SADEHA — 1

Publication: SADEHA · Issue: 1
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749 विदेह विदेह Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) 'विदेह' १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) एहि अंकमे अछि:- १.संपादकीय संदेश (संगमे पछिला २४ अंकक चुनल सम्पादकीय केर अंश)- २.आद्याचरण झा ३.डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” ४.डॉ.प्रेमशंकर सिंह ५.गंगेश गुंजन ६.महेन्द्र मलंगिया ७.डॉ. रामभरोस कापड़ि “भ्रमर” ८.कमलानन्द झा ९.डॉ. देवशंकर नवीन १०.धीरेन्द्र प्रेमर्षि ११.अनलकान्त १२.रूपा धीरू १३.नूतन झा १४.लक्ष्मी ठाकुर १५.प्रीति ठाकुर १६.ज्योति झा चौधरी १७.कृपानन्द झा १८.अशोक दत्त १९.मनोज झा “मुक्ति” २०.सुभाषचन्द्र यादव २१.शिव प्रसाद यादव २२.पंकज पराशर २३.गजेन्द्र ठाकुर २४.विनीत उत्पल २५.हिमांशु चौधरी २६.रोशन जनकपुरी २७.राजेन्द्र विमल २९.रेवतीरमण लाल ३०.बृखेशचन्द्र लाल ३१.डॉ. रमानन्द झा रमण ३२.प्रेमचन्द्र मिश्र ३३.नवेन्दु झा ३४.जितेन्द्र झा ३५.कुमार मनोज कश्यप ३६.रामलोचन ठाकुर ३७.ब्रज कु. कर्ण ३८.ज्योति प्रकाश लाल ३९.शुशान्त झा ४०.रूपेश कुमार झा “त्योंथ” ४१.अंकुर काशीनाथ झा ४२.प्रीति मिश्र ४३.ओमप्रकाश झा ४४.हृदयनारायण झा ४५.रामाश्रय झा “रामरंग” ४६.प्रकाश झा ४७.पञ्जीकार विद्यानन्द झा ४८.महेश मिश्र “विभूति” ४९.भालचन्द्र झा ५०.विभा रानी ५१.केदारनाथ चौधरी ५२.कृष्णमोहन झा ५३.डॉ रत्नेश्वर मिश्र ५४.शीतल झा ५५.श्याम सुन्दर शशि ५६.निमिष झा ५७.अजित कुमार झा ५८.जितमोहन झा ५९.धर्मेन्द्र विह्वल ६०.वैकुण्ठ झा ६१.कैलास कुमार मिश्र ६२.श्यामल सुमन ६३.दिगम्बर झा “दिनमणि” ६४.नवीननाथ झा ६५.सुभाष साह ६६.शक्ति शेखर ६७.शम्भू कुमार सिंह ६८.शैलेन्द्र मोहन झा ६९.प्रकाश झा ७०.मैथिलीपुत्र प्रदीप ७१.डॉ.पालन झा ७२.तूलिका ७३.मित्रनाथ झा विदेह (दिनांक १ जनवरी २००९) १.संपादकीय (वर्ष २ मास १३ अंक २५) मान्यवर, विदेहक नव अंक (वर्ष २ मास १३ अंक २५) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | ई अक प्रिंट फॉर्ममे सेहो अहाँक समक्ष अछि। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हमारा कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओऽ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे www.videha.com पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका www.videha.co.in पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आऽ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आऽ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आऽ पाठक एके छथि।कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आऽ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आऽ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आऽ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आऽ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आऽ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आऽ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आऽ सातो दिन उपलब्ध होए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होए आऽ जाहिसँ वितरण केर समस्या आऽ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आऽ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आऽ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। पुरान अंक pdf स्वरूपमे डाउनलोड कएल जा सकैत अछि आऽ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आऽ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि। १.संपादकीय चित्र: प्रीति ठाकुर प्रिय पाठकगण, विदेहक नव अंक  ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | एहि अ‍ंकसँ डॉ शम्भु कुमार सिंहक आलेख प्रतियोगी परेक्षार्थीक लेल शुरु कएल गेल अछि। रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्ति एहि महत्वपूर्ण नाट्यवृत्तिक संचालनक भार  मैलोरंग केँ देल गेल । प्रमीला झा मेमोरियल ट्रस्ट,घोंघौर आ ओकर प्रबंध न्यासी श्री श्रीनारायण झा द्वारा । रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्तिक स्थापना प्रथम महिला बाल नाट्य निर्देशक प्रमीला झाक स्मृतिमे भेल अछि । प्रमीला जी जीवन पर्यंत भंगिमा, पटना संग जूड़ि बाल रंगकर्म के बढ़ावा दैत रहलीह । प्रमीलाजीक स्मृति मे स्थापित प्रमीला झा मेमोरियल ट्रस्ट, घोंघौर हुनकर बाल रंगमंच मे अविस्मरणीय योगदानक लेल एहि नाट्यवृत्तिक स्थापना केलक अछि । एकर मूल मे मैथिली रंगमंच पर महिला रंगकर्मीक प्रोत्साहन संग हुनकर सामाजिक सम्मान अछि । एहि नाट्यवृत्तिक संचालनक भार ट्रस्ट द्वारा लोक कलाक लेल समर्पित संस्था मैलोरंग के प्रदान कयल गेल अछि । वर्ष 2006 सँ नियमित रूप सँ ई नाट्यवृत्ति  ज्योति वत्स (दिल्ली), रंजू झा (जनकपुर), स्वाति सिंह (पटना), प्रियंका झा (पटना), वंदना डे (सहरसा) के प्रदान कयल गेल छनि । वर्ष 2008क लेल समूचा मिथिला (भारत+नेपाल) मे चालीस गणमान्य रंगकर्मी/संस्कृतिकर्मी केँ नामक अनुशंसाक लेल पत्र पठाओल गेल छलनि । ओही अनुशंसाक आधार पर प्रथम : मधुमिता श्रीवास्तव (मधुबनी), द्वितीय : वंदना ठाकुर (कोलकाता), तृतीय : नेहा वर्मा (दिल्ली), आ चतूर्थ : विजया लक्ष्मी शिवानी (पटना) अयलीह । किछु पारिवारिक कारण सँ वंदना जी एहि बेर वितरण समारोह मे अयबा सँ असमर्थ भ’ गेलीह  तेँ  ई क्रम बदलि गेल आ वंदना जीक  स्थान अगिला बेरक लेल सुरक्षित राखल गेल अछि । रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्ति-2008 तृतीय :विजया लक्ष्मी शिवानी : पटना शिवानीक जन्म दरभंगाक रसियड़ी गाम मे भेलनि । ई पिछला तीन साल सँ लगातार मैथिली रंगमंच सँ जुड़ल छथि । शिवानी अरिपन, भंगिमा सन चिर-परिचित रंग संस्था सँ जुड़ल छथि । एहि बीच अहाँ नदी गोंगियायल जाय, मिनाक्षी, घुघ्घू, आगि धधकि रहल अछि, से कोना हेतै ?, अलख निरंजन आदि महत्वपूर्ण नाटक मे अभिनय करैत अपन नीक छवि बनेलहु अछि । मनोज मनुज, कौशल किशोर दास आ अरविन्द अक्कू जीक निर्देशन मे काज करैत शिवानीक इच्छा छनि जे  वरिष्ठ रंग निर्देशक कुणाल जीक निर्देशन मे सेहो नाटक करी । वरिष्ठ रंगकर्मी प्रेमलता मिश्र जी सन रंगकर्मी बनबाक हिनक मोन छनि । विजया लक्ष्मी शिवानीजीक कहब छनि जे - समकालीन समस्या मैथिली नाटक मे एयबाक चाही जकर अखन तक कमी अछि । पारिजात हरण हिनकर प्रिय नाटक छनि आ शिवानी नबका तुरिया के कह’ चाहैत छथि जे इमानदारी सँ रंगकर्म करबाक चाही । द्वितीय :नेहा वर्मा :  नई दिल्ली नेहाक जन्म बेगूसरायक न्यू चाणक्य नगर मे भेलैन । ई बच्चे सँ रंगमंच सँ जूड़ल रहलीह अछि । नवतरंग, इप्टा, यात्रीक संग कार्य करैत एखन मैलोरंग दिल्ली सँ रंगकर्म क’ रहल छथि । नेहा अनिल पतंग, परवेज़ यूशुफ, संतोष राणा, विजय सिंह पाल, अभिषेक, मनोज मधुकर आ प्रकाश झाक निर्देशन मे नाटक केलीह अछि । हिनका द्वारा कयल गेल प्रमुख नाटक अछि सामा-चकेवा, जट-जटिन, डोम कछ, गोरखधंधा, काठक लोक, कमल मुखी कनिया, एक छल राजा आदि । आगू लगातार मैथिली रंगमंच सँ जुड़ल रहबाक हिनकर इच्छा छनि । हिनकर प्रिय नाटककार आ निर्देशक महेन्द्र मलंगिया छथिन आ रंजू झा (जनकपुर) क अभिनय हिनका प्रभावित करैत छनि । काठक लोक प्रिय नाटक आ प्रगतिशील सोचक संग बेसी युवा के होबाक कारण मैलोरंग नेहाक मनपसंद रंग संस्था छनि । अपन आत्मसमर्पण आ संस्कारक संग रंगकर्म सँ जुड़बाक हिनकर आग्रह छनि नबका कलाकारक लेल । नेहा सी. सी. आर. टी. द्वारा जूनियर स्कॉलर्शिप प्राप्त कयने छथि । अखन राष्ट्रीय कथक केन्द्र सँ कथक मे पोस्ट डिप्लोमाक संग खैरागढ़ विश्वविद्यालय सँ एम. ए. क’ रहल  छथि । प्रथम : मधुमिता श्रीवास्तव :  मधुबनी मधुमिताक जन्म मधुबनीक सूरत गंज मुहल्लामे भेलनि । बचपने सँ हिनका नृत्य आकर्षित करैत छलनि । विगत दस साल सँ ई मैथिली रंगमंच पर सक्रिय छथि । मधुबनीक इप्टा संग रंगकर्म करैत अहाँ इप्टाक राज्य आ राष्ट्रीय स्तरक महोत्सव मे सेहो शिरकत केने छी संगहि अहाँ सॉंग आ ड्रामा डिभीजन संग सेहो संबद्ध छी । मुकाभिनयक लेल अहाँ इंटर कॉलेज यूथ फेस्टीवल-03 मे तेसर आ वर्ष 06 मे लोक नृत्यक लेल पहील स्थान प्राप्त केने छी । अहाँ ओकरा आङनक बारहमासा, ओरिजनल काम, टूटल तागक एकटा ओर, छुतहा घैल, गोनूक गबाह, दुलहा पागल भ’ गेलै, बिजलिया भौजी, बिरजू-बिलटू संग कतेको हिन्दीक नाटक केने छी । मंचीय नाटक संग नुक्कड़ नाटक मे सेहो मधुमिता बढ़ि चढ़ि क’ भाग लैत रहलीह अछि । झिझिया, झड़नी, जट जटिन डोम कछ एहन कतेको लोक नृत्य, एकल अभिनय, फिल्म सिरियल आदि मे अभिनय क’चुकल मधुमिता  नेहरू युवा केन्द्र, एस.एस.बी संग कतेको संस्था सँ सम्मानित कयल गेल छथि । (आर्काइव- पछिला अक सभक संपादकीय केर संक्षिप्त अंश) एहि प्रथमांक केँ प्रस्तुत करैत हम हर्षित छी। एहि मे मिथिला पेंटिंग आ’ संस्कृत शिक्षासँ संबंधित समग्री समयाभावक कारणे नहि देल जा’ सकल। पाठक एहि संबंधित लेख ggajendra@yahoo.co.in केँ अटैचमेण्टकछथि। 01.01.2008 एहि दोसर अंककेँ प्रस्तुत करैत हम हर्षित छी। एहि मे 1.मिथिला पेंटिंग, 2.रचना लिखबासँ पहिने छन्द,संस्कृत-मैथिलीक ज्ञान आ’ अन्यान्य शिक्षा3.संस्कृत शिक्षाक आ’ 4. ‘बालानाम् कृते’ नामसँ छोट बच्चा संबंधित सामग्री सम्मिलित कएल जा’ रहल अछि। जे मेल सभ प्राप्त भेल ताहि मे oldmani@umainc.com,iipkarna@yahoo.com,jyotiprakash.lal@gmail.comआ’bibhutithakur2000@yahoo.com केर मेल उत्साहवर्द्धक छल आ’ एहिमे किछु महत्त्वपूर्ण सुझाव सेहो प्राप्त भेल। ओहि आधार पर उपरोक्त लिखित चारि स्तंभक अतिरिक्त 5.पंजी-प्रबंध 6.संस्कृत आ’ मिथिला संस्कृत विश्वविद्यालयक प्रासंगिकता आ’ 7.Computers, softwares, interfacing of the old & new (restoring old photographs, songs on disks, tapes, etc) पर सामग्रीक प्रारम्भ कए देल गेल अछि ।अगला अंकसँ संगीत-शिक्षाक आरंभ कएल जायत।पाठक एहि सभसँ संबंधित आ’ अन्यान्य रचना सभ ggajendra@yahoo.co.in केँ अटैचमेण्टक रूपमे .doc, .txt किंवा .pdf फॉर्मेटमे पठाय सकैत छथि। पिछला साल तीन महिना मीराम्बिका आऽ मदर इंटरनेशनलक शिक्षक-शिक्षिकाकेँ संस्कृत संभाषणक शिक्षा देबाक हेतु श्री अरविन्द आश्रम,नव देहली मे हमरा बजाओल गेल छल।ओहि क्रममे जे नोट बनेलहुँ तकरे संस्कृत शिक्षाक अंतर्गत हम दय रहल छी। 15.01.2008 विदेहक एहि अंककेँ प्रस्तुत करैत हम हर्षित छी। ।एहि अंकसँ संगीत-शिक्षाक आरंभ कएल जा रहल अछि। विकीपीडिया पर मैथिली पर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाक स्वीकृति नहि भेटल छल। हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही,आ’ सूचि करैत हर्षित छी जे 27.01.2008 केँ भाषाकेँ विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक, मुदा एहि हेतु कमसँ कम पाँच गोटे,विभिन्न जगहसँ एकर एडिटरक रूपमे नियमित रूपेँ कार्य करथि तखने योजनाकेँ पूर्ण स्वीकृति भेटतैक। नीचाँ लिखल लिंक पर जाय एडिट कय एहि प्रोजेक्टमे अहाँ सभ सहयोग करब, से आशा अछि। पछिला अंकमे देवनागरी कोना लिखू ,एहि पर हम लेख लिखने रही। इंगलिश कीबोर्ड पर ओहि तरहे लिखने विकीमे सेहो मैथिली लिखि सकैत छी। एम. गेरार्डक माध्यमसँ श्री अंशुमन पाण्डेयक, जिनकर मैथिलीक युनीकोडमे स्थानक आवेदन लंबित अछि, अनुरोध भेटल छल, ओ’ सूचना मँगलन्हि जाहि सँ स्पष्ट रूपसँ बंगला लिपि आ’ मैथिली लिपिक मध्य अंतर ज्ञात भय सकय।ई सूचना हम एम. गेरार्डक माध्यमसँ हुनका पठा देलियन्हि। विकीमे पूर्ण स्वीकृतिक हेतु एहि लिंक सभ पर राखल प्रोजेक्टकेँ आँगा बढ़ाऊ। http://meta.wikimedia.org/wiki/Requests_for_new_languages/Wikipedia_Maithili http://incubator.wikimedia.org/wiki/Wp/mai http://translatewiki.net/wiki/MediaWiki:Mainpage/mai http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate?task=untranslated&group=core-mostused&limit=2000&language=mai अपनेक प्रतिक्रिया आ’ रचनाक प्रतीक्षा अछि। 01.02.2008 विश्वक कोन-कोनसँ ई-मेल प्राप्त भेल, आ’ हम आह्लादित भय गेल छी। ई पत्रिका बिना कोनो विलंबक सालक- साल चलैत रहत, से हम अपने लोकनिकेँ विश्वास दैत छी, आ’ ओ’ आबय बला काल सिद्ध करत। चित्रक पौतीकेँ दू भाग कए देल गेल अछि, मिथिलाक खोजमे चित्रकलाक संग पुरातत्त्वक वस्तु सभक आ’ दर्शनीय स्थान सभक संकलन अछि। मिथिला रत्नमे ऐतिहासिक आ’ वर्त्तमान महापुरुषक चित्रक प्रदर्शनी अछि। एहि संकलनकेँ एहिना सहयोग दय बढ़ाऊ। मैथिलीमे एनीमेशनक घोर अभाव अछि, आ’ जौँ कही जे अछिये नहि, तँ झूठ नहि होयत। संगीत आ’ संस्कृत शिक्षा सेहो ध्वन्यात्मक सामग्रीक बिना अपूर्ण लगैत अछि। अहू दुनू दिश हमर प्रयास शीघ्रे जायत, अपने लोकनिसँ तकनीकी सहयोगक आशा करैत छी। हमर इच्छा अछि, जे बालानां कृतेमे देल गेल खिस्साकेँ एनीमेट करी। एनीमेशन आ’ माइक्रोसॉफ्ट एस. क्यु. एल. डाटाबेसमे ज्योति नारायण लालजी,ब्रज कर्ण, मणि ठाकुर आ’ आन पाठक हमरा तकनीकी मदति करताह से हम आशा करैत छी। श्री गंगेश गुंजनक ईमेल आ’ मार्ग निर्देशन प्राप्त भेल, ओ’ अपन रचना पठेबाक आश्वासन सेहो देलन्हि अछि। विद्यानंद जी पञ्जीकार जी अपन निबंध पठेने छथि, से आब बुझना जाइत अछि जे रचनाक भरमार लागय बला अछि। सभटा रचना उच्चस्तरीय रहत आ’ पत्रिका पाक्षिक आधार पर नियमित चलैथ रहत से आशा करैत छी। साइटक खोज सर्च इंजन पर आसानीसँ होय ताहि हेतु किछु विशेष प्रयास कएल गेल अछि। एहि संबंधमे कोनो तकनीकी सुझाव जौँ अपनेक समक्ष होय, तँ से आमंत्रित अछि। अपनेक रचनाक आ’ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। 15/02/08 पिछला पक्षमे हम दरभंगा गेल छलहुँ, अपन भतीजीक विवाहमे। ओतय मिथिला रिसर्च इंस्टीट्युट आ’ संस्कृत विश्वविद्यालयक भ्रमण कएलहुँ।सर्वश्री भीमनाथ झा, मैथिलीपुत्र प्रदीप, रघुवीर मोची(अध्यक्ष,मैथिली अकादमी), विश्वनाथ झा(प्रतिकुलपति का. सि. दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय), देवनारायण यादव( अध्यक्ष, मिथिला रिसर्च इंस्टीट्युट) लोकनिक दर्शनक सुअवसर प्राप्त भेल। फेर बिदेश्वरस्थानसँ आँगा गौरीशंकर स्थान( हैंठी बाली) गेलहुँ, आ’ ओतय पालवंशक मूर्त्ति आ’ ओहि पर मिथिलाक्षरमे लिखल अभिलेखक चित्र खिंचलहुँ(फोटो मिथिलाक खोज स्तंभमे देखू)। ई मूर्ति भव्य अछि, आ’ 1500 वर्ष पूर्व मिथिलाक्षरक प्रभुता देखबैत अछि।एहि पर शोध लेख आँगाक कोनो अंकमे देल जायत। मिथिलाक इतिहासमे एहि स्थलकेँ आइसँ पहिने स्थान नहि देल जा’ सकल छल, आ’ ईहो तथ्य अछि जे इतिहासक विद्वान श्री डी.एन. झा अही गामक छथि, ओना हैठी बाली हमर मामा गाम सेहो छी। 01/03/08 विदेह द्वारा किचुउ पुरान अलभ्य किताबक डिजिटलाइजेशनक कॉर्पोरा सेहो शुरू कएल गेल अछि। पञ्जीक स्कैनिंग आ’ सर्च करबा योग्य डिक्श्नरी जाहिमे पाठक नव-नव शब्द जोड़ि सकताह केर आधार किछु मनोयोगी विदेह कार्यकर्त्ता सभक द्वार शुरू हेल अछि। ई सभटा सभ क्यो नि:शुल्क कए रहल छथि आ’ अपन मातृभाषाक आ’ मातृभूमिक अनुरागी होयबाक प्रमाण दए रहल छथि। 15/03/08 रचना लिखबासँ पहिने.. स्तंभमे मैथिली अकादमी द्वारा निर्धारित भाषाक अंकन कएल गेल अछि,एहिमे विशेष वृद्धि कएल गेल अछि। श्री उदय नारायण सिंह नचिकेता, निदेशक, केन्द्रीय भाषा संस्थान, मैसूर केर मेल प्राप्त भेल आ' ओ' लिखलन्हि जे ओ' एकरा डॉ. श्री बी मल्लिकार्जुनकेँ अग्रसारित कए देलन्हि, जे केन्द्रीय भाषा संस्थान, मैसूरमे भाषा पौद्योगिकी विभागक अध्यक्ष छथि। श्री मल्लिकार्जुनजीक ई-मेल सेहो प्राप्त भेल आ' ओ' लिखलन्हि अछि, जे एकरा कमेटीक समक्ष राखल जायत। बी. मल्लिकार्जुन मैथिली स्टाइल मनुअल बनएबाक कार्यकेँ आगाँ बढ़ा रहल छथि। प्रीति द्वारा कला आ' चित्रकला स्तंभ चित्रित कएल गेल अछि। मिथिलाक रत्नमे साहित्यकारक अतिरिक्त खेलकूद आ’ अन्यान्य विधासँ संबंधित (संगीत,फिल्म,पत्रकारिता,इतिहास,संस्कृत आ’ अंग्रेजी, अर्थशास्त्री,डिप्लोमेट,रजनीतिज्ञ आदि)मिथिलाक विभूतिक चित्र प्रदर्शित अछि। वेबसाइट खोलला अनन्तर विद्यापतिक ‘बड़ सुखसार पाओल तुव तीरे’क वाराणसीक गंगातट पर शहनाइ पर भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान द्वारा बजाओल, आ’ तबला पर किसन महाराज आ’ वायलिन पर श्रीमति एन. राजम द्वारा बजाओल संगीत बाजि उठैत अछि। संपर्क_खोज स्तंभ पर मिथिला आ’ मैथिलीक साइट सभक संकलन/लिंक देल गेल अछि।विदेहक अपन सर्च इंजिनसँ विदेहक नव-पुरान अंककेँ ताकल जा’ सकैत अछि। दोसर सर्च इंजिनसँ मैथिलीक विशेष संदर्भमे संपूर्ण वेबकेँ ताकि सकैत छी।पुरान किताब सभक डिजिटल इमेजिंग विदेह कॉर्पोराक अंतर्गत करबाओल जा’ रहल अछि। वेब सर्चेबल डिक्शनरी जाहिमे पाठक नव-नव शब्द जॉड़ि सकताह केर कार्य सेहो आरंभ कएल गेल अछि। मैथिलीमे बालानांकृतेक एनीमेशन सेहो शुरू कए देल गेल अछि।प्ञ्जीक मिथिलाक्षर आ’ देवनगरीक पत्रक सेहो स्कैनिग शुरू भ’ गेल अछि। ई सभ शीघ्र आर्काइवक अंतर्गत देल जायत।विदेहक पुरान अंक सामान्य pdf फॉर्मेटमे आर्काइवक अंतर्गत राखल गेल अछि। पाठक पाक्षिक पत्रिकाक pdf संस्करण डाउनलोड सेहो कए सकैत छथि।प्रथम पृष्ठ पर देवनागरी टाइप करबाक हेतु किछु सहयोगी लिंक देल गेल अछि। एहि तरहक लिंक पर ऑनलाइन टाइप क’ कॉपी क’ ई-मेल किंवा वर्ड दॉक्युमेंटमे पेस्ट क’ सकैत छी। 01.04.2008 एहि अंकमे नचिकेता अपन 25 सालक चुप्पी तोड़ि नो एंट्री: मा प्रविश नाटक मैथिलीक पाठकक समक्ष विदेह ई-पत्रिकाक माध्यमसँ पहुँचा रहल छथि।धारावाहिक रूँपे ई नाटक विदेहमे ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। श्री गंगेश गुंजन जीक वैचारिक मंथन एहि बेर पाठकक समक्ष अछि। अगिला अंकसँ पाठक हुनकर कविताक वैचारिक रस ल’ सकताह।बालानां कृतेमे ज्योति पँजियारक लोकगाथा प्रस्तुत कएल गेल अछि। 15 अप्रैल 2008 13 मई केँ एहि बेर जानकी नवमी अछि। एहि अवसर पर एहिसँ संबंधित निबंध देल जा' रहल अछि।एहि निबंधक लेखिका छथि श्रीमति नूतन झा। बालानां कृतेमे दानवीर दधीचीक वैदिक स्वरूप प्रस्तुत कएल गेल अछि, अंतमे सूत्रधारसँ ईहो कहबएलहुँ जे कोना बादमे तथाकथित पंडित लोकनि ओहि कथाक बंटाधार कए देलन्हि। मिथिला रत्नमे बैकग्राउन्ड संगीत सेहो अछि, आ' ई अछि विश्ववक प्रथम राष्ट्रभक्त्ति गीत (शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 22, मंत्र 22) जकरा मिथिलामे दूर्वाक्षत आशीश मंत्र सेहो कहल जाइत अछि। 'विदेह' ई पत्रिकाक प्रचार सर्च इंजिन द्वारा, गूगल आ' याहू ग्रुप द्वारा, वर्डप्रेस आ' ब्लॉगस्पॉटमे देलगेल ब्लॉग द्वारा, फेसबुक, आउटलूक, माय स्पेस, ओरकुट आ' चिट्ठाजगतक माध्यमसँ कएल गेल। मुदा जखन डाटा देखलहुँ तँ आधसँ बेशी पाठक सोझे http://www.videha.co.in पता टाइप कए एहि ई-पत्रिकाकेँ पढ़लन्हि। 01 मई 2008 ३ जूनकेँ एहि बेर वट सावित्री अछि। एहि अवसर पर एहिसँ संबंधित निबंध देल जा' रहल अछि।एहि निबंधक लेखिका छथि श्रीमति नूतन झा। बालानां कृतेमे बगियाक गाछ शीर्षक लोककथाकेँ ज्योतिजीक चित्रसँ सुसज्जित कएल गेल अछि। श्री गंगेश गुंजन जीक कविता पाठकक समक्ष अछि। मिथिला रत्नमे बैकग्राउन्ड संगीत सेहो अछि, आ' ई अछि विश्ववक प्रथम राष्ट्रभक्त्ति गीत (शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) जकरा मिथिलामे दूर्वाक्षत आशीश मंत्र सेहो कहल जाइत अछि, एकर अर्थ विदेह आर्काइव स्तंभमे अभिनव रूपमे देल गेल अछि, आ' ग्रिफिथक देल अर्थसँ एकर भिन्नता देखाओल गेल अछि। मुख्य पृष्ठक बैकग्राउन्ड संगीत विद्यापतिक बड़ सुख सार तँ अछिये पहिनेसँ। १५ मई २००८ नचिकेताजीक नाटक  नो एंट्री: मा प्रविश दोसर कल्लोलक दोसर खेप ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। ग‍गेश गुंजन जीक कविता आऽ विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। एहिमे कोनो संदेह नहि जे २०म शताब्दीमे जतेक मिथिला विभूति भेलाह ओहिमे श्री रामाश्रय झा ’रामरंग’ सर्वोपरि छथि। विदेह हेतु हुनकर स्पठाओल संदेशक आधार पर हुनक जीवनी आऽ कृतिकेँ विदेहक संगीत शिक्षा स्तंभमे पाठकक समक्ष अनबामे हमरा सभ गर्व अनुभव कए रहल छी। ०१ जून २००८ ग‍गेश गुंजन जीक कथा आऽ विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। रवीन्द्रनाथ ठाकुर सेहो हैकू लिखलन्हि, मुदा मैथिलीमे जापानी पद्य विधाक आधार पर "विदेह" प्रस्तुत कए रहल अछि ई विधा। १५ जून २००८ २७ जून २००८ केँ साहित्य अकादमी, नई दिल्लीक सभागारमे मैथिली कवि सम्मेलनमे अएबाक नोत विदितजी द्वारा भेटल, से ओतए साँझ छह बजे पहुँचलहुँ। हॉलक सभटा कुर्सी भरल छल, हम आऽ कैमरामेन दू गोटे छलहुँ। नजरि घुमेलहुँ तँ एकटा कुर्सी खाली छल, से कैमरामेनकेँ विदा कए स्वयं कैमरा लए ओतए बैसि गेलहुँ। अमरनाथ माइक पकड़ि घोषणा उद्घोषणा कए रहल छलाह, लागल जेना अशोक चक्रधर हिन्दी छोड़ि मैथिली बाजि रहल छथि। सभसँ पहिने संजीव तमन्ना जीकेँ काव्य-पाठक लेल बजाओल गेल। ओऽ “पीयर पोस्टकार्” शीर्षक कविताक पाठ कएलन्हि। ताहि पर उद्घोषक टीप देलखिन्ह जे एहि मोबाइलक युगमे पोस्टकार्डक एतेक चरचा पर डाक विभाग हुनका धन्यवाद देतन्हि। फेर उद्घोषणा भेल जे पंकज पराशरजी अपन कविताक पाठ करताह, मुदा ओऽ तावत धरि पहुँचल नहि छलाह, मुदा वीडियोमे बादमे देखलहुँ जे ओऽ आयल रहथि, मुदा प्रयः कतहु एम्हर-ओम्हर चलि गेल रहथि। से रमण कुमार सिंहजी केँ बजाओल गेल। ओल्ड होममे वृद्ध आऽ एना किएक होइत छैक लोक शीर्षक पद्य सुनओलन्हि रमण जी। फेर श्रीमति सुनीता झाकेँ ब्रजेन्द्र त्रिपाठी जीक विशेष अनुरोध पर बजाओल गेल। ओऽ अपन कविता निवेदन मिथिला आऽ भारत देश महान पर सुनओलन्हि। संगे ईहो कहलीह जे ई प्रथम अवसर छन्हि हुनका लेल मंच पर पद्य पाठ करबाक। फेर मंजर सुलेमान पढ़लन्हि, मोन पड़ैत अछि गाम, आऽ अविनाशजी पढ़लन्हि विद्यापति स्मृति समारोहक उपलक्षमे दू टा कविता- ई हुनकर ब्लॉग पर सेहो बहुत दिनसँ अछि। कामिनी कामायनीकेँ गाम मोन पड़लन्हि आऽ विस्थापित लोक सेहो। बिलट पासवान ’विहंगम’ जी जौँ पुछू तँ सभसँ बेशी प्रभावी रहथि, कारण ओऽ देखि कए नहि पढ़लन्हि। तावत प‍कज पराशर जी आबि गेल छलाह, आऽ ओऽ “समयकेँ अकानैत” जे हुनकर पहिल पद्य संग्रह छन्हि, सँ ”हम परिनाम निरासा’ शीर्षक पद्य पढ़लन्हि। हुनका एक बेर फेर आबय पड़लन्हि विहंगमजीक विशेष अनुरोध पर  “महापात्र” शीर्षक रचना पढ़बाक लेल। ’विदेह’ केर एहि अंकसँ ’समय केँ अकानैत’ पोथीक समीक्षा/ परिचय देल जा रहल अछि। धीरेन्द्र कुमार मिश्र महोदय एकटा पद्य पढ़लन्हि, दोसर पद्यक सस्वर पाठ करबाक अनुमति माँगि रहल छलाह, मुदा उद्घोषक जी समयाभावक कारणेँ से अनुमति नहि देलखिन्ह आऽ प्रभात झा, मध्य प्रदेशसँ राज्यसभा सांसद, मुख्य अतिथिकेँ पद्य पाठक लेल आमंत्रण देलन्हि। मुदा ओऽ तावत धरि पहुँचल नहि छलाह, बादमे जखन पहुँचलाह तँ कहलखिन्ह जे ओऽ कविता नहि लिखैत छथि, हिन्दी गद्य लिखैत छथि। हुनका एतए अएबाक छलन्हि दू टा किताबक लोकार्पण करबाक हेतु, मैथिलीमे “इतिहास” दर्शन- लेखिका वीणा ठाकुर आऽ हिन्दीमे के.बी. प्रसादक “दुर्योधन के रहते कहीं महाभारत रुका है” पद्य संग्रहक। फेर देवशंकर नवीन जी अएलाह। ओऽ हिन्दे, मैथिली आऽ अन्य भाषाक कवि सम्मेलनक चर्च कएलन्हि आऽ कहलन्हि जे एतेक बेशी मात्रामे श्रोता-दर्शकक उपस्थिति विलक्षण अछि, कारण पहिने जे ओऽ विभिन्न प्रदेशमे एहि तरहक आयोजन कएने रहथि ओतए संस्था अपन दस टा लोककेँ बैसा कए कुरसी भड़ैत छल।  प्रभात झा जाधरि पहुँचितथि तावत रमण कुमार सिंह आऽ अविनाश जीकेँ दोसर राउन्डक लेल बजाओल गेल। फेर विदित जी पद्य पाठक लेल पहुँचलाह, मुदा यावत शुरू करितथि तावत प्रभात झाजी आबि गेलाह से ओऽ उतरि कए हुनकर स्वागत कएलन्हि। विदित जी मैथिलीमे दैनिक ’मैथिली समाद’ केर कोलकातासँ ताराकान्त झा द्वारा अगस्तसँ शुरू कएल जएबाक शुभ सूचना सेहो देलन्हि आऽ पद्य पाठ सेहो कएलन्हि। फेर प्रभात जी अपन संस्मरण सुनओलन्हि आऽ दुनू पुस्तकक लोपार्पण भेल। चित्रकार सचिन्द्रनाथ झा द्वारा श्री प्रभात झा आऽ श्रे विदित जीकेँ विद्यापतिक चित्र प्रदान कएल गेल, एहि चित्रमे बैकग्राउन्डमे मिथिला चित्रकलाक योग सेहो देल गेल छल। विदित जी प्रसन्न छलाह एहि सफल आयोजनसँ, जखन हम बधाइ देलियन्हि तँ कहलन्हि जे मैथिली आब रोड पर आयत, कोठलीमे नहि रहत। ०१ जुलाई २००८ । श्री मौन जी, मैथिलीपुत्र प्रदीप, श्री सुभाषचन्द्र यादव, श्री पालन झा आऽ श्री आद्याचरण झा जीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। श्री मायानन्द जीक इन्टरव्यू लेलन्हि श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव। तकर पहिल भाग सेहो प्रस्तुत अछि। शेष स्थायी स्तंभ यथावत अछि। १५ जुलाई २००८ एहि अंकमे नचिकेताजीक नाटक  नो एंट्री: मा प्रविश अन्तिम खेप ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। ग‍गेश गुंजन जीक पद्य आऽ विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री मौन जी, मैथिलीपुत्र प्रदीप, श्री पालन झा श्री पंकज पराशर आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। श्री मायानन्द जीक इन्टरव्यू लेलन्हि श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव। तकर दोसर भाग सेहो प्रस्तुत अछि। नेपाल १ टी.वीक मैथिली कार्यक्रमक विषयमे विवरण दए रहल छथि जितेन्द्रजी आऽ भक्ति-गीत प्रस्तुत कएने छथि जितमोहनजी। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। ०१ अगस्त २००८ एहि अंकसँ श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत शुरू भए रहल अछि, "विदेह" मे पहिल खेप पढ़ू।विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री मौन जी, श्री पंकज पराशर, श्री सुशान्त, प्रकाश, ज्योतिप्रकाश लाल, जितमोहन, विनीत उत्पल शैलेन्द्र मोहन झा आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि।एहि अंकमे नचिकेताजीक टटका लिखल कविता सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। मैथिली रिपोर्ताजक नव विधाक प्रारम्भ कए रहल छथि पुण्यधाम जनकपुरधामक युवा पत्रकार श्री जितेन्द्र झा। श्री हरिमोहन झाजीक सम्पूर्ण रचना संसारक अवलोकन सेहो शुरू भए रहल अछि। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। १५ अगस्त २००८ मिथिलाक धरती बाढ़िक विभीषिकासँ आइ काल्हि जूझि रहल अछि। कुशेश्वरस्थान दिसुका क्षेत्र तँ बिन बाढ़िक बरखाक समयमये डूमल रहैत अछि। मुदा ई स्थिति १९७८-७९ केर बादक छी। पहिने ओऽ क्षेत्र पूर्ण रूपसँ उपजाऊ छल, मुदा भारतमे तटबन्धक अनियन्त्रित निर्माणक संग पानिक जमाव ओतए शुरू भए गेल। मुदा ओहि क्षेत्रक बाढ़िक कोनो समाचार कहियो नहि अबैत अछि, कहियो अबितो रहए तँ मात्र ई दुष्प्रचार जे ई सभटा पानि नेपालसँ छोड़ल गेल पानिक जमाव अछि। ओतुक्का लोक एहि नव संकटसँ लड़बाक कला सीखि गेलाह। हमरा मोन अछि ओऽ दृश्य जखन कुशेश्वरस्थानसँ महिषी उग्रतारास्थान जएबाक लेल हमरा बढ़िक समयमे अएबाक लेल कहल गेल छल कारण ओहि समयमे नाओसँ गेनाइ सरल अछि, ई कहल गेल। रुख समयमे खत्ता, चभच्चामे नाओ नहि चलि पबैत अछि आऽ सड़कक हाल तँ पुछू जुनि। फसिलक स्वरूपमे परिवर्तन भेल, मत्स्य-पालन जेना तेना कए ई क्षेत्र जबरदस्तीक एकटा जीवन-कला सिखलक। कौशिकी महारानीक एहि बेरक प्रकोप ओहि दुष्प्रचारकेँ खतम कए पाओत आकि नहि से नहि जानि! पहिने हमरा सभ ई देखी जे कोशी आऽ गंडकपर जे दू टा बैराज नेपालमे अछि ओकर नियन्त्रण ककरा लग अछि। ई नियन्त्रण अछि बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक लग आऽ एतए बिहार सरकारक अभियन्तागणक नियन्त्रण छन्हि। पानि छोड़बाक निर्णय बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक हाथमे अछि। नेपालक हाथमे पानि छोड़बाक अधिकार तखन आएत जखन ओतुक्का आन धार पर बान्ह/ छहर बनत, मुदा से ५० सालसँ ऊपर भेलाक बादो दुनू देशक बीचमे कोनो सहमतिक अछैत सम्भव नहि भए सकल। किएक? सामयिक घटनाक्रम- कोशीपर भीमनगर बैरेज, कुशहा, नेपालमे अछि। १९५८ मे बनल एहि छहरक जीवन ३० बरख निर्धारित छल, जे १९८८ मे बीति गेल। दुनू देशक बीचमे कोनो सहमति किएक नहि बनि पाओल? छहरक बीचमे जे रेत जमा भए जाइत अछि, तकरा सभ साल हटाओल जाइत अछि। कारण ई नहि कएलासँ ओकर बीचमे ऊंचाई बढ़ैत जाएत, तखन सभ साल बान्धक ऊँचाई बढ़ाबए पड़त।  एहि साल ई कार्य समयसँ किएक नहि शुरू भेल? फेर शुरू भेल बरखा, १८ अगस्तकेँ कोशी बान्धमे २ मीटर दरारि आबि गेल। १९८७ ई.क बाढ़ि हम आँखिसँ देखने छी। झंझारपुर बान्ध लग पानि झझा देलक, ओवरफ्लो भए गेल एक ठामसँ, आऽ आँखिक सोझाँ हम देखलहुँ जे कोना तकर बाद १ मीटरक कटाव किलोमीटरमे बदलि जाइत अछि। २७-२८ अगस्त २००८ धरि भीमनगर बैरेजक ई कटाव २ किलोमीटर भए चुकल अछि। आऽ ई करण भेल कोशीक अपन मुख्य धारसँ हटि कए एकटा नव धार पकड़बाक आऽ नेपालक मिथिलांचलक संग बिहारक मिथिलांचलकेँ तहस नहस करबाक। नासाक ८ अगस्त २००८ आऽ २४ अगस्त २००८ केर चित्र कौशिकीक नव आऽ पुरान धारक बीच २०० किलोमीटरक दूरी देखा रहल अछि। भीमनगर बैरेज आब एकटा कोशीक सहायक धारक ऊपर बनल बैरेज बनि गेल। राष्ट्रीय आपदा: जाहि राज्यमे आपदा अबैत अछि, से केन्द्रसँ सहायताक आग्रह करैत अछि। केन्द्रीय मंत्रीक टीम ओहि राज्यक दौरा करैत अछि आऽ अपन रिपोर्ट दैत अछि जाहिपर केन्द्रीय मंत्रीक एकटा दोसर टीम निर्णय करैत अछि, आऽ ओऽ टीम निर्णय करैत अछि जे ई आपदा राष्ट्रीय आपदा अछि वा नहि। बिहारक राजनीतिज्ञ अपन पचास सालक विफलता बिसरि जखन एक दोसराक ऊपर आक्षेपमे लागल छलाह, मनमोहन सिंह मंत्रीक प्रधानक रूपमे दौरा कए एकरा राष्ट्रीय आपदा घोषित कएलन्हि। कारण ई लेवल-३ केर आपदा अछि आऽ ई सम्बन्धित राज्यक लेल असगरे, नहि तँ वित्तक लिहाजसँ आऽ नहिए राहतक व्यवस्थाक सक्षमताक हिसाबसँ, एहिसँ पार पाएब संभव अछि। आब राष्ट्रीय आकस्मिक आपदा कोषसँ सहायता देल जाऽ रहल अछि, किसानक ऋण-माफी सेहो सम्भव अछि। उपाय की हो? कुशेश्व्रर स्थानक आपदा सभ-साल अबैछ, से सभ ओकरा बिसरिए जेकाँ गेलाह। मुदा आब की हो? दामोदर घाटीक आऽ मयूरक्षी परियोजना जेकाँ कार्य कोशी, कमला, भुतही बलान, गंडक, बूढ़ी गंडक आऽ बागमतीपर किएक सम्भव नहि भेल? विश्वेश्वरैय्याक वृन्दावन डैम किएक सफल अछि। नेपाल सरकारपर दोषारोपण कए हमरा सभ कहिया धरि जनताकेँ ठकैत रहब। एकर एकमात्र उपाए अछि बड़का यंत्रसँ कमला-बलान आदिक ऊपर जे माटिक बान्ध बान्हल गेल अछि तकरा तोड़ि कए हटाएब आऽ कच्चा नहरिक बदला पक्का नहरिक निर्माण। नेपाल सरकारसँ वार्ता आऽ त्वरित समाधन। आऽ जा धरि ई नहि होइत अछि तावत जे अल्पकालिक उपाय अछि, जेना बरखा आबएसँ पहिने बान्हक बीचक रेतकेँ हटाएब, बरखाक अएबाक बाट तकबाक बदला किछु पहिनहि बान्हक मरम्मतिक कार्य करब। आऽ एहि सभमे राजनीतिक महत्वाकांक्षाकेँ दूर राखब। कोशीकेँ पुरान पथपर अनबाक हेतु कैकटा बान्ह बनाबए पड़त आऽ ओऽ सभ एकर समाधान कहिओ नहि बनि सकत। कमला धार नहरिसँ लाभ हनि- एक तँ कच्ची नहरि आऽ ताहूपर मूलभूत डिजाइनक समस्या, एकटा उदाहरण पर्याप्त होएत जेना-तेना बनाओल परियोजना सभक। कमलाक धारसँ निकालल पछबारी कातक मुख्य नहरि जयनगरसँ उमराँव- पूर्वसँ पछबारी दिशामे अछि। मुदा ओतए धरतीक ढ़लान उत्तरसँ दक्षिण दिशामे अछि। बरखाक समयमे एकर परिणाम की होएत आकि की होइत अछि? ई बान्ह बनि जाइत अछि आऽ एकर उत्तरमे पानि थकमका जाइत अछि। सभ साल एहि नहर रूपी बान्हसँ पटौनी होए वा नहि एकर उतरबरिया कातक फसिल निश्चित रूपेण डुमबे टा करैत अछि। फलना बाबूक जमीन नहरिमे नञि चलि जाए से नहरिक दिशा बदलि देल जाइत अछि! कमला नदीपर १९६० ई. मे जयनगरसँ झंझारपुर धरि छहरक निर्माण भेल आऽ एहिसँ सम्पूर्ण क्षेत्रक विनाशलीलाक प्रारम्भ सेहो भए गेल। झंझारपुरसँ आगाँक क्षेत्रक की हाल भेल से तँ हम कुशेश्वरक वर्णन कए दए चुकल छी। मधेपुर, घनश्यामपुर, सिंघिया एहि सभक खिस्सा कुशेश्वरसँ भिन्न नहि अछि। कमला-बलानक दुनू छहरक बीच जेना-जेना रेत भरैत गेल ताहि कारणेँ एहि तटबन्धक निर्माणक बीस सालक भीतर सभ किछु तहस-नहस भए गेल। कमला धार जे बलानमे पिपराघाटमे १९५४ मे मिलि गेलीह, हिमालयसँ बहि कए कोनो पैघ लक्कड़क अवरोधक कारण। आब हाल ई अछि जे दस घण्टामे पानिक जलस्तर एहि धारमे २ मीटरसँ बेशी तक बढ़ि जाइत अछि। १९६५ ई.सँ बान्ह/ छहरक बीचमे रेत एतेक भरि गेल जे एकर ऊँचाइ बढ़ेबाक आवश्यकता भए गेल आऽ ई माँग शुरू भए गेल जे बान्ह/ छहरकेँ तोड़ि देल जाए! स्कूल कॊलेजमे छुट्टी गर्मी तातिलक बदलामे बाढ़िक समए देबामे कोन हर्ज अछि, ई निर्णय कोन तरहेँ कठिन अछि? वरिष्ठ साहित्यकार वैकुण्ठ झाजीक पद्य सेहो अछि। कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री कैलाश कुमार मिश्र जीक "यायावरी", मित्रनाथ झा जीक पद्य, नूतन जीक चौठचन्द्र पूजापर लेख, श्याम सुन्दर शशि आऽ कुमार मनोज कश्यपक लघु-कथा आऽ श्री शम्भू कुमार सि‍हक आऽ अनलकान्त जीक कथा सेहो अछि। श्री शम्भू कुमार सि‍ह जीक पद्य सेहो ई-प्रकाशित भऽ रहल अछि। बी.के कर्णक मिथिलाक विकासपर लेख, श्री ओमप्रकाश जीक लेख., श्री मौन जी, श्री पंकज पराशर, श्री सुशान्त, प्रकाश, जितमोहन, विनीत उत्पल शैलेन्द्र मोहन झा आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। मैथिली रिपोर्ताज लिखने छथि पुण्यधाम जनकपुरधामक युवा पत्रकार श्री जितेन्द्र झा संगमे ज्योतिजी सेहो लंदनसँ रिपोर्ताज पठेने छथि। श्री हरिमोहन झाजीक सम्पूर्ण रचना संसारक अवलोकन सेहो आगाँ बढ़ल अछि। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। पोथी समीक्षा: बाँकी अछि हमर दूधक कर्ज- एहि नामसँ १० टा गीतक संग्रह लए श्री बिनीत ठाकुर- शिक्षक, प्रगति आदर्श ई. स्कूल, लगनखेल, ललितपुर प्रस्तुत भेल छथि। ई एहि शताब्दीक पहिल पोथी छी जे देवनागरीक संग मिथिलाक्षरमे सेहो आयल अछि, आऽ एकरा हम अंशुमन पाण्डेयकेँ पठा देलियन्हि, यूनीकोडक मैपिंगक लेल, कारण विनीतजी हमरा एहि पोथीकेँ ई-मेलसँ पठेबाक अनुमति देने छथि, ताहि लेल हुनका धन्यवाद। “भरल नोरमे” शीर्षक पद्यमे की सुतलासँ भेटलै अछि ककरो अधिकार आऽ “गाम नगरमे”- लोकतंत्रमे अपन अधिकार लऽ कऽ रहत मधेसी, ई घोषणा छन्हि कविक तँ “कोरो आऽ पाढ़ि’मे गरीब छोड़िकऽ के बुझतै गरीबीके मारि- ई कहि कवि अपन आर्थिक चिन्तन सेहो सोझाँ रखैत छथि। चहुँदिश अमङ्गलमे जङ्गलक विनाशपर –मुश्किलेसँ सुनी चिड़ियाके चिहुं-चिहुं- कहि कवि अपन पर्यावरण चिन्तन सोझाँ रखैत छथि। “जे करथि घोटाला” मे भ्रष्टाचारपर आऽ “जाइतक टुकड़ी”मे जाति प्रथापर कवि निर्ममतासँ चोट करैत छथि तँ “बेटीक भाग्यविधान”मे कविक भावना उफानपर अछि। “कम्प्युटरक दुनिया” आऽ “अङ्गरेजिया”मे कवि सामयिकताकेँ नहि बिसरल छथि तँ  अन्तिम पद्य “ताल मिसरी” मे वरक सासुर प्रेम कनेक व्यंग्यात्मक सुरमे कवि कहि अपन एहि क्षेत्रमे सेहो दक्ष होएबाक प्रमाण दैत छथि। ओना तँ कविक ई प्रथम प्रकाशित कृति छन्हि, मुदा कवि जाहि लए सँ कविता कएने छथि ओऽ अभूतपूर्व रूपेँ प्रशंसनीय अछि। ०१ सितम्बर २००९ कोशी: कोशीक पानि माउन्ट एवेरेस्ट, कंचनजंघा आऽ गौरी-शंकर शिखर आऽ मकालू पर्वतश्रृंखलासँ अबैत अछि। नेपालमे सप्तकोशी, जाहिमे इन्द्रावती, सुनकोसी (भोट कोसी), तांबा कोसी, लिक्षु कोसी, दूध कोसी, अरुण कोसी आऽ तामर कोसी सम्मिलित अछि। एहिमे इन्द्रावती, सुनकोसी, तांबा कोसी, लिक्षु कोसी आऽ दूध कोसी मिलि कए सुनकोसीक निर्माण करैत अछि आऽ ई मोटा-मोटी पच्छिमसँ पूर्व दिशामे बहैत अछि, एकर शाखा सभ मोटा-मोटी उत्तरसँ दक्षिण दिशामे बहैत अछि। ई पाँचू धार गौरी शंकर शिखर आऽ मकालू पर्वतश्रृंखलाक पानि अनैत अछि। अरुणकोसी माउन्ट एवेरेस्ट (सगरमाथा) क्षेत्रसँ पानि ग्रहण करैत अछि। ई धार मोटा-मोटी उत्तर-दक्षिण दिशामे बहैत अछि। तामर कोसी मोटा-मोटी पूबसँ पच्छिम दिशामे बहैत अछि आऽ अपन पानि कंचनजंघा पर्वतश्रृंखलासँ पबैत अछि। आब ई तीनू शाखा सुनकोसी, अरुणकोसी आऽ तामरकोसी धनकुट्टा जिल्लाक त्रिवेणी स्थानपर मिलि सप्तकोसी बनि जाइत छथि। एतएसँ १० किलोमीटर बाद चतरा स्थान अबैत अछि जतए महाकोसी, सप्तकोसी वा कोसी मैदानी धरातलपर अबैत छथि। आब उत्तर दक्षिणमे चलैत प्रायः ५० किलोमीटर नेपालमे रहला उत्तर कोसी हनुमाननगर- भीमनगर लग भारतमे प्रवेश करैत छथि आऽ कनेक दक्षिण-पच्छिम रुखि केलाक बाद दक्षिण-पूर्व आऽ पच्छिम-पूर्व दिशा लैत अछि आऽ भारतमे लगभग १३० किमी. चललाक बाद कुरसेला लग गंगामे मिलि जाइत छथि। कोसीमे बागमती आऽ कमलाक धार सेहो सहरसा- दरभंगा- पूर्णिया जिलाक संगमपर मिलि जाइत अछि। कोसीपर पहिल बान्ह १२म शताब्दीमे लक्ष्मण द्वितीय द्वारा बनाओल वीर-बाँध छल जकर अवशेष भीमनगरक दक्षिणमे एखनो अछि। भीमनगर लग बैराजक निर्माणक संगे पूर्वी कोसी तटबन्ध सेहो बनि गेल आऽ पूर्वी कोसी नहरि सेहो। कुँअर सेन आयोग १९६६ ई. मे कोसी नियन्त्रणक लेल भीमनगरसँ २३ किमी. नीचाँ डगमारा बैराजक योजनाक प्रस्ताव देलक जे वाद-विवाद आऽ राजनीतिमे ओझरा गेल। एहि बैराजसँ दू फायदा छल। एक तँ भीमनगर बैरेजक जीवन-कालावधि समाप्त भेलापर ई बैरेज काज अबितए, दोसर एहिसँ उत्तर-प्रदेशसँ असम धरि जल परिवहन विकसित भऽ जाइत जाहिसँ उत्तर बिहारकेँ बड़ फायदा होइतए। मुदा एहि बैरेज निर्माण लेल पाइ आवंटन केन्द्रीय सिंचाई मंत्री डॉ के.एल.राव नहि देलखिन्ह। पश्चिमी कोसी नहरि एकर विकल्प रूपमे जेना तेना मन्थर गति सँ शुरू भेल मुदा एखनो धरि ओहिमे काज भइये रहल अछि। मुदा कोसी लेल ई नहि भऽ सकल। विचार आएल तँ योजना अस्वीकृत भए गेल। जतेक दिनमे कार्य पूरा हेबाक छल ततेक दिन विवाद होइत रहल, डगमारा बैराजक योजनाक बदलामे सस्ता योजनाकेँ स्वीकृति भेटल मुदा सेहो पूर्ण हेबाक बाटे ताकि रहल अछि! विश्वेश्वरैय्या पड़ैत छथि मोन :हैदराबादसँ ८२ माइल दूर मूसी आऽ ईसी धारपर बान्ह बनाओल गेल आऽ नगरसँ ६.५ माइलक दूरीपर  मूसी धारक उपधारा बनाओल गेल। संगहि धारक दुनू दिस नगरमे तटबन्ध बनाओल गेल। कृष्णराज सागर बान्हक हुनकर प्रस्तावित १३० फुट ऊँच बनेबाक योजना मैसूर राज्य द्वारा अंग्रेजकेँ पठाओल गेल तँ वायसराय हार्डिंज ओकरा घटा कए ८० फीट कए देलन्हि। विश्वेशरैय्या निचुलका भागक चौड़ाई बढ़ा कए ई कमी पूरा कए लेलन्हि। बीचेमे बाढ़ि आबि गेल तँ अतिरिक्त मजदूर लगा कए आऽ मलेरियाग्रस्त आऽ आन रोगग्रस्त मजदूरक इलाज लए डॉक्टर बहाली कए, रातिमे वाशिंगटन लैम्प लगा कए आऽ व्यक्तिगत निगरानी द्वारा केलन्हि। देशभक्त तेहन छलाह जे सीमेन्ट आयात नहि केलन्हि वरन् वालु, कैल्सियम पाथर आऽ पाकल ईटाक बुकनी मिला कए निर्मित सुरखीसँ एहि बान्हक निर्माण कएलन्हि। बान्ह निर्माणसँ पहिनहि द्विस्तरीय नहरिक निर्माण कए लेल गेल। दिल्ली अछि दूर एखनो! प्रधानमंत्री आपदा कोष आऽ मुख्यमंत्री आपदा कोषक अतिरिक्त स्वयंसेवी संगठन सभक कोषमे  सेहो दिल्लीवासी अपन अनुदान दए सकैत छथि। मुदा दीर्घ सूत्री काज होएत निम्न बिन्दुपर दिल्लीमे केन्द्र सरकारपर दवाब बनाएब। १.स्कूल कॊलेजमे गर्मी तातिलक बदलामे बाढ़िक समए छुट्टी देबामे कोन हर्ज अछि, ई निर्णय कोन तरहेँ कठिन अछि? सी.बी एस.ई आऽ आइ.सी.एस.ई. तँ छोड़ू बिहार बोर्ड धरि ई नहि कए सकल। दिल्लीवासी सी.बी एस.ई आऽ आइ.सी.एस.ई.सँ एहि तरहक कार्यान्वयन कराबी तँ लाजे बिहार बोर्ड ओकरा लागू कए देत। २.भारतमे डगमारा बैराजक योजनाक प्रारम्भ कएल जाए कारण भीमनगर बैरेज अपन जीवन-कालावधि पूर्ण कए लेने अछि। एहिमे फन्ड रेलवे आऽ सड़क दुनू मंत्रालयसँ लेल जाए कारण एहिपर रेल आऽ सड़क सेहो बनि सकैछ/ आऽ बनबाक चाही। ३.बैरेज बनबाक कालवधियेमे पक्की नहरि धरातलक स्लोपक अनुसारे बनाओल जाए। ४.कच्ची बान्ह सभकेँ तोड़ि कए हटा देल जाए आऽ पक्की बान्हकेँ मोटोरेबल बनाओल जाए, बान्हक दुनू कात पर्याप्त गाछ-वृक्ष लगाओल जाए। ५.बिहारमे सड़क परियोजना जेना स्वप्नक सत्य होए जेना देखि परि रहल अछि, तहिना सभ विघ्न-बाधा हटा कए युद्ध-स्तरपर काज एहि सभपर कार्य शुरू कएल जाए। उपरोक्त बिन्दु सभपर दिल्लीमे लॉबी बना कए केन्द्र सरकारपर/ मंत्रालयपर दवाब बनाएब तखने बिहार अपन नव छवि बना सकत। १२म शताब्दीमे शुरू कएल बान्ह तखने पूर्ण होएत आऽ धारसभ मनुक्खक सेविका बनि सकत। श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमरजीक कोसी बाढ़िपर निबन्ध आऽ कोसीक बाढ़िपर स्व. राजकमल द्वारा लिखित कथा अपराजिता देल गेल अच्हि। श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर दोसर खेप पढ़ू संगमे हुनकर विचार-टिप्पणी सेहो। कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री कैलाश कुमार मिश्र जीक "यायावरी", अंकुर झा जीक पद्य, श्याम सुन्दर शशिक रिपोर्ताज आऽ कुमार मनोज कश्यपक लघु-कथा आऽ श्री शम्भू कुमार सि‍हक कथा-निबन्ध सेहो अछि।  बी.के कर्णक मिथिलाक विकासपर लेख, श्री पंकज पराशर, जितमोहन, विनीत उत्पल, नवेन्दु कुमार झा  आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। गुँजन जीक गजल आ' विचार टिप्पणी सेहो अछि। श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी। उदाहरण आऽ नो एण्ट्री: मा प्रविश पर समीक्षा देल गेल अछि। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। गोपेशजी स्वर्गीय भए गेलाह हुनकर संस्मरण हम लिखने छी पद्य स्तंभमे, संगमे देने छी हुनकर एकटा पद्य सेहो। १५ सितम्बर २००८ श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर दोसर खेप पढ़ू संगमे हुनकर विचार-टिप्पणी सेहो।  सुभाष चन्द्र यादव जीक कथा, कुमार मनोज कश्यपक लघु-कथा, महेश मिश्र "विभूति"-श्री पंकज पराशर-  विनीत उत्पल- श्यामल जीक पद्य आऽ प्रेमशंकर सिंह, मौनजी, जितमोहन, ओमप्रकाश, शक्ति-शेखर, नूतन झा  जीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। ०१ अक्टूबर २००८ जीन मेरी गुस्ताव ली क्लाजियो (1940-)केँ एहि सालक साहित्यक ८ लाख १५ हजार पौंडक साहित्यक नोबल पुरस्कारसँ सम्मानित कएल जएबाक घोषणा भेल अछि। मानवतापर राज कए रहल सभ्यतासँ नीचाँ आऽ आगू जाऽ कए देखबाक प्रवृत्ति छन्हि क्लाजियोक। न्यू-डिपार्चर्स,पोएटिक एडवेंचर आ सेंसुअल एक्सटेसीक लेखक छथि क्लाजियो।

ली क्लाजियो मूलतः फ्रांसीसी भाषाक उपन्यासकार छथि, ओना हिनकर पिता अंग्रेज आऽ माता फ्रांसीसी छथिन्ह, दुनू गोटे मारीशससँ सम्बन्धित। आऽ क्लाजियो नाइजीरियाक समुद्री यात्रासँ नेनपनहिमे साहित्यिक जीवनक प्रारम्भ कएलन्हि। १९६३ ई. मे हिनकर पहिल उपन्यास प्रकाशित भेल जे आधुनिक समाजक प्रति एक तरहक विद्रोह छल। फ्रेंच लेखक सभमे क्लाजियो स्वीकृत नहि भऽ सकलाह आऽ एखन ओऽ न्यू मेक्सिकोमे रहैत छथि।

थर्ड वर्ल्डक नजरिसँ देखब हिनकर रचनाक एकटा विशिष्टता छन्हि। मारीशसक उपन्यासकार अभिमन्यु उनुथक आ ताहि क्रममे रामायणक चरचा सेहो क्लाजियो करैत छथि।

हिनकर पहिल उपन्यास ले-प्रोसेस-वर्बल- द इनटेरोगेशन (जांचक पूछताछ)१९६३ ई. मे आयल जे अस्तित्ववादक बादक समयक उपन्यास छल। दिन-प्रतिदिनक भाषणबाजीक बदला सत्याताकेँ देखबय बला शक्ति ओ शब्द सभकेँ देलन्हि। फेर आयल हुनकर दू टा कथा संग्रह ला-फीवर आ ला-देल्यूज, एहि दुनू संग्रहमे पाश्चात्य नगरक समस्या आ ओतुक्का डरक यथार्थ चित्रण भेल अछि। टेरा-अमाटामे हुनकर पारस्थितिकी-तंत्रसँ जुड़ाव स्पष्ट अछि तँ डेजर्टसँ ओ उपन्यासकारक रूपमे स्थापित होइत छथि, एहिमे ओ उत्तर अफ्रीकाक लुप्त होइत संस्कृतिक चित्रण करैत छथि। क्लाजियो दार्शनिक लेख सेहो लिखने छथि आऽ बच्चा लोकनिक लेल लुलाबी सेहो। अमेरिकी साहित्य जाहि प्रकारेँ अनुवादसँ दूर आऽ अपनामे मग्न भऽ गेल अछि सैह कारण अछि फिलिप रॉथक एहि रेसमे हाइपक रूपमे शामिल होएबाक बावजूद पाछू छूटि जएबाक। अर्थशास्त्रमे अमेरिकाक मोनोपोलीक विपरीतक ई साहित्यक क्षेत्रक घटनाक्रम अछि। एहि अंकमे: श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर पाँचम खेप पढ़ू संगमे हुनकर विचार-टिप्पणी सेहो।  सुभाष चन्द्र यादव आऽ विभा रानी जीक कथा,  महेश मिश्र "विभूति"-श्री पंकज पराशर-  विनीत उत्पल- श्यामल जीक पद्य आऽ प्रेमशंकर सिंह, मौनजी, जितमोहन, प्रकाश झा, ओमप्रकाश जीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी। सुभाषचन्द्र यादव जी पर श्री महाप्रकाश लिखि रहल छथि। जितेन्द्र झा, नवेन्दु आ  प्रीतिक रिपोर्ताज छन्हि तँ युवा प्रतिभा अंशुमालाक विषयमे लिखने छथि जितेन्द्र। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। मधुप जीक "घसल अठन्नी" आऽ तारानन्द वियोगी जीक "मूलभूत" केर अ‍ग्रेजी अनुवाद सेहो प्रस्तुत कएल गेल अछि। १५ अक्टूबर २००८ पहिल कीर्तिनारायण मिश्र सम्मान कवि हरेकृष्ण झाकेँ ११.११.२००८ केँ विद्यापति पर्वक अवसरपर देल जएतन्हि। एहि बेरक यात्री चेतना पुरस्कार श्री मन्त्रेश्वर झाकेँ भेटलन्हि। कीर्तिनारायण मिश्रक जन्म १७ जुलाई १९३७ ई. केँ ग्राम शोकहारा (बरौनी), जिला बेगूसरायमे भेलन्हि। हुनकर प्रकाशित कृति अछि सीमान्त, हम स्तवन नहि लिखब (कविता संग्रह)। आखर पत्रिकाक लब्धप्रतिष्ठ सम्पादक। मंत्रेश्वर झा-जन्म ६ जनवरी १९४४ ई.ग्राम-लालगंज, जिला-मधुबनीमे। प्रकाशित कृति: खाधि, अन्चिनहार गाम, बहसल रातिक इजोत (कविता संग्रह); एक बटे दू (कथा संग्रह), ओझा लेखे गाम बताह (ललित निबन्ध)। मैथिली कथा संग्रहक हिन्दी अनुवाद “कुंडली” नामसँ प्रकाशित। दि फूल्स पैराडाइज (अंग्रेजीमे ललित निबन्ध), कतेक डारि पर। हरेकृष्ण झा, जन्म १० जुलाई १९५० ई. गाम- कोइलखमे। अभियंत्रणक अध्ययण छोड़ि मार्क्सवादी राजनीतिमे सक्रिय। अनेक कविता आ आलोचनात्मक निबन्ध प्रकाशित। अनुवाद एवं विकास विषयक शोध कार्यमे रुचि। स्वतंत्र लेखन। प्रकृति एवं जीवनक तादात्म्य बोधक अग्रणी कवि। एना कतेक दिन (कविता संग्रह)। बुकर पुरस्कार: आस्ट्रेलियन पिता आऽ भारतीय माताक सन्तान ३३ वर्षीय बैचेलर श्री अरविन्द अडिग ऑक्सफोर्डसँ शिक्षा प्राप्त कएने छथि आऽ सम्प्रति मुम्बईमे रहैत छथि। हिनकर पहिल अंग्रेजी उपन्यास छन्हि द ह्वाइट टाइगर जाहि पर बिटेन, आयरलैण्ड आऽ कॉमनवेल्थ देशक वासी केँ देल जा रहल अंग्रेजी भाषाक उपन्यासक ५०,००० पौन्डक “मैन बुकर” पुरस्कार भेटलन्हि अछि आऽ बेन ओकेरीक बाद ई पुरस्कार प्राप्त केनिहार ई सभसँ कम उम्र केर लेखक छथि। द ह्वाइट टाइगर- ई उपन्यास हार्पर कॉलिन्स-रैन्डम हाउस द्वारा प्रकाशित भेल आऽ प्रकाश आऽ अन्हारक दू तरहक भारतक ई वर्णन करैत अछि। एकटा फर्मक मालिक बलराम जे शुरूमे गयासँ आयल बलराम हलवाई छलाह चीनी प्रधानमंत्री वेन जिआबाओक भारत आगमनपर अपन अनुत्तरित सात पत्र (हरिमोहन झाक पाँच पत्र आ ब्यासजीक दू पत्र जकाँ) केर माध्यमसँ अपन खिस्सा कहैत छथि। ओऽ एकटा रिक्शा चालकक बेटा छथि जे चाहक दोकानपर किछु दिन काज केलाक बाद दिल्लीमे एकटा धनिकक ड्राइवर बनैत छथि। फेर ओकरा मारि कय उद्योगपति बनि जाइत छथि। ड्राइवर सभ गप मालिकक सुनैत रहैत अछि, कलकत्ताक रिक्शाबला सभक खिस्सा सेहो अडिग सुनलन्हि आऽ दिल्लीक ड्राइवर लोकनिक सेहो आऽ खिस्साक प्लॊट बना लेलन्हि।  समालोचनाक स्थिति: हिन्दीक अखबार सभ ई पुरस्कार प्राप्त भेलाक बादो एहि पुस्तकक समीक्षा एकटा चीप टी.वी. सीरियलक पटकथाक रूपमे कएलन्हि। मैथिलीक समालोचनाक तँ गपे छोड़ू, अंग्रेजीक अखबार सभ मुदा नीक समीक्षा कएलक। दिल्लीक चिड़ियाघरमे एकटा ह्वाइट टाइगर छैक गेनेटिक म्युटेशनक परिणाम जे एक पीढ़ीमे एक बेर अबैत छैक नहियो अबैत छैक। बलराम हलवाईक खिस्सा सेहो ह्वाइट टाइगर जकाँ विरल भेटत बेशी तँ कमाइ-खाइमे जिनगी बिता दैत छथि। एकर हार्डबाउन्ड किताब २०,००० कॉपी बिका चुकल अछि। पेन्गुइन इण्डिया जे ई किताब छपबासँ इन्कार कएने छल कहलक जे क्रॉसवर्ड पुरस्कारसँ किताबक बिक्रीमे १००० कॉपीक वृद्धि होइत छैक, बुकर भेटलापर १०,००० कॉपी बेशी बिकाइत छैक आऽ साहित्य अकादमी भेटलापर अंग्रेजी किताब १० कॉपी बेशी बिकाइत अछि! श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर छठम खेप पढ़ू। सुभाष चन्द्र यादव आऽ भ्रमर जीक कथा,  महेश मिश्र "विभूति"-श्री पंकज पराशर-  विनीत उत्पल- श्यामल जीक पद्य आऽ प्रेमशंकर सिंह जीक शोध लेख अछि।, जितमोहन, रामलोचन ठाकुर,निमिष झा,राजेन्द्र विमल, रेवतीरमण लाल, दिगम्बर झा "दिनमणि", रूपा धीरू, ज्योति,विद्यानन्द झा, नवीननाथ झा, विनीत उत्पल,वृषेश चन्द्र लाल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि,विभूति,महेन्द्र मलंगिया, कुमार मनोज कश्यप, कृपानन्द झा. रामभरोस कापड़ि रोशन जनकपुरी, पंकज पराशर,वैकुण्ठ झा, प्रकाश झा आ हिमांशु चौधरी जीक रचनासँ सुशोभित ई अंक अछि। श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। शिवशंकर श्रीनिवास केर मैथिली कथाक अ‍ग्रेजी अनुवाद सेहो प्रस्तुत कएल गेल अछि। भारतक विश्वनाथन आनन्द वर्ल्ड चेस प्रतियोगिता जितलन्हि तँ भारत अपन चन्द्रयान-१ यात्रा सेहो शुरु कएलक। मुदा संगमे असमक बम विस्फोट, उड़ीसाक नन बलात्कार आ मालेगाँव विस्फोट मोरक पएर सिद्ध भेल। ०१ नवम्बर २००८ ४०म ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह ६ नवम्बर २००८: संसदक लाइब्रेरीक बालयोगी ऑडिटोरियममे कश्मीरी कवि श्री रहमान राहीकेँ प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह द्वारा प्रदान कएल जाएबला ४०म ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोहक आमंत्रण पाबि ओतए नियत समयसँ सायं छह बजे हम पहुँचलहुँ। अपन प्रतिष्ठाक अनुरूप प्रधानमंत्री निर्धारित समय ६.३० सायं पदार्पण केलन्हि। स्टेजपर श्री रवीन्द्र कालिया, निदेशक भारतीय ज्ञानपीठ, रहमान राही, डॉ. मनमोहन सिंह, सीताकान्त महापात्र, पुरस्कार चयन समितिक अध्यक्ष आऽ अखिलेश जैन, प्रबन्ध ट्रस्टी रहथि। दर्शकमे श्री टी.एन.चतुर्वेदी, अशोक वाजपेयी, आलोक पी. जैन आऽ ब्रजेन्द्र त्रिपाठी रहथि। ब्रजेन्द्रजी हमरा संग बैसल रहथि। स्व. साहू शान्ति प्रसाद जैन आऽ स्व. श्रीमति रमाजैन, एहि पुरस्कारक प्रारम्भ कएने रहथि आऽ हुनकर दुनू गोटेक फोटो पाछाँमे लागल रहन्हि। आइ काल्हि ४०म सालक महत्व एहि कारणसँ बढ़ि गेल अछि कारण ५०म वर्षगाँठक इन्तजारमे बहुत गोटे आयु बेशी भेने जीवित नहि रहैत छथि। सरला माहेश्वरी माइक पकड़ि कार्यक्रमक शुरुआतसँ पहिने अनिता जैनकेँ निराला रचित सरस्वती वन्दना गएबाक लेल अनुरोध कएलन्हि आऽ ओऽ मंचक दोसर भागमे महर्षि अगस्त्यक या कुन्देन्दुसँ शुरु कए निरालाक रचना शास्त्रीय पद्धतिमे गओलन्हि। फेर फूलसँ प्रधान मंत्रीक स्वागत प्रबन्ध न्यासी अखिलेश जैन द्वारा भेल, फेर रवीन्द्र कालिया फूलसँ रहमान राहीक स्वागत कएलन्हि। फेर श्री सीताकान्त महापात्र अंग्रेजीमे उद्गार व्यक्त करैत कहलन्हि जे राहीकेँ सम्मानित कए भारतीय ज्ञानपीठ अपनाकेँ सम्मानित कएलक अछि। फेर प्रधानमंत्री द्वारा राहीकेँ शॉल ओढ़ा कए आऽ १०३५ ई.क राजा भोजक सरस्वतीक प्रतिमाक कांस्य अनुकृति जाहिमे ज्ञानपीठ द्वारा प्रभामण्डल जोड़ल गेल (मूल प्रतिमा लंदनक ब्रिटिश म्यूजियममे अछि) आऽ प्रशस्ति पत्र आऽ ५ लाख टाकाक ड्राफ्ट दए सम्मानित कएल गेल। राही उद्गार व्यक्य कएलन्हि आऽ महान जवाहरलाल नेहरूक जाहि पदपर छलाह ओहि पदपर आसीन मनमोहन सिंहसँ पुरस्कार प्राप्त कए विशेष प्रसन्नता प्रकट कएलन्हि। फेर रवीन्द्र कालिया धन्यवाद ज्ञापन कएलन्हि। राहीक प्रतिनिधि कविताक ज्ञानपीठ द्वारा कएल हिन्दी अनुवाद राही द्वारा प्रधान मंत्रीकेँ देल गेल। अब्दुल रहमान राहीक जन्म ६ मई १९२५ ई.केँ भेल। हुनकर पहिल कविता संग्रहकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल। भारत सरकारक पद्म श्री आऽ मानव संसाधन विकास मंत्रालयक एमिरेट्स फेलोशिप हिनका भेटल छन्हि। हिनकर कविता संग्रहमे सनवुन्य साज, सुबहुक सोदा, कलाम-ए-राही प्रमुख अछि। हिनकर आलोचना आऽ निबन्धक पोथी अछि, कहवट आदि। प्रस्तुत अछि हिनकर कविता “परछाइयाँ”(कश्मीरीसँ अंग्रेजी एस.एल.सन्धु, अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर) छाह सभ अपन नियतिसँ वाद आऽ अमरताक आशा आब छोड़ि दिअ, यदि जुटा ली किछु क्षण, तँ भेर भऽ जाऊ ताहिमे। बस्तीक जाहि पथमे चलैत रहलहुँ, ओऽ धँसि गेल घनगर बोनमे, जेना हमर आस्थाक कवच भेल भेद्य केलक शंकासभ। आँखि खुजिते हमर स्वप्नकेँ लागल आँखि सभटा बासन्ती युवा छाती झरकि कए भऽ गेल सुनसान। देखू तँ देखायत आस-पड़ोसमे लावण्यमयी मेला, हाथमे आएत मात्र एकाध विचार, आऽ असगर एकटा कौआ उजाड़मे। कखनो हमर इच्छा रहए चान-तरेगन गढ़बाक, आब माथ भुका रहल छी अपन कोनो नामकरण तँ करी। सभटा विश्वास घाटीक मौलायल हरैयरी सन, सभटा चैतन्य खिसियायल साँप सन। सभटा देवता हमर अपन छाह छथि, सभटा दानव हमर अहं केर कनिया-पुतड़ा सन। सभा भवन भरल बुझू बानरक खोँ-खोँ सँ, सन्तक पहिरनक लेल ताकू बोने-बोन। केहन अछि नाओक खेबनाई, कतए तँ अछि किनार! देशांस भोथलेलक नाओकेँ अन्हारमे। हे रौ नटुआ, नाच निर्वस्त्र चारू कात ओकर, राही तँ आगि-खाएबला बताह अछि। समारोह एक घण्टामे खतम भेल आऽ घुरैत रही तँ एफ.एम.पर समाचार भेटल जे सचिन तेन्दुलकर अपन टेस्ट जीवनक ४०म शतक दिनमे पूर्ण कएलन्हि। भीमसेन जोशीकेँ भारत रत्न पुरस्कार देल गेल। आऽ चन्द्रायण-१ चन्द्रमाक १०० किलोमीटरक वृत्ताकार कक्षामे स्थापित भऽ गेल जतए ओऽ २ वर्ष धरि रहत। १५ नवम्बर २००८ ई अ‍ंकक समर्पण गर्वक-संग ओहि 16 बलिदानीक नाम जे मुम्बईमे देशक सम्मानक रक्षार्थ अपन प्राणक बलिदान देलन्हि। १.एन.एस.जी. मेजर सन्दीप उन्नीकृष्णन् २.ए.टी.एस.चीफ हेमंत कड़कड़े ३.अशोक कामटे ४.इंस्पेक्टर विजय सालस्कर ५.एन.एस.जी हवलदार गजेन्द्र सिंह "बिष्ट" ६.इंस्पेक्टर शशांक शिन्दे ७.इंस्पेक्टर ए.आर.चिटले ८.सब इंस्पेक्टर प्रकाश मोरे ९.कांस्टेबल विजय खांडेकर १०.ए.एस.आइ.वी.अबाले ११.बाउ साब दुर्गुरे १२.नानासाहब भोसले १३.कांसटेबल जयवंत पाटिल १४.कांसटेबल शेघोष पाटिल १५.अम्बादास रामचन्द्र पवार १६.एस.सी.चौधरी १ दिसम्बर २००८ विदेहक नव अंक (अंक २४, दिनांक १५ दिसम्बर २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | ४१म आ ४२म ज्ञानपीठ पुरस्कारक घोषणा- हिन्दीक नवीन कविता आन्दोलनक सशक्त कवि श्री कुँवर नारायणकेँ ४१म ज्ञानपीठ पुरस्कार (२००५) आ कोंकणीक श्री रवीन्द्र केलेकर आ संस्कृतक श्री सत्यव्रत शास्त्रीकेँ संयुक्त रूपसँ ४२म ज्ञापीठ पुरस्कार (२००६) देबाक घोषणा भेल अछि। श्री कुँवर नारायणक जन्म १९२७ ई. मे भेलन्हि। अज्ञेय द्वारा सम्पादित "तीसरा सप्तक"क सशक्त कवि कुँवर नारायणकेँ एहिसँ पहिने साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटि चुकल छन्हि। श्री रवीन्द्र केलेकरक जन्म १९२५ ई.मे भेलन्हि, हिनकर  कोंकणी भाषा मण्डलक निर्माणमे प्रमुख भूमिका रहल छन्हि। श्री सत्यव्रत शास्त्री संस्कृतमे तीन गोट महाकाव्यक रचना कएने छथि। रवीन्द्र केलेकर आ सत्यव्रत शास्त्रीकेँ सेहो साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटि चुकल छन्हि। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० दिसम्बर २००८) ७० देशक ६७३ ठामसँ १,३६,८७४ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। १५ दिसम्बर २००८ अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। वरिष्ठ रचनाकार अपन रचना हस्तलिखित रूपमे सेहो नीचाँ लिखल पता पर पठा सकैत छथि। गजेन्द्र ठाकुर 389,पॉकेट-सी, सेक्टर-ए, बसन्तकुंज,नव देहली-११००७०. फोन:०११-४१७७१७२५/ ९८११३८२०७८ http://www.videha.co.in ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.co.in  ggajendra@yahoo.co.in २.संदेश १.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि। २.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह| ३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू। ५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। ९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। ११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी। १३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल। १४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी,  एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल। (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर  'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक  'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य), शोध लेख आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे “कुरुक्षेत्रम् : अन्तर्मनक”नामसँ श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल जा रहल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com . संग मे पकज पराशर आ विनीत उत्पलक पद्य संग्रह, आऽ मौनजी आ प्रेमशंकर सिंह जीक निबन्ध संग्रह सेहो विदेह डाटाबेशक आधारपर श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल जा रहल अछि।) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी  शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे छापल जा रहल अछि- सकलन, डिजिटल इमेजिंग आ लिप्यांतरण- विद्यानन्द झा “पञ्जीकार, नागेन्द्र कुमार झा आ गजेन्द्र ठाकुर। गजेन्द्र ठाकुर (जन्म 1971) कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ -लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन प्रेसमे अछि। ई-मेल- ggajendra@airtelmail.in स्व. श्री हरिमोहन झा (१९०८-१९८४) जन्म १८ सितम्बर १९०८ ई. ग्राम+पो.- कुमर बाजितपुर , जिला- वैशाली, बिहार, भारत। पिता- स्वर्गीय पं. जनार्दन झा “जनसीदन” मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दीक लब्धप्रतिष्ठ द्विवेदीयुगीन कवि-साहित्यकार। शिक्षा- दर्शनशास्त्रमे एम.ए.- १९३२, बिहार-उड़ीसामे सर्वोच्च स्थान लेल स्वर्णपदक प्राप्त। सन् १९३३ सँ बी.एन.कॉलेज पटनामे व्याख्याता, पटना कॉलेजमे १९४८ ई.सँ प्राध्यापक, सन् १९५३ सँ पटना विश्वविद्यालयमे प्रोफेसर तथा विभागाध्यक्ष आऽ सन् १९७० सँ १९७५ धरि यू.जी.सी. रिसर्च प्रोफेसर रहलाह। हिनकर मैथिली कृति १९३३ मे “कन्यादान” (उपन्यास), १९४३ मे “द्विरागमन”(उपन्यास), १९४५ मे “प्रणम्य देवता” (कथा-संग्रह), १९४९ मे “रंगशाला”(कथा-संग्रह), १९६० मे “चर्चरी”(कथा-संग्रह) आऽ १९४८ ई. मे “खट्टर ककाक तरंग” (व्यंग्य) अछि। “एकादशी” (कथा-संग्रह)क दोसर संस्करण १९८७ ए. मे आयल जाहिमे ग्रेजुअट पुतोहुक बदलाने “द्वादश निदान” सम्मिलित कएल गेल जे पहिने “मिथिला मिहिर”मे छपल छल मुदा पहिलुका कोनो संग्रहमे नहि आएल छल।श्री रमानथ झाक अनुरोधपर लिखल गेल “बाबाक संस्कार” सेहो एहि संग्रहमे अछि।  आऽ हुनकर “खट्टर काका” हिन्दीमे सेहो १९७१ ई. मे पुस्तकाकार आएल। एकर अतिरिक्त हिनकक स्फुट प्रकाशित-लिखित पद्यक संग्रक “हरिमोहन झा रचनावली खण्ड ४ (कविता)” एहि नामसँ १९९९ ई.मे छपल आऽ हिनकर आत्मचरित “जीवन-यात्रा” १९८४ ई.मे छपल। हरिमोहन बाबूक “जीवन यात्रा” एकमात्र पोथी छल जे मैथिली अकादमी द्वारा प्रकाशित भेल छल आऽ एहि ग्रंथपर हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कार १९८५ ई. मे मृत्योपरान्त देल गेलन्हि। साहित्य अकादमीसँ १९९९ ई. मे “बीछल कथा” नामसँ श्री राजमोहन झा आऽ श्री सुभाष चन्द्र यादव द्वारा चयनित हिनकर कथा सभक संग्रह प्रकाशित कएल गेल, एहि संग्रहमे किछु कथा एहनो अछि जे हिनकर एखन धरिक कोनो पुरान संग्रहमे सम्मिलित नहि छल। हिनकर अनेक रचना हिन्दी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, तेलुगु आदि भाषामे अनुवादित भेल। हिन्दीमे “न्याय दर्षन”, “वैशेषिक दर्शन”, “तर्कशास्त्र”(निगमन), दत्त-चटर्जीक “भारतीय दर्शनक” अंग्रेजीसँ हिन्दी अनुवादक संग हिनकर सम्पादित “दार्शनिक विवेचनाएँ” आदि ग्रन्थ प्रकाशित अछि। अंग्रेजीमे हिनकर शोध ग्रंथ अछि- “ट्रेन्ड्स ऑफ लिंग्विस्टिक एनेलिसिस इन इंडियन फिलोसोफी”। प्राचीन युगमे विद्यापति मैथिली काव्यकेँ उत्कर्षक जाहि उच्च शिखरपर आसीन कएलनि, हरिमोहन झा आधुनिक मैथिली गद्यकेँ ताहि स्थानपर पहुँचा देलनि। हास्य व्यंग्यपूर्णशैलीमे सामाजिक-धार्मिक रूढ़ि, अंधविश्वास आऽ पाखण्डपर चोट हिनकर लेखनक अन्यतम वैशिष्ट्य रहलनि। मैथिलीमे आइयो सर्वाधिक कीनल आऽ पढ़ल जायबला पीसभ हिनकहि छनि। हरिमोहन झा समग्र हरिमोहन झा जीक समग्र रचनाक एक बेर सिंहावलोकन कएल जाए। कथा-एकांकी १.    १.अयाची मिश्र (एकाङ्की) २.   मंडन मिश्र (एकाङ्की) ३.   महाराज विजय (एकाङ्की)४.  बौआक दाम (एकाङ्की)५.रेलक झगड़ा (एकाङ्की) ६. संगठनक समस्या- पत्र शैली  ७. “रसमयी”क ग्राहक – पत्र-शैली  ८.पाँच पत्र –पत्र-शैली  ९. दलानपरक गप्प१०.घूरपरक गप्प११.पोखड़िपरक गप्प  १२. चौपाड़िपरक गप्प १३.धर्मशास्त्राचार्य १४.ज्योतिषाचार्य १५.पंडितजी १६.कविजी १७.परिवर्तन १८.युगक धर्म १९.महारानीक रहस्य २०.सात रंगक देवी २१.नौ लाखक गप्प २२.रंगशाला २३.अँचारक पातिल २४.चिकित्साक चक्र २५.रेशमी दोलाइ २६.धोखा २७.प्रेसक लीला २८.देवीजीक संस्कार २९.एहि बाटे अबै छथि सुरसरि धार ३०. कन्याक जीवन ३१. रेलक अनुभव ३२. ग्रामसेविका ३३. मर्यादाक भंग ३४. तिरहुताम ३५.टोटमा ३६.तीर्थयात्रा ३७.अलंकार-शिक्षा ३८.बाबाक संस्कार ३९.द्वादश निदान ४०.ग्रेजुएट पुतोहु ४१.ब्रह्माक शाप ४२.आदर्श भोजन ४३.सासुरक चिन्ह ४४.कालीबाड़ीक चोर ४५.कालाजारक उपचार४६.विनिमय ४७.दरोगाजीक मोंछ ४८.शास्त्रार्थ ४९.विकट पाहुन ५०.आदर्श कुटुम्ब ५१.साझी आश्रम ५२.घरजमाय५३.भदेशक नमूना ५४.बीमाक एजेन्ट ५५.अंगरेजिया बाबू पद्य १.सनातनी बाबा ओ कलियुगी सुधारक २.कन्याक नीलामी डाक ३.मिथिलाक मिहिर सँ ४.ढाला झा ५.टी. पार्टी ६.बुचकुन झा ७.पंडित लोकनि सँ ८.निरसन मामा ९.आगि १०.अङरेजिया लड़कीक समदाउनि ११.गरीबनीक बारहमासा १२.श्री यात्रीजीक प्रति : मैथिलीक उक्ति १३.सौराठ १४.अलगी १५.अशोक-वाटिकामे १६.पटना-स्तोत्र १७.श्रद्धेय अमरनाथ झाक प्रति श्रद्धांजलि १८.हिन्दी ओ मैथिली १९.बुचकुन बाबाक चिट्ठी २०.जगमग-जगमग दीप जराऊ २१.कलकत्ता गेला उत्तर २२.अकाल २३.कलकत्ता हमरा बड़ पसन्द २४.सलगमक खण्ड २५.बूढ़ानाथ २६.नवकी पीढ़ीसँ २७.पंडित ओ मेम २८.पंडित-विलाप २९.गंगाक घाटपर ३०.समयक चक्र ३१.महगी-माहात्म्य ३२.रस-निमन्त्रण ३३.अकविताक प्रति : कविताक उक्ति ३४.हम पाहुन छी ३५.अनागत प्रेयसीसँ ३६.मत्स्य-तीर्थ ३७.मिष्टान्न ३८.हे राजकमल ३९.घटक सौं ४०.पंडितजी सौं ४१.कनियाँक समस्या ४२.मुक्तक ४३.गजल ४४.मातृभूमि ४५.नारी-वन्दना ४६.हे दुलही के माय ४७.मात्रूभूमि वन्दना ४८.चन्द्रमाक मृत्यु ४९.मिथिला वन्दना ५०.कवि हे! आब कोदारि धरु ५१.महगी ५२.नव पराती ५३.चालिस आ चौहत्तरि ५४.प्रयोगवादी कविता ५५.स्व. ललित नारायण मिश्रक स्मृतिमे ५६.उद्गार ५७.अन्तिम सत्य ५८.मधुर भाषा मैथिली छी ५९.छगुन्ता ६०.विद्यापति पर्व महान हमर ६१.आठ संकल्प ६२.घूटर काका ६३.वनगाम-महिषी स्मृति ६४.मैथिली-वन्दना ६५.हे मातृभूमि केर माटि ६६.कहू की औ बाबू ६७.कश्मीर हमर थीक ६८.मंगल प्रभात ६९.बुचकुन बाबाक स्वप्न ७०.जय विद्यापति ७१.शुभांशसा ७२.पारिचारिका स्तोत्र ७३.मनचन बाबा ७४.एहि बेरक फगुआ ७५.परतारु जुनि ७६.हे मजूर! कष्ट लखि अहाँक (कविजी: प्रणम्य देवता) ७७.हे हे मजूर! (कविजी: प्रणम्य देवता) ७८.अबि! अनन्त कोमल करुणे! (कविजी: प्रणम्य देवता) ७९.हे वीर! हलायुध धर खड्ग(कविजी: प्रणम्य देवता) ८०.अयि! प्रचंड चंडिके! (कविजी: प्रणम्य देवता) ८१.झाँसीक रानी(कविजी: प्रणम्य देवता) ८२.हे प्रगतिशील महिला समाज(कविजी: प्रणम्य देवता) ८३.प्रिये! हम जाइत छी ओहि पार(कविजी: प्रणम्य देवता) ८४.धन्य-धन्य मातृभूमि (अयाची मिश्र : चर्चरी) ८५.धन्य ई मिथिलेशक दरबार(अयाची मिश्र : चर्चरी) ८६.हे डीह! अमर कीर्तिक निधान! (अयाची मिश्र : चर्चरी) ८७.हरिहर जन्म किएक लेल (माछक महत्व : खट्टर ककाक तरंग) ८८.केहन भेल अन्हेर(खट्टर ककाक टटका गप्प : खट्टर ककाक तरंग) खट्टर ककाक तरंग (कथा-व्यंग्य) कन्यादान (उपन्यास) द्विरागमन (उपन्यास) जीवनयात्रा (आत्मकथा) कन्यादानक समर्पण- जे समाज कन्या कैं जड़ पदार्थवत् दान कय देबा मे कुंठित नहि होइत छथि, जाहि समाजक सूत्रधार लोकनि बालक कैं पढ़ैबाक पाछाँ हजारक हजार पानि मे बहबैत छथि और कन्याक हेतु चारि कैञ्चाक सिलेटो कीनब आवश्यक नहि बुझैत छथि, जाहि समाजमे बी.ए. पास पतिक जीवन-संगिनी ए बी पर्यन्त नहि जनैत छथिन्ह, जाहि समाज कैं दाम्पत्य-जीवनक गाड़ी मे सरकसिया घोड़ाक संग निरीह बाछी कैं जोतैत कनेको ममता नहि लगैत छन्हि, ताही समाजक महारथी लोकनिक कर-कुलिश मे ई पुस्तक सविनय, सानुरोध ओ सभय समर्पित। प्रणम्य देवताक समर्पण- आइ सँ सात वर्ष पूर्व जे कार्तिकी पूर्णिमाक करार पर हमरा सँ पैंच लऽ गेलाह और तहियासँ पुनः कहियो दर्शन देबाक कृपा नहि कैलन्हि, जनिक चिर-स्मरणीय कीर्ति-कलाप प्रथमे कथा मे विशद रूप सँ वर्णित छैन्ह, जे “प्रणम्य देवता” क मध्य सर्वश्रेष्ठ आसन पर अधिकार जमा सकैत छथि, जनिक वन्दनीय बन्धुवर्ग ई पुस्तक देखि विनु मङनहि अपन स्वत्व स्थापित कय लऽ सकैत छथि, तेहन प्रमुख चरित-नायक, विकट पाहुन भीमेन्द्रनाथ क सुदृढ़ विशाल मुष्टिमे ई विचित्र-चरित्र-पूर्ण पोथी विवशतापूर्वक अर्पित छैन्ह! खट्टर ककाक तरंगक समर्पण- जे भंगक तरंगमे काव्य-शास्त्र-विनोदक धारा बहा दैत छथि; जनिक प्रवाहमे थोड़ेक कालक हेतु वेद-पुराण, धर्मशास्त्र, सभटा भसिया जाइत अछि; जे बात-बातमे अद्भुत रस ओ चमत्कारक चाशनी घोरि दैत छथि; जे मर्मस्पर्षी व्यंग्य द्वारा लोकक अन्तस्तल मे पहुँचि गुदगुदी लगा दैत छथि; तेहन चिर आनन्दमूर्ति, परिहास-प्रिय खट्टर कका कैं- त्व्दीयं वस्तु पितृव्य! तुभ्यमेव समर्पितम्। रंगशालाक समर्पण- जे अक्षययौवना नटी एहि अनादि अनन्त रंगशालाक प्रवर्तिका थिकीह, जे मनोहर वीणा-वादिनी सम्पूर्ण चराचर विश्वकैं अपना आंगुरक अग्रभाग पर नचा रहल छथि, जे रहस्यमयी अपन मोहिनी लीलाक झलक देखाय ककरो स्पर्श नहि करय दैत छथिन्ह, जे कल्पनाक रंगीन पाँखि पर आबि कलाकारक कलामे रसक संचार करैत छथिन्ह, तेहन आश्चर्यकारिणी चिरसुन्दरी त्रैलोक्य-विजयिनी माया देवी कैं। 1.शोध लेख. 1.विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी(1878-1952) जन्म स्थान- ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी,जिला-मधुबनी. मूल-पगुल्बार राजे गोत्र-शाण्डिल्य वंशावली- जीवन चौधरी(जन्म स्थान-पंचोभ-दरिभङ्गा) 1801 ई.मे रुद्रपुर आगमन -दुइ पुत्र--श्री रंगी चौधरी(रुद्रपुरमे जन्म) आ’ श्री कंत चौधरी(रुद्रपुरमे जन्म) -कंत चौधरीकेँ तीन पुत्र-श्री चुम्मन चौधरी,श्री बुधन चौधरी आ’ श्री रूदन चौधरी -चुम्मन चौधरीकेँ दुइ पुत्र श्री गोनी चौधरी आ’ श्री पं कवि रामजी चौधरी. श्री जीवन चौधरी जे कविक वृद्ध-पितामह छलाहतनिकर दोखतरी रुद्रपुरमे रहन्हि,जाहि कारणसँ ओ’ 1801 ई.मे पंचोभ छोड़ि रुद्रपुर बसि गेलाह। कविजीक पितामह बहुत पैघ गवैय्या रहथिन्ह।हुनकर गायनक मुख्य क्षेत्र युगल सरकार सीतारामक भक्ति गीत होइत छल,तजकर प्रभाव कविजी पर खूब पड़ल।ओ’ अप्पन पौत्रक नाम रामजी एहि कारणसँ रखलन्हि। स्व.कविजी अपन नामक अनुरूप तुलसीकृत श्रीरामचरित मानस कंठस्थ कय गेल छलाह। ओ’ प्रत्येक प्रश्नक उत्तर रामायणक चौपायसँ करैत छलाह। हुनकर जीवनक सभसँ दुःखद घटना छन्हि जे ओ’ तीन विवाह कएल मुदा कोनो पत्नी चारि सालसँ बेशी नहि जीबि सकलखिन्ह।अंतिम विवाह ओ’ 53 वर्षक अवस्थामे कएल ,जे एक पुत्र, जनिकर नाम दुर्गानाथ चौधरी (दुखिया चौधरी)छन्हि,,,,केर जन्मदेलाक 15 दिनक भीतरे स्वर्गवासी भय गेलीह। कविजी अप्पन जीवनकालमे दरिभङ्गा राजक अंतर्गत जेठ रैय्यतक पद पर कार्यरत छलाह,तथा तेसर पत्नीक मृत्युक उपरांत ओ’ ईहो पद त्यागि कय भगवद भक्तिमे लागि गेलाह। हिनकर एकमात्र प्रकाशित पोथीमे मैथिलीक संगे ब्रजबुलीक कविता सेहो अछि। सर्वतंत्र स्वतंत्र श्री धर्मदत्त झा(बच्चा झा) (1860 ई.-1921 ई.) (भाग-3) पं. रत्नपाणि झाक पुत्र केँ बच्चा झाकेँ अपर गङ्गेश उपाध्याय सेहो कहल जाइत अछि। हिनकर प्रारम्भिक अध्ययन गामे पर भेलन्हि। तकरा बाद ओ’ विश्वनाथ झासँ अध्ययनक हेतु ‘ठाढ़ी’ गाम चलि गेलाह। फेर बबुजन झा आ’ ऋद्धि झासँ न्यायदर्शनक विधिवत अध्ययन कएलन्हि। फेर धर्मदत्त झा प्रसिद्ध बच्चा झा काशी गेलाह। ओतय स्वामी विशुद्धानन्द सरस्वतीसँ मीमांसा, वेदान्तक अध्ययन कएलन्हि। सन् 1886 ई. केर गप छी। एकटा पुष्करिणीक उद्घाटनक उत्सवमे दामोदर शास्त्री जी काशीसँ मिथिलाक राघोपुर ग्राममे निमंत्रित भेल छलाह। ओतय हुनकर शास्त्रार्थ परम्परानुसार बच्चा झाक विद्यागुरु ऋद्धि झासँ भेल छलन्हि। एहिमे ऋद्धि झा परास्त भेल छलाह। गुरुक पराजयक प्रतिशोध लेबाक हेतु सन् 1889 मे बच्चा झा काशी गेलाह। बच्चा झाक उम्र ओहि समयमे 29 वर्ष मात्र छलन्हि। ओ’ प्रायः दामोदर शास्त्रीकेँ लक्ष्य करैत छलाह, जे काशीक वैय्याकरणिक पण्डित लोकनिकेँ शब्द-खण्डक कोनो ज्ञान नहि छन्हि।बच्चा झा समस्त काशीक विद्वान् लोकनिकेँ शास्त्रार्थक हेतु ललकारा देलन्हि। दामोदर शास्त्रीसँ भेल शास्त्रार्थक वर्णन पछिला अंकमे कएल जा’ चुकल अछि। शास्त्रार्थ तीन दिन धरि चलल। ई शास्त्रार्थ सन्ध्यासँ शुरू होइत छल, आ’ मध्य रात्रि धरि चलैत छल।शास्त्रार्थक तेसर दिन दामोदर शास्त्री तर्क कएनाइ बन्न कए देलन्हि, आ’ श्रोताक रूपमे बच्चा झाक तर्क सुनैत रहलाह। पं शिवकुमार शास्त्री आ’ कैलाशचन्द्र शिरोमणि दू टा निर्णायक छलाह। शिरोमणिजीक दृष्टिमे वादी श्री बच्चा झाक पक्ष न्यायशास्त्रक दृष्टिसँ समुचित छल। शिवकुमारजीक सम्मतिमे प्रतिवादी श्री दामोदरशास्त्रीक पक्ष व्याकरणक मंतव्यानुसार औचित्यसम्पन्न छलन्हि।दुनू पण्डितक शास्त्रार्थ कलाक संस्तुति कएल गेल आ’ दुनू गोटेकेँ अपन सिद्धान्तक उत्कृष्ट व्यवस्थापनक लेल विजयी मानल गेल। बच्चा झा गामेमे रहि कए अध्यापन करैत छलाह। मुदा महाराजाधिराज दरभंगा नरेश श्री रमेश्वरसिंहक अकाट्य आग्रहक कारणसँ मुजफ्फरपुरक धर्म समाज संस्कृत कॉलेजक प्रधानाचार्यक पद स्वीकार कएलन्हि। मुदा एकर एकहि वर्षमे ओ’ शरीर त्याग कए देलन्हि। बच्चा झाजीकेँ समालोचकगण किछु उदण्ड आ’ अभिमानी मनबाक गलती करैत रहलाह अछि। मुदा एकटा उदाहरण हमरा लगमे एहन अछि, जाहिसँ ई गलत सिद्ध होइत अछि। ई घटना एहन सन अछि। मुजफ्फरपुर धर्मसमाज संस्कृत विद्यालयमे बच्चा झा प्रधानाचार्य/अध्यक्ष पद पर छलाह, आ’ हुनकर शिष्य पं बालकृष्ण मिश्र ओतय प्रध्यापक छलाह। ओहि समय काशीक पण्डित-पत्रमे गंगाधर शास्त्रीक एकटा श्लोकक विषयमे बच्चा झा कहलन्हि, जे एहि श्लोकमे एकहि पदर्थ वारिधर एक बेर मृदंग बजबय बला चेतन व्यक्त्तिक रूपमे आ’ दोसर बेर वैह अम्बुद- जवनिकारूपी अचेतन रूपमे वर्णित अछि। एतय पदार्थाशुद्धि अछि। एहि पर हुनकर शिष्य बालकृष्ण टोकलखिन्ह- गुरुजी! एहिमे कोनो दोष नहि अछि। किएक तँ वारिकेँ धारण करए बला मेघ(वारिधर) केर स्थिति आकाशमे ऊपर होइत अछि, आ’ अम्बु(जल) केँ देबय बला मेघ (अम्बुद) केर स्थिति नीचाँ होइत अछि।अतः दुनूमे स्थानक भिन्नता अछि। वारिधर आ’ वारिद एहि दुनू शब्दसँ दू भिन्न अर्थ ज्ञात होइत अछि। ताहि हेतु एतय पदार्थक अशुद्धि नहि अछि। ई श्लोक निम्न प्रकारे छल:- मृदुमृदङ्गनिनादमनोहरे, ध्वनित वारिधरे चपला नटी। वियति नृत्यति रङ्ग इवाम्बुदे, जवनिकामनुकुर्वति सम्प्रति॥ श्री रामाश्रय झा ’रामरंग’ भारतीय शास्त्रीय संगीतक समर्पित आऽ विलक्षण ओऽ विख्यात संगीतज्ञ पं रामाश्रय झा ’रामरंग’ केर जन्म ११ अगस्त १९२८ ई. तदनुसारभाद्र कृष्णपक्ष एकादशी तिथिकेँ मधुबनी जिलान्तर्गत खजुरा नामक गाममे भेलन्हि। हिनकर पिताक नाम पं सुखदेव झा आऽ काकाक नाम पं मधुसदन झा छन्हि। रामाश्रयजीक संगीत शिक्षा हिनका दुनू गोटेसँ हारमोनियम आऽ गायनक रूपमे मात्र ५ वर्षक आयुमे शुरू भए गेलन्हि। तकरा बाद श्री अवध पाठकजीसँ गायनक शिक्षा भेटलन्हि। १५ वर्ष धरि बनारसक एकटा प्रसिद्ध नाटक कम्पनीमे रामाश्रय झा जी कम्पोजरक रूपमे कार्य कएलन्हि। पं भोलानाथ भट्ट जी सँ २५ वर्ष धरि ध्रुवपद, धमार, खयाल, ठुमरी, दादरा, टप्पा शैली सभक विधिवत शिक्षा लेलन्हि। पं भट्ट जीक अतिरिक्त्त रामाश्रय झा जी पं बी.एन. ठकार (प्रयाग), उस्ताद हबीब खाँ (किराना), पं बी.एस. पाठक (प्रयाग) सँ सेहो संगीतक शिक्षा प्राप्त कएलन्हि। पं झा १९५४ सँ प्रयागमे स्थाई रूपसँ रहि रहल छथि। १९५५ ई.मे हिनकर नियुक्त्ति लूकरगंज संगीत विद्यालयमे संगीत अध्यापक रूपमे भेलन्हि। १९६० ई.मे हिनकर नियुक्त्ति प्रयाग संगीत समितिमे भेलन्हि, जतए १९७० धरि प्रभाकर आऽ संगीत प्रवीण कक्षाक शिक्षक रहलाह। १९७०मे इलाहाबाद विश्वविद्यालयक संगीत विभागाध्यक्ष श्री प्रो. उदयशंकर कोचकजी पं झाक संगीत क्षेत्रक सेवासँ प्रभावित भए विश्वविद्यालयमे हिनकर नियुक्त्ति कएलन्हि। पं झा उत्कृष्ट शिक्षक, गायक आऽ आकाशवाणीक प्रथम श्रेणीक कलाकार छथि। हिनकर अनेक शिष्य-शिष्या आकाशवाणीक प्रथम श्रेणीक कलाकार आऽ उत्तम शिक्षक छथि, जेना- डॉ. गीता बनर्जी, श्रीमति कमला बोस, श्रीमति शुभा मुद्गल, श्रीकान्त वैश्य,श्री शान्ता राम कशालकर, श्री शान्ता राम कशालकर, श्री कामता खन्ना, श्रीमति सत्या दास, डॉ. रूपाली रानी झा, डॉ इला मालवीय, श्री अनिल कुमार शर्मा, श्री रामशंकर सिंह, श्रीमति संगीता सक्सेना, श्री राजन पर्रिकर, श्रीमति रचना उपाध्याय, श्री नरसिंह भट्त, श्री भूपेन्द्र शुक्ला, श्री जगबन्धु इत्यादि। पं झा संगीत शास्त्र केर श्रेष्ठ लेखक छथि आऽ हिनकर लिखल अभिनव गीतांजलि केर पांचू भाग प्रकाशित भए चुकल अछि, जाहिमे २००सँ ऊपर रागक व्याख्या अछि आऽ दू हजारक आसपास बंदिश अछि। मिथिलावासी श्री रामरंग राग तीरभुक्त्ति, राग वैदेही भैरव, आऽ राग विद्यापति कल्याण केर रचना सेहो कएने छथि आऽ मैथिली भाषामे हिनकर खयाल ’रंजयति इति रागः’ केर अनुरूप अछि। १९८२ मे उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कारक संगे ’रत्न सदस्यता’ सेहो देल गेलन्हि। संगीत लेखनक हेतु काका हाथरसी पुरस्कार, आऽ भारतक सर्वोच्च संगीत संस्था आइ.टी.सी. केर सम्मान सेहो हिनक भेटि चुकल छन्हि। २०० ई. मे स्वर साधना रत्न अवार्ड, २००५ मे संगीत नाटक अकादेमीक राष्ट्रीय पुरस्कार, भारत संगीत रत्न, राग ऋषि, संत तुलसीदास सम्मान, प्रायाग गौरव एवं सोपरी अकादेमीक ’सा म प वितस्ता’ इत्यादि सम्मान श्री झाकेँ प्राप्त छन्हि। श्री रामरंग जी प्रयागमे ’वारिन दास संगीत परिषद’ केर स्थापना कए अनेकानेक संगीत समारोहक आयोजन सेहो कएने छथि। ’इलाहाबाद विश्वविद्यालय संगीत सम्मेलन’ ३० वर्षसँ बन्द पड़ल छल जकरा वार्षिक रूपसँ १९८० मे पुनः श्री झा आरम्भ करबओलन्हि। किएक तँ श्री झा लग कोनो औपचारिक डिग्री नहि छलन्हि, इलाहाबाद विश्वविद्यालय अपन नियममे परिवर्त्तन कएलक आऽ हिनका ओतए संगीत विभागाध्यक्ष बनाओल गेलन्हि, जतएसँ ओऽ १९८९ ई. मे सेवानिवृत्त भेलाह। तुलसीक मानसक आधार पर श्री झा सात काण्डक संगीत रामायणक सेहो रचना कएलन्हि। पं झा मुख्य रूपसँ खयाल, ठुमरी, दादरा, टप्पा आऽ संगहि ध्रुवपद, धमार, तराना, तिरवट, चतुरंग, रागमाला, रागसागर, रागताल सागर, भजन आऽ लोकगीत गायनमे सिद्ध छथि। अखन ८० वर्षक आयुमे प्रयागमे श्री झा संगीत साधनामे रत छथि। दानवीर दधीची मंच सज्जा अम्र वन, पोखरि आ’ युद्ध स्थल वेष-भूषा अधो वस्त्र- आश्रमवासीक हेतु आश्विनक हेतु वैद्यक श्वेत वस्त्र आ’ इन्द्रक हेतु योद्धाक वस्त्र रथ आ’ अस्त्र शस्त्रक चित्र पर्दा पर छायांकित कएल जा’ सकैत अछि। प्रथम दृश्य ( महर्षि दध्यङ आथर्वन दधीचीक तपोवनक दृश्य। सूर्योदयक स्वर्णिम आभा, फूलक गाछक फूलक संग पवनक प्रभावसँ सूर्य दिशि झुकब। यज्ञक धूँआसँ  मलिन भेल गाछक पात। महर्षि सूर्योदयक दृश्यक आनन्द लए रहल छथि। मुदा दृष्टिमे अतृप्त भाव छन्हि। ओहि आश्रमक कुलपति थिकाह महर्षि, दस सहस्र छात्रकेँ विद्यादान करैत छथि, सभक नाम, गाम आ’ कार्यसँ परिचित छथि। से ओ’ तखने प्रवेश करैत एकटा अपरिचित आगंतुकक आगमन सँ साकांक्ष भ’ जाइत छथि।) दध्यङ आथर्वन दधीची: अहाँ के छी आगंतुक? अपरिचित: हम एकटा अतिथि छी महर्षि, आ’ कोनो प्रयोजनसँ आयल छी। कृपा कए अतिथिक मनोरथ पूर्ण करबाक आश्वासन देल जाय। दध्यङ आथर्वन दधीची: एहि आश्रमसँ क्यो बिना मनोरथ पूर्ण कएने अहि गेल अछि आगंतुक। हम अहाँक सभ मनोरथ पूर्ण होयबाक आश्वासन दैत छी। अपरिचित: हम देवता लोकनिक राजा इन्द्र छी। अहाँसँ परमतत्त्वक उपदेशक हेतु आयल छी।एहिसँ अहाँक कीर्त्ति स्वर्गलोक धरि पहुँचत। (दध्यङ आथर्वन दधीची सोचमे पड़ल मंच पर एम्हरसँ ओम्हर विचलित होइत घुमय लहैत छथि। ओ’ मंच पर घुमैत मोने- मोन, बिनु इन्द्रकेँ देखने, बजैत छथि, जे दर्शकगणकेँ तँ सुनबामे अबैत अछि, मुदा इन्द्र एहन सन आकृति बनओने रहैत छथि, जे ओ’ किछु सुनिये नहि रहल छथि, आ’ मंचक एक दोगमे ठाढ़ भ’ जाइत छथि।) दध्यङ आथर्वन दधीची: (मोने-मोन) हम शिक्षा देब तँ गछि लेने छी, मुदा की इन्द्र एकर अधिकारी छथि। बज्र लए घुमए बला, कामवासनामे लिप्त अनधिकारी व्यक्त्तिकेँ परमतत्त्वक शिक्षा? मुदा गछने छी तँ अपन प्रतिज्ञाक रक्षणार्थ मधु-विद्याक शिक्षा इन्द्रकेँ दैत छियन्हि। इन्द्र: कोन सोचिमे पड़ि गेलहुँ महर्षि। दध्यङ आथर्वन दधीची: इन्द्र हम अहाँकेँ मधुविद्याक शिक्षा दए रहल छी। भोगसँ दूर रहू। नाना प्रकारक भोगक आ’ भोज्यक पदार्थ सभसँ। ई सभ ओहने अछि, जेना फूल सभक बीचमे साँप। भोगक अछैत स्वर्ग अधिपति इन्द्र आ’ भूतलक निकृष्ट कुकुरमे कोन अंतर रहत तखन? ( इन्द्र अपन तुलना कुकुरसँ कएल गेल देखि कए तामसे विख-सबिख भ’ गेल। मुदा अपना पर नियंत्रण रखैत मात्र एक गोट वाक्य बजैत मंच परसँ जाइत देखल जाइत अछि।) इन्द्र: महर्षि अहाँक ई अपमान तँ आइ हम सहि लेलहुँ। मुदा आजुक बाद जौँ अहाँ ई मधु-विद्या ककरो अनका देलहुँ तँ अहाँक गरदनि पर ई मस्तिष्क जकर अहाँकेँ घमण्ड अछि, एहि भूमि पर खसत। दृश्य 2: ( ऋषिक आश्रम। आश्विन बन्धुक आगमन।महर्षिसँ अभिवादनक उपरान्त वार्त्तालाप। ) आश्विन बन्धु: महर्षि। आब हम सभ अहाँक मधु विद्याक हेतु सर्वथा सुयोग्य भ’ गेल छी। हिंसा आ’ भोगक रस्ता हम सभ छोड़ि देलहुँ। इन्द्र सोमयागमे हमरा लोकनिकेँ सोमपानक हेतु सर्वथा अयोग्य मानलन्हि, मुदा हमरा सभ प्रतिशोध नहि लेलहुँ। कतेक पंगुकेँ पैर, कतेक आन्हरकेँ आँखि हमरा सभ देलहुँ। च्यवन मुनिक बुढ़ापाकेँ दूर कएलहुँ। आ’ तकरे उपकारमे च्यवन हमरा लोकनिकेँ सोमपीथी बना देलन्हि। दध्यङ आथर्वन दधीची: आश्विनौ। ब्रह्मज्ञानककेँ देब एकटा उपकारमयी कार्य अछि, आ’ अहाँ लोकनि एहि विद्याक सर्वथा योग्य शिक्षार्थी छी। इन्द्र कहने अछि, जे जाहि दिन ई विद्या हम कहियो ककरो देब तँ तहिये ओ’ हमर माथ शरीरसँ काटि खसा देत। मुदा ई शरीरतँ अछि क्षणभंगुर। आइ नहि तँ काल्हि एकरा नष्ट होयबाक छैक। ताहि डरसँ हम ब्रह्म विद्याक लोप नहि होए देबैक। आश्विनौ: महर्षि अहाँक ई उदारचरित! मुद हमरो सभ शल्यक्रिया जनैत छी आ’ पहिने हमरा सभ घोड़ाक मस्तक अहाँक गरदनि पर लगाए देब। जखन इन्द्र अपन घृणित कार्य करत आ’ अहाँक मस्तककेँ काटत तखन अहाँक अस्ली मस्तक हमरा सभ पुनः अहाँक शरीरमे लगा देब। (मंच पर आबाजाही शुरू भ’ जाइत अछि, क्यो टेबुल अनैत अछि तँ क्यो चक्कू धिपा रहल अछि, जेना कोनो शल्य चिकित्साक कार्य शुरू भ’ रहल होय। परदा खसए लगैत अछि, आ’ पूरा खसितो नहि अछि, आकि फेर उठब प्रारम्भ भ’ जैत अछि। एहि बेर घोड़ाक गरदनि लगओने महर्षि आश्विन बन्धुकेँ शिक्षा दैत दृष्टिगोचर ओइत छथि।) दध्यङ आथर्वन दधीची: एहि जगतक सभ पदार्थ एक दोसराक उपकारी अछि। ई जे धरा अछि से सभ पदार्थक हेतु मधु अछि, आ’ सभ पदार्थ ओकरा हेतु मधु। समस्त जन मधुरूपक अछि। तेजोमय आ’ अमृतमय। सत्येक आधार पर सूर्य ज्योति पसारैत अछि एहि विश्वमे, आ’ चन्द्रक धवल प्रकाश दूर भगाबैत अछि रातिक गुमार आ’ आनैत अछि शीतलता। ज्ञानक उदयसँ अन्हारमे बुझाइत साँप देखा पड़ैत अछि रस्सा। विश्वक सूत्रात्माकेँ ओहि परमात्माकेँ अपन बुद्धिसँ पकड़ू। जाहि प्रकारेँ रथक नेमिमे अर रहैत अछि, ताहि प्रकारेँ परमात्मामे ई संपूर्ण विश्व। ( तखने मंचक पाछाँसँ बड्ड बेशी कोलाहल शुरू भ’ जाइत अछि। तखने बज्र लए इन्द्रक आगमन होइत अछि। एक्के प्रहारमे ओ’ महर्षिक गरदनि काटि दैत छथि। फेर इन्द्र चलि जाइत छथि। मंच पर आबाजाही शुरू भ’ जाइत अछि, क्यो टेबुल अनैत अछि तँ क्यो चक्कू धिपा रहल अछि, जेना कोनो शल्य चिकित्साक कार्य शुरू भ’ रहल होय। परदा खसए लगैत अछि, आ’ पूरा खसितो नहि अछि, आकि फेर उठब प्रारम्भ भ’ जैत अछि। एहि बेर महर्षि पुनः अपन स्व-शरीरमे देखल जाइत छथि। ओ’ बैसले छथि आकि इन्द्र अपन मुँह लटकओंने अबैत अछि।) इन्द्र: क्षमा करब महर्षि हमर अपराध। आइ आश्विन-बन्धु हमरा नव-रस्ता देखओलन्हि। गुरूसँ एको अक्षर सिखनहार ओकर आदर करैत छथि मुदा हम की कएलहुँ। असल शिष्य तँ छथि आश्विन बन्धु। दध्यङ आथर्वन दधीची: इन्द्र। अहाँकेँ ताहि द्वारे हम शिक्षा देबामे पराङमुख भए रहल छलहुँ। मुदा अहाँक दृढ़निश्चय आ’ सत्यक प्रति निष्ठाक द्वारे हम अहाँकेँ शिक्षा देल। हमरा मोनमे अहाँक प्रति कोनो मलिनता नहि अछि। इन्द्र: धन्य छी अहाँ आ’ धन्य छय्हि आश्विनौ। आब हम ओ’ इन्द्र नहि रहलहुँ। हमर अभिमानकेँ आश्विनौ खतम कए देलन्हि। (इन्द्र मंचसँ जाइत अछि। परदा खसैत अछि।) दृश्य 3: ( स्वर्गलोकक दृश्य। चारू दिशि वृत्र आ’ शम्बरक नामक चर्चा करैत लोक आबाजाही कए रहल छथि। ओ’ दुनू गोटे आक्रमण कए देने अछि भारतक स्वर्गभूमि पर। इन्द्र सहायताक हेतु महर्षिक आश्रम अबैत छथि।) इन्द्र: वृत्र आ’ शम्बरक आक्रमण तँ एहि बेर बड्ड प्रचंड अछि। अहाँक विचार आ’ मार्गदर्शनक हेतु आयल छी महर्षि। दध्यङ आथर्वन दधीची: इन्द्र। कुरुक्षेत्र लग एकटा जलाशय अछि, जकर नाम अछि, शर्यणा। अहाँ ओतए जाऊ, ओतय घोड़ाक मूड़ी राखल अछि, जाहिसँ हम आश्विनौकेँ उपदेश देने छलहुँ। ब्रह्मविद्या ओहि मुँहसँ बहरायल आ’ ताहि द्वारे ओ’ अत्यंत कठोर आ’ दृढ़ भ’ गेल अछि। ओहिसँ नाना-प्रकारक शस्त्र बनाऊ, अग्नि आश्रित विध्वंसकक प्रयोग करू, त्रिसंधि व्रज, धनुष, इषु-बाण-अयोमुख-लोहाक सूचीमुख सुइयाबला आ’ विकंकतीमुख- कठोर कन्ह सन एहि तरह्क शस्त्रक प्रयोग करू, कवच आ’ शिरस्त्राणक प्रयोग करू, अंधकार पसारयबला आ’ जड़ैत रस्सी द्वारा दुर्गंधयुक्त्त धुँआ निकलएबला शस्त्रक सेहो प्रयोग करू आ’ युद्ध कए विजयी बनू। इन्द्र: जे आज्ञा महर्षि। ( परदा खसैत अछि, आ’ जखन उठैत अछि, तँ पोखडिक कातमे घोड़ाक मूड़ीसँ इन्द्र द्वारा वज्र आ’ विभिन्न हथियार बनाओल जा’ रहल अछि, फेर परदा खसि क’ जखन उठैत अछि तँ अग्नियुक्त शस्त्र, जे फटक्काक द्वारा उत्पन्न कएल जा’ सकैत अछि, देखबामे अबैत अछि आ’ मंच धुँआसँ भरि जाइत अछि। फेर परदा खसैत अछि आ’ मंचक पाछाँसँ सूत्रधारक स्वर सुनबामे अबैत अछि।) सूत्रधार: इन्द्रक विजय भेलन्हि आ’ दुष्ट सभ गुफामे भागि गेल। ईएह छल वैदिक नाटक बादमे एहि अर्थकेँ अनर्थ कए देलन्हि पौराणिक लोकनि, जाहि कथामे दधीचीक हड्डीसँ इन्द्रक वज्र बनएबाक चर्च कएल गेल अछि। (पर्दा ओ’ ई असल बात अछि केर फुसफुसाहटिक संग खसले रहैत अछि, आ’ लाइट क्षणिक ऑफ भेलाक बाद ऑन भए जाइत अछि।) पोसपुत कथा संग्रह श्री संतोष कुमार मिश्र, मिथिला (नेपाल)। मिथिलाक्षरमे प्रकाशित दोसर 21म सदीक मैथिली पोथी। समीक्षा- गजेन्द्र ठाकुर. पोथी समीक्षा सन्तोष कुमार मिश्र केर कथा संग्रह पोसपुत प्राप्त भेल अछि। नेपालक एहि कथाकारक सात गोट कथा पोसपुत, एकटा ब्यथा पत्रमे, जखन कनिञा भेलखिन बिमार, सिपाहि, डाक्टर, भाग्य अप्पन-अप्पन आ’ दाग एहिमे सम्मिलित अछि। कथावस्तु प्रस्तुत करबासँ पहिने एकर अन्य पक्ष पर चर्च करब आवश्यक। पहिल गप जे एहि पुस्तकक समीक्षासँ एकर प्रारम्भ भेल अछि। श्री कालीकान्त ‘तृषित’, देपुरा रुपैठा, जनकपुर एकर सांगोपांग समीक्षा कएलन्हि अछि, आ’ ई कथाकारक उच्च मानसिकता अछि जे ओ’ एहि समीक्षाकेँ उचित रूपमे लेलन्हि, कारण जौँ से नहि रहैत तँ एकर एहि रूपमे स्थान पोथीमे नहि भेटैत। दोसर गप जे ई पोथी एक दिशिसँ देखला उत्तर देवनागरीमे आ’ दोसर दिशिसँ देखला उत्तर मिथिलाक्षरमे लिखल बुझि पड़ैत अछि आ’ से अछियो। 21म शताब्दीक ई प्रायः एहि तरहक प्रथम प्रयास अछि, जे मैथिलीमे देखबामे आएल अछि। आब पहिने तृषित जीक समालोचना देखैत छी। ओ’ लिखैत छथि, जे कथाकारक कथामे पलायनवादी सोचक प्रधानता रहैत अछि, संगहि ईहो गप उठबैत छथि जे साहित्य सृष्टाकेँ तटस्थ प्रस्तोता होयबाक चाही आकि पथ प्रदर्शक, पलायनवादे होयबाक चाही आकि संघर्षक प्रेरणाश्रोत? ‘पोसपुत’क विषयमे तृषित जी कहैत छथि, जे एहिमे तीनपुस्तक वर्णन अछि, आ’ राजा महेन्द्र आ’ राजा त्रिभुवनक समयमे भेल घटनाक वर्णन जोड़बाक अभिप्राय स्पष्ट नहि अछि। ’एकटा व्यथा पत्रमे’ केर विषयमे ऋषित कहैत छथि जे कालक  गति , लोकक विवशता आ’ अनुभूतिक वर्णन अछि एहिमे। तेसर कथा ‘ जखन कनिञा भेलखिन बिमार’ केँ तृषित जी बिमार कथा घोषित करैत छथि। ‘सिपाही’ कथामे ओहि पदक विवरण अछि जे विवाह दानमे प्राथमिकता पबैत छल आ’ आब त्याज्य भ’ गेल अछि। ‘डॉक्टर’ कथाकेँ तृषितजी पलायनवादी सोचक पराकाष्ठा कहैत छथि। तृषितजीक विचारेँ डॉक्टरकेँ मरैत दम तक रोगीकेँ बचेबाक प्रयास करबाक चाही। ’भाग्य अपन अपन’ भाग्य चक्र पर आधारित अछि। ‘दाग’मे क्षणिक आवेशमे उठाओल गेल डेग, अपरिपक्व उम्रमे भेल प्रेमविवाह फेर तकरा बाद दोसराक संग भागि जायब ई सभ पथभ्रष्टताक प्रतीक अछि। पोसपुत आत्मकथात्मक शैलीमे लिखल गेल अछि, मुदा एकर समापन अकस्मात् होइत अछि, पोसपुतक किरदानीसँ आ’ मायक नैहरि जएबासँ। दोसर कथा पत्र शैलीमे अछि, जतय पोस्पुत कथा जेकाँ पात्र संतोष छथि। एहि कथाक समापन सेहो बड्ड हड़बड़ीमे भेल अछि, आ’ घटनाक तारतम्य लेखकसँ पाठक धरि नहि पहुँचि सकल। ओहिना जखन कनिञा भेलखिन बिमारमे लेखक अपन कथ्य स्पष्ट नहि कए सकलाह। सिपाहि कथामे सेहो पात्रक नाम संतोष छन्हि, मुदा कथ्य आत्मकथात्मक नहि अछि। डॉक्टरकेँ देशमे सेवा करबाक पुरस्कार भेटलैक प्रमाण-पत्रक रद्द होयब आ’ से ओकरा हेतु प्राणघातक सिद्ध भेल।भाग्य अपन-अपन पुरान खिस्सा कहबाक शैलीमे अछि, जे राजा देशमे सर्वेक्षण करएबाक हेतु राजकुमारकेँ पठबैत छथि आ’ ई कथ नीक बनि पड़ल अछि। दाग कथा कथात्मक अछि आ’ हड़बड़ीमे लिखल भाषित होइत अछि। एहि कथा संग्रहकेँ तृषित जी समीक्षाक संग भाषायी रूपसँ संपादित नहि कएलन्हि, कारण एहिमे मानकताक अभाव अछि। प्रूफ रीडिंग सेहो नीक जेँका नहि भेल अछि। मानकताक हेतु विदेह आ’ मिथिला मंथनसँ प्रयास शुरू भेल अछि, आ’ विदेहक रचना लेखन स्तंभमे एकरा स्थान देल गेल अछि।केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर द्वारा सेहो मैथिली स्टाइल मैनुअलक निर्माण भ’ रहल अछि, आवश्यकता अछि, जे नेपालक विद्वान लोकनि सेहो अपन मत मैथिली अकादमीक मानक निर्धारण शैलीक आधार पर बनाओल जा’ रहल शैली पर देथि, जाहिसँ ई सर्वग्राह्य होए। उपन्यास:सहस्रबाढ़नि तखन बालककेँ संस्क़ृत शिक्षाक मोहसँ दूर राखल गेल। मैथिल परिवारमे अंग्रेजीक प्रवेश प्रायः नहियेक बराबर छल आ’ ताहि कारणसँ अधिकांश परिवार एक पीढ़ी पाछू चलि गेल छल। मुदा झिंगुर बाबू अपन पुत्रक कलिकतियाबाबूकेँ राखि शिक्षाक व्यवस्था कएल। तदुपरांत दरिभङ्गामे एकटा बंगालीबाबू बालककेँ अंग्रेजीक शिक्षा देलखिन्ह। बालक कलित शनैः शनैः अपन चातुर्यसँ मंत्रमुग्ध करबाक कलामे पारंगत भ’ गेलाह। जाहि बालककेँ झिंगुरबाबू अन्यमनस्क पड़ल आ’ मात्र सपनामे हँसैत देखलखिन्ह, तकर बाद ठेहुनिया मारैत, फेर चलैत से आब शिक्षा-दीक्षा प्राप्त क’ रहल छथि। हुनका अखनो मोन पड़ि रहल छलन्हि जे कोना ठेहुनिया दैत काल, नेनाक हाथ आगू नहि बढैक आ’ ओ’ बेंग जेंकाँ पाछू सँ सोझे आगू फाँगि जाइत छलाह। पूरा बेंग जेकाँ-अनायासहि ओ’ मुस्कुरा उठलाह। पत्नी पूछि देलखिन्ह जे कोन बात पर मुस्कुरेलहुँ, तँ पहिने तँ ना-नुकुर केलन्हि फेर सभटा गप कहि देलखिन्ह। तखनतँ गप पर गप निकलय लागल। “एक दिन कलितकेँ देखलहुँ जे ठेहुनियाँ मारने आगू जा’ रहल छथि। आँगनसँ बाहर भेला पर जतय अंकर-पाथर देखल ततय ठेहुन उठा कय, मात्र हाथ आ’ पैर पर आगू बढ़य लगलाह” , पत्नीकेँ मोन पड़लन्हि। “एक दिन हम देखलहुँ जे ओ’ देबालकेँ पकड़ि कय खिड़की पर ठाढ़ हेबाक प्रयासमे छथि। हमरो की फूड़ल जे चलू आइ छोड़ि दैत छियन्हि। स्वयम प्रयास करताह। दू बेर प्रयासमे ऊपर जाइत-जाइत देवालकेँ पकड़ने-पकड़ने कोच पर खसि गेलाह। हाथ पहुँचबे नहि करन्हि। फेर तेसर बेर जेना कूदि गेलाह आ’ हाथ खिड़की पर पहुँचि गेलन्हि आ’ ठाढ़ भ’ गेलाह” , झिंगुर बाबूकेँ एकाएक यादि पड़लन्हि। “एक दिन हम ओहिना एक-दू बाजि रहल छलहुँ। हम बजलहुँ एक तँ ई बजलाह, हूँ। फेर हम बजलहुँ दू तँ ई बजलाह, ऊ। तखन हमरा लागल जे ई तँ हमर नकल उतारि रहल छथि”। “ एक दिन खेत परसँ एलहुँ आ’ नहा-सोना भोजन कय खखसि रहल छलहुँ। अहाहा’ केलहुँ तँ लागल जेना कलित सेहो अहाहा’ केलथि। घूरि कय देखलहुँ तँ ओ’ गेंदसँ बैसि कय खेला रहल छलाह। दोसर बेर खखसलहुँ तँ पुनः ई खखसलाह। हम कहलहुँ किछु नहि, ई हमर नकल कय रहल छथि। दलान पर सभ क्यो हँसय लागल। फेर तँ जे आबय, कलित ऊहुहूँ, तँ जवाबमे ईहो ऊहूहूँ दोसरे तरीकासँ कहथि। उम्र कतेक हेतन्हि, नौ-वा दस महिना”। “ हम जे सुनेलहुँ ताहि समय कतेक वयस होयतन्हि, छ’ आ’ कि सात मास”। पत्नी सासु-ससुर वा बाहरी सदस्य नहि रहला पर सोझे-‘गप सुनलहुँ’ वा’ ई करू वा’ ओ’ करू बजैत छलीह। मुदा सासु- ससुरक सोझाँ तृतीया पुरुषमे-सुनैत छथिन्ह, फलना कहैत छलैक-। आ’ फेर झिंगुर बाबू की कम छलाह. ओहो ओहिना गीताक काजक लेल काजक अनुकरणमे तृतीया पुरुषमे जवाब देथि। मुदा एकांतमे फेर सभ ठीक। पुनः मुस्कुरा उठलाह झिंगुर बाबू, ई प्रण मोने-मोन लेलथि जे कलितकेँ एहि जंजालसँ मुक्त करेतथि, ओहो तँ बूझताह जे पिता कोनो पुरान-धुरान लोक छथि। पनी पुनः पुछलथिन्ह जे आब कोन बात पर मुस्की छूटल। मुदा एहि बेर झिंगुर कन्नी काटि गेलाह। मुस्की दैत दलान दिशि निकलि गेलाह, ओतय किछु गोटे अखड़ाहाक रख-रखाबक बात क’ रहल छलाह। भोरहाकातक अखड़ाहाक गपे किछु आर छल। भोरे-भोर सभ तुरियाक बच्चा सभ, जवान सभ पहुँचि जाइत छल। एकदम गद्दा सन अखड़ाहा, माटि कय कोड़ि आ’ चूरि कय बनायल। बालक कलितकेँ छोड़ि सभ बच्चा ओतय पहुँचैत छल। झिंगुर बाबू कचोट केलन्हि तँ आन लोक सभ कहलखिन्ह जे से की कहैत छी। अहाँ हुनका कोनो उद्देश्यक प्राप्ति हेतु अपनासँ दूर रखने छी, तँ एहिमे कचोट कथीक। एकौरसँ ठाकुर परिवार मात्र एक घर मेंहथ आयल आ’ आब ओहिसँ पाँचटा परिवार भ’ गेल अछि। डकही माँछक हिस्सामे एकटा टोलक बराबरी ठकुरपट्टीकेँ भेट गेल छैक। कलितक तुरियाक बच्चाकेँ ल’ कय आठटा परिवार अछि ठकुरपट्टीमे। अखनेसँ बच्चा सभकेँ मान्यता द’ देल गेल छैक। तखने एकौरसँ एकटा समदी एलाह आ’ भोजपत्रमे तिरहुतामे लिखल संदेश देलखिन्ह। झिंगुर बाबू अँगनासँ लोटा आ’ एक डोल पानि हुनका देलखिन्ह आ’ पत्र पढ़य लगलाह। प्रायः कोनो उपनयनक हकार छलन्हि। ‘परतापुरक सभागाछी देखि कय जायब’ , ई आदेशपूर्ण आग्रह झिंगुर बाबू समादीकेँ देलखिन्ह, एकटा पूर्वजसँ मूल-गोत्रक माध्यमसँ जुड़ल दियादक प्रति अनायासहि एकत्वक प्रेरणा भेलन्हि। फेर आँगन जाय पत्र पढ़ब प्रारंभ कएल। ॥श्रीः॥ स्वस्ति हरिवदराध्यश्रीमस्तु झिंगुर ठाकुर पितृचरण कमलेषु इतः श्री गुलाबस्य कोटिशः प्रणामाः संतु। शतम~ कुशलम। आगाँ समाचार जे हमर सुपुत्र श्री गड़ेस आ’ चन्द्रमोहनक उपनयन संस्कारक समाचार सुनबैत हर्षित छी। अहाँक प्रपितामह आ’ हमर प्रपितामह संगहि पढ़लथि। अपन गोत्रीयक समाचार लैत-दैत रहबाक निर्देश हमर पितामह देने गेल छलाह। हर्षक वा’ शोकक कोनो घटना हमरा गामसँ अहाँक गाम आ’ अहाँक गामसँ हमरा गाम नहि अयने अशोचक विचार नहि करबासँ भविष्यक अनिष्टक डर अछि। संप्रति अपने पाँचो ठाकुर गुरुजनक तुल्य पाँच पांडवक समान समारोहमे आबि कृतार्थ करी। अहींकेँ अपन ज्येष्ठ पुत्रक आचार्य बनेबाक विचार कएने छी। परतापुरक सभागछीक पंचकोशीमे अपने सभ गेल छी, तेँ बहुत रास लोक गप-शपक लालायित सेहो छथि। अगला महीनाक प्रथम सोमकेँ जौँ आबि जाइ तँ सभ कार्य निरन्तर चलैत रहत। बुधसँ प्रायः प्रारम्भिक कार्य सभ शुरु भ’ जायत। इति शुभम~। बलान धारक कातमे परतापुरक चतरल-चतरल गाछ सभ आ’ तकर नीचाँ सभागछी। बलानक धार खूब गहींर आ’ पूर्ण शांत। ई तँ बादमे हिमालयसँ कोनो पैघ गाछ बलानमे खसल आ’ हायाघाट लग सोझ रहलाक बदला टेढ़ भ’ एकर धारकेँ रोकि देलक आ’ एकटा नव धार कमलाक उत्पत्ति भेल। बलान झंझारपुर दिशि आ’ कमला मेंहथ , गढ़िया आ’ नरुआर दिशि। बलान गहींर आ’ शांत, रेतक कतहु पता नहि; मुदा कमला फेनिल, विनाशकारी। बाढ़िक संग रेत कमला आनय लगलीह। ग्रीष्म ऋतुमे बलान पूर्वे रूप जेकाँ रहैत छथि, बिना नावक पार केनाइ कठिन, किंतु कमलामहारानीकेँ पैरे लोक पार करैत रहथि। सभटा सभागछीक चतरल गाछ बाढ़िक प्रकोपमे सुखा गेल। चारूदिश रेत आ’ सभागाछी उपटि गेल। चलि गेल सभटा वैभव सौराठ। मुदा झिंगुर बाबूक कालमे परतेपुरक ध्रुवसँ पंचकोशी नापल जाइत छल, से बादहुमे परम्परारूपमे रहल। कलित दरिभङ्गासँ परसू आबि जयताह,,,, , तखन हुनका ल’ कय एकौर जायब। बेचारे बहुत दिन तपस्या कयलन्हि। एहि बेर मामा गाम, दीदीगाम सभ ठाम घुमा देबन्हि। सभकेँ मोन लागल छैक। महाभारत_महाकाव्य हस्तिनापुर सम्राट शांतुनु, गंग तट भ्रमण करि रहल। युवती बनि देवि गंगा, तट जकर छलि ठाढ़ निश्चल॥ भय अभिभूत कहल हे सुन्दरि, करु प्रेम स्वीकार हमर। पत्नी बनि करु राज, राज्य-धन-प्राण पर।। अछि समर्पण सभ अहाँ पर, किंतु अछि किछु बंधन हमर। क्यो पूछय नहि परिचय हमर, नहि रोक-टोक करय हमर कार्य पर।। प्रेम-विह्वल शांतुनु, करि स्वीकार बंधन सकल। आनल महल मानव-गंगाकेँ, समय बितल बितिते रहल॥ भेल बात विचित्र ई जे, सात पुत्र शांतुनुकेँ भेल। युवती फेकल सभकेँ गंगधारमे, राजाने किछु पुछि सकल॥ ई युवती के अछि जे, बुझि परैछ क्षण कोमल। क्षण क्रूर-क्रूरतम जे, अबोध बालक केर प्राणक हेतु विकल॥ पूछल राजन् अपन शर्त्त तोड़ि, आठम बेर अपनाकेँ रोकि नहि सकल। देलक युवती परिचय सकल, हम गंग आ’ ई आठ वसु छल॥ देलन्हि महर्षि वशिष्ठ शाप तनिका, मर्त्यलोकक जन्म लेबक। आठम पुत्रकेँ राखब हम किछु दिन, देवव्रत देब स्वरूप सेवक॥ महर्षि वशिष्ठक नन्दिनीकेँ, देखि केलक प्त्नी वसु प्रभासक। अपन मर्त्यलोकक सखी हेतु, नन्दिनीकेँ हरण तकर परु संग॥ ऋषि ताकल गौ-देविकेँ, ज्ञान-चक्षुसँ। देलक शाप वसुगणकेँ भय-क्रोधित, कएल प्रार्थना वसुघ्राण शापित॥ हमर शाप नहि घूरि सकत परञ्च, सात वसु भय जायत मुक्त तुरन्त। प्रभासकेँ रहय परत ततय, किछु दिन धरि मर्त्यलोकक शरण॥ होयत यशस्वी ई बहुत, घुरि आयल वसुगण गंग पास। हे देवि बनू माता हमरा सभक, दिय’ मुक्ति तखन अछि आस॥ शांतुनु भय गेल विरक्त, छूटि गेल गंगक सानिध्य। समय बीतल गेल एकदिन, तट, धारक समक्ष॥ गजेन्द्र ठाकुरक १२ टा हैकू १.वास मौसमी, मोजर लुबधल पल्लव लुप्ता २.घोड़न छत्ता, रेतल खुरचन मोँछक झक्का ३. कोइली पिक्की, गिदरक निरैठ राकश थान ४.दुपहरिया भुतही गाछीक सधने श्वास ५.सरही फल कलमी आम-गाछी, ओगरबाही ६.कोलपति आऽ चोकरक टाल, गछपक्कू टा ७.लग्गा तोड़ल गोरल उसरगि बाबाक सारा ८.तीतीक खेल सतघरिया चालि अशोक-बीया ९.कनसुपती, ओइधक गेन्द आऽ जूड़िशीतल १०.मारा अबाड़ डकहीक मछैड़ ओड़हा जारि ११.कबइ सन्ना चाली बोकरि माटि, कठफोड़बा १२.शाहीक-मौस, काँटो ओकर नहि बिधक लेल हैबून १ सोझाँ झंझारपुरक रेलवे-सड़क पुल। १९८७ सन्। झझा देलक कमला-बलानक पानिक धार, बाढ़िक दृश्य। फेर अबैत छी छहर लग। हमरा सोझाँमे एकठामसँ पानि उगडुम होइत झझात बाहर अछि अबैत। फेर ओतएसँ पानिक धार काटए लगैत अछि माटि। बढ़ए लगैत अछि पानिक प्रवाह, अबैत अछि बाढ़ि। घुरि गाम दिशि अबैत छी। हेलीकॉप्टरसँ खसैत अछि सामग्री। जतए आयल जलक प्रवाह ओतए सामग्रीक खसेबा लए सुखाएल उबेड़ भूमिखण्ड अछि बड़ थोड़। ओतए अछि जन- सम्मर्द। हेलीकॉप्टर देखि भए जाइत अछि घोल। अपघातक अछि डर हेलीकॉप्टर नहि खसबैत अछि ओतए खाद्यान्न। बढ़ि जाइत अछि आगाँ। खसबैत अछि सामग्री जतए पानि बिनु पड़ैत छल दुर्भिक्ष, बाढ़िसँ भेल अछि पटौनी। कारण एतए नहि अछि अपघातक डर। आँखिसँ हम ई देखल। १९८७ ई.। पएरे पार केने कमला धार, आइ विशाल पद्य: महाबलीपुरममे असीम समुद्रक कातक दृश्य, हृदय भेल उमंगसँ पूरित। सूर्य-मंदिर पांडव-रथ संग, आकश-द्वीपक दर्शन कयल हम। नूनगर पानि जखन मुँह गेल, भेलहुँ आश्चर्यित,गेलहुँ हमारा हेल। लहरिक दीवारिसँ हमारा टकराय, अंग-अंग सिहरि-सिहराय। देखल सुनल समुद्रक बात, बिसरल मन-तन लेलहुँ निसास। सुनेलक ‘मणि’ गाइड ई बात, एलथि विदेशी खोललथि ई सत्य, पल्लव वंशक ई छल देन, भारतवसी बिसरल तनि भेर। मोन पडल अंकोरवाटक मंदिर, राजा खतम भेल बिसरल जन,हरि-हरि। टूटल इतिहासक तार जखन, स्वाति भेल ह्रास अखन; कास्पियन सागरक पानिक भीतरक मंदिर, भारतीय व्यापारीक द्वारा निर्मित। आब एखन अछि हम्मर ई हाल, गामक बोरिंग पम्पसेट अमेरिकन इंजीनियरक खैरात। छोडू भसियेलहुँ कतय अहाँ फेर, प्रीति,पत्नी,हँसि-हँसि भेलथि भेड़। मैथिली राम चरित मानस-मैथिली समालोचनाक विफलता मैथिली साहित्यकेँ पढ़निहारक समक्ष मैथिलीमे रामचरित किंवा रामायण 1. श्री चंदा झा कृत मिथिला भाषा रामायण आऽ 2.श्री लालदासक रमेश्वर चरित मिथिला रामायण -एहि दू गोट ग्रंथक रूपमे प्राप्त होइत छन्हि।पाठ्यक्रमक अंतर्गत स्कूल,कॉलेज-विश्वविद्यालयक मैथिली विषयक पाठ हो किंवा सामान्य आलोचनग्रंथ आकि पत्र-पत्रिकामे छिड़ियायल लेख सभ एहि दू गोट रामायणक अतिरिक्त कोनो तेसर रामायणक अस्तित्वो धरि नहि स्वीकार कएल गेल अछि। एकर संग ईहो बुझि लियह जे जनमानस समालोचनाशास्त्रक आधार पर राखल विचारकेँ तखने स्वीकार करैत अछि जखन की ओऽ सत्यताक प्रतीक हो। आइयो मिथिलामे अखंड रामायण पाठ होइत अछि-बाल्मीकि रामायणक किंवा तुलसीक रामचरितमानसक। एकर कारण पर हम बहुत दिन धरि विचार करैत रहलहुँ।कैकटा चन्द्र रामायण आऽ लालदासकृत मिथिला रामायण रामायण अखंड पाठ केनिहार लोकनिकेँ बँटबो कएलहुँ, मुदा सबहक ईएह विचार छल, जे ई दुनू ग्रंथ मैथिली साहित्यक अमूल्य धरोहर अछि, मुदा अखंड पाठक सुर जे तुलसीक मानसमे अछि से दोसर भाषाक रहला उत्तरो संगीतमय अछि। शंकरदेव अपन मातृभाषा असमियाक बदला मैथिली भाषाक प्रयोग संगीतमय भाषा होयबाक द्वारे कएलन्हि ताहि भाषामे संगीतमय रामायणक रचना जे अखण्ड पाठमे प्रयोग भय सकय, केर निर्माण संभव नहि भय सकल अछि से हमर मोन मानबाक हेतु तैयार नहि छल। तखने एकटा लाइब्ररीमे हमरा श्री रामलोचनशरण-कृत यथासम्भव पूर्णभावरक्षित समश्लोकी मैथिली श्रीरामचरितमानसक दर्शन भेल । एहि ग्रंथकेँ पूर्णरूपेँ पढ़बाक मोह हम नहि त्यागि सकलहुँ आऽ आब एहि पर एक गोट छोट-छीन समीक्षा लिखबाक पहिने हम समस्त मैथिल समाजसँ दुइ गोट प्रश्न पुछय चाहैत छी। 1.अपन समीक्षक लोकनि एहि मोतीकेँ चिन्हबामे सफल किएक नहि भय सकलाह,एकर चर्चो तक मैथिलीक उपरोक्त दुनू रामायणक समक्ष किएक नहि केल गेल। आचार्य रामलोचन शरण मैथिलीक सभसँ पैघ महाकाव्यक रचयिता छथि आऽ हमरा विचारे सभसँ संपूर्ण मैथिली रामायणक सेहो। जखन हम एहि महाकाव्यक फोटोकॉपी लाइब्ररियनक विशेष अनुकंपासँ लेबामे सफल भेलहुँ आऽ एकर पूर्वाँचल मिथिलाक रामायण- अखंड- पाठक संस्थाकेँ देलहुँ, तँ ओ ऽ लोकनि एकरा देखि कय आश्चर्यचकित रहि गेलाह आऽ अगिला साल एहि रामायणक अखंड पाठक निर्णय कएलन्हि। एकरा मैथिलीक समालोचनाशास्त्रक विफलता मानल जाय, किएक तँ ई महाकाव्य तँ विफल भैये नहि सकैत अछि। आचार्यक मनोहरपोथीक चर्चा हम अपन बाल्येवस्थासँ सुनैत रही। 2. मैथिलीक सभसँ पैघ महाकाव्यक चर्चा मात्र सीतायन पर आबि किएक खतम भय जाइत अछि।आचार्य श्री रामलोचनशरणक मैथिली श्री रामचरितमानस सभसँ पैघ महाकाव्य अछि ई एकटा तथ्य अछि आऽ से समालोचनाकार किंवा मैथिली भाषाक इतिहासकार लोकनिक कृपाक वशीभूत नहि अछि। अपन ग्रंथक किञ्चित् पूर्ववृत्तम् मे आचार्य लिखैत छथि- मिथिलाभाषायाः मूर्द्धन्या लेखकाः श्रीहरिमोहनझामहोदया निशम्यैतद् वृत्तं परमाह्लादं गता भूयो भूयश्च मामुत्साहितवन्तः। आगाँ ओऽ लिखैत छथि-प्राध्यापकस्य श्री सुरेन्द्रझा ‘सुमन’ तथा सम्पादनविभागस्थ पण्डित श्री शिवशंकरझा-महोदयस्य हृदयेनाहं कृतज़्ज्ञोऽस्मि। आचार्यजीक सुन्दरकाण्डक पारंभ देखू- जामवंत केर वचन सोहाओल। सुनि हनुमंत हृदय अति भाओल॥1॥ ता धारि बाट देखब सहि सूले। खा कय बंधु कंद फल मूले॥2॥ जाधरि आबी सीतहिँ देखी। होयत काज मन हरख विसेखी॥3॥ ई कहि सबहिँ झुकाकय माथे। चलल हरषि हिय धय रघुनाथे॥4॥ सिंधु तीर एक सुंदर भूधर। कौतुक कूदि चढ़ल तेहि ऊपर॥5॥ पुनु पुनि रघुवीरहिँ उर धारी। फनला पवनतनय बल भारी॥6॥ जहि गिरि चरन देथि हनुमंते। से चल जाय पताल तुरंते॥7॥ सर अमोघ रघुपति केर जहिना। चलला हनूमान झट तहिना॥8॥ जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। कह मैनाक हौ श्रम भारी॥9॥ तुलसी अकबरक समकालीन छलाह आऽ हुनकर भाषा आऽ अखुनका भाषामे किछु अंतर आबि गेल अछि, मुदा तुलसीक गेयता ओहिनाक ओहिना अछि। आचार्यजी तुलसीक गेयता उठओलन्हि अछि, आऽ दुरूहता खतम कय देने अछि। सभ काण्डक शुरूमे देल संस्कृत पद्य तुलसीक मानससँ लेलन्हि अछि। कवि चन्द्र आऽ लालदास दुनू गोटे अप्पन संस्कृत पद्य बनओलन्हि अछि। आचार्यजीक ई मैथिली रमचरितमानस तुलसीक मानसक रूपांतर तँ अछि,मुदा ई मैथिलीक मूल महाकाव्यक रूपमे परिगणित होयबाक अधिकारी अछि जेना कंबनक तमिल रामायण आऽ तुलसीक मानस अपन-अपन भाषामे केल जा रहल अछि। कंबन बाल्मीकी रामायणक रूपांतर तमिलमे कय रहल छलाह आऽ बाल्मीकि रामायणक विषयमे कहलन्हि जे- ई रामायण एकटा दूधक समुद्र छे आऽ हम छी एकटा बिलाड़ि जे मोनसूबा बना रहल अछि जे एहि सभटा दूधकेँ पीबि जाइ। ओना इइहो सत्य जे कंबन कहियो -आचार्यजी सेहो एहिना कएलन्हि- रामायण केँ अपन मौलिक कृति नहि कहलन्हि वरन बाल्मीकिक कृतिक रूपांतरे कहलन्हि,जखन कि ओ ऽ अपन कृतिमे रामकेँ भगवान बनाय देलन्हि।बाल्मीकि रामकेँ मर्यादा पुरुष अहि मानैत छलाह।बाल्मीकि सुग्रीवक विवाह बालीक पत्नीसँ बालीक मरबाक पश्चात होयबाक वर्णन करैत छथि मुदा कंबन बालीक पत्नीक आजीवन वैधव्यक वर्णन करैत छथि। आछर्यजीकेँ ई करबाक आवश्यकता नहि पड़लन्हि किएकतँ तुलसीक मानस लोकक कंठमे बसि गेल छल,आऽ ओऽ एकर निर्वाह कएलन्हि। आब मानसक एकटा विवादास्पद पद्यक चर्चा करी। अर्थक अनर्थ कोना होइत अछि से देखू। आचार्यजी सुन्दरकाण्डक अंतमे लिखैत छथि जखन सिंधु (समुद्र)रामकेँ लंका जयबाक रस्ता नहि दैत छथि तखन राम कहैत छथि, लछुमन बान सरासन आनू। सोखब बारिधि बिसिख कृसानू॥1॥ तखन सिंधु कर जोरि बजैत छथि- ढोल गमार सुद्र पसु नारी। सब थिक ताड़न केर अधिकारी॥ एकर अर्थ ई सभ -ढोल गमार सुद्र पसु नारी- ई सभ शिक्षाकिंवा सबक देबा योग्य अछि,गमार सुद्र आऽ नारीमे शिक्षाक अभाव अछि तेँ आ ऽ पसुमे मनुष्यक अपेक्षा बुद्धि नहि छैक तेँ, ढोलक प्रयोग बिना शिक्षाक करब तँ संगीत नहि ध्वनि भय जायत। नीचाँ तुलसीक श्रीरामचरित मानसमे सेहो देखू- फेर समुद्र ओहि स्थितिमे खलनायक बनि रहल छल आ ऽ ओकर वक्त्तव्य कविक आकि रचनाकारक वक्त्तव्य नहि भय सकैत अछि। रचनाकारक रचनामे नीक अधलाह सभ पात्र रहैत अछि, आ ऽ ओहि पात्रक मुँह सँ नीक आ ऽ अधलाह दुनू गप निकलत। रचनाकारक सफलता एहि पर निर्भर करैत अछि, जे ओ ऽ अपनाकेँ अपन पत्रसँ फराक कय पबैत अछि कि नहि। एहि आलोचना निबंधक उद्देश्य चन्द्र कवि आकि कवि लालदासक रचनाकेँ छोट करब नहि अछि वरन् हुनकर रचनाक समकक्ष आचार्यक रचनाकेँ अनबा मात्र अछि जाहिसँ तुलसीक मानसक वर्चस्व आचार्यजीक रचना खतम कय सकय। तुलसीक प्रासंगिकता नहि वरण ओकर दुरूहताकेँ आचार्य खतम कएने छथि। पंजी-प्रबन्ध पंजी प्रबन्धपूर्व मध्य कालमे ब्राह्मण कायस्थ आऽ क्षत्रिय वर्गक जाति शुद्धताक हेतु निर्मित कएल गेल। एहि अंकमे ब्राह्मणक पंजी-प्रबन्धक चर्च कएल जा रहल अछि। कोनो ब्राह्मणक जाति शुद्धताक हेतु उतेढ़ जानब आवश्यक छल।उतेढ़ छल सात पुरुषक परिचय जाहि हेतु एहि बत्तीस कुलक परिचय आवश्यक छल-पिता एवं माताक पितामह एवं पितामही आऽ मातामह एवं मातामही केर पितामह एवं पितामही आऽ माता एवं मातामही केर पिता। आऽ एहि बत्तीस पूर्वजसँ विवाहयोग्य व्यक्ति सातम पड़बाक चाही। एहि क्रममे श्रोत्रिय,योग्य आऽपंजीबद्ध श्रेणी भय गेल। जे पंजीबद्ध नहि छलाह से जएबार भेलाह। उतेढ़मे श्रोत्रिय मातृपक्षमे पाँच पीढ़ी आऽ पितृपक्षमे सात पीढ़ी त्यागि विवाह करैत छलाह। योग्य मात्र श्रोत्रियसँ एहि अर्थमे भिन्न छलाह जे ओऽ लोकनि पितृ-पक्षमे सातम पीढ़ीक त्याग करैत छलाह मुदा योग्य नहि करैत छलाह। ई लोकनि पितृ पक्षमे छः पीढ़ी आऽ मातृ पक्षमे पाँच पीढ़ीक त्याह कय विवाह करैत छलाह। पंजीबद्ध लोकनि जिनका वंशज सेहो कहल जाइत अछि,मातृ पक्षमे चारि आऽ पितृ-पक्षमे छः पीढ़ी त्यागि कय विवाह करैत छलाह। 19 प्रकारक गोत्र 34 प्रकारक मूल आऽ 243 प्रकारक मूलग्राममे ई सभ विभक्त छल। पुनः कर्मकाण्डक आधार पर सामवेदी आऽ शुक्ल यजुर्वेदी ब्राह्मणक दू गोट उर्ध्वाधर विभाजन क्रमशः छन्दोग्य आऽ वाजसनेय ब्राह्मणक रूपमे बनले रहल। 19 गोट गोत्र आ’ 243 मूल ग्राममे मुख्य मूल 34 टा निर्धारित कएल गेल। एहि 243 ग्रामसँ सेहो ई सभ विभिन्न क्षेत्र आ’ ग्राममे पसरलाह। 19 गोट गोत्र निम्न प्रकारे अछि: 1. शाण्डिल्य 2. वत्स 3. सावर्ण 4. काश्यप 5. पराशर 6. भारद्वाज 7. कात्यायन 8. गर्ग 9. कौशिक 10. अलाम्बुकाक्ष 11. कृष्णात्रेय 12. गौतम 13. मौदगल्य 14. वशिष्ठ 15. कौण्डिन्य 16. उपमन्यु 17. कपिल 18. विष्णुवृद्धि 19. तण्डी मुख्य 34 मूल सेहो तीन श्रेणीमे विभक्त अछि। श्रेष्ठ-प्रथम श्रेणीमे 1. खड़ौरे, 2. खौआड़े, 3. बुधबाड़े, 4. मड़रे, 5. हरिहरे, 6. घसौते, 7. खिसौते, 8. कमहे, 9. नरौने, 10. वमनियामै, 11. हरिअम्मे, 12. सरिसवै, 13. सोदरपुरिये. द्वितीय श्रेणीमे 1. गंगोलिवार, 2. पगौलिवार, 3. कजौलिवार, 4. अड़ेवार, 5. वहड़िखाल, 6. सकड़िखार, 7. पलिवार, 8. विसेवार, 9. फनेवार, 10. उचितवार, 11. पडुलवार, 12. कटैवार, 13. तिलैवार. मध्यम मूल- 1. दिद्यवे, 2. बैलेचै, 3. एकहरे, 4. पंचोभे, 5. वलियासे, 6. जमजुआले, 7. टकवाले, 8. घड़ुए. प्रवर मैथिल ब्राह्मणक मध्य 2 वर्गक प्रवर परिवार होइत अछि- त्रिप्रवर आ’ पाँच प्रवर। जाहि गोत्रक तीन गोट पूर्वज ऋगवेदक सूक्तिक रचना कएल से त्रिप्रवर आ’ जाहि गोत्रक पाँच गोट पूर्वज लोकनि ऋगवेदक सूक्तक रचना कएल से पाँच प्रवर कहबैत छथि। एहि प्रकारेँ गोत्रानुसारे प्रवर निम्न प्रकार भेल:- त्रिप्रवर- 1.शाण्डिल्य, 2.काश्यप,3. पराशर, 4. भारद्वाज, 5. कात्यायन, 6. कौशिक, 7. अलाम्बुकाक्ष, 8. कृष्णात्रेय, 9. गौतम, 10. मौदगल्य, 11. वशिष्ठ, 12. कौण्डिन्य, 13. उपमन्यु, 14. कपिल, 15.विष्णुवृद्धि,16. तण्डी। पंचप्रवर- 1. वत्स, 2. सावर्ण, 3. गर्ग। प्रवरक विस्तृत विवरण निम्न प्रकारेँ अछि- 1. शाण्डिल्य- शाण्डिल्य, असित आ’ देवल. 2. वत्स---] ओर्व, च्यवन,भार्गव,जामदगन्य आ’ आप्लावन। 3. सावर्ण--] ओर्व, च्यवन,भार्गव,जामदगन्य आ’ आप्लावन। 4. काश्यप-काश्यप, अवत्सार आ’ नैघ्रूव. 5. पराशर-शक्ति, वशिष्ठ आ’ पराशर. 6. भारद्वाज-भारद्वाज, आंगिरस आ’ बार्ह्स्पत्य. 7. कात्यायन-कात्यायन, विष्णु आ’ आंगिरस. 8. गर्ग-गार्ग्य, घृत, वैशम्पायन, कौशिक आ’ माण्डव्याथर्वन। 9. कौशिक- कौशिक, अत्रि आ’ जमदग्नि. 10. अलाम्बुकाक्ष-गर्ग, गौतम आ’ वशिष्ठ. 11. कृष्णात्रेय-कृष्णात्रेय, आप्ल्वान आ’ सारस्वत. 12. गौतम-अंगिरा, वशिष्ठ आ’ बार्हस्पत. 13. मौदगल्य-मौदगल्य, आंगिरस आ’ बार्हस्पत्य. 14. वशिष्ठ-वशिष्ठ,अत्रि आ’ सांकृति. 15. कौण्डिन्य-आस्तिक,कौशिक आ कौण्डिन्य. 16. उपमन्यु-उपमन्यु, आंगिरस आ’ बार्हस्पत्य। 17. कपिल-शातातप, कौण्डिल्यआ’ कपिल. 18. विष्णुवृद्धि-विष्णुवृद्धि, कौरपुच्छ आ’ त्रसदस्य 19. तण्डी-तण्डी, सांख्य आ’ अंगीरस. एहिमे सावर्ण आ’ वत्सक पूर्वज एके छथि ताहि हेतु दू गोत्र र्हितो हिनका बीच विवाह नहि होइत छन्हि। छानदोग्य आ’ वाजसनेयक वैदिक युगीन उर्ध्वाधर विभाजन एकर संग रहबे कएल, आ’ यज्ञोपवीत मंत्र दुनूक भिन्न-भिन्न अछि। फेर यज्ञोपवीतमे तीन प्रवर आकि पाँच प्रवर देल जाय ताहि हेतु उपरका सूचीक प्रयोग कएल जाइछ। (अनुवर्तते) प्रथम भागमे देवनागरी लिपिकेँ रोमन टाइपराइटरपर कोन टाइप करी- पहिने www.bhashaindia.com पर जाकय हिन्दी IME V.5 डाउनलोड करू। एहि प्रोग्रामकेँ अपना कंप्युटर पर इंस्टॉल करू। फेर कंट्रोल पैनलमे रेजनल आऽ लंग्वेज पर जा कय लंग्वेज टैबकेँ दबाऊ। देखू जे कॉम्प्लेक्स स्क्रिप्ट टिक कएल छैक की नहि।नहि छैकतँ करू आऽ कंप्युटर ताहि लेल जे जे कहैत अछि से करू। एकरा बाद लंग्वेज टैबकेँ आऽ डिटैल्स केँ दबाऊ।फेर ओतय एड क्लिक करू आऽ ओतय लंग्वेज मे हिन्दी आऽ कीबोर्ड मे HINDI INDIC IME 1[V.5.1] सेलेक्ट कय अप्लाइ दबाऊ। कंप्युटरकेँ रीस्टार्ट करू। आब वर्ड डोक्युमेंट खोलू।बायाँ Alt+Shift केँ एक दू बेर सम्मिलित दबेला उत्तर H कीबोर्ड आयत।अथवा नीचाँ लंग्वेजक़ेँ क्लिक करू आऽ हिन्दी सेलेक्ट करू।कीबोर्डमे हिन्दी transliterationकेँ सेलेक्ट करू। आब राम टाइप करबा लय raama टाइप करय करत। क् टाइप करबाक हेतु k दबाऊ आऽ माउसक लेफ्ट बटन क्लिक करू, अन्यथा सिफ्ट आकि एंटर दबेला पर हलंत उड़ि जायत। देवनागरीमे टाइप करबाक हेतु पछिला अंकमे देल सॉफ्टवेयरक अतिरिक्त एकटा आर टूल अछि जे नम्नलिखित लिँक पर उपलब्ध अछि। एकर विशेषता अछि एकर संस्कृत की-बोर्ड जे आन कोनो सॉफ्टवेयर पर उपलब्ध नहि अछि। एहिमे उदात्त,अनुदात्त केर आ’ किछु आन संस्कृतक अक्षर उपलब्ध अछि। एकर बराह दाइरेक्ट आदि रूप सेहो अछि, मुदा जौँ कोनो विशेष प्रयोजन नहि हो तँ मात्र बाराह आइ.एम.ई केर प्रयोग मात्र करी। स॑ , स॒ , स॓ , सऽ कें स लिखलाक बाद सिफ्ट ३,२,४ आऽ ७ दबेलासँ लिखि सकैत छी। http://www.baraha.com/BarahaIME.htm तिरहुता लिपि लिखबाक हेतु एहि लिंक पर जाऊ। http://www.tirhutalipi.4t.com/ मुदा एकरा हेतु अही लिंक पर जे प्रीति फॉंन्ट छैक तकरा सेहो डाउनलोड करी आ’, दुनू केँ हार्डडिस्क ड्राइव C/windows/fonts मे पेस्ट कए दिय। एहिमे जे फॉन्ट अछि से Ascii मे अछि। क्रुतदेव , शुशा ई सभ फॉण्ट सेहो एहि तरहक अछि, पहिने उपयोगी छल मुदा आब सर्च इंजिनमे यूनिकोड-यू.टी.एफ.8 केर सर्च होइत छैक आ’ Ascii मे लिखल देवनागरीक सर्च नहि भय पबैत अछि। विन्डोजमे मंगल फॉन्ट अबैत छैक, आ’, एहिमे लिखल देवनागरी सर्च भय जाइत अछि। मिथिलाक्षरक यूनीकोड रूपक आवेदन (अंशुमन पाण्डेय द्वारा देल गेल) लंबित अछि। साहित्यक दू विधा अछि गद्य आऽ पद्य।छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओऽ गद्य थीक। छन्द माने भेल-एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए। छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रिक आऽ वार्णिक। वेदमे मात्रिक छन्द अछि। पहिने मात्रिक छन्द परिचय लिय। एहिमे अक्षर जिनती मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक मात्रिक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक मात्रिक गानल जाइत अछि।द्विमात्रिक कोनो अक्षर नहि होइछ।मुख्य तीनटा बिन्दु यादि राखू- 1.ह्अलंतयुकत अक्षर-0 2.संयुक्त अक्षर-1 3.अक्षर अ सँ ह -1 प्रत्येक। आब पहिल उदाहरण देखू ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=1+5+2+2+3+3+1=17 मात्रा आब दोसर उदाहरण देखू पश्चात्=2 मात्रा आब तेसर उदाहरण देखू आऽब=2 मात्रा आब चारिम उदाहरण देखू स्क्रिप्ट=2 मात्रा मुख्य वैदिक छन्द सात अछि-गायत्री,उष्णिक् ,अनुष्टुप् ,बृहती,पङ् क्त्ति,त्रिष्टुप् आ ऽ जगती। शेष ओकर भेद अछि अतिछन्द आ ऽ विच्छन्द। छन्दकेँ अक्षरसँ चिन्हल जाइत अछि। यदि अक्षर पूरा नहि भेलतँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि।य आऽ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ ऽ उ लगा कय अलग केल जाइत अछि। वरेण्यम्=वरेणियम् स्वः= सुवः गुण आ ऽ वृद्धिकेँ अलग कयकेँ सेहो अक्षर पूर कय सकैत छी। ए = अ + ई ओ = अ + उ ऐ= अ+ए =आ+ए औ=अ+ओ =आ+ओ II. पछिला बेर मात्रिक छंदक जानकारी लेने छलहुँ। आब वार्णिक छंद पर आबी। पहिने छन्दः शास्त्रमे प्रयुक्त ‘गुरु’ आ’ ‘लघु’ छंदक परिचय प्राप्त करू। तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ ई पाँच ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ, ई आठ दीर्घ स्वर अछि। ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ ‘गुणिताक्षर’ बनैत अछि। क्+अ= क, क्+आ=का । एक स्वर मात्र आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक ‘अक्षर’ कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना ‘अवाक्’ शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ , वा । सभटा ह्रस्व स्वर आ’ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर ‘लघु’ मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि। सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर ‘गुरु’ मानल जाइत अछि, आ’ एकर संकेत अछि , ऊपरमे एकटा छोट -। अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि। कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ’ स दुनू गुरु अछि। (अनुवर्तते) मायानन्द मिश्रक इतिहास-बोध श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि। प्रस्तुत प्रबंधमे मायानान्द जीक 1.प्रथमं शैल पुत्री च 2.मंत्रपुत्र 3.पुरोहित आ’ 4. स्त्री-धन एहि चारि ऐतिहासिक उपन्यास सभक आधार पर लेखक द्वारा लगभग दू दशकमे पूर्ण कएल गेल इतिहास यात्राक समीक्षा कएल गेल अछि। एहिमे प्रयुक्त पुस्तकमे मंत्रपुत्र मैथिलीमे अछि आ’ शेष तीनू उपन्यास हिन्दीमे ,तथापि यात्रा पूर्णताक दृष्ट्वा आ’ श्रृंखलाक तारतम्य आ’ समीक्षाक पूर्णताक हेतु चारू किताबक प्रयोग अनिवार्य छल। कालक्रमक दृष्टिसँ प्रथमं शैल पुत्री च प्रथम अछि, एहिमे 1500 ई.पू.सँ पहिलुका इतिहासक आधार लेल गेल अछि। मंत्रपुत्रमे 1500 ई.पू. सँ 1200 ई.पू. धरिक इतिहास उपन्यासक आधार अछि। ई सभ आधार भारत युद्धक पहिलुका अछि। पुरोहितमे 1200 ई.पू.सँ 1000 ई.पू. धरिक इतिहास अछि- एकरा ब्राह्मण साहित्यक युगक इतिहास कहि सकैत छी। स्त्रीधनक आधार अछि सूत्र-स्मृतिकालीन मिथिला। मुदा रचना भेल मैथिली मंत्रपुत्रक पहिने - नवंबर 1986 मे। प्रथमं शैल पुत्री च एकर दूसालक बाद रचित भेल आ’ ताहिमे मायानन्द जी चारू किताबक रचनाक रूपरेखा देलन्हि, मुदा ई हिन्दीक संदर्भमे छल। एकर बाद सभटा किताब हिन्दी मे आएल। हिन्दी मंत्रपुत्र आयल जाहि कारण्सँ तेसर पुस्तक पुरोहित किछु देरीसँ 1999 मे प्रकाशित भेल। स्त्रीधन जे एहि श्रृंखलाक अंतिम पुस्तक अछि, पछिला साल 2007 ई. मे प्रकाशित भेल।प्रथमं शैल पुत्री च केर प्रस्तावनाक नाम कवच छल। मंत्रपुत्रक प्रस्तावनाक नाम ऋचालोक छल आ’ ई पुस्तकक अंतमे राखल गेल। कियेकतँ ई लेखकक प्रथम ऐतिहासिक रचना छल, प्रस्तावनाकेँ अंतमे राखि कय रहस्य आ’ रोमांचकेँ बनाओल राखल गेल । पुरोहितक प्रस्तावनाक नाम विनियोग छल आ’ एकरासँ पहिने दूर्वाक्षत मंत्र राखल गेल जे भारतक आ’ विश्वक प्रथम देश्भक्ति गीत अछि। मिथिलामे एकरा आशीर्वादक मंत्रक रूपमे प्रयोग कएल जाइत अछि। स्त्रीधनक प्रस्तावनाक नाम लेखक पृष्ठभूमि रखने छथि जे उपन्यासक एतिहासिक पृष्ठभूमि प्रदान करबाक कारण सर्वथा समीचीन अछि। मायानन्दक इतिहास-बोधक समीक्षा हम श्रुति, परम्परा, तर्क, श्रद्धा आ’ भाषा-विज्ञानक आधार पर कएने छी , पाश्चात्य विद्वान सभक उच्छिष्ट भोज सँ निर्मित भारतीय इतिहास-लेखन सँ बचि कय इतिहासक समीक्षा भेल अछि, आ’ मध्य एशिया आ’ यूरोपक कनियो प्रभाव समीक्षा पर नहीं पड़ल अछि। प्रथमं शैल पुत्री च- कवच रूपी प्रस्तावनाक बाद ई पुस्तक 1. अग्ना 2. अग्न-शैला 3. शैला- कराली 4. कराली- महेष 5. महेष- पारवती 6. गणेष 7. हरकिसन 8. किसन 9. हरप्पा : मोअन गाँव 10. गणेष का श्रीगणेश 11. किश्न 12. महाजन 13. मंडल 14. किश्न मंडल 15. मंडल : मंडली 16. पतन: पुरंदर आ’ 17. उपसंहार : पलायन खंडमे विभक्त अछि। अग्ना- 2000 हजार ई. पू. सँ आरम्भ होइत अछि ई उपन्यास। खोहमे रहय बला मनुष्यक विवरण शुरू होइत अछि- बा एकटा दलक सर्वाधिक बलिष्ठ मनुष्य अछि। पूर्वज बा सेहो बलिष्ठ छल। एतेक रास बच्चा सभक बा। एकटा छोट आ’ एकटा पैघ पाथरक आविष्कार कएने छलाह पूर्वज बा। अम् दलाग्राकेँ कहल जैत छल। बा भयंकर गंधवला पशुक नाम सेहो छल। हाथक महत्त्व बढ़ल आ’ बढ़ल वृक्षसँ दूरी। सर्पकेँ मारि कय खायल नहीं जाइत अछि, से गप पूर्वजसँ ज्ञात छल। प्राचीन देव वृक्ष, दोसर नाग देव आ’ तेसर नदी देव छलाह। अम् बासँ बा संतान उत्पन्न करैत आयल छलाह। नव कुठार आ’ नव काताक आविष्कार भेल। अः आः अग अग्ग केर देखि कय वन्य पशुकेँ भागैत देखि एकर जानकारी भेल। मानुषी हुनकर संख्या वृद्धि करैत छलि।प्रथम मानुषीक नाम पड़ल अग्ना। ओकर मानुष-मित्र छलाह अग्ग। अग्ना दलाग्रा बनि गेलीह आ’ हुनकर नेतृत्वमे दल उत्तर दिशि बढ़ल। फेर लेखक लिखैत छथि जे पृथ्वीक उत्पत्ति लगभग 200 कर्प्ड़ वर्ष पूर्व भेल जे सर्वथा समीचीन अछि। कर्मकाण्डमे एक स्थान पर वर्णन अछि- “ ब्राह्मणे द्वितीये परार्धे श्री स्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वंतरे अष्ठाविंशतितमे कलियुगे प्रथम चरणे” आ’ एहि आधार पर गणना कएला उत्तर 1,97,29,49,032 वर्ष पृथ्वीक आयु अबैत अछि। रेडियोएक्टिव विधि द्वारा सेहो ईएह उत्तर अबैत अछि। यूरोपमे सत्रहम शाब्दी तक पृथ्वीक आयु 4000 वर्ष मानल जाइत रहल। ईरानक विद्वान 1200 वर्ष पहिने पृथ्वीक उत्पत्ति मनलैन्ह। ई दुनू दृष्टिकोण वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ हास्यास्पद अछि। मिथिला आऽ संस्कृत- कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालयक प्रासांगिकता मिथिला आऽ संस्कृतक संबंध बड्ड पुरान अछि। षड् दर्शनमे चारि दर्शनक प्रारंभ एतयसँ भेल। वाजसनेयी आऽ छांदोग्यक रूपमे दू गोट वैदिक शाखा अखनो ओतय अछि, मुदा नामे मात्रेक। मिथिलामे कतोक लोक भेटताह जे मात्र विवाह कालमे वाचसनय आऽ छंदोग्यक नमसँ परिचय प्राप्त करैत छथि। बीच रातिमे पता चलैत छन्हि जे वर छांदोग्य छथि आऽ स्त्रीगणमे शोर उठैत अछि जे आबतँ दू विवाह होयत-बड्ड समय लागत। वाजसनेयी आऽ छांदोग्य क्रमशः शुक्ल यजुर्वेद आऽ सामवेदक शाखा अछि से हम सभ बिसरि गेल छी। कार्यालयक कार्यावशात् हम इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर अऑफ आर्ट्स गेलहु तँ वेद पर एक गोट डी.वी.डी. देखबाक अवसर प्राप्त भेल।अखनो ओड़ीसा,महाराष्ट्र,केरल,कर्णाटक,आ ऽ तमिलनाडुमे वैदिक शाखा जीवित अछि, मुदा अपना अहिठाम शाखा रहितहुँ नामोसँ अर्थोसँ अनभिज्ञता। कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालयक स्थापना प्रधानमंत्री नरसिम्हा रावक प्रयासेँ रामटेक,महाराष्ट्रमे खुजल। अल्पावधिमे ई वि.वि. संपूर्ण महाराष्ट्रमे वर्षावधि संस्कृत संभाषण शिविर चला रहल अछि। शिशुक हेतु 23 खंडमे किताब छपलक अछि,जखन की एकर भवन अखन बनिये रहल अछि। का.सि.संस्कृत वि.वि. दरिभङ्गा बहुत रास संस्कृत-मैथिली काव्यक उद्धार कएलक मुदा आब जा कय एकर योगदान सालमे एकटा पतरा छपब धरि सीमित भय गेल छैक- आ ऽ ई विश्वविद्यालय पंचांग सेहो अपन गणनाक हेतु विवादमे पड़ि गेल अछि। मुदा एहि अंकसँ हम एकर रचनात्मक कएल गेल कार्यक विवरण देब प्रारंभ कएल छी। विश्वविद्यालय द्वारा 20 सालसँ ऊपर भेल जखन संस्कृत-प्राकृत देसिल बयना सँ युकत नाटक सभक आलोचनात्मक संस्करण प्रकाशित भेल,जे भाषा मिश्रणक कारणेँ जहिना ई संस्कृतक तहिना मैथिलीक रचनामे परिगणित होइत अछि।भावोद्रेकक लेल गीतराशिक रचना कोमलकांत मिथिलाभाषहिमे निबद्ध भेल। विश्वविद्यालय द्वारा पहिल संपादित ग्रंथ ज्योतिरीश्वर ठाकुरक धूर्त्तसमागम अछि। धूर्त्तसमागम तेरहम शताब्दीमे ज्योतिरीश्वर ठाकुर द्वारा रचल गेल। ज्योतिरीश्वर ठाकुर धूर्त्तसमागममे मैथिली गीतक समावेश कएलन्हि। ई प्रहसनक कोटिमे अबैत अछि।मैथिलीक अधिकांश नाटक-नाटिका श्रीकृष्णक अथवा हुनकर वंश्धरक चरित पर अवलंबितएवं हरण आकि स्वयंबर कथा पर आधारित छल। मुदा धूर्त्तसमागममे साधु आऽ हुनकर शिष्य मुख्य पात्र अछि। धूर्त्तसमागम सभ पात्र एकसँ-एक ध्होर्त्त छथि।ताहि हेतु एकर नाम धूर्त्तसमागम सर्वथा उपयुक्त अछि।प्रहसनकेँ संगीतक सेहो कहल जाइछ,ताहि हेतु एहि मे मैथिली गीतक समावेश सर्वथा समीचीन अछि।एहिमे सूत्रधार,नटी स्नातक,विश्वनगर,मृतांगार,सुरतप्रिया,अनंगसेना,अस्ज्जाति मिश्र,बंधुवंचक,मूलनाशक आऽ नागरिक मुख्य पात्र छथि।सूत्रधार कर्णाट चूड़ामणि नरसिंहदेवक प्रशस्ति करैत अछि।फेर ज्योतिरीश्वरक प्रशस्ति होइत अछि। एहिमे एक प्रकारक एब्सर्डिटी अछि,जे नितांत आधुनिक अछि।जे लोच छैक से एकरा लोकनाट्य बनबैत छैक। विश्वनगर स्त्रीक अभावमेब्रह्मचारी छथि।शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु मृतांगार ठाकुरक घर जाइत छथि तँ अशौचक बहाना भेटैत छन्हि। विश्वनगर शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु सुरतप्रियाक घर जाइत छथि। फेर अनंगसेना नामक वैश्याकेँ लय कय गुरु-शिष्यमे मारि बजरि जाइत छन्हि। फेर गुरु-शिष्य अनंगसेनाक संग असज्जाति मिश्रक लग जाइत छथि तँ ओतय मिश्रजी लंपट निकलैत छथि।... VIDEHA MAITHILI SANSKRIT TUTOR ENGLISH SAMSKRIT MAITHILI In which college do you study. कस्मिन् महाविद्यालये पठति भवती? कोन कॉलेजमे अहाँ पढ़ैत छी? I study in the Vishweshwaraiya Engineering College. अहं विश्वेश्वरैय्य-अभियान्त्रिक-महाविद्यालये पठामि। हम विश्वेश्वरैय्या अभियान्त्रिक महाविद्यालयमे पढ़ैत छी। Our physics teacher is very good. अस्माकं भौतिकशास्त्रस्य अध्यापकः उत्तमः अस्ति। हमरा सभक भौतिकीक शिक्षक बड्ड नीक छथि। You did not come for the first period? प्रथमकालांशं न आगतवान्? अहाँ पहिल कक्षामे नहि अएलहुँ? I got up late today. अद्य उत्थाने विलम्बः अभवत्। हम आइ देरीसँ उठलहुँ। I couldn’t get the bus. लोकयानं न प्राप्तम्। हम आइ बस नहि पकड़ि सकलहुँ। Economics lecturer has not come. अर्थशास्त्रस्य व्याख्याता न आगतवान्। अर्थशास्त्रक व्याख्याता नहि अएलाह। Today there is a debate-competition in the college. अद्य महाविद्यालये परिचर्चा-स्पर्धा अस्ति। आइ महाविद्यालयमे परिचर्चा-स्पर्धा अछि। Are you participating? भवती भागं गृह्णाति किम्? अहाँ भाग लऽ रहल छी की? No, my friend is participating. न, मम सखी भागं गृह्णाति। नहि, हमर संगी भाग लऽ रहल छथि। I should return this book today, otherwise I’ll have to pay fine. एतत् पुस्तकम् अद्य प्रत्यर्पणीयं भोः, नो चेत् दण्डः दातव्यः भवेत्। हमरा ई पोथी आइ वापस करबाक अछि नहि तँ हमरा फाइन भरय पड़त। Shall we go for a movie today? अद्य चलच्चित्रं द्रष्टुं गच्छामः किम्? हमरा सभ आइ सिनेमा देखब चली की? Tomorrow we have Biology practical exam, friend. श्वः जीवशास्त्रस्य प्रात्यक्षिक-परीक्षा अस्ति सखे। काल्हि हमर सभक जीव विज्ञानक प्रायोगिक परीक्षा अछि। Will you give me your notes? भवत्याः टिप्पणीं ददाति किम्? अहाँ अपन नोट हमरा देबकी? But Girish took them away yesterday. ह्यः एव गिरीशः स्वीकृतवान्? मुदा गिरीश ई काल्हिय्रे लऽ गेलाह। Again I left them at home today. अद्य गृहे एव त्यक्त्वा आगतवती। आइ सेहो हम हुनका सभकेँ घरपर छोड़ि अएलहुँ। I had not come to class on that day. तद्दिने अहं वर्गं न आगतवान् आसम्। हम ओहि दिन वर्ग नहि आएल छलहुँ। Please give me your pen for a minute friend. एक निमेषार्थं लेखनीं ददातु मित्र। मित्र अपन पेन एक मिनट लेल दिअ। Don’t forget to give it back. प्रतिदातुं मा विस्मरतु। वापस केनाइ नहि बिसरू। Come on, let’s play. आगच्छतु भोः क्रीडतु। आउ, हमरा सभ खेलाइ। Do we have Mr.Joshi’s class today? जोशीमहोदयस्य कक्ष्या अस्ति किम् अद्य? जोशी महोदयक वर्ग आइ अछि की? Did you complete graduation in the year 1993? पदवी त्रिनवतितमे वर्षे समापिता किम्? अहाँ १९९३मे स्नातक भऽ गेल छलहुँ? I don’t remember well. सम्यक् न स्मरामि भोः। ठीकसँ मोन नहि अछि। Did you read this novel. एतां दीर्घकथां पठितवान् किम्? ई उपन्यास पढलहुँ की? I read it long back. बहु पूर्वमेव पठितवान्। हम ई बहुत पहिनहिये पढ़ने छी। Today there won’t be any classes. अद्य कक्ष्याः न भविष्यन्ति। आइ आब आर कोनो कक्षा नहि होयत। The Principal is very strict. प्राचार्यः बहु कठोरः अस्ति भोः। प्रिन्सिपल बड़ कठोर छथि। 70% attendance is compulsory if you want to appear for the examination. परीक्षा लेखनीया चेत् ७०% उपस्थितिः अनिवार्या एव। परीक्षामे बैसबाक लेल ७०% उपस्थिति अनिवार्य अछि। We are staging a Samskrit-drama in the annual function. वार्षिकोत्सवे वयम् एकं संस्कृतनाटकं कुर्मः। हमरा सभ वार्षिकोत्सवमे एकटा संस्कृत नाटक कऽ रहल छी। Tomorrow there will be elections for the student’s council. श्वः च्छात्रसंघस्य निर्वाचनं भविष्यति। काल्हि छात्रसंघक चुनाव होएत। This year the tuition-fees have been increased. एतस्मिन् वर्षे पाठनशुल्कं वर्धितम् अस्ति। एहि साल पाठनशुल्कमे वृद्धि भेल अछि। इति भवंतः सर्वे पूर्वतन् पाठेव ज्ञातवंतः।संस्कृतेन प्रथम परिचयः प्राप्तव्यः। अद्य अन्येनक्रमेण अपि परिचयस्य अन्येषाम् अपि अभ्यासं वयं कुर्मः। अहं गजेन्द्रः। भवान् कः। अहं शिक्षकः। भवती का। अहम् अभिनेत्री। अहं छात्रा। अहं वैद्या। अहं गृहिणी। अहं कृषकः। अहं शिक्षिकाः। अहं पाचकः। अहं तंत्रज्ञः। अहं तंत्रज्ञा। एतद् वाक्यद्वयं योजयित्वा वयं परिचयं वदामः। एतैव सुखेन परिचयं वदामः।मम नाम गजेन्द्रः। अहं शिक्षकः। एतेन क्रमेण भवंतः वदंतु। भवान वदतु। मम नाम इंदुशेखरः।अहं तंत्रज्ञः। मम नाम राजलक्ष्मीः। अहं अभिनेत्री। सः उदयनः। सः छात्रः। सः छात्रः वा। आम्। सः छात्रः। तत्र कृष्णफलकम वा? आम्। तत्र कृष्णफलकम्। न। सः वैद्यः न। एतत् फेनकम वा। आम्। तत उपनेत्रम्/कङ्कतम्। प्रशांतः सज्जनः वा। संस्कृतं सरलं वा। संस्कृतं मधुरं वा। आम्। सत्यम्। इदानीम अहं वदामि। भवंतः अपि अभिनयं कुर्वंतु। उत्तिष्ठतु। तस्य नाम उदयनः। तस्य नाम किम्। कस्य नाम इंदुशेखरः। तस्याः नाम चन्द्रिका। तस्याः नाम किम्। कस्याः नाम चन्द्रिका। एतस्य नाम इन्दुशेखरः। तस्य नाम किम्। साधुः। तस्याः नाम श्रीलक्ष्मीः। कस्याः नाम श्रीलक्ष्मीः। तस्य नाम इंदुशेखरः। एतस्य नाम सुधीरः। तस्याः नाम शांतला। एतस्याः नाम राजलक्ष्मीः। घटी। सुधीरस्य घटी। कस्य मुखम्। सुधीरस्य उपनेत्रम्। नाशिका। कर्णः। गीतायाः घटी। गीतायाः घटी। गीतायाः स्यूतः। कस्याः करवस्त्रम। ददातु। कस्याः कुञ्चिका। सीतायाः। लतायाः। सा देवी। देव्याः नाम किम्। देव्याः नाम सरस्वती। कस्याः आभूषणम्। नर्तक्याः आभूषणम्। कस्याः कण्ठाहारः। गृहण्याः क्ण्ठाहारः। पार्वती। पार्वत्याः। पुस्तकस्य नाम श्रीमदभागवदगीता। काव्यस्य नाम अभिज्ञानशाकुंतलम्। अस्माकं देशस्य नाम भारतम्। शिक्षकस्य नाम विश्वासः। गीतायाः। प्रियायाः। राजेश्वरयाः। श्रीलक्ष्म्याः। रामः अस्ति। सर्वे रामस्य वदंति। कृष्णस्य। प्रमोदस्य। बाबूलालस्य। रमानन्दस्य। रामशरणस्य। राधेश्यामस्य। शिक्षकस्य। लेखकस्य। छात्रस्य। फलस्य। पुष्पस्य। मन्दिरस्य। नगरस्य। सीतायाः। राधायः। अनितायाः। मालविकायाः। कवितायाः। सुशीलायाः। गङ्गायाः। शारदायाः। भारत्याः। नद्याः। लेखन्याः। राख्याः। अङ्कन्याः। रामस्य। रामः दशरथस्य पुत्रः। कृष्णः कस्य पुत्रः। कृष्णः वसुदेवस्य पुत्रः। रामः कस्याः पतिः। रामः सीताय़ाः पतिः। लक्ष्मणः उर्मिलायाः पतिः। कृष्णः रुकमण्याःपतिः। दिल्ली भारतस्य राजधानी। बेङ्गलुरु कर्णाटकस्य राजधानी। बाल्मीकिः रामायणस्य लेखकः। व्यासः महाभारतस्य लेखकः। वयम् इदानीम् एकम् अभ्यासं कुर्मः। अहम् एकं कोष्ठकं दर्शयामि। सर्वे अभ्यासः कुर्मः। दशरथस्य पुत्रः रामः। शिवस्य पुत्रः गणेशः। रावणस्य पुत्रः मेघनादः। अर्जुनस्य पुत्रः अभिमन्युः। रघुवंशस्य लेखकः कालिदासः। रामायणस्य लेखकः बाल्मीकिः। सीतायाः पतिः रामः। उर्मिलायाः पतिः लक्ष्मणः। सत्यभामायाः पतिः कृष्णः। पार्वत्याः पतिः । देवक्याः मन्दोदरयाः दमयनत्याः गान्धी महाभागस्य महोदयस्य रेणु महोदयायाः मेरी महाभागायाः सुभाषितम् वयम् इदानीम् अद्यापि एकस्य सुभाषितस्य अभ्यासः कुर्मः। भवंतः इदानीं सुभाषितम् श्रुणवंतु। अयं निजः परोवेत्ति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥ इदानीं यत् सुभाषितम् श्रुण्वंतः तस्य अर्थः एवम् अस्ति। लोके द्विविधाः जनाः भवति। केचन् लघु मनस्काः।ते चिंतयंति, एषः मम जनः। एषः मम जनः न। इति चिंतयंति। अन्ये केचन् संति, महात्मानामः। उदार च्रिताः। ते चिन्तयन्ति-जगत एव मम कुटुम्बः। लघु कुटुम्बः। तेषां दृष्टयासमग्रः प्रपञ्चःएव मम कुटुम्बः। सज्जनाः एवं चिंतनं कुर्वंति। धन्यवाद:। कथा अहं इदानीम् एकं लघुकथां वदामि। काशीः नगरे एकः महान् पण्डितः आसीत्। सः बहुषु शास्त्रेषु पारंगतः आसीत्। तस्य समीपे बहुछात्राः अध्ययनं कुर्वंति स्म। तस्य ख्यातिः सर्वत्र प्रसारिता आसीत्। अतः दूर-दूरतः छात्राः आगच्छंति स्म। एकदा कश्चन् शिष्यः तस्य समीपम् आगतवान्। सः गुरोः नमस्कारं कृत्वा पृष्ठवान्- भोः। अहं भवतः समीपे अध्ययनं कर्त्तुम इच्छामि। अतः माम शिष्यत्वेन स्वीकरोतु। इति सः उक्तवान्। किंतुः सर्वेषाम छात्राणां बुद्धि परीक्षां कृत्वा एव तान स्वीकरोति स्म। अतः एतस्य अपि बुद्धि परीक्षां कर्त्तुम सः एकं प्रश्नं पृष्ठवान। भोः वत्सः। देवः कुत्र अस्ति। इति पृष्ठवान। तदा शिष्यः उक्तवान। भगवन्। देवः कुत्र नास्ति। सः सर्वोव्यापी अस्ति। इति। प्रस्नरूपेण एव गुरुः पृष्ठवान। एतस्य उत्तरम् श्रुत्वागुरुः अत्यन्तं संतुष्टः जातः। सः हर्षेण तम् आलिङ्गितवान। तम उक्तवान अपि। भोः वत्सः। भवान् बुद्धिमान् बालकः अस्ति। भवंतम् अहं शिष्यत्वेन निश्चयेन स्वीकरोमि। सत्यं देवः सर्वव्यापि अस्ति। इति तम उक्तवान, शिष्यत्वेन अंगीकृतवान। एवं सः शिष्यः तत्रैव विद्याभ्यासं कृतवान,गुरोः आशीर्वादं प्राप्तवान। भवन्तः कथाम् अर्थः ज्ञातवंतः किल। शीतं स्नानम् उदेति सूर्यः कुक्कुटः गायति। कृषकः उत्थति पुष्पं विकसति। चटका विचरति,आकाश मध्ये, शीतकाले जलं शीत भवति, बालः उत्थति स्नानं लब्धे, स्नानं कृत्वा सा स्फुरति। (अनुवर्तते) पोथी समीक्षा श्री पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। पराशरजी एखन हिन्दी पत्रिका ’कादम्बिनी’मे वरिष्ठ कॉपी सम्पादक छथि। समयकेँ अकानैत १९. रातिक तेसर पहरमे गामसँ गेल लोक फेर नहि घुरल गाम गाम आब दिनोमे लगैत अछि मसान आऽ फेर असोथकित भेल ग्रामदेवता टुकुर-टुकुर तकैत छथिन बाट गामसँ भेल पलायनक टीस अछि ई पद्य। २०.अन्हारक मुरुत मुरुत ... छोड़ि दैत अछि नियन्त्रण अपनो परसँ --------------------------------------- -------------------------------------- मूर्तिपूजक एहि देशमे मूर्तिक ई इतिहास बड़ पुरान अछि। हमरा बुझने एहि पद्य संग्रहक ई सभसँ गंभीर आऽ नीक पद्य अछि।  मुरुतक स्वप्नक पोटरी देखायब आऽ बिनु प्रकाशक अन्तहीन अन्धकार दिशि बढ़ैत जाएब। मुरुत करैत अछि परम्पराक परिक्रमा आऽ फेर फेंकि देल जाइत अछि घिनाएल डबड़ामे। २१.मृत्युक बोझ चारि वर्षक आँखिमे खचित बाबाक नोराएल आँखि गामक अबाल-वृद्ध सबहक अँतड़ी सुखाएल लहास श्राद्धक, भोज खयबाक उत्साहोसँ नहि मेटाएल म्त्युक तांडव विभिन्न कारणसँ कविक हृदय रसहीन भए गेलन्हि स कविताक नीरस हैब उचिते छन्हि से कवि कहैत छथि। २२. हमर बाट (अग्रज अफसर कचि रमेशजी लेल) पोथीक बात उद्वेलित करैए से नीक बात मुदा सुविधाभोगी जीवन कए की करबै आऽ फेर- चलबै हमरा संग हमर बाट पर मीता? २३.मनोहर पोथी जकर शिक्षा नहि बना सकतै ओकरा जीवनकेँ मनोहर आऽ कि हम बचा सकबै एकरा दुनूकेँ एहि उदारवादी आ बाजारवादी बिहाड़िसँ? २४. हे हमर पिता! हमरा दिक् लगलासँ भुतियाइयो जाइ आ हम क’ सकी पूर्ण अहाँ अपूर्ण यात्रा २५.माटि माटि चूल्हिक लेल होइ कि कोठीक लेल आऽ मैञा माटि चीन्हैत छथिन हम माटि नहि चीन्ह पबैत छी २६.माटिक गाड़ी उसरल अछि दिवारी थान कतय भेटत आब २७.पूर्वज इतिहासक कोन चक्कीमे पिसा गेलाह हमर पूर्वज २८.रखैल ओ ककर तकैत अछि बाट २९.सर्वनाम ठीक अछि सबटा वस्तु जात आऽ खेत जोतबाक लेल ट्रैक्टर अछि बड़द पोसबाक जरूरति नहि रहल आब तखन शहरमे संज्ञाक संकट गाममे सर्वनाम सन हालति ३०.कान्ह पर सवार बैताल कमलाक कथामे मिलैत बलानक कथा आऽ कान्ह पर लदने चलि रहल छी विशाल प्रश्नवाचक जकाँ ३१.सवयंसँ संवाद यक्ष्मासँ जर्जरित छाती स्वयंसँ स्वादक बात आब टारल नहि जा सकैए बेशी दिन ३२. छोट-छोट चीजक मादे एकालाप पोथीक बीचमे राखल मोरक पंख पद्य पढ़नहारकेँ सेहो बहुत किछु मोर पाड़ि दैत छथिन्ह कवि। ३३. बीसम शताब्दीक श्वेतपत्र पत्नी कहैत गेलि वस्तु अबैत गेल आऽ हम पड़ल छी मृत्युशय्यापर बीसम शताब्दी जकाँ ३४. द्विज मूल ठामसँ उखड़ल लोक कोना जमि जाइत अछि आन ठाम बहिन गेल छलीह सासुर आ संग हमहूँ रही सोचैत कि बहीन रहि सकतीह एहि ठाम ३५.हम घर कोना घुरब कुहरैत छी मुक्तिक लेल के करत हमरा मुक्त ३६. कुरुक्षेत्र नागा आ कूकीक संघर्ष बढ़ले जा रहल अछि आऽ टाकाक रिमोटसँ संचालित अभिनेत्रीक देह ३७.प्रश्नकालमे कालाहांडीक निवासीक भोजन आ मुसहरीक निवासीक जलखै बेर-बेर नचैए आँखिक आगूमे ३८. तुलसी चौरा पर जरैत दीप रोज साँझकेँ दीप जरबैत माय दीप जरबैत छलीह आ कि स्वयंकेँ? ३९. मोसकिल भ’ गेल अछि इजोरिया रातिक निःशब्दामे विरहा सुनब ४०.अभिशप्त निज गामकेँ पिकनिक स्पॉट बुझि ओ अबैत छथिन गाम कोनो काज निकाल’ वा मोन बहटार’ मुदा आबतँ ताहू लेल लोक गाम नहि अबैत छथि। दुर्गा पूजामे छागरक बलि चढ़ेबाक कबुलाक पूर्तियो लेल कहाँ क्यो अबैत अछि आब। ४१. खुट्टी पर टाँगल झोरा हरदम बोध करबैत छल पिताक उपस्थितिक। ४२.साँझ होइत गाममे निरन्तर अस्पष्ट होइत जा रहल साँझक गाछ तर साँझमे घुरल सुग्गा जकाँ ४३. मायक लेल किछु कविता काँकोड़ सन होइत अछि माय जकरा प्रसवक बाद ओकर बच्चे खा जैत छैक ४४. सप्पत आबतँ साँचे लगैए झूठ सन आ झूठे साँच सन ४५. प्राक् इतिहास अदौ कालसँ दिमागक खोहमे नुड़िआइत हमर असंख्य प्राक इतिहास ४६. रामभोग आब चुनाव-नाथसँ शुरू करैए अयोध्या नाच ४७.संबंध हम कोना कहि सकब अहाँ हमर किछु नहि लगैत छी मीता ४८.समयकेँ अकानैत एहि संग्रहक टाइटिल पद्य अछि ई कविता। जतए छल कलमदान ओतए एतेक रास शालिग्राम किछुए दिनक बाद गायब भ’ जाइत अछि हमर अपूर्णकविता अपूर्ण लेख मेहनतिसँ ताकल किछु महत्वपूर्ण साक्ष्य हिन्दी कवि मुक्तबोध मोन पड़ि जाइत छथि एहि पद्यसँ। एहि संग्रहक सभटा पद्य भावना आऽ स्मृतिसँ जुड़ल अछि। आब किछु तकनीकी विषय। एहि संग्रहमे मैथिलीक मानकताक विषय किछु पाछाँ रहि गेल अछि, जेना मैथिलीमे विभक्ति संगहि बाजल आऽ लिखल जाइत अछि, मुदा संग्रहक नामसँ लए सभटा पद्यमे कवि अपन हिन्दी शिक्षाक अनुरूपेँ विभक्ति हटा कए लिखने छथि। अगिला संस्करणमे ई भाषायी असुद्धि दूर होएबाक चाही। जेना सुभाषचन्द्रजीक लेखनीमे सेहो मानकता किछु दोसर रूपेँ आयल अछि। मुदा ध्वनि विज्ञानसँ ओऽ संबंधित अछि। श्री सुभाष जी ऐछ लिखैत छथि, मुदा मैथिलीमे “अछि” एकर उच्चारण होइत अछि “अ इ छ”, हिन्दीमे ह्रस्व इ लिखल पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि, देवनागरी वर्णक जेना लिखल जाइत अछि, तहिना बाजल जाइत अछि, ह्रस्व इ एकर अपवाद अछि। मुदा मैथिलीमे से नहि अछि। तहिना छै केँ छैक वा छञि, नै केँ नञि लिकल जएबाक चाही। पराशर जी मैथिलीक मैञा केर प्रयोग कएने छथि, मायक जे उच्चारण माञ कहने लिखने अबैत अछि, तकर दृष्टिसँ ई प्रयास स्तुत्य अछि। मुदा श्री सुभाषजी ( हुनकर कथा “विदेह” क एहि अंकमे ई-प्रकाशित अछि) अपन लेखनीमे मैथिलीक असल स्वरूप अनबाक लेल किंचित् प्रयोग कएने छथि, तकर किछु उद्देश्य अछि, मुदा पराशरजीक विभक्ति हटा कए लिखब मात्र टाइप दोष बनि रहि गेल अछि। फेर दोसर गप जे ई पद्य संग्रह भावना आऽ स्मृतिक विस्फोट अछि, मुदा कखनो काल कए लगैत अछि जे हमरा सभ पद्य नहि गद्य पढि रहल छी, जापानी “हैबून” जेकाँ। से अपन पहिल पद्य संग्रहमे एतेक प्रतिभाक प्रदर्शन देने छथि पंकजजी जे हमरा सभ आसमे छी जे दोसर संग्रहमे ओऽ अपन लयबद्ध पद्यसँ हमरा सभकेँ झमारि देथि। तेसर गप जे एहि पोथीमे आइ एस बी एन नम्बर नहि अछि। मैथिली प्रकाशनक सूचीबद्धता नहि भए पाबि रहल अछि, मुदा ई प्रायशः एहि दू-चारि सालमे प्रकाशित सभ मैथिली ग्रंथ सभक संग अछि। आशा अछि कविक नव रचना शीघ्रा आयत। संगीत-शिक्षा I. पहिने कमसँ कम 37 ‘की’ बला कीबोर्ड लिय। एहिमे 12-12 टाक तीन भाग करू। 13 आ’ 25 संख्या बला की सा,आ’ सां दुनूक बोध करबैत अछि। सभमेँ पाँचटा कारी आ’ सातटा उज्जर ‘की’ अछि। प्रथम 12 मंद्र सप्तक, बादक 12 मध्य सप्तक आ, सभसँ दहिन 12 तार सप्तक कहबैछ। 1 सँ 36 धरि मार्करसँ लिखि लिय। 1 आ तेरह सँ क्रमशः वाम आ’ दहिन हाथ चलत। 12 गोट ‘की’ केर सेटमे 5 टा कारी आ’ सात टा उज्जर ‘की’ अछि। प्रथम अभ्यासमे मात्र उजरा ‘की’ केर अभ्यास करू। पहिल सात टा उजरा ‘की’ सा, रे, ग, म, प, ध, नि, अछि आ’ आठम उजरा की तीव्र सं अछि जे अगूलका दोसर सेटक स अछि। वाम हाथक अनामिकासँ स, माध्यमिका सँ रे, इंडेक्स फिंगर सँ ग ,बुढ़बा आँगुरसँ म , फेर बुढ़बा आँगुरक नीचाँसँ अनामिका आनू आ’ प, फेर माध्यमिकासँ ध, इंडेक्स फिंगरसँ नि, आ’ बुढ़बा आँगुरसँ सां। दहिन हाथसँ 12 केरसेट पर पहिल’की’ पर बुढ़बा आँगुरसँ स, इंडेक्स फिंगरसँ रे, माध्यमिकासँ ग, अनामिकासँ म, फेर अनामिकाक नीचाँसँ बुढ़बा आँगुरकेँ आनू आ’ तख बुध्बा आँगुरसँ प, इंडेक्स फिंगरसँ ध, माध्यमिकासँ नि आ’ अनामिकसँ सां। दुनू हाथसँ सां दोसर 12 केर सेटक पहिल उज्जर ‘की’ अछि। आरोहमे पहिल सेटक सां अछि तँ दोसर सेटक प्रथम की रहबाक कारण सा। दोसर गप जे की बोर्डसँ जखन आवज निकलयतँ अपन कंठक आवाजसँ एकर मिलान करू। कनियो नीच-ऊँच नहि होय। तेसर गप जे संगीतक वर्ण अछि सा,रे,ग,म,प,ध,नि,सां एकरा देवनागरीक वर्ण बुझबाक गलती नहि करब। आरोह आ’ अवरोहमे कतेक नीच-ऊँच होय तकरे टा ई बोध करबैत अछि। जेना कोनो आन ध्वनि जेनाकि क केँ लिय आ, की बोर्ड पर निकलल सा,रे...केर ध्वनिक अनुसार क ध्वनिक आरोह आ’ अवरोह करू। (अनुवर्तते) महुआ घटवारिन महुआ घटवारिन परी जेकाँ सुन्दरि छलीह,जेना गूथल आँटामे एक चुटकी केसर, मुदा सतवंती छलीह। बाप गँजेरी शराबी आ’ माय सतमाय,मैभा महतारी, नजरि चोर। घरमे सतमायक राज छल। सोलह बरखक भय गेल रहथि मुदा हुनकर बियाहक चिंता ककरो नहि रहैक। परमान नदीक पुरनका घाटक मलाह प्र्रर्थना करैत छथि जे महुआक नावकेँ किनार लगा दियौक। साओन-भादवक, भरल धार, कम वयसक महुआ नहि जाऊ, एहि राति खेबय लेल नाव। एहने साओन-भादवक रातिमे सतमाय घाट पर उतरल वणिक् केँ तेल लगेबाक हेतु महुआकेँ पठबय चाहैत अछि, आ’ ओ’ जाय नहि चाहैत अछि। अपन मायकेँ यादि करैत अछि, नोन चटा केँ किए नहि मारलँह, पोसलँह एहि दिन खातिर। मुदा सतमाय साओन-भादवक रातिमे पथिककेँ घाट पार करबाबय लेल महुआकेँ पठा देलक। महुआ बिदा भेलि आ’ बीच रस्तामे अपन सखी-बहिनपा फूलमतीसँ भरि राति गप करैत रहल। केहन माय अछि जे रातिमे घाट पार करेबाक लेल कहैत अछि। माय ईहो कहलक जे पथिक पाइबला होय आ’ बूढ़ होय तँ ओकरा तेल-मालिस करबामे कोनो हर्ज नहि। ओकर मोनमे जे होय भेल तँ ओ’ पिते समान, ओकरा जेबीसँ चारि पाइ निकालि लेल जाय, अहीमे बुधियारी अछि। फूलमती कहलक- घबरायब नहि। जरेने रहू प्रेमक आगि , ओकरा लेल जे मोरंगमे आँगुर पर दिन गानि रहल अछि। मोरंगक नाम सुनि महुआ उदास भय गेलि। ओ’ फागुनमे आयत। भोरहरबा ओ’ गामपर पहुँचल आ’ माय दस बात कहलकैक। बाप नशामे आयल तँ माय ओकरो लात मारि भगा देलकैक। तखने हरकारा आयल आ’ मायक कानमे संदेश देलक। महुआ मायकेँ कहलक जे अहाँ जे कहब से हम करब। वणिक् क आदमी आयल छल,ओकरा संग महुआ घाट पर पहुँचल। वणिक् दू सिपाहेक संग नावमे बैसल। महुआ नाव खेबय लागलि। मुदा ओकरा नहि बूझल रहय जे ओकरा बेचि देल गेल छैक। सिपाही ओकरासँ पतवारि छीनि लेलक। सौदागर ओकरा कोरामे बैसाबय चाहलक, तँ ओ’ छरपटाय लागलि। सिपाही कहलक जे सभटा पाइ चुका देल गेल अछि, अहाँकेँ कोनो मँगनीमे नहि लय जा रहल छथि। महुआ स्थिर भय गेलीह। ओ’ सभ बुझलक जे महुआ मानि गेल अछि। तखने महुआ धारमे कूदि पड़लि। उल्टा धारमे मोरंग दिशि निकलि जाय चाहलक महुआ, जतय ओकर प्रेमी अछि, ओकरा लेल सात पालक नाव लेने। सौदागरक छोटका सिपाही महुआकेँ प्रेम करय लागल छल, ओहो कूदि गेल कोशिकीक धारमे, दूनू डूबि गेल। अखनो साओन-भादवक धारमे कोनो घटवारकेँ कखनो देखा पड़ैत छैक महुआ। कोनो खिस्सा वचनहारकेँ देखा जाइत अछि ओ’, आ’ शुरू भय जाइत अछि , एकटा छलीह महुआ घटवारिन..............................। आर्या विवाहक उपरान्त ढ़ेरी-ढ़ाकी लोक हमरासँ भेँट करबाक हेतु सासुरमे आबि रहल छलाह। ताहिमे छलि एकटा नवम् कक्षाक छात्रा आर्या आ’ ओकर पितामही आ’ माय। ओ’ मायक संग नहि आबि असगरे आयल छलीह। खूब कारी, दुबर-पातर, आवश्यकतासँ बेशी अनुशासित आ’ शिष्ट आ’ नापि-जोखि कय बजनिहारि। हमरासँ सभ गपमे उलटा। हमर कनियाँ हुनकासँ हमर परिचय करओलन्हि, आ’ ओकर प्रशंसा सेहो कएलन्हि। किछु कालक बाद जखन ओकर पितामही आ’ माय हमरासँ भेँट करबाक हेतु अयलीह तँ हमरा अनुभव भेल, जे हुनकर पितामहीक तँ लेहाज राखल गेल छल मुदा हुनकर मायक अवहेलना सन हमर कनियाँ आ’ सासु द्वारा भेल छल। गप्पो करबामे ओ’ नीक छलीह आ’ जाइत-जाइत कहि गेलीह, जे हमरा सभ अहाँक ससुरक किरायादार छी, आ’ उपरका महला पर रहैत छी। से भीड़-भाड़ कम भेला पर अवश्य आऊ। ई गप्प जाइत-जाइत हमर सासु प्रायः सुनि लेलन्हि, से हमर पत्नीकेँ अस्थिरेसँ मुदा आज्ञार्थक रूपेँ कहलन्हि, जे ऊपर जयबाक कोनो जरूरी नहि छैक। हम पत्नीसँ पुछलियन्हि, जे बेचारी एतेक आग्रहसँ बजओलन्हि अछि। पत्नी कहलथि जे सुनलियैक नहि, माँ मना कएलन्हि अछि। कारण पुछला पर गप अन्ठा देलन्हि। किछु दिनुका बादक घटना छी, अन्हरोखेमे गेटक झमाड़ि कय खुजबाक अबाज भेल। लागल जे क्यो पीबि कय बड़बड़ा रहल अछि। हमरा अतिरिक्त क्यो ओहि अबाज पर ध्यान नहि देलक, आ’ अन्ठयबाक स्वांग कएलन्हि। हम बाहर अएलहुँ तँ एकटा अधवयसु झुमैत अबैत दृष्टिगोचर भेलाह। हमरा देखि डोलैत हाथसँ जमायबाबू कहि नमस्कार कएलन्हि। अखन धरि हमरासँ भेँट नहि होयबाक कारण हमर पत्नीकेँ फड़िछओलन्हि आ’ डोलैत ऊपर सीढ़ीक दिशसँ चलि गेलाह। हमर पत्नी हाथ पकड़ि कय हमरा भीतर आनि लेलन्हि आ’ ईहो सूचना देलन्हि जे ईएह आर्याक पिता थीक। अनायासहि हमरा माथमे आयल जे रंग जे आर्याक छैक से पिते पर गेल छैक। बादमे हमर सासु ऊपर जा’ कय भाषण दए अयलीह आ’ एक महिनाक भीतर घर छोड़बाक अल्टीमेटम सेहो आर्याक परिवारकेँ दए देलन्हि। हमर सर कहलथि जे ई दसम अल्टीमेटम छैक, मुदा हमर सासु अडिग छलीह जे किछु भय जाय एहि बेर ओ’ नहि मानतीह। जमाय की भुझताह जे केहन भाड़ादार रखने छी। पहिने ठकिया-फुसिया कय बहटारि लैत छल। पुछला पर पता चलल जे आर्याक पिता डॉक्टर छैक, आ’ सेहो होमियोपैथिक, आयुर्वेदिक किंवा भेटनरी नहि वरन् एम. बी.बी.एस.। मुदा लक्षण देखियौक। ओना सासु ईहो गप कहलन्हि जे ई पीने रहबाक उपरान्तो गप्प एकोटा अभद्र नहि बजैत अछि, जेना आन पीनहार सभक संग होइत छैक। मनुक्खो ठीके अछि, मुदा यैह जे एकटा गड़बड़ी छैक से बड्ड भारी।अगला दिन नशा उतरलाक बाद पति-पत्नी दुनू गोटे नीचाँ अएलीह आ’ सासुकेँ कहलन्हि, जे आर्याक बोर्डक बाद ओ’ सभ पटना चलि जयतीह से हुनका सभक खातिर नहि मुदा आर्याक खातिर तावत रहय दिय’। घोँघाउजक बाद से मोहलति भेटि जाय गेलन्हि। तकरा बाद हुनकर पत्नीक नजरि हमरासँ मिलल तँ ओ’ कहलन्हि जे अहाँ तँ ऊपर नहिये आयब। आ’ एहि बेर ऊपर अयबाक आग्रहो नहि कएलथि। किछु दिन बीतल आ’ फेर सासुर जयबाक अवसर भेटल। किछु दिनमे पता चलल जे किरायादार बदलि गेल छथि। घरक लोक मात्र एतबे कहलथि जे आर्याक पिताक मृत्यु भ’ गेलन्हि आ’ अनुकम्पाक आधार पर ओकर मायकेँ नौकरी भेटि गेलैक। आब ओ’सभ क्यो पटनामे रहैत छथि। घरक लोक आगाँ किछु नहि कहलन्हि, मुदा कनियाँक एकटा पितयौत भाय आयल रहथि, से कहलथि जे डॉक्टरी रिपोर्टमे विष खा’ कय आत्महत्याक वर्णन अछि। फेर आँगा पति-पत्नीक मध्य मचल तुमुलक चर्च भेल। कनियाँ कहइत रहथिन्ह जे ई डॉक्टर बड्ड पिबैत छथि ताहि लेल झगड़ा होइत अछि, तँ डॉक्टर साहब कहथि जे झगड़ाक द्वारे पिबैत छी। अस्तु मृत्युक बाद हुनकर कनियाँक भाव एहन सन छल जेना मुक्ति भेटि गेल होय- एहि बातमे सभ क्यो एक मत रहथि। फेर दिन बितैत रहल आ’ बादमे फोन पर समाचार भेटल जे आर्या सेहो आत्म हत्या कए लेलक। फेर बहुत रास बात मोनमे घूमि गेल। आर्या भावुक छलि, किछु बेशी तनावमे रहिते छलि। गपकेँ गंभीरतासँ लइत छलि। एकटा सारि रहथि, हुनकर बात सेहो मोन पड़ल। एक गोट युवकक विषयमे आर्या कहैत छलि, जे ओकर संगीकेँ होइत छैक जे ओ’ युवक ओकरासँ प्रेम करैत अछि। मुदा आर्याक मत छल जे ऊ’ युवक ओकरासँ नहि वरन् आर्यासँ प्रेम करैत छल। हम सारिकेँ कहने रहियन्हि जे आर्या बच्चा अछि, ओहिना हँसी कएने होयत। मुदा ओ’ कहलन्हि, जे नहि यौ। बड्ड भावुक अछि आर्या। कहैत अछि जे ओहि युवकके प्राप्त करबाक हेतु किछुओ करत। एहि बात पर हम तखन कोनो बेशी ध्यान नहि देने रहियैक। मुदा एहि बातक आब महत्त्व बढ़ि गेल छल। हम फोन दोबारा लगेलहुँ। पता चलल जे ओ’ युवक कोनो पुरान महारानीक बेटीक बेटा छी। ओकर माता शिक्षिका अछि, आ’ बाप मेरीनमे काज करैत अछि। साल-छह मास पर अबैत अछि। आ’ जखन अबैत छल तँ जे मास-पंद्रह दिन रहैत छल से मारि_पीटिमे बिता दैत छल। पूरा मोहल्लामे बदनामी छैक। मायक शील-स्वभाव बड्ड नीक, बोलीसँ फूल-झड़ैत छैक। बापकेँ तँ लोक चिन्हितो नहि छैक।खाली झगड़ाक अबाजे सुनैत अछि लोक। आर्याक संगीकेँ स्कूल बससँ उतरबा काल क्यो तंग कएने छल तँ ओ’ युवक सभकेँ मारि-पीटि कय भगा देने छल, आ’ एकर बाद आर्या एहि शहरसँ दूर भ’ गेल। ओ’ मायकेँ कहैत रहलि जे परीक्षा तक रहय दिय’, मुदा माय विमुक्त भेलाक बाद एको पल पुरान कटु-स्मृतिकेँ देखय-नहि चाहैत छलथिन्ह।हम फोन पर पुछलियन्हि जे ओहि युवकक विवाह आर्याक मृत्युसँ पहिने कतय भेल। तँ सासुरक लोक अचंभित पुछलन्हि, जे ओकर विवाह तँ भेल मुदा अहाँ कोना बुझलहुँ। पता चलल जे सिलीगुड़ी-दिशि कोनो कन्यागत छथि, आ’ ओ’ युवक अपन बाप जेकाँ घर-जमाय बनि रहबाक नियाड़ कएने अछि। एहि शहरक लोककेँ तँ विवाहक हकारो नहि भेटल। हम आर्याकेँ एकटा दृढ़ बालिका बुझैत रही। मुदा ओकर ‘किछुओ कड़य पड़त से करब’ केर अर्थ आब जा’ कय बुझलहुँ। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी  ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र  लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि।-ज्योति हिमपात बर्फ ओढ़ने वातावरण ! मानू आकाश टूटि क बिखरि गेल , अपने आप के छिरियाकऽ सबके एक रंग में रंगि गेल ॥ थरथराबैत सरदी स भयभीत सब जीव अपन जगह धेलक; प्रकृति के इहो अवरोध मुदा, मनुष्य के नहि बॉंधि सकल ॥ भॉंति प्रकारक साधन जोगारलक विकट परिस्थिति पर विजय लेल; अपन सर्वश्रेष्ठ बुद्धिबल स मनुष्य अंतत: सफल भेल॥ गामक सूर्यास्त गामक सूर्यास्त एक अद्भुत दृष्य यादि पाड़ि चकित भेलहुँ, पोखरिक भीड़ पर हम ठाढ़ छलहुँ आसमानक नीलवर्ण भेल रंगमय दिया बातीक मुहुर्तमे सुर्य सबसॅं विदा लय क्षितिजमे विलीन हुअ लागल संग ओकर प्रकाशपुंज सेहो भागल सबहक खरिहानमे लालटेन टिमटिमाय छल पक्षी सब समदाओन गाबि रहल छल सेहो ध्वनि मन्द पड़ि गेल सॉंझ रातिमे बदलि गेल फेरि स अगिला भोर मे पक्षिगण गायत प्राती सब मिलि एक संग। विशाल समुद्र समुद्रक लहरिक तरंग अनगिनत बेर दोहरा रहल अछि । उद्देश्यहीन अपने मुदा ओकर गान कहिया कत’ सँ चलि रहल अछि । बेर बेर रेत पर बनल पदचिह्‌न मेटा क’ तटसॅं घुरि जाइत अछि । जलक सभसॅं शक्तिशाली संगठन सागरक रूपमे उपस्थित अछि । रातिक अन्हारोमे ओकर गर्जन ओकर विशालताक आभास कराबैत अछि । आधुनिक जीवनदर्शन अतिशयोक्ति सँ विरक्ति अछि जाबे ओ' दोसरक प्रशंसा में होय परञ्च निंदामे किएक कंजूसी जखन अनकर करबाक होय । असभ्य तऽ ओकरा बुझब जे हमर प्रशंसकके रोकयए, ने हम्मर कियो प्रशंसक अछि ने समाजमे कियो असभ्य बुझाइए । परोपकार करनिहारके आशिष जे हमर काज बना गेल अन्यथा ओ सब बेरोजगार जे आनक काजमे लागि गेल । .मनुष्य आ' ओकर भावना कठोर हृदयमे भावुकता नुकायल भेटल, पुछलियै, “ तोहर आब कोन स्थान ?” बड़ निर्मलतासॅं उत्तर देलक, ''हमरा सॅं नहिं तोरा सबके त्राण। क्रोध, प्रेम, दु:ख, दया आदि जीवनक अंश अहिसॅं पूर्णत: विमुक्त भेनाई कठिन; परन्तु गलतकेँ बिसरा कऽ नीक विचारकेँ आश्रय देनाय अछि अपन आधीन । दया परोपकारक अधिष्ठात्री अछि , दु:ख खुशीक महत्त्व बुझाबए छै। क्रोध सॅं हठ, प्रेमसँ त्याग जनमैत अछि, बस उचित दिशा निर्देशन आवश्यक छै। मानवक बुद्धि भावनासॅं  प्रभावित होइत अछि़ ; भने ओ स्वयम्‌केँ विधाता बनओने फिरैए। आधुनिकताक होड़मे निष्ठुरता ओढ़ने अछि, भावनाहीन भऽ कऽ जीवित नहि रहि सकैए। 2. हम्मर   गाम गरमी में सुर्योदय के समय कतेक शान्त आ' शीतल, लू आ उमस सॅं ओत प्रोत दुपहरिया तेहने बिगड़ल; सॉंझ हुअ सऽ पहिने धूल धक्कड़ आ' बिहारि, राइत होति देरी अन्हार, ताहि पर मच्छड़क मारि। अहि सबहक बीच बसल बस एक मात्र मिठास अप्पन भाषाक ज देने अछि गाम जायक प्यास जतऽ सभ्यता के लाज में अपनापन नहिं नुकाइत छल लोक हाक दऽ कऽ हाल पूछऽ में नहिं सकुचाइत छल अनार, शरीफा, खजूर, लताम, पपीता, जलेबी, केरा सहित लीचीक बगान केसौर, कटहर, बेल, धात्री, जामुन, बेरक संग अप्पन पोखरिक मखान फेर आमक गाछी सेहो अछि जतऽ गर्मी बितौनाई नहिं अखड़ल हवा बिहारि में खसल आम बीछऽ लेल भगनाई नहिं बिसरल विकास विकासशीलताक उच्चतम्‌ शिखर कतऽ आऽ कतेक दूर पर भेटत। ई  एकमात्र मृगमरीचिका तऽ नहि जे लग गेला पर बिला जायत । प्यासलकेँ लोभ दऽ बजाबए लेल फेर कनिक दूर पर देखायत। मनुष विज्ञान आर तकनीकक नशामे आर कते दिन ओकरा खिहारइत रहत। यात्रा मात्रसॅं प्रकृति दूषित भेल भेटऽ मे की जानि कतेक हानि हएत। परन्तु अपन ज्ञानक सीमा संकुचित कऽ बुद्धिकेँ स्थूल तऽ नहि कएल जायत। गति निर्धारण आ' सामनजस्य चाही जतऽ विकासक मार्ग नहि रोकल जायत। संगहि प्रगति आऽ प्रकृति दुनुक भैयारी विज्ञानक नाम पर नहि तोड़ल जायत। बालश्रम बालपनक किलकारी भूखक ताप सऽ भेल मूक, पोथी  बारि कोदारि पाडैत हाथक मारि अचूक। कादो रौद बसातमे श्रम केनाइ भेल मजबूरी; गरीबीक पराकाष्ठा ! पेट आ पीठक घटैत दूरी, किछु धनहीनता आ’ किछु माता पिताक मूर्खता, मुदा, सभसँ बेसी स्वार्थी समाजक संवेदनहीनता, जे बालक केँ माताक आश्रय सॅं वञ्चित केलक, लेखनि के छीन कोमल हाथमे करची धरेलक, माल जालक सेवा करैत बाल्य जीवन कुदरूप, अपने भविष्यकेँ दरिद्र करैत अज्ञान आ' अबूझ, विद्योपार्जनक ककरा फुर्सति ?  स्थिति तऽ तेहन भेल, चोर बनक आतुर अछि बालपन दू दाना अन्न लेल। (१) तारा  दूरसँ बुझाइत कतेक शीतल वास्तवमे जड़ैत (२) शाखासँ लागल पुष्प आऽ पत्रसॅं आच्छादित अछि झूलैत लता (३) पक्षी विश्राम कएल बड़का यात्राक उपरान्त एखनो जे अपूर्ण (४) अद्रभुत अपवाद छैक नागफनीक कॉँटक बीच कुसुम खिलायल (५) नीलांबरमे मेघ विचरैत अछि कोना जेना सागरमे होए शार्क (६) भावी संकट केर पशु पक्षीमे पूर्वाभास प्रभुक दिव्य आशिष (७) कोमल पंखुड़ी सुगन्धक संग सजाओल एक पुष्पक रूपमे (८) नदीक तरंग ओहिना लागैत अछि जेना ओकर घुरमल केश (९) दू टा पसरल पाँखि बाज उड़ऽ लेल तैयार अछि पूर्ण रूपसॅं जागरूक (१०) पहाड़ीक ढलान ताहि पर एकमात्र गाछक छाह भेल यात्रीक विश्राम (११) संध्याक बेला सुनसान आऽ शान्त पोखरिक कात एक एकान्त स्थान (१२) मेघ रूपी बर्फमे अछि हवाई जहाज पिछड़ैत आकाशमे विचरैत (१३) कठोरतम  भूमि समुद्रक छोर पर बसल अछि पाथरक किनार (१४) विलक्षण अपवाद आकाश जरैत संध्याकाल समुद्रक उपरि (१५) पहाड़सॅं उदित सूर्यसॅं आकाश भेल जागृत ज्वालामुखी सन (१६) उगैत सूर्य संगे आयल अंधकारक उपरान्त अंतहीन दिनक आस (१७) दिवस आब थकल रातिक स्वागतमे लीन साँझ मिझाइत सूर्य दीप (१८) गाछ भने हरियर ग्रीष्मोमे देखु पतझड़ भोरक आकाशमे (१९) पक्षीक चहक आऽ आकाशक लाली संग प्रकृति जागल (२०) अतिसुन्दर जाड़ मेघक घिस घिस छिड़यौलक हिमपातक रूपमे (२१) तैयार उड़ऽलेल पक्षी विश्रामसॅं जागल वा अछि शुरूआत (२२) पक्षीक निरीक्षण छूटल अन्नक फेरमे कटनी भेलाक बाद (२३) फूलक हुँजक बोझ शाखा केँ झुका रहल बसंत आयल अछि (२४) तितलीक पंख अंकित रंग बिरंग आकार प्रभुक चित्रकला (२५) मनुष लेल कठिन किन्तु जीवन ओतहु अछि शीतलतम स्थान (२६) उच्चतम शिखरसॅं धुन्ध भरल हरियर घाटी निहारक इच्छा (२७) विभिन्न प्रकारक घास पात  जमीन पर उगल आइरसँ दूर बॅंचल। (२८) ओसक बूँद पाबि अछि घासक फुनगी आह्‌लादित हीरा सन चमकैत (२९) बाहर घूमऽ निकलल बतख अपन बच्चा संग गर्मीक दिनमे (३०) बतख हेल रहल अछि पानिक ऊपरी सतह पर लक्ष्यक दिस निरंतर (३१) स्प्रेसो आस्ते पिब लेल गर्म देल गेल (३२) ईश्वर केँ तकनाइ नहि कठिन पाबू ओकरा पवित्र हृदयमे (३३) दृष्टि भ्रमणमे घाटी पर दूर दूर धरि भटकि सकैत अछि (३४) घोड़ा भटकि रहल उद्देश्यहीन बिन घुड़सवार भेल अनुशासनहीन (३५) स्थिर पानिमे प्रकृतिक प्रतिबिम्ब साफ लेकिन उलटा (३६) प्राकृतिक दृष्य पानिक प्रतिरूप बिना अपूर्ण बुझाइत अछि। (३७) पतझड़क पात पसारलक अप्पन सतरंजी हरियर घास बदला। (३८) समुद्रक तहमे विभिन्न आकार प्रकारक रंग बिरंग जीवन। (३९) नटखट समुद्र तटक आरामसँ वंचित कएने  बेर बेर तंग। (४०) पहाड़क चोटी आर बेसी ऊँच लागैत अछि गहीँर घाटीक बीच (४१) पोखरिमे देखु प्रकृतिक प्रतिबिम्ब उलटल बुझाइत अछि (४२) तितलीगण उतरल पंखरूपी पैराशूट लऽ फुलक झुण्ड पर। (४३) उच्चतम शिखर पर गुफासँ दृष्टिगोचर होइत रमणीय दृष्य (४४) बच्चाक संग खेलमे एकेटा खुशीक आभास ओकर किलकारी (४५) टेढ़ मेढ़ रेखा अछि बरसातक बहैत पानिसँ खिड़कीक काँच पर बनल (४६) बादलसँ छनल समुद्रक लहरिक तरंग उपर चमकैत किरण (४७) पानिक तरंग केँ पक्षी बदलि रहल अछि कलरवक लयमे (४८) मरुस्थलमे रेत अछि हवासँ बहारल सतह भेल समतल (४९) कतेक बेसी ध्यान पातक प्रारूप देबऽमे ईश्वर देने छथि (५०) बरसात खतम भेल पानि तइयो झरि रहल अछि गाछक पात सब सऽ ५१ समुद्रक लहरि लगातार टकरा रहल पाथर तइयो स्थिर ५२ मनोरम दृष्य जेना चिन्नीक चाशनीमे लिप्त अछि गाछ जाड़मे ५३ अपने रंगहीन अछि गाछ केँ रंगीन बनौलक नीचा गड़ल जड़ि ५४ शीतल प्रकाश युक्त सुर्योदयक पहिनेक समय सर्वोत्तम काल ५५ पाँखिक शाल ओढ़ने प्रकृतिक भ्रमण हेतु पक्षी निकलल जाड़मे ५६ चिडैय़ाक बच्चा माए बाप संगे अछि ताबञ जाबञ पंख नहिक छैक। ५७ प्रवासी पक्षी मीलक मील उड़िक आयल गर्मीक आनन्द लय। ५८ उछलैत पानि नदीसँ भेँट लेल खसल झरनाक रूपमे । ५९ नागफणीक गाछ सभ मरुस्थल्मे सेहो अछि मजबूतीसँ ठाढ़। ६० कठोर पातसँ लिप्त नागफनीक चोटी पर अछि कोमल फूलक ताज ६१ आर सजायल गेल कैक रंगक फूल आऽ लाइटसॅं क्रिसमसक साँझमे ६२ एक नारिकेरक फल कठोर केशयुक्त कवचमे मीठ उज्जर फल अछि ६३ भुखाएल बगुला नदीक कातमे ठाढ़ अछि माछक ताकिमे ६४ अतिथिक आगमन कौआक कर्कश काँव काँवसँ पूर्वसूचित भेल अछि ६५ सागरमे डॉलफिन खतरनाक जीवक बीचमे मनुषक साथी ६६ जिग ज़ैग ध्वनि केँ गाड़ी दोहरा रहल अछि भीजल सड़क पर ६७ भूकम्पक श्राप अछि अज्ञात अपराधक सजा मनुषकेँ भेटल ६८ छोट किन्तु तेज अछि अपन लक्ष्य चिनहऽमे भड़ल भीड़क बीच ६९ समुद्रक नीचाँ कतओ जायकाल रहैअ छोट माछ सब झुण्डमे ७० अंगूरक फल अछि मीठ जेल जमाकऽ रखने छोट छोट आकारमे ७१ स्वर्ग सदृश दृश्य हरियर प्राकृतिक संग चिड़ैआक कलरव ७२ राति हुअक पहिने आकाश दहकि रहल सूर्यास्तक पहिने ७३ खिलखिलाइत झरना मधुर ध्वनि घोरि रहल चारू दिशामे ७४ सूर्यक अएलापर रातिक अन्हार भागि गेल आऽ भोर शुरु भऽ गेल ७५ छाया उपर्युक्त अछि गोबरछत्ता केँ उगऽ आऽ पसरऽ लेल (७६) एकटा पओलाक बाद खरहा फेर भागि रहल अछि आर भोजन लेल (७७) गाछक स्वर्णिम रंग पतझड़क आगमनक घोषणा अछि करैत । (७८) गरमीक ऋतु कहॉँ ओतेक दुखद अछि शुरुक दिनमे (७९) स्वयम्‌ सिद्ध मकरा अपन सुरक्षा हेतु जाल अछि बुनैत (८०) कोनो आकारमे ढलि जाएत पानि मुदा गहराई एकर अपन गुण (८१) आकाश अखनो ऊँच बादल पहुँचमे बुझाएल ई धुन्धक रूपमे (८२) रातिमे इजोत दैत बर्फसँ परावर्तित होइत प्रकाशपुँज  जाड़मे (८३) लुक्खी सब निकलल अपन घड़सँ आलस त्यागि वसन्त ऋतुमे (८४) सोन सन सूरज भेल उज्जर चमकैत हीरा सन दिनकेँ अएला पर (८५) गाछ सब अछि होड़मे सबसँ पहिने पाबऽ लेल सूरजक रोशनी (८६) एकटा मन्दिर अछि खजूरक गाछ भीड़मे एक पोखरि कातमे (८७) सुखाएल छोट पातसभ गाछसँ नीचाँ खसैत अछि नबकेँ अवसर दैत (८८) गाछक शाखासभ अतेक ऊँचाई पर पसरल जड़ि ततब्बे गहिँर (८९) भोरक अयला पर गाछ पर लादल ओस भेल अछि चमकैत हॅँसी सन (९०) सोन सन कम्बल अछि ओढ़ने गहुमक खेत सभ कटाइक पहिने (९१) चक्रवातीय पवन जीवनसंहारक बनि गेल जीवनरक्षक छल। (९२) प्रदान करैत अछि पक्षी आऽ हिरण सभकेँ गाछ आऽ वृक्ष आश्रय (९३) फूलसँ भरल अछि एकटा घाटी एहन अछि जेना खुशी मुस्काइत। (९४) पानि बढ़ि रहल रस्ताक गाछ आऽ पाथर सभ विदा करैत ठाढ़ (९५) जाड़क गाछ अछि ठाढ़ वसन्तक प्रतीक्षामे पात सभसँ भिन्न भऽ (९६) Illusion of eye Colourful appearance of Rainbow in the sky आँखिक भ्रम, आभास वर्णमय पनिसोखा द्यौ (९७) Rainbow declares Beginning of bright days and End of rainy ones पनिसोखाक, शुभ्र दिन आबह खिचाहनि जाऽ (९८) Filled with smoky fog The wood seems to be burning Thou'  it is winter धुँआ  कुहेस जेना जड़ैत काठ, अछि ई जाड़ (९९) The words sound so sweet imitated by parrots Like baby babbles गुञ्ज मधुर सुग्गाक अभिनय, तोतराइत स्वर (१००) The sky is bright The wind has cleared the clouds Some still needs force अकाश श्वेत वायु टारैत मेघ, कनेक बल (९६ सँ १०० धरि इंग्लिशसँ मैथिली अनुवाद संपादक द्वारा कएल गेल) मेघक उत्पात कनिक काल दऽ पानिक फुहार फेर लेलक  अपन ऑँजुर सम्हारि देखू मेघक  उत्पात लोकक आशाक  उपहास करैत कखनो दर्शन दऽ बेर-बेर नुकाइत मौलाऽगेल गाछ आऽ पात कखनो गरजि भरि कऽ रहि गेल कखनो बरसि-बरसि कऽ भरि गेल डूबल पोखरिक कात कोसीक प्रवाह  सब बॉँन्ह तोड़लक गामक गाम जलमग्न कएलक ततेक भेल बरसात किसानक भविष्य मेघपर आश्रित मेघक इच्छा पूर्णतः अप्रत्याशित सभसालक अनिश्चित अनुपात बरखा तू आब कहिया जेबैं 1 बरखा तू आब कहिया जेबै अकच्छ भेलौ सब तोरा सॅं बुझलियौ तू छै बड जरूरी लेकिन अतीव सर्वत्र वर्जित छै आर कतेक तंग तू करबैं बरखा तू आब कहिया जेबैं २ बेंग सब फुदकि फुदकि कऽ घुसि रहल घर - ऑंगन में ओकरा खिहारैत सॉंपो आयत तरह - तरह के बिमारीक जड़ि मच्छड़ सभके खुशहाल केलैं बरखा तू आब कहिया जेबैं ३ कतौ बाढ़ि सॅं घर दहाइत अछि कतौ गाछ उखड़ि खसि पड़ल कतेक खतरा तोरा संग आयल आन-जान दुर्लभ तोरा कारण आढ़ि सभ कादो सऽ भरलैं बरखा तू आब कहिया जेबैं ४ टूटल फूटल खपरी सऽ छाड़ल गरीबक कुटिया कोनाक सहत तोहर निरन्तर प््रावाहक मारि पशु-पक्षी सेहो आश्रयहीन  भेल नञहर के तू सासुर बुझलैं बरखा तू आब कहिया जेबैं ५ तोहर जाइत देरी शीतलहरी अप्पन प््राकोप देखाबऽचाहत मुदा पहिने आयत शरद ऋतु कनिके दिनक आनन्दी लऽ कऽ पनिसोखा देखेनाई नञ बिसरिहैं बरखा तू आब कहिया जेबैं। मिथिलाक विस्तार हम सब ओहि समूहक लोक इतिहास छानब जकर भाग संस्कृति बड़ धनी मुदा संरक्षणक अभाव जहिया सभक नींद खुजत तहिया करब पश्चाताप ओहि सभ्यताकेँ ताकब जे अखन लगैअ श्राप उन्नतिक पथ पर चलऽ लेल पहिरलहुँ आधुनिकताक पाग जिनकासॅं ई सुरक्षित अछि से गाबैत बेरोजगारीक राग जे गरीबीक सीमा पार कएलाह से व्यस्त प्रतियोगितामे दिन राति एक संजीवनी बुटीक अभिलाषा जे सभ्यताकेँ दिअए सुरक्षित आधार विश्वस्तरीय संस्थाक निर्माण होए एकर विशेषताक जे करए विस्तार ईशक अराधना 1 हे ईश एहन हाथ दिअ जे कर्मठ आ कुशल होई अहॉं लग मात्र जोड़िक कर्म के तिलांजली नहि दई पूजाक संग काजक संगम जकरा लेल ग्राह्य होई २ हे ईश एहन पैर दिय जे अपन भार सहि सकय आनक जहन प्रयोजन होई तऽ सभसॅं आगॉं बढ़ि सकै औचित्य सॅं विचलित जकरा कोनो बाधा नञ कऽ सकै ३ हे ईश एहेन वाणि दिअ जाहि में निवास करैथ शारदा मिठास होए आ' शीतल होय नहिं होए भय आ' लोलुपता अहॉंक अराधना भक्तिभावसऽ देववाणिमे करक दिअ क्षमता ४ हे ईश एहेन दृष्टि दिअ अहॉंक रूपके कराबै चिन्‌हार अहॉंक बास जखन घट-घट मे फेर कियै जाउ हिमालय पहाड़ सत्कर्मके हम पूजा मानी नहिं रहै अज्ञानताक अन्हार ५ हे ईश एहन बुद्धि दिअ अहॉं पर सदैव रहै विश्वास संतोष आ' शान्ति पाबि बेसी के नहिं हुए आस प््रााणिमात्रक कल्याण लेल कऽ सकी आमरण प्रयास खरहाक भोज खरहा सब भामि-भामि बाड़ीमे अछि भोज करैत जतेक छल रोपल साग-पात कुचरि-कुचरि कऽ चरैत एहन असहति दृष्य देख गृहस्थक तामसे मोन जरैत प्रतिदिनक निरंतर प्रयास बाड़ी छल फूलैत-फलैत अतेक दिनका कएल धैल पर ई सभ पानि फेरैत भीड़ल सब ओकरापर चारू दिससॅं खिहारैत कियै ओ ककरो हाथ आयत नहि देरी भेल ओकरा पड़ाइत। बिन मेहनति आ' बिन धैर्य मनुषकेँ अछि किछु नहि भेटैत पशु - पक्षी सब लुझिकऽ अपन जीवन अहिना बिता लेत। कल्पनालोक कल्पनालोकमें विचरण करै छलहुँ उन्मुक्त सबतरहक विषाद जतऽ भऽ गेल छल लुप्त आह्लादित हृदय सेहो रहय विस्मयसॅं युक्त प््राशंसामें स्वर्ग शब्द लागल सबसऽ उपर्युक्त कोनो भूमि नहि भेटल जे छल कलह सॅ लिप्त थम्हलहुँ जत कतौ छल स्नेहक जलसॅंऽ सिक्त आरोग्यक कचोर रंग सर्वत्र छल पल्लवित ताहि पर खुशी कोमलतापूर्वक रहय पुष्पित शान्ति तेहेन जे देलक अपूर्व आत्मसंतोष दूर-दूर तक नहिं कतौ देखायल आक्रोश एहनो दुनिया हैत कतौ से नहिं छल भरोस जाहि सॅं दुखी छलहुँ से मेटायल सब रोष वास्तविकता अछि अलग से तऽ स्वयंसिद्ध समस्या सॅं जूझैत सब, की बच्चा की वृद्ध कल्पनाक साकार भेनाई अछि अहिमें निमित्त घर-घर जहन लोक हैत शिक्षित आ समृद्ध। कोसीक प्रकोप प्राकृतिक प्रकोप मिथिलामे देखि के नहि हैत अधीर देहाइत डूबैत जन जीवन सरकार बनल अछि बहिर कहिया सऽ अछि बनल कोसी नदी बिहारक शोक पर्यावरणके सतत हनन कियेक नहि लागल रोक घमैत हिमनद बढ़ैत जलस्तर सृष्टिके दिनोदिन बढ़ैत तापमान पर्यावरण पर गम्भीर चिन्तन आवश्यक पहिने वर्त्तमान संकट स पाबि निदान अतेक सालक समय देलाक बाद फेर रस्ता बदलि लेलक कोसी नदी अहि महाप्रलय सऽ बचनाइ छल संभव समय पर सरकारी कोष खुजितै यदि मज़बूत बान्ह आ प्रवाहक मार्गदर्शन लेल भूगोलवेत्ता आ अभियंता आगू आबैथ जलसंचयसऽ सिंचाइक समस्या भगा जलशक्ति सऽ विद्युत निर्माण करैथ। असल राज लन्दन शहरमे भोरक भीड़सऽ भागैत दिनचर्याके आढ़िसऽ ठाढ़ भेलहुं कात भऽ॥१॥ लागल सबके प्रेत रेवारने छल आकि कोनो लॉटरी फुजल सबके तेना पड़ाहि लागल छल॥२॥ समय सॅ छलै सब पैबन्ध विदा काज दिस एक बैगक संग ओवरकोटमे बन्द॥३॥ मिथ्या अभिमान भेल विलीन सब काजक सुरमे तल्लीन स्वावलम्बी आऽ आत्माधीन ॥४॥ कानूनन ठीक अछि जे कोनो काज तकरा करैमे जे नहि केलक लाज सैह कऽ रहल अछि असल राज॥ ५॥ पतझड़क आगमन पतझड़क आगमन दहैक रहल वातावरण संतरा, पीयर, लाल, भूरा रंग सऽ भरल पूरा प्रकृति जेना भेल जीर्ण मौलाएत झड़ैत तृण-तृण विविध रंगके त्यागिकऽ गेरूवा वस्त्र धारिकऽ विदा भेल लेबऽ सन्यास ताहि पर सुर्योदयक आकाश धरतीपर जे आगि छल ताहिमे ओहो लिपटल आकि अछि दर्पण जकॉं पृथ्वीक रूप देखाबैत जेना अकरा शीतल करैलेल साधु तपस्यामे लीन भेल जहिया हिमक बरखा हैत अस्वच्छता जखन दूर हैत तहिया सऽनवजीवनक प्यास लायत सुखद वसंतक अभिलाष। वृद्धक अभिलाषा एक वृद्ध रोपि रहल छल गाछ आमके कियो पुछलकै जे की लाभ हैत अहॉंके अपने छी जीवनक अंतिम छोर पर फरनाइ तऽ हैत अहॉंक मरलापर ओ वृद्ध जवाब देलैथ विनम्रता सऽ अपन काज सऽ बिना अडिग भऽ बाप दादाक रोपल कलम जे भोग केलहुं बस सैह ऋणके लौटाबक प्रयास केलहुं आगामी पीढ़ीके अपन हाथे खुआयब की नहिं कम सऽ कम ई गाछ फरैत रहत जा धरि अपन बाल बच्चामे मिठास घोरैत रहब भने ताबे अपने जीवैत रहब नहिं रहब टेम्स नदीमे नौकाविहार टेम्स नदीमे कर चललौं नौकाविहार स्टीमरमे उपरिक मंजिल पर सवार मन्द - मन्द चलैत शीतल बयार॥ वस्तुकलाक कते उत्कृष्ट उदाहरण तकनीकी विकासक प्रत्यक्ष दर्शन तटमे ठाढ़ ऊंच - ऊंच भव्य भवन॥ कलकलाइत जल स डोलैत नाव मानव प्रयाससऽ अनुशासित बहाव जगा देलक अपन बिसरल घाव॥ कतेक पॉंछा अछि अपन प्रान्त नैसर्गिक आपदा स आक्रान्त कहिया हैत बाढ़िक समस्या शान्त॥ रातिक बात तऽ आरो अद्भुत बस मंत्रक उद्घोष छल विलुप्त स्थानो नहिं छल ओहेन भक्तियुक्त॥ अन्यथा कहितौं अकरा हरिद्वार बत्तीक प्रतिबिम्ब स चमकैत धार जेना होय छठिक अर्घ्यदीपक भरमार॥ देवीजी: पिंजराक पक्षी चित्र: ज्योति झा चौधरी एकटा शिक्षिका छलीह, जिनका गाम पर सभ देवी जी कहैत छलन्हि। हुनकासॅं सभ विद्यार्थी डेराइतो छल, मुदा सम्मान सेहो करैत छल। एक दिन ओऽ एकटा कक्षामे गेलीह तँ हुनका एकटा छात्र पिंजरामे बंद एकटा सुग्गा देलकन्हि, जकरा 'देवी जी’ बजनाइ सिखा देल गेल छल । ओकरा बजैत सुनि सभ छात्र प्रसन्न भऽ हॅंसऽ लागल। देवीजी ओकरा तत्काल स्वीकार कऽ पढाबऽ मे लागि गेलीह । बादमे ओऽ ओहि बालकसँ पुछलखिन्ह जे '' जौं अहाँकेँ क्यो अपन शौक पूरा करऽ लेल सभसँ अलग कऽ छोट जगह पर बान्हि कऽ राखए तँ केहन लागत। हमरा एहि भेँटसँ कोनो खुशी नहि भेल”। बालककेँ अपन गलतीक अनुभव तुरत भऽ गेलैक। ओऽ तुरत ओहि पक्षीकेँ पिंजरासॅं मुक्त कऽ देलक। अगिला दिन देवी जी सभकेँ पक्षी देखबाक अलग तरीका सिखेलखिन्ह। पाठशालाक प्रांगणक एकान्त स्थान पर एकटा पुरान टेबुल राखि देलखिन्ह। ताहि पर मकई, चाउर, गहुम, अंकुरैल चना, रोटीक टुकड़ा, कटोरीमे पानि आदि राखि देलखिन्ह। सभ क्यो दूर बैसि कऽ प्रतीक्षा करऽ लगलैथ। कनिके देरीमे तरह-तरहक पक्षी ओतए हलचल करय लागल। ई दृष्य सभक लेल ओहि पिंजरामे पक्षी देखबासँ बेसी सुखद छलैक। तखन देवीजी कहलखिन्ह ''असली खुशी दोसराक खुश करबामे छैक। अपन स्वार्थ मात्र लेल दोसराकेँ कष्ट देनाइ पाप कहाइत छैक। सभ बच्चा शपथ लेलक जे आब कोनो पक्षीकेँ पिंजरामे बन्द नहि करत। देवीजी विद्यार्थी बनल माली एकटा बच्चा छलै जे छलै बड़ा खुरापाती।विद्यालय आबैत काल ओ रस्ताक सब फूल पात नोचने आबै छलै।विद्यालयमे सेहो फूलक गाछ के नोइच कऽ राइख दैत छल।अतब्ैा नहि ओ आनो बच्चा सबके उकसाबै छल।ओकर संगी साथी सब सेहो संगतक प््राभावे बड उपद्रवी भऽ गेल।तंग भऽ विद्यालय के माली प््राधानध्यापक लग अपन समस्या बाजल ''महोदय हम बच्चा सबहक खुरापात सऽ बड तंग छी।हम्मर दिन भरिक मिहनत ई सब क्षण भरि मे मटियामेट कऽ दैत अछि आ हम्मर बातक मोजर सेहो नहि दैत अछि।च्च् ताही पर प््राधानाध्यापक ओकरा आश्वासन देलखिन ''हम एहि पर अवश्य कार्यवाही करब।हम एहन बच्चा सभके दंडित करब।च्च् जखन देवीजी के अहि बातक खबरि लगलैन तऽ ओ स्वयम्‌ माली सॅं बात क बालक के पता केलीह फेर ओकरा सभके बजा कऽ पुछलखिन ''अहॉ सभ एहेन काज कियैक करै छी। बेचारा माली रौद बसात मे काज करैत अछि आ अहॉ सभ उारे ओकर परिणाम नहि आबैत छै। अहॉं सभके नहि ईच्छा होइत अछि विद्यालय के सुन्दर बनाब के।च्च् ताहि पर कियो बजलै ''हमरा सभके तितली पकड़नाई नीक लागैत अछि आ तितली सभत फूले पर बैसैत छै।च्च् आब देवीजीके फसादक जड़ि ज्ञात भेलैन।ओ प््राधानाचार्य सॅं आदेश पाबि सभ बच्चा सभके छुट्रटी वला दिन विद्यालय बजेलखिन। माली सेहो आयल। देवीजी खेले खेलमे सभके बागवानी सिखेलखिन। सभके मिलकऽ काज केनाइ ततेक नीक लागल जे क्षण भरिमे सभ टूटल मरल गाछ सभ हटा नब फूलक गाछ लागि गेल। देवीजी सभके कहलखिन जे जॅं ई गाछ सबके कियो तोड़त नहि त कञिये दिनमे अहि मे सुन्दर सुन्दर पुष्प लागत जाहि सॅं आकर्षित भऽ तितली के जमौड़ा लागत।संगहि देवीजी तितली के पकड़ सॅ मना केलखिन।ओकरा सुन्दरता दूर स देख के शिक्षा देलखिन।सभ बच्चा आह्‌लादित छल तैं उत्पात बन्द कऽ देलक। प््राधानाचार्य अहि परिवर्तन सॅं प््राभावित भेला। किछुए दिन बाद गाछमे फूल लाग लगलै।आ संगहि तितलीक आगमण सेहो बढ़ि गेल। आब खाली समय निकाइल कऽ देवीजी संग बच्चा सभ ओहि दृष्यक आनन्द लेब लागल।उपद्रवी बच्चा सभसॅं सकारात्मक काज करबाबऽ लेल देवीजीके सभसॅं प््राशंसा भेटलैन। देवीजी: गरीबक सहायता चित्र: ज्योति झा चौधरी देवी जी : गरीबक  सहायता एक बेर देवीजी विद्यालय आबि रहल छलीह तऽ द्वार लग हुनका एकटा चिनिया बदाम बेचऽवला  बड उदास देखेलनि। हुनका सऽ नहि रहल गेलनि। ओऽ ओकरा लग जा कऽ पुछलखिन '' एहि उदासीक की कारण? जवाबमे जे सुनऽ भेटलनि ताहि सऽ हुनकर मोन क्षोभसॅं भरि गेलनि। हुनकर विद्यालयक किछु छात्र ओकरा सऽ चिनियाबदाम खरीदकऽ पाई नहि देलकै। अगिला दिन ओऽ खुमचावला ओहि बेईमान सभकेँ समान बेचऽ सॅं मना कऽ देलक। ताहिसॅं उकता कए बच्चा सभ आर उग्र भऽ गेल आर ओकरा सब समानकेँ लुटि पाटि कऽ छिड़िया देलक। ओऽ खुमचावला गरीब छल, ओकर बड नुक्सान भेलैक। ताहि लऽ कऽ ओऽ बड दुःखी छल। देवीजी ओकरा प्रधानाध्यापक लग लऽ गेलखिन। प्रधानाध्यापककेँ सेहो अपन विद्यालयक बच्चा सबहक ई कुकर्म बड क्षोभित केलकनि। ओऽ देवीजी संगे मिलिकऽ उपद्रवी बच्चा सभकेँ अपन अभिभावक संगे बजेलखिन। सभ उपद्रवी बच्चा सभकेँ विद्यालयसँ निष्कासित  करबाक बात भेल। तहन बच्चा सभ माफी मॅगलक। देवीजी ओकरा सभकेँ बुझेलखिन जे गरीबी द्वारे ओऽ खुमचावला विद्यालय लग खुमचा लगाकऽ दू पाई कमाइत अछि जाहि सॅं ओकर परिवार चलैत छञ। एहि घटनासॅ ओकर बड हानि भेलैक। ओकरा खेनाइ पिनाइ तकक कष्ट भऽ गेलैक। तखन बच्चा सभ अपन एहि गलतीक पश्चाताप करबाक विचार केलक। देवीजीक आज्ञा लऽ ओऽ सभ टूटल खुमचाक मरम्मति केलक आऽ चंदा जमाकऽ जतेक समान लुटने रहए तकरा कीनि लौटेलक। सभ कियो ई शपथ लेलक जे कहियो फेर एहेन काज नहि करत आऽ गरीबक यथासम्भव सहायता करत । देवीजी:  साक्षरता अभियान देवीजी : साक्षरता अभियान विद्यालयमे आइ बहुत हलचल छल। बड़का सरकारी गाड़ी सामने ठाढ़ छल। बच्चासभ उत्सुक भऽ विद्यालयक अन्दर घुसल। सभकेँ किछु बुझा नहि रहल छल। बादमे प्रार्थनाक समयमे प्रधानाध्यापक सभकेँ सूचित केलखिन ''सरकारक दिस सँ ई निर्देश आयल अछि जे हम सभ देशसॅं निरक्षरता हटाबएमे योगदान करी। ताहि लेल सरकारक दिससॅं पुस्तक आऽ अन्य सामग्री प्रदान कएल गेल अछि। भारतवर्ष निरक्षरतामे विश्वमे सभसॅं आगॉं अछि। आर बिहार राज्य अपन देशमे साक्षरता आऽ स्त्रीशिक्षामे सभसॅं पाछाँ अछि। हमरा सभकेँ एकरा हटाबएमे योगदान करबाक चाही। विद्यार्थी सभ एहिमे काज करए लेल तैयार छल। सभ देवीजीसॅं पुछलक जे एहि लेल की करए पड़तैक। तऽ देवीजी सभकेँ पढ़ाबए केर तरीका सिखेलखिन। अगिला दिन सौंसे गाममे बात आगि जकॉ पसरि गेल जे रोज सॉंझकऽ स्कूलपर बुजुर्गसभकेँ आऽ जाहि बच्चा सभकेँ आर्थिक कमजोरीक कारण शिक्षा नहि भेट रहल छैक तकरा सभकेँ बिन खर्चाक साक्षर बनाओल जायत। सभकेँ आमंत्रित कएल गेल। आब प्रतिदिन सॉंझमे भीड़ लागए लागल। विद्यार्थी सभ शिक्षक संगे पढ़ाबएमे व्यस्त भऽ गेलाह। गर्मीक छुट्टीमे सेहो सभ एहि काजमे लागल  रहल। दुइए तीन महिनाक प्रयाससॅं गामक सभ बुढ़ बुजुर्गसँ लऽ कऽ उमरगर बच्चा सभ साक्षर भऽ गेल। सभसँ बेसी लाभ स्त्री सभकेँ भेलन्हि,  जिनका सभकेँ ई सुविधा भेटबाक कोनो आशा नहि छलन्हि। गाममे अखबारक खपत बढ़ि गेल। आब बुढ़ियो सभ बात करए लगलीह जे देशमे कोन पार्टीक बहुमत अछि आऽ के प्रधानमंत्री अछि। गीत नाद सेहो लिखि कए राखए लगलीह। आऽ अपन नातिन सभकेँ पढ़बाक लेल प्रोत्साहित करए लगलीह। मिथिलांचल, जतए स्त्री सर्वथा सम्मानित रहलि, मुदा शिक्षाक क्षेत्रमे ओकर भाग्य कनिक कमजोर छल, ताहुकेँ दूर करबाक ई प्रयास, आगामी उज्ज्वल भविष्यक प्रतीक छल। स्त्रीशिक्षाक एहेन दीप प्रज्वलित करबाक लेल विद्यालयकँ सरकार दिससँ सम्मानित कएल गेल। प्रधानाध्यापक आऽ सभ शिक्षक सभ अपन विद्यालयक छात्रसभक बहुत प्रशंसा केलखिन जे ओकर सबहक तन्मयतासॅं ई काज सम्पन्न भेल। फेर अगिला अवकासमे एहि कार्यक्रमकेँ आगॉं बढ़ेबाक विचार कएल गेल। देवीजी : व्यायाम आवश्यक चित्र: ज्योति झा चौधरी गामक विद्यालयमे प्रतिदिन व्यायामक शिक्षा देल जाएत छल; प्रार्थनाक समय, कक्षामे जाइ सऽ पहिने। कतेक बालककेँ इ बड्ड कष्टकारी लागैत छलै।ओ सब प्रार्थनाकाल प्रतिदिन नुका जाइ छल।शिक्षक सबसॅं ई बात नुकैल नहि रहल।ओ सब बच्चा सबहक अहि काज सऽ बहुत अप्रसन्न भेला।ओ सब देवीजीके नियुक्त केला ओकरा सबके बुझाबऽ लेल। देवीजी पता कर लगली जे ओ सब कत नुकाइत अछि।बेसी देर नहिं लगलैन इ ज्ञात करैत जे किछु बच्चा सब कक्षाक बेंचक नीचामे नुका जाइत छल। एक दिन देवीजी जहन प्रार्थना शुरु भेल तऽ कक्षामे जाकऽ तकनाई शुरी केली। किछु बच्चा सब ठीके नुकायल छलाह। देवीजी तत्काल ओकरा सबके प्रार्थना लेल पठेलखिन। तकर बाद ओकरा सबके बुझेलखिन जे व्यायाम कतेक आवश्यक छै।ई शारीरिक आर बौद्धिक दुनु तरहक विकास लेल आवश्यक छै। अहि सॅं स्फूर्ति आबैत छै।भोरे-भोर व्यायाम केला सॅं दिनभरि मोन प्रसन्न रहै छै आ सबकाज में मोन लागै छै।जहिना खेनाई आवश्यक होइत अछि तहिना व्यायाम सेहो आवश्यक छै। कसरत करक अभ्यास स्वस्थ जीवनके आधार होइत अछि।तकर बाद ओ व्यायामक शिक्षक के रोचक तरीका स व्यायाम सिखेबाक आ शिक्षक सबके सेहो संगे व्यायाम करैके सलाह देलखिन।सब हुनकर बात मानलक। बच्चो सब अहि स प्रभावित भेल आ व्यायाम स भगनाई छोड़लक। देवीजी पुनश्च अपन कार्यमे सफल भेली। शिक्षक दिवस चित्र: ज्योति झा चौधरी देवीजी : शिक्षक दिवस आई ५ सितम्बर कऽ विद्यालयमे शिक्षक दिवसके आयोजन छल। सब शिक्षक-शिक्षिका  अतिथि रहैत आ सब कार्यक्रम विद्यार्थी उारा प्रस्तुत छल। तरह - तरहक रंगारंग कार्यक्रम देखायल गेल जाहि स सब अध्यापक बहुत प्रसन्न भेलैथ।अहिबातक चर्चा विस्तृत रूपसऽ भेल जे ई तिथि देशकेप्रथम उपराष्ट्रपति एवम्‌ उितीय राष्ट्रपति स्वर्गीय सर सर्वपल्ली राधाकृष्णन  के जन्मतिथि छैन।भारतीय दर्शनके पश्चिमी सभ्यतामे मान्यता दियाबऽमे हुनकर योगदान अविस्मरणीय छैन।1952 – 1962 मे उपराष्ट्रपति रहला आ १३ मई १९६२ सॅअगिला पॉंच साल तक राष्ट्रपति रहला।जहन ओ राष्ट्रपति भेला तऽ हुनकर विद्यार्थी हुनकर जन्मदिवस मनाबऽके अनुमति मॉंगऽ गेलैन।ओ कहलखिन जे हमर जन्मदिन के आडम्बर के बदले अहि दिनके शिक्षक दिवस के रूपमे मनाकऽ हमरा गर्वित करू। तहियासॅं ई प््राथा प््राारंभ भेल। अहि दिन सब विद्यार्थी अपन शिक्षकसभके प््राति अपन आभार प््राकट करैत छथि। करैयो के चाही कारण कहल गेल अछि - ''गुरु गोविन्द दोनो खड़े़,काको लागूं पाय। धन्य गुरु आपणो ,गोविन्द दियो दिखाय॥ सबकियो अन्य शिक्षक - शिक्षिका संगे देवीजीके प्रति विशेष आभार प्रकट केलक ।अंतमे प्रधानाचार्य अपन भाषणमे विद्यार्थीक प्रशंसाक अतिरिक्त अहि बात पर विशेष जोर देलखिन जे शिक्षक देशक भविष्यक निर्माता होइत छैथ तैं हुनका विद्यार्थी लग इक आदर्श प्रस्तुत करैके चाही। शिक्षकके जिम्मेवारीक महत्व पर जोर देलाक बाद  कार्यक्रम समाप्त भेल।सब सहर्ष अपन घर दिस विदा भेला कारण आहि अवकास छल। देवीजी:  ज्योति झा चौधरी देवीजी : चित्र: ज्योति झा चौधरी देवीजी : वृक्षारोपण बाढ़िक खबरि सऽसब दुखी छल। कतेक ठाम तऽ विद्यालय बन्द भऽ चुकल छल। देवीजीक विद्यालय संयोग सऽ बाढ़ि सऽ बचल रहैन। लेकिन ओतय कैम्प लागल छल।बाढ़ि सऽपीड़ित लोक सबके बचाक ओतऽ आश्रय देल गेल। देवीजीके सेवा भाव फेर सब विद्यार्थी एवम्‌ शिक्षकगणके एकजुट भय सामाजिक कार्य करलेल उत्साहित केलकैन। सबकियो गौवॉं सबसऽ पाइ, कपड़ा आ भोजन जमाकऽ कैम्पमे बॅटलक। दवाईके इंतजाम सेहोकेलक। ओहि कैम्पमे आयल बच्चा सबके लऽ कऽ देवीजी अपन पुरान छात्र सबसंगे पढ़ेनाई सेहो प्रारम्भ केली। तहन अहि विपदाक विषयमे चर्चा उठल तऽ देवीजी  सबके पर्यावरणके बढैत तापमानक जानकारी देलखिन। ओ बतेलखिन, ''सब जगह तापमान बढ़ला सऽ हिमनद सब घमि रहल छै। ताहि पर सऽ हिमालय पर विश्वके सबसॅं ऊंच आ विशाल हिमनद छै जे गर्मीसऽ घमि रहल छै। ओकर पानि हिमालय सऽ निकल बला नदी सबमे आबि रहल छै। तैं ई विपत्ति आयल अछि। अकरा रोकैलेल नदी सबके किनार मजबूत भेनाई बड आवश्यक छै जाहिलेल सामान्य जनता वृक्षारोपण कऽ सरकारक सहायता कऽ सकैत छैथ।बान्ह बनौनाइ तऽ सरकार  द्वारा कैल जायत लेकिन जगह-जगह गाछ लगा हम सब तापमान नियंत्रण आऽ माटिक कटाव पर रोक लगा सकै छी। जौं मेघके लौह मानी तऽ गाछके चुम्बक मानू।गाछ रहला सऽ बरखाक अभाव सेहो दूर होइत अछि। देवीजीक अहि बात सऽ प्रभावित भऽ सबकियो खाली पड़ल जमीनपर आ सड़कक काते-काते  गाछ लगेला आऽ कैम्पक लोकसब तऽ इहो मोन बनेला जे अपन गाम घुरलापर ओ सब ओतौ वृक्षारोपण करता आऽ वृक्षके अनायास काटऽ पर रोक लगौता। . देवीजी:  ज्योति झा चौधरी देवीजी : देवीजी यातायात एवम्‌ अन्य सुरक्षा नियम एक दिन देवीजी विद्यालय दिस आबिये रहल छली कि कोनो गाड़ीके बहुत जोर सऽ ब्रेक लगाबऽ के आवाज सुनाई देलकैन।घुरिकय तकली तऽ एकटा कारके टेढ़ भऽ कऽ रूकल पौली।गाड़ीक ड्राइवर एकटा बच्चाके डॉंटि रहल छल।संजोग सऽ ओ बच्चा हुनके विद्यार्थी छलैन आ ककरो चोट नहिं लागल छल।लोक सभ सेहो जमा हुअ लागल ।लोक सब अपन गामक बच्चाके पक्षलऽ उल्टे कारचालक पर बाजि रहल छल।देवीजी ओतऽ पहुंचली।ओ कनिक हाल तऽ स्वयम्‌ देखने रहैथ।तैं हुनका कोनो शंका नहिं रहैन जे अहिमे बालकेके गलती अछि। तखनो ओ बालक आ लोकसबसऽ  पुछली तऽ पता चललैन जे गाड़ी नजदीक रहै तैयो बच्चा दौड़कऽ सड़क पार केनाइ शुरू केलक। ओ गाड़ीवान सऽ माफी मॅंगली आ ओकरा गाड़ी समय पर रोकइ लेल धन्यबाद देली। चित्र: ज्योति झा चौधरी तकर बाद ओ ओहि बालक के संगे विद्यालय विदा भेली।रस्ता भरि ओकरा यातायातक सुरक्षा दऽ बुझाबैत रहली।कहलखिन जे सड़कपर चलै काल कोनो बातक हड़बड़ी नहिं करैके चाही। दुर्घटना ककरो गलती सऽ भऽ सकैत छै चाहे ओ गाड़ी चलाबऽवला होई वा पैरे चलै वला लेकिन अपना दिस सॅं जरूर सावधान रहैके चाही।अपन सावधानी सॅ दुर्घटना रोकल जा सकैत छै। फेर देवीजी विद्यालय पहुंचि सबके यातायातके सामान्य नियम जे पैरे चलनिहार के बुझल रहबाक चाही से बतेलखिन।कहलखिन जे शहरमे टै्रफिक लाइट होइत अछि। गाड़ीके निर्देशित करैवला बत्ती जखन लाल भऽ जाई आर पदयात्रीक निर्देशन वला बत्ती हरियर होइ तखन आगा बढ़बाक चाही। जॅं बत्तीक व्यवस्था नहि होई केवल जेब्रा क्रॉसिंग होई तऽ ओहि पर चलैके चाही।ओतऽ गाड़ीवानके गाड़ी आस्ते एवम्‌ आवश्यकता पड़ला पर रोकक नियम छै।तैं खाली सड़कके  बदले  जेब्रा लाइन पर सड़क पार करी।  लेकिन दुर्भाग्य सऽ गामसबमे दुनुक व्यवस्था नहिये अछि आ सड़क तेहेन खराब अछि जे कियो गाड़ीवान बेसी तेज गाड़ी चलाबऽके हिम्मत नहिं करता तैयो बिना दुनु कात तकने आ बिना आश्वस्त केने जे गाड़ी दूर अछि आगा नहि बढी़ ।दौड़क सड़क पार करक परिस्थिति हुए तऽ कनि प्रतीक्षा कऽ ली। एम्बुलेंस़, अग्निशामक वाहन, पुलिसक वाहन आदि के हमेशा पहिने जाय देबाक चाही।अही प्रसंगमे देवीजी सबके मेलामे  घुमैकालक सावधानी सेहो सिखेलखिन। सबके असगर बहराई सऽ, अंचिन्हार लोकसऽ बात करै सऽ आऽ अनेर-गनेर चिज खाई सऽ मना केलखिन। मानवजीवन अमूल्य  छै अकर रक्षाकऽ संसारक कल्याणमे लगाबक चाही। तकर बाद देशक राष्ट्रपिताक बात उठल।कारण दू अक्टूबर, जहिया महात्मा गॉंधीक तथा लाल बहादुर शास्त्रीजीक जन्मदिवस छलैन, आबि रहल छल।अहिंसाक अमोघ मंत्र दैबला महात्मा गॉंधीजीक सात्विक जीवनशैली पर सबहक ज्ञान बढ़ल।देवीजी अपन अध्यापन समाप्त करैकाल सबके जानकारी देलखिन जे गॉंधी-जयन्ती कऽ विद्यालय तऽ बन्द रहत किन्तु सॉंझमे महात्मा गॉंधीजीक श्रद्धांजली दैलेल कार्यक्रमक आयोजन रहत तैं सबके तैयारीक संग पहुंचक छल। देवीजी : देवीजी यूनाइटेड नेशन्स डे ( २४ अक्टूबर) देवीजी इतिहासमे द्वितीय विश्वयुद्ध के विषय मे पढ़ा रहल छली।ताहि स आगॉं बढ़ि ओ युनाइटेड नेशन्स के स्थापनाक विषय मे बताबऽ लगली।ओ कहलखिन जे भारत सहित पचास टा देश २४ अक्टूबर १९४५ मे न्याय आ कानून के प्रति अपन आस्था एवम्‌ आदर के सिद्धान्तक संग अहि संस्थाक निर्माण केलक जाहिके मुख्य उद्देश्य छल जे कोनो राष्ट्रमे ओकर सामरिक क्षमता, आर्थिक कमजोरी वा क्षेत्रफल अन्तर के आधार पर बिना भेद-भाव केने मनुषके मौलिक अधिकारके स्त्री वा पुरुषके समान रूपसऽ उपलब्ध कराबऽ मे सहायता करत।ताहि लेल बहुत तरहक नियम-कानून बनल जाहि के मानैके सब सदस्य राष्ट्र प्रतिज्ञा लेलक आ सब साल सेन फ्रेनसिसको, अमेरिका मे एकत्रित भऽ दुहराबैत अछि। अहि सबहक लक्ष्य छल सम्पूर्ण विश्वमे शान्ति, शिक्षा आ आरोग्यक प्रसार।अकर झण्डामे विश्वक मानचित्रके ऑलिव नामक गाछक पात स घेरल देखल गेल छै।ऑलिव के शान्तिक प्रतीक मानल गेल छै।वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन सेहो अकरे शाखा अछि जे अहि वर्ष अर्थात्‌ ७ अप्रैल, २००८ कऽ अपन साठम वर्ष पूरा केलक। अहि वर्ष ओकर लक्ष्य अछि विश्वके ग्लोबल वार्मिंग' वा पर्यावरणके बढ़ैत तापमान' के दुष्प्रभावसऽ परिचित करेनाई। युनिसेफ सेहो अकरे शाखा अछि जे मूलतः बच्चा सबके स्वस्थ व शिक्षित एवम्‌ सुरक्षित समाज प्रदान करलेल प्रतिबद्ध अछि।यूनिसेफ के स्थापना ११ दिसम्बर क कैल गेल अछि।भारतमे सेहो ओकर ऑफिस अछि।जे ग्रीटिंग कार्ड युनिसेफ द्वारा प्रकाशित होएत अछि तकर पाई ओ संस्थाके जाइत अछि तैं ओ सबसऽ आग्रह केलखिन जे ईद, दिवाली, थैंक्स गीविंग डे, हैलोवीन, क्रिसमस,  नववर्ष, मकरसंक्राती आदि के लेल  ग्रीटिंग कार्ड युनिसेफ प्रिंट वला खरीदू। देवीजी इहो ज्ञात करेलखिन जे अहि संस्थाके अन्तर्गत कतेको कल्याणकारी अभियान सफल भेल अछि।जेनाकि, स्मॉल पॉक्स तथा पोलियो के प्रायः सब देशसऽ हटाबक कार्य, कतेको बच्चाके प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध करेनाई, सुनामी जकॉं आयल प्राकृतिक प्रकोपमे सहायता आदि केने अछि। हलांकि कतौ-कतौ ओकरा असफलता सेहो भेटल छै लेकिन ओ निरन्तर नश्लवाद, रंगभेद, आतंकवाद आदि के हटाबऽमे प्रयत्नरत अछि। देवीजी विद्यालयमे २४ अक्टूबर कऽ युनाइटेड नेशन्स डे मनाबक विचार बनेली।ओहि दिन ओना तऽ छुट्टी रहैत छल लेकिन बच्चा सबहक आग्रह तथा प्राधानाध्यापक के सहमति सऽ देवीजी विद्यालयमे ओहि दिन प्रश्नोत्तर(क्वीज़ ), भाषण, वाद- विवाद, निबन्ध लेखन आदि प्रतियोगिताक आयोजन कएली।अहि सबहक मुख्य विषय यू एन संस्थाक इतिहास एवम्‌ कार्यप्रणाली छल जाहि सऽ सबके बहुत जानकारी बढ़ल। देवीजी : चित्र ज्योति झा चौधरी देवीजी : बाल-दिवस १४ नवम्बर कऽ बाल दिवस समारोह छल। अहि दिन गामक विद्यालयमे विशेष आयोजन कैल गेल छल।सब अध्यापक अध्यापिका सब मिलिकऽ बच्चा सबलेल सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कऽ रहल छलैथ। देवीजी बच्चा सबके ईश्वरक रूप मानैत बहुत सुन्दर गीत सुनौली। ओ कहलथि जे बच्चा सब देशक भविष्य होइत छथि । तैं हुन्का सबके अपन जिम्मेवारीक अनुभव रहैके चाही। बेकार मे समय नष्ट केनाई छोड़ि ध्यान सऽ पढ़ाई कऽ अपन विद्यालय व अपन अभिभावक के गर्वित करैके चाही। जे विद्यार्थी पढ़ाईके समयमे मज़ा करैमे व्यस्त रहैत छैथ तिनका भविष्यमे कानऽ पड़ै छैन आऽ जे विद्यार्थी जीवनमे मिहनत करै छैथ से भविष्यमे सुख करै छैथ। तकर बाद प्रधानाध्यापक अहि बातक उल्लेख केला जे गॉंधीवादी विचार सऽ उत्प्रेरित महान स्वतंत्रता सेनानी एवम्‌ स्वतंत्र भारतके प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी के बच्चा सबसऽ बहुत प्रेम छलैन। तैं हुनक जन्मदिवस के भारतमे प्रतिवर्ष बाल दिवसके रूपमे मनाओल जाइत छै। नेहरूजी के स्नेहसऽ चाचा नेहरू कहल जाइत छलैन। हुनक जन्म १४ नवम्बर १८८९ के दिन आ मृत्यु २७ मई १९६४ के दिन भेल रहैन । ओ सबसऽ लम्बा अवधि तक भारतक प्रधानमंत्रीक पद पर रहलैथ। हलांकि यूनाइटेड नेशन्स २० नवम्बर के युनिवर्सल चिल्ड्रेन्स डे के रूपमे घोषित केने अछि लेकिन बहुत देश अलग तिथि कऽ ई मनाबैत छैथ। जेनाकि चीन आऽ हांगकांगमे ४ अप्रिल कऽ मेक्सिकोमे ३० अप्रिल कऽ जापानमे  ५ मई क तथा मलेशियामे 1 अक्टूबर कऽ बाल दिवस मनायल जाएत अछि। देवीजी : चित्र ज्योति झा चौधरी देवीजी : परीक्षाक तैयारी परीक्षा लऽग आबि गेल छल।सब विधार्थी सब सचेत भऽ रहल छल। लेकिन ओहिमेसऽ किछु तेहेनो छल जे अतिशय चिन्तित छल जाहि कारण ओकरा सबके स्वास्थ्य सेहो बिगड़ि रहल छल। जखन देवीजीके अहि बातक जानकारी भेलैन तऽ ओ सबके परीक्षाक तैयारी करैके उचित तरीका सिखाबक निर्णय लेली।एक बड़का कोठलीमे सब बच्चा सबके बजौली आ अपन पाठन शुरू केली।पहिने तऽ ओ कहली जे साल भरि बैसल रहिकऽ अंतिम समय मे अधीर भेने किछु नहिं होइत छै।तकर बाद ओ मुख्य रूपसऽ तीन शीर्षक मे अपन विचार रखली : 1 परीक्षाक समय स्वास्थ्यक ध्यान: अहिलेल देवीजी निम्नलिखित परामर्श देली-(1) पर्याप्त भोजन करू।पढ़ाई के चिन्तामे खेनाइ-पिनाइ नहि बिसरू।समय बचाबै लेल दोसर काज बन्द करू जेनाकि कतौ घुमनाई, अनेरो लोक स गप करैमे समय बितौनाई।(2) बाहर के कीनल समान नहिं खाऊ।(3) बीच-बीच मे चलनाई-फिरनाई करैत रहू।भऽ सकैतऽ योग आ ध्यान करू।(4)  हमेशा आशावादी रहू।मनुष के मस्तिष्क के क्षमता अपार छै।तैं किछु असम्भव नहिं छै मनुष लेल। (5) पर्याप्त मात्रामे सूतू।छऽ सऽ आठ घंटा जरूर सूतू।नींदके कमीसऽ एकाग्रतामे कमी आबैत छै। २ पाठ स्मरण करक तरीका: (1) पाठके स्मरण करैलेल ओकरा बुझनाई आवश्यक अछि।अहिलेल शिक्षक सऽ सहायता लिय।एक दोसर के सेहो सहायता करू।गणित लेल अभ्यास आवश्यक छै। (2)  स्मरण कैल पाठके बेर-बेर दुहराऊ तऽ ओ बिसरत नहिं। (3) एकरसता हटाबै लेल कनिक काल एकटा विषय पढ़लाक बाद फेर दोसर विषय पढ़ु। ३ अंतिम कालक पढ़ाई: (1) सब पाठके संक्षिप्त नोट बनाकऽ राखू आ परीक्षा लेल जायसऽ पहिने ओकरा पढ़ू,  (2) जे प्रश्न कठिन लागैत अछि तकरा एक जगह लिखिकऽ राखू आ जायकाल पढ़ू,  (3) रस्तामे सुरक्षाक ध्यान राखू , आ  (4) कक्षामे बैसिकऽ कनिक काल ऑंखि मुनिकऽ वा अपन हाथ दिस ताकि  ध्यान करू।अहि सऽ एकाग्रता आबैत छै। देवीजीक अहि परामर्श सऽ सब बच्चाक बढ़िया मार्गदर्शन भेल।सब आगामी वार्षिक परीक्षाक तैयारीमे लागि गेल। दैनिकी शिक्षा मानवसभ्यताक मूलमंत्र होइत अछि। मुदा प्रतियोगिताक समयमे पढ़ाईक नामपर मोट-मोट पोथीक भारसॅं विद्यार्थी सबहक जीवन कारावासमे पराधीन जीवन काटैत कैदी सनक भऽ जाइत अछि। अहि बातक ध्यान राखि हमरा सभकेँ शैक्षणिक यात्रामे पठायल जाइत छल। एहि यात्रामे हमरा सभकेँ दैनिकी सभ दिन लिखऽ पडै़त छल आऽ कतबो थाकल रहैत छलहुँ हमरा सभकेँ ओहिये दिन संगे जायवला शिक्षक - शिक्षिका सॅं हस्ताक्षर करबाबऽ पड़ैत छल।  टिस्कोक दस विद्यालयमे कक्षा छह, सात, आठ आऽ नौमे प्रथम स्थान पाबवला एवम्‌ प्रत्येक विद्यालयसॅं एकटा बहुमुखी प्रतिभाशाली छात्र-छात्राकेँ  ई सुअवसर प्राप्त होइत छल। हमरा ई सौभाग्य चारू कक्षामे भेटल। चारिम बेर सुअवसर तऽ भेटल किन्तु ६ दिसम्बर १९९२ क राजनैतिक हलचलक कारण हमर सबहक कार्यक्रम रद्द- भऽ गेल। पहिल बेर जून १९८९ मे उत्तर भारतक महत्वपूर्ण स्थान गेलहुँ लेकिन दैनिकी हेरा गेल। दोसर बेर दिसम्बर १९९० मे कोलकाता आऽ आसपासक जगह घूमलहुँ। जाहिमे निम्नलिखित स्थानक दर्शन भेल १. मेट्रो रेल २ अलीपुर जू़ ३ विक्टोरिया हाउस ४ बिरला प्लानेटोरियम ५ बिरला टेकनिकल एण्ड इण्डस्ट्रियल म्यूज़ियम ६ नेहरू चिलड्रेन्स म्यूजियम ७ दक्षिणेश्वर मन्दिर ८ बॉटेनिकल गार्डेन ९ इण्डियन म्यूज़ियम १० तारकेश्वर ११ शान्ति निकेतन १२ तारापीठ १३ बकरेश्वर १४ दिग्घा पहिल दिन : २५  दिसम्बर १९९० मंगलवार : आइ ठीक आठ बजे भोरे हमर सबहक यात्रा एक बसमे प्रारंभ भेल। सबहक अभिभावक आयल रहथि आऽ बड चिन्तित बुझाइत छलथि। हमसभ अपन खुशी नहि नुका पाबि रहल छलहुँ लेकिन खुलि कऽ तहन हॅंसलहुँ जहन बस शहर पार कऽ  पहाड़ी आ जंगलाह रस्ता पकड़लक। रस्ता भरि एक दोसराक परिचय एवम्‌ अपन-अपन स्कूलक टॉप स्कोरक तुलना करैत रहलहुँ। दुनु तरहे –एग्रीगेट(पूर्णांक)आऽ अलग-अलग विषयमे। फेर गाना बजाना अंतराक्षरीक अंतर्गत सेहो भेलै। करीब 1 बजे दुपहरियामे खड़गपुर पार केलहुँ। अढ़ाई बजे कोलाघाट पर ठहरि भोजन केलहुँ। विशाल हावड़ा ब्रीजकेँ पार करैत जहन बस कोलकाता शहरमे प्रविष्ट केलक हम सभ खिड़कीपर भीड़ लगेने छलहुँ, ओहि शहरक मकान सभकेँ देखऽ लेल। मकान सभ ब्रिटिश स्टाइलक बेसी देखायल। सड़कक भीड़ तऽ अतिशय छल। हम सभ ६ बजे सॉंझमे अग्रसेन स्मृति भवन नामक लॉजमे अपन घर जमेलहुँ। ओकर पॉंचम महलापर सभ लेल पॉंचटा कक्ष अनुबंधित छल। बालिका सभ लेल दू टा कक्ष देल गेल। ओतऽ अपन समान पाती व्यवस्थित कऽ अगिला दिनक इंतजाम कऽ हमसभ रातिक साढ़े आठ बजे भोजन लेल होटल दिस विदा भेलहुँ। एतेक बड़का टोलीकेँ देखि सभ चौकि जाइत छल। भोजनोपरान्त दैनिकी लिखि शिक्षकसँ हस्ताक्षर करा सुइत गेलहुँ। दोसर दिन : २६  दिसम्बर १९९० बुद्धवार : आई हम सब भोरे साढ़े पॉंच बजे उठलहुँ।सब तैयार छलहुँ शिक्षक सबहक आज्ञाक प्रतीक्षामे। जखने आदेश भेटल हमसब दनदनाकऽ बसमे बैस गेलहुँ। आइ दुगुना उत्साह छल। एकतऽ टूरक पहिल दिन ताहि परसॅं मेट्रो रेलवेक दर्शन।जाबे ट्रेनके आबमे देर रहए ताबे हम सब बेर बेर एस्कलेटर पर चढ़ैत उतरैत रहलहुँ। स्टेशनक नाम एस्प्लाण्ड छलै।ओहि स्टेशन पर अण्डरग्राउण्ड रेलवे पर चढ़लहुँ आ' आठम स्टेशन टॉलीगंजमे उतरि गेलहुँ। ट्रेन अतेक तेज चलैत रहए जे ठाढ भेनाई मुश्किल छलै।अहि यात्रा लेल जतबै उत्साहित छलहुँ ततबे जल्दी ई समाप्त भऽ गेल। अगिला स्थान छल अलीगढ़ जू़। अहि चिड़ियाखानामे विभिन्न प्रकारक पशु - पक्षी सहित अनेकों विचित्र सॉंप सेहो रहए। पशु - पक्षीक नाम निम्नलिखित अछि : (1)याक, (2)सरपेण्ट इगल, (3)सियार, (4)इण्डियन फॉक्स, (5)व्हाइट आइबीज, (6)हॉमर पीजन, (7)गयल, (8)सारस, (9)एमू, (10)कंगारू, (11)ब्रेकिंग डीयर, (12)रंगीन सुग्गा, (13)उदविलाव, (14)विभिन्न प्रकारक बतख, आऽ (15)नीलगाय। अकर बाद सॉंपक सिलसिला शुरु भेल। (1)विशाल अजगर, (2)कोबरा अर्थात्‌ नाग, (3)साधारण कोबरा, (4)टुक्टू - ई देवार पर छिपकली जकॉं सटल छल, (5)वाटर मॉनीटर - ई देखमे मगरमच्छ जकॉं छल, (6)बैण्डेड करैत अर्थात्‌ धारीदार करैत - करैतक नाम तऽ गामो में खूब सुनने छलहुँ। अकर पीठ पर कारी आऽ पीयर के धारी छलै आ अकरा विषैला सॉंप मानल गेल छल। (7)वाइन स्नेक - ई सॉंप हरियर आ' एकदम पातर छल जेना कोनो लत्ती हुए।इहो कनी विषवला सॉंप छल आ अंगूरक गाछमे भेटैत छल।गामदिस सुगवा सॉंपक नाम सुनने छलहुँ।(8)रैट स्नेक - ई सॉंप विषहीन होइत अछि आ मूसक जनसंख्या कम करमे सहायक अछि।(9) ब्रॉंजबैक ट्री स्नेक -  ई सॉंप कॉंसा जकॉं भूर रंगक होइत अछि आऽ गाछक डारिमे मिलक नुकायल रहैत अछि।(10) रेड सैण्ड स्नेक बलुइ, (11)ऑर्नामेंटल स्नेक -मिडिल इहो गाछपर भेटैत अछि आऽ अकर मुंह छिपकिली जकॉं होईत अछि। अकर बाद हम सब दू  टा हाथी आ किछु बानर देखलहुं।हनुमान, पिगटेल्ड मैसेक्वी आर बबून मुख्य बानर छल। हनुमानक मुंह कारी आ पूंछ नमहर छलै।पिगटेल्ड मैसेक्वीके पूंछ छोट छलै आऽ मुंह चपटल छलै।बबूनक मुंह उगल छलै मुदा कारी नहिं छलै।हम सब ओकरा संगे खूब खेलेलौं।फेर चिल्ड्र्रेंस ज़ू गेलहुं।ओतऽ हाथीक कंकालक पड़ल निशानयुक्त पाथर छल। तरह -तरहक पक्षीक अंडा देखलहुं। जेना सुगाक अंडा, ऑस्ट्रीचके अंडा, हंसक अण्डा आदि।ओतय हमसब उज्जर बाघ, उज्जर मूस आर उज्जर कौआ सेहो देखलहुं।अंतमे ज़िराफ आ विदेशी पक्षी सबहक आवास स्थान झीलक लग स होइत लौट गेलहुं। ओतऽसऽ लौटि भोजन कऽ फेर विक्टोरिया मेमोरियल विदा भेलहुं।विक्टोरिया मेमोरियल के फाटक पर दू टा पैघ सिंहक मूर्ति छल। मानू हमरे सबहक स्वागत लेल राखल छल।तकर बाद एकटा तोप राखल छल।कहै छै जे होनहार वीरवान के होत चीकने पात।अग्रेजीमें सेहो कहल गेल छई “morning  shows  the  day” हमरा पहिने सऽ नहिं बूझल रहै तैयो अंदाज लागि गेल जे अत वीर-रसक दर्शन हैत।महल सदृश मकान भव्य छल।अन्दर मैरी, डलहौजी, हेंस्टिंग्स, वेलेस्लीक विशाल मूर्त्ति स्थापित छल।अनेको प्रकारक हथियार विराजमान छल।औरंगजेब, मीरज़ाफर, टीपू, हैदर आदि महान्‌ योद्धा सबहक तलवार राखल छल।ऑस्ट्रिया स अंग्रेज द्वारा छीनल टर्किश मशीन गन राखल छल।अब्दुल फ़जलक रचित एतिहासिक पुस्तक अकबरनामा सेहो देखलहुँ।उपर के महलके देवार पर रानी विक्टोरिया के विलासिता दर्शायल गेल छै। अहि ठाम सऽ निकलि हम सब बिरला तारामण्डल पहुंचलहुं। कनिक देर पंक्तिमे ठाढ़ भेलाक बाद अन्दर जाय भेटल।सब मजाक करैत छल जे अतऽ दिनोमें तारा देखायल जाइत छै। ओहिमे खगोलीय जानकारी देल गेल। लागल जेना आकाशक नीचा बैसल छी।अहि सब के लेल जाइल्स प्लानेटोरियम प्रोजेक्टर नामक उपकरणके उपयोग कैल गेल छल। अहि तरहे हमर सबहक आहि के भ्रमण सम्पन्न भेल।हमसब अपन लॉजमे लौटि सुस्ता भोजन कर होटल गेलहुं।रस्ता भरि हमरा सभके यैह चर्चा रहल जे अत हिन्दीक महत्त्व कतेक कम छैक। सभ जगह जानकारी या त बंगाली या अंग्रेजीम लिखल छल।भोजनोपरान्त हम सभ डायरी लिखि शिक्षक सॅं हस्ताक्षर करा सूतक कार्यक्रम बनेलहुं। तेसर दिन : २७ दिसम्बर १९९०, वृहस्पतिवार : आइ जखन उठलहुँ तँ पॉंच बाजल छल। आधा घंटाक अन्दर सभ जागि जएता तैँ हमसभ किछु सहेली सभ मिलिकए जल्दीसॅं नित्यक्रियासॅं निवृत्त भऽ गेलहुँ, लाइन लागऽ सँ बचए लेल। नास्ताक बाद सभ करीब साढ़े सात बजे खिदिरपुर डॉक दिस विदा भेलहुँ। मार्गमे हाइकोर्ट, नेताजी स्टेडियम, आकाशवाणी भवन, इण्डियन गार्डेन, मोहन बगान, मलेटरी छावनी फोर्ट विलियम (जतए १९७१ क लड़ाईमे भारतीय सेना द्वारा नष्ट कएल पैटण्ट टैंक राखल छैक) , हॉर्स रेस कोड देखैत खिदिरपुर डॉक पहुचलहुँ। ओतए बहुत तरहक व्यापारिक जहाज सभ छलैक। जेना कि जापान जाए लेल कैमेलवर्ट लाइन्स, ब्लू ओशियन, अकबर इत्यादि। दू टा फोल्डिंग ब्रिज  जे ऊँच जहाजकेँ रस्ता दैक लेल बीचसँ अलग भऽ दुनु कातमे लम्बवत ठाढ़ भऽ जाइत छल। एक ब्रिजक नाम बास्कल छलैक आर दोसरकेँ सभ मूविंग ब्रिज कहैत छल। डॉकक बाद हमसभ बिरला औद्यौगिक एवम्‌ तकनीकी संग्रहालय (Birla Industrial and Technical Museum) पहुचलहुँ। एतय सभसँ पहिने हम सभ बोन्शाई गार्डेन पहुचलहुँ। एतय विशालकाय वृक्षक प्रजातिकेँ विशेष प्रक्रियासँ ओकरा छोट आकार दऽ गमलामे जीवित राखल गेल छलैक। ४५ वर्षक उम्र वला बड़क गाछ राखल गेल छलैक, एक गमलामे। बाहरक बगानक बाद हमसभ अन्दर प्रवेश केलहुँ। आइस्टिन न्यूटन गैलिलियो आदि वैज्ञानिकक प्रतिमा विराजित छल। पहिल कमरामे डायनेमो छलैक, जाहिसँ ज्ञात होइत अछि, जे मनुष चालन शक्तिकेँ प्रथम स्त्रोतक रूपमे पशु जल एवम्‌ वायुकेँ शक्तिक कोना प्रयोग करैत छल। अन्य कमरा सभमे अनेकानेक मॉडल राखल भेटल। आइ ई यात्रा वस्तुत: शैक्षणिक यात्रा लागि रहल छलै। एकर बाद भोजनक लेल कनी विराम लेल गेल। हमर सबहक  अगिला लक्ष्य छल नेहरू चिल्ड्रन्स म्यूज़ियम। ई तीन मंजिला भवन छल। सभसँ ऊपरमे सम्पूर्ण रामायणक ६१ प्रसंगक क्रमिक रूपसँ पुतला द्वारा प्रदर्शित कएल गेल रहैक। शेषमे अलग-अलग देशक प्रसिद्ध गुड़िया सभ राखल गेल रहैक। गुड़िया सभ देखि अपन बचपन मोन पड़ैत छल जखन कनिया-पुतरा खेलाइत छलहुँ। बचपन तँ एखनो नहि गेल छल कारण दिन भरि व्यस्ततामे भने माता पिताकेँ बिसरि जाइत छलहुँ लेकिन लॉज पहुँचलापर घरक मोन जरूर पड़ै-ए। ओतएसँ लौटि कए फेर सभ किछु यथावत भोजन, अगिला दिनक तैयारी, दैनिकी आऽ फेर विश्राम। चारिम दिन : २८ दिसम्बर १९९०, शुक्रवार : हमसब यथावत साढ़े पॉंच बजे भोरे उठिकऽ अपन पूर्वसूचित कार्यक्रमक अनुसारे तैयार भऽ गेलहुं।पहिने बेलुर मठ गेलहुं। बेलुर मठ : ओतऽप्रवेश करैत देरी मोन निर्मल भऽ जाइत छै। ओतके स्वच्छ वातावरण आ शान्ति अलौकिक शक्ति के प््राति श्रद्धा आर बढ़ा दैत छै।धर्मगुरु रामकृष्ण परमहंस के अनुयायी सब हुन्कर मरणोपरान्त अहि संस्थाक निर्माण केने छथि।भागमभाग सॅ भरल शहर के एक कोन में स्थित ई स्थान महावतार रामकृष्ण परमहंस, हुनकर पत्नी शारदा देवी आ हुनकर शिष्य विवेकानन्द के मन्दिर आ प्रतिमा सऽ भरल अछि।अत विराजित प्रतिमा के मुख पर जे भक्तिभाव आ आत्मसंतोष परिलक्षित होइत छै तकर दर्शनमात्रके लेल दुनियाभरि सऽ लोकसब आबैत अछि।आस्तिकताक प्रति आस्था बढ़ाबऽमे पूर्णत: सक्षम अछि।अतऽ सऽ हम सब दक्षिणेश्वर मन्दिर गेलहुं। दक्षिणेश्वर मन्दिर : गंगाक कछार पर स्थित ई मन्दिर एक अछूत स्त्री रासरानी उारा निर्मित अछि। कथानुसार रासरानी के सपना में स्वयम्‌ देवी कालीजी आदेश देलखिन मन्दिर निर्माण लेल।अहि ठाम बारहटा शिवके मंदिर चारू दिस छल आ इकटा कालीजीक मंदिर बीचमे। धार्मिक स्थानक दर्शन होइ आ शैक्षणिक यात्रा पर निकलल टोली में विज्ञान आ ईश्वरक अस्तित्वके चर्चा नहिं होई से कोना भऽ सकैत छल। बहुत सामान्य विषय परन्तु हमसब काफी देर तक अहि पर बाजैत रहलहुं।आश्चर्य ई छल जे केकरो सौ प्रतिशत हिम्मत नहिं छल जे ईश्वर के अस्तित्वके पूर्णतथ झूठ मानय। हॉं सब अहि पर सहमति छलैथ जे ईश्वर ओकरे सहायक छथिन जे अपन सत्कर्म पर अडिग रहैया। “God helps him who helps himself” (गॉड हेल्प्‌स हिम हू हेल्प्‌स हिमसेल्फ) अर्थात्‌ ईश्वरो ओकरे सहायक होइत छथिन जे अपन सहायता स्वयम्‌ करैत अछि। आब अगिला लक्ष्य छल नैशनल बॉटेनिकल गार्डेन। इंडियन बॉटेनिकल गार्डेन : अकरा कलकत्ता बॉटेनिकल गार्डेन आर रॉयल बॉटेनिकल गार्डेन के नाम सॅ सेहो चिन्हल जाइत अछि।अपन नामक अनुरूपे इ बगान अनेको तरहक गाछ पात स भरल छल।कलकत्तासऽ लगले शिवपुर, हावड़ा में स्थित १०९ हेक्टेयर में पसरल ई स्थान करीब १२००० प्रजातिक वनस्पति के संरक्षित केने अछि। बबूल, रोइन, बॉंस, अशोक, पाम के अनेक प्रजाति, महुआ, जंगली बादाम, सुप्ति आदि।अकर स्थापना १७८७ ईसवीमे ईस्ट इंडिया कम्पनीके एक ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर द्यरॉबर्ट किड' उारा वनस्पतिके नव प््राजाति के चिन्हैलेल कैल गेल छल। उद्देश्य व्यापार छल। अतऽके मुख्य आकर्षण छल विश्वके सबसऽ पैघ बड़क गाछ द्यफाइकस बेंघालेसिंस'(Ficus Bengalhensis) ।ई गाछ २२५ वर्ष पुरान अछि। १८६४ आऽ १८६७ के भयंकर बवंडर सेहो अकरा नहिं नष्ट कऽ सकल।१९२५ में फफूंदी उारा रोगग्रस्त भेलाक बाद अकर मुख्य जड़ि काटि देल गेल। किन्तु वर्तमान में स्थित १८२५ जड़ि में सऽ कोन सबसऽ बलगर अछि से कहनाई मुश्किल।अकर उच्चतम्‌ शाखाक ऊॅंचाई २४.५ मीटर छै।ई अपनेमे एकटा जंगल जकॉं छै।अकर परिधि लगभग ४२० मीटर छै ।अतऽ सऽ बहरा भोजन कैल।तदोपरान्त कलकत्ताक दोसर (मेट्रो रेलक बाद) सबसऽ रोमांचक यात्रा हमरा सबलेल हुगली नदीके स्टीमर सऽ पार केनाई छल।हमरा सबलेल पर्याप्त सीट रिजर्व छल लेकिन हमसब ठाढ़े भऽ कऽ नदीक धारक वेग अवलोकित केलहुं। हरिउारक गंगामे स्नान केने रही आ अतऽ सागर में विलीन होइकाल सेहो देख लेलहुं।घुरैकाल हावड़ा ब्रिजके पैरे पार केलहुं। ओहिमें वॉकवे बनल छल।ओहि सेतुके नजदीकसॅ देखके एहिसऽ नीक अवसर नहिं भेट सकैत अछि।अतऽ सऽ निकलि हमरा सबके एकटा मैदानमे करीब एक घंटा लेल छोड़ि देल गेल छल। ओतऽ सऽ अपन लॉज लौट गेलहुं। काल्हि हमरा सबके कलकत्तासऽ विदा भऽ जायके अछि। ओहि हिसाबसऽ अपन समान पाती सैंत लेलहुं। फेर भोजनोपरान्त किछु मनोरंजन कैल गेल। किछुगोटए गीत सुनेलक, किछु चुटकुला, तऽ किछुगोटय शायरी सुनेलक। हम एकटा स्वरचित हास्य कविता सुनेलहुं जाहिमें सब विषय आऽ ओहि विषयक शिक्षक-शिक्षिका सबसऽ बचके ईच्छा व्यक्त केने छलहुं।ई हम अपन विद्यालयमे शिक्षक दिवस पर सुनेने छलहुं। अतौ सबके हॅंसाबऽ में सक्षम भेलहुं। अहिप्रकारे आहिके दिनचर्या समाप्त भेल। पांचम दिन : २९ दिसम्बर १९९०, शनिवार : आहि भोरे उठैमे ओते उत्साह नहि बुझाइत छल। कारण लागै छल जे टूर आहिये समाप्त भऽ रहल अछि। कलकत्ता लेल अतेक मोन लागल छल आ आहि कलकत्तामे अंतिम दिन छल। सब सामान पाती लऽ बसमे सवार भऽ गेलहुं। इंडियन गार्डेन आर विक्टोरिया मेमोरियल के लग सऽ होइत इंडियन म्यूज़ियम पहुंचि गेलहुं। इंडियन म्यूज़ियम : ई भारतक सबसऽ पैघ संग्रहालय अछि।अकर स्थापना २ फरवरी १८१४ ईसवीमे भेल छै। तहन ई एशियाटिक सोसाइटीमे रहै। सन्‌ १८७८ ईसवीमे ई वर्त्तमान स्थान पर मात्र दू टा गैलेरी संगे स्थापित भेल।आब अहि दू मंजिला विशाल भवनमे साइठोटा गैलेरी छै। अकर प्रथम क्यूरेटर नथेनियल वैलिक (Nathaniel Wallich) छलैथ जे डेनमार्क सऽ आयल छलैथ। अत सबसऽ पहिने रानी विक्टोरियाके बहुत पैघ मूर्त्ति छै।तकर बाद भगवान बुद्ध के विभिन्न रूप महावीर नागराज गणेश कामदेव महिषामर्दिनी दुर्गा पार्वती शिव नटराज इत्यादिक अतिप्राचीन प्रतिमा राखल छल।ई सब मध्ययुगके मूर्त्ति छै। एहेनो मूर्त्ति सब छै जकर विषयमे बेसी ज्ञात नहि भऽ सकल छै जे ई कोन युगक अछि वा ककर अछि। ओत फोटो खिंचनाई मना छल लेकिन कतेक चित्रकार सब ओत नीचा बैसकऽ मूर्त्तिक स्केच उतारि रहल छलैथ। पुछला पर पता चलल जे ओसब कथुपर रिसर्च क रहल छलैथ।  अनेको शैलीमे बनल मू़र्ति विराजित छल जेनाकि पाल शैली गुप्तोत्तर शैली कलिया शैली आदि। नक्काशी कैल स्तम्भ सेहो राखल छल। बगलक हॉलमे मुद्राक संग्रह छल।आहत कैशवी पयाल मालवा मथुरा नागकूड़ इक्ष्वाकु कनिष्क कुषाण गुप्त आदिके विभिन्न मुद्रासब राखल छै। उपरक मंजिलमे मिश्र वला कक्षमे दु टा ममी राखल छल।हमसब दू तीन गोटय नियमके विरुद्ध ओकरा छूबो केलहु। अगिला कक्षमे कैओ हजार वर्ष पुरान पक्षीसबके कंकालके सुरक्षित राखल गेल छल।६० करोड़ सऽ लऽ कऽ २०० करोड़ वर्ष पुरान जीव सब जे आब पाथर भऽ गेल छल विशेष तरीका सऽ सुरक्षित राखल गेल छै।अत हाथी ऊंट आदिके कंकाल सुतुरमुर्ग गिलहरी आदिके शरीर के सुरक्षित राखल गेल अछि। अतऽ संरक्षित सामानक विशालता एवम्‌ विविधताक वर्णन एक पन्ना की एक पुस्तक मे केनाइ सम्भव नहि लागैत अछि। ओतय सऽ निकलि हमसब भोजन केलहु आ फेर तारकेश्वर दिस प्रस्थान केलहु। भक्तिभाव के जागृत केलहुतारकेश्वर दिस विदा भऽ गेलहु।रस्ता मे भारतक विपन्नताक दर्शन केलहु बंगालक ग्रामीण इलाकाके रूपमे। तारकेश्वर : तारकेश्वर मे शिवलिंगक पूजा होइत अछि।कलकत्तासऽ लगले सेरामपुर लग ई पवित्र स्थान अछि। बहुत श्रद्धालु अत कॉंवर लऽ कऽ सेहो आबैत छथि।कहल गेल अछि जे अहि शिवलिंगक खोज पशु सब द्वारा भेल अछि। लोक सबके पता चलल जे गामक सब गाय सब जंगलमे जा एक स्थानपर अपन दूध स्वेच्छा सऽ दऽ आबै छल। तहन ओहि जगहके साफ केलापर पता चलल जे ओतय शिवलिंग विराजमान छल। तहनस ओहि शिवलिंगके पूजा हुअ लागल। तारकेश्वर पहुचिकऽ पंडित सबहक दक्षिणाक प्रति जे लोभ देखलहॅं से मोनके बेसी व्यथित करै बला छल।ईश्वरक प्रतिमाके दर्शन करैलेल दानक शर्त राखऽबला पंडा सबसऽ बहुत दुखित भेलहु। जॅं दान मन्दिरके देख-रेखके लेल आवश्यक अछि तऽ भक्तके स्वेच्छा आ श्रद्धा सऽ हुअके चाही। आई बाकी समय  यैह सोचैत रहलहु जे धार्मिक रीति-रिवाज़के दाम लगाकऽ धार्मिक आस्थाके बेचपर रोक लगनाइ कतेक आवश्यक अछि। अन्यथा अहि देशके की हैत। छठम दिन : ३० दिसम्बर १९९०, रविवार : आईके हमर दिनचर्या ६ बजे भोरे शुरु भेल। नित्यक्रियासऽ निवृत्त भऽ नास्ता कऽ पुनथ यात्रारम्भ भेल।शहर सऽ दूर जंगलाह रस्ता हरियर गाछ वृक्ष सऽ भरल वातावरण लक्ष्यके भूमिका बना रहल छल। हमसब भारतक प््राथम नोबेल पुरस्कार विजेता स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ टैगोरक कर्मभूमि शान्ति निकेतन पहुंचलहुं।अहि स्थानक गौरवपूर्ण इतिहासदऽ किछ कहनाइ सूर्यक सोंझामे दीप रखनाई अछि।हॅं अत राखल वस्तुक विवरण देल जा सकैत अछि।सबसऽ पहिने रवीन्द्रभवन नामक संग्रहालय देखलहुं जे प्रवेशद्वारे लग छल। अहिमे रवीन्द्रनाथजी द्वारा उपयोग कैल जूता, ओवरकोट, कपड़ा, होमर ब्रैण्डक कार, अतऽ तक की प्लेट - चम्मच सब सेहो राखल रहै।ओहि संग्रहालयमे नोबेल पुरस्कार सेहो राखल छल।अहि संग्रहालयक बगलमे रवीन्द्रनाथ टैगोरके पॉंचटा भवन सेहो छल जकर नाम छल - 1 उद्दयन : ई दू मंजिला आर उज्जर रंगक छल। २ कोणार्क : ई साधारण प््राकारक घर छल। ३ श्यामली : ई माटिक बनल कुटिया छल जाहिमे गॉंधीजीक चरणकमल सेहो                    पड़ि चुकल अछि। ४ पुनश्च : अहि एकमंजिला मकानक खिड़कीमे कॉंचक केवाड़ छल। ५ उदीचि : अहि दूमंजिला मकानक बनावट मंदिर जकॉं छल। अकर बाद हमसब ओतक बाग-बगिचा, कला शिक्षण केन्द्र, यूनिवर्सिटी आदिक भ्रमण केलहुं।ई वास्तवमे एक गुर्‌उकुल छै जत प्राचीन तरीका सॅ प्राकृतिक वातावरणमे आधुनिक शिक्षा देल जाइत छै। अतय २२ भाषाक अध्यापन होइत छै।अहि तरहे ई एतिहासिक स्थानक दर्शनोपरान्त हमसब भोजन करै लेल गेलहुं।भूख तऽ लागल छल मुदा मांछ खा-खा अघा गेल छलहुं आकि थाकल छलहुं ताहि कारणे भोजनक ईच्छा नहिं छल।लेकिन जखन एकटा शिक्षकके ई पता चललैन तऽ हमरा आर हमर एक संगीके लऽ कऽ मिठाई खुआबऽ लऽ गेला। नहिं खायक बात पर डॅंटला आर ताबे तक रंग-रंगक मिठाई खुआबैत रहला जाबे मोन अकसक नहिं भऽ गेल। लागल बंगालमे मैथिलक बरियाती आयल छी।हुनकर अहि तरहक आबेस आऽ एक-एक गोटैक ध्यान राखक स्वभावके हम कहियो नहिं बिसरब। भोजन के बाद हमसब पुन: अपन मंजिल दिस बढ़लहुं।रस्ता भरि हल्ला-हुच्चर करैत रहलहुं। बुझेबो नहिं कैल कखन सुर्यास्त भेल कखन राति आबि गेल आ चारि घंटामे तारापीठ पहुंचि गेलहुं।अगिला दिन मंदिरक दर्शन करैके छल से पूर्वसूचित कैल गेल। सातम दिन : ३१ दिसम्बर १९९०, सोमवार : आहि भोरे जहन हम उठलहुं तऽ सब पहिनेहे उठि गेल छल।हम जल्दीसऽ तैयार भऽ गेलहुं। फेर सब संगे मंदिर पहुंचलहुं।विभिन्न देवी देवताक दर्शन भेल।तकर बाद हम इम्हर उम्हर घुमति रहुं।तकर बाद पुनःभोजन आऽ फेर  बकरेश्वर दिस विदा।रस्तामे शिक्षक सब बतेला जे विद्यालय के संचालनमे हुनकासबके की की दिक्कत होएत छैन।अहि तरहे हमसब अपन अपन परेशानीक आदान प्रदान करैत रहलहुं।हमरा सबके तहन अनुभव भेलजे कखनो काल सामनेक परिस्थिति सऽ उत्तेजित भऽ हम छात्रगण शिक्षक सबदऽ गलत धारणा बना लैत छी।जे की बहुत गलत छै।हॅं तऽ हमसब बकरेश्वर पहुंचलहुं।सॉंझक ६ बाजल छल।आहि १९९० के आखिरि दिन छल ताहि द्वारे हम सब अपन अपन समान सैंतकऽ सांस्कृतिक कार्यक्रमक तैयारीमे लागि गेलहुं। ताहि बीचमे हमरा सबके हेडमास्टर के तरफ सऽ बुलावा आयल।हमसब डेरा गेलहुं जे हमर सबमे सऽ एकटा छौड़ी ककरो समान फेक देने रहै तैं सबके डपटै लेल बजायल जा रहल अछि।अहि तरहक आशंका सऽ डेरा हमसब जहन ओतऽ पहुंचलहुं तऽ सब छौड़ा सब बहुत खुश छल तहान हमसब कनिक खुश भेलहुं। लेकिन फेर मुड गड़बड़ा गेल ।कियो बाजल जे छौड़े सब शिकायत केलक तैं ओ सब तऽ खुश हेबे करत।हमसब बैसकऽ शिक्षक के प््रातीक्षा करऽ लगलहुं।मुदा जखन ओ एला तऽ हुन्कर हाथमे छड़ीके स्थान पर एक कॉपी छलैन आ ओ मुस्कुरा रहल छलैथ।आबिकऽ ओ घोषित केलैथ जे मृगांक नामक एक छात्रक आहि जन्मदिवस अछि तैं हम एकटा स्वरचित कविता सुनायब।ई सुनैत देरी हमसब खुशीसऽ उछलि पड़लहुं।आब की छल हमसब कविता सुनलहुं मिठाई खेलहुं आ भोजन कऽ पुनथ नाटकके तैयारीमे लागि गेलहुं। ठीक  एगारह बजे हमसब एक कोठलीमे जमा भऽ कार्यक्र्रम प्रारंभ केलहुं।हमहु एक नाटकमे भाग लेलहुं जाहिके डाइरेक्टर आ राएटर सेहो हम रही।फेर बारह बजे रातिकऽ समूहगान संगे नववर्षक स्वागत केलहुं।शिक्षक सब सेहो अपन कार्यक्रम प्रस्तुत केलैथ।अन्ततः हम सब सुतै लेल जाय लगलहुं। जाय सऽ पहिने हमसब गुडनाइट' वा शुभरात्रि'के स्थानपर हैपी न्यू इयर' वा द्यनववर्षक शुभकामना' बाजि रहल छलहुं। आठम दिन : 1 जनवरी १९९१, मंगलवार : वर्षक पहिल दिन हम ७ बजे उठलहुं। सब छात्रसब मजाकमे कहलक जे हम साल भरि सुतैत रहब। पर उठैत देरी हम अतेक जल्दी तैयार भऽ गेलहुं जे सब हमरा ऑंधी तूफान के उपाधि देलक। पहिने हमसब बकरेश्वर के मंदिर गेलहुं। मंदिरके बाहरी दृष्य देखकर हमसब मुग्ध भऽ छलहुं। अन्दरमे पंडित सब अपना दिस आमंत्रित करैत छल लेकिन हमसब अपने सऽ घुमनाइ  पसन्द केलहुं। आगां जाकऽ देखलहुं जे एकटा गर्म कुण्ड अछि। हमसब पहिने तऽ नहा लेने रहुं तैयो नहिं रहल गेल आ किछु सहेलीके अपन कपड़ा आनैलेल पठाकऽ ओतऽ फेर सऽ स्नान केलहुं। अकर बाद नास्ता कऽ दीग्घा दिस विदा भेलहुं। हमर किछु संगीसब ओतऽ पहुंचैलेल ततेक उत्साहित छलैथ जे ओ सब बीचमे रुकिकऽ भोजन करैके कार्यक्रम छोड़ि देबाक बात करै छलैथ। परन्तु ई नहिं भऽ सकल।भोजनोपरान्त हमसब फेर विदा भेलहुं। राइतके साढ़े एगारह बजे दीग्घाके एक लॉजमे रूकलहुं। ई लॉज समुद्र तट सऽ नजदीक रहै आ बहुत सुविधा सऽ युक्त रहै। पॉंच-पॉंच टा विद्यार्थीके एक टा डबलबेडरूम अटैच्ड बाथरूम आ बालकोनी भेटल रहै। हमसब निश्चय केलहुं जे आई राति भरि जागल रहब जाहिसऽ सुर्योदय देखि सकी लेकिन पता चलल जे आकासमे बादल हुअके कारण सुर्योदय नहिं देख सकब। तखन हमसब सुतैके तैयारीमे लागि गेलहुं। नवम दिन : २ जनवरी १९९१, बुद्धवार : भोरे पॉंच बजे उठीकऽ नित्यक्रियासऽ निपटि हम सबसऽ पहिने तैयार भेलहुं।समान ठीक केलाक बाद सबके उठेलहुं।तकर बाद अपन समान बसमे राखि एलहुं।फेर जाबे सब तैयार होइत छल ताबे बगानमे खेलाइ छलहुं।कनिक देर बाद सबकियो समुद्रतट दिस विदा भेलहुं।कतेक लोक पैरे चलि गेल किन्तु हमसब बसमे गेलहुं। शिक्षक सब कनी पैघ रस्ता सऽ लऽ कऽ गेला उड़िसाके सीमामे सेहो प्रवेश करेला।तकर बाद समुद्र देखैत देरी हम ओहिमे घुसि गेलहुं।ई हमर पहिल अवसर छल जहन हम सागरक लहर सऽ खेल रहल छलहुं। तकर बाद हमरा सबके नास्ता लेल बजायल गेल।फेर हमसब लौटि गेलहुं लॉजमे।आब हमरा सबके सामान बसमे राखक छल।अहिमे हम सबके सहायता करैमे सबसऽ आगॉं रही।आधा रस्तामे रूकिकऽ हमसब भोजन केलहुं।भोजनोपरान्त पुनथ जमशेदपुर दिस विदा भेलहुं।यद्यपि अपन अभिभावक सबस भेंट हुअके खुशीतऽ छल किन्तु सबसऽ अलग हुअके दुथख सेहो छल।तुरत हमसब निर्णय लेलहुं जे एक पिकनिक करब आ ताहि लेल पाई शिक्षक अभिभावक के मीटिंगमे जमा करक छल। तुरत हमसब शिक्षक सबके सेहो आमंत्रित कऽ देलहुं। जहन जमशेदपुर पहुंचलहुं तऽ सबहक अभिभावक पहिने सऽ ओतऽ पहुंचल छलैथ।अहि तरहे हमर सबहक जीवनक ई महत्त्वपूर्ण नवम्‌ दिन समाप्त भेल। छठि पूजापर विशेष श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर, उम्र 60 वर्ष, ग्राम- हैँठी-बाली, जिला मधुबनी।षडदल अरिपन मिथिलामे भगवती पूजाक अवसर पर ई अरिपन पाड़ल जाइत अछि।एतय देवी भागवत पुरानक षटकोण यंत्र पारल गेल अछि। छः टा कमल दल एहिमे अछि। आदिशक्त्ति भुवनेश्वरीक पद चिन्ह आऽ पञ्चोपचार पूजाक सामग्रीसँ युक्त्त ई अरिपन अछि। - नीलिमा भानस भात मखानक खीर सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। जखन खौलय लागय तँ ओहिमे चिन्नी, काजू, किशमिश सभ दऽ कय अन्तिममे इलाइची पाउडर खसाऽ कऽ मिलाऽ कऽ उताड़ि लिअ। मखानक खीर तैयार अछि। नोट:- मखानकेँ सुखलो भुजि कऽ कुटि सकैत छी वा घीमे सेहो भूजि कए कूटि कऽ पाउडर बना सकैत छी। मेथीक परोठा सामग्री:-आटा-२५० ग्राम, बेसन-१०० ग्राम, रिफाइन-२५० ग्राम, मेंथी साग-५०० ग्राम, हरिअर मेरचाइ-४टा, आदी- १ इन्चक टुकड़ा, धनी-पात आऽ नोन-अंदाजसँ। विधि- मेंथीकेँ साफ कऽ कए धोऽ लिअ। मेंहीसँ काटि कए लोहियामे कनी तेल दऽ कय मेंथी पात खसा दियौक। कनी भाप लागि जाय तँ ओहिमे काटल हरियर मेरचाइ, आदी घसल, धनी-पात काटि कय आऽ नून मिला कय एहि मिश्रणकेँ बेसन फेँटल आँटामे मिला दियौक। आँटाकेँ कनेक कड़ा कऽ सानि लिअ। पराठा बेल कए तवापर कम आँचपर रिफाइन लगा कए सेकि लिअ। खास्ता मेथीक पराठा तैयार भऽ गेल। नोट:- अहाँ काँच मेंथी पात कऽ मेंही काटि कऽ, पियाजु सभ मिला कऽ सेहो आँटा सानि सकैत छी। मुगलई कोबी सामग्री:-कोबीक टुकड़ा-१/२ किलो, पियाजु महीन काटल-१कप टमाटर, कद्दूकस कएल-१ कप, हरियर मेरचाइ-आदीक पेस्ट-१ चम्मच, नून स्वादानुसार, लाल मिरचाइक पाउडर-१/२ चम्मच, धनियाँ पाउडर-१ चम्मच, हरदि- १ चम्मच, गर्म मसल्ला-१/२ चम्मच, अमचूर-१/२ चम्मच, जीर-१/२ चम्मच, मलाई-१/२ चम्मच, टोमेटो सॉस- १ चम्मच, रिफाइन तेल-२ चम्मच। विधि:- कोबीक टुकड़ा धोऽ कऽ चालनिमे आधा घंटाक लेल राखि दियौक, जाहिसँ एकर पानि निकलि जाय। फेर लोहियामे तेल गर्म कऽ कोबीकेँ हल्का गुलाबी फ्राइ कऽ लिअ आर एकटा पेपरपर निकालि लिअ, जाहिसँ तेल निकलि जाय। एक पैनमे तेल ढारू। ओहिमे जीर दऽ कए पियाज आऽ आदीक पेस्ट दऽ कय भुजि दियौक। आब सभ टा मसल्ला दऽ कय कनी देरमे आर भुजियौक। मलाएकेँ मैश कऽ दऽ दियौक, सॉसकेँ सेहो दऽ दियौक आर नीकसँ मिला दियौक। आब एहिमे कोबीक टुकड़ा दऽ कय चम्मचसँ मिला दियौक। फेर एक बाउलमे ओकरा निकालि कऽ ऊपरसँ गरम मसल्ला आर धनियाँ (धनी) पात सजा दियौक आर पड़सि लिअ। केसर पुलाव सामग्री:- २ कप बासमती चावल, १ कप मटरक दाना, १ टुकड़ा दालचीनी, १ बड़ी इलायची, ४ टा लौंग, ४ कप पानि, २ टेबुल स्पून घी, १/२ केसर, २ टीस्पून गरम पानि, एकटा पियाजु लम्बा-लम्बा काटल, १ टी स्पून जीर, २ टी स्पून नून। विधि:-केसरक गरम पानिमे फुलइ लेल दऽ दियौक। चाउरकेँ नीकसँ धोऽ कए फुलइ लेल दऽ दियौक। चाउरकेँ नीकसँ धोऽ कऽ फुलय लेल दऽ दियौक। कुकरमे घी गरम कऽ कए ओहिमे प्याज दऽ कए ब्राउन होय धरि फ्राइ कऽ कए प्लेटमे निकालि लिअ। आब एहि गरम घीमे दालचीनी, जीर, इलाइची, लौंग आर नून दऽ दियौक। मटरकेँ दऽ कए कनी चलाऊ आर चाउरकेँ पानिसँ निकालि अहीमे दऽ दियौक। ऊपरसँ पियाजु आ केसर सेहो दऽ दियौक। ४ कप पानि दऽ कय एक सीटी आबए तक पकाऊ। गरम-गरम केसर पुलाव, रायता वा कोनो रसगर तरकारी संग खाऊ। मूरक परोठा सामग्री:- आँटा-२५० ग्राम, बेसन-१०० ग्राम, मूर-२५० ग्राम, रिफाइन तेल-१०० ग्राम, जमाइन-मंगरैल-अंदाजसँ। आदी-१ इन्च टुकड़ा, धनी-पात-दू डाँट, हरियर मेरचाइ ४ टा, नून- अंदाजसँ। विधि:- मूरकेँ धोऽ कऽ कद्दूकस कऽ लिअ। लोहियामे कनी तेल दऽ दियौक। गर्म भेलापर ओहिमे मूर आ सभ मसल्ला खसा दियौक आ ढ़क्कनसँ झाँपि दियौक। कनी भाप आबि जाएत, ओकरा निकालि कऽ ठंढ़ा हेबय दियौक। आब एहि मिश्रणमे नून मिला कय बेसन मिलल आँटामे मिला कऽ सानि लिअ। गोल-गोल पातर-पातर बेल कऽ ताबापर दुनू दिस रिफाइन लगा कए सेकि लिअ। मूली पराठा तैयार भऽ गेल। मूरक परोठा बनेबाक एकटा आर विधि अछि, अहाँ मूलीक कद्दूकस कऽ कए ओहिमे सभ मसल्ला मिला लिअ। आब ओकड़ा गाड़ि कए एक दिस राखि लिअ। आब आँटाक गोलीमे थोड़े मूलीक मिश्रण लऽ कऽ नून मिला कऽ भरि लिअ आ बेल कऽ ताबापर रिफाइन दऽ कऽ सेकि लिअ। नोट:-एहि तरहेँ काँच अनरनेबा आ बन्धा कोबीक परोठा सेहो बना सकैत छी। तूलिका- गाम रुद्रपुर, जिला मधुबनी। चित्रकार उमेश कुमार महतो उमेश कुमार- पुत्र श्री केशव महतो, बहादुरगंज एकटा राजा रहए। ओकरा एकटा बेटा रहए। ओकर राजपाट खूब शांति सँ चलैत रहए। राजा जखन बीमार भेलए तँ बेटाकेँ कहलकए। १.फी कोरमे सीरा खाइले। २.द्वारपर हाथी बन्हबा कऽ राखय ले। ३.वैर भाव नहीं राखए ले। ४.बाहर निकलैपर छाँवमे रहबा ले। राजकुमार एकर अर्थ नहि बुझि पेलक। राजा मरि गेलैक। राजकुमार राजा बनि गेल। पिताजीक गपपर ओ अमल करए लागल। १.फी कोरमे सीरा खेबाक मतलब ओ बुझलकै जे सभ दिन खस्सी कटबा कए सीरा खेनाइ आ बचल मासु नोकर सभ के देनाइ आ ओ सैह करए लागल। २.द्वारपर ओ एकटा हाथी कीन कऽ रखबा देलक आ चारि टा नोकर ओकर देखभाल लेल राखि देलक। ३.ओ सभटा बैरक गाछ काटि कऽ हटा देलक। ४.ओ दू टा नोकर राखलक जे गाछ काटि कऽ जतऽ जतऽ राजा जाइत रहए ओतए-ओतए लऽ जाइत रहए। एना किछु दिन ओ राजपाट चलेलक। एना करिते-करिते राजपाट खतम भऽ रहल छलैक , कारण खर्चा बेसी भऽ गेलै आ आमदनी कम, सभ गाछ कटि गेलैक। गामक एक बुजुर्ग सँ ओ पुछलक जे हमर राजपाट किएक खतम भऽ रहल अछि। तँ ओ बुजुर्ग ओकरा बुझेलक जे जाऊ आ तीन मूरी बला आदमी सँ पुछू। चारू तरफ राजा खोजलक मुदा तीन मूरी बला आदमी ओकरा नहि भेटलैक। फेर ओही बुजुर्ग आदमी सँ पुछलक जे हमरा तँ तीन मूरी बला आदमी नहि भेटल। बुजुर्ग कहलकै जे ७० बरख सँ ८० बरखक आदमी केँ तीन मूरी बला कहल जाइत छैक कारण जे जखन ओ बैसैत अछि तँ ओकर मूरी झुकि जाइ छैक आ ठेहुन ऊपर उठि जाइत छैक आ से ओ तीन मूरी जकाँ भऽ जाइत छैक। राजा एहेने एकटा मनुक्खकेँ ताकि क' पुछलक। “पिताजी मरए से पहिने की की बतेने रहथि”। ओ तीन मूरी बला मनुख पुछलक। राजा कहलक। “ओ बतेलथि- १.फी कोरमे सीरा खाइले। २.द्वारपर हाथी बन्हबा कऽ राखय ले। ३.वैर भाव नहीं राखए ले। ४.बाहर निकलैपर छाँवमे रहबा ले”। “पहिलाक मतलब छी- एक पाव डेढ़का मांछ लऽ कऽ बनबा क' खाउ ओकर सभ कौरमे सीरा भेटत। दोसराक मतलब घरक आगाँ घूर लगा देबा लऽ जाहिसँ द्वारपर हरदम १० गोटे बैसल रहत। तेसरक मतलब झगड़ा-झाँटि सँ दूर रहि दोस्ती मिलान सँ रहू। चारिमक मतलब दू रुपैयाक छाता लऽ छाहमे चलू”। तीन मूरी बला मनुक्ख बतेलक। एकरापर अमल केलापर राजाक राजपाट वापस आबए लगलैक। मधुश्रावणी अरिपन गतांकमे एकर चर्चा छल जे मधुश्रावनीमे संगमे सूर्य चन्द्र गौर, साठि आ’ नवग्रहक चित्र सेहो लिखल जाइत अछि। एकर चित्र एहि अंकमे प्रस्तुत अछि। प्रीति ठाकुर – गाम जगेली पूर्णियां श्री डॉ. गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार।१९६४-६५ मे पाँच गोटे कवि-लेखक “काल पुरुष”(कालपुरुष अर्थात् आब स्वर्गीय प्रभास कुमार चौधरी, श्री गंगेश गुन्जन, श्री साकेतानन्द, आब स्वर्गीय श्री बालेश्वर तथा गौरीकान्त चौधरीकान्त, आब स्वर्गीय) नामसँ सम्पादित करैत मैथिलीक प्रथम  नवलेखनक अनियमितकालीन पत्रिका  “अनामा”-जकर ई नाम साकेतानन्दजी द्वारा देल गेल छल आऽ बाकी चारू गोटे द्वारा अभिहित भेल छल- छपल छल। ओहि समयमे ई प्रयास ताहि समयक यथास्थितिवादी मैथिलीमे पैघ दुस्साहस मानल गेलैक। फणीश्वरनाथ “रेणु” जी अनामाक लोकार्पण करैत काल कहलन्हि, “ किछु छिनार छौरा सभक ई साहित्यिक प्रयास अनामा भावी मैथिली लेखनमे युगचेतनाक जरूरी अनुभवक बाट खोलत आऽ आधुनिक बनाओत”। “किछु छिनार छौरा सभक” रेणुजीक अपन अन्दाज छलन्हि बजबाक, जे हुनकर सन्सर्गमे रहल आऽ सुनने अछि, तकरा एकर व्यञ्जना आऽ रस बूझल हेतैक। ओना “अनामा”क कालपुरुष लोकनि कोनो रूपमे साहित्यिक मान्य मर्यादाक प्रति अवहेलना वा तिरस्कार नहि कएने रहथि। एकाध टिप्पणीमे मैथिलीक पुरानपंथी काव्यरुचिक प्रति कतिपय मुखर आविष्कारक स्वर अवश्य रहैक, जे सभ युगमे नव-पीढ़ीक स्वाभाविक व्यवहार होइछ। आओर जे पुरान पीढ़ीक लेखककेँ प्रिय नहि लगैत छनि आऽ सेहो स्वभाविके। मुदा अनामा केर तीन अंक मात्र निकलि सकलैक। सैह अनाम्मा बादमे “कथादिशा”क नामसँ स्व.श्री प्रभास कुमार चौधरी आऽ श्री गंगेश गुंजन दू गोटेक सम्पादनमे -तकनीकी-व्यवहारिक कारणसँ-छपैत रहल। कथा-दिशाक ऐतिहासिक कथा विशेषांक लोकक मानसमे एखनो ओहिना छन्हि।  श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ,  मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। गुंजनजीक राधा विचार आ संवेदनाक एहि विदाइ युग भू- मंडलीकरणक बिहाड़िमे राधा-भावपर किछु-किछु मनोद्वेग, बड़ बेचैन कएने रहल। अनवरत किछु कहबा लेल बाध्य करैत रहल। करहि पड़ल। आब तँ तकरो कतेक दिन भऽ गेलैक। बंद अछि। माने से मन एखन छोड़ि देने अछि। जे ओकर मर्जी। मुदा स्वतंत्र नहि कए देने अछि। मनुखदेवा सवारे अछि। करीब सए-सवा सए पात कहि चुकल छियैक। माने लिखाएल छैक । आइ-काल्हि मैथिलीक महांगन (महा+आंगन) घटना-दुर्घटना सभसँ डगमगाएल- जगमगाएल अछि। सुस्वागतम! लोक मानसकें अभिजन-बुद्धि फेर बेदखल कऽ रहल अछि। मजा केर बात ई जे से सब भऽ रहल अछि- मैथिलीयेक नाम पर शहीद बनवाक उपक्रम प्रदर्शन-विन्याससँ। मिथिला राज्यक मान्यताक आंदोलनसँ लऽ कतोक अन्यान्य लक्ष्याभासक एन.जी.ओ.यी उद्योग मार्गे सेहो। एखन हमरा एतवे कहवाक छल । से एहन कालमे हम ई विहन्नास लिखवा लेल विवश छी आऽ अहाँकेँ लोक धरि पठयवा लेल राधा कहि रहल छी। विचारी। प्रस्तुत अछि गुञ्जनजीक मैगनम ओपस  "राधा" जे मैथिली साहित्यकेँ आबए बला दिनमे प्रेरणा तँ देबे करत सँगहि ई गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित सभ दुःख सहए बाली- राधा शंकरदेवक परम्परामे एकटा नव-परम्पराक प्रारम्भ करत, से आशा अछि। पढ़ू पहिल बेर "विदेह"मे राधा

ऑगी हेराएब कोनो तेहन दुर्घट बात नहि। राधा तें उदासो नहि भेलीह। उदास तं ओ आनो आन कए कारणें छलीह। जेना ,शरीरे दुखित पड़लि छलीह। कोनो टा सखि, क्यो बहिना कए दिन सं देख' पर्यंत नहि अयलनि। हुलकियो देब' नहि। दुखित कें होइत छैक आशा आग्रह। बल्कि स्पृहा। स्पृहा ई जे क्यो आबए, आबि क' दू क्षण लग मे बैसय, दःख पूछय। गप करय। किछु कहय, किछु सुनय। मन कें बहटारय। सैह तकरे अभाव आ संबन्धक जोर।जे अप्पन नहि तकरा पर अधिकारे कोन ? जे अपनो अछि आ अधिकारो बुझाइत अछि, वास्तव मे से कतेक अपन ? ई अधिकार आ प्रयोजनक प्राथमिकताक अपन-अपन वृत्त होइत छैक। मनुक्ख-मनक ई लाचारी छैक। ओकरा अपन एहि सीमाक ध्यान राख' पड़ैत छैक आ तहिना संपर्कित-संबंधित समस्त समाजक ध्यान राख' पड़ैत छैक। से जकरा बुतें एकर, एहि बुद्धिक संतुलन नहि रहल ,तकर जीवन कनीक आर मोशकिल।अर्थात्‌ जीवनक     मोशकिली धरि अपरिहार्य। राधाक ई सोचब आ दुखी हएब स्वाभाविके जे जीवन मोशकिलीक सवारी थिक। चिक्कन चुनमुन बाट पर पहिया सब गुड़कैत आगां बढ़ैत रहल तं बड़ दिब। सबटा मन विरुद्धो अनुभव पाछां छुटैत गेल आ मनलग्गू अनुभव  अपना संग आगां बढ़ैत रहल। कतहु कोनो ठाम पहुंचि गेलाक बाद कए तरहें संतुष्ट कयलक आ कए तरहें अतृप्त राखि देलक। आब फेर एत' सं अनुभवक अतृप्त प्रसंग जे एकहि क्षण पहिने मात्र नगण्य बुझाइत छल, से भ' जाइत अछि खोंचाड़ल मधुमाछी... खोंचाड़ल मधुमाछीमक खोंता । बिना बिन्हनहुं अनेरे ठेहुन सं मूड़ी धरि घनघनौने रहत बड़ी-बड़ी काल। हरदम डेरायल मन-काटत,आब काटत...। कोनो क्षण लुधकत आ काटि लेत। यद्यपि कि काटियो लेत तं कोन ओ अहांक गर्दनि छोपि लेत ? दंश देत। से मुदा भने मधु जकां नहि, विष विशाइत दंश। कोनो गर्दनिकट्ट नहि होइत अछि- मधुमाछी ! -बरु गर्दनियें काटब सुभीतगर, ओ सोचलनि। भने मनुक्ख कें छुटकारा तं भेटि जाइ छैक। आ दिन दिनक विस विसाइत भोग-अनुभूतिक अनवरत क्रम जे संपूर्ण अस्तित्वे के बेचैन कयने रहत। देह-प्राणक किछु टा आन वातावरण नहि बनब' देत। घिसियौर कटबैत रहत। ओही अपन स्वभावक परिधि आ तकर प्रयोजन मे बन्हने रहत। मात्र बन्हनहुं टा रहि जाय, तैयो सुकुर, मुदा ओ तं अहांक बुद्धि सं आर सब किछु कें काटि-बारि क' फराक क' देत। अहीं कें अपन तेहल्ला बना क' छोड़त। लैत रहू। आब एहि मन मे किछुओ क्षण रहि गेलौं कि ओ अहां सं अहींक परिचय तलब करत। यावत-यावत तैयार भ' क' अहां उपयुक्त सोचब आ बाजब, तावत-तावत ई बात, अहांक मनक  ई मामूली घटना एकटा समाचार बनि जायत। ई समाचार बिना कोनो माध्यम कें रौद आ बसात पर सवार भ' क' पहुंचि जायत ओत' धरि जत' अहां सोचियो ने सकैत छी। आब बैसि क' कपार पीटैत रहू। ककरा-ककरा आ की-की बुझयबैक ? आ से जकरा बुझयबैक से कतेक दूर धरि ,की मानत ? जतवा मानियो लेत तकरा सं अहांक जीवन कें की सुभीता आ कोन सुख ? हॅं, सुख ? की थिक ? केहन होइत छैक ? कोना होइत छैक ? कतवा होइत छैक ? ककरा होइत छैक ? मुदा... मुदा, किछु छैक तं अवश्ये ई सुख! सुखक अनुभव अवश्ये छैक एहि पृथ्वी पर-मनुक्ख सं ल' क' सब जीवधारी मे।तें रहैए एकरा पाछां व्याकुल-बेहाल!  परंतु से केहन छैक-लाल ,पीयर, हरियर ,उज्जर, कारी -केहन ? अर्थात्‌ सुखक कोनो रंगो होइत छैक ? कोनो खास रंग ? -की स्वाद छैक ? केहन स्वाद ? कोनो फलक स्वाद ? चाउर-दालि-गहूमक स्वाद ? तीमन-तरकारीक ?इनारक टटका जलक स्वाद ?एक संगे दू गोटेक इजोरियाक चन्द्रमा बा एकान्त अन्हरिया मे तारा गनवाक स्वाद ? कोनो अनचिन्हार चिड़ैक अपरिचित बोल अकानि चीन्हवाक कोसिसक स्वाद? बा भोरे भोरे जन्मौटी बच्चाक मिलमिलाइत आंखि जकां बाड़ीक कोनो नान्हि टा गाछ मे नव पनगल दिव्य ललाओन दुपत्ती कें देखि अह्‌लाद होयवाक स्वाद ?....घन अन्हार मे ककरो कंठ सं अपन नामक सम्बोधन सुनवाक ? कोनो गंध होइत छैक ? अत्तर-गुलाब सन, बेली-चमेली सन , तेजपात सं छौंकल दालि, कढ़ी पातक बा औंटवा काल लोहिया लागि गेल दूध सन, सोन्हायल डाबा सन,-कथी सन ? जन्मौटी बच्चा सन, तुरंत बियाहलि स्त्री सन आ कि बाध सं घुरल हरवाह-गृहस्थ सन, यमुना जल मे खीचल नूआ-वस्त्र सन बा पाकल कदंब सन बा श्रीकृष्णक सांस सन ? सांस मे केहन निसां छैक ! कृष्णक सांस मे केहन निस्सां छनि ? कृष्ण मे अपने केहन निसां छनि ! कृष्ण निस्सें छथि । कृष्ण माने  निसां...। बेचैनी राधाक ,बेबस मनक प्रवाह मे, बहैत रहल, यमुना धार सन, राति, रातुक अन्हार काल मे । सब सूतल अपन-अपन ठाम। धेने सब रातुक विश्रामक स्थान। चिड़ै चुनमुन्नी अपन-अपन खोंता। माल जान अपन थैर-बथान। आ मनुक्ख अपन-अपन चौकी-खाट-मचान ! निसभेर निन्न मे डूमल जीयैत। मात्र ई एकटा एकसर मनक विकल नियति, चुपचाप सूतल रातिक अन्हार मे अपन निस्बद्द चलैत रहल-बहैत गेल! राधाक मनक प्रवाह यमुना भ' गेल। एतवो पर रच्छ छल , मुदा कहां बांचल समयक इहो एहनो सुभीता, सेहो तं आंजुरक जल भेल। कतबो यत्ने बचा क' रखवा मे कहां भेलहुं सकारथ ? सबटा बहि गेल। कनीक काल रहल भने भीजल तरहत्थी-माने स्निग्ध , सेहो अगिले पल ऋतुक उष्ण प्रभावक वेग मे निठ्ठाहे सुखा गेल। जानि नहि ओ आंजुर आ आंजुरक जल कोन क्षण अलोप भेल कोना बिला गेल, कत' गेल ? सूर्य लग गेल ? चन्द्रमा लग गेल कि तारा लग ? वा माटि मे, पोखरि-इनार-धार, कोनो मे फेर सं घुरि गेल, जा क' मीलि गेल जल- अपन उद्गम सं, उत्स सं वा भाफ बनि क' बन' गेल मेघ ? कर' गेल बरखा,? जल कत'गेल ? आंजुर भरि जल कत' गेल ? ई किछु विलाप जकां राधाक मनक परिताप अपनहि अभ्यंतर मे मुखर चलि रहल- अपनहि कहैत-अपने कें सुनैत । अपने सं सभटा पूछैत। ई केहन विचित्र आत्म सम्बोधन ? अपनहि मन सोर पाड़य अपने मन ! सौंसे गाम-टोल अछैत , टोलक लोक, संबंधी, सखि-बहिनपाक एहि पसरल समाज आ संसार मे कोनो एकटा मन, एहन असकर एतेक एकान्त काटि रहल व्याकुल पल-पल जीवन । अपनहि विडंबना कें स्वयं करैत आत्म सम्बोधन.... -"राधा'' ....!! एं ई की भेल कत' सं कोन आकाशवाणी -"आब केहन मन अछि अहांक राधा !'' के पूछल ? बाजल के ? के आयल पूछ'-कुशलक्षेम, ककर थिक ई प्राणबेधी वाणी ? दुर्लभ स्वर्गिक संगीत स्वर थिक ककर ? रातिक एहि निस्बद्द एकान्त अन्हार मे के बाजल, ककरा भेलैक हमर चिन्ता ? के आयल पूछय-हालचाल,... अच्छा, तं... ई थिक हुनके ताल ? राधा कें कानमे स्पष्टे क्यो पुछलकनिहें। किछुओ संदेह नहि, सत्य छैकः 'केहन मन अछि अहांक राधा...' ई थिक सद्य : अनुभव, कोनो टा भ्रम नहि। मुदा तखन राधा कें कियेक लगलनिहें ई जिज्ञासा, पुरुष-कंठक नारी-स्वर मे प्रतिध्वनि ? यदि पुछलनिहें कृष्ण तं पछाति सैह प्रश्न करैत स्त्री के छल ई जकर स्वर छल ? ई अछि कोना संभव ? मुदा थिक तं ई सत्य ,संदेह कथमपि नहि। सत्य तं होइत अछि सत्ये। ज्वरे परजरित एहि देहक ताप पर जमुना जल भीजल पीतांबरी जकां के एना पसरि रहल-ए, आलसे निनियाइल बसात... जमुना मे झिलहरि खेलाइत, निस्बद्द राति। गंगेश गुंजन/राधा- सातम खेप/ प्रेषित २३ अक्तूबर-२००८. बाढ़िक त्रासदी-पर डॉ. गंगेश गुंजन जीक मैथिली गजल दु:खे टा चारू कात छै आ जी रहल-ए लोक ताकैत आसरा कोनो दुःख पी रहल-ए लोक ! घर-द्वारि दहि गेलैक सब बच्चा टा छै बांचल रेलवेक कात, बाट-घाट जी रहल-ए लोक ! सांझो भरिक खोराक ने छैक अगिला फसिल धरि जीबा लए ई लाचार कोना जी रहल-ए लोक ! सबटा गमा क' जान बचा आबि त' गेलय आब फेकल छुतहर जकां हद जी रहल-ए लोक ! जले पहिरना, बिछाओन जले छैक ओढना जबकल गन्हाइत पानि-ए खा पी रहल-ए लोक ! सब वर्ष  जकां एहू   बाढ़ि मे   कारप्रदार रिलीफ नामें अपन झोरी सी रहल किछु लोक ! चलि तं पड़ल-ए जीप-ट्र्‌क-नावक से तामझाम आब ताही  आसरा मे बस जी रहल-ए लोक ! कहि तं गेलाह-ए परसू-ए दस टन बंटत अन्न एखबार-रेडियो  भरोसे जी  रहल-ए  लोक ! घोखै तं छथि जे देच्च मे पर्याप्त अछि अनाज सड़ओ गोदाम मे, उपास जी रहल-ए लोक ! उमेद मे जे आब आओत एन जी ओ कतोक द' जायत बासि रोटी, वस्त्र, जी रहल-ए लोक ! अछि कठिन केहन समय ई राक्षस जकां अन्हार किछु भ' रहल अछि तय , तें तं जी रहल-ए लोक ! ॥ किछु एहनो बात विषय॥ यद्यपि एहि बात –‘सगर राति दीप जरय’ पर हम सिद्धांततः प्रभासजीसँ सहमत नहि रहलौँ, परन्तु एम्हर पछिला दशकमे ई तिमाही-कथा गोष्ठी- ‘सगर राति दीप जरय’- आजुक मैथिली कथा-विधामे की योगदान कएलक अछि, से तथ्य आब इतिहासमे दर्ज अछि। ई बात सही छैक जे एहन कोनो कार्य कोनो एक गोटेक नहि होइछ। मुदा सभ वर्त्तमानकेँ ओहि एक संस्थापना-कल्पक व्यक्त्ति-लेखककेँ अवसरोचित रूपेँ कृतज्ञतासँ स्मरण अवश्य कयल जयबाक चाही। से लेखकीय नैतिकता थिक। आ’ हमरा जनतबे, से रहथि- स्व. प्रभास कुमार चौधरी। हमरा तखन दुखद निराशा भेल जखन एहि बेरक मैथिली साहित्य अकादेमी पुरस्कार पओनिहार प्रदीप बिहारीजी साहित्य अकादेमी-सभागारमे लेखक-सम्मिलन-अवसर पर अपना वक्तव्यमे सगर राति दीप्प जरयक उपलब्धिक चर्चा तँ कएलन्हि, मुदा स्व. प्रभास जीक नामोल्लेखो नहि कयलखिन। एकरा हम साधारण घटना नहि मानि सकैत छी। गंभीर बात बुझैत छी। कारण हमरा लोकनि रचनाकार छी। औसत कोटिक कोनो राजनीतिक नहि। संभव हो नाम अनावधानतामे छूटि गेल होनि। मुदा हमरा सभ लेखक छी तेँ एहन असावधानी करबा लेल स्वाधीन नहि छी। यद्यपि अपन खेद हम हुनका प्रकट कयलियनि। हमरा लगैये जे अपन-अपन सकारात्मक इतिहासक प्रति सभ पीढ़ीक मनमे कृतज्ञताक भाव अंततः लेखकक ऊर्जा आ’ प्रेरणे बनैत रहैत छैक। बतौर कवि हम मैथिलीमे जाहि काल-बिन्दु पर ठाढ छी, तकर जड़ि विद्यापतिसँ ल’ सुमन-किरण-मधुप- आ यात्रीएमे। ई सोचि क’ मन कृतज्ञ होइत अछि! बल्कि गौरांवित। ओना, एकटा लेखक रूपमे हम एहिमे सँ क्यो नहि छी। जेना सभ, सभक कारयित्री प्रस्थान छथि, तहिना हमहुँ नागार्जुन-यात्रीक कारयात्री प्रस्थान छी। आ’ ई भाव हमरा रचनाकर्ममे अग्रसर करबाक उत्तरदायित्व द’ गेलय। तर्पण तिल-कुश –अंजलि बला कर्मकाण्डकेँ तँ हम नहि मानैत छी, मुदा पुरखाक तर्पण हमरा प्रिय अछि। अपना शैलीमे। अपन जीवन-मूल्यक एकटा अभिन्न तत्त्व बुझाइत अछि। तकर बाट की हो? अवसर पर कृतज्ञ स्मृति! अवसर पर- तिथि पर नहि। भोज परक आँटी- सत्तरिक नव-खाढ़िक युवा नवतुरिआसँ “भोज परक आँटी” अवश्य सुनल हएत बन्धु! हमरा लोकनि ते आब आयु-अवरोहणक प्रक्रियामे छी। मुदा पराभव अछि अपन एहि मैथिल मानक ओ स्वप्न जे मिथिलांचलक समग्र सामाजिक परिवर्तनक अर्थात्- जनपथक निर्माण (राजपथ नहि) आकांक्षामे सौँसे बातपर उत्कट डेगे चलिते रहबा लेल विवश छी। हमर गाम पिलखबारो ताहि से जुटल अछि, जाहिसँ हितेन्द्रजी अहाँक गाम केओटी। हमरा पीढ़ीकेँ तँ इतिहास “भोज परक आँटी” बना लेबाक बेर-बेर उपाय कएलक, जेना-तेना बँचबामे सफल रहलियैक, मुदा भऽ कहाँ कोनो खास सकलैक। तेकरे टा अफसोच। एक बोझक रूपमे फसिलकेँ खरिहानधरि कहाँ पहुँचा सकलियैक। तेकरे टा दुःख! मुदा टिकल रहलियैक अपन जीवन-मूल्य आऽ समाज दर्शनक भूमिपर। एक टा कवि-लेखक जे संघर्ष असकरो कऽ सकैत छी। से रस्ता चलबाक यत्न। जे से। पूरा बिहार- आन्दोलनक परिणति एहन आऽ एतए धरि भऽ जेतैक से क्यो सोचियोसकैत छलैक? अवश्ये बुझल हएत जे ताहि आन्दोलनक उपज- आमद भरि देश कैक टा महापद आसीन सी.एम. समेत कतोक एम.पी., एम.एल.ए. महोदय छथि। अहाँक पीढ़ीमे यदि सत्येक (सन्देह नहि सत्तरिक कारवाँक भव से कहि रहल छी जे) सत्ये मिथिलाक दर्द अछि तँ राजनीतिकेँ चिन्हैत जाइ जाऊ। पोलीटिक्स कऽ एहि नव अवतारकेँ। से भाषाक। ताहूमे मैथिलीक नव-नव ब्रांडक नेता आ एहन राजनीतिकेँ चीन्हि जाऊ। कारण जे राजनीतिक ई एकदम नव अवतार ठीक विश्व-बाजारी अवतार! कोनो औसत सुख लेल ककरो “भोज परक आँटी” नहि बनब। एहि वाष्पीकरणक प्रवाहमे एहन लोक नीक समय अर्थात् कोनो प्रतिगामी व्यवस्था रोकि नहि सकैत अछि। स्वयं राजनीतिक विचारधारा-अवधारणामे सेहो युगक अनुसार सकारात्मक पुनर्विचार चलि रहल छैक। जाति, धर्म, सम्प्रदय, क्षेत्रीयता सभसँ ऊपर सोचैत। समग्रतासँ एक होऊ। अपन मिथिलाँचलो तँ देशेमे ने अछि। अपम माँ मैथिली तँ अवश्ये महान। मुदा अन्य लोकक मातृभाषा सेहो तुच्छ नहि। अपना देशक सभ भाषा श्रेष्ठ अछि। मुदा दुर्भाग्यसँ किछु मूढ़ मैथिल मानसिकताक लोक आर तँ आर हिन्दी तककेँ अपमान जेकाँ कऽ देबाकेँ अपन मैथिल प्रेम बुझि लैत छथि, ई नकारात्मक प्रवृत्ति उचित नहि। हम तँ तेहन समयकेँ सहन कएने छी, जे किछु परम् विद्वान् अत्यन्त आदरणीय लोक लिखैत तँ मैथिली नहि तँ इंग्लिश। हिन्दी नहि। ई बहुत विचित्र लागए। आखिर हिन्दी अपन बहुत गौरवशाली लोकतन्त्र राष्ट्र-भाषा थिक। बन्धु! से मानसिकता बदलि जरूर रहल अछि मुदा अहाँ खाढ़िक (पीढ़ीक) युवा नवतुरिआमे आओर तेजीसँ परिवर्तन चाही। बात नहि रुचए तँ बिसरि जाएब, आग्रह! अंकुर काशी नाथ झा,गाम-कोइलख, जिला-मधुबनी,   मिथिलांचल सरकारी योजना माथ पर लेने जारैनक पथिया, घुमि रहल छै, कलमें गाछीये एकटा बुढ़िया । सब कहै छै ओ हरजिन छै, सरकार ओकरा देने संरक्षण छै, महिला वला सेहो ओकरा आरक्षण छै, तइयो अभगली के गंजन छै। सरकार के ओकर जाति पर बहुत छै ध्यान, ओकरा लेल घर बेनबाक सेहो छै प्रावधान, अन्न आ कपड़ा में वैह सब छै प्रधान, तइयो ओ खाइ लेल छै पेरशान। इंदिरा आवास आ अन्नपूर्णा के योजना एलै, बुढ़िया के ई सब भेटब सपना भेलै, नेता सब के अन्न भेटलै, घर बनलै, सरकार बुझलकै गरीबक कल्याण भेलै। एक बेर फेर ओ योजना सऽ वंचित रहि गेलै, पूछलीयै जे ओकरा कियैक नहि भेटलै, मुखिया जी कहलैन, जगह कम आ बेसी भीड़ छै, मुदा सत्त बात तऽ काका कहला, बेचारी बुढ़िया शरिफ छै॥ सुभाष साह, गाम-अरनाहा, जिला सरलाही, नेपाल। वर्तमानमे लंदन मेट्रोपोलिटन विश्वविद्यालयसँ बी.बी.ए.कए रहल छथि। सामाजिक कार्य, मैथिलक जुटान, सांस्क्र्तिक कार्यक्रम संचालनमे विशेष रुचि। यू.के. केर मधेसीक संगठनANMUK केर सक्रिय सदस्य आ सम्प्रति सचिव। नेतृत्व क्षमताक गुण संगहि प्रखर वक्ता। लन्दनमे नेपाल मेला २००८ (लन्दनसँ श्री सुभाष शाहक रिपोर्ट) लन्दन शहरमे पिकाडिली सर्कस  नामक स्थान पर नेपाल एमबैशीक सहायता सऽ २१ आऽ २२ सितम्बर २००८ कऽ अहि मेलाक आयोजन कैल गेल छल जाहिमे नेपाल के पर्यटन मंत्री आदरणीया सुश्री हिशिला यामी नेपालक राजदूत श्री मुरारी राज शर्मा खैतान ग्रुपके चेयरमैन एवम्‌ मैनेजिंग प्रेसिडेंट श्री राजेन्द्र खैतान आदि सहित अन्य दिग्गज सब उपस्थित छलैथ।अतऽ इहो घोषणा कैल गेल जे साल  २०११ के पर्यटन वर्षक रूपमे मनाओल जायत। सुश्री यामी सऽ हम सब अहू बात पर विचारविमर्श केलहुं जे 'लुम्बिनी' के पर्यटक सबलेल बेसी आकर्षक बनाबऽ लेल की कैल जा सकैत अछि।यामीजी अहि बात लेल प्रतिबद्ध भेली जे ओ सीता मैया एवम्‌ बुद्धदेवक इतिहास सऽ सम्बन्धित स्थानके विकासमे यथाशक्ति योगदान देती। श्री नवीन कुमार एवम्‌ सुश्री सुनीता शाह द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक परिधानक फैशन शो अत्यन्त सफल रहल।हमरा सब अन्मुक (ANMUK- Association of Nepali Madheshis in UK) के सदस्य सबलेल अहि आयोजनक सफलता बहुत पैघ प्रोत्साहन अछि। (आभार - अन्मुक के वेबसाएट जाहि सऽ फोटो प्राप्त भेल ) चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान। प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित। भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति। बनैत बिगड़ैत “हाह। हाह”। टोकारा आ थपड़ी सँ नै उड़ै छै तऽ माला कार कौवा केँ सरापय लागै छै – “बज्जर खसौ, भागबो ने करै छै”। कौवा कखनियें सँ ने काँव-काँव के टाहि लगेने छै। कौवाक टाहि सँ मालाक कलेजा धक सिन उठै छै। संतान सब परदेस रहै छै। नै जानि ककरा की भेलै! ने चिट्ठी-पतरी दै छै, ने कहियो खोज-पुछारि करै छै। कते दिन भऽ गेलै। कुशल समाचार लय जी औनाइत रहै छै। लेकिन ओकरा सब लेखे धन सन। माय-बाप मरलै की जीलै तै सँ कोनो मतलब नै। “हे भगवान, तूहीं रच्छा करिहक। हाह। हाह”।– माला कौवा संगे मनक शंका आ बलाय भगाबय चाहै छै। “धू, छोड़ू ने। कथी मे लागल छी। ओ अपन बेगरतेँ कर्रइत छै। अहाँक की लइए’- सत्तो बुझबै छै। लेकिन मालाक मन नै मानै छै। अनिष्टक आशंका सँ डरायल ओ और जोर-जोर सँ होहकारा दै छै आ थपड़ी पाड़ै छै। माला सब बेर एहिना करै छै। सत्तो लाख बुझेलक, बात भीतर जाइते नै छै। कतेक मामला मे तऽ सत्तो टोकितो नै छै। कोय परदेस जाय लागल तऽ माला लोटा मे पानि भरि देहरी पर राखि देलक। जाइ काल कोय छीक देलक तऽ गेनिहार केँ कनी काल रोकने रहल। अइ सब सँ माला केँ संतोख होइ छै, तैं सत्तो नै टोकै छै। ओकरा होइ छै टोकला सँ की फैदा? ई सब तऽ मालाक खून मे मिल गेल छै। संस्कार बनि गेल छै। सत्तो केँ छगुन्ता होइ छै। यैह माला कहियो अपन बेटा-पुतौह आ पोती सँ तंग भऽ कऽ चाहैत रहै जे ओ सब कखैन ने चैल जाय। रटना लागल रहै जे मोटरी नीक, बच्चा नै नीक। सैह माला अखैन संतान खातिर कते चिंतित छै। सत्तो सोचै अय अइ मे मालाक गलती नै छै। माला केँ सख लागले रैह गेलै जे नेहाय कऽ आयल छी तऽ पुतौह परैस कऽ खाइ ले देत आकि कहियो केशे झाड़ि देत या गोड़े हाथ दाबि देत। पोती केँ टांगैत-टांगैत तऽ छातीक हाड़ दुखाइत रहै। अपन कोखिक जनमल बेटो कहियो ई नै पुछलकै- माय केना छें ? कौवा उड़बै ले माला कखनो हाथ चमकाबैत अछि, कखनो मुँह चमकाबैत अछि। मगर ओकर धमकी-चमकी के कौवा पर कोनो असर नै भेलै। ओ ओहिना काँव-काँव करिते छै। कौवाक टाहि सँ सत्तोक जी सेहो धक रहि जाइ छै। मन मे तरह-तरह के शंका आ डर पैस जाइ छै। लेकिन ओ कहुना अपना केँ बुझा लैत अछि। सत्तो संगे ई सब बेर होइ छै। कोनो अपसगुन भेला पर आशंकित भऽ जाइत अछि। आशंका केँ बुधि आ तर्क सँ ठेल कऽ बाहर करैक कोशिश करैत अछि। कखनो संस्कारक फान मे लटपटाइत अछि। कखनो सम्हरैत अछि। फेर फँसैत अछि। फेर छुटैत अछि। ई सब बड़ी काल चलैत रहै छै। कार कौवा तेना एकपरतार टाहि लगेने जा रहल छै जे कान में झड़ पड़य लागलै। “देखियौ, ई कौवा तऽ केना-केना ने करै छै। नीक नै लागैए”।– माला व्याकुल भऽ जाइ छै। “ई अहाँक मनक भरम छी”।– सत्तो कहै छै आ एकटा रोड़ी जुमा कऽ कौवा दिस फेकै छै। कौवा उड़ि गेलै। उड़ल जाइत कौवा केँ सुना कऽ माला कहै छै- “हम ककरो कुइछ नै बिगाड़लिऐ अय। जा, चैल जा”। कौवा आगू वला छत पर बैठ रहै छै आ फेर कर्रय लागै छै। सत्तो केँ मोन पड़ै छै एक दिन बड़ी राति केँ माला ओकरा जगेलकै- “सुनै छिऐ? कुत्ता बड़ी काल सँ कानै छै। हमर जी छन-छन करैत अछि”। सत्तो अकानलक। ठीके ढेरी कुत्ता कानैत रहै। आशंका सँ ओकरो मन सिहरि गेलै। लेकिन ओ बाजल- “अरे, भूख सँ कानैत हेतै। देखै नै छिऐ आइ काल्हि कोय एक्को कर दै छै। “भूख सँ एगो दूगो ने कानितिऐ, आकि सब कानितिऐ”?- सत्तोक तर्क मानै ले माला तैयार नै रहै। “और सब केँ देखाउँस लागल हेतै”।– सत्तो दोसर तर्क देलकै। माला केँ सतोक तर्क नै सोहेलै। ओकरा झुझुआयल सन चुप बैठल देख सत्तो फेर बुझेलकै- “देखै नै छिऐ विदाइ बेर मे की होइ छै। जहाँ एगो मौगी कानल कि सभक आँखि मे नोर आबि गेल”। माला कने काल चुप रहल। फेर मूल बात पकड़ैत बाजल- “पहिने तऽ सब करे कर दैत रहै तबो किए कानैत रहै”? “कोनो कुत्ते मैर गेल हेतै, तकरे सोग मे कानैत हैत”। - सत्तोक बात सँ माला संतुष्ट तऽ नै भेल, मगर कुत्तो सब कते कनितय। एगो चुप भेल। दूगो चुप भेल। आस्ते-आस्ते कानब घटैत गेलै। फेर गोटेक आध कुत्ताक कानब कखनो कऽ सुनाइ। बाद मे ओहो बन्न भऽ गेलै। माला आ सत्तो सेहो कखनो निन्न पड़ि गेल। माला केँ कौवाक गुनधुन मे पड़ल देख सत्तो पुछै छै- “अहाँ कौवाक बोली बुझै छिऐ”? माला कने काल बात केँ ताड़ैत रहल। बातक मरम बूझि खुखुवा उठल- “दुनियांक काबिल अहीं टा तऽ छी। अहाँ सन बुझक्कड़ और कोय छै”! मालाक कटाह बोल सँ सत्तो केँ चोट लागलै। ओ चुप आ उदास भऽ गेल। ओकरा लागलै जे चीज पसिन नै पड़ै छै, तकरा प्रति लोग निष्ठुर आ अन्यायी भऽ जाइत अछि। कारी रंग आ टाँस आवाजक चलते कौवा केँ अशुभ बना देलक। सत्तो केँ अपन नौ मासक पोती मोन पड़ै छै- मुनियां। कौवा देख मुनियां चहैक उठै। आह-आह कहि ओकरा बोलाबै। मुनियां कानय लागै तऽ सत्तो कौवे केँ हाक दै- “कोने गेलही रे कौवा ऽ ऽ? मुनियाक कौवा ऽ ऽ ? कोने गेलही ई ई “? ई सुनिते मुनियां चुप भऽ जाइ आ मूड़ी घुमा-घुमा कौवा केँ ताकय लागै। कौवा बिलायल जाइ छै। कुइछ दिनक बाद तऽ साफे अलोपित भऽ जेतै। अखैन ई बात ने माला जानै छै, ने मुनियां। कौवा मुनियांक जिनगी मे समा गेल छै। मुनियां केँ बेर-बेर कौवा मोन पड़ैत रहतै, दादा मोन पड़ैत रहतै। ने ओ कौवा केँ बिसैर सकैत अछि, ने दादा केँ। मुनियां कौवा केँ ताकैत रहत, दादा केँ ताकैत रहत। कहियो ने कौवा रहतै, ने दादा रहतै। श्री बैकुण्ठ झा,पिता-स्वर्गीय रामचन्द्र झा, जन्म-२४ - ०७ - १९५४ (ग्राम-भरवाड़ा, जिला-दरभंगा),शिक्षा-स्नात्कोत्तर (अर्थशास्त्र),पेशा-  शिक्षक। मैथिली, हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषा मे लगभग २०० गीत कऽ रचना। गोनू झा पर आधारित नाटक ''हास्यशिरोमणि गोनू झा तथा अन्य कहानी कऽ  लेखन। अहि के अलावा हिन्दी मे लगभग १५ उपन्यास तथा कहानी के लेखन। धोखा (१७.०९.९१) दुनियाँ तँ ई धोखा अछि उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम ऊगि रहल पनिसोखा अछि। दुनियाँ... कौआ कर्र-कर्र करकराय रहल, आँगनमे धान सुखाय रहल। पेपर रेडियो टी.वी.पर नेतहुँ तँ शोर मचाय रहल। हो जिन्दा मुर्दा गाय-महीश वृद्धा-पेंशन हो या खरात- हर ठाम कमीशन खाय रहल, हँसि-हँसि कय गाल बजाय रहल। आजुक युग के ई शोभा अछि, ई मान बराईक नोभा अछि। दुनियाँ.. दुनियाँमे अछि सब चोर-चोर, जकरा हिस्सा नईं भेंटि रहल- मचबै सगरो तऽ वैह शोर। काटय केउ सेन्ह अन्हरियामे, लूटय तऽ केउ इजोरियामे केउ ठूसय हीरा वोरियामे बन्दूक बनैत अछि गोहियामे अछि सबहक सरदार सिपाही ऊठय निश्चिन्त ओढ़ढ़ियामे ईमान जतय घर टाटक अछि ई महल अटारी पापक अछि दुनियाँ तँ ई धोखा अछि पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण ऊगि रहल पनिसोखा। (१६.०९.९१) लिखलौं कतेक पत्र कर जोरि जोरि कऽ बूझब ओ छल नोरक जगहकेँ छोड़ि-छोड़ि कऽ लिखलौं... झहरै तऽ बूँद सावनमे, खुब झूमि-झूमि कऽ बरसै तऽ नोर नित, कपोल चूमि-चूमि कऽ लिखलौं... मुरझाय बन तराग बाग तऽ ओ गृष्ममे, पावस उमंग घोरि रहल, आईपवनमे, लिखईत छी पाँति हम, ई कलम बोरि-बोरि कऽ। लिखलौं कतेक... भेटत नम बूँद फेर, जखन हिम जे पिघलि जैत, आओत कोना ओ बाढ़ि औ! सरिता सेहो सुखैत ई लिखि रहल छी आई, आँखि फोड़ि-फोड़ि कऽ। लिखलौं कतेक... तोरि-गेरि-तोरि कऽ मुहब्बतमे तऽ तरपब भाग्यमे लिखला प्रभुसबके रही जौं दूर प्रियतमसँ सजाये मौत त ओ थिक। रही...२ यक्षक विरह छल वर्षकेँ जनलक जगत सगरो- जहाँ वर्षो विरह के बात छै- वनवास त ओ थिक। जहाँ...२ ई उपवन ओ शिखा पर्वत आ कल-कल बहि रहल सरिता अगर अली अछि नज उपवनमे त सुन्दरता कतय ओ थिक। मुहब्बत... चितवन हो यदि चंचल आ तन यौवनसँ हो भारी मगर पावसमे पहु परदेश हो यौवन कहाँ ओ थिक। मुहब्बत... परदेश रुन-झुन बाजय पायल हमर फूजल बान्हल केश औ मोर पाहुन धेलहुँ योगिन वेश। डाढ़ि-डाढ़िपर फुद-फुद्दी सभ फुदकि रहल, खढ़-खढ़केँ समटि बनौने केहन महल करै परिश्रम मिल कय दुनू नईं छन्हि कोनो क्लेश।औ.. बिजुलीसँ चमकै घर, मुदा अन्हरिया यौ। टिम-टिम दीप करै छै ओतय अन्हरिया औ दिन गनैत छी बीति रहल अछि राति कहाँ अछि शेष औ... सीता शक्ति राम सौम्य जग-प्राण बनल। पौलनि जगमे नाम घूमि जंगल-जंगल॥ महल त्यागि वनवाश गेलन्हि बना तपस्विन वेश! औ मोर... जतबय दुःख हम कहब अहाँ ततबै बुझबै नहिं पहुँचत जौं पत्र अहाँ नहिंये जनबै जड़तै तेल कोना नईं घरमे पहु जकर परदेश। औ मोर... (२०.१०.९१) रहि-रहि आँचर उड़ि जाय किया अहाँ आँचर समटि लजई किया। रहि-रहि.. देखि बागमे सुमन व्यवहार करू, उठा निज नयनकेँ चारि करू, अली हर कलीसँ फुस-फुसाय किया। रहि रहि.. चमन छी अहाँ खिलि रहल अय सुमन। लटसँ लिपटि घूमि चूमन पवन पड़य जतय नजरि लिपटि जाय किया! रहि रहि... भार सहय कोना करि केहरि अहाँक राग माधुरी सुनाबय पायल के झनक देखि अहाँ के हिरदय जुराय किया। रहि रहि आँचर.. परदेश गेलहुँ हमरो छोड़लहुँ,  छोड़लहुँ माय के छोड़ि देलहुँ घरद्वार परदेश गेलहुँ… सोनू-मोनू झगड़ा कय-कय हमरो माथ भुकाय रहल बहिकिरनी तऽ नईं अछि घरमे, कहू करत के हमर टहल? बौआ सब बौआय रहल अछि, पढ़तै कथी कपार! परदेश गेलहुँ.. जन-वन किल्लौल करै छै, कोना जेबै हम दरबज्जा बौआ दौड़ल छल सड़कपर, गेलहुँ रोटी भेल भुज्जा माय छथि बूढ़, छी एसगर घरमे कोना उठत ई भार! परदेश गेलउँ। हमरो... अहाँ जनै छी लोक केहन अछि, के कऽ देतै हाट-बजार, साल-साल त बाढ़ि अबै छै,उजरै छै सबके संसार, हेतै समुद्र आँगन-घर सगरो,के कउ देतै पार! परदेश गेलउँ। हमरो छोड़लौ... हिमांशु चौधरी-पिता : स्वर्गीय कामेश्र्वर चौधरी,माताः श्रीमती चन्द्रावती चौधरी,जन्मः वि स २०२०/६/५ लहान, सिरहा,शिक्षाः स्नातकोत्तर(नेपाली),पेशाः पत्रकारिता (सम्प्रति : राष्ट्रिय समाचार समिति ),कृति : की भार सांठू ? (मैथिली कविता संग्रह ),विगत दू दशकसं नेपाली आ मैथिली लेखन तथा अभियानमे निरन्तर क्रियाशील आ विभिन्न संघ संस्थासं आबद्ध । की भार सांठू ?......... लाते लातसं घायल लाशे लाशसं गन्हाएल सङक्रान्तिक पीडामे की भार सांठू ?......... थुराएल चानी फ़ुफ़डिआएल अहिबक फ़ड शोकाएल चाउर, पीपाएल आंजुर दन्त्यकथाक पात्र जकां कचोट द' रहल अछि गत्र गत्रमे बेधल भाला-गडांस टीसे-टीसे द' रहल अछि फ़ाटल चिटल कपडा-लत्ता मूंह कतहु, हाथ कतहु स्ट्रेमे राखल सिगरेटक ठुट्टीसन लावारिस भ' गेल इतिहासमे बहल नोर फ़ेर एहिबेर सेहो बहि गेल गन्हाएल लाशक भार कोनाक' साठू ?......... अनिष्टकारी अमरौती पीने अछि ओकरा लेल सत्यम,शिवम आ सुन्दरमक सर्जक बाधकतत्व बाधकतत्व मरि जाए/माहुरे माहुर भ' जाए अन्यायक अमरलत्ती/द्रोपदीक चिरसन नमरैत चलि जाए एहन सनकमे सनकैत ओकर अमरौती कखनो बारुद फ़ेकैए/कखनो धराप रखैए बारुद आ धरापमे पोस्तादाना कत' ताकू जे अनरसा बनाएब आ भार सांठब क्यानभासमे फ़ाटल गाछ देखि अन्हडि-बिहाडि अएबे करत विश्र्वासक जयन्ती अङकुरित भेल अछि परन्च बहुतो धोएल सींथक सेनुरक कारुणिकताक भार कोनाक' साठू ?......... नियति बिछानरुपी मशानमे अर्थहीन भ' अपन लाशक कठियारी स्वयमसन भ' गेल छी इच्छासभमे पूर्णविराम लागि गेल अछि तें एकटा नियति भ' गेल छी हंसलासं मात्र नंहि कनएटा पडैत अछि कनैत कनैत थाकि जाइत छी तखनो शान्ति नहि किछु मनोविनोद करएटा पडैत अछि बनाबटी मुस्की छोडएटा पडैत अछि धन्य कथा ! धन्य यथार्थ !! तें जीवन मृत्युमे लीन होइत जा रहल अछि जीवन आ मॄत्यु मन्जिल होइत जारहल अछि बी.के कर्ण(1963-),पिता श्री निर्भय नारायण दास गाम- बलौर, भाया- मनीगाछी, जिला-दरभंगा। पैकेजिंग टेक्नोलोजीमे स्नातकोत्तर आऽ यू.एन.डी.पी. जर्मनी आऽ इग्लैण्डक कार्यक्रमक फेलोशिप, २२ वर्षक पेशेवर अनुभव आऽ २७ टा पत्र प्रकाशित। डायगनोस्टिक मिथिला पेंटिंग आऽ मिथिलाक सामाजिक-आर्थिक समस्यापर चिन्तन। सम्प्रति इन्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ पैकेजिंग, हैदराबादमे उपनिदेशक (क्षेत्रीय प्रमुख)। स‍ंकट गुणक (रिस्क फैक्टर) आऽ मैथिल मिथिलाक विकास क़ेना आऽ कखन विकासक बिना जिनगी बड कठिन। विकासक रस्ता बड उबड  ख़ाबड । संघर्ष सदिखन। डेग डेगपर। बिना संघर्षक विकासो संभव नहि। सर्वांगीन विकासक हेतु़ व्यक्तिगत विकासे आधार होइछ । बहुत किछु गमेलहुँ मुदा आब नहि। मैथिल युवा मोर्चा तैयार भए रहल अछि। विकसित वा अविकसितक बिच-बिचवामे छी।एतवा तॅ तए अछि जे आर्थिक विकासक लेल सुर सार भए रहल अछि। आर्थिक विकास एकटा गति होइछ जे कखनो कम वा बेशी। आर्थिक उपार्जनक लेल़ हम सब सकारात्मक प्रयासमे सुतल छी। जहिया उठब़ तहिया सिंह जकां दहारब वा सांप जकां फूफकारब। जय श्री हनुमानजी एक समयमे अपन शक्ति बिसरि गेल छलाह, तहिना हम सब मैथिल अपन शक्ति बिसरौने छी। बहुतो मैथिल प्रवाशी जीवनमे़ अपन आर्थिक सक्षमता मे वृद्धि केलाह, परञ्च हुनक धिया पूता मिथिला मैथिल सॅं कोसो दुर !!! पैघ संकट। ग्रेट रिस्क!!! मैथिलक सम्मान मैथिली थीक आओर एकर अपमान मैथिले कऽ रहल छथि। अपने परिवारमे मैथिलीपर मतांतर। मैथिली घरेमे टूअर। मैथिल पलायनसॅं मैथिलीक आकस्मिक अन्त। केऽ विलाप कडत। पलायन दुइ स्थितिमे- १. जीवन भरण पोषणक लेल २. व्यक्तिगत उद्देश्यक पूर्तिक लेल मिथिलामे की कमी डेग डेग पर पोखरि घर घरमे पतरा-पोथी। गाम गाममे जाति पॉति छोटका पॉति लैऽ कऽ एके परिवारमे शानक घमासान। मैथिली संकटमे, आवश्यकत अछि कोमल स्पर्शक। कतेको बेर बिहार सरकार द्वारा मैथिली भाषापर सीधा प्रहार भेल। परम दुखक बात ई अछि जे किछु मैथिल मैथिलीकेँ तोड़यमे लागल रहल छथि। परञ्च चिंताक कोनो बात नहि़। मैथिली अछि अटल़-अविचल। मैथिलीक जड़ बड़ मजगूत। हम मैथिलसब अपन मौलिक कर्तव्य बूझि आऽ अपन भाषा सॅं अथाह लगन लगावी। बंगाली-पंजाबी-मराठी केँ देखु जे अपन मातृभाषाक प्राणोंसॅं ऊपर स्थान देने छथि। एतबाऽ नहि हर मंचपर अपन भाषाक प्रति स्नेह तथा सम्मान कन्निको कट्टौती नहि करैत छथि। परञ्च़ हम मैथिल कतेक निष्ठा रखैत छी। एहन किछुए मैथिलके देखल जा सकैछ। बंगालमे बंगाली, पंजाबमे पंजाबी। एहिना बहुतो प्रादेशिक राज्यमे़ अपन-अपन भाषाकेँ अपन जीऽ जान सॅं पैध लगाव रखने छथि। बंगालीक भाषा बंगाली पंजाबीक भाषा पंजाबी मराठीक भाषा मराठी बिहारीक भाषा की? हिन्दी़-भोजपुरी आऽ मैथिली हिन्दी़ तॅं राष्ट्रभाषाक अस्तित्वमे अछि। भोजपुरी काफी लोकप्रियता हासिल कय रहल अछि। भोजपुरी सिनेमा उद्योगकेँ काफी सफलता भेटल। मुदा  मैथिलीक स्थिति बिहारमे केहन अछि से की कहल जा्‌इछ। मैथिलीक स्थिति मिथिलामे बड़ कमजोर। गैरमैथिल बिहारी कतेक प्रतिशत मैथिलीक इज्जत करैत छी।अनुमानित प्रतिशत बड़ कम होयत। मैथिल अपनाकेँ गोद लेल मैथिल जेकाँ आचरित कहिआ धरि करताह? मैथिली सशक्त भाषा अछि। एकर अपन इतिहास अछि। परञ्च हम सब मैथिली बाजय वालाकेँ आऽ लिखय वालाकेँ पिछड़ल बुझैत छी।अनेक भाषा सीखू़ बाजू़ मुदा मैथिलीकेँ छोड़ि कऽ नहि। मैथिलीकेँ बोझ नहि बुझियौक। मैथिल जे कहियो मैथिली छोड़ि लन्हि़  ओ मानसिक रूपसं गरीब भए गेलाह।   आर्थिक विकास भेलाक तदुपरान्तों अपन मनसॅं बहुत गरीब। अमेरिकामे जे भारतीय मुलक स्थिति पर जे एकटा अमेरिकन पत्रकार अध्ययन केलाह जरूर देखल जाए। Family Ties and the Entanglements of Caste http://www.nytimes.com/2004/10/24/nyregion/24caste.html अमेरिकन क़ी मिथिलामे रहि सकैत अछि नहि़ कथमपि नहि़। की अमेरिकन आ कोनो विकसित देश व राज्य के एकोटा लोग अपन मैथिली भाषा अपनायत़ नहि़ कथमपि नहि़। बेसी मैथिले भेटताह जे़ मिथिला आ मैथिली छोड़ि ताहिमे सबसॅं आगू । मैथिल मिथिलाक सीमाक बाहर बड मेहनती परञ्च मिथिलाक सीमाक अन्दर बड आलसी। मेहनती मैथिल कतौऽ रहथि धाक जमौने छथि परञ्च मैथिली पर जेना मतसुन। एको रति रू चि नहि रखैत छथि, हुनकर धिया पुताक बाते छोड़ु। गिर्यसन जकॉं खोजी़ एहि पर अलग विचार रखैत छथि। मैथिलीके बोझ बुझय वाला मैथिल सोचि विचारमे बड़ गरीब। गरीबी झेलबाक मानसिकता मैथिल मे कियाक बेसी। मिथिलामे मौलिक सुख सुविधाक कमी कोन कारणे। बहूतो कारण भए सकैछ। गरीबीमे ककरा नेऽ इ कष्ट झेल्‌ऽ पऽडै़त। मैथिल मेहनती तॅं मिथिलामे गरीबी कियाक गरीबी झेलबाक मानसिकता कियाक !!!ग्रेट रिस्क !!! कतेक मैथिल कहताह जे भाग्यक लिखल कष्ट अछि। एहि प्रश्नक जबाब खोजि रहल छी जे पॉंच करोड़क मैथिलक एके रंग भाग्य कियाक। गरीबीक झेलबाक मानसिकता कतेक दिन तक। हम मैथिल सब वाक विवादमे बड प्रखंड छी। हरएक बातपर अपनाक अनुभवी प्रमाण दैत छी। मनसॅं वाक पटूतामे धनी। जीवनक मौलिक आवश्यकताक पूर्तिकक लेल हम सब मैथिल बड़ गरीब। गरीब मानसिकता गरीबी झेलबाक लेल सदिखन तैयार। स्वस्थ नेताविहीन मैथिल समाज अपन मौलिक हक सॅं दूर कोसो दूर अछि। जड़ जड़ हालतमे मैथिल समाज अपन देशक आजादीक बाद मिथिलामे आधारभूत ढॉंचाक शूरूआतोऽ तॅं नहि भेल। खकरा कहबैऽ केऽ सूनत के सुधि लेत। रिस्क आ मैथिल मुद्दा व्यवसाय विकसित देश वा विकसित राज्यक पाछु यदि सुक्ष्म रूपसॅं देखु तॅं भेटत जे ओहि क्षेत्रक व्यवसाय विकासक मुल कारण अछि। मिथिलामे विद्वान वा ज्ञानी मैथिलक कमी नहि। व्यापारी वर्ग नोइसो बराबरि नहि। मैथिल व्यापारो करताह ? सिन्धी़ माड़वारी आ पंजाबी समाज मिथिलामे अपन व्यवसायमे मैथिल जकॉं संस्कार अपनोने के साथ केवल ५० सालमे बढ़िया धाक जमा लेलाह, परन्तु हम मैथिल जे छी जे डींग हकैसॅं फुर्सतेऽ नहि भेट रहल अछि। मैथिल मिथिलामे की करताह ? मिथिलामे किछु मैथिलके देखबाऽ मे आयत जे़ मिथिलाक सिन्धी़ माड़वारी आ पंजाबी के व्यवसायमे नौकरी करताह। हिन्दी अखबार मॉंगि कए पढ़ताह़ परञ्च मिथिलाक विद्वान वा ज्ञानी अखबार प्रिन्ट आ बाजार मे आनबाक जोखिम नहि ऊठैऽताह। मिथिलामे चाहक दुकान पर प्रतिदिनक दिनचर्यामे लालु के लालूवाणी पर अखण्ड बहस करताह। मिथिलामे सुइदसॅं किछु मैथिल सुइदखोर व्यवसायमे वृद्धि केलाह हऽ। कोनो नियमके पालण नहि़ कए रहल छथि। अपन नियम बना कऽ अपराध मे रमल छथि। मिथिला बैंकक शुरआत होए अपराधी सुइदखोर मैथिल के झेलनाइ एकटा बढ़ पैघ अपराध अछि। !!!!Great Risk !!!! मुदा बहुतो अछि़ पर रिक्सो सॅं ज्यादा भयावह। सन २००१क जनगणणा के अनुसाऱ मिथिलाक आबादी करीब ६ करोड़ छल। जाहिमे़ व्यवसायिक वर्ग २ प्रतिशतो कम। बहुतोसॅं पुछलहु़ जे एतबा प्रतिशत कियाक कम अछि़ परञ्च एकर कारण की से नहि जानि सकलहुं। मिथिलासॅं आयात आ निर्यातक बातेऽ छोड़ू,  व्यापार तॅं बद सँ बदतर मिथिलाक पाँच जिलाक केस स्टडी: पांचो जिलाक कुल आबादी सन २००१ जनगणनामे करीब एक करोड़ अठाइस लाख छल। जनसंख्या अनुमानित ५ वा ७ प्रतिशतसॅं प्रतिसाले वृद्धि भऽ रहल अछि। एकटा बात महसूस भऽ रहल अछि जे मिथिलामे गरीबी कम भेल अछि। यदि़ सन १९८० सॅं पहिने हरेक गॉवमे हरेक दिन ४ या ५ घरमे उपवास रहैत छलैक़ परञ्च से उपवास आब गरीबीक उपवास पुजा पाठक उपवास होइत अछि। मुदा भौतिक सुविधाक पिछड़ापन तॅ पारकाष्ठा पर अछि। जिनगी भगवानक भरोसे। पांचो जिलाक मैथिल पर यदि ध्यान देल जाए तॅं एकटाक सदस्य परिवारमे नौकरी करयबाला बॉकी आश्रित सदस्य किछु नहि करयबाला बल्कि गप छटय बाला आ शान बघारय वाला। पर आश्रित भेनाए अपनेमे एकटा रिक्स एहन जे भावुक जरूरतसॅं ज्यादा आ कर्मठहीन ज्यादा बनाबैत अछि। !!!!ग्रेट रिस्क !!!! जनसंख्याक वृद्धि मानु जे कष्टक पहाड़। हर क्षण हरेक दिस स्थिति दयनीय हेबे कड़त। मिथिलामे मैथिल रिक्स लेताह ? मिथिलामे मैथिल तॅं अपन जिनगीक रिक्स लेबाऽमे सर्वोपरि छथि। जेना की़ सोचु ऩदि के ऊपर जड़ जड़ हालमे पुल ओहि पर खचाखच बस़ आ रेल गाड़ी जाहिमे छत सेहो भड़ल। फोटो देखल जाए। सोचु कनिऽ जे जिनगी आओर मौत के बीच केवल एकटा रिक्स फैक्टर अछि। मैथिल जिनगीक रिक्स हर क्षण। मिथिलामे जिनगीक रिक्स बड़ आसान पऱ व्यापारक रिक्स बड़ कठिन अछि। शक्ति शेखर, पिता-श्री शुभनाथ झा, गाम- मोहनपुर, भाया-हरलाखी, जिला-मधुबनी। कखन बदलब हम-शक्ति शेखर बहुत तामस होइए भगवानक एहि कृत्यसँ जे ओऽ अपन उपस्थिति मिथिलांचलमे दर्ज केनाय शायदे कोनो साल बिसरै छथि। मुदा हमरा सबकेँ एहि भयावह स्थितिसँ लड़बाक अलावा आओर कोनो रस्तो तँ नहि अछि। जी, हम बात कऽ रहल छी, एखन बिहारमे आयल बाढिक संदर्भमे। अनुमान लगायल जाऽ रहल अछि, जे अहि बाढिक चपेटमे करीब 50 लाख लोक आयल छथि। सभ साल जुलाई-अगस्तक मास अबिते बिहारक लोक आतंकित भऽ जाइत छथि।सबहक मोनमे ई डर रहै छनि, जे एहि बेर केकर घर उजरतौ। लोकसब भरि साल दिन राति मेहनत कऽ एकटा घर बनाबैत छथि, किछु पूंजी जमा करैत छथि,मुदा की होइए एहि सभसँ? ई बाढि तँ कोनो आतंकवादीसँ बेसी भयावह होइत अछि जे हर बेर कतेको गामकेँ, कतेको बिगहा जमीनकेँ अपन अंदर समेट लैत अछि। संबधित विभाग बाढिकेँ लऽ कऽ सब जानकारी राखितो कोनो तरहक कदम नहि उठाबैत अछि। शायद ई बाढि हुनका सभक लेल आमदनीक एकटा श्रोत जे होइ-ए। पछुलका बाढि सभक राहत-अनुदानपर नजर दौड़ाबी तँ निधोक एक बात कहनाइ अनुचित नहि होयत, जे बाढिसँ कतेको लोक करोड़पति सेहो भऽ गेलाह। ईश्र्वरक लीला देखियौक, जे एक दिस एहि बाढिसँ सभ बेर कतेको लोक (शायद अनुमान लगेनाय असंभव अछि) केर सब चीज लुइटे जाय छनि, तँ दोसर दिस बाढि घोटालाक अभियुक्त आओर कतेको लोक करोड़पतिक गिनतीमे आबि गेलाह। ओहि दृश्यक बारेमे सोचल जाय, जे पूर्णियामे बाढिक डरे अपन छत पर बैसल चारि सालक बच्चा भूखसँ अपन दम तोड़ि देलक, ओहि लोकक बारेमे सोचि, जिनका खेनाय तँ दूर पिबऽ के लेल पानि तक नहि भेटि रहल छनि। लोकक चापाकल बाढिक पानिमे डुबि गेल छनि। हिनका सभ लग किएक नहि पहुंचि पाबि रहल छनि राहत सामाग्री। कहिं एहन तँ नहि जे फ़ेर सँ कतेको लोक एहि बाढिमे करोड़पति बनए वला छथि। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बिहारक बाढिकेँ राष्ट्रीय आपदा घोषित तँ कऽ देलन्हि मुदा पीड़ितक लेल ई सांत्वना मात्र अछि। केन्द्र सरकार दिससँ बिहारक बाढि पीड़ितक लेल 1000 करोड़ रुपया अनुदानक राशि देल गेल अछि। मुदा एहि अनुदानक राशिक विषयमे अखनो कतेको बाढि पीड़ित केँ मालूम नहि चलि सकल अछि। जिनका अहि बारेमे जानकारी भेटबो कैल तँ निश्चित ओऽ सोचने हेताह कि शायदे एहि राशिमे सँ हुनका सभकेँ किछु भेटत। केन्द्र सरकार ई राशि तँ दऽ कऽ अपन बाढि पीड़ितसँ तँ अपन पल्ला झाड़ि लेलाह, मुदा बाढि पीड़ित तक ई राशि कोना पहुंचि सकत, एहि बारेमे हुनकर ध्यान नहि गेल अछि। एक बेर फ़ेरसँ कहब जे ई अनुदानक राशि सब विभाग तक बटैत बटैत दस प्रतिशतो बाढि पीड़ित तक नहि पहुंचि सकत। आओर हँ, बाढिक दोगमे जे सभसँ पैघ चीज होइत अछि ओऽ अछि राजनीति। कतेको नेता सभ एहि बाढि पीड़ितक लेल आगिमे घी देनाय जेहेन काज करैत छथि। राज्य सरकार केँ दोषी ठहराबैत नेता सब ओहि जगह अपन सीट सुनिश्चित करबाक फ़िराकमे रहैत छथि। हेलीकाप्टरसँ बाढि क्षेत्रक सर्वेक्षण करैत बहुतो नेतासभकेँ अतबो जानकारी नहि रहैत छनि जे ओऽ कोन क्षेत्रक दौड़ा कऽ रहल छथि। पता एहि बातसँ लगायल जाऽ सकैत अछि जे नेतासभ ओहि क्षेत्रक कतेक ज्ञान रखने छथि। इमहर राज्य सरकार सेहो कहां चुप रहए वला। ओऽ केन्द्रपर निशाना साधैत छथि तँ केन्द्र राज्य सरकार पर। एहि राजनीतिमे पिसाइत तँ बाढि पीड़ित छथि। कोनो बात नहि, समय आबि गेल अछि एकजुटता देखाबएबाक  आऽ मदति करबाक....बाढि पीड़ितक संग, बाढि पीड़ितक लेल। तखने हम स्वतंत्र भारतक कर्तव्यनिष्ठ नागरिक भऽ सकए छी। जोगार 'हम आपको दिखा रहे हैं कि कैसे फ़ला आदमी किसी मामले को दबाने के लिए दुसरे को पैसा दे रहे है। यह हमारे चैनल के स्टिंग आपरेशन का नतिजा है जो सिर्फ़ दिखा रही है।' जी,इ पंक्ती अछि आजुक समय के सब घटना स अपना सब के देखा रहल इलेक्ट्रोनिक चैनल के। अपना के सब स ऊपर पहुंचाबय के लेल ओ सब हथकंडा अपना लैत अछि। विडंबना इहो देखु जे सब चैनल वला अपना के राजा हरिश्चंद्र के सत्य निती पर आधारीत बताबैत अछि। बहुतो चैनल वला सब कोनो काज के तह तक पहुचबाक लेल हमेशा एकटा हथकंडा अपनाबैत अछि जाहि के अहि युग मे स्टिंग आपरेशन कहल जायत अछि। माने इ जे हम इ हम देखा रहल छी जे बस अहाक लेल अछि आ सत्य अछि। मुदा कहल जाय त एकटा सत्य मीडिया खास क इलेक्ट्रोनिक मीडिया मे अहि शब्दक बोलबाला अछि। जी,हम बात क रहल छी 'जोगार' के। आजुक युग मे बहुतो युवा के रुझान पत्रकारीता दिस झुकि रहल छैन। लाखो रुपया ओ सब अहि पत्रकारिता के पढाई पर खर्च क दैत अछि। शायद किछ उम्मीद के संग जे ओहो सब एक दिन अहि क्षेत्र मे अपन नाम रौशन करताह। मुदा कि होइया अतेक पढाई लिखाई केलाह स? पढाई के संग संग कतेको लोकनि के पत्रकारीता मे काज करबाक लेल जोगार सेहो लगाबअ पड़ै छैन। एक तरह स कहु त डीग्री डिप्लोमा स पहिले कोनो चैनल मे पहुंचबाक लेल हुनका सब के सब स पहिले त जोगार लगाबहे पड़ै छैन। अनुचित नहि हैत जौं कहि त जे पत्रकारीता क्षेत्र मे घुसबाक लेल सब स जरुरी जोगार होयत अछि। आब त कतेको चैनल सब आ अखबार एजेंसी सब अपन-अपन संस्थान सेहो खोलि लेने अछि,इ कहि क जे पढाई समाप्ती के बाद हुनका सब के ओहि चैनल आ अखबार एजेंसी मे काज देल जायत। साधारण वर्ग सब पत्रकारीता के पढाई करलाक बादो ओ सब अहि संस्थान मे नामांकन नहि ल सकैत छथि। चैनल वला सब के अहि कदम स साधारण तबका वला युबासब के अहि चैनल मे काज खोजनाय पहाड़ खोदनाय एहन भ रहल अछि। सोचल जाय जे ओ चैनल वा अखबार एजेंसी वला सब अपन संस्थानक विद्यार्थी के छोड़ि क दोसर गाटे के कियाक काज देत। बड पैघ पैघ गप्प करैत छथि इ चैनल वा अखबार वला सब जे भारत मे बेरोजगारी अहि हद तक बढि रहल अछि आ दोसर दिस अपने जोगारक मंत्र पर काज दैत अछि। ध्यान दि जे अखन समाचार चैनल वा अखबार एजेंसी मे काज क रहल छथि,ओहि मे स एहन कतेक व्यक्ती छथि जिनकर कोनो नहि कोनो संबंध अहि क्षेत्रक माफ़िया सब स नहि छैन। प्रतिशत मे देखल जाय त जोगार वला सबहक प्रतिशत शायद 80 तक पहुंच जायत। एक तरह स कहि त जे अहि पत्रकारीता क्षेत्र मे ज्यादा स ज्यादा दिन तक टिकबाक लेल जिगार रहनाय आवश्यक अछि। ओना त सब क्षेत्र मे जोगार अपन एक अलग स्थान राखैत अछि मुदा पत्रकारीता क्षेत्र के लेल एकर महत्व विशेष मे भ जायत अछि। पत्रकारीता के देशक चारिम स्तंभ मानल जायत अछि आ इ स्तंभ जोगार पर टिकल अछि। कि जिनका लक  जोगार नहि अछि,ओ पत्रकारीता क्षेत्र मे काज नहि क सकैत छथि? फ़ैसला ओहि सब लोकनि के लेबअ पड़तैन जे अहि मे संलिप्त रहै छथि,जिनकर नाम ल क जोगार लगाबअ पड़ैत अछि,ओहि सब युवासब के लेल के काइल के भविष्य छथि। ओमप्रकाश झा, गाम, विजइ, जिला-मधुबनी। मिथिले तक नहि छथि मैथिल-ओमप्रकाश झा गप्प अछि नवंबर 2007 केर, एहि समयमे हम गोवा न्यूज (जे कि गोवा अवस्थित अंग्रेजी क्षेत्रीय न्यूज चैनल छ्ल) मे काज करैत रही। गोवामे सोलहम अंतराष्ट्रीय मैथिली परिषदक सम्मेलन भेल छ्ल, जकर अध्यक्षता श्री विनय कुमार झा ,चीफ़ विजिलेंस,गोवा स्टेट केलथि। एहि कांफ़रेंसक एकटा छोट सनक अंश यू-टयूब साइट पर सेहो उपलब्ध अछि। एहि कार्यक्रमकेँ कवर करबाक भार अपन संस्थासँ हमरे भेटल छ्ल। एहि कार्यक्रमक दौरान बहुत रास चित्र जे स्पष्ट भऽ कऽ सोझाँ आयल ओऽ ई सभ छल....... 1.बहुत रास मैथिल छतीसगढ आऽ मध्य प्रदेशमे बसल छथि। हालांकि आब हुनका सबहक मातृभाषा मैथिली नहि रहि गेल अछि। यदि आओर तहमे जाई तँ ओऽ लोकनि मैथिली भाषा बिसरि चुकल छथि, तथापि मिथिलासँ ओतबेक स्नेह आऽ लगाव छन्हि, जतबाक हमरा सबकेँ अछि। हुनकर सबहक पुस्त बहुत पहिने ओतए चलि गेल रहथिन्ह। गप्प करीब 4-5 पुस्त पहिनेक अछि। 2. दिल्लीक नांगलोई इलाकामे सेहो किछु रास मैथिल छथि, जे कि अपन जीवन-यापनक क्रममे कतेक रास आन आन व्यवसाय सब अपना लेने छथि। संगहि देशक भिन्न- भिन्न भागमे कतेको ठाम मैथिल लोकनि वृहद समुदायक संग रहि रहल छथि। ओना भाषा एहिमे सँ बहुतो गोटेक हरा गेल अछि। 3. एकटा आरो गप्प जे कि सामने आयल ओऽ छल, जे कि गोवाकेँ मैथिले ब्राहम्ण सब बसेने छथि आऽ एकर प्रमाण स्कन्द पुराणमे भेटैत अछि। हम अहाँ केँ ई बात कहि दी, जे कि गोवन (गोवाक वासी) सबहक मातृभाषा कोंकणी अछि मुदा एहि भाषाक बहुतो रास शब्द मैथिली भाषाक अछि। किछु शब्दक बारेमे हम अहाँ सबकेँ कहि रहल छी, जेना कि अदहन (भातक लेल गरम कएल गेल पानि), पाहुन (गेस्ट), मधुर आदि। ओहो सब कोजगरा दिन लक्ष्मी पूजा करैत छथि। रहन-सहनक स्तर अपना सबसँ बहुत हद तक मिलैत अछि। आओर तहमे गेनाय अखन उचित नहि अछि। कार्यक्रममे कतेको मिथिला-विभूति सब उपस्थित छलाह। वर्तमानमे दिल्ली पुलिसमे वरिष्ठ अधिकारी श्री उज्जवल मिश्र ओहि ठाम तत्कालीन डी.आइ.जी. छलाह। भारतक विभिन्न भागक संगे नेपालक किछु रास प्रतिनिधि सब सेहो पहुंचल छलाह। एहि कार्यक्रमक कवर करबाक लेल गोवा न्यूज आऽ नेपाल टीवी (नेपालक) चैनल पहुंचल छल, जखन कि बड़का-बड़का मैथिल पुरोधा सब गोवामे विभिन्न मीडिया लेल काज करैत छथि। बादमे जहन हुनका सबसँ जिज्ञासा बस पुछलियन्हि तँ कुनू ने कुनू ओहने बहाना बना लेलाह, जेना कि जखन प्रधानमंत्री स्व० राजीव गांधीक समयमे मधुबनी के एम०पी० हनान अंसारी लोक सभामे मैथिली केँ अष्टम सूचीमे जोरबाक लेल आवाज बुलंद केलथि तँ श्री भोगेन्द्र झा जी जे कुनू बहान्ना बनेने रहथि। हम एकर तहमे नहि जाय चाहब, सब गोटे बुझि रहल छी। अल्पज्ञ कहु वा किशोर हमरा मोनमे कतेको प्रश्न उठए लागल जे एनामे मैथिली कोना बचल रहत। हयऔ, हमर भाषा कुनू अन्य भाषा सँ कनिको कमजोर नहि अछि। हमरा लोकनि अंग्रेजी बाजैत छी, आधुनिक परिधान पहिरैत छी, सबटा बड्ड नीक बात अछि। मुदा एहि तमाम चीजक मूल्यक रुपमे अपन भाषा आऽ संस्कृति केँ उत्सर्ग केनाय हमरा नहि पचि रहल अछि। ई तँ ओहने गप्प भेल जेना किछु रास लोककेँ आर्थिक तंगी नहि रहलाक बादो दोसरसँ कर्ज लेबाक प्रवृति होय छन्हि। परिवर्तनक फ़ेज सँ गुजरि रहल अपन समाज कहीं त्रिशंकु तँ नहि बनि रहल अछि।एखन बस एतबे। मीडिया कतअ ल जा रहल अछि? गप आरुषि कांड के करी वा मिथिलांचल मे आयल कोसी के कहरक या हाल मे दिल्ली मे भेल सिरीयल बम ब्लाष्टक। यदि अहां सब पछिला किछु दिनका मीडिया के इतिहास पर नजरि डालि तअ देखु जे ओ कि परोसि रहल अछि आ विडंबना देखु,दर्शक/पाठक के जे ओ ओकरा यथावत ग्रहण करबाक लेल बाध्य छथि। मीडिया के भूमिका के लेल अपना अहि ठाम एकटा कहावत 'खशी के जान जाय,आ खाय वला के स्वादे नहि' वला सहत प्रतिशत ठीक बैस रहल अछि। हमरा बुझा रहल अछि जे अहां सब सनक पाठक लेल मीडियाक छवि के आओर उजागर केनाय उचित नहि हैत। अहि स छोड़ि यदि मीडिया के आंतरिक संरचना पर ध्यान दी त जतेक निम्न काटि वा अहु स खराब जैं कुनु शब्द होय त संबोधनक स्वरुप ल सकैत छी। यदि टीवी पर देखाय वला सुन्दर चेहरा वा अखबार/मैगजिन मे लिखै वला पुरोधा सब के निजी जीवन मे झांकि क देखब त ओहि मे स अधिकतर व्यक्ती के व्यक्तित्वक समीक्षा केलाक बाद मोन घृणित भ जायत। मुदा विडंबना देखु जे सब गोटे सब बात बुझैत बेबस छी। जे मीडिया दोसरक स्टिंग आपरेशन करैया कि ओकरा लेल सेहो स्टिंग आपरेशन नहि होयबाक चाहि? मुदा इ के करत? हम सब त बगनखा पहिरने छी। बहुतो मैथिल पुरोधा सब मीडिया के शिर्ष पद सब के सुशोभित क रहल छथि,मुदा कि मजाल जे ओ कखनो सत्य बाजि दैथ। हमहु ओहि भीड़ मे कतौह के कतौ शामिल छी,इ कहैत कोनो लाज नहि भ रहल अछि। कहियो तिलक जेकां पत्रकार होयत छलाह। मुदा आजुक पत्रकार सब समाज के धनाढय वर्ग मे स आबैत छथि। पाठकगण अहां सब मे स जे कियो मीडियाकर्मी होयब त हमरा माफ़ क देब,मुदा कि हम सब इ दोहरा चरित्र जीवन जिबअ स मुक्त नहि भ सकै छी? अपन पूर्वज के रुप मे मंडण,अयाची,जनक आ विद्यापति के संतान हम सब कतह जा रहल छी? अहां सब मे स जे कियो मीडिया के नजदिक स नहि देखने होय त कोनो निकट परिचत जे अहि क्षेत्र मे काज क रहल हेताह,हुनका स पुछि लेबन्हि। जैं सत्य बाजअ चाहताह त सच्चाई स अवगत भ जायब। कोना बचत मिथिलाक स्मिता ? आई जहन  अपना सबहक चहुतरफ़ा विकास भ रहल अछि त हम सब अपन महत्वांक्षा के पाबि के अत्यधिक प्रसन्न भ रहल छी,हेबाको चाही। मुदा कि महत्वाकांक्षा के रथ पर सवार भ कअ हम सब कतेक मगरुर नहि भ गेल छी जे अपन स्मिता अपना स कोसो दूर पाछु छुटि रहल अछि। मुदा तकरा समेतनिहार कियो नहि अछि। आय अपना अहिठामक युवा वर्ग अत्यधिक दिग भ्रमित भ रहल अछि,ओकरा कियो सहि मार्ग दर्शक नहि भेट पाबि रहल अछि। अखुनका समय कतेको पाबनि तिहार क महिना आबि गेल अछि आ कतेको गाम मे दुर्गा पूजा के अवसर पर सास्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कैल जायत अछि मुदा किछु वर्ष पूर्व मे चलु-आइ सअ आलो पहिले हर गाम मे युवक सब नाटक खेलाय छलाह,महिनोतक रामलिला ले आयोहन होयत छल,ओ सब आय कतह चलि गेल छथि। कि आर्केस्ट्रा आ परोसी (तवायफ़) के नाच मे ओ सब हरा गेल छथि। परोसजी के कार्यक्रम इ असर पड़ैत अछि जे मंदिरक कार्यकर्ता सब सेहो एकर मजा उठाबअ लागैत अछि। इमहर मौका पाबि कुकुर,बिलाड़ि मैया के प्रतिमा के सेवा मे लागि जाइया। देखने हैब जे कुकुर मुर्ती के चाटि रहल अछि। उमहर हम सब अपन तीन पुस्तक (पुरुखा) संग माने बाप- बेटा आ पोता समेत बाईजी पर पाई लुटाबय के अवसर के नहि गवांबैत छी। अधिकतर गोटे अहि स अवगत होयब। दोसर कतअ जा रहल अछि अपन संस्कार? हयउ,आब शायद कतौ महिनो तक चलैबला रामलिलाक तम्बु गाम मे देखायत होयत? हम अपन छोट सनक अनुभव अपने संग बांटअ चाहब। पहिले रामलीला के टोली के कियो माला (मने एक दिनक भोजन) उठेनिहार नहि होइ,माने इ जे मात्र पेटे पर जे टीम सबहक मनोरंजनक वास्ते तैयार रहैत छल,ओकरा अपन समाज नकारि देलक मुदा आखन प्रायःहर छोट पैघ शहर अतह तक कि देशक राजधानी मे दुर्गा पूजा के अवसर पर लाखो आदमी रामलीलाक खुब लुफ़्त उठबैत छैथ। कतो कतो तअ रामलीला देखै के लेल टिकट सेहो लागैत अछि,कि हम झूठ बाजि रहल छी। एना मे दु टा गप्प जे हमरा स्पष्ट भेल-पहिल जे लोक के ओहि प्रति ओ रुझान नहि रहलन्हि जे कि बाईजी के नाच मे वा कौआल-कौआली मे जे कि राति भरि सबके गरिया क चलि जाइया आ हजारो आदमी मंदिरक आस पास ततबाक गोत गोबर कअ दैत छथि जे अगिला किछु महिना तक उमहर नहिये जाय मे कुशल बुझैत छी। अहि स गामक कलाक ह्रास खूब पैघ स्तर पर भेल अछि,सब गोटे बुझिति अंजान छी। तेसर आ गंभीर गप्प इ जे समाज मे जे भाई चारा प्य््रव मे छल कि ओ खत्म भ गेल अछि। कि अपन समाज ततेक गरीब तअ नहि भ गेल अछि जे आहिठम दस गोटे के भोजन करेनाय आय कठिन भ गेल अछि। एकर एकटा छोट सनक उदाहरण हम देबअ चाहैत छी जे जौं अंहा सब मे स किछु आदमी दिल्ली-बंबई स कमा क मास दिनक लेल गाम जायत होय तअ अनुभव करैत होयब जे गाम मे बीतल समय के संगे संग अपनेक मेंटिनेन्स पर होय वला खर्च मे कटौति सेहो सबगोटे व्यक्तीगत अनुभव के गहराई स देखु। अखन बस अतेबैक। इति महाप्रकाश (१९४६- ), जन्म वनगाँव, सहरसा। १९७२ ई. मे पहिल कविता संकलन "कविता संभवा"। आधुनिक मैथिली कथा-साहित्यमे एकटा नाम जे सर्वाधिक स्वीकृत आ प्रसिद्धि पौलक अछि, ओ थिक- सुभाष चन्द्र यादव। सुभाषक कथा-यात्रा पर दृष्टिपात करैत ई लगैत अछि जे ओ कथाक अन्वेषण कयलनि अछि। प्रायः लेखनक आरम्भ करिते ओ अनेक स्थान आ अनेक भाषाक यात्रा शुरू कयलनि। ई यात्रा वा भटकाव, जे हुनक नियति सेहो रहल अछि, हुनका अनुभव सँ लैस कयलक, तीक्ष्ण दृष्टि देलक आ अपन समकालीन सँ अलग विशिष्ट सांचामे ढालि देलक। श्यामल किशोर झा, लेखकीय नाम श्यामल सुमन, जन्म १०।०१।१९६० चैनपुर  जिला  सहरसा  बिहार, स्नातक । शिक्षा:अर्थशास्त्र  राजनीति शास्त्र एवं अंग्रेजी, विद्युत अभियंत्रणमे डिपलोमा, प्रशासनिक पदाधिकारी,टाटा स्टील, जमशेदपुर,स्थानीय समाचार पत्र सहित देशक अनेक पत्रिकामे समसामयिक आलेख, कविता, गीत, गजल, हास्य-व्यंग्य आदि प्रकाशित, स्थानीय टी वी चैनल एवं रेडियो स्टेशनमे गीत गजल प्रसारण, कैकटा कवि सम्मेलनमे सहभागिता ओ मंच संचालन। प्यास हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल! भूख लागल अछि एखनहुँ, उमरि बीत गेल!! हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल! नौकरी की भेटल, अपनापन छूटल! नेह डूबल वचन केर आश टूटल!! दोस्त यार कतऽ गेल, नव-लोक अपन भेल! गाम केर हम बुधियार, एतऽ बलेल!! हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल! आयल पावनि-त्योहार, गाम जाय केर विचार! घर मे चर्चा केलहुँ तऽ, भेटल फटकार!! नहि नीक कुनु रेल, रहय लोक ठेलम ठेल! कनियाँ कहली जाऊ असगर, आ बन्द करू खेल!! हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल! की कहू मन के बात, छी पड़ल काते कात! लागय छाती पर आबि कियो राखि देलक लात!! घर लागय अछि जेल, मुदा करब नहि फेल! नवका रस्ता निकालत, सुमन ढ़हलेल!! हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल! राजेन्द्र विमल (1949- )।चामत्कारिक लेखन-प्रतिभाक स्वामी राजेन्द्र विमल नेपालक मैथिली साहित्यक एक स्तम्भ छथि। मैथिली, नेपाली आ हिन्दी भाषाक प्राज्ञ विमल शिक्षाक हकमे विद्यावारिधि (पी.एच.डी.)क उपाधि प्राप्त कएने छथि। सुललित शब्द चयन एवं भाषामे प्राञ्जलता डा. विमलक लेखनक विशेषता रहलनि अछि। अपन सिद्धहस्त लेखनसँ ई कोनहु पाठकक हृदयमे स्थान बना लैत छथि। कथा आ समालोचनाक सङ्गहि मर्मभेदी गीत गजल लिखबामे प्रवीण डा. विमलक निबन्ध, अनुवाद आदि सेहो विलक्षण होइत छनि। कम्मो लिखिकऽ यथेष्ट यश अरजनिहार डा. विमलक लेखनीक प्रशंसा मैथिलीक सङ्गसङ्ग नेपाली आ हिन्दी साहित्यमे सेहो होइत रहलनि अछि। खास कऽ मानवीय संवेदनाक अभिव्यक्तिमे हिनक कलम बेजोड़ देखल जाइत अछि। त्रिभुवन विश्वविद्यालयअन्तर्गत रा.रा.ब. कैम्पस, जनकपुरधाममे प्राध्यापन कएनिहार डा. विमलक पूर्ण नाम राजेन्द्र लाभ छियनि। हिनक जन्म २६ जुलाई १९४९ ई. कऽ भेल अछि। साहित्यकारक नव पीढ़ीकेँ निरन्तर उत्प्रेरित करबाक कारणे ई डा.धीरेन्द्रक बाद जनकपुर-परिसरक साहित्यिक गुरुक रूपमे स्थापित भऽ गेल छथि। जनकपुरधामक देवी चौक स्थित हिनक घर सदति साहित्यक जिज्ञासुसभक अखाड़ाजकाँ बनल रहैत अछि। डा. राजेन्द्र विमलक गजल १. नयनमे उगै छै जे सपनाकेर कोँढ़ी फुलएबासँ पहिने सभ झरि जाइ छै कलमक सिनूरदान पएबासँ पहिने गीत काँचे कुमारेमे मरि जाइ छै चान भादवक अन्हरिये कटैत अहुरिया नुका मेघक तुराइमे हिंचुकै छल जे बिछा चानीक इजोरिया कोजगरामे आइ खेलए झिलहरि लहरिपर ओलरि जाइ छै हम किछेरेपर विमल ई बूझि गेलियै नदी उफनाएल उफनाएल कतबो रहौ एक दिन बनि बालू पाथरक बिछान पानि बाढ़िक हहाकऽ हहरि जाइ छै के जानए कखन ई बदलतै हवा सिकही पुरिवाकेर नैया डूबा जाइ छै जे धधरा छल धधकैत धोंवा जाइ छै सर्द छाउरकेर लुत्ती लहरि जाइ छै रचि-रचिकऽ रूपक करै छी सिंगार सेज चम्पा आऽ बेलीसँ सजबैत रहू मुदा सोचू कने होइ छै एहिना प्रिय सींथ रंगवासँ पहिने धोखरि जाइ छै २.. जगमग ई सृष्टि करए तखने दिवाली छी प्रेम चेतना जागि पड़ए तखने दिवाली छी जीर्ण आ पुरातनकेँ हुक्का-लोली बनाउ पलपल नव दीप जरए तखने दिवाली छी स्नेहकेर धार बहत बनत जग ज्योतिर्मय हर्षक फुलझड़ी झरए तखने दिवाली छी अनधन लछमी आबए दरिदरा बहार हो रङ्गोली रङ्ग भरए तखने दिवाली छी रामशक्ति आगूमे रावण ने टीकि सकत रावण जखने डरए तखने दिवाली छी तृष्णा- राजेन्द्र विमल आइ फेर बहु-बदला भेलैए कहाँ दन!...गे दाइ, गे दाए! रजदेबाके बहु सिकिलिया आ देबलरैनाके बहु सोनावती। सिकिलिया ओना छै मोसकिलसँ अढ़ाइ हाथक मौगी मुदा सउँसे गोर देहमे गजगज मासु करै छै। देखिते होएत जे काँचे चिबा जाइ। टोङि देबै, बन्न दऽ सोनित फेकि देतै। देहपर जेना इस्त्री कएल होइ; छिहलैत आऽ गतानल अंगअंग। देबलरैनके मुँहसँ तँ कहिया सऽ ने लेर चूबैत रहै-लसलस। देबलरैना-बहु सोनाबती, रोलल-छोलल, पोरगर करची सन लचलच करैत देह। रजदेबाके ततराटक लागि जाइक- देखैक तँ देखिते। एक्के टोलमे दसे घरक तऽ फरक हएतै दुनूक घरमे। छिनरझप्पबाली सोनावतियो केहन मन सरभसी जे जखने रजदेबासँ नयन मिलै कि छट्ट दऽ बिहुँसि उठै अंग-अंग- जेना लौका लौकि गेल होइ भीतरे भीतर। उपर सऽ सतबरती जे बनैय। रजदेबा माने राजदेव मंडल, अंचल अस्पतालमे चपरासी अछि। बाप ओकरा जनमऽ सँ पहिनहि सरग सिधारि गेल रहथिन्ह। पोसल केऽ तऽ माए। एकटा बहीन रहै चंचलिया। सभ कहै कुमरठेल्ली। सउँसे गाम अनघोलकएने रहै छौंड़ी। कहियो खेसारीक झारमे पकड़ल जाइक, कहियो राहरि खेतमे केयो देखि लैक। कहिने कते आगि भगवान देहमे देने रहथिन्ह। चंचलियाक माय कहै जे ई देहक आगि थोड़बे रहैक, पेटक आगि रहै, पेटक। आब जे रहौक, मुदा ओ मारलि गेलि। ओकरा लऽ कऽ दू टा मनसामे झगड़ा भऽ गेलैक। जगदिसबा कहै जे हमर धरबी अछि, मनमोहना रिक्साबला कहै जे हम्मर माल अछि। चंचलिया दुन्नूकेँ दूहै छलि। से बरदास्स नहि भेलै मनमोहना रिक्साबलाकेँ। ताड़ीक झोंकमे रिक्साक पुरना चेनसँ तेना ने ततारऽ लगलै जे होशे ने रहलै। सउँसे देहसँ सोनित बहि रहल छलै आ ओ मुँह बाबि देने छलि। परिवारमे विधवा माय छलै, स्वयं छल, सिकिलिया छलै आऽ पाँच बरखक बेटा रहै। बेटा बड्ड सुन्नर आ बड़ ठोला! चंचलिया तऽ संसारसँ उठिए गेलै। आब परिवारक सुखाएल आँतक घघरा मिझएबाक लेल सोनित सुखएबाक जिम्मेबारी रजबेक छलै। जूआमे चुपचाप कान्ह लगा देलक आ बहए लागल। बहु रहै चमचिकनी, फरदेबाल आ फसलीटीबाली। रोज गमकौआ तेल चाही, स्नो-पाउडर चाही। रङसँ ठोर नइँ रङब, लिपेस्सी चाही। सिनेमामे चसकलि। जी-मुँह चलिते रहइ। पनपियाइमे घुघनी-मुरही, कचरी भरि पोख। दुसंझी। रोज-रोज माछु-मासु गमकैत रहउ आङनभरि- ने किछु तऽ डोका-ककरि। आकि कछुएक झोर। कतेक दिनसँ एक जोर परबा पोसक लेल रगड़ा कए रहलि छलि साँयसँ। छमकि कए एमहर, छमकि कए ओमहर। राति-राति भरि झूलन देखए, सलहेसक नाचमे खतबैया टोलक झुलफिया या नटुआक नाच आ सतरोहनाक बिपटइ देखि-देखि कऽ लहालोट भऽ जाए। रजबाकेँ ई सभ सतखेल्ली मौगिक लच्छन बुझाइक, तेँ रोज बतकुटौअलि होइ। रिक्साबला देबलरैनासँ यारी रहै रजदेबाकेँ। देबलरैना सिकलियाके बड़ पसिन्न। कारण रहै जे देबलरैना सेहो सलहेसक नाचमे ढोलकिया रहै। ईह ढोलक बजबैकाल ओकर कनहा जे उपर-नीचाँ होइ छल- गुम-गुमुक-गुमुक...गुम गुमुक गुमुक! .. बेर-बेर झुलफी मुँहपर खसि पड़ै जकरा ओ ओहिना छोड़ि दैक। मुँहपर बुनकिआएल ओसक बूँद सन पसेना! ओ मोनहि मोन अपन साँय रजदेबासँ देबलरैनाक मिलान करै। ... कहाँ देबलरैना, कहाँ रजदेबा। रजदेबाक मुँहपर चौबीस घंटा जेना विपत्तिके झपसी लधने रहै। घोघनमुँहा एक रत्ती ने सोहाइ सिकिलियाकेँ। मगर करओ तऽ की करओ? सिङार-पटार कए एकान्तमे एसगर बिछाओनपर पड़ि रहय आ कल्पना करए-साँय जे बदलतै! देबलरैना फुलपेन्ट पेन्हि कऽ, चसमा पेन्हि कऽ बाबू-भैया नाहित जे रिक्शापर बैठिकऽ रिक्सा चलबइ हइ तऽ सिनेमाके गोबिना माउत कऽर हइ। .. मानली जे ताड़ी-दारू पीबै हइ, त की भेलइ। सुनइ छिऐ जे कहाँदुन ताड़ी-दारु पीलै हइ मनसासुन तऽ ओकरा देहपर राछच्छी सबार भऽ जाइ छै, मौगीके छोड़ने ने छोड़ै छै।..धौर, केनाकऽ सकैत होतै देबलरैना बहु।..रजदेबा ला धन्न-सन! बिछाओनोपर जाएत त खाली घरेके समेस्सा। ..रङ आ लस!! .. देहो हाथ छूबैतऽ खौंझा कऽ छूटत!.. देबलरैनाके बँसुरीके आवाज सुनएलै। ..दारू पीकऽ अबै छै तऽ आङनमे बैसिकऽ बँसुरी टेरऽ लगै छै।..अहाहाहा..की राग, की तान।..सोनाबतीके तऽ लीरीबीरी कऽ दै छै। फेर दुनू परानीमे मुँहाठुट्ठी होइत-होइत पिटापिटौअल शुरू भऽ जाइत छै।..सोनाबतीके कहब छै जे मरदाबा जे कमाइ हए से तऽ दारू पानीमे उड़ा दै हए, सिनेमामे गमा दै हए आ सूतऽ लागी हरान रहै हए।..पेटमे अन्न नैआ.. “मनसा तऽ रजदेबो हइ”- सोचैए सिकिलिया- “ओकरा सूतऽ के मन नै होइ हइ?..केरबा आमसन मुँह लटकओने रहैए!” सिकिलियाके अपने हँसी लागि जाइ छै। “दोसजी कहाँ गेलखिन”?- अरे, ई बारह बजे रातिमे सोनाबती!!.. “की हइ, हे”?- बाँसक फट्टक खोलिकऽ सिकिलिया बाहर अबैत अछि।..छौंड़ाक बाप तऽ नै एलैगऽ अस्पताल सऽ।..लैटडिपटी (नाइट ड्यूटी) हइ।..” “बहीन की कहियो दुखके बात। आइ फेनू मनसा मारलकगऽ।“ “कइला?” “धुर। की जान गेलिऐ कोन बढ़मकिटास हइ देहपर।..हमर तऽ जान लऽ लेलक।..अन्न-पानी जरि गेलै, जी-जाँघमे खौंत फुकने रहै छै चौबीस घंटा।– बलू, चल नऽ सूतऽ।..सुतना बेमारी धऽ लेलकैगऽ।“..सोनाबती घौलेघौले बजैत रहल। जोर-जोरसँ घोल-चाउर भेलै तँ बुढ़िया रजदेबामाइ टुघरि कऽ अङनामे आएल- गे, की भेलउ गऽ? चुप, लबरी। साँइयो बहुके बातके कहूँ एते घोलफचक्का भेलै गऽ?” सोनाबती घेओना पसारलकि। रित्ती रित्ती कऽ फाटल, सतरह ठामसँ गिरह बान्हल अपन नूआ आ अङिया देखओलकि। घरबाली अन्न बेत्रेक मरै छै आ ओ दारु-ताड़ी पीबिकए बेमत्त भेल रहै छै। घरमे लाल बुद्दी नं दै छै। दारू पी कऽ सेजपर ओकर गत्रगत्रमे दाँत गड़ा दै छै! “इस्स!” रजदेबाबहुके मुँहसँ अनायासे बहार भऽ गेलै। भीतर चीनीक गरम पाक जेना टघरि रहल छलै। ओ गत्रगत्र देबलरैनाक हबकबाक कल्पनामे हेरा गेलि। “हे बहीन!..मनसा नै भोगतओ तँ ई देह लऽ कऽ की करबा।..एक दिन अँचियापर तऽ सबहक देह जरै छै!”- रजदेबा-बहु समझओलकै। रजदेबामाइ दुरदुरओलकै। ताबत डिप्टीसऽ रजदेबो घूरि अएलै। आङनमे ठहाठहि इजोरियामे चमकैत सोनाबतीक मुँह चमकैत देखलक। नयन मिललै, सोनावती विहुँसि देलकि, जेना रजनीगंधा फूल झरझरा गेलै। मोनप्राण गमैक उठलै। रजदेबा बाजल किच्छु नैं। बस पुछलकै- “की भेलौ गऽ भौजी?” सोनावती फेर सउँसे खेरहा दोहरओलकि।... सिकिलिया चौल कएलकै- “साँय बदलबे?” “सहे तऽ ने उपाइ हइ।..तोहर डागदरसनके साँय हउ गजै छे।..अस्पतालमे काम करै हउ। ने दारू, ने पानी। घरगिरहस्थी डेबने हउ। भरिमुँह कोनो छौंड़ी मौगी जरे बोलबो ने करइ हउ। अपन काम से काम। एहन महाभारथ पुरुख हमर भागमे कहाँ?..” सिकिलियाकें देह जरि गेलै- हइ गोबरके चोत महाभारत कहाँदुन! मनसरभसी। अपना साँय महकै छनि आ छौंड़ाक बाप जरे केना रसिया-रसिया, सिलिया बतिआइ हए। “बहीन, तौँ घर जा।..तोहर साँयके दोसरकेँ सम्हारि देत ओ? जे अपन साइँयो के कसमे ने रखलक, से मौगी कथिके?” आ सिकिलिया रजदेबाक बाँहि पकड़ि घरदिशि घीचय लागलि। रजदेबामाइके पित्त लहरि गेलै। सोनाबत्ती कनिकाल थरभसाएलि, फेर बाजलि-“दोस जी!..हम आइ घरे नैं जबे..फेन “निम्मन सऽ कूटत।..” ओकर आकृति कातर छलै। “अहाँ जाउ। लोक फरेब जोड़त”। रजदेबा समझओलकै। ओ घूरि गेलि। सभ अप्पन-अप्पन फट्टक लगा लेलक। मुदा, भोरे उठल रजदेबा जँगलझार लेऽ तँ देखलक जे देबलरैनाके बहु दरबज्जापर एकटा फेकल तरकुन्नीपर ओंघराएलि छै, घर नैं गेलउ।..कनिकाल ओ टुकुर-टुकुर ओकर मुँह तकैत रहल। केना निभेर भऽकऽ सूतलि छै, दुधपीबा पिहुआजेकाँ। नूआँ-बस्तर अस्त-व्यस्त। बिन तेलकूँड़क जट्टा पड़ल, भुल्ल भऽ गेल पैघ पैघ केश, भुँइयापर एमहर-ओमहर जौंड़ जेकाँ लेटाएल। ओकरा देवलरैनापर बड्ड तामस भेलै। सोन-सनक सोनावती अन्न-वस्त्र बेत्रेक झाम भऽ गेलै- बीझ लागल ताम-सन। एखनो जँ नहा धो देल जाइक आ सिङार कऽ दै तऽ झकाझक भऽ जएतै। मुदा दोस तऽ दारू पीकऽ मस्त रहै छै। सलहेसक नाचमे ओकर ढोलकक गुमकीपर खतबैया टोलक कतेको छौंड़ी-मौगी ओकरापर जान दओ छै। दोसजी, खत्ता-पैन, चर-चाँचर, राहरि-कुसियारक खेत, भुसुल्ला घर, पोखरिक भीर जत्तहि पओलक, तत्तहि छौंड़ी-मौगी लऽकऽ...। राम-राम।..एहन गुनमन्तीके एना काहि कटबै हइ, दोसजी निम्मन नहि करै हइ! बड़ समझओलकै रजबा सोनाबतीके। सोनाबती नैं गेलै। देबलरैनाके धन्न-सन। खोजैत-खोजैत एक्के बेर सुरुज जखन नीचाँ अएलै तऽ बँसुरी टेरैत आएल। सोनाबतीके भरिपाँज पकड़ि कए चुम्माचाटी लेबए लागल।– सबहक सामने! दरूपिबाके कोन लाज आ बीज। रजबामाइके हँस्सी लागि गेलै। सोनाबत्ती मनसाकेँ धकेलि देलकै, मनसा धाँय दऽ चारूनाल चित्त खसल। बिच्चे आङनमे।..चटाक!...मनसा उठिकए एक चाट देलकै। मौगी घेओना पसारलकि। मनसाकेँ धन्न-सन।..दोसजी अस्पतालमे रहै। सिकिलियाक बेटाके “मैंगोफ्रूटी”क खाली डिब्बा कतहु सड़कपर फेकल भेटि गेल रहै। ओ ओहिमे पानि धऽधऽ पीबै छल। सिकिलियाक नजरि पड़लै-“केहन लगइ हउ?” छौंड़ा हँसि देलकै- आमके रस नहिंता!..पीबे?” सिकिलियाक मोन भेलै- एक बेर ओहो पीबि कए देखैत। ओ बड़का-बड़का बाबू-भैया सबके पीबैत देखने रहै।..मुदा, ओइमे तऽ पतरसुट्टी फोंफी लागल रहै, एइमे कहाँ हइ?.. ओ बड़ा ललचाएल दृष्टिसँ फ्रूटीक डिब्बाकेँ देखि रहलि छलि। “दोस्तिनी, पीयब?”-देवलरैना टुभ दऽ पूछि बैसल। दोस्तिनीक आँखिमे फ्रूटीक लालच, पतिसँ उलहन, अभावजन्य वेदना लक्काबाज देवलरैनाकेँ झक् दऽ लौकि गेलै। “चलू दोस्तिनी, फ्रूटियो पीयब, सिनेमो देखब आ होडरोमे खाएब। घूमैत-घूमैत राति तओले च्हलि आएब”।– देवलरैना बजलै आ फेर कोन जादूके बान लगलै कहिने, सिकिलिया चट दऽ ओकर रिक्सापर बैसि गेलि। सभ मुँहे तकैत रहि गेलै। ओ जे गेलै सिकिलिया से फेर ६ महीना नैं घुरलै। सोनाबती रजबाके घरसऽ टकसऽ के नाम नैं लै। पऽर भेल, पंचैती भेल। दुनू मौगीमे सँ कोनो अपन-अपन साँय लग घुरबाक लेल तैयार नहि भेलि। छओ मासक बाद दुनू अपन-अपन मनसा लग कनैत-कनैत घूरलि-ढाकीक ढाकी सिकाइत नेने। सिकिलिया आ सोनाबती एक दोसरक गरदनि पकड़ि झहरा देमए लागलि। सिकिलियाक घेओनाक आशय छल- देबलरैनाके मुँह महकै छै, ओ बदमास अछि, गुन्डा अछि, निसेबाज अछि, लापरवाह अछि; स्वार्थी अछि आदि-आदि। सोनावती छाती पीटिपीटि बेयान करै छलि- रजबा गुम्मा अछि, बहुसँ बेसी मायकें मानै अछि, दिनराति पाइ लेऽ खटै अछि आ सभ पाइसँ घरे चलबै अछि, बहु ले कहियो कचरी- मुरही नै अनने अछि। कहियो सिनेमा नैं जाइ अछि, बहुकें चुम्मा नैं लैत अछि..आदि...आदि... दुनू अपन-अपन ओरिजिनल साँय लग घूरि गेलि। मनोविज्ञानक प्रोफेसर सत्यनारायण यादव कहलैन्हि- यार, जे भेटैत छै, तकर मोल नै बुझाइ छै। जकर पति गंभीर छै ओकरा चंचल पतिक लेल मोन पनिआइ छै, जकर चंचल छै से गंभीर पतिक लेल सिहाइए..इएह क्रम छै...नो वन इज परफेक्ट.. एक दिन सिकिलिया आ सोनावती सुनू एक-एकटा कोनो मनसा संगे उरहरि गेलै- ओहो एक्के दिन। रजदेबामाइ भोरेसँ आसमान माथपर उठा लेलकि- “जुआनी कक्कर ने उमताइ हइ..फेनू बान्ह हइकि नै।..समाज आ पलिवारके बन्हन टूटि जतइ तऽ मनसा-मौगी जिनगी भरि अहिना भँड़छि-भँड़छि कए मरि जतइ... प्रो. सत्यनारायणक व्याख्या छैन्हि- म्यान इज पोलिग्यामस बाइ नेचर..इट इज सोसाइटी ह्विच च्यानलाइजेज सेक्स एनर्जी..सओ मुँह, सओ बात!..सबसँ बड़का सत्य जे सोनाबती, सिनकिलिया दुनू उरहरि गेल! वृषेश चन्द्र लाल-जन्म 29 मार्च 1955 ई. केँ भेलन्हि। पिताः स्व. उदितनारायण लाल,माताः श्रीमती भुवनेश्वरी देव।  हिनकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छन्हि। मूलतः राजनीतिककर्मी । नेपालमे लोकतन्त्रलेल निरन्तर संघर्षक क्रममे १७ बेर गिरफ्तार । लगभग ८ वर्ष जेल ।सम्प्रति तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक राष्ट«ीय उपाध्यक्ष । मैथिलीमे किछु कथा विभिन्न पत्रपत्रिकामे प्रकाशित । आन्दोलन कविता संग्रह आ बी.पीं कोइरालाक प्रसिद्ध लघु उपन्यास मोदिआइनक मैथिली रुपान्तरण तथा नेपालीमे संघीय शासनतिर नामक पुस्तक प्रकाशित । ओ विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि। नेपाली राजनीतिपर बरोबरि लिखैत रहैत छथि। फेकनाक दिआबाती—बृषेश चन्द्र लाल

दिआबातीमे फुलझडी, अनार भुइँपटका आ कनफर्रा फटक्कासभसँ कात आँखि बचा—बचाकय फेकना ताकि रहल अछि तेल बुताएल दिआसभमे एक मुठि भातपर सुअदगर तिलकोरक तरुआ लोभेँ! क्षणक छनाक...! १ चाही सभके शासन चलबएला अनुशासन ! २ लाल पहाड महाभारतबला ? खूनक ढेरी ! ३ मीत अपने हएबन्हि, ओ किछु अओर छथि ! ४ ‘एकता’ माने सभलेल नै खाली ‘एकटा’लेल ! ५ गढैअछि शब्द काबिलसभ, बात चिबबैलेल ! ६ सफल भेल अपनेस ? जरुर फेरल हैत ! ७ सनकी अछि दोष देखोनिहार धरतीपर ! ८ बरिआतमे छिटल गेल इत्र गन्हाइ छलै ! ९ पुरान मन रचतै युग नव ? नइ हेतै ! १० गैंडाक खाक ओकर शिकारक कारण थिक ! रोशन जनकपुरी डर लगैए नाचि रहल गिरगिटिया कोना, डर लगैए साँच झूठमे झिझिरकोना, डर लगैए कफन पहिरने लोक घुमए एम्हर ओमहर शहर बनल मरघटके बिछौना, डर लगैए हमरे बलपर पहुँचल अछि जे संसदमे हमरे पढ़ाबे डोढ़ा-पौना, डर लगैए आङनमे अछि गुम्हरि रहल कागजके बाघ घर घरमे अछि रोहटि-कन्ना, डर लगैए आँखि खोलि पढ़िसकी तऽ पढ़ियौ आजुक पोथी घेँटकट्टीसँ भरल अछि पन्ना, डर लगैए चलू मिलाबी डेग बढ़ैत आगूक डेगसँ आब ने करियौ एहन बहन्ना, डर लगैए डा. रेवतीरमण लाल मधुश्रावनी मधुश्रावनी आएल मन-मन हर्षए चहुँदिस साओन सुन्दर घन वर्षए काँख फुलडालि मुस्कथि कामिनी मलय पवन सुगन्धित शीतल दमकए दामिनी नभ मंडलमे घनघोर मानू जल नहि वर्षए ई विरही यक्षक नोर झिंगुर बेंङ्ग गुञ्जए जल थल अछि चहुँओर। रूपा धीरू- जन्मस्थान-मयनाकडेरी, सप्तरी, श्रीमती पूनम झा आ श्री अरूणकुमार झाक पुत्री।स्थायी पता- अञ्चल- सगरमाथा, जिल्ला- सिरहा। प्रथम प्रकाशित रचना-कोइली कानए, माटिसँ सिनेह (कविता),भगता बेङक देश-भ्रमण (कनक दीक्षितक पुस्तकक धीरेन्द्र प्रेमर्षिसँग मैथिलीमे सहअनुवाद,सङ्गीतसम्बन्धी कृति- राष्ट्रियगान, भोर, नेहक वएन, चेतना, प्रियतम हमर कमौआ (पहिल मैथिली सीडी), प्रेम भेल तरघुस्कीमे, सुरक्षित मातृत्व गीतमाला, सुखक सनेस। सम्पादन-पल्लव, मैथिली साहित्यिक मासिक पत्रिका, सम्पादन-सहयोग,हमर मैथिली पोथी (कक्षा १, २, ३, ४ आ ५ आ कक्षा 9-10 क ऐच्छिक मैथिली विषय पाठ्यपुस्तकक भाषा सम्पादन), पल्लवमिथिला, प्रथम मैथिली इन्टरनेट पत्रिका,वि.सं. २०५९ माघ (साहित्यिक), सम्पादन-सहयोग। अङ्गेजल काँट- रूपा धीरू नहि जानि बहिना किएक आइ तोँ बड़ मोन पड़ि रहल छह आ ताहूसँ बेसी तोहर ओ छहोछित्त कऽ देबवला मर्मभेदी वाण। बहिना तोँ कहने रहऽ हमरा ऐँ हइ बहिना! एहन काँट भरल गुलाबकेँ अपन आँचरमे एना जे सहेजने छह तोरा गड़ैत नहि छह? तोँ उत्तर पएबाक लेल उत्सुक छलह मुदा हम मौन भऽ गेल रही आ तोँ मोनेमोन गजिरहल छलह। हँ बहिना, ठीके हमरो तोरेजकाँ अपन जिनगीमे फूलेफूल सहेजबाक सपना रहए आ अगरएबाक लालसा रहए तोरेजकाँ अपन जिनगीपर मुदा की करबहक...! मोन पाड़ह ने छोटमे जखन अपनासभ ती-ती आ पँचगोटिया खेलाइ बेसी काल हमहीँ जीतैत रही मुदा जिनगी जीबाक खेलमे हम हारि गेल छी बहिना। काँट काँटे होइ छै बहिना गड़ै कतहु नहि मुदा हम काँटेकेँ अङेजि लेने छी मालिन जँ काँटकेँ नइ अङेजतै बहिना तँ फेर गुलाब महमहएतै कोना? नवीन नाथ झा (नवनीत)- जन्म २०.०१.१९४०, बी.ए.ऑनर्स सह एल.एल.बी., पिता- श्री बैद्यनाथ झा, गाम- भटोत्तर (चकला), जिला पूर्णिया १. दया करू माँ अहाँक शरणमे आएल छी माँ, दया कऽ केँ अपनाबू माँ। अहीँके चरण-कमलमे रमल छी माँ, दुःखी मन दोसर राह नै, सुझै अछि माँ चोट बहुत खायल छी माँ, दुनियासँ ठुकराईल माँ दया करु माँ, दया कऽ केँ अपनावू माँ॥१॥ अहाँ... माँ अपन आँचरक शीतल, सुरभित, हवासँ ताप एवम् कष्ट हरु माँ, परञ्च, मिलल नहि प्रतिदान कनेको, हर पगपर स्वार्थक लीला, चलन जगतक निराले माँ अहाँक शरणमे आएल छी माँ, दया कऽकेँ अपनाबू माँ॥२॥ (जगत) संसार माया जालमे फँसल अछि माँ, दुनियां आतंकसँ आक्रान्त अछि माँ, अज्ञानताक-अंधकारसँ भरल अछि माँ अनुशासनक कमी खलै अछि माँ॥ अहाँक शरणमे आएल छी माँ, दया कऽकेँ अपनाबू माँ...॥३॥ अपन परायाक ज्ञान घटल अछि, अधर्मक, अकर्मक बाजार गर्म अछि एहि जगसँ अज्ञानताक-अंधकार दूर करू माँ- अहींक शरणमे आएल छी माँ, ताप रहहोँ...॥४॥ दुखी जनक दुःख दूर करू माँ सत्कर्मक भाव जन-जनमे अविलम्ब आबिकेँ अहीं भरू माँ। अहींक शरणमे आएल छी माँ, दया कऽकेँ अपनावू माँ॥५॥ विश्व कल्याणक भाव सभमे जगा दियो माँ, सत्यम् शिवम् सुन्दरम् क ज्ञान सभमे भरि दियो माँ वसुधैव कुटुम्बक विचार सन्चारित कऽ दियो माँ अहींक शरणमे आएल छी माँ, दया कऽकेँ अपनावू माँ “अस्तु” दिगम्बर झा “दिनमणि” १ चल रौ बौआ चलै देखऽले घुसहा सब पकड़ेलैए घुसुर घुसुर जे घुस लैत छल, से सब आइ धरैलैए मालपोत, भन्सार, पुलिस कि, कर अदालत जेतौं घूसखोरक संजाल पसारल छै बाँच नै पबितौं अनुसन्धानक कारवाइमे सवहक होस हेरेंलैए विना घूसके कहियो ककरो, जे नै कानो काज करै बैमानी सैतानी करबा, मे नै कनिको लाज करै क्यो कानूनके चंगुलमे फँसने परदेस पड़ेलैए २ हम सुना रहल छी तीन धार भारी सहैत अछि भार कहथि सभ खेती सहिते अछि उजाड़। गिद्दड़ सन सुटकओने नाङरि आगू पाछ जे छल करैत। जे भोर साँझ, दश लोक माझ, हमरे दिश छल रहि-रहि बढ़ैत। हम आङुर पकड़ि जकरा पथपर अति शिघ्र चलाऽ देलौं हमरे प्रगतिक पथकेँ आगाँ, से ठाढ़ भेल बनिकऽ पहाड़॥ हम सुना ककरा कहबै के सुनत आब, पओ कतौ छैक छै कतौ घाव, हम भेलौं आब हड्डी समान, कहियो हमहीं रुचिगर कवाव। हम घास खाअकऽ पालि-पोसि, जकरा कएलौं दुधगरि लगहरि, तकरा लगमे जँ जाइत छियै, तऽ हमरे मारैए लथार॥ हम सुना, हम तोड़ि देबै झिक-झोड़ि देबै शाखा फल-फूल मचोड़ि देबै, स्वार्थक छै जे जड़िआएल बृक्ष तकरा जड़िस हक कोड़ि देबै। मनमे जे चिनगी सुनगि रहल, से कहियाधरि हम झाँपि सकब, तें ई मन जहिया लहरि जेतै, तहिया खएतै धोविया पछाड़॥ हम सुना ३ चलैमन जगदम्बाक द्वारि चलैमन जगदम्बाक द्वारि। सब दुःख हरती झोड़ी भरती, बिगड़ल देती सम्हारि॥ चलै मन... मधु कैटभक डरे पड़एला जटिया स्वयं विधाता। पूजन ध्यान बन्दना कएलनि कष्टहरु हे माता॥ बोधल हरि मारल मधु कैटभ बिधिकेँ कएल गोहारि। चलै मन.. महिषासुरक त्राससँ धरती थर-थर काँपए लागल छोड़ि अपन घर द्वारि देवता ऋषि मुनि जंगल भागल। हुनका सबहक कष्ट हरि लेलनि महिषासुरकेँ मारि। चलै मन.. हुँ कारक उच्चरित शब्दसँ धुम्र गेल सुरधाम। चण्ड-मुण्ड आ रक्तवीजकेँ मिटा देलनि माँ नाम। शुम्भ-निशुम्भ मारि धरतीसँ दैत्य कएल निकटारि॥ चलै मन... शशि कुज बुध गुरु शुक्र शनिश्रवर की दिनमणिक तारा। सर, नर मुनि, गन्धर्व अप्सरा सबहक अहीँ सहारा। हमरो नैया पार करु माँ, भबसँ दिय उबारि। चलै मन... डॉ मित्रनाथ झा, १९५६- , पिता स्वनामधन्य मिथिला चित्रकार स्व. लक्ष्मीनाथ झा प्रसिद्ध खोखा बाबू, ग्राम-सरिसब, पोस्ट सरिसब-पाही, भाया- मनीगाछी, जिला-मधुबनी (भारत), सम्प्रति मिथिला शोध संस्थान, दरिभङ्गामे पाण्डुलिपि विभागाध्यक्ष ओ एम.ए. (संस्कृत) कक्षाक शिक्षार्थीकेँ एम.ए. पाठ्यक्रमक सभ पत्रक अध्यापन। लेखन, उच्चस्तरीय शोध ओ समाज-सेवामे रुचि। संस्कृत, मैथिली, हिन्दी, अंग्रेजी, भोजपुरी ओ उर्दू भाषामे गद्य-पद्य लेखन। राष्ट्रीय ओ अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर सुप्रतिष्ठित अनेकानेक पत्र-पत्रिका, अभिनन्दन-ग्रन्थ ओ स्मृति-ग्रन्थादिमे अनेको रचना प्रकाशित। राष्ट्रीय ओ अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर आयोजित अनेको सेमिनार, कॉनफेरेन्स, वर्कशॉप आदिमे सक्रिय सहभागिता। विदेह-वैभव विद्या-वैभव केर गरिमासँ सर्वथा पुक्त जे सिद्ध भूमि। अन्तर कदापि नहि जे कएलक अप्पन वा आनक थातीमे॥ देलक सदिखन जे पूर्ण ज्ञान निश्छलता ओ कर्मठतासँ। मद्धिम कखनहुँ नहि पड़य देल, दय तेल ज्ञान केर बातीमे॥ हवि ज्ञानक अप्पन सतत बाँटि, हो बुद्धिक कोनो अनुष्ठान। शिक्षाक भनहि हो कोनो विधा, वर्जित नहि हिनकर पातीमे। अक्षुण्ण राखि निज-मर्यादा, अन्यहु क्षेत्रक कएलक विकास। मिथिला केर तापस ज्ञान-भानुसँ, के-के नहि लेलक प्रकाश॥ मतवैभिन्यक अप्पन महिमा, के नहि जनैछ ई दिव्यभूमि। तमसँ आच्छादित मार्ग कोनो, त्वरिते पाओल ज्ञानक प्रकाश॥ रहि मध्य मार्ग केर अनुगामी, कामी नहि कोनहु तुच्छ फलक। कएलक प्रयास विध्वंसक बड़, पर कए न सकल किञ्चित् विनाश॥ होता कोनहु हो, यजमानक ज्ञानक मानक हो ध्यान सदा। मिथिला केर पावन धरतीपर, गुञ्जित हो ज्ञानक गान सदा॥ भग्न चिन्तन चिन्ताक तप्त दावानलमे हम की रचनात्मक कार्य करू। हियमे तँ अबैछ लहरि भावक, पर धार कोना ई पार करू॥ त्रिभुवन केर प्रायः कोनो वस्तु, मानव-चिन्तनसँ दूर नञि। की भावनाक ई दिव्य महल, होएत हमरासँ पूर नञि॥ लेखनी हमर ई बाजि रहल, की हमरा अपनहि भरि रखबेँ। मानस पट से धिक्कारि रहल, की समय एतबहि भरि रखबेँ॥ खाली हाथेँ जाएत सभ क्यो, ई नीक जेकाँ हम जनैत छी। लेखनीक आइ दुर्दशा देखि, एकान्त मौन भए कनैत छी॥ कारण जनैत छी नहि जाएत भूतलसँ संग एक्कोटा कण। पर मित्र भाग्यसारणी हमर नहि देलक एहन कोनो यक्षण॥ जेहि अनुपमेय क्षणमे अप्पन भावना अतीतकेँ दोहराबी। भग्ना वीणा केर रुग्ण तारपर दू आखर हमहूँ गाबी। श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ जन्म-1951 ई. कलकत्तामे।1966 मे 15 वर्षक उम्रमे पहिल काव्य संग्रह ‘कवयो वदन्ति’ | 1971 ‘अमृतस्य पुत्राः’(कविता संकलन) आ’ ‘नायकक नाम जीवन’(नाटक)| 1974 मे ‘एक छल राजा’/’नाटकक लेल’(नाटक)। 1976-77 ‘प्रत्यावर्त्तन’/ ’रामलीला’(नाटक)। 1978मे जनक आ’ अन्य एकांकी। 1981 ‘अनुत्तरण’(कविता-संकलन)। 1988 ‘प्रियंवदा’ (नाटिका)। 1997-‘रवीन्द्रनाथक बाल-साहित्य’(अनुवाद)। 1998 ‘अनुकृति’- आधुनिक मैथिली कविताक बंगलामे अनुवाद, संगहि बंगलामे दूटा कविता संकलन। 1999 ‘अश्रु ओ परिहास’। 2002 ‘खाम खेयाली’। 2006मे ‘मध्यमपुरुष एकवचन’(कविता संग्रह। भाषा-विज्ञानक क्षेत्रमे दसटा पोथी आ’ दू सयसँ बेशी शोध-पत्र प्रकाशित। 14 टा पी.एह.डी. आ’ 29 टा एम.फिल. शोध-कर्मक दिशा निर्देश। बड़ौदा, सूरत, दिल्ली आ’ हैदराबाद वि.वि.मे अध्यापन। संप्रति निदेशक, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर। नो एंट्री : मा प्रविश (चारि-अंकीय मैथिली नाटक) नाटककार उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ निदेशक, केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर (मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत 25 वर्षक मौनभंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख  प्रस्तुत भ’ रहल अछि।) पहिल अंक जारी....विदेहक एहि आठम अंक 15 अप्रैल 2008 सँ| नो एंट्री : मा प्रविश (चारि-अंकीय मैथिली नाटक) पात्र–परिचय पर्दा उठितहि  – ढोल–पिपही, बाजा–गाजा बजौनिहार–सब दूटा चोर, जाहि मे सँ एक गोटे पॉकिट–मार आ एकटा उचक्का दू गोट भद्र व्यक्ति प्रेमी प्रेमिका बाजार सँ घुरैत प्रौढ़ व्यक्ति बीमा कंपनीक एजेंट रद्‌दी किनै–बेचैबला भिख-मंगनी रमणी-मोहन नंदी–भृंगी कैकटा मृत सैनिक बाद मे नेता आ नेताक एक-दूटा चमचा/अनुयायी अभिनेता वाम-पंथी युवा उच्च–वंशीय महिला अंत मे यम चित्रगुप्त प्रथम कल्लोल [एकटा बड़का–टा दरबज्जा मंचक बीच मे देखल जाइछ। दरबज्जाक दुनू दिसि एकटा अदृश्य मुदा सक्कत देवार छैक, जे बुझि लेबाक अछि– कखनहु अभिनेता लोकनिक अभिनय–कुशलता सँ तथा कतेको वार्तालाप सँ से स्पष्ट भ’ जाइछ। मंच परक प्रकाश–व्यवस्था सँ ई पता नहि चलैत अछि जे दिन थिक अथवा राति, आलीक कनेक मद्धिम, सुर–संगत होइत सेहो कने मरियल सन। एकटा कतार मे दस–बारह गोटे ठाढ़ छथि–जाहि मे कैकटा चोर–उचक्का, एक-दू गोटे भद्र व्यक्तित मुदा ई स्पष्ट जे हुनका लोकनिक निधन भ’ चुकल छन्हि। एकटा प्रेमी–युगल जे विष-पान क’ कए आत्म-हत्या कैल अछि, मुदा एत’ स्वर्गक (चाही त’ नरकक सेहो कहि सकै छी) द्वार लग आबि कए कने विह्वल भ’ गेल छथि जे आब की कैल जाइक। एकटा प्रौढ व्यक्तित जे बजारक झोरा ल’ कए आबि गेल छथि–बुझाइछ कोनो पथ–दुर्घटनाक शिकार भेल छथि बाजार सँ घुरैत काल। एकटा बीमा कंपनीक एजेंट सेहो छथि, किछु परेशानी छनि सेहो स्पष्ट। एकटा रद्‌दीबला जे रद्दी कागजक खरीद–बिक्री करैत छल, एकटा भिखमंगनी–एकटा पुतलाकेँ अपन बौआ (भरिसक ई कहै चाहैत छल जे वैह छल ओकर मुइल बालक अथवा तकर प्रतिरूप) जकाँ काँख तर नेने, एक गोट अत्यंत बूढ़ व्यक्ति सेहो, जनिक रमणी–प्रीति एखनहु कम नहि भेल छनि, हुनका हमसब रमणी–मोहने कहबनि। सब गोटे कतार मे त’ छथि, मुदा धीरजक अभाव स्पष्ट भ’ जाइछ। क्यो-क्यो अनकाकेँ लाँघि आगाँ जैबाक प्रयास करैत छथि, त’ क्यो से देखि कए शोर करय लागैत छथि। मात्र तीन–चारिटा मृत सैनिक–जे कि सब सँ पाछाँ ठाढ़ छथि, हुनका सबमे ने कोनो विकृति लखा दैछ आ ने कोनो हड़बड़ी। बजार-बला वृद्ध :  हे – हे – हे देखै जाउ... देखि रहलछी कि नहि सबटा तमाशा... कोना–कोना क’ रहल छइ ई सब ! की ? त’ कनीटा त’ आगाँ बढ़ि जाई ! [एकटा चोर आ एकटा उचक्का केँ देखा कए बाजि रहल छथि, जे सब ओना त’ चारिम तथा पाँचम स्थान पर ढ़ाढ छैक, मुदा कतेको काल सँ अथक प्रयास क’ रहल अछि जे कोना दुनू भद्र व्यक्ति आ प्रेमी–प्रेमिका युगलकेँ पार क’ कए कतारक आगाँ पहुँचि जाई!] बीमा एजेंट   :         [नहि बूझि पबैत छथि जे ओ वृद्ध व्यक्ति हुनके सँ किछु कहि रहल छथि कि आन ककरहु सँ। बजार- बला वृद्ध सँ आगाँ छल रद्‌दी बेचैबला आ तकरहु सँ आगाँ छलाह बीमा बाबू।] हमरा किछु कहलहुँ ? बाजारी     :        अहाँ ओम्हर देखब त’ बूझि जायब हम की कहि रहल छी आ ककरा दय...! [अकस्मात् अत्यंत क्रोधक आवेश मे आबि ] हे रौ! की बुझै छहीं... क्यो नहि देखि रहल छौ ? [बीमा बाबू केँ बजारक झोरा   थम्हबैत -] हे ई धरू त’! हम देखै छी। [कहैत शोर करैत आगाँ बढ़ि कए एकटा चोर आ उचक्का केँ कॉलर पकड़ि कए घसीटैत पुनः पाछाँ चारिम-पाँचम स्थान पर ल’ अबैत छथि, ओसब वाद–प्रतिवाद कर’ लगैत अछि -] चोर       :         हमर कॉलर कियै धरै छी ? उचक्का    :         हे बूढ़ौ ! हमर कमीज, फाड़ि देबैं की ? बाजारी     :         कमीजे कियैक ? तोहर आँखि सेहो देबौ हम फोड़ि ! की बूझै छेँ ? क्यो किछु कहै बाला नहि छौ एत’? उचक्का        :        के छै हमरा टोकै–बला एत’? देखा त’ दिय’ ? चोर       :        आहि रे बा ! हम की कैल जे हमर टीक धैने छी? दोसर चोर :    (जे कि असल मे पॉकिट–मार छल) हे हे, टीक छोड़ि दी, नंगड़ी पकड़ि लियह सरबा क ! चोर       :        (गोस्सा सँ) तोँ चुप रह ! बदमाश नहितन ! पॉकिटमार  :        (अकड़ि कए) कियै ? हम कियै नहि बाजब ? उचक्का        :        (वृद्ध व्यक्तिक हाथ सँ अपना केँ छोड़बैत) ओय खुदरा ! बेसी बड़बड़ैलें त’... (हाथ सँ इशारा करैत अछि गरा काटि देबाक) पॉकिटमार  :        त’ की करबें ? उचक्का    :        (भयंकर मुद्रामे आगाँ बढ़ैत) त’ देब  धड़ सँ गरा केँ अलगाय... रामपुरी देखने छह ? रामपुरी ? (कहैत एकटा चाकू बहार करैत अछि।) चोर       :    हे, की क’ रहल छी... भाइजी, छोड़ि दियौक ने ! बच्चा छै... कखनहु–कखनहु जोश मे आबि जाइ छै ! भद्र व्यक्ति 1 :    (पंक्तिक आगाँ सँ) हँ, हँ... छोड़ि ने देल जाय ! उचक्का    :       [भयंकर मुद्रा आ नाटकीयता केँ बरकरार रखैत पंक्तिक आगाँ दिसि जा कए... अपन रामपुरी चाकू केँ दोसर हाथ मे उस्तरा जकाँ घसैत ] छोड़ि दियह की मजा चखा देल जाय ? [एहन भाव– भंगिमा देखि दुनू भद्र व्यक्ति डरै छथि–प्रेमी– युगल अपनहिमे मगन छथि; हुनका दुनू केँ दुनियाक आर किछु सँ कोनो लेन-देन नहि...] की ? [घुरि कए पॉकिट–मार दिसि अबैत... तावत् ई सब देखि बाजारी वृद्धक होश उड़ि जाइत छनि... ओ चोरक टीक/कॉलर जे कही... छोड़ि दैत छथि घबड़ा कए ] की रौ ? दियौ  भोंकि ? आ कि…? चोर       :        उचकू–भाइजी ! बच्चा छै... अपने बिरादरीक बुझू...! [आँखि सँ इशारा करै छथि।] उचक्का    :        [अट्टहास् करैत] ऐं ? अपने बिरादरीक थिकै ? [हँसब बंद कए- पूछैत] की रौ ? कोन काज करै छेँ? [पॉकिट-मार डरेँ किछु बाजि नहि पबैत अछि– मात्र दाहिना हाथक दूटा आङुर केँ कैंची जकाँ चला कए देखबैत छैक।] उचक्का    :        पॉकिट-मार थिकेँ रौ ? [पुनः हँस’ लागै छथि-छूरी केँ तह लगबैत’] चोर            :        कहलहुँ नहि भाईजी ? ने ई हमरा सन माँजल चोर बनि सकल आ ने कहियो सपनहु मे सोचि सकल जे अहाँ सन गुंडा आ  बदमाशो बनि सकत ! उचक्का    :       बदमाश ? ककरा कहलेँ बदमाश ? आँय ! पॉकिट-मार  :    हमरा, हुजूर ! ओकर बात जाय दियह ! गेल छल गिरहथक घर मे सेंध देब’... जे आइ ने जानि कत्ते टका-पैसा-गहना भेटत ! त’ पहिले बेरि मे जागि गेल गिरहथ, आ तकर चारि–चारिटा जवान-जहान बालक आ सँगहि आठ–आठटा कुकुर... तेहन ने हल्ला मचा देलक जे पकड़ि कए पीटैत–पीटैत एत’ पठा देलक ! [हँसैत... उचक्का सेहो हँसि दैत अछि] आब बुझु ! ई केहन चोर थिक ! (मुँह दूसैत) हमरा कहैत छथि ! [कतारक आनो-आन लोक आ अंततः सब गोटे हँसय लागैत छथि] भद्र-व्यक्तित 1:   आँय यौ,चोर थिकौं ? लागै त’ नहि छी चोर जकाँ... चोर       :        किएक ? चोर देख’   मे केहन होइत छैक ? पॉकिट-मार  :     हमरा जकाँ...! (कहैत, हँसैत अछि, आरो एक-दू गोटे हँसि दैत छथि।) चललाह भिखारी बौआ बन’... ? की ? त’ हम तस्कर-राज छी !  [कतहु सँ एकटा टूल आनि ताहि पर ठाढ़ होइत... मंचक आन दिसिसँ भाषणक भंगिमा मे] सुनू, सुनू, सुनू, भाई–भगिनी! सुनू सब गोटे! श्रीमान्, श्रील 108 श्री श्री बुद्धि-शंकर महाराज तस्कर सम्राट आबि रहल छथि! सावधान, होशियार! [एतबा कहैत टूल पर सँ उतरि अपन हाथ-मुँहक मूकाभिनयसँ एहन भंगिमा करैत छथि जेना कि भोंपू बजा रहल होथि... पाछाँ सँ भोंपू – पिपहीक शब्द कनिये काल सुनल जाइछ, जाबत ओ ‘मार्च’ करैत चोर लग अबैत अछि...] चोर              :       [कनेक लजबैत] नहि तोरा हम साथ लितहुँ ओहि रातिकेँ, आ ने हमर पिटाइ देखबाक मौके तोरा भैटतिहौक! [कहैत आँखि मे एक-दूइ बुन्न पानि आबि जाइत छैक।] पॉकिट-मार  :        आ-हा-हा! एहि मे लजबैक आ मोन दुखैक कोन गप्प? [थम्हैत, लग आबि कए]  देखह! आइ ने त’ काल्हि-चोरि त’ पकड़ले जाइछ। आ एकबेर जँ भंडा- फोड़ भ’ जाइत अछि त’ बज्जर त’ माथ पर खसबे करत ! सैह भेल... एहि मे दुख कोन बातक ? उचक्का        :        (हँसैत) हँ, दुखी कियै होइ छहक? बाजारी         :        [एतबा काल आश्चर्य भए सबटा सुनि रहल छलाह। आब रहल नहि गेलनि – अगुआ कए बाजय लगलाह] हे भगवान! हमर भाग मे छल स्वस्थहि शरीर मे बिना कोनो रोग-शोक भेनहि स्वर्ग मे जायब... तैँ हम एत’ ऐलहुँ, आ स्वर्गक द्वार पर ठ़ाढ छी क्यू मे...! मुदा ई सब चोर–उचक्का जँ स्वर्गे मे जायत, तखन केहन हैत ओ स्वर्ग रहबाक लेल ? पॉकिट-मार  :        से कियै बाबा ? अहाँ की बूझै छी, स्वर्ग त’ सभक लेल होइत अछि ! एहि मे ककरहु बपौती त’ नञि। बाजारी         :     [बीमा एजेंट केँ] आब बूझू ! आब.... चोर सिखाबय गुण केर महिमा, पॉकिट–मारो करै बयान! मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि, पाट–कपाट त’ जय सियाराम ! [चोर-उचक्का-पॉकिट-मार ताली दैत अछि, सुनि कए     चौंकैत भिख-मंगनी आ प्रेमी-युगल बिनु किछु बुझनहि ताली बजाब’ लागैत अछि।] चोर       :        ई त’ नीक फकरा बनि गेल यौ! पॉकिट-मार  :        एम्हर तस्कर-राज त’ ओम्हर कवि-राज! बाजारी     :        (खौंझैत’) कियै ? कोन गुण छह तोहर, जकर बखान करै अयलह एत’? पॉकिट-मार  :        (इंगित करैत आ हँसैत) हाथक सफाई... अपन जेब मे त’ देखू , किछुओ बाकी अछि वा नञि... बाजारी     :        [बाजारी तुरंत अपन जेब टटोलैत छथि – त’ हाथ पॉकिटक भूर देने बाहर आबि जाइत छनि। आश्चर्य चकित भ’ कए मुँह सँ मात्र विस्मयक आभास होइत छनि।] जा ! [बीमा बाबूकेँ आब रहल नञि गेलनि। ओ ठहक्का पाड़ि कए हँस’  लगलाह, हुनकर देखा–देखी कैक गोटे बाजारी दिसि हाथ सँ इशारा करैत हँसि रहल छलाह।] चोर       :        [हाथ उठा कए सबकेँ थम्हबाक इशारा करैत] हँसि त’ रहल छी खूब ! उचक्का    :        ई बात त’ स्पष्ट जे मनोरंजनो खूब भेल हैतनि। पॉकिट-मार  :        मुदा अपन-अपन पॉकिट मे त’ हाथ ध’ कए देखू ! [भिखमंगनी आ प्रेमी-युगल केँ छोड़ि सब क्यो पॉकिट टेब’ लागैत’ छथि आ बैगक भीतर ताकि-झाँकि कए देख’ लागैत छथि त’ पता चलैत छनि जे सभक पाइ, आ नहि त’ बटुआ गायब भ’ गेल छनि। हुनका सबकेँ ई बात बुझिते देरी चोर, उचक्का, पॉकिट-मार आ भिख-मंगनी हँस’ लागैत छथि। बाकी सब गोटे हतबुद्धि भए टुकुर- टुकुर ताकिते रहि जाइत छथि] भिखमंगनी  :        नंगटाक कोन डर चोर की उचक्का ? जेम्हरहि तकै छी लागै अछि धक्का ! धक्का खा कए नाचब त’ नाचू ने ! खेल खेल हारि कए बाँचब त’ बाँचू ने ! [चोर-उचक्का–पॉकिट-मार, समवेत स्वर मे जेना धुन गाबि रहल होथि] नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का ! आँखिएक सामने पलटल छक्का ! भिख-मंगनी :       खेल–खेल हारि कए सबटा फक्का ! समवेत-स्वर :    नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का ? [कहैत चारू गोटे गोल-गोल घुर’ लागै छथि आ नाचि नाचि कए कहै छथि।] सब गोटे      :         आब जायब, तब जायब, कत’ ओ कक्का ? पॉकिट मे हाथ दी त’ सब किछु लक्खा ! नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का ! बीमा-बाबू     :         (चीत्कार करैत) हे थम्ह’  ! बंद कर’ ई तमाशा... चोर       :         (जेना बीमा-बाबूक चारू दिसि सपना मे भासि रहल होथि एहन भंगिमा मे) तमाशा नञि... हताशा....! उचक्का        :         (ताहिना चलैत) हताशा नञि... निराशा ! पॉकिट-मार :        [पॉकिट सँ छह-सातटा बटुआ बाहर क’  कए देखा – देखा कए] ने हताशा आ ने निराशा, मात्र तमाशा... ल’ लैह बाबू छह आना, हरेक बटुआ छह आना! [कहैत एक–एकटा बटुआ बॉल जकाँ तकर मालिकक दिसि फेंकैत छथि आ हुनका लोकनि मे तकरा सबटाकेँ बटौर’ लेल हड़बड़ी मचि जाइत छनि। एहि मौकाक फायदा उठबैत चोर–उचक्का-पॉकिटमार आ भिख-मंगनी कतारक सब सँ आगाँ जा’ कए ठाढ भ’ जाइत छथि।] रद्‌दी-बला  :   [जकर कोनो नुकसान नहि भेल छल-ओ मात्र मस्ती         क’ रहल छल आ घटनासँ भरपूर आनन्द ल’ रहल  छल।] हे बाबू– भैया लोकनि ! एकर आनन्द नञि अछि कोनो जे “भूलल-भटकल कहुना क’ कए घुरि आयल अछि हमर बटुआ”। [कहैत दू डेग बढा’ कए नाचिओ लैत’ छथि।] ई जे बुझै छी जे अहाँक धन अहीं केँ घुरि आयल... से सबटा फूसि थिक ! बीमा-बाबू   :       (आश्चर्य होइत) आँय ? से की ? बाजारी     :       (गरा सँ गरा मिला कए) सबटा फूसि ? भद्र-व्यक्ति 1          :    की कहै छी ? भद्र-व्यक्ति 2          :        माने बटुआ त’ भेटल, मुदा भीतर ढन–ढन ! रद्‌दी-बला  :        से हम कत’ कहलहुँ ? बटुओ अहींक आ पाइयो छैहे! मुदा एखन ने बटुआक कोनो काज रहत’ आ ने पाइयेक! बीमा-बाबू   :        माने ? रद्‌दी-बला  :        माने नञि बुझलियैक ? औ बाबू ! आयल छी सब गोटे यमालय... ठाढ़ छी बन्द दरबज्जाक सामने... कतार सँ... एक–दोसरा सँ जूझि रहल छी जे के पहिल ठाम मे रहत आ के रहत तकर बाद...? तखन ई  पाइ आ बटुआक कोन काज ? भद्र-व्यक्ति1 :       सत्ये त’! भीतर गेलहुँ तखन त’ ई पाइ कोनो काज मे  नहि लागत ! बाजारी     :       आँय ? भद्र-व्यक्ति2 :        नहि बुझिलियैक ? दोसर देस मे जाइ छी त’ थोड़े चलैत छैक अपन रुपैया ? (आन लोग सँ सहमतिक अपेक्षा मे-) छै कि नञि ? रमणी-मोहन :         (जेना दीर्घ मौनता के तोड़ैत पहिल बेरि किछु ढंग केर बात बाजि रहल छथि एहन भंगिमा मे... एहि सँ पहिने ओ कखनहु प्रेमी-युगलक लग जाय प्रेमिका केँ पियासल नजरि द’ रहल छलाह त’ कखनहु भिख-मंगनिये लग आबि आँखि सँ तकर शरीर केँ जेना पीबि रहल छलाह...) अपन प्रेमिका जखन अनकर बियाहल पत्नी बनि जाइत छथि तखन तकरा सँ कोन लाभ ? (कहैत दीर्घ-श्वास त्याग करैत छथि।) बीमा-बाबू   :        (डाँटैत) हे...अहाँ चुप्प रहू! क’ रहल छी बात रुपैयाक, आ ई कहै छथि रूप दय...! रमणी-मोहन :       हाय! हम त’ कहै छलहुँ रूपा दय! (भिख-मंगनी रमणी-मोहन लग सटल चलि आबै छैक।) भिख-मंगनी :      हाय! के थिकी रूपा ? रमणी-मोहन :      “कानि-कानि प्रवक्ष्यामि रूपक्यानि   रमणी च... ! बाजारी     :        माने ? रमणी-मोहन :       एकर अर्थ अनेक गंभीर होइत छैक... अहाँ सन बाजारी नहि बूझत! भिख-मंगनी :       [लास्य करैत] हमरा बुझाउ ने! [तावत भिख-मंगनीक भंगिमा देखि कने-कने बिहुँसैत’          पॉकिट–मार लग आबि जाइत अछि।] भिख-मंगनी :         [कपट क्रोधेँ] हँसै कियै छें ? हे... (कोरा सँ पुतलाकेँ पॉकिट-मारकेँ थम्हबैत) हे पकड़ू त’ एकरा... (कहैत रमणी-मोहन लग जा कए) औ मोहन जी! अहाँ की ने कहलहुँ, एखनहु धरि भीतर मे एकटा छटपटी मचल यै’! रमणी-धमनी कोन बात’ कहलहुँ ? रमणी-मोहन :       धूर मूर्ख! हम त’ करै छलहुँ शकुन्तलाक गप्प, मन्दोदरीक व्यथा... तोँ की बुझबेँ ? भिख-मंगनी :        सबटा व्यथा केर गप बुझै छी हम... भीख मांगि- मांगि खाइ छी, तकर माने ई थोड़े, जे ने हमर शरीर अछि आ ने कोनो व्यथा... ? रमणी-मोहन :        धुत् तोरी ! अपन व्यथा–तथा छोड़, आ भीतर की छैक, ताहि दय सोच ! (कहैत बंद दरबज्जा दिसि देखबैत छथि-) पॉकिट-मार :        (अवाक् भ’ कए दरबज्जा दिसि देखैत) भीतर ? की छइ भीतरमे... ? रमणी-मोहन :      (नृत्यक भंगिमा करैत ताल ठोकि-      ठोकि कए) भीतर? “धा–धिन–धिन्ना... भरल तमन्ना ! तेरे-केरे-धिन-ता... आब नञि चिन्ता !” भिख-मंगनी :       (आश्चर्य भए) माने ? की छैक ई ? रमणी-मोहन :      (गर्व सँ) ‘की’ नञि... ‘की’ नञि... ‘के’ बोल ! बोल- भीतर ‘के’ छथि ? के, के छथि? पॉकिट-मार  :        के, के छथि? रमणी-मोहन :       एक बेरि अहि द्वारकेँ पार कयलेँ त’ भीतर भेटती एक सँ एक सुर–नारी,उर्वशी–मेनका–रम्भा... (बाजैत- बाजैत जेना मुँहमे पानि आबि जाइत छनि--) भिख-मंगनी :       ईः! रंभा...मेनका... ! (मुँह दूसैत) मुँह-झरकी सब... बज्जर खसौ सबटा पर! रमणी-मोहन :       (हँसैत) कोना खसतैक बज्जर ? बज्र त’ छनि देवराज इन्द्र लग ! आ अप्सरा त’ सबटा छथि हुनकहि नृत्यांगना। [भिख-मंगनीक प्रतिक्रिया देखि कैक गोटे हँस’ लगैत छथि] पॉकिट-मार    :     हे....एकटा बात हम कहि दैत छी – ई नहि बूझू जे दरबज्जा खोलितहि आनंदे आनंद ! बाजारी     :         तखन ? बीमा-बाबू   :         अहू ठाम छै अशांति, तोड़-फोड़, बाढ़ि आ सूखार ? आ कि चारू दिसि छइ हरियर, अकाससँ झहरैत खुशी केर लहर आ माटिसँ उगलैत सोना ? पॉकिट-मार :       किएक        ? जँ अशांति, तोड़-फोड़ होइत त’ नीक... की बूझै छी, एत्तहु अहाँ जीवन–बीमा चलाब’ चाहै छी की ? चोर       :         (एतबा काल उचक्का सँ फुसुर-फुसुर क’ रहल छल आ ओत्तहि, दरबज्जा लग ठाढ़ छल– एहि बात पर हँसैत आगाँ आबि जाइत अछि) स्वर्गमे जीवन-बीमा ? वाह ! ई त’ बड्ड नीक गप्प ! पॉकिट-मार :       देवराज इंद्रक बज्र.. बोलू कतेक बोली लगबै छी? उचक्का    :         पन्द्रह करोड़! चोर       :         सोलह! पॉकिट-मार :       साढे-बाईस! बीमा-बाबू   :         पच्चीस करोड़! रमणी-मोहन :         हे हौ! तोँ सब बताह भेलह ? स्वर्गक राजा केर बज्र, तकर बीमा हेतैक एक सय करोड़ सँ कम मे ?                                          [कतहु सँ एकटा स्टूलक जोगाड़ क’ कए ताहि पर चट दय  ठाढ़ भ’ कए-] पॉकिट-मार :       बोलू, बोलू भाई-सब ! सौ करोड़ ! बीमा-बाबू   :         सौ करोड़ एक ! चोर       :         सौ करोड़ दू – रमणी-मोहन :       एक सौ दस ! भिख-मंगनी :       सवा सौ करोड़ ! चोर       :         डेढ़सौ करोड़... भिख-मंगनी :       पचपन – चोर       :         साठि – भिख-मंगनी :       एकसठि – [दूनूक आँखि–मुँह पर ‘टेनशन’ क छाप स्पष्ट भ’ जाइत छैक। ] चोर            :       (खौंझैत)  एक सौ नब्बै... [एतेक बड़का बोली पर भिख-मंगनी चुप भ’ जाइत अछि।] पॉकिट-मार :       त’ भाई-सब ! आब अंतिम घड़ी आबि गेल अछि – 190 एक, 190 दू, 190... [ठहक्का पाड़ि कए हँस’ लगलाह बाजारी, दूनू भद्र व्यक्ति आ रद्‌दी-बला-] पॉकिट-मार :       की भेल ? चोर       :         हँस्सीक मतलब ? बाजारी     :         (हँसैते कहैत छथि) हौ बाबू ! एहन मजेदार मोल- नीलामी हम कतहु नञि देखने छी ! भद्र-व्यक्ति 1          :         एकटा चोर... भद्र-व्यक्ति 2          :       त’ दोसर भिख-मंगनी... बाजारी     :         आ चलबै बला पॉकिट-मार... [कहैत तीनू गोटे हँस’ लागै छथि] बीमा-बाबू   :         त’ एहि मे कोन अचरज? भद्र-व्यक्ति 1          :       आ कोन चीजक बीमाक मोल लागि रहल अछि– त’ बज्र केर ! भद्र-व्यक्ति 2          :       बज्जर खसौ एहन नीलामी पर ! बाजारी     :         (गीत गाब’ लागै’ छथि) चोर सिखाबय बीमा–महिमा, पॉकिट-मारो करै बयान ! मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि, पाट कपाट त’ जय सियाराम ! दुनू भद्र-व्यक्ति  :      (एक्कहि संगे) जय सियाराम ! [पहिल खेप मे तीनू गोटे नाच’-गाब’ लागै छथि। तकर बाद धीरे-धीरे बीमा बाबू आ रद्‌दी-बला सेहो संग दैत छथि।] बाजारी     :         कौआ बजबै हंसक बाजा भद्र-व्यक्ति 1          :       हंस गबै अछि मोरक गीत भद्र-व्यक्ति 2          :       गीत की गाओत ? छल बदनाम ! बाजारी     :         नाट-विराटल जय सियाराम ! समवेत    :         मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि। पाट-कपाटक जय सियाराम ! [चोर-उचक्का-पॉकिट-मार ताली दैत अछि, सुनि कए चौंकैत भिख-मंगनी आ प्रेमी-युगल बिनु किछु बुझनहि ताली बजाब’ लागैत अछि।] (क्रमश:) नूतन झा; गाम : बेल्हवार, मधुबनी, बिहार; जन्म तिथि : ५ दिसम्बर १९७६; शिक्षा - बी एस सी, कल्याण कॉलेज, भिलाई; एम एस सी, कॉर्पोरेटिव कॉलेज, जमशेदपुर; फैशन डिजाइनिंग, निफ्ट, जमशेदपुर।“मैथिली भाषा आ' मैथिल संस्कृतिक प्रति आस्था आ' आदर हम्मर मोनमे बच्चेसॅं बसल अछि। इंटरनेट पर तिरहुताक्षर लिपिक उपयोग देखि हम मैथिल संस्कृतिक उज्ज्वल भविष्यक हेतु अति आशान्वित छी।” जानकी नवमी)13 मई 2008)  पर विशेष निबंध - नूतन झा बारातीसत्कार आजुक आधुनिक परिवेशमे विवाहक पुरान मान्यता आर विधि विधान अपन प्रतीकात्मक स्वरूपमे शेष बचल अछि। दिन पर दिन ओकर स्थान अपव्यय सँ परिपूर्ण परिपाटी लऽ रहल अछि। हम सब पौराणिक आ’ तर्कसंगत विचारक अवशेष मात्र देखि रहल छी। आब निरंतर जीवनशैलीमे आधुनिकताक समावेष भऽ रहल अछि। एकर किछु प्रत्यक्ष लाभो अछि, जेनाकि बढ़ियाँ शिक्षा आ' स्वास्थ्य व्यवस्था। किन्तु आधुनिकताक दुष्परिणामक सूचि बनाबी तऽ ओ’ अनन्त रहत। विवाहादिमे जे आडंबर आ' विलासितापूर्ण प्रदर्शन होइत अछि ओकर निर्वाह सर्व साधारणक लेल काफी कठिन अछि।पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा कएलाक बाद एक साधारण कन्यापक्ष विवाह समारोहक उच्चवर्गीय प्रदर्शनक आर्थिक आघात केँ कोना सहत? विभिन्न प्रकारक ताम-झाम युक्त महग व्यवस्थाक निर्वाह बहुत कष्टकारी होइत छैक। किछु घंटाक शोभा बढ़ाब’ लेल वा विवाह समारोह केँ कथित रूप सॅं अविश्वसनीय बनाबए केर दवाब सॅं लोग हजारों लाखों रूपैया पानिमे बहा दैत अछि। नब पीढ़ीक सुशिक्षित लोक केँ बुझबाक चाही जे विवाहकेँ अविस्मरणीय बनाबैत छैक दू परिवारक आपसी स्नेह आ' सम्बन्ध। विवाहकेँ अविस्मरणीय बनाबैत छैक ओकर सफलता जाहि लेल मात्र निष्ठा आ' विश्वासक प्रचुरता चाही, टेंट हाउस भोज व्यवस्था वा महग कपड़ा लत्ता आर गहना जेवर नञि। ई सभ कृत्रिम साधनक मॉँग मध्यम वर्गीय परिवारक लेल सीमित रहय तखने कल्याण अछि। अपव्यय सॅं बचि कऽ यदि नवयुगक वर कन्या अपन सूझ बूझ सॅं गरिमामय सम्बन्धक शुरूआत करथि तऽ ई सभक हितमे होयत।कन्यापक्ष पर वरपक्ष द्वारा बारातीक भव्य स्वागतक दबाब देखि बड़ा दुख होइत अछि। स्वागत तऽ हृदय सॅं हुअक चाही रूपैया पैसा सॅं नहिं। एकटा गरीब परिवारक व्यथा संवेदनशील व्यक्तिकेँ आडंबरक प्रति आर कठोर बनाबए लेल पर्याप्त अछि। एक कविक कविताक किछु पंक्ति उल्लेखित अछि : ''कोना करू बरियाती जी अहॉंक सत्कार यौ । धानो नहि भेल हमरा रब्बियो के नञि आस यौ ॥ कठिन समय छैक सुनियउ भारी परिवार यौ। रूख सुख जे भेटए कऽ लियउ स्वीकार यौ॥ सम्बन्ध बनाबऽ एलहुँ अहॉं राखू हमरो लाज यौ। घर द्वारो टूटल फाटल दलान पर नहि खाट यौ॥ दिन राति पेट भरय लय करि कऽ रोजगार यौ। खानपियनि दऽ नहि सकलहुँ छी बहुत लाचार यौ॥” आउ हम सब अहि आडंबरक समूल नाश कऽ मिथिलाक गरिमा बढ़ाबी। जानकी-नवमी वैशाख मासक शुक्ल पक्षक नवमी तिथि केँ जानकी-नवमी मनाओल जाइत अछि। लोक ओहि दिन व्रत राखैत छथि आ' सीताजीक पूजा अर्चना करैत छथि। सीता माता लक्ष्मीजीक अवतार मानल गेल छथि, तैँ ई मान्यता अछि जे ई व्रत कएलासॅं सुख एवम्‌ सम्पत्तिक प्राप्ति होइत अछि। एहि वर्ष ई पाबनि अंग्रेजी तारिख १३ मई, २००८ मंगलवार केँ अछि। कथा अछि जे राजर्षि जनकजी केँ सीताजी शैशवावस्थामे अही दिन प्राप्त भेल रहथिन्ह।राजा जनक जनकपुरक राजा छलाह आ' संतानहीन जाहिसँ एहि दु:ख सॅं पीड़ित छलाह।एक दिन कोनो शुभ कार्यक प्रयोजन सॅं ओ’ खेतमे हर जोतए गेलाह। ओही बीच हुनकर हरसॅं लागि एक स्वर्णक कलशमे सॅं एक दिव्य बालिका प्रकट भेलीह, जिनका राजा जनक आ' हुनकर पत्नी सुनयना गोद लऽ लेलखिन। बालिकाक नाम सीता राखल गेल जकर अर्थ होइत अछि हर। देवी सीताक जानकी नाम सेहो पड़ल अछि। किन्वदन्ति अछि जे सीताजी लक्ष्मी माताक अवतार देवी वेदवतीक पुनर्जन्म रूप छलीह। ऋषि कुषध्वजक पुत्री वेदवती परम सुन्दरी छलीह आ स्वयम्‌ केँ विष्णु देव केँ प्रति अर्पित कएने छलीह। अनेको राजासॅं आयल विवाहक प्रस्ताव अस्वीकृत कऽ दैत छलीह। अहि कारणसँ  ओ अहंकारी रावण के सेहो मना कऽ देलन्हि जाहि द्वारे हुनका रावणक अत्याचार सहऽ पड़लन्हि।दुःखी भय वेदवती प्रतिज्ञा लेलन्हि जे ओ अपन पुनर्जन्ममे रावणक विनाशक कारण बनतीह आ स्वयम्‌केँ अग्निमे भष्म क’ लेलन्हि।एहि बीच मन्दोदरि गर्भवती भेलीह। अपन पतिक कुकृत्य दऽ सुनलाक बाद ओ’ अपन भावी संतानकेँ लऽ कऽ आशंकित भऽ गेलीह।ओ’ अपन नइहर गेलीह आ’ अपन माता पिताक संग तीर्थ करय लगलीह। जन्मक समय नजदीक अएला पर ओ’ अपन संतानक लेल आश्रय ताकए लगलीह। तखने संजोगसॅं संतानहीन राज जनकक खिस्सा सुनलन्हि आ' समय पाबि अपन पुत्रीकँ राजाक पथमे नुकाबएमे सक्षम भऽ गेलीह।किछु लोक इहो कहैत छथि, जे संभवत: सीताजीक जन्मक बाद हुनका पानिमे बहा’ देल गेल छल आ’ संयोगसँ ओ’ जनकजीक खेत लग कात लगलीह। कथा इहो प्रचलित अछि जे राक्षसक अत्याचारसॅं हताहत ऋषि मुनिक शोणित एक कलशमे एकत्रित कऽ भूमिमे गाड़ि देल गेल छल। बादमे ओहि कलशसॅं सीताजीक जन्म भेल। जन्मक पाछाँ खिस्सा चाहे जे होए उद्देश्य तऽ रावणक नाशे रहए। एकर सांकेतिक अर्थ यैह अछि जे ‘यत्र नार्येस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’। अर्थात्‌ जतए स्त्रीक आदर होइत अछि ततए देवताक निवास होइत अछि आ' ओकर विपरीत स्त्रीक अपमान करनिहार दुखद अंत पाबैत छथि। किछु लोक मानैत छथि जे सीताक जन्म फाल्गुन मासक कृष्ण पक्षक अष्टमी तिथिकेँ भेल छन्हि। श्री विद्यानन्द झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा। पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आऽ संरक्षणमे संलग्न। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह। ॐ ॥श्री गणेशाय नमः॥ “श्रृष्टि चक्र” आदिमे शुन्य छल शुन्यसँ शान्ति छल। शुन्य केर सत्ता दिग-दिगन्त व्याप्त छल। शून्यक विधाता शून्यसँ आक्रान्त छल। शून्यसँ प्रारम्भ भए शून्यहिसँ विराम छल। विधिना विधान कएल रचना संसार कएल। खेत पथार पोखरि ओ जीवक संचार कएल। दिति ओ अदितिसँ श्रृष्टिक विस्तार कएल। कर्म सभक बान्हि बान्हि धरतीपर आनि धएल। शुन्यक विखंडनसँ वृत्तक विस्तार भेल। पोखरि ओ झांखड़ि पर्वत पहाड़ भेल। नदी-नद तालाब ओ वनस्पति हजार भेल। जीव जङ्गम स्थावर ओ गतिमान संसार भेल। चन्द्र सूर्य नक्षत्र ओ वायु वारिद नीर। धरा-गगन धरि व्याप्त भेल विद्युत ओ समीर। सभतरि पसरल तेज पुञ्ज चकाचौंध गम्भीर। तम-तम करइत दिन दुपहरिया नयन भरल ओ नीर। जल चर- थलचर- नभचर नाना। अप्पन-अप्पन धएलक बाना। विविध भेष ओ भाषा नाना। कएलक निज-निज गोत्र बखाना। विष ओ अमृत संग जनमि गेल। स्नेह-प्रेम-आघात प्रगट भेल। दोस्त-महिम कुटुम्ब अमरबेल। चतरि-चतरि चहुँओर पसरि गेल। एक दिशि जनमल चोर-उचक्का। दोसर दिशि भलमानुष सुच्चा। श्रृष्टि हेतु- समधानल सभटा। प्रभु सभ करथि हुनक ई छिच्छा। गोङ बधिर बजबैका नाङ्गर। श्वेत-श्याम सत्वर ओ अजगर। दीर्घकाय ओ दुव्वर पातर। सभटा रचलैन्हि ओ विश्वम्भर। भूख रचल प्यास रचल। श्रम ओ संधान रचल। रोग रचल व्याधि रचल। औषध अपार रचल। काम भूख दाम भूख वासनाक उग्रभूख। शान-मान-दान भूख भूखक हजार रूप। ई भूख ओ भूख भूखक विद्रूप रूप। भूख मुदा बढ़िते गेल धधकैत विकराल रूप। शाम-दाम-दण्ड भेद शासन कुशासन। काम-क्रोध-लोभ-मोह विरचल “महाशन”। राग-द्वेष-प्रेम-वैर पसरल हुताशन। श्रृष्टि चक्र चलैत रहल वैदिक ऋचा सन।....। घर बनल गाम बनल नगर ओ धाम बनल। जनता जरल सन नेता भगवान बनल। देशक खेवैया झुठ्ठा बेइमान बनल। भक्तिक भभटपन पण्डा शैतान बनल। श्रृष्टि चक्र चलैत रहल वैदिक ऋचा सन।... पाद-टिप्पणी: १.वारिद-मेघ २.समधानल-ओरियाकऽ ३.छिच्छा-स्वभाव ४.संधान-अन्वेषण,खोज ५.महाशन-विष्णु ६.हुताशन-अग्नि. अमित कुमार झा, चैनपुर, सहरसा बुढ़ी माता अपन परिवार- माँ, बाबूजी, भाइ, बहिन) संग पटनाक शेखपुरामे रहैत रही, बाबूजी पी.डब्लू. डी. मे एस.डी.ओ. एकटा प्रसिद्ध ईमानदार अधिकारी रहथि, सभसँ पैघ भैया पी.एच.ई.डी.दुमकामे पोस्टेड रहथि। हम सेंट जेवियर्स स्कूल, गाँधी मैदानसँ बारहमा करैत रही, पढ़ाइ-लिखाइमे बहुत नीक रही, पढ़ाइ-लिखाइक अलावा कोनो काज नहि रहए, ओइ पढ़ाइ-लिखाइक कारण हम बहुत कम उम्रमे नीक पद- मैनेजर बिरला ग्रुप- पर छी, हमर किछु दोस्त रहए जे ओहि समयक पैघ राजनीतिक परिवारसँ संबंधित छलाह- एहि विषयमे बादमे कहब- आइक तिथिमे सेहो बहुत पैध स्थानपर छथि। बारहमाक संगहि राम मनोहर राय, एस.पी.वर्मा रोड, पटनासँ मेडिकल एन्ट्रेंसक तैयारी सेहो करैत रही। मुख्य घटना मोन पड़ैत अछि जनवरी १९९५ क – कोचिंग क्लास ५.३० बजे भोरे सँ होइत रहए, हम घरसँ अन्हारे- ४.३०-४.४५ निकलैत रही। पटनामे जनवरी मासमे बहुत ठण्डी पड़ैत छैक, ओहि समयमे आर बेशी ठंडी पड़ैत रहए। ठंडा, ऊपरसँ अन्हार सुनसान रस्ता, बहुत डर सेहो लगैत रहए, लेकिन एक नया जोशमे सभ किछु बिसरि जाइत रही। ११ जनवरी १९९५ केँ कोचिंगमे ’मोड्युल टेस्ट’ रहए, ई कारण हम ४ बजे घरसँ कोचिंग निकलि पड़लहुँ- कारण ठंढाक कारण लेट नहि होए। हम जहिना पुनाइचक-हड़ताली मोड़क बीच मेन रेलवे लाइन लग पहुँचलहुँ, अचानक एक टा घोघ तनने, करिया कम्बल ओढ़ने बुढ़ी माता सामना आबि गेलि, हम तँ डरसँ साइकिलसँ खसि पड़लहुँ, देखलहुँ तँ ओ बहुत बुढ़ आरो कमर लगसँ झुकल लागल। हम उठि कऽ ठाढ़ भेलहुँ, गरदा सभ झाड़ि कऽ जहिना चलय लऽ चाहलहुँ तँ ओऽ आवाज देलक,..सुन..अ..बौवा... डरसँ हालत खराब भऽ गेल..चारू दिससँ सनसन जेकाँ अवाज महसूस हुअ लागल। डरल-डरल ओकरा लग गेलहुँ..। पुछलक...कतए जाऽ रहल छी!!! ताऽ तक ओऽ अपन घोघ नहि हटेने रहए। डरसँ अबाज तँ जल्दी नहि निकलल...;लेकिन हिम्मत कऽ कए जवाब देलहुँ, कोचिंग जाइ छी। फेर पुछलक..कथी के पढ़ाइ करैत छी..!! बातसँ अपनापन लागल। हम कहलहुँ-डॉक्टरीक तैयारी करैत छी.. अच्छा बैस..दोसर पढ़ाइमे मोन नहि लागए छौ- निर्देश दैत-..कनी देर रुकि जो तखन जहिये। ताऽ तक समय लगभग ४.४५ भऽ गेल रहए..एक दू टा आदमी सभ सड़कपर सेहो नजरि आबए लागल। लेट होइत रहए एहि कारण हिम्मत कए कऽ कहलहुँ...हमरा लेट भऽ रहल यऽ..हमर आइ परीक्षा अछि। कोनो बात नहि..जवाब भेटल बड़ असमंजसमे पड़ि गेलहुँ..की करी..नञि .करी..एक मोन होय रहए, चलैत लोककेँ अवाज दी, मुदा सड़क फेर सुनसान भऽ गेल। तखने ओऽ अपन घोघ हटेलक..हुनकर...चेहराकेँ देखिते लगभग बेहोश भऽ गेलहुँ..बुढ़—झुर्रीदार चेहरा...ओहिपर मर्द जेकाँ...दाढ़ी...मोँछ...हे भगवान आइ-धरि एहन नञि देखने रही...हमर हाव-भावकेँ देखि ओऽ बजली...हमरा देखि कए डर लागए छौ..नञि डर। हम दोसर किओ नञि छियौ...पता नञि किए ओऽ किछु अपन जेकाँ लागए लागल...ताऽ तक लगभग ५ से ऊपर टाइम भऽ गेल...रोडपर दूध/ न्यूजपेपर बला हॉकर सभ नजरि आबए लागल... किछु कालक बाद अवाज भेटल- आब तू जो..घुरैत काल अबिहेँ...हम हवाक भाँति/ तीर सँ बेशी तेजीसँ निकललहुँ...बहुत लेट भऽ गेल रही...साइकिलकेँ अपन क्षमतासँ बेशी तेजीसँ चलबए शुरू कए देलहुँ, जहिना गाँधी मैदान/ सब्जी बागक मुँहपर पहुँचलहुँ...देखलहुँ जे जबरदस्त एक्सीडेन्ट भेल रहए, पूरा रस्ता पुलिस ब्लॉक कऽ देने रहए- एक्सीडेंट लगभग २० मिनट पहिने भेल रहए, जाहिमे चारि टा लोक आऽ एकटा चाहक दोकानदार मारल गेल...ओऽ चारू टा हमरे इंस्टीट्यूटक छात्र रहए जे नीक चाह पीबए खातिर रुकल रहए लेकिन...!! हमहुँ ओहि चाहबलाक दोकानपर रोज रुकैत रही- अगर बुढ़ीमाता नञि भेटितए तँ हमहुँ ओहि समयमे चाहक दोकानेपर रहितहुँ ...फेर पता नञि...)- चाह पिबैक तँ आदति नहि रहए मुदा ठंढ़ाक चलते पीबि लैत रही। कहुना इंस्टीट्यूट पहुँचलहुँ..ओहिठाम घटनाक सूचना पहुँचि गेल रहए...इंस्टीट्यूट दू दिनुका लेल बन्द कऽ देल गेल। छात्रक घरबलाकेँ सेहो सूचित कए देल गेल, हमहुँ बुझल मोनसँ घर घुरए लगलहुँ, घर घुरैत काल वैह बुढ़िया ओहीठाम भेटल...ओहिना घोघ तनने...लग जाऽ कए सभ घटना सुनेलाक बादो ओऽ कोनो जवाब नहि देलक...किछु कालक बाद कहलक... बौआ हमरा भूख लागल यऽ!! की खेबए!!! हम पुछलियए। चूड़ा आऽ शक्कर..जवाब भेटल। संयोग एहन रहए जे ताऽ तक हम सभ तरहक समान किनबाक वास्ते कोनो दोकानपर नहि गेल रही, कारण घरमे काज करए लेल बहुत आदमी रहए दोसर घरक सभसँ छोट रही। तैयो दोकानपर गेलहुँ आरो बुढ़ी-माता लऽ चूड़ा-शक्कर कीनि कए अनलहुँ। किछु देरक बाद हम पुछलहुँ..कतए जेबही, हम पहुँचा देबौ। “कतहु नञि”, जवाब भेटल। “रहबीहीं कतए”, हम पुछलहुँ। “यैह जगह” सीधा जवाब भेटल। “खाना कतए खेबहीं”...पुछलापर जवाब भेटल- “ तूँ खुआ, बेशी बक-बक नञि कर, खाइ लेल दे फेर तू पुछिहेँ जे पूछए के छौ”- बिल्कुल रुखल जवाब सेहो भेटल। संगहि स्नेहसँ कहलक- “तूँहो खो”। हम तँ अजीब मुश्किलमे पड़ि गेलहुँ..ओकरा अकेले छोड़ि कए जाइ के मोन सेहो नञि करैत रहए...आखिर की करी...बहुत सोचलाक बाद निर्णय लेलहुँ..जे हुअए एकरा अपना संग लऽ जाइ...रिक्शापर बुढ़िया आरो साइकिलपर हम, घर पहुँचि ओकरा गेटपर ठाढ़ कऽ बाहर ठाढ़ कऽ हम घर गेलहुँ, सभ कहानी अपन माताजीकेँ बतेलहुँ, बुढ़िया बाहरमे ठाढ़ छै, सेहो कहि देलहुँ। सभसँ पैघ समस्या जे बुढ़ियाकेँ आखिर कतए राखी...माताजी कहलखिन- नीचाँमे एकटा रूम खाली छै- ओहिमे जगह देल जाए, सभ बेबस्था-बिछोना, कम्बल, साफ साड़ी-कऽ कए ओकरा घरमे बैसेलहुँ। साँझमे बाबूजी ऑफिससँ अएलाह तँ हुनका सभ कहानी बतेलहुँ। बाबूजी कहलन्हि-“बुढ़िया कहिया तक रहतहु”। “नञि पता”- हम कहलहुँ। फेर माताजी सभ सम्हारि लेलन्हि ..आरो बाबूजीकेँ समझा देलखिन। बुढ़ी-माताक सेवा करब हमर रोजक ड्यूटी भऽ गेल। कोचिंग जाइसँ पहिने आधा घण्टा, आबए के बाद १ सँ डेढ़ घण्टा हमर समय बुढ़ी माता लग बीतए लागल। खानाक अलग-अलग फरमाइश होइत, सभ किछु पूरा करैत एक सप्ताह बीतल, एक दिन अपना लग बैसा हमर बारेमे पूछए लागल- जेना अपन दादी-दादा-अग्रज- बुढ़ी माता दिससँ कहल गेल- तूँ दोसर पढ़ाइ- मेडिकल छोड़ि कऽ– कर। बहुत नाम हेतौ, खूब पैसा कमेबे, माँ-बाप तोरापर नाज करतौ, १० वा दिन रातिमे बिना किछु बतेने पता नञि कतए चलि गेलय- आइ तक नहि भेटलीह...एखन तक हम इन्तजार करए छी जे बुढ़ी माता एकदिन जरूर भेटतीह। बुढ़ी माताक बात बिल्कुल सही भेल जखन १४-१५ घण्टा पढ़ाइ करबाक बावजूद सी.बी.एस.ई. मेडिकलमे वेटिंग आबि गेल। बी.सी.ई.ई.मे डेयरी ब्रान्च भेटल, एम.डी.ए.टी.मे १००% चान्स रहए- ९०% एक्यूरेट प्रश्न सही कएने रही- मुदा परीक्षा-केन्द्र मिल्लत कॉलेज, दरभंगा केन्सिल भऽ गेल..एहि कारणसँ हम फ्रस्ट्रेशनमे रहए लगलहुँ। पढाइ-लिखाइ बन्द कए देलहुँ...जे एतेक पढ़ाइ करए के बाद जखन सफलता नहि भेटल तँ आब कहियो नहि हएत। फेर हमरा बुढ़ी-माताक बात याद भेल, संगहि बाबूजी सेहो कहलन्हि- अपन ट्रैक चेन्ज करू, लगभग ओही समय यू.जी.सी.सँ ३ टा नया कोर्स पटना आऽ मगध विश्वविद्यालयकेँ भेटल- बायो-टेक्नोलोजी, जल आऽ पर्यावरण प्रबंधन आऽ बी.सी.ए.। एन्ट्रेन्स परीक्षापर नामांकन प्रक्रिया शुरू भऽ गेल। बी.सी.ए. हमरा किछ ढंगक कोर्स बुझाएल, एन्ट्रेन्स देलहुँ आऽ पास कऽ गेलहुँ। यू.जी.सी. बी.सी.ए.क प्रथम बैचक पहिल छात्र हम रही जे अन्तिम परीक्षा ८९% सँ पास केलहुँ। बाबूजी कहलन्हि- आब यू.पी.एस.सी.क तैयारी करू, ढंगक सरकारी नोकरी लिअ, लेकिन हमर सोच किछु आरे रहए। “अगर अपन प्रतिभा/ क्षमताक उपयोग करबाक यऽ तऽ सरकारी नोकरी नञि करू”। फेर एम.सी.ए. केलहुँ, मोन भेल जे एम.बी.ए. कएल जाय- बहुत कठिन रहए आइ.टी.सँ एम.बी.ए. करब। मुदा बुढ़ी माताक कृपासँ एम.बी.ए. सेहो कऽ लेलहुँ। कैम्प्स सेलेक्शनमे रिलायन्सक ऑफर भेटल। जोइन केलहुँ, फेर एच.डी.एफ.सी. बैंकसँ ऑफर भेटल तँ बैंक जोइन कऽ लेलहुँ। हृदयमे इच्छा रहए जे टाटा-बिड़लामे नोकरी करबाक चाही। बुढ़ी माताक कृपासँ इच्छा पूरा भऽ गेल आऽ बिड़ला ग्रुपसँ नीक स्थानक ऑफर आबि गेल। जोइन सेहो कऽ लेलहुँ आऽ एखन तक एतहि छी..आब इच्छा यऽ दिल्ली/ मुम्बइक बहुत सेवा केलहुँ...आब अपन बिहार/ मिथिलाक सेवा कएल जाय..बुढ़ी माताक कृपासँ ओहो भऽ जेतए...लेकिन सभसँ पैघ इच्छा अछि बुढ़ी-माताक दर्शनक..पता नञि होएत कि नञि... अयोध्यानाथ चौधरी, धनुषा, नेपाल 1947- मूलत: कविक रूपमे परिचित छथि । नेपालक आधुनिक कविताक क्षेत्रमे हिनक नाम उल्लेखनीय अछि । श्री चौधरीक लेखनमे मानवीय संवेदनाक प्रतिबिम्ब पाओल जाइत अछि । कविताक संग कथा आ निबन्धमे सेहो ई कलम चलबैत छथि । फड़िछाएल लेखन हिनक विशेषता थिकनि ।धनुषा जिलाक दुहबी गामक रहनिहार श्री चौधरीक जन्म ६अक्टुबर १९४७कऽ भेल छनि । हिनक क्षितिजक ओहिपार नामसँ एक कविता-सग्ङप्रह प्रकाशित छनि । दू पत्र _________अयोध्यानाथ चौधरी अन्तत; आइ हम दिनेशकेँ पत्र लिखवाक लेल उद्यत भेलहुँ अछि । कागत-कलम सब दुरुस्त १९६९, माने ठीक ३६ वर्षक बाद । एतेक नम्हर अन्तराल ! की बूझत ओ ? खीझ होइत अछि हमरा जे जीवनमे एंकटा उत्साही पत्र लेखक किएक नहि वनि सकलहुँ हम ? एकटा सफल दायित्व किएक नहि निभा सकलहुँ हम ? जकरा हम पत्र लिखाक हेतु उद्यत भेलहुँ ओ हो त कहियो लिखवाक वात सेचि सकैत छल । खैर शरुआत हमरेसँ रहओ । ओकरा हेतु हमर पत्र एकटा अप्रत्याशित घटना सावित हेतैक – ’अ सरप्राइज’ आ, जौं ओ जीवित नहि हो ............ ? बहुत नम्हर अत्नराल भेलैक ने ! पत्र फिर्ता आबि सकैत अछि .............ओहि पर “डेड’ जा मृत कानो संकेत रहि सकैत छैक । एतेक निराशाजनक वात नहि सोचवाक चाही । ओहना स्थितिमे पोस्टमैन पत्र फारि-फेकिकऽ अपन मथ-दुक्खी सँ मृक्त भऽगेल रहत । ई समय पत्र लिखवाक अनुकूल +{बहुत अनुकूल वुझा रहल अछि । दशमीमे सब गाम अबैए- ओकरो जरुर गाम आवक चाही । तावत ओकर पत्नी, बेटा वा वेटी केओ ने के ओ पत्र सहेजिकऽराखि देने रहतैक । जाइ जमानामे हम सव – ’ग्रैजुएशन’ केने रही, ओइ हिसाव सँ ओ जरुर कोनो नोकरी मे हैत किएक त’ नीक विद्यार्थी रहय । पता नहि – पटना वोकारो, टाटा, दिल्ली कतऽ अइ..... आकि सुदुर दक्षिण केरला, मद्रास-नहि जानि कतऽ ?/ चारि वर्ष संगे अभिन्न रहवाक कारणे ओकरा पत्र लिखवामे एकटा ’पेन फ्रेन्ड’ क मजा आओत । सबसँ पहिने तँ’ ओकरा परिवाक हुलिया लेवऽ पडत । ओकरा परिवारमे के सब छैक ? के कतऽ की करैत छैक ? पत्रक सिलसिला जौ चालु भऽ जायत त कालान्तरमे इ हो बूझऽ मे आवि जायत जे ओकरा एकटा मनोनुकूल पत्नी भेटलैक की नहि..... आकी कोनो ना शेष जीवन वितावऽक क्रममे अइ । याददाश्त वा फेहरिस्त रहत । तहिया सी. एम. कलेजक आलीशान आर्ट्स व्लक नव हेवाक कारणे विल्कुल कोनो सुन्दर कागज पर पारल रंगीन नक्शा वुझाइक – पार्क जकाँ । जतऽ जाउ जेना पक्षीक झुण्ड आ कलरव पसरल । विशाल पुस्तकालय । वागमतीक मनोरम आ खतरनाक किछेर । रहस्यमयं गर्ल्स-कामन-रुम । विभिन्न विषयक अलग ’डिपार्टमेन्ट’ आ ओ रहस्यमय कोठली, उपर हेवाक कारणे, छात्रसब कौखन कार्यवश, कौखन अनेरो, कोनो ’सरसँ भेटवाक वहानामे उपर भीड कऽदैक । परन्तु’ जखन ’हुसैन’ साहव माने वाइस प्रिन्सपल अपन ’चैम्बर सँ ’ बहार भऽ केवल तर्जनी उठवैत छलाह तखन सब सिड़हीसँ नीचा भगैत छल – कान – कपार फुटवाक – टांग टुटवाक कोनोटा डर नहि । हमरा सभक ग्रूपमे एकटा रीनिता नामक लड़की छलि ’जकरा मात्रे’ कार प्रतिदिन कालेज पहुँचा जाइक । लक्ष्मी आ सरस्वतीक अपूर्व संयोग ! मांजल अंग्रेजी वजैत आ लिख्यैत छलि । फस्ट इयरमे ’विदेह’मे जे ओकर लेख छपैलक से लाजबाव रहैक – शीर्षक छल “Exclusively ours “| लेख मार्फत ओ ओकरा सभक कोठलीक पर्दा हटा भीतरक बहुत रास रहस्योदघाटन कएने छलि । मुदा ओ एक बर्षक बाद नहि जानि कतऽ चल गेलि ? धनीक बापक वेटी रहए । प्राय: ओ कलेज झुझाअन लागल हेतैक ।“ Exclusively ours”  एखनो कहियो काल पढि लैतछी मुदा शीर्षकक तात्पर्य वुझवामे एखनो माथमे बल देवऽ पडैत अछि । एकटा और घटना जकर हम सब कहियो नहि विसरि सकब । हम सव विश्वस्त छी जे जौ पत्र लेखनक शुरुआत मित्र दिनेश राय दिससँ होइत त ओहो ओइ घटनाक चर्च जरुर करैत । हम सव भाग्यवान रही जे ओहो कोनो ’नन्दी’ टाइटलवाली हमरे सभक ग्रुपक छलि आ वंगालिने छलि । ओकरा आँखिमे वास्तवमे एहन एकटा चमक छलैक जे आई ३६ वर्षसँ कतौ अन्तऽ नहिं अभरल, पता नहि ओ आँखि कतऽ अइ  ? ओइ बड़का – बड़का आँखिमे ओ चमक विद्यमाने छैक वा मलीन भेलैक अछि ? जे किछु । मुदा सारा काजेज ओ जादुई आँखि देखने छल – देखैत छल । अनहोनी भाऽ गेलै । एकटा हमरे सवहक सहपाठी लड़का ओकरा नाम पर – ओकर नाम लैत जहर खा लेलक मुदा समये पर अस्पताल पहुचाओल गेल आ जान वचि गेलैक । जंगली आगि जकाँ वात सौसे पसरि गेल । मुदा ओकरा लेल धन-सन । कोनो प्रतिक्रिया ने कोनो हलचल ने – सव किछु विल्कुल सामान्य । असलमे एक तरफा प्रेम छलैक । वात ओकरो तक जरुर गेल हेतै –लेकिन ओ वेहद गम्भीर जे छलि । Eng. Hons. Group मे टॉप कैलक । मुदा ओ जमाना वड़ वेजाए छलैक । लड़का – लड़कीमे बार्ताक संचार नहि होइत छलैक । लाख कोशिशक वाद हमरा आ दिनेशक मुँहसँ कंग्राच्युलेसन शब्द नहि फुटल – नहिए फुटल । कालेज आ संवेदनशील घटना – संवेदनशील घटना आ कालेज – जेना एक दोसरक पर्याय रहैक । कतेक वात भेल । कतेक घटना घटल । मुदा पहिने पत्राचारक क्रम त शुरु होवऽ । दिनेश वहुत वातक जानकारी करा सकैए – ओहि पानि क’ जे अइ । जन्मभूमि आ कर्मभूमि नेपाल भेलाक कारने बहुत रास अपन लोक छुटि गेल । ओना सीमा नहि बुझाइत छैक मुदा सम्पर्क जे टुटिगेल अछि । मुदा एकटा वात । एहि सन्धि-स्थल पर जीवाक अपन मजा छैक । कौखन उत्तराभिमुख, कौखन दक्षिणाभिमुख । दूटा संस्कृति मिश्रित जीवनक उत्फुल्लता – जुनि पुछू । पहाड़क गीत खोलामे झहरिकऽ समुद्रक लहरिमे विलन भऽ जाइत अछि । भास दू-मुदा भाव एके –ऐन-मेन । “जहाँ जहाँ वान्छौ तिमी, म पाइला वनि पच्छयाई रहन्छु “ तु जहाँ-जहाँ चलेगा, मेरा साया साथ होगा” । पहाड़क गीतक सन्दर्भमे १९७१ ई. क एकटा सांझ मोन पडैत अछि । काठमान्डौ सँ दूर उत्तर वालाजुउद्यानसँ उपर पहाडीपर English Language Trainning Institute द्वारा आयोजित वनभोज समारोह । नाच करैए ओ सव । कोन लड़का-कोन लड़की-नाचमे फर्क नहि वुझायत । निर्विकार । निर्विकार भऽ नाचत आ गाओत । मुदा एम्हर, अपना समाजमे लज्ज कलाके प्रस्फुटिता नहि होवऽ दैत छैक । गीत गओलक राममणि । सम्पूर्ण मण्डली अभिभूत आ मंत्रमुग्ध भऽ गेल । पहाडमे केवल निर्जीव पाथरे नहि होइत छैक । एकटा प्रशिक्षार्थी – एकटा शिक्षिकाक आँखिसँ नोर झहडऽ लागल आ समस्त वातावरण जेना जड़ भऽ गेल ।, ओ गीत एखनो कहियो काल हंमरा मन-प्राणके जेना आन्दोलित कऽ जाइत अछि – “कोई जव तुम्हारा हृदय तोड़ दे .......... “ दुर्गम पहाडी गाममे एहनो गीत गाओल जाइत अछि- आ ओतुक्को लोक ओकर तात्पर्य बूझि विभोर भऽ जाइत अछि – हमरा आश्चर्य लागि गेल । ओइ दिन हम पहाडक आँखि नोरायल देखने रही । स्पस्ट । निस्सन्देह । हमरा जनैत सैकड़ौ-हजारो वर्ष पहिने, कोनो युगमे ओइ गीत सँ बहुत बेसी, कैएक गुना वेसी दर्द-भरल गीत सुनि पहाड जे करुण क्रन्दन केने हैत तकरे फलस्वरुप एतेकं नदी नालाक जन्म भेल हैत । बहुत सम्भव गायक स्वंय Adam छल हैत आ सुननिहार ओकर प्रेयसी Eve । राममणि शर्मा ओहि दिन सँ हमर अभिन्न भऽ गेल । ओकर आ और कतेक साथी सभक पता हमरा डायरीमे ओहिना पड़ल अछि । आव त डायरीक पन्न जीर्ण-शीर्ण भऽ पीयर भऽगेल अछि । आइए ३४ वर्षक वाद एकटा पत्र हम और लिखव, एखने लिखव .........। १ जनवरी ,’०५ जनकपुरधाम दिनेश भाइ, नव वर्षक हार्दिक मंगलमय शुभकामना । आशा अछि लिफाफ पर हमरनाम पढलाक बाद हमरा चिन्हऽ मे एको क्षण देरी नहि लागल हैत । ओना किछु चौकल जरुर हैव । से त स्वभाविके ..........। कोनो अपराध वोध नहि भऽ रहल अछि । एकटा प्रश्न पुछै छियऽ । जीवन एना जटिल किएक भेल जा रहल छैक ? कतेक वेर विचार करैत छलहुँ ............ आई लिखैछी, काल्हि पक्के लिखव .......... मुदा आई ....... जावत दुनूपत्र हम लिखि नहिलेव, तावत हमराअ चैन नहि ........... चैन नहि .............। शान्ति सदन, ढुहवी-१ (धनुषा) शैलेन्द्र मोहन झा सौभाग्यसँ हम ओहि गोनू झाक गाम, भरवारासँ  छी, जिनका सम्पूर्ण भारत, हास्यशिरोमणिक नामसँ जनैत अछि। वर्तमानमे हम टाटा मोटर्स फाइनेन्स लिमिटेड, सम्बलपुरमे प्रबन्धकक रूपमे कार्यरत छी। चलला मुरारी छौरी फ़ँसबय ! एक दिनक गप्प अछि, हमर मित्रगण हमरा कहय लगला - शैलेन्द्र, अन्हां के कोनो गर्ल फ़्रैन्ड नहिं? हम कहलियनि - दोस, ई भारत अछि, इन्गलैन्ड नहिं! अखन गर्ल फ़्रैन्ड क जरूरत नहिं, अखन त पढय - लिखय के दिन अछि, प्रेम करय के मुहुरत नहिं!! सब मित्र कहय लगला, हम अनाडी छी जौं कोनो छौरी  फ़ंसाबी, तहने हम खिलाडी छी ई सब हमरा सहल नहिं गेल, बिना ई दुस्कर्म कयने रहल नहिं गेल फ़ेर की छ्ल? हम ताकय लगलहुं एकटा फ़्रैन्ड, फ़्रैन्ड नहिं, गर्ल फ़्रैन्ड...... मुदा एकटा मुश्किल छ्ल - हमरा छौरी सब स लगैत छ्ल बड्ड डर जौं हुनक सैन्डल गेल पडि, त इज्जत जायत उतरि तैयो हमरा प्रमाणित करय के छ्ल, कहुना कय एकटा छौडी पटबय के छ्ल त कुदि पडलौं मैदान में, या ई कहु श्मशान में, कियाकि, पिटला के बाद ओत्तहि जायब, फ़ीरि क मुंह नहिं देखायब बन्हलहुं माथ पर कफन, कय सब डर के करेज में दफन निकलि पडलहुं हम बाट में, एक छौरी के ताक में सब सं पहिने प्रार्थना कयलहुं - हे किशन कन्हैया! आंहां त अहि कर्म में खिलाडी छी हमरो खिलाडी बना दिअ, हमरा सोलह हजार गोपी नहिं, केवल एकटा छौडी फ़ंसवा दिअ आंहाके बड्ड गुणगान करब, फ़ंसिते छौरी, सवा रुपैया के प्रसाद चढायब हम सोचलहुं, शायद आंखि मारला सं छौरी पटै छैक! हमरा कि बुझल छल, आंखि मारला सं छौरी पीटै छैक भागि कय घर अयलहुं, आर पहिल सप्पत खेलहुं फ़ेर कहियो आंखि नहिं मारब. फ़ेर सोचलहुं - पहिने बतियायब, फ़ेर घुमायब तहन फ़ंसायब हं, ई ठीक रहत! देखलहुं एकटा छौरी, त आंखि हमर फ़रकल.... फ़ेर की छ्ल? हम कहलौं- पोखरि सन आंखि तोहर, केश जेना मेघ, फ़ूल सन ठोढ तोहर, कहियो असगर में त भेट! कहलहुं हम एतबे की भय गेली ओ लाल, ओ मारलीह एहन थप्पड, भेल गाल हमर लाल कनबोज सुन्न भेल हमर, आंखि भेल अन्हार सूझय लागल तरेगन, भेल दुपहरिया में अन्हार सरधुआ, करमघट्टु, बपटुगरा आर अभागल देखू कपार हम्मर,  ई विशेषण हाथ लागल एतबे नहिं........ ओ करय लगलीह हल्ला, जूटय लागल मोहल्ला हम कहलौं - ई कोन काज केलहुं? कियक गाम के बजेलहुं नहिं पटितौं हमरा सं, ई आफ़त कियक बजेलहुं फ़ेर की छल? पिटय लगलहुं हम आर पीटय लगला गौंआं मुंह कान तोडि देलक, अधमरु कय क छोरलक ई कोन काल घेरलक, मरय में नहिं छल भांगठ, हम भागि घर एलहुं, दुबारा सप्पत खेलहुं - फ़ेर आंखि नहिं मारब, नै गीत हम गायब, फ़ेर छौरी नहिं फ़ंसायब, नै जान हम गमायब, आर भूलि कय अंग्रेजी, हम मैथिल बनि जायब! आर भूलि कय अंग्रेजी, हम मैथिल बनि जायब!! सपना सुतल रही दुपहरियामे तँ देखलौ हम एक सपना भयल विवाह हमर यै भौजी कनिया चान्द के जेना हम्मर, टुटि गेल सपना ये भौजी, भरल दुपहरियामे... जहन भेँट भेल हुनकर हम्मर, भेलहुँ हम प्रसन्न देखि कऽ हुनकर रूप हे भौजी, भय गेलौँ हम दङ नाम पुछलियनि हुनकर हम तँ कहलनि ओऽ जे रजनी स्वप्न सुन्दरी ओऽ बनि गेलि हम्मर हृदयक रानी हमरा पुछली कहु हे साजन केहन हम लगै छी? हम कहलियनि सुनु हे सजनी आहाँ चान्द लगै छी चन्दामे तँ दागो छञि, आहाँ बेदाग लगै छी आँखि अहाँक ऐश्वर्या जेहन नाक अछि जुही चावला केश अहाँक अछि नीलम जेहन गाल वैजन्तिमाला एहि के बाद पुछलियनि हमहू केहन हम लगै छी? कहय लगलि खराब छी, छी अहूँ ठीक-ठाक लेकिन एहि यौवनमे साजन भेलहुँ कोन टाक* कनिक लगै छी सन्नी जेना, किछु-किछु राहुल राय किछु-किछु गुण गोविन्दा बाला, यैह अछि हम्मर राय तहन कहलियनि चलु हे सजनि घुरए लेल दरभंगा आहाँ लेल हम सारी किनब, अपनो लेल हम अंगा दू टा टिकट अछि उमा टाकीजक, अगले-बगले सीट दुनू गोटे बैस कऽ देखब “ममता गाबय गीत”** हुनक हाथ लेल अपन हाथमे उठि विदाय हम भेलहुँ हुनक हाथ लेल अपन हाथमे उठि विदाय हम भेलहुँ तखने जगा देलक पिंटूआ, तखने जगा देलक पिंटुआ***, नीन्दसँ हम उठि गेलहुँ हम्मर टूटि गेल सपना ये भौजी, भरल दुपहरियामे...... *= हमर केश किछु बेशी कम अछि **= प्रसिद्ध मैथिली सिनेमा ***= हमर छोट भाई डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ (1938- )- ग्राम+पोस्ट- हसनपुर, जिला-समस्तीपुर। नेपाल आऽ भारतमे प्राध्यापन। मैथिलीमे १.नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास(विराटनगर,१९७२ई.), २.ब्रह्मग्राम(रिपोर्ताज दरभंगा १९७२ ई.), ३.’मैथिली’ त्रैमासिकक सम्पादन (विराटनगर,नेपाल १९७०-७३ई.), ४.मैथिलीक नेनागीत (पटना, १९८८ ई.), ५.नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य (पटना, १९९८ ई.), ६. प्रेमचन्द चयनित कथा, भाग- १ आऽ २ (अनुवाद), ७. वाल्मीकिक देशमे (महनार, २००५ ई.)। मौन जीकेँ साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, २००४ ई., मिथिला विभूति सम्मान, दरभंगा, रेणु सम्मान, विराटनगर, नेपाल, मैथिली इतिहास सम्मान, वीरगंज, नेपाल, लोक-संस्कृति सम्मान, जनकपुरधाम,नेपाल, सलहेस शिखर सम्मान, सिरहा नेपाल, पूर्वोत्तर मैथिल सम्मान, गौहाटी, सरहपाद शिखर सम्मान, रानी, बेगूसराय आऽ चेतना समिति, पटनाक सम्मान भेटल छन्हि। वर्तमानमे मौनजी अपन गाममे साहित्य शोध आऽ रचनामे लीन छथि। पंचदेवोपासक भूमि मिथिला -डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ’मौन’ हिमालयक पादप्रदेशमे गंगासँ उत्तर, कोशीसँ पश्चिम एवं गण्डकसँ पूर्वक भूभाग सांस्कृतिक मिथिलांचलक नामे ख्यात अछि। मिथिलांचलक ई सीमा लोकमान्य, शास्त्रसम्म्त ओऽ परम्परित अछि। सत्पथब्राह्मणक अंतःसाक्ष्यक अनुसारे आर्यलोकनिक एक पूर्वाभिमुखी शाखा विदेह माथवक नेतृत्वमे सदानीरा (गण्डक) पार कऽ एहि भूमिक अग्नि संस्कार कऽ बसिवास कएलनि, जे विदेहक नामे प्रतिष्ठित भेल। कालान्तरमे एकर विस्तार सुविदेह, पूर्व विदेह, ओऽ अपर विदेहक रूपेँ अभिज्ञात अछि। विदेहक ओऽ प्राथमिक स्थलक रूपमे पश्चिम चम्पारणक लौरियानन्दनगढ़क पहिचान सुनिश्चित भेल अछि। आजुक लौरियानन्दनगढ़ प्राचीन आर्य राजा लोकनि एवं बौद्धलोकनिक स्तूपाकार समाधिस्थल सभक संगम बनल अछि। कालक्रमे अहि इक्षवाकु आर्यवंशक निमि पुत्र मिथि मिथिलापुत्रक स्थापना कयलनि। प्राचीन बौद्धसाहित्यमे विदेहकेँ राष्ट्र (देश) ओऽ मिथिलाकेँ राजधानीनगर कहल गेल अछि। अर्थात् मिथिला विदेहक राजधानी छल। मुदा ओहि भव्य मिथिलापुरीक अभिज्ञान एखन धरि सुनिश्चित नहि भेल अछि। तथापि प्राचीन विदेहक सम्पूर्ण जनपदकेँ आइ मिथिलांचल कहल जाइछ। ओऽ मिथिलांचलक भूमि महान अछि, जकर माथेपर तपस्वी हिमालयक सतत वरदहस्त हो, पादप्रदेशमे पुण्यतोया गंगा, पार्श्ववाहिनी अमृत कलश धारिणी गंडक ओऽ कलकल निनादिनी कौशिकीक धारसँ प्रक्षालित हो। एहि नदी मातृक जनपदकेँ पूर्व मध्यकालीन ऐतिहासिक परिवेशमे तीरभुक्ति अर्थात् तिरहुत कहल गेल, जकर सांस्कितिक मूलमे धर्म ओऽ दर्शनक गांभीर्य, कलासभक रागात्मक उत्कर्ष, ज्ञान-विज्ञानक गरिमा ओऽ भाषा-साहित्यक समृद्ध परम्पराक अंतः सलिला अंतर्प्रवाहित अछि। एहि सभक साक्षात् मिथिलाक शैव-शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य, सौर (सूर्य) ओऽ बौद्ध-जैनक आस्था केन्द्र एवं ऋषि-मुनिक साधना परम्परामे उपलभ्य अछि। प्रकारान्तरसँ ओहि स्थल सभकेँ सांस्कृतिक चेतनाक ऐतिहासिक स्थलक संज्ञा देल जाऽ सकैछ, जकर आइ-काल्हि पर्यटनक दृष्टिसँ महत्व बढ़ि गेल अछि। मिथिलाक प्रसिद्धि ओकर पाण्डित्य परम्परा, दार्शनिक-नैयायिक चिन्तन, साहित्य-संगीतक रागात्मक परिवेश, लोकचित्रक बहुआयामी विस्तार, धार्मिक आस्थाक स्थल, ऐतिहासिक धरोहर आदिक कारणे विशेष अनुशीलनीय अछि। जनक-याज्ञवल्क्य, कपिल, गौतम, कणाद, मंडन, उदयन, वाचस्पति, कुमारिल आदि सदृष विभूति, गार्गी, मैत्रेयी, भारती, लखिमा आदि सन आदर्श नारी चरित, ज्योतिरीश्वर, विद्यापति, विनयश्री, चन्दा झा, लाल दास आदि सन आलोकवाही साधक लोकनिक प्रसादे एहि ठामक जीवन-जगतमे आध्यात्मिक सुखानुभूति ओऽ सारस्वत चेतनादिक मणिकांचन संयोग देखना जाइछ। मिथिला आध्यात्म विद्याक केन्द्र मानल जाइछ। आजुक मिथिलांचलक संस्कृति उत्तर बिहारमे अवस्थित वाल्मीकिनगर (भैँसालोटन, पश्चिम चम्पारण) सँ मंदार (बाँका, भागलपुर) धरि, चतरा-वाराह क्षेत्र (कोशी-अंचल, नेपाल) सँ जनकपुर-धनुषा (नेपाल) धरि ओऽ कटरा (चामुण्डा, मुजफ्फरपुर), वनगाँव-महिषी, जयमंगला (बेगूसराय), वारी-बसुदेवा (समस्तीपुर), कपिलेश्वर-कुशेश्वर-तिलकेश्वर (दरभंगा), अहियारी-अकौर-कोर्थु(मधुबनी), आमी(अम्बिकास्थान, सारण), हरिहरक्षेत्र (सोनपुर, सारण) वैशाली आदि धरि सूत्रबद्ध अछि। एहि सभ धार्मिक तीर्थस्थल सभक परिवेक्षणसँ प्रमाणित होइछ जे मिथिलांचल पंचदेवोपासक क्षेत्र अछि। कालान्तरमे एहिसँ बौद्ध ओऽ जैन स्थल सभ सेहो अंतर्मुक्त भऽ आलोच्य भूभागकेँ गौर्वान्वित कयलनि। पंचदेवोपासक क्षेत्रक अर्थ भेल- गणेश, विष्णु, सूर्य, शिव ओऽ भगवतीक क्षेत्र। एहिमे सूर्य सर्वप्राचीन देव छथि एवं शिव सर्वप्राचीन ऐतिहासिक देवता छथि। विघ्नांतक गणेशक पूजन प्राथमिक रूपेँ कयल जाइछ एवं मातृपूजनक संदर्भमे भगवती अपन तीनू रूपमे लोकपूजित छथि अर्थात् दुर्गा, काली, महालक्ष्मी एवं सरस्वती। भगवती शक्तिक आदि श्रोत छथि, जनिकामे सृष्टि, पोषण ओऽ संहार (लय) तीनू शक्ति निहित अछि। मुदा लोकक लेल ओऽ कल्याणकारिणी छथि। धनदेवी लक्ष्मीक परिकल्पना वैष्णव धर्मक उत्कर्ष कालमे भेल छल एवं ओऽ विष्णुक सेविका (अनंतशायी विष्णु), विष्णुक शक्ति (लक्ष्मी नारायण) एवं देवाभिषिक्त (गजलक्ष्मी) भगवतीक रूपमे अपन स्वरूपक विस्तार कयलनि। ओना तँ लक्ष्मी ओऽ सरस्वतीकेँ विष्णुक पर्श्वदेवीक रूपमे परिकल्पना सर्वव्यापक अछि। लक्ष्मी ओऽ गणेशक पूजन सुख-समृद्धिक लेल कयल जाइछ। प्राचीन राजकीय स्थापत्यक सोहावटीमे प्रायः गणेश अथवा लक्ष्मीक मूर्ति उत्कीर्ण अछि। पंचदेवोपासना वस्तुतः धार्मिक सद्भावक प्रतीक अछि। मिथिलांचलमे एहि पाँचो देवी-देवताक स्वतंत्र विग्रह सेहो प्राप्त होइछ। भारतीय देवभावनाक विस्तारक मूलमे भगवती छथि, जे कतहु सप्तमातृकाक रूपमे पूजित छथि तँ कतहु दशमहाविद्याक रूपमे। सप्तमातृका वस्तुतः सात देवता सभक शक्ति छथि- ब्रह्माणी (ब्रह्मा), वैष्णवी (विष्णु), माहेश्वरी (महेश), इन्द्राणी (इन्द्र), कौमारी (कुमार कार्तिकेय), वाराही (विष्णु-वाराह) ओऽ चामुण्डा (शिव)। एहि सप्तमातृकाक अवधारणा दानव-संहारक लेल संयुक्त शक्तिक रूपमे कयल गेल छल, जे आइ धरि पिण्ड रूपेँ लोकपूजित छथि। मुदा एक फलक पर सप्तमातृकाक शिल्पांकनक आरम्भ कुषाणकालमे भऽ गेल छल। चामुण्डाकेँ छोड़ि सभटा देवी द्विभुजी छथि। सभक एक हाथमे अम्तकलश एवं दोसर अभयमुद्रामे उत्कीर्ण अछि। मिथिलांचलक लोकजीवनमे जनपदीय अवधारणाक अनुसार सप्त मातृकाक नामावली भिन्न अछि। मुदा बिढ्क्षिया माइ (ज्येष्ठा, आदिमाता, मातृब्रह्म) सभमे समान रूपेँ प्रतिष्ठित छथि। यद्य सप्तमातृकाक ऐतिहासिक प्रस्तर शिल्पांकन एहि भूभागसँ अप्राप्य अछि, मुदा दशमहाविद्याक ऐतिहासिक मूर्ति सभ भीठभगवानपुर (मधुबनी) एवं गढ़-बरुआरी (सहरसा)मे उपलभ्य अछि। रामाश्रय झा “रामरग” (१९२८- ) विद्वान, वागयकार, शिक्षक आऽ मंच सम्पादक छथि। रामरगजीसँ गप शप। (६ जुलाई २००८) गजेन्द्र ठाकुर: गोर लगैत छी। स्वास्थ्य केहन अछि। रामरंग: ८० बरख पार केलहुँ। संगीतमे बहटरल रहैत छी। गजेन्द्र ठाकुर: संगीतक तँ अपन फराक भाषा होइत छैक। मैथिली संगीत विद्यापति आऽ लोचन सँ शुरू भए अहाँ धरि अबैत अछि। मैथिलीमे अहाँ लिखनहिओ छी। रामरंग: अपन मिथिलासँ सम्बन्धित हम तीन रागक रचना केलहुँ अछि, जकर नाम ऐ प्रकारसँ अच्हि। १.राग तीरभुक्ति, राग विद्यापति कल्याण तथा राग वैदेही भैरव। ऐ तीनू रागमेसँ तीरभुक्ति आर विद्यापति कल्याणमे मैथिली भाषामे खयाल बनल अछि। हमर संगीत रामायणक बालकाण्डमे रागभूपाली आर बिलावलमे सेहो मैथिली भाषामे खयाल छैक। आर सन्गीत रामायणक पृष्ठ ३ पर बिलावलमे श्री गणेशजीक वन्दना तथा पृष्ठ २० पर राग भूपालीमे श्री शंकरजीक वन्दना अछि। पृष्ठ ८७ पर राग तीरभुक्तिमे मिथिला प्रदेशक वन्दना अछि आर पृष्ठ १२० पर राग वैदेही भैरवक (हिन्दीमे) रचना अछि। “अभिनव गीताञ्जलीक पंचम भागमे २६५ आर २६६ पृष्ठ पर विद्यापति कल्याण रागमे विलम्बित एवं द्रुत खयाल मैथिली भाषामे अछि। मिथिला आऽ मैथिलीमे हम उपरोक्त सामग्री बनओने छी। गजेन्द्र ठाकुर: मुदा पूर्ण रागशास्त्र विद्यापति कल्याणक, तीरभुक्तिक वा वैदेही भैरवक नञि अछि। मैथिलीमे आरो रचना अहाँ... रामरंग: बहुत रचना मोन अछि, मुदा के सीखत आऽ के लीखत। हाथ थरथराइत अछि आब हमर। गजेन्द्र ठाकुर: कमसँ कम ओहि तीनू रागक रचना शास्त्र लिखि दैतियैक तँ हम पुस्तकाकार छापि सकितहुँ। रामरंग: जे रचना सभ हम देने छी ओकरा छापि दिऔक। हाथ थरथराइत अछि , तैयो हम तीनूक विस्ट्रुत विवरण पठायब, लिखैत छी। गजेन्द्र ठाकुर: प्रणाम। रामरंग: निकेना रहू। मैथिली  भाषामे श्री रामाश्रय झा “रामरंग” केर रचना। १.राग विद्यापति कल्याण- एकताल (विलम्बित) स्थाई- कतेक कहब गुण अहाँकेँ सुवन गणेश विद्यापति विद्या गुण निधान। अन्तरा- मिथिला कोकिला किर्ति पताका “रामरंग” अहाँ शिव भगत सुजान॥ स्थायी - - सा  रेग॒म॑प ग॒रेसा ऽ ऽक  ते ऽऽऽ क,कऽ रे सा (सा),नि॒ध निसा –रे नि॒धप़ ध़नि सा सारे ग॒रे रेग॒म॑प –(म॑) ह ब  ऽ   ऽऽ  गु न ऽअ हां,ऽऽ  केऽ ऽ   सुव नऽ ऽऽऽऽ  ऽ ग प प धनि॒ धप धनिसां - -रे सांनि॒ धप (प)ग॒ रे,सा रेग॒म॑प ग॒, रेसा ने स विऽ द्याप तिऽऽ  ऽ  ऽवि द्या  गुन निधा न,क तेऽऽऽ  क,कऽ अन्तरा पप नि॒ध निसां सांरें मिथि लाऽ ऽऽ कोकि सां – निसांरेंगं॒ रें सां रें सां रें नि सांरे नि॒ धप प (प) ग॒ रेसा ला ऽ  की ऽऽऽ  तिं प     ता ऽ ऽऽ  का ऽऽ रा म  रं  ग अ रे सासा ध़नि॒प़ध निसा  -सा  रेग॒म॑प  - ग॒  सारे  सा,सा  रेग॒म॑प  ग॒,रेसा हां शिव  भऽ,ग  तऽ   ऽसु   जाऽऽऽ  ऽ ऽ  न   ऽ, क   ते ऽऽऽ  क,कऽ ***गंधार कोमल, मध्यम तीव्र, निषाद दोनों व अन्य स्वर शुद्ध। २.राग विद्यापति कल्याण – त्रिताल (मध्य लय) स्थाई- भगति वश भेला शिव जिनका घर एला शिव, डमरु त्रिशूल बसहा बिसरि उगना भेष करथि चाकरी। अन्तरा- जननी जनक धन, “रामरंग” पावल पूत एहन, मिथिलाक केलन्हि ऊँच पागड़ी॥ स्थाई- रे भ सा गम॑ प म॑ प - - म॑ग॒  - रे सा सारे  नि सा -, नि ग तिऽऽ  व   श ऽ ऽ भे  ऽ ला ऽ शि ऽ व  ऽ ऽ  जि ध़ नि सा रे सा नि॒ – प़ ध़ नि॒ ध़ प़ – नि सा - - सा न  का  ऽ  घ  र  ऽ  ऽ ए ऽ  ला ऽ  शि  व ऽ ऽ ड रे ग॒ म॑ प  प – प नि॒  ध प म॑ प  धनि  सां सां गं॒ म रु ऽ त्रि  शू ऽ ल ब  स हा  ऽ बि सऽ  ऽऽ  रि उ रें सां नि रें  सां नि॒ ध प  म॑ प पनि॒ ध  प -  -ग  -- रे ग ना ऽ ऽ   भे  ऽ  ष क  र थि चाऽ ऽ  कऽ ऽरी ऽऽ,  भ अन्तरा प ज प नि सां सां  सां - - ध नि  - ध नि नि सां रें सां -, नि न नी ऽ ज  न ऽ ऽ ऽ    ऽ क ध न    ध  न ऽ, रा नि सां – गं॒  रें सां सां नि – ध नि सां   नि॒ ध प ग॒ म॑ प नि सां  सां नि॒ ध प  म॑ प पनि॒ ध  प- -ग – रे थि ला ऽ क   के ल न्हि ऊँ ऽ च पाऽऽ    गऽ  ऽड़ी ऽऽ,भ ***गंधार कोमल, मध्यम तीव्र, निषाद दोनों व अन्य स्वर शुद्ध। ३.श्री गणेश जीक वन्दना राग बिलावल त्रिताल (मध्य लय) स्थाई: विघन हरन गज बदन दया करु, हरु हमर दुःख-ताप-संताप। अन्तरा: कतेक कहब हम अपन अवगुन, अधम आयल “रामरंग” अहाँ शरण। आशुतोष सुत गण नायक बरदायक, सब विधि टारु पाप। स्थाई नि ग प ध नि  सा नि ध प   ध नि॒ ध प   म ग म रे वि ध न ह   र न ग  ज   ब  द  न द  या ऽ क रु ग ग म नि॒   ध प म ग   ग प म ग   म रे स सा ग रु ऽ ह     म र दु ख   ता ऽ प सं   ता ऽ प ऽ अन्तरा नि                                रें प प ध नि   सां सां सां सां   सां गं गं मं         गं रें सां – क ते क क   ह ब ह म   अ प न अ     व गु न ऽ रे सां सां सां सां    ध नि॒ ध प  ध ग प म   ग ग प प अ ध म आ      य ल रा म  रे ऽ ग अ   हां श र ण ध प म ग   म रे सा सा   सा सा ध -    ध नि॒ ध प आ ऽ शु तो  ऽ ष सु त    ग ण ना ऽ     य क व र धनि संरें नि सां   ध नि॒ ध प   पध नि॒ ध प    म ग म रे दाऽ  ऽऽ य क     स ब बि ध   टाऽ ऽ रु ऽ    पा ऽ ऽ प ४.मिथिलाक वन्दना राग तीरभुक्ति झपताल स्थाई: गंग बागमती कोशी के जहँ धार, एहेन भूमि कय नमन करूँ बार-बार। अन्तरा: जनक याग्यवल्क जहँ सन्त विद्वान, “रामरंग” जय मिथिला नमन तोहे बार-बार॥ स्थाई रे – ग म प म ग रे – सा गं ऽ ग ऽ बा ऽ ग म ऽ ती प सा नि ध़ – प़ नि नि सा रे सा को ऽ शी ऽ के ज हं धा ऽ र सा म ग रेग रे प ध म पनि सां सां ए हे नऽ ऽ भू ऽ मि कऽ ऽ य प सां नि प ध (ध) म ग रे सा सा न म न क रुँ बा ऽ र बा र अन्तरा प पध म – प नि नि सां – सां ज नऽ क ऽ ऽ या ग्य व ऽ ल्क रें रें गं – मं मं गं रें – सां ज हं सं ऽ त वि ऽ द्वा ऽ न ध    प सां नि प ध म प नि सां सां सां रा म रं ऽ ग ज य मि थि ला प सां नि प ध (ध) म ग रे सा सा न म न तो हे बा ऽ र बा र ५.श्री शंकर जीक वन्दना राग भूपाली त्रिताल (मध्य लय) स्थाई: कतेक कहब दुःख अहाँ कय अपन शिव अहूँ रहब चुप साधि। अन्तरा: चिंता विथा तरह तरह क अछि, तन लागल अछि व्याधि, “रामरंग” कोन कोन गनब सब एक सय एक असाध्य॥ स्थाई प ग ध प   ग रे स रे   स ध सा रे   ग रे ग ग क ते क क   ह ब दुः ख   अ हाँ कय अ   प न शि व ग ग – रे   ग प ध सां   पध सां ध प   ग रे सा – अ हूँ ऽ र   ह ब चु प   साऽ ऽ ऽ ऽ   ऽ ऽ धि ऽ अन्तरा प ग प ध   सां सां – सां   सां ध सां सां   सां रें सां सां चिं ऽ ता ऽ   वि था ऽ त   र ह त र       ह क अ छि सां सां ध -   सां सां रें रें    सं रे गं रें     सां – ध प त न ला ऽ   ग ल अ छि   व्या ऽ ऽ ऽ     ऽ ऽ धि ऽ सां – ध प   ग रे स रे     सा ध स रे     ग रे ग ग रा ऽ म रं    ऽ ग को न   को ऽ न ग   न ब स ब ग ग ग रे   ग प ध सां   पध सां ध प   ग रे सा – ए क स य   ए ऽ क अ   साऽ ऽ ऽ ऽ   ऽ ऽ ध्य ऽ डॉ पालन झा, ग्राम-हरौली, कुशेश्वरस्थान। एम. ए. ( मैथिली ), सन्त साहेब रामदास पर डॉ दुर्गानाथ झा ’श्रीश’ केर निर्देशनमे पी.एच.डी.। संप्रति बी. डी. जे. कॉलेज, गढ़बनैलीमे मैथिली विभागाध्यक्ष। सन्त साहेब रामदास साम्प्रदायिक अर्थें मैथिली साहित्यमे सन्त कविक रूपमे साहेब रामदासक प्रमुख स्थान अछि। पचाढ़ी स्थानक महंथ बंशीदासजीक सानिध्यमे कवीश्वर चन्दा झा हिनक पदावलीक संकलन कए १९०१ ई. मे प्रकाशित कएने छथि। एहि पदावलीमे परिचयक क्रममे कवीश्वर चन्दा झा लिखैत छथि: “शिवलोचन मुख शिव सन जखन, साहेब रामदास तिथि तखन। प्रबल नरेन्द्र सिंह मिथिलेश, शासित छल भल तिर्हुत देश॥“ अर्थात् ११५३ साल (१७४६ ई.) मध्य महाराज नरेन्द्र सिंहक राज्यकालमे ई रहथि। छादनसँ न्याय-तत्त्व-चिन्तामणि कर्ता गंगेश उपाध्याय वंश कुलोद्भव साहेब रामदास “कुसुमौल” ग्रामक ( जरैल परगना, जिला- मधुबनी ) एक मैथिल ब्राह्मण छलाह।हिनक छोट भाइक नाम कुनाराम ओऽ एकमात्र प्राणसमप्रिय पुत्र ’प्रीतम’ छलनि। हिनक पूरानाम साहेब राम झा छलनि, मुदा अन्य सन्त कवि जकाँ ईहो अपन नामक आगाँ भक्ति-भावनासँ ’दास’ शब्द जोड़ि लेलनि। साहेब रामदासक पदावलीमे लगभग ४७८ टा पद संकलित अछि। एहि कविता मध्य ई अपन नाम साहेबराम, साहेबदास, साहेब, साहेबजन सेहो रखने छथि। साहेब रामदास आरम्भहिसँ भक्ति-प्रवण विचारक लोक छलाह। ई सदिखन ईश्वरहिक ध्यान-चिन्तनमे लीन रहैत छलाह। सन्यास ई बादमे ग्रहण कएलनि। एहि पाछाँ एकटा दुखद घटना घटित भेल- हिनका एकमात्र पुत्र ’प्रीतम’ छलनि। ओऽ अधिक समय दुखित रहए लगलाह। उवावस्था छलनि। एकबेर प्रीतम अधिक दुखित भए गेल छलाह। हिनक जीवनक अन्तिम कालक भान भए जएबाक कारणेँ साहेबरामदासविकल भए कानए लगलाह। मरण शय्या पर रहितहुँ प्रीतमकेँ एहन दुःखद दृश्य देखि नहि रहल गेलनि आऽ ओऽ अपन पितासँ पुछैत छथिन, “बाबूजी! अपने एतेक विकल किएक भए रहल छी? पिता उत्तर दैत छथिन “पुत्रक आवश्यकता एहि चतुर्थ अवस्थामे होइत छैक, से तँ अपने हमरा पहिने छोड़ि कए जाए रहल छी, तैँ ई सोचि-सोचि खिन्न चित्त भए व्याकुल भए रहल छी”। पुत्र प्रीतम प्रत्युत्तर दैत कहैत छथिन, “ई संसार असार थिक, क्षणभंगुर थिक, एहिमे स्त्री-पुत्र-पुत्री केओ अपन नहि थिक, ई सभटा अनित्य थिक, माया-मोह थिक। सभटा स्वार्थमूलक थिक तेँ एहि सभसँ माया-मोह रखनाइ अनुचित थिक। हम तँ अपनेक भगवन्-भजनमे विघ्न मात्र छलहुँ, आब अपने निर्विघ्नपूर्वक भगवन्-भजनमे लागि जाऊ”। एतेक बात कहैत देरी प्रीतमक प्राण-पखेरू उड़ि गेलनि। साहेब रामदास विकल भए कानि-कानि कए गाबए लगलाह- “प्रीतम प्रीति तेजि भेल परदेसिआ हो” साहेब रामदासकेँ प्रीतमक देहावसानसँ बड़ आघात लगलनि, प्रीतमक उपदेशकेँ धारण कए परिवार-समाजकेँ तिलाञ्जलि दए सन्यास ग्रहण कए लेलनि। पुत्र-वियोगक कारणेँ ई पक्का बैरागी भए गेलाह। गामसँ बाहर भए जंगले-जंगल एकान्तमे वास कए भजन-कीर्तन करए लगलाह। गामक लोकसभ बहुत दिन धरि पाछाँ कएलकनि जे अपने घुरि जाऊ, हमहु सभ अपनेक पुत्रक समान छी, अपनेकेँ कोनो कष्ट नै होएत। मुदा साहेब रामदास पर तकर कोनो प्रभाव नहि पड़लनि, उनटे जतए लोकक आवागमन देखथिन्ह, स्थानकेँ बदलि पुनः निर्जनस्थानमे चलि जाइत छलाह। लोकसभ किछु दिन धरि पाछाँ तँ केलकनि, मुदा अन्तमे हरि-थाकि कए जे ई आब पक्का बैरागी भए गेल छथि, तेँ हिनका आब तंग नहि कएल जाए, विचारि कए पाछाँ करब छोड़ि देलकनि। बैरागी भेलाक बाद ई देशक बहुतो भागमे भ्रमण कएलनि। भजन-कीर्तनक संग योग-साधनामे सेहो लीन भए गेलाह। योग-साधनामे सिद्धि प्राप्त कएलाक पश्चात् केओटीक निवासी बलिरामदासजीसँ दीक्षा ग्रहण कएलनि। दीक्षा ग्रहण कएलाक पश्चातो ई अनेक धर्म स्थानक भ्रमण करैत रहलाह। कहल जाइत अछि जे साहेबरामदास दण्ड-प्रणाम करैत-करैत जगन्नाथपुरी तक गेलाह। बाटमे बड़ कष्ट सहए पड़लनि, घाओ भए गेलनि, घाओमे पीब आबि गेलनि, मुदा दण्ड-प्रणाम ओऽ नहि छोड़लनि। दण्ड-प्रणाम करैत-करैत जगन्नाथपुरी तक गेलाह। जकर प्रमाण हुनकहि एक कवितासँ भेटैत अछि- साधुके संगत धरि गुरुक चरण धरि, आहे सजनी हमहु जाएब जगरनाथहि रेकी। नहि केओ अन्नदाता संग नहि सहोदर भ्राता, आहे सजनी माँगि भीखि दिवस गमाएब रे की। सभ जग भेल भाला गुरुआ अठारह नाला, आहे सजनी ओहिठाम केओ नहि छोड़ाओल रे की। सिंह दरबाजा देखि मन मोर लुबधल, आहे सजनी ओहिठाम पंडा पंडा बेंत बजारल रे की। साहेब जे गुनि धुनि बैसलहुँ सिर धुनि, आहे सजनी जगत जीवन निअराएल रे की। गुरु बलिरामदास मुरिया रामपुरक एक महात्मा शिष्य छलाह तथा अपन गाम केओटा (केओटी)क घनघोर जंगलमे योग साधना करैत छलाह। ई योग साधनामे निष्णात् छलाह। कहल जाइत अछि जे गुरुक बिना वास्तविक ज्ञान असम्भव अछि आऽ तेँ साहेबरामदास एक योग्य गुरुसँ दीक्षा लए, योग-साधनामे सिद्धि प्राप्त कए लेलनि। योग क्रिया पर सिद्धि प्राप्त कए लेलाक बाद जन्म-मरणसँ छुटकारा पाबि जेबाक पूर्ण विश्वास भए गेलनि, से गुरुक प्रसादहिसँ। मोक्ष प्राप्तिमे आब कोनो सन्देह नहि रहि गेलनि, जे जीवनक चरम लक्ष्य थिक। बलिरामदास हिनक दीक्षा गुरु छलथिन, तकर प्रमाण हिनकहि एक कवितासँ भेटैछ- “गुरु बलिराम चरण धरि माथे, साहेब हरि अपनाया है। अब तौ जरा-मरण छुटि जैहे, संशय सकल मेटाया है”। कृष्णक ई अनन्य भक्त छलाह। जगन्नाथपुरीक यात्राक क्रममे बाटहिमे हिनका स्वयं भगवान श्री कृष्ण दर्शन देने छलथिन। आब तँ ई कृष्णक ध्यानमे दिन-राति लागल रहैत छलाह। समाधिस्थ कालमे तँ दुनियाँक कोनो वस्तुक ध्यान नहि रहैत छलनि, ध्यान रहैत छलनि तँ एक मात्र भगवान श्री कृष्ण। जन-श्रुति तँ ईहो अछि जे भगवानक भजनक कालमे जखन ई नाच करैत छलाह तँ स्वयं भगवान श्री कृष्ण सेहो उपस्थित भए संग दैत छलथिन। साहेब रामदास अनेक तीर्थ-स्थलक दर्शन कएलनि। सांसारिक मोह-मायाकेँ त्यागि वैरागी भए गेलाह, मुदा मिथिला भूमिकेँ नहि त्यागि सकलाह। एक पदमे ओऽ लिखैत छथि, “मिथिला नगरी तोर दान बिनु साहेब होइछ बेहाल” तथा दोसर पदमे “साहेब करुणा करए शीश धुनि मिथिला होइछ अन्धेरि”। एहि पद सभसँ मिथिलाक प्रति हुनक प्रेमक सहज अनुमान लगाओल जाए सकैत अछि। धन्य ई मिथिला भूमि ओऽ धन्य महात्मा साहेब रामदास। पहिने कहि चुकल छी जे ई जंगलमे एकान्त वास कए भजन-कीर्तन कएल करथि। जतए-जतए ई जाथि ताहि-ताहि ठाम ई अपन खन्ती गारि कुटियाक निर्माण कए एक पाकड़िक गाछ अवश्य रोपि दैत छलाह। हिनक अनेक जगह पर योगमढ़ी छल आऽ सबहि ठाम ई पाकड़िक गाछ अवश्य रोपि दैत छलाह। हिनक अन्तिम योगमढ़ी दरभंगा जिलाक ’पचाढ़ी’ गाममे अछि, जे पूर्वमे बूढ़वनक नामे विख्यात छल। एहू ठाम पाकड़िक गाछ रोपने छलाह, जे अद्यावधि वर्तमान अछि। पल्लवित एहि गाछक शोध मानवशास्त्री लोकनि एखनहु कए रहल छथि। कमलाक तट पर स्थित पचाढ़ी गामक वन आऽ वृन्दावनक तुलना करब कठिन भए जाइत छल। वृन्दावनसँ एको रत्ती कम शोभा पचाढ़ी (बूढ़वनक) नहि छल। मोरक नाच, सुगाक गान, नाना प्रकारक वन्यजीव प्राणीक निर्भय विचरण करब, भिन्न-भिन्न लता-पुष्पसँ शोभित वनक दृश्य लोककेँ सहजहि आकृष्ट कए लैत छल। एहि स्थानक प्रशंसामे कवीश्वर चन्दा झा लिखैत छथि— “पाकड़ि वृक्ष सएह कमला तट जएह भजन कुटी विश्राम। चन्द्र सुकवि मन धरम परमधन धन्य पचाढ़ी ग्राम”॥ पचाढ़ी स्थानक शोभा आब नहि रहि सकल, जे पहिने एक निर्जन स्थान छल, ताहि ठाम आब ग्राम अछि, खेती-पथारी कएल जाइत अछि। वनक तँ आब निशानो नहि रहि गेल अछि, तथापि साहेब रामदासजीक समाधि-स्थलक चारूकात मन्दिर सेहो एक-दू नहि छओ-सातटा अछि। सभमे भोग-रागक व्यवस्था, पुजेगरीक संग-संग सहायकक व्यवस्था सभ मन्दिरमे फराक-फराक अछि। लगभग पाँच कट्ठा जमीनमे फुलबारी अछि। आगत-अतिथिक स्वागत यथासाध्य एखनहु कएल जाइत अछि। साहेब रामदासक नाम पर एकटा संस्कृत महाविद्यालय अछि, जाहिमे निर्धन छात्रकेँ स्थान दिससँ रहबाक व्यवस्था ओ मुफ्त भोजनक व्यवस्था कएल जाइत अछि। पचाढ़ीस्थान मिथिलाक वैभवशाली स्थानमेसँ सर्वप्रमुख अछि। एकर वैभवशालीक पाछाँ राजदरभंगाक महत्वपूर्ण योगदान अछि। तत्कालीन दरभंगा मिथिलेश नरेन्द्रसिंह निःसन्तान छलाह। हुनक पत्नी रानी पद्मावती अतिथि-सत्कार, पूजा-पाठक निमित्त ३०० (तीन सए) बीघा जमीन पचाढ़ी स्थानकेँ दानस्वरूप देने छलथिन। मुदा कहल जाइत अछि जे साहेब रामदास ओहि जमीनक दान-पत्रकेँ प्रज्वलित अग्निमे फेकि देलखिन। शिष्य लोकनिकेँ भिक्षाटन वृत्तिसँ आगत-अतिथिक सेवा सत्कार करए पड़ैत छलनि, जाहिसँ ओ लोकनि तंग आबि गेलाह आऽ फलस्वरूप ओऽ दान-पत्र पुनः महारानीसँ प्राप्त कए चुप-चाप राखि लेलनि, जे एखनहु धरि सम्पत्तिक रूपमे विद्यमान अछि। किछु जमीन भक्त लोकनि वेतियामे सेहो देने छथि। योग्य शिष्य सभ एहि सम्पत्तिकेँ बढ़ाए लगभग हजार बीघा बनाए देलनि। सरकार किछु जमीनपर सिलिंग लगाए देलक, मुदा व्यवस्थापक लोकनि अधिकांश जमीनकेँ वन-विभागकेँ दए गाछ-वृक्ष लगवाए देलनि। अपेक्षाकृत एखनहु ई स्थान समृद्ध अछि। साहेबरामदास एक सिद्ध पुरुष छलाह आऽ तेँ हिनकामे चमत्कारिक गुण स्वाभाविक अछि। चमत्कारसँ सम्बन्धित अनेक कथा हिनकासँ जुड़ल अछि, जाहिमे एक चमत्कारक उल्लेख करब हम उचित बुझैत छी, जे हिनक अन्तः साक्ष्यसँ जुड़ल अछि। राजा नरेन्द्र सिंहक समयमे पटनाक कोनो मुसलमान नवाब मिथिलापर आक्रमण कए देलक। राजा नरेन्द्र सिंहक सेना ओ नवाबक सेनाक बीच घोर संग्राम भेल, जाहिमे अपार धन-जनक क्षति भेल छल, मुदा राजा नरेन्द्र सिंह ओहिमे स्वयं वीरतापूर्वक युद्ध कएलनि आऽ शत्रु सेनाकेँ पराजित कएल। ओहि समयमे महात्मा साहेब रामदास नरेन्द्र सिंहक विजयी होएबाक कामना स्वरूप श्रीकृष्णसँ प्रार्थना कएलनि- “साहेब गिरधर हरहु नरेन्द्र दुःख, करहु सुखित मिथिलेशहि रे की”। एहिपर क्रुद्ध भए नवाब हिनका बन्दी बनाए पटनाक कारागारमे बन्द कए देलनि। साहेब रामदास योगबलेँ सभ दिन गंगा-स्नान, संध्या-तर्पण, पूजा-पाठ आदि गंगहि तटपर कएल करथि। कारागारमे रहितहुँ ई क्रम हिनक निरन्तर चलैत रहलनि। लोक सभ हिनका गंगा तटपर सभ दिन देखैत छलनि। नवाबकेँ कोना ने कोना एहि बातक जानकारी भेट गेलनि। नवाबकेँ तँ विश्वास नहि भेलनि तथापि हुनका अपन कर्मचारी सभपर संदेह भेलनि आऽ ओऽ अपनेसँ कारागारमे ताला लगाए देलनि। तथापि साहेब रामदासक गंगा-स्नानक क्रम नहि टुटलनि। अन्तमे नवाब साहेबरामदासक पएरमे बेड़ी बान्हि कारागारमे ताला लगाए देलनि। साहेबरामदास तत्क्षणहि करुणाद्र भए अपन आराध्य देव श्री कृष्णकेँ पुकारलनि- “अब न चाहिए अति देर प्रभुजी, अब न चाहिए अति देर। विप्र-धेनु-महि विकल सन्त जन, लियो है असुरगण घेरि”। गविते छलाह की पएरक बेड़ी ओ फाटकक ताला आदि सभ टूटिकए खसि पड़ल। नवाब आश्चर्य चकित भए गेल। ओ महात्माजीक पएरपर खसि पड़ल। साहेबरामदाससँ क्षमा माँगलक आऽ बादमे ससम्मान स्वागत कए मिथिला पहुँचाए देल। एहि तरहक कएक गोट चमत्कार अछि, जेना राजा राघव सिंहक समयमे राजदरभंगामे प्रेत-बाधाकेँ शान्त करब, माटिक भीतकेँ हाँकब। कृष्णाष्टमी, जन्माष्टमी आदि उत्सवक अवसरपर अधिक साधु-सन्तक भीड़ जुटलाक बादो थोड़बहु सामग्रीमे भोजनक अवसरपर भण्डारामे कोनो कमी नहि होएब आदि कतोक चमत्कारिक घटना सभ अछि, जे हिनकासँ जुड़ल अछि। एहि सिद्ध पुरुषक चमत्कारिक घटनासभसँ लोकक हिनका प्रति कतेक श्रद्धा छल से सहजहि अनुमान कएल जाए सकैत अछि। साहेबरामदास वैरागी वैष्णव-भक्त-कवि छलाह। पदक रचना करब हिनक साधन छल मुदा साध्य तँ एकमात्र छल भगवान विष्णुक भजन-कीर्तन करब। कहल जाइत अछि जे ओऽ अपनहि पदक रचना कए सभ दिन भगवानक भजन-कीर्तन कएल करथि। ओऽ भक्तिमार्गी छलाह आऽ तेँ भक्ति-मार्गक सिद्धांतक अनुरूप पदक रचना कएल करथि। भक्ति मार्गक सभ रसक पदरूपमे रचना कएलनि, मुदा प्रधान रस “मधुरं” रस सएह अछि। भगवानक कोनो एक रूपक ओऽ आग्रही नहि, सगुण-निर्गुण दुनू रूपमे मानैत छलाह, जे अपन मनोगत भाव कवितामध्य व्यक्त कएने छथि। “निर्गुण सगुण पुरुष भगवान, बुझि कहु साहेब धरइछ ध्यान”। “धैरज धरिअ मिलत तोर कन्त, साहेब ओ प्रभु पुरुष अनन्त”। साहेब रामदासक यद्यपि एकमात्र पदावली उपलब्ध अछि, जाहिमे ४७८ टा पद संकलित अछि। मुदा ईएह पदावली हुनक यशकेँ अक्षुण्ण बनाए रखबामे सभ तरहेँ समर्थ अछि। भक्तिक प्रायः सभ विषयपर पदक रचना कएने छथि, यथा- कृष्ण-जन्म, वात्सल्य, वंशीवादन, संयोग-श्रृंगार, रास-लीला, झुलोत्सव आदि। रासलीला परक जेहन पद सभक ई रचना कएने छथि से प्रायः मैथिलीमे आन केओ कवि नहि कएने छथि। हिनक रास-लीला परक पदक विवेचन स्वतंत्र रूपेँ कएल जाए सकैत अछि। कृष्ण-प्रेमक अनन्यता, भक्ति प्रवणता ओ प्रसाद गुण हिनक काव्यक मुख्य गुण कहल जाए सकैत अछि। ऋतुगीत, दिन-रातिक भिन्न-भिन्न समयोपयोगी पदक रचना, जेना-प्राती, सारंग, ललित, विहाग आदिक रचना कएल करथि। मिथिला पञ्चदेवोपासक सभ दिनसँ रहल अछि। साहेब रामदासक रचनामे सेहो भक्तिक विविध-रूपक दर्शन होइत अछि। कृष्णक तँ ई अनन्य भक्त छलाह मुदा आनो-आन देवी-देवता परक पदक रचना कएने छथि। हिनक हनुमानक फागु परक कविता देखल जाए सकैत अछि। एकरा सन्त लोकनिक फागु सेहो कहल जाए सकैछ- “प्रवल अनिल कपि कौतुक साजल लंका कएल प्रयाण। कनक अटारी कए असवारी छाड़थि अगनिक वाण॥ जरए लंक कपि खेलए फगुआ, उड़ए गगन अंगार। धुँआ वाढ़ि अकासहि लागल दिवसहि भेल अन्धार”। हिनक रचित एकटा महादेवक गीत सेहो अछि, जकर उल्लेख डॉ. रामदेव झा अपन “शैव साहित्यक भूमिका” नामक ग्रन्थमे कएने छथि- “ पुछइत फिरइत गौरा वटिया हे राम। कहु हे माइ, जाइत देखल मोर भंगिया हे राम॥ हाथ भसम केर गोला हे राम। वरद रे चढ़ि कोन नगर गेल भोला हे राम”॥ विरहिणी व्रजाङ्गनाक मनोदशाक एक विलक्षण रूप एहि ठाम सेहो देखल जाए सकैत अछि: “कमल नयन मनमोहन रे कहि गेल अनेक। कतेक दिवस भए राखब रे हुनि वचनक टेक॥ के पतिआ लए जाएत रे जहँ वसु नन्दलाल। लोचन हमर सतओलनि रे छतिआ दए शाल॥ जहँ-जहँ हरिक सिंहासन आसन जेहिठाम। हमहु मरब हरि-हरि कै मेटि जाएत पीर॥ आदि” मिथिलाक सन्गीत परम्परा अति प्राचीन ओ समृद्ध अछि। संगीतक रचना तँ विद्यापति ओ हुनकहुँसँ पूर्व होइत आएल अछि, मुदा रहस्यवादी संगीत-काव्य-रचना नवीन रूपमे आएल अछि, जकर प्रवर्तक साधु-सन्त लोकनि भेलाह। जाहिमे सन्त साहेब रामदासक स्थान अग्रगण्य अछि। हिनका लोकनिक रचनाक प्रभाव प्रायः सभ वर्गपर पड़ल। हिनक प्रायः सभ कवितामे रागक उल्लेख अछि। अतः एहिपर संगीत-शास्त्रक अनुकूल शोध-कार्य कएल जएबाक आवश्यकता अछि। साहेब रामदास परम वैरागी सुच्चा साधु छलाह, भक्त छलाह आऽ तेँ हिनक भाषापर सधुक्करी ओ तत्काल प्रचलित व्रजभाषाक किछु प्रभाव सेहो पड़ल अछि, तथापि हुनक जे पदावली उपलब्ध अछि से मैथिली साहित्यकेँ समृद्ध बनएबामे अपन महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कएने अछि। भक्ति-भावनाक सरलता ओ सहजताक दृष्टिएँ हिनक भाषा सरल ओ सहज अछि। भक्ति-भावना परक एहन कविता मैथिली-साहित्यमे प्रायः दुर्लभ अछि। हिनक भक्ति परक गीत एखनहु मिथिलाक गाम-घरमे बुढ़-बुढ़ानुसक ठोरपर अनुवर्तमान अछि, जकर संकलन करब परम आवश्यक अछि। मैथिलीपुत्र प्रदीप- आध्यात्मिक निबन्ध १. श्री मैथिली पुत्र प्रदीप (१९३६- )। ग्राम- कथवार, दरभंगा। प्रशिक्षित एम.ए., साहित्य रत्न, नवीन शास्त्री, पंचाग्नि साधक। हिनकर रचित "जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर’ आऽ ’सभक सुधि अहाँ लए छी हे अम्बे हमरा किए बिसरै छी यै" मिथिलामे लेजेंड भए गेल अछि। ॐ (मा) एकटा प्रश्न उठि सकैछ, जे मोक्ष कामीक लेल वैदिक कर्मक प्रयोजन? एकर उत्तर ई भऽ सकैछ जे यज्ञ यागादि कर्मक फलश्रुतिमे स्वर्ग प्राप्त करबाक बात कहल गेल अछि। मुदा जे व्यक्ति स्वर्ग नहि चाहैत होथि, मोक्षेटा चाहैत होथि, हुनका लेल वैदिक कर्मक आवश्यकता, ई वृहदारण्यकोपनिषद केर वचनसँ पुष्ट होइत अछि। यथा- “ तमेतं वेदानु वचनेनं ब्राह्मणाः विविदिषन्ति यज्ञेन, दानेन तपसा नाशकेन”। अर्थात्- ब्राह्मणगण वेदाध्ययनसँ कामनारहित यज्ञ, दान एवं तपसँ ओहि ब्रह्मकेँ चिन्हबाक इच्छा करैत छथि। एहि वचनमे अनाशकेन अर्थात् कामनारहित “यज्ञ, दान, तप” विशेष महत्त्व रखैत अछि। तात्पर्य जे वेदोक्त यज्ञादि कर्म जखन आशक्तिक संग कएल जाइत अछि, तखन ओहिसँ मात्र स्वर्गक भोग प्राप्त होइत अछि। परन्तु जखन बिना आशक्ति रखने निःस्वार्थ भावसँ कयल जाइत अछि, तखन काम-क्रोधसँ मुक्त भऽ कऽ कार्य केनिहारक चित्त शुद्ध भऽ जाइत अछि। ओऽ मोक्षक अधिकारी भऽ जाइत छथि। श्रीमद्भगवदगीतामे भगवान् श्रीकृष्णक उक्ति अछि- अध्याय १८ (५-६) यज्ञदान तपः कर्म न साज्यं कार्यमेव तत। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥ एतान्यापित कर्माणि संगं त्यक्त्वा फलानि च। कार्व्यानीति मे पार्थं निश्चितं मतमुत्तमम॥ अर्थात्- यज्ञ, दान, तप आदि कर्मक त्याग नहि करबाक चाही। मुदा ई समस्त कर्म निष्काम भावसँ करबाक चाही। अतएव उपनिषदक ’अनाशकेन’ एहि पदकेँ एहिठाम गीताक संगं त्यक्त्वा फलानि च पुष्ट करैत अछि। अतएव जे मनुष्य अपन आन्तरिक कल्याण चाहैत छथि अर्थात् जन्म-मृत्युक बन्धनसँ मुक्त हेबाक इच्छा करैत छथि, हुनका वैदिक कर्मकाण्डक फलस्वरूप स्वर्गक भोग केर इच्छा नहि राखि कऽ निष्काम भावसँ भगवानक प्रसन्नताक लेल मात्र कार्य करबाक चाही। ई बात मुण्डकोपनिषदमे सेहो आयल अछि। १,२,७. मनुष्यक चित्त अनेक प्रकारक कुकर्मसँ मलिन भऽ गेल रहैत अछि। एहि सभ मैलकेँ हटेबाक लेल सत् कर्म करब आवश्यक अछि। एहि सत्कर्मकेँ करबाक उद्देश्य होइत अछि वैदिक कर्म काण्ड। वेदोक्त कर्म कएलासँ चित्त शुद्ध होइत अछि। जकर बाद ब्रह्म विद्या अथवा ज्ञानक बात सुनलासँ सुफल भेटैत छैक। उपनयन संस्कारक बाद वेदोक्त कर्म करबाक लोक अधिकारी होइत छथि। वेदक अन्तिम लक्ष्य मोक्षे प्राप्त करब थीक। ईश्वरक उपासना योगक अभ्यास, धर्मक अनुष्ठान, विद्या प्राप्ति, ब्रह्मचर्य व्रतक पालन तथा सत्संग आदि मुक्तिक साधन गानल गेल अछि। कर्मफलक प्राप्तिक हेतु पुनर्जन्मक प्रतिपादन आत्मोन्नत्तिक लेल संस्कारक निरूपण, समुचित जीवन-यापन हेतु वर्णाश्रमक व्यवस्था एवं जीवनक पवित्रता हेतु भक्ष्या-भक्ष्यक निर्णय करब वेदक मुख्य विशेषता थीक। कर्मकाण्ड, उपासना-काण्ड तथा ज्ञान-काण्ड एहि तीनूक वर्णन मुख्यतया वेदमे भेटैत अछि। यज्ञान्तर्गत देवताक पूजा, ऋषि-महर्षिक सत्संग तथा दान ई तीनू क्रिया एक संग होइत अछि। तहिना ब्रह्मचर्य पालनसँ ऋषि-ऋण, यज्ञ द्वारा देव-ऋण तथा संतानोत्पत्तिसँ पितृऋण मुक्त हेबाक आदर्श वाक्य वेदेमे प्राप्त होइत अछि। पुत्र-वियोगक कारणेँ ई पक्का बैरागी भए गेलाह। गामसँ बाहर भए जंगले-जंगल एकान्तमे वास कए भजन-कीर्तन करए लगलाह। गामक लोकसभ बहुत दिन धरि पाछाँ कएलकनि जे अपने घुरि जाऊ, हमहु सभ अपनेक पुत्रक समान छी, अपनेकेँ कोनो कष्ट नै होएत। मुदा साहेब रामदास पर तकर कोनो प्रभाव नहि पड़लनि, उनटे जतए लोकक आवागमन देखथिन्ह, स्थानकेँ बदलि पुनः निर्जनस्थानमे चलि जाइत छलाह। लोकसभ किछु दिन धरि पाछाँ तँ केलकनि, मुदा अन्तमे हरि-थाकि कए जे ई आब पक्का बैरागी भए गेल छथि, तेँ हिनका आब तंग नहि कएल जाए, विचारि कए पाछाँ करब छोड़ि देलकनि। बैरागी भेलाक बाद ई देशक बहुतो भागमे भ्रमण कएलनि। भजन-कीर्तनक संग योग-साधनामे सेहो लीन भए गेलाह। योग-साधनामे सिद्धि प्राप्त कएलाक पश्चात् केओटीक निवासी बलिरामदासजीसँ दीक्षा ग्रहण कएलनि। दीक्षा ग्रहण कएलाक पश्चातो ई अनेक धर्म स्थानक भ्रमण करैत रहलाह। कहल जाइत अछि जे साहेबरामदास दण्ड-प्रणाम करैत-करैत जगन्नाथपुरी तक गेलाह। बाटमे बड़ कष्ट सहए पड़लनि, घाओ भए गेलनि, घाओमे पीब आबि गेलनि, मुदा दण्ड-प्रणाम ओऽ नहि छोड़लनि। दण्ड-प्रणाम करैत-करैत जगन्नाथपुरी तक गेलाह। जकर प्रमाण हुनकहि एक कवितासँ भेटैत अछि- साधुके संगत धरि गुरुक चरण धरि, आहे सजनी हमहु जाएब जगरनाथहि रेकी। नहि केओ अन्नदाता संग नहि सहोदर भ्राता, आहे सजनी माँगि भीखि दिवस गमाएब रे की। सभ जग भेल भाला गुरुआ अठारह नाला, आहे सजनी ओहिठाम केओ नहि छोड़ाओल रे की। सिंह दरबाजा देखि मन मोर लुबधल, आहे सजनी ओहिठाम पंडा पंडा बेंत बजारल रे की। साहेब जे गुनि धुनि बैसलहुँ सिर धुनि, आहे सजनी जगत जीवन निअराएल रे की। गुरु बलिरामदास मुरिया रामपुरक एक महात्मा शिष्य छलाह तथा अपन गाम केओटा (केओटी)क घनघोर जंगलमे योग साधना करैत छलाह। ई योग साधनामे निष्णात् छलाह। कहल जाइत अछि जे गुरुक बिना वास्तविक ज्ञान असम्भव अछि आऽ तेँ साहेबरामदास एक योग्य गुरुसँ दीक्षा लए, योग-साधनामे सिद्धि प्राप्त कए लेलनि। योग क्रिया पर सिद्धि प्राप्त कए लेलाक बाद जन्म-मरणसँ छुटकारा पाबि जेबाक पूर्ण विश्वास भए गेलनि, से गुरुक प्रसादहिसँ। मोक्ष प्राप्तिमे आब कोनो सन्देह नहि रहि गेलनि, जे जीवनक चरम लक्ष्य थिक। बलिरामदास हिनक दीक्षा गुरु छलथिन, तकर प्रमाण हिनकहि एक कवितासँ भेटैछ- “गुरु बलिराम चरण धरि माथे, साहेब हरि अपनाया है। अब तौ जरा-मरण छुटि जैहे, संशय सकल मेटाया है”। कृष्णक ई अनन्य भक्त छलाह। जगन्नाथपुरीक यात्राक क्रममे बाटहिमे हिनका स्वयं भगवान श्री कृष्ण दर्शन देने छलथिन। आब तँ ई कृष्णक ध्यानमे दिन-राति लागल रहैत छलाह। समाधिस्थ कालमे तँ दुनियाँक कोनो वस्तुक ध्यान नहि रहैत छलनि, ध्यान रहैत छलनि तँ एक मात्र भगवान श्री कृष्ण। जन-श्रुति तँ ईहो अछि जे भगवानक भजनक कालमे जखन ई नाच करैत छलाह तँ स्वयं भगवान श्री कृष्ण सेहो उपस्थित भए संग दैत छलथिन। साहेब रामदास अनेक तीर्थ-स्थलक दर्शन कएलनि। सांसारिक मोह-मायाकेँ त्यागि वैरागी भए गेलाह, मुदा मिथिला भूमिकेँ नहि त्यागि सकलाह। एक पदमे ओऽ लिखैत छथि, “मिथिला नगरी तोर दान बिनु साहेब होइछ बेहाल” तथा दोसर पदमे “साहेब करुणा करए शीश धुनि मिथिला होइछ अन्धेरि”। एहि पद सभसँ मिथिलाक प्रति हुनक प्रेमक सहज अनुमान लगाओल जाए सकैत अछि। धन्य ई मिथिला भूमि ओऽ धन्य महात्मा साहेब रामदास। पहिने कहि चुकल छी जे ई जंगलमे एकान्त वास कए भजन-कीर्तन कएल करथि। जतए-जतए ई जाथि ताहि-ताहि ठाम ई अपन खन्ती गारि कुटियाक निर्माण कए एक पाकड़िक गाछ अवश्य रोपि दैत छलाह। हिनक अनेक जगह पर योगमढ़ी छल आऽ सबहि ठाम ई पाकड़िक गाछ अवश्य रोपि दैत छलाह। हिनक अन्तिम योगमढ़ी दरभंगा जिलाक ’पचाढ़ी’ गाममे अछि, जे पूर्वमे बूढ़वनक नामे विख्यात छल। एहू ठाम पाकड़िक गाछ रोपने छलाह, जे अद्यावधि वर्तमान अछि। पल्लवित एहि गाछक शोध मानवशास्त्री लोकनि एखनहु कए रहल छथि। कमलाक तट पर स्थित पचाढ़ी गामक वन आऽ वृन्दावनक तुलना करब कठिन भए जाइत छल। वृन्दावनसँ एको रत्ती कम शोभा पचाढ़ी (बूढ़वनक) नहि छल। मोरक नाच, सुगाक गान, नाना प्रकारक वन्यजीव प्राणीक निर्भय विचरण करब, भिन्न-भिन्न लता-पुष्पसँ शोभित वनक दृश्य लोककेँ सहजहि आकृष्ट कए लैत छल। एहि स्थानक प्रशंसामे कवीश्वर चन्दा झा लिखैत छथि— “पाकड़ि वृक्ष सएह कमला तट जएह भजन कुटी विश्राम। चन्द्र सुकवि मन धरम परमधन धन्य पचाढ़ी ग्राम”॥ पचाढ़ी स्थानक शोभा आब नहि रहि सकल, जे पहिने एक निर्जन स्थान छल, ताहि ठाम आब ग्राम अछि, खेती-पथारी कएल जाइत अछि। वनक तँ आब निशानो नहि रहि गेल अछि, तथापि साहेब रामदासजीक समाधि-स्थलक चारूकात मन्दिर सेहो एक-दू नहि छओ-सातटा अछि। सभमे भोग-रागक व्यवस्था, पुजेगरीक संग-संग सहायकक व्यवस्था सभ मन्दिरमे फराक-फराक अछि। लगभग पाँच कट्ठा जमीनमे फुलबारी अछि। आगत-अतिथिक स्वागत यथासाध्य एखनहु कएल जाइत अछि। साहेब रामदासक नाम पर एकटा संस्कृत महाविद्यालय अछि, जाहिमे निर्धन छात्रकेँ स्थान दिससँ रहबाक व्यवस्था ओ मुफ्त भोजनक व्यवस्था कएल जाइत अछि। पचाढ़ीस्थान मिथिलाक वैभवशाली स्थानमेसँ सर्वप्रमुख अछि। एकर वैभवशालीक पाछाँ राजदरभंगाक महत्वपूर्ण योगदान अछि। तत्कालीन दरभंगा मिथिलेश नरेन्द्रसिंह निःसन्तान छलाह। हुनक पत्नी रानी पद्मावती अतिथि-सत्कार, पूजा-पाठक निमित्त ३०० (तीन सए) बीघा जमीन पचाढ़ी स्थानकेँ दानस्वरूप देने छलथिन। मुदा कहल जाइत अछि जे साहेब रामदास ओहि जमीनक दान-पत्रकेँ प्रज्वलित अग्निमे फेकि देलखिन। शिष्य लोकनिकेँ भिक्षाटन वृत्तिसँ आगत-अतिथिक सेवा सत्कार करए पड़ैत छलनि, जाहिसँ ओ लोकनि तंग आबि गेलाह आऽ फलस्वरूप ओऽ दान-पत्र पुनः महारानीसँ प्राप्त कए चुप-चाप राखि लेलनि, जे एखनहु धरि सम्पत्तिक रूपमे विद्यमान अछि। किछु जमीन भक्त लोकनि वेतियामे सेहो देने छथि। योग्य शिष्य सभ एहि सम्पत्तिकेँ बढ़ाए लगभग हजार बीघा बनाए देलनि। सरकार किछु जमीनपर सिलिंग लगाए देलक, मुदा व्यवस्थापक लोकनि अधिकांश जमीनकेँ वन-विभागकेँ दए गाछ-वृक्ष लगवाए देलनि। अपेक्षाकृत एखनहु ई स्थान समृद्ध अछि। साहेबरामदास एक सिद्ध पुरुष छलाह आऽ तेँ हिनकामे चमत्कारिक गुण स्वाभाविक अछि। चमत्कारसँ सम्बन्धित अनेक कथा हिनकासँ जुड़ल अछि, जाहिमे एक चमत्कारक उल्लेख करब हम उचित बुझैत छी, जे हिनक अन्तः साक्ष्यसँ जुड़ल अछि। राजा नरेन्द्र सिंहक समयमे पटनाक कोनो मुसलमान नवाब मिथिलापर आक्रमण कए देलक। राजा नरेन्द्र सिंहक सेना ओ नवाबक सेनाक बीच घोर संग्राम भेल, जाहिमे अपार धन-जनक क्षति भेल छल, मुदा राजा नरेन्द्र सिंह ओहिमे स्वयं वीरतापूर्वक युद्ध कएलनि आऽ शत्रु सेनाकेँ पराजित कएल। ओहि समयमे महात्मा साहेब रामदास नरेन्द्र सिंहक विजयी होएबाक कामना स्वरूप श्रीकृष्णसँ प्रार्थना कएलनि- “साहेब गिरधर हरहु नरेन्द्र दुःख, करहु सुखित मिथिलेशहि रे की”। एहिपर क्रुद्ध भए नवाब हिनका बन्दी बनाए पटनाक कारागारमे बन्द कए देलनि। साहेब रामदास योगबलेँ सभ दिन गंगा-स्नान, संध्या-तर्पण, पूजा-पाठ आदि गंगहि तटपर कएल करथि। कारागारमे रहितहुँ ई क्रम हिनक निरन्तर चलैत रहलनि। लोक सभ हिनका गंगा तटपर सभ दिन देखैत छलनि। नवाबकेँ कोना ने कोना एहि बातक जानकारी भेट गेलनि। नवाबकेँ तँ विश्वास नहि भेलनि तथापि हुनका अपन कर्मचारी सभपर संदेह भेलनि आऽ ओऽ अपनेसँ कारागारमे ताला लगाए देलनि। तथापि साहेब रामदासक गंगा-स्नानक क्रम नहि टुटलनि। अन्तमे नवाब साहेबरामदासक पएरमे बेड़ी बान्हि कारागारमे ताला लगाए देलनि। साहेबरामदास तत्क्षणहि करुणाद्र भए अपन आराध्य देव श्री कृष्णकेँ पुकारलनि- “अब न चाहिए अति देर प्रभुजी, अब न चाहिए अति देर। विप्र-धेनु-महि विकल सन्त जन, लियो है असुरगण घेरि”। गविते छलाह की पएरक बेड़ी ओ फाटकक ताला आदि सभ टूटिकए खसि पड़ल। नवाब आश्चर्य चकित भए गेल। ओ महात्माजीक पएरपर खसि पड़ल। साहेबरामदाससँ क्षमा माँगलक आऽ बादमे ससम्मान स्वागत कए मिथिला पहुँचाए देल। एहि तरहक कएक गोट चमत्कार अछि, जेना राजा राघव सिंहक समयमे राजदरभंगामे प्रेत-बाधाकेँ शान्त करब, माटिक भीतकेँ हाँकब। कृष्णाष्टमी, जन्माष्टमी आदि उत्सवक अवसरपर अधिक साधु-सन्तक भीड़ जुटलाक बादो थोड़बहु सामग्रीमे भोजनक अवसरपर भण्डारामे कोनो कमी नहि होएब आदि कतोक चमत्कारिक घटना सभ अछि, जे हिनकासँ जुड़ल अछि। एहि सिद्ध पुरुषक चमत्कारिक घटनासभसँ लोकक हिनका प्रति कतेक श्रद्धा छल से सहजहि अनुमान कएल जाए सकैत अछि। साहेबरामदास वैरागी वैष्णव-भक्त-कवि छलाह। पदक रचना करब हिनक साधन छल मुदा साध्य तँ एकमात्र छल भगवान विष्णुक भजन-कीर्तन करब। कहल जाइत अछि जे ओऽ अपनहि पदक रचना कए सभ दिन भगवानक भजन-कीर्तन कएल करथि। ओऽ भक्तिमार्गी छलाह आऽ तेँ भक्ति-मार्गक सिद्धांतक अनुरूप पदक रचना कएल करथि। भक्ति मार्गक सभ रसक पदरूपमे रचना कएलनि, मुदा प्रधान रस “मधुरं” रस सएह अछि। भगवानक कोनो एक रूपक ओऽ आग्रही नहि, सगुण-निर्गुण दुनू रूपमे मानैत छलाह, जे अपन मनोगत भाव कवितामध्य व्यक्त कएने छथि। “निर्गुण सगुण पुरुष भगवान, बुझि कहु साहेब धरइछ ध्यान”। “धैरज धरिअ मिलत तोर कन्त, साहेब ओ प्रभु पुरुष अनन्त”। साहेब रामदासक यद्यपि एकमात्र पदावली उपलब्ध अछि, जाहिमे ४७८ टा पद संकलित अछि। मुदा ईएह पदावली हुनक यशकेँ अक्षुण्ण बनाए रखबामे सभ तरहेँ समर्थ अछि। भक्तिक प्रायः सभ विषयपर पदक रचना कएने छथि, यथा- कृष्ण-जन्म, वात्सल्य, वंशीवादन, संयोग-श्रृंगार, रास-लीला, झुलोत्सव आदि। रासलीला परक जेहन पद सभक ई रचना कएने छथि से प्रायः मैथिलीमे आन केओ कवि नहि कएने छथि। हिनक रास-लीला परक पदक विवेचन स्वतंत्र रूपेँ कएल जाए सकैत अछि। कृष्ण-प्रेमक अनन्यता, भक्ति प्रवणता ओ प्रसाद गुण हिनक काव्यक मुख्य गुण कहल जाए सकैत अछि। ऋतुगीत, दिन-रातिक भिन्न-भिन्न समयोपयोगी पदक रचना, जेना-प्राती, सारंग, ललित, विहाग आदिक रचना कएल करथि। मिथिला पञ्चदेवोपासक सभ दिनसँ रहल अछि। साहेब रामदासक रचनामे सेहो भक्तिक विविध-रूपक दर्शन होइत अछि। कृष्णक तँ ई अनन्य भक्त छलाह मुदा आनो-आन देवी-देवता परक पदक रचना कएने छथि। हिनक हनुमानक फागु परक कविता देखल जाए सकैत अछि। एकरा सन्त लोकनिक फागु सेहो कहल जाए सकैछ- “प्रवल अनिल कपि कौतुक साजल लंका कएल प्रयाण। कनक अटारी कए असवारी छाड़थि अगनिक वाण॥ जरए लंक कपि खेलए फगुआ, उड़ए गगन अंगार। धुँआ वाढ़ि अकासहि लागल दिवसहि भेल अन्धार”। हिनक रचित एकटा महादेवक गीत सेहो अछि, जकर उल्लेख डॉ. रामदेव झा अपन “शैव साहित्यक भूमिका” नामक ग्रन्थमे कएने छथि- “ पुछइत फिरइत गौरा वटिया हे राम। कहु हे माइ, जाइत देखल मोर भंगिया हे राम॥ हाथ भसम केर गोला हे राम। वरद रे चढ़ि कोन नगर गेल भोला हे राम”॥ विरहिणी व्रजाङ्गनाक मनोदशाक एक विलक्षण रूप एहि ठाम सेहो देखल जाए सकैत अछि: “कमल नयन मनमोहन रे कहि गेल अनेक। कतेक दिवस भए राखब रे हुनि वचनक टेक॥ के पतिआ लए जाएत रे जहँ वसु नन्दलाल। लोचन हमर सतओलनि रे छतिआ दए शाल॥ जहँ-जहँ हरिक सिंहासन आसन जेहिठाम। हमहु मरब हरि-हरि कै मेटि जाएत पीर॥ आदि” मिथिलाक सन्गीत परम्परा अति प्राचीन ओ समृद्ध अछि। संगीतक रचना तँ विद्यापति ओ हुनकहुँसँ पूर्व होइत आएल अछि, मुदा रहस्यवादी संगीत-काव्य-रचना नवीन रूपमे आएल अछि, जकर प्रवर्तक साधु-सन्त लोकनि भेलाह। जाहिमे सन्त साहेब रामदासक स्थान अग्रगण्य अछि। हिनका लोकनिक रचनाक प्रभाव प्रायः सभ वर्गपर पड़ल। हिनक प्रायः सभ कवितामे रागक उल्लेख अछि। अतः एहिपर संगीत-शास्त्रक अनुकूल शोध-कार्य कएल जएबाक आवश्यकता अछि। साहेब रामदास परम वैरागी सुच्चा साधु छलाह, भक्त छलाह आऽ तेँ हिनक भाषापर सधुक्करी ओ तत्काल प्रचलित व्रजभाषाक किछु प्रभाव सेहो पड़ल अछि, तथापि हुनक जे पदावली उपलब्ध अछि से मैथिली साहित्यकेँ समृद्ध बनएबामे अपन महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कएने अछि। भक्ति-भावनाक सरलता ओ सहजताक दृष्टिएँ हिनक भाषा सरल ओ सहज अछि। भक्ति-भावना परक एहन कविता मैथिली-साहित्यमे प्रायः दुर्लभ अछि। हिनक भक्ति परक गीत एखनहु मिथिलाक गाम-घरमे बुढ़-बुढ़ानुसक ठोरपर अनुवर्तमान अछि, जकर संकलन करब परम आवश्यक अछि। साहित्य मनीषी मायानन्द मिश्रसँ साक्षात्कार -डॉ शिव प्रसाद यादवद्वारा।डॉ. श्री शिवप्रसाद यादव, मारवाड़ी महाविद्यालय भागलपुरमे मैथिली विभागाध्यक्ष छथि। भागलपुरक नामी-गामी विशाल सरोवर ’भैरवा तालाब’। जे परोपट्टामे रोहु माछक लेल प्रसिद्ध अछि। कारण एहि पोख्रिक माँछ बड़ स्वादिष्ट। किएक ने! चौगामाक गाय-महींसक एक मात्र चारागाह आर स्नानागार भैरबा पोखड़िक महाड़। दक्षिणबड़िया महाड़ पर मारवाड़ी महाविद्यालय छात्रावास। छात्रावासक प्रांगणमे हमर (अधीक्षक) निवास। आवासक प्रवेश द्वार पर लुक-खुक करैत साँझमे बुलारोक धाप। हॉर्नक ध्वनि सुनि दौड़ि कए घरसँ बहार भेलहुँ। दर्शन देलनि मिथिलाक त्रिपूर्ति, महान विभूति- दिव्य रूप। सौम्य ललाट। ताहि पर चाननक ठोप, भव्य परिधान। ताहि पर मिथिलाक पाग देखितहि मोन भेल बाग-बाग। नहुँ-नहुँ उतरलनि- साहित्य मनीषी मायानन्द, महेन्द्र ओऽ धीरेन्द्र। गुरुवर लोकनिक शुभागमनसँ घर-आँगन सोहावन भए गेल। हृदय उमंग आऽ उल्लाससँ भरि गेल। मोन प्रसन्न ओऽ प्रमुदित भए उठल। गुरुवर आसन ग्रहण कएलनि, यथा साध्य स्वागत भेलनि। तदुपरान्त भेंटवार्ताक क्रम आरम्भ भए गेल। प्रस्तुत अछि हुनक समस्त साहित्य-संसारमे समाहित भेंटवार्ताक ई अंश:- प्र. ’मिथि-मालिनी’ केँ अपने आद्योपान्त पढ़ल। एकर समृद्धिक लेल किछु सुझाव? उ. ’मिथि मालिनी’ स्वयं सुविचारित रूपें चलि रहल अछि। स्थानीय पत्रिका-प्रसंग हमर सभ दिनसँ विचार रहल अछि जे एहिमे स्थापित लेखकक संगहि स्थानीय लेखक-मंडलकेँ सेहो अधिकाधिक प्रोत्साहन भेटक चाही। एहिमे स्थानीय उपभाषाक रचनाक सेहो प्रकाशन होमक चाही। एहिसँ पारस्परिक संगठनात्मक भावनाक विकास होयत। प्र. ’मिथिला परिषद’ द्वारा आयोजित विद्यापति स्मृति पर्व समारोहमे अपनेकेँ सम्मानित कएल गेल। प्रतिक्रिया? उ. हम तँ सभ दिनसँ मैथिलीक सिपाही रहलहुँ अछि। सम्मान तँ सेनापतिक होइत छैक, तथापि हमरा सन सामान्यक प्रति अपने लोकनिक स्नेह-भाव हमरा लेल गौरवक वस्तु भेल आऽ मिथिला परिषदक महानताक सूचक। हमरा प्रसन्न्ता अछि। प्र. अपने साहित्य सृजन दिशि कहियासँ उन्मुख भेलहुँ? उ. तत्कालीन भागलपुर जिलाक सुपौलमे सन् ४४-४५ मे अक्षर पुरुष पं रामकृष्ण झा ’किसुन’ द्वारा मिथिला पुस्तकालयक स्थापना भेल छल तकर हम सातम-आठम वर्गसँ मैट्रिक धरि अर्थात् ४६-४७ ई सँ ४९-५० ई.धरि नियमित पाठक रही। एहि अध्ययनसँ लेखनक प्रेरणा भेटल तथा सन् ४९ ई. सँ मैथिलीमे लेख लिखऽ लगलहुँ जे कालान्तरमे भाङक लोटाक नामे प्रकाशितो भेल सन् ५१ ई. मे। हम तकर बादे मंच सभपर कविता पढ़ऽ लगलहुँ। प्र. अपने हिन्दी एवं मैथिली दुनू विषयसँ एम.ए. कएल। पहिल एम.ए. कोन विषयमे भेल? उ. मैट्रिकमे मैथिली छल किन्तु सन् ५० ई. मे सी.एम. कॉलेज दरभंगामे नाम लिखेबा काल कहल गेल जे मैथिलीक प्रावधान नहि अछि। तैँ हिन्दी रखलहुँ। तैँ रेडियो, पटनामे काज करैत, सन् ६० ई. मे पहिने हिन्दीमे, तखन सन् ६१ ई. मे मैथिलीमे एम. ए. कएलहुँ। प्र. हिन्दी साहित्यमे प्रथम रचना की थीक आऽ कहिया प्रकाशित भेल। उ. हिन्दीक हमर पहिल रचना थिक, ’माटी के लोक: सोने की नया’ जे कोसीक विभीषिका पर आधारित उपन्यास थिक आऽ जे सन् ६७ ई. मे राजकमल प्रकाशन, दिल्लीसँ प्रकाशित भेल। प्र.अपनेक हिन्दी साहित्यमे १. प्रथम शैल पुत्री च २. मंत्रपुत्र ३. पुरोहित ४. स्त्रीधन ५. माटी के लोक सोने की नैया, पाँच गोट उपन्यास प्रकाशित अछि। एहिमे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपन्यास कोन अछि आओर किएक? उ. अपन रचनाक प्रसंग स्वयं लेखक की मंतव्य दऽ सकैत अछि? ई काज तँ थिक पाठक आऽ समीक्षक लोकनिक। एना, हिन्दी जगतमे हमर सभ ऐतिहासिक उपन्यास चर्चित रहल अछि। अधिक हिन्दी समीक्षक प्रशंसे कएने छथि। गत वर्षसँ हिन्दीक सम्राट प्रो. नामवर सिंह जी हिन्दीक श्रेष्ठ उपन्यास पर एकटा विशिष्ट कार्य कऽ रहल छथि, जाहिमे हमर प्रथम शैल-पुत्री नामक प्रगैतिहासिक कालीन उपन्यास सेहो संकलित भऽ रहल अछि। एहि उपन्यास पर विस्तृत समीक्षा लिखने छथि जयपुर युनिवर्सिटीक डॉ शंभु गुप्त तथा हम स्वयं लिखने छी एहि उपन्यासक प्रसंग अपन मंतव्य। ई पुस्तक राजकमल प्रकाशनसँ छपि रहल अछि। असलमे प्रथम शैलपुत्री’ मे अछि भारतीय आदिम मानव सभ्यताक विकासक कथाक्रम- जे कालान्तरमे हड़प्पा अथवा सैंधव सभ्यताक निर्माण करैत अछि जकर क्रमशः अंत होइत अछि। हम स्वयं एकरा अपन सफल रचना मानैत छी, समीक्षको मानि रहलाह अछि। एना, पुरोहित अपना नीक लगैत अछि। ’स्त्रीधन’ मिथिलाक इतिहास पर अछि। श्री आद्याचरण झा (१९२०- )।मंगरौनी। संस्कृतक महान विद्वान। मैथिलीमे मिहिर, बटुक, वैदेहीमे रचना प्रकाशित। दरभंगा संस्कृत वि.वि. केर प्रतिकुलपति। राष्ट्रपतिसँ सम्मान प्राप्त। भगवत्याः सीतायाः संरक्षकोजनकः- “विदेह”- एकं महनीयं विवरणम् - श्री आद्याचरण झा १.मिथिला राजधान्यां जनकपुरे एकदा महर्षिः अष्टावक्रः समायातः। तेषां वकू शरीरं दृष्ट्वा तत्र समुपस्थिताः जनाः हसितवन्तः। तं दृष्ट्वा महर्षिः उक्तवान्- अत्रत्याः जनाः केवलं व्आह्य रूपं शरीरं पश्यन्ति।आत्मानं न जानन्ति। एतेषां नागारिकाणां भवान् कथं “विदेहः” इति ज्ञातुं न शक्नोति। २.महाराजः जनकः उक्तवान्- यथार्थता इयं नास्ति। केवलं वक्र शरीरम् अवलोक्य विद्वांसः हसितवन्तः, किन्तु सर्वे महान्तः ज्ञानिनः सन्ति। ३.”विदेह” उक्तवान्- भवन्तां मस्तके जटायां एकस्मिन् पात्रे जलं प्रपूर्य स्थापयामि। भवता सह एकः मनीषी गच्छति। भवन्तः सम्पूर्णं राजभवनं भ्रमन्तु (पश्यन्तु)। किन्तु पात्रस्थं जलं यदि एकं विन्दुं यत्र पतिष्यति ततः एव परावर्तयिष्यति स विद्वान्। ४.महर्षिः अष्टावक्रः समग्रं राजप्रासादं पश्यन्-भ्रमन् परावर्तितः। महाराजेन जनकेन पृष्टम्। किं राजभवनं दृष्टवन्तः भवन्तः? महर्षिणा कथितम्- ’राजभवनं न भ्रमितं, किन्तु मम ध्यानं जलविन्दु पतने आसीत्, न किमपि दृष्टम्। ५.विदेहः जनकः कथितवान्- ’भवन्तः जिज्ञासायाः समाधानं तु जातम्। भवन्तः समग्रं राजभवनं भ्रमन्तः न किमपि दृष्टवन्तः। तर्थेवाहं सर्वाणि कार्याणि कुर्वन् न तत्र मनसा- आत्मना च संलग्नः अस्मि। महर्षिः समायाचनां कृत्वा परावर्तितवान्। उपर्युक्त घटनाचक्रं प्रमाणयति यत् मनः एव सर्वं करोमि। ’मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयोः”- श्रीमदभगवद्गीता..” प्रकाश झा, सुपरिचित रंगकर्मी। राष्ट्रीय स्तरक सांस्कृतिक संस्था सभक संग कार्यक अनुभव। शोध आलेख (लोकनाट्य एवं रंगमंच) आऽ कथा लेखन। राष्ट्रीय जूनियर फेलोशिप, भारत सरकार प्राप्त। राजधानी दिल्लीमे मैथिली लोक रंग महोत्सवक शुरुआत। मैथिली लोककला आऽ संस्कृतिक प्रलेखन आऽ विश्व फलकपर विस्तारक लेल प्रतिबद्ध। अपन कर्मठ संगीक संग मैलोरंगक संस्थापक, निदेशक। मैलोरंग पत्रिकाक सम्पादन। संप्रति राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्लीक रंगमंचीय शोध पत्रिका रंग-प्रसंगक सहयोगी संपादकक रूपमे कार्यरत। ( मिथिलामे सभस’ उपेक्षित अछि मिथिलाक भविष्य ; यानी मिथिलाक बच्चा ।  मैथिली भाषामे बाल-बुदरुक  लेल किछु  गीतमय रचना अखन तक नहि भेल अछि जकरा बच्चा रटिक’ हरदम गावे-गुनगुनावे  जाहिसँ  बच्चा मस्तीमे रहै आ ओकर मानसिक विकास दृढ़ हुऎ । एहि ठाम प्रस्तुत अछि बौआ-बच्चाक लेल किछु बाल कविता । ) १. प्रकाश झा 1. बिलाड़ि बाघक मौसी तूँ बिलाड़ि म्याऊँ  म्याऊँ बजै बिचारि, मुसबा के हपसि क’ खाई कुतबा देख भागि जाई । 2. बाघ मौसी तूँ बिलाड़ि के बाघ छौ तोहर नाम , जंगल के तूँ राजा छेँ बा’’’ बा’’’ केनाइ तोहर काम । 3. गैया बाबा यौ! अबै यै गैया हरियर घास चड़ै यै गैया , मिठगर दूध दै यै गैया हमर सभहक मैया गैया । 4.  कुतबा दिन मे सुतै, राति मे जगै, चोर भगाबै कुतबा । रोटी देखिक’ दौड़ल अबै, नागैड़ डोलाबै कुतबा । अनठिया के देखिते देरी, भौं’’’ भौं’’’ भुकै कुतबा । 5. हाथी झूमै-झामैत अबै हाथी, लम्बा सूढ़ हिलाबै हाथी, सूप सनक कान, हाथी, कारी खटखट पैघ हाथी । बाल-बुदरुकक लेल कविता चित्र: प्रीति ठाकुर चिड़ै/जानवर सुग्गा, मेना, कौआ, बगरा, चिड़ै-चुनमुन के नाम छै । गैया, बरद, बिलाड़ि, कुतबा सभके दादी पोसै छै कौवा चार पर बैसलौ कार कौआ, कारी खटखट देह कौआ । कॉव-कॉव कुचरौ कौआ , रोटी ल’ क’ उड़तौ बौआ ॥ सुग्गा हरियर सुग्गा पिजड़ामे राम राम रटै छै । कुतरि-कुतरि क’ ठोर स’ मिरचाई लोंगिया  खाई छै ॥ मेघ कारी-कारी मेघ लगै छै, झर-झर झिस्सी झहरै छै । लक-लक लौका लौकै छै, झमझम-झमझम बरसै छै । फह-फह फूँही पड़ै छै, टपटप-टपटप टपकै छै । दीयाबाती सुक-सुकराती दीयाबाती, दादी सूप पिटतै । छुड़छुड़ी, अनार, मिरचैया,  खूब फटक्का फोड़बै । जगमग जगमग दीप जराक’ हुक्का लोली भँजबै । नानी माँ के माँ हमरे नानी, मामा के माँ हमरे नानी । मौसी के माँ हमरे नानी, खिस्सा सुनाबै हमरा नानी । छैठ परमेसरी आइ छै खड़ना खीर रातिमे, दादी सबके देतै ढाकी, केरा,कूड़ा ल’ क’, घाट पर हमहू जेबै भोरे – भोर  सूरज के ,अरघ हमहू देखेबै ठकुआ, मधूर, केरा, भुसवा हाउप हाउप खेबै . डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ बहुत दिनक बाद मिथिलाक ग्रामांचल मे सगर राति दीप जरयक आयोजन भेल अछि। ओना एहिसँ पूर्व हटनी (19.05.2001) आ ओहूसँ पहिने घोघरडीआ ( 22.10.1994) आ’ डयैाढ ़(29.04.1990)मे आयोजित भेल छल। शहरे शहरे बौआए सगर राति गाम दिस एक बेर आएल अछि। एहि लेलडा. अषोक कुमार झा ‘अविचल’धन्यवादक पात्र तँ छथिहे। हुनक गौंआँ लोकनि सेहो ओहिना धन्यवादक पात्र छथि। मुजफ्फरपुरसँ रहुआ-संग्राम धरिक सगर रातिक यात्रामे कतेको बेर निराशाजनक स्थिति आएल। कतेको गोटय एहि रतिजग्गापिकनीकके बन्द करबाक परामर्श देल, मुदा काठमाण्डूसँ कोलकाता, विराटनगरसँ वनारस जनकपुरसँ राँची, देवघरसँ पूर्णियाँ, सुपौलसँ जमशेदपुर धरि सगर रातिक दीप जरैत रहल। नव नव कथाकार अपन नवनव कथाक संग अपनाकेँ जोडै़त गेलाह। विभिन्न स्थानक मातृभाषा अनुरागीक स्नेह आ सहयोग एकरा भेटैत गेलैक। सगर रातिक दीप अवाधित रूपे  जरैत रखबा लेल ओ ओलोकनि टेमी बातीक ओरिआओन सुरुचिपूर्वक करैत रहलाह। जे सबएकरा अजगू त बुझैत छलाह, सहटि लग आबि अपने आॅंखिए देखल, विश्वास भेलनि। सगर राति दीप जरय कोन पृष्ठभूमिमे आ प्रयोजनवश शुरू भेल छल, आयोजन हेतु कोन कोन शर्त आवश्यक छलैक, तकरा स्पष्ट करबाक हेतु हम प्रथम तीन संयोजक द्वारा प्रेषित आमंत्रण पत्रक सारांश प्रस्तुत करब।सगर राति दीप जरयक अवधारणाक जन्म किरण जयन्तीक अवसर पर 01 दिसम्बर,1989के ँ लोहनामे साहित्यकार लोकनिक बीच भेल। मुदा साकार भेल प्रभास कुमार चैधरीक माध्यमसँ। ओहि अवधारणा केँ साकारकरबाक उद्देश्यसँ प्रभास कुमार चैधरी साहित्यकार लोकनिकेँ आमन्त्रित करैत छओ जनवरी 1990क पत्र द्वारा अनुरोध कएने छलाह-आदरणीय, अपने केँ विदित होएत जे किरण जयन्तीक अवसरपर लोहनामे एकत्रित साहित्यकार लोकनि निर्णय लेलनि जे पंजाबी साहित्यकार लोकनि द्वारा आयोजित ‘दीवा जले सारी रात‘ जकाँ भरि राति कथा पाठक आयोजन घूमि-घूमि कए विभिन्न स्थान पर साहित्यकार लोकनिकआवास पर होअय। पहिल आयोजन 24 दिसम्वर,1989 के ँ कटिहारमेअशोकक डेरा पर राखल गेल छल जेस्थगित भए गेल एक दुखद घटनाक कारणेँ। आगू ओ लिखैत छथि-हमरा पत्र द्वारा ई समाचार भेटल आ एहिआयोजनक प्रारम्भ मुजफ्फरपुरमे करबाक आग्रह सेहो। हम एहि निर्णयकस्वागत करैत दिन राति कथा पाठ आ परिचर्चाक अष्टयामक आयोजन 21 जनवरी 1990, रविदिन राखल अछि। सादर आमंत्रित छी। अपनेक उपस्थितिये पर आयोजनक सफलता निर्भर अछि। अपने 21 तारीखकेँ भोरे दस बजे पहुँचि जाए हमर कार्यालय जकर पाछाँ हमर निवास सेहो अछि। ई स्थान मुजफ्फरपुरक प्रसिद्ध देवी स्थानक सामने अछि। कोनो तरहकअसुविधा नहि होएत। 21 तारीखके ँ दिनुका भोजनोपरान्त कार्यक्रम शुरु होएत, जे प्रातधरि चलत। कथापाठ (नव लिखल कथा ) ओ ओहिपर विशेष चर्चा होएत।अपन अएबाक सूचना पत्र द्वारा पहिनहि दए दी तँ विशेष सुविधा रहत। अगिला कार्यक्रमक स्थान आ तिथिक निर्णय एहीठाम कार्यक्रममे लेल जाएत। डेओढ, कटिहार, दरभंगा,पटना आ जनकपुरमे कार्यक्रम करबाक विचार अछि। अहाँक आगमुनक प्रतीक्षा मे‘‘- प्रभास कमार चैधरी। एही प्रकारेँ सगर रातिक अवधारणाकेँ प्रभास कुमार चैधरी साकार कएल। हुनक पत्नी ज्योत्सना चैधरी करतेबताक आंगनक गृहपत्नी जकाआगत साहित्यकारक स्वागत करैत भरि राति टेमी उसकबैत रहलीह। पति द्वारा आयोजित साहित्यिक कार्यक्रममे पत्नी द्वारा भरि राति टेमी उसकाएब आ अतिथिक स्वागतमे तत्पर रहबाक दोसर आ सेहो दू बेर उदाहरण प्रस्तुत कएलनि अछि काठमाण्डूक दूनू आयोजनमे श्रीमती रूपा धीरू। पहिल सगर रातिक आयोजनमे रमेश (थाक), शिवशंकर श्रीनिवास (बसात मे बहैत लोक),विभूति आनन्द (अन्यपुरुष), अशोक (पिशाच),सियाराम झा ‘सरस‘ (ओहिसाँझक नाम), प्रभास कुमार चैधरी (खूनी) रवीन्द्र चैधरी, आदि कथा पढल। डा.नन्दकिशोर हिन्दी कथाक पाठ कएने छलाह। अध्यक्षता कएल रमानन्द रेणु। कथाकार लोकनिक अतिरिक्त कथाचर्चामे भाग लेलनि जीवकान्त, भीमनाथ झा, मोहन भारद्वाज, डा. रमानन्द झा ‘रमण‘। पठित कथापर चर्चाक उपरान्त डा.रमण अपन कथा विषयक आलेख शैलेन्द्र आनन्दक कथा यात्राक पाठ कएल।साहित्यकारकस्वाभिमानक रक्षाक हेतु चर्चाक क्रममे निर्णय भेल जेसमाद पर सगर रातिक आयोजनक भार लेबाक अनुरोध स्वीकार नहि कएलजाएत। आमंत्रित कएनिहार लेल स्वयं उपस्थित भए सहभागी बनब आवश्यककए देल गेल।एकर निर्वाह अद्यावधि भए रहल अछि। एक शब्दमे कहि सकैत छी, इएह शर्त सगर रातिक प्राण थिकैक। जीवकान्तक अनुरोध पर दोसर सगर राति डेओढमे तीन मासक बाद करबाक निर्णय भेल। एहिठाम हम दोसर (डेओढ) आ तेसर (दरभंगा)क संयोजक द्वाराप्रेषित पत्रक अंश प्रस्तुत करब जाहिसँ सगर रातिक लक्ष्य तँ स्पष्ट होएबे करत पत्र लिखबाक क्रम कोन स्थितिमे सम्प्रति अछि, सेहो बुझा जाएत।डेओढ आयोजनक संयोजक जीवकान्त लिखैत छथि-मैथिली भाषाककथाकार लोकनि एकठाम बैसथि अपन नव रचना पढथि आ ओहि पर टीकाविश्लेषण करथि कथाक गति देबामे सामूहिक प्रयन्त करथि। एहि उद्देश्यसँकथा रैलीक आयोजन डेओढमे कएल जाइछ-सृजनात्मक उपलब्धि लेल एकरा स्मरणीय बनेबा मे अपन योगदान करी।दोसर आयोजनमे प्रो.रमाकान्त मिश्र, कीर्तिनारायण मिश्र, डातारानन्द वियोगी, नवीन चैधरी आदि संग भए गेलाह। डा.भीमनाथ झा आ प्रदीप मैथिलीपुत्र दूनू गोटे संयुक्तरूपेँ आयोजनक भार लेल जे श्री विजयकान्त ठाकुरक सौजन्यसँ चिनगी मंच द्वारा दरभंगामे सम्पन्न भए सकल। तेसर सगर रातिक संयोजक डा.भीमनाथ झा लिखैत छथि-पत्र पत्रिकाक एहि संक्रान्ति कालमे साहित्यमे संवादहीनताक स्थिति आबि गेलअछि, कथाक स्थिति तँ आर दयनीय। स्पष्टतः कथा लेखनमे गतिरोध देखलजा रहल अछि। एकरे दूर करबाक इच्छुक किछु युवा साहित्यकर्मी कथा संवाद लेल गोष्ठीक आयोजनक निर्णय लेलनि। दरभंगाक आयेजनमे एकटा नव अध्याय लिखाएल। से थिक एहि अवसर पर पोथीक लोकार्पण। सगर रातिक अवसर पर लोकार्पित पोथीक नामावली विवरण मे देल गेल अछि। तथापि ई उल्लेखनीय अछि जे एहिअवसर पर लोकार्पित होअए बला पहिल पोथी थिक पण्डित श्री गोविन्द झाक कथा संग्रह सामाक पौतीं। प्रभास कुमार चैधरी, जीवकान्त आ भीमनाथ झाक पत्रसँ सगर रातिक आयोजनक, लक्ष्य आ कोन परिस्थितिमे सगर राति दीप जरय सनकार्यक्रम शुरू भेल छल, स्पष्ट अछि। सगर रातिक नियमक अनुसारदरभंगाक आयोजनमे चारिम सगर राति तीन मासक बाद जनकपुरमे डा धीरेन्द्रक अनुरोध पर आयोजित करबाक निर्णय भेल। मुदा कोनो कारणवशआयोजनमे विलम्ब होइत देखि पण्डित दमनकान्त झाक पटना आवास पर पण्डित श्रीगोविन्द झाक संयोजकत्वमे चारिम आयोजन भेल। प्रसिद्ध कथाकार उपेन्द्रनाथ झा ‘व्यास‘ अध्यक्षता कएल आ कथा पाठ कएल। निशा भाग रातिमे व्यासजी अध्यक्षताक भार राजमोहन झाकेँ सौपि देने छलाह। प्रदीप बिहारी पहिल बेर एहीठाम सम्मिलित भए अगिला आयोजन बेगूसरायमे करबाक भार लए लेलनि । दमन बाबू आ व्यासजी नहि छथि। दूनू गोटे मोन पड़ि रहल छथि। प्रभास कुमार चैधरीक अन्तिम सहभागिता बेगूसरायमे सम्पन्न उनतीसम सगर रातिमे छल। डा. धीरेन्द्र अन्तिम बेर बिट्ठो मे कथा पढ़ने छलाह। वनारसमे सगर रातिक उदघाटन कएने छलाह हिन्दीक प्रख्यात साहित्यकार ठाकुर प्रसाद सिंह। एहिठाम हमर आँखिक समक्ष हुनका लोकनिक स्मृति साकार भए गेल अछि। ओना मजफ्फरपुरसँ प्रभास कुमार चैधरीक संशेजकत्वमे सगर रातिक यात्रा आरम्भ भेल छल । मुदा केन्द्र रहल पटने। पटनामे सात खेप सगर राति अयोजित भेल अछि। सगर रातिक यात्राक विस्तृत वर्णन आ खण्ड खण्डमे विश्लेषण प्रस्तुत अछि। ओकर संक्षिप्त उल्लेख प्रस्तुत अछि। कटिहार सगर रातिमे नवानीमे आयोजनक निर्णय भेल छल।संयोजक मोहन भारद्वाज प्रो. सुरेश्वर झाकेँकथाकार रूपमे प्रस्तुत कएल। ओतय श्यामानन्दचैधरी आ झंझारपुरक तात्कालीन डी.एस.पी. सरदार मनमोहन सिंह सम्मिलित भेलाह। ओ बरोबरि सम्मिलित होइत रहलाह। पंजाबक कलमकेँ मिथिलाक फूलबाड़ीमे चतरल देखि प्रमुदित होइत छलाह। सुरेश्वर झा डाराम बाबूक सौजन्यसँ सकरीमे आयोजन कएल। सकरीमे ए.सी.दीपक अएलाह। नेहरामे आयोजन भेल। नेहरामे मन्त्रेश्वर झा सम्मिलित भेलाह। विराटनगरसँ जीतेन्द्र जीत अएलाह। नेहरामे सगर रातिक अवसरपर पठित कथाक एक प्रतिनिधि संग्रह प्रकाशित करबाक निर्णय भेल। डा.तारानन्द वियोगी एवं रमेश सहर्ष दायित्व ग्रहण कएल। कथा संग्रह श्वेत पत्र प्रकाशित भेल। श्वेत पत्रमे पैटघाट धरि पठित कथासँ बीछल कथा संगृहीत अछि। सगर राति दीप जरय कार्यक्रमकेँजीतेन्द्र जीत नेहरासँ विराटनगर,नेपाल पहुंचाओल। विराटनगरसँ बनारस आ बनारससँ पटना। पटनामे बुद्धिनाथ झा, अर्धनारीश्वर, रा.ना.सुधाकर केदार कानन, अरविन्द ठाकुर संग भेलाह तॅं सगर राति सुपौल पहुंचि गेल। सुपौलसँ बोकारो,ओतयसँ पैटघाट आ पैटघाटसँ रमेश रंजन जनकपुरधाम लए गेलाह।जनकपुरधामसँ इसहपुर। इसहपुरसँ श्यामानन्द चैधरी झंझारपुर आनल। ओतयसँ घोघरडीहा, बहेरा सुपौल आ फेर सुपौल सँ धीरेन्द्र प्रेमर्षि काठमाण्डू लए गेलाह।काठमाण्डूसँ रामनारायण देव राजविराज आ ओतयसँ कोलकातामे प्रभास कुमार चैधरी सगर रातिक रजत जयन्ती आयोजित कएल। कहबाक तात्पर्य जे नव-नव लोकक अबैत रहलासँ सगर रातिक आयोजन बढैत गेल । किन्तु जतय कतहु अग्रिम प्रस्तावक संकट होइत छलैक प्रभास जी आ फेर कमलेश जी ठाढ़ छलाह। किछु आयोजकक अनुरोध बरोबरि अशोकजीक पाकेटमे पेंडिंग रहैत छलनि। बेगूसरायसँ श्याम दरिहरे संग भेलाह अछि।ओहो कौखन आ कतहु आयोजन लेल तत्पर छथि।जेना जेना किछु लोक संग होइत गेलाह अछि, ओहिना किछु गोटेअपनाकेँ असम्वद्ध सेहो करैत गेलाह अछि। एकर मुख्यतः तीनि टा कारण अछि- 1.अस्वास्थ्य, 2.पठित कथाक प्रतिक्रिया पर खौझा कए असंगत प्रहार, आ‘ 3.प्रतिक्रिया सूनि हतोत्साहित होएब, एवं 4.कार्यालयीन व्यस्तता। एहि बीच नियमित एवं सक्रिय रूपसँ सहभागी बनैत कतेको साहित्यकार अस्वास्थ्य अथवा वार्धक्यक कारणेँ आब सम्मिमलित नहि भए पाबि रहल छथि। जाहि मे प्रमुख छथि पण्डित श्री गोविन्द झा, रमानन्द रेणु, सोमदेव, जीवकान्त, मोहन भारद्वाज आदि। पठित कथा पर अपन स्पष्ट मंतव्यसँ चर्चाकेँ जीवन्त बनौनिहार प्रो. रमाकान्त मिश्र कथाकार शिवशंकर श्रीनिवासक प्रतिक्रियासँ आहत भेला पर सकरीक बाद अपनाकेँ पूर्णतःसमेटि लेलनि। विविधा पर साहित्य अकादमीक पुरस्कारक विरोधमे केदार काननक नेतृत्वमे कलमल सुपौलक साहित्यकारक प्रतिक्रियाक कारणेँ डा.भीमनाथ झा जाएब छोड़ि देलनि। जे प्रभास जीक मनौअलि पर पण्डित गोविन्द झाक गाम इसहपुर जएबाक लेल तैआर भेल छलाह। तकर बाद  कमे ठाम गेलाह अछि। श्वेतपत्र मे अपन कपचल कथासँ आहत जीतेन्द्र जीत अपन बाट काटि लेलनि। किछु गोटे एहि आशाक संग संवद्ध भेल छलाह जे लोक प्रशंसाक महल ठाढ कए देत, तकर पूर्ति नहि भेला पर उत्साह कमि गेलनि। किछु गोटेक मास्टरी नव आगन्तुक लेल आतंककारी एवं अनुत्पादक भए गेल अछि।  सगर रातिक प्राण थिक अप्रकाशित आ अपठित कथाक पाठ। ओहि पर श्रोता अपन प्रतिक्रिया व्यक्त करैत छथि। ई प्रतिक्रिया तात्कालिक होइछतेँ सम्भव रहैत छैक जे पुनः सुनला वा पढला पर भिन्न प्रतिक्रिया हो। एहि सक्रियताक तीन प्रकारक सकारात्मक प्रभाव अछि- 1.रचनात्मक सक्रियतामे वृद्धि, 2.कथाक शिल्पमे सुधारक अवसर आ‘ 3.व्यक्तित्वमे सहनशीलताक गुण बढेबाक अवसर। पहिल सगर रातिमे प्रायः आठ टा कथाक पाठ भेल छल। कथाकसंख्या क्रमशः बढैत गेल। सबसँ बेसी कथाकारक सहभगिता महिषीमे भेल छल। एहि बीच जतेक कथा संग्रह छपल अछि, अधिकांश कथा सगर रातिक अवसर पर पठित आ चर्चित अछि। वयोवृद्ध साहित्यकार श्यामानन्द ठाकुर बहेरामे संग भेलाह।ओहिठामसँ संग छथि। हुनक सक्रियताक अनुमान एहीसँकए सकैत छी जे ओ प्रत्येक आयोजन लेल दू टा कथा लिखैत छथि। एमहर आबि पठित कथाक चर्चाक स्वरूप बदलि गेल अछि। पहिने पठित कथाधरि अपन प्रतिक्रिया सीमित राखल जाइत छल। मुदा आब व्यक्त विचारकेँ कटबा पर विशेष ध्यान रहैत अछि। एहिसँ पक्ष विपक्षक स्थिति बनि जाइछ। कतेकोठाम अप्रीतिकर स्थिति उत्पन्न भए गेल अछि । चर्चाबहकय नहि एहि लेल प्रभासजी पूर्ण सतर्क रहैत छलाह। हुनक अभाव खूब खटकैत रहैत अछि।कवि सम्मेलन मनोरंजनक हेतु आयोजित होअय लागल अछि।रचनात्मक स्पर्धा अथवा सक्रियताक महत्व गाण छक। तेँ कवि लोकनि गओले गीत गबैत छथि। मुदा सगर रातिक अवसर पर अप्रकाशित एवंअपठित कथा पढबाक वाध्यताक कारणेँ रचनात्मक सक्रियता बढल अछि। एक बेर व्यासजी गोविन्द बाबूकेँ परामर्श दैत कहने छलथिन्ह जे धूमि घूमि भरि राति जागब अहाँक स्वास्थ्य लेल ठीक नहि अछि। गोविन्द बाबूक उत्तर छल जे हमरा एहिसँ उर्जा प्राप्त होइत अछि। आंकडा़ कहैत अछि ओ सबसँ बेसी भरि राति ओएह बैसलाह अछि तथा सबसँ बेसी हुनके व्यक्तिगतपोथीक लोकार्पण एहि अवधिमे भेल अछि। ई थिक सगर रातिक रचनात्मक प्रभाव। रचनाकारकेँ उर्जस्वित रखबाक महान अवसर। कवि सम्मेलनमे आयोजककेँ विदाइक व्यवस्था करय पडै़त छनि । सगर राति एहि व्याधिसँ मुक्त अछि। सहभागी सत्यनारायणक पूजाक हकारजकाँ अबैत छथि आ भोर होइते घूमि जाइत छथि। एहिमे व्यावसायिकता नहि अछि, ई मातृभाषा प्रेमक सन्देश दैत अछि।सगर रातिक आयोजन विभिन्न स्थान पर भेलासँ स्थानीय विद्वत समाज आकर्षित होइत छथि। एकर प्रभाव ओहि स्थानक मैथिलीक सक्रियता पर पड़ैत अनुभव कएल गेल अछि। सगर राति दीप जरय समानधर्माकेँ भरि राति एकठाम रहबाक अवसर दैत अछि। विचारक आदन प्रदानक केन्द्र स्वतः मैथिली भाषा आ साहित्य भए जाइत अछि। एहिसँ परिचय आ अनुभवक क्षेत्रक विस्तार होइछ। मैथिलीक रचनाकारमे भावात्मक संवद्धता बढैत अछि।सगर राति दीप जरयक निरन्तर आयोजनसँ मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्तिपूर्ण क्रान्ति आबि गेल अछि। आन भाषाभाषी आ सात्यिकारकबीच मैथिलीक कथाकारक प्रतिष्ठा बढ़ल अछि। विशेषतः एहि हेतु जे मैथिलीक कथाकार दूर-दूरसँ अपन पाइ खर्च कए पहुचैत छथि। कथा पढैत आ सुनैत छथि। अपन कथा पर लोकक प्रतिक्रिया धैर्यपूर्वक सुनैत छथि। आ फेर अग्रिम आयोजनमे सम्मिलित होएबाक संकल्पक संग घूमि जाइत छथि। जे सगर राति कथाकार लेल कल्पित भेल छल,समाजक सुधी समाजक अन्तःकरण मे प्रवेश कए मैथिली भाषा साहित्यक पक्षमे अनुकूल वातावरणबनेबामे सार्थक भूमिकाक निर्वाह कए रहल अछि। जहिआ सगर राति प्रारम्भ भेल छल आ एखनुक जे स्थिति अछि ओहि मे गुणात्मक आ परिमाणात्मक दूनू प्रकारक परिवर्तन स्पष्ट अछि। विकासक ई दिशा आ गति निश्चिते शुभलक्षण थिक। एहि शुभ लक्षणक उदाहरण तँ इएह थिक जे दरभंगाक पहिल आयोजनमे पहिले पहिल दू टा पोथीक लोकार्पण भेल छल आ स्वर्ण जयन्तीक अवसर पर 36 टा पोथी लोकार्पित भेल। विद्वानलोकनि कहि सकैत छथि कोन भाषाक मंच पर एकबेर 36 टा पोथीक लोकार्पण भेल अछि।दरभंगामे एकटा अमेरिकन नागरिक मैथिलीमे कथाक पाठ कएने छलाह। सगर राति दीप जरयक दृष्टिसँ बोकरो उर्वर छल, एम्हर आबि राँची, जमदेशपुर देवघर पूर्णियां आदि स्थान मैथिली लेल जगरना कएलक अछि,इहो शुभ लक्षण थिक।मुदा, सगर रातिक लोकप्रियता आ बिना वर.विदाइक साहित्यकार एवं साहित्यानुरागीक उपस्थितिक उपयोग कतहु कतहु कथा पाठ एवं ओहि पर चर्चासँ भिन्न प्रयोजन सिद्धि लेल सेहो भए गेल अछि। जे सगर रातिक मूल अवधारणाक अनुकूल नहि अछि। ओहिसँ बचबाक चाही। सहरसामे दोसर खेप सगर रातिक आयेजन 21 जुलाई, 2007 केँ भेल छल। सगर राति आयोजनक एक प्रमुख आकर्षण अछि भेटघाँट। ओहिसँ बाहरक साहित्यकार वंचित रहलाह। उपस्थितिक प्रसंग सूनि जीवकान्त जी 22 जुलाई, 2007क अपन पोस्ट कार्डमे लिखलनि अछि- ‘सहरसा कथा गोष्ठीक खबरि भेल। कथा गोष्ठी भूतकालक वस्तु भेल। लेखन काज लेखक सभ छोड़ने जाइत छथि। सेमिनार, तकर प्रचलनबढ़ल अछि। टी.ए./डी.ए./भेटघाँट ई सभ भए गेँबुू जे लेखकीय ल तझअस्मिताक अहंकार पुष्ट भेल आ‘ एक दोसराकेँ बल देल। सरकारी मान्यताक बाद भाषामे अनेक राजरोग उत्पन्न होइत छैक।मैथिली निरपवाद रूपे पहिनेसँ बेसी रोगाहि भेल छथि। जिबैत रहओ।‘हमरा विश्वास अछि सगर रातिक नियमित आयोजन मैथिलीके राजरोगसँ मुक्त रखबामे सफल होएत। साहित्य अकादेमी सँ वर्ष 2007 लेल पुरस्कृत प्रहरी प्रदीप बिहारीक कथा संग्रह सरोकारक प्रायः समस्त कथा सगर राति दीप जरयक अवसर पर लोक सुनने अछि। आ‘ ओहि पर अपन-अपन प्रतिक्रिया व्यक्त कएने अछि। सगर रातिक ई पहिल उपलब्धि थिकैक। एहि उपलब्धि पर मैथिली एहि शान्ति क्रान्तिक एक प्रतिभागीक रूपमे गर्व अनुभव करैत छी आ‘कामना करैत छी इतिहास दोहराइत रहय। - मुखीलाल चौधरी सुखीपुर – १, सिरहा हाल ः बुटवल बहुमुखी क्‍यापस बुटवल दिनाड्ढ २०६५ जेष्‍ठ २९ गते बुधदिन । धीरेन्‍द्र बाबु, नमस्‍कार बहुत दिनक बाद अपनेक कार्यक्रम “हेलौ मिथिलामें” चिठ्ठी पठारहल छी । आशेटा नहि वरण विश्‍वास अछि, प्रकाशित होएत । दिनाड्ढ २०६५ जेठ १४ गते मंगलदिन जनकपुरधाममें लोकार्पण भेल “समझौता नेपाल”क दोसर प्रस्‍तुति गीति एल्‍वम “भोर” क गीतके संगही समझौता नेपालक निर्देशक नरेन्‍द्रकुमार मिश्रजीक साक्षात्‍कार दिनाड्ढ २०६५ जेठ १८ गते शनिदिन कान्‍तिपुर एफ़एम़के सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रम “हेलौ मिथिलामें” सुनबाक मौका भेटल । संघीय गणतान्‍त्रिक नेपालक भोरमे समझौता नेपालद्वारा प्रस्‍तुत केल गेल गीति एल्‍बम भोरके लेल समझौता नेपालक निर्देशन नरेन्‍द्रकुमार मिश्रजीके हार्दिक बधाई एवं शुभकामना । आगामी दिनमें समझौता नेपाल मार्फत गीति यात्राके निरन्‍तरततासँ गीत या संगीतके माध्‍यमसँ मिथिलावासी आ मधेशी संगही सम्‍पूर्ण आदिबासी थारु में जागणर लावय में सफल होवय आओर मिथिलावासी, मधेशी, आदिवासी थारु संगही सम्‍पूर्ण देशवासीमें सदाशयता, सदभावना, सहिस्‍णुता आ स्‍नेहमें प्रगाढता बढावमें सफलता प्राप्‍त होवय, एकर लेल साधुवाद । गीतकार सभहक गीत उत्‍कृष्‍ट अछि, कोनो गीत वीस नहि सभटा एकाईस । एकसँ बढी कय एक । गीतकार सभहक गीतके सम्‍वन्‍धमें छोटमें अलग अलग किछु कहय चाहैत अछि रुपा झाजीक गीत शिक्षा प्रति जागरुकता आ चेतानक सन्‍देश द�रहल अछि । ज्ञान प्रकाश अछि आओर अज्ञान अन्‍धकार । अन्‍धकारसँ वचवाक लेल ज्ञान प्राप्‍त केनाइ आवश्‍यक अछि । “केहनो भारी आफत आवौ, ज्ञानेसँ खदेड” पाति कोनो समस्‍या किएक नहि विकराल होय ज्ञान आ वुद्धि सँ समाधान करल जा सकैत अछि । पुनम ठाकुरजीक गीत सब सन्‍तान समान होइछ, बेटा—बेटीमे भेदभाव नहि होयबाक आ करबाह चाहि सन्‍देश द�रहल अछि । “मुदा हो केहनो अबण्‍ड बेटा, कहता कुलक लाल छी ” सिर्फ एक पातिस आजुक समाजमें बेटा—बेटी प्रति केहन अवधारणा अछि, बतारहल छथि । मिथिलाके माटि बड पावन छै । संस्‍कार आ अचार–विचार महान छै । आओर वएह माटिक सपुत साहिल अनवरजी छथि । जई माटिमें साहिल अनवरजी जकाँ मनुक्‍ख छथि ओही माटिमे सम्‍प्रदायिकताक काँट उगिए नहि सकैछ । उगत त मात्र सदभावना, सदाशयता, माया—ममता, स्‍नेहक गाछ । जेकर गमकसँ सभकेओ आनन्‍दित रहत आ होएत । “जतय हिन्‍नुओ राखि ताजिया, मान दिअए इसलामके छठि परमेसरीक कवुलाकय मुल्‍लोजी मानथि रामके” सँ इ नहि लागि रहल अछि ? कि मिथिलाके पावन माटिमें सहिश्‍णुताक सरिता आ बसन्‍तक शीतल बसात बहिरहल अछि । धन्‍य छी हम जे हमर जनम मिथिलाक माटिमें भेल अछि । धीरेन्‍द्र प्रेमर्षिजीक गीत सकारात्‍मकतासँ भरल अछि । समस्‍या किएक नहि बडका होबय आ कोनो तरहके होय निरास नहि होयवाक चाहि आओर सदिखन धैर्य—धारणकय सकारात्‍मक सोच राखिकय आगाँ बढवाक चाहि । संगहि जाहि तरहसँ माँ–बाप अपन सन्‍तानक लेल सदिखन सकारात्‍मक दृष्‍टिकोण राखैत छथि, वएह तरहसँ संतानक कर्तव्‍य होइछ जे ओ सभ अपन वुढ माँ–बाप प्रति वहिनाइते दृष्‍टिकोण अपनावैत । गीतके शुरुके जे चार पाति “संझुका सुरजक लाल किरिनिया, नहि रातिक इ निशानी छै छिटने छल जे भोर पिरितिया, तकरे मधुर कहानी छै” । सकारात्‍मकताक द्योतक अछि । एकर संगहि “सोना गढीके इएह फल पौलक, अपने बनि गेल तामसन वाह बुढवा तैओ वाजैए, हमर बेटा रामसन” इ पातिसँ मा–बापके अपन सन्‍तानक प्रति प्रगाढ माया ममताक बोध करारहल अछि । नरेन्‍द्रकुमार मिश्राजीक गीत इ बतारहल अछि कि संसारमे प्रेम, स्‍नेह, माया–ममता अछि तएँ संसार एतेक सुन्‍दर अछि । यदि प्रेम, स्‍नेह, माया–ममता हटा देल जाय त संसार निरस भ�जाएत आ निरस लाग लागत । तएँ हेतु एक दोसरक प्रति प्रेम, स्‍नेहक आदन–प्रादान होनाइ आवश्‍यक अछि । “आखि देखय त सदिखन सुन्‍दर सृजन ठोर अलगय त निकलय मधुरगर बचन” पाती सँ प्रेम आ स्‍नेह वर्षा भ�रहल अछि, लागि रहल अछि । वरिष्‍ट साहित्‍यकार, कवि, गीतकार द्वय डा़ राजेन्‍द्र ॅविमल� जी आ चन्‍द्रशेखर ॅशेखर� जीके गीत अपने अपनमे उत्‍कृष्‍ट आ विशिष्‍ट अछि । हिनका सभक गीत सम्‍बन्‍धमे विशेष किछु नहि कहिके हिनका सभक गीतक किछु पाति उधृत कयरहल छी, सबटा बखान कैय देत । डा़ राजेन्‍द्री विमल जीक पातिक “जगमग ई सृष्‍टि करए, तखने दिवाली छि प्रेम चेतना जागि पडए, तखने दिवाली छि रामशक्ति आगुमे, रावण ने टीकि सकत रावण जखने डरए, तखने दिवाली छि” अपने अपनमे विशिष्‍टता समाहित केने अछि । ओही तरहे चन्‍द्रशेखर ॅशेखर� जीक गीतक निम्‍न पाति अपने अपनमे विशिष्‍ट अछि “साँस हरेक आश भर, फतहक विश्‍वासकर बिहुँसाले रे अधर, मुक्त हो नैराश्‍य–डर रोक सब विनाशके, ठोक इतिहासके दग्‍धल निशाँसके, लागल देसाँसके” हमर यानी मुखीलाल चौधरीक गीतके सम्‍बन्‍धमे चर्चा नहि करब त कृतघ्‍नता होएत । हमरद्वारा रचित गीत भोरक संगीतकार धीरेन्‍द्र प्रेमर्षिद्वारा परिमार्जित आ सम्‍पादित केल गेल अछि । तएँ एतेक निक रुपमे अपने सभहक आगाँ प्रस्‍तुत भेल अछि । हमर गीतके इएह रुपमे लाबएमे धीरेन्‍द्र प्रेमर्षिजीक उदार या गहन भुमिका छैन्‍ह । एकर लेल प्रेमर्षिजीके हम मुखीलाल चौधरी हार्दिक धन्‍यवाद ज्ञापन करए चाहैत छी । सभटा गीतके संगीत कर्णप्रिय लगैत अछि । सुनैत छी त मोन होइत अछि फेर–फेर सुनी । कतबो सुनलाक वादो मोन नहि अगहाइत अछि । एतेक निक संगीतक लेल धीरेन्‍द्र प्रेमर्षिजीके हार्दिक बधाई आओर अगामी दिन सभमे एहोसँ निक संगीत दय सकैत, एकर लेल शुभकामना आ साधुबाद । सभ गीतकार, संगीतकार, गायक–गायिका इत्‍यादिक संयोजन कय बड सुन्‍दर आ हृदयस्‍पर्शी गीति एल्‍बम “भोर ” जाहि तरहसँ हमरा सभहक आगाँ परोसने छथि, एकर लेल भोरक संयोजक रुपा झा जीके हार्दिक बधाई । अन्‍तमे सभ गीतकार, संगीतकार, गायक–गायिका, संयोजक आ समझौता नेपालक  निर्देशकके हादिक वधाई । प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र(१९४५- ), पूर्व अध्यक्ष, इतिहास विभाग, ल.ना.मिथिला विश्वविद्यालय,दरभंगा। अनुवादक, निबन्धकार। प्रकाशन: तमिल साहित्यक इतिहास, भवभूति (दुनू अनुवाद)। मिथिला विभूति पं मोदानन्द झा-प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र पूर्णियाँ जिलाक पंजीकार परिवारमे उत्पन्न पं. मोदानन्द झा आधुनिकताक कसौटीपर अनुदार मुदा पारम्परिकताक कसौटीपर उदार, विद्वान आ विद्वत्ताक सत्संगति लेल आतुर, विलक्षण प्रतिभासँ सम्पन्न व्युत्पन्नमतित्व वाला मिथिलाक अत्यन्त सम्मानित पंजीकार छलाह। पंजीशास्त्र हुनका पूर्णतः अधिगत छलनि आ ओ पंजीसँ जुड़ल ककरहु कोनो जिज्ञासाक समाधान लेल सदैव तत्पर रहैत छलाह। ओ वस्तुतः मिथिलाक विभूति छलाह जनिकर स्मृतिक संरक्षणार्थ जे किछु कयल जायत से थोड़ होयत। पूर्णियाँ जिलाक रसाढ़ ग्रामक रहनिहार पं मोदानन्द झा पड़वे महेन्द्रपुर मूलक ब्राह्मण छलाह आओर विस्तृत कृषि-भूमिक कारणे बादमे शिवनगर ग्राममे रहय लगलाह। रसाढ़ आ शिवनगर दुनू धर्मपुर परगनान्तर्गत अवस्थित अछि। १९१४ ई.मे उत्पन्न ओ अपन माता-पिताक एक मात्र पुत्र छलाह। परम्परासँ हुनकर परिवार पंजीकारहिक छलनि आ हुनक पिता भिखिया झा ई व्यवसाय करितो रहथिन। ओ मुदा नीक कृषक रहथि आ हुनकर बेसी समय ओहिमे लगनि। हुनका २०० एकड़सँ बेशीक जोत रहनि। ओ अपने प्रायः शिक्षितो नहियें जकाँ रहथि, मुदा अपन पुत्रकेँ नीकसँ नीक शिक्षा दिआयब हुनकर अभीष्ट रहनि। मोदानन्द झा स्वयं बुझबा जोगरक भेलापर अपन कौलिक व्यवसाय आ प्रतिष्ठाक पुनरुद्धार करबा लेल कृतसंकल्प भेलाह। अपन बाल्यावस्थाक संस्मरण बजबाक क्रममे ओ प्रायः बाजथि जे ओ बड़ए प्रसन्नता आ आह्लादक समय छल। ओ माता-पिताक दुलरुआ त छलाहे, काका-काकी तथा आन सम्बन्धी आ कुटुम्बी जनक स्नेह सेहो हुनका प्रचुर प्राप्त छलनि। ओ दैनिक कृत्य आ विद्यालयसँ बाँचल समयमे माछ मारथि आ ई बहुत दिन धरि हुनकर प्रिय मनोरंजन रहनि। ओ एक बेर बहुत गम्भीर रूपेँ बीमार पड़लाह। वस्तुतः तहिया पूर्णियाँ जिलामे मलेरिया आ कालाजार महामारीक रूपमे पसरल छल। आ कहबी छलैक जे “जहर खाउ ने माहुर खाउ, मरैक होइ तऽ पूर्णियाँ जाउ”। हुनकर माता एक सम्पन्न कुलक महिला रहथिन आ ओ अपन पुत्रक रुग्णताक समाप्ति लेल किछु करबा लेल तत्पर छलीह। हुनकहि जिदपर २०० रुपया पीस दऽ कलकत्तासँ डाक्टर मँगाओल गेल। चारि पंडित अहर्निश हुनकर रुग्णावस्थामे दुर्गा सप्तशती आ गीताक पाठ करैत रहलाह। हुनकर माता स्वयं ताधरि अन्न ग्रहण नहि कयलथिन जा हुनकर पुत्र पथ्य ग्रहण करबा जोगरक नहि भेलनि। कलकत्तासँ आयल डॉक्टरक तऽ अन्य विदाइ कैले गेलनि, पाठ केनिहार ब्राह्मणो लोकनिक आ पुत्रक आरोग्य-लाभक उपलक्ष्यमे गाम-टोलक लोक सभकेँ भोज सेहो खोआओल गेल। मुदा पिताक आकांक्षा छलनि पुत्रकेँ विद्वान् देखबाक आ विद्यार्थीक लेल गण्य करक-चेष्टा, वक ध्यान, श्वान-निद्रा तथा अल्पाहारी आदि लक्षणसँ जन्मतः परिपूर्ण मोदानन्द झा लेल समय अयलनि गृह-त्यागी होयबाक। दस वर्षक अल्पायुमे हुनका वर्तमान मधुबनी जिलान्तर्गत सौराठ गाम विद्याध्ययन लेल पठाओल गेलनि। ओतय हुनक गुरु आ आश्रयदाता रहथिन ख्यातनाम पंजीकार पं.विश्वनाथ प्रसिद्ध निरसू झा, जनिकर पिता लूटन झा मोदानन्द झाक मौसा रहथिन। पंजीशास्त्रक अध्ययन लेल सामान्यतः पन्द्रह वर्षक कालावधि समुचित मानल गेल छैक मुदा मोदानन्द झा दसे-एगारह वर्षमे गुरु-कृपासँ निष्णात भेलाह। ओना ओऽ पन्द्रह-बीस वर्ष धरि लगातार गुरु सान्निध्यमे सौराठ रहलाह आऽ बादोमे आजीवन, विशेष रूपसँ वार्षिक वैवाहिक सभाक अवसरपर सौराठ अबैत-जाइत रहलाह आऽ ताहि क्रममे बाटमे दरभंगा स्थित हमर नरगौना निवासपर ओऽ कनियो देर लेल अवश्य आबथि। हमर पिता डॉ. मदनेश्वर मिश्र लेल हुनका विशेष स्नेह आऽ सम्मान रहनि आऽ हमर एक पितृव्य पं. नागेश्वर मिश्रक ओऽ सम्बन्धमे साढ़ू रहथिन। हमर एकटा पीसा स्व. दिगम्बर झा हुनकर पितियौत रहथिन। जे हो, विध्याधयन समाप्त समाप्त भेलापर राज-दरभंगा द्वारा आयोजित धौत परीक्षामे १९४० मे ओऽ सर्वोच्च स्थान प्राप्त कयलनि। हुनका संग उत्तीर्णता प्राप्त केनिहार अन्य दू महत्वपूर्ण पंजीकार छलाह ककरौरक हरिनन्दन झा आऽ सौराठक शिवदत्त मिश्र। एहि सफलता लेल महाराज सर कामेश्वर सिंहक हाथे तीनू गोटाकेँ धोती देल गेलनि, मुदा सर्वोच्च घोषित भेलाक कारणेँ मोदानन्द झाकेँ दोशाला सेहो देल गेलनि। पारम्परिक मिथिलामे धौत परीक्षामे उत्तीर्ण भेनाय बड़का सम्मान होइत छल मुदा ताहूमे सर्वोच्चता पायब तँ अनुपमे छल। तहियासँ अनवरत ओऽ अपन जीवन-पर्यन्त मिथिलाक प्रायः सर्वाधिक समादृत पंजीकार रहलाह। मोदानन्द झाकेँ पाबि पंजीकारक व्यवसाय धन्य भेल। १९६२ मे निरसू झाक दिवंगत भेलापर ओऽ सौराठ प्रतिवर्ष नियमपूर्वक वैवाहिक सभामे मात्र अपन नाम बढ़यबा लेल नहि बल्कि अपन गुरुक ऋण अदाय करबाक विचारसँ सेहो जाथि। ताधरि निरसू बाबूक दुनू बालक छोट रहथिन आऽ पंजीकारी नहि करथि। हुनकर जेठ बालक प्रोफेसर (डॉ.) कालिकादत्त झा, जे सम्प्रति ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक संस्कृत विभागक अध्यक्ष रहथि आऽ विगत लगभग दस-पन्द्रह वर्षसँ दरभंगामे रहि रहल छथि (पहिने मगध विश्वविद्यालय, गयामे रहथि) आब सक्रिय रूपेँ अधिकार जँचबा आ सिद्धान्त लिखबाक काज करय लागल छथि। ताहिसँ पहिने मोदानन्दे बाबू अपन गुरुक ओहिठाम अयनिहार लोकनि लेल सिद्धान्तादि लिखथिन। ततबे नहि ओऽ निरसू बाबूक पुत्र लोकनिकेँ पंजी-ज्ञान सेह् देलथिन आ आइयो कालिकादत्त बाबू गुरु रूपहि हुनका प्रति श्रद्धा रखैत छथि। मोदानन्द बाबू पंजीकारीक व्यवसायसँ जे धनार्जन करथि ताहिसँ सन्तुष्ट छलाह। सिद्धान्त लिखबासँ तथा विदाइसँ हुनका पर्याप्त कमाइ होइन आओर खेत-पथारसँ सेहो नीक आय होइत छलनि। कमाइसँ बेसी हुनकर अभिरुचि ज्ञानक विस्तारमे आ पंजीसँ सम्बन्धित विषयपर शोध करबामे छलनि। मैथिलीक महान् विद्वान, आलोचक आ समीक्षक डॉ. रमानाथ झाक संग ओऽ पृथक-पृथक विभिन्न मूलक विख्यात छवि, विद्वान् आ राजा-जमीन्दार सबहक वंश-परिचय तैयार करबा दिस प्रवृत्त भेलाह आ तकरहि परिणाम छल पूर्णियाँक प्रसिद्ध बनेली राजवंशक परिचयात्मक पुस्तक अलयीकुल प्रकाशक प्रकाशन। आन एहन प्रकारक कृत्य नहि तैयार कयल जा सकल तकर हुनका क्षोभ छलनि। हुनकर शोधपरक सोचक अंग छल एक अन्य परियोजना जाहिक अन्तर्गत विशिष्ट गाममे बसनिहार मैथिल ब्राह्मण सभक बीजी पुरुष धरिक परिचयात्मक विवरण तैयार करब अभीष्ट छल। ओऽ सर्वप्रथम कोइलख गामक सम्बन्धमे एहन रचना लिखलनि। ओऽ हमरा तकर कतिपय अंश सुनेबो कयलनि। हुनकर इच्छा रहनि जे उक्त रचनाक प्रकाशन हो मुदा से आइ धरि नहि भऽ सकल अछि। उपर्युक्त दुनू प्रकारक शोध परियोजनाक पंजीकार समाजमे सामान्यतः आलोचना भेलैक कियैक तँ ओऽ अपन रचनामे एहनो विवरणक सन्निवेश करय चाहैत रहथि जे पंजीकारीक व्यवसायमे प्रकाशित करब वर्जित कहल जाइत छैक- वस्तुतः ओऽ विवरण सभ दूषण पञ्जीक अंग होइत छैक जाहिमे व्यक्ति आऽ परिवार विशेषक सम्बन्धमे ज्ञात अशोभनीय आ अप्रकाश्य बात उल्लिखित रहैत छैक। एहि क्रममे एक तेसर परियोजना, जाहिपर ओऽ उन्नैस सय पचासहिक दशकमे कार्य आरम्भ कयलनि छल, ओहन पञ्जीकार परिवार लग उपलब्ध पाण्डुलिपिक संग्रह करब जाहि परिवारमे आब क्यो पंजीकारीक व्यवसायमे नहि रहि गेल रहथि आ हुनकर पंजी-पोथी सभ नष्ट भऽ रहल छलनि। पिताक मृत्यु भऽ गेलासँ हुनकर दरभंगा सम्पर्क घटि गेलनि आ पूर्णियाँमे पारिवारिक सम्पत्तिक प्रबन्धनमे अपेक्षाकृत बेसी समय लगबय पड़नि। तथापि हुनकर शोध-दृष्टि बनल रहलनि आऽ ओऽ अपेक्षा करथि जे सामाजिक विज्ञानमे आधुनिक शोध तकनीकसँ परिचित क्यो व्यक्ति हुनका संग रहि उपर्युक्त परियोजना सभ तँ पूर्ण करबे करथि पंजीसँ सम्बन्धित आनोआन विषयपर काज करथि। हुनकर ई अभिलाषा नहि पूर्ण भेलनि मुदा हुनक पुत्र  मोहनजी, जे पञ्जीकारीक पैत्रिक व्यवसायमे लागि क्रमिक रूपेँ कौलिक प्रतिष्ठाक विस्तार कय रहल छथि। आ अनुकरणीय रूपसँ पितृभक्त सेहो छथि, एहि दिशामे भविष्यमे क्रियाशील भऽ सकैत छथि। स्वयं शोधपरक दृष्टि आ रुचि रखनिहार मोदानन्द बाबू जिज्ञासु लोकनिक मदति करबालेल सदति तत्पर रहैत रहथि। हमरा कमसँ कम दू अवसरपर एकर लाभ भेटल। हम १९८७-८८मे बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटनाक अनुरोधपर बिहारक एक पूर्व मुख्यमंत्री पं. विनोदानन्द झाक जीवनी लिखि रहल छलहुँ मुदा हुनकर वंश-परिचय कतहु प्राप्य नहि छल। आधा-छिधा भेटबो कयल तँ प्रामाणिक नहि। हम कैकटा पंजीकारसँ एहि सम्बन्धमे जिज्ञासा कयलहुँ मुदा व्यर्थ। मात्र मोदानन्द बाबू सूचना देलनि जे हुनकर एक परिजन स्व. गिरिजानन्द झा गंगाक दक्षिण बसल मैथिल ब्राह्मण आ पंडा सभक वंशावली तैयार करबाक स्तुत्य प्रयास कयलनि आ अपना संग शिवनगर स्थित हुनकर घरमे जाऽ ओहि संग्रहमे विनोदानन्द झाक वंश परिचय तकबाक चेष्टो कयलनि, मुदा हुनकर पंजी-पोथी सभ व्यवस्थित आ संगठित नहि भेलाक कारणेँ से संभव नहि भेल। जे हो, हमरा ई अवश्य ज्ञात भऽ गेल जे यदि स्व. गिरिजानन्द झाक पोथी-पंजी व्यवस्थित नहि कयल गेलनि तऽ गंगाक दक्षिण बसल मैथिल ब्राह्मण लोकनिक पूर्वजसँ सम्बन्धित महत्वपूर्ण सूचना सभ लुप्त भऽ जेतैक कियैक तँ गिरिजानन्द बाबूक परिवारमे आन किनकहु पंजीकारीक व्यवसायमे रुचि नहि छनि। दोसर अवसर छल जखन भारतीय इतिहास शोध परिषदक अनुरोधपर हमरा पूर्णियाँ जिलाक धमदाहा ग्राममे उत्पन्न सुविज्ञात इतिहासकार प्रोफेसर जगदीश चन्द्र झाक अंग्रेजीमे लिखल विलक्षण पोथी “माइग्रेशन ऐन्ड एचीवमेन्ट्स ऑफ मैथिल पंडित्स: दि माइग्रैन्ट स्कौलर्स ऑफ मिथिला (८००-१९४७)क १९९० मे समीक्षा लिखबाक छल। ओहि पोथीक परिशिष्टमे कम-सँ-कम तीन पंडित (१) महामहोपाध्याय नेनन प्रसिद्ध दीनबन्धु झा, (२) म.म.भवनाथ झा आ(३)म.म.गुणाकर झा केर वंश परिचय देल छल किन्तु लेखककेँ हुनका लोकनिक मूल ज्ञात नहि भऽ सकलनि। मोदनन्द बाबू क्षण भरि ध्यानस्थ भेलाह आ कहलनि जे ई लोकनि क्रमशः खौवालय सुखेत, नरौने पूरे आ खौवालय नाहस मूलक छलाह।  एतय ई कहब आवश्यक जे मूल आ एक-दू खाढ़िक व्यक्तिक नाम देल रहलापर आन सम्बन्धित सूचना देव संभव छैक मुदा उपर्युक्त उदाहरणमे तँ उनटा बात छैक आ तैयो मोदानन्दे बाबू सन पंजीकार छलाह जे वांछित सूचना तत्काल देबामे समर्थ भेलाह। ओ ओहि पुस्तकमे उल्लिखित पन्द्रह खनाम मूलक प्रसिद्ध विद्वान् गोकुलनाथ, हुनक पिता पीताम्बर आ पुत्र रघुनाथक विषयमे बतौलनि जे ओ तीनू मिथिलाक बारह सडयन्त्री अथवा सर्वज्ञाता विद्वान् मे सँ छलाह। गोकुलनाथक पितामहक नाम रामभद्र छलनि, रामचन्द्र नहि। एतबहि नहि ओ इहो बतौलनि जे मिथिलाक एक घुमक्कड़ विद्वान् ककरौर वासी पड़वे महेन्द्रपुर मूलक गुणाकर झाक एक वंशज धीरेन्द्र झा सेहो छलाह जे आइसँ लगभग चारि सय वर्ष पूर्व बंगाल जाय ओतुक्का ब्राह्मण सभक पंजी-सूचनाक संशोधन-संवर्द्धनक क्रममे अनेक ब्राह्मणेतर व्यक्ति सभकेँ ब्राह्मणक रूपमे पंजीमे परिगणित कय देलथिन। अपन पंजी-पोथीमे उक्त धीरेन्द्र झा अपनाकेँ आ अपन पिताकेँ पंजी पंचानन कहि सम्बोधित कयलनि अछि। एहन कतेको सूचना मोदानन्द बाबू जिज्ञासु व्यक्ति सभकेँ दैत रहैत छलथिन। ओ अपन समाजमे अपन विद्वता, उदारता आ सहज सम्प्रेषणीयताक कारणेँ सर्वत्र समादृत रहथि। हम जखन छट छलहुँ, आइसँ प्रायः पचास वर्ष पूर्व, ओ हमर गाम विष्णुपुर अथवा पूर्णियाँ शहर स्थित हमर डेरा आबथि तऽ सम्पूर्ण परिवार हुनकर सम्मानमे सन्नद्ध रहैत छल। ओ सभक छुइल भोजन कहियो नहि कयलनि। बेसी काल सभ सामग्री दऽ देल जाइन तऽ ओ अपन पाक अपनहि करथि। हमरा बूझल अछि जे कैक बेर हमर सभसँ जेठ पित्ती, पूर्णियाँक अत्यन्त समादृत ओकील आ भरि बिहारमे सभसँ बेसी अवधि धरि सरकारी ओकील रहनिहार स्व. कपिलेश्वर मिश्र अपन हाथें हुनका लेल पाक करथिन। हमरा परिवारमे तऽ हुनका सदैव सम्मान भेटबे करैत रहनि मुदा अन्यत्रो कम नहि। एक बेरक घटना सुनबैत ओ कहने छलाह जे ओ वर्तमान बांग्ला देशक एक मैथिल ब्राह्मण बहुल गाम बोधगाम गेल छलाह जतय हुनका प्रचुर विदाइ तऽ भेटबे कयलनि ओतुका लोक सभ हुनकर पएर पखारि चरणोदक सेहो लेने रहनि। मोदानन्द बाबू अपन चिन्तनमे एक तरहेँ प्रगतिशील आ सुधारक सेहो रहथि। हुनकर चेष्टा रहनि जे पंजीकार लोकनि मात्र अधिक सँ अधिक धनार्जन मे लागि अपन वृत्तिक प्रतिष्ठार्थ सेहो सोचथि। हुनका ई नीक नहि लगनि जे पंजीकार सभ एक दोसराक प्रति द्वेष भावसँ कार्य करथि। हुनकर इच्छा रहनि जे सभ मिलि पंजी आओर पंजीकारक संस्थाकेँ जीवन्त बनाबथि तथा समाजमे हुनका सभकेँ जे आदर प्राप्त रहनि तकर लाभ लए समाजकेँ दिशा निर्देश देथिन। ओ राजदरभंगाक निर्देशमे चलि रहल पंजी व्यवस्थाक प्रजातंत्रीकरणक पक्षमे रहथि जाहिसँ ब्राह्मण समाजक सभ वर्गक प्रतिनिधि मिलि ओहिना परमानगी दय जातीय स्तरीकरणमे समय-समयपर वांछित परिवर्तन करथि जेना राज दरभंगाक तत्वावधानमे अतीतमे कैक बेर कयल गेल छलैक। जे कोनो ब्राह्मण परिवार पंजी-व्यवस्था विहित रीतिसँ नीक वैवाहिक सम्बन्ध करथि तनिकर स्तरोन्नयन करबाक ओ पक्षमे रहथि। १९६६ मे हमर पित्ती डॉ. रामेश्वर मिश्रक विवाह जखन सोनपुर (उजान) वासी प्रसिद्ध श्रोत्रिय ब्राह्मण स्व. दुर्गेश्वर ठाकुरक कन्यासँ स्थिर भेलनि तँ मोदानन्द बाबू राजसँ परमानगी प्राप्त करबामे तऽ सहयोगी भेबे केलथिन, सौराठमे अधिकांश पंजीकारक बैसक बजाय सभक सहमतिसँ हमर प्रपितामह लाल मिश्रक सभ सन्तति लेल कन्हौली पाँजिक स्थापना सेहो करबौलनि। ओ प्रायः खभगड़ा (अररिया जिला) वासी स्व. बालकृष्ण झाक परिवार आ कतिपय आनो परिवार लेल एहने स्तरोन्नयनक पक्षमे रहथि। हुनकर मन्तव्य रहनि जे जमीन्दारी प्रथाक उन्मूलनसँ आन अनेक संस्थाक संग पंजी व्यवस्थाक सेहो बड़ क्षति भेलैक। जमीन्दार लोकनि परम्परा आ संस्कृतिक सम्पोषक रहथि मुदा आब हुनकर स्थान लेनिहार सरकार अथवा कोनो आन संस्था से काज ताहि रूपेँ नहि कऽ पाबि रहल अछि। पंजीकार लोकनिक दुर्दशाक एक कारण जमीन्दारक समाप्ति सेहो भेल। हुनका सन्तोष रहनि जे पटनाक मैथिली अकादमी सन संस्था हुनक जीवन पर्यन्तक सेवाक मान्यता दय हुनका सम्मानित कयने छलनि, मुदा से संभव भेल छल अकादमीक तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. मदनेश्वर मिश्रक व्यक्तिगत प्रयाससँ, अन्यथा आन किछु श्रोत्रिय, योग्य आ कुलीन परिवारकेँ छोड़ि अनेकशः मैथिल ब्राह्मण परिवारेकेँ जखन पंजीकार अथवा हुनका द्वारा कयल सिद्धान्तक प्रयोजन नहि रहलनि तऽ ब्राह्मणेतर समाज आ प्रायशः तकरहि प्रतिनिधि सरकार पंजीकारक स्थितिमे सुधारक कोनो यत्न कियैक करत। मिथिला विभूति स्व. मोदानन्द झाक स्मृतिक संरक्षणार्थ ई सर्वतोभावेन वांछनीय अछि जे पूर्णियाँमे हुनका द्वारा सुविचारित शोध परियोजना सभपर काज करबाओल जाय, स्व. गिरिजानन्द झा सन मिथिला भरिमे पसरल पञ्जीकार लोकनिक ओतय उपलब्ध ओ पंजी-पांडुलिपि सभक संग्रह कयल जाय जे आब कतिपय कारणसँ उपयोगमे नहि रहि गेल अछि, मैथिल मूल ग्राम सभक अभिज्ञान प्राप्त कयल जाय तथा ज्ञात अथवा अज्ञात मैथिल ब्राह्मण परिवारक विशिष्टताक प्रचारार्थ परिचयात्मक विवरणिका तैयार करबाओल जाय। पंजी व्यवस्था निश्चयतः पतनोन्मुख अछि मुदा मोदानन्द बाबूक बताओल मार्गपर जौं शोध कार्य कयल गेल तऽ मिथिलाक सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहासक अभूतपूर्व सेवा होयत। डॉ.बलभद्र मिश्र, सेवा निवृत्त आयुर्वेदिक चिकित्सा पदाधिकारी, पूर्णियाँ लब्ध धौत प्रतिष्ठ पंजीकार- स्व. पं मोदानन्द झाजी- एक संस्मरण स्व. पंजीकार जी विलक्षण प्रतिभा संपन्न व्यक्ति छलाह। हिनक संपर्क भेलासँ पूर्वहि सुनैत आएल छलहुँ कि शिवनगर (पूर्णियाँ, संप्रति अररिया जिला) निवासी पं. मोदानन्द झा जी पुबारिपारक एकमात्र सर्वश्रेष्ठ पंजीकार तऽ छथिए, संगहि संपूर्ण मिथिलाक मूर्धन्य पंजीकारक श्रेणीमे हिनकहु नाम लेल जाइत छलन्हि। पंजीकारजी प्रतिवर्ष सौराठ सभा गाछी जाइत पुबारि-पछबारि पारक भेल विवाहक सिद्धान्तक लिपिबद्ध आदान-प्रदान करैत छलाह, जाहिसँ हिनक पंजी-पुस्तिका वृहदाकार होइत वंश परिचयक विशाल भंडारसँ सुशोभित अछि। पंजीकारजी महाराज दरिभंगाक अध्यक्षतामे आयोजित “पंजीकार धौत परीक्षा” मे सर्वप्रथम स्थान प्राप्त कऽ “लब्ध धौत प्रतिष्ठ” भेल छलाह, जकर निर्णायक मण्डलमे महामहोपाध्याय सर गंगानाथ झाजी सम प्रभृति विद्वान लोकनि छलाह। पंजीकारजी कतेको ठाम सम्मानित भेलाह, जाहिमे “अखिल भारतीय मैथिल महासभा”क विद्वत् मंडलीसँ आदृत होइत विशिष्ट स्थान पौने छलाह। हिनक कृति एवं विलक्षण प्रतिभाक आलोकमे हिनक जीवनहि कालमे “चेतना समिति” स्वयम् आमंत्रित कऽ पंजीकारजीकेँ सादर सम्मानित करैत भेल। जखन हमर विवाह १९५५ ई.मे पोर्णियाँ भेल तहियासँ पंजीकारजीक मृत्युसँ तीनमास पूर्व तक संपर्क बनल रहल। एहि तरहेँ पंजीकारजीक प्रति जे सुनैत आयल छलहुँ तकर यथार्थ अनुभूति हमरा पंजीकारजीक संगतिमे भेटल। कतेको विवाह सिद्धान्त लिखबाक अवसर हमरा बुझना गेल कि- भलमानुष (जाति-पाँजि) व्यक्तिक वंश परिचय पंजीकारजी केँ जिह्वाग्र छन्हि। यद्यपि वर कन्याक अधिकार देखबाक क्रममे पंजीकारजी केँ “पंजी पोथा” उलटबाक आवश्यकता नहि छलन्हि, तथापि कतहु गलती नहि भऽ जाय ई बुझि पोथा उलटबाक उपरान्ते अपन लिखित निर्णय दैत छलाह। पंजीकारजी सदाचार सम्पन्न होइत सभ दिन अहं भावसँ निर्मुक्त रहलाह। हिनक रहन-सहन वेश-भूषा एवं टपकैत ओजस्विताकेँ देखि केओ अपरिचित व्यक्ति हिनक गुणसँ परिचित भऽ जाइत छल। हम स्वयं पंजीकार जीक सद्विचार, सद्व्यवहार, सदाशयितासँ विशेष प्रभावित भेलहुँ। पंजीशास्त्रक गहन अध्ययन रहले सन्ताँ पूबारि-पछबारिक समन्वय करबाक स्तुत्य प्रयास जीवन भरि करैत रहलाह। खुशीक गप्प जे पंजीकारजीक बालक श्री विद्यानन्द झा (मोहनजी) पंजीकारिताकक्षेत्रमे निष्ठापूर्वक अपन मनोयोग रखने छथि, जाहिसँ स्व. पं.मोदानन्द झा जीक आत्मामे अवश्ये शान्ति भेटैत होयतन्हि। अन्ततः हम यैह कहब जे स्व. पंजीकारजीक प्रत्युत्पन्न मतित्वक आगाँ हम जे किछु कहि गेलहुँ से सूर्यकेँ दीप देखेबाक समान बुझल जाय। एहन स्वनामधन्य पंजीकार स्व. पं. मोदानन्द झा जीकेँ मरणोपरान्त एक संस्मरणक रूपमे अपन श्रद्धा-सुमन अर्पित करैत हमर शतशः प्रणाम। नरेश मोहन झा, तुलसिया, किशनगंज विद्वद्वरेण्य पञ्जीकार मोदानन्द झा वर्ष १९५४-५५क वार्ता थीक। गृष्मावकाश छल। गामहिं छलहुँ। एक दिन वेरू प्रहर मे दरवज्जहिपर छलहुँ। एक व्यक्ति, अत्यन्त गौरवर्ण, मध्यम ऊँचाई, देदीप्यमान ललाट, प्रशस्त काया, धूपमे चलबाक कारणेँ ललौंछ मुखमण्डल, पैघ-पैघ आँखि, उपस्थित भेलाह। देखितहिं बुझबामे आएल जे कोनो महापुरुष अएलाह अछि। हमर पिता पं. लीलमोहन झा सेहो दलानेपर छलाह। ओऽ परम आह्लादित भए उठि कऽ ठाढ़ भेलाह। झटकि कऽ अरियाति अनलखिन्ह। हमरा सभ जतेक नवयुवक रही- सभकेँ कहलन्हि- प्रणाम करहुन्ह। हमरो लोकनि उल्लसित एवं अनुशासित भए प्रणाम कएलियन्हि। बाल्टीमे जल, जलचौकी ओऽ अढ़िया आनल गेल। हुनकासँ पए धोएबाक आग्रह कएल गेलन्हि। हमर पिता जे परोपट्टाक श्रेष्ठ समादृत व्यक्ति छलाह- स्वयं लोटामे जल लए हुनकर पएर धोअय लगलखिन्ह। पुनः अंगपोछासँ पएर पोछि पलंगपर बिछाओल साफ सुन्दर विछाओनपर बैसेलखिन्ह। आऽ हुनक पएर धोयल जलसँ समस्त घर-आङनमे छिड़काव भेल। एहि बीच सरवत आएल- पान आएल। घरक सभ सदस्यमे एक अद्भुत उल्लास-जेना कोनो इष्टदेव आबि गेल होथि। ओहि बैसारमे तँ बहुत काल धरि कुशलादिक वार्ता होइत रहल। संध्याकाल धरि तँ हमर दरवज्जापर गाम भरिक ब्राह्मणक समूहक समूह उपस्थित होमऽ लागल। ओहि मध्य हमर पिता परिचय करौलन्हि। कहलन्हि- ई थिकाह पंजीकार प्रवर श्री मोदानन्द झा जी लब्ध धौत, शिवनगर, पूर्णियाँ निवासी। हमरा लोकनिक वंश रक्षक। हिनकहिं प्रतापे हमरा लोकनि अपन कुल ओऽ जातिक रक्षा कऽ पबैत छी। हिनक पिता पञ्जीशास्त्र मूर्धन्य पञ्जीकार भिखिया झा बड़ पैघ विद्वान् ओऽ सदाचार पालक। ओहि योग्य पिताक यशस्वी पुत्र छथि पञ्जीकार प्रवर मोदानन्द बाबू। नाम सुनितहिं अकचकयलहुँ। हम पूर्णियाँ कॉलेजक जखन छात्र रही तँ समस्त कुटुम्ब वर्ग बिष्णुपुर गामक मित्रवर्ग जे नवरतन पूर्णियाँमे रहैत छलाह तनिकासँ हिनक नाम बड़ श्रद्धापूर्वक उच्चरित होएत सुनने छलहुँ। अहि साक्षात्कार भेल सन्ता बुझि पड़ल जे जे किछु हिनकर मादे सुनने छलहुँ से बड़ कम छल। निश्चय ई व्यक्ति परम आदरणीय छथि। सांध्यकालीन बैसारमे गामक सभ श्रेष्ठ व्यक्ति अपन-अपन वंशक नवजन्मोत्पत्तिक विवरण लिखबैत गेलखिन्ह। पञ्जीकारजी तत्परतापूर्वक सभक परिचय बड़ मनोयोगसँ लिखैत रहलाह। तखन हमरा बुझाएल जे कोना कऽ हमरा लोकनिक वंश परिचय पछिला हजार वर्षसँ साङ्गो-पाङ्ग उपलब्ध रहल अछि। हमर गाम पञ्जीकार गामसँ १०० कि.मी.सँ अधिके पूर्वमे अवस्थित अछि। यातायातक कोनो सम्यक व्यवस्था पूर्वमे नहि रहल होएतैक। नाना प्रकारक असुविधाक सामना करैत एतैक भू-भागमे पसरल मैथिल ब्राह्मणक यावतो परिचय संग्रहित करब, सुरक्षित राखब आ बेर पड़लापर उपस्थित करब अत्यन्त दुःसाध्य कार्य। यात्रा ओ परिस्थिति जन्य कष्टक थोड़ेको अनुभव नहिं कऽ केँ अपन कर्तव्येक प्रधानता दैत निःस्वार्थ भावसँ धर्मशास्त्रक रक्षामे तत्पर एहि इतिहासक संरक्षण सन पुनीत कार्य करैत रहब हिनकहि सन व्यक्तिसँ संभव। प्रातः काल पूज्य पितासँ एकान्तमे पुछलियन्हि जे एतेक कष्ट उठा कऽ परिचय संग्रह करबाक प्रयोजन की? बुझौलन्हि जे अपना लोकनि जे सनातन धर्मावलम्बी से सभटा कार्य मनु, याज्ञवल्क्य, शतपथ, शंख इत्यादि महान् ऋषि लोकनिक देल व्यवस्थापर चलैत छी। मनु विवाहक सन्दर्भमे कहने छथि जे कोनो कन्या ओ वरक विवाह स्वजन, सगोत्र, सपिण्ड ओ समान प्रवरमे नहि हो। एहि हेतु आवश्यक अछि जे सपिण्ड्य निवृत्तिक ज्ञान हो। ताहि हेतु पुरुषाक विवाहादिक विवरण सम्पूर्णतः उपलब्ध हो। एहि धर्मक रक्षा तँ विन पञ्जीकारहिं सम्भव नहि। अन्यथा वर्णशंकरक प्रधानता होएत ओ जातिय रक्षा नहिं होएत। पञ्जीकारक नहिं रहने वंशक इतिहासक ज्ञान नष्ट भए जाएत। विश्वास जमि गेल। हुनका प्रति मनमे जे आस्था छल से चतुर्गुण भऽ गेल। तकर बाद जखन कखनो ओऽ अएलाह हम ओहि देवत्व भावेँ हुनक सम्मान कएल। ओहो पितृवत स्नेह देलन्हि। ओऽ अपन व्यक्तित्वक धनी छलाह। सदाचार पालनमे तत्पर। जखन कखनो हुनकर गामपर जएबाक अवसर भेटल- गमौलहुँ नहि। कतेको बेर हुनकर गाम शिवनगर गेल छी। हुनक ओऽ साफ परिछिन्न दलान। रमनगर फुलवाड़ी। पञ्जीकारजीक दैनिक चर्या कलम ओऽ खुरपीक संग सम्पन्न होइत छलन्हि। कर्मिष्ठ पुरुषः। नागेन्द्र झा, नवरत्न हाता, पूर्णियाँ स्व. पञ्जीकार मोदानन्द झासँ सुनल परुए महेन्द्रो मूलक पूर्णियाँ जिलाक शिवनगर ग्रामवासी छलाह। ई पञ्जी प्रबन्धक नीक ज्ञाता छलाह। महाराज दरभङ्गाक चलाओल धौत परीक्षोत्तीर्ण छलाह। ई लेख पञ्जीकारक विषयक थिक। अतः पञ्जी शब्दक अर्थ की से बूझब आवश्यक। पञ्ज शब्द आएल अछि संस्कृतमे तथा भाषोमे पञ्च शब्दक प्रयोग ५ संख्याक अर्थमे भेटैछ। तैं पञ्ज शब्द ५ संख्यासँ सम्बद्ध अछि। भाषामे हाथक पाँचो आङ्गुर तथा ताशक ५ कैं पञ्जा कहल जाइछ। पञ्जीमे ५ संख्याक कि प्रयोजन? उत्तर- हमरा लोकनि अर्थात् मैथिल ब्राह्मण “पञ्चदेवोपासक” छी। कोनो तरहक शुभ कार्यमे पूजा पञ्चदेवतैक पूजासँ आरम्भ होइछ। तहिना धर्मशास्त्रक अनुसारे कहल गेल अछि जे “मातृतः पञ्चमीं त्यक्त्वा पितृतः सप्तमीं भजेत्”। अर्थात् प्रकृति (माय)सँ पाँचम स्थान स्थिति कन्याक सङ्ग विवाह नहि करी। ई निषेध कयल गेल। विवाह सृष्टि प्रयोजनार्थे होइछ आ सृष्टिमे प्रकृतिक प्रयोजन तैं मायसँ पाँचम स्थान स्थित कन्यासँ विवाह निषिद्ध भेल तथा एहि निषेधक कारणसँ सम्भव थिक जे एकर नाम “पञ्जी” राखल गेल हो अथवा कन्यादानमे वरक दू पक्ष, कन्याक दू पक्षक अर्थात् दुनू मिलाकेँ चारि पक्षक निःश्शेष व्याख्या जाहि पुस्तकमे लिखल जाय आओर पञ्जीकार ओकरा स्वीकार करथि अर्थात् हस्ताक्षर करथि ओऽ भेल पञ्जी। संस्कृतमे पञ्जी (पञ्जिका) शब्दक अर्थ थिक जे पूर्णतः पदक व्याख्या जाहिमे लिखल गेल हो। अर्थात् ओऽ रजिस्टरो भऽ सकैछ, पुस्तकोक रूपमे भऽ सकैछ, हैन्डनोटोक रूपमे भऽ सकैछ। सरकारी रजिस्ट्री ऑफिसमे रजिस्टर रहैछ। हाटपर मवेशीक बिक्री भेलापर विक्रीनामा लिखल जाइछ। एकर निदान “याज्ञवल्क्य” साक्ष्य प्रकरणमे स्पष्ट कयने छथि जे बेचनिहार, खरीददार आऽ साक्षी सभक पूर्ण पता रहै जैसँ भविष्यमे कोनो तरहक विवाद नहि उठै। ई अभिलेख (रेकर्ड) वस्तु विक्रयोमे तथा दानमे सेहो राखल जाय। ई तँ कन्यादान प्रकरणमे वर-कन्या दुनूक वंशक पूर्ण सपिण्डक अभिलेख जाहिमे लिखल जाय से भेल पञ्जी आऽ ओहि पञ्जीमे जे वर-कन्या सपिण्डक अभ्यनाट नहि छथि से लिखनिहार पञ्जीकार कहवैत छथि। एहि स्थितिमे ईहो ज्ञात होबक चाही जे पञ्जी प्रथा कहियासँ चलल, कियैक चलल? ई प्रथा हरिसिंह देवक समयसँ प्रचलित भेल अछि। कियैक आरम्भ भेल से कथा स्व. पञ्जीकारे मुहसँ सुनल अछि, जे निम्न थिक। पञ्जी प्रबन्धक आरम्भक बीज- एक ब्राह्मणी रहथि। ओऽ जाहि गाममे रहथि ओऽ ब्राह्मण बहुल गाम छल। लोक कि पुरुष वा कि स्त्री बिनु पूजा-पाठ केने भोजन नहि करथि। ओहि गामक एक पोखरिपर एक शिवमन्दिर छल। उक्त ब्राह्मणीक नियम छल जे जाऽ धरि उक्त शिव-मन्दिरक महादेवक पूजा नहि करी ताऽ धरि जलग्रहण नहि करी। ई शिव पूजार्थ मन्दिर गेली ओहि समय एक चाण्डाल सेहो पूजार्थ गेल रहए। हिनका देखि हिनकासँ दुराचरणक आग्रह कएलक। ई परम पतिव्रता छलीह। ओकरा दुत्कारैत कहलनि जे ई मन्दिर थिकैक तू केहेन पापी छैं, जो भाग नहि तँ तोहर भला नहि हेतौ। ई कहिते छलीह की शिवलिङ्गसँ एक सर्प फुफकार करैत अवैत ई चाण्डाल भागल। संयोगवश बाहरसँ एक ब्राह्मणी, ओहि दुनूक वार्तालाप सुनिते छलीह। गामपर आवि मिथ्या प्रचार ओहि चाण्डालक संग कऽ देलनि। गामक लोक हिनका बजाय कहलनि जे अहाँकेँ प्रायश्चित करए पड़त। एहि लेल कि अहाँ चण्डालक सङ्गम कएल। ई कहि उठलीह जे के ई कहलक, हमरा तँ ओकरासँ स्पर्शो नहि भेल अछि। मुदा लोककेँ विश्वास नहि भेल। प्रायश्चित लिखल गेल (यदीयं चाण्डालगामिनी तदा अग्निस्तापं करोतु) ई लिखि हुनक दहिन हाथपर एक पिपरक पात राखि आऽ तैपर लह-लहानि आगि राखल गेल। ई पाकि गेलीह। तखन हिनका ग्राम निष्कासनक दण्ड देल गेल। कनैत-खिजैत लखिमा ठकुराइन नामक पण्डिताकेँ सब बात कहलनि। श्रीमती ठकुराइन प्रायश्चित्त लिखनिहार पण्डितकेँ बजाय कहल जे प्रायश्चित्त गलत लिखल गेल। हम प्रायश्चित्त लिखब। तखन ठकुराइन लिखल जे “यदीयं पतिभिन्न चाण्डाल गामिनी तदा अग्निस्तापं करोतु”। ई वाक्य पूर्ववत् दहिन हाथक पिपरक पातपर राखल गेल तँ ई नहि पकलीह। तखन ई वार्ता महाराज हरिसिंहदेवक ओतय गेल। तखन उक्त महाराज पण्डित मण्डलीकेँ आमन्त्रित कऽ पुछलनि जे उक्त स्त्रीक पति चण्डाल कोना? तखन विद्वतमण्डली उक्त स्त्रीक पतिक विवाहक शास्त्रानुकूल विचारि देखलनि तँ हुनक विवाह अनधिकृत कन्यासँ भेल तैँ हिनकर पति चण्डाल भेलाह। एकर बाद महाराजक आदेशसँ मैथिल ब्राह्मण लोकनिक विवाह पञ्जी बनल। मैथिल ब्राह्मणमे १६ गोत्रक ब्राह्मण छथि। एकर बाद गाँव-गाँवमे उक्त गोत्रान्तर्गत जे जे लोक छलाह तनिका-तनिका गामक नाम देल गेल एवं मूल कहौलक। पञ्जी मूलक अनुसार बनल, गोत्रक अनुसार नहि। एक गोत्रमे अनेक मूल अछि। गोत्रक नामपर पञ्जी बनैत तँ गामक पता नहि लगैत। हमर मतसँ पञ्जी-प्रबंध धर्मशास्त्रक अंग थिक। तैं एकर लिखनिहार, अभिलेख (रेकर्ड) रखनिहार एवं एक पढ़निहार व्यक्ति पञ्जीकार (रजिस्ट्रार वा धर्मशास्त्री) थिकाह। कलियुगानुकूल पूर्व समय जेकाँ पञ्जीकारक परामर्श बिनु लेनहुँ विवाहक निर्णय कऽ कन्यादान कऽ लैत छथि जे परम अनुचित थिक। जे पञ्जीकार हमरा लोकनिक लोकान्तर प्राप्त पूर्व पुरुषक अभिलेख (रेकर्ड) राखि आ वैह विद्या पढ़ि अपन जीवनयापन करैत छथि हुनक आर्थिक स्रोत एक मात्र ईएह जे हमरा लोकनिक सन्तान (वर वा कन्याक) जखन समय आओत तखन हुनक परामर्श शुल्क दऽ ग्रहण करी। से वर्षमे कतेक होइछ। यदि ईएह रास्ता रहत तँ ई विद्या लुप्त भऽ जायत। एहि पञ्जीक मूल्य सरकारोक न्यायालयमे कम नहि छैक जेकर निम्नांकित एक उदाहरण देखू- उदाहरण- एक राजपरिवार वंशविहीन भऽ लुप्त भऽ गेल। हुनक सब सम्पत्तिमे सँ किछु सम्पत्ति महाराज दरभंगाकेँ भेल आऽ किछु सम्पत्ति बनैलीक राजामृत राजपरिवारक उत्तराधिकारीसँ कीनि लेल। एकर बाद महाराज दरभंगा न्यायालय जाय बनैली राज्यपर ई कहि जे ओऽ (वनैली राज्य) अनधिकृत किनने छथि। मोकदमा बहुतो दिन चलल। दुनू पक्षसँ दिग्गज वकील लोकनि छलाह। उत्तराधिकारक हेतु दुनू पक्षकेँ ई पञ्जी-प्रबन्ध मान्य भेल। जाहिमे बनैली राज्यक पञ्जीकारक रूपमे उक्त पञ्जीकार जनिक विषयमे ई लेख लिखल जाऽ रहल अछि, हिनक पूज्य स्व.पिता तथा ई, दुनू गोटें मोकदमाक बहसक लेल नियुक्त भऽ पञ्जी-प्रबन्ध पुस्तकक अभिलेख न्यायालयक जजकेँ देखओलनि। एकर बाद बनैली राज्य “डिग्री” पओलक त्तथा ई दुनू पिता-पुत्रक मान्य सम्मान कयलक। एहिसँ सिद्ध भेल जे उक्त पञ्जीकारक पञ्जी सुरक्षित रहि पञ्जीकारक योग्यतोकेँ सिद्ध कएलक। हिनक निर्लोभताक वर्णन सेहो देखू:- एक राजदरबारमे कन्यादान उपस्थित छल। ताहिमे परामर्श (सिद्धान्त)क हेतु अनेको पञ्जीकार बजाओल गेल रहथि ताहिमे ईहो रहथि। राजदरबारक बात रहैक। राजाकेँ अपन कन्याक हेतु ई वर पसिन्द रहथिन। ई पञ्जीकार अन्य पञ्जीकारसँ वार्तालापमे कहलथिन जे औ पञ्जीकारजी! ऐ वरक अधिकार तँ नहि होइत छैक। ओऽ उत्तर देलथिन जे अहाँ बताह भेलहुँ हेँ। राजाक बात थिकैक। राजाकेँ काज पसिन्द छनि। एहिमे अरङ्गा नहि लगबियौक। नीक पारश्रमिक भेटत। ई मोने-मोन विचारलन्हि जे ऐ पापक भागी (रुपैय्याक लोभमे पड़ि) हम कियैक होउ। किछु कालक बाद बाह्यभूमि (पैखाना) जेबाक बहाना बनाय ओतयसँ भागि अयलाह। हिनक नैष्ठिकता सेहो तेहने छल। सब दिन स्नानोत्तर सन्ध्या, तर्पण, गायत्री जप, शालिग्रामक पूजा बिनु कएने विष्णु भगवानक चरणोदक तथा तुलसीपात बिनु खएने! अन्न-जल नहि करैत छलाह। एकर अतिरिक्त कार्तिक मास जखन अबैक तखन भरि मास धात्रीयैक गाछतर हविष्यान्न भोजन करथि। ऐ सँ हुनक पूर्ण नैष्ठिकताक पता चलैत अछि। शीतल झा,संविधानसभा, संघीय संरचना आ मिथिला राज्यक औचित्य- जनकपुर, नेपाल हिमालय पर्वत ऋंखलाक करिब मध्य भागमे चीनक तिब्बतसँ दक्षिण, भारतक बिहार आ उत्तर प्रदेशसँ उत्तर आ पूर्व तथा पश्चिम बंगालसँ पश्चिम एकटा आयताकार देश नेपाल अछि । २४० वर्षपूर्व गोराखक एकटा लडाकू राजा पृथ्वीनारायण शाह हिंसक बलसँ दक्षिण–पूर्व आ पश्चिमक देशसभपर आक्रमण करैत गेल आ सुन्दर उपत्यका काठमाण्डूसहित एकटा नमहर देश बनौलक । एकर सीमा दक्षिणमे कतऽ धरि रहैक, तकर आधिकारिक रुपसँ कतहु उल्ल्ेख नहि अछि । खस शासकद्वारा शासित गोरखा राज्यक दमनपूर्ण विस्ताकरक वाद एकर नाम कहिया नेपाल रहल से निर्णायक प्रमाण नहि भेटैछ । दक्षिणमे मिथिला आ अवधसन ऐतिहासिक गणराज्यपर सेहो ई हिंसापूर्ण ढंगसँ षडयन्त्रपूर्वक आक्रमण कएलक । एहि क्रममे व्रिटिशकालीन भारतकद्वारा प्रतिरोध आ युद्ध कएल गेलाक वाद १८१६ क सुगौली सन्धिसँ ई वर्तमान सीमाङ्कित देश, बनल जाहिमे १८६० क सन्धिसँ दानस्वरुप प्राप्त पश्चिमक ४ जिलासँ एकर वर्तमान स्वरुप निर्धारित भेल । ड्ड देशक राजनीतिक शासन व्यवस्था राजतन्त्रात्मक छैक आ एकर राज्य–संरचना एकात्मक । एकर शासकीय प्रवृति निरंकुशात्मक छैक आ सामाजिक आर्थिक व्यवस्था सामन्ती छैक । ड्ड एकर सामाजिक मानवशास्त्रीय संरचना ९क्यअष्य(बलतजचयउययिनष्अब िक्तचगअतगचभ० मंगोलाइड केकेशियन प्रजातिसँ बनल अछि, जाहिमे निग्रोवाइड आ एस्टोल्वाइड प्रजाति सेहो अल्प संख्यामे बसल अछि । कैकेरियनक आर्य शाखा तँ मुख्य रहैत अछि । ड्ड हिमालय क्षेत्र आ पहाड क्षेत्रमे लिम्बु, राई, तामाङ, नेवार, मगर, गुरुङ, शेर्पा जाति तथा जनजातिक वास छैक तँ दक्षिणक समतल मैदानी भूभाग तराइृमे आर्यमूलक जाति जनजातिसभक वास छैक । दुनू क्षेत्रमे पिछड़ल जनजाति, आदिवासीसभक वास सेहो छैक, जाहिमे मिश्रित मूलक संख्या उल्लेखनिय छैक । मूख्यतः कर्णाली प्रदेशक आर्य मूलक खस जातिक गोरखा राज्य वर्तमान सम्पूर्ण नेपालपर शासन करैत अछि । तेँ ई राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायिक प्रभाव विस्तारक क्रमे प्रत्येक जातीय क्षेत्रमे प्रवेश कऽ सामाजिक, भाषिक, जातीय संरचनाकेँ तोड–मडोर कऽ देने छैक आ नेपालकेँ कथित रुपेँ राष्ट्र कहि प्रस्तुत करैत छैक । वस्तुतः सामाजिक विकासक अध्ययनमे देखल जाए तँ नेपाल एकटा नहि, विभिन्न राष्ट्रसँ बनल एक देश अछि, जतऽ एक्कहिटा खस जातिक एकल राज्यशासन छैक । २. मिथिला नेपालक दक्षिणी समतल भूभागकेँ तराई अथवा मधेश कहल जाइत छैक । एतऽ अवध आ मिथिलासन पौराणिक महिमामण्डित ऐतिहासिक समृद्धताप्राप्त गणराज्य छल, जकरा मुगल व्रिटिश शासन दमन करैत गेल आ अन्ततः शाहवंशीय राजाक सङ्ग वाँटि लेलक । १८१६ क सन्धि मिथिलाकेँ खण्डित कएलक । जाहि मिथिलाक सीमा कोशीसँ पश्चिम, गण्डकसँ पूर्व, गंगासँ उत्तर आ हिमालसँ दक्षिण छलैक, तकर आइ इतिहास छैक, भूगोल नहि छैक । जेँ कि एकर भाषा, संस्कृति, जीवित छैक तेँ बाटल–बाँटल शरीरक आधारपर कहि सकैत छी–सिमरौनगढ़सँ पूर्व, झापासँ पश्चिम आ महाभारत महाड़सँ उत्तर मिथिला जीवित अछि–अहिल्याजकाँ जीर्णोद्धारक प्रतीक्षामे अछि, उद्धारक बाट जोहि रहल अछि । ३. संविधान देशमे शासन व्यवस्था कायम करबाक लेल बनाओल गेल मूल कानूनकेँ संविधान कहल जाइत छैक । सभ कानून, ऐन, नियम एकरे सीमाक भीतर रही बनाओल जाइत छैक । लोकतन्त्रक मुख्य आधार आ एकटा प्रमाण संविधान होइत छैक । नेपालमे २००४ सालमे पहिलबेर कोनो संविधान नामक चीज प्रस्तुत भेल रहैक । ओना ताहिसँ पूर्व १९१० मे एकटा ऐन सेहो बनल रहैक । तत्पश्चात २००७ सालमे अन्तरिम शासन विधान आ २०१५ सालमे नेपाल अधिराज्यक संविधान आएल । २०१५ सालक संविधान एकदलीय पञ्चायती व्यवस्था देलक आ तकर अन्त्य २०४६ सालक आन्दोलन कएलक । २०४७ सालमे एकटा अन्तरिम सरकार बनाकऽ तकराद्वारा नेपाल अधिराज्यक संविधान २०४७ लागू कएल गेल । ई सभ संविधान राजतन्त्रात्मक एकात्मक, एकात्मक अछि आ राज्य सत्तापर, राज्यपर, प्रशासनपर एक धर्म, एक भाषा, एक जातिकेँ प्रमुखता आ अधिकारक मान्यता देने छल । राजाद्वारा प्रदत्त ओ संविधानसभ राजाक अधिकारकेँ सर्वोपरि मानैत आएल छल । मुदा ०६२÷०६३ मे भेल जनआन्दोलन भाग–२ सँ ई मान्यता ढहैत गेल आ एखन देश संविधानसभाद्वारा अर्थात जनताक प्रतिनिधिद्वारा निर्मित संविधानक निर्माण करत । ४. संविधानसभा संविधान बनएबाक लेल जनताद्वारा चुनल प्रतिनिधिसभक समूह एवं सभाकेँ संविधानसभा कहल जाइत छैक । सार्वभौमसत्ता सम्पन्न जनता अपनाकेँ अनुशासित आ शासित रहबाक लेल जाहि तरहक शासन–व्यवस्थाकेँ चलएबाक लेल अपने पठाओल प्रतिनिधिद्वारा कानूनक ग्रन्थ तैयार करबाबैक आ घोषणा करबबैक, ताहि जनप्रतिनिधिमूलक सभाकेँ संविधानसभा कहैत छैक । ५. संविधानसभाक अनुभव (क) उत्तर अमेरिका ः ब्रिटेनद्वारा शासित अमेरिकाक १३ राज्य स्वतन्त्र भेलापर ५५ सदस्यीय संविधानसभा निर्माण कऽ तकर अनुमोदन अमेरिकी जनतासँ करबाकऽ अप्रिल ३०, १९८९ मे घोषणा कएलक । (ख) फ्रान्स ः अपनहि देशक सामन्ती नायक सम्राट सोलहम लुइक विरुद्ध संविधानसभा वना १७९१ मे लागू कएलक । (ग) रुस ः १९१८ मे संविधानसभा तँ बनल मुदा संविधान लागू नहि भऽ सकल । (घ) भारत ः ब्रिटिस शासनसँ मुक्तिक लेल ३८९ सदस्यीय संविधानसभा बनल मुदा पाकिस्तानक विभाजनक बाद रहल २९९ सदस्यीय सभाद्वारा आ डा.राजेन्द्र प्रसादद्वारा ई घोषित भेल । (ङ) दक्षिण अफ्रिका ः गोर आ कारीक बीच भेल संघर्ष संविधानसभाक मार्फत अन्त्य भेल । सर्वपक्षीय सम्मेलनमार्फत ४९० सदस्यीय संविधानसभाक निर्माण भेल आ संविधान बना जनअनुमोदन कराओल गेल आ घोषणा कएल गेल । विभिन्न देशक अनुभवक आधारपर नेपालमे बननिहार संविधानसभामे निम्न तरहक विशेषता होएब वाञ्छनीय रहितैक – (क) जनसंख्याक अनुपातमे निर्वाचन क्षेत्र निर्कारण कएल जाइक आ प्रत्येक जाति, जनजाति, अल्पसंख्यक, दलित, महिला, मधेशीक ओहि अनुपातमे क्ष्ोत्र आरक्षित कऽ प्रतयक्ष निर्वाचनसँ जनप्रतिनिधिक पठा संविधानसभाक निर्माण कएल जइतैक । (ख) अन्तरिम संसदसँ संविधान मस्यौदा तैयार कऽकऽ ओकरा जनमतसंग्रहद्वारा निर्माण कएल जइतैक, मुदा प्रत्यक्ष मतादान वा समानुपातिक प्रणाली दुनू कायम कएल गेलैक । एहिसँ अत्पविकसित देशक जनतामे भ्रम आ अनावश्यक गड़बड़ी उत्पन्न मऽ सकैत छैक । आब पूर्ण समानुपातिक प्रणाली बहुतो राष्ट्रिय दलक संगहि प्रत्येक जातीय, जनजातीय, क्षेत्रीय समूहकसभक सेहो मांग रहलाक कारण ओकरे लागू कएनाइ सार्थक संविधानसभाक आधार तैयार कऽ सकैत अछि । ६. समावेशीकरण तथा समानुपातिक समावेशीकरण सत्ताक स्वरुप, शासन, प्रशासनमे देशक प्रत्यक जाति, जनजाति, अःल्पसंखयक जाति, विभिन्न भाषिक समूह, सांस्कृतिक समूह, आदिवासी, महिला, क्षेत्र आदि सभक प्रवेश नहि भेल तँ शासन पद्धति जनासँ दूर रहि जाइत अछि आ ताहूमे लोकतन्त्र तँ मात्र कथित सभ्रान्त वर्गक खास जातिक हाथक दमनक माध्यम बनि जाइत अछि । तेँ जातीय, भाषिक संख्याक समानुपातिक समावेशीकरणसँ मात्र लोकतान्त्रि शासन पद्धति मजबूत आ दीर्घजीवी भऽ सकैत अछि । (क) जनसंख्याक समानुपातिक निर्वाचन क्षेत्र निर्धारण कऽ ओहि क्षेत्रसँ ओहि ठामक मूल जाति, भाषाभाषीक मात्र प्रतिनिधित्व कराओल जाए । (ख) जनसंख्याक समानुपातिक रुपमे सरकारक प्रत्येक अंगमे अथवा न्यूनाधिक रुपमें सभ क्षेत्र, वर्ग, जाति, लिगंक उपस्थित कराओल जाए । (ग) सुरक्षा, प्रहरी, प्रशासन, राजनीति, राजनीतिक संस्था प्रत्येकमे समानुुपातिक रुप्मे प्रवेश कराओल जाए वा न्यूनाधिक रुपमे प्रारम्भ कराओल जाए आ किछु जातिक लेल प्रारम्भमे आरक्षित कएल जाए । एहि तरहेँ देखलापर आगामी शासन पद्धति समानुपातिक होएबाक लेल संविधानसभा समानुपातिक भेनाइ आवश्यक अछि आ तकरा लेल अन्तरिम संसद आ अन्तरिम सरकार, निर्वाचन आयोगकेँ सेहो समानुपातिक भेनाई आवश्यक अछि आ ओअि तरहक सुरक्षाक व्यवस्था कएनाइ सेहो आवश्यक अछि । ७. एहि तरहेँ वनल संविधानसभा नेपालक नव राज्य संरचना कऽ सकैत अछि आ संघीय संरचनादिस लऽ जा सकैत अछि – (क) राज्य (प्रान्त, प्रदेश) ः भाषा, संस्कृति, जाति, धर्म आदिक आधारपर बनल अथवा बनाओल राजनीतिक, आर्थिक, प्रशासनिक अधिकारसम्पन्न राजनीतिक भूक्षेत्रकेँ राज्य कहैत छैक । (ख) संघ – एहन, राज्य सभस वनल राजनीतिक शक्ति सम्पन्न केन्द्रीय सत्ता के संध कहै छ । आंशिक सार्वभौमिकता, स्वतन्त्रता, आत्म निर्णयक अधिकार प्राप्त सभ मिल क सार्वभौम सत्ता केन्द्रके प्रदान करैछ आ एहि राज्य संरचना के संघीय संरचना कहल जाइत अछि । ८. नेपाल संघीय होएबाक आवश्यक अछि – कारण ः– (क) नेपाल विभिन्न प्रजाति, जाति, जनजाति, धर्म, भाषा, संस्कृति के देश छै । एहि सभ के देशक मूलधारमे लएवाक लेल । (ख) लोकतान्त्रिक व्यवस्थाके समानुपातिक समावेशीकृत करबाक लेल । (ग) संघीय सरकार आ राज्य सरकार भेला स प्रत्येक नागरिक अपन योग्यता व्यवस्था अनुकूल उपयोग करबाक लेल । (घ) राज्य भीतर अनेक प्रशासनिक न्यायिक निकाय विकेन्द्रित विकाश राज्य क्षेत्रक कार्य सम्पादन ओहि राज्यक जनताके निर्णय अनुसार हौइछै । (ङ) ओहि राज्यक भीतरक प्राकृतिक सम्पदा जल, जमिन, जंगल खनिज पदार्थ पर ओहि राज्यक जनताक अधिकार होइछ, ओकर अधिकतम प्रयोग ओतहिक जनता करैछ । (च) उदयोग आदि विकास कार्य पर राज्यक नियन्त्रण रहैछ आ ताहि के लेल अन्य राज्य स, विदेश स सम्बन्ध स्थापित क सकैअ । (छ) ओहि राज्यक प्रमुख भाषा प्रशासन, न्यायिक क्षेत्र आदि मे निर्वाध रुपमेँ प्रयोग क सकैअ जहि स राज्यक जनता सामाजिक न्याय, मानवीय विकास स वंचित नहि भ सकैअ । (ज) अपन मातृभाषा, स्वत ः कायम भेल सम्पर्क भाषा, ग्रहित शिक्षाक भाषाक सुविधा भेल स प्रशासनिक, शैक्षिक वैदशिक सुरक्षा सेवा आदि मे निक संख्या मे राज्यक युवा, शिक्षित वर्ग प्रवेश होएत । (झ) कोनो खास प्रजातिक, राष्ट्रक, जातिक, जनजातिक, भाषाभाषिक, धार्मिक, सांस्कृतिक समुदायक इतिहास, संस्कृति, भाषा, भेष, कला , साहित्य, परम्परा केँ सरक्षण आ सम्बर्धन कए पहिचान के सुनिश्चत आ सुरक्षित करबाक लेल । (ञ) कोनो प्रजातिय, जातीय, धार्मिक, भाषिक समुदाय के दोसर वर्ग स शोषण दमन स मुक्ति के लेल । (ट) पृथकवादी आन्दोलन के रोकवाक लेल । (ठ) एकात्मक राज्य व्यवस्था परुर्ण रुप स असफल भगेल अछि । तै संघीय संरचना आवश्यक अछि । ९. संघीय संरचनाक आधार ः– संघक भीतर राज्यक संरचना क आधार निम्न होइछ (क) ऐतिहासिक रुप स निर्मित राष्ट्र (.....–जाति ) के आधारपर (ख) प्रकृतिक रुपस निर्मित भूखण्डके आधार पर । (ग) जातीय वाहुल्यता के आधारपर (घ) धर्म अथवा धार्मिक सम्प्रदायक अधार पर (ङ) संस्कृति के आधार पर अथवा सांस्कृतिक सामिम्प्यता के आधार पर । (च) भाषा क आधार पर (छ) प्रकृतिक सम्पदाक आवण्टन के आधार पर । (ज) विकसित नया अवस्था, सोचक, आधारपर । १०. एहि आधारसभ के देखैत आ नेपालमेँ चलैत जातीय आन्दोलन सभ केदेखैत आ ओकर मांग सभ के देखैत नेपालके निम्न संघीय राज्यमे विभाजित कएनाई आवश्यक छै ः– (क) लिम्बुवान किरांत राज्य (ख) खुम्बुवान (ग) नेवा राज्य नेवार राज्य (घ) तामाङ साम्बलिंग (ङ) तमुवान गुरुङ राज्य (च) मगरात मगर राज्य (छ) खसान खस राज्य (ज) थरुहट थारु राज्य (झ) अवध अवधी राज्य (ञ) भोजपुरी भोजपुरी (ट) मिथिला मिथिला (विदेह) संघीय विधाजनक लेल नया, तथ्यपूर्ण जनगणना आवश्यक अछि, आ ऐतिहासिक रुप स वसल जाति के सामुहिक निर्णय के आधारपर राज्यक नामाकरण कएनाई आवश्यक अछि । सम्पूर्ण नेपाल मे खस जातिक मिश्रित अवस्था भेलो स कोनो जातीय क्षेत्रक इतिहास आ ओकर भावना नहिं मेटाएल अछि । ११. मिथिला – संघीय संरचनामे मिथिला राज्य किएक चाहि ः– (क) मिथिला प्राग्ऐतिहासिक भूमि अछि आ पुराणवर्णित देश अछि । (ख) मिथिला आर्यजातिक आधार क्षेत्र आ आर्य संस्कृतिक निर्माण भूमि अछि । (ग) कोशी गण्डक, गंगा, हिमालय के विचमेँ स्थित ई भूमि निश्चित भूखण्ड प्राप्त कएने अछि । (घ) ऐतिहासिक कालखण्डमे एकरापर अनेक आक्रमण होइतोमे ई आर्य जातिक वाहुल्यताक क्षेत्र छै । (ङ) एकर अपन वहुत समृद्ध संस्कृति छै । (च) एकर भाषा हजारौं वर्ष पूर्वक इतिहास देखवैत अछि आ वहुत समुद्ध अछि । (छ) मिथिला गणराज्यक इतिहासक साक्ष्य अछि । (ज) एकर खस आर्थिक जीवन प्रणाली छैक । (झ) सामुहिक, देवी देवता स ल “क” पारिवारिक देवता प्रति आस्थाक संस्कार छै । (ञ) मिथिलामे अखनो लोक निर्मित, नियम कानून छै समग्रमेँ मिथिला के एकटा सझिया मनोभावना छैक जाहिस ई एकटा राष्ट्र छै आ एकरा संघीय संरचनामे राज्य होएबाक पूर्ण नैसर्गिक अधिकार छै । ११..... (क) मिथिलाक सम जातीके, राजनीतिमे, प्रशासनमे समानुपातिक उपस्थिति के लेल । (ख) उद्योग, कृषि, पर्यटन, जंगल, जल सभ स अधिकतम् लाभ, लेबाक लेल । (ग) नदी नियन्त्रण, सिंचाई सडक वाँध, विद्युत आदि के लेल संघीय सरकार स आ विदेश स सम्बन्ध स्थापित कए मिथिला वासी के उत्थान लेल । (घ) मिथिला स उठाओल कर ... के उचित व्यवस्थापन कए राज्यक द्रुत विकाश केल । (ङ) मिथिलामे प्रयोग होइत सभ भाषा मे सरकारी तथा गैर सरकारी कार्यालय सभमेँ कामकाज करवाक लेल । (च) सरकारी सेवामे कामकाज करबाक अवसर के लेल । अर्थात वेरोजगारी समस्या समाधानमे सहयोग कएवाक लेल । (छ) मिथिलाक पावनि तिहार मे छुट्टि पएवाक लेल । (ज) मिथिलाक दलित, उत्पीडित, पिछडल वर्ग, जनजाति आदिवासी, महिला, अल्प संख्यक केँ लेल विशेष अवसर के लेल । (झ) मिथिलाक लोकगाथा (सहलेश, लोरिक) लोकनृत्य लोकधुन लोककला, लोकगीत, लोकनाट्य आदि के रक्षा आ प्रचार प्रासरक लेल । (ञ) पौराणिक मिथिलाक राजधानी जनकपुर सहित मिथिलाक एक खण्ड, एकर लिपि, साहित्य भाषा, संस्कृति जीवन शैली सभ जीवित अछि तै रक्षाक लेल आ विश्वस्तर मे एकर सभ्यताके, विशेषताके फैलावक लेल । (ट) नेपाल मे भेल कोनो लोकतान्त्रिक आन्दोलन, जातीय मुक्ति के आन्दोलनमे मिथिलाके अग्र, उग्र भूमिका रहलैक, सपूत वलिदान देल कै तै संघीयता के लेल अधिक रक्त श्राव रोकवाक लेल । १२. मिथिला राज्यक सीमा ः– (क) प्राचीन, मिथिलाक सीमा छलैक –उत्तरमे हिमालय, दक्षिणमे गंगा, पूर्वमे कोशी, पश्चिम मे गंडक । ई मिथिला १८१६ क सुगौली सन्धि पश्चात् खंडित भेल । अखन एकर जीवित भूगोल पर जीवित इतिहास छै, जीवित लिपि भाषा, जीवित संस्कृति जीवन्त जिवन शैली, जीवन्त मनोभावनाक अधिकार अनुसार सीम्रौन गढ स पूर्व, झापा स पश्चिम महाभारत पर्वत श्रृंखला स दक्षिण आ नेपाल भारत वीचक सीमा स उत्तर मिथिला छैक, आ मिथिला राज्य होएबाक चाहि । (ख) झापा मधेश मे रहितो मे एत सतार, राजवंशी जनजातिक बसोवास छैक, आ ओकर अपन इतिहास, संस्कृति, मांग आ संघर्ष छै तै ओतए, नव आगन्तुक खस भाषी के छोडि ओकर सभके आत्म निर्णयके अधिकार अनुसार मिथिलामेँ समाहित कएल जाए अथवा स्वायत्तता देल जाए । (ग) वारा, पर्सा भोजपुरी भाषाक क्षेत्र छै । मैथिली भाषा स फरक छै परन्तु एकर संस्कृति, आर्थिक जीवन मिथिला के समान छै । खसवादी सत्ताके दृष्टिकोण व्यवहार एकरो प्रति ओहने छै तै एकरो आत्मनिर्णय के आधारपर मिथिला मे समाहित कएल जाए अथवा स्वायत्तता देल जाए । १३. मधेश आ मिथिला ः– (क) मेची स महाकाली तकके सम्पूर्ण समतल मूमि – मधेश एकहि सत्तास दमित अछि, दलित अछि, उत्पीडित अछि, प्रताडित अछि, उपेक्षित अछि । सम्पूर्ण मधेशी एकहि मनोविज्ञान एकहि मनोदशा लक जीवित अछि । एकरा प्रतिक शोषणक स्वरुप समान छैक तै तकर संघर्षक निशाना एकहिटा भाषीक वर्ग छै । (ख) खस प्रभुत्ववादी सत्ता, मैथिली , भोजपुरी अविधि कहिक उपेक्षा, अवहेलना नहि करे छै समष्टिमे मात्र मधेशी कहै छै । (ग) थारु जातिके खस शासक पहाडी नहि बुझै छै आ थारु अपना के मधेशी बुझ स भय महसुस करै छै । तथापी ओ संघीयता के संघर्षमे प्रमुख शक्ति भसकै छै । आ इएह सोच स मधेशमे वसल प्रत्येक जनजाति, द्रोणवार, सतार राजवंशी, झागड सभके देखनाइ आवश्यक छै आ ओकरा सबके एहि संघर्षमे स्थापित कएनाई आवश्यक छै । (घ) मधेशक आन्दोलन खस सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक आन्दोलन छै आ मिथिलाक आन्दोलन माथिक, सांस्कृतिक, जातीय आन्दोलन निहित राजनीतिक अन्दोलन छै तै संघीयता के आन्दोलन के अन्तरवस्तु लेने छै । (ङ) मधेश आन्दोलन केन्द्र स्थल मिथिला क्षेत्र रहैत अछि आ मानव अधिकार राजनीतिक अधिकरा प्राप्तिके आन्दोलन के केन्द्र सेहो मिथिला क्षेत्र रहैत अछि । तै मधेश आन्दोलन के मिथिला आन्दोलन स जोडनाई आ मिथिला आन्दोलन के मधेश आन्दोलन के रुपमेँ विकसित कएनाई रणनीतिक सोच राखव आवश्यक छै । १४. मिथिला आ गणतन्त्र ः– मिथिला राज्यक लेल अथवा मिथिलाक मुक्तिके लेल नेपालमे संघीय शासन आवश्यक शर्त छै । संघीय शासन के लेल गणतन्त्र आ लोकतन्त्र आवश्यक शर्त छै आ अन्तत ः लोकतन्त्र के स्थापनाके लेल, एकर सशक्तता के लेल, एकर दीर्घायु के लेल गणतन्त्र आवश्यक छै । १. गणतन्त्र – जन्मक आधारपर विशेषाधिकार सहित शासक विना के शासन पद्धति सत्ताक स्वरुप के गणतन्त्र कहैत छै । सार्वभौमिक जनता जनप्रतिनिधि द्वारा राष्ट्र प्रमुख निर्माणक पद्धति के गणतन्त्र कहैत छैक अर्थात् राजा विना के शासन पद्धति । २. नेपाल गणतन्त्रात्मक देश हाएवाक चाहि – कारण ? (क) कथित एकिकरण वलातु सैनिक वल स हिंसा द्वारा भेल छै । (ख) राजतन्त्रक मूल चरित्र निरंकुश, निर्मम, अत्याचारी होइत आएल छै । (ग) सत्तामे ,सेनामे, प्रशासनमे, न्यायलयमे दमनकानरी नीति स पकड वना क आम वर्ग केँ निर्मम शोषण दमन करैत छै । (घ) कोनो प्रकारक, नया सोच, वैज्ञानिक चिन्तन जनअधिकार आ प्रगति विरोधि भेनाई राजतन्त्रक मूल ऐतिहासिक चिन्तन आ चरित्र छै । (ङ) एक देश–एक राज्य, एक राज्य –एक राष्ट्र, एक राष्ट्र – एक जाति, एक जाति – एक धर्म, एक धर्म – एक संस्कृति, एक संस्कृति– एक भाषा, एक भाषा – एक भेष आदि प्रकारक निरंकुश एकात्मक नीति लैत आएक छै । (च) लोकतन्त्रके स्थायित्व, मानवअधिकारक वहाली, कानूनी राज्यक स्थापना स्वतन्त्र, न्यायपालिका के लेले राजतन्त्र उच्छेदन आवश्यक छै । (छ) जनतके बलीदानी संघर्ष स आएल लोकतन्त्र के साथ सदा घोर षडयन्त्र करैत आएल छै । (ज) निम्न जाति आ वर्ग के सन्तान दुर राखि दानवीय व्यवहार कएनाई के दैविक अधिकार बुझै छै । (झ) कोनो प्रजाति जाति , जनजाति, भाषाभाषी के पहिचान के दमन करैत आएल छै आ दमन मे सेना, प्रशासन, अदालत, मातृहन्त केँ प्रयोग करैत आएल छै । (ञ) मधेशी के सदा विदेशी सावित करै मे व्यस्थ रहै त आएल छै । (ट) मिथिला के साथ वहुत वडका धोखा, षडयन्त्र, गद्दारी करैत आएल छै , जहन मिथिलाक सेना स सहयोग ल क भंग कए देने छै । (ठ) जातीय अधिकार के सुनिश्चित, सुरक्षित रखवाक लेल आवश्यक संघीय संरचनाके स्थापनाक लेल गणतन्त्र आवश्यक छै । १५. सघीयता आ वर्गीय आन्दोलन ः– किछु राजनीतिक आ बौधिक वर्गमे भ्रम रहैंछ आ भ्रम श्रृजना करैछ जे संघीय आन्दोलन वर्गीय आन्दोलनकेँ कमजोर करैत छै आ संघीय आन्दोलन जातीय सम्प्रदायिक सद्भाव के दूषित छै । मुदा ई भ्रम मात्र अछि । शोषण के स्वरुप आ गति जतेक स्पष्ट आ तीब्र होइछ आ वर्गीय आन्दोलन के गुण लैत जाइत अछि आ सम्पन्न वर्ग आ “सभ्य” जाति के भितर निर्मित शोषण आ शोषितक चरित्र लबैत अछि त ओ मात्र अधिकार आन्दोलन नहिं, जाति, क्षेत्र हितक आन्दोलन मात्र नहिं मानव विकाशके क्रम मे भेल वर्गीय आन्दोलन अछि । (आ कोनो वर्गीय आन्दोलनकारी के संघीय आन्दोलनके समर्थन करबाक चाहि) मिथिला आन्दोलन सेहो वर्गीय आन्दोलन अछि जतए एकटा राष्ट्र, समृद्ध संस्कृति, भाषा, साहित्य, शोषण आ दमनके शिकार अछि । १६. मिथिला आ जातीय आन्दोलन ः– जाति स्वरुप, चरित्र, इतिहास, आ ओहि जातिपर होइत शोषण दमके मात्रा, जातीय आन्दोलनके दिशा र स्वरुप निर्धारण करैछ । (सामाजिक संरचनाके भित्ररके विभिन्न जातिकै तह, हिन्दु धर्माबलम्बीके विभिन्न जातपर होइत भेदभाव, आ शोषण सेहो आन्दोलन के समय आ स्वरुप निर्धारण करैछ । तथापि छोट आ सामयिक अन्तर विरोध एकर मुख्य आन्दोलन के असर नहिं क सकैछ आ प्रधान अन्तर विरोध के समाधान मात्र ओहि अन्तर विरोध के समाधान क सकैछ । मिथिलाके भित्तरकेँ विभिन्न द्वन्द्व मुख्य द्वन्द्व के समाधान कर में आएल वाधा राजनीतिक वैचारिक आन्दोलन के मार्फत मात्र अन्त्य कएल जाए सकैछ । १७. मिथिला आ जनजातीय आन्दोलन ः– जनजाति स्वतः शोषित दमित आ अविकसित होइत अछि । ओकरा पर सदियौं स शोषण भ रहल अछि । मुदा आब आहो अपना अधिकार के लेल अनवरत संघर्ष क रहल अछि । नेपालमेँ जनजाति कोनो विकसित आ कोनो अविकसित अछि । दुनु के स्वायत्तता चाही । किछु जनजाति सैनिक प्रहरी सेना स जुडल अछि । मुदा अधिकारस वंचित । ओ पहाड मे आ मे आ मधेश मे सेहो अछि । मधेशक आन्दोलन दुनु के अधिकारके लेल कएल संघर्ष मे सहयोग कएलक अछि । मिथिला क्षेत्र मे जे जनजाति अछि तकरा मिथिला राज्य समानुपाति अधिकारस वंचित नहिं करत से ओकरा विश्वास नहिं भैरहल छै आ पहाडके जनजाति स मिथिला तथा मधेश आन्दोलन के निक जकाँ नहिं जोडल जा रहल अछि । दुनु ठामक जनजाति के विश्वास मे लेनाई आवश्यक अछि । १८. मधेश, मिथिला आ थारु आन्दोलन ः– जनजाति में थारु क संख्या वेसी छै आ मात्र मधेश में लगभग पूर्व स पश्चिम तक अधिकांश जिल्लामें । ई जाति अलग पहिचानक जाति छै क एकर अपन भाषा आ किछु संस्कृति अलग छै । जाहि क्षेत्र में स्थित छै ताहि ठामक भाषा स जुडल छै । शारिरिक बनौट मंगलाइड सन छै मुदा सांस्कृतिक सम्बन्ध मधेश के साथ जुडल छै । ई स्वतन्त्र आन्दोलन नहिं क सकैअ आ मधेशी आन्दोलन स जुड स डराइछै । मधेशी आन्दोलन के अंगा खस सत्ता एकरा प्रयोग करै छै । कहिओ आ कोनो आन्दोलन के विरुद्ध में उतारि दैत छै । वहुत सज्जन जनजाति भेला के कारण ई आसानी स ओहि षडयन्त्र में फंसि जायत छै आ मधेश आ मधेशी कें विरुद्धमे ठाढ भ जाइत छै । एकरा जनजाति आन्दोलन स निक जकाँ जोडनाई वहुत जरुरी छै, तहन एकरा मिथिला आन्दोलन में समानुपाति अधिकार आ समानुपाति अधिकार क्षेत्र के लेल विश्वास में ल एकर विश्वास प्राप्त केनाई आवश्यक छै । १९. नेपालक मिथिला आ भारतक मिथिला ः – सुगौली सन्धि मिथिला के दु खण्डमें त वांटि देलक, मुदा राजनीतिक सीमा स मिथिलाक भाषा, संस्कृति साहित्यक सम्बन्ध नहि तोडि सकल । आई दुनु देशमें मिथिला राज्यक मांग उठि रहन छै । अइस हुनु देशक शासक वर्ग के किछु भय भरहल छै । दुनु देशक मिथिला आन्दोलन के भावनात्मक सम्बन्ध छै आ दुनु के नैतिक समर्थन छै जे नैसर्गिक छै । दुनु राजनीतिक स्वतन्त्रता कायम राखए चाहैछै, दुनु अखण्डता के सम्मान करै छै । ई वात दुनु देशक सत्ता के वुझक चाही आ हमरा सभ के कर्तव्य जे दुनु सत्ताके बुझा देवक चाही । संघीय संरचनामें दुनु मिथिला अलग अलग राज्याधिकार चाहेछै, जेना वंगाल, पंजाव इत्यादि वंगला देशकें आ पाकिस्तान में सेहो छै । २०. आत्म निर्णय के अधिकार आ मिथिला ः– व्यक्तिगत, जातिगत क्षेत्रगत, राष्ट्रगत रुपमें स्वतन्त्र पहिचानकें साथ राजनीतिक प्रशासनिक निर्णय के अधिकार आत्मनिर्णय के अधिकार अछि । आर्थिक जीवन अपने शैली में संचालन केनाई आत्मनिर्णय के अधिकार क्षेत्र छै, अनुशासित स्वतन्त्रता के अधिकार आत्मनिर्णय के अधिकारके मूल मर्म छै । कोनो व्यक्ति दोसर व्यक्ति पर, कोनो जाति दोसर जाति पर कोनो राष्ट्र दोसर राष्ट्र पर अनाधिकार के प्रयोग कएनाई के पूर्ण नियन्त्रण आत्मनिर्णयक अधिकार कै । क्षेत्रीय, जातीय, राष्ट्रिय दमन, शोषण, शासन, प्रशासन स मुक्ति के अधिकार मात्र आत्म निर्णय के आत्म निर्णायक अधिकार छै । मिथिला एकटा स्वतन्त्र ऐतिहासिक राष्ट्र छलै तै एकरा आत्मनिर्णय के अधिकार छै, जे राजनीतिक सीमा मे प्रशासनिक शासकीय दमन स मुक्त होएक । २१. मिथिला आ जातीय स्वायत्तता ः– सीमित राजनीतिक आर्थिक अधिकार सहित के खास क्षेत्र में खास जाति अर्थात राष्ट्र के प्रादेशिक शासन के जातीय स्वायत्तता कहल जाइछै । ई आत्म निर्णय के अधिकार के अर्ध तथा नियन्त्रित प्रयोग छै । आत्म निर्णय के अधिकार के स्वायत्तता में घेर देनाई आ स्वायत्ततताके जातिगत रुपमें प्रयोग केनाई अव्यवहारिक छै खासक मिश्रित सामाजिक संरचनाके देशमें आ क्षेत्रमें । मिथिला संघीय संरचनामे पूर्ण राज्यधिकार प्रयोग करए चाहैत अछि कोनो केन्द्रीय सत्ता स निर्धारण कएल सीमित अधिकार सहित कें कथित स्वायत्तता नहिं । २२. मिथिला आ दलित आन्दोलन ः– ई हरेक दमन आ उत्पीडन स मूक्ति के युग छै । राजनीतिक आर्थिक शोषण मात्र नहिं, सामाजिक उत्पीडन स मुक्ति के लेल प्रत्येक देश में, प्रत्येक राष्ट्र मे, प्रत्येक समाज में आन्दोलन तीव्र भगेल छै । एकरा समयमे स्वीकार कएनाई प्रत्येक लोकतन्त्रवादीके कर्तव्य छै । सामाजिक न्याय उपलब्ध करबैत राजनीतिक रुपमे प्रत्येक अंग में सम्मानपूर्वक उपस्थित कएनाई राज्य के कर्तव्य छै । मिथिला स्वयं उपेक्षित उत्पीडित अछि । तैं एकरा कतहु के दलित आन्दोलनके हार्दिक समर्थन सहयोग करैत मिथिलाक दलित मुक्तिके आन्दोलन में सामेल होइत, ओकर अगुवाई करैत मिथिला राज्य के स्थापना में गति स अगा बढत । २३. मिथिला आ राजनीतिक दल ः– देशमें वर्तमान में सकृय राजनीतिक दल सभ मे संघीय संरचना के विषयमे स्पष्ट धारणा वाहर नदि आएल अछि । संविधानत ः स्वीकार कएले पर एहि विषय मे पार्टीक संघ विरोधी धारणा बाहर अवैत अछि । संघीय संरचना बनाएब, ताहिमे कपटपूर्ण अभिव्यक्ति अबैत अछि । किछु दल के नीति इ रहि आएल अछि जे सम्पूर्ण मधेश के एकटा राज्यके रुपमे आवक चाही । ई संघीय मान्यता नेपाल मे कतेक व्यवहारिक हेतै ? पौराणिक मिथिला के संशोधनसहित के एकटा राज्य बना कए मधेश में अन्य राज्य सेहो उपयुक्त होएत । हरेक क्षेत्र के आन्दोलित कए समग्र मे मधेश के खसवादी प्रभुत्व स मुक्त कएल जा प्रत्येक दल आ कथित वुद्धिजिवी संघीय संरचना के स्वीकार करैत, मुक्त मधेश के मान्यता दैत मिथिला राज्यके स्थापना मे सहयोग करैक, ईहए संघीय मान्यता अनुकुल हेतै । २४. मिथिला आ महिला आन्दोलन ः– मिथिला सदा नारी के सम्मान करैत आएल अछि । तै नारी अधिकार के कुण्डित नहिं कए सकैअ । महिला अधिकार, महिला सशक्तिकरण द्वारा महिला आन्दोलन के मिथिला आन्दोलन स जोडिक ल जेनाई जरुरी छै । किछ दशक स मिथिलाके महिला के अनावश्यक अन्तरमुखी वनावल गेल छै आ एहि मे नेपालक जडिआएल सामन्ती सामाजिक राजनीतिक व्यवस्थाक खास भूमिका छै । तैं मिथिला के लोकतान्त्रिक राज्य निर्माण मे अधिकार सम्पन्न महिलाके भूमिका अति आवश्यक छै । २५. मिथिला आ कथित पिछडल आ आगा बढल वर्ग ९ द्यबअपधबचम ायच धबचम ० ः– मिथिलाक डोम सेहो सम्पत्तिशाली छल । एकरा साथ अछुत क व्यवहार नहिं छलै । गणराज्यक नायक जनकक कालमे समतामूलक समाजक प्रमाण भेटछ । तथापि मिथिला एकटा देश छल जतए सब जाति जातक बसोबास स्वभाविक छल आ अछि । अखन लोकतान्त्रिक व्यवस्था मे सभ जाति जातके समानुपातिक समावेशीकृत उपस्थिति मिथिला राज्यके प्रत्येक अंग आ निकाय में रहत से घोषित नीति अछि । मिथिला कोनो एकटा जाति के नहिं, कथित उच्च जाति के कथमपि नहिं । योग्यता क्षमता अनुसार समानुपातिक रुपमें सहभागी केनाई आवश्यक अछि । इएह मिथिला निर्माण के आधार रहत । २६. मिथिला आ मानक मैथिली ः – मानव शास्त्री आ भाषा शास्त्रीक अनुसार केव भाषा नहिं बजैअ, सब बोली ९मष्बभिअतक० बजैअ । समरुप बोली के समग्र रुप भाषा होइछ । मुदा जाहि बोलीक बेसी संचार होइछ जाहि बोली मे विशेष रचना प्रकाशित होइछ, जाहि बोली के बेसी पाठक होइछ जाहि बोलीक व्यक्ति सत्ता पर नियन्त्रण करैछ जाहि बोली द्वारा प्रकाशन, न्याय सम्पादन होइछ, जाहि बोलीके विद्धान व्याकरणक रचना करैछ, वएह बोली भाषा बनिक समाजपर प्रभाव पारैत अछि । तै कोनो बोली कथित उच्च वर्गके भए सकैछ, तै ओकरा मानक भाषा बुझनाई ओतेक उचित नहिं आ अइस कोनो जाति के राज्ययन्त्रपर नियन्त्रण के शंका केनाई उचित नहि । तै मिथिला में वर्तमान में वाजए जाए बाला प्रत्येक बोली के सम्मान करत, सभ भाषाके सम्मानकरत आ वहु भाषिक नीति राखि राज्य संचालन करत । २७. मिथिला राज्य स्थापना के लेल नीतिगत कार्यक्रम ः– (क) जनता, लोकतन्त्र, मानवअधिकार के विरोधी, जाति, भाषाक अधिकार के प्रधान शत्रु राजतन्त्र अछि । तै जनताके मित्र शक्ति लोकतन्त्रवादी, मानव अधिकारवादी, कानूनी राज्यक पक्षधर आदि शक्ति आ संगठन स मिलक गणतन्त्र लएवाक लेल अथक संघर्ष आवश्यक छै । (ख) प्रत्येक जाति, जनजाति, आदिवासी, दलित उत्पीडित वर्ग पिछडल वर्ग, अल्प संख्यक जाति, मानव अधिकरावादी सबस मिलक, संघीय संरचना केल कठोर संघर्ष आवश्यक अछि । (ग) मधेशक प्रत्येक जाति, जनजाति, भाषा भाषीक समुह, महिला मुस्लिम सभके साथ कार्यगत एकता करैत खस सत्ता स सम्पूर्ण मधेश के मुक्त कएनाई बेसी आवश्यक छै । (घ) संघीय संरचनाक मर्म, भावना अनुसार मधेशमे आत्म निर्णायक आधार पर मिथिला क्षेत्रक प्रत्येक वर्ग के आन्दोलित कए मिथिला राज्यके लेल सहमति जुटएनाय आवश्यक अछि । २८. कार्यदिशा ः– १. संघीय संरचना विना मुक्त मधेशक कल्पना तथा मुक्त मधेश विना मिथिला राज्यक कल्पना असम्भव होएत से बुझि चेतना मूलक कार्यक्रम सम्पूर्ण मधेशमे आवश्यक अछि । २. खस सत्ता वर्गिय समुदाय के दिमाग स ई भय हटैनाई जरुरी छै आ चेतना देनाई जरुरी छै जे कोनो जाति, भाषा के संरक्षण, सम्मान संघीय संरचनामे मात्र संभव छै । जन अधिकार सम्पन्न लोकतन्त्र संघीय संरचनामे मात्र संभव छै । ३. कोनो सत्ता, दलीय सरकारक निरंकुशता के न्यून करवाक लेल संघीय संरचना मात्र आधार छै । ४. संघीय शासन प्रणाली सं देश खण्डित नहिं होइछ । अर्थात संघीय शासन देश के विखण्डन स बचवैत अछि । अर्थात् संघीय संरचना विखण्डनवाद के स्थायी समाधान अछि । २९. मिथिला राज्य निर्माण वाधक चिन्तन ः– अन्तरिक १(क) मिथिला के लेल कोनो राजनीतिक संगठन नहि अछि । आ एहके लेल कोनो संघर्ष नहिं अछि । (ख) भाषा संस्कृति करे लेल कोनो एकिकृत संगठन नहि अछि । (ग) कोनो स्थापित नेतृत्व नहिं अछि । (घ) भाषा, संस्कृति के आन्दोलन के लोकतान्त्रिक आन्दोलन, मानव अधिकार वादी आन्दोलन स जोडक, लएजवाक चिन्तन या प्रयास नहिं अछि । (ङ) एहिके लेल किछ भ रहल आन्दोलन, वौद्धिक व्यक्तित्व सभक मात्र अछि, जिनकामे स्वाभिमान कम, अहंकार वेसी, संयोजन करवाक क्षमता कम फुट करवाक क्षमता वेसी छन्हि । वाह्य (क) खस जाति समग्र संघ के विरोधी चिन्तन रखैत अछि अपना के सदा केन्द्रीय सत्ताके भागी बुझैछथि आ नेपाल के अपन पुर्खा के अर्जन सम्पत्ति बुझै छथि । (ख) समग्र मधेश एकराज्यक नारामे सत्ताधारी वर्ग विखण्डन के गंध देखैत अछि आ मिथिला तथा संघीय संरचना के विरुद्ध सोचेत अछि । (ग) संघीय आन्दोलन के नेतृत्व कएनिहार, दल या व्यक्ति के हिन्दी भाषा प्रति आसक्ति स मातृभाषा प्रेमी विचकैत छथि आ खसवादी सेहो एहिमे किछु रहस्मय दुर्गन्ध सुंधवाक प्रयास करैत अछि । निश्कर्ष ः– नेपाल के सत्ताधारी, वर्ग संकट के घडि स गुजरि रहल अछि । देश अखन अधिकार प्राप्तिकँ नयाँ मोडपर ठाढ अछि । अधिकार स वंचित उत्पीडित वर्ग, जाति आन्दोलनमे कुद पडल अछि । संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र माग एकर अचूक औषधि छेक । प्रत्येक प्रभुसत्तावादी सामन्ती चिन्तन एहि आन्दोलन के पाछा धकेल चाहैत अछि आ आन्दोलन ओकरा किनार पर खसवैत आगा बढि रहल अछि । आउ, समाजक स भ वर्ग, आन्दोलन मे भाग लिअ आ नैसर्गिक अधिकार स्थापित करु । शीतल झा-जनकपुर सन्दर्भ सामाग्री ः– (क) संविधानसभा, संघीय संरचना, मिथिला राज – अवधारण १– शीतल झा ख) संघीय स्वशासन तिर ...............वृषेश चन्द्र लाल (ग) संघीय शासन व्यवस्थाको आधारमा राज्यको पुन ः संरचना – अमरेश नारायण झा (घ) मूल्यांकन मासिक । मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना धीरेन्द्र प्रेमर्षि (१९६७- )मैथिली भाषा, साहित्य, कला, संस्कृति आदि विभिन्न क्षेत्रक काजमे समान रूपेँ निरन्तर सक्रिय व्यक्तिक रूपमे चिन्हल जाइत छथि धीरेन्द्र प्रेमर्षि। वि.सं.२०२४ साल भादब १८ गते सिरहा जिलाक गोविन्दपुर-१, बस्तीपुर गाममे जन्म लेनिहार प्रेमर्षिक पूर्ण नाम धीरेन्द्र झा छियनि। सरल आ सुस्पष्ट भाषा-शैलीमे लिखनिहार प्रेमर्षि कथा, कविताक अतिरिक्त लेख, निबन्ध, अनुवाद आ पत्रकारिताक माध्यमसँ मैथिली आ नेपाली दुनू भाषाक क्षेत्रमे सुपरिचित छथि। नेपालक स्कूली कक्षा १,२,३,४,९ आ १०क ऐच्छिक मैथिली तथा १० कक्षाक ऐच्छिक हिन्दी विषयक पाठ्यपुस्तकक लेखन सेहो कएने छथि। साहित्यिक ग्रन्थमे हिनक एक सम्पादित आ एक अनूदित कृति प्रकाशित छनि। प्रेमर्षि लेखनक अतिरिक्त सङ्गीत, अभिनय आ समाचार-वाचन क्षेत्रसँ सेहो सम्बद्ध छथि। नेपालक पहिल मैथिली टेलिफिल्म मिथिलाक व्यथा आ ऐतिहासिक मैथिली टेलिश्रृङ्खला महाकवि विद्यापति सहित अनेको नाटकमे अभिनय आ निर्देशन कऽ चुकल प्रेमर्षिकेँ नेपालसँ पहिलबेर मैथिली गीतक कैसेट कलियुगी दुनिया निकालबाक श्रेय सेहो जाइत छनि। हिनक स्वर सङ्गीतमे आधा दर्जनसँ अधिक कैसेट एलबम बाहर भऽ चुकल अछि। कान्तिपुरसँ हेल्लो मिथिला कार्यक्रम प्रस्तुत कर्ता जोड़ी रूपा-धीरेन्द्रक धीरेन्द्रक अबाज गामक बच्चा-बच्चा चिन्हैत अछि। “पल्लव” मैथिली साहित्यिक पत्रिका आ “समाज” मैथिली सामाजिक पत्रिकाक सम्पादन। मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना-धीरेन्द्र प्रेमर्षि रूप-रङ्ग एवं चालि-प्रकृति देखलापर गीत आ गजल दुनू सहोदरे बुझाइत छैक। मुदा मैथिलीमे गीत अति प्राचीन काव्यशैलीक रूपमे चलैत आएल अछि, जखन कि गजल अपेक्षाकृत अत्यन्त नवीन रूपमे। एखन दुनूकेँ एकठाम देखलापर एना लगैत छैक जेना गीत-गजल कोनो कुम्भक मेलामे एक-दोसरासँ बिछुड़ि गेल छल। मेलामे भोतिआइत-भासैत गजल अरबदिस पहुँचि गेल। गजल ओम्हरे पलल-बढ़ल आ जखन बेस जुआन भऽ गेल तँ अपन बिछुड़ल सहोदरकेँ तकैत गीतक गाम मिथिलाधरि सेहो पहुँचि गेल। जखन दुनूक भेट भेलैक तँ किछु समय दुनूमे अपरिचयक अवस्था बनल रहलैक। मिथिलाक माटिमे पोसाएल गीत एकरा अपन जगह कब्जा करऽ आएल प्रतिद्वन्दीक रूपमे सेहो देखलक। मुदा जखन दुनू एक-दोसराकेँ लगसँ हियाकऽ देखलक तखन बुझबामे अएलैक-आहि रे बा, हमरासभमे एना बैर किएक, हम दुनू तँ सहोदरे छी! तकरा बाद मिथिलाक धरतीपर डेगसँ डेग मिला दुनू पूर्ण भ्रातृत्व भावेँ निरन्तर आगाँ बढ़ैत रहल अछि। गीत आ गजलक स्वरूप देखलापर दुनूक स्वभावमे अपन पोसुआ जगहक स्थानीयताक असरि पूरापूर देखबामे अबैत अछि। गीत एना लगैत छैक जेना रङ्गबिरङ्गी फूलकेँ सैँतिकऽ सजाओल सेजौट हो। मिथिलाक गीतमे काँटोसन बात जँ कहल जाइछ तँ फूलेसन मोलायम भावमे। एकरा हम एहू तरहेँ कहि सकैत छी जे गीत फूलक लतमारापर चलबैत लोककेँ भावक ऊँचाइधरि पहुँचबैत अछि। एहिमे मिथिलाक लोकव्यवहार एवं मानवीय भाव प्रमुख भूमिका निर्वाह करैत आएल अछि। जाहि भाषाक गारियोमे रिदम आ मधुरता होइत छैक, ओहि भूमिपर पोसाएल गीतक स्वरूप कटाह-धराह भइए नहि सकैत अछि। कही जे गीतमे तँ लालीगुराँसक फूलजकाँ ओ ताकत विद्यमान छैक जे माछ खाइत काल जँ गऽरमे काँट अटकि गेल तँ तकरो गलाकऽ समाप्त कऽ दैत छैक। गजलक बगय-बानि देखबामे भलहि गीतेजकाँ सुरेबगर लगैक, एहिमे गीतसन नरमाहटि नहि होइत छैक। उसराह मरुभूमिमे पोसाएल भेलाक कारणे गजलक स्वभाव किछु उस्सठ होइत छैक। ई कट्टर इस्लामीसभक सङ्गतिमे बेसी रहल अछि, तेँ एकर स्वभावमे “जब कुछ न चलेगी तो ये तलवार चलेगा” सन तेज तेवरबेसी देखबामे अबैत छैक। यद्यपि गजलकेँ प्रेमक अभिव्यक्तिक सशक्त माध्यम मानल जाइत छैक। गजल कहितहिँदेरी लोकक मन-मस्तिष्कमे प्रेममय माहौल नाचि उठैत छैक, एहि बातसँ हम कतहु असहमत नहि छी। मुदा गजलमे प्रेमक बात सेहो बेस धरगर अन्दाजमे कहल जाइत छैक। कहबाक तात्पर्य जे गजल तरुआरिजकाँ सीधे बेध दैत छैक लक्ष्यकेँ। लाइलपटमे बेसी नहि रहैत छैक गजल। मिथिलाक सन्दर्भमे गीत आ गजलक एक्कहि तरहेँ जँ अन्तर देखबऽ चाही तँ ई कहल जा सकैत अछि जे गजल फूलक प्रक्षेपणपर्यन्त तरुआरिजकाँ करैत अछि, जखन कि गीत तरुआरि सेहो फूलजकाँ भँजैत अछि। मैथिलीमे संख्यात्मक रूपेँ गजल आनहि विधाजकाँ भलहि कम लिखल जाइत रहल हो, मुदा गुणवत्ताक दृष्टिएँ ई हिन्दी वा नेपाली गजलसँ कतहु कनेको झूस नहि देखबामे अबैत अछि। एकर कारण इहो भऽ सकैत छैक जे हिन्दी, नेपाली आ मैथिली तीनू भाषामे गजलक प्रवेश एक्कहि मुहूर्त्तमे भेल छैक। गजलक श्रीगणेश करौनिहार हिन्दीक भारतेन्दु, नेपालीक मोतीराम भट्ट आ मैथिलीक पं. जीवन झा एक्कहि कालखण्डक स्रष्टासभ छथि। मैथिलीयोमे गजल आब एतबा लिखल जा चुकल अछि जे एकर संरचनाक मादे किछु कहनाइ दिनहिमे डिबिया बारबजकाँ लगैत अछि। एहनोमे यदाकदा गजलक नामपर किछु एहनो पाँतिसभ पत्रपत्रिकामे अभरि जाइत अछि, जकरा देखलापर मोन किछु झुझुआन भइए जाइत छैक। कतेकोगोटेक रचना देखलापर एहनो बुझाइत अछि, जेना ओलोकनि दू-दू पाँतिवला तुकबन्दीक एकटा समूहकेँ गजल बूझैत छथि। हमरा जनैत ओलोकनि गजलकेँ दूरेसँ देखिकऽ ओहिमे अपन पाण्डित्य छाँटब शुरू कऽ दैत छथि। जँ मैथिली साहित्यक गुणधर्मकेँ आत्मसात कऽ चलैत कोनो व्यक्ति एकबेर दू-चारिटा गजल ढङ्गसँ देखि लिअए, तँ हमरा जनैत ओकरामे गजलक संरचनाप्रति कोनो तरहक द्विविधा नहि रहि जएतैक। तेँ सामान्यतः गजलक सम्बन्धमे नव जिज्ञासुक लेल जँ किछु कहल जाए तँ विना कोनो पारिभाषिक शब्दक प्रयोग कएने हम एहि तरहेँ अपन विचार राखऽ चाहैत छी- गजलक पहिल दू पाँतिक अन्त्यानुप्रास मिलल रहैत छैक। अन्तिम एक, दू वा अधिक शब्द सभ पाँतिमे सझिया रहलहुपर साझी शब्दसँ पहिनुक शब्दमेअनुप्रास वा कही तुकबन्दी मिलल रहबाक चाही। अन्य दू-दू पाँतिमे पहिल पाँति अनुप्रासक दृष्टिएँ स्वच्छन्द रहैत अछि। मुदा दोसर पाँति वा कही जे पछिला पाँति स्थायीवला अनुप्रासकेँ पछुअबैत चलैत छैक। ई तँ भेल गजलक मुह-कानक संरचनासम्बन्धी बात। मुदा खालि मुहे-कानपर ध्यान देल जाए आ ओकर कथ्य जँ गोङिआइत वा बौआइत रहि जाए तँ देखबामे गजल लगितो यथार्थमे ओ गीजल भऽ जाइत अछि। तेँ प्रस्तुतिकरणमे किछु रहस्य, किछु रोमाञ्चक सङ्ग समधानल चोटजकाँ गजलक शब्दसभ ताल-मात्राक प्रवाहमय साँचमे खचाखच बैसैत चलि जएबाक चाही। गजलक पाँतिकेँ अर्थवत्ताक हिसाबेँ जँ देखल जाए तँ कहि सकैत छी जे हऽरक सिराउरजकाँ ई चलैत चलि जाइत छैक। हऽरक पहिल सिराउर जाहि तरहेँ धरतीक छाती चीरिकऽ ओहिमे कोनो चीज जनमाओल जा सकबाक आधार प्रदान करैत छैक, तहिना गजलक पहिल पाँति कल्पना वा विषयवस्तुक उठान करैत अछि, दोसर पाँति हऽरक दोसर सिराउरक कार्यशैलीक अनुकरण करैत पहिलमे खसाओल बीजकेँ आवश्यक मात्रमे तोपन दऽकऽ पुनः आगू बढ़बाक मार्ग प्रशस्त्र करैत अछि। गजलक प्रत्येक दू-पाँति अपनहुमे स्वतन्त्र रहैत अछि आ एक-दोसराक सङ्ग तादात्म्य स्थापित करैत समग्रमे सेहो एकटा विशिष्ट अर्थ दैत अछि। एकरा दोसर तरहेँ एहुना कहल जा सकैत अछि जे गजलक पहिल पाँति कनसारसँ निकालल लालोलाल लोह रहैत अछि, दोसर पाँति ओकरा निर्दिष्ट आकारदिस बढ़एबाक लेल पड़ऽ वला घनक समधानल चोट भेल करैत अछि। गीतक सृजनमे सिद्धहस्त मैथिलसभ थोड़े बगय-बानि बुझितहिँ आसानीसँ गजलक सृजन करऽ लगैत छथि। सम्भवतः तेँ आरसीप्रसाद सिंह, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, डॉ महेन्द्र, मार्कण्डेय प्रवासी, डॉ. गङ्गेश गुञ्जन, डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र आदि मूलतः गीत क्षेत्रक व्यक्तित्व रहितहु गजलमे सेहो कलम चलौलनि। ओहन सिद्धहस्त व्यक्तिसभक लेल हमर ई गजल लिखबाक तौर-तरिकाक मादे किछु कहब हास्यास्पद भऽ सकैत अछि, मुदा नवसिखुआसभकेँ भरिसक ई किछु सहज बुझाइक। मैथिलीमेकलम चलौनिहारसभमध्य प्रायः सभ एक-आध हाथ गजलोमे अजमबैत पाओल गेलाह अछि। जनकवि वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” सेहो “भगवान हमर ई मिथिला” शीर्षक कविता पूर्णतः गजलक संरचनामे लिखने छथि। मुदा सियाराम झा “सरस”, स्व. कलानन्द भट्ट, डॉ.राजेन्द्र विमल सन किछु साहित्यकार खाँटी गजलकारक रूपमे चिन्हल जाइत छथि। ओना सोमदेव, डॉ.केदारनाथ लाभ, डॉ.तारानन्द वियोगी, डॉ.रामचैतन्य धीरज, बाबा वैद्यनाथ, डॉ. विभूति आनन्द, डा.धीरेन्द्र धीर, फजलुर्रहमान हाशमी, रमेश, बैकुण्ठ विदेह, डा.रामदेव झा, रोशन जनकपुरी, पं. नित्यानन्द मिश्र, देवशङ्कर नवीन, श्यामसुन्दर शशि, जनार्दन ललन, जियाउर्ररहमान जाफरी, अजितकुमार आजाद, अशोक दत्त आदिसमेत कतेको स्रष्टाक गजल मैथिली गजल-संसारकेँ विस्तृति दैत आएल अछि। गजलमे महिला हस्ताक्षर बहुत कम देखल जाइत अछि। मैथिली विकास मञ्चद्वारा बहराइत पल्लवक पूर्णाङ्क १५, २०५१ चैतक अङ्क गजल अङ्कक रूपमे बहराएल अछि। सम्भवतः ३४ गोट अलग-अलग गजलकारक एकठाम भेल समायोजनक ई पहिल वानगी हएत। एहि अङ्कमे डा. शेफालिका वर्मा एक मात्र महिला हस्ताक्षरक रूपमे गजलक सङ्ग प्रस्तुत भेलीह अछि। एही अङ्कक आधारपर नेपालीमे मैथिली गजल सम्बन्धी दूगोट समालोचनात्मक आलेख सेहो लिखाएल अछि। पहिल मनु ब्राजाकीद्वारा कान्तिपुर २०५२ जेठ २७ गतेक अङ्कमे आ दोसर डा. रामदयाल राकेशद्वारा गोरखापत्र २०५२ फागुन २६ गतेक अङ्कमे। छिटफुट आनहु गजल सङ्कलन बहराएल होएत, मुदा तकर जानकारी एहि लेखककेँ नहि छैक। हँ, सियाराम झा “सरस”क सम्पादनमे बहराएल “लोकवेद आ लालकिला” मैथिली गजलक गन्तव्य आ स्वरूप दऽ बहुत किछु फरिछाकऽ कहैत पाओल गेल अछि। एहिमे सरससहित तारानन्द वियोगी आ देवशङ्कर नवीनद्वारा प्रस्तुत गजलसम्बन्धी आलेख सेहो मैथिली गजलक तत्कालीन अवस्थाधरिक साङ्गोपाङ्ग चित्र प्रस्तुत करबामे सफल भेल अछि। समग्रमे मैथिली गजलक विषयमे ई कहि सकैत छी जे मैथिली गीतक खेतसँ प्राप्त हलगर माटिमे गुणवत्ताक दृष्टिएँ मैथिली गजल निरन्तर बढ़िरहल अछि, बढ़िएरहल अछि। गजल १ झुट्ठो जे नहि डाइन नचौलक ओ भगता ओ धामी की एको गाम जँ डाहि ने सकलहुँ तँ ओढ़ने रमनामी की अक्षत-चानन धूप-दीपसँ जतऽ यज्ञ सम्पूर्ण हुअए- ततऽ जँ क्यो हड्डी रगड़ैए, ओ कामी ओ कलामी की बाप-माएपर्यन्त परोसै स्नेह जखन बटखारासँ- नकली सभक दुलार लगैए, से काकी, से मामी की सोनित सेहो शराब बनै छै शासनकेर सनकी भट्ठी दियौ घटाघटि जे भेटए से, फुसियाही की दामी की पोखरिक रखबारी पएबालए कण्ठी खालि बान्हि लिअ फेर गटागटि घोँटने चलियौ, से पोठिया से बामी की पाग उतारिकऽ कूदि गेल “प्रेमर्षि” सेहो अखाड़ामे ढाहि सकल ने जुल्म-इमारत करतै ओहन सुनामी की (वि.२०६२/०५/३०) गजल २ मोन जँ कारी अछि तँ चमड़ी गोरे की करतै? ममते जँ अरुआएल तँ माएक कोरे की करतै? गगनसँ उतरै मेघ नयनमे जखन साँचिकऽ शङ्का केहनो अन्हार चीरिकऽ जनमल भोरे की करतै? नीम पीबिकऽ माहुर सेहो पचाबैत आएल छी तँ काँटकेँ धाङैत डेगकेँ थोड़े अङोरे की करतै? घामक सिँचल धरती छोड़ि ने जकरा कतौ भरोसा तकरा लेल बनसीक सुअदगर बोरे की करतै? आगि पीबिकऽ बज्र बनौने छै जे अप्पन छाती तकरा आगाँ गोहिया आँखिक नोरे की करतै? तैयो लागल “प्रेमर्षि” अछि बस प्रेमक खेतीमे प्रेमक धन भेल घरमे जाबिड़ चोरे की करतै? (वि.२०६२/०५/२०) शुभकामना दिआबातीक- धीरेन्द्र प्रेमर्षि चमकैत दीपकेँ देखिकऽ जेना झुण्ड कीड़ा-मकोड़ा कऽ दैछ न्यौछावर अपन अस्तित्व दुर्गुण वा खलतत्त्वरूपी कीड़ा-मकोड़ाकेँ नष्ट करबाक लेल चाही ने आओर किछु अपना भीतरक मानवीय इजोतक टेमी कने आओर उसका ली अपनाकेँ सभक मन-मनमे मुसका ली इएह अछि शुभकामना दिआबातीक- देहरि दीप जरए ने जरए मनधरि सदति रहए झिलमिल किएक तँ अपना मात्र इजोतमे रहने मेटा नहि सकैछ संसारसँ अन्हार महेन्द्र मलंगिया : मैथिलीक सुपरिचित नाटककार,  रंग निर्देशक  एवं मैलोरंगक संस्थापक अध्यक्ष । लोक साहित्य पर गंभीर शोध आलेख । मैथिलीमे 13टा नाटक, 19टा एकांकी, 14टा नुक्कड़ आ 10टा रेडियो नाटक प्रकाशित आ आकाशवाणी सँ प्रसारित । सीनियर फेलोशिप (भारत सरकार), इंटरनेशनल थिएटर इंस्टिच्यूट (नेपाल), प्रबोध साहित्य सम्मान आदि सँ सम्मानित । संप्रति ज्योतिरीश्वर लिखित  मैथिलीक प्रथम पुस्तक वर्णरत्नाकर पर शोध कार्य । श्री महेन्द्र मलगियाक जन्म २० जनबरी १९४६ मे मधुबनी जिलाक मलंगिया गाममे भेलन्हि। मलंगियाजी मैथिली हिन्दी, अंग्रेजी आ नेपाली भाषाक जानकार आ थियेटर शिक्षण, पटकथा लेखन आ तत्सम्बन्धी शोधक फ्रीलान्स शिक्षक छथि। सम्मान, उपाधि आ पुरस्कार: २००६(सीनियर फ़ेलो, मानव ससाधन विकास विभाग, भारत सरकार), २००५ ई. मे मैथिली भाषाक सर्वाधिक प्रतिष्ठित प्रबोध सम्मान, उनाप सम्मान, परवाहा (उवा नाट्य परिषद, परवाहा), भानु कला पुरस्कार (कला जानकी संस्थान, जनकपुर), २००४- पाटलिपुत्र पुरस्कार ( प्रांगन थिएटर, पटना), इप्टा पुरस्कार (कटिहार इप्टा, कटिहार), २००३- गोपीनाथ आर्यल पुरस्कार (इन्टरनेशनल थिएटर इन्स्टीट्यूट, नेपाल), यात्री चेतना पुरस्कार (चेतना समिति, पटना), बैद्यनाथ सियादेवी पुरस्कार (बी.एस.डी.पी. काठमाण्डू), २०००- चेतना समिति सम्मान (चेतना समिति, पटना), जिला विकास धनुषा साहित्य पुरस्कार (जिला विकास समिति, जनकपुर), १९९९- विद्यापति सेवा संस्थान सम्मान (विद्यापति सेवा संस्थान सम्मान, दरभंगा), १९९८- रंग रत्न उपाधि (अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली साहित्य परिषद, राँची), १९९७- सर्वोत्तम निर्देशक पुरस्कार (सांस्कृतिक संस्थान, काठमाण्डू), १९९१- भानु कला पुरस्कार, विराटनगर (भानु कला परिषद, बिराटनगर),१९९०- सर्वनाम पुरस्कार (सर्वनाम समिति, काठमाण्डू), १९८५- आरोहण सम्मान, काठमाण्डू, १९८३- वैदेही पुरस्कार (विद्यापति स्मारक समिति, राँची), शोध कार्य: सलहेस: एकटा ऐतिहासिक अध्ययन, विरहा: मिथिलाक एकटा लोकरूप, सामा चकेबा: लोकनाट्यक एक अवलोकन, सलहेसक काल निर्धारण, व्इद्यापतिक उगना, शिवक गण, मधुबनी एकटा नगर अछि, हम जनकपुर छी, ई जनकपुर अछि। हिनकर दू टा पोथी “ओकरा आँगनक बारहमासा” आ “काठक लोक” ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगाक मैथिली पाठ्यक्रममे अछि। हिनकर दू टा पोथी त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमाण्डू केर एम.ए. पाठ्यक्रममे अछि। हिनकर कैकटा आलेख आ किताब सेकेण्डरी आ हायर सेकेण्डरी पाठ्यक्रममे अछि। प्रकाशित पोथी: नाटक: ओकरा आँगनक बारहमासा, जुआयल कंकनी, गाम नञि सुतय, काठक लोक, ओरिजनल काम, राजा सलहेस, कमला कातक राम, लक्ष्मण आ सीता, लक्ष्मण रेखा खण्डित, एक कमल नोरमे, पूष जाड़ कि माघ जाड़, खिच्चड़ि, छुतहा घैल, ओ खाली मुँह देखै छै। ई सभटा कैक बेर आ कैक ठाम खेलाएल गेल अछि। एकाङ्की: टूटल तागक एकटा ओर, लेवराह आन्हरमे एकटा इजोत, गोनूक गबाह, हमरो जे साम्ब भैया, “बिरजू, बिलटू आओर बाबू”, मामा सावधान, देहपर कोठी खसा दिअ, नसबन्दी, आलूक बोरी, भूतहा घर, प्रेत चाहे असौच, फोनक करामात, एकटा बताहि आयल छलय, मालिक सभ चल गेलाह, भाषणक दोकान, फगुआ आयोजन आ भाषण, भूत, एक टुकड़ा पाप, मुहक कात, प्राण बचाबह सीता राम, ओ खाली घैल फोड़य छै। ई सभटा मंचित भऽ चुकल अछि। २५ टा चौबटिया नाटक: चक्रव्युह, लटर पटर अहाँ बन्द करू, बाढ़ि फेर औतय, एक घर कानन एक घर गीत, सेर पर सवा सेर, ई गुर खेने कान छेदेने, आब कहू मन केहेन लगैए, नव घर, हमर बौआ स्कूल जेतए, बेचना गेलए बीतमोहना गबए गीत, मोड़ पर, ककर लाल आदि। ई सभटा चौबटिया वीथीपर खेलायल गेल अछि। ११ टा रेडियो नाटक: आलूक बोरी, ई जनम हम व्यर्थ गमाओल, नाकक पूरा, फटफटिया काका आदि। ई सभटा टा पटना, दरभंगा आ नेपालक रेडियो स्टेशनसँ प्रसारित भेल अछि। सम्पादन: मैथिली एकाङ्की (साहित्य अकादमी, नई दिल्ली), विदेहक नगरीसँ (कविता संग्रह), मैथिली भाषा पुस्तक (सेकेण्डरी स्कूल पोथी), लोकवेद (मैथिली पत्रिका)। कथा: प्रह्लाद जड़ि गेल, धार, एक दिनक जिनगी, बनैया सुगा, बालूक भीत, बुलबुल्ला आदि। लघुकथा: डपोरशंख, मुहचिड़ा आदि। सदस्यता: अध्यक्ष, मैथिली लोक रंग, सदस्य कार्यकारी बोर्ड, मिनाप, जनकपुर, यात्री मधुबनी, मिथिला सांस्कृतिक मंच, मधुबनी। राष्ट्रीय आ अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार सभमे सहभागिता। प्रकाश चन्द्र झा : मैथिली रंगकर्ममे थ्री-इन-वन- महेन्द्र मलंगिया प्रकाश झा १९७५ ई. मे हम जुआयल कनकनी नामक एकटा नाटक लिखने रही, जे ओही साल प्रकाशित भेल रहय । एहि नाटकक प्रसंगमे मैथिलीक सुप्रसिद्ध साहित्यकार जीवकांतजी अपन प्रतिक्रिया व्यक्त करैत लिखने रहथि – मलंगियाजी, मिथिलांचलमे एखन ओहन अभिनेता नहि जन्म लेलक अछि, जे एकर तेजकेँ सम्हारि सकत । ई बात हम अपनहुँ महसूस कएने रही आ तहिए सँ हमर आँखि एहि बातक खोज करैत रहल, जे ओहि नाटकक अनुरूप कोनो अभिनेता भेटितए । ओना मिथिलांचलमे अभिनेताक कमी नहि रहलैक अछि, मुदा सभक जिनगी अल्पकालीन । किएक तँ एहिठाम एकरा टाइमपासक रूपमे देखैत अछि । तेँ जहाँ कतहु नोकरी भेटि गेलैक कि ओ रंगकर्म केँ तिलांजली द’ दैत अछि । दोसर कोनो गार्जियन ई नहि चाहैत छैक, जे हमर बेटा रंगमंचसँ जुड़ल रहय । किएक तँ मैथिली रंगमंच केँ ओ सामर्थ्य नहि छैक जे ओकरा रोजी – रोटी द’ सकतै । तेँ रंगमंच के छोड़’ बाला नाम अनगिनत अछि आ जुटल रह’ बाला नाम आँगुरे पर गनल । एहन आँगुरेपर गन’ बाला नाम अछि – अभिषेक, चन्द्रशेखर, मुकुल, संतोष ( मधुबनीसँ ), रवीन्द्र, ओमप्रकाश, रंजू, प्रियंका ( जनकपुरसँ ), संजीव, किशोर केशव, गुड़िया, स्वाति, जितेन्द्रनाथ, प्रियंका ( पटनासँ ), मुकेश, उत्पल, प्रकाश, ज्योति, जीतू, कमल, दुर्गेश, भास्करानंद ( दिल्लीसँ ) आदि । एहि सभमे  प्रकाश कहिया हमरा भेटल - स्मरण नहि अछि, मुदा एतेक धरि अवश्य स्मरण अछि, जे ओ कहने रहय- “सर, हमर घर घोंघौर अछि आ हम आर. के. कॉलेज मधुबनी में पढैत छी” । “ कोन कक्षामे ?” “ बी.एस सी.क फर्स्ट पार्टमे ” । हमरा दिससँ कोनो प्रतिक्रिया नहि अएबाक कारणें किछु कालक बाद पुन: बाजल – “ हम नाटकसँ सेहो जुड़ल छी ” । “ कोन संस्थासँ ?” “ मधुबनी इप्टासँ ” “ बहुत खुशीक बात ” प्रकाश कोन अपेक्षा ल’ क’ हमरा लग आएल रहय से ओ ने कहि पओलक आ ने हम बूझि सकलिऎ । मुदा, एतेक अवश्य जानकारी भेटैत रहल जे नुक्कड़ नाटककेँ मधुबनी जिलामे बहुत लोकप्रिय बना देलक अछि । एक्केटा बिजुलिया भौजीक पचासटा शो कएलक अछि आ सभमे एकर अनिवार्य सहभागिता छैक । मुदा, ई हमर दुर्भाग्य रहल जे एकर एकोटा शो हम नइ देख सकलिऎ । तथापि एतेक विश्वास भैए गेल जे नाटकक प्रति एकर लगन बेजोड़ छैक । हमहूँ रहबे कएलहुँ आ इहो नाटक करिते रहल आ तखन जँ मंच पर भेट नइ होइतए तँ इहो असंभवे बाला बात भ’ जइतै । से भेलैक नहि, एकरासँ मंचपर भेट भैए गेल, मुदा कहिया से स्मरण नहि अछि । हँ, एतेक अवश्य स्मरण अछि जे  प्राय: 1995 ई. मे मिथिला सांस्कृतिक पर्व समारोहक अवसर पर हमरे नाटक ओरिजनल कामक मंचन नगर भवन, मधुबनीमे होइत रहय । हमहूँ आमंत्रित रही । जाहि मे दरोगाक भूमिका प्रकाशे केने छल । ओहि नाटकमे ई प्रशंसाक पात्र बनल रहय जकर उल्लेख दैनिक जागरण आ दैनिक हिन्दुस्तान सेहो कएने रहैक । किछु दिनक बाद गाम नइ सुतैए’क मंचन देखलियैक ओहो मे गामक तीनटा बिगड़ल युवकमे सँ एकटा बिगड़ल युवकक भूमिका यैह कएने छल । ओही दुनू मे कयलगेल अभिनयक बदैलत ई हमरो मोन मे बैसि गेल । बादमे बिहार सरकार युवा मंत्रालय, पटना दिस सँ आयोजित कार्यक्रम मे एक बेर फेर हमरे लिखल नाटक हमरो जे साम भैयाक मंचन नगर भवन, मधुबनीमे होइत रहय । हमहूँ आमंत्रित रही । जाहि मे चारुवक्य के भूमिका मे प्रकाश रहै ।  मंचपर एकरा देखलाक बाद हमरा बड़ अपसोच भेल रहय जे जीवकांतजी एहिठाम नइ छथि । ओ जँ आइ एहिठाम रहितथि तँ एकर अभिनय देखिक’ निश्चित अपन बात घुरा लितथि जे ‘मिथिलांचलमे एखन ओहन अभिनेता नहि जन्म लेलक अछि’ । बहुत विलक्षण आ मुग्ध कर’ बाला अभिनय कएने रहएअ । तेँ हमरा कह’ पड़ल जे  चारुवक्य के भूमिका एहन दोसर नइ क’ सकैए । एकर बाद करगिल समस्यापर आधारित नाटक दुलहा पागल भ’ गैलै मे सेहो अभिनय कएलक जे हम नइ देख सकलिऎक । हँ, मधुबनीक डिप्टी कलक्टर श्री दीपनारायण सिंह जी सँ जखन बात भेल तँ कहलनि जे खासक’ प्रकाशचन्द्र बड्ड नीक अभिनय कएने छल । ओना एहि बातक घमर्थन कखनो-कखनो उठिए जाइत अछि जे अभिनेता तँ निर्देशकक हाथक कठपुतली होइत अछि । ओकरा जेना-जेना निर्देशक कहैत छैक तेना-तेना ओ मंचपर करैत अछि । जँ इएह बात सत्य छैक तँ एक्केटा भूमिका जखन दू आदमी करैत अछि तखन किएक ककरो नीक आ ककरो बेजाए भ’ जाइत छैक ? एहि आधार पर तँ सृजनात्मक प्रतिभा अपन होइत छैक से मानहिटा पड़त । आ  तेँ ओ ओहन चारुवक्य क सृजन कएने रहय । फेर 2005 ई. मे रामाननद युवा क्लब, जनकपुर धाम ( नेपाल ) द्वारा आयोजित नाट्य समारोह मे नेपालक अतिरिक्त कोलकाता , दिल्ली, दरभंगा आ मधुबनीक टीमसभ भाग लेने छल । मधुबनीक यात्री संस्था , दिल्लीक यात्री संस्थाक रूप मे प्रवेश पओने छल । कारण , ओहि समयमे अधिकांश यात्रीक अभिनेतासभ दिल्लीए मे रहैत छल तेँ किछुए नवकेँ समावेश कर’ पड़लै आ काश्यप कमलक नाटक गोरखधंधा तैयार भ’ गेलै । एहि नाटक मे ओ सूत्रधारक भूमिका कएने रहय जे काफी चर्चित रहलै । मैथिली रंग जगतमे नव पीढीक कतेको लोक छथि, जे लगातार काज क’ रहल छथि मुदा, ओहि जमातमे प्रकाश कतेको कारणे सभहक ध्यान अपना दिस खींचैत अछि । एक त’ अपन रंग कालमे , प्रकाशक रंग प्रवाह बड्ड महत्वपूर्ण छैक । दोसर ई जे – प्रकाशक द्वारा जराओल गेल सर्वरंग अभियानक दीपक जे प्रभाव मैथिली रंग जगत पर पड़ल अछि ओ आरो बेसी प्रशंसाक पात्र छैक । प्रकाशक रंग प्रवाहक शुरुआत मिथिलाक एकटा छोट छीन गाम घोंघौर स’ शुरु होइत छैक । अपन नेनपने सँ गामक रंगमंच सँ जुड़ैत, अपन जिला मधुबनीक नगर इप्टाक कार्यालय सचिव बनल आ इप्टा मे एकर पाँच सालक कार्यकाल अखन तक के ओकर स्वर्णकाल कहल जा सकैत छैक । ओत’ सँ निकलिक’ विश्वविद्यालय स्तर पर अभिनय मे प्रथम सम्मान सँ सम्मानित होइत राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली मे प्रवेशक चयन प्रक्रियाक अंतिम प्रक्रिया तक शामिल भेल । ओहो कोनो नामी-गिरामी निर्देशकक संग कार्य करबाक अनुभवक बिना । फेर संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा प्रशिक्षण ल’क’ ओकरे बाकी कार्यशाला मे कार्यशाला सहायकक रूप मे कतेको राज्य मे अपन ज़िम्मेदारी केँ सफलतापूर्वक निभाबैत, साहित्य कला परिषद, दिल्लीक रंगमण्डल सँ गुजरैत, सॉग एण्ड ड्रामा डिविजन, नई दिल्ली मे कैजुअल आर्टिस्टक रूप मे चुनबैत आई राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नाई दिल्ली  द्वारा अखिल भारतीय स्तरक श्रेष्ठतम रंगशोध पत्रिका रंग प्रसंगक संपादन सहयोगीक रूपमे अपन महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी निभा रहल अछि । ई त’ छल प्रकाशक अपन रंगपक्ष , जे कि हमरा सभ केँ सीधे-सीधे देखाइत अछि । जे दोसर रूप छै ओ ई जे मधुबनी सन छोट जगह मे प्रकाश जे रंगदीप जरौलक अछिओकर परिणाम ई छैक जे आई एहि छोट शहर मे सात-सात टा रंगकर्मी रंगकर्म मे प्रशिक्षणक लेल राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृत्ति ल’ चुकल अछि । कतेको रंगकर्मी राष्ट्रीय स्तरक रंगप्रशिक्षण संस्थान सँ प्रशिक्षण प्राप्त केलन्हि अछि । 2006 ई. मे  मैथिली लोक रंग, दिल्ली ( मैलोरंग ) त्रिदिवसीय नाट्य सहोत्सवक आयोजन कएने रहय जाहिमे सहरसा, पटना आ दिल्लीक टीम ( मैथिली लोक रंग ) भाग लेने रहैक । ई तीनू टीम क्रमश: कनियाँ-पुतरा, पारिजात हरण आ काठक लोक क्रमश: उत्पल झा, कुणाल तथा प्रकाश झा क निर्देशनमे प्रस्तुत कएने रहय । उत्पल झा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली सँ उत्तीर्ण छात्र, कुणाल केँ दस-पन्द्रह नाटकक निर्देशनक अनुभव आ प्रकाश झा केँ अभिनय छोड़ि निर्देशनक कोनो अनुभव नहि । तेँ लागल जे एहि दुनू निर्देशकक बीचमे प्रकाश ओहिना दरड़ा जाएत जहिना जाँतक दुनू पट्टाक बीचमे दालि । मुदा से भेलैक नहि, प्रकाश झा आँकड़ जकाँ अड़ले रहि गेल । प्रेक्षक गुम्मी लाधिक’ नाटक देखैत रहलाह । मुदा, जत’ हँस’क अवसर छलैक ओत’ हँसबो कएलाह । नाटक समाप्त भेलाक बाद प्रकाश दू शब्द कहबाक हेतु हमरा मंच पर बजा लेलक । ओ किएक हमरा बजौलक तकर अनुमान एहि रूपमे लगौलिऎक – प्राय: नाटक मे कएल गेल किछु फेर-बदलक मादे किछु कहताह । मुदा ताहि प्रसंगमे हम किछु कहि नइ सकलिऎक । कारण, प्रेक्षक हमर मुँह बन्द क’ देने छल । तेँ हम ई बात कहबाक लेल बाध्य भ’ गेल छलहुँ जे दुलहन वही जो पिया मन भाए अर्थात नाटक वएह नीक वा निर्देशक वएह नीक जकरा प्रेक्षक गम्भीरता सँ देखलक आ बुझलक । एतेक कहलाक बाद ओ राम गोपाल बजाज जी केँ बजा लेलकनि । हुनका मंचपर बजएबाक दूटा कारण भ’ सकैत अछि – पहिल, ओ भारतीय रंगमंचक एकटा दिग्गज रंगकर्मी छथि जे मिथिलांचलक सपूत छथि आ दोसर, पहिल बेर निर्देशनक क्षेत्रमे आयल छल तेँ हुनक आशीर्वाद प्रकाशक लेल आवश्यक छलैक । तेँ बजाजजी मंचपर अएलाह आ हमर बातक समर्थन करैत कहलथिन – मलंगियाजी जे बात कहलनि अछि ताहिसँ हम सहमत छी । प्रकाश केँ जखन दर्शके सर्टिफिकेट प्रदान क’ देलकै तखन हम ओहिपर हस्ताक्षर नइ करिऎ से उचित नइ होएत । एहि प्रस्तुति के देखलाक बाद हिन्दीक युवा आ संवेदनशील रंगदृष्टि रखनिहार रंग समीक्षक संगम पाण्डे जनसत्ता में लिखने रहथि  - ... मंच पर ये सभी पात्र चरित्र के कई बारीक विन्यासों के साथ दिखाई देते हैं । उनके भदेस में कहीं भी कुछ बनाबटी नहीं लगता । और यही वजह है कि कथावस्तु में स्थितियाँ कई बार दोहराई जाकर भी अपनी रोचकता नहीं खोतीं । मंच पर पीछे की ओर दाएँ मंदिर का चबूतरा है । बाईं ओर एक पूरा का पूरा वृक्ष, और चबूतरा एक पूरा परिवेश बनाते हैं । इस परिवेश में साधु की पीतांबरी वेशभूषा एक दिलचस्प कंट्रास्ट बनाती है” । संगम पाण्डेक उपर्युक्त कथन निश्चित रूपे प्रकाशक नाट्य निर्देशक संग ओकर मंच परिकल्पना आ वस्त्र विन्यासक दृष्टिक सेहो मजबूती प्रदान करैत छैक । 2005 ई. मे स्वास्ति फाउण्डेशन, दिल्ली हमरा प्रबोध साहित्य सम्मान देने छल, जे कलकत्तामे प्रदान कएल गेल । उक्त सम्मानक अवसर पर डॉ. उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ द्वारा रचित एक छ्ल राजा नामक नाटकक मंचन कोकिल मंच, कोलकाता द्वारा कएल गेल छल । हमरा बगलमे बैसलि हमर पत्नी जिनका साक्षर मात्र कहल जा सकैए पूछि बैसलीह “कखन नाटक समाप्त होएतैक” ? एहिपर हम कहलिएनि जे एक चौथाई बाँकी अछि । अवलोकनजन्य थकान सँ ओ अपने-अपने बाजि उठलीह “एह, तखन तँ आधा घंटा सँ बेसिए बैस’ पड़त” । आब कोनो प्रेक्षकक मुँहसँ निकलल “बैस’ पड़त” शब्द नाटक प्रदर्शनपर एकटा पैघ प्रश्नचिन्ह लगबैत अछि । इएह सम्मान 2007 मे मयानन्द मिश्र केँ भेटलनि । ओहि सम्मानक अवसरपर डॉ. नचिकेता द्वारा रचित नायकक नाम जीवन, एक छल राजा , रामलीला, प्रत्यावर्तन आदिमे सँ कोनो एकटा नाटकक मंचन होएबाक चाही से विचार कएल गेल छल । संगहि स्थान बदलिक’ दिल्ली पर मोहर लागि गेल छल । उक्त आयोजनक सम्पूर्ण अभिभारा प्रकाश चन्द्र झा केँ भेटल छलैक । तेँ ओ नचिकेताक सभ नाटक मंगौलक । गम्भीरता सँ पढलक आ अंतमे एक छल राजापर आबिक’ केन्द्रित भ’ गेल । नचिकेताक जतेक नाटक छैक ओहिमे सँ सभसँ नीक नाटक एक छल राजा अछि जे प्राय: 1970 क दसकमे प्रकाशित भेल रहैक । एकरा जँ एना बूझी तँ कहि सकैत छी जे जहिया प्रकाश जन्मों नहि लेने होयत तहिए ई नाटक प्रकाशित भेल रहैक । तेँ जतेक जे एहि नाटकक मादे प्रकाशित भेल छल होएतैक ताहिसँ ओ परिचित नहि छल । तथापि ओहिमे सँ एक छल राजा केँ चूनि लेलक से ओकर निर्देशकीय दृष्टिक प्रमाण दैत छैक । कारण, निर्देशक वास्ते नाटक चयन एकटा अहम मुद्दा रखैत छैक । जँ सत्य पुछल जाए तँ ओ नाटक प्रकाश चन्द्र झाक हेतु एकटा चुनौती भरल काज छलैक । एखन धरि जतेक निर्देशक ओकरा प्रस्तुत कएने छल ओकरा कओमा आ पूर्णविराम सहित मंचपर उतारि दैत छल तेँ प्रेक्षककेँ पुछ’ पड़ैत छलैक जे आब कतेक नाटक बाँकी अछि । एहन स्थिति उत्पन्न होएबाक कारणपर विचार करबासँ पहिने हमरा नाटक कथानकपर विचार सेहो कर’ पड़त । एहि नाटकमे राजा साहेब नामक एकटा जमीन्दार अछि जकर जमीन्दारी पुर्खेक समयसँ धीरे-धीरे कमल जाइत छै । राजा साहेब लग आबिक’ विपन्नता पराकाष्ठापर पहुँच जाइत छै । कर्जक बोझ ततेक ने बढि जाइत छै जकरा सधाएब मश्किल भ’ जाइत छैक । फजूल खर्ची आ विलासिताक कारणेँ एहि स्थितिमे पहुँचब एकटा नियति छैक । फेर ओही जमीन्दारीमे पलल राजा साहेबक पिताक अवैध संतान धनिकलाल शहर जाइत अछि । ओहिठाम अपन लगन आ परिश्रमसँ काफी धनोपार्जन करैत अछि आ राजा साहेबक हवेली कीनैत अछि । फेर ओहो वएह काजसभ कर’ लगैत अछि जे राजा साहेब करैत छलाह । आब प्रश्न ई उठैत अछि जे एकटा जमीन्दारकेँ तोड़िक’ दोसर जमीन्दारकेँ ठाढ करबाक की औचित्य छैक ? जँ ठाढ भइए जाइत छैक तँ दरबारमे राजा साहेब जकाँ हवेलीमे मोजराक आयोजन करबाक की प्रयोजन छैक ? जखन ई बात स्पष्ट भ’ जाइत छैक जे राजा साहेब अपन बेटी मोहिनीक विवाह आर्थिक तंगीक कारणेँ नइ करा रहल छथि तखन ओकर प्रेम प्रसंगक एतेक दृश्यसभ रखबाक कोन प्रयोजन छैक आ अंतमे ओकरा प्रेमीकेँ खलपात्र बनएबाक कोन औचित्य छैक ? कोनो नियतिक विरुद्ध बेर-बेर धनिक लालक मुँह सँ प्रतिशोध लेब कहयबाक कोन जरूरी छैक ? राजा साहेब तँ अपन करनीक फल पाबिए गेल छलाह जे हवेली बेचिक’ सड़कपर आबि गेल छलाह । उपर्युक्त सभ प्रश्नपर प्रकाश नीक जकाँ विचार कएने छल । ओकर प्रदर्शन स्क्रिप्ट देखिक’ हमरा लागल जे ओकरामे नाटक प्रदर्शनक समझदारी छैक । नाटकसँ एक दिन पहिने हमरा डेरापर एकटा कार्ड आएल रहय । ओहिपर सपरिवार लिखल रहैक । तेँ हम पत्नीसँ पुछलियनि - “नाटक देख’ जएबैक” ? “कोन नाटक छै” ? प्रश्नपर प्रश्न ओ रखलनि । “एक छल राजा” “नइ जाएब”। “किएक”? “कलकत्ता मे देखने छी । हमरा नइ नीक लागल रहय” । “चलू ने, निर्देशक बदलल छै, अभिनेता बदलल छै” । “मुदा नाटक तँ वएह रहतै ने” । “तैयो देखि लियौ ने” । नाटक भेलैक । नाटक समाप्त भेलाक बाद नचिकेताजी केँ काफी खुश देखलियनि । एकर मतलब छलैक जे नाटक अपन ऊँचाई पाबि गेल छल । वस्तुत: हमरो बड्ड नीक लागल रहय ई प्रस्तुति । हमर मोन मानि गेल छल जे एकरा नीक निर्देशकक पाँतीमे राखल जा सकैए । जँसे बात नइ रहितै तँ नाटक एहि रूपमे नइ चमकितै । रास्तामे हम पत्नीसँ पुछ्लियनि - “केहन लागल नाटक” ? “बहुत बढियाँ” “तखन कहै छलिऎ जे नइ जाएब” । “हमरा थोड़बे बुझल छल जे एहन नाटक हेतै” । ई छलैक एकटा साक्षर मात्र लोकक मूल्यांकन । श्री मायानंद मिश्र, डॉ. गंगेश गुंजन, डॉ. देवशंकर नवीन, डॉ. ओमप्रकाश भारती आदि दिग्गज विद्वान लोकनि एहि प्रस्तुतिक प्रशंसा कएलथिन । ओना दशरथ जखन भार जनकपुर पठौलथिन तँ जनकपुरबासी मेसँ क्यो बाजि ऊठल— भार तँ बहुत बढियाँ छनि, मुदा अंकुरीक अखुआ टेढ छनि । एहन अखुआ टेढबाला लोक प्रेक्षकक प्रतिक्रिया देखिक’ अपनाकेँ चुप्पे राखब उचित बुझलक । एहि ठाम एकटा बात कह’ चाहब—आदमीक क्षमताक स्थानांतरण दोसर क्षेत्रमे सेहो होइत छैक । यदि हम दहिना हाथसँ ‘अ’ लिखैत छी तँ बामा हाथसँ ‘अ’ सेहो लिखि सकैत छी । कारण, दहिना हाथक क्षमता बामा हाथमे स्थानांतरित भ’ जाइत छैक । एही अवधारणापर लोक कहैत छैक जे बी.ए. भ’ क’ घास छिलतै तँ मूर्खसँ बढिए जकाँ छिलतै किएक तँ ओ अपन पढ’–लिख’ बाला क्षमता घास छील’ मे लगा देतैक । एहि मनोवैज्ञानिक तथ्यक सत्यापन प्रकाश चन्द्र झाक अभिनयात्मक एवं निर्देशकीय क्षमतासँ जोड़िक’ संगठनात्मक क्षमताकेँ सेहो देखल जा सकैए । ओ जतबए नीक अभिनेता तथा निर्देशक अछि ओतबए एकटा सफल संगठनकर्ता सेहो । आ हम सभ कियो जनैत छी जे रंगकर्म मे संगठनात्मक क्षमताक विशेष महत्व छैक । एहिठाम संगठनात्मक क्षमताकेँ रंगकर्मसँ जोड़िएक’ देखल जा सकैत अछि कारण, भरतक नाट्यशास्त्रक पैंतिसम अध्यायमे नाट्यदलक चर्चा आएल अछि जाहिमे सूत्रधार, अभिनेता, काष्ठकार, माली(माल्यकार), स्वर्णकार(मुकुट एवं गहना बनब’बाला), सूचिकार(दर्जी), चित्रकार आदिक चर्चा अछि । हमरा जनैत एहि सभ केँ मिलाक’ राख’बाला सूत्रधार छल होएतैक । ईसभ अपन-अपन योगदान नाट्य प्रदर्शनमे दैत छलैक । जँ एकरा सभकेँ मिलाक’ नहि राखल जैतैक तँ नाट्यप्रदर्शन असंभव भ’ जइतैक । अत: एकटा सम्पूर्ण  रंगकर्मीक हेतु संगठनात्मक क्षमता आवश्यक भ’ जाइछ । 2005 ई. मे जनकपुर नाट्य महोत्सवक आयोजन कएल गेल रहैक । एहि आयोजन मे यात्री टीम भाग लिअय से हमर हार्दिक इच्छा रहय । मुदा कलाकारसभ बिखरल रहैक । सभ एकठाम जमा होएत आ नाटक करत से संभव नहि बुझाय । तथापि एकबेर जानकारी देब आवश्यक छल । एतदर्थ बीस-बाइसटा मेम्बरमे सँ प्रकाश केँ टेलीफोन कएलिऎक । कारण, ओकर संगठनात्मक क्षमतासँ हम परिचित छलहुँ । दोसर जँ गछियो लितएअ तँ संगठनात्मक क्षमताक अभावमे जएबो करितएअ कि नहि ताहिपर हमर विश्वास नहि छल । खैर, ओ हमर इच्छाकेँ सहर्ष स्वीकार क’ लेलक आ पन्द्रह-सत्रह  आदमीक टीम ल’ क’( दिल्ली सँ ) जनकपुरधाम (नेपाल) पहुँच गेल । सम्प्रति प्रकाश  दिल्लीमे मैथिली लोक रंग (मैलोरंग) नामक संस्था चला रहल अछि । एहि संस्थाक एकटा सदस्य दिल्ली रहैत अछि तँ दोसर देवगिरी मे, माने एकटा उत्तरी दिल्ली तँ दोसर दक्षिणी दिल्ली । एहना स्थिति मे मैथिली रंगकर्म केँ जियाक’ राखब एकटा कठिन काज भ’ जाइत छैक । तथापि ओ एकरा जिआए क’ नहि, बल्कि जगजियार क’ क’ रखने अछि । इम्हर, जहिया सँ प्रकाश रंग प्रसंग सँ  जुड़ल अछि आ डॉ. ओमप्रकाश भारती, स्व. जे.एन. कौशल, महेश आनंद, देवेन्द्र राज अंकुर, प्रतिभा अग्रवाल आदि सन शोधकर्ताक सानिद्ध पौलक अछि ओकर रंग-दृष्टि आरो खुजलैक अछि । मैथिली लोकनाट्य आ रंगमंच पर ओकर शोध आलेख उल्लेखनीय होइत छैक । बाल रंगमंच पर भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय फैलोशिप प्राप्त करनिहार प्रकाश कहियो कहियो कथा सेहो लिखैत अछि । एकरा द्वारा लिखल कथा पाथर बेस चर्चा मे छल । ई कथा बुच्चीक मनोरथ नाम सँ अंतिका मे आ पाथर नाम सँ हिन्दी मे समकालीन भारतीय साहित्य मे प्रकाशित भेल रहै । हमरा जनैत कर्मठ आ सफल व्यक्ति ओ नहि होइत अछि जे समयक पाछाँ-पाछाँ चलैत अछि, सफल व्यक्ति तँ ओ होइत अछि जे अपन कर्मठतासँ समय केँ अपना लग खींच लैत अछि । इएह गुण हम मृदुभाषी आ मिलनसार प्रकाश मे पबैत छी । किएक तँ एकरासँ पहिने मिथिलांचल सँ कतेको मैथिलीक विद्वानलोकनि दिल्ली अएलाह, मुदा मैथिली रंगकर्मक जड़ि एना भ’ क’ रोपल नहि भेलनि । प्रकाशक लेल दिल्ली मे हिन्दी रंगमंच मे काज करनाइ बहुत आसान छल मुदा ओ मैथिली रंगकर्म के अपनैलक ई बेसी महत्वपूर्ण अछि ।  हमरा तँ ओहो दिन देखल अछि जहिया मैथिली रंगकर्म कलकत्तामे बहुत जगजियार छलैक, एकरा बाद ई जगजियारी ऊठिक’ पटना आ जनकपुर अएलैक सेहो देखलहुँ आ आइ लगैत अछि जे एहि जगजियारीक एकटा प्रबल दावेदारक रूपमे दिल्ली सेहो ठाढ़ भ’ गेल अछि जकर श्रेय निश्चित रूपे प्रकाश चन्द्र झा केँ जाइत छैक । आइ पटना हो, चाहे जनकपुर, चाहे सहरसा, सभकेँ अपन-अपन क्षमता देखएबाक हेतु दिल्लीमे प्लेटफार्म मैथिली लोक रंग (मैलोरंग) प्रदान कएअलक अछि जकर संचालन प्रकाश चन्द्र झा क’ रहल अछि । हम मैथिली रंगकर्मक हेतु ओकर दीर्घायु आ सफलताक कामना करैत छी । नेपाल वन आ मधेश स्पेशल -जितेन्द्र झा पताः जनकपुरधाम, नेपाल एखन ; नई दिल्ली स्वरक माला गँथती अंशु-  जितेन्द्र झा हम सभ अपने भाषाकेँ हेय दॄष्टिसँ देखैत छी तें हमर भाषासाहित्य, गीतसंगीत आ संस्कृति पछुआ रहल अछि । ई कहब छन्हि अंशुमालाक । अंशु दिल्ली विश्र्वविद्यालयमे संगीतमे एम फ़िल कऽ रहल छथि। मैथिली गीत संगीतकेँ गुणस्तरीय बनएबाक लक्ष्य रखनिहारि अंशु मैथिलकेँ अपन भाषा-संगीत प्रतिक दृष्टिकोण बदलबापर जोड दैत छथि। अंशुमाला संगीतक विद्यार्थी छथि । दिल्ली विश्र्वविद्यालयमे एम. फ़िल.मे अध्ययनरत अंशुक  माय हिनक पहिल गुरु छथिन्ह। ई माय शशि किरण झासँ मैथिली लोक संगीतक शिक्षा लेने छथि । तहिना एखन किछु बर्षसं ई रेडियो कलाकार हॄदय नारायण झासँ संगीत शिक्षा ल' रहल छथि । बाल कलाकारक रुपमे सीतायण एलबममे गाबि चुकल अंशु बिभिन्न रेडियो कार्यक्रम आ स्टेज प्रोग्राममे सहभागी भ' क' मैथिली गीत गाबि अपन स्वरसं प्रशंसा बटोरने छथि । एखन दिल्लीमे रहिकऽ संगीत साधनामे जुटल अंशु दिल्लीमे आयोजित विभिन्न कार्यक्रममे मैथिली गीत संगीत परसल करैत छथि । मैथिली भाषीमे अन्य भाषाक गीत संगीतक प्रति बढैत रुचि मैथिली गीतसंगीत लेल हितकर नञि रहल हिनक कहब छन्हि । दिल्लीमे आयोजित एकटा कार्यक्रमकेँ याद करैत ई कहैत छथि जे जाहि कार्यक्रममे लगभग ८ हजार मैथिल रहथि ताहि कार्यक्रममे चाहियोकऽ मैथिली गीत नहि गाबि सकलहुं । ओहि कार्यक्रममे भोजपुरीक डिमाण्ड पुरा करैत अंशुके मैथिली डहकन गेबाक लेल मोन मसोसिक' रह' पडलनि । मुदा अंशु स्वीकारैत छथि जे गायक स्रोताक रुचिक आगु विवश होइत अछि, 'जनता जे सुनऽ' चाहत हमरा सएह गाबऽ पडत अंशु कहलनि । पटनामे मैथिली गीत गाबिक स्रोताक तालिक गडगडाटिसं खुश हएबाक आदति पडि चुकल अंशुकेँ दिल्लीमे आबिकऽ मैथिल भाषीक बदलल सांगीतिक स्वादसं अकच्छ लागि गेल रहनि । मैथिलीमे लोकप्रिय धुनक अभाव रहबाक बात अंशु किन्नहु मान' लेल तैयार नहि छथि ।  धुन वा लयक अभाव नहि,  स्रोता एहिसं अनभिज्ञ रहल हिनक दाबी छन्हि। मैथिली संगीतकर्मी एखनो आर्थिक समस्यासँ लडि रहल छथि, अंशु कहैत छथि । एहिक अभावक कारण प्यारोडी गीतक सहारा लेबालेल संगीतकर्मी बाध्य बनल अछि । मौलिक गीत,संगीतमे लगानीकर्ताक अभाव रहलासं सेहो प्यारोडी संगीत लोकप्रिय भऽ रहल अछि, हिनक कहब छनि । 'सभसँ पैघ कमजोरी स्रोतामे छै कलाकार तँ सभ ठाम हारल रहैया' प्यारोडी प्रेमीपर रोष प्रकट करैत अंशु कहैत छथि । मुदा मैथिलीमे स्तरीय गीत संगीत स्रोताकेँ भेटक चाही से अंशुक विचार छन्हि । मैथिली लोकरंग मन्चद्वारा दिल्लीमे आयोजित कार्यक्रममे स्रोतासँ भेटल वाहवाहीक उदाहरण दैत अंशु कहैत छथि जे स्रोताक मनोरन्जनक लेल स्तरीय कार्यक्रम सेहो हएबाक चाही । मैथिली रंगकर्ममे लगनिहारकेँ उचित सम्मान तक नञि भेटि सकल, अंशुमालाक अनुभव छन्हि । मैथिली कलाकारकेँ आब' बला दिनमे बहुत मान सम्मान भेटक चाहि, हम इएह चाहैत छी अंशु कहैत छथि । मैथिली संगीतकेँ एकटा ऊँचाई पर पंहुचएबाक लक्ष्य रखनिहारि अंशु मैथिली रंगकर्ममे एखनो लडकी लेल बहुतो कठिनाई रहल बतबैत छथि । अंशु आगु कहलनि-मैथिल समाजसँ जाधरि कलाकारकेँ सम्मान नञि भेटतै ताऽ धरि एहि क्षेत्रमे लडकी अपन प्रतिभा देखाब' लेल आगु नञि आओत। टेलिभिजनमे जं मैथिलीक मादे बात करी त नेपाल वन टेलिभिजनके एकटा अलग स्थान बनि चुकल अछि । नेपाल वन टेलिभिजन राति पौने ८ बजे प्रसारित होब' बला मधेश स्पेशलक माध्यमसं मैथिली बहुतो मैथिल धरि पंहुच रहल अछि । नेपालमे सभसं बेशी बाजल जाए बला दोसर भाषा मैथिली रहितंहु ओत्त ताहि अनुपातमे संचारमाध्यममे मैथिलीके स्थान नई भेट सकल छइ । एहन अवस्थामे पडोसी देश भारतसं सन्चालित नेपाल वन टेलिभिजन मैथिलीमे कार्यक्रम प्रसारण क मैथिलीभाषा भाषी मध्य अपन अलग स्थान बनालेने अछि । नेपालमे सरकारी स्तरपर संचालित नेपाल टेलिभिजन सहित निजी टेलिभिजन च्यानलमे  मैथिली एखनो उपेक्षिते अछि । यद्यपि बेर बेरके मधेश आन्दोलन आ संचारमाध्यमपर लाग बला साम्प्रदायिकताक आरोपक कारणे काठमाण्डुकेन्द्रित टेलिभिजनसबमे आब मैथिलीके स्थान भेट लागल छइ । काठमाण्डुसं प्रसारित सगरमाथा टेलिभिजन सेहो सभदिन मैथिलीमे समाचार देल करैत अछि । नेपाल वन टेलिभिजनक मधेश स्पेशल नामक 1 घण्टाक कार्यक्रममे समाचार, नेपालक समसामयिक राजनीति, नेपालक प्रमुख मुद्दापर बातचित आ गीत संगीत समेटल गेल अछि । समसामयिक वस्तुस्थिति पर लोक अपन धारणा द क परिचर्चाके महत्वपूर्ण बना देल करैत अछि । ई कार्यक्रम राति पौने आठ बजेसं पौने नओ बजेधरि प्रसारित होइत अछि । नेपाल केन्द्रित समाचार रहितो नेपाल सं बाहर इ कार्यक्रम देखिनिहार मैथिल कमी नई अछि । नेपालक सीमावर्ती मधुवनी, दरभंगा, सीतामढी, सुपौल, सहरसासहितके जिल्लासभमे सेहो एकर दर्शकके कमी नहि अछि । नेपालक मैथिल जत्त मैथिलीमे समाचार, गीत, आ परिचर्चा सुनि क सुसूचित होइत छैथ ततई भारत आ आन ठामक दर्शक मैथिली गीत आ संचारमाध्यममे मैथिलीक बोली सुनि हर्षित भेल करैत अछि । मधेश स्पेशल नेपालक मधेशीके एकटा अन्तर्राष्ट्रिय संचारमाध्यममे मुंह खोलि क बजबाक अवसर देलकै, सेहो अपने भाषामे । नेपालक संचारमाध्यमसं सेहो कटल कट्ल रहबला मधेशके छोट छिन घटना सेहो प्रमुख समाचार बन लागल । मधेशीक मुद्दापर खुलिक बहस शुरु भ गेल । मधेशक नेता सेहो धोती कुर्ता पहिरिक काठमाण्डुएमे बैसि क कोनो टेलिभिजन पर प्रत्यक्ष रुपें जनतासं बातचित कर लगला। टेलिभिजनमे जत्त मैथिली शुन्यप्राय छल ताहि अबस्थामे एक्कहिबेर एक घण्टा मैथिलीक कार्यक्रमके लोकप्रिय होब मे बेशी समय नइ लगलै । एखन इ कार्यक्रम दू बर्ष पुरा कर लागल अइ। नेपाल 1 टेलिभिजन डिस टिभी आ टाटा स्काइपर उपलब्ध हएबाक कारणे इ देश विदेशमे रह बला मैथिललग सहजहिं पंहुच बनालेने अछि । एहिद्वारे लगभग ७० टा देशमे रहबला मैथिल भाषी मधेश स्पेशलके माध्यमसं मैथिलीमे सुचना आ मनोरन्जन ल रहल छैथ । मधेश स्पेशल मैथिली आ भोजपुरीक मिश्रित कार्यक्रम अछि । एहिमे मैथिली भाषाक गीत नादक अतिरिक्त भोजपुरीक चौकी तोड आ आधुनिक गीत सेहो प्रसारण होइ छै । ई कार्यक्रम तीन भागमे बाटल अछि। पहिलमे नेपाल आ अन्तर्राष्ट्रिय समाचार रहैछै त दोसरमे समसामयिक चर्चा(टक शो)  आ तेसरमे मैथिली/भोजपुरी गीत । दृश्य संचारमे मधेश स्पेशल मैथिलीके जगजियार करमे बड पैघ भूमिका निर्वाह क रहल अछि आ क सकैत अछि से कहनाई अतिशयोक्ति नई हएत । डोम कछ आ जट जटिनक नाचसं जं माटिक सुगन्ध लेब चाहैत हुवए त हुनका सभहक लेल मधेश स्पेशल  सहायक भ सकैत छै । मेधेश केन्द्रित कार्यक्रम होइतो इ मिथिलान्चलके सर्वाङिण विकासमे कत्तेक सहायक हएत से त आव बला दिने बताओत मुदा एतवा निश्चित जे टेलिभिजनमे मैथिलीक नियमित प्रसारणसं मैथिलके अपन बोली अपन भाषा याद दियबैत रहैतै । स्तंभ - जितेन्द्र झा रिपोर्टिंग   -मैथिली रिपोर्ताज नेपालक (किछु भारतक) मिथिला मैथिल मैथिलीक सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक समाचार भाषा हित कि भोट्क लोभ नयी दिल्लीक मैथिली भोजपुरी एकेडमीक अध्यक्ष एवं दिल्लीक मुख्यमन्त्री शीला दीक्षित मैथिली भोजपुरी एकेडमीकेँ आन एकेडमीसँ आगू बढल देखऽ चाहैत छी, से कहलनि अछि । मैथिली भोजपुरी एकेडमी द्वारा आयोजित भिखारी ठाकुरक विदेशिया नाटक मन्चन कार्यक्रममे दीक्षित ई बात कहलनि । मैथिलीक लेल अलग एकेडमीक माँगक प्रति दीक्षित कहलनि जे हमरा सभकेँ जोड़क बात करक चाही तोडक नञि । एकताक दोहाइ दैत मुख्यमन्त्री भने अलग एकेडमीक् बातसँ कन्नी कटने होथि मुदा मैथिली भाषा साहित्यमे लागल प्रबुद्धबर्ग मानैत छथि जे अलग एकेडमीसँ मात्र मैथिलीक वास्तविक विकास भऽ सकत । ओना एकेडमी भोट बटोरबाक साधन मात्र नञि बनए ताहि दिश सेहो ध्यान देब जरुरी अछि । एकेडमीक आयोजनमे ६ अगस्त मंगलक राति विदेशिया आऽ ७ अगस्त बुधक राति महेन्द्र मलंगियाक काठक लोक मन्चित कएल गेल छल। मैथिली भोजपुरी एकेडमी आन एकेडमीसँ आगू बढय से दीक्षितके कहब रहनि । सरकारी ढिलासुस्तीकेँ स्वीकारैत ओऽ एक दिन सबहक आवाज सुनल जायत, कहलनि । नव दिल्लीमे एकेडमी द्वारा आयोजित कार्यक्रममे भोजपुरी नाटक विदेशिया देखलाक बाद दीक्षित नाटक खेलनिहार रंगकर्मीकेँ प्रशंसा केने रहथि । नाटयशालामे भोजपुरी आऽ मैथिली भाषीक भीड़ लागल छल । तहिना मैथिली भोजपुरी एकेडमीक उपाध्यक्ष अनिल मिश्र, एकेडमी, विहारक समॄद्ध संस्कॄतिकेँ बखानैत एहन प्रस्तुति निरन्तर होइत रहत, से जनतब देलनि। "हमर सिंहासन अटल अछि" मलंगिया 'जाधरि हमर कलम चलैत रहत ताधरि मैथिली नाटककारक रुपमे  हमर ऊँचाइ धरि कियो नञि पहुँचि सकैत अछिए। ई सिंहनाद छनि मैथिलीक प्रख्यात नाटककार महेन्द्र मलंगियाक । समकालीन मैथिली साहित्यकारकेँ चुनौती दैत, ओ नाटककार अपन सिंहासन किनको बुते डोलाएल पार नञि लगतए से दाबी करैत छथि।  मैथिली नाटककार महेन्द्र मलंगिया एखन मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय आऽ ख्यातिप्राप्त नाटककारमे चिन्हल जाइत छथि। चुनौतीपुर्ण शैलीमे मलंगिया कहैत छथि, हमर हाथमे जाधरि कलम अछि, हम अपन स्थानपर टिकले रहब, हमर सिंहासन अटल अछि। मैथिली नाटकक भीष्मपितामह कहल जाए तँ केहन लगैए, ताहि जिज्ञासामे मलंगिया मुस्कियाइत कहलनि जे हमर नाटक लोककेँ पसिन छञि हमरा ताहि पर गर्व अछि, हम जाहि स्तरक नाटक लिखैत छी, तेहन रचना एखन नञि भऽ रहल छञि। ओऽ  जनकपुरक रंगकर्मीक खुलिकऽ प्रशंसा करैत छथि। मैथिली रंगकर्ममे लागल जनकपुरक कलाकारक मलंगिया प्रसंशा करैत कहलनि, जनकपुरक कलाकारसँ बहुत आशा कएल जाऽ सकैत अछि ।  मैथिली नाटकमे शेक्सपियर कहल जाएबला मलंगिया ४ दशकसँ बेशी समय  नेपालमे  बिता देने छथि। ओऽ नेपालमे मैथिली साहित्यक संरक्षण लेल सन्तोषप्रद काज नञि भऽ सकल, बतौलनि । नेपालमे  दोसर सभसँ बेशी बाजल जाएबला भाषा मैथिलीमे रंगकर्मक समयसापेक्ष बिकास नञि भऽ सकल मलंगियाक कहब छनि। लोकतन्त्र बहालीक बाद सेहो नेपाल सरकार मैथिलीक लेल किछु नञि कऽ सकल हुनक आरोप छन्हि। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान द्वारा मैथिली भाषा, साहित्यक लेल भेल काजके ओऽ कौराके संज्ञा देलनि । प्रतिष्ठानद्वारा मैथिलीलेल भऽ रहल काज प्रति मलंगिया असन्तुष्टि ब्यक्त कएलनि । मैथिली रंगकर्ममे निरन्तर कार्यरत संस्थाकेँ सरकार दिशसँ कोनो तरहक सहयोग नञि भेट रहल बतबैत, ताहि प्रति खेद ब्यक्त कएलनि। सरकारी उपेक्षाक कारण सेहो मैथिली रंगकर्म ओझराहटिमे पडल, मलंगिया मानैत छैथ । मैथिली साहित्यमे नाटककार आऽ निर्देशकक रुपमे ख्यातिप्राप्त मलंगिया रंगकर्मकेँ रोजीरोटीसेँ जोडल जाए, से कहैत छथि। जाऽ धरि रोजीरोटीसँ रंगकर्म नञि जुटत ताऽ धरि बिकास सम्भव नञि, मलंगिया स्पष्ट कहैत छथि।  जनकपुरमे मिथिला नाटय कला परिषदसँ आबद्ध भऽ मैथिली नाटककेँ जन-जन धरि पंहुचएबाक अभियानमे लागल मलंगिया राजतन्त्रमे मैथिली भाषा संस्कृतिक संरक्षणक लेल कोनो काज नञि भेलाक कारणे सेहो मैथिली पछुआएल अछि, से कहलनि । मैथिली भाषामे आम दर्शकक मोनमे गडि जाएबला नाटक लिखिकऽ मैथिली साहित्यक श्री बृद्धिमे  योगदान देनिहार मलंगिया नाटककार नाटक लिखैत काल दर्शकक मानसिकता, उमेर , शिक्षा आऽ पेशाकेँ ध्यानमे राखए से सलाह दैत छथि। 'हम दर्शककेँ लक्षित कऽ नाटक लिखैत छी, तेँ हमर लिखल नाटक लोककेँ नीक लगैत छञि, मलंगिया अपन सफ़लताक रहस्य बतबैत कहलनि । बिदेशिया नाटक बिदेशिया घुरि जो विदेश जएवाक बाध्यता समाजक एकटा कटु सत्य अछि । अपन गामघर छोडिकऽ कियो विदेश जाय नञि चाहै-ए, मुदा परिस्थितिक आगू ककरो किछु नञि चलए छञि। किछु एहने परिवेशकेँ पर्दापर देखेबाक प्रयास कएल गेल विदेशिया नाटकमे । मैथिली भोजपुरी एकेडमीद्वारा दिल्लीमे आयोजित विदेशिया नाटकमे किछु एहने देखल गेल । वियाह भेलाक किछुए दिनक बाद विदेशिया गाम छोडि दैत छञि, विदेश जाऽ कऽ पैसा कमाय लेल। गाम संगहि विदेशियाकेँ छुटि जाइत छञि, अपन नवकी कनियाँ, गामक संगी-साथी आऽ याद सेहो । ओ पाईक लोभसँ घर छोडने रहैया, मुदा ओऽ पाई तँ नईहे कमासकल शहरमे अपन जीवनके एकटा आओर साथी बनालैयऽ।  एम्हर ओकर पहिल कनियां विदेशियाके बाट जोहैत रहैयऽ। विदेशियाक यादमे ओऽ कखनो बटुवाके पुछैयऽ तँ कखनो बारहमासा गबैयऽ । नाटकक निर्देशक संजय उपाध्याय विदेश जएबाक ग्रामीण प्रबॄतिकेँ सुखान्त बनेलहुँ से कहलनि। गामक सोझ आऽ सुशील कनियाकेँ छोडि विदेशिया विदेशमे रइम जाइयऽ । ओकरा आब शहरिया संगी निक लगै छइ, जे दुगोट बच्चाक माय सेहो अइ। विदेशिया अपना आपके बिसरि जाइयऽ। गामक कनिया नइ शहरक छम्मकछल्लो आब ओकर प्राण भऽ गेल छञि । एहिबीच भिखारी विदेशियाकेँ निन्नसँ जगबैत अछि। नाटकमे भिखारी बनल रंगकर्मी अभिषेक शर्मा नाटकक माध्यमसँ लोक अपन गाम घरके याद करलेल विवश भऽ जाइयऽ, से कहलनि । विहारक सुपौल जिलाक रंगकर्मी शारदा सिंह नाटकमे देखाएल गेल विषय बस्तु समाजक सत्य रुप रहल बतौलनि । विदेशिया गाम तँ घुरैयऽ मुदा असगरे नई चारि गोटेक संगे , दूटा बालगोपाल आऽ तकर माय। किछु झोंटाझोंटी आऽ कलहक बाद दु्नू सौतिन आऽ विदेशिया गामेमे रहऽ लगैयऽ । नाटक अन्ततः सुखान्त भऽ कऽ समाप्त होइत अछि । ई कथा गामसँ बाहर रहनिहार एकटा निम्न मध्यमबर्गीय युवककेँ जिनगीक मात्रे नञि अछि । बहुतो युवक गाम देहात छोडिते अपन माटि पानिकेँ बिसरि जाइत अछि । शरीरसँ मात्र नञि मोनसँ सेहो विदेशिया भेनिहारकेँ ई नाटक अपन गाम अपन वास्तविक पहिचानक याद दियबैत रहत । आब चलू नेपाल दिस सशस्त्रक सनसनी मधेश एखन दू दर्जनसँ बेशीक संख्यामे रहल सशस्त्र समूहसँ आक्रान्त अछि। कहियो सशस्त्रक विरोधमे जनकपुरक जानकी मन्दिरमे पत्रकार रैली निकालैत अछि तँ कहियो सिरहाक कर्मचारी कार्यालयमे ताला लगाकऽ सशस्त्रक विरोध प्रदर्शन करैत अछि । तहिना सर्लाहीमे बस चालकक हत्या भेलासँ शुरु भेल यातायात बन्दसँ जनजीवन कष्टकर भऽ रहल अछि । मधेशक माँगकेँ अपन नारा बनाकऽ खुलल दू दर्जनसँ बेशी संगठनकेँ एखन मधेशमे तीब्र बिरोधक सामना करऽ पड़ि रहल छन्हि । चालकक हत्या सर्लाही । राजमार्गमे एखनो शान्ति सुरक्षाक अबस्था बेहाळे अछि । सर्लाही जिलामे हथियारधारी लुटेरा समुह ७ तारिखक रातिमे एकटा बस चालकक  गोली मारि हत्या कऽ देलक । राजधानी काठमाण्डू जाऽ रहल बसक चालक कॄष्ण खवासक गोली लागि मॄत्यु भेल छल । पूर्व पश्चिम राजमार्ग अन्तर्गत सर्लाहीक जंगलमे राति ९ बजे ओऽ समुह बसमे लूटपाटक प्रयास कएने रहए । बस नञि रोकि भागऽ लगलाक बाद लुटेरा समूह गोली चलौने छल। गोली लागि घायल भेनिहार चालक खवासकेँ उपचारक बास्ते लालबन्दी अस्पताल लऽ जाइत अबस्थामे  बाटेमे मृत्यु भेल, से स्थानीय प्रहरी जनौलक अछि । चालकक गोली लगलाक बाद खलासी बसकेँ नियन्त्रणमे लऽ कए दुर्घटना होबऽ सँ बचौने छल। प्रहरी घटनामे संलग्न होएबाक आशंकामे सात गोटेकेँ पकडलक अछि । दोसर यातायात व्यवसायी आऽ मजदुर चालक हत्याक बिरोधमे चक्काजाम जारी रखने अछि। सरकार समस्या समाधान लेल आगू नञि आएल, कहैत यातायात मजदूर देशव्यापि आन्दोलनक चेतावनी देलक अछि । मजदूर आऽ व्यवसायी पुर्वान्चलक तीन अन्चल आऽ जनकपुर अन्चलमे चक्काजाम कएलाक बाद जनजीवन प्रभावित भेल अछि । बन्दक कारण उपभोग्य वस्तुक अभाव होबऽ लागल अछि । नेपालक (किछु भारतक) मिथिला मैथिल मैथिलीक सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक समाचार "रे नोर एना तोँ नञि टपक" कोशी नेपाल आऽ भारतक जनता लेल एकटा अभिशापसँ कम नञि । १८ अगस्तक कोशी नदी पुर्वी तटबन्धकेँ पश्चिम कुशहा लग तीन सय मीटर भत्थन करैत बाट बदलने छल । तञि के बाद नेपालक लगभग १ लाख जनता विस्थापित भेल। वएह पानि जहन बिहारमे आएल तँ आओर विकराल रुप ल लेलक । बिहारमे पानिसं ३० लाखसं बेशी जनता प्रभावित  अछि, जाहिमे २० लाख कोशी इलाकाके अछि । मृतकक संख्या हजारोमे हेबाक आशंका कएल जाऽ रहल अछि। बिहार सरकारक तथ्यक अनुसार कोशी बाढिसँ ७ सय ७५ गामक २२ लाख ७५ हजार जनता प्रभावित अछि । कोशीक कोप चीनक तिब्बत उदगमस्थल रहल कोशी नेपाल होइत बिहार कुर्सेला धरि सात सय २० किलमीटर दुरी पार करैत गंगानदीमे मिलैत अछि। कोशी नदी वार्षिक ५० अरब घन लिटर पानि गंगानदीमे पंहुचाबै-ए। कोशी नदीक वर्तमान जलाधर क्षेत्र ९२ हजार ५ सय ३८ वर्ग फ़िट मिटर अछि, जाहिमेसँ ४१ हजार ३ सय ३३ वर्ग किलोमीटर नेपालक भीतर पड़ैत अछि। कोशी योजना संचालनक ४५ वर्ष होइतो कोशी पीडितक समस्या जहिनाक तहिना अछि । नेपाल आऽ भारत दुनु देशकेँ एहि प्रश्नक उत्तर देव आवश्यक अछि- किए टुटल बान्ह ? बाढिसँ गरीब किसान भूमिहीन भऽ गेल अछि, ने लत्ता कपडा ने पेटमे अन्न आऽ ने पीबालेल पानि । किसान टकटक्की लगौने अछि कोशीक पानि पर, जे कखन घटत? जमिनदार पानिदार भऽ गेल, गाय महिष सबटा दहाऽ गेल छैक, आव बाँकी छञि मात्र जीवाक आश,,,,,। दोष ककर नेपाल आऽ भारत दुनु पक्ष एक दोसराके दोषारोपण कऽ रहल अछि । 'भारतीय प्राविधिक तटबन्ध मरम्मतिक लेल गेल छल मुदा, ओत्त काज करबाक वातावरण नञि बनलाक बाद तटबन्ध निर्माण नञि भऽ सकल, भारतीय पक्ष कहैत अछि। कोशी नदीक समझौता अनुसार नेपाल किछु नञि कऽ सकैत अछि, तेँ हमसभ मुक दर्शक छी, दोष भारतक अछि नेपाली पक्षके दाबी। भारतीय प्रधानमन्त्री डा मनमोहन सिंह बाढ़िक बिभीषिका देखिते राष्ट्रीय विपत्तिक घोषणा कऽ देलनि। बहुत रास पाई आऽ खाद्यान्न सहयोग करबाक आश्र्वासन सेहो। मुदा कोशी तटबन्ध टुटल किए, एकर सरकारी स्तरपर कोनो तरहक जाँच-बुझक आदेश नञि देल गेल अछि। हँ नेपालसँ एहि बिषयमे बातचीत करबालेल एकटा उच्चस्तरीय कमिटीक गठन कएल गेल अछि। ओऽ समिति की बातचीत करत आऽ की निष्कर्ष निकालत भविष्यक गर्भमे अछि। क्षतिपुर्ति कोशी समझौताक अनुसार कोशी तटबन्धक सभ तरहक काज भारतक जिम्मामे अछि । तटबन्धक मरम्मति मात्रे नञि तटबन्ध टूटलासँ होबऽ बला क्षतिपुर्ति सेहो भारते देत, से सन्धिमे उल्लेख अछि । नेपालक परराष्ट्रमन्त्री उपेन्द्र यादव कोशी समझौता अनुसार भारत सरकारकेँ सभ तरहक क्षतिपुर्ति देबऽ पडतै, से कहैत छथि। सन्धिक अनुसार इलाज, पुनर्वास आऽ खाद्यान्न जेहन सहयोग भारत सरकारकेँ करक चाही। भारतीय प्रधानमन्त्री आऽ विदेशमन्त्रीसँ सहयोगक आग्रह कएल गेल आऽ ओऽ सभ एहि प्रति सकारात्मक रहल, मन्त्री यादव कहलनि। आब देखऽ के बाँकी अछि, कोशी पीडित धरि कहिआ पडोसी देशसँ सहयोग पंहुचैत छञि। नञि रुकल कटान कोशी कटान नियन्त्रणलेल एखन धरि कएल गेल सभ प्रयास असफ़ल भेल अछि। कोशीक सभसँ महत्वपुर्ण मानल जाएबला स्पर बहऽ लागल अछि। नेपाल आऽ भारतीय प्राविधिक टोलीद्वारा कटान नियन्त्रणलेल कएल गेल प्रयास निरर्थक भऽ गेल अछि। संयुक्त  प्राविधिक  टोलीक निगरानीमे बीस हजार बोरा बालु, गिटी राखि कऽ नदिकेँ पश्चिम दिश घुमएबाक प्रयास निरर्थक भऽ गेल अछि। बर्षाक कारण सेहो बाढि नियन्त्रण दुरुह बनल अछि। नेपाल सरकार कोशी कटानसँ बिस्थापित भेनिहारक प्रति परिवार १५ हजार टका सहयोग देत। ई १५ हजार ब्यथित कोशीपीडितके कत्तेक सहयोग भऽ सकत ओऽ सहजहि अनुमान लगाओल जा सकै-ए। किछु मरल बहुतो निपत्ता सप्तकोशी नदी गामेक बाटसँ बह लगलाक बाद विस्थापित भेनिहारसभ एखनो अपन परिजनक खोजिमे अछि । हरिपुर, श्रीपुर आऽ पश्चिम कुशाहासँ विस्थापित सभ अपन घर परिवारक सदस्यके ढुंढि रहल अछि। सुनसरी प्रशासन एखनधरि ५ गोटेक मृत्युक पुष्टि कएलक अछि। मुदा एखनो चारि सय गोट सम्पर्कविहीन अछि। दोसर दिश कोशी बाढ़िसँ विस्थापित आब पेटझरीक चपेटमे आबि गेल अछि। पानि गन्दा भऽ गेलाक बाद विस्थापित शिविरमे पेटझरी आऽ मुँहपेट जाएव विकराल रुप लऽ लेने अछि। विस्थापित एक बालक सहित दु गोटक पेटझरीसँ मृत्यु भेल अछि। मृत्यु भेनिहारमे  श्रीपुर-३ के ५६ वर्षीयय तेजन सदा आऽ ६ वर्षिय रम्बा सदा अछि। सुनसरीक विभिन्न २९ शिविरमे एक हजार ५ सय गोट एखन बिमार अछि। अधिकांशमे पेटझरी, निमोनिया, बोखार आऽ छातीमे इन्फ़ेक्सन देखल गेल अछि। रोगीमेसँ १२ गोटक अवस्था चिन्ताजनक रहल, उपचारमे संलग्न चिकित्सक जनौलक अछि । कत्तेक बिपत्ति ! बाढ़िसंगहि सप्तरी जिलामे सर्पदंश बढि गेल अछि। सर्पदंशसँ शुक्रक राति आओर एक गोटेक मृत्यु भेल अछि। भादव महिनामे सांप कटलासँ मरनिहारक संख्या ६ भऽ गेल स्थानीय जनस्वास्थ्य कार्यालय जनौलक। खेतमे काज कऽ रहल स्थानीय रामकृष्ण यादवकेँ सांप कटने रहन्हि। इलाजक लेल सगरमाथा अंचल अस्पताल लऽ जाइत काल हुनक मृत्यु भेल। एहिसँ पहिने फ़किरा ३ क ४५ बर्षीय रामअशिष यादव, पत्थरगाडा ७ क १४ बर्षिय बमभोला यादव आऽ महादेव ८क १२ बर्षीय घनश्याम इसरक मृत्यु भऽ चुकल अछि । बिहारक बाध्यता कोशीक जलस्तर बढ़लाक बाद बिहारक स्थिति आओर असहज भऽ गेल अछि।  बिहार सरकार वायु सेनाक ४  हेलिकप्टर, ८ सय ४० नाव आऽ सेनाक मदतिसँ युद्ध स्तरमे राहत कार्य भऽ रहल बतौलक अछि। मुदा  बाढिपीडित लाखो जनता एखनो बाढिमे फ़ंसल अछि। सरकारी सहयोग समेत अपर्याप्त रहल, बाढिपीडितक कहब छञि। बिहार सरकार एखन धरि कोशी क्षेत्रमे २८ आऽ समुचा राज्यमे ७६ गोटेक मृत्यु भेल जनौलक अछि। मुदा प्रभावित इलाकामे स्थानीयवासी बहुतो शव दहाइत देखल गेल कहैत अछि। बिहार सरकारक तथ्यांकमे कोशी बाढ़िसँ ७ सय ७५ गामक २३ लाख जनता प्रभावित भेल कहल गेल अछि। बिछियाक आर्तनाद पेटमे अन्न नईं, राहतलेल आकाशमे टकटकी लगौने आंखि, आङमे लत्ताकपडाक अभाव आ भोक्कासी ...। सभ अपन अपन पीडा सुना रहल अछि । पेटके राक्षस शान्त नई भेलाक बाद ओ त सौंसे आदमीएके खा लेलक । नवजात शिशु कत्तेक काल भुक्खे रहैत, ओकरा कोशीक कोरमे छोडिदेल गेल । कोशी सन बेदर्दी जगमे कोइ नइ लघुनाटकमे किछु एहने देखल गेल । मैलोरंगक आयोजनमे दिल्लीमे सेप्टेम्बर १२ क' मन्चित लघुनाटकमे कोशीक बिभीषिका देखएबाक प्रयास कएल गेल । नाटकमे राहतलेल मारामारी कएनिहार  जनता भुखसं मृत्युवरण करबाक बाध्यताके जीवन्त रुपमे प्रस्तुत कएल गेल। पीडितके रोदनसं दर्शक भावविह्वल बनल छल । मैलोरंग सेप्टेम्बर १२ सं १४ तारिखधरि मैथिली लोकरंग महोत्सव स्थगित कएलक अछि । कोशी क्षेत्रमे घुरैत मुस्कानकसंग महोत्सव आयोजन हएत मैलोरंग जनौलक अछि । संघर्षक कठिन बाट मैथिली साहित्यकार व्रजकिशोर बर्मा मणिपद्मक स्मृतिमे नयां दिल्लीमे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजन कएल गेल । एहि कार्यक्रममे मैथिली नाटक मन्चन हएबाक संगहि मिथिलांगन संस्थाक स्मारिका सेहो  विमोचन कएल गेल । मिथिलांगन साहित्यकार मणिपद्मक स्मृतिमे 'उगना हल्ट' नामक मैथिली नाट्क मन्चन कएने छल । ब्रज किशोर बर्मा मणिपद्म मैथिली साहित्यक चर्चित नाम अछि । लोक साहित्यक संरक्षणमे हुनक योगदान उल्लेखनीय मानल जाईत अछि । इएह योगदानक सम्मान करैत हुनका मैथिलीको वाल्टर स्काट सेहो कहल जाईत छन्हि । लोरिक, राजा सल्हेश, नैका बन्जारा जेहन लोकगाथाक संरक्षण करबामे  हुनक योगदान सराहनीय रहल कार्यक्रममे कहल गेल । मिथिलांगन एहिसं पहिने सेहो मणिपद्मक स्मृतिमे विभिन्न कार्यक्रम आयोजन करैत आएल अछि । तहिना त्रैमासिक मिथिलांगन पत्रिका सेहो प्रकाशनके निरन्तरता देल गेल संस्था जनौलक अछि । उगना हल्टक लेखक कुमार शैलेन्द्र आ निर्देशक संजय चौधरी छैथ । नाटकमे दिल्लीमे संघर्षरत मैथिली रंगकर्मीक जीवनक कटु सत्य देखएबाक प्रयास कएल गेल अछि । उगना हल्ट बिहारक मधुवनी जिलाक एक रेल्वे स्टेशनको नाम अछि , यद्यपि नाटकके परिवेश नयां दिल्लीक रंगकर्मीक अडडा मण्डी हाउसपर केन्द्रित अछि । स्थानीय पण्डौल आ सकरी बीचक स्टशन अछि उगना हल्ट । नाटकमे मैथिली भाषा संस्कृतिक संरक्षणलेल अपस्यांत नवतुरियाक कथा ब्यथा समेटल गेल अछि । वएह युवाक संघर्षक इतिबृत मे नाटक घुमैया । कियो संगीतकार बन' चाहैत अछि त कियो गीतकार, ककरो फ़िल्ममे हिरो बनबाक धुन सबार छइ त ककरो हिरोइन । अन्ततः कडा संघर्षक बाद सभ अपन लक्ष्य प्राप्त करबामे सफ़ल होइत अछि । नाटकमे संगठने शक्ति अछि आ  एहिसं सफ़लता पाबि सकैत छी से पाठ सिखएबाक प्रयास कएने छैथ नाटककार । छिरिआएल आ दिग्भ्रमित जंका बुझाईत पात्रक अभियान अन्तमे सफ़ल होइत अछि । अन्ततः नाटक सुखान्त अछि । जन्म : 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत। आलेख: मैथिली सामाजिक नाटकक मूल केन्द्र बिन्दु : नारी समस्या स्वातंत्र्योत्तर युगक अधिकांश नाटक सामाजिक विवर्तन पर लिखल गेल अछि। एहि नाटक सभक केन्द्र बिन्दु नारी समस्या रहल अछि। नारी वर्ग मे अशिक्षा, सामाजिक बिडम्बनाक रुपमे तिलक-प्रथा, बाल विवाह एवं बेमेल विवाहक परिणामस्वरुप उपस्थित समस्याक समाधानक लेल नाटककार लोकनि प्रेरित भेलाह तथा एहि विषय बस्तुकेँ अपन नाटकक कथ्य बना सुधारवादी भावनाक प्रचार-प्रसार कयलनि जाहिसँ समाज सुधारक जागरण जोर पकड़ि सकय। स्वातंत्र्योत्तर मैथिली नाटकमे समाजक अति यथार्थ प्रतिबिम्ब देखबाक हेतु भेटैछ। युग विशेषताक अनुसारेँ एहि कालावधिक नाटकमे नारीक विभिन्न रूपक प्रतिबिम्ब  हैब अत्यन्त स्वाभाविक अछि। एहि काल प्रारंभिक नाटकमे नारी संबंधी सहानुभूति ओ करूणाक स्पष्ट चित्र उपलब्ध होइत अछि। किछु नाटकमे तत्कालीन नारी जीवनक, परिवारक मर्यादामे ओकर यथार्थ चित्र अंकित कयल गेल अछि। मैथिलीक कतिपय नाटकमे नारीक वेदनामय रुप परिवारक अन्तर्गत उभरि कए सोझाँ आयल अछि। एहि कालक नाटककार सुधारक आँखिये समाज ओ परिवारक विभिन्न दोषकेँ देखलनि परिवारमे नारीक दुखमय जीवन हुनक सहानुभूतिक पात्र बनलीह। नारीक सभसँ पैघ मर्यादा ओकर पति तथा वैवाहिक जीवन थिक। कन्याक जीवन मध्यवर्गीय परिवारक हेतु चिन्ताक कारण बनि जाइत अछि। दहेजक समस्या नारीकेँ योग्य वर नहि भेटबामे कठिनता, कन्याकेँ ऋतुमति होएबासँ पूर्वहि विवाहक आवश्यकता जीवनक प्रत्येक क्षणमे मर्यादा रक्षाक चिन्ता, पतिक असामयिक मृत्युक कारणेँ विधवा बनि जयबाक संभावना ओ पराश्रित भ’ कए पतित होयबाक भय, असुरक्षित अवस्थामे समाजक कुदृष्टिक  शिकार हैबाक आशंका , वेश्या जीवन व्यतीत करबाक बाध्यता तथा कानूनी दृष्टिएँ पुरूषक एकाधिकार इत्यादि अनेक कारण अछि जे नारी जीवनक वेदनामय, यंत्रणामय ओ पीड़ामय कथा कहैत अछि। अतः स्वातंत्र्योत्तर कालक अधिकांश नाटककार तत्कालीन सामाजिक स्थितिमे नारीक यथार्थ रूपक अंकन कयलनि जे उपर्युक्त समस्यादिक संदर्भमे नारी-जीवनक चित्रण करैत अछि। भारतीय समाजमे नारीक स्थान समाजमे नारी आ पुरूष दुनूक समान महत्व अछि। जाहि प्रकारेँ एक पहियासँ गाड़ी नहि चलि सकैत अछि ओकरा चल’ क लेल  दुनू पहियाक ठीक होयब आवश्यक अछि, ओहिना समाज रूपी गाड़ी केँ चलयबाक लेल पुरुष आ नारीक स्थिति समान भेनाइ आवश्यक अछि। दुनू मे सँ जँ एकहु निर्बल अछि तँ समाजक उन्नति सुचारु रूपसँ नहि भ’ सकैत अछि। एक समय छल, जखन भारतमे नारीक स्थान बड़ आदरणीय छल। समाजक प्रत्येक काजमे ओकरा समान अधिकार छलैक। पुरूषक समानहि सभा, उत्सव आ अन्य सामाजिक काजमे भाग लेबाक ओकरा पूर्ण स्वतंत्रता छलैक। धार्मिक काज तँ हुनक सहयोगक बिना अपूर्णे मानल जाइत छल। ओहि समय नारी वास्तविक अर्थमे पुरुषक अर्द्धांगिनी छलीह। कोनहु काज हुनक सम्मतिक बिना नहि होइत छल। पुरूष सेहो ओकरा निरीह मानि अत्याचार नहि करैत छलाह। नारी सहो अपनाकेँ गौरवान्वित महसूस करैत छलीह तथा अपन चरित्र वा आदर्शकेँ उत्तम रखबाक प्रयास करैत छलीह। देशमे सीता, आ सावित्री सन देवी  घर-घरमे पाओल जाइत छलीह। समाजमे स्त्री शिक्षाक सेहो खूब प्रचार छलैक। मैत्रेयी, गार्गी, अपाला, विद्यावती, भारती सन विदुषी सँ गौरवान्वित छल। ओहि युगमे नारी वास्तविक अर्थमे देवी छलीह। समाजक लेल नारी गौरवक वस्तु छलीह। ओहि समयक साहित्यमे नारीकेँ स्पष्ट रूपसँ पूजनीय मानल जाइत छल। एहि लेल मनीषी द्वारा कहल गेल छल “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंतु तस्य देवताः”  अर्थात जतय नारीक पूजा आ आदर होइत अछि ओतय देवता विचरण करैत छथि। एहि प्रकारेँ संस्कृत साहित्यमे नारीकेँ आदर आ सम्मानक दृष्टिसँ देखबाक वर्णन अछि। समय परिवर्तनशील अछि। देशमे अनेक परिवर्तन भेल, धार्मिक, सामाजिक, आ राजनतिक क्रांति भेल एहि सभक प्रभाव नारी समाज पर सेहो पड़ल। मध्ययुगमे आबि कए नारीक पूर्ववत सम्मान नहि रहल। पूजनीय आ आदरणीय हेबाक स्थान पर ओ केवल उपभोगक वस्तु बनि कए रहि गेलीह। एमहर देशक राजनीतिक स्थितिमे  सेहो महान परिवर्तन भ’ रहल छल। विदेशी आक्रमण प्रबल भेल जा रहल छल। देश पर विदेशी सभ्यता आ संस्कृतिक प्रभाव पड़ल जा रहल छल। परिणामतः आब नारी पर अनेक प्रकारक बन्धन पड़’ लागल जकर कोनो कल्पना धरि नहि छल। हुनका पर अनेक प्रकारक सामाजिक बन्धन लाग’ लागल। हुनक स्वतंत्रता आब केवल घरक चौखटि धरि सीमित रहि गेल। आब ओ समाज आ साहित्यमे केवल मनोरंजनक वस्तु रहि गेलीह। जखन मुसलमानी शासन एहि देशमे दृढ़ भ’ गेल, तखन नारीक पतन सीमा आर बढ़ि गेल। मुसलमान जखन निश्चिंत भ’ क’ शासन करय लगलाह, तखन दरबारमे जतय महफिल जमय लागल, सुरा क दौर चल’ लागल ततय पायलक झनकार सेहो होम’ लागल। नारी आब कविक लेल श्रृंगारक वस्तु बनि गेलीह। कवि आब ओकर जननि रूप बिसरि कय ओकर नख- शिखक वर्णनमे डूबि गेलाह। हुनक अश्लील चित्रक अतिरिक्त एहि कालक साहित्यमे आर कोनहु स्थान नहि रहि गेल। आधुनिक युग जागृतिक युग थिक। देशमे जतय सामाजिक आ राजनीतिक क्रांति आयल ओतय नारी समाजकेँ सेहो उन्नतिक अवसर भेटलैक। वास्तवमे ई युग समानताक युग थिक। सत्य त’ ई थिक जे जाधरि नारीक उत्थान नहि हैत ताधरि देश आ समाजक उन्नति असंभव थिक। एक नारीक महानता समस्त परिवारकेँ महान बना दैत अछि। हमरा देशक सभ महान विभूतिक चरित्र निर्माण मे नारीक महत्वपूर्ण स्थान रहल अछि। आब ओ समय आबि गेल अछि जे नारी समाजक संग लागल सभ कुप्रथाक अंत कयल जाय। विधवा-विवाह हो वा पिताक संपत्तिमे कन्याक अधिकार हो, शिक्षाक क्षेत्रक बाधा हो वा पर्दा-प्रथाक सभ क्षेत्रमे जतेको बन्धन अवशेष अछि आइ ओहि सभ कुप्रथाकेँ समाप्त कर’ पड़त। जँ समाज नारीक महत्ताकेँ स्वीकार क’ ओकर सभ अधिकार ओकरा पुनः घुरा देत तखनहि देश पुनः ओहि गौरवकेँ प्राप्त क’ सकत जकरा लेल ओकर जगत्ख्याति प्रसिद्ध रहलैक अछि। एहि दिशामे जतय धरि मैथिली नाट्यकारक प्रश्न अछि, बुझाइत अछि ओ समाजक एकटा सजग प्रहरी जकाँ एहि भूमिकाक निर्वाह क’ रहल छथि। नारीक कारुणिक स्वरुप नारी, पत्नी वा मायक रुपमे भारतीय परिवारक मूल केन्द्रबिन्दु होइत अछि। एहि हेतु परिवारक उत्थान ओ पतनक इतिहासमे नारीक स्थितिक समीक्षा होएब अत्यंत प्रयोजनीय अछि। वैदिक युगसँ ल’ क’  आइ धरि परिवार मे नारीक स्थितिमे परिणामात्मक परिवर्तन भेल अछि। जतय धरि वैदिक युगक प्रश्न अछि भारतमे अन्य  सभ्यताक अपेक्षा नारीक स्थिति कतहुँ नीक छल। अन्य प्रचीन समाजमे नारीक संग निर्दयताक व्यवहार कयल जाइत छल। एतय धरि जे यूनान जे अपन संस्कृतिकेँ अति प्राचीन होयबक दावा करैत अछि, ओतहु नारीक स्थिति नीक नहि छल। इतिहासकार डेविस लिखैत छथि “एथेंस आ स्पार्टा मे नारीक सुखद स्थितिक कोनहुँ प्रश्ने नहि उठैत छल। स्पार्टा मे नारी पशुसँ किछुए उन्नत छल।”1 भारतीय मौलिक सामाजिक व्यवस्था विशेष कए मिथिलाक संदर्भमे नारीकेँ धन, ज्ञान, ओ शक्तिक प्रतीक मानल गेल अछि, जकर अभिव्यक्तिक रुपमे लक्ष्मी, सरस्वती ओ दुर्गाक पूजा एखनहुँ, घर-घर मे कयल जाइत अछि। नारीकेँ पुरुषक अर्द्धांगिनीक रुपमे स्थान देल गेल अछि, जकरा अभावमे पुरुष कोनहुँ कर्तव्यक पूर्ति नहि क’ सकैत अछि। मुदा आइ हमरा सभक दुर्भाग्य थिक जे वैदिक आ उत्तर वैदिक कालक पश्चात् हमरा समाजक मौलिक व्यवस्था रूढ़िक रुपमे परिवर्तित होम’ लागल तत्पश्चात् नारी मे लाज, ममता आ स्नेहक गुणकेँ ओकर कमजोरी मानि पुरुष वर्ग द्वारा ओकर शोषण करब आरंभ क’ देलक। पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्थामे नारीकेँ पुरुषक वासना-पूर्तिक एक साधन मात्र बुझल जाइत अछि। ई बात ओहि सभ जाति आ वर्गक लेल सत्य थिक जकर प्रणाली सामन्तवादी विचारसँ प्रभावित अछि। हमर सामाजिक जीवन मुख्य रुपसँ चारि क्रियासँ सम्बन्धित अछि- जनन, परिवारक प्रबंध, आ नेनाक सामाजिकरण। व्यावहारिक रुपमे एहि सभटा क्रिया पर पुरुषक एकाधिकार अछि। अधिकांश लोक द्वारा नारीक नोकरी करब, शिक्षा प्राप्त करब अथवा परिवारक प्रबन्ध मे हस्तक्षेप करब ने केवल संदेहक दृष्टिसँ देखल जाइछ अपितु अपन अहमक विरुद्ध सेहो मानैत छथि। एकैसम शताब्दीक तथाकथित  समतावादी समाजहुँमे नारी पर होम’ वला अत्याचारमे कोनो बेसी सुधार नहि भेल अछि, जखन की एहि अत्याचारमे परिवर्तन अवश्यंभावी भ’ गेल अछि। नारी एवं पुरुष समाजक समविभाग अछि। प्रत्येक क्षेत्रमे दूनूक समान अधिकार अछि। किन्तु समाजक संरचना एहन अछि जे पुरुष द्वारा नारीकेँ उत्पीड़ित करबाक प्रवृत्ति मैथिल समाजमे दृष्टिगत भ’ रहल अछि। जँ हम आन-आन भारतीय समाजक तुलना मैथिल समाजसँ करी तँ बुझना जाइछ जे मैथिल समाजमे नारीक उत्पीड़न समस्या कने बेसी गंभीर अछि। एहि कारण सँ पारिवारिक स्वरुप मे सेहो स्पष्ट परिवर्तन दृष्टिगोचर भ’ रहल अछि आ समाजमे नारीक स्थान नगण्य भेल जा रहल अछि। यथासमय खास क’ मैथिल समाजमे नारीक स्थितिमे नारीक समताकारी मूल्यमे परिस्थिति कोन तरहेँ प्रभावित कयलक आ क’ रहल अछि एहि संबंधमे सामाजिक नाटकक माध्यमे विभिन्न मैथिली नाट्यकार नारीक दशाक वास्तविक चित्रण अपन- अपन नाट्यकृतिमे करबाक प्रयास कयने छथि जकर चर्चा निम्न रुपेँ कयल जा सकैत अछि। शारीरिक प्रताड़ना शारीरिक प्रताड़नाक रुपमे हिंसाक बढ़ैत समस्या केवल भारते धरि सीमित नहि अछि अपितु संसारक अधिकांश देशमे ई समस्या गंभीर भेल जा रहल अछि। “कनाडा मे प्रति चारि नारी पर एकक संग मारि-पीटक घटना होइत अछि। बैंकाकमे आधा नारी अपन पति द्वारा पीटल जाइत छथि। अमेरिका सन विकसित देश मे सेहो ई समस्या गंभीर अछि।”2 एकटा नवविवाहिता  जाहि संरक्षण प्रेम आ सहयोगक भावना ल’ क’  नव घरमे अबैत अछि ओतय पति, सास वा परिवारक अन्य सदस्यक द्वारा पीटल गेला पर ओकरा कतके असह्य वेदना होइत हैतेक तकर अनुमान हम आसानीसँ नहि लगा सकैत छी। नारीकेँ शारीरिक रुपसँ प्रताड़ित करबाक पाछू पारिवारिक कलह, पारिवारिक विघटन, पारस्परिक अविश्वास आ गरीबी अछि। मैथिली नाटकमे कतिपय नारीक वेदनाक रुप पारिवारक अन्तर्गत उभरि कय आयल अछि। मैथिली नाटककार सुधारक आँखिये  समाज ओ परिवारक  विभिन्न दोषकेँ देखलनि अछि। परिवारमे नारीक दुःखमय जीवन हुनक सहानुभूतिक पात्र बनलीह। गोविन्द झाक ‘बसात’ नाटक मे सुगिया अपन पतिकेँ परमेश्वर मानि सेवा करैछ। ओ सामाजिक जीवनकेँ व्यवस्थित रखबाक हेतु अपन सम्पूर्ण परिवारक भार उठौने छथि तथापि ओ अपन पति द्वारा प्रताड़ित होइत छथि--- सुगियाः  “मड़ुआ उलबैय छलियै। एलैय हल्ला करैत जलखै ला,जलखै                       ला, हम कहलियै, कोनदन कमाइ क’ के एलाह जे जलखै    दिऔन। की बस, ठामहि चेरा उठा केँ पिटपिटा देलक।”3 विडम्बना ई थिक जे इ समस्या केवल ग्रामीण , गरीब आ अशिक्षित नारिये धरि सीमित नहि अछि अपितु शिक्षित मध्यवर्गीय ओ नगरीय परिवारहुँ मे नारीक कमोबेश यैह स्थिति अछि। यौन उत्पीड़न मैथिली नाटकक अध्ययन ओ अनुशीलनक उपरांत जे एक समस्या स्पष्ट दृष्टिगोचर होइत अछि ओ थिक नारी पर होम’ वाला अत्याचार ओ शोषण। मर्यादा, चरित्र कर्त्तव्यपरायण, त्याग, सहनशीलता, शील ओ अन्य गुण  सँ महिमामंडित क’ जाहि सुन्दर ढंगसँ पुरुष समाज ओकरा संग छल कयने अछि ओहिमे स्त्रीकेँ सेहो पता नहि चलि सकल जे ओ शोषित भ’ रहल अछि। उत्सर्गक नाम पर पुरुष ओकरासँ सभ किछु माँगैत रहल आ ओकरा लूटैत रहल। नारी कतहुँ महानतासँ विभूषित होयबाक गर्वक मोहसँ ओकरा पर अपनाकेँ निछावर करैत रहल त’ कतहु परिस्थितिवश। मुदा ई स्त्रीयजनित गुण जतय ओकरा लेल एक दिस हथियार सिद्ध भेल ओतहि दोसर दिस ओकर यैह गुण , ओकर कमजोरी, विवशता, लाचारी ओ पतनक कारण सेहो बनल। नारी शोषणक सभसँ घृणित रुप थिक ओकर यौन शोषण। ई एक प्रकारक गहन मानसिक शोषण थिक जे शारीरिक यातनाहुँ सँ बेसी पीड़ादायक अछि। डॉ. प्रबोध नारायण सिंह द्वारा लिखित एकांकी नाटक ‘हाथीक दाँत’ क नेता महिला आश्रमक संरक्षिका बिजली देवीक सहयोगसँ खूब टकाक संग्रह करैत छथि आ जखन ओहि टकामेसँ बिजली अपन कमीशन माँगैत छथि तँ नेताजी बनावटी प्रेमीक रुप धारण कय बिजलीक संग आलिंगनबद्ध भ’ जाइत छथि आ कहैत छथि कतेक टका लेब, ई कपटी नेता चरित्र भ्रष्ट अछि। ई टकाक लोभ देखा बिजलीक संग अनैतिक संबंध त’ रखनहि छथि, बिजलीयेक सहयोगसँ अपन वासनाक भूखकेँ रोहिणी नामक एक युवतीसँ शान्त करैत छथि। परिणाम स्वरुप ओ असहाय लाचार युवती गर्भवती भ’ जाइत अछि। आब ओ बिजलीकेँ परामर्श दैत छथि जे----“धुर औषध कहि के किछु पुड़िया खोआ दियौक ने ?4 वर्तमान समाजमे उच्चवर्गक लोक द्वारा नीच वर्गक स्त्रीक संग कोना यौन अत्याचार करल जाइत अछि तकर स्पष्ट चित्र हमरा भेटैछ कांचीनाथ झा ‘किरण’ द्वारा लिखित ‘कर्ण’ नामक एकांकीमे यद्यपि एकांकीक कथानक आ पात्र पौराणिक अछि मुदा एकांकीकार लाक्षणिक रुपमे सूर्यकेँ उच्च वर्ग आ कुन्तीकेँ अछोप वर्ग मानि समाजमे घटि रहल यौन उत्पीड़न दिस समाजक ध्यान आकृष्ट कयने छथि। एहि एकांकीक माध्यमे समाजमे पैघ लोक कहओनिहारक गुप्त भ्रष्टताक भण्डाफोड़ कयल गेल अछि। देव अर्थात् उच्च वर्गक लोक जे नीच वर्गक संग विवाह तँ नहि क’ सकैत अछि मुदा गुप्त रुपसँ सम्भोग आ सम्पर्क क’ सकैछ जकर कुत्सित परिणाम भोग पड़ैत छैक नीच वर्गक लोककेँ। सूर्यः       हम देवता छी। देवता मनुक्खक बेटीकेँ....... कुन्तीः   (उत्तेजित स्वरमें) मनुक्खक संगे भोग-विलास कयने देह        नहि छूतई छनि आ देस छुति जयतनि ? सूर्यः     (विरक्त स्वरमे) मनुक्ख एखन तन-मन-धन लगा क’ देवताक   पूजा करैत अछि-- मरलाक बाद स्वर्ग जयबाक लेल। जीबैत स्वर्ग जयबाक कल्पनो नहि करैत अछि। मनुक्खक बेटीकेँ स्त्री बना क’ स्वर्ग ल’ जाय लगबैक तँ ओ भाव रहतैक ? कुन्तीः    (अप्रतिभ स्वरमे) तखन मनुक्खक कन्याक संग सम्पर्के किएक  करैत छी ? सूर्यः      (हँसि) आनन्दक लेल ? मनुक्खकेँ मनुक्ख बना क’ राखैक      लेल। कुन्तीः     (गह्वरित स्वरेँ) आ जँ संतान भ’ जाइत होइत त’ ओ मनुक्खे  भ’ क’ रहैत होयत। सूर्यः       हँ, मनुक्खक पेटक देवता कोना होयत ? 5 अरविन्द कुमार ‘अक्कू’ क नाटक ‘रक्त’ (1992) मे अवैध सन्तानोत्पतिक भयावह परिणाम सँ समाजकेँ एकटा चेतावनी देल गेल अछि। एहि घृणित सामाजिक विभीषिका पर नाटककार कहेन प्रकाश देने छथि से द्रष्टव्य थिक----- किसुनः    “तोहर तँ गप्पे अनटटेल होइछ। हौ सड़कक कातमे गरीबक नै तँ धनिकक नेना फकेल रहतैक?”6 तृप्ति नारायण लालक नाटक ‘सप्पत’ मे समाजक एक दुःष्चरित्र व्यक्ति श्रीकान्त, हरिजन युवती नीलमकेँ अपन प्रेमजालमे फँसा ओकर सतीत्व भंग करैछ जाहि करणेँ ओ समाजमे मुँह देखयबाक योग्य नहि रहि जाइत अछि। अन्ततः कोठा परक नारकीय जीवन जीबाक लेल बाध्य होम’ पड़ैत छैक। महेन्द्र मंगगियाक ‘लक्ष्मण रेखा खण्डित’ मे सेहो एहि विषय पर दृष्टिपात कयल गेल अछि---- मनोजः     “हँ, एना सकपकेलेँ किएक ?  दरोगा साहिब इएह ओ शैतान छी जे कतेको बेटी-पुतोहुक इस्त्रीकेँ लोभ आ बलात्कारसँ भ्रष्ट करैत आयल अछि। गाममे हरदम एकटा ने एकटा उधवा मचबैते रहैत अछि जाहिसँ लोक अशांत अछि।”7 एहि तरहेँ कहल जा सकैछ जे आधुनिक समाजमे नारीकेँ कहक लेल भनहि देवी आ दुर्गाक दर्जा देल गेल अछि, मुदा पुरुषक वासना शिकार ओ कोना भ’ रहल छथि एहि विषय वस्तुकेँ मैथिली नाटककार बड़ सजीव चित्रण कयने छथि। बाल विवाह बाल-विवाहक तात्पर्य विवाहक ओहि प्रथासँ अछि जाहिमे रजोदर्शन सँ पूर्वहि कन्याक विवाह कइल जाइत अछि। अनेक धर्मशास्त्रक नामपर मध्यकालहिसँ जाहि विश्वासकेँ बढ़ावा देल गेल जे कन्याकेँ रजस्वला होम’ सँ पूर्व जँ विवाह नहि कयल गेल तँ एहि सँ माता-पिताकेँ महापाप होइत छैक। एहन विवाह कतके हास्यास्पद अछि से एहि बातसँ स्पष्ट भ’ जाइत अछि जे हमरा कोनहुँ मूल धर्म ग्रंथमे बाल-विवाहक कोनहुँ निर्देश नहि देल गेल अछि । तथापि ई व्यवस्था आइयहुँ मिथिलामे व्याप्त अछि। बाल-विवाहक प्रचलन मैथिल समाजमे चाहे जाहि परिस्थितिसँ भेल हो मुदा एहि कुप्रथाक कारणेँ आइ समाजमे कतोक प्रकारक गंभीर दोष उत्पन्न भ’ गेल अछि। एक दिस जँ कन्याक अपरिपक्व आयुमे नेनाक पालन-पोषणक भार आबि जाइत अछि तँ दोसर दिस दुर्बल स्वास्थ्य हेबाक कारणेँ लाखक लाख मायक मृत्यु प्रसवक समय भ’ जाइत छैक। एहि समस्याक कारणेँ मैथिल समाजक कन्यामे शिक्षाक दर बहुत निम्न भ’ गेल छैक किएक तँ बाल- विवाहक कारणेँ ने त’ ओ शिक्षा प्राप्त क’ सकैत अछि आ ने एकरा जरूरी बूझल जाइत अछि। एहि प्रथाक कारणेँ विवाह एकटा संयोग मात्र बनि कए रहि गेल अछि। एहिमे उमिरक असमानता हेबाक कारणेँ एक दिस जँ यौन-लिप्सा अतृप्त रहि जाइत अछि तँ दोसर दिस बाल-वैधव्य आ तकर परिणामस्वरूप वेश्यावृति आदि सन समस्यासँ समाज ग्रसित भ’ जाइत अछि। एहना स्थिति मे नारीक जीवन  नारकीय भ’ जाइत अछि। मैथिली नाटकमे बाल-विवाहक समस्या ल’ क’ कतोक नाटककार अपन नाट्य रचना कयने छथि, एहिमे एकटा बानगी प्रस्तुत अछि ‘त्रिवेणी’ क नायिका दुर्गाक जनिक विवाह छओ वर्षक उमिरमे पैंतालीस वर्षक बूढ़सँ क’ देल जाइत छैक । कन्याक पिता मधुकान्त पन्द्रह  हजार टकाक लोभमे अपन फूल सन कन्याक विवाह एहन वरक संगे क’ दैत छथि जे विवाहक चारिये मासक पश्चात् ओ विधवा भ’ जाइत अछि। नायिका दुर्गा जखनहि बाल्यावस्थाकेँ पार कए युवावस्थामे प्रवेश करैत छथि हुनक देओर नरेश हुनका अपन वासनाक शिकार बनाब’ चाहैत छथि जे दुर्गाकेँ मान्य नहि छनि। अन्ततः ओकरा शरीर पर पेट्रोल ढ़ारि कए आगिमे स्वाहा क’ देल  जाइत छैक। कन्याक भावी दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण हुनक माय मधुकलाक शब्दमे एना देखल जा सकैछ-- मधुकला—    “(उग्र भावेँ) बाप रे बाप ! एहन अन्हेर गप्प कतहुँ सुनल अछि। एक दिस छओ वर्षक पत्नी आ दोसर दिस पैंतालीस वर्षक पति। बड़ अन्हेर होइत अछि। हमर बेटीकेँ ओ बाप सदृश बुझि पड़तैक, नहि कि पति सदृश। हम अपन बेटीक विवाह ओकरासँ नहि करब।’’8 मुदा आश्चर्यक विषय थिक एखनहु समाजमे बाल विवाह भ’ रहल अछि जकर दुष्परिणाम समाज भोगि रहल अछि मुदा ओकर आँखि नहि फुजैत छैक। दहेज मैथिल समाजमे घरेलू हिंसाक सबसँ व्यापक रूप दहेजक कारणेँ नारीकेँ देल गेल यातना आ ओकर हत्याक रूपमे आयल अछि। आश्चर्यक गप्प थिक जे दहेज निरोधक अधिनियम बनि गेलाक पश्चातो विभिन्न समुदायमे कन्या पक्षसँ बेसीसँ बेसी दहेज प्राप्त करबाक प्रचलन समाजमे बढ़िये रहल अछि। अधिकांश माय-बाप वर-पक्षक इच्छानुकूल दहेज देब’ मे असमर्थ रहैत छथि। विवाहक पश्चातो विभिन्न अवसर पर कन्याक माता-पितासँ ओकर सासु-ससुर द्वारा विभिन्न वस्तुक माँग करब एक स्वाभाविक प्रक्रिया बनि गेल अछि। जँ नवविवाहिता अपन माय-बापसँ ओ वस्तु नहि आनि सकैत छथि  तँ ओकरा सासुर पक्ष द्वारा कतोक प्रकारक मर्मस्पर्शी ताना सुन’ पड़ैत छैक। बात-बात मे ओकरा अपमानित कयल जाइत अछि। ओ भाँति-भाँतिक लाँछन सेहो लगाओल जाइत छैक। एतबे नहि ई प्रक्रिया ता धरि चलैत रहैत छैक जाधरि ओ सासुर वलाक इच्छाक पूर्ति नहि क’ दैछ। दहेजक कारणेँ भारतीय नारीक केहन दुर्दशा होइत छैक तकर चित्रण हमरा सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी क ‘लेटाइत आँचर’ क नायिका ममताक करूण चीत्कार मे भेटैत अछि--- ममता : “अहाँ हमरा खत्तामे फेकि देलौं। ओकरा रेडियो, साइकिल नै    देलियै, ओ दोसर मौगी बेसाहि आनलक। बाबू अहाँ देखलिए ऐ ओकरा ? हम एतहिसँ सभ दिन देखै छियै। ओ सब दिन हमरा लग अबैए, सब दिन हमरा छाती पर आबि कए बैसि जाइए, हमरा छाती पर बैसि कए जाँत पिसैत रहैये । अहाँ ओहि मौगीकेँ कहियो देखने छियै ?” 9 पर्याप्त दहेज नहि देबाक कारणेँ ममता सन नारीक केहन विक्षिप्त अवस्था      भ’ जाइत छैक से स्वतः अनुमान कयल जा सकैछ। एतबे नहि एहि पैशाचिक व्यवस्थाक प्रति मोनमे ततेक ने डर समा जाइत छैक जे ओ दोसरहुकेँ एहि परिणामक भविष्य भोक्ता  रूपमे देखि सिहरि जाइत छैक— ममता : “भैया, बाउक ससुर जँ बाउकेँ मेटरसाइकिल नै देतै तँ बाउ            अपन कनियाकेँ छोड़ि देतै ? एत’ कहियो नै आब’ देतै ?......अहाँ नै बाजै छी बाउ, तोहीं कह’ छोड़ि देबहक ?”10 जाहि परिवारमे ममता सदृश दहेजक मारलि कन्या छैक ओहो अपन पुत्रक विवाहमे टकाक लेन- देन उचिक बुझैत छथि। तिलक दहेजक कारणेँ मैथिल ललनाकेँ एहन दुष्परिणाम भोग’ पड़ैत छैक जे “कनियाँ – पुतराक” नायिका सत्यानाशी दहेज प्रथाक मारिसँ बताहि भ’ जाइत अछि, जाहिसँ सर्वगुण संपन्न भेलो उत्तर ओकरा पति द्वारा दाम्पत्य सुख नहि भेटैत छैक। फलस्वरूप यौवनावस्थामे ओ बताहि भ’ कनियाँ- पुतरा खेलाइत रहैत छैक। द्रष्टव्य थिक ओकर इ वेदना आ अतृप्त लालसा--- निर्मला--- “ठगै छी। (मायसँ) सुनही माँ ! पिपही बाजै छै कि नहि.....? माँ कनियाँ पुतराक विवाह हेतैक की वर कन्याक ? नहि, नहि कनियाँ-पुतराक...कनियाँ-पुतराक ह- ह- ह- ह-”11 पर्याप्त दहेज नहि लयबाक कारणेँ कन्याकेँ एतेक प्रताड़ित कयल जाइत अछि जे ओ प्रायः आत्महत्या धरि क’ लैत अछि। एतबे नहि कखनहु-कखनहु तँ दहेजक लोभमे लोक अपन पत्नी केँ घरक आन सदस्यक संग मिलि कए हत्या सेहो क’  दैत छैक। एहन भावनाक परिचय हमरा मणिपद्म लिखित एकांकी नाटक ‘तेसर कनियाँ’ मे भेटैत अछि जाहिमे दहेज प्राप्त करबाक लेल तरूण पीढ़ी एवं ओकर माय-बाप नरभक्षी बनि दू-टा कन्याकेँ सुड्डाह क’ देलक। एतय दहेज पीड़िताक करूण चीत्कार सुनल जा सकैत अछि---- षोडसीः  “हम जीबय चाहै छी राजा,  जीबय चाहैत छी, हमरा खोलबा     दिअ। रातिए एहि रोगी वृद्धसँ हमर विवाह एहि कारणेँ भेल जे हमरा सुलक्षणा हेबाक कारणेँ ई नहि मरताह। हाय रे सुलक्षणा ! रातिमे विवाह भेल आ आइ हम जरय जा रहल छी। वृद्धाः     चुप पपिनियाँ। षोडसीः   हमरा बचा लिय राजा, हम जीबय चाहै छी।”12 एहि कुप्रथा आ अनैतिक व्यापारसँ क्षुब्ध भ’ नाटककार स्वयं कहैत छथि— “आरे तिलक आ दहेजक पिशाच, एहि देशक नारीत्वकेँ आ   सिनेहसँ पोसल बेटी सभकेँ सुआदि-सुआदि खो।”13 भारतक संदर्भमे दहेजक कारणेँ घरेलु हिंसाक समस्याकेँ एहि चौंकाब’ वला तथ्यसँ बुझल जा सकैत अछि। मानव संसाधन विकास मंत्रालयक एकटा आँकड़ासँ स्पष्ट होइछ जे एतय प्रतिदिन सोलह नारीक दहेजक कारणेँ हत्या होइत छैक, लगभग सत्तरि प्रतिशत ग्रामीण आ नगरीय परिवार एहन अछि जाहिमे कोनो ने कोनो रुपमे नारीक विरुद्ध हिंसा भ’ रहल छैक। वेश्यावृत्ति वेश्यावृत्ति भारतीय  समाजक कैंसर थिक। एहि ज्वलंत समस्यासँ हमर समाज तेनाने ग्रसित अछि। जे ने ओकरा आत्मसात करबाक शक्ति छैक आ ने ओकरा अन्त करबाक सामर्थ्य छैक। एतबा तँ निर्विवाद रुपेँ स्वीकार कयल जा सकैछ जे क्यो नारी जन्मजात वेश्या नहि बनैत अछि, प्रत्युत परिस्थितिक मारिक कारणेँ ओ एहि धन्धाकेँ स्वीकार करैत अछि जकर कतिपय सामाजिक पृष्टभूमि थिक जे एकर निर्माणमे समान रुपेँ सहयोग प्रदान करैत आयल अछि। वेश्याक ने सामाजिक मर्यादा छैक  आ ने सामाजिक प्राणी ओकरा इज्जतिक दृष्टिसँ देखैत अछि। तथापि ओकर समाजिक पक्ष एहन अछि जे क्यो स्वेच्छया तँ क्यो परिस्थितिसँ लाचार भ’ समाजमे जीवित रहबाक हेतु एहि धन्धाकेँ स्वीकार क’ लैत अछि। उत्कर्ष युगक मैथिली नाटककार नारीकेँ उच्छृंखल ओ स्वच्छन्द रुपमे देखबाक आकांक्षी नहि छथि, किएक तँ जीवनक गहन अध्ययनक पश्चात् ओ अनुभव कएलनि जे समाजक आधार नारी थिक। किन्तु स्त्रीक प्रति पुरुषक  कुत्सित  मनोवृत्तिमे अद्यापि कोनो परिवर्तन नहि देखबामे अबैत अछि। पारिवारिक जीवनमे अपन अस्तित्वसँ प्रसन्नता आ संतोष उत्पन्न कएनिहारि नारीकेँ डेग-डेग पर पतिसँ समझौता करय पड़ैत छैक। आधुनिक समाजमे कतिपय एहन पति छथि जे पत्नीकेँ पत्नी नहि बुझि केवल हार-माँस वाली नारीक रुपमे देखैत छथि। ओ अपन स्वार्थ सिद्ध करय लेल पत्नीकेँ अनुचित यौन व्यापार कर’ लेल प्रोत्साहित करैत अछि जकरा वेश्यावृत्तिक नाम देब सर्वथा उचित बुझना जाइत अछि। नोकरीमे पदोन्नति प्राप्त करबाक लेल नारीक सदुपयोग करबाक प्रवृत्तिक दिग्दर्शन हमरा नचिकेताक ‘नाटकक लेल’ मे भेटैत अछि। एकर पात्र शंकर सतीकेँ वेश्यावृत्तिक दिस धकेलि रहल छथि। सतीक संस्कार इच्छा  एवं मानसिकता सर्वथा एकर विरोध करैत अछि, किन्तु पुरुष प्रधान समाजमे ओकर महत्व नहि रहि जाइत अछि। ओ अपन इच्छाक प्रतिकूल पर-पुरुषक अंक-शायिनी बनैत अछि जे ओकर निरीहताक परिचायक कहल जा सकैछः- सतीः “(क्रोधसँ असंवृत भए चीत्कार करैत) अहाँ हमरा वेश्या बना रहल छी,अहाँ अपन प्रेमकेँ बेचि रहल छी, अहाँ हमरा समस्त प्रेम-प्रीतिक गला घोंटि देने छी, अहाँक हाथमे तकर चेन्ह अछि। क्षमताक लालसामे अहाँक सभ बातसँ दुर्गंध बहरा रहल अछि।”14 नारी शोषणक विरुद्ध अपन नाटक ‘नायकक नाम जीवनमे’ नचिकेता समाजपर व्यंग्य कयने छथि। नवलः     “हम नहि जनैत रही, हमर मुहल्लाक मानल लोक सब        रातिक पहरमे  जाहि कोठा सबसँ घुरथि छलथि ओहि महक वेश्या सब कालू सरदारक अधीन छैक।’’15 चौधरी यदुनाथ ठाकुर ‘यादव’ क नाटक ‘दहेज’ मे सेहो वेश्यावृत्तिक चित्र उपस्थित कएल गेल अछि। नाटकक नायक रघुनन्दन अपन विवाहिता पत्नी दुलरीकेँ छोड़ि मोती (वेश्या) क संग वेश्यागामी भ’ जाइत अछि-- रघुनन्दनः  “तुम्हारी और तुम्हारी खुबसुरती के अलावा मेरे लिए  सोचने    का मसाला ही कौन सा है ? मोतीः      (सलाम करैत) मैं निहाल हुई मेरे राजा। रघुनन्दनः  निहाल यों हुआ जाता है ? मेरे पहलू मे बैठो, मेरे जलते हुए जिगर पर मरहम डालो। तर होने दो मेरे प्यासे लबों को, अपने लवों और शरबते अनार से।”16 एहि तरहँ हम देखैत छी आजुक समाजमे कोना नारीकेँ विवश कयल जाइत छैक वेश्यावृत्तिक लेल। उन्मेष युगक नाटककार एहि रोगक पर्दाफाश कयलनि ओ संगहि चेतावनी द’ रहल छथि एहि कुप्रथाकेँ सुधारबाक हेतु। स्त्री - पुरूष संबंधक नव आयाम वर्तमान समयमे हमरा समाजमे प्रत्येक स्तर पर भ’ रहल परिवर्त्तन केँ लक्षित कयल जा सकैत अछि। ई परिवर्तन नवीन विचारधाराकेँ जन्म देलक जाहिसँ स्त्री-पुरूषक संबंधकेँ बेसी प्रभावित कयलक । हमरा समाजक धूरि परिवार थिक आ परिवारक धूरी पति-पत्नी। एहि तरहेँ ओकरा आपसी संबंधमे आयल परिवर्तनक प्रभाव परिवार ओ समाज पर पड़ब स्वाभाविके अछि। प्रारंभमे पति ओ पत्नीक परस्पर रिश्तामे पतिकेँ ऊँच स्थान प्राप्त छलैक आ ओकर तुलना परमेश्वर सँ कयल जाइत छलैक। शिक्षाक अभावमे पत्नीक जीवन पूर्णरूपेँ पति पर आश्रित छलैक एहि कारणेँ ओ पतिक संग अपन संबंधमे कोनो तरहक परिवर्तन लाब’ मे असमर्थ छलीह। जँ पति अपन अधिकारक दुरूपयोग क’ ओकर उपेक्षा ओ तिरस्कार करैत छल तैयहु ओकरामे ओतेक साहस नहि छलैक जो अपन संग भ’ रहल अन्यायक प्रतिकार क’ सकय। जेना-जेना शिक्षाक प्रति नारीक जागरूकता बढ़ल गेलैक आ नारी शिक्षित होमय लगलीह तहिना-तहिना पति-पत्नीक परस्पर रिश्ता सोहो प्रभावित होमय लागल। किएक तँ शिक्षा नारीकेँ अपन अस्तित्व आ अधिकारक प्रति जागरूक बनैलक। जखन ओकरामे अधिकारक प्रति जागरूकता बढ़लैक तखन ओकरा लेल आवश्यक भ’ गेलैक जो ओ अधिकारक रक्षा करय आ अन्याय भेला पर ओकर विरूद्ध अपन आवाज उठा सकय। आ ई तखने संभव अछि जखन ओ आत्मनिर्भर हो, परिणामस्वरूप नारी शिक्षित होमक संगहि-संग आत्मनिर्भर सेहो होम लागल। गोविन्द झाक नाटक ‘बसात’ मे हमरा एहि दृष्टिकोणक आभास भेटैत अछि। एहि नाटकक नायक कृष्णकान्त एक आदर्शवादी युवक छथि। हुनक पिता फलहारीक पुत्री फुलेश्वरी सँ हुनक विवाह कर’ चाहैत छथि, मुदा कृष्णकान्त अशिक्षिता फुलेश्वरी पर अशिक्षत होयबाक कटाक्ष करैत छथि आ घरसँ पड़ा जाइत छथि। फुलेश्वरी एहि अपमानकेँ एकटा चुनौतीक रूपमे स्वीकार करैत छथि तथा ओ घर सँ बाहर भ’ शिक्षा प्राप्त करैत अछि आ समाज सेवा करैत अछि। जोतखीजी द्वारा पुष्पा (फुलेश्वरी) क चरित्रकेँ उद्घाटित करैत छथि----- बमबाबा--- “वाह वाह ! बेटी, तोहर सफलता पर आइ हमरा अपार हर्ष भ’  रहल अछि, आ कतेक अबलाकेँ सबला बना रहल अछि। आब हमरा विश्वास भ’ गेल। आइ नहि काल्हि तोहर प्रतिज्ञा अवश्य पूरा हेतौक—एक दिन फेर मिथिलाक महिला भारतक आदर्श महिला कहाओत।”17 एहि तरहेँ हम कहि सकैत छी जे शिक्षा ,पाश्चात्य संस्कृति ओ सभ्यताक प्रभाव, स्त्री-पुरूषक समानता आ स्वतंत्रताक भावना नारीमे स्वातंत्र्य भावक जन्म देलक। व्यक्तित्व विकासक संगहि संग ओकर बाहरी दुनियाँ मे हस्तक्षेप बढ़’ लागल एहि तरहेँ नारीक बदलैत परिस्थिति, समाजक बदलैत मूल्य दृष्टि, नव नैतिकता बोध, स्त्री-पुरूषक परस्पर रिश्ताक आयामहि केँ बदलि देलक। पुरूषक प्रति विद्रोहक भावना आधुनिक सामाजिक मैथिली नाटक मध्य नायिकाक चरित्रविकासमे पुरूष-समाजक प्रति विद्रोहक स्वर अनुगुंजित भ’ रहल अछि। ओ परिवारर ओ समाजक बन्धनकेँ ठोकर मारबाक हेतु एकर विद्रूप ओ परिहासकेँ ध्यान नहि द’ अपन व्यक्तित्वक विकासक हेतु शिक्षा ग्रहण करबाक क्षमता दिस आकर्षित भेलीह अछि। एहन नारी अपन विचार ओ अपन व्यक्तित्वकेँ महत्व देलनि तथा वैवाहिक बन्धनकेँ तोड़बाक हेतु तत्पर भ’ गेलीह जकर परिणाम एतबा अवश्य भेल सामाजिक परिप्रेक्ष्यमे एहन परिवारक जीवन अत्यधिक नारकीय बनि गेल अछि। एहन नारीक ध्वंसात्मक ओ विद्रोहत्मक पक्ष अत्यंत सशक्त अछि। एहि हेतु मात्र पुरूषकेँ दोष नहि देल जा सकैछ प्रत्युत ओहि समाज व्यवस्थाक अछि जाहिमे हमर परंपरा बनल अछि जकर फलस्वरूप नारी-पुरूषक स्वस्थ सामंजस्य अधुनातम संदर्भमे अत्यंत दुष्कर भ’ गेल अछि। पुरुष विरोधसँ सामाजिक व्यवस्था पर आघात करैत अछि तँ संभवतः एकांगीकता ओ विक्षिप्तताक आरोप सँ नारी बाँचि सकैत अछि। स्वतंत्र्योत्तर नाटककार किछु एहन नारी चरित्रक अंकन कयलनि जे अपवाद भूत रुपमे चतुर कर्तृत्ववान, मेधावी आ तेजस्वी छथि। पुरुष हुनका समक्ष दुर्बल ओ आत्मकेन्द्रित देखाओल गेल  छथि।  पत्नी, पति पर हावी रहब श्रेयस्कर बुझैत छथि--- रजनीः--- “हुँह....मान मर्यादा। अहाँकेँ जतेक चिन्ता माय-बापक मान-  मर्यादाक तकर दशांशो यदि हुनका लोकनिकेँ अहाँक चिन्ता रहितियन्हि दँ बुझितहुँ आइ धरि ओ की कएलनि अछि अहाँक लेल ?”18 व्यावहारिक रुपसँ पुरूषक विरोधक परिणामकेँ अन्त धरि ल’ जा कए विचारब आवश्यक अछि किएक तँ स्वस्थ ओ मानवाली नारीक यौन- वासनाक पूर्तिक समस्या एहिसँ सम्बद्ध अछि। नारी स्वातंत्र्यक आकांक्षा संभवतः पुरूषसँ पृथक रहिक पूर्ण भ’ सकैछ , किन्तु नारीक नैसर्गिक भावना कोना चरितार्थ हैत। एहन नारी व्यवहार शून्य भ’ जाइत अछि तथा परिस्थितिक अंतरंगताक अनुभव क्षमताक अभाव रहैछ जाहिसँ हुनक विद्वता निरर्थक प्रमाणित भ’ जाइत अछि। एहन स्वरूपक वास्तविक चित्र उपलब्ध होइत अछि परित्यकता ममताक चरित्रमे। पिताक हेतु सब सन्तान एक समान होइत अछि मुदा ‘लेटाइत आँचर’ मे दीनानाथ अपन तीनू संतानक प्रति तीन दृष्टि रखने छथि जकर वास्तविकताक उद्घाटन ममताक कथनसँ स्पष्ट भ’ जाइत अछि--- ममताः— “अहाँ बच्चा भैयाकेँ दुरदुरौने रहैत छियनि.... लाल भैयाक  लल्लो-चप्पो मे लागल रहै छी....जे काल्हि डॉक्टर बनताह तनिका छनन-मनन खोअबैत छियनि।”19 समाजक नींव परिवार छैक आ परिवारक आधारशिला पति-पत्नी। पति-पत्नीक परस्पर विश्वास, समझदारी ओ सहयोगहिसँ परिवार सुखी भ’ सकैछ। जँ दुनूमे सँ एकहुँ पंगु भ’ जायत तँ परिवाररुपी गाड़ीक दुर्घटना हेबाक संभावना बढ़ि जाइत अछि। ताहि हेतु आब पुरुषहुँ केँ सोच’ पड़तैन्हि जे नारीक संग मानसिक समायोजन आब अत्यंत आवश्यक भ’ गेल अछि। शिक्षाक प्रति नारीक बदलैत दृष्टिकोण कोनो देश समाज अथवा जाति तावत धरि सभ्य नहि बुझल जायत जाधरि ओहि देश, समाज, अथवा जातिमे नारीक आदर नहि हेतैक। जँ पुरुष देशक भुजा थिक तँ नारी हृदय, जँ पुरुष देशक हेतु दीप थिकाह तँ नारी दीपकक तेल जँ पुरुष द्वारक सुन्दरता छथि नारी घरक प्रकाश, जँ एकक बिनु द्वार सुन्न लागैत अछि तँ एकक बिन घर अन्हार। वैदिक युगमे पुत्रीक शिक्षाक ओतबे महत्व छल जतबा कि पुत्रक। ऋग्वेदमे शिक्षित स्त्री-पुरूषक विवाहहि केँ उपयुक्त मानल गेल अछि। पिता द्वारा कन्याकेँ अपन पुत्राहिक भाँति शिक्षित कयल जाइत छल आ कन्याकेँ सेहो ब्रह्मचर्य कालसँ गुजर’ पड़ैत छलैक। अथर्व वेदमे लिखल छैक जे “कन्या सुयोग्य पति प्राप्त कर’  मे तखने सफल भ’ सकैत अछि जखन कि ब्रह्मचर्य कालमे ओ स्वयं सुशिक्षित भ’ चुकल हो। कतोक नारी शिक्षाक क्षेत्रमे महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त  कयने छलीह। एतय धरि ओ लोकनि वैदिक ऋचा धरिक रचना कयने छलीह। लोपामुद्रा, धोषा, सिकता, निवावरी, विश्ववारी आदि एहि प्रकारक विदुषी नारी छलीह जनिक उल्लेख ऋग्वेदमे भेटैत अछि। वैदिक यज्ञवादक प्रतिक्रियाक फलस्वरुप उपनिषद्कालमे एक नव दार्शनिक आन्दोलनक प्रारम्भ भेल। ओहिमे नारीक सहयोग कोनो कम नहि छल। ऋषि याज्ञवल्क्यक पत्नी मैत्रेयी परम विदुषी छलीह। ओ धनक अपेक्षा ज्ञान प्राप्तिक कामना बेसी करैत छलीह। बृहदारण्यक उपनिषदमे उल्लेख अछि जे याज्ञवल्क्यक दोसर पत्नी कात्यायनीक पक्षमे अपन सम्पतिक अधिकार छोड़ि अपन पतिसँ मात्र ज्ञानदानक प्रार्थना कएलनि। एहि तरहेँ बृहदारण्यक उपनिषद् मे सेहो विदेहक राजा जनकक सभामे गार्गी आ याज्ञवल्क्यक मध्य उच्च स्तरीय दार्शनिक वाद-विवादक उल्लेख अछि। उत्तर वैदिक कालमे समयक गतिक संगहि-संग नारी शिक्षाक क्षेत्रमे शनैः शनैः ह्रास होम’ लागल। कन्याकेँ सुविख्यात आचार्य ओ प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्र धरि भेज’ मे समाजक उत्साह किछु कम पड़ि गेलैक, ई विचार प्रबल भ’ गेल जे घरहि पर कन्याक पिता, भाय अथवा आन कोनो निकट संबंधी हुनका शिक्षित करताह। परिणाम स्वरुप स्वाभाविक रुपसँ ओकर धार्मिक अधिकार शिक्षाक अधिकारमे ह्रास होम लागल। कालक्रमानुसारे शनैः शनैः नारीक प्रति पुरुषक बदलैत धारणाक कारणेँ नारी वर्गमे अशिक्षा व्याप्त भ’ गेल। मैथिल समाजमे एखनहुँ नारी शिक्षाकेँ अधलाह मानल जाइत अछि। नारी जगतमे शिक्षाक अभावक कारणेँ ओकर मूल्य एको कौड़ीक नहि रहि जाइत अछि। एहि संदर्भमे ‘बसात’ केँ देखल जा सकैछ- “जे महिला आजुक युगमे देहरिसँ आगाँ पयर नहि बढ़ा सकय एको कौड़ी अरजि नहि सकय, एतेक तक जे ककरहुँसँ भरि मुँह बाजि नहि सकय तकरा जँ नाँगड़ि कही बलेल कही, बौक कही, गोबरक चोत कही त’ कोनो अनुचित नहि।”20 स्वातंत्र्योत्तर युगमे नारी मे आत्मनिर्भरताक प्रवृति विशेष रुपमे देखल जाइत अछि, आब ओ गोबरक चोत बनि नहि रह’ चाहैत छथि कालीनाथ झा ‘सुधीर’ क  नाटक ‘कुसुम’ क नायिका पिताक आज्ञासँ शिक्षा प्राप्त करैत छथि मुदा हुनक माय हुनका एहि लेल तिरस्कृत करैत छथि— कमला-  “इ गप्प की छियैक ? हमरा वंशमे आइ धरि कोनो स्त्री नहि  पढ़लक तों हमर वंशमे दाग लगौलेँ। मौगीक काज थिक भानस, गीतनाद, कसीदा आ ओइसँ बेसी भेल तँ चिट्ठी - पत्री लिखब । तोँ कि बाप जकाँ अँगरेजिया बनबैं ?”21 ‘बसात’ नाटकमे कृष्णकान्त द्वारा मिथिलाक अशिक्षित नारी पर तीव्र प्रहार कयल जाइत अछि। ओ अशिक्षिता फुलेश्वरी विवाह नहि क’ पड़ा जाइत छथि। फुलेश्वरी  कृष्णकान्त द्वारा अपमानित भेला पर अपनाकेँ सुधारैत छथि। शिक्षा प्राप्त कय समाज सेविकाक काज करैत छथि। शिक्षा प्राप्त क’ फुलेश्वरी मैथिल नारीक मस्तक गर्वसँ ऊँच करैत छथि। हिनक चरित्र द्वारा नाटककार मैथिल ललनाक शिक्षाक प्रति जागरूकताक दिस ध्यान आकृष्ट  कयने छथि। शिक्षिता फुलेश्वरीकेँ देखि जोतखी द्वारा हुनक प्रशंसा कयल जाइत अछि- बम बाबा—“वाह-वाह! --- बेटी तोहर सफलता पर आइ हमरा अपार हर्ष भ’ रहल अछि, आ कतेक अबलाकेँ सबला बना रहल अछि। आब हमरा विश्वास भ’ गेल। आइ ने काल्हि तोहर प्रतिज्ञा अवश्य पूरा हेतौ- एक दिन फेर मिथिलाक महिला भारतक आदर्श महिला कहओतीह।”22 एहि तरहेँ हम देखैत छी जे उनैसम आ बीसम शताब्दीक आरंभमे राजा राममोहन राय तथा आर्य समाजक प्रयत्नसँ जाहि नारी शिक्षाकेँ आरंभ कयल गेल ओहिमे आइ व्यापक प्रगति भेल अछि, आ एहि विषय के प्रतिपाद्य बना कतोक मैथिली नाटककार मिथिलाक नारीमे शिक्षाक प्रति दृष्टिकोणमे  परिवर्तन आनबाक प्रयास कयने छथि। एहि प्रयासक सकारात्मक प्रभाव आजुक समाज पर प्रत्यक्ष देखबामे आबि रहल अछि। नारीक शिक्षाक संदर्भमे ‘पणिक्कर’ लिखैत  छथि। नारी शिक्षा विद्रोहक ओहि कुड़हड़िक धारकेँ तेज क’ देने अछि जाहिसँ हिन्दु सामाजक जीवनक झाड़ी केँ साफ केनाय संभव भ’ गेल अछि।23 निष्कर्ष मैथिली सामाजिक नाटकक अध्ययन आ अनुशीलनोपरान्त हम एहि निष्कर्ष पर पहुँचैत छी जे विशेष क’ स्वातंत्र्योत्तर युगक मैथिली नाटककार सामाजिक विवर्तनकेँ ध्यानमे राखि लिखलनि जाहिमे प्रमुख स्वर रहल अछि नारी समस्या। यद्यपि एखनहुँ मिथिलामे दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती, जानकी आदिक पूजा कयल जाइत अछि, तथापि आजुक नारी विभिन्न सामाजिक कुप्रथाक कारणेँ मजबूर छथि, लाचार छथि। एहि उत्पीड़नक जड़ि जँ खोजल जाय तँ हमरा जनितेँ सभसँ भयावह स्थिति उत्पन्न होइत अछि दहेज आ विधवा-विवाहक समस्याकेँ ल’ क’ ।  यद्यपि बाल-विवाह, वृद्ध – विवाह, बिकौआ प्रथा  एखनहुँ समाजसँ उठि नहि गेल अछि तथापि एहि दिशामे जागरुकता अवश्ये देखबामे आबि रहल अछि। मैथिली नाटककार लोकनि नारीक कारूणिक दशासँ द्रवित भ’ कए कतोक नाटक मध्य एहि समस्या सभकेँ लक्ष्य बना नाटकक रचना कयने छथि जाहिसँ समाज-सुधारक जागरण जोर पकड़ि सकय। मुदा एतय एकटा प्रश्न उपस्थित होइत अछि जे स्वातंत्र्योत्तर मैथिली नाटकमे सामान्य नारीक प्रतिबिम्ब कतेक दूर धरि स्पष्ट अछि ? एहि कालावधिक नाटककार नारी-चित्रण आत्मीयता एवं सहानुभूतिसँ नहि कयलनि, प्रत्युत पुरूषक दृष्टिएँ कएलनि। स्वातंत्र्योत्तर नाटकमे नारीक निष्प्रेम जीवनक कथा थिक जे सामाजिक प्रतिबन्धक अन्तर्ज्वालामे झुलसि कए नष्ट भ’ रहल अछि। पुरूषक आकांक्षा, आदर्श ओ निर्दयताकेँ टारब हुनका हेतु असंभव भ’ जाइत अछि। नारी जीवनक व्यथा, कठिनता एवं कुण्ठाक चित्रण करबामे नाटककार तत्परता देखौलनि, किन्तु ओ समाजक हेतु निष्प्रयोजनीय प्रतीत भ’ रहल अछि। एहि कालावधिमे मैथिली नाटकमे नारीकेँ जतेक आदर्शवादी ढ़ंगसँ चित्रण कयल गेल अछि, ततेक यथार्थवादी दृष्टिएँ नहि। संदर्भ 1.           डेविस, ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ वोमेन, पृष्ठ—172 2.           स्वर्ण सकूजाक लेख, ‘महिला सशक्तीकरण युग में निरंतर असक्त होती नारी’, राधाकमल मुखर्जी चिन्तन परंपरा, जुलाई—दिसम्बर 2001, अंक—1 3.           बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—43 4.           एकांकी संग्रह, सं. सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, मैथिली अकादमी, पटना, 1977,पृष्ठ—133 5.           वएह, पृष्ठ—26 6.           रक्त, अरविन्द कुमार ‘अक्कू’, शेखर प्रकाशन, टेक्सटबुक कॉलोनी, इन्द्रपुरी, पटना, 1992,पृष्ठ—20 7.           लक्ष्मण रेखा खण्डित, महेन्द्र झा, उपेन्द्र झा, ग्राम- मलंगिया, दरभंगा, पृष्ठ—68 8.           त्रिवेणी, परमेश्वर मिश्र, मिथिला प्रेस, 1950,पृष्ठ—41 9.           लेटाइत आँचर, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, पृष्ठ—25 10.      वएह, पृष्ठ—63 11.      कनियाँ-पुतरा, गुणनाथ झा, पृष्ठ—21 12.      सप्तपर्णा, सं. डॉ. देवेन्द्र झा, पृष्ठ--21 13.      तेसर कनियाँ, मणिपद्म, पृष्ठ---16 14.      नाटकक लेल, नचिकेता, पृष्ठ—20-21 15.      नायकक नाम जीवन, नचिकेता, अखिल भारतीय मिथिला संघ, 9/1  खेलात घोष लेन, कलकत्ता, 1971,पृष्ठ—9 16.      दहेज, चौधरी यदुनाथ ठाकुर ‘यादव’ पृष्ठ—46 17.      बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—47 18.      एना कते दिन, अरविन्द कुमार ‘अक्कू’, चेतना समिति पटना,1985, पृष्ठ—16 19.      लेटाइत आँचर, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, पृष्ठ—63 20.      बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—18 21.      कुसुम, कालीनाथ झा ‘सुधीर’, पृष्ठ—3 22.      बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—47 23.      के. एम. पन्निकर, दूभि 09 मई 2008 क बात थिक। गाम गेल रही। साँझ चारि बजे तरकारी किनबा आ घुमबाक लाथे तिरंगा चौक दिस चलि गेलहुँ, घुरैत काल स्कूल लग अबैत-अबैत दीया-बातीक बेर भ’ गेलैक। गरमीक दिन छलैक मोन भेल कनी काल स्कूलक ओहि प्रांगणमे सुस्ता ली जतय कहियो बैसि हम अपन पाठ याद करैत रही। जहिना बैसबाक उपक्रम कयलहुँ कि एकटा अप्रत्याशित स्वर सुनबामे आयल... हे बाउ! ओतय नहि एमहर आउ। हम चौंकि गेलहुँ, देखैत छी तँ सरिपहुँ एकटा स्त्री हमरा सोझामे ठाढ़ छलीह आ बैसबाक आग्रह क’ रहल छलीह। हम बैसि गेलहुँ, हमरा सम्मुख ओ स्त्री  सेहो बैसि गेलीह। हम साश्चर्य ओहि स्त्रीकेँ देखय लागलहुँ जिनक रूप-रंग किछु एना रहनि---हरितवर्णक शरीर ताहिपर हरियर रंगक मैल,पुरान-सन साड़ी जे कहुना हुनकर स्त्रीयांगकेँ झाँपने रहनि, ताहूमे कतोक ठाम पियन लागल, शेष शरीर उघारे बुझू। सम्पूर्ण शरीरमे छोट-पैघ घाव जाहिसँ पीज बहैत रहनि। एक-दू ठाम मैला सेहो लागल, जे दुर्गन्ध करैत छल। बामा जाँघ पर ढ़ल-ढ़ल करैत फोका, दहिना जाँघ पर गोदना जकाँ कोनो विशिष्ट आकृति, दुनू हाथ नोछड़ल जकाँ, माथक केश गोबरछत्ता जकाँ जाहिमे शिखर, पान-पराग, तुलसी, रजनीगंधा, माणिकचंद गुटखा, आदिक फाटल-चिटल पुड़िया, अखबार, कागदक टुकड़ी, जड़लका सिगरेटक पुत्ती आ टुकड़ी, सुखल गोबर, सूगरक मैला आदि-आदि सभ ओझरायल। एहि नारीक विचित्र ओ दयनीय दशा देखि हमर उत्कंठा बढ़ि गेल। हम पुछलियनि-- अहाँ के छी? ओ कहलनि-- हम दूभि थिकहुँ। वैह दूभि जाहि पर अहाँ एखन बैसल छी। वैह दूभि जतय बैसि अहाँ नेनपनमे नीरजक कविता पढ़ैत छलहुँ “यह जीवन क्या है निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है, सुख-दुख के दोनो तीरों से चल रहा राह मनमानी है...।” हम फेर पुछलियनि –अहाँक एहन दुर्दशा किएक ? ओ बजलीह--- बाउ, हम देखि रहल छी जे अहाँ तखनसँ हमर अंग-प्रत्यंगकेँ खूब नीक जकाँ निहारि  नेने छी। पहिने अहाँ बताउ, हमरा सुनबामे आयल अछि जे अहाँ साहित्यमे उच्च शिक्षा प्राप्त केने छी, ओहुमे मैथिली सन सरस साहित्यमे। हम कहलियनि—सत्ते कहलहुँ। तखन संभव भ’ सकय त’ हमर एहि दयनीय दशाकेँ अहाँ कोनो पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित करबा दिऔक। आ ओ आश्वस्त हैत बाजय लगलीह—बाउ, हमर शरीर स्कूलक एहि हातामे पसरल दूभिक प्रतीक थिक तैँ हरियर। हमरा माथ पर जे अहाँ गुटखा, सिगरेटक टुकड़ी, अखबार आ कागदक टुकड़ी देखैत छी से एहि स्कूलक छौंड़ा-छौंड़ी सभक किरदानी थिक, हम अहाँकेँ कहैत जाइत छी आ अहाँ एमहर-ओमहर नजरि दौड़ा-दौड़ा क’ देखने जाउ....। हमर देह जे घावसँ दागल अछि से सिगरेटक जड़लका पुत्तीसँ, हाथ जे नोछड़ल देखैत छी से थिक मोद बाबू (मुखियाजी) क नोकरक किरदानी, ओ सभ दिन एतय आबि छिल्ला छिलैत अछि, दिनमे कैक बेर सूगर, महिस, गाय, बकरी आदि हमरा दूषित करैत रहैत यै, बाम जाँघ पर ई ढ़ल-ढ़ल फोका थिक वैह मंगरूआक लोकक किरदानी, ओ काल्हि राति चूल्हिक अँगोरा हमरा देह पर फेंकि देलक, आ हमरा दहिना जाँघ परक ई चेन्ह जकरा अहाँ गोदना बुझि रहल छी से वस्तुतः कोन चीजक आकृति थिक से हमरा कहितहुँ लाज लागि रहल ऐ, साँझहिकेँ, माने एखनसँ कनी कालक पश्चाते देखबैक जे एहि गामक गँजेरी छौंड़ा सभ हेज बनाकेँ आओत, सिगरेटमे भरि कए गाँजा पीयत आ हमरा झरका-झरका कए एहन अश्लील आकृति बनबैत अछि, हे! ओहिठाम देखियौक..., ई जे मैला देखि रहल छी, से थिक एहि आस-पड़ोसक स्त्रीगणक काज, कने रतिगर भेलाक बादे एक दिस सँ पथार जकाँ बैसि जाइत छथि। हे! ओमहर देखियौक हत्ताक कछेड़मे... की कहू बाउ, जीयब दूभर भ’ गेल अछि। (एकटा दीर्घस्वास लैत) ओ फेर बाजय लगलीह--बाउ, अहाँकेँ अपन नेनपनक बात स्मरण अछि ने ? ताहि दिन प्रातः 10 बजे (प्रायः) स्कूल पहुँचलाक पश्चाते सभसँ पहिने सरस्वती वन्दना होइत छलैक जाहिमे शिक्षक-छात्र सभ क्यो भाग लैत छलाह। तकरा बाद श्रीवास्तव मास्टर साहेब सभ नेनाकेँ एक पतियानीसँ बैसा दैत छलाह, आ ओसब नेना एकहक टा कागद आ आन-आन सभ प्रकारक गंदगी सभ चुनि-बीछि लैत छल। हमर काया एकदम साफ भ’ जाइत छल। कक्षा सभमे जखन हाजरी होइत छलैक तँ नाम पुकारल जाइत छलैक, हरेराम, युगलकिशोर, शंभु, कुमारसंभव, चन्द्रकला, रहीम, कौशल्या, कतेक मधुर आ सार्थक नाम! सुनि कए मोन तृप्त भ’ जाइत छल। साँझ के नेना सब कबड्डी आ खो-खो खेलाइत जखन गिर जाइत छल तँ हम ओकरा बेसी चोट नहि लागय दियैक, वात्सल्यक अनुभव करैत छलहुँ तहिया। शनि केँ विशेष आयोजन होइत छलैक। शनिचराक गुर-चाउर बाकुटक-बाकुट नेना सभ खाइत छल, की कहू बाऊ, अहाँ सभक हाथ सँ गिरलाहा गुर-चाउर खयबा लेल हमहुँ शनि दिनक प्रतीक्षा करैत छलहुँ। दोसर पहरमे सांस्कृतिक कार्यक्रम होइत छलैक। “जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर, हे माय अहाँ बिनु आस ककर...। कखन हरब दुःख मोर हे भोला बाबा... । दुनियाँ मे तेरा है बड़ा नाम, आज मुझे भी तुमसे पर गया काम....।” अहाँकेँ तेँ स्मरण हेबे करत बाउ रमाकान्त एकबेर गयने छलाह “चल चमेली बाग मे मेवा खिलाऊँगा.....” ताहिपर मोलवी मास्टर साहेब हुनका चुत्तर पर ततेक ने छौंकी मारने रहनि जे बेचारेक सभटा मेवा घोसड़ि गेल रहनि। आ अहाँकेँ ओ अन्त्याक्षरी वला बात याद अछि की नहि? तहिया अन्त्याक्षरी मे कविताक पद्य सभ पढ़ल जाइत छलैक, अहाँ एकबेर ‘य’ पर अटकि गेल रही, गाब’ लगलहुँ—“ये मेरा दीवानापन था....”अहाँकेँ मोलवी साहब बजा कए पुछने छलाह “यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ......अहाँ काल्हिये ने याद केने छलहुँ, तँ बिसरि कोना गेलहुँ ? ” आ तकरा बाद हुनक छड़ी आ अहाँक दुनू हाथ। एकदिन रविशंकरक चुगली एकटा नेना क’ देने रहैक जे “मास्टर साहेब ई अपन ककाक जड़लका बीड़ी  पीबैत रहय” एहि लेल श्रीवास्तव मास्टर साहेब रविशंकरकेँ रौद मे एक घंटा धरि अहीठाम मुरगा बना देने रहथि। ताहिदिन ककर मजाल रहैक जे एहि स्कूलक हाता मे क्यो गाय, महीस, आ बकड़ी-छकड़ी ल’ कए घुसि जायत। यैह मोद बाबू (मुखियाजी) क नोकर एतय एकबेर छिल्ला छिलय बैसल रहय, मुखियाजी हुनका ततेक ने गारि-बात दलकैक, तकर ठेकान ने। ओ बजने जाइत छलीह आ हम अपन अतीतलोकमे विचरण क’ रहल छलहुँ। अचानक हम हुनका टोकि देलियनि-- अच्छा एकटा बात कहू, आइ काल्हि की एहन व्यवस्था नहि छैक एतय ? आब तँ देखै छियै जे ताहि दिन सँ बेसी सरकारक ध्यान शिक्षा पर छैक। लोक सेहो जागरूक भेल अछि शिक्षाक प्रति। हम त’ देखि रहल छी जे नीक भवन अछि, पानि पीबा लेल कल अछि, मूत्रालय अछि, शौचालय अछि, उचित संख्यामे शिक्षकगण छथि, आब की चाही ? ओ बजलीह-- औ बाउ! अहाँ जे किछु बजलहुँ सेहो साँचे थिक मुदा अहाँ आइ एलहुँ काल्हि चलि जायब। हम तँ कतोक बरखसँ एतहि छी आ प्रत्यक्षदर्शी छी, तैँ हमहुँ जे कहल आ जे कहब से फूसि नहि। एतय दूई भवन मे चारि टा कक्ष छैक आ विद्यार्थी 400 सयक करीब, एक तिहाई बच्चा कक्षमे बैसैत छैक आ शेष एहि हातामे आ ओहि बड़क गाछतर घुड़दौड़ करैत रहैत छैक, क्यो गुटखा, क्यो....., क्यो चरैत महिसक सींग पर दय ओकरापर चढ़बाक अभ्यास करैत अछि तँ क्यो........। शौचालय, मूत्रालयकेँ अहाँ एकबेर देखि अबियौक एकोटामे पल्ला नहि लागल छैक, उपरसँ ततेक दुर्गन्ध जे राम कहू ! कल अहाँ काल्हि आबि कए देखि लेब। ई तँ परसू जलघर बाबूक बेटीक बियाह छलनि ताहिलेल ओ अप्पन कल एतए लगौने छलाह, आ शौचालयमे बोराक चट्टी। काल्हिए कलो खुलि जेतैक ? एतय गड़लाहा पाइपे टा स्कूलक छैक। की कहू, कल जहिना लागै छैक पाँचे-दस दिनमे क्यो चोरा लैत छैक। हे लियह! कुकुरक झौहड़ि सुनि रहल छी ने अहाँ ? बराती सभ जे काल्हि भोरमे चूड़ा-दही खा-खा क’ पात सभ स्कूलक पछुआड़ि मे फेकने छल ततहि कुकुर सभ लड़ि रहल अछि। खैर! छोडू ई सब बात। आब पढ़ाईक व्यवस्था सुनू--- अहाँ केँ तँ बुझले हैत जे हमरा सभक दयानिधान मुखमंत्रीजी कॉन्ट्रेक्ट पर कैक लाख लोककेँ बिना कोनो परीक्षे-तरीक्षे नेने मास्टर बना देलथिन, सेहो की जे गामक लोक गामहिमे शिक्षक हेताह। तैँ ढ़ोरहाय-मंगड़ू सब शिक्षक बनि-बनि एतय आबि गेल छथि, जिनकामे सँ कतोक केँ तेँ अपन नामो.....। प्रार्थना आब नहि होइत छैक। जँ कहियो काल होइतो छैक तँ चारि सय मे सँ चारिये टा नेनाक मुँहसँ स्पष्ट शब्द बहराइत छैक बाँकी सब आऊँ-आऊँ, ऊँ-ऊँ करैत रहैत छैक। हाजरी मे नाम पुकारल जाइत छैक-–डबलू, बबलू, डेजी, रोजी, स्वीटी.....। शनिचराक प्रथा उठि गेल छैक। सांस्कृतिक कार्यक्रम एखन धरि होइत छैक, एखनो गीत गाओल जाइत छैक—“एक आँख मारूँ तो पर्दा हट जाये, दूजा आँख मारूँ कलेजा फट जाये.........। तनी सा जींस ढीला कर.... आदि।” एक दिनक बात कहैत छी, एकटा विद्यार्थी गाना शुरू कएलक—“चोली के पीछे क्या है......” आकि सबटा मास्टर ठेठिया-ठेठिया क’ हँस’ लागलाह। मंजय मास्टर साहेब केँ नहि रहल गेलनि ओ नेनाकेँ डाँटि कय बैसा देलथिन। ताहिपर, मंतोष मास्टर साहेब आ मंजय मास्टर साहेबमे नीक जकाँ बाझि गेलनि। मंजय मास्टर साहेब कहलैथ—मेरा मानना है कि इसमें बच्चे का कोई दोष नहीं है, अगर यही गाना गाना उस बच्चे की मजबूरी है, तो हम एक शिक्षक होने के नाते इसी गाने के प्रति उसके दृष्टिकोण को बदल सकते हैं, बस एक वाक्य में समझाकर की, “चोली के पीछे, ‘माँ’ होती है, जिसका अमृतपान करके हम, आप, सबके शरीर को जीवन मिला है।” एहि घटनाक बाद सभ शिक्षक मिलि कए मंजय बाबूक नव नामकरण कय देलकनि ‘मायराम’। तहिया सँ ओहि कागमंडली मे हंस सदृश्य मंजय बाबूक बुधिये हेरा गेलनि। एकटा आर गप्प सुनू, यैह पिछले शनि दिनक बात छैक, अन्त्याक्षरी चलैत रहैक, एक सँ बढ़िकए एक कटगर फिल्मी गाना सब नेना लोकानि गबैत छल, अचानक ‘य’ पर एकटा दल अटकि गेलैक….. एकटा बच्चा उठल आ कहलक, “यह लघु सरिता का बहता जल, कितना शीतल, कितना निर्मल.......।” एकटा मास्टर साहेब ओहि बच्चकेँ लगमे बजौलकनि आ कहलथि-- “अहाँ काल्हिये ने अपन मम्मी-पप्पाक संग सिनेमा देख’ सहर्षा गेल रही, ओहि सिनेमाक गाना, ये गोरी गोरी बाँहे, ये तिरछी तिरछी.......,बिसरि गेलहुँ ? बड़ भोदू छी अहाँ।” दुभि रानीक कथा चलितहि रहनि की एहि बीचमे हमरा एकटा आर नारीक कर्कश स्वर सुनाए पड़ल... “गै माय के छियै ई मुनसा! ऐतेक कालसँ एतय की क’ रहल छैक? बुझैत नहि छैक जे  ई लोक-बेदक, बाहर-भीतर करबाक बेर छैक?” हमर ध्यान ओमहर गेल, अन्हारमे बुझा पड़ल जे तीन-चारिटा स्त्रीगण एम्हरे बढ़लि चलि आबि रहल छलीह। हम जा एमहर ताकी ताधरि दूभिरानी निपत्ता ! हमहुँ उठि कए घर दिस चलि देलहुँ। ओहि भरि राति हमरा निन्न नहि भेल। कारण छल जे हम ई निर्णय नहि क’ सकलहुँ जे ओ सरिपहुँ दुभिए छलीह आ कि हमरा मोनक भ्रम ? जतेक सोचैत गेलहुँ ओतेक ओझराइते गेलहुँ, मुदा एकटा बात हमरा मोनमे घर क’ लेलक जे ई घटना एकटा कथाक रूप अवश्य ल’ सकैत अछि। काल्हिए हमरा मैसूर जेबाक रहय। सोचलहुँ एकर पांडुलिपि बना कए कोनो पत्रिकाक संपादक लग प्रेषित क’ देबैक, जँ ई कथा छपि गेल तँ हमहुँ अपन सीना तानि कए कहब जे “हम मैथिलीक कथाकार छी” सोझे-सोझ मैथिलीक एम.ए., पी-एच.डी. कहयलासँ कोनो प्रतिष्ठा नहि। मैथिली पढ़ि जँ मैथिलीक कथाकार, साहित्यकार नहि कहयलहुँ, तँ मैथिली पढ़बे किएक कएलहुँ ? हँ एकटा समस्या तँ रहिये गेल, एहि कथाक शीर्षक की दिऐक ? चलू जेहने कथा तेहने शीर्षक, ‘दूभि’। (समसामयिक निबंध) जाग’ जाग’  महादेव ! मिथिला, अनादिकालसँ धर्म, शिक्षा, साहित्य संस्कृति आदिक विशिष्टताक लेल अद्वितीय रहल अछि। एतय एक-सँ बढ़ि कए एक मुनि, मनीषी, तपस्वी भेल छथि, जिनका सभक उपदेश आ आचरण आइयहुँ ओतबे प्रासंगिक अछि। मुदा अनेकानेक कारणसँ आइ बड़ तीव्र गतिएँ सामाजिक विवर्तन भ’ रहल छैक। एहि बदलैत सामाजिक परिस्थितिमे कोन वस्तु आ संस्कार ग्राह्य छैक आ कोन अग्राह्य ताहि विषयकेँ ल’ क’ लोकमे भयंकर द्वन्द्व आ संघर्षक स्थिति उत्पन्न भ’ गेल छैक। मूल रूपसँ पाश्चात्यवादी सभ्यताक अन्धानुकरण ओ आन-आन कारणेँ, लोक अपन सभ्यता, संस्कृति, सँ विमुख भेल जा रहल अछि, परिणामस्वरूप, समाजमे भूख, भय, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अपराध, बेरोजगारी आदिक समस्या दिनानुदिन गंभीर भेल जा रहल छैक। लोक एहि सभ समस्यासँ मुक्तिक लेल अपस्यांत अछि, बैचैन अछि। ओकरा कोनो रस्ता नहि भेटि रहल छैक। मानसिक अशांतिक शांतिक लेल लोक भगवानक शरण मे आबि रहल अछि (ओकरा लागै छैक आब यैह टा रस्ता बचि गेल अछि)। यैह कारण अछि आइ जतय देखू ततहि थोकमे धर्मक दोकान खुजि गेल छैक। हमरो संग सैह भेल, विभिन्न प्रकारक विसंगति आ झंझावात तेना ने हमरा नचार क’ देलक जे हमहुँ अंततः धर्महिक शरण मे गेलहुँ। ई संयोगे छल जे ताहिदिन हमरा सभक दिस धर्मक एकटा टटका दोकान खुजल छलैक- जाग’ जाग’ महादेव! मिथिलाक लेल ई कोनो नव धर्म आ नव संप्रदाय नहि छलैक, हँ, एकटा बात नव अवश्य कहि सकैत छी जे एहिमे बस अहाँ देवाधिदेव महादेवकेँ ‘गुरू’ बना लिअ, आ कि सभ समस्या छू मंतर। हम अपन अनुभव कहि रहल छी, जहिया सँ हम महादेवकेँ गुरू बनैलियन्हि हमर सभटा समस्या सरिपहुँ छू-मंतर भेल जा रहल अछि। महादेवमे दम छनि, से हमर धारणा दिनानुदिन दृढ़ भेल जा रहल अछि। यैह कारण थिक जे कतहुँ अबैत-जाइत, माने जतय कतहुँ महादेवक मंदिर, फोटो देखैत छी, मोने-मोन जाग’ जाग’ महादेव! कह’ लागैत छी। यैह परसूका बात थिक हमरा एक आवश्यक काजे गामसँ सहरसा जयबाक रहय, ने जानि कोन कारणेँ ओहिदिन गाड़ी-घोड़ा बन्न छलैक, हम पयरे चलि देलहुँ। हमरा गामसँ लगभग 10 कि.मी. क दूरी पर महादेवक एकटा मंदिर छैक, बड़ भव्य, प्राचीन आ सिद्ध। गरमीक दिन रहैक, रौद कपारे पर लागैक। सोचलहुँ मंदिरमे जाग’ जाग’ महादेव ! क’ लैत छी, आ कने काल प्रांगणक एहि विशाल बरक गाछतर चबूतरा पर सुस्ता लेब। मंदिरमे माथ टेकि चबूतरा लग आबि बैसि गेलहुँ। हमर मोन कने अशांत रहय तैँ ओतय ध्यानक मुद्रामे बैसि महादेवक स्मरण कर’ लागलहुँ, आकि एहन आभास भेल जे सरिपहुँ साक्षात् महादेव हमरा समक्ष आबि गेलाह। आबितहि पुछलैथ– की यौ शिष्य! की हाल-चाल ? हम कहलियनि-- हे गुरू! से तँ अहाँ जनिते छी ? ओ कहलनि-- चिन्ता जुनि करू शिष्य! सभ समाधान भ’ जेतैक। हम कहलियनि-- हे महादेव! जखन अहाँ लग सभ समस्याक एतेक त्वरित उपचार अछि तखन अपनेक एहि संसारमे एतेक प्रकारक रोग-शोक, व्यभिचार, अनाचार, अत्याचार आदि किएक ? ओ कहलनि-- शिष्य, “मोन चंगा तँ कठौत मे गंगा” अहाँ पहिने हमर अस्तित्वकेँ स्वीकार करैत छलहुँ ? नहि ने? मुदा आइ जखन अहाँक मोनक श्रद्धा जागृत भेल तँ देखिये रहल छी जे हम साक्षात् अहाँक समक्ष उपस्थित छी। हम कहलियनि-- एकर माने भेल जे अहाँ अपन शिष्ये टा पर कृपा करैत छी, वैह टा अहाँक संतान थिक, आ आर सभ ? की ई प्रश्न अहाँक ‘जगतपिता’ उपाधि पर प्रश्न चिह्न नहि अछि? ओ कहलिन-- कथमपि नहि शिष्य हमरा लेल सभक मान बरोबरि अछि। जाधरि धर्म आ कर्मक गणितकेँ लोक नहि बूझत ताधरि ई समस्या, ई भेद रहबे करतैक। एहिमे हमर कोन दोख। अहीं जे अपन सभ काज-धन्धा छोड़ि कय एतय दिन-राति जाग’ जाग’ महादेव! करैत रहब तँ अहाँकेँ की बुझाइत अछि जे महादेव....। हे महादेव! हमरा सन मन्द-बुद्धि, धर्म आ कर्मक तत्त्वकेँ कोना बुझत? हम तँ बस एक्कहिटा चीज बुझैत छी, महादेव! आर किछु नहि। बस! बस! बस! अहाँक श्रद्धा, विश्वास आ सत्कर्म सैह थिकाह महादेव, सत्यं शिवं सुन्दरम्। हे महादेव! ई बूझब तँ हमरालेल आर जटिल भ’ गेल, सत्य, सुंदर आ शिव केँ बुझ’क सामार्थ्य हमरा कतय? अपन संस्कार, संस्कृति, लोकाचार, भाषा-साहित्य, धार्मिक आचरण, आदिकेँ बुझू, यैह सत्य थिक, यैह सुंदर थिक, यैह शिव थिक। बेस, आब कने-कने बुझलहुँ। हे महादेव! आर सभ छोड़ू एकटा बात बताऊ, एहि गामक अधिकांश लोकनि पढ़ल-लिखल छथि, ज्ञानी छथि, अपन परंपरा, अपन संस्कारादिक प्रति जागरूक छथि तकर पश्चातो हमरा बुझने कतहुँ ने कतहुँ........। औ शिष्य! आइ-काल्हि जे जतेक बेसी पढ़ल-लिखल लोक छथि से ततबे बेसी मूर्ख। ई अहाँ की कहि रहल छी, एहन भ’ सकैत अछि जे कखनहुँ-कखनहुँ पढ़लो-लिखलो लोकसँ गलती भ’ जाइत छैक, मुदा तकर जतेक परिमाण अहाँ बता रहल छी से बात हमरा नहि पचि रहल अछि। औ शिष्य! कहब तँ छक द’ लागत। ई कोनो गुटका (पान-मसाला) छियैक जे पचि जायत। अहीं कहू, अहाँ जे भरि दिनमे 10 पुड़िया गुटखा खा जाइत छी से कोना? ओहि पुड़िया पर नहि लिखल छैक जे “तम्बाकू चबाना स्वास्थ के लिए हानिकारक है”। हे ओहि महाशयकेँ देखियौक, ओ राजधानीक जानल-मानल डॉक्टर छथि, घंटे-घंटे पर सिगरेट (ओहो किंग साइज) पीबैत छैक, जखन की सभटा सिगरेटक पैकेट पर लिखल रहैत छैक, “धुम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है” एतबे किएक, हे ओमहर ओहि होर्डिंग पर पढ़ियौक- “सिगरेट पीने से कैंसर होता है, जनहित मे जारी, कैप्सटन फिल्टर, आखिरी कश तक मजेदार।” (हमर माथ शरम सँ झुकि गेल) से जे हो मुदा एहिठामक लोक धर्माचारी आ........। महादेव- हँ, हँ, से त’ अवश्ये, तहिया सँ ठीके आइ काल्हि हमर पूजा पाठ करयबलाक संख्या बढ़ि गेल अछि। मुदा ........। मुदा की ? आब लोकमे ओ भाव नहि रहलैक। आब लोक हमर पूजा कर’ नहि अबैयै, हमरासँ ‘डील’ कर’ अबैये। बुझलहुँ नहि, कने स्पष्ट करू। की-की सभ स्पष्ट करी शिष्य! सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्थामे घून लागि गेल छैक। एकहकटा जँ फरिछा-फरिछा अहाँकेँ कह’ लागी तँ कैक दिन धरि एहिना अहाँ केँ ध्यानमग्न रह’ पड़त। जिज्ञासा कएलहुँ अछि तँ लिअ हम किछु ‘डील’ केर बानगी अहाँकेँ सुना दैत छी..... एकटा (बालक)--- हे महादेव! बाप कहैत छलाह पढ़’क लेल तँ हम गुल्ली-डंडा खैलयबामे भरि साल मस्त रहलहुँ, एहिबेर कहुना पास करा दिय’ तँ ...... एकटा नवयुवक –- हे महादेव! एहिबेर देवघर जयबाकाल हमरा जाहि ‘मालबम’ सँ परिचय भेल छल तकरहिसँ हमर बियाह करा दिअ तँ..... एकटा नवयुवती— हे महादेव! अहाँ हमरा कोनो नीक निर्देशकक सिनेमामे माधुरी दीक्षितक ‘धक-धक’ वला रोल दिआ देब तँ...... दोसर नवयुवती--- हे महादेव! अहाँक देल गेल रूप–गुण सँ संपन्न रहितहुँ हमर बियाह नहि भ’ रहल अछि, हमर माय-बाप विक्षिप्त भ’ गेल छथि। एहि दुनियाँ सँ सबटा दहेजक दानव केँ एक्कहि दिन उठा लिअ तँ.... एकटा प्रौढ़— हे महादेव! जानैत-बुझैत ‘मनीगाछी’क कोठा पर बेर-बेर जाइत रहलहुँ तैँ आइ ‘एडस’ सन लाईलाज बीमारीसँ ग्रस्त छी—जँ अहाँ हमरा एहि सँ मुक्ति दिया दी तँ.... एकटा बेरोजगार— हे महादेव! पढ़ि-लिखि कए झाम गुड़ैत छी, जँ अहाँ हमरा एकबेर लादेनसँ भेंट करा दी तँ........ एकटा वृद्ध दम्पति- हे महादेव! अपनेक दयासँ हमरा बेटा-पुतोहुकेँ कोनो कमी नहि, मुदा हमरा दुनू परानीक पेट ओकरा सभक लेल पहाड़ सदृश छैक। जँ अहाँ हमरा एहि जन्मसँ मुक्ति दिया दी तँ अगिला जनममे ............ एकटा राजनेता— हे महादेव! हमरा पार्टीक सरकार बन’मे एक्केटा सीट घटैत छैक। हम निर्दलीय महाप्रलय सिंह केँ तीन करोड़ टका देब’ लेल तैयार छी अहाँ ओकर मति फेरि दिऔक, जँ हमर सरकार बनि गेल तँ............. एकटा व्याख्याता— हे महादेव! भरि जिनगी चोरि आ जोगाड़क बलेँ नीक अंक सँ पास होइत रहलहुँ आब व्याख्याता छी। छौंडा सभकेँ ततेक ने नेतागिरीक चस्का लगा दिऔक जे साल भरि महाविद्यालय आ विश्वविद्यालयमे ताला लटकले रहय। जँ एहन संभव भ’ जाय तँ..... एकटा अछूत-– हे महादेव! एक्के हार-मांस, एक्के खून, तकरा पश्चातो लोक हमरा अछूत बुझैये। हमरा संग जे भेल से भेल हमरा बेटाकेँ एहन दंश नहि झेलय पड़य। जँ एहन भ’ गेल तँ.... एकटा शराबी --- हे महादेव! पीबैत-पीबैत, सभटा धन-सम्पति स्वाहा भ’ गेल। तीन दिनसँ एक्को ठोप नहि भेटल अछि, हम अपन बेटी सुगियाकेँ ओहि दारूवाला लग.....जँ एक्को बोतल दिआ दी तँ.... मैथिली (भाषा) – हे महादेव! अहाँ तँ जानिते छी जे हमर गौरव, मान, मर्यादा, कहियो मिथालाकेँ के कहए जगत्ख्याति प्राप्त कएने छल, मुदा आइ अपनहि घरमे हम उपेक्षित  छी। ओना आइ काल्हि मैथिलीक लेल तथाकथित संघर्षकर्ता लोकानि एतयसँ दिल्ली धरि धरना-प्रदर्शन कर’ चलि जाइत छथि, मुदा सबटा फुसि थिक, सबटा मिथ्याडंबर, तैँ जाधरि हमरा अप्पन घरमे सम्मान नहि भेटत ताधरि हम अपन गौरवकेँ पुनः प्राप्त नहि क’ सकैत छी। जँ एहने स्थिति रहलैक तँ भ’ सकैछ जे हम कहियो निर्वस्त्र भ’ जाएब। हे जगतपति! अहाँ मैथिल लोकनिमे मैथिलीक प्रति नवजागृति आनि दिऔक। एहिसँ अहाँकेँ सेहो लाभ हैत-- फेर कवि विद्यापतिक श्रुतिमाधुर्य नचारीसँ अहाँक मंदिरक वातावरण आप्लावित भ’ जाएत। हम कंगालिन छी, हमरा अहाँकेँ देबाक लेल किछु अछिए नहि, तैं हम की ‘डील’ करी ! हे महादेव सुतल किएक छी, जागू ! एहि अबलाक व्यथा सूनू-जाग’ जाग’ महादेव..... मैथिली ततेक जोरसँ चीकरलीह जे हमर ध्यान दुटि गेल। ने जानि आब कहिया महादेव दर्शन देताह। आह्वान भारत भूमिक नवतुरिया हमर कविताक आह्वान सनू भ’ तन्मय अपन कान खोलि छथि बाजि रहल भारती से सुनू हे भारत ! ई भारती थिक अति विवश भाव भंगिमा नेने हिल रहल ठोर किछु कहबा लेल प्रेरित क’ रहल किछु करबा लेल कखनहुँ अहाँक कखनहुँ हमर एहि लेल बाट निहारैत छथि बस त्राहि-माम पुकारैत छथि छथि कहथि देखू हमर ई दशा शोणित सँ रंजित श्वेत वसन नखसँ शिख धरि अछि जख्म भरल लूटि रहल हमर अछि अमन-चैन पंजाब,असम,गुजरात,आँध्र कश्मीर सहित अन्यान्य प्रान्त अछि सिसकि रहल भ’ भयाक्रान्त छल कहियो उत्तुंग गर्वसँ हम्मर सिर प्रकृति प्रदत्त पावन कश्मीर केसरिया सेब क’ रहल श्रृंगार लहलह-हरियर बाग निशात उज्जर बर्फशिला बाँटि रहल छल शांतिकेर संदेश उधार छल बहैत जतय शीतल समीर चहुँदिस आब बरसैत अछि गोली नहि खेलू, नहि खेलू रोकू ई खूनक होली जाति-धर्मक उन्माद भड़का जे उन्मादी अहाँकेँ लड़ाबैत छथि हुनकर तँ कुरसीक प्रश्न छैक मुदा की यैह अहाँक मानवता थिक ? (18-08-2008,मैसूर) अनलकांत- मैथिली त्रैमासिक पत्रिका अंतिकाक सम्पादक। हिन्दीमे गौरीनाथ नामसँ लेखन दू टा हिन्दी कथा-संग्रह प्रकाशित। तर्पण अनल·ांत गाम· छिच्छा आब ए·ोरत्ती नी· नइँ लागि रहल छै डॉक्टर ·ामना यादव ·ेँ। लो·े अधक्·ी होइ छै, वंशउजाड़ौन होइ छै! अपने हाथ-पयर भ·ोसि ·ृतमुख बनि जाइ छै!...मुदा एना तँ नइँ जे गाम· ·ोनो चीन्हे-पहिचान नइँ रहय? ·तÓ गेल ओ गाम जे उजडि़-उपटि गेल अपन भूतपूर्व गौआँ लो·नि· स्वप्ने टा मे अबै अछि?... तखन ओ अपना आँगन· ·Óल लग बाथ·ीट आ ·पड़ा राखि पछुआडि़ धरि आयल छलि। ई पछुआडि़ ओ·रा पोखरि· पूबारि महार पर छलै। जतÓ ए· टा ·ागजी नेबो· गाछ छलै आ ओहि मे मारतेरास नेबो लुध·ल छलै। ·िछु पीयर-पीयर नेबो खसि ·Ó सडि़ गेल छलै। ·ने हटि पतियानी सँ पाँच टा अडऱनेबा गाछ रहै। ओहू मे ·ै· टा अडऱनेबा तेहन पीयर सँ ललौन ज·ाँ भÓ रहल छलै जे खसेला पर भक्·ा-भक्·ा भÓ जयतै। ·िछु मे तँ चिड़ै-चुनमुनी भूर सेहो तेना पैघ-पैघ ·Ó देने छलै जे भितर·ा लाली लखा दै छलै। ओ भूर सब ·ेँ ध्यान सँ देखि रहलि छलि। ·ि ए· टा अडऱनेबा· भूर देखि ओ चिड़ै· ·ला·ारी पर मुग्ध भÓ गेलि। ओहि अडऱनेबा मे ऊपर-नीचाँ पातर आ बीच मे ·ने चा·र भूर तेहन ढंग सँ बनायल छलै जेना अंग्रेजी· ए· टा 'वीÓ अक्षर पर दोसर 'वीÓ उनटि ·Ó राखल हो!...ओहि पर ए· गो बगिया राखि देने पूरा भूर मुना जयतै! ओहि भूर देखि बगिया मोन पड़ला सँ ओ·र अरुआयल-अरुआयल सन मोन ओस नहायलि दूबि ज·ाँ लहलहा गेलै। एहि बेर गाम अयला· बाद पछिला तीन दिन मे ई एहन पहिल क्षण छलै जखन ओ·र ठोर पर मुस्·ी· पातर-सन रेह जगजियार भÓ अयलै। पछिला तीन दिन सँ ओ ए· टा ढंग· रखबार आ·ि चौ·ीदार लेल परेशान छलि। ·ै· टा एजेंसी· दलाल सँ गप्प ·Ó चु·लि छलि। सब ·ै· टा ने रखबार लÓ ·Ó आयलो छलै, मुदा ·ामना यादव ·ेँ जेहन ग्रामीण टाइप· ·ाजुल आ अनुभवी रखबार चाही छल, से नइँ भेटि पाबि रहल छलै। ओ·र दादा ·ारी यादव· अमल सँ रहि रहल बुढ़बा रामजी मंडल आब अपन बेटा-पोता लग रहय चाहै छल। ओ·र पैरुख सेहो था·ि गेल छलै। जेना-तेना ·ारी यादव सँ मंगनी यादव धरि· जीवन तँ पार लगा देल·ै, मुदा त·रा बाद ·ामना लग हाथ जोडि़ देल·ै, ''नइँ बुच्ïची, आब पैरुख नइँ छौ। ·िछु दिन हमरो बेटा-पोता संग रहै· सख पुरबÓ दे। ÓÓ एहि पर ·ी ·हैत ·ामना?...ते ँ ओ ससम्मान बुढ़वा· विदाइ ·रÓ चाहै छलि, मुदा ·ोनो दोसर रखबार भेटतै तखने ने?... पछिला दू मास मे ई ओ·र तेसर यात्रा छलै। लगले लागल ई यात्रा ओ·रा परेशान ·यने छलै, मुदा ओ·र समस्या· निदान नइँ भÓ रहल छलै। ओम्हर पूना मे ओ·र क्लीनि· ए·-ए· दिन बन्न भेला सँ जे परेशानी आबि रहल छलै, से अलगे। बाप· जीबैत ·ामना गाम· बाट बिसरिए ज·ाँ गेलि छलि। ·ै· बेर तीन वा चारि साल सँ बेसी पर आयलि छलि। तहिना दू मास पहिने मंगनीलाल यादव· मुइला· बाद जे ओ गाम आयलि छलि सेहो प्राय: दू साल सँ बेसीए पर। ई रच्छ रहलै जे ओ·र बाप ओ·रा क्लीनि· मे मुइलै आ तत्·ाल गाम अयबा· झंझटि सँ बचि गेलि। नइँ तँ एसगरि जान ·ी-·ी ·रितय? एहने ठाम भाय-भातीज, ·क्·ा-पीसा, बहिन-गोतनी आ·ि जाउत-जयधी बला पुरना परिवार मोन पडि़ जाइ छै लो· ·ेँ। जे-से, ओ एसगरुआ छलि ते ँ ·हियो ओ·रा पर ·ोनो दबावो नइँ देल·ै ओ·र बाप। तीन सँ चारि मास नइँ बीतै ·ि बुढ़वा अपने पहुँचि जाइ पूना। फोन पर तँ गप्प होइते रहै छलै।... बाप· मादे सोचैत-सोचैत ·ामना· ठोर पर· मुस्·ी ·खन ने बिला गेल छलै। ओ·र नजरि चारूभर सँ भट·ि ·Ó पोखरि· अँगनी दिस झु·ल लताम गाछ पर चलि गेल छलै। एहि गाछ· रतबा लताम तेहन ने लाली लेने रहैत रहै जेना सुग्गा· लोल ·ि ओ·र अपने तहिया· ठोर बुझाइत रहै। लताम गाछ· पात ·ो·डिय़ा गेल छलै। फूल-फर एखन नइँ छलै। मुदा ·िछुए मास मे, ·ने गरमी धबिते, ए·र पात फेर नव तरहे ँ लहलहा जयतै आ फूल-फर सँ लदि जयतै ए·र डारि। फेर-फेर एहि पर लुध·ि जयतै डम्हा आ पा·ल लताम। तखन फेर बहरेतै एहि रतबा लताम· भीतर सँ वैह लाली। मुदा ओ·र ठोर? नइँ, आब तँ बाजार· महँग-सँ-महँग लिपिस्टि·ो नइँ सोहाइ छै ओ·रा। गाछ· आत्मा डिब्बा मे ·े भरि स·ैए? पछुआडि़· मारतेरास अड़हर-बड़हर, अत्ता-शरीफा, अनार-बेल, ·ेरा-मुनिगा सन गाछ पर सँ नजरि हटा ·ामना यादव पोखरि· पानि मे खेलाइत माछ दिस ता·Ó लागलि। चारि-पाँच टा रोहु· ए· टा झुंड पैघ-पैघ सुंग डोलबैत झिहरि खेला रहल छलै। पानि· सतह पर दूर धरि खूब-खूब हलचल पसरि रहल छलै। एहि हलचल मे हेरायलि ·ामना दू डेग आगू बढि़ दूबि· निर्मल ओछाओन पर टाँग पसारि बैसि गेलि। ओहि दूबि पर ·चनार· ·िछु फूल खसल छलै। ए· फूल उठा हाथ मे तँ लÓ लेल·, मुदा ओ·र नजरि पानि· हलचले पर रहलै। ई हलचल ओ·रा भीतर ए· टा नव हलचल अनल·ै। ओहि हलचल संग बहैत-भसिआइत ·ामना· भीतर ·ते· ने अतीत· पन्ना फडफ़ड़ाबÓ लगलै।... ...ई पोखरि ओ·र दादा· खुनायल छलै। अपन पूरा जीवन गाय-महीस· बीच गुजारÓ बला ओ·र दादा एहि परोपट्टïा· अंतिम अँगुठाछाप छलै। ओना रोज-रोज गाय-महीस दूहैत ओ·र अँगुठा· निशान मेटा ज·ाँ गेल छलै। ताहि पर, गोबर-गोंत गिजला· बाद, सदिखन ओ तीन ·िलो· हरौती आ·ि गेन्हवाँ लाठी जे प·डऩे रहैत छल, से ओ·र हाथ· रेखा खाय गेलै। मुदा ओ·र ·पार· रेखा जगजियारे होइत गेलै। खदबद ·रैत पंडित-पजियार आ·ि बाबू-बबुआन सभ सँ भरल गाम· ए· मात्र 'अहूठ गुआरÓ ·हाबÓबला ·ारी यादव ओहिना 'मडऱÓ नइँ ·हाबÓ लागल छल! दूध-घी· पैसा आ·ि गाछ-बाँस आ उपजा-बारी सँ ·ै गोटे सुभ्यस्त भेल अछि? ओहि सँ पैत-पानह बचि जाय, तँ बड़·ा बात!...से जेना-तेना पैत-पानह बचबैत ·ारी यादव स्वयं अँगुठाछाप होइतो अपन ए·मात्र मँगनिया बेटा मंगनी यादव ·ेँ शहर-नगर· ·ॉलेज-यूनिवर्सिटी धरि पढै़ मे ·ोनो ·मी नइँ होअय देल·। ·ारी यादव सुधंग लो· छल। ओ·रा नजरि मे दरोगा आ बीडीओ सँ बढि़ दुनिया मेेेे ·ोनो हा·ीम नइँ छलै आ सैह ओ अपन बेटो ·ेँ बनबÓ चाहै छल। मुदा मंगनी यादव से नइँ बनि स·ल। ओ ·ाशी· नामी विश्वविद्यालय मे प्रोफेसर बनल तँ ·ी? बाप· लेल मास्टरे छल!...ओ रंगमंच· मशहूर ·ला·ार भेल तँ ·ी? बाप· लेल नचनि!े छल!...बियाहो ओम्हरे ·यल·। मुदा ·ारी यादव लेल धनसन। माय· चेहरा मोन नइँ छलै मंगनी ·ेँ। बापे· रान्हल खाइत अपना हाथें बनायब सीखल·। ते ँ बाप· दु:ख ओ·रा बेसी छटपटाबै, मुदा बाप लेल ओ ·िछु ·Ó नइँ पाबय। ई फरा· जे हरसाइत मंगनी बाप ·ेँ खुश ·रै· खूब प्रयास ·Ó रहल छल। ओ जखन-जखन गाम आबय, बाप लेल मारतेरास ·पड़ा-लत्ता आ अने· सामान आनय। मुदा ओ·र बाप ·ेँ त·र दर·ारे ने रहै छलै! खरपा पहिरय बला ·ारी यादव ·ेँ चप्पल-जूता सँ गोड़ मे गुदगुदी लागै। गोलगला छोडि़ ·ुर्ता पहिरब ओ·रा ·ोनादन ने बुझाइ। मंगनी· आग्रह पर बाबा विश्वनाथ· दर्शन ·रबा· लोभ ओ·रा बनारस जयबा लेल उस·ाबै तँ जरूर, मुदा माल-जाल आ गाछ-बिरिछ· चिन्ता पयर रो·ै। ते ँ ओ बेटा लग बनारस ·हियो ने जा स·ल। गाछ-बिरिछ सँ बुढ़वा· बेसी लगाव· ए· टा खास ·ारण ईहो छलै जे बेसी गाछ बुढिय़ा· लगायल छलै। फेर बुढिय़ा· सारा सेहो सरौली आम आ बुढ़वा धात्री गाछ· बीच मे छलै जे गोहाल सँ ओ·रा सुतÓ बला मचान· ठी· सोझाँ पड़ैत छलै तहिया। ओइ सारा पर ए· टा ने ए· टा तुलसी गाछ सब दिन रहै छलै। गाय-महीस दुहला· बाद बुढवा ओही तुलसी गाछ दिस घुरि·Ó धार दैत छल। फेर नहेला· बाद ओहि तुलसी आ धात्री· जडि़ मे पानि ढारब सेहो नइँ बिसरै छल। मंगनी जहिया ठे·नगर भेल छल तहिया सँ बाप ·ेँ अपने हाथे ँ भानस ·रैत देखने छल। ओ·र ·नियाँ· गौना· बाद ई सब ·िछु दिन लेल छुटबो ·यलै, मुदा ·ामना· जन्म· ·िछुए मास बाद ओ अपन परिवार बनारस आनि लेल·। फेर बुढ़वा· वैह हाल भÓ गेल रहै। मंगनी ए· टा चा·र रखबाबÓ चाहल·, तँ बुढ़वा डाँटि-धोपि थथमारि देल·ै, ''धुर बुडि़! हमरा देह मे ·ोन घुन लागल जे हम दोसरा सँ चा·री खटायब?... एहने ठाम ·है छै, माय ·रय ·ुटौन-पिसौन बेटा· नाम दुर्गादत्त!...ÓÓ ·िछु दिनु·ा बाद मंगनी तातिल मे गाम आयल तँ बुढ़वा ·ेँ ·ने बीमार देखल·। बुढ़वा डाँड़ ·ने टेढ़ ·Ó·Ó चलै छल आ सूतल मे ·ुहरैत रहै छल। दिन मे ·ै· ने बेर लोटा लÓ बहराइत छल आ ढंग सँ ·िछु खाइतो ने छल। मंगनी ·तबो पूछै, ''हौ, ·ी होइ छअ?ÓÓ, मुदा बुढ़वा सही-सही ·िछु बतबैते ने छलै। बुढ़वा ·ेँ शहर· डॉक्टर लग चलै लेल मंगनी ·तबो जिद्द ·रै, बुढ़वा तैयारे ने होइ। अंत मे मंगनी खायब-पीबि छोडि़ रुसि रहल। तखन बुढ़वा मंगनी ·ेँ मनबैत ·हल·ै, ''रौ मंगनी, चल खाय ले। तों ·िऐ जान दै छही! हम मरिये जेबै तँ ·ी बिगड़तै? आब जीवि·Ó ·ोनो बान्ह-पोखरि देबा· छै हमरा?ÓÓ ''·िऐ हौ बाबू, मरि·Ó तों हमरा ·पूत ·हबेबह·? ·हÓ तँ जीवि·Ó बान्ह-पोखरि ·िऐ ने दए स·ै छह· तों?ÓÓ मंगनी· स्वर भखरि गेलै। ''रौ मंगनी, ओइ लेल ए· बोरा टा·ा चाही। से ने हमरा दूध-घी सँ हैत, आ ने गाछ-बाँस आ·ि उपजा-बारी सँ। तोहर मास्टरियो सँ नहिऐं हेतौ। ·ोनो दरोगा-बीडीओ भेल रहितय तखन ने!...ÓÓ ·ारी यादव गंभीर स्वर मे बाजल। ''हौ बाबू, तों नइँ बुझै छह·! हम दरोगा-बीडीओ सँ पैघे छिऐ हौ। तों बाजÓ ने जे ·ोन बान्ह देबह· आ·ि पोखरि खुनेबह·!...ÓÓ ''ठी·े ·है छही रे?ÓÓ ''हँ हौ!...हम तोरा फूसि ·हबह?ÓÓ ''बान्ह· तँ एहि जमाना मे ·ोनो खगते नइँ छै। ए· टा पोखरिए खुना तँ बड़·ी टा, अपना घर· पश्चिम दू बिगहा मे। मरियो जायब तँ, जुग-जुग धरि नाम तँ रहतै जे ·ारी जादब पोखरि खुनेल·।...ÓÓ बुढ़वा भावना मे बहÓ लागल छल। ''चलह, पहिने तोहर दवाइ ·रा दै छियह। ठी· होइते तों मटि·ट्टïा मजूर सब सँ बात ·रह। जहिया· दिन तों ठी·बह· तहिए सँ ·ाज शुरू भÓ जेतै।ÓÓ आ से ठी·े भÓ गेलै। आ ओही संग ए· टा चौ·ीदार, टेहलु·, भनसिया आ·ि मैनेजर जे बूझी, ताहि रूप मे रामजी मंडल ·ेँ ओ रखबौने छल। ई फरा· जे त·रा बादो बूढ़वा जावत जीयलै माल-जाल रोमब, दुहब-गारब आ·ि गोबर-·रसी; ·िछु ने छोड़ल·। रामजी मंडल ओ·रा घर-परिवार· अपन समाँग ज·ाँ भÓ गेल छलै।...आ ·ारी यादव· मान-मर्यादा तते· बढि़ गेलै जे ओ पूरा परोपट्टïा मे 'मडऱÓ ·हाबय लागल छल। ·ामना ·ेँ ई सब बेसी सुनले छै। ओहि पोखरि· जाग जे भेल छलै त·र भोज ·ने-मने मोन छै ओ·रा। मुदा दादा· हाथ· तीन ·िलो· लाठी· ओ लाली एखनो खूब मोन छै ओ·रा। ओहि लाठी मे चुरु भरि तेल पचाबैत ·ाल· दादा· मालिश सेहो ओ·रा मोन छै। ओ लाठी एखनो ओ·रा घर· ·ोनो ·ोन मे राखल छै ठी· सँ, जुगता·Ó। ओ·र दादा ·ारी यादव· मुइला· बादे एतÓ फुसिघर· जगह पक्·ा म·ान बनल छलै। मुदा ओहि मे रहÓबला रामजी मंडल टा छलै। ओ·रा सँ मारते बबुआन· बीच ए· गुआर· घर· ठी· सँ देखभाल नइँ भÓ पबै। ताहि पर ·िछु मालोजाल छलै। सभ छुट्टïी मे मंगनी अबै तँ ·िछु ने ·िछु नव बिदैत भÓ गेल रहै। हारि·Ó ओ आँगन-दलान संगे पोखरि-गाछ—माने पूरा सात बिगहा· र·बा· चारू ·ात खूब ऊँच देबाल दÓ·Ó त·रा ऊपर खूब ऊँच धरि ·ाँटबला तार· बेढ़ सँ बेढ़बा देल·। ए· जोड़ा ·रिया गाय छोडि़ बा·ी मालजाल हटा देल·। त·रा संग रामजी मंडल ·ेँ सख्त आदेश भेटलै जे गाछ· ·ोनो फल आ·ि तीमन तर·ारी ओ जते चाहय खाय स·ैत अछि, मुदा एक्·ो पाइ· ·िछु बेचि नइँ स·ै अछि। त·र पालन ·रैत रामजी मंडल ओ·र बाग-बगीचा, बाड़ी-झाड़ी सँ पोखरि धरि ·ेँ सब दिन खिलखिल हँसैत जेना बनौने रहल। अपने मंगनी दू-तीन मास पर आबि त·तान ·Ó जाय। ओना ओ·रा सभ· सब छुट्टïी गामे मे बीतै छलै आ ओहि छुट्टïी मे माय-बाप· संग ·ामना सेहो अबै छलि। जे-से, समय-साल बीतैत गेलै। आ ए· दिन मंगनी यादव विश्वविद्यालय सँ सेवामुक्त भÓ सपत्नी· गाम आबि गेल। तखन ·ामना अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली मे एमबीबीएस फाइनल ·Ó रहलि छलि आ दुनियाँ साधारण सँ साधारण आदमी· मु_ïी मे अँटÓ लागल छलै। ओहि समय धरि दुनियाँ· सब शहर मे ए· तरह· बसात बहÓ लागल छलै आ अपना ठाँ· गाम-घर खाली भÓ रहल छलै। ··रो बेटा शहर बसलै, तँ बाप· मरिते डीह पर नढिय़ा भु·Ó लगलै। ·िओ चारो दिस· ·र्ज आ उ·बा मे घेराय आ·ि दबंग· प्रताडऩा सँ डराय राता-राती गाम छोडि़ देल·, तँ ·िओ भूख· आवेग मे जतÓ-ततÓ पड़ा गेल। बाबू-भैया लो·नि ·ोनो ने ·ोनो ·ंपनी· स्थानीय मैनेजर भÓ अपना ·ेँ शहरी बनाबÓ लगलाह, तँ ·िछु गोटे वातानु·ूलित लाक्षागृह मे सेन्ह लगेबा· प्रयास मे धोती-·ुर्ता उज्ïजर ·रÓ लगलाह। गाम-गाम· खेत-पथार बड़·ा-बड़·ा ·ंपनी· फॉर्म हाउस मे बदलÓ लागल छल। सस्ता ·ार सन· ·ारखाना आ ·ेमि·ल्स हौज लेल पैघ-पैघ र·बा हथियाओल जा लागल छल। ·िसान नाम· प्राणी मे सँ ·िछु अपने अपन लीला खत्म ·Ó लेल·, ·िछु शहर-नगर· मशीन चलबÓ चलि गेल आ जे बचल छल त·रा मे सँ ·िछु मारल गेल, ·िछु ·ेर जीन बदलि एहन मजूर बना देल गेल जे ने शहरी रहल आ ने देहाती आ ज·र ने ·ोनो भाषा रहल आ ने ·ोनो आने चीन्ह-पहिचान। सगरे नव-नव ·न्वेंट, नव-नव ढाबा, नव-नव च·लाघर मिल्·-बुथ आ टेलीफोन-बुथ ज·ाँ खुजÓ लागल छलै। आ साधारण लो· 'मैन-पावरÓ ·हाबÓ लागल छलै। एहने सन आफत-बसात मंगनी यादव· गाम मे सेहो आयल छलै। एही आफत मे रामजी मंडल· बेटा-पोता ओ·र ·ाजुल घरवाली धरि ·ेँ लÓ·Ó दिल्ली· झुग्गीवास ·रÓ चलि गेल। मंगनी यादव जहिया सेवामुक्त भÓ बनारस सँ गाम घूरल छल, ओ·रा अपन स्टेशन ·ात· दो·ान मे बेसी अपरिचिते लो· भेटल छलै। साँझ· झलअन्हारी मे घर पहुँचÓ धरि ·तौ ·िओ एहन नइँ भेटलै ज·रा सँ दूटप्पियो ·ुशल-क्षेम भÓ स·ैत। रामजी मंडल ·ेँ छोडि़ ओ·र आगमन ··रो लेल ·ोनो खबरि नइँ छलै। अगिला भोर गाम· सड़· धयने टोल· एहि ·ात सँ ओहि ·ात गुजरि गेल मंगनी, ·ेओ हाल-चाल नइँ पुछल·ै। ओतÓ ·तहु ओ·रा अपन ओ गाम नइँ भेटलै ज·रा ओ चिन्है छल। जतÓ पहिने पंडित दीनबंधु झा· घर छलै, ओहि ठाम शून्य-सपाट ए· टा मैदान बनि गेल छलै आ त·रा चारू·ात खूब ऊँच देबाल रहै ज·रा गेट पर ए· टा पैघ सन बोर्ड टाँगल छलै, 'भटिंडा फार्म हाउसÓ। पंडितजी· बेटा आब जामनगर मे बैसि गेल छनि। बेटी अमेरि·ी नागरि·ता लÓ लेने छनि। मंगनी ·ने आरो आगू बढ़ल, तँ देखल· जेम्हर पहिने धनु·टोली छलै, ओतÓ पैघ सन ·ोनो फैक्ट्री खुजि गेल छलै ज·रा छत· ऊपर तीन टा मोट-मोट चीमनीनुमा पाइप मारतेरास धुआँ छोड़ैत आसमान ·ारी ·रबा· अभियान मे लागल छलै। आ टोला· ·ात सँ ·ल·ल हँसैत बहÓबला स्वच्छ-निर्मल जलधारा बला मिरचैया मे जमुना सन गन्हाइत ·ारी पानि तेना जम·ल छलै जेना ·ोनो नाला। मंगनी ·ेँ थ·ान भेलै आ घर घुरय लागल। घर घुरैत ओ जगह ध्यान मे अयलै जतÓ पहिने विशाल-विशाल बर आ पा·डि़· गाछ छलै। ओहि ठाँ लगे-लग ·ोनो दू गोट मोबाइल ·ंपनी· विशाल-विशाल टावर ठाढ़ छलै। ओ रु·ि·Ó चारूभर ता·Ó लागल। दूर-दूर धरि देखला· बादो ओ·रा नजरि पर अपना घर लग· गाछ छोडि़ ·तहु एक्·ो टा तेहेन पैघ गाछ नइँ अयलै। जेम्हरे देखल· सब ·िछु ए·दम उजड़ल-उजड़ल सन बुझेलै। बीच टोल मे आबि ए· ठाम ठम·ल। बगल· दासजी· डीह पर ·ोनो टैंट हाउस· बोर्ड लागल छलै। ·ने हटि ए· टा ट्रैवेल एजेंट· साइन बोर्ड टँगल छलै ज·रा नीचाँ शीशा· गेट· भीतर ए· टा पगड़ीवला सरदार जी ·ुर्सी पर बैसल छलै। त·रा दस डेग आगु· ग्राम देवता स्थान पर बजरंगबली· ए· टा पैघ सन मंदिर ठाढ़ छलै ज·र दछिनबरिया देबाल पर ·ामोत्तेजना जगबÓबला ·ोनो टि·िया· विज्ञापन छलै। त·रा बाद मंगनी ·िछु ने देखल· आ सोझे अपना घर आबि गेल। घर मे ओ·र पत्नी मुनिगा· तर·ारी रान्हि रहल छलि। ओ ओ·रा लग जाय अ·ब·ा गेल। रसे-रस मंगनी अपन घर आ सात बिगहा· र·बा मे घेरायल पोखरि-गाछ, पछुआडि़-महार धरि अपना ·ेँ समेटि लेल·। बेटी ·ामना आ बा·ी हित-मित सँ संपर्· लेल ओ·रा घर मे फोन आ मोबाइल छलै, रंगीन स्·्रीनबला ·ंप्यूटर छलै ज·र तार सम्पूर्ण दुनियाँ सँ जुड़ल छलै। घर· पाछाँ पैघ सन आयता·ार आँगन छलै। आँगन· पश्चिम-उत्तर ·ोन मे चापा·ल छलै। त·र पछुआडि़ मे पोखरि· महार पर मारते गाछ-बिरिछ छलै। ओहि पर सँ ·खनो ·ोयली, तँ ·खनो पड़ौ·ी ·ेर सुपरिचित स्वर आबै।...माने ओ·र गाम ओ·रा सात बिगहा· र·बा मे बन्हायल छलै। जेना-तेना समय ·टि रहल छलै। ·ामना दिल्ली छोडि़ पूना मे प्रैक्टिस शुरू ·Ó देने छलि। मुदा मंगनी· घर पर ए· टा एहन ·ार ·ौआ बैसि गेल छलै जे जखने ओ दुनू प्राणी शांति सँ आराम ·रÓ चाहय ·ि ओ जोर-जोर सँ टाँहि मारÓ लागै। भोर होइ ·ि साँझ, दिन होइ ·ि राति—·ार ·ौआ· टाँहि मारब बन्न नइँ भेलै। आ ए· राति ·ामना· माय· छाती मे तेहेन ने दर्द उठलै जे डॉक्टर· अबैत-अबैत बेचारी चलि गेलि। आ त·रा बाद एसगर मंगनी ·ारी यादव ज·ाँ बाड़ी-झाड़ी मे लागल रहय आ बीच-बीच मे ·ामना लग पूना चलि जाय।...मुदा रामजी मंडल तँ एहन शापित यक्ष छल ज·रा लग ने ·िओ अबै छलै आ ने ओ ·तौ जाय छल।... अनचो·े ·ामना· भ· टूटलै । पोखरि· उतरबरिया महार पर· ·ोनो गाछ पर नु·ायल ·ोयली बाजि रहल छलै। ·ामना· भीतर ·िछु उमडि़ अयलै। मुदा ओ तत्·ाल उठि गेलि। स्नान ·ेँ अबेर भÓ रहल छलै। भोजन· बाद ओ आराम ·Ó रहलि छलि ·ि ओ·र मोबाइल बजलै। ए· टा नव एजेंट· ·ॉल छलै, ''मैडम, ऐसा ·ीजिए ·ि चौ·ीदार और माली ·े रूप में दो अलग-अलग आदमी ·ो रख लीजिए। यहाँ ऐसा ·ोई चौ·ीदार नहीं मिल रहा जो आप·ी प्रॉपर्टी ·े साथ पेड़-पौधों ·ी भी देखरेख ·र स·े। यूँ पोखर ·ी मछली ·ी देखरेख ·े लिए मछुआरे ·ी जरूरत फिर भी रह जाएगी।ÓÓ ''नहीं, तीन-तीन आदमी रखना मुश्·िल है हमारे लिए।ÓÓ, ·ामना बाजलि। ''चौ·ीदार तो नेपाली ही है मगर माली जो मिल रहा है, वह ए· उडिय़ा भाई है। ये दोनों हमारे पटना सेंटर ·े मार्फत आ रहे हैं और उन·ी शर्त है ·ि वेतन ·े अलावा हाउसिंग फैसिलिटी भी चाहिए।ÓÓ बिना ·ोनो जवाब देने ·ामना ·ॉल डिस्·नेक्ट ·Ó देल·। मुदा भीतर सँ ओ·र परेशानी आरो बढि़ गेल छलै। आब एहि गाम मे गाम भने नहि रहि गेल हो मुदा ओ·र बाप-दादा, माय-दादी सभ· स्मृति· गाम सात बिगहा· एहि र·बा मे बेड़हल घर-आँगन, गाछ-बिरिछ, पोखरि-·ल सभ· बीच छै। ·ारी यादव सँ मंगनी यादव धरि· नाल एतहि गड़ल छै। ·ारी यादव· माल-जाल· गोबर-गोंत एतÓ· माटि· ·ोनो ने ·ोनो ·ण मे एखनो खाद· रूप मे बचल हेतै। प्रोफेसर मंगनी यादव· ·ला·ार मोन एहि र·बा मे जाहि गाम· लघु संस्·रण ·ेँ समेटने छल, से जरूर एही ठाम ·तहु ने ·तहु नु·ायल हेतै।... ·ी ए·रा सब ·ेँ ओ लुटा देत?...·ी ओ अपन जिनगी भरि· ·माइ सँ ए·र रक्षा नइँ ·Ó पाओत? ·ामना ·ेँ मोन पडै़ छै जे ए· बेर ओ·र पिता मंगनी यादव बड़ व्यथित मोन सँ ·हने छलै, ''गाम मे जेहो गाम देखाइ छलै, से तोरा माय· मुइला· बाद नइँ बुझाइ छै। ·खनो-·खनो तँ मोन ·रैए जे हमहूँ सब ·िछु बेचि-बि·ीनि ली। मात्र घर-आँगन आ गाछ-पोखरि सँ गाम नइँ होइ छै, बौआ। जखन पहिने ज·ाँ ·ेओ गौएँ नइँ रहल तँ ·ोन गाम आ ·ी गाम?...ÓÓ ·ामना ·िछु जवाब नइँ दÓ स·लि छलि तखन। मुदा एखनो मोन छै ओ·रा जे ओ अपन बाप· ओहि हेरायल-बेचैन आ·ृति ·ेँ बड़ी ·ाल धरि देखैत परेशान भÓ रहलि छलि। एक्·ो शब्द एहन नइँ भेेटल छलै तखन ओ·रा जाहि सँ अपन ·ला·ारमना बाप· मोन ·ेँ राहत दÓ स·ैत छलि। तखन ओ·रा अपन डॉक्टरी· ज्ञान अ·ाज· बुझायल छलै। सहसा ए· ·ोन मे राखल अपन दादा ·ारी यादव· ·ारी खटखट लाठी देखा पड़लै ओ·रा। ओ उठलि ओहि लाठी ·ेँ छुबि·Ó देखबा· लेल, मुदा तखने ·ॉलबेल जोर सँ बजलै। ओ गेट दिस पलटलि। गेट पर सी सी मिश्रा नाम· ए· टा मैथिली भाषी सेक्युरिटी एजेंट· दलाल छलै जे पछिला दू दिन सँ नव-नव रखबार ओ·रा लेल ता·ि रहल छलै। ओहि दलाल ·ेँ ड्राइंग रूम मे बैसा ओ दू मिनट बाद दू गिलास पानि लÓ घुरलि। ·ि विनम्र सन बनैत ओ दलाल बाजल, ''डॉक्टर यादव, सुनियौ! अहाँ बड़ सौभाग्यशालिनी छी जे एखनो अपन बाप-दादा· डीह पर अबै छी। हम तँ नो·रीये· ·्रम मे एम्हर आबि गेलहुँ। ·ोशी· पूबे सही, मुदा ईहो ·हाइ तँ छै आइयो मिथिले ने। हम डीही छी ·मला ·ात·। हमर जनम भेल हिमाचल मे व्यास नदी ·ात· ए· टा अस्पताल मे। बचपन बीतल दिल्ली· यमुनापार मे आ नो·री भेल ·ोल·ाता मे। मैथिली तँ हम ·ोल·ाता आबि सिखलहुँ सेहो एहि लेल जे हमर दादा मैथिली· प्रसिद्ध लेख· छलाह आ हुन·र ·िताब सभ· अंग्रेजी अनुवाद एखनो खूब लाभ दै अछि।...एखन ·ोल·ते· एजेंसी· ·ाजें तीन मास लेल एहि क्षेत्र मे अयबा· अवसर भेटल। एहि क्षेत्र मे ·ै· टा ·ंपनी अपन ·ल-·ारखाना शुरू ·Ó रहल छै, से बहुत जल्दी एतÓ· प्रॉपर्टी· ·ीमत उछलÓबला छै।...ÓÓ ·ामना· धैर्य चु·ि रहल छलै। ओ बाजलि, ''अहाँ ·हÓ ·ी चाहै छी?... साफ-साफ बाजू!ÓÓ ''अहाँ अन्यथा तँ नइँ लेबै?ÓÓ ''बाजू ने!...ÓÓ ''अहाँ यैह ने चाहै छी जे अहाँ· ई गाछ-पोखरि बचल रहय, सुरक्षित रहय आ अहाँ· बाप-दादा· नाम...ÓÓ ''तँ?...ÓÓ, ·ामना· माथ पर बल पड़लै। ''देखू, ओहेन रखबार बड़ महँग पड़त जे अहाँ· इच्छा अनु·ूल हो। एहि लेल रखबार, माली, मल्लाह आ मारतेरास मजदूर पर खर्च ·यला· बादो भेटत तँ ·िछु ने, उनटे चिन्ता आ परेशानी बेचैन ·यने रहत।ÓÓ ''तँ ·ी ·री?... हम बड़ परेशान छी। ओझराउ जुनि।ÓÓ ''सैह ने ·है छी!...आ लाभ· बात ·है छी।...ÓÓ क्षण भरि बिलमि ओ बाजल, ''एहि ठाम ए· टा भव्य रिजार्ट खोलै ·ेर अनुमति जँ दी तँ अहाँ ·ेँ ए· खोखा पूरा भेटि जायत। संगे पोखरि-गाछ· सुरक्षा· गारंटी सेहो। मात्र एहि घर-आँगन ·ेँ तोडि़ नव बहुमंजिला बनबÓ· अनुमति देबÓ पड़त। गाछ सब लग मुक्ता·ाश मे टेबुल-·ुर्सी लगा देल जयतै आ डारि सब पर जगमग लाइट टँगा जयतै। पोखरि मे दू-चारि टा छोट·ा नाह खसा देल जयतै जाहि पर लो· सब अन्हरियो मे इजोरिया राति· मजा लैत नौ·ा-विहार ·रत। पोखरि· बीच मे जाठि· जगह ए· टा छोट सन· सुइट बनि जायत, ज·र डिमांड पर्यटन स्थल सभ पर सब सँ बेसी होइत छै। से एतहु हेबे टा ·रतै। ·िए· तँ एतहु रसे-रस बड़·ा-बड़·ा ·ंपनी· डायरेक्टर, सीईओ, एनआरआई आ विदेशी मेहमान· आगमन शुरू होबए बला छै।...ÓÓ ''हम अहाँ· गप्प खूब नी· ज·ाँ बुझि गेलहुँ।... अहाँ तँ बड़ बुधियार लो· छी यौ!...तत्·ाल अहाँ जा स·ै छी, दान-पत्र हम शीघ्रे पठा देब!...ÓÓ ·ामना अपन आवाज सप्रयास संयत रखल·। ·ने· स·प·ा ज·ाँ गेल मृदुभाषी मैथिल दलाल सी सी मिश्रा चालीस सँ बेसी· नइँ छल। गेट पार ·Ó ओ ए·बेर ठम·ल, ''·ने इत्मीनान सँ विचार ·रबै मैडम। डॉक्टर छी अहाँ, ओल्ड थिं· आ भावु·ता सँ ·िछुओ फायदा नइँ हैत। हानिए-हानि!...ÓÓआ हीं-हीं ·Ó ठिठिआबÓ लागल। चालीस पार ·Ó चु·लि डॉक्टर ·ामना यादव मे प्रौढ़ता आ धैर्य आबि गेल छलै, मुदा तैयो ओ अपना जगह पर बैसलि नइँ रहि स·लि। ओ उठि·Ó दुआरि दिस आयलि। तेज-तर्रार दलाल सी सी मिश्रा लप·ि·Ó अपन विदेशी मॉडल· गाड़ी मे बैसि गेल छल। ·दम· गाछ तर थोड़े· गरदा उडिय़ाबैत ओ·र गाड़ी तुरंते फुर्र भÓ गेलै। ·ामना बाहर· ओसारा पर नहुँ-नहुँ बुलÓ लागलि छलि। ·दम गाछ· बाद देबाल· ·ाते-·ात लागल जिम्हड़, अमड़ा आ अशो· पर बेरिया· रौद खसि रहल छलै। ओहि रौद मे गाछ सभ· पात-पात पर जमल गरदा· मोट·ा परत पर्यावरण-·था ·हि रहल छलै। ओ एहि ·था सँ उबि-था·ि भीतर जइए रहलि छलि ·ि दूरे सँ आबि रहल रामजी मंडल देखा पड़लै। जलखै ·Ó·Ó जे ओ पोस्ट ऑफिस गेल छल से एखन घुरि रहल छलै। ·ामना रु·ि गेलि आ नहुँ-नहुँ अबैत रामजी मंडल ·ेँ देखÓ लागलि। ओ·र देखैत रहबा· अंतराल जते· बढ़ल जा रहल छलै, तते· नजदी· रामजी मंडल पहुँचि नइँ पाबि रहल छलै। रामजी मंडल· डेग भारी भÓ गेल छलै। ओ थाहि-थाहि·Ó लाठी भरें चलि रहल छल। ओ·र लग पहुँचबा· आरो प्रतीक्षा नइँ ·Ó स·लि ·ामना। ओसारा सँ उतरि बाहर· गेट पार ·Ó ओ सड़· धरि चलि आयलि। सड़· पर ·रीब पचास डेग दूर मे अबैत रामजी मंडल ओ·रा अपन दादा ·ारी यादव सन बूढ़ झुन·ुट बुझेलै। ओ झट·ि ·Ó ओ·रा लग पहुँचलि, ''बाबा, ·ी भेलह? था·ल बुझाइ छह·?ÓÓ ''हँ, बुच्ïची!...ÓÓ, रामजी मंडल एतबे बाजल। ओ·र साँस तेज छलै। ·ामना ओ·र बिना लाठी बला हाथ प·ड़ल·ै, ''मोन ठी· छह ने हौ बुढ़वा?ÓÓ ''हँ, ठी· छै!... पहिने ई ·हह जे ·ोनो चौ·ीदार-सिपाही रखलह· तँ नइँ?...ÓÓ ''से ·ी?ÓÓ ''हमरा ई दुआरि नइँ छोड़ा बुच्ïची! हमर साँस एत्ते खतम हेतौ आब।ÓÓ ''हौ बुढ़वा! हम तोरा ·हिया एतÓ सँ जाय ·हलियह? ई सब टा तोरे राजपाट छियह।...हम ·ी ·रबै ए·र?ÓÓ बुढ़वा ·िछु ने बजलै। ·ामना· सहारा पाबि डेग पैघ ·रैत ओ ओसारा पर चढ़ल आ लुद्द दÓ बैसि गेल, ''बुच्ïची, हमरा ·ोनो बेटा-पोता नइँ छौ! ओ सब रा·स छियौ! ओ·रा सब ·ेँ भेलै जे बुढ़वा एतÓ ·मा-·मा तमघैल मे गाडि़·Ó रखने हेतै। ते ँ बजबै छलै। साँच बात ·हला· बाद दू-दू टा चिट्ïठी देने रहियै। तैयो जवाब नइँ आयल, तँ आइ तेसर चिट्ïठी दैत रहियै जे ·हिया लेबÓ अबैए...मुदा ·ी ने ·ी मोन भेल आ पोस्ट ऑफिस लग जाय चिट्ïठी नइँ खसाय, फोन लगेलियै छौंड़ा· फैक्ट्री। ओ बाजल ·ी से सुनबह·?...·हल· , 'एतÓ आबि ·ी ·रबह·? तोरा सँ एतÓ आब ·ोन ·ाज ·यल हेतह? बुढिय़ा ·ेँ सेहो ओतहि पठा दै छियह। जहिया हाथ ·टा लेल·ै, तहिया सँ ·ोनो ·ाज· नइँ छै। ओ·र निमेरा एतÓ नइँ हेतह।Ó...ÓÓ ·ामना ए· क्षण चुप रहलि फेर उत्साह दैत बाजलि, ''हौ बुढ़वा, तोरा नी·े ने हेतह हौ! दु:ख-सुख जे-से, एहि उमेर मे दुनू परानी ए· संग रहबह· तै सँ नी· आर ·ी हेतह?ÓÓ रामजी मंडल· बूढ़ चेहरा पर लाज· संग हँसी· फाहा छिडिय़ा गेलै। ओ खिलखिलाइत उठि·Ó आँगन चलि गेल। तखने घर मे राखल ·ामना· मोबाइल बजलै। पूना सँ ओ·र क्लीनि·· फोन छलै। ओ उठबैते बाजलि, ''डोंट वर्री! सुबह ·ी फ्लाइट से आ रही हूँ। ए·-डेढ़ बजे त· क्लीनि· में रहूँगी।ÓÓ आ एतबा ·हैत ओ·र नजरि ए·बेर फेर अपन दादा ·ारी यादव· तीन ·िलो· हरौती लाठी पर चलि गेलै। ओ लप·ि·Ó लाठी उठौल·। लाठी मे पहिने· लाली आ चम·ि नइँ छलै। ·ारी खटखट ओहि लाठी पर झोल-गरदा जमि गेल छलै। भावावेश मे ·ामना ओहि लाठी ·ेँ चूमÓ चाहल·। मुदा रु·ि गेलि।... ·ामना· हाथ चीन्हÓ जोग नइँ छलै। पूरा हाथ ·ारी भÓ गेल छलै। तखने ध्यान अयलै जे ओ·र ओजनो आब तीन ·िलो तँ नहिये टा हेतै। ·ि ए· ठाम लाठी पर ·ने· दबाव पडि़ते ओ·र आँगूर धँसि जेना गेलै! ·ि ओ·रा बुझेलै जे ई लाठी ·ो·नि ·Ó फों· भÓ गेल छलै आ जोर सँ पट·ि देेने टु·ड़ी-टु·ड़ी भÓ जयतै!... अचांच·े डरा गेलि ओ। डराइते-डराइत ओ ओहि लाठी ·ेँ पूर्ववत घर· ·ोन मे राखि हाथ धोअÓ ·ल पर चलि गेलि। बड़ी ·ाल धरि बेर-बेर हाथ धोयला· बादो ठी· सँ हाथ साफ नइँ भेलै। साबि·· तेल पीयल लाठी सँ आओल ए· टा अजीब तरह· गंध हाथ मे समा गेल छलै। हारि·Ó तोलिया सँ हाथ पोछैत क्षण भरि· लेल पछुआडि़ दिस गेलि ·ामना। ओतÓ ओ·रा लगलै, सब गाछ पर जोर-जोर सँ ·ेओ ·ुड़हरि चला रहल छलै। पोखरि दिस त·बा· साहस नइँ भेलै ओ·रा। ओ सोझे पड़ायलि घर आ जल्दी-जल्दी अपन ब्रीफ·ेस सैंतÓ लागलि। द्य द्य द्य श्याम सुन्दर शशि, जनकपुरधाम, नेपाल। पेशा-पत्रकारिता। शिक्षा: त्रिभुवन विश्वविद्यालयसँ,एम.ए. मैथिली, प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। मैथिलीक प्रायः सभ विधामे रचनारत। बहुत रास रचना विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। हिन्दी, नेपाली आऽ अंग्रेजी भाषामे सेहो रचनारत आऽ बहुतरास रचना प्रकाशित। सम्प्रति- कान्तिपुर प्रवासक अरब ब्यूरोमे कार्यरत। मरदे कि बरदे भगवान भाष्करक प्रचण्ड प्रतापकेँ सम्हारि सकब धरती मैआक वास्ते कठिन भऽ रहल छलनि। मैञा अपरतीव छलीह। चण्डलवाक प्रलयंकारी रौद्र अवतारसँ अपने बाचथु कि अपन सखा सन्तानकेँ बचाबथु? “अपन मथा साहुर, साहुर” करबाक अवस्था सेहो नहि छल। मिथिलाक धरती थोरै छैक जे यत्र तत्र सर्वत्र हरियरी रहतै। लोक अपनो जुराएत आऽ लोकोकेँ जुरौतैक? ई कतार छै भाई। कतार। एत्त गाछ वृक्ष कत पावि? धनीमानीलोक ऐजुवा (वगैचा) लगबैत छथि। जेना लोक धीया पूताकेँ दूध पियाकऽ पोसैत अछि। तहिना पोसैत अछि एतुका सेखसभ गाछ-वृक्ष। ककरो मजाल छै जे ओहि गाछक नीचाँ सुस्ता लेत..। तुरन्त वन-विनाश कानूनक अन्तर्गत शख्त कार्यवाही भऽ जएतैक। आऽ ओऽ गाछ वृक्ष होईतो नहि अछि सुस्तैवा योग्य। एक कविक कवित जकाँ “वड़ा हुआ तो क्या हुआ लम्बे पेड़ खजुर। पंछीको छाया नही फल लागे अति दूर..” डार मोरवाक योग्य छाहरि नहि। बूझि परैत छल, दोहाक समुद्र वाफ भऽ कऽ उड़ि जाएत। सड़क उपरके अलकत्रा पघलि रहल छल। सरकार एहि गरमीक महिनामे दुपहरमे काज करबापर पाबन्दी लगौने छैक। तथापि देश विदेशक मजुरसभ अपन-अपन ओभर टाईम पका रहल छल। भगवान भाष्करसंगक महासमरमे लागल छल। धरती पुत्रलोकनि। धरती तँ आखिर धरती छैक ने। अपन जनम धरती हो कि करम धरती...। एहि रौदसँ बेपरवाह लक्ष्मण पैघ-पैघ डेग मारैत आगाँ बढ़ि रहल छल। कोनो अभेद्य लक्ष्यकेँ भेदन करबाक योजनामे आगू बढ़ि रहल चोटाएल, हारल योद्धा जेकाँ। एहि बेरक समरमे विजयश्री प्राप्त करबाक दृढ़ सन्कल्पित छल ओऽ। ओकरा ठेकान नहि छलै जे ओकर समग्र देह घामे पसिने भिजी गेल छैक। ओऽ कारी झामर भऽ गेल अछि। ओऽ बस आगू बढ़ि रहल छल, अपन गंतव्य दिस। ओकर गन्तव्य छलै, दोहाक अतिव्यस्त इलाकामे अवस्थित नेपाली दूतावास। जतए ओकर प्रेयसी गत एक सप्ताहसँ शरणागत छैक। मुदा किछुए किलोमीटरक दूरीपर अवस्थित रहलाक बावजूदो ओऽ हुनकासँ भेटि नहि सकल अछि। ओऽ सीधा दूतावासमे प्रवेश कएकऽ मुदा तुरन्ते पाछाँ घुमि गेल। चार दिवालीक ओटमे ठाढ़ भऽ जिन्सपेन्टक पछिला जेबीसँ कंघी निकाललक। केस सीटलक। कपड़ा मिलौलक। आऽ कनेक सतर्क कदमसँ दूतावासक मेन गेटकेँ पार कएलक। दूतावास परिसरमे रहल नेबोक गाछक ओटमे बैसि ओकर प्रेयसी केस झारि रहल छलै। ओएह घुरमल-घुरमल केस। सुराही सन कमर आऽ सुडौल शरीर। पीठपर करिकवा तिलसँ ओऽ आओर निधोख भऽ गेल। ओऽ ओकरे रेशमा छैक। आगूसँ देखू कि पाछोसँ। ईस्स...। ओकरा मोनमे टिस जेकाँ उठलै। मोन भेलै जे पाछेसँ जाऽ भरि पाजकँ पकड़ि ली आऽ गत ९ महिनाक हिसाब-किताब माँगी। ओऽ आगू सेहो बढ़ल मुदा रेश्माक केश जखनसँ खुजल रहैक तखनेसँ दूतावासक चौकीदार सेहो ओकरे दिस ताकि रहल छलै। लक्ष्मणकेँ हिम्मति नहि भेलै अपने प्रेयसीक हाथ धरि पकड़बाक। जहन दुनूक आँखि मिललैक तँ दुनूक नयनसँ अनन्त अश्रुधारा बहि गेलै। एक दिस लक्ष्मण छल, दोसर दिस रेशमा आऽ बीचमे रहैक गाछ। जकरा साक्षी राखि दुनू ९ महिनाक हिसाब किताब फरियौलक। लक्ष्मण एतबे बाजल “हम तँ बरद जेकाँ बहिए रहल छी, एहि मरुभूमिमे, अहाँ दुधपिया बौवाकेँ छोड़िकऽ किया आबि गेलौ?” कतारक मैथिल भेड़ा चरवाह- कतारक सदरमुकाम दोहासँ लगभग एक सय किलोमीटर दूर जमालिया स्थित मरुभूमिक छातीपर बनाओल गेल भेड़ाक गोहियाक आगू ठाढ़ भऽ एक गोट युवक सिटी बजा रहल छल। महाभारतकालीन कृष्ण जकाँ। जनु अपन गोप आऽ गोपीकेँ लग बजेबाक उपक्रम कऽ रहल हो। मुदा एहि मरुभूमिमे ने गाई अएबाक कोनो सम्भावना छलै आऽ ने गोपी। मुदा बकड़ी आऽ भेड़ा धरि अवश्य आबि गेल ओकर सिसकारी सुनिकए। दिनभरि ५० डिग्रीक ताप छोड़ि स्वयं थकित सुरुज भगवान संध्या रानीसँ रसकेलि करबाक धुनमे पश्चिमाचलगामी वाट पकड़ि लेने छलाह। पश्चिमसँ आवएवला सेनुताएल प्रकाश मरुभूमिक वालुपर पड़ि मलिछाह आकृति बना रहल छल। मरुभूमि पिलिया ग्रस्त रोगी जकाँ बेजान देखना जाऽ रहल छल। पछिया हावा सांय सांय कऽ रहल छल। हावाक गतिसंग वालुक छोट-छोट कण उड़ि-उड़ि राहगीरकेँ घायल बना रहल छल। बूझि पड़ैत छल जे प्रलयके पूर्व संकेत हो। चारुकात वियावान मरुभूमि आऽ एहिमे उगल एक आध बबूरक पौध। हम बेर-बेर सोचैत रहैत छी जे धन्य बबूर, ऊँट आऽ सार्कदेशक दुखिया मजुरसभ जे एहि भूमिकेँ धरती होएबाक ओहदा प्रदान करैत छैक। अन्यथा...?? मुदा ओऽ युवक शान्त छल। एक क्षणक बाद सुरुज अस्त भऽ जएतै, सगर सन्सार अन्हार भऽ जएतै आऽ सयौ विगहामे पसरल मरुभूमिपर कारी रंगक चादर ओछा जाएत। ओऽ अन्हार होएबासँ पहिनहि अपना अधिनक भेड़ा आऽ बकड़ीकेँ गोहियामे घुसियावए चाहैत छल। कर्तव्य परायण मनुपुत्रक रूपमे अपन दायित्व निर्वाह करए चाहैत छल। एहि तरहेँ अपन ईसारापर कृष्ण जकाँ भेड़ा-बकड़ीकेँ नचावएवला युवक के नाम छल महेन्द्र कापर। नेपालक सिरहा जिल्लाक कमलाकात भेड़िया गामक ई मैथिल युवक, विजुली, पिवाक पानि, सड़क आऽ स्वास्थ्यादि सुविधासँ विहीन एहि मरुभूमिमे गत एक वर्षसँ एहिना भेड़ा वकरी चड़वैत अछि। महेन्द्र कापर मात्र नहि, एहि मरुभूमिक विभिन्न भागमे बनाओल गेल विभिन्न भेड़ा, बकड़ी आऽ ऊट बथान तथा लगाओल गेल वगैचामे हजारौं नेपाली, भारतीय, वंगलादेशी, श्रीलंकन आऽ सुडियन मजुरसभ काज करैत अछि। अपना सभ दिस एक गोट कहबी नहि छैक जे, “जएवह नेपाल, संगहि जएतह कपार”। तहिना ई युवक सभ अपन करम भोगि रहल अछि। ओऽ सभ अबैत काल जे दोहा देखने छल, चकमक विजुलीवत्ती देखने छल आऽ चिक्कन चुनमुन फोरलेन सड़क देखने छल से घुरैत काल फेर देखत। ओकरा सभक वास्ते दोहा सहर दिल्ली दूर छैक। महेन्द्र जमालियाक एहि अन्कन्टार मरुभूमिमे गत एक वर्षसँ काज करैत अछि। ओकरा जिम्मामे दू सय भेड़ा आऽ बकड़ी छैक। हमरा सभकेँ देखिते ओकर आँखिमे विशेष प्रकारक चमक व्याप्त भऽ गेलै, मुखमण्डलपर खुशीक रेखा नाचए लगलैक। साँझ पड़ि रहल छैक ओकरा लालटेम नेसवाक छैक, रातुक खाना बनेवाक छैक आऽ खुला आकाशक नीचाँ तरेगन गनैत राति बितेवाक छैक। गत एक वर्षसँ महेन्द्रक ई दैनिकी बनि गेल छैक। ईजोरिया रातिक चानकेँ देखि ओऽ अतिशय प्रसन्न होइत अछि, “ई चान हमरो बाऊ आऽ माय आउर सेहो देखैत होतै नञि”? ओकर निश्चल प्रश्न हमरा भावुक बना देने छल। ओऽ भेड़ा आऽ बकरीकेँ गोहियामे गोतैत अछि। पठरूसभकेँ दुध पियबैत अछि। चारा रखैत अछि आऽ चैन भऽ हमरा सभसँ गप्प करवा वास्ते बैसि जाइत अछि। ओऽ एक वर्ष पूर्व कतार आएल छल। मानव तस्करसभ ओकरा कहने रहैक जे वगैचाक काज छैक। ओऽ सोचने रहय जे फलफूलमे पानि पटाएव, रोपव उखारव आ रियाल कमाएव मुदा से भेलै नहि। ओऽ भेड़ा चरवाह बनि कऽ रहि गेल। असलमे महेन्द्र अपने निरक्षर अछि। ओकर कतार आगमनके उद्देश्य छलै गाममे घर बनाएव आऽ बेटा-बेटीकेँ बोर्डिंग स्कूलमे पढ़ाएव। मुदा ओकर एक वर्षक श्रमसँ ई संभव नहि भऽ पाओल छैक। एक वर्षमे तँ महाजनकेँ ऋणो नहि फरिछाओल छैक। एहि वास्ते ओकरा आओर दू वर्ष एहि मरुभूमिक वालुकेँ फाकय परतैक। अवैत काल दलाल ओकरासँ ७५ हजार रुपैया लेने रहैक। जे ओऽ महाजनसँ ऋण लऽ कऽ चुकता कएने छल। जहन महेन्द्रक गप्पक बखारी खुजलै तँ फेर बन्द होएवाक नामे नहि लैक। ओकरा तँ ओहि गोहियामे राति बतैवाक छलै मुदा हमरा सभकेँ सय किलोमीटर दूर दोहा अएवाक छल। हमरा सभक धरफड़ीकेँ ओऽ अकानि गेल छल। कहलक सर, कहियोकाल अवैत जाइत रहब। भेड़ा बकड़ी संगे रहैत-रहैत ओहने भऽ गेल छी, देखियौ चाहो पानिक लेल नहि पुछलहुँ। आऽ कपड़ा लपेटल एकगोट पानिक बोतल आगाँ बढ़ा देलक। “हमरा सभक फ्रिज बुझू कि एयर कन्डीशन ईहे अछि”। गर्मीसँ सुखाएल कण्डकेँ पानिसँ भिजाओल आऽ अपन गन्तव्य दिस आगाँ बढ़ि चललहुँ। लगभग दश किलोमीटर वाट तय कएलाक बाद हमरा लोकनि जमालिया नगरमे पहुँचलहुँ। मुसलमान धर्मावलम्बी सभक रोजा खोलवाक समय भऽ गेल रहै। सड़क कातमे बनाओल गेल चबुतरापर नाना प्रकारक व्यंजन साँठल जाऽ रहल छल। लोक विस्मील्लाह करवालेल तैयार छलाह। हमरा मोन पड़ल महेन्द्रके गोहियामे राखल खवुज (कतार सरकारक सस्ता दरक रोटी) आऽ प्याउजक धेसर। एसगर महेन्द्र एखन नून, मिरचाई आऽ तेल प्याउजक संग खवुज दकरि रहल हएत। एतए ओकरेद्वारा पोसल गेल खस्सीक विरयानीक स्वाद लऽ रहल अछि मालिक आउर। दोहा,कतार, जमलिया। कुमार मनोज कश्यप जन्‌म : १९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाममे आऽ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखनमे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आऽ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रिय सचिवालयमे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित। हारल मनुक्ख बरी काल सँ प्रतिक्षा कऽ रहल छलहु बस के। गामक कोनो बस आबिये नहिं रहल छलै। एक तऽ प्रतिक्षा ओहिना कष्टप्रद, तहु मे जेठक दुपहरिया मे।   रौद आ पब्लिक  ट्रांसपोर्टक स्थिति ---- खिन्न भऽ गेल मोन। समय बितेबाक आर कोनो साधन नहिं देखि, मोन नहिंयो रहैत ठंढा पिबाक लेल बढि गेलहु सामने के रेस्टोरेंट दिस -- छाँह तऽ भेटबे करत,  सँगहि प््रातिक्षा के घड़ी सेहो बितत। बस एबा मे एखन आधा घंटा सँ कम समय नहिंये लगतैक। रेस्टोरेंट के तजबीज करैत आगू बढल जाईत छलहु कि केयो रस्ता रोकलक - जिर्ण, मलिन, बृद्ध नहिंयो रहैत बृद्ध सन - लाठी लेने '' भैया! दू रुपैया हुअय तऽ दऽ दियऽ, ट्रेकर पकड़ि गाम चल जायब। पायरे नहिं गेल भऽ रहल आछ ।'' आबाज मे एकटा संकोचक सँग दयनियता साफ झलकैत छलैक । तखने हमरा आगु मे नाचि गेल भीख माँगबाक नव-नव ढ़ब़ मोन परऽ लागल पढ़ल आ सुनल खिस्सा सभ जे कोना लोक ठका गेल ई सभ ढ़ब पऱ। ओकर याचना के अनसुना करैत हम बढ़ि गेलंहु रेस्टोरेंट दिस । बस अयला पर ख़िडकी कात सीट पर बैसि सुभ्यस्त भेलंहु।  कने काल मे बस चलि पड़ल। रस्ता कात मे सहसा ककरो पर नजरि पड़ि गेल़ चौंकलंहु - 'ई वैह आदमी तऽ नहिं जे हमरा सँ दू रुपैया मँगैत छल?'  दिमाग पर जोर देलहुँ हँ ई तऽ वैह आदमी आछ़़क़हुना- कहुना कऽ डेग बढबैत लगभग घिसियैत जँका --चलल जा रहल आछ गंतव्य दिस। ई दृश्य हमरा विचलित करऽ लागल़ हमर अंतरात्मा कचोटि उठल - 'दू रुपैया! मात्र दू रुपैयाक लेल बीमार - असक्क के पायरे जाय पड़ि रहल छैक आ तों मोन नहियो रहैत दस रुपैया ठंढा पी कऽ बर्बाद कऽ देलह! धिक्कार एहन मनुष्यता के!' अपराध बोध सँ हम आकाश दिस देखैत ओकर शून्यता मे विलिन भेल जा रहल छी। थाकल बाट ''सर, हमर मीटरक फाईल कहा तक पहुचलई?'' ''उपर सँ नहि लौटलै'' - बिजली ऑफिसक कर्मचरीक ई चिरपरिचित उत्तर फेर हमर कानमे गेल। उत्तर जेना स्टीरियोटाईप, प्री-रिकोर्डेड, बिना कोनो जाच-पड़ताल, नाम-पता पुछने, पेᆬकल सन। १५ दिन भऽ गेल बिजली ऑफिसक चक्कर लगबैत आऽ यैह उत्तर सुनैत । ''अरे ई सभ बड घाघ होईत छई। बिना 'सेवा' के किछु नहि हेतौक। परेशानी सँ बँचैक छहु तऽ सेवा करहि परतौ'' - अपन मित्र प्रभासक ई सलाह कचोटैतो मोन सँ मानहिं परल -विवसतामे। आखिर नोकरी छोड़ि कतेक दिन दौरैत रहब - अनायास,अनर्थक,आनश्रचत़। बिजली विभागक कर्मचारी 'सेवा' पबिते झट् दऽ हमरा आदेश-पत्र थम्हा देलक। जेना ओकरा सँपौती अबैत होईक- हमर मोनक आशय ओ पहिने बुझि गेल हो आ आदेश पहिने सँ तैयार रखने हो- हमरा देबाक हेतु। कायल भेलहुँ हम 'सेवा' महिमा सँ। विजयी भाव सँ आदेश-पत्र कें देखैत हम बाहर निकलि रहल छलहु कि नजरि परल कातमे लटकल बोर्ड पर जाहि पर मोंट आखरमे लिखल छलै -''रिश्वत लेना एवं देना जुर्म है।'' भने लोक पानक पीक फेकि विकृत कऽ देने छलै ओकरा। उपयुक्त चिज उपयुत्त जगह रहक चाही। रस्तामे फेकना भेटल बड़का लग्गा सँ बिजलीक तारमे टोका फंसबैत। हमरा देख कऽ मुस्कियायल ओऽ। लागल जेना हमर मुँह दुसि रहल हो। भावना जेठ महिना मे तऽ सूरज जेना भोरे सँ आगि उगलऽ लगैत छैक। दुपहरिया तक तऽ वातावरण ओहिना जेना लोहा गलाबऽ बला भट्ठी। छुट्टी के दिन रह्ने भोर मे देरिये सँ उठलंहु; साईत तहु द्वारे कनिया भानस करबा मे अलसा रहल छलीह। अंततोगत्वा निर्णय भेल - भोजन बाहरे कैल जाय। घर सँ बाहर निकललंहु। बाहर एकदम सुनसान - एक्का दुक्का लोक चलैत - सेहो साईत मजबूरीये मे। कियैक निकलत केयो घर सँ एहन समय मे? एहन रौद मे निकलनाई कोनो सजा सँ कम थोड़बे छैक। बड़ मसकत्ति के बाद एक टा रिक्सावला तैयार भेल लऽ जेबाक हेतु। रिक्सावला कि - अधबेसु, कृशकाय, हँपैᆬत़।रेस्टोरेंट पहुंचि भाड़ा पुछलियै। कहलक दस रुपैया। कनिया लड़ि पड़ली ओकरा सँ -''पांच रुपैया के दस रुपैया मंगैत छैंह! हमरा सभ कें बाहरी बुझैत छैं कि? ठक्क नहिंतन! एना जबर्दस्ती सँ बढिया होयतौक जे पौकेट सँ पाई निकालि ले। बजबियौ पुलिस के?'' बेचारा रिक्सावला घबड़ा गेल। पसेना सँ मैल-चिक्कट भेल गमछा सँ अपन मुंह पोछैत, बिना किछु बजने पांचक सिक्का लऽ कऽ चलि गेल बिना किछु बजने़ निरीह। रेस्टोरेंट मे भोजनोपरांत हमरा दस रुपैया टीप के रुप मे छोड़ैत देखि कनिया बजलिह - '' अपना स्टेटस के तऽ कम-सँ-कम ध्यान राखू। की दसे रुपैया दैत छियई - पाछाँ सँ गरियाओत'' एतबा  कहि झट सँ पचासक नोट बिल-फोल्डर मे छोड़ैत हमरा चलबाक ईसारा केलनि। आकस्मात हमरा आंखिक आगाँ रिक्सावलाक चेहरा मूर्तिमान भऽ उठल। तुलना करऽ लगलंहु - रेस्टोरेंटक वेटर आ रिक्सावला मे - एकटा वातनुवूᆬलित कक्ष मे भोजन परसैत आ दोसर रौद मे कोंढ तोरैत। भवनाक अंतर सँ सिहरि उठलंहु हम। बी०डी०ओ० ओकर असली नाम की छलैक से तऽ नहिं कहि; मुदा हम सभ ओकरा 'माने' कहि कऽ बजबैत  छलियैक। कारण, ओ बात-बात पर 'माने' शब्दक प्रयोग करैत छलीह। से 'माने' ओकर नामे पड़ि गेलई भरि गामक लोक लै। बाल-विधवा, संतानहीन 'माने' हमर घरक सदस्या जकाँ छलीह। हमरा बाद मे बुझवा मे आयल जे 'माने' हमरा ओहिठाम काज करैत छलीह। बृद्धावस्था के कारणे आब काज तऽ नहिंये कऽ सकैत छलीह; हँ दोसर नोकर-चाकर पर मुस्तैद भऽ काज  धरि अवश्य करबैत छलीह। प्रधान मंत्रीक मधुबनी  आगमन के लऽ कऽ लोक मे बेसी उल्लास आ उत्साह छलैक, सभ सक्षात दर्शनक पुण्य उठाबऽ चाहि रहल छल। लोकक एहि ईच्छा के पुरा करबा मे सहयोग दऽ रहल छलाह पार्टी कार्यकर्ता लोकनि जे बेसी-सँ-बेसी लोक के जुटा अपन शक्ति प्रदर्शन करबा लेल मुपत्त सवारी के व्यवस्था केने छलाह। हम मजाक मे 'माने' सँ पुछलियै- '' प्रधान मंत्री मधुबनी मे आबि रहल छथिन। अपन गामक सभ केयो जा रहल अछि देखऽ। अहाँ नहि जायब?'' ''के अबैत छथिन?''- माने पुछलनि। ''प्रधान मंत्री।'' - हम उत्तर देलियै। ''धुर! ओ कोनो बी०डी०ओ० छथिन जे 'बिरधा-पेलसुम'(वृद्धावस्था पेंसन) देताह। हम अनेरे की  देखऽ जाऊ हुनका ?'' हम अवाक रहि गेलंहु माने के उत्तर सँ। नव-वर्ष शहरी संस्कृति मे नव-वर्षक बड़ महत्त्व भऽ गेलैक आछ। चारु कात उल्लास, आनंद़ कोनो पाबनि-त्योहार सँ बेसिये। लोक पुरनका बितल साल सँ पिण्ड छोड़ा नवका साल कें स्वागत करय मे बेहाल़ एहि मे केयो ककरो सँ पाछाँ नहिं रहऽ चाहैछ । धूम-धड़्‌क्का, नाच-गाऩ आई जकरा जे मोन मे आबय कऽ रहल अछि नया सालक स्वागत मोन सँ कऽ रहल आछ । मुदा सब केयो थोड़बे? शहरक एहि उल्लास के नहि बुझि पाबि; सुकना के सात सालक बेटा  पुछिये देलकै ओकरा सँ -'' बाबू, आई कि छियै जे लोक एना कऽ रहल आछ?'' ''बाऊ, पैघ लोक सभक नया साल आई सँ शुरु भऽ रहल छै; तैं सभ पाबनि मना रहल आछ।''- बाल-मन कें बुझेबाक प्रयास केलक सुकना । चोट्टहि प्रश्र्नक झड़ी लगा देने छलई छौंड़ा - ''हम सभ नया साल कियैक नहिं मनबैत छि ? हमरा सभक नया साल कहिया एतैक? हम सभ कहिया मनेबई नया साल?'' सुकना एहि अबोध कें कोना बुझबौक जे गरीबक कोनो साल नया नहिं होईत छैक। बोनिहारक सभ सांझ नया साल आ सभ भिनसर पुरान साल जँका होईत छैक। बोनिहारी भेटलई तऽ नूने-रोटी सही, परिवारक सभ व्यत्तिक पेट भरलैक ; नहि तऽ भुखले रहि गेल सभ गोटे । एना मे कोन सीमा-रेखा मजूरक लेल नया आ पुरानक भऽ सकैछ़ ज़ँ भऽ सकैछ तऽ एक मात्र मजूरी भेटब़ भेट गेल तऽ नया सालक खुशी; नहि भेटल तऽ पुरान साल सन दुख़ तै सभ सांझ नया साल आ सभ भिनसर पुरान साल । बाप-बेटा दुनू चुप एक दोसराक मुँह देखि रहल छल़ साईत आँखि आँखिक भाषा बूझि गेल छलैक। गजल धज्जी रातुक श्याह आँचर मे, अहल भोर के ताकि रहल छि। अपन आंगन मे ठाढ़ हम, आई अपने घर के ताकि रहल छि । आहत मोनक घायल तड़पन, पेᆬरो  आई   कनाबऽ आयल। जतऽ जलन के पीड़ा कम हो, ओहन छाँह  के ताकि रहल छि। दोसरा कें कि दोष देबई हम, अपनो सभ तऽ अंठिये  बनला । याद ने कोनो बाँचल रहि जाय, ओहन ठौर के ताकि रहल छि। बगबाहो अपनहिं हाथें, आई  कलम-बाग सभ जारऽ  आयल। तड़पन जतऽ तड़पि रहि जायत, ओहने कहर के ताकि रहल छि। बिसरि गेल जे याद छलै, से  सपना  कियैक याद दियौलक? नोर ने ढ़रकय जाहि पलक सँ, एहन आँखि के ताकि रहल छि। निकलि गेलहुँ आछ सुन्न राह पर,  अन्हारेक टा सम्बल केवल। अपन-आन केयो कतहु नहि, आई ओहन दर के ताकि रहल छि। कृपानन्द झा (1970- ), जन्म- समौल, मधुबनी, मिथिला। गणितमे स्नातकोत्तर (एल.एन.एम.यू, दरभंगा), बी.लिब. (जामिया मिलिया इस्लामिया) आऽ सोचाना विज्ञानमे एसोसिएटशिप, आइ.एन.एस.डी.ओ.सी., नई दिल्ली। कृपानन्द जी मीरा बाइ पोलीटेकनिक, महारानी बाग, नई दिल्लीमे व्याखाता छथि। कृपानन्दजी यूथ ऑफ मिथिलाक अध्यक्ष छलाह आऽ एखन अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषदक जेनरल सेक्रेटरी छथि। हिनकर ६ टा शोध पेपर सूचना प्रबन्धनक क्षेत्रमे प्रकाशित छन्हि, संगहि हिन्दी आऽ अग्रेजीमे एक-एकटा कविता सेहो प्रकाशित छन्हि। चौकपर आणविक समझौता:- कृपानन्द झा साँझ काल गामक चौकपर गहमा-गहमी छलैक। टोनुआँक दोकानपर चाहक गिलास खनखना रहल छलैक मंडलजी पान लगेवमे व्यस्त छलाह। कनीक दूरपर दुर्गा मन्दिरक पुवरिया कात बनल चबुतरापर दस-बारह युवा आ वृद्ध सम सामयिक चर्चामे मग्न छलाह। बीचमे मन्नू भाइक आवाज जोड़सँ आयल। “हौ! एहन कोन आफद आबि गेलैक अपन देशपर जे प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंहजी अपन देशक वैज्ञानिकक लगभग पछिला पचास वर्षक तपस्या आ अनुसंधान तथा भविष्यक आणविक सामरिक अनुसंधानकेँ अमेरिकाक हाथ बंधकी रखबापर उतारु भय गेल छथि। गगनजी चबुतरापर सँ उचकि पानक पीक कातमे फेकैत कहि उठलाह, “कक्का! एहन बात नहि छैक। ई समझौता मात्र अपन देशक महज ऊर्जा आवश्यकताकेँ ध्यानमे राखि कएल गेल-हँ!.. मन्नू भाई तम्बाकू ठोढ़मे दैत कहलखिन, “है। ई ऊर्जा आवश्यकता महज बहाना छैक। अमेरिका एहि बहाने अपन देशक स्वतन्त्र आणविक कार्यक्रममे टाँग अड़ेबाक फिराकमे बहुत दिनसँ छल। आब ओ अपन मनशामे १२३ समझौता आ ओहिमे हाइड एक्टक प्रावधान सौँ सफल भय रहल अछि”। गगन जी थोड़ेक चिन्तित मुद्रामे कहलखिन- “देखियौ कक्का, जहाँ तक १२३ समझौता आ भारतक आणविक सामरिक कार्यक्रमक प्रश्न छैक तँ मात्र ओ सब रियेक्टर अंतर्राष्ट्रीय एजेन्सीक देखरेखमे आनल जेतैक, जे सब रियैक्टर, भारत सरकार चाहतैक। तेँ बाकी कार्यक्रमपर एकर असर नहि परतैक”। “हाँ हौ! लेकिन ई अनबाक कोन जरूरी छैक?” मन्नू भाई आवेशमे बजलाह। ताधरि बैंकर सैहैब सेहो सहटि कय चबुतरा दिश आबि गेल छलाह। गम्भीर आवाजमे मन्नू भाईकेँ सम्बोधित कय कहलथिन- “भाई, किछु एहन प्रावधान सभ जरूरी छैक एहि समझौतामे, परन्तु ई सभ निर्भर करैत छैक जे भविष्यमे भारतक स्थिति अंतर्राष्ट्रीय स्तरपर कतेक मजबूत रहैत छैक आ हमर राजनीतिज्ञ सब परिस्थितिसँ कतेक फायदा उठबैत छथि। कारण जे ड्राफ्ट एखन प्रस्तुत कएल गेल छैक ताहिमे कोनो कन्फ्लिक्टक स्थितिमे की कदम उठायल जायत आ ओ भारतक फायदामे होयत वा नुकसानमे से ओहि समयक देशक कूटनीतिज्ञ एवं अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितिपर निर्भर करत। परंच, वर्तमान परिस्थितिकेँ अगर देखल जाय तँ हमर देशक आणविक विद्युत उत्पादनक वर्तमान क्षमता मात्र ४०-५०% उत्पादन भय रहल अछि बाँकी आगू जे योजना छैक ओकरो अगर ध्यानमे राखल जाय तँ कहल जा सकैत अछि जे आणविक इन्धन एवं शान्तिपूर्व आणविकौपयोगसँ जुड़ल किछु तकनीककेँ यथाशीघ्र आवश्यकता छैक। “हौ बैंकर! ई पक्ष तँ छैक परंच एखनहु अगर सरकार आंतरिक संसाधनकेँ सही ढंगसँ दोहन करय तँ ई आणविक इंधनक समस्या अल्पकालिक साबित होयत”। मन्नू भाई किछु शान्त मुद्रामे बजलाह। अपन बातकेँ आगू बढ़बैत कहलखिन जे – “हौ, एखनहु जे योजना सब झाड़खण्डक (जादूगुड़ा, बन्दूहुरंग, तुरमडीह) आन्ध्र प्रदेशक (तुम्मालापल्ली) कर्णाटक, मेघालय आ राजस्थान आदि राज्यमे चलि रहल छैक ओ अगर सही ढंगसँ कार्यान्वित कयल जाय तँ आणविक इन्धनक ई वर्तमान समस्याक समाधान आसानीसँ कयल जा सकैछ”। चबुतराक उतरवरिया-पछवरिया कोनापर बैसल टुन्ना बाजि उठल, “यौ कक्का, मंडलजी पानक दोकान आब बन्द करताह! ८ बाजि रहल छैक”। बैंकर सैहैब जोड़सँ कहलखिन- “यौ मंडलजी! आठटा पान लगाकऽ एमहर पठाऊ”। चबुतराक पछवरिया कातमे मजहर सोचपूर्ण मुद्रामे साँझेसँ बैसल सबहक गप सुनि रहल छलाह। बैंकर सैहैब मजहरकेँ कहलखिन- “हौ मजहर! तूँ तँ एखन कम्पीटिशन सबहक तैयारी कए रहल छह। तूँ एहि सम्पूर्ण प्रकरण पर बहुत मंथन कयने हेब। आखिर तोहर सोच की छह”? खखसि गरदनि साफ कय खखाड़ कातमे फेकैत बजलाह- “भाईजी! अंतर्राष्ट्रीय आ आर्थिक नीति काफी संकीर्ण विषय छैक। पहिल बात अछि जे हमरा लोकनि एन.पी.टी.पर हस्ताक्षर केने बिना अंतर्राष्ट्रीय आणविक बाजारमे सेंह मारवाक कोशिश कय रहल छी। एहि हालतमे किछु ने किछु अंतर्राष्ट्रीय बंधन तँ स्वीकार करहिये परत। परन्तु हम एकरा एकटा अवसरक रूपमे देख रहल छियैक। आणविक क्षेत्रक किछु एहन पक्ष छैक जाहिमे हमर देशक अनुसंधान शायद अमेरिकोसँ ऊपर अछि। हालमे एकटा रिपोर्ट पढ़ने रही, जाहिमे कहल गेल छैक जे भारतक वैज्ञानिक २००५ आ २००६ मे प्रकाशित अनुसंधान रिपोर्टक आधारपर तकनीकी रूपसँ समृद्ध देश सबकेँ सेहो पाछू छोड़ि आगू बढ़ि गेल अछि। एहि स्थितिमे आणविक इन्धन आ किछु तकनीकक आयात तँ महज अल्पकालिक छैक। दीर्घकालिक असर हमरा जनैत ई हेतैक जे भारत किछु दिनका बाद आणविक क्षेत्रमे एकटा पैघ निर्यातक भऽ कऽ उभरत। एकरामे तकनीकी क्षमता छैक आ अन्तरि आणविक साधन, जे किछु काल पहिने चर्चा भेल जेना, झारखण्ड, आन्ध्रप्रदेश, मेघालय आदिमे उपलब्ध छैक तथा अंतर्राष्ट्रीय आणविक सहयोगक माध्यमसँ एकटा पैघ निर्यातक भेनाइ सम्भव छैक। तेँ हेतु हमर तँ एतबय कहब अछि जे जौँ एहि समझौताकेँ सही ढंगसँ उपयोग कयल जाय तँ ई अपन देशक लेल वरदान साबित होयत”। कमलानन्द झा,हिन्दी विभाग,सी.एम. कॉलेज,दरभंगा मैथिली समस्याक टोह लैत कथा-संकलन : उदाहरण पछिला चारि बर्खमे कोनो पैघ आ महत्वपूर्ण प्रकाशनसँ मैथिलीक तीन गोट कथा-संकलनक प्रकाशन मैथिली भाषा लेल एकटा शुभ-संकेत मानल जा सकै'छ। नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा सम्पादित मैथिली कथा संचयन(सन्‌ २००५) आ सन्‌ २००७मे तारानन्द वियोगी द्वारा सम्पादित देसिल बयना(सन्‌ २००७) पाठकक बीच लोकप्रिय भ'ए रहल छल कि प्रकाशन विभागसँ देवशंकर नवीन द्वारा सम्पादित टटका मैथिली कथा-संग्रह उदाहरण छपि क' आबि गेल। प्रसन्नताक बात थिक जे उदाहरणक प्रकाशनसँ प्रकाशन विभागमे साहित्यिक रचनाक प्रकाशनक बाट फूजल, जे स्वागत योग्य अछि। उदाहरणमे ललितसँ सियाराम सरस धरिकक कुल छत्तीस गोट कथा संकलित अछि। एहि संकलनसँ मैथिली कथा-संसारक परिदृश्य स्पष्ट होइत अछि। संकलनक कतोक कथा समस्त भारतीय भाषासँ कान्ही मिलान लेल तत्पर अछि, जे संकलनकर्त्ताक चयनकौशलक सूचक थिक। श्रेष्ठ कथाकार राजकमल चौधरीक कथा ÷एकटा चम्पाकली एकटा विषधर' घाघ मैथिल समाजक टोप-टहंकारकें अद्भुत रूपें अनावृत्त करैत अछि। सवर्ण मैथिलक गरीबी, ओहि गरीबीसँ उत्पन्न दयनीयता, आ तकर खोलमे दुबकल बेटीक शातिर माइ-बापक घिनौन आचरण घनघोर तनावक संग पाठककें झकझोरैत अछि। दशरथ झा आ हुनकर घरबाली अपन तेरह बर्खक बेटी चम्पाक विवाह बासैठ बर्खक वृद्ध शशि बाबू संग करेबाक षड्यंत्रापूर्ण योजना बनबैत अछि। दुनू प्राणीक गिद्ध दृष्टि शशि बाबूक सम्पति पर टिकल छनि, जकर मलिकाइन विवाहोपरान्त हुनक तेरह वर्षीया चम्पा बनैबाली छनि। अतिशयोक्ति सन लगैबला एहि घटनाक मर्मकें ओएह बूझि सकत जे मिथिलांचलक बहुविवाह प्रथासँ नीक जकाँ परिचित छथि। बीसम-एकैसम विवाहक बाद पति अपन पूर्व पत्नी सभक मुँहो बिसरि जाइ छलाह। पत्राकारिता दुनियाक महत्वपूर्ण आ सम्वेदनशील पक्षसँ मायानन्द मिश्रक कथा ÷भए प्रकट कृपाला' साक्षात्कार करबैत अछि। मीडिया-तन्त्रा पर बनल सार्थक हिन्दी सिनेमा ÷पेज थ्री' जे किओ देखने छथि, से एहि कथाक मर्मकें बेसी नीक जकाँ बुझि सकै छथि। शीघ्रतासँ नामी पत्राकार बनि जाएबाक हड़बड़ीकें कथामे कलात्मक ढंगसँ एकेरल गेल अछि। कॉरपोरेट दुनियाँक बादशाह श्याम बोगलाक मृत्युक खबरि सबसँ पहिने देबाक होड़ लागल अछि। पत्राकार लोकनिक नजरिमे ओएह सभसँ पैघ खबर अछि, दुनियामे किछु भ' जाउ। लिलीरे मैथिलीक सशक्त कथालेखिक छथि। हुनकर कथा ÷विधिक विधान'मे कामकाजी स्त्राीक संघर्षकें यथार्थतः देखबाक, आ यथार्थक मर्मकें कलात्मक कौंध संग उभारबाक सफल चेष्टा अछि। उषाकिरण खान अपन कथा ÷त्यागपत्रा'मे ग्रामीण युवतीक अदम्य जिजीविषाकें व्यक्त करबामे पूर्ण सफल नहि भ' सकलीह। घोर आदर्शवादी आ कठोर अनुशासित परिवारमे पालित-पोषित चम्पा कॉलेजमे पढ़' चाहैत अछि, अपन मर्जीसँ विवाह कर' चाहैत अछि। मुदा आजीवन विवाह नहि करबाक घोषणा करैत चम्पा स्वयंकें ओही परंपराक केंचुलमे समेटि लैत अछि। चम्पा विवाहक लक्ष्मण रेखा पार करैत ÷और भी ग़म हैं' कें आधार मानि अपन व्यक्तित्वकें विस्तृत आयाम नहि द' पबैत अछि। मनमोहन झाक कया ÷फयदा'मे स्त्राी जातिक मोलभाव बला प्रवृत्तिक रेखांकन खूब जमल अछि, मुदा वो एहि प्रवृत्तिक वर्णन क' स्त्राी जाति कोन पक्षक उद्घाटन करै छथि, से बूझब कठिन। कोनो व्यक्तिक स्वभावमे नीक आ खराब दूनू भाव रहैत अछि। कथाक हेतु कोन तरहक भावक चुनाव कयल जाए, ई महत्वपूर्ण अछि। इएह चुनाव मैथिली कथामे स्त्राी चेतनाक दर्शन करा सकैत अछि। स्त्राी चेतनाक दृष्टिएं प्रदीप बिहारीक कथा ÷मकड़ी' अपेक्षाकृत मेच्योर्ड आ बोल्ड कथा कहल जा सकैछ। बेराबेरी कथानायिका सुनीता दू बेर विवाह करैत अछि, दुनू बेर ओकर पति मरि जाइछ, मुदा ओ जिनगीसँ हारि नहि मानैत अछि। सिलाई मशीन चला क' ओ गुजर-बसर करैत अछि। एतबे नहि, ओ एकटा अनाथ आ बौक बच्चाक लालन-पालनक दायित्व ल' क' अपन व्यक्तित्वकें विस्तार दैत अछि। कथामे मोड़ तखन अबैत अछि जखन ओ बौका समर्थ भेला पर सुनीताक स्वीकृतियेसँ सही, ओकरा गर्भाधान क' क' भागि जाइत अछि। सुनीताकें एहि बातक अपराधबोध नहि छै, जे ओ बौका संग किऐ  ई कृत्य केलक, ओ देहक विवशतासँ परिचित अछि, मुदा बौकाक भागि जेबाक दंश ओकरा व्यथित करै छै। देवशंकर नवीनक कथा ÷पेंपी' पति-पत्नीक सम्बन्ध विच्छेदक परिणामस्वरूप बेटीक मनोमस्तिष्क आ व्यक्तित्व पर पड़ैबला कुप्रभाव आ बेहिसाब उपेक्षाभावकें करुणापूर्ण ढंगसँ व्यक्त करैत अछि। मुदा एहिमे सभटा दोष स्त्राी पर फेकि देब पूर्वाग्रह मानल जा सकैछ। ई सामाजिक सत्य नहि भ' सकैत अछि। वरिष्ठ कथाकार राजमोहन झा अत्यंत कुशलतापूर्वक ÷भोजन' कथाक बहन्ने स्त्राीक बाहर काज करबाक विरोध क' जाइत छथि। राजमोहनजीक दक्षता इएह छन्हि जे ई सभ बात कहिओ क' ओ प्रगतिशील बनल रहै छथि। राजकमल चौधरीक ÷एकटा चम्पाकली एकटा विषधर', धूमकेतुक ÷भरदुतिया', गंगेश गुंजनक ÷अपन समांग'(ई कथा देसिल बयनामे सेहो संकलित अछि), तारानन्द वियोगीक ÷पन्द्रह अगस्त सन्तानबे' आ अशोकक ÷तानपूरा' एहि संग्रहक श्रेष्ठ कथा मानल जा सकैछ। धूमकेतुक कथा ÷भरदुतिया' व्यक्ति स्वार्थ हेतु भाई-बहिनक पावन पाबनिक दुरुपयोग करबैत देखबैत अछि। आजुक मनुख अहू पाबनिकें नहि छोड़लक। ÷पन्द्रह अगस्त सन्तानबे' वियोगीक सफल राजनीतिक कथा कहल जा सकैछ। कथाक ई निष्पति एकदम ठीक लगैत अछि जे सवर्णक पार्टी एहि दुआरे जीतैत रहल जे निम्नजातिक आर्थिक स्थित बहुत खराब छल। स्वामीक पार्टी दासोक पार्टी होइछ। दोसर पार्टीक मादे सोचब मृत्युकें आमन्त्राण देब छल। आओर नइं किछु त' आवास आ रोजगार छीनि बेलल्ला बना देब उच्चवर्गक हेतु बाम हाथक काज छल। दिल्ली-पंजाब प्रवासँ निम्नवर्गक आर्थिक, सामाजिक स्थितिमे सुधार भेल। परिणामस्वरूप ओहि वर्गमे आत्मसम्मान आ राजनीतिक चेतनाक अंकुरण भेल। भक्तिकाव्यक उन्मेष आ ओहिमे निम्नजातिक कविक बाहुल्यक पृष्ठभूमिमे सुप्रसिद्ध इतिहाकार इरफमान हबीब मुगलकालीन विकास कार्यकें लक्षित केलनि अछि। ÷पन्द्रह अगस्त सन्तानबे'  कथाक विलक्षणता बिहारमे बनल निम्नजातिक पार्टीक आत्मालोचन थिक। कहबा लेल त' ई पार्टी निम्नजातिक-निम्नवर्गक छल, मुदा अइ पार्टीमे छल, प्रपंच, भ्रष्टाचार, अपराध आओर पाखण्ड पहिनहुँसँ तेजगर और धारदार भ' गेल छल। कथाकारक इएह द्वन्द्व कथाकें गरिमा प्रदान करैछ। चाहक दोकान चलबैबला मुदा बहुत प्रारम्भहिसँ सक्रिय मूल्यपरक राजनीति करैबला हीरा महतोक धैर्य जखन संग छोड़ि दै छनि त' ओ पार्टी प्रमुख बासुदेव महतो पर बिफरैत कहै छथि-- रे निर्लज्जा, एतबो सरम कर! जे कुकर्म करै छैं से अपन करैत रह, लेकिन एना समाजमे नइं कहिए जे कुकर्मे करब ठीक छिऐ। एतबो रहम कर बहिं...।'' अशोकक कथा ÷तानपूरा' मध्यवर्गीय हिप्पोक्रेसीक घटाटोपकें तार-तार क' देबामे पूर्ण सफल भेल अछि। बिना कोनो उपदेश आ नैतिक आग्रहक कथा मध्यवर्गीय कुत्सित मानसिकताक दुर्ग भेदन करैत अछि। कथानायक विनोद बाबूक संगीत-प्रेमकें हुनक पिता घोर अभाव आ द्ररिद््रयक बीच जेना-तेना पूरा करैत छथि, मुदा जखन विनोद बाबूक पुत्रा संगीत सिखबाक इच्छा प्रकट करै छनि त' दुनू प्राणीकें साँप सूँघि जाइत छनि। एहि दुआरे नहि, जे हुनका कोनो तरहक अभाव छनि। बल्कि एहि दुआरे जे संगीतक स'ख हुनक बेटाकें रुपैया कमबैबला मशीन नहि बना सकत। जे दम्पति कोनो विषय पर कहियो एकमत नहि भेल, एहि विषय पर एकमत भ' पुत्राक एहि अव्यावहारिक स'ख'क केठ मोंकबाक साजिशपूर्ण योजना बनबए लगै छथि। संग्रहक किछु कथा जेना अवकाश, अयना, खान साहेब, जंगलक हरीन आदि यथार्थक मोहमे शुष्क गद्य बनि क' रहि गेल अछि। एहिमे किछु कथा ततेक सरलीकृत भ' गेल अछि जे ओ नवसाक्षर हेतु लिखल कथा बुझि पडै+छ। एहन कथा सभक मूल संरचना इतिवृत्तात्मक अछि। यद्यपि इतिवृत्त कोनो कथाक सीमा नहि होइछ, मुदा जखन कोनो कथा घटनाक स्थूल आ तथ्यात्मक विवरण टा दैछ, कथामे समय वा क्षणक मर्म नहि आबि पबैछ, त' एहन इतिवृत्त निपट गद्य बनि क' रहि जाइछ। यथार्थ कोनो कथाकें विश्वसनीयता देबाक बदलामे ओकरा भीतरसँ संवेदना निचोड़ि अनैत अछि, कथाकें प्रमाणिक बनेबाक फेरमे पड़ल नहि रहैत अछि। कथाकार रमेश अपन कथा ÷नागदेसमे अयनाक व्यवसाय'मे अतियथार्थ आ इतिवृत्तक फ्रेमकें तोड़ि प्रतीक वा फैंटेसीक प्रयोगसँ कथा बुनबाक प्रयास त' केलनि, मुदा कथाक विन्यासमे एकरसता आबि गेल। एहि फ्रेम हेतु हमरा लोकनिकें राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा(दुविधा)  आ हिन्दी कथाकार उदय प्रकाश (वारेन हेस्टिंग्स का सांढ़) आदिकें पढ़बाक चाही। हिनका लोकनिक कथा यथार्थक फ्रेमकें तोड़ियो क' यथार्थ बनल रहल अछि। मैथिलीमे प्रकाशित उक्त तीनूँ कथा संकलनसँ मैथिली कथाक प्रसार राष्ट्रीय स्तर पर भ' रहल अछि, एहिमे दू मत नहि। मुदा उक्त संकलनकें पढ़ि आम पाठकक राय इएह बनत जे मैथिलीमे कुल इएह तीस-चालीस गोट कथाकार आइ तक भेलाहे। कारण तीनूँ संग्रहमे कथाकारक सूचीमे अद्भुत साम्य अछि। कथा पढ़ि बुझना जाइछ जे कथा चयनमे कथाक अपेक्षा कथाकारकें महत्व देल गेल अदि। ई कहब सर्वथा अनुचित जे संकलनक कथाकार महत्वपूर्ण नहि छथि, मुदा अन्य श्रेष्ठ कथाकें सेहो प्रकाशमे अएबाक प्रयास हेबाक चाही। हमरा लोकनि ई नीक जकाँ जनै छी जे मैथिलीमे श्रेष्ठ कथाक अभाव नहि अछि। किन्तु प्रकाशनक अभावमे पत्रा-पत्रिाकाकें छानि मारब कठिनाहे नहि समय-साध्य कार्य थिक। वैद्यनाथ मिश्र यात्राीक पहिचान भने श्रेष्ठ कविक रूपमे छनि, मुदा हुनकर मैथिली कथा ÷चितकबड़ी इजोरिया' आ ÷रूपांतर' कतोक दृष्टिएं महत्वपूर्ण अछि। रेणुजी सेहो मैथिली कथा लिखलनि अछि। ई दीगर बात थिक जे बादमे ओ हिन्दिए टामे लिखए लगलाह। ÷नेपथ्य अभिनेता' आ ÷जहां पमन को गमन नहीं' आदि लीकसँ हटि क' लिखल गेल कथा थिक। ÷उदाहरण'मे कथाक प्रकाशन वर्ष आ सन्दर्भक अनुपस्थिति खटकैत अछि। समय-सीमा जनने बिना कोनो कथाक सम्यक मूल्यांकन सम्भव नहि। नवीनजी सदृश दक्ष आ अनुभवी सम्पादकसँ ई आशा नहि कएल जा सकै छल। एहि कमीकें पूरा करैत अछि हुनकर चौदह पृष्ठीय भूमिका। सम्पादक मैथिली कथाक सीमा आ सम्भावनाक विस्तृत पड़ताल अपन एहि भूमिकामे केलनि अछि। मैथिली कथाक इतिहासकें बुझबा लेल ई भूमिका निश्चित रूपें रेखांकन योग्य अछि। उदाहरण पुस्तकक नाम    -     उदाहरण सम्पादक         -     देवशंकर नवीन प्रकाशक         -     प्रकाशन विभाग सूचना और प्रसारण मन्त्राालय भारत सरकार पृष्ठ        -     २७४ मूल्य      -     २०० टाका मात्रा डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)। सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)। सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक। देवशंकर नवीन-अदद्दी पेनकें मजगुत करबाक आवश्यकता मिथिलाक सांस्कृतिक विरासत तकैत दूर धरि नजरि जाइत अछि, सबसँ पहिने  देखाइत अछि जे उच्च शिक्षा प्राप्त करबाक, गम्भीर चिन्तन-मनन करबाक, छोट-सँ-छोट बात पर पर्याप्त विचार-विमर्श करैत निर्णय लेबाक प्रथा मिथिलामे पुरातन कालसँ अबैत रहैत रहल अछि। मुदा तकर अतिरिक्त ÷परसुख देबामे परमसुख'क आनन्द लेबाक आ जीवनक हरेक आचार एवं आचरणमे लयाश्रित रहबाक अभ्यास मैथिल जनकें निकेनाँ रहलनि अछि। स्वयं कष्ट सहिओ क', अपन सब किछु गमाइओ क', दोसरकें अधिकसँ अधिक प्रसन्नता देबाक आदति मिथिलामे बड़ पुरान अछि। प्रायः इएह कारण थिक जे अतिथि सत्कारमे मिथिलाक लोक अपना घरक थाड़ी-लोटा धरि बन्हकी राखि देलनि। दोसरकें सम्मान देबामे मैथिल नागरिक बढ़ि-चढ़ि कए आगू रहल अछि। भनसियाक काज कर'बला व्यक्तिकें महराज अथवा महराजिन, केस-नह-दाढ़ी-मोंछ साफ कर'बला व्यक्तिकें ठाकुर-ठकुराइन, घर-आँगनमे नौरी-बहिकिरनी आ सोइरी घ'रमे परसौतीक काज करबाब'वाली स्त्राीकें दाय कहि क' सम्बोधित करबाक प्रथा मिथिलामे एहने धारणासँ रहल होएत। ध्यान देबाक थिक जे मिथिलामे दादीकें, जेठ बहिनकें आ घ'रक अत्यधिक दुलारि बेटीकें दाय कहबाक परम्परा अछि। अध्ययन, चिन्तन, मननक प्रथा मिथिलामे बड़ पुरान अछि। मुदा ई सत्य थिक जे अशिक्षेक कारणें मिथिला एतेक पछुआएलो रहल। गनल गूथल जे व्यक्ति अध्ययनशील भेलाह, से अत्यधिक पढ़लनि, जे नहि पढ़ि सकल, से अपन रोजी-रोटीमे लागल रहल। रोजी-रोटीक एक मात्रा आधार कृषि छल। विद्वान लोकनिक गम्भीर बहसमे बैसबाक अथवा ओहिमे हिस्सा लेबाक तर्कशक्ति, बोध-सामर्थ्य, आ पलखति रहै नहि छलनि, तें जे उपदेश देल जाइन, तकरा आर्ष वाक्य मानि अपन जीवन-यापनमे मैथिल लोकनि तल्लीन रहै छलाह। ईश भक्तिक प्रथा अहू कारणें मिथिलामे दृढ़ भेल। मानव सभ्यताक इतिहास कहै'ए जे प्रकृति-पूजन, नदी-पहाड़-भूमि-वृक्ष-पशु आदिक पूजन एहि करणें शुरुह भेल जे प्रारम्भिक कालमे जीवन-रक्षाक आधार इएह होइत छल। लोक अनुमान लगौलक जे सृष्टिक कारण, स्त्राी-पुरुषक जननांग थिक, तें ओ लिंग पूजा आ योनि-पूजा शुरुह केलक, जे बादमे शिवलिंग आ कामयोनि पूजाक रूपमे प्रचलित भेल। बादमे औजार पूजन होअए लागल।... तें पूजा पाठमे लीन हेबाक प्रथा पुरान अछि। मिथिलामे ओहि समस्त पूजन-पद्धतिक अनुपालन तँ होइते रहल; पितर पूजा, ग्रामदेव पूजा, ऋतु पूजा, फसल पूजा, कुलदेव-देवी पूजा आदिक प्रथा बढ़ल। हमरा जनैत विद्वान लोकनि द्वारा ईश भक्तिक उपदेश एहि लेल देल जाइत रहल हएत जे ईश भक्तिमे लागल लोक धर्म-भयसँ सदाचार अनुपालनमे लागल रहत, सद्वृत्तिमे लीन रहत, सामाजिक मर्यादाक ध्यान राखत, भुजबल-धनबलक मदमे निर्बल-निर्धन पर अत्याचार नहि करत।...लक्ष्यपूर्ति त' नहिएँ भेल, उनटे लोक धर्मभीरु, पाखण्डी अन्धविश्वासी आ निरन्तर लोभी, स्वार्थी, अत्याचारी होइत गेल, परिणामस्वरूप आजुक मैथिल-प्रवृत्ति हमरा सभक सोझाँ अछि। कृषि जीवनसँ समाजक कौटुम्बिक बन्हन एते मजगुत छल, जे भूमिहीनो व्यक्ति सम्पूर्ण किसानक दर्जा पबै छल। हरेक गाममे सब वृत्तिक लोक रहै छल। डोम, चमार, नौआ, कुमार, गुआर, धोबि, कुम्हार, कोइरी, बाह्मण, क्षत्राी... आदि समस्त जातिक उपस्थितिसँ गाम पूरा होइ छल। जमीन्दार लोकनि समस्त भूमिहीनकें जागीर दै छलाह, बाह्मण पुरहिताइ करै छलाह, नौआ केश कटै छलाह; कुमार ह'र-फार, चौकी केबाड़ बनबै छलाह; धोबि कपड़ा-बस्तर धोइ छलाह...। सम्पूर्ण समाज एक परिवार जकाँ चलै छल। सब एक दोसरा लेल जीबै छलाह, सब गोटए किसान छलाह, कृषि-सभ्यतामे मस्त छलाह। सिरपंचमी दिनक ह'र-पूजा हो; दसमी, दीया-बाती, सामा-चकेबाक उत्सव हो; मूड़न-उपनयन-विवाह-श्राद्ध हो; छठि अथवा फगुआ हो... बिना सर्वजातीय, सर्ववृत्तीय लोकक सहभाग नेने कोनो काज पूर नहि होइ छल। एहिमेसँ बहुत बात तँ एखनहुँ बाँचल अछि, होइत अछि ओहिना, ओकर ध्येय कतहु लुप्त भ' गेल अछि। मिथिलाक विवाहमे एखनहुँ जा धरि नौआ ब'रक कानमे हुनकर खानदान लेल गारि नहि देताह (परिहास लेल); धोबिन अपना केस संगें कनियाँक केस धो क' सोहाग नहि देतीह, विवाह पूर्ण नहि मानल जाइत अछि। ध्यान देबाक थिक जे एहि तरहें ओहि नौआकें कन्याक पिता आ धोबिनकें कन्याक माइक ओहदा देल जाइत अछि। मिथिलाक छठि पाबनि तँ अद्भुत रूपें सम्पूर्ण विरासतक रक्षा क' रहल अछि। नदीमे ठाढ़ भ' कए सूर्यकें अर्घ देबाक ई प्रथा जाति-धर्म समभावक सुरक्षा एना केने अछि जे समाजक कोनहुँ वर्गक सहभागक बिना ई पाबनि पूर्ण नहि होएत। नेत अइ स'ब टामे एकता आ समानताक सूत्रा स्थापित रखबाक रहैत छल। ई कलंक स्वातन्त्रयोत्तरकालीन मिथिलाक स्वाधीन मानवक नाम अथवा वैज्ञानिक विकास, बौद्धिक उन्नति, औद्योगिक प्रगतिक माथ जाइत अछि, जे समस्त विकासक अछैत मानव-मनमे लोभ-द्रोह, अहंकार एहि तरहें भरलक छूआछूत, जाति-द्वेष, शोषण-उत्पीड़न बढ़ैत गेल; आ आइ मिथिला-समाज, जे त्याग, बलिदान, प्रेम, सौहार्द लेल ख्यात छल, सामाकि रूपें खण्ड-खण्ड भेल अछि। पैघसँ पैघ आपदा, विभीषिका ओकरा एक ठाँ आनि कए, एकमत नहि क' पबै'ए। मिथलाक उदारता आ सामाजिकता ई छल जे ककरो बाड़ी-झारीमे अथवा लत्ती-फत्तीमे अथवा कलम-गाछीमे नव साग-पात, तर-तरकारी, फूल-फल होइ छल तँ सभसँ पहिने ग्रामदेवक थान पर आ पड़ोसियाक आँगनमे पहुँचाओल जाइ छल; कोनो फसिल तैयार भेलाक बाद आगों-राशि कोनो परगोत्राीकें देल जाइ छल; खेतमे फसिल कटबा काल खेतक हरेक टुकड़ीमे एक अंश रखबारकें देल जाइ छल...ई समस्त बात सामाजिक सम्बन्ध-बन्धक मजगूतीक उदाहरण छल। कोनो स'र-कुटुमक ओतएसँ कोनो वस्तु सनेसमे आबए, तँ ओ सौंसे टोलमे लोक बिलहै छल।...कहबा लेल कहि सकै छी जे ई मैथिलजनक जीवनक नाटकीयता आ प्रशंसा हेतु लोलुपता रहल होएत... मुदा तकर अछैत एहि पद्धति आ परम्पराक श्रेष्ठता आ सामाजिक मूल्य हेतु एकर आवश्यकतासँ मुँह नहि मोड़ल जा सकैत अछि। गाममे कोनो बेटीक दुरागसनक दिन तय होइ छल, तँ बेटीक सासुरसँ आएल मिठाइ भरि गाममे बिलहल जाइ छल। तात्पर्य ई होइ छल जे भरि गामक लोक बूझि जाए, जे ई बेटी आब अइ गामसँ चल जाएत। ओहि बेटीकें भरि गामक लोक धन-वित्त-जातिसँ परे, ओहि बेटीकें अपना घ'रमे एक साँझ भोजन करबै छल। सब किछुक लक्ष्यार्थ गुप्त रहै छल। एकर अर्थ ई छल, जे सम्पूर्ण गाम अपन-अपन थाड़ी-पीढ़ी देखा कए ओहि बेटीक विवेककें उद्बुद्ध करै छल जे बेटी! आब तों ई गाम, ई कुल-वंश छोड़ि आन ठाम जा रहल छह, हमरा लोकनि अपन शील-संस्कृतिक ज्ञान तोरा देलियहु, सासुर जा कए, ओतुक्का शील-संस्कार देखि कए अपन विवेकसँ चलिह', आ अपन गाम, अपन कुल-शीलक प्रतिष्ठा बढ़बिह'। इएह कारण थिक जे पहिने कोनो बेटीक दुरागमनक दिन पैघ अन्तराल द' कए तय होइ छल। मुदा आब ई रिवाज एकटा औपचारिकता बनि कए रहि गेल अछि; गामक बेटीकें अपन बेटी मानिते के अछि? मिथिलामे कोनो स्त्राी संगें भैंसुर आ ममिया ससुरक वार्तालाप, भेंट-घाँट वर्जित रहल अछि, एते धरि जे दुनूमे छूआछूतक प्रथा अछि। आधुनिक सभ्यताक लोक एकरा पाखण्ड घोषित केलनि। परिस्थिति बदलै छै, त' मान्यताक सन्दर्भ बदलि जाइ छै, से भिन्न बात; मुदा एहि प्रथाकें पाखण्ड कहनिहार लोककें ई बुझबाक थिक जे ई प्रथा एहि लेल छल, जे एहि दुनू सम्बन्धमे समवयस्की हेबाक सम्भावना बेसी काल रहै छल। संयुक्त परिवारक प्रथा छल, कखनहुँ कोनो अघट घटि सकै छल। ई वर्जना एकटा शिष्टाचार निर्वहरण हेतु पैघ आधार छल। प्रायः इएह कारण थिक जे विवाह कालमे घोघट देबा लेल प्राथमिक अधिकार अही दुनू सम्बन्धीय व्यक्तिकें देल जाइ छनि। जाहि स्त्राीकें केओ भैंसुर अथवा ममिया ससुर नहि छनि, हुनकहि टा ससुर स्थानीय कोनो आन व्यक्ति घोघट दै छनि। घोघट देबाक प्रक्रियामे कतेक नैतिक बन्हन रहैत अछि, से देखू, जे सकल समाजक समक्ष भैंसुर, नव विवाहित भावहुक उघार माथकें नव नूआसँ झाँपै छथि आ बगलमे ठाढ़ ब'र ओहि नूआकें घीचिकए माथ उघारि दैत अछि, ई प्रक्रिया तीन बेर होइत अछि, अन्तिम बेर माथ झाँपले राखल जाइत अछि। अर्थात्‌, सकल समाजक सम्मुख ओ व्यक्ति प्रतिज्ञा करैत अछि--हे शुभे! हम, तोहर भैंसुर (ससुर) प्रण लैत छी, जे जीवन पर्यन्त तोहर लाजक रक्षा करब! एते धरि जे अग्नि, आकाश, धरती, पवनकें साक्षी राखि जे व्यक्ति तोरा संग विवाह केलकहु अछि, सेहो जखन तोहर लाज पर आक्रमण करतहु, हम तोहर रक्षा लेल तैयार रहब! अही तरहें उपनयनमे आचार्य, बह्मा, केस नेनिहारि, भीख देनिहारि, डोम, चमार, नौआ, धोबि, कमार, कुम्हार आदिक भागीदारी; आ एहने कोनो आन उत्सव, संस्कारमे सामूहिक भागीदारी सामाजिक अनुबन्धक तार्किक आधार देखबैत अछि। कहबी अछि जे मैथिल भोजन भट्ट होइ छथि। अइ कहबीक त'हमे जाइ तँ ओतहु एकर सांस्कृतिक, पारम्परकि सूत्रा भेटल। मिथिलाक स्त्राी, खाहे ओ कोनहु जाति-वर्गक होथि, तीक्ष्ण प्रतिभाक स्वामिनी होइत रहल छथि। मुदा परदा प्रथाक कारणें हुनकर पैर भनसा घरसँ ल' क' अँगनाक डेरही धरि बान्हल रहै छलनि। अधिकांश समय भनसे घरमे बितब' पड़नि। सृजनशील प्रतिभा निश्चिन्त बैस' नहि दैन। की करितथि! भोजनक विन्यासमे अपन समय आ प्रतिभा लगब' लगलथि। आइयो भोजनक जतेक विन्यास, तीमन-तरकारीक जतेक कोटि, चटनी आ अचारक जेतक विधान मिथिलामे अछि, हमरा जनैत देशक कोनहुँ आन भागमे नहि होएत। वनस्पतिजन्य औषधिकें सुस्वादु भोजन बनएबाक प्रथा सेहो मिथिलामे सर्वाधिक अछि।... आब जखन एते प्रकारक भोजन ओ बनौलनि, तँ उपयोग कतए हैत?... घरक पुरुष वर्गकें खोआओल जाएत। सर्वदा एहिना होइत रहल अछि, जे कोनो क्रियाक विकृति प्रचारित भ' जाइत अछि, मूल तत्व गौण रहि जाइत अछि। मैथिल पेटू होइत अछि, से सब जनै'ए, मुदा मिथिलाक स्त्राीमे विलक्षण सृजनशीलता रहलैक अछि, से बात कम प्रचारित अछि। जे स्त्राी कामकाजी होइ छलीह, खेत-पथार जा कए शरीर श्रम करै छलीह, गामक बाबू बबुआनक घर-आँगन नीपै, लेबै छलीह, तिनकहु कलात्मक कौशल हुनका लोकनिक काजमे देखाइ छल। स्त्राी जातिक कला-कौशलक मनोविज्ञानक उत्कर्ष तँ एना देखाइ अछि जे हुनका लोकनिक उछाह-उल्लास धरिमे जीवन-यापनक आधार आ घर-परिवारक मंगलकामना गुम्फित रहै छल। जट-जटिन लोक नाटिका विशुद्ध रूपसँ कृषि कर्मक आयोजन थिक, जे अनावृष्टिक आशंकामे मेघक आवाहन लेल होइ छल, होइत अछि; सामा भसेबा काल गाओल जाइबला गीतमे सब स्त्राी अपन पारिवारिक पुरुष पात्राक स्वास्थ्यक कामना करै छथि; विवाह उपनयनमे अपरिहार्य रूपें वृक्ष पूजा (आम, महु), नदी पूजा, प्रकृति पूजा आदि करै छथि। विभिन्न वृत्तिक लोकक अधिकार क्षेत्रा पर नजरि दी, तँ नौआ, कमार, कुम्हार, डोम, धोबि... सबहक स्वामित्व निर्धारित रहैत आएल अछि। जाहि गाम अथवा टोल पर जिनकर स्वामित्व छनि, हुनकर अनुमतिक बिना केओ दोसर प्रवेश नहि क' सकै छलाह। ई लोकनि आपसी समझौतासँ अथवा निलामीसँ गामक खरीद-बिक्री करै छलाह। एहि व्यवहारमे जजमानक कोनो भूमिका अथवा दखल नहि होइ छल। हस्तकलाक कुटीर उद्योग एतेक सम्पन्न छल, जे सामाजिक व्यवस्थामे सब एक दोसरा पर आश्रित छल। सूप, कोनियाँ, पथिया, बखाड़ी, घैल, छाँछी, सरबा, पुरहर, मौनी, पौती, जनौ, चरखा, लदहा, बरहा, गरदामी, मुखारी, उघैन, कराम, खाट, सीक, अरिपन... सब किछु लुप्तप्राय भ' गेल। एते धरि जे ई शब्द आ क्रिया अपरिचित भेल जा रहल अछि। ढोनि केनाइ, भौरी केनाइ, केन केनाइ, पस'र चरेनाइ, झिल्हैर खेलेनाइ सन क्रिया, आ सुठौरा, हरीस, लागन, बरेन, जोती, कनेल, पालो, चास, समार, फेरा, पचोटा, ढोसि, करीन सन शब्द आब आधुनिक साहित्योमे कमे काल अबै'ए। मिथिलाक एहेन विलक्षण विरासत--कला, संस्कृति आ जीवन-यापन पद्धतिक उत्कृष्ट उदाहरण सम्भावनाविहीन भविष्यक कारणें आ सामाजिक कटुताक कारणें हेराएल जा रहल अछि। नवीन शिक्षा पद्धतिसँ सामाजिक जागृति बढ़ल, मुदा ओहि जागृतिक समक्ष ठढ़ भेल वैज्ञानिक विकास आ आर्थिक उदारीकरणक प्रभावमे अहंकारग्रस्त समृद्ध लोकक लोलुपता आ क्षुद्र वृत्ति। संघर्ष जायज छल। अपन पारम्परिक वृत्ति आ हस्तकलामे, पुश्तैनी पेशामे लोककें अपन भविष्य सुरक्षित नहि देखेलै। ÷रंग उड़ल मुरूत' कथामे मायानन्द मिश्र आ ÷रमजानी' कथामे ललित मिथिलाक परम्परा पर आघात देखा चुकल छथि।... ख'ढ़क घर आब होइत नहि अछि, घरामीक वृत्ति एहिना चल गेल। सीक'क प्रयोजन, खाटक प्रयोजन समाप्त भ' गेल, बचल-खुचल माल-जाल लेल नाथ-गरदामी आब प्लास्टिकक बनल-बनाएल डोरिसँ होअए लागल, बच्चाक खेलौना प्लास्टिकक होअए लागल। नौआ, कमार, धोबि, डोमक जागीर आपस लेल जा लागल। ओ लोकनि अपन पुश्तैनी पेशा छोड़ि आन-आन नोकरी चाकरीमे जाए लगलाह। स्त्राी जाति आब भानस करबा लेल किताब पढ़ए लगलीह, फास्ट फूड खएबाक प्रथा विकसित भेल। मिथिला पेंटिंगकें आफसेट मशीन पर छपबा कए पूँजीपति लोकनि री-प्रोडक्शन बेच' लगलाह। जट-जटिन आ सामा-चकेबाक खेलक विडियोग्राफी देखाओल जाए लागल। गोनू झा, राजा सलहेस, नैका बनिजारा, कारू खिरहरि, लोरिकाइनि आदिक कथा छपा कए बिक्री होअए लागल, टेप पर रेकॉर्ड क' कए, अथवा सी.डी.मे तैयार क' कए, री-मिक्ससँ ओकर मौलिकतामे फेंट-फाँट क' कए लाक सुन' लागल, आ एकरा अपन बड़का उपलब्धि घोषित कर' लागल। ... अर्थात्‌ जे लोककला लोकजीवनक संग विकसित आ परिवर्द्धित होइ छल, तकर अभिलेखनसँ (डकुमेण्टेशन) ओकरा स्थिर कएल जा लागल। लोकजीवनक संग अविरल प्रवाहित रहैबाली सांस्कृतिक-धारा आब अभिलेखागारमे बन्द रहत, ओकर विकासक सम्भावना स्थगित रहत। अइ समस्त वृत्तिमे जुड़ल लोककें सम्मानित जीवन जीबै जोगर वृत्ति द' कए एकर विकासमान प्रक्रियाकें आओर तीव्र करबाक आवश्यकता छलै, मुदा जखन मिथिलाक लोके ओ ÷लोक' नहि रहि गेल अछि, तखन लोक-संस्कृति आ लोक-परम्पराक रक्षा के करत? श्री रामभरोस कापड़ि “भ्रमर” (१९५१- ) जन्म-बघचौरा, जिला धनुषा (नेपाल)। सम्प्रति-जनकपुरधाम, नेपाल। त्रिभुवन विश्वविद्यालयसँ एम.ए., पी.एच.डी. (मानद)। हाल: प्रधान सम्पादक: गामघर साप्ताहिक, जनकपुर एक्सप्रेस दैनिक, आंजुर मासिक, आंगन अर्द्धवार्षिक (प्रकाशक नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, कमलादी)। मौलिक कृति: बन्नकोठरी: औनाइत धुँआ (कविता संग्रह), नहि, आब नहि (दीर्घ कविता), तोरा संगे जएबौ रे कुजबा (कथा संग्रह, मैथिली अकादमी पटना, १९८४), मोमक पघलैत अधर (गीत, गजल संग्रह, १९८३), अप्पन अनचिन्हार (कविता संग्रह, १९९० ई.), रानी चन्द्रावती (नाटक), एकटा आओर बसन्त (नाटक), महिषासुर मुर्दाबाद एवं अन्य नाटक (नाटक संग्रह), अन्ततः (कथा-संग्रह), मैथिली संस्कृति बीच रमाउंदा (सांस्कृतिक निबन्ध सभक संग्रह), बिसरल-बिसरल सन (कविता-संग्रह), जनकपुर लोक चित्र (मिथिला पेंटिङ्गस), लोक नाट्य: जट-जटिन (अनुसन्धान)। नेपाली कृति: आजको धनुषा, जनकपुरधाम र यस क्षेत्रका सांस्कृतिक सम्पदाहरु (आलेख-संग्रह), भ्रमरका उत्कृष्ट नाटकहरु (अनुवाद)। सम्पादन: मैथिली पद्य संग्रह (नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान), लाबाक धान (कविता संग्रह), माथुरजीक “त्रिशुली” खण्डकाव्य (कवि स्व. मथुरानन्द चौधरी “माथुर”), नेपालमे मैथिली पत्रकारिता, मैथिली लोक नृत्य: भाव, भंगिमा एवं स्वरूप (आलेख संग्रह)। गामघर साप्ताहिकक २६ वर्षसँ सम्पादन-प्रकाशन, “अर्चना” साहित्यिक संग्रहक १५ वर्ष धरि सम्पादन-प्रकाशन। “आँजुर” मैथिली मासिकक सम्पादन प्रकाशन, “अंजुली” नेपाली मासिक/ पाक्षिकक सम्पादन प्रकाशन। अनुवाद: भयो, अब भयो (“नहि आब नहि”क मनु ब्राजाकीद्वारा कयल नेपाली अनुवाद) सम्मान: नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान द्वारा पहिल बेर १९९५ ई.मे घोषित ५० हजार टाकाक मायादेवी प्रज्ञा पुरस्कारक पहिल प्राप्तकर्ता। प्रधानमंत्रीद्वारा प्रशस्तिपत्र एवं पुरस्कार प्रदान। विद्यापति सेवा संस्थान दरिभङ्गाद्वारा सम्मानित, मैथिली साहित्य परिषद, वीरगंजद्वारा सम्मानित, “आकृति” जनकपुर द्वारा सम्मानित, दीर्घ पत्रकारिता सेवाक लेल नेपाल पत्रकार महासंघ धनुषाद्वारा सम्मानित, जिल्ला विकास समिति धनुषा द्वारा दीर्घ पत्रकारिता सेवाक लेल पुरस्कृत एवं सम्मानित, नेपाली मैथिली साहित्य परिषद द्वारा २०५९ सालक अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन मुम्वई द्वारा “मिथिला रत्न” द्वारा सम्मानित, शेखर प्रकाशन “पटना” द्वारा “शेखर सम्मान”, मधुरिमा नेपाल (काठमाण्डौ) द्वारा २०६३ सालक मधुरिमा सम्मान प्राप्त। काठमाण्डूमे आयोजित सार्कस्तरीय कवि गोष्ठीमे मैथिली भाषाक प्रतिनिधित्व। सामाजिक सेवा : अध्यक्ष-तराई जनजाति अध्ययन प्रतिष्ठान, जनकपुर, अध्यक्ष- जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठान, जनकपुर, उपाध्यक्ष- मैथिली प्रज्ञा प्रतिष्ठान, जनकपुर, उपकुलपति- मैथिली अकादमी, नेपाल, उपाध्यक्ष- नेपाल मैथिली थाई सांस्कृतिक परिषद, सचिव- दीनानाथ भगवती समाज कल्याण गुठी, जनकपुर, सदस्य- जिल्ला वाल कल्याण समिति, धनुषा, सदस्य- मैथिली विकास कोष, धनुषा, राष्ट्रीय पार्षद- नेपाल पत्रकार महासंघ, धनुषा। अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन आ नेपाल रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’

चारिम वर्ष हम पटना गेल रही । चेतना समितिमे बैजू बाबू भेटलथि । विद्यापति स्मृति पर्व भ’ गेल रहै । कोनो आने सन्दर्भमे रही । ओ आवेशपूर्वक दिल्लीमे आयोजन होब बला अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनमे अएबाक हेतु आमंत्रण देलनि । हमरा सभ लेखें पहिल आयोजन रहैक–हम आ डा. विमलकें जएबाक रहैक, मुदा जं कि ओ बड हडबडीमे आ अस्पष्ट रुपें अएबाक बात बाजल रहथि, हम सभ जा नहि सकल रही । बरु काठमाण्डूसं धीरेन्द्र आ कमलेश झा गेल रहथि । ‘मिथिलारत्न’ सं सम्मानित होइत गेलाह आ ओत्तहि घोषणा कएलनि–अगिला साल ई समारोह काठमाण्डूमे हयत । तालीक गडगडाहटि भेल । जे से हम सभ जा नहि सकलहुं । बादमे बैजू बाबूकें भेलनि जे नेपाल सं किछु आरलोकनि छुटि गेलाह, अएबाक चाहियनि । ओ जनकपुर अएलाह आ धीरेन्द्र आदिसं सम्पर्क कएलखिन्ह जे एहि वर्ष काठमाण्डूमे आयोजनक की तैयारी अछि । जे हुनका संग रहनि हुनक कथन अनुसार धीरेन्द्र आदि जे केओ गछने रहनि साफ पाछां हटि गेलनि । ओ मर्माहत भ’ जनकपुरसं घूरि गेलाह । तखन ओम्हर जा मुम्वईमे आयोजन करबाक ब्योंत धरौलनि । आब मुम्वईमे अएबालेल पुनः बैजू बाबूक आमंत्रण, आग्रह आ स्नेहपूर्ण दवाव आएल । रेवती जीकें सेहो आग्रह भ’ गेल रहिन–विद्यापति स्मृतिपर्वक अवसर पर दरिभंगेमे । ई तेसर सालक गप थिक । अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन नेपाल–भारतक विद्वान, मैथिली सेवी सभक सझिआ मंच होएबाक हमर विश्वास मुम्वई चलबाले’ प्रेरित कएलक आ तखन दरिभंगासं टिकट रिजर्बक व्यवस्था चन्द्रेशजी जिम्मा देल गेल । जेना बैजु बाबूक मुंहकहबी कार्यक्रम तहिना अस्पष्ट चन्द्रेशजीक ओरिआओन । हम सभ दरिभंगा पहुंचि दोसर दिन भेने मुम्वईक हेतु प्रस्थान कएने रही । मुम्वईक सम्पूर्ण कार्यक्रमक सन्दर्भमे पुस्तकमे आनठाम हमर विचार आबि चुकल अछि । तहिना गत वर्ष कलकत्ताक तैयारी रहैक । एहि बेर हमरा पर थप भार द’ देलनि बैजू बाबू–‘मिथिला रत्न’क हेतु व्यक्तित्व चयनक । रेवती जीसं सल्लाह कएल–ओ वदरी नारायणवर्माक नाम बतौलनि । हम डा. रामदयाल राकेशकें एकरा लेल उपयुक्त वूझि दुनूक नाम बैजूबाबू लग पठा देलियनि । डा. राकेश कें काठमाण्डूसं बजाओल गेलनि । हम सभ निर्धारित तिथिकें ‘गंगासागर’ सं कलकत्ताक हेतु विदा भ’ गेल रही । ओत्त पहुंचलाक बाद स्टेशन पर ठाढ बैजू बाबू मोनकें गदगद क’ देने रहथि । तकरा बाद अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनमे नेपालक हमरा चारि गोटकैं फूटे कोठरीमे आवास देल गेल आ सम्मान सेहो । मैथिली सम्मेलनक अन्तराष्ट्रिय स्वरुप प्रदान करबा लेल हमरा सभक उपस्थिति जहिना अनिवार्य देखल गेल तहिना डा. वैद्यनाथ चौधरी बैजूक व्यवहार ततबे सहज आ अपनत्व भरल । आब चारिम चेन्नईमे अछि । तैयारी चलि रहल छैक । ओत्तहु नेपाल एकटा महत्वपूर्ण सहभागी रुपमे उपस्थित हयत तकर आशा करैत छी । अनुभूति आ औचित्य हमरा बूझल नहि अछि बैजू बाबू कोन उद्देश्य राखि ई अन्तराष्ट्रिय स्वरुपमे एकरा शुरु कएलनि । ओ एकर शुभारंभ मैथिलीकें अष्टम अनुसूचिमे स्थान भेटलाक बाद ताही तिथि २२ दिसम्वरकें कएलन्हि । जकरा अधिकार दिवसके रुपमे मनाओल जाइछ – २२ ता.क’ अधिकार दिवस आ २३ ता.क’ अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन । पहिल बेर दिल्लीक हेतु आमंत्रण भेटला पर हमरा सभक हिचकिचाहट, आयोजनमादे शंका ढेर सन छल । बैजू बाबूक संघर्षशील व्यक्तित्व प्रभावित त करैत छल, मुदा हरफन मौला काम काजसं आशंका उठैत छल, पता नहि जे कहैत छथि, करबो करैत छथि वा नहि तए“ दिल्लीक ओ सम्मेलन छुटल तकर हमरा काफी अफशोच अछि । बादमे मुम्वई आ कलकत्ताक अनुभब काफी सकारात्मक, प्रशंसनीय आ अनुकरणीय रहल । अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक समस्त गरिमाकें निर्वाह करबाक प्रयास ओ करैत छथि । कतौ स्थानीय आयोजक अपनासं उन्नैस वुझाइत छनि तं कतौ वीस । तए“ परेशानी त हुनके उठब’ पडैत छनि । मुदा हम सभ जे अनुभव कएलहुं ओ अत्यन्त काजक छल । मैथिली संसारक बहुतो साहित्यकार, सेवी, भाषाशास्त्री, संगीत एवं नृत्यकलाकार सभसं भेंटघांट होइत अछि । सभक विचारक आदान–प्रदान होइत छैक । नव संसारक निर्माण होइत छैक । भाषा, साहित्य, संस्कृतिक हेतु सेहो एहि सम्मेलनक उपादेयता स्पष्ट अछि । मैथिली भाषाक उत्थानक हेतु नव–नव योजना बनैत छैक । नव–नव पोथी प्रकाशित एवं विमोचित होइछ । विद्वान एवं प्रेमी लोकनि सम्मानित होइत छथि । सांस्कृतिक कार्यक्रममे नव–नव प्रतिभा आगां अबैत छथि । सम्पूर्ण मैथिल समाजसं ओ प्रतिभा जुडैत अछि, जाहिसं बादमे ओकर विकासक अवसर प्रदान होइछ । ‘राखी’ एकटा अपाहिज लडकी एहने प्रतिभा अछि जे सभकें प्रभावित कएने रहए । अमता धरानाक कलाकार लोकनि मुग्ध करैत छथि । नेपाल आ भारतक विचक सम्वन्धक नीक सूत्रपात ई सम्मेलन करैत अछि । नेपालक प्रतिनिधिके मंचपर उपस्थितिसं दुनू देशक प्राचीन सम्वन्धमे ताजापन अबैछ । मुम्वई आ कलकत्तामे पंक्ति लेखकक भाषणसं हजारोंक दर्शक दीर्धामे भेल तालीक गडगडाहटि तकर प्रमाण छैक । नेपालमे होइत मैथिली गतिविधिसं सम्पूर्ण मिथिलाञ्चलकें, खास क’ प्रवासी मैथिलकें जानकारी करएबाक ई सुन्दर अवसर होइत अछि, जकर उपयोग मुम्वई आ कलकत्ता दुनूठाम कएल गेल । कलकत्तामे नेपालमे मैथिली, नामक वूकलेट छपा वांटल गेल रहय तं राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’क सद्यः प्रकाशित पुस्तक” राजकमलक कथा साहित्यमे नारी’ विमोचित भेल । ओत्त गामघर साप्ताहिक विशेष अंक, नेमिकानन’क अंक सभ वांटल व विक्रय लेल उपलव्ध कराओल गेल । बहुतो साहित्यकार रुचिसं नेपालक भाषा, साहित्यक वारेमे जानकारी लेलनि । जानकारीक आदान प्रदान भेल । ज्ञान समृद्ध भेल । तखन एखन धरि सहभागी भ’ जे किछु अनुभव कएल अछि ओ एकर औचित्यकें स्वतः प्रमाणित करैत अछि । ई सम्मेलन निरन्तर जारी रहबाक चाही । वैजू बाबू जुझारु लोक छथि, आयोजनकें सफल बनएबा लेल अहर्निश खटैत छथि । हाथ, पएर, मुंह सभ धरबामे संकोच नहि करैत छथि मां मैथिलीक प्रतिष्ठाक हेतु । एहन विराट हृदयी, समर्पित आ लगनशील व्यक्तित्व भेने मैथिली समादृत भेलीह अछि । अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक अनुभूति किछु किछु सुझाव देबाक लेल हमरा उत्प्रेरित करैत अछि । जं ई भ’ जाइत त सोनमे सुगन्ध भ’ जइतैक – ई हमरा लगैत अछि । सूझाओ १. अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन हयबाक कारणें एकर वैनर जे बनैक ताहिमे नेपालक किछुओ प्रतीक चिन्ह अवश्य रहैक । २. कार्यक्रम सभ व्यवस्थित आ पूर्व निर्धारित होएबाक चाही । कार्यक्रम चलैत बेरमे व्यवस्थापन करब अस्तव्यस्तता लबैत अछि । ३. सभ कार्यक्रम, सहभागी वीच एकदिन पूर्वे वितरीत भ’ जाए तं उत्तम ४. अधिकार दिवस दिन मात्र भाषण नहि, कार्यपत्र प्रस्तुति आ टिप्पणीक कार्यक्रम राखल जाए । नेपालक प्रतिनिधिकें कार्यपत्र आ बजबाक अवसर अवश्य देल जाइछ । ५. मूल समारोहमे नेपालक प्रतिनिधित्व मंच पर अवश्य हयबाक चाही । ओ उपस्थिति आ वक्ता दुनू रुपमे होए । ६. आवासक व्यवस्था प्रति सतर्क रहल जाए । ७ स्मारिकाक स्तरीय प्रकाशन हो, जाहिमे विगतक सम्मेलन सभक सन्दर्भमे आलेख आ चित्रवाली अवश्य देल जाए । ८. कलकत्ता सम्मेलनमे एकर निर्वाह भेल अछि, एकरा आगूओ एही रुपमे बढाओल जाए । ९. अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक सहभागि सभक सूची १५ दिन पूर्व अन्तिम रुप द’ सार्वजनिक क’ देल जाइक आ संगहि ‘मिथिला रत्न’ पौनिहारक जीवनी फूटसं प्रकाशित क’ औचित्य प्रमाणित कएल जाए । नेपालक साहित्यकार, मैथिली प्रेमी सभकें अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनसं बहुत किछु आशा छैक । दुनू देशमे मैथिली अपन अस्तित्व लेल लडि रहल अछि । एहनमे ई भेंटघांट, अप्पन–अपनौती, दुख–दुखक वंटवारा आपसी सम्वन्धकें सुदृढ त करबे करैत अछि, लक्ष्य प्राप्तिक हेतु मोनकें मजवूत सेहो बनबैत अछि । अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक महासचिव डा. वैद्यनाथ चौधरी बैजू एहि सम्वन्धक सूत्रकें गसिआ क’ पकडने छथि । हुनक इएह स्नेह, सद्भाव आ अपनैती नेपालीय राजनीतिक इतिहासमे मिथिलाराज्य’क स्थापनार्थ शक्ति आ वातावरण निर्माणमे सहायक भ’ रहल अछि । हुनक जुझारु व्यक्तित्व एत्त प्रेरणाक स्रोत रहलए । हमसभ एहि सम्वन्धक निरन्तरताक अपेक्षा करैत छी । आ नेपाल–भारत विचक आपसी आ प्रेमक प्रतीक रुपमे चलैत आबि रहल एहि सम्मेलनक सफलताक कामना करैत छी । फ्लैश बैक-रामभरोस कपडि भ्रमर नरेश पाछां चलि गेल अछि, बहुत पाछां । प्रायः पचास वर्ष  पाछां । गामक सहपाठी सभक संगे खेलए ओ । बहादुर नोकर रहैक – वावूजी जंगलकातसं लओने छलाह । एक बोलिआ, आदेश चाही, काम फत्तह कइएक दम लैत छल । से बाबूजीकें आदेश रहैक – गुरुजीलग पढ ल जएबाक छै से बहादुर लाख चिचिऔलो पर नरेशकें कान्‍हपर बोकि कन्‍हाइ साहुक दलान पर गुरुजी लग दइए अबैक । ओत्त गेला पर गुरुजीक कांच करची अथवा खजूरक छडी ओकर सभ जीद हेरा दैक । ओ चुपचाप हाथमहक पाटीपर कारिख पोति कचरासं साफ क चमकाब लागए आ तखन भठासं लिखबाक प्रयास करए – क ख ग घ...। “इस्‍स....” गुरुजीक छडी जखन बांहि पर पडैक तं ओ लोहछि जाए । मन होइ भागि जाइ मुदा... वहादुरक डीलडौल आ पिताक आदेश मन पडितो मनमारि क पाटी पर आंखि गडा कखरा लिखबाक प्रयास कर लगए । गुरुजीक ओहिठाम बटखरा कंठस्‍थ रहैक । ई कंठस्‍थ करब ओकर मजवूरी रहैक, ओना हिसावमे ओ ओहुना कमजोरी महशूस करए । चौठचन्‍दमे गुरुजीक संग घंटी बजबैत, काठक डंटाकें बजबैत घरे–घरे घुमनाई आ गुरुजीक डेरापर जा गुडचाउरक प्रसाद खएनाईक अपन आनन्‍द रहैक । आनन्‍द तं पानि नहि पडने हर हर महादेव बना गाम घुमबै काल सेहो अबैक । कोनो सहपाठीकें सौंसे देहमे छाउर रगडि देल जाइत छलैक । माथपर आ बांहिमे सेहो अशोक पात सभ लपेटि देल जाइत छलैक । माथ पर जूट आ सनसं जटा ताहिपर टीनकें कैंचीसं काटि चान लटका देल जाइक । हाथमे वावाजीके त्रिशूल आनि क ध देल जाइक । वस–वनि जाइक महादेब । छौडा सभक हेंज पाछां–पाछां हाक परैत जाइक – हर, हर महादेव पानी देऊ अलिकती पुगेन, बढी देउ ! भाव रहैक महादेव पानी दीअ, कम सं नहि भेल, बेसी दीअ.... । जकरा दरबज्‍जा पर जाइक पानि उझलि दैक । मान्‍यता रहैक पानि देलापर वर्षाक संभावना बढि जाइत छैक । वेचारे महादेव बनल बौआ बादमे थर–थर कांपए, वच्‍चा सभ ताली पिटैत हंसैक । वाल सुलभ प्रताडना ओहि समयमे खूब प्रचलित रहैक । नरेश ओहि हेंजमे अगुवा रहय....। नरेशक ठोढ पर अपने आप मुस्‍की दौडि जाइत छैक । वितलाहा क्षणक स्‍मरण कतौसं गुदगुदा दैत छैक ओकरा । वालशोषणक विरुद्ध ओहो कतेक आलेख लिखि चुकल अछि, कतेको सेमिनार मे भाग ल भाषण छांटि चुकल अछि । मुदा नेनामे नेनेद्वारा कएल ई अपराध शोषण नहि रहैक ! नरेश वाल सुलभताक ओ क्षण फेरसं स्‍मरण करैत सिहरि उठैत अछि आ कतौ भोतिआ जाइछ पुन.......। मुश्‍किलसं ७–८ वर्षक छल हयत । गामेक स्‍कूलमे पढए, मुदा संगति रहैक अपने टोल महल्‍लाक धीआपूतासं । ताही मंडलीमे एकटा छौरी रहैक इजोतिया । ओकरे लगुआक वेटी । नीक रहैक कि अधलाह ओकरा तहिया ज्ञान नहि रहैक मुदा ओकरा संगे इजोरिया रातिमे अन्‍हरिया–इजोरिया खेलैत ओ खूब प्रशन्‍न रहल करए । आंगनेमे दुनूपयर आगां पसारि वैसि , वांहिके केहुनी लगसं मोडि आगां पाछां करैत आ ताही लयमे दुनू पयरके सेहो आगां पाछां करैत पाछा मुंहे घुसकैत इजोतिया खेलल करए आ गाओल करए–“आगेमाई ककरी के बतिआ...” त ओकरा नीक लगैक । इजोरिया रातिमे चानक चारुकात बनल गोल घेराकें कौतुहल सं देखैत काल माय रहस्‍यमय बोलीमे     समझबैक – ई हमरा सभक पुरखा सभक वैसार छै इन्‍दर भगवान लग । कहै है निचां पानि विना अकाल पडल छै, पानि दिऔ । आब पानि हयबे करत....। नेनामे ई बात सत्‍य लगैक आ आश बन्‍हाई जरुर वर्षा हयत । तेहने समयमे जट–जटिन गीत होइक । टोलक महिला सभ जटा आ जटिन कनए आ गीत गाबि–गाबि झूमए । ओहिमे पुरुष नहि, नेनाकें छुट रहैक । नरेश नियमित ओकर दर्शक रहए, ओकर संगी इजोतिया ओहि मंडली मे सामेल रहैक, ओ एकटक ओकरा सभकें झूकि क आगां बढैत आ तहिना माथ उठा क पाछां अबैत देखैत रहय..... । नरेशकें फेर किछु मोन पडैछै, ठोढ पर हंसी अबैत–अबैत रुकि जाइछै । भतखोखरि बुढिआक अंगनामे वेंग कुटि मैलाक संग पतली फेकि देल जाइ छल आ ओ वुढिआ भरि राति फेकनिहारिकें पुरा खनदानकें उराहि दैत छलैक । वेटी–रोटी करैत रहैत छली । वास्‍तवमे वेंट कुटि क तए ओकरे आंगनमे फेकल जाइत छलै जे ओ बेसी गाडि पढि सकैत छलीह । राति भरि जुआन छौडी सभक धुमगज्‍जरिक संग वालसुलभ उत्‍सुकतासं पाछां – पाछां दौगब महज खुशी दैत छलै । लगै दिनमे बहादुरक घीसिआ क गुरुजी के चटिसारमे ल जएबाक डरसं मुक्त रातुक ई माहौल स्‍वच्‍छन्‍द छैक । ने वावूजीक डर, ने वहादुरके उठा  ल जएबाक चिन्‍ता । वात वुझौक कि नहि, नरेश रमल रहैत छल ओहि खेलमे । ओकरा तं तखनो ने किछु बुझायल रहै जखन इजोतिया ओकर घरक पछुआर बला गाछी आ भुसा घरलग एकटा प्रस्‍ताव कएने रहैक – नरेश,खेलबे  अर्थ त ओकरा ओतेक नै वुझल भेलै मुदा ओकर इशारासं आशय वुझने रहय आ डेरा गेल रहैक – नहि, हम नहि खेलबौ । ठाढे ओ नासकार चलि गेल रहय । जं कि इजोतिया ओकरा उमेर सं बेसीक वुझाइक, ओ वातकें वुझैक, मुदा नरेश....। पता नहि नरेशकें किए आइ पुरना बात मोन पड लागल छै । ओ भोरेसं अपन पोताक उदण्‍डपनीसं फिरिशान भेल अछि । एक तं भोरमे देरीसं उठत, उठि कत्त पडायत ठेकान नहि । स्‍कूल जएबाक कोनो जरुरी जेना नहि होइक । कुण्‍डलिया छौडा सभक संगत आ पता नहि गुटका, भांग, सिगरेट किंवा आनो कोनो नशा खाइत हो ,त मनमे आशंका उठल छै । खौंझायल मोने वरण्‍डाक खुरसीपर बैसि गेल । तखने ओकरा वुझएलै – एक ई दिन अछि आ एक ओ दिन रहय ।फेर भसिया गेल रहय । एखनो मोन थीर कहां भेलैए...। माय जखन ओकरा दुनू मोडलहबा टांगपर लादि दुनू हाथ पकडि घुघुमना खेलबै तं हिल्‍ला झुलबाक मजा ओ लेल करए । गीतकलय संगे झुलैत नरेशक वालपन महज देहमे गुदगुदी आ आनन्‍द मात्र उठा सकैत रहय वुझए किछु नहि । मुदा जखन ओ टेल्‍हगर भेल त मायक नक्‍कल करबाक मोन होइक । अपन भातिजकें ओहिना टांगपर ध झुलब लागय आ पढ लागय–घुघुमना घुघुमना, बौआकें गढा देब दुनू कान सोना । ओकरो झुलबैत आनन्‍द लगैक आ बौआ सेहो हंसि, हंसि क अपन आनन्‍दक अनुभूति करबैत छल । ओना ओकर छोट–छोट पयर–हाथ बौआके बेसी काल सम्‍भारबाक अवस्‍थामे नहि रहैक, ओ उतारि दैक तुरते । अपन नेनपनक उछल–कुदक दूटा घटना मन पडिते सौंसे देह सीहरि जाइत छैक । बड मुश्‍किलसं बचल रहैक आंखि ओकर.. । आंगन मे दुनू भाइ खेलैत रहय । भैया तीर धनुष बना चलौल करए । एक बेर भेलै ई जे तीर सोझे नरेशकें आखिएमे लगलै–वाम आंखिमे । सौंसे हाहाकार मचि गेलै, माय त बताह भ गेल छलीह । ओकरा कनैत–कनैत बेहाल रहैक । गामेक टोटकासं आंखि ठीक भेल रहैक । पता नहि माय कोन–कोन दैब पीतरकें एहि लेल मानि देने छलीह । तहिना एकबेर गछुलीमे आम लुट बेरमे अन्‍धाधुन्‍ध दौगल रहय नरेश, त गाछीमे गाडल एकटा खुट्टाक नोक सोझे कपारमे गरि गेल रहैक । माथ सुन्‍न भ गेल रहैक । मायके जखन पता लगलै त ओ हकासल–पिआसल दौगलि रहय घराडी पर आ ओकरा समेटि क गामक बैध लग लजा उपचार करौने रहैक । वाल सुलभ जीवन शैली, गामसं जनकपुर धरिक यात्रा, पढाइ आ डिग्री सभक अपन–अपन कथा रहैक । धन–खेती जे होइक, शिक्षामे पछुआएल परिवारक प्रत्‍येक ओ संघर्ष ओकरा भोग पडलै जे एकटा सभ्‍य समाजक अंग बनबा ले जरुरी होइत छैक । आइ जखन उमेरक चारिम प्रहरमे जएबा ले तैयार अछि ओकरा लगैछै ओ फेरसं बचपन दिश लौट चाहैए । दिन रातिक षडयन्‍त्र, राजनीतिक विद्रुपतता, चन्‍दा, अपहरण, हत्‍या किंवा दिन दिन बढैत असुरक्षाक भय आ आतंकसं त्रसित समाजमे तनावक जिनगी जीबाक अर्थेकी? मुदा फेरसं ओ स्‍वयं प्रश्‍न करैत अछि की ओ नेनपनक स्‍वच्‍छन्‍द, सहज स्‍नेहसं भरल किछु साल घूरि सकत ! चलु ओ वितलहा वर्ष नहि घूरत ई सत्‍य थिक, अपने तं ओहि युगमे जा सकैछी ने ! हं, ई संभव छैक । भ सकैछ एना भेने तनावमे कमि अबैक, मुंहपर चापलुसीक वोल झाडैत, परोक्षमे चरित्र हत्‍याले उताहुल सरसमाजक व्‍यक्तित्‍वक दोगला मुंह देखबाक दुर्भाग्‍यसं बंचि त सकै छी । हमहीं किएने अपनाकें नेना बनाली ! नरेशकें अपने सोचपर हंसी लगै छी । की ई संभव छैक । ओहुना साठिक बाद लोक नेनपनमे पुनः प्रवेश क जाइए कहांदन । ओकरो अवस्‍था तं आबिए रहल छैक । चलल जाए एक बेर सएह सही....। नरेशकें जेना सौंसे देह हल्‍लुक लगैत छैक । वरण्‍डासं उठैत अछि । आंगन मे अबैत अछि । पोता आबि गेल छै । ओकरा डंटबाक इच्‍छा रहितो ओ चुप रहैत अछि । प्रारंभ एत्तहिसं हुअए तं हर्जे की? डॉ कैलाश कुमार मिश्र (८ फरबरी १९६७- ) दिल्ली विश्वविद्यालयसँ एम.एस.सी., एम.फिल., “मैथिली फॉकलोर स्ट्रक्चर एण्ड कॊग्निशन ऑफ द फॉकसांग्स ऑफ मिथिला: एन एनेलिटिकल स्टडी ऑफ एन्थ्रोपोलोजी ऑफ म्युजिक” पर पी.एच.डी.। मानव अधिकार मे स्नातकोत्तर, ४०० सँ बेशी प्रबन्ध -अंग्रेजी-हिन्दी आऽ मैथिली भाषामे- फॉकलोर, एन्थ्रोपोलोजी, कला-इतिहास, यात्रावृत्तांत आऽ साहित्य विषयपर जर्नल, पत्रिका, समाचारपत्र आऽ सम्पादित-ग्रन्थ सभमे प्रकाशित। भारतक लगभग सभ सांस्कृतिक क्षेत्रमे भ्रमण, एखन उत्तर-पूर्वमे मौखिक आऽ लोक संस्कृतिक सर्वांगीन पक्षपर गहन रूपसँ कार्यरत। यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का, यू.एस.ए. केर “फॉकलोर ऑफ इण्डिया” विषयक रेफ़ेरी। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालयक पुरस्कारक रेफरी सेहो। सय सँ ऊपर सेमीनार आऽ वर्कशॉपक संचालन, बहु-विषयक राष्ट्रीय आऽ अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता। एम.फिल. आऽ पी. एच.डी. छात्रकेँ दिशा-निर्देशक संग कैलाशजी विजिटिंग फैकल्टीक रूपमे विश्वविद्यालय आऽ उच्च-प्रशस्ति प्राप्त संस्थानमे अध्यापन सेहो करैत छथि। मैथिलीक लोक गीत, मैथिलीक डहकन, विद्यापति-गीत, मधुपजीक गीत सभक अंग्रेजीमे अनुवाद। “रचना” मैथिली साहित्यिक पत्रिकामे “यायावरी” स्तंभक प्रशस्त स्तंभकार श्री कैलास जीक “विदेह” लेल प्रारम्भ कएल गेल ई यायावरी स्तंभ दीर्घ काल तक स्थायी रहत ताहि कामनाक संग प्रस्तुत अछि अहाँ लोकनिक समक्ष ई पहिल खेप। यायावरी नॉर्थ कछार हिल्स: धरतीक नुकाएल स्वर्ग –डॉ कैलाश कुमार मिश्र -हमर अंग्रेजीमे लिखल लेख पढ़ि लोक सभ हमरासँ मैथिलीमे लिखबाक हेतु अनुरोध करैत छथि। स्पष्ट कए दी जे अंग्रेजी हमर व्यवसाय केर भाषा थिक। कहियो मिथिलामे नहि रहलहुँ, संस्कृत आऽ सोतियामी मैथिली नहि तँ पढ़लहुँ आऽ ने लिखलहुँ। तञि मैथिलीमे लिखक कल्पना जखने करैत छी तँ हाथ काँपय लगैत अछि। तीन वर्ष पूर्व डॉ विश्वनाथ झा अपन त्रैमासिक पत्रिका रचना हेतु लिखबाक लेल भावनात्मक रूपेँ हमरा बाध्य कऽ देलन्हि। डराइत-डराइत हम रचनामे “यायावरी” नामसँ अपन यात्रा-वृत्तान्त लिखनाइ प्रारम्भ केलहुँ। पाँच अंकमे लगातार लिखलाक बाद कार्यक अत्यधिक व्यस्तताक कारणेँ यायावरी लिखनाइ बन्द कऽ देलहुँ। घुमब आऽ अंग्रेजीमे लिखबसँ समय कहाँ बचैत अछि। एम्हर नौ-दस माससँ गजेन्द्र बाबू अपन पत्रिकाक हेतु पुनः मैथिलीमे लिखबाक हेतु कहि रहलाह अछि। अतेक चेरियेलन्हि जे अन्ततः यात्रा-वृत्तान्तक “यायावरी” प्रारम्भ कऽ रहल छी। पाठक लोकनिसँ नम्र निवेदन जे हमर लेखक विषय आऽ वर्णनकेँ पढ़थि आऽ भाषा-विन्यासक गलतीपर बेशी ध्यान नहि देथि। यायावरीक प्रारम्भ हम असम केर एक छोट भव्य, रम्य, आकर्षक, कठिन परन्तु अनेक रंग आऽ उल्लाससँ भरल भूखण्ड, नार्थ कछार हिल्ससँ कऽ रहल छी। अपन संस्था – इन्दिरा गान्धी राष्ट्रीय कला केन्द्रक सदस्य सचिव डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्ती महोदय केर निर्देश एवं कार्यशैलीसँ प्रभावित भऽ हम समस्त उत्तर-पूर्व भारत एवं सिक्किममे विभिन्न क्रियाकलाप प्रारम्भ केलहुँ, जाहिसँ स्थानीय संस्कृति आऽ विरासत केर रक्षा कएल जाऽ सकय। असममे कार्यक श्रीगणेश हमरा लोकनि “श्रीमंत शंकरदेव कला क्षेत्र” गुआहाटी केर सचिव श्री गौतम शर्माक संग कएल। लगभग ६४ बीघा पहाड़ी धरतीमे बनल श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र बड्ड रमनगर जगह बुझना गेल। जे कियो गुआहाटी घुमए जाथि आऽ हुनका कलासँ थोरेकबो प्रेम होइन तँ श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र अवश्य जाथि, ई हमर निवेदन। कलाक्षेत्रमे पानिक फब्बारा, फुलबारी, विशाल आऽ कलात्मक अनेको भवन, दू टा अतिथि गृह, आर्टिस्ट विलेज; कलाकार सभकेँ रहबाक हेतु डॉरमेटरी; संग्रहालय, कला दीर्घा, बच्चा सभक लेल टॉय रेल एवं अन्य व्यवस्था; असम केर इतिहासक सम्बन्धमे “लाइट एण्ड साउंड” कार्यक्रम; पुस्तकालय, शिवसागर जिलाक ऐतिहासिक रंगघर केर रिप्रोडक्शन इत्यादि बरवश कुनो घुमए बलाकेँ मोन मोहि लैत छैक। असम केर अधिकांश ऑफिस आऽ घरसभमे लोक अपन जुत्ता-चप्पल आदि घरक बाहरे खोलि प्रवेश करैत छथि। हमहूँ एहि परम्पराक पालन जखन-जखन असम जाइत छे, तखन-तखन करैत छी। स्पष्ट कऽ दी जे श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र सोलहम शताब्दीक महान वैष्णव सन्त शंकरदेव केर नामपर असम राज्य सरकार, भारत सरकारक आर्थिक सहायतासँ समस्त उत्तर-पूर्व भारत, विशेषरूपेण असम केर संस्कृति, विरासत तथा गौरवक संरक्षण एवं सम्वर्धन करबाक दृष्टिसँ बनल छैक। शंकरदेव जातिसँ कायस्थ छलाह। श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह जे असम काडर केर आइ.ए.एस.पदाधिकारी छलाह; बादमे भारत सरकारक गृह सचिव भेलाह आऽ अन्ततः विश्वबैंक केर कार्यकारी निदेशक पदसँ अवकाश प्राप्त कएलन्हि, हमरा कहलाह जे शंकरदेव मैथिल छलाह। हुनकर पितामह मिथिलासँ असम प्रवास कऽ गेलथिन्ह। पञ्जीसँ ईहो पता चलैत छैक, जे शंकरदेव तँ नहि परन्तु हुनकर पिता तीन-चारि बेर मिथिला आयल छलाह। एहि बातक एतय उल्लेख करब केर पर्याय ई जे एहि विषयपर गहन शोध करबाक आवश्यकता थिक। यदि ई बात प्रमाणित भऽ गेल जे शंकरदेव मैथिल छलाह तँ आइ हमरा लोकनि विद्यापतिक मैथिल होएबापर गर्व करैत छी, तहिना शंकरदेवोपर गर्व करब। हमरा हिसाबे तँ प्रबुद्ध मैथिल सभ बिहार सरकारसँ शंकरदेवपर एक गहन शोध करबाक परियोजना प्रारम्भ करबाक हेतु निवेदन करथि। गजेन्द्रजी एहि दिशामे आगाँ बढ़थि तँ नीक बात। संयोगसँ वाल्मीकि बाबू आइ-काल्हि सिक्किम प्रदेशक राज्यपाल थिकाह। हुनकर मदतिसँ परियोजनाक प्रारम्भ कएल जाऽ सकैत अछि। ओऽ हमरा कतेको बेर एहिपर कार्य करक हेतु कहि चुकल छथि। एक समय एहनो छलैक जखन बंगाली सभ विद्यापतिकेँ बंगाली बुझैत छलाह। परन्तु आब प्रमाणित भऽ गेल जे विद्यापति मैथिल छलाह। यदि एहने किछु सबरा परम्परा केर जनक श्रीमंत शंकरदेवक उतेढ़पोथीसँ चलि जाय तँ बुझू जे हमरा लोकनि धन्य भऽ जाएब। श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्रक सचिव गौतम शर्मा आऽ सुलझल व्यक्ति छथि। लगभग पचास वर्षक गौर वर्ण आऽ मध्यम कद-काठीक आकर्षक व्यक्तित्व। स्थिर चित्त। प्रथम दृष्टिमे लागत जे ओहिना कियो छथि। परन्तु मुदा डायनेमिक लोक। कलाक्षेत्रक १२५ आदमी हुनकर इशारापर नचैत रहैत अछि। हमेशा ओऽ अपन सहयोगी सभकेँ परिवारक सदस्य जेकाँ स्नेह करैत छथि। गौतम शर्माक सहयोगक कारणेँ हमरा लोकनि गुआहाटी आऽ तेजपुरमे बहुत सफलतापूर्वक अनेक कार्यक्रम कऽ चुकल रही। हमरा लोकनि असम केर किछु एहन क्षेत्रमे ओहि क्षेत्रक संस्कृति आऽ विरासतपर कार्य करए चाहैत रही, जाहिपर विशेष कार्य नहि भेल हो। शर्माजीसँ पता चलल जे सांस्कृतिक दृष्टिएँ असम प्रदेशकेँ मोटा-मोटी चारि क्षेत्रमे बाँटल जाऽ सकैत अछि: १.अपर असम २.लोअर असम ३.बराक घाटी ४.नॉर्थ कछार घाटी शर्माजीसँ इहो पता चलल जे नॉर्थ कछार हिल्स सांस्कृतिक वैविध्यतासँ भरल अनुपम स्थान थिक, जाहिपर कोनो विशेष कार्य नहि भेलैक अछि। परन्तु ई घाटी उपद्रव, विभिन्न घटना, बन्द आदिक कारणेँ बेशी जानल जाइत अछि। लोक सभ सामान्यतया एतय जाएसँ बचए चाहैत छथि। मुदा सौन्दर्य आऽ सांस्कृतिक विभिन्नताक कारणे ई थिक असम केर शृंगार-नकमुन्नी। शर्माजीक बात सुनि हमरा मोनमे ई भावना प्रबल भऽ गेल जे नॉर्थ कछार घाटीमे अवश्य कार्य करब। गौतम शर्मा हमर मनोदशाकेँ बुझैत कहलाह: “कैलाशजी, अगर अहाँ एतए कार्य करए चाहैत छी तँ हम व्यवस्था कए देब। एतए केर जिला अधिकारी आऽ नॉर्थ कछार घाटी ऑटोनोमस काउन्सिल केर प्रिंसिपल सचिव अनिल कुमार बरुआ हमर मित्र छथि। एस.पी.केँ हम सेहो जनैत छियन्हि। ऑटोनोमस काउन्सिल केर संस्कृति विभागक अधिकारीगण हमरा लग बराबर अबैत रहैत छथि। सभ कियो मदति करताह। गौतम शर्माक बातसँ हमर मोन प्रसन्न भऽ गेल। तुरतहि डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्तीसँ अनुमति लए २३ नवम्बर २००७ ई. सँ ८ दिनक संस्कृति एवं विरासत केर प्रलेखन केर कार्यक्रम नॉर्थ कछार धारी केर मुख्यालय हाफलौंगमे करबाक प्लान बना लेलहुँ। ई कार्यक्रम गौतम शर्माक सहयोगसँ करक छल। तदनुसार पूर्व निर्धारित् योजनाक अनुसार हम २१ नवम्बरकें साँझे दिल्लीसँ सँझुका हवाई-जहाजसँ गोवाहाटी पहुँचि गेलहुँ। गुआहाटीसँ हाफलोंग केर दूरी सड़कमार्गसँ २६१ किलोमीटर छैक। हमरा लोकनि (हम आऽ शर्माजीक ३ सहयोगी) टाटा सूमो (जीपसँ) २२ नवम्बरक साढ़े चारि बजे प्रातः गुआहाटीसँ हाफलौंगक लेल प्रस्थान कऽ देलहुँ। शर्माजी बड्ड पारिवारिक व्यक्ति छथि। ओऽ पूरा टीमक लोक सभक लेल भोजन, टेन्ट, जलखै, जेनरेटर आदिक व्यवस्था गुआहाटीसँ कए ट्रकमे लादि हॉफलोंग लऽ गेलाह। समय दुर्गापूजाक छलैक। रास्तामे अनेक ठाम स्थानीय युवक सभ हमरा लोकनिकेँ चन्दा लेल रोकैत रहल। एक ठाम हमरा लोकनि केर राशन-पानि आऽ करीब २५ आदमीसँ भरल बड़का बसक चक्का सड़कक कात माँटिमे धसि गेल। चारि घन्टाक इन्तजारक बाद सेनाक सहायता लए चक्काकेँ दलदलसँ बाहर निकालल गेल। अन्ततः साढ़े एगारह बजे रातिमे हाफलौंग पहुँचलहुँ। मोनमे डर छल। हेबो किएक नहि करैत! हमरा सभकेँ अएबासँ दू दिन पहिने पाँच आदमीक बीच हाफलौंग शहरमे गोलीसँ मारि देल गेल रहैक। खैर! शर्माजीक प्रयास आऽ डॉ के.के.चक्रवर्ती जीक असम केर मुख्य सचिव केर नाम लिखल चिट्ठीक कारण हमरा हाफलौंग सर्किट हाउसमे रहबाक व्यवस्था भऽ गेल। सर्किट हाउस शहरक सभसँ ऊँच स्थानपर बनल अंग्रेजी हुकुमतक समयक भव्य मकान छैक। एतएसँ प्रकृति केर अवलोकन तथा समस्त हाफलौंग शहर एवं अगल-बगलक इलाकाकेँ देखल जाऽ सकैत अछि। हमर कमरा काफी पैघ आऽ साफ सुथरा छल। हँ, पानिक कनिक दिक्कत अवश्य छलैक। कपड़ा बदलिते सुति रहलहुँ। भेल जे रातिमे भोजन नहि करब। परन्तु गौतम शर्मा कतऽ मानऽ बला छलाह! कनिकबे कालक बाद एक स्थानीय कलाकारकेँ लए आबि गेलाह। हम शिष्टतावश नहिओ चाहैत बैसि रहलहुँ। शर्माजी कहलन्हि, “जल्दी चलू। भोजन तैयार अछि”। नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर कला एवं संस्कृति विभागक निदेशक श्री लंगथासा सेहो शर्माजीक संग छलथिन्ह। हुनके प्रयाससँ संस्कृति भवन केर प्रांगणमे हमरा लोकनिकेँ कार्यक्रम करबाक अनुमति भेटल छल। लंगथासा उदार आऽ संस्कृति प्रेमी छथि। स्वयं दिमासा जनजातिक छथि। कहलन्हि “हमरा सभ लेल ई गौरव केर बात थीक जे अहाँ लोकनि दिल्लीसँ आबि एहि इलाकामे जतए कियोक नहि आबए चहैत अछि, अयलहुँ अछि आऽ हमरा लोकनिक संस्कृति एवं धरोहरक रक्षाक प्रति कृतसंकल्पित छी। एतए तँ ओना असम राइफल्स, सैनिक, पुलिस आदिक जमघट लागल रहैत अछि, परन्तु संस्कृति आऽ विरासतक चिन्ता ककरा छैक? अहाँ सभकेँ केना धन्यवाद दी”। हम लंगथासा महोदय दिस तकैत बजलहुँ: “अहाँ सभ यदि चाही तँ हमरा लोकनि एहि क्षेत्रक सांस्कृतिक धरोहरकेँ संरक्षण एवं संवर्धनक हेतु बेर-बेर आएब”। हमरा बातपर उत्साहित भऽ लंगथासाजी बजलाह: हमरा लोकनि सभ तरहक सहयोग करबाक हेतु तैयार छी। एतय केर तमाम अलगाववादी, सरकार विरोधी जत्था समूह संस्कृति रक्षणक विरोधी नहि थिक। तमाम लोसभ अहाँक निर्णयसँ प्रसन्न अछि। जावत धरि अहाँ सभ एतए रहब तावत धरि अतए कुनो मार-काट नहि हैत। अहाँ जे जाहि तरहक स्थानीय सहयोग चाही, हमरा लोकनि करबाक हेतु तत्पर छी”। एकर बाद हमरा लोकनि रात्रिक भोजन हेतु विदा भेलहुँ। चटगर भोजन-भात, माछ, दालि, सजमनि केर तरकारी, सलाद, मिठाई, चटनी- केलाक बाद पुनः सर्किट हाउस आबि सुतबाक तैयारीमे लागि गेलहुँ। सुतएसँ पहिने अपन पत्नीकेँ दूरभाषसँ आश्वस्त कए देलियन्हि। जे चिन्ताक कोनो बात नञि। हम एतए ठीक छी”। एकर तुरत बाद सुति रहलहुँ। अगिला दिन प्रातः पाँच बजे उठि बाहर अएलहुँ तँ मनोरम दृश्य देखि मोन मस्त भऽ गेल। सर्किट हाऊससँ एना बुझना गेल जेना सुरुज अपन लालिमा लए लाल गेन जकाँ उगैत छथि। हरियर जंगल, कलकल करैत छोट परन्तु घुमावदार नदीक प्रभाव, दूरमे बनल जंगलक मध्य आदिवासी सबहक छोट-छोट घर, सभ किछु मनमोहक लगैत छल। किछु कालक बाद गौतम शर्मा सम्वाद पठओलन्हि जे हमरा लोकनिक कार्यक्रम साँझ ६ बजे प्रारम्भ हैत। किछु कालक बाद सत्यकाम आऽ कुशा महन्त किछु स्थानीय लोक संग हमरा लग आबि कहलन्हि जे खाली समयमे हॉफलौंग आऽ अगल-बगलक क्षेत्रकेँ देखबाक चाही। हमरा ई विचार नीक लागल। तुरत तैयार भऽ गेलहुँ। स्थानीय लोकसभसँ पता चलल जे हाफलोंग मूलतः “हंगक्लौंग” सँ बनल छैक जकर अर्थ थीक सम्पन्न आऽ रत्नगर्भा धरती। बादमे किछु दोसर विद्वान लोकनि कहलन्हि जे “हॉफलौंग” शब्द दिमासा जनजातिक शब्द “हाफलाऊ” (HAFLAU)क विकृत रूप थीक। “हाफलाऊ” शब्दक अर्थ भेल वाल्मीक पहाड़ी (Ante hill)। हाफलौँग शहरक निर्माण अँग्रेज प्रशासन द्वारा १८९५ ई. मे बोराइल रेंजपर एकटा छोट छिन हिल स्टेशनक रूपमे कएल गेलैक। प्रारम्भमे चीर, देवदारक पाँतिसँ लागल गाछ, नौ छेदक गोल्फ कोर्स, छोट परन्तु आकर्षक आऽ कलात्मक बंगला, हाफलौंग लेक, रेलवेक कर्मचारी सभ लेल स्टाफ क्वार्टर, छोट बजार, रेलवे स्टेशन आदि सुविधाक संग एहि शहरक विकास प्रारम्भ कएल गेलैक। अंग्रेज सबहक हिम्मतिक प्रशंसा करए पड़त। ३६ खोह (tunnels) कऽ बना रेल लाइन लऽ गेनाइ ओहि जमानामे अर्थात् १८९५-९८ मे की छोट बात छैक? रेलवेक निर्माण कार्यक हेतु ठीकेदार, मजदूर, कर्मचारी, व्यापारी आदि सभ उत्तर-प्रदेश, बिहार, बंगाल आऽ असम केर अन्य स्थानसँ आनल गेल। पुनः आपसमे वार्तालापक हेतु एक नव तरहक बजारु हिन्दी विकसित कएल गेलैक। एहि हिन्दीकेँ हॉफलौंग-हिन्दी कहल जाइत छैक। ई हिन्दी व्याकरणक निअमक पालन स्वतंत्र भऽ करक अधिकार दैत छैक। हाफलौंग हिन्दी रोमन लिपिमे लिखल जाइत छैक। स्थानीय बुद्धिजीवी लोकनिक कठिन संघर्षक फलस्वरूप आइ-काल्हि हॉफलौंग हिन्दीक मान्यता साहित्य अकादमीसँ भऽ गेल छैक। नार्थ कछार हिल्स असम केर बहुरंगी चुनरी थीक। एतए निम्नलिखित एगारह जनजातिक लोक रहैत छथि: १.दीमासा (Dimasa or Cachari) २.ह्मार (Hmar) ३.जेमि नागा (Zeme Naga) ४.कुकी (Kuki) ५.बंइते (Baite) ६.कार्बी (Karbi) ७.खासी अथवा प्नार (Khasi or Pnar) ८.ह्रांगखल (Hrangkhals) ९.वइफी (Vaiphies) १०.खेलमा (Khelma) ११.रोंगमई (Rongmei) एकर अतिरिक्त अन्य समुदाय जेना कि बंगाली, असमी, नेपाली, मणिपुरी, मुसलमान, देसवाली आदि सेहो एतए रहैत छथि। सभ समुदायक बीच हमरा भावनात्मक एकताक कड़ी बुझना गेल। भारतक अनेकतामे एकताक स्वरूप बुझाएल जेना अपन मनिएचर धारण कए एहि छोट धरामे मोडेल बनि “संगे-संगे चली”, “संगे-संगे खाई”, “संगे-संगे रही” केँ चरितार्थ करैत छल। स्वतन्त्रता प्राप्तिक बाद भारतक अन्य शहर जकाँ हॉफलौंग सेहो शनैः-शनैः विकसित भऽ रहल अछि। १९७० ई. मे एकरा जिलाक मुख्यालय बना देल गेलैक। आब नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर मुख्यालय, विभिन्न सरकारी विभागक दफ्तर आऽ मकान, आवासीय परिसर, पार्क, जेहल, खेल परिसर आऽ मैदान, दू टा रेलवे स्टेशन, सिविल अस्पताल, प्राइमरीसँ हाइयर सेकेण्डरी स्तर केर विभिन्न विद्यालय, सभ सुविधासँ परिपूर्ण सरकारी महाविद्यालय जाहिमे कला, विज्ञान एवं वाणिज्य संकाय केर अधिकांश विषयक पढ़ाई केर सुविधा सहजतासँ उपलब्ध छैक; पानिक सुविधा, डाक, टेलीग्राम, टेलीफोन आदिक सुविधा, बैंक, चर्च, मन्दिर, मस्जिद, पुस्तकालय अनेक तरहक सामाजिक-सांस्कृतिक क्रिया-कलापमे संलग्न संस्था; सिनेमा हॉल, बस स्टेण्ड आदि सुविधासँ भरल अछि। अगर रेलसँ हाफलौंग आबय चाही तँ गुआहाटीसँ नॉर्थ प्रन्टीयर हिल सेक्शन केर मीटरगेज द्वारा लम्डींगक रस्ते लोअर हाफलौंग स्टेशन आबि सकैत छी। एकर दूरी गुआहाटीसँ २८५ किलोमीटर छैक। सिलचरसँ बदरपुर होइत हिल हाफलौंग स्टेशन केर दूरी ९२ किलोमीटर छैक। रेलक डिब्बामे बैसि नॉर्थ कछार हिल्स केर नील पहाड़ीक अवलोकन केनाई स्वर्ग केर अवलोकनसँ कम नञि छैक। जीग-जैग (टेढ़-मेढ़) रस्ता नगाँवसँ प्रारम्भ भय समस्त नॉर्थ कछार हिल्सक उत्तरसँ दक्षिण दिशामे जिलाक तीन प्रमुख नदी- माहुर, दीयूंग आऽ जटिंगा- कऽ संग-संग चलैत रहैत छैक। बुझाएत जेना पानि, रेलक पटरी आऽ मनुक्खक मोन तीनू आपसमे तालसँ ताल मिला गतिमान भेल होए। उपरोक्त तीन नदीक अतिरिक्त एहि धरामे चारि छोट-मोट नदी आरो थीक। एहि नदी सबहक नाम छैक: जीनाम, लंगटींग, कोपिली, डिलेयमा। सभसँ पैघ नदी दीयूंग छैक जकर लम्बाई २४० किलोमीटर छैक। १८६६ मीटर केर ऊँचाई पर अवस्थित थुंगजांग पहाड़ी सभसँ ऊँच स्थान छैक। नॉर्थ कछार हिल्स पूबसँ असम केर पड़ोसी प्रदेश नागालैण्ड आऽ मणिपुर; पश्चिममे मेघालय आर कार्बी अंगलौंग जिला; उत्तरमे नगांव आऽ कार्बी अंगलौंग जिला तथा दक्षिणमे बराक घाटीक कछार जिलासँ घेरल अछि। ४८९० वर्ग किलोमीटर क्षेत्रमे पसरल नॉर्थ कछार हिल्स केर सामान्य ऊँचाई समुद्र तलसँ ३११७ फीट छैक। नॉर्थ कछार हिल्स जिलामे ६१९ गाम; पाँच प्रखण्ड, दू सब डिवीजन (हाफलौंग आऽ मइबांग)मे विभक्त अछि। अतए केर आदिवासी मूल रूपसँ झूम खेती करैत छथि। झूममे एक भागक जंगल-झाड़केँ काटि ओहिमे आगि लगा पुनः खेती कएल जाइत छैक। तीन-चारि वर्षक बादओहि भूमिमे पुनः जंगल झाड़केँ बढ़ए देल जाइत छैक आऽ जंगल-झाड़सँ भरल जमीनकेँ आगि लगा साफ कय ओहिमे खेती कएल जाइत छैक। एतए १७,२९३ हेक्टेअर जमीन झूम खेतीक रूपमे, टोटल फसल हेतु उपयुक्त जमीन ३६७५८ हेक्टेअर आर बीया रोपए बला समस्त जमीन २९२०५ हेक्टेअर छैक। एहि जनपद केर करीब ४५२९वर्ग किलोमीटर धरती जंगलसँ भरल छैक। ६१०.५१ वर्ग किलोमीटर सुरक्षित आऽ बाकी हिस्सा राज्य सरकार द्वाराघोषित। तीन सुरक्षित जंगल क्षेत्रक नाम क्रमशः लांगटींग-मूपा सुरक्षित जंगल (४९७.५५ वर्ग कि.मी.) कूरुंग सुरक्षित जंगल (१२४.४२ वर्ग किलोमीटर) बोराइल सुरक्षित जंगल (८९.८३ वर्ग किलोमीटर) ओहि दिन लगभग साढ़े बारह बजे भोजन कयल। तत्पश्चात् नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस हिल्स काउन्सिलक कला एवं संस्कृति विभागक निदेशक लंगथासा महोदय, उप-निदेशक श्री संजय जी दूंग एवं किछु अन्य लोकनि हमरा लग अयलाह आऽ कहलन्हि जे “चलू अहाँकेँ पहाद्ई दिस लऽ चलैत छी। यदि समय बचत तँ जटींगा पहाड़ी आऽ गाम सेहो चलब”। गुआहाटीमे किछु लोक सभ जानकारी देने छलाह जे जटींगा पहाड़ीपर चिड़ै सभ रातिमे रोशनी देखलापर झुण्डक-झुण्डाअबि रोशनीपर प्रहार करैत छञि तथा सामूहिक रूपेण आत्महत्या कऽ लैत छैक। इहो पता चलल छल जे पक्षीशास्त्री लोकनि एहिपर गहन शोधमे बहुत दिनसँ लागल छथि परन्तु एखन धरि कोनो ठोस निष्कर्षपर नहि आबि सकल छथि जे आखिर एकर रहस्य की छञि? आऽ एकर सत्यता की थिकैक? गुआहाटीमे मोन बना लेने रही जे जटींगा पहाड़ी अवश्य जायब। आइ ई अवसर हमरा लंगथासाजी देलन्हि तँ मोन गद् गद् भऽ गेल। हम तुरत हुनका लोकनिक संग जटींगा गाम जयबाक लेल तैयार भऽ गेलहुँ। जटींगा पहाड़ी आऽ गामक रस्तामे विभिन्न प्रकारक बेंतक झाड़ी आऽ बांस भेटल। नॉर्थ कछार हिल्सक टोटल धरती (४८९००० हेक्टेअर)मे लगभग ३०७९०० हेक्टेअरमे बांस लागल छैक। बांस अनेक प्रकारक अनेक प्रजातिक, असम प्रदेशमे ३३ नस्ल केर बांस होइत छैक, जाहिमे लगभग २० नस्ल वा प्रजाति एहि क्षेत्रमे उपलब्ध छैक। प्रमुख प्रजातिमे काको/ पीछा वा पीछा, जाति, डालू, मूली, हिलजाति, कता, मकालू, काली-सूण्डी, टेराई आदिक नाम सामान्यो मनुक्खक जीभमे रचल-बसल छैक। बांस एहि क्षेत्रक लोकक जीवनक प्रमुख आधार छैक। एकर प्रयोग झोपड़ी, जाफरी, जारनि, पूल आदि बनेबाक लेल कएल जाइत छैक। बांसक कोपड़सँ तरकारी, अचार आदि सेहो बनायल जाइत छैक। बांसकेँ स्थानीय चाऊर, मकई आदिसँ बनल दारु पीबाक हेतु बर्तन (ग्लास-कप)क रूपमे कएल जाइत छैक। जमीनक कटाव रोकबाक हेतु बांसक आधार देल जाइत छैक। एकर अलावे बांसक प्रयोग बर्तन, फर्नीचर, कृषियन्त्र एवं उपकरण, धनुष-वाण, सजेबाक कलात्मक वस्तु, हस्तकला, बत्ती, सीढ़ी इत्यादिमे उपयोग होइत छैक। बादमे हम अनेको वाद्य या लोकवद्य यंत्र देखलहुँ जाहिमे बांसक प्रयोग कएल गेल रहैक। अन्ततः हमरा लोकनि जटींगा गाम पहुँचलहुँ। ई गाम बोराइल रेंज केर पादगिरि (foothills) पर बसल छैक। ई पहाड़ी तरह-तरहक प्रवासी एवं देशी चिड़ै सबहक विश्राम-स्थली थिकैक। एहि स्थानमे अंग्रेजी मास सितम्बर-अक्टूबरमे चिड़ै सभ अन्हरिया पक्षक रातिमे रोशनीक कोनो स्रोत जेना कि टॉर्च, मशाल आदि देखि झुण्डक-झुण्डमे आबि खसि पड़ैत छैक आऽ आत्महत्या कऽ लैत छैक। जटींगा गाम हॉफलौंग शहरसँ आठ किलोमीटर केर दूरीपर बसल छैक। लोक सभसँ ज्ञात भेल जे चिड़ै सभ अन्हरिया रातिमे रोशनी देखि झलफलाक खसय लगैत छैक; जकर फायदा उठा कऽ चिड़ैमार सभ बांसक लग्गी अथवा बत्तीसँ चोन्हरायल चिड़ै सभपर प्रहार करय लगैत छैक एवं पकड़ि लैत छैक। अन्हरिया रातिक संग-संग एक निश्चित वातावरणक भेनाई चिड़ै सबहक सामूहिक आत्महत्याक लेल सेहो कारण बनैत छैक। ई वातावरण छैक हवाक बहबाक दिशा। हवाक दिशा दक्षिण-पश्चिमसँ उत्तर-पूबमे हेबाक चाही। बोराइल पहाड़ीक अगल-बगलमे धूंध आऽ शीत लागल रहनाई सेहो जरूरी। धूंधमे कनीक झलफलाईत रोशनी हेबाक चाही। एहन स्थितिमे जखन दक्षिण दिशासँ धूँध चलैत छैक तखने चिद्ऐ सभ जटिंगा दिस आगाँ बढ़ैत अछि। सामूहिक आत्महत्या करय बला चिड़ै सभमे लाली चिड़ै (Indian ruddy), कौड़िल्ला (King fisher), भारतीय नौरंग (Indian pitta), हारिल, ब्लैक ड्रोंगो, उजरा बगुला, चितकबरी पौरकी, बटेर आदि प्रमुख छैक। आश्चर्यक बात ई जे अधिकांश चिड़ै जे कृत्रिम रोशनीक चकाचौंधसँ सामूहिक रूपसँ झुण्डक-झुण्डमे झलफला या चौंधिया कऽ खसैत छैक ओ सभ देशी चिड़ै छैक। प्रवासी चिड़ै सभ संगे ई घटना घटित नहि होइत छैक। स्थानीय लोकसभसँ ईहो पता चलल जे ई प्रवृत्ति समस्त जटींगा पहाड़ीमे नहि भऽ कऽ किछु खास क्षेत्र जे कि मात्र डेढ़ किलोमीटर केर लम्बाई आऽ २०० मीटर केर चौड़ाईक सीमामे बन्हल छैक। जटींगा गामक एक पच्चासी बर्षक वृद्ध जे प्नार (खासी) जनजातिक छथि सँ पता चलल जे चिड़ै सबहक जटींगामे कृत्रिम रोशनीसँ सामूहिक आत्महत्याक प्रवृत्ति केर जानकारी सर्वप्रथम १९१४ ई.क आसपास चललैक। भेलैक ई जे एक राति ककरो चारि-पांच बरद जंगल दिस भागि गेलैक। बरदक मालिककेँ भेलैक जे अगर बरदकेँ रातियेमे नहि पकड़ल गेलैक तँ बाघ-शेर सभ खाऽ जेतैक। तञि पाँच आदमी एकटा टोली बना बांसक फट्ठीमे कपड़ा बान्हि ओहिमे मटिया तेल डालि ओकर मशाल बना कऽ तथा हाथमे लालटेन लय बरद सभकेँ ताकक लेल जंगल दिस बिदा भेल। कनीक कालक बाद आश्चर्यजनक ढ़ंगसँ चिड़ै सभ झुण्डमे आबि मशाल लग आबि खसय लगलैक। परन्तु ई लोकनि ओहि चिड़ै सभकेँ नहि पकड़लकैक। यद्यपि ओऽ सभ चिड़ै मांसक प्रयोगमे लाबए जोग रहैक। एकर कारण ई छलैक जे स्थानीय जेमि नागा समुदाय (जनजाति) क लोकक बीच ई भ्रान्ति रहैक जे जटींगा क्षेत्रमे रातिक भूत-प्रेत विचरण चिड़ै बनि करैत रहैत छैक। हुनका लोकनिकेँ तञि डर भेलन्हि जे चिड़ै केँ पकड़लासँ कहिं कोनो अनिष्ट ने भऽ जाए। १९१७ ई.क आसपास लाखन-सारा नामक एक व्यक्ति कृत्रिम रोशनीसँ झलफलाएल चिड़ै सभकेँ सर्वप्रथम पकड़ि घर अनलाह एवं ओकर मांसकेँ भुजि पका कऽ खयलन्हि। आऽ ओकर कोनो दुष्प्रभाव हुनका सभकेँ नञि भेलन्हि। एकर बाद चिड़ै सभपर आफत शुरू भऽ गेलैक। लोकसभ अन्हरिया रातिमे कृत्रिम रोशनीक मदतिसँ चिड़ै सभक संहार प्रारम्भ कऽ देलक। हालाँकि जखन अंग्रेज प्रशासनकेँ एहि बातक जानकारी भेटलैक तँ एहि परम्परापर रोक लगा देल गेलैक। स्वतन्त्रता प्राप्तिक बाद लोक पुनः नुका-चोरा कऽ शिकार करए लगलाह। आब पर्यावरणविद्, पक्षीशास्त्री, पत्रकार एवं अन्य लोकनिक अथक प्रयासक बाद प्रशासन पुनः कृत्रिम रोशनीसँ चिड़ै मारबाक प्रथापर प्रतिबन्ध लगा देलकैक अछि। हम ओहि स्थानपर गेलहुँ। ओतए रंग-बिरंगक चिड़ै सबहक आकर्षक फोटो टांगल रहैक। एक मूल वाक्य नीक लागल। वाक्य ई रहैक: “shoot these birds with your camera, not with bullets:. घड़ी देखलहुँ तँ साँझ भऽ गेल छल। आब हमरा लोकनि जटींगासँ सोझे सर्किट हाउस आबि गेलहुँ। मुँह हाथ धोलाक बाद कार्यक्रम स्थलीपर पहुँचलहुँ। ओतए पाँच हजार लोक सभ आयल छलाह। सभ जनजाति केर स्त्री-पुरुष, बच्चा सीयान सभ कियो अपन समुदायक परम्परागत रंग-बिरंगक वस्त्र पहिरने सुसज्जित भेल पहुँचल छलाह। प्रशासन केर सहयोग तँ छले। डिप्युटी कमिश्नर, नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर चेअरमेन, सदस्य, प्रमुख सचिव, एस.पी., स्थानीय कॉलेजक शिक्षक एवं छात्र सभ कियो पहुँचल छलाह। स्थानीय पत्रकार सभ सेहो उत्साहित छलाह। सभ कियो हमरा माध्यमसँ आऽ गौतम शर्माक माध्यमसँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र केर प्रति धन्यवाद दैत छलाह। हम सोचलहुँ जे केहेन विडम्बना छैक। जे क्षेत्र सांस्कृतिक सम्पन्नताक खान थिक ओकर एहेन अपमान! मुख्यधारासँ एहि क्षेत्रकेँ वंचित किएक कएल गेल छैक! हमरा भेल जे समस्त विश्वमे नॉर्थ कछार हिल्ससँ शान्त आर सांस्कृतिक वैविध्यसँ भरल आर कोनो जगह नञि भऽ सकैत अछि। हम अपन भाषणमे बजलहुँ: “हमरा लोकनि अहाँ सभकेँ सिखाबए नहि अएलहुँ अछि। हमरा लोकनि अएलहुँ अछि अहाँ लोकनिकेँ जाग्रत करक हेतु जे अहाँ सभ अपन सांस्कृतिक वैविध्यता तथा गरिमाकेँ बुझू आऽ एकरा सास्वत राखू। हमरा लोकनि एतए केर सांस्कृतिक विरासतकेँ जानए आऽ ओकर डॉक्युमेन्टेशन करए आएल छी। अगर अहाँ सबहक सहयोग रहल तँ बेर-बेर आएब। हमर कार्यक्रममे आऽ एक्शनमे कौमा (,) वा अर्धविराम भऽ सकैत अछि, पूर्ण विराम कखनहुँ नहि हैत”। लोक सभ हमर बातकेँ सही अर्थमे लेलन्हि। पहिल दिनक कार्यक्रम लगभग साढ़े-नौ बजे राति धरि चललैक। जखन रातिमे भोजनक उपरान्त विश्राम करए गेलहुँ तँ एक आदमीक देल एक पुस्तक पढ़य लगलहुँ। पुस्तक नॉर्थ कछार हिल्सपर छलैक। ओहि पोथीमे रातु हकमओसा नामक स्थानीय कविकेँ नॉर्थ कछार हिल्सपर लिखल किछु पंक्ति बड्ड उपयुक्त बुझना गेल: पंक्ति यथावत अंग्रेजीमे पाठक लेल लिखि रहल छी: A harmonious game of hide and seek Behind the bushes, marshy meadow Under shadow with clouds view, Ever ready for worthwhile, cherish at dawn, The blues make enchanting heart of lovers Midst of covers white Changing scene that lively for romance Beauty and bounty of brooks that flow. Moments of joy, love to cherish Insight the harmony game of hide and seek Behind thick trespasses of white and blue With narrow path of zig-zag. The beauty of hills under cover Orchids, white fall, violet at hills Every moment thrilled with behalf Nature disposal at North Cachar Hills. श्री भालचन्द्र झा, ए.टी.डी., बी.ए., (अर्थशास्त्र), मुम्बईसँ थिएटर कलामे डिप्लोमा। मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी, मराठी, अग्रेजी आऽ गुजरातीमे निष्णात। १९७४ ई.सँ मराठी आऽ हिन्दी थिएटरमे निदेशक। महाराष्ट्र राज्य उपाधि १९८६ आऽ १९९९ मे। थिएटर वर्कशॉप पर अतिथीय भाषण आऽ नामी संस्थानक नाटक प्रतियोगिताक हेतु न्यायाधीश। आइ.एन.टी. केर लेल नाटक “सीता” केर निर्देशन। “वासुदेव संगति” आइ.एन.टी.क लोक कलाक शोध आऽ प्रदर्शनसँ जुड़ल छथि आऽ नाट्यशालासँ जुड़ल छथि विकलांग बाल लेल थिएटरसँ। निम्न टी.वी. मीडियामे रचनात्मक निदेशक रूपेँ कार्य- आभलमया (मराठी दैनिक धारावाहिक ६० एपीसोड), आकाश (हिन्दी, जी.टी.वी.), जीवन संध्या (मराठी), सफलता (रजस्थानी), पोलिसनामा (महाराष्ट्र शासनक लेल), मुन्गी उदाली आकाशी (मराठी), जय गणेश (मराठी), कच्ची-सौन्धी (हिन्दी डी.डी.), यात्रा (मराठी), धनाजी नाना चौधरी (महाराष्ट्र शासनक लेल), श्री पी.के अना पाटिल (मराठी), स्वयम्बर (मराठी), फिर नहीं कभी नहीं( नशा-सुधारपर), आहट (एड्सपर), बैंगन राजा (बच्चाक लेल कठपुतली शो), मेरा देश महान (बच्चाक लेल कठपुतली शो), झूठा पालतू(बच्चाक लेल कठपुतली शो), टी.वी. नाटक- बन्दी (लेखक- राजीव जोशी), शतकवली (लेखक- स्व. उत्पल दत्त), चित्रकाठी (लेखक- स्व. मनोहर वाकोडे), हृदयची गोस्ता (लेखक- राजीव जोशी), हद्दापार (लेखक- एह.एम.मराठे), वालन (लेखक- अज्ञात)। लेखन- बीछल बेरायल मराठी एकांकी, सिंहावलोकन (मराठी साहित्यक १५० वर्ष), आकाश (जी.टी.वी.क धारावाहिकक ३० एपीसोड), जीवन सन्ध्या( मराठी साप्ताहिक, डी.डी, मुम्बई), धनाजी नाना चौधरी (मराठी), स्वयम्बर (मराठी), फिर नहीं कभी नहीं( हिन्दी), आहट (हिन्दी), यात्रा ( मराठी सीरयल), मयूरपन्ख ( मराठी बाल-धारावाहिक), हेल्थकेअर इन २०० ए.डी.) (डी.डी.)। थिएटर वर्कशॉप- कला विभाग, महाराष्ट्र सरकार, अखिल भारतीय मराठी नाट्य परिषद, दक्षिण-मध्य क्षेत्र कला केन्द्र, नागपुर, स्व. गजानन जहागीरदारक प्राध्यापकत्वमे चन्द्राक फिल्मक लेल अभिनय स्कूल, उस्ताद अमजद अली खानक दू टा संगीत प्रदर्शन। श्री भालचन्द्र झा एखन फ़्री-लान्स लेखक-निदेशकक रूपमे कार्यरत छथि। दू गो कविता १.अपन अस्तीत्वक असली मोल बुझबाक हुअए यदि अपन अस्तीत्वक असली मोल त पुछियौक सुकरातकें देखबियौक ओकरा विश्वक नक्शा पर पहिने अपन “देसक” अस्तीत्व ओहि देस मे अपन “राज्यक” अस्तीत्व राज्य मे अपन “जिलाक” अस्तीत्व जिला मे अपन “गामक” अस्तीत्व गाम मे अपन “घरक” अस्तीत्व आ तहन घर महुक “अपन” अस्तीत्व आ ई सभ “विश्वक नक्शा” पर से बूझि लियौक... २. हमर माय गर्भगृहक सुखासन सँ बहरेलहुँ त हमर जन्मदात्री अपसियाँत रहय भनसिया घर मे तीतल जारैन कें धूआँ मे करैत रहय धधराक आवाहन देहक धौंकनी कऽकऽ आ तहिया सँ लऽ कऽ आइ धरि ओकरा आन कोनो ठाम नहिं देखलियैक देखलियैक त बस कोनटा घरक ऐंठार पर सभक ऐंठ पखारैत कखनो अँगना बहारैत त कखनो जारैन बीछैत कखनो कपड़ा पसारैत त कखनो नेन्नासभक परिचर्या करैत खिन मे जाँत पर, त खिन मे ढेकी पर, चार पर, चिनमार पर अँगनाक मरबा पर, घरक असोरा पर दिन-दुपहर, तीनू पहर जोतल कखनो दाईक चाइन पर तेल रगड़ैत त कखनो छौंरी सभक जुट्टी गूहैत राति मे पहिने दाईकें आ तहन बाबूकें पएर दबबैत एहि तरहें ओकर जीवनक आध्यात्म भनसिया घर सँ शुरू भऽ कऽ भनसिये घर मे समाप्त भऽ गेलैक झुलसैत देखलियैक चूल्हिक आगि मे नारीक स्वतंत्रता, ओकर अस्मिता ओकर मान आ स्वाभिमानकें कहाँ भेटलैक पलखतियो ओकरा एहि सभ दिसि ताकहो कें आइ सोचै छी सेहो नीके भेलैक अगिलुका पीढ़ी सचेत भऽ गेलैक भलमनसियत सँ जँ नहिं भेटलैक त छिनबाक ताकति भेटि गेलैक मुदा ताँहिं की हमर मायक त्याग आ बलिदान ईब्सेन कें नोरा सँ अथवा गोर्कीक माय सँ रत्तियो भरि कम कहाओत? हमरा जनितबे रत्ती भरि बेसिये बूझू विभा रानी (लेखक- एक्टर- सामाजिक कार्यकर्ता) बहुआयामी प्रतिभाक धनी विभा रानी राष्ट्रीय स्तरक हिन्दी व मैथिलीक लेखिका, अनुवादक, थिएटर एक्टर, पत्रकार छथि, जिनक दर्ज़न भरि से बेसी किताब प्रकाशित छन्हि आ कएकटा रचना हिन्दी आ र्मैथिलीक कएकटा किताबमे संकलित छन्हि। मैथिली के 3 साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकक 4 गोट किताब "कन्यादान" (हरिमोहन झा), "राजा पोखरे में कितनी मछलियां" (प्रभास कुमार चाऊधरी), "बिल टेलर की डायरी" व "पटाक्षेप" (लिली रे) हिन्दीमे अनूदित छन्हि। समकालीन विषय, फ़िल्म, महिला व बाल विषय पर गंभीर लेखन हिनक प्रकृति छन्हि। रेडियोक स्वीकृत आवाज़क संग ई फ़िल्म्स डिविजन लेल डॉक्यूमेंटरी फ़िल्म, टीवी चैनल्स लेल सीरियल्स लिखल व वॉयस ओवरक काज केलन्हि। मिथिलाक 'लोक' पर गहराई स काज करैत 2 गोट लोककथाक पुस्तक "मिथिला की लोक कथाएं" व "गोनू झा के किस्से" के प्रकाशनक संगहि संग मिथिलाक रीति-रिवाज, लोक गीत, खान-पान आदिक वृहत खज़ाना हिनका लग अछि। हिन्दीमे हिनक 2 गोट कथा संग्रह "बन्द कमरे का कोरस" व "चल खुसरो घर आपने" तथा मैथिली में एक गोट कथा संग्रह "खोह स' निकसइत" छन्हि। हिनक लिखल नाटक 'दूसरा आदमी, दूसरी औरत' राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह भारंगममे प्रस्तुत कएल जा चुकल अछि। नाटक 'पीर पराई'क मंचन, 'विवेचना', जबलपुर द्वारा देश भरमे भ रहल अछि। अन्य नाटक 'ऐ प्रिये तेरे लिए' के मंचन मुंबई व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' के मंचन फ़िनलैंडमे भेलाक बाद मुंबई, रायपुरमे कएल गेल अछि। 'आओ तनिक प्रेम करें' के 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित तथा मंचन श्रीराम सेंटर, नई दिल्लीमे कएल गेल। "अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो" सेहो 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित अछि। दुनु नाटक पुस्तक रूप में प्रकाशित सेहो अछि। मैथिलीमे लिखल नाटक "भाग रौ" आ "मदद करू संतोषी माता" अछि। हिनक नव मैथिली नाटक -प्रस्तुति छन्हि- बलचन्दा। विभा 'दुलारीबाई', 'सावधान पुरुरवा', 'पोस्टर', 'कसाईबाड़ा', सनक नाटक के संग-संग फ़िल्म 'धधक' व टेली -फ़िल्म 'चिट्ठी'मे अभिनय केलन्हि अछि। नाटक 'मि. जिन्ना' व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' (एकपात्रीय नाटक) हिनक टटका प्रस्तुति छन्हि। 'एक बेहतर विश्र्व-- कल के लिए' के परिकल्पनाक संगे विभा 'अवितोको' नामक बहुउद्देश्यीय संस्था संग जुड़ल छथि,  जिनक अटूट विश्र्वास 'थिएटर व आर्ट-- सभी के लिए' पर अछि। 'रंग जीवन' के दर्शनक साथ कला, रंगमंच, साहित्य व संस्कृति के माध्यम से समाज के 'विशेष' वर्ग, यथा, जेल- बन्दी, वृद्ध्राश्रम, अनाथालय, 'विशेष' बच्चा सभके बालगृहक संगहि संग समाजक मुख्य धाराल लोकक बीच सार्थक हस्तक्षेप करैत छथि। एतय हिनकर नियमित रूप से थिएटर व आर्ट वर्कशॉप चलति छन्हि। अहि सभक अतिरिक्त कॉर्पोरेट जगत सहित आम जीवनक सभटा लोक आओर लेल कला व रंगमंचक माध्यम से विविध विकासात्मक प्रशिक्षण कार्यक्रम सेहो आयोजित करैत छथि। भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक) लेखिका - विभा रानी पात्र - परिचय मंगतू भिखारी बच्चा 1 भिखारी बच्चा 2 भिखारी बच्चा 3 पुलिस यात्री 1 यात्री 2 यात्री 3 छात्र 1 छात्र 2 छात्र 3 पत्रकार युवक पत्रकार युवती गणपत क्क्का राजू - गणपतक बेटा गणपतक बेटी गुंडा 1 गुंडा 2 गुंडा 3 हिज़ड़ा 1 हिज़ड़ा 2 किसुनदेव रामआसरे दर्शक 1 दर्शक 2 आदमी तांबे स्त्री - मंगतूक माय पुरुष - मंगतूक पिता भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक) - विभा रानी दृश्य : 1 (ट्रेनक दृश्य। (ट्रेन नञि भ' क' ई कोनो हाट- बजार अथवा मेला-ठेला सेहो भ' सकैत अछि।) ट्रेन मे महिला आ पुरूष यात्री। भीख माँग' बला तीन टा बच्चा चढ़ैत अछि। एक के गला मे हारमोनियम, दोसराक हाथ मे पाथरक दू टा खपटा। तेसरक हाथ मे खँजड़ी। तेसर बच्चा उमिर में सभ स' छोट। तीनू क तीनू फाटल, चीकट कपड़ा मे अछि। बच्चा नं. 1 हारमोनियम पर सभ' स' नवीन फिल्मी गीतक धुन बजाक गाबि रहल अछि। दोसर बच्चा खपटा बजा-बजाक' ओकरा संगे गएबाक प्रयास क' रहल अछि। छोटका बच्चा खंजड़ी बजा रहल अछि आ गीतक पंक्ति पकड़बाक प्रयास मे आधा-छिया पंक्ति गबैत अछि। तीनूक स्वर; सुर-ताल में कोनो एकरूपता नञि अछि। सभस' छोटका; बच्चा नं. 3 सभ स' पाई मँगैत अछि। किओ देइत अछि, किओ डपटैत अछि, किओ कोनो दोसर दिस तकैत अछि, किओ ऑंखि मूनि लेइत अछि।) (ट्रेन रूकैत अछि। तीनू बच्चा उतरि जाइत अछि। मंचक एकटा कोन्टी मे तीनू ठाढ़ भ' क' दिनु भरका कमाई गिनैत अछि।) बच्चा 1 : कतेक? बच्चा 2 : साढ़े एगारह। बच्चा 1 : बस? भरि दिन ट्रेने-ट्रेने घूमल आ तइयो साढ़े एगारहे? अकरा मे त' अपना सभक लेल चाहो-मूढ़ी नञि। (सभस' छोटका बच्चा स') आँए रौ, खाए लेल भरि थारी आ माँग' मे सभ स' पिछारी! ठीक स' माँगै कियै नै छें रे? (बच्चा 3 बिटिर-बिटिर तकैत रहैत अछि।) मुंह की निहारि रहल छें? हम कोनो की गोविंदा छी कि रितिक रोशन। आ तोहों आमिर खान नञि छें। जतेक गरीब छें, तकरो स' बेसी गरीब बनल रह। तखने दू टा पाइ भेटतौ। बच्चा 3 : (सहमैत) ई पटना छै कि दानापुर? (दुनू बच्चा ई सुनि हठात ठठा पड़ैत अछि। छोटका फेर बिटिर-बिटिर मुंह तकैत रहैत अछि।) बच्चा 3 : रौ बूड़ि। ई पटना नञि छै, जकरा ककरो स' नञि पटै छै। दानापुर माने दाना स' पूरम पूरा। हमर आओरक पेट मे त' मरल सनकिरबो नञि अछि। की करबहीं रौ जानि क' की हम कत' छी? बच्चा 1 : भूख लागलए। बच्चा 2 : तकरा लेल पटना-दानापुर मे रहब जरूरी छै? भूख त' कखनो आ कतहु लागि जाइ छै। दम धर। बच्चा 3 : पटना सिटी? बच्चा 2 : ऊँ हूँ। पटना साहेब। सिटी त' कहिया ने बदलि गेलै। बच्चा 1 : रौ बता, सिटी स' साहेब भ' गेला स' की भ' गेलै? की बदलि गेलै? बच्चा 2 : बदलि गेलै ने? जनाना स' मर्दाना भ' गेलै। बच्चा 1 : माने? (गंभीर भ' क') बच्चा 2 : माने.. सिटी जनाना आ साहेब मर्दाना (दुनू हँसैत अछि। बच्चा 3 ओहिना बिटिर-बिटिर मुंह तकैत रहैत अछि) बच्चा 1 : नाम बदल' स' तकदीर सेहो बदलै छै की? सिटी स' साहेब भ' गेलै त' हमरा आओरक भूख-पियासक रंग बदलि गेलै की? अपना आओर के काज भेटलौ? पाइ भेटलौ? तहन कियैक एतेक मगजमारी? पटना कि दानापुर कि साहेब की फारबिस गंज.. हुँह! बच्चा 3 : (उसांस भरिक') भूख लागल अछि। बच्चा 1 : रौ सार! जो, कोनो हाथी पकड़ि ला आ घोंटि जो। सार.. भूख लागलए, भूख लागलए.. नकिया देलक ईत'.. बच्चा 2 : आजुक समाचार? बच्चा 2 : बच्चा बेमार। हजारो नेन्ना मरि गेलै, खाएक अभाव मे.. बच्चा 3 : हमरा खाए ला दे। नञि त' हमहू मरि जाएब। बच्चा 1 : त' मरि जो। प्रधानमंत्री छें जे मरि जेबें त' देसक काज-धंधा थम्हि जेतै। बच्चा 3 परधानमंत्री कोनो खायबला चीज होइ छै। केहेन होइ छै? कत' भेटै छै? बच्चा 2 : (ओकर बात पर धेयान देने बेगर) तों कोना बुझलही? तों त' अखबार नञि पढ़ै छैं। बच्चा 1 : टेसन मे टीबी छै ने। ओकरा मे देखलियै। बढ़िया स' बूझाब' लेल मँगतुआ त' अछिए। बच्चा 2 : ओकरा कोना बूझल छै? बच्चा 1 : ओ पढुआ छै। अखबार पढ़ै छै। बच्चा 2 : भिखमंगो सभ अखबार पढ़ै छै? बाप रौ! बच्चा 1 : ओ कीनै नञि छै। प्रेसक बाहर बैसै छै। चौकीदार ओकरा द' दै छै अखबार। बच्चा 3 : भीख मे अखबार! भीख मे चाह-मूढ़ी.. (बजैत-बजैत थम्हि जाइ छै: दुनू बच्चा ओकरा घूरै छै।) बच्चा 2 : मंगतू सभटा पढ़ि लेइत छै? बच्चा 1 : हँ, रौ। पूरा अखबार चाटि जाइत छै। पूरा दुनियाक हाल ओकरा बूझल रहै छै। ओ पढ़ल छै। बच्चा 3 : पढ़ल की होइ छै? पटना-दानापुर जकाँ कोनो टेसन छै की? बच्चा 2 : (स्नेह स') तो नञि बुझबे अखन। बच्चा 1 : पढ़ल बहुत पैघ चीज होइत छै। पढ़ि-लिखि क' लोक बहुत पैध-पैध लोक बनि जाइत अछि। मुदा अपना आओरक तकदीर मे ई नञि अछि। बच्चा 2 : (भरोस दियबैत) नञि छै त' नञि छै। मंगतुआ छै नें पढ़ल-लिखल। अपने बिरादरीवाला। अपना आओर स' गप्प-सप्प सेहो करै छै। दुनिया जहानक समाचार त' दइते छै। (अई बेर तेसरका बच्चा कएक बेर हाथ मुंह स' भूख लगबाक संकेत द' चुकल अछि। सभ बेर दुनू बच्चा ओकरा घूरैत अछि। तेसरका सभ बेर डेराक शांत भ' जाइत अछि।) बच्चा 1 : हे.. देख ओम्हर! अपन गोबिन्दा। बच्चा 3 : ई कोनो नव भिखमंगा ऐलै की? आब त' आओरो भीख नञि भेटत। .. भूख.. बच्चा 2 : मंगतुआ छै। बच्चा 3 : ई एतेक पैघ घर ओकर छै? आ तइयो भीख.. बच्चा 1 : धुरि बुडि.बक। ई अखबारक ओफीस छियै। अई ठाँ क सभस' पैध अखबारक ओफीस। बच्चा 2 : ऐं मारल! वो गुड्डी बकाट्टा। बुझा गेल जे ओकरा पढ़ब-लिखब कोना एलै। बच्चा 1 : अखबारक बगल में रहला स' किओ पढ़ि जाइ छै। मू.ढ़ीक दुकान लग रहला स' मूढ़ी भेटि जाइत छै? बच्चा 3 : मूढ़ी.. भूख.. दुनू : चोप! बच्चा 2 : कोनाक' ऊ पढ़ि गेलै तहन? बच्चा 3 : हमहू पढ़ब। बच्चा 1 : रौ, कुकुरक नांगरि। पढ़िक' की बनबही? सोनिया गांधी कि मनमोहन सिंह? बच्चा 2 : राबड़ी देवी। पढ़क जरूरते नञि। बच्चा 3 : (खिसिया क') पढ़ नञि देबें, खाए लेल नञि देबें, त' करब की? मूति! बच्चा 2 : पढ़ाईक गेरंटी नञि । खाएक गेरंटी त' आओरो नञि। बच्चा 1 : कोना पढ़बही रे? मंगतुआ गप्प दोसर छै। ओकरा लग टेम छै। ओकरा भीखो खूब भेटै छै? बच्चा 3 : पढ़ले सन्ते ने! हमहू पढ़ि लेब त' हमरो बेसी भीख भेटत। बच्चा 1 : चल, चल .. बच्चा 3 : कोम्हर? हमरा भूख लागलए। बच्चा 2 : मंगतुआ लग चल। ओकरा खेनाइयो-पिनाई बहुत रास भेटै छै? बच्चा 3 : पढ़िक' भीख मांगला स' खेनाइयो फ्री.. हमरा पढ.ा दे। बच्चा 1 : (दुनू क हाथ पकड़िक एक दिस ल' जाइत) चल, चल पानि सेहो बरस' बला छै। चल ओम्हर (दुनू रास्ता क्रॉस करबाक अभिनय करैत अछि। तेसरका पाछा रहि जइत अछि। दोसरका ओकरा पार करबाक इशारा करैत अछि। तेसरका डेराइत अछि। दोसरका फेर एम्हर अछि। ओकरा एक धौल लगाबैत अछि। फेर खींचिक' रोड पार करैत अछि। पार क' क' तीनू मंगतू लग पहुंचइत अछि। एक गोट मोटरी, एक गोट कटोरा, किछु पाइ ओकरा लग पड़ल अछि। प्रकाश तीनू बच्चाक संगे-संगे आब मंगतू पर।) बच्चा 1 : की रौ मंगतुआ। की भ' रहल छौ। मंगतू : के? ओह! चनरा, गोबरा, झुनमा रौ! आ बइस, केहेन चलि रहल छौ धंधा-पानी? बच्चा 2 : भीख माँगब धंधा पानी होइ छै? आ सेहो अई अंधड़ पानि में! बच्चा 1 : हमरा त' फूटलो आँखि नञि सोहाइये ई बरखा- बुन्नी। लोक आओर घर मे, आफिस में बन्न। दुकान दौरी सेहो ठप्प। लोक आओरक धंधा-पानी नञि त' हमरा आओर के भीख के देत? मंगतू : हमरा त' बड्ड नीक लगैय' ई बरिसात। चारू दिस हरियाली, मोन के बड्ड सोहाओन लगैत अछि। बच्चा 1 : पेट भरल रहला पर बनरनियो रानी मुखर्जी लागै छै। बच्चा 2 : अपना घर मे बइसक' चाह पकौड़ी उड़ाब' मे केकरा मजा नञि एतै? (चाह पकौड़ीक नाम स' बच्चा 3 फेर हाथ स' भूख बतबइत अछि।) बच्चा 1 : हमरा आओरक कोनो ठेकाने नञि! देखै छियै नें जे जहन पानि बरसै छै, तहन भिजैत माय कोरा मे भीजैत बच्चा के ल' क' बिल्डिंगे-बिल्डिंग, घरे-घर बउआ अबैत छै। मुदा कतहु-कोनो चौकीदार ओकरा अपना बिल्डिंग के नीचा आसरा नञि देई छै। मंगतू : छै। तइयो पानि बरसै छै त' नीक लागै छै। देह मे जिनगी सुरसुराय लागै छै। पानि छै तैं। जिनगी छै नै रौ..! (स्वर बदलिक') आ, तों सभ भिंगमे कियै। तोरा-आओर के त' घर छौ। हमरा जकाँ नञि छौ ने। बच्चा 1 : हं, सहीए । तोरा नाहित नञि छियै रौ। रहितियैक त' भरि दिन ई टरेन, ऊ बस, नञि करैत रहितहुँ। लोकक लात-बात नञि सुनतहुँ। ई गर्दनि देख.. चिकरि-चिकरि के बाँस जतेक पैध भूर भ' गेल अछि। बच्चा 2 : आ जे दू टा पाइ भेटै छै, ओहू में पुलिस, दादा सभक.. (ओ बाजिए रहल अछि कि एकटा पुलिस डंडा घुमबैत ओम्हर अबैत अछि। तीनू के देखिते तीनू पर ताबड़तोप. डंडा बरसाब' लगैत अछि। तीनू एम्हर-ओम्हर बचबाक प्रयास करैत अछि। ओही मे देह छीपि-छीपि के पुलिस से नञि मारबक नेहोरा करैत अछि। मंगतूक सेहो प्रयास। अई क्रम मे एक -दू डंडा ओकरो लागि जाइत अछि।) पुलिस : सार सभ! फेर एम्हर आबि गेलैं। चढ़बे बस ट्रेन में माँग' लेल भीख, आ करबें पाकिटमारी। बच्चा 1 : नञि साब! हम सभ त'.. पुलिस : चोप.. भोसड़ी के.. सार, बहिनक इयार! ई डंडा एम्हर स' घुसतौ त' मुंह दने निकलतौ। चल भाग, जो ओई गल्ली मे। (तीनू पुलिसक बताओल गल्ली मे भागि जाइत अछि। पुलिसबाला विजयी भाव स' बस स्टैंड पर ठाढ़ लोक आओर के देखैत अछि आ फेर मंगतू दिस।) मौज कर रो बाउ, मौज कर। तोहरे भाग मे मौज लिखल छौ। ऐहेन ने देह बना के आएल छें जे मौजे-मौज छौ। (कहैत ओ गल्ली दिस बढ़ैत अछि।) ------- दृश्य : 2 (यात्री सभ आपस मे गप्प करैत अछि) यात्री 1 : एह! ई पुलिसवाला सभ त'.. यात्र 2 : राज-पाट त' एकरे सभक छै ने। कहबी छै ने जे जकरे लाठी, तकरे महीस। यात्री 3 : कतेक डंडा बरसौलकै ओहि बच्चा सभ पर। बुझाई छै जे ओकरा अपना धिया-पुता नञि छै। आ अईठांक लोग आओर! तमासे देखैत रहि गेल। बाज' लेल किओ नञि । यात्री 1 : सभक मुंह मे त' जाभी लागल छलै। अहीं कियैक ने बजलियै? यात्री 2 : अहाँ बाजतहुं त' हमरो सभक हिम्मति बढ़ितियैक ने। यात्री 3 : (मंगतू दिस) एकरो पर कम नञि बरसलै। हमरा आओर स' नीक त' इएह छल। एहेन देह- दसा होइतहुँ बचब' लेल त' गेलै। यात्री 1 : के छै ई? यात्री 3 : (चिढ़ क') अनिल अंबानी। यात्री 3 : खासियत छै एकरा मे। यात्री 1 : से की? यात्री 3 : पढ़ल लिखल छै। रोज अखबार पढ़ै छै। यात्री 2 : त' जहन पढ़ल छै त' कोनो काज-धंधा कियै नञि करै छै? यात्री 3 : एतेक अनटेटर गप्प किओ कएलए! अएँ यौ, ओकर देह नञि देखै छियै? के देतै ओकरा काज? अहीं द' दियऊ ने! ओ त' बड्ड प्रसन्न हएत। यात्री 2 : से कियैक यौ? यात्री 3 : कियैक त' भीख माँगब ओकरा बड्ड गर्हित कर्म बुझाइ छै। यात्री 1 : आब अहूं त'। एहेन अनसोहाँति गप नञि करू। यात्री 2 : अहाँ करी त' किछु नञि, हम करी त' जुलुम? यात्री 1 : हम कत' स' ओकरा काम देबै? हम त' अपने सेठ के ओहिठाँ बेगार खटै छी। यात्री 3 : त' खटू । मालिकक दया दृष्टि पर खेबैत रहू। हे, अहीं की, हम सभ किओ सेठक दया-दृष्टिक भीख जोहैत रहै छी। तमासा मे तमासा ई जे हमर सभक मेहनति पर मालिक सभ मौज करैत अछि। काला पानीक कैदी जकाँ माह भर हमरा आओर खटै छी। माहक आखिर मे भीखे जकाँ दस टा पत्ता हमरा आओर दिस फेंक देल जाइत अछि। (बस अयबाक ध्वनि। यात्री सभ मे हलचल। 'हमर बस आबि गेल', 'हमरो'। 'हमर एखनि धरि नञि।' 'फेर घर पहँुच' मे लेट भ' जाएत' - यात्री सभक उक्ति आ बस द्वारा प्रस्थान।) कुकुर जकाँ छी, सेठक पगारक सूखल हड्डी चुसैत हम सभ। (बस अबै छै। ओहो लपकि' क' चढ़ि जाइत अछि।) (प्रकाश तीनू बच्चा पर।) बच्चा 1 : रौ, जल्दी स' पचटकिया निकाल आ बाकी सभ एम्हर रख। रकसबा अबिते हैतौक। बच्चा 3 : ओकरा रकसबा कियैक कहै छहौक। बच्चा 2 : त' की भगवान कहियै? (बच्चा 3 स) तों एकदम किछु नञि बाजबें। कहि देइ छियौ (बच्चा 3 हं में मूंड़ी डोलबैत अछि। पुलिसक प्रवेश।) पुलिस : रौ हीरो। की भेलौ रौ? ब्रह्मा, विष्णु, महेश? आ कि सलमान खान, आमिर खान, शाहरूख खान। ओकरो.. ऊ लंगड़ा के सेहो पकड़ि ले त' आओर कोनो नाम द' दही नारद बाबा, कृष्ण जी, बलराम जी.. फिल्मी चाही त' जायद खान। एकदम टटका खान छौ। ऐं! कतेक माल बटोरले रे! लेडीज डिब्बा मे सेहो गेल छले ने! अरे, तोरा जकाँ हम रहितियौक ने, त' हम त' खाली लेडीज में जयतियौ। नञि भेंटतियैक भीख, नञि भेंटौ, मुदा मौगी सभके छुबाक अवसर त' भेटितियैक ने! (ठोर भिजबैत अछि) अच्छा चल, निकाल माल! देरी नञि । (बच्चा 1 पाँच टकाक रेजगी निकालि क' देइत अछि। पुलिस वाला गिनैत अछि।) पुलिस : सार! तोरा सभक संगे इएह सभ झंझट अदि। देबें चार गो छदाम आ गिनेबे एक घंटा जे गनैत-गनैत हाथ मे ऐंठी होब' लागय। बच्चा 1 : साब! आई कतेक पानि बरसलै अछि। देखियौ ने साब। कतेक घटाटोप बरिसाति छियै। भिन्सरे स' ट्रेने-ट्रेन घूमल, मुदा ई पाँच टका स' जास्ती नञि भेटल। साब, एकरा मे स' किछु हमरो सभक भेटि जाए। भिन्सर स' उपासले छी। ई छोटकाक त' अंतड.ी सुखा गेलैय'। (सलाम ठोकैत अछि।) (पुलिस निर्लज्ज हंसी हंसैत छै। फेर एक धौल बच्चा 1 के लगबैत अछि।) पुलिस : दलाल स' दलाली एकरे कहै छै ने। ऐ हीरो, बेसी एक्टिंग नञि। (दर्शक स') देखियौ छौड़ा सभक ढिठाई। देत पांच गो टाका, आ ओहि मे आपसो चाही। माने हफ्ता मे हफ्ता। (गब्बर सिंह स्टाइल मे बाजैत अछि) सोच, सोच। हमरा आओरक सोच। सरकार कहै छै, भीख नञि माँग' लेल। कानूनो बना देलकै। मुदा हमरा आओर के दया आबि जाइत अछि तोरा आओर पर। भीख नञि माँगबे त' खेबे कत स'? रौ, मेहरबानी बूझ, मेहरबानी। आ, आब ई पाँच टका स' किछु नञि होब बला छौ। रेट बढ.ा, रेट। देखै नञि छही, कतेक मँहगाई बढ़ि गेलैये। (डंडा घुमाबैत चलि जाइत अछि.. तीनू एक दोसरा के देखैत अछि। पुलिस के जाइत देरी कि तीनू पाथरक नीचा दबाक' राखल पाइ दिस लुझैत अछि।) बच्चा 3 : भूख लागलए हमरा। बच्चा 1 : (खिसिखा क' एक झांपड़ लगबैत अछि। ले, हमर देह काटि क' खा ले हे, ओम्हर जे पांच टका छै ने, तकरा मे बिसरियो के हाथ नञि लगबिहै। नञि त' ओ हाथे कन्हा स' अलग भ' जेतौ। दादाक हिस्सा छै, दादाक।) बच्चा 2 : त' आब बचलौ की? बच्चा 1 : डेढ़ टाका। जकरा मे एक गिलास सतुओ नञि एतौ। बच्चा 2 : तहन .. भूख त' लागल अछि। हमरो, तोरो। चल न फेर मंगतुए लग। ओकरा ल'ग खेनाइयो-पिनाईक समान सभ खूब रहै छै। (तीनू ओकरा दिस बढ़ैत अछि । मंगतू किछु बड़बड़ क' रहल अछि।) बच्चा 1 : की रौ मँगतुआ! की डैलोग मारि रहल छैं। नाना पाटेकर जकाँ। मंगतू : (चौेंकि क') अँए.. किछुओ त' नञि । बच्चा 3 : भूख .. बच्चा 1 : चुप सार, कुकुरक पोंछि। बच्चा 2 : मारि लें डैलोग। तोरे राजपाट छौ रौ। मौज छौ तोरे। ने कोम्हरो एनाइ ने गेनाई। एम्हरे बइसल-बइसल पाइ बरसै छौ तोरा पर। हमरा आओर के देख। भरि दिन ट्रेने-टेन घूमल, तइयो कतेक भेटल? साढ़े एगारह टाका। पाँच टाका पुलिस के, पाँच टाका दादा के। बचलौ कतेक? डेढ़ टाका? अब अई डेढ़ टाका मे की खाऊ हम आओर, जाहि स' पेट भरए? तोरा त' ई सभ नञि सोचबाक छौ ने। तैं कहलियौ जे बड्ड भगमंता छें। मंगतू : (तिक्त स्वर म') तोंहों भगमंता बनि सकै छें। ब. 1+2 : (एके स्वर म') हँ, कोना? बता कने! पाइ लेल किछुओ क' सकै छी हम सभ। मंगतू : किछुओ क' सकै छे ने! त' आ, तोहों बनि जो हमरे जकाँ लूल्हि, लांगड़ .. फिर तोरो लग बरसतो पानिक बदला मे पाइ .. आ .. आ .. बना दियौ .. आबि जो .. (खूँखार हाव-भाव स' ओकरा दिस बढ़ैत अछि। दुनू बच्चा चिचियाइत अछि। बच्चा 1 ओकरा मार' लेल हाथ उठबैत अछि। फेर नीचा क' लेइत अछि। बच्चा - 3 बच्चा 2 के हाथ स' भूख लगबाक इशारा क' रहल अछि। बच्चा 1 ओकरा देखि लेइत अछि आ मंगतू पर उठाओल हाथ, जे नीचा आबि रहल छलै, ओकरा बच्चा 3 पर जमा देइत छै।) (अंधकार । प्रकाश। सोझा स' दु गोट पत्रकार युवक-युवती अबैत अछि। युवती जींस आ बॉडी टाइट टी शर्ट मे अछि। कटल केश, कंधा पर शांतिपुरी झोरा, गर्दनि मे पेन आ मोबाइल लटकल। युवक सेहो जींस आ खूब ढोल ठक्कल टी शर्ट मे अछि। कन्हा पर पोर्टफोलियो बैग, गर्दनि मे कैमरा, मुंह मे सिगरेट। सिगरेट पिबैत धुआँ छोड़ैत छै। धुआं युवती दिस पहुँचै छै। युवती हाथस' धुआं हटबैत तेज नजरि स' युवक के देखै छै।) युवक : सॉरी, सॉरी। की करू। सभ ठाँ त' नो स्मोकिंग जोन बना देने छै। दफ्तर, पार्क, होटल, अस्पताल - कतहु नञि पीबि सकै छी। युवती : त' नञि पियू। पानि नञि छै ने, जे मरि जाएब। युवक : पानि नञि प्राण अछि। अनका लेल अपन प्राण गमाएब हमरा मंजूर नञि । (गप्प करैत-करैत युवतीक दृष्टि मंगतू पर पड़ैत छै। ओ भीख लेल सिक्का निकालैत अछि। युवती रोकि देइत अछि।) युवती : ऊँहू! युवक : (मजाकिया स्वर मे) त' ई सिगरेटे द' अबै छियै। युवती : सभ समय मजाक नञि । युवक : तहन? युवती : ओकरा पर चलू एकटा स्टोरी करै छी। युवक : फेदा। युवती : ओ पढ़ल-लिखल छै। शारीरिक रूप स' नचार । पढ़ल छै, तैं भ' सकैछ जे भीख माँगब ओकरा पसीन नञि हुअए। मजबूरी मे.. युवक : कह' की चाहै छी अहाँ? युवती : कर' चाहै छी स्टोरी । युवक : व्हाट? (किछु सोचैत अछि) हँू .. फिजिकली इनेबल, मेंटली शार्प, लिटरेट .. काज कएल जा सकैय'। युवती : छपला स' जे पाइ भेटत, तकरा मे स' आधा एकरा द' दबै। ओकरो लागतै जे भीख स' अलग किछु ओकरा भेटलैय'। आत्मविश्र्वास बढ़तै ओकर। युवक : यदि हम फिल्म धरि सोची त'? 'अ हैंडीकैप्ट लिटरेट'..। नीक बनि गेल त' अवार्ड-तवार्ड सेहो.. (अवार्डक नाम पर युवतीक ऑखि चमकैत छै।) युवती : नॉट अ बैड आइडिया। (दुनू मंगतू लग पहूँचइत छथि।) युवक : रौं, नाम की छौ तोहर। (मंगतू चेहाक' ओकरा दिस देखै छै। किछु बोलबाक होइ छै, मुदा दोसरे पल मुंह बन्न आ चेहरा कठोर क' लेइत अछि।) युवती : अहीं स' पूछि रहल छी जे की नांव भेल। (मंगतू एखनो चुप अछि। मुदा ओकरा मे एकटा नाराजगी भरल उत्तेजना बढ़ि रहल अछि।) युवक : सुन! हम सभ तोरा पर किछु काज कर' चाहै छी। अई में तोहर सपोर्ट चाही। माने सहायता। युवती : अहाँक नाँव, गाम, ठेकान। अहिठाँ कोना पहुंचलहुँ.. (मंगतू एखनो दुनू दिस ताकिए रहल छै। युवक मे रोष पैदा होई छै। युवती स') युवक : ही इज डफर। एक्टिंग। नोइंग हिज इंपोर्टेंस। लेट्स मूव। युवती : बी पेशेंट। ही विल टॉक। (मंगतू स') भाई, कनेक अहाँक सहयोग चाही। अहीं पर हम सभ काज कर' चाहै छी। दुनिया के बताब' चाहै छी जे अहाँ के छी, कोना छी। लोक-आओरक धेयान खींच' चाहै छी- अहाँक गुण पर, जे अई हालति में रहियो क' अहाँ पढ़लौं। मंगतू : (अकस्मात) अहाँ के कोना बूझल? युवती : देखै छियै ने। अबैत-जाइत। अखबार पढ़ैत, लोक आओरक चिट्ठी पढ़ैत। मंगतू : (एकटा धार मे बहैत जकाँ) हुँ बहुत लोक छै, जे पढ़' नञि जानै छथि। हुनका गाम आओर स' चिट्ठी अबै छै। ओ सभ हमरा लग अबैत अछि। हम पढ़ि दै छियै। हमरा लिखहू अबैय'। हे, (बाम हाथ देखबैत) देखियौ। पहिने त' अच्छर खराब होई छल। आब कने ठीक भ' गेलै। मुदा, अहाँ कियै पूछि रहल छी ई सभ? युवक : कहलियौ ने रे जे तोरा पर एकटा स्टोरी करबाक अछि। मंगतू : ओहि स' हमरा फेदा? हमरा भीख माँग' से' छुट्टी भेंटि जाएत? कोनो काज भेंटत हमरा? अहाँ त' अपन काज बना लेब आ लाति मारि क' चलि देब। चिन्हबो नञि करब। युवती : एहेन गप्प नञि छै.. मंगतू : त' केहेन गप्प छै? सभ किओ अपना मतलब साध' लेल अबैत अछि। अहूँ आओरक मतलब अछि। नञि त' .. अहाँ दुनू त' रोजे ई बिल्डिंग मे अबै छी। लोक आओर त' एक नजर एम्हर मारियो लेइत अछि, अहाँ दुनू त' सेहो नञि .. युवती : एहेन किछु नञि छै। कहियो न कहियो, ककरो न ककरो नजरि त' पड़बे करै छै। अहाँ पर आई गेल आ हमर दुनूक गेल। भ' सकै छै जे हमर लेख पढ़ि क' किओ अहाँ स' भेंट कर' आबथु, गप्प करथु। भ' सकै छै, जे अहाँ के अपना जिनगीक कोनो राह भेंटि जाए। मंगतू : कोनो एहेन नञि आओत जे हमरा बाट देखाओत। हँ, भीखक चवन्नी -अठन्नी बीग' लेल अबस्से आबि जाएत। काज कोनो नञि देत। की करब अहाँ सभ जानि क' जे हम के छी, कत' स' आएल छी.. युवक : एना मोन हारला स' किछु भेटै छै की? (युवती दिस) ई कहबे केली ने जे भ' सकै छै, हमर स्टोरी पढ़ि क' किओ तोरा कोना काज-धन्धा देइये दै। अरे आसे पर त' ई दुनिया ठाढ़ छै। तों नञि बाजबें त'.. युवती : ईहो भ' सकै छै ने जे अहांक कथा पढ़ि-सुन क' दोसरो लोक आओर मे नव जिनगीक संचार हुअए। अहां त' उदाहरण भ' जाएब। प्रेरणा पुंज.. मंगतू : कहबाक गप छै ई सभ। नञि किओ आएत, नञि हमरा काज देत। हम अहिना भीख मँगैत, मँगतुआ कहबैत मरि जाएब- अही ठाँ, अही फुटपाथ पर। मुन्सीपाल्टीबला आओत, अपना गाड़ी मे ल' जा क' कतहु देह के ठेकान लगा देत.. भिखमंगे बनल मरि जाएब। (युवक स') कहू त', हमर कोन कसूर जे जनमते हम मोरी मे बिगा गेलहुँ। मात्र अही लेल ने जे हम नजायज छी। मुदा कहू जे छोट-छोट, भोला-भाला बच्चा सभ कोना क' नजायज भ' गेलै। (तेज नजरि स' युवती के देखै छै।) युवती : सही। कोनो नवजात नाजायज कोना भ' सकै छै? मंगतू : सएह त'। नजायज त' हुनकर संबंध भेलै ने। आ सेहो नजायज कियैक? बच्चा जनमाएब कोनो नजायज कर्म छिकै ? तहन त' हे, ई पूरा दुनिये नजायज अछि। समाजक रीति-नीति नञि मानू त' सभ किछु नजायज.. ई समाज हमरा भिखमंगा बना देलक, ई नजायज नञि भेलै? युवक : हूँ, बात मे दम छौ तोहर! मंगतू : (जेना अतीत मे।) हम एहेन नञि छलहुँ। एकदम पूरा देह छल हमर, अहीं आओरक माफिक - दू टा पएर, दू टा हाथ। तीर जकाँ भगैत छलहुँ, लट्टू जकाँ नचैत छलहुँ.. घिर्र.. (लट्टू जकाँ गोल-गोल घुमबाक प्रयास करैत अछि।) युवती : फेर? मंगतू : फेर की? (रिजर्व होइत) छोड़ू! की रखल छै ऊ सभ मोन पाड़ि क'। नञि त' ऊ दिन घूरत आ ने हमर हाथे-गोर। युवती : एना नञि बाजी। कहलहुँ ने हम जे हमर स्टोरी पढ़ि क' कोनो मातबरि, दयालु पहुँचि सकैत छथि अहाँक मदति लेल। भ' सकैछ, जे ओ अहाँक पएरे बनवा देथु। आइ-काल्हि खूब चलल छै ने जयपुरी लेग। देखैयो में एकदम असली लागै छै आ काजो एकदम असलीये जकाँ करै छै। युवक : तों त' पढ़ल छें। पढ़नेही ही हेबें एकरा मादे। मंगतू : (अही प्रवाह मे) हँ, सुधा चंद्रनक पएर जकाँ। युवक : एकदम सही। यदि किओ तोरो पएर एना बनबा देलकौ त' तोहों हमरे सभ नाहीत चलि-फिरि सकबें.. मुदा ई त' बता जे ई सभ भेलौं कोना। जन्मे स' एहेन नै छें एखने कहलें.. मंगतू : (बीच ही मे) पूरा छलहँु हम' एकदम अहीं सभ जकाँ। नान्हि टा छलहुँ छौंड़ा सभक संग खेलाए छलहुँ। अकास मे गुड्डी देखल हे.. ऊ.. बकाट्टा सभ गुड्डी लूट लेल पड़ाएल। हमहूँ पड़ेलौ.. भागलहुँ, भगैत गेलहुँ, भगैत गेलहुँ- होस छोड़िक'। नञि बूझ' में आएल जे सोझा स' बस.. (कनेक स्थिर भ' क') ई गणपत काका (केलावाला दिस इशारा करैत) छथि, सएह हमर माय-बाप बनि गेलाह। अस्पताल ल' गेलाह, जतेक भ' सकलै इलाज पानी करौलन्हि! युवती : आ अहाँक माय-बाप? मंगतू : दाइ, कियैक कटल पर नून बुरकै छी? अरे हम भेलहुँ हरामी, सुअरक औलाद! हमरा आओरक माय-बाप कोन? एतबे हिम्मति रहितियैक त' जनम के बाद हमरा मोरी मे त' नञि ध' देने रहितियैक'ने। आब त' गणपते कक्का हमरा लेल माय-बाप सभ छथि। युवक : चलू, जान त' बांचि गेलौ ने! मंगतू : (फेर भड़कैत) ई जान? ई जिनगी? अहाँ के चाही एहेन जिनगी? त' ल' लिय' ने! खुशी-खुशी द' देब। मुदा नञि । अहीं के कियैक, ककरो नञि चाहीं एहेन जिनगी। ई कटल-भांगल, लोथ, अपाहिज जिनगी। अरे साहब, कहब बहुत आसान छै। अपन जीह छै ने। युवती : कह' सुन' स' मोन हल्लुक भ' जाए छै। मंगतू : नेनपने स' भीख मांगब हमरा बड्ड अक्खजि बुझाइत छल। नेनपनि मे, जाधरि हाथ-गोर सही सलामति छल, एम्हर-ओम्हर काज क' क', टिकुली-ककही बेचि क', कप प्लेट धो-धो क' जिनगी बसर केलहुँ। सुनने छलियै जे काज कर' बला धिया-पुता लेल राति मे स्कूल चलै छै.. सोचने छलहँु जे नाम लिखा लेब। पढ़ि-लिखि जाएब त' कोनो छोट-मोट काज भेटि जाएत। मुदा.. ऊ गुड्डी अपने की बकाट्टा भेलै, हमर जिनगी के सेहो बकाट्टा क' देलकै। आनक आसरे भ' गेलहुँ हम। मांगि-चाँगि क', खेनाई! छिया-छिया, कतेक गर्हित कर्म छै ई। कएक बेर सोचल, जे नञि माँगब भीख- लग मे फेंकल पाई सेहो नञि उठबै छी। घिन अबैय'। मुदा, ई पापी पेट घिन स' बढ़ि क' भ' जाइए। युवक : नाम की भेलौ तोहर! मंगतू : नाम त' ओकर होई छै ने यौ बाबू, जकर माय-बाप रहै छै! रोडबला लोकक कोनो नाम होई छै.., जे-जे कह' लागल, सएह नाम भ' जाइत छै.. माँगि-चाँगि क' खेने सन्ते लोक आओर हमरा मंगतू कह' लागल। मंगतू स' मँगतुआ। (करूण हंसी) (मंगतूक गप्प युवक-युवती नोट-बुक मे नोट करैत रहैत छथि।) मंगतू : आओर साब, हम जहन.. युवक : (अचानक नोट बुक बंद करैत) अच्छा मंगतू, फेर होइत अछि भेंट-घाट। (युवती सेहो नोट-बुक बंद क' देइत अछि। मुदा ओकर आँखि मे अथाह प्रश्न व आश्चर्यक भाव छै। मंगतू हतवाक युवक दिस देखिते रहि जाइत अछि। ओ किछु बाजबाक प्रयास करैत अछि, मुदा ओ दुनू ओहिठाँ से उठि जाइत छथि। ओ दुनू मंच स' प्रस्थान करैत, मंच क' दोसर भाग स' पुन: अबै छथि, गप्प-सप्प करैत। प्रकाश ई दुनू पर । मंगतू फ्रीज अवस्था में..) युवती : बाप रौ बाप! कतेक सीरियसली गप्प करैत छलै। कतेक कन्सर्नं भ' क! संबंध नजायज होई छै, बच्चा नञि! ..कतेक आसानी स' हम सभ अपन भूलक चद्दरि दोसराक माथा ओढ़ा अबैत छी। आ, बना लेइत छी अपना के पाक-साफ। ई मंगतू, कतेक भाव भरल छै एकरा भीतर। कतेक नीक जकाँ सोचै छै। आ हम सभ पढुआ लोक, मात्र एकटा भीखमंगा बूझि ओकरा टालि जाइ छी। युवक : हे! बेसी भावुक नञि बनी। स्टोरी कर' आएल छी, ओकर जिनगीक रामनामी चद्दरि ओढ़' नञि। बूझि पड़ैत अछि, किछु बेसीए प्रभावित क' देलक ओ लुल्हबा। कोनो चक्कर-उक्कर त' शुरू नञि भ' रहल अछि.. एकदम फिल्मी स्टाइल मे। युवती : शटअप! अहाँ सभ के एकरा अलावे आओर सूझबे की करत? (दुनूक प्रस्थान। प्रकाश मंगतू पर। ऊ ई दुनू के जाएत देखैत छै, किछु.. किछु असंतुष्ट, किछु-किछु संतुष्ट।) मंगतू : चलि गेलाह! भरि पोखि गप्प भेबो नञि कएल आ.. (संतुष्टि क भाव स) तइयो पहिल बेर आई कोनो पढ़ल लिखल लोक स' गप भेल। मोन त' होइ छल जे बतियबिते रही। मुदा.. बीचहि मे.. भ' सकै छै, जतेक सूचना चाही, भेंटि गल हुअए.. तइयो.. जतबे गप्प भेल, नीक लागल.. हम त.. हमरा त' मोन होइते रहैत अछि जे हम एहेन-एहेन लोक सभ स' गप्प करी - देस, दुनिया, समाज आ अपना पर। (उल्लसित स्वर मे) गणपत कक्का! देखलहुँ अहाँ। ओ सभ हमरा स' गप्प केलाह। पत्रकार सभ.. पढुआ लोक सभ। आब जरूर हमर जिनगी बदलि जाएत। हमरा पएर भेटत, काज भेटत.. कतेक सोहाओन समय हेतै ओ.. (गणपत काका केराक चंगेरी उठौने ओकरा लग अबैत छै आ सभ' स' उतरल केरा ओकरा दै छै।) गणपत : ले, खो! मंगतू : काका.. हमर गप्प नञि सुनै छी ! गणपत : सभ सुनै छी। पत्रकार छथि। हुनका आओरक काजे छै दोसरा आओरक जिनगी बनेनाइ। (केरा देइत) ले, खतम क' ले त' हम जाइ.. मंगतू : कत? गणपत : घर! बेटी बाट तकैत होएत। सीधा-पानी ल' क' जेबै, तहने ने चूल्हि मे आंच पजरतै। मंगतू : (नमगर सांस लेइत) हँ, घर! अई ठाँ सभ के नीक-बेजाय, पैघ, छोट- अपन घर छै, परिवार छै, धिया-पुता छै, ओकरा आओर लेल ओकरा सभ के घुरबाक छै। पच्छिम दिस डूबैत घुरैत सुरूज जकाँ। आरामक ओसांसि लेल, परिवारक बीच अपन सुख-दुख बाँट' लेल। गणपत : (ओसांसि भरिक') हँ रौ, घर आ परिवार! टिनाक चदरा, पोलथीन स' छारल चार बित्ताक घर, जाहि मे ठामें-ठाम भूरि। सेहो चार-छओ मास पर मुंसीपाल्टीबला खसा दै छै। सभ बेर के तोड़ि-फोड़ि में पांच मे स' टीन टा चीज गायब भ' जाइ छै। बेटी जवान भ' गेल। लोक आओर घूरैत रहै छै, हम किछुओ नञि क' पबै छी। (उठि क' बिदा होइत अछि। प्रकाश ओकरा पाछां। एक कोन्टा मे माथ पर स' चंगेरी उतारबाक अभिनय। संगहि पार्श्र्व स' 'ऐ चमेली', गै छप्पन छुरी, कोम्हर जाइ छैं करेजाक छप्पन टुकड़ी क' के', 'एम्हर आ, एक्कहि राति मे रानी बना देबौ' 'ऐ, आती क्या खंडाला' सनक स्वर ।) .. बेटा जवान भ' गेल अछि। मुदा चारि टा पाइ कमेनाइ अपना इज्जत पर बट्टा बूझैत अछि। बेटा : (घुसैत) रौ बुढ़बा, भरि दिन सेठ जकाँ बइसल रहले कि किुछ बेचबो केलें। (नेपथ्य दिस मुंह क' क') किओ अछि? किछु छैहो खाए-पिय' लेल कि सभ ठुंसा देलही ई महाराजा के। (नेपथ्य दिस स' 18-19 वर्षक एकटा लड़की हाथ में थारी ल' क' अबैत अछि। एम्हर स' ऊ थारी ल' क' अबैत अछि आ दोसर दिस स' दू-तीन टा गुंडा सनक लोक अबैत अछि आ लड़की के अश्लील रूप स' घूरैत अछि। लड़की भाई के थारी देइत अछि। भाइ थारी देखिक' फेंक देइत अछि।) ई सूखल-टटाएल रोटी आ पानि जकाँ तीमन! ई खाएक छै? गुंडा 1 : रौ राजू! तोंहो कत' आबि जाइ छै मगजमारी कर' लेल। रौ मीता, चल हमरा संगे। तोरा तंदूरी चिकन खुएबौ। मुर्गीक टंगड़ी (बोतलक इशारा करैत) एकदम मेम चीज.. मोन खुस भ' जेतौ.. मुदा.. राजू : मुदा की? गुंडा 2 : किछु लेब' लेल किछु देब' पड़ै छै ने यार! राजु : हमरा लग अछिए की? ई बुढ़बा राखलए किछु हमरा लेल? गुंडा 3 : नगीना रौ नगीना। एकदम पटाखा छौ तोहर घर मे आ कहै छैं जे बुढ़ऊ किछु छोड़बे नञि केलकौ अछि? गुंडा 1 : एहेन मोट-ताज मुर्गी । कहियो हमरो टेस्ट करा यार! (निर्लज्ज हंसी। लड़की सुकुचाक' भीतर चलि जाइत अछि। गणपत खिसिया क' ओकरा दिस बढ़ैत अछि, मुदा बेटा बीचहि मे छेकि लेइत छै।) बेटा : हे हमर परम पूज्य पिताजी! कत' जा रहल छी अहाँ? ई सभ के छथि, बूझलए अहाँ के? .. ई सभ हमर दोस्त छथि आ हमरा तंदूरी मुर्गा खुआब' ल' जा रहल छथि। (चिचियाक') रौ बुढ़बा, ला, निकाल, जे छौ तोरा ल'ग। (जबर्दस्ती ओकर पाइ छीनैत छै। गणपत चिकरैत अछि। ओकर चिकराब सुनि लड़की भीतर स' अबैत अछि आ बाप के बचाब' लेल बाप दिस भगैत अछि। एक गुंडा ओकर गाल छुबि लेइत अछि, दोसर ओकर हाथ खींचिक' बाहर ल' जाइत अछि। ई देख गणपत पाइ छोड़ि बेटी के बचाब' भागैत अछि। बेटा पाछाँ स' एक लात ओकरा जमबैत अछि। गणपत मुंहक भरे खसैत अछि। बेटा समेत सभ कियो ठठाइत निकलि जाइत अछि। पार्श्र्व स' लड़कीक चिकरब आ गुंडा सभक अट्टाहास आ अश्लील प्रलाप सुनाइ दैत छै। तेज संगीत.. बेंजोक तेज ध्वनि हठात समाप्त होइत अछि। मंच पर घोर अंधकार आ सन्नाटा!) ------ दृश्य : 3 (प्रकाश मंगतू पर। ओ अखबार पढ़ि रहल अछि। पढ़ैत-पढ़ैत पसेने पसेने भ' जाइत अछि। ओ मुंह पोछैत, एम्हर-ओम्हर देखै छै.. फेर अटकि-अटकि क' पढ़ैत अछि..) मंगतू : नवयुवती के साथ बलात्‌.. चार युवक.. नशे में.. भाई भी.. दो गिफ्तार.. दो अभी भी फरार.. (पसेना पोछैत अछि। हकला क' घबड़ाहटि मे बजैत अछि) माने.. काल्हि.. कविता.. गणपत कक्का.. राजू.. (माथ पकड़ि लेइत अछि) बहीनक रखवार अपने स' ओकरा परोसि देलकै गिद्घक सोझा.. (चिकरैत अछि) .. कक्का, गणपत कक्का.. (आवाज सुनि किछु छात्र, किछु यात्री ओम्हर अबैत अछि सभ पूछैत अछि -- की भेलौ रौ? सपना देखै छही की? दिने मे सपना.. हँ, एकरा करैये के की छै? चौबीसो घंटा, आठो पहर सूतल रहौ,.. हमरा आओर जकाँ नञि छै ने.. छिछियाइत फिरू।) (मंगतू कानि रहलए। कखनो अखबार स' माथ पीटैत अछि, कखनो बेबसी मे अपन केस नोचैत अछि।) मरियो नञि जाइ छी हम। एहेन देह, एहेन जिनगी, एहेन समाज.. मरि कियै नञि जाइ छी हम। रे दैब.. आह रे दैब! कक्का यौ, गणपत कक्का..? (भीड़ के काटैत गणपत बहिराइत अछि। मंगतू ओकरा देखतही भरि पांज ध' लेइत अछि आ कनैत अछि। कक्का पीठ-माथ सोहरबैत ओकरा भरोस दियबैत अछि।) मंगतू : कक्का.. काल्हि.. काल्हि.. गणपत : की भेलौ बेटा? मंगतू : कक्का.. कविता.. काल्हि.. गणपत : कत्त' घुरलौ बाऊ। दुनू मे स' किओ नञि। आँखिए मे राति कटलए। मंगतू : कविता आब नञि आओत कक्का.. (गणपत प्रश्नवाची दृष्टि स' ओकरा देखैत अछि.. मंगतू अखबार ओकरा दिस बढ़ा देइत छै। गणपत अनपढ़क मुद्रा मे अखबार उनटैत-पुनटैत अछि.. एकटा यात्री अखबार ल' क' पढ़ैत अछि.. खबरि सुनि गणपत थहराक' खसैत अछि.. मंगतू फेर भरि पाँजि ओकरा ध' लइत अछि।) गणपत : (विक्षिप्त जकाँ) रौ दैब रौ दैब.. मौगत द' दे रो दैब.. आब हम जीबि क' की करब.. (मंगतू के झोरि क') कहै छले ने तों जे हम सभ घर-दुआर, बाल-बच्चेदार, परिवारबला आदमी सभ छी। देख लेले नें? ईहे अछि घर आ ईहे अछि धिया-पुता। गै कविता गै.. हमर सोन सन बेटी गै.. रौ रजुआ.. रौ तोरा नरको मे ठौर नञि भेटतौ रौ.. (पुलिसक सायरन बजै छै.. सभ यात्री ओत' स' हटि क' बस स्टैंड लग ठाढ़ भ' जाइत अछि। किओ घड़ी देखैत अछि, किओ मोबाइल करैत अछि, किओ चोर नजरि स' मंगतू-गणपत दिस देखैत अछि, किओ अखबार स' पंखा करैत अछि.. छात्रक एक गोट टोली मे खुसर-फुसर करैत अछि।) (पहिला दृश्यबला पुलिस अबैत अछि.. डंडा डोलबैत..) पुलिस : रौ, गणपत तोंही छें? गणपत : जी हुजूर। पुलिस : चल थाना.. गणपत : हमर कसूर हुज़ूर। पुलिस सार नहिंतन! बेटी स' धंधा आ बेटा स' भड़ुआगिरी, आ पूछै छें.. चल थाना.. पता चलतौ जे की छौ तोहर कसूर.. (पकड़ि क' ठेलैत- ठालैत ल' जाइत अछि।) मंगतू : साब! साब, हिनका छोड़ि देल जाओ। ई निर्दोख छथि। पुलिस : (मंगतू के लात लगबैत) त' तोंही चल। रौ डाँड़ मे छौ बूता छौंड़ी सभ लेल! हट सार! (मंगतू फेर बीच-बचावक प्रयास करैत अछि। पुलिस डंडा बरसाबइत ओकरा ठेलि देइत अछि। मंगतू मुंहक भरे खसल रहि जाइत अछि। पुलिस गणपत काका के पकड़ि क' ल' जाइत अछि। यात्री, जाहि मे किछु छात्र सभ सेहो छथि, बिटर-बिटर तकैत रहैत छथि। पुलिस के गेलाक बाद) यात्री 1 : बाप रौ बाप! एहेन कलजुग! बापे बेटीबेच्चा। यात्री 2 : अहूँ त'! जे पुलिसबाला कहि देलकै, पतिया लेलहुँ ने! यात्री 3 : पुलिसक बात आ चूल्हिक पाद एक सन! छात्र 1 : एतेक घमर्थन क' रहल छी। जहन पुलिस बुढ़बा के पकड़ि क' ल' गेलै, एकरा (मंगतू दिस) एतेक मारलकै, तहन त' नञि फ़ूटल बकार॥ पुलिस के जाइते देरी कि सभक लोल एक-एक हाथ नमगर भ' गेलै। यात्री 1 : रौ, पुलिसक सोझा बाजक कोनो मतलब छै। छात्र 2 : त' एखनि बाजबाक कोन अर्थ? यात्री 2 : हे रौ, बूझल जे हम सभ किछु नञि बाजल। तों सभ त' छलें, युवा शक्ति, छात्र शक्ति! तोहें सभ कियैक ने बाजलें रे! यात्री 1 : (मंगतू दिस) हम सभ त' बाउ रौ, जिनगीक दोग मे फँसल बूँट छी। सेठ साहूकार कैंचीक मध्य फँसल कापड़ि। पुलिस-दारोगा करबाक समय कत'? छात्र 2 : जहन अपना पर आओत तहन? यात्री 3 : तहन देखल जेतै। छात्र 3 : माने अपना पर पड़ल मोसीबत पहाड़, आ आनक फूसि-फासि? यात्री 1 : तैं ने कहलियौ रौ भाय जे तों आओर त' छें छुट्टा बरदि। ने घर गिरस्थीक चक्करि ने नौकरी पातीक झंझटि, ने बाल-बच्चाक पिरसानी। ऊपर स' नेता बनबाक मोका फ्री-फंड मे। (बस देखैत.. हे हमर बस आबि गेल' कहैत चढ़बाक अभिनय करैत अछि। चढ़ि गेलाक बाद सोर पारिक' छात्र के कहैत अछि -) रौ, मोन राखिहें हमर गप्प। की ठेकान, छात्र नेता स' मुख्य मंत्री आ फेर केंद्रीय मंत्री भ' जेबें। घरोवालीक निस्तार भ' जेतौ। हे ले (पाइ फेंकैत अछि..) ऊ भिखमंगाक दबाई करबा दिहें। (छात्र सभ तमतमाएल ठाढ रहैत छथि, अन्य यात्री सभी हंसैत अछि। किओ ठहाका पारि क', किओ मुंह तोपिक! किओ मुसिकियाइत पेपर पढ़बाक त' किओ समय देखबाक अभिनय करैत अछि। सभक बस एकाएकी अबैत छै, सभ ओहि मे सवार भ' भ' चलि जाइत अछि। जाए स' पहिले सभ किओ चवन्नी, अठन्नी, सिक्का मंगतू दिस फेंकैत अछि आ छात्र आओर के इलाज क तगेदा करैत अछि।) छात्र 1 : ओह! रहब मोश्किल भ' रहल छै! मोन उजबुजाइय ई सभ देखि क'। छात्र 2 : सपना देखै छी, देखैत रहै छी। कहियो किओ सपना देखल त' आइ देश आजाद भेल। आजाद देश लेल सपना देखल जे सभके जीबाक, रहबाक, काज करबाक समान अधिकार अछि। किओ भूखल-पियासल, बेरोजगार नञि रहत। पढ़ाई रोटीए जकाँ अनिवार्य रहतै। मुदा भेटलै की? आजादीक एतेक बरखक बादो वएह भूख, गरीबी, बेरोजगारी.. छात्रा 1 : भ्रष्टाचार, बेईमानी, सत्ताक अपराधीकरण। जिनगी जीबाक विवश्ता.. मंगतू : (कने जोरगर आवाज मे, जाहि स' छात्र सभ सुन सकथि।) रौ हाथ-गोर रहितहु कियैक एना बाजि रहल छें। (छात्रक ध्यान ओकरा दिस जाइत छै। ओ सभ ओकरा ल'ग अबैत अछि) छात्र 1 : भाई, हाथे-गोर रहला स' समस्याक समाधान नञि भ' जाइ छै। छात्र 2 : सभ ठाँ पाई चाही, पैरवी चाही। देख भाई, लोक आओर हमरा सभ के कहै छथि जे हम सभ युवा शक्ति छी, देशक भविष्य छी। छात्र 3 : रौ, वास्तविकता त' अछि जे हमरा आओर के अपने नञि बूझल अछि अपन भविष्य। छात्र 1 : माय-बाप सपना काढ़ै छथि जे बेटा सभ पढ़ि-लिख क' हमर दुख दूर करत। छात्र 2 : हम सभ त' हुनकर दुखक भीजल चिपरी मे चिनगी लगाक' आबि जाई छी, रसे-रसे सुनगैइत रहू। छात्र 3 : करैत रहै छी - अपन अरमानक खून, माय-बापक सपनाक हत्या। रौ, तों त' खाली देहे स' अपाहिज छें। ई व्यवस्थाक हाथे हम सभ त' तन-मन दुनू स' अपाहिज छी। मंगतू : मुदा भाई, ई व्यवस्था की छै। ककर छै, के बदलत? छात्र 1 : (रोब स') हे, नेता जुनि बन। दू अच्छर अखबार पढ़िक' अपना के प्रधानमंत्री नञि बूझ। (पहिलुका पत्रकार युवक-युवतीक प्रवेश) युवक : अरे वाह, आई त' एकरा लग छात्र सभ सेहो अछि। गुड। चलू, एकरो आओर के कवर क' लेइत छी। युवती : हम त' आइ काल्हि रोजे देखै छी, किओ न किओ एकरा लग बनले रहैत छै। युवक : ई छैहे तेहेन कमालक चीज। हाथ नञि, पएर नञि, घर-परिवार नञि, शिक्षा-संस्कार नञि । तइयो पढुआ छै, अखबार पढ़ै छै। चिट्टी-पत्री लिखै-पढ़ै छै। (दुनू सटि क' ओकरा आओरक गप्प सुनैत छथि। छात्र सभ मंगतू लग स' हटि क' बस स्टॉप दिस बढ़ैत छथि।) छात्र 1 : कह' लेल जे कही। भने ओकरा झलकारि दही। हमर गप्प मे सेहो तों सभ दर्शन ताक' लाग। मुदा, कखनो लगैत अछि जे एकरे जकाँ हम आओर सेहो भेल जाइ छी। लोक आओर भेल जाइत अछि, देश-दुनिया बनल जाइत अछि। छात्र 2 : रौ बाप, हे, पहिनहीं परीक्षा खराब भ' गेल अछि। आब ई दर्शन-तरसन छाँटि क' माथ नञि खराब कर। छात्र 1 : सुन त'! एकरा देखिक' तोरा नञि बुझाइ छौ जे एकर देह-देह नञि, ई समाज आ ओकर व्यवस्था छै। ई समाज, ई व्यवस्थाक माथ छै, माथ मे दिमागो छै, जे सोचैत त' छै, मुदा किुछ करै नञि छै। करबाक लेल सक्रियताक हाथ-गोर चाही, जे एकरे जकाँ ओकरो नञि छै। तैं एकरे जकाँ पड़ल रहै छै - लोथ भेल। छात्र 3 : (छात्र 2 आ 3 माथ ठोकैत छथि।) गेलौ रौ गेलौ। पूरमपूर गलौ। आब ई हमरा आओर के त' पकेबे करतौ, तोरो आओर के नञि छोड़तौ। (युवक-युवती के देख) नीक भेल। आबि गेलहुँ। सुनू आब अरस्तूक गप्प। (दुनू तेजी स' निकलि जाइत अछि। छात्र 1 ओही ठाँ अछि।) युवक : देखू! पत्रकार छी हम आओर आ पत्रकार जकाँ बतियाइत छथि ई आओर। युवती : हमरा आओर त' छात्र सभक संगे ओकरा कवर कर' चाहै छलहुँ। युवक : से त' रहिए गेल। युवती : ई एकटा अछि ने! एकरे कवर क' लेइत छी। युवक : (चिढ़िक') त' निकालू साड़ी आ क' लिय' कवर। युवती : शटअप! फालतू गप्प नञि करी। हमर संग साथ नञि नीक लगैत अछि त' अहाँ जा सकै छी। हम अपन काज क' लेब। युवक : ककरा संगे? ऊ लोथक संगे की ई देशक भविष्यक संगे। युवती : (चिकरैत) बंद करू ई बकवास। अहाँ जर्नलिस्ट छी। बूझै छी जर्नलिस्टक माने? (ओही उत्तेजना मे) जर्नलिस्ट माने उन्नत विचारक स्वामी, खुलल दिल आ दिमागवाला व्यक्ति, जनताक विचार वहन कर' बला, व्यवस्थाक छेद मे आंगुर द' क' देखाब' बाला। मुदा अहाँ त' ईर्ष्या आ द्वेष स' जरैत संठी छी मात्र। दुर्गंध स' भरल तौला। दुनियाक चौथा आवाजक नाम पर भड़ुआगिरी कर' बला। छि:। (युवक नाराज भ' क' यवती दिस घूरैत अछि। युवतीक चिकरब सुनि बाहर गेल दुनू छात्र घूरि अबैत अछि। छात्र 1 पहिनही स' अकबकाएल बेरी-बेरी स' दुनू युवक-युवती के देखैत अछि। युवक-युवतीक हाथ घीचि क' मंच क दहिना भाग मे ल' जाइत अछि। छात्र सभ मंचक बाम दिस छथि आ मंगतू बीच मे। मंच पर अत्यन्त मद्घम प्रकाश। अचानक युवक-युवती पर हाथ उठबैत छै। सभ चौंकि उठैत अछि। युवती खसल अछि। मंगतू हड़बड़ाक' ओम्हर बढ़बाक प्रयास करैत अछि, मुदा खसि पड़ैत अछि। छात्र सभ युवकक चेहरा देखि ओहि ठाँ थकमकाएल रहि जाइत छथि। पार्श्र्व स' समवेत स्वर में ईको साउन्ड इफेक्ट मे ई पंक्ति चलैत अछि।) किओ किछु नञि क' सकैत अछि। किओ किछु नञि कहि सकैत अछि। बिकाएल बजार मे मानवताक मूल्य बंधक अछि माथ हाथ गोर भांगल, धड़ शिथिल जागू, जागू, तखने होएत विहान नव सूरज रचत इतिहासक नव काल खंड। (प्रकाश शनै: शनै: फेडआउट होइत अछि।) (मध्यांतर) अंक : 2 दृश्य : 1 (बाजारक दृश्य। फेरीबाला रूमाल, टिकुली, सेब, नारंगी, खिलौना सभ बेचबाक आवाज नेपथ्य स' - 'ऐ बच्चा के खेलौना, साढ़े बीस रूपैया, दौग-दौग क' ले, जाऊ, दीदी, काकी, भैया,' खसि गेल खसि गेल, पेंटक दाम खसि गेल', हरेक माल 30 रूपैया, 30 रूपैया, 30 रूपैया' आदि।) (प्रकाश शनै-शनै: मंगतू पर केन्द्रित होइत अछि।) मंगतू : ओह, ई हल्ला-गुल्ला! ई भीड़, ई धक्का-धुक्की!.. नीक लागै छै। जिनगी चलि रहल छै अई सभ मे.. ई जगह.. बरगदक नाहित.. हमरा सन-सन कतेक लोकक आसरा.. कखनो, कखनो त' हम सड़क पर नजरि जमा देइत छी.. ओह खाली पएरे-पैर.. दौगैत-भगैत गोरे-गोर.. कनेक ओकरा स' ऊपर त' दायाँ-बाम डोलैत हाथ.. कनेक ओकरा स' ऊपर त' माथे-माथ.. कारी-कारी केस, स्त्रीक माथ, पुरूषक माथ.. सभक लक्ष्य अपना-अपना गंतव्य धरि पहुँचबाक, रहि जाइ छी त' हमी - लोथ, नांगरि., लूल्हि.. अही के अही ठां.. लोक आओर कहैत रहैत अछि जे हम बड्ड भगमंता छी.. बइसल-बइसल पाइ भेंटि जाइत अछि.. कोना क' हम बुझाबी जे हमरा भीख नञि, काज चाही काज। .. (शून्य मे चिकरि क') रौ, हम भगमंता छी त' तोहो सभ कियैक ने बनि जाइ छें हमरे जकाँ भगमंता.. (विक्षिप्त जकां हंसैत अछि) .. अरे, सभ हमरे जकाँ बनि जाएत, त' फेर कमाएत के.. हमरा आओर पर भीखक नजरि आ चवन्नी, अठन्नी फेंकत के? .. हं, बूझल। ई सभ चलैत रहौक, तकरा लेल साबुत लोकक भेनाई जरूरी छै.. आ ओ सभ पुण्य कमाबैथि, तकरा लेल हमरा आओरक रहनाई सेहो .. (मंगतू जहन ई बाजि रहलए, दू-तीन टा हिज़ड़ा ओम्हर अबैत अछि। सभक नजरि मंगतू लग छिड़ियाएल पाई पर छै। सभक के आँखि मे लालच छै।) हिजड़ा 1 : की राजा! की भेलौ रौ? सूखल गरी जकाँ मुंह कियै बनेने छें? अरे हाय, हाय, तोरा देखि क' हमरा त' किछु किछु होबैत अछि (गबैत अछि) 'क्या करूँ हाय, कुछ-कुछ होता है।' मंगतू : (अपनही धुन मे) धिया-पुता सभ स्कूल-बैग ल' क' स्कूल जाइत अछि.. कतेक नीक लगै छै.. हम नान्हि टा स' जवान भ' गेलहुँ, मुदा स्कूलक मुंह.. हिजरा 2 : त' की भेलौ रौ राजा। अपना ओहिठां बहुत रास लोक स्कूलक मुंह देखने बेगर मरि जाइत अछि। हमरे आओर के देख। मुदा फ़िकिर नईं। हमरा आओर खुशो छी आ हे देख, तोरा लेल गीतो गाबि रहल छी।.. (गबैत अछि) ''सैंया दिल में आना रे, आके फिर ना जाना रे, हो आके फिर ना जाना रे, छम-छमा-छम-छम!''(अथवा कोनो आधुनिक गीत)़ मंगतू : हमहू कहियो ई चाकर-चिक्कन रोड पर चलि सकब! बस- ट्रेन में चढ़ि सकब। अपना कमाई स' बसक टिकट कीनि सकब! .. भ' सकै छै.. कोनो मददगार आबि क'.. मुदा, की भेटत कोनो एहेन। हिजड़ा 3 : चल रौ, हम बनि जाइ छियौ तोहर खुदाई खिदमतगार। चल, चल, हम सभ तोरा ल' क' सनीमा जेबौ, चाट-पकौड़ी खुएबौ (गबैत अछि) ''चौपाटी जाएंगा, भेलपुरी खाएगा, पीछा न छोड़ेंगा हम, गाना बजाना, खाना-पीना, गाड़ी में होंगा सनम।'' (सभ मिलिक' मंगतू के झोरैत अछि। मंगतूक धेयान टूटैत छै।) हि. 1 : की रौ हीरो। एना अभिषेक बच्चन जकाँ मुंह कियैक लटकौने छे? हि. 2 : रौ, तों कोनो भीख थोड़बे मांगै छें। तोरा देखितही मातर लोक आओरक' हाथ अपने आपे अपन पॉकिट दिस बढ़ि जाइ छै। हि. 3 : हमरा आओर स' नीके छें रे। देख, तोहर हाथ-गोर नञि छौ, तइयो तों आदमी कहबैत छें - आदमी, मरद। हमरा आओर के अछि ई चारू हाथ-गोर! तइयो एक गोट पहिचान नञि अछि। तैं (ताली बजबैत अछि) कहबैत छी। हि. 1 : सिगनले-सिगनले, रोडे-रोडे भीख मंगैत फिरै छी। हमरा आओर के देखितही बाबू-मेम सभ सीसा चढ़ा लेइत छथि गाड़ीक। मंगतू : मुदा हमरा भीख नञि चाही। हमरा काज चाही। हि. 2 : (हंसैत) से तोरा भेंटतौ नञि! कह, त' स्टाम पेपर पर लिखि क' द' दियौ। (गबैत अछि) 'कोरे कागज पे मुझसे करा ले सही।' 'अरे हमर चिक्कन-चुनमुन राजा, हमर छैला, ई सनी देओल जकाँ डकरै स' तोरा काज भेंट जेतौ। भेंटल हमरा आओर के ? तोहर त' हाथ-गोर नञि छौ, हम्मर त' अछि। मुदा दोकानदार बाजल - रौ बाप रौ बाप! हे पानि मे आगि लगाब' लेल हमही भेटलियौ रौ? तोरा देखि क' त' गँहकी पराइए जेतौ। फेर बिक्री-बट्टाक की हएत। हि. 1 : हम ऑफिस-ऑफिस केहुरिया काटल। सभक एक्के टेर- पढ़ल-लिखल छें? डिग्री छौ? हि. 2 : सोचल, अपने कोना धंधा-पानी आरंभ करी त' -पूँजीए नञि (करूण हंसी) घर मे मुर्गी नञि, कीने चलल मसल्ला। हि. 1 : एखनि नीक भ' गेल अछि। रबि क रबि सभ दोकान पर रेट फिक्स अछि- एक रूपैया फी दोकान। (हंसैत अछि) फ़ी रूपैया, फ़ी दोकान, फ़ी छक्का । रौ, तोरा त' अठन्नी, रूपैया दू रुपैया डेली भेटै हेतौक। हमरा आओर के त' एक रूपैया फी हफ्ता, फी छक्का। देख, सभ किछु अछि - हाथ गोर, नाक-आँख, मूड़ी, दिमाग। हि. 2 : मुदा सभ किछु रहितहु किछु नञि छी हम सभ.. ने मनुक्ख, ने कुकुर। हि. 1 : बस एक रूपैया फी हफ्ता, फी छक्का (गबैत नचैत अछि। शेष दुनू ओकरा संगति देइत अछि) एक रूपैया मे.. एक रूपैया मे, पूड़ी खाऊं, जिलेबी खाऊं, नरेटी फाड़ि क' तान लगाऊ.. एक रूपैया मे। (नचैत गबैत ओ सभ मंगतूक माथ, बाल, मुंह छुबैत अछि, चूमैत अछि, नाच' लेल उठाबैत अछि। मंगतू सेहो प्रयास करैत अछि। पार्श्र्व स' नृत्य प्रधान संगीत तेज होइत अछि.. नाचबाक प्रयास करैत-करैत मंगतू खसि पड़ैत अछि। सांस सामान्य भेला पर।) मंगतू : हँ रौ, सही कहै छें तो सभ। अई ठाँ त' लोक-आओर अठन्नी - टाका, में पुण्य कीनैत छथि त' अपना आओर के काज द' क' किओ अपन पांच सौ, सात सौक खारा कियैक करत? लोक आओर त' इएह बूझैत छथि ने जे लोथ, लूल्हि-नांगड़ि. कोन काजक? तोरा आओर स्त्री-पुरूष नञि भेलें त' समाज मे तोहर गिनतीयो नञि! अरे किओ पूछल हमरा आओर स' जे हम सभ.. हम सभ की सभ क' सकै छी। अरे, किओ करबा के त' देखौ जे हम सभ की नञि क' सकै छी! हि. 2 : (हंसैत आ थपड़ी पीटैत) की सभ क' सकै छें रे? साला, दगेबाज, हमरा संगे प्रेम बना सकै छें! रौ सार.. (चिढ़बैत अछि। मंगतू पहिने खिसियाइत अछि, फेर हंसि पड़ैत अछि।) मंगतू : बनेबौ रौ, बनेबौ, मुदा पहिने अखबार त' पढ़' दें। भिन्सर स' नञि भेटल। नञि त' रामआसरे भाइ आ नहिए किसुनदेवे भाइ आइ अखबार देलैन्हि.. चली, अपनही स' ल' आनी। भ' सकै छथि, जे बेसी काज हुअए हुनका आओर के.. (मंगतू अखबारक औफ़िसक प्रवेश द्वार धरि अपना के ल' जाइत अछि। द्वार पर किसुनदेव आ रामआसरे अति सावधानक मुद्रा मे ठाढ़ छथि।) किसुन. : आई सीएमडी साहेब आब' बला छथि। राम. : हँ, तैं देखहक नें, सभकिछु कतेक चकाचक छै.. फिट-फाट.. फस्ट किलास। किसुन. : आई त' सभ स्टाफ सेहो आएल अछि। कोनो गैरहाजिर नञि । राम. : सुनल जे आइ सीएमडी साहेब सभ' स' भेंट करताह। मीटिंग करताह। किसुन . : तहन त' अपनो सभ स' भेंट करताह! राम. : भ' सकैत अछि। किसुन : एहेन हेतै त' हम पलखति निकालि क' हुनका पएर छुबि कहबै, जे साहब.. हमरा कनकिरबा के कोनो नोकरी.. राम. : सपना जुनि देख.. ई एतेक बड़का लोक सभ.. अर्जी दइयो देबही त' अई हाथ मे लेथुन्ह आ ओहि हाथ स'.. (अही बीच युवक आ युवती पत्रकार अबैत छथि। दरबानक मुंह पर पहिचानक मुस्की अबैत छै। दुनू ओहि दुनू के नमस्कार करैत छथि।) युवक : (भीतर जाइत) रामआसरे! की बात? वर्दी एकदम कलफदार। मूँछो-एकदम कड़क। मूछो के कलफ लगा देलही की? राम. : (लजाइत) ऊ साहेब, आइ.. ऊ.. सीएमडी साहेब.. युवक : ओ हो.. तोरा संगे हुनकर मीटिंग छौ की? बढ़िया, बहुत बढ़िया (दर्शक दिस) देख रहल छी ने प्रशासन के। ओ तखने चुस्त-दुरूस्त नजरि अबैत अछि, जहन ओकर माय-बाप सभ अबैत अछि.. वरना.. (रामआसरेक एक दिसक मोछ के नीचा क' देइत अछि आ भीतर चलि जाइत अछि। ओकरा गेलाक बाद रामआसरे अपन मोछ पूर्ववत करैत अछि।) (मंगतू ताबैत द्वार धरि पहुँचि जाइत अछि। दुनू दरबान के देखि क' मुस्काइत अछि। मुदा दुनू ओकरा दिस ध्यान नञि द' क' मुस्तैदी स' अपन ड्यूटी क' रहल अछि। मंगतू अपन एकलौता हाथ स' सलाम ठोकैत अछि।) मंगतू : रामआसरे भाई? किसुनदेव भाई? आई त' बड्ड जोरदार लगि रहल छी दुनू। (दुनू कोनो जवाब नञि देइत छथि) मंगतू : बेरहटिया भ' गेलै.. अखबार नञि भेटल.. मोन बेचैन भेल अछि.. आ रामआसरे भाई.. कहियो हमरो ई ओफिस भीतर स' घुमा दिय' ने। सुनै छी, बड्ड मोडन ओफिस छै.. कम्पूटर, त' की त' की सभ छै। अच्छा, अहीं सभक पुन्न परताप से पढ़ब सीखि गेलहुँ त' अहींक किरपे कोनो दिन ओफीसो.. (तखने गेट पर हलचल होइत अछि। 'साब आ गए'। 'हटो, हटो, रास्ता छोड़ो' आदि स्वर उभरैत अछि। सिक्यूरिटी अटेंशनक मुद्रा मे आबि जाइत अछि। रामआसरे आ किसुनदेव दुनू मंगतू के देखैत छथि, फेर पलखतिये मे दुनू मे जेना कोनो करार होइत अछि आ दोसरे पल मे दुनू मंगतू के घीचि क' गेट स' दूर ल' जाक' पटकि देत छथि आ झब स' अपना स्थान पर आबि क' ठाढ़ भ' जाइत छथि। एक गोट सूटेड-बूटेड साहेब कएक टा अधिकारी सभस' घेराएल अबैत छथि आ भीतर चलि जाइत छथि। दुनू हुनका खूब चुस्त, मुदा नमगर सलाम ठोकैत छथि। सीएमडी आ बाकी लोकके भीतर गेलाक बाद।) राम. : यार किसुनदेव! ई नीक नञि भेलै। किसु. : त' कइए की सकैत छलहुँ? सीएमडी साहेब आब' बला छलाह। ऐहेन स्थिति मे हम सभ एकटा लोथ.. नांगड़ि भिखमंगा स' गपियाइत रहितहँु त'.. अपन नोकरी त' सोझे.. राम : तइयो.. आराम स' ल' जा सकै छलियै.. एना बोरा जकाँ पटकि देलियै.. की जान' चोटो-तोटो लागल हेतै.. किसुन : चल, चल देखि लेइत छियै.. राम. : नराज हेतैक ओ.. किसुन : अरे अखबार ल' क' चलै छी। ओकर नराजगी दूर भ' जेतै.. अखबार त' ओकरा लेल चरसो-गाँजा स' बढ़िक छै.. राम : पढ़ियो कतेक जल्दी लइत छै। पढ़ै की छै, घोखि जाइ छै, (गर्व स') हमही त' सिखेलियै ओकरा, अहिना एक दिन आएल छल आ बाजल छल.. हमरो अखबार पढ़ाएब सीखा दिय' ने भाई जी। हम मजाक केलियै -'की रौ, पढ़ि क' की बनबें? शिक्षा मंत्री? ओ बाजल, मंत्री बन' लेल पढ़ब जरूरी थोड़बे छै। राम. : मंगतूक ई प्रश्न हमरा छुबि गेल। बड़का-बड़का लोक सभक धिया-पुता के पढ़ब नीक नयि लागे छै.. माय-बाप ओकर पढ़ाईक पाछा पागल बनल रहैत अछि आ धिया-पुता सभ हुनकर मंह पर पों-पों पदैत रहैत छथि.. आ ई एकटा लोथ.. भिखमंगा.. हम तय केलहुँ जे एकरा ओतेक त' पढ़ाइए देबै जे ई पेपर - तेपर पढ़ि सकय.. ई अ, ज आकारा जा.. ह उूकार हि.. आ आखर-आखर करैत ओ पढ़ब सीखि गेलै। आ आब त' ओ जतेक तेजी स' पढ़ैत अछि कि ओतेक तेजी से पढुओ सभ नञि पढ़ि सकत। किसुन : हिन्दी छै ने! तैं जीभ के लकबा मारि जाइ छै.. एना-एना मुंह बनाओत कि लागत जे कोनो लाटक नाती आबि गेल अछि बिलायत से। राम : कंपूटरो स' तेज ओकर दिमाग छै.. सभ किछु जेना जीहे पर राखल रहैत छै.. जेना कंपूटरक, की कहै छै... ऊ, मेमोरी में.. किसुन : अरे रामआसरे भाइ, ई मोरी तो सुने थे.. नाली। ई मेमोरी की छै? मोरीक बहीन की? राम : ननदि छै। रौ मेमोरी नञि बूझै छें.. कंपूटरक दिमाग। मुदा मंगतूआक दिमाग त' कंपूटरोक दिमाग स' बेसी तेज छै। एकदम फास्ट.. रौ, कंपूटर मे त' देख' लेल ओकरा पहिने फोलू, फ़ेर फाइल त' की दनि, कहाँ दनि फोलू.. तहनो सेभ माने दिमाग बचा क' राखने छी त' भेटत, नञि त'.. हवा.. लें सार.. गेल सभ.. आ जदि कोनो बेरामी घुसि गेल, तहन त' पूरे गुड्डी बकट्टा.. किसुन : अरे, ठीक इएह गप्प हमर साहेब कहै छथि। आ सएह सच्छात विराजमान छै मंगतुआक खोपड़ी में। ऊँहूँ, गलति बाजि गेलहुँ, ओकर मेमोरी त' ई कंपूटरोक मेमोरी स' फास्ट चलै छै। चालू कि बन्द करबाक झंझटि स' फ्री। कोनो घटनाक दिन, समय, साल, कारण पूछू, तत्काल हाजिर। पोलटिस पर पूछू कि सनीमा पर कि टीवी पर की मौगी सभक नवरंगा डरेस पर की ठोर पालिस पर। सभ कंठस्थ, हनुमान चलीसा जकाँ। भूत-पिचास निकट नहिं आबै.. राम : अरे, शुरू-शुरू मे लोक आओर बड्ड हैरान होइत छलै ओकरा अखबार पढ़ैत देखि क'। किओ-किओ त' मुंहो बिचकबैत छल जे एह, भेल भिखमंगा आ शान प्रधानमंत्री के। किसुन : ओकरा आओर के बुझले नञि छै ने जे मंत्री सभ अखबार नञि पढ़ै छथि.. पढ़ताह कोना.. फुर्सतिये कत' छै.. जन-सेवा स' (जनसेवा पर स्वर मे व्यंगात्मक जो।) (तखने पार्श्र्व स' तेज गति स' चलबाक ध्वनि अबैत छै। दुनू पुन: अटेंशनक मुद्रा मे आबि जाइत छथि। सीएमडी निकलैत छथि। दुनू खूब नमगर सलाम हुनका ठोकैत छथि। हुनका जाइते देर कि सभ किओ फक स' साँस छोड़ैत छथि आ फेर सभ-किछु ढील-ढाल भ' जाइत छै। रामआसरे आ किसुनदेव अपन वर्दीक कलफ ढीला करैत छथि, मोछो नीचा करै छथि।) राम : देखलही। साहेब के जाइते सावधानक कलफ मे लागल ई पूराक पूरा.. की कहै छै .. मैनेजमेंट ग्रुप.. सभ एकदम स' ढील-ढाल भ' क' लटकि गेलौ। एना (हाथ-गोर मूड़ी ढीला क' क' देखबैत अछि।) किसुन : चल आब मंगतुआ लग। द' आबी अखबार। (दुनू मंगतू लग पहुँचैत छथि। ओकरा अखबार देइत छै। मंगतूक चेहरा पर दुख, अपमान, नाराजगीक भाव छै। ओ अखबार लेब' लेल उत्सुक नञि देखाई पड़ैत अछि।) किसुन : रौ लाट साहेबक नाती। मंगबे भीख आ शान रखबें राजा-महाराजा के। (कनेक नरम भ' क') रौ, हम सभ त' अदना मोलाजिम छी। हुकुम नञि बजाएब त' नोकरी स' छुट्टी। देखलही ने आइ तों जे बड़का-बड़का हाकिम सभ सेहो कोना कुकुरक नांगरि जकाँ .. ले, राखि लें, काल्हि स' जल्दी आनि देबौ। (मंगतू ओकरा आओर दिस बेगर देखि क' अखबार ल' लैत अछि।) किसुन : की जानि एहेन कोन हीरा-मोती जड़ल रहै छै अई मे जाहि लेल ई एतेक पिरीसान फिरैत अछि। वएह त' खबरि होइत छै - हत्या, अपहरण, बलात्कार। लागै छै जे पूरा देस अई सभ' मे हाथ रोपि क' बइस गेल अछि। मंगतू : (अखबार मे डूबि गेल अछि।) ओहि दिन हम अखबार मे गिनती कएल.. 380 लोकक मरबाक समाचार। किओ अपन मौगत नञि मरलै.. किओ गोली स' त' किओ बस पलटी स, किओ बम स', किओ अपनही बेटा-पुतौहु द्वारा.. एखने त' खबरि छलै - बम फ़ुटबाक। खूब असमान चढ़ि रहल छै मौगतक ई धंधा। एखने त' लोक आओर निकलल छलाह, घर स', बजार स', काज स', हंसैत-खेलैत, सौंसे देहे आ एखने हाथ-गोर साफ.. भरि जिनगी लेल लोथ.. तहन एक दिन की ई पूरा दुनिये लोथ भ' जेतै? (ठेहुन मे मुंह नुका लइत अछि, दर्शक मे स' एक गोट बाजैत अछि। मंगतू चेहाक मूड़ी ऊपर उठबैत अछि।) दर्शक 1 : साँच कहल रौ भाई, साँच! ई देख (केहुनी धरि कटल हाथ देखबैत अछि) रौ, बम, दंगा, झगड़ा-फसाद - मरैये के? कोनो नेता? हुनकर बेटा-जमाय, नाती-पोता? ऊँहूँ - धूरि सन हम, तों, ई, ओ..। ओ सभ पैघ.. मातबर लोग.. पैघ लोक, पैघ गिनती.. पैघ गिनती मे छोट-छीन संख्याक मोजर नञि .. । दर्शक 2 : (महिला अछि) देखू हमर ई मुंह (झरकल मुंह) जहिया स' एना भेलए, ऐना देखब छोड़ि देलहुंए.. सुनैत छलहुं जे लोक प्रेम मे त्याग करैत छथि। आई प्रेमो जबर्दस्तीक चीज बनि गेलैय'! हमरा अहाँ स' प्रेम भ' गेलए तैं अहाँ के हमरा स' प्रेम करैये पड़त.. दोसर रस्ताक कोनो गुंजाइसे नञि.. वरना तैयार रहू.. परिणाम लेल.. आह.. हम शिकार भ' गेलहुँ एहेन प्रेमक। (चिकरैत) रौ, बिगाड़' त' आबै छौ, बनाब' आबै छौ? कोन हक्के तों एना केलें हमरा संगे.. (कनैत) आब ऊपरबला स' मौगत माँगै छी त' सेहो नञि भेटैय'.. दिन-राति ओढ़नी स' मुंह तोपैत चलैत रहू, अपना स' बेसी दोसर लोकक खेयाल करू जे हुनका हमर ई मुंह नञि देखाइ पड़य.. (ओत्तहि ठेहुन भरे बैसि जाइत अछि।) मंगतू : कहबी छै जे सात जनमक बाद मनुक्ख जनम भेटै छै। आ सएह मनुक्खक ई अवस्था? (विक्षिप्त जकाँ चिकरैत अछि) रौ, रौ सर्वशक्तिमान कहाब'बला भगमान! कत' छें तों? मनुक्ख बनेबाक बदले राक्षस कियैक बना रहल छें? एतेक फ़ुटानी कियैक रौ? आ सोझा मे, देखियौ तोहर हिम्मति.. रौ, बौक-बहीर छें की.. देखबही ई धरती के, किछु करबहीं एकरा लेल कि कान मे तेल ध' क' सुतल रहबें?.. रौ, किछु क' सकै छें त' कर.. नयिं त' हमरो मारि दे आ तोंहो कतहु डूबि-धँसि जों.. नञि जीबाक अछि.. मौगत.. द' दे.. भगवान, मौगत.. नञि जीब' चाहै छी राक्षस स' भरल अई दुनिया मे.. (भोकासी पारि क' कनैत अछि।) (जाहि समय मे मंगतूक प्रलाप चलैत अछि, ओहि समय ओम्हर स' पास होब बला लोक आओर ओकरा दिस देखैत चलि जाइत रहैत अछि। ककरो नजरि मे ओकरा लेल कोनो सहानुभूति नञि । ध्वनि सभ ऊभरैत अछि.. 'की भेलै रौ एकरा?', 'अरे, किछु नञि, पागल छै सार!','चोट्टा, भगवान के गरियबैत छै, पछिलो जनम मे गरियैने हेतै, तैं' अई जनम से सेहो..', 'रौ, बइसल बनिया की करय, ई कोठीक धान ऊ कोठी करय', 'काज ने धंधा, मौज-मस्ती ठंढा.. ', 'हमरा आओर जकाँ ट्रेन बस ट्रेन करितियइ, नौ स' पाँच मे जिनगी स्वाहा कर' पड़तियैत त' बुझितियइ.. गै चल, तोंहो कोन पगलेटक चक्कर मे फँसि गेलैं.. ', 'नञि रौ ई पगलेट नञि छै.. वाजिब गप्प कहै छै.. भीख माँगब एकरा नीक नञि लागै छै.. मुदा.. मजबूरी छै.. के काज देतै एकरा.. ' आदि - आदि । ..सभ पात्र एम्हर ओम्हर स' निकलि क' मंगतूक पाछा ठाढ़ भ' जाइत अछि आ समवेत स्वर मे कहैत अछि..) 'हम सभ.. मात्र पुतली भरि नियंताक अपन-अपन इच्छाक / कामनाक दीप लेसने हम सख्त अछि ताकीद देखू मात्र, बजाऊ कोर्निश गबैत रहू राग-दरबारी.. हे प्रभो, अन्नदाता बस कृपा करी एतबे जे बनल रही हम सभ पुतरी भरि.. डोरी अदृश्यक हाथ मे। (प्रकाश मंगतू पर केन्द्रित होबैत शनै: शनै: फेड आउट) -------- दृश्य : 2 (मंगतूक स्थान - भोरक बेला - मोटर गाड़ी स' एक गोट सेठ उतरैत अछि - गाड़ीक दरवाजा फोलब, बंद करबाक, जेब स' टाका निकालबाक अभिनय.. टाका निकालिक' ओ मंगतू दिस-बढ़ैत अछि..) आदमी : उठ, उठ, ऐ भाई.. भोर भ' गेलै। (मंगतू ओकरा दिस प्रश्नाकुल नजरि स' देखैत अछि। बाजैत किछु नञि अछि..) ई ले - एकावन टाका। राखि ले। मंगतू : एकावन टाका? मुदा कियैक? आदमी : आई हमर बाउजीक बरखी अछि। ब्राह्मण अथवा दरिद्रनारायण भोजन करेबाक फुर्सति अछि नञि तैं, आई पाँच लोक के दान क' देइत छियै। मंगतू : साब, हमर एक गोट विनती अछि.. साब, ई पाई अहाँ राखि लिय'.. आ एकरा बदला मे हमरा कोनो काज द' दिय.. पतियाउ साहब जी, हम काज क' सकै छी.. ई हमर हाथ देखियौ.. गोर देखू.. (विचित्र तरीका स' हाथ-गोर चलबैत अछि) साहेब जी.. हमरा अई नरक स' निकालू साहेब जी.. हमरा काज दिय'.. केहनो.. पैघ-छोट.. अहाँ के शिकायतक मोका नञि देब साहेब जी। (ओकर पएर-पकड़बाक अभिनय करैत अछि। आदमी घबड़ाक' पराएत अछि। गाड़ी मे बैसबाक, स्टार्ट करबाक अभिनयक संग खौंझाएल स्वर में..) आदमी : हुंह! काज चाही । देह न दशा, मुर्गी प्यारे फँसा। नीक-नीक लोक के त' काज भेटै नञि छै.. सभ ठॉ त' भर्ती पर रोक लागल छै.. चुनावक समय मे अखबार मे नौकरीक विज्ञापन भरि.. तकरा बाद फुस्स! सरकारक आमदनिए छै। ई विज्ञापन स'.. डीडी, पे-ऑर्डर.. एकरा देखियौ.. काज क' लेब.. कोनो काज.. जहन कोनो काज कइए लेबें त' माँग भीख! ईहो त' काजे छै आ बड्ड मेहनति आ हिम्मति बला काज छै। (गाड़ी चलेबाक अभिनय संगे मंच स' बाहर। बाहर जाइत काले मंगतू पर नजरि..) मंगतू : चलि गेलाह। सब चलि जाइत अछि। भीखक एक गोट अठन्नी, रूपैया फेंकि क'.. बस! साधे रहि गेल जे किओ हमरो सहारा दितियैक - अपना पैर पर ठाढ़ हेबा मे.. लोक आओर पतियाइ कियै नञि छथि जे हम ठाढ़ भ' सकै छी.. लिख-पढ़ि सकै छी.. ई देखू (हाथ स' जमीन पर किछु लिखबाक प्रयास करैत अछि) .. आ.. आ.. ई किसुनदेव आ रामआसरे भाई त' कहैत छथि जे हमर दिमागो बड्ड तेज अछि (कनेक मुस्काइत अछि।) तैं त' हुनकर बड़का साहेब हमरा लग आएल छलाह.. बाप रौ, की सूट-बूट, की शान.. (मंगतू पर स' फेड आउट) (फ्लैश बैक आरंभ) (एक अधेड़, रोबदाब बला व्यक्ति.. नाम तांबे.. मंच पर बेचैनी स' एम्हर-ओम्हर बूलि रहल छथि। रामआसरेक प्रवेश) राम. : साहेब जी? तांबे : (अनसोहांत स्वर मे) yes? राम. : साहेब जी किछु पिरीशानी मे बूझा रहल छथि। तांबे : परेसान नञि होइ त' की राग मल्हार गाबी? सभटा डाटा कलेक्ट कएल छल। पता नञि कोना हार्ड डिस्क सेहे उड़ि गेल। राम. : साहेब जी, कम्पलेन नञि लिखाओल की? तांबे : एंट्री त' क' देलहुँ। मगर तकरा स' की? इंजीनियर त' काल्हिए आओत। आ मैटर हरि हालति मे आइए देबाक अछि। तैं त' लेट बइसल छी.. मुदा.. (माथ पकड़ि लेइत अछि।) राम. : साहेब जी.. छोट मुंह पैघ गप्प.. अनसोहांत सन सेहो.. मुदा नीचाँ.. छै ने.. ओ लोथ.. मंगतू.. भ' सकैय' ओ बता दियए.. तांबे : (एक नजरि ओकरा देखि ठठा क' पेट पकड़ि क' ठठाएत अछि।) ऊ लोथ भिखमंगा, ऊ हमरा डाटा बताओत? रौ, तोहर दिमाग दुरूस्त त' छौ ने! जे डाटा कलेक्ट कर' मे हमरा एतेक समय लागल, एतेक - एतेक किताब कंसल्ट कर' पड़ल, ओ ओहि अनपढ़, लोथ, भिखमंगा.. राम. : साहेब जी, कम्पूटर त' अहाँ के अहिना.. इंजीनियर काल्हिए आओत। काज करबाक अछिए अहाँ के। आर कोनो उपाय त' अछि नञि! त' एक बेर टराइ करबा मे हर्जे की! हमरा ओना विश्र्वास अछि जे ओ अहाँक अबस्से बता देत। तांबे : कोन आधार पर तों कहि रहल छें एना? राम. : ओ पढ़' जानै छै। हमहीं आ किसुनदेव मिलिक' ओकरा अच्छर ज्ञान करैलियै। ओकर लगन आ मेहनति.. आई ओ अखबारक नाम स' ल'क' अंतिम पन्ना आ संपादकीय धरि पढ़ि जाइत अछि। सभकिछु सिलेट पर लिखल लाइन जकाँ मोन रहैत छै ओकरा। तैं हम.. बाकी त' अहाँक इच्छा..। (फ्लैशबैक समाप्त। प्रकाश मंगतू पर।) मंगतू : रामआसरे कहला सन्ते तांबे साहेब आएल छलाह! (हंसैत) बार रौ बाप! की गुमान मे फूलल छलाह। हमरा ल'ग ठाढ़ हेबाक विवशता, मुंह पर बहुत किछु जनबाक दर्प, जेना दुनियाक संपूर्ण ज्ञानक गठरी हुनके लग हुअए, हमरा लेल हुनक ऑखि मे लहराइत घिरनाक समुंदरि, संगही एकटा उपकारक भाव सेहो, जे देख - हमही छी, जे ऐलौं तोरा लग.. ले बिलइया के, हौ जी, ऐलौं त' कोनो हमरा लेल.. एलौं अहाँ अपना लेल.. ऐलौं, पूछलौं, हमरा मोन छल, बतेलौं, अहाँ लिखलौं, छपेलौं, आ बिसरि गेलौं। एकटा धन्यवादो धरि नञि। रामआसरे भाइ लेख देखाओल.. मुदा पढ़ि नञि सकलहुँ - अंग्रेजी सन्ता। हमर ज्ञानक उपयोग कोना भेलै.. ई हमरे नञि पता.. इएह त' अछि हमर तकदीर.. (विचित्र हँसी हँसैत अछि.. पत्रकार-युवक-युवतीक प्रवेश। ओकरा हँसैत देखि थम्हि जाइत छथि।) युवती : मुगतू? (मंगतूक हंसी थम्हि जाइत अछि।) की भेलौ? बड्ड हंसि रहल छे। मंगतू : (कनेक सकुचाइत) जी.. ओ किछु नञि.. बस.. तांबे साहेब बला बात.. युवक : (रूक्ष स्वर मे) सुनल जे ओ तोरा लग आएल छलाह आ तों एकदम टेपरेकॉर्डर जकाँ चालू भ' गेल छलें? मंगतू : (ओकर रूक्षपन के लक्षित नञि करैत अपनही प्रवाह मे) त' की करितियैक! एतेक बड़का साहेब! एतेक पिरीसान.. चांसे बूझल जाओ जे हमरा पता छल। - जे किछु पता छल, से सभ बता देलियइ.. देखलियइ हम लेख.. मुदा अंग्रेजी.. साब, अहाँ हमरा अंग्रेजी पढ़ब सिखा देब? युवती : (मोन पारैत) हे सुनु, हम सभ एकरा पर स्टोरी केने छलहुँ ने? युवक : अरे, ऊ त' पुरान कथा भ' गेलै। वंडरफुल एंड पावरफुल प्रोजेक्ट । युवती : एकरा किछु लाभ करेलहू की नञि? युवक : माने? (ऑफिस दिस बढ़ैत अछि।) युवती : (अनुसरण करैत) माने ई, जे ओहि समय गप्प भेल छल जे पेमेंट भेलाक बाद अहाँ ओकरा किछु देबै.. जस्ट फॉर ए नाइस जेस्चर.. मुदा, अहाँ त' हमरो किछु नञि बताओल। युवक : अहँू त'! ओ की केलकई जे ओकरा पेमेंट करियई? युवती : वएह त' धुरी छल। नञि बतेतियैक त' अहाँ काज क' सकै छलहुँ? नञि न! आब किछु ओहि गरीब के.. (दुनू ऑफिसक गेट धरि पहुँचइत छथि। रामआसरे आ किसुनदेव दुनूक गप्प सुनै छथि।) काज निकलि गेल त' बस, मुंह फेरि लेलहूँ! युवक : जमाने इएह छै डार्लिंग। देखलहुँ मि. तांबे के.. सभटा काज करबा लेलन्हि मुदा नामोक क्रेडिट नञि.. युवती : अहँू सएह बन' चाहै छी त' बनू.. मुदा हमर मानधन हमरा दिय'! हम ओही मे स' ओकरा.. राम. : नमस्कार साहेब। युवक : नमस्कार नमस्कार। किसुन: कोनो गंभीर गप्प सर? युवक: उंहूं, किच्च्छु नयिं। युवती : किछु कियैक नञि? अरे, हम दुनू ओहि मंगतू पर काज करै छलहुँ। तहन ई गप्प भेल छल जे पाइ भेटला पर हम किछु ओकरो देबै। मुदा.. ई त' हमरो पाइ घोखि गेलैन्हि.. युवक : (जेना भेद खुलि गेल हुअए) ओके बाबा ओके। अहांक पाइ अहां के द' देब। ओकरो द' देबै.. आब त' खुश? (फसफुसाइत) सभके सभ किछु कहब जरूरी छै की? (बाजैत भीतर चलि जाइत छथि। युवती पहिने जाइत अछि। पाछा स' युवक अपन तर्जनी माथ पर ल' जाक घुमबैत अछि -- माने युवती कनेक क्रैक अछि।) राम. : देखल भइया ई बड़का-बड़का लोकक खेल! पत्रकार छथि ई सभ। जनताक पैरोकार। जनताक रच्छक। रच्छक खुदे भच्छक.. हाँक' लेल कहू त' एकदम सूरूजे पर, देब' बेर मे पद-पद पाद' लगताह! हजारो टाका झिंटने हेतै मंगतुआक नाम पर। आ ओकरे किछु देबाक नाम पर .. किसुन : सटक सीताराम! सभ एक्के थरियाक भांटा रो भाइ! राम. : ऊ तांबे साहेब! ओकरे मदति स' ओ लेख लिखलन्हि। छपबो केलै। आब हमरा त' अंग्रेजी, फंगरेजी अबै नञि अछि। हम पूछ' गेलियै जे साहेब, अई मे मंगतूक कोनो जिकिर-उकिर..! किसुन : की बाजलन्हि? राम. : अरे, ओ तेहेन न आँखि गुरेरलन्हि जे एह -'ई लेख है रामआसरे, इन्टरव्यू नहीं कि सबका नाम देते रहें।' हम त' तइयो ढीठ बनल बजलहुँ जे साहेब, ओकर कोनो भला भ' जयतियन्हि। भिखमंगाक जिनगी स' ओकरा छुटकारा भेटि जइतियैक। ओ फेर आँखि तरेरलन्हि। हम फेरो थेथर जकाँ बाजलियैक जे ठीक छै, नाम नञि देलियै त' किछु दामे द' दियऊ। लगतै ओकरो जे हँ, आई अपना दिमागक कमाई भेटलए.. सभ सार चोर अछि- ऊ तांबे, ई छौंड़ा.. काम रहला पर बाबू-भैया आ निकलि गेला पर दू-दू लात। (पार्श्र्व स' सोगबला धुन। प्रकाश मंगतू पर। ओ चिकरैत अछि) मंगतू : किओ हमरा अई नरक स' निकालि क' ल जाऊ। रौ तकदीरक नाति, कत' मुंह मरा रहल छें। देह नञि त' तोहें नीक जकां रहितें हमरा लग। कोनो नीक, पाईबला घर मे देतें। माय-बाप लग। मुदा, जहन अपने माय-बाप अपन नञि भेल तहन.. (सोगबला धुन उत्सव धुन मे बदलि जाइत अछि। मंगतूक चेहरा फेड आउट होइत अछि। एक काल्पनिक लोकक आभास देइत लाल-नारंगी-पीयर रोशनी पसरइत अछि आ ओहि प्रकाश मे देखाइ पड़ैत अछि - एक गोट स्त्री, जकरा कोरा मे एकटा नवजात अछि। अन्य स्त्रीगण नाचि-गाबि रहल छथि!) रूपैया मांगे ननदी लाल के बधाई एके रूपैया मोरा ससुर के कमाई अठन्नी ले लो ननदी लाल के बधाई एके अठन्नी मोरा पिया के कमाई ओ ना मैं दूँ ननदी लाल के बधाई एक स्त्री : देखू भौजी। चान जइसन बेटा देलन्हि अछि हमर भैया अहाँ के। आब बेगर छत्तीस भरक डँड़कस के नञि मानब। (सभ हंसैत छथि। स्त्री लजाइत अछि। पुरूषक प्रवेश। हँसैत-नचैत स्त्रीगण विदा भ' जाइत छथि।) पुरूष : राधा, की नाम राखब एकर? स्त्री : (लजाइत) जे अहाँ कही। पुरूष : हमर मानी त' एकर नाम राखब चिरंजीवी। खूब पढ़ाएब, लिखाएब, कलक्टर बनाएब। स्त्री : हमरा मानी त' ओकरा पर अपन मर्जी नञि थोपी । अपना मर्जी स' ओ जे बनय, डाक्टर कलक्टर, एक्टर.. पुरूष : अच्छा भई, हम त' हुकुमक गुलाम छी। हुकुमक बेगम जे हुकुम देतीह, हुकुमक गुलाम बजा आनत (कोर्निश करैत अछि। स्त्री हंसैत अछि। पुरूष छेड़ैत अछि) गीत मे कहलियै - पिया के कमाई नञि देबै ननदि के, हमर बहीन के। ओ जीवित नञि छोड़ती अहाँ के! तहन? तहन हमर की हएत (आवाज रोमांटिक होइत अछि। स्त्रीक हंसी। अंधकार-प्रकाश मंगतू पर।) मंगतू : एहेन माय-बाप हमर करम मे कत'? समाजक सामना करबाक हिम्मत नञि भेलै। अई समाज मे श्राप भोग' लेल छोड़ि देलैन्हि। सोचल, जे अपने स' अपन तकदीरक किताब लिखब, मुदा ऊ बकट्टा गुड्डी हमरे जिन्दगी के बकट्टा क' गेल.. लोथ, लूल-लांगड. बनल ई जिनगी । मौगत की एकरा स' अधलाह हेतै?.. मुदा मौगतो त' नञि अबैत अछि। नञि घरक आसरा, नञि समाजक, नञि लोकक। कथी लेल जीब, ककरा लेल जीब, ई जीबाक कोनो अर्थ? (मंगतू भोकासी पारि कान' लागैत अछि। रामआसरे आ किसुनदेव ओकरा लग अबैत छथि।) राम. : अपन इ ऑफिसे मे त' कतेक विकलांग लोक काज करै छथि, भोइकर साहेब, लीना मैडम, सिन्हा जी.. मुदा .. एक दिस एहेन माय-बाप आ दोसर दिस ई समाज.. सभक फाटल मे आंगुर कर' बला। रौ, तोरा कोन मतलब छौ किओ किछु करए। ककरो चैन स' जीब' नञि देतै ई समाज.. (रामआसरे आ किसुनदेव मंगतू के धैरज बंधबैत छथि । पार्श्र्व स' कविता ) 'जिनगी जुआ अछि सट्टा अछि, बजार अछि ताश अछि, पत्ता अछि रोशनीक बाढ़ि चोन्हियाएल लोक भीड़ अछि, एकान्त अछि भोरक तारा विश्रान्त अछि तारा टूटए नञि आस छूटए नञि (फेड आउट) दृश्य : 3 सांझुक समय। तेज बरिसाति आ मेघ बिजली गर्जन-तर्जनक स्वर। पहिलुका तीनू भिखमंगा' छौंड़ा मे स' सभस' छोटका आब रूमाल बेचैत अछि। ओ अपन समान सभ प्लास्टिक स' तोपबाक चेष्टा करैत बस स्टैंड दिस अबैत अछि। मंगतू अपना जगह बइसल पानि बरिसब देखि रहल अछि। ओकरा लग भीखक पाइ छितराएल छै। छौंड़ा दूरे स' मंगतू के देखैत अछि आ फेर अपना पेन्टक जेबी उन्टा क' देइत अछि। मंगतू लग पड़ल पाई दिस ओ चुंबक जकाँ आकर्षित होबैत बढ़ल चलैत अबैत अछि। मंगतू पानि छोड़ि ओकरा दिस देख' लगैत अछि। छौंड़ा दू-चार डेगक दूरी पर एकाएक थम्हि जाइत अछि। मंगतू : की रौ झुनमा, की भेलौ। झुनमा : किछु नञि । मंगतू : त' रूकि कियैक गेलें? झुनमा : अहिना। मुंगतू : मुंह एना छाउर जकाँ कियैक केने छें? माल-ताल नञि बिकलऊ की? झुनमा : ई बरखा-बैकाल मे लोक घर भागत की समान कीनत। मंगतू : (कनेक काल चुप रहिक' जेना बात बदलिक) ई त' तों नीक केलें, जे भीख मांगब छोड़ि काज पकड़ि लेलें। अच्छा झुनमा, ई बता, तोरा पानि नीक लागै छौ? झुनमा : पेट भरल रहला पर गदहियो करीना कपूर लगै छै। मंगतू : (जेना अपनही प्रवाह मे) हमरा बड्ड नीक लगैत अछि ई बरिसाति! आ, सुनबै छियौ, किताब आओर मे केहेन-केहेन गप्प सभ लिखल छै, बरिसाति लेल - कारी-कारी मेघ, झमझम बरिसति पानिक धार - चांनी जकाँ, भीजल धरतीक सोंन्हिपन, जेना कुम्हारक आबा मे बासन आओर पाकि रहल हुअए। हवा मे सिहकी आ मोन मे कामनाक ज्वार! प्रिय स' मिलनक इच्छा..। (पार्श्र्व स' कजरीक मद्घम स्वर) सखी हे आएल रात अंधियारी बदरा कारी-कारी ना झींगुर, मोर, पपीहा बोले दादुर दमके ना, सखि हे दादुर दमके ना, सखि हे आएल रात अंधियारी बदरा कारी-कारी ना। झुनमा : रह' दे रौ, रह' दे। पोथीक गप्प रह' दे। पोथी लिख' बला पढुआ लोक छै। ओकरा सभ के भरिसकि नञि बूझल छै जे पानि एला स' बाढ़ि अबै छै, घर, जान-माल डूबि जाइ छै, सभटा जमा पूँजी स्वाहा.. मंगतू : (फेर अपनही रौ मे) आ ओकरो स' त' नीक लागै छै बरिसातिक बादक रौद। एकदम नहाएल धोएल, स्वच्छ काया जकाँ। झुनमा : (खौंझा क') रौ सार! एतेक साहरूख खान कियै बनल जाए छें रे। एहेन बरखा-बैकाल मे तोरा सनीमा सूझै छौ, हमरा राहत बाँट'बला देखाई पड़ैत अछि। हे.. ऊ देख.. हवाई जहाज स' पाकिट सभ खसि रहल छौ, हे एम्हर.. हे ओम्हर.. हौ, हौ जी, एकटा एम्हरो खसाबहक ने! यौ भाई जी, भाई जी यौ, एकटा एम्हरो खसबियौ ने यौ। बड्ड भूख लागलए.. एको छदामक माल नञि बिकाएल..। मंगतू : रौ झुनमा। ओम्हर की चिकरि रहल छें। ले, ई पाइ ल' ले, आ ल' आन किछु.. गप-सप्प करैत खा-पी लेब। आ हे, सूत'क मोन करओ त' सुतियो जइहें। अही ठाँ स' धंधा पर निकलि जैहें। (झुनमा पाइ लेइत अछि आ चलि जाइत अछि। मंगतू फेर स' अपन दुनिया मे भुतिया जाइत अछि। ओ गबैत अछि..) 'बरसात में हमसे मिले तुम सजन तुमसे मिले हम, बरसात मे।' (झुनमा अबैत छै आ एकटा ठोंगा ओकरा थमा देइत छै। झुनमा : ले रौ हमर आमिर खान! खो। (दुनू खाइत अछि। मंगतू स्वाभाविक रूप स' आ झुनमा हबड़-हबड़ खाइत अछि।) मंगतू : चौप खूब नीक बनल छै ने। झुनमा : हूँ.. मंगतू : काल्हि कोनो आओर चीज आनिहें। झुनमा : हूं.. मंगतू : किछु बाजै कियै ने छें? (झुनमा हाथ स' थम्ह' के इशारा करैत अछि। मंगतू ओकरा देखैत रहैत अछि। झुनमा पूरा खेलाक बाद ढेकरैत अछि आ बजैत अछि।) झुनमा : हँ, आब बाज! पेट खाली रहला पर दुनिया बड़का अंडा देखाई छै। आब पेट भरि गेल अछि आ भरल पेट मे त' सुअरनिओ रबीना टंडन लागै छै। (गबैत अछि) तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त। (खाए पीबि क' दुनू ठोंगा ओही ठाँ एक कोना मे बीगि देइत अछि। दुनू पानि पिबै अछि आ ढेकरैत अछि। दुनू एक-दोसरा के देखैत ठठाक' हॅँसि' पड़ैत अछि।) झुनमा : कतेक बाजल हेतै? मंगतू : दस स' कम की भेल हेतै! पानि त' कहैय' जे आइ छोड़ि काल्हि हम बरसबे नञि करब। झुनमा : (उदास होइा) एतेक पानि बरसतै त' रोड सभ टूटि जेतै। पटरी डूबि जेतै। बस ट्रेन चलल बन्न भ' जेतै। मंगतू : त' अई लेल तों मलिन कियैक भ' गेलें? झुनमा : रौ, बस-ट्रेन नञि चलतै त' पसिन्जर नञि ऐतै। ओ सभ नञि एतै त' हमर बिक्री-बट्टा.. बिक्री नञि त' पाइ नञि.. पाइ नञि त' दाना नञि। मंगतू : रौ झुनमा, एक बात बता। तों बस-ट्रेन स' कतेक दूर धरि गेल छें? पटना स' मुजफ्फरपुर धरि.. किऊल धरि.. दानापुर.. पटना साहिब.. केहेन सोहनगर लागैत हेतौक ने देख' मे.. हजारो लोकक एके संग चढ़ब, एके संगे उतरब। फर्र-फर्र भागैत बस- ट्रेन। सर्र-स' छूटैत लोक, घर, खेत, खलिहान, गोरू बरद.. । हमरो हाथ-गोर रहतियैक त' जएतहुँ ने तोरे आओर जकाँ। झुनमा : हँ, जेतें आ पुलिसक डंडा आ पब्लिक गारि-बात खेतें। बम फ़ुटनें जान गमबितें। एम्हर बम ओम्हर बम, एतेक मरलै, एतेक घायल.. याहि सभ त' आइ काल्हिक नूज छै। मंगतू : (दीर्घ साँस लेइत) जानक की। ऊ त' अई ठाँ बइसलो बइसलो जा सकै छै। के जानए, एगो बम एम्हरो फाटय आ हम सभ' लत्ता बनि उड़ि जाइ.. बम, गोली, दंगा- ई सभ त' आइ काल्हिक रीत भ' गेलैये। एगो बम फूटै छै आ सैकड़ो लोक एक्के मिनट मे अपाहिज, लोथ भ' जाइ छै। किओ पूछय हमरा स' लोथ भेलाक दर्द। रौ.. हम त' रोजे मनबै छी जे हमरा मौगत आबि जाए। ई लोथ जिनगी स' की फेदा! झुनमा : हमहँू सभ त' इएह बाजै छी।.. की सोचै छें? ऊपरवाला लग एतेक टेम छै हमरा आओरक गप्प-सुनबाक। नमगर लाइन हेतै रौ भाइ! (ओकासी मारैत अछि।) मंगतू : नींद आबि रहल छौ। सूति रह अही ठाँ। (दुनू मिलिक' मंगतूक चीकट कथरी ओछा ओठँगि जाइत अछि। कनेक देरी मे दुनू फ़ोंफ़ि काट' लगैत अछि। मंचक प्रकाश शनै:-शनै: लाल होब' लगैत अछि। नीने में मंगतू बड़-बड़ाइत अछि-'हम जीय' नञि चाहै छी, 'हमरा मौगत द' दिय!' 'हमरा मौगत कियैक नञि अबैत अछि।' झुनमोक अस्फुट स्वर बहिराइ छै -'हं', जिय' नञि चाहै छी।' 'ई केहेन जिनगी अछि! मरने बेसी नीक' आदि। प्रकाशक लाली मंगतू पर केन्द्रित। मंगतू नींने मे उठि क' बैसि जाइत अछि आ अलसाएल नजरि स' अपना के देखैत अछि। जेना-जेना ओ अपना के देखैत अछि, तेना-तेना ओकर आँखि स' नींद गायब भेल जाइत अछि आ ओहि स्थान पर आश्चर्य भर' लागैत छै।) मंगतू : अरे, ई की? हमर हाथ? आ पैर सेहो?.. जेना जमीन स' बीया फूटि रहल अछि - सुंदर, कोमल, नरम.. ई केहेन चमत्कार! भगवान, अहाँ सचमुच कृपालु छी.. (शनै: शनै: मंगतू मंच पर पूर्ण व्यक्तिक रूप मे ठाढ़ भ' जाइत अछि।) हम.. हम एक गोट पूरा-पूरा आदमी, दुनू हाथ, दुनू गोर.. पतियाऊ की नञि पतियाऊ। (अपने बांहि मे बिठुआ कटैत) नञि, पतियाएबला गप्प नञि छै। (फ़ेर अपने स') कियैक नञि छै? हमर हाथ गोर घुरि आएलए हमरा लग, त' अइ मे नञि पतियाएबला गप्प की भेलै? आब हम अपन हैसियत बदलि सकै छी.. नीक समांग़ बनि सकै छी। भीख माँगब .... ई गर्हित कर्म स' हमरा मुक्ति भेंटि जाएत.. भेटत की.. भेटि गेल! हे.. ई लिय'.. छोड़लहुँ हम भीख माँगब.. (हँसैत अछि।) आई स', एखनि स'। आब हमरा अई जिनगी स' कोनो सिकाइत नञि । (किलकि उठैत अछि। झुनमा ओकर आवाज सुनि उठैत अछि। मंगतू के अई रूप मे पाबि क' हैरान रहि जाइत अछि। मंगतू कनखी मारि क' खुशी प्रकट करैत अछि।) झुनमा : ई जादू छै। मंगतू : ऊँहूँ! सच। झुनमा : भइए नञि सकै छै। ई जरूर कोनो जादू छै अथवा नैना -जोगिन। मंगतू : अहँ! एकदम सच। छूबि के देख। (झुनमा ओकरा छुबै छै। अपन आँखि मलैत छै, फेर छुबै छै।) झुनमा : हँ, बुझा त' रहलए सचे सन! जौं ई सच छै, त' गुरू, कहू, आब की इरादा? मंगतू : इरादा? अरे, आब त' हम खुजल आसमानक मुक्त पंछी छी। (गबैत अछि) 'पंछी बनू उड़ती फिरूँ मस्त गगन में आज मैं आजाद हूँ दुनिया के चमन में' झुनमा : एतेक आजाद नञि छें, जतेक बूझै छें। मंगतू : माने?.. जीवन एतेक सुंदर भ' सकै छै, हम त' ई सोचबो नञि केने छलहँु। देख, ई रोडक बत्ती.. बरिसातक पानि मे केहेन सतरंगी किरण छोड़ैत अछि। ई चाकर रोड, एखन शांत अछि - भिनसर होइत होइत कतेक जगजियार भ' जाइ छै.. (गबैत अछि) 'ई सहर बहुत हसीन है।' (आगाँ बढ़ैत अछि।) झुनमा : कत' जा रहल छें। मंगतू : पता नञि। हम त' खाली बूझ' चाहै छी, ई पूरा-पूरा देहक सुख उठाब' चाहै छी। भगवान, हम अहाँ के कएक बेर गारि पढलहुँ। आई अहाँ के धनबाद दइ छी। हमरा माफी द' दिय'.. (आओर तेजी स' चलैत अछि) की करब! लोक आओर जहन दुखी होइ छै, अहिना बाजै छै.. (खूब तेज-तेज चलैत अछि।) झुनमा : रौ, हवाइ जहाज जकाँ कियैक उड़ल जा रहल छें? मंगतू : चल, चल (गबैत अछि) 'दो दीवाने शहर में, रात मे या दोपहर में, आबो दाना ढँूढ़ते हैं, इस आशियाना ढँूढ़ते है।' झुनमा : रौ, हम थाकि गेलहूँ। गमे - गमे चल। मंगतू : हमर त' मोन भ' रहलए जे हम ई पूरा-पूरा धरती मापि ली, बामन भगवान जकाँ.. पूरा संसार के अपन अंकबारि मे भरि ली.. खूब चिकरि-चिकरि के गाबी - 'आज मदहोश हुआ जाए रे, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन। शरारत करने को ललचाए रे, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन।' झुनमा : (डेराइत) मंगतू, एना सनकाह - बताह जकाँ नञि कर। हमरा डर होइए। मंगतू : झुनमा, हमरा आइ केहेन लागि रहलए, बूझल छौ? झुनमा : .. .. मंगतू : आई हमरा मोन मे एकटा कामना, एक गोट इच्छाक मूर्ति बनि रहलए.. प्रेमक नरम अनुभूति.. आइए.. एखने.. लागि रहलए जे कोनो नरम, नाजुक अंचरा मे अपन मुंह तोपि ली.. ओकर प्रेम भरल स्पर्श हमर केश, देहक रग-रग मे पहुँचए आ अमृतक समुन्दर मे गहीर, खूब गहीर ल' जाए.. जत' प्रेम स' भरल संसार हएत..कियैक भ' रहल अछि एना? झुनमा : भ' गेल ई आमिर खान.. आब गाओत 'आती क्या खंडाला!' मंगतू : प्रेमक लालसा अई स' पहिने नञि भेल छल कहियो! झुनमा, सुन, तोहर भौजी.. (कनेक लजाइत अछि) झुनमा : भेल आब ई सलमान खान (गाबैत अछि) तेरे बिना, तेरे बिना.. (मंगतू आगॉं बढ़ैत अछि.. पाछू-पाछू झुनमा सेहो..) मंगतू : देख, ई श्रमक जीबैत रूप.. मेहनति स' लोक एतेक ने थाकि जाइत छै जे.. ओ कहबी छै ने जे 'नींन नञि जानै टूटल खाट।' हमहू.. एकरे आओर जकाँ खटब.. एतेक जे बस, खसिते फोंफ काटब शुरू। (फोंफ काटैत अछि।) झुनमा : मुदा तों काज की करबें रे! के देतौ काज तोरा? लूल्हि-नांगड़ि. मंगतुआ के सभ किओ जनैत छै.. मुदा आजुक ई नमगर, सोहनगर रितिक रोसन के काज के देतौ? जास्ती स' जास्ती उपदेस देतौ, जाहि स' पेट चलतौ नञि। (फोंफ काटबाक नकल करैत मंगतू एकदम स' चेहाइत अछि। फोंफ बीचहि मे रूकि जाइत अछि। मुंहक चमक, खुशी बिला जाइत अछि।) मंगतू : ऐं? की करब हम? (हँसैत अछि।) एकदम सही पकड़लें तों.. की करब हम?.. नञि, की क' सकै छी हम? ..रौ, तोंही बाज ने, की क' सकै छी हम? झुनमा : खाली भीख माँगि सकै छें। सेहो लोथ-नांगर भ' क! एहेन मुस्टंडा भ' क' नञि । मंगतू : एह! एना नञि बाज । एतेक दिन बाद हमरा ई सनेस भेटलए, ओकरा.. (हठात ओकर गर्दनि पकड़ि लेइत छै।) फेर जुनि बजिहें ई.. रौ तों त' चारि हाथ-गोर बाला आदमी भेलैं। तो की बूझबें लोथक पीर। झुनमा : (गर्दनि छोड़बैत) त' कलक्टरी कर। डाक्टरी कर। हम तोहर चपरासी, कंपोडर बन' लेल तेयार छी। मंगतू : तों हमर हौसला बढ़ेबाक बदले ओकरा खसा रहल छें। हमरा लग डिग्री अछि जे.. झुनमा : त' कोनो धंधा क' ले.. किरानाक दोकान, कपड़ाक दोकान.. किछुओ.. हमरा अपना दोकान पर राखि लिहें। मंगतू : कियैक मजाक क' रहल छें.. धंधा शुरू कर' लेल पूँजी चाही.. तों मदति की करबें, उन्टे.. चलि जो हमरा लग स'.. झुनमा : जाइ छी, जाइ छी। काल्हि फेर एबौ। अई बेर सिंघाड़ा खुअबिहें.. (जाए लागै छै। बीच-बीच मे मुड़ि-मुड़ि क' देखै छै जे मंगतू ओकरा बजा लियए। मंगतू ओकरा दिस ध्यान नञि देइत अछि। ई देखि ओ अपने स' एक कोन्टा में ठाढ़ भ' जाइत अछि आ मंगतू के देखैत अछि..) मंगतू : (जेना फेर अपना धुन मे) एह! एतेक सोहनगर समय। भोर भ' रहल छै..। हे, ई सुनू, पाखीक स्वर। भोरक मंद- मंद बेयार। हे देखियौ, ई सूतल अछि। एक उठल कि सभ किओ उठि जाएत.. बल्कि, देखियौ, जनीजात सभ त' उठियो गेलीह। ओ ओम्हर चूल्हि सुनगा रहल छै.. एम्हर ई अपना बच्चा के दूध पिया रहल छै.. आ ओकरा देखियौ, ऊ चाहक पानि सेहो चढ़ा देलकै.. ओम्हर एकटा बच्चा माय के देखि मुस्किया रहल अछि.. कतेक सोहनगर छै.. पाजेबक छुन-छुन जकाँ जिनगी छनकि रहल अछि.. मंगतू.. रौ.. हिम्मत जुनि हारि.. काज भेटतौ तोरा.. धैरज धर.. (ओ ई सभ बाजिए रहल अछि कि पाछू स' बम फ़ुटबाक भयंकर आवाज़ होइत छै। पलखतिए मे रोआ- कन्नटि, भागा दौड़ी मचि जाइत अछि। मंगतू किछु नञि बूझला सन्ते अकबकायल ओहि ठां ठाढेक ठाढ रहि जाइत अछि। दिग्भ्रमित भेल ऊ चारू दिस देखैत अछि, फेर माज़रा सभ बूझ' मे अबितही चिकर' लागैत अछि..) मंगतू : अरे, ई की भेलै.. ऊ दूध पियबैत माय! .... बच्चा ओकरा हाथ स' .... एतेक दूर खसि ..... आ ओ अपने गेंद जकाँ.. माथ फाटि गेलै.. ओ, ओ चूल्हि सुनगबैत स्त्री.. ओकर त' हाथे-गोर उड़ि .. अरे, ई निचिन्त सूतल लोक सभ.. कागज-पत्तर, खढ -पात जकाँ उड़िया.. (चिकरैत अछि) रौ, .. रौ रछसबा सभ.. जल्लाद, कसाइया सभ.. रौ, जिनगीक एक गोट साँस त' द' नञि सकै छें, मुदा.. कियैक छीन रहल छें हमर जिनगी? कियैक लोथ बना रहल छें हमरा? हमर अपराध की? (पार्श्र्व स' ध्वनि.. जन्म लेबक अपराध केने छें तों सभ.. आब भोग।) (चीख-पुकार एखनो मचल छै। मंगतू असहाय सन ठाढ़ अछि.. हठात ओकर कान में जोरदार आवाज अबैत छै 'भाग रौ, बम.. भाग, जान बचो.. भाग रौ.. ' (भीड़क भागबाक ध्वनि। मंगतू, सेहो बिनु किछु बूझने बदहवास चिकरैत भाग' लागैत अछि.. 'भाग रौ, बम.. भाग, जान बचेबाक छौ त' भाग.. भाग रौ.. ' रसे- रसे अई भगदडि. मे सभटा पात्र सम्मिलित भ' जाइत छथि.. सभ चिकरि. रहल छथि.. 'भागू, जान बचाऊ.. भाग रौ.. भाग.. ' रसे- रसे स्वर शांत होइत अछि.. सभटा चरित्र एक-दोसराक हाथ पकड़ने मंचक एकदम अग्रभाग मे ठाढ़ भ' जाइत छथि। समवेत स्वर मे सभ बाजैत छथि।) समवेत स्वर : हुअए खाहे युद्घक विभीषिका वा खूनक बाजार गर्म मुदा नञि थाक' बला, हार' बला हम! ओ परम पिता, ओ काल.. अहीं सं', हँ, अहीं स' अछि टक्कर हमर.. हम खसब, लड़ब, मरब, मुदा फेर ठाढ़ भ' उठब साठि हजार सगर-पुत्रक भाँति ई संसार खल अछि, कामी अछि, दुष्ट अछि, पिशाच अछि, मुदा तइयो छै अई मे जीवनक आभा जे अछि सत्यो स' बढ़ि क' सत्य.. शिवो स' बढ़ि क' शिव अमरो स' अमर सुंदरतो स' सुंदर.. जीवन, नञि अछि एतेक सस्त जे बिछलि जाए मुट्ठी मे बंद बालु जकाँ हम जीयब, आ पारब रेघ कालोक सम्मुख ललकारब मौत के बढ़ब विजय पथ पर रचब नित नवीन अभियान नित नवीन विहान नित नवीन वितान (अंतिम पंक्ति बाजैत-बाजैत सभ किओ आधा-आधा हिस्सा मे बॅंटिक' मंचक दुनू ओर ठाढ़ भ' जाइत छथि। प्रकाश मंगतू पर.. ओ अपन पहिल स्थिति मे अछि.. आ निन्न मे बड़बड़ क' रहल अछि.. 'भाग रौ, बम.. भाग, जान बचेबाक छौ त' भाग.. भाग रौ.. ' । ओ नींने मे एम्हर स' ओम्हर भागबाक प्रयास क' रहल अछि। सभ पात्र वृत्ताकार मे ओकरा घेर लेइत अछि। फेर सभ एक दोसराक हाथ पकड़ि पाछू दिस झुकैत अछि, जाहि स' एकटा मानव-पुष्पक निर्माण होबैत अछि.. सभ कविताक अंतिम चार पंक्ति बाजि रहल छथि.. 'बढ़ब विजय- पथ पर, रचब नित नवीन अभियान.. ' बाजैत-बाजैत सभटा पात्र फ्रीज भ' जाइत छथि। परदा खसैत अछि। डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे। कृति- मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८ मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६. अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८. लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७। सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८। पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२ बीसम शताब्दी मैथिली साहित्यक स्वर्णिम युग -प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह अतीत आऽ भविष्यक संग सम्बन्ध स्थापित कऽ कए साहित्य अपन अस्तित्वक सत्यताक उद्घोषणा करैछ। विश्व-मानव अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक साहित्यक गवाक्षसँ अतीतक गिरिगह्वरक गुफामे प्रवाहित जीवन-धाराक अवलोकन करैछ आऽ अपन गम्भीरतम उद्देश्यक विविध प्रकारक साधन भूल आऽ संशोधन द्वारा प्राप्त करैत अपन भावी जीवनकेँ सिंचित होइत देखबाक उत्कट अभिलाषा रखैछ। अतीतक प्रेरणा आऽ भविष्यक चेतना नहि तँ साहित्य नहि। अतीत, वर्तमान आऽ भविष्यक कड़ीक अनन्त शृंखलाक रूपमे भावक सृष्टि होइत चल जाइछ आऽ मानव अपन प्रगतिक नियमादि, सिद्धान्तादिकेँ अपन वास्तविक सत्ताक विकासक मंगल कंगन पहिरि कए अपन दुनू हाथसँ आवृत्त कयने रहैछ। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर (१८६१-१९४१)क कथन छनि जे विश्व-मानवक विराट जीवन साहित्य द्वारा आत्मप्रकाश करैछ। एहन साहित्यक आकलनक तात्पर्य काव्यकार एवं गद्यकारक जीवनी, भाषा तथा पाठ सम्बन्धी अध्ययन तथा साहित्यक विविध विधादिक अध्ययन करब मात्र नहि, प्रत्युत ओकर सम्बन्ध संस्कृतिक इतिहाससँ अछि, मानव-मनसँ, सभ्यताक इतिहासमे साहित्य द्वारा सुरक्षित मनसँ अछि। उन्नैसम शताब्दीमे भारतवर्षमे नवजागरणक प्रबल ज्वार उठल। तकर कोनो प्रभाव मिथिलांचलपर नहि पड़ल, कारण मिथिलावासी प्राचीन परम्पराक पृष्ठपोषक रहलाक कारणेँ संस्कृत शिक्षामे लागल रहलाह आऽ अंग्रेजी शिक्षा तथा पाश्चात्य विचारधाराक महत्वकेँ नहि स्वीकारलनि। नवजागरणक फलस्वरूप षष्ठ दशकमे भारतीय परतन्त्रताक बेड़ीसँ मुक्त होएबाक निमित्त सन् १८३७ ई. मे सिपाही विद्रोह कएलक। मिथिलाक नव शासक मैथिलीकेँ कोनो स्थान नहि देलनि। एहि दशकक अन्तिम बेलामे मिथिलाक प्रशासन “कोर्ट ऑफ वार्ड्स”क अधीन चल गेल जकरप्रभाव मिथिलापर पड़लैक। जे एहिठामक निवासीकेँ प्रथमे-प्रथम पश्चिमक स्पर्शानुभूति भेलनि। किन्तु दुर्भाग्य भेलैक जे “कोर्ट ऑफ वार्ड्स” द्वारा मिथिलाक भाषा मैथिली आऽ ओकर लिपिकेँ बहिष्कृत कऽ कए ओकरा स्थानापन्न कयलक उर्दु आऽ फारसी तथा देवनागरी। मिथिलेश महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह (१८५८-१९९८)क गद्देनशीन भेलापर उन्नैसम शताब्दीक अष्टदशकोत्तर कालमे मिथिलावासीक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक जीवनमे नव चेतनाक संचार भेलैक। हुनक चुम्बकीय व्यक्त्तित्व, कृपापूर्ण व्यवहार, विद्या-व्यसन आऽ असीम देशभक्ति एवं दानशीलताक फलस्वरूप विद्वान साहित्य सर्जककेँ आकृष्ट कएलक। हुनक उत्तराधिकारी मिथिलेश महाराज रमेश्वर सिंह (१८९८-१९२९) सेहो उक्त परम्पराकेँ कायम रखलनि। उन्नैसम शताब्दीक अष्टदशकोत्तर कालमे भारतीयमे अभूतपूर्व जनजागरण भेलैक, जकर फलस्वरूप स्वतन्त्रता संग्रामक नव स्फुलिंग जागृत भेल आऽ ओऽ सभ स्वतन्त्रताक निमित्त अत्यधिक सचेष्टताक संग सन्नद्ध भेलाह, जकर प्रभाव साहित्य सृजनिहारपर पड़लनि। यद्यपि शताब्दीक अन्तिम वर्ष धरि धार्मिक आऽ सांस्कृतिक चिन्तनपर रुढ़िवादिताक पुनः प्रकोपक विस्तृत छायासँ बौद्धिक आऽ साहित्यिक प्रगतिक समक्ष अवसादपूर्ण वातावरणक परिव्याप्त भऽ गेलैक। तथापि मैथिली साहित्य जगतमे उत्कर्ष अनबाक निमित्त अपन परम्परागत परिधानक परित्याग कऽ नव प्रवृत्तिक रचनाकारक प्रादुर्भाव भेल जाहिमे मातृभाषानुरागी आऽ प्रकाशनक सौविध्यसँ साहित्य नव रूप धारण करय लागल जकर नेतृत्व कयलनि कवीश्वर चन्दा झा (१८३०-१९०७), कविवर जीवन झा (१८४८-१९१२), पण्डित लालदास(१८५६-१९२१), परमेश्वर झा (१८५६-१९२४), तुलापति सिंह (१८५९-१९१४), साहित्य रत्नाकर मुन्शी रघुनन्दन दास (१८६८-१९४५), मुकुन्द जा बक्शी (१८६०-१९३८), जीवछ मिश्र (१८६४-१९२३), चेतनाथ झा (१८६६-१९२१), खुद्दी झा (१८६६-१९२७), मुरलीधर झा (१८६८-१९२९), जनार्दन झा “जनसीदन”, सर गंगानाथ झा (१८७२-१९४१), दीनबन्धु झा (१८७३-१९५५), रामचन्द्र मिश्र (१८७३-१९३८), बबुआजी मिश्र (१८७८-१९५९), गुणवन्तलालदास (१८८०-१९४३), कुशेश्वर कुमर (१८८१-१९४३), विद्यानन्द ठाकुर (१८९०-१९५०), कविशेखर बद्रीनाथ झा (१८९३-१७४), पुलकितलालदास (१८९३-१९४३), गंगापति सिंह (१८९४-१९६९), उमेश मिश्र (१८९६-१९६७), धनुषधारीलालदास (१८९६-१९६५), भोलालालदास (१८९७-१९७७), अमरनाथ झा (१८९७-१९५५), राजपण्डित बलदेव मिश्र (१८९७-१९६५), कुमार गंगानन्द सिंह (१८९८-१९७०), ब्रजमोहन ठाकुर (१८९९-१९७०) एवं रासबिहारीलालदास आदि-आदि जे विविध साहित्यिक विधादिक जन्म देलनि आऽ एकरा सम्वर्धित करबाक दृढ़ सन्कल्प कयलनि। वस्तुतः विगत शताब्दी मैथिली साहित्यक हेतु एक क्रान्तिकारी युगक रूपमे प्रस्तुत भेल। अंग्रेजी राज्यक स्थापना देशक साहित्यिक, वैज्ञानिक, राजनैतिक, आर्थिक आऽ सामाजिक क्षेत्रमे एक नव स्फूर्ति प्रदान कऽ कए मिथिलांचलक जीवन-शैली आऽ सोचक पुनर्संस्कार कयलक। एहि शताब्दीमे आधुनिक शिक्षा, छापाखाना आऽ सरल यातायातक सुविधाक अभाव रहितहुँ मैथिलीमे साहित्य सृजनक परम्परा वर्तमान रहल। बहुतो दिन धरि मैथिली साहित्य संस्कृत साहित्यक प्रतिछाया सदृश रहल। एहिमे साहित्यिक एवं अन्य प्रकारक लेखन निरन्तर होइत रहल। दुइ विश्व युद्धक बीचक कालमे मैथिली साहित्यक सर्वांगीन समुद्धारक चेतना अनलक। एहि कालक लेखनमे ई नव मनोदशा प्रतिफलित भेल आऽ साहित्यक विभिन्न विधामे उल्लेख्य योग्य परिवर्तन भेल। जितमोहन झा घरक नाम "जितू"  जन्मतिथि ०२/०३/१९८५ भेल, श्री बैद्यनाथ झा आ श्रीमति शांति देवी केँ सभ स छोट (द्वितीय) सुपूत्र। स्व.रामेश्वर झा पितामह आ स्व.शोभाकांत झा मातृमह। गाम-बनगाँव, सहरसा जिला। एखन मुम्बईमे एक लिमिटेड कंपनी मे पद्स्थापित।रुचि : अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली ।पसंद : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि। कन्या भ्रूण हत्या, प्रकृति के साथ खिलवार पिछला छुट्टीमे एक सालपर हम गाम गेल छलहुँ। जहिया गाम पहुँचलहुँ ओकर दोसरे दिन पता चलल की हमर बचपनक दोस्तक बहुत जोर मोन ख़राब छनि ! आर ओ अस्पतालमे भरती छथि ! खबर जहिना हम सुनलहुँ अस्पतालक लेल चलि देलहुँ ! हमरा संग हमर पत्नी सेहो चलि देलीह, अस्पताल पहुंचला पर पता चलल जे कुनू चिंताक बात नै सब ठीक ठाक अछि ! एक घंटाक बाद हुनका (हमर दोस्तकेँ) छुट्टी मिल जेतनि, बहुत दिनक बाद अस्पताल आयल छलहुँ, इच्छा भेल कनी चारू दिस घुमि - फिरि ली। मनमे अस्पतालक लेल बहुत जिज्ञासा छलए ! हम आर हमर पत्नी जहिना दोस्तक वार्डसँ बाहर निकललहुँ, हमर नज़रि अपन चचेरा भैया - भाभी पर पड़ल, अचानक हुनका सभकेँ अस्पतालमे देखिकेँ हम चौक गेलहुँ ! हमर नज़र एकाएक भाभीक उदास, कनमुँह चेहरा पर परल .....पुछलियनि की बात ... मुदा ओ किछु जबाब नञि देलीह। हमर पत्नी कातमे बजा कए हुनकर पीड़ा सुनलन्हि ! दुबारा पुछलासँ भाभी अपन पीड़ा नञि रोकि सकलीह, हुनकर पीड़ा हुनकर आँखिसँ छलकि उठलनि, पता चलल जे दू गोट कन्याक जन्मक बाद आब तेसर बेर फेरसँ कन्याकेँ नञि बर्दाश्त करैक चेतावनी भैया हुनका पहिने द् चुकलकिन-ए ....पता चलल गर्भ परिक्षण लेल भैया भाभीकेँ अस्पताल अनने छथि ! गर्भमे पोसा रहल बच्चाक प्रति पिताक खौफनाक इरादासँ उपजल भयक भाव भाभीक चेहरा पर साफ - साफ देख्अलहुँ ! बादमे हमरा आर हमर पत्नी केँ कतेक बुझेलापर भैया भाभीकेँ वापस घर लए गेलखिन ! संयोगवश अगला संतानक रूपमे हुनका बालकक प्राप्ति भेलनि .... ओना भ्रूण परिक्षण प्रतिबंधित अछि आर सरकार एकरा लेल बाकायदा कानूनो बनेने छथि ! मुदा ई की ? लागैत अछि पिछला दरवाजाक संस्कृति अस्पतालों के नञि छोड़ने अछि, तखने तँ भैया बहुत आसानीसँ भाभीकेँ गर्भ परीक्षण करबाबए लेल चलि देने छलथि। हम तँ कहए छी चाहे सरकार लाखो कानून बनबथि, लाखो कड़ासँ कड़ा सजा तय करथि लेकिन जा तक हम सब स्वयं अपना तरफसँ कुनू कदम नञि उठायब ई कानूनक हेब नञि हएबक समान अछि ! आइ तक भ्रष्ट्राचार, बालश्रम, शोषणक विरुधो सरकार बहुत कानून लागू केलथि मुदा कि समाजमे एकर रोकथाम भs सकल ? नञि ! आर यदि अपने ई नञि हेबाक कारणक पता करब तँ पायब कि शायद हम खुद कतहु ने कतहु कुनू न कुनू प्रकारे एकर दोषी छी ! हम सब परिस्थितिक संग कुनू तरहक समझौता करबाक वजाय ओकरा सदा बदलबाक फेरमे नए रहैत छलहुँ चाहे ओकरा लेल हमरा सभ के कुनू तरहक हथकंडा कियेक नञि अपनाबए परए .... हम सब चुकय नञि छी ! हम तँ पूछे छी जे कि कारण अछि जे लड़कीक जन्म भेला पर आइयो मूह सिकोरल जाइत अछि ? शायद हुनकर परवरिश, शिक्षा, विवाह आदिमे आबै वाला तमाम मुश्किलक कारण एहि तरहक व्यवहार कएल जाइत अछि ! मुदा कि लड़काक जन्म भेनेसँ ई तमाम समस्या समाप्त भs जाइत अछि ? लड़कोकेँ तँ परवरिश करए परए-ए ? हुनकरो शिक्षा,नौकरीक लेल दर-दर भटकए पड़ैत अछि ! आर विवाह ........! यदि एहि गतिसँ कन्या भ्रूण हत्या होइत रहत तँ बूझि लिअ जे सब लड़काकेँ कुंआरे रहए पड़त ! उदाहरण स्वरूप अपने हरियाणामे लड़कीक संख्यामे लगातार दर्ज कएल गेल कमी देख सकैत छी, हरियाणामे विवाह लेल लड़की नञि भेटए छनि। ओहि ठामक लोकनीकेँ दोसर राज्यमे लड़कीक तलाश करए पड़ैत छनि ..... कनी सोचु अगर पूरा देशमे ईएह स्थिति भs जाएत तँ की होएत ? हम नीक जेकाँ जनैत छी जे अपने एहि बातकेँ ध्यानमे नञि राखब आर यदि राखबो करब तँ दोसर केँ उदाहरण देबाक लेल ! लेकिन कि अपने स्वयं कन्या भ्रूण हत्या रोकएमे दोसरकेँ जागरूक करब ? अपनेकेँ नञि लागैत अछि जे प्रकृति द्वारा निर्धारित जीवनकेँ सुचारू रूपसँ चलबै लेल एहि गाड़ीक दुनु पहियाक समान रूपसँ आवश्यक अछि ! आर कन्या भ्रूण हत्या यानी कि प्रकृतिक संग खिलवाड़ अछि ! एहि खिलवाड़केँ रोकए लेल हमरा सभकेँ एकजुट हेबए परत आर एतबे नञि एहि मानसिकतोकेँ बदलए पड़त कि वंशबेल खाली आर खाली लड़के चलेता, तखने हम सही रूपामे आधुनिक कहाएब .... भक्तिगीत- जितमोहन झा मात पिता गुरु प्रभु चरणमे प्रणवत बारम्बार हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। माताजी जे कष्ट उठेलखिन्ह ओऽ ऋण कहियो नञि चुकलऒ, आंगुर पकड़ि कs चलब सिखेल्खिन्ह ममताक देलखिन शीतल छाया, जिनकर कोरामे पलिकए हम कहेलहुँ होशिया॥ हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। पिताजी हमरा योग्य बनेलथि कमा-कमा कऽ अन्न खुएलथि, पढा लिखा गुणवान बनेलथि, जीवन पथ पर चलब सिखेलथि, जोड़ि-जोड़ि अपन सम्पति केँ बनाऽ देलथि हक़दा। हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। सत्य ज्ञान गुरूजी बतेलथि, अंधकार सभ दूर हटेलथि, ह्रदयमे भक्तिक दीप जरेलथि,हरी दर्शनक मार्ग बतेलथि, बिना स्वार्थ्क कृपा केला ओऽ कतेक पैघ उदार। हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। प्रभु कृपासँ नर तन पेलहुँ संत मिलनक साज सजेलहुँ, बल बुद्धि आर विद्या दऽ कs सभ जीवमे श्रेष्ठ बनेलहुँ, जे कियो हिनकर शरणमे एल्खिन,भेलन्हि हुनकर उद्धार। हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। ज्योति प्रकाश लाल, ग्राम-जगतपुर, सुपौल, बिहार (भारत)। ज्योतिप्रकाश लाल विप्रो टेक्नोलोजी, हैदराबादमे सॉफ्टवेअर अभियन्ता छथि, स्पेन आऽ यू.एस.ए.मे पहिने काज कए चुकल छथि। एप्लिकेशन आऽ वेब आधारित सॉफ्टवेअरक निर्माणमे संलग्न। माइक्रोसॉफ्ट कॉरपोरेशन, वाशिंगटनमे विन्डोज ऑपेरेटिंग सिस्टमपर शोध आऽ विकासमे योगदान। स्कूल, कम्प्य़ुटर इंस्टीट्यूट आऽ सरकारी पोलीटेकनिकमे शिक्षणक पूर्व अनुभव। वर्तमानमे साक्षातकार आऽ व्यक्तित्व विकासपर पोथी लिखबामे व्यस्त। श्री लालमे संगठनात्मक शक्ति छन्हि आऽ ओऽ विभिन्न ग्रुप आऽ फोरमसँ जुड़ल छथि। किछु आर अनुभवी सहयोगीक संग ओऽ www.jyoticonsultant.com द्वारा मुफ्त कैरिअर सुझाव दए रहल छथि। आजुक समय मे कम्प्युटर शिक्षाक महत्व (Importance of Computer Education in Modern Days) कम्प्युटर: कि आ किएक? आजुक दिन मड कम्प्युटर शब्द किनको सँ बाँचल नहि अछि। ओना तँ हिन्दी वा मैथिली मँ कम्प्युटरक नामि अछि “संगणक” मुदा ऍहि नामि सँ बहुतो लोकनि अनभिञ होयब आओर ई शब्द किछ अनगराईल बुझायल जायति। खैर…. अपन मातृभाषा मैथिली मे एहेन ढेर अंग्रेजी शब्दक प्रयोग करैत छी जे विशुद्ध मैथिली मे विचित्र बुझाएल जायति छैक। आइ केँ दिन मे सभ केँ ‘कम्प्युटर साक्षर‘ (Computer Literate) होवाक चाही। ‘कम्प्युटर साक्षरता‘ (Computer Literacy)  सँ मतलब जेँ कोनो भी आदमी ‘कम्प्युटर अनुप्रयोग‘ (Computer Applications) कँ प्रयोग मे लाबि सकैथि। दोसर तरहेँ यदि इ बात केँ कही तँ एकटा ऐहेन आदमी जेँ कम्प्युटर कँ प्रयोग कड केँ कोनो काम कड सकैथि। कम्प्युटर सँ लगभग सभ काम भड सकैति अछि। जाहि कारणे वर्तमान समय मे कम्प्युटर एकटा महत्वपुर्ण अंग बैनि गेइल छैक। आजुक छोट – मोट व्यापारीयो एकटा कम्प्युटर खरीदबाक आ कम्प्युटर ऑपरेटर रखवाक हिम्मत करैत छैथि। एकर लोकप्रियता आ माँगक पाँछा ढेर कारण अछि। उदाहरणक तौर पर देखि तड: जेना कोनो दरख्वास्त वा चिठ्ठी कोनो ओफिस मे देबाक जरुरत होयत अछि तड दरख्वास्त कँ टाइपराइटर (Typewriter) पर टाइप करा कँ देति छी, मुदा इ टाइप करायल दरख्वास्त मे बहुतो कमी आ अपुर्णताक संभावना रहैति छैक, जेना Spelling Mistakes के संभावना, पाराग्राफक Alignment मे समस्या, पृष्टक Margins मे समस्या, इत्यादि। इ सभटा समस्याक समाधान अपने कम्प्युटर सँ  बिना बहुत कठिनाई सँ कँ सकैति छी। कम्प्युटर मे Spelling Checking केँ सुबिधा अछि जेँ अपने – आप बता दैति जेँ कोन – कोन शब्द्क हिज्जै (Spelling) गलत अछि। एकर अलावा कम्प्युटर Grammatical Errors सेहो पकैर सकैति अछि। इ सब सुविधा (Facilities) सँ लिखल दरख्वास्त वा चिठ्ठी मे कोनो Spelling Mistakes आ Grammatical Errors केँ संवाभना कम अछि। पाराग्राफक Alignment आ Margins केँ तरीका बहुत ही सुविधाजनक अछि। एकर अलावे एकटा दरख्वास्त वा चिठ्ठी लिखवाक आ ओकर छायाप्रति (Printouts) निकलवाक तक जेँ – जेँ सुविधा (Facilities) होवाक चाहि वो सभटा कम्प्युटरक सोफ़्ट्वेयर पैकेज (Software Package) मे छैक। वर्तमान समय मे कम्प्युटर बहुत आँगा बढि गेल अछि। Banking Sector मे जहिना धुम – धडाका सँ प्रयोग मे अछि तहिना Medical केँ क्षैत्र मे। जहिना रेलक सवारी केँ आरक्षण मेँ कम्प्युटरक Whistle बाजि रहल अछि तहिना हवाई जहाज केँ सेहो उड़ा रहल अछि। मोटा – मोटी यदि एक लाईन मे कही तँ नवयुग मे कम्प्युटर ओहिना सब क्षैत्र मे जरुरी अछि जहिना तरकारी मे नोन। वर्तमान समय मे कम्प्युटरक आवश्यकता केँ आधार पर इ कहल जा सकैति अछि जेँ यदि अहाँ कम्प्युटर नहि जानैत छी तँ अहाँ निरकक्षर छी। अंग्रेजी मे सेहो मुहावरा (Proverb) बनि गेल अछि – “If you are not a computer literate it means you are illiterate.” आइ केर समय मे जिनका पास Internet केँ सुविधा उपलव्ध अछि तँ हुनका लेल बहुतो चीज बदैलि गेल छैकि। यदि आइ केँ समय सँ दस – बारह साल पाँछा केँ समय मे जाई आ पत्राचारक माध्यम केँ बारे मे सोची तँ पहिले स्मृति-पट्ल पर थोक मे पोस्टकार्ड, अन्तरदेशी आ लिफाफाक खरीदवाक बात आबि जायति। एकर पाँछा एकटा कारण अछि जेँ ओहि समय मे पत्राचारक माध्यम लेल पोस्ट – ऒफिश केँ प्रखर भुमिका छलि। आओर सबहक लेल डाकक माध्यमे सुगम आ सरल छलि। पत्र कें अलावे गाम – गाम मे मनीओडर पहुँचेबाक मे सेहो डाक अग्रणी छळि। एवम प्रकारे डाक पत्राचारक आ मनीओडर वास्ते एक मात्र साधन बुझला जायति छलि। मुदा नहुँए – नहुँए समय आ दुनिया मे परिवर्तनक लीला जारी रहैत अछि। ई पत्राचारक परिवर्तनक लीला मे कुरियर (Courier) आ ई-मेल (E – mail / Electronic - Mail) आयलि आ धुम – धड़ाका सँ पत्राचारक माध्यम पर कब्जा कँ लेलक। आजुक दिन मे जिनका कुरियर वा ई – मेलक सुविधा अछि वो सब पोस्ट – ऒफिश केर रास्ता – पेरा बिसरि गेल छैथि। सब लोकनि जेँ प्रत्येक दिन डाकिया केर इंतजार मे दरवाजा पर एकटक लगा केँ बैठल रहैति छलाह वो सब आई डाकिया केँ चिन्हेतो नहि छैथि। कारण बहुतो पत्राचार ई – मेल सँ ही सम्भव भड जायति अछि, खास कड केँ शहरी परिवेश मे। किएक?? आ ई – मेल केँ प्रखर जगह बनेवाक कारण की? एकर कारण तँ बहुत अछि आ ताहि मे सब सँ पैघ कारण अछि जेँ ई – मेल बहुत ही सस्ता आ तेज अछि। सस्ता सँ मतलब अछि जेँ यदि हम एकटा दस पन्ना केँ पत्र कतोँ डाक सँ भेजब तँ जेँ भेजबा मे पाय लागत वो पाय ई – मेल भेजबा मे लागल पाय सँ बहुत ही ज्यादा होयत। आओर तेज सँ मतलब जेँ डाक सँ भेजल पत्र यदि गन्तव्य स्थान पर चारि दिन मे पहुँचत तँ ई – मेल कयलि पत्र दुइ मिनट मे गन्तव्य स्थान पर पहुँचि जायति। एकर अलावा डाक सँ भेजल पत्र कँ गन्तव्य स्थान सँ ही पावि सकैति छी मुदा ई – मेल केँ कोनो स्थान पर पावि सकैत छी। मतलब डाक सँ भेजल पत्र यदि कोलकत्ताक केँ अछि तँ वो पत्र कोलकत्ता मे ही प्राप्त भड सकैत अछि, मुदा ई – मेल मे वो बात नहि अछि; ई – मेल कँ विश्व केँ कोनो जगह मे पावि सकैत छी। आइ यदि कोनो शहर मे नौकरी खोजवा लेल जाइ तँ साक्षात्कार (Interview) लेबे बलाक पहिल प्रश्न यैहि होयत जेँ “कम्प्युटर केँ जानकारी अछि? ” वा “Do you know computers?”.  आइ छोट – मोट अस्पतालो मे बिल वा रसीद कम्प्युटर सँ निकालल जायति अछि। यैहि काम पहिल समय मे बिना कम्प्युटर सँ होयति छलि। यदि विकसित शहर केँ किराना दुकान कँ देखि तँ वो दुकान सँ भी कोनो समान खरीदवाक वाद कम्प्युटर सँ ही निकलल रसीद भेटत। दैखि तँ कम्प्युटर पुरा दुनिया मे छा रहल अछि चाहे वो दवाई केँ दुकान मे हो वा बैक मे। कम्प्युटर प्रयोग करवा सँ मुख्य लाभ: (अ)  समयक बचत (Saving of Time): कम्प्युटर प्रयोग करवा सँ समयक बहुत बचत होयति अछि। जेँ कोनो हिसाब – किताब करवा मे ७ – ८ घंटा लगैति अछि, ओहि काम कड कम्प्युटर ७ – ८ मिनट मे कड सकैति अछि। (ब) एकदम सही परिणाम (Accuracy in Results):कम्प्युटर कोनो भी हिसाब – किताबक परिणाम सही दैति अछि। कोनो तरह केँ हिसाब मे गलती नहि करैत अछि। (स) दुबारा काम करवाक जरुरत नहि (Elimination of Repeatitive Tasks): कोनो काम एक बेर जँ कम्प्युटर सँ भड गेल अछि तँ ओहि काम केँ Save कड केँ रखवाक बाद दुबारा ओहि काम केँ बिना करनाय परिणाम पावि सकैति छी। (द) आदमी केँ मेहनतक बचत (Saving of Man Powers): यदि एक आदमी सँ कम्प्युटर प्रयोगक उपरांत आठ घंटा मे सँ छः घंटाक बचि जायति अछि तँ वो छः घंटाक उपयोग कोनो दोसर काम मे भड सकैति अछि जाहि सँ उत्पादन (Production) बढ़ि सकैति अछि। (म) थकावटक संभावना नहि (Lack of Tiredness or Always attentive): आदमी लगातार ४ – ५ घंटा काम करत तँ छःटम घंटा मे काम करवाक रफ्तार आ फुर्ती कम भड जायति अछि। मतलब आदमी मे थकान महसुस करवाक अवगुण वा गुण अछि मुदा कम्प्युटर एक मशीन रुप मे थकान अनुभव नहि कड सकैति अछि। कम्प्युटर आठ घंटा लगातार काम करक उपरांतो नंवम घंटा मे काम ओहिने रफ्तार आ फुर्ती सँ करैत अछि जाहि रफ्तार आ फुर्ती सँ वो पहिल घंटा मे करल छलि। कना पाबि कम्प्युटरक शिक्षा: सब नौकरी करैय बला दुइ तरहेँ कम्प्युटरक शिक्षा पावैति अछि। पहिल, रोजगार करैय बला केँ अपन कम्पनी सँ खुद कोनो – कोनो कम्प्युटर साक्षरता योजना केँ अन्तरगर्त्त शिक्षा वा ट्रेनिंग (Training) मिल जायति अछि। दोसर, नौकरी खोजनिहार केँ नौकरी ढुढ़वा सँ पहिले कोनो डिपलोमा (Diploma) केँ कोर्स (Course) करै परैति छैक। कम्प्युटर शिक्षा (Computer Education) आजुक दिनक जरुरत बनि गेइल छैक। जिनका – जिनका नौकरी लेवाक अछि हुनका सभकेँ प्रारंभिक जानकारी (Fundamental Knowledge of Basic Computer Operation) चाहवे करी। कम्प्युटर शिक्षित (Computer Literate) होवाक लेल अनेको साघन अछि, जेना: (अ)         Short - term Computer Course or Diploma: आजुक दिन शहर – शहर मे अनेको कम्प्युटर सँस्थान खुजलि अछि। जाहि सँ तीन, छः वा बारह महीना केँ कोर्स (Course) कड सकैति छी। कुछ कोचिंग सँस्थान (Coaching Institute) वगैरह सेहो खुजलि अछि जाहि जगह सँ जरुरतक क्रैश कोर्स (Crash Course) सेहो कड सकैति छी। (ब) कोनो कम्प्युटर कोच (Computer Coach) सँ: अगर सुविधा भड सकै तँ कोनो कम्प्युटर जानिहार कड पकैर सकैति छी। जेना घर मे केओ भाई, कोनो चाची वा कोनो दोस्त, तँ हुनका सँ सेहो कम्प्युटर सीख सकैति छी। Privite Jobs मे तत्कालिक रुप सँ कोनो सर्टिफिकेटक (Certificate) केँ जरुरत नहि होयत। बाद मे मँगला पर कम्प्युटर कोर्स कड केँ सर्टिफिकेट द्ड देबैकि। (स) किताबक मदद सँ: अगर घर मे कम्प्युटर अछि तँ, जे विषय वा सोफ्ट्वेयर पैकेज (Software Package) सिखवाक अछि, वो किताव बाजार सँ खरीद केँ कम्प्युटर सीख सकैति छी। (द) CD - Rom केँ सहायता सँ: बाजार मे बहुतो CD – ROM (Compact Disk – Read Only Memory) वा CD बहुतो कम्प्युटरक Basic Courses वा Operations केँ लेल मिलैत अछि। जाहि सँ लगभग सभटा Basic Computer Operations सीखल जा सकैति अछि। गाँव – देहहात मे कम्प्युटरक उपयोग आजुक समय मे ओरगेनिक खेती (Organic Farming) केँ बहुत बोल – बाला अछि। आओर ढ़ेर Software Packages कृषि केँ लेल Applied Computer Science केँ आधार पर उपल्ब्ध अछि जाहि सँ धान, गेहुँ इत्यादि फसल सभ केँ उत्पादन मे नया रुप देल जा सकैत अछि। साथे – साथ Pest Control, Weed Control, Plant diseases इत्यादि के सेहो पह्चानि सकै छी। इ सभक वास्ते Multi - Media (जेँही सँ फोटो देखल जा सकैति अछि आ सँगे – सँग आवाजो सुनल जा सकैत अछि)  आधारित Software Package (Software Application) बनल अछि आओर सुबिधापुर्वक देखल आ सुनल जा सकैति अछि। एकर अलावा इ Software केँ मदद सँ भिन्न प्रकारक कृषि – संबंधी Decision - Making सेहो भड सकैति अछि। यदि कम्प्युटर शिक्षित छी तँ आइ केँ दिन मे बैंकिग ए.टी. एम (ATM), जेँ छोट – छोट शहर आ बाजार मे उपलब्ध अछि, कँ ओपेरेट करवा मे आसानी होयत। पैसा निकाल – बाहर करैय मे कोनो दिक्कत नहि होयति। एकर अलावे लगभग सभ बैंक मे Internet Banking केँ सुबिधा उपलब्ध अछि। इ सुबिधाक उपयोग वो व्यक्ति कँ सकैति छैथि जिनका Computer Operation बुझल होय। आइ केँ समय मे ए.टी. एम (ATM) आकारक रेलवे आरक्षण मशीन लगभग प्रत्येक रेलवे स्टेशन पर मिल जायति। आ ओकर Operation कम्प्युटर जँका होयति छैक। कम्पुटर सिखला उपराँत आरक्षण करवा मे सुविधा होयति। इ एकटा कम्पुटर सीखल व्यक्ति कँ Indirect फायदा होयत। आजुक दिन मे गाँव – देहहात मे Teachers Training मे काफी दिक्कत आ Staff केँ कमी होयति अछि। यदि कम्पुटर सँ Training देल जाय तँ Training ज्यादा प्रभावी आ सफल होयति। कम्पुटर सँ Video - Conferencing भ सकैति अछि। Video - Conferencing सभ क्षैत्र मे बढ़िया भुमिका निभायत, चाहे Pest Control वा Teachers Training होय। कम्पुटर शिक्षित व्यक्ति यदि कोनो बाहरक यात्रा (Tour and Travels) करवा लेल सोचेत छैथि तँ हुनका इन्टरनेट सँ सभटा Tourism Department केँ जानकारी प्राप्त भ सकैति अछि। वो Online Hotel Booking, Ticket Booking इत्यादि कँ सकैति छैथि। गाँव मे कियो Printing Press स्थापित करवा लेल सक्रिय छैथि तँ हुनक बढ़िया Publishing केँ लेल कम्पुटर आ Publishing Software के व्यवस्था करैक चाही। गृहणी / अवकाश – प्राप्त व्यक्ति के लेल कम्प्युटर शिक्षा हम एक बेर गाम पर एकटा एम. ए. (M. A.)  पास भौजी, जेँ पटना मे रहैति छथिन्ह, सँ पुछ्लहु, ’ये भौजी, ये भौजी, अहाँ पटना मे रहैत छी, खाली समय मे जखन बच्चा सब स्कूल मे रहैत अछि, कम्पुटर किएक नहि सीख लैत छी, आगु काम दैति’। जबाब मे भौजी बाजलिह, ’धोड़ि जाउ, हम की करब कम्पुटर – फम्प्युटर सीख कैय’। मुदा आइ छोट – छोट शहरक नजरिया बदलि गेल छैकि। छोट – छोट शहर मे कौल – सेन्टर (Call - Centre), डाटा – ईन्ट्री (Data - Entry) इत्यादि खुजि गेल छैक आ ओकर काम मिलैत छैक। कौल – सेन्टर मे अँग्रेजी के अलावा हिन्दी मे सेहो Customer Handling होयत छैक। डाटा – ईन्ट्री जेँ एकटा पढ़्ल – लिखल औरत भि अपन ४ – ५ घंटा समय द्ड कड पुरा कड सकैति छैथि। इ काम एकटा अवकाश – प्राप्त व्यक्ति भि कड सकैति छैथि। छोट – मोट जगह पर DTP, Accounting Package वा Graphics Designing जानकार आदमी केँ जरुरत होयति छैक आ इ कोर्स करवा मे कोनो ज्यादा समय नहि लागैति छैक। ३ – ६ महिना मे कियो आदमी इक बढ़िया Trainer केँ Guidance मे Expert भड सकैति छैथि। कोन कम्प्युटर खरीदी? Branded वा Assembled Computer? पहिल चीज जेँ अहाँक जरुरत आ बजट केहेन अछि? Branded कम्प्युटर मे fixed type केँ Machinery रहैति छैक आ Assembled मे अपन जरुरतक मुताबिक Machinery लगवा सकैति छी। तुल्नात्मक ढ़ंग सँ देखि तँ Assembled कम्प्युटर सस्ता परत। मुदा जखन कम्प्युटर Assemble कराबी तँ जान-पह्चान बला दुकान वा आदमी सँ करायब तँ बढ़िया रहत। कोन Type केँ कम्प्युटर खरीदी? Laptop वा Desktop कम्प्युटर खरीदी? Laptop ऐहेन कम्प्युटर अछि जकरा अहाँ कतों आराम सँ Move कड सकैति छी, सुतैत – बैठेति काम कड सकैति छी। मोटा – मोटी कही तँ Laptop वो व्यक्ति कड बढ़िया सँ Suit करैति छैक जेँ व्यक्ति कड सदिखन Mobile रहै पड़ेति छैक। विद्दार्थी लोकनि लड Desktop Computer हि बढ़िया होयति छैक। कुर्सी पर बैठ कड केँ काम करवा मे आलस आ सुस्ती ऐवाक संभावना कम रहैति छैक। विद्दार्थी लोकनि केँ आलस कम होयतैन तड पढ़वा मे ज्यादा मन लागतैन। केहेन Configuration केँ कम्प्युटर खरीदी? जखन कम्प्युटर खरीदवाक हुए तँ इ बात ध्यान मे राखल जाय जेँ कम्प्युटर लेबे केँ कि उद्देश्य अछि? आ कम्प्युटर सँ कि काम करवाक अछि? कोनो सामान्य Data Entry आ Composing केँ वास्ते Hi - Fi कम्प्युटर केँ जरुरत नहि अछि। हाँ, जेँ केयो D.T.P. (Desk Top Publishing) वा Publisher केँ कामक लेल कम्प्युटर खरीदवाक इच्छुक छैथि तँ हुनका लेल उत्तम कम्प्युटर होवाक चाहि। ओना एकटा बात इलेक्ट्रोनिक सामान (Electronic Goods) मे सदिखन ध्यान मे राखि जेँ आइ जेँ समान केयो खरीद कड रहल छैथि, छः मासक उपरांत ओहि समान सँ उत्कृष्ट समान आ सस्ता सेहो बाजार मे उपलब्ध भड जायति। ताहि कारणे कम्प्युटर जखन खरीदी तँ Advanced  वा Latest Configuration केँ साथ खरीदी। जाहि कारणे भविष्य मे २ - ३ सालक उपरांत Compatibility बनल रहत। कम्प्युटर खरीदवा मे मुख्यतः CPU आ ओकर Speed, RAM केँ क्षमता (Capacity), Hard Disk केँ Storage Capacity आ Monitor केँ ध्यान मे राखवाक प्रयास होयवाक चाहि। Hardware Recommendation for a new computer(एकटा सलाह) CPU:2.0/ 2.6 GHz Pentium IV RAM: 512 MB/ 1 GB Warranty: सब Hardware पर १ – ५ सालक वारंटी मिलत, इ लेल दुकानदार सँ खुलाशा कड केँ बात कड लेबा सँ बढ़िया रहत। सँगे – सँगे कम्प्युटर पर जेँ भि Software Package वा Operating System चाहैत छी वोहि लेल सेहो दुकानदार के पहिले बता देला सँ ठीक रह्त। कम्प्युटर बना रहल अछि आदमी केँ जीवन सरल: पहिले हि ढ़ेर गप – शप कम्प्युटर केँ उपयोगिता आ लाभ पर भड चुकल अछि, जाहि मे देखल गेल जेँ कम्प्युटरक सहयोग सँ शीघ्रता, सही आ संगठित रुपेन काम सम्भव अछि। मुदा किछ बात और अछि जेँ सभ व्यक्ति केँ लेल उपयोगी अछि। जेना ई-मेल एकटा ऐहेन बढ़िया सुविधा अछि जकरा सँग सुबह, दुपहरिया, साँझ वा राति, सदिखन उपयोग मे ला सकैति छी। विद्दार्थी लोकनि खातिर बढ़िया – बढ़िया पुस्तक CD केँ रुप मे उपलब्ध अछि जाहि सँ सभ विषयक तैयारी आ Exercise इक सही (Systematic) रुपेन सम्भव अछि। बहुतो संख्या मे इन्टरनेट पर Online Books आ Exercise सेहो उपलब्ध अछि। जाहि सँ विद्दार्थी लोकनि केँ पढ़ाई – लिखाई सुगम भड सकैति अछि। अखबार घर पर मँगावी वा नहि मँगावी, सँगे – सँगे घर पर अखबार पढ़वाक मौका लागे वा नहि लागे, मुदा इन्टरनेट केँ द्वारा सभटा अखबार, चाहे हिन्दी मे हो वा अंग्रेजी मे, पढ़ि सकैति छी। मतलब अनेको अखबार आ E-Journels इक कम्प्युटरक माउस (Mouse) केँ Click सँ पाबि सकैति छी। एकर अलावे सभटा टी.वीक (TeleVision) News Channels केँ Website सेहो उपलब्ध अछि, वो Website सँ Audio आ Video दुनु तरहक समाचारक आनंद लड सकैति छी। ऐतवे नहि Online Channels सेहो उपलब्ध अछि, जे ठीक TV केँ प्रतिरुप अछि। बाजार मे TV Tunner Card सेहो उपलब्ध छैक। इ Card कम्प्युटर मे लगा कड TV केँ आनंद कम्प्युटर सँ हि भेट सकैति अछि। मनोरंजन केँ बहुतो साधन मे कम्प्युटर सँ FM Radio वगैरह सेहो सुनल जा सकैति छैक। आइ – कालि बहुतो Online Games आ Games CD बाजार मे उपलब्ध छैक जाहि सँ बच्चा लोकनि सहित सभ समुह केँ व्यक्ति बढ़िया मनोरंजन कड सकैति छैथि। एकर अलावा अनेका – नेक सुविधा अछि जाहि केँ विवरण इ Article केँ Coverage सँ बाहरि अछि। आशा अछि अपनेक लोकनि कड इ लेख उपयोगी होयति। एकर अतिरिक्त हम इक मैथिल होवाक नाते अहाँ केँ कोन तरहेँ, कोनो सहायता वा दिशा – निर्देश कम्प्युटरक क्षैत्र मे कड सकैति छी? हमर शोभाग्य होयति अपनेक कोनो सहायता करवा मे। जिनको कोनो जानकारी लेवाक हुए तँ हमर E-Mail (JYOTIPRAKASH.LAL@GMAIL.COM) पर संपर्क कड सकैति छी। हमर नि:स्वार्थ इच्छा अछि जेँ मिथिलाक घरे – घरे कम्प्युटर जानिहार हुए। आशा अछि जल्द हि अपनेक लोकनिक समच्छ हमर लिखल एकटा किताब, जकर नामि अछि “HOW TO GET A JOB”, प्रस्तुत होयति आ जाहि सँ सब लोकनि (रोजगार वा वेरोजगार) केँ इक बढ़िया नौकरी (Job) पाबि मे मार्गदर्शन करत। अंत मे कहल जा सकैति अछि जेँ कम्प्युटर केवल उपयोगी नहि अछि साथे – साथे नौकरी पावैक लेल एकटा साधनो बनि गेल अछि। सुशांत झा,ग्राम+पत्रालय-खोजपुर, मधुबनी(बिहार),हिनकर पिता श्री पद्मनारायण झा 'विरंचि' ताहि समयक मिथिला मिहिर आऽ आर्यावर्तक प्रसिद्ध स्थाई स्तंभकार। पठन-लेखन विरासतमे भेटल छन्हि सुशान्तजीकेँ। सम्प्रति सुशांत जी इंडिया न्यूजमे कॉपी राईटर छथि,-मिथिला विश्वविद्यालयसँ स्नातक(इतिहास), तकर बाद आईआईएमसी(भारतीय जनसंचार संस्थान) जेएनयू कैम्पससँ टेलिविजन पत्रकारितामे डिप्लोमा(2004-05) ओकरबाद किछु पत्र-पत्रिका आऽ न्यूज वेबसाईटमे काज,दूरदर्शनमे लगभग साल भरि काज। संप्रति इंडिया न्यूजसँ जुड़ल| की बलिराज गढ़ मिथिलाक प्राचीन राजधानी अछि? हमर गाम खोजपुरसँ करीब एक किलोमीटर दक्षिण दिस बलिराजपुर नामक एकटा गाम छैक। ई गाम मुधुबनी जिला मुख्यालयसँ करीब 34 किलोमीटर उत्तर-पूब दिसामे छैक। एतय एक टा प्राचीन किला छैक जे 365 बिगहामे पसरल छैक आऽ एकर देखभाल भारत सरकारक पुरातत्व विभाग कऽ रहल अछि। किलाक खुदाई भेलापर एहिमे सँ मृदभांड आऽ विभिन्न तरहक बस्तु निकललए आऽ सोनाक सिक्का सेहो भेटलैक। किलाक बाहर जे बोर्ड लागल छैक ताहि के मुताबिक ई किला मौर्यकालीन हुअक चाही। किला के कात करोटमे जे गाम छैक ओहिमे भांति-भांतिक किंवदन्ति पसरल छैक, किलाक विषयमे। जतेक लोक, ततेक तरहक बात। किछु लोकक कथन छन्हि जे ई किला राक्षस राज बलिक राजधानी छलै -आऽ किछु गोटा तँ राजा बलिकेँ देखबाक सेहो दावा केलन्हि अछि। साँझ भेलाक बाद लोक सभ किला दिस जाइसँ बचए चाहैत छथि। भऽ सकैत अछि जे ई अफवाह सरकारी कर्मचारी लोकन्हि फैलेने हुए-कारण जे ओकरा सभकेँ ड्यूटी करएमे कनी आराम भऽ जाइत छैक। लोक सभ राजा बलिक डरे किछु चोरबऽ नञि चाहए छैक। किला अद्भुत छैक। किलाक देबार भग्नावस्थामे रहितहु अपन यौवनक याद दिआ रहल अछि। किलाक देबार एतेक चाकर छैक जे ओहपर तँ आसानी सँ एकटा रथ निकलिये जाइत हेतैक। देबारमे लागल ईंटा दू-दू फीट नमहर आऽ लगभग गोटेक फुट चाकर छैक। चीनक देबारसँ कम मोट नहि हेतैक ई अपन यौवन कालमे। किलामे एकटा पोखरि छैक, ककरो नहि बूझल छैक, जे कहिया खुनेलय ई पोखरि। बूढ़-पुरानक कहब छन्हि जे ई पोखरि राक्षसक कोरल अछि। किछु लोकनिक तँ ई मत छन्हि जे एहिमे एकटा सुरंग सेहो छैक-जकर रस्ता कतओ आर निकलैत छैक। सुनैत छियैक जे राज-परिवारक सदस्यकेँ आपतकालमे बाहर निकालैक लेल एहन सुरंग बनायल जाति छलैक। किलाक कात-करोटमे जे गाम छैक तकर नाम सेहो ऐतिहासिक। किलाक पूब दिस छैक फुलबरिया नामक गाम आऽ ओकर बगलमे सटल छैक गढ़ी गाम..जे आब अप्रभंश भऽ कऽ गरही भऽ गेलैए। किलाक पच्छीम दिस छैक रमणी पट्टी नामक गाम आऽ ओहिसँ सटल छैक भुपट्टी। किलाक दक्षिणमे छैक बिक्रमशेर, जतय प्राचीन सूर्य मंदिरक अवशेष भेटलैए। ई बात ध्यान देबाक जोग जे सूर्य मंदिर देशमे बड्ड कम जगह छैक। बलिराज गढ़क खुदाई पहिल बेर 1976 मे भेलैक, जखन केन्द्रमे साइत डॉ कर्ण सिंह एहि बिभागक मंत्री छलाह। गढ़क उद्धारक लेल मधुबनीक पूर्व सांसद भोगेन्द्र झा आऽ कुदाल सेनाक अध्यक्ष सीताराम झाक बड्ड योगदान छन्हि। किछु इतिहासकार लोकनिक कहब छन्हि, जे ई किला बंगालक पालवंशीय राजा लोकनिक किला भऽ सकैत अछि वा फेर मौर्य सम्राटक उत्तरी सुरक्षा किला भऽ सकैत अछि। ओना किछु गोटेक कहब छन्हि जे एकर बड्ड संभावना- जे ई किला मिथिलाक प्राचीन राजधानी सेहो भऽ सकैत अछि। एकर पाछू ओऽ ई तर्क दैत छथिन्ह, जे एखुनका जे जनकपुर अछि, ओऽ नव जगह अछि आऽ ओतुक्का मंदिर १८हम शताव्दीमे इंदौरक महाराणी दुर्गावतीक द्वारा बनबाएल गेल अछि। विद्वान लोकनि जनकपुरक ऐतिहासिकताक संदिग्ध मानैत छथि। हमरा एहि संबंधमे एकटा घटना मोन पड़ि रहल अछि। १० साल पहिने पटनामे वैशालीक एकटा सज्जन हमरा भेटलाह आऽ कहलन्हि जे बलिराज गढ़ वास्तबमे मिथिलाक प्राचीन राजधानी अछि। हुनकर कहब छलन्हि जे ह्वेनसांगक एकटा विवरणक मुताबिक पाटलिपुत्रँस एकटा खास दूरी पर वैशाली अछि, वैशालीसँ एतेक दूरीपर कांठमांडू (काष्ठमंडप) अछि आऽ काठमांडूक दच्छिन आऽ पूब दिशामे मिथिलाक प्राचीन राजधानी छैक। एखुनका जनकपुर ओहि मापदंडपर सही नञि उतरि रहल अछि। पता नञि एहि बातमे कतेक सत्यता छैक। एकर अलावा, रामायणमे सेहो मिथिलाक प्राचीन राजधानीक संदर्भमे किछु संकेत छैक। रामायणक संकेत सेहो बलिराजपुरकेँ मिथिलाक राजधानी होएबाक संकेत कय रहल अछि। सांसद भोगेन्द्र झाक मुताबिक, राजा बलिक राजधानी महाबलीपुरम भय सकैत अछि, जे दच्छिन भारतमे छैक। सभसँ पैघ बात ई जे पूरा मिथिलामे बलिराजपुरसँ पुरान कोनो किला नहि अछि, जे मिथिलाक प्राचीन राजधानी होएबाक दावा कय सकए। किलाक भीतर उबड़-खाबड़ मैदान छैक, जे राजमहलक जमीनक भीतक धँसि जएबाक प्रमाण अछि। एतय एकाध जगह खुदाई भेलैए आऽ ओहीमे काफी कीमती धातु आऽ समान भेटलैक अछि। अगर एकर ढ़ंगसँ खुदाई कएल जाय तँ नञि जानि कतेक रहस्य परसँ आवरण उठि जायत। एखन धरि सरकारक तरफसँ कोनो ठोस प्रयास नहि भऽ पाओल अछि, जञिसँ बलिराज गढ़क प्राचीनताकेँ दुनियाक सोझाँ रखबाक कोसीस कएल जाय। बस एकटा कामचलाऊ सड़कसँ एकरा बगलक गाम खोजपुरसँ जोड़ि देल गेलैक आऽ इतिश्री कय देल गेलैक। यदि बलिराज गढ़क खुदाई ढ़ंगसँ कएल जाय आऽ एतय एकटा नीक संग्रहालय बना देल जाय तँ बढ़िया काज होयत। मिथिलांचलक हृदयस्थलीमे रहबाक कारणेँ एतय मिथिला पेंटिंगक कोनो संस्थान वा आर्ट गैलरी सेहो खोलल जाऽ सकैत अछि। एकटा नीक(चाकर आऽ चिक्कन हाईवे) क संग नीक विज्ञापन बलिराजगढ़क पर्यटक सभकेँ निगाहमे आनि सकैत अछि। एहिसँ इलाकाक गरीबी दूर करबामे सेहो मदद भेटत। यदि एकरा बुद्धा सर्किट वा रामायण सर्किटक अंग बना लेल जाय तँ आर उत्तम। मिथिला मंथन- १. मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि लेकिन ओहियो स पैघ कारण एहि इलाका के मे कोनो नीक नेतृत्व के आगू नै एनाई अछि। आजादी के लगभग 60 वर्ष बीत गेलाक के बाद देश में जहि हिसाब स आर्थिक असमानता बढ़ि गेलैक अछि ओहि में बिहार आ खासक मिथिला के सामने एकटा बड्ड पैघ संकट छैक जे ई और पाछू नै फेका जाय। उदाहरण के लेल ई आंकड़ा आंखि खोलि दै बला अछि जे एकटा गोआ मे रहय बला औसत आदमी के प्रतिव्यक्ति आमदमी एकटा औसत बिहारी सं सात गुना बेसी छैक आ एकटा पंजबी के आमदनी पांच गुना बेसी छैक। बिहारो मे अगर क्षेत्रबार आंकड़ा निकालल जाय त बिहार के दक्षिणी( एखुनका गंगा पार मगध आ अंग) एवम पश्चिमी ईलाका बेसी सुखी अछि, आ ओकर जीवनशैली सेहो दू पाई नीक छैक। त एहन में सवाल ई जे फेर रस्ता की छैक। की मिथिलांचल के लोक एहिना दर-दर के ठोकर खाईके लेल दुनियां में बौआईत रहता अथवा हुनको एक दिनि विकास के दर्शन हेतन्हि। मिथिलांचलक  ई दुर्भाग्य छैक जे एकर एकट पैघ हमरा हिसाब सं आधा से बेसी इलाका बाढ़ि में डूबल रहैत छैक। बाढ़ि के समस्या के निदान सिर्फ राज्य सरकार के मर्जी सं नहि भ सकैत बल्कि अहि में केंद्रसरकार के सहयोग चाही। पिछला साठि साल मे बिहार के नेतागण अहिपर कोनो गंभीर ध्यान नहि देलन्हि जकर नतीजा अछि जे बाढ़ एखन तक काबू मे नहि आबि रहल अछि। पिछला कोसी के आपदा एकर पैघ उदाहरण अछि, आब नेतासब के आंखि कनी खुललन्हि अछि, लेकिन एखन सं मेहनत केल जायत त अहि मे कमस कम 20 साल लागत। बाढ़ि सिर्फ संपत्ति के नाश नहि करैत छैक, बल्कि आधारभूत ढ़ांचा जेना सड़क, रलेवे आ पुल के खत्म क दैत छैक। एहन हालत मे कोनो उद्योग के लगनाई सिर्फ दिन मे सपना देखैक बराबर अछि। किछु गोटाके कहब छन्हे जे बिहार मे उद्योग धंधा के जाल बिछाक एकर विकास केल जा सकैछ। लेकिन जखन सड़क आ विजलिये नहि अछि त केना उद्योग आओत। दोसर बात ई जे पिछला अविकासके चक्रक फलस्वरुप आबादीके बोझ एतेक बढ़िगेल अछि जे पूरा इलाका मे कोनो खाली जमीन नहि अछि जतय पैघ उद्योग लगायल जा सकय। सिंगूर के उदाहरण  सामने अछि। महाशक्तिशाली वाममोर्चा के सरकार के जखन बंगाल मे 1000 एकड़ जमीन नै खोजल भेलैक त एकर कल्पना व्यर्थ जे दरभंगा आ मधुबनी मे सरकार कोनो पैघ उद्योग के जमीन दै। दोसर बात इहो जे पूरा मिथिला के पट्टी मे, मुजफ्फरपुर सं ल क कटिहार तक कोनो पैघ संस्था-चाहे ओ शैक्षणिक होई या औद्योगिक- नै छै जे एकमुश्त 3-4 हजार लोग के रोजगार द सकै। हमरा इलाका मे शहरीकरण के घनघोर अभाव अछि। जतेक शहर अछि ओ एकटा पैघ चौक या एकटा विकसित गांव स बेसी नहि।एकटा ढंग के इंजिनियरिंग या मेडिकल कालेज नहि, एकटा यूनिवर्सिटी नहि।  कालेज सब केहन जे 4 साल में डिग्री द रहल अछि। एक जमाना मे प्रसिद्ध दरभंगा मेडिकल कालेज मे टीचर के अभाव छैक आ कालेज जंग खा रहल अछि। हम सब एहन अकर्मण्य समाज छी जे कोसी पर एकटा पुल बनबैक मांग तक नै केलहुं,हमर नेता हमरा ठेंगा देखबैत रहला। आब जा क रेलवे आ रोड पुल के बात भ रहल अछि।कुल मिलाकर इलाका मे सिर्फ 8-10 प्रतिशत लोक शहर में रहैत छथि,  ई ओ लोक छथि जिनका सरकारी नौकरी छन्हि। ई शहर कोनो उद्योग के बल पर नहि विकसित भेल। बाकी आबादी-लगभग 40  प्रतिशत दिल्ली आ पंजाब मे अपन कीमती श्रम औने-पौने दाम मे बेच रहल अछि। मिथिला के श्रम पंजाब मे फ्लाईओवर आ शापिंग माल बनाब मे खर्च भ रहल अछि, कारण कि हमसब एहेन माहौल नहि बनौलिएकि जे ओ श्रम अपन घर मे नहर या सड़क बनब मे खर्च हुए। तखन सवाल ई जे फेर उपाय की अछि। हमरा ओतय पैघ उद्योग नहि लागि सकैछ, रोड नहि अछि बाढ़ि के समस्या विकराल अछि, त हमसब की करी। लेकिन नहि, मिथिला के विकास एतेक पाछू भ गेलाक बाद एखनों कयल जा सकैछ। आ अहि विषय मे कय टा विचार छैक। किछु गोटा के कहब छन्हि जे एखुनका बिहारक सरकार मगध आ भोजपुर के विकास पर बेसी ध्यान द रहल छैक। एकर वजह जे सत्ता मे पैघ नेता ओही इलाका के छथि, लेकिन दोसर कारण इहो जे ओ इलाका बाढ़िग्रस्त नहि छैक। पैघ प्रोजेक्ट के लेल ओ इलाका उपयुक्त छैक। उदाहरणस्वरुप-एनटीपीसी, नालंदा यूनिवर्सिटी आ आयुध फैक्ट्री-ई तमाम चीज मगध मे अछि। दोसर बात ई जे नीक कनेक्टिविटी भेला के कारणे भविष्य मे जे कोनो निवेश बिहार मे हेतैक ओ सीधे एही इलाका मे जेतैक। कुलमिलाक आबै बला समय मे बिहार मे क्षेत्रीय असमानता बढ़य बला अछि। एहि हालत मे किछु गोटा अलग मिथिला राज्यक मांग क रहल छथि, आ हमरा जनैत संस्कृति स बेसी -अपन आर्थिक विकास के लेल ई मांग उचित अछि। मिथिला के विकास के माडेल की हुअके चाही।मिथिला के जमीन दुनिया के सबस बेसी उपजाऊ जमीन अछि। हमसब पूरा भारत के सागसब्जी आ अनाज सप्लाई क सकैत छी। लेकिन ओ सब्जी दरभंगा सं दिल्ली कोना जायत। एहिलेल फोरलेन हाईवे आ रेलवे के रेफ्रजेरेटर डिब्बा चाही। दोसर गप्प हमर इलाका के एकटा पैघ रकम दोसर राज्य मे इंजिनियरिंग आ मेडिकल कालेज चल जाईत अछि। हमरा इलाका मे 50 टा इंजिनीयरिंग कालेज आ 10 टा मेडिकल कालेज चाही। ई कालेज भविष्य में विकास के रीढ़ साबित होयत। हमरा इलाका मे छोट-छोट उद्योग जेना स़ाफ्टवेयर डेवलपमेंट या पार्टपुर्जा बनबै बला फैक्ट्री चाही जहि मे 100-200 आदमी के रोजगार भेटि जाय। लेकिन एहिलेल 24 घंटा विजली चाही। ई कतेक दुर्भाग्य के बात जे बगल के झारखंडक कोयला के उपयोग त पंजाब में बिजली बनबैक लेल भ जाय छैक लेकिन हमसब एकर कोनो उपयोग नहि क रहल छी। आई अगर हमरा अपन इलाका मे 24 घंटा बिजली भेटि जाय़ त पंजाब जाय बला मजदूर के संख्या में कम सं कम आधा कमी त पहिले साल भ जायत। भारत के दोसर राज्य सिर्फ आ सिर्फ अही इलाका के सस्ता श्रम के बले तरक्की क रहल अछि। हमसब ई जनतौ किछु नहि क रहल छी, ई दुर्भाग्य के गप्प। मिथिला मे पढ़ाई लिखाई के प्राचीन परंपरा रहलैक अछि लेकिन सुविधा के अभाव मे ई धारा हाल मे कमजोर भेल अछि। खासकर महिला शिक्षा के दशा-दिशा त आर खराब अछि। एकटा लड़की कतेको तेज कियेक ने रहे ओ 10 सं बेसी नहि पढ़ि सकैत अछि कारण घर के पास कालेज नहि छैक। हमरा अगर तरक्की करय के अछि त इलाका मे एकटा महिला यूनिवर्सिटी त अवश्ये हुअके चाही, संगहि सरकार के ईहो दायित्व छैक जे हरेक ब्लाक में कमस कम एकटा डिग्री कालेज के स्थापना हुए। देश के विकास मे अहि इलाका के संग कतेक भेदभाव केल गेलैक आ हमर नेतागण कतेक निकम्मा छथि-एकर पैघ उदाहरण त ई जे इलाका मे एकहुटा केंद्रीय संस्थान नहि छैक। एकटा यूनिवर्सिटी नहि, एकटा कारखाना नहि। आब जा  क कटिहार मे अलीगढ यूनिवर्सिटी, दरभंगा में आईआईआईटी आ बरौनी मे फेर सं खाद कारखाना के पुनर्जीवित करैक बात कयल जा रहल अछि। हमरा याद अछि जे साल 1996 तक दरभंगा तक मे बड़ी लाईन नहि छलैक। हमसब कुलमिलाकर कोनो तरहक संपत्ति के निर्माण नहि करैत छी। हमसब अपन आमदनी दोसर राज्य भेज दै छियैक-बेटा के बंगलोर मे इंजिनीयरिंग करबै सं ल क दियासलाई तक खरीदै मे। हमर पूंजी अपन राज्य, अपन इलाका के विकास में नहि लागि रहल अछि। एहि स्थिति के जाबत काल तक नहि बदलल जायत हम किछु नहि क सकैत छी। २. प्रवीण आई अमेरिका चलि गेल। ओकरा एल एंड टी के प्रोजेक्ट पर शिकागो पठा देल गेलै। लेकिन ओकरा संग पढ़ैवाली पूनम के भाग्य ओहन नहि छलैक। ओ दू बच्चा के मां  बनि अपन स्वामी के सेवा में अपन जिंदगी बिता रहल अछि। बितला समय याद करैत छी त लगैत अछि जे पूनम के संग बड़्ड अन्याय भेलैक। बात सन् 95 के हतैक, हमर बोर्ड के रिजल्ट आबि गेल छल। ओहि समय पूनम आ प्रवीण छट्ठा में पढैत छल।  जाहि स्कूल में पढ़ैत छल ओहि में चारि टा मास्टर छलैक जे बेसीकाल खेतिए बारी में लागल रहैत छलैक। पूनम क्लास में फर्स्ट अबैत छल आ प्रवीण सेकेंड...लेकिन छट्ठा के बाद प्रवीण के बाबू जी ओकरा ल क कटक चलि गेलखिन्ह जतय  ओ एकटा दुकान में काज करैत छलखिन्ह। पूनम के घरक हालत अपेक्षाकृत ठीक छलैक, ओकर बाबूजी सरकारी सेवा में छलखिन्ह, लेकिन पूनम दसवीं से आगू नहि पढि सकल। ओकरा इंटर में मधुबनी के झुमकलाल महिला कालेज में नामो लिखा देल गेलैक लेकिन बाद में ओ आगू नै पढ़ि सकल। लेकिन प्रवीण राउरकेला सं इंजीनरिंग केलाक बाद एल एंड टी में प्लेस्ड भ गेल आ कंपनी ओकरा शिकागो पठा देलकै। एक दिन हमर दीदी पूनम के पूछवो केलकैक जे ओ कियेक ने बीए में नाम लिखेलक, त पूनम के जवाब छलैक जे ओकर मां-पप्पा के बीच ओकर पढ़ाई के ल क नित दिन घोंघाउज होइक। ओकर बेसी पढ़नाई पूनम के विवाह में बाधा बनि रहल छलैक। तीन बहिन में सबस पैघ पूनम के दहेज एकटा बड्ड पैघ समस्या छलैक। दू साल के बाद पूनम के विवाह भ गैलैक आ जे  पूनम क्लास में फर्स्ट अबैत छल ओ जीवन के दौड़ में सदा के लेल सेकेंड भ गेल। पूनम के तमाम टैलेंट आब सिलाई-कढ़ाई आ स्वेटर के नब डिजाइन सीख में खप लगलैक। आई हमरा गाम में प्रवीण के टैलेंट के धूम मचल छैक। मिथिला के तमाम दहेजदाता ओकर दरवाजा पर आबि चुकल छथि, लेकिन सवाल ई जे कि पूनम के आगू नै पढ़ि पबै में कि सिर्फ दहेज टा एकटा कारण छलैक या किछू आउर...?  मानि लिय जे दहेज नहियों रहितैक त की पूनम के अपन घर लग नीक कालेज भटि जयतैक ? हम सोचैत छी जे यदि पूनम के जन्म कर्नाटक या केरल में भेल रहितैक  त भ सकैछ ओ इंजिनीयर बनि जाईत आ एल एंड टी ओकरो शिकागो भेजि दैतैक। लेकिन ई सवाल एखनो नीतीश कुमार अतबा अर्जुन सिंह के एजेंडा में नहि छन्हि। नै जानि कतेको लाख पूनम आई चिचिया-चिचिया क ई सवाल अहि व्यवस्था सं पूछि रहल अछि। हमर ई पोस्ट हिंदी के हमर ब्लाग आम्रपाली(amrapaali.blogspot.com)...ओहि पर एकटा टिप्पणी अछि जे सब साधन सबके नहि देल जा सकैत छैक, आगू बढ़य बला के खुदे के जिजीविषा हुअके चाही। लेकिन हमर कथन ई अछि जे प्रवीण के संग कोनो जीजिविषा नहि छलैक-ई पुरुष प्रधान समाज के एकटा दुखद अध्याय छैक जे हजारो प्रवीण के त कोटा स ल क बंगलोर तक डोनेशन पर भेज देल जाइत छैक लेकिन लाखों पूनम एखनों आशाके बाट जोहि रहल अछि। की ई सरकार के कर्तव्य नहि छैक जे ओ पूनम सब के उचित पढ़ाई के व्यवस्था करैक..?. ई कतेक दुर्भाग्य केर बात अछि जे बिहार में एखन हाईस्कूल खोलै पर प्रतिबंध लागल छैक। एखन 5 किलोमीटर के दायरा में बिहार में एकटा हाईस्कूल छैक। कोनो लड़की के लेल ई कोना संभव छैक जे ओ पांच किलोमीटर पढ़य लेल हाईस्कूल जाय। आब बिहार सरकार हाईस्कूल में लड़की सबके साइकिल द रहल छैक लेकिन की सिर्फ हाईस्कूल तक के पढ़ाई उपयुक्त छैक..? दोसर बात ई जे बिहार सनहक राज्य में जतेक सामान्य ग्रेजुएशन के सीट नै छैक, कर्नाटक आ महाराष्ट्र में ओहि स बेसी इंजिनीयरिंग के सीट छैक। एखन तक राज्य में एकोटा महिला विश्वविद्यालय आ तकनीकी विश्वविद्यालय नै छैक। हुअके ती ई चाही छल जे बिहारल में 20-25 साल पहिनहि हर जिला- आ ब्लाक में एकटा कालेज खोलि देबाक चाही छलैक। आब के जमाना त इंजिनीयरिंग आ एमबीए कालेज खोलक छैक। एहन हालत में ओहि खाई के के भरत जे बिहार आ दोसर राज्य के बीच में बनि गेलैक अछि। फेर वेह सवाल सामने अछि- की अबैयो बला समय में पूनम इंजिनीयरिंग कालेज में जेती....? डॉ पंकज पराशरश्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.। पृथकावली दिल्लीक शरणागत अहल भोरेसँ साँझ धरि डेग-डेगपर अर्पित करैत छी अपन आत्म आओर अपन सम्मान आ जिनगीमे अर्जित कयल सबटा ज्ञान चारि कौर अन्न आ पाँच हाथ बस्तर लेल रने-बने बौआइत बाकी चारू भाइ आ बहीन हमर देशक कोन-कोनमे अभ्यर्थित आँखिसँ बेस उताहुल बेर-बेर भरोस दियबैत अछि नियोक्ताकेँ अपन बुत्ता भरि जे कहियो नहि धयलक हरक लागन जिनगीमे से मोंछगर हमर भाइ सब आइ खूब हरखित मोनेँ रोपैत छथि धान आ बेचैत छथि पान देशक कोन-कोनमे बिहरल अहराक खोजमे दूरभाषिक वार्तालापमे सबटा खेरहा सुनबैत बिहरैत परिवारक गाथाक बीच बढ़ैत सदस्य सबहक बिलहैत अछि सूचना मुक्त मोनेँ, संचारी भाव केर स्थायी अर्थाभावक बिना कोनो चिन्ता कयनेँ- गामक खिस्सा सबहक बीच-बीचमे कइक सालसँ कलकत्तामे निपत्ता बड़का काकाकेँ ताकबाक सबटा व्यर्थ भेल प्रयास केर खिस्सा हमरा सुनल अछि काकीक एकादशी-हरिबासन आ गंगामे एकटंगा देबाक आख्यान सेहो सबहक पता-ठेकान जनितो हमरा लोकनि आब जोखैत रहैत छी भेंट-घाँटक आकुलताकेँ मासूलक पाइसँ नहि जानि आपात चिकित्सा कक्षमे हमरा किएक मोन पड़ैत अछि रहैत अछि बाबीक गाओल सोहर आ साँझक गीत जखन कि बाबीकेँ मुइना आइ तीस-पैंतीस बरखसँ बेशी भऽ गेलनि एक भाइ दिल्ली आ एक कलकत्ता एक बहीन पंजाब आ दोसर राजस्थानक रेगिस्तानमे अभिशापित नैहरमे सुनल फकड़ा दोहरबैत रहैत अछि मोने-मोन... जाहि बाटे गेली बेटी दूबिया जनमि गेलइ... पृथ्वीक कोने-कोन बौआइत हम देखैत छी गरीबक अहरापर गहन पहरा दैत महाशक्तिकेँ करे-कमान कतेक गाम नापब एखनो बाकी छनि वामनावतार प्रभुकेँ? जरीब-कड़ीकेँ उघबाक लेल जनमल हमरा लोकनि कोन-कोन नक्शाक लेल पृथ्वीपर घीचैत रहब डाँड़ि आ लड़ैत रहब ओहि राष्ट्र केर गौरवक लेल जकर झटहा कइक पुस्तसँ हमरा लोकनिकेँ खेहारि रहल अछि जंगलसँ गाम आ गामसँ शहरक नहर-छहरपर बसल जलहीन मलिन बस्तीक मल-जलक असह्य दुर्गंधक बीच बाबाक अपार्थिव इच्छा हुनक पार्थिव शरीरक संगे चलि गेलनि क्यो काका ईर घाट तँ क्यो काका बीर घाटमे बसल दसकठबा डीहकेँ पियाजुक क्यारीमे बाँटिकेँ संतुष्ट आब कोनो काज-परोजनक अवसरपर गामक स्मृति-संपदाकेँ दूरभाषिक आ ई-मेली चँगेरामे बिलहैत छथिन नहि जानि कहिया धरि अपने देशक अमेरिका आ इजराइलमे कहुखन अफ्रीकी तँ कहुखन फिलिस्तीनी बनल मतृभूमिसँ तिरस्कृत संज्ञाकेँ घृणा आओर घृणाकेँ जीवनक प्रसाद बुझि बौआइत रहब अनौन-बिसौन भेल जिनगीक फागुनेमे साओन-भादब भेल... थाल-कादो भेल...! विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ  इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक .। ककर गलती कतेक दिवससँ सोचैत रही जे गाम जाएब परञ्च दिल्लीक उथल-धक्कासँ मुक्त होएब तखन नञि। पिछला दशहरामे जखन गाम पहुँचलहुँ तs आड़ि पकड़ि टोल घुसैत रही। ओहि ब्रह्मबाबाक ठामपर एकटा स्त्रिगन बैसल रहथि की कहू, धक्कसँ रहि गेलहुँ कंठक थूक कंठहिमे सूखि गेल स्त्रिगन कोनो भूत नहि छलीह ओऽ कोनो डायन-जोगिन नहि रहथि ओऽ गौरी दाई छलीह बियाहक ठामे साल विधवा भs गेलीह ताहि दिनसँ ओऽ नवयुवती उजरा नुआ पहिरैत छथि सीथमे चुटकी भरि सेनूर नहि गुमसुम रहैत समय काटि रहल छथि। तs हुनका देखि कs हरदम सोचैत छी की यैह मिथिला थिक यैह हमर संस्कृति थिक जे मन केँ मारि कए एकटा नवयुवती जीवन काटि रहल अछि ओकरा कियो देखनिहार नहि छैक ओ नवयुवतीक मांग जुआनीमे उजड़ि गेल ताहि दिनसँ हुनकापर की बितैत होयत पति बीमारीसँ मरि गेलखिन एकरामे गौरी दायक की दोष दोष तs हुनक पिताक छनि जिनका वरक बीमारीक जानकारी नहि छल मुदा ओहो की करताह घटक बनि कs गेल रहथि द्वितीकार जे बतोलथि सैह ने सत्य मानितथि ई गप सच छल जे गौरी दाय अपन पिताक गलतीक सजा भोगि रहल छथि भाग्यकेँ कोसि रहल छथि आब की कही देश-परदेशमे तs वर- कनिया बदलि जाइत अछि जेना हर छः मास पर बदलैत छी हम अपन अंगा मुदा, ई गौरी दाय बीसेक साल बादो नहि बदललीह ओहि दिनसँ पतिक वियोगमे दिन-राति घुटैत छथि कियो कतहुसँ खुशियोमे हुनका नोत नहि दैत छथि कियो अपन नवजातकेँ खेलाबए ले नहि दैत छथि की करती गौरी दाय कियो हुनका देवी कहैत अछि तऽ डायन-जोगिन कहबासँ लोक-वेद पाछुओ नहि रहैत छथि। १. समर्पण (कथक नृत्यांगना पुनीता शर्माक लेल) जीवनक जीवंतता कि मनुष्यक मनुष्यता कि जेहन मोन, जेहन भाव तहिने होइत समर्पण भाव नर्तकी जखन राग मालकौस मे स्टेज पर रोशनीक चकाचौंध मे अपन संपूर्ण प्रतिभाक प्रदर्शन करैत छथि देखू तखैन कि हैत छथि राग, कि हैत छथि भाव लागत जना हुनकर देह मे नर्तकीक आत्मा नहि देवता बैस गेल जे जेना नचाबि रहल छैल तहिना नर्तकी नाचैत छथि कि ततकार कि ठाठ कि करि ओइ चक्करक वर्णन शब्दो तं ओतेक नहि अछि त कोना करि समर्पण भावक वर्णन अहां जकर बेटी होइब अहां जकर बहिन होइब मुदा, अहां जकरा सं प्रेम करैत होइब ई सब कतेक खुशनसीब होइत जे नर्तकी अपन संपूर्ण अस्तित्व नृत्य मे झोंइक दैत छथि हुनकर प्रेम वा पुरुष वा समर्पन जरूर संपूर्ण होइत. महेश मिश्र “विभूति” (१९४३- ),पटेगना, अररिया, बिहार। पिता स्व. जलधर मिश्र, शिक्षा-स्नातक, अवकाश प्राप्त शिक्षक। पन्थीसँ तनिक विलमिके सुनिली पन्थी, अविलम पहुँचब गेहे। तरुणाईमे कथिक अपेक्षा, जतबा कहब, बुझब सब नेहे॥ अहाँ पन्थी! पथिक बनिके, जा रहल छी बाटमे। दृश्य अगणित देखब पन्थी, भ्रमब नहि जग-हाटमे॥ आओत बाढ़ि जे स्नेह-सलिलके, शपथ, सबल पग राखब। दुर्बलता जँ व्यापत किञ्चित, कहू! कोना जल थाहब॥ बिनु जल भवसागर की नदिया, दहब-भसब नहिं बाबू। दृढ़-सङ्कल्प पतवार पकड़िके, राखब मन पर काबू॥ होयत हँसारति भरि जगमे, जँ, बुड़ि जाओत नौका। अस्तु, सोचब गृद्ध दृष्टि लऽ, नहिं आओत फेर मौका॥ पुनः कतबा कहब बाबू? शुभकामना अछि संगमे। सफल होऊ , सुफल पाऊ, शुभ रंग आनू रङ्गमे॥ अहाँ पायब सुयश जगमे, पुलकि पुलकत गात मम्। पूर्ण पूनम सम जँ देखब, परम आनन्दित होयब हम॥ अछि निवेदन ईशसँ, सद्बुद्धि दैथि सुजान के। बड़ आश अछि पंथी अहाँसँ, करंहु मुकलित प्राणके॥ सन्तोष (०६.०२.६५) सन्तोष सरितमे नित नहाय, बल्कल पहिरी तँ लाज न हो। बेदाग होय कर्तव्य करी, हाथी नवीश सँ काज न हो॥ कहू! व्यर्थ झगड़िके धन अरजी, सत् कर्म बिना सब काज हो। एक दिन बिन कैंचाके जगसँ, प्रस्थान करू, तँ लाज न हो॥ भऽ जाय फकीरी वोहि सँकी? मस्तक ऊँचा सदिकाल रहे। कहू? भला वो अमीरी की, लानत जेहि पर कङ्गाल कहे॥ भऽ जाय अमीरी वोहिसँ की? सत् कीर्ति समुज्ज्वल कर्म करू, निशि दिन सद्भाव निबाहू जँ। भगवान् भला करता निश्चय, कहियौन हुनकहि, नहिं काहूसँ॥ हुनकर लीला अनदेखल अछि, फल प्राप्त करै छथि विश्वासी। सुनितहुँ छथि सबहक परमप्रभु, कारण; वो छथि घट-घट वासी॥ उद् बोधन : ढाढ़स (३१.०७.६३) मत होउ निराश एक झटका पर, नित कर्मक ध्यान धरू मनमे। दुनियाँमे एहिना होइतैं छै, ई सोचि पुनः उतरू रनमे॥ बहुतोंके एहिना मेल एतऽ, किन्तु; की साहस छोड़ि देलक।?। साहस थीक सम्बल आशाके, जगमे हारल पुनि लाहु लेलक॥ नभमे देखू वो चन्दाके, जे पूर्ण विकासक क्रमपर अछि। एक दिन पूनम परिपूरित भऽ, पुनि ग्रास ह्रास भऽ जाइत अछि॥ नयन निहारि निरखू जगके, के रहल समान निशि दिन जगमे।?। उत्थान-पतन क्रम कर्मक अछि, निर्भीक बनूँ, बिचरू महमे॥ जी तोड़ि परिश्रम करथि कोय, फल नीक नाहिं, तँ दोष कोन। विधना के एहिना लीला छन्हि, तँ, एकरामे किनको दोष कोन॥?॥ बड़ आश केलहुँ शुभ आशाके, सम्भव केलहुँ नहिं काज कोन। फलदाता दरजल नाहिं यदि, तँ, एकरामे किनको लाज कोन॥?॥ भेटत वोतबहि, जे लिखल अछि, पाथर परके रेखा बुझियौ। कर्तव्य करू नित निकक हित, भेटत निश्चय, भागक लेखा बुझियौ॥ श्रम-साध्य मजूरी भेटतैं छै, ई शास्त्र-पुराण, सुधि जन कहि गेल। औकतेलासँ भट्टा पाकयऽ? ई कथ्य युगाब्दक रहि गेल॥ वोपदेव इतिहास-पुरुष, अमर लेख्य पाणिनी तिनकर। धीर धैर्य धारण करियौ, यथा भाग भावी जिनकर॥ पाण्डव के राज भेटल छीनल, नल दमयन्तीके याद करू। सिंहासनारुढ़ सियावर भेला, वसुदेव कोना आजाद करू॥ मधुर स्वप्न (०७.११.६२, रवि श्री विजयादशमी) मधुर स्वप्न की देख रहल छी, दत्यतासँ सँदूर भऽ के। चिरनिशा के गर्भमे, तल्लीनतासँ निकट भऽ के॥ दुक्खसँ जँ दूर छी तँ, कहू कोन उपचार हो। मूक मुद्रा एना कऽ के, अति दुःखक नेँ विस्तार हो॥ या कहू अन्तर्निहित, दुःखसँ दुःखी छी मनहि-मन, से कहू सङ्कोच तजि के, की स्वप्न देखब छनहि-छन॥ मौन रहला पर कोना के, बुझि सकत पर वेदना। वेदना के व्यक्त कऽ के, छाड़ि दी निज कल्पना॥ मधुर स्वप्नक की महत्ता, कहि दियऽ दू शब्दमे। हम भ्रमित छी दशा लखिके, किछु कहू, किछु शब्दमे॥?॥ या कहू किछु विसरि गेने छी, अहाँ निज ख्यालसँ। मधुर स्वप्नक ज्वलित ज्वाला, त्यागि दी अन्तरालसँ॥ सजनि! पता दी अपन क्लेशक, विषम वेदना मानस के। वा बहु भाँति व्यथित छी अपने, हृदयान्तर्गत तामस से॥ कोना वेदना उमड़ल अछि जे, अगम-अथाह, पता नहिं आय। अतिशय क्लेशक दुःसह भारसँ, दबयित छी दयनीय भऽ हाय॥ कहू-कहू! मानस के ओझरी, मधुर स्वप्न के त्यागू आय। मधुर यदि दुःखदाई हो, तुरत त्यागी, कथमपि नहिं खाय॥ अहाँ बेसुधि, हम ससुधि भऽ कोना जीवन-रथ चलत। सामंजस्यानन्दक प्रयोजन, जीवनक रथ अथ चलत॥ सिन्दूर-दानक गीत: “अनुरोध” (१४.०५.६३, सोम) “प्रिय पाहुन सिन्दूर-दान करू” सुन्दर सरस समय शुभ सरसल, सिन्दूर हाथ धरू। उषा निहारथि कमल हस्तके, अविलम कर्म करू॥...॥ नव निर्मित नगरीमे सिञ्चित किञ्चित ख्याल करू। विलम छाड़ि, सिन्दुर लऽ करमे, हिय प्रभुनाम धरू॥...॥ दर्शक सब व्याकुल होय निरखय, स्वातीक जल बरसू। नवजीवनके सृजन करथि प्रभु कर्मक ध्यान धरू॥...॥ कबलौं प्रभु अनुरोध करायब शुभ-शुभ कर्म करू। मनःपूत मनसाके कऽ के, भवनदमे विहरू॥...॥ शुभ शङ्कर-गौरी मैयाके शुभाशीष हिय मध्य धरू। विनय “विभूति”क एतवहि प्रभुसँ, युगल जगत् विचरू॥...॥ बादरीक आगमन (२६.०५.६३) “नभमण्डलमे पवनक रथपर, कारी-कारी बादरि आयल”। बिजुरि छटकै, ठनका ठनकै, देखि-सुनि जनमन खूब डेरायल॥ चहु दिशि उमड़ल कारी बादरी, बादरि आबिके जल बरसायल। प्रलयनाद मेघक सुनि-सुनि, वृद्ध जनी सब नेनहिं नुकायल॥ हकरै बालक वृद्ध जनी सब, लोक कहै सब माल हेरायल। बाँस-आम गीरल अनगिनती, क्यो कहै हमरो महिंस हेरायल॥ लोक कहै बहु भाँति मनोदुःख, प्रिया कहै मोर प्रिय नहिं आयल। कामिनी कलपथि, प्रिय नहिं गृह छथि, विजुरिक धुनि-सुनि जियरा डेरायल॥ रोर मचल अछि चहु दिशि जन-जन, एतबहिमे अति जल झहरायल। त्रिषित भूमि “विभूति”मय भेली, तरु-तृण वो जन-मन हरसायल॥ जगक प्रमान (०९.०६.६३) डोली उठल बिन खोलीके दुवारसँ, घुरि नहिं आओत, प्रमान हे। काँच कचम्बा काटि कुढ़ावोल, उघल सबटा सामान हे॥ श्वेत वस्त्रसँ मृतक सजाओल, नित प्रति होत जहान हे। अचरज के नेँ बात बुझि ई, ई थिक ध्रुवक समान हे॥ चारि जने मिलि कान्ह लगाओल गमन करत शमशान हे। पुत्र-प्रणय के परिचय देता, करता अग्निक दान हे॥ सच् होय अछि “पुत्रार्थे भार्या” होय छथि पुत्र महान् हे। कहथि “विभूति” बनब विभूति, एहि थिक जगक प्रमान हे॥ “अपटुडेट बलिष्ठ युवकसँ” (१५.१२.१९६२) करू किछु काज बाबू औ, रतन धन आय पौने छी। धरा पर अवतरित भऽ के, एना की मन गमौने छी॥?॥ करू उत्साह किछु मनमे, चलू सन्मार्गपर निशि-दिन। चुकाऊ कर्ज माताके- जे भेटल अछि अहाँके रिन॥ बढ़ाऊ डेगके आगू, समय तँ कटि रहल अछि औ। पुनः ऋण बढ़ि रहल अछि जे, सधाउ आय, नेँ राखू शेष तनिको औ॥ पड़ल माता कराहति छथि, दया के बेच देने छी। तनिक तँ लाज राखू जे, एना की मन गमौने छी॥?॥ सुयश पायब समाजीसँ, धवल यश देश व्यापी औ। पिता-माता सुकीरति लहि, अभय वरदान देता औ॥ “अनुरोध” (२८.०९.१९६२) की कहू? कहलो नेँ जाय अछि, हिय व्यथित, वाणी सबल नहिं, बुद्धि व्याकुल, व्याल चहु दिश ज्वाल ऊरमे बढ़ि रहल अछि। की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥ दशा पातर, हाल दयनीय, आननक सुकुमारताके। मौन शब्दातीत मुद्रा;- से हृदयमे चुभि रहल अछि। की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥ प्राण आकुल, विकल की छी, व्यथा-ज्वालमे जरि रहल छी, शूल बज्रक पतित नगसँ बमरि-झहरिके खसि रहल अछि! की कहू कहलो नेँ जाय अछि॥ हृदय दारुण दुःख सहिके, मात्र प्राणे शेष बाँचल। एना विह्वल हाल कऽ के, व्यथा द्विगुणित दऽ रहल छी॥ की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥ चन्द्रमुख-मण्डल सुलोचन, कच-विकच बेहाल की अछि। वेदनासँ व्यथित भऽ के, व्यथित अनका कऽ रहल छी।। की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥ बस आश एक, अनुरोध केवल, मधु-मधुर मुस्कान के। हेरि चानक स्वच्छ आभा, करु मुकुल, विकसित प्राण के॥ पुनः मञ्जुल मृदुलाअ के, हेतु अनुरोधी बनल छी। मानिनी भऽ मान राखू, दशा लखि के अति विकल छी॥ प्रीति (प्रीति अभियंत्रणक छात्रा छथि संगमे नेपाल १ टी.वी. मे दैनिक मैथिली कार्यक्रमक होस्ट छथि।) १. वियाह एकटा रिश्ता के एहन अटूट बंधन अछि जकरा सामाजिक मान्यता प्राप्त छैक आ एक खास अवस्था में सब स्वेच्छा सअ अहि बंधन में बंधय चाहैत अछि। प्राचीनकाल में स्वयंबर के प्रचलन छल। यानि महिला के स्वयं वर चुनवाक सामाजिक आजादी छलन्हि। कालांतर में सामाजिक स्थिति में बदलाव आयल। बहु विवाह या दोसर वियाह पहिनुहुं व्याप्त छल मुदा महिला के नहि भेटल ई आजादी। आइयो कमोवेश दोसर वियाह पर समाज महिला के प्रति ओतेक उदार शायद नहि अछि जतेक उदार ओ पुरूषक दोसर वियाह पर अछि। दोसर वियाह के बारे में जौं सच पुछी त समाज पुरूख के संग दैत अछि। पहिने त समाज में बहु वियाहक प्रथा छल मुदा आब यद्यपि एकरा मानयता नहि छैक तथापि समाज सअ ई प्रथा पूर्णत: खत्म नहि भेल अछि। दोसर वियाह जौं विधुर द्वारा या कोनो खास विशेष परिस्थिति में कयल जाय त एकर कारण बुझवा में अबैत अछि पर यदि मात्र शौक, दहेजक लोभ या छद्म आधुनिकता के होड़ में कयल जाय त ई अक्षम्य अपराध अछि। अहि मादे समाज आ स्वयं पुरूष के अपन सोच बदलबाक आवश्यकता अछि । समय बदलल संगहि लोक के सोच सेहो बदलल अछि। मुदा एखनो नहि बदलल अछि महिला के मादे पुनर्विवाह या दोसर वियाह पर समाजक नजरिया। जौं पुरूष क सकैत छथि दोसर वियाह त किएक नहि परित्यक्ता, विधवा महिला के सेहो भेटबाक चाही ई अधिकार। कतेक नींक महिला होयत जौं जवान के संतानहीन विधवा के पुनर्विवाह के अनिवार्य बना देल जाय आ बाकियो के स्वेच्छा पर छोड़ि देल जाय। जौं ई भ सकय संभव त नहि सिर्फ समाज सअ महिला आ पुरूषक भेदभाव किछु कम होयत अपितु बल्कि समाज द्वारा उपेक्षित आ एक तरहे त्यागल महिला पुन: समाज के मुख्यधारा में शामिल भय अपन जीवनक नैराश्य सअ मुक्ति पाबि सकलीह। २. कोजागरा पावनि आश्र्िवन शुक्ल पूर्णिमा के मनाओल जाइत अछि। नवविवाहित लड़का लेल अहि पावनि के विशेष महत्व अछि या कहू त ई पावनि खासकय हुनके सभक लेल छन्हि। नवका बरक लेल ई पावनि तहिने महत्वपूर्ण अछि जेहन नवविवाहिता लेल मधुश्रावनी। फर्क यैह अछि जे मधुश्रावनी कतेको दिन लम्बा चलैय बला पावनि अछि आ अहि में नव कन्या लेल बहुत रास विधि-विधान अछि जखनकि कोजागरा मुख्यतःमात्र एक दिन होइत अछि। जहिना मधुश्रावनी में कनिया सासुरक अन्न-वस्त्रक प्रयोग करैत छथि तहिना कोजागरा में बर सासुर सं आयल नव वस्त्र धारण करैत छथि। कोजागरा के अवसर पर बर के सासुर सं कपड़ा-लत्ता, भार-दोर अबैत छन्हि। अहि भार में मखानक विशेष महत्व रहैत अछि। यैह मखान गाम-समाज में सेहो बरक सासुरक सनेस के रूप में देल जाइत अछि। सासुर सं आयल कपड़ा पहिरा बरक चुमाओन कयल जाइत अछि। बरक चुमाओन पर होइत अछि बहुत रास गीत-नाद। कोजागरा में नींक जकां घर-आंगन नीपी-पोछि दोआरी सं भगवतीक चिनवारि धरि अरिपन देल जाइत अछि। भगवती के लोटाक जल सं घर कयल जाइत अछि। चिनबार पर कमलक अरिपन दय एकटा लोआ में जल भरि राखि ओहि पर आमक पल्लव राखि तामक सराई में एकटा चांदी के रूपैया राखि लक्ष्मी के पूजा कयल जाइत अछि। राति में अधपहरा दकखि बरक चुमाओन कयल जाइत अछि। आंगन में अष्टदल अरिपन द ओहि पर डाला राखि कलशक अरिपन द ताहि में धान द कलश में आमक पल्लव राखल जाइत अछि। एकटा पीढ़ी पर अरिपन देल जाइत अछि जे अष्टदलक पश्चिम राखल जाइत अछि। चुमाओनक डाला पर मखान, पांच टा नारियल, पांच हत्था केरा, दही के छांछ, पानक ढोली, गोटा सुपारी, मखानक माला आदि राखि पान, धान आ दूबि सं वर के अंगोछल जाइत अछि तहन दही सं चुमाओन कयल जाइत अछि। चुमाओन काल में बर सासुर सं आयल कपड़ा पहिरि पीढ़ी पर पूब मुंहे बैसैत छथि। पुरहरक पातिल के दीप सं वर के चुमाओन सं पहिने सेकल जाइत छथि। फेर कजरौटा के काजर सं आंखि कजराओल जाइत छन्हि। तकर बाद पांच बेर अंगोछल जाइत छन्हि। तखने होइत छन्हि चुमाओन। चुमाओनक बाद वरकें दुर्वाक्षत मंत्र पढ़ि कम सं कम पांच टा ब्राह्मण दूर्वाक्षत दैत छन्हि। फेर पान आ मखान बांटल जाइत अछि। आ अगिला दिन धरि मखान गाम घर में बांटल जाइत अछि। श्री रामलचन ठाकुर, जन्म १८ मार्च १९४९ ई.पलिमोहन, मधुबनीमे। वरिष्ठ कवि, रंगकर्मी, सम्पादक, समीक्षक। भाषाई आन्दोलनमे सक्रिय भागीदारी। प्रकाशित कृति- इतिहासहन्ता, माटिपानिक गीत, देशक नाम छल सोन चिड़ैया, अपूर्वा (कविता संग्रह), बेताल कथा (व्यंग्य), मैथिली लोक कथा (लोककथा), प्रतिध्वनि (अनुदित कविता), जा सकै छी, किन्तु किए जाउ(अनुदित कविता), लाख प्रश्न अनुत्तरित (कविता), जादूगर (अनुवाद), स्मृतिक धोखरल रंग (संस्मरणात्मक निबन्ध), आंखि मुनने: आंखि खोलने (निबन्ध)। पास करबाक लेल उत्तर पुस्तिका आपस रखिते पुछि बैसैत छथि मैम अर्धवसना बाब्ऽकेशी वय विलम्वित नवल वेशी सोनाक वर्ग शिक्षिका- देखलहुँ, बड़ कमजोर अछि नेना अहाँक कने नीक जकाँ करिऔक गाइड... -          कमजोर त ई नहि अछि मैम आ जहाँधरि छैक बात करबाक गाइड से स्कूल त ताही लेल पठाओल जाइत अछि अंग्रेजीक एक पत्र मे पचासी आ दोसर मे किएक अबैत छैक पचीस सोचबाक बात इहो की नहि थिक? विहुँसैत बजैत छथि मैम पाश्चात्य शिक्षा-संस्कृतिक सेविका वैश्वीकरण मेनका- खाता त देखबे कएल लिखने अछि मात्र दूटा पेज -तें ने कहल हम कमजोर ओ नहि अछि पढ़बैत छिऐक स्वयं हम लिखबे नहि कएलक से बात भेल अन्य परंच एहिठाम नम्बर नहि देल गेलैक से भेल नहि बोधगम्य... ओहिना बिहुँसैत पुछैत छियनि हम देखबैत पुस्तिकाक पंक्ति विशेष आश्चर्य चकित सन भेल कहै छथि मैम- गलती लिखने अछि संयुक्त परिवार सुखी परिवार! -          त एहि मे गलती की छैक? रिक्तस्थान मे ओ लिखि देलक संयुक्त मैम, संयुक्त परिवार आ बसुधैव कुटुम्वकम् केर संस्कारमे पालित हमर पौत्र केना लिखि पाओत छोट परिवार नीक... -          मुदा -          पोथी मे सएह छैक इएह ने कहब अहाँ आ पास करबाक लेल उएह सिखए पड़तैक आर की-की सिखए पड़तैक एकरा जिनगी मे करबाक लेल पास? मैम चुपचाप निहारैत रहि जाइत छथि हमर मुह निर्निमेष विदा लैत छी हम कहैत- वेश!! (२६.१०.२००८) हर्जे की चलू तिरंगा कने उड़ा ली हर्जे की। आजादी के रश्म पुरा ली हर्जे की॥ आजादी के अर्थ कोश मे जुनि ताकी। आजादी के जश्न मना ली हर्जे की॥ शुल्क-मुक्त आयात स्कॉच-सैम्पेन होइछ। शिक्षा स्वास्थ्यक शुल्क वृद्धि मे हर्जे की॥ देशक प्रगति विकास विदेशी पूँजी स। संसद हैत निलाम होउक ने हर्जे की॥ सौ-हजार भसि गेल बाढ़ि मे भसए दिऔ। राता-राती शेठ बनत किछु हर्जे की॥ रौदी-दाही सबदिना छै रहए दिऔ। जनता बाढ़ि अकाल मरत किछु हर्जे की॥ गाम-देहातक बात बैकवार्डक लक्षण। मेट्रो प्रगति निशान देश के हर्जे की॥ नेता जिन्दावाद रहओ आवाद सदा। देश चलै छै एहिना चलतै हर्जे की॥ (२६.१०.२००८) किछु क्षणिका (हाइकू) १.भोजक पान सासुरक सम्मान पुनिमाक चान २.हाथीक कान नटुआक बतान एक समान ३.दूरक चास गामक कात बास कोन विश्वास ४.बाँझीक फूल महकारीक फल के कहै भल ५.दादुर-गान डोकाक अभियान वेथे गुमान ६.हिजरा-नाच ओकिल केर साँच की ६ की पाँच (२६.१०.२००८) निमिष झा, समाचार प्रमुख,हेडलाइंस एण्ड म्यूजिक एफ.एम.,97.2, ललितपुर, नेपाल विद्यापति- निमिष झा कोनो साहित्यमे किछ साहित्यकारसभ एहन होइत छथि जिनकर जन्म कोनो घटनाक रूपमे होइत अछि आ ओहि घटनासँ सम्बन्धित सम्पूर्ण साहित्य प्रभावित भऽ जाइत अछि । ओहन साहित्यकारक साहित्यिक व्यक्तित्व ओहि साहित्यक सर्वाङ्गीण विकासमे वरदानसिद्ध होइत अछि । ओहन साहित्यिक महापुरुष पूर्ववर्ती साहित्यिक परम्परा आदिक सम्यक अनुशीलन पश्चात अपन मान्यता एवम साहित्यिक योजना निर्दिष्ट करैत छथि । अपन कार्यसभक माध्यमसँ युगान्तकारी आ प्रभावशाली रेखा निर्माण कऽ अमरत्व प्राप्त करैत छथि । मैथिली साहित्यक इतिहासमे विद्यापति एकटा एहने अतुलनीय प्रतिभाक नाम अछि । सम्पूर्ण मैथिली साहित्य हुनकासँ प्रभावित अछि । हुनकर प्रभाव रेखाकेँ क्षीण करबाक साहित्यिक क्षमता भेल व्यक्ति मैथिली साहित्यक इतिहासमे अखन धरि किओ नहि अछि । विद्यापति मैथिली साहित्यक सर्वश्रेष्ठ कवि छथि । हुनकेमे मैथिली साहित्यक सम्पूर्ण गौरव आधारित अछि । इतिहासकार दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’क शब्दमे विद्यापति आधुनिक भारतीय भाषाक प्रथम कवि छथि । ओ संस्कृत साहित्यक अभेद्य किलाकेँ दृढ़तापूर्वक तोड़ि भाषामे काव्य रचना करबाक साहस कयलनि । हुनकरे आदर्शसँ अनुप्रेरित भऽ शङ्करदेव, चण्डीदास, रामानन्द राय, कवीर, तुलसीदास, मीरावाई, सुरदास सनक महान स्रष्टासभ अपन भक्ति भावनाक माध्यमसँ अपन मातृ भाषाकेँ समृद्ध कयलनि । मैथिली साहित्यमे विद्यापति युग ओतबे महत्वपूर्ण अछि जतबे अङ्ग्रेजी साहित्यमे शेक्सपियर युग, नेपाली साहित्यमे भानुभक्त युग, बङ्गालीमे रवीन्द्र युग तथा हिन्दीमे भारतेन्दु युग । विद्यापतिक रचनासभमे मिथिला पहिल बेर अपन वैशिष्टय भक्तिभावना, शृङ्गगारिक सरसता एवम् मौलिक साङ्गीतिक लय प्रस्फुटित भेल आभाष कयलक अछि । ओकर बाद विद्यापतिक पदावलीसभ जनजनक स्वर बनि सकल तऽ मिथिलामे युगोसँ व्याप्त असमानताक अन्त करैत विद्यापतिक रचनासभ समान रूपसँ लोकस्वरक रूप ग्रहण कऽ सकल । वास्तवमे विद्यापति युगद्रष्टा रहथि । ओ मैथिली साहित्यक श्रीवृद्धिक लेल अथक प्रयास मात्र नहि कयलनि, तत्कालीन समयमे पतनोन्मुख मैथिल समाजक पुनर्संरचनाक लेल सेहो मद्दत पहुँचौलनि । विद्यापतिक प्रादुर्भावक समयमे भारतीय उपमहाद्वीपका प्रायः हरेक भागक सभ्यता आ संस्कृति सङकटपूर्ण अवस्थामे छल । मुसलमानी शासकसभक आतङक चरमोत्कर्षमे रहल ओहि समयमे मैथिल संस्कृतिक रक्षा आवश्यक भऽ गेल छल । ओहन अवस्थामे विद्यापतिक आगमन मैथिली साहित्य आ संस्कृतिक विकासक लेल महत्वपूर्ण वरदान सिद्ध भेल । एक दिस मुसलमानी शासकसभक आक्रमण आ दोसर दिस बौद्ध धर्मक बढ़ैत प्रभावक कारण समाजमे सिर्जित वैराग्यक मनस्थितिसँ आक्रान्त मैथिल सभ्यता आ संस्कृति अपन उन्नयनक रूपमे सेहो विद्यापतिकेँ प्राप्त कऽ अपन मौलिकता बचाबयमे सक्षम भेल । विद्यापति अपन विविध रचनासभक माध्यमसँ सामाजिक पुनर्संगठनक प्रक्रियाकेँ बल देलनि । ओ समाजसँ पलायन भऽ रहल मैथिल युवासभकेँ समाज निर्माणक मूल धारामे प्रभावित करएबाक लेल अथक प्रयास सेहो कयलनि । हुनकर एहने प्रयासक उपज अछि शृङ्गगारिक रचनासभ । मुसलमानसभक आक्रमणसँ पीडित आ पलायन भऽ रहल तत्कालीन मिथिलाक युवासभकेँ मुसलमान विरुद्ध प्रयोग कऽ मिथिलाक अस्तित्व रक्षा करबाक लेल विद्यापतिक ई रचनासभ सहयोगी प्रमाणित भेल । तत्कालीन समयक लेल विद्यापतिक अहि प्रकारक चातुर्यकेँ कुटनीतिक सफलताक रूपमे देखल जा सकैया । समाजमे व्याप्त असमानाता, कुरीति, अन्धविश्वास सहित विभिन्न विसङगतिसकेँ मानव प्रेम एवम भाषा उत्थानक भरमे विद्यापति अन्त करबाक काजमे सफल छथि । विद्यापतिक सम्पूर्ण रचनासभ शृङ्गगार आ भक्ति रससँ ओतप्रोत अछि । कतेको विद्वानसभ विश्व साहित्यमे विद्यापतिसँ दोसर पैघ शृङ्गगारिक कवि आन किओ नहि रहल कहैत छथि । महाकवि विद्यापति तत्कालीन समाजमे प्रचलित संस्कृत, अवहठ्ठ आ मैथिली भाषाक ज्ञाता छलथि । ई तीनु भाषामे प्राप्त रचनासभ अहि बातकेँ प्रमाणित करैत अछि । यद्यपी विद्यापतिक जन्म तथा मृत्युक सम्बन्धमे विभिन्न विद्वानसभक विभिन्न मत अछि । तथापि मिथिला महाराज शिव सिंहसँ ओ दू वर्षक जेष्ठ रहथि । अहि तथ्यक आधार पर विद्वानसभ हुनकर जन्म तिथिकेँ आधिकारिक मानैत छथि । कवि चन्दा झा विद्यापतिद्वारा रचित पुरुष परीक्षाक आधार पर विद्यापति राजा शिव सिंहसँ दू वर्ष पैघ रहथि उल्लेख कयने छथि । जँ ई तथ्यकेँ मानल जायतऽ सन् १४०२ मे राज्यारोहणक समयमे राजा शिव सिंहक उमेर ५० वर्ष छल आ विद्यापति ५२ वर्षक रहथि । अहि आधार पर विद्यापतिक जन्म सन् १३५० मे भेल निश्चित अछि । डा.सुभद्र झा, प्रो. रमानाथ झा, पं. शशिनाथ झा आदि विद्वानसभ ई मतकेँ स्वीकार करैत छथि मुदा डा.उमेश मिश्र, डा.जयमन्त मिश्र सहितक विद्वानसभ विद्यापतिक जन्म सन् १३६० मे भेल कहैत छथि । अहिना विद्यापतिक मृत्यु प्रसङ्गमे सेहो एक मत नहि अछि । अपन मृत्युक सम्बन्धमे मृत्यु पूर्व विद्यापति स्वयंद्वारा रचित पद विद्यापतिक आयु अवसान कात्तिक धवल त्रयोदशी जानेकेँ तुलनात्मक रूपमे अन्य मत सभसँ अपेक्षाकृत युक्ति संगत मानल गेल अछि । मुदा अहिसँ वर्षक निरुपण नहि भेल अछि । विद्यापतिक जन्म हाल भारतक बिहार राज्यक मधुवनि जिल्ला अन्तर्गत बिसफी गाममे भेल छल । ई मधुवनी दरभङ्गा रेल्वे लाइनक कमतौल स्टेसन लग अवस्थित अछि । हिनक पिताक नाम गणपति ठाकुर आ माताक नाम गंगादेवी रहनि । हाल विद्यापतिक वंशजसभ सौराठमे रहति छथि । विद्यापति बालके कालसँ कुशाग्र वुद्धिक अलौकिक प्रतिभाक रहथि । अपन विद्वान पिताक सम्पर्कमे ओ प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण कयलनि । मुदा औपचारिक रूपमे प्रकाण्ड विद्वान हरि मिश्रसँ शिक्षा ग्रहण कयलनि । तहिना प्रकाण्ड विद्वान पक्षधर मिश्र विद्यापतिक सहपाठी रहनि । विद्यापति मैथिली साहित्यक धरोहर मात्र नहि भऽ संस्कृतक सेहो प्रकाण्ड विद्वान रहथि । ओ मैथिली आ अवहठ्ठक अतिरिक्त संस्कृतमे सेहो अनेको रचना कयने रहथि । हुनकर रचनासभकेँ तीन भागमे वर्गीकरण कयल जाइत अछि । क) संस्कृत ग्रन्थ ः भू–परिक्रमा, पुरुष परीक्षा, शैवसर्वस्वसार, शैवसर्वस्वसार प्रमाणभूत, लिखनावली, गङ्गा वाक्यावली, विभागािर, दान वाक्यावली, गया पत्तलक, दुर्गाभक्ति तरङ्गिणी, मणिमञ्जरी, वर्ष, व्रत्य, व्यादिभक्ति तरङ्गिणी । ख) अवहठ्ठ ग्रन्थ ः कृतिलता, कृतिपताका ग) मैथिली ग्रन्थ ः गोरक्ष विजय महाकवि विद्यापति तीन भाषाक ज्ञाता रहथि । ओ दू दर्जनसँ बेसी ग्रन्थसभक रचना कयने छथि । हुनकर बहुतो कृति सभ अखन बजारमे उपलब्ध अछि । प्रस्तुत अछि विद्यापतिक ग्रन्थसभक संक्षिप्त विवरण १) गंगावाक्यावली ः अहि ग्रन्थमे गंगा नदी आ एकर तट पर होबय बला धार्मिक कार्य अर्थात कर्म काण्डक विषयमे विस्तृत जानकारी अछि । गंगा वाक्यावलीक रचना विद्यापति रानी विश्वास देवीक आज्ञासँ कयने रहथि । कृतिमे गंगा नदीक स्मरण, कीर्तन, गंगा तट पर प्राण विसर्जनक महात्म्य वर्णन अछि । २) दानवाक्यावली ः राजा नरसिंह दपंनारायणक पत्नी रानी धीरमतीक आज्ञासँ ई ग्रन्थक रचना भेल अछि । अहिमे सभ प्रकारक दान विधि विधान विस्तार पूर्वक कयल गेल अछि । ३) वर्षकृत्य ः अहि ग्रन्थमे वर्ष भरि होबयबला प्रत्येक पावनि तथा शुभ कार्यक विस्तृत विधान प्रस्तुत अछि । तहिना पूजा, अर्चना, व्रत, दान आदि नियमक सम्बन्धमे सेहो चर्चा कयल गेल अछि । ४) दुर्गाभक्तितरंगिणी ः दुर्गाभक्तितरंगिणीकेँ दुर्गोत्सव पद्धतिक नामसँ सेहो जानल जाइत अछि । विद्यापति एकर रचना राजा भैरव सिंहक आज्ञासँ कयने रहथि । अहि ग्रन्थमे कालिका पुराण, देवी पुराण, भविष्य पुराण ब्रह्म पुराण, मार्कण्डेय तथा दुर्गा पूजाक पद्धति संग्रहित अछि । ५) शैवसर्वस्वसार ः राजा पद्मम सिंहक पत्नी विश्वास देवीक आज्ञासँ रचित अहि ग्रन्थमे महाकवि विद्यापति भगवान शिवक पूजासँ सम्बन्धित सभ विधि विधानक वर्णन कयने छथि । अहि ग्रन्थकेँ शम्भुवाक्यावली सेहो कहल जाइत अछि । ६) गयापत्तलक ः गयापत्तलक ग्रन्थक रचना कोनो राजा या रानीक आदेशसँ नहि भेल अछि । अहि ग्रन्थक सम्बन्ध सामान्य जनतासँ अछि । गयामे श्राद्ध एवम पिण्ड दान तथा गया जा कऽ पितृ ऋणसँ मुक्त होबाक महात्म्य ग्रन्थमे अछि । ७) विभागसार ः विद्यापति विभागसारक रचना राजा नरसिंह देव दपंनारायणक आदेशसँ कयलनि । अहिमे दायभागक संक्षिप्त मुदा सुन्दर आ आकर्षक विवेचन अछि । मिथिलामे तात्कालीन दायभाग आ उत्तराधिकार सम्बन्धी विधानक लेल ई प्रमाणिक ग्रन्थ मानल जाइत अछि । ८) लिखनावली ः राजा शिवसिंह तिरोधान भेलाक बाद विद्यापति रजाबनौलीमे राजा पुरादित्यक आश्रममे अहि ग्रन्थक रचना कयलनि । ई ग्रन्थमे पत्राचार करबाक विधिकेँ स्पष्ट व्याख्या कयल गेल अछि । अपनासँ पैघ, छोट, समान तथा नियम व्यावहारपयोगी सहित चारि प्रकारक पत्रक उल्लेख अछि । ग्रन्थसँ मिथिलाक तात्कालीन सामाजिक आ सांस्कृतिक अवस्थाक परिचय भेटैत अछि । ९) शैवसर्वस्वसार प्रमाणभूत संग्रह ः शैवसर्वस्वसारक रचनाक बाद विद्यापति अहि ग्रन्थक रचना कयने रहथि । अहिमे शैवसर्वस्वसारक प्रमाणभूत पौराणिक वचनक संग्रह अछि । १०) व्याडिभक्तितरंगिणी ः ई लघु ग्रन्थमे सर्पिणीक पूजाक वर्णन अछि । विभिन्न पौराणिक कथा सभ उल्लेख अछि । ११) द्वेतैनिर्णय ः ई एक तन्त्र शास्त्रीय लघु ग्रन्थ अछि । जाहिमे तन्त्र शास्त्रक गुप्त चर्चा कयल गेल अछि । अहि ग्रन्थसँ विद्यापतिकेँ तन्त्रक सेहो विशद ज्ञान रहल प्रमाणित होइत अछि । १२) पुरुषपरीक्षा ः राजा शिव सिंहक निर्देशन पर रचित ई ग्रन्थकेँ विद्यापतिक उत्तम कोटिक ग्रन्थ मानल जाइत अछि । पुरुषपरीक्षामे वीर कथा, सुवुद्धि कथा, सुविद्य कथा आ पुरषार्थ कथा नामक चारि वर्गक पञ्चतन्त्रक शिक्षाप्रद कथा सभ समाविष्ट अछि । समाजशास्त्री, इतिहासकार, मानवशास्त्री, राजनीति शास्त्री सहित दर्शन एवम साहित्य विधाक व्यक्तिक लेल ई अपूर्व कृति अछि । १३) भूपरिक्रमा ः ई विद्यापतिक अत्यन्त प्रभावकारी ग्रन्थ अछि । राजा देव सिंहक आज्ञासँ भूपरिक्रमाक रचना कयल गेल अछि । ग्रन्थमे वलदेवजीद्वारा कयल गेल भूपरिक्रमाक वर्णन अछि । तहिना नैमिषारण्यसँ मिथिला धरिक सभ तीर्थ स्थलक वर्णन सेहो अछि । १४) कीर्तिलता ः कीर्तिलताक रचना विद्यापति अवहठ्ठमे कयलनि अछि आ अहि ग्रन्थमे राजा कीर्ति सिंहक कीर्ति कीर्तन अछि । मिथिलाक तात्कालीन राजनीतिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक स्थितिक अध्ययनक लेल ई ग्रन्थ महत्वपूर्ण मानल जाइत अछि । ग्रन्थसँ विद्यापतिक प्रौढ़ काव्य कलाक प्रमाण भेटैत अछि । तहिना विकसित काव्य प्रतिमाक दर्शन सेहो होइत अछि । १५) कीर्तिपताका ः अहि ग्रन्थमे राजा शिवसिंहक बहुत चतुरतापूर्वक यशोवर्णन अछि । ग्रन्थक रचना दोहा आ छन्दमे अछि । ग्रन्थक आरम्भमे अद्र्धनारीश्वर, चन्द्रचूड शिव आ गणेशक बन्दना अछि । कीर्तिपताका खण्डित रूपमे मात्र उपलब्ध अछि । एकर ९ सँ २० धरिक जम्मा २१ टा पृष्ठ अप्राप्त अछि । तीसम पृष्ठमे राजा शिव सिंहक युद्ध पराक्रमक वर्णन अछि । १६) गोरक्षविजय ः ई एक एकांकी नाटक अछि । अहिमे विद्यापतिक नूतन प्रयोग सेहो अछि । गोरक्षनाथ आ मत्स्येन्द्रनाथक कथा पर नाटक आधारित अछि । ग्रन्थक रचना राजा शिव सिंहक आदेशसँ कयल गेल छल । १७) मणिमंजश नाटिका ः ई एक लघु नाटिका अछि । नाटिकामे राजा चन्द्रसेन आ मणिमंजरीक प्रेमक वर्णन अछि । १८) मैथिली पदावली ः विद्यापतिक मैथिलीमे रचित पदावलीक संग्रहित ग्रन्थ अछि मैथिली पदावली । लिखित संकलनक अभावमे विद्यापतिक गीत अपन माधुर्यक कारण लोक कण्ठमे जीवित छल आ बहुत बाद एकर समग्र रूपमे संकलित करबाक प्रयास कयल गेल । यद्यपी अनेक संग्रहसभमे विद्यापतिक गीतक संकलित भेल अछि । पदावलीमे राधा एवम कृष्णक प्रेम प्रसंग गेय पदमे प्रकाशित अछि । हाइकू चाँदनी राति नीमक गाछ तर जरैछ आगि। गरम साँस छिला गेलैक ठोर प्रथम स्पर्श। परिचित छी जीवनक अन्तसँ मुदा जीयब। बहैछ पछबरिया जरै उम्मिदक दीया उदास मोन। पीयाक पत्र किलकिञ्चत् भेल उद्दीप्त मोन श्रम ठाढ़ छै श्रमिक पड़ल छै मसिनि युग। मृत्युक नोत जीबाक लेल सिखु देब बधाइ। अशोक दत्त , जनकपुर, नेपाल दू टप्पी पतुरियासन मुस्की मगरसन नोर नेने भोरसं सांझधरि फ़ुसिएटा परसैए गिरगिट त दुनियांमे ब्यर्थे बदनाम अछि गिरगिटसं बेशी मनुक्ख रंग बदलैए लुत्ती करेजपर चोट लगै छै त लुत्ती जनमै छै केओ जं घात करै छै त लुत्ती जनमै छै फ़ाटल चाहे जत्ते हो देहके वस्त्र मुदा चीर पर हाथ बढै छै त लुत्ती जन्मै छै रहओ केहनो अपन मडैया बडा नीक लगैछ बास उपट' लगै छै त लुत्ती जनमै छै ल कर्मक रङकुच्ची बनबैया अपन फ़ोटो ओ फ़ोटो डहै छै त' लुत्ती जनमै छै सोनित या पानि धर्ती होइछै समान सभके भेदके रङ चढ़ैछै त लुत्ती जनमै छै बुझि छाउर सर्द चाहे जत्ते खेल करए बात जं हकके अबैछै त लुत्ती जनमै छै अजीत कुमार झा, गोवराही, दुहबी-6, धनुषा, कनकपुर नेपाल। सम्प्रति, हानवेल, यूके.मे अध्ययन काका काकी दहेज लेलथि

कक्का भोरे बिदा भेलाह जीट-जाट आ कान्हि छटा पुछलहुँ कक्का एना कतए कहल जे जाइ काल टोक नञि ने अबए छी कने बजार भेने मीठ पकवान आ मिठाई नेने एम्हर काकी घरकेँ नीपल सर सफाई कका चमका रहल कोन अवसर जे एना भ’ की रहल पुछलहुँ जे काकीसँ कहलनि बौआ आइ घटक आबि रहल

अच्छा तँ दोकानक सजावट छी ई ग्राहकक स्वागतक तैयारी छी ई सभ किछु आइ नव तेँ लागि रहल भाइजीयोक मुँह चमकि रहल कान्हि छटाक’ केश रँगा क’ पान चबाबैत कुर्तामे बान्हल जतेक बढ़िया समान ततबे बढ़िया दाम बनीमाक राज कक्काक’ खूब नीकसँ बुझल

घटक जी अएला निहारि क’ देखला ठोकि बजा क’ सभ किछु परखला भाइजीपर ओ’ फेर बोली लगेलथि मोल तोल केँ ल’ क’ खूब भेल घमर्थन सवा चारि लाखमे भेल बात पक्का देखू आजु हम्मर भैयि बिकेलथि लागनिक सूद-मूर सभ उप्पर भेलन्हि जमा-पूँजीकेँ खूब नीकसँ भजओलथि कक्का काकी आइ हमर दहेज लेलथि निमुख बरद जेकाँ भैय्या बिकेलथि कक्का काकी आइ हमर दहेज लेलथि धर्मेन्द्र विह्वल-जन्म विक्रम सम्वत २०२३-१२-०४, बस्तीपुर सिरहा,शिक्षा : एम ए ( मैथिली/राजनीतिशास्त्र ),डिप्लोमा ईन डेभलपमेन्ट जर्नालिज्म,प्रकाशित कृति : एक समयक बात (वि स २०६१ मैथिली हाईकु संग्रह ),रस्ता तकैत जिनगी (वि स २०५०/ कविता संग्रह ),एक सृष्टि एक कविता (२०५७/ दीर्घ कविता ),हमर मैथिली पोथी ( कक्षा 1 सं ५ धरिक पाठय पुस्तक ),सम्प्रति : सभापति, नेपाल पत्रकार महासंघ किछु छौंक १) बदनामी– प्रेम आ सिनेहकेँ सरेबजार निलाम नहि करू गौरवमय इतिहासकेँ एना बदनाम नहि करू । २) विज्ञापन जानि नहि आदमीक जंगलमे हम कतय हेरा रहल छी अखवारक ढ़ेरमे हम जिनगीक विज्ञापन ताकि रहल छी । ३) इज्जत खुलेआम इज्जत बिका रहल अछि दाम दऽ झट कीनि दिअ जल्दि करू स्टक सीमित अछि । नवेन्दु कुमार झा समाचार वाचक सह अनुवादक (मैथिली), प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी, पटना आब प्रवासक आश- कोसी क्षेत्रमे आएल भीषण बाढ़िसँ ई क्षेत्र तबाह भऽ गेल अछि। वर्तमान परिदृश्य महान कथाकार फणीश्वर नाथ रेणुक “परती परिकथा” दिस लोक ध्यान खींचि रहल अछि। कोसीक मारि सहैत कतेको लाखक आबादीकेँ ओहि दिन राहत भेटल छल जखन कि बिहारक शोक कहल जाएवाला नदी कोसीपर तटबंधक निर्माण भेल छल। आशा जागल जे ई क्षेत्र आब सोना उगलत। ई भेबो कएल। मुदा १८ अगस्त २००८ केँ पूरा परिदृश्य बदलि गेल। सरकारक लापरवाही चाहे ओ केन्द्र सरकारक हो कि राज्य सरकारक ई क्षेत्र एक बेर फेरसँ बालूक ढेर बनि गेल। जे नदी एहि क्षेत्रकेँ बसौलक ओहि नदीक कारण एक बेर फेर क्षेत्र विरान भऽ गेल। विकास दौरसँ ई क्षेत्र चलि गेल पचास वर्ष पाछाँ। एशिया क्षेत्रमे सभसँ उपजाऊ मानल जाएबला एहि क्षेत्रमे एखन बाँचल अछि तँ ओऽ छथि अपन घर-घरारी छोड़ि शरणार्थी बनल बाढ़ि पीड़ित आ पसरि रहल बिमारी आ बाँचल अछि जिनगी कटबाक आशा। मलेरिया सन महामारीक लेल बदनाम एहि क्षेत्रमे किछु वर्षसँ जे हरियरी देखाइत छल ताहिपर पानि पसरि गेल। गहूम, मकई आ धानक लहराइत खेत देखबाक चिन्तामे लागल अछि लोक। खेतीपर निर्भर एहि क्षेत्रक अर्थव्यवस्थापर जे घाव भेल अछि से कतेक दिनमे भरत से निश्चित नहि बुझि पड़ैत अछि। ओना तँ एहि क्षेत्रक एकटा पैघ आबादी एखनो प्रवासी छल मुदा जे एखन छलाह तिनको ई बाढ़ि प्रवासी बनबापर विवश कएलक अछि। खेतीक बाद जाहिसँ एहि ठामक अर्थव्यवस्था चलैत छल ओ अछि मनीआर्डर। मनीआर्डरक भरोसे लोक कहुना जिनगी कटैत छल। आब ओकरो अपन जिनगी पहाड़ लागि रहल अछि। राहत शिविर आ सुरक्षित स्थानपर शरण लेने एकटा पैघ आबादीकेँ अपन भविष्य प्रवसी बनबामे बुझि पड़ैत अछि। ओऽ आब बिचारि लेने अछि जे घर गृहस्थीकेँ पटरीपर आनब बिनु प्रवासी बनने संभव नहि अछि। कोसी क्षेत्रक कतेको रेलवे-स्टेशनपर लगातार बढ़ि रहल भीड़ एकर प्रमाण अछि। कतेको माय-बाप-भाइ-बहिन अपन-अपन परिजनकेँ घर-घरारीक चिन्ता नहि करबाक आशा देआ प्रदेशक लेल बिदा कऽ रहल छथि। किएक तँ जिनगी कटबाक एकमात्र रास्ता ओकरा मनीआर्डर बुझि पड़ैत अछि। एहि ठाम तँ सभ किछु उजड़ि गेल अछि। आब एकमात्र आशा प्रवासी बनि रहल परिजनक मनीआर्डर मात्र अछि जाहिसँ फेरसँ घर गृहस्थीकेँ पटरीपर आनल जाऽ सकैत अछि। ओकरा एहि बातक कोनो चिन्ता नहि अछि जे देशक कतेको भागमे बिहारी सभक विरुद्ध गतिविधि चलाओल जा रहल अछि। ओऽ तँ आब ई मानि लेलक अछि जे एहि ठाम एखन कोन जिन्दा छी जे प्रदेशमे कोनो अनहोनी घटनाक शिकार भऽ जाएब। ई एहि बातक प्रमाण अछि जे पेट आगिक सोझाँ प्रदेशमे होमए वाला कोनो तरहक अनहोनीक कोनो मोल नहि अछि। अपन आँखिसँ कोसीक धारमे बहैत अपन लोक, आर-परोस आ परिचितक लहाससँ एहि क्षेत्रक लोक हृदय पाथर भऽ गेल अछि। बाँचल जिनगी कटबाक लेल मृत्युक सामना करएसँ आब कोनो घबराहटि ओकरा नहि छै। कोसीक तटबन्ध टुटलाक बाद आब सरकारी स्तरपर जाँच, कार्वाई आ आयोगक गठन आदि खानापूर्ति भऽ रहल अछि आ होएत एहिसँ ओकरा कोनो माने मतलब नहि रहि गेल छै। आब चिन्ता छै तँ बस अपन घर-घरारी बसेबाक आ अपन परिवारक भविष्य रक्षा करबाक। बाढ़ि पीड़ितक लहासपर राजनीति, राहत आ बचाव काजक नामपर सरकारी खजाना लुटाएत, वोटक लेल गोलबन्दी होएत मुदा अगिला साल फेर कोसीक तांडव नहि होएत आ राजनेता, अधिकारी आ सरकार अपन जिम्मेदारी निर्वाह करताह एकर कोनो गारंटी नहि अछि। प्रकाश झा, ग्राम+पो.- कठरा, भाया-पुटाई, थाना- मनीगाछी, दरभंगा, बिहार (भारत) हमर मिथिलाक दर्शन मैथिल छी हम, मैथिली बजबामे अछि कोन लाज देश हो वा परदेश ज्यो हम करै छी ओऽ तऽ काज मिथिला के याद करबैछ सदिखन, विद्यापतिजी माथपर शोभैत पाग। हमरा लोकनिक पिता जनक, बहिन सीता, बहनोइ छथि राम कमला-कोशी अछि चरण जकर पखारैत ओ अछि हमर मिथिला धाम। मैथिल कवि लोकनिक पोथीमे पढ़ैत रहए छी जे खिस्सा मनमे उठैत रहैत अछि जिज्ञासा जे आओर कतेक बाकी अछि प्रशंसा कोइलिक कु-कू राग सुनि मोन म मारऽ...लगैत अछि टीस तखने किछु काल बाद नम्र हृदय सऽ निकलैत अछि गोसाउनिक गीत विद्यापति, मण्डन, अयाची आऽ मैथिलपुत्र प्रदीप हिनकर लोकनिक सुन्दर लेखन पढ़ि मोनमे जड़ैत अछि शब्दक दीप एहि मातृभूमिपर पान, मखान, खराम कऽ अछि एकटा इतिहास बाढ़-बोन के आड़ि-धुरपर बैस, नीक लगैछ मड़ुआ रोटी- सागक स्वाद। चहु ओर हरियाली, घर फूसक, लच-लच करैत ओऽ खरहीक टाट। भोरे सुइत-उठि कए बाधमे सुन्दर लगैत अछि शीतल घास। घरक चारपर कुम्हर, कदीमा आओर सजमनिक अछि लत्ती पसरल नजरि नञि लागए कोनो डैनियाहीके, ताहि लऽ एकटा खापैड़मे कारी-चून लेपल राखल। पछबाड़ि कातक बारीमे राखल एकटा कटही गाड़ी पुरान बाबू-कक्का चौकपर बैसल, बाबा धेने छथि दलान। आब कतेक हम विवरण करबए, शब्दसँ अछि ठेक भरल मिथिलांचलमे मैथिली भाषाक लेल छी हम मैथिल भिड़ल मिथिला चित्रकला एखनो धरि केने अछि राज देश-विदेश संगहि प्रकाशझाक ई प्रस्तुति पढ़ि बुझबइ एकटा छोट सनेस। जन्म 3 जनवरी 1936 ई नेहरा, जिला दरभंगामे। 1958 ई.मे अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर, 1959 ई.मे लॉ। 1969 ई.मे कैलिफोर्निया वि.वि.सँ अर्थस्थास्त्र मे स्नातकोत्तर, 1971 ई.मे सानफ्रांसिस्को वि.वि.सँ एम.बी.ए., 1978मे भारत आगमन। 1981-86क बीच तेहरान आ प्रैंकफुर्तमे। फेर बम्बई पुने होइत 2000सँ लहेरियासरायमे निवास। मैथिली फिल्म ममता गाबय गीतक मदनमोहन दास आ उदयभानु सिंहक संग सह निर्माता।तीन टा उपन्यास 2004मे चमेली रानी, 2006मे करार, 2008 मे माहुर। माहुर ..1.. दृ”आह! भैया आबि गेला। हाथ मे पोटरी छनि। अबस्से ओहि मे ‘मीट’, अरे! नहि माता दुर्गाक परसाद हेतनि!“ रंजना बाजलि छलीह। ओ दौड़ैत आंगन सँ बाहर एलीह। हुनका भाइजीक हाथ मे ठीके पोटरी छलनि जाहि मे ‘मीट’ रहैक। भाइजी अपन हाथक पोटरी रंजनाक हाथ मे देब’ चाहलनि। फेर, ने जानि हुनका की मोन पड़लनि जे अपन पोटरी बला हाथ क¢ँ पाछाँ घीचि लेलनि। ओ बूत बनि ठार भ’ गेला। भाइजीक ठोर मे कंपन होब’ लगलनि, आँखि सँ ढबढब नोर बह’ लगलनि आ हुनक समग्र शरीर थर-थर काँपए लगलनि। भाइजी अर्थात आकाश सँ हुनक एकमात्रा छोट बहिन रंजना हुनका सँ बारह बर्खक छोट छलथिन जे आब पन्द्रहम मे पयर रखने छलीह। ओ सलवार-कुर्ती पहिरने छलीह। हाथ मे चूड़ीक स्थान पर घड़ी बान्हल छलनि। पुछू किएक? रंजना विधवा छलीह। पछिला आषाढ़ मे रंजनाक विवाह कमीशन प्राप्त सेकेण्ड लेफ्टिनेन्ट भास्कर चैधरी सँ भेल रहनि। एक महिनाक अवकाश समाप्त भेला पर भास्कर चैधरी अपन ड्यूटी पर कश्मीर पहुँचल छला। ओतहि आतंकवादीक संग मुठभेर मे शहीद भ’ गेलाह। रंजना विधवा भ’ गेलीह। आकाश लगक शहर दरिभंगाक एक बैंक मे कार्यरत रहथि। ओ गामहि सँ स्कूटर पर बैंक जाथि आ आबथि। अष्टमी रहैक आ बैंक दशहराक छुट्टी मे बन्द छलै। गामेक दुर्गा स्थान मे बलिप्रदान कएल छागरक भड़ाक माँउस पुजेगरीक आदेश सँ बिकाइत छलै। ओही ठाम सँ आकाश एक किलो ‘मीट’ आ की परसाद जे कहियौ कीनि क’ अनने रहथि। सम्प्रति जे दृश्य उपस्थित भेल छलै ओहि मे आकाश हाथ मे मीटक पोटरी टंगने थरथराइत ठार रहथि। हुनका आँखि सँ दहो-बहो नोर बहि रहल छलनि। हुनक पत्नी, पांच बर्खक बेटी सुजाता, माता-पिता सभ कियो ढलानक एक कात ठार डबडबाएल आँखिए देखैत चुपचाप आकाश दिस ताकि रहल छलथिन। रंजना ठीक आकाशक सामने छलीह। हुनक बाल सुलभ सदृश मुख-मंडल पर बड़ी टा प्रश्न चिन्ह बनि गेल छल। काजर पोतल आँखि मे रंजनाक समग्र भविष्य धह-धह धधकि रहल छल। त¢ँ नोरक एकोटा बून्न देखाइ नहि पड़ि रहल छल। परिवारक क्रंदन बीच रंजना एक अजीबे दृष्टि सँ अपन भ्राता, आकाश क¢ँ निहारि रहल छलीह। बड़ी काल सँ अंटकल आकाशक कंठ सँ कुहरैत शब्द बाहर भेलदृ”हे भगवान! हम ई की कएल? कियक हम ‘मीट’ कीनल?“ एतबा बाजि आकाश मीट’क पोटरी क¢ँ नाला मे फेकि, दुनू हाथे माथ पकड़ि, नीचा जमीन पर बैसि हबोढेकार कान’ लगलाह। आब रंजना क¢ँ छोड़ि परिवारक सामूहिक क्रंदन सँ स्थान पीड़ादायक बनि गेल। मात्रा रंजना अविचल ठार रहलीह आ शून्य नजरि सँ सभ किछु देखैत रहलीह। हम कोन तरहक खिस्सा सुनाब लगलहुँ। इहो कोनो खिस्सा भेलै? रंजनाक विवाह लड़ाइक सिपाही संग भेल छलनि। ताहू मे एहन सिपाही सँ जनिक नियुक्ति कश्मीर मे आतंकवादी सँ भिड़न्त मे भेल होअय। तखन त’ प्राण जायब करीब-करीब निश्चिते छलै। त¢ँ रंजना विधवा बनलीह। अहि मे अजगुत बला कोनो बात नहि भेलै। दुखक बात जँ रहै त’ एतबेटा जे जाहि जाति मे रंजनाक जन्म भेल रहनि ओहि जाति मे पुनर्विवाहक नियम नहि रहैक। ओहि जातिमे आ सनातन सँ आयल परम्परा मे विधवाक निदान हेतु कोनो टा व्यवस्था नहि रहैक। रंजना विधवा भेलीह त’ भेलीह। पूर्वजन्मक पाप ओ नहि भोगती त’ के भोगत? त¢ँ ई मात्रा ओहने आ ओतबेटा बात भेल जेना मनता मानल कोनो पाठीक बलि पड़ल होअय। आब अहाँ कहबै जे ई कोन तरहक मिलान भैलै? नहि अरघै अछि, त’ सुनू। मनता मानल पाठी-छागरक बलि पड़ै काल बलि देनिहार, कबुला केनिहार एवं बाँकी सभटा तमाशा देखनिहार एतबे ने सोचैत छथि यौ जे हरदि, मिरचाइ आ मसल्ला मे भूजल एकर माँउस मे कतेक सुआद हेतै? तहिना विधवा भेलि रंजना द’ सभ सोच’ लागल छथि जे ई आब सासुर त’ जेतीह नहि, गामहि मे रहतीह। गाम मे सभहक टहल-टिकोरा करतीह, अदौरी-कुम्हरौरी खोंटतीह, अँगने मे भानस-भात करतीह, एकरा-ओकरा संग तीर्थाटन जेबा काल भनसिया बनि क’ जेतीह आ छौंड़ा सँ लगाति बूढ़बा तकक करेजक तपन मेटौती। त¢ँ बरसामबाली काकी कहने रहथिन यौ, भगवान सभहक सभटा इन्तजाम बैसले-बैसल ‘क’ दैत छथिन। दूर जो, मनसा सभहक लप-लप करैत जिह्वा आ आँखिक खोराकक पूर्ति सदिकाल सँ बाल-विधवे सँ पूर्ति होइत रहलै अछि। ई कोनो नुकायल गप्प छैक? आब अहीं कहू जे मनता मानल पाठी आ विधवा भेलि रंजना मे की फर्क? कोनो तरहक शिकायत करब सेहो युक्ति संगत नहि होयत। त¢ँ आब नीक होयत जे अहि खिस्सा क¢ँ अही ठाम विराम द’ क’ ओही गाम मे ओही दिन घटल दोसर घटनाक जानकारी प्राप्त करी। गामक नाम भेल पानापुर। पानापुर मे सभ जाति, समुदाय एवं सम्प्रदायक लोकक निवास। गाम आर्थिक रूपे सम्पन्न। ओहि गाम मे छल एकटा दुर्गा मंदिर, जे दस-बीस कोस दूर तक प्रसिद्ध छल। पैघ पोखरिक पूबरिया भीड़ पर तीन-चारि बीघा मे पसरल मंदिर आ मंदिरक परिसर। मंदिर मे दुर्गाक भव्य प्रतिमा। तकरबाद मंडप, पुजारीजीक आवास आ सदिकाल खल-खल हँसैत, स्वच्छ, विशाल समतल भूमि। दशहराक समय मे अही स्थान पर मेला, नौटंकी, नाच-गान आदि आयोजित होइत छल। दुर्गा मंदिरक पुजारी छलाह काली कान्त ओझा। दुब्बर-पातर, साँची धोती, खोंसल ढेका, छाती पर उगल पंक्तिबद्ध हड्डीक उपर दू भत्ता फहराइत जनउ, गौ-खूँर बरोबरि टीक, पयर मे खराम आ ललाट पर सेनुरक ठोप। पुजारीजी सज्जन आ मृदुभाषी छलाह। वैष्णव त’ओ छलाहे आ सप्ताह मे अधिक दिन उपासे मे रहैत छलाह। मुदा हुनक पत्नी अढ़ाइ मोनक पट्टा छलथिन। थुलथुल देह, खुजल कारी केश, नाक सँ मांग तक पतिव्रताक निशानी स्वरूप सेनुरक डरीर, पान-जर्दा दुआरे कारी भेल दाँत आ बीड़ी त’ ओ नैहरे सँ पिबैत आयल रहथि। जँ जुमनि त’ नित्य माँउस-माँछ चाहबे करी। दू अगहनी जोड़ दू रब्बी गुण दू बरोबरि मंदिरक बर्ख भरिक अन्न-टाकाक आमदनी पर हुनक पूर्ण एकाधिकार छलनि। पुजारीजी पत्नीक सोझा मे आब’ मे कँपैत छलाह। शारीरिक दुर्बलता अथवा धार्मिक अजीर्णता, कारण जे हौउ, पुजारी जी सदिकाल पत्नी सँ डेरायल रहैत छलाह। तखन पुजारीजी के संतान स्वरूप पुत्राक प्राप्ति भेलनि कोना? ई रहस्यक विषय अवस्से छल। मुदा अहि रहस्यक छेदन नीति शास्त्रा ज्ञाता कइएक बेर क’ चुकल छथि। हुनका लोकनिक अनुसारे पति-पत्नीक ग्रह-नक्षत्रा कतबो उल्टा-पुल्टा किएक ने हौउक, प्रचुरता एवं परिपक्कता बेला मे कखनहुँ काल अर्द्ध-विराम पूर्ण विराम भैए जाइत छैक। पुजारीजीक पुत्राक नाम रहनि यदुनाथ ओझा। पैघ भेला पर यदुनाथक उपनयन भेलनि आ बर्ख भरिक भीतरे विवाह सेहो भ’गेलनि। यदुनाथक पत्नी अर्थात पुजारीजीक पुतहु जखन दुरागमन भेला पर सासुर अयलीह त’ हुनक अनुपम सौन्दर्यक दुआरे सम्पूर्ण पानापुर गाम महमही सँ गमकि उठल। यदुनाथ त’ अपन बापक कार्बन काॅपी छलाह। मुदा हुनक पत्नी जनिक नाम छल कामिनी, तनिका जे देखलक सैह विभोर होइत बाजल छलदृ”माइ गे माइ! एतेक रूप पुजारी जीक सन्दुक-पेटार मे झाँपल कोना रहतैक? कोनो अनहोनी ने भ’ जाइक?“ अष्टमीक निस्तब्ध राति। पानापुर गामक सभटा मनुक्ख भरि दिन नाच तमासा देखलक, इच्छा भरि नशा केलक आ भरि पेट माँउस-भात खाए थाकि क’ झुरझमान भ’ सुति रहल। मुदा चोर-उचक्का, अत्याचारी एवं व्यभिचारी किस्मक लोक क¢ँ राति मे निन्न होइते ने छैक। ओहन लोक रातिए मे अपन इच्छा-पूर्तिक जोगार करैत अछि। ओहने राक्षस प्रवृतिक श्रेणी मे छल बिदेसरा कुएक। गाम मे एकटा अस्पताल अवस्से छलै। मुदा डाक्टर महिना, दू महिना मे कहिओ काल अबैत छलाह। गामक स्वास्थ्य विभाग कुएकक जिम्मा छल। ओना सड़क-छाप बहुतो कुएक छल। मुदा बिदेसरा कुएक सभ सँ तेज-तर्रार मानल जाइत छल। ज्वर-धाह राति-विराति कखनो-ककरो भ’ सकैत छलै। ताहि कालक भगवान छल बिदेसरा कुएक। ककरा मे एतेक साहस रहै जे बिदेसरा कुएक सँ तकरार करितय। नाड़ी देखै लेल अथवा सूइया भोंकै लेल बिदेसरा कुएक ककरहु आंगन मे कखनहुँ प्रवेश क’ जाइत छल। ओकरा कोनो रोक-टोक नहि रहैक। जहिया सँ यदुनाथ दुरागमन करा क’ अयलाह आ सुन्दर कनिआँक कारणें गाम भरिक छौंड़ा सभहक बीच इर्खाक मूर्ति बनलाह तहिया सँ बिदेसरा कुएक हुनका मे अधिक काल सटले रहैत छल। चाह-नास्ताक संग चोटगर-मिठगर गप-सप कहि बिदेसरा कुएक यदुनाथक मोन क¢ँ मोहैत रहल आ अन्ततः हुनकर अभिन्न मित्रा बनि गेल। एहना मे जिगरी यार बिदेसरा कुएकक फर्माइस यदुनाथ पूर्ति कोना नहि करितथि? ओही अष्टमीक राति बुझू निशा पूजा निमित्ते, दुनू यार बैसल रहथि। स्थान छल यदुनाथक शयन-कक्ष। पुजारीजीक आवास मे पहिने छल कनेटा खुजल दरबज्जा। तकरबादक कोठली मे पुजारीजी पत्नीक संग रात्रि विश्राम करैत छलाह। तकर सटले भंडार आ भनसाघर। सभ सँ अन्त मे जे कोठली छल सैह भेल यदुनाथक शयन-कक्ष। दुरगमनिआँ पलंगक एक कात टेबुल आ कुर्सी। देवाल पर सिनेमाक अभिनेत्राीक नयनाभिराम फोटोक बीच भगवतीक फोटो। खिड़की-केबाड़ पर्दा सँ झाँपल। दू गोट कुर्सी पर यदुनाथ आ बिदेसरा कुएक आमने-सामने बैसल छल। बीचक टेबुल पर एकटा फूलदार विदेशी शराबक खुजल बोतल, पानि सँ भरल जग आ दू गोट शीशाक गिलास राखल रहैक। ताही काल यदुनाथक कनिआँ कामिनी छिपली मे भुजल माँउस टेबुल पर रखलनि आ पतिक अगिला आदेशक प्रतीक्षा मे एक कात ठार भ’ गेलीह। हुनक गोरकी बाँहि मे सटल करिका ब्लाॅउज ककरो एक बेर आरो देखीक’ लोभ मे पटकि सकैत छल। बिदेसरा कुएक अपन नजरिक नोक क¢ँ कामिनीक उठल ब्लाॅउज मे भोंकैत बाजलदृ”यार, एतय सभ ठर्रा पिबैत अछि। मुदा अहाँ लेल हम दरिभंगा सँ सय टाका मे असली अस्सी प्रतिशत प्रूफ अल्कोहलबला ‘जीन’ मंगौलहुँ अछि। आब बिलम्ब नहि क’ एकरा टेस्ट करियौ।“ दू टा गिलास मे शराब ढारल गेल, पानि मिलाओल गेल, गिलास टकराओल गेल आ तखन दुनू यार पिअब शुरू केलनि। माँउस निघंटि गेल। कोनो बात ने, कामिनी छिपली भरी भूजल माँउस फेर सँ अनलनि। यदुनाथ पहिले पैग मे डोलि गेल छलाह। शराब पचेबाक ने हुनका काया रहनि आ ने प्राइटिस। दोसर पैग समाप्त करैत-करैत यदुनाथक आँखिक डिम्हा सँ टर्चक फोक्सिंग बाहर होब’ लगलनि। तेसर पेगक आरम्भे मे कामिनी फेर सँ भूजल माँउस आन’ चलि गेल रहथि। जाबे ओ घूमि क’ एलीह ताबे हुनक नाथ पलंग पर चित बेहोश पड़ल रहथिन आ हुनकर थुथून सँ सा¢ँ-सौंक अबाज प्रसारित भ’ रहल छल। कामिनीक हाथ मे तेसर खेपबला भूजल माँउसक छिपली छलनि। ओ थकमकाइत ठार भ’ गेलीह आ पलंग पर पड़ल अपन स्वामी क¢ँ टकटक देख’ लगलीह। किछु समय लेल कामिनीक मस्तिष्कक सोचक यंत्रा मे ब्रेक लागि गेलनि। बेगूसराय सँ खगड़िया जेबाक ‘हाइ वे’क दक्षिण गंगाक तटपर बसल छल पिहुआ नामक गाँव। ओही गामक मंदिरक पुजारीक कन्या छलीह कामिनी। गंगाजल सँ घोअल मंदिरक पवित्रा परिसर मे कामिनीक जन्म आ पालन-पोषण भेल रहनि। सासु-ससुरक सेवा एवं पतिक आदेशक पालन करबाक बीज मंत्रा ल’क’ कामिनी सासुर आयल रहथि। मुदा सासुरक वातावरण किछु अलगे तरहक रहैक। सासुक बीड़ी पिअल मुँहक गंध सँ कामिनी क¢ँ मितली होब’ लागनि, असरधा होनि। मुदा ओ अपना क¢ँ रोकथि आ बुझबथिदृकोनो बात नहि। नव स्थान मे एना प्रायः होइते छै। सभटा अपने आप ठीक भ’ जेतै! केवल धैर्यक निर्वाह चाही। यद्यपि ई बात हुनका कियो सिखौने नहि छलनि। मुदा आन-आन नव विआहलि कन्या जकाँ एकर विश्वास हुनकर संस्कार मे पहिने सँ छलनि जे पति हुनकर रक्षक छथि, परमेश्वर छथि। तखन चिंता कथिक? मुदा एखन त’ हुनकर रक्षक, परमेश्वर बेसुध भेल पड़ल छथि। एखुनका बयस तक कामिनी क¢ँ नीक-बेजायक कोनो टा ज्ञान नहि भेल छलनि। त¢ँ कामिनीक लेल एखुनका परिस्थिति अप्रत्याशित आ ओझरायल सन छल। ओ काठ बनलि ठार रहि गेलीह। कृष्णमोहन झा (1968- ), जन्म मधेपुरा जिलाक जीतपुर गाममे। “विजयदेव नारायण साही की काव्यानुभूति की बनावट” विषयपर जे.एन.यू. सँ एम.फिल आ ओतहिसँ “निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में प्रेम की परिकल्पना” विषयपर पी.एच.डी.। हिन्दीमे एकटा कविता सँग्रह “समय को चीरकर” आ मैथिलीमे “एकटा हेरायल दुनिया” प्रकाशित। हिन्दी कविता लेल “कन्हैया स्मृति सम्मान”(1998) आ “हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार”(2003)। असम विश्वविद्यालय, सिल्चरक हिन्दी विभागमे अध्यापन। दुनूकेँ माछकेँ देखैत अछि स्त्री स्त्री केँ देखैत अछि माछ अहाँ दुनू केँ देखि रहल छी रूपेश कुमार झा 'त्योंथ',ग्राम+पत्रालय-त्योंथा,भाया-खिरहर, थाना-बेनीपट्टी,जिला-मधुबनी,सम्प्रति कोलकाता मे स्नातक स्तर मे अध्यनरत, साहित्यिक गतिविधि मे सेहो सक्रिय, दर्जन भरि रचना पत्र-पत्रकादि मे प्रकाशित। बूथ कैप्चरिग कोन पाप लागल से ने जानि घुरि अयलहुँ मोनक बात मानि नोकरी सँ ने भेटैत अवकाश ने करितहुँ हम ई गाम वास अयलहुँ तऽ लागय सभटा नीक अछि ने मुदा किछुओ ठीक आब गामक हवा अछि बिगड़ल अछि स्वार्त जल सँ सभ भीजल तथापि रहैत छलहुँ हर्षित भेल समाजक हेतु समर्पित मुदा आयल बइमनमा चुनाव बढ़ल लोक सभक आब भाव ग्रामीण सभ मिलि कयलक बैसार भेल ओ जे छल ने आसार सभ क्यो कयलक आग्रह प्रगाढ़ जे होऊ अहाँ एहि बेर ठाढ़ सोचल दी कोना लोकक बात काटि सेवाक अवसर देलक आइ माटि बनि एहि पंचायतक हम मुखिया रहय देबै ने ककरो दुखिया सोचि बनल मुखियाक प्रतिनिधि कल जोड़ि पोस्टर छपओलहुँ सविधि प्रचार मे जुटलहुँ दिन-राति विरुद्ध मे ठाढ़ भेल कतेको पछाति भेल शुरू मारामारी-गड़ागड़ौवल कएक ठाम भेल लठा-लठौवल भेटल सभ केँ दू-चारि गोट नोट खसलहि दोसरेक हक मे वोट तइयो नहि भेटलै संतोष छपलक बूथ मिलि सभ दोस परिणाम सुनि भेलहुँ स्तब्ध भऽ गेल छल हमर जमानत जब्त घर सँ निकलैत आब होइछ लाज किएक कयलहुँ हम एहन काज बैसब ने मुदा निश्चित आब हेबे करतै फेरो चुनाव होयब ठाढ़ हम फेर जा पोसब गुंडा आब कएकटा उगि गेलैछ हमरो दू गोट सिंग करब हमहुँ आब बूथ कैप्चरिग हृदय नारायण झा, आकाशवाणीक बी हाइग्रेड कलाकार। परम्परागत योगक शिक्षा प्राप्त। लुप्तप्राय मैथिली लोकगीत प्राती ,गोसाउनिक गीत भगवतीगीत झूमरा,सोहर,खेलउना, कुमार,परिछन ,चुमान, डहकन ,बिषहारा   गीत , झूमरि ,बटगमनी,मलार चैमासा ,लगनी ,समदाउन आ एकर अतिरिक्त नदी संस्कृति मे कोशी   गीत आदि कतेको मैथिली लोकगीत लुप्तप्राय अछि । जतए कतहु एखनहु लोककण्ठ मे ई गीत सभ     बाचल अछि तकरा संग्रहित   कऽ ओहि गीतक प्रकाशन आ ओहि धुन कें सुरक्षित रखबाक लेल ओकर  आॅडियो वीडियो रूप मे दस्तावेजीकरण करबाक आवश्यकता विचारणीय अछि । संवैधानिक मान्यता    प्राप्त भारतीय भाषा बनलाक बाद मैथिलीक  संस्कार ,रीति रिवाज , पर्व त्योहार ओ )तु पर आधारित गीतक समृ( परंपरा वर्तमान आ भविष्यक पीढ़ी लेल कोना सुरक्षित कएल जाय ई संपूर्ण मैथिली जगतक लेल चिन्ताक विषय बनल अछि । मिथिला महान रहल अछि अपन विशेषताक कारणें। मिथिलाक    प्रशंसा में   वृहद्विष्णुपुराणक   उक्ति अछि धन्यास्ते ये प्रयत्नेन निवसन्ति महात्मुने । विचरेन्मिथिला मध्ये ग्रामे ग्रामे विचक्षणः ।। सदाम्रवन सम्पन्ना नदीतीरेषु संस्थिता । तीरेषुभुक्तियोगेन तैरभुक्ति रितिस्मृता ।। अर्थात् हे मुनीश्वर ! ओ धन्य छथि  जे मिथिला में यत्नपूर्वक निवास करइ छथि आ मिथिलाक गामे गाम घूमइ छथि । ई मिथिला  सदैव आमक वन सॅ सम्पन्न  नदीक तट पर स्थित अछि आ तीर में भोगक लेल प्रसि( अछि । ते  तीरभुक्ति अर्थात् तिरहुत  नाम सॅ सेहो जानल जाइत अछि मिथिलांचल । पुराणोक्त कपिलेश्वर, हरिलाखी , पिप्पलीवन , फुलहर ,गिरिजास्थान , विलावती , हरित्वेकी , कूपेश्वर ;कुशेश्वरस्थान द्ध , सिंहेश्वर , जनकपुर ,वनग्राम ,सिन्दूरेश्वर , त्रपनायनवन , विषहर , मंगला, मंगलवती विरजा , पापहारिणी , सुखेलीवन आदि तीर्थ सॅ पावन मिथिलाक महिमा वृहद्विष्णुपुराणक   मिथिला   माहात्म्य में  वर्णन कएल गेल अछि । मिथिलाक लोकगीत में धर्म आ लोक बेवहारक प्रधानता अछि । ब्राह्मवेलाक, पराती , श्रमगीत;लगनीद्ध ,गोदना , भगवतीक आवाहन गीत ;गहबर मे प्रचलित गीत झूमराद्ध , कोशी संस्कृति में विकसित गीत सहित परंपरागत संस्कार गीतक कतेको प्रकार मिथिलाक नव पीढ़ीक बीच लुप्तप्राय अछि । ओहि लुप्तप्राय  गीत सभक शब्द रचना ,धुन ,स्वर ,लय आ भाव एखनहुॅ सबकें आकर्षित करइत अछि । सब तरहें ज्ञान कें बढ्ऱाब बला , संस्कारक संग रीति नीतिक बोध कराब बला आ सुनबा मे मनोरंजक  अछि ओ गीत सभ । एखनहुॅ जतए कतहु परातीक स्वर कान में पड़ैछ मन भाव विभोर भ जाइत अछि । प्रस्तुत अछि साहेबदासक लिखल पराती मौलिक पारंपरिक भास में - अजहुॅ भजन चित चेत मुगुध मन   अजहु भजन चित चेत ।। बालापन तरूणापन बीतल , केस भये सभ सेत  मुगुध मन । अजहुॅ ।। जा मुख राम नाम ने आबत , मानहु सो जन प्रेत  मुगुध मन । अजहुॅ ।। हरि विमुखी सुख लहत न कबहुॅ , परए  नरक  के रेत  मुगुध मन । अजहुॅ ।। साहेबदास तोहि क्या लागत , राम नाम मुख लेत  मुगुध मन अजहुॅ भजन चित चेत ।। परातीक संबंध में श्रेष्ठ जन कहइ छथि -  जखन पराती गाओल जाइ छल त एक कोस धरि ओर ध्वनि पहुॅचइत छल । परातीक भास आ भाव  लोकसभ के जगा क मंगल विहानक आनन्द दैत छल । ओहि   भासक पराती केहन होइत अछि ,देखल जाय - प्राण रहत  नहि मोर श्याम बिनु प्राण रहत नहि मोर ।। काहि पुछओ  कोई मोहि ने बताबए , कहाॅ गेल नन्द किशोर । श्याम बिनु ।। छल कए गेल छलिक नन्दनन्दन  , नैन झझाइछ नोर । श्याम बिनु ।। साध्यौ मौन कानन पशु पंछी , कतहु ने कुहुकए मोर । श्याम बिनु ।। हमहुॅ मरब हुनि बहुरि न आएब , साहेब जीवन  दि न थोर । श्याम बिनु प्राण रहत नहि मोर ।। मधुबनी में श्री दुर्गास्थान ,कोइलख में भद्रकाली,श्री दुर्गाशक्तिपीठ , मंगरौनी में बूढ़ी माई, डोकहर मे राजराजेश्वरी ,जितवारपुर मे सि(काली पीठ ,ठाढ़ी मे परमेश्वरी स्थान ,  खोजपुर में तारामंदिर ,      सहरसा के वनगाॅव मे उग्रतारा , विराटपुर मे चण्डिका ,बदलाघाट मे कात्यायनी , पचगछिया मे श्री कंकाली , पटोरी आ गढ़बरूआरी मे दशमहाविद्या ,देवनाडीह मे वनदुर्गा , दरभंगा मे श्यामामंदिर , म्लेच्छमर्दिनी , गलमा मे तारास्थान ,पचही मे चामुण्डा , अहल्यास्थान ,ककरौल मे शीतला स्थान , पूर्णियां मे पूरनदेवी , अररिया मे दक्षिण कालिका मंदिर , मुजफ्फरपुर मे त्रिपुरसुन्दरी , सखरा मे सखलेश्वरी ,       उच्चैठ मे    छिन्नमस्तिका ,  चम्पारन मे वैराटी देवी , चण्डी स्थान , सहोदरा स्थान  सन कतेको देवी तीर्थ सॅ  सम्पन्न  मिथिलाक जन जन मे देवी  शक्तिक उपासनाक परंपरा समृ( अछि । मिथिलाक घर घर मे कुलदेवी रूप मे पूजित हेबाक कारणेॅ विविध भावक देवीगीतक परंपरा विकसित भेल।  संपूर्ण भारत वर्ष मे मिथिला एकमात्र क्षेत्र अछि जतए भगवती गीतक सर्वाधिक धुन पाओल जाइछ । कोनो मंगल कार्यक आरंभ में गोसाउनिक गीत गेबाक जे परंपरा अछि ओहि मे प्रचलित अधिकांश गीत आ धुन लुप्तप्राय अछि । लोककंठ में एखनहुॅ कतहुॅ कतहुॅ सूनल जा सकैछ एहन किछु गीत । यथा 1पारंपरिक जय वर जय वर दिअ हे गोसाउनि हे मा तारिणी त्रिभुवन देवी । सिंह चढल मैया फिरथि गोसाउनि हे मा अतिबल भगवती चण्डी ।। कट कट कट मैया दन्त शबद कएलि हे मा गट गट गिरलनि काॅचे । घट घट घट मैया शोणित पिबलनि हे मा मातलि योगिन संगे ।। 2  म0म0मदन उपाध्याय जय जय तारिणी भव भय हारिणी दुरित निवारिणी वर  माले । परम स्वरूपिणी उग्र विभूषिणी दनुज विदूषिणी अहिमाले । । पितृवन वासिनि खल खल हासिनि भूत निवासिनि सुविशाले । त्रिभुवन तारिणि त्रिपुर विदारिणि वदन करालिनि अहिमाले ।। शतभख फल दे दिविशत शुभ दे अरिकुल भय दे धननिले । अति धन धन दे हरि हर जय दे अनुपम वर दे वर शिले ।। मदन विलासिनी विदित विकासिनि कर कृतपाशिनि जगदीशे । हरिकर चक्रिणि हरिकर वज्रिणि हरिकर शूलिनि परिमिशे ।। रवि शशि लोचिनि कलुष विलोचिनि वर सुख कारिणि शिव संगे । श्रुति पथ चारिणि महिष विदारिनि क्षितिज विपोथिनि रण संगे ।। अतिशय हासिनि कमल विलासिनि  तिमिर विनासिनि वर सारे । हर हृदि हर्षिणि रिपुकुल घर्षिणि धन रव वरसिनि हे तारे ।। जय जय तारिणि भव भव हारिणि दुरित निवारिनि वर माले ।। 3  पारंपरिक करू भव सागर पार हे जननी करू भवसागर पार । के मोरा नैया के मोर खेबैया   के मोरा उतारत पार हे जननी ।। अहीं मोर नैया अहीं मोर खेबइया अहीं उतारब पार हे जननी ।। के मोरा माता  पिता मोर के छथि के मोर सहोदर भाई हे जननी ।। अहीं मोर माता अहीं मोर पिता छी अहीं सहोदर भाई हे जननी ।। 4   कालिकान्त अखिल विश्व के नैन तारा अहीं छी हे जगदम्ब हम्मर सहारा अहीं छी ।। अनल वायु शशि सूर्य सभ मे अहीं मा , नदी के विमल मंजुधारा अहीं छी ।। रज सत्व तम केर उदभव अहीं मा , प्रगट मे तदपि शंभुधारा अहीं छी ।। विपत धार मे सुत जौं डुबि रहल हो तकर हेतु निकटक किनारा अहीं छी ।। विनय कालिकान्तक सुनत आन के मा दया के सकल सृष्टि सारा अहीं छी ।। 5 पारंपरिक सुर नर मुनि जन जगतक जननी हमरो पर होइयौ ने सहाय हे मा ।। जनम जनम सॅओ मुरूख बनल छी , आबहु देहु किछु ज्ञान हे मा ।। केओ ने जगत बीच अपन लखित भेल , हमहुॅ अहींक सन्तान हे मा ।। दुखिया के जिनगी माता देखलो ने जाइए , सुखमय जग करू दान हे मा ।। काम क्रोध लोभ मोह माया जाल बाझलहुॅ , मुक्तिक देहु वरदान हे मा ।। 6  पारंपरिक हे जगदम्ब जगत माता काली प्रथम प्रणाम करै छी हे ।। प्रथम प्रणाम करै छी हे जननी हम त किछु ने जनै छी हे ।। नहि जानी हम पूजा जप तप अटपट गीत गबइ छी हे । अटपट गीत गबई छी हे जननी हम त किछु ने जनै छी हे ।। विपतिक हाल कहू की अहाॅ के सबटा अहाॅ जनै छी हे । सबटा अहाॅ जनै छी हे माता ,हम त किछु ने जनै छी हे ।। मात पिता हित मित कुल परिजन  माया जाल बझल छी हे । जगतारिणी जगदम्ब अहीें केॅ गहि गहि चरन कहै छी हे ।। 7  पारंपरिक हे अम्बे माता हमरो पर होइयौ सहाय ।। हमार जगजननी हमरो पर होइयौ सहाय ।। युग युग सॅ भटकल छी जीवन भॅवर मे आबहुॅ उबारू हे माय।। दुःखहि जनम बाल यौवन मे पाओल सुख के ने भेटल उपाय ।। अज्ञानी शक्तिहीन लोभी बनल छी ,एहन ने जिनगी सोहाय ।। 8  महाकवि विद्यापति आदि भवानी विनय तुअ पाय ,तुअ सुमिरइत दुरत दूर जाय ।। सिंह चढ़ल देवि देल परवेश बघछाल पहिरन जोगिन भेष ।। बाम लेल खपर दहिन लेल काति , असुर के बधए चललि निशि राति ।। आदि भवानी विनय तुअ पाय ,तुअ सुमिरइत दुरत दूर जाय ।। तुअ भल छाज देवि मुण्डहार , नूपूर शबद करए छनकार ।। भनई विद्यापति कालीकेलि सदा ए रहू मैया दहिन भेलि ।। आदि भवानी 9 कवीश्वर चन्दा झा तुअ बिनु आज भवन भेल रे घन विपिन समान ।। जनु रिधि सिधिक गरूअ गेल रे मन होइछ भान ।। परमेश्वरी महिमा तुअ रे जग के नहि जान । मोर अपराध छेमब सब रे नहि याचब  आन ।। जगत जननी काॅ जग कह रे जन जानकि नाम । नहर नेह नियत नित रे रह मिथिला धाम ।। शुभमयी शुभ शुभ सब दिन रे  थिर पति अनुराग । तुअ सेवि पूरल मनोरथ रे हम सुलित सभाग ।। इ नवो गीत नौ धुन मे अछि । एकर अतिरिक्त कतोक गीत अछि मुदा आबक नब पीढ़ीक बीच एकर परंपरागत शिक्षाक बेवहार नहि देखल जाइछ । परिणामतः फिल्मी गीतक धुन मे भगवती गीत सभक चलन मैथिली परंपरागत गोसाउनिक गीत भगवती गीतक परंपराक समक्ष अस्तित्वक संकट अछि । एकर अतिरिक्त  गाम गाम मे गहबर बीच भगतक मंडली मे झूमरा गाबक समृ( परंपरा रहल अछि ।  मुदा कालक्रमे इहो परंपरा अस्तित्वक संकट झेलि रहल अछि । नौ सदस्यक समवेत स्वर मे झालि आ  माॅडर के संगति मे प्रस्तुत झूमरा गायन सॅ भगवतीक आवाहन होइत अछि आ भगतक शरीर मे देवी प्रगट होइत छथि । बीज रूप में एखनहुॅ बचल अछि ई परंपरा मुदा लुप्तप्राय अछि । बतहू यादव सन    भगत चिन्तित छथि जे हुनक बाद इ परंपरा कोना बाॅचत ? हुनकहि सॅ सूनल अछि इ झूमरा गीत अरही जे वन से मइया खरही कटओलियइ हे मइया खरही कटओलियइ हे । मइया जी हे बिजुबन कटओलियइ बिट बाॅस  जगदम्बा रचि रचि महल बनओलियई हे ।। गोड़लागूॅ पैयाॅ पड़ूॅ मइया जगदम्बा  आइ मइया गहबर अबियउ हे । मइया जी हे राखि लिअउ भगत केर लाज जगदम्बा कलजोरि पैयाॅ पड़इ छी हे ।। जहिना बलकबा खेलइ माता के गोदिया हे , भवानी माता के गोदिया हे । मइया जी हे तहिना खेलाबहु  जग बीच  जगदम्बा  आब मइया गहबर अबियउ हे ।। नामो ने जनइ छी मइया  पदो ने बूझै छी हे मइया पदो ने बूझै छी हे । मइया जी हे सेवक बीच कण्ठ लियउ बास जगदम्बा आब मइया लाज रखियौ हे ।। गोड़ लागूॅ पइयाॅ परूॅ आद्या जलामुखी हे  मइया अद्या जलामुखी हे । मइयाजी हे राखि लिअउ  अरज केर लाज  जगदम्बा  सेवक कलजोड़इए हे।। प्रेमचन्द मिश्र- गाम बरहारा, जिला-मधुबनी अनाम कथा- पी. सी. मिश्र गामक एकटा कम प्ढ़ल-लिखल युवक छथि, उम्र करीब २४ वर्ष। ६ साल पहिने गामसँ दिल्ली आयल छलाह। संघर्षरत जीवनसँ सफर करैत आब ठीक-ठाक अवस्थामे छलाह यानि ताहि समयमे एकटा मध्यम् वर्गक युवककेँ तनख्वाह जे हैत से तनख्वाह पावैत छलाह आ संगे गामसँ अयलाक बाद दिल्लीमे किछु नीक लोकक संपर्कमे रहलासँ अंग्रेजी फर्राटेसँ बजैत छथि यानि कि अंग्रेजी बजैत काल कियो नहि कहि सकैत छनि जे ओ पढ़ल-लिखल कम छथि। ताहि कारण लोककेँ कहैत छथिन सत्यता- जे हम पढ़ल-लिखल कम छी- तँ लोक मजाक बुझैत अछि। एकटा प्राइवेट कम्पनी, जे ट्रैवेल एजेन्टक काज करैत अछि, मे पी.सी.मिश्र रंजीतक, जे हुनकर रिश्तामे भागिन छथिन मुदा कम्पनीमे उच्च पदपर छथिन्ह, केर संग  कज करैत छथि। पी.सी.मिश्र विवाह योग्य भऽ गेल छथिन, पिताजी बुढ़ापामे प्रवेश कऽ लेने छथिन। ओऽ चाहैत छथि जे जहिना पैघ भाई सभक विवाह भऽ गेल छनि, हुनको विवाह कऽ देल जाय। कारण एकटा छोट भाई सेहो छनि, रुपैय्या पाइ कमा लैत छथि आऽ अपन आब कोन भरोस। कखन छी कखन नहि छी। चुंकि जमाना बदलि गेल छैक, ताहि हेतु पी.सी.मिश्रासँ संपर्क केलन्हि जे लोक सभ बहुत परेशान करैत छथि अहाँक विवाह लेल, से की कहैत छी। हुनकर जवाब छलनि, जे पिताजी हमर किछु शर्त अछि विवाहमे। तँ पिताजी कहलखिन- ठीक छै, रातिमे भौजीसँ गप्प करायब, ठीक छै। रातिमे भोजनक बाद पी.सी.मिश्रा जी भौजीक द्वारा अपन शर्त पठेलन्हि- एक विवाहमे रुपैय्या पैसाक आदान-प्रदान नहि, यानि बिना पैसाक विवाह-आदर्श विवाह। दोसर लड़की पढ़ल-लिखल आऽ अंग्रेजी बजनाय अनिवार्य ताकि बच्चाक शिक्षा उच्च होय। तेसर द्विरागमन जल्दी होय ताकि साल भरि जे अपन संस्कार यानी विध-विधानमे कम खर्च होयत। चारिम जिनका ओहिठाम विवाह होय ओ हमर तुलनामे गरीब होय ताकि हुनका ओहिठाम सम्मान बेसी भेटत। ई सभ शर्त सुनि हुनकर पिताजी कहलनि- हम शर्तसँ बहुत प्रसन्न छी, लेकिन सभ शर्त हमरासँ भऽ सकत मुदा दोसर शर्त  हमरा विश्वास नहि अछि की गामक लोक पूरा करए देत वा नहि। ताहि हेतु कहबनि जे एहन कुनू भेट जानि तँ ओऽ हमरा कहि देत। ई बात रंजीतकेँ पता लगलनि, तँ ओहो सोचलन्हि जे कोनो सम्पर्कक आदमीसँ पी.सी.मिश्राक विवाह करल जाय तँ उत्तम। ई दू-चारि ठाम बजलाह जाहिमे “श्रीमति महारानी मिश्रा” जे रंजीतक भाभी आऽ पी.सी. मिश्राक रिश्तामे भौजी छलथिन केँ सेहो पता लगलन्हि। अपन छोट बहिन अनीता झाक ननदि छलथिन सोनी आ हुनकर उम्र १९ साल रहनि। ओऽ अपन बाबूजी श्री भरत झाकेँ कहलथिन जे ई कथा मुफ्तमे भऽ जाएत। ओऽ अपन जमाय दिलीप झाकेँ फोनसँ संपर्क केलन्हि। दिलीप झाक बाबूजी १० साल पहिने स्वर्गवासी भऽ गेल छथिन, ताहि हेतु बहिन सोनीक विवाह दिलीप झा आऽ विनय झाकेँ करबाक छनि। ई सभ बात सुनि दिलीप झा अपन पत्नी अनीताकेँ कहलथिन जे ई काज बुझू मँगनीमे भऽ जाएत। ई बात सुनिते अनीता कहलथिन जे अहाँ देरी नहि करू आऽ जयपुर जाऊ। बुझू लक्ष्मी चलि कऽ आबि गेल छथि। ई बात ओऽ विनय झाकेँ सेहो कहलन्हि आऽ सोनीक दूटा नीक फोटो लऽ जयपुर आबि गेलाह। आब महारानी रंजीतक द्वारा पी.सी.मिश्राकेँ जयपुर बजेलन्हि। होलीक बहन्ना बना कय अपन दफ्तरसँ रंजीत आऽ पी.सी.मिश्रा जयपुर गेलाह। साँझक हवाई जहाजसँ जयपुर पहुँचलाह। पहुँचलाक उपरान्त चाय-पानिक बाद महारानी पी.सी.मिश्रासँ बजलीह- बौआ विवाह कहिया करब, आब तँ लगन आबय बला छैक आऽ विवाह योग्य भय गेल छी। हम काकासँ बात करू? पी.सी.मिश्र हँसैत कहलन्हि- जे भौजी हमर किछु शर्त अछि, से जँ पूरा भय जायत तँ हम विवाह एखन कय लेब। ई गप सुनि महारानी कहलथिन बुझू बौआ जे अहाँक विवाह भऽ गेल आऽ अपन बातसँ पलटब नहि। पी.सी. एकरा एकटा मजाक बुझि ठहक्का लगा कऽ हँसऽ लगलाह। तावत लगभग रातिक ११ बाजि गेलैक। महारानी कहलथिन- चलू खाना खाऽ लिअ, रुकू हम खाना लगावैत छी। रातुक भोजनमे दू तोर भेल, एक बेर भोजनक लेल बैसलाह पी.सी.मिश्रा, रंजीत ठाकुर आऽ रामानन्द मिश्रा। भोजनक उपरान्त ओऽ तीनू गोटे पहिल तलपर गेलाह सुतक लेल। दोसर बेर फेर भोजन लागल जाहिमे भरत झा, दिलीप झा, राजू झा व नूनू झा – राजू आ नूनू झा महारानीक छोट भाई छथिन-, फेर सभ अपन-अपन बिस्तरपर सुतक लेल गेलाह। भोर भेल चायक आयोजन भेल। सातू गोटे भरत झा, दिलीप झा, रामानन्द मिश्रा, राजू झा, नूनू झा, रंजीत ठाकुर, पी.सी.मिश्रा व महारानी चायक पश्चात् गप्प करए लगलाह। महारानी बजलीह-बौआ विवाह कहिया तक करब। मजाकक स्वरमे पी.सी.मिश्रा बजलाह- देखियौक आब जल्दी करब, कारण जे बाबूजीक फोन आयल छल जे लोक सभ परेशान करैत अछि विवाहक लेल, तँ आब जल्दी भऽ जाएत। ई सुनिते भरत झा बजलाह जे कतेक पैसा लेताह। पी.सी.मिश्रा कहलथिन जे एहन कोनो बात नहि छैक। ई शब्द पूरा होइसँ पहिने बीचेमे रंजीत बजलाह- लड़की जँ नीक भेटत तँ कोनो पाई-रुपैया नहि। ई शब्द सुनिते पाछूसँ महारानीक माय बजलीह- जे कही तँ अनीताक ननदिसँ करा दियौन, लड़की तँ बड़ भव्य छथिन, सज्जन-भव्य व धार्मिक प्रकृतिक घरक, सभटा काज आ लूरि-व्यवहार जनैत छथिन्ह। ई बात पूरा भेलाक बाद महारानी बजलीह जे ओझा ओतेक पाई कतएसँ देथिन्ह। ताहिपर रंजीत बजलाह- पाइक कोनो प्रश्न नहि छैक, हुनकर किछु शर्त छन्हि ओऽ चारूटा शर्त दोहरेलन्हि। ताहिपर दिलीप झा बजलाह- हम चारू शर्तसँ परिपूर्ण छी। ई बात सुनि रामानन्द मिश्र बजलाह जे जल्दीमे काज नहि होयबाक चाही। पहिने ई शर्तपर चिन्तन कैल जाऊ। कारण जे सवाल दू टा जिनगीक अछि आ शर्तक कोनो जवाब नहि अछि। एहन सोच तँ बहुत कम लोकक होइत छनि, ताहि हेतु पुनर्विचार करू। ई बात पूरा भेलाक बाद दिलीप झा बजलाह जे लड़कीक फोटो देख लेल जाओ आऽ हमहु पढ़ल-लिखल छी आऽ पेशासँ एकटा प्राइवेट शिक्षक छी ताहि हेतु शिक्षाक महत्व बुझैत छी। ई बात सुनिते भरत झा बजलाह- रंजीत ई (फोटो दैत) लिअ आऽ अहाँ सभ देख लिअ। हम भीम बाबू (समधि) सँ बात कऽ लैत छी। बिच्चेमे रंजीत फोटो लैत आऽ पी.सी.मिश्राक हाथ पकड़ैत पहिल तलसँ ऊपर छतपर गेलाह आऽ मजाकक तौरपर बजलाह जे देखू भाई जँ अहाँ नहि करब तँ हमही दोसर विवाह कय लेब। हमरा तँ लड़की बहुत पसन्द अछि। ई कहैत पी.सी.मिश्रकेँ हाथ फोटो पकड़ेलन्हि। फोटो बहुत आकर्षक छल। पी.सी.मिश्र कहलथिन- फोटो तँ बहुत आकर्षक अछि, हमरा किछु सन्देह भऽ रहल अछि। रंजीत उत्तर देलन्हि- भाभी झूठ नहि कहतीह। संदेहक मतलब अछि भाभीपर शक करब। ताहिपर पी.सी.मिश्रा जवाब देलन्हि- हम शकक नजरिसँ नहि देखैत छी, चलू जे छथि, ई तँ हमर शर्तमे नहि शामिल अछि। लेकिन लड़की पढ़ल-लिखल अवश्य चाही। सुन्दर-खराब कोनो बात नहि अछि ई बात करैत दुनू नीचाँ अएलाह। एतबामे महारानी पुनः चाह अनलन्हि, फेर चाहक चुश्की लैत रंजीत बजलाह- देखू सभ बात बुझू भऽ गेल। आगू बात जे बरियाती ६५-७५ तक जाएब आऽ सत्कारमे कोनो तरहक शिकायत नहि। ई बात सुनैत दिलीप झा बजलाह जे सरकार हम गरीब छी, हमरासँ संभव नहि अछि ७५ टा बरियाती, हमरा किछु छूट देल जाऊ! लेकिन सत्कारमे कोनो त्रुटि नहि होएत। ई बातक बिच्चेमे महारानी बजलीह जे लड़काकेँ एकटा अंगूठी आऽ दू भरीक सोनाक चेन (सीकरी) आऽ लड़कीक नामसँ ५१,०००/-क फिक्स डिपोजिटक कागज ओझाजी दऽ देथिन, बरियाती ५१ टाक बात फाइनल, बस आब ने बौआ। ने ई किछु बजताह आऽ ने ओझा किछु बजताह! आर खान-पीन दिन घरक प्रत्येक सदस्यकेँ नीक आऽ ५ टूक कपड़ा। बस रंजीत आब किछु नहि बाजू आऽ ओझाजी अहूँकेँ एतेक तँ करए पड़त। रंजीत किछु बजैक उत्सुकता देखबैत छलाह की बिचमे भरत झा बजलाह जे फेर विवाहसँ एक साल तक दुनू दिस लड़की वलाक काज छैक, रंजीत ताहि हेतु आब बुझू जे ई बहुत महग भऽ गेल। भरत झा बजलाह जे चलु कुल मिलाकय बात बरियातीक ६५ टा आ आब दिनक निर्णय कएल जाएत। तखनहि प्रेमचन्द्र बजलाह जे ई निर्णय गामपर बाबूजी करताह कारण जे हमरा बहुर सर-कुटुम छथि आ सभकेँ सूचना (नोत-हकार) सेहो देनाय छैक। भरत झा बजलाह- ई सत्य अछि, कोनो बात नहि, हम दिन ताकैत छी आ फोन कय देबनि वा भेट कऽ लेल जाएत। बस किछु समय पश्चात् पतराक अनुसार दिन भेल- २०, २१ अप्रील आ २,३ मई। ई सूचना देल गेल, फेर बड़हरा (गाम)सँ किछु दिन बाद सूचित भेल जे २१ अप्रील क ठीक रहत, तदुपरान्त प्रेमचन्दकेँ पिताजी गामसँ कहलथिन जे कपड़ाक खरीदारी दिल्लीमे कऽ लिअ आ जेवर सभ एहिठाम (गाममे) खरीदब। कपड़ा खरीदल गेल, विवाहक, कनियाक लेल, कनिया बहीन लेल, भौजीक लेल, मायक लेल आ विधकरीक लेल आ घरक प्रत्येक सदस्यक लेल। २१ अप्रील कय दिनक विवाह छल। कन्या पक्ष आ वर पक्षक बीच सहमति छलनि जे दिनक विवाह छैक ताहि हेतु हाथ धरएके लेल समयसँ पहुँचब आ बात भेल जे दू आदमी हाथ धरैक लेल अएताह। एम्हर वर पक्षक ओहिठाम सबेरेसँ चहल-पहल छल। गाम-गामक बच्चा वा स्त्रीगण दू दिन पहिनेसँ आयल छल। पुरुष लोकनि सेहो सबेरे पहुँचलाह कारण जे दिनक विवाह छै ताहि हेतु बरियाती सेहो जल्दी जयबाक विचार छल आ दूरी वा सड़कसँ सभ अवगत छलाह। गामक धाय-माय सेहो एक अँगनासँ दोसर अँगना कय रहल छली। ताबत धरि लगभग २ बाजि गेल घड़ीक अनुसार लेकिन कन्या पक्षक कोनो पता नहि देखि बच्चा सबक भीतरक उत्साह कम भऽ रहल छल! करीब चारि बजेक लगभग एकटा आदमी राजू, दिलीप झाक जेठ सार, संवाद लऽ कय अयलाह जे किछु विलम्ब भय गेल ताहि लेल क्षमा करब। लगभग ५ बजेक करीब एकटा मार्शल (गाड़ी) दरबाजापर लागल। ओहि गाड़ीसँ चारि टा सज्जन उतरलाह आ एकटा चारि सालक बच्चा सेहो, कुल मिला कय पाँच! ई देखितहि दाइ-माइ कनफुसकी करए लगलीह जे कहने छलथिन दू आदमी आ पहुँचलाह पाँच! पुरुष वर्ग आगन्तुकक सेवामे जुटलाह। विश्वनथवा सभकेँ पानिसँ पएर धोबि कय अपन काज सम्पन्न कयलक। तावत कियो ठंढ़ा पानि अनलक आ ई काज सभ पूरा भेलाक बाद पुरुष वर्ग बजलाह जे अँगनामे दाय-माय सब कने अहाँ सभ अपन काज जल्दी करू, कारण जे पहिलेसँ विलम्ब भऽ गेल अछि। अँगनामे गोसाउनिक आ ब्राह्मणक गीत शुरू भेल। सभ दाय-माय अँगनाक माँझमे मरबापर गीत गावैत छलीह तावत एकटा बच्चा एकटा लोकल ब्रिफकेश लऽ कय पहुँचल। प्रेमचन्द पश्चिम दिशाक घरमे पलंगपर बैसल भौजी आ बहिनसँ वाच कय रहल छलाह। ब्रिफकेशकेँ देखि विभा (बहीन) भौजीसँ कहलथिन अहाँ सभ बात करू, हम कनी ब्रिफकेशक समान देखैत छी आ ओऽ मरबा दिश निकलि पड़लीह! तावत धरि एकटा बुजुर्ग महिला ब्रिफकेश खोललन्हि। प्रेमचन्द्रक नजरि पड़ि गेल तौलियापर जे पीयर रंगक दु-सूतीक छल। ई देखते दाय-माय एक दोसरकेँ मुँह दिश देखऽ लगलीह जे ई केहेन आदमी अछि, आयल अछि मार्शलसँ आ कपड़ा देखियौ। तौलियाकेँ देखिते प्रेमचन्दक क्रोध आसमानकेँ छूबि लेलक। ओऽ दू डेगमे बरन्डा फानि कय मरबापर पहुँचलाह आ कपड़ा साड़ी आ ब्रिफकेश देखैत बजलाह जे दाय-माय ई बन्द करू आ गीत-नाद सेहो। हम विवाह नहि करब। ई सुनिते बिभा हुनका सम्हारैत बजलीह, बौआ की भेल अहाँकेँ? अपन क्रोधकेँ शान्त करू, दलानपर लोक सभ की कहताह। दू मिनटमे अँगनामे गीतक बदलामे सन्नाटा भय गेल। आब दाय-माय गीत की कहती, सभ कहलथिन जे अहाँ चुप रहू, की हेतै। अहाँ एतेक खर्च कएलहुँ, तिलक नहि लेलहुँ आ कपड़ा वा समानक लेल की हल्ला करैत छी। प्रेमचन्दक जवाब छलनि, जे हम विवाह नहि करब। ई बात भय रहल छल की गीतक अवाज बन्द सूनि ४-५ टा बुजुर्ग पुरुष  वर्ग दरवाजासँ अँगना पहुँचलाह आ ई दृश्य देखि सभ हुनका बुझाबय लगलाह आ कहलथिन दाय-माय अहाँ सभ आगू काज करू! आ ओ लोकनि प्रेमचन्दकेँ पुनः पछबरिया घरमे लय गेलाह। किछु पुरुष वर्ग आगन्तुक देख-भाल कय रहल छलाह। पुरुष-वर्ग मे सँ एकटा काका पुछलथिन जे बौआ की भेल, शान्तिसँ बाजू। बिभा एकटा गिलासमे पानि दैत कहलन्हि जे कपड़ा सभ नीक नहि छैक काका। काका बजलाह जे ई तँ छोट बात अछि। ई तुक्षताक प्रतीक छी! अहाँ शान्त रहू, अहाँकेँ केहेन चाही हम मँगवा दैत छी। एक घंटामे बजारसँ उपलब्ध भय जायत! प्रेमचन्द जवाब देलखिन जे काका, बात कपड़ाक नहि अछि, कारण जे हम स्पष्ट कहने छलियनि जे हमरा किछु नहि चाही। लेकिन जँ अपने किछु अनबए तँ समान नीक कम्पनीक चाही। ई तँ हमरा बेवकूफ बनओलथि! हमरा बातक दुःख अछि! जँ अपनेकेँ हमरा बातपर विश्वास नहि अछि तँ भौजी (महारानी) केँ पुछल जाय! आ अबाज देलखिन यै भौजी, अहाँ एम्हर आऊ! भौजी शब्द सुनिते महारानी उपस्थित भेलीह आ बजलीह जे बौआक बात १००% सही छनि। कन्यागत गलत काज कयने छथि, एहिमे कोनो सन्देह नहि! ई बात पूरा होमयसँ पहिने बिच्चेमे प्रेमचन्द बजलाह जे हम विवाह नहि करब कारण जे कि पता ? ओ हमरा लड़कीमे सेहो ठकताह। लेकिन बात आब इज्जत आ मान-मर्यादाक अछि, जँ विवाह नहि होएत तँ दुनू पक्षक इज्जत बर्बाद भय जायत! एक-दिश इज्जत, मान-मर्यादा आ दोसर दिशसँ दू-टा जिनगीक प्रश्न। समस्या जटिल अछि, कोनो सन्देह नहि! लेकिन छी तँ मैथिल आऽ मान-मर्यादासँ पैघ जिनगी नहि अछि। जे मान-मर्यादा ककरो लेल अभिशाप बनि जाइत अछि! हम सभ मैथिल जे किछु छी, बाप-दादाक पाग छी, जिनगीक कोनो मोल नहि! मोनमे एक हजार प्रश्न अबैत अछि जे हम मैथिलगण विश्वमे सभसँ बेशी चतुर छी आ तखनो सभसँ पाछू छी, तेकर की कारण अछि? हमरा नजरिमे जे हम सभ भूतकेँ बेशी महत्व दैत छी आ भविष्यकेँ गला दबा दैत छी, सेहो बहुत आसानीसँ हमरा लोकनिकेँ कनियो हिचकिचाहटि नहि होइत अछि! प्रेमचन्दक एकेटा उत्तर छलनि जे किछु बीति जाएत, हम विवाह नहि करब। कारण जे हमरा आब हुनका सभ (कन्यापक्ष) पर विश्वास नहि अछि। दाय-माय गीत तँ गबैत छलीह लेकिन श्वरमे उदासी गीत छल। गोसाउनिक (हे जगदम्बा जगत माँ काली प्रथम प्रणाम करै छी हे), लेकिन श्वर सुनयमे लागैत छल जेना उदासी गाबैत छथि। अँगनाक माहौल खराब भय गेल छल। लगभग एक घंटा बीति गेलाक उपरान्त जखन कोनो तरहसँ मानैत नहि देखि भीम मिश्र (प्रेमचन्दक पिताजी) बजलाह- आब हमरोसँ बर्दाश्त नहि भय रहल अछि आ हमरो निर्णय अछि से अहाँ सुनू- जँ अहाँ विवाह नहि करब तँ हम आत्म हत्या कय लेब। आब अहाँक हाथमे गेंद अछि! निर्णय अहाँकेँ लेबाक अछि जे की करब। पहिल निर्णय विवाह ओहि लड़कीसँ करब आकि दोसर निर्णय हमर दाह-संस्कार करब? कारण हम अपन जिबैत अपन पुरुखाक इज्जत नहि गवाँ सकैत छी। ई कहि ओ ओहिठामसँ उठि चलि पड़लाह। हुनका उठिते सभ पुरुषवर्ग ठाढ़ भय गेलाह आ एकक बाद एक दरबज्जा दिस बिदा भेलाह। हुनका (भीम मिश्र) केँ बुझबैत जे अहूँ एना नहि करू, ओ बात मानताह अहाँक आ अहाँसँ पैघ हुनकर अपन भविष्य नहि छनि। सभ मड़वापर ठाढ़ गप्प करैत छलाह। एतबेमे प्रेमचन्द घरसँ निकललाह आ आँखिमे दहो-बहो नोरक मुद्रामे पिताक पएर पर खसैत बजलाह जे हमरा माफ करू आ करुण स्वरमे बजलाह, जखन श्रवण कुमार मातृ-पितृक लेल अपन प्राण न्योछावर कय देलन्हि तँ हम अपन पिताक लेल अपन भविष्यक बलिदान दैत छी। लेकिन किछु शर्त अछि, भीम मिश्र बजलाह- मंजूर अछि। पहिल शर्त हम कन्यागतक समान नहि लेब दोसर हुनकर गाड़ीपर नहि जाएब तेसर देल गोरलगाइक रुपैया नहि लेब। ई शब्द सुनैत सभ दाय-माय समेत उपस्थित पुरुषवर्ग आ नेना-भुटकाक हृदय सेहो करुण भय गेल! प्रेमचन्दकेँ उठबैत भीम मिश्र करुण स्वरमे बजलाह- हे दाय-माय। जल्दी-जल्दी अपन काज करू। हजामकेँ अबाज दैत कहलथिन- अहाँ जल्दीसँ स्नानी चौकी धो कऽ आनू। फेर अबाज देलखिन- भोगी पाहुनकेँ जल्दीसँ खानाक व्यवस्था करू! ई शब्द सुनितहि सभ बिहारि जेना काज करए लगलाह आ लगभग २०-२५ मिनटमे सभटा काज भऽ गेल। एतबामे जयदेव मिश्र बसकेँ दरबज्जापर लगबैत सभ बरियातीकेँ बसमे बैसबैत बजलाह- भीम भैया हम बसमे सभकेँ बैसा लेलहुँ। अहाँ- मार्शल दिश इशारा करैत- बैसू। प्रेमचन्दक आँखिसँ गंगा-जमुनाक धार जकाँ नोर बन्द होइके नाम नहि लैत छलनि। बड़की भौजी एक आँखिमे काजर कऽ आबथि जा दोसर आँखिमे करतीह ताधरि ओ काजर नोरक रूपमे परिवर्तित भय नीचाँ चलि आबनि। हुनकर बुझु अधा आँचर नोरमे भीजि कय गुलाबी साउथ शिल्कक साड़ी काजरमय भय गेलनि आ हुनका किछु खबरि तक नहि! एहि तरहेँ ओहिठाम हाथधरीक विध पूरा भेल आ बर आ बरियाती प्रस्थान कयलक! ड्राइवर गाड़ीकेँ तेज चलाबयके प्रयास करैत लेकिन गामसँ तीन कि.मी. क बाद रस्ता सेहो नीक नहि। गाड़ी आगू जायके नाम नहि लैत छल जेना सभटा केँ मुहक्षी मारि देने हो। कोनो तरहेँ वर आ बरियाती गन्तव्य तक पहुँचल। ओहिठामक दृश्य तँ बहुत रमणीय छल। नीक पंडाल जे बहुत नीक सुसज्जित नीक-नीक मधुर स्वरमे मैथिली कैसेट सँ स्टीरियोक अवाज मोन मोहित कय रहल छल। ई दृश्य देखि बरियाती लोकनिकेँ विश्वास नहि भेलनि जे एहिठाम हमर बैसबाक व्यवस्था अछि! ओ सभ तुलना करए लगलाह ब्रिफकेश आ कपड़ाक जे वरक लेल गेल छल आ ओहि सजावटक। हुनका लोकनिकेँ विश्वास नहि होइत छलनि जे समान एहिठामसँ गेल अछि। तावत अवाज आबए लागल जे अपने सभ बैसल जाऊ, सरकार ठाढ़ कियैक छी? ओम्हर सँ दिलीप झाकेँ कियो अवाज देलखिन जे हजमा कतऽ गेलाह। बरियातीकेँ पएर धो कय शुद्धिकरणक विध पूरा करबाऊ! पंडालमे सभटा आधुनिक सुविधा उपलब्ध छल! किछु नवतुरिआ लोकनि पेपसी आ पेयजल तँ कियो बिगजीक समान बन्द डिब्बामे ल कय उपस्थित भेलाह! बरियाती लोकनि शहरी मजा लऽ रहल छलाह। लेकिन प्रेमचन्दक आँखिसँ नोर बन्द हो से नामे नहि लऽ रहल छल। ओ मोने-मोन अतेक दु:खी छलाह जेना शमसान घाटमे कोनो मुर्दाक अन्तिम संस्कार हो। करीब बीस मिनटक बाद गामक नवतुरिआ लड़की आ नेना भुटका पंडालक पाछूसँ अबाज देलथिन जे वरकेँ कहियन्हु कनि पागक लटकैत भागकेँ आगूसँ उठा देथिन ताकि ओ लोकनि वरकेँ देखि सकथि। किछु नवतुरिआ लड़का सभ मजाक करैत छल वरक प्रति- एतवामे आज्ञा-डाला आयल आ ई विध सेहो पूरा भेल। ओम्हर परिछनक लेल आय-माय अयलीह आ परिछनक लेल प्रेमचन्द बिदा भेलाह मुदा हुनकर डेग आगू नहि होइन। चलथि जेना महुअकक चालि हो, किछु जवान लड़की मजाकमे बाजथि जे बड़ शान्त आ सुशील छथि वर, तँ कियो किछु जे खाना खाऽ कय नहि आयल छथि। प्रेमचन्द कोनो जवाब नहि देथि जेना गामपर सभटा क्रोध छोड़ि आयल होथि। कारण छल पिताक देल वचन जे जाधरि अपने लोकनि रहबए हम किछु नहि बाजब आ तकर बाद जँ आगू ओ गलती करताह तँ हम नहि छोड़बनि हुनका सभकेँ। परिछन भेल आ विवाहक शुरुआत भेल। ओम्हर बरियाती लोकनिक स्वागतमे कोनो कमी नहि। सभ समान पर्याप्त मात्रामे उपलब्ध छल। विवाहक अन्तिम विध छल सोहाग देब। सभ बरियातीगण प्रस्थान करत। एहि बीचमे दुनू पक्ष वार्ता कयलनि जे द्विरागमन संगे होय कारण भीम मिश्रकेँ कनी डर भऽ रहल छलनि, लोककेँ चिन्हबामे देरी नहि लगलनि, जे एकरा सभकेँ लड़काकेँ एकटा नीक कुरता देबाक उपाय नहि छैक आ पंडाल लगैत अछि जेना पैघ घरक काज हो। विवाह तँ भेल मुदा दू सालक बाद अगर द्विरागमन हो तँ ई किछु देत तँ अपमान वा कलहक कारण। द्विरागमनक दिन पक्का भऽ गेल एगारहम दिन। सोहागक उपरान्त श्री भीम मिश्र प्रेमचन्दकेँ बजाकय एकान्तमे ५-७ टा गणमान्यक संग बुझेलखिन जे संगे द्विरागमनक हम बात कय लेलहुँ आ अहाँकेँ इच्छा अछि जे किछु नहि लेबाक अछि तँ आब ओ लड़की हमर आदमी भेलीह, पुतोहु भेलीह। हम अपन आदमीकेँ एहनठाम नहि छोड़ब कारण जे ओ हिनके रूपमे रंगि जेतीह। ई सभ बुझबैत श्री भीम मिश्र प्रेमचन्दकेँ भरोसा दैत कहलथिन जे हम अपन पुतोहुकेँ अपना रंगमे रंगि लेब। अहाँ चिन्ता नहि करब आ चतुर्थी दिन गाम जरूर आयब तखन बात करब। ई शब्द कहैत ओ विदा भय गेलाह। प्रेमचन्द आब कोबरघरमे छथि। विधकरी आ किछु घरक सदस्यगण सेहो छथि। ओ उदासीक कारण पुछलथिन। ओ किछु नहि बजलाह। करीब ५-७ बेर अलग-अलग दाय-मायक शब्द सुनिकय उत्तर देलखिन जे एखन नीन्द आबि रहल अछि, भोर भेलापर बात करब। ई बात सुनैत सभ एका-एकी घरसँ बाहर भेलीह। कोबरमे नीचाँमे बिस्तर लगाओल गेल। प्रेमचन्द सुतबाक प्रयास जरूर केलन्हि, मुदा आँखिसँ नोर पुनः आबय लगलनि। करीब २०-२५ मिनटक बाद एकटा जनानी कोबरमे प्रवेश कएलक लेकिन हुनका ऊपर कोनो प्रभाव नहि पड़लनि, आँखिसँ अश्रु पूर्ववत निकलैत रहलनि। ओ जनानी किछु काल धरि ठाढ़ रहल आ तावत पाछूसँ अवाज भेल जे प्रणाम करू, ठाढ़ भय की कय रहल छी। मुदा प्रेमचन्दक ऊपर कोनो असर नहि कारण ओ पहिने कहने छलाह जे हम भोर भेलापर किनकोसँ बात करब। तखने हुनका बुझना गेलनि जे हमर पएरकेँ कियो स्पर्श कय रहल अछि आ लहठीक खन-खनाहटि सेहो आयल। ई अवाज सुनैत आ पएरक स्पर्श अनुभव करैत ओ पहिनेसँ बेशी अनभिज्ञताक परिचय देलखिन आ जहिना छलाह ओहिना रहि गेलाह जेना हुनका कोनो खबरि नहि। बस पएर स्पर्शक दू-मिनट बाद ओ जनानी वापस भेल। ओ मोनमे सोचैत छल जे ई जरूर नव विवाहिता छलीह। लेकिन ई बात गुप्र राखएमे नीक जे हम सुतल छलहुँ, हमरा कोनो बातक खबरि नहि। किछु समय पश्चात् भोर भेल। भोरमे निन्न आबए लगलनि। ओ घर बन्न कए सूतय लेल चलि गेलाह। कोबरमे दू पहर बितलाक बाद गामक दाय-मायक झुण्ड तँ कखनो दू-चारि गोटेक आवाजाही छल। आब सभकेँ पएर छूबि प्रणामक सेहो प्रावधान अछि कारण जे हम मैथिल छी। साँझमे मौहकक विध पूर्ण भेल। पुनः रात्रिमे बिस्तरपर विश्रामक लेल गेलाह। लगभग दस-पन्द्रह मिनट बाद अनुभव भेलनि जे पुनः  कोनो जनानी प्रवेश कए रहल अछि। ओ पुनः पएरक स्पर्श कय रहल अछि आ ओ अहिठाम बैसल अछि। प्रेमचन्दकेँ निन्न तँ नहि लागल छलन्हि मुदा निन्नक बहन्ना जरूर भेटलन्हि कारण विवाहक रात्रिमे ओ नहि सूतल छलाह। ओ दिनमे दुपहरिया बादसँ जागल छलाह। करीब दू घण्टा बैसि ओ जनानी पुनः वापस भेलीह। पुनः तेसर राति ओ जनानी पुनः अएलीह आ पूर्ववत अपन कर्ममे लिप्त भय गेलीह, यानी चरण-स्पर्श कए बैसि रहलीह। लगभग चारि-पाँच घंटा धरि ओ बैसलि रहलीह आ पएर धय निकलबाक कोनो चेष्टा नहि कय रहलि छलीह, जेना हुनकर प्रतिज्ञा हो जे आशीर्वाद कानमे जरूर सुनी। एतबेमे प्रेमचन्दकेँ एकटा शरारत सुझलनि आ ओ बहन्ना केलन्हि जेना पूरा निन्नमे होथि। ओ करोट बदलि कय पएरकेँ स्थानान्तर कय देलथिन। एकरा बाद ओ जनानी पुनः ओहिठामसँ हिलय के कोशिश नहि केलक। प्रेमचन्द तँ करोट लेलन्हि मुदा ओ जनानी पूर्ववत छलि जेना माटिक मूर्ति हो जेकरा कियो ओहिठाम बैसल अवस्थामे राखि बिसरि गेल हो। चारिम राति पुनः ओहि जनानीक प्रवेश भेल आ ओ अपन कर्तव्यमे पूर्ववत छल। प्रेमचन्द बजलाह- हमरा कोन कारणसँ परेशान कय रहल छी? अहाँ के छी? हम की कपट देने छी जे अहाँ प्रति रात्रिमे आबि हमर पएरकेँ स्पर्श करैत छी? हमर निन्नकेँ कोन कारणसँ खराब कय रहल छी? ई बात सुनिते ओ जनानी लाजसँ शरीरकेँ सकुचा लेलक। जेना लजबिज्जीक पातमे किछु स्पर्श भेलापर ओ सिकुरि जाइत अछि ठीक ओहि प्रकारसँ ओ बाला सिकुरि गेलीह। कोनो उत्तर नहि भेटलापर प्रेमचन्द पुनः निन्नक बहन्ना बना कए फोंफ काटए लगलाह। किछु समय उपरान्त ओ बाला कोबरसँ निकलि गेलीह। करीब दू-तीन घंटा पश्चात् विधकरी कोबरमे प्रवेश कय अवाज देलन्हि जे मिसरजी उठथु, नहा लथु। नित्यक्रियासँ निवृत्त भऽ स्नान भेल। हरक पालोपर बैसाकए नवविवाहिता संग पुनः विवाह शुरू भेल- चतुर्थीक विध सभ। आजुक दिन नुनगर-चहटगर भोजन भेटलन्हि आ प्रेमचन्द घरक लेल प्रस्थान करबाक तैयारीमे छलाह तँ रिश्तामे ज्येष्ठ साढ़ू कहलन्हि जे साढ़ू भाइ, हमरो जेबाक अछि। संगे चलब। हम हुनके दू-पहियापर बैसि गाम अयलहुँ। किछु काल पश्चात् पुनः गाममे भोजन कय प्रेमचन्द एम्हर-ओम्हर निकलय के प्रयास जरूर केलन्हि, लेकिन ओ ओहिठाम सँ निकलि नहि सकलाह। पुनः साँझमे पिताजी आ ज्येष्ठ भ्रातृगणक दवाबमे सासुर घुरि कए अएलाह। रात्रि-भोजनक पश्चात् विश्रामक लेल कोबर गेलाह। करीब मध्यरात्रिमे पुनः ओहि बालाक प्रवेश भेल। ओ अपन काजमे व्यस्त छलीह। प्रेमचन्द पुनः निन्नक बहन्ना कयलनि। फेर मोन पड़लनि जे गामसँ जखन आबय लगलाह तँ बड़की भौजी किछु ज्वेलरी देने छलथिन जे ई कनियाँकेँ मुँहबजना छी, दऽ देबय, तखन सुतब।  जेबीसँ निकालि कय ओ बालाकेँ कहलथन, ई अहाँक समान अछि, लऽ लेब। हमरा निन्न आबि रहल अछि, सूति रहल छी। निन्न की होयतनि, शरीर तँ लगभग चारि-पाँच दिनमे आधा भय गेल रहनि। दिमागमे सोच जे पैसि गेलनि! ने खेनाइ-पिनाइ नीक जेकाँ ने निन्न। एकदम चिरचिरा स्वाभावक भय गेल छलाह। मध्यरात्रिमे प्यास लगलन्हि तँ पानिक लोटा ताकि रहल छलाह। ओ बाला हुनका एकटा गिलासमे लगभग ठंढा भऽ गेल दूध बढ़ेलखिन। प्रेमचन्द कहलथिन जे ई दूध छी, हमरा प्यास लागल अछि, ई राखि देल जाओ। मुदा ओ नहि रखलन्हि। हुनका संग समस्या छल जे ओ घोघमे छलीह, भरि रातिक जागलि छलीह आ कहियो बाजल नहि छलीह। ई सभ कारणेँ ओ हाथमे दूधक ग्लास लऽ तपस्याक मुद्रामे ठाढ़ रहलीह। प्रेमचन्दकेँ लगेमे लोटामे राखल पानि भेटलन्हि आ ओ पानि पीबि कए पुनः सुतबाक प्रयासमे छलाह। हुनका की जिज्ञासा भेलनि जे देखियै ई बाला कतेक काल धरि ठाढ़ भय गिलाससँ भरल दूध रखैत अछि। लगभग एक घण्टा बीति गेल मुदा ओ तपस्यामे लीन छथि ई देखि प्रेमचन्दकेँ दया आबि गेलनि आ दूधक गिलास हाथसँ लय दू-चारि घोंट पीबि गिलास राखि देलन्हि। पुनः परिचय भेल। प्रेमचन्दक प्रश्नक उत्तरक समय ओ बाला थर-थर काँपि रहल छलीह, जेना कसाइकेँ देखि छागरक आँखिमे डर। प्रेमचन्द- नाम? -सोनी। -कतेक पढ़ल छी? -दसम बोर्ड फेल छी। -सत्य या झूठ? -ई ध्रुव सत्य अछि। ई बात सुनिते प्रेमचन्दक आँखिमे पुनः गंगा-यमुनाक धारा प्रवाहित भय गेलन्हि तँ सोनी रुदन अवस्थामे बजलीह- हम अपनेसँ झूठ नहि बाजि सकैत छी। हमरा क्षमा करू। हमरा जे सजा देब से कम अछि। आ हुनको आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलन्हि। -अपने शरीरसँ विकलांग तँ नहि छी? -नहि। -अपने कोनो बीमारीसँ ग्रसित तँ नहि छी? -नहि। -अपने जिबैत किनका लेल छी? -अहाँ हमर गरदनि दबा दिअ तँ हमरासँ बेशी भाग्यशाली कियो दोसर नहि होएत। -अपनेक सभसँ पैघ लक्ष्य? -अहाँक खुशी। -अपने कानि रहल छी, कारण? -अहाँक कष्ट देखि बर्दाश्त नहि भऽ रहल अछि। -अहाँ जुनि कानू सोनी। एहिमे अहाँक कोनो दोष नहि अछि। -आइ हम मरि गेल रहितहुँ तँ अहाँकेँ कष्ट नहि भेल रहैत।ई तँ ईश्वरक बनायल विधिक विधान छी! एकरा कोनो शक्ति नहि काटि सकैत छैक। -देखू, एहि दुनियाँमे दू तरहक लोक होइत अछि- आशावादी आ पुरुषार्थवादी। हम आशावादी पुरुष नहि छी, पुरुषार्थवादी छी आ आशावादीसँ घृणा करैत छी। कारण आशावादी पुरुष या औरत मेहनती नहि होइत अछि। अपने कोन तरहक छी? -हम धार्मिक प्रवृत्तिक छी आर धर्ममे बहुत विश्वास अछि, ताहि हेतु आशावादी छी! ई सुनि प्रेमचन्दक मोनमे आर बेशी तकलीफ बढ़ि गेलन्हि। एहि तरहेँ चतुर्थीक राति दुनू नव-विवाहित जोड़ी कटलन्हि। प्रेमचन्द फेर अपन गाम घुरि गेलाह। साँझ भेल, भौजीसभकेँ भेलन्हि जे प्रेमचन्द पुनः गाम जएताह। मुदा कोनो प्रतिक्रिया नहि देखि पुछल गेलन्हि तँ उत्तर आएल जे आब द्विरागमनक लेल हम उपस्थित होएब  सासुरमे, नहि तँ आब दिल्ली घुरि जाएब। अन्यथा हमर पीड़ाकेँ बढ़ाओल नहि गेल जाऊ। हमरा आब जीवित रहय के कोनो इच्छा नहि अछि। कोनो मनोरथ नहि अछि। हमर कोनो भविष्य नहि अछि! द्विरागमन भेल, कनियाँ सासुर अयलीह। भड़फोरीक पश्चात् प्रेमचन्द दिल्ली उपस्थित भेलाह। अपन कम्पनीक काम-काज सम्हारलथि। काजपर तँ जाथि मुदा अन्तरात्मामे कतेक प्रश्न अबन्हि। कारण जे जीबाक आशाक किरण लगभग अन्तिम चरणमे पहुँचि गेल छलन्हि। आब कोनो मनोरथ नहि, नहिए जिनगीक कोनो लक्ष्य बाँचि गेल छलन्हि। आ एकर कारण मैथिल समाजक किछु महानुभावक विचार आ कृत्य अछि, संगहि मैथिल समाजक किछु प्रावधान सेहो जिम्मेदार अछि। एहि प्रकारेँ नहि जानि कतेक मैथिल नव-युवक-युवतीकेँ अपन करुण जिनगी जीबाक लेल मजबूर होमए पड़ैत अछि। आशीष अनचिन्हार- १.        मनुख मनुख काज करैत जान अरोपि कए आफिसमे, रोडपर वा कतौ भरि लैए टका जेबीमे निकलि जाइए मार्केटिंग करबाक लेल कीनि लबैए रेडीमेड खुशी वस्तु-जातक रूपमे की मनुख रेडीमेड भेल जा रहल अछि? २.गजल जीवनमे दर्दक सनेश शेष कुशल अछि नहि कहब विशेष शेष कुशल अछि अन्हरा सरकार चला रहल राजकाज छैक बौकक ई देश शेष कुशल अछि देह बदलैए आत्मा नहि सूनि लिअ एहने छैक सरकारक भेष शेष कुशल अछि मुक्का आ थापड़क उपयोग के करत खाली आँखिए लाल टरेस शेष कुशल अछि गजल कहब असान नहि एतेक आशीष आब चलैत छी बेश शेष कुशल अछि एना किए ?- सन्तोष मिश्र एकटा स्‍त्री , हमर घरकें सबहे काज कऽ दैअ समय–समय पर आबिकऽ हमर जरुरत पुरा क दैअ एहिके बाध ओ परतरि दैअ मुदा एना किए ? जहिया हम असगरे रहैछी तहिया ओ हमरा संग राति बितऽबैय कखनो तिर त कखनो तार कहियो राईके बनादै पहाड़ कखनो हमरा लेल आाखिमे नोर आ कखनो हमरासँ दूर मुदा एना किए ? कि ईहे त प्रेम नहि ? कि ईहो प्रेम छै ? हमरा कोनो बेगरता होए ओ सेहो पुरा कऽ दैअ गलती जौ भऽगेल हमरासँ त डटबो करैए मुदा एना किए ? ओकर आँखिमे, एकटा भावना रहैछैक ओकरा विश्‍वास रहैछैक हमरे पर तैयो ओ हमरा डटैत रहैए मुदा एना किए ? किछु जौं कहि दिऐ त भऽजाइए टोका–चाली बन्‍द ओकर मूँह बन्‍द भइयोक ओकर आँखि, अपन प्रेमक गीत कहैए मुदा एना किए ? किछु समय बाद जेना किछु भेले नहि हुए जेना ओ हमरासँ चिन्‍तीते नहि हुए तहिना ब्‍यवहार करैए मुदा एना किए ? बिनीत ठाकुर बाँहिके गोदना कविता रैहगेल निशानी आब बाँहीके गोदना अनाहकमे मारल गेलै बुधनीके बुधना उमेरोनै बेसी भेलरहै मात्र बिस मरैतकाल ए १ राम बजलैनै ईश फटलैजे बम त शरीर भेलै चिथरा दैवोनै गवाही त कहबै की ककरा लागल छै गाराभुकुर बुधनिके चिन्‍ता के करतै आब पुरा ओकर बच्‍चाके सिहन्‍ता ऐ देशेके लागलछै शतिके श्रात एत सिधा सोझा जनताके केउ नै माई बाप भरल नोर मे केहन  सपना  हम मीता देखलौँ भोर मे माय  मिथिला  जगाबथि  भरल नोर मे कहथि रने वने घुमी अपन अधिकार लेल छैं तूँ सुतल छुब्ध छी तोहर बिचार लेल कनिको  बातपर  हमरा  तूं करै  विचार की सुतलासँ ककरो भेटलै अछि अधिकार जोरि एक एक हाथ बनवै जो लाखों हाथ कर हिम्मत तूं पुत्र छियौ हम तोहर साथ अछि तोरापर बाँकी हमर  दूधक कर्ज करै एहिबेर तूं पुरा सबटा अपन फर्ज लौटादे  हमर  आब अपन स्वाभिमान पुत्र तूं छै महान तोहर कर्म छौ महान छवि झा/ कुमुद सिंह लेखिका छवि झा पिछला तीस वर्ष स मिथिला चित्रकला कए अर्थ पर काज कए रहल छथि। संप्रति ओ 'स्नेह छवि मिथिला स्कूल ऑफ आर्टÓ, दरभंगा क निदेशक छथि आ एकरा परिभाषित करबा मे लागल छथि। लेखिका कुमुद सिंह मैथिलीक पहिल इ-पेपर समादक संपादक छथि।

मिथिला चित्रकला : अर्थक अधिकता आ सार्थकता

1960 क दशक मे मिथिला चित्रकला कए दीवार स कागज पर उतारबाक प्रयास शुरू भेल छल आ तहिए स शुरू भ गेल एहि चित्र मे नव-नव प्रयोग। तहिये स शुरू भेल एकर अर्थक नव संसार जे मिथिलाक सोच आ संस्कृति स पूरा भिन्न अछि। नव प्रयोग आ पुरान अर्थक एहन मिश्रण भेल जे कलाक पूरा स्वरूप आ अर्थ क औचित्य पर सवाल उठा देलक।

सब कलाकृतिक एकटा अर्थ होइत छैक। जेकर कलाकृति स घनिष्टï संबंध होइत अछि। कलाकृति आ ओकर अर्थ ओ कृतिक सार्थकता कए सिद्घ करैत अछि। मिथिला चित्रकलाक संबंध मे जखन विचार करैत छी त कर्ठटा गप सामने अबैत अछि, मुदा एकटा गप स्पस्ट होइत अछि जे मिथिला आ भारतक विद्घान एहि कलाक प्रति आइ धरि अपन नजरिया नहि बना सकलथि अछि। पिछला पांच दशक मे विदेशी विद्वान जे एहि कलाक प्रति नजरिया स्थापित केलथि अछि, देशक विद्वान ओकरे आधार मानि कए आगू बढैत रहलथि अछि। च पूछु त देशी विद्वान कहियो अपन नजरिया प्रस्तुत करबाक प्रयास तक नहि केलथि। मिथिला चित्रकलाक एहि गुप्त आ जटिल वास्तविकता कए धुंध स निकालबाक पहिल प्रयास सेहो अमरीका मे कैल गेल। 1984 मे अमरीका स प्रकाशित मानव शास्त्र पर आधारित पत्रिका मे पहिल बेर एहि गप कए रोचक आ गंभीरतापूर्वक उठाउल गेल जे अर्थक अधिकता स केना एहि कलाक सार्थकता खत्म भ रहल अछि। उत्तर बिहार आ नेपालक तराई मे पसरल मिथिला क महिला द्वारा अपन घरक दीवार आ आंगना मे बनाउल जाइवाला एहि चित्रक संबंध मे एखन धरि कई बेर लिखन जा चुकल अछि आ कई ठाम कहल जा चुकल अछि। एतबे नहि कई टा अंतरराष्टï्र्रीय मंच पर एकर प्रस्तुति सेहो भ चुकल अछि। मुदा एकर संबंध मे लिखल साक्ष्य बेसी पुरान नहि अछि। 1949 मे पहिल बेर एहि पुरातन कलाक संबंध मे कागज पर किछु लिखल गेल। डब्ल्यू जी आरचर अपन किताब मे एहि चित्रकला कए अद्भुत आ आश्र्चयजनक कहने छथि। मुदा 1962 मे प्रकाशित लक्ष्मीनााि झाक पुस्तक मिथिला की सांस्कृतिक लोकचित्रकला सही मायने मे एहि चित्रकला पर पहिल आधिकारिक दस्तावेज अछि। देसी नजरियाक संग-संग एकर भाषा मे सेहो हिंदी आ मैथिलीक मिश्रण अछि, जाहि स अर्थक भाव अंगरेजी स बेसी साफ बुझबा मे अबैत अछि। देशी नजरियावाला एहन पुस्तक कए पाठक तक नहि पहुंचब एहि कलाक अर्थक अधिकताक मूल कारण कहल जा सकैत अछि। मिथिला चित्रकलाक अर्थक संबंध मे समय-समय पुस्तक क प्रकाशन होइत रहल अछि। 1952 मे ब्राउन आ लेन्यूइस, 1966 मे माथुर, 1977 मे इब्स विको (वैक्यूवाद) आ 1990 मे जयकर एहि कलाक अर्थक संबंध मे बहुत किछु लिखलथि। अविश्वसनीय मुदा सत्य अछि जे एहि किताब सब मे जे किछु लिखल गेल अछि ओ मिथिला मे प्रचलित अर्थक स सर्वथा भिन्न अछि। एहि संबंध मे अमरीकाक चीको विश्वविद्यालयक कैरोलिन ब्राउन लिखैत छथि जे मिथिला चित्रकलाक अर्थ कए हरदम गलत आ भ्रमक तरीका स विश्वक समक्ष राखल गेल अछि। एकर मुख्य कारण इ रहल जे एहि पर देशी खास कए मिथिलाक विद्वान गंभीर काज नहि केलथि, जे काज भेल ओ विदेशी विद्वानक शोध स भेल। मिथिलाक अंगना मे बनाउल गेल एहि चित्रक संबंध मे पुख्ता जानकारी लेब कोनो विदेशी लेल हरदम एकटा चुनौती रहल अछि। लोककला कए बुझलाक बाद ओकर सही अर्थ बुझब आ फेर ओकरा सही रूप मे परिभाषित करि अभिव्यक्त करब कोनो विदेशी शोधकर्ता लेल राई क पहाड़ सन काज अछि। 1986 मे एसैड, वैल, मारकस आ फिसर, 1988 मे क्लिवाड आ 1992 मे वूल्फ क आलेख स बुझबा मे अबैत अछि जे ओ किछु एहने सच्चाई स सामना केने हेताह। कैरोलिन ब्राउन एहि संबंध मे साफ तौर पर लिखैत छथि- हम पश्चिम कए लोक एहि चित्रकला कए परिभाषित नहि करि सकैत छी, ताहि कारण हम सब एहि अद्भुत विषय कए तोडि़-मरोड़ी कए पेश करैत रहलहुं अछि। हालांकि एहि मे कोनो संदेह नहि अछि जे एकटा समाज मे भिन्न-भिन्न लोकक अगल-अलग नजरिया भ सकैत अछि, ओ एकटा चित्रक भिन्न-भिन्न अर्थ कहि सकैत छथि, मुदा विभिन्न अर्थक बीच मे एकटा समानता होइत अछि, जे अर्थ कए कतहु ने कतहु जोड़ैत अछि। उदहारण लेल मिथिला मे पुरुख कर्मकांड, न्यायशास्त्र सन शास्त्रीय विधा मे नीक पकड़ रहैत छथि आ ओहि स जुड़ल पावैन-तिहार क व्याख्या नीक जेका करि लैत छथि, ओतहि मौगी घरेलू पावैन-तिहार पर नीक पकड़ी रखैत छथि आ ओकर अपन अनुसारे व्याख्या सेहो करैत छथि। एहि लेल कुलदेवीक पूजा या गौरी पूजा मे पुरुखक योगदान कम देखबा मे अबैत अछि। एकर पाछु कारण इ अछि जे अत्यंत गूढ़ संसार आ अत्यधिक विकसित समाजक सबटा गपक ज्ञान राखब असंभव अछि। ओना मिथिला समाज कए अत्यंत विकसित समाज बहुत कम विद्वान मानने छथि। जेना कि 1991 मे दरिदा आ 1994 मे वाल साफ तौर पर लिखने छथि जे एहि चित्रकलाक सही अर्थ मिथिला मे आब गिनल-चुनल लोक बता सकैत अछि। वेल क कहब अछि जे मिथिला मे जे चित्रक अर्थ कहि सकैत छथि ओ चुप रहय चाहैत छथि, जखन कि अर्थ नहि जननिहार लोक कए चुप राखब एकटा कठिन काज अछि। ओना एहि संबंध मे ब्राउनक मत किछु अलग अछि। ब्राउन कहैत छथि, 'इ सच अछि जे आम मैथिल एहि कलाक संबंध में कम जानकारी रखैत छथि, मुदा बहुत विद्वान लेल इ कोनो महत्व नहि रखैत अछि जे मैथिल एहि संबंध में कतेक बुझैत अछि आ की कहैत अछि। अधिकतर विद्वान मैथिलक भावना कए अपन शोध मे तोडि़-मरोडि़ कए प्रस्तुत करबा स पाछु नहि हटला अछि। दुर्भाग्य अछि जे एखन तक कोनो देशी विद्वान एहि तथ्य कए रेखांकित नहि केलाह अछि, मुदा ब्राउन अपन मिथिला प्रवासक दौरान किछु एहने महसूस केलीह। असल मे सबस पैघ गप इ अछि जे पाश्चात्य संस्कृति, व्यवहार आ शिक्षा हमरा लोकनि क सोच कए दबा देलक अछि या इ कहू जे सीमित करि देलक अछि। एकर अलावा हमरा लोकनि मे अनुवाद करबाक क्षमता सेहो कम भ चुकल अछि। आब सवाल उठैत अछि जे एतेक जटिल आ गुप्त तथ्यक कोनो एक व्यक्ति द्वारा कैल अनुवाद कए सर्वोच्च मानल जा सकैत अछि? एहि ठाम इ कहब जरूरी अछि जे एकटा चित्रक कई टा अर्थ भ सकैत अछि, मुदा ओकर सूत्र दूटा नहि भ सकैत अछि। वैह एकटा सूत्र ओकरा आन स भिन्न करैत अछि। एहि सूत्रक चारुआत ओकर अर्थ घुमैत रहैत छैक। एहन सूत्र मिथिला मे एखनो किछु महिला कए बुझल छैन, मुदा ओ निश्चित रूप स व्यावसायिक नहि छथि। ताहि लेल हुनका स ओ सूत्र बुझब कोनो देशी विद्वान लेल कठिन काज अछि, एहन मे विदेशी विद्वानक गप करब बेकार अछि। दरअसल मिथिलाक मौगी एहि सूत्र कए अपन शरीरआ आत्मा मे बसा रखने छथि आ नव पीड़ी कए थोड़े-थोड़े करि कए बुझाउल जाइत रहल अछि। एहन मे अल्प ज्ञानी स जानकारी लेलाक बाद विदेशी विद्वान मिथिलाक सूत्र जनिनिहार महिला कए नजरअंदाज करि दैत छथि। मिथिला चित्रकला क सबस प्रचलित चित्र कोहबरक पुरैन कए ल कए सबस बेसी भ्रमक स्थिति अछि। अधिकतर विद्वान एकरा कोहबर नाम स परिभाषित केलन्हि अछि, जखन कि पुरैन कोहबरक अनेक चित्रगुच्छक एकटा सदस्य मात्र अछि। आइ जे पुरैनक स्वरूप देखबा मे आबि रहल अछि, ओ जानकार महिला मे भ्रम पैदा करि रहल अछि। हालांकि एतबा अवश्य अछि जे एकटा गोलाकार आकृतिक चारुआत छह टा मौगिक मुंह बनाउल गेल अछि, जेकर बीच मे सातम मुंह सेहो अछि जे छह टा मुंह स कनि पैघ आकारक अछि। एहि चित्र कए रेखाचित्रक रूप मे बनाउल गेल अछि। पुरैनक सूत्र पर बनाउल गेल एहि रेखाचित्र स भ्रण हेबाक कईटा कारण अछि। मिथिला मे पुरैन रेखाचित्र नहि, बल्कि भित्तिचित्र अछि आ पांचटा रंग स बनाउल जाइत अछि। हालांकि आइ अधिकतर कागज पर एहन चित्र बनाउल जा रहल अछि, लेकिन एहि चित्रक विशेष मे साफ तौर पर कहल गेल अछि जे एकरा दीवार पर बनाउल जाइत अछि। मिथिला मे रेखाचित्र कए अरिपन कहल जाइत छैक आ ओ जमीन पर बनाउल जाइत अछि। ओनाओ मिथिला मे पुरैनक दू टा सूत्र अछि। एकटा ब्राह्मïण आ दोसर कर्णकायस्त लोकनिक पुरैन। दूनू मे सूत्रक अंतर अछि। मुदा एहि चित्र मे एकर प्रारूपक कोनो चर्च नहि अछि। सातटा मौगिक मुंहक संग सांप, कछुआ, माछ आदिक चित्रक औचित्य जखन मिथिलाक लोक लेल बुझब कठिन अछि तखन विदेशी की बुझत? विदेशी विद्वान लेल इ मात्र एकटा भीड़वाला चित्र अछि, जाहि मे संदेशक कोनो स्थान नहि अछि। बहुत रास विदेशी विद्वान त एकरा जादू-टोना आ भूत-प्रेत लेल बनाउल गेल चित्र कहलथि अछि। मुदा ब्राउनक कहब अछि जे इ पुरैनक नव रूप अछि आ कायस्त प्रारूप स मिलैत-जुलैत अछि। मिथिला मे पुरैन कमलक लत्ती कए कहल जाइत अछि। ब्राह्मïण प्रारूप मे नौ आ कायस्थ प्रारूप मे सातटा कमलक पात दर्शाउल जाइत अछि। चूंकि कमलक लत्ती पाइन मे होइत अछि, ताहि लेल एकर संग-संग पाइन मे रहैवाला वस्तु आ जीवक चित्र बनाउल जाइत अछि। लक्ष्मीनाथ झा एहि संबंध मे लिखैत छथि जे पुरैन मुख्य रूप स वंश वृद्घिक लेल नव दंपति स सांकेतिक अनुरोध अछि। जेना कमलक एकटा लत्ती पोखरि कए कहियो कमल विहीन नहि हुए दैत अछि, तहिना नव दंपति कए घर कए कहियो वंश विहीन नहि हुए देबाक कर्तव्य निभेबाक चाही। एतबा त जरूर अछि जे 20वीं शताब्दी मे पश्चिम मे पलल-बढ़ल कोनो व्यक्ति एहि स्त्रीत्व कए(स्त्री कए हृदय मे वास करैयवाला भावना) घेरा नहि बुझि पाउत। आइ जखन बियाह एकटा अलग अर्थ ल चुकल अछि, एहन मे पुरैनक औचित्य जरूर प्रासंगिक भ गेल अछि। 1960 क दशक मे एहि चित्र कए कागज पर उतारबाक प्रयास शुरू भेल छल आ तहिए स शुरू भेल एहि चित्र मे नव-नव प्रयोग। तहिये स शुरू भेल एकर अर्थक नव संसार जे मिथिलाक सोच आ संस्कृति स पूरा भिन्न अछि। नव प्रयोग आ पुरान अर्थक एहन मिश्रण भेल जे कलाक पूरा स्वरूप आ अर्थ क औचित्य पर सवाल उठा देलक। सच कहल जाए त मिथिलाक महिलाक एहि विलक्षण प्रतिभा कए परिभाषित करबा मे एखन धरि कोनो विद्वान सफलता नहि पाबि सकलथि अछि। समस्त मिथिला मे बनाउल जाइवाला एहि चित्र कए किछु चारि-पांच टा गाम मे समेट देबाक अलावा इ विद्वान लोकनि एहि चित्र कए कएटा अनपढ़-गवांर मौकी द्वारा बनाउल गेल चित्र स बेसी किछु नहि साबित कए सकलथि अछि। मिथिला मे एखनो कई टा महिला अपन फाटल पुरान कॉपी निकालि देखबैत छथि, जाहि मे कईटा विदेशी विद्वानक लिखल वाक्य अछि। दुख आ तामस तखन होइत अछि जखन कॉपी पर लिखल वाक्य पढ़ैत छी, जाहि मे लिखल रहैत छैक जे इ चित्र एकटा पिछड़ल समाजक गवांर, अनपढ़ आ मूर्ख महिला द्वारा बनाउल गेल अछि। विदेशी विद्वान मे इ सोच अचानक नहि आबि गेल अछि। हुनका कई प्रकार स इ बतेबाक बेर-बेर प्रयास भेल अछि। दुनिया मे इ धारण कए स्थापित करबाक श्रेय इब्स विको कए अछि। विको स बेसी शायद कोनो विद्वान एहि चित्रकला पर काज नहि केलथि अछि, मुदा ओ जतेक एहि चित्रक करीब अबैक कोशिश केलाह, एकर अर्थ स ओ ओतेक दूर होइत गेलाह। विको राय औवेन्स क संग एकटा फिल्म सेहो बनौलथि, जेकर नाम 'मुन्नीÓ अछि। ओ एकटा फ्रंच फिल्म सेहो बनउलथि, मुदा चित्रक अर्थ बुझबा आ बुझेबा मे सब बेर असफल भेलथि। विको तखनो हार नहि मानलथि, ओ 1994 मे एकटा विडियो फिल्म 'मिथिला पेंटरस...Ó बनौलथि, मुदा नव किछु नहि कहि पैउलथि। आइ स्थिति एहन भ चुकल अछि जे समाजक सब लोक इ बुझबा मे लागल अछि जे आखिर इ परंपराक कौन वस्तु बारे मे थिक। एहि चित्रकलाक संबंध मे सबसे लोकप्रिय स्रोत विकोक 1977 मे छपल किताब' द वीमेंस पेंटर ऑफ मिथिला...Ó अछि। जखन कियो एहि पुस्तकक एक-एक टा चित्र कए गौर स देखैत अछि आ ओकर रूपरेखा कए पढ़ैत अछि त ओकर सामना एकटा आश्र्चजनक, अद्भुत आओर लगभग असंभव सन प्रतीत होइवाला संसार स होइत अछि। विको लिखैत छथि जे मिथिला समाज मे मुख्यपात्र महिला छथि आ एहि ठाम पुरुषक भरमार अछि। एहि ठाम युवती हमउम्र युवक स विवाह करबा लेल तरह-तरह स प्रयास करैत छथि।(1977, पृष्ठ- 17)। विको एहि गप कए बाजारू आओर रोचक बनबैत आगू लिखने अछि जे मिथिला मे एकटा युवती अपना लेल सुयोग्य युवक कए चुनैत अछि आ विवाहक प्रस्ताव स्वरूप ओकर सामने कोहबर रखैत अछि ।(1977, पृष्ठ- 17)। ओ लोक जे मिथिला कए नीक जेका नहि चिन्हाल अछि, हुनको इ वाक्य पढ़लाक बाद आश्र्चय हेतेन जे विको केना मिथिला समाज कए अतेक चरित्रहीन बना देलथि। इ अद्भुत मुदा सत्य सन आलेख कए पढ़लाक बाद एहन प्रतीत होइत अछि जे विको कए एहन अनुवादक भेटलन्हि जेकरा मिथिला समाज, संस्कृति आ सभ्यता स कोनो वास्ता नहि रहैन, संगहि हुनका मिथिलाक रिति-रिवाज आ लोकाचार तक कए ज्ञान नहि रहैन। सच पूछु त अनुवादकलेल विको मात्र टका देनिहार विदेशी छलाह। ओना देखल जाए त विको क इ किताब एहि विषय पर लिखल गेल पहिल अथवा आखिरी किताब नहि थिक। इ पुस्तक एहि लेल महत्वपूर्ण भ गेल अछि, किया कि मिथिला चित्रकला पर शोध केनिहार अधिकतर विद्वान एहि पुस्तक स प्रभावित छथि। एतबा धरि कि भारतीय विद्वान उपेंद्र ठाकुर तक अपन किताब मे विको क नजरिया कए नजरअंदाज नहि केलथि अछि। विको क एहि किताब क महत्व पर ब्राउनक कहब अछि जे पश्चिमक विद्वान जखन कोनो विषय पर काज शुरू करैत छथि तखन ओहि विषय पर लिखल गेल पूर्वक किताब स काफी प्रभावित होइत छथि। मिथिला चित्रकलाक संग सेहो किछु एहने भेल। अधिकतर विद्वान विकोक रूप-रेखा स प्रेरणा लेलथि, किछु त हुनकर नकल तक कैलथि। ताहि लेल इ अन्य पुस्तक बेसी महत्वपूर्ण भ जाइत अछि। दोसर इ जे विको बहुत दिन धरि एहि विषय पर काज केलथि अछि आ कई प्रकार स एकरा दुनियाक समक्ष अनलथि अछि, एहन मे विदेशी विद्वान लेल हुनका नजरअंदाज करब कठिन रहल अछि। एहि प्रकारे विको भ्रमक आओर सर्वथा गलत तरीका स अनुवाद करि झूठ कए एकटा सत्य स बेसी सत्य रूप मे स्थापित केलथि अछि। ओना अधिकतर विदेशी विद्वानक कहब अछि जे मिथिला समाज विश्वक सबस चरित्रवान समाज मे स एक अछि। एकर संस्कृतिक संबंध मे प्राख्यात चिकित्सक डॉ कैमेल क कहब अछि जे आइ 'जीनÓ(अणु)क संबंध मे दुनिया भरि मे शोध भ रहल अछि, जखनकि मिथिला मे पंजी व्यवस्था ओकरे एकटा रूप अछि। मिथिलाक ब्राह्मïण आ कर्णकायस्थ लग एखनो बीस-बीस पीढिक़ जानकारी उपलब्ध अछि। विको कए शायद इ नहि बताउल गेल कि मिथिला मे युवतिक विवाह पंजीकारक राय स तय कैल जाइत अछि। युवतिक इच्छा एहि ठाम कोनो मायने नहि रखैत अछि। एहि तथ्य कए ब्राउन बहुत साफ तौर पर रखने छथि। ब्राउन कहैत छथि जे ओ मिथिला प्रवासक दौरान पंजीक विधिवत शिक्षा ल चुकल छथि। ओ एहि गप कए सेहो साफ करबाक प्रयास केलथि अछि जे मिथिला मे कहियो युवति कए पति चुनबाक अधिकार नहि रहल अछि। सीताक संबंध मे सेहो ब्राउनक मत स्पष्टï अछि। ओ कहैत छथि जे सीताक स्वयंवर नहि छल ओ एकटा सशर्त विवाह छल। इ सच अछि जे ओहि विवाह मे पंजीक कोनो व्यवस्था नहि छल, मुदा धणुष रामक बदला मे रावण उठा लैत त कि सीताक इच्छा रहितो राम स विवाह संभव छल? सीताक इच्छा हुनक विवाह मे कोनो मायने नहि रखैत छल। ब्राउल इ तर्क देलाक बाद आखिरी फैसला मिथिलाक लोक पर छोड़ैत कहैत छथि जे मेरे एहि मत स शायद मिथिलाक लोक सहमत नहि हेताह। वैकसेनेलक शब्द मे कहल जा सकैत अछि जे मिथिला चित्रकला एकटा आंखिक भांति अछि जे समयक संग-संग अपना कए बदलैत रहल अछि, मुदा अपन मूल सिद्घांत स कखनो समझौता नहि केलक अछि। इ कला जगतक एकटा अद्भुत औजार अछि जेकरा स कलाकार अपन समाजक संग-संग पूरा विश्वक गुढ़ गप आ रिति-रिवाज कए चित्रक माध्यम स प्रस्तुत करैत आइल अछि। (1972,पृष्ठ-38) जे किछु हुए एतबा त अवश्य भेल अछि जे मिथिलाक संस्कृति कए दुनियाक सामने सर्वथा गलत तरीका स परिभाषित केल गेल अछि। आइ मिथिला चित्रकला अधिकतर एहन चित्र बनाउल जा रहल अछि, जेकर एतुका संस्कृति स कोनो लेनादेना नहि अछि। आवश्यकता अछि एहि चित्र क गंभीरता स शोध करबाक आ एकर अर्थक अधिकता कए समाप्त करबाक, नहि त इ चित्र हरदम लेल हमरा लोकनिक अज्ञानताक द्योतक बनल रहत। शेख मोहम्मद शरीफ प्रसिद्ध वेमपल्ली शरीफक जन्म आन्ध्र प्रदेशक कडापा जिलामे भेल छल। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। जुम्मा हमर अम्मीक निर्दोष मुखमंदल अबैत अछि हमर आँखिक सोझाँ, चाहे आँखि बन्द रहए वा खुजल रहए। ओहि मुखक डर हमर विचलित करैत अछि। एखनो हुनकर डराएल कहल बोल हमर कानमे बजैत रहए-ए। ई दिन रहए जुम्माक जाहि दिन मक्का मस्जिदक बीचमे बम विस्फोट भेल रहए। सभ दिस कोलाहल, टी.वी. चैनल सभपर घबराहटिक संग हल्ला, पाथरक बरखा, आदंक आऽ खुनाहनि। हम काजमे व्यस्त छलहुँ जखन फोन बाजल। फोन उठेलहुँ तँ दोसर दिस अम्मी छलीह..हुनकर फोन ओहि समय नीक आ सहज लागल। एहिसँ पहिने कि हम “अम्मी..” कहितहुँ ओ चिन्तित स्वरेँ “हमर बाउ...!” कहलन्हि। “की अहाँकेँ ई बुझल छल...?” हम पुछलियन्हि। “हँ एखन तुरत्ते हमरा ई पता चलल..अहाँ सतर्क रहब! ...लागै-ए अहाँ आइ मस्जिद नहि गेल रही हमर बाउ।” हम हुनका डरसँ सर्द अवाजमे बजैत सुनलहुँ। जिनगीमे पहिल बेर हमर मस्जिद नहि जएबासँ ओ प्रसन्न भेल छलीह। ई विचार हमरा दुख पहुँचेलक। की हमर अम्मी ई गप बाजि रहल छलीह? ई ओ छथि जे हमरासँ ई पूछि रहल छथि? ई हमर अम्मी छथि जे एहि तरहेँ डरलि छथि? हमर मस्तिष्क विचरक विस्फोटसँ भरि गेल आ स्मृतिक बाढ़िमे बहए लागल। १ हमर अम्मीकेँ जुम्माक नवाज आस्थाक दृष्टिसँ नीक लगैत छलन्हि। ओ कोनो चीजक अवहेलना कऽ सकैत रहथि मुदा जुम्माक दिन नमाजक नहि, से ओ हमरा सभकेँ ओहि दिन घरमे नहि रहए दैत रहथि। अब्बा सेहो हुनकर दामससँ नहि बचि पाबथि जे ओ घरपर रहबाक प्रयास करथि। हुनकर सन डीलडौल बलाकेँ सेहो हाथमे टोपी लए मस्जिद चुपचाप जाए पड़न्हि। हमरा सभक घरमे काजसँ दूर भागए बला, आलसी बच्चा, शिकारी हम आ हमर अब्बा हरदम मस्जिद नहि जएबा लेल बहन्नाक ताकिमे रहैत छलहुँ। हमर अब्बा भोरेसँ छाती तनैत कहैत रहैत छलाह जे आइ जुम्मा अछि से कोनो हालतिमे मस्जिद जएबाके अछि। मुदा जखने समय लग अबैत रहए हुनकर बहन्ना शुरू- “अरे! अखने कादोमे हम खसि पड़लहुँ...” हमर अम्मी लग कोनो रस्ता नहि बचन्हि। जे से, तखन ओ हमरा सेहो मस्जिद नहि पठा सकैत छलीह...हमरा नहबैत, हमर कपड़ा धोबैत, ओ कोना कऽ सकितथि? तैयो ओ हाथमे छड़ी लेने आँगन आबथि, हमरापर गुम्हरैत, हमर पुष्ट पिटान करैत आ हमरा अँगनामे कपड़ा जकाँ टँगैत। से हम ई चोट खएबासँ नीक बुझैत रही नमाजे पढ़ब। हमर आलसपना मस्जिद पहुँचिते अकाशमे उड़ि जाइत रहए। एक बेर ओतए पहुँचिते हम दोसर बच्चा सभ संग मिझरा जाइत रही आ सभटा नीक वरदानक लेल प्रार्थना करैत रही- जेना हमर अब्बा लग खूब पाइ होन्हि, हमर अम्मीक स्वास्थ्य नीक भऽ जान्हि, हमर पढ़ाईमे मोन लागए आ की की। हमर अम्मा बुझाबथि- “हमरा सभकेँ मस्जिद मात्र वरदान प्राप्त करबाक लेल नहि जएबाक चाही, हमर बाउ..हमरा सभकेँ नमाज पढ़बाक चाही...अल्लामे आस्था हेबाक चाही। वैह छथि जे हमर सभ कल्याण देखैत छथि”। जखन दोसर हुनका हमर उपराग देन्हि जे हम नमाज काल आस्ते-आस्ते गप करैत रहै छी तँ ओ हमरा आस्तेसँ दबाड़ि बाजथि- “हमर बाउ, प्रार्थनाक काल बजबासँ अपनाकेँ रोकू...कमसँ कम मस्तिष्कमे दोसर तरहक विचारकेँ अएबासँ रोकू। बगलमे बम किएक ने फाटय तैयो सर्वदा अपन मस्तिष्ककेँ अल्लापर केन्द्रित राखू...”। हुनका ओहि दिन एहि गपक अन्देशा नहि रहन्हि जे एक दिन ठीकेमे मस्जिदमे बम फाटत। से आश्चर्य नहि जे ओ एतेक आत्मविश्वाससँ बाजि रहल छलीह। आब जखन ठीकेमे बम विस्फोट भेल अछि, हुनका ई अनुभव भऽ रहल छन्हि जे कतेक भावह ई भऽ सकैत अछि। हम हुनकर वेदनाकेँ नहि देखि पाबि रहल छी। ओ डरायलि छलीह। ओ नमाजसँ डरायल छलीह। ओ अल्लासँ सेहो डरायल छलीह। “अम्मी...”। हम उद्यत भऽ कहलहुँ। “हमर बेटा...”। ओ दोसर कातसँ बजलीह।  “अहाँ आइ मस्जिद नहि गेलहुँ, नहि ने, हमर बाउ”? ओ फेरसँ कहलीह। हमर हृदय डूमि रहल रहए। शब्द हमर संग छोड़ि रहल रहए। हमर कंठ सूखि रहल रहए। हम घुटनक अनुभव कएलहुँ। विचार ज्वारि जकाँ हमरा भीतर उठि रहल छल। हमरा लागल जे क्यो हमरा ठेलि कए सोखिं कए भूतमे लऽ जाऽ रहल अछि। २ जुम्माक दिन मस्जिदसँ घुरलाक बाद हम सभटा घटनाक आवृत्ति अम्मी लग करैत छलहुँ। हम नमाजक एकटा छोट संस्करण हुनका लगमे करैत छलहुँ। हमरा प्रार्थना पढ़ैत देखि ओ हमरा आलिंगन मे लऽ चुम्मा लैत छलीह, “अल्ला हरदम अहाँक रक्षा करताह, हमर बाउ...”। ओ हमरा आशीर्वाद दैत रहथि। तखन हम निर्णय कएलहुँ जे जहुँ हमरा कोनो ज्ञानप्राण अछि तँ हमरा कोनो नमाज नहि छोड़बाक चाही। सभ जुम्माकेँ ओ नमाजक महत्वपर बाजथि आ मस्जिद जएबापर जोड़ देथि। आन चीजक अतिरिक्त ओ एहि गपक विषयमे बाजथि जे कुरान अही दिन बनाओल गेल रहए, कि मनुक्ख अपन कर्मक लेल अही दिन उत्तर दैत अछि आ जे विश्व जीवन रहित जे कहियो होएत तँ सेहो अही दिन होएत। हमर माथ, छोट रहितो, ई गप बुझि गेल जे जुम्मा किएक मुसलमान लेल पवित्र अछि। सभ बच्चा जुम्मा दिन साँझ धरि स्कूलमे रहैत छलाह, मात्र हम दुपहरियाक बादे स्कूल छोड़ि दैत छलहुँ, मस्जिद जएबाक बहन्ने झोरा झुलबैत घर घुरैत छलहुँ। हमर अम्मी शिक्षकसँ परामर्श कए केने छलीह। दोसर छात्र सभ हमरा एतेक शीघ्र घर जाइत देखि ईर्ष्या करैत छलाह। ओ हमरा भाग्यशाली बुझैत छलाह आ अपनो मुस्लिम होएबाक मनोरथ करैत छलाह। हुनकर ईर्ष्यालु मुख देखि हम भीतरे-भीतर हँसैत रही। हम खुशी-खुशी घर घुरैत रही जेना हाथीक सवारी कएने होइ। हमर अम्मी ओहि महत्वपूर्ण उपस्थितिक लेल हमरा तैयार करैत रहथि- गरम पानिसँ नहबैत रहथि, हमर आँखिमे काजर लगबैत रहथि, हमर केशक लटकेँ टोपीक नीचाँ समेटि कए राखथि। हम सभ दिन तँ हाफ पैंटमे रहैत छलहुँ मुदा ओहि दिन उजरा कुरता पैजामामे चमकैत छलहुँ। दोसर स्त्रीगण हमरा देखि अपन हाथ हमर मुखक चारू दिस जोरसँ घुमाबथि आ कोनो दुष्टात्माकेँ भगाबथि आ कहथि, “जखन जुम्मा अबैत अछि अहाँ जुम्माक सभटा चक लए अबिते ने छी”!! अहाँ जुम्माक साँझमे ई खुशी सभ घरमे देखि सकैत छी, दरगा केर फ्रेम कएल चित्रक सोझाँमे जड़ैत लैम्प, अगरबतीक सुगन्धी वायुमे हेलैत; अपन माथ झँपने स्त्रीगण घरक भीतर-बाहर होइत; आ नारिकेलक दाम दोकानक खिड़कीपर बढ़ैत। दरगा केर फ्रेम कएल चित्र पर नारिकेल चढ़ेबाक विधक वर्णन एतए अहाँ नहि छोड़ि सकैत छियैक। किएक तँ हमर अब्बाकेँ अर्पण विधक ज्ञान नहि छलन्हि से ओ हजरतकेँ छओटका रस्तासँ घर अनैत रहथि। हमर अम्मी ई सिखबाक लेल हुनकर पछोर धेने अबैत रहथि। “अहाँकेँ ई अन्तरो नहि बुझल अछि कलमा..आकि गुसुल...हमरा अहाँसँ निकाह करेबाक लेल अपन अम्मी-अब्बाकेँ दोषी बनाबए पड़त...कियो अहाँसँ नीक हुनका सभकेँ नहि भेटलन्हि, अहाँसँ हमर बियाह करेलथि। आब बच्चो सभ अहींक रस्ता पकड़लथि हँ...” ओ हुनकासँ एहि तरहेँ विवादपर उतरि जाथि। “अहाँ ..घरक...ई उत्पीड़न हमरा लेल असह्य भऽ गेल अछि..”। पजरैत, ओ मस्जिद जाइत रहथि लाल-पीयर होइत हजरतकेँ घर अनबा लए। हजरत नारिकेलक अर्पण विध पूरा करबाक बाद अपन मुँह आ पएर धोबि आ अपन दाढ़ीमे ककबा फेरि बाहरमे खाटपर बैसैत रहथि। एहि बीच हमर अम्मी फोड़ल नारिकेलक गुद्दा निकालि ओकर कैक भाग कए ओहिमे चिन्नी मिलाबथि। ओ तखन एहि मिश्रणकेँ बाहर हातामे जमा भेल सभ गोटेमे बाँटथि। ओ अन्तमे हमरा लेल राखल दू-तीन टा टुकड़ी लेने हमरा लग आबथि। हम शिकाइत करियन्हि, “यैह हमरा लेल बचल अछि”? “हमरा सभकेँ अल्लाकेँ अर्पित कएल वस्तु नहि खएबाक चाही, हमर बेटा..हम दोसरामे एकरा बाँटी तैयो जहुँ हमरा सभ लेल किछु नहि बचए”। ओ हमरा शान्त करथि। हुनकर मीठ बोल हमरा मोनसँ नारिकेलक पर्याप्त हिस्सा नहि भेटबाक निराशाकेँ खतम कए दैत छल। बादमे हमर पिता आ हजरत साँझमे अबेर धरि बैसि गप करैत रहथि। अपन वस्त्र बदलि सामान्य वस्त्रमे हम, अपना संगी सभक संग पड़ोसक एकटा निर्माण स्थलपर बालूक ढेरपर खेलाय लेल चलि जाइत रही। ई सभ सोचि हमर आँखिमे नोरक इनार बनि गेल... “हमर पुत्र, अहाँ किएक नहि बाजि रहल छी? की भेल? हम डरक अनुभव कऽ रहल छी...बाजू...” हमर अम्मी पुछैत रहलीह। ओना तँ हैदराबाद एनाइ तीन बरख भऽ गेल मुदा एको दिन हम नमाज नहि पढ़लहुँ। असमयक पारीमे काज करबा अनन्तर हम ईहो बिसरि गेलहुँ जे नमाज पढ़नाइ की छियैक। “अम्मी..” हम उत्तर लेल शब्द तकैत बजलहुँ। “अम्मी, हम कहिया हैदराबादमे नमाज पढ़बाक लेल मस्जिद जाइत छी जे अहाँ एतेक चिन्तित भऽ रहल छी”? हम पुछलहुँ। हम मोन पाड़लहुँ ओहि दिनकेँ जखन ओ हैदराबाद आएल रहथि कारण हम कहन्र् रहियन्हि जे हम हुनका हैदराबाद नगर देखेबन्हि। मुदा हैदराबाद आबि अपन विरोध देखबैत ओ बजलथि, “हम कतहु जाए नहि चाहैत छी...हमरापर किएक पाइ खर्च कऽ रहल छी”? हम हुनकर मोनक गप बुझैत रही। ओ हमरापर बोझ नहि बनए चाहथि, मुदा हम हुनकर विरोधपर ध्यान नहि देलहुँ। हमर जोर देलापर ओ एक बेर अएलीह। हम हुनकर हाथ पकड़ि रस्ता पार करबामे मदति करियन्हि। एक बेर खैरताबादक लग सड़क पार करबा काल हुनकर आँखि नोरसँ आद्र भऽ गेलन्हि। “अहाँ कतए जन्म लेलहुँ...कतए अहाँ बढ़लहुँ...अहाँ कतेक टा भऽ गेलहुँ? अहाँ एहि पैघ नगरमे कोना रहए छी? अहाँ बहुत पैघ भऽ गेलहुँ...” ओ बड़ाई करैत कानए लगलीह। “अहाँ जखन बच्चा रही तखन हम अहाँकेँ नानीगाम बससँ लऽ गेल रही। हम अहाँक हाथ कसि कऽ पकड़ने रही कि अहाँ कतहु हेराऽ ने जाइ। आब अहाँ एतेक पैघ भऽ गेलहुँ जे हमर हाथ पकड़ि बसपर चढ़बामे मदति करी”। ई कहैत ओ नोरक द्वारे ठहरि गेलीह। ओ खखसलीह, “खुस...खुस...” परिश्रमसँ अपन श्वास वापस अनलन्हि। ओ जखन भूतकेँ मोन पाड़ि रहल छलीह हम हुनका सान्त्वना देलियन्हि आ हुनकर नोर पोछलियन्हि। “अम्मी...हम एतए जीबाक इच्छासँ अएलहुँ। हम साहस केलहुँ आ कतेक रास कठिन क्षणकेँ सहन कएलहुँ। जखन दुखित रही, हम अपनेसँ दबाइ लए ले जाइ आ संगमे तखनो प्रत्यन करी।, ई सभ अम्मी...ई सभ अहाँक आशीर्वादसँ भेल, आकि नहि? एहि नगरमे अपना कहि कऽ संबोधित करए बला हमर क्यो नहि अछि, तखनो हम एतए बिना असगर रहबाक अनुभूतिक रहैत छी”। अपन आँखिक नोर पोछि कऽ ओ हमरा आशीर्वाद दैत कहलन्हि, “दीर्घायु रहू हमर पुत्र”। समस्याक आरम्भ तकर बाद भेल। “सभ जुम्मा..जुम्मा...अहाँ नमाज पड़ए छी हमर बाउ”? ओ पुछलन्हि। “नहि माँ। कहू ने, कखन हमरा पलखति भेटैत अछि”? “अहाँकेँ कहियो समय नहि भेटत, मुदा अहाँकेँ करए पड़त, एकरा छोड़बाक कोनो गुन्जाइश नहि अछि। मुस्लिमक रूपमे जन्म लेबाक कारण अहाँकेँ, कमसँ कम सप्ताहमे एक दिन समय निकालए पड़त”, ओ कहलन्हि। आगाँ कहलन्हि, “धनिक आ गरीब नमाजक काल संग अबैत अछि। ओ सभ कान्हमे कान्ह मिलाए नमाज पढ़ैत छथि। ओहि दिन ई बेशी गुणक संग अबैत अछि। एक बेर हरेलापर अहाँ ओ आशीष कहियि घुरा नहि सकैत छी। ताहि द्वारे धनिक आ एहनो जो लाखमे रुपैयाक लेनदेन करैत छथि, अपन व्यवसायकेँ एक कात राखि नमाज पढ़ैत छथि। दोकानदार सभ सेहो अपन व्यवसाय बन्न कऽ दैत छथि बिना ई सोचने जे कतेक घाटा हुनका एहिसँ हेतन्हि। संगहि ओ गरीब सभ जे प्रतिदिनक खेनाइक जोगार नहि कऽ पबैत छथि, सेहो नमाज पढ़ैत छथि”। हमरा डर छल जे हमर माँ वैह पुरान खिस्सा फेरसँ तँ नहि शुरू कऽ देतीह। विषय बदलि कऽ हम कहलियन्हि, “की अहाँकेँ बुझल अछि जे एतए निजाम नवाब द्वारा निर्मित एकटा पैघ मक्का मस्जिद अछि...”? “एहन अछि की? हमरा अहाँ ओतए नहि लऽ चलब”? ओ उत्साहसँ बजलीह। “जखन अहाँ ओतए पहुँचब तँ हमरा नमाज पढ़बा ले अहाँ नहि ने कहब”। हम विनयपूर्वक प्रार्थना कएलियन्हि। “हमर बाउ...अहाँ ई की कहैत छी...हम अहाँकेँ ई सुझाव अहाँक अपन भलाइ लेल दैत छी”। “ठीक छैक..चलू चली”! हम सभ ओतएसँ बस द्वारा सोझे मस्जिद गेलहुँ। ओ चारमीनार दिस देखलन्हि जे मस्जिदकक मीनारसँ बेशी पैघ रहए। “अम्मी ओ छी चारमीनार। हम पहिने ओतए चली..आकि मस्जिद”? हम पुछलियन्हि। “ओतए चारमीनारमे की अछि हमर बाउ”? “ओतए किछु नहि अछि...कोनो दिशामे देखू एके रंग लागत। मुदा अहाँ ऊपर चढ़ि सकैत छी। ओतएसँ अहाँ मक्का मस्जिद स्पष्ट रूपमे देखि सकैत छी...आब देरी भऽ गेल अछि। हम चारमीनार बादमे देखि सकैत छी...अखन तँ हमरा सभ मस्जिद देखी”। ओ स्वीकृति देलन्हि। मस्जिदक भीतरमे शान्ति रहए। शान्तिक साम्राज्य छल। ई शीतल, सुखकारी आ विस्तृत रहए। आगन्तुकक आबाजाही बेशी रहए। अम्मी भीतर जएबामे संकोच कऽ रहल छलीह कारण स्त्रीगण सामान्यतः मस्जिदमे नहि प्रवेश करैत छथि। मुदा ओ किछु बुरकाधारी स्त्रीगणकेँ ओतए देखि ओम्हर बढ़ि गेलीह। अपन सारीक ओरकेँ माथपर लैत ओ बजलीह, “हमहूँ अपन बुरका आनि लैतहुँ ने”? घरसँ चलैत काल ओ एहि लेल कहने रहथि मुद ई हम रही जे हुनका एकरा पहिरएसँ रोकने रही। अपन ठामपर हुनका लेल एकरा छोड़नाइ सम्भव नहि छलन्हि मुदा हम एहि नव स्थानपर हुनका एहि झंझटसँ मुक्ति देमए चाहैत रही। मुदा अपन सम्प्रदयक स्त्रीगण बीचमे बिना बुरका पहिरने ओ अपनाकेँ बिना चामक अनुभव कऽ रहल छलीह। जखन हम हुनका स्तंभित आ थरथराइत चलैत देखलियन्हि तखन हम हुनका बुरका नहि पहिरए देबाक लेल लज्जित अनुभव कएलहुँ। तैयो अपन रक्षा करैत हम कहलियन्हि, “हम कोना ई बुझितहुँ अम्मी जे हमर सभकेँ मस्जिद घुमबाक ब्योँत लागत”। ओ किछु नहि बजलीह। “एहिसँ कोनो अन्तर नहि पड़ैत अछि...आऊ”। हम बादमे ई कहि हुनका भीतर लऽ गेलहुँ। ओ हमर संग अएलीह। हम सभ अपन चप्पल कातमे रखलहुँ जाहिसँ बादमे ओकरा लेबामे आसानी होए। कतेक गोटे मस्जिदक सीढ़ीयेपर आलती-पालथी मारि कए बैसल रहथि। परबाक संग खेलाइत किछु गोटे ओकरा दाना खुआ रहल रहथि। किछु परबा उड़ि गेल आ किछु आन घुरि कए उतरल। किचु परबा पानिक चभच्चाक कातमे बैसि कऽ एम्हर-ओम्हर ताकि रहल रहए, एकटा आह्लादकारी दृश्य। अम्मी हुनकाँ आश्चर्यित भऽ देखलन्हि। बादमे ओ हमर पाछाँ अएलीह जखन हम सीढ़ीक ऊपर प्लेटफॉर्मपर पहुँचलहुँ। प्लेटफॉर्मकेँ चारू दिस देखैत ओ चिकरि कए बजलीह, “हमर बाउ, एक बेरमे कतेक गोटे एतए बैसि कऽ नमाज पढ़ि सकैत छथि”? “हमरा नहि बुझल अछि अम्मी...कैक हजार हमरा लागए-ए। रमजानक दिनमे लोक चारमीनार धरि बैसि कऽ नमाज पढ़ैत छथि”। हम उत्तर देलियन्हि। “हँ, ई टी.वी. मे देखबैत अछि” अम्मी प्रत्युत्तर देलन्हि। ओ एकरा नीकसँ चीन्हि गेल रहथि, हम अपनामे सोचलहुँ। चारू कात देखाऽ कऽ अन्तिममे हम हुनका मस्जिदक पाछाँ लऽ गेलहुँ। पाथारक फलक चिड़ैक मलसँ मैल भेल रहए। परबा सभ देबालक छिद्रमे खोप बनेने रहए। ओ मीनारक देबालकेँ छूबि आ आँखिसँ श्रद्धापूर्वक सटा कऽ अति प्रसन्न भऽ गेलीह। “एतए नमाज पढ़ब पवित्र गप अछि, हमर बाउ”, ओ कहलन्हि। हम एहि बेर कोनो अति सम्वेदना नहि भेल। “हँ। ठीके, हम एतए कमसँ कम एक बेर नमाज अवश्य पढ़ब”। हम अपनाकेँ कहलहुँ। हम जतए रहैत छी मक्का मस्जिद ओतएसँ बड्ड दूर अछि। जुम्मा आ छुट्टीक दिन बससँ एतए अएनाइ बड्ड दुर्गम अछि। तैयो, अगिला बेर हम एतहि नमाज पढ़बाक प्रण कएलहुँ। “हम अगिला सप्ताह् एतए  आबि नमाज पढ़ब अम्मी”, हम कहलियन्हि। ओ प्रफुल्लित अनुभव कएलन्हि आ हमरा दिस आवेशसँ देखलन्हि। “एहि सभ ठाम नमाज पढ़बामे अपनाकेँ धन्य बुझबाक चाही”, ओ कहलन्हि। “अहाँक अब्बा ओतेक दूर रहैत छथि, ओ की नमाज पढ़बाक लेल एतए आबि सकैत छथि? अहाँ अही नगरमे छी..एतए नमाज पढ़ू”, ओ कहलन्हि। “नहि मात्र एतए, जतए कतहु पुरान मस्जिद होए ततए नमाज पढ़ू। कतेक प्रसिद्ध लोक एतए नमाज पढ़ने होएताह। एहि सभ ठाम नमाज पढ़लाक बाद कोनो घुरए केर गप नहि अबैछ। अल्ला अहाँकेँ निकेना रखताह”। हम मस्जिदमे एना ठाढ़ रही जेना जादूक असरि होए। हम हुनकर गप सुनलहुँ, कान पाथि कऽ। बदमे, बाहर निकललाक बाद हम सभ किछु बिसरि गेलहुँ। अपन मस्जिद जएबाक प्रतिज्ञाकेँ सेहो हम कात राखि देलहुँ। ओही संध्यामे हम अम्मीकेँ बस-स्टैण्डपर छोड़लहुँ। तकर बादा दू टा जुम्मा बीतल, मुदा से एना बीतल जेना ओ कोनो जुम्मा नहि छल। आब बम विस्फोटक एहि समाचारक बाद हम जुम्मासँ भयभीत छी। “अम्मी...अहाँकेँ ईहो बुझल अछि जे कोन मस्जिदमे बम फूटल छल”? हम फोनपर पुछलियन्हि। “कोनमे हमर बाउ”? ओ उत्सुक भऽ पुछलन्हि। “अहाँ एक बेर हैदराबाद आएल रही, मोन पाड़ू? हम नञि अहाँकेँ एकटा मस्जिदमे लऽ गेल रही...मक्का मस्जिद...पैघ सन? ओतहि, ओही मस्जिदमे...खुनाहनि ओही मस्जिदमे अम्मी...खसैत लहाश.. अहाँ कहने रही जे कियो जे ओतए नमाज पढ़त, धन्य होएत...ओही मस्जिदमे अम्मी”। हम कहलियन्हि।  “छोट बच्चा सभ...ओकर सभक देह खोनमे लेपटाएल...परबा सभ सेहो मरल...”। नोर अनियन्त्रित दुखमे बहए लागल। हम बाथरूम लग नोर पोछबाक लेल गेलहुँ। हुनक हृदय हमर काननि देख फाटए लगलन्हि। ओ सेहो कानए लगलीह। हम आगाँ कहलहुँ, “अम्मी, नहि कानू...अब्बाकेँ होएतन्हि जे हमरा किछु भऽ गेल अछि...हुनका कहियन्हि जे हम नीकेना छी”। कनैत ओ हमरा पुछलन्हि, “फोन नहि राखब हमर बाउ”। “जल्दी अम्मी, कहू”। “अहाँ चलि आउ...गाम चलि आउ...हमर गप सुनू”। “हमरा किछु नहि भेल अछि अम्मी”। “बाहर नहि जाएब..हमर बाउ”। “ठीक छैक अम्मी”। “ओहि मस्जिदमे नहि जाएब, हमर बाउ”। हमर हृदय फटबा लेल फेर तैयार अछि। हम हुनका ई आश्वासन दैत जे ओहि मस्जिदक लगो कोनोठाम हम नहि जाएब, फोन रखलहुँ। मुदा विचारक आगम बढ़ैत रहल। कतेक विभिन्नता! कतेक परिवर्तन काल्हिसँ! ई हमर अम्मी छथि जे एना बाजि रहल छथि? ई ओ छथि जे हमरा ई बाजि रहल छथि जे मस्जिदक लगो कोनोठाम नहि जाऊ? अल्ला कोनो आन भऽ गेल छथि अपन बच्चाक प्रेमक आगाँ? अपन खूनक आगाँ अल्ला अस्वादु भऽ गेलथि? नमाज विरोधक योग्य भऽ गेल? अल्ला माफी दिअ! क्षमा करू! आन जुम्माकेँ कोनो खुनाहनि नहि हो..औज बिल्लाही..मिनाशैतान...निर्राजीम..बिस्मिल्लाह इर्रहमा निर्रहीम...! (ओहि सभ अम्मीजानकेँ समर्पित जिनका मक्का मस्जिदक बाद अपनाकेँ हमर अम्मी जकाँ परिवर्तित होमए पड़लन्हि...लेखक) अजय सरवैया, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। अहाँक तामस हमर स्वागतपथ “अहाँ आवेष्टित छी प्रतिध्वनि आ मोहक स्वरसँ”. पाब्लो नेरुदा चक्रधर आ पीयुषक लेल १. “कहि धरि हम खिचैत रहब एना”? ओ पूछत आद्र मुखसँ हेराएल आँखिसँ हम राखब सोझाँ शब्दकेँ, ओ रखतीह नियमावली हम करब सोझाँ अपन इच्छा, ओ भ्रमकेँ हम देबन्हि मेघ, ओ चक्र हम आनब प्रश्न, ओ पलायन हम प्रतिभाक प्रेमी, ओ बन्धनक हम स्वप्नक आकांक्षी, ओ निर्जनताक कहिया धरि? हम बुझलहुँ नीक जकाँ हमर भाग्य रहए फराक हमरा सभक दिन राति सेहो ऋतु आ पाबनि तिहार जकाँ समय काल हमरा सभक अन्तर हमरा सभक विभिन्नता रहए विभिन्न हमरा सभ प्रेम करैत रही कतेक दिन धरि? राजेन्द्र पटेल, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। १ हम किएक कऽ रहल छी अनुभव धरा बिन शाखक बिना एहि हाथक? पसारैत दूर आ विस्तृत जीवित साँपक ताकिमे ई सभ हाथ एक दोसरमे ओझराएल आ समाप्त होइत मात्र नहक वृद्धिमे। बाबाक छड़ीक पकड़िसँ बसक ठाढ़ होएबला लटकल चक्र मुट्ठी अनैत अछि वैह अविचल शून्याकाश। ओकर कए अनुभूति ई सभ खेंचल कार कौआक हाथ घुमि जाएत आकाश दिस सभटा खेत अंकुरित प्रफुल्लित पृथ्वीक गत्र-गत्रक पाँजर खेतमे औंगठल बाँहि जकाँ। सभटा हरक फारक चेन्ह भाग्य रेखा हाथक। पंक्ति जोखि सकैए मात्र हाथक लम्बाई नहि एकर जड़ि पहिने हम कए सकी एकर निदान हाथक आक्रमण जड़िपर श्वेत धरापर रोशनाईसँ पसरल अपन नव अंकुरित आँखिए उड़ि गेल नव-जनमल पाँखिए ओहि धूसरित गगनक पार आब सभटा मस्तिष्क कोशिकामे हाथ रहैछ अहर्निश प्रवेश कए रहल गँहीर आर गँहीर जड़िमे पीयूष ठक्कर, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। सांध्य बेला साँझ होइते शिशिर आह पर्वतक आच्छादित कएल अकाश अविलम्ब पड़त सम्पूर्ण आकाश फाँसमे एहि पर्वतक छाहक पर्वतकेँ भेटत अकाश प्रकाशकेँ छाह शरीर सुतत हृदय दुखित ओहिना जेना ईश्वरकेँ भेटल मनुक्ख पन्ना त्रिवेदी, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। आमद हे विदेशी! देखाऊ हमरा एहन दृश्य यदि अछि कोनो एहन बिनु प्रकाश बिनु गद्दक ओछाओन बिनु छाह जतए नहिए अछि चुप्पीक अंश व्यथित हृदयक ध्वनि नहिए ध्वनिक आँगुरक नोकक स्पर्श देखाऊ हमरा ओ दृश्य यदि अछि कोनो एहन हौ विदेशी! जतए क्यो नहि करैछ एकत्रित स्वासक मालगुजारि। बाबू सुथार, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। गृहमोह १. गंध पहिल बुन्नीक आ हम बैसि आ पसारी एक-दोसराक दिस भेदित पड़पड़ाइत बुन्नीक बुन्द बलुआही माटि भेल यथार्थ छननी अएल प्रखर रौदक फोका पाथरक चामपर अविलम्ब झझायत छातक खपराक भूर धारक संग उगडुम करत नवतुरिआ बरद कछेरपर नाचत। सभटा गलीमे बरद सभ आनत पानि सोलह टा पालो बान्हि गरदनिमे सभ घरमे धरनि सभ नहाएत जी भरि देबालपर गाछक छातीपर स्मृतिक शिलालेखपर हदसैत पानि खोलत हस्ताक्षर भगवानक पूर्वजक। बराखक संगे चमकैत आकाश माएक कोमल तरहत्थी। सूर्य करत आच्छादित वृक्षक शाखक पातक पँखुडिक। टाँगल पक्षिक आवास सभ गृहक बाहर मयूर सभ करत नृत्य। जेना प्रिय नव वधु मयूरीक माथपरक जलक घट गामक दोगहीसँ निकलत अनबा लए पानि छिटैत नहक आकारक झील वैतरणी डुमाएत रीढ़युक्त नागफनीक पात। संग जीव आ शिव करत अष्टमी आ एकादशी चन्द्रमा उगत चुट्टीक कटगर पीठपर आ चाली सभ बहराएत आडम्बरसँ राजसी मुकुट धेने सत्ये किछु अकठ अछि हमरा सभक भाग्यमे आइ आइ गंध पहिल अछारक आ हम बैसि आ पसरैत एक दोसरामे। वासुदेव सुनानी, ओड़िया कवि ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद शैलेन राउत्रॉय आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा अनुमति हमरा अनुमति अछि श्रीमान! हम कए ली विश्राम कनेक काल? अहाँक आदेशानुसार छाह केँ देने अछि बहारि, बत्तू केँ देने छी खोआए, अहाँक नालाकेँ कए देने छी साफ, नहि रहत कोनो दुर्गन्ध आब। हमर अछि ढोल बजबए बला मधुमाछी युगसँ अहाँक मनोरंजनार्थ आ हमर आँगुर स्थिरताक राखए आश हम करी विश्राम थोड़बे काल? हम करैत छी अनुभव पुरखाक स्वेद हमर देव, हमर मृतात्मा। ताहि लेल प्रिय श्रीमान् घंटा भरिक विश्राम मात्र अभिवादन जकाँ किएक तँ हमर दुर्गन्ध, स्वेदक आ किछु आन वस्तुक। हम करए छी प्रतीक्षा अहाँक नीक समय तृप्तिक संगहि अपन कीट-संक्रमित जिनगीक समाप्तिक संकेतक। प्रतीक्षा सेहि भरि दैत अछि थकान, श्रीमान् प्रियवर विशेषकए लाख बरखक जहुँ ई होए। से हम करए छी विश्राम थोड़ेक काल, श्रीमान्? कारण हमरो सन् तुच्छकेँ बुझल छैक छोट-मोट विद्रोहक कला। भरत माँझी, ओड़िया कवि ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद शैलेन राउत्रॉय आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा हमर घुरलाक बाद हमर घुरलाक बादो ओहि स्थानके नहि छोडू रिक्त पकड़ने रहू ओकरा। फूल सभकेँ नहि फेकू की कोनो महत्व अछि एकर जे ओ टटका फुलाएल अछि आकि अछि मौलाएल? खोलू हमर सभटा नुकाएल भोथियाएल स्वप्न, ओकरा अलंकृत कए। उनटि दिअ सभ ठामक लैम्पकेँ, आ रोकि दिअ अन्हारक प्रति घृणा बिना घबरेने देखू समुद्र आ तखनो नहि करू घृणा अकाससँ। नेहोरा अछि!!! पृथ्वीकेँ बुझू एकटा सममिश्रित स्थान प्रयास करू आ ठाढ़ रहू ओतए। कृपया बाट ताकू अपन आ से करए काल, रहू जागल! मोन राखू, हम घुरब एहि पृथ्वीपर जे एहन एकेटा अछि राखू मोन कि हम घुरब हम बाउग केने छी पथकेँ सरिसवक बीआसँ, मोन राखू ओ पथ शीला सुभद्रा देवी (१९४९- ) कैकटा तेलुगु पद्य संग्रह प्रकाशित। १९९७ ई. मे तेलुगु विश्वविद्यालयसँ उत्तम लेखकक पुरस्कार प्राप्त। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। पसीझक काँट बाड़ीमे लगाओल पसीझक काँट गहना लेल केना ओऽ सभ पसरैतत अछि सोहड़ैत! चुपचाप बुनैत रस्ता आच्छादित करैत स्थान। भीड़-भाड़ सभठाम सभ कोणमे काँटबला पसीझक झाड़ सभ, सभ रोकैत स्नेहक अनवरुद्ध प्रवाह चिन्तन विखण्डित पड़ि काँटक मध्य वाणी अवरुद्ध फँसि कोनो झाड़ मस्तिष्क उर्ध्वपतित चुपचाप हृदय बनैछ मात्र एकटा अंग आऽ मौन करैत राज यांत्रिक रूपे॥ मुनैत, बहत नहि हवा एकताक तेनाकेँ ठुसैत सभक आश कोनहुना निकसी आकाश। मुदा की अछि विस्तृत खेत मध्य? कतए गेल फूलक क्यारी फुनगैत मित्रताक हिलबैत अपन माथ आमंत्रणमे? कतए गेल ओ चाली सभ अपन तन्तुसँ बढ़ैत? सभकेँ समेटैत ओ लता-कुञ्जक मंडप कतए गेल छोड़ि मात्र अशोक आऽ साखुक वृक्ष जे पसारि रहल आकाश मध्य अपन हाथ नीचाँ देखैत विश्वकेँ घासक पात सन तुच्छ? यदि हम मोड़ी आऽ घुमी घोरैत अपनाकेँ नोरमे वेधए बला मोथा नहि भोकैत अछि मात्र पएर वरन् आँखि सेहो। सभठाम लोक उन्मुक्त ठाममे मानवीय सम्पर्कसँ घृणा करैत परिवर्तित कएलक नगरकेँ सेहो बोनमे। पसारैत काँट सभ ठाम परिवर्तित भेल पसीझक झाड़मे साँसक फुलब पसरैत चारू दिश दोसराक संवेदना नहि आबए दैछ विचार जिनगी भेल उसनाइत खेत सन। इच्छा भागबाक पएर केने आगाँ। आश्चर्य, मथि नहि सकैत छी, औँठा धरि। देखि सकी जौँ अपनेकेँ मात्र भीतरसँ बाहर पसीझक काँट मात्र। एन. अरुणाक जन्म निजामाबाद लग एकटा गाममे १९४९ ई.मे देलन्हि। तेलुगुमे पाँचटा कविता संग्रह प्रकाशित। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। ई सेहो अछि प्रवास अहाँ नहि छी मानैत मोटा-मोटी ईहो छी प्रवास एकर गुण षडयन्त्र जेकाँ मूल जन्मकालेसँ “तैयो अछि तँ बेटीये” अछि ने ई? कोनो पुरुषक हाथमे तँ जएबाके छैक ने एक दिन प्रवास मात्र अमेरिके टा प्रवासक नहिक नहि नारी सेहो अछि एकटा ई। अहाँ एकर अवहेलना कए सकैत छी सुविधासँ। तैयो कतेक कठिन छोड़ब जिनगी भरिक लेल अपन जन्मस्थान पाएब एकटा अनचिन्हारक आँगुर? अहाँ घुरि सकैत छी कखनो काल मुदा बनि मात्र पाहुन। जखने हम पएर राखब कतेक काल धरि अहाँ रहब पुछब हमर लोककेँ। “जाऽ धरि हम चाही” इच्छा अछि कहबाक मुदा श्रृंखला ससरल हमर इच्छापर बहुत पहिनहि। प्रवास नहि अछि हर्खक वस्तु। छोड़ि ई मात्र जे समय बितने बढ़ैत अछि ई बनैत अछि अभ्यास। कल्‍पना आ यथार्थ-            अमरेन्‍द्र यादव- दिघवा, सप्‍तरी । जिनगीक हड़हड़ खटखटसँ दूर मृत्‍युक तगेदासँ अन्‍जान बनल जिनगीक अति व्‍यस्‍त समयसँ किछ पलखति चोराकऽ अहाँक यादक उडनखटोलामे उडि जाइ छी हम प्रेमक अन्‍तरिक्षमे । नदीक ओहि पार दू गछिया तऽर हमर कोरामे औङ्गठल हमरासँग हँसैत बजैत खाइत छी अहाँ सप्‍पत खाइत छी हमहूँ सप्‍पत अहाँक तरहत्‍थीकेँ चुमिकऽ खोसि दैत छी हम एकटा गेनाक फूल अहाँक खोपामे । तखने हमर नाकमे अचानक ढकैत अछि जरल तरकारीक गन्‍ध आ अकचकाइत उठैत छी हम मिझबय लेल स्‍टोभ तखने हमर नजरि पडैत अछि टेबुलपर राखल चिठीपर जे काल्‍हिए एलै हमर गामसँ आ हमर आगा नाचय लगैत अछि भरना लागल खेत बाबुक फाटल बेमाय बहिनक कुमारि सिँथ भायक पढाइ खर्च आ मायक दम्‍मा बेमारी । मिथिला राज्‍य- राम नारायण देव उठल मधेशी कयल हुँकार लऽके रहत, अप्‍पन अधिकार जन जनकेँ, एके आवाज सबहक माँग, मिथिला राज्‍य अप्‍पन भाष, अप्‍पन सँस्‍कृति अप्‍पन अर्थनीति, अप्‍पन राजनीति मधेशी आन्‍दोलनक यैह सन्‍देश अप्‍पन बात, अप्‍पन परिवेश निरँकुश राजतन्‍त्रक भेल अवसान भेंटल लोकतन्‍त्रक बरदान मेची—महाकाली उमडिगेल अछि राज्‍यशक्‍ति मुकिगेल अछि उठू बन्‍धू, उठाउ तरवार भगाउ सामन्‍ती राजदरवार गठन करु गणतन्‍त्रक सरकार करु राज्‍यक पुर्नसँरचना समावेसी लोकतन्‍त्र आ समानुपातिक कल्‍पना अप्‍पन विकार, अप्‍पन विचार आव कियो नहि रहत, शिक्षित वेरोजगार छोडू आपसी मेल, करु विकासक मात्र खेल उखाडि फेकू, राजाक ताज तखन भेटत अप्‍पन स्‍वराज जन—जनके एके आवाज सबहक माँग, मिथिला राज्‍य । हमर मैथिली-अमरेन्‍द्र यादव डाक्‍टर चन्‍देश्‍वरजी, अहाँक बाबुजी पियौने हेथिन्‍ह उठौना दूध अहाँकेँ पोसने हेथिन्‍ह भाड़ापरक माए लेकिन हमरा नओ महिनाधरि गर्भमे मैथिलीए केलखिन्‍ह सम्‍हार सोइरी घरमे सेहो मैथिलीए केलखिन्‍ह दुलार हम कनियाँक स्‍पर्श विना जीबि सकैत छी हस्‍थमैथुनक उत्‍कर्ष विना जीबि सकैत छी लेकिन मैथिलीक आकाश विना नहि मैथिलीक श्‍वासप्रश्‍वास विना नहि डाक्‍टर चन्‍देश्‍वरजी, हमर खाँडो, खुट्टी आ बलानमे बहै हइ मैथिली । हमर दिनाभदरी आ सलहेशक दलानमे रहै हइ मैथिली । अभियान गीत-भवनाथ ‘दीपक’ उठह, उठह, उठह चलह, चलह, भलह बढह, बढह, बढह घरक भेदभाव बूझि शत्रु आबि गेल बुझा दियौक आन सँग एक बुद्धि भेल विश्‍व मंच मध्‍य हम उचित जगह लेल विशद विविध भेष हरित भरित देश जाति–पाँति वर्ण धर्म भेद–भाव हीन राज–पाट कर्म काज सब अपन अधीन श्रमिक कृषक बुद्धिजीव, उद्यमी उदार ग्रथित एक सूत्र मध्‍य व्‍यक्ति शत प्रकार भुक्ति मुक्ति हेतु वृत्त आइ एकताक सेतु जनैत हित मिलैत माँटि के सकत अनेर डाँटि ! सब प्रबुद्ध, सब सचेत पैर पाछु क्‍यो न देत देखाय देत शत्रुकेँ भैरवक स्‍वरुप के अलच्‍छ निन्‍दमे रहत भसैत चूप ? तिर्हुतिक माटिपर रहनिहार भाइ ! जन्‍म भूमि प्राण हेतु ठाढ हुअह आइ लाख–लाख कोटि–कोटि केर प्रयाण के कहैछ, मैंथिलीक पुत्र अल्‍पप्राण ? लक्ष्‍य चीन्‍हि–लेल आब निधि चीन्‍हि लेल शत्रु–मित्र केर भेद–विधि चीन्‍हि लेल उठह, उठह, उठह चलह, चलह, चलह बढह, बढह, बढह.....। अहाँ की छी—मयानन्‍द मिश्र अहाँ प्रलोभनक नाक काट’बला मर्यादा नञि छी नग्‍नताकेँ आवरण दैबला नञि छी सँतुलन राख’बला ट्रैफिक गाइड जकाँ चौबटियापर ठाढ दुनू हाथ उठौने अहिँसा नञि छी । अहाँ छी कोडोपैरीन खा–खा कऽ तत्‍काल अपन मथदुखी केँ दबबऽ बला क्षुब्‍ध हिमालय । अहाँ छी अपन खण्‍डित रसनाकेँ दाबि चुपचाप कान’बला सिन्‍धु । वस्‍तुतः अहाँ छी एकटा बिन्‍दु जाहिठामसँ अनेक रेखा तँ खीचल जा सकैछ किन्‍तु ओ सबटा दुर्जेय चट्टानक कोनो विराट अन्‍हार गुफाक अंतहीन घाटीमे जा क’ समाप्‍त भ’ जाइत अछि सरिपहुँ ई प्रश्‍न अछि जे अहाँ की छी? आत्‍मा–डाक्‍टर सुर्यनाथ गोप,दिघवा, सप्‍तरी मैथिलीकेँ बेचिकऽ पैन्‍ट सर्टपर टाईकोट कसिकऽ माथपर ढाका टोपी चढाकऽ बगलमे भारतीय दुतावासक झोरा लटकाकऽ एहि युगक सभसँ बडका विसंगति– डाक्‍टर सुर्यनाथ गोप एक हाथमे पासपोर्ट–भिसा मुठियबैत दोसर हाथमे हिन्‍दीक झण्‍डा फहरबैत हिनहिनाईत गिनगिनाईत जारहल छथि मौरिसस अन्‍तर्राष्‍ट्रिय हिन्‍दी सम्‍मेलनमे । आई हम ठाढ़ भेल छी- सच्‍चिदानन्‍द यादव,रायपुर– ६, सप्‍तरी आई हम ठाढ़ भेल छी चौबटियापर नइँ, बाट तऽ एक्‍केटा छै मुदा ओकरा रुकय पडतै जे हमरा एतय अनलकै हम ठाढ़ भेल छी ठीक ओहिना जेना कपड़ाक दोकानमे पुतरा सभदिन नव नव पहिरनमे ठाढ़ भेल रहै छै आ, किनयबला देखै छै उन्‍टापुन्‍टाकऽ । स्‍मिताक लडाई- मनोज मुक्‍ति पशुपतिनाथक देशमे होइछ व्‍यभिचार सब भेषमे आन ठाम त बाते छोडू अबुह लगैया अपनो देशमे । प्रकृतिक देल ई आँखि,कान ओ बडका नाक आब दुष्‍मन प्रतित होइया सँसारमे अपन अलग छाप छोडने मिथिलावासी,डरपोकक हूलमे सरिक होइया । अपना समस्‍त अधिकार सऽभसँ बन्‍चित होइतो,बँचल छी काइल्‍हुक आशामे भ्रष्‍ट प्रशासन ओ नेताक लोभ सँ, जकडा रहल अछि देश, विदेशीक पाशामे । एतेक कठीन आ दूर्लभ मनुष्‍यक जीवन पाओल स्‍वर्ग समान एही मिथिलामे मूदा लगैछ जे जन्‍मजाते अभागल थिकहुँ जे दूर्दशा होइत देखैछी, मिथिलाके अपन आगामे । सम्‍पूर्ण श्रृँगार सँ सुशोभित जगतक माय ओ विलक्षणा सीता आई घरसँ निकालल जाऽरहल अछि मिथिलावासी एम्‍हर ओम्‍हरक वात सुनैत, घरक एकटा कोनामे बहादुरी देखाबि रहल अछि । भऽरहल अछि सस्‍ता रँग सँ शोणीत जाहिसँ सब छथि नहाएल कतेक दिन सऽब चुप्‍पे रहतै, बैसतइ एना नुकाएल? ताहि सँ, एहि स्‍मिताक लडाईमे बचने मात्र सँ काज नई चलत सम्‍पूर्ण मैथिलमे नव चेतना भरैत, सबके लडहिटा पडत । अन्तर्वार्ता-डा. राम दयाल राकेश/आभाष लाभ..... सरकारके ध्‍यान छठि पावनिपर देवाक चाही.....डा. राम दयाल राकेश ( सँस्‍कृति विद) छठि पावनि मधेसके संस्‍कृति कियाक मानल जाईत अछि ? –छठि पावनके अपने मौलिक विशेषता छइ,, ई पावनि शुरु होबऽ सँ एकमहिना पहिने सँ  पावनि कयनिहार सब तैयारी मे लाईग जाईत छथि । एकर तैयारी आ पुजाके जौं देखल जाय त अईमे विशुद्ध मधेसी संस्‍कृति पाउल जाईत अछि । पावनि केनहार सँ लक ओईके तैयारीमे लागल हरेक व्‍यक्ति ओ संस्‍कृतिमे भिजल रहल पाओल जाइत अछि । ओकर प्रसाद सँ लऽक हरेक सामगी्रमे मधेसक संस्‍कृति देखल जाईत छक, ओ पावनिके अवसरमे गावै वाला विभिन्‍न धुन तथा गीत सब मैथिल संस्‍कृतिमे गाओल जाईत अछि । ई पावनि कियाक मनाओल जाईत अछि ? –एकर अपने पहिचान आ विशेषता छैक । सब पावनि सँ अई पावनिके अपने इतिहास छैक किया त कोनो पावनि एसगरे अपना घर परिवार मे रहिकऽ मनाओल जाइत अछि मुदा ई एकटा एहन पावनि अछि जे खुला जगहमे सामूहिक रुप सँ मनाओल जाइत अछि । अई पावन के मात्रे लोकतान्‍त्रीक पावनि कहल जा सकैय कियाक त अई पावनि मे कोनो भेदभाव उच्‍च नीच, जात भात नई देखल जाइत अछि । अई पावनिमे सूर्यके पुजा भेलाके कारण आओर एकर गरीमा के उच्‍च देखल जा सकैय । सूर्य जहिना ककरो पर भेदभाव नई क कऽ सम्‍पूर्ण जगतके   रोशनी प्रदान करैत अछि, तहिना छठि पावनि सब के एक समान रुप सँ देखैत आईव  रहल छैक । ई पावनि अपना परीवार के सुख समृद्धिके लेल तथा कोनेा रोग व्‍यधा नई लागै से मनोकामना सँ मनाओल जाइत अछि । भोर आ साँझक सूर्यके किरणमे एक प्रकारके गरीमा होईत अछि जकरा रोशनी सँ शरीरमे रहल विभिन्‍न विमारी फैलाब वाला किटाणु सबके नष्‍ट सेहो करैत चर्मरोग सँ बचाबैत अछि । चर्म रोगके अचुक दवाई मानल  जाईत अछि छठि पावनि । छठि पर्व मे महिला सब अपना आचरा पर नटुवा कियाक नचवैत छैथ ? –एकरा एकटा श्रद्धाके रुपमे लेल जा सकैय, छठि माताके ध्‍यानमे राखि क कोनो किसीमके मनोकमना केला सँ जौं ओ पुरा भ जाईछै त ओई देवता पर आरो श्रद्धा बैढ जाईछै आ ओहि किसीमके कौबुला क क अपना आँचर पर नटुवा नचवैत छैथ । छठिक घाट पर चमार जाईत सब ढोल( डुगडुगीया) बजावैत छथि, ओकर कि विशेषता अछि ? –ओकरो जातिय तथा संस्‍कृति परिचयके रुपमे लेल जा सकैय, ओ जाईत सब अपन संस्‍कृति आ संस्‍कारके बचएबाक लेल ओ काज क रहल अछि । ओ ढोल बजला सँ घाट पर कतेक मधुरता आ रौनक महशुस होईत रहैत अछि, ओना त कते लोक सब अग्रेजी वाजा बाजा क पावैन मानावैत छैथ मुदा जतेक ढोल पीपही के आवाजमे संस्‍कृति के झलक भेटैत अछि ओते कोनो बाजामे नई । अई पावनि मे सूर्यके पुजा होईतो पर छठि माता या छईठ परमेश्‍वरीके नाम सँ कियाक जानल जाईत अछि ? –सूर्यके अर्थ उषा होईत अछि, उषा भगवतिके रुपमे पुजलाके कारण एकरा छठी माताके रुपमे सम्‍बोधन कायल जाइत  छैक । ओना त स्‍पष्‍ट रुपमे कतौ ने अई विषयमे चर्चा भेल अछि लेकीन किछ शास्‍त्रमे महाभारत के कुन्‍ति शुरुमे छठि पावनि केनेे रहैथ ओही दिन सँ छठि पावनि शुरु भेल अछि से कतौ कतौ उल्‍लेख पाएल जाईत अछि । दिनकर के आ जलके कि सम्‍बन्‍ध अछि ? –जल के आ दिनानाथके बहुत गहिर सम्‍बन्‍ध अछि, बिना जलके दिनकरके पुजे नई भऽ सकैय हुनका खुश करबाक लेल जल चाहबेटा करी । छठिएके उदाहरणके रुपमे लऽ लिय, ओ पावनि बिना जल के नई भऽ सकैय कोनो जलासय नई भेला पर अपना घरमे खधिया खनि क ओइमे जल राईख क पावनि सम्‍पन्‍न करैत अछि, कियाक त दिनानाथे सूर्य छथि । एकटा एहो कहि सकै छि कि सूर्य मे बहूत गर्मी भेला के कारण जल के अर्घ देला सँ ओ किछ ठन्‍ढा होइत  छैथ । लोकतान्‍त्रिक गणतन्‍त्रमे छठि पावनिके संस्‍कृतिके बारे मे अपने कि कहब अछि ? – हम गणतन्‍त्र नई कहिक लोकतन्‍त्रके चर्चा करैत ई कहव कि छठि एकटा विशुद्ध लोकतान्‍त्रिक पावन अछि, समानुपातिक ढगं सँ एकरा मनाओल जाइत अछि । सामूहिक रुपमे मनबाक सँगहि अई मे कोनो भेद भाव नई होइत अछि । गरीब सँ लक धनीक तक सब एकरा समान ढगं मनावैत अछि । जनता गणतन्‍त्रके रस्‍ता चलनाई शूरु कदेलक मुदा सरकार अखुनोे पाछा परल अछि । अखनोे मधेसी पहाडी बीच , दलित गैर दलित बीच, गरीब धनीकके बीच भेदभाव अछि, कि एकरे गणतन्‍त्र कहबै ? नवका नेपाल बनाबऽ लागल नेेतागण सबके छठि पावनि सँ किछ सिखवाक चाहि । अन्‍तर्वाता ...आभाष लाभ (२०२८ सालमें डा.राजेन्‍द्र विमल आ श्रीमति विणा विमलक सन्‍तानक रुपमें जनकपुरक देवीचौकक निवासमें जन्‍म लऽ २२ वर्ष पहिने सँ निरन्‍तर मैथिली गीत सँगितक आकाशमें ध्रुवतारा जकाँ चमकैत रहऽबला एकटा मिथिलाक बेटा छथि, गायक आभाष लाभ । बाल्‍येवस्‍था सँ विभिन्‍न मँच सबपर अपन आवाज सँ दर्शक श्रोता सबके हृदयमें वास कयनिहार आभाष लाभ, मैथिली आ मिथिला सँ सम्‍बन्‍ध रखनिहारकलेल चीरपरिचीत नाम अछि । प्रस्‍तुत अछि, गायक आभाष लाभ सँगक भेल बातचीतक प्रमुख आश ) १. आभाष जी गीत सँगीतमें कहिया सँ लगलहुँ? कहिया सँ लगलहुँ से त नईं बुझल अछि, मूदा बच्‍चे सँ जनकपुर आ लऽग परोसक गाँव सबहक एकौटा मञ्‍च हमरासँ नई छुटैत छल । २. पहिलबेर आहाँक रेकर्डेड गीत कोन अछि - पहिलबेर हम नेपाल सँ बहराएल अशोक चौधरीक मैथिली क्‍यासेट पानस में गीत गएने छलहुँ । ३. मैथिली गीत सँगीतक अवस्‍था केहन बुझा रहल अछि? जतेक होयबाक चाही ओतेक सँतोष जनक नहि अछि । नव नव प्रतिभा जाई तरहें एबाक चाही, नई आबि रहल छैक । दोसर बात अखन प्रविधि एतेक परफेक्‍ट भऽगेल छैक जे पाइ सेहो वड खर्च होइत छैक । ४. की बुझाइया, मैथिली गीत सँगीतमें लागिकऽ अखनुक युगमें बाँचल जा सकैया एकदम नीक जकाँ बाँचल जा सकैया एही क्षेत्रमें लागिकऽ । मैथिलीक क्षेत्र बहुत पैघ छियै । जौं मेहनतिसँ नीक काज कायल जाए त मैथिलीयो सँगीतक क्षेत्रमें बहुत पाई छै । उदाहरण लऽ सकैत छी, हमरे सबहक क्‍यसेट “रे छौंडा तोरा बज्‍जर खसतौ”के जे १५ लाख प्रति बिकाएल छल । तहिना  “गीत घरघर के” जे जहिया सँ बहरायल तहिया सँ आइयोधरि बिकाइते अछि । हँ, काज नीक होयबाक चाही । ५. प्‍यारोडीके प्रभाव केहन पडि रहल छैक मैथिली गीत सँगीत पर? प्‍यारोडी मौलीकताके साफ साफ खतम कऽ दैत छैक । गीत सँगीतक क्षेत्रमें लागल श्रष्‍टा सबके मनोवलके तोडिकऽ राखिदेने छैक प्‍यारोडी गीतसब । ६. प्‍यारोडी गीत सँगीत सँ पिण्‍ड छुटबाक उपाय की देखियौ, जखन अपन सँगीत या गीत नई हुए तखन प्‍यारोडीके किछु हद धरि पचाओल जाऽ सकैया,मूदा मैथिलीमे अपन मौलीक सँगीतक आभाव त कहियो नई रहलै । जहातक प्‍यारोडी गीत सँगीत सँ पिण्‍ड छुटेवाक बात छई त अइमे आम जे श्रोता सब छथि, जे वास्‍तविक रुपमें चाहैत छथि की अप्‍पन मौलीक सँगीतक विकास होइ, हूनका सबके प्‍यारोडी गीतके निरुत्‍साहीत करबाकलेल ताई प्रकारक क्‍यासेट किनऽसँ परहेज करऽ पडतन्‍हि आ सँचार माध्‍यम सबके सेहो ओहन गीत बजेवा सँ बचऽ पडतन्‍हि, तखने ई सँभव अछि । ७. नेपालीय आ भारतीय मिथिलाञ्‍चलमें मैथिलीक बहुत रास काज भऽ रहल छैक, की अन्‍तर बुझाऽ रहल अछि दूनु देशक मैथिलीक काजमे हम त मात्र एतबा बुझैत छियै जे एकटा हमर सहोदरा विदेशमे कमाऽरहल अछि आ हम नेपालमे । दूनु ठाम अपना अपना तरहें काज भऽरहल अछि एतबे बुझु । ८. अखन सऽभ भाषाक गीतमे रिमिक्‍सके बाढि आएल बुझाति छई, एकरा कोन रुप सँ आहाँ देखैत छियै? बहुत नीकबात छई रिमिक्‍स गीत औनाई । समय अनुसार आधुनिकीकरण होयबाके चाही । समाजकलेल आ बजारकलेल गीत गौनाई दूनु दूटा बात छियै, ताहिमें गीत सँगीतक व्‍यावसायीकरणमे रिमिक्‍स बहुत नीक सँकेत छई । रिमिक्‍स गीत बहरेवाक चाही बशर्ते अपन सँस्‍कार नई लुप्‍त भऽ जाई ताइके ध्‍यानमें रखैत । ९. अखनधरि कतेक गीत गएलहुँ जे रेकर्डेड अछि? अखनधरि लगभग साढे तीनसय गीत हम गाबि चुकल छी जे रेकर्डेड अछि । १०. क्‍यासेटके अलावा कोन फिल्‍ममें अपन स्‍वर देने छी आहाँ ? मैथिलीमे दहेज,ममता,प्रितम,आशिर्वाद फिल्‍ममे,  तहिना भोजपुरी फिल्‍मसब सजना के आगना, ममता, तहार गलिया आदिमे । ११. स्‍टेज शो के सीलसीलामे कतऽ कतऽ गेलहुँ? अपन देश नेपालक लगभग सबठामके अलावा, कतार (४बेर),दूवई(२बेर),मलेशिया,पाकिस्‍तान,बंगलादेश, भारतक विभिन्‍न शहरमें अखन धरि जाऽचुकल छी । १२. नव की आबि रहल अछि मैथिल श्रोता सबहक लेल? बहुत जल्‍दिए निखिल राजेन्‍द्रक सँगीतमे भेनस क्‍यासेट सँ रिलिज भऽ रहल अछि.... डटके जलपान- कुमार शुशान्‍त एकटा कविताक भाव निश्‍चितरुपसँ स्‍मरण हायत, “सात समुद्रक जलके स्‍याही बनादेलजाए, वनक जँगलके लेखनी, समस्‍त धर्तीकेँ कागज बनादेलजाए, तखनो भगवानक महिमा पूर्णरुपसँ नहि लिखल जाऽसकैया” भगवानक महिमा त छोडि दिय एतबा में त डटकेजलपानेक महिमा नई अटत । डटकेजलपान   हूनक वास्‍तविक नाम छन्‍हि दिबसलाल । जे हुनकर कर्मेन भेटल छन्‍हि हूनक किछु महिमा प्रस्‍तुत अइछ, क्‍ीऋ परिक्षाक सेंन्‍टर गामसँ ७० कि.मि. दूर एकटा स्‍कूल में रहें, आवत–जाबत नई संभव हाएत ई विचार कऽक गामक १० टा जे परिक्षार्थी छल सबगोटे एके ठाम डेरा लेनहुँ । पहिलबेर अभिभावकके नजरसँ दूर स्‍वच्‍छंद लंगोटिया यार–दोस्‍त संग रहबाक मौका भेटल । उमंग–उत्‍साह त एते कि बर्णने उचित नई । ओम्‍हर अभिभावकके कि फुरौलनि से भगवान जानथि । देख–रेखलेल संग लगौलनि डटकेजलपानके । एक त राकश मंडलि उपर स न्‍योत से भेट गेल, डेरामें समानसब राइखकऽ फ्रेश होयबाकलेल कोका–कोला  पिबाक निर्णय भेल मंइलिके । दोकानपर पहुँचिते हुकुम भेल दोकनदारके, “दसटा खूब ठंढा कोका–कोला दऽ” डटकेजलपान लगा कुल संख्‍या छल एग्‍यारह, मुदा जानि–बूझकऽ मंगनऊ दशेटा । आवशुरु भेल विवेचन एकटा मित्र “ जा हुनका नइ भेटलनि ” दोसर “ नई–नई हुनका देबो नइ करबनि ” तेसर “ से किया ?” चौथा “ बड़ कडा निशा होइत छैक अइ में” सब गोटे जाहि मंशासँ गप्‍प नारने छलहुँ से पुरा भेल, डटकेजलपान बजलथि । डटके “ उबारु सब, माँए बाप परिक्षा देबला पढएने छन्‍हि आ ईसब एतऽ दारु पिबइ छथि ” एक मित्र “ तोहरा अपन ँबतजभच के शपथ छह, कतौ बजिहऽ नई ” अंगूठा द्दाप, ँबतजभच के मतलब नई बूझलथि ताएँ झगड़ा नई कएलथि, एतबे बजलनि “ ठिकछई–२ नइ कहब ” । किछुदेर सऽबके पिबैत देख नइ रहलगलन्‍हि, पूछि बैसलथि,“ कते कड़ा होइछै एकर निशा ?” मित्र “ नइ पूछह, झूमा देतौ ” डटके “(मूंह बिचकबइत) हूँह, केहन–२ भाँग–धतूर के त सिधें घोंटि जाइ छियनि त ई कि झूमाओत ?” मित्र “ कहैत छिओ ने , भूलियोकऽ नई पिविहऽ ” डटके “ एहन बात छइ तहन लबही तरे ” लेलथि कोका–कोला; मुश्‍किलसँ आधा बोतल पिने रहथि कि लड़बड़ाईत आवाजमें कहैछथि “ हमरा कान में फहऽहऽहऽ करईया ” एक मित्र “ हौ, ई कोन बिमारी भेल  ” दोसर मित्र “ बिमारी नई, हिनका निशा लागि गेल छन्‍हि ” हौजी एतवा सुनिते आधा बोतल कोका–कोला हाथमें नेने ओङ्घराए लगलथि रोडपर । आबत भेल भीड़, जे तुरत्ते आएल रहथि हूनक एकैटा प्रश्‍न रहन्‍हि– “ कि भ गेल छन्‍हि ” “ निशा लागल छन्‍हि ” “ कि लऽ लेलथि ” “ कोका–कोला ” “ बड़ नौटंकियाह लोक छथि, ओइसँ कोनो निशा लगइ छइ  ” जइन एतबे जवाब धिरे–धिरे जम्‍मा भेल पचासटा लोकसँ सुनलथि तइन ठाढ भऽ क देहपर लागल माटि झाड़ैत बजलथि,“ उबारु सब, झूठे किया बजैजाइत गेले हऽ जे निशा बला चिज छइ से, करा देले ने बेइज्‍जति” । एकटा मित्र “ तों किया चिंता करैत छऽ बेइज्‍जतिके ?, ओकरा करऽ दहक ने जकरा ठाम इज्‍जत छई  ” । “ बोनि निक भेटल” चर्चा करैत सब गोटे पहुँचनऊ डेरामें । आब निर्णय भेल भोजन लेल जएबाक ।बेरा–बेरी भोजन कऽक आएल जाए । २ रुपैयामे भरिपेट भोजन पहिनहिं एकटा होटलमे तय कऽ क एडभान्‍स १० रुपैया जमा सेहो करा चुकल छलहुँ । होटलके नाम कहिकऽ सबसँ पहिने भोजन करबाकलेल पठाओलगेल डटके जलपानकेँ । घन्‍टा दू घन्‍टा, चारि घन्‍टा भऽगेल मूदा डटके जलपान अएलथि नहि । चिन्‍ता सँ बेसी कौतुहुलतावश हुनक तलाशमे सबगोटे निकललहुँ । होटल आगा पहुँचलहुँ त फेर सँ नजर पडल किछु लोकक भीडपर । पहुचिते देखैत छी जे डटकेजलपान आओइ होटल मालिक बीच गर्मागरम बहश भऽरहल अछि । होटल मालिक “हम कोनहुँ किमतपर नईं खुवा सकैत छी” डटके– “अपने मने नई खुएबे, पाई देने छियौ, फोकटमे नईं” बीच बचाव करैत होटल मालिकसँ प्रश्‍न पुछि बसिलहुँ–“की बात ” जबावमे खाना बनाबऽवला महराज बडका हण्‍डाके करछुसँ पिटैत पहुँचल ओतऽ जतऽ हमसब ठाढ छलहुँ । दोकानदार–(खाली हण्‍डा दिस ईशारा करैत)“आब बुमाएल बात” किछुदेरक चुप्‍पीक बाद, फेरसँ हाथ जोडिकऽ बजलथि–“सरकार हम मनुख्‍खक भोजनके बात कएने छलहुँ” हमसब कहलियैन्‍हि–“ई त ऊचीत नई भेल ! हमसब त एडभान्‍स देने छी ” दोकानदार गल्‍लामेसँ १२ टका निकालिकऽ, लगमे आबि हाथमे पकडा देलक आ कानमें धिरेसँ कहैया–“बारह टका देलहुँ, १० टका जे अपने एडभान्‍स देने छलहुँ से आ सुनु–ऊ जे सामनेके होटल अछि(सामनेके होटल दिस ईशारा करैत) ओकरा मालिकसँ बड कसिकऽ दू दिन पहिने हमरा मगडा भेल छल, उपरका जे फाजिल दू टका अछि ओ हमरा तरफसँ घूसभेल, अई आदमिके काल्‍हिसँ ओही होटलमें पठाऊ” दोकानदार सँगे सब मित्रके हँसैत–हँसैत पेट दुखाए लागल । डटकेजलपान अर्थात दिवसलालजीक एक एकटा काजक वर्णन लिखऽमे जौं समुद्रक पानिके मसी बनादेल जाए त भलेही समुद्र सुखा जाए मूदा दिवसलालजीक कारनामा नई लिखा सकत । धन्‍यछथि....दिवसलालजी ! अपन अपन माय-परमेश्‍वर कापडि सबके नव नेपाल, समृद्ध आ संघात्‍मक नेपालक सुन्‍दर चित्र बनएबाक बेगरता रहनि । उमटुमाएल त’ बहुतो गोटे रहथि धरि चुनुआ बिछुआ, नामी—गरामी सातटा कलाकारके अपन बुमि ई भार देल गेलनि । भार अबधारि सब एहि निहुछल काजमे लागि जाइत गेला । केओ धर— मुडी, केओ हाथ त’ केओ टाङ्ग, केओ पयर त केओ बाहिँहाथ बनाबऽमे तन्‍मय भ गेलाह । देखिते देरि सब सबआग बना बनाक अनलनि । आहिरेबा । जखनि जे सबके द्धारा बनाएल नेपाल मायक आगके एकठाम जोडिक देखलनि त ओ आकृति कुरुपे नहि विद्रुप आ राक्षसी लगैत छल । ई चित्र देखिते निर्माणक आग्रही संरचनावादी लोक भडकिक आन्‍दोलन पर उतारु भगेल । असलमें ई नरी चित्र भेलै कि नहि सेहे विवादक विषय बनि गेल । भेल कि रहै त जे पयर बनएने रहथि से रहथि माटिक मूर्तिकार आ पएर एहन सुकोमल माने परी रानीक सुन्‍नर पयरसन रहै । माय माये हाइछै । मायक पयर धरती परक लोकक रेहल खेहल आ कर्मठ पयर होएबाक चाही ने से रहबे नहि करए । मुँह जे बनएने रहथि से अमूर्त पेन्‍टिङ्गक रहैक । आँखि किदन त नाक निपत्‍ता । केश दोसरे रङ्गके, पश्‍चिमी कटिङ्गके । फडफरायल ठाढ, किछु लट ओम राएल बेहाल । हाथ धातु मूर्तिकारद्धारा बनाएल रहैक त धर काठ मुर्तिकारद्धारा बनाएल कोकनल, निरस । लगै जेना मेहन जोदर्डो सभ्‍यताक वा पाषणकालक उत्‍खनन कएल गेल हो । तहिना कटि आ ओद्रभाग हिन्‍दी फिल्‍मक आइटम गर्लक कपचि छपटिक ल आएल सनके । बेनङ्गन निर्लज । बात निर्विवाद छलै जे समरसताके अभावमे ई मूर्तिपूर्णे नहि भेलै । गढनिसब बेमेल बानि उबानि । बेलुरा रहैक । असफलता पर पछताबा कोनो कलाकारके नहि रहैक । अहँकारी हेठी सबके मनमे । आब ऐ बात पर घोंघाउज कटाउँज होइत होइत अरारि आ मारि पीट धरिक नौबत आबि गेलै । से केना त जेना एखनि नेपालक क्षेत्रीय मुद्दाक बलिधिङ्गरोक विवाद । काष्‍ठकलाबाला कहथि हपरा के अदुस अधलाह कहत, तेकरा हम बसिलेस पाङ्गि देबै । पेन्‍टर रङ्गकर्मीके अपन हठ हमर सृजनाके चिन्‍ह बुमके एकरा सबके दृष्‍टिए दम नै छन्‍हि । चित्रकारके अपने राग । पाषाणमुर्तिकारक अपने ठक ठक । सब अपन बातके इर बान्‍हि, गिठर पारि अडल जे मायक चित्र हमरे कल्‍पना भावना अनुसार बनए । सह लहके बाते कोन अपना आगूमे सबके सब अदने, निकम्‍मे बुमथि । घोल घमर्थन, गेङ्ग छेंटके वैचारिक दर्शन कहैत सब हुडफेर फेरने घुमए । अपना अपनीके सब तानहिबला, सुनबाला निठाहे नइ । लोकमे सब रङ्गके, सब तौंतके लोक रहैछ ने । ओइमेस एगोटे आगू अएलाह आ थोडथम्‍ह लगबैत कालाकार सहित सबके बम्‍बोधित करैत कहलन्‍हि हमर बात पहिने ध्‍यानस सुनैत जाऊ । बात हम पयरस सुरु करैत छी, मूहँस नहि ।  पहिने पयरेस एहि दुआरे जे हमरासबके सँस्‍कृतिमे सबसँ पहिने पयरे पूजल जाइत अछि । पयरे चलिक केओ अबैत अछि । पयरेपर केओ ठाढ होइत अछि । पयरै लक्ष्‍मी होइत अछि । आगत अतिथिके पयरे पवित्र मानल जाइत अछि । प्रवेशके पयर देव कहल जाइत अछि । माने पयरे प्रथम अछि । कर्मशील भेने बन्‍दनीय आ ई लक्ष्‍मीपात्र अछि । ताहि दुआरे पयरेस चित्रक निर्माण शुरु हुअओ । आतंकवाद महत्‍वाकांक्षाक खेतमे आकुरण होइत अछि -महेन्‍द्र कुमार मिश्र, पूर्व सांसद महेन्‍द्र कुमार मिश्र पूर्व सांसद आतँक प्राणी जगतमे आदिम प्रत्‍युषा सँ चलैत आवि रहल अछि । प्राणीके अपन अकार, शक्ती आ कार्यक्षमताक कारणे आतँकक परिणम आ प्रकार सभमे विविधता देखल जा सकैत अछि । पुराणादीमे वर्णित देवासुर संग्रामसभ आतँकवादीक श्रृंखलाके महागाथा अछि । महिषासुरक क्रिया कलाप सँ आतँककीत देवतागण शक्तिक आराधनामे लागि नारी द्धारा छल प्रपञ्‍च रचना कऽ ओकरा समाप्‍त कयलगेल प्रसँग दुर्गा सप्‍तशीमे वर्णित अछि । रावणक आतँक समाप्‍त करवालैल राम अनेक जातिक सहयोग ल समाजके मुक्ति देवौलन्‍हि । तहिना कंशक उन्‍माद अती भेलाक पश्‍चात एकटा सामान्‍य गोपाल कृष्‍णक रुपमे अवतरीत भेलाह । कहवी छैक, बीनु बीज वृक्षक आकुरण नहि होइत छैक । अमेरिका के जन्‍मओल सद्दाम आ ओसामावीन लादेन अमेरिका विरुद्ध कियाक आततायी भ प्रगट भेल ? इन्‍दिरा गाँधीद्धारा पालीत सन्‍त जर्नेल सिंह भिण्‍डवाल इन्‍दिराकै प्राणे ल लेलक । ओसामावीन आ ओमार आजुक युगक विश्‍वके सर्वाधिक शक्ति सम्‍पन्‍न अमैरिकाक निन्‍न आ भूख उडादेने अछि । आतँकवाद कहियो महत्‍वाकाँक्षाक खेतमे अंकुरण होइत अछि आ अन्‍याय अत्‍याचार, शोषण आ दमनक वर्षामै वढैत या त ताही श्रृंखलाके तोडैत अछि कि त अपने समाप्‍त भ जाइत अछि । संसारक आतंकके इतिहास व्‍याह परिणम देखवैत अछि । हिंसामे प्रतिहिंसा जकां आतंकवादी सभ मात्र अपने हत्‍या हिंसा, लुटपाट आ अगिलग्‍गी नहि करैत छैक दोसर पक्षके सेहो ओहने काज करवालेल वाध्‍य करवैत अछि । संसारक द्धन्‍दरत पक्षके गहींर सं अध्‍ययन, मनन कयला उपरान्‍त एकरा सभहक क्रिया कलापक परिनती याह प्रमाणित होइत अछि । आतंक शब्‍द सं कोनो हैजाक प्रकोप आ कठोर अत्‍याचार आदिसं उत्‍पन्‍न होव बला भयके वोध करवैत अछि । आतंकमे वाद जोडिदेलाक बाद  एकर अर्थ मनुष्‍यकै डेरा क धमका क या त्रास श्रृजना क क हिंसात्‍मक विद्रोहक रुपमे अपन प्रभुत्‍व स्‍थापित क काज सिद्ध करवाक विचार आ सिद्धान्‍त बुझना जाइत अछि । दोसरके सम्‍पति लुटव, घरमे आगि लगाएव, पर स्‍त्रीसंग बलात्‍कार करब, समाजमे उत्‍पाद मचाएव एहन दुष्‍कर्मीकै दुराचारी कहल जाइत अछि । तानाशाही चाहे जेकर होउक, जर्जबुशक हौउक वा मुसर्रफकै एकरा कौनो दृष्‍टिए नीक नहि मानल जायत । कानो राष्‍टक तानाशाही आ दादागिरीके एक न एक दिन विनाश होयबेटा करैत अछि । आव ओ युग नहि रहिगेल जे लोक बुझौक परमेश्‍वरक अनुकम्‍पासं गर्भ धारण भैल, ई लौक मान लेल तैयार नहि रहिगेल । ककरोलेल तोपक सलामी आ केओ लाठी,बुट आ गरमे गोली खाई, आजुक मानव समाजक चैतना एकरा सह लेल तैयार नहि अछि । विश्‍वक कोनो ठाम जे विद्रोह भेलैक तकर समाधान करवाक काजक दायित्‍व वाहक अपना आपके विशिष्‍ट नहि समान्‍यस्‍तरक खण्‍डमे राखय तखने ई समस्‍याक समाधान भ सकैत अछि । २००७ साल सं पालीत, पोषित आ वढैत आएल समाजिक विद्रोहक स्‍तरके माओवादी लगायत तथाकथित प्रजातन्‍त्रवादी दलसब तराई समस्‍याकै जाइन बुझि क अखनो कार्यान्‍वयन पक्षकै कमजोर बनाविक रखने अछि । पिडीत पक्ष अखनो विश्‍वस्‍त भ नहि पाविरहल अछि । नेपालक सन्‍दर्भमै माओवादी १० वर्षधरि हथियार उठा जनविद्रौह कएलो उपरान्‍त सबपक्षके समेट नहि सकल । संगही आन पार्टी सैहो पिडीत,उत्‍पीडीत,राज्‍यक संरचना सं दर रह बला वर्गक प्रति इमान्‍दार नहि रहल त दौसर विद्रोहक सम्‍भावना अवश्‍सम्‍भावी अछि । विद्रोहक अनेक शैलीआ पद्यती मध्‍ये कम सं कम जनआतंक आ जनधनक क्षति होइक एहने शैली एवं आचरण मात्र विश्‍मे अनादिकालसं समाजिक मान्‍यता वपैत अछि । समाजिक रुपानतरण हथियार नहि विचार सं कायल जाइक तखने टिकाउ भ सकैत अछि । आसुरी ताल या वृति एकटा स्‍वभाविक कमजोरी अछि । सहिष्‍णुता संस्‍कारक उदात्तीकरण अछि । मनोविज्ञान याह तथ्‍यके मान्‍यता दैत छैक जकर प्रशस्‍त प्रमाणसब छैक । ३० वर्षे पञ्‍चायती शासन स्‍वैच्‍छाचारी, हुकुमी, निरंकुश सामन्‍ती प्रवृतिक छलेैक त २०४६ सालक जनआन्‍दोलन व्‍यावस्‍थामे परिवर्तन लौलक तथापि प्रवृतिमे कोनो परिवर्तन नहि दैखलगेल । पूर्व राजा ज्ञानेन्‍द्रद्धारा फैर सं व्‍याह शासन प्रणालीके पुनरावृति कर चाहलक मुदा सफल नहि भ सकल । ज्ञानेन्‍द्रक महत्‍वाकांक्षा बढैतगेल जकर फलस्‍वरुप देशक जनता गणतन्‍त्रोन्‍मुख होइत आई दैशमे गणतन्‍त्र स्‍थापना भ गेल अछि । आव जौ कोनो प्रकारक वाधा व्‍यवधान उत्‍पन्‍न करबाक कोशिश कायलगेल त विद्रोह बढवेटा करत । संविधानसभा मूद्दा नहि समाधाने मूद्दा अछि । संविधान सभाक विर्वाचन पश्‍चात मधैशक साथ कोनो दल धोखा देवाक धृष्‍टता करत त परिणाम अनिष्‍टकारी हायत । राष्‍ट दोसर दूगिर्तकै आमन्‍त्रण करत । मधेशक जनता अखनधरि उपेक्षित, उत्‍पीडित रहल, समान अधिकार आ समान पहिचानकलेल लालाइत रहल मधेशक मूद्दापर यदि राजनीति करबाक धृष्‍टता करत त स्‍वाभिमानी मधेशी जनता फेर विद्रोहमे उतरत, मधेशी जनता मधेशवादी अछि, मात्र मधेशवादी गणतन्‍त्रवादी नहि । गणतन्‍त्रवादी कहि जनता भोंट नहि देलक आइ किछु नेता कहैत छथि, “हामी गणतन्‍त्रवादी हौं” हुनका “हामी मधेशवादी” कह मे लाज किएक ? आबक संविधान जनआन्‍दोलन २०६२।०६३ तथा मधेश आन्‍दोलनद्धारा प्राप्‍त जनाधिकारक सन्‍दर्भमै एकटा एहन संविधानक आवश्‍यकता छैक जाहि संविधानक माध्‍यम सं नेपालक जनता सही अर्थमै समावेशी लोकतन्‍त्र, प्रतिस्‍पर्धात्‍मक बहूदलि, बहूभाषिक, बहूसांस्‍कृतिक स्‍वरुपक संगहि सम्‍बन्‍धित अधिकार सबहक उपभोग क सकय । एकरा संगही एहि दैशमे सयकडो वर्ष सं शोषित रहल मधेशी समुदाय, दलित, अल्‍पसंख्‍यक, आदिवासी एवं जनजाती आव निर्माण हौव बला नयां संविधानद्धारा एकटा कण्‍ठारहित समुन्‍नत, समावेशी आ विकाशशील समाजक निर्माण भ सकै आ तकर यथार्थ अनुभूति अनुभव जनता क सकय । काशीकान्त मिश्र "मधुप" 1906-1987 ’राधाविरह’ (महाकाव्य) पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त मैथिलीक प्रशस्त कवि आ मैथिलीक प्रचार-प्रसारक समर्पित कार्यकर्ता ’झंकार’ कवितासँ क्रान्ति गीतक आह्वान कएलनि । प्रकृति प्रेमक विलक्षण कवि । ’घसल अठन्नी कविताक लेल कथ्य आ शिल्प-संवेदना—दुहू स्तर पर चरम लोकप्रियता भेटलनि। मधुप जीक कवितामय चिट्ठी (अप्रकाशित पद्य-डॉ.पालन झाक सौजन्यसँ) चि. श्री चन्द्रकान्त मिश्र शुभाशीर्वाद पाबि अहाँकेँ कुशल थिकहुँ सह्लाद गामहुमे परिवार अपन आनन्द अहींक हेतु छल चिन्तित चित्त अनन्त। घेंट-पेट ओ तैठ पेटसँ हीन उदय रहए अछि मनहि मन किछु खिन्न। मंगलमय श्री मंगल झा सूरधाम काशीवासी ’तजि वनता’ आराम। अहूँ हुनक सेवामे मेवा छी चखैत छी तहिठाम जतए केओ नहि अछि झखैत। (चन्द्रकान्त मिश्र-मधुप जीक छोट भाइ उदय- चन्द्रकान्त मिश्रक बालक चन्द्रकान्त मिश्रक विवाह मंगलदत्त झा, गाम हरौलीक कन्यासँ। मंगल झाक काशी प्रवासमे लिखल पत्र, सूर्यक उत्तरायणमे गेलापर मृत्युक वरण, संगमे उदय आऽ मंगल झाक पौत्र श्री प्रद्युम्न कुमार झा सेहो संगमे रहथि।) (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ' आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकें सजिल्द 

मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास

डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00  राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00 पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 225.00 स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.200.00 अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.180.00

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.125.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 180.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 बडक़ू चाचा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कविता-संग्रह

या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00 जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 300.00 कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 225.00 लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.190.00 लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00 दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00 कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00 मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00 संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00 दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष 2000 मूल्य रु. 40.00 सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 165.00 पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15% और उससे ज्यादा की किताबों पर 20% की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी । अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/- चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू। बया, हिन्दी छमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन ” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 70.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 90.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00

शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

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अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 मोबाइल नं.9868380797, 9891245023 ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in, antika.prakashan@antika-prakashan.com http://www.antika-prakashan.com (विज्ञापन) श्रुति प्रकाशनसँ १.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन २.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह ३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन ४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव ५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर ६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर ७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल ८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता” ९/१०/११ १.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा) श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८ Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

अनुक्रम संपादकीय 1 संदेश 13 अंकुर काशीनाथ झा 35 अजय सरवैया 26 अजीत कुमार झा 26 अनलकांत 30 अबू सुथार 24 अमरेन्द्र यादव 29 अमित कुमार झा 27 अयोध्यानाथ चौधरी 78 अशोक दत्त 36 आद्याचरण झा 25 आभाष लाभ 21 आशीष अनचिन्हार 36 उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ 224 उमेश कुमार महतो 223 एन. अरुणा 134 ओमप्रकाश झा 146 कमलानन्द झा 69 काशीकान्त मिश्र "मधुप" 113 कुमार मनोज कश्यप 76 कुमार शुशान्‍त 111 कुमुद सिंह 92 कृपानन्द झा 74 कृष्णमोहन झा 75 केदारनाथ चौधरी 71 कैलाश कुमार मिश्र 61 गंगेश गुंजन 37 गजेन्द्र ठाकुर 103 छवि झा 92 जितमोहन झा 51 जितेन्द्र झा 45 ज्योति 53 ज्योति प्रकाश लाल 60 तूलिका 222 दिगम्बर झा 'दिनमणि' 102 देवशंकर नवीन 95 देवांशु वत्स 238 धर्मेन्द्र विह्वल 98 धीरेन्द्र प्रेमर्षि 99 नरेश मोहन झा 137 नवीन नाथ झा (नवनीत) 240 नवेन्दु कुमार झा 138 नागेन्द्र झा 135 निमिष झा 141 नीलिमा 140 नूतन झा 144 पंकज पराशर 152 पन्ना त्रिवेदी 153 परमेश्वर कापड़ि 154 पालन झा 148 पीयूष ठक्कर 155 प्रकाश झा 156 प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ 129 प्रीति 159 प्रीति ठाकुर 160 प्रेमचन्द मिश्र 161 प्रेमशंकर सिंह 167 बलभद्र मिश्र 80 बिनीत ठाकुर 88 बी.के कर्ण 89 बैकुण्ठ झा 229 भरत माँझी 82 भवनाथ दीपक 83 भालचन्द्र झा 81 मनोज मुक्‍ति 128 महाप्रकाश 113 महेन्द्र मलंगिया 116 महेन्‍द्र कुमार मिश्र 114 महेश मिश्र “विभूति” 121 मायानन्‍द मिश्र 131 मित्रनाथ झा 132 मुखीलाल चौधरी 133 मैथिलीपुत्र प्रदीप 124 रत्नेश्वर मिश्र 181 रमानन्द झा ‘रमण‘ 173 राजमोहन झा 17 राजेन्द्र पटेल 169 राजेन्द्र विमल 170 राम दयाल राकेश 22 राम नारायण देव 180 राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' 84 रामलोचन ठाकुर 179 रामजी चौधरी 240 रामाश्रय झा "रामरंग" प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे 14,177 रूपा धीरू 185 रूपेश कुमार झा "त्योँथ" 186 रेवती रमण लाल 184 रोशन जनकपुरी 184 लक्ष्मी ठाकुर 112 वासुदेव सुनानी 231 विद्यानन्द झा 235 विनीत उत्पल 236 विभा रानी 232 वृषेश चन्द्र लाल 91 शंभु कुमार सिंह 193 शक्ति शेखर 191 शिवप्रसाद यादव 23 शीतल झा 199 शीला सुभद्रा देवी 198 शेख मोहम्मद शरीफ 206 शैलेन्द्र मोहन झा 189 श्याम सुन्दर "शशि" 214 श्यामल सुमन 213 श्रीधरम 216 सच्चिदानन्द यादव 186 सतीश चन्द्र झा 188 सन्तोष मिश्र 187 सुभाष चन्द्र यादव 220 सुभाष साह 219 सुशांत झा 210 सूर्यनाथ गोप 221 हिमांशु चौधरी 41 हृदय नारायण झा 42 मैथिलीक मानक लेखन-शैली 241

1313 13 13 'विदेह' १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश (संगमे पछिला २४ अंकक चुनल सम्पादकीय केर अंश)- 0 २. आद्याचरण झा 0 ३. डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” 0 ४. डॉ.प्रेमशंकर सिंह 0 ५. गंगेश गुंजन ६. महेन्द्र मलंगिया ७. डॉ. रामभरोस कापड़ि “भ्रमर” ८. कमलानन्द झा ९. डॉ. देवशंकर नवीन १०. धीरेन्द्र प्रेमर्षि ११. अनलकान्त १२. रूपा धीरू १३. नूतन झा १४. लक्ष्मी ठाकुर १५. प्रीति ठाकुर १६. ज्योति झा चौधरी १७. कृपानन्द झा १८. अशोक दत्त १९. मनोज झा “मुक्ति” २०. सुभाषचन्द्र यादव २१. शिव प्रसाद यादव २२. पंकज पराशर २३. गजेन्द्र ठाकुर २४. विनीत उत्पल २५. हिमांशु चौधरी २६. रोशन जनकपुरी २७. राजेन्द्र विमल २९. रेवतीरमण लाल ३०. बृखेशचन्द्र लाल ३१. डॉ. रमानन्द झा रमण ३२. प्रेमचन्द्र मिश्र ३३. नवेन्दु झा ३४. जितेन्द्र झा ३५. कुमार मनोज कश्यप ३६. रामलोचन ठाकुर ३७. ब्रज कु. कर्ण ३८. ज्योति प्रकाश लाल ३९. शुशान्त झा ४०. रूपेश कुमार झा “त्योंथ” ४१. अंकुर काशीनाथ झा ४२. प्रीति मिश्र ४३. ओमप्रकाश झा ४४. हृदयनारायण झा ४५. रामाश्रय झा “रामरंग” ४६. प्रकाश झा ४७. पञ्जीकार विद्यानन्द झा ४८. महेश मिश्र “विभूति” ४९. भालचन्द्र झा ५०. विभा रानी ५१. केदारनाथ चौधरी ५२. कृष्णमोहन झा ५३. डॉ रत्नेश्वर मिश्र ५४. शीतल झा ५५. श्याम सुन्दर शशि ५६. निमिष झा ५७. अजित कुमार झा ५८. जितमोहन झा ५९. धर्मेन्द्र विह्वल ६०. वैकुण्ठ झा ६१. कैलास कुमार मिश्र ६२. श्यामल सुमन ६३. दिगम्बर झा “दिनमणि” ६४. नवीननाथ झा ६५. सुभाष साह ६६. शक्ति शेखर ६७. शम्भू कुमार सिंह ६८. शैलेन्द्र मोहन झा ६९. प्रकाश झा ७०. मैथिलीपुत्र प्रदीप ७१. डॉ.पालन झा ७२. तूलिका ७१. मित्रनाथ झा मान्यवर ,१. संपादकीय(वर्ष २ मास १३ अंक २५)१. संपादकीय(वर्ष २ मास १३ अंक २५) १. संपादकीय (वर्ष २ मास १३ अंक २५) १. संपादकीय (वर्ष २ मास १३ अंक २५) विदेहक नव अंक (वर्ष २ मास १३ अंक २५) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | ई अक प्रिंट फॉर्ममे सेहो अहाँक समक्ष अछि। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हमारा कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओऽ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे www.videha.com पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका www.videha.co.in पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आऽ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आऽ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आऽ पाठक एके छथि।कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आऽ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आऽ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आऽ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आऽ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आऽ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आऽ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आऽ सातो दिन उपलब्ध होए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होए आऽ जाहिसँ वितरण केर समस्या आऽ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आऽ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आऽ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। पुरान अंक pdf स्वरूपमे डाउनलोड कएल जा सकैत अछि आऽ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आऽ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि। (आर्काइव- पछिला अक सभक संपादकीय केर संक्षिप्त अंश) एहि प्रथमांक केँ प्रस्तुत करैत हम हर्षित छी। एहि मे मिथिला पेंटिंग आ’ संस्कृत शिक्षासँ संबंधित समग्री समयाभावक कारणे नहि देल जा’ सकल। पाठक एहि संबंधित लेख ggajendra@yahoo.co.in केँ अटैचमेण्टकछथि। 01.01.2008 एहि दोसर अंककेँ प्रस्तुत करैत हम हर्षित छी। एहि मे 1. मिथिला पेंटिंग, 2. रचना लिखबासँ पहिने छन्द, संस्कृत-मैथिलीक ज्ञान आ’ अन्यान्य शिक्षा, 3. संस्कृत शिक्षाक आ’ 4. ‘बालानाम् कृते’ नामसँ छोट बच्चा संबंधित सामग्री सम्मिलित कएल जा’ रहल अछि। जे मेल सभ प्राप्त भेल ताहि मे oldmani@umainc.com, iipkarna@yahoo.com, jyotiprakash.lal@gmail.com आ’ bibhutithakur2000@yahoo.com केर मेल उत्साहवर्द्धक छल आ’ एहिमे किछु महत्त्वपूर्ण सुझाव सेहो प्राप्त भेल। ओहि आधार पर उपरोक्त लिखित चारि स्तंभक अतिरिक्त 5. पंजी-प्रबंध 6. संस्कृत आ’ मिथिला संस्कृत विश्वविद्यालयक प्रासंगिकता आ’ 7. Computers, softwares, interfacing of the old & new (restoring old photographs, songs on disks, tapes, etc) पर सामग्रीक प्रारम्भ कए देल गेल अछि। अगला अंकसँ संगीत-शिक्षाक आरंभ कएल जायत।पाठक एहि सभसँ संबंधित आ’ अन्यान्य रचना सभ ggajendra@yahoo.co.in केँ अटैचमेण्टक रूपमे .doc, .txt किंवा .pdf फॉर्मेटमे पठाय सकैत छथि। पिछला साल तीन महिना मीराम्बिका आऽ मदर इंटरनेशनलक शिक्षक-शिक्षिकाकेँ संस्कृत संभाषणक शिक्षा देबाक हेतु श्री अरविन्द आश्रम,नव देहली मे हमरा बजाओल गेल छल। ओहि क्रममे जे नोट बनेलहुँ तकरे संस्कृत शिक्षाक अंतर्गत हम दय रहल छी। 15.01.2008 विदेहक एहि अंककेँ प्रस्तुत करैत हम हर्षित छी। ।एहि अंकसँ संगीत-शिक्षाक आरंभ कएल जा रहल अछि। विकीपीडिया पर मैथिली पर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाक स्वीकृति नहि भेटल छल। हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही,आ’ सूचि करैत हर्षित छी जे 27.01.2008 केँ भाषाकेँ विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक, मुदा एहि हेतु कमसँ कम पाँच गोटे,विभिन्न जगहसँ एकर एडिटरक रूपमे नियमित रूपेँ कार्य करथि तखने योजनाकेँ पूर्ण स्वीकृति भेटतैक। नीचाँ लिखल लिंक पर जाय एडिट कय एहि प्रोजेक्टमे अहाँ सभ सहयोग करब, से आशा अछि। पछिला अंकमे देवनागरी कोना लिखू ,एहि पर हम लेख लिखने रही। इंगलिश कीबोर्ड पर ओहि तरहे लिखने विकीमे सेहो मैथिली लिखि सकैत छी। एम. गेरार्डक माध्यमसँ श्री अंशुमन पाण्डेयक, जिनकर मैथिलीक युनीकोडमे स्थानक आवेदन लंबित अछि, अनुरोध भेटल छल, ओ’ सूचना मँगलन्हि जाहि सँ स्पष्ट रूपसँ बंगला लिपि आ’ मैथिली लिपिक मध्य अंतर ज्ञात भय सकय।ई सूचना हम एम. गेरार्डक माध्यमसँ हुनका पठा देलियन्हि। विकीमे पूर्ण स्वीकृतिक हेतु एहि लिंक सभ पर राखल प्रोजेक्टकेँ आँगा बढ़ाऊ। http://meta.wikimedia.org/wiki/Requests_for_new_languages/Wikipedia_Maithili http://incubator.wikimedia.org/wiki/Wp/mai http://translatewiki.net/wiki/MediaWiki:Mainpage/mai http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate?task=untranslated&group=core-mostused&limit=2000&language=mai अपनेक प्रतिक्रिया आ’ रचनाक प्रतीक्षा अछि। 01.02.2008 विश्वक कोन-कोनसँ ई-मेल प्राप्त भेल, आ’ हम आह्लादित भय गेल छी। ई पत्रिका बिना कोनो विलंबक सालक- साल चलैत रहत, से हम अपने लोकनिकेँ विश्वास दैत छी, आ’ ओ’ आबय बला काल सिद्ध करत। चित्रक पौतीकेँ दू भाग कए देल गेल अछि, मिथिलाक खोजमे चित्रकलाक संग पुरातत्त्वक वस्तु सभक आ’ दर्शनीय स्थान सभक संकलन अछि। मिथिला रत्नमे ऐतिहासिक आ’ वर्त्तमान महापुरुषक चित्रक प्रदर्शनी अछि। एहि संकलनकेँ एहिना सहयोग दय बढ़ाऊ। मैथिलीमे एनीमेशनक घोर अभाव अछि, आ’ जौँ कही जे अछिये नहि, तँ झूठ नहि होयत। संगीत आ’ संस्कृत शिक्षा सेहो ध्वन्यात्मक सामग्रीक बिना अपूर्ण लगैत अछि। अहू दुनू दिश हमर प्रयास शीघ्रे जायत, अपने लोकनिसँ तकनीकी सहयोगक आशा करैत छी। हमर इच्छा अछि, जे बालानां कृतेमे देल गेल खिस्साकेँ एनीमेट करी। एनीमेशन आ’ माइक्रोसॉफ्ट एस. क्यु. एल. डाटाबेसमे ज्योति नारायण लालजी, ब्रज कर्ण, मणि ठाकुर आ’ आन पाठक हमरा तकनीकी मदति करताह से हम आशा करैत छी। श्री गंगेश गुंजनक ईमेल आ’ मार्ग निर्देशन प्राप्त भेल, ओ’ अपन रचना पठेबाक आश्वासन सेहो देलन्हि अछि। विद्यानंद जी पञ्जीकार जी अपन निबंध पठेने छथि, से आब बुझना जाइत अछि जे रचनाक भरमार लागय बला अछि। सभटा रचना उच्चस्तरीय रहत आ’ पत्रिका पाक्षिक आधार पर नियमित चलैथ रहत से आशा करैत छी। साइटक खोज सर्च इंजन पर आसानीसँ होय ताहि हेतु किछु विशेष प्रयास कएल गेल अछि। एहि संबंधमे कोनो तकनीकी सुझाव जौँ अपनेक समक्ष होय, तँ से आमंत्रित अछि। अपनेक रचनाक आ’ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। 15.02.08 पिछला पक्षमे हम दरभंगा गेल छलहुँ, अपन भतीजीक विवाहमे। ओतय मिथिला रिसर्च इंस्टीट्युट आ’ संस्कृत विश्वविद्यालयक भ्रमण कएलहुँ।सर्वश्री भीमनाथ झा, मैथिलीपुत्र प्रदीप, रघुवीर मोची(अध्यक्ष,मैथिली अकादमी), विश्वनाथ झा(प्रतिकुलपति का. सि. दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय), देवनारायण यादव( अध्यक्ष, मिथिला रिसर्च इंस्टीट्युट) लोकनिक दर्शनक सुअवसर प्राप्त भेल। फेर बिदेश्वरस्थानसँ आँगा गौरीशंकर स्थान( हैंठी बाली) गेलहुँ, आ’ ओतय पालवंशक मूर्त्ति आ’ ओहि पर मिथिलाक्षरमे लिखल अभिलेखक चित्र खिंचलहुँ(फोटो मिथिलाक खोज स्तंभमे देखू)। ई मूर्ति भव्य अछि, आ’ 1500 वर्ष पूर्व मिथिलाक्षरक प्रभुता देखबैत अछि।एहि पर शोध लेख आँगाक कोनो अंकमे देल जायत। मिथिलाक इतिहासमे एहि स्थलकेँ आइसँ पहिने स्थान नहि देल जा’ सकल छल, आ’ ईहो तथ्य अछि जे इतिहासक विद्वान श्री डी.एन. झा अही गामक छथि, ओना हैठी बाली हमर मामा गाम सेहो छी। 01.03.08 विदेह द्वारा किचुउ पुरान अलभ्य किताबक डिजिटलाइजेशनक कॉर्पोरा सेहो शुरू कएल गेल अछि। पञ्जीक स्कैनिंग आ’ सर्च करबा योग्य डिक्श्नरी जाहिमे पाठक नव-नव शब्द जोड़ि सकताह केर आधार किछु मनोयोगी विदेह कार्यकर्त्ता सभक द्वार शुरू हेल अछि। ई सभटा सभ क्यो नि:शुल्क कए रहल छथि आ’ अपन मातृभाषाक आ’ मातृभूमिक अनुरागी होयबाक प्रमाण दए रहल छथि। 15.03.08 रचना लिखबासँ पहिने.. स्तंभमे मैथिली अकादमी द्वारा निर्धारित भाषाक अंकन कएल गेल अछि,एहिमे विशेष वृद्धि कएल गेल अछि। श्री उदय नारायण सिंह नचिकेता, निदेशक, केन्द्रीय भाषा संस्थान, मैसूर केर मेल प्राप्त भेल आ' ओ' लिखलन्हि जे ओ' एकरा डॉ. श्री बी मल्लिकार्जुनकेँ अग्रसारित कए देलन्हि, जे केन्द्रीय भाषा संस्थान, मैसूरमे भाषा पौद्योगिकी विभागक अध्यक्ष छथि। श्री मल्लिकार्जुनजीक ई-मेल सेहो प्राप्त भेल आ' ओ' लिखलन्हि अछि, जे एकरा कमेटीक समक्ष राखल जायत। बी. मल्लिकार्जुन मैथिली स्टाइल मनुअल बनएबाक कार्यकेँ आगाँ बढ़ा रहल छथि। प्रीति द्वारा कला आ' चित्रकला स्तंभ चित्रित कएल गेल अछि। मिथिलाक रत्नमे साहित्यकारक अतिरिक्त खेलकूद आ’ अन्यान्य विधासँ संबंधित (संगीत, फिल्म, पत्रकारिता, इतिहास, संस्कृत आ’ अंग्रेजी, अर्थशास्त्री, डिप्लोमेट, रजनीतिज्ञ आदि) मिथिलाक विभूतिक चित्र प्रदर्शित अछि। वेबसाइट खोलला अनन्तर विद्यापतिक ‘बड़ सुखसार पाओल तुव तीरे’क वाराणसीक गंगातट पर शहनाइ पर भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान द्वारा बजाओल, आ’ तबला पर किसन महाराज आ’ वायलिन पर श्रीमति एन. राजम द्वारा बजाओल संगीत बाजि उठैत अछि। संपर्क_खोज स्तंभ पर मिथिला आ’ मैथिलीक साइट सभक संकलन/लिंक देल गेल अछि।विदेहक अपन सर्च इंजिनसँ विदेहक नव-पुरान अंककेँ ताकल जा’ सकैत अछि। दोसर सर्च इंजिनसँ मैथिलीक विशेष संदर्भमे संपूर्ण वेबकेँ ताकि सकैत छी।पुरान किताब सभक डिजिटल इमेजिंग विदेह कॉर्पोराक अंतर्गत करबाओल जा’ रहल अछि। वेब सर्चेबल डिक्शनरी जाहिमे पाठक नव-नव शब्द जॉड़ि सकताह केर कार्य सेहो आरंभ कएल गेल अछि। मैथिलीमे बालानांकृतेक एनीमेशन सेहो शुरू कए देल गेल अछि।प्ञ्जीक मिथिलाक्षर आ’ देवनगरीक पत्रक सेहो स्कैनिग शुरू भ’ गेल अछि। ई सभ शीघ्र आर्काइवक अंतर्गत देल जायत।विदेहक पुरान अंक सामान्य pdf फॉर्मेटमे आर्काइवक अंतर्गत राखल गेल अछि। पाठक पाक्षिक पत्रिकाक pdf संस्करण डाउनलोड सेहो कए सकैत छथि।प्रथम पृष्ठ पर देवनागरी टाइप करबाक हेतु किछु सहयोगी लिंक देल गेल अछि। एहि तरहक लिंक पर ऑनलाइन टाइप क’ कॉपी क’ ई-मेल किंवा वर्ड दॉक्युमेंटमे पेस्ट क’ सकैत छी। 01.04.2008 एहि अंकमे नचिकेता अपन 25 सालक चुप्पी तोड़ि नो एंट्री: मा प्रविश नाटक मैथिलीक पाठकक समक्ष विदेह ई-पत्रिकाक माध्यमसँ पहुँचा रहल छथि। धारावाहिक रूँपे ई नाटक विदेहमे ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। श्री गंगेश गुंजन जीक वैचारिक मंथन एहि बेर पाठकक समक्ष अछि। अगिला अंकसँ पाठक हुनकर कविताक वैचारिक रस ल’ सकताह।बालानां कृतेमे ज्योति पँजियारक लोकगाथा प्रस्तुत कएल गेल अछि। 15.04.2008 13 मई केँ एहि बेर जानकी नवमी अछि। एहि अवसर पर एहिसँ संबंधित निबंध देल जा' रहल अछि।एहि निबंधक लेखिका छथि श्रीमति नूतन झा। बालानां कृतेमे दानवीर दधीचीक वैदिक स्वरूप प्रस्तुत कएल गेल अछि, अंतमे सूत्रधारसँ ईहो कहबएलहुँ जे कोना बादमे तथाकथित पंडित लोकनि ओहि कथाक बंटाधार कए देलन्हि। मिथिला रत्नमे बैकग्राउन्ड संगीत सेहो अछि, आ' ई अछि विश्ववक प्रथम राष्ट्रभक्त्ति गीत (शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 22, मंत्र 22) जकरा मिथिलामे दूर्वाक्षत आशीश मंत्र सेहो कहल जाइत अछि। 'विदेह' ई पत्रिकाक प्रचार सर्च इंजिन द्वारा, गूगल आ' याहू ग्रुप द्वारा, वर्डप्रेस आ' ब्लॉगस्पॉटमे देलगेल ब्लॉग द्वारा, फेसबुक, आउटलूक, माय स्पेस, ओरकुट आ' चिट्ठाजगतक माध्यमसँ कएल गेल। मुदा जखन डाटा देखलहुँ तँ आधसँ बेशी पाठक सोझे http://www.videha.co.in पता टाइप कए एहि ई-पत्रिकाकेँ पढ़लन्हि। 01.05.2008 ३ जूनकेँ एहि बेर वट सावित्री अछि। एहि अवसर पर एहिसँ संबंधित निबंध देल जा' रहल अछि।एहि निबंधक लेखिका छथि श्रीमति नूतन झा। बालानां कृतेमे बगियाक गाछ शीर्षक लोककथाकेँ ज्योतिजीक चित्रसँ सुसज्जित कएल गेल अछि। श्री गंगेश गुंजन जीक कविता पाठकक समक्ष अछि। मिथिला रत्नमे बैकग्राउन्ड संगीत सेहो अछि, आ' ई अछि विश्ववक प्रथम राष्ट्रभक्त्ति गीत (शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) जकरा मिथिलामे दूर्वाक्षत आशीश मंत्र सेहो कहल जाइत अछि, एकर अर्थ विदेह आर्काइव स्तंभमे अभिनव रूपमे देल गेल अछि, आ' ग्रिफिथक देल अर्थसँ एकर भिन्नता देखाओल गेल अछि। मुख्य पृष्ठक बैकग्राउन्ड संगीत विद्यापतिक बड़ सुख सार तँ अछिये पहिनेसँ। 15.05.2008 नचिकेताजीक नाटक  नो एंट्री: मा प्रविश दोसर कल्लोलक दोसर खेप ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। ग‍गेश गुंजन जीक कविता आऽ विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। एहिमे कोनो संदेह नहि जे २०म शताब्दीमे जतेक मिथिला विभूति भेलाह ओहिमे श्री रामाश्रय झा ’रामरंग’ सर्वोपरि छथि। विदेह हेतु हुनकर स्पठाओल संदेशक आधार पर हुनक जीवनी आऽ कृतिकेँ विदेहक संगीत शिक्षा स्तंभमे पाठकक समक्ष अनबामे हमरा सभ गर्व अनुभव कए रहल छी। 01.06.2008 ग‍गेश गुंजन जीक कथा आऽ विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। रवीन्द्रनाथ ठाकुर सेहो हैकू लिखलन्हि, मुदा मैथिलीमे जापानी पद्य विधाक आधार पर "विदेह" प्रस्तुत कए रहल अछि ई विधा। 15.06.2008 २७ जून २००८ केँ साहित्य अकादमी, नई दिल्लीक सभागारमे मैथिली कवि सम्मेलनमे अएबाक नोत विदितजी द्वारा भेटल, से ओतए साँझ छह बजे पहुँचलहुँ। हॉलक सभटा कुर्सी भरल छल, हम आऽ कैमरामेन दू गोटे छलहुँ। नजरि घुमेलहुँ तँ एकटा कुर्सी खाली छल, से कैमरामेनकेँ विदा कए स्वयं कैमरा लए ओतए बैसि गेलहुँ। अमरनाथ माइक पकड़ि घोषणा उद्घोषणा कए रहल छलाह, लागल जेना अशोक चक्रधर हिन्दी छोड़ि मैथिली बाजि रहल छथि। सभसँ पहिने संजीव तमन्ना जीकेँ काव्य-पाठक लेल बजाओल गेल। ओऽ “पीयर पोस्टकार्” शीर्षक कविताक पाठ कएलन्हि। ताहि पर उद्घोषक टीप देलखिन्ह जे एहि मोबाइलक युगमे पोस्टकार्डक एतेक चरचा पर डाक विभाग हुनका धन्यवाद देतन्हि। फेर उद्घोषणा भेल जे पंकज पराशरजी अपन कविताक पाठ करताह, मुदा ओऽ तावत धरि पहुँचल नहि छलाह, मुदा वीडियोमे बादमे देखलहुँ जे ओऽ आयल रहथि, मुदा प्रयः कतहु एम्हर-ओम्हर चलि गेल रहथि। से रमण कुमार सिंहजी केँ बजाओल गेल। ओल्ड होममे वृद्ध आऽ एना किएक होइत छैक लोक शीर्षक पद्य सुनओलन्हि रमण जी। फेर श्रीमति सुनीता झाकेँ ब्रजेन्द्र त्रिपाठी जीक विशेष अनुरोध पर बजाओल गेल। ओऽ अपन कविता निवेदन मिथिला आऽ भारत देश महान पर सुनओलन्हि। संगे ईहो कहलीह जे ई प्रथम अवसर छन्हि हुनका लेल मंच पर पद्य पाठ करबाक। फेर मंजर सुलेमान पढ़लन्हि, मोन पड़ैत अछि गाम, आऽ अविनाशजी पढ़लन्हि विद्यापति स्मृति समारोहक उपलक्षमे दू टा कविता- ई हुनकर ब्लॉग पर सेहो बहुत दिनसँ अछि। कामिनी कामायनीकेँ गाम मोन पड़लन्हि आऽ विस्थापित लोक सेहो। बिलट पासवान ’विहंगम’ जी जौँ पुछू तँ सभसँ बेशी प्रभावी रहथि, कारण ओऽ देखि कए नहि पढ़लन्हि। तावत प‍कज पराशर जी आबि गेल छलाह, आऽ ओऽ “समयकेँ अकानैत” जे हुनकर पहिल पद्य संग्रह छन्हि, सँ ”हम परिनाम निरासा’ शीर्षक पद्य पढ़लन्हि। हुनका एक बेर फेर आबय पड़लन्हि विहंगमजीक विशेष अनुरोध पर  “महापात्र” शीर्षक रचना पढ़बाक लेल। ’विदेह’ केर एहि अंकसँ ’समय केँ अकानैत’ पोथीक समीक्षा/ परिचय देल जा रहल अछि। धीरेन्द्र कुमार मिश्र महोदय एकटा पद्य पढ़लन्हि, दोसर पद्यक सस्वर पाठ करबाक अनुमति माँगि रहल छलाह, मुदा उद्घोषक जी समयाभावक कारणेँ से अनुमति नहि देलखिन्ह आऽ प्रभात झा, मध्य प्रदेशसँ राज्यसभा सांसद, मुख्य अतिथिकेँ पद्य पाठक लेल आमंत्रण देलन्हि। मुदा ओऽ तावत धरि पहुँचल नहि छलाह, बादमे जखन पहुँचलाह तँ कहलखिन्ह जे ओऽ कविता नहि लिखैत छथि, हिन्दी गद्य लिखैत छथि। हुनका एतए अएबाक छलन्हि दू टा किताबक लोकार्पण करबाक हेतु, मैथिलीमे “इतिहास” दर्शन- लेखिका वीणा ठाकुर आऽ हिन्दीमे के.बी. प्रसादक “दुर्योधन के रहते कहीं महाभारत रुका है” पद्य संग्रहक। फेर देवशंकर नवीन जी अएलाह। ओऽ हिन्दे, मैथिली आऽ अन्य भाषाक कवि सम्मेलनक चर्च कएलन्हि आऽ कहलन्हि जे एतेक बेशी मात्रामे श्रोता-दर्शकक उपस्थिति विलक्षण अछि, कारण पहिने जे ओऽ विभिन्न प्रदेशमे एहि तरहक आयोजन कएने रहथि ओतए संस्था अपन दस टा लोककेँ बैसा कए कुरसी भड़ैत छल।  प्रभात झा जाधरि पहुँचितथि तावत रमण कुमार सिंह आऽ अविनाश जीकेँ दोसर राउन्डक लेल बजाओल गेल। फेर विदित जी पद्य पाठक लेल पहुँचलाह, मुदा यावत शुरू करितथि तावत प्रभात झाजी आबि गेलाह से ओऽ उतरि कए हुनकर स्वागत कएलन्हि। विदित जी मैथिलीमे दैनिक ’मैथिली समाद’ केर कोलकातासँ ताराकान्त झा द्वारा अगस्तसँ शुरू कएल जएबाक शुभ सूचना सेहो देलन्हि आऽ पद्य पाठ सेहो कएलन्हि। फेर प्रभात जी अपन संस्मरण सुनओलन्हि आऽ दुनू पुस्तकक लोपार्पण भेल। चित्रकार सचिन्द्रनाथ झा द्वारा श्री प्रभात झा आऽ श्रे विदित जीकेँ विद्यापतिक चित्र प्रदान कएल गेल, एहि चित्रमे बैकग्राउन्डमे मिथिला चित्रकलाक योग सेहो देल गेल छल। विदित जी प्रसन्न छलाह एहि सफल आयोजनसँ, जखन हम बधाइ देलियन्हि तँ कहलन्हि जे मैथिली आब रोड पर आयत, कोठलीमे नहि रहत। 01.07.2008 ।श्री मौन जी, मैथिलीपुत्र प्रदीप, श्री सुभाषचन्द्र यादव, श्री पालन झा आऽ श्री आद्याचरण झा जीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। श्री मायानन्द जीक इन्टरव्यू लेलन्हि श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव। तकर पहिल भाग सेहो प्रस्तुत अछि। शेष स्थायी स्तंभ यथावत अछि। 15.07.2008 एहि अंकमे नचिकेताजीक नाटक  नो एंट्री: मा प्रविश अन्तिम खेप ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। ग‍गेश गुंजन जीक पद्य आऽ विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री मौन जी, मैथिलीपुत्र प्रदीप, श्री पालन झा श्री पंकज पराशर आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। श्री मायानन्द जीक इन्टरव्यू लेलन्हि श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव। तकर दोसर भाग सेहो प्रस्तुत अछि। नेपाल १ टी.वीक मैथिली कार्यक्रमक विषयमे विवरण दए रहल छथि जितेन्द्रजी आऽ भक्ति-गीत प्रस्तुत कएने छथि जितमोहनजी। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। 01.08.2008 एहि अंकसँ श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत शुरू भए रहल अछि, "विदेह" मे पहिल खेप पढ़ू। विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री मौन जी, श्री पंकज पराशर, श्री सुशान्त, प्रकाश, ज्योतिप्रकाश लाल, जितमोहन, विनीत उत्पल शैलेन्द्र मोहन झा आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि।एहि अंकमे नचिकेताजीक टटका लिखल कविता सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। मैथिली रिपोर्ताजक नव विधाक प्रारम्भ कए रहल छथि पुण्यधाम जनकपुरधामक युवा पत्रकार श्री जितेन्द्र झा। श्री हरिमोहन झाजीक सम्पूर्ण रचना संसारक अवलोकन सेहो शुरू भए रहल अछि। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। 15.08.2008 मिथिलाक धरती बाढ़िक विभीषिकासँ आइ काल्हि जूझि रहल अछि। कुशेश्वरस्थान दिसुका क्षेत्र तँ बिन बाढ़िक बरखाक समयमये डूमल रहैत अछि। मुदा ई स्थिति १९७८-७९ केर बादक छी। पहिने ओऽ क्षेत्र पूर्ण रूपसँ उपजाऊ छल, मुदा भारतमे तटबन्धक अनियन्त्रित निर्माणक संग पानिक जमाव ओतए शुरू भए गेल। मुदा ओहि क्षेत्रक बाढ़िक कोनो समाचार कहियो नहि अबैत अछि, कहियो अबितो रहए तँ मात्र ई दुष्प्रचार जे ई सभटा पानि नेपालसँ छोड़ल गेल पानिक जमाव अछि। ओतुक्का लोक एहि नव संकटसँ लड़बाक कला सीखि गेलाह। हमरा मोन अछि ओऽ दृश्य जखन कुशेश्वरस्थानसँ महिषी उग्रतारास्थान जएबाक लेल हमरा बढ़िक समयमे अएबाक लेल कहल गेल छल कारण ओहि समयमे नाओसँ गेनाइ सरल अछि, ई कहल गेल। रुख समयमे खत्ता, चभच्चामे नाओ नहि चलि पबैत अछि आऽ सड़कक हाल तँ पुछू जुनि। फसिलक स्वरूपमे परिवर्तन भेल, मत्स्य-पालन जेना तेना कए ई क्षेत्र जबरदस्तीक एकटा जीवन-कला सिखलक। कौशिकी महारानीक एहि बेरक प्रकोप ओहि दुष्प्रचारकेँ खतम कए पाओत आकि नहि से नहि जानि! पहिने हमरा सभ ई देखी जे कोशी आऽ गंडकपर जे दू टा बैराज नेपालमे अछि ओकर नियन्त्रण ककरा लग अछि। ई नियन्त्रण अछि बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक लग आऽ एतए बिहार सरकारक अभियन्तागणक नियन्त्रण छन्हि। पानि छोड़बाक निर्णय बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक हाथमे अछि। नेपालक हाथमे पानि छोड़बाक अधिकार तखन आएत जखन ओतुक्का आन धार पर बान्ह/ छहर बनत, मुदा से ५० सालसँ ऊपर भेलाक बादो दुनू देशक बीचमे कोनो सहमतिक अछैत सम्भव नहि भए सकल। किएक? सामयिक घटनाक्रम: कोशीपर भीमनगर बैरेज, कुशहा, नेपालमे अछि। १९५८ मे बनल एहि छहरक जीवन ३० बरख निर्धारित छल, जे १९८८ मे बीति गेल। दुनू देशक बीचमे कोनो सहमति किएक नहि बनि पाओल? छहरक बीचमे जे रेत जमा भए जाइत अछि, तकरा सभ साल हटाओल जाइत अछि। कारण ई नहि कएलासँ ओकर बीचमे ऊंचाई बढ़ैत जाएत, तखन सभ साल बान्धक ऊँचाई बढ़ाबए पड़त।  एहि साल ई कार्य समयसँ किएक नहि शुरू भेल? फेर शुरू भेल बरखा, १८ अगस्तकेँ कोशी बान्धमे २ मीटर दरारि आबि गेल। १९८७ ई.क बाढ़ि हम आँखिसँ देखने छी। झंझारपुर बान्ध लग पानि झझा देलक, ओवरफ्लो भए गेल एक ठामसँ, आऽ आँखिक सोझाँ हम देखलहुँ जे कोना तकर बाद १ मीटरक कटाव किलोमीटरमे बदलि जाइत अछि। २७-२८ अगस्त २००८ धरि भीमनगर बैरेजक ई कटाव २ किलोमीटर भए चुकल अछि। आऽ ई करण भेल कोशीक अपन मुख्य धारसँ हटि कए एकटा नव धार पकड़बाक आऽ नेपालक मिथिलांचलक संग बिहारक मिथिलांचलकेँ तहस नहस करबाक। नासाक ८ अगस्त २००८ आऽ २४ अगस्त २००८ केर चित्र कौशिकीक नव आऽ पुरान धारक बीच २०० किलोमीटरक दूरी देखा रहल अछि। भीमनगर बैरेज आब एकटा कोशीक सहायक धारक ऊपर बनल बैरेज बनि गेल। राष्ट्रीय आपदा: जाहि राज्यमे आपदा अबैत अछि, से केन्द्रसँ सहायताक आग्रह करैत अछि। केन्द्रीय मंत्रीक टीम ओहि राज्यक दौरा करैत अछि आऽ अपन रिपोर्ट दैत अछि जाहिपर केन्द्रीय मंत्रीक एकटा दोसर टीम निर्णय करैत अछि, आऽ ओऽ टीम निर्णय करैत अछि जे ई आपदा राष्ट्रीय आपदा अछि वा नहि। बिहारक राजनीतिज्ञ अपन पचास सालक विफलता बिसरि जखन एक दोसराक ऊपर आक्षेपमे लागल छलाह, मनमोहन सिंह मंत्रीक प्रधानक रूपमे दौरा कए एकरा राष्ट्रीय आपदा घोषित कएलन्हि। कारण ई लेवल-३ केर आपदा अछि आऽ ई सम्बन्धित राज्यक लेल असगरे, नहि तँ वित्तक लिहाजसँ आऽ नहिए राहतक व्यवस्थाक सक्षमताक हिसाबसँ, एहिसँ पार पाएब संभव अछि। आब राष्ट्रीय आकस्मिक आपदा कोषसँ सहायता देल जाऽ रहल अछि, किसानक ऋण-माफी सेहो सम्भव अछि। उपाय की हो? कुशेश्व्रर स्थानक आपदा सभ-साल अबैछ, से सभ ओकरा बिसरिए जेकाँ गेलाह। मुदा आब की हो? दामोदर घाटीक आऽ मयूरक्षी परियोजना जेकाँ कार्य कोशी, कमला, भुतही बलान, गंडक, बूढ़ी गंडक आऽ बागमतीपर किएक सम्भव नहि भेल? विश्वेश्वरैय्याक वृन्दावन डैम किएक सफल अछि। नेपाल सरकारपर दोषारोपण कए हमरा सभ कहिया धरि जनताकेँ ठकैत रहब। एकर एकमात्र उपाए अछि बड़का यंत्रसँ कमला-बलान आदिक ऊपर जे माटिक बान्ध बान्हल गेल अछि तकरा तोड़ि कए हटाएब आऽ कच्चा नहरिक बदला पक्का नहरिक निर्माण। नेपाल सरकारसँ वार्ता आऽ त्वरित समाधन। आऽ जा धरि ई नहि होइत अछि तावत जे अल्पकालिक उपाय अछि, जेना बरखा आबएसँ पहिने बान्हक बीचक रेतकेँ हटाएब, बरखाक अएबाक बाट तकबाक बदला किछु पहिनहि बान्हक मरम्मतिक कार्य करब। आऽ एहि सभमे राजनीतिक महत्वाकांक्षाकेँ दूर राखब। कोशीकेँ पुरान पथपर अनबाक हेतु कैकटा बान्ह बनाबए पड़त आऽ ओऽ सभ एकर समाधान कहिओ नहि बनि सकत। कमला धार नहरिसँ लाभ हनि- एक तँ कच्ची नहरि आऽ ताहूपर मूलभूत डिजाइनक समस्या, एकटा उदाहरण पर्याप्त होएत जेना-तेना बनाओल परियोजना सभक। कमलाक धारसँ निकालल पछबारी कातक मुख्य नहरि जयनगरसँ उमराँव- पूर्वसँ पछबारी दिशामे अछि। मुदा ओतए धरतीक ढ़लान उत्तरसँ दक्षिण दिशामे अछि। बरखाक समयमे एकर परिणाम की होएत आकि की होइत अछि? ई बान्ह बनि जाइत अछि आऽ एकर उत्तरमे पानि थकमका जाइत अछि। सभ साल एहि नहर रूपी बान्हसँ पटौनी होए वा नहि एकर उतरबरिया कातक फसिल निश्चित रूपेण डुमबे टा करैत अछि। फलना बाबूक जमीन नहरिमे नञि चलि जाए से नहरिक दिशा बदलि देल जाइत अछि! कमला नदीपर १९६० ई. मे जयनगरसँ झंझारपुर धरि छहरक निर्माण भेल आऽ एहिसँ सम्पूर्ण क्षेत्रक विनाशलीलाक प्रारम्भ सेहो भए गेल। झंझारपुरसँ आगाँक क्षेत्रक की हाल भेल से तँ हम कुशेश्वरक वर्णन कए दए चुकल छी। मधेपुर, घनश्यामपुर, सिंघिया एहि सभक खिस्सा कुशेश्वरसँ भिन्न नहि अछि। कमला-बलानक दुनू छहरक बीच जेना-जेना रेत भरैत गेल ताहि कारणेँ एहि तटबन्धक निर्माणक बीस सालक भीतर सभ किछु तहस-नहस भए गेल। कमला धार जे बलानमे पिपराघाटमे १९५४ मे मिलि गेलीह, हिमालयसँ बहि कए कोनो पैघ लक्कड़क अवरोधक कारण। आब हाल ई अछि जे दस घण्टामे पानिक जलस्तर एहि धारमे २ मीटरसँ बेशी तक बढ़ि जाइत अछि। १९६५ ई.सँ बान्ह/ छहरक बीचमे रेत एतेक भरि गेल जे एकर ऊँचाइ बढ़ेबाक आवश्यकता भए गेल आऽ ई माँग शुरू भए गेल जे बान्ह/ छहरकेँ तोड़ि देल जाए! स्कूल कॊलेजमे छुट्टी गर्मी तातिलक बदलामे बाढ़िक समए देबामे कोन हर्ज अछि, ई निर्णय कोन तरहेँ कठिन अछि? वरिष्ठ साहित्यकार वैकुण्ठ झाजीक पद्य सेहो अछि। कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री कैलाश कुमार मिश्र जीक "यायावरी", मित्रनाथ झा जीक पद्य, नूतन जीक चौठचन्द्र पूजापर लेख, श्याम सुन्दर शशि आऽ कुमार मनोज कश्यपक लघु-कथा आऽ श्री शम्भू कुमार सि‍हक आऽ अनलकान्त जीक कथा सेहो अछि। श्री शम्भू कुमार सि‍ह जीक पद्य सेहो ई-प्रकाशित भऽ रहल अछि। बी.के कर्णक मिथिलाक विकासपर लेख, श्री ओमप्रकाश जीक लेख., श्री मौन जी, श्री पंकज पराशर, श्री सुशान्त, प्रकाश, जितमोहन, विनीत उत्पल शैलेन्द्र मोहन झा आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। मैथिली रिपोर्ताज लिखने छथि पुण्यधाम जनकपुरधामक युवा पत्रकार श्री जितेन्द्र झा संगमे ज्योतिजी सेहो लंदनसँ रिपोर्ताज पठेने छथि। श्री हरिमोहन झाजीक सम्पूर्ण रचना संसारक अवलोकन सेहो आगाँ बढ़ल अछि। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। पोथी समीक्षा: बाँकी अछि हमर दूधक कर्ज- एहि नामसँ १० टा गीतक संग्रह लए श्री बिनीत ठाकुर- शिक्षक, प्रगति आदर्श ई. स्कूल, लगनखेल, ललितपुर प्रस्तुत भेल छथि। ई एहि शताब्दीक पहिल पोथी छी जे देवनागरीक संग मिथिलाक्षरमे सेहो आयल अछि, आऽ एकरा हम अंशुमन पाण्डेयकेँ पठा देलियन्हि, यूनीकोडक मैपिंगक लेल, कारण विनीतजी हमरा एहि पोथीकेँ ई-मेलसँ पठेबाक अनुमति देने छथि, ताहि लेल हुनका धन्यवाद। “भरल नोरमे” शीर्षक पद्यमे की सुतलासँ भेटलै अछि ककरो अधिकार आऽ “गाम नगरमे”- लोकतंत्रमे अपन अधिकार लऽ कऽ रहत मधेसी, ई घोषणा छन्हि कविक तँ “कोरो आऽ पाढ़ि’मे गरीब छोड़िकऽ के बुझतै गरीबीके मारि- ई कहि कवि अपन आर्थिक चिन्तन सेहो सोझाँ रखैत छथि। चहुँदिश अमङ्गलमे जङ्गलक विनाशपर –मुश्किलेसँ सुनी चिड़ियाके चिहुं-चिहुं- कहि कवि अपन पर्यावरण चिन्तन सोझाँ रखैत छथि। “जे करथि घोटाला” मे भ्रष्टाचारपर आऽ “जाइतक टुकड़ी”मे जाति प्रथापर कवि निर्ममतासँ चोट करैत छथि तँ “बेटीक भाग्यविधान”मे कविक भावना उफानपर अछि। “कम्प्युटरक दुनिया” आऽ “अङ्गरेजिया”मे कवि सामयिकताकेँ नहि बिसरल छथि तँ  अन्तिम पद्य “ताल मिसरी” मे वरक सासुर प्रेम कनेक व्यंग्यात्मक सुरमे कवि कहि अपन एहि क्षेत्रमे सेहो दक्ष होएबाक प्रमाण दैत छथि। ओना तँ कविक ई प्रथम प्रकाशित कृति छन्हि, मुदा कवि जाहि लए सँ कविता कएने छथि ओऽ अभूतपूर्व रूपेँ प्रशंसनीय अछि। 01.09.2008 कोशी: कोशीक पानि माउन्ट एवेरेस्ट, कंचनजंघा आऽ गौरी-शंकर शिखर आऽ मकालू पर्वतश्रृंखलासँ अबैत अछि। नेपालमे सप्तकोशी, जाहिमे इन्द्रावती, सुनकोसी (भोट कोसी), तांबा कोसी, लिक्षु कोसी, दूध कोसी, अरुण कोसी आऽ तामर कोसी सम्मिलित अछि। एहिमे इन्द्रावती, सुनकोसी, तांबा कोसी, लिक्षु कोसी आऽ दूध कोसी मिलि कए सुनकोसीक निर्माण करैत अछि आऽ ई मोटा-मोटी पच्छिमसँ पूर्व दिशामे बहैत अछि, एकर शाखा सभ मोटा-मोटी उत्तरसँ दक्षिण दिशामे बहैत अछि। ई पाँचू धार गौरी शंकर शिखर आऽ मकालू पर्वतश्रृंखलाक पानि अनैत अछि। अरुणकोसी माउन्ट एवेरेस्ट (सगरमाथा) क्षेत्रसँ पानि ग्रहण करैत अछि। ई धार मोटा-मोटी उत्तर-दक्षिण दिशामे बहैत अछि। तामर कोसी मोटा-मोटी पूबसँ पच्छिम दिशामे बहैत अछि आऽ अपन पानि कंचनजंघा पर्वतश्रृंखलासँ पबैत अछि। आब ई तीनू शाखा सुनकोसी, अरुणकोसी आऽ तामरकोसी धनकुट्टा जिल्लाक त्रिवेणी स्थानपर मिलि सप्तकोसी बनि जाइत छथि। एतएसँ १० किलोमीटर बाद चतरा स्थान अबैत अछि जतए महाकोसी, सप्तकोसी वा कोसी मैदानी धरातलपर अबैत छथि। आब उत्तर दक्षिणमे चलैत प्रायः ५० किलोमीटर नेपालमे रहला उत्तर कोसी हनुमाननगर- भीमनगर लग भारतमे प्रवेश करैत छथि आऽ कनेक दक्षिण-पच्छिम रुखि केलाक बाद दक्षिण-पूर्व आऽ पच्छिम-पूर्व दिशा लैत अछि आऽ भारतमे लगभग १३० किमी. चललाक बाद कुरसेला लग गंगामे मिलि जाइत छथि। कोसीमे बागमती आऽ कमलाक धार सेहो सहरसा- दरभंगा- पूर्णिया जिलाक संगमपर मिलि जाइत अछि। कोसीपर पहिल बान्ह १२म शताब्दीमे लक्ष्मण द्वितीय द्वारा बनाओल वीर-बाँध छल जकर अवशेष भीमनगरक दक्षिणमे एखनो अछि। भीमनगर लग बैराजक निर्माणक संगे पूर्वी कोसी तटबन्ध सेहो बनि गेल आऽ पूर्वी कोसी नहरि सेहो। कुँअर सेन आयोग १९६६ ई. मे कोसी नियन्त्रणक लेल भीमनगरसँ २३ किमी. नीचाँ डगमारा बैराजक योजनाक प्रस्ताव देलक जे वाद-विवाद आऽ राजनीतिमे ओझरा गेल। एहि बैराजसँ दू फायदा छल। एक तँ भीमनगर बैरेजक जीवन-कालावधि समाप्त भेलापर ई बैरेज काज अबितए, दोसर एहिसँ उत्तर-प्रदेशसँ असम धरि जल परिवहन विकसित भऽ जाइत जाहिसँ उत्तर बिहारकेँ बड़ फायदा होइतए। मुदा एहि बैरेज निर्माण लेल पाइ आवंटन केन्द्रीय सिंचाई मंत्री डॉ के.एल.राव नहि देलखिन्ह। पश्चिमी कोसी नहरि एकर विकल्प रूपमे जेना तेना मन्थर गति सँ शुरू भेल मुदा एखनो धरि ओहिमे काज भइये रहल अछि। मुदा कोसी लेल ई नहि भऽ सकल। विचार आएल तँ योजना अस्वीकृत भए गेल। जतेक दिनमे कार्य पूरा हेबाक छल ततेक दिन विवाद होइत रहल, डगमारा बैराजक योजनाक बदलामे सस्ता योजनाकेँ स्वीकृति भेटल मुदा सेहो पूर्ण हेबाक बाटे ताकि रहल अछि! विश्वेश्वरैय्या पड़ैत छथि मोन : हैदराबादसँ ८२ माइल दूर मूसी आऽ ईसी धारपर बान्ह बनाओल गेल आऽ नगरसँ ६.५ माइलक दूरीपर  मूसी धारक उपधारा बनाओल गेल। संगहि धारक दुनू दिस नगरमे तटबन्ध बनाओल गेल। कृष्णराज सागर बान्हक हुनकर प्रस्तावित १३० फुट ऊँच बनेबाक योजना मैसूर राज्य द्वारा अंग्रेजकेँ पठाओल गेल तँ वायसराय हार्डिंज ओकरा घटा कए ८० फीट कए देलन्हि। विश्वेशरैय्या निचुलका भागक चौड़ाई बढ़ा कए ई कमी पूरा कए लेलन्हि। बीचेमे बाढ़ि आबि गेल तँ अतिरिक्त मजदूर लगा कए आऽ मलेरियाग्रस्त आऽ आन रोगग्रस्त मजदूरक इलाज लए डॉक्टर बहाली कए, रातिमे वाशिंगटन लैम्प लगा कए आऽ व्यक्तिगत निगरानी द्वारा केलन्हि। देशभक्त तेहन छलाह जे सीमेन्ट आयात नहि केलन्हि वरन् वालु, कैल्सियम पाथर आऽ पाकल ईटाक बुकनी मिला कए निर्मित सुरखीसँ एहि बान्हक निर्माण कएलन्हि। बान्ह निर्माणसँ पहिनहि द्विस्तरीय नहरिक निर्माण कए लेल गेल। दिल्ली अछि दूर एखनो! प्रधानमंत्री आपदा कोष आऽ मुख्यमंत्री आपदा कोषक अतिरिक्त स्वयंसेवी संगठन सभक कोषमे सेहो दिल्लीवासी अपन अनुदान दए सकैत छथि। मुदा दीर्घ सूत्री काज होएत निम्न बिन्दुपर दिल्लीमे केन्द्र सरकारपर दवाब बनाएब। १. स्कूल कॊलेजमे गर्मी तातिलक बदलामे बाढ़िक समए छुट्टी देबामे कोन हर्ज अछि, ई निर्णय कोन तरहेँ कठिन अछि? सी.बी एस.ई आऽ आइ.सी.एस.ई. तँ छोड़ू बिहार बोर्ड धरि ई नहि कए सकल। दिल्लीवासी सी.बी एस.ई आऽ आइ.सी.एस.ई.सँ एहि तरहक कार्यान्वयन कराबी तँ लाजे बिहार बोर्ड ओकरा लागू कए देत। २. भारतमे डगमारा बैराजक योजनाक प्रारम्भ कएल जाए कारण भीमनगर बैरेज अपन जीवन-कालावधि पूर्ण कए लेने अछि। एहिमे फन्ड रेलवे आऽ सड़क दुनू मंत्रालयसँ लेल जाए कारण एहिपर रेल आऽ सड़क सेहो बनि सकैछ/ आऽ बनबाक चाही। ३. बैरेज बनबाक कालवधियेमे पक्की नहरि धरातलक स्लोपक अनुसारे बनाओल जाए। ४. कच्ची बान्ह सभकेँ तोड़ि कए हटा देल जाए आऽ पक्की बान्हकेँ मोटोरेबल बनाओल जाए, बान्हक दुनू कात पर्याप्त गाछ-वृक्ष लगाओल जाए। ५. बिहारमे सड़क परियोजना जेना स्वप्नक सत्य होए जेना देखि परि रहल अछि, तहिना सभ विघ्न-बाधा हटा कए युद्ध-स्तरपर काज एहि सभपर कार्य शुरू कएल जाए। उपरोक्त बिन्दु सभपर दिल्लीमे लॉबी बना कए केन्द्र सरकारपर/ मंत्रालयपर दवाब बनाएब तखने बिहार अपन नव छवि बना सकत। १२म शताब्दीमे शुरू कएल बान्ह तखने पूर्ण होएत आऽ धारसभ मनुक्खक सेविका बनि सकत। श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमरजीक कोसी बाढ़िपर निबन्ध आऽ कोसीक बाढ़िपर स्व. राजकमल द्वारा लिखित कथा अपराजिता देल गेल अच्हि। श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर दोसर खेप पढ़ू संगमे हुनकर विचार-टिप्पणी सेहो। कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री कैलाश कुमार मिश्र जीक "यायावरी", अंकुर झा जीक पद्य, श्याम सुन्दर शशिक रिपोर्ताज आऽ कुमार मनोज कश्यपक लघु-कथा आऽ श्री शम्भू कुमार सि‍हक कथा-निबन्ध सेहो अछि।  बी.के कर्णक मिथिलाक विकासपर लेख, श्री पंकज पराशर, जितमोहन, विनीत उत्पल, नवेन्दु कुमार झा  आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। गुँजन जीक गजल आ' विचार टिप्पणी सेहो अछि। श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी। उदाहरण आऽ नो एण्ट्री: मा प्रविश पर समीक्षा देल गेल अछि। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। गोपेशजी स्वर्गीय भए गेलाह हुनकर संस्मरण हम लिखने छी पद्य स्तंभमे, संगमे देने छी हुनकर एकटा पद्य सेहो। 15.09.2008 श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर दोसर खेप पढ़ू संगमे हुनकर विचार-टिप्पणी सेहो।  सुभाष चन्द्र यादव जीक कथा, कुमार मनोज कश्यपक लघु-कथा, महेश मिश्र "विभूति"-श्री पंकज पराशर-  विनीत उत्पल- श्यामल जीक पद्य आऽ प्रेमशंकर सिंह, मौनजी, जितमोहन, ओमप्रकाश, शक्ति-शेखर, नूतन झा  जीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। 01.10.2008 जीन मेरी गुस्ताव ली क्लाजियो (1940-)केँ एहि सालक साहित्यक ८ लाख १५ हजार पौंडक साहित्यक नोबल पुरस्कारसँ सम्मानित कएल जएबाक घोषणा भेल अछि। मानवतापर राज कए रहल सभ्यतासँ नीचाँ आऽ आगू जाऽ कए देखबाक प्रवृत्ति छन्हि क्लाजियोक। न्यू-डिपार्चर्स,पोएटिक एडवेंचर आ सेंसुअल एक्सटेसीक लेखक छथि क्लाजियो।

ली क्लाजियो मूलतः फ्रांसीसी भाषाक उपन्यासकार छथि, ओना हिनकर पिता अंग्रेज आऽ माता फ्रांसीसी छथिन्ह, दुनू गोटे मारीशससँ सम्बन्धित। आऽ क्लाजियो नाइजीरियाक समुद्री यात्रासँ नेनपनहिमे साहित्यिक जीवनक प्रारम्भ कएलन्हि। १९६३ ई. मे हिनकर पहिल उपन्यास प्रकाशित भेल जे आधुनिक समाजक प्रति एक तरहक विद्रोह छल। फ्रेंच लेखक सभमे क्लाजियो स्वीकृत नहि भऽ सकलाह आऽ एखन ओऽ न्यू मेक्सिकोमे रहैत छथि। थर्ड वर्ल्डक नजरिसँ देखब हिनकर रचनाक एकटा विशिष्टता छन्हि। मारीशसक उपन्यासकार अभिमन्यु उनुथक आ ताहि क्रममे रामायणक चरचा सेहो क्लाजियो करैत छथि। हिनकर पहिल उपन्यास ले-प्रोसेस-वर्बल- द इनटेरोगेशन (जांचक पूछताछ)१९६३ ई. मे आयल जे अस्तित्ववादक बादक समयक उपन्यास छल। दिन-प्रतिदिनक भाषणबाजीक बदला सत्याताकेँ देखबय बला शक्ति ओ शब्द सभकेँ देलन्हि। फेर आयल हुनकर दू टा कथा संग्रह ला-फीवर आ ला-देल्यूज, एहि दुनू संग्रहमे पाश्चात्य नगरक समस्या आ ओतुक्का डरक यथार्थ चित्रण भेल अछि। टेरा-अमाटामे हुनकर पारस्थितिकी-तंत्रसँ जुड़ाव स्पष्ट अछि तँ डेजर्टसँ ओ उपन्यासकारक रूपमे स्थापित होइत छथि, एहिमे ओ उत्तर अफ्रीकाक लुप्त होइत संस्कृतिक चित्रण करैत छथि। क्लाजियो दार्शनिक लेख सेहो लिखने छथि आऽ बच्चा लोकनिक लेल लुलाबी सेहो। अमेरिकी साहित्य जाहि प्रकारेँ अनुवादसँ दूर आऽ अपनामे मग्न भऽ गेल अछि सैह कारण अछि फिलिप रॉथक एहि रेसमे हाइपक रूपमे शामिल होएबाक बावजूद पाछू छूटि जएबाक। अर्थशास्त्रमे अमेरिकाक मोनोपोलीक विपरीतक ई साहित्यक क्षेत्रक घटनाक्रम अछि। एहि अंकमे: श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर पाँचम खेप पढ़ू संगमे हुनकर विचार-टिप्पणी सेहो।  सुभाष चन्द्र यादव आऽ विभा रानी जीक कथा,  महेश मिश्र "विभूति"-श्री पंकज पराशर-  विनीत उत्पल- श्यामल जीक पद्य आऽ प्रेमशंकर सिंह, मौनजी, जितमोहन, प्रकाश झा, ओमप्रकाश जीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी। सुभाषचन्द्र यादव जी पर श्री महाप्रकाश लिखि रहल छथि। जितेन्द्र झा, नवेन्दु आ  प्रीतिक रिपोर्ताज छन्हि तँ युवा प्रतिभा अंशुमालाक विषयमे लिखने छथि जितेन्द्र। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। मधुप जीक "घसल अठन्नी" आऽ तारानन्द वियोगी जीक "मूलभूत" केर अ‍ग्रेजी अनुवाद सेहो प्रस्तुत कएल गेल अछि। 15.10.2008 पहिल कीर्तिनारायण मिश्र सम्मान कवि हरेकृष्ण झाकेँ कविता संग्रह "एना कतेक दिन" पर ११.११.२००८ केँ विद्यापति पर्वक अवसरपर देल जएतन्हि। एहि बेरक यात्री चेतना पुरस्कार श्री मन्त्रेश्वर झाकेँ भेटलन्हि। कीर्तिनारायण मिश्रक जन्म १७ जुलाई १९३७ ई. केँ ग्राम शोकहारा (बरौनी), जिला बेगूसरायमे भेलन्हि। हुनकर प्रकाशित कृति अछि सीमान्त, हम स्तवन नहि लिखब (कविता संग्रह)। आखर पत्रिकाक लब्धप्रतिष्ठ सम्पादक। मंत्रेश्वर झा-जन्म ६ जनवरी १९४४ ई.ग्राम-लालगंज, जिला-मधुबनीमे। प्रकाशित कृति: खाधि, अन्चिनहार गाम, बहसल रातिक इजोत (कविता संग्रह); एक बटे दू (कथा संग्रह), ओझा लेखे गाम बताह (ललित निबन्ध)। मैथिली कथा संग्रहक हिन्दी अनुवाद “कुंडली” नामसँ प्रकाशित। दि फूल्स पैराडाइज (अंग्रेजीमे ललित निबन्ध), कतेक डारि पर। हरेकृष्ण झा, जन्म १० जुलाई १९५० ई. गाम- कोइलखमे। अभियंत्रणक अध्ययण छोड़ि मार्क्सवादी राजनीतिमे सक्रिय। अनेक कविता आ आलोचनात्मक निबन्ध प्रकाशित। अनुवाद एवं विकास विषयक शोध कार्यमे रुचि। स्वतंत्र लेखन। प्रकृति एवं जीवनक तादात्म्य बोधक अग्रणी कवि। एना कतेक दिन (कविता संग्रह)। बुकर पुरस्कार: आस्ट्रेलियन पिता आऽ भारतीय माताक सन्तान ३३ वर्षीय बैचेलर श्री अरविन्द अडिग ऑक्सफोर्डसँ शिक्षा प्राप्त कएने छथि आऽ सम्प्रति मुम्बईमे रहैत छथि। हिनकर पहिल अंग्रेजी उपन्यास छन्हि द ह्वाइट टाइगर जाहि पर बिटेन, आयरलैण्ड आऽ कॉमनवेल्थ देशक वासी केँ देल जा रहल अंग्रेजी भाषाक उपन्यासक ५०,००० पौन्डक “मैन बुकर” पुरस्कार भेटलन्हि अछि आऽ बेन ओकेरीक बाद ई पुरस्कार प्राप्त केनिहार ई सभसँ कम उम्र केर लेखक छथि। द ह्वाइट टाइगर- ई उपन्यास हार्पर कॉलिन्स-रैन्डम हाउस द्वारा प्रकाशित भेल आऽ प्रकाश आऽ अन्हारक दू तरहक भारतक ई वर्णन करैत अछि। एकटा फर्मक मालिक बलराम जे शुरूमे गयासँ आयल बलराम हलवाई छलाह चीनी प्रधानमंत्री वेन जिआबाओक भारत आगमनपर अपन अनुत्तरित सात पत्र (हरिमोहन झाक पाँच पत्र आ ब्यासजीक दू पत्र जकाँ) केर माध्यमसँ अपन खिस्सा कहैत छथि। ओऽ एकटा रिक्शा चालकक बेटा छथि जे चाहक दोकानपर किछु दिन काज केलाक बाद दिल्लीमे एकटा धनिकक ड्राइवर बनैत छथि। फेर ओकरा मारि कय उद्योगपति बनि जाइत छथि। ड्राइवर सभ गप मालिकक सुनैत रहैत अछि, कलकत्ताक रिक्शाबला सभक खिस्सा सेहो अडिग सुनलन्हि आऽ दिल्लीक ड्राइवर लोकनिक सेहो आऽ खिस्साक प्लॊट बना लेलन्हि।  समालोचनाक स्थिति: हिन्दीक अखबार सभ ई पुरस्कार प्राप्त भेलाक बादो एहि पुस्तकक समीक्षा एकटा चीप टी.वी. सीरियलक पटकथाक रूपमे कएलन्हि। मैथिलीक समालोचनाक तँ गपे छोड़ू, अंग्रेजीक अखबार सभ मुदा नीक समीक्षा कएलक। दिल्लीक चिड़ियाघरमे एकटा ह्वाइट टाइगर छैक गेनेटिक म्युटेशनक परिणाम जे एक पीढ़ीमे एक बेर अबैत छैक नहियो अबैत छैक। बलराम हलवाईक खिस्सा सेहो ह्वाइट टाइगर जकाँ विरल भेटत बेशी तँ कमाइ-खाइमे जिनगी बिता दैत छथि। एकर हार्डबाउन्ड किताब २०,००० कॉपी बिका चुकल अछि। पेन्गुइन इण्डिया जे ई किताब छपबासँ इन्कार कएने छल कहलक जे क्रॉसवर्ड पुरस्कारसँ किताबक बिक्रीमे १००० कॉपीक वृद्धि होइत छैक, बुकर भेटलापर १०,००० कॉपी बेशी बिकाइत छैक आऽ साहित्य अकादमी भेटलापर अंग्रेजी किताब १० कॉपी बेशी बिकाइत अछि! श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर छठम खेप पढ़ू। सुभाष चन्द्र यादव आऽ भ्रमर जीक कथा,  महेश मिश्र "विभूति"-श्री पंकज पराशर-  विनीत उत्पल- श्यामल जीक पद्य आऽ प्रेमशंकर सिंह जीक शोध लेख अछि।, जितमोहन, रामलोचन ठाकुर,निमिष झा,राजेन्द्र विमल, रेवतीरमण लाल, दिगम्बर झा "दिनमणि", रूपा धीरू, ज्योति,विद्यानन्द झा, नवीननाथ झा, विनीत उत्पल,वृषेश चन्द्र लाल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि,विभूति, महेन्द्र मलंगिया, कुमार मनोज कश्यप, कृपानन्द झा. रामभरोस कापड़ि रोशन जनकपुरी, पंकज पराशर,वैकुण्ठ झा, प्रकाश झा आ हिमांशु चौधरी जीक रचनासँ सुशोभित ई अंक अछि। श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। शिवशंकर श्रीनिवास केर मैथिली कथाक अ‍ग्रेजी अनुवाद सेहो प्रस्तुत कएल गेल अछि। भारतक विश्वनाथन आनन्द वर्ल्ड चेस प्रतियोगिता जितलन्हि तँ भारत अपन चन्द्रयान-१ यात्रा सेहो शुरु कएलक। मुदा संगमे असमक बम विस्फोट, उड़ीसाक नन बलात्कार आ मालेगाँव विस्फोट मोरक पएर सिद्ध भेल। 01.11.2008 ४०म ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह ६ नवम्बर २००८: संसदक लाइब्रेरीक बालयोगी ऑडिटोरियममे कश्मीरी कवि श्री रहमान राहीकेँ प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह द्वारा प्रदान कएल जाएबला ४०म ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोहक आमंत्रण पाबि ओतए नियत समयसँ सायं छह बजे हम पहुँचलहुँ। अपन प्रतिष्ठाक अनुरूप प्रधानमंत्री निर्धारित समय ६.३० सायं पदार्पण केलन्हि। स्टेजपर श्री रवीन्द्र कालिया, निदेशक भारतीय ज्ञानपीठ, रहमान राही, डॉ. मनमोहन सिंह, सीताकान्त महापात्र, पुरस्कार चयन समितिक अध्यक्ष आऽ अखिलेश जैन, प्रबन्ध ट्रस्टी रहथि। दर्शकमे श्री टी.एन.चतुर्वेदी, अशोक वाजपेयी, आलोक पी. जैन आऽ ब्रजेन्द्र त्रिपाठी रहथि। ब्रजेन्द्रजी हमरा संग बैसल रहथि। स्व. साहू शान्ति प्रसाद जैन आऽ स्व. श्रीमति रमाजैन, एहि पुरस्कारक प्रारम्भ कएने रहथि आऽ हुनकर दुनू गोटेक फोटो पाछाँमे लागल रहन्हि। आइ काल्हि ४०म सालक महत्व एहि कारणसँ बढ़ि गेल अछि कारण ५०म वर्षगाँठक इन्तजारमे बहुत गोटे आयु बेशी भेने जीवित नहि रहैत छथि। सरला माहेश्वरी माइक पकड़ि कार्यक्रमक शुरुआतसँ पहिने अनिता जैनकेँ निराला रचित सरस्वती वन्दना गएबाक लेल अनुरोध कएलन्हि आऽ ओऽ मंचक दोसर भागमे महर्षि अगस्त्यक या कुन्देन्दुसँ शुरु कए निरालाक रचना शास्त्रीय पद्धतिमे गओलन्हि। फेर फूलसँ प्रधान मंत्रीक स्वागत प्रबन्ध न्यासी अखिलेश जैन द्वारा भेल, फेर रवीन्द्र कालिया फूलसँ रहमान राहीक स्वागत कएलन्हि। फेर श्री सीताकान्त महापात्र अंग्रेजीमे उद्गार व्यक्त करैत कहलन्हि जे राहीकेँ सम्मानित कए भारतीय ज्ञानपीठ अपनाकेँ सम्मानित कएलक अछि। फेर प्रधानमंत्री द्वारा राहीकेँ शॉल ओढ़ा कए आऽ १०३५ ई.क राजा भोजक सरस्वतीक प्रतिमाक कांस्य अनुकृति जाहिमे ज्ञानपीठ द्वारा प्रभामण्डल जोड़ल गेल (मूल प्रतिमा लंदनक ब्रिटिश म्यूजियममे अछि) आऽ प्रशस्ति पत्र आऽ ५ लाख टाकाक ड्राफ्ट दए सम्मानित कएल गेल। राही उद्गार व्यक्य कएलन्हि आऽ महान जवाहरलाल नेहरूक जाहि पदपर छलाह ओहि पदपर आसीन मनमोहन सिंहसँ पुरस्कार प्राप्त कए विशेष प्रसन्नता प्रकट कएलन्हि। फेर रवीन्द्र कालिया धन्यवाद ज्ञापन कएलन्हि। राहीक प्रतिनिधि कविताक ज्ञानपीठ द्वारा कएल हिन्दी अनुवाद राही द्वारा प्रधान मंत्रीकेँ देल गेल। अब्दुल रहमान राहीक जन्म ६ मई १९२५ ई.केँ भेल। हुनकर पहिल कविता संग्रहकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल। भारत सरकारक पद्म श्री आऽ मानव संसाधन विकास मंत्रालयक एमिरेट्स फेलोशिप हिनका भेटल छन्हि। हिनकर कविता संग्रहमे सनवुन्य साज, सुबहुक सोदा, कलाम-ए-राही प्रमुख अछि। हिनकर आलोचना आऽ निबन्धक पोथी अछि, कहवट आदि। प्रस्तुत अछि हिनकर कविता “परछाइयाँ” (कश्मीरीसँ अंग्रेजी एस.एल.सन्धु, अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर) छाह सभ अपन नियतिसँ वाद आऽ अमरताक आशा आब छोड़ि दिअ, यदि जुटा ली किछु क्षण, तँ भेर भऽ जाऊ ताहिमे। बस्तीक जाहि पथमे चलैत रहलहुँ, ओऽ धँसि गेल घनगर बोनमे, जेना हमर आस्थाक कवच भेल भेद्य केलक शंकासभ। आँखि खुजिते हमर स्वप्नकेँ लागल आँखि सभटा बासन्ती युवा छाती झरकि कए भऽ गेल सुनसान। देखू तँ देखायत आस-पड़ोसमे लावण्यमयी मेला, हाथमे आएत मात्र एकाध विचार, आऽ असगर एकटा कौआ उजाड़मे। कखनो हमर इच्छा रहए चान-तरेगन गढ़बाक, आब माथ भुका रहल छी अपन कोनो नामकरण तँ करी। सभटा विश्वास घाटीक मौलायल हरैयरी सन, सभटा चैतन्य खिसियायल साँप सन। सभटा देवता हमर अपन छाह छथि, सभटा दानव हमर अहं केर कनिया-पुतड़ा सन। सभा भवन भरल बुझू बानरक खोँ-खोँ सँ, सन्तक पहिरनक लेल ताकू बोने-बोन। केहन अछि नाओक खेबनाई, कतए तँ अछि किनार! देशांस भोथलेलक नाओकेँ अन्हारमे। हे रौ नटुआ, नाच निर्वस्त्र चारू कात ओकर, राही तँ आगि-खाएबला बताह अछि। समारोह एक घण्टामे खतम भेल आऽ घुरैत रही तँ एफ.एम.पर समाचार भेटल जे सचिन तेन्दुलकर अपन टेस्ट जीवनक ४०म शतक दिनमे पूर्ण कएलन्हि। भीमसेन जोशीकेँ भारत रत्न पुरस्कार देल गेल। आऽ चन्द्रायण-१ चन्द्रमाक १०० किलोमीटरक वृत्ताकार कक्षामे स्थापित भऽ गेल जतए ओऽ २ वर्ष धरि रहत। 15.11.2008 ई अ‍ंकक समर्पण गर्वक-संग ओहि 16 बलिदानीक नाम जे मुम्बईमे देशक सम्मानक रक्षार्थ अपन प्राणक बलिदान देलन्हि। १. एन.एस.जी. मेजर सन्दीप उन्नीकृष्णन् २. ए.टी.एस.चीफ हेमंत कड़कड़े ३. अशोक कामटे ४. इंस्पेक्टर विजय सालस्कर ५. एन.एस.जी हवलदार गजेन्द्र सिंह "बिष्ट" ६. इंस्पेक्टर शशांक शिन्दे ७. इंस्पेक्टर ए.आर.चिटले ८. सब इंस्पेक्टर प्रकाश मोरे ९. कांस्टेबल विजय खांडेकर १०. ए.एस.आइ.वी.अबाले ११. बाउ साब दुर्गुरे १२. नानासाहब भोसले १३. कांसटेबल जयवंत पाटिल १४. कांसटेबल शेघोष पाटिल १५. अम्बादास रामचन्द्र पवार १६. एस.सी.चौधरी 01.12.2008 संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १६ दिसम्बर धरि) देशसँ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। वरिष्ठ रचनाकार अपन रचना हस्तलिखित रूपमे सेहो नीचाँ लिखल पता पर पठा सकैत छथि। गजेन्द्र ठाकुर 389, पॉकेट-सी, सेक्टर-ए, बसन्तकुंज, नव देहली-११००७०. फोन:०११-४१७७१७२५/ ९८११३८२०७८ http://www.videha.co.in ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

1919 19 19 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह (दिनांक १ जनवरी २००९) १.संपादकीय (वर्ष २ मास १३ अंक २५) मान्यवर, विदेहक नव अंक (वर्ष २ मास १३ अंक २५) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | ई अक प्रिंट फॉर्ममे सेहो अहाँक समक्ष अछि। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हमारा कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओऽ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे www.videha.com पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका www.videha.co.in पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आऽ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आऽ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आऽ पाठक एके छथि।कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आऽ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आऽ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आऽ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आऽ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आऽ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आऽ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आऽ सातो दिन उपलब्ध होए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होए आऽ जाहिसँ वितरण केर समस्या आऽ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आऽ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आऽ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। पुरान अंक pdf स्वरूपमे डाउनलोड कएल जा सकैत अछि आऽ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आऽ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि। १.संपादकीय चित्र: प्रीति ठाकुर प्रिय पाठकगण, विदेहक नव अंक  ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | एहि अ‍ंकसँ डॉ शम्भु कुमार सिंहक आलेख प्रतियोगी परेक्षार्थीक लेल शुरु कएल गेल अछि। रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्ति एहि महत्वपूर्ण नाट्यवृत्तिक संचालनक भार  मैलोरंग केँ देल गेल । प्रमीला झा मेमोरियल ट्रस्ट,घोंघौर आ ओकर प्रबंध न्यासी श्री श्रीनारायण झा द्वारा । रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्तिक स्थापना प्रथम महिला बाल नाट्य निर्देशक प्रमीला झाक स्मृतिमे भेल अछि । प्रमीला जी जीवन पर्यंत भंगिमा, पटना संग जूड़ि बाल रंगकर्म के बढ़ावा दैत रहलीह । प्रमीलाजीक स्मृति मे स्थापित प्रमीला झा मेमोरियल ट्रस्ट, घोंघौर हुनकर बाल रंगमंच मे अविस्मरणीय योगदानक लेल एहि नाट्यवृत्तिक स्थापना केलक अछि । एकर मूल मे मैथिली रंगमंच पर महिला रंगकर्मीक प्रोत्साहन संग हुनकर सामाजिक सम्मान अछि । एहि नाट्यवृत्तिक संचालनक भार ट्रस्ट द्वारा लोक कलाक लेल समर्पित संस्था मैलोरंग के प्रदान कयल गेल अछि । वर्ष 2006 सँ नियमित रूप सँ ई नाट्यवृत्ति  ज्योति वत्स (दिल्ली), रंजू झा (जनकपुर), स्वाति सिंह (पटना), प्रियंका झा (पटना), वंदना डे (सहरसा) के प्रदान कयल गेल छनि । वर्ष 2008क लेल समूचा मिथिला (भारत+नेपाल) मे चालीस गणमान्य रंगकर्मी/संस्कृतिकर्मी केँ नामक अनुशंसाक लेल पत्र पठाओल गेल छलनि । ओही अनुशंसाक आधार पर प्रथम : मधुमिता श्रीवास्तव (मधुबनी), द्वितीय : वंदना ठाकुर (कोलकाता), तृतीय : नेहा वर्मा (दिल्ली), आ चतूर्थ : विजया लक्ष्मी शिवानी (पटना) अयलीह । किछु पारिवारिक कारण सँ वंदना जी एहि बेर वितरण समारोह मे अयबा सँ असमर्थ भ’ गेलीह  तेँ  ई क्रम बदलि गेल आ वंदना जीक  स्थान अगिला बेरक लेल सुरक्षित राखल गेल अछि । रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्ति-2008 तृतीय :विजया लक्ष्मी शिवानी : पटना शिवानीक जन्म दरभंगाक रसियड़ी गाम मे भेलनि । ई पिछला तीन साल सँ लगातार मैथिली रंगमंच सँ जुड़ल छथि । शिवानी अरिपन, भंगिमा सन चिर-परिचित रंग संस्था सँ जुड़ल छथि । एहि बीच अहाँ नदी गोंगियायल जाय, मिनाक्षी, घुघ्घू, आगि धधकि रहल अछि, से कोना हेतै ?, अलख निरंजन आदि महत्वपूर्ण नाटक मे अभिनय करैत अपन नीक छवि बनेलहु अछि । मनोज मनुज, कौशल किशोर दास आ अरविन्द अक्कू जीक निर्देशन मे काज करैत शिवानीक इच्छा छनि जे  वरिष्ठ रंग निर्देशक कुणाल जीक निर्देशन मे सेहो नाटक करी । वरिष्ठ रंगकर्मी प्रेमलता मिश्र जी सन रंगकर्मी बनबाक हिनक मोन छनि । विजया लक्ष्मी शिवानीजीक कहब छनि जे - समकालीन समस्या मैथिली नाटक मे एयबाक चाही जकर अखन तक कमी अछि । पारिजात हरण हिनकर प्रिय नाटक छनि आ शिवानी नबका तुरिया के कह’ चाहैत छथि जे इमानदारी सँ रंगकर्म करबाक चाही । द्वितीय :नेहा वर्मा :  नई दिल्ली नेहाक जन्म बेगूसरायक न्यू चाणक्य नगर मे भेलैन । ई बच्चे सँ रंगमंच सँ जूड़ल रहलीह अछि । नवतरंग, इप्टा, यात्रीक संग कार्य करैत एखन मैलोरंग दिल्ली सँ रंगकर्म क’ रहल छथि । नेहा अनिल पतंग, परवेज़ यूशुफ, संतोष राणा, विजय सिंह पाल, अभिषेक, मनोज मधुकर आ प्रकाश झाक निर्देशन मे नाटक केलीह अछि । हिनका द्वारा कयल गेल प्रमुख नाटक अछि सामा-चकेवा, जट-जटिन, डोम कछ, गोरखधंधा, काठक लोक, कमल मुखी कनिया, एक छल राजा आदि । आगू लगातार मैथिली रंगमंच सँ जुड़ल रहबाक हिनकर इच्छा छनि । हिनकर प्रिय नाटककार आ निर्देशक महेन्द्र मलंगिया छथिन आ रंजू झा (जनकपुर) क अभिनय हिनका प्रभावित करैत छनि । काठक लोक प्रिय नाटक आ प्रगतिशील सोचक संग बेसी युवा के होबाक कारण मैलोरंग नेहाक मनपसंद रंग संस्था छनि । अपन आत्मसमर्पण आ संस्कारक संग रंगकर्म सँ जुड़बाक हिनकर आग्रह छनि नबका कलाकारक लेल । नेहा सी. सी. आर. टी. द्वारा जूनियर स्कॉलर्शिप प्राप्त कयने छथि । अखन राष्ट्रीय कथक केन्द्र सँ कथक मे पोस्ट डिप्लोमाक संग खैरागढ़ विश्वविद्यालय सँ एम. ए. क’ रहल  छथि । प्रथम : मधुमिता श्रीवास्तव :  मधुबनी मधुमिताक जन्म मधुबनीक सूरत गंज मुहल्लामे भेलनि । बचपने सँ हिनका नृत्य आकर्षित करैत छलनि । विगत दस साल सँ ई मैथिली रंगमंच पर सक्रिय छथि । मधुबनीक इप्टा संग रंगकर्म करैत अहाँ इप्टाक राज्य आ राष्ट्रीय स्तरक महोत्सव मे सेहो शिरकत केने छी संगहि अहाँ सॉंग आ ड्रामा डिभीजन संग सेहो संबद्ध छी । मुकाभिनयक लेल अहाँ इंटर कॉलेज यूथ फेस्टीवल-03 मे तेसर आ वर्ष 06 मे लोक नृत्यक लेल पहील स्थान प्राप्त केने छी । अहाँ ओकरा आङनक बारहमासा, ओरिजनल काम, टूटल तागक एकटा ओर, छुतहा घैल, गोनूक गबाह, दुलहा पागल भ’ गेलै, बिजलिया भौजी, बिरजू-बिलटू संग कतेको हिन्दीक नाटक केने छी । मंचीय नाटक संग नुक्कड़ नाटक मे सेहो मधुमिता बढ़ि चढ़ि क’ भाग लैत रहलीह अछि । झिझिया, झड़नी, जट जटिन डोम कछ एहन कतेको लोक नृत्य, एकल अभिनय, फिल्म सिरियल आदि मे अभिनय क’चुकल मधुमिता  नेहरू युवा केन्द्र, एस.एस.बी संग कतेको संस्था सँ सम्मानित कयल गेल छथि । (आर्काइव- पछिला अक सभक संपादकीय केर संक्षिप्त अंश) एहि प्रथमांक केँ प्रस्तुत करैत हम हर्षित छी। एहि मे मिथिला पेंटिंग आ’ संस्कृत शिक्षासँ संबंधित समग्री समयाभावक कारणे नहि देल जा’ सकल। पाठक एहि संबंधित लेख ggajendra@yahoo.co.in केँ अटैचमेण्टकछथि। 01.01.2008 एहि दोसर अंककेँ प्रस्तुत करैत हम हर्षित छी। एहि मे 1.मिथिला पेंटिंग, 2.रचना लिखबासँ पहिने छन्द,संस्कृत-मैथिलीक ज्ञान आ’ अन्यान्य शिक्षा3.संस्कृत शिक्षाक आ’ 4. ‘बालानाम् कृते’ नामसँ छोट बच्चा संबंधित सामग्री सम्मिलित कएल जा’ रहल अछि। जे मेल सभ प्राप्त भेल ताहि मे oldmani@umainc.com,iipkarna@yahoo.com,jyotiprakash.lal@gmail.comआ’bibhutithakur2000@yahoo.com केर मेल उत्साहवर्द्धक छल आ’ एहिमे किछु महत्त्वपूर्ण सुझाव सेहो प्राप्त भेल। ओहि आधार पर उपरोक्त लिखित चारि स्तंभक अतिरिक्त 5.पंजी-प्रबंध 6.संस्कृत आ’ मिथिला संस्कृत विश्वविद्यालयक प्रासंगिकता आ’ 7.Computers, softwares, interfacing of the old & new (restoring old photographs, songs on disks, tapes, etc) पर सामग्रीक प्रारम्भ कए देल गेल अछि ।अगला अंकसँ संगीत-शिक्षाक आरंभ कएल जायत।पाठक एहि सभसँ संबंधित आ’ अन्यान्य रचना सभ ggajendra@yahoo.co.in केँ अटैचमेण्टक रूपमे .doc, .txt किंवा .pdf फॉर्मेटमे पठाय सकैत छथि। पिछला साल तीन महिना मीराम्बिका आऽ मदर इंटरनेशनलक शिक्षक-शिक्षिकाकेँ संस्कृत संभाषणक शिक्षा देबाक हेतु श्री अरविन्द आश्रम,नव देहली मे हमरा बजाओल गेल छल।ओहि क्रममे जे नोट बनेलहुँ तकरे संस्कृत शिक्षाक अंतर्गत हम दय रहल छी। 15.01.2008 विदेहक एहि अंककेँ प्रस्तुत करैत हम हर्षित छी। ।एहि अंकसँ संगीत-शिक्षाक आरंभ कएल जा रहल अछि। विकीपीडिया पर मैथिली पर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाक स्वीकृति नहि भेटल छल। हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही,आ’ सूचि करैत हर्षित छी जे 27.01.2008 केँ भाषाकेँ विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक, मुदा एहि हेतु कमसँ कम पाँच गोटे,विभिन्न जगहसँ एकर एडिटरक रूपमे नियमित रूपेँ कार्य करथि तखने योजनाकेँ पूर्ण स्वीकृति भेटतैक। नीचाँ लिखल लिंक पर जाय एडिट कय एहि प्रोजेक्टमे अहाँ सभ सहयोग करब, से आशा अछि। पछिला अंकमे देवनागरी कोना लिखू ,एहि पर हम लेख लिखने रही। इंगलिश कीबोर्ड पर ओहि तरहे लिखने विकीमे सेहो मैथिली लिखि सकैत छी। एम. गेरार्डक माध्यमसँ श्री अंशुमन पाण्डेयक, जिनकर मैथिलीक युनीकोडमे स्थानक आवेदन लंबित अछि, अनुरोध भेटल छल, ओ’ सूचना मँगलन्हि जाहि सँ स्पष्ट रूपसँ बंगला लिपि आ’ मैथिली लिपिक मध्य अंतर ज्ञात भय सकय।ई सूचना हम एम. गेरार्डक माध्यमसँ हुनका पठा देलियन्हि। विकीमे पूर्ण स्वीकृतिक हेतु एहि लिंक सभ पर राखल प्रोजेक्टकेँ आँगा बढ़ाऊ। http://meta.wikimedia.org/wiki/Requests_for_new_languages/Wikipedia_Maithili http://incubator.wikimedia.org/wiki/Wp/mai http://translatewiki.net/wiki/MediaWiki:Mainpage/mai http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate?task=untranslated&group=core-mostused&limit=2000&language=mai अपनेक प्रतिक्रिया आ’ रचनाक प्रतीक्षा अछि। 01.02.2008 विश्वक कोन-कोनसँ ई-मेल प्राप्त भेल, आ’ हम आह्लादित भय गेल छी। ई पत्रिका बिना कोनो विलंबक सालक- साल चलैत रहत, से हम अपने लोकनिकेँ विश्वास दैत छी, आ’ ओ’ आबय बला काल सिद्ध करत। चित्रक पौतीकेँ दू भाग कए देल गेल अछि, मिथिलाक खोजमे चित्रकलाक संग पुरातत्त्वक वस्तु सभक आ’ दर्शनीय स्थान सभक संकलन अछि। मिथिला रत्नमे ऐतिहासिक आ’ वर्त्तमान महापुरुषक चित्रक प्रदर्शनी अछि। एहि संकलनकेँ एहिना सहयोग दय बढ़ाऊ। मैथिलीमे एनीमेशनक घोर अभाव अछि, आ’ जौँ कही जे अछिये नहि, तँ झूठ नहि होयत। संगीत आ’ संस्कृत शिक्षा सेहो ध्वन्यात्मक सामग्रीक बिना अपूर्ण लगैत अछि। अहू दुनू दिश हमर प्रयास शीघ्रे जायत, अपने लोकनिसँ तकनीकी सहयोगक आशा करैत छी। हमर इच्छा अछि, जे बालानां कृतेमे देल गेल खिस्साकेँ एनीमेट करी। एनीमेशन आ’ माइक्रोसॉफ्ट एस. क्यु. एल. डाटाबेसमे ज्योति नारायण लालजी,ब्रज कर्ण, मणि ठाकुर आ’ आन पाठक हमरा तकनीकी मदति करताह से हम आशा करैत छी। श्री गंगेश गुंजनक ईमेल आ’ मार्ग निर्देशन प्राप्त भेल, ओ’ अपन रचना पठेबाक आश्वासन सेहो देलन्हि अछि। विद्यानंद जी पञ्जीकार जी अपन निबंध पठेने छथि, से आब बुझना जाइत अछि जे रचनाक भरमार लागय बला अछि। सभटा रचना उच्चस्तरीय रहत आ’ पत्रिका पाक्षिक आधार पर नियमित चलैथ रहत से आशा करैत छी। साइटक खोज सर्च इंजन पर आसानीसँ होय ताहि हेतु किछु विशेष प्रयास कएल गेल अछि। एहि संबंधमे कोनो तकनीकी सुझाव जौँ अपनेक समक्ष होय, तँ से आमंत्रित अछि। अपनेक रचनाक आ’ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। 15/02/08 पिछला पक्षमे हम दरभंगा गेल छलहुँ, अपन भतीजीक विवाहमे। ओतय मिथिला रिसर्च इंस्टीट्युट आ’ संस्कृत विश्वविद्यालयक भ्रमण कएलहुँ।सर्वश्री भीमनाथ झा, मैथिलीपुत्र प्रदीप, रघुवीर मोची(अध्यक्ष,मैथिली अकादमी), विश्वनाथ झा(प्रतिकुलपति का. सि. दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय), देवनारायण यादव( अध्यक्ष, मिथिला रिसर्च इंस्टीट्युट) लोकनिक दर्शनक सुअवसर प्राप्त भेल। फेर बिदेश्वरस्थानसँ आँगा गौरीशंकर स्थान( हैंठी बाली) गेलहुँ, आ’ ओतय पालवंशक मूर्त्ति आ’ ओहि पर मिथिलाक्षरमे लिखल अभिलेखक चित्र खिंचलहुँ(फोटो मिथिलाक खोज स्तंभमे देखू)। ई मूर्ति भव्य अछि, आ’ 1500 वर्ष पूर्व मिथिलाक्षरक प्रभुता देखबैत अछि।एहि पर शोध लेख आँगाक कोनो अंकमे देल जायत। मिथिलाक इतिहासमे एहि स्थलकेँ आइसँ पहिने स्थान नहि देल जा’ सकल छल, आ’ ईहो तथ्य अछि जे इतिहासक विद्वान श्री डी.एन. झा अही गामक छथि, ओना हैठी बाली हमर मामा गाम सेहो छी। 01/03/08 विदेह द्वारा किचुउ पुरान अलभ्य किताबक डिजिटलाइजेशनक कॉर्पोरा सेहो शुरू कएल गेल अछि। पञ्जीक स्कैनिंग आ’ सर्च करबा योग्य डिक्श्नरी जाहिमे पाठक नव-नव शब्द जोड़ि सकताह केर आधार किछु मनोयोगी विदेह कार्यकर्त्ता सभक द्वार शुरू हेल अछि। ई सभटा सभ क्यो नि:शुल्क कए रहल छथि आ’ अपन मातृभाषाक आ’ मातृभूमिक अनुरागी होयबाक प्रमाण दए रहल छथि। 15/03/08 रचना लिखबासँ पहिने.. स्तंभमे मैथिली अकादमी द्वारा निर्धारित भाषाक अंकन कएल गेल अछि,एहिमे विशेष वृद्धि कएल गेल अछि। श्री उदय नारायण सिंह नचिकेता, निदेशक, केन्द्रीय भाषा संस्थान, मैसूर केर मेल प्राप्त भेल आ' ओ' लिखलन्हि जे ओ' एकरा डॉ. श्री बी मल्लिकार्जुनकेँ अग्रसारित कए देलन्हि, जे केन्द्रीय भाषा संस्थान, मैसूरमे भाषा पौद्योगिकी विभागक अध्यक्ष छथि। श्री मल्लिकार्जुनजीक ई-मेल सेहो प्राप्त भेल आ' ओ' लिखलन्हि अछि, जे एकरा कमेटीक समक्ष राखल जायत। बी. मल्लिकार्जुन मैथिली स्टाइल मनुअल बनएबाक कार्यकेँ आगाँ बढ़ा रहल छथि। प्रीति द्वारा कला आ' चित्रकला स्तंभ चित्रित कएल गेल अछि। मिथिलाक रत्नमे साहित्यकारक अतिरिक्त खेलकूद आ’ अन्यान्य विधासँ संबंधित (संगीत,फिल्म,पत्रकारिता,इतिहास,संस्कृत आ’ अंग्रेजी, अर्थशास्त्री,डिप्लोमेट,रजनीतिज्ञ आदि)मिथिलाक विभूतिक चित्र प्रदर्शित अछि। वेबसाइट खोलला अनन्तर विद्यापतिक ‘बड़ सुखसार पाओल तुव तीरे’क वाराणसीक गंगातट पर शहनाइ पर भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान द्वारा बजाओल, आ’ तबला पर किसन महाराज आ’ वायलिन पर श्रीमति एन. राजम द्वारा बजाओल संगीत बाजि उठैत अछि। संपर्क_खोज स्तंभ पर मिथिला आ’ मैथिलीक साइट सभक संकलन/लिंक देल गेल अछि।विदेहक अपन सर्च इंजिनसँ विदेहक नव-पुरान अंककेँ ताकल जा’ सकैत अछि। दोसर सर्च इंजिनसँ मैथिलीक विशेष संदर्भमे संपूर्ण वेबकेँ ताकि सकैत छी।पुरान किताब सभक डिजिटल इमेजिंग विदेह कॉर्पोराक अंतर्गत करबाओल जा’ रहल अछि। वेब सर्चेबल डिक्शनरी जाहिमे पाठक नव-नव शब्द जॉड़ि सकताह केर कार्य सेहो आरंभ कएल गेल अछि। मैथिलीमे बालानांकृतेक एनीमेशन सेहो शुरू कए देल गेल अछि।प्ञ्जीक मिथिलाक्षर आ’ देवनगरीक पत्रक सेहो स्कैनिग शुरू भ’ गेल अछि। ई सभ शीघ्र आर्काइवक अंतर्गत देल जायत।विदेहक पुरान अंक सामान्य pdf फॉर्मेटमे आर्काइवक अंतर्गत राखल गेल अछि। पाठक पाक्षिक पत्रिकाक pdf संस्करण डाउनलोड सेहो कए सकैत छथि।प्रथम पृष्ठ पर देवनागरी टाइप करबाक हेतु किछु सहयोगी लिंक देल गेल अछि। एहि तरहक लिंक पर ऑनलाइन टाइप क’ कॉपी क’ ई-मेल किंवा वर्ड दॉक्युमेंटमे पेस्ट क’ सकैत छी। 01.04.2008 एहि अंकमे नचिकेता अपन 25 सालक चुप्पी तोड़ि नो एंट्री: मा प्रविश नाटक मैथिलीक पाठकक समक्ष विदेह ई-पत्रिकाक माध्यमसँ पहुँचा रहल छथि।धारावाहिक रूँपे ई नाटक विदेहमे ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। श्री गंगेश गुंजन जीक वैचारिक मंथन एहि बेर पाठकक समक्ष अछि। अगिला अंकसँ पाठक हुनकर कविताक वैचारिक रस ल’ सकताह।बालानां कृतेमे ज्योति पँजियारक लोकगाथा प्रस्तुत कएल गेल अछि। 15 अप्रैल 2008 13 मई केँ एहि बेर जानकी नवमी अछि। एहि अवसर पर एहिसँ संबंधित निबंध देल जा' रहल अछि।एहि निबंधक लेखिका छथि श्रीमति नूतन झा। बालानां कृतेमे दानवीर दधीचीक वैदिक स्वरूप प्रस्तुत कएल गेल अछि, अंतमे सूत्रधारसँ ईहो कहबएलहुँ जे कोना बादमे तथाकथित पंडित लोकनि ओहि कथाक बंटाधार कए देलन्हि। मिथिला रत्नमे बैकग्राउन्ड संगीत सेहो अछि, आ' ई अछि विश्ववक प्रथम राष्ट्रभक्त्ति गीत (शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 22, मंत्र 22) जकरा मिथिलामे दूर्वाक्षत आशीश मंत्र सेहो कहल जाइत अछि। 'विदेह' ई पत्रिकाक प्रचार सर्च इंजिन द्वारा, गूगल आ' याहू ग्रुप द्वारा, वर्डप्रेस आ' ब्लॉगस्पॉटमे देलगेल ब्लॉग द्वारा, फेसबुक, आउटलूक, माय स्पेस, ओरकुट आ' चिट्ठाजगतक माध्यमसँ कएल गेल। मुदा जखन डाटा देखलहुँ तँ आधसँ बेशी पाठक सोझे http://www.videha.co.in पता टाइप कए एहि ई-पत्रिकाकेँ पढ़लन्हि। 01 मई 2008 ३ जूनकेँ एहि बेर वट सावित्री अछि। एहि अवसर पर एहिसँ संबंधित निबंध देल जा' रहल अछि।एहि निबंधक लेखिका छथि श्रीमति नूतन झा। बालानां कृतेमे बगियाक गाछ शीर्षक लोककथाकेँ ज्योतिजीक चित्रसँ सुसज्जित कएल गेल अछि। श्री गंगेश गुंजन जीक कविता पाठकक समक्ष अछि। मिथिला रत्नमे बैकग्राउन्ड संगीत सेहो अछि, आ' ई अछि विश्ववक प्रथम राष्ट्रभक्त्ति गीत (शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) जकरा मिथिलामे दूर्वाक्षत आशीश मंत्र सेहो कहल जाइत अछि, एकर अर्थ विदेह आर्काइव स्तंभमे अभिनव रूपमे देल गेल अछि, आ' ग्रिफिथक देल अर्थसँ एकर भिन्नता देखाओल गेल अछि। मुख्य पृष्ठक बैकग्राउन्ड संगीत विद्यापतिक बड़ सुख सार तँ अछिये पहिनेसँ। १५ मई २००८ नचिकेताजीक नाटक  नो एंट्री: मा प्रविश दोसर कल्लोलक दोसर खेप ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। ग‍गेश गुंजन जीक कविता आऽ विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। एहिमे कोनो संदेह नहि जे २०म शताब्दीमे जतेक मिथिला विभूति भेलाह ओहिमे श्री रामाश्रय झा ’रामरंग’ सर्वोपरि छथि। विदेह हेतु हुनकर स्पठाओल संदेशक आधार पर हुनक जीवनी आऽ कृतिकेँ विदेहक संगीत शिक्षा स्तंभमे पाठकक समक्ष अनबामे हमरा सभ गर्व अनुभव कए रहल छी। ०१ जून २००८ ग‍गेश गुंजन जीक कथा आऽ विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। रवीन्द्रनाथ ठाकुर सेहो हैकू लिखलन्हि, मुदा मैथिलीमे जापानी पद्य विधाक आधार पर "विदेह" प्रस्तुत कए रहल अछि ई विधा। १५ जून २००८ २७ जून २००८ केँ साहित्य अकादमी, नई दिल्लीक सभागारमे मैथिली कवि सम्मेलनमे अएबाक नोत विदितजी द्वारा भेटल, से ओतए साँझ छह बजे पहुँचलहुँ। हॉलक सभटा कुर्सी भरल छल, हम आऽ कैमरामेन दू गोटे छलहुँ। नजरि घुमेलहुँ तँ एकटा कुर्सी खाली छल, से कैमरामेनकेँ विदा कए स्वयं कैमरा लए ओतए बैसि गेलहुँ। अमरनाथ माइक पकड़ि घोषणा उद्घोषणा कए रहल छलाह, लागल जेना अशोक चक्रधर हिन्दी छोड़ि मैथिली बाजि रहल छथि। सभसँ पहिने संजीव तमन्ना जीकेँ काव्य-पाठक लेल बजाओल गेल। ओऽ “पीयर पोस्टकार्” शीर्षक कविताक पाठ कएलन्हि। ताहि पर उद्घोषक टीप देलखिन्ह जे एहि मोबाइलक युगमे पोस्टकार्डक एतेक चरचा पर डाक विभाग हुनका धन्यवाद देतन्हि। फेर उद्घोषणा भेल जे पंकज पराशरजी अपन कविताक पाठ करताह, मुदा ओऽ तावत धरि पहुँचल नहि छलाह, मुदा वीडियोमे बादमे देखलहुँ जे ओऽ आयल रहथि, मुदा प्रयः कतहु एम्हर-ओम्हर चलि गेल रहथि। से रमण कुमार सिंहजी केँ बजाओल गेल। ओल्ड होममे वृद्ध आऽ एना किएक होइत छैक लोक शीर्षक पद्य सुनओलन्हि रमण जी। फेर श्रीमति सुनीता झाकेँ ब्रजेन्द्र त्रिपाठी जीक विशेष अनुरोध पर बजाओल गेल। ओऽ अपन कविता निवेदन मिथिला आऽ भारत देश महान पर सुनओलन्हि। संगे ईहो कहलीह जे ई प्रथम अवसर छन्हि हुनका लेल मंच पर पद्य पाठ करबाक। फेर मंजर सुलेमान पढ़लन्हि, मोन पड़ैत अछि गाम, आऽ अविनाशजी पढ़लन्हि विद्यापति स्मृति समारोहक उपलक्षमे दू टा कविता- ई हुनकर ब्लॉग पर सेहो बहुत दिनसँ अछि। कामिनी कामायनीकेँ गाम मोन पड़लन्हि आऽ विस्थापित लोक सेहो। बिलट पासवान ’विहंगम’ जी जौँ पुछू तँ सभसँ बेशी प्रभावी रहथि, कारण ओऽ देखि कए नहि पढ़लन्हि। तावत प‍कज पराशर जी आबि गेल छलाह, आऽ ओऽ “समयकेँ अकानैत” जे हुनकर पहिल पद्य संग्रह छन्हि, सँ ”हम परिनाम निरासा’ शीर्षक पद्य पढ़लन्हि। हुनका एक बेर फेर आबय पड़लन्हि विहंगमजीक विशेष अनुरोध पर  “महापात्र” शीर्षक रचना पढ़बाक लेल। ’विदेह’ केर एहि अंकसँ ’समय केँ अकानैत’ पोथीक समीक्षा/ परिचय देल जा रहल अछि। धीरेन्द्र कुमार मिश्र महोदय एकटा पद्य पढ़लन्हि, दोसर पद्यक सस्वर पाठ करबाक अनुमति माँगि रहल छलाह, मुदा उद्घोषक जी समयाभावक कारणेँ से अनुमति नहि देलखिन्ह आऽ प्रभात झा, मध्य प्रदेशसँ राज्यसभा सांसद, मुख्य अतिथिकेँ पद्य पाठक लेल आमंत्रण देलन्हि। मुदा ओऽ तावत धरि पहुँचल नहि छलाह, बादमे जखन पहुँचलाह तँ कहलखिन्ह जे ओऽ कविता नहि लिखैत छथि, हिन्दी गद्य लिखैत छथि। हुनका एतए अएबाक छलन्हि दू टा किताबक लोकार्पण करबाक हेतु, मैथिलीमे “इतिहास” दर्शन- लेखिका वीणा ठाकुर आऽ हिन्दीमे के.बी. प्रसादक “दुर्योधन के रहते कहीं महाभारत रुका है” पद्य संग्रहक। फेर देवशंकर नवीन जी अएलाह। ओऽ हिन्दे, मैथिली आऽ अन्य भाषाक कवि सम्मेलनक चर्च कएलन्हि आऽ कहलन्हि जे एतेक बेशी मात्रामे श्रोता-दर्शकक उपस्थिति विलक्षण अछि, कारण पहिने जे ओऽ विभिन्न प्रदेशमे एहि तरहक आयोजन कएने रहथि ओतए संस्था अपन दस टा लोककेँ बैसा कए कुरसी भड़ैत छल।  प्रभात झा जाधरि पहुँचितथि तावत रमण कुमार सिंह आऽ अविनाश जीकेँ दोसर राउन्डक लेल बजाओल गेल। फेर विदित जी पद्य पाठक लेल पहुँचलाह, मुदा यावत शुरू करितथि तावत प्रभात झाजी आबि गेलाह से ओऽ उतरि कए हुनकर स्वागत कएलन्हि। विदित जी मैथिलीमे दैनिक ’मैथिली समाद’ केर कोलकातासँ ताराकान्त झा द्वारा अगस्तसँ शुरू कएल जएबाक शुभ सूचना सेहो देलन्हि आऽ पद्य पाठ सेहो कएलन्हि। फेर प्रभात जी अपन संस्मरण सुनओलन्हि आऽ दुनू पुस्तकक लोपार्पण भेल। चित्रकार सचिन्द्रनाथ झा द्वारा श्री प्रभात झा आऽ श्रे विदित जीकेँ विद्यापतिक चित्र प्रदान कएल गेल, एहि चित्रमे बैकग्राउन्डमे मिथिला चित्रकलाक योग सेहो देल गेल छल। विदित जी प्रसन्न छलाह एहि सफल आयोजनसँ, जखन हम बधाइ देलियन्हि तँ कहलन्हि जे मैथिली आब रोड पर आयत, कोठलीमे नहि रहत। ०१ जुलाई २००८ । श्री मौन जी, मैथिलीपुत्र प्रदीप, श्री सुभाषचन्द्र यादव, श्री पालन झा आऽ श्री आद्याचरण झा जीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। श्री मायानन्द जीक इन्टरव्यू लेलन्हि श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव। तकर पहिल भाग सेहो प्रस्तुत अछि। शेष स्थायी स्तंभ यथावत अछि। १५ जुलाई २००८ एहि अंकमे नचिकेताजीक नाटक  नो एंट्री: मा प्रविश अन्तिम खेप ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। ग‍गेश गुंजन जीक पद्य आऽ विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री मौन जी, मैथिलीपुत्र प्रदीप, श्री पालन झा श्री पंकज पराशर आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। श्री मायानन्द जीक इन्टरव्यू लेलन्हि श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव। तकर दोसर भाग सेहो प्रस्तुत अछि। नेपाल १ टी.वीक मैथिली कार्यक्रमक विषयमे विवरण दए रहल छथि जितेन्द्रजी आऽ भक्ति-गीत प्रस्तुत कएने छथि जितमोहनजी। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। ०१ अगस्त २००८ एहि अंकसँ श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत शुरू भए रहल अछि, "विदेह" मे पहिल खेप पढ़ू।विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री मौन जी, श्री पंकज पराशर, श्री सुशान्त, प्रकाश, ज्योतिप्रकाश लाल, जितमोहन, विनीत उत्पल शैलेन्द्र मोहन झा आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि।एहि अंकमे नचिकेताजीक टटका लिखल कविता सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। मैथिली रिपोर्ताजक नव विधाक प्रारम्भ कए रहल छथि पुण्यधाम जनकपुरधामक युवा पत्रकार श्री जितेन्द्र झा। श्री हरिमोहन झाजीक सम्पूर्ण रचना संसारक अवलोकन सेहो शुरू भए रहल अछि। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। १५ अगस्त २००८ मिथिलाक धरती बाढ़िक विभीषिकासँ आइ काल्हि जूझि रहल अछि। कुशेश्वरस्थान दिसुका क्षेत्र तँ बिन बाढ़िक बरखाक समयमये डूमल रहैत अछि। मुदा ई स्थिति १९७८-७९ केर बादक छी। पहिने ओऽ क्षेत्र पूर्ण रूपसँ उपजाऊ छल, मुदा भारतमे तटबन्धक अनियन्त्रित निर्माणक संग पानिक जमाव ओतए शुरू भए गेल। मुदा ओहि क्षेत्रक बाढ़िक कोनो समाचार कहियो नहि अबैत अछि, कहियो अबितो रहए तँ मात्र ई दुष्प्रचार जे ई सभटा पानि नेपालसँ छोड़ल गेल पानिक जमाव अछि। ओतुक्का लोक एहि नव संकटसँ लड़बाक कला सीखि गेलाह। हमरा मोन अछि ओऽ दृश्य जखन कुशेश्वरस्थानसँ महिषी उग्रतारास्थान जएबाक लेल हमरा बढ़िक समयमे अएबाक लेल कहल गेल छल कारण ओहि समयमे नाओसँ गेनाइ सरल अछि, ई कहल गेल। रुख समयमे खत्ता, चभच्चामे नाओ नहि चलि पबैत अछि आऽ सड़कक हाल तँ पुछू जुनि। फसिलक स्वरूपमे परिवर्तन भेल, मत्स्य-पालन जेना तेना कए ई क्षेत्र जबरदस्तीक एकटा जीवन-कला सिखलक। कौशिकी महारानीक एहि बेरक प्रकोप ओहि दुष्प्रचारकेँ खतम कए पाओत आकि नहि से नहि जानि! पहिने हमरा सभ ई देखी जे कोशी आऽ गंडकपर जे दू टा बैराज नेपालमे अछि ओकर नियन्त्रण ककरा लग अछि। ई नियन्त्रण अछि बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक लग आऽ एतए बिहार सरकारक अभियन्तागणक नियन्त्रण छन्हि। पानि छोड़बाक निर्णय बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक हाथमे अछि। नेपालक हाथमे पानि छोड़बाक अधिकार तखन आएत जखन ओतुक्का आन धार पर बान्ह/ छहर बनत, मुदा से ५० सालसँ ऊपर भेलाक बादो दुनू देशक बीचमे कोनो सहमतिक अछैत सम्भव नहि भए सकल। किएक? सामयिक घटनाक्रम- कोशीपर भीमनगर बैरेज, कुशहा, नेपालमे अछि। १९५८ मे बनल एहि छहरक जीवन ३० बरख निर्धारित छल, जे १९८८ मे बीति गेल। दुनू देशक बीचमे कोनो सहमति किएक नहि बनि पाओल? छहरक बीचमे जे रेत जमा भए जाइत अछि, तकरा सभ साल हटाओल जाइत अछि। कारण ई नहि कएलासँ ओकर बीचमे ऊंचाई बढ़ैत जाएत, तखन सभ साल बान्धक ऊँचाई बढ़ाबए पड़त।  एहि साल ई कार्य समयसँ किएक नहि शुरू भेल? फेर शुरू भेल बरखा, १८ अगस्तकेँ कोशी बान्धमे २ मीटर दरारि आबि गेल। १९८७ ई.क बाढ़ि हम आँखिसँ देखने छी। झंझारपुर बान्ध लग पानि झझा देलक, ओवरफ्लो भए गेल एक ठामसँ, आऽ आँखिक सोझाँ हम देखलहुँ जे कोना तकर बाद १ मीटरक कटाव किलोमीटरमे बदलि जाइत अछि। २७-२८ अगस्त २००८ धरि भीमनगर बैरेजक ई कटाव २ किलोमीटर भए चुकल अछि। आऽ ई करण भेल कोशीक अपन मुख्य धारसँ हटि कए एकटा नव धार पकड़बाक आऽ नेपालक मिथिलांचलक संग बिहारक मिथिलांचलकेँ तहस नहस करबाक। नासाक ८ अगस्त २००८ आऽ २४ अगस्त २००८ केर चित्र कौशिकीक नव आऽ पुरान धारक बीच २०० किलोमीटरक दूरी देखा रहल अछि। भीमनगर बैरेज आब एकटा कोशीक सहायक धारक ऊपर बनल बैरेज बनि गेल। राष्ट्रीय आपदा: जाहि राज्यमे आपदा अबैत अछि, से केन्द्रसँ सहायताक आग्रह करैत अछि। केन्द्रीय मंत्रीक टीम ओहि राज्यक दौरा करैत अछि आऽ अपन रिपोर्ट दैत अछि जाहिपर केन्द्रीय मंत्रीक एकटा दोसर टीम निर्णय करैत अछि, आऽ ओऽ टीम निर्णय करैत अछि जे ई आपदा राष्ट्रीय आपदा अछि वा नहि। बिहारक राजनीतिज्ञ अपन पचास सालक विफलता बिसरि जखन एक दोसराक ऊपर आक्षेपमे लागल छलाह, मनमोहन सिंह मंत्रीक प्रधानक रूपमे दौरा कए एकरा राष्ट्रीय आपदा घोषित कएलन्हि। कारण ई लेवल-३ केर आपदा अछि आऽ ई सम्बन्धित राज्यक लेल असगरे, नहि तँ वित्तक लिहाजसँ आऽ नहिए राहतक व्यवस्थाक सक्षमताक हिसाबसँ, एहिसँ पार पाएब संभव अछि। आब राष्ट्रीय आकस्मिक आपदा कोषसँ सहायता देल जाऽ रहल अछि, किसानक ऋण-माफी सेहो सम्भव अछि। उपाय की हो? कुशेश्व्रर स्थानक आपदा सभ-साल अबैछ, से सभ ओकरा बिसरिए जेकाँ गेलाह। मुदा आब की हो? दामोदर घाटीक आऽ मयूरक्षी परियोजना जेकाँ कार्य कोशी, कमला, भुतही बलान, गंडक, बूढ़ी गंडक आऽ बागमतीपर किएक सम्भव नहि भेल? विश्वेश्वरैय्याक वृन्दावन डैम किएक सफल अछि। नेपाल सरकारपर दोषारोपण कए हमरा सभ कहिया धरि जनताकेँ ठकैत रहब। एकर एकमात्र उपाए अछि बड़का यंत्रसँ कमला-बलान आदिक ऊपर जे माटिक बान्ध बान्हल गेल अछि तकरा तोड़ि कए हटाएब आऽ कच्चा नहरिक बदला पक्का नहरिक निर्माण। नेपाल सरकारसँ वार्ता आऽ त्वरित समाधन। आऽ जा धरि ई नहि होइत अछि तावत जे अल्पकालिक उपाय अछि, जेना बरखा आबएसँ पहिने बान्हक बीचक रेतकेँ हटाएब, बरखाक अएबाक बाट तकबाक बदला किछु पहिनहि बान्हक मरम्मतिक कार्य करब। आऽ एहि सभमे राजनीतिक महत्वाकांक्षाकेँ दूर राखब। कोशीकेँ पुरान पथपर अनबाक हेतु कैकटा बान्ह बनाबए पड़त आऽ ओऽ सभ एकर समाधान कहिओ नहि बनि सकत। कमला धार नहरिसँ लाभ हनि- एक तँ कच्ची नहरि आऽ ताहूपर मूलभूत डिजाइनक समस्या, एकटा उदाहरण पर्याप्त होएत जेना-तेना बनाओल परियोजना सभक। कमलाक धारसँ निकालल पछबारी कातक मुख्य नहरि जयनगरसँ उमराँव- पूर्वसँ पछबारी दिशामे अछि। मुदा ओतए धरतीक ढ़लान उत्तरसँ दक्षिण दिशामे अछि। बरखाक समयमे एकर परिणाम की होएत आकि की होइत अछि? ई बान्ह बनि जाइत अछि आऽ एकर उत्तरमे पानि थकमका जाइत अछि। सभ साल एहि नहर रूपी बान्हसँ पटौनी होए वा नहि एकर उतरबरिया कातक फसिल निश्चित रूपेण डुमबे टा करैत अछि। फलना बाबूक जमीन नहरिमे नञि चलि जाए से नहरिक दिशा बदलि देल जाइत अछि! कमला नदीपर १९६० ई. मे जयनगरसँ झंझारपुर धरि छहरक निर्माण भेल आऽ एहिसँ सम्पूर्ण क्षेत्रक विनाशलीलाक प्रारम्भ सेहो भए गेल। झंझारपुरसँ आगाँक क्षेत्रक की हाल भेल से तँ हम कुशेश्वरक वर्णन कए दए चुकल छी। मधेपुर, घनश्यामपुर, सिंघिया एहि सभक खिस्सा कुशेश्वरसँ भिन्न नहि अछि। कमला-बलानक दुनू छहरक बीच जेना-जेना रेत भरैत गेल ताहि कारणेँ एहि तटबन्धक निर्माणक बीस सालक भीतर सभ किछु तहस-नहस भए गेल। कमला धार जे बलानमे पिपराघाटमे १९५४ मे मिलि गेलीह, हिमालयसँ बहि कए कोनो पैघ लक्कड़क अवरोधक कारण। आब हाल ई अछि जे दस घण्टामे पानिक जलस्तर एहि धारमे २ मीटरसँ बेशी तक बढ़ि जाइत अछि। १९६५ ई.सँ बान्ह/ छहरक बीचमे रेत एतेक भरि गेल जे एकर ऊँचाइ बढ़ेबाक आवश्यकता भए गेल आऽ ई माँग शुरू भए गेल जे बान्ह/ छहरकेँ तोड़ि देल जाए! स्कूल कॊलेजमे छुट्टी गर्मी तातिलक बदलामे बाढ़िक समए देबामे कोन हर्ज अछि, ई निर्णय कोन तरहेँ कठिन अछि? वरिष्ठ साहित्यकार वैकुण्ठ झाजीक पद्य सेहो अछि। कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री कैलाश कुमार मिश्र जीक "यायावरी", मित्रनाथ झा जीक पद्य, नूतन जीक चौठचन्द्र पूजापर लेख, श्याम सुन्दर शशि आऽ कुमार मनोज कश्यपक लघु-कथा आऽ श्री शम्भू कुमार सि‍हक आऽ अनलकान्त जीक कथा सेहो अछि। श्री शम्भू कुमार सि‍ह जीक पद्य सेहो ई-प्रकाशित भऽ रहल अछि। बी.के कर्णक मिथिलाक विकासपर लेख, श्री ओमप्रकाश जीक लेख., श्री मौन जी, श्री पंकज पराशर, श्री सुशान्त, प्रकाश, जितमोहन, विनीत उत्पल शैलेन्द्र मोहन झा आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। मैथिली रिपोर्ताज लिखने छथि पुण्यधाम जनकपुरधामक युवा पत्रकार श्री जितेन्द्र झा संगमे ज्योतिजी सेहो लंदनसँ रिपोर्ताज पठेने छथि। श्री हरिमोहन झाजीक सम्पूर्ण रचना संसारक अवलोकन सेहो आगाँ बढ़ल अछि। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। पोथी समीक्षा: बाँकी अछि हमर दूधक कर्ज- एहि नामसँ १० टा गीतक संग्रह लए श्री बिनीत ठाकुर- शिक्षक, प्रगति आदर्श ई. स्कूल, लगनखेल, ललितपुर प्रस्तुत भेल छथि। ई एहि शताब्दीक पहिल पोथी छी जे देवनागरीक संग मिथिलाक्षरमे सेहो आयल अछि, आऽ एकरा हम अंशुमन पाण्डेयकेँ पठा देलियन्हि, यूनीकोडक मैपिंगक लेल, कारण विनीतजी हमरा एहि पोथीकेँ ई-मेलसँ पठेबाक अनुमति देने छथि, ताहि लेल हुनका धन्यवाद। “भरल नोरमे” शीर्षक पद्यमे की सुतलासँ भेटलै अछि ककरो अधिकार आऽ “गाम नगरमे”- लोकतंत्रमे अपन अधिकार लऽ कऽ रहत मधेसी, ई घोषणा छन्हि कविक तँ “कोरो आऽ पाढ़ि’मे गरीब छोड़िकऽ के बुझतै गरीबीके मारि- ई कहि कवि अपन आर्थिक चिन्तन सेहो सोझाँ रखैत छथि। चहुँदिश अमङ्गलमे जङ्गलक विनाशपर –मुश्किलेसँ सुनी चिड़ियाके चिहुं-चिहुं- कहि कवि अपन पर्यावरण चिन्तन सोझाँ रखैत छथि। “जे करथि घोटाला” मे भ्रष्टाचारपर आऽ “जाइतक टुकड़ी”मे जाति प्रथापर कवि निर्ममतासँ चोट करैत छथि तँ “बेटीक भाग्यविधान”मे कविक भावना उफानपर अछि। “कम्प्युटरक दुनिया” आऽ “अङ्गरेजिया”मे कवि सामयिकताकेँ नहि बिसरल छथि तँ  अन्तिम पद्य “ताल मिसरी” मे वरक सासुर प्रेम कनेक व्यंग्यात्मक सुरमे कवि कहि अपन एहि क्षेत्रमे सेहो दक्ष होएबाक प्रमाण दैत छथि। ओना तँ कविक ई प्रथम प्रकाशित कृति छन्हि, मुदा कवि जाहि लए सँ कविता कएने छथि ओऽ अभूतपूर्व रूपेँ प्रशंसनीय अछि। ०१ सितम्बर २००९ कोशी: कोशीक पानि माउन्ट एवेरेस्ट, कंचनजंघा आऽ गौरी-शंकर शिखर आऽ मकालू पर्वतश्रृंखलासँ अबैत अछि। नेपालमे सप्तकोशी, जाहिमे इन्द्रावती, सुनकोसी (भोट कोसी), तांबा कोसी, लिक्षु कोसी, दूध कोसी, अरुण कोसी आऽ तामर कोसी सम्मिलित अछि। एहिमे इन्द्रावती, सुनकोसी, तांबा कोसी, लिक्षु कोसी आऽ दूध कोसी मिलि कए सुनकोसीक निर्माण करैत अछि आऽ ई मोटा-मोटी पच्छिमसँ पूर्व दिशामे बहैत अछि, एकर शाखा सभ मोटा-मोटी उत्तरसँ दक्षिण दिशामे बहैत अछि। ई पाँचू धार गौरी शंकर शिखर आऽ मकालू पर्वतश्रृंखलाक पानि अनैत अछि। अरुणकोसी माउन्ट एवेरेस्ट (सगरमाथा) क्षेत्रसँ पानि ग्रहण करैत अछि। ई धार मोटा-मोटी उत्तर-दक्षिण दिशामे बहैत अछि। तामर कोसी मोटा-मोटी पूबसँ पच्छिम दिशामे बहैत अछि आऽ अपन पानि कंचनजंघा पर्वतश्रृंखलासँ पबैत अछि। आब ई तीनू शाखा सुनकोसी, अरुणकोसी आऽ तामरकोसी धनकुट्टा जिल्लाक त्रिवेणी स्थानपर मिलि सप्तकोसी बनि जाइत छथि। एतएसँ १० किलोमीटर बाद चतरा स्थान अबैत अछि जतए महाकोसी, सप्तकोसी वा कोसी मैदानी धरातलपर अबैत छथि। आब उत्तर दक्षिणमे चलैत प्रायः ५० किलोमीटर नेपालमे रहला उत्तर कोसी हनुमाननगर- भीमनगर लग भारतमे प्रवेश करैत छथि आऽ कनेक दक्षिण-पच्छिम रुखि केलाक बाद दक्षिण-पूर्व आऽ पच्छिम-पूर्व दिशा लैत अछि आऽ भारतमे लगभग १३० किमी. चललाक बाद कुरसेला लग गंगामे मिलि जाइत छथि। कोसीमे बागमती आऽ कमलाक धार सेहो सहरसा- दरभंगा- पूर्णिया जिलाक संगमपर मिलि जाइत अछि। कोसीपर पहिल बान्ह १२म शताब्दीमे लक्ष्मण द्वितीय द्वारा बनाओल वीर-बाँध छल जकर अवशेष भीमनगरक दक्षिणमे एखनो अछि। भीमनगर लग बैराजक निर्माणक संगे पूर्वी कोसी तटबन्ध सेहो बनि गेल आऽ पूर्वी कोसी नहरि सेहो। कुँअर सेन आयोग १९६६ ई. मे कोसी नियन्त्रणक लेल भीमनगरसँ २३ किमी. नीचाँ डगमारा बैराजक योजनाक प्रस्ताव देलक जे वाद-विवाद आऽ राजनीतिमे ओझरा गेल। एहि बैराजसँ दू फायदा छल। एक तँ भीमनगर बैरेजक जीवन-कालावधि समाप्त भेलापर ई बैरेज काज अबितए, दोसर एहिसँ उत्तर-प्रदेशसँ असम धरि जल परिवहन विकसित भऽ जाइत जाहिसँ उत्तर बिहारकेँ बड़ फायदा होइतए। मुदा एहि बैरेज निर्माण लेल पाइ आवंटन केन्द्रीय सिंचाई मंत्री डॉ के.एल.राव नहि देलखिन्ह। पश्चिमी कोसी नहरि एकर विकल्प रूपमे जेना तेना मन्थर गति सँ शुरू भेल मुदा एखनो धरि ओहिमे काज भइये रहल अछि। मुदा कोसी लेल ई नहि भऽ सकल। विचार आएल तँ योजना अस्वीकृत भए गेल। जतेक दिनमे कार्य पूरा हेबाक छल ततेक दिन विवाद होइत रहल, डगमारा बैराजक योजनाक बदलामे सस्ता योजनाकेँ स्वीकृति भेटल मुदा सेहो पूर्ण हेबाक बाटे ताकि रहल अछि! विश्वेश्वरैय्या पड़ैत छथि मोन :हैदराबादसँ ८२ माइल दूर मूसी आऽ ईसी धारपर बान्ह बनाओल गेल आऽ नगरसँ ६.५ माइलक दूरीपर  मूसी धारक उपधारा बनाओल गेल। संगहि धारक दुनू दिस नगरमे तटबन्ध बनाओल गेल। कृष्णराज सागर बान्हक हुनकर प्रस्तावित १३० फुट ऊँच बनेबाक योजना मैसूर राज्य द्वारा अंग्रेजकेँ पठाओल गेल तँ वायसराय हार्डिंज ओकरा घटा कए ८० फीट कए देलन्हि। विश्वेशरैय्या निचुलका भागक चौड़ाई बढ़ा कए ई कमी पूरा कए लेलन्हि। बीचेमे बाढ़ि आबि गेल तँ अतिरिक्त मजदूर लगा कए आऽ मलेरियाग्रस्त आऽ आन रोगग्रस्त मजदूरक इलाज लए डॉक्टर बहाली कए, रातिमे वाशिंगटन लैम्प लगा कए आऽ व्यक्तिगत निगरानी द्वारा केलन्हि। देशभक्त तेहन छलाह जे सीमेन्ट आयात नहि केलन्हि वरन् वालु, कैल्सियम पाथर आऽ पाकल ईटाक बुकनी मिला कए निर्मित सुरखीसँ एहि बान्हक निर्माण कएलन्हि। बान्ह निर्माणसँ पहिनहि द्विस्तरीय नहरिक निर्माण कए लेल गेल। दिल्ली अछि दूर एखनो! प्रधानमंत्री आपदा कोष आऽ मुख्यमंत्री आपदा कोषक अतिरिक्त स्वयंसेवी संगठन सभक कोषमे  सेहो दिल्लीवासी अपन अनुदान दए सकैत छथि। मुदा दीर्घ सूत्री काज होएत निम्न बिन्दुपर दिल्लीमे केन्द्र सरकारपर दवाब बनाएब। १.स्कूल कॊलेजमे गर्मी तातिलक बदलामे बाढ़िक समए छुट्टी देबामे कोन हर्ज अछि, ई निर्णय कोन तरहेँ कठिन अछि? सी.बी एस.ई आऽ आइ.सी.एस.ई. तँ छोड़ू बिहार बोर्ड धरि ई नहि कए सकल। दिल्लीवासी सी.बी एस.ई आऽ आइ.सी.एस.ई.सँ एहि तरहक कार्यान्वयन कराबी तँ लाजे बिहार बोर्ड ओकरा लागू कए देत। २.भारतमे डगमारा बैराजक योजनाक प्रारम्भ कएल जाए कारण भीमनगर बैरेज अपन जीवन-कालावधि पूर्ण कए लेने अछि। एहिमे फन्ड रेलवे आऽ सड़क दुनू मंत्रालयसँ लेल जाए कारण एहिपर रेल आऽ सड़क सेहो बनि सकैछ/ आऽ बनबाक चाही। ३.बैरेज बनबाक कालवधियेमे पक्की नहरि धरातलक स्लोपक अनुसारे बनाओल जाए। ४.कच्ची बान्ह सभकेँ तोड़ि कए हटा देल जाए आऽ पक्की बान्हकेँ मोटोरेबल बनाओल जाए, बान्हक दुनू कात पर्याप्त गाछ-वृक्ष लगाओल जाए। ५.बिहारमे सड़क परियोजना जेना स्वप्नक सत्य होए जेना देखि परि रहल अछि, तहिना सभ विघ्न-बाधा हटा कए युद्ध-स्तरपर काज एहि सभपर कार्य शुरू कएल जाए। उपरोक्त बिन्दु सभपर दिल्लीमे लॉबी बना कए केन्द्र सरकारपर/ मंत्रालयपर दवाब बनाएब तखने बिहार अपन नव छवि बना सकत। १२म शताब्दीमे शुरू कएल बान्ह तखने पूर्ण होएत आऽ धारसभ मनुक्खक सेविका बनि सकत। श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमरजीक कोसी बाढ़िपर निबन्ध आऽ कोसीक बाढ़िपर स्व. राजकमल द्वारा लिखित कथा अपराजिता देल गेल अच्हि। श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर दोसर खेप पढ़ू संगमे हुनकर विचार-टिप्पणी सेहो। कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री कैलाश कुमार मिश्र जीक "यायावरी", अंकुर झा जीक पद्य, श्याम सुन्दर शशिक रिपोर्ताज आऽ कुमार मनोज कश्यपक लघु-कथा आऽ श्री शम्भू कुमार सि‍हक कथा-निबन्ध सेहो अछि।  बी.के कर्णक मिथिलाक विकासपर लेख, श्री पंकज पराशर, जितमोहन, विनीत उत्पल, नवेन्दु कुमार झा  आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। गुँजन जीक गजल आ' विचार टिप्पणी सेहो अछि। श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी। उदाहरण आऽ नो एण्ट्री: मा प्रविश पर समीक्षा देल गेल अछि। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। गोपेशजी स्वर्गीय भए गेलाह हुनकर संस्मरण हम लिखने छी पद्य स्तंभमे, संगमे देने छी हुनकर एकटा पद्य सेहो। १५ सितम्बर २००८ श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर दोसर खेप पढ़ू संगमे हुनकर विचार-टिप्पणी सेहो।  सुभाष चन्द्र यादव जीक कथा, कुमार मनोज कश्यपक लघु-कथा, महेश मिश्र "विभूति"-श्री पंकज पराशर-  विनीत उत्पल- श्यामल जीक पद्य आऽ प्रेमशंकर सिंह, मौनजी, जितमोहन, ओमप्रकाश, शक्ति-शेखर, नूतन झा  जीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। ०१ अक्टूबर २००८ जीन मेरी गुस्ताव ली क्लाजियो (1940-)केँ एहि सालक साहित्यक ८ लाख १५ हजार पौंडक साहित्यक नोबल पुरस्कारसँ सम्मानित कएल जएबाक घोषणा भेल अछि। मानवतापर राज कए रहल सभ्यतासँ नीचाँ आऽ आगू जाऽ कए देखबाक प्रवृत्ति छन्हि क्लाजियोक। न्यू-डिपार्चर्स,पोएटिक एडवेंचर आ सेंसुअल एक्सटेसीक लेखक छथि क्लाजियो।

ली क्लाजियो मूलतः फ्रांसीसी भाषाक उपन्यासकार छथि, ओना हिनकर पिता अंग्रेज आऽ माता फ्रांसीसी छथिन्ह, दुनू गोटे मारीशससँ सम्बन्धित। आऽ क्लाजियो नाइजीरियाक समुद्री यात्रासँ नेनपनहिमे साहित्यिक जीवनक प्रारम्भ कएलन्हि। १९६३ ई. मे हिनकर पहिल उपन्यास प्रकाशित भेल जे आधुनिक समाजक प्रति एक तरहक विद्रोह छल। फ्रेंच लेखक सभमे क्लाजियो स्वीकृत नहि भऽ सकलाह आऽ एखन ओऽ न्यू मेक्सिकोमे रहैत छथि।

थर्ड वर्ल्डक नजरिसँ देखब हिनकर रचनाक एकटा विशिष्टता छन्हि। मारीशसक उपन्यासकार अभिमन्यु उनुथक आ ताहि क्रममे रामायणक चरचा सेहो क्लाजियो करैत छथि।

हिनकर पहिल उपन्यास ले-प्रोसेस-वर्बल- द इनटेरोगेशन (जांचक पूछताछ)१९६३ ई. मे आयल जे अस्तित्ववादक बादक समयक उपन्यास छल। दिन-प्रतिदिनक भाषणबाजीक बदला सत्याताकेँ देखबय बला शक्ति ओ शब्द सभकेँ देलन्हि। फेर आयल हुनकर दू टा कथा संग्रह ला-फीवर आ ला-देल्यूज, एहि दुनू संग्रहमे पाश्चात्य नगरक समस्या आ ओतुक्का डरक यथार्थ चित्रण भेल अछि। टेरा-अमाटामे हुनकर पारस्थितिकी-तंत्रसँ जुड़ाव स्पष्ट अछि तँ डेजर्टसँ ओ उपन्यासकारक रूपमे स्थापित होइत छथि, एहिमे ओ उत्तर अफ्रीकाक लुप्त होइत संस्कृतिक चित्रण करैत छथि। क्लाजियो दार्शनिक लेख सेहो लिखने छथि आऽ बच्चा लोकनिक लेल लुलाबी सेहो। अमेरिकी साहित्य जाहि प्रकारेँ अनुवादसँ दूर आऽ अपनामे मग्न भऽ गेल अछि सैह कारण अछि फिलिप रॉथक एहि रेसमे हाइपक रूपमे शामिल होएबाक बावजूद पाछू छूटि जएबाक। अर्थशास्त्रमे अमेरिकाक मोनोपोलीक विपरीतक ई साहित्यक क्षेत्रक घटनाक्रम अछि। एहि अंकमे: श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर पाँचम खेप पढ़ू संगमे हुनकर विचार-टिप्पणी सेहो।  सुभाष चन्द्र यादव आऽ विभा रानी जीक कथा,  महेश मिश्र "विभूति"-श्री पंकज पराशर-  विनीत उत्पल- श्यामल जीक पद्य आऽ प्रेमशंकर सिंह, मौनजी, जितमोहन, प्रकाश झा, ओमप्रकाश जीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी। सुभाषचन्द्र यादव जी पर श्री महाप्रकाश लिखि रहल छथि। जितेन्द्र झा, नवेन्दु आ  प्रीतिक रिपोर्ताज छन्हि तँ युवा प्रतिभा अंशुमालाक विषयमे लिखने छथि जितेन्द्र। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। मधुप जीक "घसल अठन्नी" आऽ तारानन्द वियोगी जीक "मूलभूत" केर अ‍ग्रेजी अनुवाद सेहो प्रस्तुत कएल गेल अछि। १५ अक्टूबर २००८ पहिल कीर्तिनारायण मिश्र सम्मान कवि हरेकृष्ण झाकेँ ११.११.२००८ केँ विद्यापति पर्वक अवसरपर देल जएतन्हि। एहि बेरक यात्री चेतना पुरस्कार श्री मन्त्रेश्वर झाकेँ भेटलन्हि। कीर्तिनारायण मिश्रक जन्म १७ जुलाई १९३७ ई. केँ ग्राम शोकहारा (बरौनी), जिला बेगूसरायमे भेलन्हि। हुनकर प्रकाशित कृति अछि सीमान्त, हम स्तवन नहि लिखब (कविता संग्रह)। आखर पत्रिकाक लब्धप्रतिष्ठ सम्पादक। मंत्रेश्वर झा-जन्म ६ जनवरी १९४४ ई.ग्राम-लालगंज, जिला-मधुबनीमे। प्रकाशित कृति: खाधि, अन्चिनहार गाम, बहसल रातिक इजोत (कविता संग्रह); एक बटे दू (कथा संग्रह), ओझा लेखे गाम बताह (ललित निबन्ध)। मैथिली कथा संग्रहक हिन्दी अनुवाद “कुंडली” नामसँ प्रकाशित। दि फूल्स पैराडाइज (अंग्रेजीमे ललित निबन्ध), कतेक डारि पर। हरेकृष्ण झा, जन्म १० जुलाई १९५० ई. गाम- कोइलखमे। अभियंत्रणक अध्ययण छोड़ि मार्क्सवादी राजनीतिमे सक्रिय। अनेक कविता आ आलोचनात्मक निबन्ध प्रकाशित। अनुवाद एवं विकास विषयक शोध कार्यमे रुचि। स्वतंत्र लेखन। प्रकृति एवं जीवनक तादात्म्य बोधक अग्रणी कवि। एना कतेक दिन (कविता संग्रह)। बुकर पुरस्कार: आस्ट्रेलियन पिता आऽ भारतीय माताक सन्तान ३३ वर्षीय बैचेलर श्री अरविन्द अडिग ऑक्सफोर्डसँ शिक्षा प्राप्त कएने छथि आऽ सम्प्रति मुम्बईमे रहैत छथि। हिनकर पहिल अंग्रेजी उपन्यास छन्हि द ह्वाइट टाइगर जाहि पर बिटेन, आयरलैण्ड आऽ कॉमनवेल्थ देशक वासी केँ देल जा रहल अंग्रेजी भाषाक उपन्यासक ५०,००० पौन्डक “मैन बुकर” पुरस्कार भेटलन्हि अछि आऽ बेन ओकेरीक बाद ई पुरस्कार प्राप्त केनिहार ई सभसँ कम उम्र केर लेखक छथि। द ह्वाइट टाइगर- ई उपन्यास हार्पर कॉलिन्स-रैन्डम हाउस द्वारा प्रकाशित भेल आऽ प्रकाश आऽ अन्हारक दू तरहक भारतक ई वर्णन करैत अछि। एकटा फर्मक मालिक बलराम जे शुरूमे गयासँ आयल बलराम हलवाई छलाह चीनी प्रधानमंत्री वेन जिआबाओक भारत आगमनपर अपन अनुत्तरित सात पत्र (हरिमोहन झाक पाँच पत्र आ ब्यासजीक दू पत्र जकाँ) केर माध्यमसँ अपन खिस्सा कहैत छथि। ओऽ एकटा रिक्शा चालकक बेटा छथि जे चाहक दोकानपर किछु दिन काज केलाक बाद दिल्लीमे एकटा धनिकक ड्राइवर बनैत छथि। फेर ओकरा मारि कय उद्योगपति बनि जाइत छथि। ड्राइवर सभ गप मालिकक सुनैत रहैत अछि, कलकत्ताक रिक्शाबला सभक खिस्सा सेहो अडिग सुनलन्हि आऽ दिल्लीक ड्राइवर लोकनिक सेहो आऽ खिस्साक प्लॊट बना लेलन्हि।  समालोचनाक स्थिति: हिन्दीक अखबार सभ ई पुरस्कार प्राप्त भेलाक बादो एहि पुस्तकक समीक्षा एकटा चीप टी.वी. सीरियलक पटकथाक रूपमे कएलन्हि। मैथिलीक समालोचनाक तँ गपे छोड़ू, अंग्रेजीक अखबार सभ मुदा नीक समीक्षा कएलक। दिल्लीक चिड़ियाघरमे एकटा ह्वाइट टाइगर छैक गेनेटिक म्युटेशनक परिणाम जे एक पीढ़ीमे एक बेर अबैत छैक नहियो अबैत छैक। बलराम हलवाईक खिस्सा सेहो ह्वाइट टाइगर जकाँ विरल भेटत बेशी तँ कमाइ-खाइमे जिनगी बिता दैत छथि। एकर हार्डबाउन्ड किताब २०,००० कॉपी बिका चुकल अछि। पेन्गुइन इण्डिया जे ई किताब छपबासँ इन्कार कएने छल कहलक जे क्रॉसवर्ड पुरस्कारसँ किताबक बिक्रीमे १००० कॉपीक वृद्धि होइत छैक, बुकर भेटलापर १०,००० कॉपी बेशी बिकाइत छैक आऽ साहित्य अकादमी भेटलापर अंग्रेजी किताब १० कॉपी बेशी बिकाइत अछि! श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर छठम खेप पढ़ू। सुभाष चन्द्र यादव आऽ भ्रमर जीक कथा,  महेश मिश्र "विभूति"-श्री पंकज पराशर-  विनीत उत्पल- श्यामल जीक पद्य आऽ प्रेमशंकर सिंह जीक शोध लेख अछि।, जितमोहन, रामलोचन ठाकुर,निमिष झा,राजेन्द्र विमल, रेवतीरमण लाल, दिगम्बर झा "दिनमणि", रूपा धीरू, ज्योति,विद्यानन्द झा, नवीननाथ झा, विनीत उत्पल,वृषेश चन्द्र लाल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि,विभूति,महेन्द्र मलंगिया, कुमार मनोज कश्यप, कृपानन्द झा. रामभरोस कापड़ि रोशन जनकपुरी, पंकज पराशर,वैकुण्ठ झा, प्रकाश झा आ हिमांशु चौधरी जीक रचनासँ सुशोभित ई अंक अछि। श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। शिवशंकर श्रीनिवास केर मैथिली कथाक अ‍ग्रेजी अनुवाद सेहो प्रस्तुत कएल गेल अछि। भारतक विश्वनाथन आनन्द वर्ल्ड चेस प्रतियोगिता जितलन्हि तँ भारत अपन चन्द्रयान-१ यात्रा सेहो शुरु कएलक। मुदा संगमे असमक बम विस्फोट, उड़ीसाक नन बलात्कार आ मालेगाँव विस्फोट मोरक पएर सिद्ध भेल। ०१ नवम्बर २००८ ४०म ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह ६ नवम्बर २००८: संसदक लाइब्रेरीक बालयोगी ऑडिटोरियममे कश्मीरी कवि श्री रहमान राहीकेँ प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह द्वारा प्रदान कएल जाएबला ४०म ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोहक आमंत्रण पाबि ओतए नियत समयसँ सायं छह बजे हम पहुँचलहुँ। अपन प्रतिष्ठाक अनुरूप प्रधानमंत्री निर्धारित समय ६.३० सायं पदार्पण केलन्हि। स्टेजपर श्री रवीन्द्र कालिया, निदेशक भारतीय ज्ञानपीठ, रहमान राही, डॉ. मनमोहन सिंह, सीताकान्त महापात्र, पुरस्कार चयन समितिक अध्यक्ष आऽ अखिलेश जैन, प्रबन्ध ट्रस्टी रहथि। दर्शकमे श्री टी.एन.चतुर्वेदी, अशोक वाजपेयी, आलोक पी. जैन आऽ ब्रजेन्द्र त्रिपाठी रहथि। ब्रजेन्द्रजी हमरा संग बैसल रहथि। स्व. साहू शान्ति प्रसाद जैन आऽ स्व. श्रीमति रमाजैन, एहि पुरस्कारक प्रारम्भ कएने रहथि आऽ हुनकर दुनू गोटेक फोटो पाछाँमे लागल रहन्हि। आइ काल्हि ४०म सालक महत्व एहि कारणसँ बढ़ि गेल अछि कारण ५०म वर्षगाँठक इन्तजारमे बहुत गोटे आयु बेशी भेने जीवित नहि रहैत छथि। सरला माहेश्वरी माइक पकड़ि कार्यक्रमक शुरुआतसँ पहिने अनिता जैनकेँ निराला रचित सरस्वती वन्दना गएबाक लेल अनुरोध कएलन्हि आऽ ओऽ मंचक दोसर भागमे महर्षि अगस्त्यक या कुन्देन्दुसँ शुरु कए निरालाक रचना शास्त्रीय पद्धतिमे गओलन्हि। फेर फूलसँ प्रधान मंत्रीक स्वागत प्रबन्ध न्यासी अखिलेश जैन द्वारा भेल, फेर रवीन्द्र कालिया फूलसँ रहमान राहीक स्वागत कएलन्हि। फेर श्री सीताकान्त महापात्र अंग्रेजीमे उद्गार व्यक्त करैत कहलन्हि जे राहीकेँ सम्मानित कए भारतीय ज्ञानपीठ अपनाकेँ सम्मानित कएलक अछि। फेर प्रधानमंत्री द्वारा राहीकेँ शॉल ओढ़ा कए आऽ १०३५ ई.क राजा भोजक सरस्वतीक प्रतिमाक कांस्य अनुकृति जाहिमे ज्ञानपीठ द्वारा प्रभामण्डल जोड़ल गेल (मूल प्रतिमा लंदनक ब्रिटिश म्यूजियममे अछि) आऽ प्रशस्ति पत्र आऽ ५ लाख टाकाक ड्राफ्ट दए सम्मानित कएल गेल। राही उद्गार व्यक्य कएलन्हि आऽ महान जवाहरलाल नेहरूक जाहि पदपर छलाह ओहि पदपर आसीन मनमोहन सिंहसँ पुरस्कार प्राप्त कए विशेष प्रसन्नता प्रकट कएलन्हि। फेर रवीन्द्र कालिया धन्यवाद ज्ञापन कएलन्हि। राहीक प्रतिनिधि कविताक ज्ञानपीठ द्वारा कएल हिन्दी अनुवाद राही द्वारा प्रधान मंत्रीकेँ देल गेल। अब्दुल रहमान राहीक जन्म ६ मई १९२५ ई.केँ भेल। हुनकर पहिल कविता संग्रहकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल। भारत सरकारक पद्म श्री आऽ मानव संसाधन विकास मंत्रालयक एमिरेट्स फेलोशिप हिनका भेटल छन्हि। हिनकर कविता संग्रहमे सनवुन्य साज, सुबहुक सोदा, कलाम-ए-राही प्रमुख अछि। हिनकर आलोचना आऽ निबन्धक पोथी अछि, कहवट आदि। प्रस्तुत अछि हिनकर कविता “परछाइयाँ”(कश्मीरीसँ अंग्रेजी एस.एल.सन्धु, अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर) छाह सभ अपन नियतिसँ वाद आऽ अमरताक आशा आब छोड़ि दिअ, यदि जुटा ली किछु क्षण, तँ भेर भऽ जाऊ ताहिमे। बस्तीक जाहि पथमे चलैत रहलहुँ, ओऽ धँसि गेल घनगर बोनमे, जेना हमर आस्थाक कवच भेल भेद्य केलक शंकासभ। आँखि खुजिते हमर स्वप्नकेँ लागल आँखि सभटा बासन्ती युवा छाती झरकि कए भऽ गेल सुनसान। देखू तँ देखायत आस-पड़ोसमे लावण्यमयी मेला, हाथमे आएत मात्र एकाध विचार, आऽ असगर एकटा कौआ उजाड़मे। कखनो हमर इच्छा रहए चान-तरेगन गढ़बाक, आब माथ भुका रहल छी अपन कोनो नामकरण तँ करी। सभटा विश्वास घाटीक मौलायल हरैयरी सन, सभटा चैतन्य खिसियायल साँप सन। सभटा देवता हमर अपन छाह छथि, सभटा दानव हमर अहं केर कनिया-पुतड़ा सन। सभा भवन भरल बुझू बानरक खोँ-खोँ सँ, सन्तक पहिरनक लेल ताकू बोने-बोन। केहन अछि नाओक खेबनाई, कतए तँ अछि किनार! देशांस भोथलेलक नाओकेँ अन्हारमे। हे रौ नटुआ, नाच निर्वस्त्र चारू कात ओकर, राही तँ आगि-खाएबला बताह अछि। समारोह एक घण्टामे खतम भेल आऽ घुरैत रही तँ एफ.एम.पर समाचार भेटल जे सचिन तेन्दुलकर अपन टेस्ट जीवनक ४०म शतक दिनमे पूर्ण कएलन्हि। भीमसेन जोशीकेँ भारत रत्न पुरस्कार देल गेल। आऽ चन्द्रायण-१ चन्द्रमाक १०० किलोमीटरक वृत्ताकार कक्षामे स्थापित भऽ गेल जतए ओऽ २ वर्ष धरि रहत। १५ नवम्बर २००८ ई अ‍ंकक समर्पण गर्वक-संग ओहि 16 बलिदानीक नाम जे मुम्बईमे देशक सम्मानक रक्षार्थ अपन प्राणक बलिदान देलन्हि। १.एन.एस.जी. मेजर सन्दीप उन्नीकृष्णन् २.ए.टी.एस.चीफ हेमंत कड़कड़े ३.अशोक कामटे ४.इंस्पेक्टर विजय सालस्कर ५.एन.एस.जी हवलदार गजेन्द्र सिंह "बिष्ट" ६.इंस्पेक्टर शशांक शिन्दे ७.इंस्पेक्टर ए.आर.चिटले ८.सब इंस्पेक्टर प्रकाश मोरे ९.कांस्टेबल विजय खांडेकर १०.ए.एस.आइ.वी.अबाले ११.बाउ साब दुर्गुरे १२.नानासाहब भोसले १३.कांसटेबल जयवंत पाटिल १४.कांसटेबल शेघोष पाटिल १५.अम्बादास रामचन्द्र पवार १६.एस.सी.चौधरी १ दिसम्बर २००८ विदेहक नव अंक (अंक २४, दिनांक १५ दिसम्बर २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | ४१म आ ४२म ज्ञानपीठ पुरस्कारक घोषणा- हिन्दीक नवीन कविता आन्दोलनक सशक्त कवि श्री कुँवर नारायणकेँ ४१म ज्ञानपीठ पुरस्कार (२००५) आ कोंकणीक श्री रवीन्द्र केलेकर आ संस्कृतक श्री सत्यव्रत शास्त्रीकेँ संयुक्त रूपसँ ४२म ज्ञापीठ पुरस्कार (२००६) देबाक घोषणा भेल अछि। श्री कुँवर नारायणक जन्म १९२७ ई. मे भेलन्हि। अज्ञेय द्वारा सम्पादित "तीसरा सप्तक"क सशक्त कवि कुँवर नारायणकेँ एहिसँ पहिने साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटि चुकल छन्हि। श्री रवीन्द्र केलेकरक जन्म १९२५ ई.मे भेलन्हि, हिनकर  कोंकणी भाषा मण्डलक निर्माणमे प्रमुख भूमिका रहल छन्हि। श्री सत्यव्रत शास्त्री संस्कृतमे तीन गोट महाकाव्यक रचना कएने छथि। रवीन्द्र केलेकर आ सत्यव्रत शास्त्रीकेँ सेहो साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटि चुकल छन्हि। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० दिसम्बर २००८) ७० देशक ६७३ ठामसँ १,३६,८७४ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। १५ दिसम्बर २००८ अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। वरिष्ठ रचनाकार अपन रचना हस्तलिखित रूपमे सेहो नीचाँ लिखल पता पर पठा सकैत छथि। गजेन्द्र ठाकुर 389,पॉकेट-सी, सेक्टर-ए, बसन्तकुंज,नव देहली-११००७०. फोन:०११-४१७७१७२५/ ९८११३८२०७८ http://www.videha.co.in ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.co.in  ggajendra@yahoo.co.in

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् १. श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।२. संदेश२. संदेश २. संदेश २. संदेश २. श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह| ३. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू। ५. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६. श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८. श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। ९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १०. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। ११. डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १२. श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी। १३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल। १४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी,  एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल। (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर  'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक  'सहस्रबाढ़नि' (उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ' (कथा संग्रह), 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य), शोध लेख आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे “कुरुक्षेत्रम् : अन्तर्मनक”नामसँ श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल जा रहल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com . संग मे पकज पराशर आ विनीत उत्पलक पद्य संग्रह, आऽ मौनजी आ प्रेमशंकर सिंह जीक निबन्ध संग्रह सेहो विदेह डाटाबेशक आधारपर श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल जा रहल अछि।) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी  शब्द कोश २. अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३. मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे छापल जा रहल अछि- सकलन, डिजिटल इमेजिंग आ लिप्यांतरण- विद्यानन्द झा “पञ्जीकार, नागेन्द्र कुमार झा आ गजेन्द्र ठाकुर।

3737 37 37 गजेन्द्र ठाकुर (जन्म 1971) कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ -लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन प्रेसमे अछि। ई-मेल- ggajendra@airtelmail.in स्व. श्री हरिमोहन झा (१९०८-१९८४) जन्म १८ सितम्बर १९०८ ई. ग्राम+पो.- कुमर बाजितपुर , जिला- वैशाली, बिहार, भारत। पिता- स्वर्गीय पं. जनार्दन झा “जनसीदन” मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दीक लब्धप्रतिष्ठ द्विवेदीयुगीन कवि-साहित्यकार। शिक्षा- दर्शनशास्त्रमे एम.ए.- १९३२, बिहार-उड़ीसामे सर्वोच्च स्थान लेल स्वर्णपदक प्राप्त। सन् १९३३ सँ बी.एन.कॉलेज पटनामे व्याख्याता, पटना कॉलेजमे १९४८ ई.सँ प्राध्यापक, सन् १९५३ सँ पटना विश्वविद्यालयमे प्रोफेसर तथा विभागाध्यक्ष आऽ सन् १९७० सँ १९७५ धरि यू.जी.सी. रिसर्च प्रोफेसर रहलाह। हिनकर मैथिली कृति १९३३ मे “कन्यादान” (उपन्यास), १९४३ मे “द्विरागमन”(उपन्यास), १९४५ मे “प्रणम्य देवता” (कथा-संग्रह), १९४९ मे “रंगशाला”(कथा-संग्रह), १९६० मे “चर्चरी”(कथा-संग्रह) आऽ १९४८ ई. मे “खट्टर ककाक तरंग” (व्यंग्य) अछि। “एकादशी” (कथा-संग्रह)क दोसर संस्करण १९८७ ए. मे आयल जाहिमे ग्रेजुअट पुतोहुक बदलाने “द्वादश निदान” सम्मिलित कएल गेल जे पहिने “मिथिला मिहिर”मे छपल छल मुदा पहिलुका कोनो संग्रहमे नहि आएल छल।श्री रमानथ झाक अनुरोधपर लिखल गेल “बाबाक संस्कार” सेहो एहि संग्रहमे अछि।  आऽ हुनकर “खट्टर काका” हिन्दीमे सेहो १९७१ ई. मे पुस्तकाकार आएल। एकर अतिरिक्त हिनकक स्फुट प्रकाशित-लिखित पद्यक संग्रक “हरिमोहन झा रचनावली खण्ड ४ (कविता)” एहि नामसँ १९९९ ई.मे छपल आऽ हिनकर आत्मचरित “जीवन-यात्रा” १९८४ ई.मे छपल। हरिमोहन बाबूक “जीवन यात्रा” एकमात्र पोथी छल जे मैथिली अकादमी द्वारा प्रकाशित भेल छल आऽ एहि ग्रंथपर हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कार १९८५ ई. मे मृत्योपरान्त देल गेलन्हि। साहित्य अकादमीसँ १९९९ ई. मे “बीछल कथा” नामसँ श्री राजमोहन झा आऽ श्री सुभाष चन्द्र यादव द्वारा चयनित हिनकर कथा सभक संग्रह प्रकाशित कएल गेल, एहि संग्रहमे किछु कथा एहनो अछि जे हिनकर एखन धरिक कोनो पुरान संग्रहमे सम्मिलित नहि छल। हिनकर अनेक रचना हिन्दी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, तेलुगु आदि भाषामे अनुवादित भेल। हिन्दीमे “न्याय दर्षन”, “वैशेषिक दर्शन”, “तर्कशास्त्र”(निगमन), दत्त-चटर्जीक “भारतीय दर्शनक” अंग्रेजीसँ हिन्दी अनुवादक संग हिनकर सम्पादित “दार्शनिक विवेचनाएँ” आदि ग्रन्थ प्रकाशित अछि। अंग्रेजीमे हिनकर शोध ग्रंथ अछि- “ट्रेन्ड्स ऑफ लिंग्विस्टिक एनेलिसिस इन इंडियन फिलोसोफी”। प्राचीन युगमे विद्यापति मैथिली काव्यकेँ उत्कर्षक जाहि उच्च शिखरपर आसीन कएलनि, हरिमोहन झा आधुनिक मैथिली गद्यकेँ ताहि स्थानपर पहुँचा देलनि। हास्य व्यंग्यपूर्णशैलीमे सामाजिक-धार्मिक रूढ़ि, अंधविश्वास आऽ पाखण्डपर चोट हिनकर लेखनक अन्यतम वैशिष्ट्य रहलनि। मैथिलीमे आइयो सर्वाधिक कीनल आऽ पढ़ल जायबला पीसभ हिनकहि छनि। हरिमोहन झा समग्र हरिमोहन झा जीक समग्र रचनाक एक बेर सिंहावलोकन कएल जाए। कथा-एकांकी १.    १.अयाची मिश्र (एकाङ्की) २.   मंडन मिश्र (एकाङ्की) ३.   महाराज विजय (एकाङ्की)४.  बौआक दाम (एकाङ्की)५.रेलक झगड़ा (एकाङ्की) ६. संगठनक समस्या- पत्र शैली  ७. “रसमयी”क ग्राहक – पत्र-शैली  ८.पाँच पत्र –पत्र-शैली  ९. दलानपरक गप्प१०.घूरपरक गप्प११.पोखड़िपरक गप्प  १२. चौपाड़िपरक गप्प १३.धर्मशास्त्राचार्य १४.ज्योतिषाचार्य १५.पंडितजी १६.कविजी १७.परिवर्तन १८.युगक धर्म १९.महारानीक रहस्य २०.सात रंगक देवी २१.नौ लाखक गप्प २२.रंगशाला २३.अँचारक पातिल २४.चिकित्साक चक्र २५.रेशमी दोलाइ २६.धोखा २७.प्रेसक लीला २८.देवीजीक संस्कार २९.एहि बाटे अबै छथि सुरसरि धार ३०. कन्याक जीवन ३१. रेलक अनुभव ३२. ग्रामसेविका ३३. मर्यादाक भंग ३४. तिरहुताम ३५.टोटमा ३६.तीर्थयात्रा ३७.अलंकार-शिक्षा ३८.बाबाक संस्कार ३९.द्वादश निदान ४०.ग्रेजुएट पुतोहु ४१.ब्रह्माक शाप ४२.आदर्श भोजन ४३.सासुरक चिन्ह ४४.कालीबाड़ीक चोर ४५.कालाजारक उपचार४६.विनिमय ४७.दरोगाजीक मोंछ ४८.शास्त्रार्थ ४९.विकट पाहुन ५०.आदर्श कुटुम्ब ५१.साझी आश्रम ५२.घरजमाय५३.भदेशक नमूना ५४.बीमाक एजेन्ट ५५.अंगरेजिया बाबू पद्य १.सनातनी बाबा ओ कलियुगी सुधारक २.कन्याक नीलामी डाक ३.मिथिलाक मिहिर सँ ४.ढाला झा ५.टी. पार्टी ६.बुचकुन झा ७.पंडित लोकनि सँ ८.निरसन मामा ९.आगि १०.अङरेजिया लड़कीक समदाउनि ११.गरीबनीक बारहमासा १२.श्री यात्रीजीक प्रति : मैथिलीक उक्ति १३.सौराठ १४.अलगी १५.अशोक-वाटिकामे १६.पटना-स्तोत्र १७.श्रद्धेय अमरनाथ झाक प्रति श्रद्धांजलि १८.हिन्दी ओ मैथिली १९.बुचकुन बाबाक चिट्ठी २०.जगमग-जगमग दीप जराऊ २१.कलकत्ता गेला उत्तर २२.अकाल २३.कलकत्ता हमरा बड़ पसन्द २४.सलगमक खण्ड २५.बूढ़ानाथ २६.नवकी पीढ़ीसँ २७.पंडित ओ मेम २८.पंडित-विलाप २९.गंगाक घाटपर ३०.समयक चक्र ३१.महगी-माहात्म्य ३२.रस-निमन्त्रण ३३.अकविताक प्रति : कविताक उक्ति ३४.हम पाहुन छी ३५.अनागत प्रेयसीसँ ३६.मत्स्य-तीर्थ ३७.मिष्टान्न ३८.हे राजकमल ३९.घटक सौं ४०.पंडितजी सौं ४१.कनियाँक समस्या ४२.मुक्तक ४३.गजल ४४.मातृभूमि ४५.नारी-वन्दना ४६.हे दुलही के माय ४७.मात्रूभूमि वन्दना ४८.चन्द्रमाक मृत्यु ४९.मिथिला वन्दना ५०.कवि हे! आब कोदारि धरु ५१.महगी ५२.नव पराती ५३.चालिस आ चौहत्तरि ५४.प्रयोगवादी कविता ५५.स्व. ललित नारायण मिश्रक स्मृतिमे ५६.उद्गार ५७.अन्तिम सत्य ५८.मधुर भाषा मैथिली छी ५९.छगुन्ता ६०.विद्यापति पर्व महान हमर ६१.आठ संकल्प ६२.घूटर काका ६३.वनगाम-महिषी स्मृति ६४.मैथिली-वन्दना ६५.हे मातृभूमि केर माटि ६६.कहू की औ बाबू ६७.कश्मीर हमर थीक ६८.मंगल प्रभात ६९.बुचकुन बाबाक स्वप्न ७०.जय विद्यापति ७१.शुभांशसा ७२.पारिचारिका स्तोत्र ७३.मनचन बाबा ७४.एहि बेरक फगुआ ७५.परतारु जुनि ७६.हे मजूर! कष्ट लखि अहाँक (कविजी: प्रणम्य देवता) ७७.हे हे मजूर! (कविजी: प्रणम्य देवता) ७८.अबि! अनन्त कोमल करुणे! (कविजी: प्रणम्य देवता) ७९.हे वीर! हलायुध धर खड्ग(कविजी: प्रणम्य देवता) ८०.अयि! प्रचंड चंडिके! (कविजी: प्रणम्य देवता) ८१.झाँसीक रानी(कविजी: प्रणम्य देवता) ८२.हे प्रगतिशील महिला समाज(कविजी: प्रणम्य देवता) ८३.प्रिये! हम जाइत छी ओहि पार(कविजी: प्रणम्य देवता) ८४.धन्य-धन्य मातृभूमि (अयाची मिश्र : चर्चरी) ८५.धन्य ई मिथिलेशक दरबार(अयाची मिश्र : चर्चरी) ८६.हे डीह! अमर कीर्तिक निधान! (अयाची मिश्र : चर्चरी) ८७.हरिहर जन्म किएक लेल (माछक महत्व : खट्टर ककाक तरंग) ८८.केहन भेल अन्हेर(खट्टर ककाक टटका गप्प : खट्टर ककाक तरंग) खट्टर ककाक तरंग (कथा-व्यंग्य) कन्यादान (उपन्यास) द्विरागमन (उपन्यास) जीवनयात्रा (आत्मकथा) कन्यादानक समर्पण- जे समाज कन्या कैं जड़ पदार्थवत् दान कय देबा मे कुंठित नहि होइत छथि, जाहि समाजक सूत्रधार लोकनि बालक कैं पढ़ैबाक पाछाँ हजारक हजार पानि मे बहबैत छथि और कन्याक हेतु चारि कैञ्चाक सिलेटो कीनब आवश्यक नहि बुझैत छथि, जाहि समाजमे बी.ए. पास पतिक जीवन-संगिनी ए बी पर्यन्त नहि जनैत छथिन्ह, जाहि समाज कैं दाम्पत्य-जीवनक गाड़ी मे सरकसिया घोड़ाक संग निरीह बाछी कैं जोतैत कनेको ममता नहि लगैत छन्हि, ताही समाजक महारथी लोकनिक कर-कुलिश मे ई पुस्तक सविनय, सानुरोध ओ सभय समर्पित। प्रणम्य देवताक समर्पण- आइ सँ सात वर्ष पूर्व जे कार्तिकी पूर्णिमाक करार पर हमरा सँ पैंच लऽ गेलाह और तहियासँ पुनः कहियो दर्शन देबाक कृपा नहि कैलन्हि, जनिक चिर-स्मरणीय कीर्ति-कलाप प्रथमे कथा मे विशद रूप सँ वर्णित छैन्ह, जे “प्रणम्य देवता” क मध्य सर्वश्रेष्ठ आसन पर अधिकार जमा सकैत छथि, जनिक वन्दनीय बन्धुवर्ग ई पुस्तक देखि विनु मङनहि अपन स्वत्व स्थापित कय लऽ सकैत छथि, तेहन प्रमुख चरित-नायक, विकट पाहुन भीमेन्द्रनाथ क सुदृढ़ विशाल मुष्टिमे ई विचित्र-चरित्र-पूर्ण पोथी विवशतापूर्वक अर्पित छैन्ह! खट्टर ककाक तरंगक समर्पण- जे भंगक तरंगमे काव्य-शास्त्र-विनोदक धारा बहा दैत छथि; जनिक प्रवाहमे थोड़ेक कालक हेतु वेद-पुराण, धर्मशास्त्र, सभटा भसिया जाइत अछि; जे बात-बातमे अद्भुत रस ओ चमत्कारक चाशनी घोरि दैत छथि; जे मर्मस्पर्षी व्यंग्य द्वारा लोकक अन्तस्तल मे पहुँचि गुदगुदी लगा दैत छथि; तेहन चिर आनन्दमूर्ति, परिहास-प्रिय खट्टर कका कैं- त्व्दीयं वस्तु पितृव्य! तुभ्यमेव समर्पितम्। रंगशालाक समर्पण- जे अक्षययौवना नटी एहि अनादि अनन्त रंगशालाक प्रवर्तिका थिकीह, जे मनोहर वीणा-वादिनी सम्पूर्ण चराचर विश्वकैं अपना आंगुरक अग्रभाग पर नचा रहल छथि, जे रहस्यमयी अपन मोहिनी लीलाक झलक देखाय ककरो स्पर्श नहि करय दैत छथिन्ह, जे कल्पनाक रंगीन पाँखि पर आबि कलाकारक कलामे रसक संचार करैत छथिन्ह, तेहन आश्चर्यकारिणी चिरसुन्दरी त्रैलोक्य-विजयिनी माया देवी कैं। 1.शोध लेख. 1.विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी(1878-1952) जन्म स्थान- ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी,जिला-मधुबनी. मूल-पगुल्बार राजे गोत्र-शाण्डिल्य वंशावली- जीवन चौधरी(जन्म स्थान-पंचोभ-दरिभङ्गा) 1801 ई.मे रुद्रपुर आगमन -दुइ पुत्र--श्री रंगी चौधरी(रुद्रपुरमे जन्म) आ’ श्री कंत चौधरी(रुद्रपुरमे जन्म) -कंत चौधरीकेँ तीन पुत्र-श्री चुम्मन चौधरी,श्री बुधन चौधरी आ’ श्री रूदन चौधरी -चुम्मन चौधरीकेँ दुइ पुत्र श्री गोनी चौधरी आ’ श्री पं कवि रामजी चौधरी. श्री जीवन चौधरी जे कविक वृद्ध-पितामह छलाहतनिकर दोखतरी रुद्रपुरमे रहन्हि,जाहि कारणसँ ओ’ 1801 ई.मे पंचोभ छोड़ि रुद्रपुर बसि गेलाह। कविजीक पितामह बहुत पैघ गवैय्या रहथिन्ह।हुनकर गायनक मुख्य क्षेत्र युगल सरकार सीतारामक भक्ति गीत होइत छल,तजकर प्रभाव कविजी पर खूब पड़ल।ओ’ अप्पन पौत्रक नाम रामजी एहि कारणसँ रखलन्हि। स्व.कविजी अपन नामक अनुरूप तुलसीकृत श्रीरामचरित मानस कंठस्थ कय गेल छलाह। ओ’ प्रत्येक प्रश्नक उत्तर रामायणक चौपायसँ करैत छलाह। हुनकर जीवनक सभसँ दुःखद घटना छन्हि जे ओ’ तीन विवाह कएल मुदा कोनो पत्नी चारि सालसँ बेशी नहि जीबि सकलखिन्ह।अंतिम विवाह ओ’ 53 वर्षक अवस्थामे कएल ,जे एक पुत्र, जनिकर नाम दुर्गानाथ चौधरी (दुखिया चौधरी)छन्हि,,,,केर जन्मदेलाक 15 दिनक भीतरे स्वर्गवासी भय गेलीह। कविजी अप्पन जीवनकालमे दरिभङ्गा राजक अंतर्गत जेठ रैय्यतक पद पर कार्यरत छलाह,तथा तेसर पत्नीक मृत्युक उपरांत ओ’ ईहो पद त्यागि कय भगवद भक्तिमे लागि गेलाह। हिनकर एकमात्र प्रकाशित पोथीमे मैथिलीक संगे ब्रजबुलीक कविता सेहो अछि। सर्वतंत्र स्वतंत्र श्री धर्मदत्त झा(बच्चा झा) (1860 ई.-1921 ई.) (भाग-3) पं. रत्नपाणि झाक पुत्र केँ बच्चा झाकेँ अपर गङ्गेश उपाध्याय सेहो कहल जाइत अछि। हिनकर प्रारम्भिक अध्ययन गामे पर भेलन्हि। तकरा बाद ओ’ विश्वनाथ झासँ अध्ययनक हेतु ‘ठाढ़ी’ गाम चलि गेलाह। फेर बबुजन झा आ’ ऋद्धि झासँ न्यायदर्शनक विधिवत अध्ययन कएलन्हि। फेर धर्मदत्त झा प्रसिद्ध बच्चा झा काशी गेलाह। ओतय स्वामी विशुद्धानन्द सरस्वतीसँ मीमांसा, वेदान्तक अध्ययन कएलन्हि। सन् 1886 ई. केर गप छी। एकटा पुष्करिणीक उद्घाटनक उत्सवमे दामोदर शास्त्री जी काशीसँ मिथिलाक राघोपुर ग्राममे निमंत्रित भेल छलाह। ओतय हुनकर शास्त्रार्थ परम्परानुसार बच्चा झाक विद्यागुरु ऋद्धि झासँ भेल छलन्हि। एहिमे ऋद्धि झा परास्त भेल छलाह। गुरुक पराजयक प्रतिशोध लेबाक हेतु सन् 1889 मे बच्चा झा काशी गेलाह। बच्चा झाक उम्र ओहि समयमे 29 वर्ष मात्र छलन्हि। ओ’ प्रायः दामोदर शास्त्रीकेँ लक्ष्य करैत छलाह, जे काशीक वैय्याकरणिक पण्डित लोकनिकेँ शब्द-खण्डक कोनो ज्ञान नहि छन्हि।बच्चा झा समस्त काशीक विद्वान् लोकनिकेँ शास्त्रार्थक हेतु ललकारा देलन्हि। दामोदर शास्त्रीसँ भेल शास्त्रार्थक वर्णन पछिला अंकमे कएल जा’ चुकल अछि। शास्त्रार्थ तीन दिन धरि चलल। ई शास्त्रार्थ सन्ध्यासँ शुरू होइत छल, आ’ मध्य रात्रि धरि चलैत छल।शास्त्रार्थक तेसर दिन दामोदर शास्त्री तर्क कएनाइ बन्न कए देलन्हि, आ’ श्रोताक रूपमे बच्चा झाक तर्क सुनैत रहलाह। पं शिवकुमार शास्त्री आ’ कैलाशचन्द्र शिरोमणि दू टा निर्णायक छलाह। शिरोमणिजीक दृष्टिमे वादी श्री बच्चा झाक पक्ष न्यायशास्त्रक दृष्टिसँ समुचित छल। शिवकुमारजीक सम्मतिमे प्रतिवादी श्री दामोदरशास्त्रीक पक्ष व्याकरणक मंतव्यानुसार औचित्यसम्पन्न छलन्हि।दुनू पण्डितक शास्त्रार्थ कलाक संस्तुति कएल गेल आ’ दुनू गोटेकेँ अपन सिद्धान्तक उत्कृष्ट व्यवस्थापनक लेल विजयी मानल गेल। बच्चा झा गामेमे रहि कए अध्यापन करैत छलाह। मुदा महाराजाधिराज दरभंगा नरेश श्री रमेश्वरसिंहक अकाट्य आग्रहक कारणसँ मुजफ्फरपुरक धर्म समाज संस्कृत कॉलेजक प्रधानाचार्यक पद स्वीकार कएलन्हि। मुदा एकर एकहि वर्षमे ओ’ शरीर त्याग कए देलन्हि। बच्चा झाजीकेँ समालोचकगण किछु उदण्ड आ’ अभिमानी मनबाक गलती करैत रहलाह अछि। मुदा एकटा उदाहरण हमरा लगमे एहन अछि, जाहिसँ ई गलत सिद्ध होइत अछि। ई घटना एहन सन अछि। मुजफ्फरपुर धर्मसमाज संस्कृत विद्यालयमे बच्चा झा प्रधानाचार्य/अध्यक्ष पद पर छलाह, आ’ हुनकर शिष्य पं बालकृष्ण मिश्र ओतय प्रध्यापक छलाह। ओहि समय काशीक पण्डित-पत्रमे गंगाधर शास्त्रीक एकटा श्लोकक विषयमे बच्चा झा कहलन्हि, जे एहि श्लोकमे एकहि पदर्थ वारिधर एक बेर मृदंग बजबय बला चेतन व्यक्त्तिक रूपमे आ’ दोसर बेर वैह अम्बुद- जवनिकारूपी अचेतन रूपमे वर्णित अछि। एतय पदार्थाशुद्धि अछि। एहि पर हुनकर शिष्य बालकृष्ण टोकलखिन्ह- गुरुजी! एहिमे कोनो दोष नहि अछि। किएक तँ वारिकेँ धारण करए बला मेघ(वारिधर) केर स्थिति आकाशमे ऊपर होइत अछि, आ’ अम्बु(जल) केँ देबय बला मेघ (अम्बुद) केर स्थिति नीचाँ होइत अछि।अतः दुनूमे स्थानक भिन्नता अछि। वारिधर आ’ वारिद एहि दुनू शब्दसँ दू भिन्न अर्थ ज्ञात होइत अछि। ताहि हेतु एतय पदार्थक अशुद्धि नहि अछि। ई श्लोक निम्न प्रकारे छल:- मृदुमृदङ्गनिनादमनोहरे, ध्वनित वारिधरे चपला नटी। वियति नृत्यति रङ्ग इवाम्बुदे, जवनिकामनुकुर्वति सम्प्रति॥ श्री रामाश्रय झा ’रामरंग’ भारतीय शास्त्रीय संगीतक समर्पित आऽ विलक्षण ओऽ विख्यात संगीतज्ञ पं रामाश्रय झा ’रामरंग’ केर जन्म ११ अगस्त १९२८ ई. तदनुसारभाद्र कृष्णपक्ष एकादशी तिथिकेँ मधुबनी जिलान्तर्गत खजुरा नामक गाममे भेलन्हि। हिनकर पिताक नाम पं सुखदेव झा आऽ काकाक नाम पं मधुसदन झा छन्हि। रामाश्रयजीक संगीत शिक्षा हिनका दुनू गोटेसँ हारमोनियम आऽ गायनक रूपमे मात्र ५ वर्षक आयुमे शुरू भए गेलन्हि। तकरा बाद श्री अवध पाठकजीसँ गायनक शिक्षा भेटलन्हि। १५ वर्ष धरि बनारसक एकटा प्रसिद्ध नाटक कम्पनीमे रामाश्रय झा जी कम्पोजरक रूपमे कार्य कएलन्हि। पं भोलानाथ भट्ट जी सँ २५ वर्ष धरि ध्रुवपद, धमार, खयाल, ठुमरी, दादरा, टप्पा शैली सभक विधिवत शिक्षा लेलन्हि। पं भट्ट जीक अतिरिक्त्त रामाश्रय झा जी पं बी.एन. ठकार (प्रयाग), उस्ताद हबीब खाँ (किराना), पं बी.एस. पाठक (प्रयाग) सँ सेहो संगीतक शिक्षा प्राप्त कएलन्हि। पं झा १९५४ सँ प्रयागमे स्थाई रूपसँ रहि रहल छथि। १९५५ ई.मे हिनकर नियुक्त्ति लूकरगंज संगीत विद्यालयमे संगीत अध्यापक रूपमे भेलन्हि। १९६० ई.मे हिनकर नियुक्त्ति प्रयाग संगीत समितिमे भेलन्हि, जतए १९७० धरि प्रभाकर आऽ संगीत प्रवीण कक्षाक शिक्षक रहलाह। १९७०मे इलाहाबाद विश्वविद्यालयक संगीत विभागाध्यक्ष श्री प्रो. उदयशंकर कोचकजी पं झाक संगीत क्षेत्रक सेवासँ प्रभावित भए विश्वविद्यालयमे हिनकर नियुक्त्ति कएलन्हि। पं झा उत्कृष्ट शिक्षक, गायक आऽ आकाशवाणीक प्रथम श्रेणीक कलाकार छथि। हिनकर अनेक शिष्य-शिष्या आकाशवाणीक प्रथम श्रेणीक कलाकार आऽ उत्तम शिक्षक छथि, जेना- डॉ. गीता बनर्जी, श्रीमति कमला बोस, श्रीमति शुभा मुद्गल, श्रीकान्त वैश्य,श्री शान्ता राम कशालकर, श्री शान्ता राम कशालकर, श्री कामता खन्ना, श्रीमति सत्या दास, डॉ. रूपाली रानी झा, डॉ इला मालवीय, श्री अनिल कुमार शर्मा, श्री रामशंकर सिंह, श्रीमति संगीता सक्सेना, श्री राजन पर्रिकर, श्रीमति रचना उपाध्याय, श्री नरसिंह भट्त, श्री भूपेन्द्र शुक्ला, श्री जगबन्धु इत्यादि। पं झा संगीत शास्त्र केर श्रेष्ठ लेखक छथि आऽ हिनकर लिखल अभिनव गीतांजलि केर पांचू भाग प्रकाशित भए चुकल अछि, जाहिमे २००सँ ऊपर रागक व्याख्या अछि आऽ दू हजारक आसपास बंदिश अछि। मिथिलावासी श्री रामरंग राग तीरभुक्त्ति, राग वैदेही भैरव, आऽ राग विद्यापति कल्याण केर रचना सेहो कएने छथि आऽ मैथिली भाषामे हिनकर खयाल ’रंजयति इति रागः’ केर अनुरूप अछि। १९८२ मे उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कारक संगे ’रत्न सदस्यता’ सेहो देल गेलन्हि। संगीत लेखनक हेतु काका हाथरसी पुरस्कार, आऽ भारतक सर्वोच्च संगीत संस्था आइ.टी.सी. केर सम्मान सेहो हिनक भेटि चुकल छन्हि। २०० ई. मे स्वर साधना रत्न अवार्ड, २००५ मे संगीत नाटक अकादेमीक राष्ट्रीय पुरस्कार, भारत संगीत रत्न, राग ऋषि, संत तुलसीदास सम्मान, प्रायाग गौरव एवं सोपरी अकादेमीक ’सा म प वितस्ता’ इत्यादि सम्मान श्री झाकेँ प्राप्त छन्हि। श्री रामरंग जी प्रयागमे ’वारिन दास संगीत परिषद’ केर स्थापना कए अनेकानेक संगीत समारोहक आयोजन सेहो कएने छथि। ’इलाहाबाद विश्वविद्यालय संगीत सम्मेलन’ ३० वर्षसँ बन्द पड़ल छल जकरा वार्षिक रूपसँ १९८० मे पुनः श्री झा आरम्भ करबओलन्हि। किएक तँ श्री झा लग कोनो औपचारिक डिग्री नहि छलन्हि, इलाहाबाद विश्वविद्यालय अपन नियममे परिवर्त्तन कएलक आऽ हिनका ओतए संगीत विभागाध्यक्ष बनाओल गेलन्हि, जतएसँ ओऽ १९८९ ई. मे सेवानिवृत्त भेलाह। तुलसीक मानसक आधार पर श्री झा सात काण्डक संगीत रामायणक सेहो रचना कएलन्हि। पं झा मुख्य रूपसँ खयाल, ठुमरी, दादरा, टप्पा आऽ संगहि ध्रुवपद, धमार, तराना, तिरवट, चतुरंग, रागमाला, रागसागर, रागताल सागर, भजन आऽ लोकगीत गायनमे सिद्ध छथि। अखन ८० वर्षक आयुमे प्रयागमे श्री झा संगीत साधनामे रत छथि। दानवीर दधीची मंच सज्जा अम्र वन, पोखरि आ’ युद्ध स्थल वेष-भूषा अधो वस्त्र- आश्रमवासीक हेतु आश्विनक हेतु वैद्यक श्वेत वस्त्र आ’ इन्द्रक हेतु योद्धाक वस्त्र रथ आ’ अस्त्र शस्त्रक चित्र पर्दा पर छायांकित कएल जा’ सकैत अछि। प्रथम दृश्य ( महर्षि दध्यङ आथर्वन दधीचीक तपोवनक दृश्य। सूर्योदयक स्वर्णिम आभा, फूलक गाछक फूलक संग पवनक प्रभावसँ सूर्य दिशि झुकब। यज्ञक धूँआसँ  मलिन भेल गाछक पात। महर्षि सूर्योदयक दृश्यक आनन्द लए रहल छथि। मुदा दृष्टिमे अतृप्त भाव छन्हि। ओहि आश्रमक कुलपति थिकाह महर्षि, दस सहस्र छात्रकेँ विद्यादान करैत छथि, सभक नाम, गाम आ’ कार्यसँ परिचित छथि। से ओ’ तखने प्रवेश करैत एकटा अपरिचित आगंतुकक आगमन सँ साकांक्ष भ’ जाइत छथि।) दध्यङ आथर्वन दधीची: अहाँ के छी आगंतुक? अपरिचित: हम एकटा अतिथि छी महर्षि, आ’ कोनो प्रयोजनसँ आयल छी। कृपा कए अतिथिक मनोरथ पूर्ण करबाक आश्वासन देल जाय। दध्यङ आथर्वन दधीची: एहि आश्रमसँ क्यो बिना मनोरथ पूर्ण कएने अहि गेल अछि आगंतुक। हम अहाँक सभ मनोरथ पूर्ण होयबाक आश्वासन दैत छी। अपरिचित: हम देवता लोकनिक राजा इन्द्र छी। अहाँसँ परमतत्त्वक उपदेशक हेतु आयल छी।एहिसँ अहाँक कीर्त्ति स्वर्गलोक धरि पहुँचत। (दध्यङ आथर्वन दधीची सोचमे पड़ल मंच पर एम्हरसँ ओम्हर विचलित होइत घुमय लहैत छथि। ओ’ मंच पर घुमैत मोने- मोन, बिनु इन्द्रकेँ देखने, बजैत छथि, जे दर्शकगणकेँ तँ सुनबामे अबैत अछि, मुदा इन्द्र एहन सन आकृति बनओने रहैत छथि, जे ओ’ किछु सुनिये नहि रहल छथि, आ’ मंचक एक दोगमे ठाढ़ भ’ जाइत छथि।) दध्यङ आथर्वन दधीची: (मोने-मोन) हम शिक्षा देब तँ गछि लेने छी, मुदा की इन्द्र एकर अधिकारी छथि। बज्र लए घुमए बला, कामवासनामे लिप्त अनधिकारी व्यक्त्तिकेँ परमतत्त्वक शिक्षा? मुदा गछने छी तँ अपन प्रतिज्ञाक रक्षणार्थ मधु-विद्याक शिक्षा इन्द्रकेँ दैत छियन्हि। इन्द्र: कोन सोचिमे पड़ि गेलहुँ महर्षि। दध्यङ आथर्वन दधीची: इन्द्र हम अहाँकेँ मधुविद्याक शिक्षा दए रहल छी। भोगसँ दूर रहू। नाना प्रकारक भोगक आ’ भोज्यक पदार्थ सभसँ। ई सभ ओहने अछि, जेना फूल सभक बीचमे साँप। भोगक अछैत स्वर्ग अधिपति इन्द्र आ’ भूतलक निकृष्ट कुकुरमे कोन अंतर रहत तखन? ( इन्द्र अपन तुलना कुकुरसँ कएल गेल देखि कए तामसे विख-सबिख भ’ गेल। मुदा अपना पर नियंत्रण रखैत मात्र एक गोट वाक्य बजैत मंच परसँ जाइत देखल जाइत अछि।) इन्द्र: महर्षि अहाँक ई अपमान तँ आइ हम सहि लेलहुँ। मुदा आजुक बाद जौँ अहाँ ई मधु-विद्या ककरो अनका देलहुँ तँ अहाँक गरदनि पर ई मस्तिष्क जकर अहाँकेँ घमण्ड अछि, एहि भूमि पर खसत। दृश्य 2: ( ऋषिक आश्रम। आश्विन बन्धुक आगमन।महर्षिसँ अभिवादनक उपरान्त वार्त्तालाप। ) आश्विन बन्धु: महर्षि। आब हम सभ अहाँक मधु विद्याक हेतु सर्वथा सुयोग्य भ’ गेल छी। हिंसा आ’ भोगक रस्ता हम सभ छोड़ि देलहुँ। इन्द्र सोमयागमे हमरा लोकनिकेँ सोमपानक हेतु सर्वथा अयोग्य मानलन्हि, मुदा हमरा सभ प्रतिशोध नहि लेलहुँ। कतेक पंगुकेँ पैर, कतेक आन्हरकेँ आँखि हमरा सभ देलहुँ। च्यवन मुनिक बुढ़ापाकेँ दूर कएलहुँ। आ’ तकरे उपकारमे च्यवन हमरा लोकनिकेँ सोमपीथी बना देलन्हि। दध्यङ आथर्वन दधीची: आश्विनौ। ब्रह्मज्ञानककेँ देब एकटा उपकारमयी कार्य अछि, आ’ अहाँ लोकनि एहि विद्याक सर्वथा योग्य शिक्षार्थी छी। इन्द्र कहने अछि, जे जाहि दिन ई विद्या हम कहियो ककरो देब तँ तहिये ओ’ हमर माथ शरीरसँ काटि खसा देत। मुदा ई शरीरतँ अछि क्षणभंगुर। आइ नहि तँ काल्हि एकरा नष्ट होयबाक छैक। ताहि डरसँ हम ब्रह्म विद्याक लोप नहि होए देबैक। आश्विनौ: महर्षि अहाँक ई उदारचरित! मुद हमरो सभ शल्यक्रिया जनैत छी आ’ पहिने हमरा सभ घोड़ाक मस्तक अहाँक गरदनि पर लगाए देब। जखन इन्द्र अपन घृणित कार्य करत आ’ अहाँक मस्तककेँ काटत तखन अहाँक अस्ली मस्तक हमरा सभ पुनः अहाँक शरीरमे लगा देब। (मंच पर आबाजाही शुरू भ’ जाइत अछि, क्यो टेबुल अनैत अछि तँ क्यो चक्कू धिपा रहल अछि, जेना कोनो शल्य चिकित्साक कार्य शुरू भ’ रहल होय। परदा खसए लगैत अछि, आ’ पूरा खसितो नहि अछि, आकि फेर उठब प्रारम्भ भ’ जैत अछि। एहि बेर घोड़ाक गरदनि लगओने महर्षि आश्विन बन्धुकेँ शिक्षा दैत दृष्टिगोचर ओइत छथि।) दध्यङ आथर्वन दधीची: एहि जगतक सभ पदार्थ एक दोसराक उपकारी अछि। ई जे धरा अछि से सभ पदार्थक हेतु मधु अछि, आ’ सभ पदार्थ ओकरा हेतु मधु। समस्त जन मधुरूपक अछि। तेजोमय आ’ अमृतमय। सत्येक आधार पर सूर्य ज्योति पसारैत अछि एहि विश्वमे, आ’ चन्द्रक धवल प्रकाश दूर भगाबैत अछि रातिक गुमार आ’ आनैत अछि शीतलता। ज्ञानक उदयसँ अन्हारमे बुझाइत साँप देखा पड़ैत अछि रस्सा। विश्वक सूत्रात्माकेँ ओहि परमात्माकेँ अपन बुद्धिसँ पकड़ू। जाहि प्रकारेँ रथक नेमिमे अर रहैत अछि, ताहि प्रकारेँ परमात्मामे ई संपूर्ण विश्व। ( तखने मंचक पाछाँसँ बड्ड बेशी कोलाहल शुरू भ’ जाइत अछि। तखने बज्र लए इन्द्रक आगमन होइत अछि। एक्के प्रहारमे ओ’ महर्षिक गरदनि काटि दैत छथि। फेर इन्द्र चलि जाइत छथि। मंच पर आबाजाही शुरू भ’ जाइत अछि, क्यो टेबुल अनैत अछि तँ क्यो चक्कू धिपा रहल अछि, जेना कोनो शल्य चिकित्साक कार्य शुरू भ’ रहल होय। परदा खसए लगैत अछि, आ’ पूरा खसितो नहि अछि, आकि फेर उठब प्रारम्भ भ’ जैत अछि। एहि बेर महर्षि पुनः अपन स्व-शरीरमे देखल जाइत छथि। ओ’ बैसले छथि आकि इन्द्र अपन मुँह लटकओंने अबैत अछि।) इन्द्र: क्षमा करब महर्षि हमर अपराध। आइ आश्विन-बन्धु हमरा नव-रस्ता देखओलन्हि। गुरूसँ एको अक्षर सिखनहार ओकर आदर करैत छथि मुदा हम की कएलहुँ। असल शिष्य तँ छथि आश्विन बन्धु। दध्यङ आथर्वन दधीची: इन्द्र। अहाँकेँ ताहि द्वारे हम शिक्षा देबामे पराङमुख भए रहल छलहुँ। मुदा अहाँक दृढ़निश्चय आ’ सत्यक प्रति निष्ठाक द्वारे हम अहाँकेँ शिक्षा देल। हमरा मोनमे अहाँक प्रति कोनो मलिनता नहि अछि। इन्द्र: धन्य छी अहाँ आ’ धन्य छय्हि आश्विनौ। आब हम ओ’ इन्द्र नहि रहलहुँ। हमर अभिमानकेँ आश्विनौ खतम कए देलन्हि। (इन्द्र मंचसँ जाइत अछि। परदा खसैत अछि।) दृश्य 3: ( स्वर्गलोकक दृश्य। चारू दिशि वृत्र आ’ शम्बरक नामक चर्चा करैत लोक आबाजाही कए रहल छथि। ओ’ दुनू गोटे आक्रमण कए देने अछि भारतक स्वर्गभूमि पर। इन्द्र सहायताक हेतु महर्षिक आश्रम अबैत छथि।) इन्द्र: वृत्र आ’ शम्बरक आक्रमण तँ एहि बेर बड्ड प्रचंड अछि। अहाँक विचार आ’ मार्गदर्शनक हेतु आयल छी महर्षि। दध्यङ आथर्वन दधीची: इन्द्र। कुरुक्षेत्र लग एकटा जलाशय अछि, जकर नाम अछि, शर्यणा। अहाँ ओतए जाऊ, ओतय घोड़ाक मूड़ी राखल अछि, जाहिसँ हम आश्विनौकेँ उपदेश देने छलहुँ। ब्रह्मविद्या ओहि मुँहसँ बहरायल आ’ ताहि द्वारे ओ’ अत्यंत कठोर आ’ दृढ़ भ’ गेल अछि। ओहिसँ नाना-प्रकारक शस्त्र बनाऊ, अग्नि आश्रित विध्वंसकक प्रयोग करू, त्रिसंधि व्रज, धनुष, इषु-बाण-अयोमुख-लोहाक सूचीमुख सुइयाबला आ’ विकंकतीमुख- कठोर कन्ह सन एहि तरह्क शस्त्रक प्रयोग करू, कवच आ’ शिरस्त्राणक प्रयोग करू, अंधकार पसारयबला आ’ जड़ैत रस्सी द्वारा दुर्गंधयुक्त्त धुँआ निकलएबला शस्त्रक सेहो प्रयोग करू आ’ युद्ध कए विजयी बनू। इन्द्र: जे आज्ञा महर्षि। ( परदा खसैत अछि, आ’ जखन उठैत अछि, तँ पोखडिक कातमे घोड़ाक मूड़ीसँ इन्द्र द्वारा वज्र आ’ विभिन्न हथियार बनाओल जा’ रहल अछि, फेर परदा खसि क’ जखन उठैत अछि तँ अग्नियुक्त शस्त्र, जे फटक्काक द्वारा उत्पन्न कएल जा’ सकैत अछि, देखबामे अबैत अछि आ’ मंच धुँआसँ भरि जाइत अछि। फेर परदा खसैत अछि आ’ मंचक पाछाँसँ सूत्रधारक स्वर सुनबामे अबैत अछि।) सूत्रधार: इन्द्रक विजय भेलन्हि आ’ दुष्ट सभ गुफामे भागि गेल। ईएह छल वैदिक नाटक बादमे एहि अर्थकेँ अनर्थ कए देलन्हि पौराणिक लोकनि, जाहि कथामे दधीचीक हड्डीसँ इन्द्रक वज्र बनएबाक चर्च कएल गेल अछि। (पर्दा ओ’ ई असल बात अछि केर फुसफुसाहटिक संग खसले रहैत अछि, आ’ लाइट क्षणिक ऑफ भेलाक बाद ऑन भए जाइत अछि।) पोसपुत कथा संग्रह श्री संतोष कुमार मिश्र, मिथिला (नेपाल)। मिथिलाक्षरमे प्रकाशित दोसर 21म सदीक मैथिली पोथी। समीक्षा- गजेन्द्र ठाकुर. पोथी समीक्षा सन्तोष कुमार मिश्र केर कथा संग्रह पोसपुत प्राप्त भेल अछि। नेपालक एहि कथाकारक सात गोट कथा पोसपुत, एकटा ब्यथा पत्रमे, जखन कनिञा भेलखिन बिमार, सिपाहि, डाक्टर, भाग्य अप्पन-अप्पन आ’ दाग एहिमे सम्मिलित अछि। कथावस्तु प्रस्तुत करबासँ पहिने एकर अन्य पक्ष पर चर्च करब आवश्यक। पहिल गप जे एहि पुस्तकक समीक्षासँ एकर प्रारम्भ भेल अछि। श्री कालीकान्त ‘तृषित’, देपुरा रुपैठा, जनकपुर एकर सांगोपांग समीक्षा कएलन्हि अछि, आ’ ई कथाकारक उच्च मानसिकता अछि जे ओ’ एहि समीक्षाकेँ उचित रूपमे लेलन्हि, कारण जौँ से नहि रहैत तँ एकर एहि रूपमे स्थान पोथीमे नहि भेटैत। दोसर गप जे ई पोथी एक दिशिसँ देखला उत्तर देवनागरीमे आ’ दोसर दिशिसँ देखला उत्तर मिथिलाक्षरमे लिखल बुझि पड़ैत अछि आ’ से अछियो। 21म शताब्दीक ई प्रायः एहि तरहक प्रथम प्रयास अछि, जे मैथिलीमे देखबामे आएल अछि। आब पहिने तृषित जीक समालोचना देखैत छी। ओ’ लिखैत छथि, जे कथाकारक कथामे पलायनवादी सोचक प्रधानता रहैत अछि, संगहि ईहो गप उठबैत छथि जे साहित्य सृष्टाकेँ तटस्थ प्रस्तोता होयबाक चाही आकि पथ प्रदर्शक, पलायनवादे होयबाक चाही आकि संघर्षक प्रेरणाश्रोत? ‘पोसपुत’क विषयमे तृषित जी कहैत छथि, जे एहिमे तीनपुस्तक वर्णन अछि, आ’ राजा महेन्द्र आ’ राजा त्रिभुवनक समयमे भेल घटनाक वर्णन जोड़बाक अभिप्राय स्पष्ट नहि अछि। ’एकटा व्यथा पत्रमे’ केर विषयमे ऋषित कहैत छथि जे कालक  गति , लोकक विवशता आ’ अनुभूतिक वर्णन अछि एहिमे। तेसर कथा ‘ जखन कनिञा भेलखिन बिमार’ केँ तृषित जी बिमार कथा घोषित करैत छथि। ‘सिपाही’ कथामे ओहि पदक विवरण अछि जे विवाह दानमे प्राथमिकता पबैत छल आ’ आब त्याज्य भ’ गेल अछि। ‘डॉक्टर’ कथाकेँ तृषितजी पलायनवादी सोचक पराकाष्ठा कहैत छथि। तृषितजीक विचारेँ डॉक्टरकेँ मरैत दम तक रोगीकेँ बचेबाक प्रयास करबाक चाही। ’भाग्य अपन अपन’ भाग्य चक्र पर आधारित अछि। ‘दाग’मे क्षणिक आवेशमे उठाओल गेल डेग, अपरिपक्व उम्रमे भेल प्रेमविवाह फेर तकरा बाद दोसराक संग भागि जायब ई सभ पथभ्रष्टताक प्रतीक अछि। पोसपुत आत्मकथात्मक शैलीमे लिखल गेल अछि, मुदा एकर समापन अकस्मात् होइत अछि, पोसपुतक किरदानीसँ आ’ मायक नैहरि जएबासँ। दोसर कथा पत्र शैलीमे अछि, जतय पोस्पुत कथा जेकाँ पात्र संतोष छथि। एहि कथाक समापन सेहो बड्ड हड़बड़ीमे भेल अछि, आ’ घटनाक तारतम्य लेखकसँ पाठक धरि नहि पहुँचि सकल। ओहिना जखन कनिञा भेलखिन बिमारमे लेखक अपन कथ्य स्पष्ट नहि कए सकलाह। सिपाहि कथामे सेहो पात्रक नाम संतोष छन्हि, मुदा कथ्य आत्मकथात्मक नहि अछि। डॉक्टरकेँ देशमे सेवा करबाक पुरस्कार भेटलैक प्रमाण-पत्रक रद्द होयब आ’ से ओकरा हेतु प्राणघातक सिद्ध भेल।भाग्य अपन-अपन पुरान खिस्सा कहबाक शैलीमे अछि, जे राजा देशमे सर्वेक्षण करएबाक हेतु राजकुमारकेँ पठबैत छथि आ’ ई कथ नीक बनि पड़ल अछि। दाग कथा कथात्मक अछि आ’ हड़बड़ीमे लिखल भाषित होइत अछि। एहि कथा संग्रहकेँ तृषित जी समीक्षाक संग भाषायी रूपसँ संपादित नहि कएलन्हि, कारण एहिमे मानकताक अभाव अछि। प्रूफ रीडिंग सेहो नीक जेँका नहि भेल अछि। मानकताक हेतु विदेह आ’ मिथिला मंथनसँ प्रयास शुरू भेल अछि, आ’ विदेहक रचना लेखन स्तंभमे एकरा स्थान देल गेल अछि।केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर द्वारा सेहो मैथिली स्टाइल मैनुअलक निर्माण भ’ रहल अछि, आवश्यकता अछि, जे नेपालक विद्वान लोकनि सेहो अपन मत मैथिली अकादमीक मानक निर्धारण शैलीक आधार पर बनाओल जा’ रहल शैली पर देथि, जाहिसँ ई सर्वग्राह्य होए। उपन्यास:सहस्रबाढ़नि तखन बालककेँ संस्क़ृत शिक्षाक मोहसँ दूर राखल गेल। मैथिल परिवारमे अंग्रेजीक प्रवेश प्रायः नहियेक बराबर छल आ’ ताहि कारणसँ अधिकांश परिवार एक पीढ़ी पाछू चलि गेल छल। मुदा झिंगुर बाबू अपन पुत्रक कलिकतियाबाबूकेँ राखि शिक्षाक व्यवस्था कएल। तदुपरांत दरिभङ्गामे एकटा बंगालीबाबू बालककेँ अंग्रेजीक शिक्षा देलखिन्ह। बालक कलित शनैः शनैः अपन चातुर्यसँ मंत्रमुग्ध करबाक कलामे पारंगत भ’ गेलाह। जाहि बालककेँ झिंगुरबाबू अन्यमनस्क पड़ल आ’ मात्र सपनामे हँसैत देखलखिन्ह, तकर बाद ठेहुनिया मारैत, फेर चलैत से आब शिक्षा-दीक्षा प्राप्त क’ रहल छथि। हुनका अखनो मोन पड़ि रहल छलन्हि जे कोना ठेहुनिया दैत काल, नेनाक हाथ आगू नहि बढैक आ’ ओ’ बेंग जेंकाँ पाछू सँ सोझे आगू फाँगि जाइत छलाह। पूरा बेंग जेकाँ-अनायासहि ओ’ मुस्कुरा उठलाह। पत्नी पूछि देलखिन्ह जे कोन बात पर मुस्कुरेलहुँ, तँ पहिने तँ ना-नुकुर केलन्हि फेर सभटा गप कहि देलखिन्ह। तखनतँ गप पर गप निकलय लागल। “एक दिन कलितकेँ देखलहुँ जे ठेहुनियाँ मारने आगू जा’ रहल छथि। आँगनसँ बाहर भेला पर जतय अंकर-पाथर देखल ततय ठेहुन उठा कय, मात्र हाथ आ’ पैर पर आगू बढ़य लगलाह” , पत्नीकेँ मोन पड़लन्हि। “एक दिन हम देखलहुँ जे ओ’ देबालकेँ पकड़ि कय खिड़की पर ठाढ़ हेबाक प्रयासमे छथि। हमरो की फूड़ल जे चलू आइ छोड़ि दैत छियन्हि। स्वयम प्रयास करताह। दू बेर प्रयासमे ऊपर जाइत-जाइत देवालकेँ पकड़ने-पकड़ने कोच पर खसि गेलाह। हाथ पहुँचबे नहि करन्हि। फेर तेसर बेर जेना कूदि गेलाह आ’ हाथ खिड़की पर पहुँचि गेलन्हि आ’ ठाढ़ भ’ गेलाह” , झिंगुर बाबूकेँ एकाएक यादि पड़लन्हि। “एक दिन हम ओहिना एक-दू बाजि रहल छलहुँ। हम बजलहुँ एक तँ ई बजलाह, हूँ। फेर हम बजलहुँ दू तँ ई बजलाह, ऊ। तखन हमरा लागल जे ई तँ हमर नकल उतारि रहल छथि”। “ एक दिन खेत परसँ एलहुँ आ’ नहा-सोना भोजन कय खखसि रहल छलहुँ। अहाहा’ केलहुँ तँ लागल जेना कलित सेहो अहाहा’ केलथि। घूरि कय देखलहुँ तँ ओ’ गेंदसँ बैसि कय खेला रहल छलाह। दोसर बेर खखसलहुँ तँ पुनः ई खखसलाह। हम कहलहुँ किछु नहि, ई हमर नकल कय रहल छथि। दलान पर सभ क्यो हँसय लागल। फेर तँ जे आबय, कलित ऊहुहूँ, तँ जवाबमे ईहो ऊहूहूँ दोसरे तरीकासँ कहथि। उम्र कतेक हेतन्हि, नौ-वा दस महिना”। “ हम जे सुनेलहुँ ताहि समय कतेक वयस होयतन्हि, छ’ आ’ कि सात मास”। पत्नी सासु-ससुर वा बाहरी सदस्य नहि रहला पर सोझे-‘गप सुनलहुँ’ वा’ ई करू वा’ ओ’ करू बजैत छलीह। मुदा सासु- ससुरक सोझाँ तृतीया पुरुषमे-सुनैत छथिन्ह, फलना कहैत छलैक-। आ’ फेर झिंगुर बाबू की कम छलाह. ओहो ओहिना गीताक काजक लेल काजक अनुकरणमे तृतीया पुरुषमे जवाब देथि। मुदा एकांतमे फेर सभ ठीक। पुनः मुस्कुरा उठलाह झिंगुर बाबू, ई प्रण मोने-मोन लेलथि जे कलितकेँ एहि जंजालसँ मुक्त करेतथि, ओहो तँ बूझताह जे पिता कोनो पुरान-धुरान लोक छथि। पनी पुनः पुछलथिन्ह जे आब कोन बात पर मुस्की छूटल। मुदा एहि बेर झिंगुर कन्नी काटि गेलाह। मुस्की दैत दलान दिशि निकलि गेलाह, ओतय किछु गोटे अखड़ाहाक रख-रखाबक बात क’ रहल छलाह। भोरहाकातक अखड़ाहाक गपे किछु आर छल। भोरे-भोर सभ तुरियाक बच्चा सभ, जवान सभ पहुँचि जाइत छल। एकदम गद्दा सन अखड़ाहा, माटि कय कोड़ि आ’ चूरि कय बनायल। बालक कलितकेँ छोड़ि सभ बच्चा ओतय पहुँचैत छल। झिंगुर बाबू कचोट केलन्हि तँ आन लोक सभ कहलखिन्ह जे से की कहैत छी। अहाँ हुनका कोनो उद्देश्यक प्राप्ति हेतु अपनासँ दूर रखने छी, तँ एहिमे कचोट कथीक। एकौरसँ ठाकुर परिवार मात्र एक घर मेंहथ आयल आ’ आब ओहिसँ पाँचटा परिवार भ’ गेल अछि। डकही माँछक हिस्सामे एकटा टोलक बराबरी ठकुरपट्टीकेँ भेट गेल छैक। कलितक तुरियाक बच्चाकेँ ल’ कय आठटा परिवार अछि ठकुरपट्टीमे। अखनेसँ बच्चा सभकेँ मान्यता द’ देल गेल छैक। तखने एकौरसँ एकटा समदी एलाह आ’ भोजपत्रमे तिरहुतामे लिखल संदेश देलखिन्ह। झिंगुर बाबू अँगनासँ लोटा आ’ एक डोल पानि हुनका देलखिन्ह आ’ पत्र पढ़य लगलाह। प्रायः कोनो उपनयनक हकार छलन्हि। ‘परतापुरक सभागाछी देखि कय जायब’ , ई आदेशपूर्ण आग्रह झिंगुर बाबू समादीकेँ देलखिन्ह, एकटा पूर्वजसँ मूल-गोत्रक माध्यमसँ जुड़ल दियादक प्रति अनायासहि एकत्वक प्रेरणा भेलन्हि। फेर आँगन जाय पत्र पढ़ब प्रारंभ कएल। ॥श्रीः॥ स्वस्ति हरिवदराध्यश्रीमस्तु झिंगुर ठाकुर पितृचरण कमलेषु इतः श्री गुलाबस्य कोटिशः प्रणामाः संतु। शतम~ कुशलम। आगाँ समाचार जे हमर सुपुत्र श्री गड़ेस आ’ चन्द्रमोहनक उपनयन संस्कारक समाचार सुनबैत हर्षित छी। अहाँक प्रपितामह आ’ हमर प्रपितामह संगहि पढ़लथि। अपन गोत्रीयक समाचार लैत-दैत रहबाक निर्देश हमर पितामह देने गेल छलाह। हर्षक वा’ शोकक कोनो घटना हमरा गामसँ अहाँक गाम आ’ अहाँक गामसँ हमरा गाम नहि अयने अशोचक विचार नहि करबासँ भविष्यक अनिष्टक डर अछि। संप्रति अपने पाँचो ठाकुर गुरुजनक तुल्य पाँच पांडवक समान समारोहमे आबि कृतार्थ करी। अहींकेँ अपन ज्येष्ठ पुत्रक आचार्य बनेबाक विचार कएने छी। परतापुरक सभागछीक पंचकोशीमे अपने सभ गेल छी, तेँ बहुत रास लोक गप-शपक लालायित सेहो छथि। अगला महीनाक प्रथम सोमकेँ जौँ आबि जाइ तँ सभ कार्य निरन्तर चलैत रहत। बुधसँ प्रायः प्रारम्भिक कार्य सभ शुरु भ’ जायत। इति शुभम~। बलान धारक कातमे परतापुरक चतरल-चतरल गाछ सभ आ’ तकर नीचाँ सभागछी। बलानक धार खूब गहींर आ’ पूर्ण शांत। ई तँ बादमे हिमालयसँ कोनो पैघ गाछ बलानमे खसल आ’ हायाघाट लग सोझ रहलाक बदला टेढ़ भ’ एकर धारकेँ रोकि देलक आ’ एकटा नव धार कमलाक उत्पत्ति भेल। बलान झंझारपुर दिशि आ’ कमला मेंहथ , गढ़िया आ’ नरुआर दिशि। बलान गहींर आ’ शांत, रेतक कतहु पता नहि; मुदा कमला फेनिल, विनाशकारी। बाढ़िक संग रेत कमला आनय लगलीह। ग्रीष्म ऋतुमे बलान पूर्वे रूप जेकाँ रहैत छथि, बिना नावक पार केनाइ कठिन, किंतु कमलामहारानीकेँ पैरे लोक पार करैत रहथि। सभटा सभागछीक चतरल गाछ बाढ़िक प्रकोपमे सुखा गेल। चारूदिश रेत आ’ सभागाछी उपटि गेल। चलि गेल सभटा वैभव सौराठ। मुदा झिंगुर बाबूक कालमे परतेपुरक ध्रुवसँ पंचकोशी नापल जाइत छल, से बादहुमे परम्परारूपमे रहल। कलित दरिभङ्गासँ परसू आबि जयताह,,,, , तखन हुनका ल’ कय एकौर जायब। बेचारे बहुत दिन तपस्या कयलन्हि। एहि बेर मामा गाम, दीदीगाम सभ ठाम घुमा देबन्हि। सभकेँ मोन लागल छैक। महाभारत_महाकाव्य हस्तिनापुर सम्राट शांतुनु, गंग तट भ्रमण करि रहल। युवती बनि देवि गंगा, तट जकर छलि ठाढ़ निश्चल॥ भय अभिभूत कहल हे सुन्दरि, करु प्रेम स्वीकार हमर। पत्नी बनि करु राज, राज्य-धन-प्राण पर।। अछि समर्पण सभ अहाँ पर, किंतु अछि किछु बंधन हमर। क्यो पूछय नहि परिचय हमर, नहि रोक-टोक करय हमर कार्य पर।। प्रेम-विह्वल शांतुनु, करि स्वीकार बंधन सकल। आनल महल मानव-गंगाकेँ, समय बितल बितिते रहल॥ भेल बात विचित्र ई जे, सात पुत्र शांतुनुकेँ भेल। युवती फेकल सभकेँ गंगधारमे, राजाने किछु पुछि सकल॥ ई युवती के अछि जे, बुझि परैछ क्षण कोमल। क्षण क्रूर-क्रूरतम जे, अबोध बालक केर प्राणक हेतु विकल॥ पूछल राजन् अपन शर्त्त तोड़ि, आठम बेर अपनाकेँ रोकि नहि सकल। देलक युवती परिचय सकल, हम गंग आ’ ई आठ वसु छल॥ देलन्हि महर्षि वशिष्ठ शाप तनिका, मर्त्यलोकक जन्म लेबक। आठम पुत्रकेँ राखब हम किछु दिन, देवव्रत देब स्वरूप सेवक॥ महर्षि वशिष्ठक नन्दिनीकेँ, देखि केलक प्त्नी वसु प्रभासक। अपन मर्त्यलोकक सखी हेतु, नन्दिनीकेँ हरण तकर परु संग॥ ऋषि ताकल गौ-देविकेँ, ज्ञान-चक्षुसँ। देलक शाप वसुगणकेँ भय-क्रोधित, कएल प्रार्थना वसुघ्राण शापित॥ हमर शाप नहि घूरि सकत परञ्च, सात वसु भय जायत मुक्त तुरन्त। प्रभासकेँ रहय परत ततय, किछु दिन धरि मर्त्यलोकक शरण॥ होयत यशस्वी ई बहुत, घुरि आयल वसुगण गंग पास। हे देवि बनू माता हमरा सभक, दिय’ मुक्ति तखन अछि आस॥ शांतुनु भय गेल विरक्त, छूटि गेल गंगक सानिध्य। समय बीतल गेल एकदिन, तट, धारक समक्ष॥ गजेन्द्र ठाकुरक १२ टा हैकू १.वास मौसमी, मोजर लुबधल पल्लव लुप्ता २.घोड़न छत्ता, रेतल खुरचन मोँछक झक्का ३. कोइली पिक्की, गिदरक निरैठ राकश थान ४.दुपहरिया भुतही गाछीक सधने श्वास ५.सरही फल कलमी आम-गाछी, ओगरबाही ६.कोलपति आऽ चोकरक टाल, गछपक्कू टा ७.लग्गा तोड़ल गोरल उसरगि बाबाक सारा ८.तीतीक खेल सतघरिया चालि अशोक-बीया ९.कनसुपती, ओइधक गेन्द आऽ जूड़िशीतल १०.मारा अबाड़ डकहीक मछैड़ ओड़हा जारि ११.कबइ सन्ना चाली बोकरि माटि, कठफोड़बा १२.शाहीक-मौस, काँटो ओकर नहि बिधक लेल हैबून १ सोझाँ झंझारपुरक रेलवे-सड़क पुल। १९८७ सन्। झझा देलक कमला-बलानक पानिक धार, बाढ़िक दृश्य। फेर अबैत छी छहर लग। हमरा सोझाँमे एकठामसँ पानि उगडुम होइत झझात बाहर अछि अबैत। फेर ओतएसँ पानिक धार काटए लगैत अछि माटि। बढ़ए लगैत अछि पानिक प्रवाह, अबैत अछि बाढ़ि। घुरि गाम दिशि अबैत छी। हेलीकॉप्टरसँ खसैत अछि सामग्री। जतए आयल जलक प्रवाह ओतए सामग्रीक खसेबा लए सुखाएल उबेड़ भूमिखण्ड अछि बड़ थोड़। ओतए अछि जन- सम्मर्द। हेलीकॉप्टर देखि भए जाइत अछि घोल। अपघातक अछि डर हेलीकॉप्टर नहि खसबैत अछि ओतए खाद्यान्न। बढ़ि जाइत अछि आगाँ। खसबैत अछि सामग्री जतए पानि बिनु पड़ैत छल दुर्भिक्ष, बाढ़िसँ भेल अछि पटौनी। कारण एतए नहि अछि अपघातक डर। आँखिसँ हम ई देखल। १९८७ ई.। पएरे पार केने कमला धार, आइ विशाल पद्य: महाबलीपुरममे असीम समुद्रक कातक दृश्य, हृदय भेल उमंगसँ पूरित। सूर्य-मंदिर पांडव-रथ संग, आकश-द्वीपक दर्शन कयल हम। नूनगर पानि जखन मुँह गेल, भेलहुँ आश्चर्यित,गेलहुँ हमारा हेल। लहरिक दीवारिसँ हमारा टकराय, अंग-अंग सिहरि-सिहराय। देखल सुनल समुद्रक बात, बिसरल मन-तन लेलहुँ निसास। सुनेलक ‘मणि’ गाइड ई बात, एलथि विदेशी खोललथि ई सत्य, पल्लव वंशक ई छल देन, भारतवसी बिसरल तनि भेर। मोन पडल अंकोरवाटक मंदिर, राजा खतम भेल बिसरल जन,हरि-हरि। टूटल इतिहासक तार जखन, स्वाति भेल ह्रास अखन; कास्पियन सागरक पानिक भीतरक मंदिर, भारतीय व्यापारीक द्वारा निर्मित। आब एखन अछि हम्मर ई हाल, गामक बोरिंग पम्पसेट अमेरिकन इंजीनियरक खैरात। छोडू भसियेलहुँ कतय अहाँ फेर, प्रीति,पत्नी,हँसि-हँसि भेलथि भेड़। मैथिली राम चरित मानस-मैथिली समालोचनाक विफलता मैथिली साहित्यकेँ पढ़निहारक समक्ष मैथिलीमे रामचरित किंवा रामायण 1. श्री चंदा झा कृत मिथिला भाषा रामायण आऽ 2.श्री लालदासक रमेश्वर चरित मिथिला रामायण -एहि दू गोट ग्रंथक रूपमे प्राप्त होइत छन्हि।पाठ्यक्रमक अंतर्गत स्कूल,कॉलेज-विश्वविद्यालयक मैथिली विषयक पाठ हो किंवा सामान्य आलोचनग्रंथ आकि पत्र-पत्रिकामे छिड़ियायल लेख सभ एहि दू गोट रामायणक अतिरिक्त कोनो तेसर रामायणक अस्तित्वो धरि नहि स्वीकार कएल गेल अछि। एकर संग ईहो बुझि लियह जे जनमानस समालोचनाशास्त्रक आधार पर राखल विचारकेँ तखने स्वीकार करैत अछि जखन की ओऽ सत्यताक प्रतीक हो। आइयो मिथिलामे अखंड रामायण पाठ होइत अछि-बाल्मीकि रामायणक किंवा तुलसीक रामचरितमानसक। एकर कारण पर हम बहुत दिन धरि विचार करैत रहलहुँ।कैकटा चन्द्र रामायण आऽ लालदासकृत मिथिला रामायण रामायण अखंड पाठ केनिहार लोकनिकेँ बँटबो कएलहुँ, मुदा सबहक ईएह विचार छल, जे ई दुनू ग्रंथ मैथिली साहित्यक अमूल्य धरोहर अछि, मुदा अखंड पाठक सुर जे तुलसीक मानसमे अछि से दोसर भाषाक रहला उत्तरो संगीतमय अछि। शंकरदेव अपन मातृभाषा असमियाक बदला मैथिली भाषाक प्रयोग संगीतमय भाषा होयबाक द्वारे कएलन्हि ताहि भाषामे संगीतमय रामायणक रचना जे अखण्ड पाठमे प्रयोग भय सकय, केर निर्माण संभव नहि भय सकल अछि से हमर मोन मानबाक हेतु तैयार नहि छल। तखने एकटा लाइब्ररीमे हमरा श्री रामलोचनशरण-कृत यथासम्भव पूर्णभावरक्षित समश्लोकी मैथिली श्रीरामचरितमानसक दर्शन भेल । एहि ग्रंथकेँ पूर्णरूपेँ पढ़बाक मोह हम नहि त्यागि सकलहुँ आऽ आब एहि पर एक गोट छोट-छीन समीक्षा लिखबाक पहिने हम समस्त मैथिल समाजसँ दुइ गोट प्रश्न पुछय चाहैत छी। 1.अपन समीक्षक लोकनि एहि मोतीकेँ चिन्हबामे सफल किएक नहि भय सकलाह,एकर चर्चो तक मैथिलीक उपरोक्त दुनू रामायणक समक्ष किएक नहि केल गेल। आचार्य रामलोचन शरण मैथिलीक सभसँ पैघ महाकाव्यक रचयिता छथि आऽ हमरा विचारे सभसँ संपूर्ण मैथिली रामायणक सेहो। जखन हम एहि महाकाव्यक फोटोकॉपी लाइब्ररियनक विशेष अनुकंपासँ लेबामे सफल भेलहुँ आऽ एकर पूर्वाँचल मिथिलाक रामायण- अखंड- पाठक संस्थाकेँ देलहुँ, तँ ओ ऽ लोकनि एकरा देखि कय आश्चर्यचकित रहि गेलाह आऽ अगिला साल एहि रामायणक अखंड पाठक निर्णय कएलन्हि। एकरा मैथिलीक समालोचनाशास्त्रक विफलता मानल जाय, किएक तँ ई महाकाव्य तँ विफल भैये नहि सकैत अछि। आचार्यक मनोहरपोथीक चर्चा हम अपन बाल्येवस्थासँ सुनैत रही। 2. मैथिलीक सभसँ पैघ महाकाव्यक चर्चा मात्र सीतायन पर आबि किएक खतम भय जाइत अछि।आचार्य श्री रामलोचनशरणक मैथिली श्री रामचरितमानस सभसँ पैघ महाकाव्य अछि ई एकटा तथ्य अछि आऽ से समालोचनाकार किंवा मैथिली भाषाक इतिहासकार लोकनिक कृपाक वशीभूत नहि अछि। अपन ग्रंथक किञ्चित् पूर्ववृत्तम् मे आचार्य लिखैत छथि- मिथिलाभाषायाः मूर्द्धन्या लेखकाः श्रीहरिमोहनझामहोदया निशम्यैतद् वृत्तं परमाह्लादं गता भूयो भूयश्च मामुत्साहितवन्तः। आगाँ ओऽ लिखैत छथि-प्राध्यापकस्य श्री सुरेन्द्रझा ‘सुमन’ तथा सम्पादनविभागस्थ पण्डित श्री शिवशंकरझा-महोदयस्य हृदयेनाहं कृतज़्ज्ञोऽस्मि। आचार्यजीक सुन्दरकाण्डक पारंभ देखू- जामवंत केर वचन सोहाओल। सुनि हनुमंत हृदय अति भाओल॥1॥ ता धारि बाट देखब सहि सूले। खा कय बंधु कंद फल मूले॥2॥ जाधरि आबी सीतहिँ देखी। होयत काज मन हरख विसेखी॥3॥ ई कहि सबहिँ झुकाकय माथे। चलल हरषि हिय धय रघुनाथे॥4॥ सिंधु तीर एक सुंदर भूधर। कौतुक कूदि चढ़ल तेहि ऊपर॥5॥ पुनु पुनि रघुवीरहिँ उर धारी। फनला पवनतनय बल भारी॥6॥ जहि गिरि चरन देथि हनुमंते। से चल जाय पताल तुरंते॥7॥ सर अमोघ रघुपति केर जहिना। चलला हनूमान झट तहिना॥8॥ जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। कह मैनाक हौ श्रम भारी॥9॥ तुलसी अकबरक समकालीन छलाह आऽ हुनकर भाषा आऽ अखुनका भाषामे किछु अंतर आबि गेल अछि, मुदा तुलसीक गेयता ओहिनाक ओहिना अछि। आचार्यजी तुलसीक गेयता उठओलन्हि अछि, आऽ दुरूहता खतम कय देने अछि। सभ काण्डक शुरूमे देल संस्कृत पद्य तुलसीक मानससँ लेलन्हि अछि। कवि चन्द्र आऽ लालदास दुनू गोटे अप्पन संस्कृत पद्य बनओलन्हि अछि। आचार्यजीक ई मैथिली रमचरितमानस तुलसीक मानसक रूपांतर तँ अछि,मुदा ई मैथिलीक मूल महाकाव्यक रूपमे परिगणित होयबाक अधिकारी अछि जेना कंबनक तमिल रामायण आऽ तुलसीक मानस अपन-अपन भाषामे केल जा रहल अछि। कंबन बाल्मीकी रामायणक रूपांतर तमिलमे कय रहल छलाह आऽ बाल्मीकि रामायणक विषयमे कहलन्हि जे- ई रामायण एकटा दूधक समुद्र छे आऽ हम छी एकटा बिलाड़ि जे मोनसूबा बना रहल अछि जे एहि सभटा दूधकेँ पीबि जाइ। ओना इइहो सत्य जे कंबन कहियो -आचार्यजी सेहो एहिना कएलन्हि- रामायण केँ अपन मौलिक कृति नहि कहलन्हि वरन बाल्मीकिक कृतिक रूपांतरे कहलन्हि,जखन कि ओ ऽ अपन कृतिमे रामकेँ भगवान बनाय देलन्हि।बाल्मीकि रामकेँ मर्यादा पुरुष अहि मानैत छलाह।बाल्मीकि सुग्रीवक विवाह बालीक पत्नीसँ बालीक मरबाक पश्चात होयबाक वर्णन करैत छथि मुदा कंबन बालीक पत्नीक आजीवन वैधव्यक वर्णन करैत छथि। आछर्यजीकेँ ई करबाक आवश्यकता नहि पड़लन्हि किएकतँ तुलसीक मानस लोकक कंठमे बसि गेल छल,आऽ ओऽ एकर निर्वाह कएलन्हि। आब मानसक एकटा विवादास्पद पद्यक चर्चा करी। अर्थक अनर्थ कोना होइत अछि से देखू। आचार्यजी सुन्दरकाण्डक अंतमे लिखैत छथि जखन सिंधु (समुद्र)रामकेँ लंका जयबाक रस्ता नहि दैत छथि तखन राम कहैत छथि, लछुमन बान सरासन आनू। सोखब बारिधि बिसिख कृसानू॥1॥ तखन सिंधु कर जोरि बजैत छथि- ढोल गमार सुद्र पसु नारी। सब थिक ताड़न केर अधिकारी॥ एकर अर्थ ई सभ -ढोल गमार सुद्र पसु नारी- ई सभ शिक्षाकिंवा सबक देबा योग्य अछि,गमार सुद्र आऽ नारीमे शिक्षाक अभाव अछि तेँ आ ऽ पसुमे मनुष्यक अपेक्षा बुद्धि नहि छैक तेँ, ढोलक प्रयोग बिना शिक्षाक करब तँ संगीत नहि ध्वनि भय जायत। नीचाँ तुलसीक श्रीरामचरित मानसमे सेहो देखू- फेर समुद्र ओहि स्थितिमे खलनायक बनि रहल छल आ ऽ ओकर वक्त्तव्य कविक आकि रचनाकारक वक्त्तव्य नहि भय सकैत अछि। रचनाकारक रचनामे नीक अधलाह सभ पात्र रहैत अछि, आ ऽ ओहि पात्रक मुँह सँ नीक आ ऽ अधलाह दुनू गप निकलत। रचनाकारक सफलता एहि पर निर्भर करैत अछि, जे ओ ऽ अपनाकेँ अपन पत्रसँ फराक कय पबैत अछि कि नहि। एहि आलोचना निबंधक उद्देश्य चन्द्र कवि आकि कवि लालदासक रचनाकेँ छोट करब नहि अछि वरन् हुनकर रचनाक समकक्ष आचार्यक रचनाकेँ अनबा मात्र अछि जाहिसँ तुलसीक मानसक वर्चस्व आचार्यजीक रचना खतम कय सकय। तुलसीक प्रासंगिकता नहि वरण ओकर दुरूहताकेँ आचार्य खतम कएने छथि। पंजी-प्रबन्ध पंजी प्रबन्धपूर्व मध्य कालमे ब्राह्मण कायस्थ आऽ क्षत्रिय वर्गक जाति शुद्धताक हेतु निर्मित कएल गेल। एहि अंकमे ब्राह्मणक पंजी-प्रबन्धक चर्च कएल जा रहल अछि। कोनो ब्राह्मणक जाति शुद्धताक हेतु उतेढ़ जानब आवश्यक छल।उतेढ़ छल सात पुरुषक परिचय जाहि हेतु एहि बत्तीस कुलक परिचय आवश्यक छल-पिता एवं माताक पितामह एवं पितामही आऽ मातामह एवं मातामही केर पितामह एवं पितामही आऽ माता एवं मातामही केर पिता। आऽ एहि बत्तीस पूर्वजसँ विवाहयोग्य व्यक्ति सातम पड़बाक चाही। एहि क्रममे श्रोत्रिय,योग्य आऽपंजीबद्ध श्रेणी भय गेल। जे पंजीबद्ध नहि छलाह से जएबार भेलाह। उतेढ़मे श्रोत्रिय मातृपक्षमे पाँच पीढ़ी आऽ पितृपक्षमे सात पीढ़ी त्यागि विवाह करैत छलाह। योग्य मात्र श्रोत्रियसँ एहि अर्थमे भिन्न छलाह जे ओऽ लोकनि पितृ-पक्षमे सातम पीढ़ीक त्याग करैत छलाह मुदा योग्य नहि करैत छलाह। ई लोकनि पितृ पक्षमे छः पीढ़ी आऽ मातृ पक्षमे पाँच पीढ़ीक त्याह कय विवाह करैत छलाह। पंजीबद्ध लोकनि जिनका वंशज सेहो कहल जाइत अछि,मातृ पक्षमे चारि आऽ पितृ-पक्षमे छः पीढ़ी त्यागि कय विवाह करैत छलाह। 19 प्रकारक गोत्र 34 प्रकारक मूल आऽ 243 प्रकारक मूलग्राममे ई सभ विभक्त छल। पुनः कर्मकाण्डक आधार पर सामवेदी आऽ शुक्ल यजुर्वेदी ब्राह्मणक दू गोट उर्ध्वाधर विभाजन क्रमशः छन्दोग्य आऽ वाजसनेय ब्राह्मणक रूपमे बनले रहल। 19 गोट गोत्र आ’ 243 मूल ग्राममे मुख्य मूल 34 टा निर्धारित कएल गेल। एहि 243 ग्रामसँ सेहो ई सभ विभिन्न क्षेत्र आ’ ग्राममे पसरलाह। 19 गोट गोत्र निम्न प्रकारे अछि: 1. शाण्डिल्य 2. वत्स 3. सावर्ण 4. काश्यप 5. पराशर 6. भारद्वाज 7. कात्यायन 8. गर्ग 9. कौशिक 10. अलाम्बुकाक्ष 11. कृष्णात्रेय 12. गौतम 13. मौदगल्य 14. वशिष्ठ 15. कौण्डिन्य 16. उपमन्यु 17. कपिल 18. विष्णुवृद्धि 19. तण्डी मुख्य 34 मूल सेहो तीन श्रेणीमे विभक्त अछि। श्रेष्ठ-प्रथम श्रेणीमे 1. खड़ौरे, 2. खौआड़े, 3. बुधबाड़े, 4. मड़रे, 5. हरिहरे, 6. घसौते, 7. खिसौते, 8. कमहे, 9. नरौने, 10. वमनियामै, 11. हरिअम्मे, 12. सरिसवै, 13. सोदरपुरिये. द्वितीय श्रेणीमे 1. गंगोलिवार, 2. पगौलिवार, 3. कजौलिवार, 4. अड़ेवार, 5. वहड़िखाल, 6. सकड़िखार, 7. पलिवार, 8. विसेवार, 9. फनेवार, 10. उचितवार, 11. पडुलवार, 12. कटैवार, 13. तिलैवार. मध्यम मूल- 1. दिद्यवे, 2. बैलेचै, 3. एकहरे, 4. पंचोभे, 5. वलियासे, 6. जमजुआले, 7. टकवाले, 8. घड़ुए. प्रवर मैथिल ब्राह्मणक मध्य 2 वर्गक प्रवर परिवार होइत अछि- त्रिप्रवर आ’ पाँच प्रवर। जाहि गोत्रक तीन गोट पूर्वज ऋगवेदक सूक्तिक रचना कएल से त्रिप्रवर आ’ जाहि गोत्रक पाँच गोट पूर्वज लोकनि ऋगवेदक सूक्तक रचना कएल से पाँच प्रवर कहबैत छथि। एहि प्रकारेँ गोत्रानुसारे प्रवर निम्न प्रकार भेल:- त्रिप्रवर- 1.शाण्डिल्य, 2.काश्यप,3. पराशर, 4. भारद्वाज, 5. कात्यायन, 6. कौशिक, 7. अलाम्बुकाक्ष, 8. कृष्णात्रेय, 9. गौतम, 10. मौदगल्य, 11. वशिष्ठ, 12. कौण्डिन्य, 13. उपमन्यु, 14. कपिल, 15.विष्णुवृद्धि,16. तण्डी। पंचप्रवर- 1. वत्स, 2. सावर्ण, 3. गर्ग। प्रवरक विस्तृत विवरण निम्न प्रकारेँ अछि- 1. शाण्डिल्य- शाण्डिल्य, असित आ’ देवल. 2. वत्स---] ओर्व, च्यवन,भार्गव,जामदगन्य आ’ आप्लावन। 3. सावर्ण--] ओर्व, च्यवन,भार्गव,जामदगन्य आ’ आप्लावन। 4. काश्यप-काश्यप, अवत्सार आ’ नैघ्रूव. 5. पराशर-शक्ति, वशिष्ठ आ’ पराशर. 6. भारद्वाज-भारद्वाज, आंगिरस आ’ बार्ह्स्पत्य. 7. कात्यायन-कात्यायन, विष्णु आ’ आंगिरस. 8. गर्ग-गार्ग्य, घृत, वैशम्पायन, कौशिक आ’ माण्डव्याथर्वन। 9. कौशिक- कौशिक, अत्रि आ’ जमदग्नि. 10. अलाम्बुकाक्ष-गर्ग, गौतम आ’ वशिष्ठ. 11. कृष्णात्रेय-कृष्णात्रेय, आप्ल्वान आ’ सारस्वत. 12. गौतम-अंगिरा, वशिष्ठ आ’ बार्हस्पत. 13. मौदगल्य-मौदगल्य, आंगिरस आ’ बार्हस्पत्य. 14. वशिष्ठ-वशिष्ठ,अत्रि आ’ सांकृति. 15. कौण्डिन्य-आस्तिक,कौशिक आ कौण्डिन्य. 16. उपमन्यु-उपमन्यु, आंगिरस आ’ बार्हस्पत्य। 17. कपिल-शातातप, कौण्डिल्यआ’ कपिल. 18. विष्णुवृद्धि-विष्णुवृद्धि, कौरपुच्छ आ’ त्रसदस्य 19. तण्डी-तण्डी, सांख्य आ’ अंगीरस. एहिमे सावर्ण आ’ वत्सक पूर्वज एके छथि ताहि हेतु दू गोत्र र्हितो हिनका बीच विवाह नहि होइत छन्हि। छानदोग्य आ’ वाजसनेयक वैदिक युगीन उर्ध्वाधर विभाजन एकर संग रहबे कएल, आ’ यज्ञोपवीत मंत्र दुनूक भिन्न-भिन्न अछि। फेर यज्ञोपवीतमे तीन प्रवर आकि पाँच प्रवर देल जाय ताहि हेतु उपरका सूचीक प्रयोग कएल जाइछ। (अनुवर्तते) प्रथम भागमे देवनागरी लिपिकेँ रोमन टाइपराइटरपर कोन टाइप करी- पहिने www.bhashaindia.com पर जाकय हिन्दी IME V.5 डाउनलोड करू। एहि प्रोग्रामकेँ अपना कंप्युटर पर इंस्टॉल करू। फेर कंट्रोल पैनलमे रेजनल आऽ लंग्वेज पर जा कय लंग्वेज टैबकेँ दबाऊ। देखू जे कॉम्प्लेक्स स्क्रिप्ट टिक कएल छैक की नहि।नहि छैकतँ करू आऽ कंप्युटर ताहि लेल जे जे कहैत अछि से करू। एकरा बाद लंग्वेज टैबकेँ आऽ डिटैल्स केँ दबाऊ।फेर ओतय एड क्लिक करू आऽ ओतय लंग्वेज मे हिन्दी आऽ कीबोर्ड मे HINDI INDIC IME 1[V.5.1] सेलेक्ट कय अप्लाइ दबाऊ। कंप्युटरकेँ रीस्टार्ट करू। आब वर्ड डोक्युमेंट खोलू।बायाँ Alt+Shift केँ एक दू बेर सम्मिलित दबेला उत्तर H कीबोर्ड आयत।अथवा नीचाँ लंग्वेजक़ेँ क्लिक करू आऽ हिन्दी सेलेक्ट करू।कीबोर्डमे हिन्दी transliterationकेँ सेलेक्ट करू। आब राम टाइप करबा लय raama टाइप करय करत। क् टाइप करबाक हेतु k दबाऊ आऽ माउसक लेफ्ट बटन क्लिक करू, अन्यथा सिफ्ट आकि एंटर दबेला पर हलंत उड़ि जायत। देवनागरीमे टाइप करबाक हेतु पछिला अंकमे देल सॉफ्टवेयरक अतिरिक्त एकटा आर टूल अछि जे नम्नलिखित लिँक पर उपलब्ध अछि। एकर विशेषता अछि एकर संस्कृत की-बोर्ड जे आन कोनो सॉफ्टवेयर पर उपलब्ध नहि अछि। एहिमे उदात्त,अनुदात्त केर आ’ किछु आन संस्कृतक अक्षर उपलब्ध अछि। एकर बराह दाइरेक्ट आदि रूप सेहो अछि, मुदा जौँ कोनो विशेष प्रयोजन नहि हो तँ मात्र बाराह आइ.एम.ई केर प्रयोग मात्र करी। स॑ , स॒ , स॓ , सऽ कें स लिखलाक बाद सिफ्ट ३,२,४ आऽ ७ दबेलासँ लिखि सकैत छी। http://www.baraha.com/BarahaIME.htm तिरहुता लिपि लिखबाक हेतु एहि लिंक पर जाऊ। http://www.tirhutalipi.4t.com/ मुदा एकरा हेतु अही लिंक पर जे प्रीति फॉंन्ट छैक तकरा सेहो डाउनलोड करी आ’, दुनू केँ हार्डडिस्क ड्राइव C/windows/fonts मे पेस्ट कए दिय। एहिमे जे फॉन्ट अछि से Ascii मे अछि। क्रुतदेव , शुशा ई सभ फॉण्ट सेहो एहि तरहक अछि, पहिने उपयोगी छल मुदा आब सर्च इंजिनमे यूनिकोड-यू.टी.एफ.8 केर सर्च होइत छैक आ’ Ascii मे लिखल देवनागरीक सर्च नहि भय पबैत अछि। विन्डोजमे मंगल फॉन्ट अबैत छैक, आ’, एहिमे लिखल देवनागरी सर्च भय जाइत अछि। मिथिलाक्षरक यूनीकोड रूपक आवेदन (अंशुमन पाण्डेय द्वारा देल गेल) लंबित अछि। साहित्यक दू विधा अछि गद्य आऽ पद्य।छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओऽ गद्य थीक। छन्द माने भेल-एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए। छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रिक आऽ वार्णिक। वेदमे मात्रिक छन्द अछि। पहिने मात्रिक छन्द परिचय लिय। एहिमे अक्षर जिनती मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक मात्रिक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक मात्रिक गानल जाइत अछि।द्विमात्रिक कोनो अक्षर नहि होइछ।मुख्य तीनटा बिन्दु यादि राखू- 1.ह्अलंतयुकत अक्षर-0 2.संयुक्त अक्षर-1 3.अक्षर अ सँ ह -1 प्रत्येक। आब पहिल उदाहरण देखू ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=1+5+2+2+3+3+1=17 मात्रा आब दोसर उदाहरण देखू पश्चात्=2 मात्रा आब तेसर उदाहरण देखू आऽब=2 मात्रा आब चारिम उदाहरण देखू स्क्रिप्ट=2 मात्रा मुख्य वैदिक छन्द सात अछि-गायत्री,उष्णिक् ,अनुष्टुप् ,बृहती,पङ् क्त्ति,त्रिष्टुप् आ ऽ जगती। शेष ओकर भेद अछि अतिछन्द आ ऽ विच्छन्द। छन्दकेँ अक्षरसँ चिन्हल जाइत अछि। यदि अक्षर पूरा नहि भेलतँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि।य आऽ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ ऽ उ लगा कय अलग केल जाइत अछि। वरेण्यम्=वरेणियम् स्वः= सुवः गुण आ ऽ वृद्धिकेँ अलग कयकेँ सेहो अक्षर पूर कय सकैत छी। ए = अ + ई ओ = अ + उ ऐ= अ+ए =आ+ए औ=अ+ओ =आ+ओ II. पछिला बेर मात्रिक छंदक जानकारी लेने छलहुँ। आब वार्णिक छंद पर आबी। पहिने छन्दः शास्त्रमे प्रयुक्त ‘गुरु’ आ’ ‘लघु’ छंदक परिचय प्राप्त करू। तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ ई पाँच ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ, ई आठ दीर्घ स्वर अछि। ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ ‘गुणिताक्षर’ बनैत अछि। क्+अ= क, क्+आ=का । एक स्वर मात्र आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक ‘अक्षर’ कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना ‘अवाक्’ शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ , वा । सभटा ह्रस्व स्वर आ’ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर ‘लघु’ मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि। सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर ‘गुरु’ मानल जाइत अछि, आ’ एकर संकेत अछि , ऊपरमे एकटा छोट -। अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि। कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ’ स दुनू गुरु अछि। (अनुवर्तते) मायानन्द मिश्रक इतिहास-बोध श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि। प्रस्तुत प्रबंधमे मायानान्द जीक 1.प्रथमं शैल पुत्री च 2.मंत्रपुत्र 3.पुरोहित आ’ 4. स्त्री-धन एहि चारि ऐतिहासिक उपन्यास सभक आधार पर लेखक द्वारा लगभग दू दशकमे पूर्ण कएल गेल इतिहास यात्राक समीक्षा कएल गेल अछि। एहिमे प्रयुक्त पुस्तकमे मंत्रपुत्र मैथिलीमे अछि आ’ शेष तीनू उपन्यास हिन्दीमे ,तथापि यात्रा पूर्णताक दृष्ट्वा आ’ श्रृंखलाक तारतम्य आ’ समीक्षाक पूर्णताक हेतु चारू किताबक प्रयोग अनिवार्य छल। कालक्रमक दृष्टिसँ प्रथमं शैल पुत्री च प्रथम अछि, एहिमे 1500 ई.पू.सँ पहिलुका इतिहासक आधार लेल गेल अछि। मंत्रपुत्रमे 1500 ई.पू. सँ 1200 ई.पू. धरिक इतिहास उपन्यासक आधार अछि। ई सभ आधार भारत युद्धक पहिलुका अछि। पुरोहितमे 1200 ई.पू.सँ 1000 ई.पू. धरिक इतिहास अछि- एकरा ब्राह्मण साहित्यक युगक इतिहास कहि सकैत छी। स्त्रीधनक आधार अछि सूत्र-स्मृतिकालीन मिथिला। मुदा रचना भेल मैथिली मंत्रपुत्रक पहिने - नवंबर 1986 मे। प्रथमं शैल पुत्री च एकर दूसालक बाद रचित भेल आ’ ताहिमे मायानन्द जी चारू किताबक रचनाक रूपरेखा देलन्हि, मुदा ई हिन्दीक संदर्भमे छल। एकर बाद सभटा किताब हिन्दी मे आएल। हिन्दी मंत्रपुत्र आयल जाहि कारण्सँ तेसर पुस्तक पुरोहित किछु देरीसँ 1999 मे प्रकाशित भेल। स्त्रीधन जे एहि श्रृंखलाक अंतिम पुस्तक अछि, पछिला साल 2007 ई. मे प्रकाशित भेल।प्रथमं शैल पुत्री च केर प्रस्तावनाक नाम कवच छल। मंत्रपुत्रक प्रस्तावनाक नाम ऋचालोक छल आ’ ई पुस्तकक अंतमे राखल गेल। कियेकतँ ई लेखकक प्रथम ऐतिहासिक रचना छल, प्रस्तावनाकेँ अंतमे राखि कय रहस्य आ’ रोमांचकेँ बनाओल राखल गेल । पुरोहितक प्रस्तावनाक नाम विनियोग छल आ’ एकरासँ पहिने दूर्वाक्षत मंत्र राखल गेल जे भारतक आ’ विश्वक प्रथम देश्भक्ति गीत अछि। मिथिलामे एकरा आशीर्वादक मंत्रक रूपमे प्रयोग कएल जाइत अछि। स्त्रीधनक प्रस्तावनाक नाम लेखक पृष्ठभूमि रखने छथि जे उपन्यासक एतिहासिक पृष्ठभूमि प्रदान करबाक कारण सर्वथा समीचीन अछि। मायानन्दक इतिहास-बोधक समीक्षा हम श्रुति, परम्परा, तर्क, श्रद्धा आ’ भाषा-विज्ञानक आधार पर कएने छी , पाश्चात्य विद्वान सभक उच्छिष्ट भोज सँ निर्मित भारतीय इतिहास-लेखन सँ बचि कय इतिहासक समीक्षा भेल अछि, आ’ मध्य एशिया आ’ यूरोपक कनियो प्रभाव समीक्षा पर नहीं पड़ल अछि। प्रथमं शैल पुत्री च- कवच रूपी प्रस्तावनाक बाद ई पुस्तक 1. अग्ना 2. अग्न-शैला 3. शैला- कराली 4. कराली- महेष 5. महेष- पारवती 6. गणेष 7. हरकिसन 8. किसन 9. हरप्पा : मोअन गाँव 10. गणेष का श्रीगणेश 11. किश्न 12. महाजन 13. मंडल 14. किश्न मंडल 15. मंडल : मंडली 16. पतन: पुरंदर आ’ 17. उपसंहार : पलायन खंडमे विभक्त अछि। अग्ना- 2000 हजार ई. पू. सँ आरम्भ होइत अछि ई उपन्यास। खोहमे रहय बला मनुष्यक विवरण शुरू होइत अछि- बा एकटा दलक सर्वाधिक बलिष्ठ मनुष्य अछि। पूर्वज बा सेहो बलिष्ठ छल। एतेक रास बच्चा सभक बा। एकटा छोट आ’ एकटा पैघ पाथरक आविष्कार कएने छलाह पूर्वज बा। अम् दलाग्राकेँ कहल जैत छल। बा भयंकर गंधवला पशुक नाम सेहो छल। हाथक महत्त्व बढ़ल आ’ बढ़ल वृक्षसँ दूरी। सर्पकेँ मारि कय खायल नहीं जाइत अछि, से गप पूर्वजसँ ज्ञात छल। प्राचीन देव वृक्ष, दोसर नाग देव आ’ तेसर नदी देव छलाह। अम् बासँ बा संतान उत्पन्न करैत आयल छलाह। नव कुठार आ’ नव काताक आविष्कार भेल। अः आः अग अग्ग केर देखि कय वन्य पशुकेँ भागैत देखि एकर जानकारी भेल। मानुषी हुनकर संख्या वृद्धि करैत छलि।प्रथम मानुषीक नाम पड़ल अग्ना। ओकर मानुष-मित्र छलाह अग्ग। अग्ना दलाग्रा बनि गेलीह आ’ हुनकर नेतृत्वमे दल उत्तर दिशि बढ़ल। फेर लेखक लिखैत छथि जे पृथ्वीक उत्पत्ति लगभग 200 कर्प्ड़ वर्ष पूर्व भेल जे सर्वथा समीचीन अछि। कर्मकाण्डमे एक स्थान पर वर्णन अछि- “ ब्राह्मणे द्वितीये परार्धे श्री स्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वंतरे अष्ठाविंशतितमे कलियुगे प्रथम चरणे” आ’ एहि आधार पर गणना कएला उत्तर 1,97,29,49,032 वर्ष पृथ्वीक आयु अबैत अछि। रेडियोएक्टिव विधि द्वारा सेहो ईएह उत्तर अबैत अछि। यूरोपमे सत्रहम शाब्दी तक पृथ्वीक आयु 4000 वर्ष मानल जाइत रहल। ईरानक विद्वान 1200 वर्ष पहिने पृथ्वीक उत्पत्ति मनलैन्ह। ई दुनू दृष्टिकोण वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ हास्यास्पद अछि। मिथिला आऽ संस्कृत- कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालयक प्रासांगिकता मिथिला आऽ संस्कृतक संबंध बड्ड पुरान अछि। षड् दर्शनमे चारि दर्शनक प्रारंभ एतयसँ भेल। वाजसनेयी आऽ छांदोग्यक रूपमे दू गोट वैदिक शाखा अखनो ओतय अछि, मुदा नामे मात्रेक। मिथिलामे कतोक लोक भेटताह जे मात्र विवाह कालमे वाचसनय आऽ छंदोग्यक नमसँ परिचय प्राप्त करैत छथि। बीच रातिमे पता चलैत छन्हि जे वर छांदोग्य छथि आऽ स्त्रीगणमे शोर उठैत अछि जे आबतँ दू विवाह होयत-बड्ड समय लागत। वाजसनेयी आऽ छांदोग्य क्रमशः शुक्ल यजुर्वेद आऽ सामवेदक शाखा अछि से हम सभ बिसरि गेल छी। कार्यालयक कार्यावशात् हम इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर अऑफ आर्ट्स गेलहु तँ वेद पर एक गोट डी.वी.डी. देखबाक अवसर प्राप्त भेल।अखनो ओड़ीसा,महाराष्ट्र,केरल,कर्णाटक,आ ऽ तमिलनाडुमे वैदिक शाखा जीवित अछि, मुदा अपना अहिठाम शाखा रहितहुँ नामोसँ अर्थोसँ अनभिज्ञता। कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालयक स्थापना प्रधानमंत्री नरसिम्हा रावक प्रयासेँ रामटेक,महाराष्ट्रमे खुजल। अल्पावधिमे ई वि.वि. संपूर्ण महाराष्ट्रमे वर्षावधि संस्कृत संभाषण शिविर चला रहल अछि। शिशुक हेतु 23 खंडमे किताब छपलक अछि,जखन की एकर भवन अखन बनिये रहल अछि। का.सि.संस्कृत वि.वि. दरिभङ्गा बहुत रास संस्कृत-मैथिली काव्यक उद्धार कएलक मुदा आब जा कय एकर योगदान सालमे एकटा पतरा छपब धरि सीमित भय गेल छैक- आ ऽ ई विश्वविद्यालय पंचांग सेहो अपन गणनाक हेतु विवादमे पड़ि गेल अछि। मुदा एहि अंकसँ हम एकर रचनात्मक कएल गेल कार्यक विवरण देब प्रारंभ कएल छी। विश्वविद्यालय द्वारा 20 सालसँ ऊपर भेल जखन संस्कृत-प्राकृत देसिल बयना सँ युकत नाटक सभक आलोचनात्मक संस्करण प्रकाशित भेल,जे भाषा मिश्रणक कारणेँ जहिना ई संस्कृतक तहिना मैथिलीक रचनामे परिगणित होइत अछि।भावोद्रेकक लेल गीतराशिक रचना कोमलकांत मिथिलाभाषहिमे निबद्ध भेल। विश्वविद्यालय द्वारा पहिल संपादित ग्रंथ ज्योतिरीश्वर ठाकुरक धूर्त्तसमागम अछि। धूर्त्तसमागम तेरहम शताब्दीमे ज्योतिरीश्वर ठाकुर द्वारा रचल गेल। ज्योतिरीश्वर ठाकुर धूर्त्तसमागममे मैथिली गीतक समावेश कएलन्हि। ई प्रहसनक कोटिमे अबैत अछि।मैथिलीक अधिकांश नाटक-नाटिका श्रीकृष्णक अथवा हुनकर वंश्धरक चरित पर अवलंबितएवं हरण आकि स्वयंबर कथा पर आधारित छल। मुदा धूर्त्तसमागममे साधु आऽ हुनकर शिष्य मुख्य पात्र अछि। धूर्त्तसमागम सभ पात्र एकसँ-एक ध्होर्त्त छथि।ताहि हेतु एकर नाम धूर्त्तसमागम सर्वथा उपयुक्त अछि।प्रहसनकेँ संगीतक सेहो कहल जाइछ,ताहि हेतु एहि मे मैथिली गीतक समावेश सर्वथा समीचीन अछि।एहिमे सूत्रधार,नटी स्नातक,विश्वनगर,मृतांगार,सुरतप्रिया,अनंगसेना,अस्ज्जाति मिश्र,बंधुवंचक,मूलनाशक आऽ नागरिक मुख्य पात्र छथि।सूत्रधार कर्णाट चूड़ामणि नरसिंहदेवक प्रशस्ति करैत अछि।फेर ज्योतिरीश्वरक प्रशस्ति होइत अछि। एहिमे एक प्रकारक एब्सर्डिटी अछि,जे नितांत आधुनिक अछि।जे लोच छैक से एकरा लोकनाट्य बनबैत छैक। विश्वनगर स्त्रीक अभावमेब्रह्मचारी छथि।शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु मृतांगार ठाकुरक घर जाइत छथि तँ अशौचक बहाना भेटैत छन्हि। विश्वनगर शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु सुरतप्रियाक घर जाइत छथि। फेर अनंगसेना नामक वैश्याकेँ लय कय गुरु-शिष्यमे मारि बजरि जाइत छन्हि। फेर गुरु-शिष्य अनंगसेनाक संग असज्जाति मिश्रक लग जाइत छथि तँ ओतय मिश्रजी लंपट निकलैत छथि।... VIDEHA MAITHILI SANSKRIT TUTOR ENGLISH SAMSKRIT MAITHILI In which college do you study. कस्मिन् महाविद्यालये पठति भवती? कोन कॉलेजमे अहाँ पढ़ैत छी? I study in the Vishweshwaraiya Engineering College. अहं विश्वेश्वरैय्य-अभियान्त्रिक-महाविद्यालये पठामि। हम विश्वेश्वरैय्या अभियान्त्रिक महाविद्यालयमे पढ़ैत छी। Our physics teacher is very good. अस्माकं भौतिकशास्त्रस्य अध्यापकः उत्तमः अस्ति। हमरा सभक भौतिकीक शिक्षक बड्ड नीक छथि। You did not come for the first period? प्रथमकालांशं न आगतवान्? अहाँ पहिल कक्षामे नहि अएलहुँ? I got up late today. अद्य उत्थाने विलम्बः अभवत्। हम आइ देरीसँ उठलहुँ। I couldn’t get the bus. लोकयानं न प्राप्तम्। हम आइ बस नहि पकड़ि सकलहुँ। Economics lecturer has not come. अर्थशास्त्रस्य व्याख्याता न आगतवान्। अर्थशास्त्रक व्याख्याता नहि अएलाह। Today there is a debate-competition in the college. अद्य महाविद्यालये परिचर्चा-स्पर्धा अस्ति। आइ महाविद्यालयमे परिचर्चा-स्पर्धा अछि। Are you participating? भवती भागं गृह्णाति किम्? अहाँ भाग लऽ रहल छी की? No, my friend is participating. न, मम सखी भागं गृह्णाति। नहि, हमर संगी भाग लऽ रहल छथि। I should return this book today, otherwise I’ll have to pay fine. एतत् पुस्तकम् अद्य प्रत्यर्पणीयं भोः, नो चेत् दण्डः दातव्यः भवेत्। हमरा ई पोथी आइ वापस करबाक अछि नहि तँ हमरा फाइन भरय पड़त। Shall we go for a movie today? अद्य चलच्चित्रं द्रष्टुं गच्छामः किम्? हमरा सभ आइ सिनेमा देखब चली की? Tomorrow we have Biology practical exam, friend. श्वः जीवशास्त्रस्य प्रात्यक्षिक-परीक्षा अस्ति सखे। काल्हि हमर सभक जीव विज्ञानक प्रायोगिक परीक्षा अछि। Will you give me your notes? भवत्याः टिप्पणीं ददाति किम्? अहाँ अपन नोट हमरा देबकी? But Girish took them away yesterday. ह्यः एव गिरीशः स्वीकृतवान्? मुदा गिरीश ई काल्हिय्रे लऽ गेलाह। Again I left them at home today. अद्य गृहे एव त्यक्त्वा आगतवती। आइ सेहो हम हुनका सभकेँ घरपर छोड़ि अएलहुँ। I had not come to class on that day. तद्दिने अहं वर्गं न आगतवान् आसम्। हम ओहि दिन वर्ग नहि आएल छलहुँ। Please give me your pen for a minute friend. एक निमेषार्थं लेखनीं ददातु मित्र। मित्र अपन पेन एक मिनट लेल दिअ। Don’t forget to give it back. प्रतिदातुं मा विस्मरतु। वापस केनाइ नहि बिसरू। Come on, let’s play. आगच्छतु भोः क्रीडतु। आउ, हमरा सभ खेलाइ। Do we have Mr.Joshi’s class today? जोशीमहोदयस्य कक्ष्या अस्ति किम् अद्य? जोशी महोदयक वर्ग आइ अछि की? Did you complete graduation in the year 1993? पदवी त्रिनवतितमे वर्षे समापिता किम्? अहाँ १९९३मे स्नातक भऽ गेल छलहुँ? I don’t remember well. सम्यक् न स्मरामि भोः। ठीकसँ मोन नहि अछि। Did you read this novel. एतां दीर्घकथां पठितवान् किम्? ई उपन्यास पढलहुँ की? I read it long back. बहु पूर्वमेव पठितवान्। हम ई बहुत पहिनहिये पढ़ने छी। Today there won’t be any classes. अद्य कक्ष्याः न भविष्यन्ति। आइ आब आर कोनो कक्षा नहि होयत। The Principal is very strict. प्राचार्यः बहु कठोरः अस्ति भोः। प्रिन्सिपल बड़ कठोर छथि। 70% attendance is compulsory if you want to appear for the examination. परीक्षा लेखनीया चेत् ७०% उपस्थितिः अनिवार्या एव। परीक्षामे बैसबाक लेल ७०% उपस्थिति अनिवार्य अछि। We are staging a Samskrit-drama in the annual function. वार्षिकोत्सवे वयम् एकं संस्कृतनाटकं कुर्मः। हमरा सभ वार्षिकोत्सवमे एकटा संस्कृत नाटक कऽ रहल छी। Tomorrow there will be elections for the student’s council. श्वः च्छात्रसंघस्य निर्वाचनं भविष्यति। काल्हि छात्रसंघक चुनाव होएत। This year the tuition-fees have been increased. एतस्मिन् वर्षे पाठनशुल्कं वर्धितम् अस्ति। एहि साल पाठनशुल्कमे वृद्धि भेल अछि। इति भवंतः सर्वे पूर्वतन् पाठेव ज्ञातवंतः।संस्कृतेन प्रथम परिचयः प्राप्तव्यः। अद्य अन्येनक्रमेण अपि परिचयस्य अन्येषाम् अपि अभ्यासं वयं कुर्मः। अहं गजेन्द्रः। भवान् कः। अहं शिक्षकः। भवती का। अहम् अभिनेत्री। अहं छात्रा। अहं वैद्या। अहं गृहिणी। अहं कृषकः। अहं शिक्षिकाः। अहं पाचकः। अहं तंत्रज्ञः। अहं तंत्रज्ञा। एतद् वाक्यद्वयं योजयित्वा वयं परिचयं वदामः। एतैव सुखेन परिचयं वदामः।मम नाम गजेन्द्रः। अहं शिक्षकः। एतेन क्रमेण भवंतः वदंतु। भवान वदतु। मम नाम इंदुशेखरः।अहं तंत्रज्ञः। मम नाम राजलक्ष्मीः। अहं अभिनेत्री। सः उदयनः। सः छात्रः। सः छात्रः वा। आम्। सः छात्रः। तत्र कृष्णफलकम वा? आम्। तत्र कृष्णफलकम्। न। सः वैद्यः न। एतत् फेनकम वा। आम्। तत उपनेत्रम्/कङ्कतम्। प्रशांतः सज्जनः वा। संस्कृतं सरलं वा। संस्कृतं मधुरं वा। आम्। सत्यम्। इदानीम अहं वदामि। भवंतः अपि अभिनयं कुर्वंतु। उत्तिष्ठतु। तस्य नाम उदयनः। तस्य नाम किम्। कस्य नाम इंदुशेखरः। तस्याः नाम चन्द्रिका। तस्याः नाम किम्। कस्याः नाम चन्द्रिका। एतस्य नाम इन्दुशेखरः। तस्य नाम किम्। साधुः। तस्याः नाम श्रीलक्ष्मीः। कस्याः नाम श्रीलक्ष्मीः। तस्य नाम इंदुशेखरः। एतस्य नाम सुधीरः। तस्याः नाम शांतला। एतस्याः नाम राजलक्ष्मीः। घटी। सुधीरस्य घटी। कस्य मुखम्। सुधीरस्य उपनेत्रम्। नाशिका। कर्णः। गीतायाः घटी। गीतायाः घटी। गीतायाः स्यूतः। कस्याः करवस्त्रम। ददातु। कस्याः कुञ्चिका। सीतायाः। लतायाः। सा देवी। देव्याः नाम किम्। देव्याः नाम सरस्वती। कस्याः आभूषणम्। नर्तक्याः आभूषणम्। कस्याः कण्ठाहारः। गृहण्याः क्ण्ठाहारः। पार्वती। पार्वत्याः। पुस्तकस्य नाम श्रीमदभागवदगीता। काव्यस्य नाम अभिज्ञानशाकुंतलम्। अस्माकं देशस्य नाम भारतम्। शिक्षकस्य नाम विश्वासः। गीतायाः। प्रियायाः। राजेश्वरयाः। श्रीलक्ष्म्याः। रामः अस्ति। सर्वे रामस्य वदंति। कृष्णस्य। प्रमोदस्य। बाबूलालस्य। रमानन्दस्य। रामशरणस्य। राधेश्यामस्य। शिक्षकस्य। लेखकस्य। छात्रस्य। फलस्य। पुष्पस्य। मन्दिरस्य। नगरस्य। सीतायाः। राधायः। अनितायाः। मालविकायाः। कवितायाः। सुशीलायाः। गङ्गायाः। शारदायाः। भारत्याः। नद्याः। लेखन्याः। राख्याः। अङ्कन्याः। रामस्य। रामः दशरथस्य पुत्रः। कृष्णः कस्य पुत्रः। कृष्णः वसुदेवस्य पुत्रः। रामः कस्याः पतिः। रामः सीताय़ाः पतिः। लक्ष्मणः उर्मिलायाः पतिः। कृष्णः रुकमण्याःपतिः। दिल्ली भारतस्य राजधानी। बेङ्गलुरु कर्णाटकस्य राजधानी। बाल्मीकिः रामायणस्य लेखकः। व्यासः महाभारतस्य लेखकः। वयम् इदानीम् एकम् अभ्यासं कुर्मः। अहम् एकं कोष्ठकं दर्शयामि। सर्वे अभ्यासः कुर्मः। दशरथस्य पुत्रः रामः। शिवस्य पुत्रः गणेशः। रावणस्य पुत्रः मेघनादः। अर्जुनस्य पुत्रः अभिमन्युः। रघुवंशस्य लेखकः कालिदासः। रामायणस्य लेखकः बाल्मीकिः। सीतायाः पतिः रामः। उर्मिलायाः पतिः लक्ष्मणः। सत्यभामायाः पतिः कृष्णः। पार्वत्याः पतिः । देवक्याः मन्दोदरयाः दमयनत्याः गान्धी महाभागस्य महोदयस्य रेणु महोदयायाः मेरी महाभागायाः सुभाषितम् वयम् इदानीम् अद्यापि एकस्य सुभाषितस्य अभ्यासः कुर्मः। भवंतः इदानीं सुभाषितम् श्रुणवंतु। अयं निजः परोवेत्ति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥ इदानीं यत् सुभाषितम् श्रुण्वंतः तस्य अर्थः एवम् अस्ति। लोके द्विविधाः जनाः भवति। केचन् लघु मनस्काः।ते चिंतयंति, एषः मम जनः। एषः मम जनः न। इति चिंतयंति। अन्ये केचन् संति, महात्मानामः। उदार च्रिताः। ते चिन्तयन्ति-जगत एव मम कुटुम्बः। लघु कुटुम्बः। तेषां दृष्टयासमग्रः प्रपञ्चःएव मम कुटुम्बः। सज्जनाः एवं चिंतनं कुर्वंति। धन्यवाद:। कथा अहं इदानीम् एकं लघुकथां वदामि। काशीः नगरे एकः महान् पण्डितः आसीत्। सः बहुषु शास्त्रेषु पारंगतः आसीत्। तस्य समीपे बहुछात्राः अध्ययनं कुर्वंति स्म। तस्य ख्यातिः सर्वत्र प्रसारिता आसीत्। अतः दूर-दूरतः छात्राः आगच्छंति स्म। एकदा कश्चन् शिष्यः तस्य समीपम् आगतवान्। सः गुरोः नमस्कारं कृत्वा पृष्ठवान्- भोः। अहं भवतः समीपे अध्ययनं कर्त्तुम इच्छामि। अतः माम शिष्यत्वेन स्वीकरोतु। इति सः उक्तवान्। किंतुः सर्वेषाम छात्राणां बुद्धि परीक्षां कृत्वा एव तान स्वीकरोति स्म। अतः एतस्य अपि बुद्धि परीक्षां कर्त्तुम सः एकं प्रश्नं पृष्ठवान। भोः वत्सः। देवः कुत्र अस्ति। इति पृष्ठवान। तदा शिष्यः उक्तवान। भगवन्। देवः कुत्र नास्ति। सः सर्वोव्यापी अस्ति। इति। प्रस्नरूपेण एव गुरुः पृष्ठवान। एतस्य उत्तरम् श्रुत्वागुरुः अत्यन्तं संतुष्टः जातः। सः हर्षेण तम् आलिङ्गितवान। तम उक्तवान अपि। भोः वत्सः। भवान् बुद्धिमान् बालकः अस्ति। भवंतम् अहं शिष्यत्वेन निश्चयेन स्वीकरोमि। सत्यं देवः सर्वव्यापि अस्ति। इति तम उक्तवान, शिष्यत्वेन अंगीकृतवान। एवं सः शिष्यः तत्रैव विद्याभ्यासं कृतवान,गुरोः आशीर्वादं प्राप्तवान। भवन्तः कथाम् अर्थः ज्ञातवंतः किल। शीतं स्नानम् उदेति सूर्यः कुक्कुटः गायति। कृषकः उत्थति पुष्पं विकसति। चटका विचरति,आकाश मध्ये, शीतकाले जलं शीत भवति, बालः उत्थति स्नानं लब्धे, स्नानं कृत्वा सा स्फुरति। (अनुवर्तते) पोथी समीक्षा श्री पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। पराशरजी एखन हिन्दी पत्रिका ’कादम्बिनी’मे वरिष्ठ कॉपी सम्पादक छथि। समयकेँ अकानैत १९. रातिक तेसर पहरमे गामसँ गेल लोक फेर नहि घुरल गाम गाम आब दिनोमे लगैत अछि मसान आऽ फेर असोथकित भेल ग्रामदेवता टुकुर-टुकुर तकैत छथिन बाट गामसँ भेल पलायनक टीस अछि ई पद्य। २०.अन्हारक मुरुत मुरुत ... छोड़ि दैत अछि नियन्त्रण अपनो परसँ --------------------------------------- -------------------------------------- मूर्तिपूजक एहि देशमे मूर्तिक ई इतिहास बड़ पुरान अछि। हमरा बुझने एहि पद्य संग्रहक ई सभसँ गंभीर आऽ नीक पद्य अछि।  मुरुतक स्वप्नक पोटरी देखायब आऽ बिनु प्रकाशक अन्तहीन अन्धकार दिशि बढ़ैत जाएब। मुरुत करैत अछि परम्पराक परिक्रमा आऽ फेर फेंकि देल जाइत अछि घिनाएल डबड़ामे। २१.मृत्युक बोझ चारि वर्षक आँखिमे खचित बाबाक नोराएल आँखि गामक अबाल-वृद्ध सबहक अँतड़ी सुखाएल लहास श्राद्धक, भोज खयबाक उत्साहोसँ नहि मेटाएल म्त्युक तांडव विभिन्न कारणसँ कविक हृदय रसहीन भए गेलन्हि स कविताक नीरस हैब उचिते छन्हि से कवि कहैत छथि। २२. हमर बाट (अग्रज अफसर कचि रमेशजी लेल) पोथीक बात उद्वेलित करैए से नीक बात मुदा सुविधाभोगी जीवन कए की करबै आऽ फेर- चलबै हमरा संग हमर बाट पर मीता? २३.मनोहर पोथी जकर शिक्षा नहि बना सकतै ओकरा जीवनकेँ मनोहर आऽ कि हम बचा सकबै एकरा दुनूकेँ एहि उदारवादी आ बाजारवादी बिहाड़िसँ? २४. हे हमर पिता! हमरा दिक् लगलासँ भुतियाइयो जाइ आ हम क’ सकी पूर्ण अहाँ अपूर्ण यात्रा २५.माटि माटि चूल्हिक लेल होइ कि कोठीक लेल आऽ मैञा माटि चीन्हैत छथिन हम माटि नहि चीन्ह पबैत छी २६.माटिक गाड़ी उसरल अछि दिवारी थान कतय भेटत आब २७.पूर्वज इतिहासक कोन चक्कीमे पिसा गेलाह हमर पूर्वज २८.रखैल ओ ककर तकैत अछि बाट २९.सर्वनाम ठीक अछि सबटा वस्तु जात आऽ खेत जोतबाक लेल ट्रैक्टर अछि बड़द पोसबाक जरूरति नहि रहल आब तखन शहरमे संज्ञाक संकट गाममे सर्वनाम सन हालति ३०.कान्ह पर सवार बैताल कमलाक कथामे मिलैत बलानक कथा आऽ कान्ह पर लदने चलि रहल छी विशाल प्रश्नवाचक जकाँ ३१.सवयंसँ संवाद यक्ष्मासँ जर्जरित छाती स्वयंसँ स्वादक बात आब टारल नहि जा सकैए बेशी दिन ३२. छोट-छोट चीजक मादे एकालाप पोथीक बीचमे राखल मोरक पंख पद्य पढ़नहारकेँ सेहो बहुत किछु मोर पाड़ि दैत छथिन्ह कवि। ३३. बीसम शताब्दीक श्वेतपत्र पत्नी कहैत गेलि वस्तु अबैत गेल आऽ हम पड़ल छी मृत्युशय्यापर बीसम शताब्दी जकाँ ३४. द्विज मूल ठामसँ उखड़ल लोक कोना जमि जाइत अछि आन ठाम बहिन गेल छलीह सासुर आ संग हमहूँ रही सोचैत कि बहीन रहि सकतीह एहि ठाम ३५.हम घर कोना घुरब कुहरैत छी मुक्तिक लेल के करत हमरा मुक्त ३६. कुरुक्षेत्र नागा आ कूकीक संघर्ष बढ़ले जा रहल अछि आऽ टाकाक रिमोटसँ संचालित अभिनेत्रीक देह ३७.प्रश्नकालमे कालाहांडीक निवासीक भोजन आ मुसहरीक निवासीक जलखै बेर-बेर नचैए आँखिक आगूमे ३८. तुलसी चौरा पर जरैत दीप रोज साँझकेँ दीप जरबैत माय दीप जरबैत छलीह आ कि स्वयंकेँ? ३९. मोसकिल भ’ गेल अछि इजोरिया रातिक निःशब्दामे विरहा सुनब ४०.अभिशप्त निज गामकेँ पिकनिक स्पॉट बुझि ओ अबैत छथिन गाम कोनो काज निकाल’ वा मोन बहटार’ मुदा आबतँ ताहू लेल लोक गाम नहि अबैत छथि। दुर्गा पूजामे छागरक बलि चढ़ेबाक कबुलाक पूर्तियो लेल कहाँ क्यो अबैत अछि आब। ४१. खुट्टी पर टाँगल झोरा हरदम बोध करबैत छल पिताक उपस्थितिक। ४२.साँझ होइत गाममे निरन्तर अस्पष्ट होइत जा रहल साँझक गाछ तर साँझमे घुरल सुग्गा जकाँ ४३. मायक लेल किछु कविता काँकोड़ सन होइत अछि माय जकरा प्रसवक बाद ओकर बच्चे खा जैत छैक ४४. सप्पत आबतँ साँचे लगैए झूठ सन आ झूठे साँच सन ४५. प्राक् इतिहास अदौ कालसँ दिमागक खोहमे नुड़िआइत हमर असंख्य प्राक इतिहास ४६. रामभोग आब चुनाव-नाथसँ शुरू करैए अयोध्या नाच ४७.संबंध हम कोना कहि सकब अहाँ हमर किछु नहि लगैत छी मीता ४८.समयकेँ अकानैत एहि संग्रहक टाइटिल पद्य अछि ई कविता। जतए छल कलमदान ओतए एतेक रास शालिग्राम किछुए दिनक बाद गायब भ’ जाइत अछि हमर अपूर्णकविता अपूर्ण लेख मेहनतिसँ ताकल किछु महत्वपूर्ण साक्ष्य हिन्दी कवि मुक्तबोध मोन पड़ि जाइत छथि एहि पद्यसँ। एहि संग्रहक सभटा पद्य भावना आऽ स्मृतिसँ जुड़ल अछि। आब किछु तकनीकी विषय। एहि संग्रहमे मैथिलीक मानकताक विषय किछु पाछाँ रहि गेल अछि, जेना मैथिलीमे विभक्ति संगहि बाजल आऽ लिखल जाइत अछि, मुदा संग्रहक नामसँ लए सभटा पद्यमे कवि अपन हिन्दी शिक्षाक अनुरूपेँ विभक्ति हटा कए लिखने छथि। अगिला संस्करणमे ई भाषायी असुद्धि दूर होएबाक चाही। जेना सुभाषचन्द्रजीक लेखनीमे सेहो मानकता किछु दोसर रूपेँ आयल अछि। मुदा ध्वनि विज्ञानसँ ओऽ संबंधित अछि। श्री सुभाष जी ऐछ लिखैत छथि, मुदा मैथिलीमे “अछि” एकर उच्चारण होइत अछि “अ इ छ”, हिन्दीमे ह्रस्व इ लिखल पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि, देवनागरी वर्णक जेना लिखल जाइत अछि, तहिना बाजल जाइत अछि, ह्रस्व इ एकर अपवाद अछि। मुदा मैथिलीमे से नहि अछि। तहिना छै केँ छैक वा छञि, नै केँ नञि लिकल जएबाक चाही। पराशर जी मैथिलीक मैञा केर प्रयोग कएने छथि, मायक जे उच्चारण माञ कहने लिखने अबैत अछि, तकर दृष्टिसँ ई प्रयास स्तुत्य अछि। मुदा श्री सुभाषजी ( हुनकर कथा “विदेह” क एहि अंकमे ई-प्रकाशित अछि) अपन लेखनीमे मैथिलीक असल स्वरूप अनबाक लेल किंचित् प्रयोग कएने छथि, तकर किछु उद्देश्य अछि, मुदा पराशरजीक विभक्ति हटा कए लिखब मात्र टाइप दोष बनि रहि गेल अछि। फेर दोसर गप जे ई पद्य संग्रह भावना आऽ स्मृतिक विस्फोट अछि, मुदा कखनो काल कए लगैत अछि जे हमरा सभ पद्य नहि गद्य पढि रहल छी, जापानी “हैबून” जेकाँ। से अपन पहिल पद्य संग्रहमे एतेक प्रतिभाक प्रदर्शन देने छथि पंकजजी जे हमरा सभ आसमे छी जे दोसर संग्रहमे ओऽ अपन लयबद्ध पद्यसँ हमरा सभकेँ झमारि देथि। तेसर गप जे एहि पोथीमे आइ एस बी एन नम्बर नहि अछि। मैथिली प्रकाशनक सूचीबद्धता नहि भए पाबि रहल अछि, मुदा ई प्रायशः एहि दू-चारि सालमे प्रकाशित सभ मैथिली ग्रंथ सभक संग अछि। आशा अछि कविक नव रचना शीघ्रा आयत। संगीत-शिक्षा I. पहिने कमसँ कम 37 ‘की’ बला कीबोर्ड लिय। एहिमे 12-12 टाक तीन भाग करू। 13 आ’ 25 संख्या बला की सा,आ’ सां दुनूक बोध करबैत अछि। सभमेँ पाँचटा कारी आ’ सातटा उज्जर ‘की’ अछि। प्रथम 12 मंद्र सप्तक, बादक 12 मध्य सप्तक आ, सभसँ दहिन 12 तार सप्तक कहबैछ। 1 सँ 36 धरि मार्करसँ लिखि लिय। 1 आ तेरह सँ क्रमशः वाम आ’ दहिन हाथ चलत। 12 गोट ‘की’ केर सेटमे 5 टा कारी आ’ सात टा उज्जर ‘की’ अछि। प्रथम अभ्यासमे मात्र उजरा ‘की’ केर अभ्यास करू। पहिल सात टा उजरा ‘की’ सा, रे, ग, म, प, ध, नि, अछि आ’ आठम उजरा की तीव्र सं अछि जे अगूलका दोसर सेटक स अछि। वाम हाथक अनामिकासँ स, माध्यमिका सँ रे, इंडेक्स फिंगर सँ ग ,बुढ़बा आँगुरसँ म , फेर बुढ़बा आँगुरक नीचाँसँ अनामिका आनू आ’ प, फेर माध्यमिकासँ ध, इंडेक्स फिंगरसँ नि, आ’ बुढ़बा आँगुरसँ सां। दहिन हाथसँ 12 केरसेट पर पहिल’की’ पर बुढ़बा आँगुरसँ स, इंडेक्स फिंगरसँ रे, माध्यमिकासँ ग, अनामिकासँ म, फेर अनामिकाक नीचाँसँ बुढ़बा आँगुरकेँ आनू आ’ तख बुध्बा आँगुरसँ प, इंडेक्स फिंगरसँ ध, माध्यमिकासँ नि आ’ अनामिकसँ सां। दुनू हाथसँ सां दोसर 12 केर सेटक पहिल उज्जर ‘की’ अछि। आरोहमे पहिल सेटक सां अछि तँ दोसर सेटक प्रथम की रहबाक कारण सा। दोसर गप जे की बोर्डसँ जखन आवज निकलयतँ अपन कंठक आवाजसँ एकर मिलान करू। कनियो नीच-ऊँच नहि होय। तेसर गप जे संगीतक वर्ण अछि सा,रे,ग,म,प,ध,नि,सां एकरा देवनागरीक वर्ण बुझबाक गलती नहि करब। आरोह आ’ अवरोहमे कतेक नीच-ऊँच होय तकरे टा ई बोध करबैत अछि। जेना कोनो आन ध्वनि जेनाकि क केँ लिय आ, की बोर्ड पर निकलल सा,रे...केर ध्वनिक अनुसार क ध्वनिक आरोह आ’ अवरोह करू। (अनुवर्तते) महुआ घटवारिन महुआ घटवारिन परी जेकाँ सुन्दरि छलीह,जेना गूथल आँटामे एक चुटकी केसर, मुदा सतवंती छलीह। बाप गँजेरी शराबी आ’ माय सतमाय,मैभा महतारी, नजरि चोर। घरमे सतमायक राज छल। सोलह बरखक भय गेल रहथि मुदा हुनकर बियाहक चिंता ककरो नहि रहैक। परमान नदीक पुरनका घाटक मलाह प्र्रर्थना करैत छथि जे महुआक नावकेँ किनार लगा दियौक। साओन-भादवक, भरल धार, कम वयसक महुआ नहि जाऊ, एहि राति खेबय लेल नाव। एहने साओन-भादवक रातिमे सतमाय घाट पर उतरल वणिक् केँ तेल लगेबाक हेतु महुआकेँ पठबय चाहैत अछि, आ’ ओ’ जाय नहि चाहैत अछि। अपन मायकेँ यादि करैत अछि, नोन चटा केँ किए नहि मारलँह, पोसलँह एहि दिन खातिर। मुदा सतमाय साओन-भादवक रातिमे पथिककेँ घाट पार करबाबय लेल महुआकेँ पठा देलक। महुआ बिदा भेलि आ’ बीच रस्तामे अपन सखी-बहिनपा फूलमतीसँ भरि राति गप करैत रहल। केहन माय अछि जे रातिमे घाट पार करेबाक लेल कहैत अछि। माय ईहो कहलक जे पथिक पाइबला होय आ’ बूढ़ होय तँ ओकरा तेल-मालिस करबामे कोनो हर्ज नहि। ओकर मोनमे जे होय भेल तँ ओ’ पिते समान, ओकरा जेबीसँ चारि पाइ निकालि लेल जाय, अहीमे बुधियारी अछि। फूलमती कहलक- घबरायब नहि। जरेने रहू प्रेमक आगि , ओकरा लेल जे मोरंगमे आँगुर पर दिन गानि रहल अछि। मोरंगक नाम सुनि महुआ उदास भय गेलि। ओ’ फागुनमे आयत। भोरहरबा ओ’ गामपर पहुँचल आ’ माय दस बात कहलकैक। बाप नशामे आयल तँ माय ओकरो लात मारि भगा देलकैक। तखने हरकारा आयल आ’ मायक कानमे संदेश देलक। महुआ मायकेँ कहलक जे अहाँ जे कहब से हम करब। वणिक् क आदमी आयल छल,ओकरा संग महुआ घाट पर पहुँचल। वणिक् दू सिपाहेक संग नावमे बैसल। महुआ नाव खेबय लागलि। मुदा ओकरा नहि बूझल रहय जे ओकरा बेचि देल गेल छैक। सिपाही ओकरासँ पतवारि छीनि लेलक। सौदागर ओकरा कोरामे बैसाबय चाहलक, तँ ओ’ छरपटाय लागलि। सिपाही कहलक जे सभटा पाइ चुका देल गेल अछि, अहाँकेँ कोनो मँगनीमे नहि लय जा रहल छथि। महुआ स्थिर भय गेलीह। ओ’ सभ बुझलक जे महुआ मानि गेल अछि। तखने महुआ धारमे कूदि पड़लि। उल्टा धारमे मोरंग दिशि निकलि जाय चाहलक महुआ, जतय ओकर प्रेमी अछि, ओकरा लेल सात पालक नाव लेने। सौदागरक छोटका सिपाही महुआकेँ प्रेम करय लागल छल, ओहो कूदि गेल कोशिकीक धारमे, दूनू डूबि गेल। अखनो साओन-भादवक धारमे कोनो घटवारकेँ कखनो देखा पड़ैत छैक महुआ। कोनो खिस्सा वचनहारकेँ देखा जाइत अछि ओ’, आ’ शुरू भय जाइत अछि , एकटा छलीह महुआ घटवारिन..............................। आर्या विवाहक उपरान्त ढ़ेरी-ढ़ाकी लोक हमरासँ भेँट करबाक हेतु सासुरमे आबि रहल छलाह। ताहिमे छलि एकटा नवम् कक्षाक छात्रा आर्या आ’ ओकर पितामही आ’ माय। ओ’ मायक संग नहि आबि असगरे आयल छलीह। खूब कारी, दुबर-पातर, आवश्यकतासँ बेशी अनुशासित आ’ शिष्ट आ’ नापि-जोखि कय बजनिहारि। हमरासँ सभ गपमे उलटा। हमर कनियाँ हुनकासँ हमर परिचय करओलन्हि, आ’ ओकर प्रशंसा सेहो कएलन्हि। किछु कालक बाद जखन ओकर पितामही आ’ माय हमरासँ भेँट करबाक हेतु अयलीह तँ हमरा अनुभव भेल, जे हुनकर पितामहीक तँ लेहाज राखल गेल छल मुदा हुनकर मायक अवहेलना सन हमर कनियाँ आ’ सासु द्वारा भेल छल। गप्पो करबामे ओ’ नीक छलीह आ’ जाइत-जाइत कहि गेलीह, जे हमरा सभ अहाँक ससुरक किरायादार छी, आ’ उपरका महला पर रहैत छी। से भीड़-भाड़ कम भेला पर अवश्य आऊ। ई गप्प जाइत-जाइत हमर सासु प्रायः सुनि लेलन्हि, से हमर पत्नीकेँ अस्थिरेसँ मुदा आज्ञार्थक रूपेँ कहलन्हि, जे ऊपर जयबाक कोनो जरूरी नहि छैक। हम पत्नीसँ पुछलियन्हि, जे बेचारी एतेक आग्रहसँ बजओलन्हि अछि। पत्नी कहलथि जे सुनलियैक नहि, माँ मना कएलन्हि अछि। कारण पुछला पर गप अन्ठा देलन्हि। किछु दिनुका बादक घटना छी, अन्हरोखेमे गेटक झमाड़ि कय खुजबाक अबाज भेल। लागल जे क्यो पीबि कय बड़बड़ा रहल अछि। हमरा अतिरिक्त क्यो ओहि अबाज पर ध्यान नहि देलक, आ’ अन्ठयबाक स्वांग कएलन्हि। हम बाहर अएलहुँ तँ एकटा अधवयसु झुमैत अबैत दृष्टिगोचर भेलाह। हमरा देखि डोलैत हाथसँ जमायबाबू कहि नमस्कार कएलन्हि। अखन धरि हमरासँ भेँट नहि होयबाक कारण हमर पत्नीकेँ फड़िछओलन्हि आ’ डोलैत ऊपर सीढ़ीक दिशसँ चलि गेलाह। हमर पत्नी हाथ पकड़ि कय हमरा भीतर आनि लेलन्हि आ’ ईहो सूचना देलन्हि जे ईएह आर्याक पिता थीक। अनायासहि हमरा माथमे आयल जे रंग जे आर्याक छैक से पिते पर गेल छैक। बादमे हमर सासु ऊपर जा’ कय भाषण दए अयलीह आ’ एक महिनाक भीतर घर छोड़बाक अल्टीमेटम सेहो आर्याक परिवारकेँ दए देलन्हि। हमर सर कहलथि जे ई दसम अल्टीमेटम छैक, मुदा हमर सासु अडिग छलीह जे किछु भय जाय एहि बेर ओ’ नहि मानतीह। जमाय की भुझताह जे केहन भाड़ादार रखने छी। पहिने ठकिया-फुसिया कय बहटारि लैत छल। पुछला पर पता चलल जे आर्याक पिता डॉक्टर छैक, आ’ सेहो होमियोपैथिक, आयुर्वेदिक किंवा भेटनरी नहि वरन् एम. बी.बी.एस.। मुदा लक्षण देखियौक। ओना सासु ईहो गप कहलन्हि जे ई पीने रहबाक उपरान्तो गप्प एकोटा अभद्र नहि बजैत अछि, जेना आन पीनहार सभक संग होइत छैक। मनुक्खो ठीके अछि, मुदा यैह जे एकटा गड़बड़ी छैक से बड्ड भारी।अगला दिन नशा उतरलाक बाद पति-पत्नी दुनू गोटे नीचाँ अएलीह आ’ सासुकेँ कहलन्हि, जे आर्याक बोर्डक बाद ओ’ सभ पटना चलि जयतीह से हुनका सभक खातिर नहि मुदा आर्याक खातिर तावत रहय दिय’। घोँघाउजक बाद से मोहलति भेटि जाय गेलन्हि। तकरा बाद हुनकर पत्नीक नजरि हमरासँ मिलल तँ ओ’ कहलन्हि जे अहाँ तँ ऊपर नहिये आयब। आ’ एहि बेर ऊपर अयबाक आग्रहो नहि कएलथि। किछु दिन बीतल आ’ फेर सासुर जयबाक अवसर भेटल। किछु दिनमे पता चलल जे किरायादार बदलि गेल छथि। घरक लोक मात्र एतबे कहलथि जे आर्याक पिताक मृत्यु भ’ गेलन्हि आ’ अनुकम्पाक आधार पर ओकर मायकेँ नौकरी भेटि गेलैक। आब ओ’सभ क्यो पटनामे रहैत छथि। घरक लोक आगाँ किछु नहि कहलन्हि, मुदा कनियाँक एकटा पितयौत भाय आयल रहथि, से कहलथि जे डॉक्टरी रिपोर्टमे विष खा’ कय आत्महत्याक वर्णन अछि। फेर आँगा पति-पत्नीक मध्य मचल तुमुलक चर्च भेल। कनियाँ कहइत रहथिन्ह जे ई डॉक्टर बड्ड पिबैत छथि ताहि लेल झगड़ा होइत अछि, तँ डॉक्टर साहब कहथि जे झगड़ाक द्वारे पिबैत छी। अस्तु मृत्युक बाद हुनकर कनियाँक भाव एहन सन छल जेना मुक्ति भेटि गेल होय- एहि बातमे सभ क्यो एक मत रहथि। फेर दिन बितैत रहल आ’ बादमे फोन पर समाचार भेटल जे आर्या सेहो आत्म हत्या कए लेलक। फेर बहुत रास बात मोनमे घूमि गेल। आर्या भावुक छलि, किछु बेशी तनावमे रहिते छलि। गपकेँ गंभीरतासँ लइत छलि। एकटा सारि रहथि, हुनकर बात सेहो मोन पड़ल। एक गोट युवकक विषयमे आर्या कहैत छलि, जे ओकर संगीकेँ होइत छैक जे ओ’ युवक ओकरासँ प्रेम करैत अछि। मुदा आर्याक मत छल जे ऊ’ युवक ओकरासँ नहि वरन् आर्यासँ प्रेम करैत छल। हम सारिकेँ कहने रहियन्हि जे आर्या बच्चा अछि, ओहिना हँसी कएने होयत। मुदा ओ’ कहलन्हि, जे नहि यौ। बड्ड भावुक अछि आर्या। कहैत अछि जे ओहि युवकके प्राप्त करबाक हेतु किछुओ करत। एहि बात पर हम तखन कोनो बेशी ध्यान नहि देने रहियैक। मुदा एहि बातक आब महत्त्व बढ़ि गेल छल। हम फोन दोबारा लगेलहुँ। पता चलल जे ओ’ युवक कोनो पुरान महारानीक बेटीक बेटा छी। ओकर माता शिक्षिका अछि, आ’ बाप मेरीनमे काज करैत अछि। साल-छह मास पर अबैत अछि। आ’ जखन अबैत छल तँ जे मास-पंद्रह दिन रहैत छल से मारि_पीटिमे बिता दैत छल। पूरा मोहल्लामे बदनामी छैक। मायक शील-स्वभाव बड्ड नीक, बोलीसँ फूल-झड़ैत छैक। बापकेँ तँ लोक चिन्हितो नहि छैक।खाली झगड़ाक अबाजे सुनैत अछि लोक। आर्याक संगीकेँ स्कूल बससँ उतरबा काल क्यो तंग कएने छल तँ ओ’ युवक सभकेँ मारि-पीटि कय भगा देने छल, आ’ एकर बाद आर्या एहि शहरसँ दूर भ’ गेल। ओ’ मायकेँ कहैत रहलि जे परीक्षा तक रहय दिय’, मुदा माय विमुक्त भेलाक बाद एको पल पुरान कटु-स्मृतिकेँ देखय-नहि चाहैत छलथिन्ह।हम फोन पर पुछलियन्हि जे ओहि युवकक विवाह आर्याक मृत्युसँ पहिने कतय भेल। तँ सासुरक लोक अचंभित पुछलन्हि, जे ओकर विवाह तँ भेल मुदा अहाँ कोना बुझलहुँ। पता चलल जे सिलीगुड़ी-दिशि कोनो कन्यागत छथि, आ’ ओ’ युवक अपन बाप जेकाँ घर-जमाय बनि रहबाक नियाड़ कएने अछि। एहि शहरक लोककेँ तँ विवाहक हकारो नहि भेटल। हम आर्याकेँ एकटा दृढ़ बालिका बुझैत रही। मुदा ओकर ‘किछुओ कड़य पड़त से करब’ केर अर्थ आब जा’ कय बुझलहुँ। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

3030 30 30 ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी  ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र  लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि।-ज्योति हिमपात बर्फ ओढ़ने वातावरण ! मानू आकाश टूटि क बिखरि गेल , अपने आप के छिरियाकऽ सबके एक रंग में रंगि गेल ॥ थरथराबैत सरदी स भयभीत सब जीव अपन जगह धेलक; प्रकृति के इहो अवरोध मुदा, मनुष्य के नहि बॉंधि सकल ॥ भॉंति प्रकारक साधन जोगारलक विकट परिस्थिति पर विजय लेल; अपन सर्वश्रेष्ठ बुद्धिबल स मनुष्य अंतत: सफल भेल॥ गामक सूर्यास्त गामक सूर्यास्त एक अद्भुत दृष्य यादि पाड़ि चकित भेलहुँ, पोखरिक भीड़ पर हम ठाढ़ छलहुँ आसमानक नीलवर्ण भेल रंगमय दिया बातीक मुहुर्तमे सुर्य सबसॅं विदा लय क्षितिजमे विलीन हुअ लागल संग ओकर प्रकाशपुंज सेहो भागल सबहक खरिहानमे लालटेन टिमटिमाय छल पक्षी सब समदाओन गाबि रहल छल सेहो ध्वनि मन्द पड़ि गेल सॉंझ रातिमे बदलि गेल फेरि स अगिला भोर मे पक्षिगण गायत प्राती सब मिलि एक संग। विशाल समुद्र समुद्रक लहरिक तरंग अनगिनत बेर दोहरा रहल अछि । उद्देश्यहीन अपने मुदा ओकर गान कहिया कत’ सँ चलि रहल अछि । बेर बेर रेत पर बनल पदचिह्‌न मेटा क’ तटसॅं घुरि जाइत अछि । जलक सभसॅं शक्तिशाली संगठन सागरक रूपमे उपस्थित अछि । रातिक अन्हारोमे ओकर गर्जन ओकर विशालताक आभास कराबैत अछि । आधुनिक जीवनदर्शन अतिशयोक्ति सँ विरक्ति अछि जाबे ओ' दोसरक प्रशंसा में होय परञ्च निंदामे किएक कंजूसी जखन अनकर करबाक होय । असभ्य तऽ ओकरा बुझब जे हमर प्रशंसकके रोकयए, ने हम्मर कियो प्रशंसक अछि ने समाजमे कियो असभ्य बुझाइए । परोपकार करनिहारके आशिष जे हमर काज बना गेल अन्यथा ओ सब बेरोजगार जे आनक काजमे लागि गेल । .मनुष्य आ' ओकर भावना कठोर हृदयमे भावुकता नुकायल भेटल, पुछलियै, “ तोहर आब कोन स्थान ?” बड़ निर्मलतासॅं उत्तर देलक, ''हमरा सॅं नहिं तोरा सबके त्राण। क्रोध, प्रेम, दु:ख, दया आदि जीवनक अंश अहिसॅं पूर्णत: विमुक्त भेनाई कठिन; परन्तु गलतकेँ बिसरा कऽ नीक विचारकेँ आश्रय देनाय अछि अपन आधीन । दया परोपकारक अधिष्ठात्री अछि , दु:ख खुशीक महत्त्व बुझाबए छै। क्रोध सॅं हठ, प्रेमसँ त्याग जनमैत अछि, बस उचित दिशा निर्देशन आवश्यक छै। मानवक बुद्धि भावनासॅं  प्रभावित होइत अछि़ ; भने ओ स्वयम्‌केँ विधाता बनओने फिरैए। आधुनिकताक होड़मे निष्ठुरता ओढ़ने अछि, भावनाहीन भऽ कऽ जीवित नहि रहि सकैए। 2. हम्मर   गाम गरमी में सुर्योदय के समय कतेक शान्त आ' शीतल, लू आ उमस सॅं ओत प्रोत दुपहरिया तेहने बिगड़ल; सॉंझ हुअ सऽ पहिने धूल धक्कड़ आ' बिहारि, राइत होति देरी अन्हार, ताहि पर मच्छड़क मारि। अहि सबहक बीच बसल बस एक मात्र मिठास अप्पन भाषाक ज देने अछि गाम जायक प्यास जतऽ सभ्यता के लाज में अपनापन नहिं नुकाइत छल लोक हाक दऽ कऽ हाल पूछऽ में नहिं सकुचाइत छल अनार, शरीफा, खजूर, लताम, पपीता, जलेबी, केरा सहित लीचीक बगान केसौर, कटहर, बेल, धात्री, जामुन, बेरक संग अप्पन पोखरिक मखान फेर आमक गाछी सेहो अछि जतऽ गर्मी बितौनाई नहिं अखड़ल हवा बिहारि में खसल आम बीछऽ लेल भगनाई नहिं बिसरल विकास विकासशीलताक उच्चतम्‌ शिखर कतऽ आऽ कतेक दूर पर भेटत। ई  एकमात्र मृगमरीचिका तऽ नहि जे लग गेला पर बिला जायत । प्यासलकेँ लोभ दऽ बजाबए लेल फेर कनिक दूर पर देखायत। मनुष विज्ञान आर तकनीकक नशामे आर कते दिन ओकरा खिहारइत रहत। यात्रा मात्रसॅं प्रकृति दूषित भेल भेटऽ मे की जानि कतेक हानि हएत। परन्तु अपन ज्ञानक सीमा संकुचित कऽ बुद्धिकेँ स्थूल तऽ नहि कएल जायत। गति निर्धारण आ' सामनजस्य चाही जतऽ विकासक मार्ग नहि रोकल जायत। संगहि प्रगति आऽ प्रकृति दुनुक भैयारी विज्ञानक नाम पर नहि तोड़ल जायत। बालश्रम बालपनक किलकारी भूखक ताप सऽ भेल मूक, पोथी  बारि कोदारि पाडैत हाथक मारि अचूक। कादो रौद बसातमे श्रम केनाइ भेल मजबूरी; गरीबीक पराकाष्ठा ! पेट आ पीठक घटैत दूरी, किछु धनहीनता आ’ किछु माता पिताक मूर्खता, मुदा, सभसँ बेसी स्वार्थी समाजक संवेदनहीनता, जे बालक केँ माताक आश्रय सॅं वञ्चित केलक, लेखनि के छीन कोमल हाथमे करची धरेलक, माल जालक सेवा करैत बाल्य जीवन कुदरूप, अपने भविष्यकेँ दरिद्र करैत अज्ञान आ' अबूझ, विद्योपार्जनक ककरा फुर्सति ?  स्थिति तऽ तेहन भेल, चोर बनक आतुर अछि बालपन दू दाना अन्न लेल। (१) तारा  दूरसँ बुझाइत कतेक शीतल वास्तवमे जड़ैत (२) शाखासँ लागल पुष्प आऽ पत्रसॅं आच्छादित अछि झूलैत लता (३) पक्षी विश्राम कएल बड़का यात्राक उपरान्त एखनो जे अपूर्ण (४) अद्रभुत अपवाद छैक नागफनीक कॉँटक बीच कुसुम खिलायल (५) नीलांबरमे मेघ विचरैत अछि कोना जेना सागरमे होए शार्क (६) भावी संकट केर पशु पक्षीमे पूर्वाभास प्रभुक दिव्य आशिष (७) कोमल पंखुड़ी सुगन्धक संग सजाओल एक पुष्पक रूपमे (८) नदीक तरंग ओहिना लागैत अछि जेना ओकर घुरमल केश (९) दू टा पसरल पाँखि बाज उड़ऽ लेल तैयार अछि पूर्ण रूपसॅं जागरूक (१०) पहाड़ीक ढलान ताहि पर एकमात्र गाछक छाह भेल यात्रीक विश्राम (११) संध्याक बेला सुनसान आऽ शान्त पोखरिक कात एक एकान्त स्थान (१२) मेघ रूपी बर्फमे अछि हवाई जहाज पिछड़ैत आकाशमे विचरैत (१३) कठोरतम  भूमि समुद्रक छोर पर बसल अछि पाथरक किनार (१४) विलक्षण अपवाद आकाश जरैत संध्याकाल समुद्रक उपरि (१५) पहाड़सॅं उदित सूर्यसॅं आकाश भेल जागृत ज्वालामुखी सन (१६) उगैत सूर्य संगे आयल अंधकारक उपरान्त अंतहीन दिनक आस (१७) दिवस आब थकल रातिक स्वागतमे लीन साँझ मिझाइत सूर्य दीप (१८) गाछ भने हरियर ग्रीष्मोमे देखु पतझड़ भोरक आकाशमे (१९) पक्षीक चहक आऽ आकाशक लाली संग प्रकृति जागल (२०) अतिसुन्दर जाड़ मेघक घिस घिस छिड़यौलक हिमपातक रूपमे (२१) तैयार उड़ऽलेल पक्षी विश्रामसॅं जागल वा अछि शुरूआत (२२) पक्षीक निरीक्षण छूटल अन्नक फेरमे कटनी भेलाक बाद (२३) फूलक हुँजक बोझ शाखा केँ झुका रहल बसंत आयल अछि (२४) तितलीक पंख अंकित रंग बिरंग आकार प्रभुक चित्रकला (२५) मनुष लेल कठिन किन्तु जीवन ओतहु अछि शीतलतम स्थान (२६) उच्चतम शिखरसॅं धुन्ध भरल हरियर घाटी निहारक इच्छा (२७) विभिन्न प्रकारक घास पात  जमीन पर उगल आइरसँ दूर बॅंचल। (२८) ओसक बूँद पाबि अछि घासक फुनगी आह्‌लादित हीरा सन चमकैत (२९) बाहर घूमऽ निकलल बतख अपन बच्चा संग गर्मीक दिनमे (३०) बतख हेल रहल अछि पानिक ऊपरी सतह पर लक्ष्यक दिस निरंतर (३१) स्प्रेसो आस्ते पिब लेल गर्म देल गेल (३२) ईश्वर केँ तकनाइ नहि कठिन पाबू ओकरा पवित्र हृदयमे (३३) दृष्टि भ्रमणमे घाटी पर दूर दूर धरि भटकि सकैत अछि (३४) घोड़ा भटकि रहल उद्देश्यहीन बिन घुड़सवार भेल अनुशासनहीन (३५) स्थिर पानिमे प्रकृतिक प्रतिबिम्ब साफ लेकिन उलटा (३६) प्राकृतिक दृष्य पानिक प्रतिरूप बिना अपूर्ण बुझाइत अछि। (३७) पतझड़क पात पसारलक अप्पन सतरंजी हरियर घास बदला। (३८) समुद्रक तहमे विभिन्न आकार प्रकारक रंग बिरंग जीवन। (३९) नटखट समुद्र तटक आरामसँ वंचित कएने  बेर बेर तंग। (४०) पहाड़क चोटी आर बेसी ऊँच लागैत अछि गहीँर घाटीक बीच (४१) पोखरिमे देखु प्रकृतिक प्रतिबिम्ब उलटल बुझाइत अछि (४२) तितलीगण उतरल पंखरूपी पैराशूट लऽ फुलक झुण्ड पर। (४३) उच्चतम शिखर पर गुफासँ दृष्टिगोचर होइत रमणीय दृष्य (४४) बच्चाक संग खेलमे एकेटा खुशीक आभास ओकर किलकारी (४५) टेढ़ मेढ़ रेखा अछि बरसातक बहैत पानिसँ खिड़कीक काँच पर बनल (४६) बादलसँ छनल समुद्रक लहरिक तरंग उपर चमकैत किरण (४७) पानिक तरंग केँ पक्षी बदलि रहल अछि कलरवक लयमे (४८) मरुस्थलमे रेत अछि हवासँ बहारल सतह भेल समतल (४९) कतेक बेसी ध्यान पातक प्रारूप देबऽमे ईश्वर देने छथि (५०) बरसात खतम भेल पानि तइयो झरि रहल अछि गाछक पात सब सऽ ५१ समुद्रक लहरि लगातार टकरा रहल पाथर तइयो स्थिर ५२ मनोरम दृष्य जेना चिन्नीक चाशनीमे लिप्त अछि गाछ जाड़मे ५३ अपने रंगहीन अछि गाछ केँ रंगीन बनौलक नीचा गड़ल जड़ि ५४ शीतल प्रकाश युक्त सुर्योदयक पहिनेक समय सर्वोत्तम काल ५५ पाँखिक शाल ओढ़ने प्रकृतिक भ्रमण हेतु पक्षी निकलल जाड़मे ५६ चिडैय़ाक बच्चा माए बाप संगे अछि ताबञ जाबञ पंख नहिक छैक। ५७ प्रवासी पक्षी मीलक मील उड़िक आयल गर्मीक आनन्द लय। ५८ उछलैत पानि नदीसँ भेँट लेल खसल झरनाक रूपमे । ५९ नागफणीक गाछ सभ मरुस्थल्मे सेहो अछि मजबूतीसँ ठाढ़। ६० कठोर पातसँ लिप्त नागफनीक चोटी पर अछि कोमल फूलक ताज ६१ आर सजायल गेल कैक रंगक फूल आऽ लाइटसॅं क्रिसमसक साँझमे ६२ एक नारिकेरक फल कठोर केशयुक्त कवचमे मीठ उज्जर फल अछि ६३ भुखाएल बगुला नदीक कातमे ठाढ़ अछि माछक ताकिमे ६४ अतिथिक आगमन कौआक कर्कश काँव काँवसँ पूर्वसूचित भेल अछि ६५ सागरमे डॉलफिन खतरनाक जीवक बीचमे मनुषक साथी ६६ जिग ज़ैग ध्वनि केँ गाड़ी दोहरा रहल अछि भीजल सड़क पर ६७ भूकम्पक श्राप अछि अज्ञात अपराधक सजा मनुषकेँ भेटल ६८ छोट किन्तु तेज अछि अपन लक्ष्य चिनहऽमे भड़ल भीड़क बीच ६९ समुद्रक नीचाँ कतओ जायकाल रहैअ छोट माछ सब झुण्डमे ७० अंगूरक फल अछि मीठ जेल जमाकऽ रखने छोट छोट आकारमे ७१ स्वर्ग सदृश दृश्य हरियर प्राकृतिक संग चिड़ैआक कलरव ७२ राति हुअक पहिने आकाश दहकि रहल सूर्यास्तक पहिने ७३ खिलखिलाइत झरना मधुर ध्वनि घोरि रहल चारू दिशामे ७४ सूर्यक अएलापर रातिक अन्हार भागि गेल आऽ भोर शुरु भऽ गेल ७५ छाया उपर्युक्त अछि गोबरछत्ता केँ उगऽ आऽ पसरऽ लेल (७६) एकटा पओलाक बाद खरहा फेर भागि रहल अछि आर भोजन लेल (७७) गाछक स्वर्णिम रंग पतझड़क आगमनक घोषणा अछि करैत । (७८) गरमीक ऋतु कहॉँ ओतेक दुखद अछि शुरुक दिनमे (७९) स्वयम्‌ सिद्ध मकरा अपन सुरक्षा हेतु जाल अछि बुनैत (८०) कोनो आकारमे ढलि जाएत पानि मुदा गहराई एकर अपन गुण (८१) आकाश अखनो ऊँच बादल पहुँचमे बुझाएल ई धुन्धक रूपमे (८२) रातिमे इजोत दैत बर्फसँ परावर्तित होइत प्रकाशपुँज  जाड़मे (८३) लुक्खी सब निकलल अपन घड़सँ आलस त्यागि वसन्त ऋतुमे (८४) सोन सन सूरज भेल उज्जर चमकैत हीरा सन दिनकेँ अएला पर (८५) गाछ सब अछि होड़मे सबसँ पहिने पाबऽ लेल सूरजक रोशनी (८६) एकटा मन्दिर अछि खजूरक गाछ भीड़मे एक पोखरि कातमे (८७) सुखाएल छोट पातसभ गाछसँ नीचाँ खसैत अछि नबकेँ अवसर दैत (८८) गाछक शाखासभ अतेक ऊँचाई पर पसरल जड़ि ततब्बे गहिँर (८९) भोरक अयला पर गाछ पर लादल ओस भेल अछि चमकैत हॅँसी सन (९०) सोन सन कम्बल अछि ओढ़ने गहुमक खेत सभ कटाइक पहिने (९१) चक्रवातीय पवन जीवनसंहारक बनि गेल जीवनरक्षक छल। (९२) प्रदान करैत अछि पक्षी आऽ हिरण सभकेँ गाछ आऽ वृक्ष आश्रय (९३) फूलसँ भरल अछि एकटा घाटी एहन अछि जेना खुशी मुस्काइत। (९४) पानि बढ़ि रहल रस्ताक गाछ आऽ पाथर सभ विदा करैत ठाढ़ (९५) जाड़क गाछ अछि ठाढ़ वसन्तक प्रतीक्षामे पात सभसँ भिन्न भऽ (९६) Illusion of eye Colourful appearance of Rainbow in the sky आँखिक भ्रम, आभास वर्णमय पनिसोखा द्यौ (९७) Rainbow declares Beginning of bright days and End of rainy ones पनिसोखाक, शुभ्र दिन आबह खिचाहनि जाऽ (९८) Filled with smoky fog The wood seems to be burning Thou'  it is winter धुँआ  कुहेस जेना जड़ैत काठ, अछि ई जाड़ (९९) The words sound so sweet imitated by parrots Like baby babbles गुञ्ज मधुर सुग्गाक अभिनय, तोतराइत स्वर (१००) The sky is bright The wind has cleared the clouds Some still needs force अकाश श्वेत वायु टारैत मेघ, कनेक बल (९६ सँ १०० धरि इंग्लिशसँ मैथिली अनुवाद संपादक द्वारा कएल गेल) मेघक उत्पात कनिक काल दऽ पानिक फुहार फेर लेलक  अपन ऑँजुर सम्हारि देखू मेघक  उत्पात लोकक आशाक  उपहास करैत कखनो दर्शन दऽ बेर-बेर नुकाइत मौलाऽगेल गाछ आऽ पात कखनो गरजि भरि कऽ रहि गेल कखनो बरसि-बरसि कऽ भरि गेल डूबल पोखरिक कात कोसीक प्रवाह  सब बॉँन्ह तोड़लक गामक गाम जलमग्न कएलक ततेक भेल बरसात किसानक भविष्य मेघपर आश्रित मेघक इच्छा पूर्णतः अप्रत्याशित सभसालक अनिश्चित अनुपात बरखा तू आब कहिया जेबैं 1 बरखा तू आब कहिया जेबै अकच्छ भेलौ सब तोरा सॅं बुझलियौ तू छै बड जरूरी लेकिन अतीव सर्वत्र वर्जित छै आर कतेक तंग तू करबैं बरखा तू आब कहिया जेबैं २ बेंग सब फुदकि फुदकि कऽ घुसि रहल घर - ऑंगन में ओकरा खिहारैत सॉंपो आयत तरह - तरह के बिमारीक जड़ि मच्छड़ सभके खुशहाल केलैं बरखा तू आब कहिया जेबैं ३ कतौ बाढ़ि सॅं घर दहाइत अछि कतौ गाछ उखड़ि खसि पड़ल कतेक खतरा तोरा संग आयल आन-जान दुर्लभ तोरा कारण आढ़ि सभ कादो सऽ भरलैं बरखा तू आब कहिया जेबैं ४ टूटल फूटल खपरी सऽ छाड़ल गरीबक कुटिया कोनाक सहत तोहर निरन्तर प््रावाहक मारि पशु-पक्षी सेहो आश्रयहीन  भेल नञहर के तू सासुर बुझलैं बरखा तू आब कहिया जेबैं ५ तोहर जाइत देरी शीतलहरी अप्पन प््राकोप देखाबऽचाहत मुदा पहिने आयत शरद ऋतु कनिके दिनक आनन्दी लऽ कऽ पनिसोखा देखेनाई नञ बिसरिहैं बरखा तू आब कहिया जेबैं। मिथिलाक विस्तार हम सब ओहि समूहक लोक इतिहास छानब जकर भाग संस्कृति बड़ धनी मुदा संरक्षणक अभाव जहिया सभक नींद खुजत तहिया करब पश्चाताप ओहि सभ्यताकेँ ताकब जे अखन लगैअ श्राप उन्नतिक पथ पर चलऽ लेल पहिरलहुँ आधुनिकताक पाग जिनकासॅं ई सुरक्षित अछि से गाबैत बेरोजगारीक राग जे गरीबीक सीमा पार कएलाह से व्यस्त प्रतियोगितामे दिन राति एक संजीवनी बुटीक अभिलाषा जे सभ्यताकेँ दिअए सुरक्षित आधार विश्वस्तरीय संस्थाक निर्माण होए एकर विशेषताक जे करए विस्तार ईशक अराधना 1 हे ईश एहन हाथ दिअ जे कर्मठ आ कुशल होई अहॉं लग मात्र जोड़िक कर्म के तिलांजली नहि दई पूजाक संग काजक संगम जकरा लेल ग्राह्य होई २ हे ईश एहन पैर दिय जे अपन भार सहि सकय आनक जहन प्रयोजन होई तऽ सभसॅं आगॉं बढ़ि सकै औचित्य सॅं विचलित जकरा कोनो बाधा नञ कऽ सकै ३ हे ईश एहेन वाणि दिअ जाहि में निवास करैथ शारदा मिठास होए आ' शीतल होय नहिं होए भय आ' लोलुपता अहॉंक अराधना भक्तिभावसऽ देववाणिमे करक दिअ क्षमता ४ हे ईश एहेन दृष्टि दिअ अहॉंक रूपके कराबै चिन्‌हार अहॉंक बास जखन घट-घट मे फेर कियै जाउ हिमालय पहाड़ सत्कर्मके हम पूजा मानी नहिं रहै अज्ञानताक अन्हार ५ हे ईश एहन बुद्धि दिअ अहॉं पर सदैव रहै विश्वास संतोष आ' शान्ति पाबि बेसी के नहिं हुए आस प््रााणिमात्रक कल्याण लेल कऽ सकी आमरण प्रयास खरहाक भोज खरहा सब भामि-भामि बाड़ीमे अछि भोज करैत जतेक छल रोपल साग-पात कुचरि-कुचरि कऽ चरैत एहन असहति दृष्य देख गृहस्थक तामसे मोन जरैत प्रतिदिनक निरंतर प्रयास बाड़ी छल फूलैत-फलैत अतेक दिनका कएल धैल पर ई सभ पानि फेरैत भीड़ल सब ओकरापर चारू दिससॅं खिहारैत कियै ओ ककरो हाथ आयत नहि देरी भेल ओकरा पड़ाइत। बिन मेहनति आ' बिन धैर्य मनुषकेँ अछि किछु नहि भेटैत पशु - पक्षी सब लुझिकऽ अपन जीवन अहिना बिता लेत। कल्पनालोक कल्पनालोकमें विचरण करै छलहुँ उन्मुक्त सबतरहक विषाद जतऽ भऽ गेल छल लुप्त आह्लादित हृदय सेहो रहय विस्मयसॅं युक्त प््राशंसामें स्वर्ग शब्द लागल सबसऽ उपर्युक्त कोनो भूमि नहि भेटल जे छल कलह सॅ लिप्त थम्हलहुँ जत कतौ छल स्नेहक जलसॅंऽ सिक्त आरोग्यक कचोर रंग सर्वत्र छल पल्लवित ताहि पर खुशी कोमलतापूर्वक रहय पुष्पित शान्ति तेहेन जे देलक अपूर्व आत्मसंतोष दूर-दूर तक नहिं कतौ देखायल आक्रोश एहनो दुनिया हैत कतौ से नहिं छल भरोस जाहि सॅं दुखी छलहुँ से मेटायल सब रोष वास्तविकता अछि अलग से तऽ स्वयंसिद्ध समस्या सॅं जूझैत सब, की बच्चा की वृद्ध कल्पनाक साकार भेनाई अछि अहिमें निमित्त घर-घर जहन लोक हैत शिक्षित आ समृद्ध। कोसीक प्रकोप प्राकृतिक प्रकोप मिथिलामे देखि के नहि हैत अधीर देहाइत डूबैत जन जीवन सरकार बनल अछि बहिर कहिया सऽ अछि बनल कोसी नदी बिहारक शोक पर्यावरणके सतत हनन कियेक नहि लागल रोक घमैत हिमनद बढ़ैत जलस्तर सृष्टिके दिनोदिन बढ़ैत तापमान पर्यावरण पर गम्भीर चिन्तन आवश्यक पहिने वर्त्तमान संकट स पाबि निदान अतेक सालक समय देलाक बाद फेर रस्ता बदलि लेलक कोसी नदी अहि महाप्रलय सऽ बचनाइ छल संभव समय पर सरकारी कोष खुजितै यदि मज़बूत बान्ह आ प्रवाहक मार्गदर्शन लेल भूगोलवेत्ता आ अभियंता आगू आबैथ जलसंचयसऽ सिंचाइक समस्या भगा जलशक्ति सऽ विद्युत निर्माण करैथ। असल राज लन्दन शहरमे भोरक भीड़सऽ भागैत दिनचर्याके आढ़िसऽ ठाढ़ भेलहुं कात भऽ॥१॥ लागल सबके प्रेत रेवारने छल आकि कोनो लॉटरी फुजल सबके तेना पड़ाहि लागल छल॥२॥ समय सॅ छलै सब पैबन्ध विदा काज दिस एक बैगक संग ओवरकोटमे बन्द॥३॥ मिथ्या अभिमान भेल विलीन सब काजक सुरमे तल्लीन स्वावलम्बी आऽ आत्माधीन ॥४॥ कानूनन ठीक अछि जे कोनो काज तकरा करैमे जे नहि केलक लाज सैह कऽ रहल अछि असल राज॥ ५॥ पतझड़क आगमन पतझड़क आगमन दहैक रहल वातावरण संतरा, पीयर, लाल, भूरा रंग सऽ भरल पूरा प्रकृति जेना भेल जीर्ण मौलाएत झड़ैत तृण-तृण विविध रंगके त्यागिकऽ गेरूवा वस्त्र धारिकऽ विदा भेल लेबऽ सन्यास ताहि पर सुर्योदयक आकाश धरतीपर जे आगि छल ताहिमे ओहो लिपटल आकि अछि दर्पण जकॉं पृथ्वीक रूप देखाबैत जेना अकरा शीतल करैलेल साधु तपस्यामे लीन भेल जहिया हिमक बरखा हैत अस्वच्छता जखन दूर हैत तहिया सऽनवजीवनक प्यास लायत सुखद वसंतक अभिलाष। वृद्धक अभिलाषा एक वृद्ध रोपि रहल छल गाछ आमके कियो पुछलकै जे की लाभ हैत अहॉंके अपने छी जीवनक अंतिम छोर पर फरनाइ तऽ हैत अहॉंक मरलापर ओ वृद्ध जवाब देलैथ विनम्रता सऽ अपन काज सऽ बिना अडिग भऽ बाप दादाक रोपल कलम जे भोग केलहुं बस सैह ऋणके लौटाबक प्रयास केलहुं आगामी पीढ़ीके अपन हाथे खुआयब की नहिं कम सऽ कम ई गाछ फरैत रहत जा धरि अपन बाल बच्चामे मिठास घोरैत रहब भने ताबे अपने जीवैत रहब नहिं रहब टेम्स नदीमे नौकाविहार टेम्स नदीमे कर चललौं नौकाविहार स्टीमरमे उपरिक मंजिल पर सवार मन्द - मन्द चलैत शीतल बयार॥ वस्तुकलाक कते उत्कृष्ट उदाहरण तकनीकी विकासक प्रत्यक्ष दर्शन तटमे ठाढ़ ऊंच - ऊंच भव्य भवन॥ कलकलाइत जल स डोलैत नाव मानव प्रयाससऽ अनुशासित बहाव जगा देलक अपन बिसरल घाव॥ कतेक पॉंछा अछि अपन प्रान्त नैसर्गिक आपदा स आक्रान्त कहिया हैत बाढ़िक समस्या शान्त॥ रातिक बात तऽ आरो अद्भुत बस मंत्रक उद्घोष छल विलुप्त स्थानो नहिं छल ओहेन भक्तियुक्त॥ अन्यथा कहितौं अकरा हरिद्वार बत्तीक प्रतिबिम्ब स चमकैत धार जेना होय छठिक अर्घ्यदीपक भरमार॥ देवीजी: पिंजराक पक्षी चित्र: ज्योति झा चौधरी एकटा शिक्षिका छलीह, जिनका गाम पर सभ देवी जी कहैत छलन्हि। हुनकासॅं सभ विद्यार्थी डेराइतो छल, मुदा सम्मान सेहो करैत छल। एक दिन ओऽ एकटा कक्षामे गेलीह तँ हुनका एकटा छात्र पिंजरामे बंद एकटा सुग्गा देलकन्हि, जकरा 'देवी जी’ बजनाइ सिखा देल गेल छल । ओकरा बजैत सुनि सभ छात्र प्रसन्न भऽ हॅंसऽ लागल। देवीजी ओकरा तत्काल स्वीकार कऽ पढाबऽ मे लागि गेलीह । बादमे ओऽ ओहि बालकसँ पुछलखिन्ह जे '' जौं अहाँकेँ क्यो अपन शौक पूरा करऽ लेल सभसँ अलग कऽ छोट जगह पर बान्हि कऽ राखए तँ केहन लागत। हमरा एहि भेँटसँ कोनो खुशी नहि भेल”। बालककेँ अपन गलतीक अनुभव तुरत भऽ गेलैक। ओऽ तुरत ओहि पक्षीकेँ पिंजरासॅं मुक्त कऽ देलक। अगिला दिन देवी जी सभकेँ पक्षी देखबाक अलग तरीका सिखेलखिन्ह। पाठशालाक प्रांगणक एकान्त स्थान पर एकटा पुरान टेबुल राखि देलखिन्ह। ताहि पर मकई, चाउर, गहुम, अंकुरैल चना, रोटीक टुकड़ा, कटोरीमे पानि आदि राखि देलखिन्ह। सभ क्यो दूर बैसि कऽ प्रतीक्षा करऽ लगलैथ। कनिके देरीमे तरह-तरहक पक्षी ओतए हलचल करय लागल। ई दृष्य सभक लेल ओहि पिंजरामे पक्षी देखबासँ बेसी सुखद छलैक। तखन देवीजी कहलखिन्ह ''असली खुशी दोसराक खुश करबामे छैक। अपन स्वार्थ मात्र लेल दोसराकेँ कष्ट देनाइ पाप कहाइत छैक। सभ बच्चा शपथ लेलक जे आब कोनो पक्षीकेँ पिंजरामे बन्द नहि करत। देवीजी विद्यार्थी बनल माली एकटा बच्चा छलै जे छलै बड़ा खुरापाती।विद्यालय आबैत काल ओ रस्ताक सब फूल पात नोचने आबै छलै।विद्यालयमे सेहो फूलक गाछ के नोइच कऽ राइख दैत छल।अतब्ैा नहि ओ आनो बच्चा सबके उकसाबै छल।ओकर संगी साथी सब सेहो संगतक प््राभावे बड उपद्रवी भऽ गेल।तंग भऽ विद्यालय के माली प््राधानध्यापक लग अपन समस्या बाजल ''महोदय हम बच्चा सबहक खुरापात सऽ बड तंग छी।हम्मर दिन भरिक मिहनत ई सब क्षण भरि मे मटियामेट कऽ दैत अछि आ हम्मर बातक मोजर सेहो नहि दैत अछि।च्च् ताही पर प््राधानाध्यापक ओकरा आश्वासन देलखिन ''हम एहि पर अवश्य कार्यवाही करब।हम एहन बच्चा सभके दंडित करब।च्च् जखन देवीजी के अहि बातक खबरि लगलैन तऽ ओ स्वयम्‌ माली सॅं बात क बालक के पता केलीह फेर ओकरा सभके बजा कऽ पुछलखिन ''अहॉ सभ एहेन काज कियैक करै छी। बेचारा माली रौद बसात मे काज करैत अछि आ अहॉ सभ उारे ओकर परिणाम नहि आबैत छै। अहॉं सभके नहि ईच्छा होइत अछि विद्यालय के सुन्दर बनाब के।च्च् ताहि पर कियो बजलै ''हमरा सभके तितली पकड़नाई नीक लागैत अछि आ तितली सभत फूले पर बैसैत छै।च्च् आब देवीजीके फसादक जड़ि ज्ञात भेलैन।ओ प््राधानाचार्य सॅं आदेश पाबि सभ बच्चा सभके छुट्रटी वला दिन विद्यालय बजेलखिन। माली सेहो आयल। देवीजी खेले खेलमे सभके बागवानी सिखेलखिन। सभके मिलकऽ काज केनाइ ततेक नीक लागल जे क्षण भरिमे सभ टूटल मरल गाछ सभ हटा नब फूलक गाछ लागि गेल। देवीजी सभके कहलखिन जे जॅं ई गाछ सबके कियो तोड़त नहि त कञिये दिनमे अहि मे सुन्दर सुन्दर पुष्प लागत जाहि सॅं आकर्षित भऽ तितली के जमौड़ा लागत।संगहि देवीजी तितली के पकड़ सॅ मना केलखिन।ओकरा सुन्दरता दूर स देख के शिक्षा देलखिन।सभ बच्चा आह्‌लादित छल तैं उत्पात बन्द कऽ देलक। प््राधानाचार्य अहि परिवर्तन सॅं प््राभावित भेला। किछुए दिन बाद गाछमे फूल लाग लगलै।आ संगहि तितलीक आगमण सेहो बढ़ि गेल। आब खाली समय निकाइल कऽ देवीजी संग बच्चा सभ ओहि दृष्यक आनन्द लेब लागल।उपद्रवी बच्चा सभसॅं सकारात्मक काज करबाबऽ लेल देवीजीके सभसॅं प््राशंसा भेटलैन। देवीजी: गरीबक सहायता चित्र: ज्योति झा चौधरी देवी जी : गरीबक  सहायता एक बेर देवीजी विद्यालय आबि रहल छलीह तऽ द्वार लग हुनका एकटा चिनिया बदाम बेचऽवला  बड उदास देखेलनि। हुनका सऽ नहि रहल गेलनि। ओऽ ओकरा लग जा कऽ पुछलखिन '' एहि उदासीक की कारण? जवाबमे जे सुनऽ भेटलनि ताहि सऽ हुनकर मोन क्षोभसॅं भरि गेलनि। हुनकर विद्यालयक किछु छात्र ओकरा सऽ चिनियाबदाम खरीदकऽ पाई नहि देलकै। अगिला दिन ओऽ खुमचावला ओहि बेईमान सभकेँ समान बेचऽ सॅं मना कऽ देलक। ताहिसॅं उकता कए बच्चा सभ आर उग्र भऽ गेल आर ओकरा सब समानकेँ लुटि पाटि कऽ छिड़िया देलक। ओऽ खुमचावला गरीब छल, ओकर बड नुक्सान भेलैक। ताहि लऽ कऽ ओऽ बड दुःखी छल। देवीजी ओकरा प्रधानाध्यापक लग लऽ गेलखिन। प्रधानाध्यापककेँ सेहो अपन विद्यालयक बच्चा सबहक ई कुकर्म बड क्षोभित केलकनि। ओऽ देवीजी संगे मिलिकऽ उपद्रवी बच्चा सभकेँ अपन अभिभावक संगे बजेलखिन। सभ उपद्रवी बच्चा सभकेँ विद्यालयसँ निष्कासित  करबाक बात भेल। तहन बच्चा सभ माफी मॅगलक। देवीजी ओकरा सभकेँ बुझेलखिन जे गरीबी द्वारे ओऽ खुमचावला विद्यालय लग खुमचा लगाकऽ दू पाई कमाइत अछि जाहि सॅं ओकर परिवार चलैत छञ। एहि घटनासॅ ओकर बड हानि भेलैक। ओकरा खेनाइ पिनाइ तकक कष्ट भऽ गेलैक। तखन बच्चा सभ अपन एहि गलतीक पश्चाताप करबाक विचार केलक। देवीजीक आज्ञा लऽ ओऽ सभ टूटल खुमचाक मरम्मति केलक आऽ चंदा जमाकऽ जतेक समान लुटने रहए तकरा कीनि लौटेलक। सभ कियो ई शपथ लेलक जे कहियो फेर एहेन काज नहि करत आऽ गरीबक यथासम्भव सहायता करत । देवीजी:  साक्षरता अभियान देवीजी : साक्षरता अभियान विद्यालयमे आइ बहुत हलचल छल। बड़का सरकारी गाड़ी सामने ठाढ़ छल। बच्चासभ उत्सुक भऽ विद्यालयक अन्दर घुसल। सभकेँ किछु बुझा नहि रहल छल। बादमे प्रार्थनाक समयमे प्रधानाध्यापक सभकेँ सूचित केलखिन ''सरकारक दिस सँ ई निर्देश आयल अछि जे हम सभ देशसॅं निरक्षरता हटाबएमे योगदान करी। ताहि लेल सरकारक दिससॅं पुस्तक आऽ अन्य सामग्री प्रदान कएल गेल अछि। भारतवर्ष निरक्षरतामे विश्वमे सभसॅं आगॉं अछि। आर बिहार राज्य अपन देशमे साक्षरता आऽ स्त्रीशिक्षामे सभसॅं पाछाँ अछि। हमरा सभकेँ एकरा हटाबएमे योगदान करबाक चाही। विद्यार्थी सभ एहिमे काज करए लेल तैयार छल। सभ देवीजीसॅं पुछलक जे एहि लेल की करए पड़तैक। तऽ देवीजी सभकेँ पढ़ाबए केर तरीका सिखेलखिन। अगिला दिन सौंसे गाममे बात आगि जकॉ पसरि गेल जे रोज सॉंझकऽ स्कूलपर बुजुर्गसभकेँ आऽ जाहि बच्चा सभकेँ आर्थिक कमजोरीक कारण शिक्षा नहि भेट रहल छैक तकरा सभकेँ बिन खर्चाक साक्षर बनाओल जायत। सभकेँ आमंत्रित कएल गेल। आब प्रतिदिन सॉंझमे भीड़ लागए लागल। विद्यार्थी सभ शिक्षक संगे पढ़ाबएमे व्यस्त भऽ गेलाह। गर्मीक छुट्टीमे सेहो सभ एहि काजमे लागल  रहल। दुइए तीन महिनाक प्रयाससॅं गामक सभ बुढ़ बुजुर्गसँ लऽ कऽ उमरगर बच्चा सभ साक्षर भऽ गेल। सभसँ बेसी लाभ स्त्री सभकेँ भेलन्हि,  जिनका सभकेँ ई सुविधा भेटबाक कोनो आशा नहि छलन्हि। गाममे अखबारक खपत बढ़ि गेल। आब बुढ़ियो सभ बात करए लगलीह जे देशमे कोन पार्टीक बहुमत अछि आऽ के प्रधानमंत्री अछि। गीत नाद सेहो लिखि कए राखए लगलीह। आऽ अपन नातिन सभकेँ पढ़बाक लेल प्रोत्साहित करए लगलीह। मिथिलांचल, जतए स्त्री सर्वथा सम्मानित रहलि, मुदा शिक्षाक क्षेत्रमे ओकर भाग्य कनिक कमजोर छल, ताहुकेँ दूर करबाक ई प्रयास, आगामी उज्ज्वल भविष्यक प्रतीक छल। स्त्रीशिक्षाक एहेन दीप प्रज्वलित करबाक लेल विद्यालयकँ सरकार दिससँ सम्मानित कएल गेल। प्रधानाध्यापक आऽ सभ शिक्षक सभ अपन विद्यालयक छात्रसभक बहुत प्रशंसा केलखिन जे ओकर सबहक तन्मयतासॅं ई काज सम्पन्न भेल। फेर अगिला अवकासमे एहि कार्यक्रमकेँ आगॉं बढ़ेबाक विचार कएल गेल। देवीजी : व्यायाम आवश्यक चित्र: ज्योति झा चौधरी गामक विद्यालयमे प्रतिदिन व्यायामक शिक्षा देल जाएत छल; प्रार्थनाक समय, कक्षामे जाइ सऽ पहिने। कतेक बालककेँ इ बड्ड कष्टकारी लागैत छलै।ओ सब प्रार्थनाकाल प्रतिदिन नुका जाइ छल।शिक्षक सबसॅं ई बात नुकैल नहि रहल।ओ सब बच्चा सबहक अहि काज सऽ बहुत अप्रसन्न भेला।ओ सब देवीजीके नियुक्त केला ओकरा सबके बुझाबऽ लेल। देवीजी पता कर लगली जे ओ सब कत नुकाइत अछि।बेसी देर नहिं लगलैन इ ज्ञात करैत जे किछु बच्चा सब कक्षाक बेंचक नीचामे नुका जाइत छल। एक दिन देवीजी जहन प्रार्थना शुरु भेल तऽ कक्षामे जाकऽ तकनाई शुरी केली। किछु बच्चा सब ठीके नुकायल छलाह। देवीजी तत्काल ओकरा सबके प्रार्थना लेल पठेलखिन। तकर बाद ओकरा सबके बुझेलखिन जे व्यायाम कतेक आवश्यक छै।ई शारीरिक आर बौद्धिक दुनु तरहक विकास लेल आवश्यक छै। अहि सॅं स्फूर्ति आबैत छै।भोरे-भोर व्यायाम केला सॅं दिनभरि मोन प्रसन्न रहै छै आ सबकाज में मोन लागै छै।जहिना खेनाई आवश्यक होइत अछि तहिना व्यायाम सेहो आवश्यक छै। कसरत करक अभ्यास स्वस्थ जीवनके आधार होइत अछि।तकर बाद ओ व्यायामक शिक्षक के रोचक तरीका स व्यायाम सिखेबाक आ शिक्षक सबके सेहो संगे व्यायाम करैके सलाह देलखिन।सब हुनकर बात मानलक। बच्चो सब अहि स प्रभावित भेल आ व्यायाम स भगनाई छोड़लक। देवीजी पुनश्च अपन कार्यमे सफल भेली। शिक्षक दिवस चित्र: ज्योति झा चौधरी देवीजी : शिक्षक दिवस आई ५ सितम्बर कऽ विद्यालयमे शिक्षक दिवसके आयोजन छल। सब शिक्षक-शिक्षिका  अतिथि रहैत आ सब कार्यक्रम विद्यार्थी उारा प्रस्तुत छल। तरह - तरहक रंगारंग कार्यक्रम देखायल गेल जाहि स सब अध्यापक बहुत प्रसन्न भेलैथ।अहिबातक चर्चा विस्तृत रूपसऽ भेल जे ई तिथि देशकेप्रथम उपराष्ट्रपति एवम्‌ उितीय राष्ट्रपति स्वर्गीय सर सर्वपल्ली राधाकृष्णन  के जन्मतिथि छैन।भारतीय दर्शनके पश्चिमी सभ्यतामे मान्यता दियाबऽमे हुनकर योगदान अविस्मरणीय छैन।1952 – 1962 मे उपराष्ट्रपति रहला आ १३ मई १९६२ सॅअगिला पॉंच साल तक राष्ट्रपति रहला।जहन ओ राष्ट्रपति भेला तऽ हुनकर विद्यार्थी हुनकर जन्मदिवस मनाबऽके अनुमति मॉंगऽ गेलैन।ओ कहलखिन जे हमर जन्मदिन के आडम्बर के बदले अहि दिनके शिक्षक दिवस के रूपमे मनाकऽ हमरा गर्वित करू। तहियासॅं ई प््राथा प््राारंभ भेल। अहि दिन सब विद्यार्थी अपन शिक्षकसभके प््राति अपन आभार प््राकट करैत छथि। करैयो के चाही कारण कहल गेल अछि - ''गुरु गोविन्द दोनो खड़े़,काको लागूं पाय। धन्य गुरु आपणो ,गोविन्द दियो दिखाय॥ सबकियो अन्य शिक्षक - शिक्षिका संगे देवीजीके प्रति विशेष आभार प्रकट केलक ।अंतमे प्रधानाचार्य अपन भाषणमे विद्यार्थीक प्रशंसाक अतिरिक्त अहि बात पर विशेष जोर देलखिन जे शिक्षक देशक भविष्यक निर्माता होइत छैथ तैं हुनका विद्यार्थी लग इक आदर्श प्रस्तुत करैके चाही। शिक्षकके जिम्मेवारीक महत्व पर जोर देलाक बाद  कार्यक्रम समाप्त भेल।सब सहर्ष अपन घर दिस विदा भेला कारण आहि अवकास छल। देवीजी:  ज्योति झा चौधरी देवीजी : चित्र: ज्योति झा चौधरी देवीजी : वृक्षारोपण बाढ़िक खबरि सऽसब दुखी छल। कतेक ठाम तऽ विद्यालय बन्द भऽ चुकल छल। देवीजीक विद्यालय संयोग सऽ बाढ़ि सऽ बचल रहैन। लेकिन ओतय कैम्प लागल छल।बाढ़ि सऽपीड़ित लोक सबके बचाक ओतऽ आश्रय देल गेल। देवीजीके सेवा भाव फेर सब विद्यार्थी एवम्‌ शिक्षकगणके एकजुट भय सामाजिक कार्य करलेल उत्साहित केलकैन। सबकियो गौवॉं सबसऽ पाइ, कपड़ा आ भोजन जमाकऽ कैम्पमे बॅटलक। दवाईके इंतजाम सेहोकेलक। ओहि कैम्पमे आयल बच्चा सबके लऽ कऽ देवीजी अपन पुरान छात्र सबसंगे पढ़ेनाई सेहो प्रारम्भ केली। तहन अहि विपदाक विषयमे चर्चा उठल तऽ देवीजी  सबके पर्यावरणके बढैत तापमानक जानकारी देलखिन। ओ बतेलखिन, ''सब जगह तापमान बढ़ला सऽ हिमनद सब घमि रहल छै। ताहि पर सऽ हिमालय पर विश्वके सबसॅं ऊंच आ विशाल हिमनद छै जे गर्मीसऽ घमि रहल छै। ओकर पानि हिमालय सऽ निकल बला नदी सबमे आबि रहल छै। तैं ई विपत्ति आयल अछि। अकरा रोकैलेल नदी सबके किनार मजबूत भेनाई बड आवश्यक छै जाहिलेल सामान्य जनता वृक्षारोपण कऽ सरकारक सहायता कऽ सकैत छैथ।बान्ह बनौनाइ तऽ सरकार  द्वारा कैल जायत लेकिन जगह-जगह गाछ लगा हम सब तापमान नियंत्रण आऽ माटिक कटाव पर रोक लगा सकै छी। जौं मेघके लौह मानी तऽ गाछके चुम्बक मानू।गाछ रहला सऽ बरखाक अभाव सेहो दूर होइत अछि। देवीजीक अहि बात सऽ प्रभावित भऽ सबकियो खाली पड़ल जमीनपर आ सड़कक काते-काते  गाछ लगेला आऽ कैम्पक लोकसब तऽ इहो मोन बनेला जे अपन गाम घुरलापर ओ सब ओतौ वृक्षारोपण करता आऽ वृक्षके अनायास काटऽ पर रोक लगौता। . देवीजी:  ज्योति झा चौधरी देवीजी : देवीजी यातायात एवम्‌ अन्य सुरक्षा नियम एक दिन देवीजी विद्यालय दिस आबिये रहल छली कि कोनो गाड़ीके बहुत जोर सऽ ब्रेक लगाबऽ के आवाज सुनाई देलकैन।घुरिकय तकली तऽ एकटा कारके टेढ़ भऽ कऽ रूकल पौली।गाड़ीक ड्राइवर एकटा बच्चाके डॉंटि रहल छल।संजोग सऽ ओ बच्चा हुनके विद्यार्थी छलैन आ ककरो चोट नहिं लागल छल।लोक सभ सेहो जमा हुअ लागल ।लोक सब अपन गामक बच्चाके पक्षलऽ उल्टे कारचालक पर बाजि रहल छल।देवीजी ओतऽ पहुंचली।ओ कनिक हाल तऽ स्वयम्‌ देखने रहैथ।तैं हुनका कोनो शंका नहिं रहैन जे अहिमे बालकेके गलती अछि। तखनो ओ बालक आ लोकसबसऽ  पुछली तऽ पता चललैन जे गाड़ी नजदीक रहै तैयो बच्चा दौड़कऽ सड़क पार केनाइ शुरू केलक। ओ गाड़ीवान सऽ माफी मॅंगली आ ओकरा गाड़ी समय पर रोकइ लेल धन्यबाद देली। चित्र: ज्योति झा चौधरी तकर बाद ओ ओहि बालक के संगे विद्यालय विदा भेली।रस्ता भरि ओकरा यातायातक सुरक्षा दऽ बुझाबैत रहली।कहलखिन जे सड़कपर चलै काल कोनो बातक हड़बड़ी नहिं करैके चाही। दुर्घटना ककरो गलती सऽ भऽ सकैत छै चाहे ओ गाड़ी चलाबऽवला होई वा पैरे चलै वला लेकिन अपना दिस सॅं जरूर सावधान रहैके चाही।अपन सावधानी सॅ दुर्घटना रोकल जा सकैत छै। फेर देवीजी विद्यालय पहुंचि सबके यातायातके सामान्य नियम जे पैरे चलनिहार के बुझल रहबाक चाही से बतेलखिन।कहलखिन जे शहरमे टै्रफिक लाइट होइत अछि। गाड़ीके निर्देशित करैवला बत्ती जखन लाल भऽ जाई आर पदयात्रीक निर्देशन वला बत्ती हरियर होइ तखन आगा बढ़बाक चाही। जॅं बत्तीक व्यवस्था नहि होई केवल जेब्रा क्रॉसिंग होई तऽ ओहि पर चलैके चाही।ओतऽ गाड़ीवानके गाड़ी आस्ते एवम्‌ आवश्यकता पड़ला पर रोकक नियम छै।तैं खाली सड़कके  बदले  जेब्रा लाइन पर सड़क पार करी।  लेकिन दुर्भाग्य सऽ गामसबमे दुनुक व्यवस्था नहिये अछि आ सड़क तेहेन खराब अछि जे कियो गाड़ीवान बेसी तेज गाड़ी चलाबऽके हिम्मत नहिं करता तैयो बिना दुनु कात तकने आ बिना आश्वस्त केने जे गाड़ी दूर अछि आगा नहि बढी़ ।दौड़क सड़क पार करक परिस्थिति हुए तऽ कनि प्रतीक्षा कऽ ली। एम्बुलेंस़, अग्निशामक वाहन, पुलिसक वाहन आदि के हमेशा पहिने जाय देबाक चाही।अही प्रसंगमे देवीजी सबके मेलामे  घुमैकालक सावधानी सेहो सिखेलखिन। सबके असगर बहराई सऽ, अंचिन्हार लोकसऽ बात करै सऽ आऽ अनेर-गनेर चिज खाई सऽ मना केलखिन। मानवजीवन अमूल्य  छै अकर रक्षाकऽ संसारक कल्याणमे लगाबक चाही। तकर बाद देशक राष्ट्रपिताक बात उठल।कारण दू अक्टूबर, जहिया महात्मा गॉंधीक तथा लाल बहादुर शास्त्रीजीक जन्मदिवस छलैन, आबि रहल छल।अहिंसाक अमोघ मंत्र दैबला महात्मा गॉंधीजीक सात्विक जीवनशैली पर सबहक ज्ञान बढ़ल।देवीजी अपन अध्यापन समाप्त करैकाल सबके जानकारी देलखिन जे गॉंधी-जयन्ती कऽ विद्यालय तऽ बन्द रहत किन्तु सॉंझमे महात्मा गॉंधीजीक श्रद्धांजली दैलेल कार्यक्रमक आयोजन रहत तैं सबके तैयारीक संग पहुंचक छल। देवीजी : देवीजी यूनाइटेड नेशन्स डे ( २४ अक्टूबर) देवीजी इतिहासमे द्वितीय विश्वयुद्ध के विषय मे पढ़ा रहल छली।ताहि स आगॉं बढ़ि ओ युनाइटेड नेशन्स के स्थापनाक विषय मे बताबऽ लगली।ओ कहलखिन जे भारत सहित पचास टा देश २४ अक्टूबर १९४५ मे न्याय आ कानून के प्रति अपन आस्था एवम्‌ आदर के सिद्धान्तक संग अहि संस्थाक निर्माण केलक जाहिके मुख्य उद्देश्य छल जे कोनो राष्ट्रमे ओकर सामरिक क्षमता, आर्थिक कमजोरी वा क्षेत्रफल अन्तर के आधार पर बिना भेद-भाव केने मनुषके मौलिक अधिकारके स्त्री वा पुरुषके समान रूपसऽ उपलब्ध कराबऽ मे सहायता करत।ताहि लेल बहुत तरहक नियम-कानून बनल जाहि के मानैके सब सदस्य राष्ट्र प्रतिज्ञा लेलक आ सब साल सेन फ्रेनसिसको, अमेरिका मे एकत्रित भऽ दुहराबैत अछि। अहि सबहक लक्ष्य छल सम्पूर्ण विश्वमे शान्ति, शिक्षा आ आरोग्यक प्रसार।अकर झण्डामे विश्वक मानचित्रके ऑलिव नामक गाछक पात स घेरल देखल गेल छै।ऑलिव के शान्तिक प्रतीक मानल गेल छै।वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन सेहो अकरे शाखा अछि जे अहि वर्ष अर्थात्‌ ७ अप्रैल, २००८ कऽ अपन साठम वर्ष पूरा केलक। अहि वर्ष ओकर लक्ष्य अछि विश्वके ग्लोबल वार्मिंग' वा पर्यावरणके बढ़ैत तापमान' के दुष्प्रभावसऽ परिचित करेनाई। युनिसेफ सेहो अकरे शाखा अछि जे मूलतः बच्चा सबके स्वस्थ व शिक्षित एवम्‌ सुरक्षित समाज प्रदान करलेल प्रतिबद्ध अछि।यूनिसेफ के स्थापना ११ दिसम्बर क कैल गेल अछि।भारतमे सेहो ओकर ऑफिस अछि।जे ग्रीटिंग कार्ड युनिसेफ द्वारा प्रकाशित होएत अछि तकर पाई ओ संस्थाके जाइत अछि तैं ओ सबसऽ आग्रह केलखिन जे ईद, दिवाली, थैंक्स गीविंग डे, हैलोवीन, क्रिसमस,  नववर्ष, मकरसंक्राती आदि के लेल  ग्रीटिंग कार्ड युनिसेफ प्रिंट वला खरीदू। देवीजी इहो ज्ञात करेलखिन जे अहि संस्थाके अन्तर्गत कतेको कल्याणकारी अभियान सफल भेल अछि।जेनाकि, स्मॉल पॉक्स तथा पोलियो के प्रायः सब देशसऽ हटाबक कार्य, कतेको बच्चाके प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध करेनाई, सुनामी जकॉं आयल प्राकृतिक प्रकोपमे सहायता आदि केने अछि। हलांकि कतौ-कतौ ओकरा असफलता सेहो भेटल छै लेकिन ओ निरन्तर नश्लवाद, रंगभेद, आतंकवाद आदि के हटाबऽमे प्रयत्नरत अछि। देवीजी विद्यालयमे २४ अक्टूबर कऽ युनाइटेड नेशन्स डे मनाबक विचार बनेली।ओहि दिन ओना तऽ छुट्टी रहैत छल लेकिन बच्चा सबहक आग्रह तथा प्राधानाध्यापक के सहमति सऽ देवीजी विद्यालयमे ओहि दिन प्रश्नोत्तर(क्वीज़ ), भाषण, वाद- विवाद, निबन्ध लेखन आदि प्रतियोगिताक आयोजन कएली।अहि सबहक मुख्य विषय यू एन संस्थाक इतिहास एवम्‌ कार्यप्रणाली छल जाहि सऽ सबके बहुत जानकारी बढ़ल। देवीजी : चित्र ज्योति झा चौधरी देवीजी : बाल-दिवस १४ नवम्बर कऽ बाल दिवस समारोह छल। अहि दिन गामक विद्यालयमे विशेष आयोजन कैल गेल छल।सब अध्यापक अध्यापिका सब मिलिकऽ बच्चा सबलेल सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कऽ रहल छलैथ। देवीजी बच्चा सबके ईश्वरक रूप मानैत बहुत सुन्दर गीत सुनौली। ओ कहलथि जे बच्चा सब देशक भविष्य होइत छथि । तैं हुन्का सबके अपन जिम्मेवारीक अनुभव रहैके चाही। बेकार मे समय नष्ट केनाई छोड़ि ध्यान सऽ पढ़ाई कऽ अपन विद्यालय व अपन अभिभावक के गर्वित करैके चाही। जे विद्यार्थी पढ़ाईके समयमे मज़ा करैमे व्यस्त रहैत छैथ तिनका भविष्यमे कानऽ पड़ै छैन आऽ जे विद्यार्थी जीवनमे मिहनत करै छैथ से भविष्यमे सुख करै छैथ। तकर बाद प्रधानाध्यापक अहि बातक उल्लेख केला जे गॉंधीवादी विचार सऽ उत्प्रेरित महान स्वतंत्रता सेनानी एवम्‌ स्वतंत्र भारतके प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी के बच्चा सबसऽ बहुत प्रेम छलैन। तैं हुनक जन्मदिवस के भारतमे प्रतिवर्ष बाल दिवसके रूपमे मनाओल जाइत छै। नेहरूजी के स्नेहसऽ चाचा नेहरू कहल जाइत छलैन। हुनक जन्म १४ नवम्बर १८८९ के दिन आ मृत्यु २७ मई १९६४ के दिन भेल रहैन । ओ सबसऽ लम्बा अवधि तक भारतक प्रधानमंत्रीक पद पर रहलैथ। हलांकि यूनाइटेड नेशन्स २० नवम्बर के युनिवर्सल चिल्ड्रेन्स डे के रूपमे घोषित केने अछि लेकिन बहुत देश अलग तिथि कऽ ई मनाबैत छैथ। जेनाकि चीन आऽ हांगकांगमे ४ अप्रिल कऽ मेक्सिकोमे ३० अप्रिल कऽ जापानमे  ५ मई क तथा मलेशियामे 1 अक्टूबर कऽ बाल दिवस मनायल जाएत अछि। देवीजी : चित्र ज्योति झा चौधरी देवीजी : परीक्षाक तैयारी परीक्षा लऽग आबि गेल छल।सब विधार्थी सब सचेत भऽ रहल छल। लेकिन ओहिमेसऽ किछु तेहेनो छल जे अतिशय चिन्तित छल जाहि कारण ओकरा सबके स्वास्थ्य सेहो बिगड़ि रहल छल। जखन देवीजीके अहि बातक जानकारी भेलैन तऽ ओ सबके परीक्षाक तैयारी करैके उचित तरीका सिखाबक निर्णय लेली।एक बड़का कोठलीमे सब बच्चा सबके बजौली आ अपन पाठन शुरू केली।पहिने तऽ ओ कहली जे साल भरि बैसल रहिकऽ अंतिम समय मे अधीर भेने किछु नहिं होइत छै।तकर बाद ओ मुख्य रूपसऽ तीन शीर्षक मे अपन विचार रखली : 1 परीक्षाक समय स्वास्थ्यक ध्यान: अहिलेल देवीजी निम्नलिखित परामर्श देली-(1) पर्याप्त भोजन करू।पढ़ाई के चिन्तामे खेनाइ-पिनाइ नहि बिसरू।समय बचाबै लेल दोसर काज बन्द करू जेनाकि कतौ घुमनाई, अनेरो लोक स गप करैमे समय बितौनाई।(2) बाहर के कीनल समान नहिं खाऊ।(3) बीच-बीच मे चलनाई-फिरनाई करैत रहू।भऽ सकैतऽ योग आ ध्यान करू।(4)  हमेशा आशावादी रहू।मनुष के मस्तिष्क के क्षमता अपार छै।तैं किछु असम्भव नहिं छै मनुष लेल। (5) पर्याप्त मात्रामे सूतू।छऽ सऽ आठ घंटा जरूर सूतू।नींदके कमीसऽ एकाग्रतामे कमी आबैत छै। २ पाठ स्मरण करक तरीका: (1) पाठके स्मरण करैलेल ओकरा बुझनाई आवश्यक अछि।अहिलेल शिक्षक सऽ सहायता लिय।एक दोसर के सेहो सहायता करू।गणित लेल अभ्यास आवश्यक छै। (2)  स्मरण कैल पाठके बेर-बेर दुहराऊ तऽ ओ बिसरत नहिं। (3) एकरसता हटाबै लेल कनिक काल एकटा विषय पढ़लाक बाद फेर दोसर विषय पढ़ु। ३ अंतिम कालक पढ़ाई: (1) सब पाठके संक्षिप्त नोट बनाकऽ राखू आ परीक्षा लेल जायसऽ पहिने ओकरा पढ़ू,  (2) जे प्रश्न कठिन लागैत अछि तकरा एक जगह लिखिकऽ राखू आ जायकाल पढ़ू,  (3) रस्तामे सुरक्षाक ध्यान राखू , आ  (4) कक्षामे बैसिकऽ कनिक काल ऑंखि मुनिकऽ वा अपन हाथ दिस ताकि  ध्यान करू।अहि सऽ एकाग्रता आबैत छै। देवीजीक अहि परामर्श सऽ सब बच्चाक बढ़िया मार्गदर्शन भेल।सब आगामी वार्षिक परीक्षाक तैयारीमे लागि गेल। दैनिकी शिक्षा मानवसभ्यताक मूलमंत्र होइत अछि। मुदा प्रतियोगिताक समयमे पढ़ाईक नामपर मोट-मोट पोथीक भारसॅं विद्यार्थी सबहक जीवन कारावासमे पराधीन जीवन काटैत कैदी सनक भऽ जाइत अछि। अहि बातक ध्यान राखि हमरा सभकेँ शैक्षणिक यात्रामे पठायल जाइत छल। एहि यात्रामे हमरा सभकेँ दैनिकी सभ दिन लिखऽ पडै़त छल आऽ कतबो थाकल रहैत छलहुँ हमरा सभकेँ ओहिये दिन संगे जायवला शिक्षक - शिक्षिका सॅं हस्ताक्षर करबाबऽ पड़ैत छल।  टिस्कोक दस विद्यालयमे कक्षा छह, सात, आठ आऽ नौमे प्रथम स्थान पाबवला एवम्‌ प्रत्येक विद्यालयसॅं एकटा बहुमुखी प्रतिभाशाली छात्र-छात्राकेँ  ई सुअवसर प्राप्त होइत छल। हमरा ई सौभाग्य चारू कक्षामे भेटल। चारिम बेर सुअवसर तऽ भेटल किन्तु ६ दिसम्बर १९९२ क राजनैतिक हलचलक कारण हमर सबहक कार्यक्रम रद्द- भऽ गेल। पहिल बेर जून १९८९ मे उत्तर भारतक महत्वपूर्ण स्थान गेलहुँ लेकिन दैनिकी हेरा गेल। दोसर बेर दिसम्बर १९९० मे कोलकाता आऽ आसपासक जगह घूमलहुँ। जाहिमे निम्नलिखित स्थानक दर्शन भेल १. मेट्रो रेल २ अलीपुर जू़ ३ विक्टोरिया हाउस ४ बिरला प्लानेटोरियम ५ बिरला टेकनिकल एण्ड इण्डस्ट्रियल म्यूज़ियम ६ नेहरू चिलड्रेन्स म्यूजियम ७ दक्षिणेश्वर मन्दिर ८ बॉटेनिकल गार्डेन ९ इण्डियन म्यूज़ियम १० तारकेश्वर ११ शान्ति निकेतन १२ तारापीठ १३ बकरेश्वर १४ दिग्घा पहिल दिन : २५  दिसम्बर १९९० मंगलवार : आइ ठीक आठ बजे भोरे हमर सबहक यात्रा एक बसमे प्रारंभ भेल। सबहक अभिभावक आयल रहथि आऽ बड चिन्तित बुझाइत छलथि। हमसभ अपन खुशी नहि नुका पाबि रहल छलहुँ लेकिन खुलि कऽ तहन हॅंसलहुँ जहन बस शहर पार कऽ  पहाड़ी आ जंगलाह रस्ता पकड़लक। रस्ता भरि एक दोसराक परिचय एवम्‌ अपन-अपन स्कूलक टॉप स्कोरक तुलना करैत रहलहुँ। दुनु तरहे –एग्रीगेट(पूर्णांक)आऽ अलग-अलग विषयमे। फेर गाना बजाना अंतराक्षरीक अंतर्गत सेहो भेलै। करीब 1 बजे दुपहरियामे खड़गपुर पार केलहुँ। अढ़ाई बजे कोलाघाट पर ठहरि भोजन केलहुँ। विशाल हावड़ा ब्रीजकेँ पार करैत जहन बस कोलकाता शहरमे प्रविष्ट केलक हम सभ खिड़कीपर भीड़ लगेने छलहुँ, ओहि शहरक मकान सभकेँ देखऽ लेल। मकान सभ ब्रिटिश स्टाइलक बेसी देखायल। सड़कक भीड़ तऽ अतिशय छल। हम सभ ६ बजे सॉंझमे अग्रसेन स्मृति भवन नामक लॉजमे अपन घर जमेलहुँ। ओकर पॉंचम महलापर सभ लेल पॉंचटा कक्ष अनुबंधित छल। बालिका सभ लेल दू टा कक्ष देल गेल। ओतऽ अपन समान पाती व्यवस्थित कऽ अगिला दिनक इंतजाम कऽ हमसभ रातिक साढ़े आठ बजे भोजन लेल होटल दिस विदा भेलहुँ। एतेक बड़का टोलीकेँ देखि सभ चौकि जाइत छल। भोजनोपरान्त दैनिकी लिखि शिक्षकसँ हस्ताक्षर करा सुइत गेलहुँ। दोसर दिन : २६  दिसम्बर १९९० बुद्धवार : आई हम सब भोरे साढ़े पॉंच बजे उठलहुँ।सब तैयार छलहुँ शिक्षक सबहक आज्ञाक प्रतीक्षामे। जखने आदेश भेटल हमसब दनदनाकऽ बसमे बैस गेलहुँ। आइ दुगुना उत्साह छल। एकतऽ टूरक पहिल दिन ताहि परसॅं मेट्रो रेलवेक दर्शन।जाबे ट्रेनके आबमे देर रहए ताबे हम सब बेर बेर एस्कलेटर पर चढ़ैत उतरैत रहलहुँ। स्टेशनक नाम एस्प्लाण्ड छलै।ओहि स्टेशन पर अण्डरग्राउण्ड रेलवे पर चढ़लहुँ आ' आठम स्टेशन टॉलीगंजमे उतरि गेलहुँ। ट्रेन अतेक तेज चलैत रहए जे ठाढ भेनाई मुश्किल छलै।अहि यात्रा लेल जतबै उत्साहित छलहुँ ततबे जल्दी ई समाप्त भऽ गेल। अगिला स्थान छल अलीगढ़ जू़। अहि चिड़ियाखानामे विभिन्न प्रकारक पशु - पक्षी सहित अनेकों विचित्र सॉंप सेहो रहए। पशु - पक्षीक नाम निम्नलिखित अछि : (1)याक, (2)सरपेण्ट इगल, (3)सियार, (4)इण्डियन फॉक्स, (5)व्हाइट आइबीज, (6)हॉमर पीजन, (7)गयल, (8)सारस, (9)एमू, (10)कंगारू, (11)ब्रेकिंग डीयर, (12)रंगीन सुग्गा, (13)उदविलाव, (14)विभिन्न प्रकारक बतख, आऽ (15)नीलगाय। अकर बाद सॉंपक सिलसिला शुरु भेल। (1)विशाल अजगर, (2)कोबरा अर्थात्‌ नाग, (3)साधारण कोबरा, (4)टुक्टू - ई देवार पर छिपकली जकॉं सटल छल, (5)वाटर मॉनीटर - ई देखमे मगरमच्छ जकॉं छल, (6)बैण्डेड करैत अर्थात्‌ धारीदार करैत - करैतक नाम तऽ गामो में खूब सुनने छलहुँ। अकर पीठ पर कारी आऽ पीयर के धारी छलै आ अकरा विषैला सॉंप मानल गेल छल। (7)वाइन स्नेक - ई सॉंप हरियर आ' एकदम पातर छल जेना कोनो लत्ती हुए।इहो कनी विषवला सॉंप छल आ अंगूरक गाछमे भेटैत छल।गामदिस सुगवा सॉंपक नाम सुनने छलहुँ।(8)रैट स्नेक - ई सॉंप विषहीन होइत अछि आ मूसक जनसंख्या कम करमे सहायक अछि।(9) ब्रॉंजबैक ट्री स्नेक -  ई सॉंप कॉंसा जकॉं भूर रंगक होइत अछि आऽ गाछक डारिमे मिलक नुकायल रहैत अछि।(10) रेड सैण्ड स्नेक बलुइ, (11)ऑर्नामेंटल स्नेक -मिडिल इहो गाछपर भेटैत अछि आऽ अकर मुंह छिपकिली जकॉं होईत अछि। अकर बाद हम सब दू  टा हाथी आ किछु बानर देखलहुं।हनुमान, पिगटेल्ड मैसेक्वी आर बबून मुख्य बानर छल। हनुमानक मुंह कारी आ पूंछ नमहर छलै।पिगटेल्ड मैसेक्वीके पूंछ छोट छलै आऽ मुंह चपटल छलै।बबूनक मुंह उगल छलै मुदा कारी नहिं छलै।हम सब ओकरा संगे खूब खेलेलौं।फेर चिल्ड्र्रेंस ज़ू गेलहुं।ओतऽ हाथीक कंकालक पड़ल निशानयुक्त पाथर छल। तरह -तरहक पक्षीक अंडा देखलहुं। जेना सुगाक अंडा, ऑस्ट्रीचके अंडा, हंसक अण्डा आदि।ओतय हमसब उज्जर बाघ, उज्जर मूस आर उज्जर कौआ सेहो देखलहुं।अंतमे ज़िराफ आ विदेशी पक्षी सबहक आवास स्थान झीलक लग स होइत लौट गेलहुं। ओतऽसऽ लौटि भोजन कऽ फेर विक्टोरिया मेमोरियल विदा भेलहुं।विक्टोरिया मेमोरियल के फाटक पर दू टा पैघ सिंहक मूर्ति छल। मानू हमरे सबहक स्वागत लेल राखल छल।तकर बाद एकटा तोप राखल छल।कहै छै जे होनहार वीरवान के होत चीकने पात।अग्रेजीमें सेहो कहल गेल छई “morning  shows  the  day” हमरा पहिने सऽ नहिं बूझल रहै तैयो अंदाज लागि गेल जे अत वीर-रसक दर्शन हैत।महल सदृश मकान भव्य छल।अन्दर मैरी, डलहौजी, हेंस्टिंग्स, वेलेस्लीक विशाल मूर्त्ति स्थापित छल।अनेको प्रकारक हथियार विराजमान छल।औरंगजेब, मीरज़ाफर, टीपू, हैदर आदि महान्‌ योद्धा सबहक तलवार राखल छल।ऑस्ट्रिया स अंग्रेज द्वारा छीनल टर्किश मशीन गन राखल छल।अब्दुल फ़जलक रचित एतिहासिक पुस्तक अकबरनामा सेहो देखलहुँ।उपर के महलके देवार पर रानी विक्टोरिया के विलासिता दर्शायल गेल छै। अहि ठाम सऽ निकलि हम सब बिरला तारामण्डल पहुंचलहुं। कनिक देर पंक्तिमे ठाढ़ भेलाक बाद अन्दर जाय भेटल।सब मजाक करैत छल जे अतऽ दिनोमें तारा देखायल जाइत छै। ओहिमे खगोलीय जानकारी देल गेल। लागल जेना आकाशक नीचा बैसल छी।अहि सब के लेल जाइल्स प्लानेटोरियम प्रोजेक्टर नामक उपकरणके उपयोग कैल गेल छल। अहि तरहे हमर सबहक आहि के भ्रमण सम्पन्न भेल।हमसब अपन लॉजमे लौटि सुस्ता भोजन कर होटल गेलहुं।रस्ता भरि हमरा सभके यैह चर्चा रहल जे अत हिन्दीक महत्त्व कतेक कम छैक। सभ जगह जानकारी या त बंगाली या अंग्रेजीम लिखल छल।भोजनोपरान्त हम सभ डायरी लिखि शिक्षक सॅं हस्ताक्षर करा सूतक कार्यक्रम बनेलहुं। तेसर दिन : २७ दिसम्बर १९९०, वृहस्पतिवार : आइ जखन उठलहुँ तँ पॉंच बाजल छल। आधा घंटाक अन्दर सभ जागि जएता तैँ हमसभ किछु सहेली सभ मिलिकए जल्दीसॅं नित्यक्रियासॅं निवृत्त भऽ गेलहुँ, लाइन लागऽ सँ बचए लेल। नास्ताक बाद सभ करीब साढ़े सात बजे खिदिरपुर डॉक दिस विदा भेलहुँ। मार्गमे हाइकोर्ट, नेताजी स्टेडियम, आकाशवाणी भवन, इण्डियन गार्डेन, मोहन बगान, मलेटरी छावनी फोर्ट विलियम (जतए १९७१ क लड़ाईमे भारतीय सेना द्वारा नष्ट कएल पैटण्ट टैंक राखल छैक) , हॉर्स रेस कोड देखैत खिदिरपुर डॉक पहुचलहुँ। ओतए बहुत तरहक व्यापारिक जहाज सभ छलैक। जेना कि जापान जाए लेल कैमेलवर्ट लाइन्स, ब्लू ओशियन, अकबर इत्यादि। दू टा फोल्डिंग ब्रिज  जे ऊँच जहाजकेँ रस्ता दैक लेल बीचसँ अलग भऽ दुनु कातमे लम्बवत ठाढ़ भऽ जाइत छल। एक ब्रिजक नाम बास्कल छलैक आर दोसरकेँ सभ मूविंग ब्रिज कहैत छल। डॉकक बाद हमसभ बिरला औद्यौगिक एवम्‌ तकनीकी संग्रहालय (Birla Industrial and Technical Museum) पहुचलहुँ। एतय सभसँ पहिने हम सभ बोन्शाई गार्डेन पहुचलहुँ। एतय विशालकाय वृक्षक प्रजातिकेँ विशेष प्रक्रियासँ ओकरा छोट आकार दऽ गमलामे जीवित राखल गेल छलैक। ४५ वर्षक उम्र वला बड़क गाछ राखल गेल छलैक, एक गमलामे। बाहरक बगानक बाद हमसभ अन्दर प्रवेश केलहुँ। आइस्टिन न्यूटन गैलिलियो आदि वैज्ञानिकक प्रतिमा विराजित छल। पहिल कमरामे डायनेमो छलैक, जाहिसँ ज्ञात होइत अछि, जे मनुष चालन शक्तिकेँ प्रथम स्त्रोतक रूपमे पशु जल एवम्‌ वायुकेँ शक्तिक कोना प्रयोग करैत छल। अन्य कमरा सभमे अनेकानेक मॉडल राखल भेटल। आइ ई यात्रा वस्तुत: शैक्षणिक यात्रा लागि रहल छलै। एकर बाद भोजनक लेल कनी विराम लेल गेल। हमर सबहक  अगिला लक्ष्य छल नेहरू चिल्ड्रन्स म्यूज़ियम। ई तीन मंजिला भवन छल। सभसँ ऊपरमे सम्पूर्ण रामायणक ६१ प्रसंगक क्रमिक रूपसँ पुतला द्वारा प्रदर्शित कएल गेल रहैक। शेषमे अलग-अलग देशक प्रसिद्ध गुड़िया सभ राखल गेल रहैक। गुड़िया सभ देखि अपन बचपन मोन पड़ैत छल जखन कनिया-पुतरा खेलाइत छलहुँ। बचपन तँ एखनो नहि गेल छल कारण दिन भरि व्यस्ततामे भने माता पिताकेँ बिसरि जाइत छलहुँ लेकिन लॉज पहुँचलापर घरक मोन जरूर पड़ै-ए। ओतएसँ लौटि कए फेर सभ किछु यथावत भोजन, अगिला दिनक तैयारी, दैनिकी आऽ फेर विश्राम। चारिम दिन : २८ दिसम्बर १९९०, शुक्रवार : हमसब यथावत साढ़े पॉंच बजे भोरे उठिकऽ अपन पूर्वसूचित कार्यक्रमक अनुसारे तैयार भऽ गेलहुं।पहिने बेलुर मठ गेलहुं। बेलुर मठ : ओतऽप्रवेश करैत देरी मोन निर्मल भऽ जाइत छै। ओतके स्वच्छ वातावरण आ शान्ति अलौकिक शक्ति के प््राति श्रद्धा आर बढ़ा दैत छै।धर्मगुरु रामकृष्ण परमहंस के अनुयायी सब हुन्कर मरणोपरान्त अहि संस्थाक निर्माण केने छथि।भागमभाग सॅ भरल शहर के एक कोन में स्थित ई स्थान महावतार रामकृष्ण परमहंस, हुनकर पत्नी शारदा देवी आ हुनकर शिष्य विवेकानन्द के मन्दिर आ प्रतिमा सऽ भरल अछि।अत विराजित प्रतिमा के मुख पर जे भक्तिभाव आ आत्मसंतोष परिलक्षित होइत छै तकर दर्शनमात्रके लेल दुनियाभरि सऽ लोकसब आबैत अछि।आस्तिकताक प्रति आस्था बढ़ाबऽमे पूर्णत: सक्षम अछि।अतऽ सऽ हम सब दक्षिणेश्वर मन्दिर गेलहुं। दक्षिणेश्वर मन्दिर : गंगाक कछार पर स्थित ई मन्दिर एक अछूत स्त्री रासरानी उारा निर्मित अछि। कथानुसार रासरानी के सपना में स्वयम्‌ देवी कालीजी आदेश देलखिन मन्दिर निर्माण लेल।अहि ठाम बारहटा शिवके मंदिर चारू दिस छल आ इकटा कालीजीक मंदिर बीचमे। धार्मिक स्थानक दर्शन होइ आ शैक्षणिक यात्रा पर निकलल टोली में विज्ञान आ ईश्वरक अस्तित्वके चर्चा नहिं होई से कोना भऽ सकैत छल। बहुत सामान्य विषय परन्तु हमसब काफी देर तक अहि पर बाजैत रहलहुं।आश्चर्य ई छल जे केकरो सौ प्रतिशत हिम्मत नहिं छल जे ईश्वर के अस्तित्वके पूर्णतथ झूठ मानय। हॉं सब अहि पर सहमति छलैथ जे ईश्वर ओकरे सहायक छथिन जे अपन सत्कर्म पर अडिग रहैया। “God helps him who helps himself” (गॉड हेल्प्‌स हिम हू हेल्प्‌स हिमसेल्फ) अर्थात्‌ ईश्वरो ओकरे सहायक होइत छथिन जे अपन सहायता स्वयम्‌ करैत अछि। आब अगिला लक्ष्य छल नैशनल बॉटेनिकल गार्डेन। इंडियन बॉटेनिकल गार्डेन : अकरा कलकत्ता बॉटेनिकल गार्डेन आर रॉयल बॉटेनिकल गार्डेन के नाम सॅ सेहो चिन्हल जाइत अछि।अपन नामक अनुरूपे इ बगान अनेको तरहक गाछ पात स भरल छल।कलकत्तासऽ लगले शिवपुर, हावड़ा में स्थित १०९ हेक्टेयर में पसरल ई स्थान करीब १२००० प्रजातिक वनस्पति के संरक्षित केने अछि। बबूल, रोइन, बॉंस, अशोक, पाम के अनेक प्रजाति, महुआ, जंगली बादाम, सुप्ति आदि।अकर स्थापना १७८७ ईसवीमे ईस्ट इंडिया कम्पनीके एक ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर द्यरॉबर्ट किड' उारा वनस्पतिके नव प््राजाति के चिन्हैलेल कैल गेल छल। उद्देश्य व्यापार छल। अतऽके मुख्य आकर्षण छल विश्वके सबसऽ पैघ बड़क गाछ द्यफाइकस बेंघालेसिंस'(Ficus Bengalhensis) ।ई गाछ २२५ वर्ष पुरान अछि। १८६४ आऽ १८६७ के भयंकर बवंडर सेहो अकरा नहिं नष्ट कऽ सकल।१९२५ में फफूंदी उारा रोगग्रस्त भेलाक बाद अकर मुख्य जड़ि काटि देल गेल। किन्तु वर्तमान में स्थित १८२५ जड़ि में सऽ कोन सबसऽ बलगर अछि से कहनाई मुश्किल।अकर उच्चतम्‌ शाखाक ऊॅंचाई २४.५ मीटर छै।ई अपनेमे एकटा जंगल जकॉं छै।अकर परिधि लगभग ४२० मीटर छै ।अतऽ सऽ बहरा भोजन कैल।तदोपरान्त कलकत्ताक दोसर (मेट्रो रेलक बाद) सबसऽ रोमांचक यात्रा हमरा सबलेल हुगली नदीके स्टीमर सऽ पार केनाई छल।हमरा सबलेल पर्याप्त सीट रिजर्व छल लेकिन हमसब ठाढ़े भऽ कऽ नदीक धारक वेग अवलोकित केलहुं। हरिउारक गंगामे स्नान केने रही आ अतऽ सागर में विलीन होइकाल सेहो देख लेलहुं।घुरैकाल हावड़ा ब्रिजके पैरे पार केलहुं। ओहिमें वॉकवे बनल छल।ओहि सेतुके नजदीकसॅ देखके एहिसऽ नीक अवसर नहिं भेट सकैत अछि।अतऽ सऽ निकलि हमरा सबके एकटा मैदानमे करीब एक घंटा लेल छोड़ि देल गेल छल। ओतऽ सऽ अपन लॉज लौट गेलहुं। काल्हि हमरा सबके कलकत्तासऽ विदा भऽ जायके अछि। ओहि हिसाबसऽ अपन समान पाती सैंत लेलहुं। फेर भोजनोपरान्त किछु मनोरंजन कैल गेल। किछुगोटए गीत सुनेलक, किछु चुटकुला, तऽ किछुगोटय शायरी सुनेलक। हम एकटा स्वरचित हास्य कविता सुनेलहुं जाहिमें सब विषय आऽ ओहि विषयक शिक्षक-शिक्षिका सबसऽ बचके ईच्छा व्यक्त केने छलहुं।ई हम अपन विद्यालयमे शिक्षक दिवस पर सुनेने छलहुं। अतौ सबके हॅंसाबऽ में सक्षम भेलहुं। अहिप्रकारे आहिके दिनचर्या समाप्त भेल। पांचम दिन : २९ दिसम्बर १९९०, शनिवार : आहि भोरे उठैमे ओते उत्साह नहि बुझाइत छल। कारण लागै छल जे टूर आहिये समाप्त भऽ रहल अछि। कलकत्ता लेल अतेक मोन लागल छल आ आहि कलकत्तामे अंतिम दिन छल। सब सामान पाती लऽ बसमे सवार भऽ गेलहुं। इंडियन गार्डेन आर विक्टोरिया मेमोरियल के लग सऽ होइत इंडियन म्यूज़ियम पहुंचि गेलहुं। इंडियन म्यूज़ियम : ई भारतक सबसऽ पैघ संग्रहालय अछि।अकर स्थापना २ फरवरी १८१४ ईसवीमे भेल छै। तहन ई एशियाटिक सोसाइटीमे रहै। सन्‌ १८७८ ईसवीमे ई वर्त्तमान स्थान पर मात्र दू टा गैलेरी संगे स्थापित भेल।आब अहि दू मंजिला विशाल भवनमे साइठोटा गैलेरी छै। अकर प्रथम क्यूरेटर नथेनियल वैलिक (Nathaniel Wallich) छलैथ जे डेनमार्क सऽ आयल छलैथ। अत सबसऽ पहिने रानी विक्टोरियाके बहुत पैघ मूर्त्ति छै।तकर बाद भगवान बुद्ध के विभिन्न रूप महावीर नागराज गणेश कामदेव महिषामर्दिनी दुर्गा पार्वती शिव नटराज इत्यादिक अतिप्राचीन प्रतिमा राखल छल।ई सब मध्ययुगके मूर्त्ति छै। एहेनो मूर्त्ति सब छै जकर विषयमे बेसी ज्ञात नहि भऽ सकल छै जे ई कोन युगक अछि वा ककर अछि। ओत फोटो खिंचनाई मना छल लेकिन कतेक चित्रकार सब ओत नीचा बैसकऽ मूर्त्तिक स्केच उतारि रहल छलैथ। पुछला पर पता चलल जे ओसब कथुपर रिसर्च क रहल छलैथ।  अनेको शैलीमे बनल मू़र्ति विराजित छल जेनाकि पाल शैली गुप्तोत्तर शैली कलिया शैली आदि। नक्काशी कैल स्तम्भ सेहो राखल छल। बगलक हॉलमे मुद्राक संग्रह छल।आहत कैशवी पयाल मालवा मथुरा नागकूड़ इक्ष्वाकु कनिष्क कुषाण गुप्त आदिके विभिन्न मुद्रासब राखल छै। उपरक मंजिलमे मिश्र वला कक्षमे दु टा ममी राखल छल।हमसब दू तीन गोटय नियमके विरुद्ध ओकरा छूबो केलहु। अगिला कक्षमे कैओ हजार वर्ष पुरान पक्षीसबके कंकालके सुरक्षित राखल गेल छल।६० करोड़ सऽ लऽ कऽ २०० करोड़ वर्ष पुरान जीव सब जे आब पाथर भऽ गेल छल विशेष तरीका सऽ सुरक्षित राखल गेल छै।अत हाथी ऊंट आदिके कंकाल सुतुरमुर्ग गिलहरी आदिके शरीर के सुरक्षित राखल गेल अछि। अतऽ संरक्षित सामानक विशालता एवम्‌ विविधताक वर्णन एक पन्ना की एक पुस्तक मे केनाइ सम्भव नहि लागैत अछि। ओतय सऽ निकलि हमसब भोजन केलहु आ फेर तारकेश्वर दिस प्रस्थान केलहु। भक्तिभाव के जागृत केलहुतारकेश्वर दिस विदा भऽ गेलहु।रस्ता मे भारतक विपन्नताक दर्शन केलहु बंगालक ग्रामीण इलाकाके रूपमे। तारकेश्वर : तारकेश्वर मे शिवलिंगक पूजा होइत अछि।कलकत्तासऽ लगले सेरामपुर लग ई पवित्र स्थान अछि। बहुत श्रद्धालु अत कॉंवर लऽ कऽ सेहो आबैत छथि।कहल गेल अछि जे अहि शिवलिंगक खोज पशु सब द्वारा भेल अछि। लोक सबके पता चलल जे गामक सब गाय सब जंगलमे जा एक स्थानपर अपन दूध स्वेच्छा सऽ दऽ आबै छल। तहन ओहि जगहके साफ केलापर पता चलल जे ओतय शिवलिंग विराजमान छल। तहनस ओहि शिवलिंगके पूजा हुअ लागल। तारकेश्वर पहुचिकऽ पंडित सबहक दक्षिणाक प्रति जे लोभ देखलहॅं से मोनके बेसी व्यथित करै बला छल।ईश्वरक प्रतिमाके दर्शन करैलेल दानक शर्त राखऽबला पंडा सबसऽ बहुत दुखित भेलहु। जॅं दान मन्दिरके देख-रेखके लेल आवश्यक अछि तऽ भक्तके स्वेच्छा आ श्रद्धा सऽ हुअके चाही। आई बाकी समय  यैह सोचैत रहलहु जे धार्मिक रीति-रिवाज़के दाम लगाकऽ धार्मिक आस्थाके बेचपर रोक लगनाइ कतेक आवश्यक अछि। अन्यथा अहि देशके की हैत। छठम दिन : ३० दिसम्बर १९९०, रविवार : आईके हमर दिनचर्या ६ बजे भोरे शुरु भेल। नित्यक्रियासऽ निवृत्त भऽ नास्ता कऽ पुनथ यात्रारम्भ भेल।शहर सऽ दूर जंगलाह रस्ता हरियर गाछ वृक्ष सऽ भरल वातावरण लक्ष्यके भूमिका बना रहल छल। हमसब भारतक प््राथम नोबेल पुरस्कार विजेता स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ टैगोरक कर्मभूमि शान्ति निकेतन पहुंचलहुं।अहि स्थानक गौरवपूर्ण इतिहासदऽ किछ कहनाइ सूर्यक सोंझामे दीप रखनाई अछि।हॅं अत राखल वस्तुक विवरण देल जा सकैत अछि।सबसऽ पहिने रवीन्द्रभवन नामक संग्रहालय देखलहुं जे प्रवेशद्वारे लग छल। अहिमे रवीन्द्रनाथजी द्वारा उपयोग कैल जूता, ओवरकोट, कपड़ा, होमर ब्रैण्डक कार, अतऽ तक की प्लेट - चम्मच सब सेहो राखल रहै।ओहि संग्रहालयमे नोबेल पुरस्कार सेहो राखल छल।अहि संग्रहालयक बगलमे रवीन्द्रनाथ टैगोरके पॉंचटा भवन सेहो छल जकर नाम छल - 1 उद्दयन : ई दू मंजिला आर उज्जर रंगक छल। २ कोणार्क : ई साधारण प््राकारक घर छल। ३ श्यामली : ई माटिक बनल कुटिया छल जाहिमे गॉंधीजीक चरणकमल सेहो                    पड़ि चुकल अछि। ४ पुनश्च : अहि एकमंजिला मकानक खिड़कीमे कॉंचक केवाड़ छल। ५ उदीचि : अहि दूमंजिला मकानक बनावट मंदिर जकॉं छल। अकर बाद हमसब ओतक बाग-बगिचा, कला शिक्षण केन्द्र, यूनिवर्सिटी आदिक भ्रमण केलहुं।ई वास्तवमे एक गुर्‌उकुल छै जत प्राचीन तरीका सॅ प्राकृतिक वातावरणमे आधुनिक शिक्षा देल जाइत छै। अतय २२ भाषाक अध्यापन होइत छै।अहि तरहे ई एतिहासिक स्थानक दर्शनोपरान्त हमसब भोजन करै लेल गेलहुं।भूख तऽ लागल छल मुदा मांछ खा-खा अघा गेल छलहुं आकि थाकल छलहुं ताहि कारणे भोजनक ईच्छा नहिं छल।लेकिन जखन एकटा शिक्षकके ई पता चललैन तऽ हमरा आर हमर एक संगीके लऽ कऽ मिठाई खुआबऽ लऽ गेला। नहिं खायक बात पर डॅंटला आर ताबे तक रंग-रंगक मिठाई खुआबैत रहला जाबे मोन अकसक नहिं भऽ गेल। लागल बंगालमे मैथिलक बरियाती आयल छी।हुनकर अहि तरहक आबेस आऽ एक-एक गोटैक ध्यान राखक स्वभावके हम कहियो नहिं बिसरब। भोजन के बाद हमसब पुन: अपन मंजिल दिस बढ़लहुं।रस्ता भरि हल्ला-हुच्चर करैत रहलहुं। बुझेबो नहिं कैल कखन सुर्यास्त भेल कखन राति आबि गेल आ चारि घंटामे तारापीठ पहुंचि गेलहुं।अगिला दिन मंदिरक दर्शन करैके छल से पूर्वसूचित कैल गेल। सातम दिन : ३१ दिसम्बर १९९०, सोमवार : आहि भोरे जहन हम उठलहुं तऽ सब पहिनेहे उठि गेल छल।हम जल्दीसऽ तैयार भऽ गेलहुं। फेर सब संगे मंदिर पहुंचलहुं।विभिन्न देवी देवताक दर्शन भेल।तकर बाद हम इम्हर उम्हर घुमति रहुं।तकर बाद पुनःभोजन आऽ फेर  बकरेश्वर दिस विदा।रस्तामे शिक्षक सब बतेला जे विद्यालय के संचालनमे हुनकासबके की की दिक्कत होएत छैन।अहि तरहे हमसब अपन अपन परेशानीक आदान प्रदान करैत रहलहुं।हमरा सबके तहन अनुभव भेलजे कखनो काल सामनेक परिस्थिति सऽ उत्तेजित भऽ हम छात्रगण शिक्षक सबदऽ गलत धारणा बना लैत छी।जे की बहुत गलत छै।हॅं तऽ हमसब बकरेश्वर पहुंचलहुं।सॉंझक ६ बाजल छल।आहि १९९० के आखिरि दिन छल ताहि द्वारे हम सब अपन अपन समान सैंतकऽ सांस्कृतिक कार्यक्रमक तैयारीमे लागि गेलहुं। ताहि बीचमे हमरा सबके हेडमास्टर के तरफ सऽ बुलावा आयल।हमसब डेरा गेलहुं जे हमर सबमे सऽ एकटा छौड़ी ककरो समान फेक देने रहै तैं सबके डपटै लेल बजायल जा रहल अछि।अहि तरहक आशंका सऽ डेरा हमसब जहन ओतऽ पहुंचलहुं तऽ सब छौड़ा सब बहुत खुश छल तहान हमसब कनिक खुश भेलहुं। लेकिन फेर मुड गड़बड़ा गेल ।कियो बाजल जे छौड़े सब शिकायत केलक तैं ओ सब तऽ खुश हेबे करत।हमसब बैसकऽ शिक्षक के प््रातीक्षा करऽ लगलहुं।मुदा जखन ओ एला तऽ हुन्कर हाथमे छड़ीके स्थान पर एक कॉपी छलैन आ ओ मुस्कुरा रहल छलैथ।आबिकऽ ओ घोषित केलैथ जे मृगांक नामक एक छात्रक आहि जन्मदिवस अछि तैं हम एकटा स्वरचित कविता सुनायब।ई सुनैत देरी हमसब खुशीसऽ उछलि पड़लहुं।आब की छल हमसब कविता सुनलहुं मिठाई खेलहुं आ भोजन कऽ पुनथ नाटकके तैयारीमे लागि गेलहुं। ठीक  एगारह बजे हमसब एक कोठलीमे जमा भऽ कार्यक्र्रम प्रारंभ केलहुं।हमहु एक नाटकमे भाग लेलहुं जाहिके डाइरेक्टर आ राएटर सेहो हम रही।फेर बारह बजे रातिकऽ समूहगान संगे नववर्षक स्वागत केलहुं।शिक्षक सब सेहो अपन कार्यक्रम प्रस्तुत केलैथ।अन्ततः हम सब सुतै लेल जाय लगलहुं। जाय सऽ पहिने हमसब गुडनाइट' वा शुभरात्रि'के स्थानपर हैपी न्यू इयर' वा द्यनववर्षक शुभकामना' बाजि रहल छलहुं। आठम दिन : 1 जनवरी १९९१, मंगलवार : वर्षक पहिल दिन हम ७ बजे उठलहुं। सब छात्रसब मजाकमे कहलक जे हम साल भरि सुतैत रहब। पर उठैत देरी हम अतेक जल्दी तैयार भऽ गेलहुं जे सब हमरा ऑंधी तूफान के उपाधि देलक। पहिने हमसब बकरेश्वर के मंदिर गेलहुं। मंदिरके बाहरी दृष्य देखकर हमसब मुग्ध भऽ छलहुं। अन्दरमे पंडित सब अपना दिस आमंत्रित करैत छल लेकिन हमसब अपने सऽ घुमनाइ  पसन्द केलहुं। आगां जाकऽ देखलहुं जे एकटा गर्म कुण्ड अछि। हमसब पहिने तऽ नहा लेने रहुं तैयो नहिं रहल गेल आ किछु सहेलीके अपन कपड़ा आनैलेल पठाकऽ ओतऽ फेर सऽ स्नान केलहुं। अकर बाद नास्ता कऽ दीग्घा दिस विदा भेलहुं। हमर किछु संगीसब ओतऽ पहुंचैलेल ततेक उत्साहित छलैथ जे ओ सब बीचमे रुकिकऽ भोजन करैके कार्यक्रम छोड़ि देबाक बात करै छलैथ। परन्तु ई नहिं भऽ सकल।भोजनोपरान्त हमसब फेर विदा भेलहुं। राइतके साढ़े एगारह बजे दीग्घाके एक लॉजमे रूकलहुं। ई लॉज समुद्र तट सऽ नजदीक रहै आ बहुत सुविधा सऽ युक्त रहै। पॉंच-पॉंच टा विद्यार्थीके एक टा डबलबेडरूम अटैच्ड बाथरूम आ बालकोनी भेटल रहै। हमसब निश्चय केलहुं जे आई राति भरि जागल रहब जाहिसऽ सुर्योदय देखि सकी लेकिन पता चलल जे आकासमे बादल हुअके कारण सुर्योदय नहिं देख सकब। तखन हमसब सुतैके तैयारीमे लागि गेलहुं। नवम दिन : २ जनवरी १९९१, बुद्धवार : भोरे पॉंच बजे उठीकऽ नित्यक्रियासऽ निपटि हम सबसऽ पहिने तैयार भेलहुं।समान ठीक केलाक बाद सबके उठेलहुं।तकर बाद अपन समान बसमे राखि एलहुं।फेर जाबे सब तैयार होइत छल ताबे बगानमे खेलाइ छलहुं।कनिक देर बाद सबकियो समुद्रतट दिस विदा भेलहुं।कतेक लोक पैरे चलि गेल किन्तु हमसब बसमे गेलहुं। शिक्षक सब कनी पैघ रस्ता सऽ लऽ कऽ गेला उड़िसाके सीमामे सेहो प्रवेश करेला।तकर बाद समुद्र देखैत देरी हम ओहिमे घुसि गेलहुं।ई हमर पहिल अवसर छल जहन हम सागरक लहर सऽ खेल रहल छलहुं। तकर बाद हमरा सबके नास्ता लेल बजायल गेल।फेर हमसब लौटि गेलहुं लॉजमे।आब हमरा सबके सामान बसमे राखक छल।अहिमे हम सबके सहायता करैमे सबसऽ आगॉं रही।आधा रस्तामे रूकिकऽ हमसब भोजन केलहुं।भोजनोपरान्त पुनथ जमशेदपुर दिस विदा भेलहुं।यद्यपि अपन अभिभावक सबस भेंट हुअके खुशीतऽ छल किन्तु सबसऽ अलग हुअके दुथख सेहो छल।तुरत हमसब निर्णय लेलहुं जे एक पिकनिक करब आ ताहि लेल पाई शिक्षक अभिभावक के मीटिंगमे जमा करक छल। तुरत हमसब शिक्षक सबके सेहो आमंत्रित कऽ देलहुं। जहन जमशेदपुर पहुंचलहुं तऽ सबहक अभिभावक पहिने सऽ ओतऽ पहुंचल छलैथ।अहि तरहे हमर सबहक जीवनक ई महत्त्वपूर्ण नवम्‌ दिन समाप्त भेल। छठि पूजापर विशेष Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर, उम्र 60 वर्ष, ग्राम- हैँठी-बाली, जिला मधुबनी।षडदल अरिपन मिथिलामे भगवती पूजाक अवसर पर ई अरिपन पाड़ल जाइत अछि।एतय देवी भागवत पुरानक षटकोण यंत्र पारल गेल अछि। छः टा कमल दल एहिमे अछि। आदिशक्त्ति भुवनेश्वरीक पद चिन्ह आऽ पञ्चोपचार पूजाक सामग्रीसँ युक्त्त ई अरिपन अछि। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

22 2 2 - नीलिमा भानस भात मखानक खीर सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। जखन खौलय लागय तँ ओहिमे चिन्नी, काजू, किशमिश सभ दऽ कय अन्तिममे इलाइची पाउडर खसाऽ कऽ मिलाऽ कऽ उताड़ि लिअ। मखानक खीर तैयार अछि। नोट:- मखानकेँ सुखलो भुजि कऽ कुटि सकैत छी वा घीमे सेहो भूजि कए कूटि कऽ पाउडर बना सकैत छी। मेथीक परोठा सामग्री:-आटा-२५० ग्राम, बेसन-१०० ग्राम, रिफाइन-२५० ग्राम, मेंथी साग-५०० ग्राम, हरिअर मेरचाइ-४टा, आदी- १ इन्चक टुकड़ा, धनी-पात आऽ नोन-अंदाजसँ। विधि- मेंथीकेँ साफ कऽ कए धोऽ लिअ। मेंहीसँ काटि कए लोहियामे कनी तेल दऽ कय मेंथी पात खसा दियौक। कनी भाप लागि जाय तँ ओहिमे काटल हरियर मेरचाइ, आदी घसल, धनी-पात काटि कय आऽ नून मिला कय एहि मिश्रणकेँ बेसन फेँटल आँटामे मिला दियौक। आँटाकेँ कनेक कड़ा कऽ सानि लिअ। पराठा बेल कए तवापर कम आँचपर रिफाइन लगा कए सेकि लिअ। खास्ता मेथीक पराठा तैयार भऽ गेल। नोट:- अहाँ काँच मेंथी पात कऽ मेंही काटि कऽ, पियाजु सभ मिला कऽ सेहो आँटा सानि सकैत छी। मुगलई कोबी सामग्री:-कोबीक टुकड़ा-१/२ किलो, पियाजु महीन काटल-१कप टमाटर, कद्दूकस कएल-१ कप, हरियर मेरचाइ-आदीक पेस्ट-१ चम्मच, नून स्वादानुसार, लाल मिरचाइक पाउडर-१/२ चम्मच, धनियाँ पाउडर-१ चम्मच, हरदि- १ चम्मच, गर्म मसल्ला-१/२ चम्मच, अमचूर-१/२ चम्मच, जीर-१/२ चम्मच, मलाई-१/२ चम्मच, टोमेटो सॉस- १ चम्मच, रिफाइन तेल-२ चम्मच। विधि:- कोबीक टुकड़ा धोऽ कऽ चालनिमे आधा घंटाक लेल राखि दियौक, जाहिसँ एकर पानि निकलि जाय। फेर लोहियामे तेल गर्म कऽ कोबीकेँ हल्का गुलाबी फ्राइ कऽ लिअ आर एकटा पेपरपर निकालि लिअ, जाहिसँ तेल निकलि जाय। एक पैनमे तेल ढारू। ओहिमे जीर दऽ कए पियाज आऽ आदीक पेस्ट दऽ कय भुजि दियौक। आब सभ टा मसल्ला दऽ कय कनी देरमे आर भुजियौक। मलाएकेँ मैश कऽ दऽ दियौक, सॉसकेँ सेहो दऽ दियौक आर नीकसँ मिला दियौक। आब एहिमे कोबीक टुकड़ा दऽ कय चम्मचसँ मिला दियौक। फेर एक बाउलमे ओकरा निकालि कऽ ऊपरसँ गरम मसल्ला आर धनियाँ (धनी) पात सजा दियौक आर पड़सि लिअ। केसर पुलाव सामग्री:- २ कप बासमती चावल, १ कप मटरक दाना, १ टुकड़ा दालचीनी, १ बड़ी इलायची, ४ टा लौंग, ४ कप पानि, २ टेबुल स्पून घी, १/२ केसर, २ टीस्पून गरम पानि, एकटा पियाजु लम्बा-लम्बा काटल, १ टी स्पून जीर, २ टी स्पून नून। विधि:-केसरक गरम पानिमे फुलइ लेल दऽ दियौक। चाउरकेँ नीकसँ धोऽ कए फुलइ लेल दऽ दियौक। चाउरकेँ नीकसँ धोऽ कऽ फुलय लेल दऽ दियौक। कुकरमे घी गरम कऽ कए ओहिमे प्याज दऽ कए ब्राउन होय धरि फ्राइ कऽ कए प्लेटमे निकालि लिअ। आब एहि गरम घीमे दालचीनी, जीर, इलाइची, लौंग आर नून दऽ दियौक। मटरकेँ दऽ कए कनी चलाऊ आर चाउरकेँ पानिसँ निकालि अहीमे दऽ दियौक। ऊपरसँ पियाजु आ केसर सेहो दऽ दियौक। ४ कप पानि दऽ कय एक सीटी आबए तक पकाऊ। गरम-गरम केसर पुलाव, रायता वा कोनो रसगर तरकारी संग खाऊ। मूरक परोठा सामग्री:- आँटा-२५० ग्राम, बेसन-१०० ग्राम, मूर-२५० ग्राम, रिफाइन तेल-१०० ग्राम, जमाइन-मंगरैल-अंदाजसँ। आदी-१ इन्च टुकड़ा, धनी-पात-दू डाँट, हरियर मेरचाइ ४ टा, नून- अंदाजसँ। विधि:- मूरकेँ धोऽ कऽ कद्दूकस कऽ लिअ। लोहियामे कनी तेल दऽ दियौक। गर्म भेलापर ओहिमे मूर आ सभ मसल्ला खसा दियौक आ ढ़क्कनसँ झाँपि दियौक। कनी भाप आबि जाएत, ओकरा निकालि कऽ ठंढ़ा हेबय दियौक। आब एहि मिश्रणमे नून मिला कय बेसन मिलल आँटामे मिला कऽ सानि लिअ। गोल-गोल पातर-पातर बेल कऽ ताबापर दुनू दिस रिफाइन लगा कए सेकि लिअ। मूली पराठा तैयार भऽ गेल। मूरक परोठा बनेबाक एकटा आर विधि अछि, अहाँ मूलीक कद्दूकस कऽ कए ओहिमे सभ मसल्ला मिला लिअ। आब ओकड़ा गाड़ि कए एक दिस राखि लिअ। आब आँटाक गोलीमे थोड़े मूलीक मिश्रण लऽ कऽ नून मिला कऽ भरि लिअ आ बेल कऽ ताबापर रिफाइन दऽ कऽ सेकि लिअ। नोट:-एहि तरहेँ काँच अनरनेबा आ बन्धा कोबीक परोठा सेहो बना सकैत छी। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 तूलिका- गाम रुद्रपुर, जिला मधुबनी। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

22 2 2 चित्रकार उमेश कुमार महतो उमेश कुमार- पुत्र श्री केशव महतो, बहादुरगंज एकटा राजा रहए। ओकरा एकटा बेटा रहए। ओकर राजपाट खूब शांति सँ चलैत रहए। राजा जखन बीमार भेलए तँ बेटाकेँ कहलकए। १.फी कोरमे सीरा खाइले। २.द्वारपर हाथी बन्हबा कऽ राखय ले। ३.वैर भाव नहीं राखए ले। ४.बाहर निकलैपर छाँवमे रहबा ले। राजकुमार एकर अर्थ नहि बुझि पेलक। राजा मरि गेलैक। राजकुमार राजा बनि गेल। पिताजीक गपपर ओ अमल करए लागल। १.फी कोरमे सीरा खेबाक मतलब ओ बुझलकै जे सभ दिन खस्सी कटबा कए सीरा खेनाइ आ बचल मासु नोकर सभ के देनाइ आ ओ सैह करए लागल। २.द्वारपर ओ एकटा हाथी कीन कऽ रखबा देलक आ चारि टा नोकर ओकर देखभाल लेल राखि देलक। ३.ओ सभटा बैरक गाछ काटि कऽ हटा देलक। ४.ओ दू टा नोकर राखलक जे गाछ काटि कऽ जतऽ जतऽ राजा जाइत रहए ओतए-ओतए लऽ जाइत रहए। एना किछु दिन ओ राजपाट चलेलक। एना करिते-करिते राजपाट खतम भऽ रहल छलैक , कारण खर्चा बेसी भऽ गेलै आ आमदनी कम, सभ गाछ कटि गेलैक। गामक एक बुजुर्ग सँ ओ पुछलक जे हमर राजपाट किएक खतम भऽ रहल अछि। तँ ओ बुजुर्ग ओकरा बुझेलक जे जाऊ आ तीन मूरी बला आदमी सँ पुछू। चारू तरफ राजा खोजलक मुदा तीन मूरी बला आदमी ओकरा नहि भेटलैक। फेर ओही बुजुर्ग आदमी सँ पुछलक जे हमरा तँ तीन मूरी बला आदमी नहि भेटल। बुजुर्ग कहलकै जे ७० बरख सँ ८० बरखक आदमी केँ तीन मूरी बला कहल जाइत छैक कारण जे जखन ओ बैसैत अछि तँ ओकर मूरी झुकि जाइ छैक आ ठेहुन ऊपर उठि जाइत छैक आ से ओ तीन मूरी जकाँ भऽ जाइत छैक। राजा एहेने एकटा मनुक्खकेँ ताकि क' पुछलक। “पिताजी मरए से पहिने की की बतेने रहथि”। ओ तीन मूरी बला मनुख पुछलक। राजा कहलक। “ओ बतेलथि- १.फी कोरमे सीरा खाइले। २.द्वारपर हाथी बन्हबा कऽ राखय ले। ३.वैर भाव नहीं राखए ले। ४.बाहर निकलैपर छाँवमे रहबा ले”। “पहिलाक मतलब छी- एक पाव डेढ़का मांछ लऽ कऽ बनबा क' खाउ ओकर सभ कौरमे सीरा भेटत। दोसराक मतलब घरक आगाँ घूर लगा देबा लऽ जाहिसँ द्वारपर हरदम १० गोटे बैसल रहत। तेसरक मतलब झगड़ा-झाँटि सँ दूर रहि दोस्ती मिलान सँ रहू। चारिमक मतलब दू रुपैयाक छाता लऽ छाहमे चलू”। तीन मूरी बला मनुक्ख बतेलक। एकरापर अमल केलापर राजाक राजपाट वापस आबए लगलैक। मधुश्रावणी अरिपन गतांकमे एकर चर्चा छल जे मधुश्रावनीमे संगमे सूर्य चन्द्र गौर, साठि आ’ नवग्रहक चित्र सेहो लिखल जाइत अछि। एकर चित्र एहि अंकमे प्रस्तुत अछि। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 प्रीति ठाकुर – गाम जगेली पूर्णियां Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 कल्‍पना आ यथार्थ-            अमरेन्‍द्र यादव- दिघवा, सप्‍तरी । जिनगीक हड़हड़ खटखटसँ दूर मृत्‍युक तगेदासँ अन्‍जान बनल जिनगीक अति व्‍यस्‍त समयसँ किछ पलखति चोराकऽ अहाँक यादक उडनखटोलामे उडि जाइ छी हम प्रेमक अन्‍तरिक्षमे । नदीक ओहि पार दू गछिया तऽर हमर कोरामे औङ्गठल हमरासँग हँसैत बजैत खाइत छी अहाँ सप्‍पत खाइत छी हमहूँ सप्‍पत अहाँक तरहत्‍थीकेँ चुमिकऽ खोसि दैत छी हम एकटा गेनाक फूल अहाँक खोपामे । तखने हमर नाकमे अचानक ढकैत अछि जरल तरकारीक गन्‍ध आ अकचकाइत उठैत छी हम मिझबय लेल स्‍टोभ तखने हमर नजरि पडैत अछि टेबुलपर राखल चिठीपर जे काल्‍हिए एलै हमर गामसँ आ हमर आगा नाचय लगैत अछि भरना लागल खेत बाबुक फाटल बेमाय बहिनक कुमारि सिँथ भायक पढाइ खर्च आ मायक दम्‍मा बेमारी । Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 मिथिला राज्‍य- राम नारायण देव उठल मधेशी कयल हुँकार लऽके रहत, अप्‍पन अधिकार जन जनकेँ, एके आवाज सबहक माँग, मिथिला राज्‍य अप्‍पन भाष, अप्‍पन सँस्‍कृति अप्‍पन अर्थनीति, अप्‍पन राजनीति मधेशी आन्‍दोलनक यैह सन्‍देश अप्‍पन बात, अप्‍पन परिवेश निरँकुश राजतन्‍त्रक भेल अवसान भेंटल लोकतन्‍त्रक बरदान मेची—महाकाली उमडिगेल अछि राज्‍यशक्‍ति मुकिगेल अछि उठू बन्‍धू, उठाउ तरवार भगाउ सामन्‍ती राजदरवार गठन करु गणतन्‍त्रक सरकार करु राज्‍यक पुर्नसँरचना समावेसी लोकतन्‍त्र आ समानुपातिक कल्‍पना अप्‍पन विकार, अप्‍पन विचार आव कियो नहि रहत, शिक्षित वेरोजगार छोडू आपसी मेल, करु विकासक मात्र खेल उखाडि फेकू, राजाक ताज तखन भेटत अप्‍पन स्‍वराज जन—जनके एके आवाज सबहक माँग, मिथिला राज्‍य । Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 हमर मैथिली-अमरेन्‍द्र यादव डाक्‍टर चन्‍देश्‍वरजी, अहाँक बाबुजी पियौने हेथिन्‍ह उठौना दूध अहाँकेँ पोसने हेथिन्‍ह भाड़ापरक माए लेकिन हमरा नओ महिनाधरि गर्भमे मैथिलीए केलखिन्‍ह सम्‍हार सोइरी घरमे सेहो मैथिलीए केलखिन्‍ह दुलार हम कनियाँक स्‍पर्श विना जीबि सकैत छी हस्‍थमैथुनक उत्‍कर्ष विना जीबि सकैत छी लेकिन मैथिलीक आकाश विना नहि मैथिलीक श्‍वासप्रश्‍वास विना नहि डाक्‍टर चन्‍देश्‍वरजी, हमर खाँडो, खुट्टी आ बलानमे बहै हइ मैथिली । हमर दिनाभदरी आ सलहेशक दलानमे रहै हइ मैथिली । Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 अभियान गीत-भवनाथ ‘दीपक’ उठह, उठह, उठह चलह, चलह, भलह बढह, बढह, बढह घरक भेदभाव बूझि शत्रु आबि गेल बुझा दियौक आन सँग एक बुद्धि भेल विश्‍व मंच मध्‍य हम उचित जगह लेल विशद विविध भेष हरित भरित देश जाति–पाँति वर्ण धर्म भेद–भाव हीन राज–पाट कर्म काज सब अपन अधीन श्रमिक कृषक बुद्धिजीव, उद्यमी उदार ग्रथित एक सूत्र मध्‍य व्‍यक्ति शत प्रकार भुक्ति मुक्ति हेतु वृत्त आइ एकताक सेतु जनैत हित मिलैत माँटि के सकत अनेर डाँटि ! सब प्रबुद्ध, सब सचेत पैर पाछु क्‍यो न देत देखाय देत शत्रुकेँ भैरवक स्‍वरुप के अलच्‍छ निन्‍दमे रहत भसैत चूप ? तिर्हुतिक माटिपर रहनिहार भाइ ! जन्‍म भूमि प्राण हेतु ठाढ हुअह आइ लाख–लाख कोटि–कोटि केर प्रयाण के कहैछ, मैंथिलीक पुत्र अल्‍पप्राण ? लक्ष्‍य चीन्‍हि–लेल आब निधि चीन्‍हि लेल शत्रु–मित्र केर भेद–विधि चीन्‍हि लेल उठह, उठह, उठह चलह, चलह, चलह बढह, बढह, बढह.....। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 अहाँ की छी—मयानन्‍द मिश्र अहाँ प्रलोभनक नाक काट’बला मर्यादा नञि छी नग्‍नताकेँ आवरण दैबला नञि छी सँतुलन राख’बला ट्रैफिक गाइड जकाँ चौबटियापर ठाढ दुनू हाथ उठौने अहिँसा नञि छी । अहाँ छी कोडोपैरीन खा–खा कऽ तत्‍काल अपन मथदुखी केँ दबबऽ बला क्षुब्‍ध हिमालय । अहाँ छी अपन खण्‍डित रसनाकेँ दाबि चुपचाप कान’बला सिन्‍धु । वस्‍तुतः अहाँ छी एकटा बिन्‍दु जाहिठामसँ अनेक रेखा तँ खीचल जा सकैछ किन्‍तु ओ सबटा दुर्जेय चट्टानक कोनो विराट अन्‍हार गुफाक अंतहीन घाटीमे जा क’ समाप्‍त भ’ जाइत अछि सरिपहुँ ई प्रश्‍न अछि जे अहाँ की छी? Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 आत्‍मा–डाक्‍टर सुर्यनाथ गोप,दिघवा, सप्‍तरी मैथिलीकेँ बेचिकऽ पैन्‍ट सर्टपर टाईकोट कसिकऽ माथपर ढाका टोपी चढाकऽ बगलमे भारतीय दुतावासक झोरा लटकाकऽ एहि युगक सभसँ बडका विसंगति– डाक्‍टर सुर्यनाथ गोप एक हाथमे पासपोर्ट–भिसा मुठियबैत दोसर हाथमे हिन्‍दीक झण्‍डा फहरबैत हिनहिनाईत गिनगिनाईत जारहल छथि मौरिसस अन्‍तर्राष्‍ट्रिय हिन्‍दी सम्‍मेलनमे । Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 आई हम ठाढ़ भेल छी- सच्‍चिदानन्‍द यादव,रायपुर– ६, सप्‍तरी आई हम ठाढ़ भेल छी चौबटियापर नइँ, बाट तऽ एक्‍केटा छै मुदा ओकरा रुकय पडतै जे हमरा एतय अनलकै हम ठाढ़ भेल छी ठीक ओहिना जेना कपड़ाक दोकानमे पुतरा सभदिन नव नव पहिरनमे ठाढ़ भेल रहै छै आ, किनयबला देखै छै उन्‍टापुन्‍टाकऽ । Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 स्‍मिताक लडाई- मनोज मुक्‍ति पशुपतिनाथक देशमे होइछ व्‍यभिचार सब भेषमे आन ठाम त बाते छोडू अबुह लगैया अपनो देशमे । प्रकृतिक देल ई आँखि,कान ओ बडका नाक आब दुष्‍मन प्रतित होइया सँसारमे अपन अलग छाप छोडने मिथिलावासी,डरपोकक हूलमे सरिक होइया । अपना समस्‍त अधिकार सऽभसँ बन्‍चित होइतो,बँचल छी काइल्‍हुक आशामे भ्रष्‍ट प्रशासन ओ नेताक लोभ सँ, जकडा रहल अछि देश, विदेशीक पाशामे । एतेक कठीन आ दूर्लभ मनुष्‍यक जीवन पाओल स्‍वर्ग समान एही मिथिलामे मूदा लगैछ जे जन्‍मजाते अभागल थिकहुँ जे दूर्दशा होइत देखैछी, मिथिलाके अपन आगामे । सम्‍पूर्ण श्रृँगार सँ सुशोभित जगतक माय ओ विलक्षणा सीता आई घरसँ निकालल जाऽरहल अछि मिथिलावासी एम्‍हर ओम्‍हरक वात सुनैत, घरक एकटा कोनामे बहादुरी देखाबि रहल अछि । भऽरहल अछि सस्‍ता रँग सँ शोणीत जाहिसँ सब छथि नहाएल कतेक दिन सऽब चुप्‍पे रहतै, बैसतइ एना नुकाएल? ताहि सँ, एहि स्‍मिताक लडाईमे बचने मात्र सँ काज नई चलत सम्‍पूर्ण मैथिलमे नव चेतना भरैत, सबके लडहिटा पडत । Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् अन्तर्वार्ता-डा. राम दयाल राकेश/आभाष लाभ..... सरकारके ध्‍यान छठि पावनिपर देवाक चाही.....डा. राम दयाल राकेश ( सँस्‍कृति विद) छठि पावनि मधेसके संस्‍कृति कियाक मानल जाईत अछि ? –छठि पावनके अपने मौलिक विशेषता छइ,, ई पावनि शुरु होबऽ सँ एकमहिना पहिने सँ  पावनि कयनिहार सब तैयारी मे लाईग जाईत छथि । एकर तैयारी आ पुजाके जौं देखल जाय त अईमे विशुद्ध मधेसी संस्‍कृति पाउल जाईत अछि । पावनि केनहार सँ लक ओईके तैयारीमे लागल हरेक व्‍यक्ति ओ संस्‍कृतिमे भिजल रहल पाओल जाइत अछि । ओकर प्रसाद सँ लऽक हरेक सामगी्रमे मधेसक संस्‍कृति देखल जाईत छक, ओ पावनिके अवसरमे गावै वाला विभिन्‍न धुन तथा गीत सब मैथिल संस्‍कृतिमे गाओल जाईत अछि । ई पावनि कियाक मनाओल जाईत अछि ? –एकर अपने पहिचान आ विशेषता छैक । सब पावनि सँ अई पावनिके अपने इतिहास छैक किया त कोनो पावनि एसगरे अपना घर परिवार मे रहिकऽ मनाओल जाइत अछि मुदा ई एकटा एहन पावनि अछि जे खुला जगहमे सामूहिक रुप सँ मनाओल जाइत अछि । अई पावन के मात्रे लोकतान्‍त्रीक पावनि कहल जा सकैय कियाक त अई पावनि मे कोनो भेदभाव उच्‍च नीच, जात भात नई देखल जाइत अछि । अई पावनिमे सूर्यके पुजा भेलाके कारण आओर एकर गरीमा के उच्‍च देखल जा सकैय । सूर्य जहिना ककरो पर भेदभाव नई क कऽ सम्‍पूर्ण जगतके   रोशनी प्रदान करैत अछि, तहिना छठि पावनि सब के एक समान रुप सँ देखैत आईव  रहल छैक । ई पावनि अपना परीवार के सुख समृद्धिके लेल तथा कोनेा रोग व्‍यधा नई लागै से मनोकामना सँ मनाओल जाइत अछि । भोर आ साँझक सूर्यके किरणमे एक प्रकारके गरीमा होईत अछि जकरा रोशनी सँ शरीरमे रहल विभिन्‍न विमारी फैलाब वाला किटाणु सबके नष्‍ट सेहो करैत चर्मरोग सँ बचाबैत अछि । चर्म रोगके अचुक दवाई मानल  जाईत अछि छठि पावनि । छठि पर्व मे महिला सब अपना आचरा पर नटुवा कियाक नचवैत छैथ ? –एकरा एकटा श्रद्धाके रुपमे लेल जा सकैय, छठि माताके ध्‍यानमे राखि क कोनो किसीमके मनोकमना केला सँ जौं ओ पुरा भ जाईछै त ओई देवता पर आरो श्रद्धा बैढ जाईछै आ ओहि किसीमके कौबुला क क अपना आँचर पर नटुवा नचवैत छैथ । छठिक घाट पर चमार जाईत सब ढोल( डुगडुगीया) बजावैत छथि, ओकर कि विशेषता अछि ? –ओकरो जातिय तथा संस्‍कृति परिचयके रुपमे लेल जा सकैय, ओ जाईत सब अपन संस्‍कृति आ संस्‍कारके बचएबाक लेल ओ काज क रहल अछि । ओ ढोल बजला सँ घाट पर कतेक मधुरता आ रौनक महशुस होईत रहैत अछि, ओना त कते लोक सब अग्रेजी वाजा बाजा क पावैन मानावैत छैथ मुदा जतेक ढोल पीपही के आवाजमे संस्‍कृति के झलक भेटैत अछि ओते कोनो बाजामे नई । अई पावनि मे सूर्यके पुजा होईतो पर छठि माता या छईठ परमेश्‍वरीके नाम सँ कियाक जानल जाईत अछि ? –सूर्यके अर्थ उषा होईत अछि, उषा भगवतिके रुपमे पुजलाके कारण एकरा छठी माताके रुपमे सम्‍बोधन कायल जाइत  छैक । ओना त स्‍पष्‍ट रुपमे कतौ ने अई विषयमे चर्चा भेल अछि लेकीन किछ शास्‍त्रमे महाभारत के कुन्‍ति शुरुमे छठि पावनि केनेे रहैथ ओही दिन सँ छठि पावनि शुरु भेल अछि से कतौ कतौ उल्‍लेख पाएल जाईत अछि । दिनकर के आ जलके कि सम्‍बन्‍ध अछि ? –जल के आ दिनानाथके बहुत गहिर सम्‍बन्‍ध अछि, बिना जलके दिनकरके पुजे नई भऽ सकैय हुनका खुश करबाक लेल जल चाहबेटा करी । छठिएके उदाहरणके रुपमे लऽ लिय, ओ पावनि बिना जल के नई भऽ सकैय कोनो जलासय नई भेला पर अपना घरमे खधिया खनि क ओइमे जल राईख क पावनि सम्‍पन्‍न करैत अछि, कियाक त दिनानाथे सूर्य छथि । एकटा एहो कहि सकै छि कि सूर्य मे बहूत गर्मी भेला के कारण जल के अर्घ देला सँ ओ किछ ठन्‍ढा होइत  छैथ । लोकतान्‍त्रिक गणतन्‍त्रमे छठि पावनिके संस्‍कृतिके बारे मे अपने कि कहब अछि ? – हम गणतन्‍त्र नई कहिक लोकतन्‍त्रके चर्चा करैत ई कहव कि छठि एकटा विशुद्ध लोकतान्‍त्रिक पावन अछि, समानुपातिक ढगं सँ एकरा मनाओल जाइत अछि । सामूहिक रुपमे मनबाक सँगहि अई मे कोनो भेद भाव नई होइत अछि । गरीब सँ लक धनीक तक सब एकरा समान ढगं मनावैत अछि । जनता गणतन्‍त्रके रस्‍ता चलनाई शूरु कदेलक मुदा सरकार अखुनोे पाछा परल अछि । अखनोे मधेसी पहाडी बीच , दलित गैर दलित बीच, गरीब धनीकके बीच भेदभाव अछि, कि एकरे गणतन्‍त्र कहबै ? नवका नेपाल बनाबऽ लागल नेेतागण सबके छठि पावनि सँ किछ सिखवाक चाहि ।

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् अन्‍तर्वाता ...आभाष लाभ (२०२८ सालमें डा.राजेन्‍द्र विमल आ श्रीमति विणा विमलक सन्‍तानक रुपमें जनकपुरक देवीचौकक निवासमें जन्‍म लऽ २२ वर्ष पहिने सँ निरन्‍तर मैथिली गीत सँगितक आकाशमें ध्रुवतारा जकाँ चमकैत रहऽबला एकटा मिथिलाक बेटा छथि, गायक आभाष लाभ । बाल्‍येवस्‍था सँ विभिन्‍न मँच सबपर अपन आवाज सँ दर्शक श्रोता सबके हृदयमें वास कयनिहार आभाष लाभ, मैथिली आ मिथिला सँ सम्‍बन्‍ध रखनिहारकलेल चीरपरिचीत नाम अछि । प्रस्‍तुत अछि, गायक आभाष लाभ सँगक भेल बातचीतक प्रमुख आश ) १. आभाष जी गीत सँगीतमें कहिया सँ लगलहुँ? कहिया सँ लगलहुँ से त नईं बुझल अछि, मूदा बच्‍चे सँ जनकपुर आ लऽग परोसक गाँव सबहक एकौटा मञ्‍च हमरासँ नई छुटैत छल । २. पहिलबेर आहाँक रेकर्डेड गीत कोन अछि - पहिलबेर हम नेपाल सँ बहराएल अशोक चौधरीक मैथिली क्‍यासेट पानस में गीत गएने छलहुँ । ३. मैथिली गीत सँगीतक अवस्‍था केहन बुझा रहल अछि? जतेक होयबाक चाही ओतेक सँतोष जनक नहि अछि । नव नव प्रतिभा जाई तरहें एबाक चाही, नई आबि रहल छैक । दोसर बात अखन प्रविधि एतेक परफेक्‍ट भऽगेल छैक जे पाइ सेहो वड खर्च होइत छैक । ४. की बुझाइया, मैथिली गीत सँगीतमें लागिकऽ अखनुक युगमें बाँचल जा सकैया एकदम नीक जकाँ बाँचल जा सकैया एही क्षेत्रमें लागिकऽ । मैथिलीक क्षेत्र बहुत पैघ छियै । जौं मेहनतिसँ नीक काज कायल जाए त मैथिलीयो सँगीतक क्षेत्रमें बहुत पाई छै । उदाहरण लऽ सकैत छी, हमरे सबहक क्‍यसेट “रे छौंडा तोरा बज्‍जर खसतौ”के जे १५ लाख प्रति बिकाएल छल । तहिना  “गीत घरघर के” जे जहिया सँ बहरायल तहिया सँ आइयोधरि बिकाइते अछि । हँ, काज नीक होयबाक चाही । ५. प्‍यारोडीके प्रभाव केहन पडि रहल छैक मैथिली गीत सँगीत पर? प्‍यारोडी मौलीकताके साफ साफ खतम कऽ दैत छैक । गीत सँगीतक क्षेत्रमें लागल श्रष्‍टा सबके मनोवलके तोडिकऽ राखिदेने छैक प्‍यारोडी गीतसब । ६. प्‍यारोडी गीत सँगीत सँ पिण्‍ड छुटबाक उपाय की देखियौ, जखन अपन सँगीत या गीत नई हुए तखन प्‍यारोडीके किछु हद धरि पचाओल जाऽ सकैया,मूदा मैथिलीमे अपन मौलीक सँगीतक आभाव त कहियो नई रहलै । जहातक प्‍यारोडी गीत सँगीत सँ पिण्‍ड छुटेवाक बात छई त अइमे आम जे श्रोता सब छथि, जे वास्‍तविक रुपमें चाहैत छथि की अप्‍पन मौलीक सँगीतक विकास होइ, हूनका सबके प्‍यारोडी गीतके निरुत्‍साहीत करबाकलेल ताई प्रकारक क्‍यासेट किनऽसँ परहेज करऽ पडतन्‍हि आ सँचार माध्‍यम सबके सेहो ओहन गीत बजेवा सँ बचऽ पडतन्‍हि, तखने ई सँभव अछि । ७. नेपालीय आ भारतीय मिथिलाञ्‍चलमें मैथिलीक बहुत रास काज भऽ रहल छैक, की अन्‍तर बुझाऽ रहल अछि दूनु देशक मैथिलीक काजमे हम त मात्र एतबा बुझैत छियै जे एकटा हमर सहोदरा विदेशमे कमाऽरहल अछि आ हम नेपालमे । दूनु ठाम अपना अपना तरहें काज भऽरहल अछि एतबे बुझु । ८. अखन सऽभ भाषाक गीतमे रिमिक्‍सके बाढि आएल बुझाति छई, एकरा कोन रुप सँ आहाँ देखैत छियै? बहुत नीकबात छई रिमिक्‍स गीत औनाई । समय अनुसार आधुनिकीकरण होयबाके चाही । समाजकलेल आ बजारकलेल गीत गौनाई दूनु दूटा बात छियै, ताहिमें गीत सँगीतक व्‍यावसायीकरणमे रिमिक्‍स बहुत नीक सँकेत छई । रिमिक्‍स गीत बहरेवाक चाही बशर्ते अपन सँस्‍कार नई लुप्‍त भऽ जाई ताइके ध्‍यानमें रखैत । ९. अखनधरि कतेक गीत गएलहुँ जे रेकर्डेड अछि? अखनधरि लगभग साढे तीनसय गीत हम गाबि चुकल छी जे रेकर्डेड अछि । १०. क्‍यासेटके अलावा कोन फिल्‍ममें अपन स्‍वर देने छी आहाँ ? मैथिलीमे दहेज,ममता,प्रितम,आशिर्वाद फिल्‍ममे,  तहिना भोजपुरी फिल्‍मसब सजना के आगना, ममता, तहार गलिया आदिमे । ११. स्‍टेज शो के सीलसीलामे कतऽ कतऽ गेलहुँ? अपन देश नेपालक लगभग सबठामके अलावा, कतार (४बेर),दूवई(२बेर),मलेशिया,पाकिस्‍तान,बंगलादेश, भारतक विभिन्‍न शहरमें अखन धरि जाऽचुकल छी । १२. नव की आबि रहल अछि मैथिल श्रोता सबहक लेल? बहुत जल्‍दिए निखिल राजेन्‍द्रक सँगीतमे भेनस क्‍यासेट सँ रिलिज भऽ रहल अछि....

66 6 6 श्री डॉ. गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार।१९६४-६५ मे पाँच गोटे कवि-लेखक “काल पुरुष”(कालपुरुष अर्थात् आब स्वर्गीय प्रभास कुमार चौधरी, श्री गंगेश गुन्जन, श्री साकेतानन्द, आब स्वर्गीय श्री बालेश्वर तथा गौरीकान्त चौधरीकान्त, आब स्वर्गीय) नामसँ सम्पादित करैत मैथिलीक प्रथम  नवलेखनक अनियमितकालीन पत्रिका  “अनामा”-जकर ई नाम साकेतानन्दजी द्वारा देल गेल छल आऽ बाकी चारू गोटे द्वारा अभिहित भेल छल- छपल छल। ओहि समयमे ई प्रयास ताहि समयक यथास्थितिवादी मैथिलीमे पैघ दुस्साहस मानल गेलैक। फणीश्वरनाथ “रेणु” जी अनामाक लोकार्पण करैत काल कहलन्हि, “ किछु छिनार छौरा सभक ई साहित्यिक प्रयास अनामा भावी मैथिली लेखनमे युगचेतनाक जरूरी अनुभवक बाट खोलत आऽ आधुनिक बनाओत”। “किछु छिनार छौरा सभक” रेणुजीक अपन अन्दाज छलन्हि बजबाक, जे हुनकर सन्सर्गमे रहल आऽ सुनने अछि, तकरा एकर व्यञ्जना आऽ रस बूझल हेतैक। ओना “अनामा”क कालपुरुष लोकनि कोनो रूपमे साहित्यिक मान्य मर्यादाक प्रति अवहेलना वा तिरस्कार नहि कएने रहथि। एकाध टिप्पणीमे मैथिलीक पुरानपंथी काव्यरुचिक प्रति कतिपय मुखर आविष्कारक स्वर अवश्य रहैक, जे सभ युगमे नव-पीढ़ीक स्वाभाविक व्यवहार होइछ। आओर जे पुरान पीढ़ीक लेखककेँ प्रिय नहि लगैत छनि आऽ सेहो स्वभाविके। मुदा अनामा केर तीन अंक मात्र निकलि सकलैक। सैह अनाम्मा बादमे “कथादिशा”क नामसँ स्व.श्री प्रभास कुमार चौधरी आऽ श्री गंगेश गुंजन दू गोटेक सम्पादनमे -तकनीकी-व्यवहारिक कारणसँ-छपैत रहल। कथा-दिशाक ऐतिहासिक कथा विशेषांक लोकक मानसमे एखनो ओहिना छन्हि।  श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ,  मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। गुंजनजीक राधा विचार आ संवेदनाक एहि विदाइ युग भू- मंडलीकरणक बिहाड़िमे राधा-भावपर किछु-किछु मनोद्वेग, बड़ बेचैन कएने रहल। अनवरत किछु कहबा लेल बाध्य करैत रहल। करहि पड़ल। आब तँ तकरो कतेक दिन भऽ गेलैक। बंद अछि। माने से मन एखन छोड़ि देने अछि। जे ओकर मर्जी। मुदा स्वतंत्र नहि कए देने अछि। मनुखदेवा सवारे अछि। करीब सए-सवा सए पात कहि चुकल छियैक। माने लिखाएल छैक । आइ-काल्हि मैथिलीक महांगन (महा+आंगन) घटना-दुर्घटना सभसँ डगमगाएल- जगमगाएल अछि। सुस्वागतम! लोक मानसकें अभिजन-बुद्धि फेर बेदखल कऽ रहल अछि। मजा केर बात ई जे से सब भऽ रहल अछि- मैथिलीयेक नाम पर शहीद बनवाक उपक्रम प्रदर्शन-विन्याससँ। मिथिला राज्यक मान्यताक आंदोलनसँ लऽ कतोक अन्यान्य लक्ष्याभासक एन.जी.ओ.यी उद्योग मार्गे सेहो। एखन हमरा एतवे कहवाक छल । से एहन कालमे हम ई विहन्नास लिखवा लेल विवश छी आऽ अहाँकेँ लोक धरि पठयवा लेल राधा कहि रहल छी। विचारी। प्रस्तुत अछि गुञ्जनजीक मैगनम ओपस  "राधा" जे मैथिली साहित्यकेँ आबए बला दिनमे प्रेरणा तँ देबे करत सँगहि ई गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित सभ दुःख सहए बाली- राधा शंकरदेवक परम्परामे एकटा नव-परम्पराक प्रारम्भ करत, से आशा अछि। पढ़ू पहिल बेर "विदेह"मे राधा

ऑगी हेराएब कोनो तेहन दुर्घट बात नहि। राधा तें उदासो नहि भेलीह। उदास तं ओ आनो आन कए कारणें छलीह। जेना ,शरीरे दुखित पड़लि छलीह। कोनो टा सखि, क्यो बहिना कए दिन सं देख' पर्यंत नहि अयलनि। हुलकियो देब' नहि। दुखित कें होइत छैक आशा आग्रह। बल्कि स्पृहा। स्पृहा ई जे क्यो आबए, आबि क' दू क्षण लग मे बैसय, दःख पूछय। गप करय। किछु कहय, किछु सुनय। मन कें बहटारय। सैह तकरे अभाव आ संबन्धक जोर।जे अप्पन नहि तकरा पर अधिकारे कोन ? जे अपनो अछि आ अधिकारो बुझाइत अछि, वास्तव मे से कतेक अपन ? ई अधिकार आ प्रयोजनक प्राथमिकताक अपन-अपन वृत्त होइत छैक। मनुक्ख-मनक ई लाचारी छैक। ओकरा अपन एहि सीमाक ध्यान राख' पड़ैत छैक आ तहिना संपर्कित-संबंधित समस्त समाजक ध्यान राख' पड़ैत छैक। से जकरा बुतें एकर, एहि बुद्धिक संतुलन नहि रहल ,तकर जीवन कनीक आर मोशकिल।अर्थात्‌ जीवनक     मोशकिली धरि अपरिहार्य। राधाक ई सोचब आ दुखी हएब स्वाभाविके जे जीवन मोशकिलीक सवारी थिक। चिक्कन चुनमुन बाट पर पहिया सब गुड़कैत आगां बढ़ैत रहल तं बड़ दिब। सबटा मन विरुद्धो अनुभव पाछां छुटैत गेल आ मनलग्गू अनुभव  अपना संग आगां बढ़ैत रहल। कतहु कोनो ठाम पहुंचि गेलाक बाद कए तरहें संतुष्ट कयलक आ कए तरहें अतृप्त राखि देलक। आब फेर एत' सं अनुभवक अतृप्त प्रसंग जे एकहि क्षण पहिने मात्र नगण्य बुझाइत छल, से भ' जाइत अछि खोंचाड़ल मधुमाछी... खोंचाड़ल मधुमाछीमक खोंता । बिना बिन्हनहुं अनेरे ठेहुन सं मूड़ी धरि घनघनौने रहत बड़ी-बड़ी काल। हरदम डेरायल मन-काटत,आब काटत...। कोनो क्षण लुधकत आ काटि लेत। यद्यपि कि काटियो लेत तं कोन ओ अहांक गर्दनि छोपि लेत ? दंश देत। से मुदा भने मधु जकां नहि, विष विशाइत दंश। कोनो गर्दनिकट्ट नहि होइत अछि- मधुमाछी ! -बरु गर्दनियें काटब सुभीतगर, ओ सोचलनि। भने मनुक्ख कें छुटकारा तं भेटि जाइ छैक। आ दिन दिनक विस विसाइत भोग-अनुभूतिक अनवरत क्रम जे संपूर्ण अस्तित्वे के बेचैन कयने रहत। देह-प्राणक किछु टा आन वातावरण नहि बनब' देत। घिसियौर कटबैत रहत। ओही अपन स्वभावक परिधि आ तकर प्रयोजन मे बन्हने रहत। मात्र बन्हनहुं टा रहि जाय, तैयो सुकुर, मुदा ओ तं अहांक बुद्धि सं आर सब किछु कें काटि-बारि क' फराक क' देत। अहीं कें अपन तेहल्ला बना क' छोड़त। लैत रहू। आब एहि मन मे किछुओ क्षण रहि गेलौं कि ओ अहां सं अहींक परिचय तलब करत। यावत-यावत तैयार भ' क' अहां उपयुक्त सोचब आ बाजब, तावत-तावत ई बात, अहांक मनक  ई मामूली घटना एकटा समाचार बनि जायत। ई समाचार बिना कोनो माध्यम कें रौद आ बसात पर सवार भ' क' पहुंचि जायत ओत' धरि जत' अहां सोचियो ने सकैत छी। आब बैसि क' कपार पीटैत रहू। ककरा-ककरा आ की-की बुझयबैक ? आ से जकरा बुझयबैक से कतेक दूर धरि ,की मानत ? जतवा मानियो लेत तकरा सं अहांक जीवन कें की सुभीता आ कोन सुख ? हॅं, सुख ? की थिक ? केहन होइत छैक ? कोना होइत छैक ? कतवा होइत छैक ? ककरा होइत छैक ? मुदा... मुदा, किछु छैक तं अवश्ये ई सुख! सुखक अनुभव अवश्ये छैक एहि पृथ्वी पर-मनुक्ख सं ल' क' सब जीवधारी मे।तें रहैए एकरा पाछां व्याकुल-बेहाल!  परंतु से केहन छैक-लाल ,पीयर, हरियर ,उज्जर, कारी -केहन ? अर्थात्‌ सुखक कोनो रंगो होइत छैक ? कोनो खास रंग ? -की स्वाद छैक ? केहन स्वाद ? कोनो फलक स्वाद ? चाउर-दालि-गहूमक स्वाद ? तीमन-तरकारीक ?इनारक टटका जलक स्वाद ?एक संगे दू गोटेक इजोरियाक चन्द्रमा बा एकान्त अन्हरिया मे तारा गनवाक स्वाद ? कोनो अनचिन्हार चिड़ैक अपरिचित बोल अकानि चीन्हवाक कोसिसक स्वाद? बा भोरे भोरे जन्मौटी बच्चाक मिलमिलाइत आंखि जकां बाड़ीक कोनो नान्हि टा गाछ मे नव पनगल दिव्य ललाओन दुपत्ती कें देखि अह्‌लाद होयवाक स्वाद ?....घन अन्हार मे ककरो कंठ सं अपन नामक सम्बोधन सुनवाक ? कोनो गंध होइत छैक ? अत्तर-गुलाब सन, बेली-चमेली सन , तेजपात सं छौंकल दालि, कढ़ी पातक बा औंटवा काल लोहिया लागि गेल दूध सन, सोन्हायल डाबा सन,-कथी सन ? जन्मौटी बच्चा सन, तुरंत बियाहलि स्त्री सन आ कि बाध सं घुरल हरवाह-गृहस्थ सन, यमुना जल मे खीचल नूआ-वस्त्र सन बा पाकल कदंब सन बा श्रीकृष्णक सांस सन ? सांस मे केहन निसां छैक ! कृष्णक सांस मे केहन निस्सां छनि ? कृष्ण मे अपने केहन निसां छनि ! कृष्ण निस्सें छथि । कृष्ण माने  निसां...। बेचैनी राधाक ,बेबस मनक प्रवाह मे, बहैत रहल, यमुना धार सन, राति, रातुक अन्हार काल मे । सब सूतल अपन-अपन ठाम। धेने सब रातुक विश्रामक स्थान। चिड़ै चुनमुन्नी अपन-अपन खोंता। माल जान अपन थैर-बथान। आ मनुक्ख अपन-अपन चौकी-खाट-मचान ! निसभेर निन्न मे डूमल जीयैत। मात्र ई एकटा एकसर मनक विकल नियति, चुपचाप सूतल रातिक अन्हार मे अपन निस्बद्द चलैत रहल-बहैत गेल! राधाक मनक प्रवाह यमुना भ' गेल। एतवो पर रच्छ छल , मुदा कहां बांचल समयक इहो एहनो सुभीता, सेहो तं आंजुरक जल भेल। कतबो यत्ने बचा क' रखवा मे कहां भेलहुं सकारथ ? सबटा बहि गेल। कनीक काल रहल भने भीजल तरहत्थी-माने स्निग्ध , सेहो अगिले पल ऋतुक उष्ण प्रभावक वेग मे निठ्ठाहे सुखा गेल। जानि नहि ओ आंजुर आ आंजुरक जल कोन क्षण अलोप भेल कोना बिला गेल, कत' गेल ? सूर्य लग गेल ? चन्द्रमा लग गेल कि तारा लग ? वा माटि मे, पोखरि-इनार-धार, कोनो मे फेर सं घुरि गेल, जा क' मीलि गेल जल- अपन उद्गम सं, उत्स सं वा भाफ बनि क' बन' गेल मेघ ? कर' गेल बरखा,? जल कत'गेल ? आंजुर भरि जल कत' गेल ? ई किछु विलाप जकां राधाक मनक परिताप अपनहि अभ्यंतर मे मुखर चलि रहल- अपनहि कहैत-अपने कें सुनैत । अपने सं सभटा पूछैत। ई केहन विचित्र आत्म सम्बोधन ? अपनहि मन सोर पाड़य अपने मन ! सौंसे गाम-टोल अछैत , टोलक लोक, संबंधी, सखि-बहिनपाक एहि पसरल समाज आ संसार मे कोनो एकटा मन, एहन असकर एतेक एकान्त काटि रहल व्याकुल पल-पल जीवन । अपनहि विडंबना कें स्वयं करैत आत्म सम्बोधन.... -"राधा'' ....!! एं ई की भेल कत' सं कोन आकाशवाणी -"आब केहन मन अछि अहांक राधा !'' के पूछल ? बाजल के ? के आयल पूछ'-कुशलक्षेम, ककर थिक ई प्राणबेधी वाणी ? दुर्लभ स्वर्गिक संगीत स्वर थिक ककर ? रातिक एहि निस्बद्द एकान्त अन्हार मे के बाजल, ककरा भेलैक हमर चिन्ता ? के आयल पूछय-हालचाल,... अच्छा, तं... ई थिक हुनके ताल ? राधा कें कानमे स्पष्टे क्यो पुछलकनिहें। किछुओ संदेह नहि, सत्य छैकः 'केहन मन अछि अहांक राधा...' ई थिक सद्य : अनुभव, कोनो टा भ्रम नहि। मुदा तखन राधा कें कियेक लगलनिहें ई जिज्ञासा, पुरुष-कंठक नारी-स्वर मे प्रतिध्वनि ? यदि पुछलनिहें कृष्ण तं पछाति सैह प्रश्न करैत स्त्री के छल ई जकर स्वर छल ? ई अछि कोना संभव ? मुदा थिक तं ई सत्य ,संदेह कथमपि नहि। सत्य तं होइत अछि सत्ये। ज्वरे परजरित एहि देहक ताप पर जमुना जल भीजल पीतांबरी जकां के एना पसरि रहल-ए, आलसे निनियाइल बसात... जमुना मे झिलहरि खेलाइत, निस्बद्द राति। गंगेश गुंजन/राधा- सातम खेप/ प्रेषित २३ अक्तूबर-२००८. बाढ़िक त्रासदी-पर डॉ. गंगेश गुंजन जीक मैथिली गजल दु:खे टा चारू कात छै आ जी रहल-ए लोक ताकैत आसरा कोनो दुःख पी रहल-ए लोक ! घर-द्वारि दहि गेलैक सब बच्चा टा छै बांचल रेलवेक कात, बाट-घाट जी रहल-ए लोक ! सांझो भरिक खोराक ने छैक अगिला फसिल धरि जीबा लए ई लाचार कोना जी रहल-ए लोक ! सबटा गमा क' जान बचा आबि त' गेलय आब फेकल छुतहर जकां हद जी रहल-ए लोक ! जले पहिरना, बिछाओन जले छैक ओढना जबकल गन्हाइत पानि-ए खा पी रहल-ए लोक ! सब वर्ष  जकां एहू   बाढ़ि मे   कारप्रदार रिलीफ नामें अपन झोरी सी रहल किछु लोक ! चलि तं पड़ल-ए जीप-ट्र्‌क-नावक से तामझाम आब ताही  आसरा मे बस जी रहल-ए लोक ! कहि तं गेलाह-ए परसू-ए दस टन बंटत अन्न एखबार-रेडियो  भरोसे जी  रहल-ए  लोक ! घोखै तं छथि जे देच्च मे पर्याप्त अछि अनाज सड़ओ गोदाम मे, उपास जी रहल-ए लोक ! उमेद मे जे आब आओत एन जी ओ कतोक द' जायत बासि रोटी, वस्त्र, जी रहल-ए लोक ! अछि कठिन केहन समय ई राक्षस जकां अन्हार किछु भ' रहल अछि तय , तें तं जी रहल-ए लोक ! ॥ किछु एहनो बात विषय॥ यद्यपि एहि बात –‘सगर राति दीप जरय’ पर हम सिद्धांततः प्रभासजीसँ सहमत नहि रहलौँ, परन्तु एम्हर पछिला दशकमे ई तिमाही-कथा गोष्ठी- ‘सगर राति दीप जरय’- आजुक मैथिली कथा-विधामे की योगदान कएलक अछि, से तथ्य आब इतिहासमे दर्ज अछि। ई बात सही छैक जे एहन कोनो कार्य कोनो एक गोटेक नहि होइछ। मुदा सभ वर्त्तमानकेँ ओहि एक संस्थापना-कल्पक व्यक्त्ति-लेखककेँ अवसरोचित रूपेँ कृतज्ञतासँ स्मरण अवश्य कयल जयबाक चाही। से लेखकीय नैतिकता थिक। आ’ हमरा जनतबे, से रहथि- स्व. प्रभास कुमार चौधरी। हमरा तखन दुखद निराशा भेल जखन एहि बेरक मैथिली साहित्य अकादेमी पुरस्कार पओनिहार प्रदीप बिहारीजी साहित्य अकादेमी-सभागारमे लेखक-सम्मिलन-अवसर पर अपना वक्तव्यमे सगर राति दीप्प जरयक उपलब्धिक चर्चा तँ कएलन्हि, मुदा स्व. प्रभास जीक नामोल्लेखो नहि कयलखिन। एकरा हम साधारण घटना नहि मानि सकैत छी। गंभीर बात बुझैत छी। कारण हमरा लोकनि रचनाकार छी। औसत कोटिक कोनो राजनीतिक नहि। संभव हो नाम अनावधानतामे छूटि गेल होनि। मुदा हमरा सभ लेखक छी तेँ एहन असावधानी करबा लेल स्वाधीन नहि छी। यद्यपि अपन खेद हम हुनका प्रकट कयलियनि। हमरा लगैये जे अपन-अपन सकारात्मक इतिहासक प्रति सभ पीढ़ीक मनमे कृतज्ञताक भाव अंततः लेखकक ऊर्जा आ’ प्रेरणे बनैत रहैत छैक। बतौर कवि हम मैथिलीमे जाहि काल-बिन्दु पर ठाढ छी, तकर जड़ि विद्यापतिसँ ल’ सुमन-किरण-मधुप- आ यात्रीएमे। ई सोचि क’ मन कृतज्ञ होइत अछि! बल्कि गौरांवित। ओना, एकटा लेखक रूपमे हम एहिमे सँ क्यो नहि छी। जेना सभ, सभक कारयित्री प्रस्थान छथि, तहिना हमहुँ नागार्जुन-यात्रीक कारयात्री प्रस्थान छी। आ’ ई भाव हमरा रचनाकर्ममे अग्रसर करबाक उत्तरदायित्व द’ गेलय। तर्पण तिल-कुश –अंजलि बला कर्मकाण्डकेँ तँ हम नहि मानैत छी, मुदा पुरखाक तर्पण हमरा प्रिय अछि। अपना शैलीमे। अपन जीवन-मूल्यक एकटा अभिन्न तत्त्व बुझाइत अछि। तकर बाट की हो? अवसर पर कृतज्ञ स्मृति! अवसर पर- तिथि पर नहि। भोज परक आँटी- सत्तरिक नव-खाढ़िक युवा नवतुरिआसँ “भोज परक आँटी” अवश्य सुनल हएत बन्धु! हमरा लोकनि ते आब आयु-अवरोहणक प्रक्रियामे छी। मुदा पराभव अछि अपन एहि मैथिल मानक ओ स्वप्न जे मिथिलांचलक समग्र सामाजिक परिवर्तनक अर्थात्- जनपथक निर्माण (राजपथ नहि) आकांक्षामे सौँसे बातपर उत्कट डेगे चलिते रहबा लेल विवश छी। हमर गाम पिलखबारो ताहि से जुटल अछि, जाहिसँ हितेन्द्रजी अहाँक गाम केओटी। हमरा पीढ़ीकेँ तँ इतिहास “भोज परक आँटी” बना लेबाक बेर-बेर उपाय कएलक, जेना-तेना बँचबामे सफल रहलियैक, मुदा भऽ कहाँ कोनो खास सकलैक। तेकरे टा अफसोच। एक बोझक रूपमे फसिलकेँ खरिहानधरि कहाँ पहुँचा सकलियैक। तेकरे टा दुःख! मुदा टिकल रहलियैक अपन जीवन-मूल्य आऽ समाज दर्शनक भूमिपर। एक टा कवि-लेखक जे संघर्ष असकरो कऽ सकैत छी। से रस्ता चलबाक यत्न। जे से। पूरा बिहार- आन्दोलनक परिणति एहन आऽ एतए धरि भऽ जेतैक से क्यो सोचियोसकैत छलैक? अवश्ये बुझल हएत जे ताहि आन्दोलनक उपज- आमद भरि देश कैक टा महापद आसीन सी.एम. समेत कतोक एम.पी., एम.एल.ए. महोदय छथि। अहाँक पीढ़ीमे यदि सत्येक (सन्देह नहि सत्तरिक कारवाँक भव से कहि रहल छी जे) सत्ये मिथिलाक दर्द अछि तँ राजनीतिकेँ चिन्हैत जाइ जाऊ। पोलीटिक्स कऽ एहि नव अवतारकेँ। से भाषाक। ताहूमे मैथिलीक नव-नव ब्रांडक नेता आ एहन राजनीतिकेँ चीन्हि जाऊ। कारण जे राजनीतिक ई एकदम नव अवतार ठीक विश्व-बाजारी अवतार! कोनो औसत सुख लेल ककरो “भोज परक आँटी” नहि बनब। एहि वाष्पीकरणक प्रवाहमे एहन लोक नीक समय अर्थात् कोनो प्रतिगामी व्यवस्था रोकि नहि सकैत अछि। स्वयं राजनीतिक विचारधारा-अवधारणामे सेहो युगक अनुसार सकारात्मक पुनर्विचार चलि रहल छैक। जाति, धर्म, सम्प्रदय, क्षेत्रीयता सभसँ ऊपर सोचैत। समग्रतासँ एक होऊ। अपन मिथिलाँचलो तँ देशेमे ने अछि। अपम माँ मैथिली तँ अवश्ये महान। मुदा अन्य लोकक मातृभाषा सेहो तुच्छ नहि। अपना देशक सभ भाषा श्रेष्ठ अछि। मुदा दुर्भाग्यसँ किछु मूढ़ मैथिल मानसिकताक लोक आर तँ आर हिन्दी तककेँ अपमान जेकाँ कऽ देबाकेँ अपन मैथिल प्रेम बुझि लैत छथि, ई नकारात्मक प्रवृत्ति उचित नहि। हम तँ तेहन समयकेँ सहन कएने छी, जे किछु परम् विद्वान् अत्यन्त आदरणीय लोक लिखैत तँ मैथिली नहि तँ इंग्लिश। हिन्दी नहि। ई बहुत विचित्र लागए। आखिर हिन्दी अपन बहुत गौरवशाली लोकतन्त्र राष्ट्र-भाषा थिक। बन्धु! से मानसिकता बदलि जरूर रहल अछि मुदा अहाँ खाढ़िक (पीढ़ीक) युवा नवतुरिआमे आओर तेजीसँ परिवर्तन चाही। बात नहि रुचए तँ बिसरि जाएब, आग्रह! Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् डटके जलपान- कुमार शुशान्‍त एकटा कविताक भाव निश्‍चितरुपसँ स्‍मरण हायत, “सात समुद्रक जलके स्‍याही बनादेलजाए, वनक जँगलके लेखनी, समस्‍त धर्तीकेँ कागज बनादेलजाए, तखनो भगवानक महिमा पूर्णरुपसँ नहि लिखल जाऽसकैया” भगवानक महिमा त छोडि दिय एतबा में त डटकेजलपानेक महिमा नई अटत । डटकेजलपान   हूनक वास्‍तविक नाम छन्‍हि दिबसलाल । जे हुनकर कर्मेन भेटल छन्‍हि हूनक किछु महिमा प्रस्‍तुत अइछ, क्‍ीऋ परिक्षाक सेंन्‍टर गामसँ ७० कि.मि. दूर एकटा स्‍कूल में रहें, आवत–जाबत नई संभव हाएत ई विचार कऽक गामक १० टा जे परिक्षार्थी छल सबगोटे एके ठाम डेरा लेनहुँ । पहिलबेर अभिभावकके नजरसँ दूर स्‍वच्‍छंद लंगोटिया यार–दोस्‍त संग रहबाक मौका भेटल । उमंग–उत्‍साह त एते कि बर्णने उचित नई । ओम्‍हर अभिभावकके कि फुरौलनि से भगवान जानथि । देख–रेखलेल संग लगौलनि डटकेजलपानके । एक त राकश मंडलि उपर स न्‍योत से भेट गेल, डेरामें समानसब राइखकऽ फ्रेश होयबाकलेल कोका–कोला  पिबाक निर्णय भेल मंइलिके । दोकानपर पहुँचिते हुकुम भेल दोकनदारके, “दसटा खूब ठंढा कोका–कोला दऽ” डटकेजलपान लगा कुल संख्‍या छल एग्‍यारह, मुदा जानि–बूझकऽ मंगनऊ दशेटा । आवशुरु भेल विवेचन एकटा मित्र “ जा हुनका नइ भेटलनि ” दोसर “ नई–नई हुनका देबो नइ करबनि ” तेसर “ से किया ?” चौथा “ बड़ कडा निशा होइत छैक अइ में” सब गोटे जाहि मंशासँ गप्‍प नारने छलहुँ से पुरा भेल, डटकेजलपान बजलथि । डटके “ उबारु सब, माँए बाप परिक्षा देबला पढएने छन्‍हि आ ईसब एतऽ दारु पिबइ छथि ” एक मित्र “ तोहरा अपन ँबतजभच के शपथ छह, कतौ बजिहऽ नई ” अंगूठा द्दाप, ँबतजभच के मतलब नई बूझलथि ताएँ झगड़ा नई कएलथि, एतबे बजलनि “ ठिकछई–२ नइ कहब ” । किछुदेर सऽबके पिबैत देख नइ रहलगलन्‍हि, पूछि बैसलथि,“ कते कड़ा होइछै एकर निशा ?” मित्र “ नइ पूछह, झूमा देतौ ” डटके “(मूंह बिचकबइत) हूँह, केहन–२ भाँग–धतूर के त सिधें घोंटि जाइ छियनि त ई कि झूमाओत ?” मित्र “ कहैत छिओ ने , भूलियोकऽ नई पिविहऽ ” डटके “ एहन बात छइ तहन लबही तरे ” लेलथि कोका–कोला; मुश्‍किलसँ आधा बोतल पिने रहथि कि लड़बड़ाईत आवाजमें कहैछथि “ हमरा कान में फहऽहऽहऽ करईया ” एक मित्र “ हौ, ई कोन बिमारी भेल  ” दोसर मित्र “ बिमारी नई, हिनका निशा लागि गेल छन्‍हि ” हौजी एतवा सुनिते आधा बोतल कोका–कोला हाथमें नेने ओङ्घराए लगलथि रोडपर । आबत भेल भीड़, जे तुरत्ते आएल रहथि हूनक एकैटा प्रश्‍न रहन्‍हि– “ कि भ गेल छन्‍हि ” “ निशा लागल छन्‍हि ” “ कि लऽ लेलथि ” “ कोका–कोला ” “ बड़ नौटंकियाह लोक छथि, ओइसँ कोनो निशा लगइ छइ  ” जइन एतबे जवाब धिरे–धिरे जम्‍मा भेल पचासटा लोकसँ सुनलथि तइन ठाढ भऽ क देहपर लागल माटि झाड़ैत बजलथि,“ उबारु सब, झूठे किया बजैजाइत गेले हऽ जे निशा बला चिज छइ से, करा देले ने बेइज्‍जति” । एकटा मित्र “ तों किया चिंता करैत छऽ बेइज्‍जतिके ?, ओकरा करऽ दहक ने जकरा ठाम इज्‍जत छई  ” । “ बोनि निक भेटल” चर्चा करैत सब गोटे पहुँचनऊ डेरामें । आब निर्णय भेल भोजन लेल जएबाक ।बेरा–बेरी भोजन कऽक आएल जाए । २ रुपैयामे भरिपेट भोजन पहिनहिं एकटा होटलमे तय कऽ क एडभान्‍स १० रुपैया जमा सेहो करा चुकल छलहुँ । होटलके नाम कहिकऽ सबसँ पहिने भोजन करबाकलेल पठाओलगेल डटके जलपानकेँ । घन्‍टा दू घन्‍टा, चारि घन्‍टा भऽगेल मूदा डटके जलपान अएलथि नहि । चिन्‍ता सँ बेसी कौतुहुलतावश हुनक तलाशमे सबगोटे निकललहुँ । होटल आगा पहुँचलहुँ त फेर सँ नजर पडल किछु लोकक भीडपर । पहुचिते देखैत छी जे डटकेजलपान आओइ होटल मालिक बीच गर्मागरम बहश भऽरहल अछि । होटल मालिक “हम कोनहुँ किमतपर नईं खुवा सकैत छी” डटके– “अपने मने नई खुएबे, पाई देने छियौ, फोकटमे नईं” बीच बचाव करैत होटल मालिकसँ प्रश्‍न पुछि बसिलहुँ–“की बात ” जबावमे खाना बनाबऽवला महराज बडका हण्‍डाके करछुसँ पिटैत पहुँचल ओतऽ जतऽ हमसब ठाढ छलहुँ । दोकानदार–(खाली हण्‍डा दिस ईशारा करैत)“आब बुमाएल बात” किछुदेरक चुप्‍पीक बाद, फेरसँ हाथ जोडिकऽ बजलथि–“सरकार हम मनुख्‍खक भोजनके बात कएने छलहुँ” हमसब कहलियैन्‍हि–“ई त ऊचीत नई भेल ! हमसब त एडभान्‍स देने छी ” दोकानदार गल्‍लामेसँ १२ टका निकालिकऽ, लगमे आबि हाथमे पकडा देलक आ कानमें धिरेसँ कहैया–“बारह टका देलहुँ, १० टका जे अपने एडभान्‍स देने छलहुँ से आ सुनु–ऊ जे सामनेके होटल अछि(सामनेके होटल दिस ईशारा करैत) ओकरा मालिकसँ बड कसिकऽ दू दिन पहिने हमरा मगडा भेल छल, उपरका जे फाजिल दू टका अछि ओ हमरा तरफसँ घूसभेल, अई आदमिके काल्‍हिसँ ओही होटलमें पठाऊ” दोकानदार सँगे सब मित्रके हँसैत–हँसैत पेट दुखाए लागल । डटकेजलपान अर्थात दिवसलालजीक एक एकटा काजक वर्णन लिखऽमे जौं समुद्रक पानिके मसी बनादेल जाए त भलेही समुद्र सुखा जाए मूदा दिवसलालजीक कारनामा नई लिखा सकत । धन्‍यछथि....दिवसलालजी !

11 1 1 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् अपन अपन माय-परमेश्‍वर कापडि सबके नव नेपाल, समृद्ध आ संघात्‍मक नेपालक सुन्‍दर चित्र बनएबाक बेगरता रहनि । उमटुमाएल त’ बहुतो गोटे रहथि धरि चुनुआ बिछुआ, नामी—गरामी सातटा कलाकारके अपन बुमि ई भार देल गेलनि । भार अबधारि सब एहि निहुछल काजमे लागि जाइत गेला । केओ धर— मुडी, केओ हाथ त’ केओ टाङ्ग, केओ पयर त केओ बाहिँहाथ बनाबऽमे तन्‍मय भ गेलाह । देखिते देरि सब सबआग बना बनाक अनलनि । आहिरेबा । जखनि जे सबके द्धारा बनाएल नेपाल मायक आगके एकठाम जोडिक देखलनि त ओ आकृति कुरुपे नहि विद्रुप आ राक्षसी लगैत छल । ई चित्र देखिते निर्माणक आग्रही संरचनावादी लोक भडकिक आन्‍दोलन पर उतारु भगेल । असलमें ई नरी चित्र भेलै कि नहि सेहे विवादक विषय बनि गेल । भेल कि रहै त जे पयर बनएने रहथि से रहथि माटिक मूर्तिकार आ पएर एहन सुकोमल माने परी रानीक सुन्‍नर पयरसन रहै । माय माये हाइछै । मायक पयर धरती परक लोकक रेहल खेहल आ कर्मठ पयर होएबाक चाही ने से रहबे नहि करए । मुँह जे बनएने रहथि से अमूर्त पेन्‍टिङ्गक रहैक । आँखि किदन त नाक निपत्‍ता । केश दोसरे रङ्गके, पश्‍चिमी कटिङ्गके । फडफरायल ठाढ, किछु लट ओम राएल बेहाल । हाथ धातु मूर्तिकारद्धारा बनाएल रहैक त धर काठ मुर्तिकारद्धारा बनाएल कोकनल, निरस । लगै जेना मेहन जोदर्डो सभ्‍यताक वा पाषणकालक उत्‍खनन कएल गेल हो । तहिना कटि आ ओद्रभाग हिन्‍दी फिल्‍मक आइटम गर्लक कपचि छपटिक ल आएल सनके । बेनङ्गन निर्लज । बात निर्विवाद छलै जे समरसताके अभावमे ई मूर्तिपूर्णे नहि भेलै । गढनिसब बेमेल बानि उबानि । बेलुरा रहैक । असफलता पर पछताबा कोनो कलाकारके नहि रहैक । अहँकारी हेठी सबके मनमे । आब ऐ बात पर घोंघाउज कटाउँज होइत होइत अरारि आ मारि पीट धरिक नौबत आबि गेलै । से केना त जेना एखनि नेपालक क्षेत्रीय मुद्दाक बलिधिङ्गरोक विवाद । काष्‍ठकलाबाला कहथि हपरा के अदुस अधलाह कहत, तेकरा हम बसिलेस पाङ्गि देबै । पेन्‍टर रङ्गकर्मीके अपन हठ हमर सृजनाके चिन्‍ह बुमके एकरा सबके दृष्‍टिए दम नै छन्‍हि । चित्रकारके अपने राग । पाषाणमुर्तिकारक अपने ठक ठक । सब अपन बातके इर बान्‍हि, गिठर पारि अडल जे मायक चित्र हमरे कल्‍पना भावना अनुसार बनए । सह लहके बाते कोन अपना आगूमे सबके सब अदने, निकम्‍मे बुमथि । घोल घमर्थन, गेङ्ग छेंटके वैचारिक दर्शन कहैत सब हुडफेर फेरने घुमए । अपना अपनीके सब तानहिबला, सुनबाला निठाहे नइ । लोकमे सब रङ्गके, सब तौंतके लोक रहैछ ने । ओइमेस एगोटे आगू अएलाह आ थोडथम्‍ह लगबैत कालाकार सहित सबके बम्‍बोधित करैत कहलन्‍हि हमर बात पहिने ध्‍यानस सुनैत जाऊ । बात हम पयरस सुरु करैत छी, मूहँस नहि ।  पहिने पयरेस एहि दुआरे जे हमरासबके सँस्‍कृतिमे सबसँ पहिने पयरे पूजल जाइत अछि । पयरे चलिक केओ अबैत अछि । पयरेपर केओ ठाढ होइत अछि । पयरै लक्ष्‍मी होइत अछि । आगत अतिथिके पयरे पवित्र मानल जाइत अछि । प्रवेशके पयर देव कहल जाइत अछि । माने पयरे प्रथम अछि । कर्मशील भेने बन्‍दनीय आ ई लक्ष्‍मीपात्र अछि । ताहि दुआरे पयरेस चित्रक निर्माण शुरु हुअओ ।

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् आतंकवाद महत्‍वाकांक्षाक खेतमे आकुरण होइत अछि -महेन्‍द्र कुमार मिश्र, पूर्व सांसद महेन्‍द्र कुमार मिश्र पूर्व सांसद आतँक प्राणी जगतमे आदिम प्रत्‍युषा सँ चलैत आवि रहल अछि । प्राणीके अपन अकार, शक्ती आ कार्यक्षमताक कारणे आतँकक परिणम आ प्रकार सभमे विविधता देखल जा सकैत अछि । पुराणादीमे वर्णित देवासुर संग्रामसभ आतँकवादीक श्रृंखलाके महागाथा अछि । महिषासुरक क्रिया कलाप सँ आतँककीत देवतागण शक्तिक आराधनामे लागि नारी द्धारा छल प्रपञ्‍च रचना कऽ ओकरा समाप्‍त कयलगेल प्रसँग दुर्गा सप्‍तशीमे वर्णित अछि । रावणक आतँक समाप्‍त करवालैल राम अनेक जातिक सहयोग ल समाजके मुक्ति देवौलन्‍हि । तहिना कंशक उन्‍माद अती भेलाक पश्‍चात एकटा सामान्‍य गोपाल कृष्‍णक रुपमे अवतरीत भेलाह । कहवी छैक, बीनु बीज वृक्षक आकुरण नहि होइत छैक । अमेरिका के जन्‍मओल सद्दाम आ ओसामावीन लादेन अमेरिका विरुद्ध कियाक आततायी भ प्रगट भेल ? इन्‍दिरा गाँधीद्धारा पालीत सन्‍त जर्नेल सिंह भिण्‍डवाल इन्‍दिराकै प्राणे ल लेलक । ओसामावीन आ ओमार आजुक युगक विश्‍वके सर्वाधिक शक्ति सम्‍पन्‍न अमैरिकाक निन्‍न आ भूख उडादेने अछि । आतँकवाद कहियो महत्‍वाकाँक्षाक खेतमे अंकुरण होइत अछि आ अन्‍याय अत्‍याचार, शोषण आ दमनक वर्षामै वढैत या त ताही श्रृंखलाके तोडैत अछि कि त अपने समाप्‍त भ जाइत अछि । संसारक आतंकके इतिहास व्‍याह परिणम देखवैत अछि । हिंसामे प्रतिहिंसा जकां आतंकवादी सभ मात्र अपने हत्‍या हिंसा, लुटपाट आ अगिलग्‍गी नहि करैत छैक दोसर पक्षके सेहो ओहने काज करवालेल वाध्‍य करवैत अछि । संसारक द्धन्‍दरत पक्षके गहींर सं अध्‍ययन, मनन कयला उपरान्‍त एकरा सभहक क्रिया कलापक परिनती याह प्रमाणित होइत अछि । आतंक शब्‍द सं कोनो हैजाक प्रकोप आ कठोर अत्‍याचार आदिसं उत्‍पन्‍न होव बला भयके वोध करवैत अछि । आतंकमे वाद जोडिदेलाक बाद  एकर अर्थ मनुष्‍यकै डेरा क धमका क या त्रास श्रृजना क क हिंसात्‍मक विद्रोहक रुपमे अपन प्रभुत्‍व स्‍थापित क काज सिद्ध करवाक विचार आ सिद्धान्‍त बुझना जाइत अछि । दोसरके सम्‍पति लुटव, घरमे आगि लगाएव, पर स्‍त्रीसंग बलात्‍कार करब, समाजमे उत्‍पाद मचाएव एहन दुष्‍कर्मीकै दुराचारी कहल जाइत अछि । तानाशाही चाहे जेकर होउक, जर्जबुशक हौउक वा मुसर्रफकै एकरा कौनो दृष्‍टिए नीक नहि मानल जायत । कानो राष्‍टक तानाशाही आ दादागिरीके एक न एक दिन विनाश होयबेटा करैत अछि । आव ओ युग नहि रहिगेल जे लोक बुझौक परमेश्‍वरक अनुकम्‍पासं गर्भ धारण भैल, ई लौक मान लेल तैयार नहि रहिगेल । ककरोलेल तोपक सलामी आ केओ लाठी,बुट आ गरमे गोली खाई, आजुक मानव समाजक चैतना एकरा सह लेल तैयार नहि अछि । विश्‍वक कोनो ठाम जे विद्रोह भेलैक तकर समाधान करवाक काजक दायित्‍व वाहक अपना आपके विशिष्‍ट नहि समान्‍यस्‍तरक खण्‍डमे राखय तखने ई समस्‍याक समाधान भ सकैत अछि । २००७ साल सं पालीत, पोषित आ वढैत आएल समाजिक विद्रोहक स्‍तरके माओवादी लगायत तथाकथित प्रजातन्‍त्रवादी दलसब तराई समस्‍याकै जाइन बुझि क अखनो कार्यान्‍वयन पक्षकै कमजोर बनाविक रखने अछि । पिडीत पक्ष अखनो विश्‍वस्‍त भ नहि पाविरहल अछि । नेपालक सन्‍दर्भमै माओवादी १० वर्षधरि हथियार उठा जनविद्रौह कएलो उपरान्‍त सबपक्षके समेट नहि सकल । संगही आन पार्टी सैहो पिडीत,उत्‍पीडीत,राज्‍यक संरचना सं दर रह बला वर्गक प्रति इमान्‍दार नहि रहल त दौसर विद्रोहक सम्‍भावना अवश्‍सम्‍भावी अछि । विद्रोहक अनेक शैलीआ पद्यती मध्‍ये कम सं कम जनआतंक आ जनधनक क्षति होइक एहने शैली एवं आचरण मात्र विश्‍मे अनादिकालसं समाजिक मान्‍यता वपैत अछि । समाजिक रुपानतरण हथियार नहि विचार सं कायल जाइक तखने टिकाउ भ सकैत अछि । आसुरी ताल या वृति एकटा स्‍वभाविक कमजोरी अछि । सहिष्‍णुता संस्‍कारक उदात्तीकरण अछि । मनोविज्ञान याह तथ्‍यके मान्‍यता दैत छैक जकर प्रशस्‍त प्रमाणसब छैक । ३० वर्षे पञ्‍चायती शासन स्‍वैच्‍छाचारी, हुकुमी, निरंकुश सामन्‍ती प्रवृतिक छलेैक त २०४६ सालक जनआन्‍दोलन व्‍यावस्‍थामे परिवर्तन लौलक तथापि प्रवृतिमे कोनो परिवर्तन नहि दैखलगेल । पूर्व राजा ज्ञानेन्‍द्रद्धारा फैर सं व्‍याह शासन प्रणालीके पुनरावृति कर चाहलक मुदा सफल नहि भ सकल । ज्ञानेन्‍द्रक महत्‍वाकांक्षा बढैतगेल जकर फलस्‍वरुप देशक जनता गणतन्‍त्रोन्‍मुख होइत आई दैशमे गणतन्‍त्र स्‍थापना भ गेल अछि । आव जौ कोनो प्रकारक वाधा व्‍यवधान उत्‍पन्‍न करबाक कोशिश कायलगेल त विद्रोह बढवेटा करत । संविधानसभा मूद्दा नहि समाधाने मूद्दा अछि । संविधान सभाक विर्वाचन पश्‍चात मधैशक साथ कोनो दल धोखा देवाक धृष्‍टता करत त परिणाम अनिष्‍टकारी हायत । राष्‍ट दोसर दूगिर्तकै आमन्‍त्रण करत । मधेशक जनता अखनधरि उपेक्षित, उत्‍पीडित रहल, समान अधिकार आ समान पहिचानकलेल लालाइत रहल मधेशक मूद्दापर यदि राजनीति करबाक धृष्‍टता करत त स्‍वाभिमानी मधेशी जनता फेर विद्रोहमे उतरत, मधेशी जनता मधेशवादी अछि, मात्र मधेशवादी गणतन्‍त्रवादी नहि । गणतन्‍त्रवादी कहि जनता भोंट नहि देलक आइ किछु नेता कहैत छथि, “हामी गणतन्‍त्रवादी हौं” हुनका “हामी मधेशवादी” कह मे लाज किएक ? आबक संविधान जनआन्‍दोलन २०६२।०६३ तथा मधेश आन्‍दोलनद्धारा प्राप्‍त जनाधिकारक सन्‍दर्भमै एकटा एहन संविधानक आवश्‍यकता छैक जाहि संविधानक माध्‍यम सं नेपालक जनता सही अर्थमै समावेशी लोकतन्‍त्र, प्रतिस्‍पर्धात्‍मक बहूदलि, बहूभाषिक, बहूसांस्‍कृतिक स्‍वरुपक संगहि सम्‍बन्‍धित अधिकार सबहक उपभोग क सकय । एकरा संगही एहि दैशमे सयकडो वर्ष सं शोषित रहल मधेशी समुदाय, दलित, अल्‍पसंख्‍यक, आदिवासी एवं जनजाती आव निर्माण हौव बला नयां संविधानद्धारा एकटा कण्‍ठारहित समुन्‍नत, समावेशी आ विकाशशील समाजक निर्माण भ सकै आ तकर यथार्थ अनुभूति अनुभव जनता क सकय ।

11 1 1 काशीकान्त मिश्र "मधुप" 1906-1987 ’राधाविरह’ (महाकाव्य) पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त मैथिलीक प्रशस्त कवि आ मैथिलीक प्रचार-प्रसारक समर्पित कार्यकर्ता ’झंकार’ कवितासँ क्रान्ति गीतक आह्वान कएलनि । प्रकृति प्रेमक विलक्षण कवि । ’घसल अठन्नी कविताक लेल कथ्य आ शिल्प-संवेदना—दुहू स्तर पर चरम लोकप्रियता भेटलनि। मधुप जीक कवितामय चिट्ठी (अप्रकाशित पद्य-डॉ.पालन झाक सौजन्यसँ) चि. श्री चन्द्रकान्त मिश्र शुभाशीर्वाद पाबि अहाँकेँ कुशल थिकहुँ सह्लाद गामहुमे परिवार अपन आनन्द अहींक हेतु छल चिन्तित चित्त अनन्त। घेंट-पेट ओ तैठ पेटसँ हीन उदय रहए अछि मनहि मन किछु खिन्न। मंगलमय श्री मंगल झा सूरधाम काशीवासी ’तजि वनता’ आराम। अहूँ हुनक सेवामे मेवा छी चखैत छी तहिठाम जतए केओ नहि अछि झखैत। (चन्द्रकान्त मिश्र-मधुप जीक छोट भाइ उदय- चन्द्रकान्त मिश्रक बालक चन्द्रकान्त मिश्रक विवाह मंगलदत्त झा, गाम हरौलीक कन्यासँ। मंगल झाक काशी प्रवासमे लिखल पत्र, सूर्यक उत्तरायणमे गेलापर मृत्युक वरण, संगमे उदय आऽ मंगल झाक पौत्र श्री प्रद्युम्न कुमार झा सेहो संगमे रहथि।) Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ' आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

33 3 3 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकें सजिल्द 

मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास

डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00  राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00 पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 225.00 स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.200.00 अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.180.00

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.125.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 180.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 बडक़ू चाचा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कविता-संग्रह

या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00 जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 300.00 कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 225.00 लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.190.00 लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00 दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00 कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00 मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00 संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00 दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष 2000 मूल्य रु. 40.00 सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 165.00 पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15% और उससे ज्यादा की किताबों पर 20% की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी । अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/- चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू। बया, हिन्दी छमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन ” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 70.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 90.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00

शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन

अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 मोबाइल नं.9868380797, 9891245023 ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in, antika.prakashan@antika-prakashan.com http://www.antika-prakashan.com (विज्ञापन)

11 1 1 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् श्रुति प्रकाशनसँ १.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन २.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह ३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन ४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव ५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर ६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर ७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल ८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता” ९/१०/११ १.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा) श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८ Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन)

11 1 1 अंकुर काशी नाथ झा,गाम-कोइलख, जिला-मधुबनी,   मिथिलांचल सरकारी योजना माथ पर लेने जारैनक पथिया, घुमि रहल छै, कलमें गाछीये एकटा बुढ़िया । सब कहै छै ओ हरजिन छै, सरकार ओकरा देने संरक्षण छै, महिला वला सेहो ओकरा आरक्षण छै, तइयो अभगली के गंजन छै। सरकार के ओकर जाति पर बहुत छै ध्यान, ओकरा लेल घर बेनबाक सेहो छै प्रावधान, अन्न आ कपड़ा में वैह सब छै प्रधान, तइयो ओ खाइ लेल छै पेरशान। इंदिरा आवास आ अन्नपूर्णा के योजना एलै, बुढ़िया के ई सब भेटब सपना भेलै, नेता सब के अन्न भेटलै, घर बनलै, सरकार बुझलकै गरीबक कल्याण भेलै। एक बेर फेर ओ योजना सऽ वंचित रहि गेलै, पूछलीयै जे ओकरा कियैक नहि भेटलै, मुखिया जी कहलैन, जगह कम आ बेसी भीड़ छै, मुदा सत्त बात तऽ काका कहला, बेचारी बुढ़िया शरिफ छै॥ Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

22 2 2 सुभाष साह, गाम-अरनाहा, जिला सरलाही, नेपाल। वर्तमानमे लंदन मेट्रोपोलिटन विश्वविद्यालयसँ बी.बी.ए.कए रहल छथि। सामाजिक कार्य, मैथिलक जुटान, सांस्क्र्तिक कार्यक्रम संचालनमे विशेष रुचि। यू.के. केर मधेसीक संगठनANMUK केर सक्रिय सदस्य आ सम्प्रति सचिव। नेतृत्व क्षमताक गुण संगहि प्रखर वक्ता। लन्दनमे नेपाल मेला २००८ (लन्दनसँ श्री सुभाष शाहक रिपोर्ट) लन्दन शहरमे पिकाडिली सर्कस  नामक स्थान पर नेपाल एमबैशीक सहायता सऽ २१ आऽ २२ सितम्बर २००८ कऽ अहि मेलाक आयोजन कैल गेल छल जाहिमे नेपाल के पर्यटन मंत्री आदरणीया सुश्री हिशिला यामी नेपालक राजदूत श्री मुरारी राज शर्मा खैतान ग्रुपके चेयरमैन एवम्‌ मैनेजिंग प्रेसिडेंट श्री राजेन्द्र खैतान आदि सहित अन्य दिग्गज सब उपस्थित छलैथ।अतऽ इहो घोषणा कैल गेल जे साल  २०११ के पर्यटन वर्षक रूपमे मनाओल जायत। सुश्री यामी सऽ हम सब अहू बात पर विचारविमर्श केलहुं जे 'लुम्बिनी' के पर्यटक सबलेल बेसी आकर्षक बनाबऽ लेल की कैल जा सकैत अछि।यामीजी अहि बात लेल प्रतिबद्ध भेली जे ओ सीता मैया एवम्‌ बुद्धदेवक इतिहास सऽ सम्बन्धित स्थानके विकासमे यथाशक्ति योगदान देती। श्री नवीन कुमार एवम्‌ सुश्री सुनीता शाह द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक परिधानक फैशन शो अत्यन्त सफल रहल।हमरा सब अन्मुक (ANMUK- Association of Nepali Madheshis in UK) के सदस्य सबलेल अहि आयोजनक सफलता बहुत पैघ प्रोत्साहन अछि। (आभार - अन्मुक के वेबसाएट जाहि सऽ फोटो प्राप्त भेल ) Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

22 2 2 चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान। प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित। भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति। बनैत बिगड़ैत “हाह। हाह”। टोकारा आ थपड़ी सँ नै उड़ै छै तऽ माला कार कौवा केँ सरापय लागै छै – “बज्जर खसौ, भागबो ने करै छै”। कौवा कखनियें सँ ने काँव-काँव के टाहि लगेने छै। कौवाक टाहि सँ मालाक कलेजा धक सिन उठै छै। संतान सब परदेस रहै छै। नै जानि ककरा की भेलै! ने चिट्ठी-पतरी दै छै, ने कहियो खोज-पुछारि करै छै। कते दिन भऽ गेलै। कुशल समाचार लय जी औनाइत रहै छै। लेकिन ओकरा सब लेखे धन सन। माय-बाप मरलै की जीलै तै सँ कोनो मतलब नै। “हे भगवान, तूहीं रच्छा करिहक। हाह। हाह”।– माला कौवा संगे मनक शंका आ बलाय भगाबय चाहै छै। “धू, छोड़ू ने। कथी मे लागल छी। ओ अपन बेगरतेँ कर्रइत छै। अहाँक की लइए’- सत्तो बुझबै छै। लेकिन मालाक मन नै मानै छै। अनिष्टक आशंका सँ डरायल ओ और जोर-जोर सँ होहकारा दै छै आ थपड़ी पाड़ै छै। माला सब बेर एहिना करै छै। सत्तो लाख बुझेलक, बात भीतर जाइते नै छै। कतेक मामला मे तऽ सत्तो टोकितो नै छै। कोय परदेस जाय लागल तऽ माला लोटा मे पानि भरि देहरी पर राखि देलक। जाइ काल कोय छीक देलक तऽ गेनिहार केँ कनी काल रोकने रहल। अइ सब सँ माला केँ संतोख होइ छै, तैं सत्तो नै टोकै छै। ओकरा होइ छै टोकला सँ की फैदा? ई सब तऽ मालाक खून मे मिल गेल छै। संस्कार बनि गेल छै। सत्तो केँ छगुन्ता होइ छै। यैह माला कहियो अपन बेटा-पुतौह आ पोती सँ तंग भऽ कऽ चाहैत रहै जे ओ सब कखैन ने चैल जाय। रटना लागल रहै जे मोटरी नीक, बच्चा नै नीक। सैह माला अखैन संतान खातिर कते चिंतित छै। सत्तो सोचै अय अइ मे मालाक गलती नै छै। माला केँ सख लागले रैह गेलै जे नेहाय कऽ आयल छी तऽ पुतौह परैस कऽ खाइ ले देत आकि कहियो केशे झाड़ि देत या गोड़े हाथ दाबि देत। पोती केँ टांगैत-टांगैत तऽ छातीक हाड़ दुखाइत रहै। अपन कोखिक जनमल बेटो कहियो ई नै पुछलकै- माय केना छें ? कौवा उड़बै ले माला कखनो हाथ चमकाबैत अछि, कखनो मुँह चमकाबैत अछि। मगर ओकर धमकी-चमकी के कौवा पर कोनो असर नै भेलै। ओ ओहिना काँव-काँव करिते छै। कौवाक टाहि सँ सत्तोक जी सेहो धक रहि जाइ छै। मन मे तरह-तरह के शंका आ डर पैस जाइ छै। लेकिन ओ कहुना अपना केँ बुझा लैत अछि। सत्तो संगे ई सब बेर होइ छै। कोनो अपसगुन भेला पर आशंकित भऽ जाइत अछि। आशंका केँ बुधि आ तर्क सँ ठेल कऽ बाहर करैक कोशिश करैत अछि। कखनो संस्कारक फान मे लटपटाइत अछि। कखनो सम्हरैत अछि। फेर फँसैत अछि। फेर छुटैत अछि। ई सब बड़ी काल चलैत रहै छै। कार कौवा तेना एकपरतार टाहि लगेने जा रहल छै जे कान में झड़ पड़य लागलै। “देखियौ, ई कौवा तऽ केना-केना ने करै छै। नीक नै लागैए”।– माला व्याकुल भऽ जाइ छै। “ई अहाँक मनक भरम छी”।– सत्तो कहै छै आ एकटा रोड़ी जुमा कऽ कौवा दिस फेकै छै। कौवा उड़ि गेलै। उड़ल जाइत कौवा केँ सुना कऽ माला कहै छै- “हम ककरो कुइछ नै बिगाड़लिऐ अय। जा, चैल जा”। कौवा आगू वला छत पर बैठ रहै छै आ फेर कर्रय लागै छै। सत्तो केँ मोन पड़ै छै एक दिन बड़ी राति केँ माला ओकरा जगेलकै- “सुनै छिऐ? कुत्ता बड़ी काल सँ कानै छै। हमर जी छन-छन करैत अछि”। सत्तो अकानलक। ठीके ढेरी कुत्ता कानैत रहै। आशंका सँ ओकरो मन सिहरि गेलै। लेकिन ओ बाजल- “अरे, भूख सँ कानैत हेतै। देखै नै छिऐ आइ काल्हि कोय एक्को कर दै छै। “भूख सँ एगो दूगो ने कानितिऐ, आकि सब कानितिऐ”?- सत्तोक तर्क मानै ले माला तैयार नै रहै। “और सब केँ देखाउँस लागल हेतै”।– सत्तो दोसर तर्क देलकै। माला केँ सतोक तर्क नै सोहेलै। ओकरा झुझुआयल सन चुप बैठल देख सत्तो फेर बुझेलकै- “देखै नै छिऐ विदाइ बेर मे की होइ छै। जहाँ एगो मौगी कानल कि सभक आँखि मे नोर आबि गेल”। माला कने काल चुप रहल। फेर मूल बात पकड़ैत बाजल- “पहिने तऽ सब करे कर दैत रहै तबो किए कानैत रहै”? “कोनो कुत्ते मैर गेल हेतै, तकरे सोग मे कानैत हैत”। - सत्तोक बात सँ माला संतुष्ट तऽ नै भेल, मगर कुत्तो सब कते कनितय। एगो चुप भेल। दूगो चुप भेल। आस्ते-आस्ते कानब घटैत गेलै। फेर गोटेक आध कुत्ताक कानब कखनो कऽ सुनाइ। बाद मे ओहो बन्न भऽ गेलै। माला आ सत्तो सेहो कखनो निन्न पड़ि गेल। माला केँ कौवाक गुनधुन मे पड़ल देख सत्तो पुछै छै- “अहाँ कौवाक बोली बुझै छिऐ”? माला कने काल बात केँ ताड़ैत रहल। बातक मरम बूझि खुखुवा उठल- “दुनियांक काबिल अहीं टा तऽ छी। अहाँ सन बुझक्कड़ और कोय छै”! मालाक कटाह बोल सँ सत्तो केँ चोट लागलै। ओ चुप आ उदास भऽ गेल। ओकरा लागलै जे चीज पसिन नै पड़ै छै, तकरा प्रति लोग निष्ठुर आ अन्यायी भऽ जाइत अछि। कारी रंग आ टाँस आवाजक चलते कौवा केँ अशुभ बना देलक। सत्तो केँ अपन नौ मासक पोती मोन पड़ै छै- मुनियां। कौवा देख मुनियां चहैक उठै। आह-आह कहि ओकरा बोलाबै। मुनियां कानय लागै तऽ सत्तो कौवे केँ हाक दै- “कोने गेलही रे कौवा ऽ ऽ? मुनियाक कौवा ऽ ऽ ? कोने गेलही ई ई “? ई सुनिते मुनियां चुप भऽ जाइ आ मूड़ी घुमा-घुमा कौवा केँ ताकय लागै। कौवा बिलायल जाइ छै। कुइछ दिनक बाद तऽ साफे अलोपित भऽ जेतै। अखैन ई बात ने माला जानै छै, ने मुनियां। कौवा मुनियांक जिनगी मे समा गेल छै। मुनियां केँ बेर-बेर कौवा मोन पड़ैत रहतै, दादा मोन पड़ैत रहतै। ने ओ कौवा केँ बिसैर सकैत अछि, ने दादा केँ। मुनियां कौवा केँ ताकैत रहत, दादा केँ ताकैत रहत। कहियो ने कौवा रहतै, ने दादा रहतै। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

33 3 3 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् श्री बैकुण्ठ झा,पिता-स्वर्गीय रामचन्द्र झा, जन्म-२४ - ०७ - १९५४ (ग्राम-भरवाड़ा, जिला-दरभंगा),शिक्षा-स्नात्कोत्तर (अर्थशास्त्र),पेशा-  शिक्षक। मैथिली, हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषा मे लगभग २०० गीत कऽ रचना। गोनू झा पर आधारित नाटक ''हास्यशिरोमणि गोनू झा तथा अन्य कहानी कऽ  लेखन। अहि के अलावा हिन्दी मे लगभग १५ उपन्यास तथा कहानी के लेखन। धोखा (१७.०९.९१) दुनियाँ तँ ई धोखा अछि उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम ऊगि रहल पनिसोखा अछि। दुनियाँ... कौआ कर्र-कर्र करकराय रहल, आँगनमे धान सुखाय रहल। पेपर रेडियो टी.वी.पर नेतहुँ तँ शोर मचाय रहल। हो जिन्दा मुर्दा गाय-महीश वृद्धा-पेंशन हो या खरात- हर ठाम कमीशन खाय रहल, हँसि-हँसि कय गाल बजाय रहल। आजुक युग के ई शोभा अछि, ई मान बराईक नोभा अछि। दुनियाँ.. दुनियाँमे अछि सब चोर-चोर, जकरा हिस्सा नईं भेंटि रहल- मचबै सगरो तऽ वैह शोर। काटय केउ सेन्ह अन्हरियामे, लूटय तऽ केउ इजोरियामे केउ ठूसय हीरा वोरियामे बन्दूक बनैत अछि गोहियामे अछि सबहक सरदार सिपाही ऊठय निश्चिन्त ओढ़ढ़ियामे ईमान जतय घर टाटक अछि ई महल अटारी पापक अछि दुनियाँ तँ ई धोखा अछि पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण ऊगि रहल पनिसोखा। (१६.०९.९१) लिखलौं कतेक पत्र कर जोरि जोरि कऽ बूझब ओ छल नोरक जगहकेँ छोड़ि-छोड़ि कऽ लिखलौं... झहरै तऽ बूँद सावनमे, खुब झूमि-झूमि कऽ बरसै तऽ नोर नित, कपोल चूमि-चूमि कऽ लिखलौं... मुरझाय बन तराग बाग तऽ ओ गृष्ममे, पावस उमंग घोरि रहल, आईपवनमे, लिखईत छी पाँति हम, ई कलम बोरि-बोरि कऽ। लिखलौं कतेक... भेटत नम बूँद फेर, जखन हिम जे पिघलि जैत, आओत कोना ओ बाढ़ि औ! सरिता सेहो सुखैत ई लिखि रहल छी आई, आँखि फोड़ि-फोड़ि कऽ। लिखलौं कतेक... तोरि-गेरि-तोरि कऽ मुहब्बतमे तऽ तरपब भाग्यमे लिखला प्रभुसबके रही जौं दूर प्रियतमसँ सजाये मौत त ओ थिक। रही...२ यक्षक विरह छल वर्षकेँ जनलक जगत सगरो- जहाँ वर्षो विरह के बात छै- वनवास त ओ थिक। जहाँ...२ ई उपवन ओ शिखा पर्वत आ कल-कल बहि रहल सरिता अगर अली अछि नज उपवनमे त सुन्दरता कतय ओ थिक। मुहब्बत... चितवन हो यदि चंचल आ तन यौवनसँ हो भारी मगर पावसमे पहु परदेश हो यौवन कहाँ ओ थिक। मुहब्बत... परदेश रुन-झुन बाजय पायल हमर फूजल बान्हल केश औ मोर पाहुन धेलहुँ योगिन वेश। डाढ़ि-डाढ़िपर फुद-फुद्दी सभ फुदकि रहल, खढ़-खढ़केँ समटि बनौने केहन महल करै परिश्रम मिल कय दुनू नईं छन्हि कोनो क्लेश।औ.. बिजुलीसँ चमकै घर, मुदा अन्हरिया यौ। टिम-टिम दीप करै छै ओतय अन्हरिया औ दिन गनैत छी बीति रहल अछि राति कहाँ अछि शेष औ... सीता शक्ति राम सौम्य जग-प्राण बनल। पौलनि जगमे नाम घूमि जंगल-जंगल॥ महल त्यागि वनवाश गेलन्हि बना तपस्विन वेश! औ मोर... जतबय दुःख हम कहब अहाँ ततबै बुझबै नहिं पहुँचत जौं पत्र अहाँ नहिंये जनबै जड़तै तेल कोना नईं घरमे पहु जकर परदेश। औ मोर... (२०.१०.९१) रहि-रहि आँचर उड़ि जाय किया अहाँ आँचर समटि लजई किया। रहि-रहि.. देखि बागमे सुमन व्यवहार करू, उठा निज नयनकेँ चारि करू, अली हर कलीसँ फुस-फुसाय किया। रहि रहि.. चमन छी अहाँ खिलि रहल अय सुमन। लटसँ लिपटि घूमि चूमन पवन पड़य जतय नजरि लिपटि जाय किया! रहि रहि... भार सहय कोना करि केहरि अहाँक राग माधुरी सुनाबय पायल के झनक देखि अहाँ के हिरदय जुराय किया। रहि रहि आँचर.. परदेश गेलहुँ हमरो छोड़लहुँ,  छोड़लहुँ माय के छोड़ि देलहुँ घरद्वार परदेश गेलहुँ… सोनू-मोनू झगड़ा कय-कय हमरो माथ भुकाय रहल बहिकिरनी तऽ नईं अछि घरमे, कहू करत के हमर टहल? बौआ सब बौआय रहल अछि, पढ़तै कथी कपार! परदेश गेलहुँ.. जन-वन किल्लौल करै छै, कोना जेबै हम दरबज्जा बौआ दौड़ल छल सड़कपर, गेलहुँ रोटी भेल भुज्जा माय छथि बूढ़, छी एसगर घरमे कोना उठत ई भार! परदेश गेलउँ। हमरो... अहाँ जनै छी लोक केहन अछि, के कऽ देतै हाट-बजार, साल-साल त बाढ़ि अबै छै,उजरै छै सबके संसार, हेतै समुद्र आँगन-घर सगरो,के कउ देतै पार! परदेश गेलउँ। हमरो छोड़लौ...

44 4 4 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् बी.के कर्ण(1963-),पिता श्री निर्भय नारायण दास गाम- बलौर, भाया- मनीगाछी, जिला-दरभंगा। पैकेजिंग टेक्नोलोजीमे स्नातकोत्तर आऽ यू.एन.डी.पी. जर्मनी आऽ इग्लैण्डक कार्यक्रमक फेलोशिप, २२ वर्षक पेशेवर अनुभव आऽ २७ टा पत्र प्रकाशित। डायगनोस्टिक मिथिला पेंटिंग आऽ मिथिलाक सामाजिक-आर्थिक समस्यापर चिन्तन। सम्प्रति इन्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ पैकेजिंग, हैदराबादमे उपनिदेशक (क्षेत्रीय प्रमुख)। स‍ंकट गुणक (रिस्क फैक्टर) आऽ मैथिल मिथिलाक विकास क़ेना आऽ कखन विकासक बिना जिनगी बड कठिन। विकासक रस्ता बड उबड  ख़ाबड । संघर्ष सदिखन। डेग डेगपर। बिना संघर्षक विकासो संभव नहि। सर्वांगीन विकासक हेतु़ व्यक्तिगत विकासे आधार होइछ । बहुत किछु गमेलहुँ मुदा आब नहि। मैथिल युवा मोर्चा तैयार भए रहल अछि। विकसित वा अविकसितक बिच-बिचवामे छी।एतवा तॅ तए अछि जे आर्थिक विकासक लेल सुर सार भए रहल अछि। आर्थिक विकास एकटा गति होइछ जे कखनो कम वा बेशी। आर्थिक उपार्जनक लेल़ हम सब सकारात्मक प्रयासमे सुतल छी। जहिया उठब़ तहिया सिंह जकां दहारब वा सांप जकां फूफकारब। जय श्री हनुमानजी एक समयमे अपन शक्ति बिसरि गेल छलाह, तहिना हम सब मैथिल अपन शक्ति बिसरौने छी। बहुतो मैथिल प्रवाशी जीवनमे़ अपन आर्थिक सक्षमता मे वृद्धि केलाह, परञ्च हुनक धिया पूता मिथिला मैथिल सॅं कोसो दुर !!! पैघ संकट। ग्रेट रिस्क!!! मैथिलक सम्मान मैथिली थीक आओर एकर अपमान मैथिले कऽ रहल छथि। अपने परिवारमे मैथिलीपर मतांतर। मैथिली घरेमे टूअर। मैथिल पलायनसॅं मैथिलीक आकस्मिक अन्त। केऽ विलाप कडत। पलायन दुइ स्थितिमे- १. जीवन भरण पोषणक लेल २. व्यक्तिगत उद्देश्यक पूर्तिक लेल मिथिलामे की कमी डेग डेग पर पोखरि घर घरमे पतरा-पोथी। गाम गाममे जाति पॉति छोटका पॉति लैऽ कऽ एके परिवारमे शानक घमासान। मैथिली संकटमे, आवश्यकत अछि कोमल स्पर्शक। कतेको बेर बिहार सरकार द्वारा मैथिली भाषापर सीधा प्रहार भेल। परम दुखक बात ई अछि जे किछु मैथिल मैथिलीकेँ तोड़यमे लागल रहल छथि। परञ्च चिंताक कोनो बात नहि़। मैथिली अछि अटल़-अविचल। मैथिलीक जड़ बड़ मजगूत। हम मैथिलसब अपन मौलिक कर्तव्य बूझि आऽ अपन भाषा सॅं अथाह लगन लगावी। बंगाली-पंजाबी-मराठी केँ देखु जे अपन मातृभाषाक प्राणोंसॅं ऊपर स्थान देने छथि। एतबाऽ नहि हर मंचपर अपन भाषाक प्रति स्नेह तथा सम्मान कन्निको कट्टौती नहि करैत छथि। परञ्च़ हम मैथिल कतेक निष्ठा रखैत छी। एहन किछुए मैथिलके देखल जा सकैछ। बंगालमे बंगाली, पंजाबमे पंजाबी। एहिना बहुतो प्रादेशिक राज्यमे़ अपन-अपन भाषाकेँ अपन जीऽ जान सॅं पैध लगाव रखने छथि। बंगालीक भाषा बंगाली पंजाबीक भाषा पंजाबी मराठीक भाषा मराठी बिहारीक भाषा की? हिन्दी़-भोजपुरी आऽ मैथिली हिन्दी़ तॅं राष्ट्रभाषाक अस्तित्वमे अछि। भोजपुरी काफी लोकप्रियता हासिल कय रहल अछि। भोजपुरी सिनेमा उद्योगकेँ काफी सफलता भेटल। मुदा  मैथिलीक स्थिति बिहारमे केहन अछि से की कहल जा्‌इछ। मैथिलीक स्थिति मिथिलामे बड़ कमजोर। गैरमैथिल बिहारी कतेक प्रतिशत मैथिलीक इज्जत करैत छी।अनुमानित प्रतिशत बड़ कम होयत। मैथिल अपनाकेँ गोद लेल मैथिल जेकाँ आचरित कहिआ धरि करताह? मैथिली सशक्त भाषा अछि। एकर अपन इतिहास अछि। परञ्च हम सब मैथिली बाजय वालाकेँ आऽ लिखय वालाकेँ पिछड़ल बुझैत छी।अनेक भाषा सीखू़ बाजू़ मुदा मैथिलीकेँ छोड़ि कऽ नहि। मैथिलीकेँ बोझ नहि बुझियौक। मैथिल जे कहियो मैथिली छोड़ि लन्हि़  ओ मानसिक रूपसं गरीब भए गेलाह।   आर्थिक विकास भेलाक तदुपरान्तों अपन मनसॅं बहुत गरीब। अमेरिकामे जे भारतीय मुलक स्थिति पर जे एकटा अमेरिकन पत्रकार अध्ययन केलाह जरूर देखल जाए। Family Ties and the Entanglements of Caste http://www.nytimes.com/2004/10/24/nyregion/24caste.html अमेरिकन क़ी मिथिलामे रहि सकैत अछि नहि़ कथमपि नहि़। की अमेरिकन आ कोनो विकसित देश व राज्य के एकोटा लोग अपन मैथिली भाषा अपनायत़ नहि़ कथमपि नहि़। बेसी मैथिले भेटताह जे़ मिथिला आ मैथिली छोड़ि ताहिमे सबसॅं आगू । मैथिल मिथिलाक सीमाक बाहर बड मेहनती परञ्च मिथिलाक सीमाक अन्दर बड आलसी। मेहनती मैथिल कतौऽ रहथि धाक जमौने छथि परञ्च मैथिली पर जेना मतसुन। एको रति रू चि नहि रखैत छथि, हुनकर धिया पुताक बाते छोड़ु। गिर्यसन जकॉं खोजी़ एहि पर अलग विचार रखैत छथि। मैथिलीके बोझ बुझय वाला मैथिल सोचि विचारमे बड़ गरीब। गरीबी झेलबाक मानसिकता मैथिल मे कियाक बेसी। मिथिलामे मौलिक सुख सुविधाक कमी कोन कारणे। बहूतो कारण भए सकैछ। गरीबीमे ककरा नेऽ इ कष्ट झेल्‌ऽ पऽडै़त। मैथिल मेहनती तॅं मिथिलामे गरीबी कियाक गरीबी झेलबाक मानसिकता कियाक !!!ग्रेट रिस्क !!! कतेक मैथिल कहताह जे भाग्यक लिखल कष्ट अछि। एहि प्रश्नक जबाब खोजि रहल छी जे पॉंच करोड़क मैथिलक एके रंग भाग्य कियाक। गरीबीक झेलबाक मानसिकता कतेक दिन तक। हम मैथिल सब वाक विवादमे बड प्रखंड छी। हरएक बातपर अपनाक अनुभवी प्रमाण दैत छी। मनसॅं वाक पटूतामे धनी। जीवनक मौलिक आवश्यकताक पूर्तिकक लेल हम सब मैथिल बड़ गरीब। गरीब मानसिकता गरीबी झेलबाक लेल सदिखन तैयार। स्वस्थ नेताविहीन मैथिल समाज अपन मौलिक हक सॅं दूर कोसो दूर अछि। जड़ जड़ हालतमे मैथिल समाज अपन देशक आजादीक बाद मिथिलामे आधारभूत ढॉंचाक शूरूआतोऽ तॅं नहि भेल। खकरा कहबैऽ केऽ सूनत के सुधि लेत। रिस्क आ मैथिल मुद्दा व्यवसाय विकसित देश वा विकसित राज्यक पाछु यदि सुक्ष्म रूपसॅं देखु तॅं भेटत जे ओहि क्षेत्रक व्यवसाय विकासक मुल कारण अछि। मिथिलामे विद्वान वा ज्ञानी मैथिलक कमी नहि। व्यापारी वर्ग नोइसो बराबरि नहि। मैथिल व्यापारो करताह ? सिन्धी़ माड़वारी आ पंजाबी समाज मिथिलामे अपन व्यवसायमे मैथिल जकॉं संस्कार अपनोने के साथ केवल ५० सालमे बढ़िया धाक जमा लेलाह, परन्तु हम मैथिल जे छी जे डींग हकैसॅं फुर्सतेऽ नहि भेट रहल अछि। मैथिल मिथिलामे की करताह ? मिथिलामे किछु मैथिलके देखबाऽ मे आयत जे़ मिथिलाक सिन्धी़ माड़वारी आ पंजाबी के व्यवसायमे नौकरी करताह। हिन्दी अखबार मॉंगि कए पढ़ताह़ परञ्च मिथिलाक विद्वान वा ज्ञानी अखबार प्रिन्ट आ बाजार मे आनबाक जोखिम नहि ऊठैऽताह। मिथिलामे चाहक दुकान पर प्रतिदिनक दिनचर्यामे लालु के लालूवाणी पर अखण्ड बहस करताह। मिथिलामे सुइदसॅं किछु मैथिल सुइदखोर व्यवसायमे वृद्धि केलाह हऽ। कोनो नियमके पालण नहि़ कए रहल छथि। अपन नियम बना कऽ अपराध मे रमल छथि। मिथिला बैंकक शुरआत होए अपराधी सुइदखोर मैथिल के झेलनाइ एकटा बढ़ पैघ अपराध अछि। !!!!Great Risk !!!! मुदा बहुतो अछि़ पर रिक्सो सॅं ज्यादा भयावह। सन २००१क जनगणणा के अनुसाऱ मिथिलाक आबादी करीब ६ करोड़ छल। जाहिमे़ व्यवसायिक वर्ग २ प्रतिशतो कम। बहुतोसॅं पुछलहु़ जे एतबा प्रतिशत कियाक कम अछि़ परञ्च एकर कारण की से नहि जानि सकलहुं। मिथिलासॅं आयात आ निर्यातक बातेऽ छोड़ू,  व्यापार तॅं बद सँ बदतर मिथिलाक पाँच जिलाक केस स्टडी: पांचो जिलाक कुल आबादी सन २००१ जनगणनामे करीब एक करोड़ अठाइस लाख छल। जनसंख्या अनुमानित ५ वा ७ प्रतिशतसॅं प्रतिसाले वृद्धि भऽ रहल अछि। एकटा बात महसूस भऽ रहल अछि जे मिथिलामे गरीबी कम भेल अछि। यदि़ सन १९८० सॅं पहिने हरेक गॉवमे हरेक दिन ४ या ५ घरमे उपवास रहैत छलैक़ परञ्च से उपवास आब गरीबीक उपवास पुजा पाठक उपवास होइत अछि। मुदा भौतिक सुविधाक पिछड़ापन तॅ पारकाष्ठा पर अछि। जिनगी भगवानक भरोसे। पांचो जिलाक मैथिल पर यदि ध्यान देल जाए तॅं एकटाक सदस्य परिवारमे नौकरी करयबाला बॉकी आश्रित सदस्य किछु नहि करयबाला बल्कि गप छटय बाला आ शान बघारय वाला। पर आश्रित भेनाए अपनेमे एकटा रिक्स एहन जे भावुक जरूरतसॅं ज्यादा आ कर्मठहीन ज्यादा बनाबैत अछि। !!!!ग्रेट रिस्क !!!! जनसंख्याक वृद्धि मानु जे कष्टक पहाड़। हर क्षण हरेक दिस स्थिति दयनीय हेबे कड़त। मिथिलामे मैथिल रिक्स लेताह ? मिथिलामे मैथिल तॅं अपन जिनगीक रिक्स लेबाऽमे सर्वोपरि छथि। जेना की़ सोचु ऩदि के ऊपर जड़ जड़ हालमे पुल ओहि पर खचाखच बस़ आ रेल गाड़ी जाहिमे छत सेहो भड़ल। फोटो देखल जाए। सोचु कनिऽ जे जिनगी आओर मौत के बीच केवल एकटा रिक्स फैक्टर अछि। मैथिल जिनगीक रिक्स हर क्षण। मिथिलामे जिनगीक रिक्स बड़ आसान पऱ व्यापारक रिक्स बड़ कठिन अछि।

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् शक्ति शेखर, पिता-श्री शुभनाथ झा, गाम- मोहनपुर, भाया-हरलाखी, जिला-मधुबनी। कखन बदलब हम-शक्ति शेखर बहुत तामस होइए भगवानक एहि कृत्यसँ जे ओऽ अपन उपस्थिति मिथिलांचलमे दर्ज केनाय शायदे कोनो साल बिसरै छथि। मुदा हमरा सबकेँ एहि भयावह स्थितिसँ लड़बाक अलावा आओर कोनो रस्तो तँ नहि अछि। जी, हम बात कऽ रहल छी, एखन बिहारमे आयल बाढिक संदर्भमे। अनुमान लगायल जाऽ रहल अछि, जे अहि बाढिक चपेटमे करीब 50 लाख लोक आयल छथि। सभ साल जुलाई-अगस्तक मास अबिते बिहारक लोक आतंकित भऽ जाइत छथि।सबहक मोनमे ई डर रहै छनि, जे एहि बेर केकर घर उजरतौ। लोकसब भरि साल दिन राति मेहनत कऽ एकटा घर बनाबैत छथि, किछु पूंजी जमा करैत छथि,मुदा की होइए एहि सभसँ? ई बाढि तँ कोनो आतंकवादीसँ बेसी भयावह होइत अछि जे हर बेर कतेको गामकेँ, कतेको बिगहा जमीनकेँ अपन अंदर समेट लैत अछि। संबधित विभाग बाढिकेँ लऽ कऽ सब जानकारी राखितो कोनो तरहक कदम नहि उठाबैत अछि। शायद ई बाढि हुनका सभक लेल आमदनीक एकटा श्रोत जे होइ-ए। पछुलका बाढि सभक राहत-अनुदानपर नजर दौड़ाबी तँ निधोक एक बात कहनाइ अनुचित नहि होयत, जे बाढिसँ कतेको लोक करोड़पति सेहो भऽ गेलाह। ईश्र्वरक लीला देखियौक, जे एक दिस एहि बाढिसँ सभ बेर कतेको लोक (शायद अनुमान लगेनाय असंभव अछि) केर सब चीज लुइटे जाय छनि, तँ दोसर दिस बाढि घोटालाक अभियुक्त आओर कतेको लोक करोड़पतिक गिनतीमे आबि गेलाह। ओहि दृश्यक बारेमे सोचल जाय, जे पूर्णियामे बाढिक डरे अपन छत पर बैसल चारि सालक बच्चा भूखसँ अपन दम तोड़ि देलक, ओहि लोकक बारेमे सोचि, जिनका खेनाय तँ दूर पिबऽ के लेल पानि तक नहि भेटि रहल छनि। लोकक चापाकल बाढिक पानिमे डुबि गेल छनि। हिनका सभ लग किएक नहि पहुंचि पाबि रहल छनि राहत सामाग्री। कहिं एहन तँ नहि जे फ़ेर सँ कतेको लोक एहि बाढिमे करोड़पति बनए वला छथि। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बिहारक बाढिकेँ राष्ट्रीय आपदा घोषित तँ कऽ देलन्हि मुदा पीड़ितक लेल ई सांत्वना मात्र अछि। केन्द्र सरकार दिससँ बिहारक बाढि पीड़ितक लेल 1000 करोड़ रुपया अनुदानक राशि देल गेल अछि। मुदा एहि अनुदानक राशिक विषयमे अखनो कतेको बाढि पीड़ित केँ मालूम नहि चलि सकल अछि। जिनका अहि बारेमे जानकारी भेटबो कैल तँ निश्चित ओऽ सोचने हेताह कि शायदे एहि राशिमे सँ हुनका सभकेँ किछु भेटत। केन्द्र सरकार ई राशि तँ दऽ कऽ अपन बाढि पीड़ितसँ तँ अपन पल्ला झाड़ि लेलाह, मुदा बाढि पीड़ित तक ई राशि कोना पहुंचि सकत, एहि बारेमे हुनकर ध्यान नहि गेल अछि। एक बेर फ़ेरसँ कहब जे ई अनुदानक राशि सब विभाग तक बटैत बटैत दस प्रतिशतो बाढि पीड़ित तक नहि पहुंचि सकत। आओर हँ, बाढिक दोगमे जे सभसँ पैघ चीज होइत अछि ओऽ अछि राजनीति। कतेको नेता सभ एहि बाढि पीड़ितक लेल आगिमे घी देनाय जेहेन काज करैत छथि। राज्य सरकार केँ दोषी ठहराबैत नेता सब ओहि जगह अपन सीट सुनिश्चित करबाक फ़िराकमे रहैत छथि। हेलीकाप्टरसँ बाढि क्षेत्रक सर्वेक्षण करैत बहुतो नेतासभकेँ अतबो जानकारी नहि रहैत छनि जे ओऽ कोन क्षेत्रक दौड़ा कऽ रहल छथि। पता एहि बातसँ लगायल जाऽ सकैत अछि जे नेतासभ ओहि क्षेत्रक कतेक ज्ञान रखने छथि। इमहर राज्य सरकार सेहो कहां चुप रहए वला। ओऽ केन्द्रपर निशाना साधैत छथि तँ केन्द्र राज्य सरकार पर। एहि राजनीतिमे पिसाइत तँ बाढि पीड़ित छथि। कोनो बात नहि, समय आबि गेल अछि एकजुटता देखाबएबाक  आऽ मदति करबाक....बाढि पीड़ितक संग, बाढि पीड़ितक लेल। तखने हम स्वतंत्र भारतक कर्तव्यनिष्ठ नागरिक भऽ सकए छी। जोगार 'हम आपको दिखा रहे हैं कि कैसे फ़ला आदमी किसी मामले को दबाने के लिए दुसरे को पैसा दे रहे है। यह हमारे चैनल के स्टिंग आपरेशन का नतिजा है जो सिर्फ़ दिखा रही है।' जी,इ पंक्ती अछि आजुक समय के सब घटना स अपना सब के देखा रहल इलेक्ट्रोनिक चैनल के। अपना के सब स ऊपर पहुंचाबय के लेल ओ सब हथकंडा अपना लैत अछि। विडंबना इहो देखु जे सब चैनल वला अपना के राजा हरिश्चंद्र के सत्य निती पर आधारीत बताबैत अछि। बहुतो चैनल वला सब कोनो काज के तह तक पहुचबाक लेल हमेशा एकटा हथकंडा अपनाबैत अछि जाहि के अहि युग मे स्टिंग आपरेशन कहल जायत अछि। माने इ जे हम इ हम देखा रहल छी जे बस अहाक लेल अछि आ सत्य अछि। मुदा कहल जाय त एकटा सत्य मीडिया खास क इलेक्ट्रोनिक मीडिया मे अहि शब्दक बोलबाला अछि। जी,हम बात क रहल छी 'जोगार' के। आजुक युग मे बहुतो युवा के रुझान पत्रकारीता दिस झुकि रहल छैन। लाखो रुपया ओ सब अहि पत्रकारिता के पढाई पर खर्च क दैत अछि। शायद किछ उम्मीद के संग जे ओहो सब एक दिन अहि क्षेत्र मे अपन नाम रौशन करताह। मुदा कि होइया अतेक पढाई लिखाई केलाह स? पढाई के संग संग कतेको लोकनि के पत्रकारीता मे काज करबाक लेल जोगार सेहो लगाबअ पड़ै छैन। एक तरह स कहु त डीग्री डिप्लोमा स पहिले कोनो चैनल मे पहुंचबाक लेल हुनका सब के सब स पहिले त जोगार लगाबहे पड़ै छैन। अनुचित नहि हैत जौं कहि त जे पत्रकारीता क्षेत्र मे घुसबाक लेल सब स जरुरी जोगार होयत अछि। आब त कतेको चैनल सब आ अखबार एजेंसी सब अपन-अपन संस्थान सेहो खोलि लेने अछि,इ कहि क जे पढाई समाप्ती के बाद हुनका सब के ओहि चैनल आ अखबार एजेंसी मे काज देल जायत। साधारण वर्ग सब पत्रकारीता के पढाई करलाक बादो ओ सब अहि संस्थान मे नामांकन नहि ल सकैत छथि। चैनल वला सब के अहि कदम स साधारण तबका वला युबासब के अहि चैनल मे काज खोजनाय पहाड़ खोदनाय एहन भ रहल अछि। सोचल जाय जे ओ चैनल वा अखबार एजेंसी वला सब अपन संस्थानक विद्यार्थी के छोड़ि क दोसर गाटे के कियाक काज देत। बड पैघ पैघ गप्प करैत छथि इ चैनल वा अखबार वला सब जे भारत मे बेरोजगारी अहि हद तक बढि रहल अछि आ दोसर दिस अपने जोगारक मंत्र पर काज दैत अछि। ध्यान दि जे अखन समाचार चैनल वा अखबार एजेंसी मे काज क रहल छथि,ओहि मे स एहन कतेक व्यक्ती छथि जिनकर कोनो नहि कोनो संबंध अहि क्षेत्रक माफ़िया सब स नहि छैन। प्रतिशत मे देखल जाय त जोगार वला सबहक प्रतिशत शायद 80 तक पहुंच जायत। एक तरह स कहि त जे अहि पत्रकारीता क्षेत्र मे ज्यादा स ज्यादा दिन तक टिकबाक लेल जिगार रहनाय आवश्यक अछि। ओना त सब क्षेत्र मे जोगार अपन एक अलग स्थान राखैत अछि मुदा पत्रकारीता क्षेत्र के लेल एकर महत्व विशेष मे भ जायत अछि। पत्रकारीता के देशक चारिम स्तंभ मानल जायत अछि आ इ स्तंभ जोगार पर टिकल अछि। कि जिनका लक  जोगार नहि अछि,ओ पत्रकारीता क्षेत्र मे काज नहि क सकैत छथि? फ़ैसला ओहि सब लोकनि के लेबअ पड़तैन जे अहि मे संलिप्त रहै छथि,जिनकर नाम ल क जोगार लगाबअ पड़ैत अछि,ओहि सब युवासब के लेल के काइल के भविष्य छथि।

33 3 3 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ओमप्रकाश झा, गाम, विजइ, जिला-मधुबनी। मिथिले तक नहि छथि मैथिल-ओमप्रकाश झा गप्प अछि नवंबर 2007 केर, एहि समयमे हम गोवा न्यूज (जे कि गोवा अवस्थित अंग्रेजी क्षेत्रीय न्यूज चैनल छ्ल) मे काज करैत रही। गोवामे सोलहम अंतराष्ट्रीय मैथिली परिषदक सम्मेलन भेल छ्ल, जकर अध्यक्षता श्री विनय कुमार झा ,चीफ़ विजिलेंस,गोवा स्टेट केलथि। एहि कांफ़रेंसक एकटा छोट सनक अंश यू-टयूब साइट पर सेहो उपलब्ध अछि। एहि कार्यक्रमकेँ कवर करबाक भार अपन संस्थासँ हमरे भेटल छ्ल। एहि कार्यक्रमक दौरान बहुत रास चित्र जे स्पष्ट भऽ कऽ सोझाँ आयल ओऽ ई सभ छल....... 1.बहुत रास मैथिल छतीसगढ आऽ मध्य प्रदेशमे बसल छथि। हालांकि आब हुनका सबहक मातृभाषा मैथिली नहि रहि गेल अछि। यदि आओर तहमे जाई तँ ओऽ लोकनि मैथिली भाषा बिसरि चुकल छथि, तथापि मिथिलासँ ओतबेक स्नेह आऽ लगाव छन्हि, जतबाक हमरा सबकेँ अछि। हुनकर सबहक पुस्त बहुत पहिने ओतए चलि गेल रहथिन्ह। गप्प करीब 4-5 पुस्त पहिनेक अछि। 2. दिल्लीक नांगलोई इलाकामे सेहो किछु रास मैथिल छथि, जे कि अपन जीवन-यापनक क्रममे कतेक रास आन आन व्यवसाय सब अपना लेने छथि। संगहि देशक भिन्न- भिन्न भागमे कतेको ठाम मैथिल लोकनि वृहद समुदायक संग रहि रहल छथि। ओना भाषा एहिमे सँ बहुतो गोटेक हरा गेल अछि। 3. एकटा आरो गप्प जे कि सामने आयल ओऽ छल, जे कि गोवाकेँ मैथिले ब्राहम्ण सब बसेने छथि आऽ एकर प्रमाण स्कन्द पुराणमे भेटैत अछि। हम अहाँ केँ ई बात कहि दी, जे कि गोवन (गोवाक वासी) सबहक मातृभाषा कोंकणी अछि मुदा एहि भाषाक बहुतो रास शब्द मैथिली भाषाक अछि। किछु शब्दक बारेमे हम अहाँ सबकेँ कहि रहल छी, जेना कि अदहन (भातक लेल गरम कएल गेल पानि), पाहुन (गेस्ट), मधुर आदि। ओहो सब कोजगरा दिन लक्ष्मी पूजा करैत छथि। रहन-सहनक स्तर अपना सबसँ बहुत हद तक मिलैत अछि। आओर तहमे गेनाय अखन उचित नहि अछि। कार्यक्रममे कतेको मिथिला-विभूति सब उपस्थित छलाह। वर्तमानमे दिल्ली पुलिसमे वरिष्ठ अधिकारी श्री उज्जवल मिश्र ओहि ठाम तत्कालीन डी.आइ.जी. छलाह। भारतक विभिन्न भागक संगे नेपालक किछु रास प्रतिनिधि सब सेहो पहुंचल छलाह। एहि कार्यक्रमक कवर करबाक लेल गोवा न्यूज आऽ नेपाल टीवी (नेपालक) चैनल पहुंचल छल, जखन कि बड़का-बड़का मैथिल पुरोधा सब गोवामे विभिन्न मीडिया लेल काज करैत छथि। बादमे जहन हुनका सबसँ जिज्ञासा बस पुछलियन्हि तँ कुनू ने कुनू ओहने बहाना बना लेलाह, जेना कि जखन प्रधानमंत्री स्व० राजीव गांधीक समयमे मधुबनी के एम०पी० हनान अंसारी लोक सभामे मैथिली केँ अष्टम सूचीमे जोरबाक लेल आवाज बुलंद केलथि तँ श्री भोगेन्द्र झा जी जे कुनू बहान्ना बनेने रहथि। हम एकर तहमे नहि जाय चाहब, सब गोटे बुझि रहल छी। अल्पज्ञ कहु वा किशोर हमरा मोनमे कतेको प्रश्न उठए लागल जे एनामे मैथिली कोना बचल रहत। हयऔ, हमर भाषा कुनू अन्य भाषा सँ कनिको कमजोर नहि अछि। हमरा लोकनि अंग्रेजी बाजैत छी, आधुनिक परिधान पहिरैत छी, सबटा बड्ड नीक बात अछि। मुदा एहि तमाम चीजक मूल्यक रुपमे अपन भाषा आऽ संस्कृति केँ उत्सर्ग केनाय हमरा नहि पचि रहल अछि। ई तँ ओहने गप्प भेल जेना किछु रास लोककेँ आर्थिक तंगी नहि रहलाक बादो दोसरसँ कर्ज लेबाक प्रवृति होय छन्हि। परिवर्तनक फ़ेज सँ गुजरि रहल अपन समाज कहीं त्रिशंकु तँ नहि बनि रहल अछि।एखन बस एतबे। मीडिया कतअ ल जा रहल अछि? गप आरुषि कांड के करी वा मिथिलांचल मे आयल कोसी के कहरक या हाल मे दिल्ली मे भेल सिरीयल बम ब्लाष्टक। यदि अहां सब पछिला किछु दिनका मीडिया के इतिहास पर नजरि डालि तअ देखु जे ओ कि परोसि रहल अछि आ विडंबना देखु,दर्शक/पाठक के जे ओ ओकरा यथावत ग्रहण करबाक लेल बाध्य छथि। मीडिया के भूमिका के लेल अपना अहि ठाम एकटा कहावत 'खशी के जान जाय,आ खाय वला के स्वादे नहि' वला सहत प्रतिशत ठीक बैस रहल अछि। हमरा बुझा रहल अछि जे अहां सब सनक पाठक लेल मीडियाक छवि के आओर उजागर केनाय उचित नहि हैत। अहि स छोड़ि यदि मीडिया के आंतरिक संरचना पर ध्यान दी त जतेक निम्न काटि वा अहु स खराब जैं कुनु शब्द होय त संबोधनक स्वरुप ल सकैत छी। यदि टीवी पर देखाय वला सुन्दर चेहरा वा अखबार/मैगजिन मे लिखै वला पुरोधा सब के निजी जीवन मे झांकि क देखब त ओहि मे स अधिकतर व्यक्ती के व्यक्तित्वक समीक्षा केलाक बाद मोन घृणित भ जायत। मुदा विडंबना देखु जे सब गोटे सब बात बुझैत बेबस छी। जे मीडिया दोसरक स्टिंग आपरेशन करैया कि ओकरा लेल सेहो स्टिंग आपरेशन नहि होयबाक चाहि? मुदा इ के करत? हम सब त बगनखा पहिरने छी। बहुतो मैथिल पुरोधा सब मीडिया के शिर्ष पद सब के सुशोभित क रहल छथि,मुदा कि मजाल जे ओ कखनो सत्य बाजि दैथ। हमहु ओहि भीड़ मे कतौह के कतौ शामिल छी,इ कहैत कोनो लाज नहि भ रहल अछि। कहियो तिलक जेकां पत्रकार होयत छलाह। मुदा आजुक पत्रकार सब समाज के धनाढय वर्ग मे स आबैत छथि। पाठकगण अहां सब मे स जे कियो मीडियाकर्मी होयब त हमरा माफ़ क देब,मुदा कि हम सब इ दोहरा चरित्र जीवन जिबअ स मुक्त नहि भ सकै छी? अपन पूर्वज के रुप मे मंडण,अयाची,जनक आ विद्यापति के संतान हम सब कतह जा रहल छी? अहां सब मे स जे कियो मीडिया के नजदिक स नहि देखने होय त कोनो निकट परिचत जे अहि क्षेत्र मे काज क रहल हेताह,हुनका स पुछि लेबन्हि। जैं सत्य बाजअ चाहताह त सच्चाई स अवगत भ जायब। कोना बचत मिथिलाक स्मिता ? आई जहन  अपना सबहक चहुतरफ़ा विकास भ रहल अछि त हम सब अपन महत्वांक्षा के पाबि के अत्यधिक प्रसन्न भ रहल छी,हेबाको चाही। मुदा कि महत्वाकांक्षा के रथ पर सवार भ कअ हम सब कतेक मगरुर नहि भ गेल छी जे अपन स्मिता अपना स कोसो दूर पाछु छुटि रहल अछि। मुदा तकरा समेतनिहार कियो नहि अछि। आय अपना अहिठामक युवा वर्ग अत्यधिक दिग भ्रमित भ रहल अछि,ओकरा कियो सहि मार्ग दर्शक नहि भेट पाबि रहल अछि। अखुनका समय कतेको पाबनि तिहार क महिना आबि गेल अछि आ कतेको गाम मे दुर्गा पूजा के अवसर पर सास्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कैल जायत अछि मुदा किछु वर्ष पूर्व मे चलु-आइ सअ आलो पहिले हर गाम मे युवक सब नाटक खेलाय छलाह,महिनोतक रामलिला ले आयोहन होयत छल,ओ सब आय कतह चलि गेल छथि। कि आर्केस्ट्रा आ परोसी (तवायफ़) के नाच मे ओ सब हरा गेल छथि। परोसजी के कार्यक्रम इ असर पड़ैत अछि जे मंदिरक कार्यकर्ता सब सेहो एकर मजा उठाबअ लागैत अछि। इमहर मौका पाबि कुकुर,बिलाड़ि मैया के प्रतिमा के सेवा मे लागि जाइया। देखने हैब जे कुकुर मुर्ती के चाटि रहल अछि। उमहर हम सब अपन तीन पुस्तक (पुरुखा) संग माने बाप- बेटा आ पोता समेत बाईजी पर पाई लुटाबय के अवसर के नहि गवांबैत छी। अधिकतर गोटे अहि स अवगत होयब। दोसर कतअ जा रहल अछि अपन संस्कार? हयउ,आब शायद कतौ महिनो तक चलैबला रामलिलाक तम्बु गाम मे देखायत होयत? हम अपन छोट सनक अनुभव अपने संग बांटअ चाहब। पहिले रामलीला के टोली के कियो माला (मने एक दिनक भोजन) उठेनिहार नहि होइ,माने इ जे मात्र पेटे पर जे टीम सबहक मनोरंजनक वास्ते तैयार रहैत छल,ओकरा अपन समाज नकारि देलक मुदा आखन प्रायःहर छोट पैघ शहर अतह तक कि देशक राजधानी मे दुर्गा पूजा के अवसर पर लाखो आदमी रामलीलाक खुब लुफ़्त उठबैत छैथ। कतो कतो तअ रामलीला देखै के लेल टिकट सेहो लागैत अछि,कि हम झूठ बाजि रहल छी। एना मे दु टा गप्प जे हमरा स्पष्ट भेल-पहिल जे लोक के ओहि प्रति ओ रुझान नहि रहलन्हि जे कि बाईजी के नाच मे वा कौआल-कौआली मे जे कि राति भरि सबके गरिया क चलि जाइया आ हजारो आदमी मंदिरक आस पास ततबाक गोत गोबर कअ दैत छथि जे अगिला किछु महिना तक उमहर नहिये जाय मे कुशल बुझैत छी। अहि स गामक कलाक ह्रास खूब पैघ स्तर पर भेल अछि,सब गोटे बुझिति अंजान छी। तेसर आ गंभीर गप्प इ जे समाज मे जे भाई चारा प्य््रव मे छल कि ओ खत्म भ गेल अछि। कि अपन समाज ततेक गरीब तअ नहि भ गेल अछि जे आहिठम दस गोटे के भोजन करेनाय आय कठिन भ गेल अछि। एकर एकटा छोट सनक उदाहरण हम देबअ चाहैत छी जे जौं अंहा सब मे स किछु आदमी दिल्ली-बंबई स कमा क मास दिनक लेल गाम जायत होय तअ अनुभव करैत होयब जे गाम मे बीतल समय के संगे संग अपनेक मेंटिनेन्स पर होय वला खर्च मे कटौति सेहो सबगोटे व्यक्तीगत अनुभव के गहराई स देखु। अखन बस अतेबैक। इति

11 1 1 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् श्यामल किशोर झा, लेखकीय नाम श्यामल सुमन, जन्म १०।०१।१९६० चैनपुर  जिला  सहरसा  बिहार, स्नातक । शिक्षा:अर्थशास्त्र  राजनीति शास्त्र एवं अंग्रेजी, विद्युत अभियंत्रणमे डिपलोमा, प्रशासनिक पदाधिकारी,टाटा स्टील, जमशेदपुर,स्थानीय समाचार पत्र सहित देशक अनेक पत्रिकामे समसामयिक आलेख, कविता, गीत, गजल, हास्य-व्यंग्य आदि प्रकाशित, स्थानीय टी वी चैनल एवं रेडियो स्टेशनमे गीत गजल प्रसारण, कैकटा कवि सम्मेलनमे सहभागिता ओ मंच संचालन। प्यास हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल! भूख लागल अछि एखनहुँ, उमरि बीत गेल!! हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल! नौकरी की भेटल, अपनापन छूटल! नेह डूबल वचन केर आश टूटल!! दोस्त यार कतऽ गेल, नव-लोक अपन भेल! गाम केर हम बुधियार, एतऽ बलेल!! हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल! आयल पावनि-त्योहार, गाम जाय केर विचार! घर मे चर्चा केलहुँ तऽ, भेटल फटकार!! नहि नीक कुनु रेल, रहय लोक ठेलम ठेल! कनियाँ कहली जाऊ असगर, आ बन्द करू खेल!! हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल! की कहू मन के बात, छी पड़ल काते कात! लागय छाती पर आबि कियो राखि देलक लात!! घर लागय अछि जेल, मुदा करब नहि फेल! नवका रस्ता निकालत, सुमन ढ़हलेल!! हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!

44 4 4 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् राजेन्द्र विमल (1949- )।चामत्कारिक लेखन-प्रतिभाक स्वामी राजेन्द्र विमल नेपालक मैथिली साहित्यक एक स्तम्भ छथि। मैथिली, नेपाली आ हिन्दी भाषाक प्राज्ञ विमल शिक्षाक हकमे विद्यावारिधि (पी.एच.डी.)क उपाधि प्राप्त कएने छथि। सुललित शब्द चयन एवं भाषामे प्राञ्जलता डा. विमलक लेखनक विशेषता रहलनि अछि। अपन सिद्धहस्त लेखनसँ ई कोनहु पाठकक हृदयमे स्थान बना लैत छथि। कथा आ समालोचनाक सङ्गहि मर्मभेदी गीत गजल लिखबामे प्रवीण डा. विमलक निबन्ध, अनुवाद आदि सेहो विलक्षण होइत छनि। कम्मो लिखिकऽ यथेष्ट यश अरजनिहार डा. विमलक लेखनीक प्रशंसा मैथिलीक सङ्गसङ्ग नेपाली आ हिन्दी साहित्यमे सेहो होइत रहलनि अछि। खास कऽ मानवीय संवेदनाक अभिव्यक्तिमे हिनक कलम बेजोड़ देखल जाइत अछि। त्रिभुवन विश्वविद्यालयअन्तर्गत रा.रा.ब. कैम्पस, जनकपुरधाममे प्राध्यापन कएनिहार डा. विमलक पूर्ण नाम राजेन्द्र लाभ छियनि। हिनक जन्म २६ जुलाई १९४९ ई. कऽ भेल अछि। साहित्यकारक नव पीढ़ीकेँ निरन्तर उत्प्रेरित करबाक कारणे ई डा.धीरेन्द्रक बाद जनकपुर-परिसरक साहित्यिक गुरुक रूपमे स्थापित भऽ गेल छथि। जनकपुरधामक देवी चौक स्थित हिनक घर सदति साहित्यक जिज्ञासुसभक अखाड़ाजकाँ बनल रहैत अछि। डा. राजेन्द्र विमलक गजल १. नयनमे उगै छै जे सपनाकेर कोँढ़ी फुलएबासँ पहिने सभ झरि जाइ छै कलमक सिनूरदान पएबासँ पहिने गीत काँचे कुमारेमे मरि जाइ छै चान भादवक अन्हरिये कटैत अहुरिया नुका मेघक तुराइमे हिंचुकै छल जे बिछा चानीक इजोरिया कोजगरामे आइ खेलए झिलहरि लहरिपर ओलरि जाइ छै हम किछेरेपर विमल ई बूझि गेलियै नदी उफनाएल उफनाएल कतबो रहौ एक दिन बनि बालू पाथरक बिछान पानि बाढ़िक हहाकऽ हहरि जाइ छै के जानए कखन ई बदलतै हवा सिकही पुरिवाकेर नैया डूबा जाइ छै जे धधरा छल धधकैत धोंवा जाइ छै सर्द छाउरकेर लुत्ती लहरि जाइ छै रचि-रचिकऽ रूपक करै छी सिंगार सेज चम्पा आऽ बेलीसँ सजबैत रहू मुदा सोचू कने होइ छै एहिना प्रिय सींथ रंगवासँ पहिने धोखरि जाइ छै २.. जगमग ई सृष्टि करए तखने दिवाली छी प्रेम चेतना जागि पड़ए तखने दिवाली छी जीर्ण आ पुरातनकेँ हुक्का-लोली बनाउ पलपल नव दीप जरए तखने दिवाली छी स्नेहकेर धार बहत बनत जग ज्योतिर्मय हर्षक फुलझड़ी झरए तखने दिवाली छी अनधन लछमी आबए दरिदरा बहार हो रङ्गोली रङ्ग भरए तखने दिवाली छी रामशक्ति आगूमे रावण ने टीकि सकत रावण जखने डरए तखने दिवाली छी तृष्णा- राजेन्द्र विमल आइ फेर बहु-बदला भेलैए कहाँ दन!...गे दाइ, गे दाए! रजदेबाके बहु सिकिलिया आ देबलरैनाके बहु सोनावती। सिकिलिया ओना छै मोसकिलसँ अढ़ाइ हाथक मौगी मुदा सउँसे गोर देहमे गजगज मासु करै छै। देखिते होएत जे काँचे चिबा जाइ। टोङि देबै, बन्न दऽ सोनित फेकि देतै। देहपर जेना इस्त्री कएल होइ; छिहलैत आऽ गतानल अंगअंग। देबलरैनके मुँहसँ तँ कहिया सऽ ने लेर चूबैत रहै-लसलस। देबलरैना-बहु सोनाबती, रोलल-छोलल, पोरगर करची सन लचलच करैत देह। रजदेबाके ततराटक लागि जाइक- देखैक तँ देखिते। एक्के टोलमे दसे घरक तऽ फरक हएतै दुनूक घरमे। छिनरझप्पबाली सोनावतियो केहन मन सरभसी जे जखने रजदेबासँ नयन मिलै कि छट्ट दऽ बिहुँसि उठै अंग-अंग- जेना लौका लौकि गेल होइ भीतरे भीतर। उपर सऽ सतबरती जे बनैय। रजदेबा माने राजदेव मंडल, अंचल अस्पतालमे चपरासी अछि। बाप ओकरा जनमऽ सँ पहिनहि सरग सिधारि गेल रहथिन्ह। पोसल केऽ तऽ माए। एकटा बहीन रहै चंचलिया। सभ कहै कुमरठेल्ली। सउँसे गाम अनघोलकएने रहै छौंड़ी। कहियो खेसारीक झारमे पकड़ल जाइक, कहियो राहरि खेतमे केयो देखि लैक। कहिने कते आगि भगवान देहमे देने रहथिन्ह। चंचलियाक माय कहै जे ई देहक आगि थोड़बे रहैक, पेटक आगि रहै, पेटक। आब जे रहौक, मुदा ओ मारलि गेलि। ओकरा लऽ कऽ दू टा मनसामे झगड़ा भऽ गेलैक। जगदिसबा कहै जे हमर धरबी अछि, मनमोहना रिक्साबला कहै जे हम्मर माल अछि। चंचलिया दुन्नूकेँ दूहै छलि। से बरदास्स नहि भेलै मनमोहना रिक्साबलाकेँ। ताड़ीक झोंकमे रिक्साक पुरना चेनसँ तेना ने ततारऽ लगलै जे होशे ने रहलै। सउँसे देहसँ सोनित बहि रहल छलै आ ओ मुँह बाबि देने छलि। परिवारमे विधवा माय छलै, स्वयं छल, सिकिलिया छलै आऽ पाँच बरखक बेटा रहै। बेटा बड्ड सुन्नर आ बड़ ठोला! चंचलिया तऽ संसारसँ उठिए गेलै। आब परिवारक सुखाएल आँतक घघरा मिझएबाक लेल सोनित सुखएबाक जिम्मेबारी रजबेक छलै। जूआमे चुपचाप कान्ह लगा देलक आ बहए लागल। बहु रहै चमचिकनी, फरदेबाल आ फसलीटीबाली। रोज गमकौआ तेल चाही, स्नो-पाउडर चाही। रङसँ ठोर नइँ रङब, लिपेस्सी चाही। सिनेमामे चसकलि। जी-मुँह चलिते रहइ। पनपियाइमे घुघनी-मुरही, कचरी भरि पोख। दुसंझी। रोज-रोज माछु-मासु गमकैत रहउ आङनभरि- ने किछु तऽ डोका-ककरि। आकि कछुएक झोर। कतेक दिनसँ एक जोर परबा पोसक लेल रगड़ा कए रहलि छलि साँयसँ। छमकि कए एमहर, छमकि कए ओमहर। राति-राति भरि झूलन देखए, सलहेसक नाचमे खतबैया टोलक झुलफिया या नटुआक नाच आ सतरोहनाक बिपटइ देखि-देखि कऽ लहालोट भऽ जाए। रजबाकेँ ई सभ सतखेल्ली मौगिक लच्छन बुझाइक, तेँ रोज बतकुटौअलि होइ। रिक्साबला देबलरैनासँ यारी रहै रजदेबाकेँ। देबलरैना सिकलियाके बड़ पसिन्न। कारण रहै जे देबलरैना सेहो सलहेसक नाचमे ढोलकिया रहै। ईह ढोलक बजबैकाल ओकर कनहा जे उपर-नीचाँ होइ छल- गुम-गुमुक-गुमुक...गुम गुमुक गुमुक! .. बेर-बेर झुलफी मुँहपर खसि पड़ै जकरा ओ ओहिना छोड़ि दैक। मुँहपर बुनकिआएल ओसक बूँद सन पसेना! ओ मोनहि मोन अपन साँय रजदेबासँ देबलरैनाक मिलान करै। ... कहाँ देबलरैना, कहाँ रजदेबा। रजदेबाक मुँहपर चौबीस घंटा जेना विपत्तिके झपसी लधने रहै। घोघनमुँहा एक रत्ती ने सोहाइ सिकिलियाकेँ। मगर करओ तऽ की करओ? सिङार-पटार कए एकान्तमे एसगर बिछाओनपर पड़ि रहय आ कल्पना करए-साँय जे बदलतै! देबलरैना फुलपेन्ट पेन्हि कऽ, चसमा पेन्हि कऽ बाबू-भैया नाहित जे रिक्शापर बैठिकऽ रिक्सा चलबइ हइ तऽ सिनेमाके गोबिना माउत कऽर हइ। .. मानली जे ताड़ी-दारू पीबै हइ, त की भेलइ। सुनइ छिऐ जे कहाँदुन ताड़ी-दारु पीलै हइ मनसासुन तऽ ओकरा देहपर राछच्छी सबार भऽ जाइ छै, मौगीके छोड़ने ने छोड़ै छै।..धौर, केनाकऽ सकैत होतै देबलरैना बहु।..रजदेबा ला धन्न-सन! बिछाओनोपर जाएत त खाली घरेके समेस्सा। ..रङ आ लस!! .. देहो हाथ छूबैतऽ खौंझा कऽ छूटत!.. देबलरैनाके बँसुरीके आवाज सुनएलै। ..दारू पीकऽ अबै छै तऽ आङनमे बैसिकऽ बँसुरी टेरऽ लगै छै।..अहाहाहा..की राग, की तान।..सोनाबतीके तऽ लीरीबीरी कऽ दै छै। फेर दुनू परानीमे मुँहाठुट्ठी होइत-होइत पिटापिटौअल शुरू भऽ जाइत छै।..सोनाबतीके कहब छै जे मरदाबा जे कमाइ हए से तऽ दारू पानीमे उड़ा दै हए, सिनेमामे गमा दै हए आ सूतऽ लागी हरान रहै हए।..पेटमे अन्न नैआ.. “मनसा तऽ रजदेबो हइ”- सोचैए सिकिलिया- “ओकरा सूतऽ के मन नै होइ हइ?..केरबा आमसन मुँह लटकओने रहैए!” सिकिलियाके अपने हँसी लागि जाइ छै। “दोसजी कहाँ गेलखिन”?- अरे, ई बारह बजे रातिमे सोनाबती!!.. “की हइ, हे”?- बाँसक फट्टक खोलिकऽ सिकिलिया बाहर अबैत अछि।..छौंड़ाक बाप तऽ नै एलैगऽ अस्पताल सऽ।..लैटडिपटी (नाइट ड्यूटी) हइ।..” “बहीन की कहियो दुखके बात। आइ फेनू मनसा मारलकगऽ।“ “कइला?” “धुर। की जान गेलिऐ कोन बढ़मकिटास हइ देहपर।..हमर तऽ जान लऽ लेलक।..अन्न-पानी जरि गेलै, जी-जाँघमे खौंत फुकने रहै छै चौबीस घंटा।– बलू, चल नऽ सूतऽ।..सुतना बेमारी धऽ लेलकैगऽ।“..सोनाबती घौलेघौले बजैत रहल। जोर-जोरसँ घोल-चाउर भेलै तँ बुढ़िया रजदेबामाइ टुघरि कऽ अङनामे आएल- गे, की भेलउ गऽ? चुप, लबरी। साँइयो बहुके बातके कहूँ एते घोलफचक्का भेलै गऽ?” सोनाबती घेओना पसारलकि। रित्ती रित्ती कऽ फाटल, सतरह ठामसँ गिरह बान्हल अपन नूआ आ अङिया देखओलकि। घरबाली अन्न बेत्रेक मरै छै आ ओ दारु-ताड़ी पीबिकए बेमत्त भेल रहै छै। घरमे लाल बुद्दी नं दै छै। दारू पी कऽ सेजपर ओकर गत्रगत्रमे दाँत गड़ा दै छै! “इस्स!” रजदेबाबहुके मुँहसँ अनायासे बहार भऽ गेलै। भीतर चीनीक गरम पाक जेना टघरि रहल छलै। ओ गत्रगत्र देबलरैनाक हबकबाक कल्पनामे हेरा गेलि। “हे बहीन!..मनसा नै भोगतओ तँ ई देह लऽ कऽ की करबा।..एक दिन अँचियापर तऽ सबहक देह जरै छै!”- रजदेबा-बहु समझओलकै। रजदेबामाइ दुरदुरओलकै। ताबत डिप्टीसऽ रजदेबो घूरि अएलै। आङनमे ठहाठहि इजोरियामे चमकैत सोनाबतीक मुँह चमकैत देखलक। नयन मिललै, सोनावती विहुँसि देलकि, जेना रजनीगंधा फूल झरझरा गेलै। मोनप्राण गमैक उठलै। रजदेबा बाजल किच्छु नैं। बस पुछलकै- “की भेलौ गऽ भौजी?” सोनावती फेर सउँसे खेरहा दोहरओलकि।... सिकिलिया चौल कएलकै- “साँय बदलबे?” “सहे तऽ ने उपाइ हइ।..तोहर डागदरसनके साँय हउ गजै छे।..अस्पतालमे काम करै हउ। ने दारू, ने पानी। घरगिरहस्थी डेबने हउ। भरिमुँह कोनो छौंड़ी मौगी जरे बोलबो ने करइ हउ। अपन काम से काम। एहन महाभारथ पुरुख हमर भागमे कहाँ?..” सिकिलियाकें देह जरि गेलै- हइ गोबरके चोत महाभारत कहाँदुन! मनसरभसी। अपना साँय महकै छनि आ छौंड़ाक बाप जरे केना रसिया-रसिया, सिलिया बतिआइ हए। “बहीन, तौँ घर जा।..तोहर साँयके दोसरकेँ सम्हारि देत ओ? जे अपन साइँयो के कसमे ने रखलक, से मौगी कथिके?” आ सिकिलिया रजदेबाक बाँहि पकड़ि घरदिशि घीचय लागलि। रजदेबामाइके पित्त लहरि गेलै। सोनाबत्ती कनिकाल थरभसाएलि, फेर बाजलि-“दोस जी!..हम आइ घरे नैं जबे..फेन “निम्मन सऽ कूटत।..” ओकर आकृति कातर छलै। “अहाँ जाउ। लोक फरेब जोड़त”। रजदेबा समझओलकै। ओ घूरि गेलि। सभ अप्पन-अप्पन फट्टक लगा लेलक। मुदा, भोरे उठल रजदेबा जँगलझार लेऽ तँ देखलक जे देबलरैनाके बहु दरबज्जापर एकटा फेकल तरकुन्नीपर ओंघराएलि छै, घर नैं गेलउ।..कनिकाल ओ टुकुर-टुकुर ओकर मुँह तकैत रहल। केना निभेर भऽकऽ सूतलि छै, दुधपीबा पिहुआजेकाँ। नूआँ-बस्तर अस्त-व्यस्त। बिन तेलकूँड़क जट्टा पड़ल, भुल्ल भऽ गेल पैघ पैघ केश, भुँइयापर एमहर-ओमहर जौंड़ जेकाँ लेटाएल। ओकरा देवलरैनापर बड्ड तामस भेलै। सोन-सनक सोनावती अन्न-वस्त्र बेत्रेक झाम भऽ गेलै- बीझ लागल ताम-सन। एखनो जँ नहा धो देल जाइक आ सिङार कऽ दै तऽ झकाझक भऽ जएतै। मुदा दोस तऽ दारू पीकऽ मस्त रहै छै। सलहेसक नाचमे ओकर ढोलकक गुमकीपर खतबैया टोलक कतेको छौंड़ी-मौगी ओकरापर जान दओ छै। दोसजी, खत्ता-पैन, चर-चाँचर, राहरि-कुसियारक खेत, भुसुल्ला घर, पोखरिक भीर जत्तहि पओलक, तत्तहि छौंड़ी-मौगी लऽकऽ...। राम-राम।..एहन गुनमन्तीके एना काहि कटबै हइ, दोसजी निम्मन नहि करै हइ! बड़ समझओलकै रजबा सोनाबतीके। सोनाबती नैं गेलै। देबलरैनाके धन्न-सन। खोजैत-खोजैत एक्के बेर सुरुज जखन नीचाँ अएलै तऽ बँसुरी टेरैत आएल। सोनाबतीके भरिपाँज पकड़ि कए चुम्माचाटी लेबए लागल।– सबहक सामने! दरूपिबाके कोन लाज आ बीज। रजबामाइके हँस्सी लागि गेलै। सोनाबत्ती मनसाकेँ धकेलि देलकै, मनसा धाँय दऽ चारूनाल चित्त खसल। बिच्चे आङनमे।..चटाक!...मनसा उठिकए एक चाट देलकै। मौगी घेओना पसारलकि। मनसाकेँ धन्न-सन।..दोसजी अस्पतालमे रहै। सिकिलियाक बेटाके “मैंगोफ्रूटी”क खाली डिब्बा कतहु सड़कपर फेकल भेटि गेल रहै। ओ ओहिमे पानि धऽधऽ पीबै छल। सिकिलियाक नजरि पड़लै-“केहन लगइ हउ?” छौंड़ा हँसि देलकै- आमके रस नहिंता!..पीबे?” सिकिलियाक मोन भेलै- एक बेर ओहो पीबि कए देखैत। ओ बड़का-बड़का बाबू-भैया सबके पीबैत देखने रहै।..मुदा, ओइमे तऽ पतरसुट्टी फोंफी लागल रहै, एइमे कहाँ हइ?.. ओ बड़ा ललचाएल दृष्टिसँ फ्रूटीक डिब्बाकेँ देखि रहलि छलि। “दोस्तिनी, पीयब?”-देवलरैना टुभ दऽ पूछि बैसल। दोस्तिनीक आँखिमे फ्रूटीक लालच, पतिसँ उलहन, अभावजन्य वेदना लक्काबाज देवलरैनाकेँ झक् दऽ लौकि गेलै। “चलू दोस्तिनी, फ्रूटियो पीयब, सिनेमो देखब आ होडरोमे खाएब। घूमैत-घूमैत राति तओले च्हलि आएब”।– देवलरैना बजलै आ फेर कोन जादूके बान लगलै कहिने, सिकिलिया चट दऽ ओकर रिक्सापर बैसि गेलि। सभ मुँहे तकैत रहि गेलै। ओ जे गेलै सिकिलिया से फेर ६ महीना नैं घुरलै। सोनाबती रजबाके घरसऽ टकसऽ के नाम नैं लै। पऽर भेल, पंचैती भेल। दुनू मौगीमे सँ कोनो अपन-अपन साँय लग घुरबाक लेल तैयार नहि भेलि। छओ मासक बाद दुनू अपन-अपन मनसा लग कनैत-कनैत घूरलि-ढाकीक ढाकी सिकाइत नेने। सिकिलिया आ सोनाबती एक दोसरक गरदनि पकड़ि झहरा देमए लागलि। सिकिलियाक घेओनाक आशय छल- देबलरैनाके मुँह महकै छै, ओ बदमास अछि, गुन्डा अछि, निसेबाज अछि, लापरवाह अछि; स्वार्थी अछि आदि-आदि। सोनावती छाती पीटिपीटि बेयान करै छलि- रजबा गुम्मा अछि, बहुसँ बेसी मायकें मानै अछि, दिनराति पाइ लेऽ खटै अछि आ सभ पाइसँ घरे चलबै अछि, बहु ले कहियो कचरी- मुरही नै अनने अछि। कहियो सिनेमा नैं जाइ अछि, बहुकें चुम्मा नैं लैत अछि..आदि...आदि... दुनू अपन-अपन ओरिजिनल साँय लग घूरि गेलि। मनोविज्ञानक प्रोफेसर सत्यनारायण यादव कहलैन्हि- यार, जे भेटैत छै, तकर मोल नै बुझाइ छै। जकर पति गंभीर छै ओकरा चंचल पतिक लेल मोन पनिआइ छै, जकर चंचल छै से गंभीर पतिक लेल सिहाइए..इएह क्रम छै...नो वन इज परफेक्ट.. एक दिन सिकिलिया आ सोनावती सुनू एक-एकटा कोनो मनसा संगे उरहरि गेलै- ओहो एक्के दिन। रजदेबामाइ भोरेसँ आसमान माथपर उठा लेलकि- “जुआनी कक्कर ने उमताइ हइ..फेनू बान्ह हइकि नै।..समाज आ पलिवारके बन्हन टूटि जतइ तऽ मनसा-मौगी जिनगी भरि अहिना भँड़छि-भँड़छि कए मरि जतइ... प्रो. सत्यनारायणक व्याख्या छैन्हि- म्यान इज पोलिग्यामस बाइ नेचर..इट इज सोसाइटी ह्विच च्यानलाइजेज सेक्स एनर्जी..सओ मुँह, सओ बात!..सबसँ बड़का सत्य जे सोनाबती, सिनकिलिया दुनू उरहरि गेल!

11 1 1 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् वृषेश चन्द्र लाल-जन्म 29 मार्च 1955 ई. केँ भेलन्हि। पिताः स्व. उदितनारायण लाल,माताः श्रीमती भुवनेश्वरी देव।  हिनकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छन्हि। मूलतः राजनीतिककर्मी । नेपालमे लोकतन्त्रलेल निरन्तर संघर्षक क्रममे १७ बेर गिरफ्तार । लगभग ८ वर्ष जेल ।सम्प्रति तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक राष्ट«ीय उपाध्यक्ष । मैथिलीमे किछु कथा विभिन्न पत्रपत्रिकामे प्रकाशित । आन्दोलन कविता संग्रह आ बी.पीं कोइरालाक प्रसिद्ध लघु उपन्यास मोदिआइनक मैथिली रुपान्तरण तथा नेपालीमे संघीय शासनतिर नामक पुस्तक प्रकाशित । ओ विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि। नेपाली राजनीतिपर बरोबरि लिखैत रहैत छथि। फेकनाक दिआबाती—बृषेश चन्द्र लाल

दिआबातीमे फुलझडी, अनार भुइँपटका आ कनफर्रा फटक्कासभसँ कात आँखि बचा—बचाकय फेकना ताकि रहल अछि तेल बुताएल दिआसभमे एक मुठि भातपर सुअदगर तिलकोरक तरुआ लोभेँ! क्षणक छनाक...! १ चाही सभके शासन चलबएला अनुशासन ! २ लाल पहाड महाभारतबला ? खूनक ढेरी ! ३ मीत अपने हएबन्हि, ओ किछु अओर छथि ! ४ ‘एकता’ माने सभलेल नै खाली ‘एकटा’लेल ! ५ गढैअछि शब्द काबिलसभ, बात चिबबैलेल ! ६ सफल भेल अपनेस ? जरुर फेरल हैत ! ७ सनकी अछि दोष देखोनिहार धरतीपर ! ८ बरिआतमे छिटल गेल इत्र गन्हाइ छलै ! ९ पुरान मन रचतै युग नव ? नइ हेतै ! १० गैंडाक खाक ओकर शिकारक कारण थिक !

11 1 1 रोशन जनकपुरी डर लगैए नाचि रहल गिरगिटिया कोना, डर लगैए साँच झूठमे झिझिरकोना, डर लगैए कफन पहिरने लोक घुमए एम्हर ओमहर शहर बनल मरघटके बिछौना, डर लगैए हमरे बलपर पहुँचल अछि जे संसदमे हमरे पढ़ाबे डोढ़ा-पौना, डर लगैए आङनमे अछि गुम्हरि रहल कागजके बाघ घर घरमे अछि रोहटि-कन्ना, डर लगैए आँखि खोलि पढ़िसकी तऽ पढ़ियौ आजुक पोथी घेँटकट्टीसँ भरल अछि पन्ना, डर लगैए चलू मिलाबी डेग बढ़ैत आगूक डेगसँ आब ने करियौ एहन बहन्ना, डर लगैए Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 डा. रेवतीरमण लाल मधुश्रावनी मधुश्रावनी आएल मन-मन हर्षए चहुँदिस साओन सुन्दर घन वर्षए काँख फुलडालि मुस्कथि कामिनी मलय पवन सुगन्धित शीतल दमकए दामिनी नभ मंडलमे घनघोर मानू जल नहि वर्षए ई विरही यक्षक नोर झिंगुर बेंङ्ग गुञ्जए जल थल अछि चहुँओर। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् रूपा धीरू- जन्मस्थान-मयनाकडेरी, सप्तरी, श्रीमती पूनम झा आ श्री अरूणकुमार झाक पुत्री।स्थायी पता- अञ्चल- सगरमाथा, जिल्ला- सिरहा। प्रथम प्रकाशित रचना-कोइली कानए, माटिसँ सिनेह (कविता),भगता बेङक देश-भ्रमण (कनक दीक्षितक पुस्तकक धीरेन्द्र प्रेमर्षिसँग मैथिलीमे सहअनुवाद,सङ्गीतसम्बन्धी कृति- राष्ट्रियगान, भोर, नेहक वएन, चेतना, प्रियतम हमर कमौआ (पहिल मैथिली सीडी), प्रेम भेल तरघुस्कीमे, सुरक्षित मातृत्व गीतमाला, सुखक सनेस। सम्पादन-पल्लव, मैथिली साहित्यिक मासिक पत्रिका, सम्पादन-सहयोग,हमर मैथिली पोथी (कक्षा १, २, ३, ४ आ ५ आ कक्षा 9-10 क ऐच्छिक मैथिली विषय पाठ्यपुस्तकक भाषा सम्पादन), पल्लवमिथिला, प्रथम मैथिली इन्टरनेट पत्रिका,वि.सं. २०५९ माघ (साहित्यिक), सम्पादन-सहयोग। अङ्गेजल काँट- रूपा धीरू नहि जानि बहिना किएक आइ तोँ बड़ मोन पड़ि रहल छह आ ताहूसँ बेसी तोहर ओ छहोछित्त कऽ देबवला मर्मभेदी वाण। बहिना तोँ कहने रहऽ हमरा ऐँ हइ बहिना! एहन काँट भरल गुलाबकेँ अपन आँचरमे एना जे सहेजने छह तोरा गड़ैत नहि छह? तोँ उत्तर पएबाक लेल उत्सुक छलह मुदा हम मौन भऽ गेल रही आ तोँ मोनेमोन गजिरहल छलह। हँ बहिना, ठीके हमरो तोरेजकाँ अपन जिनगीमे फूलेफूल सहेजबाक सपना रहए आ अगरएबाक लालसा रहए तोरेजकाँ अपन जिनगीपर मुदा की करबहक...! मोन पाड़ह ने छोटमे जखन अपनासभ ती-ती आ पँचगोटिया खेलाइ बेसी काल हमहीँ जीतैत रही मुदा जिनगी जीबाक खेलमे हम हारि गेल छी बहिना। काँट काँटे होइ छै बहिना गड़ै कतहु नहि मुदा हम काँटेकेँ अङेजि लेने छी मालिन जँ काँटकेँ नइ अङेजतै बहिना तँ फेर गुलाब महमहएतै कोना?

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् दिगम्बर झा “दिनमणि” १ चल रौ बौआ चलै देखऽले घुसहा सब पकड़ेलैए घुसुर घुसुर जे घुस लैत छल, से सब आइ धरैलैए मालपोत, भन्सार, पुलिस कि, कर अदालत जेतौं घूसखोरक संजाल पसारल छै बाँच नै पबितौं अनुसन्धानक कारवाइमे सवहक होस हेरेंलैए विना घूसके कहियो ककरो, जे नै कानो काज करै बैमानी सैतानी करबा, मे नै कनिको लाज करै क्यो कानूनके चंगुलमे फँसने परदेस पड़ेलैए २ हम सुना रहल छी तीन धार भारी सहैत अछि भार कहथि सभ खेती सहिते अछि उजाड़। गिद्दड़ सन सुटकओने नाङरि आगू पाछ जे छल करैत। जे भोर साँझ, दश लोक माझ, हमरे दिश छल रहि-रहि बढ़ैत। हम आङुर पकड़ि जकरा पथपर अति शिघ्र चलाऽ देलौं हमरे प्रगतिक पथकेँ आगाँ, से ठाढ़ भेल बनिकऽ पहाड़॥ हम सुना ककरा कहबै के सुनत आब, पओ कतौ छैक छै कतौ घाव, हम भेलौं आब हड्डी समान, कहियो हमहीं रुचिगर कवाव। हम घास खाअकऽ पालि-पोसि, जकरा कएलौं दुधगरि लगहरि, तकरा लगमे जँ जाइत छियै, तऽ हमरे मारैए लथार॥ हम सुना, हम तोड़ि देबै झिक-झोड़ि देबै शाखा फल-फूल मचोड़ि देबै, स्वार्थक छै जे जड़िआएल बृक्ष तकरा जड़िस हक कोड़ि देबै। मनमे जे चिनगी सुनगि रहल, से कहियाधरि हम झाँपि सकब, तें ई मन जहिया लहरि जेतै, तहिया खएतै धोविया पछाड़॥ हम सुना ३ चलैमन जगदम्बाक द्वारि चलैमन जगदम्बाक द्वारि। सब दुःख हरती झोड़ी भरती, बिगड़ल देती सम्हारि॥ चलै मन... मधु कैटभक डरे पड़एला जटिया स्वयं विधाता। पूजन ध्यान बन्दना कएलनि कष्टहरु हे माता॥ बोधल हरि मारल मधु कैटभ बिधिकेँ कएल गोहारि। चलै मन.. महिषासुरक त्राससँ धरती थर-थर काँपए लागल छोड़ि अपन घर द्वारि देवता ऋषि मुनि जंगल भागल। हुनका सबहक कष्ट हरि लेलनि महिषासुरकेँ मारि। चलै मन.. हुँ कारक उच्चरित शब्दसँ धुम्र गेल सुरधाम। चण्ड-मुण्ड आ रक्तवीजकेँ मिटा देलनि माँ नाम। शुम्भ-निशुम्भ मारि धरतीसँ दैत्य कएल निकटारि॥ चलै मन... शशि कुज बुध गुरु शुक्र शनिश्रवर की दिनमणिक तारा। सर, नर मुनि, गन्धर्व अप्सरा सबहक अहीँ सहारा। हमरो नैया पार करु माँ, भबसँ दिय उबारि। चलै मन...

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् डॉ मित्रनाथ झा, १९५६- , पिता स्वनामधन्य मिथिला चित्रकार स्व. लक्ष्मीनाथ झा प्रसिद्ध खोखा बाबू, ग्राम-सरिसब, पोस्ट सरिसब-पाही, भाया- मनीगाछी, जिला-मधुबनी (भारत), सम्प्रति मिथिला शोध संस्थान, दरिभङ्गामे पाण्डुलिपि विभागाध्यक्ष ओ एम.ए. (संस्कृत) कक्षाक शिक्षार्थीकेँ एम.ए. पाठ्यक्रमक सभ पत्रक अध्यापन। लेखन, उच्चस्तरीय शोध ओ समाज-सेवामे रुचि। संस्कृत, मैथिली, हिन्दी, अंग्रेजी, भोजपुरी ओ उर्दू भाषामे गद्य-पद्य लेखन। राष्ट्रीय ओ अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर सुप्रतिष्ठित अनेकानेक पत्र-पत्रिका, अभिनन्दन-ग्रन्थ ओ स्मृति-ग्रन्थादिमे अनेको रचना प्रकाशित। राष्ट्रीय ओ अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर आयोजित अनेको सेमिनार, कॉनफेरेन्स, वर्कशॉप आदिमे सक्रिय सहभागिता। विदेह-वैभव विद्या-वैभव केर गरिमासँ सर्वथा पुक्त जे सिद्ध भूमि। अन्तर कदापि नहि जे कएलक अप्पन वा आनक थातीमे॥ देलक सदिखन जे पूर्ण ज्ञान निश्छलता ओ कर्मठतासँ। मद्धिम कखनहुँ नहि पड़य देल, दय तेल ज्ञान केर बातीमे॥ हवि ज्ञानक अप्पन सतत बाँटि, हो बुद्धिक कोनो अनुष्ठान। शिक्षाक भनहि हो कोनो विधा, वर्जित नहि हिनकर पातीमे। अक्षुण्ण राखि निज-मर्यादा, अन्यहु क्षेत्रक कएलक विकास। मिथिला केर तापस ज्ञान-भानुसँ, के-के नहि लेलक प्रकाश॥ मतवैभिन्यक अप्पन महिमा, के नहि जनैछ ई दिव्यभूमि। तमसँ आच्छादित मार्ग कोनो, त्वरिते पाओल ज्ञानक प्रकाश॥ रहि मध्य मार्ग केर अनुगामी, कामी नहि कोनहु तुच्छ फलक। कएलक प्रयास विध्वंसक बड़, पर कए न सकल किञ्चित् विनाश॥ होता कोनहु हो, यजमानक ज्ञानक मानक हो ध्यान सदा। मिथिला केर पावन धरतीपर, गुञ्जित हो ज्ञानक गान सदा॥ भग्न चिन्तन चिन्ताक तप्त दावानलमे हम की रचनात्मक कार्य करू। हियमे तँ अबैछ लहरि भावक, पर धार कोना ई पार करू॥ त्रिभुवन केर प्रायः कोनो वस्तु, मानव-चिन्तनसँ दूर नञि। की भावनाक ई दिव्य महल, होएत हमरासँ पूर नञि॥ लेखनी हमर ई बाजि रहल, की हमरा अपनहि भरि रखबेँ। मानस पट से धिक्कारि रहल, की समय एतबहि भरि रखबेँ॥ खाली हाथेँ जाएत सभ क्यो, ई नीक जेकाँ हम जनैत छी। लेखनीक आइ दुर्दशा देखि, एकान्त मौन भए कनैत छी॥ कारण जनैत छी नहि जाएत भूतलसँ संग एक्कोटा कण। पर मित्र भाग्यसारणी हमर नहि देलक एहन कोनो यक्षण॥ जेहि अनुपमेय क्षणमे अप्पन भावना अतीतकेँ दोहराबी। भग्ना वीणा केर रुग्ण तारपर दू आखर हमहूँ गाबी।

1414 14 14 श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ जन्म-1951 ई. कलकत्तामे।1966 मे 15 वर्षक उम्रमे पहिल काव्य संग्रह ‘कवयो वदन्ति’ | 1971 ‘अमृतस्य पुत्राः’(कविता संकलन) आ’ ‘नायकक नाम जीवन’(नाटक)| 1974 मे ‘एक छल राजा’/’नाटकक लेल’(नाटक)। 1976-77 ‘प्रत्यावर्त्तन’/ ’रामलीला’(नाटक)। 1978मे जनक आ’ अन्य एकांकी। 1981 ‘अनुत्तरण’(कविता-संकलन)। 1988 ‘प्रियंवदा’ (नाटिका)। 1997-‘रवीन्द्रनाथक बाल-साहित्य’(अनुवाद)। 1998 ‘अनुकृति’- आधुनिक मैथिली कविताक बंगलामे अनुवाद, संगहि बंगलामे दूटा कविता संकलन। 1999 ‘अश्रु ओ परिहास’। 2002 ‘खाम खेयाली’। 2006मे ‘मध्यमपुरुष एकवचन’(कविता संग्रह। भाषा-विज्ञानक क्षेत्रमे दसटा पोथी आ’ दू सयसँ बेशी शोध-पत्र प्रकाशित। 14 टा पी.एह.डी. आ’ 29 टा एम.फिल. शोध-कर्मक दिशा निर्देश। बड़ौदा, सूरत, दिल्ली आ’ हैदराबाद वि.वि.मे अध्यापन। संप्रति निदेशक, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर। नो एंट्री : मा प्रविश (चारि-अंकीय मैथिली नाटक) नाटककार उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ निदेशक, केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर (मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत 25 वर्षक मौनभंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख  प्रस्तुत भ’ रहल अछि।) पहिल अंक जारी....विदेहक एहि आठम अंक 15 अप्रैल 2008 सँ| नो एंट्री : मा प्रविश (चारि-अंकीय मैथिली नाटक) पात्र–परिचय पर्दा उठितहि  – ढोल–पिपही, बाजा–गाजा बजौनिहार–सब दूटा चोर, जाहि मे सँ एक गोटे पॉकिट–मार आ एकटा उचक्का दू गोट भद्र व्यक्ति प्रेमी प्रेमिका बाजार सँ घुरैत प्रौढ़ व्यक्ति बीमा कंपनीक एजेंट रद्‌दी किनै–बेचैबला भिख-मंगनी रमणी-मोहन नंदी–भृंगी कैकटा मृत सैनिक बाद मे नेता आ नेताक एक-दूटा चमचा/अनुयायी अभिनेता वाम-पंथी युवा उच्च–वंशीय महिला अंत मे यम चित्रगुप्त प्रथम कल्लोल [एकटा बड़का–टा दरबज्जा मंचक बीच मे देखल जाइछ। दरबज्जाक दुनू दिसि एकटा अदृश्य मुदा सक्कत देवार छैक, जे बुझि लेबाक अछि– कखनहु अभिनेता लोकनिक अभिनय–कुशलता सँ तथा कतेको वार्तालाप सँ से स्पष्ट भ’ जाइछ। मंच परक प्रकाश–व्यवस्था सँ ई पता नहि चलैत अछि जे दिन थिक अथवा राति, आलीक कनेक मद्धिम, सुर–संगत होइत सेहो कने मरियल सन। एकटा कतार मे दस–बारह गोटे ठाढ़ छथि–जाहि मे कैकटा चोर–उचक्का, एक-दू गोटे भद्र व्यक्तित मुदा ई स्पष्ट जे हुनका लोकनिक निधन भ’ चुकल छन्हि। एकटा प्रेमी–युगल जे विष-पान क’ कए आत्म-हत्या कैल अछि, मुदा एत’ स्वर्गक (चाही त’ नरकक सेहो कहि सकै छी) द्वार लग आबि कए कने विह्वल भ’ गेल छथि जे आब की कैल जाइक। एकटा प्रौढ व्यक्तित जे बजारक झोरा ल’ कए आबि गेल छथि–बुझाइछ कोनो पथ–दुर्घटनाक शिकार भेल छथि बाजार सँ घुरैत काल। एकटा बीमा कंपनीक एजेंट सेहो छथि, किछु परेशानी छनि सेहो स्पष्ट। एकटा रद्‌दीबला जे रद्दी कागजक खरीद–बिक्री करैत छल, एकटा भिखमंगनी–एकटा पुतलाकेँ अपन बौआ (भरिसक ई कहै चाहैत छल जे वैह छल ओकर मुइल बालक अथवा तकर प्रतिरूप) जकाँ काँख तर नेने, एक गोट अत्यंत बूढ़ व्यक्ति सेहो, जनिक रमणी–प्रीति एखनहु कम नहि भेल छनि, हुनका हमसब रमणी–मोहने कहबनि। सब गोटे कतार मे त’ छथि, मुदा धीरजक अभाव स्पष्ट भ’ जाइछ। क्यो-क्यो अनकाकेँ लाँघि आगाँ जैबाक प्रयास करैत छथि, त’ क्यो से देखि कए शोर करय लागैत छथि। मात्र तीन–चारिटा मृत सैनिक–जे कि सब सँ पाछाँ ठाढ़ छथि, हुनका सबमे ने कोनो विकृति लखा दैछ आ ने कोनो हड़बड़ी। बजार-बला वृद्ध :  हे – हे – हे देखै जाउ... देखि रहलछी कि नहि सबटा तमाशा... कोना–कोना क’ रहल छइ ई सब ! की ? त’ कनीटा त’ आगाँ बढ़ि जाई ! [एकटा चोर आ एकटा उचक्का केँ देखा कए बाजि रहल छथि, जे सब ओना त’ चारिम तथा पाँचम स्थान पर ढ़ाढ छैक, मुदा कतेको काल सँ अथक प्रयास क’ रहल अछि जे कोना दुनू भद्र व्यक्ति आ प्रेमी–प्रेमिका युगलकेँ पार क’ कए कतारक आगाँ पहुँचि जाई!] बीमा एजेंट   :         [नहि बूझि पबैत छथि जे ओ वृद्ध व्यक्ति हुनके सँ किछु कहि रहल छथि कि आन ककरहु सँ। बजार- बला वृद्ध सँ आगाँ छल रद्‌दी बेचैबला आ तकरहु सँ आगाँ छलाह बीमा बाबू।] हमरा किछु कहलहुँ ? बाजारी     :        अहाँ ओम्हर देखब त’ बूझि जायब हम की कहि रहल छी आ ककरा दय...! [अकस्मात् अत्यंत क्रोधक आवेश मे आबि ] हे रौ! की बुझै छहीं... क्यो नहि देखि रहल छौ ? [बीमा बाबू केँ बजारक झोरा   थम्हबैत -] हे ई धरू त’! हम देखै छी। [कहैत शोर करैत आगाँ बढ़ि कए एकटा चोर आ उचक्का केँ कॉलर पकड़ि कए घसीटैत पुनः पाछाँ चारिम-पाँचम स्थान पर ल’ अबैत छथि, ओसब वाद–प्रतिवाद कर’ लगैत अछि -] चोर       :         हमर कॉलर कियै धरै छी ? उचक्का    :         हे बूढ़ौ ! हमर कमीज, फाड़ि देबैं की ? बाजारी     :         कमीजे कियैक ? तोहर आँखि सेहो देबौ हम फोड़ि ! की बूझै छेँ ? क्यो किछु कहै बाला नहि छौ एत’? उचक्का        :        के छै हमरा टोकै–बला एत’? देखा त’ दिय’ ? चोर       :        आहि रे बा ! हम की कैल जे हमर टीक धैने छी? दोसर चोर :    (जे कि असल मे पॉकिट–मार छल) हे हे, टीक छोड़ि दी, नंगड़ी पकड़ि लियह सरबा क ! चोर       :        (गोस्सा सँ) तोँ चुप रह ! बदमाश नहितन ! पॉकिटमार  :        (अकड़ि कए) कियै ? हम कियै नहि बाजब ? उचक्का        :        (वृद्ध व्यक्तिक हाथ सँ अपना केँ छोड़बैत) ओय खुदरा ! बेसी बड़बड़ैलें त’... (हाथ सँ इशारा करैत अछि गरा काटि देबाक) पॉकिटमार  :        त’ की करबें ? उचक्का    :        (भयंकर मुद्रामे आगाँ बढ़ैत) त’ देब  धड़ सँ गरा केँ अलगाय... रामपुरी देखने छह ? रामपुरी ? (कहैत एकटा चाकू बहार करैत अछि।) चोर       :    हे, की क’ रहल छी... भाइजी, छोड़ि दियौक ने ! बच्चा छै... कखनहु–कखनहु जोश मे आबि जाइ छै ! भद्र व्यक्ति 1 :    (पंक्तिक आगाँ सँ) हँ, हँ... छोड़ि ने देल जाय ! उचक्का    :       [भयंकर मुद्रा आ नाटकीयता केँ बरकरार रखैत पंक्तिक आगाँ दिसि जा कए... अपन रामपुरी चाकू केँ दोसर हाथ मे उस्तरा जकाँ घसैत ] छोड़ि दियह की मजा चखा देल जाय ? [एहन भाव– भंगिमा देखि दुनू भद्र व्यक्ति डरै छथि–प्रेमी– युगल अपनहिमे मगन छथि; हुनका दुनू केँ दुनियाक आर किछु सँ कोनो लेन-देन नहि...] की ? [घुरि कए पॉकिट–मार दिसि अबैत... तावत् ई सब देखि बाजारी वृद्धक होश उड़ि जाइत छनि... ओ चोरक टीक/कॉलर जे कही... छोड़ि दैत छथि घबड़ा कए ] की रौ ? दियौ  भोंकि ? आ कि…? चोर       :        उचकू–भाइजी ! बच्चा छै... अपने बिरादरीक बुझू...! [आँखि सँ इशारा करै छथि।] उचक्का    :        [अट्टहास् करैत] ऐं ? अपने बिरादरीक थिकै ? [हँसब बंद कए- पूछैत] की रौ ? कोन काज करै छेँ? [पॉकिट-मार डरेँ किछु बाजि नहि पबैत अछि– मात्र दाहिना हाथक दूटा आङुर केँ कैंची जकाँ चला कए देखबैत छैक।] उचक्का    :        पॉकिट-मार थिकेँ रौ ? [पुनः हँस’ लागै छथि-छूरी केँ तह लगबैत’] चोर            :        कहलहुँ नहि भाईजी ? ने ई हमरा सन माँजल चोर बनि सकल आ ने कहियो सपनहु मे सोचि सकल जे अहाँ सन गुंडा आ  बदमाशो बनि सकत ! उचक्का    :       बदमाश ? ककरा कहलेँ बदमाश ? आँय ! पॉकिट-मार  :    हमरा, हुजूर ! ओकर बात जाय दियह ! गेल छल गिरहथक घर मे सेंध देब’... जे आइ ने जानि कत्ते टका-पैसा-गहना भेटत ! त’ पहिले बेरि मे जागि गेल गिरहथ, आ तकर चारि–चारिटा जवान-जहान बालक आ सँगहि आठ–आठटा कुकुर... तेहन ने हल्ला मचा देलक जे पकड़ि कए पीटैत–पीटैत एत’ पठा देलक ! [हँसैत... उचक्का सेहो हँसि दैत अछि] आब बुझु ! ई केहन चोर थिक ! (मुँह दूसैत) हमरा कहैत छथि ! [कतारक आनो-आन लोक आ अंततः सब गोटे हँसय लागैत छथि] भद्र-व्यक्तित 1:   आँय यौ,चोर थिकौं ? लागै त’ नहि छी चोर जकाँ... चोर       :        किएक ? चोर देख’   मे केहन होइत छैक ? पॉकिट-मार  :     हमरा जकाँ...! (कहैत, हँसैत अछि, आरो एक-दू गोटे हँसि दैत छथि।) चललाह भिखारी बौआ बन’... ? की ? त’ हम तस्कर-राज छी !  [कतहु सँ एकटा टूल आनि ताहि पर ठाढ़ होइत... मंचक आन दिसिसँ भाषणक भंगिमा मे] सुनू, सुनू, सुनू, भाई–भगिनी! सुनू सब गोटे! श्रीमान्, श्रील 108 श्री श्री बुद्धि-शंकर महाराज तस्कर सम्राट आबि रहल छथि! सावधान, होशियार! [एतबा कहैत टूल पर सँ उतरि अपन हाथ-मुँहक मूकाभिनयसँ एहन भंगिमा करैत छथि जेना कि भोंपू बजा रहल होथि... पाछाँ सँ भोंपू – पिपहीक शब्द कनिये काल सुनल जाइछ, जाबत ओ ‘मार्च’ करैत चोर लग अबैत अछि...] चोर              :       [कनेक लजबैत] नहि तोरा हम साथ लितहुँ ओहि रातिकेँ, आ ने हमर पिटाइ देखबाक मौके तोरा भैटतिहौक! [कहैत आँखि मे एक-दूइ बुन्न पानि आबि जाइत छैक।] पॉकिट-मार  :        आ-हा-हा! एहि मे लजबैक आ मोन दुखैक कोन गप्प? [थम्हैत, लग आबि कए]  देखह! आइ ने त’ काल्हि-चोरि त’ पकड़ले जाइछ। आ एकबेर जँ भंडा- फोड़ भ’ जाइत अछि त’ बज्जर त’ माथ पर खसबे करत ! सैह भेल... एहि मे दुख कोन बातक ? उचक्का        :        (हँसैत) हँ, दुखी कियै होइ छहक? बाजारी         :        [एतबा काल आश्चर्य भए सबटा सुनि रहल छलाह। आब रहल नहि गेलनि – अगुआ कए बाजय लगलाह] हे भगवान! हमर भाग मे छल स्वस्थहि शरीर मे बिना कोनो रोग-शोक भेनहि स्वर्ग मे जायब... तैँ हम एत’ ऐलहुँ, आ स्वर्गक द्वार पर ठ़ाढ छी क्यू मे...! मुदा ई सब चोर–उचक्का जँ स्वर्गे मे जायत, तखन केहन हैत ओ स्वर्ग रहबाक लेल ? पॉकिट-मार  :        से कियै बाबा ? अहाँ की बूझै छी, स्वर्ग त’ सभक लेल होइत अछि ! एहि मे ककरहु बपौती त’ नञि। बाजारी         :     [बीमा एजेंट केँ] आब बूझू ! आब.... चोर सिखाबय गुण केर महिमा, पॉकिट–मारो करै बयान! मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि, पाट–कपाट त’ जय सियाराम ! [चोर-उचक्का-पॉकिट-मार ताली दैत अछि, सुनि कए     चौंकैत भिख-मंगनी आ प्रेमी-युगल बिनु किछु बुझनहि ताली बजाब’ लागैत अछि।] चोर       :        ई त’ नीक फकरा बनि गेल यौ! पॉकिट-मार  :        एम्हर तस्कर-राज त’ ओम्हर कवि-राज! बाजारी     :        (खौंझैत’) कियै ? कोन गुण छह तोहर, जकर बखान करै अयलह एत’? पॉकिट-मार  :        (इंगित करैत आ हँसैत) हाथक सफाई... अपन जेब मे त’ देखू , किछुओ बाकी अछि वा नञि... बाजारी     :        [बाजारी तुरंत अपन जेब टटोलैत छथि – त’ हाथ पॉकिटक भूर देने बाहर आबि जाइत छनि। आश्चर्य चकित भ’ कए मुँह सँ मात्र विस्मयक आभास होइत छनि।] जा ! [बीमा बाबूकेँ आब रहल नञि गेलनि। ओ ठहक्का पाड़ि कए हँस’  लगलाह, हुनकर देखा–देखी कैक गोटे बाजारी दिसि हाथ सँ इशारा करैत हँसि रहल छलाह।] चोर       :        [हाथ उठा कए सबकेँ थम्हबाक इशारा करैत] हँसि त’ रहल छी खूब ! उचक्का    :        ई बात त’ स्पष्ट जे मनोरंजनो खूब भेल हैतनि। पॉकिट-मार  :        मुदा अपन-अपन पॉकिट मे त’ हाथ ध’ कए देखू ! [भिखमंगनी आ प्रेमी-युगल केँ छोड़ि सब क्यो पॉकिट टेब’ लागैत’ छथि आ बैगक भीतर ताकि-झाँकि कए देख’ लागैत छथि त’ पता चलैत छनि जे सभक पाइ, आ नहि त’ बटुआ गायब भ’ गेल छनि। हुनका सबकेँ ई बात बुझिते देरी चोर, उचक्का, पॉकिट-मार आ भिख-मंगनी हँस’ लागैत छथि। बाकी सब गोटे हतबुद्धि भए टुकुर- टुकुर ताकिते रहि जाइत छथि] भिखमंगनी  :        नंगटाक कोन डर चोर की उचक्का ? जेम्हरहि तकै छी लागै अछि धक्का ! धक्का खा कए नाचब त’ नाचू ने ! खेल खेल हारि कए बाँचब त’ बाँचू ने ! [चोर-उचक्का–पॉकिट-मार, समवेत स्वर मे जेना धुन गाबि रहल होथि] नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का ! आँखिएक सामने पलटल छक्का ! भिख-मंगनी :       खेल–खेल हारि कए सबटा फक्का ! समवेत-स्वर :    नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का ? [कहैत चारू गोटे गोल-गोल घुर’ लागै छथि आ नाचि नाचि कए कहै छथि।] सब गोटे      :         आब जायब, तब जायब, कत’ ओ कक्का ? पॉकिट मे हाथ दी त’ सब किछु लक्खा ! नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का ! बीमा-बाबू     :         (चीत्कार करैत) हे थम्ह’  ! बंद कर’ ई तमाशा... चोर       :         (जेना बीमा-बाबूक चारू दिसि सपना मे भासि रहल होथि एहन भंगिमा मे) तमाशा नञि... हताशा....! उचक्का        :         (ताहिना चलैत) हताशा नञि... निराशा ! पॉकिट-मार :        [पॉकिट सँ छह-सातटा बटुआ बाहर क’  कए देखा – देखा कए] ने हताशा आ ने निराशा, मात्र तमाशा... ल’ लैह बाबू छह आना, हरेक बटुआ छह आना! [कहैत एक–एकटा बटुआ बॉल जकाँ तकर मालिकक दिसि फेंकैत छथि आ हुनका लोकनि मे तकरा सबटाकेँ बटौर’ लेल हड़बड़ी मचि जाइत छनि। एहि मौकाक फायदा उठबैत चोर–उचक्का-पॉकिटमार आ भिख-मंगनी कतारक सब सँ आगाँ जा’ कए ठाढ भ’ जाइत छथि।] रद्‌दी-बला  :   [जकर कोनो नुकसान नहि भेल छल-ओ मात्र मस्ती         क’ रहल छल आ घटनासँ भरपूर आनन्द ल’ रहल  छल।] हे बाबू– भैया लोकनि ! एकर आनन्द नञि अछि कोनो जे “भूलल-भटकल कहुना क’ कए घुरि आयल अछि हमर बटुआ”। [कहैत दू डेग बढा’ कए नाचिओ लैत’ छथि।] ई जे बुझै छी जे अहाँक धन अहीं केँ घुरि आयल... से सबटा फूसि थिक ! बीमा-बाबू   :       (आश्चर्य होइत) आँय ? से की ? बाजारी     :       (गरा सँ गरा मिला कए) सबटा फूसि ? भद्र-व्यक्ति 1          :    की कहै छी ? भद्र-व्यक्ति 2          :        माने बटुआ त’ भेटल, मुदा भीतर ढन–ढन ! रद्‌दी-बला  :        से हम कत’ कहलहुँ ? बटुओ अहींक आ पाइयो छैहे! मुदा एखन ने बटुआक कोनो काज रहत’ आ ने पाइयेक! बीमा-बाबू   :        माने ? रद्‌दी-बला  :        माने नञि बुझलियैक ? औ बाबू ! आयल छी सब गोटे यमालय... ठाढ़ छी बन्द दरबज्जाक सामने... कतार सँ... एक–दोसरा सँ जूझि रहल छी जे के पहिल ठाम मे रहत आ के रहत तकर बाद...? तखन ई  पाइ आ बटुआक कोन काज ? भद्र-व्यक्ति1 :       सत्ये त’! भीतर गेलहुँ तखन त’ ई पाइ कोनो काज मे  नहि लागत ! बाजारी     :       आँय ? भद्र-व्यक्ति2 :        नहि बुझिलियैक ? दोसर देस मे जाइ छी त’ थोड़े चलैत छैक अपन रुपैया ? (आन लोग सँ सहमतिक अपेक्षा मे-) छै कि नञि ? रमणी-मोहन :         (जेना दीर्घ मौनता के तोड़ैत पहिल बेरि किछु ढंग केर बात बाजि रहल छथि एहन भंगिमा मे... एहि सँ पहिने ओ कखनहु प्रेमी-युगलक लग जाय प्रेमिका केँ पियासल नजरि द’ रहल छलाह त’ कखनहु भिख-मंगनिये लग आबि आँखि सँ तकर शरीर केँ जेना पीबि रहल छलाह...) अपन प्रेमिका जखन अनकर बियाहल पत्नी बनि जाइत छथि तखन तकरा सँ कोन लाभ ? (कहैत दीर्घ-श्वास त्याग करैत छथि।) बीमा-बाबू   :        (डाँटैत) हे...अहाँ चुप्प रहू! क’ रहल छी बात रुपैयाक, आ ई कहै छथि रूप दय...! रमणी-मोहन :       हाय! हम त’ कहै छलहुँ रूपा दय! (भिख-मंगनी रमणी-मोहन लग सटल चलि आबै छैक।) भिख-मंगनी :      हाय! के थिकी रूपा ? रमणी-मोहन :      “कानि-कानि प्रवक्ष्यामि रूपक्यानि   रमणी च... ! बाजारी     :        माने ? रमणी-मोहन :       एकर अर्थ अनेक गंभीर होइत छैक... अहाँ सन बाजारी नहि बूझत! भिख-मंगनी :       [लास्य करैत] हमरा बुझाउ ने! [तावत भिख-मंगनीक भंगिमा देखि कने-कने बिहुँसैत’          पॉकिट–मार लग आबि जाइत अछि।] भिख-मंगनी :         [कपट क्रोधेँ] हँसै कियै छें ? हे... (कोरा सँ पुतलाकेँ पॉकिट-मारकेँ थम्हबैत) हे पकड़ू त’ एकरा... (कहैत रमणी-मोहन लग जा कए) औ मोहन जी! अहाँ की ने कहलहुँ, एखनहु धरि भीतर मे एकटा छटपटी मचल यै’! रमणी-धमनी कोन बात’ कहलहुँ ? रमणी-मोहन :       धूर मूर्ख! हम त’ करै छलहुँ शकुन्तलाक गप्प, मन्दोदरीक व्यथा... तोँ की बुझबेँ ? भिख-मंगनी :        सबटा व्यथा केर गप बुझै छी हम... भीख मांगि- मांगि खाइ छी, तकर माने ई थोड़े, जे ने हमर शरीर अछि आ ने कोनो व्यथा... ? रमणी-मोहन :        धुत् तोरी ! अपन व्यथा–तथा छोड़, आ भीतर की छैक, ताहि दय सोच ! (कहैत बंद दरबज्जा दिसि देखबैत छथि-) पॉकिट-मार :        (अवाक् भ’ कए दरबज्जा दिसि देखैत) भीतर ? की छइ भीतरमे... ? रमणी-मोहन :      (नृत्यक भंगिमा करैत ताल ठोकि-      ठोकि कए) भीतर? “धा–धिन–धिन्ना... भरल तमन्ना ! तेरे-केरे-धिन-ता... आब नञि चिन्ता !” भिख-मंगनी :       (आश्चर्य भए) माने ? की छैक ई ? रमणी-मोहन :      (गर्व सँ) ‘की’ नञि... ‘की’ नञि... ‘के’ बोल ! बोल- भीतर ‘के’ छथि ? के, के छथि? पॉकिट-मार  :        के, के छथि? रमणी-मोहन :       एक बेरि अहि द्वारकेँ पार कयलेँ त’ भीतर भेटती एक सँ एक सुर–नारी,उर्वशी–मेनका–रम्भा... (बाजैत- बाजैत जेना मुँहमे पानि आबि जाइत छनि--) भिख-मंगनी :       ईः! रंभा...मेनका... ! (मुँह दूसैत) मुँह-झरकी सब... बज्जर खसौ सबटा पर! रमणी-मोहन :       (हँसैत) कोना खसतैक बज्जर ? बज्र त’ छनि देवराज इन्द्र लग ! आ अप्सरा त’ सबटा छथि हुनकहि नृत्यांगना। [भिख-मंगनीक प्रतिक्रिया देखि कैक गोटे हँस’ लगैत छथि] पॉकिट-मार    :     हे....एकटा बात हम कहि दैत छी – ई नहि बूझू जे दरबज्जा खोलितहि आनंदे आनंद ! बाजारी     :         तखन ? बीमा-बाबू   :         अहू ठाम छै अशांति, तोड़-फोड़, बाढ़ि आ सूखार ? आ कि चारू दिसि छइ हरियर, अकाससँ झहरैत खुशी केर लहर आ माटिसँ उगलैत सोना ? पॉकिट-मार :       किएक        ? जँ अशांति, तोड़-फोड़ होइत त’ नीक... की बूझै छी, एत्तहु अहाँ जीवन–बीमा चलाब’ चाहै छी की ? चोर       :         (एतबा काल उचक्का सँ फुसुर-फुसुर क’ रहल छल आ ओत्तहि, दरबज्जा लग ठाढ़ छल– एहि बात पर हँसैत आगाँ आबि जाइत अछि) स्वर्गमे जीवन-बीमा ? वाह ! ई त’ बड्ड नीक गप्प ! पॉकिट-मार :       देवराज इंद्रक बज्र.. बोलू कतेक बोली लगबै छी? उचक्का    :         पन्द्रह करोड़! चोर       :         सोलह! पॉकिट-मार :       साढे-बाईस! बीमा-बाबू   :         पच्चीस करोड़! रमणी-मोहन :         हे हौ! तोँ सब बताह भेलह ? स्वर्गक राजा केर बज्र, तकर बीमा हेतैक एक सय करोड़ सँ कम मे ?                                          [कतहु सँ एकटा स्टूलक जोगाड़ क’ कए ताहि पर चट दय  ठाढ़ भ’ कए-] पॉकिट-मार :       बोलू, बोलू भाई-सब ! सौ करोड़ ! बीमा-बाबू   :         सौ करोड़ एक ! चोर       :         सौ करोड़ दू – रमणी-मोहन :       एक सौ दस ! भिख-मंगनी :       सवा सौ करोड़ ! चोर       :         डेढ़सौ करोड़... भिख-मंगनी :       पचपन – चोर       :         साठि – भिख-मंगनी :       एकसठि – [दूनूक आँखि–मुँह पर ‘टेनशन’ क छाप स्पष्ट भ’ जाइत छैक। ] चोर            :       (खौंझैत)  एक सौ नब्बै... [एतेक बड़का बोली पर भिख-मंगनी चुप भ’ जाइत अछि।] पॉकिट-मार :       त’ भाई-सब ! आब अंतिम घड़ी आबि गेल अछि – 190 एक, 190 दू, 190... [ठहक्का पाड़ि कए हँस’ लगलाह बाजारी, दूनू भद्र व्यक्ति आ रद्‌दी-बला-] पॉकिट-मार :       की भेल ? चोर       :         हँस्सीक मतलब ? बाजारी     :         (हँसैते कहैत छथि) हौ बाबू ! एहन मजेदार मोल- नीलामी हम कतहु नञि देखने छी ! भद्र-व्यक्ति 1          :         एकटा चोर... भद्र-व्यक्ति 2          :       त’ दोसर भिख-मंगनी... बाजारी     :         आ चलबै बला पॉकिट-मार... [कहैत तीनू गोटे हँस’ लागै छथि] बीमा-बाबू   :         त’ एहि मे कोन अचरज? भद्र-व्यक्ति 1          :       आ कोन चीजक बीमाक मोल लागि रहल अछि– त’ बज्र केर ! भद्र-व्यक्ति 2          :       बज्जर खसौ एहन नीलामी पर ! बाजारी     :         (गीत गाब’ लागै’ छथि) चोर सिखाबय बीमा–महिमा, पॉकिट-मारो करै बयान ! मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि, पाट कपाट त’ जय सियाराम ! दुनू भद्र-व्यक्ति  :      (एक्कहि संगे) जय सियाराम ! [पहिल खेप मे तीनू गोटे नाच’-गाब’ लागै छथि। तकर बाद धीरे-धीरे बीमा बाबू आ रद्‌दी-बला सेहो संग दैत छथि।] बाजारी     :         कौआ बजबै हंसक बाजा भद्र-व्यक्ति 1          :       हंस गबै अछि मोरक गीत भद्र-व्यक्ति 2          :       गीत की गाओत ? छल बदनाम ! बाजारी     :         नाट-विराटल जय सियाराम ! समवेत    :         मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि। पाट-कपाटक जय सियाराम ! [चोर-उचक्का-पॉकिट-मार ताली दैत अछि, सुनि कए चौंकैत भिख-मंगनी आ प्रेमी-युगल बिनु किछु बुझनहि ताली बजाब’ लागैत अछि।] (क्रमश:) Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् नूतन झा; गाम : बेल्हवार, मधुबनी, बिहार; जन्म तिथि : ५ दिसम्बर १९७६; शिक्षा - बी एस सी, कल्याण कॉलेज, भिलाई; एम एस सी, कॉर्पोरेटिव कॉलेज, जमशेदपुर; फैशन डिजाइनिंग, निफ्ट, जमशेदपुर।“मैथिली भाषा आ' मैथिल संस्कृतिक प्रति आस्था आ' आदर हम्मर मोनमे बच्चेसॅं बसल अछि। इंटरनेट पर तिरहुताक्षर लिपिक उपयोग देखि हम मैथिल संस्कृतिक उज्ज्वल भविष्यक हेतु अति आशान्वित छी।” जानकी नवमी)13 मई 2008)  पर विशेष निबंध - नूतन झा बारातीसत्कार आजुक आधुनिक परिवेशमे विवाहक पुरान मान्यता आर विधि विधान अपन प्रतीकात्मक स्वरूपमे शेष बचल अछि। दिन पर दिन ओकर स्थान अपव्यय सँ परिपूर्ण परिपाटी लऽ रहल अछि। हम सब पौराणिक आ’ तर्कसंगत विचारक अवशेष मात्र देखि रहल छी। आब निरंतर जीवनशैलीमे आधुनिकताक समावेष भऽ रहल अछि। एकर किछु प्रत्यक्ष लाभो अछि, जेनाकि बढ़ियाँ शिक्षा आ' स्वास्थ्य व्यवस्था। किन्तु आधुनिकताक दुष्परिणामक सूचि बनाबी तऽ ओ’ अनन्त रहत। विवाहादिमे जे आडंबर आ' विलासितापूर्ण प्रदर्शन होइत अछि ओकर निर्वाह सर्व साधारणक लेल काफी कठिन अछि।पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा कएलाक बाद एक साधारण कन्यापक्ष विवाह समारोहक उच्चवर्गीय प्रदर्शनक आर्थिक आघात केँ कोना सहत? विभिन्न प्रकारक ताम-झाम युक्त महग व्यवस्थाक निर्वाह बहुत कष्टकारी होइत छैक। किछु घंटाक शोभा बढ़ाब’ लेल वा विवाह समारोह केँ कथित रूप सॅं अविश्वसनीय बनाबए केर दवाब सॅं लोग हजारों लाखों रूपैया पानिमे बहा दैत अछि। नब पीढ़ीक सुशिक्षित लोक केँ बुझबाक चाही जे विवाहकेँ अविस्मरणीय बनाबैत छैक दू परिवारक आपसी स्नेह आ' सम्बन्ध। विवाहकेँ अविस्मरणीय बनाबैत छैक ओकर सफलता जाहि लेल मात्र निष्ठा आ' विश्वासक प्रचुरता चाही, टेंट हाउस भोज व्यवस्था वा महग कपड़ा लत्ता आर गहना जेवर नञि। ई सभ कृत्रिम साधनक मॉँग मध्यम वर्गीय परिवारक लेल सीमित रहय तखने कल्याण अछि। अपव्यय सॅं बचि कऽ यदि नवयुगक वर कन्या अपन सूझ बूझ सॅं गरिमामय सम्बन्धक शुरूआत करथि तऽ ई सभक हितमे होयत।कन्यापक्ष पर वरपक्ष द्वारा बारातीक भव्य स्वागतक दबाब देखि बड़ा दुख होइत अछि। स्वागत तऽ हृदय सॅं हुअक चाही रूपैया पैसा सॅं नहिं। एकटा गरीब परिवारक व्यथा संवेदनशील व्यक्तिकेँ आडंबरक प्रति आर कठोर बनाबए लेल पर्याप्त अछि। एक कविक कविताक किछु पंक्ति उल्लेखित अछि : ''कोना करू बरियाती जी अहॉंक सत्कार यौ । धानो नहि भेल हमरा रब्बियो के नञि आस यौ ॥ कठिन समय छैक सुनियउ भारी परिवार यौ। रूख सुख जे भेटए कऽ लियउ स्वीकार यौ॥ सम्बन्ध बनाबऽ एलहुँ अहॉं राखू हमरो लाज यौ। घर द्वारो टूटल फाटल दलान पर नहि खाट यौ॥ दिन राति पेट भरय लय करि कऽ रोजगार यौ। खानपियनि दऽ नहि सकलहुँ छी बहुत लाचार यौ॥” आउ हम सब अहि आडंबरक समूल नाश कऽ मिथिलाक गरिमा बढ़ाबी। जानकी-नवमी वैशाख मासक शुक्ल पक्षक नवमी तिथि केँ जानकी-नवमी मनाओल जाइत अछि। लोक ओहि दिन व्रत राखैत छथि आ' सीताजीक पूजा अर्चना करैत छथि। सीता माता लक्ष्मीजीक अवतार मानल गेल छथि, तैँ ई मान्यता अछि जे ई व्रत कएलासॅं सुख एवम्‌ सम्पत्तिक प्राप्ति होइत अछि। एहि वर्ष ई पाबनि अंग्रेजी तारिख १३ मई, २००८ मंगलवार केँ अछि। कथा अछि जे राजर्षि जनकजी केँ सीताजी शैशवावस्थामे अही दिन प्राप्त भेल रहथिन्ह।राजा जनक जनकपुरक राजा छलाह आ' संतानहीन जाहिसँ एहि दु:ख सॅं पीड़ित छलाह।एक दिन कोनो शुभ कार्यक प्रयोजन सॅं ओ’ खेतमे हर जोतए गेलाह। ओही बीच हुनकर हरसॅं लागि एक स्वर्णक कलशमे सॅं एक दिव्य बालिका प्रकट भेलीह, जिनका राजा जनक आ' हुनकर पत्नी सुनयना गोद लऽ लेलखिन। बालिकाक नाम सीता राखल गेल जकर अर्थ होइत अछि हर। देवी सीताक जानकी नाम सेहो पड़ल अछि। किन्वदन्ति अछि जे सीताजी लक्ष्मी माताक अवतार देवी वेदवतीक पुनर्जन्म रूप छलीह। ऋषि कुषध्वजक पुत्री वेदवती परम सुन्दरी छलीह आ स्वयम्‌ केँ विष्णु देव केँ प्रति अर्पित कएने छलीह। अनेको राजासॅं आयल विवाहक प्रस्ताव अस्वीकृत कऽ दैत छलीह। अहि कारणसँ  ओ अहंकारी रावण के सेहो मना कऽ देलन्हि जाहि द्वारे हुनका रावणक अत्याचार सहऽ पड़लन्हि।दुःखी भय वेदवती प्रतिज्ञा लेलन्हि जे ओ अपन पुनर्जन्ममे रावणक विनाशक कारण बनतीह आ स्वयम्‌केँ अग्निमे भष्म क’ लेलन्हि।एहि बीच मन्दोदरि गर्भवती भेलीह। अपन पतिक कुकृत्य दऽ सुनलाक बाद ओ’ अपन भावी संतानकेँ लऽ कऽ आशंकित भऽ गेलीह।ओ’ अपन नइहर गेलीह आ’ अपन माता पिताक संग तीर्थ करय लगलीह। जन्मक समय नजदीक अएला पर ओ’ अपन संतानक लेल आश्रय ताकए लगलीह। तखने संजोगसॅं संतानहीन राज जनकक खिस्सा सुनलन्हि आ' समय पाबि अपन पुत्रीकँ राजाक पथमे नुकाबएमे सक्षम भऽ गेलीह।किछु लोक इहो कहैत छथि, जे संभवत: सीताजीक जन्मक बाद हुनका पानिमे बहा’ देल गेल छल आ’ संयोगसँ ओ’ जनकजीक खेत लग कात लगलीह। कथा इहो प्रचलित अछि जे राक्षसक अत्याचारसॅं हताहत ऋषि मुनिक शोणित एक कलशमे एकत्रित कऽ भूमिमे गाड़ि देल गेल छल। बादमे ओहि कलशसॅं सीताजीक जन्म भेल। जन्मक पाछाँ खिस्सा चाहे जे होए उद्देश्य तऽ रावणक नाशे रहए। एकर सांकेतिक अर्थ यैह अछि जे ‘यत्र नार्येस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’। अर्थात्‌ जतए स्त्रीक आदर होइत अछि ततए देवताक निवास होइत अछि आ' ओकर विपरीत स्त्रीक अपमान करनिहार दुखद अंत पाबैत छथि। किछु लोक मानैत छथि जे सीताक जन्म फाल्गुन मासक कृष्ण पक्षक अष्टमी तिथिकेँ भेल छन्हि।

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् श्री विद्यानन्द झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा। पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आऽ संरक्षणमे संलग्न। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह। ॐ ॥श्री गणेशाय नमः॥ “श्रृष्टि चक्र” आदिमे शुन्य छल शुन्यसँ शान्ति छल। शुन्य केर सत्ता दिग-दिगन्त व्याप्त छल। शून्यक विधाता शून्यसँ आक्रान्त छल। शून्यसँ प्रारम्भ भए शून्यहिसँ विराम छल। विधिना विधान कएल रचना संसार कएल। खेत पथार पोखरि ओ जीवक संचार कएल। दिति ओ अदितिसँ श्रृष्टिक विस्तार कएल। कर्म सभक बान्हि बान्हि धरतीपर आनि धएल। शुन्यक विखंडनसँ वृत्तक विस्तार भेल। पोखरि ओ झांखड़ि पर्वत पहाड़ भेल। नदी-नद तालाब ओ वनस्पति हजार भेल। जीव जङ्गम स्थावर ओ गतिमान संसार भेल। चन्द्र सूर्य नक्षत्र ओ वायु वारिद नीर। धरा-गगन धरि व्याप्त भेल विद्युत ओ समीर। सभतरि पसरल तेज पुञ्ज चकाचौंध गम्भीर। तम-तम करइत दिन दुपहरिया नयन भरल ओ नीर। जल चर- थलचर- नभचर नाना। अप्पन-अप्पन धएलक बाना। विविध भेष ओ भाषा नाना। कएलक निज-निज गोत्र बखाना। विष ओ अमृत संग जनमि गेल। स्नेह-प्रेम-आघात प्रगट भेल। दोस्त-महिम कुटुम्ब अमरबेल। चतरि-चतरि चहुँओर पसरि गेल। एक दिशि जनमल चोर-उचक्का। दोसर दिशि भलमानुष सुच्चा। श्रृष्टि हेतु- समधानल सभटा। प्रभु सभ करथि हुनक ई छिच्छा। गोङ बधिर बजबैका नाङ्गर। श्वेत-श्याम सत्वर ओ अजगर। दीर्घकाय ओ दुव्वर पातर। सभटा रचलैन्हि ओ विश्वम्भर। भूख रचल प्यास रचल। श्रम ओ संधान रचल। रोग रचल व्याधि रचल। औषध अपार रचल। काम भूख दाम भूख वासनाक उग्रभूख। शान-मान-दान भूख भूखक हजार रूप। ई भूख ओ भूख भूखक विद्रूप रूप। भूख मुदा बढ़िते गेल धधकैत विकराल रूप। शाम-दाम-दण्ड भेद शासन कुशासन। काम-क्रोध-लोभ-मोह विरचल “महाशन”। राग-द्वेष-प्रेम-वैर पसरल हुताशन। श्रृष्टि चक्र चलैत रहल वैदिक ऋचा सन।....। घर बनल गाम बनल नगर ओ धाम बनल। जनता जरल सन नेता भगवान बनल। देशक खेवैया झुठ्ठा बेइमान बनल। भक्तिक भभटपन पण्डा शैतान बनल। श्रृष्टि चक्र चलैत रहल वैदिक ऋचा सन।... पाद-टिप्पणी: १.वारिद-मेघ २.समधानल-ओरियाकऽ ३.छिच्छा-स्वभाव ४.संधान-अन्वेषण,खोज ५.महाशन-विष्णु ६.हुताशन-अग्नि.

33 3 3 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् अमित कुमार झा, चैनपुर, सहरसा बुढ़ी माता अपन परिवार- माँ, बाबूजी, भाइ, बहिन) संग पटनाक शेखपुरामे रहैत रही, बाबूजी पी.डब्लू. डी. मे एस.डी.ओ. एकटा प्रसिद्ध ईमानदार अधिकारी रहथि, सभसँ पैघ भैया पी.एच.ई.डी.दुमकामे पोस्टेड रहथि। हम सेंट जेवियर्स स्कूल, गाँधी मैदानसँ बारहमा करैत रही, पढ़ाइ-लिखाइमे बहुत नीक रही, पढ़ाइ-लिखाइक अलावा कोनो काज नहि रहए, ओइ पढ़ाइ-लिखाइक कारण हम बहुत कम उम्रमे नीक पद- मैनेजर बिरला ग्रुप- पर छी, हमर किछु दोस्त रहए जे ओहि समयक पैघ राजनीतिक परिवारसँ संबंधित छलाह- एहि विषयमे बादमे कहब- आइक तिथिमे सेहो बहुत पैध स्थानपर छथि। बारहमाक संगहि राम मनोहर राय, एस.पी.वर्मा रोड, पटनासँ मेडिकल एन्ट्रेंसक तैयारी सेहो करैत रही। मुख्य घटना मोन पड़ैत अछि जनवरी १९९५ क – कोचिंग क्लास ५.३० बजे भोरे सँ होइत रहए, हम घरसँ अन्हारे- ४.३०-४.४५ निकलैत रही। पटनामे जनवरी मासमे बहुत ठण्डी पड़ैत छैक, ओहि समयमे आर बेशी ठंडी पड़ैत रहए। ठंडा, ऊपरसँ अन्हार सुनसान रस्ता, बहुत डर सेहो लगैत रहए, लेकिन एक नया जोशमे सभ किछु बिसरि जाइत रही। ११ जनवरी १९९५ केँ कोचिंगमे ’मोड्युल टेस्ट’ रहए, ई कारण हम ४ बजे घरसँ कोचिंग निकलि पड़लहुँ- कारण ठंढाक कारण लेट नहि होए। हम जहिना पुनाइचक-हड़ताली मोड़क बीच मेन रेलवे लाइन लग पहुँचलहुँ, अचानक एक टा घोघ तनने, करिया कम्बल ओढ़ने बुढ़ी माता सामना आबि गेलि, हम तँ डरसँ साइकिलसँ खसि पड़लहुँ, देखलहुँ तँ ओ बहुत बुढ़ आरो कमर लगसँ झुकल लागल। हम उठि कऽ ठाढ़ भेलहुँ, गरदा सभ झाड़ि कऽ जहिना चलय लऽ चाहलहुँ तँ ओऽ आवाज देलक,..सुन..अ..बौवा... डरसँ हालत खराब भऽ गेल..चारू दिससँ सनसन जेकाँ अवाज महसूस हुअ लागल। डरल-डरल ओकरा लग गेलहुँ..। पुछलक...कतए जाऽ रहल छी!!! ताऽ तक ओऽ अपन घोघ नहि हटेने रहए। डरसँ अबाज तँ जल्दी नहि निकलल...;लेकिन हिम्मत कऽ कए जवाब देलहुँ, कोचिंग जाइ छी। फेर पुछलक..कथी के पढ़ाइ करैत छी..!! बातसँ अपनापन लागल। हम कहलहुँ-डॉक्टरीक तैयारी करैत छी.. अच्छा बैस..दोसर पढ़ाइमे मोन नहि लागए छौ- निर्देश दैत-..कनी देर रुकि जो तखन जहिये। ताऽ तक समय लगभग ४.४५ भऽ गेल रहए..एक दू टा आदमी सभ सड़कपर सेहो नजरि आबए लागल। लेट होइत रहए एहि कारण हिम्मत कए कऽ कहलहुँ...हमरा लेट भऽ रहल यऽ..हमर आइ परीक्षा अछि। कोनो बात नहि..जवाब भेटल बड़ असमंजसमे पड़ि गेलहुँ..की करी..नञि .करी..एक मोन होय रहए, चलैत लोककेँ अवाज दी, मुदा सड़क फेर सुनसान भऽ गेल। तखने ओऽ अपन घोघ हटेलक..हुनकर...चेहराकेँ देखिते लगभग बेहोश भऽ गेलहुँ..बुढ़—झुर्रीदार चेहरा...ओहिपर मर्द जेकाँ...दाढ़ी...मोँछ...हे भगवान आइ-धरि एहन नञि देखने रही...हमर हाव-भावकेँ देखि ओऽ बजली...हमरा देखि कए डर लागए छौ..नञि डर। हम दोसर किओ नञि छियौ...पता नञि किए ओऽ किछु अपन जेकाँ लागए लागल...ताऽ तक लगभग ५ से ऊपर टाइम भऽ गेल...रोडपर दूध/ न्यूजपेपर बला हॉकर सभ नजरि आबए लागल... किछु कालक बाद अवाज भेटल- आब तू जो..घुरैत काल अबिहेँ...हम हवाक भाँति/ तीर सँ बेशी तेजीसँ निकललहुँ...बहुत लेट भऽ गेल रही...साइकिलकेँ अपन क्षमतासँ बेशी तेजीसँ चलबए शुरू कए देलहुँ, जहिना गाँधी मैदान/ सब्जी बागक मुँहपर पहुँचलहुँ...देखलहुँ जे जबरदस्त एक्सीडेन्ट भेल रहए, पूरा रस्ता पुलिस ब्लॉक कऽ देने रहए- एक्सीडेंट लगभग २० मिनट पहिने भेल रहए, जाहिमे चारि टा लोक आऽ एकटा चाहक दोकानदार मारल गेल...ओऽ चारू टा हमरे इंस्टीट्यूटक छात्र रहए जे नीक चाह पीबए खातिर रुकल रहए लेकिन...!! हमहुँ ओहि चाहबलाक दोकानपर रोज रुकैत रही- अगर बुढ़ीमाता नञि भेटितए तँ हमहुँ ओहि समयमे चाहक दोकानेपर रहितहुँ ...फेर पता नञि...)- चाह पिबैक तँ आदति नहि रहए मुदा ठंढ़ाक चलते पीबि लैत रही। कहुना इंस्टीट्यूट पहुँचलहुँ..ओहिठाम घटनाक सूचना पहुँचि गेल रहए...इंस्टीट्यूट दू दिनुका लेल बन्द कऽ देल गेल। छात्रक घरबलाकेँ सेहो सूचित कए देल गेल, हमहुँ बुझल मोनसँ घर घुरए लगलहुँ, घर घुरैत काल वैह बुढ़िया ओहीठाम भेटल...ओहिना घोघ तनने...लग जाऽ कए सभ घटना सुनेलाक बादो ओऽ कोनो जवाब नहि देलक...किछु कालक बाद कहलक... बौआ हमरा भूख लागल यऽ!! की खेबए!!! हम पुछलियए। चूड़ा आऽ शक्कर..जवाब भेटल। संयोग एहन रहए जे ताऽ तक हम सभ तरहक समान किनबाक वास्ते कोनो दोकानपर नहि गेल रही, कारण घरमे काज करए लेल बहुत आदमी रहए दोसर घरक सभसँ छोट रही। तैयो दोकानपर गेलहुँ आरो बुढ़ी-माता लऽ चूड़ा-शक्कर कीनि कए अनलहुँ। किछु देरक बाद हम पुछलहुँ..कतए जेबही, हम पहुँचा देबौ। “कतहु नञि”, जवाब भेटल। “रहबीहीं कतए”, हम पुछलहुँ। “यैह जगह” सीधा जवाब भेटल। “खाना कतए खेबहीं”...पुछलापर जवाब भेटल- “ तूँ खुआ, बेशी बक-बक नञि कर, खाइ लेल दे फेर तू पुछिहेँ जे पूछए के छौ”- बिल्कुल रुखल जवाब सेहो भेटल। संगहि स्नेहसँ कहलक- “तूँहो खो”। हम तँ अजीब मुश्किलमे पड़ि गेलहुँ..ओकरा अकेले छोड़ि कए जाइ के मोन सेहो नञि करैत रहए...आखिर की करी...बहुत सोचलाक बाद निर्णय लेलहुँ..जे हुअए एकरा अपना संग लऽ जाइ...रिक्शापर बुढ़िया आरो साइकिलपर हम, घर पहुँचि ओकरा गेटपर ठाढ़ कऽ बाहर ठाढ़ कऽ हम घर गेलहुँ, सभ कहानी अपन माताजीकेँ बतेलहुँ, बुढ़िया बाहरमे ठाढ़ छै, सेहो कहि देलहुँ। सभसँ पैघ समस्या जे बुढ़ियाकेँ आखिर कतए राखी...माताजी कहलखिन- नीचाँमे एकटा रूम खाली छै- ओहिमे जगह देल जाए, सभ बेबस्था-बिछोना, कम्बल, साफ साड़ी-कऽ कए ओकरा घरमे बैसेलहुँ। साँझमे बाबूजी ऑफिससँ अएलाह तँ हुनका सभ कहानी बतेलहुँ। बाबूजी कहलन्हि-“बुढ़िया कहिया तक रहतहु”। “नञि पता”- हम कहलहुँ। फेर माताजी सभ सम्हारि लेलन्हि ..आरो बाबूजीकेँ समझा देलखिन। बुढ़ी-माताक सेवा करब हमर रोजक ड्यूटी भऽ गेल। कोचिंग जाइसँ पहिने आधा घण्टा, आबए के बाद १ सँ डेढ़ घण्टा हमर समय बुढ़ी माता लग बीतए लागल। खानाक अलग-अलग फरमाइश होइत, सभ किछु पूरा करैत एक सप्ताह बीतल, एक दिन अपना लग बैसा हमर बारेमे पूछए लागल- जेना अपन दादी-दादा-अग्रज- बुढ़ी माता दिससँ कहल गेल- तूँ दोसर पढ़ाइ- मेडिकल छोड़ि कऽ– कर। बहुत नाम हेतौ, खूब पैसा कमेबे, माँ-बाप तोरापर नाज करतौ, १० वा दिन रातिमे बिना किछु बतेने पता नञि कतए चलि गेलय- आइ तक नहि भेटलीह...एखन तक हम इन्तजार करए छी जे बुढ़ी माता एकदिन जरूर भेटतीह। बुढ़ी माताक बात बिल्कुल सही भेल जखन १४-१५ घण्टा पढ़ाइ करबाक बावजूद सी.बी.एस.ई. मेडिकलमे वेटिंग आबि गेल। बी.सी.ई.ई.मे डेयरी ब्रान्च भेटल, एम.डी.ए.टी.मे १००% चान्स रहए- ९०% एक्यूरेट प्रश्न सही कएने रही- मुदा परीक्षा-केन्द्र मिल्लत कॉलेज, दरभंगा केन्सिल भऽ गेल..एहि कारणसँ हम फ्रस्ट्रेशनमे रहए लगलहुँ। पढाइ-लिखाइ बन्द कए देलहुँ...जे एतेक पढ़ाइ करए के बाद जखन सफलता नहि भेटल तँ आब कहियो नहि हएत। फेर हमरा बुढ़ी-माताक बात याद भेल, संगहि बाबूजी सेहो कहलन्हि- अपन ट्रैक चेन्ज करू, लगभग ओही समय यू.जी.सी.सँ ३ टा नया कोर्स पटना आऽ मगध विश्वविद्यालयकेँ भेटल- बायो-टेक्नोलोजी, जल आऽ पर्यावरण प्रबंधन आऽ बी.सी.ए.। एन्ट्रेन्स परीक्षापर नामांकन प्रक्रिया शुरू भऽ गेल। बी.सी.ए. हमरा किछ ढंगक कोर्स बुझाएल, एन्ट्रेन्स देलहुँ आऽ पास कऽ गेलहुँ। यू.जी.सी. बी.सी.ए.क प्रथम बैचक पहिल छात्र हम रही जे अन्तिम परीक्षा ८९% सँ पास केलहुँ। बाबूजी कहलन्हि- आब यू.पी.एस.सी.क तैयारी करू, ढंगक सरकारी नोकरी लिअ, लेकिन हमर सोच किछु आरे रहए। “अगर अपन प्रतिभा/ क्षमताक उपयोग करबाक यऽ तऽ सरकारी नोकरी नञि करू”। फेर एम.सी.ए. केलहुँ, मोन भेल जे एम.बी.ए. कएल जाय- बहुत कठिन रहए आइ.टी.सँ एम.बी.ए. करब। मुदा बुढ़ी माताक कृपासँ एम.बी.ए. सेहो कऽ लेलहुँ। कैम्प्स सेलेक्शनमे रिलायन्सक ऑफर भेटल। जोइन केलहुँ, फेर एच.डी.एफ.सी. बैंकसँ ऑफर भेटल तँ बैंक जोइन कऽ लेलहुँ। हृदयमे इच्छा रहए जे टाटा-बिड़लामे नोकरी करबाक चाही। बुढ़ी माताक कृपासँ इच्छा पूरा भऽ गेल आऽ बिड़ला ग्रुपसँ नीक स्थानक ऑफर आबि गेल। जोइन सेहो कऽ लेलहुँ आऽ एखन तक एतहि छी..आब इच्छा यऽ दिल्ली/ मुम्बइक बहुत सेवा केलहुँ...आब अपन बिहार/ मिथिलाक सेवा कएल जाय..बुढ़ी माताक कृपासँ ओहो भऽ जेतए...लेकिन सभसँ पैघ इच्छा अछि बुढ़ी-माताक दर्शनक..पता नञि होएत कि नञि...

33 3 3 अयोध्यानाथ चौधरी, धनुषा, नेपाल 1947- मूलत: कविक रूपमे परिचित छथि । नेपालक आधुनिक कविताक क्षेत्रमे हिनक नाम उल्लेखनीय अछि । श्री चौधरीक लेखनमे मानवीय संवेदनाक प्रतिबिम्ब पाओल जाइत अछि । कविताक संग कथा आ निबन्धमे सेहो ई कलम चलबैत छथि । फड़िछाएल लेखन हिनक विशेषता थिकनि ।धनुषा जिलाक दुहबी गामक रहनिहार श्री चौधरीक जन्म ६अक्टुबर १९४७कऽ भेल छनि । हिनक क्षितिजक ओहिपार नामसँ एक कविता-सग्ङप्रह प्रकाशित छनि । दू पत्र _________अयोध्यानाथ चौधरी अन्तत; आइ हम दिनेशकेँ पत्र लिखवाक लेल उद्यत भेलहुँ अछि । कागत-कलम सब दुरुस्त १९६९, माने ठीक ३६ वर्षक बाद । एतेक नम्हर अन्तराल ! की बूझत ओ ? खीझ होइत अछि हमरा जे जीवनमे एंकटा उत्साही पत्र लेखक किएक नहि वनि सकलहुँ हम ? एकटा सफल दायित्व किएक नहि निभा सकलहुँ हम ? जकरा हम पत्र लिखाक हेतु उद्यत भेलहुँ ओ हो त कहियो लिखवाक वात सेचि सकैत छल । खैर शरुआत हमरेसँ रहओ । ओकरा हेतु हमर पत्र एकटा अप्रत्याशित घटना सावित हेतैक – ’अ सरप्राइज’ आ, जौं ओ जीवित नहि हो ............ ? बहुत नम्हर अत्नराल भेलैक ने ! पत्र फिर्ता आबि सकैत अछि .............ओहि पर “डेड’ जा मृत कानो संकेत रहि सकैत छैक । एतेक निराशाजनक वात नहि सोचवाक चाही । ओहना स्थितिमे पोस्टमैन पत्र फारि-फेकिकऽ अपन मथ-दुक्खी सँ मृक्त भऽगेल रहत । ई समय पत्र लिखवाक अनुकूल +{बहुत अनुकूल वुझा रहल अछि । दशमीमे सब गाम अबैए- ओकरो जरुर गाम आवक चाही । तावत ओकर पत्नी, बेटा वा वेटी केओ ने के ओ पत्र सहेजिकऽराखि देने रहतैक । जाइ जमानामे हम सव – ’ग्रैजुएशन’ केने रही, ओइ हिसाव सँ ओ जरुर कोनो नोकरी मे हैत किएक त’ नीक विद्यार्थी रहय । पता नहि – पटना वोकारो, टाटा, दिल्ली कतऽ अइ..... आकि सुदुर दक्षिण केरला, मद्रास-नहि जानि कतऽ ?/ चारि वर्ष संगे अभिन्न रहवाक कारणे ओकरा पत्र लिखवामे एकटा ’पेन फ्रेन्ड’ क मजा आओत । सबसँ पहिने तँ’ ओकरा परिवाक हुलिया लेवऽ पडत । ओकरा परिवारमे के सब छैक ? के कतऽ की करैत छैक ? पत्रक सिलसिला जौ चालु भऽ जायत त कालान्तरमे इ हो बूझऽ मे आवि जायत जे ओकरा एकटा मनोनुकूल पत्नी भेटलैक की नहि..... आकी कोनो ना शेष जीवन वितावऽक क्रममे अइ । याददाश्त वा फेहरिस्त रहत । तहिया सी. एम. कलेजक आलीशान आर्ट्स व्लक नव हेवाक कारणे विल्कुल कोनो सुन्दर कागज पर पारल रंगीन नक्शा वुझाइक – पार्क जकाँ । जतऽ जाउ जेना पक्षीक झुण्ड आ कलरव पसरल । विशाल पुस्तकालय । वागमतीक मनोरम आ खतरनाक किछेर । रहस्यमयं गर्ल्स-कामन-रुम । विभिन्न विषयक अलग ’डिपार्टमेन्ट’ आ ओ रहस्यमय कोठली, उपर हेवाक कारणे, छात्रसब कौखन कार्यवश, कौखन अनेरो, कोनो ’सरसँ भेटवाक वहानामे उपर भीड कऽदैक । परन्तु’ जखन ’हुसैन’ साहव माने वाइस प्रिन्सपल अपन ’चैम्बर सँ ’ बहार भऽ केवल तर्जनी उठवैत छलाह तखन सब सिड़हीसँ नीचा भगैत छल – कान – कपार फुटवाक – टांग टुटवाक कोनोटा डर नहि । हमरा सभक ग्रूपमे एकटा रीनिता नामक लड़की छलि ’जकरा मात्रे’ कार प्रतिदिन कालेज पहुँचा जाइक । लक्ष्मी आ सरस्वतीक अपूर्व संयोग ! मांजल अंग्रेजी वजैत आ लिख्यैत छलि । फस्ट इयरमे ’विदेह’मे जे ओकर लेख छपैलक से लाजबाव रहैक – शीर्षक छल “Exclusively ours “| लेख मार्फत ओ ओकरा सभक कोठलीक पर्दा हटा भीतरक बहुत रास रहस्योदघाटन कएने छलि । मुदा ओ एक बर्षक बाद नहि जानि कतऽ चल गेलि ? धनीक बापक वेटी रहए । प्राय: ओ कलेज झुझाअन लागल हेतैक ।“ Exclusively ours”  एखनो कहियो काल पढि लैतछी मुदा शीर्षकक तात्पर्य वुझवामे एखनो माथमे बल देवऽ पडैत अछि । एकटा और घटना जकर हम सब कहियो नहि विसरि सकब । हम सव विश्वस्त छी जे जौ पत्र लेखनक शुरुआत मित्र दिनेश राय दिससँ होइत त ओहो ओइ घटनाक चर्च जरुर करैत । हम सव भाग्यवान रही जे ओहो कोनो ’नन्दी’ टाइटलवाली हमरे सभक ग्रुपक छलि आ वंगालिने छलि । ओकरा आँखिमे वास्तवमे एहन एकटा चमक छलैक जे आई ३६ वर्षसँ कतौ अन्तऽ नहिं अभरल, पता नहि ओ आँखि कतऽ अइ  ? ओइ बड़का – बड़का आँखिमे ओ चमक विद्यमाने छैक वा मलीन भेलैक अछि ? जे किछु । मुदा सारा काजेज ओ जादुई आँखि देखने छल – देखैत छल । अनहोनी भाऽ गेलै । एकटा हमरे सवहक सहपाठी लड़का ओकरा नाम पर – ओकर नाम लैत जहर खा लेलक मुदा समये पर अस्पताल पहुचाओल गेल आ जान वचि गेलैक । जंगली आगि जकाँ वात सौसे पसरि गेल । मुदा ओकरा लेल धन-सन । कोनो प्रतिक्रिया ने कोनो हलचल ने – सव किछु विल्कुल सामान्य । असलमे एक तरफा प्रेम छलैक । वात ओकरो तक जरुर गेल हेतै –लेकिन ओ वेहद गम्भीर जे छलि । Eng. Hons. Group मे टॉप कैलक । मुदा ओ जमाना वड़ वेजाए छलैक । लड़का – लड़कीमे बार्ताक संचार नहि होइत छलैक । लाख कोशिशक वाद हमरा आ दिनेशक मुँहसँ कंग्राच्युलेसन शब्द नहि फुटल – नहिए फुटल । कालेज आ संवेदनशील घटना – संवेदनशील घटना आ कालेज – जेना एक दोसरक पर्याय रहैक । कतेक वात भेल । कतेक घटना घटल । मुदा पहिने पत्राचारक क्रम त शुरु होवऽ । दिनेश वहुत वातक जानकारी करा सकैए – ओहि पानि क’ जे अइ । जन्मभूमि आ कर्मभूमि नेपाल भेलाक कारने बहुत रास अपन लोक छुटि गेल । ओना सीमा नहि बुझाइत छैक मुदा सम्पर्क जे टुटिगेल अछि । मुदा एकटा वात । एहि सन्धि-स्थल पर जीवाक अपन मजा छैक । कौखन उत्तराभिमुख, कौखन दक्षिणाभिमुख । दूटा संस्कृति मिश्रित जीवनक उत्फुल्लता – जुनि पुछू । पहाड़क गीत खोलामे झहरिकऽ समुद्रक लहरिमे विलन भऽ जाइत अछि । भास दू-मुदा भाव एके –ऐन-मेन । “जहाँ जहाँ वान्छौ तिमी, म पाइला वनि पच्छयाई रहन्छु “ तु जहाँ-जहाँ चलेगा, मेरा साया साथ होगा” । पहाड़क गीतक सन्दर्भमे १९७१ ई. क एकटा सांझ मोन पडैत अछि । काठमान्डौ सँ दूर उत्तर वालाजुउद्यानसँ उपर पहाडीपर English Language Trainning Institute द्वारा आयोजित वनभोज समारोह । नाच करैए ओ सव । कोन लड़का-कोन लड़की-नाचमे फर्क नहि वुझायत । निर्विकार । निर्विकार भऽ नाचत आ गाओत । मुदा एम्हर, अपना समाजमे लज्ज कलाके प्रस्फुटिता नहि होवऽ दैत छैक । गीत गओलक राममणि । सम्पूर्ण मण्डली अभिभूत आ मंत्रमुग्ध भऽ गेल । पहाडमे केवल निर्जीव पाथरे नहि होइत छैक । एकटा प्रशिक्षार्थी – एकटा शिक्षिकाक आँखिसँ नोर झहडऽ लागल आ समस्त वातावरण जेना जड़ भऽ गेल ।, ओ गीत एखनो कहियो काल हंमरा मन-प्राणके जेना आन्दोलित कऽ जाइत अछि – “कोई जव तुम्हारा हृदय तोड़ दे .......... “ दुर्गम पहाडी गाममे एहनो गीत गाओल जाइत अछि- आ ओतुक्को लोक ओकर तात्पर्य बूझि विभोर भऽ जाइत अछि – हमरा आश्चर्य लागि गेल । ओइ दिन हम पहाडक आँखि नोरायल देखने रही । स्पस्ट । निस्सन्देह । हमरा जनैत सैकड़ौ-हजारो वर्ष पहिने, कोनो युगमे ओइ गीत सँ बहुत बेसी, कैएक गुना वेसी दर्द-भरल गीत सुनि पहाड जे करुण क्रन्दन केने हैत तकरे फलस्वरुप एतेकं नदी नालाक जन्म भेल हैत । बहुत सम्भव गायक स्वंय Adam छल हैत आ सुननिहार ओकर प्रेयसी Eve । राममणि शर्मा ओहि दिन सँ हमर अभिन्न भऽ गेल । ओकर आ और कतेक साथी सभक पता हमरा डायरीमे ओहिना पड़ल अछि । आव त डायरीक पन्न जीर्ण-शीर्ण भऽ पीयर भऽगेल अछि । आइए ३४ वर्षक वाद एकटा पत्र हम और लिखव, एखने लिखव .........। १ जनवरी ,’०५ जनकपुरधाम दिनेश भाइ, नव वर्षक हार्दिक मंगलमय शुभकामना । आशा अछि लिफाफ पर हमरनाम पढलाक बाद हमरा चिन्हऽ मे एको क्षण देरी नहि लागल हैत । ओना किछु चौकल जरुर हैव । से त स्वभाविके ..........। कोनो अपराध वोध नहि भऽ रहल अछि । एकटा प्रश्न पुछै छियऽ । जीवन एना जटिल किएक भेल जा रहल छैक ? कतेक वेर विचार करैत छलहुँ ............ आई लिखैछी, काल्हि पक्के लिखव .......... मुदा आई ....... जावत दुनूपत्र हम लिखि नहिलेव, तावत हमराअ चैन नहि ........... चैन नहि .............। शान्ति सदन, ढुहवी-१ (धनुषा) Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

33 3 3 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् शैलेन्द्र मोहन झा सौभाग्यसँ हम ओहि गोनू झाक गाम, भरवारासँ  छी, जिनका सम्पूर्ण भारत, हास्यशिरोमणिक नामसँ जनैत अछि। वर्तमानमे हम टाटा मोटर्स फाइनेन्स लिमिटेड, सम्बलपुरमे प्रबन्धकक रूपमे कार्यरत छी। चलला मुरारी छौरी फ़ँसबय ! एक दिनक गप्प अछि, हमर मित्रगण हमरा कहय लगला - शैलेन्द्र, अन्हां के कोनो गर्ल फ़्रैन्ड नहिं? हम कहलियनि - दोस, ई भारत अछि, इन्गलैन्ड नहिं! अखन गर्ल फ़्रैन्ड क जरूरत नहिं, अखन त पढय - लिखय के दिन अछि, प्रेम करय के मुहुरत नहिं!! सब मित्र कहय लगला, हम अनाडी छी जौं कोनो छौरी  फ़ंसाबी, तहने हम खिलाडी छी ई सब हमरा सहल नहिं गेल, बिना ई दुस्कर्म कयने रहल नहिं गेल फ़ेर की छ्ल? हम ताकय लगलहुं एकटा फ़्रैन्ड, फ़्रैन्ड नहिं, गर्ल फ़्रैन्ड...... मुदा एकटा मुश्किल छ्ल - हमरा छौरी सब स लगैत छ्ल बड्ड डर जौं हुनक सैन्डल गेल पडि, त इज्जत जायत उतरि तैयो हमरा प्रमाणित करय के छ्ल, कहुना कय एकटा छौडी पटबय के छ्ल त कुदि पडलौं मैदान में, या ई कहु श्मशान में, कियाकि, पिटला के बाद ओत्तहि जायब, फ़ीरि क मुंह नहिं देखायब बन्हलहुं माथ पर कफन, कय सब डर के करेज में दफन निकलि पडलहुं हम बाट में, एक छौरी के ताक में सब सं पहिने प्रार्थना कयलहुं - हे किशन कन्हैया! आंहां त अहि कर्म में खिलाडी छी हमरो खिलाडी बना दिअ, हमरा सोलह हजार गोपी नहिं, केवल एकटा छौडी फ़ंसवा दिअ आंहाके बड्ड गुणगान करब, फ़ंसिते छौरी, सवा रुपैया के प्रसाद चढायब हम सोचलहुं, शायद आंखि मारला सं छौरी पटै छैक! हमरा कि बुझल छल, आंखि मारला सं छौरी पीटै छैक भागि कय घर अयलहुं, आर पहिल सप्पत खेलहुं फ़ेर कहियो आंखि नहिं मारब. फ़ेर सोचलहुं - पहिने बतियायब, फ़ेर घुमायब तहन फ़ंसायब हं, ई ठीक रहत! देखलहुं एकटा छौरी, त आंखि हमर फ़रकल.... फ़ेर की छ्ल? हम कहलौं- पोखरि सन आंखि तोहर, केश जेना मेघ, फ़ूल सन ठोढ तोहर, कहियो असगर में त भेट! कहलहुं हम एतबे की भय गेली ओ लाल, ओ मारलीह एहन थप्पड, भेल गाल हमर लाल कनबोज सुन्न भेल हमर, आंखि भेल अन्हार सूझय लागल तरेगन, भेल दुपहरिया में अन्हार सरधुआ, करमघट्टु, बपटुगरा आर अभागल देखू कपार हम्मर,  ई विशेषण हाथ लागल एतबे नहिं........ ओ करय लगलीह हल्ला, जूटय लागल मोहल्ला हम कहलौं - ई कोन काज केलहुं? कियक गाम के बजेलहुं नहिं पटितौं हमरा सं, ई आफ़त कियक बजेलहुं फ़ेर की छल? पिटय लगलहुं हम आर पीटय लगला गौंआं मुंह कान तोडि देलक, अधमरु कय क छोरलक ई कोन काल घेरलक, मरय में नहिं छल भांगठ, हम भागि घर एलहुं, दुबारा सप्पत खेलहुं - फ़ेर आंखि नहिं मारब, नै गीत हम गायब, फ़ेर छौरी नहिं फ़ंसायब, नै जान हम गमायब, आर भूलि कय अंग्रेजी, हम मैथिल बनि जायब! आर भूलि कय अंग्रेजी, हम मैथिल बनि जायब!! सपना सुतल रही दुपहरियामे तँ देखलौ हम एक सपना भयल विवाह हमर यै भौजी कनिया चान्द के जेना हम्मर, टुटि गेल सपना ये भौजी, भरल दुपहरियामे... जहन भेँट भेल हुनकर हम्मर, भेलहुँ हम प्रसन्न देखि कऽ हुनकर रूप हे भौजी, भय गेलौँ हम दङ नाम पुछलियनि हुनकर हम तँ कहलनि ओऽ जे रजनी स्वप्न सुन्दरी ओऽ बनि गेलि हम्मर हृदयक रानी हमरा पुछली कहु हे साजन केहन हम लगै छी? हम कहलियनि सुनु हे सजनी आहाँ चान्द लगै छी चन्दामे तँ दागो छञि, आहाँ बेदाग लगै छी आँखि अहाँक ऐश्वर्या जेहन नाक अछि जुही चावला केश अहाँक अछि नीलम जेहन गाल वैजन्तिमाला एहि के बाद पुछलियनि हमहू केहन हम लगै छी? कहय लगलि खराब छी, छी अहूँ ठीक-ठाक लेकिन एहि यौवनमे साजन भेलहुँ कोन टाक* कनिक लगै छी सन्नी जेना, किछु-किछु राहुल राय किछु-किछु गुण गोविन्दा बाला, यैह अछि हम्मर राय तहन कहलियनि चलु हे सजनि घुरए लेल दरभंगा आहाँ लेल हम सारी किनब, अपनो लेल हम अंगा दू टा टिकट अछि उमा टाकीजक, अगले-बगले सीट दुनू गोटे बैस कऽ देखब “ममता गाबय गीत”** हुनक हाथ लेल अपन हाथमे उठि विदाय हम भेलहुँ हुनक हाथ लेल अपन हाथमे उठि विदाय हम भेलहुँ तखने जगा देलक पिंटूआ, तखने जगा देलक पिंटुआ***, नीन्दसँ हम उठि गेलहुँ हम्मर टूटि गेल सपना ये भौजी, भरल दुपहरियामे...... *= हमर केश किछु बेशी कम अछि **= प्रसिद्ध मैथिली सिनेमा ***= हमर छोट भाई

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ (1938- )- ग्राम+पोस्ट- हसनपुर, जिला-समस्तीपुर। नेपाल आऽ भारतमे प्राध्यापन। मैथिलीमे १.नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास(विराटनगर,१९७२ई.), २.ब्रह्मग्राम(रिपोर्ताज दरभंगा १९७२ ई.), ३.’मैथिली’ त्रैमासिकक सम्पादन (विराटनगर,नेपाल १९७०-७३ई.), ४.मैथिलीक नेनागीत (पटना, १९८८ ई.), ५.नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य (पटना, १९९८ ई.), ६. प्रेमचन्द चयनित कथा, भाग- १ आऽ २ (अनुवाद), ७. वाल्मीकिक देशमे (महनार, २००५ ई.)। मौन जीकेँ साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, २००४ ई., मिथिला विभूति सम्मान, दरभंगा, रेणु सम्मान, विराटनगर, नेपाल, मैथिली इतिहास सम्मान, वीरगंज, नेपाल, लोक-संस्कृति सम्मान, जनकपुरधाम,नेपाल, सलहेस शिखर सम्मान, सिरहा नेपाल, पूर्वोत्तर मैथिल सम्मान, गौहाटी, सरहपाद शिखर सम्मान, रानी, बेगूसराय आऽ चेतना समिति, पटनाक सम्मान भेटल छन्हि। वर्तमानमे मौनजी अपन गाममे साहित्य शोध आऽ रचनामे लीन छथि। पंचदेवोपासक भूमि मिथिला -डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ’मौन’ हिमालयक पादप्रदेशमे गंगासँ उत्तर, कोशीसँ पश्चिम एवं गण्डकसँ पूर्वक भूभाग सांस्कृतिक मिथिलांचलक नामे ख्यात अछि। मिथिलांचलक ई सीमा लोकमान्य, शास्त्रसम्म्त ओऽ परम्परित अछि। सत्पथब्राह्मणक अंतःसाक्ष्यक अनुसारे आर्यलोकनिक एक पूर्वाभिमुखी शाखा विदेह माथवक नेतृत्वमे सदानीरा (गण्डक) पार कऽ एहि भूमिक अग्नि संस्कार कऽ बसिवास कएलनि, जे विदेहक नामे प्रतिष्ठित भेल। कालान्तरमे एकर विस्तार सुविदेह, पूर्व विदेह, ओऽ अपर विदेहक रूपेँ अभिज्ञात अछि। विदेहक ओऽ प्राथमिक स्थलक रूपमे पश्चिम चम्पारणक लौरियानन्दनगढ़क पहिचान सुनिश्चित भेल अछि। आजुक लौरियानन्दनगढ़ प्राचीन आर्य राजा लोकनि एवं बौद्धलोकनिक स्तूपाकार समाधिस्थल सभक संगम बनल अछि। कालक्रमे अहि इक्षवाकु आर्यवंशक निमि पुत्र मिथि मिथिलापुत्रक स्थापना कयलनि। प्राचीन बौद्धसाहित्यमे विदेहकेँ राष्ट्र (देश) ओऽ मिथिलाकेँ राजधानीनगर कहल गेल अछि। अर्थात् मिथिला विदेहक राजधानी छल। मुदा ओहि भव्य मिथिलापुरीक अभिज्ञान एखन धरि सुनिश्चित नहि भेल अछि। तथापि प्राचीन विदेहक सम्पूर्ण जनपदकेँ आइ मिथिलांचल कहल जाइछ। ओऽ मिथिलांचलक भूमि महान अछि, जकर माथेपर तपस्वी हिमालयक सतत वरदहस्त हो, पादप्रदेशमे पुण्यतोया गंगा, पार्श्ववाहिनी अमृत कलश धारिणी गंडक ओऽ कलकल निनादिनी कौशिकीक धारसँ प्रक्षालित हो। एहि नदी मातृक जनपदकेँ पूर्व मध्यकालीन ऐतिहासिक परिवेशमे तीरभुक्ति अर्थात् तिरहुत कहल गेल, जकर सांस्कितिक मूलमे धर्म ओऽ दर्शनक गांभीर्य, कलासभक रागात्मक उत्कर्ष, ज्ञान-विज्ञानक गरिमा ओऽ भाषा-साहित्यक समृद्ध परम्पराक अंतः सलिला अंतर्प्रवाहित अछि। एहि सभक साक्षात् मिथिलाक शैव-शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य, सौर (सूर्य) ओऽ बौद्ध-जैनक आस्था केन्द्र एवं ऋषि-मुनिक साधना परम्परामे उपलभ्य अछि। प्रकारान्तरसँ ओहि स्थल सभकेँ सांस्कृतिक चेतनाक ऐतिहासिक स्थलक संज्ञा देल जाऽ सकैछ, जकर आइ-काल्हि पर्यटनक दृष्टिसँ महत्व बढ़ि गेल अछि। मिथिलाक प्रसिद्धि ओकर पाण्डित्य परम्परा, दार्शनिक-नैयायिक चिन्तन, साहित्य-संगीतक रागात्मक परिवेश, लोकचित्रक बहुआयामी विस्तार, धार्मिक आस्थाक स्थल, ऐतिहासिक धरोहर आदिक कारणे विशेष अनुशीलनीय अछि। जनक-याज्ञवल्क्य, कपिल, गौतम, कणाद, मंडन, उदयन, वाचस्पति, कुमारिल आदि सदृष विभूति, गार्गी, मैत्रेयी, भारती, लखिमा आदि सन आदर्श नारी चरित, ज्योतिरीश्वर, विद्यापति, विनयश्री, चन्दा झा, लाल दास आदि सन आलोकवाही साधक लोकनिक प्रसादे एहि ठामक जीवन-जगतमे आध्यात्मिक सुखानुभूति ओऽ सारस्वत चेतनादिक मणिकांचन संयोग देखना जाइछ। मिथिला आध्यात्म विद्याक केन्द्र मानल जाइछ। आजुक मिथिलांचलक संस्कृति उत्तर बिहारमे अवस्थित वाल्मीकिनगर (भैँसालोटन, पश्चिम चम्पारण) सँ मंदार (बाँका, भागलपुर) धरि, चतरा-वाराह क्षेत्र (कोशी-अंचल, नेपाल) सँ जनकपुर-धनुषा (नेपाल) धरि ओऽ कटरा (चामुण्डा, मुजफ्फरपुर), वनगाँव-महिषी, जयमंगला (बेगूसराय), वारी-बसुदेवा (समस्तीपुर), कपिलेश्वर-कुशेश्वर-तिलकेश्वर (दरभंगा), अहियारी-अकौर-कोर्थु(मधुबनी), आमी(अम्बिकास्थान, सारण), हरिहरक्षेत्र (सोनपुर, सारण) वैशाली आदि धरि सूत्रबद्ध अछि। एहि सभ धार्मिक तीर्थस्थल सभक परिवेक्षणसँ प्रमाणित होइछ जे मिथिलांचल पंचदेवोपासक क्षेत्र अछि। कालान्तरमे एहिसँ बौद्ध ओऽ जैन स्थल सभ सेहो अंतर्मुक्त भऽ आलोच्य भूभागकेँ गौर्वान्वित कयलनि। पंचदेवोपासक क्षेत्रक अर्थ भेल- गणेश, विष्णु, सूर्य, शिव ओऽ भगवतीक क्षेत्र। एहिमे सूर्य सर्वप्राचीन देव छथि एवं शिव सर्वप्राचीन ऐतिहासिक देवता छथि। विघ्नांतक गणेशक पूजन प्राथमिक रूपेँ कयल जाइछ एवं मातृपूजनक संदर्भमे भगवती अपन तीनू रूपमे लोकपूजित छथि अर्थात् दुर्गा, काली, महालक्ष्मी एवं सरस्वती। भगवती शक्तिक आदि श्रोत छथि, जनिकामे सृष्टि, पोषण ओऽ संहार (लय) तीनू शक्ति निहित अछि। मुदा लोकक लेल ओऽ कल्याणकारिणी छथि। धनदेवी लक्ष्मीक परिकल्पना वैष्णव धर्मक उत्कर्ष कालमे भेल छल एवं ओऽ विष्णुक सेविका (अनंतशायी विष्णु), विष्णुक शक्ति (लक्ष्मी नारायण) एवं देवाभिषिक्त (गजलक्ष्मी) भगवतीक रूपमे अपन स्वरूपक विस्तार कयलनि। ओना तँ लक्ष्मी ओऽ सरस्वतीकेँ विष्णुक पर्श्वदेवीक रूपमे परिकल्पना सर्वव्यापक अछि। लक्ष्मी ओऽ गणेशक पूजन सुख-समृद्धिक लेल कयल जाइछ। प्राचीन राजकीय स्थापत्यक सोहावटीमे प्रायः गणेश अथवा लक्ष्मीक मूर्ति उत्कीर्ण अछि। पंचदेवोपासना वस्तुतः धार्मिक सद्भावक प्रतीक अछि। मिथिलांचलमे एहि पाँचो देवी-देवताक स्वतंत्र विग्रह सेहो प्राप्त होइछ। भारतीय देवभावनाक विस्तारक मूलमे भगवती छथि, जे कतहु सप्तमातृकाक रूपमे पूजित छथि तँ कतहु दशमहाविद्याक रूपमे। सप्तमातृका वस्तुतः सात देवता सभक शक्ति छथि- ब्रह्माणी (ब्रह्मा), वैष्णवी (विष्णु), माहेश्वरी (महेश), इन्द्राणी (इन्द्र), कौमारी (कुमार कार्तिकेय), वाराही (विष्णु-वाराह) ओऽ चामुण्डा (शिव)। एहि सप्तमातृकाक अवधारणा दानव-संहारक लेल संयुक्त शक्तिक रूपमे कयल गेल छल, जे आइ धरि पिण्ड रूपेँ लोकपूजित छथि। मुदा एक फलक पर सप्तमातृकाक शिल्पांकनक आरम्भ कुषाणकालमे भऽ गेल छल। चामुण्डाकेँ छोड़ि सभटा देवी द्विभुजी छथि। सभक एक हाथमे अम्तकलश एवं दोसर अभयमुद्रामे उत्कीर्ण अछि। मिथिलांचलक लोकजीवनमे जनपदीय अवधारणाक अनुसार सप्त मातृकाक नामावली भिन्न अछि। मुदा बिढ्क्षिया माइ (ज्येष्ठा, आदिमाता, मातृब्रह्म) सभमे समान रूपेँ प्रतिष्ठित छथि। यद्य सप्तमातृकाक ऐतिहासिक प्रस्तर शिल्पांकन एहि भूभागसँ अप्राप्य अछि, मुदा दशमहाविद्याक ऐतिहासिक मूर्ति सभ भीठभगवानपुर (मधुबनी) एवं गढ़-बरुआरी (सहरसा)मे उपलभ्य अछि।

44 4 4 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् रामाश्रय झा “रामरग” (१९२८- ) विद्वान, वागयकार, शिक्षक आऽ मंच सम्पादक छथि। रामरगजीसँ गप शप। (६ जुलाई २००८) गजेन्द्र ठाकुर: गोर लगैत छी। स्वास्थ्य केहन अछि। रामरंग: ८० बरख पार केलहुँ। संगीतमे बहटरल रहैत छी। गजेन्द्र ठाकुर: संगीतक तँ अपन फराक भाषा होइत छैक। मैथिली संगीत विद्यापति आऽ लोचन सँ शुरू भए अहाँ धरि अबैत अछि। मैथिलीमे अहाँ लिखनहिओ छी। रामरंग: अपन मिथिलासँ सम्बन्धित हम तीन रागक रचना केलहुँ अछि, जकर नाम ऐ प्रकारसँ अच्हि। १.राग तीरभुक्ति, राग विद्यापति कल्याण तथा राग वैदेही भैरव। ऐ तीनू रागमेसँ तीरभुक्ति आर विद्यापति कल्याणमे मैथिली भाषामे खयाल बनल अछि। हमर संगीत रामायणक बालकाण्डमे रागभूपाली आर बिलावलमे सेहो मैथिली भाषामे खयाल छैक। आर सन्गीत रामायणक पृष्ठ ३ पर बिलावलमे श्री गणेशजीक वन्दना तथा पृष्ठ २० पर राग भूपालीमे श्री शंकरजीक वन्दना अछि। पृष्ठ ८७ पर राग तीरभुक्तिमे मिथिला प्रदेशक वन्दना अछि आर पृष्ठ १२० पर राग वैदेही भैरवक (हिन्दीमे) रचना अछि। “अभिनव गीताञ्जलीक पंचम भागमे २६५ आर २६६ पृष्ठ पर विद्यापति कल्याण रागमे विलम्बित एवं द्रुत खयाल मैथिली भाषामे अछि। मिथिला आऽ मैथिलीमे हम उपरोक्त सामग्री बनओने छी। गजेन्द्र ठाकुर: मुदा पूर्ण रागशास्त्र विद्यापति कल्याणक, तीरभुक्तिक वा वैदेही भैरवक नञि अछि। मैथिलीमे आरो रचना अहाँ... रामरंग: बहुत रचना मोन अछि, मुदा के सीखत आऽ के लीखत। हाथ थरथराइत अछि आब हमर। गजेन्द्र ठाकुर: कमसँ कम ओहि तीनू रागक रचना शास्त्र लिखि दैतियैक तँ हम पुस्तकाकार छापि सकितहुँ। रामरंग: जे रचना सभ हम देने छी ओकरा छापि दिऔक। हाथ थरथराइत अछि , तैयो हम तीनूक विस्ट्रुत विवरण पठायब, लिखैत छी। गजेन्द्र ठाकुर: प्रणाम। रामरंग: निकेना रहू। मैथिली  भाषामे श्री रामाश्रय झा “रामरंग” केर रचना। १.राग विद्यापति कल्याण- एकताल (विलम्बित) स्थाई- कतेक कहब गुण अहाँकेँ सुवन गणेश विद्यापति विद्या गुण निधान। अन्तरा- मिथिला कोकिला किर्ति पताका “रामरंग” अहाँ शिव भगत सुजान॥ स्थायी - - सा  रेग॒म॑प ग॒रेसा ऽ ऽक  ते ऽऽऽ क,कऽ रे सा (सा),नि॒ध निसा –रे नि॒धप़ ध़नि सा सारे ग॒रे रेग॒म॑प –(म॑) ह ब  ऽ   ऽऽ  गु न ऽअ हां,ऽऽ  केऽ ऽ   सुव नऽ ऽऽऽऽ  ऽ ग प प धनि॒ धप धनिसां - -रे सांनि॒ धप (प)ग॒ रे,सा रेग॒म॑प ग॒, रेसा ने स विऽ द्याप तिऽऽ  ऽ  ऽवि द्या  गुन निधा न,क तेऽऽऽ  क,कऽ अन्तरा पप नि॒ध निसां सांरें मिथि लाऽ ऽऽ कोकि सां – निसांरेंगं॒ रें सां रें सां रें नि सांरे नि॒ धप प (प) ग॒ रेसा ला ऽ  की ऽऽऽ  तिं प     ता ऽ ऽऽ  का ऽऽ रा म  रं  ग अ रे सासा ध़नि॒प़ध निसा  -सा  रेग॒म॑प  - ग॒  सारे  सा,सा  रेग॒म॑प  ग॒,रेसा हां शिव  भऽ,ग  तऽ   ऽसु   जाऽऽऽ  ऽ ऽ  न   ऽ, क   ते ऽऽऽ  क,कऽ ***गंधार कोमल, मध्यम तीव्र, निषाद दोनों व अन्य स्वर शुद्ध। २.राग विद्यापति कल्याण – त्रिताल (मध्य लय) स्थाई- भगति वश भेला शिव जिनका घर एला शिव, डमरु त्रिशूल बसहा बिसरि उगना भेष करथि चाकरी। अन्तरा- जननी जनक धन, “रामरंग” पावल पूत एहन, मिथिलाक केलन्हि ऊँच पागड़ी॥ स्थाई- रे भ सा गम॑ प म॑ प - - म॑ग॒  - रे सा सारे  नि सा -, नि ग तिऽऽ  व   श ऽ ऽ भे  ऽ ला ऽ शि ऽ व  ऽ ऽ  जि ध़ नि सा रे सा नि॒ – प़ ध़ नि॒ ध़ प़ – नि सा - - सा न  का  ऽ  घ  र  ऽ  ऽ ए ऽ  ला ऽ  शि  व ऽ ऽ ड रे ग॒ म॑ प  प – प नि॒  ध प म॑ प  धनि  सां सां गं॒ म रु ऽ त्रि  शू ऽ ल ब  स हा  ऽ बि सऽ  ऽऽ  रि उ रें सां नि रें  सां नि॒ ध प  म॑ प पनि॒ ध  प -  -ग  -- रे ग ना ऽ ऽ   भे  ऽ  ष क  र थि चाऽ ऽ  कऽ ऽरी ऽऽ,  भ अन्तरा प ज प नि सां सां  सां - - ध नि  - ध नि नि सां रें सां -, नि न नी ऽ ज  न ऽ ऽ ऽ    ऽ क ध न    ध  न ऽ, रा नि सां – गं॒  रें सां सां नि – ध नि सां   नि॒ ध प ग॒ म॑ प नि सां  सां नि॒ ध प  म॑ प पनि॒ ध  प- -ग – रे थि ला ऽ क   के ल न्हि ऊँ ऽ च पाऽऽ    गऽ  ऽड़ी ऽऽ,भ ***गंधार कोमल, मध्यम तीव्र, निषाद दोनों व अन्य स्वर शुद्ध। ३.श्री गणेश जीक वन्दना राग बिलावल त्रिताल (मध्य लय) स्थाई: विघन हरन गज बदन दया करु, हरु हमर दुःख-ताप-संताप। अन्तरा: कतेक कहब हम अपन अवगुन, अधम आयल “रामरंग” अहाँ शरण। आशुतोष सुत गण नायक बरदायक, सब विधि टारु पाप। स्थाई नि ग प ध नि  सा नि ध प   ध नि॒ ध प   म ग म रे वि ध न ह   र न ग  ज   ब  द  न द  या ऽ क रु ग ग म नि॒   ध प म ग   ग प म ग   म रे स सा ग रु ऽ ह     म र दु ख   ता ऽ प सं   ता ऽ प ऽ अन्तरा नि                                रें प प ध नि   सां सां सां सां   सां गं गं मं         गं रें सां – क ते क क   ह ब ह म   अ प न अ     व गु न ऽ रे सां सां सां सां    ध नि॒ ध प  ध ग प म   ग ग प प अ ध म आ      य ल रा म  रे ऽ ग अ   हां श र ण ध प म ग   म रे सा सा   सा सा ध -    ध नि॒ ध प आ ऽ शु तो  ऽ ष सु त    ग ण ना ऽ     य क व र धनि संरें नि सां   ध नि॒ ध प   पध नि॒ ध प    म ग म रे दाऽ  ऽऽ य क     स ब बि ध   टाऽ ऽ रु ऽ    पा ऽ ऽ प ४.मिथिलाक वन्दना राग तीरभुक्ति झपताल स्थाई: गंग बागमती कोशी के जहँ धार, एहेन भूमि कय नमन करूँ बार-बार। अन्तरा: जनक याग्यवल्क जहँ सन्त विद्वान, “रामरंग” जय मिथिला नमन तोहे बार-बार॥ स्थाई रे – ग म प म ग रे – सा गं ऽ ग ऽ बा ऽ ग म ऽ ती प सा नि ध़ – प़ नि नि सा रे सा को ऽ शी ऽ के ज हं धा ऽ र सा म ग रेग रे प ध म पनि सां सां ए हे नऽ ऽ भू ऽ मि कऽ ऽ य प सां नि प ध (ध) म ग रे सा सा न म न क रुँ बा ऽ र बा र अन्तरा प पध म – प नि नि सां – सां ज नऽ क ऽ ऽ या ग्य व ऽ ल्क रें रें गं – मं मं गं रें – सां ज हं सं ऽ त वि ऽ द्वा ऽ न ध    प सां नि प ध म प नि सां सां सां रा म रं ऽ ग ज य मि थि ला प सां नि प ध (ध) म ग रे सा सा न म न तो हे बा ऽ र बा र ५.श्री शंकर जीक वन्दना राग भूपाली त्रिताल (मध्य लय) स्थाई: कतेक कहब दुःख अहाँ कय अपन शिव अहूँ रहब चुप साधि। अन्तरा: चिंता विथा तरह तरह क अछि, तन लागल अछि व्याधि, “रामरंग” कोन कोन गनब सब एक सय एक असाध्य॥ स्थाई प ग ध प   ग रे स रे   स ध सा रे   ग रे ग ग क ते क क   ह ब दुः ख   अ हाँ कय अ   प न शि व ग ग – रे   ग प ध सां   पध सां ध प   ग रे सा – अ हूँ ऽ र   ह ब चु प   साऽ ऽ ऽ ऽ   ऽ ऽ धि ऽ अन्तरा प ग प ध   सां सां – सां   सां ध सां सां   सां रें सां सां चिं ऽ ता ऽ   वि था ऽ त   र ह त र       ह क अ छि सां सां ध -   सां सां रें रें    सं रे गं रें     सां – ध प त न ला ऽ   ग ल अ छि   व्या ऽ ऽ ऽ     ऽ ऽ धि ऽ सां – ध प   ग रे स रे     सा ध स रे     ग रे ग ग रा ऽ म रं    ऽ ग को न   को ऽ न ग   न ब स ब ग ग ग रे   ग प ध सां   पध सां ध प   ग रे सा – ए क स य   ए ऽ क अ   साऽ ऽ ऽ ऽ   ऽ ऽ ध्य ऽ

55 5 5 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् डॉ पालन झा, ग्राम-हरौली, कुशेश्वरस्थान। एम. ए. ( मैथिली ), सन्त साहेब रामदास पर डॉ दुर्गानाथ झा ’श्रीश’ केर निर्देशनमे पी.एच.डी.। संप्रति बी. डी. जे. कॉलेज, गढ़बनैलीमे मैथिली विभागाध्यक्ष। सन्त साहेब रामदास साम्प्रदायिक अर्थें मैथिली साहित्यमे सन्त कविक रूपमे साहेब रामदासक प्रमुख स्थान अछि। पचाढ़ी स्थानक महंथ बंशीदासजीक सानिध्यमे कवीश्वर चन्दा झा हिनक पदावलीक संकलन कए १९०१ ई. मे प्रकाशित कएने छथि। एहि पदावलीमे परिचयक क्रममे कवीश्वर चन्दा झा लिखैत छथि: “शिवलोचन मुख शिव सन जखन, साहेब रामदास तिथि तखन। प्रबल नरेन्द्र सिंह मिथिलेश, शासित छल भल तिर्हुत देश॥“ अर्थात् ११५३ साल (१७४६ ई.) मध्य महाराज नरेन्द्र सिंहक राज्यकालमे ई रहथि। छादनसँ न्याय-तत्त्व-चिन्तामणि कर्ता गंगेश उपाध्याय वंश कुलोद्भव साहेब रामदास “कुसुमौल” ग्रामक ( जरैल परगना, जिला- मधुबनी ) एक मैथिल ब्राह्मण छलाह।हिनक छोट भाइक नाम कुनाराम ओऽ एकमात्र प्राणसमप्रिय पुत्र ’प्रीतम’ छलनि। हिनक पूरानाम साहेब राम झा छलनि, मुदा अन्य सन्त कवि जकाँ ईहो अपन नामक आगाँ भक्ति-भावनासँ ’दास’ शब्द जोड़ि लेलनि। साहेब रामदासक पदावलीमे लगभग ४७८ टा पद संकलित अछि। एहि कविता मध्य ई अपन नाम साहेबराम, साहेबदास, साहेब, साहेबजन सेहो रखने छथि। साहेब रामदास आरम्भहिसँ भक्ति-प्रवण विचारक लोक छलाह। ई सदिखन ईश्वरहिक ध्यान-चिन्तनमे लीन रहैत छलाह। सन्यास ई बादमे ग्रहण कएलनि। एहि पाछाँ एकटा दुखद घटना घटित भेल- हिनका एकमात्र पुत्र ’प्रीतम’ छलनि। ओऽ अधिक समय दुखित रहए लगलाह। उवावस्था छलनि। एकबेर प्रीतम अधिक दुखित भए गेल छलाह। हिनक जीवनक अन्तिम कालक भान भए जएबाक कारणेँ साहेबरामदासविकल भए कानए लगलाह। मरण शय्या पर रहितहुँ प्रीतमकेँ एहन दुःखद दृश्य देखि नहि रहल गेलनि आऽ ओऽ अपन पितासँ पुछैत छथिन, “बाबूजी! अपने एतेक विकल किएक भए रहल छी? पिता उत्तर दैत छथिन “पुत्रक आवश्यकता एहि चतुर्थ अवस्थामे होइत छैक, से तँ अपने हमरा पहिने छोड़ि कए जाए रहल छी, तैँ ई सोचि-सोचि खिन्न चित्त भए व्याकुल भए रहल छी”। पुत्र प्रीतम प्रत्युत्तर दैत कहैत छथिन, “ई संसार असार थिक, क्षणभंगुर थिक, एहिमे स्त्री-पुत्र-पुत्री केओ अपन नहि थिक, ई सभटा अनित्य थिक, माया-मोह थिक। सभटा स्वार्थमूलक थिक तेँ एहि सभसँ माया-मोह रखनाइ अनुचित थिक। हम तँ अपनेक भगवन्-भजनमे विघ्न मात्र छलहुँ, आब अपने निर्विघ्नपूर्वक भगवन्-भजनमे लागि जाऊ”। एतेक बात कहैत देरी प्रीतमक प्राण-पखेरू उड़ि गेलनि। साहेब रामदास विकल भए कानि-कानि कए गाबए लगलाह- “प्रीतम प्रीति तेजि भेल परदेसिआ हो” साहेब रामदासकेँ प्रीतमक देहावसानसँ बड़ आघात लगलनि, प्रीतमक उपदेशकेँ धारण कए परिवार-समाजकेँ तिलाञ्जलि दए सन्यास ग्रहण कए लेलनि। पुत्र-वियोगक कारणेँ ई पक्का बैरागी भए गेलाह। गामसँ बाहर भए जंगले-जंगल एकान्तमे वास कए भजन-कीर्तन करए लगलाह। गामक लोकसभ बहुत दिन धरि पाछाँ कएलकनि जे अपने घुरि जाऊ, हमहु सभ अपनेक पुत्रक समान छी, अपनेकेँ कोनो कष्ट नै होएत। मुदा साहेब रामदास पर तकर कोनो प्रभाव नहि पड़लनि, उनटे जतए लोकक आवागमन देखथिन्ह, स्थानकेँ बदलि पुनः निर्जनस्थानमे चलि जाइत छलाह। लोकसभ किछु दिन धरि पाछाँ तँ केलकनि, मुदा अन्तमे हरि-थाकि कए जे ई आब पक्का बैरागी भए गेल छथि, तेँ हिनका आब तंग नहि कएल जाए, विचारि कए पाछाँ करब छोड़ि देलकनि। बैरागी भेलाक बाद ई देशक बहुतो भागमे भ्रमण कएलनि। भजन-कीर्तनक संग योग-साधनामे सेहो लीन भए गेलाह। योग-साधनामे सिद्धि प्राप्त कएलाक पश्चात् केओटीक निवासी बलिरामदासजीसँ दीक्षा ग्रहण कएलनि। दीक्षा ग्रहण कएलाक पश्चातो ई अनेक धर्म स्थानक भ्रमण करैत रहलाह। कहल जाइत अछि जे साहेबरामदास दण्ड-प्रणाम करैत-करैत जगन्नाथपुरी तक गेलाह। बाटमे बड़ कष्ट सहए पड़लनि, घाओ भए गेलनि, घाओमे पीब आबि गेलनि, मुदा दण्ड-प्रणाम ओऽ नहि छोड़लनि। दण्ड-प्रणाम करैत-करैत जगन्नाथपुरी तक गेलाह। जकर प्रमाण हुनकहि एक कवितासँ भेटैत अछि- साधुके संगत धरि गुरुक चरण धरि, आहे सजनी हमहु जाएब जगरनाथहि रेकी। नहि केओ अन्नदाता संग नहि सहोदर भ्राता, आहे सजनी माँगि भीखि दिवस गमाएब रे की। सभ जग भेल भाला गुरुआ अठारह नाला, आहे सजनी ओहिठाम केओ नहि छोड़ाओल रे की। सिंह दरबाजा देखि मन मोर लुबधल, आहे सजनी ओहिठाम पंडा पंडा बेंत बजारल रे की। साहेब जे गुनि धुनि बैसलहुँ सिर धुनि, आहे सजनी जगत जीवन निअराएल रे की। गुरु बलिरामदास मुरिया रामपुरक एक महात्मा शिष्य छलाह तथा अपन गाम केओटा (केओटी)क घनघोर जंगलमे योग साधना करैत छलाह। ई योग साधनामे निष्णात् छलाह। कहल जाइत अछि जे गुरुक बिना वास्तविक ज्ञान असम्भव अछि आऽ तेँ साहेबरामदास एक योग्य गुरुसँ दीक्षा लए, योग-साधनामे सिद्धि प्राप्त कए लेलनि। योग क्रिया पर सिद्धि प्राप्त कए लेलाक बाद जन्म-मरणसँ छुटकारा पाबि जेबाक पूर्ण विश्वास भए गेलनि, से गुरुक प्रसादहिसँ। मोक्ष प्राप्तिमे आब कोनो सन्देह नहि रहि गेलनि, जे जीवनक चरम लक्ष्य थिक। बलिरामदास हिनक दीक्षा गुरु छलथिन, तकर प्रमाण हिनकहि एक कवितासँ भेटैछ- “गुरु बलिराम चरण धरि माथे, साहेब हरि अपनाया है। अब तौ जरा-मरण छुटि जैहे, संशय सकल मेटाया है”। कृष्णक ई अनन्य भक्त छलाह। जगन्नाथपुरीक यात्राक क्रममे बाटहिमे हिनका स्वयं भगवान श्री कृष्ण दर्शन देने छलथिन। आब तँ ई कृष्णक ध्यानमे दिन-राति लागल रहैत छलाह। समाधिस्थ कालमे तँ दुनियाँक कोनो वस्तुक ध्यान नहि रहैत छलनि, ध्यान रहैत छलनि तँ एक मात्र भगवान श्री कृष्ण। जन-श्रुति तँ ईहो अछि जे भगवानक भजनक कालमे जखन ई नाच करैत छलाह तँ स्वयं भगवान श्री कृष्ण सेहो उपस्थित भए संग दैत छलथिन। साहेब रामदास अनेक तीर्थ-स्थलक दर्शन कएलनि। सांसारिक मोह-मायाकेँ त्यागि वैरागी भए गेलाह, मुदा मिथिला भूमिकेँ नहि त्यागि सकलाह। एक पदमे ओऽ लिखैत छथि, “मिथिला नगरी तोर दान बिनु साहेब होइछ बेहाल” तथा दोसर पदमे “साहेब करुणा करए शीश धुनि मिथिला होइछ अन्धेरि”। एहि पद सभसँ मिथिलाक प्रति हुनक प्रेमक सहज अनुमान लगाओल जाए सकैत अछि। धन्य ई मिथिला भूमि ओऽ धन्य महात्मा साहेब रामदास। पहिने कहि चुकल छी जे ई जंगलमे एकान्त वास कए भजन-कीर्तन कएल करथि। जतए-जतए ई जाथि ताहि-ताहि ठाम ई अपन खन्ती गारि कुटियाक निर्माण कए एक पाकड़िक गाछ अवश्य रोपि दैत छलाह। हिनक अनेक जगह पर योगमढ़ी छल आऽ सबहि ठाम ई पाकड़िक गाछ अवश्य रोपि दैत छलाह। हिनक अन्तिम योगमढ़ी दरभंगा जिलाक ’पचाढ़ी’ गाममे अछि, जे पूर्वमे बूढ़वनक नामे विख्यात छल। एहू ठाम पाकड़िक गाछ रोपने छलाह, जे अद्यावधि वर्तमान अछि। पल्लवित एहि गाछक शोध मानवशास्त्री लोकनि एखनहु कए रहल छथि। कमलाक तट पर स्थित पचाढ़ी गामक वन आऽ वृन्दावनक तुलना करब कठिन भए जाइत छल। वृन्दावनसँ एको रत्ती कम शोभा पचाढ़ी (बूढ़वनक) नहि छल। मोरक नाच, सुगाक गान, नाना प्रकारक वन्यजीव प्राणीक निर्भय विचरण करब, भिन्न-भिन्न लता-पुष्पसँ शोभित वनक दृश्य लोककेँ सहजहि आकृष्ट कए लैत छल। एहि स्थानक प्रशंसामे कवीश्वर चन्दा झा लिखैत छथि— “पाकड़ि वृक्ष सएह कमला तट जएह भजन कुटी विश्राम। चन्द्र सुकवि मन धरम परमधन धन्य पचाढ़ी ग्राम”॥ पचाढ़ी स्थानक शोभा आब नहि रहि सकल, जे पहिने एक निर्जन स्थान छल, ताहि ठाम आब ग्राम अछि, खेती-पथारी कएल जाइत अछि। वनक तँ आब निशानो नहि रहि गेल अछि, तथापि साहेब रामदासजीक समाधि-स्थलक चारूकात मन्दिर सेहो एक-दू नहि छओ-सातटा अछि। सभमे भोग-रागक व्यवस्था, पुजेगरीक संग-संग सहायकक व्यवस्था सभ मन्दिरमे फराक-फराक अछि। लगभग पाँच कट्ठा जमीनमे फुलबारी अछि। आगत-अतिथिक स्वागत यथासाध्य एखनहु कएल जाइत अछि। साहेब रामदासक नाम पर एकटा संस्कृत महाविद्यालय अछि, जाहिमे निर्धन छात्रकेँ स्थान दिससँ रहबाक व्यवस्था ओ मुफ्त भोजनक व्यवस्था कएल जाइत अछि। पचाढ़ीस्थान मिथिलाक वैभवशाली स्थानमेसँ सर्वप्रमुख अछि। एकर वैभवशालीक पाछाँ राजदरभंगाक महत्वपूर्ण योगदान अछि। तत्कालीन दरभंगा मिथिलेश नरेन्द्रसिंह निःसन्तान छलाह। हुनक पत्नी रानी पद्मावती अतिथि-सत्कार, पूजा-पाठक निमित्त ३०० (तीन सए) बीघा जमीन पचाढ़ी स्थानकेँ दानस्वरूप देने छलथिन। मुदा कहल जाइत अछि जे साहेब रामदास ओहि जमीनक दान-पत्रकेँ प्रज्वलित अग्निमे फेकि देलखिन। शिष्य लोकनिकेँ भिक्षाटन वृत्तिसँ आगत-अतिथिक सेवा सत्कार करए पड़ैत छलनि, जाहिसँ ओ लोकनि तंग आबि गेलाह आऽ फलस्वरूप ओऽ दान-पत्र पुनः महारानीसँ प्राप्त कए चुप-चाप राखि लेलनि, जे एखनहु धरि सम्पत्तिक रूपमे विद्यमान अछि। किछु जमीन भक्त लोकनि वेतियामे सेहो देने छथि। योग्य शिष्य सभ एहि सम्पत्तिकेँ बढ़ाए लगभग हजार बीघा बनाए देलनि। सरकार किछु जमीनपर सिलिंग लगाए देलक, मुदा व्यवस्थापक लोकनि अधिकांश जमीनकेँ वन-विभागकेँ दए गाछ-वृक्ष लगवाए देलनि। अपेक्षाकृत एखनहु ई स्थान समृद्ध अछि। साहेबरामदास एक सिद्ध पुरुष छलाह आऽ तेँ हिनकामे चमत्कारिक गुण स्वाभाविक अछि। चमत्कारसँ सम्बन्धित अनेक कथा हिनकासँ जुड़ल अछि, जाहिमे एक चमत्कारक उल्लेख करब हम उचित बुझैत छी, जे हिनक अन्तः साक्ष्यसँ जुड़ल अछि। राजा नरेन्द्र सिंहक समयमे पटनाक कोनो मुसलमान नवाब मिथिलापर आक्रमण कए देलक। राजा नरेन्द्र सिंहक सेना ओ नवाबक सेनाक बीच घोर संग्राम भेल, जाहिमे अपार धन-जनक क्षति भेल छल, मुदा राजा नरेन्द्र सिंह ओहिमे स्वयं वीरतापूर्वक युद्ध कएलनि आऽ शत्रु सेनाकेँ पराजित कएल। ओहि समयमे महात्मा साहेब रामदास नरेन्द्र सिंहक विजयी होएबाक कामना स्वरूप श्रीकृष्णसँ प्रार्थना कएलनि- “साहेब गिरधर हरहु नरेन्द्र दुःख, करहु सुखित मिथिलेशहि रे की”। एहिपर क्रुद्ध भए नवाब हिनका बन्दी बनाए पटनाक कारागारमे बन्द कए देलनि। साहेब रामदास योगबलेँ सभ दिन गंगा-स्नान, संध्या-तर्पण, पूजा-पाठ आदि गंगहि तटपर कएल करथि। कारागारमे रहितहुँ ई क्रम हिनक निरन्तर चलैत रहलनि। लोक सभ हिनका गंगा तटपर सभ दिन देखैत छलनि। नवाबकेँ कोना ने कोना एहि बातक जानकारी भेट गेलनि। नवाबकेँ तँ विश्वास नहि भेलनि तथापि हुनका अपन कर्मचारी सभपर संदेह भेलनि आऽ ओऽ अपनेसँ कारागारमे ताला लगाए देलनि। तथापि साहेब रामदासक गंगा-स्नानक क्रम नहि टुटलनि। अन्तमे नवाब साहेबरामदासक पएरमे बेड़ी बान्हि कारागारमे ताला लगाए देलनि। साहेबरामदास तत्क्षणहि करुणाद्र भए अपन आराध्य देव श्री कृष्णकेँ पुकारलनि- “अब न चाहिए अति देर प्रभुजी, अब न चाहिए अति देर। विप्र-धेनु-महि विकल सन्त जन, लियो है असुरगण घेरि”। गविते छलाह की पएरक बेड़ी ओ फाटकक ताला आदि सभ टूटिकए खसि पड़ल। नवाब आश्चर्य चकित भए गेल। ओ महात्माजीक पएरपर खसि पड़ल। साहेबरामदाससँ क्षमा माँगलक आऽ बादमे ससम्मान स्वागत कए मिथिला पहुँचाए देल। एहि तरहक कएक गोट चमत्कार अछि, जेना राजा राघव सिंहक समयमे राजदरभंगामे प्रेत-बाधाकेँ शान्त करब, माटिक भीतकेँ हाँकब। कृष्णाष्टमी, जन्माष्टमी आदि उत्सवक अवसरपर अधिक साधु-सन्तक भीड़ जुटलाक बादो थोड़बहु सामग्रीमे भोजनक अवसरपर भण्डारामे कोनो कमी नहि होएब आदि कतोक चमत्कारिक घटना सभ अछि, जे हिनकासँ जुड़ल अछि। एहि सिद्ध पुरुषक चमत्कारिक घटनासभसँ लोकक हिनका प्रति कतेक श्रद्धा छल से सहजहि अनुमान कएल जाए सकैत अछि। साहेबरामदास वैरागी वैष्णव-भक्त-कवि छलाह। पदक रचना करब हिनक साधन छल मुदा साध्य तँ एकमात्र छल भगवान विष्णुक भजन-कीर्तन करब। कहल जाइत अछि जे ओऽ अपनहि पदक रचना कए सभ दिन भगवानक भजन-कीर्तन कएल करथि। ओऽ भक्तिमार्गी छलाह आऽ तेँ भक्ति-मार्गक सिद्धांतक अनुरूप पदक रचना कएल करथि। भक्ति मार्गक सभ रसक पदरूपमे रचना कएलनि, मुदा प्रधान रस “मधुरं” रस सएह अछि। भगवानक कोनो एक रूपक ओऽ आग्रही नहि, सगुण-निर्गुण दुनू रूपमे मानैत छलाह, जे अपन मनोगत भाव कवितामध्य व्यक्त कएने छथि। “निर्गुण सगुण पुरुष भगवान, बुझि कहु साहेब धरइछ ध्यान”। “धैरज धरिअ मिलत तोर कन्त, साहेब ओ प्रभु पुरुष अनन्त”। साहेब रामदासक यद्यपि एकमात्र पदावली उपलब्ध अछि, जाहिमे ४७८ टा पद संकलित अछि। मुदा ईएह पदावली हुनक यशकेँ अक्षुण्ण बनाए रखबामे सभ तरहेँ समर्थ अछि। भक्तिक प्रायः सभ विषयपर पदक रचना कएने छथि, यथा- कृष्ण-जन्म, वात्सल्य, वंशीवादन, संयोग-श्रृंगार, रास-लीला, झुलोत्सव आदि। रासलीला परक जेहन पद सभक ई रचना कएने छथि से प्रायः मैथिलीमे आन केओ कवि नहि कएने छथि। हिनक रास-लीला परक पदक विवेचन स्वतंत्र रूपेँ कएल जाए सकैत अछि। कृष्ण-प्रेमक अनन्यता, भक्ति प्रवणता ओ प्रसाद गुण हिनक काव्यक मुख्य गुण कहल जाए सकैत अछि। ऋतुगीत, दिन-रातिक भिन्न-भिन्न समयोपयोगी पदक रचना, जेना-प्राती, सारंग, ललित, विहाग आदिक रचना कएल करथि। मिथिला पञ्चदेवोपासक सभ दिनसँ रहल अछि। साहेब रामदासक रचनामे सेहो भक्तिक विविध-रूपक दर्शन होइत अछि। कृष्णक तँ ई अनन्य भक्त छलाह मुदा आनो-आन देवी-देवता परक पदक रचना कएने छथि। हिनक हनुमानक फागु परक कविता देखल जाए सकैत अछि। एकरा सन्त लोकनिक फागु सेहो कहल जाए सकैछ- “प्रवल अनिल कपि कौतुक साजल लंका कएल प्रयाण। कनक अटारी कए असवारी छाड़थि अगनिक वाण॥ जरए लंक कपि खेलए फगुआ, उड़ए गगन अंगार। धुँआ वाढ़ि अकासहि लागल दिवसहि भेल अन्धार”। हिनक रचित एकटा महादेवक गीत सेहो अछि, जकर उल्लेख डॉ. रामदेव झा अपन “शैव साहित्यक भूमिका” नामक ग्रन्थमे कएने छथि- “ पुछइत फिरइत गौरा वटिया हे राम। कहु हे माइ, जाइत देखल मोर भंगिया हे राम॥ हाथ भसम केर गोला हे राम। वरद रे चढ़ि कोन नगर गेल भोला हे राम”॥ विरहिणी व्रजाङ्गनाक मनोदशाक एक विलक्षण रूप एहि ठाम सेहो देखल जाए सकैत अछि: “कमल नयन मनमोहन रे कहि गेल अनेक। कतेक दिवस भए राखब रे हुनि वचनक टेक॥ के पतिआ लए जाएत रे जहँ वसु नन्दलाल। लोचन हमर सतओलनि रे छतिआ दए शाल॥ जहँ-जहँ हरिक सिंहासन आसन जेहिठाम। हमहु मरब हरि-हरि कै मेटि जाएत पीर॥ आदि” मिथिलाक सन्गीत परम्परा अति प्राचीन ओ समृद्ध अछि। संगीतक रचना तँ विद्यापति ओ हुनकहुँसँ पूर्व होइत आएल अछि, मुदा रहस्यवादी संगीत-काव्य-रचना नवीन रूपमे आएल अछि, जकर प्रवर्तक साधु-सन्त लोकनि भेलाह। जाहिमे सन्त साहेब रामदासक स्थान अग्रगण्य अछि। हिनका लोकनिक रचनाक प्रभाव प्रायः सभ वर्गपर पड़ल। हिनक प्रायः सभ कवितामे रागक उल्लेख अछि। अतः एहिपर संगीत-शास्त्रक अनुकूल शोध-कार्य कएल जएबाक आवश्यकता अछि। साहेब रामदास परम वैरागी सुच्चा साधु छलाह, भक्त छलाह आऽ तेँ हिनक भाषापर सधुक्करी ओ तत्काल प्रचलित व्रजभाषाक किछु प्रभाव सेहो पड़ल अछि, तथापि हुनक जे पदावली उपलब्ध अछि से मैथिली साहित्यकेँ समृद्ध बनएबामे अपन महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कएने अछि। भक्ति-भावनाक सरलता ओ सहजताक दृष्टिएँ हिनक भाषा सरल ओ सहज अछि। भक्ति-भावना परक एहन कविता मैथिली-साहित्यमे प्रायः दुर्लभ अछि। हिनक भक्ति परक गीत एखनहु मिथिलाक गाम-घरमे बुढ़-बुढ़ानुसक ठोरपर अनुवर्तमान अछि, जकर संकलन करब परम आवश्यक अछि।

55 5 5 मैथिलीपुत्र प्रदीप- आध्यात्मिक निबन्ध १. श्री मैथिली पुत्र प्रदीप (१९३६- )। ग्राम- कथवार, दरभंगा। प्रशिक्षित एम.ए., साहित्य रत्न, नवीन शास्त्री, पंचाग्नि साधक। हिनकर रचित "जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर’ आऽ ’सभक सुधि अहाँ लए छी हे अम्बे हमरा किए बिसरै छी यै" मिथिलामे लेजेंड भए गेल अछि। ॐ (मा) एकटा प्रश्न उठि सकैछ, जे मोक्ष कामीक लेल वैदिक कर्मक प्रयोजन? एकर उत्तर ई भऽ सकैछ जे यज्ञ यागादि कर्मक फलश्रुतिमे स्वर्ग प्राप्त करबाक बात कहल गेल अछि। मुदा जे व्यक्ति स्वर्ग नहि चाहैत होथि, मोक्षेटा चाहैत होथि, हुनका लेल वैदिक कर्मक आवश्यकता, ई वृहदारण्यकोपनिषद केर वचनसँ पुष्ट होइत अछि। यथा- “ तमेतं वेदानु वचनेनं ब्राह्मणाः विविदिषन्ति यज्ञेन, दानेन तपसा नाशकेन”। अर्थात्- ब्राह्मणगण वेदाध्ययनसँ कामनारहित यज्ञ, दान एवं तपसँ ओहि ब्रह्मकेँ चिन्हबाक इच्छा करैत छथि। एहि वचनमे अनाशकेन अर्थात् कामनारहित “यज्ञ, दान, तप” विशेष महत्त्व रखैत अछि। तात्पर्य जे वेदोक्त यज्ञादि कर्म जखन आशक्तिक संग कएल जाइत अछि, तखन ओहिसँ मात्र स्वर्गक भोग प्राप्त होइत अछि। परन्तु जखन बिना आशक्ति रखने निःस्वार्थ भावसँ कयल जाइत अछि, तखन काम-क्रोधसँ मुक्त भऽ कऽ कार्य केनिहारक चित्त शुद्ध भऽ जाइत अछि। ओऽ मोक्षक अधिकारी भऽ जाइत छथि। श्रीमद्भगवदगीतामे भगवान् श्रीकृष्णक उक्ति अछि- अध्याय १८ (५-६) यज्ञदान तपः कर्म न साज्यं कार्यमेव तत। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥ एतान्यापित कर्माणि संगं त्यक्त्वा फलानि च। कार्व्यानीति मे पार्थं निश्चितं मतमुत्तमम॥ अर्थात्- यज्ञ, दान, तप आदि कर्मक त्याग नहि करबाक चाही। मुदा ई समस्त कर्म निष्काम भावसँ करबाक चाही। अतएव उपनिषदक ’अनाशकेन’ एहि पदकेँ एहिठाम गीताक संगं त्यक्त्वा फलानि च पुष्ट करैत अछि। अतएव जे मनुष्य अपन आन्तरिक कल्याण चाहैत छथि अर्थात् जन्म-मृत्युक बन्धनसँ मुक्त हेबाक इच्छा करैत छथि, हुनका वैदिक कर्मकाण्डक फलस्वरूप स्वर्गक भोग केर इच्छा नहि राखि कऽ निष्काम भावसँ भगवानक प्रसन्नताक लेल मात्र कार्य करबाक चाही। ई बात मुण्डकोपनिषदमे सेहो आयल अछि। १,२,७. मनुष्यक चित्त अनेक प्रकारक कुकर्मसँ मलिन भऽ गेल रहैत अछि। एहि सभ मैलकेँ हटेबाक लेल सत् कर्म करब आवश्यक अछि। एहि सत्कर्मकेँ करबाक उद्देश्य होइत अछि वैदिक कर्म काण्ड। वेदोक्त कर्म कएलासँ चित्त शुद्ध होइत अछि। जकर बाद ब्रह्म विद्या अथवा ज्ञानक बात सुनलासँ सुफल भेटैत छैक। उपनयन संस्कारक बाद वेदोक्त कर्म करबाक लोक अधिकारी होइत छथि। वेदक अन्तिम लक्ष्य मोक्षे प्राप्त करब थीक। ईश्वरक उपासना योगक अभ्यास, धर्मक अनुष्ठान, विद्या प्राप्ति, ब्रह्मचर्य व्रतक पालन तथा सत्संग आदि मुक्तिक साधन गानल गेल अछि। कर्मफलक प्राप्तिक हेतु पुनर्जन्मक प्रतिपादन आत्मोन्नत्तिक लेल संस्कारक निरूपण, समुचित जीवन-यापन हेतु वर्णाश्रमक व्यवस्था एवं जीवनक पवित्रता हेतु भक्ष्या-भक्ष्यक निर्णय करब वेदक मुख्य विशेषता थीक। कर्मकाण्ड, उपासना-काण्ड तथा ज्ञान-काण्ड एहि तीनूक वर्णन मुख्यतया वेदमे भेटैत अछि। यज्ञान्तर्गत देवताक पूजा, ऋषि-महर्षिक सत्संग तथा दान ई तीनू क्रिया एक संग होइत अछि। तहिना ब्रह्मचर्य पालनसँ ऋषि-ऋण, यज्ञ द्वारा देव-ऋण तथा संतानोत्पत्तिसँ पितृऋण मुक्त हेबाक आदर्श वाक्य वेदेमे प्राप्त होइत अछि। पुत्र-वियोगक कारणेँ ई पक्का बैरागी भए गेलाह। गामसँ बाहर भए जंगले-जंगल एकान्तमे वास कए भजन-कीर्तन करए लगलाह। गामक लोकसभ बहुत दिन धरि पाछाँ कएलकनि जे अपने घुरि जाऊ, हमहु सभ अपनेक पुत्रक समान छी, अपनेकेँ कोनो कष्ट नै होएत। मुदा साहेब रामदास पर तकर कोनो प्रभाव नहि पड़लनि, उनटे जतए लोकक आवागमन देखथिन्ह, स्थानकेँ बदलि पुनः निर्जनस्थानमे चलि जाइत छलाह। लोकसभ किछु दिन धरि पाछाँ तँ केलकनि, मुदा अन्तमे हरि-थाकि कए जे ई आब पक्का बैरागी भए गेल छथि, तेँ हिनका आब तंग नहि कएल जाए, विचारि कए पाछाँ करब छोड़ि देलकनि। बैरागी भेलाक बाद ई देशक बहुतो भागमे भ्रमण कएलनि। भजन-कीर्तनक संग योग-साधनामे सेहो लीन भए गेलाह। योग-साधनामे सिद्धि प्राप्त कएलाक पश्चात् केओटीक निवासी बलिरामदासजीसँ दीक्षा ग्रहण कएलनि। दीक्षा ग्रहण कएलाक पश्चातो ई अनेक धर्म स्थानक भ्रमण करैत रहलाह। कहल जाइत अछि जे साहेबरामदास दण्ड-प्रणाम करैत-करैत जगन्नाथपुरी तक गेलाह। बाटमे बड़ कष्ट सहए पड़लनि, घाओ भए गेलनि, घाओमे पीब आबि गेलनि, मुदा दण्ड-प्रणाम ओऽ नहि छोड़लनि। दण्ड-प्रणाम करैत-करैत जगन्नाथपुरी तक गेलाह। जकर प्रमाण हुनकहि एक कवितासँ भेटैत अछि- साधुके संगत धरि गुरुक चरण धरि, आहे सजनी हमहु जाएब जगरनाथहि रेकी। नहि केओ अन्नदाता संग नहि सहोदर भ्राता, आहे सजनी माँगि भीखि दिवस गमाएब रे की। सभ जग भेल भाला गुरुआ अठारह नाला, आहे सजनी ओहिठाम केओ नहि छोड़ाओल रे की। सिंह दरबाजा देखि मन मोर लुबधल, आहे सजनी ओहिठाम पंडा पंडा बेंत बजारल रे की। साहेब जे गुनि धुनि बैसलहुँ सिर धुनि, आहे सजनी जगत जीवन निअराएल रे की। गुरु बलिरामदास मुरिया रामपुरक एक महात्मा शिष्य छलाह तथा अपन गाम केओटा (केओटी)क घनघोर जंगलमे योग साधना करैत छलाह। ई योग साधनामे निष्णात् छलाह। कहल जाइत अछि जे गुरुक बिना वास्तविक ज्ञान असम्भव अछि आऽ तेँ साहेबरामदास एक योग्य गुरुसँ दीक्षा लए, योग-साधनामे सिद्धि प्राप्त कए लेलनि। योग क्रिया पर सिद्धि प्राप्त कए लेलाक बाद जन्म-मरणसँ छुटकारा पाबि जेबाक पूर्ण विश्वास भए गेलनि, से गुरुक प्रसादहिसँ। मोक्ष प्राप्तिमे आब कोनो सन्देह नहि रहि गेलनि, जे जीवनक चरम लक्ष्य थिक। बलिरामदास हिनक दीक्षा गुरु छलथिन, तकर प्रमाण हिनकहि एक कवितासँ भेटैछ- “गुरु बलिराम चरण धरि माथे, साहेब हरि अपनाया है। अब तौ जरा-मरण छुटि जैहे, संशय सकल मेटाया है”। कृष्णक ई अनन्य भक्त छलाह। जगन्नाथपुरीक यात्राक क्रममे बाटहिमे हिनका स्वयं भगवान श्री कृष्ण दर्शन देने छलथिन। आब तँ ई कृष्णक ध्यानमे दिन-राति लागल रहैत छलाह। समाधिस्थ कालमे तँ दुनियाँक कोनो वस्तुक ध्यान नहि रहैत छलनि, ध्यान रहैत छलनि तँ एक मात्र भगवान श्री कृष्ण। जन-श्रुति तँ ईहो अछि जे भगवानक भजनक कालमे जखन ई नाच करैत छलाह तँ स्वयं भगवान श्री कृष्ण सेहो उपस्थित भए संग दैत छलथिन। साहेब रामदास अनेक तीर्थ-स्थलक दर्शन कएलनि। सांसारिक मोह-मायाकेँ त्यागि वैरागी भए गेलाह, मुदा मिथिला भूमिकेँ नहि त्यागि सकलाह। एक पदमे ओऽ लिखैत छथि, “मिथिला नगरी तोर दान बिनु साहेब होइछ बेहाल” तथा दोसर पदमे “साहेब करुणा करए शीश धुनि मिथिला होइछ अन्धेरि”। एहि पद सभसँ मिथिलाक प्रति हुनक प्रेमक सहज अनुमान लगाओल जाए सकैत अछि। धन्य ई मिथिला भूमि ओऽ धन्य महात्मा साहेब रामदास। पहिने कहि चुकल छी जे ई जंगलमे एकान्त वास कए भजन-कीर्तन कएल करथि। जतए-जतए ई जाथि ताहि-ताहि ठाम ई अपन खन्ती गारि कुटियाक निर्माण कए एक पाकड़िक गाछ अवश्य रोपि दैत छलाह। हिनक अनेक जगह पर योगमढ़ी छल आऽ सबहि ठाम ई पाकड़िक गाछ अवश्य रोपि दैत छलाह। हिनक अन्तिम योगमढ़ी दरभंगा जिलाक ’पचाढ़ी’ गाममे अछि, जे पूर्वमे बूढ़वनक नामे विख्यात छल। एहू ठाम पाकड़िक गाछ रोपने छलाह, जे अद्यावधि वर्तमान अछि। पल्लवित एहि गाछक शोध मानवशास्त्री लोकनि एखनहु कए रहल छथि। कमलाक तट पर स्थित पचाढ़ी गामक वन आऽ वृन्दावनक तुलना करब कठिन भए जाइत छल। वृन्दावनसँ एको रत्ती कम शोभा पचाढ़ी (बूढ़वनक) नहि छल। मोरक नाच, सुगाक गान, नाना प्रकारक वन्यजीव प्राणीक निर्भय विचरण करब, भिन्न-भिन्न लता-पुष्पसँ शोभित वनक दृश्य लोककेँ सहजहि आकृष्ट कए लैत छल। एहि स्थानक प्रशंसामे कवीश्वर चन्दा झा लिखैत छथि— “पाकड़ि वृक्ष सएह कमला तट जएह भजन कुटी विश्राम। चन्द्र सुकवि मन धरम परमधन धन्य पचाढ़ी ग्राम”॥ पचाढ़ी स्थानक शोभा आब नहि रहि सकल, जे पहिने एक निर्जन स्थान छल, ताहि ठाम आब ग्राम अछि, खेती-पथारी कएल जाइत अछि। वनक तँ आब निशानो नहि रहि गेल अछि, तथापि साहेब रामदासजीक समाधि-स्थलक चारूकात मन्दिर सेहो एक-दू नहि छओ-सातटा अछि। सभमे भोग-रागक व्यवस्था, पुजेगरीक संग-संग सहायकक व्यवस्था सभ मन्दिरमे फराक-फराक अछि। लगभग पाँच कट्ठा जमीनमे फुलबारी अछि। आगत-अतिथिक स्वागत यथासाध्य एखनहु कएल जाइत अछि। साहेब रामदासक नाम पर एकटा संस्कृत महाविद्यालय अछि, जाहिमे निर्धन छात्रकेँ स्थान दिससँ रहबाक व्यवस्था ओ मुफ्त भोजनक व्यवस्था कएल जाइत अछि। पचाढ़ीस्थान मिथिलाक वैभवशाली स्थानमेसँ सर्वप्रमुख अछि। एकर वैभवशालीक पाछाँ राजदरभंगाक महत्वपूर्ण योगदान अछि। तत्कालीन दरभंगा मिथिलेश नरेन्द्रसिंह निःसन्तान छलाह। हुनक पत्नी रानी पद्मावती अतिथि-सत्कार, पूजा-पाठक निमित्त ३०० (तीन सए) बीघा जमीन पचाढ़ी स्थानकेँ दानस्वरूप देने छलथिन। मुदा कहल जाइत अछि जे साहेब रामदास ओहि जमीनक दान-पत्रकेँ प्रज्वलित अग्निमे फेकि देलखिन। शिष्य लोकनिकेँ भिक्षाटन वृत्तिसँ आगत-अतिथिक सेवा सत्कार करए पड़ैत छलनि, जाहिसँ ओ लोकनि तंग आबि गेलाह आऽ फलस्वरूप ओऽ दान-पत्र पुनः महारानीसँ प्राप्त कए चुप-चाप राखि लेलनि, जे एखनहु धरि सम्पत्तिक रूपमे विद्यमान अछि। किछु जमीन भक्त लोकनि वेतियामे सेहो देने छथि। योग्य शिष्य सभ एहि सम्पत्तिकेँ बढ़ाए लगभग हजार बीघा बनाए देलनि। सरकार किछु जमीनपर सिलिंग लगाए देलक, मुदा व्यवस्थापक लोकनि अधिकांश जमीनकेँ वन-विभागकेँ दए गाछ-वृक्ष लगवाए देलनि। अपेक्षाकृत एखनहु ई स्थान समृद्ध अछि। साहेबरामदास एक सिद्ध पुरुष छलाह आऽ तेँ हिनकामे चमत्कारिक गुण स्वाभाविक अछि। चमत्कारसँ सम्बन्धित अनेक कथा हिनकासँ जुड़ल अछि, जाहिमे एक चमत्कारक उल्लेख करब हम उचित बुझैत छी, जे हिनक अन्तः साक्ष्यसँ जुड़ल अछि। राजा नरेन्द्र सिंहक समयमे पटनाक कोनो मुसलमान नवाब मिथिलापर आक्रमण कए देलक। राजा नरेन्द्र सिंहक सेना ओ नवाबक सेनाक बीच घोर संग्राम भेल, जाहिमे अपार धन-जनक क्षति भेल छल, मुदा राजा नरेन्द्र सिंह ओहिमे स्वयं वीरतापूर्वक युद्ध कएलनि आऽ शत्रु सेनाकेँ पराजित कएल। ओहि समयमे महात्मा साहेब रामदास नरेन्द्र सिंहक विजयी होएबाक कामना स्वरूप श्रीकृष्णसँ प्रार्थना कएलनि- “साहेब गिरधर हरहु नरेन्द्र दुःख, करहु सुखित मिथिलेशहि रे की”। एहिपर क्रुद्ध भए नवाब हिनका बन्दी बनाए पटनाक कारागारमे बन्द कए देलनि। साहेब रामदास योगबलेँ सभ दिन गंगा-स्नान, संध्या-तर्पण, पूजा-पाठ आदि गंगहि तटपर कएल करथि। कारागारमे रहितहुँ ई क्रम हिनक निरन्तर चलैत रहलनि। लोक सभ हिनका गंगा तटपर सभ दिन देखैत छलनि। नवाबकेँ कोना ने कोना एहि बातक जानकारी भेट गेलनि। नवाबकेँ तँ विश्वास नहि भेलनि तथापि हुनका अपन कर्मचारी सभपर संदेह भेलनि आऽ ओऽ अपनेसँ कारागारमे ताला लगाए देलनि। तथापि साहेब रामदासक गंगा-स्नानक क्रम नहि टुटलनि। अन्तमे नवाब साहेबरामदासक पएरमे बेड़ी बान्हि कारागारमे ताला लगाए देलनि। साहेबरामदास तत्क्षणहि करुणाद्र भए अपन आराध्य देव श्री कृष्णकेँ पुकारलनि- “अब न चाहिए अति देर प्रभुजी, अब न चाहिए अति देर। विप्र-धेनु-महि विकल सन्त जन, लियो है असुरगण घेरि”। गविते छलाह की पएरक बेड़ी ओ फाटकक ताला आदि सभ टूटिकए खसि पड़ल। नवाब आश्चर्य चकित भए गेल। ओ महात्माजीक पएरपर खसि पड़ल। साहेबरामदाससँ क्षमा माँगलक आऽ बादमे ससम्मान स्वागत कए मिथिला पहुँचाए देल। एहि तरहक कएक गोट चमत्कार अछि, जेना राजा राघव सिंहक समयमे राजदरभंगामे प्रेत-बाधाकेँ शान्त करब, माटिक भीतकेँ हाँकब। कृष्णाष्टमी, जन्माष्टमी आदि उत्सवक अवसरपर अधिक साधु-सन्तक भीड़ जुटलाक बादो थोड़बहु सामग्रीमे भोजनक अवसरपर भण्डारामे कोनो कमी नहि होएब आदि कतोक चमत्कारिक घटना सभ अछि, जे हिनकासँ जुड़ल अछि। एहि सिद्ध पुरुषक चमत्कारिक घटनासभसँ लोकक हिनका प्रति कतेक श्रद्धा छल से सहजहि अनुमान कएल जाए सकैत अछि। साहेबरामदास वैरागी वैष्णव-भक्त-कवि छलाह। पदक रचना करब हिनक साधन छल मुदा साध्य तँ एकमात्र छल भगवान विष्णुक भजन-कीर्तन करब। कहल जाइत अछि जे ओऽ अपनहि पदक रचना कए सभ दिन भगवानक भजन-कीर्तन कएल करथि। ओऽ भक्तिमार्गी छलाह आऽ तेँ भक्ति-मार्गक सिद्धांतक अनुरूप पदक रचना कएल करथि। भक्ति मार्गक सभ रसक पदरूपमे रचना कएलनि, मुदा प्रधान रस “मधुरं” रस सएह अछि। भगवानक कोनो एक रूपक ओऽ आग्रही नहि, सगुण-निर्गुण दुनू रूपमे मानैत छलाह, जे अपन मनोगत भाव कवितामध्य व्यक्त कएने छथि। “निर्गुण सगुण पुरुष भगवान, बुझि कहु साहेब धरइछ ध्यान”। “धैरज धरिअ मिलत तोर कन्त, साहेब ओ प्रभु पुरुष अनन्त”। साहेब रामदासक यद्यपि एकमात्र पदावली उपलब्ध अछि, जाहिमे ४७८ टा पद संकलित अछि। मुदा ईएह पदावली हुनक यशकेँ अक्षुण्ण बनाए रखबामे सभ तरहेँ समर्थ अछि। भक्तिक प्रायः सभ विषयपर पदक रचना कएने छथि, यथा- कृष्ण-जन्म, वात्सल्य, वंशीवादन, संयोग-श्रृंगार, रास-लीला, झुलोत्सव आदि। रासलीला परक जेहन पद सभक ई रचना कएने छथि से प्रायः मैथिलीमे आन केओ कवि नहि कएने छथि। हिनक रास-लीला परक पदक विवेचन स्वतंत्र रूपेँ कएल जाए सकैत अछि। कृष्ण-प्रेमक अनन्यता, भक्ति प्रवणता ओ प्रसाद गुण हिनक काव्यक मुख्य गुण कहल जाए सकैत अछि। ऋतुगीत, दिन-रातिक भिन्न-भिन्न समयोपयोगी पदक रचना, जेना-प्राती, सारंग, ललित, विहाग आदिक रचना कएल करथि। मिथिला पञ्चदेवोपासक सभ दिनसँ रहल अछि। साहेब रामदासक रचनामे सेहो भक्तिक विविध-रूपक दर्शन होइत अछि। कृष्णक तँ ई अनन्य भक्त छलाह मुदा आनो-आन देवी-देवता परक पदक रचना कएने छथि। हिनक हनुमानक फागु परक कविता देखल जाए सकैत अछि। एकरा सन्त लोकनिक फागु सेहो कहल जाए सकैछ- “प्रवल अनिल कपि कौतुक साजल लंका कएल प्रयाण। कनक अटारी कए असवारी छाड़थि अगनिक वाण॥ जरए लंक कपि खेलए फगुआ, उड़ए गगन अंगार। धुँआ वाढ़ि अकासहि लागल दिवसहि भेल अन्धार”। हिनक रचित एकटा महादेवक गीत सेहो अछि, जकर उल्लेख डॉ. रामदेव झा अपन “शैव साहित्यक भूमिका” नामक ग्रन्थमे कएने छथि- “ पुछइत फिरइत गौरा वटिया हे राम। कहु हे माइ, जाइत देखल मोर भंगिया हे राम॥ हाथ भसम केर गोला हे राम। वरद रे चढ़ि कोन नगर गेल भोला हे राम”॥ विरहिणी व्रजाङ्गनाक मनोदशाक एक विलक्षण रूप एहि ठाम सेहो देखल जाए सकैत अछि: “कमल नयन मनमोहन रे कहि गेल अनेक। कतेक दिवस भए राखब रे हुनि वचनक टेक॥ के पतिआ लए जाएत रे जहँ वसु नन्दलाल। लोचन हमर सतओलनि रे छतिआ दए शाल॥ जहँ-जहँ हरिक सिंहासन आसन जेहिठाम। हमहु मरब हरि-हरि कै मेटि जाएत पीर॥ आदि” मिथिलाक सन्गीत परम्परा अति प्राचीन ओ समृद्ध अछि। संगीतक रचना तँ विद्यापति ओ हुनकहुँसँ पूर्व होइत आएल अछि, मुदा रहस्यवादी संगीत-काव्य-रचना नवीन रूपमे आएल अछि, जकर प्रवर्तक साधु-सन्त लोकनि भेलाह। जाहिमे सन्त साहेब रामदासक स्थान अग्रगण्य अछि। हिनका लोकनिक रचनाक प्रभाव प्रायः सभ वर्गपर पड़ल। हिनक प्रायः सभ कवितामे रागक उल्लेख अछि। अतः एहिपर संगीत-शास्त्रक अनुकूल शोध-कार्य कएल जएबाक आवश्यकता अछि। साहेब रामदास परम वैरागी सुच्चा साधु छलाह, भक्त छलाह आऽ तेँ हिनक भाषापर सधुक्करी ओ तत्काल प्रचलित व्रजभाषाक किछु प्रभाव सेहो पड़ल अछि, तथापि हुनक जे पदावली उपलब्ध अछि से मैथिली साहित्यकेँ समृद्ध बनएबामे अपन महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कएने अछि। भक्ति-भावनाक सरलता ओ सहजताक दृष्टिएँ हिनक भाषा सरल ओ सहज अछि। भक्ति-भावना परक एहन कविता मैथिली-साहित्यमे प्रायः दुर्लभ अछि। हिनक भक्ति परक गीत एखनहु मिथिलाक गाम-घरमे बुढ़-बुढ़ानुसक ठोरपर अनुवर्तमान अछि, जकर संकलन करब परम आवश्यक अछि। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् साहित्य मनीषी मायानन्द मिश्रसँ साक्षात्कार -डॉ शिव प्रसाद यादवद्वारा।डॉ. श्री शिवप्रसाद यादव, मारवाड़ी महाविद्यालय भागलपुरमे मैथिली विभागाध्यक्ष छथि। भागलपुरक नामी-गामी विशाल सरोवर ’भैरवा तालाब’। जे परोपट्टामे रोहु माछक लेल प्रसिद्ध अछि। कारण एहि पोख्रिक माँछ बड़ स्वादिष्ट। किएक ने! चौगामाक गाय-महींसक एक मात्र चारागाह आर स्नानागार भैरबा पोखड़िक महाड़। दक्षिणबड़िया महाड़ पर मारवाड़ी महाविद्यालय छात्रावास। छात्रावासक प्रांगणमे हमर (अधीक्षक) निवास। आवासक प्रवेश द्वार पर लुक-खुक करैत साँझमे बुलारोक धाप। हॉर्नक ध्वनि सुनि दौड़ि कए घरसँ बहार भेलहुँ। दर्शन देलनि मिथिलाक त्रिपूर्ति, महान विभूति- दिव्य रूप। सौम्य ललाट। ताहि पर चाननक ठोप, भव्य परिधान। ताहि पर मिथिलाक पाग देखितहि मोन भेल बाग-बाग। नहुँ-नहुँ उतरलनि- साहित्य मनीषी मायानन्द, महेन्द्र ओऽ धीरेन्द्र। गुरुवर लोकनिक शुभागमनसँ घर-आँगन सोहावन भए गेल। हृदय उमंग आऽ उल्लाससँ भरि गेल। मोन प्रसन्न ओऽ प्रमुदित भए उठल। गुरुवर आसन ग्रहण कएलनि, यथा साध्य स्वागत भेलनि। तदुपरान्त भेंटवार्ताक क्रम आरम्भ भए गेल। प्रस्तुत अछि हुनक समस्त साहित्य-संसारमे समाहित भेंटवार्ताक ई अंश:- प्र. ’मिथि-मालिनी’ केँ अपने आद्योपान्त पढ़ल। एकर समृद्धिक लेल किछु सुझाव? उ. ’मिथि मालिनी’ स्वयं सुविचारित रूपें चलि रहल अछि। स्थानीय पत्रिका-प्रसंग हमर सभ दिनसँ विचार रहल अछि जे एहिमे स्थापित लेखकक संगहि स्थानीय लेखक-मंडलकेँ सेहो अधिकाधिक प्रोत्साहन भेटक चाही। एहिमे स्थानीय उपभाषाक रचनाक सेहो प्रकाशन होमक चाही। एहिसँ पारस्परिक संगठनात्मक भावनाक विकास होयत। प्र. ’मिथिला परिषद’ द्वारा आयोजित विद्यापति स्मृति पर्व समारोहमे अपनेकेँ सम्मानित कएल गेल। प्रतिक्रिया? उ. हम तँ सभ दिनसँ मैथिलीक सिपाही रहलहुँ अछि। सम्मान तँ सेनापतिक होइत छैक, तथापि हमरा सन सामान्यक प्रति अपने लोकनिक स्नेह-भाव हमरा लेल गौरवक वस्तु भेल आऽ मिथिला परिषदक महानताक सूचक। हमरा प्रसन्न्ता अछि। प्र. अपने साहित्य सृजन दिशि कहियासँ उन्मुख भेलहुँ? उ. तत्कालीन भागलपुर जिलाक सुपौलमे सन् ४४-४५ मे अक्षर पुरुष पं रामकृष्ण झा ’किसुन’ द्वारा मिथिला पुस्तकालयक स्थापना भेल छल तकर हम सातम-आठम वर्गसँ मैट्रिक धरि अर्थात् ४६-४७ ई सँ ४९-५० ई.धरि नियमित पाठक रही। एहि अध्ययनसँ लेखनक प्रेरणा भेटल तथा सन् ४९ ई. सँ मैथिलीमे लेख लिखऽ लगलहुँ जे कालान्तरमे भाङक लोटाक नामे प्रकाशितो भेल सन् ५१ ई. मे। हम तकर बादे मंच सभपर कविता पढ़ऽ लगलहुँ। प्र. अपने हिन्दी एवं मैथिली दुनू विषयसँ एम.ए. कएल। पहिल एम.ए. कोन विषयमे भेल? उ. मैट्रिकमे मैथिली छल किन्तु सन् ५० ई. मे सी.एम. कॉलेज दरभंगामे नाम लिखेबा काल कहल गेल जे मैथिलीक प्रावधान नहि अछि। तैँ हिन्दी रखलहुँ। तैँ रेडियो, पटनामे काज करैत, सन् ६० ई. मे पहिने हिन्दीमे, तखन सन् ६१ ई. मे मैथिलीमे एम. ए. कएलहुँ। प्र. हिन्दी साहित्यमे प्रथम रचना की थीक आऽ कहिया प्रकाशित भेल। उ. हिन्दीक हमर पहिल रचना थिक, ’माटी के लोक: सोने की नया’ जे कोसीक विभीषिका पर आधारित उपन्यास थिक आऽ जे सन् ६७ ई. मे राजकमल प्रकाशन, दिल्लीसँ प्रकाशित भेल। प्र.अपनेक हिन्दी साहित्यमे १. प्रथम शैल पुत्री च २. मंत्रपुत्र ३. पुरोहित ४. स्त्रीधन ५. माटी के लोक सोने की नैया, पाँच गोट उपन्यास प्रकाशित अछि। एहिमे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपन्यास कोन अछि आओर किएक? उ. अपन रचनाक प्रसंग स्वयं लेखक की मंतव्य दऽ सकैत अछि? ई काज तँ थिक पाठक आऽ समीक्षक लोकनिक। एना, हिन्दी जगतमे हमर सभ ऐतिहासिक उपन्यास चर्चित रहल अछि। अधिक हिन्दी समीक्षक प्रशंसे कएने छथि। गत वर्षसँ हिन्दीक सम्राट प्रो. नामवर सिंह जी हिन्दीक श्रेष्ठ उपन्यास पर एकटा विशिष्ट कार्य कऽ रहल छथि, जाहिमे हमर प्रथम शैल-पुत्री नामक प्रगैतिहासिक कालीन उपन्यास सेहो संकलित भऽ रहल अछि। एहि उपन्यास पर विस्तृत समीक्षा लिखने छथि जयपुर युनिवर्सिटीक डॉ शंभु गुप्त तथा हम स्वयं लिखने छी एहि उपन्यासक प्रसंग अपन मंतव्य। ई पुस्तक राजकमल प्रकाशनसँ छपि रहल अछि। असलमे प्रथम शैलपुत्री’ मे अछि भारतीय आदिम मानव सभ्यताक विकासक कथाक्रम- जे कालान्तरमे हड़प्पा अथवा सैंधव सभ्यताक निर्माण करैत अछि जकर क्रमशः अंत होइत अछि। हम स्वयं एकरा अपन सफल रचना मानैत छी, समीक्षको मानि रहलाह अछि। एना, पुरोहित अपना नीक लगैत अछि। ’स्त्रीधन’ मिथिलाक इतिहास पर अछि।

11 1 1 श्री आद्याचरण झा (१९२०- )।मंगरौनी। संस्कृतक महान विद्वान। मैथिलीमे मिहिर, बटुक, वैदेहीमे रचना प्रकाशित। दरभंगा संस्कृत वि.वि. केर प्रतिकुलपति। राष्ट्रपतिसँ सम्मान प्राप्त। भगवत्याः सीतायाः संरक्षकोजनकः- “विदेह”- एकं महनीयं विवरणम् - श्री आद्याचरण झा १.मिथिला राजधान्यां जनकपुरे एकदा महर्षिः अष्टावक्रः समायातः। तेषां वकू शरीरं दृष्ट्वा तत्र समुपस्थिताः जनाः हसितवन्तः। तं दृष्ट्वा महर्षिः उक्तवान्- अत्रत्याः जनाः केवलं व्आह्य रूपं शरीरं पश्यन्ति।आत्मानं न जानन्ति। एतेषां नागारिकाणां भवान् कथं “विदेहः” इति ज्ञातुं न शक्नोति। २.महाराजः जनकः उक्तवान्- यथार्थता इयं नास्ति। केवलं वक्र शरीरम् अवलोक्य विद्वांसः हसितवन्तः, किन्तु सर्वे महान्तः ज्ञानिनः सन्ति। ३.”विदेह” उक्तवान्- भवन्तां मस्तके जटायां एकस्मिन् पात्रे जलं प्रपूर्य स्थापयामि। भवता सह एकः मनीषी गच्छति। भवन्तः सम्पूर्णं राजभवनं भ्रमन्तु (पश्यन्तु)। किन्तु पात्रस्थं जलं यदि एकं विन्दुं यत्र पतिष्यति ततः एव परावर्तयिष्यति स विद्वान्। ४.महर्षिः अष्टावक्रः समग्रं राजप्रासादं पश्यन्-भ्रमन् परावर्तितः। महाराजेन जनकेन पृष्टम्। किं राजभवनं दृष्टवन्तः भवन्तः? महर्षिणा कथितम्- ’राजभवनं न भ्रमितं, किन्तु मम ध्यानं जलविन्दु पतने आसीत्, न किमपि दृष्टम्। ५.विदेहः जनकः कथितवान्- ’भवन्तः जिज्ञासायाः समाधानं तु जातम्। भवन्तः समग्रं राजभवनं भ्रमन्तः न किमपि दृष्टवन्तः। तर्थेवाहं सर्वाणि कार्याणि कुर्वन् न तत्र मनसा- आत्मना च संलग्नः अस्मि। महर्षिः समायाचनां कृत्वा परावर्तितवान्। उपर्युक्त घटनाचक्रं प्रमाणयति यत् मनः एव सर्वं करोमि। ’मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयोः”- श्रीमदभगवद्गीता..” Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

33 3 3 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् प्रकाश झा, सुपरिचित रंगकर्मी। राष्ट्रीय स्तरक सांस्कृतिक संस्था सभक संग कार्यक अनुभव। शोध आलेख (लोकनाट्य एवं रंगमंच) आऽ कथा लेखन। राष्ट्रीय जूनियर फेलोशिप, भारत सरकार प्राप्त। राजधानी दिल्लीमे मैथिली लोक रंग महोत्सवक शुरुआत। मैथिली लोककला आऽ संस्कृतिक प्रलेखन आऽ विश्व फलकपर विस्तारक लेल प्रतिबद्ध। अपन कर्मठ संगीक संग मैलोरंगक संस्थापक, निदेशक। मैलोरंग पत्रिकाक सम्पादन। संप्रति राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्लीक रंगमंचीय शोध पत्रिका रंग-प्रसंगक सहयोगी संपादकक रूपमे कार्यरत। ( मिथिलामे सभस’ उपेक्षित अछि मिथिलाक भविष्य ; यानी मिथिलाक बच्चा ।  मैथिली भाषामे बाल-बुदरुक  लेल किछु  गीतमय रचना अखन तक नहि भेल अछि जकरा बच्चा रटिक’ हरदम गावे-गुनगुनावे  जाहिसँ  बच्चा मस्तीमे रहै आ ओकर मानसिक विकास दृढ़ हुऎ । एहि ठाम प्रस्तुत अछि बौआ-बच्चाक लेल किछु बाल कविता । ) १. प्रकाश झा 1. बिलाड़ि बाघक मौसी तूँ बिलाड़ि म्याऊँ  म्याऊँ बजै बिचारि, मुसबा के हपसि क’ खाई कुतबा देख भागि जाई । 2. बाघ मौसी तूँ बिलाड़ि के बाघ छौ तोहर नाम , जंगल के तूँ राजा छेँ बा’’’ बा’’’ केनाइ तोहर काम । 3. गैया बाबा यौ! अबै यै गैया हरियर घास चड़ै यै गैया , मिठगर दूध दै यै गैया हमर सभहक मैया गैया । 4.  कुतबा दिन मे सुतै, राति मे जगै, चोर भगाबै कुतबा । रोटी देखिक’ दौड़ल अबै, नागैड़ डोलाबै कुतबा । अनठिया के देखिते देरी, भौं’’’ भौं’’’ भुकै कुतबा । 5. हाथी झूमै-झामैत अबै हाथी, लम्बा सूढ़ हिलाबै हाथी, सूप सनक कान, हाथी, कारी खटखट पैघ हाथी । बाल-बुदरुकक लेल कविता चित्र: प्रीति ठाकुर चिड़ै/जानवर सुग्गा, मेना, कौआ, बगरा, चिड़ै-चुनमुन के नाम छै । गैया, बरद, बिलाड़ि, कुतबा सभके दादी पोसै छै कौवा चार पर बैसलौ कार कौआ, कारी खटखट देह कौआ । कॉव-कॉव कुचरौ कौआ , रोटी ल’ क’ उड़तौ बौआ ॥ सुग्गा हरियर सुग्गा पिजड़ामे राम राम रटै छै । कुतरि-कुतरि क’ ठोर स’ मिरचाई लोंगिया  खाई छै ॥ मेघ कारी-कारी मेघ लगै छै, झर-झर झिस्सी झहरै छै । लक-लक लौका लौकै छै, झमझम-झमझम बरसै छै । फह-फह फूँही पड़ै छै, टपटप-टपटप टपकै छै । दीयाबाती सुक-सुकराती दीयाबाती, दादी सूप पिटतै । छुड़छुड़ी, अनार, मिरचैया,  खूब फटक्का फोड़बै । जगमग जगमग दीप जराक’ हुक्का लोली भँजबै । नानी माँ के माँ हमरे नानी, मामा के माँ हमरे नानी । मौसी के माँ हमरे नानी, खिस्सा सुनाबै हमरा नानी । छैठ परमेसरी आइ छै खड़ना खीर रातिमे, दादी सबके देतै ढाकी, केरा,कूड़ा ल’ क’, घाट पर हमहू जेबै भोरे – भोर  सूरज के ,अरघ हमहू देखेबै ठकुआ, मधूर, केरा, भुसवा हाउप हाउप खेबै .

55 5 5 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ बहुत दिनक बाद मिथिलाक ग्रामांचल मे सगर राति दीप जरयक आयोजन भेल अछि। ओना एहिसँ पूर्व हटनी (19.05.2001) आ ओहूसँ पहिने घोघरडीआ ( 22.10.1994) आ’ डयैाढ ़(29.04.1990)मे आयोजित भेल छल। शहरे शहरे बौआए सगर राति गाम दिस एक बेर आएल अछि। एहि लेलडा. अषोक कुमार झा ‘अविचल’धन्यवादक पात्र तँ छथिहे। हुनक गौंआँ लोकनि सेहो ओहिना धन्यवादक पात्र छथि। मुजफ्फरपुरसँ रहुआ-संग्राम धरिक सगर रातिक यात्रामे कतेको बेर निराशाजनक स्थिति आएल। कतेको गोटय एहि रतिजग्गापिकनीकके बन्द करबाक परामर्श देल, मुदा काठमाण्डूसँ कोलकाता, विराटनगरसँ वनारस जनकपुरसँ राँची, देवघरसँ पूर्णियाँ, सुपौलसँ जमशेदपुर धरि सगर रातिक दीप जरैत रहल। नव नव कथाकार अपन नवनव कथाक संग अपनाकेँ जोडै़त गेलाह। विभिन्न स्थानक मातृभाषा अनुरागीक स्नेह आ सहयोग एकरा भेटैत गेलैक। सगर रातिक दीप अवाधित रूपे  जरैत रखबा लेल ओ ओलोकनि टेमी बातीक ओरिआओन सुरुचिपूर्वक करैत रहलाह। जे सबएकरा अजगू त बुझैत छलाह, सहटि लग आबि अपने आॅंखिए देखल, विश्वास भेलनि। सगर राति दीप जरय कोन पृष्ठभूमिमे आ प्रयोजनवश शुरू भेल छल, आयोजन हेतु कोन कोन शर्त आवश्यक छलैक, तकरा स्पष्ट करबाक हेतु हम प्रथम तीन संयोजक द्वारा प्रेषित आमंत्रण पत्रक सारांश प्रस्तुत करब।सगर राति दीप जरयक अवधारणाक जन्म किरण जयन्तीक अवसर पर 01 दिसम्बर,1989के ँ लोहनामे साहित्यकार लोकनिक बीच भेल। मुदा साकार भेल प्रभास कुमार चैधरीक माध्यमसँ। ओहि अवधारणा केँ साकारकरबाक उद्देश्यसँ प्रभास कुमार चैधरी साहित्यकार लोकनिकेँ आमन्त्रित करैत छओ जनवरी 1990क पत्र द्वारा अनुरोध कएने छलाह-आदरणीय, अपने केँ विदित होएत जे किरण जयन्तीक अवसरपर लोहनामे एकत्रित साहित्यकार लोकनि निर्णय लेलनि जे पंजाबी साहित्यकार लोकनि द्वारा आयोजित ‘दीवा जले सारी रात‘ जकाँ भरि राति कथा पाठक आयोजन घूमि-घूमि कए विभिन्न स्थान पर साहित्यकार लोकनिकआवास पर होअय। पहिल आयोजन 24 दिसम्वर,1989 के ँ कटिहारमेअशोकक डेरा पर राखल गेल छल जेस्थगित भए गेल एक दुखद घटनाक कारणेँ। आगू ओ लिखैत छथि-हमरा पत्र द्वारा ई समाचार भेटल आ एहिआयोजनक प्रारम्भ मुजफ्फरपुरमे करबाक आग्रह सेहो। हम एहि निर्णयकस्वागत करैत दिन राति कथा पाठ आ परिचर्चाक अष्टयामक आयोजन 21 जनवरी 1990, रविदिन राखल अछि। सादर आमंत्रित छी। अपनेक उपस्थितिये पर आयोजनक सफलता निर्भर अछि। अपने 21 तारीखकेँ भोरे दस बजे पहुँचि जाए हमर कार्यालय जकर पाछाँ हमर निवास सेहो अछि। ई स्थान मुजफ्फरपुरक प्रसिद्ध देवी स्थानक सामने अछि। कोनो तरहकअसुविधा नहि होएत। 21 तारीखके ँ दिनुका भोजनोपरान्त कार्यक्रम शुरु होएत, जे प्रातधरि चलत। कथापाठ (नव लिखल कथा ) ओ ओहिपर विशेष चर्चा होएत।अपन अएबाक सूचना पत्र द्वारा पहिनहि दए दी तँ विशेष सुविधा रहत। अगिला कार्यक्रमक स्थान आ तिथिक निर्णय एहीठाम कार्यक्रममे लेल जाएत। डेओढ, कटिहार, दरभंगा,पटना आ जनकपुरमे कार्यक्रम करबाक विचार अछि। अहाँक आगमुनक प्रतीक्षा मे‘‘- प्रभास कमार चैधरी। एही प्रकारेँ सगर रातिक अवधारणाकेँ प्रभास कुमार चैधरी साकार कएल। हुनक पत्नी ज्योत्सना चैधरी करतेबताक आंगनक गृहपत्नी जकाआगत साहित्यकारक स्वागत करैत भरि राति टेमी उसकबैत रहलीह। पति द्वारा आयोजित साहित्यिक कार्यक्रममे पत्नी द्वारा भरि राति टेमी उसकाएब आ अतिथिक स्वागतमे तत्पर रहबाक दोसर आ सेहो दू बेर उदाहरण प्रस्तुत कएलनि अछि काठमाण्डूक दूनू आयोजनमे श्रीमती रूपा धीरू। पहिल सगर रातिक आयोजनमे रमेश (थाक), शिवशंकर श्रीनिवास (बसात मे बहैत लोक),विभूति आनन्द (अन्यपुरुष), अशोक (पिशाच),सियाराम झा ‘सरस‘ (ओहिसाँझक नाम), प्रभास कुमार चैधरी (खूनी) रवीन्द्र चैधरी, आदि कथा पढल। डा.नन्दकिशोर हिन्दी कथाक पाठ कएने छलाह। अध्यक्षता कएल रमानन्द रेणु। कथाकार लोकनिक अतिरिक्त कथाचर्चामे भाग लेलनि जीवकान्त, भीमनाथ झा, मोहन भारद्वाज, डा. रमानन्द झा ‘रमण‘। पठित कथापर चर्चाक उपरान्त डा.रमण अपन कथा विषयक आलेख शैलेन्द्र आनन्दक कथा यात्राक पाठ कएल।साहित्यकारकस्वाभिमानक रक्षाक हेतु चर्चाक क्रममे निर्णय भेल जेसमाद पर सगर रातिक आयोजनक भार लेबाक अनुरोध स्वीकार नहि कएलजाएत। आमंत्रित कएनिहार लेल स्वयं उपस्थित भए सहभागी बनब आवश्यककए देल गेल।एकर निर्वाह अद्यावधि भए रहल अछि। एक शब्दमे कहि सकैत छी, इएह शर्त सगर रातिक प्राण थिकैक। जीवकान्तक अनुरोध पर दोसर सगर राति डेओढमे तीन मासक बाद करबाक निर्णय भेल। एहिठाम हम दोसर (डेओढ) आ तेसर (दरभंगा)क संयोजक द्वाराप्रेषित पत्रक अंश प्रस्तुत करब जाहिसँ सगर रातिक लक्ष्य तँ स्पष्ट होएबे करत पत्र लिखबाक क्रम कोन स्थितिमे सम्प्रति अछि, सेहो बुझा जाएत।डेओढ आयोजनक संयोजक जीवकान्त लिखैत छथि-मैथिली भाषाककथाकार लोकनि एकठाम बैसथि अपन नव रचना पढथि आ ओहि पर टीकाविश्लेषण करथि कथाक गति देबामे सामूहिक प्रयन्त करथि। एहि उद्देश्यसँकथा रैलीक आयोजन डेओढमे कएल जाइछ-सृजनात्मक उपलब्धि लेल एकरा स्मरणीय बनेबा मे अपन योगदान करी।दोसर आयोजनमे प्रो.रमाकान्त मिश्र, कीर्तिनारायण मिश्र, डातारानन्द वियोगी, नवीन चैधरी आदि संग भए गेलाह। डा.भीमनाथ झा आ प्रदीप मैथिलीपुत्र दूनू गोटे संयुक्तरूपेँ आयोजनक भार लेल जे श्री विजयकान्त ठाकुरक सौजन्यसँ चिनगी मंच द्वारा दरभंगामे सम्पन्न भए सकल। तेसर सगर रातिक संयोजक डा.भीमनाथ झा लिखैत छथि-पत्र पत्रिकाक एहि संक्रान्ति कालमे साहित्यमे संवादहीनताक स्थिति आबि गेलअछि, कथाक स्थिति तँ आर दयनीय। स्पष्टतः कथा लेखनमे गतिरोध देखलजा रहल अछि। एकरे दूर करबाक इच्छुक किछु युवा साहित्यकर्मी कथा संवाद लेल गोष्ठीक आयोजनक निर्णय लेलनि। दरभंगाक आयेजनमे एकटा नव अध्याय लिखाएल। से थिक एहि अवसर पर पोथीक लोकार्पण। सगर रातिक अवसर पर लोकार्पित पोथीक नामावली विवरण मे देल गेल अछि। तथापि ई उल्लेखनीय अछि जे एहिअवसर पर लोकार्पित होअए बला पहिल पोथी थिक पण्डित श्री गोविन्द झाक कथा संग्रह सामाक पौतीं। प्रभास कुमार चैधरी, जीवकान्त आ भीमनाथ झाक पत्रसँ सगर रातिक आयोजनक, लक्ष्य आ कोन परिस्थितिमे सगर राति दीप जरय सनकार्यक्रम शुरू भेल छल, स्पष्ट अछि। सगर रातिक नियमक अनुसारदरभंगाक आयोजनमे चारिम सगर राति तीन मासक बाद जनकपुरमे डा धीरेन्द्रक अनुरोध पर आयोजित करबाक निर्णय भेल। मुदा कोनो कारणवशआयोजनमे विलम्ब होइत देखि पण्डित दमनकान्त झाक पटना आवास पर पण्डित श्रीगोविन्द झाक संयोजकत्वमे चारिम आयोजन भेल। प्रसिद्ध कथाकार उपेन्द्रनाथ झा ‘व्यास‘ अध्यक्षता कएल आ कथा पाठ कएल। निशा भाग रातिमे व्यासजी अध्यक्षताक भार राजमोहन झाकेँ सौपि देने छलाह। प्रदीप बिहारी पहिल बेर एहीठाम सम्मिलित भए अगिला आयोजन बेगूसरायमे करबाक भार लए लेलनि । दमन बाबू आ व्यासजी नहि छथि। दूनू गोटे मोन पड़ि रहल छथि। प्रभास कुमार चैधरीक अन्तिम सहभागिता बेगूसरायमे सम्पन्न उनतीसम सगर रातिमे छल। डा. धीरेन्द्र अन्तिम बेर बिट्ठो मे कथा पढ़ने छलाह। वनारसमे सगर रातिक उदघाटन कएने छलाह हिन्दीक प्रख्यात साहित्यकार ठाकुर प्रसाद सिंह। एहिठाम हमर आँखिक समक्ष हुनका लोकनिक स्मृति साकार भए गेल अछि। ओना मजफ्फरपुरसँ प्रभास कुमार चैधरीक संशेजकत्वमे सगर रातिक यात्रा आरम्भ भेल छल । मुदा केन्द्र रहल पटने। पटनामे सात खेप सगर राति अयोजित भेल अछि। सगर रातिक यात्राक विस्तृत वर्णन आ खण्ड खण्डमे विश्लेषण प्रस्तुत अछि। ओकर संक्षिप्त उल्लेख प्रस्तुत अछि। कटिहार सगर रातिमे नवानीमे आयोजनक निर्णय भेल छल।संयोजक मोहन भारद्वाज प्रो. सुरेश्वर झाकेँकथाकार रूपमे प्रस्तुत कएल। ओतय श्यामानन्दचैधरी आ झंझारपुरक तात्कालीन डी.एस.पी. सरदार मनमोहन सिंह सम्मिलित भेलाह। ओ बरोबरि सम्मिलित होइत रहलाह। पंजाबक कलमकेँ मिथिलाक फूलबाड़ीमे चतरल देखि प्रमुदित होइत छलाह। सुरेश्वर झा डाराम बाबूक सौजन्यसँ सकरीमे आयोजन कएल। सकरीमे ए.सी.दीपक अएलाह। नेहरामे आयोजन भेल। नेहरामे मन्त्रेश्वर झा सम्मिलित भेलाह। विराटनगरसँ जीतेन्द्र जीत अएलाह। नेहरामे सगर रातिक अवसरपर पठित कथाक एक प्रतिनिधि संग्रह प्रकाशित करबाक निर्णय भेल। डा.तारानन्द वियोगी एवं रमेश सहर्ष दायित्व ग्रहण कएल। कथा संग्रह श्वेत पत्र प्रकाशित भेल। श्वेत पत्रमे पैटघाट धरि पठित कथासँ बीछल कथा संगृहीत अछि। सगर राति दीप जरय कार्यक्रमकेँजीतेन्द्र जीत नेहरासँ विराटनगर,नेपाल पहुंचाओल। विराटनगरसँ बनारस आ बनारससँ पटना। पटनामे बुद्धिनाथ झा, अर्धनारीश्वर, रा.ना.सुधाकर केदार कानन, अरविन्द ठाकुर संग भेलाह तॅं सगर राति सुपौल पहुंचि गेल। सुपौलसँ बोकारो,ओतयसँ पैटघाट आ पैटघाटसँ रमेश रंजन जनकपुरधाम लए गेलाह।जनकपुरधामसँ इसहपुर। इसहपुरसँ श्यामानन्द चैधरी झंझारपुर आनल। ओतयसँ घोघरडीहा, बहेरा सुपौल आ फेर सुपौल सँ धीरेन्द्र प्रेमर्षि काठमाण्डू लए गेलाह।काठमाण्डूसँ रामनारायण देव राजविराज आ ओतयसँ कोलकातामे प्रभास कुमार चैधरी सगर रातिक रजत जयन्ती आयोजित कएल। कहबाक तात्पर्य जे नव-नव लोकक अबैत रहलासँ सगर रातिक आयोजन बढैत गेल । किन्तु जतय कतहु अग्रिम प्रस्तावक संकट होइत छलैक प्रभास जी आ फेर कमलेश जी ठाढ़ छलाह। किछु आयोजकक अनुरोध बरोबरि अशोकजीक पाकेटमे पेंडिंग रहैत छलनि। बेगूसरायसँ श्याम दरिहरे संग भेलाह अछि।ओहो कौखन आ कतहु आयोजन लेल तत्पर छथि।जेना जेना किछु लोक संग होइत गेलाह अछि, ओहिना किछु गोटेअपनाकेँ असम्वद्ध सेहो करैत गेलाह अछि। एकर मुख्यतः तीनि टा कारण अछि- 1.अस्वास्थ्य, 2.पठित कथाक प्रतिक्रिया पर खौझा कए असंगत प्रहार, आ‘ 3.प्रतिक्रिया सूनि हतोत्साहित होएब, एवं 4.कार्यालयीन व्यस्तता। एहि बीच नियमित एवं सक्रिय रूपसँ सहभागी बनैत कतेको साहित्यकार अस्वास्थ्य अथवा वार्धक्यक कारणेँ आब सम्मिमलित नहि भए पाबि रहल छथि। जाहि मे प्रमुख छथि पण्डित श्री गोविन्द झा, रमानन्द रेणु, सोमदेव, जीवकान्त, मोहन भारद्वाज आदि। पठित कथा पर अपन स्पष्ट मंतव्यसँ चर्चाकेँ जीवन्त बनौनिहार प्रो. रमाकान्त मिश्र कथाकार शिवशंकर श्रीनिवासक प्रतिक्रियासँ आहत भेला पर सकरीक बाद अपनाकेँ पूर्णतःसमेटि लेलनि। विविधा पर साहित्य अकादमीक पुरस्कारक विरोधमे केदार काननक नेतृत्वमे कलमल सुपौलक साहित्यकारक प्रतिक्रियाक कारणेँ डा.भीमनाथ झा जाएब छोड़ि देलनि। जे प्रभास जीक मनौअलि पर पण्डित गोविन्द झाक गाम इसहपुर जएबाक लेल तैआर भेल छलाह। तकर बाद  कमे ठाम गेलाह अछि। श्वेतपत्र मे अपन कपचल कथासँ आहत जीतेन्द्र जीत अपन बाट काटि लेलनि। किछु गोटे एहि आशाक संग संवद्ध भेल छलाह जे लोक प्रशंसाक महल ठाढ कए देत, तकर पूर्ति नहि भेला पर उत्साह कमि गेलनि। किछु गोटेक मास्टरी नव आगन्तुक लेल आतंककारी एवं अनुत्पादक भए गेल अछि।  सगर रातिक प्राण थिक अप्रकाशित आ अपठित कथाक पाठ। ओहि पर श्रोता अपन प्रतिक्रिया व्यक्त करैत छथि। ई प्रतिक्रिया तात्कालिक होइछतेँ सम्भव रहैत छैक जे पुनः सुनला वा पढला पर भिन्न प्रतिक्रिया हो। एहि सक्रियताक तीन प्रकारक सकारात्मक प्रभाव अछि- 1.रचनात्मक सक्रियतामे वृद्धि, 2.कथाक शिल्पमे सुधारक अवसर आ‘ 3.व्यक्तित्वमे सहनशीलताक गुण बढेबाक अवसर। पहिल सगर रातिमे प्रायः आठ टा कथाक पाठ भेल छल। कथाकसंख्या क्रमशः बढैत गेल। सबसँ बेसी कथाकारक सहभगिता महिषीमे भेल छल। एहि बीच जतेक कथा संग्रह छपल अछि, अधिकांश कथा सगर रातिक अवसर पर पठित आ चर्चित अछि। वयोवृद्ध साहित्यकार श्यामानन्द ठाकुर बहेरामे संग भेलाह।ओहिठामसँ संग छथि। हुनक सक्रियताक अनुमान एहीसँकए सकैत छी जे ओ प्रत्येक आयोजन लेल दू टा कथा लिखैत छथि। एमहर आबि पठित कथाक चर्चाक स्वरूप बदलि गेल अछि। पहिने पठित कथाधरि अपन प्रतिक्रिया सीमित राखल जाइत छल। मुदा आब व्यक्त विचारकेँ कटबा पर विशेष ध्यान रहैत अछि। एहिसँ पक्ष विपक्षक स्थिति बनि जाइछ। कतेकोठाम अप्रीतिकर स्थिति उत्पन्न भए गेल अछि । चर्चाबहकय नहि एहि लेल प्रभासजी पूर्ण सतर्क रहैत छलाह। हुनक अभाव खूब खटकैत रहैत अछि।कवि सम्मेलन मनोरंजनक हेतु आयोजित होअय लागल अछि।रचनात्मक स्पर्धा अथवा सक्रियताक महत्व गाण छक। तेँ कवि लोकनि गओले गीत गबैत छथि। मुदा सगर रातिक अवसर पर अप्रकाशित एवंअपठित कथा पढबाक वाध्यताक कारणेँ रचनात्मक सक्रियता बढल अछि। एक बेर व्यासजी गोविन्द बाबूकेँ परामर्श दैत कहने छलथिन्ह जे धूमि घूमि भरि राति जागब अहाँक स्वास्थ्य लेल ठीक नहि अछि। गोविन्द बाबूक उत्तर छल जे हमरा एहिसँ उर्जा प्राप्त होइत अछि। आंकडा़ कहैत अछि ओ सबसँ बेसी भरि राति ओएह बैसलाह अछि तथा सबसँ बेसी हुनके व्यक्तिगतपोथीक लोकार्पण एहि अवधिमे भेल अछि। ई थिक सगर रातिक रचनात्मक प्रभाव। रचनाकारकेँ उर्जस्वित रखबाक महान अवसर। कवि सम्मेलनमे आयोजककेँ विदाइक व्यवस्था करय पडै़त छनि । सगर राति एहि व्याधिसँ मुक्त अछि। सहभागी सत्यनारायणक पूजाक हकारजकाँ अबैत छथि आ भोर होइते घूमि जाइत छथि। एहिमे व्यावसायिकता नहि अछि, ई मातृभाषा प्रेमक सन्देश दैत अछि।सगर रातिक आयोजन विभिन्न स्थान पर भेलासँ स्थानीय विद्वत समाज आकर्षित होइत छथि। एकर प्रभाव ओहि स्थानक मैथिलीक सक्रियता पर पड़ैत अनुभव कएल गेल अछि। सगर राति दीप जरय समानधर्माकेँ भरि राति एकठाम रहबाक अवसर दैत अछि। विचारक आदन प्रदानक केन्द्र स्वतः मैथिली भाषा आ साहित्य भए जाइत अछि। एहिसँ परिचय आ अनुभवक क्षेत्रक विस्तार होइछ। मैथिलीक रचनाकारमे भावात्मक संवद्धता बढैत अछि।सगर राति दीप जरयक निरन्तर आयोजनसँ मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्तिपूर्ण क्रान्ति आबि गेल अछि। आन भाषाभाषी आ सात्यिकारकबीच मैथिलीक कथाकारक प्रतिष्ठा बढ़ल अछि। विशेषतः एहि हेतु जे मैथिलीक कथाकार दूर-दूरसँ अपन पाइ खर्च कए पहुचैत छथि। कथा पढैत आ सुनैत छथि। अपन कथा पर लोकक प्रतिक्रिया धैर्यपूर्वक सुनैत छथि। आ फेर अग्रिम आयोजनमे सम्मिलित होएबाक संकल्पक संग घूमि जाइत छथि। जे सगर राति कथाकार लेल कल्पित भेल छल,समाजक सुधी समाजक अन्तःकरण मे प्रवेश कए मैथिली भाषा साहित्यक पक्षमे अनुकूल वातावरणबनेबामे सार्थक भूमिकाक निर्वाह कए रहल अछि। जहिआ सगर राति प्रारम्भ भेल छल आ एखनुक जे स्थिति अछि ओहि मे गुणात्मक आ परिमाणात्मक दूनू प्रकारक परिवर्तन स्पष्ट अछि। विकासक ई दिशा आ गति निश्चिते शुभलक्षण थिक। एहि शुभ लक्षणक उदाहरण तँ इएह थिक जे दरभंगाक पहिल आयोजनमे पहिले पहिल दू टा पोथीक लोकार्पण भेल छल आ स्वर्ण जयन्तीक अवसर पर 36 टा पोथी लोकार्पित भेल। विद्वानलोकनि कहि सकैत छथि कोन भाषाक मंच पर एकबेर 36 टा पोथीक लोकार्पण भेल अछि।दरभंगामे एकटा अमेरिकन नागरिक मैथिलीमे कथाक पाठ कएने छलाह। सगर राति दीप जरयक दृष्टिसँ बोकरो उर्वर छल, एम्हर आबि राँची, जमदेशपुर देवघर पूर्णियां आदि स्थान मैथिली लेल जगरना कएलक अछि,इहो शुभ लक्षण थिक।मुदा, सगर रातिक लोकप्रियता आ बिना वर.विदाइक साहित्यकार एवं साहित्यानुरागीक उपस्थितिक उपयोग कतहु कतहु कथा पाठ एवं ओहि पर चर्चासँ भिन्न प्रयोजन सिद्धि लेल सेहो भए गेल अछि। जे सगर रातिक मूल अवधारणाक अनुकूल नहि अछि। ओहिसँ बचबाक चाही। सहरसामे दोसर खेप सगर रातिक आयेजन 21 जुलाई, 2007 केँ भेल छल। सगर राति आयोजनक एक प्रमुख आकर्षण अछि भेटघाँट। ओहिसँ बाहरक साहित्यकार वंचित रहलाह। उपस्थितिक प्रसंग सूनि जीवकान्त जी 22 जुलाई, 2007क अपन पोस्ट कार्डमे लिखलनि अछि- ‘सहरसा कथा गोष्ठीक खबरि भेल। कथा गोष्ठी भूतकालक वस्तु भेल। लेखन काज लेखक सभ छोड़ने जाइत छथि। सेमिनार, तकर प्रचलनबढ़ल अछि। टी.ए./डी.ए./भेटघाँट ई सभ भए गेँबुू जे लेखकीय ल तझअस्मिताक अहंकार पुष्ट भेल आ‘ एक दोसराकेँ बल देल। सरकारी मान्यताक बाद भाषामे अनेक राजरोग उत्पन्न होइत छैक।मैथिली निरपवाद रूपे पहिनेसँ बेसी रोगाहि भेल छथि। जिबैत रहओ।‘हमरा विश्वास अछि सगर रातिक नियमित आयोजन मैथिलीके राजरोगसँ मुक्त रखबामे सफल होएत। साहित्य अकादेमी सँ वर्ष 2007 लेल पुरस्कृत प्रहरी प्रदीप बिहारीक कथा संग्रह सरोकारक प्रायः समस्त कथा सगर राति दीप जरयक अवसर पर लोक सुनने अछि। आ‘ ओहि पर अपन-अपन प्रतिक्रिया व्यक्त कएने अछि। सगर रातिक ई पहिल उपलब्धि थिकैक। एहि उपलब्धि पर मैथिली एहि शान्ति क्रान्तिक एक प्रतिभागीक रूपमे गर्व अनुभव करैत छी आ‘कामना करैत छी इतिहास दोहराइत रहय। -

22 2 2 मुखीलाल चौधरी सुखीपुर – १, सिरहा हाल ः बुटवल बहुमुखी क्‍यापस बुटवल दिनाड्ढ २०६५ जेष्‍ठ २९ गते बुधदिन । धीरेन्‍द्र बाबु, नमस्‍कार बहुत दिनक बाद अपनेक कार्यक्रम “हेलौ मिथिलामें” चिठ्ठी पठारहल छी । आशेटा नहि वरण विश्‍वास अछि, प्रकाशित होएत । दिनाड्ढ २०६५ जेठ १४ गते मंगलदिन जनकपुरधाममें लोकार्पण भेल “समझौता नेपाल”क दोसर प्रस्‍तुति गीति एल्‍वम “भोर” क गीतके संगही समझौता नेपालक निर्देशक नरेन्‍द्रकुमार मिश्रजीक साक्षात्‍कार दिनाड्ढ २०६५ जेठ १८ गते शनिदिन कान्‍तिपुर एफ़एम़के सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रम “हेलौ मिथिलामें” सुनबाक मौका भेटल । संघीय गणतान्‍त्रिक नेपालक भोरमे समझौता नेपालद्वारा प्रस्‍तुत केल गेल गीति एल्‍बम भोरके लेल समझौता नेपालक निर्देशन नरेन्‍द्रकुमार मिश्रजीके हार्दिक बधाई एवं शुभकामना । आगामी दिनमें समझौता नेपाल मार्फत गीति यात्राके निरन्‍तरततासँ गीत या संगीतके माध्‍यमसँ मिथिलावासी आ मधेशी संगही सम्‍पूर्ण आदिबासी थारु में जागणर लावय में सफल होवय आओर मिथिलावासी, मधेशी, आदिवासी थारु संगही सम्‍पूर्ण देशवासीमें सदाशयता, सदभावना, सहिस्‍णुता आ स्‍नेहमें प्रगाढता बढावमें सफलता प्राप्‍त होवय, एकर लेल साधुवाद । गीतकार सभहक गीत उत्‍कृष्‍ट अछि, कोनो गीत वीस नहि सभटा एकाईस । एकसँ बढी कय एक । गीतकार सभहक गीतके सम्‍वन्‍धमें छोटमें अलग अलग किछु कहय चाहैत अछि रुपा झाजीक गीत शिक्षा प्रति जागरुकता आ चेतानक सन्‍देश द�रहल अछि । ज्ञान प्रकाश अछि आओर अज्ञान अन्‍धकार । अन्‍धकारसँ वचवाक लेल ज्ञान प्राप्‍त केनाइ आवश्‍यक अछि । “केहनो भारी आफत आवौ, ज्ञानेसँ खदेड” पाति कोनो समस्‍या किएक नहि विकराल होय ज्ञान आ वुद्धि सँ समाधान करल जा सकैत अछि । पुनम ठाकुरजीक गीत सब सन्‍तान समान होइछ, बेटा—बेटीमे भेदभाव नहि होयबाक आ करबाह चाहि सन्‍देश द�रहल अछि । “मुदा हो केहनो अबण्‍ड बेटा, कहता कुलक लाल छी ” सिर्फ एक पातिस आजुक समाजमें बेटा—बेटी प्रति केहन अवधारणा अछि, बतारहल छथि । मिथिलाके माटि बड पावन छै । संस्‍कार आ अचार–विचार महान छै । आओर वएह माटिक सपुत साहिल अनवरजी छथि । जई माटिमें साहिल अनवरजी जकाँ मनुक्‍ख छथि ओही माटिमे सम्‍प्रदायिकताक काँट उगिए नहि सकैछ । उगत त मात्र सदभावना, सदाशयता, माया—ममता, स्‍नेहक गाछ । जेकर गमकसँ सभकेओ आनन्‍दित रहत आ होएत । “जतय हिन्‍नुओ राखि ताजिया, मान दिअए इसलामके छठि परमेसरीक कवुलाकय मुल्‍लोजी मानथि रामके” सँ इ नहि लागि रहल अछि ? कि मिथिलाके पावन माटिमें सहिश्‍णुताक सरिता आ बसन्‍तक शीतल बसात बहिरहल अछि । धन्‍य छी हम जे हमर जनम मिथिलाक माटिमें भेल अछि । धीरेन्‍द्र प्रेमर्षिजीक गीत सकारात्‍मकतासँ भरल अछि । समस्‍या किएक नहि बडका होबय आ कोनो तरहके होय निरास नहि होयवाक चाहि आओर सदिखन धैर्य—धारणकय सकारात्‍मक सोच राखिकय आगाँ बढवाक चाहि । संगहि जाहि तरहसँ माँ–बाप अपन सन्‍तानक लेल सदिखन सकारात्‍मक दृष्‍टिकोण राखैत छथि, वएह तरहसँ संतानक कर्तव्‍य होइछ जे ओ सभ अपन वुढ माँ–बाप प्रति वहिनाइते दृष्‍टिकोण अपनावैत । गीतके शुरुके जे चार पाति “संझुका सुरजक लाल किरिनिया, नहि रातिक इ निशानी छै छिटने छल जे भोर पिरितिया, तकरे मधुर कहानी छै” । सकारात्‍मकताक द्योतक अछि । एकर संगहि “सोना गढीके इएह फल पौलक, अपने बनि गेल तामसन वाह बुढवा तैओ वाजैए, हमर बेटा रामसन” इ पातिसँ मा–बापके अपन सन्‍तानक प्रति प्रगाढ माया ममताक बोध करारहल अछि । नरेन्‍द्रकुमार मिश्राजीक गीत इ बतारहल अछि कि संसारमे प्रेम, स्‍नेह, माया–ममता अछि तएँ संसार एतेक सुन्‍दर अछि । यदि प्रेम, स्‍नेह, माया–ममता हटा देल जाय त संसार निरस भ�जाएत आ निरस लाग लागत । तएँ हेतु एक दोसरक प्रति प्रेम, स्‍नेहक आदन–प्रादान होनाइ आवश्‍यक अछि । “आखि देखय त सदिखन सुन्‍दर सृजन ठोर अलगय त निकलय मधुरगर बचन” पाती सँ प्रेम आ स्‍नेह वर्षा भ�रहल अछि, लागि रहल अछि । वरिष्‍ट साहित्‍यकार, कवि, गीतकार द्वय डा़ राजेन्‍द्र ॅविमल� जी आ चन्‍द्रशेखर ॅशेखर� जीके गीत अपने अपनमे उत्‍कृष्‍ट आ विशिष्‍ट अछि । हिनका सभक गीत सम्‍बन्‍धमे विशेष किछु नहि कहिके हिनका सभक गीतक किछु पाति उधृत कयरहल छी, सबटा बखान कैय देत । डा़ राजेन्‍द्री विमल जीक पातिक “जगमग ई सृष्‍टि करए, तखने दिवाली छि प्रेम चेतना जागि पडए, तखने दिवाली छि रामशक्ति आगुमे, रावण ने टीकि सकत रावण जखने डरए, तखने दिवाली छि” अपने अपनमे विशिष्‍टता समाहित केने अछि । ओही तरहे चन्‍द्रशेखर ॅशेखर� जीक गीतक निम्‍न पाति अपने अपनमे विशिष्‍ट अछि “साँस हरेक आश भर, फतहक विश्‍वासकर बिहुँसाले रे अधर, मुक्त हो नैराश्‍य–डर रोक सब विनाशके, ठोक इतिहासके दग्‍धल निशाँसके, लागल देसाँसके” हमर यानी मुखीलाल चौधरीक गीतके सम्‍बन्‍धमे चर्चा नहि करब त कृतघ्‍नता होएत । हमरद्वारा रचित गीत भोरक संगीतकार धीरेन्‍द्र प्रेमर्षिद्वारा परिमार्जित आ सम्‍पादित केल गेल अछि । तएँ एतेक निक रुपमे अपने सभहक आगाँ प्रस्‍तुत भेल अछि । हमर गीतके इएह रुपमे लाबएमे धीरेन्‍द्र प्रेमर्षिजीक उदार या गहन भुमिका छैन्‍ह । एकर लेल प्रेमर्षिजीके हम मुखीलाल चौधरी हार्दिक धन्‍यवाद ज्ञापन करए चाहैत छी । सभटा गीतके संगीत कर्णप्रिय लगैत अछि । सुनैत छी त मोन होइत अछि फेर–फेर सुनी । कतबो सुनलाक वादो मोन नहि अगहाइत अछि । एतेक निक संगीतक लेल धीरेन्‍द्र प्रेमर्षिजीके हार्दिक बधाई आओर अगामी दिन सभमे एहोसँ निक संगीत दय सकैत, एकर लेल शुभकामना आ साधुबाद । सभ गीतकार, संगीतकार, गायक–गायिका इत्‍यादिक संयोजन कय बड सुन्‍दर आ हृदयस्‍पर्शी गीति एल्‍बम “भोर ” जाहि तरहसँ हमरा सभहक आगाँ परोसने छथि, एकर लेल भोरक संयोजक रुपा झा जीके हार्दिक बधाई । अन्‍तमे सभ गीतकार, संगीतकार, गायक–गायिका, संयोजक आ समझौता नेपालक  निर्देशकके हादिक वधाई । Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

55 5 5 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र(१९४५- ), पूर्व अध्यक्ष, इतिहास विभाग, ल.ना.मिथिला विश्वविद्यालय,दरभंगा। अनुवादक, निबन्धकार। प्रकाशन: तमिल साहित्यक इतिहास, भवभूति (दुनू अनुवाद)। मिथिला विभूति पं मोदानन्द झा-प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र पूर्णियाँ जिलाक पंजीकार परिवारमे उत्पन्न पं. मोदानन्द झा आधुनिकताक कसौटीपर अनुदार मुदा पारम्परिकताक कसौटीपर उदार, विद्वान आ विद्वत्ताक सत्संगति लेल आतुर, विलक्षण प्रतिभासँ सम्पन्न व्युत्पन्नमतित्व वाला मिथिलाक अत्यन्त सम्मानित पंजीकार छलाह। पंजीशास्त्र हुनका पूर्णतः अधिगत छलनि आ ओ पंजीसँ जुड़ल ककरहु कोनो जिज्ञासाक समाधान लेल सदैव तत्पर रहैत छलाह। ओ वस्तुतः मिथिलाक विभूति छलाह जनिकर स्मृतिक संरक्षणार्थ जे किछु कयल जायत से थोड़ होयत। पूर्णियाँ जिलाक रसाढ़ ग्रामक रहनिहार पं मोदानन्द झा पड़वे महेन्द्रपुर मूलक ब्राह्मण छलाह आओर विस्तृत कृषि-भूमिक कारणे बादमे शिवनगर ग्राममे रहय लगलाह। रसाढ़ आ शिवनगर दुनू धर्मपुर परगनान्तर्गत अवस्थित अछि। १९१४ ई.मे उत्पन्न ओ अपन माता-पिताक एक मात्र पुत्र छलाह। परम्परासँ हुनकर परिवार पंजीकारहिक छलनि आ हुनक पिता भिखिया झा ई व्यवसाय करितो रहथिन। ओ मुदा नीक कृषक रहथि आ हुनकर बेसी समय ओहिमे लगनि। हुनका २०० एकड़सँ बेशीक जोत रहनि। ओ अपने प्रायः शिक्षितो नहियें जकाँ रहथि, मुदा अपन पुत्रकेँ नीकसँ नीक शिक्षा दिआयब हुनकर अभीष्ट रहनि। मोदानन्द झा स्वयं बुझबा जोगरक भेलापर अपन कौलिक व्यवसाय आ प्रतिष्ठाक पुनरुद्धार करबा लेल कृतसंकल्प भेलाह। अपन बाल्यावस्थाक संस्मरण बजबाक क्रममे ओ प्रायः बाजथि जे ओ बड़ए प्रसन्नता आ आह्लादक समय छल। ओ माता-पिताक दुलरुआ त छलाहे, काका-काकी तथा आन सम्बन्धी आ कुटुम्बी जनक स्नेह सेहो हुनका प्रचुर प्राप्त छलनि। ओ दैनिक कृत्य आ विद्यालयसँ बाँचल समयमे माछ मारथि आ ई बहुत दिन धरि हुनकर प्रिय मनोरंजन रहनि। ओ एक बेर बहुत गम्भीर रूपेँ बीमार पड़लाह। वस्तुतः तहिया पूर्णियाँ जिलामे मलेरिया आ कालाजार महामारीक रूपमे पसरल छल। आ कहबी छलैक जे “जहर खाउ ने माहुर खाउ, मरैक होइ तऽ पूर्णियाँ जाउ”। हुनकर माता एक सम्पन्न कुलक महिला रहथिन आ ओ अपन पुत्रक रुग्णताक समाप्ति लेल किछु करबा लेल तत्पर छलीह। हुनकहि जिदपर २०० रुपया पीस दऽ कलकत्तासँ डाक्टर मँगाओल गेल। चारि पंडित अहर्निश हुनकर रुग्णावस्थामे दुर्गा सप्तशती आ गीताक पाठ करैत रहलाह। हुनकर माता स्वयं ताधरि अन्न ग्रहण नहि कयलथिन जा हुनकर पुत्र पथ्य ग्रहण करबा जोगरक नहि भेलनि। कलकत्तासँ आयल डॉक्टरक तऽ अन्य विदाइ कैले गेलनि, पाठ केनिहार ब्राह्मणो लोकनिक आ पुत्रक आरोग्य-लाभक उपलक्ष्यमे गाम-टोलक लोक सभकेँ भोज सेहो खोआओल गेल। मुदा पिताक आकांक्षा छलनि पुत्रकेँ विद्वान् देखबाक आ विद्यार्थीक लेल गण्य करक-चेष्टा, वक ध्यान, श्वान-निद्रा तथा अल्पाहारी आदि लक्षणसँ जन्मतः परिपूर्ण मोदानन्द झा लेल समय अयलनि गृह-त्यागी होयबाक। दस वर्षक अल्पायुमे हुनका वर्तमान मधुबनी जिलान्तर्गत सौराठ गाम विद्याध्ययन लेल पठाओल गेलनि। ओतय हुनक गुरु आ आश्रयदाता रहथिन ख्यातनाम पंजीकार पं.विश्वनाथ प्रसिद्ध निरसू झा, जनिकर पिता लूटन झा मोदानन्द झाक मौसा रहथिन। पंजीशास्त्रक अध्ययन लेल सामान्यतः पन्द्रह वर्षक कालावधि समुचित मानल गेल छैक मुदा मोदानन्द झा दसे-एगारह वर्षमे गुरु-कृपासँ निष्णात भेलाह। ओना ओऽ पन्द्रह-बीस वर्ष धरि लगातार गुरु सान्निध्यमे सौराठ रहलाह आऽ बादोमे आजीवन, विशेष रूपसँ वार्षिक वैवाहिक सभाक अवसरपर सौराठ अबैत-जाइत रहलाह आऽ ताहि क्रममे बाटमे दरभंगा स्थित हमर नरगौना निवासपर ओऽ कनियो देर लेल अवश्य आबथि। हमर पिता डॉ. मदनेश्वर मिश्र लेल हुनका विशेष स्नेह आऽ सम्मान रहनि आऽ हमर एक पितृव्य पं. नागेश्वर मिश्रक ओऽ सम्बन्धमे साढ़ू रहथिन। हमर एकटा पीसा स्व. दिगम्बर झा हुनकर पितियौत रहथिन। जे हो, विध्याधयन समाप्त समाप्त भेलापर राज-दरभंगा द्वारा आयोजित धौत परीक्षामे १९४० मे ओऽ सर्वोच्च स्थान प्राप्त कयलनि। हुनका संग उत्तीर्णता प्राप्त केनिहार अन्य दू महत्वपूर्ण पंजीकार छलाह ककरौरक हरिनन्दन झा आऽ सौराठक शिवदत्त मिश्र। एहि सफलता लेल महाराज सर कामेश्वर सिंहक हाथे तीनू गोटाकेँ धोती देल गेलनि, मुदा सर्वोच्च घोषित भेलाक कारणेँ मोदानन्द झाकेँ दोशाला सेहो देल गेलनि। पारम्परिक मिथिलामे धौत परीक्षामे उत्तीर्ण भेनाय बड़का सम्मान होइत छल मुदा ताहूमे सर्वोच्चता पायब तँ अनुपमे छल। तहियासँ अनवरत ओऽ अपन जीवन-पर्यन्त मिथिलाक प्रायः सर्वाधिक समादृत पंजीकार रहलाह। मोदानन्द झाकेँ पाबि पंजीकारक व्यवसाय धन्य भेल। १९६२ मे निरसू झाक दिवंगत भेलापर ओऽ सौराठ प्रतिवर्ष नियमपूर्वक वैवाहिक सभामे मात्र अपन नाम बढ़यबा लेल नहि बल्कि अपन गुरुक ऋण अदाय करबाक विचारसँ सेहो जाथि। ताधरि निरसू बाबूक दुनू बालक छोट रहथिन आऽ पंजीकारी नहि करथि। हुनकर जेठ बालक प्रोफेसर (डॉ.) कालिकादत्त झा, जे सम्प्रति ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक संस्कृत विभागक अध्यक्ष रहथि आऽ विगत लगभग दस-पन्द्रह वर्षसँ दरभंगामे रहि रहल छथि (पहिने मगध विश्वविद्यालय, गयामे रहथि) आब सक्रिय रूपेँ अधिकार जँचबा आ सिद्धान्त लिखबाक काज करय लागल छथि। ताहिसँ पहिने मोदानन्दे बाबू अपन गुरुक ओहिठाम अयनिहार लोकनि लेल सिद्धान्तादि लिखथिन। ततबे नहि ओऽ निरसू बाबूक पुत्र लोकनिकेँ पंजी-ज्ञान सेह् देलथिन आ आइयो कालिकादत्त बाबू गुरु रूपहि हुनका प्रति श्रद्धा रखैत छथि। मोदानन्द बाबू पंजीकारीक व्यवसायसँ जे धनार्जन करथि ताहिसँ सन्तुष्ट छलाह। सिद्धान्त लिखबासँ तथा विदाइसँ हुनका पर्याप्त कमाइ होइन आओर खेत-पथारसँ सेहो नीक आय होइत छलनि। कमाइसँ बेसी हुनकर अभिरुचि ज्ञानक विस्तारमे आ पंजीसँ सम्बन्धित विषयपर शोध करबामे छलनि। मैथिलीक महान् विद्वान, आलोचक आ समीक्षक डॉ. रमानाथ झाक संग ओऽ पृथक-पृथक विभिन्न मूलक विख्यात छवि, विद्वान् आ राजा-जमीन्दार सबहक वंश-परिचय तैयार करबा दिस प्रवृत्त भेलाह आ तकरहि परिणाम छल पूर्णियाँक प्रसिद्ध बनेली राजवंशक परिचयात्मक पुस्तक अलयीकुल प्रकाशक प्रकाशन। आन एहन प्रकारक कृत्य नहि तैयार कयल जा सकल तकर हुनका क्षोभ छलनि। हुनकर शोधपरक सोचक अंग छल एक अन्य परियोजना जाहिक अन्तर्गत विशिष्ट गाममे बसनिहार मैथिल ब्राह्मण सभक बीजी पुरुष धरिक परिचयात्मक विवरण तैयार करब अभीष्ट छल। ओऽ सर्वप्रथम कोइलख गामक सम्बन्धमे एहन रचना लिखलनि। ओऽ हमरा तकर कतिपय अंश सुनेबो कयलनि। हुनकर इच्छा रहनि जे उक्त रचनाक प्रकाशन हो मुदा से आइ धरि नहि भऽ सकल अछि। उपर्युक्त दुनू प्रकारक शोध परियोजनाक पंजीकार समाजमे सामान्यतः आलोचना भेलैक कियैक तँ ओऽ अपन रचनामे एहनो विवरणक सन्निवेश करय चाहैत रहथि जे पंजीकारीक व्यवसायमे प्रकाशित करब वर्जित कहल जाइत छैक- वस्तुतः ओऽ विवरण सभ दूषण पञ्जीक अंग होइत छैक जाहिमे व्यक्ति आऽ परिवार विशेषक सम्बन्धमे ज्ञात अशोभनीय आ अप्रकाश्य बात उल्लिखित रहैत छैक। एहि क्रममे एक तेसर परियोजना, जाहिपर ओऽ उन्नैस सय पचासहिक दशकमे कार्य आरम्भ कयलनि छल, ओहन पञ्जीकार परिवार लग उपलब्ध पाण्डुलिपिक संग्रह करब जाहि परिवारमे आब क्यो पंजीकारीक व्यवसायमे नहि रहि गेल रहथि आ हुनकर पंजी-पोथी सभ नष्ट भऽ रहल छलनि। पिताक मृत्यु भऽ गेलासँ हुनकर दरभंगा सम्पर्क घटि गेलनि आ पूर्णियाँमे पारिवारिक सम्पत्तिक प्रबन्धनमे अपेक्षाकृत बेसी समय लगबय पड़नि। तथापि हुनकर शोध-दृष्टि बनल रहलनि आऽ ओऽ अपेक्षा करथि जे सामाजिक विज्ञानमे आधुनिक शोध तकनीकसँ परिचित क्यो व्यक्ति हुनका संग रहि उपर्युक्त परियोजना सभ तँ पूर्ण करबे करथि पंजीसँ सम्बन्धित आनोआन विषयपर काज करथि। हुनकर ई अभिलाषा नहि पूर्ण भेलनि मुदा हुनक पुत्र  मोहनजी, जे पञ्जीकारीक पैत्रिक व्यवसायमे लागि क्रमिक रूपेँ कौलिक प्रतिष्ठाक विस्तार कय रहल छथि। आ अनुकरणीय रूपसँ पितृभक्त सेहो छथि, एहि दिशामे भविष्यमे क्रियाशील भऽ सकैत छथि। स्वयं शोधपरक दृष्टि आ रुचि रखनिहार मोदानन्द बाबू जिज्ञासु लोकनिक मदति करबालेल सदति तत्पर रहैत रहथि। हमरा कमसँ कम दू अवसरपर एकर लाभ भेटल। हम १९८७-८८मे बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटनाक अनुरोधपर बिहारक एक पूर्व मुख्यमंत्री पं. विनोदानन्द झाक जीवनी लिखि रहल छलहुँ मुदा हुनकर वंश-परिचय कतहु प्राप्य नहि छल। आधा-छिधा भेटबो कयल तँ प्रामाणिक नहि। हम कैकटा पंजीकारसँ एहि सम्बन्धमे जिज्ञासा कयलहुँ मुदा व्यर्थ। मात्र मोदानन्द बाबू सूचना देलनि जे हुनकर एक परिजन स्व. गिरिजानन्द झा गंगाक दक्षिण बसल मैथिल ब्राह्मण आ पंडा सभक वंशावली तैयार करबाक स्तुत्य प्रयास कयलनि आ अपना संग शिवनगर स्थित हुनकर घरमे जाऽ ओहि संग्रहमे विनोदानन्द झाक वंश परिचय तकबाक चेष्टो कयलनि, मुदा हुनकर पंजी-पोथी सभ व्यवस्थित आ संगठित नहि भेलाक कारणेँ से संभव नहि भेल। जे हो, हमरा ई अवश्य ज्ञात भऽ गेल जे यदि स्व. गिरिजानन्द झाक पोथी-पंजी व्यवस्थित नहि कयल गेलनि तऽ गंगाक दक्षिण बसल मैथिल ब्राह्मण लोकनिक पूर्वजसँ सम्बन्धित महत्वपूर्ण सूचना सभ लुप्त भऽ जेतैक कियैक तँ गिरिजानन्द बाबूक परिवारमे आन किनकहु पंजीकारीक व्यवसायमे रुचि नहि छनि। दोसर अवसर छल जखन भारतीय इतिहास शोध परिषदक अनुरोधपर हमरा पूर्णियाँ जिलाक धमदाहा ग्राममे उत्पन्न सुविज्ञात इतिहासकार प्रोफेसर जगदीश चन्द्र झाक अंग्रेजीमे लिखल विलक्षण पोथी “माइग्रेशन ऐन्ड एचीवमेन्ट्स ऑफ मैथिल पंडित्स: दि माइग्रैन्ट स्कौलर्स ऑफ मिथिला (८००-१९४७)क १९९० मे समीक्षा लिखबाक छल। ओहि पोथीक परिशिष्टमे कम-सँ-कम तीन पंडित (१) महामहोपाध्याय नेनन प्रसिद्ध दीनबन्धु झा, (२) म.म.भवनाथ झा आ(३)म.म.गुणाकर झा केर वंश परिचय देल छल किन्तु लेखककेँ हुनका लोकनिक मूल ज्ञात नहि भऽ सकलनि। मोदनन्द बाबू क्षण भरि ध्यानस्थ भेलाह आ कहलनि जे ई लोकनि क्रमशः खौवालय सुखेत, नरौने पूरे आ खौवालय नाहस मूलक छलाह।  एतय ई कहब आवश्यक जे मूल आ एक-दू खाढ़िक व्यक्तिक नाम देल रहलापर आन सम्बन्धित सूचना देव संभव छैक मुदा उपर्युक्त उदाहरणमे तँ उनटा बात छैक आ तैयो मोदानन्दे बाबू सन पंजीकार छलाह जे वांछित सूचना तत्काल देबामे समर्थ भेलाह। ओ ओहि पुस्तकमे उल्लिखित पन्द्रह खनाम मूलक प्रसिद्ध विद्वान् गोकुलनाथ, हुनक पिता पीताम्बर आ पुत्र रघुनाथक विषयमे बतौलनि जे ओ तीनू मिथिलाक बारह सडयन्त्री अथवा सर्वज्ञाता विद्वान् मे सँ छलाह। गोकुलनाथक पितामहक नाम रामभद्र छलनि, रामचन्द्र नहि। एतबहि नहि ओ इहो बतौलनि जे मिथिलाक एक घुमक्कड़ विद्वान् ककरौर वासी पड़वे महेन्द्रपुर मूलक गुणाकर झाक एक वंशज धीरेन्द्र झा सेहो छलाह जे आइसँ लगभग चारि सय वर्ष पूर्व बंगाल जाय ओतुक्का ब्राह्मण सभक पंजी-सूचनाक संशोधन-संवर्द्धनक क्रममे अनेक ब्राह्मणेतर व्यक्ति सभकेँ ब्राह्मणक रूपमे पंजीमे परिगणित कय देलथिन। अपन पंजी-पोथीमे उक्त धीरेन्द्र झा अपनाकेँ आ अपन पिताकेँ पंजी पंचानन कहि सम्बोधित कयलनि अछि। एहन कतेको सूचना मोदानन्द बाबू जिज्ञासु व्यक्ति सभकेँ दैत रहैत छलथिन। ओ अपन समाजमे अपन विद्वता, उदारता आ सहज सम्प्रेषणीयताक कारणेँ सर्वत्र समादृत रहथि। हम जखन छट छलहुँ, आइसँ प्रायः पचास वर्ष पूर्व, ओ हमर गाम विष्णुपुर अथवा पूर्णियाँ शहर स्थित हमर डेरा आबथि तऽ सम्पूर्ण परिवार हुनकर सम्मानमे सन्नद्ध रहैत छल। ओ सभक छुइल भोजन कहियो नहि कयलनि। बेसी काल सभ सामग्री दऽ देल जाइन तऽ ओ अपन पाक अपनहि करथि। हमरा बूझल अछि जे कैक बेर हमर सभसँ जेठ पित्ती, पूर्णियाँक अत्यन्त समादृत ओकील आ भरि बिहारमे सभसँ बेसी अवधि धरि सरकारी ओकील रहनिहार स्व. कपिलेश्वर मिश्र अपन हाथें हुनका लेल पाक करथिन। हमरा परिवारमे तऽ हुनका सदैव सम्मान भेटबे करैत रहनि मुदा अन्यत्रो कम नहि। एक बेरक घटना सुनबैत ओ कहने छलाह जे ओ वर्तमान बांग्ला देशक एक मैथिल ब्राह्मण बहुल गाम बोधगाम गेल छलाह जतय हुनका प्रचुर विदाइ तऽ भेटबे कयलनि ओतुका लोक सभ हुनकर पएर पखारि चरणोदक सेहो लेने रहनि। मोदानन्द बाबू अपन चिन्तनमे एक तरहेँ प्रगतिशील आ सुधारक सेहो रहथि। हुनकर चेष्टा रहनि जे पंजीकार लोकनि मात्र अधिक सँ अधिक धनार्जन मे लागि अपन वृत्तिक प्रतिष्ठार्थ सेहो सोचथि। हुनका ई नीक नहि लगनि जे पंजीकार सभ एक दोसराक प्रति द्वेष भावसँ कार्य करथि। हुनकर इच्छा रहनि जे सभ मिलि पंजी आओर पंजीकारक संस्थाकेँ जीवन्त बनाबथि तथा समाजमे हुनका सभकेँ जे आदर प्राप्त रहनि तकर लाभ लए समाजकेँ दिशा निर्देश देथिन। ओ राजदरभंगाक निर्देशमे चलि रहल पंजी व्यवस्थाक प्रजातंत्रीकरणक पक्षमे रहथि जाहिसँ ब्राह्मण समाजक सभ वर्गक प्रतिनिधि मिलि ओहिना परमानगी दय जातीय स्तरीकरणमे समय-समयपर वांछित परिवर्तन करथि जेना राज दरभंगाक तत्वावधानमे अतीतमे कैक बेर कयल गेल छलैक। जे कोनो ब्राह्मण परिवार पंजी-व्यवस्था विहित रीतिसँ नीक वैवाहिक सम्बन्ध करथि तनिकर स्तरोन्नयन करबाक ओ पक्षमे रहथि। १९६६ मे हमर पित्ती डॉ. रामेश्वर मिश्रक विवाह जखन सोनपुर (उजान) वासी प्रसिद्ध श्रोत्रिय ब्राह्मण स्व. दुर्गेश्वर ठाकुरक कन्यासँ स्थिर भेलनि तँ मोदानन्द बाबू राजसँ परमानगी प्राप्त करबामे तऽ सहयोगी भेबे केलथिन, सौराठमे अधिकांश पंजीकारक बैसक बजाय सभक सहमतिसँ हमर प्रपितामह लाल मिश्रक सभ सन्तति लेल कन्हौली पाँजिक स्थापना सेहो करबौलनि। ओ प्रायः खभगड़ा (अररिया जिला) वासी स्व. बालकृष्ण झाक परिवार आ कतिपय आनो परिवार लेल एहने स्तरोन्नयनक पक्षमे रहथि। हुनकर मन्तव्य रहनि जे जमीन्दारी प्रथाक उन्मूलनसँ आन अनेक संस्थाक संग पंजी व्यवस्थाक सेहो बड़ क्षति भेलैक। जमीन्दार लोकनि परम्परा आ संस्कृतिक सम्पोषक रहथि मुदा आब हुनकर स्थान लेनिहार सरकार अथवा कोनो आन संस्था से काज ताहि रूपेँ नहि कऽ पाबि रहल अछि। पंजीकार लोकनिक दुर्दशाक एक कारण जमीन्दारक समाप्ति सेहो भेल। हुनका सन्तोष रहनि जे पटनाक मैथिली अकादमी सन संस्था हुनक जीवन पर्यन्तक सेवाक मान्यता दय हुनका सम्मानित कयने छलनि, मुदा से संभव भेल छल अकादमीक तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. मदनेश्वर मिश्रक व्यक्तिगत प्रयाससँ, अन्यथा आन किछु श्रोत्रिय, योग्य आ कुलीन परिवारकेँ छोड़ि अनेकशः मैथिल ब्राह्मण परिवारेकेँ जखन पंजीकार अथवा हुनका द्वारा कयल सिद्धान्तक प्रयोजन नहि रहलनि तऽ ब्राह्मणेतर समाज आ प्रायशः तकरहि प्रतिनिधि सरकार पंजीकारक स्थितिमे सुधारक कोनो यत्न कियैक करत। मिथिला विभूति स्व. मोदानन्द झाक स्मृतिक संरक्षणार्थ ई सर्वतोभावेन वांछनीय अछि जे पूर्णियाँमे हुनका द्वारा सुविचारित शोध परियोजना सभपर काज करबाओल जाय, स्व. गिरिजानन्द झा सन मिथिला भरिमे पसरल पञ्जीकार लोकनिक ओतय उपलब्ध ओ पंजी-पांडुलिपि सभक संग्रह कयल जाय जे आब कतिपय कारणसँ उपयोगमे नहि रहि गेल अछि, मैथिल मूल ग्राम सभक अभिज्ञान प्राप्त कयल जाय तथा ज्ञात अथवा अज्ञात मैथिल ब्राह्मण परिवारक विशिष्टताक प्रचारार्थ परिचयात्मक विवरणिका तैयार करबाओल जाय। पंजी व्यवस्था निश्चयतः पतनोन्मुख अछि मुदा मोदानन्द बाबूक बताओल मार्गपर जौं शोध कार्य कयल गेल तऽ मिथिलाक सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहासक अभूतपूर्व सेवा होयत।

11 1 1 डॉ.बलभद्र मिश्र, सेवा निवृत्त आयुर्वेदिक चिकित्सा पदाधिकारी, पूर्णियाँ लब्ध धौत प्रतिष्ठ पंजीकार- स्व. पं मोदानन्द झाजी- एक संस्मरण स्व. पंजीकार जी विलक्षण प्रतिभा संपन्न व्यक्ति छलाह। हिनक संपर्क भेलासँ पूर्वहि सुनैत आएल छलहुँ कि शिवनगर (पूर्णियाँ, संप्रति अररिया जिला) निवासी पं. मोदानन्द झा जी पुबारिपारक एकमात्र सर्वश्रेष्ठ पंजीकार तऽ छथिए, संगहि संपूर्ण मिथिलाक मूर्धन्य पंजीकारक श्रेणीमे हिनकहु नाम लेल जाइत छलन्हि। पंजीकारजी प्रतिवर्ष सौराठ सभा गाछी जाइत पुबारि-पछबारि पारक भेल विवाहक सिद्धान्तक लिपिबद्ध आदान-प्रदान करैत छलाह, जाहिसँ हिनक पंजी-पुस्तिका वृहदाकार होइत वंश परिचयक विशाल भंडारसँ सुशोभित अछि। पंजीकारजी महाराज दरिभंगाक अध्यक्षतामे आयोजित “पंजीकार धौत परीक्षा” मे सर्वप्रथम स्थान प्राप्त कऽ “लब्ध धौत प्रतिष्ठ” भेल छलाह, जकर निर्णायक मण्डलमे महामहोपाध्याय सर गंगानाथ झाजी सम प्रभृति विद्वान लोकनि छलाह। पंजीकारजी कतेको ठाम सम्मानित भेलाह, जाहिमे “अखिल भारतीय मैथिल महासभा”क विद्वत् मंडलीसँ आदृत होइत विशिष्ट स्थान पौने छलाह। हिनक कृति एवं विलक्षण प्रतिभाक आलोकमे हिनक जीवनहि कालमे “चेतना समिति” स्वयम् आमंत्रित कऽ पंजीकारजीकेँ सादर सम्मानित करैत भेल। जखन हमर विवाह १९५५ ई.मे पोर्णियाँ भेल तहियासँ पंजीकारजीक मृत्युसँ तीनमास पूर्व तक संपर्क बनल रहल। एहि तरहेँ पंजीकारजीक प्रति जे सुनैत आयल छलहुँ तकर यथार्थ अनुभूति हमरा पंजीकारजीक संगतिमे भेटल। कतेको विवाह सिद्धान्त लिखबाक अवसर हमरा बुझना गेल कि- भलमानुष (जाति-पाँजि) व्यक्तिक वंश परिचय पंजीकारजी केँ जिह्वाग्र छन्हि। यद्यपि वर कन्याक अधिकार देखबाक क्रममे पंजीकारजी केँ “पंजी पोथा” उलटबाक आवश्यकता नहि छलन्हि, तथापि कतहु गलती नहि भऽ जाय ई बुझि पोथा उलटबाक उपरान्ते अपन लिखित निर्णय दैत छलाह। पंजीकारजी सदाचार सम्पन्न होइत सभ दिन अहं भावसँ निर्मुक्त रहलाह। हिनक रहन-सहन वेश-भूषा एवं टपकैत ओजस्विताकेँ देखि केओ अपरिचित व्यक्ति हिनक गुणसँ परिचित भऽ जाइत छल। हम स्वयं पंजीकार जीक सद्विचार, सद्व्यवहार, सदाशयितासँ विशेष प्रभावित भेलहुँ। पंजीशास्त्रक गहन अध्ययन रहले सन्ताँ पूबारि-पछबारिक समन्वय करबाक स्तुत्य प्रयास जीवन भरि करैत रहलाह। खुशीक गप्प जे पंजीकारजीक बालक श्री विद्यानन्द झा (मोहनजी) पंजीकारिताकक्षेत्रमे निष्ठापूर्वक अपन मनोयोग रखने छथि, जाहिसँ स्व. पं.मोदानन्द झा जीक आत्मामे अवश्ये शान्ति भेटैत होयतन्हि। अन्ततः हम यैह कहब जे स्व. पंजीकारजीक प्रत्युत्पन्न मतित्वक आगाँ हम जे किछु कहि गेलहुँ से सूर्यकेँ दीप देखेबाक समान बुझल जाय। एहन स्वनामधन्य पंजीकार स्व. पं. मोदानन्द झा जीकेँ मरणोपरान्त एक संस्मरणक रूपमे अपन श्रद्धा-सुमन अर्पित करैत हमर शतशः प्रणाम। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

22 2 2 नरेश मोहन झा, तुलसिया, किशनगंज विद्वद्वरेण्य पञ्जीकार मोदानन्द झा वर्ष १९५४-५५क वार्ता थीक। गृष्मावकाश छल। गामहिं छलहुँ। एक दिन वेरू प्रहर मे दरवज्जहिपर छलहुँ। एक व्यक्ति, अत्यन्त गौरवर्ण, मध्यम ऊँचाई, देदीप्यमान ललाट, प्रशस्त काया, धूपमे चलबाक कारणेँ ललौंछ मुखमण्डल, पैघ-पैघ आँखि, उपस्थित भेलाह। देखितहिं बुझबामे आएल जे कोनो महापुरुष अएलाह अछि। हमर पिता पं. लीलमोहन झा सेहो दलानेपर छलाह। ओऽ परम आह्लादित भए उठि कऽ ठाढ़ भेलाह। झटकि कऽ अरियाति अनलखिन्ह। हमरा सभ जतेक नवयुवक रही- सभकेँ कहलन्हि- प्रणाम करहुन्ह। हमरो लोकनि उल्लसित एवं अनुशासित भए प्रणाम कएलियन्हि। बाल्टीमे जल, जलचौकी ओऽ अढ़िया आनल गेल। हुनकासँ पए धोएबाक आग्रह कएल गेलन्हि। हमर पिता जे परोपट्टाक श्रेष्ठ समादृत व्यक्ति छलाह- स्वयं लोटामे जल लए हुनकर पएर धोअय लगलखिन्ह। पुनः अंगपोछासँ पएर पोछि पलंगपर बिछाओल साफ सुन्दर विछाओनपर बैसेलखिन्ह। आऽ हुनक पएर धोयल जलसँ समस्त घर-आङनमे छिड़काव भेल। एहि बीच सरवत आएल- पान आएल। घरक सभ सदस्यमे एक अद्भुत उल्लास-जेना कोनो इष्टदेव आबि गेल होथि। ओहि बैसारमे तँ बहुत काल धरि कुशलादिक वार्ता होइत रहल। संध्याकाल धरि तँ हमर दरवज्जापर गाम भरिक ब्राह्मणक समूहक समूह उपस्थित होमऽ लागल। ओहि मध्य हमर पिता परिचय करौलन्हि। कहलन्हि- ई थिकाह पंजीकार प्रवर श्री मोदानन्द झा जी लब्ध धौत, शिवनगर, पूर्णियाँ निवासी। हमरा लोकनिक वंश रक्षक। हिनकहिं प्रतापे हमरा लोकनि अपन कुल ओऽ जातिक रक्षा कऽ पबैत छी। हिनक पिता पञ्जीशास्त्र मूर्धन्य पञ्जीकार भिखिया झा बड़ पैघ विद्वान् ओऽ सदाचार पालक। ओहि योग्य पिताक यशस्वी पुत्र छथि पञ्जीकार प्रवर मोदानन्द बाबू। नाम सुनितहिं अकचकयलहुँ। हम पूर्णियाँ कॉलेजक जखन छात्र रही तँ समस्त कुटुम्ब वर्ग बिष्णुपुर गामक मित्रवर्ग जे नवरतन पूर्णियाँमे रहैत छलाह तनिकासँ हिनक नाम बड़ श्रद्धापूर्वक उच्चरित होएत सुनने छलहुँ। अहि साक्षात्कार भेल सन्ता बुझि पड़ल जे जे किछु हिनकर मादे सुनने छलहुँ से बड़ कम छल। निश्चय ई व्यक्ति परम आदरणीय छथि। सांध्यकालीन बैसारमे गामक सभ श्रेष्ठ व्यक्ति अपन-अपन वंशक नवजन्मोत्पत्तिक विवरण लिखबैत गेलखिन्ह। पञ्जीकारजी तत्परतापूर्वक सभक परिचय बड़ मनोयोगसँ लिखैत रहलाह। तखन हमरा बुझाएल जे कोना कऽ हमरा लोकनिक वंश परिचय पछिला हजार वर्षसँ साङ्गो-पाङ्ग उपलब्ध रहल अछि। हमर गाम पञ्जीकार गामसँ १०० कि.मी.सँ अधिके पूर्वमे अवस्थित अछि। यातायातक कोनो सम्यक व्यवस्था पूर्वमे नहि रहल होएतैक। नाना प्रकारक असुविधाक सामना करैत एतैक भू-भागमे पसरल मैथिल ब्राह्मणक यावतो परिचय संग्रहित करब, सुरक्षित राखब आ बेर पड़लापर उपस्थित करब अत्यन्त दुःसाध्य कार्य। यात्रा ओ परिस्थिति जन्य कष्टक थोड़ेको अनुभव नहिं कऽ केँ अपन कर्तव्येक प्रधानता दैत निःस्वार्थ भावसँ धर्मशास्त्रक रक्षामे तत्पर एहि इतिहासक संरक्षण सन पुनीत कार्य करैत रहब हिनकहि सन व्यक्तिसँ संभव। प्रातः काल पूज्य पितासँ एकान्तमे पुछलियन्हि जे एतेक कष्ट उठा कऽ परिचय संग्रह करबाक प्रयोजन की? बुझौलन्हि जे अपना लोकनि जे सनातन धर्मावलम्बी से सभटा कार्य मनु, याज्ञवल्क्य, शतपथ, शंख इत्यादि महान् ऋषि लोकनिक देल व्यवस्थापर चलैत छी। मनु विवाहक सन्दर्भमे कहने छथि जे कोनो कन्या ओ वरक विवाह स्वजन, सगोत्र, सपिण्ड ओ समान प्रवरमे नहि हो। एहि हेतु आवश्यक अछि जे सपिण्ड्य निवृत्तिक ज्ञान हो। ताहि हेतु पुरुषाक विवाहादिक विवरण सम्पूर्णतः उपलब्ध हो। एहि धर्मक रक्षा तँ विन पञ्जीकारहिं सम्भव नहि। अन्यथा वर्णशंकरक प्रधानता होएत ओ जातिय रक्षा नहिं होएत। पञ्जीकारक नहिं रहने वंशक इतिहासक ज्ञान नष्ट भए जाएत। विश्वास जमि गेल। हुनका प्रति मनमे जे आस्था छल से चतुर्गुण भऽ गेल। तकर बाद जखन कखनो ओऽ अएलाह हम ओहि देवत्व भावेँ हुनक सम्मान कएल। ओहो पितृवत स्नेह देलन्हि। ओऽ अपन व्यक्तित्वक धनी छलाह। सदाचार पालनमे तत्पर। जखन कखनो हुनकर गामपर जएबाक अवसर भेटल- गमौलहुँ नहि। कतेको बेर हुनकर गाम शिवनगर गेल छी। हुनक ओऽ साफ परिछिन्न दलान। रमनगर फुलवाड़ी। पञ्जीकारजीक दैनिक चर्या कलम ओऽ खुरपीक संग सम्पन्न होइत छलन्हि। कर्मिष्ठ पुरुषः। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

22 2 2 नागेन्द्र झा, नवरत्न हाता, पूर्णियाँ स्व. पञ्जीकार मोदानन्द झासँ सुनल परुए महेन्द्रो मूलक पूर्णियाँ जिलाक शिवनगर ग्रामवासी छलाह। ई पञ्जी प्रबन्धक नीक ज्ञाता छलाह। महाराज दरभङ्गाक चलाओल धौत परीक्षोत्तीर्ण छलाह। ई लेख पञ्जीकारक विषयक थिक। अतः पञ्जी शब्दक अर्थ की से बूझब आवश्यक। पञ्ज शब्द आएल अछि संस्कृतमे तथा भाषोमे पञ्च शब्दक प्रयोग ५ संख्याक अर्थमे भेटैछ। तैं पञ्ज शब्द ५ संख्यासँ सम्बद्ध अछि। भाषामे हाथक पाँचो आङ्गुर तथा ताशक ५ कैं पञ्जा कहल जाइछ। पञ्जीमे ५ संख्याक कि प्रयोजन? उत्तर- हमरा लोकनि अर्थात् मैथिल ब्राह्मण “पञ्चदेवोपासक” छी। कोनो तरहक शुभ कार्यमे पूजा पञ्चदेवतैक पूजासँ आरम्भ होइछ। तहिना धर्मशास्त्रक अनुसारे कहल गेल अछि जे “मातृतः पञ्चमीं त्यक्त्वा पितृतः सप्तमीं भजेत्”। अर्थात् प्रकृति (माय)सँ पाँचम स्थान स्थिति कन्याक सङ्ग विवाह नहि करी। ई निषेध कयल गेल। विवाह सृष्टि प्रयोजनार्थे होइछ आ सृष्टिमे प्रकृतिक प्रयोजन तैं मायसँ पाँचम स्थान स्थित कन्यासँ विवाह निषिद्ध भेल तथा एहि निषेधक कारणसँ सम्भव थिक जे एकर नाम “पञ्जी” राखल गेल हो अथवा कन्यादानमे वरक दू पक्ष, कन्याक दू पक्षक अर्थात् दुनू मिलाकेँ चारि पक्षक निःश्शेष व्याख्या जाहि पुस्तकमे लिखल जाय आओर पञ्जीकार ओकरा स्वीकार करथि अर्थात् हस्ताक्षर करथि ओऽ भेल पञ्जी। संस्कृतमे पञ्जी (पञ्जिका) शब्दक अर्थ थिक जे पूर्णतः पदक व्याख्या जाहिमे लिखल गेल हो। अर्थात् ओऽ रजिस्टरो भऽ सकैछ, पुस्तकोक रूपमे भऽ सकैछ, हैन्डनोटोक रूपमे भऽ सकैछ। सरकारी रजिस्ट्री ऑफिसमे रजिस्टर रहैछ। हाटपर मवेशीक बिक्री भेलापर विक्रीनामा लिखल जाइछ। एकर निदान “याज्ञवल्क्य” साक्ष्य प्रकरणमे स्पष्ट कयने छथि जे बेचनिहार, खरीददार आऽ साक्षी सभक पूर्ण पता रहै जैसँ भविष्यमे कोनो तरहक विवाद नहि उठै। ई अभिलेख (रेकर्ड) वस्तु विक्रयोमे तथा दानमे सेहो राखल जाय। ई तँ कन्यादान प्रकरणमे वर-कन्या दुनूक वंशक पूर्ण सपिण्डक अभिलेख जाहिमे लिखल जाय से भेल पञ्जी आऽ ओहि पञ्जीमे जे वर-कन्या सपिण्डक अभ्यनाट नहि छथि से लिखनिहार पञ्जीकार कहवैत छथि। एहि स्थितिमे ईहो ज्ञात होबक चाही जे पञ्जी प्रथा कहियासँ चलल, कियैक चलल? ई प्रथा हरिसिंह देवक समयसँ प्रचलित भेल अछि। कियैक आरम्भ भेल से कथा स्व. पञ्जीकारे मुहसँ सुनल अछि, जे निम्न थिक। पञ्जी प्रबन्धक आरम्भक बीज- एक ब्राह्मणी रहथि। ओऽ जाहि गाममे रहथि ओऽ ब्राह्मण बहुल गाम छल। लोक कि पुरुष वा कि स्त्री बिनु पूजा-पाठ केने भोजन नहि करथि। ओहि गामक एक पोखरिपर एक शिवमन्दिर छल। उक्त ब्राह्मणीक नियम छल जे जाऽ धरि उक्त शिव-मन्दिरक महादेवक पूजा नहि करी ताऽ धरि जलग्रहण नहि करी। ई शिव पूजार्थ मन्दिर गेली ओहि समय एक चाण्डाल सेहो पूजार्थ गेल रहए। हिनका देखि हिनकासँ दुराचरणक आग्रह कएलक। ई परम पतिव्रता छलीह। ओकरा दुत्कारैत कहलनि जे ई मन्दिर थिकैक तू केहेन पापी छैं, जो भाग नहि तँ तोहर भला नहि हेतौ। ई कहिते छलीह की शिवलिङ्गसँ एक सर्प फुफकार करैत अवैत ई चाण्डाल भागल। संयोगवश बाहरसँ एक ब्राह्मणी, ओहि दुनूक वार्तालाप सुनिते छलीह। गामपर आवि मिथ्या प्रचार ओहि चाण्डालक संग कऽ देलनि। गामक लोक हिनका बजाय कहलनि जे अहाँकेँ प्रायश्चित करए पड़त। एहि लेल कि अहाँ चण्डालक सङ्गम कएल। ई कहि उठलीह जे के ई कहलक, हमरा तँ ओकरासँ स्पर्शो नहि भेल अछि। मुदा लोककेँ विश्वास नहि भेल। प्रायश्चित लिखल गेल (यदीयं चाण्डालगामिनी तदा अग्निस्तापं करोतु) ई लिखि हुनक दहिन हाथपर एक पिपरक पात राखि आऽ तैपर लह-लहानि आगि राखल गेल। ई पाकि गेलीह। तखन हिनका ग्राम निष्कासनक दण्ड देल गेल। कनैत-खिजैत लखिमा ठकुराइन नामक पण्डिताकेँ सब बात कहलनि। श्रीमती ठकुराइन प्रायश्चित्त लिखनिहार पण्डितकेँ बजाय कहल जे प्रायश्चित्त गलत लिखल गेल। हम प्रायश्चित्त लिखब। तखन ठकुराइन लिखल जे “यदीयं पतिभिन्न चाण्डाल गामिनी तदा अग्निस्तापं करोतु”। ई वाक्य पूर्ववत् दहिन हाथक पिपरक पातपर राखल गेल तँ ई नहि पकलीह। तखन ई वार्ता महाराज हरिसिंहदेवक ओतय गेल। तखन उक्त महाराज पण्डित मण्डलीकेँ आमन्त्रित कऽ पुछलनि जे उक्त स्त्रीक पति चण्डाल कोना? तखन विद्वतमण्डली उक्त स्त्रीक पतिक विवाहक शास्त्रानुकूल विचारि देखलनि तँ हुनक विवाह अनधिकृत कन्यासँ भेल तैँ हिनकर पति चण्डाल भेलाह। एकर बाद महाराजक आदेशसँ मैथिल ब्राह्मण लोकनिक विवाह पञ्जी बनल। मैथिल ब्राह्मणमे १६ गोत्रक ब्राह्मण छथि। एकर बाद गाँव-गाँवमे उक्त गोत्रान्तर्गत जे जे लोक छलाह तनिका-तनिका गामक नाम देल गेल एवं मूल कहौलक। पञ्जी मूलक अनुसार बनल, गोत्रक अनुसार नहि। एक गोत्रमे अनेक मूल अछि। गोत्रक नामपर पञ्जी बनैत तँ गामक पता नहि लगैत। हमर मतसँ पञ्जी-प्रबंध धर्मशास्त्रक अंग थिक। तैं एकर लिखनिहार, अभिलेख (रेकर्ड) रखनिहार एवं एक पढ़निहार व्यक्ति पञ्जीकार (रजिस्ट्रार वा धर्मशास्त्री) थिकाह। कलियुगानुकूल पूर्व समय जेकाँ पञ्जीकारक परामर्श बिनु लेनहुँ विवाहक निर्णय कऽ कन्यादान कऽ लैत छथि जे परम अनुचित थिक। जे पञ्जीकार हमरा लोकनिक लोकान्तर प्राप्त पूर्व पुरुषक अभिलेख (रेकर्ड) राखि आ वैह विद्या पढ़ि अपन जीवनयापन करैत छथि हुनक आर्थिक स्रोत एक मात्र ईएह जे हमरा लोकनिक सन्तान (वर वा कन्याक) जखन समय आओत तखन हुनक परामर्श शुल्क दऽ ग्रहण करी। से वर्षमे कतेक होइछ। यदि ईएह रास्ता रहत तँ ई विद्या लुप्त भऽ जायत। एहि पञ्जीक मूल्य सरकारोक न्यायालयमे कम नहि छैक जेकर निम्नांकित एक उदाहरण देखू- उदाहरण- एक राजपरिवार वंशविहीन भऽ लुप्त भऽ गेल। हुनक सब सम्पत्तिमे सँ किछु सम्पत्ति महाराज दरभंगाकेँ भेल आऽ किछु सम्पत्ति बनैलीक राजामृत राजपरिवारक उत्तराधिकारीसँ कीनि लेल। एकर बाद महाराज दरभंगा न्यायालय जाय बनैली राज्यपर ई कहि जे ओऽ (वनैली राज्य) अनधिकृत किनने छथि। मोकदमा बहुतो दिन चलल। दुनू पक्षसँ दिग्गज वकील लोकनि छलाह। उत्तराधिकारक हेतु दुनू पक्षकेँ ई पञ्जी-प्रबन्ध मान्य भेल। जाहिमे बनैली राज्यक पञ्जीकारक रूपमे उक्त पञ्जीकार जनिक विषयमे ई लेख लिखल जाऽ रहल अछि, हिनक पूज्य स्व.पिता तथा ई, दुनू गोटें मोकदमाक बहसक लेल नियुक्त भऽ पञ्जी-प्रबन्ध पुस्तकक अभिलेख न्यायालयक जजकेँ देखओलनि। एकर बाद बनैली राज्य “डिग्री” पओलक त्तथा ई दुनू पिता-पुत्रक मान्य सम्मान कयलक। एहिसँ सिद्ध भेल जे उक्त पञ्जीकारक पञ्जी सुरक्षित रहि पञ्जीकारक योग्यतोकेँ सिद्ध कएलक। हिनक निर्लोभताक वर्णन सेहो देखू:- एक राजदरबारमे कन्यादान उपस्थित छल। ताहिमे परामर्श (सिद्धान्त)क हेतु अनेको पञ्जीकार बजाओल गेल रहथि ताहिमे ईहो रहथि। राजदरबारक बात रहैक। राजाकेँ अपन कन्याक हेतु ई वर पसिन्द रहथिन। ई पञ्जीकार अन्य पञ्जीकारसँ वार्तालापमे कहलथिन जे औ पञ्जीकारजी! ऐ वरक अधिकार तँ नहि होइत छैक। ओऽ उत्तर देलथिन जे अहाँ बताह भेलहुँ हेँ। राजाक बात थिकैक। राजाकेँ काज पसिन्द छनि। एहिमे अरङ्गा नहि लगबियौक। नीक पारश्रमिक भेटत। ई मोने-मोन विचारलन्हि जे ऐ पापक भागी (रुपैय्याक लोभमे पड़ि) हम कियैक होउ। किछु कालक बाद बाह्यभूमि (पैखाना) जेबाक बहाना बनाय ओतयसँ भागि अयलाह। हिनक नैष्ठिकता सेहो तेहने छल। सब दिन स्नानोत्तर सन्ध्या, तर्पण, गायत्री जप, शालिग्रामक पूजा बिनु कएने विष्णु भगवानक चरणोदक तथा तुलसीपात बिनु खएने! अन्न-जल नहि करैत छलाह। एकर अतिरिक्त कार्तिक मास जखन अबैक तखन भरि मास धात्रीयैक गाछतर हविष्यान्न भोजन करथि। ऐ सँ हुनक पूर्ण नैष्ठिकताक पता चलैत अछि। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

1111 11 11 शीतल झा,संविधानसभा, संघीय संरचना आ मिथिला राज्यक औचित्य- जनकपुर, नेपाल हिमालय पर्वत ऋंखलाक करिब मध्य भागमे चीनक तिब्बतसँ दक्षिण, भारतक बिहार आ उत्तर प्रदेशसँ उत्तर आ पूर्व तथा पश्चिम बंगालसँ पश्चिम एकटा आयताकार देश नेपाल अछि । २४० वर्षपूर्व गोराखक एकटा लडाकू राजा पृथ्वीनारायण शाह हिंसक बलसँ दक्षिण–पूर्व आ पश्चिमक देशसभपर आक्रमण करैत गेल आ सुन्दर उपत्यका काठमाण्डूसहित एकटा नमहर देश बनौलक । एकर सीमा दक्षिणमे कतऽ धरि रहैक, तकर आधिकारिक रुपसँ कतहु उल्ल्ेख नहि अछि । खस शासकद्वारा शासित गोरखा राज्यक दमनपूर्ण विस्ताकरक वाद एकर नाम कहिया नेपाल रहल से निर्णायक प्रमाण नहि भेटैछ । दक्षिणमे मिथिला आ अवधसन ऐतिहासिक गणराज्यपर सेहो ई हिंसापूर्ण ढंगसँ षडयन्त्रपूर्वक आक्रमण कएलक । एहि क्रममे व्रिटिशकालीन भारतकद्वारा प्रतिरोध आ युद्ध कएल गेलाक वाद १८१६ क सुगौली सन्धिसँ ई वर्तमान सीमाङ्कित देश, बनल जाहिमे १८६० क सन्धिसँ दानस्वरुप प्राप्त पश्चिमक ४ जिलासँ एकर वर्तमान स्वरुप निर्धारित भेल । ड्ड देशक राजनीतिक शासन व्यवस्था राजतन्त्रात्मक छैक आ एकर राज्य–संरचना एकात्मक । एकर शासकीय प्रवृति निरंकुशात्मक छैक आ सामाजिक आर्थिक व्यवस्था सामन्ती छैक । ड्ड एकर सामाजिक मानवशास्त्रीय संरचना ९क्यअष्य(बलतजचयउययिनष्अब िक्तचगअतगचभ० मंगोलाइड केकेशियन प्रजातिसँ बनल अछि, जाहिमे निग्रोवाइड आ एस्टोल्वाइड प्रजाति सेहो अल्प संख्यामे बसल अछि । कैकेरियनक आर्य शाखा तँ मुख्य रहैत अछि । ड्ड हिमालय क्षेत्र आ पहाड क्षेत्रमे लिम्बु, राई, तामाङ, नेवार, मगर, गुरुङ, शेर्पा जाति तथा जनजातिक वास छैक तँ दक्षिणक समतल मैदानी भूभाग तराइृमे आर्यमूलक जाति जनजातिसभक वास छैक । दुनू क्षेत्रमे पिछड़ल जनजाति, आदिवासीसभक वास सेहो छैक, जाहिमे मिश्रित मूलक संख्या उल्लेखनिय छैक । मूख्यतः कर्णाली प्रदेशक आर्य मूलक खस जातिक गोरखा राज्य वर्तमान सम्पूर्ण नेपालपर शासन करैत अछि । तेँ ई राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायिक प्रभाव विस्तारक क्रमे प्रत्येक जातीय क्षेत्रमे प्रवेश कऽ सामाजिक, भाषिक, जातीय संरचनाकेँ तोड–मडोर कऽ देने छैक आ नेपालकेँ कथित रुपेँ राष्ट्र कहि प्रस्तुत करैत छैक । वस्तुतः सामाजिक विकासक अध्ययनमे देखल जाए तँ नेपाल एकटा नहि, विभिन्न राष्ट्रसँ बनल एक देश अछि, जतऽ एक्कहिटा खस जातिक एकल राज्यशासन छैक । २. मिथिला नेपालक दक्षिणी समतल भूभागकेँ तराई अथवा मधेश कहल जाइत छैक । एतऽ अवध आ मिथिलासन पौराणिक महिमामण्डित ऐतिहासिक समृद्धताप्राप्त गणराज्य छल, जकरा मुगल व्रिटिश शासन दमन करैत गेल आ अन्ततः शाहवंशीय राजाक सङ्ग वाँटि लेलक । १८१६ क सन्धि मिथिलाकेँ खण्डित कएलक । जाहि मिथिलाक सीमा कोशीसँ पश्चिम, गण्डकसँ पूर्व, गंगासँ उत्तर आ हिमालसँ दक्षिण छलैक, तकर आइ इतिहास छैक, भूगोल नहि छैक । जेँ कि एकर भाषा, संस्कृति, जीवित छैक तेँ बाटल–बाँटल शरीरक आधारपर कहि सकैत छी–सिमरौनगढ़सँ पूर्व, झापासँ पश्चिम आ महाभारत महाड़सँ उत्तर मिथिला जीवित अछि–अहिल्याजकाँ जीर्णोद्धारक प्रतीक्षामे अछि, उद्धारक बाट जोहि रहल अछि । ३. संविधान देशमे शासन व्यवस्था कायम करबाक लेल बनाओल गेल मूल कानूनकेँ संविधान कहल जाइत छैक । सभ कानून, ऐन, नियम एकरे सीमाक भीतर रही बनाओल जाइत छैक । लोकतन्त्रक मुख्य आधार आ एकटा प्रमाण संविधान होइत छैक । नेपालमे २००४ सालमे पहिलबेर कोनो संविधान नामक चीज प्रस्तुत भेल रहैक । ओना ताहिसँ पूर्व १९१० मे एकटा ऐन सेहो बनल रहैक । तत्पश्चात २००७ सालमे अन्तरिम शासन विधान आ २०१५ सालमे नेपाल अधिराज्यक संविधान आएल । २०१५ सालक संविधान एकदलीय पञ्चायती व्यवस्था देलक आ तकर अन्त्य २०४६ सालक आन्दोलन कएलक । २०४७ सालमे एकटा अन्तरिम सरकार बनाकऽ तकराद्वारा नेपाल अधिराज्यक संविधान २०४७ लागू कएल गेल । ई सभ संविधान राजतन्त्रात्मक एकात्मक, एकात्मक अछि आ राज्य सत्तापर, राज्यपर, प्रशासनपर एक धर्म, एक भाषा, एक जातिकेँ प्रमुखता आ अधिकारक मान्यता देने छल । राजाद्वारा प्रदत्त ओ संविधानसभ राजाक अधिकारकेँ सर्वोपरि मानैत आएल छल । मुदा ०६२÷०६३ मे भेल जनआन्दोलन भाग–२ सँ ई मान्यता ढहैत गेल आ एखन देश संविधानसभाद्वारा अर्थात जनताक प्रतिनिधिद्वारा निर्मित संविधानक निर्माण करत । ४. संविधानसभा संविधान बनएबाक लेल जनताद्वारा चुनल प्रतिनिधिसभक समूह एवं सभाकेँ संविधानसभा कहल जाइत छैक । सार्वभौमसत्ता सम्पन्न जनता अपनाकेँ अनुशासित आ शासित रहबाक लेल जाहि तरहक शासन–व्यवस्थाकेँ चलएबाक लेल अपने पठाओल प्रतिनिधिद्वारा कानूनक ग्रन्थ तैयार करबाबैक आ घोषणा करबबैक, ताहि जनप्रतिनिधिमूलक सभाकेँ संविधानसभा कहैत छैक । ५. संविधानसभाक अनुभव (क) उत्तर अमेरिका ः ब्रिटेनद्वारा शासित अमेरिकाक १३ राज्य स्वतन्त्र भेलापर ५५ सदस्यीय संविधानसभा निर्माण कऽ तकर अनुमोदन अमेरिकी जनतासँ करबाकऽ अप्रिल ३०, १९८९ मे घोषणा कएलक । (ख) फ्रान्स ः अपनहि देशक सामन्ती नायक सम्राट सोलहम लुइक विरुद्ध संविधानसभा वना १७९१ मे लागू कएलक । (ग) रुस ः १९१८ मे संविधानसभा तँ बनल मुदा संविधान लागू नहि भऽ सकल । (घ) भारत ः ब्रिटिस शासनसँ मुक्तिक लेल ३८९ सदस्यीय संविधानसभा बनल मुदा पाकिस्तानक विभाजनक बाद रहल २९९ सदस्यीय सभाद्वारा आ डा.राजेन्द्र प्रसादद्वारा ई घोषित भेल । (ङ) दक्षिण अफ्रिका ः गोर आ कारीक बीच भेल संघर्ष संविधानसभाक मार्फत अन्त्य भेल । सर्वपक्षीय सम्मेलनमार्फत ४९० सदस्यीय संविधानसभाक निर्माण भेल आ संविधान बना जनअनुमोदन कराओल गेल आ घोषणा कएल गेल । विभिन्न देशक अनुभवक आधारपर नेपालमे बननिहार संविधानसभामे निम्न तरहक विशेषता होएब वाञ्छनीय रहितैक – (क) जनसंख्याक अनुपातमे निर्वाचन क्षेत्र निर्कारण कएल जाइक आ प्रत्येक जाति, जनजाति, अल्पसंख्यक, दलित, महिला, मधेशीक ओहि अनुपातमे क्ष्ोत्र आरक्षित कऽ प्रतयक्ष निर्वाचनसँ जनप्रतिनिधिक पठा संविधानसभाक निर्माण कएल जइतैक । (ख) अन्तरिम संसदसँ संविधान मस्यौदा तैयार कऽकऽ ओकरा जनमतसंग्रहद्वारा निर्माण कएल जइतैक, मुदा प्रत्यक्ष मतादान वा समानुपातिक प्रणाली दुनू कायम कएल गेलैक । एहिसँ अत्पविकसित देशक जनतामे भ्रम आ अनावश्यक गड़बड़ी उत्पन्न मऽ सकैत छैक । आब पूर्ण समानुपातिक प्रणाली बहुतो राष्ट्रिय दलक संगहि प्रत्येक जातीय, जनजातीय, क्षेत्रीय समूहकसभक सेहो मांग रहलाक कारण ओकरे लागू कएनाइ सार्थक संविधानसभाक आधार तैयार कऽ सकैत अछि । ६. समावेशीकरण तथा समानुपातिक समावेशीकरण सत्ताक स्वरुप, शासन, प्रशासनमे देशक प्रत्यक जाति, जनजाति, अःल्पसंखयक जाति, विभिन्न भाषिक समूह, सांस्कृतिक समूह, आदिवासी, महिला, क्षेत्र आदि सभक प्रवेश नहि भेल तँ शासन पद्धति जनासँ दूर रहि जाइत अछि आ ताहूमे लोकतन्त्र तँ मात्र कथित सभ्रान्त वर्गक खास जातिक हाथक दमनक माध्यम बनि जाइत अछि । तेँ जातीय, भाषिक संख्याक समानुपातिक समावेशीकरणसँ मात्र लोकतान्त्रि शासन पद्धति मजबूत आ दीर्घजीवी भऽ सकैत अछि । (क) जनसंख्याक समानुपातिक निर्वाचन क्षेत्र निर्धारण कऽ ओहि क्षेत्रसँ ओहि ठामक मूल जाति, भाषाभाषीक मात्र प्रतिनिधित्व कराओल जाए । (ख) जनसंख्याक समानुपातिक रुपमे सरकारक प्रत्येक अंगमे अथवा न्यूनाधिक रुपमें सभ क्षेत्र, वर्ग, जाति, लिगंक उपस्थित कराओल जाए । (ग) सुरक्षा, प्रहरी, प्रशासन, राजनीति, राजनीतिक संस्था प्रत्येकमे समानुुपातिक रुप्मे प्रवेश कराओल जाए वा न्यूनाधिक रुपमे प्रारम्भ कराओल जाए आ किछु जातिक लेल प्रारम्भमे आरक्षित कएल जाए । एहि तरहेँ देखलापर आगामी शासन पद्धति समानुपातिक होएबाक लेल संविधानसभा समानुपातिक भेनाइ आवश्यक अछि आ तकरा लेल अन्तरिम संसद आ अन्तरिम सरकार, निर्वाचन आयोगकेँ सेहो समानुपातिक भेनाई आवश्यक अछि आ ओअि तरहक सुरक्षाक व्यवस्था कएनाइ सेहो आवश्यक अछि । ७. एहि तरहेँ वनल संविधानसभा नेपालक नव राज्य संरचना कऽ सकैत अछि आ संघीय संरचनादिस लऽ जा सकैत अछि – (क) राज्य (प्रान्त, प्रदेश) ः भाषा, संस्कृति, जाति, धर्म आदिक आधारपर बनल अथवा बनाओल राजनीतिक, आर्थिक, प्रशासनिक अधिकारसम्पन्न राजनीतिक भूक्षेत्रकेँ राज्य कहैत छैक । (ख) संघ – एहन, राज्य सभस वनल राजनीतिक शक्ति सम्पन्न केन्द्रीय सत्ता के संध कहै छ । आंशिक सार्वभौमिकता, स्वतन्त्रता, आत्म निर्णयक अधिकार प्राप्त सभ मिल क सार्वभौम सत्ता केन्द्रके प्रदान करैछ आ एहि राज्य संरचना के संघीय संरचना कहल जाइत अछि । ८. नेपाल संघीय होएबाक आवश्यक अछि – कारण ः– (क) नेपाल विभिन्न प्रजाति, जाति, जनजाति, धर्म, भाषा, संस्कृति के देश छै । एहि सभ के देशक मूलधारमे लएवाक लेल । (ख) लोकतान्त्रिक व्यवस्थाके समानुपातिक समावेशीकृत करबाक लेल । (ग) संघीय सरकार आ राज्य सरकार भेला स प्रत्येक नागरिक अपन योग्यता व्यवस्था अनुकूल उपयोग करबाक लेल । (घ) राज्य भीतर अनेक प्रशासनिक न्यायिक निकाय विकेन्द्रित विकाश राज्य क्षेत्रक कार्य सम्पादन ओहि राज्यक जनताके निर्णय अनुसार हौइछै । (ङ) ओहि राज्यक भीतरक प्राकृतिक सम्पदा जल, जमिन, जंगल खनिज पदार्थ पर ओहि राज्यक जनताक अधिकार होइछ, ओकर अधिकतम प्रयोग ओतहिक जनता करैछ । (च) उदयोग आदि विकास कार्य पर राज्यक नियन्त्रण रहैछ आ ताहि के लेल अन्य राज्य स, विदेश स सम्बन्ध स्थापित क सकैअ । (छ) ओहि राज्यक प्रमुख भाषा प्रशासन, न्यायिक क्षेत्र आदि मे निर्वाध रुपमेँ प्रयोग क सकैअ जहि स राज्यक जनता सामाजिक न्याय, मानवीय विकास स वंचित नहि भ सकैअ । (ज) अपन मातृभाषा, स्वत ः कायम भेल सम्पर्क भाषा, ग्रहित शिक्षाक भाषाक सुविधा भेल स प्रशासनिक, शैक्षिक वैदशिक सुरक्षा सेवा आदि मे निक संख्या मे राज्यक युवा, शिक्षित वर्ग प्रवेश होएत । (झ) कोनो खास प्रजातिक, राष्ट्रक, जातिक, जनजातिक, भाषाभाषिक, धार्मिक, सांस्कृतिक समुदायक इतिहास, संस्कृति, भाषा, भेष, कला , साहित्य, परम्परा केँ सरक्षण आ सम्बर्धन कए पहिचान के सुनिश्चत आ सुरक्षित करबाक लेल । (ञ) कोनो प्रजातिय, जातीय, धार्मिक, भाषिक समुदाय के दोसर वर्ग स शोषण दमन स मुक्ति के लेल । (ट) पृथकवादी आन्दोलन के रोकवाक लेल । (ठ) एकात्मक राज्य व्यवस्था परुर्ण रुप स असफल भगेल अछि । तै संघीय संरचना आवश्यक अछि । ९. संघीय संरचनाक आधार ः– संघक भीतर राज्यक संरचना क आधार निम्न होइछ (क) ऐतिहासिक रुप स निर्मित राष्ट्र (.....–जाति ) के आधारपर (ख) प्रकृतिक रुपस निर्मित भूखण्डके आधार पर । (ग) जातीय वाहुल्यता के आधारपर (घ) धर्म अथवा धार्मिक सम्प्रदायक अधार पर (ङ) संस्कृति के आधार पर अथवा सांस्कृतिक सामिम्प्यता के आधार पर । (च) भाषा क आधार पर (छ) प्रकृतिक सम्पदाक आवण्टन के आधार पर । (ज) विकसित नया अवस्था, सोचक, आधारपर । १०. एहि आधारसभ के देखैत आ नेपालमेँ चलैत जातीय आन्दोलन सभ केदेखैत आ ओकर मांग सभ के देखैत नेपालके निम्न संघीय राज्यमे विभाजित कएनाई आवश्यक छै ः– (क) लिम्बुवान किरांत राज्य (ख) खुम्बुवान (ग) नेवा राज्य नेवार राज्य (घ) तामाङ साम्बलिंग (ङ) तमुवान गुरुङ राज्य (च) मगरात मगर राज्य (छ) खसान खस राज्य (ज) थरुहट थारु राज्य (झ) अवध अवधी राज्य (ञ) भोजपुरी भोजपुरी (ट) मिथिला मिथिला (विदेह) संघीय विधाजनक लेल नया, तथ्यपूर्ण जनगणना आवश्यक अछि, आ ऐतिहासिक रुप स वसल जाति के सामुहिक निर्णय के आधारपर राज्यक नामाकरण कएनाई आवश्यक अछि । सम्पूर्ण नेपाल मे खस जातिक मिश्रित अवस्था भेलो स कोनो जातीय क्षेत्रक इतिहास आ ओकर भावना नहिं मेटाएल अछि । ११. मिथिला – संघीय संरचनामे मिथिला राज्य किएक चाहि ः– (क) मिथिला प्राग्ऐतिहासिक भूमि अछि आ पुराणवर्णित देश अछि । (ख) मिथिला आर्यजातिक आधार क्षेत्र आ आर्य संस्कृतिक निर्माण भूमि अछि । (ग) कोशी गण्डक, गंगा, हिमालय के विचमेँ स्थित ई भूमि निश्चित भूखण्ड प्राप्त कएने अछि । (घ) ऐतिहासिक कालखण्डमे एकरापर अनेक आक्रमण होइतोमे ई आर्य जातिक वाहुल्यताक क्षेत्र छै । (ङ) एकर अपन वहुत समृद्ध संस्कृति छै । (च) एकर भाषा हजारौं वर्ष पूर्वक इतिहास देखवैत अछि आ वहुत समुद्ध अछि । (छ) मिथिला गणराज्यक इतिहासक साक्ष्य अछि । (ज) एकर खस आर्थिक जीवन प्रणाली छैक । (झ) सामुहिक, देवी देवता स ल “क” पारिवारिक देवता प्रति आस्थाक संस्कार छै । (ञ) मिथिलामे अखनो लोक निर्मित, नियम कानून छै समग्रमेँ मिथिला के एकटा सझिया मनोभावना छैक जाहिस ई एकटा राष्ट्र छै आ एकरा संघीय संरचनामे राज्य होएबाक पूर्ण नैसर्गिक अधिकार छै । ११..... (क) मिथिलाक सम जातीके, राजनीतिमे, प्रशासनमे समानुपातिक उपस्थिति के लेल । (ख) उद्योग, कृषि, पर्यटन, जंगल, जल सभ स अधिकतम् लाभ, लेबाक लेल । (ग) नदी नियन्त्रण, सिंचाई सडक वाँध, विद्युत आदि के लेल संघीय सरकार स आ विदेश स सम्बन्ध स्थापित कए मिथिला वासी के उत्थान लेल । (घ) मिथिला स उठाओल कर ... के उचित व्यवस्थापन कए राज्यक द्रुत विकाश केल । (ङ) मिथिलामे प्रयोग होइत सभ भाषा मे सरकारी तथा गैर सरकारी कार्यालय सभमेँ कामकाज करवाक लेल । (च) सरकारी सेवामे कामकाज करबाक अवसर के लेल । अर्थात वेरोजगारी समस्या समाधानमे सहयोग कएवाक लेल । (छ) मिथिलाक पावनि तिहार मे छुट्टि पएवाक लेल । (ज) मिथिलाक दलित, उत्पीडित, पिछडल वर्ग, जनजाति आदिवासी, महिला, अल्प संख्यक केँ लेल विशेष अवसर के लेल । (झ) मिथिलाक लोकगाथा (सहलेश, लोरिक) लोकनृत्य लोकधुन लोककला, लोकगीत, लोकनाट्य आदि के रक्षा आ प्रचार प्रासरक लेल । (ञ) पौराणिक मिथिलाक राजधानी जनकपुर सहित मिथिलाक एक खण्ड, एकर लिपि, साहित्य भाषा, संस्कृति जीवन शैली सभ जीवित अछि तै रक्षाक लेल आ विश्वस्तर मे एकर सभ्यताके, विशेषताके फैलावक लेल । (ट) नेपाल मे भेल कोनो लोकतान्त्रिक आन्दोलन, जातीय मुक्ति के आन्दोलनमे मिथिलाके अग्र, उग्र भूमिका रहलैक, सपूत वलिदान देल कै तै संघीयता के लेल अधिक रक्त श्राव रोकवाक लेल । १२. मिथिला राज्यक सीमा ः– (क) प्राचीन, मिथिलाक सीमा छलैक –उत्तरमे हिमालय, दक्षिणमे गंगा, पूर्वमे कोशी, पश्चिम मे गंडक । ई मिथिला १८१६ क सुगौली सन्धि पश्चात् खंडित भेल । अखन एकर जीवित भूगोल पर जीवित इतिहास छै, जीवित लिपि भाषा, जीवित संस्कृति जीवन्त जिवन शैली, जीवन्त मनोभावनाक अधिकार अनुसार सीम्रौन गढ स पूर्व, झापा स पश्चिम महाभारत पर्वत श्रृंखला स दक्षिण आ नेपाल भारत वीचक सीमा स उत्तर मिथिला छैक, आ मिथिला राज्य होएबाक चाहि । (ख) झापा मधेश मे रहितो मे एत सतार, राजवंशी जनजातिक बसोवास छैक, आ ओकर अपन इतिहास, संस्कृति, मांग आ संघर्ष छै तै ओतए, नव आगन्तुक खस भाषी के छोडि ओकर सभके आत्म निर्णयके अधिकार अनुसार मिथिलामेँ समाहित कएल जाए अथवा स्वायत्तता देल जाए । (ग) वारा, पर्सा भोजपुरी भाषाक क्षेत्र छै । मैथिली भाषा स फरक छै परन्तु एकर संस्कृति, आर्थिक जीवन मिथिला के समान छै । खसवादी सत्ताके दृष्टिकोण व्यवहार एकरो प्रति ओहने छै तै एकरो आत्मनिर्णय के आधारपर मिथिला मे समाहित कएल जाए अथवा स्वायत्तता देल जाए । १३. मधेश आ मिथिला ः– (क) मेची स महाकाली तकके सम्पूर्ण समतल मूमि – मधेश एकहि सत्तास दमित अछि, दलित अछि, उत्पीडित अछि, प्रताडित अछि, उपेक्षित अछि । सम्पूर्ण मधेशी एकहि मनोविज्ञान एकहि मनोदशा लक जीवित अछि । एकरा प्रतिक शोषणक स्वरुप समान छैक तै तकर संघर्षक निशाना एकहिटा भाषीक वर्ग छै । (ख) खस प्रभुत्ववादी सत्ता, मैथिली , भोजपुरी अविधि कहिक उपेक्षा, अवहेलना नहि करे छै समष्टिमे मात्र मधेशी कहै छै । (ग) थारु जातिके खस शासक पहाडी नहि बुझै छै आ थारु अपना के मधेशी बुझ स भय महसुस करै छै । तथापी ओ संघीयता के संघर्षमे प्रमुख शक्ति भसकै छै । आ इएह सोच स मधेशमे वसल प्रत्येक जनजाति, द्रोणवार, सतार राजवंशी, झागड सभके देखनाइ आवश्यक छै आ ओकरा सबके एहि संघर्षमे स्थापित कएनाई आवश्यक छै । (घ) मधेशक आन्दोलन खस सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक आन्दोलन छै आ मिथिलाक आन्दोलन माथिक, सांस्कृतिक, जातीय आन्दोलन निहित राजनीतिक अन्दोलन छै तै संघीयता के आन्दोलन के अन्तरवस्तु लेने छै । (ङ) मधेश आन्दोलन केन्द्र स्थल मिथिला क्षेत्र रहैत अछि आ मानव अधिकार राजनीतिक अधिकरा प्राप्तिके आन्दोलन के केन्द्र सेहो मिथिला क्षेत्र रहैत अछि । तै मधेश आन्दोलन के मिथिला आन्दोलन स जोडनाई आ मिथिला आन्दोलन के मधेश आन्दोलन के रुपमेँ विकसित कएनाई रणनीतिक सोच राखव आवश्यक छै । १४. मिथिला आ गणतन्त्र ः– मिथिला राज्यक लेल अथवा मिथिलाक मुक्तिके लेल नेपालमे संघीय शासन आवश्यक शर्त छै । संघीय शासन के लेल गणतन्त्र आ लोकतन्त्र आवश्यक शर्त छै आ अन्तत ः लोकतन्त्र के स्थापनाके लेल, एकर सशक्तता के लेल, एकर दीर्घायु के लेल गणतन्त्र आवश्यक छै । १. गणतन्त्र – जन्मक आधारपर विशेषाधिकार सहित शासक विना के शासन पद्धति सत्ताक स्वरुप के गणतन्त्र कहैत छै । सार्वभौमिक जनता जनप्रतिनिधि द्वारा राष्ट्र प्रमुख निर्माणक पद्धति के गणतन्त्र कहैत छैक अर्थात् राजा विना के शासन पद्धति । २. नेपाल गणतन्त्रात्मक देश हाएवाक चाहि – कारण ? (क) कथित एकिकरण वलातु सैनिक वल स हिंसा द्वारा भेल छै । (ख) राजतन्त्रक मूल चरित्र निरंकुश, निर्मम, अत्याचारी होइत आएल छै । (ग) सत्तामे ,सेनामे, प्रशासनमे, न्यायलयमे दमनकानरी नीति स पकड वना क आम वर्ग केँ निर्मम शोषण दमन करैत छै । (घ) कोनो प्रकारक, नया सोच, वैज्ञानिक चिन्तन जनअधिकार आ प्रगति विरोधि भेनाई राजतन्त्रक मूल ऐतिहासिक चिन्तन आ चरित्र छै । (ङ) एक देश–एक राज्य, एक राज्य –एक राष्ट्र, एक राष्ट्र – एक जाति, एक जाति – एक धर्म, एक धर्म – एक संस्कृति, एक संस्कृति– एक भाषा, एक भाषा – एक भेष आदि प्रकारक निरंकुश एकात्मक नीति लैत आएक छै । (च) लोकतन्त्रके स्थायित्व, मानवअधिकारक वहाली, कानूनी राज्यक स्थापना स्वतन्त्र, न्यायपालिका के लेले राजतन्त्र उच्छेदन आवश्यक छै । (छ) जनतके बलीदानी संघर्ष स आएल लोकतन्त्र के साथ सदा घोर षडयन्त्र करैत आएल छै । (ज) निम्न जाति आ वर्ग के सन्तान दुर राखि दानवीय व्यवहार कएनाई के दैविक अधिकार बुझै छै । (झ) कोनो प्रजाति जाति , जनजाति, भाषाभाषी के पहिचान के दमन करैत आएल छै आ दमन मे सेना, प्रशासन, अदालत, मातृहन्त केँ प्रयोग करैत आएल छै । (ञ) मधेशी के सदा विदेशी सावित करै मे व्यस्थ रहै त आएल छै । (ट) मिथिला के साथ वहुत वडका धोखा, षडयन्त्र, गद्दारी करैत आएल छै , जहन मिथिलाक सेना स सहयोग ल क भंग कए देने छै । (ठ) जातीय अधिकार के सुनिश्चित, सुरक्षित रखवाक लेल आवश्यक संघीय संरचनाके स्थापनाक लेल गणतन्त्र आवश्यक छै । १५. सघीयता आ वर्गीय आन्दोलन ः– किछु राजनीतिक आ बौधिक वर्गमे भ्रम रहैंछ आ भ्रम श्रृजना करैछ जे संघीय आन्दोलन वर्गीय आन्दोलनकेँ कमजोर करैत छै आ संघीय आन्दोलन जातीय सम्प्रदायिक सद्भाव के दूषित छै । मुदा ई भ्रम मात्र अछि । शोषण के स्वरुप आ गति जतेक स्पष्ट आ तीब्र होइछ आ वर्गीय आन्दोलन के गुण लैत जाइत अछि आ सम्पन्न वर्ग आ “सभ्य” जाति के भितर निर्मित शोषण आ शोषितक चरित्र लबैत अछि त ओ मात्र अधिकार आन्दोलन नहिं, जाति, क्षेत्र हितक आन्दोलन मात्र नहिं मानव विकाशके क्रम मे भेल वर्गीय आन्दोलन अछि । (आ कोनो वर्गीय आन्दोलनकारी के संघीय आन्दोलनके समर्थन करबाक चाहि) मिथिला आन्दोलन सेहो वर्गीय आन्दोलन अछि जतए एकटा राष्ट्र, समृद्ध संस्कृति, भाषा, साहित्य, शोषण आ दमनके शिकार अछि । १६. मिथिला आ जातीय आन्दोलन ः– जाति स्वरुप, चरित्र, इतिहास, आ ओहि जातिपर होइत शोषण दमके मात्रा, जातीय आन्दोलनके दिशा र स्वरुप निर्धारण करैछ । (सामाजिक संरचनाके भित्ररके विभिन्न जातिकै तह, हिन्दु धर्माबलम्बीके विभिन्न जातपर होइत भेदभाव, आ शोषण सेहो आन्दोलन के समय आ स्वरुप निर्धारण करैछ । तथापि छोट आ सामयिक अन्तर विरोध एकर मुख्य आन्दोलन के असर नहिं क सकैछ आ प्रधान अन्तर विरोध के समाधान मात्र ओहि अन्तर विरोध के समाधान क सकैछ । मिथिलाके भित्तरकेँ विभिन्न द्वन्द्व मुख्य द्वन्द्व के समाधान कर में आएल वाधा राजनीतिक वैचारिक आन्दोलन के मार्फत मात्र अन्त्य कएल जाए सकैछ । १७. मिथिला आ जनजातीय आन्दोलन ः– जनजाति स्वतः शोषित दमित आ अविकसित होइत अछि । ओकरा पर सदियौं स शोषण भ रहल अछि । मुदा आब आहो अपना अधिकार के लेल अनवरत संघर्ष क रहल अछि । नेपालमेँ जनजाति कोनो विकसित आ कोनो अविकसित अछि । दुनु के स्वायत्तता चाही । किछु जनजाति सैनिक प्रहरी सेना स जुडल अछि । मुदा अधिकारस वंचित । ओ पहाड मे आ मे आ मधेश मे सेहो अछि । मधेशक आन्दोलन दुनु के अधिकारके लेल कएल संघर्ष मे सहयोग कएलक अछि । मिथिला क्षेत्र मे जे जनजाति अछि तकरा मिथिला राज्य समानुपाति अधिकारस वंचित नहिं करत से ओकरा विश्वास नहिं भैरहल छै आ पहाडके जनजाति स मिथिला तथा मधेश आन्दोलन के निक जकाँ नहिं जोडल जा रहल अछि । दुनु ठामक जनजाति के विश्वास मे लेनाई आवश्यक अछि । १८. मधेश, मिथिला आ थारु आन्दोलन ः– जनजाति में थारु क संख्या वेसी छै आ मात्र मधेश में लगभग पूर्व स पश्चिम तक अधिकांश जिल्लामें । ई जाति अलग पहिचानक जाति छै क एकर अपन भाषा आ किछु संस्कृति अलग छै । जाहि क्षेत्र में स्थित छै ताहि ठामक भाषा स जुडल छै । शारिरिक बनौट मंगलाइड सन छै मुदा सांस्कृतिक सम्बन्ध मधेश के साथ जुडल छै । ई स्वतन्त्र आन्दोलन नहिं क सकैअ आ मधेशी आन्दोलन स जुड स डराइछै । मधेशी आन्दोलन के अंगा खस सत्ता एकरा प्रयोग करै छै । कहिओ आ कोनो आन्दोलन के विरुद्ध में उतारि दैत छै । वहुत सज्जन जनजाति भेला के कारण ई आसानी स ओहि षडयन्त्र में फंसि जायत छै आ मधेश आ मधेशी कें विरुद्धमे ठाढ भ जाइत छै । एकरा जनजाति आन्दोलन स निक जकाँ जोडनाई वहुत जरुरी छै, तहन एकरा मिथिला आन्दोलन में समानुपाति अधिकार आ समानुपाति अधिकार क्षेत्र के लेल विश्वास में ल एकर विश्वास प्राप्त केनाई आवश्यक छै । १९. नेपालक मिथिला आ भारतक मिथिला ः – सुगौली सन्धि मिथिला के दु खण्डमें त वांटि देलक, मुदा राजनीतिक सीमा स मिथिलाक भाषा, संस्कृति साहित्यक सम्बन्ध नहि तोडि सकल । आई दुनु देशमें मिथिला राज्यक मांग उठि रहन छै । अइस हुनु देशक शासक वर्ग के किछु भय भरहल छै । दुनु देशक मिथिला आन्दोलन के भावनात्मक सम्बन्ध छै आ दुनु के नैतिक समर्थन छै जे नैसर्गिक छै । दुनु राजनीतिक स्वतन्त्रता कायम राखए चाहैछै, दुनु अखण्डता के सम्मान करै छै । ई वात दुनु देशक सत्ता के वुझक चाही आ हमरा सभ के कर्तव्य जे दुनु सत्ताके बुझा देवक चाही । संघीय संरचनामें दुनु मिथिला अलग अलग राज्याधिकार चाहेछै, जेना वंगाल, पंजाव इत्यादि वंगला देशकें आ पाकिस्तान में सेहो छै । २०. आत्म निर्णय के अधिकार आ मिथिला ः– व्यक्तिगत, जातिगत क्षेत्रगत, राष्ट्रगत रुपमें स्वतन्त्र पहिचानकें साथ राजनीतिक प्रशासनिक निर्णय के अधिकार आत्मनिर्णय के अधिकार अछि । आर्थिक जीवन अपने शैली में संचालन केनाई आत्मनिर्णय के अधिकार क्षेत्र छै, अनुशासित स्वतन्त्रता के अधिकार आत्मनिर्णय के अधिकारके मूल मर्म छै । कोनो व्यक्ति दोसर व्यक्ति पर, कोनो जाति दोसर जाति पर कोनो राष्ट्र दोसर राष्ट्र पर अनाधिकार के प्रयोग कएनाई के पूर्ण नियन्त्रण आत्मनिर्णयक अधिकार कै । क्षेत्रीय, जातीय, राष्ट्रिय दमन, शोषण, शासन, प्रशासन स मुक्ति के अधिकार मात्र आत्म निर्णय के आत्म निर्णायक अधिकार छै । मिथिला एकटा स्वतन्त्र ऐतिहासिक राष्ट्र छलै तै एकरा आत्मनिर्णय के अधिकार छै, जे राजनीतिक सीमा मे प्रशासनिक शासकीय दमन स मुक्त होएक । २१. मिथिला आ जातीय स्वायत्तता ः– सीमित राजनीतिक आर्थिक अधिकार सहित के खास क्षेत्र में खास जाति अर्थात राष्ट्र के प्रादेशिक शासन के जातीय स्वायत्तता कहल जाइछै । ई आत्म निर्णय के अधिकार के अर्ध तथा नियन्त्रित प्रयोग छै । आत्म निर्णय के अधिकार के स्वायत्तता में घेर देनाई आ स्वायत्ततताके जातिगत रुपमें प्रयोग केनाई अव्यवहारिक छै खासक मिश्रित सामाजिक संरचनाके देशमें आ क्षेत्रमें । मिथिला संघीय संरचनामे पूर्ण राज्यधिकार प्रयोग करए चाहैत अछि कोनो केन्द्रीय सत्ता स निर्धारण कएल सीमित अधिकार सहित कें कथित स्वायत्तता नहिं । २२. मिथिला आ दलित आन्दोलन ः– ई हरेक दमन आ उत्पीडन स मूक्ति के युग छै । राजनीतिक आर्थिक शोषण मात्र नहिं, सामाजिक उत्पीडन स मुक्ति के लेल प्रत्येक देश में, प्रत्येक राष्ट्र मे, प्रत्येक समाज में आन्दोलन तीव्र भगेल छै । एकरा समयमे स्वीकार कएनाई प्रत्येक लोकतन्त्रवादीके कर्तव्य छै । सामाजिक न्याय उपलब्ध करबैत राजनीतिक रुपमे प्रत्येक अंग में सम्मानपूर्वक उपस्थित कएनाई राज्य के कर्तव्य छै । मिथिला स्वयं उपेक्षित उत्पीडित अछि । तैं एकरा कतहु के दलित आन्दोलनके हार्दिक समर्थन सहयोग करैत मिथिलाक दलित मुक्तिके आन्दोलन में सामेल होइत, ओकर अगुवाई करैत मिथिला राज्य के स्थापना में गति स अगा बढत । २३. मिथिला आ राजनीतिक दल ः– देशमें वर्तमान में सकृय राजनीतिक दल सभ मे संघीय संरचना के विषयमे स्पष्ट धारणा वाहर नदि आएल अछि । संविधानत ः स्वीकार कएले पर एहि विषय मे पार्टीक संघ विरोधी धारणा बाहर अवैत अछि । संघीय संरचना बनाएब, ताहिमे कपटपूर्ण अभिव्यक्ति अबैत अछि । किछु दल के नीति इ रहि आएल अछि जे सम्पूर्ण मधेश के एकटा राज्यके रुपमे आवक चाही । ई संघीय मान्यता नेपाल मे कतेक व्यवहारिक हेतै ? पौराणिक मिथिला के संशोधनसहित के एकटा राज्य बना कए मधेश में अन्य राज्य सेहो उपयुक्त होएत । हरेक क्षेत्र के आन्दोलित कए समग्र मे मधेश के खसवादी प्रभुत्व स मुक्त कएल जा प्रत्येक दल आ कथित वुद्धिजिवी संघीय संरचना के स्वीकार करैत, मुक्त मधेश के मान्यता दैत मिथिला राज्यके स्थापना मे सहयोग करैक, ईहए संघीय मान्यता अनुकुल हेतै । २४. मिथिला आ महिला आन्दोलन ः– मिथिला सदा नारी के सम्मान करैत आएल अछि । तै नारी अधिकार के कुण्डित नहिं कए सकैअ । महिला अधिकार, महिला सशक्तिकरण द्वारा महिला आन्दोलन के मिथिला आन्दोलन स जोडिक ल जेनाई जरुरी छै । किछ दशक स मिथिलाके महिला के अनावश्यक अन्तरमुखी वनावल गेल छै आ एहि मे नेपालक जडिआएल सामन्ती सामाजिक राजनीतिक व्यवस्थाक खास भूमिका छै । तैं मिथिला के लोकतान्त्रिक राज्य निर्माण मे अधिकार सम्पन्न महिलाके भूमिका अति आवश्यक छै । २५. मिथिला आ कथित पिछडल आ आगा बढल वर्ग ९ द्यबअपधबचम ायच धबचम ० ः– मिथिलाक डोम सेहो सम्पत्तिशाली छल । एकरा साथ अछुत क व्यवहार नहिं छलै । गणराज्यक नायक जनकक कालमे समतामूलक समाजक प्रमाण भेटछ । तथापि मिथिला एकटा देश छल जतए सब जाति जातक बसोबास स्वभाविक छल आ अछि । अखन लोकतान्त्रिक व्यवस्था मे सभ जाति जातके समानुपातिक समावेशीकृत उपस्थिति मिथिला राज्यके प्रत्येक अंग आ निकाय में रहत से घोषित नीति अछि । मिथिला कोनो एकटा जाति के नहिं, कथित उच्च जाति के कथमपि नहिं । योग्यता क्षमता अनुसार समानुपातिक रुपमें सहभागी केनाई आवश्यक अछि । इएह मिथिला निर्माण के आधार रहत । २६. मिथिला आ मानक मैथिली ः – मानव शास्त्री आ भाषा शास्त्रीक अनुसार केव भाषा नहिं बजैअ, सब बोली ९मष्बभिअतक० बजैअ । समरुप बोली के समग्र रुप भाषा होइछ । मुदा जाहि बोलीक बेसी संचार होइछ जाहि बोली मे विशेष रचना प्रकाशित होइछ, जाहि बोली के बेसी पाठक होइछ जाहि बोलीक व्यक्ति सत्ता पर नियन्त्रण करैछ जाहि बोली द्वारा प्रकाशन, न्याय सम्पादन होइछ, जाहि बोलीके विद्धान व्याकरणक रचना करैछ, वएह बोली भाषा बनिक समाजपर प्रभाव पारैत अछि । तै कोनो बोली कथित उच्च वर्गके भए सकैछ, तै ओकरा मानक भाषा बुझनाई ओतेक उचित नहिं आ अइस कोनो जाति के राज्ययन्त्रपर नियन्त्रण के शंका केनाई उचित नहि । तै मिथिला में वर्तमान में वाजए जाए बाला प्रत्येक बोली के सम्मान करत, सभ भाषाके सम्मानकरत आ वहु भाषिक नीति राखि राज्य संचालन करत । २७. मिथिला राज्य स्थापना के लेल नीतिगत कार्यक्रम ः– (क) जनता, लोकतन्त्र, मानवअधिकार के विरोधी, जाति, भाषाक अधिकार के प्रधान शत्रु राजतन्त्र अछि । तै जनताके मित्र शक्ति लोकतन्त्रवादी, मानव अधिकारवादी, कानूनी राज्यक पक्षधर आदि शक्ति आ संगठन स मिलक गणतन्त्र लएवाक लेल अथक संघर्ष आवश्यक छै । (ख) प्रत्येक जाति, जनजाति, आदिवासी, दलित उत्पीडित वर्ग पिछडल वर्ग, अल्प संख्यक जाति, मानव अधिकरावादी सबस मिलक, संघीय संरचना केल कठोर संघर्ष आवश्यक अछि । (ग) मधेशक प्रत्येक जाति, जनजाति, भाषा भाषीक समुह, महिला मुस्लिम सभके साथ कार्यगत एकता करैत खस सत्ता स सम्पूर्ण मधेश के मुक्त कएनाई बेसी आवश्यक छै । (घ) संघीय संरचनाक मर्म, भावना अनुसार मधेशमे आत्म निर्णायक आधार पर मिथिला क्षेत्रक प्रत्येक वर्ग के आन्दोलित कए मिथिला राज्यके लेल सहमति जुटएनाय आवश्यक अछि । २८. कार्यदिशा ः– १. संघीय संरचना विना मुक्त मधेशक कल्पना तथा मुक्त मधेश विना मिथिला राज्यक कल्पना असम्भव होएत से बुझि चेतना मूलक कार्यक्रम सम्पूर्ण मधेशमे आवश्यक अछि । २. खस सत्ता वर्गिय समुदाय के दिमाग स ई भय हटैनाई जरुरी छै आ चेतना देनाई जरुरी छै जे कोनो जाति, भाषा के संरक्षण, सम्मान संघीय संरचनामे मात्र संभव छै । जन अधिकार सम्पन्न लोकतन्त्र संघीय संरचनामे मात्र संभव छै । ३. कोनो सत्ता, दलीय सरकारक निरंकुशता के न्यून करवाक लेल संघीय संरचना मात्र आधार छै । ४. संघीय शासन प्रणाली सं देश खण्डित नहिं होइछ । अर्थात संघीय शासन देश के विखण्डन स बचवैत अछि । अर्थात् संघीय संरचना विखण्डनवाद के स्थायी समाधान अछि । २९. मिथिला राज्य निर्माण वाधक चिन्तन ः– अन्तरिक १(क) मिथिला के लेल कोनो राजनीतिक संगठन नहि अछि । आ एहके लेल कोनो संघर्ष नहिं अछि । (ख) भाषा संस्कृति करे लेल कोनो एकिकृत संगठन नहि अछि । (ग) कोनो स्थापित नेतृत्व नहिं अछि । (घ) भाषा, संस्कृति के आन्दोलन के लोकतान्त्रिक आन्दोलन, मानव अधिकार वादी आन्दोलन स जोडक, लएजवाक चिन्तन या प्रयास नहिं अछि । (ङ) एहिके लेल किछ भ रहल आन्दोलन, वौद्धिक व्यक्तित्व सभक मात्र अछि, जिनकामे स्वाभिमान कम, अहंकार वेसी, संयोजन करवाक क्षमता कम फुट करवाक क्षमता वेसी छन्हि । वाह्य (क) खस जाति समग्र संघ के विरोधी चिन्तन रखैत अछि अपना के सदा केन्द्रीय सत्ताके भागी बुझैछथि आ नेपाल के अपन पुर्खा के अर्जन सम्पत्ति बुझै छथि । (ख) समग्र मधेश एकराज्यक नारामे सत्ताधारी वर्ग विखण्डन के गंध देखैत अछि आ मिथिला तथा संघीय संरचना के विरुद्ध सोचेत अछि । (ग) संघीय आन्दोलन के नेतृत्व कएनिहार, दल या व्यक्ति के हिन्दी भाषा प्रति आसक्ति स मातृभाषा प्रेमी विचकैत छथि आ खसवादी सेहो एहिमे किछु रहस्मय दुर्गन्ध सुंधवाक प्रयास करैत अछि । निश्कर्ष ः– नेपाल के सत्ताधारी, वर्ग संकट के घडि स गुजरि रहल अछि । देश अखन अधिकार प्राप्तिकँ नयाँ मोडपर ठाढ अछि । अधिकार स वंचित उत्पीडित वर्ग, जाति आन्दोलनमे कुद पडल अछि । संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र माग एकर अचूक औषधि छेक । प्रत्येक प्रभुसत्तावादी सामन्ती चिन्तन एहि आन्दोलन के पाछा धकेल चाहैत अछि आ आन्दोलन ओकरा किनार पर खसवैत आगा बढि रहल अछि । आउ, समाजक स भ वर्ग, आन्दोलन मे भाग लिअ आ नैसर्गिक अधिकार स्थापित करु । शीतल झा-जनकपुर सन्दर्भ सामाग्री ः– (क) संविधानसभा, संघीय संरचना, मिथिला राज – अवधारण १– शीतल झा ख) संघीय स्वशासन तिर ...............वृषेश चन्द्र लाल (ग) संघीय शासन व्यवस्थाको आधारमा राज्यको पुन ः संरचना – अमरेश नारायण झा (घ) मूल्यांकन मासिक । Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

44 4 4 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना धीरेन्द्र प्रेमर्षि (१९६७- )मैथिली भाषा, साहित्य, कला, संस्कृति आदि विभिन्न क्षेत्रक काजमे समान रूपेँ निरन्तर सक्रिय व्यक्तिक रूपमे चिन्हल जाइत छथि धीरेन्द्र प्रेमर्षि। वि.सं.२०२४ साल भादब १८ गते सिरहा जिलाक गोविन्दपुर-१, बस्तीपुर गाममे जन्म लेनिहार प्रेमर्षिक पूर्ण नाम धीरेन्द्र झा छियनि। सरल आ सुस्पष्ट भाषा-शैलीमे लिखनिहार प्रेमर्षि कथा, कविताक अतिरिक्त लेख, निबन्ध, अनुवाद आ पत्रकारिताक माध्यमसँ मैथिली आ नेपाली दुनू भाषाक क्षेत्रमे सुपरिचित छथि। नेपालक स्कूली कक्षा १,२,३,४,९ आ १०क ऐच्छिक मैथिली तथा १० कक्षाक ऐच्छिक हिन्दी विषयक पाठ्यपुस्तकक लेखन सेहो कएने छथि। साहित्यिक ग्रन्थमे हिनक एक सम्पादित आ एक अनूदित कृति प्रकाशित छनि। प्रेमर्षि लेखनक अतिरिक्त सङ्गीत, अभिनय आ समाचार-वाचन क्षेत्रसँ सेहो सम्बद्ध छथि। नेपालक पहिल मैथिली टेलिफिल्म मिथिलाक व्यथा आ ऐतिहासिक मैथिली टेलिश्रृङ्खला महाकवि विद्यापति सहित अनेको नाटकमे अभिनय आ निर्देशन कऽ चुकल प्रेमर्षिकेँ नेपालसँ पहिलबेर मैथिली गीतक कैसेट कलियुगी दुनिया निकालबाक श्रेय सेहो जाइत छनि। हिनक स्वर सङ्गीतमे आधा दर्जनसँ अधिक कैसेट एलबम बाहर भऽ चुकल अछि। कान्तिपुरसँ हेल्लो मिथिला कार्यक्रम प्रस्तुत कर्ता जोड़ी रूपा-धीरेन्द्रक धीरेन्द्रक अबाज गामक बच्चा-बच्चा चिन्हैत अछि। “पल्लव” मैथिली साहित्यिक पत्रिका आ “समाज” मैथिली सामाजिक पत्रिकाक सम्पादन। मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना-धीरेन्द्र प्रेमर्षि रूप-रङ्ग एवं चालि-प्रकृति देखलापर गीत आ गजल दुनू सहोदरे बुझाइत छैक। मुदा मैथिलीमे गीत अति प्राचीन काव्यशैलीक रूपमे चलैत आएल अछि, जखन कि गजल अपेक्षाकृत अत्यन्त नवीन रूपमे। एखन दुनूकेँ एकठाम देखलापर एना लगैत छैक जेना गीत-गजल कोनो कुम्भक मेलामे एक-दोसरासँ बिछुड़ि गेल छल। मेलामे भोतिआइत-भासैत गजल अरबदिस पहुँचि गेल। गजल ओम्हरे पलल-बढ़ल आ जखन बेस जुआन भऽ गेल तँ अपन बिछुड़ल सहोदरकेँ तकैत गीतक गाम मिथिलाधरि सेहो पहुँचि गेल। जखन दुनूक भेट भेलैक तँ किछु समय दुनूमे अपरिचयक अवस्था बनल रहलैक। मिथिलाक माटिमे पोसाएल गीत एकरा अपन जगह कब्जा करऽ आएल प्रतिद्वन्दीक रूपमे सेहो देखलक। मुदा जखन दुनू एक-दोसराकेँ लगसँ हियाकऽ देखलक तखन बुझबामे अएलैक-आहि रे बा, हमरासभमे एना बैर किएक, हम दुनू तँ सहोदरे छी! तकरा बाद मिथिलाक धरतीपर डेगसँ डेग मिला दुनू पूर्ण भ्रातृत्व भावेँ निरन्तर आगाँ बढ़ैत रहल अछि। गीत आ गजलक स्वरूप देखलापर दुनूक स्वभावमे अपन पोसुआ जगहक स्थानीयताक असरि पूरापूर देखबामे अबैत अछि। गीत एना लगैत छैक जेना रङ्गबिरङ्गी फूलकेँ सैँतिकऽ सजाओल सेजौट हो। मिथिलाक गीतमे काँटोसन बात जँ कहल जाइछ तँ फूलेसन मोलायम भावमे। एकरा हम एहू तरहेँ कहि सकैत छी जे गीत फूलक लतमारापर चलबैत लोककेँ भावक ऊँचाइधरि पहुँचबैत अछि। एहिमे मिथिलाक लोकव्यवहार एवं मानवीय भाव प्रमुख भूमिका निर्वाह करैत आएल अछि। जाहि भाषाक गारियोमे रिदम आ मधुरता होइत छैक, ओहि भूमिपर पोसाएल गीतक स्वरूप कटाह-धराह भइए नहि सकैत अछि। कही जे गीतमे तँ लालीगुराँसक फूलजकाँ ओ ताकत विद्यमान छैक जे माछ खाइत काल जँ गऽरमे काँट अटकि गेल तँ तकरो गलाकऽ समाप्त कऽ दैत छैक। गजलक बगय-बानि देखबामे भलहि गीतेजकाँ सुरेबगर लगैक, एहिमे गीतसन नरमाहटि नहि होइत छैक। उसराह मरुभूमिमे पोसाएल भेलाक कारणे गजलक स्वभाव किछु उस्सठ होइत छैक। ई कट्टर इस्लामीसभक सङ्गतिमे बेसी रहल अछि, तेँ एकर स्वभावमे “जब कुछ न चलेगी तो ये तलवार चलेगा” सन तेज तेवरबेसी देखबामे अबैत छैक। यद्यपि गजलकेँ प्रेमक अभिव्यक्तिक सशक्त माध्यम मानल जाइत छैक। गजल कहितहिँदेरी लोकक मन-मस्तिष्कमे प्रेममय माहौल नाचि उठैत छैक, एहि बातसँ हम कतहु असहमत नहि छी। मुदा गजलमे प्रेमक बात सेहो बेस धरगर अन्दाजमे कहल जाइत छैक। कहबाक तात्पर्य जे गजल तरुआरिजकाँ सीधे बेध दैत छैक लक्ष्यकेँ। लाइलपटमे बेसी नहि रहैत छैक गजल। मिथिलाक सन्दर्भमे गीत आ गजलक एक्कहि तरहेँ जँ अन्तर देखबऽ चाही तँ ई कहल जा सकैत अछि जे गजल फूलक प्रक्षेपणपर्यन्त तरुआरिजकाँ करैत अछि, जखन कि गीत तरुआरि सेहो फूलजकाँ भँजैत अछि। मैथिलीमे संख्यात्मक रूपेँ गजल आनहि विधाजकाँ भलहि कम लिखल जाइत रहल हो, मुदा गुणवत्ताक दृष्टिएँ ई हिन्दी वा नेपाली गजलसँ कतहु कनेको झूस नहि देखबामे अबैत अछि। एकर कारण इहो भऽ सकैत छैक जे हिन्दी, नेपाली आ मैथिली तीनू भाषामे गजलक प्रवेश एक्कहि मुहूर्त्तमे भेल छैक। गजलक श्रीगणेश करौनिहार हिन्दीक भारतेन्दु, नेपालीक मोतीराम भट्ट आ मैथिलीक पं. जीवन झा एक्कहि कालखण्डक स्रष्टासभ छथि। मैथिलीयोमे गजल आब एतबा लिखल जा चुकल अछि जे एकर संरचनाक मादे किछु कहनाइ दिनहिमे डिबिया बारबजकाँ लगैत अछि। एहनोमे यदाकदा गजलक नामपर किछु एहनो पाँतिसभ पत्रपत्रिकामे अभरि जाइत अछि, जकरा देखलापर मोन किछु झुझुआन भइए जाइत छैक। कतेकोगोटेक रचना देखलापर एहनो बुझाइत अछि, जेना ओलोकनि दू-दू पाँतिवला तुकबन्दीक एकटा समूहकेँ गजल बूझैत छथि। हमरा जनैत ओलोकनि गजलकेँ दूरेसँ देखिकऽ ओहिमे अपन पाण्डित्य छाँटब शुरू कऽ दैत छथि। जँ मैथिली साहित्यक गुणधर्मकेँ आत्मसात कऽ चलैत कोनो व्यक्ति एकबेर दू-चारिटा गजल ढङ्गसँ देखि लिअए, तँ हमरा जनैत ओकरामे गजलक संरचनाप्रति कोनो तरहक द्विविधा नहि रहि जएतैक। तेँ सामान्यतः गजलक सम्बन्धमे नव जिज्ञासुक लेल जँ किछु कहल जाए तँ विना कोनो पारिभाषिक शब्दक प्रयोग कएने हम एहि तरहेँ अपन विचार राखऽ चाहैत छी- गजलक पहिल दू पाँतिक अन्त्यानुप्रास मिलल रहैत छैक। अन्तिम एक, दू वा अधिक शब्द सभ पाँतिमे सझिया रहलहुपर साझी शब्दसँ पहिनुक शब्दमेअनुप्रास वा कही तुकबन्दी मिलल रहबाक चाही। अन्य दू-दू पाँतिमे पहिल पाँति अनुप्रासक दृष्टिएँ स्वच्छन्द रहैत अछि। मुदा दोसर पाँति वा कही जे पछिला पाँति स्थायीवला अनुप्रासकेँ पछुअबैत चलैत छैक। ई तँ भेल गजलक मुह-कानक संरचनासम्बन्धी बात। मुदा खालि मुहे-कानपर ध्यान देल जाए आ ओकर कथ्य जँ गोङिआइत वा बौआइत रहि जाए तँ देखबामे गजल लगितो यथार्थमे ओ गीजल भऽ जाइत अछि। तेँ प्रस्तुतिकरणमे किछु रहस्य, किछु रोमाञ्चक सङ्ग समधानल चोटजकाँ गजलक शब्दसभ ताल-मात्राक प्रवाहमय साँचमे खचाखच बैसैत चलि जएबाक चाही। गजलक पाँतिकेँ अर्थवत्ताक हिसाबेँ जँ देखल जाए तँ कहि सकैत छी जे हऽरक सिराउरजकाँ ई चलैत चलि जाइत छैक। हऽरक पहिल सिराउर जाहि तरहेँ धरतीक छाती चीरिकऽ ओहिमे कोनो चीज जनमाओल जा सकबाक आधार प्रदान करैत छैक, तहिना गजलक पहिल पाँति कल्पना वा विषयवस्तुक उठान करैत अछि, दोसर पाँति हऽरक दोसर सिराउरक कार्यशैलीक अनुकरण करैत पहिलमे खसाओल बीजकेँ आवश्यक मात्रमे तोपन दऽकऽ पुनः आगू बढ़बाक मार्ग प्रशस्त्र करैत अछि। गजलक प्रत्येक दू-पाँति अपनहुमे स्वतन्त्र रहैत अछि आ एक-दोसराक सङ्ग तादात्म्य स्थापित करैत समग्रमे सेहो एकटा विशिष्ट अर्थ दैत अछि। एकरा दोसर तरहेँ एहुना कहल जा सकैत अछि जे गजलक पहिल पाँति कनसारसँ निकालल लालोलाल लोह रहैत अछि, दोसर पाँति ओकरा निर्दिष्ट आकारदिस बढ़एबाक लेल पड़ऽ वला घनक समधानल चोट भेल करैत अछि। गीतक सृजनमे सिद्धहस्त मैथिलसभ थोड़े बगय-बानि बुझितहिँ आसानीसँ गजलक सृजन करऽ लगैत छथि। सम्भवतः तेँ आरसीप्रसाद सिंह, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, डॉ महेन्द्र, मार्कण्डेय प्रवासी, डॉ. गङ्गेश गुञ्जन, डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र आदि मूलतः गीत क्षेत्रक व्यक्तित्व रहितहु गजलमे सेहो कलम चलौलनि। ओहन सिद्धहस्त व्यक्तिसभक लेल हमर ई गजल लिखबाक तौर-तरिकाक मादे किछु कहब हास्यास्पद भऽ सकैत अछि, मुदा नवसिखुआसभकेँ भरिसक ई किछु सहज बुझाइक। मैथिलीमेकलम चलौनिहारसभमध्य प्रायः सभ एक-आध हाथ गजलोमे अजमबैत पाओल गेलाह अछि। जनकवि वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” सेहो “भगवान हमर ई मिथिला” शीर्षक कविता पूर्णतः गजलक संरचनामे लिखने छथि। मुदा सियाराम झा “सरस”, स्व. कलानन्द भट्ट, डॉ.राजेन्द्र विमल सन किछु साहित्यकार खाँटी गजलकारक रूपमे चिन्हल जाइत छथि। ओना सोमदेव, डॉ.केदारनाथ लाभ, डॉ.तारानन्द वियोगी, डॉ.रामचैतन्य धीरज, बाबा वैद्यनाथ, डॉ. विभूति आनन्द, डा.धीरेन्द्र धीर, फजलुर्रहमान हाशमी, रमेश, बैकुण्ठ विदेह, डा.रामदेव झा, रोशन जनकपुरी, पं. नित्यानन्द मिश्र, देवशङ्कर नवीन, श्यामसुन्दर शशि, जनार्दन ललन, जियाउर्ररहमान जाफरी, अजितकुमार आजाद, अशोक दत्त आदिसमेत कतेको स्रष्टाक गजल मैथिली गजल-संसारकेँ विस्तृति दैत आएल अछि। गजलमे महिला हस्ताक्षर बहुत कम देखल जाइत अछि। मैथिली विकास मञ्चद्वारा बहराइत पल्लवक पूर्णाङ्क १५, २०५१ चैतक अङ्क गजल अङ्कक रूपमे बहराएल अछि। सम्भवतः ३४ गोट अलग-अलग गजलकारक एकठाम भेल समायोजनक ई पहिल वानगी हएत। एहि अङ्कमे डा. शेफालिका वर्मा एक मात्र महिला हस्ताक्षरक रूपमे गजलक सङ्ग प्रस्तुत भेलीह अछि। एही अङ्कक आधारपर नेपालीमे मैथिली गजल सम्बन्धी दूगोट समालोचनात्मक आलेख सेहो लिखाएल अछि। पहिल मनु ब्राजाकीद्वारा कान्तिपुर २०५२ जेठ २७ गतेक अङ्कमे आ दोसर डा. रामदयाल राकेशद्वारा गोरखापत्र २०५२ फागुन २६ गतेक अङ्कमे। छिटफुट आनहु गजल सङ्कलन बहराएल होएत, मुदा तकर जानकारी एहि लेखककेँ नहि छैक। हँ, सियाराम झा “सरस”क सम्पादनमे बहराएल “लोकवेद आ लालकिला” मैथिली गजलक गन्तव्य आ स्वरूप दऽ बहुत किछु फरिछाकऽ कहैत पाओल गेल अछि। एहिमे सरससहित तारानन्द वियोगी आ देवशङ्कर नवीनद्वारा प्रस्तुत गजलसम्बन्धी आलेख सेहो मैथिली गजलक तत्कालीन अवस्थाधरिक साङ्गोपाङ्ग चित्र प्रस्तुत करबामे सफल भेल अछि। समग्रमे मैथिली गजलक विषयमे ई कहि सकैत छी जे मैथिली गीतक खेतसँ प्राप्त हलगर माटिमे गुणवत्ताक दृष्टिएँ मैथिली गजल निरन्तर बढ़िरहल अछि, बढ़िएरहल अछि। गजल १ झुट्ठो जे नहि डाइन नचौलक ओ भगता ओ धामी की एको गाम जँ डाहि ने सकलहुँ तँ ओढ़ने रमनामी की अक्षत-चानन धूप-दीपसँ जतऽ यज्ञ सम्पूर्ण हुअए- ततऽ जँ क्यो हड्डी रगड़ैए, ओ कामी ओ कलामी की बाप-माएपर्यन्त परोसै स्नेह जखन बटखारासँ- नकली सभक दुलार लगैए, से काकी, से मामी की सोनित सेहो शराब बनै छै शासनकेर सनकी भट्ठी दियौ घटाघटि जे भेटए से, फुसियाही की दामी की पोखरिक रखबारी पएबालए कण्ठी खालि बान्हि लिअ फेर गटागटि घोँटने चलियौ, से पोठिया से बामी की पाग उतारिकऽ कूदि गेल “प्रेमर्षि” सेहो अखाड़ामे ढाहि सकल ने जुल्म-इमारत करतै ओहन सुनामी की (वि.२०६२/०५/३०) गजल २ मोन जँ कारी अछि तँ चमड़ी गोरे की करतै? ममते जँ अरुआएल तँ माएक कोरे की करतै? गगनसँ उतरै मेघ नयनमे जखन साँचिकऽ शङ्का केहनो अन्हार चीरिकऽ जनमल भोरे की करतै? नीम पीबिकऽ माहुर सेहो पचाबैत आएल छी तँ काँटकेँ धाङैत डेगकेँ थोड़े अङोरे की करतै? घामक सिँचल धरती छोड़ि ने जकरा कतौ भरोसा तकरा लेल बनसीक सुअदगर बोरे की करतै? आगि पीबिकऽ बज्र बनौने छै जे अप्पन छाती तकरा आगाँ गोहिया आँखिक नोरे की करतै? तैयो लागल “प्रेमर्षि” अछि बस प्रेमक खेतीमे प्रेमक धन भेल घरमे जाबिड़ चोरे की करतै? (वि.२०६२/०५/२०) शुभकामना दिआबातीक- धीरेन्द्र प्रेमर्षि चमकैत दीपकेँ देखिकऽ जेना झुण्ड कीड़ा-मकोड़ा कऽ दैछ न्यौछावर अपन अस्तित्व दुर्गुण वा खलतत्त्वरूपी कीड़ा-मकोड़ाकेँ नष्ट करबाक लेल चाही ने आओर किछु अपना भीतरक मानवीय इजोतक टेमी कने आओर उसका ली अपनाकेँ सभक मन-मनमे मुसका ली इएह अछि शुभकामना दिआबातीक- देहरि दीप जरए ने जरए मनधरि सदति रहए झिलमिल किएक तँ अपना मात्र इजोतमे रहने मेटा नहि सकैछ संसारसँ अन्हार

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् महेन्द्र मलंगिया : मैथिलीक सुपरिचित नाटककार,  रंग निर्देशक  एवं मैलोरंगक संस्थापक अध्यक्ष । लोक साहित्य पर गंभीर शोध आलेख । मैथिलीमे 13टा नाटक, 19टा एकांकी, 14टा नुक्कड़ आ 10टा रेडियो नाटक प्रकाशित आ आकाशवाणी सँ प्रसारित । सीनियर फेलोशिप (भारत सरकार), इंटरनेशनल थिएटर इंस्टिच्यूट (नेपाल), प्रबोध साहित्य सम्मान आदि सँ सम्मानित । संप्रति ज्योतिरीश्वर लिखित  मैथिलीक प्रथम पुस्तक वर्णरत्नाकर पर शोध कार्य । श्री महेन्द्र मलगियाक जन्म २० जनबरी १९४६ मे मधुबनी जिलाक मलंगिया गाममे भेलन्हि। मलंगियाजी मैथिली हिन्दी, अंग्रेजी आ नेपाली भाषाक जानकार आ थियेटर शिक्षण, पटकथा लेखन आ तत्सम्बन्धी शोधक फ्रीलान्स शिक्षक छथि। सम्मान, उपाधि आ पुरस्कार: २००६(सीनियर फ़ेलो, मानव ससाधन विकास विभाग, भारत सरकार), २००५ ई. मे मैथिली भाषाक सर्वाधिक प्रतिष्ठित प्रबोध सम्मान, उनाप सम्मान, परवाहा (उवा नाट्य परिषद, परवाहा), भानु कला पुरस्कार (कला जानकी संस्थान, जनकपुर), २००४- पाटलिपुत्र पुरस्कार ( प्रांगन थिएटर, पटना), इप्टा पुरस्कार (कटिहार इप्टा, कटिहार), २००३- गोपीनाथ आर्यल पुरस्कार (इन्टरनेशनल थिएटर इन्स्टीट्यूट, नेपाल), यात्री चेतना पुरस्कार (चेतना समिति, पटना), बैद्यनाथ सियादेवी पुरस्कार (बी.एस.डी.पी. काठमाण्डू), २०००- चेतना समिति सम्मान (चेतना समिति, पटना), जिला विकास धनुषा साहित्य पुरस्कार (जिला विकास समिति, जनकपुर), १९९९- विद्यापति सेवा संस्थान सम्मान (विद्यापति सेवा संस्थान सम्मान, दरभंगा), १९९८- रंग रत्न उपाधि (अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली साहित्य परिषद, राँची), १९९७- सर्वोत्तम निर्देशक पुरस्कार (सांस्कृतिक संस्थान, काठमाण्डू), १९९१- भानु कला पुरस्कार, विराटनगर (भानु कला परिषद, बिराटनगर),१९९०- सर्वनाम पुरस्कार (सर्वनाम समिति, काठमाण्डू), १९८५- आरोहण सम्मान, काठमाण्डू, १९८३- वैदेही पुरस्कार (विद्यापति स्मारक समिति, राँची), शोध कार्य: सलहेस: एकटा ऐतिहासिक अध्ययन, विरहा: मिथिलाक एकटा लोकरूप, सामा चकेबा: लोकनाट्यक एक अवलोकन, सलहेसक काल निर्धारण, व्इद्यापतिक उगना, शिवक गण, मधुबनी एकटा नगर अछि, हम जनकपुर छी, ई जनकपुर अछि। हिनकर दू टा पोथी “ओकरा आँगनक बारहमासा” आ “काठक लोक” ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगाक मैथिली पाठ्यक्रममे अछि। हिनकर दू टा पोथी त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमाण्डू केर एम.ए. पाठ्यक्रममे अछि। हिनकर कैकटा आलेख आ किताब सेकेण्डरी आ हायर सेकेण्डरी पाठ्यक्रममे अछि। प्रकाशित पोथी: नाटक: ओकरा आँगनक बारहमासा, जुआयल कंकनी, गाम नञि सुतय, काठक लोक, ओरिजनल काम, राजा सलहेस, कमला कातक राम, लक्ष्मण आ सीता, लक्ष्मण रेखा खण्डित, एक कमल नोरमे, पूष जाड़ कि माघ जाड़, खिच्चड़ि, छुतहा घैल, ओ खाली मुँह देखै छै। ई सभटा कैक बेर आ कैक ठाम खेलाएल गेल अछि। एकाङ्की: टूटल तागक एकटा ओर, लेवराह आन्हरमे एकटा इजोत, गोनूक गबाह, हमरो जे साम्ब भैया, “बिरजू, बिलटू आओर बाबू”, मामा सावधान, देहपर कोठी खसा दिअ, नसबन्दी, आलूक बोरी, भूतहा घर, प्रेत चाहे असौच, फोनक करामात, एकटा बताहि आयल छलय, मालिक सभ चल गेलाह, भाषणक दोकान, फगुआ आयोजन आ भाषण, भूत, एक टुकड़ा पाप, मुहक कात, प्राण बचाबह सीता राम, ओ खाली घैल फोड़य छै। ई सभटा मंचित भऽ चुकल अछि। २५ टा चौबटिया नाटक: चक्रव्युह, लटर पटर अहाँ बन्द करू, बाढ़ि फेर औतय, एक घर कानन एक घर गीत, सेर पर सवा सेर, ई गुर खेने कान छेदेने, आब कहू मन केहेन लगैए, नव घर, हमर बौआ स्कूल जेतए, बेचना गेलए बीतमोहना गबए गीत, मोड़ पर, ककर लाल आदि। ई सभटा चौबटिया वीथीपर खेलायल गेल अछि। ११ टा रेडियो नाटक: आलूक बोरी, ई जनम हम व्यर्थ गमाओल, नाकक पूरा, फटफटिया काका आदि। ई सभटा टा पटना, दरभंगा आ नेपालक रेडियो स्टेशनसँ प्रसारित भेल अछि। सम्पादन: मैथिली एकाङ्की (साहित्य अकादमी, नई दिल्ली), विदेहक नगरीसँ (कविता संग्रह), मैथिली भाषा पुस्तक (सेकेण्डरी स्कूल पोथी), लोकवेद (मैथिली पत्रिका)। कथा: प्रह्लाद जड़ि गेल, धार, एक दिनक जिनगी, बनैया सुगा, बालूक भीत, बुलबुल्ला आदि। लघुकथा: डपोरशंख, मुहचिड़ा आदि। सदस्यता: अध्यक्ष, मैथिली लोक रंग, सदस्य कार्यकारी बोर्ड, मिनाप, जनकपुर, यात्री मधुबनी, मिथिला सांस्कृतिक मंच, मधुबनी। राष्ट्रीय आ अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार सभमे सहभागिता। प्रकाश चन्द्र झा : मैथिली रंगकर्ममे थ्री-इन-वन- महेन्द्र मलंगिया

55 5 5 प्रकाश झा १९७५ ई. मे हम जुआयल कनकनी नामक एकटा नाटक लिखने रही, जे ओही साल प्रकाशित भेल रहय । एहि नाटकक प्रसंगमे मैथिलीक सुप्रसिद्ध साहित्यकार जीवकांतजी अपन प्रतिक्रिया व्यक्त करैत लिखने रहथि – मलंगियाजी, मिथिलांचलमे एखन ओहन अभिनेता नहि जन्म लेलक अछि, जे एकर तेजकेँ सम्हारि सकत । ई बात हम अपनहुँ महसूस कएने रही आ तहिए सँ हमर आँखि एहि बातक खोज करैत रहल, जे ओहि नाटकक अनुरूप कोनो अभिनेता भेटितए । ओना मिथिलांचलमे अभिनेताक कमी नहि रहलैक अछि, मुदा सभक जिनगी अल्पकालीन । किएक तँ एहिठाम एकरा टाइमपासक रूपमे देखैत अछि । तेँ जहाँ कतहु नोकरी भेटि गेलैक कि ओ रंगकर्म केँ तिलांजली द’ दैत अछि । दोसर कोनो गार्जियन ई नहि चाहैत छैक, जे हमर बेटा रंगमंचसँ जुड़ल रहय । किएक तँ मैथिली रंगमंच केँ ओ सामर्थ्य नहि छैक जे ओकरा रोजी – रोटी द’ सकतै । तेँ रंगमंच के छोड़’ बाला नाम अनगिनत अछि आ जुटल रह’ बाला नाम आँगुरे पर गनल । एहन आँगुरेपर गन’ बाला नाम अछि – अभिषेक, चन्द्रशेखर, मुकुल, संतोष ( मधुबनीसँ ), रवीन्द्र, ओमप्रकाश, रंजू, प्रियंका ( जनकपुरसँ ), संजीव, किशोर केशव, गुड़िया, स्वाति, जितेन्द्रनाथ, प्रियंका ( पटनासँ ), मुकेश, उत्पल, प्रकाश, ज्योति, जीतू, कमल, दुर्गेश, भास्करानंद ( दिल्लीसँ ) आदि । एहि सभमे  प्रकाश कहिया हमरा भेटल - स्मरण नहि अछि, मुदा एतेक धरि अवश्य स्मरण अछि, जे ओ कहने रहय- “सर, हमर घर घोंघौर अछि आ हम आर. के. कॉलेज मधुबनी में पढैत छी” । “ कोन कक्षामे ?” “ बी.एस सी.क फर्स्ट पार्टमे ” । हमरा दिससँ कोनो प्रतिक्रिया नहि अएबाक कारणें किछु कालक बाद पुन: बाजल – “ हम नाटकसँ सेहो जुड़ल छी ” । “ कोन संस्थासँ ?” “ मधुबनी इप्टासँ ” “ बहुत खुशीक बात ” प्रकाश कोन अपेक्षा ल’ क’ हमरा लग आएल रहय से ओ ने कहि पओलक आ ने हम बूझि सकलिऎ । मुदा, एतेक अवश्य जानकारी भेटैत रहल जे नुक्कड़ नाटककेँ मधुबनी जिलामे बहुत लोकप्रिय बना देलक अछि । एक्केटा बिजुलिया भौजीक पचासटा शो कएलक अछि आ सभमे एकर अनिवार्य सहभागिता छैक । मुदा, ई हमर दुर्भाग्य रहल जे एकर एकोटा शो हम नइ देख सकलिऎ । तथापि एतेक विश्वास भैए गेल जे नाटकक प्रति एकर लगन बेजोड़ छैक । हमहूँ रहबे कएलहुँ आ इहो नाटक करिते रहल आ तखन जँ मंच पर भेट नइ होइतए तँ इहो असंभवे बाला बात भ’ जइतै । से भेलैक नहि, एकरासँ मंचपर भेट भैए गेल, मुदा कहिया से स्मरण नहि अछि । हँ, एतेक अवश्य स्मरण अछि जे  प्राय: 1995 ई. मे मिथिला सांस्कृतिक पर्व समारोहक अवसर पर हमरे नाटक ओरिजनल कामक मंचन नगर भवन, मधुबनीमे होइत रहय । हमहूँ आमंत्रित रही । जाहि मे दरोगाक भूमिका प्रकाशे केने छल । ओहि नाटकमे ई प्रशंसाक पात्र बनल रहय जकर उल्लेख दैनिक जागरण आ दैनिक हिन्दुस्तान सेहो कएने रहैक । किछु दिनक बाद गाम नइ सुतैए’क मंचन देखलियैक ओहो मे गामक तीनटा बिगड़ल युवकमे सँ एकटा बिगड़ल युवकक भूमिका यैह कएने छल । ओही दुनू मे कयलगेल अभिनयक बदैलत ई हमरो मोन मे बैसि गेल । बादमे बिहार सरकार युवा मंत्रालय, पटना दिस सँ आयोजित कार्यक्रम मे एक बेर फेर हमरे लिखल नाटक हमरो जे साम भैयाक मंचन नगर भवन, मधुबनीमे होइत रहय । हमहूँ आमंत्रित रही । जाहि मे चारुवक्य के भूमिका मे प्रकाश रहै ।  मंचपर एकरा देखलाक बाद हमरा बड़ अपसोच भेल रहय जे जीवकांतजी एहिठाम नइ छथि । ओ जँ आइ एहिठाम रहितथि तँ एकर अभिनय देखिक’ निश्चित अपन बात घुरा लितथि जे ‘मिथिलांचलमे एखन ओहन अभिनेता नहि जन्म लेलक अछि’ । बहुत विलक्षण आ मुग्ध कर’ बाला अभिनय कएने रहएअ । तेँ हमरा कह’ पड़ल जे  चारुवक्य के भूमिका एहन दोसर नइ क’ सकैए । एकर बाद करगिल समस्यापर आधारित नाटक दुलहा पागल भ’ गैलै मे सेहो अभिनय कएलक जे हम नइ देख सकलिऎक । हँ, मधुबनीक डिप्टी कलक्टर श्री दीपनारायण सिंह जी सँ जखन बात भेल तँ कहलनि जे खासक’ प्रकाशचन्द्र बड्ड नीक अभिनय कएने छल । ओना एहि बातक घमर्थन कखनो-कखनो उठिए जाइत अछि जे अभिनेता तँ निर्देशकक हाथक कठपुतली होइत अछि । ओकरा जेना-जेना निर्देशक कहैत छैक तेना-तेना ओ मंचपर करैत अछि । जँ इएह बात सत्य छैक तँ एक्केटा भूमिका जखन दू आदमी करैत अछि तखन किएक ककरो नीक आ ककरो बेजाए भ’ जाइत छैक ? एहि आधार पर तँ सृजनात्मक प्रतिभा अपन होइत छैक से मानहिटा पड़त । आ  तेँ ओ ओहन चारुवक्य क सृजन कएने रहय । फेर 2005 ई. मे रामाननद युवा क्लब, जनकपुर धाम ( नेपाल ) द्वारा आयोजित नाट्य समारोह मे नेपालक अतिरिक्त कोलकाता , दिल्ली, दरभंगा आ मधुबनीक टीमसभ भाग लेने छल । मधुबनीक यात्री संस्था , दिल्लीक यात्री संस्थाक रूप मे प्रवेश पओने छल । कारण , ओहि समयमे अधिकांश यात्रीक अभिनेतासभ दिल्लीए मे रहैत छल तेँ किछुए नवकेँ समावेश कर’ पड़लै आ काश्यप कमलक नाटक गोरखधंधा तैयार भ’ गेलै । एहि नाटक मे ओ सूत्रधारक भूमिका कएने रहय जे काफी चर्चित रहलै । मैथिली रंग जगतमे नव पीढीक कतेको लोक छथि, जे लगातार काज क’ रहल छथि मुदा, ओहि जमातमे प्रकाश कतेको कारणे सभहक ध्यान अपना दिस खींचैत अछि । एक त’ अपन रंग कालमे , प्रकाशक रंग प्रवाह बड्ड महत्वपूर्ण छैक । दोसर ई जे – प्रकाशक द्वारा जराओल गेल सर्वरंग अभियानक दीपक जे प्रभाव मैथिली रंग जगत पर पड़ल अछि ओ आरो बेसी प्रशंसाक पात्र छैक । प्रकाशक रंग प्रवाहक शुरुआत मिथिलाक एकटा छोट छीन गाम घोंघौर स’ शुरु होइत छैक । अपन नेनपने सँ गामक रंगमंच सँ जुड़ैत, अपन जिला मधुबनीक नगर इप्टाक कार्यालय सचिव बनल आ इप्टा मे एकर पाँच सालक कार्यकाल अखन तक के ओकर स्वर्णकाल कहल जा सकैत छैक । ओत’ सँ निकलिक’ विश्वविद्यालय स्तर पर अभिनय मे प्रथम सम्मान सँ सम्मानित होइत राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली मे प्रवेशक चयन प्रक्रियाक अंतिम प्रक्रिया तक शामिल भेल । ओहो कोनो नामी-गिरामी निर्देशकक संग कार्य करबाक अनुभवक बिना । फेर संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा प्रशिक्षण ल’क’ ओकरे बाकी कार्यशाला मे कार्यशाला सहायकक रूप मे कतेको राज्य मे अपन ज़िम्मेदारी केँ सफलतापूर्वक निभाबैत, साहित्य कला परिषद, दिल्लीक रंगमण्डल सँ गुजरैत, सॉग एण्ड ड्रामा डिविजन, नई दिल्ली मे कैजुअल आर्टिस्टक रूप मे चुनबैत आई राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नाई दिल्ली  द्वारा अखिल भारतीय स्तरक श्रेष्ठतम रंगशोध पत्रिका रंग प्रसंगक संपादन सहयोगीक रूपमे अपन महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी निभा रहल अछि । ई त’ छल प्रकाशक अपन रंगपक्ष , जे कि हमरा सभ केँ सीधे-सीधे देखाइत अछि । जे दोसर रूप छै ओ ई जे मधुबनी सन छोट जगह मे प्रकाश जे रंगदीप जरौलक अछिओकर परिणाम ई छैक जे आई एहि छोट शहर मे सात-सात टा रंगकर्मी रंगकर्म मे प्रशिक्षणक लेल राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृत्ति ल’ चुकल अछि । कतेको रंगकर्मी राष्ट्रीय स्तरक रंगप्रशिक्षण संस्थान सँ प्रशिक्षण प्राप्त केलन्हि अछि । 2006 ई. मे  मैथिली लोक रंग, दिल्ली ( मैलोरंग ) त्रिदिवसीय नाट्य सहोत्सवक आयोजन कएने रहय जाहिमे सहरसा, पटना आ दिल्लीक टीम ( मैथिली लोक रंग ) भाग लेने रहैक । ई तीनू टीम क्रमश: कनियाँ-पुतरा, पारिजात हरण आ काठक लोक क्रमश: उत्पल झा, कुणाल तथा प्रकाश झा क निर्देशनमे प्रस्तुत कएने रहय । उत्पल झा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली सँ उत्तीर्ण छात्र, कुणाल केँ दस-पन्द्रह नाटकक निर्देशनक अनुभव आ प्रकाश झा केँ अभिनय छोड़ि निर्देशनक कोनो अनुभव नहि । तेँ लागल जे एहि दुनू निर्देशकक बीचमे प्रकाश ओहिना दरड़ा जाएत जहिना जाँतक दुनू पट्टाक बीचमे दालि । मुदा से भेलैक नहि, प्रकाश झा आँकड़ जकाँ अड़ले रहि गेल । प्रेक्षक गुम्मी लाधिक’ नाटक देखैत रहलाह । मुदा, जत’ हँस’क अवसर छलैक ओत’ हँसबो कएलाह । नाटक समाप्त भेलाक बाद प्रकाश दू शब्द कहबाक हेतु हमरा मंच पर बजा लेलक । ओ किएक हमरा बजौलक तकर अनुमान एहि रूपमे लगौलिऎक – प्राय: नाटक मे कएल गेल किछु फेर-बदलक मादे किछु कहताह । मुदा ताहि प्रसंगमे हम किछु कहि नइ सकलिऎक । कारण, प्रेक्षक हमर मुँह बन्द क’ देने छल । तेँ हम ई बात कहबाक लेल बाध्य भ’ गेल छलहुँ जे दुलहन वही जो पिया मन भाए अर्थात नाटक वएह नीक वा निर्देशक वएह नीक जकरा प्रेक्षक गम्भीरता सँ देखलक आ बुझलक । एतेक कहलाक बाद ओ राम गोपाल बजाज जी केँ बजा लेलकनि । हुनका मंचपर बजएबाक दूटा कारण भ’ सकैत अछि – पहिल, ओ भारतीय रंगमंचक एकटा दिग्गज रंगकर्मी छथि जे मिथिलांचलक सपूत छथि आ दोसर, पहिल बेर निर्देशनक क्षेत्रमे आयल छल तेँ हुनक आशीर्वाद प्रकाशक लेल आवश्यक छलैक । तेँ बजाजजी मंचपर अएलाह आ हमर बातक समर्थन करैत कहलथिन – मलंगियाजी जे बात कहलनि अछि ताहिसँ हम सहमत छी । प्रकाश केँ जखन दर्शके सर्टिफिकेट प्रदान क’ देलकै तखन हम ओहिपर हस्ताक्षर नइ करिऎ से उचित नइ होएत । एहि प्रस्तुति के देखलाक बाद हिन्दीक युवा आ संवेदनशील रंगदृष्टि रखनिहार रंग समीक्षक संगम पाण्डे जनसत्ता में लिखने रहथि  - ... मंच पर ये सभी पात्र चरित्र के कई बारीक विन्यासों के साथ दिखाई देते हैं । उनके भदेस में कहीं भी कुछ बनाबटी नहीं लगता । और यही वजह है कि कथावस्तु में स्थितियाँ कई बार दोहराई जाकर भी अपनी रोचकता नहीं खोतीं । मंच पर पीछे की ओर दाएँ मंदिर का चबूतरा है । बाईं ओर एक पूरा का पूरा वृक्ष, और चबूतरा एक पूरा परिवेश बनाते हैं । इस परिवेश में साधु की पीतांबरी वेशभूषा एक दिलचस्प कंट्रास्ट बनाती है” । संगम पाण्डेक उपर्युक्त कथन निश्चित रूपे प्रकाशक नाट्य निर्देशक संग ओकर मंच परिकल्पना आ वस्त्र विन्यासक दृष्टिक सेहो मजबूती प्रदान करैत छैक । 2005 ई. मे स्वास्ति फाउण्डेशन, दिल्ली हमरा प्रबोध साहित्य सम्मान देने छल, जे कलकत्तामे प्रदान कएल गेल । उक्त सम्मानक अवसर पर डॉ. उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ द्वारा रचित एक छ्ल राजा नामक नाटकक मंचन कोकिल मंच, कोलकाता द्वारा कएल गेल छल । हमरा बगलमे बैसलि हमर पत्नी जिनका साक्षर मात्र कहल जा सकैए पूछि बैसलीह “कखन नाटक समाप्त होएतैक” ? एहिपर हम कहलिएनि जे एक चौथाई बाँकी अछि । अवलोकनजन्य थकान सँ ओ अपने-अपने बाजि उठलीह “एह, तखन तँ आधा घंटा सँ बेसिए बैस’ पड़त” । आब कोनो प्रेक्षकक मुँहसँ निकलल “बैस’ पड़त” शब्द नाटक प्रदर्शनपर एकटा पैघ प्रश्नचिन्ह लगबैत अछि । इएह सम्मान 2007 मे मयानन्द मिश्र केँ भेटलनि । ओहि सम्मानक अवसरपर डॉ. नचिकेता द्वारा रचित नायकक नाम जीवन, एक छल राजा , रामलीला, प्रत्यावर्तन आदिमे सँ कोनो एकटा नाटकक मंचन होएबाक चाही से विचार कएल गेल छल । संगहि स्थान बदलिक’ दिल्ली पर मोहर लागि गेल छल । उक्त आयोजनक सम्पूर्ण अभिभारा प्रकाश चन्द्र झा केँ भेटल छलैक । तेँ ओ नचिकेताक सभ नाटक मंगौलक । गम्भीरता सँ पढलक आ अंतमे एक छल राजापर आबिक’ केन्द्रित भ’ गेल । नचिकेताक जतेक नाटक छैक ओहिमे सँ सभसँ नीक नाटक एक छल राजा अछि जे प्राय: 1970 क दसकमे प्रकाशित भेल रहैक । एकरा जँ एना बूझी तँ कहि सकैत छी जे जहिया प्रकाश जन्मों नहि लेने होयत तहिए ई नाटक प्रकाशित भेल रहैक । तेँ जतेक जे एहि नाटकक मादे प्रकाशित भेल छल होएतैक ताहिसँ ओ परिचित नहि छल । तथापि ओहिमे सँ एक छल राजा केँ चूनि लेलक से ओकर निर्देशकीय दृष्टिक प्रमाण दैत छैक । कारण, निर्देशक वास्ते नाटक चयन एकटा अहम मुद्दा रखैत छैक । जँ सत्य पुछल जाए तँ ओ नाटक प्रकाश चन्द्र झाक हेतु एकटा चुनौती भरल काज छलैक । एखन धरि जतेक निर्देशक ओकरा प्रस्तुत कएने छल ओकरा कओमा आ पूर्णविराम सहित मंचपर उतारि दैत छल तेँ प्रेक्षककेँ पुछ’ पड़ैत छलैक जे आब कतेक नाटक बाँकी अछि । एहन स्थिति उत्पन्न होएबाक कारणपर विचार करबासँ पहिने हमरा नाटक कथानकपर विचार सेहो कर’ पड़त । एहि नाटकमे राजा साहेब नामक एकटा जमीन्दार अछि जकर जमीन्दारी पुर्खेक समयसँ धीरे-धीरे कमल जाइत छै । राजा साहेब लग आबिक’ विपन्नता पराकाष्ठापर पहुँच जाइत छै । कर्जक बोझ ततेक ने बढि जाइत छै जकरा सधाएब मश्किल भ’ जाइत छैक । फजूल खर्ची आ विलासिताक कारणेँ एहि स्थितिमे पहुँचब एकटा नियति छैक । फेर ओही जमीन्दारीमे पलल राजा साहेबक पिताक अवैध संतान धनिकलाल शहर जाइत अछि । ओहिठाम अपन लगन आ परिश्रमसँ काफी धनोपार्जन करैत अछि आ राजा साहेबक हवेली कीनैत अछि । फेर ओहो वएह काजसभ कर’ लगैत अछि जे राजा साहेब करैत छलाह । आब प्रश्न ई उठैत अछि जे एकटा जमीन्दारकेँ तोड़िक’ दोसर जमीन्दारकेँ ठाढ करबाक की औचित्य छैक ? जँ ठाढ भइए जाइत छैक तँ दरबारमे राजा साहेब जकाँ हवेलीमे मोजराक आयोजन करबाक की प्रयोजन छैक ? जखन ई बात स्पष्ट भ’ जाइत छैक जे राजा साहेब अपन बेटी मोहिनीक विवाह आर्थिक तंगीक कारणेँ नइ करा रहल छथि तखन ओकर प्रेम प्रसंगक एतेक दृश्यसभ रखबाक कोन प्रयोजन छैक आ अंतमे ओकरा प्रेमीकेँ खलपात्र बनएबाक कोन औचित्य छैक ? कोनो नियतिक विरुद्ध बेर-बेर धनिक लालक मुँह सँ प्रतिशोध लेब कहयबाक कोन जरूरी छैक ? राजा साहेब तँ अपन करनीक फल पाबिए गेल छलाह जे हवेली बेचिक’ सड़कपर आबि गेल छलाह । उपर्युक्त सभ प्रश्नपर प्रकाश नीक जकाँ विचार कएने छल । ओकर प्रदर्शन स्क्रिप्ट देखिक’ हमरा लागल जे ओकरामे नाटक प्रदर्शनक समझदारी छैक । नाटकसँ एक दिन पहिने हमरा डेरापर एकटा कार्ड आएल रहय । ओहिपर सपरिवार लिखल रहैक । तेँ हम पत्नीसँ पुछलियनि - “नाटक देख’ जएबैक” ? “कोन नाटक छै” ? प्रश्नपर प्रश्न ओ रखलनि । “एक छल राजा” “नइ जाएब”। “किएक”? “कलकत्ता मे देखने छी । हमरा नइ नीक लागल रहय” । “चलू ने, निर्देशक बदलल छै, अभिनेता बदलल छै” । “मुदा नाटक तँ वएह रहतै ने” । “तैयो देखि लियौ ने” । नाटक भेलैक । नाटक समाप्त भेलाक बाद नचिकेताजी केँ काफी खुश देखलियनि । एकर मतलब छलैक जे नाटक अपन ऊँचाई पाबि गेल छल । वस्तुत: हमरो बड्ड नीक लागल रहय ई प्रस्तुति । हमर मोन मानि गेल छल जे एकरा नीक निर्देशकक पाँतीमे राखल जा सकैए । जँसे बात नइ रहितै तँ नाटक एहि रूपमे नइ चमकितै । रास्तामे हम पत्नीसँ पुछ्लियनि - “केहन लागल नाटक” ? “बहुत बढियाँ” “तखन कहै छलिऎ जे नइ जाएब” । “हमरा थोड़बे बुझल छल जे एहन नाटक हेतै” । ई छलैक एकटा साक्षर मात्र लोकक मूल्यांकन । श्री मायानंद मिश्र, डॉ. गंगेश गुंजन, डॉ. देवशंकर नवीन, डॉ. ओमप्रकाश भारती आदि दिग्गज विद्वान लोकनि एहि प्रस्तुतिक प्रशंसा कएलथिन । ओना दशरथ जखन भार जनकपुर पठौलथिन तँ जनकपुरबासी मेसँ क्यो बाजि ऊठल— भार तँ बहुत बढियाँ छनि, मुदा अंकुरीक अखुआ टेढ छनि । एहन अखुआ टेढबाला लोक प्रेक्षकक प्रतिक्रिया देखिक’ अपनाकेँ चुप्पे राखब उचित बुझलक । एहि ठाम एकटा बात कह’ चाहब—आदमीक क्षमताक स्थानांतरण दोसर क्षेत्रमे सेहो होइत छैक । यदि हम दहिना हाथसँ ‘अ’ लिखैत छी तँ बामा हाथसँ ‘अ’ सेहो लिखि सकैत छी । कारण, दहिना हाथक क्षमता बामा हाथमे स्थानांतरित भ’ जाइत छैक । एही अवधारणापर लोक कहैत छैक जे बी.ए. भ’ क’ घास छिलतै तँ मूर्खसँ बढिए जकाँ छिलतै किएक तँ ओ अपन पढ’–लिख’ बाला क्षमता घास छील’ मे लगा देतैक । एहि मनोवैज्ञानिक तथ्यक सत्यापन प्रकाश चन्द्र झाक अभिनयात्मक एवं निर्देशकीय क्षमतासँ जोड़िक’ संगठनात्मक क्षमताकेँ सेहो देखल जा सकैए । ओ जतबए नीक अभिनेता तथा निर्देशक अछि ओतबए एकटा सफल संगठनकर्ता सेहो । आ हम सभ कियो जनैत छी जे रंगकर्म मे संगठनात्मक क्षमताक विशेष महत्व छैक । एहिठाम संगठनात्मक क्षमताकेँ रंगकर्मसँ जोड़िएक’ देखल जा सकैत अछि कारण, भरतक नाट्यशास्त्रक पैंतिसम अध्यायमे नाट्यदलक चर्चा आएल अछि जाहिमे सूत्रधार, अभिनेता, काष्ठकार, माली(माल्यकार), स्वर्णकार(मुकुट एवं गहना बनब’बाला), सूचिकार(दर्जी), चित्रकार आदिक चर्चा अछि । हमरा जनैत एहि सभ केँ मिलाक’ राख’बाला सूत्रधार छल होएतैक । ईसभ अपन-अपन योगदान नाट्य प्रदर्शनमे दैत छलैक । जँ एकरा सभकेँ मिलाक’ नहि राखल जैतैक तँ नाट्यप्रदर्शन असंभव भ’ जइतैक । अत: एकटा सम्पूर्ण  रंगकर्मीक हेतु संगठनात्मक क्षमता आवश्यक भ’ जाइछ । 2005 ई. मे जनकपुर नाट्य महोत्सवक आयोजन कएल गेल रहैक । एहि आयोजन मे यात्री टीम भाग लिअय से हमर हार्दिक इच्छा रहय । मुदा कलाकारसभ बिखरल रहैक । सभ एकठाम जमा होएत आ नाटक करत से संभव नहि बुझाय । तथापि एकबेर जानकारी देब आवश्यक छल । एतदर्थ बीस-बाइसटा मेम्बरमे सँ प्रकाश केँ टेलीफोन कएलिऎक । कारण, ओकर संगठनात्मक क्षमतासँ हम परिचित छलहुँ । दोसर जँ गछियो लितएअ तँ संगठनात्मक क्षमताक अभावमे जएबो करितएअ कि नहि ताहिपर हमर विश्वास नहि छल । खैर, ओ हमर इच्छाकेँ सहर्ष स्वीकार क’ लेलक आ पन्द्रह-सत्रह  आदमीक टीम ल’ क’( दिल्ली सँ ) जनकपुरधाम (नेपाल) पहुँच गेल । सम्प्रति प्रकाश  दिल्लीमे मैथिली लोक रंग (मैलोरंग) नामक संस्था चला रहल अछि । एहि संस्थाक एकटा सदस्य दिल्ली रहैत अछि तँ दोसर देवगिरी मे, माने एकटा उत्तरी दिल्ली तँ दोसर दक्षिणी दिल्ली । एहना स्थिति मे मैथिली रंगकर्म केँ जियाक’ राखब एकटा कठिन काज भ’ जाइत छैक । तथापि ओ एकरा जिआए क’ नहि, बल्कि जगजियार क’ क’ रखने अछि । इम्हर, जहिया सँ प्रकाश रंग प्रसंग सँ  जुड़ल अछि आ डॉ. ओमप्रकाश भारती, स्व. जे.एन. कौशल, महेश आनंद, देवेन्द्र राज अंकुर, प्रतिभा अग्रवाल आदि सन शोधकर्ताक सानिद्ध पौलक अछि ओकर रंग-दृष्टि आरो खुजलैक अछि । मैथिली लोकनाट्य आ रंगमंच पर ओकर शोध आलेख उल्लेखनीय होइत छैक । बाल रंगमंच पर भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय फैलोशिप प्राप्त करनिहार प्रकाश कहियो कहियो कथा सेहो लिखैत अछि । एकरा द्वारा लिखल कथा पाथर बेस चर्चा मे छल । ई कथा बुच्चीक मनोरथ नाम सँ अंतिका मे आ पाथर नाम सँ हिन्दी मे समकालीन भारतीय साहित्य मे प्रकाशित भेल रहै । हमरा जनैत कर्मठ आ सफल व्यक्ति ओ नहि होइत अछि जे समयक पाछाँ-पाछाँ चलैत अछि, सफल व्यक्ति तँ ओ होइत अछि जे अपन कर्मठतासँ समय केँ अपना लग खींच लैत अछि । इएह गुण हम मृदुभाषी आ मिलनसार प्रकाश मे पबैत छी । किएक तँ एकरासँ पहिने मिथिलांचल सँ कतेको मैथिलीक विद्वानलोकनि दिल्ली अएलाह, मुदा मैथिली रंगकर्मक जड़ि एना भ’ क’ रोपल नहि भेलनि । प्रकाशक लेल दिल्ली मे हिन्दी रंगमंच मे काज करनाइ बहुत आसान छल मुदा ओ मैथिली रंगकर्म के अपनैलक ई बेसी महत्वपूर्ण अछि ।  हमरा तँ ओहो दिन देखल अछि जहिया मैथिली रंगकर्म कलकत्तामे बहुत जगजियार छलैक, एकरा बाद ई जगजियारी ऊठिक’ पटना आ जनकपुर अएलैक सेहो देखलहुँ आ आइ लगैत अछि जे एहि जगजियारीक एकटा प्रबल दावेदारक रूपमे दिल्ली सेहो ठाढ़ भ’ गेल अछि जकर श्रेय निश्चित रूपे प्रकाश चन्द्र झा केँ जाइत छैक । आइ पटना हो, चाहे जनकपुर, चाहे सहरसा, सभकेँ अपन-अपन क्षमता देखएबाक हेतु दिल्लीमे प्लेटफार्म मैथिली लोक रंग (मैलोरंग) प्रदान कएअलक अछि जकर संचालन प्रकाश चन्द्र झा क’ रहल अछि । हम मैथिली रंगकर्मक हेतु ओकर दीर्घायु आ सफलताक कामना करैत छी । Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

88 8 8 नेपाल वन आ मधेश स्पेशल -जितेन्द्र झा पताः जनकपुरधाम, नेपाल एखन ; नई दिल्ली स्वरक माला गँथती अंशु-  जितेन्द्र झा हम सभ अपने भाषाकेँ हेय दॄष्टिसँ देखैत छी तें हमर भाषासाहित्य, गीतसंगीत आ संस्कृति पछुआ रहल अछि । ई कहब छन्हि अंशुमालाक । अंशु दिल्ली विश्र्वविद्यालयमे संगीतमे एम फ़िल कऽ रहल छथि। मैथिली गीत संगीतकेँ गुणस्तरीय बनएबाक लक्ष्य रखनिहारि अंशु मैथिलकेँ अपन भाषा-संगीत प्रतिक दृष्टिकोण बदलबापर जोड दैत छथि। अंशुमाला संगीतक विद्यार्थी छथि । दिल्ली विश्र्वविद्यालयमे एम. फ़िल.मे अध्ययनरत अंशुक  माय हिनक पहिल गुरु छथिन्ह। ई माय शशि किरण झासँ मैथिली लोक संगीतक शिक्षा लेने छथि । तहिना एखन किछु बर्षसं ई रेडियो कलाकार हॄदय नारायण झासँ संगीत शिक्षा ल' रहल छथि । बाल कलाकारक रुपमे सीतायण एलबममे गाबि चुकल अंशु बिभिन्न रेडियो कार्यक्रम आ स्टेज प्रोग्राममे सहभागी भ' क' मैथिली गीत गाबि अपन स्वरसं प्रशंसा बटोरने छथि । एखन दिल्लीमे रहिकऽ संगीत साधनामे जुटल अंशु दिल्लीमे आयोजित विभिन्न कार्यक्रममे मैथिली गीत संगीत परसल करैत छथि । मैथिली भाषीमे अन्य भाषाक गीत संगीतक प्रति बढैत रुचि मैथिली गीतसंगीत लेल हितकर नञि रहल हिनक कहब छन्हि । दिल्लीमे आयोजित एकटा कार्यक्रमकेँ याद करैत ई कहैत छथि जे जाहि कार्यक्रममे लगभग ८ हजार मैथिल रहथि ताहि कार्यक्रममे चाहियोकऽ मैथिली गीत नहि गाबि सकलहुं । ओहि कार्यक्रममे भोजपुरीक डिमाण्ड पुरा करैत अंशुके मैथिली डहकन गेबाक लेल मोन मसोसिक' रह' पडलनि । मुदा अंशु स्वीकारैत छथि जे गायक स्रोताक रुचिक आगु विवश होइत अछि, 'जनता जे सुनऽ' चाहत हमरा सएह गाबऽ पडत अंशु कहलनि । पटनामे मैथिली गीत गाबिक स्रोताक तालिक गडगडाटिसं खुश हएबाक आदति पडि चुकल अंशुकेँ दिल्लीमे आबिकऽ मैथिल भाषीक बदलल सांगीतिक स्वादसं अकच्छ लागि गेल रहनि । मैथिलीमे लोकप्रिय धुनक अभाव रहबाक बात अंशु किन्नहु मान' लेल तैयार नहि छथि ।  धुन वा लयक अभाव नहि,  स्रोता एहिसं अनभिज्ञ रहल हिनक दाबी छन्हि। मैथिली संगीतकर्मी एखनो आर्थिक समस्यासँ लडि रहल छथि, अंशु कहैत छथि । एहिक अभावक कारण प्यारोडी गीतक सहारा लेबालेल संगीतकर्मी बाध्य बनल अछि । मौलिक गीत,संगीतमे लगानीकर्ताक अभाव रहलासं सेहो प्यारोडी संगीत लोकप्रिय भऽ रहल अछि, हिनक कहब छनि । 'सभसँ पैघ कमजोरी स्रोतामे छै कलाकार तँ सभ ठाम हारल रहैया' प्यारोडी प्रेमीपर रोष प्रकट करैत अंशु कहैत छथि । मुदा मैथिलीमे स्तरीय गीत संगीत स्रोताकेँ भेटक चाही से अंशुक विचार छन्हि । मैथिली लोकरंग मन्चद्वारा दिल्लीमे आयोजित कार्यक्रममे स्रोतासँ भेटल वाहवाहीक उदाहरण दैत अंशु कहैत छथि जे स्रोताक मनोरन्जनक लेल स्तरीय कार्यक्रम सेहो हएबाक चाही । मैथिली रंगकर्ममे लगनिहारकेँ उचित सम्मान तक नञि भेटि सकल, अंशुमालाक अनुभव छन्हि । मैथिली कलाकारकेँ आब' बला दिनमे बहुत मान सम्मान भेटक चाहि, हम इएह चाहैत छी अंशु कहैत छथि । मैथिली संगीतकेँ एकटा ऊँचाई पर पंहुचएबाक लक्ष्य रखनिहारि अंशु मैथिली रंगकर्ममे एखनो लडकी लेल बहुतो कठिनाई रहल बतबैत छथि । अंशु आगु कहलनि-मैथिल समाजसँ जाधरि कलाकारकेँ सम्मान नञि भेटतै ताऽ धरि एहि क्षेत्रमे लडकी अपन प्रतिभा देखाब' लेल आगु नञि आओत। टेलिभिजनमे जं मैथिलीक मादे बात करी त नेपाल वन टेलिभिजनके एकटा अलग स्थान बनि चुकल अछि । नेपाल वन टेलिभिजन राति पौने ८ बजे प्रसारित होब' बला मधेश स्पेशलक माध्यमसं मैथिली बहुतो मैथिल धरि पंहुच रहल अछि । नेपालमे सभसं बेशी बाजल जाए बला दोसर भाषा मैथिली रहितंहु ओत्त ताहि अनुपातमे संचारमाध्यममे मैथिलीके स्थान नई भेट सकल छइ । एहन अवस्थामे पडोसी देश भारतसं सन्चालित नेपाल वन टेलिभिजन मैथिलीमे कार्यक्रम प्रसारण क मैथिलीभाषा भाषी मध्य अपन अलग स्थान बनालेने अछि । नेपालमे सरकारी स्तरपर संचालित नेपाल टेलिभिजन सहित निजी टेलिभिजन च्यानलमे  मैथिली एखनो उपेक्षिते अछि । यद्यपि बेर बेरके मधेश आन्दोलन आ संचारमाध्यमपर लाग बला साम्प्रदायिकताक आरोपक कारणे काठमाण्डुकेन्द्रित टेलिभिजनसबमे आब मैथिलीके स्थान भेट लागल छइ । काठमाण्डुसं प्रसारित सगरमाथा टेलिभिजन सेहो सभदिन मैथिलीमे समाचार देल करैत अछि । नेपाल वन टेलिभिजनक मधेश स्पेशल नामक 1 घण्टाक कार्यक्रममे समाचार, नेपालक समसामयिक राजनीति, नेपालक प्रमुख मुद्दापर बातचित आ गीत संगीत समेटल गेल अछि । समसामयिक वस्तुस्थिति पर लोक अपन धारणा द क परिचर्चाके महत्वपूर्ण बना देल करैत अछि । ई कार्यक्रम राति पौने आठ बजेसं पौने नओ बजेधरि प्रसारित होइत अछि । नेपाल केन्द्रित समाचार रहितो नेपाल सं बाहर इ कार्यक्रम देखिनिहार मैथिल कमी नई अछि । नेपालक सीमावर्ती मधुवनी, दरभंगा, सीतामढी, सुपौल, सहरसासहितके जिल्लासभमे सेहो एकर दर्शकके कमी नहि अछि । नेपालक मैथिल जत्त मैथिलीमे समाचार, गीत, आ परिचर्चा सुनि क सुसूचित होइत छैथ ततई भारत आ आन ठामक दर्शक मैथिली गीत आ संचारमाध्यममे मैथिलीक बोली सुनि हर्षित भेल करैत अछि । मधेश स्पेशल नेपालक मधेशीके एकटा अन्तर्राष्ट्रिय संचारमाध्यममे मुंह खोलि क बजबाक अवसर देलकै, सेहो अपने भाषामे । नेपालक संचारमाध्यमसं सेहो कटल कट्ल रहबला मधेशके छोट छिन घटना सेहो प्रमुख समाचार बन लागल । मधेशीक मुद्दापर खुलिक बहस शुरु भ गेल । मधेशक नेता सेहो धोती कुर्ता पहिरिक काठमाण्डुएमे बैसि क कोनो टेलिभिजन पर प्रत्यक्ष रुपें जनतासं बातचित कर लगला। टेलिभिजनमे जत्त मैथिली शुन्यप्राय छल ताहि अबस्थामे एक्कहिबेर एक घण्टा मैथिलीक कार्यक्रमके लोकप्रिय होब मे बेशी समय नइ लगलै । एखन इ कार्यक्रम दू बर्ष पुरा कर लागल अइ। नेपाल 1 टेलिभिजन डिस टिभी आ टाटा स्काइपर उपलब्ध हएबाक कारणे इ देश विदेशमे रह बला मैथिललग सहजहिं पंहुच बनालेने अछि । एहिद्वारे लगभग ७० टा देशमे रहबला मैथिल भाषी मधेश स्पेशलके माध्यमसं मैथिलीमे सुचना आ मनोरन्जन ल रहल छैथ । मधेश स्पेशल मैथिली आ भोजपुरीक मिश्रित कार्यक्रम अछि । एहिमे मैथिली भाषाक गीत नादक अतिरिक्त भोजपुरीक चौकी तोड आ आधुनिक गीत सेहो प्रसारण होइ छै । ई कार्यक्रम तीन भागमे बाटल अछि। पहिलमे नेपाल आ अन्तर्राष्ट्रिय समाचार रहैछै त दोसरमे समसामयिक चर्चा(टक शो)  आ तेसरमे मैथिली/भोजपुरी गीत । दृश्य संचारमे मधेश स्पेशल मैथिलीके जगजियार करमे बड पैघ भूमिका निर्वाह क रहल अछि आ क सकैत अछि से कहनाई अतिशयोक्ति नई हएत । डोम कछ आ जट जटिनक नाचसं जं माटिक सुगन्ध लेब चाहैत हुवए त हुनका सभहक लेल मधेश स्पेशल  सहायक भ सकैत छै । मेधेश केन्द्रित कार्यक्रम होइतो इ मिथिलान्चलके सर्वाङिण विकासमे कत्तेक सहायक हएत से त आव बला दिने बताओत मुदा एतवा निश्चित जे टेलिभिजनमे मैथिलीक नियमित प्रसारणसं मैथिलके अपन बोली अपन भाषा याद दियबैत रहैतै । स्तंभ - जितेन्द्र झा रिपोर्टिंग   -मैथिली रिपोर्ताज नेपालक (किछु भारतक) मिथिला मैथिल मैथिलीक सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक समाचार भाषा हित कि भोट्क लोभ नयी दिल्लीक मैथिली भोजपुरी एकेडमीक अध्यक्ष एवं दिल्लीक मुख्यमन्त्री शीला दीक्षित मैथिली भोजपुरी एकेडमीकेँ आन एकेडमीसँ आगू बढल देखऽ चाहैत छी, से कहलनि अछि । मैथिली भोजपुरी एकेडमी द्वारा आयोजित भिखारी ठाकुरक विदेशिया नाटक मन्चन कार्यक्रममे दीक्षित ई बात कहलनि । मैथिलीक लेल अलग एकेडमीक माँगक प्रति दीक्षित कहलनि जे हमरा सभकेँ जोड़क बात करक चाही तोडक नञि । एकताक दोहाइ दैत मुख्यमन्त्री भने अलग एकेडमीक् बातसँ कन्नी कटने होथि मुदा मैथिली भाषा साहित्यमे लागल प्रबुद्धबर्ग मानैत छथि जे अलग एकेडमीसँ मात्र मैथिलीक वास्तविक विकास भऽ सकत । ओना एकेडमी भोट बटोरबाक साधन मात्र नञि बनए ताहि दिश सेहो ध्यान देब जरुरी अछि । एकेडमीक आयोजनमे ६ अगस्त मंगलक राति विदेशिया आऽ ७ अगस्त बुधक राति महेन्द्र मलंगियाक काठक लोक मन्चित कएल गेल छल। मैथिली भोजपुरी एकेडमी आन एकेडमीसँ आगू बढय से दीक्षितके कहब रहनि । सरकारी ढिलासुस्तीकेँ स्वीकारैत ओऽ एक दिन सबहक आवाज सुनल जायत, कहलनि । नव दिल्लीमे एकेडमी द्वारा आयोजित कार्यक्रममे भोजपुरी नाटक विदेशिया देखलाक बाद दीक्षित नाटक खेलनिहार रंगकर्मीकेँ प्रशंसा केने रहथि । नाटयशालामे भोजपुरी आऽ मैथिली भाषीक भीड़ लागल छल । तहिना मैथिली भोजपुरी एकेडमीक उपाध्यक्ष अनिल मिश्र, एकेडमी, विहारक समॄद्ध संस्कॄतिकेँ बखानैत एहन प्रस्तुति निरन्तर होइत रहत, से जनतब देलनि। "हमर सिंहासन अटल अछि" मलंगिया 'जाधरि हमर कलम चलैत रहत ताधरि मैथिली नाटककारक रुपमे  हमर ऊँचाइ धरि कियो नञि पहुँचि सकैत अछिए। ई सिंहनाद छनि मैथिलीक प्रख्यात नाटककार महेन्द्र मलंगियाक । समकालीन मैथिली साहित्यकारकेँ चुनौती दैत, ओ नाटककार अपन सिंहासन किनको बुते डोलाएल पार नञि लगतए से दाबी करैत छथि।  मैथिली नाटककार महेन्द्र मलंगिया एखन मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय आऽ ख्यातिप्राप्त नाटककारमे चिन्हल जाइत छथि। चुनौतीपुर्ण शैलीमे मलंगिया कहैत छथि, हमर हाथमे जाधरि कलम अछि, हम अपन स्थानपर टिकले रहब, हमर सिंहासन अटल अछि। मैथिली नाटकक भीष्मपितामह कहल जाए तँ केहन लगैए, ताहि जिज्ञासामे मलंगिया मुस्कियाइत कहलनि जे हमर नाटक लोककेँ पसिन छञि हमरा ताहि पर गर्व अछि, हम जाहि स्तरक नाटक लिखैत छी, तेहन रचना एखन नञि भऽ रहल छञि। ओऽ  जनकपुरक रंगकर्मीक खुलिकऽ प्रशंसा करैत छथि। मैथिली रंगकर्ममे लागल जनकपुरक कलाकारक मलंगिया प्रसंशा करैत कहलनि, जनकपुरक कलाकारसँ बहुत आशा कएल जाऽ सकैत अछि ।  मैथिली नाटकमे शेक्सपियर कहल जाएबला मलंगिया ४ दशकसँ बेशी समय  नेपालमे  बिता देने छथि। ओऽ नेपालमे मैथिली साहित्यक संरक्षण लेल सन्तोषप्रद काज नञि भऽ सकल, बतौलनि । नेपालमे  दोसर सभसँ बेशी बाजल जाएबला भाषा मैथिलीमे रंगकर्मक समयसापेक्ष बिकास नञि भऽ सकल मलंगियाक कहब छनि। लोकतन्त्र बहालीक बाद सेहो नेपाल सरकार मैथिलीक लेल किछु नञि कऽ सकल हुनक आरोप छन्हि। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान द्वारा मैथिली भाषा, साहित्यक लेल भेल काजके ओऽ कौराके संज्ञा देलनि । प्रतिष्ठानद्वारा मैथिलीलेल भऽ रहल काज प्रति मलंगिया असन्तुष्टि ब्यक्त कएलनि । मैथिली रंगकर्ममे निरन्तर कार्यरत संस्थाकेँ सरकार दिशसँ कोनो तरहक सहयोग नञि भेट रहल बतबैत, ताहि प्रति खेद ब्यक्त कएलनि। सरकारी उपेक्षाक कारण सेहो मैथिली रंगकर्म ओझराहटिमे पडल, मलंगिया मानैत छैथ । मैथिली साहित्यमे नाटककार आऽ निर्देशकक रुपमे ख्यातिप्राप्त मलंगिया रंगकर्मकेँ रोजीरोटीसेँ जोडल जाए, से कहैत छथि। जाऽ धरि रोजीरोटीसँ रंगकर्म नञि जुटत ताऽ धरि बिकास सम्भव नञि, मलंगिया स्पष्ट कहैत छथि।  जनकपुरमे मिथिला नाटय कला परिषदसँ आबद्ध भऽ मैथिली नाटककेँ जन-जन धरि पंहुचएबाक अभियानमे लागल मलंगिया राजतन्त्रमे मैथिली भाषा संस्कृतिक संरक्षणक लेल कोनो काज नञि भेलाक कारणे सेहो मैथिली पछुआएल अछि, से कहलनि । मैथिली भाषामे आम दर्शकक मोनमे गडि जाएबला नाटक लिखिकऽ मैथिली साहित्यक श्री बृद्धिमे  योगदान देनिहार मलंगिया नाटककार नाटक लिखैत काल दर्शकक मानसिकता, उमेर , शिक्षा आऽ पेशाकेँ ध्यानमे राखए से सलाह दैत छथि। 'हम दर्शककेँ लक्षित कऽ नाटक लिखैत छी, तेँ हमर लिखल नाटक लोककेँ नीक लगैत छञि, मलंगिया अपन सफ़लताक रहस्य बतबैत कहलनि । बिदेशिया नाटक बिदेशिया घुरि जो विदेश जएवाक बाध्यता समाजक एकटा कटु सत्य अछि । अपन गामघर छोडिकऽ कियो विदेश जाय नञि चाहै-ए, मुदा परिस्थितिक आगू ककरो किछु नञि चलए छञि। किछु एहने परिवेशकेँ पर्दापर देखेबाक प्रयास कएल गेल विदेशिया नाटकमे । मैथिली भोजपुरी एकेडमीद्वारा दिल्लीमे आयोजित विदेशिया नाटकमे किछु एहने देखल गेल । वियाह भेलाक किछुए दिनक बाद विदेशिया गाम छोडि दैत छञि, विदेश जाऽ कऽ पैसा कमाय लेल। गाम संगहि विदेशियाकेँ छुटि जाइत छञि, अपन नवकी कनियाँ, गामक संगी-साथी आऽ याद सेहो । ओ पाईक लोभसँ घर छोडने रहैया, मुदा ओऽ पाई तँ नईहे कमासकल शहरमे अपन जीवनके एकटा आओर साथी बनालैयऽ।  एम्हर ओकर पहिल कनियां विदेशियाके बाट जोहैत रहैयऽ। विदेशियाक यादमे ओऽ कखनो बटुवाके पुछैयऽ तँ कखनो बारहमासा गबैयऽ । नाटकक निर्देशक संजय उपाध्याय विदेश जएबाक ग्रामीण प्रबॄतिकेँ सुखान्त बनेलहुँ से कहलनि। गामक सोझ आऽ सुशील कनियाकेँ छोडि विदेशिया विदेशमे रइम जाइयऽ । ओकरा आब शहरिया संगी निक लगै छइ, जे दुगोट बच्चाक माय सेहो अइ। विदेशिया अपना आपके बिसरि जाइयऽ। गामक कनिया नइ शहरक छम्मकछल्लो आब ओकर प्राण भऽ गेल छञि । एहिबीच भिखारी विदेशियाकेँ निन्नसँ जगबैत अछि। नाटकमे भिखारी बनल रंगकर्मी अभिषेक शर्मा नाटकक माध्यमसँ लोक अपन गाम घरके याद करलेल विवश भऽ जाइयऽ, से कहलनि । विहारक सुपौल जिलाक रंगकर्मी शारदा सिंह नाटकमे देखाएल गेल विषय बस्तु समाजक सत्य रुप रहल बतौलनि । विदेशिया गाम तँ घुरैयऽ मुदा असगरे नई चारि गोटेक संगे , दूटा बालगोपाल आऽ तकर माय। किछु झोंटाझोंटी आऽ कलहक बाद दु्नू सौतिन आऽ विदेशिया गामेमे रहऽ लगैयऽ । नाटक अन्ततः सुखान्त भऽ कऽ समाप्त होइत अछि । ई कथा गामसँ बाहर रहनिहार एकटा निम्न मध्यमबर्गीय युवककेँ जिनगीक मात्रे नञि अछि । बहुतो युवक गाम देहात छोडिते अपन माटि पानिकेँ बिसरि जाइत अछि । शरीरसँ मात्र नञि मोनसँ सेहो विदेशिया भेनिहारकेँ ई नाटक अपन गाम अपन वास्तविक पहिचानक याद दियबैत रहत । आब चलू नेपाल दिस सशस्त्रक सनसनी मधेश एखन दू दर्जनसँ बेशीक संख्यामे रहल सशस्त्र समूहसँ आक्रान्त अछि। कहियो सशस्त्रक विरोधमे जनकपुरक जानकी मन्दिरमे पत्रकार रैली निकालैत अछि तँ कहियो सिरहाक कर्मचारी कार्यालयमे ताला लगाकऽ सशस्त्रक विरोध प्रदर्शन करैत अछि । तहिना सर्लाहीमे बस चालकक हत्या भेलासँ शुरु भेल यातायात बन्दसँ जनजीवन कष्टकर भऽ रहल अछि । मधेशक माँगकेँ अपन नारा बनाकऽ खुलल दू दर्जनसँ बेशी संगठनकेँ एखन मधेशमे तीब्र बिरोधक सामना करऽ पड़ि रहल छन्हि । चालकक हत्या सर्लाही । राजमार्गमे एखनो शान्ति सुरक्षाक अबस्था बेहाळे अछि । सर्लाही जिलामे हथियारधारी लुटेरा समुह ७ तारिखक रातिमे एकटा बस चालकक  गोली मारि हत्या कऽ देलक । राजधानी काठमाण्डू जाऽ रहल बसक चालक कॄष्ण खवासक गोली लागि मॄत्यु भेल छल । पूर्व पश्चिम राजमार्ग अन्तर्गत सर्लाहीक जंगलमे राति ९ बजे ओऽ समुह बसमे लूटपाटक प्रयास कएने रहए । बस नञि रोकि भागऽ लगलाक बाद लुटेरा समूह गोली चलौने छल। गोली लागि घायल भेनिहार चालक खवासकेँ उपचारक बास्ते लालबन्दी अस्पताल लऽ जाइत अबस्थामे  बाटेमे मृत्यु भेल, से स्थानीय प्रहरी जनौलक अछि । चालकक गोली लगलाक बाद खलासी बसकेँ नियन्त्रणमे लऽ कए दुर्घटना होबऽ सँ बचौने छल। प्रहरी घटनामे संलग्न होएबाक आशंकामे सात गोटेकेँ पकडलक अछि । दोसर यातायात व्यवसायी आऽ मजदुर चालक हत्याक बिरोधमे चक्काजाम जारी रखने अछि। सरकार समस्या समाधान लेल आगू नञि आएल, कहैत यातायात मजदूर देशव्यापि आन्दोलनक चेतावनी देलक अछि । मजदूर आऽ व्यवसायी पुर्वान्चलक तीन अन्चल आऽ जनकपुर अन्चलमे चक्काजाम कएलाक बाद जनजीवन प्रभावित भेल अछि । बन्दक कारण उपभोग्य वस्तुक अभाव होबऽ लागल अछि । नेपालक (किछु भारतक) मिथिला मैथिल मैथिलीक सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक समाचार "रे नोर एना तोँ नञि टपक" कोशी नेपाल आऽ भारतक जनता लेल एकटा अभिशापसँ कम नञि । १८ अगस्तक कोशी नदी पुर्वी तटबन्धकेँ पश्चिम कुशहा लग तीन सय मीटर भत्थन करैत बाट बदलने छल । तञि के बाद नेपालक लगभग १ लाख जनता विस्थापित भेल। वएह पानि जहन बिहारमे आएल तँ आओर विकराल रुप ल लेलक । बिहारमे पानिसं ३० लाखसं बेशी जनता प्रभावित  अछि, जाहिमे २० लाख कोशी इलाकाके अछि । मृतकक संख्या हजारोमे हेबाक आशंका कएल जाऽ रहल अछि। बिहार सरकारक तथ्यक अनुसार कोशी बाढिसँ ७ सय ७५ गामक २२ लाख ७५ हजार जनता प्रभावित अछि । कोशीक कोप चीनक तिब्बत उदगमस्थल रहल कोशी नेपाल होइत बिहार कुर्सेला धरि सात सय २० किलमीटर दुरी पार करैत गंगानदीमे मिलैत अछि। कोशी नदी वार्षिक ५० अरब घन लिटर पानि गंगानदीमे पंहुचाबै-ए। कोशी नदीक वर्तमान जलाधर क्षेत्र ९२ हजार ५ सय ३८ वर्ग फ़िट मिटर अछि, जाहिमेसँ ४१ हजार ३ सय ३३ वर्ग किलोमीटर नेपालक भीतर पड़ैत अछि। कोशी योजना संचालनक ४५ वर्ष होइतो कोशी पीडितक समस्या जहिनाक तहिना अछि । नेपाल आऽ भारत दुनु देशकेँ एहि प्रश्नक उत्तर देव आवश्यक अछि- किए टुटल बान्ह ? बाढिसँ गरीब किसान भूमिहीन भऽ गेल अछि, ने लत्ता कपडा ने पेटमे अन्न आऽ ने पीबालेल पानि । किसान टकटक्की लगौने अछि कोशीक पानि पर, जे कखन घटत? जमिनदार पानिदार भऽ गेल, गाय महिष सबटा दहाऽ गेल छैक, आव बाँकी छञि मात्र जीवाक आश,,,,,। दोष ककर नेपाल आऽ भारत दुनु पक्ष एक दोसराके दोषारोपण कऽ रहल अछि । 'भारतीय प्राविधिक तटबन्ध मरम्मतिक लेल गेल छल मुदा, ओत्त काज करबाक वातावरण नञि बनलाक बाद तटबन्ध निर्माण नञि भऽ सकल, भारतीय पक्ष कहैत अछि। कोशी नदीक समझौता अनुसार नेपाल किछु नञि कऽ सकैत अछि, तेँ हमसभ मुक दर्शक छी, दोष भारतक अछि नेपाली पक्षके दाबी। भारतीय प्रधानमन्त्री डा मनमोहन सिंह बाढ़िक बिभीषिका देखिते राष्ट्रीय विपत्तिक घोषणा कऽ देलनि। बहुत रास पाई आऽ खाद्यान्न सहयोग करबाक आश्र्वासन सेहो। मुदा कोशी तटबन्ध टुटल किए, एकर सरकारी स्तरपर कोनो तरहक जाँच-बुझक आदेश नञि देल गेल अछि। हँ नेपालसँ एहि बिषयमे बातचीत करबालेल एकटा उच्चस्तरीय कमिटीक गठन कएल गेल अछि। ओऽ समिति की बातचीत करत आऽ की निष्कर्ष निकालत भविष्यक गर्भमे अछि। क्षतिपुर्ति कोशी समझौताक अनुसार कोशी तटबन्धक सभ तरहक काज भारतक जिम्मामे अछि । तटबन्धक मरम्मति मात्रे नञि तटबन्ध टूटलासँ होबऽ बला क्षतिपुर्ति सेहो भारते देत, से सन्धिमे उल्लेख अछि । नेपालक परराष्ट्रमन्त्री उपेन्द्र यादव कोशी समझौता अनुसार भारत सरकारकेँ सभ तरहक क्षतिपुर्ति देबऽ पडतै, से कहैत छथि। सन्धिक अनुसार इलाज, पुनर्वास आऽ खाद्यान्न जेहन सहयोग भारत सरकारकेँ करक चाही। भारतीय प्रधानमन्त्री आऽ विदेशमन्त्रीसँ सहयोगक आग्रह कएल गेल आऽ ओऽ सभ एहि प्रति सकारात्मक रहल, मन्त्री यादव कहलनि। आब देखऽ के बाँकी अछि, कोशी पीडित धरि कहिआ पडोसी देशसँ सहयोग पंहुचैत छञि। नञि रुकल कटान कोशी कटान नियन्त्रणलेल एखन धरि कएल गेल सभ प्रयास असफ़ल भेल अछि। कोशीक सभसँ महत्वपुर्ण मानल जाएबला स्पर बहऽ लागल अछि। नेपाल आऽ भारतीय प्राविधिक टोलीद्वारा कटान नियन्त्रणलेल कएल गेल प्रयास निरर्थक भऽ गेल अछि। संयुक्त  प्राविधिक  टोलीक निगरानीमे बीस हजार बोरा बालु, गिटी राखि कऽ नदिकेँ पश्चिम दिश घुमएबाक प्रयास निरर्थक भऽ गेल अछि। बर्षाक कारण सेहो बाढि नियन्त्रण दुरुह बनल अछि। नेपाल सरकार कोशी कटानसँ बिस्थापित भेनिहारक प्रति परिवार १५ हजार टका सहयोग देत। ई १५ हजार ब्यथित कोशीपीडितके कत्तेक सहयोग भऽ सकत ओऽ सहजहि अनुमान लगाओल जा सकै-ए। किछु मरल बहुतो निपत्ता सप्तकोशी नदी गामेक बाटसँ बह लगलाक बाद विस्थापित भेनिहारसभ एखनो अपन परिजनक खोजिमे अछि । हरिपुर, श्रीपुर आऽ पश्चिम कुशाहासँ विस्थापित सभ अपन घर परिवारक सदस्यके ढुंढि रहल अछि। सुनसरी प्रशासन एखनधरि ५ गोटेक मृत्युक पुष्टि कएलक अछि। मुदा एखनो चारि सय गोट सम्पर्कविहीन अछि। दोसर दिश कोशी बाढ़िसँ विस्थापित आब पेटझरीक चपेटमे आबि गेल अछि। पानि गन्दा भऽ गेलाक बाद विस्थापित शिविरमे पेटझरी आऽ मुँहपेट जाएव विकराल रुप लऽ लेने अछि। विस्थापित एक बालक सहित दु गोटक पेटझरीसँ मृत्यु भेल अछि। मृत्यु भेनिहारमे  श्रीपुर-३ के ५६ वर्षीयय तेजन सदा आऽ ६ वर्षिय रम्बा सदा अछि। सुनसरीक विभिन्न २९ शिविरमे एक हजार ५ सय गोट एखन बिमार अछि। अधिकांशमे पेटझरी, निमोनिया, बोखार आऽ छातीमे इन्फ़ेक्सन देखल गेल अछि। रोगीमेसँ १२ गोटक अवस्था चिन्ताजनक रहल, उपचारमे संलग्न चिकित्सक जनौलक अछि । कत्तेक बिपत्ति ! बाढ़िसंगहि सप्तरी जिलामे सर्पदंश बढि गेल अछि। सर्पदंशसँ शुक्रक राति आओर एक गोटेक मृत्यु भेल अछि। भादव महिनामे सांप कटलासँ मरनिहारक संख्या ६ भऽ गेल स्थानीय जनस्वास्थ्य कार्यालय जनौलक। खेतमे काज कऽ रहल स्थानीय रामकृष्ण यादवकेँ सांप कटने रहन्हि। इलाजक लेल सगरमाथा अंचल अस्पताल लऽ जाइत काल हुनक मृत्यु भेल। एहिसँ पहिने फ़किरा ३ क ४५ बर्षीय रामअशिष यादव, पत्थरगाडा ७ क १४ बर्षिय बमभोला यादव आऽ महादेव ८क १२ बर्षीय घनश्याम इसरक मृत्यु भऽ चुकल अछि । बिहारक बाध्यता कोशीक जलस्तर बढ़लाक बाद बिहारक स्थिति आओर असहज भऽ गेल अछि।  बिहार सरकार वायु सेनाक ४  हेलिकप्टर, ८ सय ४० नाव आऽ सेनाक मदतिसँ युद्ध स्तरमे राहत कार्य भऽ रहल बतौलक अछि। मुदा  बाढिपीडित लाखो जनता एखनो बाढिमे फ़ंसल अछि। सरकारी सहयोग समेत अपर्याप्त रहल, बाढिपीडितक कहब छञि। बिहार सरकार एखन धरि कोशी क्षेत्रमे २८ आऽ समुचा राज्यमे ७६ गोटेक मृत्यु भेल जनौलक अछि। मुदा प्रभावित इलाकामे स्थानीयवासी बहुतो शव दहाइत देखल गेल कहैत अछि। बिहार सरकारक तथ्यांकमे कोशी बाढ़िसँ ७ सय ७५ गामक २३ लाख जनता प्रभावित भेल कहल गेल अछि। बिछियाक आर्तनाद पेटमे अन्न नईं, राहतलेल आकाशमे टकटकी लगौने आंखि, आङमे लत्ताकपडाक अभाव आ भोक्कासी ...। सभ अपन अपन पीडा सुना रहल अछि । पेटके राक्षस शान्त नई भेलाक बाद ओ त सौंसे आदमीएके खा लेलक । नवजात शिशु कत्तेक काल भुक्खे रहैत, ओकरा कोशीक कोरमे छोडिदेल गेल । कोशी सन बेदर्दी जगमे कोइ नइ लघुनाटकमे किछु एहने देखल गेल । मैलोरंगक आयोजनमे दिल्लीमे सेप्टेम्बर १२ क' मन्चित लघुनाटकमे कोशीक बिभीषिका देखएबाक प्रयास कएल गेल । नाटकमे राहतलेल मारामारी कएनिहार  जनता भुखसं मृत्युवरण करबाक बाध्यताके जीवन्त रुपमे प्रस्तुत कएल गेल। पीडितके रोदनसं दर्शक भावविह्वल बनल छल । मैलोरंग सेप्टेम्बर १२ सं १४ तारिखधरि मैथिली लोकरंग महोत्सव स्थगित कएलक अछि । कोशी क्षेत्रमे घुरैत मुस्कानकसंग महोत्सव आयोजन हएत मैलोरंग जनौलक अछि । संघर्षक कठिन बाट मैथिली साहित्यकार व्रजकिशोर बर्मा मणिपद्मक स्मृतिमे नयां दिल्लीमे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजन कएल गेल । एहि कार्यक्रममे मैथिली नाटक मन्चन हएबाक संगहि मिथिलांगन संस्थाक स्मारिका सेहो  विमोचन कएल गेल । मिथिलांगन साहित्यकार मणिपद्मक स्मृतिमे 'उगना हल्ट' नामक मैथिली नाट्क मन्चन कएने छल । ब्रज किशोर बर्मा मणिपद्म मैथिली साहित्यक चर्चित नाम अछि । लोक साहित्यक संरक्षणमे हुनक योगदान उल्लेखनीय मानल जाईत अछि । इएह योगदानक सम्मान करैत हुनका मैथिलीको वाल्टर स्काट सेहो कहल जाईत छन्हि । लोरिक, राजा सल्हेश, नैका बन्जारा जेहन लोकगाथाक संरक्षण करबामे  हुनक योगदान सराहनीय रहल कार्यक्रममे कहल गेल । मिथिलांगन एहिसं पहिने सेहो मणिपद्मक स्मृतिमे विभिन्न कार्यक्रम आयोजन करैत आएल अछि । तहिना त्रैमासिक मिथिलांगन पत्रिका सेहो प्रकाशनके निरन्तरता देल गेल संस्था जनौलक अछि । उगना हल्टक लेखक कुमार शैलेन्द्र आ निर्देशक संजय चौधरी छैथ । नाटकमे दिल्लीमे संघर्षरत मैथिली रंगकर्मीक जीवनक कटु सत्य देखएबाक प्रयास कएल गेल अछि । उगना हल्ट बिहारक मधुवनी जिलाक एक रेल्वे स्टेशनको नाम अछि , यद्यपि नाटकके परिवेश नयां दिल्लीक रंगकर्मीक अडडा मण्डी हाउसपर केन्द्रित अछि । स्थानीय पण्डौल आ सकरी बीचक स्टशन अछि उगना हल्ट । नाटकमे मैथिली भाषा संस्कृतिक संरक्षणलेल अपस्यांत नवतुरियाक कथा ब्यथा समेटल गेल अछि । वएह युवाक संघर्षक इतिबृत मे नाटक घुमैया । कियो संगीतकार बन' चाहैत अछि त कियो गीतकार, ककरो फ़िल्ममे हिरो बनबाक धुन सबार छइ त ककरो हिरोइन । अन्ततः कडा संघर्षक बाद सभ अपन लक्ष्य प्राप्त करबामे सफ़ल होइत अछि । नाटकमे संगठने शक्ति अछि आ  एहिसं सफ़लता पाबि सकैत छी से पाठ सिखएबाक प्रयास कएने छैथ नाटककार । छिरिआएल आ दिग्भ्रमित जंका बुझाईत पात्रक अभियान अन्तमे सफ़ल होइत अछि । अन्ततः नाटक सुखान्त अछि । Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

2020 20 20 जन्म : 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत। आलेख: मैथिली सामाजिक नाटकक मूल केन्द्र बिन्दु : नारी समस्या स्वातंत्र्योत्तर युगक अधिकांश नाटक सामाजिक विवर्तन पर लिखल गेल अछि। एहि नाटक सभक केन्द्र बिन्दु नारी समस्या रहल अछि। नारी वर्ग मे अशिक्षा, सामाजिक बिडम्बनाक रुपमे तिलक-प्रथा, बाल विवाह एवं बेमेल विवाहक परिणामस्वरुप उपस्थित समस्याक समाधानक लेल नाटककार लोकनि प्रेरित भेलाह तथा एहि विषय बस्तुकेँ अपन नाटकक कथ्य बना सुधारवादी भावनाक प्रचार-प्रसार कयलनि जाहिसँ समाज सुधारक जागरण जोर पकड़ि सकय। स्वातंत्र्योत्तर मैथिली नाटकमे समाजक अति यथार्थ प्रतिबिम्ब देखबाक हेतु भेटैछ। युग विशेषताक अनुसारेँ एहि कालावधिक नाटकमे नारीक विभिन्न रूपक प्रतिबिम्ब  हैब अत्यन्त स्वाभाविक अछि। एहि काल प्रारंभिक नाटकमे नारी संबंधी सहानुभूति ओ करूणाक स्पष्ट चित्र उपलब्ध होइत अछि। किछु नाटकमे तत्कालीन नारी जीवनक, परिवारक मर्यादामे ओकर यथार्थ चित्र अंकित कयल गेल अछि। मैथिलीक कतिपय नाटकमे नारीक वेदनामय रुप परिवारक अन्तर्गत उभरि कए सोझाँ आयल अछि। एहि कालक नाटककार सुधारक आँखिये समाज ओ परिवारक विभिन्न दोषकेँ देखलनि परिवारमे नारीक दुखमय जीवन हुनक सहानुभूतिक पात्र बनलीह। नारीक सभसँ पैघ मर्यादा ओकर पति तथा वैवाहिक जीवन थिक। कन्याक जीवन मध्यवर्गीय परिवारक हेतु चिन्ताक कारण बनि जाइत अछि। दहेजक समस्या नारीकेँ योग्य वर नहि भेटबामे कठिनता, कन्याकेँ ऋतुमति होएबासँ पूर्वहि विवाहक आवश्यकता जीवनक प्रत्येक क्षणमे मर्यादा रक्षाक चिन्ता, पतिक असामयिक मृत्युक कारणेँ विधवा बनि जयबाक संभावना ओ पराश्रित भ’ कए पतित होयबाक भय, असुरक्षित अवस्थामे समाजक कुदृष्टिक  शिकार हैबाक आशंका , वेश्या जीवन व्यतीत करबाक बाध्यता तथा कानूनी दृष्टिएँ पुरूषक एकाधिकार इत्यादि अनेक कारण अछि जे नारी जीवनक वेदनामय, यंत्रणामय ओ पीड़ामय कथा कहैत अछि। अतः स्वातंत्र्योत्तर कालक अधिकांश नाटककार तत्कालीन सामाजिक स्थितिमे नारीक यथार्थ रूपक अंकन कयलनि जे उपर्युक्त समस्यादिक संदर्भमे नारी-जीवनक चित्रण करैत अछि। भारतीय समाजमे नारीक स्थान समाजमे नारी आ पुरूष दुनूक समान महत्व अछि। जाहि प्रकारेँ एक पहियासँ गाड़ी नहि चलि सकैत अछि ओकरा चल’ क लेल  दुनू पहियाक ठीक होयब आवश्यक अछि, ओहिना समाज रूपी गाड़ी केँ चलयबाक लेल पुरुष आ नारीक स्थिति समान भेनाइ आवश्यक अछि। दुनू मे सँ जँ एकहु निर्बल अछि तँ समाजक उन्नति सुचारु रूपसँ नहि भ’ सकैत अछि। एक समय छल, जखन भारतमे नारीक स्थान बड़ आदरणीय छल। समाजक प्रत्येक काजमे ओकरा समान अधिकार छलैक। पुरूषक समानहि सभा, उत्सव आ अन्य सामाजिक काजमे भाग लेबाक ओकरा पूर्ण स्वतंत्रता छलैक। धार्मिक काज तँ हुनक सहयोगक बिना अपूर्णे मानल जाइत छल। ओहि समय नारी वास्तविक अर्थमे पुरुषक अर्द्धांगिनी छलीह। कोनहु काज हुनक सम्मतिक बिना नहि होइत छल। पुरूष सेहो ओकरा निरीह मानि अत्याचार नहि करैत छलाह। नारी सहो अपनाकेँ गौरवान्वित महसूस करैत छलीह तथा अपन चरित्र वा आदर्शकेँ उत्तम रखबाक प्रयास करैत छलीह। देशमे सीता, आ सावित्री सन देवी  घर-घरमे पाओल जाइत छलीह। समाजमे स्त्री शिक्षाक सेहो खूब प्रचार छलैक। मैत्रेयी, गार्गी, अपाला, विद्यावती, भारती सन विदुषी सँ गौरवान्वित छल। ओहि युगमे नारी वास्तविक अर्थमे देवी छलीह। समाजक लेल नारी गौरवक वस्तु छलीह। ओहि समयक साहित्यमे नारीकेँ स्पष्ट रूपसँ पूजनीय मानल जाइत छल। एहि लेल मनीषी द्वारा कहल गेल छल “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंतु तस्य देवताः”  अर्थात जतय नारीक पूजा आ आदर होइत अछि ओतय देवता विचरण करैत छथि। एहि प्रकारेँ संस्कृत साहित्यमे नारीकेँ आदर आ सम्मानक दृष्टिसँ देखबाक वर्णन अछि। समय परिवर्तनशील अछि। देशमे अनेक परिवर्तन भेल, धार्मिक, सामाजिक, आ राजनतिक क्रांति भेल एहि सभक प्रभाव नारी समाज पर सेहो पड़ल। मध्ययुगमे आबि कए नारीक पूर्ववत सम्मान नहि रहल। पूजनीय आ आदरणीय हेबाक स्थान पर ओ केवल उपभोगक वस्तु बनि कए रहि गेलीह। एमहर देशक राजनीतिक स्थितिमे  सेहो महान परिवर्तन भ’ रहल छल। विदेशी आक्रमण प्रबल भेल जा रहल छल। देश पर विदेशी सभ्यता आ संस्कृतिक प्रभाव पड़ल जा रहल छल। परिणामतः आब नारी पर अनेक प्रकारक बन्धन पड़’ लागल जकर कोनो कल्पना धरि नहि छल। हुनका पर अनेक प्रकारक सामाजिक बन्धन लाग’ लागल। हुनक स्वतंत्रता आब केवल घरक चौखटि धरि सीमित रहि गेल। आब ओ समाज आ साहित्यमे केवल मनोरंजनक वस्तु रहि गेलीह। जखन मुसलमानी शासन एहि देशमे दृढ़ भ’ गेल, तखन नारीक पतन सीमा आर बढ़ि गेल। मुसलमान जखन निश्चिंत भ’ क’ शासन करय लगलाह, तखन दरबारमे जतय महफिल जमय लागल, सुरा क दौर चल’ लागल ततय पायलक झनकार सेहो होम’ लागल। नारी आब कविक लेल श्रृंगारक वस्तु बनि गेलीह। कवि आब ओकर जननि रूप बिसरि कय ओकर नख- शिखक वर्णनमे डूबि गेलाह। हुनक अश्लील चित्रक अतिरिक्त एहि कालक साहित्यमे आर कोनहु स्थान नहि रहि गेल। आधुनिक युग जागृतिक युग थिक। देशमे जतय सामाजिक आ राजनीतिक क्रांति आयल ओतय नारी समाजकेँ सेहो उन्नतिक अवसर भेटलैक। वास्तवमे ई युग समानताक युग थिक। सत्य त’ ई थिक जे जाधरि नारीक उत्थान नहि हैत ताधरि देश आ समाजक उन्नति असंभव थिक। एक नारीक महानता समस्त परिवारकेँ महान बना दैत अछि। हमरा देशक सभ महान विभूतिक चरित्र निर्माण मे नारीक महत्वपूर्ण स्थान रहल अछि। आब ओ समय आबि गेल अछि जे नारी समाजक संग लागल सभ कुप्रथाक अंत कयल जाय। विधवा-विवाह हो वा पिताक संपत्तिमे कन्याक अधिकार हो, शिक्षाक क्षेत्रक बाधा हो वा पर्दा-प्रथाक सभ क्षेत्रमे जतेको बन्धन अवशेष अछि आइ ओहि सभ कुप्रथाकेँ समाप्त कर’ पड़त। जँ समाज नारीक महत्ताकेँ स्वीकार क’ ओकर सभ अधिकार ओकरा पुनः घुरा देत तखनहि देश पुनः ओहि गौरवकेँ प्राप्त क’ सकत जकरा लेल ओकर जगत्ख्याति प्रसिद्ध रहलैक अछि। एहि दिशामे जतय धरि मैथिली नाट्यकारक प्रश्न अछि, बुझाइत अछि ओ समाजक एकटा सजग प्रहरी जकाँ एहि भूमिकाक निर्वाह क’ रहल छथि। नारीक कारुणिक स्वरुप नारी, पत्नी वा मायक रुपमे भारतीय परिवारक मूल केन्द्रबिन्दु होइत अछि। एहि हेतु परिवारक उत्थान ओ पतनक इतिहासमे नारीक स्थितिक समीक्षा होएब अत्यंत प्रयोजनीय अछि। वैदिक युगसँ ल’ क’  आइ धरि परिवार मे नारीक स्थितिमे परिणामात्मक परिवर्तन भेल अछि। जतय धरि वैदिक युगक प्रश्न अछि भारतमे अन्य  सभ्यताक अपेक्षा नारीक स्थिति कतहुँ नीक छल। अन्य प्रचीन समाजमे नारीक संग निर्दयताक व्यवहार कयल जाइत छल। एतय धरि जे यूनान जे अपन संस्कृतिकेँ अति प्राचीन होयबक दावा करैत अछि, ओतहु नारीक स्थिति नीक नहि छल। इतिहासकार डेविस लिखैत छथि “एथेंस आ स्पार्टा मे नारीक सुखद स्थितिक कोनहुँ प्रश्ने नहि उठैत छल। स्पार्टा मे नारी पशुसँ किछुए उन्नत छल।”1 भारतीय मौलिक सामाजिक व्यवस्था विशेष कए मिथिलाक संदर्भमे नारीकेँ धन, ज्ञान, ओ शक्तिक प्रतीक मानल गेल अछि, जकर अभिव्यक्तिक रुपमे लक्ष्मी, सरस्वती ओ दुर्गाक पूजा एखनहुँ, घर-घर मे कयल जाइत अछि। नारीकेँ पुरुषक अर्द्धांगिनीक रुपमे स्थान देल गेल अछि, जकरा अभावमे पुरुष कोनहुँ कर्तव्यक पूर्ति नहि क’ सकैत अछि। मुदा आइ हमरा सभक दुर्भाग्य थिक जे वैदिक आ उत्तर वैदिक कालक पश्चात् हमरा समाजक मौलिक व्यवस्था रूढ़िक रुपमे परिवर्तित होम’ लागल तत्पश्चात् नारी मे लाज, ममता आ स्नेहक गुणकेँ ओकर कमजोरी मानि पुरुष वर्ग द्वारा ओकर शोषण करब आरंभ क’ देलक। पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्थामे नारीकेँ पुरुषक वासना-पूर्तिक एक साधन मात्र बुझल जाइत अछि। ई बात ओहि सभ जाति आ वर्गक लेल सत्य थिक जकर प्रणाली सामन्तवादी विचारसँ प्रभावित अछि। हमर सामाजिक जीवन मुख्य रुपसँ चारि क्रियासँ सम्बन्धित अछि- जनन, परिवारक प्रबंध, आ नेनाक सामाजिकरण। व्यावहारिक रुपमे एहि सभटा क्रिया पर पुरुषक एकाधिकार अछि। अधिकांश लोक द्वारा नारीक नोकरी करब, शिक्षा प्राप्त करब अथवा परिवारक प्रबन्ध मे हस्तक्षेप करब ने केवल संदेहक दृष्टिसँ देखल जाइछ अपितु अपन अहमक विरुद्ध सेहो मानैत छथि। एकैसम शताब्दीक तथाकथित  समतावादी समाजहुँमे नारी पर होम’ वला अत्याचारमे कोनो बेसी सुधार नहि भेल अछि, जखन की एहि अत्याचारमे परिवर्तन अवश्यंभावी भ’ गेल अछि। नारी एवं पुरुष समाजक समविभाग अछि। प्रत्येक क्षेत्रमे दूनूक समान अधिकार अछि। किन्तु समाजक संरचना एहन अछि जे पुरुष द्वारा नारीकेँ उत्पीड़ित करबाक प्रवृत्ति मैथिल समाजमे दृष्टिगत भ’ रहल अछि। जँ हम आन-आन भारतीय समाजक तुलना मैथिल समाजसँ करी तँ बुझना जाइछ जे मैथिल समाजमे नारीक उत्पीड़न समस्या कने बेसी गंभीर अछि। एहि कारण सँ पारिवारिक स्वरुप मे सेहो स्पष्ट परिवर्तन दृष्टिगोचर भ’ रहल अछि आ समाजमे नारीक स्थान नगण्य भेल जा रहल अछि। यथासमय खास क’ मैथिल समाजमे नारीक स्थितिमे नारीक समताकारी मूल्यमे परिस्थिति कोन तरहेँ प्रभावित कयलक आ क’ रहल अछि एहि संबंधमे सामाजिक नाटकक माध्यमे विभिन्न मैथिली नाट्यकार नारीक दशाक वास्तविक चित्रण अपन- अपन नाट्यकृतिमे करबाक प्रयास कयने छथि जकर चर्चा निम्न रुपेँ कयल जा सकैत अछि। शारीरिक प्रताड़ना शारीरिक प्रताड़नाक रुपमे हिंसाक बढ़ैत समस्या केवल भारते धरि सीमित नहि अछि अपितु संसारक अधिकांश देशमे ई समस्या गंभीर भेल जा रहल अछि। “कनाडा मे प्रति चारि नारी पर एकक संग मारि-पीटक घटना होइत अछि। बैंकाकमे आधा नारी अपन पति द्वारा पीटल जाइत छथि। अमेरिका सन विकसित देश मे सेहो ई समस्या गंभीर अछि।”2 एकटा नवविवाहिता  जाहि संरक्षण प्रेम आ सहयोगक भावना ल’ क’  नव घरमे अबैत अछि ओतय पति, सास वा परिवारक अन्य सदस्यक द्वारा पीटल गेला पर ओकरा कतके असह्य वेदना होइत हैतेक तकर अनुमान हम आसानीसँ नहि लगा सकैत छी। नारीकेँ शारीरिक रुपसँ प्रताड़ित करबाक पाछू पारिवारिक कलह, पारिवारिक विघटन, पारस्परिक अविश्वास आ गरीबी अछि। मैथिली नाटकमे कतिपय नारीक वेदनाक रुप पारिवारक अन्तर्गत उभरि कय आयल अछि। मैथिली नाटककार सुधारक आँखिये  समाज ओ परिवारक  विभिन्न दोषकेँ देखलनि अछि। परिवारमे नारीक दुःखमय जीवन हुनक सहानुभूतिक पात्र बनलीह। गोविन्द झाक ‘बसात’ नाटक मे सुगिया अपन पतिकेँ परमेश्वर मानि सेवा करैछ। ओ सामाजिक जीवनकेँ व्यवस्थित रखबाक हेतु अपन सम्पूर्ण परिवारक भार उठौने छथि तथापि ओ अपन पति द्वारा प्रताड़ित होइत छथि--- सुगियाः  “मड़ुआ उलबैय छलियै। एलैय हल्ला करैत जलखै ला,जलखै                       ला, हम कहलियै, कोनदन कमाइ क’ के एलाह जे जलखै    दिऔन। की बस, ठामहि चेरा उठा केँ पिटपिटा देलक।”3 विडम्बना ई थिक जे इ समस्या केवल ग्रामीण , गरीब आ अशिक्षित नारिये धरि सीमित नहि अछि अपितु शिक्षित मध्यवर्गीय ओ नगरीय परिवारहुँ मे नारीक कमोबेश यैह स्थिति अछि। यौन उत्पीड़न मैथिली नाटकक अध्ययन ओ अनुशीलनक उपरांत जे एक समस्या स्पष्ट दृष्टिगोचर होइत अछि ओ थिक नारी पर होम’ वाला अत्याचार ओ शोषण। मर्यादा, चरित्र कर्त्तव्यपरायण, त्याग, सहनशीलता, शील ओ अन्य गुण  सँ महिमामंडित क’ जाहि सुन्दर ढंगसँ पुरुष समाज ओकरा संग छल कयने अछि ओहिमे स्त्रीकेँ सेहो पता नहि चलि सकल जे ओ शोषित भ’ रहल अछि। उत्सर्गक नाम पर पुरुष ओकरासँ सभ किछु माँगैत रहल आ ओकरा लूटैत रहल। नारी कतहुँ महानतासँ विभूषित होयबाक गर्वक मोहसँ ओकरा पर अपनाकेँ निछावर करैत रहल त’ कतहु परिस्थितिवश। मुदा ई स्त्रीयजनित गुण जतय ओकरा लेल एक दिस हथियार सिद्ध भेल ओतहि दोसर दिस ओकर यैह गुण , ओकर कमजोरी, विवशता, लाचारी ओ पतनक कारण सेहो बनल। नारी शोषणक सभसँ घृणित रुप थिक ओकर यौन शोषण। ई एक प्रकारक गहन मानसिक शोषण थिक जे शारीरिक यातनाहुँ सँ बेसी पीड़ादायक अछि। डॉ. प्रबोध नारायण सिंह द्वारा लिखित एकांकी नाटक ‘हाथीक दाँत’ क नेता महिला आश्रमक संरक्षिका बिजली देवीक सहयोगसँ खूब टकाक संग्रह करैत छथि आ जखन ओहि टकामेसँ बिजली अपन कमीशन माँगैत छथि तँ नेताजी बनावटी प्रेमीक रुप धारण कय बिजलीक संग आलिंगनबद्ध भ’ जाइत छथि आ कहैत छथि कतेक टका लेब, ई कपटी नेता चरित्र भ्रष्ट अछि। ई टकाक लोभ देखा बिजलीक संग अनैतिक संबंध त’ रखनहि छथि, बिजलीयेक सहयोगसँ अपन वासनाक भूखकेँ रोहिणी नामक एक युवतीसँ शान्त करैत छथि। परिणाम स्वरुप ओ असहाय लाचार युवती गर्भवती भ’ जाइत अछि। आब ओ बिजलीकेँ परामर्श दैत छथि जे----“धुर औषध कहि के किछु पुड़िया खोआ दियौक ने ?4 वर्तमान समाजमे उच्चवर्गक लोक द्वारा नीच वर्गक स्त्रीक संग कोना यौन अत्याचार करल जाइत अछि तकर स्पष्ट चित्र हमरा भेटैछ कांचीनाथ झा ‘किरण’ द्वारा लिखित ‘कर्ण’ नामक एकांकीमे यद्यपि एकांकीक कथानक आ पात्र पौराणिक अछि मुदा एकांकीकार लाक्षणिक रुपमे सूर्यकेँ उच्च वर्ग आ कुन्तीकेँ अछोप वर्ग मानि समाजमे घटि रहल यौन उत्पीड़न दिस समाजक ध्यान आकृष्ट कयने छथि। एहि एकांकीक माध्यमे समाजमे पैघ लोक कहओनिहारक गुप्त भ्रष्टताक भण्डाफोड़ कयल गेल अछि। देव अर्थात् उच्च वर्गक लोक जे नीच वर्गक संग विवाह तँ नहि क’ सकैत अछि मुदा गुप्त रुपसँ सम्भोग आ सम्पर्क क’ सकैछ जकर कुत्सित परिणाम भोग पड़ैत छैक नीच वर्गक लोककेँ। सूर्यः       हम देवता छी। देवता मनुक्खक बेटीकेँ....... कुन्तीः   (उत्तेजित स्वरमें) मनुक्खक संगे भोग-विलास कयने देह        नहि छूतई छनि आ देस छुति जयतनि ? सूर्यः     (विरक्त स्वरमे) मनुक्ख एखन तन-मन-धन लगा क’ देवताक   पूजा करैत अछि-- मरलाक बाद स्वर्ग जयबाक लेल। जीबैत स्वर्ग जयबाक कल्पनो नहि करैत अछि। मनुक्खक बेटीकेँ स्त्री बना क’ स्वर्ग ल’ जाय लगबैक तँ ओ भाव रहतैक ? कुन्तीः    (अप्रतिभ स्वरमे) तखन मनुक्खक कन्याक संग सम्पर्के किएक  करैत छी ? सूर्यः      (हँसि) आनन्दक लेल ? मनुक्खकेँ मनुक्ख बना क’ राखैक      लेल। कुन्तीः     (गह्वरित स्वरेँ) आ जँ संतान भ’ जाइत होइत त’ ओ मनुक्खे  भ’ क’ रहैत होयत। सूर्यः       हँ, मनुक्खक पेटक देवता कोना होयत ? 5 अरविन्द कुमार ‘अक्कू’ क नाटक ‘रक्त’ (1992) मे अवैध सन्तानोत्पतिक भयावह परिणाम सँ समाजकेँ एकटा चेतावनी देल गेल अछि। एहि घृणित सामाजिक विभीषिका पर नाटककार कहेन प्रकाश देने छथि से द्रष्टव्य थिक----- किसुनः    “तोहर तँ गप्पे अनटटेल होइछ। हौ सड़कक कातमे गरीबक नै तँ धनिकक नेना फकेल रहतैक?”6 तृप्ति नारायण लालक नाटक ‘सप्पत’ मे समाजक एक दुःष्चरित्र व्यक्ति श्रीकान्त, हरिजन युवती नीलमकेँ अपन प्रेमजालमे फँसा ओकर सतीत्व भंग करैछ जाहि करणेँ ओ समाजमे मुँह देखयबाक योग्य नहि रहि जाइत अछि। अन्ततः कोठा परक नारकीय जीवन जीबाक लेल बाध्य होम’ पड़ैत छैक। महेन्द्र मंगगियाक ‘लक्ष्मण रेखा खण्डित’ मे सेहो एहि विषय पर दृष्टिपात कयल गेल अछि---- मनोजः     “हँ, एना सकपकेलेँ किएक ?  दरोगा साहिब इएह ओ शैतान छी जे कतेको बेटी-पुतोहुक इस्त्रीकेँ लोभ आ बलात्कारसँ भ्रष्ट करैत आयल अछि। गाममे हरदम एकटा ने एकटा उधवा मचबैते रहैत अछि जाहिसँ लोक अशांत अछि।”7 एहि तरहेँ कहल जा सकैछ जे आधुनिक समाजमे नारीकेँ कहक लेल भनहि देवी आ दुर्गाक दर्जा देल गेल अछि, मुदा पुरुषक वासना शिकार ओ कोना भ’ रहल छथि एहि विषय वस्तुकेँ मैथिली नाटककार बड़ सजीव चित्रण कयने छथि। बाल विवाह बाल-विवाहक तात्पर्य विवाहक ओहि प्रथासँ अछि जाहिमे रजोदर्शन सँ पूर्वहि कन्याक विवाह कइल जाइत अछि। अनेक धर्मशास्त्रक नामपर मध्यकालहिसँ जाहि विश्वासकेँ बढ़ावा देल गेल जे कन्याकेँ रजस्वला होम’ सँ पूर्व जँ विवाह नहि कयल गेल तँ एहि सँ माता-पिताकेँ महापाप होइत छैक। एहन विवाह कतके हास्यास्पद अछि से एहि बातसँ स्पष्ट भ’ जाइत अछि जे हमरा कोनहुँ मूल धर्म ग्रंथमे बाल-विवाहक कोनहुँ निर्देश नहि देल गेल अछि । तथापि ई व्यवस्था आइयहुँ मिथिलामे व्याप्त अछि। बाल-विवाहक प्रचलन मैथिल समाजमे चाहे जाहि परिस्थितिसँ भेल हो मुदा एहि कुप्रथाक कारणेँ आइ समाजमे कतोक प्रकारक गंभीर दोष उत्पन्न भ’ गेल अछि। एक दिस जँ कन्याक अपरिपक्व आयुमे नेनाक पालन-पोषणक भार आबि जाइत अछि तँ दोसर दिस दुर्बल स्वास्थ्य हेबाक कारणेँ लाखक लाख मायक मृत्यु प्रसवक समय भ’ जाइत छैक। एहि समस्याक कारणेँ मैथिल समाजक कन्यामे शिक्षाक दर बहुत निम्न भ’ गेल छैक किएक तँ बाल- विवाहक कारणेँ ने त’ ओ शिक्षा प्राप्त क’ सकैत अछि आ ने एकरा जरूरी बूझल जाइत अछि। एहि प्रथाक कारणेँ विवाह एकटा संयोग मात्र बनि कए रहि गेल अछि। एहिमे उमिरक असमानता हेबाक कारणेँ एक दिस जँ यौन-लिप्सा अतृप्त रहि जाइत अछि तँ दोसर दिस बाल-वैधव्य आ तकर परिणामस्वरूप वेश्यावृति आदि सन समस्यासँ समाज ग्रसित भ’ जाइत अछि। एहना स्थिति मे नारीक जीवन  नारकीय भ’ जाइत अछि। मैथिली नाटकमे बाल-विवाहक समस्या ल’ क’ कतोक नाटककार अपन नाट्य रचना कयने छथि, एहिमे एकटा बानगी प्रस्तुत अछि ‘त्रिवेणी’ क नायिका दुर्गाक जनिक विवाह छओ वर्षक उमिरमे पैंतालीस वर्षक बूढ़सँ क’ देल जाइत छैक । कन्याक पिता मधुकान्त पन्द्रह  हजार टकाक लोभमे अपन फूल सन कन्याक विवाह एहन वरक संगे क’ दैत छथि जे विवाहक चारिये मासक पश्चात् ओ विधवा भ’ जाइत अछि। नायिका दुर्गा जखनहि बाल्यावस्थाकेँ पार कए युवावस्थामे प्रवेश करैत छथि हुनक देओर नरेश हुनका अपन वासनाक शिकार बनाब’ चाहैत छथि जे दुर्गाकेँ मान्य नहि छनि। अन्ततः ओकरा शरीर पर पेट्रोल ढ़ारि कए आगिमे स्वाहा क’ देल  जाइत छैक। कन्याक भावी दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण हुनक माय मधुकलाक शब्दमे एना देखल जा सकैछ-- मधुकला—    “(उग्र भावेँ) बाप रे बाप ! एहन अन्हेर गप्प कतहुँ सुनल अछि। एक दिस छओ वर्षक पत्नी आ दोसर दिस पैंतालीस वर्षक पति। बड़ अन्हेर होइत अछि। हमर बेटीकेँ ओ बाप सदृश बुझि पड़तैक, नहि कि पति सदृश। हम अपन बेटीक विवाह ओकरासँ नहि करब।’’8 मुदा आश्चर्यक विषय थिक एखनहु समाजमे बाल विवाह भ’ रहल अछि जकर दुष्परिणाम समाज भोगि रहल अछि मुदा ओकर आँखि नहि फुजैत छैक। दहेज मैथिल समाजमे घरेलू हिंसाक सबसँ व्यापक रूप दहेजक कारणेँ नारीकेँ देल गेल यातना आ ओकर हत्याक रूपमे आयल अछि। आश्चर्यक गप्प थिक जे दहेज निरोधक अधिनियम बनि गेलाक पश्चातो विभिन्न समुदायमे कन्या पक्षसँ बेसीसँ बेसी दहेज प्राप्त करबाक प्रचलन समाजमे बढ़िये रहल अछि। अधिकांश माय-बाप वर-पक्षक इच्छानुकूल दहेज देब’ मे असमर्थ रहैत छथि। विवाहक पश्चातो विभिन्न अवसर पर कन्याक माता-पितासँ ओकर सासु-ससुर द्वारा विभिन्न वस्तुक माँग करब एक स्वाभाविक प्रक्रिया बनि गेल अछि। जँ नवविवाहिता अपन माय-बापसँ ओ वस्तु नहि आनि सकैत छथि  तँ ओकरा सासुर पक्ष द्वारा कतोक प्रकारक मर्मस्पर्शी ताना सुन’ पड़ैत छैक। बात-बात मे ओकरा अपमानित कयल जाइत अछि। ओ भाँति-भाँतिक लाँछन सेहो लगाओल जाइत छैक। एतबे नहि ई प्रक्रिया ता धरि चलैत रहैत छैक जाधरि ओ सासुर वलाक इच्छाक पूर्ति नहि क’ दैछ। दहेजक कारणेँ भारतीय नारीक केहन दुर्दशा होइत छैक तकर चित्रण हमरा सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी क ‘लेटाइत आँचर’ क नायिका ममताक करूण चीत्कार मे भेटैत अछि--- ममता : “अहाँ हमरा खत्तामे फेकि देलौं। ओकरा रेडियो, साइकिल नै    देलियै, ओ दोसर मौगी बेसाहि आनलक। बाबू अहाँ देखलिए ऐ ओकरा ? हम एतहिसँ सभ दिन देखै छियै। ओ सब दिन हमरा लग अबैए, सब दिन हमरा छाती पर आबि कए बैसि जाइए, हमरा छाती पर बैसि कए जाँत पिसैत रहैये । अहाँ ओहि मौगीकेँ कहियो देखने छियै ?” 9 पर्याप्त दहेज नहि देबाक कारणेँ ममता सन नारीक केहन विक्षिप्त अवस्था      भ’ जाइत छैक से स्वतः अनुमान कयल जा सकैछ। एतबे नहि एहि पैशाचिक व्यवस्थाक प्रति मोनमे ततेक ने डर समा जाइत छैक जे ओ दोसरहुकेँ एहि परिणामक भविष्य भोक्ता  रूपमे देखि सिहरि जाइत छैक— ममता : “भैया, बाउक ससुर जँ बाउकेँ मेटरसाइकिल नै देतै तँ बाउ            अपन कनियाकेँ छोड़ि देतै ? एत’ कहियो नै आब’ देतै ?......अहाँ नै बाजै छी बाउ, तोहीं कह’ छोड़ि देबहक ?”10 जाहि परिवारमे ममता सदृश दहेजक मारलि कन्या छैक ओहो अपन पुत्रक विवाहमे टकाक लेन- देन उचिक बुझैत छथि। तिलक दहेजक कारणेँ मैथिल ललनाकेँ एहन दुष्परिणाम भोग’ पड़ैत छैक जे “कनियाँ – पुतराक” नायिका सत्यानाशी दहेज प्रथाक मारिसँ बताहि भ’ जाइत अछि, जाहिसँ सर्वगुण संपन्न भेलो उत्तर ओकरा पति द्वारा दाम्पत्य सुख नहि भेटैत छैक। फलस्वरूप यौवनावस्थामे ओ बताहि भ’ कनियाँ- पुतरा खेलाइत रहैत छैक। द्रष्टव्य थिक ओकर इ वेदना आ अतृप्त लालसा--- निर्मला--- “ठगै छी। (मायसँ) सुनही माँ ! पिपही बाजै छै कि नहि.....? माँ कनियाँ पुतराक विवाह हेतैक की वर कन्याक ? नहि, नहि कनियाँ-पुतराक...कनियाँ-पुतराक ह- ह- ह- ह-”11 पर्याप्त दहेज नहि लयबाक कारणेँ कन्याकेँ एतेक प्रताड़ित कयल जाइत अछि जे ओ प्रायः आत्महत्या धरि क’ लैत अछि। एतबे नहि कखनहु-कखनहु तँ दहेजक लोभमे लोक अपन पत्नी केँ घरक आन सदस्यक संग मिलि कए हत्या सेहो क’  दैत छैक। एहन भावनाक परिचय हमरा मणिपद्म लिखित एकांकी नाटक ‘तेसर कनियाँ’ मे भेटैत अछि जाहिमे दहेज प्राप्त करबाक लेल तरूण पीढ़ी एवं ओकर माय-बाप नरभक्षी बनि दू-टा कन्याकेँ सुड्डाह क’ देलक। एतय दहेज पीड़िताक करूण चीत्कार सुनल जा सकैत अछि---- षोडसीः  “हम जीबय चाहै छी राजा,  जीबय चाहैत छी, हमरा खोलबा     दिअ। रातिए एहि रोगी वृद्धसँ हमर विवाह एहि कारणेँ भेल जे हमरा सुलक्षणा हेबाक कारणेँ ई नहि मरताह। हाय रे सुलक्षणा ! रातिमे विवाह भेल आ आइ हम जरय जा रहल छी। वृद्धाः     चुप पपिनियाँ। षोडसीः   हमरा बचा लिय राजा, हम जीबय चाहै छी।”12 एहि कुप्रथा आ अनैतिक व्यापारसँ क्षुब्ध भ’ नाटककार स्वयं कहैत छथि— “आरे तिलक आ दहेजक पिशाच, एहि देशक नारीत्वकेँ आ   सिनेहसँ पोसल बेटी सभकेँ सुआदि-सुआदि खो।”13 भारतक संदर्भमे दहेजक कारणेँ घरेलु हिंसाक समस्याकेँ एहि चौंकाब’ वला तथ्यसँ बुझल जा सकैत अछि। मानव संसाधन विकास मंत्रालयक एकटा आँकड़ासँ स्पष्ट होइछ जे एतय प्रतिदिन सोलह नारीक दहेजक कारणेँ हत्या होइत छैक, लगभग सत्तरि प्रतिशत ग्रामीण आ नगरीय परिवार एहन अछि जाहिमे कोनो ने कोनो रुपमे नारीक विरुद्ध हिंसा भ’ रहल छैक। वेश्यावृत्ति वेश्यावृत्ति भारतीय  समाजक कैंसर थिक। एहि ज्वलंत समस्यासँ हमर समाज तेनाने ग्रसित अछि। जे ने ओकरा आत्मसात करबाक शक्ति छैक आ ने ओकरा अन्त करबाक सामर्थ्य छैक। एतबा तँ निर्विवाद रुपेँ स्वीकार कयल जा सकैछ जे क्यो नारी जन्मजात वेश्या नहि बनैत अछि, प्रत्युत परिस्थितिक मारिक कारणेँ ओ एहि धन्धाकेँ स्वीकार करैत अछि जकर कतिपय सामाजिक पृष्टभूमि थिक जे एकर निर्माणमे समान रुपेँ सहयोग प्रदान करैत आयल अछि। वेश्याक ने सामाजिक मर्यादा छैक  आ ने सामाजिक प्राणी ओकरा इज्जतिक दृष्टिसँ देखैत अछि। तथापि ओकर समाजिक पक्ष एहन अछि जे क्यो स्वेच्छया तँ क्यो परिस्थितिसँ लाचार भ’ समाजमे जीवित रहबाक हेतु एहि धन्धाकेँ स्वीकार क’ लैत अछि। उत्कर्ष युगक मैथिली नाटककार नारीकेँ उच्छृंखल ओ स्वच्छन्द रुपमे देखबाक आकांक्षी नहि छथि, किएक तँ जीवनक गहन अध्ययनक पश्चात् ओ अनुभव कएलनि जे समाजक आधार नारी थिक। किन्तु स्त्रीक प्रति पुरुषक  कुत्सित  मनोवृत्तिमे अद्यापि कोनो परिवर्तन नहि देखबामे अबैत अछि। पारिवारिक जीवनमे अपन अस्तित्वसँ प्रसन्नता आ संतोष उत्पन्न कएनिहारि नारीकेँ डेग-डेग पर पतिसँ समझौता करय पड़ैत छैक। आधुनिक समाजमे कतिपय एहन पति छथि जे पत्नीकेँ पत्नी नहि बुझि केवल हार-माँस वाली नारीक रुपमे देखैत छथि। ओ अपन स्वार्थ सिद्ध करय लेल पत्नीकेँ अनुचित यौन व्यापार कर’ लेल प्रोत्साहित करैत अछि जकरा वेश्यावृत्तिक नाम देब सर्वथा उचित बुझना जाइत अछि। नोकरीमे पदोन्नति प्राप्त करबाक लेल नारीक सदुपयोग करबाक प्रवृत्तिक दिग्दर्शन हमरा नचिकेताक ‘नाटकक लेल’ मे भेटैत अछि। एकर पात्र शंकर सतीकेँ वेश्यावृत्तिक दिस धकेलि रहल छथि। सतीक संस्कार इच्छा  एवं मानसिकता सर्वथा एकर विरोध करैत अछि, किन्तु पुरुष प्रधान समाजमे ओकर महत्व नहि रहि जाइत अछि। ओ अपन इच्छाक प्रतिकूल पर-पुरुषक अंक-शायिनी बनैत अछि जे ओकर निरीहताक परिचायक कहल जा सकैछः- सतीः “(क्रोधसँ असंवृत भए चीत्कार करैत) अहाँ हमरा वेश्या बना रहल छी,अहाँ अपन प्रेमकेँ बेचि रहल छी, अहाँ हमरा समस्त प्रेम-प्रीतिक गला घोंटि देने छी, अहाँक हाथमे तकर चेन्ह अछि। क्षमताक लालसामे अहाँक सभ बातसँ दुर्गंध बहरा रहल अछि।”14 नारी शोषणक विरुद्ध अपन नाटक ‘नायकक नाम जीवनमे’ नचिकेता समाजपर व्यंग्य कयने छथि। नवलः     “हम नहि जनैत रही, हमर मुहल्लाक मानल लोक सब        रातिक पहरमे  जाहि कोठा सबसँ घुरथि छलथि ओहि महक वेश्या सब कालू सरदारक अधीन छैक।’’15 चौधरी यदुनाथ ठाकुर ‘यादव’ क नाटक ‘दहेज’ मे सेहो वेश्यावृत्तिक चित्र उपस्थित कएल गेल अछि। नाटकक नायक रघुनन्दन अपन विवाहिता पत्नी दुलरीकेँ छोड़ि मोती (वेश्या) क संग वेश्यागामी भ’ जाइत अछि-- रघुनन्दनः  “तुम्हारी और तुम्हारी खुबसुरती के अलावा मेरे लिए  सोचने    का मसाला ही कौन सा है ? मोतीः      (सलाम करैत) मैं निहाल हुई मेरे राजा। रघुनन्दनः  निहाल यों हुआ जाता है ? मेरे पहलू मे बैठो, मेरे जलते हुए जिगर पर मरहम डालो। तर होने दो मेरे प्यासे लबों को, अपने लवों और शरबते अनार से।”16 एहि तरहँ हम देखैत छी आजुक समाजमे कोना नारीकेँ विवश कयल जाइत छैक वेश्यावृत्तिक लेल। उन्मेष युगक नाटककार एहि रोगक पर्दाफाश कयलनि ओ संगहि चेतावनी द’ रहल छथि एहि कुप्रथाकेँ सुधारबाक हेतु। स्त्री - पुरूष संबंधक नव आयाम वर्तमान समयमे हमरा समाजमे प्रत्येक स्तर पर भ’ रहल परिवर्त्तन केँ लक्षित कयल जा सकैत अछि। ई परिवर्तन नवीन विचारधाराकेँ जन्म देलक जाहिसँ स्त्री-पुरूषक संबंधकेँ बेसी प्रभावित कयलक । हमरा समाजक धूरि परिवार थिक आ परिवारक धूरी पति-पत्नी। एहि तरहेँ ओकरा आपसी संबंधमे आयल परिवर्तनक प्रभाव परिवार ओ समाज पर पड़ब स्वाभाविके अछि। प्रारंभमे पति ओ पत्नीक परस्पर रिश्तामे पतिकेँ ऊँच स्थान प्राप्त छलैक आ ओकर तुलना परमेश्वर सँ कयल जाइत छलैक। शिक्षाक अभावमे पत्नीक जीवन पूर्णरूपेँ पति पर आश्रित छलैक एहि कारणेँ ओ पतिक संग अपन संबंधमे कोनो तरहक परिवर्तन लाब’ मे असमर्थ छलीह। जँ पति अपन अधिकारक दुरूपयोग क’ ओकर उपेक्षा ओ तिरस्कार करैत छल तैयहु ओकरामे ओतेक साहस नहि छलैक जो अपन संग भ’ रहल अन्यायक प्रतिकार क’ सकय। जेना-जेना शिक्षाक प्रति नारीक जागरूकता बढ़ल गेलैक आ नारी शिक्षित होमय लगलीह तहिना-तहिना पति-पत्नीक परस्पर रिश्ता सोहो प्रभावित होमय लागल। किएक तँ शिक्षा नारीकेँ अपन अस्तित्व आ अधिकारक प्रति जागरूक बनैलक। जखन ओकरामे अधिकारक प्रति जागरूकता बढ़लैक तखन ओकरा लेल आवश्यक भ’ गेलैक जो ओ अधिकारक रक्षा करय आ अन्याय भेला पर ओकर विरूद्ध अपन आवाज उठा सकय। आ ई तखने संभव अछि जखन ओ आत्मनिर्भर हो, परिणामस्वरूप नारी शिक्षित होमक संगहि-संग आत्मनिर्भर सेहो होम लागल। गोविन्द झाक नाटक ‘बसात’ मे हमरा एहि दृष्टिकोणक आभास भेटैत अछि। एहि नाटकक नायक कृष्णकान्त एक आदर्शवादी युवक छथि। हुनक पिता फलहारीक पुत्री फुलेश्वरी सँ हुनक विवाह कर’ चाहैत छथि, मुदा कृष्णकान्त अशिक्षिता फुलेश्वरी पर अशिक्षत होयबाक कटाक्ष करैत छथि आ घरसँ पड़ा जाइत छथि। फुलेश्वरी एहि अपमानकेँ एकटा चुनौतीक रूपमे स्वीकार करैत छथि तथा ओ घर सँ बाहर भ’ शिक्षा प्राप्त करैत अछि आ समाज सेवा करैत अछि। जोतखीजी द्वारा पुष्पा (फुलेश्वरी) क चरित्रकेँ उद्घाटित करैत छथि----- बमबाबा--- “वाह वाह ! बेटी, तोहर सफलता पर आइ हमरा अपार हर्ष भ’  रहल अछि, आ कतेक अबलाकेँ सबला बना रहल अछि। आब हमरा विश्वास भ’ गेल। आइ नहि काल्हि तोहर प्रतिज्ञा अवश्य पूरा हेतौक—एक दिन फेर मिथिलाक महिला भारतक आदर्श महिला कहाओत।”17 एहि तरहेँ हम कहि सकैत छी जे शिक्षा ,पाश्चात्य संस्कृति ओ सभ्यताक प्रभाव, स्त्री-पुरूषक समानता आ स्वतंत्रताक भावना नारीमे स्वातंत्र्य भावक जन्म देलक। व्यक्तित्व विकासक संगहि संग ओकर बाहरी दुनियाँ मे हस्तक्षेप बढ़’ लागल एहि तरहेँ नारीक बदलैत परिस्थिति, समाजक बदलैत मूल्य दृष्टि, नव नैतिकता बोध, स्त्री-पुरूषक परस्पर रिश्ताक आयामहि केँ बदलि देलक। पुरूषक प्रति विद्रोहक भावना आधुनिक सामाजिक मैथिली नाटक मध्य नायिकाक चरित्रविकासमे पुरूष-समाजक प्रति विद्रोहक स्वर अनुगुंजित भ’ रहल अछि। ओ परिवारर ओ समाजक बन्धनकेँ ठोकर मारबाक हेतु एकर विद्रूप ओ परिहासकेँ ध्यान नहि द’ अपन व्यक्तित्वक विकासक हेतु शिक्षा ग्रहण करबाक क्षमता दिस आकर्षित भेलीह अछि। एहन नारी अपन विचार ओ अपन व्यक्तित्वकेँ महत्व देलनि तथा वैवाहिक बन्धनकेँ तोड़बाक हेतु तत्पर भ’ गेलीह जकर परिणाम एतबा अवश्य भेल सामाजिक परिप्रेक्ष्यमे एहन परिवारक जीवन अत्यधिक नारकीय बनि गेल अछि। एहन नारीक ध्वंसात्मक ओ विद्रोहत्मक पक्ष अत्यंत सशक्त अछि। एहि हेतु मात्र पुरूषकेँ दोष नहि देल जा सकैछ प्रत्युत ओहि समाज व्यवस्थाक अछि जाहिमे हमर परंपरा बनल अछि जकर फलस्वरूप नारी-पुरूषक स्वस्थ सामंजस्य अधुनातम संदर्भमे अत्यंत दुष्कर भ’ गेल अछि। पुरुष विरोधसँ सामाजिक व्यवस्था पर आघात करैत अछि तँ संभवतः एकांगीकता ओ विक्षिप्तताक आरोप सँ नारी बाँचि सकैत अछि। स्वतंत्र्योत्तर नाटककार किछु एहन नारी चरित्रक अंकन कयलनि जे अपवाद भूत रुपमे चतुर कर्तृत्ववान, मेधावी आ तेजस्वी छथि। पुरुष हुनका समक्ष दुर्बल ओ आत्मकेन्द्रित देखाओल गेल  छथि।  पत्नी, पति पर हावी रहब श्रेयस्कर बुझैत छथि--- रजनीः--- “हुँह....मान मर्यादा। अहाँकेँ जतेक चिन्ता माय-बापक मान-  मर्यादाक तकर दशांशो यदि हुनका लोकनिकेँ अहाँक चिन्ता रहितियन्हि दँ बुझितहुँ आइ धरि ओ की कएलनि अछि अहाँक लेल ?”18 व्यावहारिक रुपसँ पुरूषक विरोधक परिणामकेँ अन्त धरि ल’ जा कए विचारब आवश्यक अछि किएक तँ स्वस्थ ओ मानवाली नारीक यौन- वासनाक पूर्तिक समस्या एहिसँ सम्बद्ध अछि। नारी स्वातंत्र्यक आकांक्षा संभवतः पुरूषसँ पृथक रहिक पूर्ण भ’ सकैछ , किन्तु नारीक नैसर्गिक भावना कोना चरितार्थ हैत। एहन नारी व्यवहार शून्य भ’ जाइत अछि तथा परिस्थितिक अंतरंगताक अनुभव क्षमताक अभाव रहैछ जाहिसँ हुनक विद्वता निरर्थक प्रमाणित भ’ जाइत अछि। एहन स्वरूपक वास्तविक चित्र उपलब्ध होइत अछि परित्यकता ममताक चरित्रमे। पिताक हेतु सब सन्तान एक समान होइत अछि मुदा ‘लेटाइत आँचर’ मे दीनानाथ अपन तीनू संतानक प्रति तीन दृष्टि रखने छथि जकर वास्तविकताक उद्घाटन ममताक कथनसँ स्पष्ट भ’ जाइत अछि--- ममताः— “अहाँ बच्चा भैयाकेँ दुरदुरौने रहैत छियनि.... लाल भैयाक  लल्लो-चप्पो मे लागल रहै छी....जे काल्हि डॉक्टर बनताह तनिका छनन-मनन खोअबैत छियनि।”19 समाजक नींव परिवार छैक आ परिवारक आधारशिला पति-पत्नी। पति-पत्नीक परस्पर विश्वास, समझदारी ओ सहयोगहिसँ परिवार सुखी भ’ सकैछ। जँ दुनूमे सँ एकहुँ पंगु भ’ जायत तँ परिवाररुपी गाड़ीक दुर्घटना हेबाक संभावना बढ़ि जाइत अछि। ताहि हेतु आब पुरुषहुँ केँ सोच’ पड़तैन्हि जे नारीक संग मानसिक समायोजन आब अत्यंत आवश्यक भ’ गेल अछि। शिक्षाक प्रति नारीक बदलैत दृष्टिकोण कोनो देश समाज अथवा जाति तावत धरि सभ्य नहि बुझल जायत जाधरि ओहि देश, समाज, अथवा जातिमे नारीक आदर नहि हेतैक। जँ पुरुष देशक भुजा थिक तँ नारी हृदय, जँ पुरुष देशक हेतु दीप थिकाह तँ नारी दीपकक तेल जँ पुरुष द्वारक सुन्दरता छथि नारी घरक प्रकाश, जँ एकक बिनु द्वार सुन्न लागैत अछि तँ एकक बिन घर अन्हार। वैदिक युगमे पुत्रीक शिक्षाक ओतबे महत्व छल जतबा कि पुत्रक। ऋग्वेदमे शिक्षित स्त्री-पुरूषक विवाहहि केँ उपयुक्त मानल गेल अछि। पिता द्वारा कन्याकेँ अपन पुत्राहिक भाँति शिक्षित कयल जाइत छल आ कन्याकेँ सेहो ब्रह्मचर्य कालसँ गुजर’ पड़ैत छलैक। अथर्व वेदमे लिखल छैक जे “कन्या सुयोग्य पति प्राप्त कर’  मे तखने सफल भ’ सकैत अछि जखन कि ब्रह्मचर्य कालमे ओ स्वयं सुशिक्षित भ’ चुकल हो। कतोक नारी शिक्षाक क्षेत्रमे महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त  कयने छलीह। एतय धरि ओ लोकनि वैदिक ऋचा धरिक रचना कयने छलीह। लोपामुद्रा, धोषा, सिकता, निवावरी, विश्ववारी आदि एहि प्रकारक विदुषी नारी छलीह जनिक उल्लेख ऋग्वेदमे भेटैत अछि। वैदिक यज्ञवादक प्रतिक्रियाक फलस्वरुप उपनिषद्कालमे एक नव दार्शनिक आन्दोलनक प्रारम्भ भेल। ओहिमे नारीक सहयोग कोनो कम नहि छल। ऋषि याज्ञवल्क्यक पत्नी मैत्रेयी परम विदुषी छलीह। ओ धनक अपेक्षा ज्ञान प्राप्तिक कामना बेसी करैत छलीह। बृहदारण्यक उपनिषदमे उल्लेख अछि जे याज्ञवल्क्यक दोसर पत्नी कात्यायनीक पक्षमे अपन सम्पतिक अधिकार छोड़ि अपन पतिसँ मात्र ज्ञानदानक प्रार्थना कएलनि। एहि तरहेँ बृहदारण्यक उपनिषद् मे सेहो विदेहक राजा जनकक सभामे गार्गी आ याज्ञवल्क्यक मध्य उच्च स्तरीय दार्शनिक वाद-विवादक उल्लेख अछि। उत्तर वैदिक कालमे समयक गतिक संगहि-संग नारी शिक्षाक क्षेत्रमे शनैः शनैः ह्रास होम’ लागल। कन्याकेँ सुविख्यात आचार्य ओ प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्र धरि भेज’ मे समाजक उत्साह किछु कम पड़ि गेलैक, ई विचार प्रबल भ’ गेल जे घरहि पर कन्याक पिता, भाय अथवा आन कोनो निकट संबंधी हुनका शिक्षित करताह। परिणाम स्वरुप स्वाभाविक रुपसँ ओकर धार्मिक अधिकार शिक्षाक अधिकारमे ह्रास होम लागल। कालक्रमानुसारे शनैः शनैः नारीक प्रति पुरुषक बदलैत धारणाक कारणेँ नारी वर्गमे अशिक्षा व्याप्त भ’ गेल। मैथिल समाजमे एखनहुँ नारी शिक्षाकेँ अधलाह मानल जाइत अछि। नारी जगतमे शिक्षाक अभावक कारणेँ ओकर मूल्य एको कौड़ीक नहि रहि जाइत अछि। एहि संदर्भमे ‘बसात’ केँ देखल जा सकैछ- “जे महिला आजुक युगमे देहरिसँ आगाँ पयर नहि बढ़ा सकय एको कौड़ी अरजि नहि सकय, एतेक तक जे ककरहुँसँ भरि मुँह बाजि नहि सकय तकरा जँ नाँगड़ि कही बलेल कही, बौक कही, गोबरक चोत कही त’ कोनो अनुचित नहि।”20 स्वातंत्र्योत्तर युगमे नारी मे आत्मनिर्भरताक प्रवृति विशेष रुपमे देखल जाइत अछि, आब ओ गोबरक चोत बनि नहि रह’ चाहैत छथि कालीनाथ झा ‘सुधीर’ क  नाटक ‘कुसुम’ क नायिका पिताक आज्ञासँ शिक्षा प्राप्त करैत छथि मुदा हुनक माय हुनका एहि लेल तिरस्कृत करैत छथि— कमला-  “इ गप्प की छियैक ? हमरा वंशमे आइ धरि कोनो स्त्री नहि  पढ़लक तों हमर वंशमे दाग लगौलेँ। मौगीक काज थिक भानस, गीतनाद, कसीदा आ ओइसँ बेसी भेल तँ चिट्ठी - पत्री लिखब । तोँ कि बाप जकाँ अँगरेजिया बनबैं ?”21 ‘बसात’ नाटकमे कृष्णकान्त द्वारा मिथिलाक अशिक्षित नारी पर तीव्र प्रहार कयल जाइत अछि। ओ अशिक्षिता फुलेश्वरी विवाह नहि क’ पड़ा जाइत छथि। फुलेश्वरी  कृष्णकान्त द्वारा अपमानित भेला पर अपनाकेँ सुधारैत छथि। शिक्षा प्राप्त कय समाज सेविकाक काज करैत छथि। शिक्षा प्राप्त क’ फुलेश्वरी मैथिल नारीक मस्तक गर्वसँ ऊँच करैत छथि। हिनक चरित्र द्वारा नाटककार मैथिल ललनाक शिक्षाक प्रति जागरूकताक दिस ध्यान आकृष्ट  कयने छथि। शिक्षिता फुलेश्वरीकेँ देखि जोतखी द्वारा हुनक प्रशंसा कयल जाइत अछि- बम बाबा—“वाह-वाह! --- बेटी तोहर सफलता पर आइ हमरा अपार हर्ष भ’ रहल अछि, आ कतेक अबलाकेँ सबला बना रहल अछि। आब हमरा विश्वास भ’ गेल। आइ ने काल्हि तोहर प्रतिज्ञा अवश्य पूरा हेतौ- एक दिन फेर मिथिलाक महिला भारतक आदर्श महिला कहओतीह।”22 एहि तरहेँ हम देखैत छी जे उनैसम आ बीसम शताब्दीक आरंभमे राजा राममोहन राय तथा आर्य समाजक प्रयत्नसँ जाहि नारी शिक्षाकेँ आरंभ कयल गेल ओहिमे आइ व्यापक प्रगति भेल अछि, आ एहि विषय के प्रतिपाद्य बना कतोक मैथिली नाटककार मिथिलाक नारीमे शिक्षाक प्रति दृष्टिकोणमे  परिवर्तन आनबाक प्रयास कयने छथि। एहि प्रयासक सकारात्मक प्रभाव आजुक समाज पर प्रत्यक्ष देखबामे आबि रहल अछि। नारीक शिक्षाक संदर्भमे ‘पणिक्कर’ लिखैत  छथि। नारी शिक्षा विद्रोहक ओहि कुड़हड़िक धारकेँ तेज क’ देने अछि जाहिसँ हिन्दु सामाजक जीवनक झाड़ी केँ साफ केनाय संभव भ’ गेल अछि।23 निष्कर्ष मैथिली सामाजिक नाटकक अध्ययन आ अनुशीलनोपरान्त हम एहि निष्कर्ष पर पहुँचैत छी जे विशेष क’ स्वातंत्र्योत्तर युगक मैथिली नाटककार सामाजिक विवर्तनकेँ ध्यानमे राखि लिखलनि जाहिमे प्रमुख स्वर रहल अछि नारी समस्या। यद्यपि एखनहुँ मिथिलामे दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती, जानकी आदिक पूजा कयल जाइत अछि, तथापि आजुक नारी विभिन्न सामाजिक कुप्रथाक कारणेँ मजबूर छथि, लाचार छथि। एहि उत्पीड़नक जड़ि जँ खोजल जाय तँ हमरा जनितेँ सभसँ भयावह स्थिति उत्पन्न होइत अछि दहेज आ विधवा-विवाहक समस्याकेँ ल’ क’ ।  यद्यपि बाल-विवाह, वृद्ध – विवाह, बिकौआ प्रथा  एखनहुँ समाजसँ उठि नहि गेल अछि तथापि एहि दिशामे जागरुकता अवश्ये देखबामे आबि रहल अछि। मैथिली नाटककार लोकनि नारीक कारूणिक दशासँ द्रवित भ’ कए कतोक नाटक मध्य एहि समस्या सभकेँ लक्ष्य बना नाटकक रचना कयने छथि जाहिसँ समाज-सुधारक जागरण जोर पकड़ि सकय। मुदा एतय एकटा प्रश्न उपस्थित होइत अछि जे स्वातंत्र्योत्तर मैथिली नाटकमे सामान्य नारीक प्रतिबिम्ब कतेक दूर धरि स्पष्ट अछि ? एहि कालावधिक नाटककार नारी-चित्रण आत्मीयता एवं सहानुभूतिसँ नहि कयलनि, प्रत्युत पुरूषक दृष्टिएँ कएलनि। स्वातंत्र्योत्तर नाटकमे नारीक निष्प्रेम जीवनक कथा थिक जे सामाजिक प्रतिबन्धक अन्तर्ज्वालामे झुलसि कए नष्ट भ’ रहल अछि। पुरूषक आकांक्षा, आदर्श ओ निर्दयताकेँ टारब हुनका हेतु असंभव भ’ जाइत अछि। नारी जीवनक व्यथा, कठिनता एवं कुण्ठाक चित्रण करबामे नाटककार तत्परता देखौलनि, किन्तु ओ समाजक हेतु निष्प्रयोजनीय प्रतीत भ’ रहल अछि। एहि कालावधिमे मैथिली नाटकमे नारीकेँ जतेक आदर्शवादी ढ़ंगसँ चित्रण कयल गेल अछि, ततेक यथार्थवादी दृष्टिएँ नहि। संदर्भ 1.           डेविस, ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ वोमेन, पृष्ठ—172 2.           स्वर्ण सकूजाक लेख, ‘महिला सशक्तीकरण युग में निरंतर असक्त होती नारी’, राधाकमल मुखर्जी चिन्तन परंपरा, जुलाई—दिसम्बर 2001, अंक—1 3.           बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—43 4.           एकांकी संग्रह, सं. सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, मैथिली अकादमी, पटना, 1977,पृष्ठ—133 5.           वएह, पृष्ठ—26 6.           रक्त, अरविन्द कुमार ‘अक्कू’, शेखर प्रकाशन, टेक्सटबुक कॉलोनी, इन्द्रपुरी, पटना, 1992,पृष्ठ—20 7.           लक्ष्मण रेखा खण्डित, महेन्द्र झा, उपेन्द्र झा, ग्राम- मलंगिया, दरभंगा, पृष्ठ—68 8.           त्रिवेणी, परमेश्वर मिश्र, मिथिला प्रेस, 1950,पृष्ठ—41 9.           लेटाइत आँचर, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, पृष्ठ—25 10.      वएह, पृष्ठ—63 11.      कनियाँ-पुतरा, गुणनाथ झा, पृष्ठ—21 12.      सप्तपर्णा, सं. डॉ. देवेन्द्र झा, पृष्ठ--21 13.      तेसर कनियाँ, मणिपद्म, पृष्ठ---16 14.      नाटकक लेल, नचिकेता, पृष्ठ—20-21 15.      नायकक नाम जीवन, नचिकेता, अखिल भारतीय मिथिला संघ, 9/1  खेलात घोष लेन, कलकत्ता, 1971,पृष्ठ—9 16.      दहेज, चौधरी यदुनाथ ठाकुर ‘यादव’ पृष्ठ—46 17.      बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—47 18.      एना कते दिन, अरविन्द कुमार ‘अक्कू’, चेतना समिति पटना,1985, पृष्ठ—16 19.      लेटाइत आँचर, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, पृष्ठ—63 20.      बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—18 21.      कुसुम, कालीनाथ झा ‘सुधीर’, पृष्ठ—3 22.      बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—47 23.      के. एम. पन्निकर, दूभि 09 मई 2008 क बात थिक। गाम गेल रही। साँझ चारि बजे तरकारी किनबा आ घुमबाक लाथे तिरंगा चौक दिस चलि गेलहुँ, घुरैत काल स्कूल लग अबैत-अबैत दीया-बातीक बेर भ’ गेलैक। गरमीक दिन छलैक मोन भेल कनी काल स्कूलक ओहि प्रांगणमे सुस्ता ली जतय कहियो बैसि हम अपन पाठ याद करैत रही। जहिना बैसबाक उपक्रम कयलहुँ कि एकटा अप्रत्याशित स्वर सुनबामे आयल... हे बाउ! ओतय नहि एमहर आउ। हम चौंकि गेलहुँ, देखैत छी तँ सरिपहुँ एकटा स्त्री हमरा सोझामे ठाढ़ छलीह आ बैसबाक आग्रह क’ रहल छलीह। हम बैसि गेलहुँ, हमरा सम्मुख ओ स्त्री  सेहो बैसि गेलीह। हम साश्चर्य ओहि स्त्रीकेँ देखय लागलहुँ जिनक रूप-रंग किछु एना रहनि---हरितवर्णक शरीर ताहिपर हरियर रंगक मैल,पुरान-सन साड़ी जे कहुना हुनकर स्त्रीयांगकेँ झाँपने रहनि, ताहूमे कतोक ठाम पियन लागल, शेष शरीर उघारे बुझू। सम्पूर्ण शरीरमे छोट-पैघ घाव जाहिसँ पीज बहैत रहनि। एक-दू ठाम मैला सेहो लागल, जे दुर्गन्ध करैत छल। बामा जाँघ पर ढ़ल-ढ़ल करैत फोका, दहिना जाँघ पर गोदना जकाँ कोनो विशिष्ट आकृति, दुनू हाथ नोछड़ल जकाँ, माथक केश गोबरछत्ता जकाँ जाहिमे शिखर, पान-पराग, तुलसी, रजनीगंधा, माणिकचंद गुटखा, आदिक फाटल-चिटल पुड़िया, अखबार, कागदक टुकड़ी, जड़लका सिगरेटक पुत्ती आ टुकड़ी, सुखल गोबर, सूगरक मैला आदि-आदि सभ ओझरायल। एहि नारीक विचित्र ओ दयनीय दशा देखि हमर उत्कंठा बढ़ि गेल। हम पुछलियनि-- अहाँ के छी? ओ कहलनि-- हम दूभि थिकहुँ। वैह दूभि जाहि पर अहाँ एखन बैसल छी। वैह दूभि जतय बैसि अहाँ नेनपनमे नीरजक कविता पढ़ैत छलहुँ “यह जीवन क्या है निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है, सुख-दुख के दोनो तीरों से चल रहा राह मनमानी है...।” हम फेर पुछलियनि –अहाँक एहन दुर्दशा किएक ? ओ बजलीह--- बाउ, हम देखि रहल छी जे अहाँ तखनसँ हमर अंग-प्रत्यंगकेँ खूब नीक जकाँ निहारि  नेने छी। पहिने अहाँ बताउ, हमरा सुनबामे आयल अछि जे अहाँ साहित्यमे उच्च शिक्षा प्राप्त केने छी, ओहुमे मैथिली सन सरस साहित्यमे। हम कहलियनि—सत्ते कहलहुँ। तखन संभव भ’ सकय त’ हमर एहि दयनीय दशाकेँ अहाँ कोनो पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित करबा दिऔक। आ ओ आश्वस्त हैत बाजय लगलीह—बाउ, हमर शरीर स्कूलक एहि हातामे पसरल दूभिक प्रतीक थिक तैँ हरियर। हमरा माथ पर जे अहाँ गुटखा, सिगरेटक टुकड़ी, अखबार आ कागदक टुकड़ी देखैत छी से एहि स्कूलक छौंड़ा-छौंड़ी सभक किरदानी थिक, हम अहाँकेँ कहैत जाइत छी आ अहाँ एमहर-ओमहर नजरि दौड़ा-दौड़ा क’ देखने जाउ....। हमर देह जे घावसँ दागल अछि से सिगरेटक जड़लका पुत्तीसँ, हाथ जे नोछड़ल देखैत छी से थिक मोद बाबू (मुखियाजी) क नोकरक किरदानी, ओ सभ दिन एतय आबि छिल्ला छिलैत अछि, दिनमे कैक बेर सूगर, महिस, गाय, बकरी आदि हमरा दूषित करैत रहैत यै, बाम जाँघ पर ई ढ़ल-ढ़ल फोका थिक वैह मंगरूआक लोकक किरदानी, ओ काल्हि राति चूल्हिक अँगोरा हमरा देह पर फेंकि देलक, आ हमरा दहिना जाँघ परक ई चेन्ह जकरा अहाँ गोदना बुझि रहल छी से वस्तुतः कोन चीजक आकृति थिक से हमरा कहितहुँ लाज लागि रहल ऐ, साँझहिकेँ, माने एखनसँ कनी कालक पश्चाते देखबैक जे एहि गामक गँजेरी छौंड़ा सभ हेज बनाकेँ आओत, सिगरेटमे भरि कए गाँजा पीयत आ हमरा झरका-झरका कए एहन अश्लील आकृति बनबैत अछि, हे! ओहिठाम देखियौक..., ई जे मैला देखि रहल छी, से थिक एहि आस-पड़ोसक स्त्रीगणक काज, कने रतिगर भेलाक बादे एक दिस सँ पथार जकाँ बैसि जाइत छथि। हे! ओमहर देखियौक हत्ताक कछेड़मे... की कहू बाउ, जीयब दूभर भ’ गेल अछि। (एकटा दीर्घस्वास लैत) ओ फेर बाजय लगलीह--बाउ, अहाँकेँ अपन नेनपनक बात स्मरण अछि ने ? ताहि दिन प्रातः 10 बजे (प्रायः) स्कूल पहुँचलाक पश्चाते सभसँ पहिने सरस्वती वन्दना होइत छलैक जाहिमे शिक्षक-छात्र सभ क्यो भाग लैत छलाह। तकरा बाद श्रीवास्तव मास्टर साहेब सभ नेनाकेँ एक पतियानीसँ बैसा दैत छलाह, आ ओसब नेना एकहक टा कागद आ आन-आन सभ प्रकारक गंदगी सभ चुनि-बीछि लैत छल। हमर काया एकदम साफ भ’ जाइत छल। कक्षा सभमे जखन हाजरी होइत छलैक तँ नाम पुकारल जाइत छलैक, हरेराम, युगलकिशोर, शंभु, कुमारसंभव, चन्द्रकला, रहीम, कौशल्या, कतेक मधुर आ सार्थक नाम! सुनि कए मोन तृप्त भ’ जाइत छल। साँझ के नेना सब कबड्डी आ खो-खो खेलाइत जखन गिर जाइत छल तँ हम ओकरा बेसी चोट नहि लागय दियैक, वात्सल्यक अनुभव करैत छलहुँ तहिया। शनि केँ विशेष आयोजन होइत छलैक। शनिचराक गुर-चाउर बाकुटक-बाकुट नेना सभ खाइत छल, की कहू बाऊ, अहाँ सभक हाथ सँ गिरलाहा गुर-चाउर खयबा लेल हमहुँ शनि दिनक प्रतीक्षा करैत छलहुँ। दोसर पहरमे सांस्कृतिक कार्यक्रम होइत छलैक। “जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर, हे माय अहाँ बिनु आस ककर...। कखन हरब दुःख मोर हे भोला बाबा... । दुनियाँ मे तेरा है बड़ा नाम, आज मुझे भी तुमसे पर गया काम....।” अहाँकेँ तेँ स्मरण हेबे करत बाउ रमाकान्त एकबेर गयने छलाह “चल चमेली बाग मे मेवा खिलाऊँगा.....” ताहिपर मोलवी मास्टर साहेब हुनका चुत्तर पर ततेक ने छौंकी मारने रहनि जे बेचारेक सभटा मेवा घोसड़ि गेल रहनि। आ अहाँकेँ ओ अन्त्याक्षरी वला बात याद अछि की नहि? तहिया अन्त्याक्षरी मे कविताक पद्य सभ पढ़ल जाइत छलैक, अहाँ एकबेर ‘य’ पर अटकि गेल रही, गाब’ लगलहुँ—“ये मेरा दीवानापन था....”अहाँकेँ मोलवी साहब बजा कए पुछने छलाह “यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ......अहाँ काल्हिये ने याद केने छलहुँ, तँ बिसरि कोना गेलहुँ ? ” आ तकरा बाद हुनक छड़ी आ अहाँक दुनू हाथ। एकदिन रविशंकरक चुगली एकटा नेना क’ देने रहैक जे “मास्टर साहेब ई अपन ककाक जड़लका बीड़ी  पीबैत रहय” एहि लेल श्रीवास्तव मास्टर साहेब रविशंकरकेँ रौद मे एक घंटा धरि अहीठाम मुरगा बना देने रहथि। ताहिदिन ककर मजाल रहैक जे एहि स्कूलक हाता मे क्यो गाय, महीस, आ बकड़ी-छकड़ी ल’ कए घुसि जायत। यैह मोद बाबू (मुखियाजी) क नोकर एतय एकबेर छिल्ला छिलय बैसल रहय, मुखियाजी हुनका ततेक ने गारि-बात दलकैक, तकर ठेकान ने। ओ बजने जाइत छलीह आ हम अपन अतीतलोकमे विचरण क’ रहल छलहुँ। अचानक हम हुनका टोकि देलियनि-- अच्छा एकटा बात कहू, आइ काल्हि की एहन व्यवस्था नहि छैक एतय ? आब तँ देखै छियै जे ताहि दिन सँ बेसी सरकारक ध्यान शिक्षा पर छैक। लोक सेहो जागरूक भेल अछि शिक्षाक प्रति। हम त’ देखि रहल छी जे नीक भवन अछि, पानि पीबा लेल कल अछि, मूत्रालय अछि, शौचालय अछि, उचित संख्यामे शिक्षकगण छथि, आब की चाही ? ओ बजलीह-- औ बाउ! अहाँ जे किछु बजलहुँ सेहो साँचे थिक मुदा अहाँ आइ एलहुँ काल्हि चलि जायब। हम तँ कतोक बरखसँ एतहि छी आ प्रत्यक्षदर्शी छी, तैँ हमहुँ जे कहल आ जे कहब से फूसि नहि। एतय दूई भवन मे चारि टा कक्ष छैक आ विद्यार्थी 400 सयक करीब, एक तिहाई बच्चा कक्षमे बैसैत छैक आ शेष एहि हातामे आ ओहि बड़क गाछतर घुड़दौड़ करैत रहैत छैक, क्यो गुटखा, क्यो....., क्यो चरैत महिसक सींग पर दय ओकरापर चढ़बाक अभ्यास करैत अछि तँ क्यो........। शौचालय, मूत्रालयकेँ अहाँ एकबेर देखि अबियौक एकोटामे पल्ला नहि लागल छैक, उपरसँ ततेक दुर्गन्ध जे राम कहू ! कल अहाँ काल्हि आबि कए देखि लेब। ई तँ परसू जलघर बाबूक बेटीक बियाह छलनि ताहिलेल ओ अप्पन कल एतए लगौने छलाह, आ शौचालयमे बोराक चट्टी। काल्हिए कलो खुलि जेतैक ? एतय गड़लाहा पाइपे टा स्कूलक छैक। की कहू, कल जहिना लागै छैक पाँचे-दस दिनमे क्यो चोरा लैत छैक। हे लियह! कुकुरक झौहड़ि सुनि रहल छी ने अहाँ ? बराती सभ जे काल्हि भोरमे चूड़ा-दही खा-खा क’ पात सभ स्कूलक पछुआड़ि मे फेकने छल ततहि कुकुर सभ लड़ि रहल अछि। खैर! छोडू ई सब बात। आब पढ़ाईक व्यवस्था सुनू--- अहाँ केँ तँ बुझले हैत जे हमरा सभक दयानिधान मुखमंत्रीजी कॉन्ट्रेक्ट पर कैक लाख लोककेँ बिना कोनो परीक्षे-तरीक्षे नेने मास्टर बना देलथिन, सेहो की जे गामक लोक गामहिमे शिक्षक हेताह। तैँ ढ़ोरहाय-मंगड़ू सब शिक्षक बनि-बनि एतय आबि गेल छथि, जिनकामे सँ कतोक केँ तेँ अपन नामो.....। प्रार्थना आब नहि होइत छैक। जँ कहियो काल होइतो छैक तँ चारि सय मे सँ चारिये टा नेनाक मुँहसँ स्पष्ट शब्द बहराइत छैक बाँकी सब आऊँ-आऊँ, ऊँ-ऊँ करैत रहैत छैक। हाजरी मे नाम पुकारल जाइत छैक-–डबलू, बबलू, डेजी, रोजी, स्वीटी.....। शनिचराक प्रथा उठि गेल छैक। सांस्कृतिक कार्यक्रम एखन धरि होइत छैक, एखनो गीत गाओल जाइत छैक—“एक आँख मारूँ तो पर्दा हट जाये, दूजा आँख मारूँ कलेजा फट जाये.........। तनी सा जींस ढीला कर.... आदि।” एक दिनक बात कहैत छी, एकटा विद्यार्थी गाना शुरू कएलक—“चोली के पीछे क्या है......” आकि सबटा मास्टर ठेठिया-ठेठिया क’ हँस’ लागलाह। मंजय मास्टर साहेब केँ नहि रहल गेलनि ओ नेनाकेँ डाँटि कय बैसा देलथिन। ताहिपर, मंतोष मास्टर साहेब आ मंजय मास्टर साहेबमे नीक जकाँ बाझि गेलनि। मंजय मास्टर साहेब कहलैथ—मेरा मानना है कि इसमें बच्चे का कोई दोष नहीं है, अगर यही गाना गाना उस बच्चे की मजबूरी है, तो हम एक शिक्षक होने के नाते इसी गाने के प्रति उसके दृष्टिकोण को बदल सकते हैं, बस एक वाक्य में समझाकर की, “चोली के पीछे, ‘माँ’ होती है, जिसका अमृतपान करके हम, आप, सबके शरीर को जीवन मिला है।” एहि घटनाक बाद सभ शिक्षक मिलि कए मंजय बाबूक नव नामकरण कय देलकनि ‘मायराम’। तहिया सँ ओहि कागमंडली मे हंस सदृश्य मंजय बाबूक बुधिये हेरा गेलनि। एकटा आर गप्प सुनू, यैह पिछले शनि दिनक बात छैक, अन्त्याक्षरी चलैत रहैक, एक सँ बढ़िकए एक कटगर फिल्मी गाना सब नेना लोकानि गबैत छल, अचानक ‘य’ पर एकटा दल अटकि गेलैक….. एकटा बच्चा उठल आ कहलक, “यह लघु सरिता का बहता जल, कितना शीतल, कितना निर्मल.......।” एकटा मास्टर साहेब ओहि बच्चकेँ लगमे बजौलकनि आ कहलथि-- “अहाँ काल्हिये ने अपन मम्मी-पप्पाक संग सिनेमा देख’ सहर्षा गेल रही, ओहि सिनेमाक गाना, ये गोरी गोरी बाँहे, ये तिरछी तिरछी.......,बिसरि गेलहुँ ? बड़ भोदू छी अहाँ।” दुभि रानीक कथा चलितहि रहनि की एहि बीचमे हमरा एकटा आर नारीक कर्कश स्वर सुनाए पड़ल... “गै माय के छियै ई मुनसा! ऐतेक कालसँ एतय की क’ रहल छैक? बुझैत नहि छैक जे  ई लोक-बेदक, बाहर-भीतर करबाक बेर छैक?” हमर ध्यान ओमहर गेल, अन्हारमे बुझा पड़ल जे तीन-चारिटा स्त्रीगण एम्हरे बढ़लि चलि आबि रहल छलीह। हम जा एमहर ताकी ताधरि दूभिरानी निपत्ता ! हमहुँ उठि कए घर दिस चलि देलहुँ। ओहि भरि राति हमरा निन्न नहि भेल। कारण छल जे हम ई निर्णय नहि क’ सकलहुँ जे ओ सरिपहुँ दुभिए छलीह आ कि हमरा मोनक भ्रम ? जतेक सोचैत गेलहुँ ओतेक ओझराइते गेलहुँ, मुदा एकटा बात हमरा मोनमे घर क’ लेलक जे ई घटना एकटा कथाक रूप अवश्य ल’ सकैत अछि। काल्हिए हमरा मैसूर जेबाक रहय। सोचलहुँ एकर पांडुलिपि बना कए कोनो पत्रिकाक संपादक लग प्रेषित क’ देबैक, जँ ई कथा छपि गेल तँ हमहुँ अपन सीना तानि कए कहब जे “हम मैथिलीक कथाकार छी” सोझे-सोझ मैथिलीक एम.ए., पी-एच.डी. कहयलासँ कोनो प्रतिष्ठा नहि। मैथिली पढ़ि जँ मैथिलीक कथाकार, साहित्यकार नहि कहयलहुँ, तँ मैथिली पढ़बे किएक कएलहुँ ? हँ एकटा समस्या तँ रहिये गेल, एहि कथाक शीर्षक की दिऐक ? चलू जेहने कथा तेहने शीर्षक, ‘दूभि’। (समसामयिक निबंध) जाग’ जाग’  महादेव ! मिथिला, अनादिकालसँ धर्म, शिक्षा, साहित्य संस्कृति आदिक विशिष्टताक लेल अद्वितीय रहल अछि। एतय एक-सँ बढ़ि कए एक मुनि, मनीषी, तपस्वी भेल छथि, जिनका सभक उपदेश आ आचरण आइयहुँ ओतबे प्रासंगिक अछि। मुदा अनेकानेक कारणसँ आइ बड़ तीव्र गतिएँ सामाजिक विवर्तन भ’ रहल छैक। एहि बदलैत सामाजिक परिस्थितिमे कोन वस्तु आ संस्कार ग्राह्य छैक आ कोन अग्राह्य ताहि विषयकेँ ल’ क’ लोकमे भयंकर द्वन्द्व आ संघर्षक स्थिति उत्पन्न भ’ गेल छैक। मूल रूपसँ पाश्चात्यवादी सभ्यताक अन्धानुकरण ओ आन-आन कारणेँ, लोक अपन सभ्यता, संस्कृति, सँ विमुख भेल जा रहल अछि, परिणामस्वरूप, समाजमे भूख, भय, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अपराध, बेरोजगारी आदिक समस्या दिनानुदिन गंभीर भेल जा रहल छैक। लोक एहि सभ समस्यासँ मुक्तिक लेल अपस्यांत अछि, बैचैन अछि। ओकरा कोनो रस्ता नहि भेटि रहल छैक। मानसिक अशांतिक शांतिक लेल लोक भगवानक शरण मे आबि रहल अछि (ओकरा लागै छैक आब यैह टा रस्ता बचि गेल अछि)। यैह कारण अछि आइ जतय देखू ततहि थोकमे धर्मक दोकान खुजि गेल छैक। हमरो संग सैह भेल, विभिन्न प्रकारक विसंगति आ झंझावात तेना ने हमरा नचार क’ देलक जे हमहुँ अंततः धर्महिक शरण मे गेलहुँ। ई संयोगे छल जे ताहिदिन हमरा सभक दिस धर्मक एकटा टटका दोकान खुजल छलैक- जाग’ जाग’ महादेव! मिथिलाक लेल ई कोनो नव धर्म आ नव संप्रदाय नहि छलैक, हँ, एकटा बात नव अवश्य कहि सकैत छी जे एहिमे बस अहाँ देवाधिदेव महादेवकेँ ‘गुरू’ बना लिअ, आ कि सभ समस्या छू मंतर। हम अपन अनुभव कहि रहल छी, जहिया सँ हम महादेवकेँ गुरू बनैलियन्हि हमर सभटा समस्या सरिपहुँ छू-मंतर भेल जा रहल अछि। महादेवमे दम छनि, से हमर धारणा दिनानुदिन दृढ़ भेल जा रहल अछि। यैह कारण थिक जे कतहुँ अबैत-जाइत, माने जतय कतहुँ महादेवक मंदिर, फोटो देखैत छी, मोने-मोन जाग’ जाग’ महादेव! कह’ लागैत छी। यैह परसूका बात थिक हमरा एक आवश्यक काजे गामसँ सहरसा जयबाक रहय, ने जानि कोन कारणेँ ओहिदिन गाड़ी-घोड़ा बन्न छलैक, हम पयरे चलि देलहुँ। हमरा गामसँ लगभग 10 कि.मी. क दूरी पर महादेवक एकटा मंदिर छैक, बड़ भव्य, प्राचीन आ सिद्ध। गरमीक दिन रहैक, रौद कपारे पर लागैक। सोचलहुँ मंदिरमे जाग’ जाग’ महादेव ! क’ लैत छी, आ कने काल प्रांगणक एहि विशाल बरक गाछतर चबूतरा पर सुस्ता लेब। मंदिरमे माथ टेकि चबूतरा लग आबि बैसि गेलहुँ। हमर मोन कने अशांत रहय तैँ ओतय ध्यानक मुद्रामे बैसि महादेवक स्मरण कर’ लागलहुँ, आकि एहन आभास भेल जे सरिपहुँ साक्षात् महादेव हमरा समक्ष आबि गेलाह। आबितहि पुछलैथ– की यौ शिष्य! की हाल-चाल ? हम कहलियनि-- हे गुरू! से तँ अहाँ जनिते छी ? ओ कहलनि-- चिन्ता जुनि करू शिष्य! सभ समाधान भ’ जेतैक। हम कहलियनि-- हे महादेव! जखन अहाँ लग सभ समस्याक एतेक त्वरित उपचार अछि तखन अपनेक एहि संसारमे एतेक प्रकारक रोग-शोक, व्यभिचार, अनाचार, अत्याचार आदि किएक ? ओ कहलनि-- शिष्य, “मोन चंगा तँ कठौत मे गंगा” अहाँ पहिने हमर अस्तित्वकेँ स्वीकार करैत छलहुँ ? नहि ने? मुदा आइ जखन अहाँक मोनक श्रद्धा जागृत भेल तँ देखिये रहल छी जे हम साक्षात् अहाँक समक्ष उपस्थित छी। हम कहलियनि-- एकर माने भेल जे अहाँ अपन शिष्ये टा पर कृपा करैत छी, वैह टा अहाँक संतान थिक, आ आर सभ ? की ई प्रश्न अहाँक ‘जगतपिता’ उपाधि पर प्रश्न चिह्न नहि अछि? ओ कहलिन-- कथमपि नहि शिष्य हमरा लेल सभक मान बरोबरि अछि। जाधरि धर्म आ कर्मक गणितकेँ लोक नहि बूझत ताधरि ई समस्या, ई भेद रहबे करतैक। एहिमे हमर कोन दोख। अहीं जे अपन सभ काज-धन्धा छोड़ि कय एतय दिन-राति जाग’ जाग’ महादेव! करैत रहब तँ अहाँकेँ की बुझाइत अछि जे महादेव....। हे महादेव! हमरा सन मन्द-बुद्धि, धर्म आ कर्मक तत्त्वकेँ कोना बुझत? हम तँ बस एक्कहिटा चीज बुझैत छी, महादेव! आर किछु नहि। बस! बस! बस! अहाँक श्रद्धा, विश्वास आ सत्कर्म सैह थिकाह महादेव, सत्यं शिवं सुन्दरम्। हे महादेव! ई बूझब तँ हमरालेल आर जटिल भ’ गेल, सत्य, सुंदर आ शिव केँ बुझ’क सामार्थ्य हमरा कतय? अपन संस्कार, संस्कृति, लोकाचार, भाषा-साहित्य, धार्मिक आचरण, आदिकेँ बुझू, यैह सत्य थिक, यैह सुंदर थिक, यैह शिव थिक। बेस, आब कने-कने बुझलहुँ। हे महादेव! आर सभ छोड़ू एकटा बात बताऊ, एहि गामक अधिकांश लोकनि पढ़ल-लिखल छथि, ज्ञानी छथि, अपन परंपरा, अपन संस्कारादिक प्रति जागरूक छथि तकर पश्चातो हमरा बुझने कतहुँ ने कतहुँ........। औ शिष्य! आइ-काल्हि जे जतेक बेसी पढ़ल-लिखल लोक छथि से ततबे बेसी मूर्ख। ई अहाँ की कहि रहल छी, एहन भ’ सकैत अछि जे कखनहुँ-कखनहुँ पढ़लो-लिखलो लोकसँ गलती भ’ जाइत छैक, मुदा तकर जतेक परिमाण अहाँ बता रहल छी से बात हमरा नहि पचि रहल अछि। औ शिष्य! कहब तँ छक द’ लागत। ई कोनो गुटका (पान-मसाला) छियैक जे पचि जायत। अहीं कहू, अहाँ जे भरि दिनमे 10 पुड़िया गुटखा खा जाइत छी से कोना? ओहि पुड़िया पर नहि लिखल छैक जे “तम्बाकू चबाना स्वास्थ के लिए हानिकारक है”। हे ओहि महाशयकेँ देखियौक, ओ राजधानीक जानल-मानल डॉक्टर छथि, घंटे-घंटे पर सिगरेट (ओहो किंग साइज) पीबैत छैक, जखन की सभटा सिगरेटक पैकेट पर लिखल रहैत छैक, “धुम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है” एतबे किएक, हे ओमहर ओहि होर्डिंग पर पढ़ियौक- “सिगरेट पीने से कैंसर होता है, जनहित मे जारी, कैप्सटन फिल्टर, आखिरी कश तक मजेदार।” (हमर माथ शरम सँ झुकि गेल) से जे हो मुदा एहिठामक लोक धर्माचारी आ........। महादेव- हँ, हँ, से त’ अवश्ये, तहिया सँ ठीके आइ काल्हि हमर पूजा पाठ करयबलाक संख्या बढ़ि गेल अछि। मुदा ........। मुदा की ? आब लोकमे ओ भाव नहि रहलैक। आब लोक हमर पूजा कर’ नहि अबैयै, हमरासँ ‘डील’ कर’ अबैये। बुझलहुँ नहि, कने स्पष्ट करू। की-की सभ स्पष्ट करी शिष्य! सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्थामे घून लागि गेल छैक। एकहकटा जँ फरिछा-फरिछा अहाँकेँ कह’ लागी तँ कैक दिन धरि एहिना अहाँ केँ ध्यानमग्न रह’ पड़त। जिज्ञासा कएलहुँ अछि तँ लिअ हम किछु ‘डील’ केर बानगी अहाँकेँ सुना दैत छी..... एकटा (बालक)--- हे महादेव! बाप कहैत छलाह पढ़’क लेल तँ हम गुल्ली-डंडा खैलयबामे भरि साल मस्त रहलहुँ, एहिबेर कहुना पास करा दिय’ तँ ...... एकटा नवयुवक –- हे महादेव! एहिबेर देवघर जयबाकाल हमरा जाहि ‘मालबम’ सँ परिचय भेल छल तकरहिसँ हमर बियाह करा दिअ तँ..... एकटा नवयुवती— हे महादेव! अहाँ हमरा कोनो नीक निर्देशकक सिनेमामे माधुरी दीक्षितक ‘धक-धक’ वला रोल दिआ देब तँ...... दोसर नवयुवती--- हे महादेव! अहाँक देल गेल रूप–गुण सँ संपन्न रहितहुँ हमर बियाह नहि भ’ रहल अछि, हमर माय-बाप विक्षिप्त भ’ गेल छथि। एहि दुनियाँ सँ सबटा दहेजक दानव केँ एक्कहि दिन उठा लिअ तँ.... एकटा प्रौढ़— हे महादेव! जानैत-बुझैत ‘मनीगाछी’क कोठा पर बेर-बेर जाइत रहलहुँ तैँ आइ ‘एडस’ सन लाईलाज बीमारीसँ ग्रस्त छी—जँ अहाँ हमरा एहि सँ मुक्ति दिया दी तँ.... एकटा बेरोजगार— हे महादेव! पढ़ि-लिखि कए झाम गुड़ैत छी, जँ अहाँ हमरा एकबेर लादेनसँ भेंट करा दी तँ........ एकटा वृद्ध दम्पति- हे महादेव! अपनेक दयासँ हमरा बेटा-पुतोहुकेँ कोनो कमी नहि, मुदा हमरा दुनू परानीक पेट ओकरा सभक लेल पहाड़ सदृश छैक। जँ अहाँ हमरा एहि जन्मसँ मुक्ति दिया दी तँ अगिला जनममे ............ एकटा राजनेता— हे महादेव! हमरा पार्टीक सरकार बन’मे एक्केटा सीट घटैत छैक। हम निर्दलीय महाप्रलय सिंह केँ तीन करोड़ टका देब’ लेल तैयार छी अहाँ ओकर मति फेरि दिऔक, जँ हमर सरकार बनि गेल तँ............. एकटा व्याख्याता— हे महादेव! भरि जिनगी चोरि आ जोगाड़क बलेँ नीक अंक सँ पास होइत रहलहुँ आब व्याख्याता छी। छौंडा सभकेँ ततेक ने नेतागिरीक चस्का लगा दिऔक जे साल भरि महाविद्यालय आ विश्वविद्यालयमे ताला लटकले रहय। जँ एहन संभव भ’ जाय तँ..... एकटा अछूत-– हे महादेव! एक्के हार-मांस, एक्के खून, तकरा पश्चातो लोक हमरा अछूत बुझैये। हमरा संग जे भेल से भेल हमरा बेटाकेँ एहन दंश नहि झेलय पड़य। जँ एहन भ’ गेल तँ.... एकटा शराबी --- हे महादेव! पीबैत-पीबैत, सभटा धन-सम्पति स्वाहा भ’ गेल। तीन दिनसँ एक्को ठोप नहि भेटल अछि, हम अपन बेटी सुगियाकेँ ओहि दारूवाला लग.....जँ एक्को बोतल दिआ दी तँ.... मैथिली (भाषा) – हे महादेव! अहाँ तँ जानिते छी जे हमर गौरव, मान, मर्यादा, कहियो मिथालाकेँ के कहए जगत्ख्याति प्राप्त कएने छल, मुदा आइ अपनहि घरमे हम उपेक्षित  छी। ओना आइ काल्हि मैथिलीक लेल तथाकथित संघर्षकर्ता लोकानि एतयसँ दिल्ली धरि धरना-प्रदर्शन कर’ चलि जाइत छथि, मुदा सबटा फुसि थिक, सबटा मिथ्याडंबर, तैँ जाधरि हमरा अप्पन घरमे सम्मान नहि भेटत ताधरि हम अपन गौरवकेँ पुनः प्राप्त नहि क’ सकैत छी। जँ एहने स्थिति रहलैक तँ भ’ सकैछ जे हम कहियो निर्वस्त्र भ’ जाएब। हे जगतपति! अहाँ मैथिल लोकनिमे मैथिलीक प्रति नवजागृति आनि दिऔक। एहिसँ अहाँकेँ सेहो लाभ हैत-- फेर कवि विद्यापतिक श्रुतिमाधुर्य नचारीसँ अहाँक मंदिरक वातावरण आप्लावित भ’ जाएत। हम कंगालिन छी, हमरा अहाँकेँ देबाक लेल किछु अछिए नहि, तैं हम की ‘डील’ करी ! हे महादेव सुतल किएक छी, जागू ! एहि अबलाक व्यथा सूनू-जाग’ जाग’ महादेव..... मैथिली ततेक जोरसँ चीकरलीह जे हमर ध्यान दुटि गेल। ने जानि आब कहिया महादेव दर्शन देताह। आह्वान भारत भूमिक नवतुरिया हमर कविताक आह्वान सनू भ’ तन्मय अपन कान खोलि छथि बाजि रहल भारती से सुनू हे भारत ! ई भारती थिक अति विवश भाव भंगिमा नेने हिल रहल ठोर किछु कहबा लेल प्रेरित क’ रहल किछु करबा लेल कखनहुँ अहाँक कखनहुँ हमर एहि लेल बाट निहारैत छथि बस त्राहि-माम पुकारैत छथि छथि कहथि देखू हमर ई दशा शोणित सँ रंजित श्वेत वसन नखसँ शिख धरि अछि जख्म भरल लूटि रहल हमर अछि अमन-चैन पंजाब,असम,गुजरात,आँध्र कश्मीर सहित अन्यान्य प्रान्त अछि सिसकि रहल भ’ भयाक्रान्त छल कहियो उत्तुंग गर्वसँ हम्मर सिर प्रकृति प्रदत्त पावन कश्मीर केसरिया सेब क’ रहल श्रृंगार लहलह-हरियर बाग निशात उज्जर बर्फशिला बाँटि रहल छल शांतिकेर संदेश उधार छल बहैत जतय शीतल समीर चहुँदिस आब बरसैत अछि गोली नहि खेलू, नहि खेलू रोकू ई खूनक होली जाति-धर्मक उन्माद भड़का जे उन्मादी अहाँकेँ लड़ाबैत छथि हुनकर तँ कुरसीक प्रश्न छैक मुदा की यैह अहाँक मानवता थिक ? (18-08-2008,मैसूर) Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

88 8 8 अनलकांत- मैथिली त्रैमासिक पत्रिका अंतिकाक सम्पादक। हिन्दीमे गौरीनाथ नामसँ लेखन दू टा हिन्दी कथा-संग्रह प्रकाशित। तर्पण अनल·ांत गाम· छिच्छा आब ए·ोरत्ती नी· नइँ लागि रहल छै डॉक्टर ·ामना यादव ·ेँ। लो·े अधक्·ी होइ छै, वंशउजाड़ौन होइ छै! अपने हाथ-पयर भ·ोसि ·ृतमुख बनि जाइ छै!...मुदा एना तँ नइँ जे गाम· ·ोनो चीन्हे-पहिचान नइँ रहय? ·तÓ गेल ओ गाम जे उजडि़-उपटि गेल अपन भूतपूर्व गौआँ लो·नि· स्वप्ने टा मे अबै अछि?... तखन ओ अपना आँगन· ·Óल लग बाथ·ीट आ ·पड़ा राखि पछुआडि़ धरि आयल छलि। ई पछुआडि़ ओ·रा पोखरि· पूबारि महार पर छलै। जतÓ ए· टा ·ागजी नेबो· गाछ छलै आ ओहि मे मारतेरास नेबो लुध·ल छलै। ·िछु पीयर-पीयर नेबो खसि ·Ó सडि़ गेल छलै। ·ने हटि पतियानी सँ पाँच टा अडऱनेबा गाछ रहै। ओहू मे ·ै· टा अडऱनेबा तेहन पीयर सँ ललौन ज·ाँ भÓ रहल छलै जे खसेला पर भक्·ा-भक्·ा भÓ जयतै। ·िछु मे तँ चिड़ै-चुनमुनी भूर सेहो तेना पैघ-पैघ ·Ó देने छलै जे भितर·ा लाली लखा दै छलै। ओ भूर सब ·ेँ ध्यान सँ देखि रहलि छलि। ·ि ए· टा अडऱनेबा· भूर देखि ओ चिड़ै· ·ला·ारी पर मुग्ध भÓ गेलि। ओहि अडऱनेबा मे ऊपर-नीचाँ पातर आ बीच मे ·ने चा·र भूर तेहन ढंग सँ बनायल छलै जेना अंग्रेजी· ए· टा 'वीÓ अक्षर पर दोसर 'वीÓ उनटि ·Ó राखल हो!...ओहि पर ए· गो बगिया राखि देने पूरा भूर मुना जयतै! ओहि भूर देखि बगिया मोन पड़ला सँ ओ·र अरुआयल-अरुआयल सन मोन ओस नहायलि दूबि ज·ाँ लहलहा गेलै। एहि बेर गाम अयला· बाद पछिला तीन दिन मे ई एहन पहिल क्षण छलै जखन ओ·र ठोर पर मुस्·ी· पातर-सन रेह जगजियार भÓ अयलै। पछिला तीन दिन सँ ओ ए· टा ढंग· रखबार आ·ि चौ·ीदार लेल परेशान छलि। ·ै· टा एजेंसी· दलाल सँ गप्प ·Ó चु·लि छलि। सब ·ै· टा ने रखबार लÓ ·Ó आयलो छलै, मुदा ·ामना यादव ·ेँ जेहन ग्रामीण टाइप· ·ाजुल आ अनुभवी रखबार चाही छल, से नइँ भेटि पाबि रहल छलै। ओ·र दादा ·ारी यादव· अमल सँ रहि रहल बुढ़बा रामजी मंडल आब अपन बेटा-पोता लग रहय चाहै छल। ओ·र पैरुख सेहो था·ि गेल छलै। जेना-तेना ·ारी यादव सँ मंगनी यादव धरि· जीवन तँ पार लगा देल·ै, मुदा त·रा बाद ·ामना लग हाथ जोडि़ देल·ै, ''नइँ बुच्ïची, आब पैरुख नइँ छौ। ·िछु दिन हमरो बेटा-पोता संग रहै· सख पुरबÓ दे। ÓÓ एहि पर ·ी ·हैत ·ामना?...ते ँ ओ ससम्मान बुढ़वा· विदाइ ·रÓ चाहै छलि, मुदा ·ोनो दोसर रखबार भेटतै तखने ने?... पछिला दू मास मे ई ओ·र तेसर यात्रा छलै। लगले लागल ई यात्रा ओ·रा परेशान ·यने छलै, मुदा ओ·र समस्या· निदान नइँ भÓ रहल छलै। ओम्हर पूना मे ओ·र क्लीनि· ए·-ए· दिन बन्न भेला सँ जे परेशानी आबि रहल छलै, से अलगे। बाप· जीबैत ·ामना गाम· बाट बिसरिए ज·ाँ गेलि छलि। ·ै· बेर तीन वा चारि साल सँ बेसी पर आयलि छलि। तहिना दू मास पहिने मंगनीलाल यादव· मुइला· बाद जे ओ गाम आयलि छलि सेहो प्राय: दू साल सँ बेसीए पर। ई रच्छ रहलै जे ओ·र बाप ओ·रा क्लीनि· मे मुइलै आ तत्·ाल गाम अयबा· झंझटि सँ बचि गेलि। नइँ तँ एसगरि जान ·ी-·ी ·रितय? एहने ठाम भाय-भातीज, ·क्·ा-पीसा, बहिन-गोतनी आ·ि जाउत-जयधी बला पुरना परिवार मोन पडि़ जाइ छै लो· ·ेँ। जे-से, ओ एसगरुआ छलि ते ँ ·हियो ओ·रा पर ·ोनो दबावो नइँ देल·ै ओ·र बाप। तीन सँ चारि मास नइँ बीतै ·ि बुढ़वा अपने पहुँचि जाइ पूना। फोन पर तँ गप्प होइते रहै छलै।... बाप· मादे सोचैत-सोचैत ·ामना· ठोर पर· मुस्·ी ·खन ने बिला गेल छलै। ओ·र नजरि चारूभर सँ भट·ि ·Ó पोखरि· अँगनी दिस झु·ल लताम गाछ पर चलि गेल छलै। एहि गाछ· रतबा लताम तेहन ने लाली लेने रहैत रहै जेना सुग्गा· लोल ·ि ओ·र अपने तहिया· ठोर बुझाइत रहै। लताम गाछ· पात ·ो·डिय़ा गेल छलै। फूल-फर एखन नइँ छलै। मुदा ·िछुए मास मे, ·ने गरमी धबिते, ए·र पात फेर नव तरहे ँ लहलहा जयतै आ फूल-फर सँ लदि जयतै ए·र डारि। फेर-फेर एहि पर लुध·ि जयतै डम्हा आ पा·ल लताम। तखन फेर बहरेतै एहि रतबा लताम· भीतर सँ वैह लाली। मुदा ओ·र ठोर? नइँ, आब तँ बाजार· महँग-सँ-महँग लिपिस्टि·ो नइँ सोहाइ छै ओ·रा। गाछ· आत्मा डिब्बा मे ·े भरि स·ैए? पछुआडि़· मारतेरास अड़हर-बड़हर, अत्ता-शरीफा, अनार-बेल, ·ेरा-मुनिगा सन गाछ पर सँ नजरि हटा ·ामना यादव पोखरि· पानि मे खेलाइत माछ दिस ता·Ó लागलि। चारि-पाँच टा रोहु· ए· टा झुंड पैघ-पैघ सुंग डोलबैत झिहरि खेला रहल छलै। पानि· सतह पर दूर धरि खूब-खूब हलचल पसरि रहल छलै। एहि हलचल मे हेरायलि ·ामना दू डेग आगू बढि़ दूबि· निर्मल ओछाओन पर टाँग पसारि बैसि गेलि। ओहि दूबि पर ·चनार· ·िछु फूल खसल छलै। ए· फूल उठा हाथ मे तँ लÓ लेल·, मुदा ओ·र नजरि पानि· हलचले पर रहलै। ई हलचल ओ·रा भीतर ए· टा नव हलचल अनल·ै। ओहि हलचल संग बहैत-भसिआइत ·ामना· भीतर ·ते· ने अतीत· पन्ना फडफ़ड़ाबÓ लगलै।... ...ई पोखरि ओ·र दादा· खुनायल छलै। अपन पूरा जीवन गाय-महीस· बीच गुजारÓ बला ओ·र दादा एहि परोपट्टïा· अंतिम अँगुठाछाप छलै। ओना रोज-रोज गाय-महीस दूहैत ओ·र अँगुठा· निशान मेटा ज·ाँ गेल छलै। ताहि पर, गोबर-गोंत गिजला· बाद, सदिखन ओ तीन ·िलो· हरौती आ·ि गेन्हवाँ लाठी जे प·डऩे रहैत छल, से ओ·र हाथ· रेखा खाय गेलै। मुदा ओ·र ·पार· रेखा जगजियारे होइत गेलै। खदबद ·रैत पंडित-पजियार आ·ि बाबू-बबुआन सभ सँ भरल गाम· ए· मात्र 'अहूठ गुआरÓ ·हाबÓबला ·ारी यादव ओहिना 'मडऱÓ नइँ ·हाबÓ लागल छल! दूध-घी· पैसा आ·ि गाछ-बाँस आ उपजा-बारी सँ ·ै गोटे सुभ्यस्त भेल अछि? ओहि सँ पैत-पानह बचि जाय, तँ बड़·ा बात!...से जेना-तेना पैत-पानह बचबैत ·ारी यादव स्वयं अँगुठाछाप होइतो अपन ए·मात्र मँगनिया बेटा मंगनी यादव ·ेँ शहर-नगर· ·ॉलेज-यूनिवर्सिटी धरि पढै़ मे ·ोनो ·मी नइँ होअय देल·। ·ारी यादव सुधंग लो· छल। ओ·रा नजरि मे दरोगा आ बीडीओ सँ बढि़ दुनिया मेेेे ·ोनो हा·ीम नइँ छलै आ सैह ओ अपन बेटो ·ेँ बनबÓ चाहै छल। मुदा मंगनी यादव से नइँ बनि स·ल। ओ ·ाशी· नामी विश्वविद्यालय मे प्रोफेसर बनल तँ ·ी? बाप· लेल मास्टरे छल!...ओ रंगमंच· मशहूर ·ला·ार भेल तँ ·ी? बाप· लेल नचनि!े छल!...बियाहो ओम्हरे ·यल·। मुदा ·ारी यादव लेल धनसन। माय· चेहरा मोन नइँ छलै मंगनी ·ेँ। बापे· रान्हल खाइत अपना हाथें बनायब सीखल·। ते ँ बाप· दु:ख ओ·रा बेसी छटपटाबै, मुदा बाप लेल ओ ·िछु ·Ó नइँ पाबय। ई फरा· जे हरसाइत मंगनी बाप ·ेँ खुश ·रै· खूब प्रयास ·Ó रहल छल। ओ जखन-जखन गाम आबय, बाप लेल मारतेरास ·पड़ा-लत्ता आ अने· सामान आनय। मुदा ओ·र बाप ·ेँ त·र दर·ारे ने रहै छलै! खरपा पहिरय बला ·ारी यादव ·ेँ चप्पल-जूता सँ गोड़ मे गुदगुदी लागै। गोलगला छोडि़ ·ुर्ता पहिरब ओ·रा ·ोनादन ने बुझाइ। मंगनी· आग्रह पर बाबा विश्वनाथ· दर्शन ·रबा· लोभ ओ·रा बनारस जयबा लेल उस·ाबै तँ जरूर, मुदा माल-जाल आ गाछ-बिरिछ· चिन्ता पयर रो·ै। ते ँ ओ बेटा लग बनारस ·हियो ने जा स·ल। गाछ-बिरिछ सँ बुढ़वा· बेसी लगाव· ए· टा खास ·ारण ईहो छलै जे बेसी गाछ बुढिय़ा· लगायल छलै। फेर बुढिय़ा· सारा सेहो सरौली आम आ बुढ़वा धात्री गाछ· बीच मे छलै जे गोहाल सँ ओ·रा सुतÓ बला मचान· ठी· सोझाँ पड़ैत छलै तहिया। ओइ सारा पर ए· टा ने ए· टा तुलसी गाछ सब दिन रहै छलै। गाय-महीस दुहला· बाद बुढवा ओही तुलसी गाछ दिस घुरि·Ó धार दैत छल। फेर नहेला· बाद ओहि तुलसी आ धात्री· जडि़ मे पानि ढारब सेहो नइँ बिसरै छल। मंगनी जहिया ठे·नगर भेल छल तहिया सँ बाप ·ेँ अपने हाथे ँ भानस ·रैत देखने छल। ओ·र ·नियाँ· गौना· बाद ई सब ·िछु दिन लेल छुटबो ·यलै, मुदा ·ामना· जन्म· ·िछुए मास बाद ओ अपन परिवार बनारस आनि लेल·। फेर बुढ़वा· वैह हाल भÓ गेल रहै। मंगनी ए· टा चा·र रखबाबÓ चाहल·, तँ बुढ़वा डाँटि-धोपि थथमारि देल·ै, ''धुर बुडि़! हमरा देह मे ·ोन घुन लागल जे हम दोसरा सँ चा·री खटायब?... एहने ठाम ·है छै, माय ·रय ·ुटौन-पिसौन बेटा· नाम दुर्गादत्त!...ÓÓ ·िछु दिनु·ा बाद मंगनी तातिल मे गाम आयल तँ बुढ़वा ·ेँ ·ने बीमार देखल·। बुढ़वा डाँड़ ·ने टेढ़ ·Ó·Ó चलै छल आ सूतल मे ·ुहरैत रहै छल। दिन मे ·ै· ने बेर लोटा लÓ बहराइत छल आ ढंग सँ ·िछु खाइतो ने छल। मंगनी ·तबो पूछै, ''हौ, ·ी होइ छअ?ÓÓ, मुदा बुढ़वा सही-सही ·िछु बतबैते ने छलै। बुढ़वा ·ेँ शहर· डॉक्टर लग चलै लेल मंगनी ·तबो जिद्द ·रै, बुढ़वा तैयारे ने होइ। अंत मे मंगनी खायब-पीबि छोडि़ रुसि रहल। तखन बुढ़वा मंगनी ·ेँ मनबैत ·हल·ै, ''रौ मंगनी, चल खाय ले। तों ·िऐ जान दै छही! हम मरिये जेबै तँ ·ी बिगड़तै? आब जीवि·Ó ·ोनो बान्ह-पोखरि देबा· छै हमरा?ÓÓ ''·िऐ हौ बाबू, मरि·Ó तों हमरा ·पूत ·हबेबह·? ·हÓ तँ जीवि·Ó बान्ह-पोखरि ·िऐ ने दए स·ै छह· तों?ÓÓ मंगनी· स्वर भखरि गेलै। ''रौ मंगनी, ओइ लेल ए· बोरा टा·ा चाही। से ने हमरा दूध-घी सँ हैत, आ ने गाछ-बाँस आ·ि उपजा-बारी सँ। तोहर मास्टरियो सँ नहिऐं हेतौ। ·ोनो दरोगा-बीडीओ भेल रहितय तखन ने!...ÓÓ ·ारी यादव गंभीर स्वर मे बाजल। ''हौ बाबू, तों नइँ बुझै छह·! हम दरोगा-बीडीओ सँ पैघे छिऐ हौ। तों बाजÓ ने जे ·ोन बान्ह देबह· आ·ि पोखरि खुनेबह·!...ÓÓ ''ठी·े ·है छही रे?ÓÓ ''हँ हौ!...हम तोरा फूसि ·हबह?ÓÓ ''बान्ह· तँ एहि जमाना मे ·ोनो खगते नइँ छै। ए· टा पोखरिए खुना तँ बड़·ी टा, अपना घर· पश्चिम दू बिगहा मे। मरियो जायब तँ, जुग-जुग धरि नाम तँ रहतै जे ·ारी जादब पोखरि खुनेल·।...ÓÓ बुढ़वा भावना मे बहÓ लागल छल। ''चलह, पहिने तोहर दवाइ ·रा दै छियह। ठी· होइते तों मटि·ट्टïा मजूर सब सँ बात ·रह। जहिया· दिन तों ठी·बह· तहिए सँ ·ाज शुरू भÓ जेतै।ÓÓ आ से ठी·े भÓ गेलै। आ ओही संग ए· टा चौ·ीदार, टेहलु·, भनसिया आ·ि मैनेजर जे बूझी, ताहि रूप मे रामजी मंडल ·ेँ ओ रखबौने छल। ई फरा· जे त·रा बादो बूढ़वा जावत जीयलै माल-जाल रोमब, दुहब-गारब आ·ि गोबर-·रसी; ·िछु ने छोड़ल·। रामजी मंडल ओ·रा घर-परिवार· अपन समाँग ज·ाँ भÓ गेल छलै।...आ ·ारी यादव· मान-मर्यादा तते· बढि़ गेलै जे ओ पूरा परोपट्टïा मे 'मडऱÓ ·हाबय लागल छल। ·ामना ·ेँ ई सब बेसी सुनले छै। ओहि पोखरि· जाग जे भेल छलै त·र भोज ·ने-मने मोन छै ओ·रा। मुदा दादा· हाथ· तीन ·िलो· लाठी· ओ लाली एखनो खूब मोन छै ओ·रा। ओहि लाठी मे चुरु भरि तेल पचाबैत ·ाल· दादा· मालिश सेहो ओ·रा मोन छै। ओ लाठी एखनो ओ·रा घर· ·ोनो ·ोन मे राखल छै ठी· सँ, जुगता·Ó। ओ·र दादा ·ारी यादव· मुइला· बादे एतÓ फुसिघर· जगह पक्·ा म·ान बनल छलै। मुदा ओहि मे रहÓबला रामजी मंडल टा छलै। ओ·रा सँ मारते बबुआन· बीच ए· गुआर· घर· ठी· सँ देखभाल नइँ भÓ पबै। ताहि पर ·िछु मालोजाल छलै। सभ छुट्टïी मे मंगनी अबै तँ ·िछु ने ·िछु नव बिदैत भÓ गेल रहै। हारि·Ó ओ आँगन-दलान संगे पोखरि-गाछ—माने पूरा सात बिगहा· र·बा· चारू ·ात खूब ऊँच देबाल दÓ·Ó त·रा ऊपर खूब ऊँच धरि ·ाँटबला तार· बेढ़ सँ बेढ़बा देल·। ए· जोड़ा ·रिया गाय छोडि़ बा·ी मालजाल हटा देल·। त·रा संग रामजी मंडल ·ेँ सख्त आदेश भेटलै जे गाछ· ·ोनो फल आ·ि तीमन तर·ारी ओ जते चाहय खाय स·ैत अछि, मुदा एक्·ो पाइ· ·िछु बेचि नइँ स·ै अछि। त·र पालन ·रैत रामजी मंडल ओ·र बाग-बगीचा, बाड़ी-झाड़ी सँ पोखरि धरि ·ेँ सब दिन खिलखिल हँसैत जेना बनौने रहल। अपने मंगनी दू-तीन मास पर आबि त·तान ·Ó जाय। ओना ओ·रा सभ· सब छुट्टïी गामे मे बीतै छलै आ ओहि छुट्टïी मे माय-बाप· संग ·ामना सेहो अबै छलि। जे-से, समय-साल बीतैत गेलै। आ ए· दिन मंगनी यादव विश्वविद्यालय सँ सेवामुक्त भÓ सपत्नी· गाम आबि गेल। तखन ·ामना अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली मे एमबीबीएस फाइनल ·Ó रहलि छलि आ दुनियाँ साधारण सँ साधारण आदमी· मु_ïी मे अँटÓ लागल छलै। ओहि समय धरि दुनियाँ· सब शहर मे ए· तरह· बसात बहÓ लागल छलै आ अपना ठाँ· गाम-घर खाली भÓ रहल छलै। ··रो बेटा शहर बसलै, तँ बाप· मरिते डीह पर नढिय़ा भु·Ó लगलै। ·िओ चारो दिस· ·र्ज आ उ·बा मे घेराय आ·ि दबंग· प्रताडऩा सँ डराय राता-राती गाम छोडि़ देल·, तँ ·िओ भूख· आवेग मे जतÓ-ततÓ पड़ा गेल। बाबू-भैया लो·नि ·ोनो ने ·ोनो ·ंपनी· स्थानीय मैनेजर भÓ अपना ·ेँ शहरी बनाबÓ लगलाह, तँ ·िछु गोटे वातानु·ूलित लाक्षागृह मे सेन्ह लगेबा· प्रयास मे धोती-·ुर्ता उज्ïजर ·रÓ लगलाह। गाम-गाम· खेत-पथार बड़·ा-बड़·ा ·ंपनी· फॉर्म हाउस मे बदलÓ लागल छल। सस्ता ·ार सन· ·ारखाना आ ·ेमि·ल्स हौज लेल पैघ-पैघ र·बा हथियाओल जा लागल छल। ·िसान नाम· प्राणी मे सँ ·िछु अपने अपन लीला खत्म ·Ó लेल·, ·िछु शहर-नगर· मशीन चलबÓ चलि गेल आ जे बचल छल त·रा मे सँ ·िछु मारल गेल, ·िछु ·ेर जीन बदलि एहन मजूर बना देल गेल जे ने शहरी रहल आ ने देहाती आ ज·र ने ·ोनो भाषा रहल आ ने ·ोनो आने चीन्ह-पहिचान। सगरे नव-नव ·न्वेंट, नव-नव ढाबा, नव-नव च·लाघर मिल्·-बुथ आ टेलीफोन-बुथ ज·ाँ खुजÓ लागल छलै। आ साधारण लो· 'मैन-पावरÓ ·हाबÓ लागल छलै। एहने सन आफत-बसात मंगनी यादव· गाम मे सेहो आयल छलै। एही आफत मे रामजी मंडल· बेटा-पोता ओ·र ·ाजुल घरवाली धरि ·ेँ लÓ·Ó दिल्ली· झुग्गीवास ·रÓ चलि गेल। मंगनी यादव जहिया सेवामुक्त भÓ बनारस सँ गाम घूरल छल, ओ·रा अपन स्टेशन ·ात· दो·ान मे बेसी अपरिचिते लो· भेटल छलै। साँझ· झलअन्हारी मे घर पहुँचÓ धरि ·तौ ·िओ एहन नइँ भेटलै ज·रा सँ दूटप्पियो ·ुशल-क्षेम भÓ स·ैत। रामजी मंडल ·ेँ छोडि़ ओ·र आगमन ··रो लेल ·ोनो खबरि नइँ छलै। अगिला भोर गाम· सड़· धयने टोल· एहि ·ात सँ ओहि ·ात गुजरि गेल मंगनी, ·ेओ हाल-चाल नइँ पुछल·ै। ओतÓ ·तहु ओ·रा अपन ओ गाम नइँ भेटलै ज·रा ओ चिन्है छल। जतÓ पहिने पंडित दीनबंधु झा· घर छलै, ओहि ठाम शून्य-सपाट ए· टा मैदान बनि गेल छलै आ त·रा चारू·ात खूब ऊँच देबाल रहै ज·रा गेट पर ए· टा पैघ सन बोर्ड टाँगल छलै, 'भटिंडा फार्म हाउसÓ। पंडितजी· बेटा आब जामनगर मे बैसि गेल छनि। बेटी अमेरि·ी नागरि·ता लÓ लेने छनि। मंगनी ·ने आरो आगू बढ़ल, तँ देखल· जेम्हर पहिने धनु·टोली छलै, ओतÓ पैघ सन ·ोनो फैक्ट्री खुजि गेल छलै ज·रा छत· ऊपर तीन टा मोट-मोट चीमनीनुमा पाइप मारतेरास धुआँ छोड़ैत आसमान ·ारी ·रबा· अभियान मे लागल छलै। आ टोला· ·ात सँ ·ल·ल हँसैत बहÓबला स्वच्छ-निर्मल जलधारा बला मिरचैया मे जमुना सन गन्हाइत ·ारी पानि तेना जम·ल छलै जेना ·ोनो नाला। मंगनी ·ेँ थ·ान भेलै आ घर घुरय लागल। घर घुरैत ओ जगह ध्यान मे अयलै जतÓ पहिने विशाल-विशाल बर आ पा·डि़· गाछ छलै। ओहि ठाँ लगे-लग ·ोनो दू गोट मोबाइल ·ंपनी· विशाल-विशाल टावर ठाढ़ छलै। ओ रु·ि·Ó चारूभर ता·Ó लागल। दूर-दूर धरि देखला· बादो ओ·रा नजरि पर अपना घर लग· गाछ छोडि़ ·तहु एक्·ो टा तेहेन पैघ गाछ नइँ अयलै। जेम्हरे देखल· सब ·िछु ए·दम उजड़ल-उजड़ल सन बुझेलै। बीच टोल मे आबि ए· ठाम ठम·ल। बगल· दासजी· डीह पर ·ोनो टैंट हाउस· बोर्ड लागल छलै। ·ने हटि ए· टा ट्रैवेल एजेंट· साइन बोर्ड टँगल छलै ज·रा नीचाँ शीशा· गेट· भीतर ए· टा पगड़ीवला सरदार जी ·ुर्सी पर बैसल छलै। त·रा दस डेग आगु· ग्राम देवता स्थान पर बजरंगबली· ए· टा पैघ सन मंदिर ठाढ़ छलै ज·र दछिनबरिया देबाल पर ·ामोत्तेजना जगबÓबला ·ोनो टि·िया· विज्ञापन छलै। त·रा बाद मंगनी ·िछु ने देखल· आ सोझे अपना घर आबि गेल। घर मे ओ·र पत्नी मुनिगा· तर·ारी रान्हि रहल छलि। ओ ओ·रा लग जाय अ·ब·ा गेल। रसे-रस मंगनी अपन घर आ सात बिगहा· र·बा मे घेरायल पोखरि-गाछ, पछुआडि़-महार धरि अपना ·ेँ समेटि लेल·। बेटी ·ामना आ बा·ी हित-मित सँ संपर्· लेल ओ·रा घर मे फोन आ मोबाइल छलै, रंगीन स्·्रीनबला ·ंप्यूटर छलै ज·र तार सम्पूर्ण दुनियाँ सँ जुड़ल छलै। घर· पाछाँ पैघ सन आयता·ार आँगन छलै। आँगन· पश्चिम-उत्तर ·ोन मे चापा·ल छलै। त·र पछुआडि़ मे पोखरि· महार पर मारते गाछ-बिरिछ छलै। ओहि पर सँ ·खनो ·ोयली, तँ ·खनो पड़ौ·ी ·ेर सुपरिचित स्वर आबै।...माने ओ·र गाम ओ·रा सात बिगहा· र·बा मे बन्हायल छलै। जेना-तेना समय ·टि रहल छलै। ·ामना दिल्ली छोडि़ पूना मे प्रैक्टिस शुरू ·Ó देने छलि। मुदा मंगनी· घर पर ए· टा एहन ·ार ·ौआ बैसि गेल छलै जे जखने ओ दुनू प्राणी शांति सँ आराम ·रÓ चाहय ·ि ओ जोर-जोर सँ टाँहि मारÓ लागै। भोर होइ ·ि साँझ, दिन होइ ·ि राति—·ार ·ौआ· टाँहि मारब बन्न नइँ भेलै। आ ए· राति ·ामना· माय· छाती मे तेहेन ने दर्द उठलै जे डॉक्टर· अबैत-अबैत बेचारी चलि गेलि। आ त·रा बाद एसगर मंगनी ·ारी यादव ज·ाँ बाड़ी-झाड़ी मे लागल रहय आ बीच-बीच मे ·ामना लग पूना चलि जाय।...मुदा रामजी मंडल तँ एहन शापित यक्ष छल ज·रा लग ने ·िओ अबै छलै आ ने ओ ·तौ जाय छल।... अनचो·े ·ामना· भ· टूटलै । पोखरि· उतरबरिया महार पर· ·ोनो गाछ पर नु·ायल ·ोयली बाजि रहल छलै। ·ामना· भीतर ·िछु उमडि़ अयलै। मुदा ओ तत्·ाल उठि गेलि। स्नान ·ेँ अबेर भÓ रहल छलै। भोजन· बाद ओ आराम ·Ó रहलि छलि ·ि ओ·र मोबाइल बजलै। ए· टा नव एजेंट· ·ॉल छलै, ''मैडम, ऐसा ·ीजिए ·ि चौ·ीदार और माली ·े रूप में दो अलग-अलग आदमी ·ो रख लीजिए। यहाँ ऐसा ·ोई चौ·ीदार नहीं मिल रहा जो आप·ी प्रॉपर्टी ·े साथ पेड़-पौधों ·ी भी देखरेख ·र स·े। यूँ पोखर ·ी मछली ·ी देखरेख ·े लिए मछुआरे ·ी जरूरत फिर भी रह जाएगी।ÓÓ ''नहीं, तीन-तीन आदमी रखना मुश्·िल है हमारे लिए।ÓÓ, ·ामना बाजलि। ''चौ·ीदार तो नेपाली ही है मगर माली जो मिल रहा है, वह ए· उडिय़ा भाई है। ये दोनों हमारे पटना सेंटर ·े मार्फत आ रहे हैं और उन·ी शर्त है ·ि वेतन ·े अलावा हाउसिंग फैसिलिटी भी चाहिए।ÓÓ बिना ·ोनो जवाब देने ·ामना ·ॉल डिस्·नेक्ट ·Ó देल·। मुदा भीतर सँ ओ·र परेशानी आरो बढि़ गेल छलै। आब एहि गाम मे गाम भने नहि रहि गेल हो मुदा ओ·र बाप-दादा, माय-दादी सभ· स्मृति· गाम सात बिगहा· एहि र·बा मे बेड़हल घर-आँगन, गाछ-बिरिछ, पोखरि-·ल सभ· बीच छै। ·ारी यादव सँ मंगनी यादव धरि· नाल एतहि गड़ल छै। ·ारी यादव· माल-जाल· गोबर-गोंत एतÓ· माटि· ·ोनो ने ·ोनो ·ण मे एखनो खाद· रूप मे बचल हेतै। प्रोफेसर मंगनी यादव· ·ला·ार मोन एहि र·बा मे जाहि गाम· लघु संस्·रण ·ेँ समेटने छल, से जरूर एही ठाम ·तहु ने ·तहु नु·ायल हेतै।... ·ी ए·रा सब ·ेँ ओ लुटा देत?...·ी ओ अपन जिनगी भरि· ·माइ सँ ए·र रक्षा नइँ ·Ó पाओत? ·ामना ·ेँ मोन पडै़ छै जे ए· बेर ओ·र पिता मंगनी यादव बड़ व्यथित मोन सँ ·हने छलै, ''गाम मे जेहो गाम देखाइ छलै, से तोरा माय· मुइला· बाद नइँ बुझाइ छै। ·खनो-·खनो तँ मोन ·रैए जे हमहूँ सब ·िछु बेचि-बि·ीनि ली। मात्र घर-आँगन आ गाछ-पोखरि सँ गाम नइँ होइ छै, बौआ। जखन पहिने ज·ाँ ·ेओ गौएँ नइँ रहल तँ ·ोन गाम आ ·ी गाम?...ÓÓ ·ामना ·िछु जवाब नइँ दÓ स·लि छलि तखन। मुदा एखनो मोन छै ओ·रा जे ओ अपन बाप· ओहि हेरायल-बेचैन आ·ृति ·ेँ बड़ी ·ाल धरि देखैत परेशान भÓ रहलि छलि। एक्·ो शब्द एहन नइँ भेेटल छलै तखन ओ·रा जाहि सँ अपन ·ला·ारमना बाप· मोन ·ेँ राहत दÓ स·ैत छलि। तखन ओ·रा अपन डॉक्टरी· ज्ञान अ·ाज· बुझायल छलै। सहसा ए· ·ोन मे राखल अपन दादा ·ारी यादव· ·ारी खटखट लाठी देखा पड़लै ओ·रा। ओ उठलि ओहि लाठी ·ेँ छुबि·Ó देखबा· लेल, मुदा तखने ·ॉलबेल जोर सँ बजलै। ओ गेट दिस पलटलि। गेट पर सी सी मिश्रा नाम· ए· टा मैथिली भाषी सेक्युरिटी एजेंट· दलाल छलै जे पछिला दू दिन सँ नव-नव रखबार ओ·रा लेल ता·ि रहल छलै। ओहि दलाल ·ेँ ड्राइंग रूम मे बैसा ओ दू मिनट बाद दू गिलास पानि लÓ घुरलि। ·ि विनम्र सन बनैत ओ दलाल बाजल, ''डॉक्टर यादव, सुनियौ! अहाँ बड़ सौभाग्यशालिनी छी जे एखनो अपन बाप-दादा· डीह पर अबै छी। हम तँ नो·रीये· ·्रम मे एम्हर आबि गेलहुँ। ·ोशी· पूबे सही, मुदा ईहो ·हाइ तँ छै आइयो मिथिले ने। हम डीही छी ·मला ·ात·। हमर जनम भेल हिमाचल मे व्यास नदी ·ात· ए· टा अस्पताल मे। बचपन बीतल दिल्ली· यमुनापार मे आ नो·री भेल ·ोल·ाता मे। मैथिली तँ हम ·ोल·ाता आबि सिखलहुँ सेहो एहि लेल जे हमर दादा मैथिली· प्रसिद्ध लेख· छलाह आ हुन·र ·िताब सभ· अंग्रेजी अनुवाद एखनो खूब लाभ दै अछि।...एखन ·ोल·ते· एजेंसी· ·ाजें तीन मास लेल एहि क्षेत्र मे अयबा· अवसर भेटल। एहि क्षेत्र मे ·ै· टा ·ंपनी अपन ·ल-·ारखाना शुरू ·Ó रहल छै, से बहुत जल्दी एतÓ· प्रॉपर्टी· ·ीमत उछलÓबला छै।...ÓÓ ·ामना· धैर्य चु·ि रहल छलै। ओ बाजलि, ''अहाँ ·हÓ ·ी चाहै छी?... साफ-साफ बाजू!ÓÓ ''अहाँ अन्यथा तँ नइँ लेबै?ÓÓ ''बाजू ने!...ÓÓ ''अहाँ यैह ने चाहै छी जे अहाँ· ई गाछ-पोखरि बचल रहय, सुरक्षित रहय आ अहाँ· बाप-दादा· नाम...ÓÓ ''तँ?...ÓÓ, ·ामना· माथ पर बल पड़लै। ''देखू, ओहेन रखबार बड़ महँग पड़त जे अहाँ· इच्छा अनु·ूल हो। एहि लेल रखबार, माली, मल्लाह आ मारतेरास मजदूर पर खर्च ·यला· बादो भेटत तँ ·िछु ने, उनटे चिन्ता आ परेशानी बेचैन ·यने रहत।ÓÓ ''तँ ·ी ·री?... हम बड़ परेशान छी। ओझराउ जुनि।ÓÓ ''सैह ने ·है छी!...आ लाभ· बात ·है छी।...ÓÓ क्षण भरि बिलमि ओ बाजल, ''एहि ठाम ए· टा भव्य रिजार्ट खोलै ·ेर अनुमति जँ दी तँ अहाँ ·ेँ ए· खोखा पूरा भेटि जायत। संगे पोखरि-गाछ· सुरक्षा· गारंटी सेहो। मात्र एहि घर-आँगन ·ेँ तोडि़ नव बहुमंजिला बनबÓ· अनुमति देबÓ पड़त। गाछ सब लग मुक्ता·ाश मे टेबुल-·ुर्सी लगा देल जयतै आ डारि सब पर जगमग लाइट टँगा जयतै। पोखरि मे दू-चारि टा छोट·ा नाह खसा देल जयतै जाहि पर लो· सब अन्हरियो मे इजोरिया राति· मजा लैत नौ·ा-विहार ·रत। पोखरि· बीच मे जाठि· जगह ए· टा छोट सन· सुइट बनि जायत, ज·र डिमांड पर्यटन स्थल सभ पर सब सँ बेसी होइत छै। से एतहु हेबे टा ·रतै। ·िए· तँ एतहु रसे-रस बड़·ा-बड़·ा ·ंपनी· डायरेक्टर, सीईओ, एनआरआई आ विदेशी मेहमान· आगमन शुरू होबए बला छै।...ÓÓ ''हम अहाँ· गप्प खूब नी· ज·ाँ बुझि गेलहुँ।... अहाँ तँ बड़ बुधियार लो· छी यौ!...तत्·ाल अहाँ जा स·ै छी, दान-पत्र हम शीघ्रे पठा देब!...ÓÓ ·ामना अपन आवाज सप्रयास संयत रखल·। ·ने· स·प·ा ज·ाँ गेल मृदुभाषी मैथिल दलाल सी सी मिश्रा चालीस सँ बेसी· नइँ छल। गेट पार ·Ó ओ ए·बेर ठम·ल, ''·ने इत्मीनान सँ विचार ·रबै मैडम। डॉक्टर छी अहाँ, ओल्ड थिं· आ भावु·ता सँ ·िछुओ फायदा नइँ हैत। हानिए-हानि!...ÓÓआ हीं-हीं ·Ó ठिठिआबÓ लागल। चालीस पार ·Ó चु·लि डॉक्टर ·ामना यादव मे प्रौढ़ता आ धैर्य आबि गेल छलै, मुदा तैयो ओ अपना जगह पर बैसलि नइँ रहि स·लि। ओ उठि·Ó दुआरि दिस आयलि। तेज-तर्रार दलाल सी सी मिश्रा लप·ि·Ó अपन विदेशी मॉडल· गाड़ी मे बैसि गेल छल। ·दम· गाछ तर थोड़े· गरदा उडिय़ाबैत ओ·र गाड़ी तुरंते फुर्र भÓ गेलै। ·ामना बाहर· ओसारा पर नहुँ-नहुँ बुलÓ लागलि छलि। ·दम गाछ· बाद देबाल· ·ाते-·ात लागल जिम्हड़, अमड़ा आ अशो· पर बेरिया· रौद खसि रहल छलै। ओहि रौद मे गाछ सभ· पात-पात पर जमल गरदा· मोट·ा परत पर्यावरण-·था ·हि रहल छलै। ओ एहि ·था सँ उबि-था·ि भीतर जइए रहलि छलि ·ि दूरे सँ आबि रहल रामजी मंडल देखा पड़लै। जलखै ·Ó·Ó जे ओ पोस्ट ऑफिस गेल छल से एखन घुरि रहल छलै। ·ामना रु·ि गेलि आ नहुँ-नहुँ अबैत रामजी मंडल ·ेँ देखÓ लागलि। ओ·र देखैत रहबा· अंतराल जते· बढ़ल जा रहल छलै, तते· नजदी· रामजी मंडल पहुँचि नइँ पाबि रहल छलै। रामजी मंडल· डेग भारी भÓ गेल छलै। ओ थाहि-थाहि·Ó लाठी भरें चलि रहल छल। ओ·र लग पहुँचबा· आरो प्रतीक्षा नइँ ·Ó स·लि ·ामना। ओसारा सँ उतरि बाहर· गेट पार ·Ó ओ सड़· धरि चलि आयलि। सड़· पर ·रीब पचास डेग दूर मे अबैत रामजी मंडल ओ·रा अपन दादा ·ारी यादव सन बूढ़ झुन·ुट बुझेलै। ओ झट·ि ·Ó ओ·रा लग पहुँचलि, ''बाबा, ·ी भेलह? था·ल बुझाइ छह·?ÓÓ ''हँ, बुच्ïची!...ÓÓ, रामजी मंडल एतबे बाजल। ओ·र साँस तेज छलै। ·ामना ओ·र बिना लाठी बला हाथ प·ड़ल·ै, ''मोन ठी· छह ने हौ बुढ़वा?ÓÓ ''हँ, ठी· छै!... पहिने ई ·हह जे ·ोनो चौ·ीदार-सिपाही रखलह· तँ नइँ?...ÓÓ ''से ·ी?ÓÓ ''हमरा ई दुआरि नइँ छोड़ा बुच्ïची! हमर साँस एत्ते खतम हेतौ आब।ÓÓ ''हौ बुढ़वा! हम तोरा ·हिया एतÓ सँ जाय ·हलियह? ई सब टा तोरे राजपाट छियह।...हम ·ी ·रबै ए·र?ÓÓ बुढ़वा ·िछु ने बजलै। ·ामना· सहारा पाबि डेग पैघ ·रैत ओ ओसारा पर चढ़ल आ लुद्द दÓ बैसि गेल, ''बुच्ïची, हमरा ·ोनो बेटा-पोता नइँ छौ! ओ सब रा·स छियौ! ओ·रा सब ·ेँ भेलै जे बुढ़वा एतÓ ·मा-·मा तमघैल मे गाडि़·Ó रखने हेतै। ते ँ बजबै छलै। साँच बात ·हला· बाद दू-दू टा चिट्ïठी देने रहियै। तैयो जवाब नइँ आयल, तँ आइ तेसर चिट्ïठी दैत रहियै जे ·हिया लेबÓ अबैए...मुदा ·ी ने ·ी मोन भेल आ पोस्ट ऑफिस लग जाय चिट्ïठी नइँ खसाय, फोन लगेलियै छौंड़ा· फैक्ट्री। ओ बाजल ·ी से सुनबह·?...·हल· , 'एतÓ आबि ·ी ·रबह·? तोरा सँ एतÓ आब ·ोन ·ाज ·यल हेतह? बुढिय़ा ·ेँ सेहो ओतहि पठा दै छियह। जहिया हाथ ·टा लेल·ै, तहिया सँ ·ोनो ·ाज· नइँ छै। ओ·र निमेरा एतÓ नइँ हेतह।Ó...ÓÓ ·ामना ए· क्षण चुप रहलि फेर उत्साह दैत बाजलि, ''हौ बुढ़वा, तोरा नी·े ने हेतह हौ! दु:ख-सुख जे-से, एहि उमेर मे दुनू परानी ए· संग रहबह· तै सँ नी· आर ·ी हेतह?ÓÓ रामजी मंडल· बूढ़ चेहरा पर लाज· संग हँसी· फाहा छिडिय़ा गेलै। ओ खिलखिलाइत उठि·Ó आँगन चलि गेल। तखने घर मे राखल ·ामना· मोबाइल बजलै। पूना सँ ओ·र क्लीनि·· फोन छलै। ओ उठबैते बाजलि, ''डोंट वर्री! सुबह ·ी फ्लाइट से आ रही हूँ। ए·-डेढ़ बजे त· क्लीनि· में रहूँगी।ÓÓ आ एतबा ·हैत ओ·र नजरि ए·बेर फेर अपन दादा ·ारी यादव· तीन ·िलो· हरौती लाठी पर चलि गेलै। ओ लप·ि·Ó लाठी उठौल·। लाठी मे पहिने· लाली आ चम·ि नइँ छलै। ·ारी खटखट ओहि लाठी पर झोल-गरदा जमि गेल छलै। भावावेश मे ·ामना ओहि लाठी ·ेँ चूमÓ चाहल·। मुदा रु·ि गेलि।... ·ामना· हाथ चीन्हÓ जोग नइँ छलै। पूरा हाथ ·ारी भÓ गेल छलै। तखने ध्यान अयलै जे ओ·र ओजनो आब तीन ·िलो तँ नहिये टा हेतै। ·ि ए· ठाम लाठी पर ·ने· दबाव पडि़ते ओ·र आँगूर धँसि जेना गेलै! ·ि ओ·रा बुझेलै जे ई लाठी ·ो·नि ·Ó फों· भÓ गेल छलै आ जोर सँ पट·ि देेने टु·ड़ी-टु·ड़ी भÓ जयतै!... अचांच·े डरा गेलि ओ। डराइते-डराइत ओ ओहि लाठी ·ेँ पूर्ववत घर· ·ोन मे राखि हाथ धोअÓ ·ल पर चलि गेलि। बड़ी ·ाल धरि बेर-बेर हाथ धोयला· बादो ठी· सँ हाथ साफ नइँ भेलै। साबि·· तेल पीयल लाठी सँ आओल ए· टा अजीब तरह· गंध हाथ मे समा गेल छलै। हारि·Ó तोलिया सँ हाथ पोछैत क्षण भरि· लेल पछुआडि़ दिस गेलि ·ामना। ओतÓ ओ·रा लगलै, सब गाछ पर जोर-जोर सँ ·ेओ ·ुड़हरि चला रहल छलै। पोखरि दिस त·बा· साहस नइँ भेलै ओ·रा। ओ सोझे पड़ायलि घर आ जल्दी-जल्दी अपन ब्रीफ·ेस सैंतÓ लागलि। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

33 3 3 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् श्याम सुन्दर शशि, जनकपुरधाम, नेपाल। पेशा-पत्रकारिता। शिक्षा: त्रिभुवन विश्वविद्यालयसँ,एम.ए. मैथिली, प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। मैथिलीक प्रायः सभ विधामे रचनारत। बहुत रास रचना विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। हिन्दी, नेपाली आऽ अंग्रेजी भाषामे सेहो रचनारत आऽ बहुतरास रचना प्रकाशित। सम्प्रति- कान्तिपुर प्रवासक अरब ब्यूरोमे कार्यरत। मरदे कि बरदे भगवान भाष्करक प्रचण्ड प्रतापकेँ सम्हारि सकब धरती मैआक वास्ते कठिन भऽ रहल छलनि। मैञा अपरतीव छलीह। चण्डलवाक प्रलयंकारी रौद्र अवतारसँ अपने बाचथु कि अपन सखा सन्तानकेँ बचाबथु? “अपन मथा साहुर, साहुर” करबाक अवस्था सेहो नहि छल। मिथिलाक धरती थोरै छैक जे यत्र तत्र सर्वत्र हरियरी रहतै। लोक अपनो जुराएत आऽ लोकोकेँ जुरौतैक? ई कतार छै भाई। कतार। एत्त गाछ वृक्ष कत पावि? धनीमानीलोक ऐजुवा (वगैचा) लगबैत छथि। जेना लोक धीया पूताकेँ दूध पियाकऽ पोसैत अछि। तहिना पोसैत अछि एतुका सेखसभ गाछ-वृक्ष। ककरो मजाल छै जे ओहि गाछक नीचाँ सुस्ता लेत..। तुरन्त वन-विनाश कानूनक अन्तर्गत शख्त कार्यवाही भऽ जएतैक। आऽ ओऽ गाछ वृक्ष होईतो नहि अछि सुस्तैवा योग्य। एक कविक कवित जकाँ “वड़ा हुआ तो क्या हुआ लम्बे पेड़ खजुर। पंछीको छाया नही फल लागे अति दूर..” डार मोरवाक योग्य छाहरि नहि। बूझि परैत छल, दोहाक समुद्र वाफ भऽ कऽ उड़ि जाएत। सड़क उपरके अलकत्रा पघलि रहल छल। सरकार एहि गरमीक महिनामे दुपहरमे काज करबापर पाबन्दी लगौने छैक। तथापि देश विदेशक मजुरसभ अपन-अपन ओभर टाईम पका रहल छल। भगवान भाष्करसंगक महासमरमे लागल छल। धरती पुत्रलोकनि। धरती तँ आखिर धरती छैक ने। अपन जनम धरती हो कि करम धरती...। एहि रौदसँ बेपरवाह लक्ष्मण पैघ-पैघ डेग मारैत आगाँ बढ़ि रहल छल। कोनो अभेद्य लक्ष्यकेँ भेदन करबाक योजनामे आगू बढ़ि रहल चोटाएल, हारल योद्धा जेकाँ। एहि बेरक समरमे विजयश्री प्राप्त करबाक दृढ़ सन्कल्पित छल ओऽ। ओकरा ठेकान नहि छलै जे ओकर समग्र देह घामे पसिने भिजी गेल छैक। ओऽ कारी झामर भऽ गेल अछि। ओऽ बस आगू बढ़ि रहल छल, अपन गंतव्य दिस। ओकर गन्तव्य छलै, दोहाक अतिव्यस्त इलाकामे अवस्थित नेपाली दूतावास। जतए ओकर प्रेयसी गत एक सप्ताहसँ शरणागत छैक। मुदा किछुए किलोमीटरक दूरीपर अवस्थित रहलाक बावजूदो ओऽ हुनकासँ भेटि नहि सकल अछि। ओऽ सीधा दूतावासमे प्रवेश कएकऽ मुदा तुरन्ते पाछाँ घुमि गेल। चार दिवालीक ओटमे ठाढ़ भऽ जिन्सपेन्टक पछिला जेबीसँ कंघी निकाललक। केस सीटलक। कपड़ा मिलौलक। आऽ कनेक सतर्क कदमसँ दूतावासक मेन गेटकेँ पार कएलक। दूतावास परिसरमे रहल नेबोक गाछक ओटमे बैसि ओकर प्रेयसी केस झारि रहल छलै। ओएह घुरमल-घुरमल केस। सुराही सन कमर आऽ सुडौल शरीर। पीठपर करिकवा तिलसँ ओऽ आओर निधोख भऽ गेल। ओऽ ओकरे रेशमा छैक। आगूसँ देखू कि पाछोसँ। ईस्स...। ओकरा मोनमे टिस जेकाँ उठलै। मोन भेलै जे पाछेसँ जाऽ भरि पाजकँ पकड़ि ली आऽ गत ९ महिनाक हिसाब-किताब माँगी। ओऽ आगू सेहो बढ़ल मुदा रेश्माक केश जखनसँ खुजल रहैक तखनेसँ दूतावासक चौकीदार सेहो ओकरे दिस ताकि रहल छलै। लक्ष्मणकेँ हिम्मति नहि भेलै अपने प्रेयसीक हाथ धरि पकड़बाक। जहन दुनूक आँखि मिललैक तँ दुनूक नयनसँ अनन्त अश्रुधारा बहि गेलै। एक दिस लक्ष्मण छल, दोसर दिस रेशमा आऽ बीचमे रहैक गाछ। जकरा साक्षी राखि दुनू ९ महिनाक हिसाब किताब फरियौलक। लक्ष्मण एतबे बाजल “हम तँ बरद जेकाँ बहिए रहल छी, एहि मरुभूमिमे, अहाँ दुधपिया बौवाकेँ छोड़िकऽ किया आबि गेलौ?” कतारक मैथिल भेड़ा चरवाह- कतारक सदरमुकाम दोहासँ लगभग एक सय किलोमीटर दूर जमालिया स्थित मरुभूमिक छातीपर बनाओल गेल भेड़ाक गोहियाक आगू ठाढ़ भऽ एक गोट युवक सिटी बजा रहल छल। महाभारतकालीन कृष्ण जकाँ। जनु अपन गोप आऽ गोपीकेँ लग बजेबाक उपक्रम कऽ रहल हो। मुदा एहि मरुभूमिमे ने गाई अएबाक कोनो सम्भावना छलै आऽ ने गोपी। मुदा बकड़ी आऽ भेड़ा धरि अवश्य आबि गेल ओकर सिसकारी सुनिकए। दिनभरि ५० डिग्रीक ताप छोड़ि स्वयं थकित सुरुज भगवान संध्या रानीसँ रसकेलि करबाक धुनमे पश्चिमाचलगामी वाट पकड़ि लेने छलाह। पश्चिमसँ आवएवला सेनुताएल प्रकाश मरुभूमिक वालुपर पड़ि मलिछाह आकृति बना रहल छल। मरुभूमि पिलिया ग्रस्त रोगी जकाँ बेजान देखना जाऽ रहल छल। पछिया हावा सांय सांय कऽ रहल छल। हावाक गतिसंग वालुक छोट-छोट कण उड़ि-उड़ि राहगीरकेँ घायल बना रहल छल। बूझि पड़ैत छल जे प्रलयके पूर्व संकेत हो। चारुकात वियावान मरुभूमि आऽ एहिमे उगल एक आध बबूरक पौध। हम बेर-बेर सोचैत रहैत छी जे धन्य बबूर, ऊँट आऽ सार्कदेशक दुखिया मजुरसभ जे एहि भूमिकेँ धरती होएबाक ओहदा प्रदान करैत छैक। अन्यथा...?? मुदा ओऽ युवक शान्त छल। एक क्षणक बाद सुरुज अस्त भऽ जएतै, सगर सन्सार अन्हार भऽ जएतै आऽ सयौ विगहामे पसरल मरुभूमिपर कारी रंगक चादर ओछा जाएत। ओऽ अन्हार होएबासँ पहिनहि अपना अधिनक भेड़ा आऽ बकड़ीकेँ गोहियामे घुसियावए चाहैत छल। कर्तव्य परायण मनुपुत्रक रूपमे अपन दायित्व निर्वाह करए चाहैत छल। एहि तरहेँ अपन ईसारापर कृष्ण जकाँ भेड़ा-बकड़ीकेँ नचावएवला युवक के नाम छल महेन्द्र कापर। नेपालक सिरहा जिल्लाक कमलाकात भेड़िया गामक ई मैथिल युवक, विजुली, पिवाक पानि, सड़क आऽ स्वास्थ्यादि सुविधासँ विहीन एहि मरुभूमिमे गत एक वर्षसँ एहिना भेड़ा वकरी चड़वैत अछि। महेन्द्र कापर मात्र नहि, एहि मरुभूमिक विभिन्न भागमे बनाओल गेल विभिन्न भेड़ा, बकड़ी आऽ ऊट बथान तथा लगाओल गेल वगैचामे हजारौं नेपाली, भारतीय, वंगलादेशी, श्रीलंकन आऽ सुडियन मजुरसभ काज करैत अछि। अपना सभ दिस एक गोट कहबी नहि छैक जे, “जएवह नेपाल, संगहि जएतह कपार”। तहिना ई युवक सभ अपन करम भोगि रहल अछि। ओऽ सभ अबैत काल जे दोहा देखने छल, चकमक विजुलीवत्ती देखने छल आऽ चिक्कन चुनमुन फोरलेन सड़क देखने छल से घुरैत काल फेर देखत। ओकरा सभक वास्ते दोहा सहर दिल्ली दूर छैक। महेन्द्र जमालियाक एहि अन्कन्टार मरुभूमिमे गत एक वर्षसँ काज करैत अछि। ओकरा जिम्मामे दू सय भेड़ा आऽ बकड़ी छैक। हमरा सभकेँ देखिते ओकर आँखिमे विशेष प्रकारक चमक व्याप्त भऽ गेलै, मुखमण्डलपर खुशीक रेखा नाचए लगलैक। साँझ पड़ि रहल छैक ओकरा लालटेम नेसवाक छैक, रातुक खाना बनेवाक छैक आऽ खुला आकाशक नीचाँ तरेगन गनैत राति बितेवाक छैक। गत एक वर्षसँ महेन्द्रक ई दैनिकी बनि गेल छैक। ईजोरिया रातिक चानकेँ देखि ओऽ अतिशय प्रसन्न होइत अछि, “ई चान हमरो बाऊ आऽ माय आउर सेहो देखैत होतै नञि”? ओकर निश्चल प्रश्न हमरा भावुक बना देने छल। ओऽ भेड़ा आऽ बकरीकेँ गोहियामे गोतैत अछि। पठरूसभकेँ दुध पियबैत अछि। चारा रखैत अछि आऽ चैन भऽ हमरा सभसँ गप्प करवा वास्ते बैसि जाइत अछि। ओऽ एक वर्ष पूर्व कतार आएल छल। मानव तस्करसभ ओकरा कहने रहैक जे वगैचाक काज छैक। ओऽ सोचने रहय जे फलफूलमे पानि पटाएव, रोपव उखारव आ रियाल कमाएव मुदा से भेलै नहि। ओऽ भेड़ा चरवाह बनि कऽ रहि गेल। असलमे महेन्द्र अपने निरक्षर अछि। ओकर कतार आगमनके उद्देश्य छलै गाममे घर बनाएव आऽ बेटा-बेटीकेँ बोर्डिंग स्कूलमे पढ़ाएव। मुदा ओकर एक वर्षक श्रमसँ ई संभव नहि भऽ पाओल छैक। एक वर्षमे तँ महाजनकेँ ऋणो नहि फरिछाओल छैक। एहि वास्ते ओकरा आओर दू वर्ष एहि मरुभूमिक वालुकेँ फाकय परतैक। अवैत काल दलाल ओकरासँ ७५ हजार रुपैया लेने रहैक। जे ओऽ महाजनसँ ऋण लऽ कऽ चुकता कएने छल। जहन महेन्द्रक गप्पक बखारी खुजलै तँ फेर बन्द होएवाक नामे नहि लैक। ओकरा तँ ओहि गोहियामे राति बतैवाक छलै मुदा हमरा सभकेँ सय किलोमीटर दूर दोहा अएवाक छल। हमरा सभक धरफड़ीकेँ ओऽ अकानि गेल छल। कहलक सर, कहियोकाल अवैत जाइत रहब। भेड़ा बकड़ी संगे रहैत-रहैत ओहने भऽ गेल छी, देखियौ चाहो पानिक लेल नहि पुछलहुँ। आऽ कपड़ा लपेटल एकगोट पानिक बोतल आगाँ बढ़ा देलक। “हमरा सभक फ्रिज बुझू कि एयर कन्डीशन ईहे अछि”। गर्मीसँ सुखाएल कण्डकेँ पानिसँ भिजाओल आऽ अपन गन्तव्य दिस आगाँ बढ़ि चललहुँ। लगभग दश किलोमीटर वाट तय कएलाक बाद हमरा लोकनि जमालिया नगरमे पहुँचलहुँ। मुसलमान धर्मावलम्बी सभक रोजा खोलवाक समय भऽ गेल रहै। सड़क कातमे बनाओल गेल चबुतरापर नाना प्रकारक व्यंजन साँठल जाऽ रहल छल। लोक विस्मील्लाह करवालेल तैयार छलाह। हमरा मोन पड़ल महेन्द्रके गोहियामे राखल खवुज (कतार सरकारक सस्ता दरक रोटी) आऽ प्याउजक धेसर। एसगर महेन्द्र एखन नून, मिरचाई आऽ तेल प्याउजक संग खवुज दकरि रहल हएत। एतए ओकरेद्वारा पोसल गेल खस्सीक विरयानीक स्वाद लऽ रहल अछि मालिक आउर। दोहा,कतार, जमलिया।

44 4 4 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् कुमार मनोज कश्यप जन्‌म : १९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाममे आऽ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखनमे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आऽ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रिय सचिवालयमे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित। हारल मनुक्ख बरी काल सँ प्रतिक्षा कऽ रहल छलहु बस के। गामक कोनो बस आबिये नहिं रहल छलै। एक तऽ प्रतिक्षा ओहिना कष्टप्रद, तहु मे जेठक दुपहरिया मे।   रौद आ पब्लिक  ट्रांसपोर्टक स्थिति ---- खिन्न भऽ गेल मोन। समय बितेबाक आर कोनो साधन नहिं देखि, मोन नहिंयो रहैत ठंढा पिबाक लेल बढि गेलहु सामने के रेस्टोरेंट दिस -- छाँह तऽ भेटबे करत,  सँगहि प््रातिक्षा के घड़ी सेहो बितत। बस एबा मे एखन आधा घंटा सँ कम समय नहिंये लगतैक। रेस्टोरेंट के तजबीज करैत आगू बढल जाईत छलहु कि केयो रस्ता रोकलक - जिर्ण, मलिन, बृद्ध नहिंयो रहैत बृद्ध सन - लाठी लेने '' भैया! दू रुपैया हुअय तऽ दऽ दियऽ, ट्रेकर पकड़ि गाम चल जायब। पायरे नहिं गेल भऽ रहल आछ ।'' आबाज मे एकटा संकोचक सँग दयनियता साफ झलकैत छलैक । तखने हमरा आगु मे नाचि गेल भीख माँगबाक नव-नव ढ़ब़ मोन परऽ लागल पढ़ल आ सुनल खिस्सा सभ जे कोना लोक ठका गेल ई सभ ढ़ब पऱ। ओकर याचना के अनसुना करैत हम बढ़ि गेलंहु रेस्टोरेंट दिस । बस अयला पर ख़िडकी कात सीट पर बैसि सुभ्यस्त भेलंहु।  कने काल मे बस चलि पड़ल। रस्ता कात मे सहसा ककरो पर नजरि पड़ि गेल़ चौंकलंहु - 'ई वैह आदमी तऽ नहिं जे हमरा सँ दू रुपैया मँगैत छल?'  दिमाग पर जोर देलहुँ हँ ई तऽ वैह आदमी आछ़़क़हुना- कहुना कऽ डेग बढबैत लगभग घिसियैत जँका --चलल जा रहल आछ गंतव्य दिस। ई दृश्य हमरा विचलित करऽ लागल़ हमर अंतरात्मा कचोटि उठल - 'दू रुपैया! मात्र दू रुपैयाक लेल बीमार - असक्क के पायरे जाय पड़ि रहल छैक आ तों मोन नहियो रहैत दस रुपैया ठंढा पी कऽ बर्बाद कऽ देलह! धिक्कार एहन मनुष्यता के!' अपराध बोध सँ हम आकाश दिस देखैत ओकर शून्यता मे विलिन भेल जा रहल छी। थाकल बाट ''सर, हमर मीटरक फाईल कहा तक पहुचलई?'' ''उपर सँ नहि लौटलै'' - बिजली ऑफिसक कर्मचरीक ई चिरपरिचित उत्तर फेर हमर कानमे गेल। उत्तर जेना स्टीरियोटाईप, प्री-रिकोर्डेड, बिना कोनो जाच-पड़ताल, नाम-पता पुछने, पेᆬकल सन। १५ दिन भऽ गेल बिजली ऑफिसक चक्कर लगबैत आऽ यैह उत्तर सुनैत । ''अरे ई सभ बड घाघ होईत छई। बिना 'सेवा' के किछु नहि हेतौक। परेशानी सँ बँचैक छहु तऽ सेवा करहि परतौ'' - अपन मित्र प्रभासक ई सलाह कचोटैतो मोन सँ मानहिं परल -विवसतामे। आखिर नोकरी छोड़ि कतेक दिन दौरैत रहब - अनायास,अनर्थक,आनश्रचत़। बिजली विभागक कर्मचारी 'सेवा' पबिते झट् दऽ हमरा आदेश-पत्र थम्हा देलक। जेना ओकरा सँपौती अबैत होईक- हमर मोनक आशय ओ पहिने बुझि गेल हो आ आदेश पहिने सँ तैयार रखने हो- हमरा देबाक हेतु। कायल भेलहुँ हम 'सेवा' महिमा सँ। विजयी भाव सँ आदेश-पत्र कें देखैत हम बाहर निकलि रहल छलहु कि नजरि परल कातमे लटकल बोर्ड पर जाहि पर मोंट आखरमे लिखल छलै -''रिश्वत लेना एवं देना जुर्म है।'' भने लोक पानक पीक फेकि विकृत कऽ देने छलै ओकरा। उपयुक्त चिज उपयुत्त जगह रहक चाही। रस्तामे फेकना भेटल बड़का लग्गा सँ बिजलीक तारमे टोका फंसबैत। हमरा देख कऽ मुस्कियायल ओऽ। लागल जेना हमर मुँह दुसि रहल हो। भावना जेठ महिना मे तऽ सूरज जेना भोरे सँ आगि उगलऽ लगैत छैक। दुपहरिया तक तऽ वातावरण ओहिना जेना लोहा गलाबऽ बला भट्ठी। छुट्टी के दिन रह्ने भोर मे देरिये सँ उठलंहु; साईत तहु द्वारे कनिया भानस करबा मे अलसा रहल छलीह। अंततोगत्वा निर्णय भेल - भोजन बाहरे कैल जाय। घर सँ बाहर निकललंहु। बाहर एकदम सुनसान - एक्का दुक्का लोक चलैत - सेहो साईत मजबूरीये मे। कियैक निकलत केयो घर सँ एहन समय मे? एहन रौद मे निकलनाई कोनो सजा सँ कम थोड़बे छैक। बड़ मसकत्ति के बाद एक टा रिक्सावला तैयार भेल लऽ जेबाक हेतु। रिक्सावला कि - अधबेसु, कृशकाय, हँपैᆬत़।रेस्टोरेंट पहुंचि भाड़ा पुछलियै। कहलक दस रुपैया। कनिया लड़ि पड़ली ओकरा सँ -''पांच रुपैया के दस रुपैया मंगैत छैंह! हमरा सभ कें बाहरी बुझैत छैं कि? ठक्क नहिंतन! एना जबर्दस्ती सँ बढिया होयतौक जे पौकेट सँ पाई निकालि ले। बजबियौ पुलिस के?'' बेचारा रिक्सावला घबड़ा गेल। पसेना सँ मैल-चिक्कट भेल गमछा सँ अपन मुंह पोछैत, बिना किछु बजने पांचक सिक्का लऽ कऽ चलि गेल बिना किछु बजने़ निरीह। रेस्टोरेंट मे भोजनोपरांत हमरा दस रुपैया टीप के रुप मे छोड़ैत देखि कनिया बजलिह - '' अपना स्टेटस के तऽ कम-सँ-कम ध्यान राखू। की दसे रुपैया दैत छियई - पाछाँ सँ गरियाओत'' एतबा  कहि झट सँ पचासक नोट बिल-फोल्डर मे छोड़ैत हमरा चलबाक ईसारा केलनि। आकस्मात हमरा आंखिक आगाँ रिक्सावलाक चेहरा मूर्तिमान भऽ उठल। तुलना करऽ लगलंहु - रेस्टोरेंटक वेटर आ रिक्सावला मे - एकटा वातनुवूᆬलित कक्ष मे भोजन परसैत आ दोसर रौद मे कोंढ तोरैत। भवनाक अंतर सँ सिहरि उठलंहु हम। बी०डी०ओ० ओकर असली नाम की छलैक से तऽ नहिं कहि; मुदा हम सभ ओकरा 'माने' कहि कऽ बजबैत  छलियैक। कारण, ओ बात-बात पर 'माने' शब्दक प्रयोग करैत छलीह। से 'माने' ओकर नामे पड़ि गेलई भरि गामक लोक लै। बाल-विधवा, संतानहीन 'माने' हमर घरक सदस्या जकाँ छलीह। हमरा बाद मे बुझवा मे आयल जे 'माने' हमरा ओहिठाम काज करैत छलीह। बृद्धावस्था के कारणे आब काज तऽ नहिंये कऽ सकैत छलीह; हँ दोसर नोकर-चाकर पर मुस्तैद भऽ काज  धरि अवश्य करबैत छलीह। प्रधान मंत्रीक मधुबनी  आगमन के लऽ कऽ लोक मे बेसी उल्लास आ उत्साह छलैक, सभ सक्षात दर्शनक पुण्य उठाबऽ चाहि रहल छल। लोकक एहि ईच्छा के पुरा करबा मे सहयोग दऽ रहल छलाह पार्टी कार्यकर्ता लोकनि जे बेसी-सँ-बेसी लोक के जुटा अपन शक्ति प्रदर्शन करबा लेल मुपत्त सवारी के व्यवस्था केने छलाह। हम मजाक मे 'माने' सँ पुछलियै- '' प्रधान मंत्री मधुबनी मे आबि रहल छथिन। अपन गामक सभ केयो जा रहल अछि देखऽ। अहाँ नहि जायब?'' ''के अबैत छथिन?''- माने पुछलनि। ''प्रधान मंत्री।'' - हम उत्तर देलियै। ''धुर! ओ कोनो बी०डी०ओ० छथिन जे 'बिरधा-पेलसुम'(वृद्धावस्था पेंसन) देताह। हम अनेरे की  देखऽ जाऊ हुनका ?'' हम अवाक रहि गेलंहु माने के उत्तर सँ। नव-वर्ष शहरी संस्कृति मे नव-वर्षक बड़ महत्त्व भऽ गेलैक आछ। चारु कात उल्लास, आनंद़ कोनो पाबनि-त्योहार सँ बेसिये। लोक पुरनका बितल साल सँ पिण्ड छोड़ा नवका साल कें स्वागत करय मे बेहाल़ एहि मे केयो ककरो सँ पाछाँ नहिं रहऽ चाहैछ । धूम-धड़्‌क्का, नाच-गाऩ आई जकरा जे मोन मे आबय कऽ रहल अछि नया सालक स्वागत मोन सँ कऽ रहल आछ । मुदा सब केयो थोड़बे? शहरक एहि उल्लास के नहि बुझि पाबि; सुकना के सात सालक बेटा  पुछिये देलकै ओकरा सँ -'' बाबू, आई कि छियै जे लोक एना कऽ रहल आछ?'' ''बाऊ, पैघ लोक सभक नया साल आई सँ शुरु भऽ रहल छै; तैं सभ पाबनि मना रहल आछ।''- बाल-मन कें बुझेबाक प्रयास केलक सुकना । चोट्टहि प्रश्र्नक झड़ी लगा देने छलई छौंड़ा - ''हम सभ नया साल कियैक नहिं मनबैत छि ? हमरा सभक नया साल कहिया एतैक? हम सभ कहिया मनेबई नया साल?'' सुकना एहि अबोध कें कोना बुझबौक जे गरीबक कोनो साल नया नहिं होईत छैक। बोनिहारक सभ सांझ नया साल आ सभ भिनसर पुरान साल जँका होईत छैक। बोनिहारी भेटलई तऽ नूने-रोटी सही, परिवारक सभ व्यत्तिक पेट भरलैक ; नहि तऽ भुखले रहि गेल सभ गोटे । एना मे कोन सीमा-रेखा मजूरक लेल नया आ पुरानक भऽ सकैछ़ ज़ँ भऽ सकैछ तऽ एक मात्र मजूरी भेटब़ भेट गेल तऽ नया सालक खुशी; नहि भेटल तऽ पुरान साल सन दुख़ तै सभ सांझ नया साल आ सभ भिनसर पुरान साल । बाप-बेटा दुनू चुप एक दोसराक मुँह देखि रहल छल़ साईत आँखि आँखिक भाषा बूझि गेल छलैक। गजल धज्जी रातुक श्याह आँचर मे, अहल भोर के ताकि रहल छि। अपन आंगन मे ठाढ़ हम, आई अपने घर के ताकि रहल छि । आहत मोनक घायल तड़पन, पेᆬरो  आई   कनाबऽ आयल। जतऽ जलन के पीड़ा कम हो, ओहन छाँह  के ताकि रहल छि। दोसरा कें कि दोष देबई हम, अपनो सभ तऽ अंठिये  बनला । याद ने कोनो बाँचल रहि जाय, ओहन ठौर के ताकि रहल छि। बगबाहो अपनहिं हाथें, आई  कलम-बाग सभ जारऽ  आयल। तड़पन जतऽ तड़पि रहि जायत, ओहने कहर के ताकि रहल छि। बिसरि गेल जे याद छलै, से  सपना  कियैक याद दियौलक? नोर ने ढ़रकय जाहि पलक सँ, एहन आँखि के ताकि रहल छि। निकलि गेलहुँ आछ सुन्न राह पर,  अन्हारेक टा सम्बल केवल। अपन-आन केयो कतहु नहि, आई ओहन दर के ताकि रहल छि।

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् कृपानन्द झा (1970- ), जन्म- समौल, मधुबनी, मिथिला। गणितमे स्नातकोत्तर (एल.एन.एम.यू, दरभंगा), बी.लिब. (जामिया मिलिया इस्लामिया) आऽ सोचाना विज्ञानमे एसोसिएटशिप, आइ.एन.एस.डी.ओ.सी., नई दिल्ली। कृपानन्द जी मीरा बाइ पोलीटेकनिक, महारानी बाग, नई दिल्लीमे व्याखाता छथि। कृपानन्दजी यूथ ऑफ मिथिलाक अध्यक्ष छलाह आऽ एखन अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषदक जेनरल सेक्रेटरी छथि। हिनकर ६ टा शोध पेपर सूचना प्रबन्धनक क्षेत्रमे प्रकाशित छन्हि, संगहि हिन्दी आऽ अग्रेजीमे एक-एकटा कविता सेहो प्रकाशित छन्हि। चौकपर आणविक समझौता:- कृपानन्द झा साँझ काल गामक चौकपर गहमा-गहमी छलैक। टोनुआँक दोकानपर चाहक गिलास खनखना रहल छलैक मंडलजी पान लगेवमे व्यस्त छलाह। कनीक दूरपर दुर्गा मन्दिरक पुवरिया कात बनल चबुतरापर दस-बारह युवा आ वृद्ध सम सामयिक चर्चामे मग्न छलाह। बीचमे मन्नू भाइक आवाज जोड़सँ आयल। “हौ! एहन कोन आफद आबि गेलैक अपन देशपर जे प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंहजी अपन देशक वैज्ञानिकक लगभग पछिला पचास वर्षक तपस्या आ अनुसंधान तथा भविष्यक आणविक सामरिक अनुसंधानकेँ अमेरिकाक हाथ बंधकी रखबापर उतारु भय गेल छथि। गगनजी चबुतरापर सँ उचकि पानक पीक कातमे फेकैत कहि उठलाह, “कक्का! एहन बात नहि छैक। ई समझौता मात्र अपन देशक महज ऊर्जा आवश्यकताकेँ ध्यानमे राखि कएल गेल-हँ!.. मन्नू भाई तम्बाकू ठोढ़मे दैत कहलखिन, “है। ई ऊर्जा आवश्यकता महज बहाना छैक। अमेरिका एहि बहाने अपन देशक स्वतन्त्र आणविक कार्यक्रममे टाँग अड़ेबाक फिराकमे बहुत दिनसँ छल। आब ओ अपन मनशामे १२३ समझौता आ ओहिमे हाइड एक्टक प्रावधान सौँ सफल भय रहल अछि”। गगन जी थोड़ेक चिन्तित मुद्रामे कहलखिन- “देखियौ कक्का, जहाँ तक १२३ समझौता आ भारतक आणविक सामरिक कार्यक्रमक प्रश्न छैक तँ मात्र ओ सब रियेक्टर अंतर्राष्ट्रीय एजेन्सीक देखरेखमे आनल जेतैक, जे सब रियैक्टर, भारत सरकार चाहतैक। तेँ बाकी कार्यक्रमपर एकर असर नहि परतैक”। “हाँ हौ! लेकिन ई अनबाक कोन जरूरी छैक?” मन्नू भाई आवेशमे बजलाह। ताधरि बैंकर सैहैब सेहो सहटि कय चबुतरा दिश आबि गेल छलाह। गम्भीर आवाजमे मन्नू भाईकेँ सम्बोधित कय कहलथिन- “भाई, किछु एहन प्रावधान सभ जरूरी छैक एहि समझौतामे, परन्तु ई सभ निर्भर करैत छैक जे भविष्यमे भारतक स्थिति अंतर्राष्ट्रीय स्तरपर कतेक मजबूत रहैत छैक आ हमर राजनीतिज्ञ सब परिस्थितिसँ कतेक फायदा उठबैत छथि। कारण जे ड्राफ्ट एखन प्रस्तुत कएल गेल छैक ताहिमे कोनो कन्फ्लिक्टक स्थितिमे की कदम उठायल जायत आ ओ भारतक फायदामे होयत वा नुकसानमे से ओहि समयक देशक कूटनीतिज्ञ एवं अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितिपर निर्भर करत। परंच, वर्तमान परिस्थितिकेँ अगर देखल जाय तँ हमर देशक आणविक विद्युत उत्पादनक वर्तमान क्षमता मात्र ४०-५०% उत्पादन भय रहल अछि बाँकी आगू जे योजना छैक ओकरो अगर ध्यानमे राखल जाय तँ कहल जा सकैत अछि जे आणविक इन्धन एवं शान्तिपूर्व आणविकौपयोगसँ जुड़ल किछु तकनीककेँ यथाशीघ्र आवश्यकता छैक। “हौ बैंकर! ई पक्ष तँ छैक परंच एखनहु अगर सरकार आंतरिक संसाधनकेँ सही ढंगसँ दोहन करय तँ ई आणविक इंधनक समस्या अल्पकालिक साबित होयत”। मन्नू भाई किछु शान्त मुद्रामे बजलाह। अपन बातकेँ आगू बढ़बैत कहलखिन जे – “हौ, एखनहु जे योजना सब झाड़खण्डक (जादूगुड़ा, बन्दूहुरंग, तुरमडीह) आन्ध्र प्रदेशक (तुम्मालापल्ली) कर्णाटक, मेघालय आ राजस्थान आदि राज्यमे चलि रहल छैक ओ अगर सही ढंगसँ कार्यान्वित कयल जाय तँ आणविक इन्धनक ई वर्तमान समस्याक समाधान आसानीसँ कयल जा सकैछ”। चबुतराक उतरवरिया-पछवरिया कोनापर बैसल टुन्ना बाजि उठल, “यौ कक्का, मंडलजी पानक दोकान आब बन्द करताह! ८ बाजि रहल छैक”। बैंकर सैहैब जोड़सँ कहलखिन- “यौ मंडलजी! आठटा पान लगाकऽ एमहर पठाऊ”। चबुतराक पछवरिया कातमे मजहर सोचपूर्ण मुद्रामे साँझेसँ बैसल सबहक गप सुनि रहल छलाह। बैंकर सैहैब मजहरकेँ कहलखिन- “हौ मजहर! तूँ तँ एखन कम्पीटिशन सबहक तैयारी कए रहल छह। तूँ एहि सम्पूर्ण प्रकरण पर बहुत मंथन कयने हेब। आखिर तोहर सोच की छह”? खखसि गरदनि साफ कय खखाड़ कातमे फेकैत बजलाह- “भाईजी! अंतर्राष्ट्रीय आ आर्थिक नीति काफी संकीर्ण विषय छैक। पहिल बात अछि जे हमरा लोकनि एन.पी.टी.पर हस्ताक्षर केने बिना अंतर्राष्ट्रीय आणविक बाजारमे सेंह मारवाक कोशिश कय रहल छी। एहि हालतमे किछु ने किछु अंतर्राष्ट्रीय बंधन तँ स्वीकार करहिये परत। परन्तु हम एकरा एकटा अवसरक रूपमे देख रहल छियैक। आणविक क्षेत्रक किछु एहन पक्ष छैक जाहिमे हमर देशक अनुसंधान शायद अमेरिकोसँ ऊपर अछि। हालमे एकटा रिपोर्ट पढ़ने रही, जाहिमे कहल गेल छैक जे भारतक वैज्ञानिक २००५ आ २००६ मे प्रकाशित अनुसंधान रिपोर्टक आधारपर तकनीकी रूपसँ समृद्ध देश सबकेँ सेहो पाछू छोड़ि आगू बढ़ि गेल अछि। एहि स्थितिमे आणविक इन्धन आ किछु तकनीकक आयात तँ महज अल्पकालिक छैक। दीर्घकालिक असर हमरा जनैत ई हेतैक जे भारत किछु दिनका बाद आणविक क्षेत्रमे एकटा पैघ निर्यातक भऽ कऽ उभरत। एकरामे तकनीकी क्षमता छैक आ अन्तरि आणविक साधन, जे किछु काल पहिने चर्चा भेल जेना, झारखण्ड, आन्ध्रप्रदेश, मेघालय आदिमे उपलब्ध छैक तथा अंतर्राष्ट्रीय आणविक सहयोगक माध्यमसँ एकटा पैघ निर्यातक भेनाइ सम्भव छैक। तेँ हेतु हमर तँ एतबय कहब अछि जे जौँ एहि समझौताकेँ सही ढंगसँ उपयोग कयल जाय तँ ई अपन देशक लेल वरदान साबित होयत”।

33 3 3 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् कमलानन्द झा,हिन्दी विभाग,सी.एम. कॉलेज,दरभंगा मैथिली समस्याक टोह लैत कथा-संकलन : उदाहरण पछिला चारि बर्खमे कोनो पैघ आ महत्वपूर्ण प्रकाशनसँ मैथिलीक तीन गोट कथा-संकलनक प्रकाशन मैथिली भाषा लेल एकटा शुभ-संकेत मानल जा सकै'छ। नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा सम्पादित मैथिली कथा संचयन(सन्‌ २००५) आ सन्‌ २००७मे तारानन्द वियोगी द्वारा सम्पादित देसिल बयना(सन्‌ २००७) पाठकक बीच लोकप्रिय भ'ए रहल छल कि प्रकाशन विभागसँ देवशंकर नवीन द्वारा सम्पादित टटका मैथिली कथा-संग्रह उदाहरण छपि क' आबि गेल। प्रसन्नताक बात थिक जे उदाहरणक प्रकाशनसँ प्रकाशन विभागमे साहित्यिक रचनाक प्रकाशनक बाट फूजल, जे स्वागत योग्य अछि। उदाहरणमे ललितसँ सियाराम सरस धरिकक कुल छत्तीस गोट कथा संकलित अछि। एहि संकलनसँ मैथिली कथा-संसारक परिदृश्य स्पष्ट होइत अछि। संकलनक कतोक कथा समस्त भारतीय भाषासँ कान्ही मिलान लेल तत्पर अछि, जे संकलनकर्त्ताक चयनकौशलक सूचक थिक। श्रेष्ठ कथाकार राजकमल चौधरीक कथा ÷एकटा चम्पाकली एकटा विषधर' घाघ मैथिल समाजक टोप-टहंकारकें अद्भुत रूपें अनावृत्त करैत अछि। सवर्ण मैथिलक गरीबी, ओहि गरीबीसँ उत्पन्न दयनीयता, आ तकर खोलमे दुबकल बेटीक शातिर माइ-बापक घिनौन आचरण घनघोर तनावक संग पाठककें झकझोरैत अछि। दशरथ झा आ हुनकर घरबाली अपन तेरह बर्खक बेटी चम्पाक विवाह बासैठ बर्खक वृद्ध शशि बाबू संग करेबाक षड्यंत्रापूर्ण योजना बनबैत अछि। दुनू प्राणीक गिद्ध दृष्टि शशि बाबूक सम्पति पर टिकल छनि, जकर मलिकाइन विवाहोपरान्त हुनक तेरह वर्षीया चम्पा बनैबाली छनि। अतिशयोक्ति सन लगैबला एहि घटनाक मर्मकें ओएह बूझि सकत जे मिथिलांचलक बहुविवाह प्रथासँ नीक जकाँ परिचित छथि। बीसम-एकैसम विवाहक बाद पति अपन पूर्व पत्नी सभक मुँहो बिसरि जाइ छलाह। पत्राकारिता दुनियाक महत्वपूर्ण आ सम्वेदनशील पक्षसँ मायानन्द मिश्रक कथा ÷भए प्रकट कृपाला' साक्षात्कार करबैत अछि। मीडिया-तन्त्रा पर बनल सार्थक हिन्दी सिनेमा ÷पेज थ्री' जे किओ देखने छथि, से एहि कथाक मर्मकें बेसी नीक जकाँ बुझि सकै छथि। शीघ्रतासँ नामी पत्राकार बनि जाएबाक हड़बड़ीकें कथामे कलात्मक ढंगसँ एकेरल गेल अछि। कॉरपोरेट दुनियाँक बादशाह श्याम बोगलाक मृत्युक खबरि सबसँ पहिने देबाक होड़ लागल अछि। पत्राकार लोकनिक नजरिमे ओएह सभसँ पैघ खबर अछि, दुनियामे किछु भ' जाउ। लिलीरे मैथिलीक सशक्त कथालेखिक छथि। हुनकर कथा ÷विधिक विधान'मे कामकाजी स्त्राीक संघर्षकें यथार्थतः देखबाक, आ यथार्थक मर्मकें कलात्मक कौंध संग उभारबाक सफल चेष्टा अछि। उषाकिरण खान अपन कथा ÷त्यागपत्रा'मे ग्रामीण युवतीक अदम्य जिजीविषाकें व्यक्त करबामे पूर्ण सफल नहि भ' सकलीह। घोर आदर्शवादी आ कठोर अनुशासित परिवारमे पालित-पोषित चम्पा कॉलेजमे पढ़' चाहैत अछि, अपन मर्जीसँ विवाह कर' चाहैत अछि। मुदा आजीवन विवाह नहि करबाक घोषणा करैत चम्पा स्वयंकें ओही परंपराक केंचुलमे समेटि लैत अछि। चम्पा विवाहक लक्ष्मण रेखा पार करैत ÷और भी ग़म हैं' कें आधार मानि अपन व्यक्तित्वकें विस्तृत आयाम नहि द' पबैत अछि। मनमोहन झाक कया ÷फयदा'मे स्त्राी जातिक मोलभाव बला प्रवृत्तिक रेखांकन खूब जमल अछि, मुदा वो एहि प्रवृत्तिक वर्णन क' स्त्राी जाति कोन पक्षक उद्घाटन करै छथि, से बूझब कठिन। कोनो व्यक्तिक स्वभावमे नीक आ खराब दूनू भाव रहैत अछि। कथाक हेतु कोन तरहक भावक चुनाव कयल जाए, ई महत्वपूर्ण अछि। इएह चुनाव मैथिली कथामे स्त्राी चेतनाक दर्शन करा सकैत अछि। स्त्राी चेतनाक दृष्टिएं प्रदीप बिहारीक कथा ÷मकड़ी' अपेक्षाकृत मेच्योर्ड आ बोल्ड कथा कहल जा सकैछ। बेराबेरी कथानायिका सुनीता दू बेर विवाह करैत अछि, दुनू बेर ओकर पति मरि जाइछ, मुदा ओ जिनगीसँ हारि नहि मानैत अछि। सिलाई मशीन चला क' ओ गुजर-बसर करैत अछि। एतबे नहि, ओ एकटा अनाथ आ बौक बच्चाक लालन-पालनक दायित्व ल' क' अपन व्यक्तित्वकें विस्तार दैत अछि। कथामे मोड़ तखन अबैत अछि जखन ओ बौका समर्थ भेला पर सुनीताक स्वीकृतियेसँ सही, ओकरा गर्भाधान क' क' भागि जाइत अछि। सुनीताकें एहि बातक अपराधबोध नहि छै, जे ओ बौका संग किऐ  ई कृत्य केलक, ओ देहक विवशतासँ परिचित अछि, मुदा बौकाक भागि जेबाक दंश ओकरा व्यथित करै छै। देवशंकर नवीनक कथा ÷पेंपी' पति-पत्नीक सम्बन्ध विच्छेदक परिणामस्वरूप बेटीक मनोमस्तिष्क आ व्यक्तित्व पर पड़ैबला कुप्रभाव आ बेहिसाब उपेक्षाभावकें करुणापूर्ण ढंगसँ व्यक्त करैत अछि। मुदा एहिमे सभटा दोष स्त्राी पर फेकि देब पूर्वाग्रह मानल जा सकैछ। ई सामाजिक सत्य नहि भ' सकैत अछि। वरिष्ठ कथाकार राजमोहन झा अत्यंत कुशलतापूर्वक ÷भोजन' कथाक बहन्ने स्त्राीक बाहर काज करबाक विरोध क' जाइत छथि। राजमोहनजीक दक्षता इएह छन्हि जे ई सभ बात कहिओ क' ओ प्रगतिशील बनल रहै छथि। राजकमल चौधरीक ÷एकटा चम्पाकली एकटा विषधर', धूमकेतुक ÷भरदुतिया', गंगेश गुंजनक ÷अपन समांग'(ई कथा देसिल बयनामे सेहो संकलित अछि), तारानन्द वियोगीक ÷पन्द्रह अगस्त सन्तानबे' आ अशोकक ÷तानपूरा' एहि संग्रहक श्रेष्ठ कथा मानल जा सकैछ। धूमकेतुक कथा ÷भरदुतिया' व्यक्ति स्वार्थ हेतु भाई-बहिनक पावन पाबनिक दुरुपयोग करबैत देखबैत अछि। आजुक मनुख अहू पाबनिकें नहि छोड़लक। ÷पन्द्रह अगस्त सन्तानबे' वियोगीक सफल राजनीतिक कथा कहल जा सकैछ। कथाक ई निष्पति एकदम ठीक लगैत अछि जे सवर्णक पार्टी एहि दुआरे जीतैत रहल जे निम्नजातिक आर्थिक स्थित बहुत खराब छल। स्वामीक पार्टी दासोक पार्टी होइछ। दोसर पार्टीक मादे सोचब मृत्युकें आमन्त्राण देब छल। आओर नइं किछु त' आवास आ रोजगार छीनि बेलल्ला बना देब उच्चवर्गक हेतु बाम हाथक काज छल। दिल्ली-पंजाब प्रवासँ निम्नवर्गक आर्थिक, सामाजिक स्थितिमे सुधार भेल। परिणामस्वरूप ओहि वर्गमे आत्मसम्मान आ राजनीतिक चेतनाक अंकुरण भेल। भक्तिकाव्यक उन्मेष आ ओहिमे निम्नजातिक कविक बाहुल्यक पृष्ठभूमिमे सुप्रसिद्ध इतिहाकार इरफमान हबीब मुगलकालीन विकास कार्यकें लक्षित केलनि अछि। ÷पन्द्रह अगस्त सन्तानबे'  कथाक विलक्षणता बिहारमे बनल निम्नजातिक पार्टीक आत्मालोचन थिक। कहबा लेल त' ई पार्टी निम्नजातिक-निम्नवर्गक छल, मुदा अइ पार्टीमे छल, प्रपंच, भ्रष्टाचार, अपराध आओर पाखण्ड पहिनहुँसँ तेजगर और धारदार भ' गेल छल। कथाकारक इएह द्वन्द्व कथाकें गरिमा प्रदान करैछ। चाहक दोकान चलबैबला मुदा बहुत प्रारम्भहिसँ सक्रिय मूल्यपरक राजनीति करैबला हीरा महतोक धैर्य जखन संग छोड़ि दै छनि त' ओ पार्टी प्रमुख बासुदेव महतो पर बिफरैत कहै छथि-- रे निर्लज्जा, एतबो सरम कर! जे कुकर्म करै छैं से अपन करैत रह, लेकिन एना समाजमे नइं कहिए जे कुकर्मे करब ठीक छिऐ। एतबो रहम कर बहिं...।'' अशोकक कथा ÷तानपूरा' मध्यवर्गीय हिप्पोक्रेसीक घटाटोपकें तार-तार क' देबामे पूर्ण सफल भेल अछि। बिना कोनो उपदेश आ नैतिक आग्रहक कथा मध्यवर्गीय कुत्सित मानसिकताक दुर्ग भेदन करैत अछि। कथानायक विनोद बाबूक संगीत-प्रेमकें हुनक पिता घोर अभाव आ द्ररिद््रयक बीच जेना-तेना पूरा करैत छथि, मुदा जखन विनोद बाबूक पुत्रा संगीत सिखबाक इच्छा प्रकट करै छनि त' दुनू प्राणीकें साँप सूँघि जाइत छनि। एहि दुआरे नहि, जे हुनका कोनो तरहक अभाव छनि। बल्कि एहि दुआरे जे संगीतक स'ख हुनक बेटाकें रुपैया कमबैबला मशीन नहि बना सकत। जे दम्पति कोनो विषय पर कहियो एकमत नहि भेल, एहि विषय पर एकमत भ' पुत्राक एहि अव्यावहारिक स'ख'क केठ मोंकबाक साजिशपूर्ण योजना बनबए लगै छथि। संग्रहक किछु कथा जेना अवकाश, अयना, खान साहेब, जंगलक हरीन आदि यथार्थक मोहमे शुष्क गद्य बनि क' रहि गेल अछि। एहिमे किछु कथा ततेक सरलीकृत भ' गेल अछि जे ओ नवसाक्षर हेतु लिखल कथा बुझि पडै+छ। एहन कथा सभक मूल संरचना इतिवृत्तात्मक अछि। यद्यपि इतिवृत्त कोनो कथाक सीमा नहि होइछ, मुदा जखन कोनो कथा घटनाक स्थूल आ तथ्यात्मक विवरण टा दैछ, कथामे समय वा क्षणक मर्म नहि आबि पबैछ, त' एहन इतिवृत्त निपट गद्य बनि क' रहि जाइछ। यथार्थ कोनो कथाकें विश्वसनीयता देबाक बदलामे ओकरा भीतरसँ संवेदना निचोड़ि अनैत अछि, कथाकें प्रमाणिक बनेबाक फेरमे पड़ल नहि रहैत अछि। कथाकार रमेश अपन कथा ÷नागदेसमे अयनाक व्यवसाय'मे अतियथार्थ आ इतिवृत्तक फ्रेमकें तोड़ि प्रतीक वा फैंटेसीक प्रयोगसँ कथा बुनबाक प्रयास त' केलनि, मुदा कथाक विन्यासमे एकरसता आबि गेल। एहि फ्रेम हेतु हमरा लोकनिकें राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा(दुविधा)  आ हिन्दी कथाकार उदय प्रकाश (वारेन हेस्टिंग्स का सांढ़) आदिकें पढ़बाक चाही। हिनका लोकनिक कथा यथार्थक फ्रेमकें तोड़ियो क' यथार्थ बनल रहल अछि। मैथिलीमे प्रकाशित उक्त तीनूँ कथा संकलनसँ मैथिली कथाक प्रसार राष्ट्रीय स्तर पर भ' रहल अछि, एहिमे दू मत नहि। मुदा उक्त संकलनकें पढ़ि आम पाठकक राय इएह बनत जे मैथिलीमे कुल इएह तीस-चालीस गोट कथाकार आइ तक भेलाहे। कारण तीनूँ संग्रहमे कथाकारक सूचीमे अद्भुत साम्य अछि। कथा पढ़ि बुझना जाइछ जे कथा चयनमे कथाक अपेक्षा कथाकारकें महत्व देल गेल अदि। ई कहब सर्वथा अनुचित जे संकलनक कथाकार महत्वपूर्ण नहि छथि, मुदा अन्य श्रेष्ठ कथाकें सेहो प्रकाशमे अएबाक प्रयास हेबाक चाही। हमरा लोकनि ई नीक जकाँ जनै छी जे मैथिलीमे श्रेष्ठ कथाक अभाव नहि अछि। किन्तु प्रकाशनक अभावमे पत्रा-पत्रिाकाकें छानि मारब कठिनाहे नहि समय-साध्य कार्य थिक। वैद्यनाथ मिश्र यात्राीक पहिचान भने श्रेष्ठ कविक रूपमे छनि, मुदा हुनकर मैथिली कथा ÷चितकबड़ी इजोरिया' आ ÷रूपांतर' कतोक दृष्टिएं महत्वपूर्ण अछि। रेणुजी सेहो मैथिली कथा लिखलनि अछि। ई दीगर बात थिक जे बादमे ओ हिन्दिए टामे लिखए लगलाह। ÷नेपथ्य अभिनेता' आ ÷जहां पमन को गमन नहीं' आदि लीकसँ हटि क' लिखल गेल कथा थिक। ÷उदाहरण'मे कथाक प्रकाशन वर्ष आ सन्दर्भक अनुपस्थिति खटकैत अछि। समय-सीमा जनने बिना कोनो कथाक सम्यक मूल्यांकन सम्भव नहि। नवीनजी सदृश दक्ष आ अनुभवी सम्पादकसँ ई आशा नहि कएल जा सकै छल। एहि कमीकें पूरा करैत अछि हुनकर चौदह पृष्ठीय भूमिका। सम्पादक मैथिली कथाक सीमा आ सम्भावनाक विस्तृत पड़ताल अपन एहि भूमिकामे केलनि अछि। मैथिली कथाक इतिहासकें बुझबा लेल ई भूमिका निश्चित रूपें रेखांकन योग्य अछि। उदाहरण पुस्तकक नाम    -     उदाहरण सम्पादक         -     देवशंकर नवीन प्रकाशक         -     प्रकाशन विभाग सूचना और प्रसारण मन्त्राालय भारत सरकार पृष्ठ        -     २७४ मूल्य      -     २०० टाका मात्रा

44 4 4 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)। सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)। सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक। देवशंकर नवीन-अदद्दी पेनकें मजगुत करबाक आवश्यकता मिथिलाक सांस्कृतिक विरासत तकैत दूर धरि नजरि जाइत अछि, सबसँ पहिने  देखाइत अछि जे उच्च शिक्षा प्राप्त करबाक, गम्भीर चिन्तन-मनन करबाक, छोट-सँ-छोट बात पर पर्याप्त विचार-विमर्श करैत निर्णय लेबाक प्रथा मिथिलामे पुरातन कालसँ अबैत रहैत रहल अछि। मुदा तकर अतिरिक्त ÷परसुख देबामे परमसुख'क आनन्द लेबाक आ जीवनक हरेक आचार एवं आचरणमे लयाश्रित रहबाक अभ्यास मैथिल जनकें निकेनाँ रहलनि अछि। स्वयं कष्ट सहिओ क', अपन सब किछु गमाइओ क', दोसरकें अधिकसँ अधिक प्रसन्नता देबाक आदति मिथिलामे बड़ पुरान अछि। प्रायः इएह कारण थिक जे अतिथि सत्कारमे मिथिलाक लोक अपना घरक थाड़ी-लोटा धरि बन्हकी राखि देलनि। दोसरकें सम्मान देबामे मैथिल नागरिक बढ़ि-चढ़ि कए आगू रहल अछि। भनसियाक काज कर'बला व्यक्तिकें महराज अथवा महराजिन, केस-नह-दाढ़ी-मोंछ साफ कर'बला व्यक्तिकें ठाकुर-ठकुराइन, घर-आँगनमे नौरी-बहिकिरनी आ सोइरी घ'रमे परसौतीक काज करबाब'वाली स्त्राीकें दाय कहि क' सम्बोधित करबाक प्रथा मिथिलामे एहने धारणासँ रहल होएत। ध्यान देबाक थिक जे मिथिलामे दादीकें, जेठ बहिनकें आ घ'रक अत्यधिक दुलारि बेटीकें दाय कहबाक परम्परा अछि। अध्ययन, चिन्तन, मननक प्रथा मिथिलामे बड़ पुरान अछि। मुदा ई सत्य थिक जे अशिक्षेक कारणें मिथिला एतेक पछुआएलो रहल। गनल गूथल जे व्यक्ति अध्ययनशील भेलाह, से अत्यधिक पढ़लनि, जे नहि पढ़ि सकल, से अपन रोजी-रोटीमे लागल रहल। रोजी-रोटीक एक मात्रा आधार कृषि छल। विद्वान लोकनिक गम्भीर बहसमे बैसबाक अथवा ओहिमे हिस्सा लेबाक तर्कशक्ति, बोध-सामर्थ्य, आ पलखति रहै नहि छलनि, तें जे उपदेश देल जाइन, तकरा आर्ष वाक्य मानि अपन जीवन-यापनमे मैथिल लोकनि तल्लीन रहै छलाह। ईश भक्तिक प्रथा अहू कारणें मिथिलामे दृढ़ भेल। मानव सभ्यताक इतिहास कहै'ए जे प्रकृति-पूजन, नदी-पहाड़-भूमि-वृक्ष-पशु आदिक पूजन एहि करणें शुरुह भेल जे प्रारम्भिक कालमे जीवन-रक्षाक आधार इएह होइत छल। लोक अनुमान लगौलक जे सृष्टिक कारण, स्त्राी-पुरुषक जननांग थिक, तें ओ लिंग पूजा आ योनि-पूजा शुरुह केलक, जे बादमे शिवलिंग आ कामयोनि पूजाक रूपमे प्रचलित भेल। बादमे औजार पूजन होअए लागल।... तें पूजा पाठमे लीन हेबाक प्रथा पुरान अछि। मिथिलामे ओहि समस्त पूजन-पद्धतिक अनुपालन तँ होइते रहल; पितर पूजा, ग्रामदेव पूजा, ऋतु पूजा, फसल पूजा, कुलदेव-देवी पूजा आदिक प्रथा बढ़ल। हमरा जनैत विद्वान लोकनि द्वारा ईश भक्तिक उपदेश एहि लेल देल जाइत रहल हएत जे ईश भक्तिमे लागल लोक धर्म-भयसँ सदाचार अनुपालनमे लागल रहत, सद्वृत्तिमे लीन रहत, सामाजिक मर्यादाक ध्यान राखत, भुजबल-धनबलक मदमे निर्बल-निर्धन पर अत्याचार नहि करत।...लक्ष्यपूर्ति त' नहिएँ भेल, उनटे लोक धर्मभीरु, पाखण्डी अन्धविश्वासी आ निरन्तर लोभी, स्वार्थी, अत्याचारी होइत गेल, परिणामस्वरूप आजुक मैथिल-प्रवृत्ति हमरा सभक सोझाँ अछि। कृषि जीवनसँ समाजक कौटुम्बिक बन्हन एते मजगुत छल, जे भूमिहीनो व्यक्ति सम्पूर्ण किसानक दर्जा पबै छल। हरेक गाममे सब वृत्तिक लोक रहै छल। डोम, चमार, नौआ, कुमार, गुआर, धोबि, कुम्हार, कोइरी, बाह्मण, क्षत्राी... आदि समस्त जातिक उपस्थितिसँ गाम पूरा होइ छल। जमीन्दार लोकनि समस्त भूमिहीनकें जागीर दै छलाह, बाह्मण पुरहिताइ करै छलाह, नौआ केश कटै छलाह; कुमार ह'र-फार, चौकी केबाड़ बनबै छलाह; धोबि कपड़ा-बस्तर धोइ छलाह...। सम्पूर्ण समाज एक परिवार जकाँ चलै छल। सब एक दोसरा लेल जीबै छलाह, सब गोटए किसान छलाह, कृषि-सभ्यतामे मस्त छलाह। सिरपंचमी दिनक ह'र-पूजा हो; दसमी, दीया-बाती, सामा-चकेबाक उत्सव हो; मूड़न-उपनयन-विवाह-श्राद्ध हो; छठि अथवा फगुआ हो... बिना सर्वजातीय, सर्ववृत्तीय लोकक सहभाग नेने कोनो काज पूर नहि होइ छल। एहिमेसँ बहुत बात तँ एखनहुँ बाँचल अछि, होइत अछि ओहिना, ओकर ध्येय कतहु लुप्त भ' गेल अछि। मिथिलाक विवाहमे एखनहुँ जा धरि नौआ ब'रक कानमे हुनकर खानदान लेल गारि नहि देताह (परिहास लेल); धोबिन अपना केस संगें कनियाँक केस धो क' सोहाग नहि देतीह, विवाह पूर्ण नहि मानल जाइत अछि। ध्यान देबाक थिक जे एहि तरहें ओहि नौआकें कन्याक पिता आ धोबिनकें कन्याक माइक ओहदा देल जाइत अछि। मिथिलाक छठि पाबनि तँ अद्भुत रूपें सम्पूर्ण विरासतक रक्षा क' रहल अछि। नदीमे ठाढ़ भ' कए सूर्यकें अर्घ देबाक ई प्रथा जाति-धर्म समभावक सुरक्षा एना केने अछि जे समाजक कोनहुँ वर्गक सहभागक बिना ई पाबनि पूर्ण नहि होएत। नेत अइ स'ब टामे एकता आ समानताक सूत्रा स्थापित रखबाक रहैत छल। ई कलंक स्वातन्त्रयोत्तरकालीन मिथिलाक स्वाधीन मानवक नाम अथवा वैज्ञानिक विकास, बौद्धिक उन्नति, औद्योगिक प्रगतिक माथ जाइत अछि, जे समस्त विकासक अछैत मानव-मनमे लोभ-द्रोह, अहंकार एहि तरहें भरलक छूआछूत, जाति-द्वेष, शोषण-उत्पीड़न बढ़ैत गेल; आ आइ मिथिला-समाज, जे त्याग, बलिदान, प्रेम, सौहार्द लेल ख्यात छल, सामाकि रूपें खण्ड-खण्ड भेल अछि। पैघसँ पैघ आपदा, विभीषिका ओकरा एक ठाँ आनि कए, एकमत नहि क' पबै'ए। मिथलाक उदारता आ सामाजिकता ई छल जे ककरो बाड़ी-झारीमे अथवा लत्ती-फत्तीमे अथवा कलम-गाछीमे नव साग-पात, तर-तरकारी, फूल-फल होइ छल तँ सभसँ पहिने ग्रामदेवक थान पर आ पड़ोसियाक आँगनमे पहुँचाओल जाइ छल; कोनो फसिल तैयार भेलाक बाद आगों-राशि कोनो परगोत्राीकें देल जाइ छल; खेतमे फसिल कटबा काल खेतक हरेक टुकड़ीमे एक अंश रखबारकें देल जाइ छल...ई समस्त बात सामाजिक सम्बन्ध-बन्धक मजगूतीक उदाहरण छल। कोनो स'र-कुटुमक ओतएसँ कोनो वस्तु सनेसमे आबए, तँ ओ सौंसे टोलमे लोक बिलहै छल।...कहबा लेल कहि सकै छी जे ई मैथिलजनक जीवनक नाटकीयता आ प्रशंसा हेतु लोलुपता रहल होएत... मुदा तकर अछैत एहि पद्धति आ परम्पराक श्रेष्ठता आ सामाजिक मूल्य हेतु एकर आवश्यकतासँ मुँह नहि मोड़ल जा सकैत अछि। गाममे कोनो बेटीक दुरागसनक दिन तय होइ छल, तँ बेटीक सासुरसँ आएल मिठाइ भरि गाममे बिलहल जाइ छल। तात्पर्य ई होइ छल जे भरि गामक लोक बूझि जाए, जे ई बेटी आब अइ गामसँ चल जाएत। ओहि बेटीकें भरि गामक लोक धन-वित्त-जातिसँ परे, ओहि बेटीकें अपना घ'रमे एक साँझ भोजन करबै छल। सब किछुक लक्ष्यार्थ गुप्त रहै छल। एकर अर्थ ई छल, जे सम्पूर्ण गाम अपन-अपन थाड़ी-पीढ़ी देखा कए ओहि बेटीक विवेककें उद्बुद्ध करै छल जे बेटी! आब तों ई गाम, ई कुल-वंश छोड़ि आन ठाम जा रहल छह, हमरा लोकनि अपन शील-संस्कृतिक ज्ञान तोरा देलियहु, सासुर जा कए, ओतुक्का शील-संस्कार देखि कए अपन विवेकसँ चलिह', आ अपन गाम, अपन कुल-शीलक प्रतिष्ठा बढ़बिह'। इएह कारण थिक जे पहिने कोनो बेटीक दुरागमनक दिन पैघ अन्तराल द' कए तय होइ छल। मुदा आब ई रिवाज एकटा औपचारिकता बनि कए रहि गेल अछि; गामक बेटीकें अपन बेटी मानिते के अछि? मिथिलामे कोनो स्त्राी संगें भैंसुर आ ममिया ससुरक वार्तालाप, भेंट-घाँट वर्जित रहल अछि, एते धरि जे दुनूमे छूआछूतक प्रथा अछि। आधुनिक सभ्यताक लोक एकरा पाखण्ड घोषित केलनि। परिस्थिति बदलै छै, त' मान्यताक सन्दर्भ बदलि जाइ छै, से भिन्न बात; मुदा एहि प्रथाकें पाखण्ड कहनिहार लोककें ई बुझबाक थिक जे ई प्रथा एहि लेल छल, जे एहि दुनू सम्बन्धमे समवयस्की हेबाक सम्भावना बेसी काल रहै छल। संयुक्त परिवारक प्रथा छल, कखनहुँ कोनो अघट घटि सकै छल। ई वर्जना एकटा शिष्टाचार निर्वहरण हेतु पैघ आधार छल। प्रायः इएह कारण थिक जे विवाह कालमे घोघट देबा लेल प्राथमिक अधिकार अही दुनू सम्बन्धीय व्यक्तिकें देल जाइ छनि। जाहि स्त्राीकें केओ भैंसुर अथवा ममिया ससुर नहि छनि, हुनकहि टा ससुर स्थानीय कोनो आन व्यक्ति घोघट दै छनि। घोघट देबाक प्रक्रियामे कतेक नैतिक बन्हन रहैत अछि, से देखू, जे सकल समाजक समक्ष भैंसुर, नव विवाहित भावहुक उघार माथकें नव नूआसँ झाँपै छथि आ बगलमे ठाढ़ ब'र ओहि नूआकें घीचिकए माथ उघारि दैत अछि, ई प्रक्रिया तीन बेर होइत अछि, अन्तिम बेर माथ झाँपले राखल जाइत अछि। अर्थात्‌, सकल समाजक सम्मुख ओ व्यक्ति प्रतिज्ञा करैत अछि--हे शुभे! हम, तोहर भैंसुर (ससुर) प्रण लैत छी, जे जीवन पर्यन्त तोहर लाजक रक्षा करब! एते धरि जे अग्नि, आकाश, धरती, पवनकें साक्षी राखि जे व्यक्ति तोरा संग विवाह केलकहु अछि, सेहो जखन तोहर लाज पर आक्रमण करतहु, हम तोहर रक्षा लेल तैयार रहब! अही तरहें उपनयनमे आचार्य, बह्मा, केस नेनिहारि, भीख देनिहारि, डोम, चमार, नौआ, धोबि, कमार, कुम्हार आदिक भागीदारी; आ एहने कोनो आन उत्सव, संस्कारमे सामूहिक भागीदारी सामाजिक अनुबन्धक तार्किक आधार देखबैत अछि। कहबी अछि जे मैथिल भोजन भट्ट होइ छथि। अइ कहबीक त'हमे जाइ तँ ओतहु एकर सांस्कृतिक, पारम्परकि सूत्रा भेटल। मिथिलाक स्त्राी, खाहे ओ कोनहु जाति-वर्गक होथि, तीक्ष्ण प्रतिभाक स्वामिनी होइत रहल छथि। मुदा परदा प्रथाक कारणें हुनकर पैर भनसा घरसँ ल' क' अँगनाक डेरही धरि बान्हल रहै छलनि। अधिकांश समय भनसे घरमे बितब' पड़नि। सृजनशील प्रतिभा निश्चिन्त बैस' नहि दैन। की करितथि! भोजनक विन्यासमे अपन समय आ प्रतिभा लगब' लगलथि। आइयो भोजनक जतेक विन्यास, तीमन-तरकारीक जतेक कोटि, चटनी आ अचारक जेतक विधान मिथिलामे अछि, हमरा जनैत देशक कोनहुँ आन भागमे नहि होएत। वनस्पतिजन्य औषधिकें सुस्वादु भोजन बनएबाक प्रथा सेहो मिथिलामे सर्वाधिक अछि।... आब जखन एते प्रकारक भोजन ओ बनौलनि, तँ उपयोग कतए हैत?... घरक पुरुष वर्गकें खोआओल जाएत। सर्वदा एहिना होइत रहल अछि, जे कोनो क्रियाक विकृति प्रचारित भ' जाइत अछि, मूल तत्व गौण रहि जाइत अछि। मैथिल पेटू होइत अछि, से सब जनै'ए, मुदा मिथिलाक स्त्राीमे विलक्षण सृजनशीलता रहलैक अछि, से बात कम प्रचारित अछि। जे स्त्राी कामकाजी होइ छलीह, खेत-पथार जा कए शरीर श्रम करै छलीह, गामक बाबू बबुआनक घर-आँगन नीपै, लेबै छलीह, तिनकहु कलात्मक कौशल हुनका लोकनिक काजमे देखाइ छल। स्त्राी जातिक कला-कौशलक मनोविज्ञानक उत्कर्ष तँ एना देखाइ अछि जे हुनका लोकनिक उछाह-उल्लास धरिमे जीवन-यापनक आधार आ घर-परिवारक मंगलकामना गुम्फित रहै छल। जट-जटिन लोक नाटिका विशुद्ध रूपसँ कृषि कर्मक आयोजन थिक, जे अनावृष्टिक आशंकामे मेघक आवाहन लेल होइ छल, होइत अछि; सामा भसेबा काल गाओल जाइबला गीतमे सब स्त्राी अपन पारिवारिक पुरुष पात्राक स्वास्थ्यक कामना करै छथि; विवाह उपनयनमे अपरिहार्य रूपें वृक्ष पूजा (आम, महु), नदी पूजा, प्रकृति पूजा आदि करै छथि। विभिन्न वृत्तिक लोकक अधिकार क्षेत्रा पर नजरि दी, तँ नौआ, कमार, कुम्हार, डोम, धोबि... सबहक स्वामित्व निर्धारित रहैत आएल अछि। जाहि गाम अथवा टोल पर जिनकर स्वामित्व छनि, हुनकर अनुमतिक बिना केओ दोसर प्रवेश नहि क' सकै छलाह। ई लोकनि आपसी समझौतासँ अथवा निलामीसँ गामक खरीद-बिक्री करै छलाह। एहि व्यवहारमे जजमानक कोनो भूमिका अथवा दखल नहि होइ छल। हस्तकलाक कुटीर उद्योग एतेक सम्पन्न छल, जे सामाजिक व्यवस्थामे सब एक दोसरा पर आश्रित छल। सूप, कोनियाँ, पथिया, बखाड़ी, घैल, छाँछी, सरबा, पुरहर, मौनी, पौती, जनौ, चरखा, लदहा, बरहा, गरदामी, मुखारी, उघैन, कराम, खाट, सीक, अरिपन... सब किछु लुप्तप्राय भ' गेल। एते धरि जे ई शब्द आ क्रिया अपरिचित भेल जा रहल अछि। ढोनि केनाइ, भौरी केनाइ, केन केनाइ, पस'र चरेनाइ, झिल्हैर खेलेनाइ सन क्रिया, आ सुठौरा, हरीस, लागन, बरेन, जोती, कनेल, पालो, चास, समार, फेरा, पचोटा, ढोसि, करीन सन शब्द आब आधुनिक साहित्योमे कमे काल अबै'ए। मिथिलाक एहेन विलक्षण विरासत--कला, संस्कृति आ जीवन-यापन पद्धतिक उत्कृष्ट उदाहरण सम्भावनाविहीन भविष्यक कारणें आ सामाजिक कटुताक कारणें हेराएल जा रहल अछि। नवीन शिक्षा पद्धतिसँ सामाजिक जागृति बढ़ल, मुदा ओहि जागृतिक समक्ष ठढ़ भेल वैज्ञानिक विकास आ आर्थिक उदारीकरणक प्रभावमे अहंकारग्रस्त समृद्ध लोकक लोलुपता आ क्षुद्र वृत्ति। संघर्ष जायज छल। अपन पारम्परिक वृत्ति आ हस्तकलामे, पुश्तैनी पेशामे लोककें अपन भविष्य सुरक्षित नहि देखेलै। ÷रंग उड़ल मुरूत' कथामे मायानन्द मिश्र आ ÷रमजानी' कथामे ललित मिथिलाक परम्परा पर आघात देखा चुकल छथि।... ख'ढ़क घर आब होइत नहि अछि, घरामीक वृत्ति एहिना चल गेल। सीक'क प्रयोजन, खाटक प्रयोजन समाप्त भ' गेल, बचल-खुचल माल-जाल लेल नाथ-गरदामी आब प्लास्टिकक बनल-बनाएल डोरिसँ होअए लागल, बच्चाक खेलौना प्लास्टिकक होअए लागल। नौआ, कमार, धोबि, डोमक जागीर आपस लेल जा लागल। ओ लोकनि अपन पुश्तैनी पेशा छोड़ि आन-आन नोकरी चाकरीमे जाए लगलाह। स्त्राी जाति आब भानस करबा लेल किताब पढ़ए लगलीह, फास्ट फूड खएबाक प्रथा विकसित भेल। मिथिला पेंटिंगकें आफसेट मशीन पर छपबा कए पूँजीपति लोकनि री-प्रोडक्शन बेच' लगलाह। जट-जटिन आ सामा-चकेबाक खेलक विडियोग्राफी देखाओल जाए लागल। गोनू झा, राजा सलहेस, नैका बनिजारा, कारू खिरहरि, लोरिकाइनि आदिक कथा छपा कए बिक्री होअए लागल, टेप पर रेकॉर्ड क' कए, अथवा सी.डी.मे तैयार क' कए, री-मिक्ससँ ओकर मौलिकतामे फेंट-फाँट क' कए लाक सुन' लागल, आ एकरा अपन बड़का उपलब्धि घोषित कर' लागल। ... अर्थात्‌ जे लोककला लोकजीवनक संग विकसित आ परिवर्द्धित होइ छल, तकर अभिलेखनसँ (डकुमेण्टेशन) ओकरा स्थिर कएल जा लागल। लोकजीवनक संग अविरल प्रवाहित रहैबाली सांस्कृतिक-धारा आब अभिलेखागारमे बन्द रहत, ओकर विकासक सम्भावना स्थगित रहत। अइ समस्त वृत्तिमे जुड़ल लोककें सम्मानित जीवन जीबै जोगर वृत्ति द' कए एकर विकासमान प्रक्रियाकें आओर तीव्र करबाक आवश्यकता छलै, मुदा जखन मिथिलाक लोके ओ ÷लोक' नहि रहि गेल अछि, तखन लोक-संस्कृति आ लोक-परम्पराक रक्षा के करत?

55 5 5 श्री रामभरोस कापड़ि “भ्रमर” (१९५१- ) जन्म-बघचौरा, जिला धनुषा (नेपाल)। सम्प्रति-जनकपुरधाम, नेपाल। त्रिभुवन विश्वविद्यालयसँ एम.ए., पी.एच.डी. (मानद)। हाल: प्रधान सम्पादक: गामघर साप्ताहिक, जनकपुर एक्सप्रेस दैनिक, आंजुर मासिक, आंगन अर्द्धवार्षिक (प्रकाशक नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, कमलादी)। मौलिक कृति: बन्नकोठरी: औनाइत धुँआ (कविता संग्रह), नहि, आब नहि (दीर्घ कविता), तोरा संगे जएबौ रे कुजबा (कथा संग्रह, मैथिली अकादमी पटना, १९८४), मोमक पघलैत अधर (गीत, गजल संग्रह, १९८३), अप्पन अनचिन्हार (कविता संग्रह, १९९० ई.), रानी चन्द्रावती (नाटक), एकटा आओर बसन्त (नाटक), महिषासुर मुर्दाबाद एवं अन्य नाटक (नाटक संग्रह), अन्ततः (कथा-संग्रह), मैथिली संस्कृति बीच रमाउंदा (सांस्कृतिक निबन्ध सभक संग्रह), बिसरल-बिसरल सन (कविता-संग्रह), जनकपुर लोक चित्र (मिथिला पेंटिङ्गस), लोक नाट्य: जट-जटिन (अनुसन्धान)। नेपाली कृति: आजको धनुषा, जनकपुरधाम र यस क्षेत्रका सांस्कृतिक सम्पदाहरु (आलेख-संग्रह), भ्रमरका उत्कृष्ट नाटकहरु (अनुवाद)। सम्पादन: मैथिली पद्य संग्रह (नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान), लाबाक धान (कविता संग्रह), माथुरजीक “त्रिशुली” खण्डकाव्य (कवि स्व. मथुरानन्द चौधरी “माथुर”), नेपालमे मैथिली पत्रकारिता, मैथिली लोक नृत्य: भाव, भंगिमा एवं स्वरूप (आलेख संग्रह)। गामघर साप्ताहिकक २६ वर्षसँ सम्पादन-प्रकाशन, “अर्चना” साहित्यिक संग्रहक १५ वर्ष धरि सम्पादन-प्रकाशन। “आँजुर” मैथिली मासिकक सम्पादन प्रकाशन, “अंजुली” नेपाली मासिक/ पाक्षिकक सम्पादन प्रकाशन। अनुवाद: भयो, अब भयो (“नहि आब नहि”क मनु ब्राजाकीद्वारा कयल नेपाली अनुवाद) सम्मान: नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान द्वारा पहिल बेर १९९५ ई.मे घोषित ५० हजार टाकाक मायादेवी प्रज्ञा पुरस्कारक पहिल प्राप्तकर्ता। प्रधानमंत्रीद्वारा प्रशस्तिपत्र एवं पुरस्कार प्रदान। विद्यापति सेवा संस्थान दरिभङ्गाद्वारा सम्मानित, मैथिली साहित्य परिषद, वीरगंजद्वारा सम्मानित, “आकृति” जनकपुर द्वारा सम्मानित, दीर्घ पत्रकारिता सेवाक लेल नेपाल पत्रकार महासंघ धनुषाद्वारा सम्मानित, जिल्ला विकास समिति धनुषा द्वारा दीर्घ पत्रकारिता सेवाक लेल पुरस्कृत एवं सम्मानित, नेपाली मैथिली साहित्य परिषद द्वारा २०५९ सालक अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन मुम्वई द्वारा “मिथिला रत्न” द्वारा सम्मानित, शेखर प्रकाशन “पटना” द्वारा “शेखर सम्मान”, मधुरिमा नेपाल (काठमाण्डौ) द्वारा २०६३ सालक मधुरिमा सम्मान प्राप्त। काठमाण्डूमे आयोजित सार्कस्तरीय कवि गोष्ठीमे मैथिली भाषाक प्रतिनिधित्व। सामाजिक सेवा : अध्यक्ष-तराई जनजाति अध्ययन प्रतिष्ठान, जनकपुर, अध्यक्ष- जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठान, जनकपुर, उपाध्यक्ष- मैथिली प्रज्ञा प्रतिष्ठान, जनकपुर, उपकुलपति- मैथिली अकादमी, नेपाल, उपाध्यक्ष- नेपाल मैथिली थाई सांस्कृतिक परिषद, सचिव- दीनानाथ भगवती समाज कल्याण गुठी, जनकपुर, सदस्य- जिल्ला वाल कल्याण समिति, धनुषा, सदस्य- मैथिली विकास कोष, धनुषा, राष्ट्रीय पार्षद- नेपाल पत्रकार महासंघ, धनुषा। अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन आ नेपाल रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’

चारिम वर्ष हम पटना गेल रही । चेतना समितिमे बैजू बाबू भेटलथि । विद्यापति स्मृति पर्व भ’ गेल रहै । कोनो आने सन्दर्भमे रही । ओ आवेशपूर्वक दिल्लीमे आयोजन होब बला अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनमे अएबाक हेतु आमंत्रण देलनि । हमरा सभ लेखें पहिल आयोजन रहैक–हम आ डा. विमलकें जएबाक रहैक, मुदा जं कि ओ बड हडबडीमे आ अस्पष्ट रुपें अएबाक बात बाजल रहथि, हम सभ जा नहि सकल रही । बरु काठमाण्डूसं धीरेन्द्र आ कमलेश झा गेल रहथि । ‘मिथिलारत्न’ सं सम्मानित होइत गेलाह आ ओत्तहि घोषणा कएलनि–अगिला साल ई समारोह काठमाण्डूमे हयत । तालीक गडगडाहटि भेल । जे से हम सभ जा नहि सकलहुं । बादमे बैजू बाबूकें भेलनि जे नेपाल सं किछु आरलोकनि छुटि गेलाह, अएबाक चाहियनि । ओ जनकपुर अएलाह आ धीरेन्द्र आदिसं सम्पर्क कएलखिन्ह जे एहि वर्ष काठमाण्डूमे आयोजनक की तैयारी अछि । जे हुनका संग रहनि हुनक कथन अनुसार धीरेन्द्र आदि जे केओ गछने रहनि साफ पाछां हटि गेलनि । ओ मर्माहत भ’ जनकपुरसं घूरि गेलाह । तखन ओम्हर जा मुम्वईमे आयोजन करबाक ब्योंत धरौलनि । आब मुम्वईमे अएबालेल पुनः बैजू बाबूक आमंत्रण, आग्रह आ स्नेहपूर्ण दवाव आएल । रेवती जीकें सेहो आग्रह भ’ गेल रहिन–विद्यापति स्मृतिपर्वक अवसर पर दरिभंगेमे । ई तेसर सालक गप थिक । अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन नेपाल–भारतक विद्वान, मैथिली सेवी सभक सझिआ मंच होएबाक हमर विश्वास मुम्वई चलबाले’ प्रेरित कएलक आ तखन दरिभंगासं टिकट रिजर्बक व्यवस्था चन्द्रेशजी जिम्मा देल गेल । जेना बैजु बाबूक मुंहकहबी कार्यक्रम तहिना अस्पष्ट चन्द्रेशजीक ओरिआओन । हम सभ दरिभंगा पहुंचि दोसर दिन भेने मुम्वईक हेतु प्रस्थान कएने रही । मुम्वईक सम्पूर्ण कार्यक्रमक सन्दर्भमे पुस्तकमे आनठाम हमर विचार आबि चुकल अछि । तहिना गत वर्ष कलकत्ताक तैयारी रहैक । एहि बेर हमरा पर थप भार द’ देलनि बैजू बाबू–‘मिथिला रत्न’क हेतु व्यक्तित्व चयनक । रेवती जीसं सल्लाह कएल–ओ वदरी नारायणवर्माक नाम बतौलनि । हम डा. रामदयाल राकेशकें एकरा लेल उपयुक्त वूझि दुनूक नाम बैजूबाबू लग पठा देलियनि । डा. राकेश कें काठमाण्डूसं बजाओल गेलनि । हम सभ निर्धारित तिथिकें ‘गंगासागर’ सं कलकत्ताक हेतु विदा भ’ गेल रही । ओत्त पहुंचलाक बाद स्टेशन पर ठाढ बैजू बाबू मोनकें गदगद क’ देने रहथि । तकरा बाद अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनमे नेपालक हमरा चारि गोटकैं फूटे कोठरीमे आवास देल गेल आ सम्मान सेहो । मैथिली सम्मेलनक अन्तराष्ट्रिय स्वरुप प्रदान करबा लेल हमरा सभक उपस्थिति जहिना अनिवार्य देखल गेल तहिना डा. वैद्यनाथ चौधरी बैजूक व्यवहार ततबे सहज आ अपनत्व भरल । आब चारिम चेन्नईमे अछि । तैयारी चलि रहल छैक । ओत्तहु नेपाल एकटा महत्वपूर्ण सहभागी रुपमे उपस्थित हयत तकर आशा करैत छी । अनुभूति आ औचित्य हमरा बूझल नहि अछि बैजू बाबू कोन उद्देश्य राखि ई अन्तराष्ट्रिय स्वरुपमे एकरा शुरु कएलनि । ओ एकर शुभारंभ मैथिलीकें अष्टम अनुसूचिमे स्थान भेटलाक बाद ताही तिथि २२ दिसम्वरकें कएलन्हि । जकरा अधिकार दिवसके रुपमे मनाओल जाइछ – २२ ता.क’ अधिकार दिवस आ २३ ता.क’ अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन । पहिल बेर दिल्लीक हेतु आमंत्रण भेटला पर हमरा सभक हिचकिचाहट, आयोजनमादे शंका ढेर सन छल । बैजू बाबूक संघर्षशील व्यक्तित्व प्रभावित त करैत छल, मुदा हरफन मौला काम काजसं आशंका उठैत छल, पता नहि जे कहैत छथि, करबो करैत छथि वा नहि तए“ दिल्लीक ओ सम्मेलन छुटल तकर हमरा काफी अफशोच अछि । बादमे मुम्वई आ कलकत्ताक अनुभब काफी सकारात्मक, प्रशंसनीय आ अनुकरणीय रहल । अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक समस्त गरिमाकें निर्वाह करबाक प्रयास ओ करैत छथि । कतौ स्थानीय आयोजक अपनासं उन्नैस वुझाइत छनि तं कतौ वीस । तए“ परेशानी त हुनके उठब’ पडैत छनि । मुदा हम सभ जे अनुभव कएलहुं ओ अत्यन्त काजक छल । मैथिली संसारक बहुतो साहित्यकार, सेवी, भाषाशास्त्री, संगीत एवं नृत्यकलाकार सभसं भेंटघांट होइत अछि । सभक विचारक आदान–प्रदान होइत छैक । नव संसारक निर्माण होइत छैक । भाषा, साहित्य, संस्कृतिक हेतु सेहो एहि सम्मेलनक उपादेयता स्पष्ट अछि । मैथिली भाषाक उत्थानक हेतु नव–नव योजना बनैत छैक । नव–नव पोथी प्रकाशित एवं विमोचित होइछ । विद्वान एवं प्रेमी लोकनि सम्मानित होइत छथि । सांस्कृतिक कार्यक्रममे नव–नव प्रतिभा आगां अबैत छथि । सम्पूर्ण मैथिल समाजसं ओ प्रतिभा जुडैत अछि, जाहिसं बादमे ओकर विकासक अवसर प्रदान होइछ । ‘राखी’ एकटा अपाहिज लडकी एहने प्रतिभा अछि जे सभकें प्रभावित कएने रहए । अमता धरानाक कलाकार लोकनि मुग्ध करैत छथि । नेपाल आ भारतक विचक सम्वन्धक नीक सूत्रपात ई सम्मेलन करैत अछि । नेपालक प्रतिनिधिके मंचपर उपस्थितिसं दुनू देशक प्राचीन सम्वन्धमे ताजापन अबैछ । मुम्वई आ कलकत्तामे पंक्ति लेखकक भाषणसं हजारोंक दर्शक दीर्धामे भेल तालीक गडगडाहटि तकर प्रमाण छैक । नेपालमे होइत मैथिली गतिविधिसं सम्पूर्ण मिथिलाञ्चलकें, खास क’ प्रवासी मैथिलकें जानकारी करएबाक ई सुन्दर अवसर होइत अछि, जकर उपयोग मुम्वई आ कलकत्ता दुनूठाम कएल गेल । कलकत्तामे नेपालमे मैथिली, नामक वूकलेट छपा वांटल गेल रहय तं राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’क सद्यः प्रकाशित पुस्तक” राजकमलक कथा साहित्यमे नारी’ विमोचित भेल । ओत्त गामघर साप्ताहिक विशेष अंक, नेमिकानन’क अंक सभ वांटल व विक्रय लेल उपलव्ध कराओल गेल । बहुतो साहित्यकार रुचिसं नेपालक भाषा, साहित्यक वारेमे जानकारी लेलनि । जानकारीक आदान प्रदान भेल । ज्ञान समृद्ध भेल । तखन एखन धरि सहभागी भ’ जे किछु अनुभव कएल अछि ओ एकर औचित्यकें स्वतः प्रमाणित करैत अछि । ई सम्मेलन निरन्तर जारी रहबाक चाही । वैजू बाबू जुझारु लोक छथि, आयोजनकें सफल बनएबा लेल अहर्निश खटैत छथि । हाथ, पएर, मुंह सभ धरबामे संकोच नहि करैत छथि मां मैथिलीक प्रतिष्ठाक हेतु । एहन विराट हृदयी, समर्पित आ लगनशील व्यक्तित्व भेने मैथिली समादृत भेलीह अछि । अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक अनुभूति किछु किछु सुझाव देबाक लेल हमरा उत्प्रेरित करैत अछि । जं ई भ’ जाइत त सोनमे सुगन्ध भ’ जइतैक – ई हमरा लगैत अछि । सूझाओ १. अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन हयबाक कारणें एकर वैनर जे बनैक ताहिमे नेपालक किछुओ प्रतीक चिन्ह अवश्य रहैक । २. कार्यक्रम सभ व्यवस्थित आ पूर्व निर्धारित होएबाक चाही । कार्यक्रम चलैत बेरमे व्यवस्थापन करब अस्तव्यस्तता लबैत अछि । ३. सभ कार्यक्रम, सहभागी वीच एकदिन पूर्वे वितरीत भ’ जाए तं उत्तम ४. अधिकार दिवस दिन मात्र भाषण नहि, कार्यपत्र प्रस्तुति आ टिप्पणीक कार्यक्रम राखल जाए । नेपालक प्रतिनिधिकें कार्यपत्र आ बजबाक अवसर अवश्य देल जाइछ । ५. मूल समारोहमे नेपालक प्रतिनिधित्व मंच पर अवश्य हयबाक चाही । ओ उपस्थिति आ वक्ता दुनू रुपमे होए । ६. आवासक व्यवस्था प्रति सतर्क रहल जाए । ७ स्मारिकाक स्तरीय प्रकाशन हो, जाहिमे विगतक सम्मेलन सभक सन्दर्भमे आलेख आ चित्रवाली अवश्य देल जाए । ८. कलकत्ता सम्मेलनमे एकर निर्वाह भेल अछि, एकरा आगूओ एही रुपमे बढाओल जाए । ९. अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक सहभागि सभक सूची १५ दिन पूर्व अन्तिम रुप द’ सार्वजनिक क’ देल जाइक आ संगहि ‘मिथिला रत्न’ पौनिहारक जीवनी फूटसं प्रकाशित क’ औचित्य प्रमाणित कएल जाए । नेपालक साहित्यकार, मैथिली प्रेमी सभकें अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनसं बहुत किछु आशा छैक । दुनू देशमे मैथिली अपन अस्तित्व लेल लडि रहल अछि । एहनमे ई भेंटघांट, अप्पन–अपनौती, दुख–दुखक वंटवारा आपसी सम्वन्धकें सुदृढ त करबे करैत अछि, लक्ष्य प्राप्तिक हेतु मोनकें मजवूत सेहो बनबैत अछि । अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक महासचिव डा. वैद्यनाथ चौधरी बैजू एहि सम्वन्धक सूत्रकें गसिआ क’ पकडने छथि । हुनक इएह स्नेह, सद्भाव आ अपनैती नेपालीय राजनीतिक इतिहासमे मिथिलाराज्य’क स्थापनार्थ शक्ति आ वातावरण निर्माणमे सहायक भ’ रहल अछि । हुनक जुझारु व्यक्तित्व एत्त प्रेरणाक स्रोत रहलए । हमसभ एहि सम्वन्धक निरन्तरताक अपेक्षा करैत छी । आ नेपाल–भारत विचक आपसी आ प्रेमक प्रतीक रुपमे चलैत आबि रहल एहि सम्मेलनक सफलताक कामना करैत छी । फ्लैश बैक-रामभरोस कपडि भ्रमर नरेश पाछां चलि गेल अछि, बहुत पाछां । प्रायः पचास वर्ष  पाछां । गामक सहपाठी सभक संगे खेलए ओ । बहादुर नोकर रहैक – वावूजी जंगलकातसं लओने छलाह । एक बोलिआ, आदेश चाही, काम फत्तह कइएक दम लैत छल । से बाबूजीकें आदेश रहैक – गुरुजीलग पढ ल जएबाक छै से बहादुर लाख चिचिऔलो पर नरेशकें कान्‍हपर बोकि कन्‍हाइ साहुक दलान पर गुरुजी लग दइए अबैक । ओत्त गेला पर गुरुजीक कांच करची अथवा खजूरक छडी ओकर सभ जीद हेरा दैक । ओ चुपचाप हाथमहक पाटीपर कारिख पोति कचरासं साफ क चमकाब लागए आ तखन भठासं लिखबाक प्रयास करए – क ख ग घ...। “इस्‍स....” गुरुजीक छडी जखन बांहि पर पडैक तं ओ लोहछि जाए । मन होइ भागि जाइ मुदा... वहादुरक डीलडौल आ पिताक आदेश मन पडितो मनमारि क पाटी पर आंखि गडा कखरा लिखबाक प्रयास कर लगए । गुरुजीक ओहिठाम बटखरा कंठस्‍थ रहैक । ई कंठस्‍थ करब ओकर मजवूरी रहैक, ओना हिसावमे ओ ओहुना कमजोरी महशूस करए । चौठचन्‍दमे गुरुजीक संग घंटी बजबैत, काठक डंटाकें बजबैत घरे–घरे घुमनाई आ गुरुजीक डेरापर जा गुडचाउरक प्रसाद खएनाईक अपन आनन्‍द रहैक । आनन्‍द तं पानि नहि पडने हर हर महादेव बना गाम घुमबै काल सेहो अबैक । कोनो सहपाठीकें सौंसे देहमे छाउर रगडि देल जाइत छलैक । माथपर आ बांहिमे सेहो अशोक पात सभ लपेटि देल जाइत छलैक । माथ पर जूट आ सनसं जटा ताहिपर टीनकें कैंचीसं काटि चान लटका देल जाइक । हाथमे वावाजीके त्रिशूल आनि क ध देल जाइक । वस–वनि जाइक महादेब । छौडा सभक हेंज पाछां–पाछां हाक परैत जाइक – हर, हर महादेव पानी देऊ अलिकती पुगेन, बढी देउ ! भाव रहैक महादेव पानी दीअ, कम सं नहि भेल, बेसी दीअ.... । जकरा दरबज्‍जा पर जाइक पानि उझलि दैक । मान्‍यता रहैक पानि देलापर वर्षाक संभावना बढि जाइत छैक । वेचारे महादेव बनल बौआ बादमे थर–थर कांपए, वच्‍चा सभ ताली पिटैत हंसैक । वाल सुलभ प्रताडना ओहि समयमे खूब प्रचलित रहैक । नरेश ओहि हेंजमे अगुवा रहय....। नरेशक ठोढ पर अपने आप मुस्‍की दौडि जाइत छैक । वितलाहा क्षणक स्‍मरण कतौसं गुदगुदा दैत छैक ओकरा । वालशोषणक विरुद्ध ओहो कतेक आलेख लिखि चुकल अछि, कतेको सेमिनार मे भाग ल भाषण छांटि चुकल अछि । मुदा नेनामे नेनेद्वारा कएल ई अपराध शोषण नहि रहैक ! नरेश वाल सुलभताक ओ क्षण फेरसं स्‍मरण करैत सिहरि उठैत अछि आ कतौ भोतिआ जाइछ पुन.......। मुश्‍किलसं ७–८ वर्षक छल हयत । गामेक स्‍कूलमे पढए, मुदा संगति रहैक अपने टोल महल्‍लाक धीआपूतासं । ताही मंडलीमे एकटा छौरी रहैक इजोतिया । ओकरे लगुआक वेटी । नीक रहैक कि अधलाह ओकरा तहिया ज्ञान नहि रहैक मुदा ओकरा संगे इजोरिया रातिमे अन्‍हरिया–इजोरिया खेलैत ओ खूब प्रशन्‍न रहल करए । आंगनेमे दुनूपयर आगां पसारि वैसि , वांहिके केहुनी लगसं मोडि आगां पाछां करैत आ ताही लयमे दुनू पयरके सेहो आगां पाछां करैत पाछा मुंहे घुसकैत इजोतिया खेलल करए आ गाओल करए–“आगेमाई ककरी के बतिआ...” त ओकरा नीक लगैक । इजोरिया रातिमे चानक चारुकात बनल गोल घेराकें कौतुहल सं देखैत काल माय रहस्‍यमय बोलीमे     समझबैक – ई हमरा सभक पुरखा सभक वैसार छै इन्‍दर भगवान लग । कहै है निचां पानि विना अकाल पडल छै, पानि दिऔ । आब पानि हयबे करत....। नेनामे ई बात सत्‍य लगैक आ आश बन्‍हाई जरुर वर्षा हयत । तेहने समयमे जट–जटिन गीत होइक । टोलक महिला सभ जटा आ जटिन कनए आ गीत गाबि–गाबि झूमए । ओहिमे पुरुष नहि, नेनाकें छुट रहैक । नरेश नियमित ओकर दर्शक रहए, ओकर संगी इजोतिया ओहि मंडली मे सामेल रहैक, ओ एकटक ओकरा सभकें झूकि क आगां बढैत आ तहिना माथ उठा क पाछां अबैत देखैत रहय..... । नरेशकें फेर किछु मोन पडैछै, ठोढ पर हंसी अबैत–अबैत रुकि जाइछै । भतखोखरि बुढिआक अंगनामे वेंग कुटि मैलाक संग पतली फेकि देल जाइ छल आ ओ वुढिआ भरि राति फेकनिहारिकें पुरा खनदानकें उराहि दैत छलैक । वेटी–रोटी करैत रहैत छली । वास्‍तवमे वेंट कुटि क तए ओकरे आंगनमे फेकल जाइत छलै जे ओ बेसी गाडि पढि सकैत छलीह । राति भरि जुआन छौडी सभक धुमगज्‍जरिक संग वालसुलभ उत्‍सुकतासं पाछां – पाछां दौगब महज खुशी दैत छलै । लगै दिनमे बहादुरक घीसिआ क गुरुजी के चटिसारमे ल जएबाक डरसं मुक्त रातुक ई माहौल स्‍वच्‍छन्‍द छैक । ने वावूजीक डर, ने वहादुरके उठा  ल जएबाक चिन्‍ता । वात वुझौक कि नहि, नरेश रमल रहैत छल ओहि खेलमे । ओकरा तं तखनो ने किछु बुझायल रहै जखन इजोतिया ओकर घरक पछुआर बला गाछी आ भुसा घरलग एकटा प्रस्‍ताव कएने रहैक – नरेश,खेलबे  अर्थ त ओकरा ओतेक नै वुझल भेलै मुदा ओकर इशारासं आशय वुझने रहय आ डेरा गेल रहैक – नहि, हम नहि खेलबौ । ठाढे ओ नासकार चलि गेल रहय । जं कि इजोतिया ओकरा उमेर सं बेसीक वुझाइक, ओ वातकें वुझैक, मुदा नरेश....। पता नहि नरेशकें किए आइ पुरना बात मोन पड लागल छै । ओ भोरेसं अपन पोताक उदण्‍डपनीसं फिरिशान भेल अछि । एक तं भोरमे देरीसं उठत, उठि कत्त पडायत ठेकान नहि । स्‍कूल जएबाक कोनो जरुरी जेना नहि होइक । कुण्‍डलिया छौडा सभक संगत आ पता नहि गुटका, भांग, सिगरेट किंवा आनो कोनो नशा खाइत हो ,त मनमे आशंका उठल छै । खौंझायल मोने वरण्‍डाक खुरसीपर बैसि गेल । तखने ओकरा वुझएलै – एक ई दिन अछि आ एक ओ दिन रहय ।फेर भसिया गेल रहय । एखनो मोन थीर कहां भेलैए...। माय जखन ओकरा दुनू मोडलहबा टांगपर लादि दुनू हाथ पकडि घुघुमना खेलबै तं हिल्‍ला झुलबाक मजा ओ लेल करए । गीतकलय संगे झुलैत नरेशक वालपन महज देहमे गुदगुदी आ आनन्‍द मात्र उठा सकैत रहय वुझए किछु नहि । मुदा जखन ओ टेल्‍हगर भेल त मायक नक्‍कल करबाक मोन होइक । अपन भातिजकें ओहिना टांगपर ध झुलब लागय आ पढ लागय–घुघुमना घुघुमना, बौआकें गढा देब दुनू कान सोना । ओकरो झुलबैत आनन्‍द लगैक आ बौआ सेहो हंसि, हंसि क अपन आनन्‍दक अनुभूति करबैत छल । ओना ओकर छोट–छोट पयर–हाथ बौआके बेसी काल सम्‍भारबाक अवस्‍थामे नहि रहैक, ओ उतारि दैक तुरते । अपन नेनपनक उछल–कुदक दूटा घटना मन पडिते सौंसे देह सीहरि जाइत छैक । बड मुश्‍किलसं बचल रहैक आंखि ओकर.. । आंगन मे दुनू भाइ खेलैत रहय । भैया तीर धनुष बना चलौल करए । एक बेर भेलै ई जे तीर सोझे नरेशकें आखिएमे लगलै–वाम आंखिमे । सौंसे हाहाकार मचि गेलै, माय त बताह भ गेल छलीह । ओकरा कनैत–कनैत बेहाल रहैक । गामेक टोटकासं आंखि ठीक भेल रहैक । पता नहि माय कोन–कोन दैब पीतरकें एहि लेल मानि देने छलीह । तहिना एकबेर गछुलीमे आम लुट बेरमे अन्‍धाधुन्‍ध दौगल रहय नरेश, त गाछीमे गाडल एकटा खुट्टाक नोक सोझे कपारमे गरि गेल रहैक । माथ सुन्‍न भ गेल रहैक । मायके जखन पता लगलै त ओ हकासल–पिआसल दौगलि रहय घराडी पर आ ओकरा समेटि क गामक बैध लग लजा उपचार करौने रहैक । वाल सुलभ जीवन शैली, गामसं जनकपुर धरिक यात्रा, पढाइ आ डिग्री सभक अपन–अपन कथा रहैक । धन–खेती जे होइक, शिक्षामे पछुआएल परिवारक प्रत्‍येक ओ संघर्ष ओकरा भोग पडलै जे एकटा सभ्‍य समाजक अंग बनबा ले जरुरी होइत छैक । आइ जखन उमेरक चारिम प्रहरमे जएबा ले तैयार अछि ओकरा लगैछै ओ फेरसं बचपन दिश लौट चाहैए । दिन रातिक षडयन्‍त्र, राजनीतिक विद्रुपतता, चन्‍दा, अपहरण, हत्‍या किंवा दिन दिन बढैत असुरक्षाक भय आ आतंकसं त्रसित समाजमे तनावक जिनगी जीबाक अर्थेकी? मुदा फेरसं ओ स्‍वयं प्रश्‍न करैत अछि की ओ नेनपनक स्‍वच्‍छन्‍द, सहज स्‍नेहसं भरल किछु साल घूरि सकत ! चलु ओ वितलहा वर्ष नहि घूरत ई सत्‍य थिक, अपने तं ओहि युगमे जा सकैछी ने ! हं, ई संभव छैक । भ सकैछ एना भेने तनावमे कमि अबैक, मुंहपर चापलुसीक वोल झाडैत, परोक्षमे चरित्र हत्‍याले उताहुल सरसमाजक व्‍यक्तित्‍वक दोगला मुंह देखबाक दुर्भाग्‍यसं बंचि त सकै छी । हमहीं किएने अपनाकें नेना बनाली ! नरेशकें अपने सोचपर हंसी लगै छी । की ई संभव छैक । ओहुना साठिक बाद लोक नेनपनमे पुनः प्रवेश क जाइए कहांदन । ओकरो अवस्‍था तं आबिए रहल छैक । चलल जाए एक बेर सएह सही....। नरेशकें जेना सौंसे देह हल्‍लुक लगैत छैक । वरण्‍डासं उठैत अछि । आंगन मे अबैत अछि । पोता आबि गेल छै । ओकरा डंटबाक इच्‍छा रहितो ओ चुप रहैत अछि । प्रारंभ एत्तहिसं हुअए तं हर्जे की? Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

1515 15 15 डॉ कैलाश कुमार मिश्र (८ फरबरी १९६७- ) दिल्ली विश्वविद्यालयसँ एम.एस.सी., एम.फिल., “मैथिली फॉकलोर स्ट्रक्चर एण्ड कॊग्निशन ऑफ द फॉकसांग्स ऑफ मिथिला: एन एनेलिटिकल स्टडी ऑफ एन्थ्रोपोलोजी ऑफ म्युजिक” पर पी.एच.डी.। मानव अधिकार मे स्नातकोत्तर, ४०० सँ बेशी प्रबन्ध -अंग्रेजी-हिन्दी आऽ मैथिली भाषामे- फॉकलोर, एन्थ्रोपोलोजी, कला-इतिहास, यात्रावृत्तांत आऽ साहित्य विषयपर जर्नल, पत्रिका, समाचारपत्र आऽ सम्पादित-ग्रन्थ सभमे प्रकाशित। भारतक लगभग सभ सांस्कृतिक क्षेत्रमे भ्रमण, एखन उत्तर-पूर्वमे मौखिक आऽ लोक संस्कृतिक सर्वांगीन पक्षपर गहन रूपसँ कार्यरत। यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का, यू.एस.ए. केर “फॉकलोर ऑफ इण्डिया” विषयक रेफ़ेरी। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालयक पुरस्कारक रेफरी सेहो। सय सँ ऊपर सेमीनार आऽ वर्कशॉपक संचालन, बहु-विषयक राष्ट्रीय आऽ अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता। एम.फिल. आऽ पी. एच.डी. छात्रकेँ दिशा-निर्देशक संग कैलाशजी विजिटिंग फैकल्टीक रूपमे विश्वविद्यालय आऽ उच्च-प्रशस्ति प्राप्त संस्थानमे अध्यापन सेहो करैत छथि। मैथिलीक लोक गीत, मैथिलीक डहकन, विद्यापति-गीत, मधुपजीक गीत सभक अंग्रेजीमे अनुवाद। “रचना” मैथिली साहित्यिक पत्रिकामे “यायावरी” स्तंभक प्रशस्त स्तंभकार श्री कैलास जीक “विदेह” लेल प्रारम्भ कएल गेल ई यायावरी स्तंभ दीर्घ काल तक स्थायी रहत ताहि कामनाक संग प्रस्तुत अछि अहाँ लोकनिक समक्ष ई पहिल खेप। यायावरी नॉर्थ कछार हिल्स: धरतीक नुकाएल स्वर्ग –डॉ कैलाश कुमार मिश्र -हमर अंग्रेजीमे लिखल लेख पढ़ि लोक सभ हमरासँ मैथिलीमे लिखबाक हेतु अनुरोध करैत छथि। स्पष्ट कए दी जे अंग्रेजी हमर व्यवसाय केर भाषा थिक। कहियो मिथिलामे नहि रहलहुँ, संस्कृत आऽ सोतियामी मैथिली नहि तँ पढ़लहुँ आऽ ने लिखलहुँ। तञि मैथिलीमे लिखक कल्पना जखने करैत छी तँ हाथ काँपय लगैत अछि। तीन वर्ष पूर्व डॉ विश्वनाथ झा अपन त्रैमासिक पत्रिका रचना हेतु लिखबाक लेल भावनात्मक रूपेँ हमरा बाध्य कऽ देलन्हि। डराइत-डराइत हम रचनामे “यायावरी” नामसँ अपन यात्रा-वृत्तान्त लिखनाइ प्रारम्भ केलहुँ। पाँच अंकमे लगातार लिखलाक बाद कार्यक अत्यधिक व्यस्तताक कारणेँ यायावरी लिखनाइ बन्द कऽ देलहुँ। घुमब आऽ अंग्रेजीमे लिखबसँ समय कहाँ बचैत अछि। एम्हर नौ-दस माससँ गजेन्द्र बाबू अपन पत्रिकाक हेतु पुनः मैथिलीमे लिखबाक हेतु कहि रहलाह अछि। अतेक चेरियेलन्हि जे अन्ततः यात्रा-वृत्तान्तक “यायावरी” प्रारम्भ कऽ रहल छी। पाठक लोकनिसँ नम्र निवेदन जे हमर लेखक विषय आऽ वर्णनकेँ पढ़थि आऽ भाषा-विन्यासक गलतीपर बेशी ध्यान नहि देथि। यायावरीक प्रारम्भ हम असम केर एक छोट भव्य, रम्य, आकर्षक, कठिन परन्तु अनेक रंग आऽ उल्लाससँ भरल भूखण्ड, नार्थ कछार हिल्ससँ कऽ रहल छी। अपन संस्था – इन्दिरा गान्धी राष्ट्रीय कला केन्द्रक सदस्य सचिव डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्ती महोदय केर निर्देश एवं कार्यशैलीसँ प्रभावित भऽ हम समस्त उत्तर-पूर्व भारत एवं सिक्किममे विभिन्न क्रियाकलाप प्रारम्भ केलहुँ, जाहिसँ स्थानीय संस्कृति आऽ विरासत केर रक्षा कएल जाऽ सकय। असममे कार्यक श्रीगणेश हमरा लोकनि “श्रीमंत शंकरदेव कला क्षेत्र” गुआहाटी केर सचिव श्री गौतम शर्माक संग कएल। लगभग ६४ बीघा पहाड़ी धरतीमे बनल श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र बड्ड रमनगर जगह बुझना गेल। जे कियो गुआहाटी घुमए जाथि आऽ हुनका कलासँ थोरेकबो प्रेम होइन तँ श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र अवश्य जाथि, ई हमर निवेदन। कलाक्षेत्रमे पानिक फब्बारा, फुलबारी, विशाल आऽ कलात्मक अनेको भवन, दू टा अतिथि गृह, आर्टिस्ट विलेज; कलाकार सभकेँ रहबाक हेतु डॉरमेटरी; संग्रहालय, कला दीर्घा, बच्चा सभक लेल टॉय रेल एवं अन्य व्यवस्था; असम केर इतिहासक सम्बन्धमे “लाइट एण्ड साउंड” कार्यक्रम; पुस्तकालय, शिवसागर जिलाक ऐतिहासिक रंगघर केर रिप्रोडक्शन इत्यादि बरवश कुनो घुमए बलाकेँ मोन मोहि लैत छैक। असम केर अधिकांश ऑफिस आऽ घरसभमे लोक अपन जुत्ता-चप्पल आदि घरक बाहरे खोलि प्रवेश करैत छथि। हमहूँ एहि परम्पराक पालन जखन-जखन असम जाइत छे, तखन-तखन करैत छी। स्पष्ट कऽ दी जे श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र सोलहम शताब्दीक महान वैष्णव सन्त शंकरदेव केर नामपर असम राज्य सरकार, भारत सरकारक आर्थिक सहायतासँ समस्त उत्तर-पूर्व भारत, विशेषरूपेण असम केर संस्कृति, विरासत तथा गौरवक संरक्षण एवं सम्वर्धन करबाक दृष्टिसँ बनल छैक। शंकरदेव जातिसँ कायस्थ छलाह। श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह जे असम काडर केर आइ.ए.एस.पदाधिकारी छलाह; बादमे भारत सरकारक गृह सचिव भेलाह आऽ अन्ततः विश्वबैंक केर कार्यकारी निदेशक पदसँ अवकाश प्राप्त कएलन्हि, हमरा कहलाह जे शंकरदेव मैथिल छलाह। हुनकर पितामह मिथिलासँ असम प्रवास कऽ गेलथिन्ह। पञ्जीसँ ईहो पता चलैत छैक, जे शंकरदेव तँ नहि परन्तु हुनकर पिता तीन-चारि बेर मिथिला आयल छलाह। एहि बातक एतय उल्लेख करब केर पर्याय ई जे एहि विषयपर गहन शोध करबाक आवश्यकता थिक। यदि ई बात प्रमाणित भऽ गेल जे शंकरदेव मैथिल छलाह तँ आइ हमरा लोकनि विद्यापतिक मैथिल होएबापर गर्व करैत छी, तहिना शंकरदेवोपर गर्व करब। हमरा हिसाबे तँ प्रबुद्ध मैथिल सभ बिहार सरकारसँ शंकरदेवपर एक गहन शोध करबाक परियोजना प्रारम्भ करबाक हेतु निवेदन करथि। गजेन्द्रजी एहि दिशामे आगाँ बढ़थि तँ नीक बात। संयोगसँ वाल्मीकि बाबू आइ-काल्हि सिक्किम प्रदेशक राज्यपाल थिकाह। हुनकर मदतिसँ परियोजनाक प्रारम्भ कएल जाऽ सकैत अछि। ओऽ हमरा कतेको बेर एहिपर कार्य करक हेतु कहि चुकल छथि। एक समय एहनो छलैक जखन बंगाली सभ विद्यापतिकेँ बंगाली बुझैत छलाह। परन्तु आब प्रमाणित भऽ गेल जे विद्यापति मैथिल छलाह। यदि एहने किछु सबरा परम्परा केर जनक श्रीमंत शंकरदेवक उतेढ़पोथीसँ चलि जाय तँ बुझू जे हमरा लोकनि धन्य भऽ जाएब। श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्रक सचिव गौतम शर्मा आऽ सुलझल व्यक्ति छथि। लगभग पचास वर्षक गौर वर्ण आऽ मध्यम कद-काठीक आकर्षक व्यक्तित्व। स्थिर चित्त। प्रथम दृष्टिमे लागत जे ओहिना कियो छथि। परन्तु मुदा डायनेमिक लोक। कलाक्षेत्रक १२५ आदमी हुनकर इशारापर नचैत रहैत अछि। हमेशा ओऽ अपन सहयोगी सभकेँ परिवारक सदस्य जेकाँ स्नेह करैत छथि। गौतम शर्माक सहयोगक कारणेँ हमरा लोकनि गुआहाटी आऽ तेजपुरमे बहुत सफलतापूर्वक अनेक कार्यक्रम कऽ चुकल रही। हमरा लोकनि असम केर किछु एहन क्षेत्रमे ओहि क्षेत्रक संस्कृति आऽ विरासतपर कार्य करए चाहैत रही, जाहिपर विशेष कार्य नहि भेल हो। शर्माजीसँ पता चलल जे सांस्कृतिक दृष्टिएँ असम प्रदेशकेँ मोटा-मोटी चारि क्षेत्रमे बाँटल जाऽ सकैत अछि: १.अपर असम २.लोअर असम ३.बराक घाटी ४.नॉर्थ कछार घाटी शर्माजीसँ इहो पता चलल जे नॉर्थ कछार हिल्स सांस्कृतिक वैविध्यतासँ भरल अनुपम स्थान थिक, जाहिपर कोनो विशेष कार्य नहि भेलैक अछि। परन्तु ई घाटी उपद्रव, विभिन्न घटना, बन्द आदिक कारणेँ बेशी जानल जाइत अछि। लोक सभ सामान्यतया एतय जाएसँ बचए चाहैत छथि। मुदा सौन्दर्य आऽ सांस्कृतिक विभिन्नताक कारणे ई थिक असम केर शृंगार-नकमुन्नी। शर्माजीक बात सुनि हमरा मोनमे ई भावना प्रबल भऽ गेल जे नॉर्थ कछार घाटीमे अवश्य कार्य करब। गौतम शर्मा हमर मनोदशाकेँ बुझैत कहलाह: “कैलाशजी, अगर अहाँ एतए कार्य करए चाहैत छी तँ हम व्यवस्था कए देब। एतए केर जिला अधिकारी आऽ नॉर्थ कछार घाटी ऑटोनोमस काउन्सिल केर प्रिंसिपल सचिव अनिल कुमार बरुआ हमर मित्र छथि। एस.पी.केँ हम सेहो जनैत छियन्हि। ऑटोनोमस काउन्सिल केर संस्कृति विभागक अधिकारीगण हमरा लग बराबर अबैत रहैत छथि। सभ कियो मदति करताह। गौतम शर्माक बातसँ हमर मोन प्रसन्न भऽ गेल। तुरतहि डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्तीसँ अनुमति लए २३ नवम्बर २००७ ई. सँ ८ दिनक संस्कृति एवं विरासत केर प्रलेखन केर कार्यक्रम नॉर्थ कछार धारी केर मुख्यालय हाफलौंगमे करबाक प्लान बना लेलहुँ। ई कार्यक्रम गौतम शर्माक सहयोगसँ करक छल। तदनुसार पूर्व निर्धारित् योजनाक अनुसार हम २१ नवम्बरकें साँझे दिल्लीसँ सँझुका हवाई-जहाजसँ गोवाहाटी पहुँचि गेलहुँ। गुआहाटीसँ हाफलोंग केर दूरी सड़कमार्गसँ २६१ किलोमीटर छैक। हमरा लोकनि (हम आऽ शर्माजीक ३ सहयोगी) टाटा सूमो (जीपसँ) २२ नवम्बरक साढ़े चारि बजे प्रातः गुआहाटीसँ हाफलौंगक लेल प्रस्थान कऽ देलहुँ। शर्माजी बड्ड पारिवारिक व्यक्ति छथि। ओऽ पूरा टीमक लोक सभक लेल भोजन, टेन्ट, जलखै, जेनरेटर आदिक व्यवस्था गुआहाटीसँ कए ट्रकमे लादि हॉफलोंग लऽ गेलाह। समय दुर्गापूजाक छलैक। रास्तामे अनेक ठाम स्थानीय युवक सभ हमरा लोकनिकेँ चन्दा लेल रोकैत रहल। एक ठाम हमरा लोकनि केर राशन-पानि आऽ करीब २५ आदमीसँ भरल बड़का बसक चक्का सड़कक कात माँटिमे धसि गेल। चारि घन्टाक इन्तजारक बाद सेनाक सहायता लए चक्काकेँ दलदलसँ बाहर निकालल गेल। अन्ततः साढ़े एगारह बजे रातिमे हाफलौंग पहुँचलहुँ। मोनमे डर छल। हेबो किएक नहि करैत! हमरा सभकेँ अएबासँ दू दिन पहिने पाँच आदमीक बीच हाफलौंग शहरमे गोलीसँ मारि देल गेल रहैक। खैर! शर्माजीक प्रयास आऽ डॉ के.के.चक्रवर्ती जीक असम केर मुख्य सचिव केर नाम लिखल चिट्ठीक कारण हमरा हाफलौंग सर्किट हाउसमे रहबाक व्यवस्था भऽ गेल। सर्किट हाउस शहरक सभसँ ऊँच स्थानपर बनल अंग्रेजी हुकुमतक समयक भव्य मकान छैक। एतएसँ प्रकृति केर अवलोकन तथा समस्त हाफलौंग शहर एवं अगल-बगलक इलाकाकेँ देखल जाऽ सकैत अछि। हमर कमरा काफी पैघ आऽ साफ सुथरा छल। हँ, पानिक कनिक दिक्कत अवश्य छलैक। कपड़ा बदलिते सुति रहलहुँ। भेल जे रातिमे भोजन नहि करब। परन्तु गौतम शर्मा कतऽ मानऽ बला छलाह! कनिकबे कालक बाद एक स्थानीय कलाकारकेँ लए आबि गेलाह। हम शिष्टतावश नहिओ चाहैत बैसि रहलहुँ। शर्माजी कहलन्हि, “जल्दी चलू। भोजन तैयार अछि”। नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर कला एवं संस्कृति विभागक निदेशक श्री लंगथासा सेहो शर्माजीक संग छलथिन्ह। हुनके प्रयाससँ संस्कृति भवन केर प्रांगणमे हमरा लोकनिकेँ कार्यक्रम करबाक अनुमति भेटल छल। लंगथासा उदार आऽ संस्कृति प्रेमी छथि। स्वयं दिमासा जनजातिक छथि। कहलन्हि “हमरा सभ लेल ई गौरव केर बात थीक जे अहाँ लोकनि दिल्लीसँ आबि एहि इलाकामे जतए कियोक नहि आबए चहैत अछि, अयलहुँ अछि आऽ हमरा लोकनिक संस्कृति एवं धरोहरक रक्षाक प्रति कृतसंकल्पित छी। एतए तँ ओना असम राइफल्स, सैनिक, पुलिस आदिक जमघट लागल रहैत अछि, परन्तु संस्कृति आऽ विरासतक चिन्ता ककरा छैक? अहाँ सभकेँ केना धन्यवाद दी”। हम लंगथासा महोदय दिस तकैत बजलहुँ: “अहाँ सभ यदि चाही तँ हमरा लोकनि एहि क्षेत्रक सांस्कृतिक धरोहरकेँ संरक्षण एवं संवर्धनक हेतु बेर-बेर आएब”। हमरा बातपर उत्साहित भऽ लंगथासाजी बजलाह: हमरा लोकनि सभ तरहक सहयोग करबाक हेतु तैयार छी। एतय केर तमाम अलगाववादी, सरकार विरोधी जत्था समूह संस्कृति रक्षणक विरोधी नहि थिक। तमाम लोसभ अहाँक निर्णयसँ प्रसन्न अछि। जावत धरि अहाँ सभ एतए रहब तावत धरि अतए कुनो मार-काट नहि हैत। अहाँ जे जाहि तरहक स्थानीय सहयोग चाही, हमरा लोकनि करबाक हेतु तत्पर छी”। एकर बाद हमरा लोकनि रात्रिक भोजन हेतु विदा भेलहुँ। चटगर भोजन-भात, माछ, दालि, सजमनि केर तरकारी, सलाद, मिठाई, चटनी- केलाक बाद पुनः सर्किट हाउस आबि सुतबाक तैयारीमे लागि गेलहुँ। सुतएसँ पहिने अपन पत्नीकेँ दूरभाषसँ आश्वस्त कए देलियन्हि। जे चिन्ताक कोनो बात नञि। हम एतए ठीक छी”। एकर तुरत बाद सुति रहलहुँ। अगिला दिन प्रातः पाँच बजे उठि बाहर अएलहुँ तँ मनोरम दृश्य देखि मोन मस्त भऽ गेल। सर्किट हाऊससँ एना बुझना गेल जेना सुरुज अपन लालिमा लए लाल गेन जकाँ उगैत छथि। हरियर जंगल, कलकल करैत छोट परन्तु घुमावदार नदीक प्रभाव, दूरमे बनल जंगलक मध्य आदिवासी सबहक छोट-छोट घर, सभ किछु मनमोहक लगैत छल। किछु कालक बाद गौतम शर्मा सम्वाद पठओलन्हि जे हमरा लोकनिक कार्यक्रम साँझ ६ बजे प्रारम्भ हैत। किछु कालक बाद सत्यकाम आऽ कुशा महन्त किछु स्थानीय लोक संग हमरा लग आबि कहलन्हि जे खाली समयमे हॉफलौंग आऽ अगल-बगलक क्षेत्रकेँ देखबाक चाही। हमरा ई विचार नीक लागल। तुरत तैयार भऽ गेलहुँ। स्थानीय लोकसभसँ पता चलल जे हाफलोंग मूलतः “हंगक्लौंग” सँ बनल छैक जकर अर्थ थीक सम्पन्न आऽ रत्नगर्भा धरती। बादमे किछु दोसर विद्वान लोकनि कहलन्हि जे “हॉफलौंग” शब्द दिमासा जनजातिक शब्द “हाफलाऊ” (HAFLAU)क विकृत रूप थीक। “हाफलाऊ” शब्दक अर्थ भेल वाल्मीक पहाड़ी (Ante hill)। हाफलौँग शहरक निर्माण अँग्रेज प्रशासन द्वारा १८९५ ई. मे बोराइल रेंजपर एकटा छोट छिन हिल स्टेशनक रूपमे कएल गेलैक। प्रारम्भमे चीर, देवदारक पाँतिसँ लागल गाछ, नौ छेदक गोल्फ कोर्स, छोट परन्तु आकर्षक आऽ कलात्मक बंगला, हाफलौंग लेक, रेलवेक कर्मचारी सभ लेल स्टाफ क्वार्टर, छोट बजार, रेलवे स्टेशन आदि सुविधाक संग एहि शहरक विकास प्रारम्भ कएल गेलैक। अंग्रेज सबहक हिम्मतिक प्रशंसा करए पड़त। ३६ खोह (tunnels) कऽ बना रेल लाइन लऽ गेनाइ ओहि जमानामे अर्थात् १८९५-९८ मे की छोट बात छैक? रेलवेक निर्माण कार्यक हेतु ठीकेदार, मजदूर, कर्मचारी, व्यापारी आदि सभ उत्तर-प्रदेश, बिहार, बंगाल आऽ असम केर अन्य स्थानसँ आनल गेल। पुनः आपसमे वार्तालापक हेतु एक नव तरहक बजारु हिन्दी विकसित कएल गेलैक। एहि हिन्दीकेँ हॉफलौंग-हिन्दी कहल जाइत छैक। ई हिन्दी व्याकरणक निअमक पालन स्वतंत्र भऽ करक अधिकार दैत छैक। हाफलौंग हिन्दी रोमन लिपिमे लिखल जाइत छैक। स्थानीय बुद्धिजीवी लोकनिक कठिन संघर्षक फलस्वरूप आइ-काल्हि हॉफलौंग हिन्दीक मान्यता साहित्य अकादमीसँ भऽ गेल छैक। नार्थ कछार हिल्स असम केर बहुरंगी चुनरी थीक। एतए निम्नलिखित एगारह जनजातिक लोक रहैत छथि: १.दीमासा (Dimasa or Cachari) २.ह्मार (Hmar) ३.जेमि नागा (Zeme Naga) ४.कुकी (Kuki) ५.बंइते (Baite) ६.कार्बी (Karbi) ७.खासी अथवा प्नार (Khasi or Pnar) ८.ह्रांगखल (Hrangkhals) ९.वइफी (Vaiphies) १०.खेलमा (Khelma) ११.रोंगमई (Rongmei) एकर अतिरिक्त अन्य समुदाय जेना कि बंगाली, असमी, नेपाली, मणिपुरी, मुसलमान, देसवाली आदि सेहो एतए रहैत छथि। सभ समुदायक बीच हमरा भावनात्मक एकताक कड़ी बुझना गेल। भारतक अनेकतामे एकताक स्वरूप बुझाएल जेना अपन मनिएचर धारण कए एहि छोट धरामे मोडेल बनि “संगे-संगे चली”, “संगे-संगे खाई”, “संगे-संगे रही” केँ चरितार्थ करैत छल। स्वतन्त्रता प्राप्तिक बाद भारतक अन्य शहर जकाँ हॉफलौंग सेहो शनैः-शनैः विकसित भऽ रहल अछि। १९७० ई. मे एकरा जिलाक मुख्यालय बना देल गेलैक। आब नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर मुख्यालय, विभिन्न सरकारी विभागक दफ्तर आऽ मकान, आवासीय परिसर, पार्क, जेहल, खेल परिसर आऽ मैदान, दू टा रेलवे स्टेशन, सिविल अस्पताल, प्राइमरीसँ हाइयर सेकेण्डरी स्तर केर विभिन्न विद्यालय, सभ सुविधासँ परिपूर्ण सरकारी महाविद्यालय जाहिमे कला, विज्ञान एवं वाणिज्य संकाय केर अधिकांश विषयक पढ़ाई केर सुविधा सहजतासँ उपलब्ध छैक; पानिक सुविधा, डाक, टेलीग्राम, टेलीफोन आदिक सुविधा, बैंक, चर्च, मन्दिर, मस्जिद, पुस्तकालय अनेक तरहक सामाजिक-सांस्कृतिक क्रिया-कलापमे संलग्न संस्था; सिनेमा हॉल, बस स्टेण्ड आदि सुविधासँ भरल अछि। अगर रेलसँ हाफलौंग आबय चाही तँ गुआहाटीसँ नॉर्थ प्रन्टीयर हिल सेक्शन केर मीटरगेज द्वारा लम्डींगक रस्ते लोअर हाफलौंग स्टेशन आबि सकैत छी। एकर दूरी गुआहाटीसँ २८५ किलोमीटर छैक। सिलचरसँ बदरपुर होइत हिल हाफलौंग स्टेशन केर दूरी ९२ किलोमीटर छैक। रेलक डिब्बामे बैसि नॉर्थ कछार हिल्स केर नील पहाड़ीक अवलोकन केनाई स्वर्ग केर अवलोकनसँ कम नञि छैक। जीग-जैग (टेढ़-मेढ़) रस्ता नगाँवसँ प्रारम्भ भय समस्त नॉर्थ कछार हिल्सक उत्तरसँ दक्षिण दिशामे जिलाक तीन प्रमुख नदी- माहुर, दीयूंग आऽ जटिंगा- कऽ संग-संग चलैत रहैत छैक। बुझाएत जेना पानि, रेलक पटरी आऽ मनुक्खक मोन तीनू आपसमे तालसँ ताल मिला गतिमान भेल होए। उपरोक्त तीन नदीक अतिरिक्त एहि धरामे चारि छोट-मोट नदी आरो थीक। एहि नदी सबहक नाम छैक: जीनाम, लंगटींग, कोपिली, डिलेयमा। सभसँ पैघ नदी दीयूंग छैक जकर लम्बाई २४० किलोमीटर छैक। १८६६ मीटर केर ऊँचाई पर अवस्थित थुंगजांग पहाड़ी सभसँ ऊँच स्थान छैक। नॉर्थ कछार हिल्स पूबसँ असम केर पड़ोसी प्रदेश नागालैण्ड आऽ मणिपुर; पश्चिममे मेघालय आर कार्बी अंगलौंग जिला; उत्तरमे नगांव आऽ कार्बी अंगलौंग जिला तथा दक्षिणमे बराक घाटीक कछार जिलासँ घेरल अछि। ४८९० वर्ग किलोमीटर क्षेत्रमे पसरल नॉर्थ कछार हिल्स केर सामान्य ऊँचाई समुद्र तलसँ ३११७ फीट छैक। नॉर्थ कछार हिल्स जिलामे ६१९ गाम; पाँच प्रखण्ड, दू सब डिवीजन (हाफलौंग आऽ मइबांग)मे विभक्त अछि। अतए केर आदिवासी मूल रूपसँ झूम खेती करैत छथि। झूममे एक भागक जंगल-झाड़केँ काटि ओहिमे आगि लगा पुनः खेती कएल जाइत छैक। तीन-चारि वर्षक बादओहि भूमिमे पुनः जंगल झाड़केँ बढ़ए देल जाइत छैक आऽ जंगल-झाड़सँ भरल जमीनकेँ आगि लगा साफ कय ओहिमे खेती कएल जाइत छैक। एतए १७,२९३ हेक्टेअर जमीन झूम खेतीक रूपमे, टोटल फसल हेतु उपयुक्त जमीन ३६७५८ हेक्टेअर आर बीया रोपए बला समस्त जमीन २९२०५ हेक्टेअर छैक। एहि जनपद केर करीब ४५२९वर्ग किलोमीटर धरती जंगलसँ भरल छैक। ६१०.५१ वर्ग किलोमीटर सुरक्षित आऽ बाकी हिस्सा राज्य सरकार द्वाराघोषित। तीन सुरक्षित जंगल क्षेत्रक नाम क्रमशः लांगटींग-मूपा सुरक्षित जंगल (४९७.५५ वर्ग कि.मी.) कूरुंग सुरक्षित जंगल (१२४.४२ वर्ग किलोमीटर) बोराइल सुरक्षित जंगल (८९.८३ वर्ग किलोमीटर) ओहि दिन लगभग साढ़े बारह बजे भोजन कयल। तत्पश्चात् नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस हिल्स काउन्सिलक कला एवं संस्कृति विभागक निदेशक लंगथासा महोदय, उप-निदेशक श्री संजय जी दूंग एवं किछु अन्य लोकनि हमरा लग अयलाह आऽ कहलन्हि जे “चलू अहाँकेँ पहाद्ई दिस लऽ चलैत छी। यदि समय बचत तँ जटींगा पहाड़ी आऽ गाम सेहो चलब”। गुआहाटीमे किछु लोक सभ जानकारी देने छलाह जे जटींगा पहाड़ीपर चिड़ै सभ रातिमे रोशनी देखलापर झुण्डक-झुण्डाअबि रोशनीपर प्रहार करैत छञि तथा सामूहिक रूपेण आत्महत्या कऽ लैत छैक। इहो पता चलल छल जे पक्षीशास्त्री लोकनि एहिपर गहन शोधमे बहुत दिनसँ लागल छथि परन्तु एखन धरि कोनो ठोस निष्कर्षपर नहि आबि सकल छथि जे आखिर एकर रहस्य की छञि? आऽ एकर सत्यता की थिकैक? गुआहाटीमे मोन बना लेने रही जे जटींगा पहाड़ी अवश्य जायब। आइ ई अवसर हमरा लंगथासाजी देलन्हि तँ मोन गद् गद् भऽ गेल। हम तुरत हुनका लोकनिक संग जटींगा गाम जयबाक लेल तैयार भऽ गेलहुँ। जटींगा पहाड़ी आऽ गामक रस्तामे विभिन्न प्रकारक बेंतक झाड़ी आऽ बांस भेटल। नॉर्थ कछार हिल्सक टोटल धरती (४८९००० हेक्टेअर)मे लगभग ३०७९०० हेक्टेअरमे बांस लागल छैक। बांस अनेक प्रकारक अनेक प्रजातिक, असम प्रदेशमे ३३ नस्ल केर बांस होइत छैक, जाहिमे लगभग २० नस्ल वा प्रजाति एहि क्षेत्रमे उपलब्ध छैक। प्रमुख प्रजातिमे काको/ पीछा वा पीछा, जाति, डालू, मूली, हिलजाति, कता, मकालू, काली-सूण्डी, टेराई आदिक नाम सामान्यो मनुक्खक जीभमे रचल-बसल छैक। बांस एहि क्षेत्रक लोकक जीवनक प्रमुख आधार छैक। एकर प्रयोग झोपड़ी, जाफरी, जारनि, पूल आदि बनेबाक लेल कएल जाइत छैक। बांसक कोपड़सँ तरकारी, अचार आदि सेहो बनायल जाइत छैक। बांसकेँ स्थानीय चाऊर, मकई आदिसँ बनल दारु पीबाक हेतु बर्तन (ग्लास-कप)क रूपमे कएल जाइत छैक। जमीनक कटाव रोकबाक हेतु बांसक आधार देल जाइत छैक। एकर अलावे बांसक प्रयोग बर्तन, फर्नीचर, कृषियन्त्र एवं उपकरण, धनुष-वाण, सजेबाक कलात्मक वस्तु, हस्तकला, बत्ती, सीढ़ी इत्यादिमे उपयोग होइत छैक। बादमे हम अनेको वाद्य या लोकवद्य यंत्र देखलहुँ जाहिमे बांसक प्रयोग कएल गेल रहैक। अन्ततः हमरा लोकनि जटींगा गाम पहुँचलहुँ। ई गाम बोराइल रेंज केर पादगिरि (foothills) पर बसल छैक। ई पहाड़ी तरह-तरहक प्रवासी एवं देशी चिड़ै सबहक विश्राम-स्थली थिकैक। एहि स्थानमे अंग्रेजी मास सितम्बर-अक्टूबरमे चिड़ै सभ अन्हरिया पक्षक रातिमे रोशनीक कोनो स्रोत जेना कि टॉर्च, मशाल आदि देखि झुण्डक-झुण्डमे आबि खसि पड़ैत छैक आऽ आत्महत्या कऽ लैत छैक। जटींगा गाम हॉफलौंग शहरसँ आठ किलोमीटर केर दूरीपर बसल छैक। लोक सभसँ ज्ञात भेल जे चिड़ै सभ अन्हरिया रातिमे रोशनी देखि झलफलाक खसय लगैत छैक; जकर फायदा उठा कऽ चिड़ैमार सभ बांसक लग्गी अथवा बत्तीसँ चोन्हरायल चिड़ै सभपर प्रहार करय लगैत छैक एवं पकड़ि लैत छैक। अन्हरिया रातिक संग-संग एक निश्चित वातावरणक भेनाई चिड़ै सबहक सामूहिक आत्महत्याक लेल सेहो कारण बनैत छैक। ई वातावरण छैक हवाक बहबाक दिशा। हवाक दिशा दक्षिण-पश्चिमसँ उत्तर-पूबमे हेबाक चाही। बोराइल पहाड़ीक अगल-बगलमे धूंध आऽ शीत लागल रहनाई सेहो जरूरी। धूंधमे कनीक झलफलाईत रोशनी हेबाक चाही। एहन स्थितिमे जखन दक्षिण दिशासँ धूँध चलैत छैक तखने चिद्ऐ सभ जटिंगा दिस आगाँ बढ़ैत अछि। सामूहिक आत्महत्या करय बला चिड़ै सभमे लाली चिड़ै (Indian ruddy), कौड़िल्ला (King fisher), भारतीय नौरंग (Indian pitta), हारिल, ब्लैक ड्रोंगो, उजरा बगुला, चितकबरी पौरकी, बटेर आदि प्रमुख छैक। आश्चर्यक बात ई जे अधिकांश चिड़ै जे कृत्रिम रोशनीक चकाचौंधसँ सामूहिक रूपसँ झुण्डक-झुण्डमे झलफला या चौंधिया कऽ खसैत छैक ओ सभ देशी चिड़ै छैक। प्रवासी चिड़ै सभ संगे ई घटना घटित नहि होइत छैक। स्थानीय लोकसभसँ ईहो पता चलल जे ई प्रवृत्ति समस्त जटींगा पहाड़ीमे नहि भऽ कऽ किछु खास क्षेत्र जे कि मात्र डेढ़ किलोमीटर केर लम्बाई आऽ २०० मीटर केर चौड़ाईक सीमामे बन्हल छैक। जटींगा गामक एक पच्चासी बर्षक वृद्ध जे प्नार (खासी) जनजातिक छथि सँ पता चलल जे चिड़ै सबहक जटींगामे कृत्रिम रोशनीसँ सामूहिक आत्महत्याक प्रवृत्ति केर जानकारी सर्वप्रथम १९१४ ई.क आसपास चललैक। भेलैक ई जे एक राति ककरो चारि-पांच बरद जंगल दिस भागि गेलैक। बरदक मालिककेँ भेलैक जे अगर बरदकेँ रातियेमे नहि पकड़ल गेलैक तँ बाघ-शेर सभ खाऽ जेतैक। तञि पाँच आदमी एकटा टोली बना बांसक फट्ठीमे कपड़ा बान्हि ओहिमे मटिया तेल डालि ओकर मशाल बना कऽ तथा हाथमे लालटेन लय बरद सभकेँ ताकक लेल जंगल दिस बिदा भेल। कनीक कालक बाद आश्चर्यजनक ढ़ंगसँ चिड़ै सभ झुण्डमे आबि मशाल लग आबि खसय लगलैक। परन्तु ई लोकनि ओहि चिड़ै सभकेँ नहि पकड़लकैक। यद्यपि ओऽ सभ चिड़ै मांसक प्रयोगमे लाबए जोग रहैक। एकर कारण ई छलैक जे स्थानीय जेमि नागा समुदाय (जनजाति) क लोकक बीच ई भ्रान्ति रहैक जे जटींगा क्षेत्रमे रातिक भूत-प्रेत विचरण चिड़ै बनि करैत रहैत छैक। हुनका लोकनिकेँ तञि डर भेलन्हि जे चिड़ै केँ पकड़लासँ कहिं कोनो अनिष्ट ने भऽ जाए। १९१७ ई.क आसपास लाखन-सारा नामक एक व्यक्ति कृत्रिम रोशनीसँ झलफलाएल चिड़ै सभकेँ सर्वप्रथम पकड़ि घर अनलाह एवं ओकर मांसकेँ भुजि पका कऽ खयलन्हि। आऽ ओकर कोनो दुष्प्रभाव हुनका सभकेँ नञि भेलन्हि। एकर बाद चिड़ै सभपर आफत शुरू भऽ गेलैक। लोकसभ अन्हरिया रातिमे कृत्रिम रोशनीक मदतिसँ चिड़ै सभक संहार प्रारम्भ कऽ देलक। हालाँकि जखन अंग्रेज प्रशासनकेँ एहि बातक जानकारी भेटलैक तँ एहि परम्परापर रोक लगा देल गेलैक। स्वतन्त्रता प्राप्तिक बाद लोक पुनः नुका-चोरा कऽ शिकार करए लगलाह। आब पर्यावरणविद्, पक्षीशास्त्री, पत्रकार एवं अन्य लोकनिक अथक प्रयासक बाद प्रशासन पुनः कृत्रिम रोशनीसँ चिड़ै मारबाक प्रथापर प्रतिबन्ध लगा देलकैक अछि। हम ओहि स्थानपर गेलहुँ। ओतए रंग-बिरंगक चिड़ै सबहक आकर्षक फोटो टांगल रहैक। एक मूल वाक्य नीक लागल। वाक्य ई रहैक: “shoot these birds with your camera, not with bullets:. घड़ी देखलहुँ तँ साँझ भऽ गेल छल। आब हमरा लोकनि जटींगासँ सोझे सर्किट हाउस आबि गेलहुँ। मुँह हाथ धोलाक बाद कार्यक्रम स्थलीपर पहुँचलहुँ। ओतए पाँच हजार लोक सभ आयल छलाह। सभ जनजाति केर स्त्री-पुरुष, बच्चा सीयान सभ कियो अपन समुदायक परम्परागत रंग-बिरंगक वस्त्र पहिरने सुसज्जित भेल पहुँचल छलाह। प्रशासन केर सहयोग तँ छले। डिप्युटी कमिश्नर, नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर चेअरमेन, सदस्य, प्रमुख सचिव, एस.पी., स्थानीय कॉलेजक शिक्षक एवं छात्र सभ कियो पहुँचल छलाह। स्थानीय पत्रकार सभ सेहो उत्साहित छलाह। सभ कियो हमरा माध्यमसँ आऽ गौतम शर्माक माध्यमसँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र केर प्रति धन्यवाद दैत छलाह। हम सोचलहुँ जे केहेन विडम्बना छैक। जे क्षेत्र सांस्कृतिक सम्पन्नताक खान थिक ओकर एहेन अपमान! मुख्यधारासँ एहि क्षेत्रकेँ वंचित किएक कएल गेल छैक! हमरा भेल जे समस्त विश्वमे नॉर्थ कछार हिल्ससँ शान्त आर सांस्कृतिक वैविध्यसँ भरल आर कोनो जगह नञि भऽ सकैत अछि। हम अपन भाषणमे बजलहुँ: “हमरा लोकनि अहाँ सभकेँ सिखाबए नहि अएलहुँ अछि। हमरा लोकनि अएलहुँ अछि अहाँ लोकनिकेँ जाग्रत करक हेतु जे अहाँ सभ अपन सांस्कृतिक वैविध्यता तथा गरिमाकेँ बुझू आऽ एकरा सास्वत राखू। हमरा लोकनि एतए केर सांस्कृतिक विरासतकेँ जानए आऽ ओकर डॉक्युमेन्टेशन करए आएल छी। अगर अहाँ सबहक सहयोग रहल तँ बेर-बेर आएब। हमर कार्यक्रममे आऽ एक्शनमे कौमा (,) वा अर्धविराम भऽ सकैत अछि, पूर्ण विराम कखनहुँ नहि हैत”। लोक सभ हमर बातकेँ सही अर्थमे लेलन्हि। पहिल दिनक कार्यक्रम लगभग साढ़े-नौ बजे राति धरि चललैक। जखन रातिमे भोजनक उपरान्त विश्राम करए गेलहुँ तँ एक आदमीक देल एक पुस्तक पढ़य लगलहुँ। पुस्तक नॉर्थ कछार हिल्सपर छलैक। ओहि पोथीमे रातु हकमओसा नामक स्थानीय कविकेँ नॉर्थ कछार हिल्सपर लिखल किछु पंक्ति बड्ड उपयुक्त बुझना गेल: पंक्ति यथावत अंग्रेजीमे पाठक लेल लिखि रहल छी: A harmonious game of hide and seek Behind the bushes, marshy meadow Under shadow with clouds view, Ever ready for worthwhile, cherish at dawn, The blues make enchanting heart of lovers Midst of covers white Changing scene that lively for romance Beauty and bounty of brooks that flow. Moments of joy, love to cherish Insight the harmony game of hide and seek Behind thick trespasses of white and blue With narrow path of zig-zag. The beauty of hills under cover Orchids, white fall, violet at hills Every moment thrilled with behalf Nature disposal at North Cachar Hills. Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

22 2 2 श्री भालचन्द्र झा, ए.टी.डी., बी.ए., (अर्थशास्त्र), मुम्बईसँ थिएटर कलामे डिप्लोमा। मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी, मराठी, अग्रेजी आऽ गुजरातीमे निष्णात। १९७४ ई.सँ मराठी आऽ हिन्दी थिएटरमे निदेशक। महाराष्ट्र राज्य उपाधि १९८६ आऽ १९९९ मे। थिएटर वर्कशॉप पर अतिथीय भाषण आऽ नामी संस्थानक नाटक प्रतियोगिताक हेतु न्यायाधीश। आइ.एन.टी. केर लेल नाटक “सीता” केर निर्देशन। “वासुदेव संगति” आइ.एन.टी.क लोक कलाक शोध आऽ प्रदर्शनसँ जुड़ल छथि आऽ नाट्यशालासँ जुड़ल छथि विकलांग बाल लेल थिएटरसँ। निम्न टी.वी. मीडियामे रचनात्मक निदेशक रूपेँ कार्य- आभलमया (मराठी दैनिक धारावाहिक ६० एपीसोड), आकाश (हिन्दी, जी.टी.वी.), जीवन संध्या (मराठी), सफलता (रजस्थानी), पोलिसनामा (महाराष्ट्र शासनक लेल), मुन्गी उदाली आकाशी (मराठी), जय गणेश (मराठी), कच्ची-सौन्धी (हिन्दी डी.डी.), यात्रा (मराठी), धनाजी नाना चौधरी (महाराष्ट्र शासनक लेल), श्री पी.के अना पाटिल (मराठी), स्वयम्बर (मराठी), फिर नहीं कभी नहीं( नशा-सुधारपर), आहट (एड्सपर), बैंगन राजा (बच्चाक लेल कठपुतली शो), मेरा देश महान (बच्चाक लेल कठपुतली शो), झूठा पालतू(बच्चाक लेल कठपुतली शो), टी.वी. नाटक- बन्दी (लेखक- राजीव जोशी), शतकवली (लेखक- स्व. उत्पल दत्त), चित्रकाठी (लेखक- स्व. मनोहर वाकोडे), हृदयची गोस्ता (लेखक- राजीव जोशी), हद्दापार (लेखक- एह.एम.मराठे), वालन (लेखक- अज्ञात)। लेखन- बीछल बेरायल मराठी एकांकी, सिंहावलोकन (मराठी साहित्यक १५० वर्ष), आकाश (जी.टी.वी.क धारावाहिकक ३० एपीसोड), जीवन सन्ध्या( मराठी साप्ताहिक, डी.डी, मुम्बई), धनाजी नाना चौधरी (मराठी), स्वयम्बर (मराठी), फिर नहीं कभी नहीं( हिन्दी), आहट (हिन्दी), यात्रा ( मराठी सीरयल), मयूरपन्ख ( मराठी बाल-धारावाहिक), हेल्थकेअर इन २०० ए.डी.) (डी.डी.)। थिएटर वर्कशॉप- कला विभाग, महाराष्ट्र सरकार, अखिल भारतीय मराठी नाट्य परिषद, दक्षिण-मध्य क्षेत्र कला केन्द्र, नागपुर, स्व. गजानन जहागीरदारक प्राध्यापकत्वमे चन्द्राक फिल्मक लेल अभिनय स्कूल, उस्ताद अमजद अली खानक दू टा संगीत प्रदर्शन। श्री भालचन्द्र झा एखन फ़्री-लान्स लेखक-निदेशकक रूपमे कार्यरत छथि। दू गो कविता १.अपन अस्तीत्वक असली मोल बुझबाक हुअए यदि अपन अस्तीत्वक असली मोल त पुछियौक सुकरातकें देखबियौक ओकरा विश्वक नक्शा पर पहिने अपन “देसक” अस्तीत्व ओहि देस मे अपन “राज्यक” अस्तीत्व राज्य मे अपन “जिलाक” अस्तीत्व जिला मे अपन “गामक” अस्तीत्व गाम मे अपन “घरक” अस्तीत्व आ तहन घर महुक “अपन” अस्तीत्व आ ई सभ “विश्वक नक्शा” पर से बूझि लियौक... २. हमर माय गर्भगृहक सुखासन सँ बहरेलहुँ त हमर जन्मदात्री अपसियाँत रहय भनसिया घर मे तीतल जारैन कें धूआँ मे करैत रहय धधराक आवाहन देहक धौंकनी कऽकऽ आ तहिया सँ लऽ कऽ आइ धरि ओकरा आन कोनो ठाम नहिं देखलियैक देखलियैक त बस कोनटा घरक ऐंठार पर सभक ऐंठ पखारैत कखनो अँगना बहारैत त कखनो जारैन बीछैत कखनो कपड़ा पसारैत त कखनो नेन्नासभक परिचर्या करैत खिन मे जाँत पर, त खिन मे ढेकी पर, चार पर, चिनमार पर अँगनाक मरबा पर, घरक असोरा पर दिन-दुपहर, तीनू पहर जोतल कखनो दाईक चाइन पर तेल रगड़ैत त कखनो छौंरी सभक जुट्टी गूहैत राति मे पहिने दाईकें आ तहन बाबूकें पएर दबबैत एहि तरहें ओकर जीवनक आध्यात्म भनसिया घर सँ शुरू भऽ कऽ भनसिये घर मे समाप्त भऽ गेलैक झुलसैत देखलियैक चूल्हिक आगि मे नारीक स्वतंत्रता, ओकर अस्मिता ओकर मान आ स्वाभिमानकें कहाँ भेटलैक पलखतियो ओकरा एहि सभ दिसि ताकहो कें आइ सोचै छी सेहो नीके भेलैक अगिलुका पीढ़ी सचेत भऽ गेलैक भलमनसियत सँ जँ नहिं भेटलैक त छिनबाक ताकति भेटि गेलैक मुदा ताँहिं की हमर मायक त्याग आ बलिदान ईब्सेन कें नोरा सँ अथवा गोर्कीक माय सँ रत्तियो भरि कम कहाओत? हमरा जनितबे रत्ती भरि बेसिये बूझू Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

4141 41 41 विभा रानी (लेखक- एक्टर- सामाजिक कार्यकर्ता) बहुआयामी प्रतिभाक धनी विभा रानी राष्ट्रीय स्तरक हिन्दी व मैथिलीक लेखिका, अनुवादक, थिएटर एक्टर, पत्रकार छथि, जिनक दर्ज़न भरि से बेसी किताब प्रकाशित छन्हि आ कएकटा रचना हिन्दी आ र्मैथिलीक कएकटा किताबमे संकलित छन्हि। मैथिली के 3 साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकक 4 गोट किताब "कन्यादान" (हरिमोहन झा), "राजा पोखरे में कितनी मछलियां" (प्रभास कुमार चाऊधरी), "बिल टेलर की डायरी" व "पटाक्षेप" (लिली रे) हिन्दीमे अनूदित छन्हि। समकालीन विषय, फ़िल्म, महिला व बाल विषय पर गंभीर लेखन हिनक प्रकृति छन्हि। रेडियोक स्वीकृत आवाज़क संग ई फ़िल्म्स डिविजन लेल डॉक्यूमेंटरी फ़िल्म, टीवी चैनल्स लेल सीरियल्स लिखल व वॉयस ओवरक काज केलन्हि। मिथिलाक 'लोक' पर गहराई स काज करैत 2 गोट लोककथाक पुस्तक "मिथिला की लोक कथाएं" व "गोनू झा के किस्से" के प्रकाशनक संगहि संग मिथिलाक रीति-रिवाज, लोक गीत, खान-पान आदिक वृहत खज़ाना हिनका लग अछि। हिन्दीमे हिनक 2 गोट कथा संग्रह "बन्द कमरे का कोरस" व "चल खुसरो घर आपने" तथा मैथिली में एक गोट कथा संग्रह "खोह स' निकसइत" छन्हि। हिनक लिखल नाटक 'दूसरा आदमी, दूसरी औरत' राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह भारंगममे प्रस्तुत कएल जा चुकल अछि। नाटक 'पीर पराई'क मंचन, 'विवेचना', जबलपुर द्वारा देश भरमे भ रहल अछि। अन्य नाटक 'ऐ प्रिये तेरे लिए' के मंचन मुंबई व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' के मंचन फ़िनलैंडमे भेलाक बाद मुंबई, रायपुरमे कएल गेल अछि। 'आओ तनिक प्रेम करें' के 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित तथा मंचन श्रीराम सेंटर, नई दिल्लीमे कएल गेल। "अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो" सेहो 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित अछि। दुनु नाटक पुस्तक रूप में प्रकाशित सेहो अछि। मैथिलीमे लिखल नाटक "भाग रौ" आ "मदद करू संतोषी माता" अछि। हिनक नव मैथिली नाटक -प्रस्तुति छन्हि- बलचन्दा। विभा 'दुलारीबाई', 'सावधान पुरुरवा', 'पोस्टर', 'कसाईबाड़ा', सनक नाटक के संग-संग फ़िल्म 'धधक' व टेली -फ़िल्म 'चिट्ठी'मे अभिनय केलन्हि अछि। नाटक 'मि. जिन्ना' व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' (एकपात्रीय नाटक) हिनक टटका प्रस्तुति छन्हि। 'एक बेहतर विश्र्व-- कल के लिए' के परिकल्पनाक संगे विभा 'अवितोको' नामक बहुउद्देश्यीय संस्था संग जुड़ल छथि,  जिनक अटूट विश्र्वास 'थिएटर व आर्ट-- सभी के लिए' पर अछि। 'रंग जीवन' के दर्शनक साथ कला, रंगमंच, साहित्य व संस्कृति के माध्यम से समाज के 'विशेष' वर्ग, यथा, जेल- बन्दी, वृद्ध्राश्रम, अनाथालय, 'विशेष' बच्चा सभके बालगृहक संगहि संग समाजक मुख्य धाराल लोकक बीच सार्थक हस्तक्षेप करैत छथि। एतय हिनकर नियमित रूप से थिएटर व आर्ट वर्कशॉप चलति छन्हि। अहि सभक अतिरिक्त कॉर्पोरेट जगत सहित आम जीवनक सभटा लोक आओर लेल कला व रंगमंचक माध्यम से विविध विकासात्मक प्रशिक्षण कार्यक्रम सेहो आयोजित करैत छथि। भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक) लेखिका - विभा रानी पात्र - परिचय मंगतू भिखारी बच्चा 1 भिखारी बच्चा 2 भिखारी बच्चा 3 पुलिस यात्री 1 यात्री 2 यात्री 3 छात्र 1 छात्र 2 छात्र 3 पत्रकार युवक पत्रकार युवती गणपत क्क्का राजू - गणपतक बेटा गणपतक बेटी गुंडा 1 गुंडा 2 गुंडा 3 हिज़ड़ा 1 हिज़ड़ा 2 किसुनदेव रामआसरे दर्शक 1 दर्शक 2 आदमी तांबे स्त्री - मंगतूक माय पुरुष - मंगतूक पिता भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक) - विभा रानी दृश्य : 1 (ट्रेनक दृश्य। (ट्रेन नञि भ' क' ई कोनो हाट- बजार अथवा मेला-ठेला सेहो भ' सकैत अछि।) ट्रेन मे महिला आ पुरूष यात्री। भीख माँग' बला तीन टा बच्चा चढ़ैत अछि। एक के गला मे हारमोनियम, दोसराक हाथ मे पाथरक दू टा खपटा। तेसरक हाथ मे खँजड़ी। तेसर बच्चा उमिर में सभ स' छोट। तीनू क तीनू फाटल, चीकट कपड़ा मे अछि। बच्चा नं. 1 हारमोनियम पर सभ' स' नवीन फिल्मी गीतक धुन बजाक गाबि रहल अछि। दोसर बच्चा खपटा बजा-बजाक' ओकरा संगे गएबाक प्रयास क' रहल अछि। छोटका बच्चा खंजड़ी बजा रहल अछि आ गीतक पंक्ति पकड़बाक प्रयास मे आधा-छिया पंक्ति गबैत अछि। तीनूक स्वर; सुर-ताल में कोनो एकरूपता नञि अछि। सभस' छोटका; बच्चा नं. 3 सभ स' पाई मँगैत अछि। किओ देइत अछि, किओ डपटैत अछि, किओ कोनो दोसर दिस तकैत अछि, किओ ऑंखि मूनि लेइत अछि।) (ट्रेन रूकैत अछि। तीनू बच्चा उतरि जाइत अछि। मंचक एकटा कोन्टी मे तीनू ठाढ़ भ' क' दिनु भरका कमाई गिनैत अछि।) बच्चा 1 : कतेक? बच्चा 2 : साढ़े एगारह। बच्चा 1 : बस? भरि दिन ट्रेने-ट्रेने घूमल आ तइयो साढ़े एगारहे? अकरा मे त' अपना सभक लेल चाहो-मूढ़ी नञि। (सभस' छोटका बच्चा स') आँए रौ, खाए लेल भरि थारी आ माँग' मे सभ स' पिछारी! ठीक स' माँगै कियै नै छें रे? (बच्चा 3 बिटिर-बिटिर तकैत रहैत अछि।) मुंह की निहारि रहल छें? हम कोनो की गोविंदा छी कि रितिक रोशन। आ तोहों आमिर खान नञि छें। जतेक गरीब छें, तकरो स' बेसी गरीब बनल रह। तखने दू टा पाइ भेटतौ। बच्चा 3 : (सहमैत) ई पटना छै कि दानापुर? (दुनू बच्चा ई सुनि हठात ठठा पड़ैत अछि। छोटका फेर बिटिर-बिटिर मुंह तकैत रहैत अछि।) बच्चा 3 : रौ बूड़ि। ई पटना नञि छै, जकरा ककरो स' नञि पटै छै। दानापुर माने दाना स' पूरम पूरा। हमर आओरक पेट मे त' मरल सनकिरबो नञि अछि। की करबहीं रौ जानि क' की हम कत' छी? बच्चा 1 : भूख लागलए। बच्चा 2 : तकरा लेल पटना-दानापुर मे रहब जरूरी छै? भूख त' कखनो आ कतहु लागि जाइ छै। दम धर। बच्चा 3 : पटना सिटी? बच्चा 2 : ऊँ हूँ। पटना साहेब। सिटी त' कहिया ने बदलि गेलै। बच्चा 1 : रौ बता, सिटी स' साहेब भ' गेला स' की भ' गेलै? की बदलि गेलै? बच्चा 2 : बदलि गेलै ने? जनाना स' मर्दाना भ' गेलै। बच्चा 1 : माने? (गंभीर भ' क') बच्चा 2 : माने.. सिटी जनाना आ साहेब मर्दाना (दुनू हँसैत अछि। बच्चा 3 ओहिना बिटिर-बिटिर मुंह तकैत रहैत अछि) बच्चा 1 : नाम बदल' स' तकदीर सेहो बदलै छै की? सिटी स' साहेब भ' गेलै त' हमरा आओरक भूख-पियासक रंग बदलि गेलै की? अपना आओर के काज भेटलौ? पाइ भेटलौ? तहन कियैक एतेक मगजमारी? पटना कि दानापुर कि साहेब की फारबिस गंज.. हुँह! बच्चा 3 : (उसांस भरिक') भूख लागल अछि। बच्चा 1 : रौ सार! जो, कोनो हाथी पकड़ि ला आ घोंटि जो। सार.. भूख लागलए, भूख लागलए.. नकिया देलक ईत'.. बच्चा 2 : आजुक समाचार? बच्चा 2 : बच्चा बेमार। हजारो नेन्ना मरि गेलै, खाएक अभाव मे.. बच्चा 3 : हमरा खाए ला दे। नञि त' हमहू मरि जाएब। बच्चा 1 : त' मरि जो। प्रधानमंत्री छें जे मरि जेबें त' देसक काज-धंधा थम्हि जेतै। बच्चा 3 परधानमंत्री कोनो खायबला चीज होइ छै। केहेन होइ छै? कत' भेटै छै? बच्चा 2 : (ओकर बात पर धेयान देने बेगर) तों कोना बुझलही? तों त' अखबार नञि पढ़ै छैं। बच्चा 1 : टेसन मे टीबी छै ने। ओकरा मे देखलियै। बढ़िया स' बूझाब' लेल मँगतुआ त' अछिए। बच्चा 2 : ओकरा कोना बूझल छै? बच्चा 1 : ओ पढुआ छै। अखबार पढ़ै छै। बच्चा 2 : भिखमंगो सभ अखबार पढ़ै छै? बाप रौ! बच्चा 1 : ओ कीनै नञि छै। प्रेसक बाहर बैसै छै। चौकीदार ओकरा द' दै छै अखबार। बच्चा 3 : भीख मे अखबार! भीख मे चाह-मूढ़ी.. (बजैत-बजैत थम्हि जाइ छै: दुनू बच्चा ओकरा घूरै छै।) बच्चा 2 : मंगतू सभटा पढ़ि लेइत छै? बच्चा 1 : हँ, रौ। पूरा अखबार चाटि जाइत छै। पूरा दुनियाक हाल ओकरा बूझल रहै छै। ओ पढ़ल छै। बच्चा 3 : पढ़ल की होइ छै? पटना-दानापुर जकाँ कोनो टेसन छै की? बच्चा 2 : (स्नेह स') तो नञि बुझबे अखन। बच्चा 1 : पढ़ल बहुत पैघ चीज होइत छै। पढ़ि-लिखि क' लोक बहुत पैध-पैध लोक बनि जाइत अछि। मुदा अपना आओरक तकदीर मे ई नञि अछि। बच्चा 2 : (भरोस दियबैत) नञि छै त' नञि छै। मंगतुआ छै नें पढ़ल-लिखल। अपने बिरादरीवाला। अपना आओर स' गप्प-सप्प सेहो करै छै। दुनिया जहानक समाचार त' दइते छै। (अई बेर तेसरका बच्चा कएक बेर हाथ मुंह स' भूख लगबाक संकेत द' चुकल अछि। सभ बेर दुनू बच्चा ओकरा घूरैत अछि। तेसरका सभ बेर डेराक शांत भ' जाइत अछि।) बच्चा 1 : हे.. देख ओम्हर! अपन गोबिन्दा। बच्चा 3 : ई कोनो नव भिखमंगा ऐलै की? आब त' आओरो भीख नञि भेटत। .. भूख.. बच्चा 2 : मंगतुआ छै। बच्चा 3 : ई एतेक पैघ घर ओकर छै? आ तइयो भीख.. बच्चा 1 : धुरि बुडि.बक। ई अखबारक ओफीस छियै। अई ठाँ क सभस' पैध अखबारक ओफीस। बच्चा 2 : ऐं मारल! वो गुड्डी बकाट्टा। बुझा गेल जे ओकरा पढ़ब-लिखब कोना एलै। बच्चा 1 : अखबारक बगल में रहला स' किओ पढ़ि जाइ छै। मू.ढ़ीक दुकान लग रहला स' मूढ़ी भेटि जाइत छै? बच्चा 3 : मूढ़ी.. भूख.. दुनू : चोप! बच्चा 2 : कोनाक' ऊ पढ़ि गेलै तहन? बच्चा 3 : हमहू पढ़ब। बच्चा 1 : रौ, कुकुरक नांगरि। पढ़िक' की बनबही? सोनिया गांधी कि मनमोहन सिंह? बच्चा 2 : राबड़ी देवी। पढ़क जरूरते नञि। बच्चा 3 : (खिसिया क') पढ़ नञि देबें, खाए लेल नञि देबें, त' करब की? मूति! बच्चा 2 : पढ़ाईक गेरंटी नञि । खाएक गेरंटी त' आओरो नञि। बच्चा 1 : कोना पढ़बही रे? मंगतुआ गप्प दोसर छै। ओकरा लग टेम छै। ओकरा भीखो खूब भेटै छै? बच्चा 3 : पढ़ले सन्ते ने! हमहू पढ़ि लेब त' हमरो बेसी भीख भेटत। बच्चा 1 : चल, चल .. बच्चा 3 : कोम्हर? हमरा भूख लागलए। बच्चा 2 : मंगतुआ लग चल। ओकरा खेनाइयो-पिनाई बहुत रास भेटै छै? बच्चा 3 : पढ़िक' भीख मांगला स' खेनाइयो फ्री.. हमरा पढ.ा दे। बच्चा 1 : (दुनू क हाथ पकड़िक एक दिस ल' जाइत) चल, चल पानि सेहो बरस' बला छै। चल ओम्हर (दुनू रास्ता क्रॉस करबाक अभिनय करैत अछि। तेसरका पाछा रहि जइत अछि। दोसरका ओकरा पार करबाक इशारा करैत अछि। तेसरका डेराइत अछि। दोसरका फेर एम्हर अछि। ओकरा एक धौल लगाबैत अछि। फेर खींचिक' रोड पार करैत अछि। पार क' क' तीनू मंगतू लग पहुंचइत अछि। एक गोट मोटरी, एक गोट कटोरा, किछु पाइ ओकरा लग पड़ल अछि। प्रकाश तीनू बच्चाक संगे-संगे आब मंगतू पर।) बच्चा 1 : की रौ मंगतुआ। की भ' रहल छौ। मंगतू : के? ओह! चनरा, गोबरा, झुनमा रौ! आ बइस, केहेन चलि रहल छौ धंधा-पानी? बच्चा 2 : भीख माँगब धंधा पानी होइ छै? आ सेहो अई अंधड़ पानि में! बच्चा 1 : हमरा त' फूटलो आँखि नञि सोहाइये ई बरखा- बुन्नी। लोक आओर घर मे, आफिस में बन्न। दुकान दौरी सेहो ठप्प। लोक आओरक धंधा-पानी नञि त' हमरा आओर के भीख के देत? मंगतू : हमरा त' बड्ड नीक लगैय' ई बरिसात। चारू दिस हरियाली, मोन के बड्ड सोहाओन लगैत अछि। बच्चा 1 : पेट भरल रहला पर बनरनियो रानी मुखर्जी लागै छै। बच्चा 2 : अपना घर मे बइसक' चाह पकौड़ी उड़ाब' मे केकरा मजा नञि एतै? (चाह पकौड़ीक नाम स' बच्चा 3 फेर हाथ स' भूख बतबइत अछि।) बच्चा 1 : हमरा आओरक कोनो ठेकाने नञि! देखै छियै नें जे जहन पानि बरसै छै, तहन भिजैत माय कोरा मे भीजैत बच्चा के ल' क' बिल्डिंगे-बिल्डिंग, घरे-घर बउआ अबैत छै। मुदा कतहु-कोनो चौकीदार ओकरा अपना बिल्डिंग के नीचा आसरा नञि देई छै। मंगतू : छै। तइयो पानि बरसै छै त' नीक लागै छै। देह मे जिनगी सुरसुराय लागै छै। पानि छै तैं। जिनगी छै नै रौ..! (स्वर बदलिक') आ, तों सभ भिंगमे कियै। तोरा-आओर के त' घर छौ। हमरा जकाँ नञि छौ ने। बच्चा 1 : हं, सहीए । तोरा नाहित नञि छियै रौ। रहितियैक त' भरि दिन ई टरेन, ऊ बस, नञि करैत रहितहुँ। लोकक लात-बात नञि सुनतहुँ। ई गर्दनि देख.. चिकरि-चिकरि के बाँस जतेक पैध भूर भ' गेल अछि। बच्चा 2 : आ जे दू टा पाइ भेटै छै, ओहू में पुलिस, दादा सभक.. (ओ बाजिए रहल अछि कि एकटा पुलिस डंडा घुमबैत ओम्हर अबैत अछि। तीनू के देखिते तीनू पर ताबड़तोप. डंडा बरसाब' लगैत अछि। तीनू एम्हर-ओम्हर बचबाक प्रयास करैत अछि। ओही मे देह छीपि-छीपि के पुलिस से नञि मारबक नेहोरा करैत अछि। मंगतूक सेहो प्रयास। अई क्रम मे एक -दू डंडा ओकरो लागि जाइत अछि।) पुलिस : सार सभ! फेर एम्हर आबि गेलैं। चढ़बे बस ट्रेन में माँग' लेल भीख, आ करबें पाकिटमारी। बच्चा 1 : नञि साब! हम सभ त'.. पुलिस : चोप.. भोसड़ी के.. सार, बहिनक इयार! ई डंडा एम्हर स' घुसतौ त' मुंह दने निकलतौ। चल भाग, जो ओई गल्ली मे। (तीनू पुलिसक बताओल गल्ली मे भागि जाइत अछि। पुलिसबाला विजयी भाव स' बस स्टैंड पर ठाढ़ लोक आओर के देखैत अछि आ फेर मंगतू दिस।) मौज कर रो बाउ, मौज कर। तोहरे भाग मे मौज लिखल छौ। ऐहेन ने देह बना के आएल छें जे मौजे-मौज छौ। (कहैत ओ गल्ली दिस बढ़ैत अछि।) ------- दृश्य : 2 (यात्री सभ आपस मे गप्प करैत अछि) यात्री 1 : एह! ई पुलिसवाला सभ त'.. यात्र 2 : राज-पाट त' एकरे सभक छै ने। कहबी छै ने जे जकरे लाठी, तकरे महीस। यात्री 3 : कतेक डंडा बरसौलकै ओहि बच्चा सभ पर। बुझाई छै जे ओकरा अपना धिया-पुता नञि छै। आ अईठांक लोग आओर! तमासे देखैत रहि गेल। बाज' लेल किओ नञि । यात्री 1 : सभक मुंह मे त' जाभी लागल छलै। अहीं कियैक ने बजलियै? यात्री 2 : अहाँ बाजतहुं त' हमरो सभक हिम्मति बढ़ितियैक ने। यात्री 3 : (मंगतू दिस) एकरो पर कम नञि बरसलै। हमरा आओर स' नीक त' इएह छल। एहेन देह- दसा होइतहुँ बचब' लेल त' गेलै। यात्री 1 : के छै ई? यात्री 3 : (चिढ़ क') अनिल अंबानी। यात्री 3 : खासियत छै एकरा मे। यात्री 1 : से की? यात्री 3 : पढ़ल लिखल छै। रोज अखबार पढ़ै छै। यात्री 2 : त' जहन पढ़ल छै त' कोनो काज-धंधा कियै नञि करै छै? यात्री 3 : एतेक अनटेटर गप्प किओ कएलए! अएँ यौ, ओकर देह नञि देखै छियै? के देतै ओकरा काज? अहीं द' दियऊ ने! ओ त' बड्ड प्रसन्न हएत। यात्री 2 : से कियैक यौ? यात्री 3 : कियैक त' भीख माँगब ओकरा बड्ड गर्हित कर्म बुझाइ छै। यात्री 1 : आब अहूं त'। एहेन अनसोहाँति गप नञि करू। यात्री 2 : अहाँ करी त' किछु नञि, हम करी त' जुलुम? यात्री 1 : हम कत' स' ओकरा काम देबै? हम त' अपने सेठ के ओहिठाँ बेगार खटै छी। यात्री 3 : त' खटू । मालिकक दया दृष्टि पर खेबैत रहू। हे, अहीं की, हम सभ किओ सेठक दया-दृष्टिक भीख जोहैत रहै छी। तमासा मे तमासा ई जे हमर सभक मेहनति पर मालिक सभ मौज करैत अछि। काला पानीक कैदी जकाँ माह भर हमरा आओर खटै छी। माहक आखिर मे भीखे जकाँ दस टा पत्ता हमरा आओर दिस फेंक देल जाइत अछि। (बस अयबाक ध्वनि। यात्री सभ मे हलचल। 'हमर बस आबि गेल', 'हमरो'। 'हमर एखनि धरि नञि।' 'फेर घर पहँुच' मे लेट भ' जाएत' - यात्री सभक उक्ति आ बस द्वारा प्रस्थान।) कुकुर जकाँ छी, सेठक पगारक सूखल हड्डी चुसैत हम सभ। (बस अबै छै। ओहो लपकि' क' चढ़ि जाइत अछि।) (प्रकाश तीनू बच्चा पर।) बच्चा 1 : रौ, जल्दी स' पचटकिया निकाल आ बाकी सभ एम्हर रख। रकसबा अबिते हैतौक। बच्चा 3 : ओकरा रकसबा कियैक कहै छहौक। बच्चा 2 : त' की भगवान कहियै? (बच्चा 3 स) तों एकदम किछु नञि बाजबें। कहि देइ छियौ (बच्चा 3 हं में मूंड़ी डोलबैत अछि। पुलिसक प्रवेश।) पुलिस : रौ हीरो। की भेलौ रौ? ब्रह्मा, विष्णु, महेश? आ कि सलमान खान, आमिर खान, शाहरूख खान। ओकरो.. ऊ लंगड़ा के सेहो पकड़ि ले त' आओर कोनो नाम द' दही नारद बाबा, कृष्ण जी, बलराम जी.. फिल्मी चाही त' जायद खान। एकदम टटका खान छौ। ऐं! कतेक माल बटोरले रे! लेडीज डिब्बा मे सेहो गेल छले ने! अरे, तोरा जकाँ हम रहितियौक ने, त' हम त' खाली लेडीज में जयतियौ। नञि भेंटतियैक भीख, नञि भेंटौ, मुदा मौगी सभके छुबाक अवसर त' भेटितियैक ने! (ठोर भिजबैत अछि) अच्छा चल, निकाल माल! देरी नञि । (बच्चा 1 पाँच टकाक रेजगी निकालि क' देइत अछि। पुलिस वाला गिनैत अछि।) पुलिस : सार! तोरा सभक संगे इएह सभ झंझट अदि। देबें चार गो छदाम आ गिनेबे एक घंटा जे गनैत-गनैत हाथ मे ऐंठी होब' लागय। बच्चा 1 : साब! आई कतेक पानि बरसलै अछि। देखियौ ने साब। कतेक घटाटोप बरिसाति छियै। भिन्सरे स' ट्रेने-ट्रेन घूमल, मुदा ई पाँच टका स' जास्ती नञि भेटल। साब, एकरा मे स' किछु हमरो सभक भेटि जाए। भिन्सर स' उपासले छी। ई छोटकाक त' अंतड.ी सुखा गेलैय'। (सलाम ठोकैत अछि।) (पुलिस निर्लज्ज हंसी हंसैत छै। फेर एक धौल बच्चा 1 के लगबैत अछि।) पुलिस : दलाल स' दलाली एकरे कहै छै ने। ऐ हीरो, बेसी एक्टिंग नञि। (दर्शक स') देखियौ छौड़ा सभक ढिठाई। देत पांच गो टाका, आ ओहि मे आपसो चाही। माने हफ्ता मे हफ्ता। (गब्बर सिंह स्टाइल मे बाजैत अछि) सोच, सोच। हमरा आओरक सोच। सरकार कहै छै, भीख नञि माँग' लेल। कानूनो बना देलकै। मुदा हमरा आओर के दया आबि जाइत अछि तोरा आओर पर। भीख नञि माँगबे त' खेबे कत स'? रौ, मेहरबानी बूझ, मेहरबानी। आ, आब ई पाँच टका स' किछु नञि होब बला छौ। रेट बढ.ा, रेट। देखै नञि छही, कतेक मँहगाई बढ़ि गेलैये। (डंडा घुमाबैत चलि जाइत अछि.. तीनू एक दोसरा के देखैत अछि। पुलिस के जाइत देरी कि तीनू पाथरक नीचा दबाक' राखल पाइ दिस लुझैत अछि।) बच्चा 3 : भूख लागलए हमरा। बच्चा 1 : (खिसिखा क' एक झांपड़ लगबैत अछि। ले, हमर देह काटि क' खा ले हे, ओम्हर जे पांच टका छै ने, तकरा मे बिसरियो के हाथ नञि लगबिहै। नञि त' ओ हाथे कन्हा स' अलग भ' जेतौ। दादाक हिस्सा छै, दादाक।) बच्चा 2 : त' आब बचलौ की? बच्चा 1 : डेढ़ टाका। जकरा मे एक गिलास सतुओ नञि एतौ। बच्चा 2 : तहन .. भूख त' लागल अछि। हमरो, तोरो। चल न फेर मंगतुए लग। ओकरा ल'ग खेनाइयो-पिनाईक समान सभ खूब रहै छै। (तीनू ओकरा दिस बढ़ैत अछि । मंगतू किछु बड़बड़ क' रहल अछि।) बच्चा 1 : की रौ मँगतुआ! की डैलोग मारि रहल छैं। नाना पाटेकर जकाँ। मंगतू : (चौेंकि क') अँए.. किछुओ त' नञि । बच्चा 3 : भूख .. बच्चा 1 : चुप सार, कुकुरक पोंछि। बच्चा 2 : मारि लें डैलोग। तोरे राजपाट छौ रौ। मौज छौ तोरे। ने कोम्हरो एनाइ ने गेनाई। एम्हरे बइसल-बइसल पाइ बरसै छौ तोरा पर। हमरा आओर के देख। भरि दिन ट्रेने-टेन घूमल, तइयो कतेक भेटल? साढ़े एगारह टाका। पाँच टाका पुलिस के, पाँच टाका दादा के। बचलौ कतेक? डेढ़ टाका? अब अई डेढ़ टाका मे की खाऊ हम आओर, जाहि स' पेट भरए? तोरा त' ई सभ नञि सोचबाक छौ ने। तैं कहलियौ जे बड्ड भगमंता छें। मंगतू : (तिक्त स्वर म') तोंहों भगमंता बनि सकै छें। ब. 1+2 : (एके स्वर म') हँ, कोना? बता कने! पाइ लेल किछुओ क' सकै छी हम सभ। मंगतू : किछुओ क' सकै छे ने! त' आ, तोहों बनि जो हमरे जकाँ लूल्हि, लांगड़ .. फिर तोरो लग बरसतो पानिक बदला मे पाइ .. आ .. आ .. बना दियौ .. आबि जो .. (खूँखार हाव-भाव स' ओकरा दिस बढ़ैत अछि। दुनू बच्चा चिचियाइत अछि। बच्चा 1 ओकरा मार' लेल हाथ उठबैत अछि। फेर नीचा क' लेइत अछि। बच्चा - 3 बच्चा 2 के हाथ स' भूख लगबाक इशारा क' रहल अछि। बच्चा 1 ओकरा देखि लेइत अछि आ मंगतू पर उठाओल हाथ, जे नीचा आबि रहल छलै, ओकरा बच्चा 3 पर जमा देइत छै।) (अंधकार । प्रकाश। सोझा स' दु गोट पत्रकार युवक-युवती अबैत अछि। युवती जींस आ बॉडी टाइट टी शर्ट मे अछि। कटल केश, कंधा पर शांतिपुरी झोरा, गर्दनि मे पेन आ मोबाइल लटकल। युवक सेहो जींस आ खूब ढोल ठक्कल टी शर्ट मे अछि। कन्हा पर पोर्टफोलियो बैग, गर्दनि मे कैमरा, मुंह मे सिगरेट। सिगरेट पिबैत धुआँ छोड़ैत छै। धुआं युवती दिस पहुँचै छै। युवती हाथस' धुआं हटबैत तेज नजरि स' युवक के देखै छै।) युवक : सॉरी, सॉरी। की करू। सभ ठाँ त' नो स्मोकिंग जोन बना देने छै। दफ्तर, पार्क, होटल, अस्पताल - कतहु नञि पीबि सकै छी। युवती : त' नञि पियू। पानि नञि छै ने, जे मरि जाएब। युवक : पानि नञि प्राण अछि। अनका लेल अपन प्राण गमाएब हमरा मंजूर नञि । (गप्प करैत-करैत युवतीक दृष्टि मंगतू पर पड़ैत छै। ओ भीख लेल सिक्का निकालैत अछि। युवती रोकि देइत अछि।) युवती : ऊँहू! युवक : (मजाकिया स्वर मे) त' ई सिगरेटे द' अबै छियै। युवती : सभ समय मजाक नञि । युवक : तहन? युवती : ओकरा पर चलू एकटा स्टोरी करै छी। युवक : फेदा। युवती : ओ पढ़ल-लिखल छै। शारीरिक रूप स' नचार । पढ़ल छै, तैं भ' सकैछ जे भीख माँगब ओकरा पसीन नञि हुअए। मजबूरी मे.. युवक : कह' की चाहै छी अहाँ? युवती : कर' चाहै छी स्टोरी । युवक : व्हाट? (किछु सोचैत अछि) हँू .. फिजिकली इनेबल, मेंटली शार्प, लिटरेट .. काज कएल जा सकैय'। युवती : छपला स' जे पाइ भेटत, तकरा मे स' आधा एकरा द' दबै। ओकरो लागतै जे भीख स' अलग किछु ओकरा भेटलैय'। आत्मविश्र्वास बढ़तै ओकर। युवक : यदि हम फिल्म धरि सोची त'? 'अ हैंडीकैप्ट लिटरेट'..। नीक बनि गेल त' अवार्ड-तवार्ड सेहो.. (अवार्डक नाम पर युवतीक ऑखि चमकैत छै।) युवती : नॉट अ बैड आइडिया। (दुनू मंगतू लग पहूँचइत छथि।) युवक : रौं, नाम की छौ तोहर। (मंगतू चेहाक' ओकरा दिस देखै छै। किछु बोलबाक होइ छै, मुदा दोसरे पल मुंह बन्न आ चेहरा कठोर क' लेइत अछि।) युवती : अहीं स' पूछि रहल छी जे की नांव भेल। (मंगतू एखनो चुप अछि। मुदा ओकरा मे एकटा नाराजगी भरल उत्तेजना बढ़ि रहल अछि।) युवक : सुन! हम सभ तोरा पर किछु काज कर' चाहै छी। अई में तोहर सपोर्ट चाही। माने सहायता। युवती : अहाँक नाँव, गाम, ठेकान। अहिठाँ कोना पहुंचलहुँ.. (मंगतू एखनो दुनू दिस ताकिए रहल छै। युवक मे रोष पैदा होई छै। युवती स') युवक : ही इज डफर। एक्टिंग। नोइंग हिज इंपोर्टेंस। लेट्स मूव। युवती : बी पेशेंट। ही विल टॉक। (मंगतू स') भाई, कनेक अहाँक सहयोग चाही। अहीं पर हम सभ काज कर' चाहै छी। दुनिया के बताब' चाहै छी जे अहाँ के छी, कोना छी। लोक-आओरक धेयान खींच' चाहै छी- अहाँक गुण पर, जे अई हालति में रहियो क' अहाँ पढ़लौं। मंगतू : (अकस्मात) अहाँ के कोना बूझल? युवती : देखै छियै ने। अबैत-जाइत। अखबार पढ़ैत, लोक आओरक चिट्ठी पढ़ैत। मंगतू : (एकटा धार मे बहैत जकाँ) हुँ बहुत लोक छै, जे पढ़' नञि जानै छथि। हुनका गाम आओर स' चिट्ठी अबै छै। ओ सभ हमरा लग अबैत अछि। हम पढ़ि दै छियै। हमरा लिखहू अबैय'। हे, (बाम हाथ देखबैत) देखियौ। पहिने त' अच्छर खराब होई छल। आब कने ठीक भ' गेलै। मुदा, अहाँ कियै पूछि रहल छी ई सभ? युवक : कहलियौ ने रे जे तोरा पर एकटा स्टोरी करबाक अछि। मंगतू : ओहि स' हमरा फेदा? हमरा भीख माँग' से' छुट्टी भेंटि जाएत? कोनो काज भेंटत हमरा? अहाँ त' अपन काज बना लेब आ लाति मारि क' चलि देब। चिन्हबो नञि करब। युवती : एहेन गप्प नञि छै.. मंगतू : त' केहेन गप्प छै? सभ किओ अपना मतलब साध' लेल अबैत अछि। अहूँ आओरक मतलब अछि। नञि त' .. अहाँ दुनू त' रोजे ई बिल्डिंग मे अबै छी। लोक आओर त' एक नजर एम्हर मारियो लेइत अछि, अहाँ दुनू त' सेहो नञि .. युवती : एहेन किछु नञि छै। कहियो न कहियो, ककरो न ककरो नजरि त' पड़बे करै छै। अहाँ पर आई गेल आ हमर दुनूक गेल। भ' सकै छै जे हमर लेख पढ़ि क' किओ अहाँ स' भेंट कर' आबथु, गप्प करथु। भ' सकै छै, जे अहाँ के अपना जिनगीक कोनो राह भेंटि जाए। मंगतू : कोनो एहेन नञि आओत जे हमरा बाट देखाओत। हँ, भीखक चवन्नी -अठन्नी बीग' लेल अबस्से आबि जाएत। काज कोनो नञि देत। की करब अहाँ सभ जानि क' जे हम के छी, कत' स' आएल छी.. युवक : एना मोन हारला स' किछु भेटै छै की? (युवती दिस) ई कहबे केली ने जे भ' सकै छै, हमर स्टोरी पढ़ि क' किओ तोरा कोना काज-धन्धा देइये दै। अरे आसे पर त' ई दुनिया ठाढ़ छै। तों नञि बाजबें त'.. युवती : ईहो भ' सकै छै ने जे अहांक कथा पढ़ि-सुन क' दोसरो लोक आओर मे नव जिनगीक संचार हुअए। अहां त' उदाहरण भ' जाएब। प्रेरणा पुंज.. मंगतू : कहबाक गप छै ई सभ। नञि किओ आएत, नञि हमरा काज देत। हम अहिना भीख मँगैत, मँगतुआ कहबैत मरि जाएब- अही ठाँ, अही फुटपाथ पर। मुन्सीपाल्टीबला आओत, अपना गाड़ी मे ल' जा क' कतहु देह के ठेकान लगा देत.. भिखमंगे बनल मरि जाएब। (युवक स') कहू त', हमर कोन कसूर जे जनमते हम मोरी मे बिगा गेलहुँ। मात्र अही लेल ने जे हम नजायज छी। मुदा कहू जे छोट-छोट, भोला-भाला बच्चा सभ कोना क' नजायज भ' गेलै। (तेज नजरि स' युवती के देखै छै।) युवती : सही। कोनो नवजात नाजायज कोना भ' सकै छै? मंगतू : सएह त'। नजायज त' हुनकर संबंध भेलै ने। आ सेहो नजायज कियैक? बच्चा जनमाएब कोनो नजायज कर्म छिकै ? तहन त' हे, ई पूरा दुनिये नजायज अछि। समाजक रीति-नीति नञि मानू त' सभ किछु नजायज.. ई समाज हमरा भिखमंगा बना देलक, ई नजायज नञि भेलै? युवक : हूँ, बात मे दम छौ तोहर! मंगतू : (जेना अतीत मे।) हम एहेन नञि छलहुँ। एकदम पूरा देह छल हमर, अहीं आओरक माफिक - दू टा पएर, दू टा हाथ। तीर जकाँ भगैत छलहुँ, लट्टू जकाँ नचैत छलहुँ.. घिर्र.. (लट्टू जकाँ गोल-गोल घुमबाक प्रयास करैत अछि।) युवती : फेर? मंगतू : फेर की? (रिजर्व होइत) छोड़ू! की रखल छै ऊ सभ मोन पाड़ि क'। नञि त' ऊ दिन घूरत आ ने हमर हाथे-गोर। युवती : एना नञि बाजी। कहलहुँ ने हम जे हमर स्टोरी पढ़ि क' कोनो मातबरि, दयालु पहुँचि सकैत छथि अहाँक मदति लेल। भ' सकैछ, जे ओ अहाँक पएरे बनवा देथु। आइ-काल्हि खूब चलल छै ने जयपुरी लेग। देखैयो में एकदम असली लागै छै आ काजो एकदम असलीये जकाँ करै छै। युवक : तों त' पढ़ल छें। पढ़नेही ही हेबें एकरा मादे। मंगतू : (अही प्रवाह मे) हँ, सुधा चंद्रनक पएर जकाँ। युवक : एकदम सही। यदि किओ तोरो पएर एना बनबा देलकौ त' तोहों हमरे सभ नाहीत चलि-फिरि सकबें.. मुदा ई त' बता जे ई सभ भेलौं कोना। जन्मे स' एहेन नै छें एखने कहलें.. मंगतू : (बीच ही मे) पूरा छलहँु हम' एकदम अहीं सभ जकाँ। नान्हि टा छलहुँ छौंड़ा सभक संग खेलाए छलहुँ। अकास मे गुड्डी देखल हे.. ऊ.. बकाट्टा सभ गुड्डी लूट लेल पड़ाएल। हमहूँ पड़ेलौ.. भागलहुँ, भगैत गेलहुँ, भगैत गेलहुँ- होस छोड़िक'। नञि बूझ' में आएल जे सोझा स' बस.. (कनेक स्थिर भ' क') ई गणपत काका (केलावाला दिस इशारा करैत) छथि, सएह हमर माय-बाप बनि गेलाह। अस्पताल ल' गेलाह, जतेक भ' सकलै इलाज पानी करौलन्हि! युवती : आ अहाँक माय-बाप? मंगतू : दाइ, कियैक कटल पर नून बुरकै छी? अरे हम भेलहुँ हरामी, सुअरक औलाद! हमरा आओरक माय-बाप कोन? एतबे हिम्मति रहितियैक त' जनम के बाद हमरा मोरी मे त' नञि ध' देने रहितियैक'ने। आब त' गणपते कक्का हमरा लेल माय-बाप सभ छथि। युवक : चलू, जान त' बांचि गेलौ ने! मंगतू : (फेर भड़कैत) ई जान? ई जिनगी? अहाँ के चाही एहेन जिनगी? त' ल' लिय' ने! खुशी-खुशी द' देब। मुदा नञि । अहीं के कियैक, ककरो नञि चाहीं एहेन जिनगी। ई कटल-भांगल, लोथ, अपाहिज जिनगी। अरे साहब, कहब बहुत आसान छै। अपन जीह छै ने। युवती : कह' सुन' स' मोन हल्लुक भ' जाए छै। मंगतू : नेनपने स' भीख मांगब हमरा बड्ड अक्खजि बुझाइत छल। नेनपनि मे, जाधरि हाथ-गोर सही सलामति छल, एम्हर-ओम्हर काज क' क', टिकुली-ककही बेचि क', कप प्लेट धो-धो क' जिनगी बसर केलहुँ। सुनने छलियै जे काज कर' बला धिया-पुता लेल राति मे स्कूल चलै छै.. सोचने छलहँु जे नाम लिखा लेब। पढ़ि-लिखि जाएब त' कोनो छोट-मोट काज भेटि जाएत। मुदा.. ऊ गुड्डी अपने की बकाट्टा भेलै, हमर जिनगी के सेहो बकाट्टा क' देलकै। आनक आसरे भ' गेलहुँ हम। मांगि-चाँगि क', खेनाई! छिया-छिया, कतेक गर्हित कर्म छै ई। कएक बेर सोचल, जे नञि माँगब भीख- लग मे फेंकल पाई सेहो नञि उठबै छी। घिन अबैय'। मुदा, ई पापी पेट घिन स' बढ़ि क' भ' जाइए। युवक : नाम की भेलौ तोहर! मंगतू : नाम त' ओकर होई छै ने यौ बाबू, जकर माय-बाप रहै छै! रोडबला लोकक कोनो नाम होई छै.., जे-जे कह' लागल, सएह नाम भ' जाइत छै.. माँगि-चाँगि क' खेने सन्ते लोक आओर हमरा मंगतू कह' लागल। मंगतू स' मँगतुआ। (करूण हंसी) (मंगतूक गप्प युवक-युवती नोट-बुक मे नोट करैत रहैत छथि।) मंगतू : आओर साब, हम जहन.. युवक : (अचानक नोट बुक बंद करैत) अच्छा मंगतू, फेर होइत अछि भेंट-घाट। (युवती सेहो नोट-बुक बंद क' देइत अछि। मुदा ओकर आँखि मे अथाह प्रश्न व आश्चर्यक भाव छै। मंगतू हतवाक युवक दिस देखिते रहि जाइत अछि। ओ किछु बाजबाक प्रयास करैत अछि, मुदा ओ दुनू ओहिठाँ से उठि जाइत छथि। ओ दुनू मंच स' प्रस्थान करैत, मंच क' दोसर भाग स' पुन: अबै छथि, गप्प-सप्प करैत। प्रकाश ई दुनू पर । मंगतू फ्रीज अवस्था में..) युवती : बाप रौ बाप! कतेक सीरियसली गप्प करैत छलै। कतेक कन्सर्नं भ' क! संबंध नजायज होई छै, बच्चा नञि! ..कतेक आसानी स' हम सभ अपन भूलक चद्दरि दोसराक माथा ओढ़ा अबैत छी। आ, बना लेइत छी अपना के पाक-साफ। ई मंगतू, कतेक भाव भरल छै एकरा भीतर। कतेक नीक जकाँ सोचै छै। आ हम सभ पढुआ लोक, मात्र एकटा भीखमंगा बूझि ओकरा टालि जाइ छी। युवक : हे! बेसी भावुक नञि बनी। स्टोरी कर' आएल छी, ओकर जिनगीक रामनामी चद्दरि ओढ़' नञि। बूझि पड़ैत अछि, किछु बेसीए प्रभावित क' देलक ओ लुल्हबा। कोनो चक्कर-उक्कर त' शुरू नञि भ' रहल अछि.. एकदम फिल्मी स्टाइल मे। युवती : शटअप! अहाँ सभ के एकरा अलावे आओर सूझबे की करत? (दुनूक प्रस्थान। प्रकाश मंगतू पर। ऊ ई दुनू के जाएत देखैत छै, किछु.. किछु असंतुष्ट, किछु-किछु संतुष्ट।) मंगतू : चलि गेलाह! भरि पोखि गप्प भेबो नञि कएल आ.. (संतुष्टि क भाव स) तइयो पहिल बेर आई कोनो पढ़ल लिखल लोक स' गप भेल। मोन त' होइ छल जे बतियबिते रही। मुदा.. बीचहि मे.. भ' सकै छै, जतेक सूचना चाही, भेंटि गल हुअए.. तइयो.. जतबे गप्प भेल, नीक लागल.. हम त.. हमरा त' मोन होइते रहैत अछि जे हम एहेन-एहेन लोक सभ स' गप्प करी - देस, दुनिया, समाज आ अपना पर। (उल्लसित स्वर मे) गणपत कक्का! देखलहुँ अहाँ। ओ सभ हमरा स' गप्प केलाह। पत्रकार सभ.. पढुआ लोक सभ। आब जरूर हमर जिनगी बदलि जाएत। हमरा पएर भेटत, काज भेटत.. कतेक सोहाओन समय हेतै ओ.. (गणपत काका केराक चंगेरी उठौने ओकरा लग अबैत छै आ सभ' स' उतरल केरा ओकरा दै छै।) गणपत : ले, खो! मंगतू : काका.. हमर गप्प नञि सुनै छी ! गणपत : सभ सुनै छी। पत्रकार छथि। हुनका आओरक काजे छै दोसरा आओरक जिनगी बनेनाइ। (केरा देइत) ले, खतम क' ले त' हम जाइ.. मंगतू : कत? गणपत : घर! बेटी बाट तकैत होएत। सीधा-पानी ल' क' जेबै, तहने ने चूल्हि मे आंच पजरतै। मंगतू : (नमगर सांस लेइत) हँ, घर! अई ठाँ सभ के नीक-बेजाय, पैघ, छोट- अपन घर छै, परिवार छै, धिया-पुता छै, ओकरा आओर लेल ओकरा सभ के घुरबाक छै। पच्छिम दिस डूबैत घुरैत सुरूज जकाँ। आरामक ओसांसि लेल, परिवारक बीच अपन सुख-दुख बाँट' लेल। गणपत : (ओसांसि भरिक') हँ रौ, घर आ परिवार! टिनाक चदरा, पोलथीन स' छारल चार बित्ताक घर, जाहि मे ठामें-ठाम भूरि। सेहो चार-छओ मास पर मुंसीपाल्टीबला खसा दै छै। सभ बेर के तोड़ि-फोड़ि में पांच मे स' टीन टा चीज गायब भ' जाइ छै। बेटी जवान भ' गेल। लोक आओर घूरैत रहै छै, हम किछुओ नञि क' पबै छी। (उठि क' बिदा होइत अछि। प्रकाश ओकरा पाछां। एक कोन्टा मे माथ पर स' चंगेरी उतारबाक अभिनय। संगहि पार्श्र्व स' 'ऐ चमेली', गै छप्पन छुरी, कोम्हर जाइ छैं करेजाक छप्पन टुकड़ी क' के', 'एम्हर आ, एक्कहि राति मे रानी बना देबौ' 'ऐ, आती क्या खंडाला' सनक स्वर ।) .. बेटा जवान भ' गेल अछि। मुदा चारि टा पाइ कमेनाइ अपना इज्जत पर बट्टा बूझैत अछि। बेटा : (घुसैत) रौ बुढ़बा, भरि दिन सेठ जकाँ बइसल रहले कि किुछ बेचबो केलें। (नेपथ्य दिस मुंह क' क') किओ अछि? किछु छैहो खाए-पिय' लेल कि सभ ठुंसा देलही ई महाराजा के। (नेपथ्य दिस स' 18-19 वर्षक एकटा लड़की हाथ में थारी ल' क' अबैत अछि। एम्हर स' ऊ थारी ल' क' अबैत अछि आ दोसर दिस स' दू-तीन टा गुंडा सनक लोक अबैत अछि आ लड़की के अश्लील रूप स' घूरैत अछि। लड़की भाई के थारी देइत अछि। भाइ थारी देखिक' फेंक देइत अछि।) ई सूखल-टटाएल रोटी आ पानि जकाँ तीमन! ई खाएक छै? गुंडा 1 : रौ राजू! तोंहो कत' आबि जाइ छै मगजमारी कर' लेल। रौ मीता, चल हमरा संगे। तोरा तंदूरी चिकन खुएबौ। मुर्गीक टंगड़ी (बोतलक इशारा करैत) एकदम मेम चीज.. मोन खुस भ' जेतौ.. मुदा.. राजू : मुदा की? गुंडा 2 : किछु लेब' लेल किछु देब' पड़ै छै ने यार! राजु : हमरा लग अछिए की? ई बुढ़बा राखलए किछु हमरा लेल? गुंडा 3 : नगीना रौ नगीना। एकदम पटाखा छौ तोहर घर मे आ कहै छैं जे बुढ़ऊ किछु छोड़बे नञि केलकौ अछि? गुंडा 1 : एहेन मोट-ताज मुर्गी । कहियो हमरो टेस्ट करा यार! (निर्लज्ज हंसी। लड़की सुकुचाक' भीतर चलि जाइत अछि। गणपत खिसिया क' ओकरा दिस बढ़ैत अछि, मुदा बेटा बीचहि मे छेकि लेइत छै।) बेटा : हे हमर परम पूज्य पिताजी! कत' जा रहल छी अहाँ? ई सभ के छथि, बूझलए अहाँ के? .. ई सभ हमर दोस्त छथि आ हमरा तंदूरी मुर्गा खुआब' ल' जा रहल छथि। (चिचियाक') रौ बुढ़बा, ला, निकाल, जे छौ तोरा ल'ग। (जबर्दस्ती ओकर पाइ छीनैत छै। गणपत चिकरैत अछि। ओकर चिकराब सुनि लड़की भीतर स' अबैत अछि आ बाप के बचाब' लेल बाप दिस भगैत अछि। एक गुंडा ओकर गाल छुबि लेइत अछि, दोसर ओकर हाथ खींचिक' बाहर ल' जाइत अछि। ई देख गणपत पाइ छोड़ि बेटी के बचाब' भागैत अछि। बेटा पाछाँ स' एक लात ओकरा जमबैत अछि। गणपत मुंहक भरे खसैत अछि। बेटा समेत सभ कियो ठठाइत निकलि जाइत अछि। पार्श्र्व स' लड़कीक चिकरब आ गुंडा सभक अट्टाहास आ अश्लील प्रलाप सुनाइ दैत छै। तेज संगीत.. बेंजोक तेज ध्वनि हठात समाप्त होइत अछि। मंच पर घोर अंधकार आ सन्नाटा!) ------ दृश्य : 3 (प्रकाश मंगतू पर। ओ अखबार पढ़ि रहल अछि। पढ़ैत-पढ़ैत पसेने पसेने भ' जाइत अछि। ओ मुंह पोछैत, एम्हर-ओम्हर देखै छै.. फेर अटकि-अटकि क' पढ़ैत अछि..) मंगतू : नवयुवती के साथ बलात्‌.. चार युवक.. नशे में.. भाई भी.. दो गिफ्तार.. दो अभी भी फरार.. (पसेना पोछैत अछि। हकला क' घबड़ाहटि मे बजैत अछि) माने.. काल्हि.. कविता.. गणपत कक्का.. राजू.. (माथ पकड़ि लेइत अछि) बहीनक रखवार अपने स' ओकरा परोसि देलकै गिद्घक सोझा.. (चिकरैत अछि) .. कक्का, गणपत कक्का.. (आवाज सुनि किछु छात्र, किछु यात्री ओम्हर अबैत अछि सभ पूछैत अछि -- की भेलौ रौ? सपना देखै छही की? दिने मे सपना.. हँ, एकरा करैये के की छै? चौबीसो घंटा, आठो पहर सूतल रहौ,.. हमरा आओर जकाँ नञि छै ने.. छिछियाइत फिरू।) (मंगतू कानि रहलए। कखनो अखबार स' माथ पीटैत अछि, कखनो बेबसी मे अपन केस नोचैत अछि।) मरियो नञि जाइ छी हम। एहेन देह, एहेन जिनगी, एहेन समाज.. मरि कियै नञि जाइ छी हम। रे दैब.. आह रे दैब! कक्का यौ, गणपत कक्का..? (भीड़ के काटैत गणपत बहिराइत अछि। मंगतू ओकरा देखतही भरि पांज ध' लेइत अछि आ कनैत अछि। कक्का पीठ-माथ सोहरबैत ओकरा भरोस दियबैत अछि।) मंगतू : कक्का.. काल्हि.. काल्हि.. गणपत : की भेलौ बेटा? मंगतू : कक्का.. कविता.. काल्हि.. गणपत : कत्त' घुरलौ बाऊ। दुनू मे स' किओ नञि। आँखिए मे राति कटलए। मंगतू : कविता आब नञि आओत कक्का.. (गणपत प्रश्नवाची दृष्टि स' ओकरा देखैत अछि.. मंगतू अखबार ओकरा दिस बढ़ा देइत छै। गणपत अनपढ़क मुद्रा मे अखबार उनटैत-पुनटैत अछि.. एकटा यात्री अखबार ल' क' पढ़ैत अछि.. खबरि सुनि गणपत थहराक' खसैत अछि.. मंगतू फेर भरि पाँजि ओकरा ध' लइत अछि।) गणपत : (विक्षिप्त जकाँ) रौ दैब रौ दैब.. मौगत द' दे रो दैब.. आब हम जीबि क' की करब.. (मंगतू के झोरि क') कहै छले ने तों जे हम सभ घर-दुआर, बाल-बच्चेदार, परिवारबला आदमी सभ छी। देख लेले नें? ईहे अछि घर आ ईहे अछि धिया-पुता। गै कविता गै.. हमर सोन सन बेटी गै.. रौ रजुआ.. रौ तोरा नरको मे ठौर नञि भेटतौ रौ.. (पुलिसक सायरन बजै छै.. सभ यात्री ओत' स' हटि क' बस स्टैंड लग ठाढ़ भ' जाइत अछि। किओ घड़ी देखैत अछि, किओ मोबाइल करैत अछि, किओ चोर नजरि स' मंगतू-गणपत दिस देखैत अछि, किओ अखबार स' पंखा करैत अछि.. छात्रक एक गोट टोली मे खुसर-फुसर करैत अछि।) (पहिला दृश्यबला पुलिस अबैत अछि.. डंडा डोलबैत..) पुलिस : रौ, गणपत तोंही छें? गणपत : जी हुजूर। पुलिस : चल थाना.. गणपत : हमर कसूर हुज़ूर। पुलिस सार नहिंतन! बेटी स' धंधा आ बेटा स' भड़ुआगिरी, आ पूछै छें.. चल थाना.. पता चलतौ जे की छौ तोहर कसूर.. (पकड़ि क' ठेलैत- ठालैत ल' जाइत अछि।) मंगतू : साब! साब, हिनका छोड़ि देल जाओ। ई निर्दोख छथि। पुलिस : (मंगतू के लात लगबैत) त' तोंही चल। रौ डाँड़ मे छौ बूता छौंड़ी सभ लेल! हट सार! (मंगतू फेर बीच-बचावक प्रयास करैत अछि। पुलिस डंडा बरसाबइत ओकरा ठेलि देइत अछि। मंगतू मुंहक भरे खसल रहि जाइत अछि। पुलिस गणपत काका के पकड़ि क' ल' जाइत अछि। यात्री, जाहि मे किछु छात्र सभ सेहो छथि, बिटर-बिटर तकैत रहैत छथि। पुलिस के गेलाक बाद) यात्री 1 : बाप रौ बाप! एहेन कलजुग! बापे बेटीबेच्चा। यात्री 2 : अहूँ त'! जे पुलिसबाला कहि देलकै, पतिया लेलहुँ ने! यात्री 3 : पुलिसक बात आ चूल्हिक पाद एक सन! छात्र 1 : एतेक घमर्थन क' रहल छी। जहन पुलिस बुढ़बा के पकड़ि क' ल' गेलै, एकरा (मंगतू दिस) एतेक मारलकै, तहन त' नञि फ़ूटल बकार॥ पुलिस के जाइते देरी कि सभक लोल एक-एक हाथ नमगर भ' गेलै। यात्री 1 : रौ, पुलिसक सोझा बाजक कोनो मतलब छै। छात्र 2 : त' एखनि बाजबाक कोन अर्थ? यात्री 2 : हे रौ, बूझल जे हम सभ किछु नञि बाजल। तों सभ त' छलें, युवा शक्ति, छात्र शक्ति! तोहें सभ कियैक ने बाजलें रे! यात्री 1 : (मंगतू दिस) हम सभ त' बाउ रौ, जिनगीक दोग मे फँसल बूँट छी। सेठ साहूकार कैंचीक मध्य फँसल कापड़ि। पुलिस-दारोगा करबाक समय कत'? छात्र 2 : जहन अपना पर आओत तहन? यात्री 3 : तहन देखल जेतै। छात्र 3 : माने अपना पर पड़ल मोसीबत पहाड़, आ आनक फूसि-फासि? यात्री 1 : तैं ने कहलियौ रौ भाय जे तों आओर त' छें छुट्टा बरदि। ने घर गिरस्थीक चक्करि ने नौकरी पातीक झंझटि, ने बाल-बच्चाक पिरसानी। ऊपर स' नेता बनबाक मोका फ्री-फंड मे। (बस देखैत.. हे हमर बस आबि गेल' कहैत चढ़बाक अभिनय करैत अछि। चढ़ि गेलाक बाद सोर पारिक' छात्र के कहैत अछि -) रौ, मोन राखिहें हमर गप्प। की ठेकान, छात्र नेता स' मुख्य मंत्री आ फेर केंद्रीय मंत्री भ' जेबें। घरोवालीक निस्तार भ' जेतौ। हे ले (पाइ फेंकैत अछि..) ऊ भिखमंगाक दबाई करबा दिहें। (छात्र सभ तमतमाएल ठाढ रहैत छथि, अन्य यात्री सभी हंसैत अछि। किओ ठहाका पारि क', किओ मुंह तोपिक! किओ मुसिकियाइत पेपर पढ़बाक त' किओ समय देखबाक अभिनय करैत अछि। सभक बस एकाएकी अबैत छै, सभ ओहि मे सवार भ' भ' चलि जाइत अछि। जाए स' पहिले सभ किओ चवन्नी, अठन्नी, सिक्का मंगतू दिस फेंकैत अछि आ छात्र आओर के इलाज क तगेदा करैत अछि।) छात्र 1 : ओह! रहब मोश्किल भ' रहल छै! मोन उजबुजाइय ई सभ देखि क'। छात्र 2 : सपना देखै छी, देखैत रहै छी। कहियो किओ सपना देखल त' आइ देश आजाद भेल। आजाद देश लेल सपना देखल जे सभके जीबाक, रहबाक, काज करबाक समान अधिकार अछि। किओ भूखल-पियासल, बेरोजगार नञि रहत। पढ़ाई रोटीए जकाँ अनिवार्य रहतै। मुदा भेटलै की? आजादीक एतेक बरखक बादो वएह भूख, गरीबी, बेरोजगारी.. छात्रा 1 : भ्रष्टाचार, बेईमानी, सत्ताक अपराधीकरण। जिनगी जीबाक विवश्ता.. मंगतू : (कने जोरगर आवाज मे, जाहि स' छात्र सभ सुन सकथि।) रौ हाथ-गोर रहितहु कियैक एना बाजि रहल छें। (छात्रक ध्यान ओकरा दिस जाइत छै। ओ सभ ओकरा ल'ग अबैत अछि) छात्र 1 : भाई, हाथे-गोर रहला स' समस्याक समाधान नञि भ' जाइ छै। छात्र 2 : सभ ठाँ पाई चाही, पैरवी चाही। देख भाई, लोक आओर हमरा सभ के कहै छथि जे हम सभ युवा शक्ति छी, देशक भविष्य छी। छात्र 3 : रौ, वास्तविकता त' अछि जे हमरा आओर के अपने नञि बूझल अछि अपन भविष्य। छात्र 1 : माय-बाप सपना काढ़ै छथि जे बेटा सभ पढ़ि-लिख क' हमर दुख दूर करत। छात्र 2 : हम सभ त' हुनकर दुखक भीजल चिपरी मे चिनगी लगाक' आबि जाई छी, रसे-रसे सुनगैइत रहू। छात्र 3 : करैत रहै छी - अपन अरमानक खून, माय-बापक सपनाक हत्या। रौ, तों त' खाली देहे स' अपाहिज छें। ई व्यवस्थाक हाथे हम सभ त' तन-मन दुनू स' अपाहिज छी। मंगतू : मुदा भाई, ई व्यवस्था की छै। ककर छै, के बदलत? छात्र 1 : (रोब स') हे, नेता जुनि बन। दू अच्छर अखबार पढ़िक' अपना के प्रधानमंत्री नञि बूझ। (पहिलुका पत्रकार युवक-युवतीक प्रवेश) युवक : अरे वाह, आई त' एकरा लग छात्र सभ सेहो अछि। गुड। चलू, एकरो आओर के कवर क' लेइत छी। युवती : हम त' आइ काल्हि रोजे देखै छी, किओ न किओ एकरा लग बनले रहैत छै। युवक : ई छैहे तेहेन कमालक चीज। हाथ नञि, पएर नञि, घर-परिवार नञि, शिक्षा-संस्कार नञि । तइयो पढुआ छै, अखबार पढ़ै छै। चिट्टी-पत्री लिखै-पढ़ै छै। (दुनू सटि क' ओकरा आओरक गप्प सुनैत छथि। छात्र सभ मंगतू लग स' हटि क' बस स्टॉप दिस बढ़ैत छथि।) छात्र 1 : कह' लेल जे कही। भने ओकरा झलकारि दही। हमर गप्प मे सेहो तों सभ दर्शन ताक' लाग। मुदा, कखनो लगैत अछि जे एकरे जकाँ हम आओर सेहो भेल जाइ छी। लोक आओर भेल जाइत अछि, देश-दुनिया बनल जाइत अछि। छात्र 2 : रौ बाप, हे, पहिनहीं परीक्षा खराब भ' गेल अछि। आब ई दर्शन-तरसन छाँटि क' माथ नञि खराब कर। छात्र 1 : सुन त'! एकरा देखिक' तोरा नञि बुझाइ छौ जे एकर देह-देह नञि, ई समाज आ ओकर व्यवस्था छै। ई समाज, ई व्यवस्थाक माथ छै, माथ मे दिमागो छै, जे सोचैत त' छै, मुदा किुछ करै नञि छै। करबाक लेल सक्रियताक हाथ-गोर चाही, जे एकरे जकाँ ओकरो नञि छै। तैं एकरे जकाँ पड़ल रहै छै - लोथ भेल। छात्र 3 : (छात्र 2 आ 3 माथ ठोकैत छथि।) गेलौ रौ गेलौ। पूरमपूर गलौ। आब ई हमरा आओर के त' पकेबे करतौ, तोरो आओर के नञि छोड़तौ। (युवक-युवती के देख) नीक भेल। आबि गेलहुँ। सुनू आब अरस्तूक गप्प। (दुनू तेजी स' निकलि जाइत अछि। छात्र 1 ओही ठाँ अछि।) युवक : देखू! पत्रकार छी हम आओर आ पत्रकार जकाँ बतियाइत छथि ई आओर। युवती : हमरा आओर त' छात्र सभक संगे ओकरा कवर कर' चाहै छलहुँ। युवक : से त' रहिए गेल। युवती : ई एकटा अछि ने! एकरे कवर क' लेइत छी। युवक : (चिढ़िक') त' निकालू साड़ी आ क' लिय' कवर। युवती : शटअप! फालतू गप्प नञि करी। हमर संग साथ नञि नीक लगैत अछि त' अहाँ जा सकै छी। हम अपन काज क' लेब। युवक : ककरा संगे? ऊ लोथक संगे की ई देशक भविष्यक संगे। युवती : (चिकरैत) बंद करू ई बकवास। अहाँ जर्नलिस्ट छी। बूझै छी जर्नलिस्टक माने? (ओही उत्तेजना मे) जर्नलिस्ट माने उन्नत विचारक स्वामी, खुलल दिल आ दिमागवाला व्यक्ति, जनताक विचार वहन कर' बला, व्यवस्थाक छेद मे आंगुर द' क' देखाब' बाला। मुदा अहाँ त' ईर्ष्या आ द्वेष स' जरैत संठी छी मात्र। दुर्गंध स' भरल तौला। दुनियाक चौथा आवाजक नाम पर भड़ुआगिरी कर' बला। छि:। (युवक नाराज भ' क' यवती दिस घूरैत अछि। युवतीक चिकरब सुनि बाहर गेल दुनू छात्र घूरि अबैत अछि। छात्र 1 पहिनही स' अकबकाएल बेरी-बेरी स' दुनू युवक-युवती के देखैत अछि। युवक-युवतीक हाथ घीचि क' मंच क दहिना भाग मे ल' जाइत अछि। छात्र सभ मंचक बाम दिस छथि आ मंगतू बीच मे। मंच पर अत्यन्त मद्घम प्रकाश। अचानक युवक-युवती पर हाथ उठबैत छै। सभ चौंकि उठैत अछि। युवती खसल अछि। मंगतू हड़बड़ाक' ओम्हर बढ़बाक प्रयास करैत अछि, मुदा खसि पड़ैत अछि। छात्र सभ युवकक चेहरा देखि ओहि ठाँ थकमकाएल रहि जाइत छथि। पार्श्र्व स' समवेत स्वर में ईको साउन्ड इफेक्ट मे ई पंक्ति चलैत अछि।) किओ किछु नञि क' सकैत अछि। किओ किछु नञि कहि सकैत अछि। बिकाएल बजार मे मानवताक मूल्य बंधक अछि माथ हाथ गोर भांगल, धड़ शिथिल जागू, जागू, तखने होएत विहान नव सूरज रचत इतिहासक नव काल खंड। (प्रकाश शनै: शनै: फेडआउट होइत अछि।) (मध्यांतर) अंक : 2 दृश्य : 1 (बाजारक दृश्य। फेरीबाला रूमाल, टिकुली, सेब, नारंगी, खिलौना सभ बेचबाक आवाज नेपथ्य स' - 'ऐ बच्चा के खेलौना, साढ़े बीस रूपैया, दौग-दौग क' ले, जाऊ, दीदी, काकी, भैया,' खसि गेल खसि गेल, पेंटक दाम खसि गेल', हरेक माल 30 रूपैया, 30 रूपैया, 30 रूपैया' आदि।) (प्रकाश शनै-शनै: मंगतू पर केन्द्रित होइत अछि।) मंगतू : ओह, ई हल्ला-गुल्ला! ई भीड़, ई धक्का-धुक्की!.. नीक लागै छै। जिनगी चलि रहल छै अई सभ मे.. ई जगह.. बरगदक नाहित.. हमरा सन-सन कतेक लोकक आसरा.. कखनो, कखनो त' हम सड़क पर नजरि जमा देइत छी.. ओह खाली पएरे-पैर.. दौगैत-भगैत गोरे-गोर.. कनेक ओकरा स' ऊपर त' दायाँ-बाम डोलैत हाथ.. कनेक ओकरा स' ऊपर त' माथे-माथ.. कारी-कारी केस, स्त्रीक माथ, पुरूषक माथ.. सभक लक्ष्य अपना-अपना गंतव्य धरि पहुँचबाक, रहि जाइ छी त' हमी - लोथ, नांगरि., लूल्हि.. अही के अही ठां.. लोक आओर कहैत रहैत अछि जे हम बड्ड भगमंता छी.. बइसल-बइसल पाइ भेंटि जाइत अछि.. कोना क' हम बुझाबी जे हमरा भीख नञि, काज चाही काज। .. (शून्य मे चिकरि क') रौ, हम भगमंता छी त' तोहो सभ कियैक ने बनि जाइ छें हमरे जकाँ भगमंता.. (विक्षिप्त जकां हंसैत अछि) .. अरे, सभ हमरे जकाँ बनि जाएत, त' फेर कमाएत के.. हमरा आओर पर भीखक नजरि आ चवन्नी, अठन्नी फेंकत के? .. हं, बूझल। ई सभ चलैत रहौक, तकरा लेल साबुत लोकक भेनाई जरूरी छै.. आ ओ सभ पुण्य कमाबैथि, तकरा लेल हमरा आओरक रहनाई सेहो .. (मंगतू जहन ई बाजि रहलए, दू-तीन टा हिज़ड़ा ओम्हर अबैत अछि। सभक नजरि मंगतू लग छिड़ियाएल पाई पर छै। सभक के आँखि मे लालच छै।) हिजड़ा 1 : की राजा! की भेलौ रौ? सूखल गरी जकाँ मुंह कियै बनेने छें? अरे हाय, हाय, तोरा देखि क' हमरा त' किछु किछु होबैत अछि (गबैत अछि) 'क्या करूँ हाय, कुछ-कुछ होता है।' मंगतू : (अपनही धुन मे) धिया-पुता सभ स्कूल-बैग ल' क' स्कूल जाइत अछि.. कतेक नीक लगै छै.. हम नान्हि टा स' जवान भ' गेलहुँ, मुदा स्कूलक मुंह.. हिजरा 2 : त' की भेलौ रौ राजा। अपना ओहिठां बहुत रास लोक स्कूलक मुंह देखने बेगर मरि जाइत अछि। हमरे आओर के देख। मुदा फ़िकिर नईं। हमरा आओर खुशो छी आ हे देख, तोरा लेल गीतो गाबि रहल छी।.. (गबैत अछि) ''सैंया दिल में आना रे, आके फिर ना जाना रे, हो आके फिर ना जाना रे, छम-छमा-छम-छम!''(अथवा कोनो आधुनिक गीत)़ मंगतू : हमहू कहियो ई चाकर-चिक्कन रोड पर चलि सकब! बस- ट्रेन में चढ़ि सकब। अपना कमाई स' बसक टिकट कीनि सकब! .. भ' सकै छै.. कोनो मददगार आबि क'.. मुदा, की भेटत कोनो एहेन। हिजड़ा 3 : चल रौ, हम बनि जाइ छियौ तोहर खुदाई खिदमतगार। चल, चल, हम सभ तोरा ल' क' सनीमा जेबौ, चाट-पकौड़ी खुएबौ (गबैत अछि) ''चौपाटी जाएंगा, भेलपुरी खाएगा, पीछा न छोड़ेंगा हम, गाना बजाना, खाना-पीना, गाड़ी में होंगा सनम।'' (सभ मिलिक' मंगतू के झोरैत अछि। मंगतूक धेयान टूटैत छै।) हि. 1 : की रौ हीरो। एना अभिषेक बच्चन जकाँ मुंह कियैक लटकौने छे? हि. 2 : रौ, तों कोनो भीख थोड़बे मांगै छें। तोरा देखितही मातर लोक आओरक' हाथ अपने आपे अपन पॉकिट दिस बढ़ि जाइ छै। हि. 3 : हमरा आओर स' नीके छें रे। देख, तोहर हाथ-गोर नञि छौ, तइयो तों आदमी कहबैत छें - आदमी, मरद। हमरा आओर के अछि ई चारू हाथ-गोर! तइयो एक गोट पहिचान नञि अछि। तैं (ताली बजबैत अछि) कहबैत छी। हि. 1 : सिगनले-सिगनले, रोडे-रोडे भीख मंगैत फिरै छी। हमरा आओर के देखितही बाबू-मेम सभ सीसा चढ़ा लेइत छथि गाड़ीक। मंगतू : मुदा हमरा भीख नञि चाही। हमरा काज चाही। हि. 2 : (हंसैत) से तोरा भेंटतौ नञि! कह, त' स्टाम पेपर पर लिखि क' द' दियौ। (गबैत अछि) 'कोरे कागज पे मुझसे करा ले सही।' 'अरे हमर चिक्कन-चुनमुन राजा, हमर छैला, ई सनी देओल जकाँ डकरै स' तोरा काज भेंट जेतौ। भेंटल हमरा आओर के ? तोहर त' हाथ-गोर नञि छौ, हम्मर त' अछि। मुदा दोकानदार बाजल - रौ बाप रौ बाप! हे पानि मे आगि लगाब' लेल हमही भेटलियौ रौ? तोरा देखि क' त' गँहकी पराइए जेतौ। फेर बिक्री-बट्टाक की हएत। हि. 1 : हम ऑफिस-ऑफिस केहुरिया काटल। सभक एक्के टेर- पढ़ल-लिखल छें? डिग्री छौ? हि. 2 : सोचल, अपने कोना धंधा-पानी आरंभ करी त' -पूँजीए नञि (करूण हंसी) घर मे मुर्गी नञि, कीने चलल मसल्ला। हि. 1 : एखनि नीक भ' गेल अछि। रबि क रबि सभ दोकान पर रेट फिक्स अछि- एक रूपैया फी दोकान। (हंसैत अछि) फ़ी रूपैया, फ़ी दोकान, फ़ी छक्का । रौ, तोरा त' अठन्नी, रूपैया दू रुपैया डेली भेटै हेतौक। हमरा आओर के त' एक रूपैया फी हफ्ता, फी छक्का। देख, सभ किछु अछि - हाथ गोर, नाक-आँख, मूड़ी, दिमाग। हि. 2 : मुदा सभ किछु रहितहु किछु नञि छी हम सभ.. ने मनुक्ख, ने कुकुर। हि. 1 : बस एक रूपैया फी हफ्ता, फी छक्का (गबैत नचैत अछि। शेष दुनू ओकरा संगति देइत अछि) एक रूपैया मे.. एक रूपैया मे, पूड़ी खाऊं, जिलेबी खाऊं, नरेटी फाड़ि क' तान लगाऊ.. एक रूपैया मे। (नचैत गबैत ओ सभ मंगतूक माथ, बाल, मुंह छुबैत अछि, चूमैत अछि, नाच' लेल उठाबैत अछि। मंगतू सेहो प्रयास करैत अछि। पार्श्र्व स' नृत्य प्रधान संगीत तेज होइत अछि.. नाचबाक प्रयास करैत-करैत मंगतू खसि पड़ैत अछि। सांस सामान्य भेला पर।) मंगतू : हँ रौ, सही कहै छें तो सभ। अई ठाँ त' लोक-आओर अठन्नी - टाका, में पुण्य कीनैत छथि त' अपना आओर के काज द' क' किओ अपन पांच सौ, सात सौक खारा कियैक करत? लोक आओर त' इएह बूझैत छथि ने जे लोथ, लूल्हि-नांगड़ि. कोन काजक? तोरा आओर स्त्री-पुरूष नञि भेलें त' समाज मे तोहर गिनतीयो नञि! अरे किओ पूछल हमरा आओर स' जे हम सभ.. हम सभ की सभ क' सकै छी। अरे, किओ करबा के त' देखौ जे हम सभ की नञि क' सकै छी! हि. 2 : (हंसैत आ थपड़ी पीटैत) की सभ क' सकै छें रे? साला, दगेबाज, हमरा संगे प्रेम बना सकै छें! रौ सार.. (चिढ़बैत अछि। मंगतू पहिने खिसियाइत अछि, फेर हंसि पड़ैत अछि।) मंगतू : बनेबौ रौ, बनेबौ, मुदा पहिने अखबार त' पढ़' दें। भिन्सर स' नञि भेटल। नञि त' रामआसरे भाइ आ नहिए किसुनदेवे भाइ आइ अखबार देलैन्हि.. चली, अपनही स' ल' आनी। भ' सकै छथि, जे बेसी काज हुअए हुनका आओर के.. (मंगतू अखबारक औफ़िसक प्रवेश द्वार धरि अपना के ल' जाइत अछि। द्वार पर किसुनदेव आ रामआसरे अति सावधानक मुद्रा मे ठाढ़ छथि।) किसुन. : आई सीएमडी साहेब आब' बला छथि। राम. : हँ, तैं देखहक नें, सभकिछु कतेक चकाचक छै.. फिट-फाट.. फस्ट किलास। किसुन. : आई त' सभ स्टाफ सेहो आएल अछि। कोनो गैरहाजिर नञि । राम. : सुनल जे आइ सीएमडी साहेब सभ' स' भेंट करताह। मीटिंग करताह। किसुन . : तहन त' अपनो सभ स' भेंट करताह! राम. : भ' सकैत अछि। किसुन : एहेन हेतै त' हम पलखति निकालि क' हुनका पएर छुबि कहबै, जे साहब.. हमरा कनकिरबा के कोनो नोकरी.. राम. : सपना जुनि देख.. ई एतेक बड़का लोक सभ.. अर्जी दइयो देबही त' अई हाथ मे लेथुन्ह आ ओहि हाथ स'.. (अही बीच युवक आ युवती पत्रकार अबैत छथि। दरबानक मुंह पर पहिचानक मुस्की अबैत छै। दुनू ओहि दुनू के नमस्कार करैत छथि।) युवक : (भीतर जाइत) रामआसरे! की बात? वर्दी एकदम कलफदार। मूँछो-एकदम कड़क। मूछो के कलफ लगा देलही की? राम. : (लजाइत) ऊ साहेब, आइ.. ऊ.. सीएमडी साहेब.. युवक : ओ हो.. तोरा संगे हुनकर मीटिंग छौ की? बढ़िया, बहुत बढ़िया (दर्शक दिस) देख रहल छी ने प्रशासन के। ओ तखने चुस्त-दुरूस्त नजरि अबैत अछि, जहन ओकर माय-बाप सभ अबैत अछि.. वरना.. (रामआसरेक एक दिसक मोछ के नीचा क' देइत अछि आ भीतर चलि जाइत अछि। ओकरा गेलाक बाद रामआसरे अपन मोछ पूर्ववत करैत अछि।) (मंगतू ताबैत द्वार धरि पहुँचि जाइत अछि। दुनू दरबान के देखि क' मुस्काइत अछि। मुदा दुनू ओकरा दिस ध्यान नञि द' क' मुस्तैदी स' अपन ड्यूटी क' रहल अछि। मंगतू अपन एकलौता हाथ स' सलाम ठोकैत अछि।) मंगतू : रामआसरे भाई? किसुनदेव भाई? आई त' बड्ड जोरदार लगि रहल छी दुनू। (दुनू कोनो जवाब नञि देइत छथि) मंगतू : बेरहटिया भ' गेलै.. अखबार नञि भेटल.. मोन बेचैन भेल अछि.. आ रामआसरे भाई.. कहियो हमरो ई ओफिस भीतर स' घुमा दिय' ने। सुनै छी, बड्ड मोडन ओफिस छै.. कम्पूटर, त' की त' की सभ छै। अच्छा, अहीं सभक पुन्न परताप से पढ़ब सीखि गेलहुँ त' अहींक किरपे कोनो दिन ओफीसो.. (तखने गेट पर हलचल होइत अछि। 'साब आ गए'। 'हटो, हटो, रास्ता छोड़ो' आदि स्वर उभरैत अछि। सिक्यूरिटी अटेंशनक मुद्रा मे आबि जाइत अछि। रामआसरे आ किसुनदेव दुनू मंगतू के देखैत छथि, फेर पलखतिये मे दुनू मे जेना कोनो करार होइत अछि आ दोसरे पल मे दुनू मंगतू के घीचि क' गेट स' दूर ल' जाक' पटकि देत छथि आ झब स' अपना स्थान पर आबि क' ठाढ़ भ' जाइत छथि। एक गोट सूटेड-बूटेड साहेब कएक टा अधिकारी सभस' घेराएल अबैत छथि आ भीतर चलि जाइत छथि। दुनू हुनका खूब चुस्त, मुदा नमगर सलाम ठोकैत छथि। सीएमडी आ बाकी लोकके भीतर गेलाक बाद।) राम. : यार किसुनदेव! ई नीक नञि भेलै। किसु. : त' कइए की सकैत छलहुँ? सीएमडी साहेब आब' बला छलाह। ऐहेन स्थिति मे हम सभ एकटा लोथ.. नांगड़ि भिखमंगा स' गपियाइत रहितहँु त'.. अपन नोकरी त' सोझे.. राम : तइयो.. आराम स' ल' जा सकै छलियै.. एना बोरा जकाँ पटकि देलियै.. की जान' चोटो-तोटो लागल हेतै.. किसुन : चल, चल देखि लेइत छियै.. राम. : नराज हेतैक ओ.. किसुन : अरे अखबार ल' क' चलै छी। ओकर नराजगी दूर भ' जेतै.. अखबार त' ओकरा लेल चरसो-गाँजा स' बढ़िक छै.. राम : पढ़ियो कतेक जल्दी लइत छै। पढ़ै की छै, घोखि जाइ छै, (गर्व स') हमही त' सिखेलियै ओकरा, अहिना एक दिन आएल छल आ बाजल छल.. हमरो अखबार पढ़ाएब सीखा दिय' ने भाई जी। हम मजाक केलियै -'की रौ, पढ़ि क' की बनबें? शिक्षा मंत्री? ओ बाजल, मंत्री बन' लेल पढ़ब जरूरी थोड़बे छै। राम. : मंगतूक ई प्रश्न हमरा छुबि गेल। बड़का-बड़का लोक सभक धिया-पुता के पढ़ब नीक नयि लागे छै.. माय-बाप ओकर पढ़ाईक पाछा पागल बनल रहैत अछि आ धिया-पुता सभ हुनकर मंह पर पों-पों पदैत रहैत छथि.. आ ई एकटा लोथ.. भिखमंगा.. हम तय केलहुँ जे एकरा ओतेक त' पढ़ाइए देबै जे ई पेपर - तेपर पढ़ि सकय.. ई अ, ज आकारा जा.. ह उूकार हि.. आ आखर-आखर करैत ओ पढ़ब सीखि गेलै। आ आब त' ओ जतेक तेजी स' पढ़ैत अछि कि ओतेक तेजी से पढुओ सभ नञि पढ़ि सकत। किसुन : हिन्दी छै ने! तैं जीभ के लकबा मारि जाइ छै.. एना-एना मुंह बनाओत कि लागत जे कोनो लाटक नाती आबि गेल अछि बिलायत से। राम : कंपूटरो स' तेज ओकर दिमाग छै.. सभ किछु जेना जीहे पर राखल रहैत छै.. जेना कंपूटरक, की कहै छै... ऊ, मेमोरी में.. किसुन : अरे रामआसरे भाइ, ई मोरी तो सुने थे.. नाली। ई मेमोरी की छै? मोरीक बहीन की? राम : ननदि छै। रौ मेमोरी नञि बूझै छें.. कंपूटरक दिमाग। मुदा मंगतूआक दिमाग त' कंपूटरोक दिमाग स' बेसी तेज छै। एकदम फास्ट.. रौ, कंपूटर मे त' देख' लेल ओकरा पहिने फोलू, फ़ेर फाइल त' की दनि, कहाँ दनि फोलू.. तहनो सेभ माने दिमाग बचा क' राखने छी त' भेटत, नञि त'.. हवा.. लें सार.. गेल सभ.. आ जदि कोनो बेरामी घुसि गेल, तहन त' पूरे गुड्डी बकट्टा.. किसुन : अरे, ठीक इएह गप्प हमर साहेब कहै छथि। आ सएह सच्छात विराजमान छै मंगतुआक खोपड़ी में। ऊँहूँ, गलति बाजि गेलहुँ, ओकर मेमोरी त' ई कंपूटरोक मेमोरी स' फास्ट चलै छै। चालू कि बन्द करबाक झंझटि स' फ्री। कोनो घटनाक दिन, समय, साल, कारण पूछू, तत्काल हाजिर। पोलटिस पर पूछू कि सनीमा पर कि टीवी पर की मौगी सभक नवरंगा डरेस पर की ठोर पालिस पर। सभ कंठस्थ, हनुमान चलीसा जकाँ। भूत-पिचास निकट नहिं आबै.. राम : अरे, शुरू-शुरू मे लोक आओर बड्ड हैरान होइत छलै ओकरा अखबार पढ़ैत देखि क'। किओ-किओ त' मुंहो बिचकबैत छल जे एह, भेल भिखमंगा आ शान प्रधानमंत्री के। किसुन : ओकरा आओर के बुझले नञि छै ने जे मंत्री सभ अखबार नञि पढ़ै छथि.. पढ़ताह कोना.. फुर्सतिये कत' छै.. जन-सेवा स' (जनसेवा पर स्वर मे व्यंगात्मक जो।) (तखने पार्श्र्व स' तेज गति स' चलबाक ध्वनि अबैत छै। दुनू पुन: अटेंशनक मुद्रा मे आबि जाइत छथि। सीएमडी निकलैत छथि। दुनू खूब नमगर सलाम हुनका ठोकैत छथि। हुनका जाइते देर कि सभ किओ फक स' साँस छोड़ैत छथि आ फेर सभ-किछु ढील-ढाल भ' जाइत छै। रामआसरे आ किसुनदेव अपन वर्दीक कलफ ढीला करैत छथि, मोछो नीचा करै छथि।) राम : देखलही। साहेब के जाइते सावधानक कलफ मे लागल ई पूराक पूरा.. की कहै छै .. मैनेजमेंट ग्रुप.. सभ एकदम स' ढील-ढाल भ' क' लटकि गेलौ। एना (हाथ-गोर मूड़ी ढीला क' क' देखबैत अछि।) किसुन : चल आब मंगतुआ लग। द' आबी अखबार। (दुनू मंगतू लग पहुँचैत छथि। ओकरा अखबार देइत छै। मंगतूक चेहरा पर दुख, अपमान, नाराजगीक भाव छै। ओ अखबार लेब' लेल उत्सुक नञि देखाई पड़ैत अछि।) किसुन : रौ लाट साहेबक नाती। मंगबे भीख आ शान रखबें राजा-महाराजा के। (कनेक नरम भ' क') रौ, हम सभ त' अदना मोलाजिम छी। हुकुम नञि बजाएब त' नोकरी स' छुट्टी। देखलही ने आइ तों जे बड़का-बड़का हाकिम सभ सेहो कोना कुकुरक नांगरि जकाँ .. ले, राखि लें, काल्हि स' जल्दी आनि देबौ। (मंगतू ओकरा आओर दिस बेगर देखि क' अखबार ल' लैत अछि।) किसुन : की जानि एहेन कोन हीरा-मोती जड़ल रहै छै अई मे जाहि लेल ई एतेक पिरीसान फिरैत अछि। वएह त' खबरि होइत छै - हत्या, अपहरण, बलात्कार। लागै छै जे पूरा देस अई सभ' मे हाथ रोपि क' बइस गेल अछि। मंगतू : (अखबार मे डूबि गेल अछि।) ओहि दिन हम अखबार मे गिनती कएल.. 380 लोकक मरबाक समाचार। किओ अपन मौगत नञि मरलै.. किओ गोली स' त' किओ बस पलटी स, किओ बम स', किओ अपनही बेटा-पुतौहु द्वारा.. एखने त' खबरि छलै - बम फ़ुटबाक। खूब असमान चढ़ि रहल छै मौगतक ई धंधा। एखने त' लोक आओर निकलल छलाह, घर स', बजार स', काज स', हंसैत-खेलैत, सौंसे देहे आ एखने हाथ-गोर साफ.. भरि जिनगी लेल लोथ.. तहन एक दिन की ई पूरा दुनिये लोथ भ' जेतै? (ठेहुन मे मुंह नुका लइत अछि, दर्शक मे स' एक गोट बाजैत अछि। मंगतू चेहाक मूड़ी ऊपर उठबैत अछि।) दर्शक 1 : साँच कहल रौ भाई, साँच! ई देख (केहुनी धरि कटल हाथ देखबैत अछि) रौ, बम, दंगा, झगड़ा-फसाद - मरैये के? कोनो नेता? हुनकर बेटा-जमाय, नाती-पोता? ऊँहूँ - धूरि सन हम, तों, ई, ओ..। ओ सभ पैघ.. मातबर लोग.. पैघ लोक, पैघ गिनती.. पैघ गिनती मे छोट-छीन संख्याक मोजर नञि .. । दर्शक 2 : (महिला अछि) देखू हमर ई मुंह (झरकल मुंह) जहिया स' एना भेलए, ऐना देखब छोड़ि देलहुंए.. सुनैत छलहुं जे लोक प्रेम मे त्याग करैत छथि। आई प्रेमो जबर्दस्तीक चीज बनि गेलैय'! हमरा अहाँ स' प्रेम भ' गेलए तैं अहाँ के हमरा स' प्रेम करैये पड़त.. दोसर रस्ताक कोनो गुंजाइसे नञि.. वरना तैयार रहू.. परिणाम लेल.. आह.. हम शिकार भ' गेलहुँ एहेन प्रेमक। (चिकरैत) रौ, बिगाड़' त' आबै छौ, बनाब' आबै छौ? कोन हक्के तों एना केलें हमरा संगे.. (कनैत) आब ऊपरबला स' मौगत माँगै छी त' सेहो नञि भेटैय'.. दिन-राति ओढ़नी स' मुंह तोपैत चलैत रहू, अपना स' बेसी दोसर लोकक खेयाल करू जे हुनका हमर ई मुंह नञि देखाइ पड़य.. (ओत्तहि ठेहुन भरे बैसि जाइत अछि।) मंगतू : कहबी छै जे सात जनमक बाद मनुक्ख जनम भेटै छै। आ सएह मनुक्खक ई अवस्था? (विक्षिप्त जकाँ चिकरैत अछि) रौ, रौ सर्वशक्तिमान कहाब'बला भगमान! कत' छें तों? मनुक्ख बनेबाक बदले राक्षस कियैक बना रहल छें? एतेक फ़ुटानी कियैक रौ? आ सोझा मे, देखियौ तोहर हिम्मति.. रौ, बौक-बहीर छें की.. देखबही ई धरती के, किछु करबहीं एकरा लेल कि कान मे तेल ध' क' सुतल रहबें?.. रौ, किछु क' सकै छें त' कर.. नयिं त' हमरो मारि दे आ तोंहो कतहु डूबि-धँसि जों.. नञि जीबाक अछि.. मौगत.. द' दे.. भगवान, मौगत.. नञि जीब' चाहै छी राक्षस स' भरल अई दुनिया मे.. (भोकासी पारि क' कनैत अछि।) (जाहि समय मे मंगतूक प्रलाप चलैत अछि, ओहि समय ओम्हर स' पास होब बला लोक आओर ओकरा दिस देखैत चलि जाइत रहैत अछि। ककरो नजरि मे ओकरा लेल कोनो सहानुभूति नञि । ध्वनि सभ ऊभरैत अछि.. 'की भेलै रौ एकरा?', 'अरे, किछु नञि, पागल छै सार!','चोट्टा, भगवान के गरियबैत छै, पछिलो जनम मे गरियैने हेतै, तैं' अई जनम से सेहो..', 'रौ, बइसल बनिया की करय, ई कोठीक धान ऊ कोठी करय', 'काज ने धंधा, मौज-मस्ती ठंढा.. ', 'हमरा आओर जकाँ ट्रेन बस ट्रेन करितियइ, नौ स' पाँच मे जिनगी स्वाहा कर' पड़तियैत त' बुझितियइ.. गै चल, तोंहो कोन पगलेटक चक्कर मे फँसि गेलैं.. ', 'नञि रौ ई पगलेट नञि छै.. वाजिब गप्प कहै छै.. भीख माँगब एकरा नीक नञि लागै छै.. मुदा.. मजबूरी छै.. के काज देतै एकरा.. ' आदि - आदि । ..सभ पात्र एम्हर ओम्हर स' निकलि क' मंगतूक पाछा ठाढ़ भ' जाइत अछि आ समवेत स्वर मे कहैत अछि..) 'हम सभ.. मात्र पुतली भरि नियंताक अपन-अपन इच्छाक / कामनाक दीप लेसने हम सख्त अछि ताकीद देखू मात्र, बजाऊ कोर्निश गबैत रहू राग-दरबारी.. हे प्रभो, अन्नदाता बस कृपा करी एतबे जे बनल रही हम सभ पुतरी भरि.. डोरी अदृश्यक हाथ मे। (प्रकाश मंगतू पर केन्द्रित होबैत शनै: शनै: फेड आउट) -------- दृश्य : 2 (मंगतूक स्थान - भोरक बेला - मोटर गाड़ी स' एक गोट सेठ उतरैत अछि - गाड़ीक दरवाजा फोलब, बंद करबाक, जेब स' टाका निकालबाक अभिनय.. टाका निकालिक' ओ मंगतू दिस-बढ़ैत अछि..) आदमी : उठ, उठ, ऐ भाई.. भोर भ' गेलै। (मंगतू ओकरा दिस प्रश्नाकुल नजरि स' देखैत अछि। बाजैत किछु नञि अछि..) ई ले - एकावन टाका। राखि ले। मंगतू : एकावन टाका? मुदा कियैक? आदमी : आई हमर बाउजीक बरखी अछि। ब्राह्मण अथवा दरिद्रनारायण भोजन करेबाक फुर्सति अछि नञि तैं, आई पाँच लोक के दान क' देइत छियै। मंगतू : साब, हमर एक गोट विनती अछि.. साब, ई पाई अहाँ राखि लिय'.. आ एकरा बदला मे हमरा कोनो काज द' दिय.. पतियाउ साहब जी, हम काज क' सकै छी.. ई हमर हाथ देखियौ.. गोर देखू.. (विचित्र तरीका स' हाथ-गोर चलबैत अछि) साहेब जी.. हमरा अई नरक स' निकालू साहेब जी.. हमरा काज दिय'.. केहनो.. पैघ-छोट.. अहाँ के शिकायतक मोका नञि देब साहेब जी। (ओकर पएर-पकड़बाक अभिनय करैत अछि। आदमी घबड़ाक' पराएत अछि। गाड़ी मे बैसबाक, स्टार्ट करबाक अभिनयक संग खौंझाएल स्वर में..) आदमी : हुंह! काज चाही । देह न दशा, मुर्गी प्यारे फँसा। नीक-नीक लोक के त' काज भेटै नञि छै.. सभ ठॉ त' भर्ती पर रोक लागल छै.. चुनावक समय मे अखबार मे नौकरीक विज्ञापन भरि.. तकरा बाद फुस्स! सरकारक आमदनिए छै। ई विज्ञापन स'.. डीडी, पे-ऑर्डर.. एकरा देखियौ.. काज क' लेब.. कोनो काज.. जहन कोनो काज कइए लेबें त' माँग भीख! ईहो त' काजे छै आ बड्ड मेहनति आ हिम्मति बला काज छै। (गाड़ी चलेबाक अभिनय संगे मंच स' बाहर। बाहर जाइत काले मंगतू पर नजरि..) मंगतू : चलि गेलाह। सब चलि जाइत अछि। भीखक एक गोट अठन्नी, रूपैया फेंकि क'.. बस! साधे रहि गेल जे किओ हमरो सहारा दितियैक - अपना पैर पर ठाढ़ हेबा मे.. लोक आओर पतियाइ कियै नञि छथि जे हम ठाढ़ भ' सकै छी.. लिख-पढ़ि सकै छी.. ई देखू (हाथ स' जमीन पर किछु लिखबाक प्रयास करैत अछि) .. आ.. आ.. ई किसुनदेव आ रामआसरे भाई त' कहैत छथि जे हमर दिमागो बड्ड तेज अछि (कनेक मुस्काइत अछि।) तैं त' हुनकर बड़का साहेब हमरा लग आएल छलाह.. बाप रौ, की सूट-बूट, की शान.. (मंगतू पर स' फेड आउट) (फ्लैश बैक आरंभ) (एक अधेड़, रोबदाब बला व्यक्ति.. नाम तांबे.. मंच पर बेचैनी स' एम्हर-ओम्हर बूलि रहल छथि। रामआसरेक प्रवेश) राम. : साहेब जी? तांबे : (अनसोहांत स्वर मे) yes? राम. : साहेब जी किछु पिरीशानी मे बूझा रहल छथि। तांबे : परेसान नञि होइ त' की राग मल्हार गाबी? सभटा डाटा कलेक्ट कएल छल। पता नञि कोना हार्ड डिस्क सेहे उड़ि गेल। राम. : साहेब जी, कम्पलेन नञि लिखाओल की? तांबे : एंट्री त' क' देलहुँ। मगर तकरा स' की? इंजीनियर त' काल्हिए आओत। आ मैटर हरि हालति मे आइए देबाक अछि। तैं त' लेट बइसल छी.. मुदा.. (माथ पकड़ि लेइत अछि।) राम. : साहेब जी.. छोट मुंह पैघ गप्प.. अनसोहांत सन सेहो.. मुदा नीचाँ.. छै ने.. ओ लोथ.. मंगतू.. भ' सकैय' ओ बता दियए.. तांबे : (एक नजरि ओकरा देखि ठठा क' पेट पकड़ि क' ठठाएत अछि।) ऊ लोथ भिखमंगा, ऊ हमरा डाटा बताओत? रौ, तोहर दिमाग दुरूस्त त' छौ ने! जे डाटा कलेक्ट कर' मे हमरा एतेक समय लागल, एतेक - एतेक किताब कंसल्ट कर' पड़ल, ओ ओहि अनपढ़, लोथ, भिखमंगा.. राम. : साहेब जी, कम्पूटर त' अहाँ के अहिना.. इंजीनियर काल्हिए आओत। काज करबाक अछिए अहाँ के। आर कोनो उपाय त' अछि नञि! त' एक बेर टराइ करबा मे हर्जे की! हमरा ओना विश्र्वास अछि जे ओ अहाँक अबस्से बता देत। तांबे : कोन आधार पर तों कहि रहल छें एना? राम. : ओ पढ़' जानै छै। हमहीं आ किसुनदेव मिलिक' ओकरा अच्छर ज्ञान करैलियै। ओकर लगन आ मेहनति.. आई ओ अखबारक नाम स' ल'क' अंतिम पन्ना आ संपादकीय धरि पढ़ि जाइत अछि। सभकिछु सिलेट पर लिखल लाइन जकाँ मोन रहैत छै ओकरा। तैं हम.. बाकी त' अहाँक इच्छा..। (फ्लैशबैक समाप्त। प्रकाश मंगतू पर।) मंगतू : रामआसरे कहला सन्ते तांबे साहेब आएल छलाह! (हंसैत) बार रौ बाप! की गुमान मे फूलल छलाह। हमरा ल'ग ठाढ़ हेबाक विवशता, मुंह पर बहुत किछु जनबाक दर्प, जेना दुनियाक संपूर्ण ज्ञानक गठरी हुनके लग हुअए, हमरा लेल हुनक ऑखि मे लहराइत घिरनाक समुंदरि, संगही एकटा उपकारक भाव सेहो, जे देख - हमही छी, जे ऐलौं तोरा लग.. ले बिलइया के, हौ जी, ऐलौं त' कोनो हमरा लेल.. एलौं अहाँ अपना लेल.. ऐलौं, पूछलौं, हमरा मोन छल, बतेलौं, अहाँ लिखलौं, छपेलौं, आ बिसरि गेलौं। एकटा धन्यवादो धरि नञि। रामआसरे भाइ लेख देखाओल.. मुदा पढ़ि नञि सकलहुँ - अंग्रेजी सन्ता। हमर ज्ञानक उपयोग कोना भेलै.. ई हमरे नञि पता.. इएह त' अछि हमर तकदीर.. (विचित्र हँसी हँसैत अछि.. पत्रकार-युवक-युवतीक प्रवेश। ओकरा हँसैत देखि थम्हि जाइत छथि।) युवती : मुगतू? (मंगतूक हंसी थम्हि जाइत अछि।) की भेलौ? बड्ड हंसि रहल छे। मंगतू : (कनेक सकुचाइत) जी.. ओ किछु नञि.. बस.. तांबे साहेब बला बात.. युवक : (रूक्ष स्वर मे) सुनल जे ओ तोरा लग आएल छलाह आ तों एकदम टेपरेकॉर्डर जकाँ चालू भ' गेल छलें? मंगतू : (ओकर रूक्षपन के लक्षित नञि करैत अपनही प्रवाह मे) त' की करितियैक! एतेक बड़का साहेब! एतेक पिरीसान.. चांसे बूझल जाओ जे हमरा पता छल। - जे किछु पता छल, से सभ बता देलियइ.. देखलियइ हम लेख.. मुदा अंग्रेजी.. साब, अहाँ हमरा अंग्रेजी पढ़ब सिखा देब? युवती : (मोन पारैत) हे सुनु, हम सभ एकरा पर स्टोरी केने छलहुँ ने? युवक : अरे, ऊ त' पुरान कथा भ' गेलै। वंडरफुल एंड पावरफुल प्रोजेक्ट । युवती : एकरा किछु लाभ करेलहू की नञि? युवक : माने? (ऑफिस दिस बढ़ैत अछि।) युवती : (अनुसरण करैत) माने ई, जे ओहि समय गप्प भेल छल जे पेमेंट भेलाक बाद अहाँ ओकरा किछु देबै.. जस्ट फॉर ए नाइस जेस्चर.. मुदा, अहाँ त' हमरो किछु नञि बताओल। युवक : अहँू त'! ओ की केलकई जे ओकरा पेमेंट करियई? युवती : वएह त' धुरी छल। नञि बतेतियैक त' अहाँ काज क' सकै छलहुँ? नञि न! आब किछु ओहि गरीब के.. (दुनू ऑफिसक गेट धरि पहुँचइत छथि। रामआसरे आ किसुनदेव दुनूक गप्प सुनै छथि।) काज निकलि गेल त' बस, मुंह फेरि लेलहूँ! युवक : जमाने इएह छै डार्लिंग। देखलहुँ मि. तांबे के.. सभटा काज करबा लेलन्हि मुदा नामोक क्रेडिट नञि.. युवती : अहँू सएह बन' चाहै छी त' बनू.. मुदा हमर मानधन हमरा दिय'! हम ओही मे स' ओकरा.. राम. : नमस्कार साहेब। युवक : नमस्कार नमस्कार। किसुन: कोनो गंभीर गप्प सर? युवक: उंहूं, किच्च्छु नयिं। युवती : किछु कियैक नञि? अरे, हम दुनू ओहि मंगतू पर काज करै छलहुँ। तहन ई गप्प भेल छल जे पाइ भेटला पर हम किछु ओकरो देबै। मुदा.. ई त' हमरो पाइ घोखि गेलैन्हि.. युवक : (जेना भेद खुलि गेल हुअए) ओके बाबा ओके। अहांक पाइ अहां के द' देब। ओकरो द' देबै.. आब त' खुश? (फसफुसाइत) सभके सभ किछु कहब जरूरी छै की? (बाजैत भीतर चलि जाइत छथि। युवती पहिने जाइत अछि। पाछा स' युवक अपन तर्जनी माथ पर ल' जाक घुमबैत अछि -- माने युवती कनेक क्रैक अछि।) राम. : देखल भइया ई बड़का-बड़का लोकक खेल! पत्रकार छथि ई सभ। जनताक पैरोकार। जनताक रच्छक। रच्छक खुदे भच्छक.. हाँक' लेल कहू त' एकदम सूरूजे पर, देब' बेर मे पद-पद पाद' लगताह! हजारो टाका झिंटने हेतै मंगतुआक नाम पर। आ ओकरे किछु देबाक नाम पर .. किसुन : सटक सीताराम! सभ एक्के थरियाक भांटा रो भाइ! राम. : ऊ तांबे साहेब! ओकरे मदति स' ओ लेख लिखलन्हि। छपबो केलै। आब हमरा त' अंग्रेजी, फंगरेजी अबै नञि अछि। हम पूछ' गेलियै जे साहेब, अई मे मंगतूक कोनो जिकिर-उकिर..! किसुन : की बाजलन्हि? राम. : अरे, ओ तेहेन न आँखि गुरेरलन्हि जे एह -'ई लेख है रामआसरे, इन्टरव्यू नहीं कि सबका नाम देते रहें।' हम त' तइयो ढीठ बनल बजलहुँ जे साहेब, ओकर कोनो भला भ' जयतियन्हि। भिखमंगाक जिनगी स' ओकरा छुटकारा भेटि जइतियैक। ओ फेर आँखि तरेरलन्हि। हम फेरो थेथर जकाँ बाजलियैक जे ठीक छै, नाम नञि देलियै त' किछु दामे द' दियऊ। लगतै ओकरो जे हँ, आई अपना दिमागक कमाई भेटलए.. सभ सार चोर अछि- ऊ तांबे, ई छौंड़ा.. काम रहला पर बाबू-भैया आ निकलि गेला पर दू-दू लात। (पार्श्र्व स' सोगबला धुन। प्रकाश मंगतू पर। ओ चिकरैत अछि) मंगतू : किओ हमरा अई नरक स' निकालि क' ल जाऊ। रौ तकदीरक नाति, कत' मुंह मरा रहल छें। देह नञि त' तोहें नीक जकां रहितें हमरा लग। कोनो नीक, पाईबला घर मे देतें। माय-बाप लग। मुदा, जहन अपने माय-बाप अपन नञि भेल तहन.. (सोगबला धुन उत्सव धुन मे बदलि जाइत अछि। मंगतूक चेहरा फेड आउट होइत अछि। एक काल्पनिक लोकक आभास देइत लाल-नारंगी-पीयर रोशनी पसरइत अछि आ ओहि प्रकाश मे देखाइ पड़ैत अछि - एक गोट स्त्री, जकरा कोरा मे एकटा नवजात अछि। अन्य स्त्रीगण नाचि-गाबि रहल छथि!) रूपैया मांगे ननदी लाल के बधाई एके रूपैया मोरा ससुर के कमाई अठन्नी ले लो ननदी लाल के बधाई एके अठन्नी मोरा पिया के कमाई ओ ना मैं दूँ ननदी लाल के बधाई एक स्त्री : देखू भौजी। चान जइसन बेटा देलन्हि अछि हमर भैया अहाँ के। आब बेगर छत्तीस भरक डँड़कस के नञि मानब। (सभ हंसैत छथि। स्त्री लजाइत अछि। पुरूषक प्रवेश। हँसैत-नचैत स्त्रीगण विदा भ' जाइत छथि।) पुरूष : राधा, की नाम राखब एकर? स्त्री : (लजाइत) जे अहाँ कही। पुरूष : हमर मानी त' एकर नाम राखब चिरंजीवी। खूब पढ़ाएब, लिखाएब, कलक्टर बनाएब। स्त्री : हमरा मानी त' ओकरा पर अपन मर्जी नञि थोपी । अपना मर्जी स' ओ जे बनय, डाक्टर कलक्टर, एक्टर.. पुरूष : अच्छा भई, हम त' हुकुमक गुलाम छी। हुकुमक बेगम जे हुकुम देतीह, हुकुमक गुलाम बजा आनत (कोर्निश करैत अछि। स्त्री हंसैत अछि। पुरूष छेड़ैत अछि) गीत मे कहलियै - पिया के कमाई नञि देबै ननदि के, हमर बहीन के। ओ जीवित नञि छोड़ती अहाँ के! तहन? तहन हमर की हएत (आवाज रोमांटिक होइत अछि। स्त्रीक हंसी। अंधकार-प्रकाश मंगतू पर।) मंगतू : एहेन माय-बाप हमर करम मे कत'? समाजक सामना करबाक हिम्मत नञि भेलै। अई समाज मे श्राप भोग' लेल छोड़ि देलैन्हि। सोचल, जे अपने स' अपन तकदीरक किताब लिखब, मुदा ऊ बकट्टा गुड्डी हमरे जिन्दगी के बकट्टा क' गेल.. लोथ, लूल-लांगड. बनल ई जिनगी । मौगत की एकरा स' अधलाह हेतै?.. मुदा मौगतो त' नञि अबैत अछि। नञि घरक आसरा, नञि समाजक, नञि लोकक। कथी लेल जीब, ककरा लेल जीब, ई जीबाक कोनो अर्थ? (मंगतू भोकासी पारि कान' लागैत अछि। रामआसरे आ किसुनदेव ओकरा लग अबैत छथि।) राम. : अपन इ ऑफिसे मे त' कतेक विकलांग लोक काज करै छथि, भोइकर साहेब, लीना मैडम, सिन्हा जी.. मुदा .. एक दिस एहेन माय-बाप आ दोसर दिस ई समाज.. सभक फाटल मे आंगुर कर' बला। रौ, तोरा कोन मतलब छौ किओ किछु करए। ककरो चैन स' जीब' नञि देतै ई समाज.. (रामआसरे आ किसुनदेव मंगतू के धैरज बंधबैत छथि । पार्श्र्व स' कविता ) 'जिनगी जुआ अछि सट्टा अछि, बजार अछि ताश अछि, पत्ता अछि रोशनीक बाढ़ि चोन्हियाएल लोक भीड़ अछि, एकान्त अछि भोरक तारा विश्रान्त अछि तारा टूटए नञि आस छूटए नञि (फेड आउट) दृश्य : 3 सांझुक समय। तेज बरिसाति आ मेघ बिजली गर्जन-तर्जनक स्वर। पहिलुका तीनू भिखमंगा' छौंड़ा मे स' सभस' छोटका आब रूमाल बेचैत अछि। ओ अपन समान सभ प्लास्टिक स' तोपबाक चेष्टा करैत बस स्टैंड दिस अबैत अछि। मंगतू अपना जगह बइसल पानि बरिसब देखि रहल अछि। ओकरा लग भीखक पाइ छितराएल छै। छौंड़ा दूरे स' मंगतू के देखैत अछि आ फेर अपना पेन्टक जेबी उन्टा क' देइत अछि। मंगतू लग पड़ल पाई दिस ओ चुंबक जकाँ आकर्षित होबैत बढ़ल चलैत अबैत अछि। मंगतू पानि छोड़ि ओकरा दिस देख' लगैत अछि। छौंड़ा दू-चार डेगक दूरी पर एकाएक थम्हि जाइत अछि। मंगतू : की रौ झुनमा, की भेलौ। झुनमा : किछु नञि । मंगतू : त' रूकि कियैक गेलें? झुनमा : अहिना। मुंगतू : मुंह एना छाउर जकाँ कियैक केने छें? माल-ताल नञि बिकलऊ की? झुनमा : ई बरखा-बैकाल मे लोक घर भागत की समान कीनत। मंगतू : (कनेक काल चुप रहिक' जेना बात बदलिक) ई त' तों नीक केलें, जे भीख मांगब छोड़ि काज पकड़ि लेलें। अच्छा झुनमा, ई बता, तोरा पानि नीक लागै छौ? झुनमा : पेट भरल रहला पर गदहियो करीना कपूर लगै छै। मंगतू : (जेना अपनही प्रवाह मे) हमरा बड्ड नीक लगैत अछि ई बरिसाति! आ, सुनबै छियौ, किताब आओर मे केहेन-केहेन गप्प सभ लिखल छै, बरिसाति लेल - कारी-कारी मेघ, झमझम बरिसति पानिक धार - चांनी जकाँ, भीजल धरतीक सोंन्हिपन, जेना कुम्हारक आबा मे बासन आओर पाकि रहल हुअए। हवा मे सिहकी आ मोन मे कामनाक ज्वार! प्रिय स' मिलनक इच्छा..। (पार्श्र्व स' कजरीक मद्घम स्वर) सखी हे आएल रात अंधियारी बदरा कारी-कारी ना झींगुर, मोर, पपीहा बोले दादुर दमके ना, सखि हे दादुर दमके ना, सखि हे आएल रात अंधियारी बदरा कारी-कारी ना। झुनमा : रह' दे रौ, रह' दे। पोथीक गप्प रह' दे। पोथी लिख' बला पढुआ लोक छै। ओकरा सभ के भरिसकि नञि बूझल छै जे पानि एला स' बाढ़ि अबै छै, घर, जान-माल डूबि जाइ छै, सभटा जमा पूँजी स्वाहा.. मंगतू : (फेर अपनही रौ मे) आ ओकरो स' त' नीक लागै छै बरिसातिक बादक रौद। एकदम नहाएल धोएल, स्वच्छ काया जकाँ। झुनमा : (खौंझा क') रौ सार! एतेक साहरूख खान कियै बनल जाए छें रे। एहेन बरखा-बैकाल मे तोरा सनीमा सूझै छौ, हमरा राहत बाँट'बला देखाई पड़ैत अछि। हे.. ऊ देख.. हवाई जहाज स' पाकिट सभ खसि रहल छौ, हे एम्हर.. हे ओम्हर.. हौ, हौ जी, एकटा एम्हरो खसाबहक ने! यौ भाई जी, भाई जी यौ, एकटा एम्हरो खसबियौ ने यौ। बड्ड भूख लागलए.. एको छदामक माल नञि बिकाएल..। मंगतू : रौ झुनमा। ओम्हर की चिकरि रहल छें। ले, ई पाइ ल' ले, आ ल' आन किछु.. गप-सप्प करैत खा-पी लेब। आ हे, सूत'क मोन करओ त' सुतियो जइहें। अही ठाँ स' धंधा पर निकलि जैहें। (झुनमा पाइ लेइत अछि आ चलि जाइत अछि। मंगतू फेर स' अपन दुनिया मे भुतिया जाइत अछि। ओ गबैत अछि..) 'बरसात में हमसे मिले तुम सजन तुमसे मिले हम, बरसात मे।' (झुनमा अबैत छै आ एकटा ठोंगा ओकरा थमा देइत छै। झुनमा : ले रौ हमर आमिर खान! खो। (दुनू खाइत अछि। मंगतू स्वाभाविक रूप स' आ झुनमा हबड़-हबड़ खाइत अछि।) मंगतू : चौप खूब नीक बनल छै ने। झुनमा : हूँ.. मंगतू : काल्हि कोनो आओर चीज आनिहें। झुनमा : हूं.. मंगतू : किछु बाजै कियै ने छें? (झुनमा हाथ स' थम्ह' के इशारा करैत अछि। मंगतू ओकरा देखैत रहैत अछि। झुनमा पूरा खेलाक बाद ढेकरैत अछि आ बजैत अछि।) झुनमा : हँ, आब बाज! पेट खाली रहला पर दुनिया बड़का अंडा देखाई छै। आब पेट भरि गेल अछि आ भरल पेट मे त' सुअरनिओ रबीना टंडन लागै छै। (गबैत अछि) तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त। (खाए पीबि क' दुनू ठोंगा ओही ठाँ एक कोना मे बीगि देइत अछि। दुनू पानि पिबै अछि आ ढेकरैत अछि। दुनू एक-दोसरा के देखैत ठठाक' हॅँसि' पड़ैत अछि।) झुनमा : कतेक बाजल हेतै? मंगतू : दस स' कम की भेल हेतै! पानि त' कहैय' जे आइ छोड़ि काल्हि हम बरसबे नञि करब। झुनमा : (उदास होइा) एतेक पानि बरसतै त' रोड सभ टूटि जेतै। पटरी डूबि जेतै। बस ट्रेन चलल बन्न भ' जेतै। मंगतू : त' अई लेल तों मलिन कियैक भ' गेलें? झुनमा : रौ, बस-ट्रेन नञि चलतै त' पसिन्जर नञि ऐतै। ओ सभ नञि एतै त' हमर बिक्री-बट्टा.. बिक्री नञि त' पाइ नञि.. पाइ नञि त' दाना नञि। मंगतू : रौ झुनमा, एक बात बता। तों बस-ट्रेन स' कतेक दूर धरि गेल छें? पटना स' मुजफ्फरपुर धरि.. किऊल धरि.. दानापुर.. पटना साहिब.. केहेन सोहनगर लागैत हेतौक ने देख' मे.. हजारो लोकक एके संग चढ़ब, एके संगे उतरब। फर्र-फर्र भागैत बस- ट्रेन। सर्र-स' छूटैत लोक, घर, खेत, खलिहान, गोरू बरद.. । हमरो हाथ-गोर रहतियैक त' जएतहुँ ने तोरे आओर जकाँ। झुनमा : हँ, जेतें आ पुलिसक डंडा आ पब्लिक गारि-बात खेतें। बम फ़ुटनें जान गमबितें। एम्हर बम ओम्हर बम, एतेक मरलै, एतेक घायल.. याहि सभ त' आइ काल्हिक नूज छै। मंगतू : (दीर्घ साँस लेइत) जानक की। ऊ त' अई ठाँ बइसलो बइसलो जा सकै छै। के जानए, एगो बम एम्हरो फाटय आ हम सभ' लत्ता बनि उड़ि जाइ.. बम, गोली, दंगा- ई सभ त' आइ काल्हिक रीत भ' गेलैये। एगो बम फूटै छै आ सैकड़ो लोक एक्के मिनट मे अपाहिज, लोथ भ' जाइ छै। किओ पूछय हमरा स' लोथ भेलाक दर्द। रौ.. हम त' रोजे मनबै छी जे हमरा मौगत आबि जाए। ई लोथ जिनगी स' की फेदा! झुनमा : हमहँू सभ त' इएह बाजै छी।.. की सोचै छें? ऊपरवाला लग एतेक टेम छै हमरा आओरक गप्प-सुनबाक। नमगर लाइन हेतै रौ भाइ! (ओकासी मारैत अछि।) मंगतू : नींद आबि रहल छौ। सूति रह अही ठाँ। (दुनू मिलिक' मंगतूक चीकट कथरी ओछा ओठँगि जाइत अछि। कनेक देरी मे दुनू फ़ोंफ़ि काट' लगैत अछि। मंचक प्रकाश शनै:-शनै: लाल होब' लगैत अछि। नीने में मंगतू बड़-बड़ाइत अछि-'हम जीय' नञि चाहै छी, 'हमरा मौगत द' दिय!' 'हमरा मौगत कियैक नञि अबैत अछि।' झुनमोक अस्फुट स्वर बहिराइ छै -'हं', जिय' नञि चाहै छी।' 'ई केहेन जिनगी अछि! मरने बेसी नीक' आदि। प्रकाशक लाली मंगतू पर केन्द्रित। मंगतू नींने मे उठि क' बैसि जाइत अछि आ अलसाएल नजरि स' अपना के देखैत अछि। जेना-जेना ओ अपना के देखैत अछि, तेना-तेना ओकर आँखि स' नींद गायब भेल जाइत अछि आ ओहि स्थान पर आश्चर्य भर' लागैत छै।) मंगतू : अरे, ई की? हमर हाथ? आ पैर सेहो?.. जेना जमीन स' बीया फूटि रहल अछि - सुंदर, कोमल, नरम.. ई केहेन चमत्कार! भगवान, अहाँ सचमुच कृपालु छी.. (शनै: शनै: मंगतू मंच पर पूर्ण व्यक्तिक रूप मे ठाढ़ भ' जाइत अछि।) हम.. हम एक गोट पूरा-पूरा आदमी, दुनू हाथ, दुनू गोर.. पतियाऊ की नञि पतियाऊ। (अपने बांहि मे बिठुआ कटैत) नञि, पतियाएबला गप्प नञि छै। (फ़ेर अपने स') कियैक नञि छै? हमर हाथ गोर घुरि आएलए हमरा लग, त' अइ मे नञि पतियाएबला गप्प की भेलै? आब हम अपन हैसियत बदलि सकै छी.. नीक समांग़ बनि सकै छी। भीख माँगब .... ई गर्हित कर्म स' हमरा मुक्ति भेंटि जाएत.. भेटत की.. भेटि गेल! हे.. ई लिय'.. छोड़लहुँ हम भीख माँगब.. (हँसैत अछि।) आई स', एखनि स'। आब हमरा अई जिनगी स' कोनो सिकाइत नञि । (किलकि उठैत अछि। झुनमा ओकर आवाज सुनि उठैत अछि। मंगतू के अई रूप मे पाबि क' हैरान रहि जाइत अछि। मंगतू कनखी मारि क' खुशी प्रकट करैत अछि।) झुनमा : ई जादू छै। मंगतू : ऊँहूँ! सच। झुनमा : भइए नञि सकै छै। ई जरूर कोनो जादू छै अथवा नैना -जोगिन। मंगतू : अहँ! एकदम सच। छूबि के देख। (झुनमा ओकरा छुबै छै। अपन आँखि मलैत छै, फेर छुबै छै।) झुनमा : हँ, बुझा त' रहलए सचे सन! जौं ई सच छै, त' गुरू, कहू, आब की इरादा? मंगतू : इरादा? अरे, आब त' हम खुजल आसमानक मुक्त पंछी छी। (गबैत अछि) 'पंछी बनू उड़ती फिरूँ मस्त गगन में आज मैं आजाद हूँ दुनिया के चमन में' झुनमा : एतेक आजाद नञि छें, जतेक बूझै छें। मंगतू : माने?.. जीवन एतेक सुंदर भ' सकै छै, हम त' ई सोचबो नञि केने छलहँु। देख, ई रोडक बत्ती.. बरिसातक पानि मे केहेन सतरंगी किरण छोड़ैत अछि। ई चाकर रोड, एखन शांत अछि - भिनसर होइत होइत कतेक जगजियार भ' जाइ छै.. (गबैत अछि) 'ई सहर बहुत हसीन है।' (आगाँ बढ़ैत अछि।) झुनमा : कत' जा रहल छें। मंगतू : पता नञि। हम त' खाली बूझ' चाहै छी, ई पूरा-पूरा देहक सुख उठाब' चाहै छी। भगवान, हम अहाँ के कएक बेर गारि पढलहुँ। आई अहाँ के धनबाद दइ छी। हमरा माफी द' दिय'.. (आओर तेजी स' चलैत अछि) की करब! लोक आओर जहन दुखी होइ छै, अहिना बाजै छै.. (खूब तेज-तेज चलैत अछि।) झुनमा : रौ, हवाइ जहाज जकाँ कियैक उड़ल जा रहल छें? मंगतू : चल, चल (गबैत अछि) 'दो दीवाने शहर में, रात मे या दोपहर में, आबो दाना ढँूढ़ते हैं, इस आशियाना ढँूढ़ते है।' झुनमा : रौ, हम थाकि गेलहूँ। गमे - गमे चल। मंगतू : हमर त' मोन भ' रहलए जे हम ई पूरा-पूरा धरती मापि ली, बामन भगवान जकाँ.. पूरा संसार के अपन अंकबारि मे भरि ली.. खूब चिकरि-चिकरि के गाबी - 'आज मदहोश हुआ जाए रे, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन। शरारत करने को ललचाए रे, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन।' झुनमा : (डेराइत) मंगतू, एना सनकाह - बताह जकाँ नञि कर। हमरा डर होइए। मंगतू : झुनमा, हमरा आइ केहेन लागि रहलए, बूझल छौ? झुनमा : .. .. मंगतू : आई हमरा मोन मे एकटा कामना, एक गोट इच्छाक मूर्ति बनि रहलए.. प्रेमक नरम अनुभूति.. आइए.. एखने.. लागि रहलए जे कोनो नरम, नाजुक अंचरा मे अपन मुंह तोपि ली.. ओकर प्रेम भरल स्पर्श हमर केश, देहक रग-रग मे पहुँचए आ अमृतक समुन्दर मे गहीर, खूब गहीर ल' जाए.. जत' प्रेम स' भरल संसार हएत..कियैक भ' रहल अछि एना? झुनमा : भ' गेल ई आमिर खान.. आब गाओत 'आती क्या खंडाला!' मंगतू : प्रेमक लालसा अई स' पहिने नञि भेल छल कहियो! झुनमा, सुन, तोहर भौजी.. (कनेक लजाइत अछि) झुनमा : भेल आब ई सलमान खान (गाबैत अछि) तेरे बिना, तेरे बिना.. (मंगतू आगॉं बढ़ैत अछि.. पाछू-पाछू झुनमा सेहो..) मंगतू : देख, ई श्रमक जीबैत रूप.. मेहनति स' लोक एतेक ने थाकि जाइत छै जे.. ओ कहबी छै ने जे 'नींन नञि जानै टूटल खाट।' हमहू.. एकरे आओर जकाँ खटब.. एतेक जे बस, खसिते फोंफ काटब शुरू। (फोंफ काटैत अछि।) झुनमा : मुदा तों काज की करबें रे! के देतौ काज तोरा? लूल्हि-नांगड़ि. मंगतुआ के सभ किओ जनैत छै.. मुदा आजुक ई नमगर, सोहनगर रितिक रोसन के काज के देतौ? जास्ती स' जास्ती उपदेस देतौ, जाहि स' पेट चलतौ नञि। (फोंफ काटबाक नकल करैत मंगतू एकदम स' चेहाइत अछि। फोंफ बीचहि मे रूकि जाइत अछि। मुंहक चमक, खुशी बिला जाइत अछि।) मंगतू : ऐं? की करब हम? (हँसैत अछि।) एकदम सही पकड़लें तों.. की करब हम?.. नञि, की क' सकै छी हम? ..रौ, तोंही बाज ने, की क' सकै छी हम? झुनमा : खाली भीख माँगि सकै छें। सेहो लोथ-नांगर भ' क! एहेन मुस्टंडा भ' क' नञि । मंगतू : एह! एना नञि बाज । एतेक दिन बाद हमरा ई सनेस भेटलए, ओकरा.. (हठात ओकर गर्दनि पकड़ि लेइत छै।) फेर जुनि बजिहें ई.. रौ तों त' चारि हाथ-गोर बाला आदमी भेलैं। तो की बूझबें लोथक पीर। झुनमा : (गर्दनि छोड़बैत) त' कलक्टरी कर। डाक्टरी कर। हम तोहर चपरासी, कंपोडर बन' लेल तेयार छी। मंगतू : तों हमर हौसला बढ़ेबाक बदले ओकरा खसा रहल छें। हमरा लग डिग्री अछि जे.. झुनमा : त' कोनो धंधा क' ले.. किरानाक दोकान, कपड़ाक दोकान.. किछुओ.. हमरा अपना दोकान पर राखि लिहें। मंगतू : कियैक मजाक क' रहल छें.. धंधा शुरू कर' लेल पूँजी चाही.. तों मदति की करबें, उन्टे.. चलि जो हमरा लग स'.. झुनमा : जाइ छी, जाइ छी। काल्हि फेर एबौ। अई बेर सिंघाड़ा खुअबिहें.. (जाए लागै छै। बीच-बीच मे मुड़ि-मुड़ि क' देखै छै जे मंगतू ओकरा बजा लियए। मंगतू ओकरा दिस ध्यान नञि देइत अछि। ई देखि ओ अपने स' एक कोन्टा में ठाढ़ भ' जाइत अछि आ मंगतू के देखैत अछि..) मंगतू : (जेना फेर अपना धुन मे) एह! एतेक सोहनगर समय। भोर भ' रहल छै..। हे, ई सुनू, पाखीक स्वर। भोरक मंद- मंद बेयार। हे देखियौ, ई सूतल अछि। एक उठल कि सभ किओ उठि जाएत.. बल्कि, देखियौ, जनीजात सभ त' उठियो गेलीह। ओ ओम्हर चूल्हि सुनगा रहल छै.. एम्हर ई अपना बच्चा के दूध पिया रहल छै.. आ ओकरा देखियौ, ऊ चाहक पानि सेहो चढ़ा देलकै.. ओम्हर एकटा बच्चा माय के देखि मुस्किया रहल अछि.. कतेक सोहनगर छै.. पाजेबक छुन-छुन जकाँ जिनगी छनकि रहल अछि.. मंगतू.. रौ.. हिम्मत जुनि हारि.. काज भेटतौ तोरा.. धैरज धर.. (ओ ई सभ बाजिए रहल अछि कि पाछू स' बम फ़ुटबाक भयंकर आवाज़ होइत छै। पलखतिए मे रोआ- कन्नटि, भागा दौड़ी मचि जाइत अछि। मंगतू किछु नञि बूझला सन्ते अकबकायल ओहि ठां ठाढेक ठाढ रहि जाइत अछि। दिग्भ्रमित भेल ऊ चारू दिस देखैत अछि, फेर माज़रा सभ बूझ' मे अबितही चिकर' लागैत अछि..) मंगतू : अरे, ई की भेलै.. ऊ दूध पियबैत माय! .... बच्चा ओकरा हाथ स' .... एतेक दूर खसि ..... आ ओ अपने गेंद जकाँ.. माथ फाटि गेलै.. ओ, ओ चूल्हि सुनगबैत स्त्री.. ओकर त' हाथे-गोर उड़ि .. अरे, ई निचिन्त सूतल लोक सभ.. कागज-पत्तर, खढ -पात जकाँ उड़िया.. (चिकरैत अछि) रौ, .. रौ रछसबा सभ.. जल्लाद, कसाइया सभ.. रौ, जिनगीक एक गोट साँस त' द' नञि सकै छें, मुदा.. कियैक छीन रहल छें हमर जिनगी? कियैक लोथ बना रहल छें हमरा? हमर अपराध की? (पार्श्र्व स' ध्वनि.. जन्म लेबक अपराध केने छें तों सभ.. आब भोग।) (चीख-पुकार एखनो मचल छै। मंगतू असहाय सन ठाढ़ अछि.. हठात ओकर कान में जोरदार आवाज अबैत छै 'भाग रौ, बम.. भाग, जान बचो.. भाग रौ.. ' (भीड़क भागबाक ध्वनि। मंगतू, सेहो बिनु किछु बूझने बदहवास चिकरैत भाग' लागैत अछि.. 'भाग रौ, बम.. भाग, जान बचेबाक छौ त' भाग.. भाग रौ.. ' रसे- रसे अई भगदडि. मे सभटा पात्र सम्मिलित भ' जाइत छथि.. सभ चिकरि. रहल छथि.. 'भागू, जान बचाऊ.. भाग रौ.. भाग.. ' रसे- रसे स्वर शांत होइत अछि.. सभटा चरित्र एक-दोसराक हाथ पकड़ने मंचक एकदम अग्रभाग मे ठाढ़ भ' जाइत छथि। समवेत स्वर मे सभ बाजैत छथि।) समवेत स्वर : हुअए खाहे युद्घक विभीषिका वा खूनक बाजार गर्म मुदा नञि थाक' बला, हार' बला हम! ओ परम पिता, ओ काल.. अहीं सं', हँ, अहीं स' अछि टक्कर हमर.. हम खसब, लड़ब, मरब, मुदा फेर ठाढ़ भ' उठब साठि हजार सगर-पुत्रक भाँति ई संसार खल अछि, कामी अछि, दुष्ट अछि, पिशाच अछि, मुदा तइयो छै अई मे जीवनक आभा जे अछि सत्यो स' बढ़ि क' सत्य.. शिवो स' बढ़ि क' शिव अमरो स' अमर सुंदरतो स' सुंदर.. जीवन, नञि अछि एतेक सस्त जे बिछलि जाए मुट्ठी मे बंद बालु जकाँ हम जीयब, आ पारब रेघ कालोक सम्मुख ललकारब मौत के बढ़ब विजय पथ पर रचब नित नवीन अभियान नित नवीन विहान नित नवीन वितान (अंतिम पंक्ति बाजैत-बाजैत सभ किओ आधा-आधा हिस्सा मे बॅंटिक' मंचक दुनू ओर ठाढ़ भ' जाइत छथि। प्रकाश मंगतू पर.. ओ अपन पहिल स्थिति मे अछि.. आ निन्न मे बड़बड़ क' रहल अछि.. 'भाग रौ, बम.. भाग, जान बचेबाक छौ त' भाग.. भाग रौ.. ' । ओ नींने मे एम्हर स' ओम्हर भागबाक प्रयास क' रहल अछि। सभ पात्र वृत्ताकार मे ओकरा घेर लेइत अछि। फेर सभ एक दोसराक हाथ पकड़ि पाछू दिस झुकैत अछि, जाहि स' एकटा मानव-पुष्पक निर्माण होबैत अछि.. सभ कविताक अंतिम चार पंक्ति बाजि रहल छथि.. 'बढ़ब विजय- पथ पर, रचब नित नवीन अभियान.. ' बाजैत-बाजैत सभटा पात्र फ्रीज भ' जाइत छथि। परदा खसैत अछि। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

33 3 3 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे। कृति- मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८ मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६. अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८. लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७। सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८। पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२ बीसम शताब्दी मैथिली साहित्यक स्वर्णिम युग -प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह अतीत आऽ भविष्यक संग सम्बन्ध स्थापित कऽ कए साहित्य अपन अस्तित्वक सत्यताक उद्घोषणा करैछ। विश्व-मानव अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक साहित्यक गवाक्षसँ अतीतक गिरिगह्वरक गुफामे प्रवाहित जीवन-धाराक अवलोकन करैछ आऽ अपन गम्भीरतम उद्देश्यक विविध प्रकारक साधन भूल आऽ संशोधन द्वारा प्राप्त करैत अपन भावी जीवनकेँ सिंचित होइत देखबाक उत्कट अभिलाषा रखैछ। अतीतक प्रेरणा आऽ भविष्यक चेतना नहि तँ साहित्य नहि। अतीत, वर्तमान आऽ भविष्यक कड़ीक अनन्त शृंखलाक रूपमे भावक सृष्टि होइत चल जाइछ आऽ मानव अपन प्रगतिक नियमादि, सिद्धान्तादिकेँ अपन वास्तविक सत्ताक विकासक मंगल कंगन पहिरि कए अपन दुनू हाथसँ आवृत्त कयने रहैछ। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर (१८६१-१९४१)क कथन छनि जे विश्व-मानवक विराट जीवन साहित्य द्वारा आत्मप्रकाश करैछ। एहन साहित्यक आकलनक तात्पर्य काव्यकार एवं गद्यकारक जीवनी, भाषा तथा पाठ सम्बन्धी अध्ययन तथा साहित्यक विविध विधादिक अध्ययन करब मात्र नहि, प्रत्युत ओकर सम्बन्ध संस्कृतिक इतिहाससँ अछि, मानव-मनसँ, सभ्यताक इतिहासमे साहित्य द्वारा सुरक्षित मनसँ अछि। उन्नैसम शताब्दीमे भारतवर्षमे नवजागरणक प्रबल ज्वार उठल। तकर कोनो प्रभाव मिथिलांचलपर नहि पड़ल, कारण मिथिलावासी प्राचीन परम्पराक पृष्ठपोषक रहलाक कारणेँ संस्कृत शिक्षामे लागल रहलाह आऽ अंग्रेजी शिक्षा तथा पाश्चात्य विचारधाराक महत्वकेँ नहि स्वीकारलनि। नवजागरणक फलस्वरूप षष्ठ दशकमे भारतीय परतन्त्रताक बेड़ीसँ मुक्त होएबाक निमित्त सन् १८३७ ई. मे सिपाही विद्रोह कएलक। मिथिलाक नव शासक मैथिलीकेँ कोनो स्थान नहि देलनि। एहि दशकक अन्तिम बेलामे मिथिलाक प्रशासन “कोर्ट ऑफ वार्ड्स”क अधीन चल गेल जकरप्रभाव मिथिलापर पड़लैक। जे एहिठामक निवासीकेँ प्रथमे-प्रथम पश्चिमक स्पर्शानुभूति भेलनि। किन्तु दुर्भाग्य भेलैक जे “कोर्ट ऑफ वार्ड्स” द्वारा मिथिलाक भाषा मैथिली आऽ ओकर लिपिकेँ बहिष्कृत कऽ कए ओकरा स्थानापन्न कयलक उर्दु आऽ फारसी तथा देवनागरी। मिथिलेश महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह (१८५८-१९९८)क गद्देनशीन भेलापर उन्नैसम शताब्दीक अष्टदशकोत्तर कालमे मिथिलावासीक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक जीवनमे नव चेतनाक संचार भेलैक। हुनक चुम्बकीय व्यक्त्तित्व, कृपापूर्ण व्यवहार, विद्या-व्यसन आऽ असीम देशभक्ति एवं दानशीलताक फलस्वरूप विद्वान साहित्य सर्जककेँ आकृष्ट कएलक। हुनक उत्तराधिकारी मिथिलेश महाराज रमेश्वर सिंह (१८९८-१९२९) सेहो उक्त परम्पराकेँ कायम रखलनि। उन्नैसम शताब्दीक अष्टदशकोत्तर कालमे भारतीयमे अभूतपूर्व जनजागरण भेलैक, जकर फलस्वरूप स्वतन्त्रता संग्रामक नव स्फुलिंग जागृत भेल आऽ ओऽ सभ स्वतन्त्रताक निमित्त अत्यधिक सचेष्टताक संग सन्नद्ध भेलाह, जकर प्रभाव साहित्य सृजनिहारपर पड़लनि। यद्यपि शताब्दीक अन्तिम वर्ष धरि धार्मिक आऽ सांस्कृतिक चिन्तनपर रुढ़िवादिताक पुनः प्रकोपक विस्तृत छायासँ बौद्धिक आऽ साहित्यिक प्रगतिक समक्ष अवसादपूर्ण वातावरणक परिव्याप्त भऽ गेलैक। तथापि मैथिली साहित्य जगतमे उत्कर्ष अनबाक निमित्त अपन परम्परागत परिधानक परित्याग कऽ नव प्रवृत्तिक रचनाकारक प्रादुर्भाव भेल जाहिमे मातृभाषानुरागी आऽ प्रकाशनक सौविध्यसँ साहित्य नव रूप धारण करय लागल जकर नेतृत्व कयलनि कवीश्वर चन्दा झा (१८३०-१९०७), कविवर जीवन झा (१८४८-१९१२), पण्डित लालदास(१८५६-१९२१), परमेश्वर झा (१८५६-१९२४), तुलापति सिंह (१८५९-१९१४), साहित्य रत्नाकर मुन्शी रघुनन्दन दास (१८६८-१९४५), मुकुन्द जा बक्शी (१८६०-१९३८), जीवछ मिश्र (१८६४-१९२३), चेतनाथ झा (१८६६-१९२१), खुद्दी झा (१८६६-१९२७), मुरलीधर झा (१८६८-१९२९), जनार्दन झा “जनसीदन”, सर गंगानाथ झा (१८७२-१९४१), दीनबन्धु झा (१८७३-१९५५), रामचन्द्र मिश्र (१८७३-१९३८), बबुआजी मिश्र (१८७८-१९५९), गुणवन्तलालदास (१८८०-१९४३), कुशेश्वर कुमर (१८८१-१९४३), विद्यानन्द ठाकुर (१८९०-१९५०), कविशेखर बद्रीनाथ झा (१८९३-१७४), पुलकितलालदास (१८९३-१९४३), गंगापति सिंह (१८९४-१९६९), उमेश मिश्र (१८९६-१९६७), धनुषधारीलालदास (१८९६-१९६५), भोलालालदास (१८९७-१९७७), अमरनाथ झा (१८९७-१९५५), राजपण्डित बलदेव मिश्र (१८९७-१९६५), कुमार गंगानन्द सिंह (१८९८-१९७०), ब्रजमोहन ठाकुर (१८९९-१९७०) एवं रासबिहारीलालदास आदि-आदि जे विविध साहित्यिक विधादिक जन्म देलनि आऽ एकरा सम्वर्धित करबाक दृढ़ सन्कल्प कयलनि। वस्तुतः विगत शताब्दी मैथिली साहित्यक हेतु एक क्रान्तिकारी युगक रूपमे प्रस्तुत भेल। अंग्रेजी राज्यक स्थापना देशक साहित्यिक, वैज्ञानिक, राजनैतिक, आर्थिक आऽ सामाजिक क्षेत्रमे एक नव स्फूर्ति प्रदान कऽ कए मिथिलांचलक जीवन-शैली आऽ सोचक पुनर्संस्कार कयलक। एहि शताब्दीमे आधुनिक शिक्षा, छापाखाना आऽ सरल यातायातक सुविधाक अभाव रहितहुँ मैथिलीमे साहित्य सृजनक परम्परा वर्तमान रहल। बहुतो दिन धरि मैथिली साहित्य संस्कृत साहित्यक प्रतिछाया सदृश रहल। एहिमे साहित्यिक एवं अन्य प्रकारक लेखन निरन्तर होइत रहल। दुइ विश्व युद्धक बीचक कालमे मैथिली साहित्यक सर्वांगीन समुद्धारक चेतना अनलक। एहि कालक लेखनमे ई नव मनोदशा प्रतिफलित भेल आऽ साहित्यक विभिन्न विधामे उल्लेख्य योग्य परिवर्तन भेल।

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् जितमोहन झा घरक नाम "जितू"  जन्मतिथि ०२/०३/१९८५ भेल, श्री बैद्यनाथ झा आ श्रीमति शांति देवी केँ सभ स छोट (द्वितीय) सुपूत्र। स्व.रामेश्वर झा पितामह आ स्व.शोभाकांत झा मातृमह। गाम-बनगाँव, सहरसा जिला। एखन मुम्बईमे एक लिमिटेड कंपनी मे पद्स्थापित।रुचि : अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली ।पसंद : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि। कन्या भ्रूण हत्या, प्रकृति के साथ खिलवार पिछला छुट्टीमे एक सालपर हम गाम गेल छलहुँ। जहिया गाम पहुँचलहुँ ओकर दोसरे दिन पता चलल की हमर बचपनक दोस्तक बहुत जोर मोन ख़राब छनि ! आर ओ अस्पतालमे भरती छथि ! खबर जहिना हम सुनलहुँ अस्पतालक लेल चलि देलहुँ ! हमरा संग हमर पत्नी सेहो चलि देलीह, अस्पताल पहुंचला पर पता चलल जे कुनू चिंताक बात नै सब ठीक ठाक अछि ! एक घंटाक बाद हुनका (हमर दोस्तकेँ) छुट्टी मिल जेतनि, बहुत दिनक बाद अस्पताल आयल छलहुँ, इच्छा भेल कनी चारू दिस घुमि - फिरि ली। मनमे अस्पतालक लेल बहुत जिज्ञासा छलए ! हम आर हमर पत्नी जहिना दोस्तक वार्डसँ बाहर निकललहुँ, हमर नज़रि अपन चचेरा भैया - भाभी पर पड़ल, अचानक हुनका सभकेँ अस्पतालमे देखिकेँ हम चौक गेलहुँ ! हमर नज़र एकाएक भाभीक उदास, कनमुँह चेहरा पर परल .....पुछलियनि की बात ... मुदा ओ किछु जबाब नञि देलीह। हमर पत्नी कातमे बजा कए हुनकर पीड़ा सुनलन्हि ! दुबारा पुछलासँ भाभी अपन पीड़ा नञि रोकि सकलीह, हुनकर पीड़ा हुनकर आँखिसँ छलकि उठलनि, पता चलल जे दू गोट कन्याक जन्मक बाद आब तेसर बेर फेरसँ कन्याकेँ नञि बर्दाश्त करैक चेतावनी भैया हुनका पहिने द् चुकलकिन-ए ....पता चलल गर्भ परिक्षण लेल भैया भाभीकेँ अस्पताल अनने छथि ! गर्भमे पोसा रहल बच्चाक प्रति पिताक खौफनाक इरादासँ उपजल भयक भाव भाभीक चेहरा पर साफ - साफ देख्अलहुँ ! बादमे हमरा आर हमर पत्नी केँ कतेक बुझेलापर भैया भाभीकेँ वापस घर लए गेलखिन ! संयोगवश अगला संतानक रूपमे हुनका बालकक प्राप्ति भेलनि .... ओना भ्रूण परिक्षण प्रतिबंधित अछि आर सरकार एकरा लेल बाकायदा कानूनो बनेने छथि ! मुदा ई की ? लागैत अछि पिछला दरवाजाक संस्कृति अस्पतालों के नञि छोड़ने अछि, तखने तँ भैया बहुत आसानीसँ भाभीकेँ गर्भ परीक्षण करबाबए लेल चलि देने छलथि। हम तँ कहए छी चाहे सरकार लाखो कानून बनबथि, लाखो कड़ासँ कड़ा सजा तय करथि लेकिन जा तक हम सब स्वयं अपना तरफसँ कुनू कदम नञि उठायब ई कानूनक हेब नञि हएबक समान अछि ! आइ तक भ्रष्ट्राचार, बालश्रम, शोषणक विरुधो सरकार बहुत कानून लागू केलथि मुदा कि समाजमे एकर रोकथाम भs सकल ? नञि ! आर यदि अपने ई नञि हेबाक कारणक पता करब तँ पायब कि शायद हम खुद कतहु ने कतहु कुनू न कुनू प्रकारे एकर दोषी छी ! हम सब परिस्थितिक संग कुनू तरहक समझौता करबाक वजाय ओकरा सदा बदलबाक फेरमे नए रहैत छलहुँ चाहे ओकरा लेल हमरा सभ के कुनू तरहक हथकंडा कियेक नञि अपनाबए परए .... हम सब चुकय नञि छी ! हम तँ पूछे छी जे कि कारण अछि जे लड़कीक जन्म भेला पर आइयो मूह सिकोरल जाइत अछि ? शायद हुनकर परवरिश, शिक्षा, विवाह आदिमे आबै वाला तमाम मुश्किलक कारण एहि तरहक व्यवहार कएल जाइत अछि ! मुदा कि लड़काक जन्म भेनेसँ ई तमाम समस्या समाप्त भs जाइत अछि ? लड़कोकेँ तँ परवरिश करए परए-ए ? हुनकरो शिक्षा,नौकरीक लेल दर-दर भटकए पड़ैत अछि ! आर विवाह ........! यदि एहि गतिसँ कन्या भ्रूण हत्या होइत रहत तँ बूझि लिअ जे सब लड़काकेँ कुंआरे रहए पड़त ! उदाहरण स्वरूप अपने हरियाणामे लड़कीक संख्यामे लगातार दर्ज कएल गेल कमी देख सकैत छी, हरियाणामे विवाह लेल लड़की नञि भेटए छनि। ओहि ठामक लोकनीकेँ दोसर राज्यमे लड़कीक तलाश करए पड़ैत छनि ..... कनी सोचु अगर पूरा देशमे ईएह स्थिति भs जाएत तँ की होएत ? हम नीक जेकाँ जनैत छी जे अपने एहि बातकेँ ध्यानमे नञि राखब आर यदि राखबो करब तँ दोसर केँ उदाहरण देबाक लेल ! लेकिन कि अपने स्वयं कन्या भ्रूण हत्या रोकएमे दोसरकेँ जागरूक करब ? अपनेकेँ नञि लागैत अछि जे प्रकृति द्वारा निर्धारित जीवनकेँ सुचारू रूपसँ चलबै लेल एहि गाड़ीक दुनु पहियाक समान रूपसँ आवश्यक अछि ! आर कन्या भ्रूण हत्या यानी कि प्रकृतिक संग खिलवाड़ अछि ! एहि खिलवाड़केँ रोकए लेल हमरा सभकेँ एकजुट हेबए परत आर एतबे नञि एहि मानसिकतोकेँ बदलए पड़त कि वंशबेल खाली आर खाली लड़के चलेता, तखने हम सही रूपामे आधुनिक कहाएब .... भक्तिगीत- जितमोहन झा मात पिता गुरु प्रभु चरणमे प्रणवत बारम्बार हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। माताजी जे कष्ट उठेलखिन्ह ओऽ ऋण कहियो नञि चुकलऒ, आंगुर पकड़ि कs चलब सिखेल्खिन्ह ममताक देलखिन शीतल छाया, जिनकर कोरामे पलिकए हम कहेलहुँ होशिया॥ हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। पिताजी हमरा योग्य बनेलथि कमा-कमा कऽ अन्न खुएलथि, पढा लिखा गुणवान बनेलथि, जीवन पथ पर चलब सिखेलथि, जोड़ि-जोड़ि अपन सम्पति केँ बनाऽ देलथि हक़दा। हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। सत्य ज्ञान गुरूजी बतेलथि, अंधकार सभ दूर हटेलथि, ह्रदयमे भक्तिक दीप जरेलथि,हरी दर्शनक मार्ग बतेलथि, बिना स्वार्थ्क कृपा केला ओऽ कतेक पैघ उदार। हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। प्रभु कृपासँ नर तन पेलहुँ संत मिलनक साज सजेलहुँ, बल बुद्धि आर विद्या दऽ कs सभ जीवमे श्रेष्ठ बनेलहुँ, जे कियो हिनकर शरणमे एल्खिन,भेलन्हि हुनकर उद्धार। हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार।

66 6 6 ज्योति प्रकाश लाल, ग्राम-जगतपुर, सुपौल, बिहार (भारत)। ज्योतिप्रकाश लाल विप्रो टेक्नोलोजी, हैदराबादमे सॉफ्टवेअर अभियन्ता छथि, स्पेन आऽ यू.एस.ए.मे पहिने काज कए चुकल छथि। एप्लिकेशन आऽ वेब आधारित सॉफ्टवेअरक निर्माणमे संलग्न। माइक्रोसॉफ्ट कॉरपोरेशन, वाशिंगटनमे विन्डोज ऑपेरेटिंग सिस्टमपर शोध आऽ विकासमे योगदान। स्कूल, कम्प्य़ुटर इंस्टीट्यूट आऽ सरकारी पोलीटेकनिकमे शिक्षणक पूर्व अनुभव। वर्तमानमे साक्षातकार आऽ व्यक्तित्व विकासपर पोथी लिखबामे व्यस्त। श्री लालमे संगठनात्मक शक्ति छन्हि आऽ ओऽ विभिन्न ग्रुप आऽ फोरमसँ जुड़ल छथि। किछु आर अनुभवी सहयोगीक संग ओऽ www.jyoticonsultant.com द्वारा मुफ्त कैरिअर सुझाव दए रहल छथि। आजुक समय मे कम्प्युटर शिक्षाक महत्व (Importance of Computer Education in Modern Days) कम्प्युटर: कि आ किएक? आजुक दिन मड कम्प्युटर शब्द किनको सँ बाँचल नहि अछि। ओना तँ हिन्दी वा मैथिली मँ कम्प्युटरक नामि अछि “संगणक” मुदा ऍहि नामि सँ बहुतो लोकनि अनभिञ होयब आओर ई शब्द किछ अनगराईल बुझायल जायति। खैर…. अपन मातृभाषा मैथिली मे एहेन ढेर अंग्रेजी शब्दक प्रयोग करैत छी जे विशुद्ध मैथिली मे विचित्र बुझाएल जायति छैक। आइ केँ दिन मे सभ केँ ‘कम्प्युटर साक्षर‘ (Computer Literate) होवाक चाही। ‘कम्प्युटर साक्षरता‘ (Computer Literacy)  सँ मतलब जेँ कोनो भी आदमी ‘कम्प्युटर अनुप्रयोग‘ (Computer Applications) कँ प्रयोग मे लाबि सकैथि। दोसर तरहेँ यदि इ बात केँ कही तँ एकटा ऐहेन आदमी जेँ कम्प्युटर कँ प्रयोग कड केँ कोनो काम कड सकैथि। कम्प्युटर सँ लगभग सभ काम भड सकैति अछि। जाहि कारणे वर्तमान समय मे कम्प्युटर एकटा महत्वपुर्ण अंग बैनि गेइल छैक। आजुक छोट – मोट व्यापारीयो एकटा कम्प्युटर खरीदबाक आ कम्प्युटर ऑपरेटर रखवाक हिम्मत करैत छैथि। एकर लोकप्रियता आ माँगक पाँछा ढेर कारण अछि। उदाहरणक तौर पर देखि तड: जेना कोनो दरख्वास्त वा चिठ्ठी कोनो ओफिस मे देबाक जरुरत होयत अछि तड दरख्वास्त कँ टाइपराइटर (Typewriter) पर टाइप करा कँ देति छी, मुदा इ टाइप करायल दरख्वास्त मे बहुतो कमी आ अपुर्णताक संभावना रहैति छैक, जेना Spelling Mistakes के संभावना, पाराग्राफक Alignment मे समस्या, पृष्टक Margins मे समस्या, इत्यादि। इ सभटा समस्याक समाधान अपने कम्प्युटर सँ  बिना बहुत कठिनाई सँ कँ सकैति छी। कम्प्युटर मे Spelling Checking केँ सुबिधा अछि जेँ अपने – आप बता दैति जेँ कोन – कोन शब्द्क हिज्जै (Spelling) गलत अछि। एकर अलावा कम्प्युटर Grammatical Errors सेहो पकैर सकैति अछि। इ सब सुविधा (Facilities) सँ लिखल दरख्वास्त वा चिठ्ठी मे कोनो Spelling Mistakes आ Grammatical Errors केँ संवाभना कम अछि। पाराग्राफक Alignment आ Margins केँ तरीका बहुत ही सुविधाजनक अछि। एकर अलावे एकटा दरख्वास्त वा चिठ्ठी लिखवाक आ ओकर छायाप्रति (Printouts) निकलवाक तक जेँ – जेँ सुविधा (Facilities) होवाक चाहि वो सभटा कम्प्युटरक सोफ़्ट्वेयर पैकेज (Software Package) मे छैक। वर्तमान समय मे कम्प्युटर बहुत आँगा बढि गेल अछि। Banking Sector मे जहिना धुम – धडाका सँ प्रयोग मे अछि तहिना Medical केँ क्षैत्र मे। जहिना रेलक सवारी केँ आरक्षण मेँ कम्प्युटरक Whistle बाजि रहल अछि तहिना हवाई जहाज केँ सेहो उड़ा रहल अछि। मोटा – मोटी यदि एक लाईन मे कही तँ नवयुग मे कम्प्युटर ओहिना सब क्षैत्र मे जरुरी अछि जहिना तरकारी मे नोन। वर्तमान समय मे कम्प्युटरक आवश्यकता केँ आधार पर इ कहल जा सकैति अछि जेँ यदि अहाँ कम्प्युटर नहि जानैत छी तँ अहाँ निरकक्षर छी। अंग्रेजी मे सेहो मुहावरा (Proverb) बनि गेल अछि – “If you are not a computer literate it means you are illiterate.” आइ केर समय मे जिनका पास Internet केँ सुविधा उपलव्ध अछि तँ हुनका लेल बहुतो चीज बदैलि गेल छैकि। यदि आइ केँ समय सँ दस – बारह साल पाँछा केँ समय मे जाई आ पत्राचारक माध्यम केँ बारे मे सोची तँ पहिले स्मृति-पट्ल पर थोक मे पोस्टकार्ड, अन्तरदेशी आ लिफाफाक खरीदवाक बात आबि जायति। एकर पाँछा एकटा कारण अछि जेँ ओहि समय मे पत्राचारक माध्यम लेल पोस्ट – ऒफिश केँ प्रखर भुमिका छलि। आओर सबहक लेल डाकक माध्यमे सुगम आ सरल छलि। पत्र कें अलावे गाम – गाम मे मनीओडर पहुँचेबाक मे सेहो डाक अग्रणी छळि। एवम प्रकारे डाक पत्राचारक आ मनीओडर वास्ते एक मात्र साधन बुझला जायति छलि। मुदा नहुँए – नहुँए समय आ दुनिया मे परिवर्तनक लीला जारी रहैत अछि। ई पत्राचारक परिवर्तनक लीला मे कुरियर (Courier) आ ई-मेल (E – mail / Electronic - Mail) आयलि आ धुम – धड़ाका सँ पत्राचारक माध्यम पर कब्जा कँ लेलक। आजुक दिन मे जिनका कुरियर वा ई – मेलक सुविधा अछि वो सब पोस्ट – ऒफिश केर रास्ता – पेरा बिसरि गेल छैथि। सब लोकनि जेँ प्रत्येक दिन डाकिया केर इंतजार मे दरवाजा पर एकटक लगा केँ बैठल रहैति छलाह वो सब आई डाकिया केँ चिन्हेतो नहि छैथि। कारण बहुतो पत्राचार ई – मेल सँ ही सम्भव भड जायति अछि, खास कड केँ शहरी परिवेश मे। किएक?? आ ई – मेल केँ प्रखर जगह बनेवाक कारण की? एकर कारण तँ बहुत अछि आ ताहि मे सब सँ पैघ कारण अछि जेँ ई – मेल बहुत ही सस्ता आ तेज अछि। सस्ता सँ मतलब अछि जेँ यदि हम एकटा दस पन्ना केँ पत्र कतोँ डाक सँ भेजब तँ जेँ भेजबा मे पाय लागत वो पाय ई – मेल भेजबा मे लागल पाय सँ बहुत ही ज्यादा होयत। आओर तेज सँ मतलब जेँ डाक सँ भेजल पत्र यदि गन्तव्य स्थान पर चारि दिन मे पहुँचत तँ ई – मेल कयलि पत्र दुइ मिनट मे गन्तव्य स्थान पर पहुँचि जायति। एकर अलावा डाक सँ भेजल पत्र कँ गन्तव्य स्थान सँ ही पावि सकैति छी मुदा ई – मेल केँ कोनो स्थान पर पावि सकैत छी। मतलब डाक सँ भेजल पत्र यदि कोलकत्ताक केँ अछि तँ वो पत्र कोलकत्ता मे ही प्राप्त भड सकैत अछि, मुदा ई – मेल मे वो बात नहि अछि; ई – मेल कँ विश्व केँ कोनो जगह मे पावि सकैत छी। आइ यदि कोनो शहर मे नौकरी खोजवा लेल जाइ तँ साक्षात्कार (Interview) लेबे बलाक पहिल प्रश्न यैहि होयत जेँ “कम्प्युटर केँ जानकारी अछि? ” वा “Do you know computers?”.  आइ छोट – मोट अस्पतालो मे बिल वा रसीद कम्प्युटर सँ निकालल जायति अछि। यैहि काम पहिल समय मे बिना कम्प्युटर सँ होयति छलि। यदि विकसित शहर केँ किराना दुकान कँ देखि तँ वो दुकान सँ भी कोनो समान खरीदवाक वाद कम्प्युटर सँ ही निकलल रसीद भेटत। दैखि तँ कम्प्युटर पुरा दुनिया मे छा रहल अछि चाहे वो दवाई केँ दुकान मे हो वा बैक मे। कम्प्युटर प्रयोग करवा सँ मुख्य लाभ: (अ)  समयक बचत (Saving of Time): कम्प्युटर प्रयोग करवा सँ समयक बहुत बचत होयति अछि। जेँ कोनो हिसाब – किताब करवा मे ७ – ८ घंटा लगैति अछि, ओहि काम कड कम्प्युटर ७ – ८ मिनट मे कड सकैति अछि। (ब) एकदम सही परिणाम (Accuracy in Results):कम्प्युटर कोनो भी हिसाब – किताबक परिणाम सही दैति अछि। कोनो तरह केँ हिसाब मे गलती नहि करैत अछि। (स) दुबारा काम करवाक जरुरत नहि (Elimination of Repeatitive Tasks): कोनो काम एक बेर जँ कम्प्युटर सँ भड गेल अछि तँ ओहि काम केँ Save कड केँ रखवाक बाद दुबारा ओहि काम केँ बिना करनाय परिणाम पावि सकैति छी। (द) आदमी केँ मेहनतक बचत (Saving of Man Powers): यदि एक आदमी सँ कम्प्युटर प्रयोगक उपरांत आठ घंटा मे सँ छः घंटाक बचि जायति अछि तँ वो छः घंटाक उपयोग कोनो दोसर काम मे भड सकैति अछि जाहि सँ उत्पादन (Production) बढ़ि सकैति अछि। (म) थकावटक संभावना नहि (Lack of Tiredness or Always attentive): आदमी लगातार ४ – ५ घंटा काम करत तँ छःटम घंटा मे काम करवाक रफ्तार आ फुर्ती कम भड जायति अछि। मतलब आदमी मे थकान महसुस करवाक अवगुण वा गुण अछि मुदा कम्प्युटर एक मशीन रुप मे थकान अनुभव नहि कड सकैति अछि। कम्प्युटर आठ घंटा लगातार काम करक उपरांतो नंवम घंटा मे काम ओहिने रफ्तार आ फुर्ती सँ करैत अछि जाहि रफ्तार आ फुर्ती सँ वो पहिल घंटा मे करल छलि। कना पाबि कम्प्युटरक शिक्षा: सब नौकरी करैय बला दुइ तरहेँ कम्प्युटरक शिक्षा पावैति अछि। पहिल, रोजगार करैय बला केँ अपन कम्पनी सँ खुद कोनो – कोनो कम्प्युटर साक्षरता योजना केँ अन्तरगर्त्त शिक्षा वा ट्रेनिंग (Training) मिल जायति अछि। दोसर, नौकरी खोजनिहार केँ नौकरी ढुढ़वा सँ पहिले कोनो डिपलोमा (Diploma) केँ कोर्स (Course) करै परैति छैक। कम्प्युटर शिक्षा (Computer Education) आजुक दिनक जरुरत बनि गेइल छैक। जिनका – जिनका नौकरी लेवाक अछि हुनका सभकेँ प्रारंभिक जानकारी (Fundamental Knowledge of Basic Computer Operation) चाहवे करी। कम्प्युटर शिक्षित (Computer Literate) होवाक लेल अनेको साघन अछि, जेना: (अ)         Short - term Computer Course or Diploma: आजुक दिन शहर – शहर मे अनेको कम्प्युटर सँस्थान खुजलि अछि। जाहि सँ तीन, छः वा बारह महीना केँ कोर्स (Course) कड सकैति छी। कुछ कोचिंग सँस्थान (Coaching Institute) वगैरह सेहो खुजलि अछि जाहि जगह सँ जरुरतक क्रैश कोर्स (Crash Course) सेहो कड सकैति छी। (ब) कोनो कम्प्युटर कोच (Computer Coach) सँ: अगर सुविधा भड सकै तँ कोनो कम्प्युटर जानिहार कड पकैर सकैति छी। जेना घर मे केओ भाई, कोनो चाची वा कोनो दोस्त, तँ हुनका सँ सेहो कम्प्युटर सीख सकैति छी। Privite Jobs मे तत्कालिक रुप सँ कोनो सर्टिफिकेटक (Certificate) केँ जरुरत नहि होयत। बाद मे मँगला पर कम्प्युटर कोर्स कड केँ सर्टिफिकेट द्ड देबैकि। (स) किताबक मदद सँ: अगर घर मे कम्प्युटर अछि तँ, जे विषय वा सोफ्ट्वेयर पैकेज (Software Package) सिखवाक अछि, वो किताव बाजार सँ खरीद केँ कम्प्युटर सीख सकैति छी। (द) CD - Rom केँ सहायता सँ: बाजार मे बहुतो CD – ROM (Compact Disk – Read Only Memory) वा CD बहुतो कम्प्युटरक Basic Courses वा Operations केँ लेल मिलैत अछि। जाहि सँ लगभग सभटा Basic Computer Operations सीखल जा सकैति अछि। गाँव – देहहात मे कम्प्युटरक उपयोग आजुक समय मे ओरगेनिक खेती (Organic Farming) केँ बहुत बोल – बाला अछि। आओर ढ़ेर Software Packages कृषि केँ लेल Applied Computer Science केँ आधार पर उपल्ब्ध अछि जाहि सँ धान, गेहुँ इत्यादि फसल सभ केँ उत्पादन मे नया रुप देल जा सकैत अछि। साथे – साथ Pest Control, Weed Control, Plant diseases इत्यादि के सेहो पह्चानि सकै छी। इ सभक वास्ते Multi - Media (जेँही सँ फोटो देखल जा सकैति अछि आ सँगे – सँग आवाजो सुनल जा सकैत अछि)  आधारित Software Package (Software Application) बनल अछि आओर सुबिधापुर्वक देखल आ सुनल जा सकैति अछि। एकर अलावा इ Software केँ मदद सँ भिन्न प्रकारक कृषि – संबंधी Decision - Making सेहो भड सकैति अछि। यदि कम्प्युटर शिक्षित छी तँ आइ केँ दिन मे बैंकिग ए.टी. एम (ATM), जेँ छोट – छोट शहर आ बाजार मे उपलब्ध अछि, कँ ओपेरेट करवा मे आसानी होयत। पैसा निकाल – बाहर करैय मे कोनो दिक्कत नहि होयति। एकर अलावे लगभग सभ बैंक मे Internet Banking केँ सुबिधा उपलब्ध अछि। इ सुबिधाक उपयोग वो व्यक्ति कँ सकैति छैथि जिनका Computer Operation बुझल होय। आइ केँ समय मे ए.टी. एम (ATM) आकारक रेलवे आरक्षण मशीन लगभग प्रत्येक रेलवे स्टेशन पर मिल जायति। आ ओकर Operation कम्प्युटर जँका होयति छैक। कम्पुटर सिखला उपराँत आरक्षण करवा मे सुविधा होयति। इ एकटा कम्पुटर सीखल व्यक्ति कँ Indirect फायदा होयत। आजुक दिन मे गाँव – देहहात मे Teachers Training मे काफी दिक्कत आ Staff केँ कमी होयति अछि। यदि कम्पुटर सँ Training देल जाय तँ Training ज्यादा प्रभावी आ सफल होयति। कम्पुटर सँ Video - Conferencing भ सकैति अछि। Video - Conferencing सभ क्षैत्र मे बढ़िया भुमिका निभायत, चाहे Pest Control वा Teachers Training होय। कम्पुटर शिक्षित व्यक्ति यदि कोनो बाहरक यात्रा (Tour and Travels) करवा लेल सोचेत छैथि तँ हुनका इन्टरनेट सँ सभटा Tourism Department केँ जानकारी प्राप्त भ सकैति अछि। वो Online Hotel Booking, Ticket Booking इत्यादि कँ सकैति छैथि। गाँव मे कियो Printing Press स्थापित करवा लेल सक्रिय छैथि तँ हुनक बढ़िया Publishing केँ लेल कम्पुटर आ Publishing Software के व्यवस्था करैक चाही। गृहणी / अवकाश – प्राप्त व्यक्ति के लेल कम्प्युटर शिक्षा हम एक बेर गाम पर एकटा एम. ए. (M. A.)  पास भौजी, जेँ पटना मे रहैति छथिन्ह, सँ पुछ्लहु, ’ये भौजी, ये भौजी, अहाँ पटना मे रहैत छी, खाली समय मे जखन बच्चा सब स्कूल मे रहैत अछि, कम्पुटर किएक नहि सीख लैत छी, आगु काम दैति’। जबाब मे भौजी बाजलिह, ’धोड़ि जाउ, हम की करब कम्पुटर – फम्प्युटर सीख कैय’। मुदा आइ छोट – छोट शहरक नजरिया बदलि गेल छैकि। छोट – छोट शहर मे कौल – सेन्टर (Call - Centre), डाटा – ईन्ट्री (Data - Entry) इत्यादि खुजि गेल छैक आ ओकर काम मिलैत छैक। कौल – सेन्टर मे अँग्रेजी के अलावा हिन्दी मे सेहो Customer Handling होयत छैक। डाटा – ईन्ट्री जेँ एकटा पढ़्ल – लिखल औरत भि अपन ४ – ५ घंटा समय द्ड कड पुरा कड सकैति छैथि। इ काम एकटा अवकाश – प्राप्त व्यक्ति भि कड सकैति छैथि। छोट – मोट जगह पर DTP, Accounting Package वा Graphics Designing जानकार आदमी केँ जरुरत होयति छैक आ इ कोर्स करवा मे कोनो ज्यादा समय नहि लागैति छैक। ३ – ६ महिना मे कियो आदमी इक बढ़िया Trainer केँ Guidance मे Expert भड सकैति छैथि। कोन कम्प्युटर खरीदी? Branded वा Assembled Computer? पहिल चीज जेँ अहाँक जरुरत आ बजट केहेन अछि? Branded कम्प्युटर मे fixed type केँ Machinery रहैति छैक आ Assembled मे अपन जरुरतक मुताबिक Machinery लगवा सकैति छी। तुल्नात्मक ढ़ंग सँ देखि तँ Assembled कम्प्युटर सस्ता परत। मुदा जखन कम्प्युटर Assemble कराबी तँ जान-पह्चान बला दुकान वा आदमी सँ करायब तँ बढ़िया रहत। कोन Type केँ कम्प्युटर खरीदी? Laptop वा Desktop कम्प्युटर खरीदी? Laptop ऐहेन कम्प्युटर अछि जकरा अहाँ कतों आराम सँ Move कड सकैति छी, सुतैत – बैठेति काम कड सकैति छी। मोटा – मोटी कही तँ Laptop वो व्यक्ति कड बढ़िया सँ Suit करैति छैक जेँ व्यक्ति कड सदिखन Mobile रहै पड़ेति छैक। विद्दार्थी लोकनि लड Desktop Computer हि बढ़िया होयति छैक। कुर्सी पर बैठ कड केँ काम करवा मे आलस आ सुस्ती ऐवाक संभावना कम रहैति छैक। विद्दार्थी लोकनि केँ आलस कम होयतैन तड पढ़वा मे ज्यादा मन लागतैन। केहेन Configuration केँ कम्प्युटर खरीदी? जखन कम्प्युटर खरीदवाक हुए तँ इ बात ध्यान मे राखल जाय जेँ कम्प्युटर लेबे केँ कि उद्देश्य अछि? आ कम्प्युटर सँ कि काम करवाक अछि? कोनो सामान्य Data Entry आ Composing केँ वास्ते Hi - Fi कम्प्युटर केँ जरुरत नहि अछि। हाँ, जेँ केयो D.T.P. (Desk Top Publishing) वा Publisher केँ कामक लेल कम्प्युटर खरीदवाक इच्छुक छैथि तँ हुनका लेल उत्तम कम्प्युटर होवाक चाहि। ओना एकटा बात इलेक्ट्रोनिक सामान (Electronic Goods) मे सदिखन ध्यान मे राखि जेँ आइ जेँ समान केयो खरीद कड रहल छैथि, छः मासक उपरांत ओहि समान सँ उत्कृष्ट समान आ सस्ता सेहो बाजार मे उपलब्ध भड जायति। ताहि कारणे कम्प्युटर जखन खरीदी तँ Advanced  वा Latest Configuration केँ साथ खरीदी। जाहि कारणे भविष्य मे २ - ३ सालक उपरांत Compatibility बनल रहत। कम्प्युटर खरीदवा मे मुख्यतः CPU आ ओकर Speed, RAM केँ क्षमता (Capacity), Hard Disk केँ Storage Capacity आ Monitor केँ ध्यान मे राखवाक प्रयास होयवाक चाहि। Hardware Recommendation for a new computer(एकटा सलाह) CPU:2.0/ 2.6 GHz Pentium IV RAM: 512 MB/ 1 GB Warranty: सब Hardware पर १ – ५ सालक वारंटी मिलत, इ लेल दुकानदार सँ खुलाशा कड केँ बात कड लेबा सँ बढ़िया रहत। सँगे – सँगे कम्प्युटर पर जेँ भि Software Package वा Operating System चाहैत छी वोहि लेल सेहो दुकानदार के पहिले बता देला सँ ठीक रह्त। कम्प्युटर बना रहल अछि आदमी केँ जीवन सरल: पहिले हि ढ़ेर गप – शप कम्प्युटर केँ उपयोगिता आ लाभ पर भड चुकल अछि, जाहि मे देखल गेल जेँ कम्प्युटरक सहयोग सँ शीघ्रता, सही आ संगठित रुपेन काम सम्भव अछि। मुदा किछ बात और अछि जेँ सभ व्यक्ति केँ लेल उपयोगी अछि। जेना ई-मेल एकटा ऐहेन बढ़िया सुविधा अछि जकरा सँग सुबह, दुपहरिया, साँझ वा राति, सदिखन उपयोग मे ला सकैति छी। विद्दार्थी लोकनि खातिर बढ़िया – बढ़िया पुस्तक CD केँ रुप मे उपलब्ध अछि जाहि सँ सभ विषयक तैयारी आ Exercise इक सही (Systematic) रुपेन सम्भव अछि। बहुतो संख्या मे इन्टरनेट पर Online Books आ Exercise सेहो उपलब्ध अछि। जाहि सँ विद्दार्थी लोकनि केँ पढ़ाई – लिखाई सुगम भड सकैति अछि। अखबार घर पर मँगावी वा नहि मँगावी, सँगे – सँगे घर पर अखबार पढ़वाक मौका लागे वा नहि लागे, मुदा इन्टरनेट केँ द्वारा सभटा अखबार, चाहे हिन्दी मे हो वा अंग्रेजी मे, पढ़ि सकैति छी। मतलब अनेको अखबार आ E-Journels इक कम्प्युटरक माउस (Mouse) केँ Click सँ पाबि सकैति छी। एकर अलावे सभटा टी.वीक (TeleVision) News Channels केँ Website सेहो उपलब्ध अछि, वो Website सँ Audio आ Video दुनु तरहक समाचारक आनंद लड सकैति छी। ऐतवे नहि Online Channels सेहो उपलब्ध अछि, जे ठीक TV केँ प्रतिरुप अछि। बाजार मे TV Tunner Card सेहो उपलब्ध छैक। इ Card कम्प्युटर मे लगा कड TV केँ आनंद कम्प्युटर सँ हि भेट सकैति अछि। मनोरंजन केँ बहुतो साधन मे कम्प्युटर सँ FM Radio वगैरह सेहो सुनल जा सकैति छैक। आइ – कालि बहुतो Online Games आ Games CD बाजार मे उपलब्ध छैक जाहि सँ बच्चा लोकनि सहित सभ समुह केँ व्यक्ति बढ़िया मनोरंजन कड सकैति छैथि। एकर अलावा अनेका – नेक सुविधा अछि जाहि केँ विवरण इ Article केँ Coverage सँ बाहरि अछि। आशा अछि अपनेक लोकनि कड इ लेख उपयोगी होयति। एकर अतिरिक्त हम इक मैथिल होवाक नाते अहाँ केँ कोन तरहेँ, कोनो सहायता वा दिशा – निर्देश कम्प्युटरक क्षैत्र मे कड सकैति छी? हमर शोभाग्य होयति अपनेक कोनो सहायता करवा मे। जिनको कोनो जानकारी लेवाक हुए तँ हमर E-Mail (JYOTIPRAKASH.LAL@GMAIL.COM) पर संपर्क कड सकैति छी। हमर नि:स्वार्थ इच्छा अछि जेँ मिथिलाक घरे – घरे कम्प्युटर जानिहार हुए। आशा अछि जल्द हि अपनेक लोकनिक समच्छ हमर लिखल एकटा किताब, जकर नामि अछि “HOW TO GET A JOB”, प्रस्तुत होयति आ जाहि सँ सब लोकनि (रोजगार वा वेरोजगार) केँ इक बढ़िया नौकरी (Job) पाबि मे मार्गदर्शन करत। अंत मे कहल जा सकैति अछि जेँ कम्प्युटर केवल उपयोगी नहि अछि साथे – साथे नौकरी पावैक लेल एकटा साधनो बनि गेल अछि। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

55 5 5 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् सुशांत झा,ग्राम+पत्रालय-खोजपुर, मधुबनी(बिहार),हिनकर पिता श्री पद्मनारायण झा 'विरंचि' ताहि समयक मिथिला मिहिर आऽ आर्यावर्तक प्रसिद्ध स्थाई स्तंभकार। पठन-लेखन विरासतमे भेटल छन्हि सुशान्तजीकेँ। सम्प्रति सुशांत जी इंडिया न्यूजमे कॉपी राईटर छथि,-मिथिला विश्वविद्यालयसँ स्नातक(इतिहास), तकर बाद आईआईएमसी(भारतीय जनसंचार संस्थान) जेएनयू कैम्पससँ टेलिविजन पत्रकारितामे डिप्लोमा(2004-05) ओकरबाद किछु पत्र-पत्रिका आऽ न्यूज वेबसाईटमे काज,दूरदर्शनमे लगभग साल भरि काज। संप्रति इंडिया न्यूजसँ जुड़ल| की बलिराज गढ़ मिथिलाक प्राचीन राजधानी अछि? हमर गाम खोजपुरसँ करीब एक किलोमीटर दक्षिण दिस बलिराजपुर नामक एकटा गाम छैक। ई गाम मुधुबनी जिला मुख्यालयसँ करीब 34 किलोमीटर उत्तर-पूब दिसामे छैक। एतय एक टा प्राचीन किला छैक जे 365 बिगहामे पसरल छैक आऽ एकर देखभाल भारत सरकारक पुरातत्व विभाग कऽ रहल अछि। किलाक खुदाई भेलापर एहिमे सँ मृदभांड आऽ विभिन्न तरहक बस्तु निकललए आऽ सोनाक सिक्का सेहो भेटलैक। किलाक बाहर जे बोर्ड लागल छैक ताहि के मुताबिक ई किला मौर्यकालीन हुअक चाही। किला के कात करोटमे जे गाम छैक ओहिमे भांति-भांतिक किंवदन्ति पसरल छैक, किलाक विषयमे। जतेक लोक, ततेक तरहक बात। किछु लोकक कथन छन्हि जे ई किला राक्षस राज बलिक राजधानी छलै -आऽ किछु गोटा तँ राजा बलिकेँ देखबाक सेहो दावा केलन्हि अछि। साँझ भेलाक बाद लोक सभ किला दिस जाइसँ बचए चाहैत छथि। भऽ सकैत अछि जे ई अफवाह सरकारी कर्मचारी लोकन्हि फैलेने हुए-कारण जे ओकरा सभकेँ ड्यूटी करएमे कनी आराम भऽ जाइत छैक। लोक सभ राजा बलिक डरे किछु चोरबऽ नञि चाहए छैक। किला अद्भुत छैक। किलाक देबार भग्नावस्थामे रहितहु अपन यौवनक याद दिआ रहल अछि। किलाक देबार एतेक चाकर छैक जे ओहपर तँ आसानी सँ एकटा रथ निकलिये जाइत हेतैक। देबारमे लागल ईंटा दू-दू फीट नमहर आऽ लगभग गोटेक फुट चाकर छैक। चीनक देबारसँ कम मोट नहि हेतैक ई अपन यौवन कालमे। किलामे एकटा पोखरि छैक, ककरो नहि बूझल छैक, जे कहिया खुनेलय ई पोखरि। बूढ़-पुरानक कहब छन्हि जे ई पोखरि राक्षसक कोरल अछि। किछु लोकनिक तँ ई मत छन्हि जे एहिमे एकटा सुरंग सेहो छैक-जकर रस्ता कतओ आर निकलैत छैक। सुनैत छियैक जे राज-परिवारक सदस्यकेँ आपतकालमे बाहर निकालैक लेल एहन सुरंग बनायल जाति छलैक। किलाक कात-करोटमे जे गाम छैक तकर नाम सेहो ऐतिहासिक। किलाक पूब दिस छैक फुलबरिया नामक गाम आऽ ओकर बगलमे सटल छैक गढ़ी गाम..जे आब अप्रभंश भऽ कऽ गरही भऽ गेलैए। किलाक पच्छीम दिस छैक रमणी पट्टी नामक गाम आऽ ओहिसँ सटल छैक भुपट्टी। किलाक दक्षिणमे छैक बिक्रमशेर, जतय प्राचीन सूर्य मंदिरक अवशेष भेटलैए। ई बात ध्यान देबाक जोग जे सूर्य मंदिर देशमे बड्ड कम जगह छैक। बलिराज गढ़क खुदाई पहिल बेर 1976 मे भेलैक, जखन केन्द्रमे साइत डॉ कर्ण सिंह एहि बिभागक मंत्री छलाह। गढ़क उद्धारक लेल मधुबनीक पूर्व सांसद भोगेन्द्र झा आऽ कुदाल सेनाक अध्यक्ष सीताराम झाक बड्ड योगदान छन्हि। किछु इतिहासकार लोकनिक कहब छन्हि, जे ई किला बंगालक पालवंशीय राजा लोकनिक किला भऽ सकैत अछि वा फेर मौर्य सम्राटक उत्तरी सुरक्षा किला भऽ सकैत अछि। ओना किछु गोटेक कहब छन्हि जे एकर बड्ड संभावना- जे ई किला मिथिलाक प्राचीन राजधानी सेहो भऽ सकैत अछि। एकर पाछू ओऽ ई तर्क दैत छथिन्ह, जे एखुनका जे जनकपुर अछि, ओऽ नव जगह अछि आऽ ओतुक्का मंदिर १८हम शताव्दीमे इंदौरक महाराणी दुर्गावतीक द्वारा बनबाएल गेल अछि। विद्वान लोकनि जनकपुरक ऐतिहासिकताक संदिग्ध मानैत छथि। हमरा एहि संबंधमे एकटा घटना मोन पड़ि रहल अछि। १० साल पहिने पटनामे वैशालीक एकटा सज्जन हमरा भेटलाह आऽ कहलन्हि जे बलिराज गढ़ वास्तबमे मिथिलाक प्राचीन राजधानी अछि। हुनकर कहब छलन्हि जे ह्वेनसांगक एकटा विवरणक मुताबिक पाटलिपुत्रँस एकटा खास दूरी पर वैशाली अछि, वैशालीसँ एतेक दूरीपर कांठमांडू (काष्ठमंडप) अछि आऽ काठमांडूक दच्छिन आऽ पूब दिशामे मिथिलाक प्राचीन राजधानी छैक। एखुनका जनकपुर ओहि मापदंडपर सही नञि उतरि रहल अछि। पता नञि एहि बातमे कतेक सत्यता छैक। एकर अलावा, रामायणमे सेहो मिथिलाक प्राचीन राजधानीक संदर्भमे किछु संकेत छैक। रामायणक संकेत सेहो बलिराजपुरकेँ मिथिलाक राजधानी होएबाक संकेत कय रहल अछि। सांसद भोगेन्द्र झाक मुताबिक, राजा बलिक राजधानी महाबलीपुरम भय सकैत अछि, जे दच्छिन भारतमे छैक। सभसँ पैघ बात ई जे पूरा मिथिलामे बलिराजपुरसँ पुरान कोनो किला नहि अछि, जे मिथिलाक प्राचीन राजधानी होएबाक दावा कय सकए। किलाक भीतर उबड़-खाबड़ मैदान छैक, जे राजमहलक जमीनक भीतक धँसि जएबाक प्रमाण अछि। एतय एकाध जगह खुदाई भेलैए आऽ ओहीमे काफी कीमती धातु आऽ समान भेटलैक अछि। अगर एकर ढ़ंगसँ खुदाई कएल जाय तँ नञि जानि कतेक रहस्य परसँ आवरण उठि जायत। एखन धरि सरकारक तरफसँ कोनो ठोस प्रयास नहि भऽ पाओल अछि, जञिसँ बलिराज गढ़क प्राचीनताकेँ दुनियाक सोझाँ रखबाक कोसीस कएल जाय। बस एकटा कामचलाऊ सड़कसँ एकरा बगलक गाम खोजपुरसँ जोड़ि देल गेलैक आऽ इतिश्री कय देल गेलैक। यदि बलिराज गढ़क खुदाई ढ़ंगसँ कएल जाय आऽ एतय एकटा नीक संग्रहालय बना देल जाय तँ बढ़िया काज होयत। मिथिलांचलक हृदयस्थलीमे रहबाक कारणेँ एतय मिथिला पेंटिंगक कोनो संस्थान वा आर्ट गैलरी सेहो खोलल जाऽ सकैत अछि। एकटा नीक(चाकर आऽ चिक्कन हाईवे) क संग नीक विज्ञापन बलिराजगढ़क पर्यटक सभकेँ निगाहमे आनि सकैत अछि। एहिसँ इलाकाक गरीबी दूर करबामे सेहो मदद भेटत। यदि एकरा बुद्धा सर्किट वा रामायण सर्किटक अंग बना लेल जाय तँ आर उत्तम। मिथिला मंथन- १. मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि लेकिन ओहियो स पैघ कारण एहि इलाका के मे कोनो नीक नेतृत्व के आगू नै एनाई अछि। आजादी के लगभग 60 वर्ष बीत गेलाक के बाद देश में जहि हिसाब स आर्थिक असमानता बढ़ि गेलैक अछि ओहि में बिहार आ खासक मिथिला के सामने एकटा बड्ड पैघ संकट छैक जे ई और पाछू नै फेका जाय। उदाहरण के लेल ई आंकड़ा आंखि खोलि दै बला अछि जे एकटा गोआ मे रहय बला औसत आदमी के प्रतिव्यक्ति आमदमी एकटा औसत बिहारी सं सात गुना बेसी छैक आ एकटा पंजबी के आमदनी पांच गुना बेसी छैक। बिहारो मे अगर क्षेत्रबार आंकड़ा निकालल जाय त बिहार के दक्षिणी( एखुनका गंगा पार मगध आ अंग) एवम पश्चिमी ईलाका बेसी सुखी अछि, आ ओकर जीवनशैली सेहो दू पाई नीक छैक। त एहन में सवाल ई जे फेर रस्ता की छैक। की मिथिलांचल के लोक एहिना दर-दर के ठोकर खाईके लेल दुनियां में बौआईत रहता अथवा हुनको एक दिनि विकास के दर्शन हेतन्हि। मिथिलांचलक  ई दुर्भाग्य छैक जे एकर एकट पैघ हमरा हिसाब सं आधा से बेसी इलाका बाढ़ि में डूबल रहैत छैक। बाढ़ि के समस्या के निदान सिर्फ राज्य सरकार के मर्जी सं नहि भ सकैत बल्कि अहि में केंद्रसरकार के सहयोग चाही। पिछला साठि साल मे बिहार के नेतागण अहिपर कोनो गंभीर ध्यान नहि देलन्हि जकर नतीजा अछि जे बाढ़ एखन तक काबू मे नहि आबि रहल अछि। पिछला कोसी के आपदा एकर पैघ उदाहरण अछि, आब नेतासब के आंखि कनी खुललन्हि अछि, लेकिन एखन सं मेहनत केल जायत त अहि मे कमस कम 20 साल लागत। बाढ़ि सिर्फ संपत्ति के नाश नहि करैत छैक, बल्कि आधारभूत ढ़ांचा जेना सड़क, रलेवे आ पुल के खत्म क दैत छैक। एहन हालत मे कोनो उद्योग के लगनाई सिर्फ दिन मे सपना देखैक बराबर अछि। किछु गोटाके कहब छन्हे जे बिहार मे उद्योग धंधा के जाल बिछाक एकर विकास केल जा सकैछ। लेकिन जखन सड़क आ विजलिये नहि अछि त केना उद्योग आओत। दोसर बात ई जे पिछला अविकासके चक्रक फलस्वरुप आबादीके बोझ एतेक बढ़िगेल अछि जे पूरा इलाका मे कोनो खाली जमीन नहि अछि जतय पैघ उद्योग लगायल जा सकय। सिंगूर के उदाहरण  सामने अछि। महाशक्तिशाली वाममोर्चा के सरकार के जखन बंगाल मे 1000 एकड़ जमीन नै खोजल भेलैक त एकर कल्पना व्यर्थ जे दरभंगा आ मधुबनी मे सरकार कोनो पैघ उद्योग के जमीन दै। दोसर बात इहो जे पूरा मिथिला के पट्टी मे, मुजफ्फरपुर सं ल क कटिहार तक कोनो पैघ संस्था-चाहे ओ शैक्षणिक होई या औद्योगिक- नै छै जे एकमुश्त 3-4 हजार लोग के रोजगार द सकै। हमरा इलाका मे शहरीकरण के घनघोर अभाव अछि। जतेक शहर अछि ओ एकटा पैघ चौक या एकटा विकसित गांव स बेसी नहि।एकटा ढंग के इंजिनियरिंग या मेडिकल कालेज नहि, एकटा यूनिवर्सिटी नहि।  कालेज सब केहन जे 4 साल में डिग्री द रहल अछि। एक जमाना मे प्रसिद्ध दरभंगा मेडिकल कालेज मे टीचर के अभाव छैक आ कालेज जंग खा रहल अछि। हम सब एहन अकर्मण्य समाज छी जे कोसी पर एकटा पुल बनबैक मांग तक नै केलहुं,हमर नेता हमरा ठेंगा देखबैत रहला। आब जा क रेलवे आ रोड पुल के बात भ रहल अछि।कुल मिलाकर इलाका मे सिर्फ 8-10 प्रतिशत लोक शहर में रहैत छथि,  ई ओ लोक छथि जिनका सरकारी नौकरी छन्हि। ई शहर कोनो उद्योग के बल पर नहि विकसित भेल। बाकी आबादी-लगभग 40  प्रतिशत दिल्ली आ पंजाब मे अपन कीमती श्रम औने-पौने दाम मे बेच रहल अछि। मिथिला के श्रम पंजाब मे फ्लाईओवर आ शापिंग माल बनाब मे खर्च भ रहल अछि, कारण कि हमसब एहेन माहौल नहि बनौलिएकि जे ओ श्रम अपन घर मे नहर या सड़क बनब मे खर्च हुए। तखन सवाल ई जे फेर उपाय की अछि। हमरा ओतय पैघ उद्योग नहि लागि सकैछ, रोड नहि अछि बाढ़ि के समस्या विकराल अछि, त हमसब की करी। लेकिन नहि, मिथिला के विकास एतेक पाछू भ गेलाक बाद एखनों कयल जा सकैछ। आ अहि विषय मे कय टा विचार छैक। किछु गोटा के कहब छन्हि जे एखुनका बिहारक सरकार मगध आ भोजपुर के विकास पर बेसी ध्यान द रहल छैक। एकर वजह जे सत्ता मे पैघ नेता ओही इलाका के छथि, लेकिन दोसर कारण इहो जे ओ इलाका बाढ़िग्रस्त नहि छैक। पैघ प्रोजेक्ट के लेल ओ इलाका उपयुक्त छैक। उदाहरणस्वरुप-एनटीपीसी, नालंदा यूनिवर्सिटी आ आयुध फैक्ट्री-ई तमाम चीज मगध मे अछि। दोसर बात ई जे नीक कनेक्टिविटी भेला के कारणे भविष्य मे जे कोनो निवेश बिहार मे हेतैक ओ सीधे एही इलाका मे जेतैक। कुलमिलाक आबै बला समय मे बिहार मे क्षेत्रीय असमानता बढ़य बला अछि। एहि हालत मे किछु गोटा अलग मिथिला राज्यक मांग क रहल छथि, आ हमरा जनैत संस्कृति स बेसी -अपन आर्थिक विकास के लेल ई मांग उचित अछि। मिथिला के विकास के माडेल की हुअके चाही।मिथिला के जमीन दुनिया के सबस बेसी उपजाऊ जमीन अछि। हमसब पूरा भारत के सागसब्जी आ अनाज सप्लाई क सकैत छी। लेकिन ओ सब्जी दरभंगा सं दिल्ली कोना जायत। एहिलेल फोरलेन हाईवे आ रेलवे के रेफ्रजेरेटर डिब्बा चाही। दोसर गप्प हमर इलाका के एकटा पैघ रकम दोसर राज्य मे इंजिनियरिंग आ मेडिकल कालेज चल जाईत अछि। हमरा इलाका मे 50 टा इंजिनीयरिंग कालेज आ 10 टा मेडिकल कालेज चाही। ई कालेज भविष्य में विकास के रीढ़ साबित होयत। हमरा इलाका मे छोट-छोट उद्योग जेना स़ाफ्टवेयर डेवलपमेंट या पार्टपुर्जा बनबै बला फैक्ट्री चाही जहि मे 100-200 आदमी के रोजगार भेटि जाय। लेकिन एहिलेल 24 घंटा विजली चाही। ई कतेक दुर्भाग्य के बात जे बगल के झारखंडक कोयला के उपयोग त पंजाब में बिजली बनबैक लेल भ जाय छैक लेकिन हमसब एकर कोनो उपयोग नहि क रहल छी। आई अगर हमरा अपन इलाका मे 24 घंटा बिजली भेटि जाय़ त पंजाब जाय बला मजदूर के संख्या में कम सं कम आधा कमी त पहिले साल भ जायत। भारत के दोसर राज्य सिर्फ आ सिर्फ अही इलाका के सस्ता श्रम के बले तरक्की क रहल अछि। हमसब ई जनतौ किछु नहि क रहल छी, ई दुर्भाग्य के गप्प। मिथिला मे पढ़ाई लिखाई के प्राचीन परंपरा रहलैक अछि लेकिन सुविधा के अभाव मे ई धारा हाल मे कमजोर भेल अछि। खासकर महिला शिक्षा के दशा-दिशा त आर खराब अछि। एकटा लड़की कतेको तेज कियेक ने रहे ओ 10 सं बेसी नहि पढ़ि सकैत अछि कारण घर के पास कालेज नहि छैक। हमरा अगर तरक्की करय के अछि त इलाका मे एकटा महिला यूनिवर्सिटी त अवश्ये हुअके चाही, संगहि सरकार के ईहो दायित्व छैक जे हरेक ब्लाक में कमस कम एकटा डिग्री कालेज के स्थापना हुए। देश के विकास मे अहि इलाका के संग कतेक भेदभाव केल गेलैक आ हमर नेतागण कतेक निकम्मा छथि-एकर पैघ उदाहरण त ई जे इलाका मे एकहुटा केंद्रीय संस्थान नहि छैक। एकटा यूनिवर्सिटी नहि, एकटा कारखाना नहि। आब जा  क कटिहार मे अलीगढ यूनिवर्सिटी, दरभंगा में आईआईआईटी आ बरौनी मे फेर सं खाद कारखाना के पुनर्जीवित करैक बात कयल जा रहल अछि। हमरा याद अछि जे साल 1996 तक दरभंगा तक मे बड़ी लाईन नहि छलैक। हमसब कुलमिलाकर कोनो तरहक संपत्ति के निर्माण नहि करैत छी। हमसब अपन आमदनी दोसर राज्य भेज दै छियैक-बेटा के बंगलोर मे इंजिनीयरिंग करबै सं ल क दियासलाई तक खरीदै मे। हमर पूंजी अपन राज्य, अपन इलाका के विकास में नहि लागि रहल अछि। एहि स्थिति के जाबत काल तक नहि बदलल जायत हम किछु नहि क सकैत छी। २. प्रवीण आई अमेरिका चलि गेल। ओकरा एल एंड टी के प्रोजेक्ट पर शिकागो पठा देल गेलै। लेकिन ओकरा संग पढ़ैवाली पूनम के भाग्य ओहन नहि छलैक। ओ दू बच्चा के मां  बनि अपन स्वामी के सेवा में अपन जिंदगी बिता रहल अछि। बितला समय याद करैत छी त लगैत अछि जे पूनम के संग बड़्ड अन्याय भेलैक। बात सन् 95 के हतैक, हमर बोर्ड के रिजल्ट आबि गेल छल। ओहि समय पूनम आ प्रवीण छट्ठा में पढैत छल।  जाहि स्कूल में पढ़ैत छल ओहि में चारि टा मास्टर छलैक जे बेसीकाल खेतिए बारी में लागल रहैत छलैक। पूनम क्लास में फर्स्ट अबैत छल आ प्रवीण सेकेंड...लेकिन छट्ठा के बाद प्रवीण के बाबू जी ओकरा ल क कटक चलि गेलखिन्ह जतय  ओ एकटा दुकान में काज करैत छलखिन्ह। पूनम के घरक हालत अपेक्षाकृत ठीक छलैक, ओकर बाबूजी सरकारी सेवा में छलखिन्ह, लेकिन पूनम दसवीं से आगू नहि पढि सकल। ओकरा इंटर में मधुबनी के झुमकलाल महिला कालेज में नामो लिखा देल गेलैक लेकिन बाद में ओ आगू नै पढ़ि सकल। लेकिन प्रवीण राउरकेला सं इंजीनरिंग केलाक बाद एल एंड टी में प्लेस्ड भ गेल आ कंपनी ओकरा शिकागो पठा देलकै। एक दिन हमर दीदी पूनम के पूछवो केलकैक जे ओ कियेक ने बीए में नाम लिखेलक, त पूनम के जवाब छलैक जे ओकर मां-पप्पा के बीच ओकर पढ़ाई के ल क नित दिन घोंघाउज होइक। ओकर बेसी पढ़नाई पूनम के विवाह में बाधा बनि रहल छलैक। तीन बहिन में सबस पैघ पूनम के दहेज एकटा बड्ड पैघ समस्या छलैक। दू साल के बाद पूनम के विवाह भ गैलैक आ जे  पूनम क्लास में फर्स्ट अबैत छल ओ जीवन के दौड़ में सदा के लेल सेकेंड भ गेल। पूनम के तमाम टैलेंट आब सिलाई-कढ़ाई आ स्वेटर के नब डिजाइन सीख में खप लगलैक। आई हमरा गाम में प्रवीण के टैलेंट के धूम मचल छैक। मिथिला के तमाम दहेजदाता ओकर दरवाजा पर आबि चुकल छथि, लेकिन सवाल ई जे कि पूनम के आगू नै पढ़ि पबै में कि सिर्फ दहेज टा एकटा कारण छलैक या किछू आउर...?  मानि लिय जे दहेज नहियों रहितैक त की पूनम के अपन घर लग नीक कालेज भटि जयतैक ? हम सोचैत छी जे यदि पूनम के जन्म कर्नाटक या केरल में भेल रहितैक  त भ सकैछ ओ इंजिनीयर बनि जाईत आ एल एंड टी ओकरो शिकागो भेजि दैतैक। लेकिन ई सवाल एखनो नीतीश कुमार अतबा अर्जुन सिंह के एजेंडा में नहि छन्हि। नै जानि कतेको लाख पूनम आई चिचिया-चिचिया क ई सवाल अहि व्यवस्था सं पूछि रहल अछि। हमर ई पोस्ट हिंदी के हमर ब्लाग आम्रपाली(amrapaali.blogspot.com)...ओहि पर एकटा टिप्पणी अछि जे सब साधन सबके नहि देल जा सकैत छैक, आगू बढ़य बला के खुदे के जिजीविषा हुअके चाही। लेकिन हमर कथन ई अछि जे प्रवीण के संग कोनो जीजिविषा नहि छलैक-ई पुरुष प्रधान समाज के एकटा दुखद अध्याय छैक जे हजारो प्रवीण के त कोटा स ल क बंगलोर तक डोनेशन पर भेज देल जाइत छैक लेकिन लाखों पूनम एखनों आशाके बाट जोहि रहल अछि। की ई सरकार के कर्तव्य नहि छैक जे ओ पूनम सब के उचित पढ़ाई के व्यवस्था करैक..?. ई कतेक दुर्भाग्य केर बात अछि जे बिहार में एखन हाईस्कूल खोलै पर प्रतिबंध लागल छैक। एखन 5 किलोमीटर के दायरा में बिहार में एकटा हाईस्कूल छैक। कोनो लड़की के लेल ई कोना संभव छैक जे ओ पांच किलोमीटर पढ़य लेल हाईस्कूल जाय। आब बिहार सरकार हाईस्कूल में लड़की सबके साइकिल द रहल छैक लेकिन की सिर्फ हाईस्कूल तक के पढ़ाई उपयुक्त छैक..? दोसर बात ई जे बिहार सनहक राज्य में जतेक सामान्य ग्रेजुएशन के सीट नै छैक, कर्नाटक आ महाराष्ट्र में ओहि स बेसी इंजिनीयरिंग के सीट छैक। एखन तक राज्य में एकोटा महिला विश्वविद्यालय आ तकनीकी विश्वविद्यालय नै छैक। हुअके ती ई चाही छल जे बिहारल में 20-25 साल पहिनहि हर जिला- आ ब्लाक में एकटा कालेज खोलि देबाक चाही छलैक। आब के जमाना त इंजिनीयरिंग आ एमबीए कालेज खोलक छैक। एहन हालत में ओहि खाई के के भरत जे बिहार आ दोसर राज्य के बीच में बनि गेलैक अछि। फेर वेह सवाल सामने अछि- की अबैयो बला समय में पूनम इंजिनीयरिंग कालेज में जेती....?

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् डॉ पंकज पराशरश्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.। पृथकावली दिल्लीक शरणागत अहल भोरेसँ साँझ धरि डेग-डेगपर अर्पित करैत छी अपन आत्म आओर अपन सम्मान आ जिनगीमे अर्जित कयल सबटा ज्ञान चारि कौर अन्न आ पाँच हाथ बस्तर लेल रने-बने बौआइत बाकी चारू भाइ आ बहीन हमर देशक कोन-कोनमे अभ्यर्थित आँखिसँ बेस उताहुल बेर-बेर भरोस दियबैत अछि नियोक्ताकेँ अपन बुत्ता भरि जे कहियो नहि धयलक हरक लागन जिनगीमे से मोंछगर हमर भाइ सब आइ खूब हरखित मोनेँ रोपैत छथि धान आ बेचैत छथि पान देशक कोन-कोनमे बिहरल अहराक खोजमे दूरभाषिक वार्तालापमे सबटा खेरहा सुनबैत बिहरैत परिवारक गाथाक बीच बढ़ैत सदस्य सबहक बिलहैत अछि सूचना मुक्त मोनेँ, संचारी भाव केर स्थायी अर्थाभावक बिना कोनो चिन्ता कयनेँ- गामक खिस्सा सबहक बीच-बीचमे कइक सालसँ कलकत्तामे निपत्ता बड़का काकाकेँ ताकबाक सबटा व्यर्थ भेल प्रयास केर खिस्सा हमरा सुनल अछि काकीक एकादशी-हरिबासन आ गंगामे एकटंगा देबाक आख्यान सेहो सबहक पता-ठेकान जनितो हमरा लोकनि आब जोखैत रहैत छी भेंट-घाँटक आकुलताकेँ मासूलक पाइसँ नहि जानि आपात चिकित्सा कक्षमे हमरा किएक मोन पड़ैत अछि रहैत अछि बाबीक गाओल सोहर आ साँझक गीत जखन कि बाबीकेँ मुइना आइ तीस-पैंतीस बरखसँ बेशी भऽ गेलनि एक भाइ दिल्ली आ एक कलकत्ता एक बहीन पंजाब आ दोसर राजस्थानक रेगिस्तानमे अभिशापित नैहरमे सुनल फकड़ा दोहरबैत रहैत अछि मोने-मोन... जाहि बाटे गेली बेटी दूबिया जनमि गेलइ... पृथ्वीक कोने-कोन बौआइत हम देखैत छी गरीबक अहरापर गहन पहरा दैत महाशक्तिकेँ करे-कमान कतेक गाम नापब एखनो बाकी छनि वामनावतार प्रभुकेँ? जरीब-कड़ीकेँ उघबाक लेल जनमल हमरा लोकनि कोन-कोन नक्शाक लेल पृथ्वीपर घीचैत रहब डाँड़ि आ लड़ैत रहब ओहि राष्ट्र केर गौरवक लेल जकर झटहा कइक पुस्तसँ हमरा लोकनिकेँ खेहारि रहल अछि जंगलसँ गाम आ गामसँ शहरक नहर-छहरपर बसल जलहीन मलिन बस्तीक मल-जलक असह्य दुर्गंधक बीच बाबाक अपार्थिव इच्छा हुनक पार्थिव शरीरक संगे चलि गेलनि क्यो काका ईर घाट तँ क्यो काका बीर घाटमे बसल दसकठबा डीहकेँ पियाजुक क्यारीमे बाँटिकेँ संतुष्ट आब कोनो काज-परोजनक अवसरपर गामक स्मृति-संपदाकेँ दूरभाषिक आ ई-मेली चँगेरामे बिलहैत छथिन नहि जानि कहिया धरि अपने देशक अमेरिका आ इजराइलमे कहुखन अफ्रीकी तँ कहुखन फिलिस्तीनी बनल मतृभूमिसँ तिरस्कृत संज्ञाकेँ घृणा आओर घृणाकेँ जीवनक प्रसाद बुझि बौआइत रहब अनौन-बिसौन भेल जिनगीक फागुनेमे साओन-भादब भेल... थाल-कादो भेल...!

33 3 3 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ  इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक .। ककर गलती कतेक दिवससँ सोचैत रही जे गाम जाएब परञ्च दिल्लीक उथल-धक्कासँ मुक्त होएब तखन नञि। पिछला दशहरामे जखन गाम पहुँचलहुँ तs आड़ि पकड़ि टोल घुसैत रही। ओहि ब्रह्मबाबाक ठामपर एकटा स्त्रिगन बैसल रहथि की कहू, धक्कसँ रहि गेलहुँ कंठक थूक कंठहिमे सूखि गेल स्त्रिगन कोनो भूत नहि छलीह ओऽ कोनो डायन-जोगिन नहि रहथि ओऽ गौरी दाई छलीह बियाहक ठामे साल विधवा भs गेलीह ताहि दिनसँ ओऽ नवयुवती उजरा नुआ पहिरैत छथि सीथमे चुटकी भरि सेनूर नहि गुमसुम रहैत समय काटि रहल छथि। तs हुनका देखि कs हरदम सोचैत छी की यैह मिथिला थिक यैह हमर संस्कृति थिक जे मन केँ मारि कए एकटा नवयुवती जीवन काटि रहल अछि ओकरा कियो देखनिहार नहि छैक ओ नवयुवतीक मांग जुआनीमे उजड़ि गेल ताहि दिनसँ हुनकापर की बितैत होयत पति बीमारीसँ मरि गेलखिन एकरामे गौरी दायक की दोष दोष तs हुनक पिताक छनि जिनका वरक बीमारीक जानकारी नहि छल मुदा ओहो की करताह घटक बनि कs गेल रहथि द्वितीकार जे बतोलथि सैह ने सत्य मानितथि ई गप सच छल जे गौरी दाय अपन पिताक गलतीक सजा भोगि रहल छथि भाग्यकेँ कोसि रहल छथि आब की कही देश-परदेशमे तs वर- कनिया बदलि जाइत अछि जेना हर छः मास पर बदलैत छी हम अपन अंगा मुदा, ई गौरी दाय बीसेक साल बादो नहि बदललीह ओहि दिनसँ पतिक वियोगमे दिन-राति घुटैत छथि कियो कतहुसँ खुशियोमे हुनका नोत नहि दैत छथि कियो अपन नवजातकेँ खेलाबए ले नहि दैत छथि की करती गौरी दाय कियो हुनका देवी कहैत अछि तऽ डायन-जोगिन कहबासँ लोक-वेद पाछुओ नहि रहैत छथि। १. समर्पण (कथक नृत्यांगना पुनीता शर्माक लेल) जीवनक जीवंतता कि मनुष्यक मनुष्यता कि जेहन मोन, जेहन भाव तहिने होइत समर्पण भाव नर्तकी जखन राग मालकौस मे स्टेज पर रोशनीक चकाचौंध मे अपन संपूर्ण प्रतिभाक प्रदर्शन करैत छथि देखू तखैन कि हैत छथि राग, कि हैत छथि भाव लागत जना हुनकर देह मे नर्तकीक आत्मा नहि देवता बैस गेल जे जेना नचाबि रहल छैल तहिना नर्तकी नाचैत छथि कि ततकार कि ठाठ कि करि ओइ चक्करक वर्णन शब्दो तं ओतेक नहि अछि त कोना करि समर्पण भावक वर्णन अहां जकर बेटी होइब अहां जकर बहिन होइब मुदा, अहां जकरा सं प्रेम करैत होइब ई सब कतेक खुशनसीब होइत जे नर्तकी अपन संपूर्ण अस्तित्व नृत्य मे झोंइक दैत छथि हुनकर प्रेम वा पुरुष वा समर्पन जरूर संपूर्ण होइत.

66 6 6 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् महेश मिश्र “विभूति” (१९४३- ),पटेगना, अररिया, बिहार। पिता स्व. जलधर मिश्र, शिक्षा-स्नातक, अवकाश प्राप्त शिक्षक। पन्थीसँ तनिक विलमिके सुनिली पन्थी, अविलम पहुँचब गेहे। तरुणाईमे कथिक अपेक्षा, जतबा कहब, बुझब सब नेहे॥ अहाँ पन्थी! पथिक बनिके, जा रहल छी बाटमे। दृश्य अगणित देखब पन्थी, भ्रमब नहि जग-हाटमे॥ आओत बाढ़ि जे स्नेह-सलिलके, शपथ, सबल पग राखब। दुर्बलता जँ व्यापत किञ्चित, कहू! कोना जल थाहब॥ बिनु जल भवसागर की नदिया, दहब-भसब नहिं बाबू। दृढ़-सङ्कल्प पतवार पकड़िके, राखब मन पर काबू॥ होयत हँसारति भरि जगमे, जँ, बुड़ि जाओत नौका। अस्तु, सोचब गृद्ध दृष्टि लऽ, नहिं आओत फेर मौका॥ पुनः कतबा कहब बाबू? शुभकामना अछि संगमे। सफल होऊ , सुफल पाऊ, शुभ रंग आनू रङ्गमे॥ अहाँ पायब सुयश जगमे, पुलकि पुलकत गात मम्। पूर्ण पूनम सम जँ देखब, परम आनन्दित होयब हम॥ अछि निवेदन ईशसँ, सद्बुद्धि दैथि सुजान के। बड़ आश अछि पंथी अहाँसँ, करंहु मुकलित प्राणके॥ सन्तोष (०६.०२.६५) सन्तोष सरितमे नित नहाय, बल्कल पहिरी तँ लाज न हो। बेदाग होय कर्तव्य करी, हाथी नवीश सँ काज न हो॥ कहू! व्यर्थ झगड़िके धन अरजी, सत् कर्म बिना सब काज हो। एक दिन बिन कैंचाके जगसँ, प्रस्थान करू, तँ लाज न हो॥ भऽ जाय फकीरी वोहि सँकी? मस्तक ऊँचा सदिकाल रहे। कहू? भला वो अमीरी की, लानत जेहि पर कङ्गाल कहे॥ भऽ जाय अमीरी वोहिसँ की? सत् कीर्ति समुज्ज्वल कर्म करू, निशि दिन सद्भाव निबाहू जँ। भगवान् भला करता निश्चय, कहियौन हुनकहि, नहिं काहूसँ॥ हुनकर लीला अनदेखल अछि, फल प्राप्त करै छथि विश्वासी। सुनितहुँ छथि सबहक परमप्रभु, कारण; वो छथि घट-घट वासी॥ उद् बोधन : ढाढ़स (३१.०७.६३) मत होउ निराश एक झटका पर, नित कर्मक ध्यान धरू मनमे। दुनियाँमे एहिना होइतैं छै, ई सोचि पुनः उतरू रनमे॥ बहुतोंके एहिना मेल एतऽ, किन्तु; की साहस छोड़ि देलक।?। साहस थीक सम्बल आशाके, जगमे हारल पुनि लाहु लेलक॥ नभमे देखू वो चन्दाके, जे पूर्ण विकासक क्रमपर अछि। एक दिन पूनम परिपूरित भऽ, पुनि ग्रास ह्रास भऽ जाइत अछि॥ नयन निहारि निरखू जगके, के रहल समान निशि दिन जगमे।?। उत्थान-पतन क्रम कर्मक अछि, निर्भीक बनूँ, बिचरू महमे॥ जी तोड़ि परिश्रम करथि कोय, फल नीक नाहिं, तँ दोष कोन। विधना के एहिना लीला छन्हि, तँ, एकरामे किनको दोष कोन॥?॥ बड़ आश केलहुँ शुभ आशाके, सम्भव केलहुँ नहिं काज कोन। फलदाता दरजल नाहिं यदि, तँ, एकरामे किनको लाज कोन॥?॥ भेटत वोतबहि, जे लिखल अछि, पाथर परके रेखा बुझियौ। कर्तव्य करू नित निकक हित, भेटत निश्चय, भागक लेखा बुझियौ॥ श्रम-साध्य मजूरी भेटतैं छै, ई शास्त्र-पुराण, सुधि जन कहि गेल। औकतेलासँ भट्टा पाकयऽ? ई कथ्य युगाब्दक रहि गेल॥ वोपदेव इतिहास-पुरुष, अमर लेख्य पाणिनी तिनकर। धीर धैर्य धारण करियौ, यथा भाग भावी जिनकर॥ पाण्डव के राज भेटल छीनल, नल दमयन्तीके याद करू। सिंहासनारुढ़ सियावर भेला, वसुदेव कोना आजाद करू॥ मधुर स्वप्न (०७.११.६२, रवि श्री विजयादशमी) मधुर स्वप्न की देख रहल छी, दत्यतासँ सँदूर भऽ के। चिरनिशा के गर्भमे, तल्लीनतासँ निकट भऽ के॥ दुक्खसँ जँ दूर छी तँ, कहू कोन उपचार हो। मूक मुद्रा एना कऽ के, अति दुःखक नेँ विस्तार हो॥ या कहू अन्तर्निहित, दुःखसँ दुःखी छी मनहि-मन, से कहू सङ्कोच तजि के, की स्वप्न देखब छनहि-छन॥ मौन रहला पर कोना के, बुझि सकत पर वेदना। वेदना के व्यक्त कऽ के, छाड़ि दी निज कल्पना॥ मधुर स्वप्नक की महत्ता, कहि दियऽ दू शब्दमे। हम भ्रमित छी दशा लखिके, किछु कहू, किछु शब्दमे॥?॥ या कहू किछु विसरि गेने छी, अहाँ निज ख्यालसँ। मधुर स्वप्नक ज्वलित ज्वाला, त्यागि दी अन्तरालसँ॥ सजनि! पता दी अपन क्लेशक, विषम वेदना मानस के। वा बहु भाँति व्यथित छी अपने, हृदयान्तर्गत तामस से॥ कोना वेदना उमड़ल अछि जे, अगम-अथाह, पता नहिं आय। अतिशय क्लेशक दुःसह भारसँ, दबयित छी दयनीय भऽ हाय॥ कहू-कहू! मानस के ओझरी, मधुर स्वप्न के त्यागू आय। मधुर यदि दुःखदाई हो, तुरत त्यागी, कथमपि नहिं खाय॥ अहाँ बेसुधि, हम ससुधि भऽ कोना जीवन-रथ चलत। सामंजस्यानन्दक प्रयोजन, जीवनक रथ अथ चलत॥ सिन्दूर-दानक गीत: “अनुरोध” (१४.०५.६३, सोम) “प्रिय पाहुन सिन्दूर-दान करू” सुन्दर सरस समय शुभ सरसल, सिन्दूर हाथ धरू। उषा निहारथि कमल हस्तके, अविलम कर्म करू॥...॥ नव निर्मित नगरीमे सिञ्चित किञ्चित ख्याल करू। विलम छाड़ि, सिन्दुर लऽ करमे, हिय प्रभुनाम धरू॥...॥ दर्शक सब व्याकुल होय निरखय, स्वातीक जल बरसू। नवजीवनके सृजन करथि प्रभु कर्मक ध्यान धरू॥...॥ कबलौं प्रभु अनुरोध करायब शुभ-शुभ कर्म करू। मनःपूत मनसाके कऽ के, भवनदमे विहरू॥...॥ शुभ शङ्कर-गौरी मैयाके शुभाशीष हिय मध्य धरू। विनय “विभूति”क एतवहि प्रभुसँ, युगल जगत् विचरू॥...॥ बादरीक आगमन (२६.०५.६३) “नभमण्डलमे पवनक रथपर, कारी-कारी बादरि आयल”। बिजुरि छटकै, ठनका ठनकै, देखि-सुनि जनमन खूब डेरायल॥ चहु दिशि उमड़ल कारी बादरी, बादरि आबिके जल बरसायल। प्रलयनाद मेघक सुनि-सुनि, वृद्ध जनी सब नेनहिं नुकायल॥ हकरै बालक वृद्ध जनी सब, लोक कहै सब माल हेरायल। बाँस-आम गीरल अनगिनती, क्यो कहै हमरो महिंस हेरायल॥ लोक कहै बहु भाँति मनोदुःख, प्रिया कहै मोर प्रिय नहिं आयल। कामिनी कलपथि, प्रिय नहिं गृह छथि, विजुरिक धुनि-सुनि जियरा डेरायल॥ रोर मचल अछि चहु दिशि जन-जन, एतबहिमे अति जल झहरायल। त्रिषित भूमि “विभूति”मय भेली, तरु-तृण वो जन-मन हरसायल॥ जगक प्रमान (०९.०६.६३) डोली उठल बिन खोलीके दुवारसँ, घुरि नहिं आओत, प्रमान हे। काँच कचम्बा काटि कुढ़ावोल, उघल सबटा सामान हे॥ श्वेत वस्त्रसँ मृतक सजाओल, नित प्रति होत जहान हे। अचरज के नेँ बात बुझि ई, ई थिक ध्रुवक समान हे॥ चारि जने मिलि कान्ह लगाओल गमन करत शमशान हे। पुत्र-प्रणय के परिचय देता, करता अग्निक दान हे॥ सच् होय अछि “पुत्रार्थे भार्या” होय छथि पुत्र महान् हे। कहथि “विभूति” बनब विभूति, एहि थिक जगक प्रमान हे॥ “अपटुडेट बलिष्ठ युवकसँ” (१५.१२.१९६२) करू किछु काज बाबू औ, रतन धन आय पौने छी। धरा पर अवतरित भऽ के, एना की मन गमौने छी॥?॥ करू उत्साह किछु मनमे, चलू सन्मार्गपर निशि-दिन। चुकाऊ कर्ज माताके- जे भेटल अछि अहाँके रिन॥ बढ़ाऊ डेगके आगू, समय तँ कटि रहल अछि औ। पुनः ऋण बढ़ि रहल अछि जे, सधाउ आय, नेँ राखू शेष तनिको औ॥ पड़ल माता कराहति छथि, दया के बेच देने छी। तनिक तँ लाज राखू जे, एना की मन गमौने छी॥?॥ सुयश पायब समाजीसँ, धवल यश देश व्यापी औ। पिता-माता सुकीरति लहि, अभय वरदान देता औ॥ “अनुरोध” (२८.०९.१९६२) की कहू? कहलो नेँ जाय अछि, हिय व्यथित, वाणी सबल नहिं, बुद्धि व्याकुल, व्याल चहु दिश ज्वाल ऊरमे बढ़ि रहल अछि। की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥ दशा पातर, हाल दयनीय, आननक सुकुमारताके। मौन शब्दातीत मुद्रा;- से हृदयमे चुभि रहल अछि। की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥ प्राण आकुल, विकल की छी, व्यथा-ज्वालमे जरि रहल छी, शूल बज्रक पतित नगसँ बमरि-झहरिके खसि रहल अछि! की कहू कहलो नेँ जाय अछि॥ हृदय दारुण दुःख सहिके, मात्र प्राणे शेष बाँचल। एना विह्वल हाल कऽ के, व्यथा द्विगुणित दऽ रहल छी॥ की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥ चन्द्रमुख-मण्डल सुलोचन, कच-विकच बेहाल की अछि। वेदनासँ व्यथित भऽ के, व्यथित अनका कऽ रहल छी।। की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥ बस आश एक, अनुरोध केवल, मधु-मधुर मुस्कान के। हेरि चानक स्वच्छ आभा, करु मुकुल, विकसित प्राण के॥ पुनः मञ्जुल मृदुलाअ के, हेतु अनुरोधी बनल छी। मानिनी भऽ मान राखू, दशा लखि के अति विकल छी॥

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् प्रीति (प्रीति अभियंत्रणक छात्रा छथि संगमे नेपाल १ टी.वी. मे दैनिक मैथिली कार्यक्रमक होस्ट छथि।) १. वियाह एकटा रिश्ता के एहन अटूट बंधन अछि जकरा सामाजिक मान्यता प्राप्त छैक आ एक खास अवस्था में सब स्वेच्छा सअ अहि बंधन में बंधय चाहैत अछि। प्राचीनकाल में स्वयंबर के प्रचलन छल। यानि महिला के स्वयं वर चुनवाक सामाजिक आजादी छलन्हि। कालांतर में सामाजिक स्थिति में बदलाव आयल। बहु विवाह या दोसर वियाह पहिनुहुं व्याप्त छल मुदा महिला के नहि भेटल ई आजादी। आइयो कमोवेश दोसर वियाह पर समाज महिला के प्रति ओतेक उदार शायद नहि अछि जतेक उदार ओ पुरूषक दोसर वियाह पर अछि। दोसर वियाह के बारे में जौं सच पुछी त समाज पुरूख के संग दैत अछि। पहिने त समाज में बहु वियाहक प्रथा छल मुदा आब यद्यपि एकरा मानयता नहि छैक तथापि समाज सअ ई प्रथा पूर्णत: खत्म नहि भेल अछि। दोसर वियाह जौं विधुर द्वारा या कोनो खास विशेष परिस्थिति में कयल जाय त एकर कारण बुझवा में अबैत अछि पर यदि मात्र शौक, दहेजक लोभ या छद्म आधुनिकता के होड़ में कयल जाय त ई अक्षम्य अपराध अछि। अहि मादे समाज आ स्वयं पुरूष के अपन सोच बदलबाक आवश्यकता अछि । समय बदलल संगहि लोक के सोच सेहो बदलल अछि। मुदा एखनो नहि बदलल अछि महिला के मादे पुनर्विवाह या दोसर वियाह पर समाजक नजरिया। जौं पुरूष क सकैत छथि दोसर वियाह त किएक नहि परित्यक्ता, विधवा महिला के सेहो भेटबाक चाही ई अधिकार। कतेक नींक महिला होयत जौं जवान के संतानहीन विधवा के पुनर्विवाह के अनिवार्य बना देल जाय आ बाकियो के स्वेच्छा पर छोड़ि देल जाय। जौं ई भ सकय संभव त नहि सिर्फ समाज सअ महिला आ पुरूषक भेदभाव किछु कम होयत अपितु बल्कि समाज द्वारा उपेक्षित आ एक तरहे त्यागल महिला पुन: समाज के मुख्यधारा में शामिल भय अपन जीवनक नैराश्य सअ मुक्ति पाबि सकलीह। २. कोजागरा पावनि आश्र्िवन शुक्ल पूर्णिमा के मनाओल जाइत अछि। नवविवाहित लड़का लेल अहि पावनि के विशेष महत्व अछि या कहू त ई पावनि खासकय हुनके सभक लेल छन्हि। नवका बरक लेल ई पावनि तहिने महत्वपूर्ण अछि जेहन नवविवाहिता लेल मधुश्रावनी। फर्क यैह अछि जे मधुश्रावनी कतेको दिन लम्बा चलैय बला पावनि अछि आ अहि में नव कन्या लेल बहुत रास विधि-विधान अछि जखनकि कोजागरा मुख्यतःमात्र एक दिन होइत अछि। जहिना मधुश्रावनी में कनिया सासुरक अन्न-वस्त्रक प्रयोग करैत छथि तहिना कोजागरा में बर सासुर सं आयल नव वस्त्र धारण करैत छथि। कोजागरा के अवसर पर बर के सासुर सं कपड़ा-लत्ता, भार-दोर अबैत छन्हि। अहि भार में मखानक विशेष महत्व रहैत अछि। यैह मखान गाम-समाज में सेहो बरक सासुरक सनेस के रूप में देल जाइत अछि। सासुर सं आयल कपड़ा पहिरा बरक चुमाओन कयल जाइत अछि। बरक चुमाओन पर होइत अछि बहुत रास गीत-नाद। कोजागरा में नींक जकां घर-आंगन नीपी-पोछि दोआरी सं भगवतीक चिनवारि धरि अरिपन देल जाइत अछि। भगवती के लोटाक जल सं घर कयल जाइत अछि। चिनबार पर कमलक अरिपन दय एकटा लोआ में जल भरि राखि ओहि पर आमक पल्लव राखि तामक सराई में एकटा चांदी के रूपैया राखि लक्ष्मी के पूजा कयल जाइत अछि। राति में अधपहरा दकखि बरक चुमाओन कयल जाइत अछि। आंगन में अष्टदल अरिपन द ओहि पर डाला राखि कलशक अरिपन द ताहि में धान द कलश में आमक पल्लव राखल जाइत अछि। एकटा पीढ़ी पर अरिपन देल जाइत अछि जे अष्टदलक पश्चिम राखल जाइत अछि। चुमाओनक डाला पर मखान, पांच टा नारियल, पांच हत्था केरा, दही के छांछ, पानक ढोली, गोटा सुपारी, मखानक माला आदि राखि पान, धान आ दूबि सं वर के अंगोछल जाइत अछि तहन दही सं चुमाओन कयल जाइत अछि। चुमाओन काल में बर सासुर सं आयल कपड़ा पहिरि पीढ़ी पर पूब मुंहे बैसैत छथि। पुरहरक पातिल के दीप सं वर के चुमाओन सं पहिने सेकल जाइत छथि। फेर कजरौटा के काजर सं आंखि कजराओल जाइत छन्हि। तकर बाद पांच बेर अंगोछल जाइत छन्हि। तखने होइत छन्हि चुमाओन। चुमाओनक बाद वरकें दुर्वाक्षत मंत्र पढ़ि कम सं कम पांच टा ब्राह्मण दूर्वाक्षत दैत छन्हि। फेर पान आ मखान बांटल जाइत अछि। आ अगिला दिन धरि मखान गाम घर में बांटल जाइत अछि।

22 2 2 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् श्री रामलचन ठाकुर, जन्म १८ मार्च १९४९ ई.पलिमोहन, मधुबनीमे। वरिष्ठ कवि, रंगकर्मी, सम्पादक, समीक्षक। भाषाई आन्दोलनमे सक्रिय भागीदारी। प्रकाशित कृति- इतिहासहन्ता, माटिपानिक गीत, देशक नाम छल सोन चिड़ैया, अपूर्वा (कविता संग्रह), बेताल कथा (व्यंग्य), मैथिली लोक कथा (लोककथा), प्रतिध्वनि (अनुदित कविता), जा सकै छी, किन्तु किए जाउ(अनुदित कविता), लाख प्रश्न अनुत्तरित (कविता), जादूगर (अनुवाद), स्मृतिक धोखरल रंग (संस्मरणात्मक निबन्ध), आंखि मुनने: आंखि खोलने (निबन्ध)। पास करबाक लेल उत्तर पुस्तिका आपस रखिते पुछि बैसैत छथि मैम अर्धवसना बाब्ऽकेशी वय विलम्वित नवल वेशी सोनाक वर्ग शिक्षिका- देखलहुँ, बड़ कमजोर अछि नेना अहाँक कने नीक जकाँ करिऔक गाइड... -          कमजोर त ई नहि अछि मैम आ जहाँधरि छैक बात करबाक गाइड से स्कूल त ताही लेल पठाओल जाइत अछि अंग्रेजीक एक पत्र मे पचासी आ दोसर मे किएक अबैत छैक पचीस सोचबाक बात इहो की नहि थिक? विहुँसैत बजैत छथि मैम पाश्चात्य शिक्षा-संस्कृतिक सेविका वैश्वीकरण मेनका- खाता त देखबे कएल लिखने अछि मात्र दूटा पेज -तें ने कहल हम कमजोर ओ नहि अछि पढ़बैत छिऐक स्वयं हम लिखबे नहि कएलक से बात भेल अन्य परंच एहिठाम नम्बर नहि देल गेलैक से भेल नहि बोधगम्य... ओहिना बिहुँसैत पुछैत छियनि हम देखबैत पुस्तिकाक पंक्ति विशेष आश्चर्य चकित सन भेल कहै छथि मैम- गलती लिखने अछि संयुक्त परिवार सुखी परिवार! -          त एहि मे गलती की छैक? रिक्तस्थान मे ओ लिखि देलक संयुक्त मैम, संयुक्त परिवार आ बसुधैव कुटुम्वकम् केर संस्कारमे पालित हमर पौत्र केना लिखि पाओत छोट परिवार नीक... -          मुदा -          पोथी मे सएह छैक इएह ने कहब अहाँ आ पास करबाक लेल उएह सिखए पड़तैक आर की-की सिखए पड़तैक एकरा जिनगी मे करबाक लेल पास? मैम चुपचाप निहारैत रहि जाइत छथि हमर मुह निर्निमेष विदा लैत छी हम कहैत- वेश!! (२६.१०.२००८) हर्जे की चलू तिरंगा कने उड़ा ली हर्जे की। आजादी के रश्म पुरा ली हर्जे की॥ आजादी के अर्थ कोश मे जुनि ताकी। आजादी के जश्न मना ली हर्जे की॥ शुल्क-मुक्त आयात स्कॉच-सैम्पेन होइछ। शिक्षा स्वास्थ्यक शुल्क वृद्धि मे हर्जे की॥ देशक प्रगति विकास विदेशी पूँजी स। संसद हैत निलाम होउक ने हर्जे की॥ सौ-हजार भसि गेल बाढ़ि मे भसए दिऔ। राता-राती शेठ बनत किछु हर्जे की॥ रौदी-दाही सबदिना छै रहए दिऔ। जनता बाढ़ि अकाल मरत किछु हर्जे की॥ गाम-देहातक बात बैकवार्डक लक्षण। मेट्रो प्रगति निशान देश के हर्जे की॥ नेता जिन्दावाद रहओ आवाद सदा। देश चलै छै एहिना चलतै हर्जे की॥ (२६.१०.२००८) किछु क्षणिका (हाइकू) १.भोजक पान सासुरक सम्मान पुनिमाक चान २.हाथीक कान नटुआक बतान एक समान ३.दूरक चास गामक कात बास कोन विश्वास ४.बाँझीक फूल महकारीक फल के कहै भल ५.दादुर-गान डोकाक अभियान वेथे गुमान ६.हिजरा-नाच ओकिल केर साँच की ६ की पाँच (२६.१०.२००८)

44 4 4 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् निमिष झा, समाचार प्रमुख,हेडलाइंस एण्ड म्यूजिक एफ.एम.,97.2, ललितपुर, नेपाल विद्यापति- निमिष झा कोनो साहित्यमे किछ साहित्यकारसभ एहन होइत छथि जिनकर जन्म कोनो घटनाक रूपमे होइत अछि आ ओहि घटनासँ सम्बन्धित सम्पूर्ण साहित्य प्रभावित भऽ जाइत अछि । ओहन साहित्यकारक साहित्यिक व्यक्तित्व ओहि साहित्यक सर्वाङ्गीण विकासमे वरदानसिद्ध होइत अछि । ओहन साहित्यिक महापुरुष पूर्ववर्ती साहित्यिक परम्परा आदिक सम्यक अनुशीलन पश्चात अपन मान्यता एवम साहित्यिक योजना निर्दिष्ट करैत छथि । अपन कार्यसभक माध्यमसँ युगान्तकारी आ प्रभावशाली रेखा निर्माण कऽ अमरत्व प्राप्त करैत छथि । मैथिली साहित्यक इतिहासमे विद्यापति एकटा एहने अतुलनीय प्रतिभाक नाम अछि । सम्पूर्ण मैथिली साहित्य हुनकासँ प्रभावित अछि । हुनकर प्रभाव रेखाकेँ क्षीण करबाक साहित्यिक क्षमता भेल व्यक्ति मैथिली साहित्यक इतिहासमे अखन धरि किओ नहि अछि । विद्यापति मैथिली साहित्यक सर्वश्रेष्ठ कवि छथि । हुनकेमे मैथिली साहित्यक सम्पूर्ण गौरव आधारित अछि । इतिहासकार दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’क शब्दमे विद्यापति आधुनिक भारतीय भाषाक प्रथम कवि छथि । ओ संस्कृत साहित्यक अभेद्य किलाकेँ दृढ़तापूर्वक तोड़ि भाषामे काव्य रचना करबाक साहस कयलनि । हुनकरे आदर्शसँ अनुप्रेरित भऽ शङ्करदेव, चण्डीदास, रामानन्द राय, कवीर, तुलसीदास, मीरावाई, सुरदास सनक महान स्रष्टासभ अपन भक्ति भावनाक माध्यमसँ अपन मातृ भाषाकेँ समृद्ध कयलनि । मैथिली साहित्यमे विद्यापति युग ओतबे महत्वपूर्ण अछि जतबे अङ्ग्रेजी साहित्यमे शेक्सपियर युग, नेपाली साहित्यमे भानुभक्त युग, बङ्गालीमे रवीन्द्र युग तथा हिन्दीमे भारतेन्दु युग । विद्यापतिक रचनासभमे मिथिला पहिल बेर अपन वैशिष्टय भक्तिभावना, शृङ्गगारिक सरसता एवम् मौलिक साङ्गीतिक लय प्रस्फुटित भेल आभाष कयलक अछि । ओकर बाद विद्यापतिक पदावलीसभ जनजनक स्वर बनि सकल तऽ मिथिलामे युगोसँ व्याप्त असमानताक अन्त करैत विद्यापतिक रचनासभ समान रूपसँ लोकस्वरक रूप ग्रहण कऽ सकल । वास्तवमे विद्यापति युगद्रष्टा रहथि । ओ मैथिली साहित्यक श्रीवृद्धिक लेल अथक प्रयास मात्र नहि कयलनि, तत्कालीन समयमे पतनोन्मुख मैथिल समाजक पुनर्संरचनाक लेल सेहो मद्दत पहुँचौलनि । विद्यापतिक प्रादुर्भावक समयमे भारतीय उपमहाद्वीपका प्रायः हरेक भागक सभ्यता आ संस्कृति सङकटपूर्ण अवस्थामे छल । मुसलमानी शासकसभक आतङक चरमोत्कर्षमे रहल ओहि समयमे मैथिल संस्कृतिक रक्षा आवश्यक भऽ गेल छल । ओहन अवस्थामे विद्यापतिक आगमन मैथिली साहित्य आ संस्कृतिक विकासक लेल महत्वपूर्ण वरदान सिद्ध भेल । एक दिस मुसलमानी शासकसभक आक्रमण आ दोसर दिस बौद्ध धर्मक बढ़ैत प्रभावक कारण समाजमे सिर्जित वैराग्यक मनस्थितिसँ आक्रान्त मैथिल सभ्यता आ संस्कृति अपन उन्नयनक रूपमे सेहो विद्यापतिकेँ प्राप्त कऽ अपन मौलिकता बचाबयमे सक्षम भेल । विद्यापति अपन विविध रचनासभक माध्यमसँ सामाजिक पुनर्संगठनक प्रक्रियाकेँ बल देलनि । ओ समाजसँ पलायन भऽ रहल मैथिल युवासभकेँ समाज निर्माणक मूल धारामे प्रभावित करएबाक लेल अथक प्रयास सेहो कयलनि । हुनकर एहने प्रयासक उपज अछि शृङ्गगारिक रचनासभ । मुसलमानसभक आक्रमणसँ पीडित आ पलायन भऽ रहल तत्कालीन मिथिलाक युवासभकेँ मुसलमान विरुद्ध प्रयोग कऽ मिथिलाक अस्तित्व रक्षा करबाक लेल विद्यापतिक ई रचनासभ सहयोगी प्रमाणित भेल । तत्कालीन समयक लेल विद्यापतिक अहि प्रकारक चातुर्यकेँ कुटनीतिक सफलताक रूपमे देखल जा सकैया । समाजमे व्याप्त असमानाता, कुरीति, अन्धविश्वास सहित विभिन्न विसङगतिसकेँ मानव प्रेम एवम भाषा उत्थानक भरमे विद्यापति अन्त करबाक काजमे सफल छथि । विद्यापतिक सम्पूर्ण रचनासभ शृङ्गगार आ भक्ति रससँ ओतप्रोत अछि । कतेको विद्वानसभ विश्व साहित्यमे विद्यापतिसँ दोसर पैघ शृङ्गगारिक कवि आन किओ नहि रहल कहैत छथि । महाकवि विद्यापति तत्कालीन समाजमे प्रचलित संस्कृत, अवहठ्ठ आ मैथिली भाषाक ज्ञाता छलथि । ई तीनु भाषामे प्राप्त रचनासभ अहि बातकेँ प्रमाणित करैत अछि । यद्यपी विद्यापतिक जन्म तथा मृत्युक सम्बन्धमे विभिन्न विद्वानसभक विभिन्न मत अछि । तथापि मिथिला महाराज शिव सिंहसँ ओ दू वर्षक जेष्ठ रहथि । अहि तथ्यक आधार पर विद्वानसभ हुनकर जन्म तिथिकेँ आधिकारिक मानैत छथि । कवि चन्दा झा विद्यापतिद्वारा रचित पुरुष परीक्षाक आधार पर विद्यापति राजा शिव सिंहसँ दू वर्ष पैघ रहथि उल्लेख कयने छथि । जँ ई तथ्यकेँ मानल जायतऽ सन् १४०२ मे राज्यारोहणक समयमे राजा शिव सिंहक उमेर ५० वर्ष छल आ विद्यापति ५२ वर्षक रहथि । अहि आधार पर विद्यापतिक जन्म सन् १३५० मे भेल निश्चित अछि । डा.सुभद्र झा, प्रो. रमानाथ झा, पं. शशिनाथ झा आदि विद्वानसभ ई मतकेँ स्वीकार करैत छथि मुदा डा.उमेश मिश्र, डा.जयमन्त मिश्र सहितक विद्वानसभ विद्यापतिक जन्म सन् १३६० मे भेल कहैत छथि । अहिना विद्यापतिक मृत्यु प्रसङ्गमे सेहो एक मत नहि अछि । अपन मृत्युक सम्बन्धमे मृत्यु पूर्व विद्यापति स्वयंद्वारा रचित पद विद्यापतिक आयु अवसान कात्तिक धवल त्रयोदशी जानेकेँ तुलनात्मक रूपमे अन्य मत सभसँ अपेक्षाकृत युक्ति संगत मानल गेल अछि । मुदा अहिसँ वर्षक निरुपण नहि भेल अछि । विद्यापतिक जन्म हाल भारतक बिहार राज्यक मधुवनि जिल्ला अन्तर्गत बिसफी गाममे भेल छल । ई मधुवनी दरभङ्गा रेल्वे लाइनक कमतौल स्टेसन लग अवस्थित अछि । हिनक पिताक नाम गणपति ठाकुर आ माताक नाम गंगादेवी रहनि । हाल विद्यापतिक वंशजसभ सौराठमे रहति छथि । विद्यापति बालके कालसँ कुशाग्र वुद्धिक अलौकिक प्रतिभाक रहथि । अपन विद्वान पिताक सम्पर्कमे ओ प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण कयलनि । मुदा औपचारिक रूपमे प्रकाण्ड विद्वान हरि मिश्रसँ शिक्षा ग्रहण कयलनि । तहिना प्रकाण्ड विद्वान पक्षधर मिश्र विद्यापतिक सहपाठी रहनि । विद्यापति मैथिली साहित्यक धरोहर मात्र नहि भऽ संस्कृतक सेहो प्रकाण्ड विद्वान रहथि । ओ मैथिली आ अवहठ्ठक अतिरिक्त संस्कृतमे सेहो अनेको रचना कयने रहथि । हुनकर रचनासभकेँ तीन भागमे वर्गीकरण कयल जाइत अछि । क) संस्कृत ग्रन्थ ः भू–परिक्रमा, पुरुष परीक्षा, शैवसर्वस्वसार, शैवसर्वस्वसार प्रमाणभूत, लिखनावली, गङ्गा वाक्यावली, विभागािर, दान वाक्यावली, गया पत्तलक, दुर्गाभक्ति तरङ्गिणी, मणिमञ्जरी, वर्ष, व्रत्य, व्यादिभक्ति तरङ्गिणी । ख) अवहठ्ठ ग्रन्थ ः कृतिलता, कृतिपताका ग) मैथिली ग्रन्थ ः गोरक्ष विजय महाकवि विद्यापति तीन भाषाक ज्ञाता रहथि । ओ दू दर्जनसँ बेसी ग्रन्थसभक रचना कयने छथि । हुनकर बहुतो कृति सभ अखन बजारमे उपलब्ध अछि । प्रस्तुत अछि विद्यापतिक ग्रन्थसभक संक्षिप्त विवरण १) गंगावाक्यावली ः अहि ग्रन्थमे गंगा नदी आ एकर तट पर होबय बला धार्मिक कार्य अर्थात कर्म काण्डक विषयमे विस्तृत जानकारी अछि । गंगा वाक्यावलीक रचना विद्यापति रानी विश्वास देवीक आज्ञासँ कयने रहथि । कृतिमे गंगा नदीक स्मरण, कीर्तन, गंगा तट पर प्राण विसर्जनक महात्म्य वर्णन अछि । २) दानवाक्यावली ः राजा नरसिंह दपंनारायणक पत्नी रानी धीरमतीक आज्ञासँ ई ग्रन्थक रचना भेल अछि । अहिमे सभ प्रकारक दान विधि विधान विस्तार पूर्वक कयल गेल अछि । ३) वर्षकृत्य ः अहि ग्रन्थमे वर्ष भरि होबयबला प्रत्येक पावनि तथा शुभ कार्यक विस्तृत विधान प्रस्तुत अछि । तहिना पूजा, अर्चना, व्रत, दान आदि नियमक सम्बन्धमे सेहो चर्चा कयल गेल अछि । ४) दुर्गाभक्तितरंगिणी ः दुर्गाभक्तितरंगिणीकेँ दुर्गोत्सव पद्धतिक नामसँ सेहो जानल जाइत अछि । विद्यापति एकर रचना राजा भैरव सिंहक आज्ञासँ कयने रहथि । अहि ग्रन्थमे कालिका पुराण, देवी पुराण, भविष्य पुराण ब्रह्म पुराण, मार्कण्डेय तथा दुर्गा पूजाक पद्धति संग्रहित अछि । ५) शैवसर्वस्वसार ः राजा पद्मम सिंहक पत्नी विश्वास देवीक आज्ञासँ रचित अहि ग्रन्थमे महाकवि विद्यापति भगवान शिवक पूजासँ सम्बन्धित सभ विधि विधानक वर्णन कयने छथि । अहि ग्रन्थकेँ शम्भुवाक्यावली सेहो कहल जाइत अछि । ६) गयापत्तलक ः गयापत्तलक ग्रन्थक रचना कोनो राजा या रानीक आदेशसँ नहि भेल अछि । अहि ग्रन्थक सम्बन्ध सामान्य जनतासँ अछि । गयामे श्राद्ध एवम पिण्ड दान तथा गया जा कऽ पितृ ऋणसँ मुक्त होबाक महात्म्य ग्रन्थमे अछि । ७) विभागसार ः विद्यापति विभागसारक रचना राजा नरसिंह देव दपंनारायणक आदेशसँ कयलनि । अहिमे दायभागक संक्षिप्त मुदा सुन्दर आ आकर्षक विवेचन अछि । मिथिलामे तात्कालीन दायभाग आ उत्तराधिकार सम्बन्धी विधानक लेल ई प्रमाणिक ग्रन्थ मानल जाइत अछि । ८) लिखनावली ः राजा शिवसिंह तिरोधान भेलाक बाद विद्यापति रजाबनौलीमे राजा पुरादित्यक आश्रममे अहि ग्रन्थक रचना कयलनि । ई ग्रन्थमे पत्राचार करबाक विधिकेँ स्पष्ट व्याख्या कयल गेल अछि । अपनासँ पैघ, छोट, समान तथा नियम व्यावहारपयोगी सहित चारि प्रकारक पत्रक उल्लेख अछि । ग्रन्थसँ मिथिलाक तात्कालीन सामाजिक आ सांस्कृतिक अवस्थाक परिचय भेटैत अछि । ९) शैवसर्वस्वसार प्रमाणभूत संग्रह ः शैवसर्वस्वसारक रचनाक बाद विद्यापति अहि ग्रन्थक रचना कयने रहथि । अहिमे शैवसर्वस्वसारक प्रमाणभूत पौराणिक वचनक संग्रह अछि । १०) व्याडिभक्तितरंगिणी ः ई लघु ग्रन्थमे सर्पिणीक पूजाक वर्णन अछि । विभिन्न पौराणिक कथा सभ उल्लेख अछि । ११) द्वेतैनिर्णय ः ई एक तन्त्र शास्त्रीय लघु ग्रन्थ अछि । जाहिमे तन्त्र शास्त्रक गुप्त चर्चा कयल गेल अछि । अहि ग्रन्थसँ विद्यापतिकेँ तन्त्रक सेहो विशद ज्ञान रहल प्रमाणित होइत अछि । १२) पुरुषपरीक्षा ः राजा शिव सिंहक निर्देशन पर रचित ई ग्रन्थकेँ विद्यापतिक उत्तम कोटिक ग्रन्थ मानल जाइत अछि । पुरुषपरीक्षामे वीर कथा, सुवुद्धि कथा, सुविद्य कथा आ पुरषार्थ कथा नामक चारि वर्गक पञ्चतन्त्रक शिक्षाप्रद कथा सभ समाविष्ट अछि । समाजशास्त्री, इतिहासकार, मानवशास्त्री, राजनीति शास्त्री सहित दर्शन एवम साहित्य विधाक व्यक्तिक लेल ई अपूर्व कृति अछि । १३) भूपरिक्रमा ः ई विद्यापतिक अत्यन्त प्रभावकारी ग्रन्थ अछि । राजा देव सिंहक आज्ञासँ भूपरिक्रमाक रचना कयल गेल अछि । ग्रन्थमे वलदेवजीद्वारा कयल गेल भूपरिक्रमाक वर्णन अछि । तहिना नैमिषारण्यसँ मिथिला धरिक सभ तीर्थ स्थलक वर्णन सेहो अछि । १४) कीर्तिलता ः कीर्तिलताक रचना विद्यापति अवहठ्ठमे कयलनि अछि आ अहि ग्रन्थमे राजा कीर्ति सिंहक कीर्ति कीर्तन अछि । मिथिलाक तात्कालीन राजनीतिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक स्थितिक अध्ययनक लेल ई ग्रन्थ महत्वपूर्ण मानल जाइत अछि । ग्रन्थसँ विद्यापतिक प्रौढ़ काव्य कलाक प्रमाण भेटैत अछि । तहिना विकसित काव्य प्रतिमाक दर्शन सेहो होइत अछि । १५) कीर्तिपताका ः अहि ग्रन्थमे राजा शिवसिंहक बहुत चतुरतापूर्वक यशोवर्णन अछि । ग्रन्थक रचना दोहा आ छन्दमे अछि । ग्रन्थक आरम्भमे अद्र्धनारीश्वर, चन्द्रचूड शिव आ गणेशक बन्दना अछि । कीर्तिपताका खण्डित रूपमे मात्र उपलब्ध अछि । एकर ९ सँ २० धरिक जम्मा २१ टा पृष्ठ अप्राप्त अछि । तीसम पृष्ठमे राजा शिव सिंहक युद्ध पराक्रमक वर्णन अछि । १६) गोरक्षविजय ः ई एक एकांकी नाटक अछि । अहिमे विद्यापतिक नूतन प्रयोग सेहो अछि । गोरक्षनाथ आ मत्स्येन्द्रनाथक कथा पर नाटक आधारित अछि । ग्रन्थक रचना राजा शिव सिंहक आदेशसँ कयल गेल छल । १७) मणिमंजश नाटिका ः ई एक लघु नाटिका अछि । नाटिकामे राजा चन्द्रसेन आ मणिमंजरीक प्रेमक वर्णन अछि । १८) मैथिली पदावली ः विद्यापतिक मैथिलीमे रचित पदावलीक संग्रहित ग्रन्थ अछि मैथिली पदावली । लिखित संकलनक अभावमे विद्यापतिक गीत अपन माधुर्यक कारण लोक कण्ठमे जीवित छल आ बहुत बाद एकर समग्र रूपमे संकलित करबाक प्रयास कयल गेल । यद्यपी अनेक संग्रहसभमे विद्यापतिक गीतक संकलित भेल अछि । पदावलीमे राधा एवम कृष्णक प्रेम प्रसंग गेय पदमे प्रकाशित अछि । हाइकू चाँदनी राति नीमक गाछ तर जरैछ आगि। गरम साँस छिला गेलैक ठोर प्रथम स्पर्श। परिचित छी जीवनक अन्तसँ मुदा जीयब। बहैछ पछबरिया जरै उम्मिदक दीया उदास मोन। पीयाक पत्र किलकिञ्चत् भेल उद्दीप्त मोन श्रम ठाढ़ छै श्रमिक पड़ल छै मसिनि युग। मृत्युक नोत जीबाक लेल सिखु देब बधाइ।

11 1 1 अशोक दत्त , जनकपुर, नेपाल दू टप्पी पतुरियासन मुस्की मगरसन नोर नेने भोरसं सांझधरि फ़ुसिएटा परसैए गिरगिट त दुनियांमे ब्यर्थे बदनाम अछि गिरगिटसं बेशी मनुक्ख रंग बदलैए लुत्ती करेजपर चोट लगै छै त लुत्ती जनमै छै केओ जं घात करै छै त लुत्ती जनमै छै फ़ाटल चाहे जत्ते हो देहके वस्त्र मुदा चीर पर हाथ बढै छै त लुत्ती जन्मै छै रहओ केहनो अपन मडैया बडा नीक लगैछ बास उपट' लगै छै त लुत्ती जनमै छै ल कर्मक रङकुच्ची बनबैया अपन फ़ोटो ओ फ़ोटो डहै छै त' लुत्ती जनमै छै सोनित या पानि धर्ती होइछै समान सभके भेदके रङ चढ़ैछै त लुत्ती जनमै छै बुझि छाउर सर्द चाहे जत्ते खेल करए बात जं हकके अबैछै त लुत्ती जनमै छै Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 अजीत कुमार झा, गोवराही, दुहबी-6, धनुषा, कनकपुर नेपाल। सम्प्रति, हानवेल, यूके.मे अध्ययन काका काकी दहेज लेलथि

कक्का भोरे बिदा भेलाह जीट-जाट आ कान्हि छटा पुछलहुँ कक्का एना कतए कहल जे जाइ काल टोक नञि ने अबए छी कने बजार भेने मीठ पकवान आ मिठाई नेने एम्हर काकी घरकेँ नीपल सर सफाई कका चमका रहल कोन अवसर जे एना भ’ की रहल पुछलहुँ जे काकीसँ कहलनि बौआ आइ घटक आबि रहल

अच्छा तँ दोकानक सजावट छी ई ग्राहकक स्वागतक तैयारी छी ई सभ किछु आइ नव तेँ लागि रहल भाइजीयोक मुँह चमकि रहल कान्हि छटाक’ केश रँगा क’ पान चबाबैत कुर्तामे बान्हल जतेक बढ़िया समान ततबे बढ़िया दाम बनीमाक राज कक्काक’ खूब नीकसँ बुझल

घटक जी अएला निहारि क’ देखला ठोकि बजा क’ सभ किछु परखला भाइजीपर ओ’ फेर बोली लगेलथि मोल तोल केँ ल’ क’ खूब भेल घमर्थन सवा चारि लाखमे भेल बात पक्का देखू आजु हम्मर भैयि बिकेलथि लागनिक सूद-मूर सभ उप्पर भेलन्हि जमा-पूँजीकेँ खूब नीकसँ भजओलथि कक्का काकी आइ हमर दहेज लेलथि निमुख बरद जेकाँ भैय्या बिकेलथि कक्का काकी आइ हमर दहेज लेलथि Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 धर्मेन्द्र विह्वल-जन्म विक्रम सम्वत २०२३-१२-०४, बस्तीपुर सिरहा,शिक्षा : एम ए ( मैथिली/राजनीतिशास्त्र ),डिप्लोमा ईन डेभलपमेन्ट जर्नालिज्म,प्रकाशित कृति : एक समयक बात (वि स २०६१ मैथिली हाईकु संग्रह ),रस्ता तकैत जिनगी (वि स २०५०/ कविता संग्रह ),एक सृष्टि एक कविता (२०५७/ दीर्घ कविता ),हमर मैथिली पोथी ( कक्षा 1 सं ५ धरिक पाठय पुस्तक ),सम्प्रति : सभापति, नेपाल पत्रकार महासंघ किछु छौंक १) बदनामी– प्रेम आ सिनेहकेँ सरेबजार निलाम नहि करू गौरवमय इतिहासकेँ एना बदनाम नहि करू । २) विज्ञापन जानि नहि आदमीक जंगलमे हम कतय हेरा रहल छी अखवारक ढ़ेरमे हम जिनगीक विज्ञापन ताकि रहल छी । ३) इज्जत खुलेआम इज्जत बिका रहल अछि दाम दऽ झट कीनि दिअ जल्दि करू स्टक सीमित अछि । Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् नवेन्दु कुमार झा समाचार वाचक सह अनुवादक (मैथिली), प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी, पटना आब प्रवासक आश- कोसी क्षेत्रमे आएल भीषण बाढ़िसँ ई क्षेत्र तबाह भऽ गेल अछि। वर्तमान परिदृश्य महान कथाकार फणीश्वर नाथ रेणुक “परती परिकथा” दिस लोक ध्यान खींचि रहल अछि। कोसीक मारि सहैत कतेको लाखक आबादीकेँ ओहि दिन राहत भेटल छल जखन कि बिहारक शोक कहल जाएवाला नदी कोसीपर तटबंधक निर्माण भेल छल। आशा जागल जे ई क्षेत्र आब सोना उगलत। ई भेबो कएल। मुदा १८ अगस्त २००८ केँ पूरा परिदृश्य बदलि गेल। सरकारक लापरवाही चाहे ओ केन्द्र सरकारक हो कि राज्य सरकारक ई क्षेत्र एक बेर फेरसँ बालूक ढेर बनि गेल। जे नदी एहि क्षेत्रकेँ बसौलक ओहि नदीक कारण एक बेर फेर क्षेत्र विरान भऽ गेल। विकास दौरसँ ई क्षेत्र चलि गेल पचास वर्ष पाछाँ। एशिया क्षेत्रमे सभसँ उपजाऊ मानल जाएबला एहि क्षेत्रमे एखन बाँचल अछि तँ ओऽ छथि अपन घर-घरारी छोड़ि शरणार्थी बनल बाढ़ि पीड़ित आ पसरि रहल बिमारी आ बाँचल अछि जिनगी कटबाक आशा। मलेरिया सन महामारीक लेल बदनाम एहि क्षेत्रमे किछु वर्षसँ जे हरियरी देखाइत छल ताहिपर पानि पसरि गेल। गहूम, मकई आ धानक लहराइत खेत देखबाक चिन्तामे लागल अछि लोक। खेतीपर निर्भर एहि क्षेत्रक अर्थव्यवस्थापर जे घाव भेल अछि से कतेक दिनमे भरत से निश्चित नहि बुझि पड़ैत अछि। ओना तँ एहि क्षेत्रक एकटा पैघ आबादी एखनो प्रवासी छल मुदा जे एखन छलाह तिनको ई बाढ़ि प्रवासी बनबापर विवश कएलक अछि। खेतीक बाद जाहिसँ एहि ठामक अर्थव्यवस्था चलैत छल ओ अछि मनीआर्डर। मनीआर्डरक भरोसे लोक कहुना जिनगी कटैत छल। आब ओकरो अपन जिनगी पहाड़ लागि रहल अछि। राहत शिविर आ सुरक्षित स्थानपर शरण लेने एकटा पैघ आबादीकेँ अपन भविष्य प्रवसी बनबामे बुझि पड़ैत अछि। ओऽ आब बिचारि लेने अछि जे घर गृहस्थीकेँ पटरीपर आनब बिनु प्रवासी बनने संभव नहि अछि। कोसी क्षेत्रक कतेको रेलवे-स्टेशनपर लगातार बढ़ि रहल भीड़ एकर प्रमाण अछि। कतेको माय-बाप-भाइ-बहिन अपन-अपन परिजनकेँ घर-घरारीक चिन्ता नहि करबाक आशा देआ प्रदेशक लेल बिदा कऽ रहल छथि। किएक तँ जिनगी कटबाक एकमात्र रास्ता ओकरा मनीआर्डर बुझि पड़ैत अछि। एहि ठाम तँ सभ किछु उजड़ि गेल अछि। आब एकमात्र आशा प्रवासी बनि रहल परिजनक मनीआर्डर मात्र अछि जाहिसँ फेरसँ घर गृहस्थीकेँ पटरीपर आनल जाऽ सकैत अछि। ओकरा एहि बातक कोनो चिन्ता नहि अछि जे देशक कतेको भागमे बिहारी सभक विरुद्ध गतिविधि चलाओल जा रहल अछि। ओऽ तँ आब ई मानि लेलक अछि जे एहि ठाम एखन कोन जिन्दा छी जे प्रदेशमे कोनो अनहोनी घटनाक शिकार भऽ जाएब। ई एहि बातक प्रमाण अछि जे पेट आगिक सोझाँ प्रदेशमे होमए वाला कोनो तरहक अनहोनीक कोनो मोल नहि अछि। अपन आँखिसँ कोसीक धारमे बहैत अपन लोक, आर-परोस आ परिचितक लहाससँ एहि क्षेत्रक लोक हृदय पाथर भऽ गेल अछि। बाँचल जिनगी कटबाक लेल मृत्युक सामना करएसँ आब कोनो घबराहटि ओकरा नहि छै। कोसीक तटबन्ध टुटलाक बाद आब सरकारी स्तरपर जाँच, कार्वाई आ आयोगक गठन आदि खानापूर्ति भऽ रहल अछि आ होएत एहिसँ ओकरा कोनो माने मतलब नहि रहि गेल छै। आब चिन्ता छै तँ बस अपन घर-घरारी बसेबाक आ अपन परिवारक भविष्य रक्षा करबाक। बाढ़ि पीड़ितक लहासपर राजनीति, राहत आ बचाव काजक नामपर सरकारी खजाना लुटाएत, वोटक लेल गोलबन्दी होएत मुदा अगिला साल फेर कोसीक तांडव नहि होएत आ राजनेता, अधिकारी आ सरकार अपन जिम्मेदारी निर्वाह करताह एकर कोनो गारंटी नहि अछि।

11 1 1 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् प्रकाश झा, ग्राम+पो.- कठरा, भाया-पुटाई, थाना- मनीगाछी, दरभंगा, बिहार (भारत) हमर मिथिलाक दर्शन मैथिल छी हम, मैथिली बजबामे अछि कोन लाज देश हो वा परदेश ज्यो हम करै छी ओऽ तऽ काज मिथिला के याद करबैछ सदिखन, विद्यापतिजी माथपर शोभैत पाग। हमरा लोकनिक पिता जनक, बहिन सीता, बहनोइ छथि राम कमला-कोशी अछि चरण जकर पखारैत ओ अछि हमर मिथिला धाम। मैथिल कवि लोकनिक पोथीमे पढ़ैत रहए छी जे खिस्सा मनमे उठैत रहैत अछि जिज्ञासा जे आओर कतेक बाकी अछि प्रशंसा कोइलिक कु-कू राग सुनि मोन म मारऽ...लगैत अछि टीस तखने किछु काल बाद नम्र हृदय सऽ निकलैत अछि गोसाउनिक गीत विद्यापति, मण्डन, अयाची आऽ मैथिलपुत्र प्रदीप हिनकर लोकनिक सुन्दर लेखन पढ़ि मोनमे जड़ैत अछि शब्दक दीप एहि मातृभूमिपर पान, मखान, खराम कऽ अछि एकटा इतिहास बाढ़-बोन के आड़ि-धुरपर बैस, नीक लगैछ मड़ुआ रोटी- सागक स्वाद। चहु ओर हरियाली, घर फूसक, लच-लच करैत ओऽ खरहीक टाट। भोरे सुइत-उठि कए बाधमे सुन्दर लगैत अछि शीतल घास। घरक चारपर कुम्हर, कदीमा आओर सजमनिक अछि लत्ती पसरल नजरि नञि लागए कोनो डैनियाहीके, ताहि लऽ एकटा खापैड़मे कारी-चून लेपल राखल। पछबाड़ि कातक बारीमे राखल एकटा कटही गाड़ी पुरान बाबू-कक्का चौकपर बैसल, बाबा धेने छथि दलान। आब कतेक हम विवरण करबए, शब्दसँ अछि ठेक भरल मिथिलांचलमे मैथिली भाषाक लेल छी हम मैथिल भिड़ल मिथिला चित्रकला एखनो धरि केने अछि राज देश-विदेश संगहि प्रकाशझाक ई प्रस्तुति पढ़ि बुझबइ एकटा छोट सनेस।

44 4 4 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् जन्म 3 जनवरी 1936 ई नेहरा, जिला दरभंगामे। 1958 ई.मे अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर, 1959 ई.मे लॉ। 1969 ई.मे कैलिफोर्निया वि.वि.सँ अर्थस्थास्त्र मे स्नातकोत्तर, 1971 ई.मे सानफ्रांसिस्को वि.वि.सँ एम.बी.ए., 1978मे भारत आगमन। 1981-86क बीच तेहरान आ प्रैंकफुर्तमे। फेर बम्बई पुने होइत 2000सँ लहेरियासरायमे निवास। मैथिली फिल्म ममता गाबय गीतक मदनमोहन दास आ उदयभानु सिंहक संग सह निर्माता।तीन टा उपन्यास 2004मे चमेली रानी, 2006मे करार, 2008 मे माहुर। माहुर ..1.. दृ”आह! भैया आबि गेला। हाथ मे पोटरी छनि। अबस्से ओहि मे ‘मीट’, अरे! नहि माता दुर्गाक परसाद हेतनि!“ रंजना बाजलि छलीह। ओ दौड़ैत आंगन सँ बाहर एलीह। हुनका भाइजीक हाथ मे ठीके पोटरी छलनि जाहि मे ‘मीट’ रहैक। भाइजी अपन हाथक पोटरी रंजनाक हाथ मे देब’ चाहलनि। फेर, ने जानि हुनका की मोन पड़लनि जे अपन पोटरी बला हाथ क¢ँ पाछाँ घीचि लेलनि। ओ बूत बनि ठार भ’ गेला। भाइजीक ठोर मे कंपन होब’ लगलनि, आँखि सँ ढबढब नोर बह’ लगलनि आ हुनक समग्र शरीर थर-थर काँपए लगलनि। भाइजी अर्थात आकाश सँ हुनक एकमात्रा छोट बहिन रंजना हुनका सँ बारह बर्खक छोट छलथिन जे आब पन्द्रहम मे पयर रखने छलीह। ओ सलवार-कुर्ती पहिरने छलीह। हाथ मे चूड़ीक स्थान पर घड़ी बान्हल छलनि। पुछू किएक? रंजना विधवा छलीह। पछिला आषाढ़ मे रंजनाक विवाह कमीशन प्राप्त सेकेण्ड लेफ्टिनेन्ट भास्कर चैधरी सँ भेल रहनि। एक महिनाक अवकाश समाप्त भेला पर भास्कर चैधरी अपन ड्यूटी पर कश्मीर पहुँचल छला। ओतहि आतंकवादीक संग मुठभेर मे शहीद भ’ गेलाह। रंजना विधवा भ’ गेलीह। आकाश लगक शहर दरिभंगाक एक बैंक मे कार्यरत रहथि। ओ गामहि सँ स्कूटर पर बैंक जाथि आ आबथि। अष्टमी रहैक आ बैंक दशहराक छुट्टी मे बन्द छलै। गामेक दुर्गा स्थान मे बलिप्रदान कएल छागरक भड़ाक माँउस पुजेगरीक आदेश सँ बिकाइत छलै। ओही ठाम सँ आकाश एक किलो ‘मीट’ आ की परसाद जे कहियौ कीनि क’ अनने रहथि। सम्प्रति जे दृश्य उपस्थित भेल छलै ओहि मे आकाश हाथ मे मीटक पोटरी टंगने थरथराइत ठार रहथि। हुनका आँखि सँ दहो-बहो नोर बहि रहल छलनि। हुनक पत्नी, पांच बर्खक बेटी सुजाता, माता-पिता सभ कियो ढलानक एक कात ठार डबडबाएल आँखिए देखैत चुपचाप आकाश दिस ताकि रहल छलथिन। रंजना ठीक आकाशक सामने छलीह। हुनक बाल सुलभ सदृश मुख-मंडल पर बड़ी टा प्रश्न चिन्ह बनि गेल छल। काजर पोतल आँखि मे रंजनाक समग्र भविष्य धह-धह धधकि रहल छल। त¢ँ नोरक एकोटा बून्न देखाइ नहि पड़ि रहल छल। परिवारक क्रंदन बीच रंजना एक अजीबे दृष्टि सँ अपन भ्राता, आकाश क¢ँ निहारि रहल छलीह। बड़ी काल सँ अंटकल आकाशक कंठ सँ कुहरैत शब्द बाहर भेलदृ”हे भगवान! हम ई की कएल? कियक हम ‘मीट’ कीनल?“ एतबा बाजि आकाश मीट’क पोटरी क¢ँ नाला मे फेकि, दुनू हाथे माथ पकड़ि, नीचा जमीन पर बैसि हबोढेकार कान’ लगलाह। आब रंजना क¢ँ छोड़ि परिवारक सामूहिक क्रंदन सँ स्थान पीड़ादायक बनि गेल। मात्रा रंजना अविचल ठार रहलीह आ शून्य नजरि सँ सभ किछु देखैत रहलीह। हम कोन तरहक खिस्सा सुनाब लगलहुँ। इहो कोनो खिस्सा भेलै? रंजनाक विवाह लड़ाइक सिपाही संग भेल छलनि। ताहू मे एहन सिपाही सँ जनिक नियुक्ति कश्मीर मे आतंकवादी सँ भिड़न्त मे भेल होअय। तखन त’ प्राण जायब करीब-करीब निश्चिते छलै। त¢ँ रंजना विधवा बनलीह। अहि मे अजगुत बला कोनो बात नहि भेलै। दुखक बात जँ रहै त’ एतबेटा जे जाहि जाति मे रंजनाक जन्म भेल रहनि ओहि जाति मे पुनर्विवाहक नियम नहि रहैक। ओहि जातिमे आ सनातन सँ आयल परम्परा मे विधवाक निदान हेतु कोनो टा व्यवस्था नहि रहैक। रंजना विधवा भेलीह त’ भेलीह। पूर्वजन्मक पाप ओ नहि भोगती त’ के भोगत? त¢ँ ई मात्रा ओहने आ ओतबेटा बात भेल जेना मनता मानल कोनो पाठीक बलि पड़ल होअय। आब अहाँ कहबै जे ई कोन तरहक मिलान भैलै? नहि अरघै अछि, त’ सुनू। मनता मानल पाठी-छागरक बलि पड़ै काल बलि देनिहार, कबुला केनिहार एवं बाँकी सभटा तमाशा देखनिहार एतबे ने सोचैत छथि यौ जे हरदि, मिरचाइ आ मसल्ला मे भूजल एकर माँउस मे कतेक सुआद हेतै? तहिना विधवा भेलि रंजना द’ सभ सोच’ लागल छथि जे ई आब सासुर त’ जेतीह नहि, गामहि मे रहतीह। गाम मे सभहक टहल-टिकोरा करतीह, अदौरी-कुम्हरौरी खोंटतीह, अँगने मे भानस-भात करतीह, एकरा-ओकरा संग तीर्थाटन जेबा काल भनसिया बनि क’ जेतीह आ छौंड़ा सँ लगाति बूढ़बा तकक करेजक तपन मेटौती। त¢ँ बरसामबाली काकी कहने रहथिन यौ, भगवान सभहक सभटा इन्तजाम बैसले-बैसल ‘क’ दैत छथिन। दूर जो, मनसा सभहक लप-लप करैत जिह्वा आ आँखिक खोराकक पूर्ति सदिकाल सँ बाल-विधवे सँ पूर्ति होइत रहलै अछि। ई कोनो नुकायल गप्प छैक? आब अहीं कहू जे मनता मानल पाठी आ विधवा भेलि रंजना मे की फर्क? कोनो तरहक शिकायत करब सेहो युक्ति संगत नहि होयत। त¢ँ आब नीक होयत जे अहि खिस्सा क¢ँ अही ठाम विराम द’ क’ ओही गाम मे ओही दिन घटल दोसर घटनाक जानकारी प्राप्त करी। गामक नाम भेल पानापुर। पानापुर मे सभ जाति, समुदाय एवं सम्प्रदायक लोकक निवास। गाम आर्थिक रूपे सम्पन्न। ओहि गाम मे छल एकटा दुर्गा मंदिर, जे दस-बीस कोस दूर तक प्रसिद्ध छल। पैघ पोखरिक पूबरिया भीड़ पर तीन-चारि बीघा मे पसरल मंदिर आ मंदिरक परिसर। मंदिर मे दुर्गाक भव्य प्रतिमा। तकरबाद मंडप, पुजारीजीक आवास आ सदिकाल खल-खल हँसैत, स्वच्छ, विशाल समतल भूमि। दशहराक समय मे अही स्थान पर मेला, नौटंकी, नाच-गान आदि आयोजित होइत छल। दुर्गा मंदिरक पुजारी छलाह काली कान्त ओझा। दुब्बर-पातर, साँची धोती, खोंसल ढेका, छाती पर उगल पंक्तिबद्ध हड्डीक उपर दू भत्ता फहराइत जनउ, गौ-खूँर बरोबरि टीक, पयर मे खराम आ ललाट पर सेनुरक ठोप। पुजारीजी सज्जन आ मृदुभाषी छलाह। वैष्णव त’ओ छलाहे आ सप्ताह मे अधिक दिन उपासे मे रहैत छलाह। मुदा हुनक पत्नी अढ़ाइ मोनक पट्टा छलथिन। थुलथुल देह, खुजल कारी केश, नाक सँ मांग तक पतिव्रताक निशानी स्वरूप सेनुरक डरीर, पान-जर्दा दुआरे कारी भेल दाँत आ बीड़ी त’ ओ नैहरे सँ पिबैत आयल रहथि। जँ जुमनि त’ नित्य माँउस-माँछ चाहबे करी। दू अगहनी जोड़ दू रब्बी गुण दू बरोबरि मंदिरक बर्ख भरिक अन्न-टाकाक आमदनी पर हुनक पूर्ण एकाधिकार छलनि। पुजारीजी पत्नीक सोझा मे आब’ मे कँपैत छलाह। शारीरिक दुर्बलता अथवा धार्मिक अजीर्णता, कारण जे हौउ, पुजारी जी सदिकाल पत्नी सँ डेरायल रहैत छलाह। तखन पुजारीजी के संतान स्वरूप पुत्राक प्राप्ति भेलनि कोना? ई रहस्यक विषय अवस्से छल। मुदा अहि रहस्यक छेदन नीति शास्त्रा ज्ञाता कइएक बेर क’ चुकल छथि। हुनका लोकनिक अनुसारे पति-पत्नीक ग्रह-नक्षत्रा कतबो उल्टा-पुल्टा किएक ने हौउक, प्रचुरता एवं परिपक्कता बेला मे कखनहुँ काल अर्द्ध-विराम पूर्ण विराम भैए जाइत छैक। पुजारीजीक पुत्राक नाम रहनि यदुनाथ ओझा। पैघ भेला पर यदुनाथक उपनयन भेलनि आ बर्ख भरिक भीतरे विवाह सेहो भ’गेलनि। यदुनाथक पत्नी अर्थात पुजारीजीक पुतहु जखन दुरागमन भेला पर सासुर अयलीह त’ हुनक अनुपम सौन्दर्यक दुआरे सम्पूर्ण पानापुर गाम महमही सँ गमकि उठल। यदुनाथ त’ अपन बापक कार्बन काॅपी छलाह। मुदा हुनक पत्नी जनिक नाम छल कामिनी, तनिका जे देखलक सैह विभोर होइत बाजल छलदृ”माइ गे माइ! एतेक रूप पुजारी जीक सन्दुक-पेटार मे झाँपल कोना रहतैक? कोनो अनहोनी ने भ’ जाइक?“ अष्टमीक निस्तब्ध राति। पानापुर गामक सभटा मनुक्ख भरि दिन नाच तमासा देखलक, इच्छा भरि नशा केलक आ भरि पेट माँउस-भात खाए थाकि क’ झुरझमान भ’ सुति रहल। मुदा चोर-उचक्का, अत्याचारी एवं व्यभिचारी किस्मक लोक क¢ँ राति मे निन्न होइते ने छैक। ओहन लोक रातिए मे अपन इच्छा-पूर्तिक जोगार करैत अछि। ओहने राक्षस प्रवृतिक श्रेणी मे छल बिदेसरा कुएक। गाम मे एकटा अस्पताल अवस्से छलै। मुदा डाक्टर महिना, दू महिना मे कहिओ काल अबैत छलाह। गामक स्वास्थ्य विभाग कुएकक जिम्मा छल। ओना सड़क-छाप बहुतो कुएक छल। मुदा बिदेसरा कुएक सभ सँ तेज-तर्रार मानल जाइत छल। ज्वर-धाह राति-विराति कखनो-ककरो भ’ सकैत छलै। ताहि कालक भगवान छल बिदेसरा कुएक। ककरा मे एतेक साहस रहै जे बिदेसरा कुएक सँ तकरार करितय। नाड़ी देखै लेल अथवा सूइया भोंकै लेल बिदेसरा कुएक ककरहु आंगन मे कखनहुँ प्रवेश क’ जाइत छल। ओकरा कोनो रोक-टोक नहि रहैक। जहिया सँ यदुनाथ दुरागमन करा क’ अयलाह आ सुन्दर कनिआँक कारणें गाम भरिक छौंड़ा सभहक बीच इर्खाक मूर्ति बनलाह तहिया सँ बिदेसरा कुएक हुनका मे अधिक काल सटले रहैत छल। चाह-नास्ताक संग चोटगर-मिठगर गप-सप कहि बिदेसरा कुएक यदुनाथक मोन क¢ँ मोहैत रहल आ अन्ततः हुनकर अभिन्न मित्रा बनि गेल। एहना मे जिगरी यार बिदेसरा कुएकक फर्माइस यदुनाथ पूर्ति कोना नहि करितथि? ओही अष्टमीक राति बुझू निशा पूजा निमित्ते, दुनू यार बैसल रहथि। स्थान छल यदुनाथक शयन-कक्ष। पुजारीजीक आवास मे पहिने छल कनेटा खुजल दरबज्जा। तकरबादक कोठली मे पुजारीजी पत्नीक संग रात्रि विश्राम करैत छलाह। तकर सटले भंडार आ भनसाघर। सभ सँ अन्त मे जे कोठली छल सैह भेल यदुनाथक शयन-कक्ष। दुरगमनिआँ पलंगक एक कात टेबुल आ कुर्सी। देवाल पर सिनेमाक अभिनेत्राीक नयनाभिराम फोटोक बीच भगवतीक फोटो। खिड़की-केबाड़ पर्दा सँ झाँपल। दू गोट कुर्सी पर यदुनाथ आ बिदेसरा कुएक आमने-सामने बैसल छल। बीचक टेबुल पर एकटा फूलदार विदेशी शराबक खुजल बोतल, पानि सँ भरल जग आ दू गोट शीशाक गिलास राखल रहैक। ताही काल यदुनाथक कनिआँ कामिनी छिपली मे भुजल माँउस टेबुल पर रखलनि आ पतिक अगिला आदेशक प्रतीक्षा मे एक कात ठार भ’ गेलीह। हुनक गोरकी बाँहि मे सटल करिका ब्लाॅउज ककरो एक बेर आरो देखीक’ लोभ मे पटकि सकैत छल। बिदेसरा कुएक अपन नजरिक नोक क¢ँ कामिनीक उठल ब्लाॅउज मे भोंकैत बाजलदृ”यार, एतय सभ ठर्रा पिबैत अछि। मुदा अहाँ लेल हम दरिभंगा सँ सय टाका मे असली अस्सी प्रतिशत प्रूफ अल्कोहलबला ‘जीन’ मंगौलहुँ अछि। आब बिलम्ब नहि क’ एकरा टेस्ट करियौ।“ दू टा गिलास मे शराब ढारल गेल, पानि मिलाओल गेल, गिलास टकराओल गेल आ तखन दुनू यार पिअब शुरू केलनि। माँउस निघंटि गेल। कोनो बात ने, कामिनी छिपली भरी भूजल माँउस फेर सँ अनलनि। यदुनाथ पहिले पैग मे डोलि गेल छलाह। शराब पचेबाक ने हुनका काया रहनि आ ने प्राइटिस। दोसर पैग समाप्त करैत-करैत यदुनाथक आँखिक डिम्हा सँ टर्चक फोक्सिंग बाहर होब’ लगलनि। तेसर पेगक आरम्भे मे कामिनी फेर सँ भूजल माँउस आन’ चलि गेल रहथि। जाबे ओ घूमि क’ एलीह ताबे हुनक नाथ पलंग पर चित बेहोश पड़ल रहथिन आ हुनकर थुथून सँ सा¢ँ-सौंक अबाज प्रसारित भ’ रहल छल। कामिनीक हाथ मे तेसर खेपबला भूजल माँउसक छिपली छलनि। ओ थकमकाइत ठार भ’ गेलीह आ पलंग पर पड़ल अपन स्वामी क¢ँ टकटक देख’ लगलीह। किछु समय लेल कामिनीक मस्तिष्कक सोचक यंत्रा मे ब्रेक लागि गेलनि। बेगूसराय सँ खगड़िया जेबाक ‘हाइ वे’क दक्षिण गंगाक तटपर बसल छल पिहुआ नामक गाँव। ओही गामक मंदिरक पुजारीक कन्या छलीह कामिनी। गंगाजल सँ घोअल मंदिरक पवित्रा परिसर मे कामिनीक जन्म आ पालन-पोषण भेल रहनि। सासु-ससुरक सेवा एवं पतिक आदेशक पालन करबाक बीज मंत्रा ल’क’ कामिनी सासुर आयल रहथि। मुदा सासुरक वातावरण किछु अलगे तरहक रहैक। सासुक बीड़ी पिअल मुँहक गंध सँ कामिनी क¢ँ मितली होब’ लागनि, असरधा होनि। मुदा ओ अपना क¢ँ रोकथि आ बुझबथिदृकोनो बात नहि। नव स्थान मे एना प्रायः होइते छै। सभटा अपने आप ठीक भ’ जेतै! केवल धैर्यक निर्वाह चाही। यद्यपि ई बात हुनका कियो सिखौने नहि छलनि। मुदा आन-आन नव विआहलि कन्या जकाँ एकर विश्वास हुनकर संस्कार मे पहिने सँ छलनि जे पति हुनकर रक्षक छथि, परमेश्वर छथि। तखन चिंता कथिक? मुदा एखन त’ हुनकर रक्षक, परमेश्वर बेसुध भेल पड़ल छथि। एखुनका बयस तक कामिनी क¢ँ नीक-बेजायक कोनो टा ज्ञान नहि भेल छलनि। त¢ँ कामिनीक लेल एखुनका परिस्थिति अप्रत्याशित आ ओझरायल सन छल। ओ काठ बनलि ठार रहि गेलीह।

11 1 1 कृष्णमोहन झा (1968- ), जन्म मधेपुरा जिलाक जीतपुर गाममे। “विजयदेव नारायण साही की काव्यानुभूति की बनावट” विषयपर जे.एन.यू. सँ एम.फिल आ ओतहिसँ “निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में प्रेम की परिकल्पना” विषयपर पी.एच.डी.। हिन्दीमे एकटा कविता सँग्रह “समय को चीरकर” आ मैथिलीमे “एकटा हेरायल दुनिया” प्रकाशित। हिन्दी कविता लेल “कन्हैया स्मृति सम्मान”(1998) आ “हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार”(2003)। असम विश्वविद्यालय, सिल्चरक हिन्दी विभागमे अध्यापन। दुनूकेँ माछकेँ देखैत अछि स्त्री स्त्री केँ देखैत अछि माछ अहाँ दुनू केँ देखि रहल छी Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् रूपेश कुमार झा 'त्योंथ',ग्राम+पत्रालय-त्योंथा,भाया-खिरहर, थाना-बेनीपट्टी,जिला-मधुबनी,सम्प्रति कोलकाता मे स्नातक स्तर मे अध्यनरत, साहित्यिक गतिविधि मे सेहो सक्रिय, दर्जन भरि रचना पत्र-पत्रकादि मे प्रकाशित। बूथ कैप्चरिग कोन पाप लागल से ने जानि घुरि अयलहुँ मोनक बात मानि नोकरी सँ ने भेटैत अवकाश ने करितहुँ हम ई गाम वास अयलहुँ तऽ लागय सभटा नीक अछि ने मुदा किछुओ ठीक आब गामक हवा अछि बिगड़ल अछि स्वार्त जल सँ सभ भीजल तथापि रहैत छलहुँ हर्षित भेल समाजक हेतु समर्पित मुदा आयल बइमनमा चुनाव बढ़ल लोक सभक आब भाव ग्रामीण सभ मिलि कयलक बैसार भेल ओ जे छल ने आसार सभ क्यो कयलक आग्रह प्रगाढ़ जे होऊ अहाँ एहि बेर ठाढ़ सोचल दी कोना लोकक बात काटि सेवाक अवसर देलक आइ माटि बनि एहि पंचायतक हम मुखिया रहय देबै ने ककरो दुखिया सोचि बनल मुखियाक प्रतिनिधि कल जोड़ि पोस्टर छपओलहुँ सविधि प्रचार मे जुटलहुँ दिन-राति विरुद्ध मे ठाढ़ भेल कतेको पछाति भेल शुरू मारामारी-गड़ागड़ौवल कएक ठाम भेल लठा-लठौवल भेटल सभ केँ दू-चारि गोट नोट खसलहि दोसरेक हक मे वोट तइयो नहि भेटलै संतोष छपलक बूथ मिलि सभ दोस परिणाम सुनि भेलहुँ स्तब्ध भऽ गेल छल हमर जमानत जब्त घर सँ निकलैत आब होइछ लाज किएक कयलहुँ हम एहन काज बैसब ने मुदा निश्चित आब हेबे करतै फेरो चुनाव होयब ठाढ़ हम फेर जा पोसब गुंडा आब कएकटा उगि गेलैछ हमरो दू गोट सिंग करब हमहुँ आब बूथ कैप्चरिग

44 4 4 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् हृदय नारायण झा, आकाशवाणीक बी हाइग्रेड कलाकार। परम्परागत योगक शिक्षा प्राप्त। लुप्तप्राय मैथिली लोकगीत प्राती ,गोसाउनिक गीत भगवतीगीत झूमरा,सोहर,खेलउना, कुमार,परिछन ,चुमान, डहकन ,बिषहारा   गीत , झूमरि ,बटगमनी,मलार चैमासा ,लगनी ,समदाउन आ एकर अतिरिक्त नदी संस्कृति मे कोशी   गीत आदि कतेको मैथिली लोकगीत लुप्तप्राय अछि । जतए कतहु एखनहु लोककण्ठ मे ई गीत सभ     बाचल अछि तकरा संग्रहित   कऽ ओहि गीतक प्रकाशन आ ओहि धुन कें सुरक्षित रखबाक लेल ओकर  आॅडियो वीडियो रूप मे दस्तावेजीकरण करबाक आवश्यकता विचारणीय अछि । संवैधानिक मान्यता    प्राप्त भारतीय भाषा बनलाक बाद मैथिलीक  संस्कार ,रीति रिवाज , पर्व त्योहार ओ )तु पर आधारित गीतक समृ( परंपरा वर्तमान आ भविष्यक पीढ़ी लेल कोना सुरक्षित कएल जाय ई संपूर्ण मैथिली जगतक लेल चिन्ताक विषय बनल अछि । मिथिला महान रहल अछि अपन विशेषताक कारणें। मिथिलाक    प्रशंसा में   वृहद्विष्णुपुराणक   उक्ति अछि धन्यास्ते ये प्रयत्नेन निवसन्ति महात्मुने । विचरेन्मिथिला मध्ये ग्रामे ग्रामे विचक्षणः ।। सदाम्रवन सम्पन्ना नदीतीरेषु संस्थिता । तीरेषुभुक्तियोगेन तैरभुक्ति रितिस्मृता ।। अर्थात् हे मुनीश्वर ! ओ धन्य छथि  जे मिथिला में यत्नपूर्वक निवास करइ छथि आ मिथिलाक गामे गाम घूमइ छथि । ई मिथिला  सदैव आमक वन सॅ सम्पन्न  नदीक तट पर स्थित अछि आ तीर में भोगक लेल प्रसि( अछि । ते  तीरभुक्ति अर्थात् तिरहुत  नाम सॅ सेहो जानल जाइत अछि मिथिलांचल । पुराणोक्त कपिलेश्वर, हरिलाखी , पिप्पलीवन , फुलहर ,गिरिजास्थान , विलावती , हरित्वेकी , कूपेश्वर ;कुशेश्वरस्थान द्ध , सिंहेश्वर , जनकपुर ,वनग्राम ,सिन्दूरेश्वर , त्रपनायनवन , विषहर , मंगला, मंगलवती विरजा , पापहारिणी , सुखेलीवन आदि तीर्थ सॅ पावन मिथिलाक महिमा वृहद्विष्णुपुराणक   मिथिला   माहात्म्य में  वर्णन कएल गेल अछि । मिथिलाक लोकगीत में धर्म आ लोक बेवहारक प्रधानता अछि । ब्राह्मवेलाक, पराती , श्रमगीत;लगनीद्ध ,गोदना , भगवतीक आवाहन गीत ;गहबर मे प्रचलित गीत झूमराद्ध , कोशी संस्कृति में विकसित गीत सहित परंपरागत संस्कार गीतक कतेको प्रकार मिथिलाक नव पीढ़ीक बीच लुप्तप्राय अछि । ओहि लुप्तप्राय  गीत सभक शब्द रचना ,धुन ,स्वर ,लय आ भाव एखनहुॅ सबकें आकर्षित करइत अछि । सब तरहें ज्ञान कें बढ्ऱाब बला , संस्कारक संग रीति नीतिक बोध कराब बला आ सुनबा मे मनोरंजक  अछि ओ गीत सभ । एखनहुॅ जतए कतहु परातीक स्वर कान में पड़ैछ मन भाव विभोर भ जाइत अछि । प्रस्तुत अछि साहेबदासक लिखल पराती मौलिक पारंपरिक भास में - अजहुॅ भजन चित चेत मुगुध मन   अजहु भजन चित चेत ।। बालापन तरूणापन बीतल , केस भये सभ सेत  मुगुध मन । अजहुॅ ।। जा मुख राम नाम ने आबत , मानहु सो जन प्रेत  मुगुध मन । अजहुॅ ।। हरि विमुखी सुख लहत न कबहुॅ , परए  नरक  के रेत  मुगुध मन । अजहुॅ ।। साहेबदास तोहि क्या लागत , राम नाम मुख लेत  मुगुध मन अजहुॅ भजन चित चेत ।। परातीक संबंध में श्रेष्ठ जन कहइ छथि -  जखन पराती गाओल जाइ छल त एक कोस धरि ओर ध्वनि पहुॅचइत छल । परातीक भास आ भाव  लोकसभ के जगा क मंगल विहानक आनन्द दैत छल । ओहि   भासक पराती केहन होइत अछि ,देखल जाय - प्राण रहत  नहि मोर श्याम बिनु प्राण रहत नहि मोर ।। काहि पुछओ  कोई मोहि ने बताबए , कहाॅ गेल नन्द किशोर । श्याम बिनु ।। छल कए गेल छलिक नन्दनन्दन  , नैन झझाइछ नोर । श्याम बिनु ।। साध्यौ मौन कानन पशु पंछी , कतहु ने कुहुकए मोर । श्याम बिनु ।। हमहुॅ मरब हुनि बहुरि न आएब , साहेब जीवन  दि न थोर । श्याम बिनु प्राण रहत नहि मोर ।। मधुबनी में श्री दुर्गास्थान ,कोइलख में भद्रकाली,श्री दुर्गाशक्तिपीठ , मंगरौनी में बूढ़ी माई, डोकहर मे राजराजेश्वरी ,जितवारपुर मे सि(काली पीठ ,ठाढ़ी मे परमेश्वरी स्थान ,  खोजपुर में तारामंदिर ,      सहरसा के वनगाॅव मे उग्रतारा , विराटपुर मे चण्डिका ,बदलाघाट मे कात्यायनी , पचगछिया मे श्री कंकाली , पटोरी आ गढ़बरूआरी मे दशमहाविद्या ,देवनाडीह मे वनदुर्गा , दरभंगा मे श्यामामंदिर , म्लेच्छमर्दिनी , गलमा मे तारास्थान ,पचही मे चामुण्डा , अहल्यास्थान ,ककरौल मे शीतला स्थान , पूर्णियां मे पूरनदेवी , अररिया मे दक्षिण कालिका मंदिर , मुजफ्फरपुर मे त्रिपुरसुन्दरी , सखरा मे सखलेश्वरी ,       उच्चैठ मे    छिन्नमस्तिका ,  चम्पारन मे वैराटी देवी , चण्डी स्थान , सहोदरा स्थान  सन कतेको देवी तीर्थ सॅ  सम्पन्न  मिथिलाक जन जन मे देवी  शक्तिक उपासनाक परंपरा समृ( अछि । मिथिलाक घर घर मे कुलदेवी रूप मे पूजित हेबाक कारणेॅ विविध भावक देवीगीतक परंपरा विकसित भेल।  संपूर्ण भारत वर्ष मे मिथिला एकमात्र क्षेत्र अछि जतए भगवती गीतक सर्वाधिक धुन पाओल जाइछ । कोनो मंगल कार्यक आरंभ में गोसाउनिक गीत गेबाक जे परंपरा अछि ओहि मे प्रचलित अधिकांश गीत आ धुन लुप्तप्राय अछि । लोककंठ में एखनहुॅ कतहुॅ कतहुॅ सूनल जा सकैछ एहन किछु गीत । यथा 1पारंपरिक जय वर जय वर दिअ हे गोसाउनि हे मा तारिणी त्रिभुवन देवी । सिंह चढल मैया फिरथि गोसाउनि हे मा अतिबल भगवती चण्डी ।। कट कट कट मैया दन्त शबद कएलि हे मा गट गट गिरलनि काॅचे । घट घट घट मैया शोणित पिबलनि हे मा मातलि योगिन संगे ।। 2  म0म0मदन उपाध्याय जय जय तारिणी भव भय हारिणी दुरित निवारिणी वर  माले । परम स्वरूपिणी उग्र विभूषिणी दनुज विदूषिणी अहिमाले । । पितृवन वासिनि खल खल हासिनि भूत निवासिनि सुविशाले । त्रिभुवन तारिणि त्रिपुर विदारिणि वदन करालिनि अहिमाले ।। शतभख फल दे दिविशत शुभ दे अरिकुल भय दे धननिले । अति धन धन दे हरि हर जय दे अनुपम वर दे वर शिले ।। मदन विलासिनी विदित विकासिनि कर कृतपाशिनि जगदीशे । हरिकर चक्रिणि हरिकर वज्रिणि हरिकर शूलिनि परिमिशे ।। रवि शशि लोचिनि कलुष विलोचिनि वर सुख कारिणि शिव संगे । श्रुति पथ चारिणि महिष विदारिनि क्षितिज विपोथिनि रण संगे ।। अतिशय हासिनि कमल विलासिनि  तिमिर विनासिनि वर सारे । हर हृदि हर्षिणि रिपुकुल घर्षिणि धन रव वरसिनि हे तारे ।। जय जय तारिणि भव भव हारिणि दुरित निवारिनि वर माले ।। 3  पारंपरिक करू भव सागर पार हे जननी करू भवसागर पार । के मोरा नैया के मोर खेबैया   के मोरा उतारत पार हे जननी ।। अहीं मोर नैया अहीं मोर खेबइया अहीं उतारब पार हे जननी ।। के मोरा माता  पिता मोर के छथि के मोर सहोदर भाई हे जननी ।। अहीं मोर माता अहीं मोर पिता छी अहीं सहोदर भाई हे जननी ।। 4   कालिकान्त अखिल विश्व के नैन तारा अहीं छी हे जगदम्ब हम्मर सहारा अहीं छी ।। अनल वायु शशि सूर्य सभ मे अहीं मा , नदी के विमल मंजुधारा अहीं छी ।। रज सत्व तम केर उदभव अहीं मा , प्रगट मे तदपि शंभुधारा अहीं छी ।। विपत धार मे सुत जौं डुबि रहल हो तकर हेतु निकटक किनारा अहीं छी ।। विनय कालिकान्तक सुनत आन के मा दया के सकल सृष्टि सारा अहीं छी ।। 5 पारंपरिक सुर नर मुनि जन जगतक जननी हमरो पर होइयौ ने सहाय हे मा ।। जनम जनम सॅओ मुरूख बनल छी , आबहु देहु किछु ज्ञान हे मा ।। केओ ने जगत बीच अपन लखित भेल , हमहुॅ अहींक सन्तान हे मा ।। दुखिया के जिनगी माता देखलो ने जाइए , सुखमय जग करू दान हे मा ।। काम क्रोध लोभ मोह माया जाल बाझलहुॅ , मुक्तिक देहु वरदान हे मा ।। 6  पारंपरिक हे जगदम्ब जगत माता काली प्रथम प्रणाम करै छी हे ।। प्रथम प्रणाम करै छी हे जननी हम त किछु ने जनै छी हे ।। नहि जानी हम पूजा जप तप अटपट गीत गबइ छी हे । अटपट गीत गबई छी हे जननी हम त किछु ने जनै छी हे ।। विपतिक हाल कहू की अहाॅ के सबटा अहाॅ जनै छी हे । सबटा अहाॅ जनै छी हे माता ,हम त किछु ने जनै छी हे ।। मात पिता हित मित कुल परिजन  माया जाल बझल छी हे । जगतारिणी जगदम्ब अहीें केॅ गहि गहि चरन कहै छी हे ।। 7  पारंपरिक हे अम्बे माता हमरो पर होइयौ सहाय ।। हमार जगजननी हमरो पर होइयौ सहाय ।। युग युग सॅ भटकल छी जीवन भॅवर मे आबहुॅ उबारू हे माय।। दुःखहि जनम बाल यौवन मे पाओल सुख के ने भेटल उपाय ।। अज्ञानी शक्तिहीन लोभी बनल छी ,एहन ने जिनगी सोहाय ।। 8  महाकवि विद्यापति आदि भवानी विनय तुअ पाय ,तुअ सुमिरइत दुरत दूर जाय ।। सिंह चढ़ल देवि देल परवेश बघछाल पहिरन जोगिन भेष ।। बाम लेल खपर दहिन लेल काति , असुर के बधए चललि निशि राति ।। आदि भवानी विनय तुअ पाय ,तुअ सुमिरइत दुरत दूर जाय ।। तुअ भल छाज देवि मुण्डहार , नूपूर शबद करए छनकार ।। भनई विद्यापति कालीकेलि सदा ए रहू मैया दहिन भेलि ।। आदि भवानी 9 कवीश्वर चन्दा झा तुअ बिनु आज भवन भेल रे घन विपिन समान ।। जनु रिधि सिधिक गरूअ गेल रे मन होइछ भान ।। परमेश्वरी महिमा तुअ रे जग के नहि जान । मोर अपराध छेमब सब रे नहि याचब  आन ।। जगत जननी काॅ जग कह रे जन जानकि नाम । नहर नेह नियत नित रे रह मिथिला धाम ।। शुभमयी शुभ शुभ सब दिन रे  थिर पति अनुराग । तुअ सेवि पूरल मनोरथ रे हम सुलित सभाग ।। इ नवो गीत नौ धुन मे अछि । एकर अतिरिक्त कतोक गीत अछि मुदा आबक नब पीढ़ीक बीच एकर परंपरागत शिक्षाक बेवहार नहि देखल जाइछ । परिणामतः फिल्मी गीतक धुन मे भगवती गीत सभक चलन मैथिली परंपरागत गोसाउनिक गीत भगवती गीतक परंपराक समक्ष अस्तित्वक संकट अछि । एकर अतिरिक्त  गाम गाम मे गहबर बीच भगतक मंडली मे झूमरा गाबक समृ( परंपरा रहल अछि ।  मुदा कालक्रमे इहो परंपरा अस्तित्वक संकट झेलि रहल अछि । नौ सदस्यक समवेत स्वर मे झालि आ  माॅडर के संगति मे प्रस्तुत झूमरा गायन सॅ भगवतीक आवाहन होइत अछि आ भगतक शरीर मे देवी प्रगट होइत छथि । बीज रूप में एखनहुॅ बचल अछि ई परंपरा मुदा लुप्तप्राय अछि । बतहू यादव सन    भगत चिन्तित छथि जे हुनक बाद इ परंपरा कोना बाॅचत ? हुनकहि सॅ सूनल अछि इ झूमरा गीत अरही जे वन से मइया खरही कटओलियइ हे मइया खरही कटओलियइ हे । मइया जी हे बिजुबन कटओलियइ बिट बाॅस  जगदम्बा रचि रचि महल बनओलियई हे ।। गोड़लागूॅ पैयाॅ पड़ूॅ मइया जगदम्बा  आइ मइया गहबर अबियउ हे । मइया जी हे राखि लिअउ भगत केर लाज जगदम्बा कलजोरि पैयाॅ पड़इ छी हे ।। जहिना बलकबा खेलइ माता के गोदिया हे , भवानी माता के गोदिया हे । मइया जी हे तहिना खेलाबहु  जग बीच  जगदम्बा  आब मइया गहबर अबियउ हे ।। नामो ने जनइ छी मइया  पदो ने बूझै छी हे मइया पदो ने बूझै छी हे । मइया जी हे सेवक बीच कण्ठ लियउ बास जगदम्बा आब मइया लाज रखियौ हे ।। गोड़ लागूॅ पइयाॅ परूॅ आद्या जलामुखी हे  मइया अद्या जलामुखी हे । मइयाजी हे राखि लिअउ  अरज केर लाज  जगदम्बा  सेवक कलजोड़इए हे।।

77 7 7 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् प्रेमचन्द मिश्र- गाम बरहारा, जिला-मधुबनी अनाम कथा- पी. सी. मिश्र गामक एकटा कम प्ढ़ल-लिखल युवक छथि, उम्र करीब २४ वर्ष। ६ साल पहिने गामसँ दिल्ली आयल छलाह। संघर्षरत जीवनसँ सफर करैत आब ठीक-ठाक अवस्थामे छलाह यानि ताहि समयमे एकटा मध्यम् वर्गक युवककेँ तनख्वाह जे हैत से तनख्वाह पावैत छलाह आ संगे गामसँ अयलाक बाद दिल्लीमे किछु नीक लोकक संपर्कमे रहलासँ अंग्रेजी फर्राटेसँ बजैत छथि यानि कि अंग्रेजी बजैत काल कियो नहि कहि सकैत छनि जे ओ पढ़ल-लिखल कम छथि। ताहि कारण लोककेँ कहैत छथिन सत्यता- जे हम पढ़ल-लिखल कम छी- तँ लोक मजाक बुझैत अछि। एकटा प्राइवेट कम्पनी, जे ट्रैवेल एजेन्टक काज करैत अछि, मे पी.सी.मिश्र रंजीतक, जे हुनकर रिश्तामे भागिन छथिन मुदा कम्पनीमे उच्च पदपर छथिन्ह, केर संग  कज करैत छथि। पी.सी.मिश्र विवाह योग्य भऽ गेल छथिन, पिताजी बुढ़ापामे प्रवेश कऽ लेने छथिन। ओऽ चाहैत छथि जे जहिना पैघ भाई सभक विवाह भऽ गेल छनि, हुनको विवाह कऽ देल जाय। कारण एकटा छोट भाई सेहो छनि, रुपैय्या पाइ कमा लैत छथि आऽ अपन आब कोन भरोस। कखन छी कखन नहि छी। चुंकि जमाना बदलि गेल छैक, ताहि हेतु पी.सी.मिश्रासँ संपर्क केलन्हि जे लोक सभ बहुत परेशान करैत छथि अहाँक विवाह लेल, से की कहैत छी। हुनकर जवाब छलनि, जे पिताजी हमर किछु शर्त अछि विवाहमे। तँ पिताजी कहलखिन- ठीक छै, रातिमे भौजीसँ गप्प करायब, ठीक छै। रातिमे भोजनक बाद पी.सी.मिश्रा जी भौजीक द्वारा अपन शर्त पठेलन्हि- एक विवाहमे रुपैय्या पैसाक आदान-प्रदान नहि, यानि बिना पैसाक विवाह-आदर्श विवाह। दोसर लड़की पढ़ल-लिखल आऽ अंग्रेजी बजनाय अनिवार्य ताकि बच्चाक शिक्षा उच्च होय। तेसर द्विरागमन जल्दी होय ताकि साल भरि जे अपन संस्कार यानी विध-विधानमे कम खर्च होयत। चारिम जिनका ओहिठाम विवाह होय ओ हमर तुलनामे गरीब होय ताकि हुनका ओहिठाम सम्मान बेसी भेटत। ई सभ शर्त सुनि हुनकर पिताजी कहलनि- हम शर्तसँ बहुत प्रसन्न छी, लेकिन सभ शर्त हमरासँ भऽ सकत मुदा दोसर शर्त  हमरा विश्वास नहि अछि की गामक लोक पूरा करए देत वा नहि। ताहि हेतु कहबनि जे एहन कुनू भेट जानि तँ ओऽ हमरा कहि देत। ई बात रंजीतकेँ पता लगलनि, तँ ओहो सोचलन्हि जे कोनो सम्पर्कक आदमीसँ पी.सी.मिश्राक विवाह करल जाय तँ उत्तम। ई दू-चारि ठाम बजलाह जाहिमे “श्रीमति महारानी मिश्रा” जे रंजीतक भाभी आऽ पी.सी. मिश्राक रिश्तामे भौजी छलथिन केँ सेहो पता लगलन्हि। अपन छोट बहिन अनीता झाक ननदि छलथिन सोनी आ हुनकर उम्र १९ साल रहनि। ओऽ अपन बाबूजी श्री भरत झाकेँ कहलथिन जे ई कथा मुफ्तमे भऽ जाएत। ओऽ अपन जमाय दिलीप झाकेँ फोनसँ संपर्क केलन्हि। दिलीप झाक बाबूजी १० साल पहिने स्वर्गवासी भऽ गेल छथिन, ताहि हेतु बहिन सोनीक विवाह दिलीप झा आऽ विनय झाकेँ करबाक छनि। ई सभ बात सुनि दिलीप झा अपन पत्नी अनीताकेँ कहलथिन जे ई काज बुझू मँगनीमे भऽ जाएत। ई बात सुनिते अनीता कहलथिन जे अहाँ देरी नहि करू आऽ जयपुर जाऊ। बुझू लक्ष्मी चलि कऽ आबि गेल छथि। ई बात ओऽ विनय झाकेँ सेहो कहलन्हि आऽ सोनीक दूटा नीक फोटो लऽ जयपुर आबि गेलाह। आब महारानी रंजीतक द्वारा पी.सी.मिश्राकेँ जयपुर बजेलन्हि। होलीक बहन्ना बना कय अपन दफ्तरसँ रंजीत आऽ पी.सी.मिश्रा जयपुर गेलाह। साँझक हवाई जहाजसँ जयपुर पहुँचलाह। पहुँचलाक उपरान्त चाय-पानिक बाद महारानी पी.सी.मिश्रासँ बजलीह- बौआ विवाह कहिया करब, आब तँ लगन आबय बला छैक आऽ विवाह योग्य भय गेल छी। हम काकासँ बात करू? पी.सी.मिश्र हँसैत कहलन्हि- जे भौजी हमर किछु शर्त अछि, से जँ पूरा भय जायत तँ हम विवाह एखन कय लेब। ई गप सुनि महारानी कहलथिन बुझू बौआ जे अहाँक विवाह भऽ गेल आऽ अपन बातसँ पलटब नहि। पी.सी. एकरा एकटा मजाक बुझि ठहक्का लगा कऽ हँसऽ लगलाह। तावत लगभग रातिक ११ बाजि गेलैक। महारानी कहलथिन- चलू खाना खाऽ लिअ, रुकू हम खाना लगावैत छी। रातुक भोजनमे दू तोर भेल, एक बेर भोजनक लेल बैसलाह पी.सी.मिश्रा, रंजीत ठाकुर आऽ रामानन्द मिश्रा। भोजनक उपरान्त ओऽ तीनू गोटे पहिल तलपर गेलाह सुतक लेल। दोसर बेर फेर भोजन लागल जाहिमे भरत झा, दिलीप झा, राजू झा व नूनू झा – राजू आ नूनू झा महारानीक छोट भाई छथिन-, फेर सभ अपन-अपन बिस्तरपर सुतक लेल गेलाह। भोर भेल चायक आयोजन भेल। सातू गोटे भरत झा, दिलीप झा, रामानन्द मिश्रा, राजू झा, नूनू झा, रंजीत ठाकुर, पी.सी.मिश्रा व महारानी चायक पश्चात् गप्प करए लगलाह। महारानी बजलीह-बौआ विवाह कहिया तक करब। मजाकक स्वरमे पी.सी.मिश्रा बजलाह- देखियौक आब जल्दी करब, कारण जे बाबूजीक फोन आयल छल जे लोक सभ परेशान करैत अछि विवाहक लेल, तँ आब जल्दी भऽ जाएत। ई सुनिते भरत झा बजलाह जे कतेक पैसा लेताह। पी.सी.मिश्रा कहलथिन जे एहन कोनो बात नहि छैक। ई शब्द पूरा होइसँ पहिने बीचेमे रंजीत बजलाह- लड़की जँ नीक भेटत तँ कोनो पाई-रुपैया नहि। ई शब्द सुनिते पाछूसँ महारानीक माय बजलीह- जे कही तँ अनीताक ननदिसँ करा दियौन, लड़की तँ बड़ भव्य छथिन, सज्जन-भव्य व धार्मिक प्रकृतिक घरक, सभटा काज आ लूरि-व्यवहार जनैत छथिन्ह। ई बात पूरा भेलाक बाद महारानी बजलीह जे ओझा ओतेक पाई कतएसँ देथिन्ह। ताहिपर रंजीत बजलाह- पाइक कोनो प्रश्न नहि छैक, हुनकर किछु शर्त छन्हि ओऽ चारूटा शर्त दोहरेलन्हि। ताहिपर दिलीप झा बजलाह- हम चारू शर्तसँ परिपूर्ण छी। ई बात सुनि रामानन्द मिश्र बजलाह जे जल्दीमे काज नहि होयबाक चाही। पहिने ई शर्तपर चिन्तन कैल जाऊ। कारण जे सवाल दू टा जिनगीक अछि आ शर्तक कोनो जवाब नहि अछि। एहन सोच तँ बहुत कम लोकक होइत छनि, ताहि हेतु पुनर्विचार करू। ई बात पूरा भेलाक बाद दिलीप झा बजलाह जे लड़कीक फोटो देख लेल जाओ आऽ हमहु पढ़ल-लिखल छी आऽ पेशासँ एकटा प्राइवेट शिक्षक छी ताहि हेतु शिक्षाक महत्व बुझैत छी। ई बात सुनिते भरत झा बजलाह- रंजीत ई (फोटो दैत) लिअ आऽ अहाँ सभ देख लिअ। हम भीम बाबू (समधि) सँ बात कऽ लैत छी। बिच्चेमे रंजीत फोटो लैत आऽ पी.सी.मिश्राक हाथ पकड़ैत पहिल तलसँ ऊपर छतपर गेलाह आऽ मजाकक तौरपर बजलाह जे देखू भाई जँ अहाँ नहि करब तँ हमही दोसर विवाह कय लेब। हमरा तँ लड़की बहुत पसन्द अछि। ई कहैत पी.सी.मिश्रकेँ हाथ फोटो पकड़ेलन्हि। फोटो बहुत आकर्षक छल। पी.सी.मिश्र कहलथिन- फोटो तँ बहुत आकर्षक अछि, हमरा किछु सन्देह भऽ रहल अछि। रंजीत उत्तर देलन्हि- भाभी झूठ नहि कहतीह। संदेहक मतलब अछि भाभीपर शक करब। ताहिपर पी.सी.मिश्रा जवाब देलन्हि- हम शकक नजरिसँ नहि देखैत छी, चलू जे छथि, ई तँ हमर शर्तमे नहि शामिल अछि। लेकिन लड़की पढ़ल-लिखल अवश्य चाही। सुन्दर-खराब कोनो बात नहि अछि ई बात करैत दुनू नीचाँ अएलाह। एतबामे महारानी पुनः चाह अनलन्हि, फेर चाहक चुश्की लैत रंजीत बजलाह- देखू सभ बात बुझू भऽ गेल। आगू बात जे बरियाती ६५-७५ तक जाएब आऽ सत्कारमे कोनो तरहक शिकायत नहि। ई बात सुनैत दिलीप झा बजलाह जे सरकार हम गरीब छी, हमरासँ संभव नहि अछि ७५ टा बरियाती, हमरा किछु छूट देल जाऊ! लेकिन सत्कारमे कोनो त्रुटि नहि होएत। ई बातक बिच्चेमे महारानी बजलीह जे लड़काकेँ एकटा अंगूठी आऽ दू भरीक सोनाक चेन (सीकरी) आऽ लड़कीक नामसँ ५१,०००/-क फिक्स डिपोजिटक कागज ओझाजी दऽ देथिन, बरियाती ५१ टाक बात फाइनल, बस आब ने बौआ। ने ई किछु बजताह आऽ ने ओझा किछु बजताह! आर खान-पीन दिन घरक प्रत्येक सदस्यकेँ नीक आऽ ५ टूक कपड़ा। बस रंजीत आब किछु नहि बाजू आऽ ओझाजी अहूँकेँ एतेक तँ करए पड़त। रंजीत किछु बजैक उत्सुकता देखबैत छलाह की बिचमे भरत झा बजलाह जे फेर विवाहसँ एक साल तक दुनू दिस लड़की वलाक काज छैक, रंजीत ताहि हेतु आब बुझू जे ई बहुत महग भऽ गेल। भरत झा बजलाह जे चलु कुल मिलाकय बात बरियातीक ६५ टा आ आब दिनक निर्णय कएल जाएत। तखनहि प्रेमचन्द्र बजलाह जे ई निर्णय गामपर बाबूजी करताह कारण जे हमरा बहुर सर-कुटुम छथि आ सभकेँ सूचना (नोत-हकार) सेहो देनाय छैक। भरत झा बजलाह- ई सत्य अछि, कोनो बात नहि, हम दिन ताकैत छी आ फोन कय देबनि वा भेट कऽ लेल जाएत। बस किछु समय पश्चात् पतराक अनुसार दिन भेल- २०, २१ अप्रील आ २,३ मई। ई सूचना देल गेल, फेर बड़हरा (गाम)सँ किछु दिन बाद सूचित भेल जे २१ अप्रील क ठीक रहत, तदुपरान्त प्रेमचन्दकेँ पिताजी गामसँ कहलथिन जे कपड़ाक खरीदारी दिल्लीमे कऽ लिअ आ जेवर सभ एहिठाम (गाममे) खरीदब। कपड़ा खरीदल गेल, विवाहक, कनियाक लेल, कनिया बहीन लेल, भौजीक लेल, मायक लेल आ विधकरीक लेल आ घरक प्रत्येक सदस्यक लेल। २१ अप्रील कय दिनक विवाह छल। कन्या पक्ष आ वर पक्षक बीच सहमति छलनि जे दिनक विवाह छैक ताहि हेतु हाथ धरएके लेल समयसँ पहुँचब आ बात भेल जे दू आदमी हाथ धरैक लेल अएताह। एम्हर वर पक्षक ओहिठाम सबेरेसँ चहल-पहल छल। गाम-गामक बच्चा वा स्त्रीगण दू दिन पहिनेसँ आयल छल। पुरुष लोकनि सेहो सबेरे पहुँचलाह कारण जे दिनक विवाह छै ताहि हेतु बरियाती सेहो जल्दी जयबाक विचार छल आ दूरी वा सड़कसँ सभ अवगत छलाह। गामक धाय-माय सेहो एक अँगनासँ दोसर अँगना कय रहल छली। ताबत धरि लगभग २ बाजि गेल घड़ीक अनुसार लेकिन कन्या पक्षक कोनो पता नहि देखि बच्चा सबक भीतरक उत्साह कम भऽ रहल छल! करीब चारि बजेक लगभग एकटा आदमी राजू, दिलीप झाक जेठ सार, संवाद लऽ कय अयलाह जे किछु विलम्ब भय गेल ताहि लेल क्षमा करब। लगभग ५ बजेक करीब एकटा मार्शल (गाड़ी) दरबाजापर लागल। ओहि गाड़ीसँ चारि टा सज्जन उतरलाह आ एकटा चारि सालक बच्चा सेहो, कुल मिला कय पाँच! ई देखितहि दाइ-माइ कनफुसकी करए लगलीह जे कहने छलथिन दू आदमी आ पहुँचलाह पाँच! पुरुष वर्ग आगन्तुकक सेवामे जुटलाह। विश्वनथवा सभकेँ पानिसँ पएर धोबि कय अपन काज सम्पन्न कयलक। तावत कियो ठंढ़ा पानि अनलक आ ई काज सभ पूरा भेलाक बाद पुरुष वर्ग बजलाह जे अँगनामे दाय-माय सब कने अहाँ सभ अपन काज जल्दी करू, कारण जे पहिलेसँ विलम्ब भऽ गेल अछि। अँगनामे गोसाउनिक आ ब्राह्मणक गीत शुरू भेल। सभ दाय-माय अँगनाक माँझमे मरबापर गीत गावैत छलीह तावत एकटा बच्चा एकटा लोकल ब्रिफकेश लऽ कय पहुँचल। प्रेमचन्द पश्चिम दिशाक घरमे पलंगपर बैसल भौजी आ बहिनसँ वाच कय रहल छलाह। ब्रिफकेशकेँ देखि विभा (बहीन) भौजीसँ कहलथिन अहाँ सभ बात करू, हम कनी ब्रिफकेशक समान देखैत छी आ ओऽ मरबा दिश निकलि पड़लीह! तावत धरि एकटा बुजुर्ग महिला ब्रिफकेश खोललन्हि। प्रेमचन्द्रक नजरि पड़ि गेल तौलियापर जे पीयर रंगक दु-सूतीक छल। ई देखते दाय-माय एक दोसरकेँ मुँह दिश देखऽ लगलीह जे ई केहेन आदमी अछि, आयल अछि मार्शलसँ आ कपड़ा देखियौ। तौलियाकेँ देखिते प्रेमचन्दक क्रोध आसमानकेँ छूबि लेलक। ओऽ दू डेगमे बरन्डा फानि कय मरबापर पहुँचलाह आ कपड़ा साड़ी आ ब्रिफकेश देखैत बजलाह जे दाय-माय ई बन्द करू आ गीत-नाद सेहो। हम विवाह नहि करब। ई सुनिते बिभा हुनका सम्हारैत बजलीह, बौआ की भेल अहाँकेँ? अपन क्रोधकेँ शान्त करू, दलानपर लोक सभ की कहताह। दू मिनटमे अँगनामे गीतक बदलामे सन्नाटा भय गेल। आब दाय-माय गीत की कहती, सभ कहलथिन जे अहाँ चुप रहू, की हेतै। अहाँ एतेक खर्च कएलहुँ, तिलक नहि लेलहुँ आ कपड़ा वा समानक लेल की हल्ला करैत छी। प्रेमचन्दक जवाब छलनि, जे हम विवाह नहि करब। ई बात भय रहल छल की गीतक अवाज बन्द सूनि ४-५ टा बुजुर्ग पुरुष  वर्ग दरवाजासँ अँगना पहुँचलाह आ ई दृश्य देखि सभ हुनका बुझाबय लगलाह आ कहलथिन दाय-माय अहाँ सभ आगू काज करू! आ ओ लोकनि प्रेमचन्दकेँ पुनः पछबरिया घरमे लय गेलाह। किछु पुरुष वर्ग आगन्तुक देख-भाल कय रहल छलाह। पुरुष-वर्ग मे सँ एकटा काका पुछलथिन जे बौआ की भेल, शान्तिसँ बाजू। बिभा एकटा गिलासमे पानि दैत कहलन्हि जे कपड़ा सभ नीक नहि छैक काका। काका बजलाह जे ई तँ छोट बात अछि। ई तुक्षताक प्रतीक छी! अहाँ शान्त रहू, अहाँकेँ केहेन चाही हम मँगवा दैत छी। एक घंटामे बजारसँ उपलब्ध भय जायत! प्रेमचन्द जवाब देलखिन जे काका, बात कपड़ाक नहि अछि, कारण जे हम स्पष्ट कहने छलियनि जे हमरा किछु नहि चाही। लेकिन जँ अपने किछु अनबए तँ समान नीक कम्पनीक चाही। ई तँ हमरा बेवकूफ बनओलथि! हमरा बातक दुःख अछि! जँ अपनेकेँ हमरा बातपर विश्वास नहि अछि तँ भौजी (महारानी) केँ पुछल जाय! आ अबाज देलखिन यै भौजी, अहाँ एम्हर आऊ! भौजी शब्द सुनिते महारानी उपस्थित भेलीह आ बजलीह जे बौआक बात १००% सही छनि। कन्यागत गलत काज कयने छथि, एहिमे कोनो सन्देह नहि! ई बात पूरा होमयसँ पहिने बिच्चेमे प्रेमचन्द बजलाह जे हम विवाह नहि करब कारण जे कि पता ? ओ हमरा लड़कीमे सेहो ठकताह। लेकिन बात आब इज्जत आ मान-मर्यादाक अछि, जँ विवाह नहि होएत तँ दुनू पक्षक इज्जत बर्बाद भय जायत! एक-दिश इज्जत, मान-मर्यादा आ दोसर दिशसँ दू-टा जिनगीक प्रश्न। समस्या जटिल अछि, कोनो सन्देह नहि! लेकिन छी तँ मैथिल आऽ मान-मर्यादासँ पैघ जिनगी नहि अछि। जे मान-मर्यादा ककरो लेल अभिशाप बनि जाइत अछि! हम सभ मैथिल जे किछु छी, बाप-दादाक पाग छी, जिनगीक कोनो मोल नहि! मोनमे एक हजार प्रश्न अबैत अछि जे हम मैथिलगण विश्वमे सभसँ बेशी चतुर छी आ तखनो सभसँ पाछू छी, तेकर की कारण अछि? हमरा नजरिमे जे हम सभ भूतकेँ बेशी महत्व दैत छी आ भविष्यकेँ गला दबा दैत छी, सेहो बहुत आसानीसँ हमरा लोकनिकेँ कनियो हिचकिचाहटि नहि होइत अछि! प्रेमचन्दक एकेटा उत्तर छलनि जे किछु बीति जाएत, हम विवाह नहि करब। कारण जे हमरा आब हुनका सभ (कन्यापक्ष) पर विश्वास नहि अछि। दाय-माय गीत तँ गबैत छलीह लेकिन श्वरमे उदासी गीत छल। गोसाउनिक (हे जगदम्बा जगत माँ काली प्रथम प्रणाम करै छी हे), लेकिन श्वर सुनयमे लागैत छल जेना उदासी गाबैत छथि। अँगनाक माहौल खराब भय गेल छल। लगभग एक घंटा बीति गेलाक उपरान्त जखन कोनो तरहसँ मानैत नहि देखि भीम मिश्र (प्रेमचन्दक पिताजी) बजलाह- आब हमरोसँ बर्दाश्त नहि भय रहल अछि आ हमरो निर्णय अछि से अहाँ सुनू- जँ अहाँ विवाह नहि करब तँ हम आत्म हत्या कय लेब। आब अहाँक हाथमे गेंद अछि! निर्णय अहाँकेँ लेबाक अछि जे की करब। पहिल निर्णय विवाह ओहि लड़कीसँ करब आकि दोसर निर्णय हमर दाह-संस्कार करब? कारण हम अपन जिबैत अपन पुरुखाक इज्जत नहि गवाँ सकैत छी। ई कहि ओ ओहिठामसँ उठि चलि पड़लाह। हुनका उठिते सभ पुरुषवर्ग ठाढ़ भय गेलाह आ एकक बाद एक दरबज्जा दिस बिदा भेलाह। हुनका (भीम मिश्र) केँ बुझबैत जे अहूँ एना नहि करू, ओ बात मानताह अहाँक आ अहाँसँ पैघ हुनकर अपन भविष्य नहि छनि। सभ मड़वापर ठाढ़ गप्प करैत छलाह। एतबेमे प्रेमचन्द घरसँ निकललाह आ आँखिमे दहो-बहो नोरक मुद्रामे पिताक पएर पर खसैत बजलाह जे हमरा माफ करू आ करुण स्वरमे बजलाह, जखन श्रवण कुमार मातृ-पितृक लेल अपन प्राण न्योछावर कय देलन्हि तँ हम अपन पिताक लेल अपन भविष्यक बलिदान दैत छी। लेकिन किछु शर्त अछि, भीम मिश्र बजलाह- मंजूर अछि। पहिल शर्त हम कन्यागतक समान नहि लेब दोसर हुनकर गाड़ीपर नहि जाएब तेसर देल गोरलगाइक रुपैया नहि लेब। ई शब्द सुनैत सभ दाय-माय समेत उपस्थित पुरुषवर्ग आ नेना-भुटकाक हृदय सेहो करुण भय गेल! प्रेमचन्दकेँ उठबैत भीम मिश्र करुण स्वरमे बजलाह- हे दाय-माय। जल्दी-जल्दी अपन काज करू। हजामकेँ अबाज दैत कहलथिन- अहाँ जल्दीसँ स्नानी चौकी धो कऽ आनू। फेर अबाज देलखिन- भोगी पाहुनकेँ जल्दीसँ खानाक व्यवस्था करू! ई शब्द सुनितहि सभ बिहारि जेना काज करए लगलाह आ लगभग २०-२५ मिनटमे सभटा काज भऽ गेल। एतबामे जयदेव मिश्र बसकेँ दरबज्जापर लगबैत सभ बरियातीकेँ बसमे बैसबैत बजलाह- भीम भैया हम बसमे सभकेँ बैसा लेलहुँ। अहाँ- मार्शल दिश इशारा करैत- बैसू। प्रेमचन्दक आँखिसँ गंगा-जमुनाक धार जकाँ नोर बन्द होइके नाम नहि लैत छलनि। बड़की भौजी एक आँखिमे काजर कऽ आबथि जा दोसर आँखिमे करतीह ताधरि ओ काजर नोरक रूपमे परिवर्तित भय नीचाँ चलि आबनि। हुनकर बुझु अधा आँचर नोरमे भीजि कय गुलाबी साउथ शिल्कक साड़ी काजरमय भय गेलनि आ हुनका किछु खबरि तक नहि! एहि तरहेँ ओहिठाम हाथधरीक विध पूरा भेल आ बर आ बरियाती प्रस्थान कयलक! ड्राइवर गाड़ीकेँ तेज चलाबयके प्रयास करैत लेकिन गामसँ तीन कि.मी. क बाद रस्ता सेहो नीक नहि। गाड़ी आगू जायके नाम नहि लैत छल जेना सभटा केँ मुहक्षी मारि देने हो। कोनो तरहेँ वर आ बरियाती गन्तव्य तक पहुँचल। ओहिठामक दृश्य तँ बहुत रमणीय छल। नीक पंडाल जे बहुत नीक सुसज्जित नीक-नीक मधुर स्वरमे मैथिली कैसेट सँ स्टीरियोक अवाज मोन मोहित कय रहल छल। ई दृश्य देखि बरियाती लोकनिकेँ विश्वास नहि भेलनि जे एहिठाम हमर बैसबाक व्यवस्था अछि! ओ सभ तुलना करए लगलाह ब्रिफकेश आ कपड़ाक जे वरक लेल गेल छल आ ओहि सजावटक। हुनका लोकनिकेँ विश्वास नहि होइत छलनि जे समान एहिठामसँ गेल अछि। तावत अवाज आबए लागल जे अपने सभ बैसल जाऊ, सरकार ठाढ़ कियैक छी? ओम्हर सँ दिलीप झाकेँ कियो अवाज देलखिन जे हजमा कतऽ गेलाह। बरियातीकेँ पएर धो कय शुद्धिकरणक विध पूरा करबाऊ! पंडालमे सभटा आधुनिक सुविधा उपलब्ध छल! किछु नवतुरिआ लोकनि पेपसी आ पेयजल तँ कियो बिगजीक समान बन्द डिब्बामे ल कय उपस्थित भेलाह! बरियाती लोकनि शहरी मजा लऽ रहल छलाह। लेकिन प्रेमचन्दक आँखिसँ नोर बन्द हो से नामे नहि लऽ रहल छल। ओ मोने-मोन अतेक दु:खी छलाह जेना शमसान घाटमे कोनो मुर्दाक अन्तिम संस्कार हो। करीब बीस मिनटक बाद गामक नवतुरिआ लड़की आ नेना भुटका पंडालक पाछूसँ अबाज देलथिन जे वरकेँ कहियन्हु कनि पागक लटकैत भागकेँ आगूसँ उठा देथिन ताकि ओ लोकनि वरकेँ देखि सकथि। किछु नवतुरिआ लड़का सभ मजाक करैत छल वरक प्रति- एतवामे आज्ञा-डाला आयल आ ई विध सेहो पूरा भेल। ओम्हर परिछनक लेल आय-माय अयलीह आ परिछनक लेल प्रेमचन्द बिदा भेलाह मुदा हुनकर डेग आगू नहि होइन। चलथि जेना महुअकक चालि हो, किछु जवान लड़की मजाकमे बाजथि जे बड़ शान्त आ सुशील छथि वर, तँ कियो किछु जे खाना खाऽ कय नहि आयल छथि। प्रेमचन्द कोनो जवाब नहि देथि जेना गामपर सभटा क्रोध छोड़ि आयल होथि। कारण छल पिताक देल वचन जे जाधरि अपने लोकनि रहबए हम किछु नहि बाजब आ तकर बाद जँ आगू ओ गलती करताह तँ हम नहि छोड़बनि हुनका सभकेँ। परिछन भेल आ विवाहक शुरुआत भेल। ओम्हर बरियाती लोकनिक स्वागतमे कोनो कमी नहि। सभ समान पर्याप्त मात्रामे उपलब्ध छल। विवाहक अन्तिम विध छल सोहाग देब। सभ बरियातीगण प्रस्थान करत। एहि बीचमे दुनू पक्ष वार्ता कयलनि जे द्विरागमन संगे होय कारण भीम मिश्रकेँ कनी डर भऽ रहल छलनि, लोककेँ चिन्हबामे देरी नहि लगलनि, जे एकरा सभकेँ लड़काकेँ एकटा नीक कुरता देबाक उपाय नहि छैक आ पंडाल लगैत अछि जेना पैघ घरक काज हो। विवाह तँ भेल मुदा दू सालक बाद अगर द्विरागमन हो तँ ई किछु देत तँ अपमान वा कलहक कारण। द्विरागमनक दिन पक्का भऽ गेल एगारहम दिन। सोहागक उपरान्त श्री भीम मिश्र प्रेमचन्दकेँ बजाकय एकान्तमे ५-७ टा गणमान्यक संग बुझेलखिन जे संगे द्विरागमनक हम बात कय लेलहुँ आ अहाँकेँ इच्छा अछि जे किछु नहि लेबाक अछि तँ आब ओ लड़की हमर आदमी भेलीह, पुतोहु भेलीह। हम अपन आदमीकेँ एहनठाम नहि छोड़ब कारण जे ओ हिनके रूपमे रंगि जेतीह। ई सभ बुझबैत श्री भीम मिश्र प्रेमचन्दकेँ भरोसा दैत कहलथिन जे हम अपन पुतोहुकेँ अपना रंगमे रंगि लेब। अहाँ चिन्ता नहि करब आ चतुर्थी दिन गाम जरूर आयब तखन बात करब। ई शब्द कहैत ओ विदा भय गेलाह। प्रेमचन्द आब कोबरघरमे छथि। विधकरी आ किछु घरक सदस्यगण सेहो छथि। ओ उदासीक कारण पुछलथिन। ओ किछु नहि बजलाह। करीब ५-७ बेर अलग-अलग दाय-मायक शब्द सुनिकय उत्तर देलखिन जे एखन नीन्द आबि रहल अछि, भोर भेलापर बात करब। ई बात सुनैत सभ एका-एकी घरसँ बाहर भेलीह। कोबरमे नीचाँमे बिस्तर लगाओल गेल। प्रेमचन्द सुतबाक प्रयास जरूर केलन्हि, मुदा आँखिसँ नोर पुनः आबय लगलनि। करीब २०-२५ मिनटक बाद एकटा जनानी कोबरमे प्रवेश कएलक लेकिन हुनका ऊपर कोनो प्रभाव नहि पड़लनि, आँखिसँ अश्रु पूर्ववत निकलैत रहलनि। ओ जनानी किछु काल धरि ठाढ़ रहल आ तावत पाछूसँ अवाज भेल जे प्रणाम करू, ठाढ़ भय की कय रहल छी। मुदा प्रेमचन्दक ऊपर कोनो असर नहि कारण ओ पहिने कहने छलाह जे हम भोर भेलापर किनकोसँ बात करब। तखने हुनका बुझना गेलनि जे हमर पएरकेँ कियो स्पर्श कय रहल अछि आ लहठीक खन-खनाहटि सेहो आयल। ई अवाज सुनैत आ पएरक स्पर्श अनुभव करैत ओ पहिनेसँ बेशी अनभिज्ञताक परिचय देलखिन आ जहिना छलाह ओहिना रहि गेलाह जेना हुनका कोनो खबरि नहि। बस पएर स्पर्शक दू-मिनट बाद ओ जनानी वापस भेल। ओ मोनमे सोचैत छल जे ई जरूर नव विवाहिता छलीह। लेकिन ई बात गुप्र राखएमे नीक जे हम सुतल छलहुँ, हमरा कोनो बातक खबरि नहि। किछु समय पश्चात् भोर भेल। भोरमे निन्न आबए लगलनि। ओ घर बन्न कए सूतय लेल चलि गेलाह। कोबरमे दू पहर बितलाक बाद गामक दाय-मायक झुण्ड तँ कखनो दू-चारि गोटेक आवाजाही छल। आब सभकेँ पएर छूबि प्रणामक सेहो प्रावधान अछि कारण जे हम मैथिल छी। साँझमे मौहकक विध पूर्ण भेल। पुनः रात्रिमे बिस्तरपर विश्रामक लेल गेलाह। लगभग दस-पन्द्रह मिनट बाद अनुभव भेलनि जे पुनः  कोनो जनानी प्रवेश कए रहल अछि। ओ पुनः पएरक स्पर्श कय रहल अछि आ ओ अहिठाम बैसल अछि। प्रेमचन्दकेँ निन्न तँ नहि लागल छलन्हि मुदा निन्नक बहन्ना जरूर भेटलन्हि कारण विवाहक रात्रिमे ओ नहि सूतल छलाह। ओ दिनमे दुपहरिया बादसँ जागल छलाह। करीब दू घण्टा बैसि ओ जनानी पुनः वापस भेलीह। पुनः तेसर राति ओ जनानी पुनः अएलीह आ पूर्ववत अपन कर्ममे लिप्त भय गेलीह, यानी चरण-स्पर्श कए बैसि रहलीह। लगभग चारि-पाँच घंटा धरि ओ बैसलि रहलीह आ पएर धय निकलबाक कोनो चेष्टा नहि कय रहलि छलीह, जेना हुनकर प्रतिज्ञा हो जे आशीर्वाद कानमे जरूर सुनी। एतबेमे प्रेमचन्दकेँ एकटा शरारत सुझलनि आ ओ बहन्ना केलन्हि जेना पूरा निन्नमे होथि। ओ करोट बदलि कय पएरकेँ स्थानान्तर कय देलथिन। एकरा बाद ओ जनानी पुनः ओहिठामसँ हिलय के कोशिश नहि केलक। प्रेमचन्द तँ करोट लेलन्हि मुदा ओ जनानी पूर्ववत छलि जेना माटिक मूर्ति हो जेकरा कियो ओहिठाम बैसल अवस्थामे राखि बिसरि गेल हो। चारिम राति पुनः ओहि जनानीक प्रवेश भेल आ ओ अपन कर्तव्यमे पूर्ववत छल। प्रेमचन्द बजलाह- हमरा कोन कारणसँ परेशान कय रहल छी? अहाँ के छी? हम की कपट देने छी जे अहाँ प्रति रात्रिमे आबि हमर पएरकेँ स्पर्श करैत छी? हमर निन्नकेँ कोन कारणसँ खराब कय रहल छी? ई बात सुनिते ओ जनानी लाजसँ शरीरकेँ सकुचा लेलक। जेना लजबिज्जीक पातमे किछु स्पर्श भेलापर ओ सिकुरि जाइत अछि ठीक ओहि प्रकारसँ ओ बाला सिकुरि गेलीह। कोनो उत्तर नहि भेटलापर प्रेमचन्द पुनः निन्नक बहन्ना बना कए फोंफ काटए लगलाह। किछु समय उपरान्त ओ बाला कोबरसँ निकलि गेलीह। करीब दू-तीन घंटा पश्चात् विधकरी कोबरमे प्रवेश कय अवाज देलन्हि जे मिसरजी उठथु, नहा लथु। नित्यक्रियासँ निवृत्त भऽ स्नान भेल। हरक पालोपर बैसाकए नवविवाहिता संग पुनः विवाह शुरू भेल- चतुर्थीक विध सभ। आजुक दिन नुनगर-चहटगर भोजन भेटलन्हि आ प्रेमचन्द घरक लेल प्रस्थान करबाक तैयारीमे छलाह तँ रिश्तामे ज्येष्ठ साढ़ू कहलन्हि जे साढ़ू भाइ, हमरो जेबाक अछि। संगे चलब। हम हुनके दू-पहियापर बैसि गाम अयलहुँ। किछु काल पश्चात् पुनः गाममे भोजन कय प्रेमचन्द एम्हर-ओम्हर निकलय के प्रयास जरूर केलन्हि, लेकिन ओ ओहिठाम सँ निकलि नहि सकलाह। पुनः साँझमे पिताजी आ ज्येष्ठ भ्रातृगणक दवाबमे सासुर घुरि कए अएलाह। रात्रि-भोजनक पश्चात् विश्रामक लेल कोबर गेलाह। करीब मध्यरात्रिमे पुनः ओहि बालाक प्रवेश भेल। ओ अपन काजमे व्यस्त छलीह। प्रेमचन्द पुनः निन्नक बहन्ना कयलनि। फेर मोन पड़लनि जे गामसँ जखन आबय लगलाह तँ बड़की भौजी किछु ज्वेलरी देने छलथिन जे ई कनियाँकेँ मुँहबजना छी, दऽ देबय, तखन सुतब।  जेबीसँ निकालि कय ओ बालाकेँ कहलथन, ई अहाँक समान अछि, लऽ लेब। हमरा निन्न आबि रहल अछि, सूति रहल छी। निन्न की होयतनि, शरीर तँ लगभग चारि-पाँच दिनमे आधा भय गेल रहनि। दिमागमे सोच जे पैसि गेलनि! ने खेनाइ-पिनाइ नीक जेकाँ ने निन्न। एकदम चिरचिरा स्वाभावक भय गेल छलाह। मध्यरात्रिमे प्यास लगलन्हि तँ पानिक लोटा ताकि रहल छलाह। ओ बाला हुनका एकटा गिलासमे लगभग ठंढा भऽ गेल दूध बढ़ेलखिन। प्रेमचन्द कहलथिन जे ई दूध छी, हमरा प्यास लागल अछि, ई राखि देल जाओ। मुदा ओ नहि रखलन्हि। हुनका संग समस्या छल जे ओ घोघमे छलीह, भरि रातिक जागलि छलीह आ कहियो बाजल नहि छलीह। ई सभ कारणेँ ओ हाथमे दूधक ग्लास लऽ तपस्याक मुद्रामे ठाढ़ रहलीह। प्रेमचन्दकेँ लगेमे लोटामे राखल पानि भेटलन्हि आ ओ पानि पीबि कए पुनः सुतबाक प्रयासमे छलाह। हुनका की जिज्ञासा भेलनि जे देखियै ई बाला कतेक काल धरि ठाढ़ भय गिलाससँ भरल दूध रखैत अछि। लगभग एक घण्टा बीति गेल मुदा ओ तपस्यामे लीन छथि ई देखि प्रेमचन्दकेँ दया आबि गेलनि आ दूधक गिलास हाथसँ लय दू-चारि घोंट पीबि गिलास राखि देलन्हि। पुनः परिचय भेल। प्रेमचन्दक प्रश्नक उत्तरक समय ओ बाला थर-थर काँपि रहल छलीह, जेना कसाइकेँ देखि छागरक आँखिमे डर। प्रेमचन्द- नाम? -सोनी। -कतेक पढ़ल छी? -दसम बोर्ड फेल छी। -सत्य या झूठ? -ई ध्रुव सत्य अछि। ई बात सुनिते प्रेमचन्दक आँखिमे पुनः गंगा-यमुनाक धारा प्रवाहित भय गेलन्हि तँ सोनी रुदन अवस्थामे बजलीह- हम अपनेसँ झूठ नहि बाजि सकैत छी। हमरा क्षमा करू। हमरा जे सजा देब से कम अछि। आ हुनको आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलन्हि। -अपने शरीरसँ विकलांग तँ नहि छी? -नहि। -अपने कोनो बीमारीसँ ग्रसित तँ नहि छी? -नहि। -अपने जिबैत किनका लेल छी? -अहाँ हमर गरदनि दबा दिअ तँ हमरासँ बेशी भाग्यशाली कियो दोसर नहि होएत। -अपनेक सभसँ पैघ लक्ष्य? -अहाँक खुशी। -अपने कानि रहल छी, कारण? -अहाँक कष्ट देखि बर्दाश्त नहि भऽ रहल अछि। -अहाँ जुनि कानू सोनी। एहिमे अहाँक कोनो दोष नहि अछि। -आइ हम मरि गेल रहितहुँ तँ अहाँकेँ कष्ट नहि भेल रहैत।ई तँ ईश्वरक बनायल विधिक विधान छी! एकरा कोनो शक्ति नहि काटि सकैत छैक। -देखू, एहि दुनियाँमे दू तरहक लोक होइत अछि- आशावादी आ पुरुषार्थवादी। हम आशावादी पुरुष नहि छी, पुरुषार्थवादी छी आ आशावादीसँ घृणा करैत छी। कारण आशावादी पुरुष या औरत मेहनती नहि होइत अछि। अपने कोन तरहक छी? -हम धार्मिक प्रवृत्तिक छी आर धर्ममे बहुत विश्वास अछि, ताहि हेतु आशावादी छी! ई सुनि प्रेमचन्दक मोनमे आर बेशी तकलीफ बढ़ि गेलन्हि। एहि तरहेँ चतुर्थीक राति दुनू नव-विवाहित जोड़ी कटलन्हि। प्रेमचन्द फेर अपन गाम घुरि गेलाह। साँझ भेल, भौजीसभकेँ भेलन्हि जे प्रेमचन्द पुनः गाम जएताह। मुदा कोनो प्रतिक्रिया नहि देखि पुछल गेलन्हि तँ उत्तर आएल जे आब द्विरागमनक लेल हम उपस्थित होएब  सासुरमे, नहि तँ आब दिल्ली घुरि जाएब। अन्यथा हमर पीड़ाकेँ बढ़ाओल नहि गेल जाऊ। हमरा आब जीवित रहय के कोनो इच्छा नहि अछि। कोनो मनोरथ नहि अछि। हमर कोनो भविष्य नहि अछि! द्विरागमन भेल, कनियाँ सासुर अयलीह। भड़फोरीक पश्चात् प्रेमचन्द दिल्ली उपस्थित भेलाह। अपन कम्पनीक काम-काज सम्हारलथि। काजपर तँ जाथि मुदा अन्तरात्मामे कतेक प्रश्न अबन्हि। कारण जे जीबाक आशाक किरण लगभग अन्तिम चरणमे पहुँचि गेल छलन्हि। आब कोनो मनोरथ नहि, नहिए जिनगीक कोनो लक्ष्य बाँचि गेल छलन्हि। आ एकर कारण मैथिल समाजक किछु महानुभावक विचार आ कृत्य अछि, संगहि मैथिल समाजक किछु प्रावधान सेहो जिम्मेदार अछि। एहि प्रकारेँ नहि जानि कतेक मैथिल नव-युवक-युवतीकेँ अपन करुण जिनगी जीबाक लेल मजबूर होमए पड़ैत अछि।

11 1 1 आशीष अनचिन्हार- १.        मनुख मनुख काज करैत जान अरोपि कए आफिसमे, रोडपर वा कतौ भरि लैए टका जेबीमे निकलि जाइए मार्केटिंग करबाक लेल कीनि लबैए रेडीमेड खुशी वस्तु-जातक रूपमे की मनुख रेडीमेड भेल जा रहल अछि? २.गजल जीवनमे दर्दक सनेश शेष कुशल अछि नहि कहब विशेष शेष कुशल अछि अन्हरा सरकार चला रहल राजकाज छैक बौकक ई देश शेष कुशल अछि देह बदलैए आत्मा नहि सूनि लिअ एहने छैक सरकारक भेष शेष कुशल अछि मुक्का आ थापड़क उपयोग के करत खाली आँखिए लाल टरेस शेष कुशल अछि गजल कहब असान नहि एतेक आशीष आब चलैत छी बेश शेष कुशल अछि Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 एना किए ?- सन्तोष मिश्र एकटा स्‍त्री , हमर घरकें सबहे काज कऽ दैअ समय–समय पर आबिकऽ हमर जरुरत पुरा क दैअ एहिके बाध ओ परतरि दैअ मुदा एना किए ? जहिया हम असगरे रहैछी तहिया ओ हमरा संग राति बितऽबैय कखनो तिर त कखनो तार कहियो राईके बनादै पहाड़ कखनो हमरा लेल आाखिमे नोर आ कखनो हमरासँ दूर मुदा एना किए ? कि ईहे त प्रेम नहि ? कि ईहो प्रेम छै ? हमरा कोनो बेगरता होए ओ सेहो पुरा कऽ दैअ गलती जौ भऽगेल हमरासँ त डटबो करैए मुदा एना किए ? ओकर आँखिमे, एकटा भावना रहैछैक ओकरा विश्‍वास रहैछैक हमरे पर तैयो ओ हमरा डटैत रहैए मुदा एना किए ? किछु जौं कहि दिऐ त भऽजाइए टोका–चाली बन्‍द ओकर मूँह बन्‍द भइयोक ओकर आँखि, अपन प्रेमक गीत कहैए मुदा एना किए ? किछु समय बाद जेना किछु भेले नहि हुए जेना ओ हमरासँ चिन्‍तीते नहि हुए तहिना ब्‍यवहार करैए मुदा एना किए ? Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 बिनीत ठाकुर बाँहिके गोदना कविता रैहगेल निशानी आब बाँहीके गोदना अनाहकमे मारल गेलै बुधनीके बुधना उमेरोनै बेसी भेलरहै मात्र बिस मरैतकाल ए १ राम बजलैनै ईश फटलैजे बम त शरीर भेलै चिथरा दैवोनै गवाही त कहबै की ककरा लागल छै गाराभुकुर बुधनिके चिन्‍ता के करतै आब पुरा ओकर बच्‍चाके सिहन्‍ता ऐ देशेके लागलछै शतिके श्रात एत सिधा सोझा जनताके केउ नै माई बाप भरल नोर मे केहन  सपना  हम मीता देखलौँ भोर मे माय  मिथिला  जगाबथि  भरल नोर मे कहथि रने वने घुमी अपन अधिकार लेल छैं तूँ सुतल छुब्ध छी तोहर बिचार लेल कनिको  बातपर  हमरा  तूं करै  विचार की सुतलासँ ककरो भेटलै अछि अधिकार जोरि एक एक हाथ बनवै जो लाखों हाथ कर हिम्मत तूं पुत्र छियौ हम तोहर साथ अछि तोरापर बाँकी हमर  दूधक कर्ज करै एहिबेर तूं पुरा सबटा अपन फर्ज लौटादे  हमर  आब अपन स्वाभिमान पुत्र तूं छै महान तोहर कर्म छौ महान Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

44 4 4 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् छवि झा/ कुमुद सिंह लेखिका छवि झा पिछला तीस वर्ष स मिथिला चित्रकला कए अर्थ पर काज कए रहल छथि। संप्रति ओ 'स्नेह छवि मिथिला स्कूल ऑफ आर्टÓ, दरभंगा क निदेशक छथि आ एकरा परिभाषित करबा मे लागल छथि। लेखिका कुमुद सिंह मैथिलीक पहिल इ-पेपर समादक संपादक छथि।

मिथिला चित्रकला : अर्थक अधिकता आ सार्थकता

1960 क दशक मे मिथिला चित्रकला कए दीवार स कागज पर उतारबाक प्रयास शुरू भेल छल आ तहिए स शुरू भ गेल एहि चित्र मे नव-नव प्रयोग। तहिये स शुरू भेल एकर अर्थक नव संसार जे मिथिलाक सोच आ संस्कृति स पूरा भिन्न अछि। नव प्रयोग आ पुरान अर्थक एहन मिश्रण भेल जे कलाक पूरा स्वरूप आ अर्थ क औचित्य पर सवाल उठा देलक।

सब कलाकृतिक एकटा अर्थ होइत छैक। जेकर कलाकृति स घनिष्टï संबंध होइत अछि। कलाकृति आ ओकर अर्थ ओ कृतिक सार्थकता कए सिद्घ करैत अछि। मिथिला चित्रकलाक संबंध मे जखन विचार करैत छी त कर्ठटा गप सामने अबैत अछि, मुदा एकटा गप स्पस्ट होइत अछि जे मिथिला आ भारतक विद्घान एहि कलाक प्रति आइ धरि अपन नजरिया नहि बना सकलथि अछि। पिछला पांच दशक मे विदेशी विद्वान जे एहि कलाक प्रति नजरिया स्थापित केलथि अछि, देशक विद्वान ओकरे आधार मानि कए आगू बढैत रहलथि अछि। च पूछु त देशी विद्वान कहियो अपन नजरिया प्रस्तुत करबाक प्रयास तक नहि केलथि। मिथिला चित्रकलाक एहि गुप्त आ जटिल वास्तविकता कए धुंध स निकालबाक पहिल प्रयास सेहो अमरीका मे कैल गेल। 1984 मे अमरीका स प्रकाशित मानव शास्त्र पर आधारित पत्रिका मे पहिल बेर एहि गप कए रोचक आ गंभीरतापूर्वक उठाउल गेल जे अर्थक अधिकता स केना एहि कलाक सार्थकता खत्म भ रहल अछि। उत्तर बिहार आ नेपालक तराई मे पसरल मिथिला क महिला द्वारा अपन घरक दीवार आ आंगना मे बनाउल जाइवाला एहि चित्रक संबंध मे एखन धरि कई बेर लिखन जा चुकल अछि आ कई ठाम कहल जा चुकल अछि। एतबे नहि कई टा अंतरराष्टï्र्रीय मंच पर एकर प्रस्तुति सेहो भ चुकल अछि। मुदा एकर संबंध मे लिखल साक्ष्य बेसी पुरान नहि अछि। 1949 मे पहिल बेर एहि पुरातन कलाक संबंध मे कागज पर किछु लिखल गेल। डब्ल्यू जी आरचर अपन किताब मे एहि चित्रकला कए अद्भुत आ आश्र्चयजनक कहने छथि। मुदा 1962 मे प्रकाशित लक्ष्मीनााि झाक पुस्तक मिथिला की सांस्कृतिक लोकचित्रकला सही मायने मे एहि चित्रकला पर पहिल आधिकारिक दस्तावेज अछि। देसी नजरियाक संग-संग एकर भाषा मे सेहो हिंदी आ मैथिलीक मिश्रण अछि, जाहि स अर्थक भाव अंगरेजी स बेसी साफ बुझबा मे अबैत अछि। देशी नजरियावाला एहन पुस्तक कए पाठक तक नहि पहुंचब एहि कलाक अर्थक अधिकताक मूल कारण कहल जा सकैत अछि। मिथिला चित्रकलाक अर्थक संबंध मे समय-समय पुस्तक क प्रकाशन होइत रहल अछि। 1952 मे ब्राउन आ लेन्यूइस, 1966 मे माथुर, 1977 मे इब्स विको (वैक्यूवाद) आ 1990 मे जयकर एहि कलाक अर्थक संबंध मे बहुत किछु लिखलथि। अविश्वसनीय मुदा सत्य अछि जे एहि किताब सब मे जे किछु लिखल गेल अछि ओ मिथिला मे प्रचलित अर्थक स सर्वथा भिन्न अछि। एहि संबंध मे अमरीकाक चीको विश्वविद्यालयक कैरोलिन ब्राउन लिखैत छथि जे मिथिला चित्रकलाक अर्थ कए हरदम गलत आ भ्रमक तरीका स विश्वक समक्ष राखल गेल अछि। एकर मुख्य कारण इ रहल जे एहि पर देशी खास कए मिथिलाक विद्वान गंभीर काज नहि केलथि, जे काज भेल ओ विदेशी विद्वानक शोध स भेल। मिथिलाक अंगना मे बनाउल गेल एहि चित्रक संबंध मे पुख्ता जानकारी लेब कोनो विदेशी लेल हरदम एकटा चुनौती रहल अछि। लोककला कए बुझलाक बाद ओकर सही अर्थ बुझब आ फेर ओकरा सही रूप मे परिभाषित करि अभिव्यक्त करब कोनो विदेशी शोधकर्ता लेल राई क पहाड़ सन काज अछि। 1986 मे एसैड, वैल, मारकस आ फिसर, 1988 मे क्लिवाड आ 1992 मे वूल्फ क आलेख स बुझबा मे अबैत अछि जे ओ किछु एहने सच्चाई स सामना केने हेताह। कैरोलिन ब्राउन एहि संबंध मे साफ तौर पर लिखैत छथि- हम पश्चिम कए लोक एहि चित्रकला कए परिभाषित नहि करि सकैत छी, ताहि कारण हम सब एहि अद्भुत विषय कए तोडि़-मरोड़ी कए पेश करैत रहलहुं अछि। हालांकि एहि मे कोनो संदेह नहि अछि जे एकटा समाज मे भिन्न-भिन्न लोकक अगल-अलग नजरिया भ सकैत अछि, ओ एकटा चित्रक भिन्न-भिन्न अर्थ कहि सकैत छथि, मुदा विभिन्न अर्थक बीच मे एकटा समानता होइत अछि, जे अर्थ कए कतहु ने कतहु जोड़ैत अछि। उदहारण लेल मिथिला मे पुरुख कर्मकांड, न्यायशास्त्र सन शास्त्रीय विधा मे नीक पकड़ रहैत छथि आ ओहि स जुड़ल पावैन-तिहार क व्याख्या नीक जेका करि लैत छथि, ओतहि मौगी घरेलू पावैन-तिहार पर नीक पकड़ी रखैत छथि आ ओकर अपन अनुसारे व्याख्या सेहो करैत छथि। एहि लेल कुलदेवीक पूजा या गौरी पूजा मे पुरुखक योगदान कम देखबा मे अबैत अछि। एकर पाछु कारण इ अछि जे अत्यंत गूढ़ संसार आ अत्यधिक विकसित समाजक सबटा गपक ज्ञान राखब असंभव अछि। ओना मिथिला समाज कए अत्यंत विकसित समाज बहुत कम विद्वान मानने छथि। जेना कि 1991 मे दरिदा आ 1994 मे वाल साफ तौर पर लिखने छथि जे एहि चित्रकलाक सही अर्थ मिथिला मे आब गिनल-चुनल लोक बता सकैत अछि। वेल क कहब अछि जे मिथिला मे जे चित्रक अर्थ कहि सकैत छथि ओ चुप रहय चाहैत छथि, जखन कि अर्थ नहि जननिहार लोक कए चुप राखब एकटा कठिन काज अछि। ओना एहि संबंध मे ब्राउनक मत किछु अलग अछि। ब्राउन कहैत छथि, 'इ सच अछि जे आम मैथिल एहि कलाक संबंध में कम जानकारी रखैत छथि, मुदा बहुत विद्वान लेल इ कोनो महत्व नहि रखैत अछि जे मैथिल एहि संबंध में कतेक बुझैत अछि आ की कहैत अछि। अधिकतर विद्वान मैथिलक भावना कए अपन शोध मे तोडि़-मरोडि़ कए प्रस्तुत करबा स पाछु नहि हटला अछि। दुर्भाग्य अछि जे एखन तक कोनो देशी विद्वान एहि तथ्य कए रेखांकित नहि केलाह अछि, मुदा ब्राउन अपन मिथिला प्रवासक दौरान किछु एहने महसूस केलीह। असल मे सबस पैघ गप इ अछि जे पाश्चात्य संस्कृति, व्यवहार आ शिक्षा हमरा लोकनि क सोच कए दबा देलक अछि या इ कहू जे सीमित करि देलक अछि। एकर अलावा हमरा लोकनि मे अनुवाद करबाक क्षमता सेहो कम भ चुकल अछि। आब सवाल उठैत अछि जे एतेक जटिल आ गुप्त तथ्यक कोनो एक व्यक्ति द्वारा कैल अनुवाद कए सर्वोच्च मानल जा सकैत अछि? एहि ठाम इ कहब जरूरी अछि जे एकटा चित्रक कई टा अर्थ भ सकैत अछि, मुदा ओकर सूत्र दूटा नहि भ सकैत अछि। वैह एकटा सूत्र ओकरा आन स भिन्न करैत अछि। एहि सूत्रक चारुआत ओकर अर्थ घुमैत रहैत छैक। एहन सूत्र मिथिला मे एखनो किछु महिला कए बुझल छैन, मुदा ओ निश्चित रूप स व्यावसायिक नहि छथि। ताहि लेल हुनका स ओ सूत्र बुझब कोनो देशी विद्वान लेल कठिन काज अछि, एहन मे विदेशी विद्वानक गप करब बेकार अछि। दरअसल मिथिलाक मौगी एहि सूत्र कए अपन शरीरआ आत्मा मे बसा रखने छथि आ नव पीड़ी कए थोड़े-थोड़े करि कए बुझाउल जाइत रहल अछि। एहन मे अल्प ज्ञानी स जानकारी लेलाक बाद विदेशी विद्वान मिथिलाक सूत्र जनिनिहार महिला कए नजरअंदाज करि दैत छथि। मिथिला चित्रकला क सबस प्रचलित चित्र कोहबरक पुरैन कए ल कए सबस बेसी भ्रमक स्थिति अछि। अधिकतर विद्वान एकरा कोहबर नाम स परिभाषित केलन्हि अछि, जखन कि पुरैन कोहबरक अनेक चित्रगुच्छक एकटा सदस्य मात्र अछि। आइ जे पुरैनक स्वरूप देखबा मे आबि रहल अछि, ओ जानकार महिला मे भ्रम पैदा करि रहल अछि। हालांकि एतबा अवश्य अछि जे एकटा गोलाकार आकृतिक चारुआत छह टा मौगिक मुंह बनाउल गेल अछि, जेकर बीच मे सातम मुंह सेहो अछि जे छह टा मुंह स कनि पैघ आकारक अछि। एहि चित्र कए रेखाचित्रक रूप मे बनाउल गेल अछि। पुरैनक सूत्र पर बनाउल गेल एहि रेखाचित्र स भ्रण हेबाक कईटा कारण अछि। मिथिला मे पुरैन रेखाचित्र नहि, बल्कि भित्तिचित्र अछि आ पांचटा रंग स बनाउल जाइत अछि। हालांकि आइ अधिकतर कागज पर एहन चित्र बनाउल जा रहल अछि, लेकिन एहि चित्रक विशेष मे साफ तौर पर कहल गेल अछि जे एकरा दीवार पर बनाउल जाइत अछि। मिथिला मे रेखाचित्र कए अरिपन कहल जाइत छैक आ ओ जमीन पर बनाउल जाइत अछि। ओनाओ मिथिला मे पुरैनक दू टा सूत्र अछि। एकटा ब्राह्मïण आ दोसर कर्णकायस्त लोकनिक पुरैन। दूनू मे सूत्रक अंतर अछि। मुदा एहि चित्र मे एकर प्रारूपक कोनो चर्च नहि अछि। सातटा मौगिक मुंहक संग सांप, कछुआ, माछ आदिक चित्रक औचित्य जखन मिथिलाक लोक लेल बुझब कठिन अछि तखन विदेशी की बुझत? विदेशी विद्वान लेल इ मात्र एकटा भीड़वाला चित्र अछि, जाहि मे संदेशक कोनो स्थान नहि अछि। बहुत रास विदेशी विद्वान त एकरा जादू-टोना आ भूत-प्रेत लेल बनाउल गेल चित्र कहलथि अछि। मुदा ब्राउनक कहब अछि जे इ पुरैनक नव रूप अछि आ कायस्त प्रारूप स मिलैत-जुलैत अछि। मिथिला मे पुरैन कमलक लत्ती कए कहल जाइत अछि। ब्राह्मïण प्रारूप मे नौ आ कायस्थ प्रारूप मे सातटा कमलक पात दर्शाउल जाइत अछि। चूंकि कमलक लत्ती पाइन मे होइत अछि, ताहि लेल एकर संग-संग पाइन मे रहैवाला वस्तु आ जीवक चित्र बनाउल जाइत अछि। लक्ष्मीनाथ झा एहि संबंध मे लिखैत छथि जे पुरैन मुख्य रूप स वंश वृद्घिक लेल नव दंपति स सांकेतिक अनुरोध अछि। जेना कमलक एकटा लत्ती पोखरि कए कहियो कमल विहीन नहि हुए दैत अछि, तहिना नव दंपति कए घर कए कहियो वंश विहीन नहि हुए देबाक कर्तव्य निभेबाक चाही। एतबा त जरूर अछि जे 20वीं शताब्दी मे पश्चिम मे पलल-बढ़ल कोनो व्यक्ति एहि स्त्रीत्व कए(स्त्री कए हृदय मे वास करैयवाला भावना) घेरा नहि बुझि पाउत। आइ जखन बियाह एकटा अलग अर्थ ल चुकल अछि, एहन मे पुरैनक औचित्य जरूर प्रासंगिक भ गेल अछि। 1960 क दशक मे एहि चित्र कए कागज पर उतारबाक प्रयास शुरू भेल छल आ तहिए स शुरू भेल एहि चित्र मे नव-नव प्रयोग। तहिये स शुरू भेल एकर अर्थक नव संसार जे मिथिलाक सोच आ संस्कृति स पूरा भिन्न अछि। नव प्रयोग आ पुरान अर्थक एहन मिश्रण भेल जे कलाक पूरा स्वरूप आ अर्थ क औचित्य पर सवाल उठा देलक। सच कहल जाए त मिथिलाक महिलाक एहि विलक्षण प्रतिभा कए परिभाषित करबा मे एखन धरि कोनो विद्वान सफलता नहि पाबि सकलथि अछि। समस्त मिथिला मे बनाउल जाइवाला एहि चित्र कए किछु चारि-पांच टा गाम मे समेट देबाक अलावा इ विद्वान लोकनि एहि चित्र कए कएटा अनपढ़-गवांर मौकी द्वारा बनाउल गेल चित्र स बेसी किछु नहि साबित कए सकलथि अछि। मिथिला मे एखनो कई टा महिला अपन फाटल पुरान कॉपी निकालि देखबैत छथि, जाहि मे कईटा विदेशी विद्वानक लिखल वाक्य अछि। दुख आ तामस तखन होइत अछि जखन कॉपी पर लिखल वाक्य पढ़ैत छी, जाहि मे लिखल रहैत छैक जे इ चित्र एकटा पिछड़ल समाजक गवांर, अनपढ़ आ मूर्ख महिला द्वारा बनाउल गेल अछि। विदेशी विद्वान मे इ सोच अचानक नहि आबि गेल अछि। हुनका कई प्रकार स इ बतेबाक बेर-बेर प्रयास भेल अछि। दुनिया मे इ धारण कए स्थापित करबाक श्रेय इब्स विको कए अछि। विको स बेसी शायद कोनो विद्वान एहि चित्रकला पर काज नहि केलथि अछि, मुदा ओ जतेक एहि चित्रक करीब अबैक कोशिश केलाह, एकर अर्थ स ओ ओतेक दूर होइत गेलाह। विको राय औवेन्स क संग एकटा फिल्म सेहो बनौलथि, जेकर नाम 'मुन्नीÓ अछि। ओ एकटा फ्रंच फिल्म सेहो बनउलथि, मुदा चित्रक अर्थ बुझबा आ बुझेबा मे सब बेर असफल भेलथि। विको तखनो हार नहि मानलथि, ओ 1994 मे एकटा विडियो फिल्म 'मिथिला पेंटरस...Ó बनौलथि, मुदा नव किछु नहि कहि पैउलथि। आइ स्थिति एहन भ चुकल अछि जे समाजक सब लोक इ बुझबा मे लागल अछि जे आखिर इ परंपराक कौन वस्तु बारे मे थिक। एहि चित्रकलाक संबंध मे सबसे लोकप्रिय स्रोत विकोक 1977 मे छपल किताब' द वीमेंस पेंटर ऑफ मिथिला...Ó अछि। जखन कियो एहि पुस्तकक एक-एक टा चित्र कए गौर स देखैत अछि आ ओकर रूपरेखा कए पढ़ैत अछि त ओकर सामना एकटा आश्र्चजनक, अद्भुत आओर लगभग असंभव सन प्रतीत होइवाला संसार स होइत अछि। विको लिखैत छथि जे मिथिला समाज मे मुख्यपात्र महिला छथि आ एहि ठाम पुरुषक भरमार अछि। एहि ठाम युवती हमउम्र युवक स विवाह करबा लेल तरह-तरह स प्रयास करैत छथि।(1977, पृष्ठ- 17)। विको एहि गप कए बाजारू आओर रोचक बनबैत आगू लिखने अछि जे मिथिला मे एकटा युवती अपना लेल सुयोग्य युवक कए चुनैत अछि आ विवाहक प्रस्ताव स्वरूप ओकर सामने कोहबर रखैत अछि ।(1977, पृष्ठ- 17)। ओ लोक जे मिथिला कए नीक जेका नहि चिन्हाल अछि, हुनको इ वाक्य पढ़लाक बाद आश्र्चय हेतेन जे विको केना मिथिला समाज कए अतेक चरित्रहीन बना देलथि। इ अद्भुत मुदा सत्य सन आलेख कए पढ़लाक बाद एहन प्रतीत होइत अछि जे विको कए एहन अनुवादक भेटलन्हि जेकरा मिथिला समाज, संस्कृति आ सभ्यता स कोनो वास्ता नहि रहैन, संगहि हुनका मिथिलाक रिति-रिवाज आ लोकाचार तक कए ज्ञान नहि रहैन। सच पूछु त अनुवादकलेल विको मात्र टका देनिहार विदेशी छलाह। ओना देखल जाए त विको क इ किताब एहि विषय पर लिखल गेल पहिल अथवा आखिरी किताब नहि थिक। इ पुस्तक एहि लेल महत्वपूर्ण भ गेल अछि, किया कि मिथिला चित्रकला पर शोध केनिहार अधिकतर विद्वान एहि पुस्तक स प्रभावित छथि। एतबा धरि कि भारतीय विद्वान उपेंद्र ठाकुर तक अपन किताब मे विको क नजरिया कए नजरअंदाज नहि केलथि अछि। विको क एहि किताब क महत्व पर ब्राउनक कहब अछि जे पश्चिमक विद्वान जखन कोनो विषय पर काज शुरू करैत छथि तखन ओहि विषय पर लिखल गेल पूर्वक किताब स काफी प्रभावित होइत छथि। मिथिला चित्रकलाक संग सेहो किछु एहने भेल। अधिकतर विद्वान विकोक रूप-रेखा स प्रेरणा लेलथि, किछु त हुनकर नकल तक कैलथि। ताहि लेल इ अन्य पुस्तक बेसी महत्वपूर्ण भ जाइत अछि। दोसर इ जे विको बहुत दिन धरि एहि विषय पर काज केलथि अछि आ कई प्रकार स एकरा दुनियाक समक्ष अनलथि अछि, एहन मे विदेशी विद्वान लेल हुनका नजरअंदाज करब कठिन रहल अछि। एहि प्रकारे विको भ्रमक आओर सर्वथा गलत तरीका स अनुवाद करि झूठ कए एकटा सत्य स बेसी सत्य रूप मे स्थापित केलथि अछि। ओना अधिकतर विदेशी विद्वानक कहब अछि जे मिथिला समाज विश्वक सबस चरित्रवान समाज मे स एक अछि। एकर संस्कृतिक संबंध मे प्राख्यात चिकित्सक डॉ कैमेल क कहब अछि जे आइ 'जीनÓ(अणु)क संबंध मे दुनिया भरि मे शोध भ रहल अछि, जखनकि मिथिला मे पंजी व्यवस्था ओकरे एकटा रूप अछि। मिथिलाक ब्राह्मïण आ कर्णकायस्थ लग एखनो बीस-बीस पीढिक़ जानकारी उपलब्ध अछि। विको कए शायद इ नहि बताउल गेल कि मिथिला मे युवतिक विवाह पंजीकारक राय स तय कैल जाइत अछि। युवतिक इच्छा एहि ठाम कोनो मायने नहि रखैत अछि। एहि तथ्य कए ब्राउन बहुत साफ तौर पर रखने छथि। ब्राउन कहैत छथि जे ओ मिथिला प्रवासक दौरान पंजीक विधिवत शिक्षा ल चुकल छथि। ओ एहि गप कए सेहो साफ करबाक प्रयास केलथि अछि जे मिथिला मे कहियो युवति कए पति चुनबाक अधिकार नहि रहल अछि। सीताक संबंध मे सेहो ब्राउनक मत स्पष्टï अछि। ओ कहैत छथि जे सीताक स्वयंवर नहि छल ओ एकटा सशर्त विवाह छल। इ सच अछि जे ओहि विवाह मे पंजीक कोनो व्यवस्था नहि छल, मुदा धणुष रामक बदला मे रावण उठा लैत त कि सीताक इच्छा रहितो राम स विवाह संभव छल? सीताक इच्छा हुनक विवाह मे कोनो मायने नहि रखैत छल। ब्राउल इ तर्क देलाक बाद आखिरी फैसला मिथिलाक लोक पर छोड़ैत कहैत छथि जे मेरे एहि मत स शायद मिथिलाक लोक सहमत नहि हेताह। वैकसेनेलक शब्द मे कहल जा सकैत अछि जे मिथिला चित्रकला एकटा आंखिक भांति अछि जे समयक संग-संग अपना कए बदलैत रहल अछि, मुदा अपन मूल सिद्घांत स कखनो समझौता नहि केलक अछि। इ कला जगतक एकटा अद्भुत औजार अछि जेकरा स कलाकार अपन समाजक संग-संग पूरा विश्वक गुढ़ गप आ रिति-रिवाज कए चित्रक माध्यम स प्रस्तुत करैत आइल अछि। (1972,पृष्ठ-38) जे किछु हुए एतबा त अवश्य भेल अछि जे मिथिलाक संस्कृति कए दुनियाक सामने सर्वथा गलत तरीका स परिभाषित केल गेल अछि। आइ मिथिला चित्रकला अधिकतर एहन चित्र बनाउल जा रहल अछि, जेकर एतुका संस्कृति स कोनो लेनादेना नहि अछि। आवश्यकता अछि एहि चित्र क गंभीरता स शोध करबाक आ एकर अर्थक अधिकता कए समाप्त करबाक, नहि त इ चित्र हरदम लेल हमरा लोकनिक अज्ञानताक द्योतक बनल रहत।

66 6 6 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् शेख मोहम्मद शरीफ प्रसिद्ध वेमपल्ली शरीफक जन्म आन्ध्र प्रदेशक कडापा जिलामे भेल छल। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। जुम्मा हमर अम्मीक निर्दोष मुखमंदल अबैत अछि हमर आँखिक सोझाँ, चाहे आँखि बन्द रहए वा खुजल रहए। ओहि मुखक डर हमर विचलित करैत अछि। एखनो हुनकर डराएल कहल बोल हमर कानमे बजैत रहए-ए। ई दिन रहए जुम्माक जाहि दिन मक्का मस्जिदक बीचमे बम विस्फोट भेल रहए। सभ दिस कोलाहल, टी.वी. चैनल सभपर घबराहटिक संग हल्ला, पाथरक बरखा, आदंक आऽ खुनाहनि। हम काजमे व्यस्त छलहुँ जखन फोन बाजल। फोन उठेलहुँ तँ दोसर दिस अम्मी छलीह..हुनकर फोन ओहि समय नीक आ सहज लागल। एहिसँ पहिने कि हम “अम्मी..” कहितहुँ ओ चिन्तित स्वरेँ “हमर बाउ...!” कहलन्हि। “की अहाँकेँ ई बुझल छल...?” हम पुछलियन्हि। “हँ एखन तुरत्ते हमरा ई पता चलल..अहाँ सतर्क रहब! ...लागै-ए अहाँ आइ मस्जिद नहि गेल रही हमर बाउ।” हम हुनका डरसँ सर्द अवाजमे बजैत सुनलहुँ। जिनगीमे पहिल बेर हमर मस्जिद नहि जएबासँ ओ प्रसन्न भेल छलीह। ई विचार हमरा दुख पहुँचेलक। की हमर अम्मी ई गप बाजि रहल छलीह? ई ओ छथि जे हमरासँ ई पूछि रहल छथि? ई हमर अम्मी छथि जे एहि तरहेँ डरलि छथि? हमर मस्तिष्क विचरक विस्फोटसँ भरि गेल आ स्मृतिक बाढ़िमे बहए लागल। १ हमर अम्मीकेँ जुम्माक नवाज आस्थाक दृष्टिसँ नीक लगैत छलन्हि। ओ कोनो चीजक अवहेलना कऽ सकैत रहथि मुदा जुम्माक दिन नमाजक नहि, से ओ हमरा सभकेँ ओहि दिन घरमे नहि रहए दैत रहथि। अब्बा सेहो हुनकर दामससँ नहि बचि पाबथि जे ओ घरपर रहबाक प्रयास करथि। हुनकर सन डीलडौल बलाकेँ सेहो हाथमे टोपी लए मस्जिद चुपचाप जाए पड़न्हि। हमरा सभक घरमे काजसँ दूर भागए बला, आलसी बच्चा, शिकारी हम आ हमर अब्बा हरदम मस्जिद नहि जएबा लेल बहन्नाक ताकिमे रहैत छलहुँ। हमर अब्बा भोरेसँ छाती तनैत कहैत रहैत छलाह जे आइ जुम्मा अछि से कोनो हालतिमे मस्जिद जएबाके अछि। मुदा जखने समय लग अबैत रहए हुनकर बहन्ना शुरू- “अरे! अखने कादोमे हम खसि पड़लहुँ...” हमर अम्मी लग कोनो रस्ता नहि बचन्हि। जे से, तखन ओ हमरा सेहो मस्जिद नहि पठा सकैत छलीह...हमरा नहबैत, हमर कपड़ा धोबैत, ओ कोना कऽ सकितथि? तैयो ओ हाथमे छड़ी लेने आँगन आबथि, हमरापर गुम्हरैत, हमर पुष्ट पिटान करैत आ हमरा अँगनामे कपड़ा जकाँ टँगैत। से हम ई चोट खएबासँ नीक बुझैत रही नमाजे पढ़ब। हमर आलसपना मस्जिद पहुँचिते अकाशमे उड़ि जाइत रहए। एक बेर ओतए पहुँचिते हम दोसर बच्चा सभ संग मिझरा जाइत रही आ सभटा नीक वरदानक लेल प्रार्थना करैत रही- जेना हमर अब्बा लग खूब पाइ होन्हि, हमर अम्मीक स्वास्थ्य नीक भऽ जान्हि, हमर पढ़ाईमे मोन लागए आ की की। हमर अम्मा बुझाबथि- “हमरा सभकेँ मस्जिद मात्र वरदान प्राप्त करबाक लेल नहि जएबाक चाही, हमर बाउ..हमरा सभकेँ नमाज पढ़बाक चाही...अल्लामे आस्था हेबाक चाही। वैह छथि जे हमर सभ कल्याण देखैत छथि”। जखन दोसर हुनका हमर उपराग देन्हि जे हम नमाज काल आस्ते-आस्ते गप करैत रहै छी तँ ओ हमरा आस्तेसँ दबाड़ि बाजथि- “हमर बाउ, प्रार्थनाक काल बजबासँ अपनाकेँ रोकू...कमसँ कम मस्तिष्कमे दोसर तरहक विचारकेँ अएबासँ रोकू। बगलमे बम किएक ने फाटय तैयो सर्वदा अपन मस्तिष्ककेँ अल्लापर केन्द्रित राखू...”। हुनका ओहि दिन एहि गपक अन्देशा नहि रहन्हि जे एक दिन ठीकेमे मस्जिदमे बम फाटत। से आश्चर्य नहि जे ओ एतेक आत्मविश्वाससँ बाजि रहल छलीह। आब जखन ठीकेमे बम विस्फोट भेल अछि, हुनका ई अनुभव भऽ रहल छन्हि जे कतेक भावह ई भऽ सकैत अछि। हम हुनकर वेदनाकेँ नहि देखि पाबि रहल छी। ओ डरायलि छलीह। ओ नमाजसँ डरायल छलीह। ओ अल्लासँ सेहो डरायल छलीह। “अम्मी...”। हम उद्यत भऽ कहलहुँ। “हमर बेटा...”। ओ दोसर कातसँ बजलीह।  “अहाँ आइ मस्जिद नहि गेलहुँ, नहि ने, हमर बाउ”? ओ फेरसँ कहलीह। हमर हृदय डूमि रहल रहए। शब्द हमर संग छोड़ि रहल रहए। हमर कंठ सूखि रहल रहए। हम घुटनक अनुभव कएलहुँ। विचार ज्वारि जकाँ हमरा भीतर उठि रहल छल। हमरा लागल जे क्यो हमरा ठेलि कए सोखिं कए भूतमे लऽ जाऽ रहल अछि। २ जुम्माक दिन मस्जिदसँ घुरलाक बाद हम सभटा घटनाक आवृत्ति अम्मी लग करैत छलहुँ। हम नमाजक एकटा छोट संस्करण हुनका लगमे करैत छलहुँ। हमरा प्रार्थना पढ़ैत देखि ओ हमरा आलिंगन मे लऽ चुम्मा लैत छलीह, “अल्ला हरदम अहाँक रक्षा करताह, हमर बाउ...”। ओ हमरा आशीर्वाद दैत रहथि। तखन हम निर्णय कएलहुँ जे जहुँ हमरा कोनो ज्ञानप्राण अछि तँ हमरा कोनो नमाज नहि छोड़बाक चाही। सभ जुम्माकेँ ओ नमाजक महत्वपर बाजथि आ मस्जिद जएबापर जोड़ देथि। आन चीजक अतिरिक्त ओ एहि गपक विषयमे बाजथि जे कुरान अही दिन बनाओल गेल रहए, कि मनुक्ख अपन कर्मक लेल अही दिन उत्तर दैत अछि आ जे विश्व जीवन रहित जे कहियो होएत तँ सेहो अही दिन होएत। हमर माथ, छोट रहितो, ई गप बुझि गेल जे जुम्मा किएक मुसलमान लेल पवित्र अछि। सभ बच्चा जुम्मा दिन साँझ धरि स्कूलमे रहैत छलाह, मात्र हम दुपहरियाक बादे स्कूल छोड़ि दैत छलहुँ, मस्जिद जएबाक बहन्ने झोरा झुलबैत घर घुरैत छलहुँ। हमर अम्मी शिक्षकसँ परामर्श कए केने छलीह। दोसर छात्र सभ हमरा एतेक शीघ्र घर जाइत देखि ईर्ष्या करैत छलाह। ओ हमरा भाग्यशाली बुझैत छलाह आ अपनो मुस्लिम होएबाक मनोरथ करैत छलाह। हुनकर ईर्ष्यालु मुख देखि हम भीतरे-भीतर हँसैत रही। हम खुशी-खुशी घर घुरैत रही जेना हाथीक सवारी कएने होइ। हमर अम्मी ओहि महत्वपूर्ण उपस्थितिक लेल हमरा तैयार करैत रहथि- गरम पानिसँ नहबैत रहथि, हमर आँखिमे काजर लगबैत रहथि, हमर केशक लटकेँ टोपीक नीचाँ समेटि कए राखथि। हम सभ दिन तँ हाफ पैंटमे रहैत छलहुँ मुदा ओहि दिन उजरा कुरता पैजामामे चमकैत छलहुँ। दोसर स्त्रीगण हमरा देखि अपन हाथ हमर मुखक चारू दिस जोरसँ घुमाबथि आ कोनो दुष्टात्माकेँ भगाबथि आ कहथि, “जखन जुम्मा अबैत अछि अहाँ जुम्माक सभटा चक लए अबिते ने छी”!! अहाँ जुम्माक साँझमे ई खुशी सभ घरमे देखि सकैत छी, दरगा केर फ्रेम कएल चित्रक सोझाँमे जड़ैत लैम्प, अगरबतीक सुगन्धी वायुमे हेलैत; अपन माथ झँपने स्त्रीगण घरक भीतर-बाहर होइत; आ नारिकेलक दाम दोकानक खिड़कीपर बढ़ैत। दरगा केर फ्रेम कएल चित्र पर नारिकेल चढ़ेबाक विधक वर्णन एतए अहाँ नहि छोड़ि सकैत छियैक। किएक तँ हमर अब्बाकेँ अर्पण विधक ज्ञान नहि छलन्हि से ओ हजरतकेँ छओटका रस्तासँ घर अनैत रहथि। हमर अम्मी ई सिखबाक लेल हुनकर पछोर धेने अबैत रहथि। “अहाँकेँ ई अन्तरो नहि बुझल अछि कलमा..आकि गुसुल...हमरा अहाँसँ निकाह करेबाक लेल अपन अम्मी-अब्बाकेँ दोषी बनाबए पड़त...कियो अहाँसँ नीक हुनका सभकेँ नहि भेटलन्हि, अहाँसँ हमर बियाह करेलथि। आब बच्चो सभ अहींक रस्ता पकड़लथि हँ...” ओ हुनकासँ एहि तरहेँ विवादपर उतरि जाथि। “अहाँ ..घरक...ई उत्पीड़न हमरा लेल असह्य भऽ गेल अछि..”। पजरैत, ओ मस्जिद जाइत रहथि लाल-पीयर होइत हजरतकेँ घर अनबा लए। हजरत नारिकेलक अर्पण विध पूरा करबाक बाद अपन मुँह आ पएर धोबि आ अपन दाढ़ीमे ककबा फेरि बाहरमे खाटपर बैसैत रहथि। एहि बीच हमर अम्मी फोड़ल नारिकेलक गुद्दा निकालि ओकर कैक भाग कए ओहिमे चिन्नी मिलाबथि। ओ तखन एहि मिश्रणकेँ बाहर हातामे जमा भेल सभ गोटेमे बाँटथि। ओ अन्तमे हमरा लेल राखल दू-तीन टा टुकड़ी लेने हमरा लग आबथि। हम शिकाइत करियन्हि, “यैह हमरा लेल बचल अछि”? “हमरा सभकेँ अल्लाकेँ अर्पित कएल वस्तु नहि खएबाक चाही, हमर बेटा..हम दोसरामे एकरा बाँटी तैयो जहुँ हमरा सभ लेल किछु नहि बचए”। ओ हमरा शान्त करथि। हुनकर मीठ बोल हमरा मोनसँ नारिकेलक पर्याप्त हिस्सा नहि भेटबाक निराशाकेँ खतम कए दैत छल। बादमे हमर पिता आ हजरत साँझमे अबेर धरि बैसि गप करैत रहथि। अपन वस्त्र बदलि सामान्य वस्त्रमे हम, अपना संगी सभक संग पड़ोसक एकटा निर्माण स्थलपर बालूक ढेरपर खेलाय लेल चलि जाइत रही। ई सभ सोचि हमर आँखिमे नोरक इनार बनि गेल... “हमर पुत्र, अहाँ किएक नहि बाजि रहल छी? की भेल? हम डरक अनुभव कऽ रहल छी...बाजू...” हमर अम्मी पुछैत रहलीह। ओना तँ हैदराबाद एनाइ तीन बरख भऽ गेल मुदा एको दिन हम नमाज नहि पढ़लहुँ। असमयक पारीमे काज करबा अनन्तर हम ईहो बिसरि गेलहुँ जे नमाज पढ़नाइ की छियैक। “अम्मी..” हम उत्तर लेल शब्द तकैत बजलहुँ। “अम्मी, हम कहिया हैदराबादमे नमाज पढ़बाक लेल मस्जिद जाइत छी जे अहाँ एतेक चिन्तित भऽ रहल छी”? हम पुछलहुँ। हम मोन पाड़लहुँ ओहि दिनकेँ जखन ओ हैदराबाद आएल रहथि कारण हम कहन्र् रहियन्हि जे हम हुनका हैदराबाद नगर देखेबन्हि। मुदा हैदराबाद आबि अपन विरोध देखबैत ओ बजलथि, “हम कतहु जाए नहि चाहैत छी...हमरापर किएक पाइ खर्च कऽ रहल छी”? हम हुनकर मोनक गप बुझैत रही। ओ हमरापर बोझ नहि बनए चाहथि, मुदा हम हुनकर विरोधपर ध्यान नहि देलहुँ। हमर जोर देलापर ओ एक बेर अएलीह। हम हुनकर हाथ पकड़ि रस्ता पार करबामे मदति करियन्हि। एक बेर खैरताबादक लग सड़क पार करबा काल हुनकर आँखि नोरसँ आद्र भऽ गेलन्हि। “अहाँ कतए जन्म लेलहुँ...कतए अहाँ बढ़लहुँ...अहाँ कतेक टा भऽ गेलहुँ? अहाँ एहि पैघ नगरमे कोना रहए छी? अहाँ बहुत पैघ भऽ गेलहुँ...” ओ बड़ाई करैत कानए लगलीह। “अहाँ जखन बच्चा रही तखन हम अहाँकेँ नानीगाम बससँ लऽ गेल रही। हम अहाँक हाथ कसि कऽ पकड़ने रही कि अहाँ कतहु हेराऽ ने जाइ। आब अहाँ एतेक पैघ भऽ गेलहुँ जे हमर हाथ पकड़ि बसपर चढ़बामे मदति करी”। ई कहैत ओ नोरक द्वारे ठहरि गेलीह। ओ खखसलीह, “खुस...खुस...” परिश्रमसँ अपन श्वास वापस अनलन्हि। ओ जखन भूतकेँ मोन पाड़ि रहल छलीह हम हुनका सान्त्वना देलियन्हि आ हुनकर नोर पोछलियन्हि। “अम्मी...हम एतए जीबाक इच्छासँ अएलहुँ। हम साहस केलहुँ आ कतेक रास कठिन क्षणकेँ सहन कएलहुँ। जखन दुखित रही, हम अपनेसँ दबाइ लए ले जाइ आ संगमे तखनो प्रत्यन करी।, ई सभ अम्मी...ई सभ अहाँक आशीर्वादसँ भेल, आकि नहि? एहि नगरमे अपना कहि कऽ संबोधित करए बला हमर क्यो नहि अछि, तखनो हम एतए बिना असगर रहबाक अनुभूतिक रहैत छी”। अपन आँखिक नोर पोछि कऽ ओ हमरा आशीर्वाद दैत कहलन्हि, “दीर्घायु रहू हमर पुत्र”। समस्याक आरम्भ तकर बाद भेल। “सभ जुम्मा..जुम्मा...अहाँ नमाज पड़ए छी हमर बाउ”? ओ पुछलन्हि। “नहि माँ। कहू ने, कखन हमरा पलखति भेटैत अछि”? “अहाँकेँ कहियो समय नहि भेटत, मुदा अहाँकेँ करए पड़त, एकरा छोड़बाक कोनो गुन्जाइश नहि अछि। मुस्लिमक रूपमे जन्म लेबाक कारण अहाँकेँ, कमसँ कम सप्ताहमे एक दिन समय निकालए पड़त”, ओ कहलन्हि। आगाँ कहलन्हि, “धनिक आ गरीब नमाजक काल संग अबैत अछि। ओ सभ कान्हमे कान्ह मिलाए नमाज पढ़ैत छथि। ओहि दिन ई बेशी गुणक संग अबैत अछि। एक बेर हरेलापर अहाँ ओ आशीष कहियि घुरा नहि सकैत छी। ताहि द्वारे धनिक आ एहनो जो लाखमे रुपैयाक लेनदेन करैत छथि, अपन व्यवसायकेँ एक कात राखि नमाज पढ़ैत छथि। दोकानदार सभ सेहो अपन व्यवसाय बन्न कऽ दैत छथि बिना ई सोचने जे कतेक घाटा हुनका एहिसँ हेतन्हि। संगहि ओ गरीब सभ जे प्रतिदिनक खेनाइक जोगार नहि कऽ पबैत छथि, सेहो नमाज पढ़ैत छथि”। हमरा डर छल जे हमर माँ वैह पुरान खिस्सा फेरसँ तँ नहि शुरू कऽ देतीह। विषय बदलि कऽ हम कहलियन्हि, “की अहाँकेँ बुझल अछि जे एतए निजाम नवाब द्वारा निर्मित एकटा पैघ मक्का मस्जिद अछि...”? “एहन अछि की? हमरा अहाँ ओतए नहि लऽ चलब”? ओ उत्साहसँ बजलीह। “जखन अहाँ ओतए पहुँचब तँ हमरा नमाज पढ़बा ले अहाँ नहि ने कहब”। हम विनयपूर्वक प्रार्थना कएलियन्हि। “हमर बाउ...अहाँ ई की कहैत छी...हम अहाँकेँ ई सुझाव अहाँक अपन भलाइ लेल दैत छी”। “ठीक छैक..चलू चली”! हम सभ ओतएसँ बस द्वारा सोझे मस्जिद गेलहुँ। ओ चारमीनार दिस देखलन्हि जे मस्जिदकक मीनारसँ बेशी पैघ रहए। “अम्मी ओ छी चारमीनार। हम पहिने ओतए चली..आकि मस्जिद”? हम पुछलियन्हि। “ओतए चारमीनारमे की अछि हमर बाउ”? “ओतए किछु नहि अछि...कोनो दिशामे देखू एके रंग लागत। मुदा अहाँ ऊपर चढ़ि सकैत छी। ओतएसँ अहाँ मक्का मस्जिद स्पष्ट रूपमे देखि सकैत छी...आब देरी भऽ गेल अछि। हम चारमीनार बादमे देखि सकैत छी...अखन तँ हमरा सभ मस्जिद देखी”। ओ स्वीकृति देलन्हि। मस्जिदक भीतरमे शान्ति रहए। शान्तिक साम्राज्य छल। ई शीतल, सुखकारी आ विस्तृत रहए। आगन्तुकक आबाजाही बेशी रहए। अम्मी भीतर जएबामे संकोच कऽ रहल छलीह कारण स्त्रीगण सामान्यतः मस्जिदमे नहि प्रवेश करैत छथि। मुदा ओ किछु बुरकाधारी स्त्रीगणकेँ ओतए देखि ओम्हर बढ़ि गेलीह। अपन सारीक ओरकेँ माथपर लैत ओ बजलीह, “हमहूँ अपन बुरका आनि लैतहुँ ने”? घरसँ चलैत काल ओ एहि लेल कहने रहथि मुद ई हम रही जे हुनका एकरा पहिरएसँ रोकने रही। अपन ठामपर हुनका लेल एकरा छोड़नाइ सम्भव नहि छलन्हि मुदा हम एहि नव स्थानपर हुनका एहि झंझटसँ मुक्ति देमए चाहैत रही। मुदा अपन सम्प्रदयक स्त्रीगण बीचमे बिना बुरका पहिरने ओ अपनाकेँ बिना चामक अनुभव कऽ रहल छलीह। जखन हम हुनका स्तंभित आ थरथराइत चलैत देखलियन्हि तखन हम हुनका बुरका नहि पहिरए देबाक लेल लज्जित अनुभव कएलहुँ। तैयो अपन रक्षा करैत हम कहलियन्हि, “हम कोना ई बुझितहुँ अम्मी जे हमर सभकेँ मस्जिद घुमबाक ब्योँत लागत”। ओ किछु नहि बजलीह। “एहिसँ कोनो अन्तर नहि पड़ैत अछि...आऊ”। हम बादमे ई कहि हुनका भीतर लऽ गेलहुँ। ओ हमर संग अएलीह। हम सभ अपन चप्पल कातमे रखलहुँ जाहिसँ बादमे ओकरा लेबामे आसानी होए। कतेक गोटे मस्जिदक सीढ़ीयेपर आलती-पालथी मारि कए बैसल रहथि। परबाक संग खेलाइत किछु गोटे ओकरा दाना खुआ रहल रहथि। किछु परबा उड़ि गेल आ किछु आन घुरि कए उतरल। किचु परबा पानिक चभच्चाक कातमे बैसि कऽ एम्हर-ओम्हर ताकि रहल रहए, एकटा आह्लादकारी दृश्य। अम्मी हुनकाँ आश्चर्यित भऽ देखलन्हि। बादमे ओ हमर पाछाँ अएलीह जखन हम सीढ़ीक ऊपर प्लेटफॉर्मपर पहुँचलहुँ। प्लेटफॉर्मकेँ चारू दिस देखैत ओ चिकरि कए बजलीह, “हमर बाउ, एक बेरमे कतेक गोटे एतए बैसि कऽ नमाज पढ़ि सकैत छथि”? “हमरा नहि बुझल अछि अम्मी...कैक हजार हमरा लागए-ए। रमजानक दिनमे लोक चारमीनार धरि बैसि कऽ नमाज पढ़ैत छथि”। हम उत्तर देलियन्हि। “हँ, ई टी.वी. मे देखबैत अछि” अम्मी प्रत्युत्तर देलन्हि। ओ एकरा नीकसँ चीन्हि गेल रहथि, हम अपनामे सोचलहुँ। चारू कात देखाऽ कऽ अन्तिममे हम हुनका मस्जिदक पाछाँ लऽ गेलहुँ। पाथारक फलक चिड़ैक मलसँ मैल भेल रहए। परबा सभ देबालक छिद्रमे खोप बनेने रहए। ओ मीनारक देबालकेँ छूबि आ आँखिसँ श्रद्धापूर्वक सटा कऽ अति प्रसन्न भऽ गेलीह। “एतए नमाज पढ़ब पवित्र गप अछि, हमर बाउ”, ओ कहलन्हि। हम एहि बेर कोनो अति सम्वेदना नहि भेल। “हँ। ठीके, हम एतए कमसँ कम एक बेर नमाज अवश्य पढ़ब”। हम अपनाकेँ कहलहुँ। हम जतए रहैत छी मक्का मस्जिद ओतएसँ बड्ड दूर अछि। जुम्मा आ छुट्टीक दिन बससँ एतए अएनाइ बड्ड दुर्गम अछि। तैयो, अगिला बेर हम एतहि नमाज पढ़बाक प्रण कएलहुँ। “हम अगिला सप्ताह् एतए  आबि नमाज पढ़ब अम्मी”, हम कहलियन्हि। ओ प्रफुल्लित अनुभव कएलन्हि आ हमरा दिस आवेशसँ देखलन्हि। “एहि सभ ठाम नमाज पढ़बामे अपनाकेँ धन्य बुझबाक चाही”, ओ कहलन्हि। “अहाँक अब्बा ओतेक दूर रहैत छथि, ओ की नमाज पढ़बाक लेल एतए आबि सकैत छथि? अहाँ अही नगरमे छी..एतए नमाज पढ़ू”, ओ कहलन्हि। “नहि मात्र एतए, जतए कतहु पुरान मस्जिद होए ततए नमाज पढ़ू। कतेक प्रसिद्ध लोक एतए नमाज पढ़ने होएताह। एहि सभ ठाम नमाज पढ़लाक बाद कोनो घुरए केर गप नहि अबैछ। अल्ला अहाँकेँ निकेना रखताह”। हम मस्जिदमे एना ठाढ़ रही जेना जादूक असरि होए। हम हुनकर गप सुनलहुँ, कान पाथि कऽ। बदमे, बाहर निकललाक बाद हम सभ किछु बिसरि गेलहुँ। अपन मस्जिद जएबाक प्रतिज्ञाकेँ सेहो हम कात राखि देलहुँ। ओही संध्यामे हम अम्मीकेँ बस-स्टैण्डपर छोड़लहुँ। तकर बादा दू टा जुम्मा बीतल, मुदा से एना बीतल जेना ओ कोनो जुम्मा नहि छल। आब बम विस्फोटक एहि समाचारक बाद हम जुम्मासँ भयभीत छी। “अम्मी...अहाँकेँ ईहो बुझल अछि जे कोन मस्जिदमे बम फूटल छल”? हम फोनपर पुछलियन्हि। “कोनमे हमर बाउ”? ओ उत्सुक भऽ पुछलन्हि। “अहाँ एक बेर हैदराबाद आएल रही, मोन पाड़ू? हम नञि अहाँकेँ एकटा मस्जिदमे लऽ गेल रही...मक्का मस्जिद...पैघ सन? ओतहि, ओही मस्जिदमे...खुनाहनि ओही मस्जिदमे अम्मी...खसैत लहाश.. अहाँ कहने रही जे कियो जे ओतए नमाज पढ़त, धन्य होएत...ओही मस्जिदमे अम्मी”। हम कहलियन्हि।  “छोट बच्चा सभ...ओकर सभक देह खोनमे लेपटाएल...परबा सभ सेहो मरल...”। नोर अनियन्त्रित दुखमे बहए लागल। हम बाथरूम लग नोर पोछबाक लेल गेलहुँ। हुनक हृदय हमर काननि देख फाटए लगलन्हि। ओ सेहो कानए लगलीह। हम आगाँ कहलहुँ, “अम्मी, नहि कानू...अब्बाकेँ होएतन्हि जे हमरा किछु भऽ गेल अछि...हुनका कहियन्हि जे हम नीकेना छी”। कनैत ओ हमरा पुछलन्हि, “फोन नहि राखब हमर बाउ”। “जल्दी अम्मी, कहू”। “अहाँ चलि आउ...गाम चलि आउ...हमर गप सुनू”। “हमरा किछु नहि भेल अछि अम्मी”। “बाहर नहि जाएब..हमर बाउ”। “ठीक छैक अम्मी”। “ओहि मस्जिदमे नहि जाएब, हमर बाउ”। हमर हृदय फटबा लेल फेर तैयार अछि। हम हुनका ई आश्वासन दैत जे ओहि मस्जिदक लगो कोनोठाम हम नहि जाएब, फोन रखलहुँ। मुदा विचारक आगम बढ़ैत रहल। कतेक विभिन्नता! कतेक परिवर्तन काल्हिसँ! ई हमर अम्मी छथि जे एना बाजि रहल छथि? ई ओ छथि जे हमरा ई बाजि रहल छथि जे मस्जिदक लगो कोनोठाम नहि जाऊ? अल्ला कोनो आन भऽ गेल छथि अपन बच्चाक प्रेमक आगाँ? अपन खूनक आगाँ अल्ला अस्वादु भऽ गेलथि? नमाज विरोधक योग्य भऽ गेल? अल्ला माफी दिअ! क्षमा करू! आन जुम्माकेँ कोनो खुनाहनि नहि हो..औज बिल्लाही..मिनाशैतान...निर्राजीम..बिस्मिल्लाह इर्रहमा निर्रहीम...! (ओहि सभ अम्मीजानकेँ समर्पित जिनका मक्का मस्जिदक बाद अपनाकेँ हमर अम्मी जकाँ परिवर्तित होमए पड़लन्हि...लेखक)

11 1 1 अजय सरवैया, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। अहाँक तामस हमर स्वागतपथ “अहाँ आवेष्टित छी प्रतिध्वनि आ मोहक स्वरसँ”. पाब्लो नेरुदा चक्रधर आ पीयुषक लेल १. “कहि धरि हम खिचैत रहब एना”? ओ पूछत आद्र मुखसँ हेराएल आँखिसँ हम राखब सोझाँ शब्दकेँ, ओ रखतीह नियमावली हम करब सोझाँ अपन इच्छा, ओ भ्रमकेँ हम देबन्हि मेघ, ओ चक्र हम आनब प्रश्न, ओ पलायन हम प्रतिभाक प्रेमी, ओ बन्धनक हम स्वप्नक आकांक्षी, ओ निर्जनताक कहिया धरि? हम बुझलहुँ नीक जकाँ हमर भाग्य रहए फराक हमरा सभक दिन राति सेहो ऋतु आ पाबनि तिहार जकाँ समय काल हमरा सभक अन्तर हमरा सभक विभिन्नता रहए विभिन्न हमरा सभ प्रेम करैत रही कतेक दिन धरि? Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 राजेन्द्र पटेल, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। १ हम किएक कऽ रहल छी अनुभव धरा बिन शाखक बिना एहि हाथक? पसारैत दूर आ विस्तृत जीवित साँपक ताकिमे ई सभ हाथ एक दोसरमे ओझराएल आ समाप्त होइत मात्र नहक वृद्धिमे। बाबाक छड़ीक पकड़िसँ बसक ठाढ़ होएबला लटकल चक्र मुट्ठी अनैत अछि वैह अविचल शून्याकाश। ओकर कए अनुभूति ई सभ खेंचल कार कौआक हाथ घुमि जाएत आकाश दिस सभटा खेत अंकुरित प्रफुल्लित पृथ्वीक गत्र-गत्रक पाँजर खेतमे औंगठल बाँहि जकाँ। सभटा हरक फारक चेन्ह भाग्य रेखा हाथक। पंक्ति जोखि सकैए मात्र हाथक लम्बाई नहि एकर जड़ि पहिने हम कए सकी एकर निदान हाथक आक्रमण जड़िपर श्वेत धरापर रोशनाईसँ पसरल अपन नव अंकुरित आँखिए उड़ि गेल नव-जनमल पाँखिए ओहि धूसरित गगनक पार आब सभटा मस्तिष्क कोशिकामे हाथ रहैछ अहर्निश प्रवेश कए रहल गँहीर आर गँहीर जड़िमे Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 पीयूष ठक्कर, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। सांध्य बेला साँझ होइते शिशिर आह पर्वतक आच्छादित कएल अकाश अविलम्ब पड़त सम्पूर्ण आकाश फाँसमे एहि पर्वतक छाहक पर्वतकेँ भेटत अकाश प्रकाशकेँ छाह शरीर सुतत हृदय दुखित ओहिना जेना ईश्वरकेँ भेटल मनुक्ख Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 पन्ना त्रिवेदी, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। आमद हे विदेशी! देखाऊ हमरा एहन दृश्य यदि अछि कोनो एहन बिनु प्रकाश बिनु गद्दक ओछाओन बिनु छाह जतए नहिए अछि चुप्पीक अंश व्यथित हृदयक ध्वनि नहिए ध्वनिक आँगुरक नोकक स्पर्श देखाऊ हमरा ओ दृश्य यदि अछि कोनो एहन हौ विदेशी! जतए क्यो नहि करैछ एकत्रित स्वासक मालगुजारि। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

22 2 2 बाबू सुथार, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। गृहमोह १. गंध पहिल बुन्नीक आ हम बैसि आ पसारी एक-दोसराक दिस भेदित पड़पड़ाइत बुन्नीक बुन्द बलुआही माटि भेल यथार्थ छननी अएल प्रखर रौदक फोका पाथरक चामपर अविलम्ब झझायत छातक खपराक भूर धारक संग उगडुम करत नवतुरिआ बरद कछेरपर नाचत। सभटा गलीमे बरद सभ आनत पानि सोलह टा पालो बान्हि गरदनिमे सभ घरमे धरनि सभ नहाएत जी भरि देबालपर गाछक छातीपर स्मृतिक शिलालेखपर हदसैत पानि खोलत हस्ताक्षर भगवानक पूर्वजक। बराखक संगे चमकैत आकाश माएक कोमल तरहत्थी। सूर्य करत आच्छादित वृक्षक शाखक पातक पँखुडिक। टाँगल पक्षिक आवास सभ गृहक बाहर मयूर सभ करत नृत्य। जेना प्रिय नव वधु मयूरीक माथपरक जलक घट गामक दोगहीसँ निकलत अनबा लए पानि छिटैत नहक आकारक झील वैतरणी डुमाएत रीढ़युक्त नागफनीक पात। संग जीव आ शिव करत अष्टमी आ एकादशी चन्द्रमा उगत चुट्टीक कटगर पीठपर आ चाली सभ बहराएत आडम्बरसँ राजसी मुकुट धेने सत्ये किछु अकठ अछि हमरा सभक भाग्यमे आइ आइ गंध पहिल अछारक आ हम बैसि आ पसरैत एक दोसरामे। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 वासुदेव सुनानी, ओड़िया कवि ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद शैलेन राउत्रॉय आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा अनुमति हमरा अनुमति अछि श्रीमान! हम कए ली विश्राम कनेक काल? अहाँक आदेशानुसार छाह केँ देने अछि बहारि, बत्तू केँ देने छी खोआए, अहाँक नालाकेँ कए देने छी साफ, नहि रहत कोनो दुर्गन्ध आब। हमर अछि ढोल बजबए बला मधुमाछी युगसँ अहाँक मनोरंजनार्थ आ हमर आँगुर स्थिरताक राखए आश हम करी विश्राम थोड़बे काल? हम करैत छी अनुभव पुरखाक स्वेद हमर देव, हमर मृतात्मा। ताहि लेल प्रिय श्रीमान् घंटा भरिक विश्राम मात्र अभिवादन जकाँ किएक तँ हमर दुर्गन्ध, स्वेदक आ किछु आन वस्तुक। हम करए छी प्रतीक्षा अहाँक नीक समय तृप्तिक संगहि अपन कीट-संक्रमित जिनगीक समाप्तिक संकेतक। प्रतीक्षा सेहि भरि दैत अछि थकान, श्रीमान् प्रियवर विशेषकए लाख बरखक जहुँ ई होए। से हम करए छी विश्राम थोड़ेक काल, श्रीमान्? कारण हमरो सन् तुच्छकेँ बुझल छैक छोट-मोट विद्रोहक कला। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 भरत माँझी, ओड़िया कवि ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद शैलेन राउत्रॉय आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा हमर घुरलाक बाद हमर घुरलाक बादो ओहि स्थानके नहि छोडू रिक्त पकड़ने रहू ओकरा। फूल सभकेँ नहि फेकू की कोनो महत्व अछि एकर जे ओ टटका फुलाएल अछि आकि अछि मौलाएल? खोलू हमर सभटा नुकाएल भोथियाएल स्वप्न, ओकरा अलंकृत कए। उनटि दिअ सभ ठामक लैम्पकेँ, आ रोकि दिअ अन्हारक प्रति घृणा बिना घबरेने देखू समुद्र आ तखनो नहि करू घृणा अकाससँ। नेहोरा अछि!!! पृथ्वीकेँ बुझू एकटा सममिश्रित स्थान प्रयास करू आ ठाढ़ रहू ओतए। कृपया बाट ताकू अपन आ से करए काल, रहू जागल! मोन राखू, हम घुरब एहि पृथ्वीपर जे एहन एकेटा अछि राखू मोन कि हम घुरब हम बाउग केने छी पथकेँ सरिसवक बीआसँ, मोन राखू ओ पथ Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

11 1 1 Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् शीला सुभद्रा देवी (१९४९- ) कैकटा तेलुगु पद्य संग्रह प्रकाशित। १९९७ ई. मे तेलुगु विश्वविद्यालयसँ उत्तम लेखकक पुरस्कार प्राप्त। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। पसीझक काँट बाड़ीमे लगाओल पसीझक काँट गहना लेल केना ओऽ सभ पसरैतत अछि सोहड़ैत! चुपचाप बुनैत रस्ता आच्छादित करैत स्थान। भीड़-भाड़ सभठाम सभ कोणमे काँटबला पसीझक झाड़ सभ, सभ रोकैत स्नेहक अनवरुद्ध प्रवाह चिन्तन विखण्डित पड़ि काँटक मध्य वाणी अवरुद्ध फँसि कोनो झाड़ मस्तिष्क उर्ध्वपतित चुपचाप हृदय बनैछ मात्र एकटा अंग आऽ मौन करैत राज यांत्रिक रूपे॥ मुनैत, बहत नहि हवा एकताक तेनाकेँ ठुसैत सभक आश कोनहुना निकसी आकाश। मुदा की अछि विस्तृत खेत मध्य? कतए गेल फूलक क्यारी फुनगैत मित्रताक हिलबैत अपन माथ आमंत्रणमे? कतए गेल ओ चाली सभ अपन तन्तुसँ बढ़ैत? सभकेँ समेटैत ओ लता-कुञ्जक मंडप कतए गेल छोड़ि मात्र अशोक आऽ साखुक वृक्ष जे पसारि रहल आकाश मध्य अपन हाथ नीचाँ देखैत विश्वकेँ घासक पात सन तुच्छ? यदि हम मोड़ी आऽ घुमी घोरैत अपनाकेँ नोरमे वेधए बला मोथा नहि भोकैत अछि मात्र पएर वरन् आँखि सेहो। सभठाम लोक उन्मुक्त ठाममे मानवीय सम्पर्कसँ घृणा करैत परिवर्तित कएलक नगरकेँ सेहो बोनमे। पसारैत काँट सभ ठाम परिवर्तित भेल पसीझक झाड़मे साँसक फुलब पसरैत चारू दिश दोसराक संवेदना नहि आबए दैछ विचार जिनगी भेल उसनाइत खेत सन। इच्छा भागबाक पएर केने आगाँ। आश्चर्य, मथि नहि सकैत छी, औँठा धरि। देखि सकी जौँ अपनेकेँ मात्र भीतरसँ बाहर पसीझक काँट मात्र।

11 1 1 एन. अरुणाक जन्म निजामाबाद लग एकटा गाममे १९४९ ई.मे देलन्हि। तेलुगुमे पाँचटा कविता संग्रह प्रकाशित। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। ई सेहो अछि प्रवास अहाँ नहि छी मानैत मोटा-मोटी ईहो छी प्रवास एकर गुण षडयन्त्र जेकाँ मूल जन्मकालेसँ “तैयो अछि तँ बेटीये” अछि ने ई? कोनो पुरुषक हाथमे तँ जएबाके छैक ने एक दिन प्रवास मात्र अमेरिके टा प्रवासक नहिक नहि नारी सेहो अछि एकटा ई। अहाँ एकर अवहेलना कए सकैत छी सुविधासँ। तैयो कतेक कठिन छोड़ब जिनगी भरिक लेल अपन जन्मस्थान पाएब एकटा अनचिन्हारक आँगुर? अहाँ घुरि सकैत छी कखनो काल मुदा बनि मात्र पाहुन। जखने हम पएर राखब कतेक काल धरि अहाँ रहब पुछब हमर लोककेँ। “जाऽ धरि हम चाही” इच्छा अछि कहबाक मुदा श्रृंखला ससरल हमर इच्छापर बहुत पहिनहि। प्रवास नहि अछि हर्खक वस्तु। छोड़ि ई मात्र जे समय बितने बढ़ैत अछि ई बनैत अछि अभ्यास। Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

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मैथिली अंग्रेजी शब्दकोश खण्ड - 6 (कंप्यूटर / इन्टरनेट / साइंस शब्दावली सहित संगणक / अन्तर्जाल / विज्ञान शब्दावली सहित) लेखक | | i | गजेन्द्र ठाकुर | हुई ई | ी | i EHEHENENEN EEE नागेन्द्र कुमार झा [है से जी हैं सी हैं है है 5855... पब्जीकार विद्यान्द झा... ATA PE NEV ETAT जन मैथिली अंग्रेजी शब्दकोश आज (संयुक्त ISBN No. 978-8-907729-2-I ) करेगे ापापापपपपप$ण्फप्पप्प्प््ह्ड लेखक THR ठाकुर aT कुमार झा Teste विद्यानन्द झा शोध सम्पादन, डिजिटल इमेजिंग आ तिरहुतासँ देवनागरी लिप्यांतरण ( Combine ISBN No. 978-8]-97729-6-9) a ENGLISH MAITHILI DICTIONARY भाषण, उ-ञ6 (Including Computer / Internet / Science Terminology) Authors Gajendra Thakur Nagendra Kumar Jha Panjikar Vidyanand Jha English Maithili Dictionary (Combine ISBN No. 978-8-907729-3-8)

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श्रुति प्रकाशनसँ l. पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला - मौन 2. मैथिली भाषा-साहित्य (20म शताब्दी) - प्रेमशंकर सिंह 3. गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्-मिश्रित ) -. गंगेश गुंजन 4. बनैत-बिगड़ेत (कथा-गल्प संग्रह ) -. सुभाषचन्द्र यादव 5. कुरक्षेत्रमू-अन्तर्मनक, wS- सँ 7 -. गजेन्द्र ठाकुर (लेखकक छिडिआयल va, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाड्‌की, बालानां Ad, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन) 6. विलम्बित कइक युगमे fag (पद्य-संग्रह ) -. पंकज पराशर 7. हम Yea छी (पद्य-संग्रह ) -. fata उत्पल 8. नो एंट्री : मा प्रविश -. उदय नारायण सिंह (चारि कल्लोलक मैथिली नाटक) “नचिकेता 9, विभारानीक दूटा नाटक (भाग रौ आ बलचन्दा) 0. मैथिली अंग्रेजी शब्दकोश गजेन्द्र ठाकुर Il. English Maithili Dictionary नागेन्द्र कुमार झा I2. पउ्जी प्रबंध Tose विद्यानन्द झा Sole Distributor AJAY ARTS 4393/4-A, Ist Floor, Ansari Road, Darya Ganj, New Delhi - 0002 Tel.: 04-2328834 Mob.: 99687007