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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

VIDEHA · प्रथम मैथिली पाक्षिक eJournal

गाम-घर

नित नवल नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’ · Videha अंक ४५२ · 15 October 2026

लेखक: गजेन्द्र ठाकुर | शोध-आलेख

समग्र दृष्टि

नन्दक रचनाधर्मिता आ मैथिली सामाजिक कल्पना

नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’क रचना-संसारकेँ एकटा विधा, एकटा कथानक-प्रविधि वा एकटा सामाजिक प्रश्नमे समेटल नहि जा सकैत अछि। ‘गाम-घर’ आ ‘आडम्बर’क कथा-संसारसँ आरम्भ कऽ ‘गुदड़ीक लाल’, ‘अनठिया कुकुर’, ‘सुजाता’, ‘सुकन्या’ आ ‘परिवार’ धरि हुनकर गद्य समानता, पारिवारिक पुनर्गठन, स्त्रीक सम्मान आ सामाजिक न्यायक अनेक रूप पर विचार करैत अछि। ‘दिल्लीक पार्क’ आ ‘याचक के नञि’मे चर्चा, स्मृति आ सामाजिक व्यंग्यक रूप बदलि जाइत अछि। ‘महारानी कैकेयी’ परिचित आख्यानक नैतिक निर्णयक प्रतिपक्ष रचैत अछि; ‘काव्य सरिता’ गीत आ लोकधुनक विस्तृत क्षेत्र खोलैत अछि; आ ‘स्वर्ण-कमल’ बाल-कल्पना, लोककथा आ न्याय-बोधकेँ एक संग आबद्ध करैत अछि।

एहि विविधताक भीतर मुख्य सूत्र समाजक असमान व्यवस्था आ व्यक्तिगत नैतिक विवेकक बीचक टकराव अछि। ग्रामजीवन एतय केवल रमणीय स्मृति नहि। खेती, बेगार, श्राद्ध-भोज, जाति, दहेज, सम्पत्तिक विवाद, कार्यालयी व्यवस्था आ सार्वजनिक पदक मर्यादा—ई सभ कृति मे कमोबेश सामाजिक शक्तिक रूपमे उपस्थित अछि। कथाकार समाजसुधारक आग्रहक कारण कखनो प्रत्यक्ष तर्क देइत छथि आ कखनो पात्रक दैनिक व्यवहारक भीतर तर्कक परिणाम देखबैत छथि। एहि दूनू स्थितिक बीचक तनाव हुनकर साहित्यिक शिल्पक शक्ति आ सीमा दूनू बुझबाक आधार बनैत अछि।

प्रौढ़ सामाजिक आख्यानसभमे वर्ग आ जातिक अन्तर्सम्बन्ध बहुत बेर व्यंग्य, संवाद आ सार्वजनिक घटनाक मार्फत प्रकट होइत अछि। ‘गुदड़ीक लाल’मे श्रमिक परिवारक अनुभव आ शिक्षा-न्यायक प्रश्नक संग सामन्ती प्रभुत्वक द्वन्द्व अछि। ‘अनठिया कुकुर’मे गाम आ नगरक अलग-अलग मनोवृत्ति परस्पर सम्बद्ध होइत अछि। ‘सुजाता’ आ ‘सुकन्या’ स्त्रीक निर्णयक अधिकारकेँ विवाह, वैधव्य, परिवार आ कार्यस्थलक संस्था-सापेक्ष परिस्थितिमे देखैत अछि। ‘परिवार’ स्मृतिक माध्यमसँ साझा जीवनक अर्थ खोजैत अछि। ई कृतिसभ सामाजिक प्रश्नक हिसाबसँ एक-दोसरसँ संवाद करैत अछि, तथापि प्रत्येकक रचनात्मक आकार आ पात्र-संरचना अलग अछि।

नन्दक सामाजिक चेतना केवल समस्या-चिह्नित करबामे नहि, समाधानक कल्पनामे सेहो सक्रिय अछि। ओ शिक्षाकेँ सम्मान आ अवसरक मार्ग, न्यायकेँ सार्वजनिक मूल्य, स्त्रीक आत्मनिर्णयकेँ नैतिक आवश्यकता आ पारिवारिक सहकारकेँ सामाजिक शक्ति मानि चलैत छथि। मुदा साहित्यिक आलोचनाकेँ ईहो पूछय पड़ैत अछि जे आदर्शवादी समाधान कथाक अन्तःविकाससँ कतेक स्वाभाविक रूपेँ निकलैत अछि। जखन नायक वा नैतिक वक्ता सहजतासँ जटिल सामाजिक गाँठ खोलि दैत अछि, तखन कथा अपन जीवनगत प्रतिरोधक कतेक अंश सुरक्षित रखैत अछि? एहि प्रश्नकेँ उठाएब साहित्यकारक सामाजिक उद्देश्यक अवमानना नहि, बल्कि कृतिक कलात्मक उपलब्धिक परीक्षण अछि।

‘दिल्लीक पार्क’ आ ‘याचक के नञि’ एहि समीक्षा-संकलनमे महत्त्वपूर्ण मोड़ प्रदान करैत अछि। पहिल रचनामे सार्वजनिक उद्यान आपसी अनुभव-विनिमयक मंच बनैत अछि, जकरा माध्यमसँ गामक स्मृति आ शहरी नागरिकता एक-दोसरसँ संवाद करैत अछि। दोसर रचनामे ‘याचना’ शब्दक नैतिक अर्थ-विस्तार भिक्षुक आ प्रतिष्ठित लाभार्थीक बीच समाज द्वारा बनाओल भेदकेँ प्रश्न करैत अछि। एतय कथानकक गतिसँ बेसी विचारक टकराव, संवादक लय आ व्यंग्यक धार महत्त्वपूर्ण भऽ उठैत अछि।

‘महारानी कैकेयी’क पाठ मिथकीय पात्रक स्थापित दोषारोपणक पुनर्परीक्षा करैत अछि। मिथकक पुनर्व्याख्या साहित्यिक रूपेँ तखन महत्त्वपूर्ण बनैत अछि जखन ओ परिचित चरित्रकेँ नब प्रश्नक केन्द्रमे अनैत अछि। तथापि नैतिक पुनर्मूल्यांकन आ ऐतिहासिक प्रमाण एक वस्तु नहि; वैकल्पिक व्याख्याकेँ तर्कक आ अन्तर्विरोधक कसौटीपर जाँचब जरूरी अछि। एहि कारण एकर स्थान सामाजिक उपन्याससभक संग नहि, विचारप्रधान गद्यक अलग खण्डमे रखल गेल अछि।

कविताक रूपमे ‘काव्य सरिता’ वन्दना, भजन, नचारी, लोकगीत, सामाजिक व्यंग्य, मातृभाषा-चेतना आ पारिवारिक अनुभूतिक बहुधारात्मक प्रवाह अछि। ‘स्वर्ण-कमल’मे एहि लोकानुभूतिक दोसर रूप भेटैत अछि : बाबीक कथावाचन, नेनासभक जिज्ञासा, वनयात्रा, चमत्कार, न्याय आ क्षमाक प्रश्न। बाल-उपन्यासक रूपेँ एकर स्वायत्त विधागत स्थिति स्वीकार करब अनिवार्य अछि। प्रौढ़ कृतिसभमे शिक्षा अथवा नैतिक उपदेशक उपस्थितिसँ ओ सभ बालसाहित्य नहि भऽ जाइत अछि। विषय, कथन-दृष्टि, अनुभवक जटिलता आ पाठकीय आयुक भेद सुरक्षित रहबाक चाही।

एहि पुस्तकक चारि खण्ड विधा आ विचारक एही परस्पर सम्बन्धकेँ देखबैत अछि। पहिल खण्ड समाजक लघु आख्यान, दोसर खण्ड दीर्घ सामाजिक उपन्यास, तेसर खण्ड शब्दचित्र आ विचारप्रधान गद्य, आ चारिम खण्ड काव्य तथा बालकथा पर केन्द्रित अछि। प्रत्येक कृतिक विवेचन ओकर अपन पात्र, रचना-विन्यास आ भाषिक प्रविधिसँ आरम्भ होइत अछि; ओकर पश्चात् व्यापक साहित्यिक, सामाजिक आ तुलनात्मक अर्थ खुलैत अछि। ई क्रम साहित्यकारक विविध रचनाकेँ एकरूप घोषित नहि करैत, बल्कि भिन्न रचनात्मक पद्धतिक भीतर चलैत समान नैतिक आग्रहक रूप स्पष्ट करैत अछि।

पहिल खण्ड

लोकजीवन, कथा आ सामाजिक प्रतिरोध

गाम-घर · आडम्बर

ग्राम्य जीवनक नैतिक अर्थनीति, सामाजिक व्यंग्य आ बालकथात्मक प्रतिमान

नन्द कुमार मिश्रक ‘गाम-घर’ (मैथिली कथा एवं निबन्ध संग्रह) ग्राम्य अनुभवक सहारे सामाजिक विषमता, मृत्यु-संस्कारक अपव्यय, जातिगत ऊँच-नीच, स्त्रीक सार्वजनिक भागीदारी, विवाह आ दहेज, धर्मक आडम्बर, चुनावी स्वार्थ तथा शोषणक विविध रूप पर प्रश्न करैत अछि। संग्रहक पन्द्रह रचना एकरूप साहित्यिक विधामे सीमित नहि अछि : आरम्भिक कथा ग्रामीण यथार्थ आ संवादक निकट छथि; मध्य भागमे सामाजिक-राजनीतिक चिंतन कथात्मक संरचनाक भीतर पैसैत अछि; अन्तक ‘उनटा चालि’, ‘घोड़ीक अण्डा’ आ ‘शेरक आतंक’मे दृष्टान्त, विनोद आ पशु-रूपकक बल अधिक अछि। एहि लेखमे मूल पोथीक अनुक्रमणिका, आरम्भिक निवेदन, रचनाक मुद्रित पाठ आ अन्तर्निहित आलोचनात्मक सूत्रक आधारपर पाठविश्लेषण कयल गेल अछि। मैथिली बाल-साहित्यक तुलनात्मक सन्दर्भमे एहि कृतिक महत्त्व केवल ओकर ‘बालकथा’ होयब नहि, अपितु एहि बातमे अछि जे लेखक प्रौढ़ सामाजिक व्यंग्यसँ बालोपयोगी दृष्टान्त धरि एक साहित्यिक सेतु तैयार करैत छथि। तथापि दीर्घ उपदेशात्मक अंश, पात्रक सीमित मनोवैज्ञानिक विकास आ किछु स्थानपर समाधानक सरल आदर्शीकरण एकर कलात्मक सीमा बनैत अछि। इतिहास-विवेचन साहित्य अकादेमीक प्रकाशन-अभिलेख, बाल साहित्य पुरस्कार-सूची आ भारतीय विद्यालयी पाठन सम्बन्धी नीतिगत दस्तावेजक संग तुलनात्मक धरातलपर आधारित अछि।

भूमिका : संग्रहक साहित्यिक स्थिति आ आलोचनाक प्रश्न

‘गाम-घर’ शीर्षक पाठककेँ स्थानविशेषक परिचित संसारमे लऽ जाइत अछि, मुदा संग्रहक कथ्य गामक सीमामे बन्द नहि रहैत। गाम लेखकक लेल एक एहन सामाजिक प्रयोगभूमि अछि जतय रीति, प्रतिष्ठा, धन, पारिवारिक आशा, धर्म, सत्ता आ न्याय परस्पर टकराइत अछि। लेखक सतहपर साधारण देखायवला घटनासँ सामाजिक प्रश्न उपजाबैत छथि : श्राद्धक भोज कतय धरि श्रद्धा अछि आ कतयसँ प्रतिष्ठा-प्रदर्शन? बरक गाछक पूजन पर्यावरण-चिन्ता आ धार्मिक रूढ़िक बीच कोन अर्थ बनबैत अछि? ग्राम-पंचायतमे स्त्रीक नेतृत्वक वास्तविक बाधा की अछि? लोकतन्त्रक भाषा आ सत्ता-व्यवहारमे कतेक अन्तर अछि?

कृतिक उपशीर्षक “मैथिली कथा एवं निबन्ध संग्रह” अछि। तेँ एकरा शुद्ध बालकथा-संग्रह मानब विधागत भ्रम होयत। कथात्मक प्रसंगक संग विचारप्रधान गद्य मिश्रित अछि; एहि मिश्रणसँ सामाजिक हस्तक्षेप तीव्र बनैत अछि, यद्यपि कखनहुँ कथा स्वयं निबन्धक वाहक बनि जाइत अछि। लेखकक ‘दू शब्द’मे गाम-घरक ओझापन, जातीय भेदभाव, सामाजिक कुरीति आ चक्रचालिकेँ रचनात्मक प्रयोजनक रूपमे राखल गेल अछि। आरम्भिक मंगलकामनामे नरेंद्र झा कथाक व्यंग्यात्मकता, ‘शंकरक खोज’क सामाजिक आशय आ अन्तक दुई रचनाक बालकथात्मकताक चर्चा करैत छथि। एहि दू परिपाठकेँ पाठसँ मिला देखला पर संग्रहक आन्तरिक गठन स्पष्ट होइत अछि।

एहि निबन्धक प्रश्न ई नहि जे प्रत्येक प्रसंग आधुनिक लघुकथाक कसौटीपर पूर्ण अछि कि नहि। मूल प्रश्न ई अछि जे सामाजिक सुधारक आकांक्षा साहित्यिक दृश्य, संवाद आ घटना बनिकय कतय सफल होइत अछि, आ कतय विचारक प्रत्यक्ष घोषणा बनिकय रहि जाइत अछि। बाल-साहित्यक इतिहास एहि मूल्यांकनमे एकटा तुलनात्मक कसौटी अछि; समस्त कृतिक गलत विधा-निर्धारण नहि।

कृतिपरिचय आ रचना-अनुक्रम

आवरण पर पुस्तकक नाम ‘गाम-घर’, विधा ‘मैथिली कथा एवं निबन्ध संग्रह’ आ लेखक ‘नन्द कुमार मिश्र’ मुद्रित अछि। आरम्भिक प्रकाशकीय विवरणमे श्रीमती अमल देवी आ श्रीमती शान्ता भूषण (भीखनपुर, भागलपुर) केर नाम, तथा मुद्रणमे आशा प्रिन्टिंग प्रेस, तिलकामांझी, भागलपुर अंकित अछि। लेखकक ‘दू शब्द’ पर २६.११.०४ केर तिथि अछि; ई लेखकक निवेदनक तिथि अछि, पुस्तकक निश्चित प्रकाशन-वर्षक पर्याय नहि। पश्चावरण पर लेखकक पूर्व प्रकाशित ‘विद्यार्थी’क २५.०४.२००४ केर उल्लेख भेटैत अछि। एहि कारण ‘गाम-घर’क प्रकाशन-वर्षकेँ ओहि मितिसँ अनुमानित कऽ निश्चित घोषित करब उचित नहि।

मूल अनुक्रमणिका कुल पन्द्रह रचना दर्शबैत अछि, जे मुद्रित कथा-पृष्ठ १ सँ ९९ धरि पसरल छथि। रचनाक क्रम आ पृष्ठ-सीमा निम्न प्रकार अछि। एहि क्रमसँ ईहो स्पष्ट होइत अछि जे अन्तक तीन रचना विशेष रूपसँ दृष्टान्तप्रधान अछि।

कथाकेंद्री दृष्टि : ग्राम, परिवार, धर्म आ सत्ता

संग्रहमे “गाम” कौनो अपरिवर्तनीय, निश्चिन्त सांस्कृतिक इकाइ नहि। एतय पड़ोसीक देखादेखी खर्च बढ़ैत अछि; किसानक आजीविका प्रतिष्ठाक प्रदर्शनमे व्यय होइत अछि; जाति-आधारित दूरी धार्मिक व्यवहारक आड़मे ठाढ़ रहैत अछि; स्त्री सार्वजनिक निर्णय-क्षेत्रमे प्रवेश करय चाहैत छथि; आ राजनीति गामक सम्बन्धमे विष घोलैत अछि। लेखक आर्थिक विषमताकेँ केवल आमदनीक अन्तर नहि, अपितु लोक-व्यवहारमे प्रतिष्ठा आ अधिकारक असमान वितरणक रूपमे देखबैत छथि। एहि दृष्टिसँ संग्रहक केन्द्रीय विचार ‘नैतिक अर्थनीति’ कहल जा सकैत अछि—समाज धन केना खर्च करैत अछि, कोन खर्चकेँ प्रतिष्ठा मानैत अछि आ केकर पर ओहि व्ययक भार पड़ैत अछि।

कथक प्रायः घटनाक पहिने सामान्य सामाजिक स्थिति कहैत छथि, फेर एकटा परिवार, पात्र वा संवादक सहारे तकर उदाहरण दैत छथि। एहि क्रमसँ पाठक तुरन्त मुद्दासँ परिचित भऽ जाइत छथि। मुदा एतबे संरचना बहुत बेर कथा-संकेत, प्रसंग-विकास आ पूर्वनिर्धारित निष्कर्षक रूप धऽ लैत अछि। पात्रक क्रियाक स्वतन्त्र अवकाश कम रहि जाइत अछि। एकर प्रभाव ई अछि जे पुस्तक लोकशिक्षणक रूपमे सुलभ अछि, पर गहन मनोवैज्ञानिक अन्वेषणक कसौटीपर ओकर उपलब्धि असमान अछि।

पन्द्रह रचनाक पृथक पाठविश्लेषण

‘बाबाक भोज’ : मृत्यु-संस्कार आ सामाजिक प्रदर्शन

कथा फेकू बाबाक मृत्यु-सूचनासँ खुलैत अछि आ ग्रामसमुदायक प्रतिक्रिया ओकर कथात्मक पृष्ठभूमि बनैत अछि। आरम्भे मृतकक पारिवारिक हैसियत, संसाधन आ सामुदायिक प्रतिष्ठाक संकेत देल गेल अछि। अन्तिम भागमे श्राद्धक भोजक भव्य आयोजन, व्यंजनक बहुलता, बाहरी भीड़, अव्यवस्था आ धनक क्षय पाठकक सोझाँ अबैत अछि। बाहरी वैभव आ अन्तर्निहित अपव्ययक विरोध कथा-व्यंग्यक केन्द्र अछि।

महत्त्वपूर्ण ई अछि जे भोज केवल पारिवारिक घटना नहि रहैत; समाजक अदृश्य दबाव ओकर आकार तय करैत अछि। कथा प्रश्न करैत अछि जे लोकक देखादेखी कयल व्यय मृत व्यक्तिक सम्मान अछि अथवा जीवित परिवारक प्रतिष्ठा-स्पर्धा। लेखकक प्रत्यक्ष टिप्पणी कखनहुँ अन्तर्निहित व्यंग्यकेँ कम सूक्ष्म बनबैत अछि, मुदा दृश्यात्मक विवरण अर्थहीन खर्चक सामाजिक मनोविज्ञान स्पष्ट करैत अछि।

‘डबडबायल आँखि’ : स्मृति, पीढ़ी आ बदलैत संस्कार

कथावाचक पुरान गामक परिचित संस्कारक स्मरणसँ प्रसंग उठबैत छथि। लाल भैया-सँ जुड़ल सम्बन्ध आ बदलैत आचरणक तुलना कथा-भावनाक आधार बनैत अछि। शीर्षकक डबडबायल आँखि केवल करुणाक सजावटी प्रतीक नहि, बल्कि स्मृति आ वर्तमानक बीच नैतिक दूरीक सूचक अछि। एक दिशि पुरान आत्मीयता आ सामुदायिक सलंग्नताक स्मरण अछि; दोसर दिस नब सामाजिक व्यवहार पर अविश्वास आ क्षोभ।

लेखकक कथा-विधि स्मृतिमूलक अछि। अतीतक आदर्शीकरणक खतरा एतय मौजूद अछि : पुरान सामाजिक व्यवस्था स्वयं समानतामूलक छल, एहन निष्कर्ष बिना शर्त स्वीकार्य नहि। तथापि कथाक मूल संवेदना ई अछि जे सामाजिक परिवर्तनक मूल्यांकन केवल बाह्य सुविधा या वस्तुगत वृद्धि सँ नहि, आपसी सम्मान आ भावनात्मक जिम्मेदारी सँ सेहो होयबाक चाही।

‘भोरक सपना’ : जाति-व्यवस्था, पूजा आ कल्पित सामाजिक समानता

रचनाक आरम्भ भोरमे देखल गेल सपनक अनिश्चितताक चर्चासँ होइत अछि। गामक ब्रह्म-पूजामे समुदायकेँ जोड़बाक प्रसंग जातीय दूरीक प्रश्न उठा दैत अछि। “सपना”क साहित्यिक सुविधा लेखककेँ एहन समानतामूलक दृश्य कल्पना करबाक अवसर दैत अछि जे जाग्रत सामाजिक यथार्थमे कठोर अवरोधसँ टकराइत अछि। एहि कारण सपना पलायन नहि, बल्कि वर्तमानक आलोचना करबाक एकटा प्रतिकल्पनात्मक उपाय अछि।

कथाक अन्ततः स्थानीय लोकक मिलिजुलि शिक्षण, वाचनालय आदि सामुदायिक प्रयत्न दिस संकेत करैत अछि। ई रूपान्तरणक सकारात्मक कल्पना अछि, मुदा ओकर सामाजिक कार्यान्वयन कतेक कठिन अछि, ओहि प्रक्रियाक जटिलता अपेक्षाकृत कम खुलैत अछि। एतय लेखक समस्या-विवेचन आ आदर्श समाजक प्रस्तावकेँ एकसंग रखैत छथि।

‘बरक गाछ’ : लोक-आस्था, प्रकृति आ पर्यावरणीय जिम्मेदारी

बरक गाछ कथा-भूमिमे साधारण वनस्पति नहि : व्रत, पूजा, छाँह, विश्राम, बरसाइत आ ग्राम्य मेल-मिलापक केंद्र अछि। प्रथम चरणमे लेखक बरक गाछक सामाजिक-धार्मिक उपयोगक वर्णन करैत छथि; आगाँ संरक्षण आ सामुदायिक सहभागिताक विचार उभरैत अछि। एहि द्वैतसँ गाछक रूपक मात्र धार्मिक चिन्ह नहि, जनजीवनक सार्वजनिक स्थल बनैत अछि।

कथाक एक उपलब्धि ई अछि जे परम्पराकेँ पूर्णतः नकारि नहि दैत, बल्कि ओकर सामाजिक आ पर्यावरणीय उपयोगिता खोजैत अछि। एक सीमा ई जे पूजा-विधान आ वृक्ष-संरक्षणक सम्बन्ध अधिक विवेचित रहैत, तँ रचनाक तर्क आ गाढ़ होइत। ताहूमे गाछक आसपासक सामाजिक दृश्य गामक साझी सांस्कृतिक भूगोलक सार्थक पुनर्स्मरण करबैत अछि।

‘बुटक साग’ : शिक्षा, विवाह आ स्त्रीक विकल्प

एहि कथामे पढ़ाइ जारी रखय चाहनिहार युवतीक विवाह-संबन्धी दबाव प्रमुख समस्या बनि उपस्थित होइत अछि। मायक इच्छा, समाजक राय आ विद्यार्थिनी जीवनक अधूरा रहि जाएबाक सम्भावना एक-दोसरासँ गाँथल अछि। बादक प्रसंगमे शालिनी आ वैवाहिक निर्णय पाठककेँ साधारण घरेलू प्रश्नसँ स्त्रीक स्वनिर्णय आ सम्मानक बड़ प्रश्न धरि अनैत अछि।

“बुटक साग” शीर्षक अपन ग्रामीण घरेलूपनक कारण आकर्षक अछि, मुदा कथा वास्तविक बहस शिक्षा, विवाहक समय आ निर्णयक अधिकार पर केन्द्रित करैत अछि। लेखक शिक्षा-विरोधी परम्परा पर कटाक्ष करैत छथि। आलोचनात्मक दृष्टिसँ देखल जाय तँ पात्रकेँ अधिक आत्मसंवादी अवकाश देल जाय, तँ स्त्री-अनुभवक जटिलता आ स्वतंत्र व्यक्तित्व बढ़ि सकैत छल; एतय परिवर्तनक पक्ष स्पष्ट अछि, पर दृष्टिकोणक विस्तार सीमित।

‘शंकरक खोज’ : पौराणिक कथनसँ वर्गीय आ राजनीतिक प्रश्न धरि

रचना समुद्र-मंथनक पौराणिक प्रसंगसँ शुरू भऽ जहर पान करयवला शंकरक रूपक तक पहुँचैत अछि। ओकर बाद प्रश्न आधुनिक समाजक विष—भ्रष्टाचार, लूट, आर्थिक असमानता, कर्मक्षेत्रक अन्याय, श्रमिक-शोषण आ लोकतान्त्रिक संस्थाक विकार—दिस मुड़ैत अछि। एतय शंकर कौनो निष्क्रिय दैवी समाधान नहि, बल्कि सामूहिक नैतिक साहस आ आत्ममंथनक माँग बनि उपस्थित छथि।

कथाक रूप आधुनिक निबन्धात्मक व्यंग्यक निकट अछि; पौराणिक आरम्भ पाठकक स्मृति सक्रिय करैत अछि, मुदा मध्य आ अन्तमे विमर्शक विस्तार ओकर लघुकथात्मक एकाग्रताकेँ ढीला करैत अछि। तथापि लेखकक महत्त्वपूर्ण कथन ई अछि जे परिवर्तनक लेल बाहरी उद्धारक मात्र नहि, समाजक भीतर सक्रिय जिम्मेदार व्यक्ति चाही। एहि रचनामे ग्रामीण सीमासँ बाहर राष्ट्रीय सामाजिक चिन्ताक अभिव्यक्ति सर्वाधिक स्पष्ट अछि।

‘फेकनी माय’ : स्त्री-नेतृत्व आ पंचायतक लोकतान्त्रिक सम्भावना

फेकनी मायक गरीबी, श्रम आ लोकजीवनक व्यवहारक चित्रसँ कथा शुरू होइत अछि। घरेलू वंचना आ जीविकोपार्जनक कठिनाईक बीच ओकरा ग्राम-पंचायतक नेतृत्वमे आगाँ बढ़ेबाक विचार बनैत अछि। कथा फेकनी मायकेँ दया-पात्र बनाकय नहि छोड़ैत; ओकर जनविश्वास, परिचय आ सामुदायिक समर्थनकेँ राजनीतिक शक्तिक स्रोत बनबैत अछि। ग्रामक शिक्षित आ सामान्य लोक मिलिकय उपेक्षित स्त्रीकेँ सार्वजनिक पद धरि पहुँचबय चाहैत छथि।

एहि प्रसंगक विशेष महत्त्व एहि मे अछि जे लोकतन्त्रक भाषाकेँ जीवित ग्रामसमुदायमे मूर्त करबाक चेष्टा कयल गेल अछि। मुदा संघर्ष अपेक्षाकृत सरल बनि जाइत अछि; सत्ता-संरचनाक बाधा, जाति आ वर्गक अन्तर्विरोध, चुनावी प्रतिस्पर्धाक जटिलता आ निर्वाचित नेतृत्वक बादक प्रशासनिक प्रश्न विस्तारसँ नहि खुलैत। तथापि ई संग्रहक प्रमुख सकारात्मक कथा अछि, कारण स्त्रीक सामाजिक स्थिति परिवर्तनक केंद्र बनैत अछि।

‘कोढ़’ : दहेज, ऋण आ पारिवारिक नैतिकताक विघटन

कथा विवाहक तयारी आ परिवारक आर्थिक अपेक्षासँ सम्बन्धित अछि। कमलेश, विवाह-सम्बन्ध, मांगलिक अवसर आ धनक दबावक सहारे दहेजक सामाजिक हानि सोझाँ अबैत अछि। रचनामे दहेज केवल वस्तुगत विनिमय नहि, बल्कि विश्वासक अपमान आ सम्बन्धक अवमूल्यन बनि जाइत अछि। शीर्षकक “कोढ़” एकटा नैतिक रूपक अछि—व्यक्ति नहि, सामाजिक लोभकेँ रोगक रूपमे चिन्हित करबाक प्रवृत्ति।

पाठककेँ एहि कथा सँ ई विचार भेटैत अछि जे विवाहक गरिमा केनाकय लेनदेनक तर्कसँ भ्रष्ट होइत अछि। कथाकेँ उपदेशात्मक निष्कर्ष सँ अधिक पात्रसभक संकोच, भय आ आर्थिक विवशताक अन्तःसंघर्ष देल गेल रहित, तँ अनुभवक घनत्व बढ़ैत। तथापि दहेज-विरोधी तर्क ग्राम्य यथार्थक ठोस परिस्थिति सँ जुड़ल अछि।

‘चक्र–चालि’ : ग्रामीण राजनीति आ सामुदायिक विभाजन

लेखक आरम्भमे राजधानीक राजनीति आ गाम-घरक राजनीति बीच अन्तर चिन्हित करैत छथि। ग्रामक गुटबन्दी, एक-दोसरक विरोध, प्रतिस्पर्धी कर्मकाण्ड आ सामुदायिक आयोजनक राजनीति एहि निबन्धात्मक कथाक मुख्य सामग्री अछि। १९९९ केर नवाह आयोजनक प्रसंग द्वारा लेखक देखबैत छथि जे सामुदायिक धर्मानुष्ठान सेहो प्रतिष्ठा आ समूहगत प्रभुत्वक प्रतिस्पर्धा बनि सकैत अछि।

कथाक कथक स्वयं समुदाय द्वारा झेलल गेल अपमानक प्रसंग उठबैत छथि; एहि आत्मकथात्मक स्वर सँ आलोचना अधिक व्यक्तिनिष्ठ, पर साथे अधिक तात्कालिक बनैत अछि। ‘चक्र–चालि’क एक सीमा ई अछि जे स्थानीय सत्ता-संघर्षक विविध पक्ष बराबर जटिलतासँ नहि खुलैत; लेखकक नैतिक पक्ष स्पष्ट रहैत अछि। ताहूमे ई रचना बतबैत अछि जे सामाजिक विघटन केवल “बड़ राजनीति”क देन नहि, गामक भीतरक दैनिक व्यवहारमे सेहो सक्रिय अछि।

‘स्वाभिमान’ : साधारण नागरिकक प्रतिष्ठा बनाम प्रभावशाली पद

रचना परिचित व्यक्तिसँ संवादक रूपमे आरम्भ होइत अछि। अधिकारी, पुलिस, चिकित्सकीय प्रतिष्ठा आ सामान्य व्यक्ति बीच व्यवहारक विषमता कथा-क्षेत्रमे प्रवेश करैत अछि। निषाद बाबू-सँ सम्बन्धित प्रसंग स्वाभिमानक धारणा स्पष्ट करैत अछि : मान केवल पद, सम्पत्ति वा बाहरी आदेश पालनसँ नहि, बल्कि आत्मसम्मानक अनुभूतिसँ बनैत अछि।

वाचिक कथा-विधि एतय प्रभावशाली अछि; कथक एकटा घटना सुनबैत छथि आ नायक-सदृश व्यक्तिक आत्मसम्मान पर पाठकक ध्यान केन्द्रित करैत छथि। यद्यपि समाधान एक व्यक्ति-विशेषक उदार आ दृढ़ आचरण पर निर्भर बनैत अछि, रचना सामान्य जनक गरिमाक पक्षमे दृढ़ हस्तक्षेप करैत अछि।

‘लूट–तंत्र’ : लोकतन्त्रक भाषिक विडम्बना

शीर्षक स्वयं तीक्ष्ण व्यंग्य अछि : “लोकतन्त्र”क स्थानपर “लूट–तंत्र” सत्ता आ जन-अधिकारक बीच दूरी व्यक्त करैत अछि। गांधीवादी स्वाधीनताक स्मरणसँ आरम्भ भऽ पाठ मतदान, अपराध, भ्रष्टाचार, निरंकुश प्रशासन आ जाति-आधारित राजनीतिक विभाजनक आलोचना करैत अछि। एहि रचनामे अपेक्षाकृत स्पष्ट निबन्धात्मक संरचना अछि; कथानक कम, पर नैतिक-राजनीतिक तर्कक क्रम अधिक।

लेखक मताधिकारकेँ औपचारिक अधिकारसँ बेसी जन-जवाबदेहीक उपकरण मानैत छथि। कृतिक समयक राजनीतिक चेतनाक साक्ष्यक रूपमे ई महत्वपूर्ण अछि; किन्तु राजनीति-संबन्धी दावाकेँ ऐतिहासिक तथ्य नहि, लेखकक समकालीन आलोचनात्मक दृष्टिकोणक रूपमे पढ़ब उचित अछि। एकर भाषा उग्र नैतिक प्रतिवादक अछि, सन्तुलित राजनीतिक सर्वेक्षणक नहि।

‘दण्ड’ : धार्मिक पुण्यक प्रदर्शन आ नैतिक न्याय

सोनू झा आ मोनू झाक विरोधी स्वभावक सहारे कथा धर्मक बाहरी आचरण आ वास्तविक करुणाक भेद उठबैत अछि। एक पात्र सरल, सहयोगी आ उदार; दोसर धार्मिक आडम्बरक संग आत्मकेन्द्रित व्यवहार करैत अछि। रचनाक अन्तमे ‘दण्ड’क धारणा प्रत्यक्ष प्रतिशोधक कथा नहि, बल्कि नैतिक आ आध्यात्मिक परिणामक बोध बनैत अछि।

दुइ विपरीत पात्रक व्यवस्था लोकदृष्टान्तक परिचित शिल्प अछि, जाहिमे पात्रसभक मानवीय जटिलता घटि जाइत अछि जाहिसँ मूल सीख स्पष्ट भऽ सकय। एहि रचनाकेँ बालोपयोगी नैतिक आख्यानक एक सीमा तक निकट मानल जा सकैत अछि; मुदा एकर न्यायबोध धार्मिक आ नैतिक धारणासँ गाँथल अछि, वैज्ञानिक सत्यापनक प्रश्न नहि।

‘उनटा चालि’ : ठगी, पंडितक सरलता आ चेतावनीमूलक दृष्टान्त

एकटा विद्वान, किन्तु व्यवहारमे सरल पंडितजीक परिचय देकर कथा शुरू होइत अछि। किछु ठग हुनक सहजता, सामाजिक प्रतिष्ठा आ परिस्थितिजन्य असावधानीक लाभ उठाबैत छथि। घटनाक क्रममे कथित बुद्धिमत्ता आ वास्तविक व्यावहारिक विवेकक बीच अन्तर स्पष्ट होइत अछि। शीर्षक “उनटा चालि” अन्यायपूर्ण चालबाजी आ उलटल परिस्थिति दुनूक संकेत बनैत अछि।

लोककथाक परिचित धोखा-प्रसंगक सहायता सँ ई कथा हास्य आ सावधानीक पाठ एकसंग दैत अछि। बालक पाठक लेल एकर आकर्षण घटनाक उलटफेरमे अछि। मुदा लेखक पात्रक वर्ग-चित्रण आ नैतिक निष्कर्षकेँ सरल करैत छथि; एहन रचनाकेँ सामाजिक यथार्थक प्रत्यक्ष दस्तावेज बुझबाक बदला लोक-शिक्षणक विनोदी कथा मानब अधिक उपयुक्त अछि।

‘घोड़ीक अण्डा’ : असम्भव वस्तुक कारोबार आ विश्वासक ठगी

मटुरवा नामक शैतान-स्वभावक छोड़ा आ बूढ़ व्यक्ति बीचक हास्यपूर्ण सम्पर्कसँ कथाक गति बनैत अछि। असम्भव “घोड़ीक अण्डा”क कल्पना भोले विश्वास आ धूर्त व्यापारिक इच्छाक टक्कर बनबैत अछि। पाठक आरम्भसँ जानैत छथि जे एहन अण्डा असम्भव अछि; एहि कारण कथा “की होयत?”क अपेक्षा “विश्वास केना ठगल जाइत अछि?”क रुचि जगबैत अछि।

रचनाक अन्तमे समुदाय धूर्तताक पर्दाफाशक चर्चा करैत अछि आ उपभोक्ताक सावधानीक संकेत उभरैत अछि। बाल-साहित्यक दृष्टिसँ ई संग्रहक सर्वाधिक स्वाभाविक रचना मे एक अछि : कथानक छोट, वस्तु रोचक, संवाद स्पष्ट, हास्य सहज। तथापि व्यंग्यक उग्रता आ दण्डक भाषा कखनहुँ बाल-मनक अनुकूल संवेदनशील पुनर्पाठ माँगि सकैत अछि।

‘शेरक आतंक’ : पशु-रूपकमे निरंकुश सत्ता

सघन जंगलमे शेर आ अन्य पशुक सम्बन्ध शक्तिक असन्तुलनसँ निर्धारित अछि। अत्याचारी शेरक आतंकसँ त्रस्त प्राणी सामूहिक उपाय सोचैत छथि; रचना आगाँ चुनाव, पक्ष, मत आ सत्ता-परिवर्तनक रूपकमे विकसित होइत अछि। पशु-जगतक दृश्य पाठककेँ आकर्षित करैत अछि, किन्तु एकर राजनैतिक आशय वयस्क समाजक सत्तासंघर्षक आलोचना सँ सोझाँ सम्बद्ध अछि।

एहि कथामे लोककथात्मक फेबल आ राजनीतिक व्यंग्यक सफल सन्धि देखबा लेल भेटैत अछि। बालपाठक पशुपात्रक संग कथा ग्रहण कऽ सकैत छथि, आ प्रौढ़ पाठक भ्रष्ट नेतृत्वक संरचनात्मक आलोचना पढ़ि सकैत छथि। अन्तमे निरंकुश सत्ता फेर रूप बदलि सकैत अछि, ई सम्भावना जटिल नैतिक प्रश्न बनबैत अछि—शासक बदलनासँ मात्र शोषण समाप्त होइत अछि कि संस्थागत सजगता सेहो चाही? एहि खुलल राजनीतिक अर्थक कारण ई रचना संग्रहक अन्तमे प्रभावशाली स्थान लैत अछि।

मूल पाठक संक्षिप्त उद्धरण : भाषिक साक्ष्य आ आलोचनात्मक अर्थ

नीचाँक उद्धरण मूल पुस्तकमे मुद्रित पृष्ठ-संख्याक अनुसार देल गेल अछि। प्रत्येक उद्धरण ओहि स्थानक स्पष्ट पठनीय मुद्रित शब्द धरि सीमित राखल गेल अछि; एतय पुनर्निर्मित, अनुमानित वा संदिग्ध पाठ उद्धृत नहि अछि। उद्धरणक पछाति देल टिप्पणी आलोचनात्मक अर्थ-विवेचन अछि, मूल पाठक हिस्सा नहि।

1. “पता लागल जे फेकू बाबा स्वर्गवासी भय गेलाह।” — ‘बाबाक भोज’, पृ. १

मृत्यु-सूचना सँ सामुदायिक सामाजिक नाटकक आरम्भ; असाधारण घटना नहि, साधारण गामक खबर व्यंग्यक द्वार खोलैत अछि।

2. “लोक कहैत अछि जे भोरक सपना सच होइत अछि मुदा हमरा विश्वास नहि भेल।” — ‘भोरक सपना’, पृ. १५

सपनाक सत्यक प्रश्न कथकक संशय आ सामाजिक यथार्थक असमानताकेँ एकसंग खोलैत अछि।

3. “मुदा बरक गाछक अपन अलग महत्व अछि।” — ‘बरक गाछ’, पृ. २३

एहि सानो वाक्यमे गाछक जैविक रूपसँ आगाँ लोकजीवनक सामुदायिक अर्थ निहित अछि।

4. “एकटा पंडितजी छलाह। प्रकांड विद्वान आ कर्मकाण्डी सेहो रहथि।” — ‘उनटा चालि’, पृ. ८७

व्यक्तिक विद्वत्ता आ व्यवहारिक विवेकक अन्तर पर ठग-कथाक आरम्भिक नाटकीय व्यंग्य।

5. “ई घोड़ीक अण्डा छियैक।” — ‘घोड़ीक अण्डा’, पृ. ९१

असम्भव दावाक हास्य कथामे विश्वास आ छलक सम्बन्धक मुख्य सूत्र।

6. “एकटा बहुत पैघ आ सघन जंगल छल।” — ‘शेरक आतंक’, पृ. ९५

लोककथात्मक अवकाश निर्मित कर राजनीतिक पशु-रूपकक प्रवेश।

उद्धरणक चयनक सीमा जानि-बुझि छोट राखल गेल अछि : पूर्ण प्रसंगकेँ अर्थ-व्याख्याक माध्यमसँ प्रस्तुत कयल गेल अछि, विस्तृत मूल पाठ प्रतिलिपि कयल नहि गेल। एहि सँ लेखकक भाषिक स्वर, मुद्रित पृष्ठ-सन्दर्भ आ आलोचनात्मक विवेचनक बीच स्पष्ट अन्तर बनल रहैत अछि।

भाषा, वाचिकता, कथाशिल्प आ सौन्दर्यबोध

संग्रहक प्रमुख शैली प्रत्यक्ष सम्बोधन आ बोलचालक निकट भाषिक लय अछि। “हम देखलहुँ”, “ओना तँ”, “मुदा” आ “जखन कि” सन वाक्य-विन्यास कथककेँ पाठकक संग संवादमे रखैत अछि। कहावत-जेकाँ परिचित निर्णयात्मक वाक्य, ग्रामीण अर्थव्यवहारक शब्द, भोज-भातक प्रसंग, पंचायत-चुनाव आ घर-आँगनक दृश्य मिलिकय स्थानीय अनुभवकेँ भरोसेमन्द बनबैत अछि। एहि सुलभताक कारण सामाजिक प्रश्न जटिल होइतहुँ कथा दूरस्थ नहि होइत।

संरचनागत दृष्टिसँ पहिल छह-सात रचनामे घटना, स्मृति, घरेलू संवाद आ सामुदायिक व्यवहारक अनुपात बदलैत रहैत अछि। ‘शंकरक खोज’ आ ‘लूट–तंत्र’मे निबन्धक प्रधानता स्पष्ट अछि; ‘उनटा चालि’ आ ‘घोड़ीक अण्डा’मे घटनाक अनुक्रम आ विडम्बनापूर्ण मोड़ कथाक केन्द्र बनैत अछि; ‘शेरक आतंक’ पशु-रूपक द्वारा राजनीतिक सन्देश पहुँचबैत अछि। एहि विविधताकेँ पुस्तकक कमजोरी मात्र नहि, ओकर विधागत आत्मपरिचय ‘कथा एवं निबन्ध’क एक प्रामाणिक संकेत मानल जा सकैत अछि।

रचनाक नैतिक वाक्य बहुत बेर पाठककेँ अर्थ खोजबाक स्वाधीनता कम दैत अछि। पात्रक अस्पष्टता, मनोवैज्ञानिक द्वन्द्व, बहुअर्थी प्रतीक आ अनिश्चित अन्त आधुनिक कथा-सौन्दर्यक जे साधन छथि, हुनक उपयोग सीमित अछि। एकर बावजूद व्यंग्यक व्यावहारिक ऊर्जा उल्लेखनीय अछि : लेखक छोटी घटना सँ सामाजिक संस्थाक आलोचना गढ़ैत छथि आ अनेक कथा पाठककेँ आचरणपर विचार करबा लेल बाध्य करैत अछि।

मैथिली बाल-साहित्यक इतिहासमे कृतिक स्थान : तुलनात्मक अनुशीलन

लोककथा, पाठक-वर्ग आ विधाक समस्या

बाल-साहित्यक इतिहास लिखैत पहिल अंतर स्मरणीय अछि : बालककेँ पढ़ाओल जा सकयवला प्रत्येक रचना आवश्यक रूपसँ बालक लेल लिखल नहि होइत अछि। लोक-आख्यान, पशु-दृष्टान्त, नीतिकथा आ सामाजिक व्यंग्य परस्पर लग छथि, मुदा हुनका बीच पाठकक आयु, अनुभव, भाषा, कथात्मक जटिलता आ रचनाक मूल प्रयोजनक अन्तर रहैत अछि। ‘गाम-घर’ एहि अर्थमे संक्रमणशील संग्रह अछि। ‘बाबाक भोज’, ‘कोढ़’, ‘स्वाभिमान’ आ ‘लूट–तंत्र’ प्रौढ़ सामाजिक जीवनक आर्थिक-संस्थागत प्रश्न उठबैत अछि। ‘उनटा चालि’, ‘घोड़ीक अण्डा’ आ ‘शेरक आतंक’मे लोकदृष्टान्तक सहज विनोद आ रूपक बालपाठकीय प्रवेशक अनुकूल अछि।

रचनाक प्रकाशकीय आरम्भक मंगलकामना सेहो एहि भेदक पुष्टि करैत अछि : ओतय अन्तक किछु रचनाक बालकथात्मक स्वरूपक संकेत अछि, समस्त पुस्तककेँ बालसंग्रह घोषित करबाक आग्रह नहि। एकर सही साहित्येतिहासिक स्थान मैथिली सामाजिक-व्यंग्यक भीतर एहन कथाभूमिक रूपमे अछि जाहिसँ बालोपयोगी दृष्टान्तक दिशा निकलैत अछि।

१९९०क दशकक बहुभाषिक बालपाठ सँ स्थानीय कथा धरि

साहित्य अकादेमीक मैथिली प्रकाशन-सूची बतबैत अछि जे १९९०क दशकसँ बाल-साहित्यक लेल मूल मैथिली कथा आ अन्य भाषाक अनुवाद दुनू दिशामे पुस्तक उपलब्ध कराओल जाइत रहल। उदाहरणार्थ जयंत नार्लीकरक विज्ञान-कथाक सुरेश्वर झा कृत अनुवाद ‘अंतरिक्ष में विस्फोट’ (१९९६), ‘रवींद्रनाथक बाल साहित्य’क उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ कृत अनुवाद (१९९७), लीलावती भागवतक मराठी कथा ‘जंगलमे एक रात’क अनुवाद (१९९८), आ चंद्रनाथ मिश्र ‘अमर’ सम्पादित मूल मैथिली कथा-संचयन ‘कथा किसलय’ (१९९९) केर प्रकाशन-अभिलेख उपलब्ध अछि। लक्ष्मीनाथ बेजबरूआक असमिया कथासँ ‘ओ बाबा : की बउआ’ (अनुवाद गोविंद झा, २०००) सेहो एहि सूचीमे अछि।

एहि प्रकाशित अभिलेखसँ एकटा सीमित, किन्तु ठोस निष्कर्ष निकलैत अछि : मैथिली बालपाठक लेल विज्ञान, अनूदित लोककथा, रवीन्द्र-साहित्य आ मूल मैथिली रचनाक समवर्ती प्रयत्न छल। एकर तुलना ‘गाम-घर’क अन्तिम आख्यानसँ करैत काल ज्ञात होइत अछि जे मिश्रक बालोपयोगी कथा विज्ञान-आधारित जिज्ञासाक अपेक्षा लोकदृष्टान्त, नैतिक प्रश्न आ सामाजिक व्यंग्यक परम्परा सँ जुड़ैत अछि। ई तुलना प्रकाशन-वर्ष आ विधा-श्रेणी पर आधारित अछि; उपर्युक्त पुस्तकसभक सम्पूर्ण पाठक तुलनात्मक प्रत्यक्ष विश्लेषण एहि आलेखक दावा नहि।

२०१०–२०२५ : मान्यताप्राप्त बालविधाक विस्तार

साहित्य अकादेमीक आधिकारिक मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार-सूची (२०१०–२०२५) बाल-साहित्यक विधागत विविधताक प्रमाण दैत अछि। २०१०मे तारानन्द वियोगीक ‘ई भेटल तन कि भेटल’ (कथा), २०११मे मायानाथ झाक ‘जकर नारी चतुर होइ’ (कथा), २०१२मे मुरलीधर झाक ‘पिलपिलहा गाछ’ (कथा), २०१३मे धीरेन्द्र कुमार झाक ‘हमरा बीच विज्ञान’ (निबन्ध), २०१४मे जीवकान्तक ‘हमर अठन्नी खसलै वन मे’ (कविता), २०१५मे रामदेव झाक ‘हंसनि पान आ बजन्ता सुपारी’ (उपन्यास), २०१७मे अमलेन्दु शेखर पाठकक ‘लालगाछी’ (उपन्यास), २०१८मे वैद्यनाथ झाक ‘खिस्सा सुनु बाउ’ (कथा) आ २०१९मे ऋषि बशिष्ठक ‘ई फूलक गुलदस्ता’ (कथा) सूचीबद्ध छथि।

बादक क्रममे २०२०मे सियाराम झा ‘सरस’क काव्य, २०२१मे अनमोल झाक कविता, २०२२मे वीरेन्द्र झाक ‘उड़न-छू’ (कथा), २०२३मे अक्षय आनन्द ‘सन्नी’क कविता ‘ओल कतरा, झोल कतरा’, २०२४मे नारायणजीक ‘अनार’ आ २०२५मे मुन्नी कामतक ‘चुक्का’ सम्मिलित अछि। एहि आधिकारिक नामावलीसँ एतबे सिद्ध होइत अछि जे कथा, कविता, उपन्यास, जीवनी आ विज्ञान-निबन्ध बाल-साहित्यक मान्य सृजन-क्षेत्र बनल। पुरस्कार-सूचीकेँ बाल-साहित्यक सम्पूर्ण इतिहास, गुणवत्ताक एकमात्र मापदण्ड अथवा अन्य रचनाक अनुपस्थितिक प्रमाण मानब अनुचित होयत।

‘गाम-घर’ एहि पछिला संस्थागत परिदृश्यसँ पहिनुका सामाजिक बोधक एकटा अनोखा सेतु प्रस्तुत करैत अछि : एके संग्रहमे वयस्क सामाजिक विवेचन आ बालसुलभ दृष्टान्तक संयोग। ‘घोड़ीक अण्डा’ हास्यक कारण सहज बालोपयोगी अछि, जबकि ‘शेरक आतंक’क चुनावी रूपक उच्चतर आयु-वर्ग वा शिक्षकक मध्यस्थतासँ अधिक सार्थक भऽ सकैत अछि। एहि विभाजनकेँ आयु-श्रेणीकरणक शाश्वत नियम नहि, पाठकीय उपयोगिताक विवेकपूर्ण प्रस्ताव मानल जाय।

मातृभाषा, चित्र आ स्थानीय अनुभव : शैक्षिक कसौटी

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा, बुनियादी अवस्था (२०२२), स्थानीय संस्कृति सँ जुड़ल कथा-गीत, मातृभाषाक पाठ्य-सामग्री, आयु-अनुरूप कथाचयन, चित्र-सहायक पठन आ विविध बोलिक प्रतिष्ठाक महत्त्व पर बल दैत अछि। एहि नीतिगत कसौटीपर ‘गाम-घर’क गाम-घरक परिचित भाषा आ लोकदृष्टान्त उपयोगी सामग्री बनि सकैत अछि; मुदा मुद्रित स्वरूप मुख्यतः दीर्घ गद्यक अछि, चित्रित आरम्भिक पाठक-पुस्तकक नहि। बालपाठक लेल चुनिन्दा कथा, कठिन शब्दक सहायता, दृश्यात्मक प्रस्तुति, संवादोत्तर प्रश्न आ भिन्न आयु-वर्ग अनुकूल सम्पादन आवश्यक भऽ सकैत अछि।

उदाहरणार्थ ‘घोड़ीक अण्डा’क संक्षिप्त नाट्यरूपान्तरण पाठककेँ अफवाह आ प्रमाणक अन्तर बुझा सकैत अछि। ‘शेरक आतंक’ लोकतन्त्र, बहुमत आ नागरिक जिम्मेदारी पर संवादक आधार बनि सकैत अछि। ‘फेकनी माय’ लिंगसमानता आ ग्राम-शासन पर उच्चतर कक्षामे विमर्श सम्भव बनबैत अछि। एहि प्रस्तावसभकेँ मूल रचनाक अर्थसँ अलग नव कथ्य मानल जाय, लेखक द्वारा निर्मित शैक्षिक उपकरण नहि।

समग्र मूल्यांकन : उपलब्धि, अन्तर्विरोध आ आलोचनात्मक सीमा

कृतिक मुख्य उपलब्धि सरल मैथिलीमे सामाजिक अनर्थक पहिचान करब आ ओकरा कथा-स्थितिक माध्यमसँ साझा बहस बनायब अछि। ‘बाबाक भोज’मे खर्चक प्रताप, ‘भोरक सपना’मे जाति-उन्मूलनक कल्पना, ‘बुटक साग’मे विवाह-शिक्षाक द्वन्द्व, ‘फेकनी माय’मे स्त्रीक नेतृत्व, ‘कोढ़’मे दहेज-विरोध, ‘लूट–तंत्र’मे लोकतन्त्रक विडम्बना आ ‘शेरक आतंक’मे निरंकुश सत्ताक प्रतीकात्मक प्रस्तुति एक-दोसरासँ सम्बन्धित नैतिक प्रश्नक शृंखला बनबैत अछि। लेखकक सामाजिक प्रतिबद्धता इन रचनासभमे निरन्तर उपस्थित अछि।

द्वितीय उपलब्धि विधागत मिश्रण अछि। कथा, संस्मरणात्मक कथन, सामाजिक निबन्ध, धार्मिक दृष्टान्त, लोकहास्य आ पशुकथा एके संग्रहमे छथि। एहि बहुविधता सँ अलग-अलग पाठक-समूहक प्रवेश सम्भव अछि। विशेषतः अन्तिम तीन रचनामे स्थानीय कथोपकथन आ लोकप्रचलित विनोद सामाजिक व्यवस्था पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी करैत अछि।

सीमासभ सेहो स्पष्ट अछि। अनेक स्थानपर कथक घटना सँ पूर्वे निष्कर्ष बता दैत छथि; फलतः पात्रक स्वाधीनता सीमित आ कथात्मक कौतूहल क्षीण होइत अछि। सामाजिक समस्याक समाधान कखनहुँ आदर्श पात्रक सदाशयता वा सामुदायिक एकमततापर अत्यधिक निर्भर अछि। स्त्री-पात्रक समर्थक प्रस्तुति रहितहुँ ओकर आन्तरिक अनुभवक सूक्ष्म अन्वेषण अपेक्षाकृत कम अछि। राजनीतिक विवेचनमे तीक्ष्ण व्यंग्य कतिपय स्थानपर विश्लेषणक बहुपक्षीयता पर भारी पड़ैत अछि। इएह कारण एहि संग्रहकेँ सैद्धान्तिक आख्यान नहि, सामाजिक हस्तक्षेपक कथात्मक पुस्तक कहब अधिक सटीक होयत।

मुद्रित पुस्तकक स्थानीय प्रकाशन-विवरण, समर्पण, मंगलकामना आ आत्मीय ‘दू शब्द’ ओकर सांस्कृतिक वातावरणक प्रमाण छथि। ई कृति केवल पृथक कथासभक योग नहि; एक लेखकक समाज-सम्बद्ध नैतिक चेतनाक संगठित अभिव्यक्ति अछि। तखन साहित्यिक इतिहासमे एकर स्थान निर्धारित करैत समय क्षेत्रीय अनुभव आ कलात्मक रूपदृष्टि दुनूकेँ समान महत्व देब आवश्यक अछि।

निष्कर्ष

नन्द कुमार मिश्रक ‘गाम-घर’ मिथिलाक सामाजिक जीवनक ओहि बिन्दु पर केन्द्रित अछि जतय परम्परा, आधुनिक अधिकार-बोध आ सामुदायिक नैतिकता लगातार मोलभाव करैत अछि। संग्रहक कथामे ग्राम्य अनुभव अपन स्थानीय रङ्ग बनौने रहैतो राष्ट्रीय सामाजिक समस्यासँ संवाद करैत अछि। लेखक दोसराक पीड़ा, अपव्यय, लूट, भेदभाव आ अन्यायक विरुद्ध स्पष्ट दृष्टि रखैत छथि; एहि स्पष्टताक कारण अनेक प्रसंग पाठककेँ विचार करबाक सीधा आमन्त्रण दैत अछि।

बाल-साहित्यक दृष्टिसँ एकर स्थान विशेष सावधानीसँ चिन्हित करबाक चाही। सम्पूर्ण ‘गाम-घर’ बाल-साहित्य नहि अछि, किन्तु ओकर भीतर बालोपयोगी दृष्टान्तक सशक्त तत्त्व उपस्थित अछि। ‘उनटा चालि’क ठगी-विवेक, ‘घोड़ीक अण्डा’क हास्यपूर्ण अविश्वसनीय दावा आ ‘शेरक आतंक’क पशु-राजनीति बालपाठकीय पाठ, उच्चतर कक्षा आ प्रौढ़ आलोचना तीनू स्तर पर अलग-अलग सम्भावना दैत अछि। एहि प्रकार ‘गाम-घर’केँ मैथिली ग्राम्य सामाजिक-व्यंग्य आ लोकाधारित बालकथात्मक रूपबीचक सेतु मानब एकर सन्तुलित साहित्यिक मूल्यांकन होयत।