लेखक: गजेन्द्र ठाकुर | शोध-आलेख
अनुशासित गजल-शिल्प आ जनपक्षीय चेतना
सारांश
आशीष अनचिन्हारक “अनचिन्हार आखर” (२०११) मैथिली गजलक आधुनिक विकासमे एहन कृति अछि जतए रचनात्मक प्रयोग आ विधागत आत्मपरीक्षण एक-दोसराक पूरक बनि उपस्थित होइत अछि। संग्रहमे ७८ गजल, ३२ रुबाइ आ २ कता अछि। एहि रचनासभक पहिने लेखक गजलक इतिहास, मतला, मकता, काफिया, रदीफ, बहर, उच्चारण आ मैथिली ध्वनिव्यवस्थाक पारस्परिक सम्बन्धपर विचार करैत छथि। प्रस्तुत अध्ययन संग्रहक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, प्रेमपरक आ आत्मसन्दर्भी आयामक पृथक पाठविश्लेषण करैत अछि। किसानक भूमि, महँगाइ, भुखमरी, संसदीय निष्प्रभाविता, राजनीतिक अवसरवाद, प्रेमक अनुरोध आ गजलक आत्मचेतनाक विभिन्न रूप एकटा साझा काव्यभूमि निर्मित करैत अछि। लेखमे ऐतिहासिक तुलनासँ ई प्रतिपादित कएल गेल अछि जे मैथिली गजलक विकासक प्रश्न केवल बाह्य अरबी-फारसी-उर्दू शिल्प ग्रहण करबाक प्रश्न नहि, वरन् मैथिली उच्चारण, शब्दसंसार आ सामाजिक अनुभवकेँ ओहि शिल्पमे स्वाभाविक बनएबाक सेहो अछि। संगहि पुनरावृत्ति, रूढ़ बिम्ब, प्रत्यक्ष वक्तव्य आ शिल्पगत आग्रहक सीमासभक आलोचनात्मक परीक्षण कएल गेल अछि।
बीजशब्द : मैथिली गजल; आशीष अनचिन्हार; काफिया; रदीफ; बहर; रुबाइ; कता; सामाजिक व्यंग्य; जनपक्षीय कविता; मैथिली साहित्येतिहास।
१. प्रस्तावना : अपन भाषा आ अनुशासनक बीच रचनात्मक संवाद
मैथिली कविता-परम्परामे गीत, पद, लोकधुन आ छन्दक दीर्घ इतिहास रहल अछि। एहिमे गजलक प्रवेश आ ओकर स्वतंत्र पहचान एकटा अतिरिक्त प्रश्न उत्पन्न करैत अछि : कोनो बाह्य साहित्यिक विधा स्थानीय भाषामे आबि केवल अपन तकनीकी ढाँचा सुरक्षित रखत, अथवा नव भाषाक उच्चारण, सांस्कृतिक स्मृति आ अनुभवक दबाबमे नव रूप धारण करत? “अनचिन्हार आखर” एहि प्रश्नक एकटा ठोस रचनात्मक उत्तर प्रस्तुत करैत अछि। एक दिस कवि गजलक व्याकरणकेँ गंभीरतासँ ग्रहण करैत छथि, दोसर दिस गजलमे माटि, खेत, जनताक भूख, राज-काज, अन्हार, मोन, नोर आ प्रेमक स्थानीय संसार केँ प्रतिष्ठा दैत छथि।
कृतिक नाम सेहो सांकेतिक अछि। “अनचिन्हार” ओहि अप्रतिष्ठित वा अनपहिचान आवाजक परिचायक मानल जा सकैत अछि जे स्थापित साहित्यिक अभिरुचि आ अभिजन-केन्द्रित विमर्शक बाहरसँ बजैत अछि। “आखर” भाषा मात्र नहि, रचना, प्रतिरोध, स्मृति आ पहिचानक आधार अछि। शीर्षकक एहि सम्भावित अर्थ-क्षेत्रकेँ प्रत्यक्ष लेखक-घोषणा नहि, पाठक-केन्द्रित आलोचनात्मक व्याख्याक रूपमे देखबाक चाही।
संग्रहक प्रकाशन-विवरणमे लेखक आशीष अनचिन्हार, प्रकाशक श्रुति प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण २०११ आ ISBN 978-93-80538-48-8 निर्दिष्ट अछि। शीर्षकक अंग्रेजी परिचयमे सेहो एकरा मैथिली गजल, रुबाइ आ कताक संग्रह कहल गेल अछि। संग्रह स्वयं बतबैत अछि जे ई केवल कविताक पोथी नहि, विधागत बहसक आरम्भिक दस्तावेज सेहो अछि।
एहि विवेचनाक मुख्य आधार संग्रहक रचना आ लेखकक आरम्भिक विवेचन अछि; साहित्यिक इतिहासक पार्श्वभूमि, पुस्तक-सूची आ पछातिक गजलविमर्श लेल विदेह पोथी-संग्रह, विदेह शोध-सूची आ विदेहमे प्रकाशित उपलब्ध आलोचनात्मक सामग्रीक सहारा लेल गेल अछि। अन्य वेबसाइट वा असम्बद्ध अनुमानकेँ प्रमाणक स्थान नहि देल गेल अछि।
२. कृतिक संगठन आ काव्यात्मक अभिप्राय
पोथीक क्रमविन्यास ध्यान देबाक योग्य अछि। पहिने गजलक इतिहास आ व्याकरणपर लेखकक दीर्घ विवेचन, तकर बाद समर्पण, रचनानुक्रम, गजल, रुबाइ आ कता—ई क्रम पाठककेँ रचनाक आस्वादनसँ पहिने विधाक व्याकरणिक संसारमे प्रवेश करबैत अछि। शिल्पक शिक्षा आ काव्यानुभूति एतए दू पृथक विभाग नहि, एकहि साहित्यिक परियोजनाक दू आधार बनैत अछि।
गजलक अठहत्तर रचनामे मनोदशा आ कथ्यक विस्तृत फैलाव अछि। आरम्भक कतेको गजलमे सत्ता, शोषण आ विषमता पर प्रहार अछि; मध्यक रचनामे प्रेम, विरह, सम्बन्ध, प्रकृति आ रचनात्मक आत्मचेतना व्यापक रूपेँ अबैत अछि; अन्तिम समूहमे सामाजिक आलोचना पुनः तीक्ष्ण रूप ग्रहण करैत अछि। काव्यक्रम पूर्णतः एकरेखीय नहि अछि, आ एहि अस्थिर आवागमनसँ गजलक स्वतन्त्र शेर-धर्मिता स्फुट होइत अछि।
बत्तीस रुबाइ संग्रहक भाव-विस्तारकेँ संक्षिप्त चारि पाँतिक संरचनामे लै जाइत अछि। कताक दू रचना प्रेमक वर्णन, सौन्दर्य आ मिथकीय साम्यक रूपमे उपस्थित अछि। तात्पर्य ई जे पुस्तक मूलतः गजल-केन्द्रित होइतहुँ अन्य लघु काव्यरूपक स्वतंत्र सम्भावना केँ सेहो स्थान दैत अछि।
३. आरम्भिक विधा-विवेचन : इतिहास, व्याकरण आ उच्चारण
लेखकक “गजलक संक्षिप्त परिचय” भाग अरबी कसीदा, फारसी गजल, उर्दू काव्य-परम्परा आ मैथिलीमे गजलक आगमनक एकटा अनुक्रम रखैत अछि। इमरउल कैस, रूदकी, सादी, हाफिज, अमीर खुसरो, मीर आ गालिब सन नामक उल्लेखसँ लेखक गजलकेँ बहुभाषी इतिहासक अन्तर्गत राखैत छथि। मैथिली सन्दर्भमे कविवर जीवन झाक “सुन्दर संयोग”क उल्लेख विशेष महत्त्वपूर्ण अछि। एकरा लेखकक ऐतिहासिक प्रतिपादनक रूपमे ग्रहण कएल जा सकैत अछि; एहि संक्षिप्त लेखमे सभ मध्यवर्ती ऐतिहासिक दावा स्वतंत्र प्रमाणसँ पूर्णतः सिद्ध कएल गेल अछि, एहन मानब उचित नहि।
मतला, मकता, शेर, मिसरा, रदीफ, काफिया, गैर-मुसल्सल गजल, मुसल्सल गजल, बहर, तखल्लुस आदि पारिभाषिक शब्द सभक विवेचन लेखकक गंभीर शिल्प-चिन्तनक परिचायक अछि। खास बात ई जे ओ केवल अरबी-फारसीक नियम यांत्रिक रूपेँ उद्धृत नहि करैत छथि; मैथिलीमे विभक्ति जुड़बाक प्रवृत्ति, अनुस्वार-चन्द्रबिन्दुक प्रयोग, संयुक्ताक्षर, ह्रस्व-दीर्घक लेखन-उच्चारण आ मात्रा-साम्यक व्यवहारिक कठिनाइ पर सेहो विचार करैत छथि।
कविक दावा अछि जे भाषागत रूप आ बोलचालक ध्वनिप्रवाहकेँ बुझने बिना काफिया निर्धारित नहि कएल जा सकैत अछि। एहि विचारक महत्त्व एहि मे अछि जे गजल-व्याकरण मैथिलीकेँ अनुकरण करएबला निष्क्रिय भाषा मानि नहि चलैत, अपितु स्वतंत्र ध्वनितन्त्र-वला रचनात्मक भाषा स्वीकार करैत अछि। शिल्पक शुद्धता आ स्थानीय उच्चारणक बीच समन्वय एहि पुस्तकक सर्वाधिक उपयोगी बौद्धिक योगदानसभमे एक अछि।
तथापि आरम्भिक विवेचनमे प्रस्तुत सभ नियम एक समान सार्वदेशिक, निर्विवाद वा भाषावैज्ञानिक रूपेँ अन्तिम निष्कर्ष छथि, से मानि लेब उचित नहि। कतिपय स्थानपर उच्चारणक उदाहरण, परम्परागत छन्दक वर्गीकरण आ भाषिक व्यवहारक सीमा अलग-अलग प्रमाणक अपेक्षा करैत अछि। साहित्यिक सिद्धान्तक रूपमे एहि विवेचनक मूल्य असन्दिग्ध अछि; एकर प्रत्येक उपनियमक स्वतंत्र तकनीकी परीक्षण आ शेर-दर-शेर तक्तीअ एकटा अलग अध्ययनक विषय अछि।
४. चयनित गजलसभक पृथक पाठविश्लेषण
४.१. गजल १ : पूँजी, प्रदर्शन आ मनुष्यक अवमूल्यन
“मालक खातिर तँ माल-जाल बनल लोक” (गजल १)
प्रथम गजल संग्रहक वैचारिक दिग्दर्शन करैत अछि। “माल” आ “माल-जाल”क शब्द-निकटता मनुष्यक भीतर आर्थिक लोभक जाल निर्माण करैत अछि। एहि गजलमे भुखमरी, प्रदर्शन, सामाजिक व्यवहार आ आत्मविकृतिक चित्र एक दोसरासँ जुड़ैत अछि। कवि केवल गरीबीक वर्णन नहि करैत छथि; धनकेँ मनुष्यक व्यक्तित्व, नैतिकता आ पारस्परिक सम्बन्धक नियामक बनि जेबाक प्रक्रिया पर प्रहार करैत छथि। “लोक”क पुनरावर्तन व्यक्तिगत अपराधकेँ सामूहिक प्रवृत्तिक रूप दैत अछि। ई शेर साधारण बोलचालक शब्दसँ व्यापक अर्थ उत्पन्न करबाक उदाहरण अछि।
४.२. गजल १६ : राजनीतिक अन्हार आ व्यंग्यक दोहरा स्वर
“अन्हरे सरकार तँ चला रहल राज-काज” (गजल १६)
एहि रचनामे दोसर पाँतिक अन्त्य “शेष कुशल अछि” एकटा स्थायी व्यंग्यात्मक निष्कर्ष बनैत अछि। साधारण समाचार वा चिट्ठीक कुशल-क्षेमक भाषा पर कवि राजनीतिक अस्वस्थताक आरोप करैत छथि। “अन्हरे सरकार” अभिव्यक्ति एक साथ नैतिक दृष्टिहीनता, नीति-विफलता आ सार्वजनिक गैरजिम्मेदारीक संकेत करैत अछि। “शेष कुशल अछि” जतेक बेर दोहराइत अछि, ततेक बेर ओकर साधारण आश्वासन कटु विडम्बनामे बदलैत अछि। एकर काव्यात्मक शक्ति रदीफक अर्थ-परिवर्तनमे अछि—ओहि शब्दसभसँ विश्वासक नहि, अविश्वासक अनुभव उपजैत अछि।
४.३. गजल २३ : स्वयं गजल पर गजल
“गजल सुख जिनगीक गजल दर्द जिनगीक” (गजल २३)
ई रचना विधाक आत्मपरक घोषणाक रूपमे पढ़ल जा सकैत अछि। गजल एतए केवल प्रेम-वचन नहि, सम्पूर्ण जीवनक सुख-दुःखकेँ भाषा देबाक माध्यम अछि। हिमालय, आगि आ प्रतिरोधक बिम्ब गजलकेँ आन्तरिक दृढ़ता आ सामाजिक तापसँ जोड़ैत अछि। आत्मसन्दर्भी कविता होयबाक कारण रचना किछु स्थानपर गजल-विधाक प्रशस्तिमे परिणत होइत अछि। मुदा एहि आत्मस्तुतिमे लेखकक रचनात्मक आग्रह स्पष्ट अछि—मैथिली गजलकेँ सीमित श्रृंगार-विधासँ बाहर जन-जीवनक व्यापक संवेदना दैत स्थापित करब।
४.४. गजल २६ : सम्बोधन आ निकटताक विनम्र व्याकरण
“अपन आँखिमे बसा लिअ हमरा
अपन श्वासमे नुका लिअ हमरा” (गजल २६)
एहि मतलामे “लिअ हमरा”क पुनरावृत्ति प्रेमिकाक लग निकटता माँगबाक सुमधुर विनय बनैत अछि। आँखि आ श्वासक बिम्ब दृष्टि आ जीवन-दूनूकेँ प्रेमक अधिकार-क्षेत्रमे आनैत अछि। कवि आक्रामक अधिकारक बदला अपनाएल जेबाक आकांक्षा व्यक्त करैत छथि। एहि रचनाक उल्लेख आरम्भिक गजल-विवेचनमे सेहो उदाहरणक रूपमे भेटैत अछि; एहि प्रकारे रचना आ व्याकरणक बीच प्रत्यक्ष सेतु निर्मित होइत अछि। तकनीकी दृष्टिएँ पुनरावृत्त “लिअ हमरा” केवल ध्वनि-सौन्दर्य नहि, सम्बन्धक भावात्मक केन्द्र अछि।
४.५. गजल ३१ : भूमि, विचार आ युद्धक अर्थान्तरण
“माटि-पानि-बसात लेल युद्ध
देखू छोटको बात लेल युद्ध” (गजल ३१)
“माटि-पानि-बसात” मनुष्यक अस्तित्वक प्राथमिक आधारक सूची अछि। दोसर पाँतिमे “छोटको बात” एतेक कठोर शब्द “युद्ध”सँ जुड़िते राजनैतिक आ सामाजिक असंगति उजागर करैत अछि। रचना आगाँ आदर्श आ विचारधारा, जर-जमीन तथा संबंधक प्रश्न सेहो उठबैत अछि। एहि गजलमे “युद्ध”क पुनरावृत्ति अर्थबोधक केन्द्र होइतहुँ एकरस घोषणापर निर्भर रहबाक जोखिम पैदा करैत अछि। तथापि रोजमर्रा के वस्तुकेँ वैचारिक संघर्षसँ जोड़बाक कविक चेष्टा उल्लेखनीय अछि।
४.६. गजल ४८ : अन्हार, किसान आ भूखक संयुक्त बिम्ब
“इजोत लेल अन्हरे नगरी जाइत लोक
सपनमे तँ सपनाक भात खाइत लोक” (गजल ४८)
ई दू पाँति कविक सामर्थ्यक तीक्ष्ण उदाहरण अछि। पहिल पाँतिमे प्रकाश खोजबाक दिशा उलटि गेल अछि—लोक अन्हारक नगरी दिस जाइत अछि। दोसर पाँतिमे भात जे आधारभूत भोजन अछि, से यथार्थसँ विस्थापित भऽ स्वप्नक वस्तु बनि जाइत अछि। स्वप्नमे भोजनक ई स्थिति क्षुधाक सामाजिक यथार्थकेँ अतिशयोक्तिक सहारे करुण बनबैत अछि। एहि गजलमे खेत, शोषण, अकाल आ श्रमजीवी जीवनक आनो उल्लेख अछि। इजोत–अन्हार आ भात–सपना विरोधी युग्म मिलि राजनीतिक असफलताक रूपक रचैत अछि।
४.७. गजल ६० : महँगाइ आ जनप्रतिनिधिक विडम्बना
“सोना भेटत सस्ता महँग चाउर देखब एक दिन” (गजल ६०)
एहि पाँतिमे वस्तुक मूल्यक्रम उलटि गेल अछि। परम्परागत रूपेँ सोना विलासिता आ चाउर नित्य-जीवनक आवश्यकता मानल जाइत अछि; कवि दुनूकेँ विपरीत मूल्य-स्थिति मे रखैत छथि। ई उलटावक अलंकार मात्र नहि, खाद्य-सुरक्षा आ असमान वितरणक प्रश्न अछि। गजलमे लोकसभा-विधानसभा आ भूखल जनताक उल्लेख सत्ता-तन्त्रक सार्वजनिक उत्तरदायित्वक जाँच करैत अछि। रचना कखनो नारा बनबाक नजदीक पहुँचैत अछि, मुदा ओकर मूल व्यंग्य एकदम चिन्हार सामाजिक अनुभूति सँ बनल अछि।
