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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

VIDEHA · प्रथम मैथिली पाक्षिक eJournal

शब्द-अर्थ-शक्ति

नित नवल आशीष अनचिन्हार · Videha अंक ४५२ · 15 October 2026

लेखक: गजेन्द्र ठाकुर | शोध-आलेख

गजल-आलोचनाक रूपशास्त्र, भाषा आ इतिहास

सारांश

आशीष अनचिन्हारक ‘शब्द-अर्थ-शक्ति’ आधुनिक मैथिली गजलक स्वरूप, छन्दानुशासन, भाषिक स्वायत्तता आ साहित्येतिहासपर केन्द्रित आलोचनात्मक हस्तक्षेप अछि। एकर खास विशेषता ई जे लेखक गजलक लोकप्रियता अथवा रचनाकारक प्रतिष्ठाकेँ मूल्यनिर्णयक पर्याप्त आधार नहि मानि, बहर, काफिया, रदीफ, शेरक विन्यास आ भाषिक स्वाभाविकताक ठोस कसौटी प्रस्तुत करैत छथि। पोथीक पहिल खण्डमे विशिष्ट गजल-संग्रह आ काव्यप्रयोगक समीक्षा अछि; दोसर खण्डमे सम्पादन, साहित्येतिहास, गजलक सामाजिक चेतना, अभिव्यक्तिक आधुनिकता आ विधागत नामकरणसम्बन्धी विवादक पुनर्परीक्षण कएल गेल अछि। एतऽ एकर प्रमुख तर्क, आलोचनात्मक पद्धति, समकालीन मैथिली साहित्यसँ सम्बन्ध आ अन्तर्विरोधक विवेचन कएल गेल अछि। अध्ययन देखबैत अछि जे पुस्तक गजलकेँ स्वतन्त्र काव्यविधाक रूपमे स्थापित करबाक एकटा निर्भीक प्रयत्न अछि, यद्यपि बहरकेँ निर्णायक कसौटी बनएबाक क्रममे साहित्यिक बहुलता, भाव-सौन्दर्य आ लोकप्रचलित छन्दप्रयोगक प्रति लेखकक व्यवहार सर्वदा समान उदार नहि रहैत अछि। एहने द्वन्द्व पोथीकेँ विमर्शक केन्द्र बनबैत अछि।

मुख्य शब्द : मैथिली गजल, आशीष अनचिन्हार, शब्द-अर्थ-शक्ति, बहर, काफिया, रदीफ, गजल-आलोचना, विधागत अस्मिता, साहित्येतिहास, विदेह।

प्रस्तावना : गजलक आलोचना की केवल प्रशंसा?

मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक परम्परामे गीत, कविता, कथा आ उपन्यासक तुलनामे गजलक विधागत परीक्षणक प्रश्न प्रायः विस्थापित रहल अछि। ‘शब्द-अर्थ-शक्ति’ एहि विस्थापनकेँ अपने आलोचनाक विषय बनबैत अछि। लेखक मानैत छथि जे गजलक विषयवस्तु नीक होयब, सामाजिक सन्देश होयब अथवा रचनाकारक प्रगतिशील कहल जायब, मात्र एतेकसँ रचना गजल नहि बनि जाइत अछि। काव्यात्मक प्रभाव आ विधागत पहचान भिन्न, मुदा परस्पर सम्बन्धित, स्तर छथि। एहि भेदकेँ स्थापित करब लेखकक सम्पूर्ण आलोचनात्मक उद्योगक मूल प्रेरणा अछि।

एहि प्रसंगमे पुस्तकक शीर्षक सेहो अर्थवान अछि। शब्द, अर्थ आ शक्ति—ई तीनू शब्द काव्यक भाषिक संघटन, तकर बोध आ तकर सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावक एकटा सम्भावित त्रिकोण बनबैत अछि। तथापि पुस्तकक वास्तविक विवेचनमे ‘शब्द’क ध्वन्यात्मक अनुशासन आ ‘शक्ति’क रूपमे तर्कपूर्ण प्रतिवाद बेसी प्रधान अछि; अर्थक बहुस्तरीय सौन्दर्यात्मक व्याख्या अपेक्षाकृत कम विस्तृत भेटैत अछि। शीर्षकक व्यापकता आ आलोचनाक केन्द्रीय छन्दशास्त्रीय आग्रहक बीचक ई फाँक पाठककेँ लगातार सोचबाक अवसर दैत अछि।

लेखकक आत्मपरिचय आ भूमिका एकटा सक्रिय रचनाकार-आलोचकक दृष्टि प्रस्तुत करैत अछि। ओ अपन पुस्तककेँ स्वतन्त्र गजल-आलोचनाक आरम्भिक महत्त्वपूर्ण प्रयासक रूपमे देखैत छथि। ई लेखकक आत्ममूल्यांकन अछि; एकरा स्वतन्त्र साहित्येतिहासक अन्तिम निर्णय नहि मानल जा सकैत अछि। महत्त्वपूर्ण ई अछि जे पोथी आलोचनाकेँ रचनाकारक प्रशस्तिपत्र नहि, सार्वजनिक परीक्षणक क्रिया बनबैत अछि।

कृतिक रूपविन्यास आ आलोचनात्मक परियोजना

पोथी दू खण्डमे विभक्त अछि। पहिल खण्डक दस शीर्षक मुख्यतः संग्रह-विशेष, कवि-विशेष आ शेर-विशेषक आलोचनासँ बनल अछि—‘हारल युद्धक साक्ष्य’, ‘पहरा-अधपहरा’, ‘सूर्योदयसँ पहिने सूर्यास्त’, ‘छद्म गजल’, ‘कलंकित चान’, ‘मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग’, ‘चिकनी माटिमे उपजल नागफेनी’, ‘नरेन्द्रजीक मैथिली आ हिन्दी गजलक तुलनात्मक विवेचना’ तथा दू लघु आलेख ‘शेर जे सभ दिन शेर रहतै’। दोसर खण्डमे आठ निबन्ध छन्दबोध, सम्पादकीय उत्तरदायित्व, वाद-विवाद, इतिहास, सामाजिक ‘मिजाज’ आ गीत-संगीतक सम्बन्धक दिशामे विमर्श विस्तृत करैत अछि। अन्तमे फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’ प्रसंगक परिशिष्ट अछि।

ई विन्यास साधारण संग्रहण नहि अछि। पहिल खण्ड लेखकक आलोचनात्मक औजारकेँ उदाहरणक सामने राखैत अछि; दोसर खण्ड ओहि औजारक सामाजिक इतिहास आ संस्थागत परिणाम पूछैत अछि। एहि कारणे पोथीकेँ केवल ‘गजलक समीक्षा-संग्रह’ कहब एकर अध्ययनक्षेत्रकेँ छोट करब हएत। ई विधा-निर्माणक विवादग्रन्थ, छन्दशास्त्रीय पक्षसमर्थन आ साहित्यिक सार्वजनिकताक दस्तावेज—तीनू रूपमे पठनीय अछि।

संरचनाक किछु कमजोरी सेहो अछि। विभिन्न समयमे लिखल आलेख सभमे बहरक अनिवार्यता आ आलोचकक कर्तव्य विषयक तर्क पुनः-पुनः उपस्थित अछि। एहन पुनरावृत्ति विवादक ऐतिहासिक निरन्तरता तँ चिन्हबैत अछि, मुदा एकीकृत पुस्तकमे वैचारिक क्रमक जगह कखनो-कखनो तात्कालिक प्रतिवादक तीव्रता लेबैत अछि। एतए सम्पादकीय संक्षेप अथवा विषयानुसार अन्तःसन्दर्भक व्यवस्था पुस्तकक सुगमता बढ़ा सकित छल।

मूल आलोचनात्मक प्रतिज्ञा : बहर, काफिया, रदीफ आ शेर

गजलक रूपगत पहचान लेखकक विचारमे सुस्पष्ट अछि। प्रत्येक शेरक पाँतिक मध्य बहरक अनुशासन, गजलक संरचनामे काफियाक ध्वनिसाम्य, आ रदीफक नियमित पुनरावृत्ति—ई सभ नाम मात्र नहि, परीक्षणयोग्य सम्बन्ध छथि। लेखक कतिपय समीक्षामे पाँतिक ह्रस्व-दीर्घ विन्यास अंकित कऽ अपन निर्णयक समर्थन करैत छथि। ई पद्धति आलोचनाकेँ लेखकक रुचिसँ ऊपर उठाकऽ सार्वजनिक जाँचक योग्य बनबैत अछि। काव्यकेँ सुनबाक, गेबाक आ पढ़बाक विधागत भेद स्पष्ट करबाक लेल ई आग्रह उपयोगी अछि।

एहि कसौटीक तार्किक लाभ ई जे सामाजिक चेतना, प्रेम, व्यंग्य, राजनीतिक प्रतिरोध अथवा लोकभाषा—कोनो विषय वस्तुगत गुण अपन आपमे गजलक संरचनागत प्रमाण नहि भऽ सकैत अछि। तहिना गेयता मात्र बहरक पर्याय नहि; संगीतक धुन आ छन्दक क्रमबीच भेद अछि। पुस्तकक अनेक निबन्ध एही भेदपर टिकैत अछि।

मुदा एतऽ एकटा जटिलता उठैत अछि। विधाक परिभाषा इतिहासमे अपरिवर्तनीय नियमसभक यान्त्रिक सूची नहि होइत अछि। भिन्न भाषामे उच्चारण, मात्रा-बोध, यति, संयोगाक्षर आ लघु-दीर्घक व्यवहार अलग होइत अछि। लेखक स्वयं कतिपय स्थानपर भाषाक प्रकृति अनुसार छूट स्वीकार करैत छथि। तें गजलक शास्त्रीय अनुशासनक पक्ष लेबैत काल ई जरूरी अछि जे ध्वन्यात्मक भिन्नताकेँ अनियमितता कहबाक पूर्व उच्चारणक सामाजिक व्यवहार, शाइरक अभिप्रेत पाठ आ सम्पूर्ण रचनाक आन्तरिक एकरूपता जाँचल जाए। पुस्तक ई प्रश्न उठबैत अछि, मुदा एकर सम्भावित उत्तरकेँ सर्वत्र समान रूपेँ विस्तार नहि दैत अछि।

‘कविता नीक’ आ ‘गजल नीक’—ई दूनू निर्णय एक-दोसरक विरोधी नहि अछि। कोनो रचना गजलक स्वीकृत संरचनाक बाहर रहितो प्रभावी कविता भऽ सकैत अछि। एहि भेदपर लेखकक किछु टिप्पणी मूल्यवान अछि; कठोर पदावलीक कारण ओकर सन्तुलित अर्थ कखनो आच्छादित भऽ जाइत अछि।

पाठविश्लेषण : ‘हारल युद्धक साक्ष्य’

पहिल समीक्षा तारानन्द वियोगीक ‘अपन युद्धक साक्ष्य’क आधारपर गजल-आलोचनाक आवश्यकता स्पष्ट करैत अछि। लेखक संग्रहक चालीस रचनाक प्रसंगमे भाषा, विचार आ छन्दविधानकेँ अलग-अलग परखैत छथि। एहि विभाजनसँ ई लाभ होइत अछि जे एके संग्रहक आलोचना एकांगी नहि बनैत अछि। विचारक धरातलपर लेखक सामाजिक-राजनीतिक चेतनाक कतिपय सकारात्मक संकेत मानैत छथि, जखनकि भाषिक स्तरपर संस्कृतनिष्ठ अथवा अप्रचलित पदावलीक अधिकतापर आपत्ति करैत छथि।

रचनाक छन्दपरीक्षणमे लेखक बहरक अभाव आ काफियाक असंगतिक उदाहरण चिन्हैत छथि। अपन तर्क पुष्ट करबाक लेल ओ गजलक मूल पारिभाषिक अवयव बुझबैत छथि। आलोचनाक ई शिक्षणात्मक स्वर महत्वपूर्ण अछि: पाठककेँ मात्र फैसला नहि, फैसला धरि पहुँचबाक विधि सेहो भेटैत अछि।

तथापि एहि समीक्षाक भाषिक मानदण्डपर प्रतिप्रश्न सम्भव अछि। ‘जनभाषा’क निकटता साहित्यक एकटा महत्त्वपूर्ण गुण भऽ सकैत अछि, मुदा कठिन शब्द सर्वदा असफल काव्यक सूचक नहि होइत अछि। प्रसंग, ध्वनि, बिम्बात्मक आवश्यकता आ भावनात्मक संरचना सेहो शब्दचयनक उचितता निर्धारित करैत अछि। एकर प्रमाण सहित व्यापक परीक्षण लेखकक भाषिक आलोचनाकेँ आओर सुदृढ़ करितै।

पाठविश्लेषण : ‘पहरा-अधपहरा’

‘पहरा-अधपहरा’ बाबा बैद्यनाथक ‘पहरा इमानपर’क समीक्षा अछि। पुस्तक एतऽ संग्रहक ऐतिहासिक महत्त्व, रचनाक छन्दविन्यास, काफिया-रदीफ, भाषिक लोकधर्मिता आ भाव-पक्षकेँ पृथक करैत अछि। प्रारम्भिक प्रकाशन-परिस्थिति आ आलोचनात्मक उपेक्षाक प्रसंग उठाकऽ लेखक कहैत छथि जे नूतन विधाक विकासमे रचनाकारसभकेँ एक-दोसरक कृति गंभीरतापूर्वक पढ़बाक चाही। एहि रूपमे समीक्षा केवल कृति-मूल्यांकन नहि, साहित्यिक समुदाय गढ़बाक आग्रह अछि।

पाठकमे लेखकक विश्वासक विशेष अर्थ अछि। काफियाक त्रुटि बतबैत काल ओ स्वयंसिद्ध मानक थोपबाक बदला ध्वनिसाम्यक उदाहरणसँ विचार समझबैत छथि। दोसर दिस संग्रहक बोलचालक मैथिली आ समकालीन जीवन-सम्बद्ध शेरसभक उपयोगिताकेँ ओ सराहैत छथि। एहि समीक्षामे रूप आ अर्थक बीच सामान्यतः नीक सन्तुलन अछि।

संग्रहक सभ गजलकेँ छन्दशास्त्रीय कठघरामे राखलाक बादो ओकर लोकानुभवक महत्त्व सुरक्षित रहैत अछि। ई पुस्तकक मूल सिद्धान्तक रचनात्मक सम्भावना देखबैत अछि : छन्दगत असहमति साहित्यिक मूल्यक सम्पूर्ण निषेध नहि होयबाक चाही।

पाठविश्लेषण : ‘सूर्योदयसँ पहिने सूर्यास्त’

राजेन्द्र विमलक ‘सूर्यास्तसँ पहिने’क समीक्षा आधुनिक मैथिली गजलक साहित्येतिहासमे ‘पहिल’ होयबाक घोषणाक आलोचना करैत अछि। लेखक रचनाक संख्या आ संकलनक प्रकृतिपर विवाद उठबैत छथि तथा रवीन्द्रनाथ ठाकुरक ‘लेखनी एक रंग अनेक’सँ तुलना करैत छथि। एतऽ कृतिक मूल्यबोधक समानान्तर प्रकाशनक तथ्य, सम्पादकीय विश्वसनीयता आ साहित्यिक दावाक प्रमाणिकता प्रश्न बनि उठैत अछि।

एहि आलेखक खास पक्ष ई जे प्रतिवादक भीतर दोसर पक्षक स्पष्टीकरण सेहो चर्चित अछि। मिश्रित गजल-कविता-संकलन आ पूर्णतः गजलकेँ केन्द्र बनौने संग्रहक बीच भेद करबाक सम्भावना स्वीकृत अछि। शोधदृष्टिसँ देखल जाए तँ ‘पहिल’, ‘प्रथम पूर्ण संग्रह’ आ ‘नेपालमे प्रकाशित प्रथम’—एहि सभ संज्ञाक स्पष्ट परिभाषा आवश्यक अछि। बिना परिभाषाक प्राथमिकता-विवाद साहित्येतिहाससँ अधिक प्रतिष्ठा-विवाद बनि सकैत अछि।

अन्ततः एहि पाठसँ ई शिक्षा निकलैत अछि जे साहित्येतिहासमे संख्या, संस्करण, प्रकाशन-प्रदेश आ संग्रहक विधागत स्वरूपक स्पष्ट सूची तैयार करबाक चाही। लेखक विवाद उपस्थित करैत छथि; भविष्यक शोध लेल व्यवस्थित ग्रन्थसूची तैयार करबाक काज एतऽ खुलल रहैत अछि।

पाठविश्लेषण : ‘छद्म गजल’ आ ‘कलंकित चान’

‘छद्म गजल’मे गंगेश गुंजनक काव्यप्रयोगक प्रसंगमे गजल आ गजल-सन रचनाक अन्तरकेँ प्रमुख बनाओल गेल अछि। ‘स्वाधीन लय’ आ छन्दबद्ध संरचनाक सम्बन्धपर लेखकक प्रश्न सैद्धान्तिक अछि : जँ कोनो रचना छन्दबद्ध कहल जाए, तँ ओकर लय-विन्यासक प्रमाण प्रस्तुत होयबाक चाही। ई माँग प्रासंगिक अछि, विशेषतः जखन विधाक नाम ओकर शिल्पगत अपेक्षा सेहो जनबैत हो।

एहि तर्कक सीमा ओतए प्रकट होइत अछि जतऽ प्रयोगधर्मी कविताकेँ केवल विफल गजल मानि लेल जाइत अछि। सम्भव अछि जे रचनाकार विधाक सीमामे नव संभावना ताकैत होथि; तखन आलोचककेँ दू भिन्न प्रश्न पूछबाक चाही—रचना पारम्परिक गजल अछि की नहि, आ रचना स्वतन्त्र कविता अथवा रूपान्तरित काव्य-प्रयोगक रूपमे प्रभावी अछि की नहि। पहिल प्रश्नक नकारात्मक उत्तर दोसरो प्रश्नकेँ समाप्त नहि करैत अछि।

‘कलंकित चान’ रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’क ‘अन्हरियाक चान’क छन्दविधानक समीक्षा करैत अछि। लेखक मुक्त अथवा आजाद गजलक दावाक परीक्षण काफिया आ अन्य औपचारिक तत्त्वक आधारपर करैत छथि। एहि निबन्धमे एकटा महत्त्वपूर्ण असहमति अछि : जँ रचनाकार स्वयं पारम्परिक अनुशासन नहि अपनौने छथि, तँ ओहि रचनाकेँ शास्त्रीय गजल कहबाक प्रश्न अलग आ ओकर काव्यात्मक उपलब्धिक प्रश्न अलग रहबाक चाही। साहित्यिक निर्णयक कठोरता एहि दू स्तरक भेदसँ ही सार्थक बनैत अछि।

पाठविश्लेषण : ‘मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग’

ई आलेख मैथिली गजलमे छन्दनिर्माणक विभिन्न आरम्भिक प्रयासक विश्लेषण करैत अछि। लेखक वर्णिक, मात्रिक, बहर-आधारित आ गायनसम्बद्ध लयक बीचक अन्तरपर जोर दैत छथि। संगीतक स्वररचना आ छन्दक नियत अक्षर-मात्रा-विन्यास एक-दोसरसँ सम्बद्ध जरूर छथि, मुदा समानार्थी नहि—एहि तथ्यकेँ ओ बारम्बार स्पष्ट करैत छथि।

रचनाकारक नव छन्द गढ़बाक स्वतन्त्रता लेखक सम्पूर्ण रूपेँ अस्वीकार नहि करैत छथि; किन्तु नव छन्दक नियम, उदाहरण आ अनुवर्तन प्रस्तुत करबाक दायित्व आवश्यक मानैत छथि। एहि विचारमे विधागत अनुशासन आ नवोन्मेषक सम्भावित संवाद निहित अछि। नवीन नामक आविष्कार तखनहि साहित्येतिहासमे फलदायी होइत अछि जखन ओकर पुनर्पाठ आ परीक्षण सम्भव हो।

आलेखक ऐतिहासिक महत्त्व ईहो अछि जे लेखक एकटा काव्यरूपक प्रयोगकेँ अलग-थलग घटना नहि मानि, बौद्धिक बहसक क्रममे देखैत छथि। इएह आलोचना-पद्धति आगूक गजल-इतिहासविषयक निबन्धसभक आधार बनैत अछि।

पाठविश्लेषण : ‘चिकनी माटिमे उपजल नागफेनी’

रमेशक ‘नागफेनी’पर केन्द्रित ई निबन्ध पुस्तकक सबसँ रोचक अन्तर्विरोधसभमेसँ एक प्रस्तुत करैत अछि। लेखक प्रारम्भमे छन्दगत आधारपर संग्रहक गजलत्वपर सन्देह करैत छथि, मुदा ओकर भूमिका, वैचारिक दावे, भाषा आ चुनेल काव्य-पाँति सभपर विस्तारसँ विचार करैत छथि। एहि रूपमे रचनाकेँ गजल नहि मानबाक बावजूद साहित्यिक चर्चासँ बाहर नहि कएल गेल अछि।

विशेष रूपसँ लोकमैथिली शब्दावलीक सशक्त उपस्थिति लेखककेँ आकर्षित करैत अछि। सामाजिक यथार्थ, स्थानीय बिम्ब, शब्दक सहजता आ प्रतिरोधक स्वर—ई सभ गुण ओ स्वीकार करैत छथि। एहि कारणे ‘नागफेनी’क समीक्षा स्वयं साबित करैत अछि जे आलोचनाक व्यवहार बहरक विश्लेषणसँ व्यापक होयबाक चाही।

तथापि लेखक प्रगतिशीलताक नामपर छन्द-विरोधक दावाक तीव्र प्रतिवाद करैत छथि। दुष्यन्त कुमार, फैज आ अदम गोंडवीक उदाहरणसँ ओ एहि विचारकेँ खण्डित करबाक प्रयास करैत छथि जे सामाजिक प्रतिरोध लेल छन्दत्याग अनिवार्य अछि। एतऽ मूल प्रश्न आधुनिक विषयक नहि, आधुनिक विषयक काव्यरूपसँ सम्बन्धक अछि। पुस्तकक ई बहस मैथिली काव्य-आलोचनामे व्यापक तुलनात्मक अध्ययनक आधार बनि सकैत अछि।

पाठविश्लेषण : नरेन्द्रजीक द्विभाषिक गजल

‘नरेन्द्रजीक मैथिली आ हिन्दी गजलक तुलनात्मक विवेचना’ पुस्तकक एकटा व्यवस्थित तुलनात्मक प्रयत्न अछि। एके रचनाकारक दू भाषामे लिखल गजलकेँ बहर, काफिया, रदीफ, भाव, कथ्य आ भाषिक व्यवहारक धरातलपर परखबाक निर्णय साधारण द्विभाषिक तुलना नहि, एकटा उपयोगी अनुसन्धानी पद्धति अछि। एतऽ रचनाकारक प्रतिभा स्थिर रहितो भाषिक संसाधन आ छन्दपद्धतिक परिणाम केना बदलैत अछि, से देखबाक सम्भावना बनैत अछि।

लेखक मैथिली उच्चारणक विशेषता, ह्रस्व-दीर्घक व्यवहार आ तत्सम-तद्भव तथा बाहरी शब्दक स्वीकार्यताक प्रसंग उठबैत छथि। एके शब्द प्रत्येक भाषामे समान ध्वन्यात्मक भार नहि रखैत अछि; एहि कारणे भाषिक सन्दर्भक उपेक्षा करि कएल तकतीअ अविश्वसनीय भऽ सकैत अछि। ई समीक्षाक सबसँ महत्त्वपूर्ण सैद्धान्तिक निष्कर्ष अछि।

लेखक कथ्यक पुनरावृत्ति आ वैचारिक एकरेखीयतापर सेहो प्रश्न करैत छथि। एहिसँ स्पष्ट होइत अछि जे मात्र छन्द ठीक भेला पर गजल स्वतः उत्कृष्ट नहि भऽ जाइत अछि। भाषा, व्यंजना, बिम्ब, व्यंग्य आ अनुभूतिक विविधता सौन्दर्यात्मक मूल्यनिर्णयमे अनिवार्य छथि। लेखकक आलोचनात्मक व्यवहार एतऽ अपन घोषित रूपप्रधान आग्रहक अपेक्षाकृत अधिक जटिल बनैत अछि।

पाठविश्लेषण : ‘शेर जे सभ दिन शेर रहतै’

पहिल खण्डक दू लघु रचना छोट आकारक कारण मुख्य निबन्धसभक बीच विराम-जकाँ बुझा सकैत अछि। मुदा संग्रहक समग्र विन्यासमे एकर उपयोग अलग अछि। संग्रह-स्तरीय मूल्यांकनक बाद शेरकेँ स्वतन्त्र सौन्दर्यात्मक इकाइक रूपमे देखबाक आग्रह एतऽ अधिक स्पष्ट होइत अछि। गजलक विशेषता ईहो जे एकटा शेर अपन स्वायत्त अर्थ-संयोजन रखैत अछि; ओकर प्रभाव पूरा गजलक अनिवार्य कथासूत्रपर निर्भर नहि रहैत अछि।

ई सूक्ष्म पाठ-विधि काव्यक अन्विति, अप्रस्तुत-विधान, अर्थान्तर, स्मरणीयता आ ध्वनिक प्रश्नकेँ सामने अनैत अछि। एतऽ शोधक सम्भावना ई जे पुस्तकक बाकी कठोर छन्द-आलोचनाक संग एहि लघु शेर-अध्ययनकेँ जोड़ि गजलक ‘शिल्प’ आ ‘अर्थ’क सम्बन्धक अधिक व्यवस्थित सिद्धान्त तैयार कएल जा सकैत अछि।

दोसर खण्ड : आलोचना, सम्पादन आ साहित्यिक संस्था

‘मैथिली गजल आ अभट्ठाकारी’ आलोचनक दायित्वपर केन्द्रित निबन्ध अछि। एहिमे लेखक प्रश्न उठबैत छथि जे जँ साहित्यकार स्वयं अपन विधाक परीक्षण नहि करथि आ बाहरी आलोचककेँ अयोग्य सेहो मानथि, तँ नूतन विधाक विकास केना हएत। पुस्तकक एहि तर्कमे आलोचना सार्वजनिक ज्ञानक साझा श्रम बनैत अछि, निजी प्रतिद्वन्द्विताक साधन नहि।

‘अज्ञानी सम्पादकक फेरमे मरैत गजल’ एकटा गम्भीर प्रश्न सामने अनैत अछि : पत्रिकामे छपबाक क्रममे रचनाक शिल्पगत इकाइ बदलि देल गेल, अथवा गजलकेँ गीत कहि प्रकाशित कएल गेल, तँ सम्पादकीय हस्तक्षेप कतेक वैध अछि? लेखक योगानन्द हीराक रचनाक प्रसंगमे पाठक विश्वसनीयता आ सम्पादकीय उत्तरदायित्वक प्रश्न उठबैत छथि। एहि आरोपसभकेँ लेखकक प्रतिपादनक रूपमे पढ़बाक चाही; प्रत्येक सम्पादकक अभिप्रायपर स्वतन्त्र निर्णय लेल मूल प्रकाशनसभक पारस्परिक परीक्षण जरूरी होइत।

दूनू निबन्धक स्थायी योगदान ई जे साहित्यिक संस्थाकेँ रसास्वादनक बाहर नहि रखल गेल अछि। पाठनिर्माण, पाठपरिवर्तन, सम्पादन, वर्गीकरण आ प्रकाशन—ई सभ गजलक ग्रहणशीलताकेँ प्रभावित करैत अछि। समकालीन साहित्येतिहासमे ई संस्थागत संवेदनशीलता उल्लेखनीय अछि।

‘संशोधन केर मतलब विनाश नहि होइत अछि’ : वाद-विवादक आलोचनाशास्त्र

दोसर खण्डक विस्तृत निबन्ध ‘संशोधन केर मतलब विनाश नहि होइत अछि’ मैथिली गजलक शास्त्रीय नियमपर चलेल लम्बा साहित्यिक विवादक दस्तावेज अछि। लेखक अपन पूर्व लेख, सुरेन्द्रनाथक प्रतिवाद आ तकर उत्तरक क्रम प्रस्तुत करैत छथि। एहि बहसक माध्यमे साहित्यिक इतिहास, शाइरक उत्तरदायित्व, बहरक सीमा आ छन्दसमर्थक तथा छन्दविरोधी मतक टकराव स्पष्ट होइत अछि।

एहि विवादक उल्लेखनीय गुण प्रमाणक माँग अछि। लेखक अनुरोध करैत छथि जे कोनो कथनकेँ केवल वरिष्ठता अथवा ख्यातिक आधारपर स्वीकार नहि कएल जाय; उदाहरण देल जाय, बहर जाँचल जाय आ इतिहासक दावाक स्रोत प्रस्तुत कएल जाय। आलोचनाकेँ प्रतिवाद-सहिष्णु बनएबाक ई प्रवृत्ति शोधमूलक विवेकक निकट अछि।

मुदा आलोचनात्मक अनुशासनक दू रूप होइत अछि—तर्कक कठोरता आ सम्बोधनक संयम। एहि निबन्धमे प्रथम खूब प्रबल अछि, दोसर कखनो कम पड़ैत अछि। प्रतिद्वन्द्वी विचारक व्यक्ति-विशेषपर लक्षित व्यंग्य मूल प्रश्नकेँ धुँधला कऽ सकैत अछि। शोधपरम्परा लेल लेखकक प्रमाण-आग्रह ग्रहणीय अछि; व्यक्तिविशेषक नीयतपर अनिर्णीत आरोपक अपेक्षा तर्कक स्वतन्त्र परीक्षण अधिक फलदायी हएत।

‘बयानक सन्दर्भमे मैथिली गजल’ : अभिमत आ प्रमाणक दूरी

गजलक सम्भावना, ओकर रचनाभाषा, प्रेमक प्रकृति आ संगीतसँ सम्बन्ध विषयक पूर्ववर्ती कथनसभकेँ लेखक ऐतिहासिक बहसक क्रममे स्थापित करैत छथि। चर्चा व्यक्तिपरक मतसँ आरम्भ भए रूपगत उदाहरण धरि पहुँचैत अछि। ई निबन्ध देखबैत अछि जे कोनो साहित्यिक बयान तत्कालीन रचनाशीलतापर मनोवैज्ञानिक आ संस्थागत प्रभाव छोड़ि सकैत अछि।

विद्यापतिक प्रेम, उर्दू शाइरीक प्रेम आ मैथिली गजलक अभिव्यक्तिक तुलना लेखक लेल साहित्यिक वैधताक प्रश्न अछि। ओ मानैत छथि जे विषयक धार्मिक, लौकिक अथवा पारलौकिक नामकरण रचनाक मूल छन्दशास्त्रीय क्षमताकेँ निर्धारित नहि करैत अछि। एहि बिन्दुपर पोथी विधागत स्वतन्त्रताक पक्षमे ठाढ़ अछि।

अभिमतक इतिहास लिखबाक समय ई भेद महत्त्वपूर्ण अछि जे केओ की कहने छलाह, ओकर कथनक तत्कालीन अर्थ की छल, आ तकर वास्तविक प्रभावक प्रमाण की अछि। पुस्तक पहिल दू प्रश्नपर सजग अछि, मुदा तेसर प्रश्नक लेल बहुतेरे स्थानपर अनुभवजन्य दस्तावेजीकरणक गुंजाइश बचल अछि।

‘इश्क को दिल में दे जगह अकबर’ : ज्ञान आ संवेदना

जगदीशचन्द्र ठाकुर ‘अनिल’क प्रसंगवाला ई लघु आलेख एकटा सुन्दर विरोधाभास पकड़ैत अछि। छन्दशास्त्रविरोधी तर्कक समर्थनमे उद्धृत शेर स्वयं लयबद्ध संरचना रखि सकैत अछि। लेखक कहैत छथि जे ‘इल्म’ आ काव्यभावकेँ एक-दोसरक शत्रु बनएब अनुचित अछि। ज्ञान अभिव्यक्तिक उपकरण होइत अछि; ओकर उपस्थितिसँ स्वतः अनुभूति नष्ट नहि होइत अछि।

अनिलक शेरमे गजलक बन्धनसँ मुक्तिक अभिलाषा एकटा आन्तरिक व्यंग्य निर्माण करैत अछि—रचना बन्धनक विरुद्ध बोलैत अछि, मुदा अपन लयक भीतर। एहि अवलोकनसँ ‘नियम’केँ केवल निषेधात्मक आदेश नहि, सर्जनात्मक सम्भावनाक व्यवस्था मानबाक आधार भेटैत अछि।

एहू बातक संग ई जोड़ब आवश्यक अछि जे ज्ञान आ संवेदना परस्पर सहयोगी होइत अछि, मुदा समानार्थी नहि। नियमक अनुपालन काव्यक आवश्यक औजार भऽ सकैत अछि; प्रभावकारी शेर बनबाक लेल अर्थक ताजगी आ भाषिक जीवट सेहो आवश्यक अछि।

‘आधुनिक मैथिली गजलक संक्षिप्त आलोचनात्मक परिचय’ : इतिहासक रूपरेखा

दोसरो खण्डक विस्तृत ऐतिहासिक निबन्ध पुस्तकक केन्द्रीय आधारस्तम्भ अछि। लेखक आधुनिक मैथिली गजलक प्राचीन उदाहरण, बीसम शताब्दीक रचनाकार, बादक संग्रह, नव पीढ़ीक छन्दचेतना आ डिजिटल साहित्यिक प्रयासकेँ एकटा कथा-रेखामे जोड़ैत छथि। पं. जीवन झा, कविवर सीताराम झा, काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’, योगानन्द हीरा, जगदीशचन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ आ बादक अनेक नाम एहि परिचर्चामे आबैत छथि।

लेखक विशेष रूपसँ इतिहासक ओहि धारणाक प्रतिवाद करैत छथि जाहिसँ मैथिलीमे छन्दयुक्त गजल सम्भव नहि मानल जाइत छल। ओ आरम्भिक रचनाक बहर-क्रमक उदाहरण प्रस्तुत कऽ गजलक ऐतिहासिक अस्तित्वक दाबी करैत छथि। कृतिक भीतर उद्धृत रचना-साक्ष्य एहि दावाकेँ महत्व दैत अछि। तथापि ‘प्रथम’ अथवा ‘आरम्भ’क निर्धारण लेल समस्त आरम्भिक सामग्रीक संस्करणान्तर आ प्रकाशन-अभिलेख देखब अलग शोधक विषय अछि।

उक्त निबन्धमे दू प्रवाहक अवधारणा बारम्बार उभरैत अछि—छन्दविधान स्वीकार करनिहार रचनाकार आ ‘आजाद’ नामसँ छन्दमुक्ति चाहनिहार रचनाकार। ई विभाजन आलोचनात्मक बहस बुझबाक लेल उपयोगी अछि, मुदा साहित्यक वस्तुस्थिति केवल दू अनन्य खेमामे विभक्त नहि होइत अछि। कतेको रचनाकार गीत, कविता, लयबद्ध मुक्तरचना आ गजलक बीच आवागमन करैत छथि। एहि मध्यवर्ती काव्यभूमिकेँ देखनाइ साहित्येतिहासकेँ अधिक समावेशी बनबैत।

विदेह आ ‘अनचिन्हार आखर’सँ सम्बद्ध प्रकाशनगत उपक्रमक उल्लेख पुस्तकक विशिष्ट पक्ष अछि। एहि सामग्रीसँ ई स्पष्ट होइत अछि जे आधुनिक गजलक निर्माण पत्रिका, ऑनलाइन प्रकाशन, पाठकीय संवाद आ आलोचनात्मक प्रतिवादक संयुक्त क्षेत्रमे भेल। एहि कारणे डिजिटल माध्यम एतऽ केवल वितरणक सुविधा नहि, विधागत विमर्शक सक्रिय मंच अछि।

‘दुष्यन्त कुमारक गजलक मिजाज’ : आधुनिकता आ छन्दक सहअस्तित्व

एहि आलेखमे आधुनिक सामाजिक चेतना आ गजलक शिल्पबीचक सम्बन्ध पुनः उठैत अछि। लेखक दुष्यन्त कुमारक गजलक उदाहरणसँ प्रतिपादित करैत छथि जे राजनीतिक व्यंग्य, जन-संघर्ष, विषमता आ परिवर्तनक आकांक्षा बहरक अनुशासनक भीतर सेहो व्यक्त कएल जा सकैत अछि। एहिसँ लेखक ‘आधुनिक विचार’क लेल ‘छन्दहीनता’ आवश्यक मानबाक तर्कपर आपत्ति करैत छथि।

‘मिजाज’क अर्थ केवल विषय नहि; कथनक ताप, व्यंग्यक चाप, अनुभवक सार्वजनिकता आ भाषाक संक्षिप्त तीक्ष्णता सेहो अछि। दुष्यन्तक प्रभावक तुलना करैत काल ई बिन्दु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। मैथिली गजलमे छन्दयुक्त रचना उपलब्ध होयब एक बात, आ सामाजिक-राजनीतिक बोधक ओहने विशिष्ट उष्णता प्राप्त होयब दोसर बात अछि। पुस्तक पहिल बातकेँ प्रमाणित करबाक उद्देश्यसँ बहुत दूर धरि जाइत अछि; दोसर पक्षक सूक्ष्म सौन्दर्यशास्त्र आओर विकसित कएल जा सकैत छल।

एहि तुलनासँ निष्कर्ष निकलैत अछि जे समकालीन चेतना आ शास्त्रीय रूप परस्पर विरोधी नहि। मुदा रूप आ भावक सहअस्तित्वक प्रश्नकेँ रचनाविशेषक निकट पाठसँ सिद्ध करब अधिक श्रेयस्कर हएत, केवल छन्द-गणनाक प्रदर्शनसँ नहि।

‘एकटा मैथिली गजल जे बदलि देलक गीत-संगीतक इतिहास’

ई आलेख साहित्यक पाठ आ संगीतक प्रस्तुति बीच उत्पन्न होमयवाला रूपान्तरक प्रश्न उठबैत अछि। लेखक कविवर सीताराम झाक एकटा रचनाक विधागत पहचानपर जोर दैत छथि तथा ओकर गायन-परम्परामे भेल नामकरण, पाठभेद आ प्रस्तुति सम्बन्धी अन्तरक चर्चा करैत छथि। एहि विषयमे गजलक इतिहास संगीतक इतिहासक संग प्रत्यक्ष रूपेँ जुड़ैत अछि।

मूल समस्याकेँ तीन स्तरपर देखल जा सकैत अछि : रचनाकारक मूल पाठ, संगीतकार अथवा गायकक प्रस्तुति, आ जनस्मृतिमे स्थापित विधागत नाम। तीनू आपसमे सम्बन्धित छथि, मुदा समान नहि। गजलकेँ भजन अथवा गीतक रूपमे गाएल गेलासँ मूल रचनाक शिल्प स्वतः परिवर्तित नहि होइत अछि; तथापि जनमानसक ग्रहणपरम्परा एकटा स्वतन्त्र सांस्कृतिक तथ्य बनि सकैत अछि।

लेखक मूल पाठक प्रामाणिकताक रक्षा करबाक प्रयास करैत छथि। शोधक लेल एहि विमर्शक विस्तार ई होयबाक चाही जे मूल पाठ आ गायनरूपक पाठान्तर एकत्र करि, अभिधेयक फेरबदल आ संगीतकीय प्रयोजनक तुलना कएल जाय। एहि प्रकारे निबन्ध सांगीतिक पाठालोचना लेल नूतन प्रश्न खोलैत अछि।

फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’ प्रसंग : कृति, श्रेय आ पाठक विश्वसनीयता

परिशिष्टमे फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’सँ सम्बन्धित रचनाक श्रेय आ प्रसारणक विवाद उपस्थित अछि। ई भाग पोथीक मूल छन्दविवादसँ किछु अलग देखाइत अछि, मुदा वस्तुतः पाठक प्रामाणिकता, रचनाकारक दावा आ सांस्कृतिक संचारक भरोसाक प्रश्नसँ जुड़ल अछि। गजलक शिल्पक न्याय करबाक पहिले रचना केकर अछि, ओकर स्थापित पाठ कोन अछि, से स्पष्ट होयब जरूरी अछि।

साहित्यिक शोधमे श्रेय-विवादक निष्पत्ति व्यक्तिगत प्रतिज्ञापनसँ नहि, दिनांकित प्रकाशन, विश्वसनीय पाठरूप, हस्तलेख अथवा प्रकाशकीय अभिलेखसँ होयबाक चाही। परिशिष्ट एहन साक्ष्य-संग्रहक आवश्यकता रेखांकित करैत अछि। एहि प्रसंगक ऐतिहासिक महत्त्वक अन्तिम निर्णय उपलब्ध दस्तावेजक व्यापक मिलानक बादे सम्भव अछि।

प्रमाणित मूलोक्ति आ ओकर आलोचनात्मक अर्थ

पोथीक विचारधाराकेँ बुझबाक लेल किछु संक्षिप्त मूलोक्ति विशेष महत्त्वपूर्ण छथि। ‘चिकनी माटिमे उपजल नागफेनी’मे लेखक स्पष्ट करैत छथि—“हमर समीक्षा वा आलोचना-समालोचनाक आधार सदिखन व्याकरण रहैत अछि”। एहि कथनमे आलोचनाक घोषित विधि सुस्पष्ट अछि। व्याकरणकेँ व्यक्तिगत रुचिक विकल्प मानि रचनाक सार्वजनिक परीक्षणक पैमाना बनाओल गेल अछि। मुदा आलोचनाक सम्पूर्ण सिद्धान्त जँ एतबहि रहि जाए तँ बिम्ब, कथ्य, ध्वनि आ सामाजिक अनुभूतिक स्वतन्त्र महत्त्व सीमित भऽ सकैत अछि।

‘आधुनिक मैथिली गजलक संक्षिप्त आलोचनात्मक परिचय’मे लेखकक दृढ़ उक्ति अछि—“गजल लेल बहर ओ काफिया अनिवार्य छै”। ई वाक्य पोथीक विधागत परिभाषाक केन्द्र अछि। एहि आधारपर लेखक गजल आ अन्य पद्यरूपक अन्तर करैत छथि। साहित्यिक वाद-विवादमे एहि प्रतिज्ञाक उपयोगी रूप ई होयत जे मानकक स्पष्ट व्याख्या, उच्चारणभेदक प्रावधान आ अपवादक सीमासहित एकरा लागू कएल जाय।

जगदीशचन्द्र ठाकुर ‘अनिल’क उद्धृत शेरक पाँति—“हम त गजल छी, हमरा नै बरबाद करू”—रूप आ स्वतन्त्रताक द्वन्द्वक कलात्मक उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि। लेखक एहि शेरक लयात्मक अनुशासनपर ध्यान दैत छथि। अर्थस्तरपर रचना बन्धनक विरोध करैत अछि, संरचनास्तरपर लयक सहारा लैत अछि। एतऽ विडम्बना हँसीक वस्तु मात्र नहि, गजलक आत्मचिन्तनक सर्जनात्मक शक्ति बनि उठैत अछि।

एहि मूलोक्तिसभक महत्त्व ई नहि जे एकटा आलोचनात्मक मत अन्तिम सत्य बनि गेल; महत्त्व ई जे पोथीक व्यापक बहस संक्षिप्त आ जाँचल जा सकनिहार कथनमे प्रकट होइत अछि। एहि लेखमे उद्धृत मूलवाक्यसभक पाठ मूल मुद्रित रूपसँ मिलाओल गेल अछि; अन्यत्र विचारक प्रस्तुति आशयाधारित पुनर्विवेचनक रूपमे कएल गेल अछि।

मैथिली भाषाक स्वभाव : लोकप्रयोग, उच्चारण आ शब्दचयन

पुस्तकक भाषिक आलोचनामे बारम्बार एकटा आग्रह उभरैत अछि—गजल मैथिलीमे लिखल जाय तँ ओकर भाषा मैथिली समाजक जीवित बोलचाल, ध्वन्यात्मक संरचना आ अभिव्यक्तिगत स्वाभाविकतासँ जुड़ल रहय। बाहरी भाषासँ शब्द ग्रहण करब सर्वथा अनुचित नहि; अनुचित तखन अछि जखन ओकरा बिना सन्दर्भ, बिना अर्थगत आवश्यकता अथवा केवल काफिया साधबाक लेल ठूसल जाए।

एहि आग्रहमे लोकभाषिक स्वाभिमान अछि। मैथिलीकेँ केवल कोनो दोसर भाषाक वाक्यरचनाक अनुवाद नहि, अपने लय आ अर्थछविवाली साहित्यभाषा मानबाक विचार एतऽ सक्रिय अछि। मुदा लोकभाषा एकरूप नहि अछि। मिथिलाक विभिन्न भूभाग, सामाजिक समूह आ भाषिक सम्पर्कक्षेत्रमे प्रयुक्त रूप सभक विविधता छन्दगणनाक निर्णयकेँ सेहो प्रभावित कऽ सकैत अछि। पुस्तक किछु ठाम अंचलीय भेदक उपयोगी संकेत दैत अछि।

व्यावहारिक निष्कर्ष ई होयबाक चाही जे भाषिक शुद्धता काव्यक जीवित भाषासँ अलग होइत पुस्तकनिष्ठ कठोरता नहि बनय। भिन्न मैथिली रूपक ध्वन्यात्मक स्वीकृति, सम्मानसूचक क्रियारूप, विभक्तिक संयुक्त लेखन आ स्थानीय शब्दसभक साहित्यिक वैधता जाँचैत समय प्रसंग सदा प्रधान रहय। शब्दक सहजता आ ध्वनिक प्रामाणिकता काव्यक स्वाभाविक प्रवाहकेँ पोषित करैत अछि; यान्त्रिक प्रतिबन्ध ओकर स्थान नहि लऽ सकैत अछि।

सामाजिक चेतना, वर्गबोध आ रूपवादक सीमा

पुस्तकमे दुष्यन्त कुमार, अदम गोंडवी आ मैथिली रचनाकारसभक उदाहरणक माध्यमे ई विचार प्रस्तुत अछि जे जनपक्षधरता बहरक विरोधी नहि। सामाजिक अन्याय, भूख, असमानता, सत्ता-व्यंग्य, बाल-अनुभव अथवा ग्रामीण जीवन—ई सभ काव्यविषय गजलक भीतर सार्थक भऽ सकैत अछि। एहि दृष्टिसँ कृति केवल रूपवादी कठोरता नहि, रूपक भीतर अर्थक विस्तारक सम्भावना सेहो रेखांकित करैत अछि।

समस्या तखन उठैत अछि जखन काव्यविषयक मूल्यांकनक तुलनामे रूपक वर्गीकरण निर्णायक बनि जाइत अछि। ‘गजल’ शब्दक विधागत शुद्धता जतेक आवश्यक अछि, ओतेक जरूरी एहि बातक चिन्ता सेहो अछि जे रचना पाठककेँ केना प्रभावित करैत अछि, कोन सामाजिक अनुभवकेँ स्वर दैत अछि आ भाषामे कोन नव अर्थसंसार बनबैत अछि। शास्त्र आ समाजक सम्यक् सम्बन्ध बिना दूनू अधूरा छथि।

यही कारणे पुस्तकक सर्वश्रेष्ठ आलोचनात्मक क्षण ओ नहि जखन लेखक कोनो रचनाकेँ केवल छन्दगत कारणसँ अस्वीकार करैत छथि; श्रेष्ठ क्षण ओ अछि जखन ओ छन्दगत त्रुटि बतबैत हुए सेहो भाषिक ताजगी अथवा भावनात्मक उपलब्धि स्वीकार करैत छथि। एहिसँ आलोचनाक द्विस्तरीय आदर्श निर्मित होइत अछि—विधागत पहचानक परीक्षण आ स्वतन्त्र काव्यमूल्यक परीक्षण।

मैथिली साहित्येतिहासमे गजलक स्थान : तुलनात्मक विवेचन

मैथिली काव्यपरम्पराक दीर्घ कालमे पद, गीत, भजन, छन्दोबद्ध कविता, नाट्यगीत आ आधुनिक मुक्तक काव्य अनेक रूपमे विकसित भेल अछि। गजलक आगमन आ विस्तार एहि व्यापक काव्यपरिसरमे बुझल जएबाक चाही। ‘शब्द-अर्थ-शक्ति’ एहि कारणे ऐतिहासिक रूपसँ महत्त्वपूर्ण अछि जे ई गजलकेँ अन्य काव्यविधाक आश्रित उपरूप मानबाक बजाय अलग संरचनावाली विधा सिद्ध करबाक चेष्टा करैत अछि।

पुस्तकमे पं. जीवन झा, सीताराम झा आ काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’क उदाहरण गजलक आरम्भिक विधागत उपस्थितिक पक्षमे प्रस्तुत अछि। पछिला कालमे बाबा बैद्यनाथ, तारानन्द वियोगी, राजेन्द्र विमल, रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’, रमेश, जगदीशचन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ आ अनेक नव रचनाकारक चर्चा गजलक बहुविध प्रवाहक रूपरेखा बनबैत अछि। नामक एहि अनुक्रमकेँ पोथीक चयनित आलोचनात्मक इतिहास मानबाक चाही, सम्पूर्ण समावेशी सूची नहि।

भारतीय भाषासभक गजल-परम्पराक तुलना लेखक दुष्यन्त कुमार, फैज, अदम गोंडवी आ अन्य शाइरक उदाहरणसँ करैत छथि। एहि तुलनाक मुख्य उद्देश्य शब्दावली उधार लेब नहि, एकटा सैद्धान्तिक बात स्थापित करब अछि—विषयक परिवर्तन रूपक अस्वीकारक पर्याय नहि। ई कथन व्यापक साहित्यिक अर्थ रखैत अछि। तथापि विभिन्न भाषाक उच्चारण-छन्द-सांस्कृतिक अनुभवमे अन्तर ध्यानमे रखब तुलना अधिक प्रमाणिक बनबैत।

इतिहासलेखनक दृष्टिसँ पोथी एकटा ‘प्रतिहस्तक्षेप’ अछि। लेखक पुरान निर्णयक पुनर्मूल्यांकन करैत छथि, भूलेल रचनाकारक नाम सामने अनैत छथि, आरम्भिक छन्दयुक्त शेर प्रस्तुत करैत छथि आ पत्रिका-सम्पादनक भूमिका जांचैत छथि। एहि सबसँ मैथिली गजल-इतिहासक प्रश्न खुलैत अछि। कृतिक ऐतिहासिक महत्त्वक आधार एहि प्रश्नोत्तरीक स्फूर्ति अछि, एकरे निर्णायक अन्तिमता नहि।

विदेहक साहित्यिक सार्वजनिकता आ गजल-अध्ययन

आशीष अनचिन्हारक अनेक आलेख विदेहक अलग-अलग अंकमे प्रकाशित भेल रहबाक सूचना पोथीक आरम्भिक निवेदनमे अछि। विदेहक उपलब्ध शोध-अभिलेखमे ‘चिकनी माटिमे उपजल नागफेनी’, ‘मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग’, ‘बयानक सन्दर्भमे मैथिली गजल’, ‘नरेन्द्रजीक मैथिली आ हिन्दी गजलक तुलनात्मक विवेचना’, ‘दुष्यन्त कुमारक गजलक मिजाज सन गजल मैथिलीमे कहिया लीखल जेतै’ आ ‘एकटा मैथिली गजल जे बदलि देलकै मैथिली गीत-संगीतक इतिहास’ सन शीर्षक स्वतंत्र प्रविष्टि रूपमे देखल जा सकैत अछि।

एहि पूर्वप्रकाशनक लेखकीय आ संस्थागत अर्थ अछि। पुस्तक एके दिनक तैयार एकरूप प्रबन्ध नहि, विवाद, प्रतिवाद आ नव पाठानुभवसँ विकसित विचारसभक संकलित रूप अछि। एहि प्रकारक संग्रहमे एके विषयक पुनरुक्ति ओहि विमर्शक कालक्रम सेहो चिन्हबैत अछि। शोधपाठक लेल प्रश्न उठैत अछि : कखन कोन विचार कहल गेल, कोन प्रतिवाद आयल, आ लेखकक मतमे की परिवर्तन भेल?

विदेहक ग्रन्थ-संग्रह आ शोध-अनुक्रमणिका मैथिली गजलक लेखकीय आवाजक संग आलोचना-परम्पराक दस्तावेजीय उपस्थिति सेहो सुरक्षित करैत अछि। एहन संस्थागत संग्रहणक महत्त्व खास कऽ ओहि भाषिक समाजमे बेसी अछि जतऽ पत्रिका, अल्पसंख्यक प्रकाशन आ क्षेत्रीय कृतिसभक उपलब्धता असमान रहल अछि। पोथीक ऐतिहासिक अध्ययन लेल विदेहक ई सामग्री आधारभूत सन्दर्भ प्रदान करैत अछि।

आलोचनात्मक उपलब्धि आ सीमाक समाहार

पुस्तकक पहिल प्रमुख उपलब्धि पद्धतिगत दृढ़ता अछि। गजलक बहर आ काफिया परखबाक उदाहरण लेखक अपन पाठकक सामने रखैत छथि; ओ केवल ‘नीक’ अथवा ‘खराब’क अस्पष्ट निर्णय नहि दैत छथि। दोसर उपलब्धि विधाक आत्मनिर्भर पहचानक पक्षमे वैचारिक संघर्ष अछि। तेसर उपलब्धि भाषा, सम्पादन, प्रकाशन, इतिहास आ संगीत-संस्कृतिक प्रश्नसभकेँ गजल-आलोचनाक भीतर समेटब अछि। चारिम उपलब्धि ई जे लेखक गजलक सामाजिक विषय-विस्तारकेँ छन्दक संग सहअस्तित्वमे देखैत छथि।

पहिल सीमा सौन्दर्यात्मक मूल्यनिर्णयक असमान विस्तार अछि। बहरक परीक्षण प्रायः विस्तृत अछि, मुदा भावबोध, शेरक अर्थान्तर, बिम्ब-प्रतीक, रचनात्मक मौन, विडम्बना आ कथनक बहुस्तरीयता ततेक व्यवस्थित विवेचित नहि होइत अछि। दोसर सीमा समकालीन साहित्यिक मतभेदमे व्यक्तिकेँ लक्षित तीक्ष्ण सम्बोधन अछि, जाहिसँ तर्कक विषयान्तर होयबाक जोखिम रहैत अछि। तेसर सीमा ‘छन्दयुक्त’ आ ‘छन्दमुक्त’क बीच प्रायः द्वैध निर्माण अछि; मध्यवर्ती प्रयोगक श्रेणीकरण अपेक्षाकृत कम विकसित अछि।

चारिम सीमा ऐतिहासिक दावाक प्रमाण-क्रम अछि। पोथी अनेक महत्वपूर्ण संकेत दैत अछि, तथापि आरम्भिक प्रकाशन, संस्करणभेद, पुनर्प्रकाशन आ अभिहित ‘प्रथम’क प्रश्न पर स्वतंत्र ग्रन्थसूची-आधारित शोध आवश्यक अछि। पाँचम सीमा सांगीतिक रूपान्तर आ साहित्यिक पाठान्तरपर अलग सैद्धान्तिक रूपरेखाक अभाव अछि। ई सीमासभ कृतिक महत्त्व घटबैत नहि; उलटे आगामी शोधक सम्भावित दिशा स्पष्ट करैत अछि।

उपसंहार

‘शब्द-अर्थ-शक्ति’क स्थायी महत्त्व एकर विवादप्रिय स्वरमे मात्र नहि, बल्कि मैथिली गजलक मूल्यांकनकेँ सार्वजनिक प्रमाण आ परिभाषाक स्तरपर आनबाक प्रयत्नमे निहित अछि। पुस्तक पढ़ैत स्पष्ट होइत अछि जे लेखकक लेल साहित्यिक स्वाधीनताक अर्थ अनुशासनहीनता नहि; ओ रूपक ज्ञानकेँ सर्जनात्मक स्वतन्त्रताक आधार मानैत छथि। एहि विचारक फलदायी रूप तखन निर्मित होइत अछि जखन रूपगत शुद्धताक संग अर्थक बहुलता, बोलीक वैविध्य आ काव्यानुभवक नूतनता बराबर महत्त्व पबैत अछि।

मैथिली गजल-अध्ययनक इतिहासमे एहि ग्रन्थकेँ एकटा सक्रिय आलोचनात्मक मोड़ मानल जा सकैत अछि। ई विधा-प्रेमकेँ अनुशीलनमे, रचनाकारक प्रशंसाकेँ परीक्षणमे, आ साहित्यिक परम्पराक गौरवकथाकेँ प्रश्नोत्तरमे परिवर्तित करबाक चेष्टा करैत अछि। एकर तीक्ष्णताक संग संवाद करब, एकर तर्ककेँ पुनः परखब आ एकर अधूरा प्रश्नसभकेँ आगू बढ़ाएब—एहिमे एकर उचित साहित्यिक मूल्यांकन निहित अछि।

सन्दर्भसूची : विदेह-स्रोत

मूल पुस्तक तथा विदेहमे उपलब्ध कृति-सूची आ प्रकाशन-अनुक्रमणिकापर आधारित चयनित सन्दर्भ।

▪ आशीष अनचिन्हार। शब्द-अर्थ-शक्ति : गजलक आलोचना-समालोचना-समीक्षा ओ गजलपर आलेख। विदेह प्रकाशन-अभिलेख; ग्रन्थक आरम्भिक अधिकार-सूचनामे २०१२ आ २०२२ अंकित।

▪ विदेह। मैथिली पोथीक अभिलेख; आशीष अनचिन्हारक ‘शब्द-अर्थ-शक्ति’, ‘सन्दर्भ सहित’, ‘मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास’, ‘मैथिली गजलक रेडी रेकोनर’ तथा ‘अनचिन्हार आखर’क ग्रन्थसूची-प्रविष्टि। https://videha-ejournal.github.io/videha/pothi.htm

▪ विदेह। शोध-लेख अनुक्रमणिका; आशीष अनचिन्हारक गजल-सम्बन्धी आलेखसभक अंकवार विवरण। https://videha-ejournal.github.io/videha/research/index.html

▪ विदेह। शोध-लेख : अङ्क १ सँ ४५१ धरि; गजल-आलोचनासम्बद्ध शीर्षकसभक प्रकाशन-विवरण। https://videha-ejournal.github.io/videha/research/videha-scholar-research-book.html

▪ विदेह। गद्य तथा आलोचना-संसाधन; आशीष अनचिन्हारक कृतिसभक लेखकवार सूची। https://videha-ejournal.github.io/videha/prose.htm

▪ बाबा बैद्यनाथ। पहरा इमानपर (गजल-संग्रह)। विदेह पोथी-अभिलेखमे उपलब्ध ग्रन्थसूची-प्रविष्टि। https://videha-ejournal.github.io/videha/pothi.htm

▪ आशीष अनचिन्हार। चिकनी माटिमे उपजल नागफेनी; मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग। विदेह, अङ्क १६५, २०१४। विदेह शोध-अनुक्रमणिका।

▪ आशीष अनचिन्हार। बयानक सन्दर्भमे मैथिली गजल। विदेह, अङ्क २५१, २०१८। विदेह शोध-अनुक्रमणिका।

▪ आशीष अनचिन्हार। नरेन्द्रजीक मैथिली आ हिन्दी गजलक तुलनात्मक विवेचना। विदेह, अङ्क २५२, २०१८। विदेह शोध-अनुक्रमणिका।

▪ आशीष अनचिन्हार। दुष्यन्त कुमारक गजलक मिजाज सन गजल मैथिलीमे कहिया लीखल जेतै। विदेह, अङ्क ३०७, २०२०। विदेह शोध-अनुक्रमणिका।

▪ आशीष अनचिन्हार। एकटा मैथिली गजल जे बदलि देलकै मैथिली गीत-संगीतक इतिहास। विदेह, अङ्क ३१२, २०२०। विदेह शोध-अनुक्रमणिका।

खण्ड ४

डिजिटल अभिलेख आ मैथिली सार्वजनिकता

मैथिली साहित्यक पुनर्पाठ