आ कर्तव्य सम्बन्धी तर्क एना जुड़ैत अछि जे कथा दू दृष्टिकोणक प्रत्यक्ष टकराहट बनि जाइत अछि। [मूल पृ. ३८–३९]

अन्तिम पृष्ठपर नायक अशोकक तर्ककेँ एकरूप अस्वीकार नहि करैत छथि; ओ शास्त्रीय पुस्तक आ राज्य-सुरक्षासँ सम्बन्धित चिन्ताक बीच फेर लौटैत छथि। अन्तमे सामूहिक आक्रमणक आशंकासँ उद्वेलित स्वप्न-दृश्यक पुनरागमन देखाइत अछि। एहि कारण कथा समाधानक स्थिर घोषणा पर नहि, बल्कि भय आ सजगताक संगठित चित्र पर ठहरैत अछि। [मूल पृ. ४०] एतय ‘शान्ति’ आ ‘सुरक्षा’ परस्पर विरोधी नारा नहि, कथाक भीतर संकटग्रस्त मूल्य बनि उठैत अछि।

एहि कथाक शक्ति एक विचारशील व्यक्तिक मानसिक उलझनकेँ संवादक माध्यमसँ रूपायित करब अछि। सीमा ई जे राष्ट्र-समाजक व्यापक संकटक वर्णन अनेक स्थान पर विशिष्ट घटना आ चरित्रक बजाय वाद-विवादक वाक्यमे होइत अछि। अशोक प्रश्नकर्ताक प्रतिनिधि बनि उठैत अछि, ओकर स्वतंत्र जीवन-संसार बहुत कम उभरैत अछि। कथाक वैचारिक उग्रता पर सहमति देब अनिवार्य नहि; आलोचनात्मक दृष्टिसँ उल्लेखनीय बात ई थिक जे लेखक शास्त्रीय नैतिकताक सामु तत्काल सामाजिक संरक्षणक प्रश्न उपस्थित करैत छथि। पादटिप्पणीमे एहि कथाक २००२क एक पूर्व प्रकाशनक उल्लेख भेटैत अछि; अतः २०१०क संग्रह-प्रकाशनकेँ रचना-काल मानब गलत होयत। [मूल पृ. ४०, पादटिप्पणी]

३.२ ‘फैंसला’: दफ्तर, न्याय, परिवार आ सत्ता-दबाव (मूल पृ. ४१–४९)

‘फैंसला’क आरम्भ ‘गोपनीय’ लिखल लिफाफा आ कार्यालयीय प्रतिवेदनसँ होइत अछि। ई आरम्भ कथाक केन्द्रमे सूचना आ निर्णायक अधिकारक सम्बन्ध स्थापित करैत अछि। सरकारी पदाधिकारी राघवजीक निजी आवास, पत्नी जमुनी देवी, पढ़ल-लिखल सन्तान आ सामाजिक प्रतिष्ठाक विवरणसँ एक एहन परिवारक चित्र बनैत अछि जकर आर्थिक सुरक्षा आ सामाजिक सम्मान प्रशासनिक पदसँ जुड़ल अछि। बाहरसँ स्थिर देखाइत एहि घरक भीतर राघवजीक मन एक निर्णयक कारण विचलित अछि। कथाकार घरेलू संवादकेँ कार्यालयीय दायित्वक समानान्तर राखैत छथि। [मूल पृ. ४१–४४]

जमुनी देवीक भूमिका सजावटी पात्रक नहि। ओ पतिक अन्यमनस्कता देखि कारण पुछैत छथि, परिवारक आवश्यकता, बाल-बच्चाक भविष्य आ नौकरीक सुरक्षाक तर्क सोझाँ रखैत छथि। राघवजीक मानवीय कर्तव्यबोध आ जमुनी देवीक व्यवहारिक चिन्ता बीच टकराव बनेल अछि। एहि टकरावमे स्त्री-पात्रकेँ केवल नैतिक अज्ञानक प्रतीक बना देब उचित नहि होयत: ओकर भय सामाजिक आश्रितता आ परिवारक जीविकाक यथार्थसँ उपजैत अछि। तैयो कथा निर्णयक प्रमुख अधिकार पुरुष पदाधिकारी लग राखैत अछि, जकर कारण जमुनीक स्वतन्त्र सामाजिक दृष्टि आ विस्तार पा सकैत छल।

मलापुरक मन्दिर, महन्थ, स्थानीय लोग, जमीन आ प्रदर्शनक प्रसंगक प्रवेशसँ कथाक निजी दुविधा राजनीतिक-प्रशासनिक प्रश्न बनि जाइत अछि। जमीनक दावा, ग्रामीण विरोध, पुलिसक कार्रवाइ, जनसमूहक क्षति आ राजनीतिक दबावक परत सभ एक-दोसरासँ सम्बद्ध होइत अछि। पृष्ठ ४६–४९मे प्रशासनिक प्रतिवेदन तैयार करबाक परिस्थिति, स्थानीय प्रभुत्वक अन्तर्विरोध आ सत्ताक विभिन्न स्तरसँ होइत हस्तक्षेप देखल जा सकैत अछि। ई केवल ‘एकटा बुरा अधिकारी’क कथा नहि; व्यवस्था एना गठित अछि जे तथ्यक भाषा, राजनीतिक लाभ आ करियरक भय एकहि निर्णयकेँ अलग-अलग दिशामे खींचैत अछि।

कथाक शीर्षक ‘फैंसला’ एक स्पष्ट नैतिक निष्कर्षक अपेक्षा जगबैत अछि, मुदा वास्तविक कथावस्तु निर्णयक प्रक्रियामे उपस्थित दबावकेँ बेसी महत्त्व दैत अछि। अधिकारीक लिखित प्रतिवेदन, ओकरा उचित ठहरयबाक प्रयास आ राजनीतिक सम्पर्कक आगाँ विवशता कथा-अन्त धरि बनेल रहैत अछि। एहि कारण अंतिम घटनाकेँ बिना अतिरिक्त प्रमाण ‘व्यवस्थाक सुधार’ वा ‘पूर्ण न्याय’ घोषित नहि कएल जा सकैत अछि। पात्रक भीतर उठैत सवाल आ ओकर कृतीक बीच रहि गेल दूरी स्वयं कथाक आलोचनात्मक अर्थ अछि। [मूल पृ. ४५–४९]

कथाशिल्पक दृष्टिएँ गोपनीय कागज, पत्नी-संवाद, प्रशासनिक स्मृति, प्रतिवेदन आ भीड़-प्रदर्शनक दृश्य कथा-गतिक मुख्य आधार छथि। संवाद पृष्ठभूमिक सूचना देबाक काम करैत अछि, यद्यपि कतहु पात्र अपन स्वाभाविक जीवनक अपेक्षा लेखकक नैतिक तर्क प्रस्तुत करैत प्रतीत होइत छथि। पुस्तकक पहिल मौलिक कथा जे राष्ट्रीय संकटक अमूर्त भावभूमिमे चलैत छल, तकर तुलना मे ‘फैंसला’क सामाजिक संकट अपेक्षाकृत ठोस अछि: पद, कागज, जमीन, मन्दिर, भीड़ आ सत्ता-सूत्रक मार्फत। मूल पादटिप्पणीमे २००३क पूर्व प्रकाशन दर्ज अछि; ई रचनाक संग्रहमे पुनर्स्थापनक प्रामाणिक संकेत थिक। [मूल पृ. ४९, पादटिप्पणी]

३.३ ‘सपनाक डाक’: भूमिसम्बन्धी अभिलेख आ ग्रामीण असुरक्षा (मूल पृ. ५०–५४)

‘सपनाक डाक’क केन्द्रीय पात्र सुखलाल छथि। आर्थिक अस्थिरता, गामसँ जुड़ाव आ पैतृक जमीनक प्रति अपनत्वक भाव ओकर जीवनमे आधारक काम करैत अछि। कथा साक्ष्य देैत अछि जे जमीनक सामाजिक स्मृति आ कानूनी कागज दुई अलग चीज भऽ सकैत अछि। सुखलालक परिवारक दीर्घकालीन भोग-दखल वा पूर्वजक नामक स्मरण ओकरा मानसिक निश्चितता दैत अछि, मुदा सरकारी अभिलेखक अभाव ओकर अधिकारकेँ अस्थिर बनबैत अछि। कथाक आरम्भिक प्रसंगमे ग्रामीण सम्बन्ध, पुरान परिचय आ सामाजिक प्रतिष्ठाक बीच जमीन-प्रश्न धीरे-धीरे विकट होइत अछि। [मूल पृ. ५०–५२]

मोहनक आगमनसँ जमीनक नाप, खरीद-बिक्री आ दाखिल अभिलेखक उलझन स्पष्ट होइत अछि। दफ्तरमे दर्ज नाम, फर्जी कागजक आशंका, मौखिक अधिकारक दावेदारी आ भूमि-लेनदेनसँ जुड़ल व्यक्ति सभ कथाक तनाव बढ़बैत अछि। सुखलालक भय केवल धन गमाबयक नहि, पीढ़ीक स्मृति आ घरक आधार छिनायबाक भय अछि। एहि मानसिक तनावमे ‘सपना’ साधारण नीन्दक घटना नहि; ग्राम्य समाजक असुरक्षाक साहित्यिक रूप बनैत अछि। [मूल पृ. ५२–५३]

कथाक अन्तिम खण्डमे बेचैन सुखलाल जमीनकेँ बचेबाक लेल कार्यालय आ कागजक संसारमे फँसल देखाइत अछि। जागरण आ स्वप्नक सीमा धुँधल होइत अछि; अन्तमे गामसँ जुड़ल विनाशकारी स्वप्न-दृश्य ओकरा विचलित करैत अछि। एहि प्रकार कथाकार जमीनक विवादक सम्पूर्ण न्यायिक समाधान देबाक अपेक्षा ओकर मनोवैज्ञानिक परिणामक चित्र गढ़ैत छथि। शीर्षकक ‘डाक’केँ एतय संकट-सूचनाक रूपकक तौरपर पढ़ल जा सकैत अछि, मुदा एकरा वास्तविक डाक-प्रणालीक कथानक मानब उचित नहि। [मूल पृ. ५३–५४]

‘फैंसला’ आ ‘सपनाक डाक’केँ एकसाथ पढ़लासँ प्रशासनिक कागजक दू रूप देखाइत अछि: एकठाम पदाधिकारी कागजक निर्णयकर्ता अछि, दोसरठाम साधारण ग्रामीण कागजक अभावक भुक्तभोगी। एहि दोहरी रचनासँ संग्रहमे राज्य, कानून आ नागरिकक सम्बन्धक एक अनौपचारिक आलोचना निकलैत अछि। ‘सपनाक डाक’क शिल्प संक्षिप्त अछि आ कथानक स्पष्ट प्रकारेँ सुखलालक बेचैनीक ओर मुड़ैत अछि। सीमा ई जे भूमि-अधिकारक विधिक जटिलताक सूक्ष्म प्रक्रिया प्रदर्शित नहि; लेखकक अभिप्राय साहित्यिक अनुभूति रचब अछि, कचहरीक प्रक्रियाक विवरण देब नहि। एहि कथाक २००३क पूर्व प्रकाशनक उल्लेख मूल पादटिप्पणीमे अछि। [मूल पृ. ५४]

४. अनूदित कथा: लघु आख्यानक भीतर नैतिक तर्क

अनूदित खण्डमे पाँच रचना अछि। एहि पाँचूकेँ डॉ. योगानन्द झाक स्वतन्त्र मौलिक कथा मानि साहित्येतिहास लिखब तथ्यगत भूल होयत। मूल पादटिप्पणी अनुसार ‘स्वाभिमानक मार्ग’ आ ‘अपन-अपन पानि’ डॉ. श्रीमती मिथिलेश कुमारी मिश्रक हिन्दी लघुकथा-संग्रह ‘छँटता कोहरा’ सँ भाषान्तरित अछि। शेष तीन लघुकथाक पादटिप्पणीमे हुनके संस्कृत लघुकथा-संग्रहसँ भाषान्तरणक संकेत भेटैत अछि। कतेको कथा पुस्तकमे आवयसँ पूर्व मैथिली पत्रिकामे प्रकाशित भेल छल, जकर सूचना सेहो पादटिप्पणीमे अछि। एहि समीक्षा लेल मूल हिन्दी आ संस्कृत पुस्तकक समानान्तर पंक्ति-पंक्ति पाठ उपलब्ध नहि अछि; एही हेतु अनुवादक स्रोत-निष्ठा वा मूलसँ विचलनक निर्णायक दावा नहि, बल्कि उपलब्ध मैथिली अनूदित पाठक साहित्यिक क्रियाक विश्लेषण कएल गेल अछि। [मूल पृ. ५८, ६०–६३, पादटिप्पणी]

४.१ ‘स्वाभिमानक मार्ग’: सुविधा बनाम आत्मसम्मान (मूल पृ. ५७–५८)

कथामे परीक्षा वा चयन-प्रक्रियाक सन्दर्भमे किछु युवकक परस्पर संवादक माध्यमसँ अवसर, आरक्षण, पात्रता आ स्वाभिमानक प्रश्न उठैत अछि। एक वक्ता सुविधा लएबाक सम्भावना देखबैत अछि, जखन कि दोसर पात्र अपन प्रतिभा आ श्रमक भरोसापर चयन प्राप्त करबाक बात करैत अछि। कथाक अन्तिम कथन स्वाभिमान आ आत्मप्रयासकेँ प्रमुख नैतिक मूल्य बनबैत अछि। एतय पात्रक विस्तृत पारिवारिक वृत्तान्त नहि देल गेल अछि; कथाक ऊर्जा छोट-छोट संवाद आ एक निर्णायक स्वरतक सीमित अछि। [मूल पृ. ५७–५८]

रचनाक साहित्यिक प्रभाव कथाकार द्वारा बनाओल विरोधमे अछि: बाहरी अवसरक लाभ आ अपन श्रमपर नैतिक भरोसा। तथापि ई विरोध सामाजिक नीति सम्बन्धी सम्पूर्ण तर्क नहि बनैत। आरक्षणक ऐतिहासिक कारण, अवसरक संरचनात्मक असमानता आ विभिन्न समुदायक अनुभवक विवेचन एहि लघुकथामे नहि अछि। ताहि कारण रचनाक पात्रक दृष्टिकोणकेँ एक साहित्यिक स्वाभिमान-बोधक रूपमे पढ़ब अधिक युक्तिसंगत अछि; ओकरा भारतीय समाजक समस्त अवसर-वितरण पर अन्तिम नीति-निर्णय बना देब पाठसँ अधिक निष्कर्ष काढ़ब होयत।

मैथिली भाषान्तरक प्रभाव संवादक तत्परता, प्रश्नोत्तरक गति आ छोट अन्तिम कथनसँ पैदा होइत अछि। हिन्दी मूलक उपलब्धता बिना शब्दानुवाद आ भावानुवादक विस्तृत तुलना सम्भव नहि; मुदा उपलब्ध मैथिली पाठमे कथ्यक केन्द्र भाषिक अस्पष्टता बिना सोझाँ अबैत अछि। एहि प्रकार ई खण्डक अन्य सूक्तिमूलक कथाक भाँति नैतिक विकल्पक एक लघु दृश्य प्रस्तुत करैत अछि।

४.२ ‘अपन-अपन पानि’: प्राकृतिक संसाधन पर अधिकारक प्रश्न (मूल पृ. ५९–६०)

एक ऋषिक आगमन, राजाक कृती आ जलक उपयोगसँ जुड़ल प्रश्न एहि लघुकथाक मुख्य साधन छथि। राजसत्ता जल-वितरणकेँ अपन निर्णयक विषय मानैत अछि, मुदा ऋषि आनल जल आ प्राकृतिक जल बीच भेद स्पष्ट करबैत छथि। कथा तकरा मार्फत प्रश्न उठबैत अछि जे मनुष्यक जीवनाधार बनयवला प्राकृतिक संसाधन पर विशिष्ट व्यक्ति वा शासकक नैतिक अधिकार कतेक धरि मानल जा सकैत अछि। अन्तमे राजाक बुद्धि पलटैत अछि आ ओकरा प्राकृतिक जलक सामूहिक उपयोगक विचार ग्राह्य होइत अछि। [मूल पृ. ५९–६०]

एहि कथाक उपयुक्त आलोचनात्मक पाठ ‘राजा खराब, ऋषि नीक’ एतबे नहि। राजा राज्यक संस्थागत शक्ति थिक; ऋषि व्यक्तिगत विवेक आ लोकहितक प्रतिनिधि। राजाक परिवर्तन सत्ता द्वारा लोकनैतिकताकेँ स्वीकार करबाक दृश्य अछि। जलक आवश्यकताक सर्वव्यापकता कथा-कथनकेँ विशेष क्षेत्र वा जातिसँ ऊपर उठबैत अछि। कथाक विस्तार छोट होइतहुँ एतय प्रकृति, साझा जीवन आ स्वामित्वक सम्बन्ध पर सटीक प्रश्न अछि।

शिल्पमे संवादप्रधानता, पुनरावृत्त तर्क आ निर्णयक सरल उलटाव प्रधान अछि। समस्या एकदम जटिल नीति-प्रश्न बनि नहि उठैत; कथाकार पाठककेँ तत्काल नैतिक बोध देबाक लेल राजाक मन-परिवर्तन शीघ्र करबैत छथि। ई संक्षेप लघुकथाक शक्ति अछि, मुदा जलक वास्तविक असमान वितरणक सामाजिक-आर्थिक चित्र विस्तारित करबाक गुंजाइश छोड़ैत अछि।

४.३ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’: विश्वपरिवारक उच्चारण आ व्यवहारक कसौटी (मूल पृ. ६१)

एहि अत्यन्त संक्षिप्त कथा मे उच्च शिक्षाक लेल इंग्लैंड गेल बंगाली युवक, ओकर एक अंग्रेज मित्र आ परिवार-सन्दर्भ प्रस्तुत अछि। संवादमे निजी सुविधा, भोजन, व्यय, जीवनक साधन आ अन्य मनुष्यक प्रति दायित्वक प्रश्न पर चर्चा होइत अछि। संस्कृत सूक्ति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ कथाक शीर्षक भऽ कए पाठककेँ एक आदर्श दैत अछि, जखन कि कथाक पात्र अपन व्यवहारमे ओकर अर्थकेँ परखैत छथि। [मूल पृ. ६१]

एहि रचनाक आलोचनात्मक केन्द्र सूक्तिक केवल प्रशंसा नहि, ओकर व्यवहारिक परीक्षा अछि। सम्पूर्ण संसार एक परिवार अछि—एहि कथनक अर्थ तबे सार्थक होयत जखन अपन जीवनक सुविधा आ अपरिचितक कल्याणक बीच नैतिक सम्बन्ध स्वीकारल जाय। भाषा, देश आ परिवारक भिन्नतासँ बनल छोट संवाद कथाकेँ विश्वनागरिक संवेदनासँ जोड़ैत अछि; तथापि कथा विस्तारक बजाय प्रश्नकेँ खुला रखैत अछि।

अनुवादक दृष्टिसँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जेकाँ संस्कृत पदकेँ यथावत् राखि ओकर चारूकात मैथिली संवाद विन्यस्त करब बहुभाषिक सांस्कृतिक सन्दर्भक उदाहरण अछि। एहि सँ ई निष्कर्ष अवश्य निकलैत अछि जे अनूदित मैथिली पाठ हिन्दी/संस्कृतक मौलिक विचार-संसारकेँ स्थानीय पाठक लग पहुँचबैत अछि; मुदा मूल पाठक ठोस शब्द-विन्यासक संग तुलना बिना विशिष्ट भाषान्तर-रणनीतिक दावा कएल नहि जा सकैत अछि।

४.४ ‘अभिनन्दन ग्रन्थ’: पद-सम्मान आ वास्तविक लेखनक अन्तर (मूल पृ. ६२)

विद्यालयमे एक मन्त्री महोदयक आगमन अछि। पूर्व परिचयक कारण शिक्षक आ शिक्षार्थी हुनकर अभिनन्दनक आयोजन करैत छथि। प्रधानाचार्य द्वारा ‘अभिनन्दन ग्रन्थ’ समर्पित कएल जाइत अछि, मुदा सम्मानित व्यक्ति जखन लिखल सामग्रीक सम्बन्धमे प्रश्न करैत छथि तँ ग्रन्थक खोखलापन उजागर होइत अछि। कथाक व्यंग्य ई संकेत दैत अछि जे समारोहक भव्यता अपने आपमे बौद्धिक उपलब्धिक प्रमाण नहि होइत अछि। [मूल पृ. ६२]

ई लघुकथा साहित्यिक समाजक लेल विशेष उपयोगी प्रश्न उठबैत अछि। जँ ग्रन्थमे वास्तवमे रचना वा अध्ययन नहि, केवल आवरण, स्वागत-वचन आ नाममात्रक सामग्री हो, तँ ‘ग्रन्थ’ शब्दक प्रतिष्ठा आ ओकर वास्तविक स्वरूप बीच दूरी बनैत अछि। कथा एहि दूरी पर तीक्ष्ण व्यंग्य करैत अछि। व्यक्तिक पद-प्राप्ति आ तदनुरूप छपल अभिनन्दन-सामग्रीक मूल्यांकन करबाक लेल पुस्तकक वास्तविक सामग्री आवश्यक अछि; समारोहक सामाजिक दबाव आलोचनात्मक विवेकक स्थान नहि लए सकैत अछि।

रचनाक संरचना एक हास्य-व्यंग्यात्मक उलटाव पर टिकल अछि। पहिले सत्कारक आडम्बर, तकर बाद ग्रन्थक निरीक्षण, फेर पाठकक अपेक्षाक उलटा परिणाम। एहि संक्षिप्त आवृत्तिमे अतिरिक्त चरित्र-विकासक गुंजाइश कम अछि; तथापि शिक्षा, राजनीति आ पुस्तक-संस्कृतिक सम्बन्ध पर जे प्रश्न उठैत अछि, से संग्रहक विस्तृत प्राक्कथनमे उल्लिखित वास्तविक साहित्यिक सम्मान-परम्पराकेँ सेहो आलोचनात्मक दूरीसँ देखबाक अवसर दैत अछि। एहि अन्तरपाठीय विडम्बनामे पुस्तकक एक रोचक स्व-समालोचनात्मक सम्भावना निहित अछि।

४.५ ‘दुर्लभ सत्यनारायण पूजा’: कर्मकाण्डसँ सत्याचरण दिस (मूल पृ. ६३)

कथामे सत्यनारायण-व्रत कराबय चाहनिहार भक्त आ पण्डितजीक बीच संवाद अछि। भक्तक निजी संकट आ धार्मिक अनुष्ठानक इच्छा सुनि पण्डितजी सत्य, सदाचार आ लोकहितक महत्व पर बल दैत छथि। पूजा-व्यवस्थाक बाहरी औपचारिकताकेँ अस्वीकार करबाक अपेक्षा कथा पूछैत अछि जे सत्यक आराधना जीवनक प्रत्यक्ष आचरणसँ अलग किएक मानल जाय। [मूल पृ. ६३]

एहि रचनामे धार्मिक परम्पराक भीतरसँ उठल नैतिक पुनर्व्याख्याक स्वर अछि। पुरोहित अपना व्यवसायकेँ मात्र सामग्री-संग्रह आ क्रियाक्रमक आदेशमे सीमित नहि रखैत छथि; ओ जीवनमे सत्य ग्रहण करबाकेँ मूल मानदण्ड बनबैत छथि। एकर फलस्वरूप कथा पाठक लग भक्तिक तात्पर्यक नव प्रश्न आनैत अछि। ई आलोचना धार्मिक आस्थाक पूर्ण निषेध नहि, कर्मकाण्ड आ आचरण बीच प्राथमिकताक विमर्श थिक।

शीर्षकक ‘दुर्लभ’ शब्द प्रश्न पैदा करैत अछि: अनुष्ठानक अवसर दुर्लभ अछि, वा सत्यपर टिकबाक साहस दुर्लभ? पाठ एहि दोसर अर्थक दिशामे पाठककेँ प्रेरित करैत अछि। रचना एक-पृष्ठीय होइतहुँ अपनी अवधारणा स्पष्ट करैत अछि। मुदा भक्तक पारिवारिक संकटक जटिलता कथक समयमे विस्तार नहि पबैत; नैतिक सिद्धान्त दृश्यपर प्रमुख भऽ जाइत अछि। एहि रूपमे ई कथा मैथिली अनूदित लघुकथाक शिक्षापरकता आ ओकर शिल्पगत संक्षेप दुनू देखबैत अछि।

४.६ अनूदित खण्डक साझा उपलब्धि आ शोधगत सीमा

पाँचू लघुकथामे एक साधारण रचनात्मक पद्धति देखाइत अछि: पहिने जीवनक एक छोट परिस्थिति, तकर बाद दू पक्षक तर्क आ अन्तमे स्पष्ट मूल्य अथवा विडम्बनापूर्ण मोड़। स्वाभिमान, पानी, विश्वपरिवार, औपचारिक सम्मान आ सत्य-आचरण पाँच अलग विषय थिक, मुदा सभमे वाणी आ व्यवहारक दूरी पर प्रहार अछि। मैथिली अनुवाद एहि विचार सभकेँ मैथिली पाठकीय संसारमे प्रवेश देबैत अछि। छोट आकारक कारण पाठक तर्कक केन्द्र धरि पहुँचैत छथि; मुदा मनोवैज्ञानिक जटिलता आ प्रसंग-विकासक संभाव्यता सीमित रहि जाइत अछि।

मूल ग्रन्थक पादटिप्पणी भाषान्तरित कृतिक संकेत दैत अछि, ई सम्पादकीय गुण अछि। मुदा अनुसन्धानेक दृष्टिसँ मूल पाठक संस्करण, मूल भाषाक प्रकाशकीय विवरण, मूल शीर्षक आ पाठभेदक पूर्ण तुलनात्मक सूची एकसंग होयत तँ अनुवादक ऐतिहासिक समीक्षा आरो विश्वसनीय बनत। प्रस्तुत अध्ययन एहि अभावकेँ कल्पित उद्धरण वा अनिर्दिष्ट मूलपाठसँ भरबाक प्रयास नहि करैत अछि।

५. लोकवृत्तात्मक खण्ड: अन्न, सामूहिकता आ देवताक लोकस्मृति

‘लोकवृत्तात्मक’ शीर्षक संयोग नहि। एहि खण्डक रचनामे लोककथा सुनयबाक मौखिक शैली अछि, मुदा ओ सभ मात्र लोकवार्ताक अक्षरशः प्रतिलिपि नहि लगैत। कतहु कथाकार कथा आरम्भ करबाक पूर्व व्याख्यात्मक पृष्ठभूमि देैत छथि; कतहु सामाजिक आशयक स्पष्ट निष्कर्ष जोड़ैत छथि; आ कतहु देवता-परम्परा आ वंशवृत्तान्तक ऐतिहासिक सम्भावना पर अपना स्तरसँ विचार करैत छथि। अतः एतय ‘लोककथा’ कहैत समय मौखिक परम्पराक सामग्री आ लिखित पुनर्रचनाक बीच अन्तरकेँ ध्यानमे राखब आवश्यक अछि।

५.१ ‘धानक हड़ुड़ी’: अन्न, भूख आ सह-अस्तित्वक लोकनीति (मूल पृ. ६५–६९)

कथाक आरम्भमे लेखक अन्न आ चाउरक स्थान पर चिन्तन करैत छथि। एक ब्राह्मणक भोजन-अपेक्षा, धानक उत्पत्ति-संकेत आ अन्नक महत्त्वक विस्तार कथा लेल लोक-वैचारिक भूमिका रचैत अछि। ई भूमिका मनुष्यक भोजनक सांस्कृतिक महत्त्वकेँ प्रकट करैत अछि, मुदा कथाक मुख्य भाग पक्षी-जीवनक माध्यमसँ मानवीय स्वार्थक परीक्षण करैत अछि। कथामे राजा, रानी आ बहिकरी समुदाय द्वारा ‘धानक हड़ुड़ी’क प्रसंग विकसित होइत अछि। [मूल पृ. ६५–६६]

रानी लगातार परिवार आ समुदाय लेल अन्न प्राप्त करैत अछि, जखन कि राजा अपन भोगक अधिकार सहज मानैत अछि। भोजन पर निर्भरता, सेवाक असमान बँटवारा आ अपरक श्रमक अवमूल्यन किछु सरल दृश्यक माध्यमसँ सोझाँ अबैत अछि। रानीक असन्तोष केवल व्यक्तिगत रूठब नहि; ई प्रेमक नाम पर श्रमक एकतरफा उपयोगक विरुद्ध प्रतिक्रिया अछि। कथामे राजा अपन भोजन-व्यवस्था स्वयं नहि बना पबैत, ओकर अधिकार-बोध परिस्थितिसँ टकरा जाइत अछि। [मूल पृ. ६६–६७]

एक महत्त्वपूर्ण मोड़पर रानीक प्रति राजाक विश्वास, रानीक स्वतंत्र निर्णय आ राजाक संकट कथा केँ त्रासद दिशामे लऽ जाइत अछि। अन्न छोड़बाक, उपवास वा संगत्यागक संकल्प, परस्पर दया आ पश्चात्तापक प्रसंगसँ कथा केवल धान सम्बन्धी उत्पत्तिकथा नहि रहैत; ई दाम्पत्य आ सामूहिक जीवनमे परस्पर कर्तव्यक आख्यान बनि उठैत अछि। अन्तिम पृष्ठमे रानीक वियोग आ राजाक शोकक संग लोककथाक व्यापक मानवीय आशय पर लेखक स्वयं टिप्पणी करैत छथि। अन्तिम अनुच्छेदमे चीन देशसँ जुड़ल लोकविश्वासक उल्लेख सेहो अछि; ताहि कारण एहि कथाक कथानककेँ बिना स्वतंत्र क्षेत्रीय साक्ष्य केवल मिथिलामे उपजल लोककथा मानब उचित नहि। [मूल पृ. ६७–६९]

कथाक शिल्पमे लोकव्याख्या आ आख्यानक मिश्रण अछि। आरम्भिक अन्न-चर्चा कथाक प्रतीक-क्षेत्र निर्धारित करैत अछि, मुदा ई भूमिका नाटकीय कथा आरम्भ होयबामे विलम्ब सेहो करैत अछि। पक्षी-पात्रक सामाजिक व्यवहार मानवसमाजक संरचनाकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि—राजा, रानी, श्रम, अधिकार, पालन-पोषण आ वियोग। कथाक मूल शक्तिक रूपमे अन्नक वस्तुगत मूल्य आ अन्न अर्जित करबाक अदृश्य परिश्रम सोझाँ अबैत अछि।

अन्तिम टिप्पणीमे लेखक लोककथाक करुणा, परोपकार आ प्रेमक महत्व स्पष्ट करैत छथि। एतय आलोचनात्मक सावधानी ई जे लोककथाक नैतिक संकेतकेँ केवल स्त्रीक आत्मत्यागक आदर्शमे कैद नहि करबाक चाही। रानीक श्रम, ओकर असन्तोष आ ओकर अस्तित्वक आकांक्षा कथा केँ अधिक जटिल बनबैत अछि। एहि पाठक पुनःपठनमे स्त्री-पक्ष, श्रमक नैतिक अर्थ आ सामूहिक खाद्य-सुरक्षाक प्रश्न अलग-अलग उभरि सकैत अछि। मूल पादटिप्पणीमे २००८ ई.मे ‘मैथिली अकादमी पत्रिका’क एक अंकमे प्रकाशनक उल्लेख अछि। [मूल पृ. ६९]

५.२ ‘सात बहिन’: विपत्तिमे स्त्री-सामूहिकता आ युक्तिक विजय (मूल पृ. ७०–७६)

कथाक पहिल भाग लोककथाक रचनात्मक स्वभाव पर लेखकक संक्षिप्त विवेचनसँ शुरू होइत अछि। लोककथा सामान्य जनजीवनक सामूहिक अनुभव, आचार-विचार आ परम्पराक बोध दैत अछि—ई आधार प्रस्तुत कए लेखक सात बहिनक आख्यान सुनबैत छथि। कथा अनुसार एक गरीब परिवारमे सात बेटी अछि। भोजनक अभाव आ पारिवारिक संकटमे बहिन सभकेँ घर सँ दूर वन-दिशि जएबाक परिस्थिति बनैत अछि। सात बहिनक नामक क्रम, सामूहिक चलब आ एक-दोसराक संग रहबाक आग्रह मौखिक कथा-जगतक विशिष्ट ध्वनि अछि। [मूल पृ. ७०–७१]

वनमे भूख, भय, अपरिचित आश्रय आ भोजनक खोज द्वारा संघर्ष बढ़ैत अछि। बहिन सभ एक एहन स्थान पर पहुँचैत छथि जतय आरम्भमे खाद्य-सुरक्षा जकाँ प्रलोभन अछि, मुदा ओही परिवेशमे छल आ हिंसाक आशंका सेहो अछि। कथामे डाकिन-जकाँ भयकारी पात्र, अँधार घर, फाटक आ गुप्त युक्तिक प्रयोग भेटैत अछि। छोट बहिनक चातुर्य तथा बहिन सभक परस्पर बचाव कथा लेल निर्णायक अछि। [मूल पृ. ७२–७३]

उत्तरार्द्धमे बहिन सभ एक-एक कए संकटसँ निकलबाक प्रयास करैत छथि। कतहु कूदब, चढ़ब, लुकायब, फाटक खोलब वा बाधाक सामना करबाक प्रसंग अछि। पाठ बारम्बार देखबैत अछि जे व्यक्तिगत सुरक्षा आ सामूहिक सुरक्षा अलग नहि। जे बहिन आगाँ बढ़ल, से पछिला बहिनक स्थिति पर ध्यान दैत अछि; वियोग, आघात आ सम्भावित हिंसाक बीच सहयोग जारी रहैत अछि। अन्तमे कथाकार सात बहिनक एकताकेँ कथाक नैतिक तत्त्वक रूपमे रेखांकित करैत छथि। [मूल पृ. ७३–७६]

लोककथा-शिल्पक दृष्टिएँ संख्या ‘सात’ विशेष कथा-रचना करैत अछि: सात पात्रक क्रम, जोखिमक पुनरावृत्ति, बहिन सभक अलग-अलग प्रतिक्रिया आ एक सामूहिक अन्त। भिन्न-भिन्न बहिनक स्वतंत्र मनोवृत्ति बहुत विस्तृत नहि, मुदा सामूहिक पात्रत्व सशक्त अछि। वन बाहरी संकटक स्थान अछि, घर सुरक्षा आ असुरक्षा दुनूक सम्भावना लए अबैत अछि, आ डाकिन भयक साकार प्रतीक बनैत अछि। एहि सबकेँ आधुनिक सामाजिक घटनाक शाब्दिक इतिहास मानब गलत होयत; लोकगाथामे ई सामान्यतः प्रतीकात्मक अर्थक उपकरण छथि।

एहि कथाक सामाजिक पठने स्त्रीक असहायता मात्र नहि, स्त्रीक बुद्धि आ सामूहिक प्रतिरोधकेँ सेहो महत्त्व देब आवश्यक अछि। आरम्भिक आर्थिक अभाव पारिवारिक संरक्षणक विफलता देखबैत अछि; मुदा अन्तिम संघर्षमे बहिन सभ अपन रक्षाक उपाय स्वयं खोजैत छथि। एहि परिवर्तनक कारण कथा केवल करुणा-प्रधान नहि, साहसप्रधान लोकआख्यान बनैत अछि। मूल पादटिप्पणीमे ‘मिथिला दर्पण’मे २००८क प्रकाशनक सूचना भेटैत अछि, जे रचनाक मुद्रित प्रचारक एक साक्ष्य अछि। [मूल पृ. ७६]

५.३ ‘बेनीराम’: ग्रामदेवता, जातीय स्मृति आ लोकइतिहासक निर्माण (मूल पृ. ७७–८८)

‘बेनीराम’ एगारहू रचनामे आकार, विषय-विस्तार आ सांस्कृतिक जटिलताक दृष्टिएँ विशिष्ट अछि। कथा आरम्भे बेनीरामक सम्बन्ध मिथिलाक दू जाति-समुदाय—नाऊ आ करोड़ीक—लोकआस्थासँ जोड़ैत अछि। बेनीरामक पूजा लोकदेवताक रूपमे कएल जायब, गोधन, गोपालन, जादू-टोना आ ग्रामीण सुरक्षाक विश्वास; एहि विषय सभक उल्लेख सँ लेखक लोकस्मृतिक एक ठोस क्षेत्र चिन्हित करैत छथि। आरम्भिक लोकगीत-सदृश अंश आ बादक घटनाकथा एही आस्थाक लोकस्वर निर्मित करैत अछि। [मूल पृ. ७७–७९]

मूल कथामे राज परौल, लेखा ठाकुर, इन्द्र-कविलास, गोधन सती आ बेनीरामक जन्म आ जीवनसँ जुड़ल अनेक प्रसंग एक क्रममे अबैत अछि। लेखा ठाकुरक धार्मिक आचरण, गुरु-शिष्य सम्बन्ध, गोधन सतीक निष्ठा आ चमत्कारक घटना सभका इतिहास-सम्मत सूचना नहि, लोकवृत्तान्तक अङ्ग बुझबाक चाही। कथाक भीतर स्वयं एकाधिक विश्वास, सूक्ति, सामुदायिक स्मृति आ अद्भुत घटित होइत अछि; तकरा आधुनिक ऐतिहासिक तथ्यक समकक्ष राखल गेलापर रचनाक मूल प्रकृति विकृत होयत। [मूल पृ. ८०–८२]

गोधन सतीक जीवन, जसीया-बरसीयाक संग वैर, जादू-प्रतिजादू, विवाहसँ सम्बन्धित विघ्न, जन्म आ लालन-पालनक क्रमसँ कथा स्त्रीजीवन आ मातृत्वक एक लोक-आस्थामूलक संरचना गढ़ैत अछि। गोधन सतीक कर्तव्य, जोखिम उठयबाक सामर्थ्य आ पुत्रक रक्षाक आग्रह कथाक प्रमुख प्रेरक शक्ति छथि। एही संग कथामे स्त्रीक लोकधर्म ‘सतीत्व’क परम्परागत आदर्शसँ जुड़ैत अछि। आधुनिक आलोचना लेल ई प्रश्न खुलल रहैत अछि जे एहि आदर्शमे स्त्रीक साहसकेँ मान्यता कतेक भेटैत अछि आ ओकर स्वतंत्र सामाजिक सत्ता कतेक सीमित होइत अछि। [मूल पृ. ८१–८५]

बेनीरामक जन्मक पश्चात् पिताक जानकारी, पारिवारिक विच्छेद, तरुणाई, जंगल, हिंस्र पशु आ दुष्ट शक्तिसँ मुठभेड़ आदि प्रसंग कथाकेँ वीरगाथात्मक स्वर दैत छथि। बेनीरामक साहस व्यक्तिगत सामर्थ्यक मात्र प्रदर्शन नहि; ओ परिवारक सुरक्षा, अन्यायक प्रतिकार आ ग्रामीण समुदायमे प्रतिष्ठा अर्जित करबाक कर्मक रूपमे उभरैत अछि। किछु प्रसंगमे तान्त्रिक शक्ति, अभिचार, देवी-देवताक आश्रय आ चमत्कार आबहु कथा-संसारक संचालन करैत अछि। [मूल पृ. ८४–८७]

रचनाक अन्तिम भागमे बेनीरामक लोकदेवता-स्वरूप, दीनानाथसँ सम्बद्ध आस्था, मवेशीक रक्षा आ ग्रामक सामूहिक हितक प्रसंग आयल अछि। आख्यानक समापनमे लेखक स्वयं संकेत करैत छथि जे बेनीरामक लोककथा अनेक ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक पक्षक दर्शन करबैत अछि। हुनकर एहि दावाकेँ लोकमान्यता बुझबाक सामग्रीक रूपमे ग्रहण कएल जा सकैत अछि; इतिहासक रूपमे निर्णायक पुष्टि लेल स्थानीय पूजा-पद्धति, प्रचलित गीतक स्वतंत्र संस्करण, मौखिक कथावाचकक विवरण आ अभिलेखक तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक रहत। [मूल पृ. ८७–८८]

‘बेनीराम’क साहित्यिक शक्ति ओकर बहुपरतीय कथावस्तु थिक। छोट लघुकथाक उलट, एतय वंश-परम्परा, देवी-विश्वास, कथा-संगीत, धर्म, जाति, लिंग आ पशुधन-अर्थव्यवस्था परस्पर गुँथल छथि। लोकगीतक समावेश कथा केँ मौखिक परम्पराक ध्वनि दैत अछि। मुदा सम्पादकीय दृष्टिएँ कथाक कथक-स्रोत, संग्रह-स्थान, सूचनादाता आ एकाधिक पाठभेदक पूरा ब्योरा नहि भेटबाक कारण एकरा वैज्ञानिक लोककथा-संकलनक अन्तिम पाठ मानब कठिन अछि। सर्वोत्तम अध्ययन-पद्धति ई होयत जे पुस्तकमे उपलब्ध पाठकेँ एक दस्तावेजित संस्करण मानि अन्य संस्करणसँ तुलना कएल जाय।

५.४ तीन लोकवृत्तान्तक तुलनात्मक अर्थ

‘धानक हड़ुड़ी’मे अन्न आ पारस्परिक श्रमक प्रश्न छैक; ‘सात बहिन’मे भूखसँ उत्पन्न विघटन आ बहिन सभक सामूहिक आत्मरक्षा; ‘बेनीराम’मे लोकदेवता आ समुदाय-रक्षाक सांस्कृतिक कल्पना। तीनूकेँ जोड़निहार सूत्र ‘जीवनक रक्षा’ अछि। पहिल कथामे रक्षा अन्नक उपलब्धता आ प्रेमक उचित बँटवारा पर निर्भर अछि; दोसरमे संगठन आ चातुर्य पर; तेसरमे नैतिक साहस, देवी-आस्था आ लोकस्मृतिपर। एहि भिन्न माध्यम सभक एकत्रीकरण लोकजीवनक अनेक धाराकेँ देखबैत अछि।

लोकवृत्तान्तकेँ एतय मात्र प्राचीन आ विस्मयकारी सामग्री मानल गेलापर ओकर वर्तमान बोध छुटि जाएत। अन्न-अभाव, असुरक्षित बालिका, पारिवारिक श्रम, जाति-व्यवस्था, पशुधन आ ग्रामदेवता सम्बन्धी मान्यता सभ समकालीन मानवीय प्रश्नक संग संवाद करैत अछि। मुदा लोकविश्वासक नैतिक उपयोग करैत काल आलोचककेँ वर्णित सामाजिक पदक्रम, स्त्री-आदर्श वा चमत्कार-विश्वासकेँ स्वतः सत्य वा स्वतः न्यायोचित नहि मानबाक चाही। यथास्थान प्रश्न करब सेहो लोकपरम्पराक सम्मानजनक अध्ययनक अङ्ग अछि।

६. परिशिष्ट: ‘कबिलपुरक संक्षिप्त कुलीननामा’क स्वरूप आ प्रमाणिकता

संग्रहक विषय-सूची अनुसार पृ. ८९ सँ ‘कबिलपुरक संक्षिप्त कुलीननामा’ आरम्भ होइत अछि। उपलब्धक अन्तिम पृष्ठसभमे हस्तलिखित अथवा रेखाचित्र-रूपमे वंश-वृक्ष, नामक परस्पर शाखा आ कुल-सम्बन्ध देखाइत अछि। कथा-पाठक ठीक बाद एहि वंशसूचक सामग्रीक सम्मिलन अनोखा अछि। लेखकक ग्राम-केन्द्रित रुचि, जातीय स्मृति आ स्थानीय इतिहास बचा कए रखबाक प्रयत्न एहि अध्यायमे प्रत्यक्ष होइत अछि। [मूल पृ. ८९ आ अनुवर्ती वंश-चित्र;-पृष्ठ ४६–५०]

वंश-चार्टक महत्त्व ओकरा द्वारा सुरक्षित नाम आ सम्बन्धक दावामे अछि; एतय प्रमाणिकताक स्तरक अन्तर स्पष्ट राखब आवश्यक अछि। चार्ट पर ककर नाम कोन शाखामे अछि, से पुस्तकक प्रत्यक्ष साक्ष्य अछि। मुदा नामावलीक प्रत्येक सम्बन्ध इतिहासमे सत्यापित अछि—ई निष्कर्ष केवल चार्ट देखि नहि काढ़ल जा सकैत अछि। ताहि लेल परिवारक मौखिक परम्परा, उपलब्ध पुरान दस्तावेज, पञ्जी, दिनाङ्क आ स्वतंत्र वंश-प्रमाणक परीक्षण अपेक्षित अछि। क किछु रेखाचित्र आ नाम लम्बवत् अथवा घुमाओल रूपमे छपल अछि; एहि कारण बिना स्पष्ट मूल प्रतिक आधार पर प्रत्येक नामक अक्षरशः प्रतिलिपि देब जोखिमपूर्ण होयत।

साहित्यिक दृष्टिसँ ई परिशिष्ट तीन लोकवृत्तात्मक कथाक संग विशेष सम्बन्ध रखैत अछि। ‘बेनीराम’ जकाँ कथा लोकदेवता आ सामुदायिक वंश-स्मृतिक अर्थ बनबैत अछि; वंश-वृक्ष ओहि रुचिक अभिलेखीय पक्ष देखबैत अछि। मुदा पुस्तकमे कथा आ वंशावलीक सम्बन्धक पृथक् आलोचनात्मक व्याख्या पर्याप्त नहि अछि। भविष्यक सम्पादित संस्करणमे प्रत्येक चार्टक परिचय, स्रोत, अनुमानित काल, नामक मानक रूप आ अस्पष्ट स्थानक पाठ-टिप्पणी जोड़ल गेलापर ई परिशिष्ट अधिक शोधोपयोगी बनि सकैत अछि।

७. भाषा, वाक्य-विन्यास, संवाद आ कथन-प्रणालीक समग्र परीक्षा

पुस्तकक भाषामे मैथिलीक बोलचाल, साहित्यिक गद्य, सांस्कृतिक तत्सम शब्द आ लोकप्रयोगक सहअस्तित्व अछि। ‘शास्त्र-चिन्ता’मे धर्म, राष्ट्र, नीति आ दर्शन सम्बन्धी पदावली घनीभूत अछि; ‘फैंसला’मे कार्यालय, प्रतिवेदन, नौकरी, प्रशासन आ राजनैतिक सम्पर्कक शब्द अछि; ‘सपनाक डाक’मे खेत, कागज, दखल, पैतृक जमीन आ गामक व्यवहारक भाषा प्रमुख अछि। एतय शब्दसंपदा विषयक अनुरूप बदलैत अछि। ई केवल सजावटी शब्दबाहुल्य नहि, कथा-जगतक सामाजिक क्षेत्र चिन्हित करबाक साधन अछि। [मूल पृ. ३५–५४]

‘शास्त्र-चिन्ता’क कथा-स्वर प्रश्नात्मक आ अमूर्त अछि। नायक आत्मप्रश्न करैत छथि; अशोक नीतिशास्त्रीय प्रतिप्रश्न करैत अछि। वाक्यक पुनरावृत्ति मानसिक चक्रकेँ प्रकट करैत अछि, मुदा कथा कतहु दीर्घ उपदेशक निकट पहुँचि जाइत अछि। ‘फैंसला’मे अन्तर्मन आ दाम्पत्य संवादक सन्धान अधिक स्वाभाविक अछि; पत्नी जे प्रश्न करैत छथि, से घरेलू जीवनमे पदक संकट प्रवेश करयबाक प्रक्रिया देखबैत अछि। ‘सपनाक डाक’मे जमीन-सम्बन्धी भय, संवाद आ स्वप्नक मिश्रणसँ कथ्यकेँ तीव्रता भेटैत अछि। एहि तीनू मौलिक कथामे एकहिसन वाक्य-लय नहि, विषयानुकूल अन्तर अछि।

अनूदित लघुकथामे बहुधा ‘प्रश्न–उत्तर–नैतिक परिणति’क रचना-ढाँचा अछि। ओतय कथावाचक विस्तृत स्थलवर्णन नहि करैत; दू पात्रक बीच संवादेँ मुख्य अर्थ स्पष्ट होइत अछि। ‘अभिनन्दन ग्रन्थ’मे व्यंग्यक सामर्थ्य अन्तिम उलटावसँ उत्पन्न अछि, जखन कि ‘दुर्लभ सत्यनारायण पूजा’मे औपचारिक कर्म आ सत्याचरणक अन्तर अन्तिम वचनमे केन्द्रित अछि। एहि संक्षेपमे पाठककेँ शीघ्र बोध भेटैत अछि, मुदा आलोचनाक प्रश्न ई सेहो अछि जे सिद्धान्तक स्पष्टता पात्रक बहुआयामी मनोवैज्ञानिक चित्र पर कतहु भारी पड़ैत अछि।

लोकवृत्तान्तक भाषा दोसर दिशा लैत अछि। ‘सात बहिन’क घटनाक्रममे दोहराव, क्रमसूचक संख्या, सरल चेतावनी आ बचावक त्वरित गति लोकवार्ताक मौखिक प्रभाव रचैत अछि। ‘धानक हड़ुड़ी’मे अन्न सम्बन्धी लोकदृष्टि कथाक आरम्भिक कथ्य निर्धारित करैत अछि। ‘बेनीराम’मे गीत, स्थानीय देवताक नाम, कुल-सम्बन्ध, तान्त्रिक शब्दावली आ चमत्कारक प्रसंग कथा केँ बहुध्वन्यात्मक बनबैत अछि। एहि भाषा-भेदकेँ एकटा एकरूप ‘आधुनिक कथा-शैली’मे समेटब पुस्तकक रचनात्मक विविधताकेँ मेटि देब होयत।

शुद्धताक नामपर एहि पाठक ‘छलाह/छलनि’, ‘अहाँ/हमर’, ‘कएल/भेल’ अथवा स्थानिक उच्चारण सम्बन्धी रूपकेँ एक झटकेमे बदलि देब साहित्यिक विश्लेषणक उद्देश्य नहि। मौलिक बोली, पात्रक अभिव्यक्ति आ लोकगीतक ध्वनि संरक्षित रहबाक चाही। हँ, छपाइमे किछु विरामचिह्न, शीर्षकक टंकण, नामक स्थिर रूप आ पाठ-संयोजनकेँ नब संस्करणमे सम्पादकीय टिप्पणीसहित परिशोधित कएल जा सकैत अछि। मूल संस्करणक किछु छायाप्रतिलिपिक दाग-धब्बा देखल जाइत अछि; ओकरा लेखकक भाषिक दोष ठहरायब अनुचित होयत।

८. एकहि संग्रहमे तीन विधा: कथा, अनुवाद आ लोकसाहित्यक सम्बन्ध

एहि संग्रहक तीन खण्डक क्रम स्वयं अर्थपूर्ण अछि। पहिने नूतन समयक सार्वजनिक संकटसँ उलझैत व्यक्ति, तकर बाद संक्षिप्त नैतिक निर्णयक अनूदित कथा, अन्तमे सामूहिक स्मृति आ लोकविश्वासक आख्यान। ई क्रम युग-क्रमक निश्चित इतिहास नहि, मुदा पाठकीय अनुभूतिक क्रम अवश्य बनबैत अछि: अमूर्त चिन्तासँ सामाजिक व्यवहार, सामाजिक व्यवहारसँ उपदेशात्मक विवेक, आ ओतयसँ लोकसमुदायक दीर्घ स्मृति दिस। शीर्षक ‘कथा–लोककथा’क संयोग एहि संग्रहक वास्तविक रचनात्मक योजना सँ मेल खाइत अछि।

मौलिक कथाक पात्रक स्वतन्त्रता अपेक्षाकृत अधिक अछि; अशोक नायकसँ असहमति प्रकट करैत अछि, जमुनी देवी पतिक अन्तर्द्वन्द्व पर प्रश्न करैत छथि, सुखलाल अभिलेखक असुरक्षा सँ विचलित छथि। अनूदित लघुकथामे पात्र प्रायः मूल्यगत विकल्पक वाहक बनैत छथि। लोककथामे पात्र सामूहिक रूपक आ सांस्कृतिक भूमिकामे चलैत छथि। एहि अन्तरक कारण ‘बेनीराम’ सँ आधुनिक मनोवैज्ञानिक कथाक एकरूप चरित्रचित्रण, अथवा ‘अभिनन्दन ग्रन्थ’ सँ बारह पृष्ठक उपन्यास-जकाँ प्रसंगविस्तार मांगब आलोचनात्मक असंतुलन होयत।

तथापि तीनू खण्डक बीच गहिर सम्बन्ध अछि। ‘शास्त्र-चिन्ता’मे कर्तव्यक प्रश्न, ‘स्वाभिमानक मार्ग’मे आत्मनिर्णय, ‘दुर्लभ सत्यनारायण पूजा’मे आचरणक प्राथमिकता आ ‘सात बहिन’मे सामूहिक कर्तव्य—सभ अलग-अलग साहित्यिक साधनसँ ‘कथन आ करणीक अन्तर’ पूछैत अछि। ‘सपनाक डाक’मे भूमि-अधिकारक अनिश्चितता, ‘अपन-अपन पानि’मे प्राकृतिक साधनक साझा अधिकार आ ‘धानक हड़ुड़ी’मे अन्नक बँटवारा—ई सभ संसाधन आ न्यायक प्रश्नक अलग रूप प्रस्तुत करैत अछि। ‘फैंसला’मे सार्वजनिक संस्थाक दबाव आ ‘बेनीराम’मे सामुदायिक रक्षाक आस्था—ई सभ शक्ति आ सुरक्षाक भिन्न कल्पना छथि।

ग्रन्थक एक सीमा सम्पादकीय अनुपातमे अछि। तीन मौलिक कथा पर्याप्त विस्तार लैत छथि, पाँच लघुकथा अत्यल्प विस्तारमे पूर्ण होइत अछि, तेसर खण्डक ‘बेनीराम’ फेर बहुपृष्ठीय आख्यान बनि जाइत अछि। अलग विधाक लेल ई स्वाभाविक होइतहुँ पाठकीय लयमे तीव्र परिवर्तन आनैत अछि। पुस्तकक भूमिका सेहो मुख्य कथा-भागक तुलनामे विस्तृत अछि। एक सम्पादित अनुसन्धान-संस्करणमे मूल सामग्री हटौने बिना विधागत परिचय, स्रोत-टिप्पणी आ अनुक्रमक संक्षिप्त स्पष्टीकरण जोड़ल गेलापर एहि असमानताकेँ पाठकीय शक्ति बनाओल जा सकैत अछि।

९. स्त्री, वर्ग, जाति आ सत्ता: पाठक भीतरक प्रश्न

‘फैंसला’क जमुनी देवीक मनमे घर-परिवारक सुरक्षा आ पतिक नैतिक निर्णयक बीच टकराव अछि। ई दृश्य साहित्यिक दृष्टिसँ स्त्रीकेँ पारिवारिक संरचनाक वास्तविक पक्षकार बनबैत अछि, मुदा अंतिम निर्णायक स्थितिमे ओकर भूमिका सीमित रहैत अछि। ‘धानक हड़ुड़ी’क रानी अन्न अर्जित करबाक श्रम आ स्नेहक असमान बँटवाराक बीच अपन प्रतिक्रिया व्यक्त करैत अछि। ‘सात बहिन’मे स्त्रीपात्र सभक परस्पर एकता स्वयं सुरक्षाक साधन बनैत अछि। ‘बेनीराम’क गोधन सतीमें निष्ठा आ अद्भुत साहस अछि, तथापि ‘सती’क सांस्कृतिक प्रतिमान ओकर जीवनक अर्थ निर्धारित करैत अछि। चारूकथाक स्त्री-स्थितिमे अन्तर देखबाक चाही; एकहि ‘आदर्श नारी’क साँचा सभपर आरोपित नहि करबाक चाही।

वर्गक प्रश्न सेहो अलग-अलग स्तरपर उभरैत अछि। सुखलालक पीढ़ीगत भूमि-स्मृति कागजक अभावसँ जोखिममे अछि; राघवजी प्रशासनिक पदपर रहितहुँ राजनीतिक शक्तिक समक्ष दबाव अनुभव करैत छथि; मलापुरक गरीब लोक सामूहिक संघर्षक प्रभाव भोगैत छथि; ‘सात बहिन’मे भूख परिवारक विघटनक प्रारम्भिक कारण अछि। एहि दृश्य सभमे दरिद्रता केवल दया जगयबाक विशेषण नहि, मानव-सम्बन्ध आ सामाजिक अवसर निर्धारित करबाक शक्ति अछि।

‘बेनीराम’क आरम्भमे अलग जातीय समुदाय सभक लोकदेवता सम्बन्धी आस्थाक उल्लेख अछि; ई लोकधर्मक अध्ययन लेल महत्त्वपूर्ण अछि। मुदा कथा कहैत अछि जे कोन समुदाय बेनीरामकेँ अपन देवता मानैत अछि, ई एक लोकमान्यता थिक; एकर आधारपर समुदाय सभक वर्तमान सामाजिक व्यवहार वा समस्त क्षेत्रक इतिहास सम्बन्धी सार्वत्रिक दावा उचित नहि होयत। यथार्थ अध्ययन लेल जातिगत सत्ता-सन्तुलन, पूजा-अधिकार, पुजारीक परम्परा, गाय-गोरुक रक्षा सम्बन्धी विश्वास आ स्थानीय जातीय स्मृतिक बहुविध संस्करण सुनब जरूरी अछि। कथा एहि प्रश्नसभक प्रवेशद्वार खोलैत अछि, अन्तिम समाधान नहि दैत।

सत्ताक दू प्रकार एहि पुस्तकमे विशेष देखाइत अछि। एक राज्यसत्ता, जकर रूप पदाधिकारी, राजा, मन्त्री आ प्रशासनिक निर्णयमे अछि; दोसर सांस्कृतिक सत्ता, जकर रूप गुरु, पुरोहित, ग्रामदेवता, लोकगीत आ वंशावलीमे अछि। ‘अपन-अपन पानि’मे ऋषि राजाकेँ विवेक सिखबैत छथि; ‘अभिनन्दन ग्रन्थ’मे राजनीतिक पदक खोखल प्रतिष्ठाक आलोचना अछि; ‘दुर्लभ सत्यनारायण पूजा’मे पुरोहित स्वयं कर्मकाण्डक बाहरी रूपक सीमा बतबैत छथि; ‘बेनीराम’मे लोकसमुदाय एक रक्षक देवताक निर्माण करैत अछि। ई अनेक रूप कथा-संग्रहकेँ मात्र मनोरंजनक पोथीसँ आगाँ लऽ जाइत अछि।

१०. अनुसन्धानक दृष्टिएँ जाँचल जा सकनिहार अतिरिक्त बिन्दु

पुस्तकक मूल पादटिप्पणी पूर्व-प्रकाशनक उपयोगी सूचना सुरक्षित रखैत अछि: ‘शास्त्र-चिन्ता’क सन्दर्भमे २००२, ‘फैंसला’ आ ‘सपनाक डाक’क सन्दर्भमे २००३, आ लोकवृत्तात्मक कथाक सन्दर्भमे २००८क पत्रिकाक उल्लेख भेटैत अछि। एहि आधारपर ई स्पष्ट अछि जे २०१०क संग्रह एकहि वर्षमे लिखल ग्यारह रचनाक नव-निर्माण मात्र नहि; पूर्व प्रकाशित रचना सभक संकलन सेहो अछि। पत्रिकाक मूल अंकसँ पृष्ठ-संख्या, पाठान्तर आ प्रथम प्रकाशनक निश्चितता फेर जाँचल जा सकैत अछि। वर्तमान समीक्षा एकर बिना अनिर्दिष्ट पाठभेदक कल्पना नहि करैत अछि। [मूल पृ. ४०, ४९, ५४, ६९, ७६]

पुस्तकक व्यापक बाह्य ग्रन्थसूची-सन्दर्भ लेल दू ठोस स्वतंत्र सूचना भेटैत अछि। विदेहक डिजिटल पोथी-सूचीमे ‘कथा-लोककथा २०१०’ डॉ. योगानन्द झाक नामसँ दर्ज अछि। साहित्य अकादेमीक मैथिली पुस्तक-सूचीमे ‘मिथिलाक लोककथा संचय’क संकलक एवं सम्पादक योगानन्द झा आ प्रथम प्रकाशन-वर्ष २०१७ उल्लेखित अछि। एहि पछिला पुस्तकक विवरण लेखकक लोककथा-सम्बन्धी कार्यक एक आगामी ग्रन्थसूचक साक्ष्य थिक; मूल २०१७क पुस्तकक पाठ नहि मिलाओल गेल अछि, तेँ दुनू ग्रन्थमे एकहि कथाक उपस्थिति वा पाठ-सम्बन्धक निश्चित दावा एतय नहि कएल गेल अछि।

एकटा तेसर बाह्य पुस्तक-सूचना जापानक CiNii ग्रन्थ-सूचीमे ‘मैथिली कथा-सरिता’क अछि, जकर सम्पादक मदनेश्वर मिश्र आ योगानन्द झा तथा प्रकाशन-वर्ष १९८३ दर्ज अछि। एतेक सत्यापनसँ योगानन्द झाक नाम कथासाहित्यक सम्पादन-संस्कृतिक एक पूर्व प्रकाशनसँ जुड़ैत अछि। मुदा एहि तथ्यसँ ‘कथा–लोककथा’क प्रत्येक साहित्यिक विशेषताक उत्पत्ति वा १९८३क संग्रहसँ ओकर सामग्रीगत समानता प्रमाणित नहि होइत अछि। बाह्य संदर्भक उपयोग ठीक एहि सीमाधरि कएल गेल अछि।

११. उपसंहार: उपलब्धि, सीमा आ मैथिली कथासाहित्यमे स्थान

‘कथा–लोककथा’क मूल उपलब्धि विषयक विविधता मात्र नहि, साहित्यक तीन जीवन-रूपकेँ एक पुस्तकमे संग आनब अछि—वर्तमान यथार्थपर लेखकक मौलिक चिन्ता, अन्य भाषाक लघुकथासँ मूल्यक आदान-प्रदान आ लोकसमुदायक स्मृतिमे सुरक्षित आख्यान। राष्ट्रीय भय आ शास्त्र-विवेकक प्रश्नसँ शुरू भेल यात्रा राघवजीक कार्यालयीय दुविधा आ सुखलालक जमीन-भयसँ होइत साझा जल, स्वाभिमान, सत्याचरण आ सार्वजनिक सम्मानक आलोचनासँ गुजरैत अछि; अन्तमे अन्न, सात बहिनक सहयोग आ बेनीरामक लोकदेवताक संसारमे पहुँचैत अछि। एहि क्रममे पुस्तक व्यक्ति, संस्था आ समुदाय तीनूकेँ साहित्यक विषय बनबैत अछि।

कलात्मक उपलब्धिक स्तर सभठाम समान नहि अछि। मौलिक कथामे किछु ठाम विचार पात्रपर भारी पड़ैत अछि; लघुकथामे नैतिक अन्त कथा केँ अत्यन्त सीधा करि दैत अछि; लोकवृत्तान्तमे लेखकक आरम्भिक-अन्तिम विवेचन मौखिक आख्यानक स्वतंत्र अर्थक्षेत्रकेँ निर्देशित करैत अछि। तैयो ई सभ भिन्नता पुस्तकक स्वरूप बुझबाक लेल उपयोगी अछि। लेखक प्रायः नैतिक पक्ष ग्रहण करैत छथि, मुदा पाठमे उपस्थित तनाव—सुरक्षा बनाम अहिंसा, न्याय बनाम परिवार, भूमि बनाम अभिलेख, श्रम बनाम भोग, आस्था बनाम ऐतिहासिक प्रमाण—आलोचनात्मक पुनःपठनक सम्भावना बनौने रखैत अछि।

मैथिली साहित्यक अध्ययन लेल एहि पुस्तककेँ केवल ‘एगारह कथा’क गिनती धरि सीमित नहि करबाक चाही। एकर दीर्घ प्रस्तावना-प्राक्कथन साहित्यिक आयोजन आ स्थानिक रचनाकारक स्मृति दैत अछि; मूल कथाक पादटिप्पणी मुद्रित पत्रिका-जगतक कालक्रमक संकेत दैत अछि; अनूदित खण्ड भाषिक आदान-प्रदानक दस्तावेज अछि; लोकवृत्तात्मक खण्ड सामुदायिक नैतिकता आ विश्वासक अध्ययन सामग्री अछि; आ कुलीननामाक परिशिष्ट स्थानीय वंश-स्मृतिक आंशिक अभिलेख अछि। एहि बहुस्तरीय रूपमे ग्रन्थक साहित्यिक आ सांस्कृतिक मूल्य स्पष्ट होइत अछि।

संग्रहक सही आलोचनात्मक निर्णय न निर्विवाद महिमामण्डन अछि, न एकर नैतिक स्वरक आधारपर सामान्य अवमूल्यन। स्रोत-समर्थित निष्कर्ष ई अछि जे ई पोथी मैथिलीमे आधुनिक सामाजिक कथन, नैतिक लघुकथा-अनुवाद आ लोकआख्यान-संरक्षणक त्रिसन्धि प्रस्तुत करैत अछि। ओकर उत्कृष्ट उपयोग पाठक द्वारा कथा पढ़ब, सम्पादक द्वारा मूल पाठ सुरक्षित रखब, आ शोधकर्ता द्वारा लोकस्मृति आ इतिहासक दावाक पृथक् सत्यापन करब—एहि तीनू कार्यक संग होयत।

अध्याय 10 / २०११

सीतावतरण

डॉ. योगानन्द झाक कृतिक आलोचनात्मक विवेचन

२. पुस्तक-परिचय आ प्रकाशनक सत्यापित तथ्य

शीर्षक-पृष्ठ पर पोथीकेँ ‘प्रबन्धकाव्य’ कहल गेल अछि आ अंग्रेजी विवरणमे ‘Narrative Poetry’क उल्लेख अछि। शीर्षकक रचनाकार आ सम्पादकक अलग-अलग श्रेय मुद्रित अछि। एहि भेदकेँ अक्षुण्ण रखब आवश्यक अछि, कारण सम्पादक स्वयं कहलनि अछि जे मूल उपलब्ध रचना नामकरणविहीन छल आ ‘सीतावतरण’ नाम तिनकेँ देल। एहि लेल २०११ ई. के संस्करण ‘स्नेहलताक मूलरचनाक ज्यों-के-त्यों स्वहस्ताक्षरित प्रकाशन’ नहि, बल्कि सम्पादनक माध्यमसँ पाठक समक्ष आबि रहल एकटा साहित्यिक रूप अछि।

बाहरी पुष्टिमे ‘विदेह’क पोथी-सूची ‘कपिलदेव ठाकुर ‘स्नेहलता’ कृत सीतावतरण (सम्पादन) २०११’ केँ डॉ. योगानन्द झाक नामसँ सूचीकृत करैत अछि। ई पुस्तक-परिचयक सहायक साक्ष्य अछि; मुदा बाहरी सूचीसँ रचनाक छन्द, पाठ-शुद्धि वा कथानुक्रमक स्वतंत्र पुष्टि नहि होइत अछि।

३. उपोद्घातक ऐतिहासिक दृष्टि आ ओकर आलोचनात्मक परीक्षण (पृ. ३–४)

डॉ. योगानन्द झा उपोद्घातमे स्नेहलताकेँ मिथिलाक समस्तीपुर जिलाक डरोड़ी ग्रामसँ सम्बन्धित रामाश्रयी रसिक सम्प्रदायक भक्तकवि बतबैत छथि आ जीवनावधि १९०९–१९९३ लिखैत छथि। ओ मिथिलाक रामभक्ति, सीताराम-विवाह पदावली, सन्त-परम्परा आ गीतात्मक साहित्यक पृष्ठभूमिमे स्नेहलताक स्थान निर्धारित करबाक प्रयास कएने छथि। एहिमे आलोचनात्मक महत्त्व ई जे कविक साहित्यिक व्यक्तित्वकेँ केवल एकटा सीता-जन्म कथा धरि सीमित नहि करैत, पदावली आ लोकसंस्कारक विस्तृत परिप्रेक्ष्यमे रखल गेल अछि।

उपोद्घातक अनुसार, स्नेहलता अपन जीवनमे विवाह-पदावली, विनय-पदावली, झूलन, चौतावनी, शिववाणी, संस्कारगीत आदि अनेक रूपमे सृजन करैत रहलाह। ई सूचना पुस्तकक परिशिष्टसँ सेहो मिलैत अछि: ओतय मिथिला-महिमा, मैथिली-वन्दना, कृष्णलीला आ महेशवाणी राखल गेल अछि। ताहि लेल परिचय आ सामग्री परस्पर सन्दर्भ दैत अछि। मुदा अलग-अलग गीतक रचनाकाल आ पहिल प्रकाशनक पूर्ण अभिलेख एहि संस्करणमे नहि भेटैत; उपोद्घातक व्यापक साहित्येतिहासक दावाकेँ एतय सम्पादकक कथनक रूपमे मात्र ग्रहण कएल गेल अछि।

उपोद्घातमे कविक ‘अद्यावधि अनधीत ओ अनालोचित’ रहल एकटा प्रबन्धकाव्य भेटबाक चर्चा अछि। ई कथन २०१० दिसम्बरमे लिखल सम्पादकीय उपोद्घातक सन्दर्भमे अछि। एकरा आजुक समय धरि सम्पूर्ण अकादमिक साहित्यक अनुपस्थिति सिद्ध करबाक प्रमाण नहि बनाओल जा सकैत अछि। ओहि तरहें ‘अखिल भारतीय स्तर’क मूल्यांकन संपादकक आलोचनात्मक प्रशंसाभाव अछि; एहि विशेष अध्ययनक निष्कर्ष तखन बनत जखन पाठ-साक्ष्य आ अन्य समकालीन रचनाक तुलनात्मक परीक्षण भेटत।

४. सम्पादनसँ निर्मित काव्यरूप: एही संस्करणक केन्द्रीय प्रश्न (पृ. ४)

ग्रन्थक सर्वाधिक निर्णायक स्वीकारोक्ति उपोद्घातक पृ. ४ पर अछि: उपलब्ध प्रबन्धकाव्य ‘नामकरणहीने छल’; सीताक जन्म-प्रसंगक आधार पर सम्पादक ‘सीतावतरण’ नाम रखलनि। पुनः ‘कथावस्तुक माँगक अनुकूल’ स्नेहलताक कतोक मुक्तक गीतकेँ स्थान-स्थान पर जोड़ि ‘प्रबन्धात्मकता’ स्पष्ट करबाक बात लिखल अछि। ई बयान ऐतिहासिक रूपसँ दूटा अलग क्रियाक साक्ष्य अछि—शीर्षक-निर्धारण आ गीत-समावेश। एहिसँ मूल कविक रचनात्मक योगदान घटैत नहि; मुदा लेखकक मूल विन्यास आ सम्पादकक अंतिम पाठ-विन्यासकेँ एके वस्तु मानब उचित नहि।

सम्पादकक प्रयोगक सकारात्मक पक्ष अछि: बिखरल भक्तिपद आ कथा-अंश एकत्र आबि पाठककेँ मिथिलाक विस्तृत भावलोकसँ परिचित करबैत अछि। सम्भवतः जे पाठ अप्रसारित रहि गेल छल, ओकरा एकटा व्यवस्थित पठन-रूप भेटल। दोसर दिस, कोन गीत मूल प्रबन्धमे छल, कोन गीत बादमे जोड़ल गेल, कोन प्रसंगक स्थान बदलल गेल आ कोन आधार-पाण्डुलिपि लेल गेल—एकर पृष्ठवार सूची उपलब्ध नहि। एहन सूची बिना मूल रचनाकारक आ सम्पादकक संगठक हस्तक्षेपक सीमा निश्चित करब सम्भव नहि। ई संस्करणक उल्लेखनीय पाठसम्पादकीय कमी अछि, किएक तँ ई स्वयं समावेशनक बात स्पष्ट रूपेँ स्वीकारैत अछि।

‘प्रबन्धकाव्य’क मूल्यांकन एहि कारणेँ दू स्तरपर करबाक चाही। कथा-क्रम, कारण-कार्य सम्बन्ध, जनकक यज्ञ, धरतीसँ सीताक प्राकट्य आ उत्सव जेहि ठाम स्पष्ट अछि, ओ मूल काव्यरूपक प्रबन्धात्मक सम्भावना देखबैत अछि। रामजन्म-सोहर वा शिव-गौरीक गीत जेहि ठाम अलग गेय इकाइ समान ठाढ़ अछि, ओतय महाकाव्यक ‘सर्ग’-जकाँ निर्बाध कथाप्रवाह नहि, बल्कि गीत-संयोजित भक्तिपरक आख्यान बनैत अछि। ई रूप कमजोरीयो बनि सकैत अछि आ मिथिलाक लोकनाट्यात्मक परम्परासँ जुड़ल मौलिकतायो; निर्णायक मत देबाक पहिने सम्पादकीय सीमा चिन्हित करब जरूरी अछि।

५. समर्पण, रचनाक हेतु आ कविक आध्यात्मिक आत्मपरिचय (पृ. ५, ७, ९–१०)

उपलब्धमे हस्ताक्षरक पूरा पाठ निश्चित रूपसँ पढ़बा योग्य नहि; ताहि लेल ओकरा प्रमाणित शब्दशः उद्धरणक स्रोत नहि बनाओल गेल अछि। तथापि ओकर मुद्रित उपस्थिति सम्पादक आ भक्तिमण्डलीक परस्पर सम्बन्धक एकटा भौतिक संकेत अवश्य अछि।

‘समर्पण वाक्य’ (पृ. ७) पोथीकेँ सीताराम-उपासक समाज आ रामचरितमानसक भावभूमिसँ जोड़ैत अछि। समर्पणक भाषा श्रद्धापरक अछि; एहि ठाम प्रकाशकीय उद्देश्य आ कविताक अन्तःस्वरक मेल भेटैत अछि। ई पृष्ठ बतबैत अछि जे पोथीकेँ केवल आधुनिक पाठकक साहित्यिक मनोरञ्जन लेल नहि, बल्कि पाठ, गायन, पूजा-संकीर्तन आ सामुदायिक भक्तिचर्याक सन्दर्भमे सेहो देखल जाय।

‘रचनाक हेतु’ (पृ. ९–१०)मे डरोड़ी, मिथिला, सीताराम-विवाहक अनुराग, बालरूपक कल्पना, पवित्र भाव, भक्त-समाज आ ‘ललित लता’क नाम-स्मरण प्रमुख अछि। कविक आत्मस्थिति विनीत सेवकक अछि, इतिहासकारक निश्चयात्मक स्वरक नहि। प्रारम्भिक रचनाधर्मितामे काव्य-निर्माण लेल चारि वस्तु भेटैत अछि—स्थानीय पवित्र भूगोल, आराध्य-युगलक प्रणयमय भक्ति, समूहक संकीर्तन-परम्परा आ नाम-स्मरणक आग्रह। एहि आधारपर पोथीक सौन्दर्यकेँ केवल कथा-वस्तुक नापसँ मापब अपर्याप्त होयत।

६. सरस्वती-वन्दना आ मंगलाचरण: आत्मविनय सँ काव्यारम्भ (पृ. ११–१२)

पृ. ११ पर ‘श्रीगणेशाय नमः’ आ ‘सरस्वती वन्दना’सँ काव्य-पाठ आरम्भ होइत अछि। ‘माता सरस्वति हे, कहिया हरब अज्ञान’ जकाँ प्रत्यक्ष सम्बोधन कविक विद्यासम्बन्धी नम्रता प्रकट करैत अछि। ‘हम सन्तान अहाँ छी माता’क भावसँ देवता आ भक्तक सम्बन्ध ज्ञानदाता तथा आश्रित शिशुक स्वरूप ग्रहण करैत अछि। ई शास्त्रीय मङ्गलाचरणक रचना-परम्परासँ जुड़ल रहितो अपन भाषा-व्यवहारमे घरेलू ओ लोकगीतात्मक अछि।

वन्दनामे ‘दिअ कने करुणा के कोर’ आ अज्ञान दूर करबाक पुकार स्नेह-केन्द्रित बिम्ब रचैत अछि। ज्ञानकेँ बाहरी पदवी वा अधिकारक रूपेँ नहि, कृपासँ प्राप्त मानवीय क्षमता मानल गेल अछि। वर्णनात्मक दृष्टिसँ ई प्रवेश-द्वार अछि: एहि पृष्ठक बाद धर्मसंकटक व्यापक दृश्य आबैत अछि। कवि पहिले अपना सीमित ठहराबैत छथि, फेर धर्म-व्यवस्था, अवतार आ राजपरिवारक कथा कहबाक नैतिक अधिकारक कल्पना करैत छथि।

७. आरम्भिक आख्यान: धर्म-संकट, अवतार आ मिथिलाक आवश्यकता (पृ. १२–१४)

पृ. १२–१४ मे अधर्म, हिंसा, भय, व्यथित लोक, विनष्ट शान्ति आ धर्म-स्थापनाक अपेक्षाक उल्लेख अछि। ‘धर्म’ एतय केवल व्यक्तिगत पूजा नहि, समाजक अशान्ति-निवारणक मूल्य बनि उपस्थित अछि। कथाक प्रारम्भमे भवितव्य अवतारक कारण निर्मित होइत अछि—समाज असन्तुलित अछि, धरती आ जनमानस संकटमे अछि, ताहि लेल दैवी शक्ति मानवीय लोकमे उतरि सकैत अछि। एहि रचना-विधानसँ सीताक प्राकट्य एकटा अलग चमत्कार नहि, समष्टिक आवश्यकता बनैत अछि।

कवि मिथिलाक विवाह-संस्कृति आ राम-जनमक कथा एक-दोसरासँ जोड़ैत छथि। पृ. १४ पर ‘मिथिला बीच विवाहक लाथे, संग हैव संग चलब जहाँ’ जकाँ भविष्यसूचक भावक उपस्थिति अछि। ओहि ठाम कथा-समय आ भक्तक वर्तमान अनुभव परस्पर सटल अछि; अवतारक पुरातन घटना बारंबार संकीर्तनक वर्तमानमे आबि रहल अछि। एहि काल-संयोजनकेँ ऐतिहासिक तिथिक एकरेखीय प्रस्तुति नहि, भक्तिपरक रस-व्यवस्था मानि पढ़ब अधिक उपयुक्त अछि।

प्रारम्भिक पद्य मे संस्कृतनिष्ठ धार्मिक पदक संग लोकप्रचलित क्रिया, सम्बोधन, विनती आ छन्द-भंगिमा अछि। एकहि श्लोकवत् वाक्यमे ‘अधर्म’, ‘अवतार’ आ ‘धर्म धूजा’ संग सामुदायिक गायनयोग्य ध्वनि बनैत अछि। कविक भाषा बौद्धिक अलङ्कारक प्रदर्शनसँ अधिक भावक सामूहिक वहनकेँ प्रमुखता दैत अछि। एहि प्रक्रिया मे असहज वाक्यगठन आ छन्द-समताक परिवर्तन सेहो भेटैत अछि; ओकरा सम्पूर्ण रूपसँ दुर्बलता अथवा सम्पूर्ण रूपसँ सचेत कलाकौशल कहब साक्ष्यसँ आगाँ जायब होयत।

८. ‘रामजन्म सोहर’: संस्कारगीतक काव्यात्मक रूपान्तरण (पृ. १५–२१)

पृ. १५ सँ ‘रामजन्म सोहर’क शीर्षक आ क्रमांकित पद आरम्भ होइत अछि, जे पृ. २१ धरि चलैत अछि। अयोध्याक राजमहल, दशरथ-परिवार, रानी, शुभसूचना, बाजा-बजौनाइ, दान-दक्षिणा आ स्त्री-समुदायक आनन्द एहि गीत-संसारक मुख्य दृश्य अछि। सामान्य पुराणकथा जन्म-उत्सवक स्थानीय संस्कारगीतमे रूपान्तरित होइत अछि। ‘सोहर’ शब्द स्वयं काव्य-विधा आ सामाजिक अनुष्ठान—दूनूक संकेत दैत अछि; गीतकेँ घर-आँगन, बधाइ, स्त्रीक सामूहिक स्वर आ शुभ अवसरक श्रव्य परिवेशमे राखैत अछि।

एहि खण्डमे केवल देवावतारक प्रशस्ति नहि अछि; सोना, गृह-भेट, वस्त्र, बाजा आ दानक दृश्य जन्मोत्सवक भौतिक समृद्धि व्यक्त करैत अछि। राजघरानाक भव्यता आ लोकपरम्पराक व्यवहार एकठाम आबैत अछि। जन्मक समाचार जेना परिजनसँ नगर धरि पसारैत अछि, ओहिना कथनक स्वर व्यक्तिगतसँ सामूहिक बनैत अछि। एहि प्रसंगक प्रमुख साहित्यिक फल अछि जे रामजी देवता होइतहुँ शिशु, पुत्र आ परिवारक आनन्दक केन्द्र बनैत छथि।

पृ. १८–२१ क पद सभमे विशिष्ट दृष्टि ई अछि जे रामक दिव्य स्वरूप बुझनिहार आ हुनक लौकिक बालरूप देखनिहारक बीच भावान्तर अछि। लुटैत रत्न, हँसैत महारानी आ गाबैत समूहक विवरण नहि मात्र अतिशयोक्ति; ई भक्तिरसक प्रकट-पद्धति अछि। स्त्री-स्वरक समावेश गीतकेँ अनुष्ठानक सामाजिक साँचे मे स्थापित करैत अछि, मुदा राजा–रानीक केन्द्रित चित्रण साधारण परिवारक श्रम वा विषमताकेँ लगभग अप्रकट रखैत अछि। एहि सीमाक उल्लेख आधुनिक समालोचनामे जरूरी अछि।

शीर्षक ‘सीतावतरण’क मध्य रामजन्म-सोहरक स्थान एकटा विशेष आलोचनात्मक प्रश्न उत्पन्न करैत अछि। सीताक अवतरणक कथा कहबाक पहिने रामक जन्मक विशद गीत पाठककेँ आराध्य-युगलक संयुक्त दृष्टिसँ परिचित करबैत अछि। परन्तु उपोद्घातमे गीत-समावेशक स्वीकारोक्ति ध्यानमे रखैत एहि खण्डक मूल क्रम निश्चित मानल नहि जा सकैत अछि। काव्य-विन्यासक रूपमे एकर प्रभाव पर विचार कएल जा सकैत अछि; मूल पाण्डुलिपिक स्थिति पर नहि।

९. जनकक अभिलाषा, नारदक संवाद आ शिव-आराधनाक प्रवेश (पृ. २१–२२)

रामजन्मक प्रसंगक बाद कथा जनकक राजपरिवार दिस बढ़ैत अछि। जनकक बेटी-जन्मक अभिलाषा, राजद्वारक सभा आ ऋषि-मुनिक परामर्शक उल्लेख पृ. २१–२२ पर भेटैत अछि। जनक ‘विष्णु’ आ ‘महाशक्ति’क अवतार सम्बन्धी आश्वासनक सन्दर्भमे शरण आ साधनाक उपाय पूछि रहल छथि। नारद, शिव, तपस्या आ यज्ञ एतय कथानकक संक्रमण-यन्त्र बनि उपस्थित होइत अछि।

ई संक्रमण विशेष किएक तँ सीताक जन्म जैविक वंश-विस्तारक एकरेखीय प्रसंग नहि, दैवी इच्छा, धर्म-संकट आ लोककल्याणक संयुक्त रूपमे रूपायित अछि। मिथिला भूमि केवल कथाक पृष्ठभूमि नहि, अगिला अवतरणक हेतु-पृथ्वी बनैत अछि। जनकक आकांक्षामे ‘पुत्री’क महत्त्व केन्द्रीय अछि; एहि ठाम सामान्य पितृवंशीय पुत्रकामनाक अपेक्षा बेटी-जन्मक पावन आशा एकटा सांस्कृतिक उलटबाँसी रचैत अछि।

१०. ‘शैव पदावली’: शिव–गौरीक घरेलू बोली आ लीलामय विरोध (पृ. २२–२९)

पृ. २२ पर ‘शैव पदावली’ अलग शीर्षकसँ आरम्भ होइत अछि। पहिल पदमे गौरीक लोकवाणी छेक; ‘बमभोला हमरा चाकर रखता कहबनि हे गौरी’ आ भाँग-पीनाइ, झोड़ी, हाजिरी-जकाँ विषयसँ शिव एक आकाशस्थ दुर्गम देव नहि, मिथिलाक घरेलू हास-परिहासक पात्र बनैत छथि। शैवभक्तिमे महिमा आ विनोदक सहअस्तित्व एतय पाठ-सिद्ध अछि; अतएव एहि पदावलीकेँ केवल ‘शिवस्तुति’ कहि समाप्त करब अनुचित होयत।

पृ. २३–२५ क संवादात्मक गीत सभमे विवाह, कन्याक पक्ष, वरक विचित्र वेश, गौरीक आशंका, घरक व्यवहार, भाँग आ नोकझोंकक रूप देखाइत अछि। ‘हे दानी’ जकाँ पुनरावृत्त सम्बोधन श्रोता आ गायकक बीच प्रत्युत्तरक सम्भावना बढ़बैत अछि। काव्य-स्वर एकटा विश्वरक्षक महादेवकेँ लोक-समाजक विवाह-विनोदमे खिंचि आनैत अछि। ई ‘उच्च’ पुराण-प्रतिमा आ ‘निम्न’ घरेलू व्यवहारक विडम्बना नहि, लोकभक्तिक समावेशी काव्य-चाल अछि।

पृ. २६–२९ मे गौरीक रूठब, शिवक स्वीकार, परिवारक अन्तरङ्गता आ श्रृङ्गारमिश्रित मान-मनौवल विभिन्न पदमे बदलैत रहैत अछि। प्रत्यक्ष वाचिकता, छोटे पंक्ति-विराम आ भावक तुरन्त परिवर्तन ई संकेत करैत अछि जे गीत सभ पाठमे एकसाथ राखल गेलहुँ स्वतंत्र गेय रचनाक लक्षण सुरक्षित रखैत अछि। ‘प्रबन्ध’मे शिवपदक उपस्थितिक एकटा प्रयोजन जनकक व्रत, महादेवक प्रसन्नता आ सीता-अवतरणक मार्ग प्रशस्त करब अछि; दोसर प्रयोजन संभवतः संकलनमे स्नेहलताक शैवगीतक नमूना राखब। दूनू व्याख्या सम्भव अछि, मुदा निश्चित सम्पादकीय मूल-क्रम उपलब्ध नहि।

एहि पदावलीक साहित्यिक शक्ति ओकर बहुवाचिकतामे अछि। पौराणिक कथा एकल सर्वज्ञ वक्ता नहि कहैत; गौरी, दानी, वरपक्ष, स्त्री-समुदाय आ भक्तक आवाज बदलैत रहैत अछि। छन्दक विवेचनमे मात्राक कड़ाइ लागू करबाक पहिने लोकगायनक टेक, टुकड़ा आ पुनरुक्तिक भूमिका देखनाइ चाही। मूल स्वरांकन वा धुन उपलब्ध नहि, तेँ कोनो निश्चित राग–तालक दावा एहि समीक्षा मे नहि कएल गेल अछि।

११. जनकक यज्ञ, दुर्भिक्ष आ भूमिजा-जन्मक तैयारी (पृ. ३०–३२)

शैव पदावलीक बाद पृ. ३० पर कथात्मक स्वर स्पष्ट रूपेँ पुनः मुखर होइत अछि—जनकक यज्ञ, ऋषि-मुनिक परामर्श, यज्ञभूमिक तैयारी आ धरतीक असन्तुलनक विवेचन अछि। ‘अब जाय करू हे जनक यज्ञ’ जकाँ आदेशात्मक पद कथा के अगिला चरणमे धकेलैत अछि। यज्ञ एतय केवल कर्मकाण्डक वर्णन नहि, लोकक दुर्दशासँ पार पाबै लेल सामाजिक-धार्मिक आयोजनक प्रतीक अछि।

पृ. ३१ पर वर्षाक अभाव आ मर्माहत समाजक सन्दर्भ, यज्ञ-समापनक अपेक्षा आ पञ्चमी तिथिक उल्लेख भेटैत अछि। ओहि प्रसंगमे मिथिला भूमि, पवित्र नदी आ ऋतु-कालक संयुक्त उपस्थिति सीता-जन्मक भौगोलिक आ कालिक रूपरेखा बनबैत अछि। कवि जनककेँ पृथ्वीक कठिनाइमे चिन्तित राजा आ दैवी विधानक प्रतीक्षा करैत पिता दूनू रूपमे देखबैत छथि।

पृ. ३२ पर जनकक हलसँ धरती जोतनाइ, ‘मोर मन के बेटी’क आकांक्षा, धरतीक कोख आ कन्या-प्राकट्यक प्राकृतिमय सम्बन्ध एके दृश्यभित्ति पर भेटैत अछि। खेत, हल, फराक, कंचन-जकाँ प्रकाश आ किलकारीक समन्वयसँ सीताक जन्म राजमहल नहि, कृषिप्रधान लोकजीवनक केन्द्रमे घटैत अछि। एहि बिन्दु पर ‘सीतावतरण’क शीर्षक अपन सर्वाधिक ठोस अर्थ पबैत अछि: अवतार परमशक्तिक अछि, माध्यम मिथिलाक धरती अछि, आ प्रथम साक्षी राजा जनक छथि।

१२. सीताक प्राकट्य, पुत्री-भाव आ जनसमाजक उल्लास (पृ. ३२–३५)

पृ. ३२–३३ मे कंचन-हल, पृथ्वी, तेजोमय बालिका आ नगरमे पसारल समाचारक चित्रण अछि। जनकक मनमे जे कन्याक अभाव छल, से भूमिजा-प्राकट्यसँ सुखमे बदलैत अछि। पृ. ३४ क गीतात्मक उद्घोष ‘मिथिला के धरती सोहागिन जानकी जन्म लेल रे’ एहि परिवर्तनक सङ्क्षिप्त भाव-सार अछि। एक वाक्यमे भूमि, गृहस्थ-सौभाग्य, मिथिलाक सामुदायिक पहचान आ कन्याजन्मकेँ एक करैत अछि।

पृ. ३३ पर बालिकाक तेज, मुखक प्रकाश, चन्द्र-सूर्यादि उपमान आ सभक जयध्वनिक संग दैवी सौन्दर्य रचल गेल अछि। उपमान बहुल अछि, पर दैवी शरीरक ऊर्जाकेँ लोकदृष्टिसँ बुझबाक चेष्टा सेहो अछि। जनक ‘सुनयना’क संग बेटी-प्राप्ति पर प्रसन्न छथि; माँ आ पिताक संयुक्त आनन्द एहि दृश्यकेँ केवल राजकीय चमत्कारक पाठसँ अलग करैत अछि।

पृ. ३४–३५ मे गायन, मगन नगर, शुभदर्शन, दान आ उत्सव पुनः लौटैत अछि। रामजन्म सोहरमे जे सामूहिक आनन्द अयोध्यामे देखा पड़ल छल, सीता-जन्ममे ओकर मिथिलामूलक प्रतिबिम्ब बनैत अछि। ई दोहराव सरल कथात्मक पुनरुक्ति नहि, राम–सीता युगल जन्मकेँ दोसर-दोसर नगरमे सममूल्य भाव देबाक काव्य-विधान अछि। तथापि दोन्हू खण्डक सम्पादकीय संगठन साफ़-साफ़ अलग बताओल नहि गेल अछि; समानता मूल कविक सुनियोजित सममिति छल वा सम्पादकक चयनक परिणाम, से निश्चित नहि।

कन्या-जन्मक मूल्यांकनमे एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक अछि। कवि आदर्श देवी-बालिकाक रूपमे सीताक प्रशंसा करैत छथि; ई सामान्य बालिका लेल समान सामाजिक अधिकारक घोषणापत्र नहि। तथापि राजपरिवारक बेटी-आकांक्षा आ मिथिलाक सार्वजनिक उत्सव एकटा एहन भावभूमि रचैत अछि जतय बेटी-जन्म शुभ, इच्छित आ सामुदायिक गौरवक घटना बनैत अछि। साहित्यिक पाठसँ एतबे सिद्ध अछि; ऐतिहासिक मिथिलाक समग्र लिङ्ग-संबन्धक सर्वेक्षण नहि।

१३. रचनाक संरचना: निरन्तर आख्यान आ स्वायत्त गीतक द्वन्द्व

उपलब्ध पाठक प्रमुख गतिनक क्रम अछि: मंगलाचरण; धर्म-संकट आ अवतार-विचार; रामजन्म-सोहर; जनकक बेटी-अभिलाषा; शिव-आराधना आ शैव-पदावली; जनकक यज्ञ; धरतीसँ सीताक प्राकट्य; नगरोत्सव। एहि क्रमक स्पष्टतासँ कथा-पाठ सम्भव होइत अछि। मुदा ‘रामजन्म सोहर’ आ ‘शैव पदावली’क पद सभ अपन नम्बर, टेक, वाचिकता आ नाच-गायनक सूचकताक कारण स्वतंत्र काव्य-एकाइयो लगैत अछि।

परम्परागत दीर्घ प्रबन्धकाव्यक अनिवार्य कसौटी रूपेँ सर्वत्र एकहि वृत्त, एकल कथावाचक, औपचारिक सर्ग-विभाजन वा लगातार चरित्र-विकास अपेक्षित कएल जाय तऽ एहि पाठक अलग प्रकृति सोझाँ अबैत अछि। ई लोकगीतक सहायतासँ बनल देवचरित्र-आख्यान अछि, जकर रचनात्मक ऊर्जा कथा-जोड़नाइसँ बेसी भाव-परिसर बनौनाइमे अछि। ‘प्रबन्धकाव्य’क प्रकाशकीय नामकरण मान्य तथ्य अछि; ओकर पूर्ण कलात्मक निर्वाह एकटा आलोचनात्मक प्रश्न बनल रहैत अछि।

गीतक सामूहिक गायनक कल्पना करिते पढ़निहार बहुते ठाम क्रमक टूटनकेँ लोकनाट्यक दृश्य-परिवर्तनक रूपमे अनुभव कऽ सकैत छथि। मुदा लिखित पाठक स्तरपर कथामे लौटबाक संकेत कम अछि; दृश्यगति एकाएक बदलैत अछि। एहि दोहरापनकेँ स्वीकारनाइ—एक दिस लोकविधाक सजीवता आ दोसर दिस सम्पादित पाठक संक्रमण-दुर्बलता—काव्यक संग न्याय करबाक तरीका अछि।

१४. काव्य-भाषा: भक्तिक पद, मैथिली लोकबोली आ मिश्रित पदावली

भाषामे संस्कृत-उत्पन्न धार्मिक शब्द (‘अवतार’, ‘महाशक्ति’, ‘यज्ञ’, ‘सरस्वती’), मिथिलाक लोकव्यवहार (‘सोहर’, ‘बाबा’, ‘दानी’, ‘हाजिर’, ‘भाँग’, ‘गौरी’) आ रोजमर्राक क्रियापद एकसाथ चलैत अछि। ई संयोग भाषिक असावधानीक स्वतः प्रमाण नहि; भक्तिरचनाक श्रोता-समुदाय विद्वान् पाठक आ लोकगायक दुनूक बीच विचरण करैत अछि। ‘हे’, ‘रे’, ‘नहि’, ‘छथि’, ‘गाबथि’ जकाँ उच्चारण-चिह्नक माधुर्य गीतक श्रव्य रूप बनबैत अछि।

पुस्तकमध्य कवि-भनिताक रूप ‘स्नेहलता’ आ ‘लतिका सनेह’ जकाँ बदलैत देखाइत अछि। एहन भिन्नतालाई लेखकत्वक अनिवार्य विरोध नहि मानब; भक्तकाव्यमे भनिता, प्रेमनाम आ पदक अन्तिम हस्ताक्षरक अलग प्रचलन रहैत अछि। तथापि प्रत्येक रूपक उपलब्ध मुद्रित पृष्ठसँ मिलान कए बिना एककृत मानक बनौनाइ पाठविकृति उत्पन्न करि सकैत अछि। सुधारणीय मुद्रण-दोष आ मूल गीतक ध्वन्यात्मक, लोकभाषिक वैविध्य बीच भेद आवश्यक अछि।

किछु पद्य मे मानक गद्य-व्याकरणक अनुसार वाक्यक्रम उलट-पुलट अछि, कतहु संस्कृतनिष्ठ समास गीतक लयकेँ भारी करैत अछि, आ कतहु लोकरीतिक दोहराव अर्थकेँ सरल बनबैत अछि। आलोचनामे ई प्रश्न देखनाइ चाही जे कोन असमञ्जस मूल कविक शैली अछि, कोन सम्पादित पाठक छनौट आ कोन छपाई/क त्रुटि। आधार पाण्डुलिपिक अभावमे निश्चित पाठशुद्धि प्रस्तावित नहि कएल गेल अछि।

१५. रस-संयोजन: दास्य, वात्सल्य, हास्य आ लोकमङ्गल

रचनाक प्रधान भाव राम–सीता-उपासना अछि, मुदा अपन अभिव्यक्तिमे ई एकरस नहि। मङ्गलाचरणमे शरणागत विनय, रामजन्ममे वात्सल्यपूर्ण आनन्द, शिव–गौरीक दृश्यसभमे हास्यमिश्रित अपनत्व, जनकक यज्ञमे करुणा आ आशा, सीताक अवतरणमे अद्भुत तथा सामुदायिक हर्ष प्रकट अछि। ई भाव-परिवर्तन गीतात्मक विन्यासकेँ एक प्रकारक भाव-यात्रा बनबैत अछि।

विशेषतः शिवक भाँग-संबन्धी रूप आ गौरीक तिरछी घरुआ दृष्टि लोकभक्तिक परिहासात्मक स्वर राखैत अछि। ई खण्डक अस्तित्व देखबैत अछि जे स्नेहलताक भक्ति केवल संयत देवस्तुति नहि; ओ हँसैत-बोलैत, रूठैत-मानैत पारिवारिक देवजगत् रचि सकैत छथि। दोसर दिस सीताक जन्मक वर्णनमे तेज, प्रकाश आ जयघोष आश्चर्यक रस उत्पन्न करैत अछि। एहि विविधताकेँ ‘शृङ्गार’ वा ‘भक्ति’मे से मात्र समेटब पाठक बहुवचनता घटेबाक जोखिम होयत।

१६. मिथिलाक भूगोल, कृषि आ संस्कारक सांस्कृतिक पाठ

डरोड़ी, विदेहनगर, मिथिला, जनक, हल, यज्ञभूमि आ नदी-पृथ्वी के संकेत पाठक आत्मीय भूगोल निर्मित करैत अछि। ‘मिथिला के धरती सोहागिन’क उद्घोष केवल भौगोलिक नामोल्लेख नहि, भूमि-देहक भावात्मक रूपान्तरण अछि। धरतीसँ कन्या भेटबाक कथामे कृषि-कर्मक वस्तु—हल, खेत, जोतब—धार्मिक रूपमे प्रतिष्ठित होइत अछि।

सोहरक बाजा, बधाइ, वर-वधूक विनोद, विवाहक लोकसंवाद आ सामूहिक स्त्रीगायनक संकेत मैथिल संस्कार-लोकक लिखित अभिलेखक रूपमे महत्त्वपूर्ण छथि। मुदा ई साहित्यक बिम्ब छथि; एहि आधार पर कोनो विशेष गामक आजुक व्यवहार, जातिगत वितरण वा स्त्रीक वास्तविक अनुष्ठानिक भूमिकाक पूर्ण मानवशास्त्रीय निष्कर्ष नहि काढ़ल जा सकैत अछि। रस-प्रधान काव्य सांस्कृतिक साक्ष्य दैत अछि, सामाजिक जनगणना नहि।

१७. कथन-दृष्टि आ स्त्री-स्वर: सीता, सुनयना, गौरी आ गायिका-समुदाय

ग्रन्थमे सीता सर्वाधिक पूजित पात्र छथि; हुनक प्राकट्यक प्रसंग धरती आ परिवारक भावसँ भरल अछि। मुदा उपलब्ध पृष्ठमे सीताक अपन प्रत्यक्ष वाणी अत्यल्प अछि, किएक तँ कथाक अन्त सीता-जन्मक उत्सवपर केन्द्रित अछि। अतएव सीताक आत्मनिर्णय, प्रौढ़ स्त्रीत्व वा आगूक जीवन-धर्म एतय कल्पनासँ जोड़नाइ पाठ-संगत नहि होयत। एहि रचनाक केन्द्रीय स्त्री-विषय ‘प्राकट्यक आकांक्षा’ अछि, सीताक पूरा जीवन-चरित नहि।

हुनक विपरीत शिवपदमे गौरीक संवाद अपेक्षाकृत मुखर अछि: विवाह, वस्त्र, भोजन, वेशभूषा, रूठब-मनौनाइ आ घर-संसारक सवाल स्वयं स्त्री-वक्ता रखैत अछि। एही भिन्नतासँ आलोचनात्मक रोचकता उत्पन्न होइत अछि—महादेवी सीता दैवी प्रतिमाक रूपमे वर्णित छथि, गौरी लोकपरिचित बोलनिहार नारीक स्वरूपमे। दुनू प्रस्तुति अपन प्रसंगक साहित्यिक प्रयोजन पूरा करैत अछि; किन्तु आवाजक असमानता पाठमे स्पष्ट देखाइत अछि।

१८. परिशिष्टक स्थान आ रचनाकारक व्यापक काव्य-संसार (पृ. ३६–४८)

‘परिशिष्ट: स्नेहलताक किछु विशिष्ट गीत’ शीर्षक पृ. ३६ पर छपल अछि। एहि शीर्षकसँ एक बात निश्चित होइत अछि—सम्पादक एहि खण्डकेँ मुख्य प्रबन्धकाव्यसँ अलग पहचान देने छथि। परिशिष्टक गीत सबकेँ सीता-जन्मक मूल घटनाक स्वाभाविक अगिला सर्ग मानि समीक्षामे रखब अनुचित होयत। ओ गीत कविक बहुमुखी अभिरुचिक प्रमाणसामग्री छथि आ प्रकाशकीय दृष्टिसँ कवि-परिचयक विस्तार सेहो।

१८.१ मिथिला महिमा (पृ. ३६)

‘मिथिला महिमा’मे मिथिलाकेँ प्रकृति, संस्कृति, परम्परा आ रामललाक प्रिय भूमि बनाओल गेल अछि। ‘भूमण्डल के अमर गोद मे’सँ आरम्भ होइत स्तुति पृथ्वीपर मिथिलाक सांस्कृतिक स्थानक भावचित्र बनबैत अछि। पवित्र भूगोल एतय लोक-जन्मभूमिक गौरवमे परिणत होइत अछि। मुख्य काव्यमे जनकक धरती प्रतीक छल; परिशिष्टमे ओहि भूमि स्वयं प्रशस्तिक विषय बनैत अछि।

१८.२ मैथिली वन्दना आ पराती (पृ. ३७, ४७–४८)

‘मैथिली वन्दना’ मे महारानी सीताकेँ करुणा, धर्म आ आत्मसमर्पणक केन्द्र बनाओल गेल अछि; काव्य-नायकाक आराधना सीधे भक्तक प्रथमपुरुष वाणीमे आबैत अछि। एहि गीतसँ ‘मैथिली’ शब्दक देवी-सम्बन्धी अर्थ सोझाँ अबैत अछि, जकरा मैथिली भाषाक नामसँ स्वतः अभिन्न मानि नहि लेबाक चाही। पृ. ४८ क ‘पराती’मे जागरण आ भोरक पुकार अछि; समयक दैनिक चक्र आ भक्ति-अनुष्ठानक पुनरावृत्ति लोकगीतक प्रयोग-सन्दर्भ उजागर करैत अछि।

१८.३ विनय आ राम वन्दना (पृ. ३८)

‘विनय’क पंक्तिमे ईश्वरक शरणागति, आत्मग्लानि आ क्षमायाचनाक भाव प्रमुख अछि। पाठक कविक भक्ति-संवेदना आ नैतिक आत्मपरीक्षणक सम्बन्ध देखैत अछि। तत्पश्चात् ‘राम वन्दना’मे प्रभुक गुणगान आ दीनवत्सलताक स्वर अछि। ई दू गीत मुख्य आख्यानक सामूहिक उल्लासक तुलनामे अधिक निजी साधनाक चरित्र रखैत अछि। विनय-गीतक काव्यशक्ति आत्मकेँ असहाय माननाइमे नहि, आश्रयक सम्भावना जाग्रत करबामे अछि।

१८.४ श्रीकृष्णक पनिघट लीला (पृ. ३९–४३)

‘श्रीकृष्णक पनिघट लीला’मे गोपी, यमुना, पनिघट, जल, बाँट रोकेबाक लीला, हँसी-ठट्ठा आ उलाहना उपस्थित अछि। नायक कृष्ण छथि आ कथनक गति मिथिलाक रामोपासनासँ वृन्दावनक चपल लोकमाधुरी दिस सरकैत अछि। कविता केवल धार्मिक मतान्तरक नमूना नहि; आन्तरिक लोकवाणी, नेग-चेष्टा आ प्रतिरोधमय विनोदक सहायतासँ नायिका-संवादक एक अलग काव्य-रूप बनैत अछि। पृ. ४३ पर एहि रचनाक अवसान आ अगिला महेशवाणीक आरम्भ देखाइत अछि।

१८.५ महेशवाणी (पृ. ४३–४७)

‘महेशवाणी’मे शिवक असामान्य वेश, गौरीक घरेलू शिकायत, नारद-प्रसंग, भस्म, भूत-प्रेत आ देवत्वक अनेक असंगत-से लगैत मेल रोचक बनि उठैत अछि। मुख्य भागक ‘शैव पदावली’ आ परिशिष्टक ‘महेशवाणी’ बीच विषयगत निकटता अछि, मुदा एके रचनाक दू रूप अथवा मूल क्रमक अलग अंश कहबाक ठोस पाण्डुलिपि-साक्ष्य उपलब्ध नहि। जतेक प्रमाण अछि, ओतबे कहि सकैत छी जे कविक शैव-लोकगीत-रचनामे हास्य आ पूजा एक-दोसराकेँ बाधित नहि करैत अछि।

१८.६ चेतावनी आ ‘स्नेहलताक अन्तिम अपूर्ण रचना’ (पृ. ४८)

अन्तिम उपलब्ध मुद्रित पृष्ठ पर ‘चेतावनी’ शीर्षकसँ जीवनक अनित्यता, मोह आ जागरणक सन्देश भेटैत अछि। ओहि पृष्ठ पर ‘स्नेहलताक अन्तिम अपूर्ण रचना’ शीर्षक सेहो अछि। ‘अपूर्ण’ शब्द सम्पादकीय प्रस्तुति मे स्वयं उपस्थित अछि; अतएव एहि अंशकेँ जबरदस्ती पूर्ण पदक रूप देब अथवा हरायल अन्त जोड़ब अनुचित होयत। ‘अन्तिम’क अर्थ ऐतिहासिक रूपसँ कविक अन्तिम लिखल रचना अछि, ई निष्कर्ष केवल शीर्षकक आधार पर निश्चित नहि; उपलब्ध संस्करणक अपन श्रेणीकरण एतबे सिद्ध करैत अछि।

१९. परिशिष्ट आ मूल प्रबन्धक भेद किएक महत्त्वपूर्ण अछि

परिशिष्ट पाठककेँ स्नेहलताक आराधना-परिसरक विस्तार बुझबैत अछि—राम, सीता, कृष्ण, शिव, मिथिला, विनय आ चेतावनी। एहि कारण काव्य-समीक्षामे परिशिष्ट उपयोगी तुलनात्मक सामग्री अछि। तथापि ई ‘सीतावतरण’क कथानक आ विस्तार-पृष्ठक अनुपातबारे निर्णयकेँ बदलि नहि सकैत; किएक तँ सम्पादक ओहि गीतकेँ स्पष्ट रूपसँ मुख्य रचनासँ अलग राखलनि। ‘४८ पृष्ठक सीता-जन्म प्रबन्ध’ कहि सभ पृष्ठकेँ एकै कथाक पृष्ठ मानब तथ्यात्मक रूपसँ गलत होयत।

दोसर महत्त्वपूर्ण बिन्दु कहल जाय: स्नेहलता रामाश्रयी रसिक परम्परासँ सम्बन्धित होइतहुँ शैव आ कृष्णोपासना विषय पर सहजे रचना करैत छथि। एही संगति सँ एकटा समावेशी भक्तिरूपक संभावना देखाइत अछि। मुदा ऐतिहासिक सम्प्रदाय-परिवर्तन, गुरु-परम्परा वा मतागमक नियत सूची एतय उपलब्ध नहि; कविक बहुविषयक काव्य-उपस्थिति धरि सीमित रहब अधिक प्रमाणसंगत अछि।

२०. मुद्रण आ पाठसम्पादनक समस्या: पाठक प्रति जवाबदेही

ग्रन्थक पृ. ४ मे सम्पादक संकलन–सम्पादन आ मुद्रणक क्रममे सम्भावित त्रुटि लेल क्षमा माँगैत छथि। त्रुटिक इजहार लेखकक पाठसँ छेड़छाड़क खुला अनुमति नहि; उल्टे शोधक लेल आवश्यकता बढ़बैत अछि जे उपलब्ध पाठ आ मूल पाण्डुलिपि एक बेर आमनेसामने राखल जाय। पदक मूल टेक, पंक्ति-विराम, भनिता, राग-तालक सूचना आ छन्दक रूप सुरक्षित राखल बिना नवीनीकरण करब खतरनाक होयत।

अध्ययनक क्रममे पृ. ५ क हस्तलेखन आ किछु स्थानक-गुणवत्ता एहन अछि जतय अक्षरक शत-प्रतिशत निश्चित प्रतिलेखन सम्भव नहि। ताहि कारण एतय अस्पष्ट शब्द पर आधारित पंक्तिवार व्युत्पत्ति, ग्रन्थकारत्वक विवाद वा अनुसंधानिक व्याकरण-सिद्धान्त नहि गढ़ल गेल अछि। प्रमाणित पाठसम्पादनक अगिला चरणमे मूल हस्तलिपिक उपलब्धता, पंक्तिवार पाठान्तर-पञ्जी आ लेखकक अन्य छपल पोथीक तुलनात्मक जाँच अनिवार्य होयत।

२१. मूल्यांकन: उपलब्धि आ सीमा—चारि परस्पर सम्बद्ध कसौटी

२१.१ विषयगत उपलब्धि

कविक सबसँ महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ई जे सीताक धरतीसँ प्राकट्यकेँ मिथिलाक लोकजीवन, हलक कृषि-बिम्ब आ कन्या-जन्मक सामाजिक हर्षसँ जोड़ल गेल अछि। सीता दैवी शक्ति छथि, मुदा पिताक लालसा, माताक हर्ष आ नगरक गायन हुनका घर-आँगनक आत्मीय बालिका बनबैत अछि। ई घरेलूकरण आ महिमामण्डनक संयुक्त प्रक्रिया कविता केन्द्रीय विषयसँ मिलैत अछि।

२१.२ रूपगत उपलब्धि

स्नेहलताक गीतक भाषा सुनबामे उपयुक्त अछि: टेक, सम्बोधन, दोहराव, सोहरक लय, हास्यपूर्ण बोलचाल आ लोकअनुष्ठानक पद सभ मिलिक एकटा प्रस्तुतीकरण-योग्य काव्य-लोक रचैत अछि। ‘शैव पदावली’ आ ‘रामजन्म सोहर’क ऊर्जा पाठककेँ ग्रन्थक बाहिर गायनक कल्पना दिस लऽ जाइत अछि। ई उपलब्धि लिपिबद्ध कवितामे ध्वनि-प्रधान अनुभूति सुरक्षित रखबाक अछि।

२१.३ कथात्मक सीमा

मूल कथानक आ स्वतंत्र पदक बीच संक्रमण अनेक ठाम अकस्मात् अछि। शीर्षक ‘सीतावतरण’ होइतहुँ रामजन्म आ शिव–गौरी प्रसंगक विस्तृत अवकाश एकाग्र कथा-अपेक्षा राखनिहार पाठक लेल असमान अनुपात उत्पन्न करैत अछि। तथापि एकर सभ जिम्मेदारी मूल कविक माथ पर राखब अनुचित, किएक तँ सम्पादक स्वयं मुक्तक गीतक समायोजनक बात कहने छथि। आलोचनाक सटीक रूप अछि—‘उपलब्ध सम्पादित संस्करणमे संक्रमणक स्पष्टता सीमित अछि’।

२१.४ शोधोपयोगिता आ सम्पादकीय सीमा

ग्रन्थ लुप्तप्राय काव्य-सामग्रीक मुद्रित संरक्षण करैत अछि आ स्नेहलताक बहुमुखी गीतधाराक परिचय दैत अछि। मुदा मूल हस्तलिपिक फोटोपटल, संपूर्ण पाठान्तर, किन गीतकेँ कोन स्थान पर जोडल गेल तकर तालिका, गीत-संग्रहक तिथि आ छन्द-ध्वनिक निरूपणक अभाव अछि। एहि कमी सँ सम्पादकीय योगदान कम महत्त्वपूर्ण नहि होइत; भविष्यक प्रामाणिक आलोचनात्मक संस्करणक आवश्यकता निश्चित होइत अछि।

२२. स्वतन्त्र बाहरी सन्दर्भसँ जाँच: की पुष्ट होइत अछि आ की नहि

‘विदेह’ पोथी-सूचीमे प्रकाशित २०११ सम्पादित पुस्तकक उल्लेख भेटैत अछि। ‘मैथिल मंच’क पुस्तकालय-सूचीमे कपिलदेव ठाकुर ‘स्नेहलता’ नामसँ ‘वैदेही विवाह संकीर्तन’क पुस्तक-विवरण भेटैत अछि। एहि दू साक्ष्यसँ राम–सीता केन्द्रित रचनात्मकता आ सम्पादित पोथीक सार्वजनिक उपस्थिति पुष्ट होइत अछि। मुदा ‘वैदेही विवाह संकीर्तन’क पाठक संग एहि संस्करणक पंक्ति-दर-पंक्ति मिलान एतय नहि कएल गेल; समान/भिन्न रचनाक संख्या बतौनाइ अनुमान होयत।

‘मैथिल मंच’क २०२१क समाचारमे स्नेहलतापर प्रस्तावित वृत्तचित्रक सूचना आ डरोड़ी ग्रामसँ सम्बन्धक उल्लेख अछि। समाचार-स्वरूपक स्रोत कविक स्मृतिसंरक्षणक समकालीन संकेत मानल जा सकैत अछि, मुदा एतय फिल्म पूर्ण बनल, जारी भेल अथवा ओकर अनुसन्धान प्रमाणित भऽ गेल, एहन कोनो दावा नहि कएल गेल अछि। पुस्तकक मूल उपोद्घात प्रमुख जीवनी-साक्ष्य अछि; बाहरी स्रोत सभ ओकर सहायक सन्दर्भ मात्र छथि।

२४. समेकित आलोचनात्मक निष्कर्ष

‘सीतावतरण’ एहन मुद्रित सम्पादकीय कृति अछि जाहिमे कपिलदेव ठाकुर ‘स्नेहलता’क भक्तिपरक प्रबन्ध-संभावना, राम–सीता केन्द्रित रसिक संवेदना आ मैथिल लोकगीतक सक्रिय स्वर मिलैत अछि। काव्यक केन्द्रीय दृश्य सीताक भूमिजा-प्राकट्य अछि: धर्मसंकटसँ आरम्भ भेल कथा जनकक कन्याभिलाषा, यज्ञ, धरतीक उदर आ नगरक उत्सव धरि पहुँचैत अछि। एहि दृश्यकेँ प्रभावशाली बनबैत अछि मिथिलाक कृषिसंस्कृति, बेटी-जन्मक स्नेह आ दैवी प्रतिमाक पारिवारिक आत्मीयता।

पाठक काव्य-विन्यास पर एकरा स्पष्ट दृष्टिसँ देखबाक चाही: ई निर्बाध एकसर्गीय कथाप्रवाह नहि, लोकगायन-संवलित सम्पादित प्रबन्धात्मक पाठ अछि। एहिमे रामजन्म-सोहर आ शैव-पदावलीक स्वायत्तता, कृष्ण–शिवपर अलग परिशिष्ट तथा नानाविध भनिता इतिहासक मूल्यवान सामग्री छथि। एहि रूपमे एकर बल ‘शुद्ध’ महाकाव्य-रूपक अनुकरण नहि, लोकध्वनि आ उपासना-अनुभवक लेखबद्ध संरक्षण अछि।

सम्पादन पर निष्कर्ष स्पष्ट अछि: डॉ. योगानन्द झाक २०११क प्रकाशनक संग्रहणात्मक मूल्य महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा नामकरण आ गीत-समायोजनक स्वीकृत हस्तक्षेपक कारण आलोचककेँ रचनाकार आ सम्पादकक दायित्व अलग राखय पड़त। एहन भेद बिना छन्द, मूल रचनाक क्रम, कविक अभिप्राय वा प्रबन्धरूपक दोष–गुण पर अन्तिम निर्णय दऽ देब साक्ष्यक उल्लङ्घन होयत। संस्करणक मूल्य एहि बातोमे अछि जे ओ स्वयं अपने निर्माण-प्रक्रियाक संकेत दैत अछि।

अन्ततः ई पोथी आधुनिक मैथिली साहित्येतिहास लेल दू कारणसँ उपयोगी अछि: पहिल, मिथिला-केन्द्रित रामभक्तिक एकटा कम-परिचित रचनासमूहकेँ उपलब्ध करबैत अछि; दोसर, संकीर्तन–संस्कारगीत आ लिखित काव्यक बीच आदान-प्रदान देखबाक दुर्लभ अवसर दैत अछि। भविष्यक सर्वश्रेष्ठ अनुसन्धान मूल पाण्डुलिपि, स्नेहलताक अन्य गीत-संग्रह आ मौखिक गायन-परम्पराक संग एहि संस्करणक प्रमाणाधारित तुलना होयत—एहि अनुपलब्ध साक्ष्यक ठाम ककरो अनुमान नहि भरबाक चाही।

अध्याय 11 / २०१३

मंगल-प्रभात

डॉ. योगानन्द झाक कृतिक आलोचनात्मक विवेचन

१. ग्रन्थ-परिचय आ शोध-पद्धति

‘मंगल-प्रभात’ महात्मा गाँधीक आश्रमवासी लेल लिखल जीवन-नियमक व्याख्याक मैथिली अनुवाद अछि। पुस्तकक आरम्भक पृष्ठमे अंग्रेजी प्रकाशकीय विवरण स्पष्ट करैत अछि जे डॉ. योगानन्द झा हिन्दी रूपान्तरक आधार पर एहि सामग्रीकेँ मैथिलीमे प्रस्तुत कएलनि। शीर्षक-पृष्ठ, प्रकाशकीय विवरण आ अधिकार-पत्र सँ स्पष्ट होइत अछि जे एकरा मिथिला रिसर्च सोसाइटी, दरभंगा द्वारा २०१३ मे प्रकाशित कएल गेल आ नवजीवन ट्रस्टक अनुमति लेल गेल छल। ताहि कारणेँ एकर अध्ययन केवल गाँधी-दर्शनक सारांश नहि, वरन् विचार, अनुवाद, मैथिली पाठकीयता आ प्रकाशन-इतिहासक संयुक्त परीक्षण अछि। (मुद्रित पृ. १–३, १३–१४, ६७–६८)

आश्रम-व्रतक व्याख्या साधारण उपदेशात्मक अनुच्छेद नहि अछि। ‘मंगल-प्रभात’ नाम पयबाक कारण, प्रत्येक मंगलक प्रातःकालक प्रार्थनाक बाद व्रत-विषयक विचार देबाक संकल्प आ तकर प्रकाशनक चर्चा पुस्तकक आरम्भिक निबन्धमे अछि। अलग-अलग लेख पर २२ जुलाई सँ १४ अक्टूबर १९३० धरि अंकित तिथि एहि सामग्रीक क्रमिक रचना-स्वरूपक प्रमाण अछि। एहि ऐतिहासिक क्रमसँ पाठ पढ़लासँ देखाइत अछि जे गाँधीजी एकेक व्रत स्वतंत्र इकाईक रूपमे चर्चित करैत छथि, तथापि निरन्तर ओ सभकेँ सत्य-अहिंसा आ सामूहिक जीवनक केन्द्र सँ जोड़ि दैत छथि। (पृ. १७–१८; निबन्धसभक शीर्ष-तिथि)

दोसर स्रोत सेवाग्राम आश्रम द्वारा उपलब्ध ‘From Yeravda Mandir’ क अंग्रेजी संस्करण आ आश्रम-व्रत सम्बन्धी मूल/संस्थागत सामग्री अछि। अंग्रेजी संस्करणक उपयोग गाँधी-विचारक व्यापक पाठ-परम्परा आ अध्यायक्रमक तुलना लेल कएल गेल अछि, नकि मैथिली अनुवादक शब्दशः शुद्धता प्रमाणित करबाक लेल। बिनु हिन्दी मध्यवर्ती पाठक पंक्ति-दर-पंक्ति मिलान कएने अनुवादक ‘गलती’ घोषित करब उचित नहि।

२. प्रकाशन-परम्परा, भूमिका आ अनुवादकक प्रस्तावना