लेखक: गजेन्द्र ठाकुर | शोध-आलेख
अपूर्ण आकांक्षा आ पूर्ण छन्द
सारांश
आशीष अनचिन्हारक ‘कुमारि इच्छा’ आधुनिक मैथिली गजलक ओहन संग्रह अछि जाहिमे छन्दक अनुशासन आ सामाजिक असन्तोष एक-दोसराक परीक्षण करैत अछि। संग्रहक सयटा गजलमे भूख, वर्गभेद, सत्ता, बाजार, पारिवारिक विखण्डन, आधुनिक सुविधाक विसंगति, स्त्रीक श्रम, रचनाकारक आत्मपरीक्षण आ अधूर आकांक्षाक अनेक रूप प्रत्यक्ष होइत अछि। कविक विस्तृत भूमिका ई रचनाकेँ केवल कविता-पोथी नहि रहय दैत अछि; ओ मैथिली लेल अपन बहर-विन्यास बनयबाक आग्रह, परम्परागत अरूजसँ सम्बन्ध आ नव नामकरणक प्रस्ताव प्रस्तुत करैत छथि। एहि शोधक केन्द्रीय प्रतिपाद्य ई अछि जे ‘कुमारि इच्छा’क सार्थकता छन्द-विषयक घोषणामे मात्र नहि, बल्कि ओहि घोषणाकेँ जीवनानुभव, लोकभाषा, व्यंग्य आ सामाजिक आलोचनासँ भिड़बैत रहबामे अछि।
मूल संग्रहक सम्पूर्ण सयटा गजल, कविक आत्मवक्तव्य, रचनाक पछाति देल छन्द-विवरण आ विदेहक ग्रन्थ-सूची तथा शोध-अभिलेखक आधारपर एहि अध्ययनमे औपचारिक काव्यविश्लेषण, विशिष्ट गजलक पृथक पाठविश्लेषण, शीर्षकक अर्थ-मीमांसा आ मैथिली गजलक साहित्येतिहाससँ तुलनात्मक सम्बन्धक विवेचन कएल गेल अछि। मूलक अक्षररूप प्रत्यक्ष मिलानसँ सुनिश्चित भेल सीमित पाँति मात्र उद्धृत अछि। अध्ययन संग्रहक उपलब्धिक संग ओकर पुनरावृत्ति, छन्द-विचारक असम्पूर्णता, स्त्रीस्वरक सीमित स्वायत्तता आ उपदेशात्मक व्यंग्यक जोखिम सेहो रेखांकित करैत अछि।
बीजशब्द : मैथिली गजल; आशीष अनचिन्हार; कुमारि इच्छा; बहर; अरूज; विदेह; लोकधुन; व्यंग्य; आकांक्षा; सामाजिक न्याय।
साहित्यिक प्रश्न आ अध्ययन-दृष्टि
काव्यसंग्रहक मूल्यांकन करैत काल सहज प्रश्न होइत अछि जे कतेक रचना स्मरणीय अछि, कतेक लयबद्ध अछि आ कवि अपन समयकेँ कतेक सघन रूपमे चिन्हैत छथि। ‘कुमारि इच्छा’ एहि सामान्य कसौटीमे एकटा आर जटिल प्रश्न जोड़ैत अछि : जँ लेखक प्रत्येक गजलक संग बहरक मात्राक्रम आ कतहु-कतहु छूटक औचित्य स्वयं लिखैत छथि, तँ आलोचक केवल भावपर निर्णय दए सकैत छथि की छन्दक दावाक स्वतंत्र परीक्षण सेहो करबाक चाही? एहिठाम दूनू काज जरूरी अछि। छन्दक घोषणा अपनामे सफलता नहि; मुदा छन्द-विषयक प्रायोगिक सचेतना सेहो काव्य-इतिहासक दस्तावेज होइत अछि।
ई शोध मूलतः ग्रन्थकेन्द्रित अछि। पाठकें एकटा सतत काव्य-समुच्चय मानि गजलक क्रम, प्रतीक-परिवर्तन, कथ्यक आवृत्ति आ लेखकद्वारा देल शिल्प-टिप्पणीक अनुशीलन कएल गेल अछि। साहित्येतिहासक तुलनात्मक प्रसंगमे विदेहक पोथी-संग्रह, शोध-सूची, आशीष अनचिन्हारक उपलब्ध आलोचनात्मक कृतिक विवरण आ विदेहमे प्रकाशित परम्पराविषयक विवेचन उपयोगी सन्दर्भ बनैत अछि। जे इतिहास-तथ्य स्वतन्त्र पुरातन हस्तलिखित आधारपर नवसँ सिद्ध नहि कएल गेल, ओकरा एहि शोधमे अभिलेख-आधारित परिप्रेक्ष्यक रूपमे ग्रहण कएल गेल अछि।
कवि कहैत छथि जे पाठक जँ मनोरंजनक भीतरसँ ज्ञान, बुद्धि, परिवर्तन वा जीवन-सुधारक किछु सूत्र भेटबैत छथि तँ रचनाक सौभाग्य। ई कथन पाठकक अधिकार स्वीकार करैत अछि। ताहि लेल एहि पोथीक एकमात्र अधिकृत अर्थ कविक भूमिका नहि अछि; अलग-अलग शेर सामाजिक स्थिति, वैयक्तिक स्मृति आ भाषिक संकेतक अनुसार अपन अतिरिक्त अर्थ बना सकैत अछि। आलोचना एहि बहुअर्थताकेँ बचबैत हुए कविक छन्द-दावाक वस्तुनिष्ठता सेहो माँगैत अछि।
पोथीक रचना-परिसर आ आत्मवक्तव्य
‘कुमारि इच्छा’मे सयटा क्रमबद्ध गजल संकलित अछि। आरम्भमे रचनाकारक भूमिका आ अन्तमे कविक परिचय अछि। गजलक सङ्गे अधिकांश ठाम विशिष्ट मात्राक्रम, नामित बहर अथवा छूटक विवरण देल गेल अछि। एहि बनावटसँ एकटा अनोखा द्विस्तरीय पाठ बनैत अछि : ऊपर गीतात्मक-विन्यास आ नीचाँ ओहि विन्यासक कार्यविधि। पाठक पहिने भुखायल पेट, टूटैत सम्बन्ध वा राजनीतिक तामझामसँ भेट करैत छथि; तुरन्त बाद रचनाक छन्दकीय गणना हुनका औपचारिक संरचना दिस मोड़ि दैत अछि।
भूमिकामे लेखक अपन पहिल संग्रह ‘अनचिन्हार आखर’केँ २०११ आ दोसर ‘जंघाजोड़ी’केँ २०२० सँ जोड़ैत ‘कुमारि इच्छा’क सार्वजनिकताकेँ २०२१ सँ सम्बद्ध करैत छथि। विदेहक अभिलेखमे एहि कृतिक उत्तरवर्ती ई-प्रसारणक रूप सेहो उपलब्ध अछि; एहि दूनू उल्लेखकेँ एकै प्रकाशन-घटना मानि लेब उचित नहि। लेखक तीनू संग्रहक रचनाविधानमे अन्तर देखबैत सरल वर्णिक अभ्याससँ स्वयं निर्मित मात्राक्रम आ फेर स्थापित उर्दू-फारसी बहर दिस गति करबाक कल्पना रखैत छथि।
लेखकक अन्तिम स्वीकारोक्ति विशेष महत्वपूर्ण अछि। ओ अपन संग्रहकेँ छन्दयुक्त कहैत हुए भावना आ लयक सम्पन्नतापर पाठकक अनुभूतिक महत्त्व रखैत छथि। एहि आत्मालोचनामे काव्यविनयक संग काव्य-रणनीति सेहो अछि : रचनाकार तकनीकी श्रमपर जोर दैत छथि मुदा सौन्दर्यक फैसला पाठककेँ सौंपैत छथि। आलोचक लेल ई क्षण महत्त्वपूर्ण अछि, कारण छन्दक अनुशासन आ काव्यानुभवक ऐक्य अपने-आप सिद्ध नहि होइत।
छन्दक कार्यक्रम : स्थानीय ध्वनि आ वैश्विक काव्यविधाक संयोग
मैथिली गजलमे अरबी-फारसी-उर्दू अरूजक सम्पर्क आ मातृभाषाक स्वाभाविक उच्चारणक बीच तनाव पुरान बौद्धिक प्रश्न अछि। अनचिन्हार एहि तनावकेँ न त पूर्ण अनुकरण द्वारा मिटबैत छथि, न निर्बन्ध मात्रिक समानता द्वारा। हुनकर स्थापना अछि जे प्रत्येक पाँतिक मात्राक्रम नियमित रहबाक चाही, मुदा मैथिलीक ध्वनिक प्रकृति अपन स्वतंत्र बहरक विकास सेहो कऽ सकैत अछि। एहिसँ भाषा केवल उधार लेल विधाक वाहक नहि, ओकर छन्द-निर्माणक सक्रिय शक्ति बनैत अछि।
भूमिकामे ‘बहरे विदेह’ लेल लगातार दीर्घ-ध्वनिक अन्तमे लघु अपनाबयबला क्रम प्रस्तावित अछि। ‘बहरे गोविन्द’मे लघुसँ आरम्भ होइत दीर्घ-विस्तार, ‘बहरे लोचन’मे लघु-दीर्घ-लघुक अन्तिम विन्यास, ‘बहरे प्रदीप’मे खफीफक एकटा पुनर्विन्यस्त मात्राक्रम आ ‘बहरे रूप’मे २२२१ रुक्नक पुनरावृत्तिक अवधारणा देखाओल गेल अछि। नामकरणमे विदेह पत्रिका, गोविन्द झा, रामलोचन ठाकुर, मैथिलीपुत्र प्रदीप आ रूपकान्त ठाकुरक स्मरण राखल गेल अछि। ई नाम केवल छन्द-चिह्न नहि; मैथिली साहित्यक संस्थागत-सांस्कृतिक स्मृतिक घोषणापत्र बनि जाइत अछि।
तथापि नाम राखब आ नओ बहरक सांगीतिक-ध्वन्यात्मक विशिष्टता प्रमाणित करब भिन्न कार्य अछि। प्रस्तावित क्रम सभक परम्परागत अरूजक अन्तर्गत समकक्ष रूप कतेक अछि, मातृभाषिक उच्चारणमे लघु-दीर्घक स्वीकृत नियम की होयत, आ स्वतंत्र पाठकद्वारा तकतीअ करिते कोन परिणाम प्राप्त होयत—ई प्रश्न खुलल रहल अछि। लेखक स्वयं पूर्ववर्ती छन्द-रूपसँ सम्भावित साम्यक विषयमे सावधानी प्रकट करैत छथि। अतः नव नामकरणकेँ अन्तिम रूपे मानकीकृत सिद्धान्त नहि, अनुसंधान आ सामूहिक प्रयोगक प्रस्ताव मानब बेसी न्यायसंगत अछि।
छन्दकीय वितरण आ परीक्षणक सीमा
सयटा रचनाक अन्तमे देल लेखकक टिप्पणीक पृथक गणना करिते चौवन गजलक संग ‘बहरे मीर’क संज्ञा भेटैत अछि; नौटा ठाम ‘रमल’ आ चारिटा ठाम ‘मुतकारिब’क स्पष्ट उल्लेख अछि। शेष तेतीस गजलमे अन्य मात्राक्रम, स्वतंत्र प्रयोग अथवा अलग छन्दीय वर्गक विवरण अछि। ई गणना लेखकक टिप्पणीक वर्गीकरण अछि, परम्परागत अरूजक स्वतंत्र प्रमाणपत्र नहि। ओहि कारण एहि आँकड़ासँ संग्रहक घोषित शिल्प-प्राथमिकता बुझाइत अछि, किन्तु सभ गजलक नियमबद्धता निर्विवाद सिद्ध नहि होइत।
बहरे मीरक विस्तृत प्रयोगक एकटा व्यावहारिक लाभ अछि : लोकभाषामे लघु-दीर्घक तनाव सँ घबरायबामे बदला कवि अपेक्षाकृत नियमित आवृत्तिक सहारा लैत छथि। परिणामस्वरूप कतिपय मतला स्मरणीय आ वाचिक बनैत अछि। उल्टा जोखिम ई जे दीर्घक गणनाक लेल दूटा पृथक लघुकेँ एक दीर्घ मानबाक ‘छूट’क बारम्बार स्वीकारोक्ति शिल्पक निश्चितताकेँ कमजोर करैत अछि। जे छूट अपरिहार्य संगीतात्मक उच्चारणमे समर्थित अछि से एक बात; जे छूट केवल गणनाक बराबरी लेल प्रयुक्त अछि से दोसर।
कविक टिप्पणीमे उदाहरणार्थ भूखपर आरम्भिक गजलक विन्यास २२–२२–२२–२१, शान्ति आ क्रान्तिक विरोधवला गजलक विन्यास २१२२–२१२२, भातार-सम्बन्धी गजलक विन्यास २२–२२–२२–१२१ तथा शीर्षकीय गजलक विन्यास २२२–२२२–२२२–२२ बताओल गेल अछि। एहि उदाहरण सभमे केवल लिखित चिह्न बराबर होएब पर्याप्त नहि; मैथिली उच्चारणक वास्तविक ताल, विसर्ग-संयुक्ताक्षर, स्वर-भार आ विरामक स्थितिमे सुनल जायब चाही। एहि दृष्टिसँ संग्रह गजलकार आ छन्दशोधी दुनूक लेल समृद्ध, मुदा बहस माँगयवला पाठ अछि।
शेर, मतला, काफिया, रदीफ आ अर्थक स्वतन्त्रता
गजल-रूपक पहचान ओकर मात्राविधानमे समाप्त नहि होइत। मतलाक दूनू मिसरामे समान रदीफ-काफियाक प्रतिष्ठापन आ पछिला शेर सभक अपेक्षित स्थानमे तकर पुनरागमन एकटा अन्तःसंगीत बनबैत अछि। ‘कुमारि इच्छा’मे ‘पेट’, ‘भातार’, ‘राम हरे’, ‘दिक्कत’, ‘सच केर दलाल’, ‘लेने जाइए’ आ ‘बाँचल’ सन आवर्तित पद भाषाक जनपदीय भंगिमाकेँ रचनात्मक साधन बनबैत अछि। अनेक गजलमेसँ एकटा शेर हटेलो दोसर शेर अपन टिप्पणीकेँ स्वतंत्र राखैत अछि।
मुदा बारम्बार लौटैत रदीफ कतिपय ठाम अर्थक विस्तार रोकेबो करैत अछि। जेना ‘सच केर दलाल’क आवृत्तिसँ सत्तासीन झूठक मजाक तीक्ष्ण होइत अछि, मुदा अलग-अलग शेर जँ नव दृष्टि नहि जोड़य तँ एहि व्यंग्यक प्रभाव यांत्रिक भऽ सकैत अछि। शेरक स्वायत्तता आ समग्र गजलक विषयगत दिशा—दूनूक सन्तुलन कविक मुख्य कसौटी बनैत अछि।
प्रेम, कुटुम्ब, राजनीति, रोजगार आ काव्यसंस्था सँ सम्बन्धित विषय एकर पश्चातवर्ती विस्तार छी। गजलक संक्षिप्त विन्यास समकालीन समाचार-भाषा, छोट वाक्य, लोक-उक्ति आ तीक्ष्ण प्रतिप्रश्न लेल अनुकूल रहैत अछि। अनचिन्हार एहि सुविधा के खूब उपयोग करैत छथि। तरल लय आ अर्थक घनत्व एक-दोसरासँ मिलल अछि एहन शेर अधिक सफल, जखन कि केवल नारा अथवा तथ्यसूचक वाक्य बनि रहल शेर कम स्मरणीय अछि।
भाषा, लोकवाणी आ अन्तःपाठ
संग्रहक भाषा औपचारिक पाण्डित्यक ठाम बहुधा अपन गामघरक बातचीत सँ ऊर्जा प्राप्त करैत अछि। ‘मोन’, ‘पेट’, ‘आँगन’, ‘भातार’, ‘सासुर’, ‘नैहर’, ‘पैकार’, ‘दरबार’, ‘कपार’, ‘जुन्ना’ जकाँ शब्द काव्यक विषय लोकजीवनमे धरि दैत अछि। तकर संग ‘सिस्टम’, ‘रिपोर्टिंग’, ‘फाइल’, ‘फ्री’, ‘गीजर’ आ ‘ऑफिस’क प्रयोग समकालीन समाजक वस्तु-जगत खोलैत अछि। एहि मिश्रित शब्दभण्डारकेँ भाषा-अशुद्धिक सरल प्रमाण मानब त्रुटिपूर्ण होयत; एहि माध्यमसँ बाजार, प्रशासन आ घरेलू जीवनक परस्पर प्रवेश घटित होइत अछि।
लोक-धुन, भजनात्मक रदीफ, कबीर-स्मृति आ व्यंग्यात्मक स्वांग एकर अन्तरपाठक सम्बन्ध गहिर करैत अछि। ‘राम हरे’बला गजलमे कवि स्पष्ट करैत छथि जे पदक प्रयोग भजनसँ ग्रहण कएल गेल अछि। लोकधुन-आधारित राजनीतिक गजलमे ध्वनिसंरचना जनसभा अथवा सामूहिक गायनक सहज सम्भावना बनबैत अछि। एहिसँ गजल एकान्त प्रेमालापसँ बाहर सामाजिक वाचिकता धरि बढ़ैत अछि।
तथापि ‘फेस’, ‘ड्रेस’, ‘गेम’, ‘सिस्टम’ सन शब्दक तात्कालिकता कविता केँ समय-सापेक्ष बनबैत अछि। उच्चारणक समता साधबाक लेल प्रयुक्त विदेशी पद जँ आन्तरिक छन्दसँ सहज नहि जुड़य तँ ओ वाचिक तनाव उत्पन्न करैत अछि। एहि आलोचनाक अर्थ भाषिक शुद्धतावाद नहि, बल्कि रचनामे प्रयुक्त प्रत्येक शब्दक ध्वनि आ प्रसंगक काव्यात्मक अनिवार्यता देखब अछि।
पृथक पाठविश्लेषण
भूखक रूपक : खाली पेटसँ राज्यक अनैतिकता धरि
रूसल रहलै खाली पेट
नहिये भेलै राजी पेट
संग्रहक पहिल गजल पाठकेँ व्यक्तिगत प्रणयक संसारमे नहि, पेटक आग्रहमे प्रवेश करबैत अछि। ‘रूसल’ मनुष्यक भावनात्मक क्रिया अछि, मुदा कवि ओकरा पेटक गुण बना दैत छथि। एहि मानवीकरणसँ भुख्खल शरीर अपन अधिकारक वाणी पाबैत अछि। अन्नाभाव धार्मिक कर्मक नैतिकता सेहो जाँचैत अछि; साधु आ सरकारक उल्लेखसँ व्यंग्य दैनन्दिन भूखक वस्तुगत समस्या दिस वळैत अछि। ‘पेट’ रदीफ एकहि साथ हास्यक लय आ अभावक निरन्तरता बनबैत अछि।
ई आरम्भ संग्रहक विषय-सूत्र निश्चित करैत अछि : भौतिक असुरक्षा बिनु नैतिक शान्तिक अर्थ अधूरा अछि। कवि जँ भूखक निराकरणक नीति नहि लिखैत छथि, तइयो अपन लघु शेरद्वारा ओ उच्च आदर्श आ खाली पेटक बीच प्रतिपक्ष स्थापित करैत छथि। रदीफक आघातसँ पाठककेँ सभ शेरक अन्तमे पुनः ओही समस्या धरि लौटय पड़ैत छनि।
मोनक शान्ति बनाम पेटक क्रान्ति
मोन बनलै शांतिवादी
पेट बनबै क्रांतिकारी
एहि गजलक पहिल शेर शान्ति आ क्रान्तिक लोकप्रचलित विरोधकेँ शरीर आ चेतनाक परस्पर गतिशील सम्बन्धमे बदलैत अछि। ‘मोन’ आदर्शमे समझौता करबाक इच्छुक अछि; ‘पेट’ जीविकाक दबावक कारण असहमतिकेँ ठेलैत अछि। सामाजिक क्रान्तिक ई भौतिकवादी लघुरूप कठिन सैद्धान्तिक तर्कक बदला सरल अनुभवसँ निर्मित अछि। तुरन्त बाद राजा-रानी आ दास-दासीक दृश्य सामाजिक पदानुक्रमक व्याख्या बनैत अछि।
एहि शेरक शक्ति ओकर सूक्तिसुलभ काटमे अछि। मुदा बहुत एहन सूक्ति एकत्र होएबासँ अन्ततः जटिल सामाजिक प्रक्रियाक सहज द्वैतमे सरलीकरणक सम्भावना रहल करैत अछि। लेखकक सफलता विषयकेँ तीक्ष्ण बनयब अछि; कमजोरी तखन प्रकट होइत अछि जखन समान विरोधक नव-नव नामक स्थानपर अनुभवक विशेष विवरण अनुपस्थित रहैत अछि।
बाहरक एकता आ भीतरी टूटन : भातार-श्रृंखला
बाहर बाहर जोड़ल भातार
भितरे भीतर टूटल भातार
एहि गजलक केन्द्रीय पद ‘भातार’ सम्बन्धक पुरुष-पहचानक रूपमे आयल अछि, मुदा ओकर संग ‘जोड़ल’ आ ‘टूटल’ क्रियाक संयोजन बाह्य संरचना आ आन्तरिक विघटनक अन्तर खोलैत अछि। भाषा परिवारक निश्चित भूमिकाक आलोचना बनैत अछि। बाहर जुड़ल देखाइत सम्बन्ध भीतर टूटल अछि—ई सामाजिक प्रदर्शन आ भावनात्मक विस्थापनक संक्षिप्त चित्र अछि। विकासक मृगतृष्णा, हिसाब, इच्छा आ अपने लोकद्वारा घावक संकेत एहि भङ्गुरताकेँ आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि दैत अछि।
एहि गजलक छन्द-टिप्पणी विशेष ध्यान खींचैत अछि, कारण कवि एतय प्रस्तावित ‘बहरे लोचन’क मात्राविधानक उदाहरण उपस्थित करैत छथि। ताहि लेल ई रचना केवल दाम्पत्य-विसंगतिक कथन नहि; भाषा-विशिष्ट छन्द बनयबाक प्रयोगशाला सेहो अछि। साहित्यिक पक्ष परखैत काल अन्तिम लघु-दीर्घ-लघुक प्रभाव आ ‘भातार’ रदीफक वाचिक आघातक सम्बन्ध विचारेब उचित होयत।
धर्मक ध्वनि आ प्रशासनक यथार्थ
सभटा सुविधा सरकारी राम हरे
खाली हुनके सरदारी राम हरे
‘राम हरे’क पुनरावृत्ति भजनात्मक सामूहिकतानक भाव पैदा करैत अछि, मुदा कथ्य ओकर विपरीत दिशामे जाइत अछि। सुविधा, सरकारी सरदारी, रिपोर्टिंग, आपसी मारामारी आ मायके बेचैनी जेहन विषयक संग भक्तिपद जोड़ला पर पवित्र ध्वनिक भीतर लौकिक भ्रष्टाचारक व्यंग्य पैदा होइत अछि। एकर सौन्दर्य विरोधाभासमे अछि : जतेक सहज भजन-तान, ततेक कठोर सामाजिक कटाक्ष।
ई गजल लोकगीत आ गजलक सम्बन्ध बुझबाक मुख्य दृष्टान्त अछि। भजनक शब्द अखण्ड धार्मिक समर्पणक संकेत नहि दैत; ओकर पुनरावृत्ति सामाजिक अनुष्ठानक खोखलापन सेहो उजागर करैत अछि। फिरो, प्रत्येक शेर जँ नव विरोधाभास नहि रखय तँ ‘राम हरे’क व्यंग्य स्वयं सूत्र बनि रहि सकैत अछि। यही सीमा वाचिक लोकप्रियता आ साहित्यिक गहराइक बीच मूल्यांकनक आग्रह करैत अछि।
सच केर दलाल : रदीफक व्यंग्यात्मक व्यवहार
खूब गरजैए सच केर दलाल
खूब ठहकैए सच केर दलाल
एहि मतलामे ‘सच’ नितान्त पवित्र मूल्य नहि, कारोबारक वस्तु अछि। ‘दलाल’ शब्द सामाजिक नैतिकताक उलटफेरक सूचक बनैत अछि। गरजब, ठहकब, चमकब, बदलैत रहब आ बिकि जायब—ई क्रम सत्यक प्रतिनिधित्व करबाक दावाक मुखौटा उतारैत अछि। शेरक लघु ध्वनि, उपहासक आघात आ बारम्बार लौटैत पद एकत्र भऽ राजनीतिक-सांस्कृतिक स्वांगक प्रभाव बनबैत अछि।
एहि शिल्पक विशेषता अछि जे कवि सीधे आरोप-प्रमाणक निबन्ध नहि लिखैत छथि। हाव-भावक क्रमसँ व्यक्तिक चरित्र रेखांकित करैत छथि। मुदा ‘दलाल’ जकाँ तीक्ष्ण मूल्यनिर्णायक शब्दक अति-उपयोग बिंबक विविधता घटाबय सकैत अछि। सर्वाधिक सफल शेर ओ अछि जाहिमे केवल गारि नहि, व्यवहारक नव रूप उद्घाटित होइ।
हरियर चश्माक दृश्य आ बेटी पर पड़ैत दुगुना बोझ
छै बेटी भेने दुन्ना दुख
सासुर देखू नैहर देखू
एहि गजलक पंक्ति स्त्रीक सामाजिक अवस्थाकेँ ‘सासुर’ आ ‘नैहर’क दू केन्द्रमे देखैत अछि। स्त्रीक घर-अधिकार, अपेक्षा, श्रम आ अपमानक दोसर जटिल प्रसंग तत्क्षण उपस्थित होइत अछि। ‘दुन्ना दुख’क संकेत स्त्रीक ऊपर दू परिवारक दायित्वक बोझक व्याख्या देबाक सम्भावना खोलैत अछि। रचना स्वयं स्त्रीक अन्तरंग आत्मकथा नहि प्रस्तुत करैत, मुदा पितृसत्तात्मक सम्बन्धक असमानता प्रश्नित करैत अछि।
गजलक मतलामे ‘हरियर चश्मा’क आग्रह देखबाक दृष्टि के व्यंग्य-प्रतीक बनबैत अछि। एकर बरखिलाफ बेटीवला शेर धुँधल मानसिक चश्मा हटयबाक माँग करैत अछि। एहि अन्तरसँ कविक व्यंग्य केवल बहिर्मुखी नहि, सामाजिक आत्मावलोकन सेहो बनैत अछि। आलोचककेँ ध्यान रखबाक चाही जे विषय रूपमे स्त्रीक उपस्थिति आ स्वतन्त्र बोलनिहार स्त्रीस्वरक उपस्थिति एक वस्तु नहि अछि।
शीर्षकक अर्थ : माँड़, नोन, सिन्दूर आ कुमारि इच्छा
छै अमीरक दिक्कत हीरा सोन दिक्कत
आ गरीबक दिक्कत माँड़े नोन दिक्कत
कोना पुरतै सिंदूर सभ इच्छा लेल
रहतै किछु इच्छा कुमारि तँ कोन दिक्कत
एहि दू शेरमे समस्त पोथीक शीर्षकक दार्शनिक केन्द्र भेटैत अछि। अमीरक चिन्ता ‘हीरा-सोन’ अछि; गरीबक चिन्ता ‘माँड़-नोन’। पहिल शेर समान शब्द ‘दिक्कत’क भीतर वर्गानुसार समस्याक अतुलनीयता स्थापित करैत अछि। दूनू दिक्कत नामसँ समान, जीवनमूल्यमे असमान। ई विरोध कविक समाजबोधक सबसँ स्पष्ट रूपक अछि। भोजनक न्यूनतम शर्त आ विलासक चाह, दूनूकेँ एकरे काफिया-रदीफ संरचना आमनेसामने रखैत अछि।
दोसर शेरक ‘सिंदूर’ आ ‘कुमारि’ शब्द एकदम अलग स्तरक अर्थ लबैत अछि। एक दिस विवाहित होएबाक सामाजिक चिह्न, दोसर दिस अधूर आकांक्षाक प्रतीक। कवि सभ इच्छा पूर्ण होयब आवश्यक नहि मानैत छथि; किछु ‘कुमारि’ रहबामे मानवीय जीवनक असम्पूर्णता आ एक प्रकारक आत्मरक्षा दूनू निहित भऽ सकैत अछि। शीर्षक केवल स्त्रीक वैवाहिक स्थितिक नाम नहि; आकांक्षाक अधिग्रहणसँ बचल क्षेत्रक रूपक सेहो अछि।
तथापि ‘कुमारि’केँ मात्र सौन्दर्यात्मक अनछुइलापन बनाकऽ पढ़ब सीमित होयत। ‘सिंदूर’क उपस्थितिमे विवाह-संस्था आ स्त्रीक सामाजिक मान्यताक प्रश्न छिपल अछि। समग्र संग्रहमे जखन भूख, गरीबी, सासुर-नैहर आ कनियाँक करुणा बारम्बार भेटैत अछि, तखन शीर्षकक प्रतीक सामाजिक रूप सँ भारित होइत अछि। एहि दूनू अर्थधारा—व्यक्तिगत अधूरापन आ संरचनात्मक असमानता—एक-दोसराकेँ काटैत नहि, बल्कि उजागर करैत अछि।
लोकधुनक राजनीतिक गजल आ नदीक साक्ष्य
नोरे छै कोसी कमला गंगा किनार हे
नोरेमे घोरल गेलै सिंदूर पिठार हे
राजनीतिक नेता आ झड़कल जनताक शेरवला लोकधुन-आधारित गजलमे कोसी, कमला आ गंगा केवल भूगोलक नाम नहि रहैत। ओ जनपदीय क्षति, विस्थापन, सामुदायिक जीवन आ स्त्रीक मांगलिक चिह्न ‘सिंदूर-पिठार’सँ जुड़ि कऽ करुण प्रतीक बनि जाइत छथि। ‘नोर’क जल आ नदीक जलक अन्तराल मेटायल प्रतीत होइत अछि। गीतात्मक पुनरावृत्ति एहि करुणाकेँ एकल स्वर सँ सामूहिक विलापमे परिवर्तित करैत अछि।
एहि गजलक शक्ति ध्वन्यात्मक धरातलपर अछि। लोकधुन पाठक नहि, श्रोता सेहो रचैत अछि। किन्तु नदीक वास्तविक राजनैतिक-पर्यावरणीय इतिहास ओतबे पाँतिमे सम्पूर्ण नहि समा सकैत; पाठककेँ शेरसँ पयर बाहर स्थानीय सामाजिक सन्दर्भ जानबाक आवश्यकता रहैत अछि। कवि एतय इतिहासलेखन नहि, ऐतिहासिक पीड़ाक काव्यचिह्न बनबैत छथि।
कृषि-उत्पादन, पैकार आ पुरस्कारक अर्थव्यवस्था
खेतक उपजा पैकार लेने जाइए
जे बाँचल से सरदार लेने जाइए
देहक कांति चलि गेलै पेटक आगिमे
कलमक धार पुरस्कार लेने जाइए
एहि गजलक पहिल शेर कृषि श्रमक उत्पादन आ वितरणक अधिकारक बीच दूरी देखबैत अछि। उपजा खेतक, लाभ पैकारक; अवशेषपर सरदारक दखल। उत्पादनसम्बन्धक आलोचना केवल आर्थिक वक्तव्य नहि, छन्दयुक्त सारांश बनैत अछि। दोसर शेरमे शरीरक कांति नष्ट होएब आ कलमक धार पुरस्कार लऽ जायब साहित्यिक प्रतिष्ठानक सम्भावित विडम्बनाक आलोचना अछि। ‘पेटक आगि’ आ ‘पुरस्कार’ एकहि कवितामे आबि आर्थिक आ सांस्कृतिक विषमताकेँ जोड़ैत अछि।
एहि शेरक जोखिम सेहो अछि : पुरस्कारक प्रसंग जँ सार्वत्रिक आरोप बनि जाय तँ जटिल साहित्यिक संस्थाक अन्तर सभ एकरूप भऽ सकैत अछि। किन्तु ओ जे प्रश्न खोलैत अछि से अनदेखा करबाक योग्य नहि—साहित्यिक यशक वितरण रचनात्मक श्रम आ सामाजिक गरजसँ केना सम्बन्धित अछि? कवि एहि प्रश्नकेँ पाठकीय असुविधाक रूपमे जीवित रखैत छथि।
गीजर, पीपर आ कनियाँ : विकासक दोहर सत्य
कटबे केलै पीपर हो
आँगन लगलै गीजर हो
कनियाँ भुख्खे कुहरैए
बाहर उठलै सोहर हो
पीपर कटला पर गीजर लगब आधुनिक उपभोग आ पर्यावरणीय क्षतिक संगम अछि। एकटा जीवित, सामूहिक-सांस्कृतिक वृक्षक स्थानपर व्यक्तिगत सुविधा-साधन आयल; ‘विकास’ एतय प्रगतिक स्पष्ट पर्याय नहि। काव्यक व्यंग्य ‘पीपर’ आ ‘गीजर’क अप्रत्याशित तुक-परिसरमे जन्मैत अछि। एहि दृश्यकेँ केवल यान्त्रिक आधुनिकताक निन्दा मानि लेब सँ बेसी उपयोगी ई बुझब जे सुविधा कोन मूल्यमे भेटैत अछि आ ओकर लाभ कोन अपनबैत अछि।
‘कनियाँ’क भूख आ बाहर उठैत ‘सोहर’क विरोध सामाजिक उत्सव आ घरेलू असुरक्षाक भयानक अन्तर उद्घाटित करैत अछि। उत्सवक सामूहिक शोर स्त्रीक शरीरक पीड़ाकेँ ढाकि दैत अछि। लोकगीतात्मक प्रत्यय ‘हो’ व्यंग्यकेँ गेय बनबैत अछि, जखन कि शेरक नैतिक ऊर्जा निजी घावमे अछि। एहि तरहें संग्रहक सामाजिक चेतना स्त्री, भोजन, परिवार आ प्रकृतिक धारा एकहि छोट गजलमे समेटि सकैत अछि।
समापनक शेर : सभ्यता, हिंसा आ लोकक अनुपस्थिति
बिन लोकक संसार बाँचल
जे बाँचल अवतार बाँचल
बाहर बाहर सभ्य बनलहुँ
भीतरमे खुंखार बाँचल
अन्तिम गजल ‘लोक’क अनुपस्थितिक प्रश्नसँ खुलैत अछि। संसारक बचल रहब आ लोकक उपस्थित रहब एक बात नहि—ई सामाजिक-राजनीतिक दर्शनक सारगर्भित संकेत अछि। अपराधक संग सरकारक सह-अस्तित्व, दरबारक सर्वव्याप्ति आ भोथ बेकाम भोटक तस्वीर कविता केँ चुनावी प्रक्रिया सँ आगाँ नैतिक जीवनक संकट दिस लऽ जाइत अछि।
अन्तिम शेर सभ्यताक बाहरी आवरण आ भीतर जीवित हिंस्र वृत्तिक विरोध बनबैत अछि। एहि बिन्दुपर संग्रह आरम्भक खाली पेटसँ चलि सामाजिक संस्थाक रिक्तता धरि पहुँचैत अछि। शीर्षकक ‘कुमारि इच्छा’ केवल अधूर प्रेम नहि रहैत; मनुष्यकेँ मनुष्य बनेबाक ओ आकांक्षा बनैत अछि जकर पूर्ति समाजक प्रचलित व्यवस्था बारम्बार रोकैत अछि।
गजलकारक आत्मपहचान आ विडम्बनाक काव्यशास्त्र
संग्रहक अनेक गजलमे ‘अनचिन्हार’ तखल्लुस अथवा आवर्ती पद जकाँ उपस्थित अछि। कवि स्वयंकेँ ओ लोकक स्थिति मे राखैत छथि जे सार्वजनिक भाषण देलाक बाद व्यवहारमे सुविधा-केन्द्रित होइत अछि, अपन भीतर विरोधी स्वर सुनैत अछि आ अपूर्ण स्वीकृतिक अनुभव करैत अछि। एहि आत्म-सन्देहसँ व्यंग्य पूर्णतः बाहरी आरोप नहि रहैत। मिथिलाक सार्वजनिक नैतिकतापर प्रहार करैत कवि अपन रचनाकार-पहचानकेँ सेहो प्रश्नक घेरामे रखैत छथि।
शिल्पक स्तरपर ई आत्मविनोद संग्रहक प्रबल पक्ष अछि। पारम्परिक मकतामे तखल्लुसक गौरवक सम्भावना रहैत अछि; एतय तखल्लुस कखनहुँ असफलता, अनिश्चितता अथवा आत्मपरिहासक संकेत बनैत अछि। एहि स्वभावमे मिथिलाक मौखिक परिहासक परम्परासँ आधुनिक आलोचनात्मक व्यक्तित्वक संवाद देखल जा सकैत अछि।
तथापि आत्मसन्देहक आवृत्ति एकटा निश्चित मुद्रा सेहो बनि सकैत अछि। कवि जखन स्वयंकेँ लगातार असुविधाग्रस्त घोषित करैत छथि, तखन पाठककेँ पूछबाक अधिकार अछि जे वैयक्तिक आत्मालोचना कतऽ विशिष्ट जीवनानुभव बनैत अछि आ कतऽ सामान्य कथन। एहि भेदक पहचान आलोचनाक निष्पक्षता लेल आवश्यक अछि।
मैथिली गजल : परम्परा आ परिवर्तनक तुलनात्मक अवलोकन
विदेहमे उपलब्ध ‘मैथिलीक प्रतिनिधि गजल’क परिचय मैथिली गजलक इतिहासकेँ बीसम शताब्दीक आरम्भसँ वर्तमानधरि देखबाक आधार दैत अछि। एहि अभिलेखीय परम्परामे पं० जीवन झाकेँ आरम्भिक प्रलेखित नामक रूपमे राखल गेल अछि; कविवर सीताराम झा, काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’, जगदीशचन्द्र ठाकुर ‘अनिल’, योगानन्द हीरा आ अन्य रचनाकारक प्रयोगक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। एहि अनुक्रमकेँ एकरेखीय प्रगतिक विजयगाथा नहि बुझबाक चाही; विभिन्न समयमे गजल पद, गीत, शेर, लय आ छन्दबोधक अलग-अलग संगति विकसित भेल होयब सम्भव अछि।
पुरान चरणमे अरबी-फारसी छन्दक ग्रहणक प्रश्न आ मैथिली उच्चारणक अनुरूपता प्राथमिक समस्या रहैत अछि। उत्तरवर्ती चरणमे औपचारिक शुद्धता बनाम लोकगम्यता, गीत-सदृश पंक्ति बनाम शेरक स्वतन्त्रता आ रचनात्मक स्वतंत्रता बनाम छन्दक नियम विषयक विवाद अधिक स्पष्ट होइत अछि। विदेहक ई-साहित्यिक सार्वजनिक क्षेत्र एहि विवादकेँ लेख, प्रतिक्रिया, गजलक प्रकाशन आ छन्द-विवेचनक रूपमे विस्तार देलक। अनचिन्हारक ‘मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास’, ‘संदर्भ सहित’ आ संबंधित अध्ययन-विषयक रचना एहि बहसक अभिलेखीय निशानी अछि।
‘अनचिन्हार आखर’सँ ‘जंघाजोड़ी’ आ तत्पश्चात ‘कुमारि इच्छा’धरि कविक स्वघोषित यात्रा रचनाविधानक परिवर्तनक रोचक उदाहरण अछि। पहिल संग्रहकेँ सरल वर्णिक अभ्यास, दोसरकेँ स्वयं चुनल मात्राक्रमक प्रयोग आ तेसरकेँ परम्परागत तथा प्रस्तावित बहरक संगमक रूपमे लेखक स्वयं देखैत छथि। एहि आत्मवर्णनकेँ हूबहू साहित्येतिहासक प्रमाण मानबाक बदला, एहि रचनाधाराक अन्तर्गत प्रवृत्ति मानब अपेक्षित अछि। ‘कुमारि इच्छा’क वास्तविक उपलब्धि एहि बातमे देखल जाइत अछि जे छन्दसिद्धान्तक झगड़ा भूख, वोट, गाम, स्त्री, नदी आ परिवारक जीवन्त भाषा सँ अलग नहि रहैत।
विदेह शोध-अभिलेखमे अनचिन्हारक ‘काफिया’, ‘काफिया आ बहर’, ‘मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग’, ‘बयानक सन्दर्भमे मैथिली गजल’ आ ‘नरेन्द्रजीक मैथिली आ हिन्दी गजलक तुलनात्मक विवेचना’ सन लेखनक प्रविष्टि ई सिद्ध करैत अछि जे गजलक औपचारिक प्रश्न हुनकर आलोचनात्मक कार्यक केन्द्रीय विषय रहल अछि। एहि सूचीमात्रक आधारपर प्रत्येक लेखक निष्कर्षक समर्थन करब समुचित नहि; तथापि एहि लेखन-क्रमसँ ‘कुमारि इच्छा’क भूमिकाकेँ लेखकक दीर्घ आलोचनात्मक जिज्ञासाक हिस्सा मानबाक कारण भेटैत अछि।
लोकधुन, निर्बन्ध कविता आ गजलक अन्तर
गीत आ गजलक अन्तर्विरोधकेँ प्रायः सरल विधा-विभाजनसँ बुझाओल जाइत अछि, मुदा मैथिली साहित्यक बहुविध वाचिक परम्परा एहन कठोर विभाजन स्वीकार नहि करैत। लोकधुनमे आधारित रचना गजल होयबाक सम्भावना नहि खोइबैत, जँ मतला, काफिया-रदीफ, शेरक सम्बन्ध आ घोषित बहरक आवश्यक अनुशासन सँ ओकर संवाद बनल रहय। ‘राम हरे’ आ लोकधुन-आधारित राजनीतिक गजल एहि सम्भावनाक रोचक दृष्टान्त अछि।
अनचिन्हारक रचना ईहो देखबैत अछि जे व्यंग्यक विषय काव्यविधाक एकान्त परिभाषा तय नहि करैत अछि। भूख, बेरोजगारी अथवा सत्ता-विरोधपर दोहा, गीत, मुक्तक आ गजल सभ लिखल जा सकैत अछि। गजल बनबाक निर्णय विषय नहि, संरचना आ वाचिक अर्थनिर्माण पर निर्भर अछि। एही कारण रदीफक मात्र उपस्थिति अथवा पाँतिक समान लम्बाइ पर्याप्त कसौटी नहि; काफियाक ध्वनि, बहरक सुसंगति आ शेरक अर्थगत स्वायत्तता सम्मिलित रूपसँ विवेचनीय अछि।
विधाक शुद्धताक आग्रह उपयोगी तखन बनैत अछि जखन ओ नव प्रयोगकेँ सम्भावना दैत अछि। जँ नियम केवल बहिष्कारक साधन बनय, तँ साहित्यिक विकास बाधित होइ। एहि संग्रहक द्वन्द्व ई अछि जे कवि एक दिस कठोर अरूजी अनुशासन चाहैत छथि, दोसर दिस मैथिली लेल नओ बहर प्रस्तावित करैत छथि। विरोधाभास जकाँ प्रतीत होइत एहि दूनू आग्रहमे सृजनात्मक अवसर अछि : परम्परा मानक दे, भाषा ओकर पुनर्गठन करय।
अर्थ-संयम, पुनरावृत्ति आ काव्यात्मक जोखिम
कविक प्रबल रचना सभमे एकटा भौतिक वस्तु व्यापक नैतिक सङ्कट खोलैत अछि—पेट, माँड़-नोन, पीपर, गीजर, पैकार, सिंदूर। ई ठोस शब्द अमूर्त उपदेशक स्थानपर दृश्य बनबैत अछि। विशेषतः अमीर-गरीबक ‘दिक्कत’क तुलनाक सघनता, कनियाँक भूख आ सोहरक टकराहट तथा खेतक उपजक अपहरण गजलकेँ स्मृतिमे टिकबैत अछि।
कम प्रभावी स्थल ओ अछि जतय सामान्यीकरणक आवृत्ति पर्याप्त प्रतिरोध बिना अपन निष्कर्ष सुना दैत अछि। सरकारक भ्रष्ट होयब, नेता झूठ बजैत रहब, समाजमे पाखण्ड रहब अथवा दोस्तीक विखण्डन—ई सभ अनुभव सत्य होयब सम्भव अछि; मुदा कविता तखन बेसी गहिर होइत अछि जखन सामान्य कथनक स्थानपर अप्रत्याशित घटना, बिंब वा मानवीय विरोधाभास उपस्थित होइ। संग्रहमे एहन सफल बिंब अछि, किन्तु सभ गजल एकहि स्तरक सघनता प्राप्त नहि करैत।
बहरक अन्तमे टिप्पणीक ऐतिहासिक उपयोगिता निर्विवाद अछि। मुदा जे पाठक शुद्ध काव्यानुभव चाहैत छथि, हुनका रचनाक तुरन्त बाद तकनीकी व्याख्या संगीतात्मक तन्मयतासँ बाहर निकालि सकैत अछि। भविष्यक सम्पादनमे काव्य-पाठ आ छन्द-परिशिष्ट अलग कएल जाय तँ दूनू लक्ष्य अधिक स्पष्ट भऽ सकैत अछि। ई आलोचना मूल संस्करणक मूल्य घटबैत नहि; ओकर शैक्षणिक आ सौन्दर्यात्मक उपयोगक भिन्नता देखबैत अछि।
लैंगिक प्रतिमानक उपलब्धि आ सीमा
संग्रहमे ‘कनियाँ’, ‘बेटी’, ‘सासुर’, ‘नैहर’, ‘सिंदूर’ आदि संकेत स्त्रीजीवनक असमानताकेँ दृश्य बनबैत अछि। भूख आ उत्सवक भिन्नता स्त्रीक अदृश्य श्रम पर तीक्ष्ण प्रश्न अछि। विवाहक संकेत सँ ‘कुमारि इच्छा’क सम्बन्ध स्त्रीकेँ केवल पुरुषक इच्छा-वस्तु बनयबाक बदला सामाजिक रीति आ अपूर्ण आकांक्षाक जटिल क्षेत्रमे प्रवेश करबैत अछि।
तइयो अधिकतर गजल बाहरी द्रष्टाक कथनमे लिखल अछि। स्त्री स्वयं अपन भाषामे दीर्घ प्रतिवाद रखैत नहि देखाइत। एहि कमीकेँ प्रत्येक गजलक दोष बनायब सम्भव नहि, किएक तँ संग्रह सामाजिक व्यंग्यक व्यापक परियोजना अछि; मुदा शीर्षकक स्त्रीलिंग रूपकक कारण स्त्रीक आवाज कतेक स्वतन्त्र रूपे उपस्थित अछि से विचारणीय अछि। स्त्री-अनुभवक नामपर कएल करुणा आ स्त्रीक आत्मनिर्णायक वाणी एक वस्तु नहि—एहि फरकसँ मूल्यांकन अधिक न्यायपूर्ण बनैत अछि।
साहित्येतिहासमे संग्रहक स्थान
‘कुमारि इच्छा’ मैथिली गजलकेँ नव-छन्दीय प्रयोगक घोषणापत्र आ सामाजिक आलोचनाक लघु-अभिलेख, दूनू रूपमे पढ़बाक आमन्त्रण दैत अछि। लेखक अपन भूमिका द्वारा अनुशासित शिल्पक आग्रह रखैत छथि; रचना द्वारा लोकवाणी, व्यंग्य आ काव्य-संक्षेपक शक्ति जँचबैत छथि। एहि कारण ई पोथी निजी भावुकता सँ बेसी सार्वजनिक जीवनक विसंगतिक काव्य-साक्ष्य बनैत अछि।
मैथिली साहित्येतिहासमे यकर महत्त्व ‘पहिल’ अथवा ‘सर्वश्रेष्ठ’ सन अपरीक्षित विशेषणसँ तय नहि होयत। वास्तविक महत्त्व एहि विशिष्ट संगममे अछि : एकहि संग्रहमे सयटा गजल, विस्तृत शिल्प-विवेचन, नओ नामकरण, लोकधुन-उपयोग, आत्मव्यंग्य, वर्गीय आलोचना आ पाठकक निर्णायक भूमिकाक स्वीकार। एहि गुणक कारण पोथी अध्ययनयोग्य अछि; ओकर छन्दकीय घोषणाक स्वतंत्र परीक्षण भविष्यक शोधक विषय बनी रहत।
निष्कर्ष
‘कुमारि इच्छा’क सबसँ सार्थक पाठ एहि निष्कर्ष धरि पहुँचैत अछि जे कविता मात्र छन्दक विजय नहि आ मात्र सामाजिक नारा सेहो नहि। कविक छन्द-परिश्रम अनगढ़ अनुभवकेँ लय दैत अछि; वास्तविक भूख, टूटैत सम्बन्ध, स्त्रीक पीड़ा, राजनीतिक स्वांग आ बाजारक असमानता ओहि लयकेँ अर्थ दैत अछि। दुर्जेय सौन्दर्य तखने जन्मैत अछि जखन दूनू पक्ष परस्पर अवलम्बित होइत अछि।
शीर्षकक ‘कुमारि’ किछु इच्छा अपूर्ण रहबाक स्वीकृति सेहो अछि आ ओ सामाजिक स्थितिक प्रतिरोध सेहो, जाहिमे लोकक मूल अधिकार अपूर्ण छोड़ल जाइत अछि। गरीबी आ अमीरीक अलग-अलग ‘दिक्कत’सँ आरम्भ कएल तुलना एहि शीर्षककेँ सामाजिक दर्शनक स्तर धरि लऽ जाइत अछि। अन्तिम गजलक लोक-विहीन संसारक बिंब संग पढ़ला पर ई स्पष्ट होइत अछि जे संग्रहक आन्तरिक प्रश्न केवल ‘इच्छा किएक अपूर्ण अछि’ नहि, ‘ओकरा पूर्ण करबाक सामाजिक शर्त ककर हाथमे अछि’ सेहो अछि।
एहि पोथीक उपलब्धि दृढ़ गेयता, लोकभाषिक तीखापन, तकनीकी आत्मसजगता आ सामाजिक प्रश्नक संक्षेपमे अछि; सीमा असमान काव्यगुण, पुनरावृत्त व्यंग्य, बहरक छूट-संबन्धी अनिश्चितता आ स्त्रीक स्वतन्त्र स्वरक अपेक्षाकृत कम उपस्थितिमे अछि। गुण-दोषक एहि संयुक्त विवेचनसँ ‘कुमारि इच्छा’ आधुनिक मैथिली गजलक एकटा बहसउत्पादक, शोधोपयोगी आ सर्जनात्मक रूपसँ महत्त्वपूर्ण संग्रहक रूपमे उभरैत अछि।
सन्दर्भसूची
मूल पाठ आ विदेहमे सूचीबद्ध ग्रन्थ
• अनचिन्हार, आशीष। कुमारि इच्छा। गजल-संग्रह। विदेह ई-पोथी संग्रह। मूल रचनाक आधार-पाठ।
• अनचिन्हार, आशीष। अनचिन्हार आखर। गजल, रुबाइ आ कताक संग्रह। श्रुति प्रकाशन, २०११; विदेह पोथी-सूचीमे अभिलिखित।
• अनचिन्हार, आशीष। जंघाजोड़ी। गजल-संग्रह। विदेह ई-पोथी संग्रह।
• अनचिन्हार, आशीष। मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास। विदेह ई-पोथी संग्रह।
• अनचिन्हार, आशीष। संदर्भ सहित। गजल-आलोचना। विदेह ई-पोथी संग्रह।
• अनचिन्हार, आशीष। शब्द-अर्थ-शक्ति। गजल-आलोचनासँ सम्बन्धित कृति। विदेह ई-पोथी संग्रह।
• ठाकुर, गजेन्द्र आ अनचिन्हार, आशीष (सह-सम्पादक)। मैथिली गजल : आगमन ओ प्रस्थान बिन्दु। विदेह पोथी-संग्रहमे उल्लिखित आलोचनात्मक संकलन।
• ठाकुर, गजेन्द्र आ अनचिन्हार, आशीष (सह-सम्पादक)। मैथिलीक प्रतिनिधि गजल : १९०५ सँ २०२२ धरि। विदेह पोथी-संग्रहमे उल्लिखित प्रतिनिधि संकलन।
विदेहक शोध-अभिलेख आ समालोचनात्मक सामग्री
• अनचिन्हार, आशीष। काफिया। विदेह, शोध-अभिलेख, २०१२।
• अनचिन्हार, आशीष। काफिया आ बहर। विदेह, शोध-अभिलेख, २०१२।
• अनचिन्हार, आशीष। मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग। विदेह, अङ्क १६५, २०१४।
• अनचिन्हार, आशीष। मैथिली काव्यशास्त्रमे झारू छंदक अवधारणा : स्वरूप आ तत्व निर्धारण। विदेह, अङ्क १५७, २०१४।
• अनचिन्हार, आशीष। बयानक सन्दर्भमे मैथिली गजल। विदेह, अङ्क २५१, २०१८।
• अनचिन्हार, आशीष। नरेन्द्रजीक मैथिली आ हिन्दी गजलक तुलनात्मक विवेचना। विदेह, अङ्क २५२, २०१८।
• अनचिन्हार, आशीष। दुष्यंत कुमारक गजलक मिजाज सन गजल मैथिलीमे कहिया लीखल जेतै। विदेह, अङ्क ३०७, २०२०।
• विदेह। ‘विदेह पोथी-संग्रह’। https://videha-ejournal.github.io/videha/pothi.htm
• विदेह। ‘विदेह शोध-सूची’। https://videha-ejournal.github.io/videha/research/index.html
• विदेह। ‘विदेह शोध-लेख : शोध-अभिलेख’। https://videha-ejournal.github.io/videha/research/videha-scholar-research-book.html
• विदेह। ‘आशीष अनचिन्हारक गजल-लेखन आ आलोचनाक परिचयात्मक विवेचन’। https://videha-ejournal.github.io/videha/new_page_56.htm
खण्ड ३
गजलशास्त्र : व्याकरण, विमर्श आ समालोचना
मैथिली साहित्यक पुनर्पाठ
