कल्पना झा
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-११
नारी शक्तिक सम्मान कएनिहार 'विद्यालंकार'
कन्यादानक बिध काल बऽरक हाथ पर कन्याक हाथ राखल गेल। कन्याक कोमल हाथ, हाथक रेखा देखि बऽरक मोन विचलित ! "हे भगवान ! ई तऽ घोर अनर्थ भऽ रहल अछि हमरा हाथेँ" मोने मोन बड़बड़ा कऽ रहि गेलाह बऽर बाबू। एकर अतिरिक्त हुनकर साध्य छलनिओ नहि किछु। ताहि दिन परिवार-गाम-समाज द्वारा अपनहि मोने विवाह तय कऽ देल जाइत छलैक। बऽर सँ बिनु बिचार पुछनहि। बऽर केँ बेदी पर जाए कन्यादान काल भान भेलनि जे कन्या तऽ बच्चे छथि। मात्र बारह बरखक मालती देवी संग विवाह काल श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'क मन:स्थिति एहन उहापोह बला छलनि जे एक मोन भेलनि विवाह नहि करी, मना कऽ दी। मुदा डऽर भेलनि दरबज्जा पर सँ बऽर बरिआती घुरि जाएब, ओहि बिनु बापक बेटी पर कोनो वज्राघात ने सिद्ध भऽ जाइक। फेर कतहु विवाह होएब कठिन ने भऽ जाइन हुनकर। असले सांँप-छुछुन्दर बला पड़ि भऽ गेलनि 'विद्यालंकार' जीक। उगलब आ निगलब, दुनू कठिन। विवाहक बेदी पर बैसल अत्यधिक विचलित भेलाह एहि कारणेँ जे पत्रकारिता करैत सभदिन बाल-विवाह, बेमेल विवाहक विरोध मे लिखैत रहल छलाह। से बिधनाक लिखलाहा एहन किंकर्तव्यविमूढ़ बला स्थिति मे आनि पटकि देलकनि जे स्वयं द्वारा विरोध कएल जाए बला कृत्य अपनहि करबालेल विवश छलाह। लोक हँसतनि, कटाक्षक प्रहार हेतनि, सेहो आशंका छलनिहेँ। मुदा लिखलाहा मानि विवाह कएबे कएलनि। बिनु माएक बेटी अम्बा आ त्रिपुरा केँ माएक खगता छलनि। विशेष रूप सँ छोटकी बेटी त्रिपुरा केँ। दू टा पुत्रीक माए, 'विद्यालंकार'क पहिल पत्नीक मृत्युपरान्त लोक-बेद सएह सोचि दोसर विवाह लेल दबाव देलथिन। तकरहि परिणाम छलए ई बेमेल विवाह, जाहि मे बऽर छलाह बिआलीस बरखक आ कनिञा छलीह बारह बरखक। तीस बरखक अन्तर रहबाक कारणेँ पितृवत् ममता सेहो रहलनि पत्नी लेल 'विद्यालंकार' जीक हृदय मे।
मालती देवीक मूल ग्राम छलनि सतलखा, मुदा बिनु बापक बेटीक पालन-पोषण मातृक भवानीपुर मे भेल छलनि। हुनकर अनुज गर्भहि मे छलथिन जखन हुनकर पिताक देहान्त भेल छलनि। गर्भवती विधवा पुत्री केँ सासुर सँ आनि लेल गेल रहनि हुनकर माता-पिता द्वारा। तैं ई बेमेल विवाह भवानीपुर मे सम्पन्न भेल छलए। बहुत बाद मे पुनः सतलखा बसैत गेलाह मामा सभ, मतलब 'विद्यालंकार' जीक सार सभ।
विवाहोपरान्त पत्नी मालती देवीक संग हुनकर अग्रज शशिकान्त, अनुज कृष्णकान्त आ माएक जिम्मेदारी सेहो जमाए 'विद्यालंकर' जी स्वयं उठौलनि। विशेष रूप सँ जखन पटना रहए लगलाह तखन सँ। ओहि सँ पहिने जा धरि 'विद्यालंकार' जीक कर्मभूमि बंबइ आ बनारस रहलनि ता धरि भवानीपुर मे रहैत गेलाह। मुदा पटना मे निज आवास ''विद्यालंकार भवन' बनितहि सभ पटने रहए लगलाह। सार सभक पढ़ाइ-लिखाइ, विवाह-दानक जिम्मेदारी तऽ सहजहि, घर बनाबए लेल जमीन पर्यन्त लिखि देलथिन अपन पटना आवासक पछुआरे मे। पत्नीक मान-सम्मानक संग सासुक इच्छाक मान सेहो रखलनि 'विद्यालंकार' जी। बारह बरखक 'बच्चा कनिञा'क पतिक हृदय मे पत्नीक लेल पिता सन ममता सभदिन रहलनि। बल्कि पतिक अधिकार सँ बेसी पिता सम ममत्व छलनि, एहन सुनल अछि। नारी-शक्तिक सम्मान आ उत्थान पर विशेष रूप सँ ध्यान-केन्द्रित रहलनि 'विद्यालंकार' जीक। पत्नीक अतिरिक्त पुत्री, पुत्रवधू, पौत्री, दौहित्री, सभक प्रति एहन भाव रहलनि। आ जे पुरुख घरक नारी लेल सम्मान भाव राखब जानथि से बाहरक नारी लेल रखबे करताह, ई निश्चित अछि।
घरक पुत्री, पुत्रवधू, पौत्री, दौहित्री, सभ उच्च शिक्षिता होइथ, स्वावलंबी होइथ, एहि तरहक भाव आ प्रयास दुनू रहलनि 'विद्यालंकार' जीक। आ तैं हुनका घरक सभ बेटी वेल-एजुकेटेड छलीह। जखन कि ओहि समय मे कॉलेजक मुह कम्मे घरक बेटी देखैत छल। बड़ भेलैक तऽ मैट्रिक पास कऽ लेलनि बेटी सभ। ओतबे पर्याप्त मानल जाइत छल। विशेष बात ई जे शिक्षा, स्वावलंबनक पाठ पढ़ौनिहार पिताक हृदय मे ममत्व भाव माए सँ कनिको कम नहि छलनि। विवाहिता पुत्री केँ स्वास्थ्य समस्याक कारणेँ सोलह वर्ष धरि अपनहि संग बोरिंग रोड स्थित आवास 'विद्यालंकार भवन'मे रखलथिन। आ ई निर्णय 'विद्यालंकार' जीक छलनि। जखन कि अपना मिथिला मे विवाहोपरान्त बेटीक सुख-दुख सँ माता-पिता ततेक माने-मतलब नहि राखैत छलाह ताहि दिन। बेटीक भाग्य कहि हुनका, हुनकर हाल पर छोड़ि देल जाइत छलनि।
स्त्री-शिक्षाक प्रति 'विद्यालंकार' जीक जागरूकताक चर्चा करैत जमशेदपुर रेडियो स्टेशन मे अनाउंसर रहि चुकल हुनकर दौहित्री मिनाक्षी जी गप्पक क्रम मे कहलनि - "हमरा बहुत लोक शुद्ध उच्चारण लेल कॉम्पलिमेंट दैत छथि। से एकर पूरा क्रेडिट नानाजी केँ जाइत छनि। एतेन शुद्ध उच्चारण करबाक अभ्यास हमरा ओएह करओलनि। जाहि स्पष्ट आ शुद्ध उच्चारणक आधार पर रेडियो अनाउंसरक जॉब भेटल हमरा। मोन पड़ैए 'विद्यालंकार भवन' मे रहैत सभदिन नानाजी अपना सोझाँ बैसाए कइअक टा दैनिक, जे नियमित आबैत छल घर मे, ओहि मे सँ हिन्दी-अंग्रेजी दुनू अखबारक समाचारक रीडिंग लगाबए लेल हमरा कहैत छलाह। आ जहाँ अशुद्ध उच्चारण भेल, टोकलनि। टोकबे टा नहि कएलनि, बेर-बेर शुद्ध उच्चारण करबाक प्रैक्टिस करओलनि।"
'विद्यालंकार' जीक सोच एहन छलनि जे नारीक सुरक्षा करबाक भार पुरुष-वर्ग केँ अपना कान्ह पर लेबाक बेगरता नहि छनि। अपितु नारीक भीतर सभ तरहक योग्यता विकसित करबा मे ओकर सहयोग करब पुरुषक धर्म छैक। योग्यता माने शिक्षा, निर्णय लेबाक क्षमता विकसित करब, अपन सुरक्षाक लेल सक्षम बनाएब। ओहि जमाना मे एहन जागरुकता कम पुरुषक भीतर देखल जाइत छल हेतनि। आम तौर पर लोक बेटी-पुतहुक सुरक्षा लेल चिन्तित रहैत छल। स्कूल-कॉलेज, नैहर-सासुर कतहु गेल तऽ संग मे कोनो पुरुष केँ अवश्ये पठाओल जाए, चाहे ओ पुरुष बएस मे ओहि स्त्री संँ छोटे किएक ने होइथ। माने पैघ बहिनिक सुरक्षाक भार छोट भाएक माथ पर दऽ देब आ गौरवान्वित होइत रहब जे हमर घरक बेटी-पुतहु कतहु एकसरि नहि जाइत छथि। एकरे अपन कर्तव्य बुझैत छलाह ताहि दिनक पुरुष। मुदा 'विद्यालंकार' जी नारी केँ माँ, बहिन, पत्नी वा बेटी सँ पहिने एकटा स्वतंत्र व्यक्ति मानैत छलाह।
अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता छलनि 'विद्यालंकार' जीक घरक महिला लोकनि केँ। अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता पर गप्प करैत 'विद्यालंकार' जीक दुलरी बेटी उर्मिला झा कहलनि, "घर पर बहुत लोकक अबरजात रहैत छल। कहियो जँ बाबूजी द्वारा ककरो कहल कोनो बात हमरा अनर्गल बुझाइत छलए तऽ हम कहि दैत छलिअनि जे एना किएक कहलिअनि अहाँ हुनका। आ हमरा कहला पर ओ स्वीकार करैत छलाह अपन गलती।" ई कतेक पैघ बात भेल। जेनरली पिताक भीतर 'पिता' होएबाक 'इगो' हावी रहैत छै। एहन सन जे हम बाप छी तऽ हम सही छी। मुदा एतेक गुणी, एतेक प्रतिष्ठित व्यक्तिक भीतर एहि तरहक कोनो 'इगो'क छुतिओ नहि छलनि।
समग्रता मे कही तऽ ओ सामाजिक छवि अनुरूपेँ सेहो महान छलाह, व्यक्तिगत जीवनक अनुरूपेँ सेहो महान व्यक्तित्व छलाह। आदर्श व्यक्तित्व एहने लोकक कहल जाएत हमरा हिसाब सँ।
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विद्यालंकारजीसँ पहिने विदेहपर व्यासजीक कृतित्वपर कल्पनाजी लीखि रहल छथि। पाठक व्यासजीपर प्रकाशित एखन धरिक सभ खंड निच्चा केर लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि-
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