लेखक: गजेन्द्र ठाकुर | शोध-आलेख
कन्या-विरोध, दहेज आ अन्धविश्वासक विरुद्ध रंगमंच
विषय-प्रवेश: साहित्य, सामाजिक समस्या आ रंगक जिम्मेदारी
मैथिली नाटकक अध्ययन प्रायः मुद्रित ग्रन्थ आ चर्चित रंगसंस्थाक इतिहास धरि सीमित भऽ जाइत अछि। ग्रामस्तर पर नियमित मंचन, छात्र-छात्राक भागीदारी, सरस्वती-पूजाक अवसरपर सार्वजनिक प्रस्तुति आ सीमित संसाधनसँ संचालित रंगकर्मकेँ साहित्येतिहासमे समान महत्त्व देब आवश्यक अछि। बेचन ठाकुरक एहि संग्रहक विशिष्टता एतबे नहि जे लेखक दूटा सामाजिक कुरीतिक विरोधमे कथानक रचैत छथि; विशिष्टता ई सेहो जे ओ समस्या देखबैत ग्रामीण परिवार, पड़ोस, पंचायत, विवाह-गोतियारी, भगत, पुरोहित आ दर्शकक साझा नैतिक जगतकेँ नाटकक भीतर आनैत छथि।
एहि नाटकसभक विचारधारा सुधारवादी अछि, मुदा ई एकरेखीय सुधारवाद नहि। पात्र कहियो अपन कथनसँ अपनेक विरोध करैत छथि, सामाजिक मूल्य बदलला पर पुरान लोभ नव वेश धारण करैत अछि, आ धर्मक आवरणमे तर्कक प्रवेश सेहो होइत अछि। एहि कारण लेखकक घोषित सन्देश आ नाट्यकृतिसँ निकलैत व्यापक अर्थ एक्कहि वस्तु नहि छथि। समीक्षाक प्रयोजन न तँ लेखकक सदिच्छाकेँ निर्विवाद प्रशंसा बना देब अछि, ने मंचीय असंगतिक आधारपर हुनकर लोक-रंगकर्मकेँ कमतर मानब; बल्कि पाठमे उपस्थित प्रमाणक आलोकमे कलात्मक उपलब्धि आ आलोचनात्मक सीमाक जाँच करब अछि।
ग्रन्थ आ रंग-सन्दर्भ
‘बेटीक अपमान आ छीनरदेवी’ बेचन ठाकुरक दूटा सामाजिक नाटकक संग्रह अछि। श्रुति प्रकाशनक एहि पुस्तकमे आशीष अनचिन्हारक आमुख आ लेखकक अपन कथन सँ पाठककेँ सामाजिक प्रश्न तथा ग्रामीण रंग-अनुभवक परिचय भेटैत अछि।
प्रकाशन-विवरणमे प्रथम संस्करण २०१० अंकित अछि, जखन कि आमुखमे २०११ क जनगणनाक उल्लेख अछि। एहि कालगत अन्तरक कारण संस्करण-वर्षक उल्लेख सावधानीपूर्वक देखल जाएब उचित अछि।
लेखक अपन कथनमे स्पष्ट करैत छथि जे ‘बेटीक अपमान’ लिखबाक पाछाँ बेटीक प्रति हीन दृष्टि, दहेज आ गर्भस्थ कन्याक नाशक चिन्ता अछि; ‘छीनरदेवी’क पाछाँ अन्धविश्वासक कारण पारिवारिक सम्बन्धमे घृणा आ वैमनस्य बढ़बाक अनुभव अछि। ओ २००२ सँ प्रत्येक वर्ष सरस्वती पूजापर अपन रचना मंचित करबाक आ अधिकांश प्रस्तुति छात्रा सभक द्वारा भेल होयबाक उल्लेख करैत छथि। एहि आत्मसाक्ष्यकेँ लेखकक रंग-अनुभवक महत्त्वपूर्ण प्रमाण मानि सकैत छी; मुदा स्वतन्त्र मंचन-अभिलेखक अभावमे प्रस्तुति-संख्या अथवा प्रभावक ठोस सांख्यिकीय निष्कर्ष निकालब उचित नहि।
आशीष अनचिन्हार आमुखमे ‘छीनरदेवी’केँ अन्धविश्वास-विरोधी नाटकक रूपमे पढ़ैत छथि आ हरिमोहन झाक व्यंग्य-परम्परासँ एकर प्रश्नोत्तर-सम्बन्ध बनबैत छथि। ‘बेटीक अपमान’क सन्दर्भमे ओ मिथिला आ हरियाणाक पुत्र-पक्षपातक समस्या तुलनीय मानैत छथि। प्रस्तावना लेखकक प्रशस्ति मात्र नहि, अपन समयक मैथिली मंचसँ सामाजिक विषयपर अधिक प्रत्यक्ष हस्तक्षेपक अपेक्षा सेहो अछि। एतय ई ध्यानयोग्य जे प्रस्तावनाक ऐतिहासिक-सामाजिक दावा आ मूल नाटकक स्वयं उपस्थित प्रमाणकेँ अलग-अलग श्रेणीमे राखल गेल अछि।
आलोचनात्मक दृष्टि आ विधागत विभाजन
एहि अध्ययनमे पाँच प्रश्न प्रमुख अछि: (क) सामाजिक समस्या कथानकमे घटना बनैत अछि कि उपदेश-मात्र रहि जाइत अछि; (ख) पात्रक कथन आ व्यवहारमे विरोधाभास कोन अर्थ रचैत अछि; (ग) मंचीय क्रिया, दृश्य-परिवर्तन, लोकधुन, वस्तु आ सामूहिक उपस्थिति नाटककेँ कोना अर्थ दैत अछि; (घ) स्त्रीक आवाज ओकर अपन निर्णयमे परिणत होइत अछि कि पुरुषक नैतिक शिक्षा बनिकऽ रहि जाइत अछि; आ (ङ) बाल-पाठक/बाल-अभिनेता लेल रचना-औचित्य कोन सीमा धरि अछि।
‘बेटीक अपमान’ तीन अङ्कक विस्तृत सामाजिक नाटक अछि—पहिल अङ्कमे सात, दोसरमे छओ आ तेसरमे नव दृश्य, अर्थात् कुल बाइस दृश्य। ‘छीनरदेवी’ पाँच दृश्यबला एकाङ्की अछि। दृश्य-गणना शीर्षक आ दृश्य-विभाजनक मिलानपर आधारित अछि। पहिल नाटक क्रमिक पारिवारिक समय, विवाहक अनेक अवसर आ वृद्धावस्था धरि पहुँचैत अछि; दोसर संकुचित काल-प्रसारमे रोग, आशंका, आरोप, मध्यस्थता आ नाटकीय समाधानक बाट बनबैत अछि। अपन-अपन आकारक अनुरूप दुनू नाटकक गति, संवाद-संयोजन आ रंगव्यवस्था अलग-अलग अछि।
‘बेटीक अपमान’: तीन अङ्कक कथाविकासक पृथक पाठविश्लेषण
पहिल अङ्क: बेटा-पक्षपातसँ स्त्रीक देह-क्षय धरि
दृश्य १: इच्छा, पछतावा आ आर्थिक गणित
दीपक अपन तीनू बेटाक बाद एकटा बेटी होयबाक इच्छा प्रकट करैत छथि; वीणा हुनका पुरान कथन स्मरण करबैत छथि जे पहिने कन्या भेलासँ गर्भपात करएबाक सोच छल। आरम्भे ‘इच्छा’ नैतिक पश्चात्तापक रूप लेबैत अछि—जाहि बेटीकेँ जन्मक अवसर नहि देल गेल, तकर अभाव आब अनुभूत होइत अछि। अर्थलाभ आ सामाजिक खर्चक गणना पुत्र-प्रेमक संग जुड़ल अछि। ई दाम्पत्य-संवाद प्रस्तावनात्मक व्याख्यानसँ अधिक प्रभावी अछि, कारण पात्र अपनेक पूर्व निर्णयक साक्षी बनैत छथि।
“एकटा बेटीक इच्छा होइ अछि। बेटा तँ भगवान तीनटा देलनि।”
दृश्य २: श्रम, स्वास्थ्य आ वीणाक मृत्यु
घरेलू ईन्धन, खेतक जलखै, स्त्रीक श्रम आ देहक अस्वस्थता साधारण गृहरससँ करुण परिणतिक बाट खोलैत अछि। वीणा लगातार गर्भधारण, गर्भ-समापन आ औषधिक शारीरिक मूल्यक विषय उठबैत छथि; तकर बाद मंचपर हुनकर मृत्यु घटैत अछि। नाटक दर्शककेँ ई देखबैत अछि जे परिवारक कथित ‘बेटा-रक्षा’ स्त्रीक जीवनकेँ विसर्जित करैत अछि। नाटकीय दृष्टिसँ मृत्यु तीव्र प्रभावक साधन अछि, मुदा चिकित्सकीय कारणक चित्रण साहित्यिक घटना अछि—एकरा स्वतन्त्र चिकित्सकीय प्रमाण नहि मानल जा सकैत अछि।
दृश्य ३: शोकक भीतर नारी-श्रमक स्वार्थ
विधुर दीपक अपन पत्नीकेँ याद करैत छथि, मुदा शीघ्रहि घरमे रान्हनिहारक अभावकेँ बेटी अथवा पुतोहूक आवश्यकता संग जोड़ैत छथि। प्रदीप कुमारक सलाहमे सहानुभूति अछि, तथापि बेटीकेँ घरेलू सेवा-सुविधाक रूपमे कल्पना करबाक जोखिम कायम रहैत अछि। पत्नी-वियोगक बादो श्रम-विभाजन नहि बदलैत; सन्देश ई बनैत अछि जे घरक संकट मात्र ‘स्त्री नहि रहबाक’ संकट नहि, पुरुषक घरेलू श्रमसँ दूरीक संकट सेहो अछि।
दृश्य ४: शिक्षा बनाम घरेलू उपयोगिता
दीपक बेटासभकेँ पढ़बाक आग्रह करैत छथि, फेर पढ़ाइक खर्च आ रान्हन-व्यवस्था देखैत मोहनकेँ नौकरी आ शीघ्र विवाहक दिशि धकेलैत छथि। मोहनक अध्ययन-इच्छा, सोहन-गोपालक विद्यालय-आकांक्षा आ कोचिङ्ग-केन्द्रक उल्लेख ग्रामीण शिक्षाक द्विविधा खोलैत अछि। गोपालक लयात्मक कथन दृश्यकेँ बाल-अभिनय लेल स्मरणीय बनबैत अछि; संगहि विद्यालय, पोशाक, मध्याह्न-भोजन सन सुविधाक सामाजिक स्वीकृति देखाइत अछि। शिक्षा आदर्श अछि, मुदा परिवारक आर्थिक तात्कालिकता ओकरा बाधित करैत अछि।
दृश्य ५: बलवीर-सुनीताक प्रतिपक्ष
बलवीरक दू बेटी मंजू आ संजूक प्रति आत्मविश्वास दीपकक परिवारक प्रतिपक्ष रचैत अछि। बेटीक संख्या नहि, पालन-पोषण आ शिक्षा महत्त्वपूर्ण ठहरैत अछि। सुनीताक आरम्भिक पुत्र-इच्छा संवादक भीतर बदलबैत अछि; ई परिवर्तन प्रतीकात्मक अछि। तथापि ‘डॉक्टर–इन्जीनियर–एस.पी.–कलक्टर’ बनबाक लक्ष्यक अत्यधिक बल बेटीकेँ अपन अस्तित्वसँ बेसी सामाजिक प्रतिष्ठाक साधन बनाबय लगैत अछि। बालशिक्षा आ समान-अधिकारक आधार पर एहि दृश्यक ताकत बहुत अछि।
“की बेटी बेटासँ कम होइ छै?”
दृश्य ६: शालिनीक परिवार आ वर्गगत अन्तर
गरीब किसान हरिश्चन्द्र आ राधाक घरमे एकमात्र बेटी शालिनी अछि। आरम्भमे संतान-संख्याक दुख अछि, मुदा पोषणक सामर्थ्य आ गर्भ-समापनक नैतिकता पर बातचीत होइत अछि। गरीब बेटीकेँ शिक्षा देबाक संकट एतय स्वतन्त्र रूपमे उभरैत अछि। बलवीरक बेटी उच्च शिक्षाक स्वप्न अछि; शालिनीक शिक्षा कठिन प्रयत्नक विषय। नाटक एउ व्यक्तित्व सभक भीतर वर्गानुसार असमान अवसरक संकेत दैत अछि, यद्यपि शालिनीक अपन स्वर एखन कम सुनाइत अछि।
दृश्य ७: विवाहक पृष्ठभूमिक पुनरागमन
प्रदीप द्वारा मोहनक शीघ्र विवाहक परामर्श आ दीपकक दहेजक सम्भावनाक प्रश्न पहिल अङ्कक नैतिक विरोधाभासकेँ पुनः स्थापित करैत अछि। कन्याक अभावक करुण पछतावा व्यवहारमे फेर वधू-खोज आ लेन-देनक अर्थशास्त्रमे परिणत भऽ जाइत अछि। एतय नाटकक मूल व्यंग्य जन्म लैत अछि: जे व्यक्ति बेटीकेँ आर्थिक बोझ बुझैत छल, से पुतोहूकेँ घरेलू समाधान आ दहेजक लाभक साधन बनबैत अछि।
दोसर अङ्क: विवाह-बाजार आ दहेजक अपमानजनक भाषिक संसार
दृश्य १: लड़काक अधिकता कथानकक आर्थिक आधार बनैत अछि
दीपक अपन संगी महेन्द्र पण्डित लग मोहनक विवाह लेल कन्याक खोज करैत छथि। महेन्द्रक कथनमे लड़काक बहुतायत आ कन्याक अभाव उभरैत अछि। आरम्भिक गर्भ-लिङ्ग-भेदक परिणाम आब सामूहिक विवाह-संकट बनिकऽ उपस्थित होइत अछि। व्यक्तिगत निर्णय आ सामाजिक जनसांख्यिकीय असरक बीच नाटक कारण–परिणामक सम्बन्ध स्थापित करबाक प्रयास करैत अछि, यद्यपि पात्रक अनुभव संख्यात्मक सर्वेक्षणक बराबर नहि।
दृश्य २: सम्बन्ध-निर्माणक मध्यस्थता
सुरेश कामत विवाहक मध्यस्थ बनैत छथि आ बलवीरक बेटी लेल प्रस्ताव उठबैत छथि। विवाह गृहस्थी, जातीय-गोतियारी, मध्यस्थक विश्वसनीयता आ पारिवारिक सुविधाक विनिमय छी—एहि सामाजिक ढाँचाक संकेत दृश्य देइत अछि। महिला-पात्र एतय प्रत्यक्ष निर्णयक केन्द्रमे नहि छथि; पुरुष-सम्बन्धी सामाजिक वार्ता रंगमंचपर हावी अछि।
दृश्य ३: चरण-पखारब आ प्रतिष्ठाक आयोजन
बलवीरक घर विवाह-वार्ताक आरम्भमे पाँयर धोबाक विधि पर बल दैत अछि। रीतिक आदर आ वर-पक्षक अधिकारक बीच हास्यमिश्रित टकराव होइत अछि। वस्तुतः चरण-पखारबक आग्रह ‘सम्मान’क भाषामे सत्ता-संबन्धक उद्घाटन करैत अछि। लोक-रीतिक दृश्योपयोग रंगमंचकेँ स्थानीय बनबैत अछि; ई सम्पूर्ण प्रसंगकेँ केवल अनुष्ठानक उल्लेख नहि, क्रिया बनाकऽ प्रस्तुत करैत अछि।
दृश्य ४: छेका, लेन-देन आ पुरुषसभाक निर्णय
मोहनक छेकाक अवसरपर अनेक पुरुष-पात्रक बहस, रोक-टोक, पान–बीड़ी–नाश्ता, पुरोहित, दक्षिणा आ लोकगीत सभ मिलिकऽ ग्रामीण विवाहक भीड़बला रंग-विन्यास तैयार करैत अछि। एतय लेखकक मंचक अनुभव स्पष्ट अछि; मुदा बहुत पात्र, दोहरायल बात आ दीर्घ वार्ता दृश्यगतिकेँ ढील सेहो दैत अछि। दहेजक मुद्दा भावनात्मक सम्बन्धसँ हटि मोल-भावक रूप लैत अछि, जतय विवाह बजारक लेन-देनसँ भिन्न नहि रहैत।
दृश्य ५: विवाहक उत्सव आ व्यंग्यात्मक प्रदर्शन
जयमालाक तैयारी, परिछन-गीत, बरियाती–सरियाती आ गङ्गारामक अतिशयोक्तिपूर्ण व्यवहार लोक-रंगक उत्सवी सतह रचैत अछि। दहेज–प्रतिष्ठा–खानपानक हास्य नाट्यरस बनबैत अछि, मुदा कन्याक व्यक्तित्वक अभाव शून्य सेहो रचैत अछि: मंचपर विवाहक आयोजन भव्य अछि, दुलहिनक स्वतन्त्र इच्छाक विस्तार अल्प अछि।
दृश्य ६: दहेजक अपूर्ण अपेक्षा आ कर्ज
दीपकक अपेक्षित दहेज नहि भेटबाक क्षोभ नाटकक निर्णायक विडम्बना अछि। ओ माय-बेटीक मानवीय महत्त्वक पाठ एखनहुँ ग्रहण नहि केलनि; पत्नी गेलीह, मुदा लोभ बचल अछि। कर्जक बोझ आ रोगक संकेत तेसर अङ्कक विपत्तिक पूर्वाभास बनैत अछि। करुणा आ उपहास एक्कहि पात्रपर केन्द्रित होइत अछि—एहि मिश्रित प्रभावसँ नाटकक नैतिक दृष्टि अधिक जटिल बनैत अछि।
तेसर अङ्क: दहेजक उलटा प्रवाह आ पछतावाक नाटकीय पराकाष्ठा
दृश्य १: वृद्धावस्थामे पुत्रसँ दूरी
रोगग्रस्त दीपक अपन बेटा-पुतोहूक उपेक्षाक अनुभव करैत छथि। महेन्द्रक पुनर्विवाह-सलाह समाधानक बदला पुरान सामाजिक संरचना दोहराबय लगैत अछि: देखरेख लेल फेर एकटा स्त्री चाही। वृद्धक पीड़ा वास्तविक अछि, मुदा नाटक स्वयं इहो उद्घाटित करैत अछि जे महिला-श्रमकेँ परिजन-स्नेहक एकमात्र माध्यम बुझल गेल अछि।
दृश्य २: दिल्लीक दाम्पत्य आ प्रवास
मोहन–मंजूक दिल्ली-निवास, पिता-पत्र आ गाम जेबाक खर्चक चर्चा प्रवासक आर्थिक व्यवहार आ पारिवारिक उत्तरदायित्वक दूरीकेँ जोड़ैत अछि। मंजू अपन पति सँ पिताक प्रति कर्तव्य निभयबाक आग्रह करैत छथि। एहि दृश्यसँ ‘बेटी’ केवल पारिवारिक संख्या नहि, नैतिक उत्तरदायित्वक वाचक सेहो बनैत अछि—यद्यपि पाठक दृष्टिमे मंजूक स्वतन्त्र जीवनक विस्तार सीमित रहैत अछि।
दृश्य ३: कन्याक अभावक सार्वजनिक स्वीकार
प्रदीप दीपककेँ दहेज, लिङ्ग-परीक्षणक दुरुपयोग आ कन्याक घटैत उपलब्धताक सम्बन्ध समझबैत छथि। नाटक अपन कारण-व्याख्या स्पष्ट करैत अछि। किन्तु दीर्घ भाषण दृश्यसँ क्षणिक बाहर जा कऽ समाजोपदेश बनए लगैत अछि। विचारक तात्कालिकता महत्त्वपूर्ण अछि, शिल्पगत संयम ओतबे अपेक्षित।
“दहेज दुनियाक संतुलनकें बिगारि देलक आ बिगारि देत।”
दृश्य ४: शालिनीक सम्बन्धमे सत्ता-पलटा
हरिश्चन्द्रक आँगनमे आइल वर-पक्ष आब विनतीक अवस्थामे अछि। मुखिया रमण कुमार विवाहक शर्त रखैत छथि। पारम्परिक दहेज-दाता आ दहेज-ग्राहकक स्थिति उलटैत अछि: आब वर-पक्षसँ ५१ हजार टाकाक माँग पर सम्बन्ध निश्चित होइत अछि। एहि उलटफेरमे सुधारक नाटकीय चमत्कार अछि, मुदा समतामूलक विवाह नहि। लेन-देनक दिशा बदलि गेलासँ स्त्री अथवा पुरुषक वस्तुकरण समाप्त नहि होइत अछि। लेखकक आलोचना आर्थिक व्यंग्यक माध्यमसँ उभरैत अछि; ओकरा पाठककेँ स्त्री-अधिकारक पूरा प्रतिमान बुझि नहि लेबाक चाही।
दृश्य ५: धनक वचन आ जयमालाक विराम
शालिनीक विवाहमे नगद राशि दैत तखन जयमाला आगाँ बढ़बाक प्रसंग दहेज-पद्धतिक दर्पण-रूपक अछि। पुरान वर-पक्षक अहंकार आब अपने अपमानक अनुभव करैत अछि। श्रेणीगत दृष्टिसँ ई प्रतिशोधमूलक न्याय छी—शोषणक समाप्ति नहि, ओकर उलटा पुनरावृत्ति। मंचनक दृष्टिसँ जयमालाक रुकनाइ प्रभावी क्रिया बनि सकैत अछि, कारण दर्शक कथन सुनबाक बदला लेन-देनक सार्वजनिक असुविधा देखैत अछि।
दृश्य ६: वृद्धक आर्थिक थकान
दीपकक बढ़ैत रोग, विवाही खर्च आ लगातार असन्तोष सामाजिक लोभकेँ शारीरिक क्षयक रूप दैत अछि। नाटकमे रोग अनेक बेर नैतिक दण्डक निकष बनैत अछि। ई संरचना लोकनैतिक कथाक निकट अछि; समकालीन आलोचना पूछि सकैत अछि जे बीमारीकेँ कुकर्मक फल मानबाक प्रवृत्ति स्वयमेँ करुणा आ देखभालक आधुनिक नैतिकतासँ कतेक मेल खाइत अछि।
दृश्य ७: गोपालक विवाह-सम्बन्धक खोज
सुरेश लग फेर पहुँचब विवाहक दोहराएल चक्र देखबैत अछि। दहेजक अनुभवसँ दीपक उचित पाठ नहि सीखैत छथि; अभाव, लाचारी आ गणितक एकटा नव संस्करण देखाइत अछि। दोहराव लेखकक व्यङ्ग्यकेँ धार दैत अछि, मुदा दृश्य-व्यवस्था सघन करबासँ एकर असर आर बढ़ि सकैत छल।
दृश्य ८: कन्या-पक्षक मोल-भावक चरम
गोपालक विवाह-प्रसंगमे फेर नगद लेन-देन आ जयमालाक शर्त आबैत अछि। सामाजिक प्रतिष्ठाक पुरान भाषा मंचपर व्यंग्यक रूपमे पलटैत अछि। विवाहसम्बन्धी रीत, दामादक स्थिति आ पुरुषक प्रतिष्ठा सबपर हास्यक आघात अछि। तथापि लेखकक अन्तर्वस्तु एकटा महत्वपूर्ण सीमा राखैत अछि: कन्याक अधिकारक समर्थक समाधान शिक्षा, उत्तराधिकार, परस्पर सहमति आ स्वतन्त्रता होयत; वर-पक्षसँ धन लेबाक नब परम्परा मात्र नहि।
अन्तिम दृश्य: पछतावा, पुत्र-पुतोहू आ मृत्यु
दुःखग्रस्त दीपकक अन्तिम समयमे परिजनक विवाद, चिकित्सकक प्रवेश आ अन्तिम पछतावा एक्टा नैतिक परिणतिक चरम बिन्दु अछि। पत्नी वीणाक मृत्यु अङ्क-पहिलमे आ दीपकक मृत्यु अन्तमे—दुनू मिलिकऽ पारिवारिक त्रासदीक वलय बनबैत छथि। ई वलय नाटककेँ उपदेशात्मक समापन दैत अछि, मुदा संतानक सामूहिक दोषारोपण, रोगक दण्डरूपता आ अतिदीर्घ मृत्यु-दृश्यक कारण करुणानुभव कखनो घोषणाक तले दबि जाइत अछि।
‘छीनरदेवी’: पाँच दृश्यक समीप-पाठ आ वैचारिक द्वन्द्व
दृश्य १: ललनक असामान्य आचरण आ भगतक आगमन
सुभाष–मीराक बेटा ललन अस्थिर आक्रामक व्यवहार करैत अछि। परिवार कारण बुझबाक बदला आत्मा अथवा देवीक प्रभाव मानय लगैत अछि। सुखल कियोट भगतकेँ बजाओल जाइत अछि; ओ अनुष्ठानिक क्रिया आ पूछताछ करैत छथि, किन्तु अन्तमे अपन असमर्थता प्रकट करैत छथि। ई अन्तिम असमर्थता नाटकक महत्वपूर्ण विघटनकारी क्षण अछि: ‘भगत’ पूर्ण समाधानक सर्वज्ञ पात्र नहि रहैत। तथापि रोगक स्पष्ट चिकित्सकीय निदान दृश्यमे अनुपस्थित अछि।
दृश्य २: डाइन-आरोप, कुटुम्ब-विघटन आ प्रतिरोध
ललनक व्यवहारक अर्थ परिवारक एक महिला सुकनीक विरुद्ध आरोपमे बदलैत अछि। पड़ोसक मटुक-राजू आदि पात्रसँ अफवाह सामाजिक बल प्राप्त करैत अछि। सुकनीक बेटा सोमन अपन मायकेँ बचाबय लेल विरोध करैत अछि। डाइन ठहरएबाक नामपर हिंसा, सार्वजनिक अपमान आ जानलेवा धमकीक संभावना ई दृश्यकेँ सबसँ तीक्ष्ण बनबैत अछि। नाटक दिखबैत अछि जे अन्धविश्वास केवल व्यक्तिगत भ्रम नहि, सम्बन्ध-भङ्ग आ भीड़-हिंसाक तकनीक बनि सकैत अछि।
दृश्य ३: परबतियाक छद्म-दैवी मुद्रा आ विवेक
परबतिया कोइरक पात्र-परिचयमे हुनका मनोवैज्ञानिक कहल गेल अछि, मुदा मंचपर ओ भगत-सदृश आवेश, ‘बोल जय गंगा’क आवृत्ति आ काली-बन्दीक आवरण लऽ कऽ प्रवेश करैत छथि। एहि द्वैध रूपकेँ लेखकक रणनीति बुझल जा सकैत अछि: श्रद्धाक भाषामे प्रवेश कऽ श्रद्धा-जन्य भ्रान्ति तोड़ब। ओ डाइनक सर्वशक्तिमत्ता पर तर्क करैत छथि आ आरोपकेँ मनक शंका ठहरबैत छथि। ई नाटकक बौद्धिक शिखर अछि।
“डायनपर विश्वास केनाइ खाँटी अंध विश्वास छी।”
मुदा परबतिया ललनक समस्या लेल शीघ्र विवाहक उपाय सेहो दैत छथि; एहि बिन्दुपर अन्धविश्वास-विरोध आ विवाहकेँ उपचार मानबाक अनाधारित अपेक्षा एक-दोसरसँ टकराइत अछि। समाजक मनोवृत्ति बदलबाक प्रयत्न जे पात्र करैत छथि, वैह पात्र बीमारीक प्रश्नकेँ चिकित्सकीय परीक्षणक बदला विवाह-समाधान दिस मोड़ि दैत छथि। लेखकक सुधारवादी उद्देश्यकेँ मानैतहुँ एहि असङ्गतिकेँ छिपेनाइ उचित नहि।
दृश्य ४: अनुअंजना, मन्दिर-विवाह आ सहमतिक प्रश्न
घटकराज तुरन्त विवाहक उपाय सुझबैत छथि; अमोलागाछी स्थित काली मन्दिरमे विनोद झाक माध्यमसँ ललन आ अनु अंजनाक विवाह सम्पन्न होइत अछि। हास्य, अल्प-दक्षिणा, मंत्रोच्चार आ वर-वधूक उतावली दृश्यकेँ गतिशील बनबैत अछि। अनु अंजनाक पूर्व विवाहसभक प्रसङ्ग असामान्य चरित्र-हास्य उत्पन्न करैत अछि। मुदा आलोचनात्मक प्रश्न ई अछि जे अस्थिर व्यवहारबला युवककेँ औषधि दऽ शान्त करबाक बाद विवाह कएल जएबाक स्थिति सहमति, स्वास्थ्य आ जानकारीक कसौटीपर कोना जाँचल जएत? पाठ एहि प्रश्नक पर्याप्त समाधान नहि देइत अछि।
दृश्य ५: कथित आरोग्य आ नीतिवचन
अन्तिम दृश्य ललनकेँ शान्त देखबैत अछि आ परबतियाक ज्ञान-वचनसँ समापन करैत अछि। सुभाषक घरमे सामञ्जस्यक पुनः स्थापना लेखकक अपेक्षित फल अछि। मुदा विवाहक तुरन्त बाद ‘पूर्ण ठीक’ भऽ जएबाक संकेत असाधारण व्यवहारक जटिल चिकित्सकीय कारणसभकेँ सरल बनबैत अछि। एहिमे लोक-प्रदर्शनक सुखान्त अपेक्षा तृप्त होइत अछि, यथार्थवादी समस्या-विश्लेषण आंशिक रहि जाइत अछि।
“अंध विश्वासमे लोक भटकि जिनगीकें गर्तमे धकेल लैत अछि।”
स्त्रीक स्वर, पितृसत्ता आ समाज-सुधारक सीमारेखा
‘बेटीक अपमान’क पहिल सशक्त स्वर वीणा छथि। ओ पति द्वारा धन, दहेज आ बेटाक प्राथमिकताकेँ प्रश्नांकित करैत छथि। हुनकर विरोध देहक श्रम, गर्भ-समापनक कष्ट आ आत्मसम्मानक यथार्थ अनुभवसँ निकलैत अछि। त्रासदी ई अछि जे समाजकेँ नैतिक शिक्षा देबाक लेल कथानक हुनकर मृत्युकेँ आवश्यक घटनाक रूपमे बरतैत अछि। वीणाक पीड़ा प्रभावकारी अछि, मुदा हुनकर जीवित प्रतिरोधकेँ बहुत देर धरि कथा-केन्द्रमे रहबाक अवसर नहि भेटैत।
मंजू आ संजू शिक्षित बेटीक सम्भावना चिन्हित करैत छथि; शालिनी गरीबीक कारण अवसर-वञ्चित बेटी छथि; राधा आ सुनीता अलग-अलग सामाजिक अनुभवक स्वर रखैत छथि। तइयो तीनू अङ्कमे विवाहक आर्थिक शर्त प्रायः पुरुषसभ तय करैत छथि। शीर्षक बेटीक अपमानक विरुद्ध अछि, मुदा कन्याक इच्छा, संपत्तिपर अधिकार, उच्च शिक्षा आ वैवाहिक स्वायत्तताक प्रश्न अपेक्षाकृत कम विकसित अछि। एहि सीमाकेँ नाटकक सामाजिक युगसन्दर्भमे बुझि सकैत छी; आलोचनाकेँ एकरा गुण बनाकऽ नहि देखाबक चाही।
‘छीनरदेवी’मे सुकनी डाइन-आरोपक प्रत्यक्ष पीड़िता छथि। परबतिया महिला-तर्कक विचित्र मुदा असरदार प्रतिनिधि छथि, जे भगत-भेषमे वैज्ञानिक संशयक सामान्य भाषा रचैत छथि। एहि विरोधाभासमे नाटकक मौलिकता अछि। एकहि कालमे स्त्री पर आरोप लगब आ स्त्री द्वारा ओकर खण्डन होयब सामाजिक प्रतीकात्मकता बनबैत अछि। तथापि सुकनीक स्वतन्त्र पक्ष अधिक विस्तृत होइत तँ आरोप-संस्कृतिक प्रत्यक्ष मानवीय मूल्य आर उजागर होइत।
नाट्य-शिल्प: लोकवाक्य, पुनरावृत्ति, हास्य, दृश्य-सामग्री आ मंचयोग्यता
बेचन ठाकुरक संवादक भाषा मुख्यतः ग्राम्य मैथिली अछि। पात्र ‘माल-पानी’, ‘भनसा-भात’, ‘नञ्/नै’, ‘गोरा लगनाइ’, ‘दुआर’, ‘छेका’, ‘समधि’ सन सामाजिक शब्दावलीसँ अपन परिवेश बनबैत छथि। नाटकक भाव-यथार्थ एतए शुद्ध औपचारिक भाषासँ बेसी लोकबोलीक लयपर निर्भर अछि। हास्यक साधन अपमानजनक संबोधन, पुनरुक्ति, अतिशयोक्ति, सामाजिक प्रतिष्ठाक उलटफेर आ अनुष्ठानिक बातचीत अछि। संवाद कहियो अतिशय फैलैत अछि, मुदा एही विस्तारमे रंगमंचक सामूहिक जीवित बोली सुरक्षित अछि।
मंच-सामग्री विशेष अध्ययनयोग्य अछि—कुरसी, जलक लोटा, चरण-पखारबाक पात्र, छेकाक डाली, बिछाओन, चिट्ठी, खैनी, मृदंग, माटि, विभूति, रोगी लेल बर्तन, विवाह-मण्डप आ दक्षिणाक नगद राशि। ई सभटा वस्तु गामक जीवनक चिन्ह मात्र नहि; अभिनेताक चलन, प्रतीक्षा, आवागमन, हँसी, तनाव आ सार्वजनिक निर्णयक प्रक्रिया सम्भव बनबैत अछि। घर–दलान–आँगन–मन्दिर जेकाँ दोहराएल स्थानसँ कम-संसाधनक स्थानीय मंच पर प्रस्तुति सहज होयबाक सम्भावना अछि।
‘बेटीक अपमान’मे बाइस दृश्य सामाजिक सर्वेक्षण-जकाँ अनेक प्रसंग समेटैत अछि; एहि कारण कथा-केंद्र कखनो दीपकक आत्मपरिवर्तनसँ हटि विवाहक तकनीकी मोल-भावमे बँटि जाइत अछि। ‘छीनरदेवी’मे पाँच दृश्यक सघन क्रम अपेक्षाकृत एकाग्र अछि, मुदा ललनक असामान्य व्यवहारक कारण आ अनुअंजनाक चरित्रक हास्य-निर्माणमे असावधानी आधुनिक दर्शक लेल समस्या बनि सकैत अछि। अभिनय-निर्देशनमे हिंसात्मक धमकीक दृश्यकेँ आलोचनात्मक दूरीसँ प्रस्तुत करब आवश्यक होएत।
नाटकीय अन्तक तुलना सेहो अर्थपूर्ण अछि। पहिल नाटक मृत्यु आ पश्चात्तापपर समाप्त होइत अछि, दोसर विवाह आ शान्तिपर। एकटा पात्रकेँ दण्ड देइत सामाजिक चेतावनी बनबैत अछि; दोसर सांस्कृतिक मेल-मिलापद्वारा समस्या मेटाएल घोषित करैत अछि। ई दू अन्त सुधारवादी रंगमंचक दू भिन्न तकनीक—भय-जनित शिक्षा आ सुखान्त-जनित शिक्षा—प्रदर्शित करैत अछि।
बाल-साहित्यक इतिहास आ छात्र-रंगमंच: तुलनात्मक विवेचन
सर्वप्रथम विधागत स्पष्टता जरूरी अछि: ‘बेटीक अपमान’ आ ‘छीनरदेवी’ स्वयं पाठ-प्रमाणक अनुसार वयस्क-कुटुम्ब केन्द्रित सामाजिक नाटक छथि। बालक अथवा छात्र द्वारा मंचन भेलासँ कोनो कृति स्वतः बाल-साहित्य नहि भऽ जाइत अछि। बाल-साहित्यक पहचान बालकक अनुभव-दृष्टि, कथात्मक सुबोधता, भावनात्मक आयु-उपयुक्तता, कल्पना, प्रश्न करबाक अवकाश, आनन्द-तत्त्व आ प्रस्तुति-सन्दर्भ पर निर्भर करैत अछि। एहि पृथक्करणक आधारपर बेचन ठाकुरक कार्यकेँ ‘बाल-भागीदारीबला सामुदायिक रंगमंच’क इतिहासमे विशेष महत्त्व दैतहुँ बाल-नाटकक शुद्ध विधागत सूचीमे बिना टिप्पणी रखब गलत होएत।
मैथिली नाट्यपरम्पराक पूर्वकालीन अभिलेखक रूपमे विदेह-पोथी भण्डारमे ‘धूर्तसमागम’ आ पुरान नाटकक प्रस्तुति उपलब्ध अछि। ओहि परम्परासँ बेचन ठाकुरक साम्य संस्कृतनिष्ठ नाट्यरूपमे नहि, सामाजिक ढोंग, अनुष्ठान आ विद्रूपक हास्य-उद्घाटनमे ताकल जा सकैत अछि। पुरान प्रहसनमे धार्मिक अधिकारक आडम्बर विडम्बना बनैत अछि; ‘छीनरदेवी’मे भगतक भाषा उलटि कऽ अन्धविश्वास-विरोधी विवेकक माध्यम बनैत अछि। ई तुलनात्मक संकेत अछि, प्रत्यक्ष प्रभावक ऐतिहासिक दावा नहि।
विदेहमे प्रकाशित समकालीन ‘मैथिली बाल-उपन्यासक समीक्षाशास्त्र’ बाल-पाठक लेल रस, औचित्य, कथा-रचना आ भाषिक सरलताक विविध कसौटी सामने रखैत अछि। एहि कसौटीपर बेचन ठाकुरक नाटकमे लोकभाषाक तत्क्षण बोध, गीत-संवाद, दृश्याभिनय आ सामाजिक प्रश्नक शक्ति छैक; मुदा गर्भ-समापन, मृत्यु, डाइन ठहरएबाक हिंसात्मक धमकी आ वैवाहिक लेन-देन सन प्रसंग बिना शैक्षिक रूपान्तरण छोट बालक लेल उपयुक्त नहि मानल जा सकैत अछि। वरिष्ठ छात्र-कलाकार लेल ई पाठ सहमति, स्वास्थ्य, लिङ्ग-न्याय आ अन्धविश्वासक विवेचनक आधार अवश्य बनि सकैत अछि।
डॉ. अमरेन्द्रक ‘अंगिका बाल-साहित्य’ पर विदेहमे प्रकाशित तुलनात्मक समीक्षा बाल-रचनाक इतिहास लोरी, खेलगीत, पहेली, कथा आ नव युगक एकाङ्की धरि विस्तृत सांस्कृतिक वंशावलीक रूपमे देखैत अछि। एहि नजरिएँ बेचन ठाकुरक छात्र-प्रस्तुति लिखित नाटक आ सामुदायिक मौखिक संस्कृतिक बीच सेतु बनैत अछि। तइयो अंगिका आ मैथिली साहित्यक विधागत इतिहास एक समान नहि; एतय तुलना बाल-अभिनयक सांस्कृतिक माध्यम धरि सीमित अछि।
विदेहक ‘मैथिली नाट्यमंच/नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त’ शृंखला आ ‘नाट्य-नवग्रह’ सन समकालीन आलोचनात्मक सामग्री नाटकक अर्थकेँ मुद्रित संवादक अतिरिक्त प्रस्तुति, दर्शक-सम्बन्ध आ सामाजिक सत्ता-संरचनामे खोजबाक आधार दैत अछि। बेचन ठाकुरक प्रयोगमे छात्रा सभक अभिनय आ गामक उत्सवी मंचनक सूचना एहि दृष्टिएँ महत्त्वपूर्ण अछि: ई सामग्री नाट्य-साहित्यक इतिहासमे विद्यालयीन शिक्षण आ लोक-भागीदारीक साझा क्षेत्र उद्घाटित करैत अछि। तथापि उपलब्ध सूचनासँ कार्यक्रमक प्रत्येक वर्षक नाटक, कलाकार-संख्या आ वास्तविक दर्शक-प्रतिक्रियाक क्रमवार इतिहास तयार नहि कएल जा सकैत अछि। [५–६]
बाल-रंगमंचक दृष्टिसँ सम्भावना आ सीमा
बाल-रंग-अध्ययनमे कृति आ मंचनक सम्बन्ध द्विमुखी अछि। गम्भीर कथाकेँ छात्र प्रस्तुत करथि तँ अभिनयद्वारा सार्वजनिक बोलबाक साहस, उच्चारण, स्मृति, एकजुटता आ समाज-संवादक क्षमता विकसित भऽ सकैत अछि। मुदा पाठक सामाजिक दर्शन जखन अभिनेता अपन उमरसँ पैघ अनुभवक आघात सँ संबंधित हो, तँ शिक्षक/निर्देशककेँ प्रसंगक संवेदनशीलता बुझबाक आवश्यकता अछि। विशेषतः वीणाक शारीरिक पीड़ा, सुकनी पर हिंसाक धमकी आ विवाहक सहमतिक प्रश्नकेँ बाल-हितैषी संवादमे बदलब अपेक्षित अछि। एहि भेदभावक सम्यक् विवेचन बिना ‘बाल-नाटक’क श्रेणी बहुत विस्तार पाबि अर्थहीन भऽ सकैत अछि।
नैतिक परिणति आ आलोचनात्मक उपलब्धि: चारि तुलनात्मक निष्कर्ष
पहिल, दुनू नाटकमे सामाजिक संकटक जड़ सामूहिक मनोवृत्ति अछि। कन्या-विरोध वैयक्तिक गर्भ-निर्णयक पाछाँ दहेजक आर्थिक विचारधारा छैक; डाइन-आरोप वैयक्तिक भयक पाछाँ पड़ोस, कुटुम्ब आ मनगढ़न्त सत्ता छैक। एहि साझा संरचनाक कारण दुनू नाटककेँ एक पोथीमे संकलित करब अर्थपूर्ण अछि।
दोसर, दुनू नाटक परिणामसँ शिक्षा देब चाहैत अछि। ‘बेटीक अपमान’मे स्त्रीक मृत्यु आ वृद्धक पछतावा; ‘छीनरदेवी’मे परबतियाक तर्क आ सुखान्त। मुदा कारणक अतिसरल रेखांकन कखनो वास्तविक सामाजिक जटिलताकेँ घटबैत अछि। भ्रूण-समापन, मानसिक स्वास्थ्य आ घरेलू हिंसा सन विषयक मंचीय पुनर्प्रस्तुति आजुक विवेकमे भेदभावसँ मुक्त, पीड़ित-केन्द्रित आ साक्ष्य-संवेदी होयबाक चाही।
तेसर, नाटककारक सर्वाधिक सफल शिल्प-विधान ‘बोलैत समाज’क निर्माण अछि। ई मंच एक नायकक एकालाप नहि; ओहिमे काका, मामा, पड़ोसी, मुखिया, बौआ, भगत, पुरोहित, दुलहा-दुलहिन, डॉक्टर आ घरक स्त्री सभक शोर उपस्थित अछि। सामाजिक असङ्गतिक उद्घाटन एहि बहुवक्ता संसारसँ होइत अछि। मुदा बात दोहराएब, दीर्घ मोलभाव आ नीतिपाठक अधिकता कथ्यक धार कखनो कम करैत अछि।
चारिम, नारी-मुक्तिक प्रश्न नाटकक प्रमुख नैतिक शक्ति होइतहुँ ओकरा भीतर अपूर्ण अछि। बेटीकेँ नहि मारबाक आग्रह स्त्रीक जीवन-अधिकारक आवश्यक आरम्भ अछि; मुदा स्त्रीक विवाह, शिक्षा, उत्तराधिकार, देह, स्वास्थ्य आ निर्णयपर अपन अधिकार साहित्यिक परीक्षणक अगिला पड़ाव अछि। ‘छीनरदेवी’क विवेक-शिक्षा सेहो तखने पूर्ण होयत जखन डाइन-आरोपक खण्डनक संग मानसिक स्वास्थ्यक सम्मानजनक देखभाल आ वैवाहिक सहमति सेहो कथाक केन्द्र बनत।
संवादक वैचारिक प्रतिध्वनि
एहि संवादसभमे पारिवारिक निर्णय, स्त्रीक स्थिति आ सुधारवादी अन्तर्विरोधक तनाव एकाग्र होइत अछि।
“एकटा बेटीक इच्छा होइ अछि। बेटा तँ भगवान तीनटा देलनि।”
पात्र: दीपक; ‘बेटीक अपमान’, पहिल अङ्क, पहिल दृश्य।
“की बेटी बेटासँ कम होइ छै?”
पात्र: बलवीर; ‘बेटीक अपमान’, पहिल अङ्क, पाँचम दृश्य।
“दहेज दुनियाक संतुलनकें बिगारि देलक आ बिगारि देत।”
पात्र: प्रदीप; ‘बेटीक अपमान’, तेसर अङ्क, तेसर दृश्य।
“डायनपर विश्वास केनाइ खाँटी अंध विश्वास छी।”
पात्र: परबतिया; ‘छीनरदेवी’, तेसर दृश्य।
“अंध विश्वासमे लोक भटकि जिनगीकें गर्तमे धकेल लैत अछि।”
पात्र: सुभाष; ‘छीनरदेवी’, अन्तिम दृश्य।
निष्कर्ष
‘बेटीक अपमान आ छीनरदेवी’केँ मिथिलाक ग्राम-समाजमे रचल सामाजिक सुधारवादी रंगक एक महत्त्वपूर्ण पाठ मानल जाए। एकर साहित्यिक शक्ति अनुभवक निकटता, बोलचालक मैथिली, लोक-रीतिक रंगसम्भावना, सहज हास्य, नारी-पीड़ाक प्रभावी उद्घाटन आ अन्धविश्वाससँ उपजल हिंसाक सार्वजनिक विरोधमे अछि। ई नाटक दूटा अलग कुरीतिक विरोध नहि करैत; दुनू एक प्रकारक सामूहिक अज्ञान आ असमान सत्ता-वितरणक परिणाम देखबैत अछि।
एहि शक्तिक संग सीमा स्पष्ट अछि: शिक्षाक घोषणाक बीच स्त्रीक स्वायत्त स्वर सीमित, दहेजक निरसनक बदला लेन-देनक उलटफेर प्रमुख, आ रोगक उपचार विवाहद्वारा घटित मानबाक वृत्ति वैज्ञानिक चेतनासँ विरोधी अछि। नाटकक अन्तिम नीतिवचनकेँ ओही कारण आलोचनात्मक प्रश्नसँ मुक्त नहि कएल जाए। बेचन ठाकुरक महत्त्व एहि कारण घटैत नहि, बल्कि अधिक ऐतिहासिक बनैत अछि—हुनकर रंगजगत हमर समाजक परिवर्तनक इच्छा आ ओकर अन्तर्विरोध, दुनूकेँ अभिलेखित करैत अछि।
बाल-साहित्यक इतिहासमे संग्रहक स्थान केवल विशुद्ध बाल-नाटकक रूपमे नहि, छात्र-सहभागिताबला मैथिली सामुदायिक रंगमंचक सन्दर्भमे अधिक युक्तिसंगत अछि। लेखकक कथनमे दर्ज छात्रा सभक मंच-योगदान आ विदेहक पूर्वप्रकाशन ई सम्बन्ध स्थापित करैत अछि। उपलब्ध अभिलेखमे एहि दावाक सीमा यथावत् राखैत, भविष्यक रंग-इतिहासक लेल मूल पटकथा, मंचीय संस्करण, कलाकार-साक्षात्कार, प्रस्तुति-तिथि आ दर्शक-स्मृतिक संकलन सर्वाधिक उपयोगी अगिला काज होयत।
