SADEHA — 2

Publication: SADEHA · Issue: 2
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भालचन्‍द्र झा बाल-शिक्षणपर निबन्ध हमर शिक्षण-यात्रा १ ई गोट पचीस- तीस बरख पुरान गप्‍प अछि। तहिया हम नव-नव ए.टी.डी. (आर्ट टीचर्स डिप्‍लोमा) कएने रही। मुम्‍बइक (तखन बम्‍बइ रहै) एक गोट प्रसिद्ध स्‍कूलक प्राथमिक विभागमे सहायक शिक्षकक रूपमे नाकरी धऽ लेलहुँ। आध दिन नोकरी आ अ‍ाध दिन अपन कॉलेजक अगिलुका पढ़ाइ। किछुए दिनमे हमर पढ़एबाक पद्धतिकेँ लऽ कऽ अभिभावक सभक उपराग आबऽ लगलैक। नहूँ-नहूँ ई उपरागक स्‍वर कनेक ऊँच बुझाए लागल। बात मुख्‍याध्‍यापक धरि पहुँचि गेलै। मुख्‍याध्‍यापक शैक्षणिक क्षेत्रमे राष्‍ट्रपति अवार्ङसँ विभूषित छलाह। अपन काजक प्रति एतेक समर्पित, जे जाहि दिन हुनकर अपन बेटीक बियाह रहनि, ओहू दिन अपन काजक क्षतिपूर्तिक वास्‍ते भोरमे पाँचे बजे अपना टेबुलपर हाजिर। आ ककरो कानोकान खबरि धरि नहि। ने किओ प्‍यून आ ने कोनो सहायक। मुहूर्तक समएसँ किछु पहिने फोन कऽ देल गेलनि तँ कन्‍यादान करबाक हेतु विवाह मण्‍डपमे पहुँचलाह (महाराष्‍ट्रमे विवाह दिनमे होइत छै)। एकदिन हठात प्‍यून आबिकऽ हमरा हुनक समाद देलक जे ‘हेड गुरूजी अपनेकेँ याद कएलनि अछि’। एहने बिना कोनो कारणक ओ ककरो डिस्‍टर्ब नहि करैत छलाह। खासकऽ हमरा। हमरा सँ कनेक विशेष लगाव होएबाक कारण। जे हम ओहिकालक शिक्षक सभक लॉटमे नवतुरिए रही। दोसर जे कला शिक्षकक हैसियतसँ हम बिनु ककरो कहने अपने मोनसँ स्‍कूलमे अनेक तरहक विधाक काज करी। रूटीनसँ हटिकऽ किछु-किछु नब-नब प्रयोग करबामे हमरा बड्ड मोन लागए। किछु विषयान्‍तर तँ होएत मुदा एतऽ उदाहरणक वास्‍ते एक-दू गोट छोट-छिन प्रसंग कहब आवश्यक हएत। शिशु-वर्गक नेन्ना सभ जहन पहिल-पहिल बेर स्‍कूल अबैत अछि तँ माए-बापकें छोड़ैत नञि रहैत छैक। कनैत-कनैत अपस्‍यॉंत भेल रहैत छैक। झौहरि तँ एतेक पड़ैत छैक जे कान नञि देल जाइत छैक। स्‍कूलक पूरा स्‍टाफ ओकरा सभकें तरह-तरहसँ बौंसऽ मे लागल रहैत अछि। हमहूँ ओहि प्रयासमे लागल रही। नेन्ना सभक ध्‍यान बँटेबाक वास्‍ते हम किछु कागज आ ऑइल पेस्‍टल (मोमक रंग-पेन्सिल) आनि कऽ ओकरा सभक सोझाँमे राखऽ लगलिऐक। परिणामो जल्‍दीये देखाए लागल। ओहिमे सँ किछुकें तँ ओ कागज आ पेन्सिल देखिते मातर तरबा ल‍हरि मगजमे पहुँचि गेलै। ओ सभ कागजकेँ हाथमे लऽ कऽ ओकरा चिर्री-चिर्री कऽ देलकै। पेन्सिल टुकड़ी-टुकड़ी कऽ कऽ बीगि देलकै। एक गोट नेन्नाकें जहन हम बहुत फोर्स केलिऐ तँ ओ हमरा हाथसँ पेन्सिल छीनि कऽ सामने राखल कागजपर जेना टूटि पड़ल। हाँ‍‍ञि-हाँ‍‍ञि कऽ पेन्सिलकेँ कागजपर घसऽ लागल। एक बेर जे कागजपर पेन्सिल रखलकै से फेर बिनु उठौनहें पूरा कागजकें भरि देलकै। मुदा एहि के बाद ओ शांत भऽ गेलै। भऽ सकैये, ओकर एनर्जी जबाब दऽ देने होइ। अथवा ओ हमर प्रतिक्रियाक प्रतीक्षा करऽ लागल हुअए। वा हमर प्रति अपन क्रोधक प्रदर्शन करबाक वास्‍ते ओ एहि माध्‍यमक उपयोग केलाक बाद शांत भऽ गेल। बहुत दिन धरि हम एहि विषएमे सोचैत रहलहुँ। से किएक तँ पूर्ण विश्‍वास अछि जे छोटोसँ छोट, प्रत्‍येक कृतिक (Act) किछु अर्थ होइत छैक, किछु प्रयोजन होइत छैक। भने आइ ओहि विशिष्‍ट कृतिक सार्थकता दृष्टिपथमे नहि आबए। मुदा बिना कोनो प्रयोजने कृति भऽ नञि सकैत अछि। कमसँ कम एतेक तँ बुझबामे आबिये गेल जे आत्‍म-प्रगटीकरण हेतु चित्रकला सन प्रभावी दोसर माध्‍यम नहि। जाहि माध्‍यममे बिना कोनो संस्‍कार वा व्‍याकरणकेँ नेन्नो अपन मोनक गप्‍प व्‍यक्‍त कऽ सकैत हुअए, ओहिसँ सरल आ श्रेष्‍ठ कोन माध्‍यम भऽ सकैत अछि ? किछु दिनक बाद जहन नेन्ना सभ स्‍कूलक माहौलसँ घुलि-मिलि गेल, हम एही तरहक एक गोट आर प्रयोग कएल। एक गोट कक्षाक साफ-सफाइ करा कऽ पूरा फर्शपर उज्‍जर प्‍लेन कागज पसारि देलिऐक। कोठरीमे एक गोट स्‍पीकर टँगवा देलिऐक । आ डोलमे भित्र-भित्र रंगकें घोरि कऽ कोठ‍रीक बाहरक जमीनपर हेरा देलिऐक, जाहिसँ कोठरीमे जाइ काल ओकरा सभकें ओहि रंगेपर सँ जाए पड़ैक। आ तकर बाद कोठरीक स्‍पीकरपर नेन्ना सभक कोनो परिचित गीत शुरू कऽ देलिऐक। नेन्ना सभकें खालीए पएर ओहि कोठरीमे जएबाक लेल कहि देल गेलैक। अनेक रंगसँ पोताएल तरबा लऽ कऽ गीतक तालपर नेन्ना सभ ओहि उज्‍जर प्‍लेन कागजपर नाचऽ लागल। ओहि कागज परक रंग-बिरंगा छापकें देखि कऽ ओकर सभक जे प्रतिक्रिया भेलैक तकर वर्णन कोनो प्रतिभाशाली, संवेदनशील कवि कऽ सकैत छल। तकरा बाद तँ ओ सभ अपनेसँ बाहर जा-जा कऽ अपना पसंदक रंगमे पएर पोति-पोति कऽ भरि पोख अपन तरबाकें ओहि कॅनवासपर अंकित करऽ लागल। एहि तरहें बनल रंग-छापकें (Colour Print) चुनि-चुनि कऽ जहन ओकर फ्रेम बनाओल गेलै, तहन तँ ओकर सौंदर्य आर निखरि गेलैक। ओहि फ्रेमकें शिशुवर्गक कक्षा सभमे टाँगि देल गेलैक। तकरा बाद बहुत दिन धरि नेन्ना सभ अपन-अपन पएरक छाप चीन्‍हऽ मे अपन आनन्‍द हेरैत रहल। कहक माने ई जे एहि तरहक प्रयोग सभसँ हमर मुख्‍याध्‍यापक बड्ड प्रसत्र होथि। प्‍यून जखन हुनक समाद देलक तँ हम पहिल फुर‍सतिमे हुनकर केबिनमे पहुँचि गेलहुँ। ओ जाहि तरहें वातावरण बनबऽ लगलाह ओहिसँ ई बुझबा मे कनेको भाङ्गठ नहि भेल जे कोनो गम्‍भीर बात छैक। खैर ओकर अधिक विस्‍तारमे नहि जाइत एतऽ एतबे कहब जरूरी अछि, जे अभिभावक सभ हमर पढ़एबाक पद्धतिक विरोधमे हुनका धरि पहुँचि गेल रहथि। मिला-जुला कऽ उपराग एतबे जे ‘अहाँ नेन्ना सभकेँ चित्र बनाएब नञि सिखबैत छिऐक। घरमे नेन्ना सभक चित्र पूरा करबाक जिम्‍मेदारी माए-बापकें उठबऽ पड़ैत छैक।’ उपराग सुनिते एहि तरहक सोचक मूल स्रोत बुझबामे भाङ्गठ नञि भेल। एहि तरहक सोचक मूल स्रोत छैक प्रचलित शिक्षा पद्धति। हम सभ जाहि शिक्षा-व्‍यवस्‍थाकें अंगिकार कएने छी, ओकर सभसँ भारी समस्‍या हमरा जनितब इएह जे एहि शिक्षा-पद्धतिसँ नेन्ना सभक मोनपर जाहि तरहक संस्‍कार पड़ब अपेक्षित‍ से नञि भऽ रहल छैक। विद्यार्थीकें स्‍वयंसिद्ध बनएबामे जाहि तरहक ज्ञान, मेहनत आ संयमक आवश्‍यकता होइत अछि, ओकर पूर्ण अभाव। किताबमे छपल शब्‍द पढ़ि देलहुँ वा पढ़वा देलहुँ। ओही महक किछु शब्‍दक पर्यायवाची शब्‍दक अर्थ कहि कऽ पड़सि देलहुँ। भऽ गेलै! छुतिका छुटि गेलै। स्‍वाइत गुरूदेव रविन्‍द्रनाथ ठाकुरकें ‘शान्तिनिकेतन’ आरंभ करबाक आवश्‍यकता बुझेलनि ! आ हम सभ एखनो धरि वएह लकीरक फकीर बनाबऽ मे लागल छी। नवीनताकेँ स्‍वीकारब तँ हमरा सभकें जेना पापे बुझाइत रहैत अछि। तें एहि युगक महान वैज्ञानिक आइन्‍सटाइनकें ई कहऽ पडलनि, जे ‘हमर शिक्षा-दीक्षा तँ ओही दिन समाप्‍त भऽ गेल, जाहि दिन हमरा स्‍कूलमे भर्ती करा देल गेल।’ कला जकाँ सृजनशील विषएक अवस्‍था कोनो भित्र नञि अछि। ब्‍लैकबोर्डपर कोनो चित्र खीचि देल आ नेन्ना सभकेँ ऑर्डर भऽ गेल, जे एकरा देखिकऽ चित्र बनबै जाऊ। भऽ गेलै। आब अपने टाइम-पास करबाक हेतु फ्री छी। गार्जियनो सभ एहिना सिखने छथि। तें नेन्नाकें कॉपी भरल देखलन्हि आ भऽ गेलाह प्रसन्न, जे चलू, पढ़ाई भऽ रहल छैक। कॉपी भरि रहल छैक। मुदा ओ सभ ई नञि सोचैत छथि, जे ब्‍लैकबोर्डपर बनाएल चित्र तँ कोनो वयस्‍कक दिमागक प्रतिमा (Image) छैक। नेन्ना सभक दिमागमे ओहि प्रतिमाकेँ स्‍थापित करबाक धडफड़ी किएक ? नेन्ना सभक दिमागक विकास-क्रमक अनुरूप ओकर अपनो किछु प्रतिमा हेबे करतैक। ओकरा सोझा अनबाक प्रयास किएक ने, जाहिसँ ओकर अपन स्‍वतंत्र विकास होइ? एहि बातकें एहि तरहें बूझल जाए। मानि लिअ जे वयस्‍क शिक्षक अपन विकसित (! ) दिमागसँ एकगोट फुजल छत्ताक चित्र ब्‍लैकबोर्ड पर बना कऽ नेन्ना सभकें ओकरा बनाबऽ लेल कहैत छथि। ब्‍लैकबोर्डपर चित्रित फुजल छत्ता, भौमितिक आकारक अनुरूप साधरणतया अर्धगोल देखाइत छैक। मुदा अहाँ देखबैक जे नेन्ना सभक मानस पटलपर भौमितिक आकारक मिती (Dimension) स्‍पष्‍ट नहि भेल छैक। पचमा- छठमा दर्जामे जहन भूमिती पढ़ाएल जेतैक तँ ओकरो दिमागमे मितीक अंतर स्‍पष्‍ट भऽ जेतै। एहि अवस्‍थामे वयस्क शिक्षक जहन अपन चित्रक तुलनामे नेन्ना सभक चित्रमे ‘गलती’ सुधारऽ लगैत छैक तँ नेन्ना सभ बाजि तँ किछु नञि सकैत अछि। मुदा भीतरे-भीतर ओकरा सभक दिमागमे घोंघाउज (Confusion) शरू भऽ जाइत छैक। किएक तँ ओकरा जनितबें ओहो वएह चित्र बनौने अछि। तहन गलती कोन तरहक भेलैक, से बुझबाक प्रगल्‍भता एखन ओकरामे विकासित नहि भेल छैक। नेन्ना सभक चित्र वयस्‍क सभक चित्रसँ भिन्न भने देखाइत हुअए, मुदा गलत नहि भऽ सकैत अछि। तें हमरा जनितब नेन्ना सभक चित्र देखबाक नञि पढ़बाक वस्‍तु होइत अछि। एहि बातकें जखन चित्रकला सिखाबऽ बला शिक्षके नञि बुझैत छथि तँ सामान्‍य स्‍त्री-पुरुषक कथे की ! ब्‍लैकबोर्डपर चित्र बना कऽ पढ़ाएब नेन्ना सभक स्‍वतंत्र सोचपर अन्‍याय करब भेलैक। ओकरा आश्रित बनेनाइ भेलैक। हम योजित विषयपर नेन्ना सभक स्‍तरपर चर्चा कऽ ओकरा सभकें प्रेरित करबामे अधिक विश्‍वास राखैत छी, जाहिसँ ओकरा सभक मानस पटलपर ओहि विषएकेँ लऽ कऽ ओकर अपन स्‍वतंत्र बिम्‍ब बनौ, आ तकरा बाद ओ सभ अपन क्षमताक अनुरूप कागजपर ओकरा उतारए। भनहि ओ चित्र वयस्‍क सभक दृष्टियेँ कतबो बेढब, आकारहीन, मितिहीन होइ मुदा ओहि चित्रमे नेन्ना सभक अपन व्‍यक्तित्‍व हेतैक, ओकरासँ अपनत्व हेतैक, ओकर आत्‍मविश्‍वास बढ़तैक, स्‍वतंत्र रूपसँ अपन दिमाग लगएबाक आदति लगतैक। नेन्ना सभक चित्रमे एहिसँ अपेक्षा हमरा अपराध बुझाइत अछि, किएक तँ एखन ई विषए पढ़एबाक मूल उद्देश्‍य, एहि विषएक प्रति ओकरा मोनमे आत्‍मीयता उत्‍पन्न करब छैक, ओकरा चित्रकार बनेनाइ नञि। ई तँ काले तए करतै जे ओ चित्रकार बनत की नञि। एहि विषएक माध्‍यमसँ ओकरामे खाली नवनिर्माणक क्षमताक प्रति आस्‍था जागृत कएल जा सकैत अछि। एक गोट ठोस उदाहरणसँ एहि संकल्पनाकें आर बेसी स्‍पष्‍ट कएल जा सकैत अछि। साधारण रूपसँ जहन नेन्ना सभकेँ मुर्गीक चित्र बनेबाक लेल कहल जाइत छैक तँ ओ मुर्गीक पेटमे अन्‍डा सेहो देखबैत छै। आब हम सभ तथाकथित संस्कारसँ ग्रस्‍त लोक जहन ई चित्र देखैत छी, तँ गुम भऽ जाइत छी। जे केहन मतसुन्न नेन्ना अछि ई ? मुर्गीक पेटमहुक अन्‍डा कतऽ सँ देख लेलक ई ? बस लगलहुँ ओकरा हूथऽ ... तरह-तरहसँ ओहि महक गलती बुझाबऽ। चीजक ‘असलियत’ बुझने, लगलहुँ ओकरा ‘असली’ चीजक अर्थ बुझाबऽ। असलियत ई अछि जे आठ-दस साल धरि नेन्ना सभकें यथार्थ दृष्टि प्राकृतिक रूपसँ भेटल रहैत छैक। एकरा दोसर शब्‍दमे ‘एक्‍स रे’ दृष्टि सेहो कहि सकैत छिऐक। प्रत्‍येक वस्‍तुकें देखबाक ओकर अपन दृष्टिकोण होइत छैक। वस्‍तुकें आर-पार ओ देख सकैत अछि। मुदा हमरा सभक दृष्टिमे ओकर एहि दृष्टिकें कोनो मोजरे नञि। हम सभ सदखनि अपन तथाकथित वयस्‍क (!) संस्‍कारित दृष्टिकोणसँ सभ चीजकें नपबाक अभ्‍यस्त छी। तैं ओकर यथार्थवादी दृष्टिकोणकेँ पढबामे हम सभ सक्षम होइत छी। ई रहने हमरा आओर तँ बुझितिऐक जे नेन्ना जहन मुर्गीक आङ्गिक विशेषताक बारेमे ख्‍याल करैत छैक तँ ओकर यथार्थवादी दृष्टिकोण इएह कहैत छैक जे मुर्गी अन्‍डा दैत छै। ई सोचिते ओकर मोन कहैत छै, एकर माने कतहु अन्‍डा जमा हेतैक। तुरत ओकर स्‍मरण ओकरा मदद करक वास्‍ते हाजिर भऽ जाइत छैक। माएसँ सुनने अछि, मुँहसँ खाएल अन्न पेटमे चलि जाइत छैक। माने पेटमे जमा होएबाक जगह छैक। ओ पेटमे अन्‍डा देखा दैत छैक। एहि प्रक्रियामे ओ गलत कोना आ कतऽ भेल? रहल वैज्ञानिक सत्‍यताक गप्‍प। तँ जेना-जेना ओकर उम्र बढतैक, उपरका दर्जामे ओ जाएत, ओकरा ईहो स्‍पष्‍ट भऽ जेतैक। एखनि तँ शिक्षकक उद्देश्‍य ई होबाक चाही जे ओ निडरतासँ अपना आपकें व्‍यक्त करबामे सक्षम हुअए। हमरा बुझने अपन कल्‍पना लादि कऽ शिक्षक आ गार्जियन सभ ओकर प्राकृतिक यथार्थकें, तार्किक दृष्टिकोणकें, ओकर स्‍मरणशक्तिक विकासकें कुंठित करबामे लागल छथि। सभाक उपसंहार करैत हम एतेक अवश्‍य कहलियन्हि, जे जाहि दिन नेन्ना सभक चित्रमे अपने सभ दखल देब बन्न कऽ देबन्हि, ओही दिनसँ नेन्ना सभक मानसिक विकास शुरू भऽ जेतैक। २ दुइये बरखमे मास्‍टरीसँ हमर मोन उपटि गेल। नोकरी छोडि देलहुँ। मुदा ई भाव सदिखन बनल रहल जे हम स्‍कूल नञि, अपन सिखबाक प्रयोगशाला छोडि़ रहल छी। मुदा ईहो स्थिति बहुत दिन धरि नञि रहल। पुरना स्‍कूलक एक गोट स्‍टाफ हमर अभित्र छलाह। एकदिन हमरा अचक्‍के भेट गेलाह। कहऽ लगलाह जे एक गोट शिक्षक एक गोट झुग्‍गी बस्‍तीमे स्‍कूल खोलि रहल छथि। ओकर विशेषता ई अछि जे ओहि स्‍कूलमे ओ एहने विद्यार्थीकेँ एडमिशन देबऽ चाहैत छथि जकरा कोनो आन स्‍कूलमे एडमिशन नहि भेटैत छै। गप्‍प वास्‍तवमे ध्‍यान देबऽ योग्‍य रहैक। एहन स्‍कूल खोलबाक हेतु तेहन ध्‍येयवादी शिक्षक सभक आवश्‍यकता हेतैक। अपन अभिन्नक मंतव्‍य बुझबामे हमरा कनियो भाङ्गठ नहि भेल। मुदा हमरा एकहि नोकरीमे ई बुझबामे आबि गेल छल जे मास्‍टरीमे जाहि तरहक संयम, स्‍थैर्य आ धैर्यक आवश्‍यकता होइत छैक, हमरामे ओकर लेशो मात्र नञि अछि। हुनका तत्‍काल हम कोनो वचन नञि देलियन्हि। असलमे हम फेरसँ ओहि रुटीनमे फँसऽ नहि चाहैत छलहुँ। मुदा ओ अपनहिसँ हमर नामक सिफारिश कऽ देलन्हि। किछुए दिनमे हमरा ओहि मुख्याध्‍यापकजीक समाद भेटि गेल। ई १९८१-८२ क गप्‍प अछि। एक गोट शिष्‍टाचारक धर्म बुझि हम हुनकासँ भेंट करबाक निश्‍चय कएल। मुदा हुनक कथा-वार्तासँ हम बड्ड प्रभावित भेलहुँ। ओहो हमर प्रतिक्रिया स्‍वरूप टिप्‍पणीसँ प्रभावित बुझएलाह। हम ट्रायल बेसिसपर किछु दिनक हेतु हुनकर ऑफर स्‍वीकार करबाक निश्‍चय केलहुँ। एहिबेर हमर नियुक्ति माध्‍यमिक दर्जा (पँचमा सँ दसमा दर्जा) हेतु भेल रहए। झुग्‍गी बस्‍तीक ओहि स्‍कूलमे सभ तरहक अपराध बेरोकटोक चलै छल। दारू बनेनाइ, बेचनाइ, पिनाइ आ जूआ खेलेनाइ तँ बड्ड साधारण गप्‍प। बस्‍तीक स्‍वाभाविक अस्‍वच्‍छतासँ पसरल दुर्गन्धि आ दारूक गंधसँ स्‍कूलमे नाक नञि देल जाइ। स्‍कूलक खिड़कीक निच्‍चा जुआक दाँव लगै। ओ तँ धन्‍य कही मुख्याध्‍यापकजीक जे ओ निडरतासँ एहिसभ सँ निपटैत छलाह। लाठी लऽ कऽ खिहारि-खिहारि कऽ ओकरा सभकेँ भगबथि। आ स्‍कूलमे ओकरे सभक बेटा-बेटीकें पढ़एबाक भार उठाबथि। बेरोजगार युवक सभ महिला शिक्षिका सभकें बड्ड उछन्नरि दै। जान मुट्ठीमे लऽ कऽ सभ व्‍यवहार चलैक, किएक तँ कखन ककरासँ उट्ठा-बज्‍जरि भऽ जाए, एकर कोनो गैरेंटी नञि। अनुकूल परिस्थितिमे कोनो काजकें सफल बनेनाइ कोनो विशेष गप्‍प नञि। मुदा सभ तरहसँ परिस्थितिक प्रतिकूलतामे कोनो काजकें सफल बनेनाइ एकटा उपलब्धिये कहल जा सकैत अछि। आ सेहो शिक्षा जेकाँ एक गोट गंभीर तथा जिम्‍मेदारीबला क्षेत्रमे। मुख्‍याध्‍यापकजीक एहि साहसकें एक तरहें तपस्‍ये कहल जएबाक चाही। बस इएह एक गोट बात छल जाहि सँ हम हुनका दिसि आकर्षित भेलहुँ। एक गोट भित्र तरहक, शिक्षाक असली बेगरताबला नेन्ना सभक संग साथक अनुभव। स्‍कूलक टाइम-टेबुलमे ‘चित्रकला’ एकतरहें जगह भरऽ बला (Filter) विषयक तौरपर लेल जाइत अछि। टाइम-टेबुलमे सभसँ अग्रिम स्‍थान पाबऽ बला विषए होइत अछि गणित (हिसाब), दोसर मान विज्ञानक, तेसर मान देल जाइत अछि भाषाकें, ताहूमे अंग्रेजीक स्‍थान प्रथम, तहन मातृभाषा, तकरा बाद द्वितीय भाषा। चारिम स्‍थानपर इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्‍त्रकें कोनहुना फिट कऽ देल जाइत छैक। तहन अबैत छैक नम्‍बर पॉलिसी मैटरबला विषए सभक, जेना कार्यानुभव, हस्‍तकला, चित्रकला, पी.टी., जकरा ‘खेल’ क नामपर शहीद कऽ देल जाइत छैक। सप्‍ताहमे एक-दू बेर सांस्‍कृतिक कार्यक नामपर अनेक तरहक छूटल-छिरियाएल विषएसँ छुतिका छोड़ा लेल जाइत छैक। अइ कथापर गौर केलासँ शिक्षाक दर्जा आ ओहिसँ होबऽबला परिणामक अंदाज अ‍ाबि सकैत अछि। आटा पीसऽबला मशीनकें देखियौ। ओकर मुँहमे गहूम अथवा आन कोनो अनाज उझील देल जाइत छैक। आ किछुए कालमे दोसर दिसिसँ पिसाए आटा बहरा जाइत छैक। आजुक शिक्षा-पद्धतिकें देखिकऽ हमरा ई स्‍कूलो सभ विद्यार्थी बनाबऽ बला बड़का-बड़का मशीने बुझाए लगैत अछि, जाहिमे प्रत्‍येक वर्ष विद्याक अर्थी उठाओल जाइत अछि। त्रुटि दृष्टिकोण (Vision) मे नञि, त्रुटि कार्यान्‍वयन (Execution) मे अछि। प्रत्‍येक विषयक अपन किछु विशिष्‍टता छैक। समय आ स्‍थानक मर्याद अछि। तैँ सम्‍प्रति मात्र किछु पॉलिसी मैटरबला विषएक सन्‍दर्भमे हम अपन विचार राखब। असलमे एहि सभ विषएकें दू गोट श्रेणीमे राखल जा सकैत अछि। दिमागमे तनाव पैदा करऽ बला विषए आ दिमागी तनावकें ढील (Relax) करऽ बला विषय। मुख्‍य विषए सभ कोनो ने कोनो सिद्धान्‍तक व्‍याकरणक ज्ञान दैत छैक। एहि तरहक विषए सभमे शरीर स्थिर रहैत छैक मुदा दिमागी एकाग्रता, सतर्कता, आ जागरूकता अपन चरमपर, जाहिसँ दिमागपर दबाव बनैत छैक। दोसर दिस हस्‍तकला, चित्रकला, संगीत, कार्यानुभव, पी.टी. (खेल) एहि तरहक विषए सभमे एक तरहक नवनिर्मितिक आनन्‍द भेटैत छैक। संपूर्ण शरीरमे भित्र-भित्र तरहक लय, ताल आ भंगिमामे कृतिशील रहलासँ मनोरंजनक अनुभति होइत छैक। एहिसँ तनाव आ दबावकें ढील होमएमे मदति भेटैत छैक। तें नेन्ना सभक टाइम-टेबुलमे एहि दूनू तरहक विषएकें एहि तरहें बान्‍हल जएबाक चाही, जाहिसँ समतोल (Balance) बनल रहै। जतेक सम्‍भव भऽ सकै, तनाव उत्‍पत्र करऽबला विषएक बाद, तनावकेँ मुक्त करबाक वास्‍ते दोसर तरहक विषएक रचना करबाक चाही। जाहि सँ अगिलुका विषएक तनाव झेलबाक क्षमता उत्‍पत्र भऽ सकए। अइमे मेहनति छैक, दिमागी छैक। योजनाबद्ध तरीकासँ काज करबाक परीक्षा छैक। के करत ? मुदा एहि विषए सभक योग्‍य नियोजनसँ की चम‍त्‍कार भऽ सकैत छैक तकर प्रत्‍यक्ष अनुभव हमरा एहि स्‍कूलमे कएल अपन प्रयोगसँ भेल। जाहि तरहक वातावरणसँ ई स्‍कूल घेराएल छल तकर वर्णन तँ ऊपर केनहे छी। एहन वातावरणमे के टिकए ? तें शिक्षक सभक कमी सदिखन बनल रहैक। कोटा पद्धतिसँ शिक्षकक नियुक्ति, तकरामे आर अड़चनि पैदा करए। बहुत रास विषएक शिक्षके नहि भेटै। आपसमे कहुना कऽ ऐडजस्‍ट करैत विषए सभ पढ़ाअ‍ोल जाइ। हमरो कोनो ने कोनो शिक्षकक क्षतिपूर्ति करबाक वास्‍ते बेगरतू कक्षामे पठा देल जाए। हमहूँ एकरा एक गोट मौका बूझि कऽ टाइम-टेबुलपर देल विषए पढाबऽ लागी। कतहु अंग्रेजी तँ कतहु मराठी, कतहु हिन्‍दी तँ कतहु आन कोनो विषए। ताबत ए.टी.डी. कएलाक बाद हम रुपारेल कॉलेजसँ बी.ए. कऽ लेने रही। थिएटर डिप्‍लोमा चलि रहल छल। तैं पँचमासँ दसमा धरिक नेन्ना सभकें विषए पढ़ेनाइ ततेक कठिन नञि बुझाए। हम बी.ए. अर्थशास्‍त्र लऽ कएने रही। तें दसमा वर्गमे अर्थशास्‍त्र पढ़एबाक जिम्‍मा हमरे दऽ देल गेल रहए। नियामनुसार ई ठीक नञि छल। किऐक तँ हमर नियुक्ति रहए स्‍पेशल शिक्षकक रूपमे। मुख्‍य विषए पढ़एबाक हेतु हम प्रशिक्षित नञि रही। मुदा मुख्‍याध्‍यापको मजबूर छलाह। दोसर कोनो उपाये नञि रहनि। अहिना एकदिन हमरा दिमागमे एक गोट बात आएल। जे एकहि कक्षामे एक गोट विद्यार्थी प्रथम अबैत छैक। आ ओकरे बगलमे बैसऽबला फेल भऽ जाइत छैक, से किएक ? दोसर बात जे फेल विद्यार्थियो कोनो विषएमे बढिञाँ अंक आनैत अछि तँ कोनोमे खराप, से किएक ? जखन कि कक्षा, शिक्षक, समए सभ एके रंगक होइत छैक। किछु कारण तँ अवश्‍ये हेतैक। विचार केला सन्‍ता ई बुझाएल जे जाहि विषएमे ओ बेसी अंक आनैत अछि ओहिमे अवश्‍ये एहन किछु गप्‍प छैक जे ओकरा पसिन्न छैक। तें ओहि विषएमे ओकर मोन अधिक रमै‍त छैक। दोसर विषएमे ठीक एकर उल्‍टा हेतैक। यदि ओहि विशिष्‍ट विषएमे सँ ओकर पसीन (Interest) केँ ताकि लेल जाए तँ दोसर विषएमे ओकर ओहि पसीनकें पैदा कऽ कऽ परिणाम बदलल जा सकैत अछि की नहि ? हम एहि दिशामे प्रयत्‍न करबाक निश्‍चए केलहुँ। ओहि समएमे प्रत्‍येक कक्षाकें विद्यार्थी-संख्‍याक अनुसार ‘अ’-‘ब’-‘क’-‘ड’-‘ई’ ...एहि तरहेँ भिन्न-भिन्न विभागक संरचना कएल जाए। एहि व्‍यवस्‍थामे ‘अ’-‘ब’ मे बढिञाँ, पास होबऽ बला विद्यार्थी आ ओकरा बादक दर्जामे सभ भुसकौल, फेल होबऽबला विद्यार्थी सभ राखल जाइ। आब अइ तरहक भिन्न-भिनाऊज करबाक अनुमति नञि छैक। मिझ्झर कऽ बैसाएल जाइत छैक। तँ हम आठमा ‘ड’ क चारि गोट विद्यार्थीकेँ हेरि ओकरा सभकें दत्तक लेबाक विचार कएलहुँ। माने एहि चारि गोट विद्यार्थीक परीक्षा-परिणाममे परिवर्तन अनबाक दृष्टिसँ हम ओकरा सभक मार्गदर्शन करबाक जिम्‍मा उठा लेलहुँ। विद्यार्थी सभक मानसिकताकें परखऽ लेल हम चित्रकलाकें आधार बनाओल। हमरा सफलतो दृष्टिगोचार होमए लागल। एहि प्रयोगक पराकाष्‍ठामे हमरा आश्‍चर्यजनक गप्‍प सभक पता लागल। पँचमा दर्जाक एक गोट विद्यार्थी हमरा एहेन भेटल, जकरा कोनो चित्र बनाबऽ कहिऐक तँ ओ अपन चित्रकलाक कॉपी ठाढ़े (Vertical) अवस्थामे पकड़ैक। पहिने तँ एहि बातकें हम कोनो गम्‍भीरतासँ नहि लऽ पेलहुँ। मुदा जहन एकर पुनरावृत्ति होमए लगलैक तखन हमर ध्‍यान एहि दिसि गेल। तकरा बाद तँ हम जानि-बूझि कऽ ओकर प्रत्‍येक कृतिकें अपन अध्‍ययनक (Study) विषए बना लेलहुँ। ओकर रचना, आकृतिक बनावट, रंगक चुनाव, रंगबाक पद्धति... ओकर प्रत्‍येक कृतिकें कखनो हम अलग (Isolate) कऽ कऽ देखिऐक तँ कखनो आन विद्यार्थी सभक तुलनामे। ई क्रम बहुत दिन धरि चलैत रहलैक। एकर चरम आबि गेलै ओहि दिन, जहिया हम विषए देने रहिऐक ‘हमर परिवार’ (My family) । ओकर ई चित्र जेना भक दऽ हमर आँखि फोलि देलक। एहि चित्रसँ जाहि तरहक निष्‍कर्ष निकलल ओहिकें ठीकसँ बुझबा लेल सर्वप्रथम ओकर चित्रक बनावटकेँ ठीकसँ बूझए पड़त। सभसँ पहिने ओकरा द्वारा कागजकें ठाढ़ कऽ कऽ पकड़बाक पाछाँक रहस्‍य बूझि ली। कॉपी ठढ़का आयतक आकार लऽ लैत छैक। जाहिमे चौड़ाइ कम आ लम्‍बाइ बेसी होइत छैक। एहिसँ ओ ‘जगहक संकोच’ दिसि हमर सभक ध्‍यान आकृष्‍ट करऽ चाहैत छल। छोट जगह ओकर नियति बनि गेल छलैक। स्‍थानक ई अभाव ओकरा दिमागपर एतेक हाबी छलैक जे ओ एहिसँ बाहर सोचिये नहि सकैत छल। आब ओकर चित्रक संरचनाक (Construction) विषएमे। कागचक भीतर दिसि चारूकात अंदाजसँ एक-दू इन्‍चक बॉर्डर छोडि़ कऽ ओ रेघ खिचने छल। जेना ठाढ़ आयताकार कागजक भीतर एक गोट आर ठाढ़ आयत। चित्रक परिपूर्णतामे ई डायनिंग टेबुल जकॉं देखाइत छल। डायनिंग टेबुलक छवि (Image) ओकरा लेल आइ-काल्‍हुक सिनेमा आ टीभी प्रोग्रामक देन छलैक, ई बूझल जा सकैत अछि। टेबुलक उपरका हिस्‍सामे दू गोट अल्‍पवयी नेन्नाक बीचमे एक गोट वयस्‍क स्‍त्रीकेँ चित्रित कएल गेल रहैक। ई सम्‍भवत: ओकर माए आ भाएक छवि छलैक। आ ओकरा सभक आगूमे थारी, बाटी, आ गिलास सदृश किछु समान सभ। निचलुका हिस्‍सामे केवल एक गोट नेन्नाक आकार। सम्‍भवत: ओ स्‍वयं। ओकरो आगूमे ओहिना किछु बासन सभ। टेबुलक बिचला पूरा हिस्‍सा खाली। रंगक नामपर जे रंग भेटलैक ओकरा ओ पोछि-पाछि देने रहैक। एहिमे प्रत्‍येक वस्‍तुक प्रति ओकर उदासीनता प्रकट भऽ रहल छलैक। मुदा ओहूमे गौर करबाक गप्‍प ई जे लाल रंगक उपयोग प्रमाणमे किछु बेशिये बुझाइत रहैक। ई ओकर मरखाहा (Aggresive) प्रवृत्तिक निदर्शक छलै। आर किछु छोट-मोट विशेषता (Details) भऽ सकैत अछि जे हम बिसरि गेल होएब। मुदा कुल मिला कऽ ओहि नेन्नाक मानसिकता बुझबाक दृष्टिसँ ओकरा द्वारा चित्रित दृश्‍यक एतबा वर्णन काफी अछि। ओहि चित्रकें लऽ कऽ एक गोट कला शिक्षकक रूपमे तथा प्रत्‍येक कृतिक पाछाँक सत्‍यक सन्‍धानमे रुचि राखऽबला एक गोट विद्यार्थीक रूपमे हमरा अपना जे बुझाएल ताहि दिसि देखी। चित्रक विषए रहैक हमर परिवार (My family)। ई चित्रित करबाक वास्‍ते विद्यार्थी द्वारा ‘खाइक बेर’ क दृश्‍यक चुनाव करब, हमरा जनितब ओहि नेन्नाक जागृत बुद्धिकेँ देखाबैत छल। किएक तँ मुम्‍बइ सन शहरमे साधारण रूपसँ इएह ओ बेर होइत अछि, जाहिमे परिवारक सभ सदस्‍यक एक संगे बैसब संभावित छैक। वास्‍तवमे किओ बैसैत छैक कि नञि ई आन गप्‍प अछि। आन नेन्ना सभमे किओ एकरा लेल ‘बगीचा’ क चुनाव कएने छल, तँ किओ कोनो समारम्‍भक। एहि सभ विभिन्ना दृश्‍यक चुनावक पाछाँ सम्‍बन्धित पारिवारिक स्थितिकें लऽ कऽ बनल मानसिकताक छाप स्‍पष्‍ट रूपसँ बुझाइत छलैक। आब चित्रक रचनाक मादे। डायनिंग टेबुलक एक छोरपर बनल दू गोट नेन्नाक बीचमे बैसल स्‍त्री तथा दोसर छोरपर चित्रित एकसरि नेन्ना। ई पारिवारिक समबन्‍धमे आएल कोनो तरहक दूरी दिसि इंगित करैत अछि। सभसँ चौंकाबऽबला गप्‍प तँ ई छल जे एहि चित्रमे वयस्‍क पुरुषक रूपमे ककरो चित्रित नहि कएल गेल रहैक। हमरा बुझने ई बात परिवारसँ गाएब पिताक अस्तित्‍वक सम्‍बन्‍धमे छल। टेबुलक दोसर कोन्‍टा महक एक गोट नेन्नाक आकारक माध्‍यमसँ ओ ककरो एकसरिपन (Loneliness) देखा रहल छल। साइत परिवार-समूहसँ दुराएल नेनपन! कोनो ठोस निर्णयपर पहुँचबाक पहिने विचार कएलहुँ जे ओहि विद्यार्थीसँ एहि सम्‍बन्‍धमे गप्‍प कएल जाए। ओकरा अपन विश्‍वासपात्र बनएबाक दृष्टिसँ प्रयत्‍न शुरू कएलहुँ। किछुए दिनमे ओ बधि गेल। तकरा बाद फुसिए आहे-माहे करैत, ओकरा पोल्‍हा-पोल्‍हा कऽ जाहिसँ ओकरा कोनो तरहक शंका नञि होइ, ई ख्‍याल रखैत ओकर दिन क्रम, घरक वातावरण, माता-पिता, भाइ-बहिन इत्‍यादि जीवन सम्‍बन्‍धी बातक लेबऽ लगलहुँ। गप्‍प करिते सभ चीज फरिछा गेल। दुर्भाग्‍यसँ हमर कयास ठीके रहए। आब ओकर बापसँ गप्‍प करब हमरा बड्ड आवश्‍यक बुझाए लागल। दू-तीन बेरुक समादक बाद ओ भेंट करऽ आएल। किछु परिचय-पात्र भेलाक पश्‍चात जतबे गम्‍भीरतासँ हम ओकर बेटाक बारेमे चिन्‍ता व्‍यक्त करैत गेलहुँ, ओतबे दृढ़तासँ ओ एहि गप्‍पक खंडन करैत रहल। ओकरा मोने हम अनेरे एहि गप्‍पकें गंभीर बुझि रहल छलहुँ। हारि कऽ हम ओहि विषएकें छोड़ि ओकर नोकरीक विषएमे, ओकर परिवारक विषएमे, ओकर दिनचर्याक विषएमे गप्‍प करऽ लगलहुँ। बेटा नान्हिएटा रहैक, जखन ओकर पहिल स्‍त्री स्‍वर्ग सिधारि गेल रहैक। टुअर नेन्नाकें माएक कमी नञि बुझाइ, तैं ओ दोसर बियाह कऽ लेलक। नव माउगिसँ दू गोट आर नेन्ना, एक गोट बेटा, एक गोट बेटी। घरमे कमाए जोगरि वएह एके टा बेकति। भोरे काजपर चलि जाए तँ आबए साँझखनि। ई सभ बढिञाँसँ चलि रहल रहैक, एक तँ दोसर माउगि अपन नेन्ना आ ओकर पहिल नेन्नामे कहिओ कोनो फरक नहि केलकै। ई छल एहि दिसि देखबाक ओकर दृष्टिकोण। तैयो हम अपना मर्यादामे ओकरा हृदए धरि एतेक बात पहुँचा देलाइक जे एहि बेटाक बारेमे जतबा ओ बूझैत अछि ओतबा सभ किछु ठीक ठाक नञि छै। तैं तरहें आस-पड़ोससँ, दोस्‍त महीमसँ, आन कोनो स्रोतसँ एहि गप्‍पक वास्‍तविकताक जतेक जल्‍दी पता लगा लेत, ओकरा हेतु ओतबे योग्‍य हेतैक। खैर, बात आएल-गेल भऽ गेलैक। हमहूँ रुटीनमे लागि गेलहुँ। एकदिन अचानक शिक्षक-कक्षमे ओ हाजिर भऽ गेल। नमस्‍कार पातीक पश्‍चात हम अपन व्‍यक्तिगत काजमे लागि गेलहुँ। हमरा भेल अपन कोनो काजसँ ओ आएल होएत। मुदा जहन बड़ी काल धरि बिना कोनो एहन विशेष व्‍यवहारक मूड़ी खसौने बैसल देखलिऐक तँ शंका भेल। औपचारिकतावश पूछि देलिऐक जे कोनो विशेष कार्यसँ आएल छह की विद्यर्थीक रुटीन रिपोर्ट लेबाक वास्‍ते। हालाँकि अहि बातक संभावना कम्‍मे रहैक। कनेक कालक दुबिधाक बाद ओ कहलक जे अहींसँ भेंट करबाक अछि। अपन देह-भंगिमासँ ओ बड्ड डिस्‍टर्ब्‍ड बुझाएल। किछु संकोचमे सेहो रहए। हमरा कने-मने ई बुझबामे आबि गेल जे हम जे ओकर बेटाक मादे कहने रहिऐक, ओही सम्‍बन्‍धमे कोनो हेतैक। ओकरा सहज करबामे कनेक बेर तँ लागल मुदा हमरा लऽ कऽ सभ तरहें आरश्‍वस्‍त भेलाक बाद गरम बालुमे फुटैत मकइक लाबा जकाँ ओ भड़भड़ाए लागल। संपूर्ण रामायणक सार ई जे हम विद्यार्थीक चित्रकलाक आधारपर जे गप्‍प ओकरा कहने रहिऐक तकर वास्‍तविकता ओकरा समक्ष आबि गेल रहैक। हम जाहि शंकाक बीज ओकरा हृदएमे रो‍पि देने रहिऐक ओ राति-दिन ओकरा खिहारऽ लगलैक। ओहिसँ पाछाँ छोड़एबाक हेतु ओ एहि बातक तहमे जएबाक निश्‍चय केलक, जाहिसँ हमर सिद्धान्‍तक झूठ वा सत्‍य सामने आबि गेलापर ओकरा कमसँ कम एहि दुबिधासँ छुटकारा तँ भेटिये जेतैक। मुदा भेलै उन्‍टा। सत्‍यक ई चेहरा ओकर कल्‍पनोसँ अधिक भयंकर छलै। नव पत्‍नीकें अपन संतान भेलाक बादक परिस्थितिमे भेल बदलावसँ ओ पूर्णरूपेण अनभिज्ञ छल। भोरूक गेल नोकरीसँ साँझ धरि घुरए। बेटा किछु कहबो करैक तँ नेन्ना सभक गप्‍प बूझि कऽ बातकें टारि जाए। पत्‍नीयो हँसी-मजाकक आधार लऽ कऽ गप्‍पक गंभीरताकें स्‍पष्‍ट नहि होमऽ दैक। पतिक परोक्षमे ओहि नेन्नासँ ओकर व्यवहार पास-पड़ोसक लोक सभक नजरिमे सेहो आबऽ लागल रहैक। मुदा मुंबइ सन महानगरमे अनकर जीवनमे केओ जल्‍दी पैसार नञि करैत अछि। ककरो एतेक फुरिसतिए कतऽ ? केओ किछु कहियो दैक तँ पत्‍नी कानि-भाखि कऽ ओहि बातकें एना घुमा देथि जे ओकरा पत्‍नीक बातपर अविश्‍वास करबाक कोनो कारणें नहि रहि जाइक। हमरासँ चर्च भेलाक बाद ओ काजपर सँ कोनो ने कोनो बहन्ने औचक्‍कें घर घूरऽ लागल। घरबाक व्‍यवहारपर दूरेसँ नजरि राखऽ लागल तँ परिणामो दे‍खाए लगलैक। लोक सभक मुँहसँ सूनल गप्‍पक सत्‍यता दृष्टिमे आबऽ लगलैक। पहिने तँ एकाध दिनक बात बूझि कऽ अनठेलक। मुदा अनुभवक पुनरावृतिसँ ओ ठहकल। स्‍कूल छुटलाक बाद बेटा घर लौटए तँ सतमाय दरबज्‍जो नञि फोलए। बेरहटिया धरि भोजन-भात निपटा कऽ दुनू नेन्नाक संग सूति रहए। आ ई दरबज्‍जा ठोकैत-ठोकैत कानि –बाजि कऽ भूखल-पिआसल चौकठेपर बस्‍ता लेने ओकर उठबाक बाट जोहैत बैसल रहि जाए। पड़ोसी सभक नजरि पड़ैक तँ ओ सभ किछु खुआ दैक। स्‍त्री उठैक तँ बहन्ना बना दैक जे मोन खराप छल, आँखि लागि गेल तैं नञि बुझलिऐक। ऊपरसँ डरो देखा दैक जे बाबूकें कहबही तँ बूझि लिहें। छोट-छोट गप्‍पपर लोहछा देनाइ तँ सामान्‍य गप्‍प रहैक। नेन्ना नहूँ-नहूँ अपना कोश (Cell) मे घुसऽ लगलैक। ओकरा असुरक्षाक भाव घेरऽ लगलैक। नेन्ना सभक ‘अहं’ बहुत व्‍यापक होइत छैक। ओहि ‘अहं’ केँ नान्हियोटा धक्‍का लगलासँ ओ लोहछि जाइत अछि। मुदा नेन्ना सभ लग ओहि भावनाकें, दर्दकें, व्‍यक्त करबाक हेतु सियान सन साधन नञि होइत छैक। योग्‍य शब्‍द संग्रह नञि होइत छैक। दोसर शब्‍दमे एहि उम्रक नेन्ना सभ लग हम-अहाँ आसानीसँ बूझि सकिऐ एहि तरहक भावनाक आदात-प्रदानक कोनो स्‍पष्‍ट भाषा विकसित नहि भेल रहैत छैक। तैँ ओ सभ अपन भावनाकेँ प्रतीकात्मक रूपसँ व्यक्त करबाक प्रयत्न करैत देखाइत अछि। ई प्रतीकात्मकता उम्रक विभिन्न अवस्थामे भिन्न–भिन्न तरहक होइत जाइत छैक। उदाहरणार्थ, शैशवावस्थामे नेना सभ अनेकानेक तरहसँ कानि कऽ अपन भावना व्यक्त करैत छथि। आइ तँ एहि तरहक भाषाक विश्लेषण सेहो सम्भव भऽ गेल अछि। एहि भाषाकेँ ज्ञाता वा अभ्यासक, नेना सभक कानब सुनि कऽ ओहि विशिष्ट समएमे हुनक जे माँग आ समस्या छनि तकर निदान कऽ सकैत छथि। बाल्यावस्थामे अपन विरोध जतएबाक हेतु नेना सभ रूसि कऽ खेनाइ बारि कऽ अथवा कोनो आन तरहक नोकसान कऽ कऽ अपन भावनाकेँ व्यक्त करैत देखाइत अछि। नेना सभक व्यक्त करबाक इएह प्रतीकात्मक भाषाक कड़ीमे चित्रकला एक गोट महत्वपूर्ण अध्याय अछि। तैं हमर कहब अछि, जे नेना सभक चित्रकला देखबाक नहि अपितु पढ़बाक वस्तु होइत अछि। विद्यार्थीक पिताकेँ हम जतेक बुझा सकलिऐक, बुझेलिऐक। ‘जे बेटा भीतरसँ पूर्ण रूपेण टूटि गेल अछि, ओकरा शीघ्रातिशीघ्र मूल स्वभावपर आनब अति आवश्यक अछि। सभसँ पहिने ओकरा भीतरसँ असुरक्षाक भावनाकेँ निकालब जरुरी अछि। ओकर हेराएल आत्मविश्वासकेँ पुनः प्रस्थापित केनाइ जरूरी अछि। पाछाँ छुटि गेल माता–पिताक अस्तित्वकेँ ओकरा जीवनमे सम्मिलित करब जरूरी अछि। ओकरा भीतर ई विश्वास जगेनाइ जरूरी अछि जे ओहो एहि परिवारक एक गोट महत्वपूर्ण सदस्य अछि। एहि परिवारक ओकरो आवश्यकता छैक आ आन सदस्य जकाँ ओकरो सभ तरहेँ सभपर समान हक छैक। अन्यथा एहि परिवारक व्यवहारसँ एखन धरि ओकरा भीतर जाहि तरहक शत्रुत्व (Hatred) पनपि रहल अछि, ओ आगू चलि कऽ एहन भयानक रूप लऽ सकैत अछि, जकर एखन कल्पनो नञि कएल जा सकैत अछि’। ई सुनि कऽ ओ किछु ठहकल। पूछलक, ‘तखन आब उपाय की’? हम कहलियन्हि- ‘उपाय ई जे सभसँ पहिने अपना घरबालीकेँ बुझबिऔन्ह जे हुनकर व्यवहारक की परिणाम भऽ सकैत अछि। तकरा बाद किछु दिनक छुट्टी लऽ लिअ। एहि माहौलसँ ओकरा बाहर निकालू। सपरिवार पन्द्रह–बीस दिनक लेल कतहु बाहर घुमि आउ। मुदा एहि पूरा समएमे ओकरा ई अनुभव कराओल जाए जे आइ धरिक अनुभवसँ ओकर जे भावना बनल छलैक से गलत छै। खास कऽ सतमाएक माध्यमसँ ई सन्देश जाए। एहि यात्राक सभ कार्यक्रम ओकरा केन्द्रमे राखि कऽ बनाओल जेबाक चाही। मुदा सतभाय, सतबहीन, सतमाय तथा पिताक समान सहभागिता रहौक। ओकरा प्रति सभक व्यवहार सहज रहौक। ओहिमे कोनो तरहक देखाबा नहि रहौक। नेनाकेँ ई शंका नञि होइ जे जानि–बुझि कऽ हमरापर विशेष ध्यान देल जा रहल अछि। एहिसँ अपन पुरनका अनुभवकेँ ओ एक गोट दुःस्वप्न मानि कऽ ओहिसँ बाहर आबि जाएत। मुदा ओकर बाद एहि पुरनका अनुभवक ने चर्चा होए आ ने पुनरावृत्ति’। ओकर किछुए दिनक बाद हम स्कूल छोड़ि देने रही। मुदा हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे ओहि विद्यार्थीक जीवनमे अवश्ये किछु सकारात्मक उद्यम भेल हेतैक, जकर पूर्ण श्रेय जएबाक चाही चित्रकला सन सृजन शील विषएकेँ जकरा माध्यमसँ ओ अपन आंतरिक भावनाकेँ व्यक्त करबामे सक्षम भऽ सकल।

4 तूलिका(दहिनासँ पहिल)साभार:दैनिक जागरण-फोटोग्राफर-दीपूराज तूलिका: विदेह:सदेह:१ मे विदेह ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक ११३ गोटेक रचना प्रकाशित भेल जाहिमे १४ वर्षीय तूलिकासँ लए ८८ वर्षीय श्री आद्याचरण झा धरि छलाह। तूलिका एहि बरख सी.बी.एस.ई.क १०म कक्षाक तैयारीमे लागल रहबाक कारण अपन रचना किछु दिनसँ नहि पठा रहल छलीह। आब ओहि परीक्षाक परिणाम आबि गेल अछि आ डी.ए.वी.,बी.एस.ई.वी.,पटनाक एहि छात्राकेँ ९६.८ प्रतिशत अंक भेटल अछि आ ओ आब इन्जीनियरिंगक तैयारीमे लागल छथि। विदेह लेल हुनकर रचना पुनः आएल अछि जे पाठकक समक्ष अछि।:-सम्पादक । स्वास्तिका: कक्षा २ (माउन्ट कार्मेल, पटना)

मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१० (विदेह:सदेह:२ विदेह ई-पत्रिकाक २६म सँ ५०म अंकसँ बीछल आ सम्पादित कएल) प्रिय पाठकगण, विदेहक नव अंक ई प्रकाशित होइत अछि पाक्षिक रूपेँ- लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in । ई प्रिंट वर्सन माने विदेह: सदेह:२ विदेह ई-पत्रिकाक २६म (१५.०१.२००९) सँ ५०म (१५.०१.२०१०) अंक धरिक चुनल रचना (मोटा-मोटी दस प्रतिशत)क संग प्रस्तुत अछि। मुदा विदेहमे ई-प्रकाशित पाखलो (मूल कोंकणी उपन्यास तुकाराम रामा शेट आ मैथिली अनुवाद डॉ. शम्भु कुमार सिंह), ज्योति झा चौधरीक कविता संग्रह अर्चिस् आ नताशा (मैथिली चित्र-शृंखला- देवांशु वत्स) अलगसँ पुस्तकाकार प्रकाशित कएल जा रहल अछि। विदेह द्वारा प्रारम्भ भेल मैथिली (तिरहुता आ देवनागरी) साहित्य आन्दोलनमे २००सँ बेशी लेखक जुड़ि चुकल छथि, ५० टा अंक ( देवनागरी, तिरहुता आ ब्रेल तीनूमे) ई-प्रकाशित भऽ गेल अछि आ पी.डी.एफ. डाउनलोड लेल विदेह आर्काइवमे राखल गेल अछि। दू टा सदेह अंक (देवनागरी आ तिरहुतामे) सेहो प्रकाशित भऽ गेल अछि। विविध विषयपर ६००० पृष्ठक नूतन मैथिली साहित्य आ ५० लाख शब्दक मैथिली कॉर्पोरा अन्तर्जालपर विश्वक सम्मुख प्रस्तुत कएल गेल अछि। ११०० पृष्ठक भोजपत्र-तालपत्रक आ अन्यान्य पत्रक पाण्डुलिपिक मिथिलाक्षरमे अंकण आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यंतरण कएल गेल अछि। विदेह आर्काइवमे मात्र शाब्दिक कॉर्पोरा नहि अछि वरन् १००सँ बेशी मैथिली ऑडियो फाइल, १०० घण्टासँ बेशीक मैथिली वीडियो फाइल जाहिमे कैकटा सम्पूर्ण मैथिली नाटक सेहो अछि, आधुनिक कला, चित्रकला, छायाचित्रक संग मिथिला चित्रकलाक फोटो आ पी.डी.एफ. रूपमे सएसँ बेशी मैथिली पोथी सेहो देखबा, पढ़बा आ डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। संगमे बच्चा सभक साहित्य आ कार्टून सभ सेहो निर्मित आ प्रदर्शित कएल गेल अछि आ पढ़बा लेल आ डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। मैथिलीक पहिल ब्रेल पोथी उपन्यास- सहस्रबाढ़नि (हमर पोथी कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे संकलित हमर उपन्यास) सेहो प्रिंट रूपमे आबि गेल अछि। मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक मैथिलीमे संस्कार, विधि-व्यवहार आ श्रमगीत विदेह ऑडियो आ वीडियोमे राखल गेल अछि। मैथिलीक लेल भाषा सम्पादन पाठ्यक्रमकेँ अन्तर्जालक विदेहक ३००० सँ बेशी सदस्य द्वारा अन्तिम रूप सेहो प्रदान कएल गेल अछि। मिथिलाक्षरक यूनीकोड आवेदनमे विदेहक योगदानकेँ आवेदनकर्ता द्वारा आवेदनमे वर्णित कएल गेल अछि। मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि। एहि खण्डमे कुछु चुनल मैथिली मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना (विदेह:सदेह:२ विदेह ई-पत्रिकाक २६म सँ ५०म अंकसँ बीछल आ सम्पादित कएल) देल जा रहल अछि, जाहिमे साक्षात्कार, २६म सँ ५०म अंकक चुनल सम्पादकीय, संदेश-आलोचना आदि सेहो भेटत। -गजेन्द्र ठाकुर विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) १५ जनबरी २०१० वर्ष:३ मास:२५ अंक ५० विदेह: सदेह:२ (विदेह ई पत्रिकाक २६म सँ ५०म अंकक दस प्रतिशत चुनल रचनाक संग) दाम: १०० टाका (व्यक्तिगत क्रय लेल) आ $40 (for institutions and library India and Abroad) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर सहायक सम्पादक- श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, श्री उमेश मंडल भाषा सम्पादन- श्री विद्यानन्द झा आ श्री नागेन्द्र कुमार झा (c)२००८-१०.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) २००४-१० सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। © श्रुति प्रकाशन-विदेह:सदेह:२-प्रिंट वर्सन- DISTRIBUTORS: AJAY ARTS, 4393/4A, Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ.Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107 Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com http://www.videha.co.in/ एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा पाक्षिक रूपेँ डिजाइन कएल जाइत अछि। (कार्यालय प्रयोग लेल) विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान। ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत। नीचाँक फॉर्म भरू:- विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता सदस्यता चाही: ग्राहक बनू (कूरियर/ रजिस्टर्ड डाक खर्च सहित):- एक बर्ख(२०१०ई.)::INDIAरु.२००/-NEPAL-(INR 600), Abroad-(US$25) दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50) तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75) पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125) आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750) हमर नाम: हमर पता:

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(ग्राहकक हस्ताक्षर) मूर्खता पीबि कऽ विषवमन करैत अछि समीक्षक - जीवकान्त प्रबोध सम्मान २०१० लेल चयनित जीवकान्तसँ वरिष्ठ पत्रकार आ मैथिलीक उदीयमान कवि  विनीत उत्पलक साक्षात्कार

विनीत उत्पल : अहाँक जन्म कतए भेल आ दिन-वर्ष की छल? लालन-पालन कतए भेल? जीवकांत : २७ जुलाई, १९३६ क मामाक गाम सुपौल जिलाक अभुआढ़ मे हमर जन्म भेल। किछु दिन तक तँ हमर लालन-पालन मामक गाममे भेल। तकर बाद अपन गाम मधुबन क डेओढ़मे भेल। हमर पिता चारि भाइ छलथि। संयुक्त परिवार छल आओर हम सभ १५-१६ बच्चाक लालन-पालन संगे भेल।

विनीत उत्पल : एखन अहाँक परिवारमे के सभ अछि आओर ओ सभ की करैत अछि? जीवकांत : हम दू भाइ छी। जेठ हम छी आ नवकांत झा छोट अछि। नवकांत सेंट्रल बैंकक नौकरसँ अवकाश ग्रहण कए दरभंगामे रहैत अछि। एक बहिन आब नहि छथि। दोसर बहिन गोदावरी सुपौलमे ब्याहल गेल, जे सहरसामे रहैत अछि। तीन बच्चा अछि। पैघ बेटा अरुण चेन्नइमे बैंकमे कार्यरत अछि। छोट वरुण लखीसरायमे एलआईसीमे काज करैत अछि। बेटी प्रेम नेपालक राज विराजमे ब्याहल अछि।

विनीत उत्पल : घरमे आन लोक मैथिली पढ़ैत आ लिखैत अछि? कनियाक सहयोग लेखनमे कतेक भेटल? जीवकांत : हमर घरमे भाइ हुअए आकि कोनो बच्चा, मैथिलीमे नहि लिखैत अछि। शुरूमे कनियाँ शचि किछु नहि बुझैत छलीह। हुनका लगैत छल जे फालतूक काज कऽ रहल छी। हुनका अनिद्राक बीमारी छलन्हि ताहिसँ रातिमे लाइट मिझा दैत छलीह। मुदा बादमे सहयोग करए लगलीह। धन्य ओ जे हम लिखैत छी। ओना ओ ज्योँ विरोध करतीह तँ हम किछु नहि लिखि सकैत छी। एकरा लेल हम कनियाँक आभारी छी।

विनीत उत्पल : मैथिली साहित्य दिश कोना आकृष्ट भेलहुँ? विस्तारसँ बताऊ? जीवकांत : हम जाहि कालमे पैदा भेलहुँ, ताहि कालमे पढ़ैक महत्व नहि छल। हमरो पढ़ाइ देरीसँ शुरू भेल। स्कूलमे नाम लिखेबा लेल कियो नहि गेल छल। हम अपने गेल छलहुँ। ओहि कालमे हम सभ माटिपर लिखैत छलहुँ। हमर गाममे तुलसीदासक रामायणक पाठ होइत छल। द्वारपर लोक ताश खेलाइत छल आ रामायणक श्लोकक दसटा अर्थ करैत जाइ छलाह। श्लोककेँ लऽ कऽ तर्क-विर्तक सेहो होइत छल। हमरो घरमे बेंकटेश्वर स्टीम प्रेससँ छपल मोटका रामाएण छल, जकरा पढ़ैत आ सुनैत छलहुँ। तखन धरि मैथिलीक कोनो गप नहि छल। नेना रही, सोचैत रही, जखन तुलसीदासक लिखलपर एतेक तर्क-विर्तक होइत अछि, तखन हमहूँ किएक नहि लिखै छी। शुरूमे कविता लिखलहुँ, जे आर्यावर्तमे छपल। आइ.एस.सी. कऽ कए साल भरि बाद १९६४ ई. मे प्राइवेटसँ बी.ए. कएलहुँ। छह मास धरि अहापोहमे रहलहुँ, जे हिंदीमे लिखी आकि मैथिलीमे। ओहि काल मे मिथिला मिहिर पढ़ैत छलहुँ। ओहिसँ बेसी प्रभावित भेलहुँ। रवींद्रनाथ टैगोरक साहित्यसँ सेहो प्रभाविल भेलहुँ। हिंदीमे लिखी आओर मैथिलीमे सेहो। किछु काल बाद निर्णय लेलहुँ जे हम नित दिन लिखब। गृह जिला मधुबनीमे नौकरीक मादे खजौली, देहोल, पोखराम आदि गाममे रहलहुँ आ जीवनानुभवक व्यापक अनुभव लिखलहुँ।

विनीत उत्पल : अहाँक कालमे संस्कृतक विस्तार बेसी छल। तखन मैथिली दिश कोना प्रवृत भेलहुँ? जीवकांत : स्वतंत्रता प्राप्तिक कालमे इंगलिश मीडियम स्कूल खुजल रहै। हिंदी स्कूलमे मैथिली पढ़ाओल जाइत छल। इंगलिश स्कूल खुजलासँ लोक संस्कृत बिसरि गेल। मुदा हम गामक लोक गामसँ प्रभावित। २४ जनवरी १९६५ मे मिथिला मिहिरमे पहिल कविता 'इजोरिया आ टिटही’ छपल। एकरासँ हमरा जोश भेटल।

विनीत उत्पल : अहाँ केकर लेखनीसँ प्रभावित छी? जीवकांत : कविता हमर प्रिय अछि। लिखैमे आनंद अबैत अछि, ओकर गंधसँ प्रभावित होइत छी। मुदा गंधक प्रतीकमे तुलना साफ नहि होइए। कोनो गप कवितामे बेसी नीकसँ कहल जा सकैत अछि। आलोचक कहैत अछि जे अहाँ कथामे सब किछु अलग-अलग नहि करैत छी। पाठककेँ अपन दिशसँ सूत्र जोड़ए पड़ैत अछि। सबहक गंध अपन-अपन तरहक होइत छै। हमर लेखनक मूल कविता अछि, आओर अपन गप कविताक संग प्रेषित करैमे नीक लगैत अछि।

विनीत उत्पल : लेखनमे कोना प्रोत्साहित होइत छलहुँ? जीवकांत : अहाँ सोमदेवक नाम सुनने होएब। हमर कविता पढि़ कऽ यात्री जी हुनका कहलथिन जे जीवकांतकेँ कहियौ ओ उपन्यास लिखताह। एकरा संगे मिथिला मिहिरसँ लिखबाक आमंत्रण आएल। एकरा एक तरहसँ हम चुनौतीक रूपमे लेलहुँ आ जे ओ लिखबैत रहल, फरमाइश करैत छल, से लिखैत रही। शिक्षक संघसँ सेहो जुड़ल रही ताहिसँ पटना जाइत रही। ओहि काल पटनामे लोकसँ भेट होइत रहए आओर प्रोत्साहन भेटैत रहए। तीनटा उपन्यास फरमाइशपर लिखलहुँ जे धारावाहिक रूपमे छपल।

विनीत उत्पल : अहाँकेँ ई नहि लगैत अछि जे साहित्य अकादमी देरीसँ अहाँक लेखन~पर विचार केलक? जीवकांत : साहित्य अकादमीक पुरस्कारकेँ लोक संदेहक दृष्टिसँ देखैत छैक। ओतए जाएज लोककेँ किनारा कऽ दैत छै। हम साहित्य अकादमीक पॉलिटिक्स नहि जनैत छी। गाममे रहैत छी। कोनो दोस्त नहि बनेलहुँ। ओहिनो मिथिला समाज आ लोक अनौपचारिक अछि। भऽ सकैत अछि साहित्य पुरस्कार विलंबसँ भेटल। मुदा एहि सभमे हम नहि पड़ैत छी।

विनीत उत्पल : पैघ-पैघ पत्रिकामे कोना लिखए लगलहुं? जीवकांत : एखनसँ तीस साल पहिने समकालीन भारतीय साहित्य शुरू भेल, तखन हम किछु अनुवाद कएलहुँ। मैथिलीमे पहिल कहानी हमरे आएल। पहिल बेर मैथिली विशेषांक आएल। एकटा अनुवाद केदार कानन केलथि। मैथिली कविता पठबैत रही। हिंदी संपादक आ हिंदी पत्रिका खूब आदरसँ हमर रचना छपैत रहए। समय अंतरालपर कोलकाता, मुंबइ, दिल्लीसँ प्रकाशित पत्रिका सेहो छपै लागल।

विनीत उत्पल : पहिल कविता संग्रह कोन छल आओर के छपलथि? जीवकांत : 2003 मे 'तकैत अछि चिड़ै’ कविता संग्रह छपल, जेकरा ऊपर साहित्य अकादमी पुरस्कार देलक। ओकर हिंदी अनुवाद 'निशांतक चिडिय़ा’ छपल। एकरो साहित्य अकादमी छपलक। ढेरे विश्वविद्यालयमे शोध भऽ रहल अछि। प्रखर आलोचक सेहो लेखनक प्रशंसा कए रहल अछि।

विनीत उत्पल : अहांक कविता 'रहस्य’ मे गूथल बुझाइत अछि? जीवकांत : कविताक आरंभ कतहुसँ जे होइत अछि से तार्किक परिणति तक जरूर पहुँचैत अछि। लोक कहैत अछि जे हमर कविता आखिर मे 'टर्न’ लऽ लैत अछि। लोक काल आ पाठक हमर सामने नहि रहैत अछि, ताहिसँ अलग-अलग पाठक हमर कवितामे अलग-अलग गप देखैत अछि।

विनीत उत्पल : अहाँ तँ खूब समीक्षा केने छी? जीवकांत : समीक्षक तौर पर हम ओते प्रोफेशनल नहि छी। बैसल रहैत रही तँ पढ़ैत रही। नव पोथी पढ़लाक बाद छोट-छोट टिप्पणी करैत छी। पूरे ४० साल मे ६०-७० टा पोथीपर छोट-छोट टिप्पणी केने छी। एकरा बाद मन बहलबैत छी, हास-परिहास आ चर्चा, बहुत रास गप करैत छी।

विनीत उत्पल : नव लेखक आ हुनकर रचनाकेँ कोना देखैत छी? जीवकांत : एखन नवलेखक तेजीसँ आबि रहल अछि। देहातसँ सेहो लेखक आबि रहल अछि। बीच वाला पीढ़ी्मे अद्भुत लेखक भेल। महाप्रकाश आ सुभाषचंद्र यादव लोक विवशता, निर्धनताक विलक्षण चित्रण अपन रचनामे करैत छथि। मैथिली कविता सेहो गंभीर भऽ रहल अछि। ओकर स्तर बढि़ गेल अछि, सोच काफी आगू तक अछि।

विनीत उत्पल : मैथिलीक साहित्यमे समीक्षकेँ अहाँ कोन दृष्टिसँ देखैत छी? जीवकांत : समीक्षा यूरोपसँ आएल अछि। यूरोपमे अन्वेषणक संग समुचित परिप्रेक्ष्यमे समीक्षा होइत अछि। हिन्दुस्तान एहि विधामे पिछड़ल अछि। हिंदी भाषा्मे सेहो नीक समीक्षा नहि भऽ रहल अछि। लोक वेद कहैत अछि जे हिंदीक पैघ समीक्षक नामवर सिंह समीक्षा नहि कऽ भाषण दैत छथि। तटस्थ भऽ कऽ मूल्यांकन नहि भऽ रहल अछि। नीक लेखककेँ पएरसँ दबा देल गेल आओर जेकरा किछु नहि अबैत अछि ओकरा कन्हापर बैसा देल जाइत अछि। विद्यापतिपर आइ धरि कियो मैथलीमे नीक समीक्षा नहि केलक अछि। रामानाथ झाक समीक्षा जयकांत बाबूक समीक्षा नहि भऽ रहल अछि। अंग्रेजीमे नीक बुद्घि होइत अछि। अंग्रेजीसँ एम.ए. केलाक बाद लोकक नीक बुद्घि होइत अछि, मुदा मैथिलीसँ एम.ए. कोर्स करबाक बाद छात्र बरबाद होइत अछि। नाश कऽ दैत अछि ओकर भविष्य। जखन महीसे खराब होएत तखन कोनो नीक चीज आनि कऽ दियौ खेनाइ खरापे बनत। सोनारक काज लोहारक हथौड़ीसँ नहि भऽ सकैत अछि। समीक्षामे कोनो नीक काज नहि भऽ रहल अछि। 'अपन बट्टी भरि पनबट्टी’ सनक लोक अछि। जाइत-पाति बेसी अछि। लोक एक-दोसरकेँ छोट बुझैत अछि। रचना्क मूल भावनमे कमी आएल अछि। अपन रचना आ अपन लगुआ-भगुआमे लोक फंसल जाइत अछि। सब अपनाकेँ पैघ बुझैत अछि। सभटा लोक काजक क्रेडिट अपना लेल लेबाक लेल मारि कए रहल अछि।

विनीत उत्पल : रचना्मे अनुभवक की भूमिका होइत अछि? मैथिलीक प्रचार-प्रसार लेल अहाँक विचार की अछि? जीवकांत : सभ लोकक अपन अनुभव होइत अछि। ओकरे ठीक-ठाक कए लेखक शास्त्र बना दैत अछि। सभटा लेखक अपन अनुभवकेँ पुनर्जीवित करैत अछि। जहिना-जहिना शिक्षक स्तर बढ़त, तहिना-तहिना मैथिलीक प्रचार-प्रसार बढ़त। मिथिलामे शिक्षकक कमी अछि। स्त्री शिक्षा एखनो बेसी नहि अछि। साक्षरता जेना-जेना बढ़त आर्थिक स्थिति तेना-तेना नीक होएत। मैथिली बढ़त। इंटरनेटेपर मैथिली बढि़ रहल अछि। गौरीनाथ नीक काज कए रहल छथि। कोलकाताक स्वस्ति फाउंडेशन सेहो नीक काज कए रहल अछि।

विनीत उत्पल : अहाँक रचना विद्रोही प्रवृतिक अछि, से किए? जीवकांत : सरकार बनेने छी। जनताकेँ सुरक्षा चाही, सडक़ चाही। आजादी भेटल, त्रुटि सेहो भेटल। कमजोर लोकक संग दुर्व्यवहार भऽ रहल अछि। अन्यायक खिलाफ आवाज उठबैत हमर मनोदशा अछि। १९७० ई. मे कोलकातामे 'किरणजी’सँ भेट भेल छल। ओ कहलथि जे हमर स्टैंड तँ सत्ता विरोधी अछि। हुनकर गप ठीक छल। विनीत उत्पल : मार्क्सवादकेँ लऽ कऽ की सोचैत छी? जीवकांत : मार्क्सवादक पहिने सेहो गरीबी छल। विद्यापति अपन कवितामे गरीबीक व्यापक वर्णन कएने छथि। 'कखन हरब दुख मोर’ गीतमे एक तरहेँ गरीबीक वर्णन कएल गेल अछि। 'नहि दरिद्र सब जुग माही’ आ संस्कृत श्लोक 'सर्वे गुणा कांचन भाजयंति’ मे सेहो दरिद्राक गप अछि। गरीबीक खिलाफ गरीबक पक्षमे सभ दिन लिखल जाइत रहल अछि।

विनीत उत्पल : अहाँ आ अहाँक लेखन ककरासँ प्रभावित अछि? जीवकांत : हम सेहो मार्क्सवादसँ प्रभावित छी। लोहियासँ सेहो प्रभावित छी। बराबरी आ समानताक विचारकेँ प्रमुखता दैत छी। मार्क्सक समर्थक रही। एकरा लेल दीक्षा नहि लेलहुँ, कियो ई गप पैदा नहि केलक, अपने पैदा भेल।

विनीत उत्पल : तखन अहाँ मार्क्सवादक विरोध किए कए रहल छी? जीवकांत : मार्क्सवाद उत्तम विचार छी, मुदा हिंसाक पक्षमे बेसी अछि। भारतीय राजनीति आ संस्कृतिमे मार्क्सवादक संभावना कम अछि, ताहिसँ एतए समाजवाद प्रबल भेल। भारतीय संस्कृति 'सर्वे भवन्तु सुखिनः’ पर आधारित अछि। एतए गांधी प्रासंगिक छथि। मार्क्सवाद बारंबार अपन रास्तासँ भटकैत अछि। मार्क्सवादक नीतिकेँ जमीनपर उतारब कठिन अछि। रूसक जमीनपर उतरल मार्क्सवाद राष्ट्रवादक प्रबल समर्थक बनि गेल। तिब्बत, भूटान, नेपाल आ पाकिस्ताक बलधकेल जमीनमे चीनी झंडा फहराइत अछि।

विनीत उत्पल : 'सुमन’ जीक अहाँ हमेशा विरोध कएलहुँ, तखन अभिनंदन ग्रंथमे बड़ाइ करबाक की मतलब अछि? जीवकांत : 'सुमन’ जीक बड़ाइ लिखलहुँ तँ हम अछूत(......)भऽ गेलहुँ। हुनकर अध्यात्मपर लिखल अद्भुत अछि। संस्कृतमे लिखलन्हि। ओ आगि लगबैक क्षमता रखैत छथि। ओ संस्कृति आ मूल्यक विषयक ध्वजवाहक छलाह। ओ मैथिली कविताकेँ उत्कृष्टता तक लऽ गेलथि। हम मार्क्सवादी भऽ जाइ तकर माने ई तँ नहि होएत जे हम वेद-पुराणकेँ बिसरि जाइ। अभिनंदन ग्रंथ लेल फरमाइशी लेख लिखाओल गेल छल। हम हुनकर काव्य आ आध्यात्मपर लिखलहुँ। सही काल छल, एकरा लेल हम खुश छी।

विनीत उत्पल : कवितामे विशेष परिवर्तन कतए तक जाएज अछि? जीवकांत : हमरा संग ढेर लोक एलाह। सभ पछुआ गेल। पाँच साल बाद हम अपन विषय परिवर्तन केलहुं। हर क्षेत्र~मे अपनेकेँ परिवर्तन करबाक चाही। जे परिवर्तनक समर्थक होएत ओ कालजयी होएत। हमहुँ विषय बदलैत गेलहुँ ताहिसँ जीवित छी। असहमतिक कविता पंजाब आ बंगालसँ आएल। बंगालमे सुभाष मुखोपाध्याय भेलाह जे कहलथिन 'हे कृष्ण, कुरुक्षेत्र मे घोड़ाक रास छोडि़ कए फेरसँ वंशी बजाउ।’ कविताक विषय सभ दिन बदलैत रहैत अछि। विद्यापति शृंगार आ भक्तिकेँ लऽ कए लिखलथि। एखन शृंगारसँ लोककेँ वैर भऽ गेल अछि। देश प्रेमक कविता लिखल गेल। मुदा दोसर विश्वयुद्घमे देशप्रेमक गपमे देखल गेल जे ई मनुष्यकेँ बर्बाद कऽ रहल अछि। राजनीतिपर कविता लिखब बेवकूफी अछि। आदमी, मित्रता, सुख-दुख कविताक विषय रहैत अछि। जेना-जेना समय बदलत, तेना-तेना विषय सेहो बदलत। जहिना कविता बदलत तहिना एकर रूपो बदलत। एकरा एना देखी, बच्चाक छठियार करैत छी, ओकरा बाद बच्चा्मे कतेक परिवर्तन होइत अछि।

विनीत उत्पल : मैथिली समाजक स्थिति लेल की कहबाक अछि? जीवकांत : पैरवी-पैगाम आ गुटबाजी होइत अछि। अपन गाम आ समाज सिद्घांतवादी नहि अछि। जवाहरवादी अछि ताहिसँ तुरंत झुकि जाइत अछि। क्वालिटीसँ समझौता भऽ जाइत अछि। नीक लोकक नाम लेबासँ लोक अपवित्र भऽ जाइत अछि।

विनीत उत्पल : अहाँपर लोक आरोप लगबैत अछि जे 'चेला’ बनाबैत छी जेना महाप्रकाशपर रेखाचित्रमे रमेशकेँ उद्घृत करैत सुषाष चन्द्र यादव लिखै छथि। ई गप कतेक सच अछि? जीवकांत : हम गुरुजी रही। साइंस टीचर रही तँ शिष्य तँ बनबे करत। सभ आदमी अपन प्रभाव छोड़ैत अछि। कुणाल, प्रदीप बिहारी आदि ई नाम अछि। हालमे शिवशंकर कहलथिन जे अहाँक रचना हम पढ़ैत रही। तारानंद वियोगी कहलथिन अहाँक कविता मासमे दूटा पढ़ैत रही, मिथिला मिहिरमे, ताहिसँ प्रेरित भेलहुँ आ लेखनक मुख्य धारासँ जुड़लहुँ। हमहुँ कहैत छी, यात्रीजीक लेखनसँ प्रभावित भेलहुँ। हमहुँ कहैत छी जे हम यात्रीजी आ विद्यापतिक चेला छी। हम कमांडो नहि बनेने छी। हम कोनो पुरस्कार लेल पैरवीकार नहि बनेने छी। हम दलाल नहि बनेने छी। हमर रचनासँ प्रभावित भऽ कऽ कियो रचना कर्ममे आएल, एहिमे हमर की गलती? हम अपन समर्थनमे भीड़ नहि जुटेलहुँ, वोट नहि मांगलहुँ, समीक्षाक लेल पैरवी नहि कएलहुँ। तखन जे कियो कहैत अछि जे हम हुनकर 'चेला’ छी तँ एहि~मे गलत की अछि ?

विनीत उत्पल : विवेकानंद ठाकुरक कविता संग्रहकेँ लऽ कऽ मोहन भारद्वाज जी समीक्षाक पर खूब विवाद भेल छल? ताहि लेल अहाँ की कहैत छी? जीवकांत : मोहन भारद्वाज विवेकानंद ठाकुरक कविता संग्रह 'गामक कविता, कविताक गाम’ पर एकटा समीक्षा केने रहथिन। ओहिमे मोहन भारद्वाजजी लिखलथिन्ह जे हिनकर कविता सभटा समकालीन संभावनाकेँ खारिज करैत अछि। एहि संदर्भमे हम गौरीनाथकेँ एकटा पत्र पठेने छलियन्हि। एतेक घटिया समीक्षा आ तुलनात्मक अध्ययन नहि भऽ सकैत अछि। संगे-संग पत्रक फोटोस्टेट कॉपी आओरो लोककेँ पठेने छलहुँ। एकहि रचनासँ सभटा कविता खारिज भऽ जाए, एहन संभव नहि अछि। हमर विरोधक पत्र कोनो पत्रिकामे नहि आएल। मुदा गौरीनाथ एकरा मुद्दा बना देलन्हि। विनीत उत्पल: मोहन भारद्वाजक समीक्षाकेँ किछु गोटे गदगदी समीक्षा कहलन्हि मुदा ओ सभ बादमे अपने सेहो गदगदी समीक्षा कएलन्हि, मात्र किताब आ लेखक बदलि गेल! जीवकांत: ई सभटा समीक्षक दारू पी कऽ, पैसा पी कऽ, मूर्खता पी कऽ विषवमन करैत अछि।

विनीत उत्पल : अपनेसँ अनुदित पुस्तक पर मूल पोथीक लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार लेखक सभ लेमए शुरू कए देलन्हि अछि। जेना अहाँ हालेमे अपन निबन्धमे मायानंद मिश्र द्वारा अपन लिखल हिन्दीक पोथीक स्वयं मैथिलीमे अनुदित पुस्तक 'मंत्रपुत्र’पर पुरस्कार लेबाक विषयमे लिखलहुँ? जीवकांत : एहि मुद्दापर हमरा किछु नहि कहबाक अछि। मुदा मायानंद मित्र पुरस्कार लेलन्हि तँ किछु जरूर सोचने हेताह, सोचिए कऽ लेने हेताह। वैहि कहि सकैत छथि जे किए लेलन्हि।

विनीत उत्पल : साहित्य आ साहित्य लेखनमे इमानदारी आ नैतिकता कतेक आवश्यक अछि? जीवकांत : लोककेँ सभ ठाम ईमानदार हेबाक चाही। 'पंजरि प्रेम प्रकासिया’मे हम खूब ईमानदारीसँ लिखने छी। मुदा, लोक गंगाजल लऽ कऽ अपन जीवनी लिखैत अछि। कविता, कहानी, नाटक तकमे लोक गंगाजल छींट कऽ लिखैत अछि। लेखनमे प्रेम, खून, हत्या, लार नहि अबैक चाही। हम सभ पाखंड करैत छी। मुदा जे लेखक जीवनक सत्य आ समाजक स्थिति लिखलक ओ अपन धरतीपर बदनाम भऽ गेल। राजकमल चौधरी साहित्यमे समाजक सत्य लिखलक, बदनाम भऽ गेल। ओ सत्य लिखलन्हि तँ हुनका 'अय्यास प्रेतक विद्रोह’ कहल गेल।

विनीत उत्पल : मिथिलाक केंद्र मानल जाएबला शहर 'मधुबनी’मे मैथिलीक पोथी नहि भेटैत अछि, एना किए? जीवकांत : हम तँ देहातमे रहैबला लोक छी। बासन तँ दिल्ली, मुंबई, कोलकातामे बिकाइत अछि। मधुबनी, दरभंगा, घोघरडीहामे तँ घास छिलैबला लोक रहैत अछि। पढ़ै वाला लोक तँ बाहरे चलि जाइत अछि। मधुबनीमे पोथी नहि बिकाइत अछि, ओहिमे लेखकक कोन दोष? पब्लिशर्स आ सर्कुलेशनक मामला्मे समर्पित लोकक जरूरत अछि। गीता प्रेसक पोथी सभ ठाम बिकाइत अछि। हिंद पॉकेट बुक्सक पोथी ठामे-ठाम भेटैत अछि। हिंदीमे धर्मयुग, सारिका बंद भऽ गेल अछि। हमर सबहक पोथी दोकानमे नहि भेटि रहल अछि। लोक-वेद खैरातमे पोथी लएले चाहैत अछि।

विनीत उत्पल : प्रबोध सम्मान 2010 प्राप्त करबाक लेल बधाई। राजमोहन झासँ गजेन्द्र ठाकुरक साक्षात्कार गजेन्द्र ठाकुर: मैथिलीक जन सामान्यसँ दूर भऽ मैथिली साहित्यकार सभ मैथिलीकेँ प्रदर्शनक वस्तु बना देलखिन्ह, साहित्यसँ लोक किएक दूर होइत गेल? राजमोहन झा: एहि लेल अहाँ साहित्यकारकेँ कोना दोषी कहैत छियन्हि? गजेन्द्र ठाकुर: ओ साहित्य धरि सीमित रहलाह? समाजसँ कोनो मतलब नहि रहलन्हि? अपन लिखलथि आ गोष्ठी आ कवि सम्मेलन धरि सीमित रहलाह? गाम-घर छोड़ि देलन्हि। मैथिली साहित्यकार समाज आ राजनीतिसँ दूर रहलाह। फैशन जेकाँ साहित्य लिखल गेलै, पढ़ल गेलै आ सुनल गेलै? राजमोहन झा: से तँ आब भऽ रहल छै। पहिनुका साहित्यकार तँ एना नञि करथि। गजेन्द्र ठाकुर: एकटा हरिमोहन झाकेँ छोड़ि कऽ गाममे लोक कोनो दोसरक रचनाकेँ नहि पढ़ने-सुनने छथि। मिथिला मिहिर गाम-गाम जाइत छलै, बन्द भऽ गेलै। हरिमोहन झाकेँ छोड़ि कऽ गामक लोक कोनो दोसर साहित्यकारक नामो नहि सुनने छथि। दोसर साहित्यकार हरिमोहन झा जेकाँ काज किएक नहि कऽ सकलाह? राजमोहन झा: ई तँ एकटा मिस्ट्री जेकाँ छैक। हरिमोहन झाक साहित्य एतेक पोपुलर कोन कारणसँ भेलन्हि आ दोसर साहित्यकारक किएक नहि भेलन्हि। ओ गुण दोसर साहित्यकार सभमे किएक नहि अओलन्हि। एकर ओनो रेडीमेड सोल्युशन नहि भेटल अछि। जखन कि हरिमोहन झाक साहित्यक सेहो आलोचना होइत छैक जे साहित्यमे जै समाजकेँ ओ पेन्ट केलन्हि से सम्पूर्ण समाज नहि छै।एकटा विशेष वर्गकेँ लऽ कए ओ साहित्य रचलन्हि। दलित समाज हुनकर साहित्यसँ वंचिते जेकाँ छन्हि। तकर बावजूद एतेक पोपुलर कोना रहथि आ छथि से एखनो धरि नीक जेकाँ एक्सप्लेन नहि भेल छैक। कहल जाइत छैक जे हुनके साहित्यसँ पाठक वर्ग तैयार भेलैक पाठक रूप मे जे वर्ग एग्जिसटेन्समे आएल से हुनके साहित्यसँ। गजेन्द्र ठाकुर: साहित्य उद्देश्यपूर्ण होएबाक चाही वा एकर उद्देश्य मात्र मनोरंजन होएबाक चाही। राजमोहन झा: सैह सेल्फ एनेलाइज करबाक छै। मनोरंजन तँ रहबाके चाही नहि तँ क्यो पढ़बे नहि करत मुदा अन्तिम उद्देश्य मनोरंजन नहि होएबाक चाही। विभिन्न स्तरक लोकक लेल विभिन्न स्तरक साहित्य, जकर जे आवश्यकता छै तकर पूर्ति होएबाक चाही। गजेन्द्र ठाकुर: बेर-बेर सुनबामे आबए छै जे मैथिली भाषा मरि रहल अछि। माइग्रेशन नीक चीज छियैक मुदा एक जेनेरेशनमे जाहि समाजक नब्बे प्रतिशत जनसंख्या माइग्रेट कए गेल ओहिमे तँ एहि प्रकारक वस्तु तँ अवश्य आएत। भारतसँ बाहर जे जाइत छथि हुनकर भाषा अंग्रेजी आ जे भारतमे दोसर ठाम जाइत छथि अदहा गोटे हिन्दी बाजए लगैत छथि। राजमोहन झा: लोक मे भाषा प्रेम घटल अछि। पहिने ई नहि रहैक।लोक मैथिली छोड़ि रहल अछि। गजेन्द्र ठाकुर: ई भारतक मैथिली भाषी प्रदेशक विषयमे तँ सत्य अछि मुदा नेपालमे हिन्दी विरोधक कारण अप्रत्यक्ष रूपसँ मैथिलीकेँ लाभ भेल छै। राजमोहन झा: भारतमे स्थिति खराप छै।पहिलुका लोक जेना समर्पण आब लोकमे नहि छै। गजेन्द्र ठाकुर:बबुआ जी झा “अज्ञात”केँ साहित्य अकादमी पुरस्कार देबाक अहाँ विरोध कएने रहियन्हि... राजमोहन झा: हम विरोध नहि कएने रहियन्हि। दिल्लीमे आन-आन सभ कएने रहथि। गजेन्द्र ठाकुर: आरम्भक तीसम अंकमे अहाँक सामूहिक वक्तव्य आएल छल। ओहिमे २००१क साहित्य अकादमी पुरस्कार बबुआजी झा “अज्ञात”क “प्रतिज्ञा पाण्डव” आ अनुवाद पुरस्कार सुरेश्वर झाकेँ देल जएबाक विरोध भेल छल। आरम्भ तँ आब लगैए बन्द भऽ गेल अछि। राजमोहन झा: हँ।.....आरम्भ बन्द नहि भेल अछि स्थगित अछि। गजेन्द्र ठाकुर: भालचन्द्र झाक “बीछल बेराएल मराठी”एकांकी जे मूलभाषासँ सोझे अनूदित छल, सुभाष चन्द्र यादव जीक बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद) सेहो एहि तरहक सोझे अनूदित कृति छल तकरा पुरस्कार नहि भेटल। ओहि समय मे कोनो विरोध नहि भेल। मुदा अनचोक्के सभ क्यो बबुआजी झा “अज्ञात”क पाछाँ पड़ि जाइ गेलाह, हुनका बिनु पढ़ने ककरो इशारापर आ क्षुद्र उद्देश्य पूर्तिक लेल तँ ई नहि कएल गेल? जखन कि मूल समस्या मैथिलीक अछिये, पाठक शून्यता आ साहित्यक जनसँ दूर होएब आ भाषाक मृत होएबाक खतरा, तकर विरोध किएक नहि कहियो भेल? राजमोहन झा: विरोध तँ होइत अछि, मुदा लोक परवाह नहि करैत छथि। गजेन्द्र ठाकुर: तकर कारण पाठकक कमी तँ नहि अछि? जूरी आ साहित्यकारो जखन दोसराक अनूदित आ लिखित रचनाकेँ नहि पढ़ैत छथि? सिद्धार्थ राईक नेपाली कविता संग्रहक मैथिली अनुवाद “ओ लोकनि जे नहि घुरलाह” मेनका मल्लिक द्वारा कएल गेल, २००६ ई. मे प्रकाशित भेल, मनप्रसाद सुब्बाक नेपाली कविता संग्रहक अनुवाद“अक्षर आर्केष्ट्रा” नामसँ प्रदीप बिहारी कएलन्हि, ई २००७ ई.मे प्रकाशित भेल। मुदा जे जूरी एहि पोथी सभकेँ देखबे नहि करताह तँ फेर अपन लगुआ-भिरुआकेँ अनुवाद पुरस्कार दिअओताह, भने सोझे कएल अनुवाद रहए वा नहि। ओना अकादमी द्वारा२००७ मे अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली) केँ अनुवाद पुरस्कार देबाक प्रशंसा होएबाक चाही। मुदा चयन प्रक्रियामे नीक चीजक निरन्तरता किएक नहि रहैत अछि? राजमोहन झा: नञि विरोध तँ होइत रहैत छैक, होएबाक चाही। सोझे अनुवाद कएल पोथी पुरस्कारक पात्र अछि। गजेन्द्र ठाकुर: मुदा जूरीमे तँ सभटा पुरने लोक सभ छथि । पुरना लोकमे पहिल कथा, पहिल कविता, पहिल नाटक, पहिल पत्र-पत्रिका आदिक उपधि लेल घमासान होइत रहैत अछि। कोनो पत्र-पत्रिका जे छपलक सएह पढ़लक ताहिसँ कोनो मतलब नहि। पुरना लोकमे अहाँक हिसाबे भाषा प्रेम बेशी रहए। राजमोहन झा: नञि एहि तरहक जूरीक विरोध होइत रहल छैक। आइ काल्हिक साहित्यकारमे गुटबन्दी बेशी भेल अछि। पहिने नहि रहए। गजेन्द्र ठाकुर: एहि बेर फ्रेंच भाषाक जीन मेरी गुस्ताव ली क्लाजियोकेँ नोबल पुरस्कार भेटलन्हि। मेरिकाक न्यू जर्सीक फिलिप रॉथ पिछड़ि गेलाह। कहल गेल जे अमेरिकामे जे आत्ममुग्धताक स्थिति अछि ताहि कारणसँ ओतए अनुवादपर ध्यान नहि देल जाइत अछि आ ताहि कारणसँ ओकर साहित्य पाछाँ भए गेल अछि। ई आत्ममुग्धता मैथिलीक सम्दर्भमे कतेक अछि। राजमोहन झा: ट्रांशलेशन तँ बहुत जरूरी छैक। तखने तँ कम्पेरीजन कए सकब।जीवनानुभवसँ लोक लिखैत अछि, जरूरी छै, तकरा अनुवाद आर विस्तार प्रदान करत। रामाश्रय झा “रामरग” (१९२८- ) विद्वान, वागयकार, शिक्षक आ मंच सम्पादक छलाह। रामरंगजी सँ गजेन्द्र ठाकुरक गप शप। (६ जुलाई २००८) गजेन्द्र ठाकुर: गोर लगैत छी। स्वास्थ्य केहन अछि। रामरंग: ८० बरख पार केलहुँ। संगीतमे बहटरल रहैत छी। गजेन्द्र ठाकुर: संगीतक तँ अपन फराक भाषा होइत छैक। मैथिली संगीत विद्यापति आ लोचनसँ शुरू भऽ अहाँ धरि अबैत अछि। मैथिलीमे अहाँ लिखनहिओ छी। रामरंग: अपन मिथिलासँ सम्बन्धित हम तीन रागक रचना केलहुँ अछि, जकर नाम ऐ प्रकारसँ अछि। १.राग तीरभुक्ति, राग विद्यापति कल्याण तथा राग वैदेही भैरव। ऐ तीनू रागमेसँ तीरभुक्ति आर विद्यापति कल्याणमे मैथिली भाषामे खयाल बनल अछि। हमर संगीत रामायणक बालकाण्डमे रागभूपाली आर बिलावलमे सेहो मैथिली भाषामे खयाल छैक। आर सन्गीत रामायणक पृष्ठ ३ पर बिलावलमे श्री गणेशजीक वन्दना तथा पृष्ठ २० पर राग भूपालीमे श्री शंकरजीक वन्दना अछि। पृष्ठ ८७ पर राग तीरभुक्तिमे मिथिला प्रदेशक वन्दना अछि आर पृष्ठ १२० पर राग वैदेही भैरवक (हिन्दीमे) रचना अछि। “अभिनव गीताञ्जलीक पंचम भागमे २६५ आर २६६ पृष्ठपर विद्यापति कल्याण रागमे विलम्बित एवं द्रुत खयाल मैथिली भाषामे अछि। मिथिला आऽ मैथिलीमे हम उपरोक्त सामग्री बनओने छी। गजेन्द्र ठाकुर: मुदा पूर्ण रागशास्त्र विद्यापति कल्याणक, तीरभुक्तिक वा वैदेही भैरवक नञि अछि। मैथिलीमे आरो रचना अहाँ... रामरंग: बहुत रचना मोन अछि, मुदा के सीखत आ के लीखत। हाथ थरथराइत अछि आब हमर। गजेन्द्र ठाकुर: कमसँ कम ओहि तीनू रागक रचना शास्त्र लिखि दैतियैक तँ पुस्तकाकार छपि सकैत। रामरंग: जे रचना सभ हम देने छी ओकरा छापि दिऔक। हाथ थरथराइत अछि, तैयो हम तीनूक विस्तृत विवरण पठाएब, लिखैत छी। गजेन्द्र ठाकुर: प्रणाम। रामरंग: निकेना रहू। जितेन्द्र झा जनकपुरमे चक्काजाम कवि गोष्ठी जनकपुरधामक साहित्यकार आ रंगकर्मी शुक्र दिन ११ दिसम्बर कऽ सडकपर कवितावाचन करैत मिथिला राज्यक माग कएल अछि । नेपालमे चक्काजाम हएब कोनो नव बात नहि, मुदा जनकपुरधामक साहित्यकार रंगकर्मी रचनात्मक चक्काजाम कएलक अछि । जनकपुरक प्रवेशद्वार रहल पिडारी चौकपर यातायात अबरुद्ध करैत कविगोष्ठी कएल गेल। चक्काजाम कवि गोष्ठीमे कविसभ नेपालक नव संविधानमे मिथिलाराज्यक ब्यबस्था हएबाक माग कएने छल। नेपालमे एखन नव संविधान लिखबाक प्रक्रिया चलि रहल अछि। आ एहि क्रममे विभिन्न समुदाय, वर्ग अपन अधिकारक लेल आवाज उठा रहल अछि । नया संविधानमे मिथिला राज्य आ मधेशीक हक अधिकार सुनिश्चित हएबाक चाही रंगकर्मी रन्जु झा कहलनि। गोष्ठीमे साहित्यकार डा. राजेन्द्र प्रसाद विमल, मिनापक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक, सुनिल मिश्र, काशीकान्त झा, प्रमिला मिश्र, रमेश रंजन, रंजु झा, मदन ठाकुर सहितक सहभागिता छल। मिथिला राज्य संघर्ष समिति जनकपुर मिनापक सहभागितामा गोष्ठी कएने छल। चक्काजामक कारण जनकपुर महेन्द्रनगर सड़क खण्डकमे सवारी साधन नहि चलि सकल छल। संविधान सभामे मिथिला राज्यक माग कमजोर पडि़ रहल समएमे एहि तरहक गोष्ठीसँ मिथिला राज्यक माग थोड़बहुत चर्चा बटोरलक अछि । प्रिय पाहुन पारम्परिक मैथिली विअाह गीत समेटल एक गोट मैथिली क्यासेट आएल अछि प्रिय पाहुन । एहि क्यासेटमे मैथिलीक विआहक परिछनसँ विदाई धरिक गीत सभ संग्रहित अछि। अंशुमालाक एकल प्रस्तुति रहल ई क्यासेट मैथिली विआह परम्पराक किछु खास वस्तुपर केन्द्रित अछि। एहिके विशेषता जयमाल गीत जे कि मिथिलाक मौलिक गीत अछि रहल गायिका अंशुमाला कहैत छैथ। जीमनार (वरियाती खएबाक काल गाआेल जाएबला गीत) आब बहुतोक ठोरपर नर्इं छढै़त छन्हि, एहि क्यासेटमे एकरा महत्व देल गेल अछि। प्रिय पाहुन क्यासेट नव पुरान दुनू पीढीक लोक पसन्द क' रहल अंशुक कहब छन्हि । कन्या लगन गीत, परिछन गीत, देखु रसे रसे दुलहा, चाल कटाक्ष, देहरि छेकाओन, सिन्दुरदान आ समदाओनक गीत एहि क्यासेटमे संकलित अछि। एहि क्यासेटमे सीमाक भितर कएल जाएबल हंसी मजाक आ ताहिभितर नुकाएल प्रेमके देखएबाक प्रयास कएल गेल अछि। गंगा क्यासेटक प्रस्तुति रहल ई क्यासेट एखन मात्र अडियोक रुपमे अछि। क्यासेटमे गीत संकलन ह्मदय नारायण झा आ शशि किरण झा, संगीत कमल मोहन चुन्नुक छन्हि । गायिका अंशुमालाके एहि क्यासेटसँ बहुत बेशी आशा छन्हि । एना आधुनिक गीतक बजारमे ई विआह गीत अलग स्थान बनाओत से आशा कएल जा सकैए । अमरनाथ झा, दिल्ली वि.वि. १.हाँ ई तँ कहियो नहि देखने रही २.विष्णु प्रभाकर जी सादगीक प्रतिमूर्ति छलाह। ३. पूर्वजक जन्मभूमिकेँ शत-शत प्रणाम ४. पंकज जी हाँ ई तँ कहियो नहि देखने रही हाँ ई तँ कहियो नहि देखने रही .... " हमरा मोन नहि पड़ि रहल अछि जे एतेक रुचि कोनो पछुलका चुनावमे लोकक रहल अछि”। ई शब्द अछि हिन्दुस्ताम समाचार पत्रमे खुशवन्त सिंह जीक आइ काल्हिक चुनावपर। अनायास एहन लागल जेना क्यो एहि परिस्थितिकेँ बुझबाक लेल एकटा पुरान चित्र राखि देने होअए। आइ.बी.एन ७ केँ प्रबन्ध सम्पादक आशुतोषक निबन्धक पक्तिकेँ एहि सन्दर्भमे एतए राखि रहल छी: "ई कहल जा सकैत अछि जे जखन देशक राजनीतिक दिशा बदलि रहल अछि आ वोटर बुधियार भऽ रहल छथि, एकटा नव सिविल सोसाइटी ठाढ़ भऽ रहल अछि जे नेता लोकनिक लेल एकटा जिम्मेदारी तैयार कए रहल अछि। ..." । माने आब चुनावक परिदृश्य बदलि रहल अछि, एहि गपमे किछु सत्यता अछि। हमरा १९७४ केर पछुलका दौराक स्मृति नहि अछि। १९७१ क भारत-पाक युद्धक कालमे गामक चौबटिया पर ठरल साँझमे घूर तापैत किछु बूढ़-पुरान लोककक गर्वित ललाटक छाहक स्मृति अछि जे भारतीय सैनिकपर गर्व कए रहल रहथि। फेर १९७४ क आसपासक जे.पी.आन्दोलनक मोन पड़ैत अछि जे कोना सभ युवा न्यायवादी-आन्दोलनकारी भए गेल रहथि। हमर पैघ भाय आ छोट बहनोइ दुमकामे प्रदर्शनमे भाग लेने रहथि आ पुलिस द्वारा पकड़ल जएबापर बाबूजीक नाम लए कऽ अपन जान बचेने रहथि। हमर पितियौत भाए आ हुनकर तीन टा संगीक मैट्रिकक परीक्षा बड्ड खराप गेल छलन्हि से ओ आन्दोलनकारी बनि गेल रहथि आ जेल गेल रहथि। एहिमेसँ एक गोटे कहियो कांग्रेस तँ कहियो बी.जे.पी.क शरणमे जाइत छथि मुदा हाथ कतहु नहि मारि पबैत छथि, दोसर शुरूसँ कांग्रेसी रहलथि आ चौअनिया नेता बनि जिनगी गुजारि देलन्हि तँ तेसर राजनीतिसँ हाथ जोड़ि अलग भए गेल छथि। मुदा कहियो हिनको चलती रहन्हि। हमरा सन छठम-सातम कक्षाक लोक सेहो आन्दोलित होइत रहथि आ इन्कलाब-जिन्दाबादक नारा लगबैत रहथि। १९७५-७६ मे तँ हमहूँ अपनाकेँ पैघ क्रान्तिकारी बुझए लागल छलहुँ ओना तहिया हम कक्षा ७-८ मे पढ़ित रही। आपात कालक विरोधमे हम अपन पहिल कविता सेहो लिखने रही। जकरा हमर माझिल भाए हँसीमे फाड़ि कए उड़ा देलन्हि। फेर १९७७ क चुनावमे किछुकेँ छोड़ि सभ गोटे जनता पार्टीक संग देलन्हि। एतए धरि जे हमर परिवारक कुलगुरु सेहो आएल रहथि आ कहए लगलाह जे एहि बेर जनते पार्टीकेँ भोट देल जाए। नारा लागए लागल अन्न खाऊ कौरवक, गुण गाऊ पांडवक। हमर १४ वर्षीय किशोर मन तँ पूर्ण क्रांतिकारी भऽ गेल रहए। हँ ई नहि बिसरब जे हम आइक झारखण्डक संताल परगनाक एक गामक खिस्सा कहि रहल छी। हम ओहि हाई स्कूलक गप कहि रहल छी जकर माटिक धरतीकेँ गोबरसँ निपबाक हेतु हमरा सभकेँ १ किलोमीटरसँ पानि आनए पड़ैत छल आ लग-पासक जंगलसँ २-३ किलोमीटरसँ गोबर आनए पड़ैत छल। तँ अहाँ आब बुझि गेल होएब जे हम ओहि ठामक आ ओहि समएक गप कहि रहल छी जतुक्का विषयमे अहाँ आइयो कहब जे ओहि ठाम तँ भूखाएल-आ नंगटे रहनिहार निवास करैत छथि। पहिने ओतए रोटी दियौक आ तखन फेर राजनीतिक गप करब। तखन ओहू समयमे जनसाधारण मात्र नहि वरन् धर्मगुरु धरि हस्तक्षेप कएने रहथि (आइ-काल्हि बला धर्मगुरु नहि बुझि लेब)। आ ओहि समएक राजनीतिक अर्थ ओ नहि छल जे आइ भए गेल अछि। आशुतोषक प्रारम्भिक पंक्ति शाइत परिस्थितिक स्वाभाविक अभिव्यक्ति अछि जखन ओ कहैत छथि जे गरि-गूरिक बीच ई धारणा बनैत अछि जे राजनीति अपन योग्य नहि अछि... आ जनधारणा सएह तँ सामाजिक सत्य अछि। तखन हम की करी? हम तँ विशिष्ट लोक छी ने। ई कोन गप भेल जे हम करोड़ो खरचि कए टिकट नहि कीनि सकैत छी आ पढ़ाईमे भुसकौल भए नेता नहि बनि सकैत छी? तेँ की? छी तँ हम कलमक जादूगर। हमर कलमसँ जादू चलि रहल अछि आ दुनियाँ बदलि रहल अछि। पटना, भोपाल आ रायपुर सभ बदलि रहल अछि। हिन्दुस्तान पत्रक संपादिकाक भावुकता पूर्ण ललित निबंध होअए वा अहाँक-हमर एहन स्वयम्भू चिंतकक लेख, हम सभ बदलि रहल छी। अरे भाइ ककरा बुरबक बना रहल छी। टी.वी.मे आबि गेल छी आ जे मोन से करबाक अनुमति भेटि गेल अछि। अखबार हाथमे आबि गेल अछि ,लिखबाक-छापबाक छूट भेटि गेल अछि तखन विचारक बनबामे की हरज? कहियो लिखब तखन अपन मालिकक विरुद्ध..... विष्णु प्रभाकर जी सादगीक प्रतिमूर्ति छलाह। . १९९० क वर्ष हमरा लेल आब एहन लगैत अछि काफी महत्वूर्ण छल। ओहि समय हमरामे सकारातमक उर्जाक प्रबल आवेग हिलोर ल’ रहल छल. हम जे किछु समाजकेँ देलहुँ या सामजिक ऋणसँ उरिण होएबाक लेल जाहि कार्यकेँ सम्पन्न कएल ओहिमे बहुतोक शुरुआत ९० सँ भेल। ठीकसँ मोन नहि आबि रहल अछि जे की हम कोना आ ककरा संग सभसँ पहिने मोहन पैलेसक छतपर चलए वाला काफी हाउसमे पहुँचलहुँ .शाइत प्रो. राजकुमार जैन जीक संग गेल रही। ओ शनिक दिन रहए. ओतहि दिल्लीक चर्चित लेखक आ कलाकार-मंडली लागल छल. ओहि उस मंडलीक मध्य वयोवृद्ध खादी धरी,गाँधी टोपी पहिरने विष्णु प्रभाकर जी सुशोभित भ’ रहल छलाह। ओहि वातावरणमे हमरापर गजबक असर भेल. फेर हम सभ साँझ शनिकेँ ओहि शनिवारी गोष्ठीमे बैस’लगलहुँ। ई सिलसिला १९९५ तक चलल,जखन विश्वविद्यालय परिसरका रीड्स लाइन हमर निवास रहल. एहि वर्षोमे नहि जानि कतेक नामी -गिरामी लेखक, कवि, कलाकार आ पत्रकारक साहचर्य रहल.पता नहि कतेक साहित्यिक गोष्ठिमे समीक्षक या वक्ताक हैसियतसँ शामिल भेलहुँ.ओहि समयमे हम दाढी रखैत छलहुँ आ पाईप पीबैत छलहुँ। ओहि समयमे उप-कुलपति प्रो.उपेन्द्र बक्षी साहब सेहो पाईप पीबैत रहथि। अतः लोक हमरापर कखनो-कखनो व्यंग्य सेहो करैत रहथि। “एक बक्षी साहब हैं की एक झा साहब हैं-दूर से पहचाने जाते हैं”. हमहुँ खादीक कुर्ता पायजामा पहिरैत छलहुँ। से हमर कोनो बैठकमे उपस्थिति अलग अंदाजमे होइत रहए। पढबैत इतिहास छी ,परन्तु ओहि दिनमे सेहो लोक हमरा हिन्दीक शिक्षक बुझैत रहथि। काफी हाउस सेहो एकर अपवाद नहि छल। हमर कॉलेजक डॉक्टर हेमचंद जैन अक्सर हमरा कहैत रहथि –अहाँ अपन बौद्धिक लुकसँ आतंकित करैत छी .देव राज शर्मा पथिक सेहो कहैत रहथि- “झा साहब आपमे स्पार्क है” .खैर हम एहि सभ गपक आदी भेल जा रहल छलहुँ.लेकिन काफी हाउस हम बस साहित्यिक मंडलीक साहचर्य सुख लेबा लेल जाइत रही। ओतए हमर एहन अदना सन व्यक्ति बड्ड बजैत रहए परन्तु वाह रे विष्णुजीक महानता , हमरा हमर छोटपनक कखनो अहसास तक नहि होमए देलन्हि । वल्कि हमरा लगैत रहए जे हमरा काफ़ी गंभीरतासँ ओ सुनैत रहथि.बहुत गर्वोन्नत महसूस करैत छलहुँ हम। हम एक-दू बेर हाथ पकड़ि कए भीड़ भरल सड़क पार करेबाक बहने हुनकर स्नेहिल स्पर्श आ सान्निद्ध्य प्राप्त करबाक अवसर प्राप्त केलहुँ। एकर संतोष अछि .१९९४ मे भारतीय भाषा लेल संघर्ष करबाक क्रम मे संघ लोक सेवा क बाहर धरना-स्थल सँ पुष्पेन्द्र चौहान समेत कतेको साथीक संग हमरो पुलिस गिरफ्तार कए तिहाड़ जेल भेज देलक .ज्ञानी जेल सिंह,अटल बिहारी वाजपेयी विशानाथ प्रताप सिंह,मुलायम सिंह यादव आर अन्य कतेक पैघ नेता आ साहित्यकार-पत्रकार,समाज सेवि एवं आन्दोलनकारिक दबाब मे एक सप्ताहक बाद हमारासभ उपर लादल सभ केस हटा हमरासभकेँ बिना शर्त रिहा कएल गेल। एकर बाद तँ काफी हाउसमे सेहो हमरासभ प्रति साथिसभक आदर भाव बढ़ि गेलन्हि। मुदा अपन आवारा स्वाभावक कारण हम १९९५ क बाद काफी हाउस जएबाक सिलसिला चालू नहि राखि सकलहुँ. एकर हमरा आइयो अफ़सोस अछि .आवारा मसीहाक लेखक केँ एकर भान धरि नहि भेल होएतन्हि जे एक यायावरी आवारा कोनो दोसर धुन मे उलझि रहल हएत। आइ हमर बीच नहि रहबाक बादो हुनकर स्मृति एतेक मृदुल अछि जे लगैत अछि कि विष्णु जी अखनो काफी हाउसक मंडलीक बनेने छथि. हुनकर स्मृतिकेँ कोटि-कोटि प्रणाम। आचार्य पंकज पंकज जी हम अमरनाथ झा, दिल्ली विश्वविद्यालयक स्वामी श्रद्धानंद कॉलेजमे इतिहास विभागमे अससोसिएत प्रोफ़ेसर छी। हम अहाँकेँ संताल परगना (झारखण्ड) मे हिंदी साहित्य आ हिंदी कविताक अलख जगेनिहार सैकड़ामे साहित्यकार पैदा करएवला ओहि महान साहित्यकार एवं हुनकर रचनासँ अवगत कराबए चाहैत छी जे अपन बहुमुखी प्रतिभाक बलपर समस्त संताल परगनाकेँ शिक्षाक लौ सँ रौशन केलन्हि। १९१९ मे जन्म लेल श्री ज्योतींद्र प्रसाद झा "पंकज" नामक एहि महामना द्वारा १९३४ मे देवघरक हिंदी विद्यापीठमे अध्यापनक कार्य शुरू कएल गेल आ अपन प्रकांड विद्वताक बलपर तत्कालीन हिंदी जगतक धुरंधरक ध्यान अपन दिस खिचलन्हि। १९४२ क भारत छोड़ो आन्दोलनक कमान एक शिक्षकक हैसियतसँ सम्हारलन्हि १९५४ मे ओ संताल परगना महाविद्यालय दुमका (ओहि समय भागलपुर विश्वविद्यालयक अंतर्गत )क संस्थापक शिक्षक एवं हिंदी विभागक अध्यक्ष बनि गेलाह। एहि बीच तत्कालीन पत्र-पत्रिकामे ओ "पंकज" क उपनामसँ कविता ,समीक्षा आ एकांकी लिखैत रहलाह ,जकर चर्चा होइत रहल। १९५८ मे हुनकर कविता संग्रह "स्नेहदीप" क नामसँ छपल। १९६४ मे हुनकर दोसर कविता संग्रह"उदगार" क नामसँ छपल। १९६५ मे संताल परगनाक साहित्यकार सभ मिलि क’ एक बहुत पैघ साहित्यिक संगठनक निर्माण कएलन्हि जकर अध्यक्ष "पंकज"जी केँ बनाओल गेल आ एहि संगठनक नाम सेहो हुनके नामपर "पंकज-गोष्ठी" राखल गेल। १९६५ सँ १९७५ धरि पंकज गोष्ठी संपूर्ण संताल परगनाक असगर आ सभसँ पैघ साहित्यिक आन्दोलन छल। सत्य तँ ई अछि जे ओहि दौरमे ओतए पंकज गोष्ठीक मान्यताक बिना कोनो साहित्यकारहि नहि कहाइत रहथि। पंकज गोष्ठी द्वारा प्रकाशित कविता संकलनक नाम छल "अर्पण" तथा एकांकी संकलनक नाम छल "साहित्यकार"। लक्ष्मी नारण "सुधांशु ",जनार्धन प्रसाद मिश्र "परमेश",बुद्धिनाथ झा"कैरव" क समकालीन एहि महान विभूति--प्रोफ़ेसर ज्योतींद्र प्रसाद झा "पंकज' क विद्वता,रचनाधर्मिता एवं क्रांतिकारितासँ तत्कालीन महत्त्वपूर्ण हिंदी रचनाकार जेना--रामधारी सिंह"दिनकर", द्विजेन्द्र नाथ झा "द्विज",हंस कुमार तिवारी, सुमित्रानंदन" पन्त',जानकी वल्लभ शास्त्री नलिन विलोचन शर्मा आदि भली भांति परिचित छलाह । आत्मप्रचारसँ कोसो दूर रहए वाला "पंकज"जी केँ भले आइ हिंदी जगत बिसारि देलक अछि परन्तु ५८ साल कि अल्पायुमे १९७७ मे दिवंगत एहि आचार्य कविकेँ मृत्यक ३२ वर्षो बादो संताल परगनाक साहित्यकारे टा नहि वरन लाखों लोक अपन स्मृतिमे आइयो महान विभूतिक रूपमे जिन्दा रखने छथि। संताल परगनाक एहन कोनो गाम या शहर नहि अछि जतए "पंकज"जी सँ सम्बंधित किम्वदंति नहि प्रचलित होअए। की अहाँ हुन्अका आ हुनकर कृतिक ब्रिहद्तर हिन्दी जगतक समक्ष प्रस्तुत करबामे हमर सहायता करब ? लगभग ३५० बरस स हमर परिवार आधुनिक झारखण्ड क देवघर जिला अंतर्गत सारथ थाना के खैरबनी ग्राममे रही रहल छी. परिणाम स्वरुप हम सभ घरमे मैथिलि नै बजे छी. हम सभ विशुद्ध अंगिका सेहो ने बजे छी. हमर बोली मे किछु मैथिली आर किछु अंगिका के सम्मिश्रण छे. ते दुआरे मैथिलि लिखेमे जे किछु त्रुटी होए ओकरा क्षमा करू। आशा छे ई सम्बन्ध समय क संग आर प्रगाढ़ होयत। तूलिका (दहिनासँ पहिल) साभार: दैनिक जागरण-फोटोग्राफर-दीपूराज तूलिका: विदेह:सदेह:१ मे विदेह ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक ११३ गोटेक रचना प्रकाशित भेल जाहिमे १४ वर्षीय तूलिकासँ लए ८८ वर्षीय श्री आद्याचरण झा धरि छलाह। तूलिका एहि बरख सी.बी.एस.ई.क १०म कक्षाक तैयारीमे लागल रहबाक कारण अपन रचना किछु दिनसँ नहि पठा रहल छलीह। आब ओहि परीक्षाक परिणाम आबि गेल अछि आ डी.ए.वी.,बी.एस.ई.वी.,पटनाक एहि छात्राकेँ ९६.८ प्रतिशत अंक भेटल अछि आ ओ आब इन्जीनियरिंगक तैयारीमे लागल छथि। विदेह लेल हुनकर रचना पुनः आएल अछि जे पाठकक समक्ष अछि।-सम्पादक। । स्वास्तिका: कक्षा २ (माउन्ट कार्मेल, पटना) चन्द्रेश संवेनशील मोनकेँ छुबैत हुगली ऊपर बहैत गंगा रामभरोस कापडि भ्रमरक ३२ गोट कथाक संग्रह थिक हुगली ऊपर बहैत गंगा । एहि संग्रहक नामक अन्तिवम कथा थिक । हीरा आ सोना बाईक माध्यरमे कथाकार नारी मोनक संवेदनाकेँ उभारिक भविष्यगक सृजन दिस डेग उठाओल अछि । ई सत्यो थिक जे नारीक देहक अवयवकेँ कामुक पुरुष अपन धन–सम्पयत्ति बुझि ओएह व्यीवहार करैत अछि जे नारीक मोनकेँ दुःख ओ पीडामे भरिक कुण्ठिवत करैत अछि । नारी मात्र देह नहि थिक । नारी आ पुरुषक साहचर्य अबस्से सृष्टिक निरन्तयरता थिक । एकर अर्थ ई नहि जे नारीक देहकेँ खेलौना बूझिक खेलाइल जाय। ओकर अंग–प्रत्यंसगकेँ तोडि–मरोडि अर्थात् अत्याचारकेँ प्रेम ओ विश्वाूसके तोडल जाए। ई सत्य अछि जे आजुक भौतिकवादी युगमे धनक अतिशय लिप्साे अबस्से मानवीय मूल्ययबोधकेँ गिड़ने जा रहल अछि । जेँ कि मानवीय चेतना आ मनुष्यता कुण्ठिल कऽ देल गेल अछि तेँ अनैतिकताक अढमे छिडहरा खेलाओल जाइत अछि । धन–मदक एंठी पर नग्नु कामुकताक ताण्ड‍व मचल अछि । दैहिक जरुरतिसँ बेसिए काम क्रीडामे भोग आ लिप्सान नयन रंजन भऽ गेल अछि । तेँ विभिन्नु मुद्रा अख्ति यारक आवेग आ उच्छ्छाससमे अमानवीयताक – क्रूर आ पैशाचिक रुपक दिग्दएर्शन होइत अछि । लाचारमे विचार कतय? फलतः वासनाक भ्रमजालमे ओझरा कऽ नैतिकता ओ मर्यादाकेँ अतिक्रमणक कुत्सिल तँ मानसिकताक क्रूर रुप झलकि अबैत अछि । एहि शीर्षक कथामे हीरा असन्तोषक आ खौंझीकेँ मेटयबाक लेल सोनाबाइक ओहिठाम अबैत अछि । ओकर एकमात्र उद्देश्य‍ रहैत छैक जे मोनकेँ बहटारि लेब। सोनाबाइ अपन पेशामे कतहुँ कोनो कोताही नै करैत अछि । ओ आवेशक स्नेरहिल स्वकरमे लगीच अएबाक आमंत्रण अपन परिधान खोलि कऽ दैत अछि । हीराकेँ ठकमुहरी लागि जाइत छैक । ओकर हृदयमे नारीक प्रति सम्मामन– भाव जागि जाइत छैक । ओकर मनोभावमे स्त्रीु संवेदना अस्मिशताक पर्याय बनि उभरि अबैत छैक । सोनाकेँ हड़बडी़ छैक जे एकटा ग्राहकसँ निपटत तँ दोसरक आश? ओ बजैत अछि जे आउ ने, आनो ग्राहक खोज पड़त ने (१४४) । हीरा हारल जुआडी़ सन मनोव्यतथा की कहि दैत अछि जे सोनाक आँखि चमकि उठैत अछि । ओकर सबल मानवीय संवेदना उभरि अबैत छैक। हम आइ पहिल बेर कोनो सुच्चा मनुक्खमक दर्शन कएलहुँ अछि (१४६) । परिणतिमे दुनूक सुरक्षा भावमे अपनत्व बोध जागि जाइत छैक । तात्पर्य जे दैहिक भोगसँ बेसी–मोनक राग जे हल्लुको आँचपर बरकैत रहैत छैक वा बेसिए आँचपर किएक ने, मुदा दुनू स्थिेतिमे अनुशासित रहैत छैक । यैह कारण थिक जे जीवनकेँ गति आ उष्मार देबामे स्त्रीक–पुरुषक साहचर्य दोसरक पूरक बनैत अछि । आजुक समाजमे अमानवीयताक यैह स्थिति अछि जे स्त्रीकेँ चीरीचोँत कऽ अपन पुरुषत्‍व देखएबाक दम्भआ भरैत अछि ततए सोना आ हीराक बीचक घटित घटना कनेक अविश्वशनीयताकेँ पनुगबैत अछि । जतए सोनाक संग भेल अत्याचार स्वतः उघरैत व्यथा–कथा कहैत अछि ततए ई पंक्ति तँ–सोनाबाइ जकाँ तोड़ल–मचोड़ल नहि गेलि रहए, बाँचल छलीह (१४४) सेहो अविश्वशनीय बुझाइत अछि । शिल्प‍क दृष्टिाएँ अवस्से ई कथा कनेक कमजोर अछि, मुदा कथ्यतक दृष्टिएँ रक्त आ स्नेशहसँ जे अपनत्वत बोध जगाओल गेल अछि से अबस्से मनुष्यक मनुष्यताक स्वाद चीखबैत अछि । आब ई प्रश्न उठब स्वाभाविके जे मनुष्यक मनुष्यताकेँ अमानवीय बनएबाक दोषी के? की जन समाज ? समाज तँ लोकेक थिक। ई सत्य् अछि जे आइयो हीरा सन गनल–गूंथल लोक अछि। तथापि कामोत्तेजक भाव–भंगिमा नेने दैहिक जरुरति बुझि वा फैशन परस्तो भऽ कुटिल पुरुषक अहं अबस्से स्त्रीकेँ भोगक सामग्री बुझि पबैत अछि जे मोनक तुष्टिज हेतु कुविचारेँ पाश्विोक आचरण करैत अछि । जंॅ हीरा आ सोनाबाइ सन एक दोसरक प्रति समर्पण आ निष्ठाभावमे राग उभरए तँ निश्चिचते अनैतिकताक अढ़मे होएत विकृतिक विषाक्त आ चद्दरि फाटत आ असली छवि जगजियार होएत । एतेक तँ निश्चि्ते जे विश्वास आ हार्दिकतामे स्त्री –पुरुषक आकर्षण अबस्से जीवन–सत्येक अढ़मे मानवीय आकांक्षाक पूर्तिमे सबल ओ सहायक सिद्ध होएत । हीरा आ सोनाक हृदयमे वास्तकविक प्रेम–भाव की अंकुरित होइत अछि जे सहजता ओ सरलतामे आन्तिरिक जटिलताकेँ आरो सघन बनबैत अछि। नारी पूरक बनैत अछि । जेकि अभिजातीय संस्कृसतिक विरोध स्वधरुप सामाजिक अस्मि ताक व्याीपक बोध अर्थात् स्त्रीर पुरुषक सहज आकर्षणमे आत्मि्क स्वजर उभरिक आत्म स्फुह लिंग छिटकबैत अछि तेँ दुनूक संघर्षमे सामाजिक जीवनक यथार्थ झलकि उठैत अछि। आधुनिक चकचोन्हीिमे अन्हराएलि भगजोगनी कथामे रेखाक भोगबादी लिप्सा ततेक आगाँ बढि जाइत अछि जे अपन बसल–बसाओल घर उजारबासँ बाज नहि अबैत अछि । ओ बिसरि जाइत अछि जे अर्थ लिप्सा लऽ सम्बन्धकेँ गीडि़ जाइत अछि । फल भेटैत छैक जे जखन जीवनक बोध होइत छैक तँ गत कर्मक तर्पण करैत अछि। ओ भ्रमजालमे जे अहुरिया कटैत छल से तोडि़ फेकैत अछि । यौन रुपमे उन्मत्त प्रेम आ घृणाक ढहैत देबालक बीच समाज आ सत्यसँ जे साक्षात् कराओल गेल अछि से अबस्से उ वैयक्ति्क चेतनाकेँ धार दैत दाम्पत्य जीवनकेँ सफल बनबैत अछि। एहिमे प्रेम आ यौन सम्वलन्धी गेंठकेँ फोलैत कथाकार उपसंस्कृतिपर जमिक प्रहार कएल अछि । ई सत्यत थिक जे दैहिक भूख लोककेँ कामुकतामे जकडि़ अबस्से उ देह मैथुनकेँ प्रश्रय दैत अछि । एतेक दूर धरि जे आवेगमे मनोविकार अपन ठोस रुप तत्क्षकण प्रभाव जनबैत अछि । मुदा, काम–भावक भूख सम्वरन्धकेँ स्थायित्व नहि प्रदान करैत अछि तेँ असन्तोष पनुगैत अछि । सामाजिक दायित्वमे बोधक ई कथा थिक। अन्हारमे भोतिआएल एकटा सिपाही गणेशक संस्म्रण थिक । ई संस्मसरणात्मवक रिपोर्ताज थिक । कारण गणेशक संस्ममरण उपस्थापितक ओकरे गुण–गौरवकेँ परोसल गेल अछि । तेँ कथा–सूत्रक निर्माण तेना भऽ कऽ नहि भेल अछि जेना कि पात्रक परिप्रेक्ष्यमे घटना आ स्थितिक विवरणात्मकक प्रस्तुाति भेल अछि। साम्यबादी विचारधाराकेँ लऽ कऽ कामरेड कथाक सृष्टिे भेल अछि– गरीब-गरीब सभ एक हो । अर्थात् धनी–गरीबक बीच जे असमानताक खधिया अछि से आरो चकरगर भेल जाइत अछि तकरे भरबाक भरपूर प्रयासमे ई कथा सृजित भेल अछि । सुपत–कुपत आब हमहुँ सभ कहबै (३७) । आत्मभचेतना जगएबाक उद्देश्येँ ई कथा सृजित भेल अछि । पाइक आगाँ बेइज्जति आ गारि कथीक एहि पृष्ठभभूमिपर उडा़न-कथा सृजित भेल अछि । कतार दिस उडा़न भरबाक लोभेँ आ ढेर पाइ अर्जित करबाक सपना संजोगने रजिन्दर कापरकेँ पहिलु एजेन्ट दस हजार टाका, दोसर अस्सी हजार आ तेसर खेप पन्चान्वेे हजारक कर्जापर लेल टाका बोहाइत छैक । ओ ठकाइत अछि तैयो ओकरा उडा़न भरबाक आशा छैक। ओ हृदयक कोनो कोनमे दमित इच्छाेकेँ संयोगने रहैत अछि जे कोना उडा़न भरी । जहिना धनक लेल जेबाक हाहुती तहिना एजेन्टकेँ चाही लाभ । माने ई उडा़न की, दस हजारसँ पच्चीस हजार धरिक चोखे नफा । तात्पार्य जे दुनू गर भिडौ़ने । तेँ बेर बेर ठकाइतो लोक पुनि ठकाइत अछि । एहिमे पाखण्डी चरित्रक पर्दाफाशक संग केवल जीवन जीनाइयेक मात्र लुतुक नहि होएबाक प्रत्युत जीवन मूल्य बोधक लेल जीवाक ओकालति संकेत मात्रमे कएल गेल अछि । जइ मधेशमे एक मधेश, एक प्रदेश लऽ कऽ आन्दोिलत अछि । मधेशी आ पहाडी़क बीचक खधिया समानतामे पटि जाय । अयोधी मास्टेरकेँ जीवन कोहुनाक मास्टेरीमे खेपाएल आ एकमात्र बेटा अशोककेँ नोकरी नहि भेटब । तात्पर्य जे अपेक्षित योग्यकता अछैतो व्यवस्थे तेहन वनल छैक जे मधेशकेँ के पूछओ ? तेँ आन्दोालनी जुलुसमे ओकर बुढाएल देहक जोश की हिलोर मारए लगलैक जे ओहो कूदि पड़ल । ओकर अस्मि्ता की जागि उठलैक जे मधेशक लेल ओ किछुओ क सकैत अछि । राष्ट्रिओयताक परिप्रेक्ष्यिमे अपन विचार, भावना आ समएक सत्यकेँ उद्भासित कएल गेल अछि । जखन लोकक अस्मिरतापर चोट लगैत छैक तँ ओकर मोन कचोटए की लगैत छैक जे स्वितंत्रताक हनन मंजूर नहि होइत छैक । मधेशी होएबापर जे गौरवबोध होइत छैक से जखन एके देशमे विषमताक बोध होइत छैक तँ पीडा़इत मोनमे आक्रोश पनुगैत छैक । एहिमे मानवीय जीवनक संवेदना झलकि उठैत अछि । गहनतम प्रश्नानुकूलतामे भहरैत नेओक जोड़ कथाक सृजन भेल अछि । एहिमे निरसन बाबूक पुत्री सरोजाक दुःस्थितिमे अन्तन ओ रानीक संग छलाइत जीवनके कथाकार ओकर मार्मिक पीडा़केँ उभारिक सामाजिक परिवर्तन दिस ध्या्न आकृष्ट कराओल अछि । एतेक दूर धरि जे एकर जिम्मेरवार के? स्त्रीक त्रासक मार्मिक उद्घाटनक फलस्वुरुप ई कथा फोकिला मानसिकताक दम्भाकेँ आरो उघार करैत अछि । ओढ़ल अभिभावकत्विक नीतिकेँ सरेआम चौबटियापर नग्नो कऽ मानवीय जीवनक अनुभवसँ सम्घक्ति निजी संवेदनाकेँ सार्वभौमिक बना देल गेल अछि । एहि प्रकारेँ एक दिस हृदयहीनता आ मूल्यहीनताकेँ देखार कएल गेल अछि तँ दोसर दिस परिवर्तनक सुगबुगीमे मानवीय सोच आ संवेदनाकेँ आजुक परिस्थियतमे ठोस दृष्टि दऽ अमानवीयताक खोलकेँ चीटीचोंत करबाक सनेस बिलहल अछि । अन्ततः किसुनमाक ऊहमपोहक स्थिटतिमे जतए पत्नी उत्तीमपुरवालीक प्रति अनुराग–भाव अछि से पंजाबमे कमाइत मनसूबा पोसने घर अबैत अछि तँ एकटा नेना? मासक फरक। आन बापक बच्चा‍ अर्थात् अनकर जनमल बेटा। रहि रहिक ओकर हृदयकेँ ई बात टीसैत की छैक जे सभटा मनोरथ भग्न भऽ जाइत छैक आ अन्तिाम परिणतिमे नेनाक मूडी़ छपाक् कऽ दैत अछि। निर्दोष आ अबोध बच्चाक हत्या। ई सत्य थिक जे निशंस हत्याक फलस्वरुप हृदय भावमे परिवर्तन आएब स्वािभाविक थिक । मुदा, अबोध वच्चाक हत्या ? तकर परिनति ? कथा जाहि विन्दुदपर आबिक छोडि़ देल गेल अछि से आगाँक अपेक्षा रखैत अछि। तैयो, एकटा प्रश्नि पनुगबैत सोचबाक लेल वाध्या करैत अछि । अमरलत्ती कथामे रेखाक माध्यमे ओकर बहसलि उद्दाम छविक वीभत्स रुप देखार कएल गेल अछि । ओ अमरलती बनि चतरैत की अछि जे सहारा बनैत आनक बसल–बसाओल घरकेँ उजारि–पुजारि दैत अछि। अपन बनल घर तँ उपटाइये दैत अछि जे आनोक घरमे वासक ओकर सोनहल दुनियामे आगि पजारि दैत अछि । एहिमे रमेशक कामलोलुपताक रेखाक काम–भाव जाग्रत भऽ मायाजाल की पसारैत अछि जे आरो अहिमे ओझराइत जाइत अछि। एहि प्रकारें वासनाकेँ उभारिक पुरुष आ स्त्री वर्गक कुत्सित मानसिकताकेँ देखार कएल गेल अछि। सामाजिक कुव्यकवस्था ओ एहिसंॅ उपजल मानवीय व्यरथाकेँ अवस्से कथाकार उभारल अछि । सम्ब‍न्ध‍क पीडा़मे आशाक हृदयमे बरकैत हृदयक उफान जे प्रेमक उपजामे मानसिक पीडा़ प्रतिफलित अछि तकर सशक्त चित्रण भेल अछि । प्रेम कहि–सुनिक नहि होइत छैक आ ने कीनल बेसाहल जाइत छैक । जखन दूटा हृदय मिलैत छैक वा मोन मिलानी भऽ जाइत छैक तँ बाटमे केहनो रोडा अटकाओल किएक ने जाउक तैयो दुनू–प्रेमी –प्रेमिका हँसैत–कनैत, संघर्ष पथपर टकराइतो, खसितो–उठितो पार–घाट उतरिए जाइत छैक । सैह स्थिति आशा ओ संदीपक मोन–मिलानीमे भेलैक। फल भेटलैक जे आशाक माए–बापक हृदयमे उठैत विरक्ति भाव सम्बन्ध‍–सूत्रकेँ खण्डिकत कऽ देलकैक । आ आशा प्रेमक पणिामसँ उपजल मानसिक पीडाकेँ सहबाक क्षमता अपनामे विकसित करबाक प्रयास कऽ रहलीह अछि (१३८) । सामाजिक यथार्थक रुप झलकाक कथाकार सामाजिक व्‍यवस्थाकेँ उघेसिक आत्मीसयता ढंगसँ लोकजीवनक चित्र उभारबाक प्रयास कएल अछि। बालमोनक सुलभ चंचलता ओ नेनपनक निश्च छलताकेँ स्मपरण करैत नरेशक मोनमे स्मृतिक तरंग की प्रवहित भऽ अबैत छैक जे होएत छैक जे हमहीं किए ने अपनाकेँ नेना बनाली (१४२) । फ्लैश बैक कथाक माध्यटमे कथाकार बालपनक अढ़मे निडरता, निश्छलता आ सौहार्द्र भावमे वचपनक प्रेमक अनुभूति जगाओल अछि तँ उमेरक चारिम प्रहरक पनुगैत भय, सुरक्षा, षडयन्त्र , सामाजिक विदुपता आदिसँ अपनाकेँ बँचबा–बचएबाक प्रयासकेँ रेखाङ्कित करबाक । ई सत्य थिक जे नेनपनक बिताओल क्षणक मधुर स्मृयतिमे लोकजीवन चाहैए, मुदा संघर्षमे सेहो जीवनकेँ फूट आनन्द अबैत अछि। सामाजिक व्यक्तित्वक दोगला मुंॅह अर्थात् सभ्यै समाजक अंग बनबाक लेल लोक जे छल–क्षुद्रमक खोल ओढ़ने रहैत अछि। से अवस्सेक मानसिक बुद्धिकेँ कुण्ठिुत करैत अछि, सामाजिक समरसताकेँ खण्डिकत करैत अछि। नेपालीय मैथिली कथा–साहित्यिमे निस्सिन्देह कथाकार भ्रमरक कथामे जीवनक राग अछि आ अछि नव युगक नारीक प्रति विशेष श्रद्धा–भाव। तेँ हिनक बेसिए कथामे नारी जीवनक संघर्ष अछि। युग यथार्थक त्रासदी जे सामाजिक विडम्बशनामे उपजैत अछि आ एकर कारक थिक सामाजिक व्यवस्‍था । तेँ कथाकारक छटपटाइत मोनमे अबला नारीक चीख अछि आ परिवेशक दंशमे पीडा़इत मानसिक व्याथा–कथा। देह–भोगमे टीसैत दर्द उभरि की अबैत अछि जे सामाजिक सत्यवकेँ देखार करैत यथातथ्यजक मोनक पीडाकेँ उगलि दैत अछि । टूटैत सम्बउन्ध, छुटैत लोक, अर्थ लिप्साकक मोह ओ दैहिक भोगमे पीडाइत कामुकता आ रोटीक समस्या नेने कथाकारक मोनमे कतेको प्रश्न छटपटी मचौने अछि तकरे सार्थक अभिव्यक्ति सहज ओ सरल भाषामे पाठकक सोझाँ परोसि देलनि अछि । कोनो सभ्यसता–संस्कृकतिकेँ गतिशील बनाक राखब समाजक लोक दायित्वे थिक । से ताधरि जाधरि ओ सामाजिक जीवनमे सार्थक भूमिका निमाहए। ई नहि जे सड़ल गलल परम्पकराकेँ उघने व्यबवस्था िक तरमे पीसाइत जीवनसँ कटल व्यनवस्थाकेँ सत्य मानि फोकिला मानसिकताकेँ उघैत रही। जे सभ्यता संस्कृमति जीवनमे नहि उतरि सकए तकर परित्याग करब उचित–विहित थिक । ओ जीवनक अर्थक खोजमे प्रेमक आसरा लैत समएक परिवर्तनकेँ युगक अनुकूलेँ टांकिक नव समाज बनएबाक आकांक्षा रखैत छथि । तेँ कथाकार सामाजिक विसंगतिसँ उत्पन्नन विषमता ओ आर्थिक स्थितिक संग सांस्कृतिक आयामपर जमि कऽ विमर्श करबाक लेल प्रश्नकेँ पनुगबैत छथि । एहिमे हिनक परिवर्तनकारी सोच अबस्से् उत्प्रेरक बनि नव सामाजिक मूल्यतबोधक संवाहक बनैत अछि । हिनक लेखनी अबस्सेे शोषित–पीडितक अस्मिमता–अधिकारक बात उठबैत अछि । ओ दबल–कुचलल लोकक पक्षमे भऽ जाए । ई सत्य अछि जे हिनक प्रेममूलक धारणामे वासना जन्य उभार कनेक बेसिए उभरि आएल अछि से सत्ते कामुक पुरुषक दम्भोचित उपजा थिक। किएक तँ पुरुषक पौरुषत्व वासनामे विशेषे केन्द्रित भऽ आएल अछि । कथाकारक बेचैन मोनमे समतामूलक ओ प्रेममूलक धारा रस प्लवित अछि तेँ अभावजन्य पीडा़मे पीडा़इत शोषित वर्गक समस्याक उभरि आएल अछि। स्त्री वर्गक प्रति जहिना पुरुष वर्गक दम्भन, क्रूर मानसिकता ओ अव्‍यवस्‍थाकेँ उजागर करैत अछि तहिना सम–सामयिक प्रश्नक झडीमे रोटीक औकाति देखबैत अछि । एहि प्रकारेँ कथाकारक हृदयकेँ व्यथासँ उपजैत अकूलाइत मोनक छटपटाहटिमे सुखाइत प्रेम भावनाकेँ खींचबाक आकांक्षा अछि तँ मूल्य रहीताबोधक प्रति तिक्ख आक्रोश। जीवनक व्यािवहारिकतासँ सामाजिक मुद्दाकेँ उठबैत छथि। हँ, प्रश्नेक झडीमे किछुक समाहार करैत छथि तँ यथातथ्य उपस्थािपत सेहो । ओना, कथाक मूल स्विर हस्तक्षेप करिते अछि । ईहो सत्य अछि जे नारी अनुभूतिक रिक्तर क्षणमे कथाकारकेँ रहि–रहिक नारीक मानसिकताक भूख दैहिक काम–क्रीडा़मे ओझरा जाइत अछि । मुदा, ईहो सत्य थिक नारीक अन्तरमोनमे पैसिक जे मानसिक विकारकेँ स्वच्छ करबाक प्रयास भेल अछि से मात्र कामुकतामे नहि भऽ कऽ सामाजिक मूल्यमबोधक संवाहक बनिक उभरि अबैत अछि । उपसंस्कृातिक प्रति हिनक हृदयमे खोंझी आ असंतोष भाव अछि तंॅ सामाजिक नैतिकता आ धार्मिकताक अढ़मे छिड़हरा खेलाइत साम्राज्य्वादी संस्कृीति प्रति विद्रोह भाव मुखरित भेल अछि । मुदा, इहो देखल जाइत अछि जे भ्रमरक कथाकार कथा साहित्यतमे जतेक कथ्यक प्रति सजग रहि पबैत अछि ततेक शिल्पिक प्रति नहि । शैलिक दृष्टिएँ अवस्से् हिनक कथाकार सजग नहि रहि पबैत अछि जे कथा–सौन्दर्यकेँ बाधित करैत अछि । तेँ की ? भ्रमरक अनुभववादी दृष्टि सतत चौकन्नत रहैत अछि जे अपन गाम–घर, अडो़सिया–पडोसियाक देखल भोगल यथार्थक चिक्कन–चुनमुन चित्रण करैत अछि । हिनकामे कहबाक क्षमता अछि जे शिल्पक विकासमे आरो सौन्दर्य आनि निखरत । जेँकि कथाकार भ्रमरक चौकन्न दृष्टि समाजक प्रति सजग अछि । तेँ जीवन मूल्यक संवाहक बनैत ओ ओहि पात्रक सृष्टिे करैत छथि जे समाजमे आइयो निरीह अछि । खासक नारी पात्र हिनक संवेदनशील मोनकेँ छुबैत अछि। ओ नारीक अधिकार ओ चेतनाबोधक पक्षधर छथि । ओ कखनो नारीक पक्षमे छाती तानिक ठाढ होइत छथि । मुदा, उपसंस्कृबतिमे घेराएल नारीक वीभत्सी छवि अबस्से हिनक हृदयकेँ पीडित–सीदित करेत अछि । ओ कोनो परिस्थिीतिमे स्वाृभाविक यथार्थक तहकेँ फोलिते छथि। तेँ शोषणक विरोधमे झंडा उठबिते छथि । हिनक संवेदनशील मोनमे जीवनक प्रति रागात्माक बोध अछि। हंॅ, हिनक कथाकार यथातथ्यकेँ हू-बहू प्रस्तुरति कऽ दैत अछि से कैक स्तमरपर । तेँ पात्रक चरित्र तेना भऽ कऽ ठाढ़ नहि भऽ पबैत अछि जे होएबाक चाही । जाहि ठाम हिनक पात्रक चरित्र–चित्रण सजीव भऽ उठल अछि ताहि ठाम कथाक सौन्दर्य अपन अपूर्व छवि–छटा लऽ मुखरित भेल अछि । नेपालीय मैथिली कथा साहित्यमे भ्रमरक कथा मात्रात्क ओ गुणात्मक दुनू दृष्टिेए अपन प्रभाव छोडै़त एकदिस जँ कथा–साहित्यक भण्डा्रकेँ भरैत अछि तँ दोसर दिस कथा दृष्टिुमे मूल्य बोधक संवाहक बनैत अछि । तेँ मानवीय मूल्य बोधक जीवन–दृष्टि नेने भ्रमरक कथा सामाजिक परिवर्तनमे अपन औकाति सिद्ध करबे करत आ भविष्यमे ऐतिहासिक मूल्यक वस्तु– बनबे करत से आशा ओ विश्वास जगबिते अछि । ई संग्रह छपाइ–सफाइक दृष्टिकएँ देखनुक आ मनमोहक रहल अछि खास कऽ पोथीक आवरण विशेष आकर्षित करैत अछि । मनमीत कुटीर /राजपूत कालोनी मौलागंज/ दरभंगा–८४६०४ बिहार/भारत! आशाक किरण जितेन्द्र झा मैथिलीभाषा धीरे-धीरे आब विद्युतीय संचार माध्यममे स्थान बना रहल अछि । दिल्लीसँ सौभाग्य मिथिला नामक एकटा टेलिभिजन संचालन भेल अछि। ई सम्पुर्ण मैथिली टेलिभिजन रहल कहल गेल अछि। ई मनोरंजनात्मक टेलिभिजन अछि जाहिमे गीत नाद आ टेली श्रृंखला प्रसारणकेँ प्रमुखता देल जा रहल अछि । ई निश्चित जे जनसंख्याक अनुपातमे ई समुदायकेँ अपन संचार माध्यम नहि अछि। भारत आ नेपालक सीमामे बांटल प्रतीकात्मक मिथिला एखनो आन भाषाक माध्यमसंॅ सुसूचित हएबाक बाध्यतासंॅ मुक्त नहि भ' सकल अछि । ओना नेपालक किछु एफ़ एम आ नेपाली / भारतीय च्यानल सभसंॅ मैथिली भाषाक माध्यमसंॅ समाचार आ मनोरंजनक सामग्री एहि क्षेत्रमे पंहुच रहल अछि । टेलिभिजनमे मैथिलीकेँ स्थापित करबाक प्रयास दिल्लीसंॅ भेल । दिल्लीस संचालित नेपाल वन टेलिभिजनकेँ मधेश स्पेशल कार्यक्रमसंॅ मैथिली भाषामे समाचार आ गीतनाद प्रसारण भ' रहल अछि । दिल्लीसंॅ प्रसारित नेपाल वनमे लगभग दु सालसंॅ बेशी भ' गेल अछि एहि कार्यक्रमकेँ। पहिने एक घण्टाक कार्यक्रममे मैथिलीमे समाचार, अन्तर्वार्ता आ मैथिली भोजपुरी गीत प्रसारण होइत छल आब वएह समएमे भोजपुरी आ थारुकेँ सेहो सन्हिया देल गेल अछि । तहिना दिल्लीसंॅ संचालित भोजपुरी भाषाक टेलिभिजनमे मैथिलीकेँ किछु मिनेट भेट जाइत अछि । दिल्लीसंॅ प्रसारित हमार आ महुवा टेलिभिजन मैथिलीमे कखनो किछु मैथिलीमे सामग्री देल करैत अछि । सहारा समए सेहो किछु दिन मैथिली भाषामे साप्ताहिक कार्यक्रम प्रस्तुत कएलक मुदा ओ निरन्तरता नहि पाबि सकल। मैथिली भाषा भारतक अष्टम अनुसूचिमे पड़लाक बादो सरकारी संचार माध्यममे अपन स्थान नहि बना सकल अछि । दोसर दिश नेपालमे भारतसंॅ संचालित नेपाल वन मैथिली भाषाक माध्यमसंॅ मैथिली भाषीमे अपन अलग स्थान बना लेने अछि । नेपालक सरकारी टेलिभिजन नेपाल टेलिभिजनमे एखनो उपेक्षित अछि मैथिली। नेपालमे सभसंॅ बेशी बाजल जाएबला दोसर भाषा मैथिलीमे निजी टेलिभिजन सभ किछु रुचि देखौलक अछि । काठमाण्डूसंॅ प्रसारित सगरमाथा टेलिभिजन सांॅझमे लगभग 15 मिनटक समाचार प्रसारण करैत अछि तँ बिरगंजसंॅ प्रसारित तराई टेलिभिजन सेहो मैथिलीमे मनोरंजनात्मक आ सूचनामुलक कार्यक्रम प्रसारण करैत अछि । नेपाल टेलिभिजनकेँ मेट्रो टेलिभिजनमे साप्ताहिक मैथिली कार्यक्रम किछु एपिसोड चलल छल मुदा ओ निरन्तरता नहि पाबि सकल । मैथिली भाषाकेँ प्रतिनिधित्व कएनिहार सशक्त संचार माध्यमकेँ एखनो नितान्त अभाव अछि । सूचना प्रविधिक एहि युगमे मैथिलीके अपन अस्तित्व बचएबामे संचारमाध्यम सहायक भ' सकैए एहिमे किनको शंका नहि हएबाक चाही । जा धरि सशक्त संचार माध्यम मैथिलीकेँ नइ भेट्त ता धरि ई कल्पना मात्र रहत जे मैथिलीक सुनिश्चित भविष्य अछि । अपार सम्भावनाक बादो संचारमे मैथिलीक सिकुड़ल काया कहिया पुष्ट हएत से कहब अनुमानो लगाएब कठिन । फूल चन्द्र झा ‘प्रवीण’ जन्म तिथि:10 अक्टूबर 1961, पिता: श्री श्याम सुन्दर झा, माता: श्रीमति चन्द्रकला देवी, सम्पर्क: ग्राम–तुमौल, पत्रालय–पुतइ, जिला–दरभंगा (बिहार)। व्यवसाय: अध्यापन, अभिरूचि: लेखन, चित्रकला, अभिनय, गीत–संगीत, सामाजिक कार्य। रचना संसार: कविता–संग्रह- आयल नवल प्रभात, वसंतक बजनिञा, पाङल गाछक छाहरि, हमरा मोनक खंजन चिड़ैया, नाटक- आन्दोलन, लुत्ती, सामाजिक न्याय, गुरूआइनि, स्वागत हे गणतंत्र भारती। कथा-संग्रह- भूत होइत भविष्य, निबंध–संग्रह- हमरा जनैत। संकलन–सम्पादन- बाबू भोलालाल दास रचनावली, (पहिल खण्ड), मधुपजी बीछल बेरायल कविता। अनुवाद- मल्लिनाथ (अंग्रेजीसँ)। सम्मान- साहित्यकार संसद द्वारा राष्ट्रीय शिखर सम्मान- कविचूड़ामणि पं. काशीकांत मिश्र ‘मधुप’ (2006), विद्यापति(2008), सुमन स्मृति सम्मान (2009)। एकर अतिरिक्त ‘जखन–तखन’ पत्रिकामे सम्पादन सहयोग, राष्ट्रीय–अंतराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कविसम्मेलनमे सहभागिता, विभिन्न पत्र–पत्रिकामे गीत, कविता, कथा, लेख, निबंध आदिक रचनात्मक सहयोग।-सम्पादक मैथिली शिशु साहित्य लोक मैथिली लोक साहित्यमे शिशु लोक साहित्यक अम्बार लागल अछि। किछु लिपिबद्ध आ बेसी मौखिक। शिशु लोक साहित्य अज्ञात समएमे, अज्ञात लोक रचनाकारक द्वारा भेल होएत। जहियासँ एकर रचना भेल तहियासँ ई वेदक रचना जकाँ हजारो वर्ष धरि मौखिक परम्परामे जीबैत रहल। तकर बाद किछु तँ लिपिबद्ध कएल जएबाक प्रयास भेल आ बेसी एखनो धरि लोकक कंठमे अपन स्थान बना कऽ रखने अछि। प्रत्येक पीढ़ीक लोक अपन पछिला पीढ़ीक लोकसँ एकरा सुनैत आ सीखैत आबि रहल अछि। मौखिक परम्परामे जीबाक कारणेँ एकर मौलिकता दिनानुदिन नष्ट भेल जा रहल अछि। लोक–विशेष, वर्ग–विशेष आ क्षेत्र–विशेषक कारणेँ एकर शब्द आ उच्चारणमे अंतर पाओल जाइत अछि। मैथिली शिशु लोक साहित्य प्रायः सब विधामे उपलब्ध अछि, मुदा एहि आलेखमे पद्य विधाकेँ केन्द्रमे राखि थोड़ बहुत आनो विधा सभपर विचार कएल गेल अछि। एखन धरि जे मैथिली शिशु लोक साहित्यकेँ लिपिबद्ध रूपमे संकलित करबाक प्रयास भेल अछि ताहिमे प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन”क मैथिलीक नेना गीत डा. अणिमा सिंहक “शिशु गीत आ खेल” तथा सम्पूर्ण बाल साहित्य डा. दमन कुमार झाक एकटा समालोचनात्मक ग्रंथ “मैथिली बाल साहित्य” बहुत हद धरि उपयोगी सिद्ध भेल अछि। मैथिली शिशु लोक साहित्यकेँ निम्नलिखित भागमे बाँटल जा सकैत अछिः- 1. लालन–पालनसँ सम्बद्ध। 2. खेल आ मनोरंजनसँ सम्बद्ध। 3. ज्ञानोपयोगी। लालन–पालनसँ सम्बद्ध शिशु लोक साहित्य एहि प्रकारक लोक साहित्यक परिवेश पैघ नहि होइछ। ई घर–आँगनसँ दलान धरि सीमित रहैत अछि। नेनाकेँ जन्म लितहि ‘सोहर’ ओकरा कानमे पड़ैत छैक आ जेना–जेना नेनाक अवस्था बढ़ैत छैक, बदलैत छैक तेना–तेना शिशु लोक साहित्य परिवर्त्तित होइत जाइत अछि। जन्मक बाद ओकरा दिन–राति मिला कऽ कतेको बेर कड़ूतेलसँ जाँतल–पीचल जाइत छैक आ जतनिहारिक ठोर पर अनायास चल अबैत अछि– चैं–चैं–चैं बौआ सूतभैं बौआ मत्था पच्चनि तेल मुद्दै मत्था फुट्टनि बेल। चानि पर तेल पचाय, अपन दुनू टाँगपर नेनाकेँ पारि, देह उँगारैत कहैत छथि:- बौआ ईलसन, कील सन धोबियाक पाट सन कुम्हराक पाठ सन अद्दै–मुद्दैक छाती पर लात दिअ पृथ्वी पर भऽर दिअ। तकर बाद नेनाकेँ हाथसँ लोकैत छथि। नेना डरे कानए लगैत अछि। पुनः कहैत छथि–बौआ आम तोड़ू/ बौआ जाम तोड़ू। तकर बाद टाँग पकड़ि कऽ, उनटाकऽ झुलबैत कहैत छथि– बौआ मामा गाम देखू बौआ नाना गाम देखू बौआ अपन गाम देखू। एहिमे एकटा बात देखयमे अबैत अछि–जँ नेना मामा गाममे रहल तँ ओकर दादा–दादीक, जँ अपन गाममे रहल तँ नाना–नानीक चौल कएल जाइत अछि। पहिल साँझ दीप लेसलाक बाद छोट–छोट नेनाक रक्षार्थ संझा–मैयासँ प्रार्थना कएल जाइत अछि। आको मैया चाको, संझा मैया राको पहरा मैया हेरणी, सब दुःख फेरनी जे बौआकेँ दिअय दृष्टि, तकरा बान्हू गोला विष्ठी काल–भैरव रक्षा करय, सोनक दीप, पाटक बाती बौआ सूतय सुखक राती दुःख–दरिद्र पाछू जाउ, सुख–श्रृंगार आगू आउ। तहिना बेसी देखनुहुक नेनाकेँ क्यौ नजरि–गुजरि ने लगा दिअय, एहि क्रममे ई पाँती द्रष्टव्य:-– हँसनी–खिलनी गेल बजार/ हँसनी चल आयल खिजनी रहि गेल/ जहिना हस्से राजा धनपाल तहिना हस्से बालक/ दोहाइ राजा धनपाल दोहाइ मौरगनी माए। दीपक इजोतपर नेना अपन दृष्टिकेँ केन्द्रित कऽ डिम्हा घुमबैत, आनन्द लैत रहैत अछि। जनश्रुति अछि, प्राचीन कालमे छठिहारक रातिक दीप मिझा कऽ लोक राखि लैत छल तथा छः वर्ष धरि बेटाकेँ आ तीन वर्ष धरि बेटीकेँ एहि दीपसँ ई टोटमा करैत छल, मुदा वर्तमानमे एहन कम देखबामे अबैत अछि। जखन नेना बैसऽ लगैत अछि, संकेतपर आँगुर पकड़ब सीखि लैत अछि, तखन लोक कोनो बातक जिज्ञासाक क्रममे, बालबोध बुझि अपन बिचला दू गोट आँगूरकेँ नेनाक कपारपर घुमबैत कहैत छथि-–आनी–मानी हम जानी/ खारा रोटी खाए नहि जानी। आए–बापके ना नहि जानी/ सत्त छोड़ि असत्त नहि बाजी। तकर बाद नेनाकेँ आँगुर देखबैत पकड़बाक लेल कहल जाइत अछि। जँ नेना बिचला आँगुर पकड़ि लैत अछि तँ जिज्ञासा पूरा होएबाक सम्भावना प्रबल मानल जाइछ। जखन नेना ठाढ़ होएब आरम्भ करैत अछि तखन बेर–बेर खसि पड़ैत अछि। घर–परिवारक लोक ओकरा बेर–बेर आँगुरक भऽर दैत ठाढ़ होएबाक लेल आ डेग उठएबाक लेल प्रोत्साहित करैत कहैत छथि:– था.....था.....दिग्–दिग् था था.....था.....थैया.....था डेग बढ़ैया.....हम्मर बाबू.....हम्मर भैया। एहि संग नेना डैग उठबैत अछि, बेर–बेर खसैत अछि आ ई सुनि–सुनि पुनः ठाढ़ होएबाक आ डेग उठएबाक प्रयास करैत अछि। एहि पदक माध्यमसँ नेनाकेँ बूलब सिखाएल जाइत अछि। झौलाएत नेनाकेँ कोरामे लऽ घुमएबाक क्रममे कथा–गीतक परम्परा रहल अछि। एकर स्वरूप पैघ आ छोट दुनू प्रकारक देखबामे अबैत अछि। जेना चन्नामामाकेँ देखबैत नेनाकेँ कहल जाइत अछि: चन्ना मामा आ रे आ, पारे आ/ नदियाकेँ किनारे आ सोनाकेँ कटोरामे/दुध–भात नेने आ/ बौआक मुँअमे घुटुक सन। दोसरः- चन्नामामा आरे आ पारे आ/ केराक भार ला पूड़ी–पकमान ला/ फोका मखान ला/ बौआ मुँहमे ठुस। एतेक कहैत अपन हाथसँ नेनाकेँ खोअएबाक अभिनय करैत छथि। तहिना तरेगण दिस तकबैत:– एक तारा दू तारा/ तारा बेटी बड़ बुधियारि गंगाकातसँ बालु अनलक/ सेहो बालु कनुनियाँ लेलक सेहो कनुनियाँ फुटहा देलक/ सेहो फुटहा चरबहबा लेलक सेहो चरबहबा घस्सा देलक/ सेहो घस्सा गैया खेलक सेहो गैया दूध देलक/ सेहो दूध बिलैया पीलक सेहो बिलैया मूसा देलक/ सेहो मूसा चिलहोरबा खेलक सेहो चिलहोरबा पंखा देलक/ सेहो पंखा राजा लेलक सेहो राजा हाथी देलक/ सेहो हाथी मामा लेलक सेहो मामा गिलास देलक सुतयबाक काल नेनाकेँ जाँघपर लऽ बेर–बेर ओकर कनपट्टी आ माथकेँ सोहरबैत, जाँघकेँ नीचाँ–उपर करैत, अपनो देहकेँ डोलबैत, ई लोरीक परम्परा एखनो धरि मिथिलाक सभ घरमे देखबा सुनबामे अबैत अछि-–आगे निनियाँ आ आ/ बौआ लए निन ला ला निनियाँ एलै बिढ़िनियाँसँ/ बौआ एलै मातृकसँ बौआक मामा गाम की–की बिकाय। अंगा बिकाय, टोपी बिकाय/ सेहो अंगा के पहिरय/ बौआ पहिरय एकरा कत्तौ–कत्तौ दोसर प्रकारेँ एना सुनबामे अबैत अछि– निनियाँ अयलै बिरहिनियाँसँ/ बौआ अयलै ममहरसँ ममहरमे बौआ की–के खाए/ आरब चाउरक भात सोरहिया गायक दूध/ हाली–हाली खो रे बौआ जयबेँ बड़ी दूर हुअमाकेँ पियासल बौआ गेल पोखरि पोखरिक टेंगस लेल टेंगराय बोनक बगुला देल छोड़ाय/ ऐहेँ रे बगुला खेत–खरिहान एक सूप देबौ देसरिया धान/ तेकरे कुटिहे नाम–नाम चूड़ा बैसि जिमबिहेँ ब्राह्मण पूरा देल आसीस जिबिहेँ सै बौआ लाख बरीस। एहि लोरी सभक माध्यमसँ नेनाकेँ सुतएबाक संग–संग ओकर दीर्घायु होएबाक कामना सेहो कएल जाइछ। नेनाक सुति रहलापर माए निश्चिंत भऽ अपन घरक काज–रोजगारमे लागि जाइत छथि। नेनाक संग अपनो मनोरंजन करबाक क्रममे लोक अपने उतान भऽ पड़ि रहैत अछि आ नेनाकेँ पैरपर बैसाय, बेर–बेर पैर उपर–नीचाँ करैत एहि पालन गीतक आनन्द अपनो लैत छथि आ नेनोकेँ दैत छथिन। एकरा कत्तौ–कत्तौ “घुघुआ–मना” आ कत्तौ–कत्तौ “धुआँ–चुआँ” नामसँ सेहो जानल जाइत अछि। घुआँ घूँ लल्ले छूँ लल्ले मनसा नाम की सोनमन झा, टीक पकड़ि ला, पोखरि खुना पोखरिक कात–कात चम्पा लगा/ चम्पा फूल उधिआयल जाए परती फुलायल जाए/ सीकीक डगमग कोकाक फूल चकमक देवता चल बड़ी दूर/ कत्ते दूर/ मधेपुर मधेपुरमे की सब, तार छै बेतार छै काजर–बीजर कएल छै/टीकुली बैसाएल छै मामा गेलै पटना/ मामी सुतलै अंगना मामा घरमे चोर पैसल/ दोड़ऽ हो भगिनमा तकर बाद “नव घर उठे” कहि पैर उठाएल जाइत अछि आ “पुरान घर खसे” कहि पैर नीचाँ खसाएल जाइत अछि। ई खेल नेना सभ बेर–बेर खेलएबाक लेल कहैत अछि आ आनन्द विभोर होइत रहैत अछि। जावत काल धरि नेना जागल रहैत अछि, ओकरा एक ने एकटा लोकक सानिध्य चाही, नहि तँ ओ कानय लगैत अछि। एहना स्थितिमे गायक अतिरिक्त नानी, दादी, दीदी आदि ओकर मोनकेँ बहटारबाक लेल रंग–बिरंगक पद्य, भास लगा कऽ गाबऽ लगैत छथि: अलिया गै, मलिया गै/ गोला बड़द खेत खाइ छौ गै कत्तऽ गै, डीहपर गै/ डीहपर रखबार के गै/ बाबा गै सासुकेँ नहि देतौ गै/ सिरमातरमे रखतौ गै अपने सभटा खयतौ गै। दोसरः- लाल गाछी गेली, लाला आम पेली बाबाक देली, बाबा हौ/ आब नहि जाएब मकैया खेत। बाघ छै, बघिनियाँ छै, कोठीपर हरमुनियाँ छै बाबा आँगनमे चूड़ा कुटाय/ पड़बा बीछि–बीछि खाइ छै कोन बेटखउकी नजरि लगौलक/ पड़बा रूसल जाइ छै। नेनाक लालन–पालनमे माए, दादी, नानीक संग–संग दीदी अर्थात पिउसिक सेहो बड़ महत्वपूर्ण योगदान रहलैक अछि। तेँ किछु दीदी परक द्रष्टव्यः- लाल दीदी गे/की दीदी गे/डलिया दे मिरचाइ तोड़ए लेल ककरामे/ पुलिसबामे/ सबे पुलिसबा हुलिसन आएल ककरा घर नुकाएब गे/ बाबा घर नुकाएब गे बीचे बाट पर खसली गे/ सब बरियतिया हँसली गे दोसरः- लाल दीदी गे/ की दीदी गे/ बेटा कनै छी खोपड़ीमे कानय दहिन पुतखौकाकेँ/ नाचय दहिन पमरियाकेँ खाइ लेल देलहुँ दालि भात/ खाए लेलक सोहारी सुतइ लेल देलहुँ अलंग–पलंग/ सूति रहल गोरथारी गेलहुँ मोँछ पकड़ि कऽ उठबए/ फोलि देलक केबाड़ी। तेसरः- लाल दीदी गे/ की दीदी गे/ एक रत्ती छाल्ही चटलियौ गे तै लेल बाबा मारलकौ गे/ बाबा बड़ चण्डलबा गे। अपना ओहिठामक बेटीकेँ जखन संतानक योग्यता होइत छनि तखन प्रायः नैहर आनि लेबाक परम्परा एखनो धरि बाँचल अछि। एहना स्थितिमे नेनाकेँ मामा, मामी, नाना, नानीक बेसी दुलार–मलार भेटैत रहलैक अछि, तेँ किछु मामा–मामीसँ जुड़ल पालन–पद्य द्रष्टव्य:– मामा हौ पोखरी भीड़पर जइहऽ चिक्कन पड़बा मारिकऽ आनिहऽ मामी हाथकेँ दीहऽ/ तेल फोरन मिलाकऽ करिहऽ अपने खइहऽ लाल–लाल कुटिया/ हमरा दीहऽ झोर ई सब देखिकऽ बहि रहलैए/ हमरा आँखिसँ लोर। दोसरः- मामी यै भात उधिआए/ मामी यै दालि उधिआए कोठी पर सुग्गा स्नान करैए। तेसरः- आब नहि जएबै मामाक अँगना अपने खाइ छै लाल–लाल कुटिया/ हमरा दै छै झोर। खेल आ मनोरंजनसँ सम्बद्ध शिशु–लोक साहित्य एहिसँ सम्बद्ध शिशु लोक साहित्यक परिवेश बेसी विस्तृत अछि। रस्ता–पेरा, परती–पराँत, विद्यालय–परिसर, खेलक मैदान आदि ठाम नेनाक झुण्ड भोर साँझ जमा होइत अछि आ रंग बिरंगक खेल खेलाइत अछि। छोट–छोट नेना, जे खेल, बेसीकाल खेलाइत अछि, ताहिमेसँ किछु द्रष्टव्य:– अटकन–मटकन दहिया चटकन/ पूस महागर पुरनी पत्ता हिल्लय–डोल्लय/माघ मास करैला फरए/ तै करैलाक नाम की आम गोटी, जाम गोटी, तेतरी सोहाग गोटी। सिंगही लेबै की मुँगरी जँ उत्तरमे नेना ‘सिंगही’ कहैत अछि तँ ओकरा बिट्ठू काटल जाइत अछि आ जँ ‘मुँगरी’ कहैत अछि तँ मुक्कासँ मारल जाइत अछि। एकरा दोसर प्रकारेँ सेहो सुनबामे अबैत अछि:– अटकन मटकन दहिया चटकन/ केरा कूस महागर जागर पुरनिक पत्ता हिल्लै–डोल्लै/ माघ मास करैला फूलै आमुन गोटी, जामुन गोटी/ तेतरी सोहाग गोटी सिंगही लेबेँ की मुँगरी? दोसरः- गाछ करै ठाँए–ठाँए, नदी गौंगिआए कमलक फूल दुनू अलगल जाए/ सीकीक डाली चमेलीक फूल चकमक देवता चल बड़ी दूर/ हाथीपर हथबरबा भैया घोड़ापर रजपूत सब रजपूतनी खोपा गुहने/ बंका छै मजबूर बंका बिकाइए तीन–तीन बंका/ बाजूकेँ गरदाग रामजीके सुतल पुतहुआ/ कूटैत रहए धान। बाल मनोविज्ञानकेँ ध्यानमेँ राखि, नेनाक समुचित विकासक, उल्लासक लेल मैथिली शिशु लोक साहित्य थोड़ नहि प्रतीत होइछ। खेलसँ सम्बद्ध एकटा बाल–कथा काव्य द्रष्टव्य: एकटा छलै फुद्दी, ओ बैसल कुसपर कुस ओकर पेट चीरि देलक ओहिसँ निकलल तीनटा धार दूटा सुखले–सुखले छल, एकटामे पानिएँ नहि जाहिमे पानिएँ नहि, ताहिमे पैसल तीनटा हेलबार दूटा डुबिए–डुबिए गेल, एकटाक पते नहि जकर पते नहि, से नोतलक तीनटा ब्राह्मण दूटा भुखले–भुखले रहल, एकटा खएबे नहि कएलक जे खएबे नहि कएलक, तकरा भेल तीन मुक्का दण्ड दूटा हुसिए–हुसिए गेल, एकटा लगबे नहि कएल एहि प्रकारक लोक साहित्य नेना सब बड़ मनोयोगसँ सुनैत अछि। कखनो काल नेना–भुटका झुण्ड एक–दोसरक डाँर पकड़ि कऽ रेलगाड़ी बनबैत अछि। एहिमे एक गोटा इंजिन आर सभ नेना डिब्बा बनैत अछि आ घुमि–घुमि कऽ कहैत अछि। रेलगाड़ी झकमक/ पहिया लोहारक, बेल सरकारक कुँइआमे पानी, मकोलामे तेल/ आ गेलि मइयाँ, पी गेलि तेल भैया रे भैया, कुटुम्ब कहाँ गेल/ एक सय हाथी बान्हपर गेल। मिथिलाक खेलमे कबड्डीक बड्ड पुरान परम्परा रहल अछि। एहिपर आधारित किछु पद्य देखल जाए:– कबड्डी–कबड्डीकार/ मैना बच्चा अण्डापार दोसरः- चेत कबड्डी आबऽ दे/ तबला बजाबऽ दे तबलामे पइसा/ बाग–बगइचा। तेसरः- कबड्डी खेलऽ गेलहुँ कपार फुटि गेल रेशमक डोरामे हाथ कटि गेल श्रवणकेम देखिकऽ पियास लागि गेल हाथीक देखिकऽ हदास उड़ि गेल/ आम चकलेट चीनी प्लेट एकटा खेल अछि गिरगिटरानी, ई खेल मिथिलाक कन्या लोकनिक मध्य खेलाएल जाइत रहल अछि। एहिमे एकटा कन्या गिरगिट बनैत अछि आ दूटा, ओकर दुनू जाँघ पकड़ि कऽ ठाढ़ भऽ जाइत अछि आ एकटा कन्या ओकर दुनू पैर पकड़ि कऽ, ओहिपर बैसि जाइत अछि आ कहैत अछि:– गिरगिटमाला–गिरगिटमाला/ कहाँ–कहाँसँ आएल छी बौआ लाला–बौआ लाला/ देस–देससँ आएल छी। की सब लाएल छी। आम छोड़ि गुद्दा/ ककरा देलहुँ राजाक बेटीक हाथमे/ राजाक बेटी कत्तऽ अछि मजे कोठलिया/ मजे कोठलिया की सब साँप छै, बाघ छै। एहि कथा–काव्यकेँ दोसर तरहेँ सेहो कहल जाइछ– हे गिरगिटियाँ रानी! तोँ कतएसँ अएलह हमरा लेल की–की अनलह कान खोड़ि गुजुआ/ सेहो गुजुआ ककरा लेल राजा बेटी हाथक लेल/ राजा बेटी की सब देल हाथी छोड़ि घोड़ा देल/ सेहो घोड़ा कहाँ गेल विरदावनमे चरए गेल/ विरदावनमे की–की देखल साँप देखल, बाघ देखल/ नाचे गिरगिटिया। जे कन्या गिरगिट बनल रहैत अछि ओ अपन मूड़ी उठा आ हाथ पसारि कऽ उत्तर दैत रहैत अछि आ ओ तीनू सहयोगी कन्या ओकरा घुमबैत रहैत अछि। एकटा खेल अछि–कटहरक गाछ बला, एहिमे एकटा नेना ठाढ़ भऽ गाछक अभिनय करैत अछि तथा आओर नेना सब ओकर पैर पकड़ि, मूड़ी गोंतिकऽ बैसि रहैत अछि आ कटहर फलक अभिनय करैत कहैत अछि:– हमरा बाड़ी–हमरा बाड़ी के हुहुआए राज कोतवाल/ की–की मँगैए आरब चौरा, नव ढ़कना तकर बाद कोतवाल, फलक अभिनय करैत नेना सभकेँ, हाथसँ टेबैत अछि तखन गाछ कहैत अछि–: काँच छै तऽ छोड़ि दू/ पाकल छै तऽ लऽ लू। एकटा खेल अछि– “झिझिर कोना”। ई खेल पाँच गोट नेना द्वारा कोनो खाली घरमे खेलाएल जाइत अछि, जाहिमे चारिटा कोन होइ। ई खेल बेसीकाल नेना खाली दलानक कोठली वा विद्यालयमे खेलाइत अछि। एहि खेलमे प्रयुक्त लोक साहित्यकेँ देखल जाए:– झिझिर कोना–झिझिर कोना कोन कोना जैब एहि कोना जैब, ओहि कोना जैब। एकटा खेल अछि– “साँप डिग–डिग”। ई एकटा सामूहिक खेल थिक, जाहिमे बहुत नेना एक संग हत्था जोड़ि कऽ सोझ पाँतीमे ठाढ़ होइत अछि। एकटा कहैत अछि: – की रे बकरिया की रे छकरिया/ बकरी कत्तऽ खेतमे/ धान किएक खेलकौ खेत्तौ/ रोज लेब्बौ नहि देब्बौ। तखन दू हाथक बीच दऽ नेना सभ बन्हएबाक अभिनय करैत अछि आ बजैत अछि– साँप–डिगडिग/ साँप–डिगडिग। जेना पशु–पक्षी सभ अपन अबोध नेनाकेँ आत्मरक्षाक उपाय दौड़ि कऽ, बाजि कऽ, खेलाए कऽ सिखबैत रहैत अछि, तहिना शिशु लोक साहित्यमे सेहो आत्म–रक्षार्थ अनेक प्रकारक खिस्सा–पिहानी गद्य आ पद्य दुनूमे पर्याप्त मात्रामे उपलब्ध अछि। उदाहरणस्वरूप–बगिया गाछक खिस्सा, गोनू झाक खिस्सा एहिमे सभसँ बेसी लोकप्रियता पौलक अछि। ओना आरो कतेक अछि। जेना–ननदि–भाउजसँ जुरल आँझुलक खिस्सा ‘सातो भाइ परदेस गेल, आँझुलकँ दुःख देने गेल’। तहिना झाँझी कुकुरक सौतिनक खिस्सा– मोर मन मोर मन नहि पतिआइ सौतिनक टाँग दुनू झुलिते जाइ। किछु एहेन लोक–साहित्य देखबामे अबैत अछि जाहिमे निरर्थक शब्द सभक प्रयोग बुझना जाइछ। जेना– औका–बौका, तीन तरौका/ लौआ–लाठी, चानन काठी चाननके बागमे इजय–विजय/ गल–गल पुअबा–पचक। दोसरः- ईटा–माटी सोनेक टाट/ आठम लड़की भागल जाइ आलू बम बेटा बम/ भौजी नाचए छमाछम। ज्ञानोपयोगी शिशु लोक साहित्य “परिवारकेँ सामाजिक जीवनक पहिल पाठशाला” कहल गेल अछि। मैथिली शिशु लोक साहित्यक माध्यमेँ नेनाकेँ अनेक प्रकारक शिक्षा देल जाइत रहल अछि। किछु उदाहरण द्रष्टव्य:– अंक ज्ञानक लेल एकटा खेल अछि– “अट्टा–पट्टा” एहिमे नेनाक दहिना हाथपर अपन दहिना हाथसँ थापर मारल जाइत अछि आ बेरा–बेरी आँगुर पकड़ि कहल जाइत अछि:– अट्टा–पट्टा बौआकेँ पाँचगो बेट्टा एगो गेल गायमे, दोसर महींसमे तेसर बड़दमे–चारिम गेल बकरीमे/ पाँचम गेल छकरीमे। तकर बाद तरहत्थीपर, अपन आँगुर रखैत: एतऽ बुढ़िया रन्हलक, पकौलक, खएलक, पीलक ई कहैत अपन आँगुरकेँ डेगा–डेगी बढ़वैत ओकरा हाथसँ काँख धरि लऽ जाएल जाइत अछि आ कहल जाइत अछि:– एतऽ सँ जे चलल बुढ़िया..../ गुद्दू गैयाँ। नेना गुदगुदी लगलापर जोर–जोरसँ हँसैत–हँसैत लोट–पोट भऽ जाइत अछि। एहि प्रकारेँ नेनाकेँ एकसँ पाँच धरि अंकक ज्ञान कराओल जाइत अछि। तहिना दोसर खेल अछि, जाहिमे दू आ दूसँ अधिक नेना ठाढ़ भऽ आँगुरसँ संकेत करैत खेलाइत अछि– दस, बीस तीस, चालीस, पचास/ साठि, सत्तरि, अस्सी, नब्बे, सौ सौमे लागल धागा, चोर निकलिकऽ भागा रानी बेटी सोइती, फूलकेँ माला गोइती मेम खाए बिस्कुट/ साहेब बाजए भेरी गुड। एहि खेलक माध्यमसँ नेनाकेँ दहाइ आ सैकड़ा धरिक अंकक ज्ञान कराओल जाइत अछि। एकटा खेल अछि– “घो–घो रानी”। एहि खेलमे एकटा नेना बीचमे ठाढ़ होइत अछि आ चारूकात नेना सभ हत्था जोड़ी कऽ केँ वृत्ताकार ठाढ़ होइत कहैत अछि– घो–घो रानी कत्ते पानी–एड़ी धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–ठेहुन धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–जाँघ धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–डाँड़ धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–ढोढ़ी धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–पेट धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–छाती धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–गरदनि धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–मुँह धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–नाक धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–आँखि धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–माँथ धरि अंतमे ‘चुभुक’ कहि सब नेना डूबि कऽ नहएबाक अभिनय करैत अछि। एहि माध्यमसँ नेना सभकेँ अंगक ज्ञान कराओल जाइत अछि। एकटा खेल नेना सभ एहि प्रकारेँ खेलाइत अछि,–एकटा नेना अपन दुनू हाथकेँ उठा कऽ पैघ आकार बनबैत अछि आ तकर बाद क्रमशः छोट करैत जाइत अछि आ कहैत अछि:– एतेक टा की–छिट्टा/ एतेक टा की–पथिया एतेक टा की–मउनी/ एतेक टा की–चुक्का चुक्कामे की–अण्डा/ के फोरए–कउआ के गीजए–हम सभ। ई कहि– ती–ती–ती–ती....कहैत सभ नेना कूदऽ लगैत अछि। एहि लोक साहित्यक माध्यमसँ छिट्टा, पथिया, मउनी, चुक्का सभक आकारक ज्ञान कराओल जाइत अछि। तहिना एकटा खेल अछि जकरा माध्यमसँ किछु वस्तुक उपयोगक ज्ञान कराओल जाइत अछि:– खेलए–धूपए गेलिऐ/ एगो लोहा पेलिऐ सेहो लोहा कथी लेल/ हाँसू गढ़ाबऽ लेल सेहो हाँसू कथी लेल/ खड़ही कटाबऽ लेल सेहो खड़ही कथी लेल/ बंगला छराबऽ लेल सेहो बंगला कथी लेल/ भैसी बन्हाबऽ लेल सेहो भैसी कथी लेल/ चोतबा पड़ाबऽ लेल सेहो चोतबा कथी लेल/ अंगना निपाबऽ लेल सेहो अंगना कथी लेल/ गहूँम सुखाबऽ लेल सेहो गहूँम कथी लेल/ आटा पिसाबऽ लेल सेहो आटा कथी लेल/ पूरी पकाबऽ लेल सेहो पूरी कथी लेल/ भौजीकेँ मँगाबऽ लेल सेहो भौजी कथी लेल/ बेटा जनमाबऽ लेल सेहो बेटा कथी लेल/ कोरामे खेलाबऽ लेल अंतमे–टाइल–गुल्ली टूटि गेल/ बौआ रूसि गेल। उपरोक्त विवेचनसँ लगैत अछि जे मैथिली शिशु लोक-साहित्य नेनाक प्रत्येक पक्षसँ जुड़ल रहल अछि। लालन–पालन आ खेल मनोरंजनसँ सम्बद्ध लोक साहित्यक अधिकता पाओल गेल अछि। खेलक मध्यमसँ मनोरंजनक संग–संग नेना भुटकामे एकता, सहयोग, सहानुभूति आ प्रेमक भावना जगैत अछि। एकर अतिरिक्त अभिनय, नृत्य, गीत आदिक ज्ञान सेहो आरम्भहिसँ होमए लगैत अछि। एखन हमरा सभकेँ मैथिली शिशु लोक साहित्य सन अमूल्य धरोहरकेँ सहेजि कऽ समेटबाक प्रयोजन अछि, कारण दिनानुदिन ई अपन मौलिकताकेँ त्यागि विकृत रूप अपनौने जा रहल अछि। जँ एहि दिशामे हमरा सभ सचेष्ट नहि होएब तँ एहि धरोहरक मूल्यवान वस्तु नष्ट भऽ जएबाक प्रबल सम्भावना लगैत अछि। ओना हम आरम्भेमे कहि चुकल छी जे एहि विषयपर पहिनो बहुत गोटा काज कएलनि अछि आ प्रायः एखनो कऽ रहलाह अछि, मुदा एकर फलक ततेक विस्तृत अछि जे उपलब्ध संकलन यथेष्ट नहि मानल जा सकैत अछि। कारण संकलित शिशु लोक साहित्यसँ कैक बड़ बेसी लोक साहित्य एखनो धरि लोकक ठोरपर छिड़िआएल अछि। वर्तमानमे जखन पाश्चात्य–सभ्यता मिथिलाकेँ चारूकातसँ गछारने जा रहल अछि। लोक “चन्न मामा आ रे आ”केँ त्यागि “ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार” दिस आँखि मुनिकऽ भागल जा रहल अछि आ अपन जे विशिष्ट–वस्तु तकरा त्यागने जा रहल अछि। एहना स्थितिमे हमरा सभक समक्ष यक्ष प्रश्न अछि जे मिथिलाक एहि अमूल्य–निधिकेँ, जे कि, एहिठामक संस्कृतिक, एकटा अपन विशिष्ट परिचिति दैत रहल अछि, तकरा कोनाकऽ अक्षुण्ण राखल जाए। आइ जखन हम सभ इक्कीसम शताब्दीक देहतिकेँ पार कऽ रहल छी, विज्ञान अपन विस्तारकेँ सुदूर देहात धरि पसारि चुकल अछि, तेहना स्थितिमे नव–नव तकनीक द्वारा एहि असंकलित शिशु लोक साहित्यकेँ चिरकाल धरि, संकलित कऽ जोगा कऽ राखल जा सकैत अछि, जन–जन धरि एकर प्रचार-प्रसार कराओल जा सकैत अछि, परंच एकरा लेल जरूरी छै,–एहि दिशामे एकटा समधानल डेग उठएबाक आ जोरगर प्रयास करबाक। केदार कानन जगदीश प्रसाद मंडलक पछताबापर एक दृष्‍टि गंभीर साम्‍यवादी दृष्‍टि, रचल पचल जीवानानुभव आ ताहि अनुभवक सहज मुदा परिपक्‍व अभिव्‍यक्‍ति, अभिव्‍यक्‍तिमे कहबाक अपन ढ़ंग, मैथिल जीवन आ परम्‍पराक श्रेष्‍ठ अंकन-चित्रण कथाकार जगदीश प्रसाद मंडलक निजी पहचान थिक। एक बएसपर आबि गेलाक बाद ई लेखनक शुरुआत कएलनि अछि मुदा से हिनक कृतिक परायणसँ बुझाइत नहि अछि। तकर कारण ई रहल अछि जे हिनक मानसमे ई सभ वस्‍तु कागतपर उतरबासँ पहिनहि रचित-खचित रहल अछि। जीवनक सघन-बीहड़ झंझावात सहि-अंगेजि लेखनक क्षेत्रमे उतरय बला जगदीश जी सनक श्रेष्‍ठ शिल्‍पीक स्‍वागत करैत प्रसन्‍नता होइत अछि। हिनक पछताबा कथा हमर टेबुलपर राखल अछि। सुपौलमे आयोजित कथा गोष्‍ठीमे ई कथा पढ़ल गेल छल। एकटा स्‍वतंत्रता सेनानीक घरसँ बहराएल रघुनाथ अपन इंजीनियरिंगक पढ़ाइक पछाति नोकरी लेल पत्‍नीक संग अमेरिका चलि जाइत अछि, अपन माता-पिता, परिवार, सर-सम्‍बन्‍धी, समाज सभकेँ छोड़ि। ओहिठामक चाक-चिक्‍य आ भोगवादी समाजमे रचल-पचल रधुनाथ लेल पाइ कमएबाक अतिरिक्‍त कथूक चिन्‍ता नहि छनि। एम्‍हर शिवनाथ आ हुनक पत्‍नी, रघुनाथक माता-पिता गामपर रहि जाइत अछि। थोड़ेक दिन पुत्रक वियोगमे मलीन रहि ई दुनू परानी ढ़ंगसँ अपन जीवन जीबैत छथि आ सुखसँ रहैत छथि। फ्‍लैश बैंकमे ई कथा चलैत अछि आ अनेक-अनेक उपकथा कथा सभ उदघाटित होइत अछि। अमेरिकाक जीवनसँ पहिने उबैत अछि रघुनाथक पत्‍नी। ने क्‍यो संगी ने क्‍यो गप कएनिहार। एक दिन यैह पश्चाताप रघुनाथोकेँ होइत छनि। मगर ओ अपन ओछाइनपर छटपटाइत टा रहि जाइत अछि। गाम अएबाक कार्यरुप अथवा कोनो आन परिणति नहि देखाबऽ दैत अछि। कथा मोनलग्‍गू अछि। पढ़बामे क्रम भंग कतहु नहि होइत अछि। कथामे मैथिल अभिव्‍यक्‍तिक निम्‍नांकित रुप नीक लगैत अछि- जहिना पाकल आम तोड़ै लेल कियो गाछपर चढ़ैत अछि आ आम तोड़ैसँ पहिनहि खसि पड़ैत अछि, तहिना शिवनाथोकेँ भेलनि। दुनूक मन एहिरुपेँ चूर-चूर भऽ गेलनि, जहिना अएनापर पाथरक लोढ़ी खसलासँ होइत अछि। दुनूक मनमे पैघ-पैघ अरमान पैघ-पैघ सपना छलनि जे एकाएक फूटल फुकना बैलूनक हवा जेकाँ वायु मंडलमे मिलि गेलनि। पाकल आमक आँठी जेकाँ करेज आरो सक्‍कत भऽ गेलनि। अंडीक तेलमे जरैत डिबियाक इजोत जेकाँ। जगदीश प्रसाद मंडलकेँ हम व्यक्‍तिगत रूपेँ बधाइ दैत छियनि आ आशा करैत छी जे ओ अपन अनुभवकेँ आरो व्‍यापकता प्रदान करैत नव-नव कृतमे हमरा सभकेँ परिचित करौताह। प्रेमशंकर सिंह जयकान्‍त मिश्र जीवन आ साहित्‍य–साधना मिथिलांचलक पावन भूमिमे कतिपय मातृभाषानुरागी जाज्वल्यमान नक्षत्र उदित भऽ सुधी साहित्‍य–मनीषी अनवरत साधनारत रहलाह, किन्‍तु विगत शताब्‍दीक तृतीय दशकमे अपन अविरल साहित्‍य–साधना, आन्‍दोलनात्‍मक आ रचनात्‍मक सृजन द्वारा विश्‍व स्‍तरपर मैथिलीकेँ प्रतिष्ठित करबामे, स्‍वावलम्‍बी बनएबामे, विधिध अभावादिक पूत्‍यर्थ, मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षा नीति लागू करएबामे सतत संघर्षरत, वैज्ञानिक आलोचनात्‍मक ग्रन्‍थक प्रणयन करबामे, शोध एवं अनुसंधानक नव दिशामे, साहित्‍यक हेड़ाएल–भुतिआएल विभूतिकेँ प्रकाशमे अनबामे, दिवारात्रि चिन्‍ताग्रस्‍त रहनिहार एक एहन दिव्‍य अक्षर पुरुष प्रादुर्भूत भेलाह जे अपन बहुआयामी व्‍यक्तित्वक प्रभावसँ मातृभाषानुरागी निरन्‍तर एकर उत्‍थानार्थ कार्यरत रहलाह, ओ रहथि प्रोफेसर डाक्‍टर जयकान्‍त मिश्र (१९२२-२००९)। विगत लगभक सात दशकक दीर्घ अन्‍तराल धरि अनबरत एक रस आ एक चित्त भऽ कए मातृभाषाक निष्प्राण धमनीमे नव रक्‍तक संचारक अभिनव साहित्यिक वातावरणक निर्माण कऽ ओकर भरण–पोषण कएलनि। मैथिली भाषा आ साहित्य जखन अन्धकारमे टापर-टोइया दऽ रहल छल तखन अते अपन अनुसंधान द्वारा एक आलोकक रश्मि विकीर्ण कयलनि। प्रथम दर्शन मैथिलीक अध्‍ययन–अनुशीलनमे निरत रहबाक कारणेँ छात्रावस्थाहिसँ एहि अक्षर पुरुषक नामसँ अवगत छलहुँ, किन्‍तु हुनक दर्शन करबाक सुअवसर नहि भेटल छल। हिनक पहिल दर्शनक अवसर भेटल बिहारक राजधानी पटनामे जतए ओ बिहार पब्लिक सर्भिस कमीशनमे, बिहार विश्‍वविद्यालयक मैथिली विभागक रीडर एवं विभागाध्‍यक्षक एक इन्टरभ्‍यू देबाक हेतु आएल रहथि। कमीशन आफिसमे हम अपन गुरुदेव प्रोफसर शैलेन्‍द्र मोहन झा (1929-1994) क दर्शनार्थ गेल छलहुँ। ई घटना थिक सन् 1963 ईo क जखन हम पटना विश्‍वविद्यालयक एम.ए. मैथिलीक अन्तिम वर्षक छात्र छलहुँ। ओतहि हुनका प्रथमे प्रथम देखलियनि आ हमर विस्तृत परिचय शैलेन्‍द्र बाबू हुनका देलथिन। जखन हम भागलपुर विश्‍वविद्यालयमे मैथिलीक लेक्‍चरर भऽ अएलहुँ आ शहरमे विद्यापति पर्वक आयोजनमे सम्मिलित हैबाक हेतु आमंत्रित कयलनि तँ ओ सहर्ष स्‍वीकार कऽ कए आयोजनमे अपन सारगर्भित गम्‍भीर व्‍याख्‍यान दऽ कए जनमानसमे मातृभाषानुरागक बीज वपन कयलनि आ सफल बनौलनि। हम जखन शोध कार्यमे तल्‍लीन छलहुँ तँ मैथिली प्राचीन पत्रिकादिमे प्रकाशित कतिपय रचनादिक संकलनार्थ हुनक निजी पुस्‍तकालय देखबाक हेतु इलाहाबाद गेलहुँ। हमर मुख्‍य कार्य छल- हरिमोहन झा (1908-1984) क बहुचर्चित उपन्‍यास कन्‍यादान (1933) एवं द्विरागमन (1943) पर श्रीकृष्‍ण मिश्र (1918-1991)क एक वृहत समालोचना मिथिला मि‍हिरमे प्रकाशित भेल छल, तकरा देखबाक हेतु ओतए गेलहुँ। हमर शोधकेँ सारगर्भित बनएबाक उद्देश्‍यसँ हमर इच्छानुरूप आवश्‍यक सामग्री सभकेँ टाइप करबा देलनि, कारण ओहि समएमे जिराक्‍सक आविष्कार नहि भेल छलैक। ओ टाइप कॉपी अद्यापि हमर व्‍यक्तिगत पुस्‍तकालयमे स्‍मृतिक धरोहरक रूपमे वर्त्तमान अछि। मैथिलीक एहन सम्पन्‍न पुस्‍तकालय हम नहि देखने छलहुँ। हुनकासँ कतेक बेर भेट भेल तकर ठेकान नहि, किन्‍तु विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग एवं विश्‍वविद्यालय स्‍तरपर, चेतना समितिक संगोष्‍ठीमे, मिथिला सांस्‍कृतिक संगम प्रयागक आयोजनोत्‍सवपर तथा व्रजकिशोर वर्मा (1918-1986)क हुनकासँ भेट भेल छल (2009) पुस्‍तकक सम्‍पादनक क्रममे मैटर एकत्रित करबाक लेल सहस्राधिक बेर हुनक दर्शन आ सान्निद्ध प्राप्‍त करबाक अवसर हमरा भेटल तथा सतत अपन अशेष शुभकामनासँ उत्प्रेरित करैत रहलाह मातृभाषाक सेवार्थ। पृष्‍ठभूमि हिनक पारिवारिक पृष्‍ठभूमिमे संस्‍कृतक पठन–पाठनक प्रति अगाध आस्‍था आ श्रद्धा छलनि, कारण हिनक पितामह महामहोपाध्‍याय पण्डित जयदेव मिश्र आ पिता महामहोपाध्‍याय डाक्टर उमेश मिश्र (1895-1967)केँ संस्‍कृत शिक्षणक प्रति अनुराग छलनि। किन्‍तु उपर्युक्‍त वातावारणक विपरीत हिनक पठन–पाठन पाश्‍चात्‍य–शिक्षानुरूप पिता एवं प्रोफेसर अमरनाथ झा (1897-1955)क छत्रछायामे भेलनि, कारण ओहि समय समग्र उत्तर भारत वर्षमे इलाहाबाद आधुनिक यूरोपियन परम्‍पराक केन्‍द्र–बिन्दु छल, जतए अमरनाथ झा सन बहुभाषाविद अंग्रेजी विभागक सर्वेसर्वा रहथि। यद्यपि ओ पाश्‍यात्‍य–शिक्षा पद्धतिसँ अवश्‍य शिक्षित भेलाह, किन्‍तु हिनका हृदयमे भातृभाषानुराग एतेक बलवती छलनि जे जीवन पर्यन्‍त विभिन्‍न रूपेँ सक्रिय रहि ओकर उत्‍थानार्थ सतत दत्तचित रहलाह। अध्‍यापन प्रोफसर जयकान्‍त मिश्रक विलक्षण वैदुष्य आ शैक्षणिक योग्‍यताकेँ ध्‍यानमे राखि मात्र 21 वर्षक अवस्‍थामे इलाहाबाद विश्‍वविद्यालयमे स्‍टडीज एण्‍ड मार्डन यूरोपियन विभागमे लेक्चररक पदकेँ ई सुशोभित कएलनि। सन् 1944 ई. मे उक्‍त विभागमे रीडर, युनिभर्सिटी प्रोफेसर एवं विभागाध्‍यक्ष पदपर आसीन भऽ ओ सन् 1983 ई. मे अवकाश ग्रहण कएलनि। किन्‍तु अवकाशोपरान्‍त हिनका अध्‍यापन कार्यसँ मुक्ति नहि भेटलनि, कारण हुनक वैदुष्यसँ प्रभावित भऽ सागर विश्‍वविद्यालय हुनका भिजीटिंग फेलोक रूपमे चयन कयलकनि जतए ओ सन् 1985 सँ सन् 1988 धरि कार्यरत रहलाह। एही अवधिमे अर्थात् 1986 ई मे हुनक चयन आँल इण्डिया बोर्ड फार रिसर्च एवार्ड इन ह्यूमैनिटीजक हेतु मैसूर विश्‍वविद्यालय आमंत्रित कएलक। अध्‍ययन–अध्‍यापनक प्रति विशेष अभिरूचिक कारणे हुनका पुनः आमंत्रित कएलक चित्रकूट ग्रामोदय विश्‍वविद्यालय जतए ओ सन् 1992 सँ 1994 धरि डीन फैक्‍लटी ऑफ लैंग्वेजेज एण्‍ड सोसल साइन्‍स विभागमे अध्यापन करैत रहलाह। अनुसंधान–प्रेरणा निष्‍प्राण मैथिली साहित्‍यमे नव प्राणक स्पन्‍दन भरनिहार प्रोफेसर जयकान्‍त मिश्र प्रथम मैथिल सरस्‍वतीक वरद पुत्र प्रादुर्भूत भेलाह जे मातृभाषाकेँ जीवनदान देलनि अपन गहन अनुसन्‍धान द्वारा। इलाहाबाद विश्‍वविद्यालयक शैक्षणिक पृष्‍ठभूमि आ अध्‍यापन वृत्तिमे संलग्‍न रहलाक कारणेँ ओ अनुसन्धानक दिशामे उन्‍मुख भेलाह। हिनका हृदएमे अनुसन्धानक तीव्र आकांक्षा छलनि जे हुनक अनुसन्धानोत्तर कृतिक अवलोकनसँ स्‍पष्‍ट होइत अछि1 जेँ अंग्रेजी विभागमे अध्‍ययनक शुभारम्‍भ कएलनि तेँ आवश्‍यक छल जे ओ उपर्युक्‍त विषयपर शोध करथि। एहि लेल विचार-विमर्श करबाक हेतु ओ अपन गुरुवर प्रोफेसर अमरनाथ झाक लग गेलाह। ओ अपन विचार व्‍यक्‍त कयलनि जे हम शेक्‍सपियरक ड्रामापर काज करए चाहैत छी। एहि पर ओ कहलथिन ‘शेक्सपियरपर विश्‍वक विभिन्‍न भाषामे हजारो पोथी उपलब्‍ध छैक। ककरो ध्‍यान जएतैक अहाँक पोथीपर। भारतीय छात्रो आक्सफोर्डक पब्लिकेशन पढ़त? इण्डियन राइटरक पोथी नहि पढ़ए चाहत।’ प्रोफेसर झाक एहन बात सुनिकऽ ओ अवाक् भऽ गेलाह। हुनका साहस नहि भेलनि जे झा साहेबक बातकेँ काटथि। हुनकासँ ओ जिज्ञासा कएलथिन, अपने कहल जाओ जे कोन विषयपर शोध करी’। ओ कहथिन, ‘मैथिलीक काज’। ओ सन्‍न रहि गेलाह जे अंग्रेजी साहित्‍यक शोध–प्रबन्‍धक विषय मैथिली कोना होएत ? हुनका किछु नहि फुरलनि ओ पुन: साहस कऽ जिज्ञासा कएलथिन, ‘मैथिली?’ डाo झा उत्तर देलथिन, ‘हँ, मैथिली! साहित्‍यक विषयमे अमैथिल भाषी जानकारी प्राप्‍त करत। अंग्रेजी भाषामे लिखल रहतैक तँ अंग्रेजीमे डी.फिल.क डिग्री प्राप्‍त होएत’। प्रोफेसर झा एक दूरदर्शी साहित्‍य–मनीषी रहथि तेँ उपयुक्‍त सलाह आ प्रेरणा हुनका देलथिन संगहि इहो कहलथिन जे इएह अहाँकेँ अजर, अमर आ अक्षुण्‍ण यशक भागी बनाओत जकर फलस्‍वरूप हुनक भाग्‍योदय भेलनि। हुनक ई अनुसन्‍धान वर्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे मैथिली आ प्रोफेसर मिश्रक हेतु एक दोसराक पर्याय बनि गेल अछि। बिनु हुनक नामोल्‍लेख कएने मैथिलीक कोनो कृति अनोन लगैछ। हिनक अनुसंधानात्‍मक कृति A History Of Maithili Literature पर इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय हिनका सन् 1948 ई.मे डी. फिल.क उपाधिसँ अलंकृत कएलक। पश्‍चात् जा कऽ हिनक कृति प्रकाशित भेल दुइ खण्‍डमे, जे प्रकाशित होइतहि मैथिली साहित्‍यक अमूल्‍य निधिक रूपमे उदधोषित भेल, कारण हिनकासँ पूर्व मैथिलीक कोनो साहित्येतिहासि‍क ग्रन्‍थ नहि छल, तें हिनक अनुसंधान मैथिलीमे अनुसंधानकेँ दिशा–बोधक अनुसन्‍धान कहब तँ कोनो अत्‍युक्ति नहि हएत। हिनक अनुसंधान मात्र मैथिलीक हेतु नहि, प्रत्‍युत निखिल विश्‍वमे आधुनिक भारतीय भाषा साहित्‍यान्तर्गत विशिष्‍ट अवदानक रूपमे चर्चित–अर्चित अछि। हिनक अक्षय अनुसन्‍धानक फलस्‍वरूप अन्‍यान्‍य भाषा-भाषीकेँ बोध भेलैक जे मैथिली साहित्य एक सम्‍पन्‍न भाषा साहित्य थिक जकर क्रमबद्ध ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि तेरहम शताब्‍दीसँ अविच्छिन्‍न रूपेँ चलि आबि रहल अछि। एहि ऐतिहासिक अनुसन्‍धानक प्रथम खण्‍डपर विश्रुत भाषा शास्‍त्री प्रोफेसर सुनीति कुमार चटर्जी (1890-1977)क कथन छनि जे प्रथमे-प्रथमे एहि भाषा साहित्‍यक इतिहास प्रकाशित भेल अछि तेँ ई स्‍वागतेय थिक। ई श्रेय आ प्रेय हिनके छनि जे एहि साहित्यक गरिमाकेँ जन मानसक समक्ष प्रस्तुत कएलनि। द्वितीय खण्‍डपर प्रोफेसर अमरनाथ झा आमुख लिखलनि जाहिमे मातृभाषानुरागी साहित्‍य मनीषीक कीर्तिकेँ ई अवगत करौलनि। एहिपर प्रियरंजन सेन जे हुनक शोध–प्रबन्‍धक निर्देशक छलथिन हुनक कथन छनि जे एहि विस्‍तृत साहित्‍य गौरवमय इतिहास आधुनिकताक परिप्रेक्ष्‍यमे मूर्त्त रूपमे प्रस्‍तुत कऽ कए अत्‍यन्‍त साहसिक काज ई कयलनि अछि। हिनक गहन अनुसन्‍धात्मक प्रृत्तिक परिचय भेटैछ हिनक महत्त्वपूर्ण कीर्ति An Introduction to the folk literature of Mithila जाहिमे ई मिथिलांचलक परिसरमे उपलब्‍ध लोक साहित्‍यक विश्‍लेषण कएलनि। अपन शोध साहित्यक संचयनक क्रममे लोक साहित्‍यसँ सम्बन्धित जतेक सामग्री हिनका उपलब्‍ध भेलनि तकरा संकलित कएलनि आ अंग्रेजीमे विश्‍लेषण कऽ प्रमाणित कएलनि जे एकर समृद्धशाली विपुल लोक साहित्‍य जनमानसमे छिड़िआएल अछि ताहि दिशामे अनुसंधानक प्रयोजन अछि। अपन अनुसन्‍धानक तीव्र आकांक्षाक पूत्‍यर्थ ओ दुइ बेर पड़ोसी राष्ट्र नेपालक यात्रा कएलनि। प्रथम यात्रा तँ ओ शोध-प्रबन्‍धक सामग्री संकलनार्थ गेलाह आ द्वितीय यात्राक हुनक उद्देश्‍य छलनि जे प्रथम यात्रामे जाहि सामग्रीक पाण्‍डुलिपि नहि उपलब्‍ध कऽ पौलनि तकरा मूर्त्तरूप प्रदान करबाक निमित्त पुन: ओतए गेलाह। एहि क्रममे ओ मैथिली भाषा आ साहित्‍यक बहुमूल्‍य नाटकादिक पाण्‍डुलिपिक संचयन कऽ कए प्रकाशित करौलनि, जकर विवरण हुनक कृतित्‍वक अन्तर्गत कएल जाएत। ओहि नाटकादिक प्रकाशनक फलस्‍वरूप भावी अनुसन्धानकर्ताक पथ-प्रदर्शन कएलनि। उक्‍त कृतिक सम्पादनक क्रममे ई सारगर्भित भूमिका अंग्रेजी आ मैथिलीमे लिखि ओकर मूल्‍यांकनक सं‍गहि ओकर ऐतिहासिकताकेँ उदघाटित कएलनि, जकर फलस्‍वरूप मैथिलीक कतिपय समस्यादिक ओझरौठकेँ ओ सोझरा देलनि। हिनक अनुसंधान सम्‍पूर्ण अवधारणाकेँ बदलि देलक आ ओ सकारात्‍मक भेल। आब मैथिली गम्‍भीर अध्‍ययनक विषय मानल जाए लागल। ई अवधारणा एवं सकारात्‍मकता मैथिली साहित्‍यक बड्ड विधि विकास मार्ग प्रशस्‍त कएलक। एहि दिशामे हुनका द्वारा कएल गेल प्रयास स्तुत्‍य अछि। साहित्‍य–साधना जयकान्‍त मिश्रक साहित्‍य–साधनाक अन्तर्गत मौलिक, सम्पादित एवं स्‍वतन्‍त्र आलेखादिक रचनावली पाठकक समक्ष अछि ओ थिक अंग्रेजी एवं मैथिलीमे। ओ मैथिली साहित्‍यकेँ नव दिशा देबाक निमित्त उपर्युक्त दुनू भाषामे समान रूपेण लेखन कएलनि, जकरा पाछाँ हुनक उद्देश्‍य छलनि अमैथिल भाषी सेहो एकर गौरव-गरिमाकेँ जानए, बुझए- जकर विवरण एहि प्रकारेँ अछि: अंग्रेजीमे मौलिक: i. A History of Maithili Literature Volume–I–1949 ii. A History of Maithili Literature Volume–II–1950 iii. An Introduction to folk Literature of Mithila volume–I–1950 iv. An Introduction to folk Literature of Mithila Volume–II–1951 v. A case of Maithili–1963 vi A History of Maithili Literature–1976 मौलिक मैथिली i. कीर्त्तनिञा नाटक–1965 ii. तिरहुता ककहारा–1967 iii. मैथिलीमे प्राथमिक शिक्षा–1969 iv. वृहत मैथिली शब्‍दकोश खण्‍ड–1–1973 v. मैथिली साहित्‍यक इतिहास–1988 vi. वृहत मैथिली शब्‍द कोश खण्‍ड–2–1995 मौलिक अंग्रेजी जीवकोपार्जन अंग्रेजीक प्रोफेसरक रूपमे भेलनि तेँ ओहू साहित्‍यमे रचनात्‍मक प्रवृत्तिक परिचय देलनि: i. Lectures on Thomas Hardy–1955 एवं 1965 ii Lectures on Four Poets–1957 एवं 1963 iii Complete style in English Poetry–1977 vi Lectures on Four Poets (Romantic Poets) 1987 v Lectures on Four Poets (Victorian Poets) 1992 सम्पादित कृति नेपाल यात्रामे हुनका मैथिलीक बहुमूल्‍य धरोहर नाटकादि एवं अन्‍य कृति उपलब्‍ध भेलनि नेपाल दरबार लाइब्ररीमे, जे धूल-धूसरित भऽ रहल छल। तकरा सयत्‍न आनि ऐतिहासिक भूमिका लिखि सम्‍पादित कएलनि आ प्रकाशित कएलनि: i. धूर्तसमागम–ज्‍योतिरीश्‍वर–1960 ii. गौरी परिणय–शिवदत्त–1960 iii. गौरी स्‍वयंवर–कान्‍हाराम–1960 iv. गोरक्षविजय–विद्यापति–1961 v. रुक्मिणी परिणय–रमापति–1961 vi. कृष्‍ण केलिमाला–नन्‍दीपति–1961 vii. श्री कृष्‍णजन्मरहस्‍य–श्रीकान्‍त गणक–1961 viii. गौरीस्‍वयंवर–लालकवि –1962 ix. विद्या विलाप–मल्‍लशासक- 1965 x. Encyclopadie of Indian Literature Medieval & Modern Indian Literature- Maithili Section. Xi. आधुनिक गद्यक निर्माता महामहोपाध्‍याय डा. उमेश मिश्र–2006 सह सम्पादन कीर्तिपताका–विद्यापति–1960 अनुवाद जयकान्‍त मिश्र सफल अनुवादक रहथि जे साहित्‍य अकादेमी द्वारा भारतक साहित्‍य निर्माता सिरीजक अन्तर्गत गोविन्‍द झा (1923) द्वारा मैथिलीमे लिखित उमेश मिश्रक मोनोग्राफक अंग्रेजीमे अनुवाद कएलनि, जे साहित्‍य अकादेमी द्वारा प्रकाशित भेल। उपर्युक्‍त रचनावलीक अतिरिक्‍त मैथिलीमे हिनक निम्‍नस्‍थ निबंध मैथिली पत्रकादिमे प्रकाशित होइत रहल: 1. प्रोफेसर गंगापति सिंहक सुशीला उपन्‍यासक समीक्षा, मिथिला मिहिर–1943 2. मिथिलाक जन साहित्‍य, चौपाड़ि मधुमास–2011 3. मिथिलाक इतिहास सम्‍बन्‍धी किछु समस्‍या, प्रथम अखिल भारतीय लेखक सम्‍मलेन, रचना संग्रह प्रथम भाग, –1956 4. प्रथम अखिल भारतीय लेखक सम्‍मेलन, नाटक विभागक अध्‍यक्षीय भाषण–1956 5. आधुनिक मैथिली साहित्‍य पर अंग्रेजीक प्रभाव, वैदेही नवम्‍बर–दिसम्‍बर–1957 6. हमर नेपाल यात्रा, वैदेही जनवरी–1958 7. पूर्वांचलीय भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृतिक पारस्‍परिक प्रभाव, चेतना समिति संगोष्‍ठी–1972 8. आधुनिक मिथिलामे कीर्त्तनक चेतना, चेतना समिति संगोष्‍ठी–1973 9. परम्‍पराक परित्‍याग: साहित्‍यक अस्तित्‍वक प्रश्‍न, चेतना समिति संगोष्‍ठी–1974 10. मैथिली नाटक ओ रंगमंच: वर्त्तमान स्थिति एवं भविष्‍य, चेतना समिति संगोष्‍ठी–1977 11. भारतीय संविधान: मैथिलीक समस्‍या, चेतना समिति स्‍मारिका–1977 12. जीवित जातिक जीवित भाषा, मिथिला मिहिर 11 जून–1978 13. संगीत शास्‍त्र ओ पूर्वाञ्चलीय गीति काव्‍य, चेतना समिति संगोष्‍ठी–1979 14. साहित्‍य ओ प्रतिबद्धता, चेतना समिति संगोष्‍ठी–1980 15. साहित्‍य मे परिवर्तनक स्‍वर, चेतना समिति संगोष्‍ठी–1984 16. राष्‍ट्रीय ओ आञ्चलिक संस्‍कृतिक विकास, चेतना समिति संगोष्‍ठी–1986 17. साहित्यिक समालोचना: सन्‍दर्भ इतिहास लेखनक, चेतना समिति संगोष्‍ठी–1987 18. विद्यापति पर्व कोना करी, चेतना समिति स्‍मारिका–1987 19. महाकाव्‍यमे युगीन संकेत, चेतना समिति संगोष्‍ठी–1988 20. मैथिली आन्‍दोलन: अद्यतन स्थिति, चेतना समिति संगोष्‍ठी–1989 21. यात्रीक मूल्यांकन कविक रुपमे करबाक थिक, चेतना समिति संगोष्‍ठी 2000 22. मैथिली उपन्‍यासमे चित्रित समाज, चेतना समिति संगोष्‍ठी–2003 हुनक समग्र कृतिक अवलोकनसँ हुनक साहित्‍य–साधनाक यथार्थ परिचय भेटि जाइछ जे ओ अपन मातृभाषाक विकासार्थ सतत कार्यरत रहलाह। ओ अपन अक्षय कृति परवर्ती पीढ़ीक छोड़ि गेलाह, तकर आलोकमे मैथिली साहित्‍यमे नव जीवनक संभावना दृष्टिगत होइछ। ओ अपन अद्वितीय वैदुष्यक एक आदर्श प्रस्‍तुत कएलनि, जे वर्त्तमान पीढ़ीक लेल पाथेय बनल। सम्‍मान मातृभाषानुरागी एवं साहित्‍यानुरागी कीर्ति पुरुष जयकांत मिश्र जे मैथिलीक सम्‍मानार्थ जे योगदान देलनि ओहिसँ अनुप्राणित भऽ कए भारतक नेशनल एकेडेमी आँफ लेटर्सक संगहि विभिन्‍न मातृभाषा सेवी संस्थादि द्वारा समए-समएपर हिनका सम्‍मानित गौरवान्वित कएल गेलन्हि। 1. भारतक आर्थिक राजधानी मुम्‍बइक मिथिला मण्‍डल अखिल भारतीय मैथिली सम्मेलनक अवसर पर 31 दिसमबर 1969मे सम्‍मान पत्रसँ अलंकृत कएलक। 2. बिहारक राजधानी पटनाक सांस्‍कृतिक एवं साहित्यिक संस्‍था चेतना समिति 1990मे मातृभाषाक अतुलित सेवाक कारणेँ मिथिला विभूति ताम्रपत्रसँ सम्‍मानित कएलक। 3. मातृभाषानुराग आ ओकर विकासार्थ हिनका द्वारा जे साहित्यिक, रचनात्‍मक आ आन्‍दोलनात्‍मक कार्य कएल गेल ताहिसँ अनुप्राणित भऽ मिथिला सांस्‍कृतिक संगम प्रयाग–1995 ई. मे सम्‍मान पत्र समर्पित कएलक। 4. झारखण्‍डक धनबाद स्थित विद्यापति समिति विगत शताब्‍दीक अवसान बेलामे अर्थात् 1999 ई.मे मातृभाषाक उत्‍थानार्थ कार्यसँ अनुप्राणित भऽ सम्‍मान पत्र समर्पित कएलक। 5. विगत शताब्‍दीक अन्तिम वर्षमे अर्थात् 2000 ई.मे नेशनल एकेडेमी ऑफ लेटर्स अर्थात् साहित्‍य अकादेमी नई दिल्‍ली द्वारा कालजयी मध्‍यकालीन मैथिली साहित्‍यक विशेषज्ञक रुपमे भाषा सम्मानसँ विभूषित कएलक। 6. हिनक बहुमूल्‍य मातृभाषाक सेवाक परिप्रेक्ष्‍यमे साहित्‍य अकादेमी नई दिल्‍ली एवं मिथिला सांस्‍कृतिक संगम प्रयागक संयुक्‍त तत्वावधानमे मीट दऽ आथर अर्थात् लेखकसँ भेट कार्यक्रमक आयोजन कएलक, 28 मई 2000। 7. बंगभूमिक जगता ज्‍योति संस्‍था मिथिला सांस्‍कृतिक परिषद कोलकाता 2006 मे अभिनन्‍दन कएलक। संस्‍था-संस्‍थापक प्रयाग अति प्राचीन कालहिसँ मैथिल मातृभाषानुरागी मैथिलीक कार्य स्‍थल रहल अछि, तकर दू कारण अछि। प्रथमत: धर्माम्‍बलंबी मैथिल समाज गंगा–यमुना आ विलुप्‍त सरस्वती नदीक संगम रहल आ द्वितीय एतए विद्याक केन्‍द्र हैबाक कारणेँ विद्यानुरागी लोकनिक जमावड़ा रहल अछि। स्‍वाधीनतासँ पूर्व प्रयागक मातृभाषानुरागी जयकान्‍त मिश्र एतय मैथिलीक विकासार्थ दू संस्‍थाक स्‍थापना कएलनि, तीरभुक्ति पब्लिकेशन्स आ अखिल भारतीय मैथिली साहित्‍य समिति- सन् 1944 ई मे जकर वर्तमान परिदृश्‍य ऐतिहासिक‍ भऽ गेल अछि, जे जनजागरण अनलक तत्‍कालीन साहित्‍यकार लोकनिमे। एहि दुनू संस्था द्वारा कतिपय समकालीन साहित्यकार लोकनिक पुस्‍तकक प्रकाशन भेल जकर ऐतिहासिक महत्व अछि। एहि संस्‍था द्वारा मैथिली समाचार एक अनियतकालीन पत्रिका- मात्र सूचनात्‍मक समाचारक अतिरिक्त नव प्रकाशनसँ पाठककेँ अवगत करबैछ। वर्त्तमान परिदृश्‍यमे स्‍वतन्‍त्र मिथिला राज्‍यक समर्थनमे विभिन्‍न समाचार आ प्रयासक विभिन्‍न आयातपर विगत दुइ दशकसँ प्रकाशित करैत आबि रहल अछि। एकर सम्पादन ओ स्‍वयं करथि। पी.ई.एन. मे मैथिली- अन्‍तर्राष्‍ट्रीय एवं सा‍हित्यिक सोफिया वाडिया द्वारा संस्‍थापित साहित्यिक संस्‍था Poets, Essayist and Novelist जकरा संक्षेपमे पी.ई.एन. कहल जाइछ। उक्‍त संस्‍थाक ई सक्रिय सदस्‍य भऽ भारतीय भाषा साहित्‍यानुरागी लोकनिक ध्‍यान मैथिली भाषा आ साहित्य दिस आकर्षित कएलनि। एकर अधिवेशनमे ओ सहभागी भेलाह- बड़ौदा (1957), भुवनेश्‍वर (1959) आ लखनऊ (1964)मे सम्मिलित भऽ कए मैथिली भाषा आ साहित्‍यक पुनराख्‍यान कऽ कए ओहि संस्‍था द्वारा मैथिलीकेँ भारतक प्राचीनतम भाषाक रुपमे मान्‍यता दिऔलनि। एहि संस्‍था द्वारा मान्‍यता भेटलाक पश्‍चात् एकर अग्रिम योजनाकेँ क्रियान्वित करबामे अभूतपूर्व सहायता भेटल। उक्‍त अधिवेशनमे पठित हिनक भाषणादि ओकर कार्य विवरिणीमे प्रकाशित अछि। पुस्‍तक प्रदर्शनी बिहारक तत्‍कालीन राज्‍यपाल डा. रंगनाथ रामचन्‍द्र दिवाकर आँल इण्डिया पर एक भाषण देलनि जाहिमे हृदएसँ अपन उद्गार व्‍यक्‍त करैत उद्घोषणा कएने रहथि जे मैथिली ज्ञान ग्रन्‍थस्थ प्राचीन भाषा थिक, जे एकर विकासमे अति महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कएलक। जखन जयकान्‍त मिश्र ई व्याख्‍यान सुनलनि तँ ओ अत्‍यधिक उत्‍साहित भऽ जोर-सोरसँ काज करब प्रारम्‍भ कएलनि। ई एक ऐतिहासिक परिदृश्‍य अछि जे मैथिलीक भविष्‍यक दिशा–निर्देश करैछ। पुरातन कालसँ इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय प्राच्‍य एवं प्रतीच्‍य उच्‍च शिक्षाक हृदए स्‍थल अछि जतए साहित्यिक एवं सांस्‍कृतिक क्षेत्रक लब्‍ध प्रतिष्‍ठ विद्वानक निवास स्‍थल रहलनि। हिनक कर्मभूमि सेहो ओही विश्‍वविद्यालयमे रहलनि जतए गणतन्‍त्र भारतक प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरूक जन्‍म भूमि छलनि। ओ अवकाश भेटलापर निश्चित रुपेँ ओतए अबैत–जाइत रहथि। अखिल भारतीय मैथिली साहित्‍य समितिक अध्‍यक्ष आ विश्‍वविद्यालयक अंग्रेजी विभागक व्याख्याताक रूपमे ओ तत्कालीन प्रधानमंत्रीसँ सन् 1960 ई.मे आनन्‍द भवनमे दर्शनार्थीक रुपमे मैथिली दू पुस्‍तक वैद्यनाथ मिश्र यात्री (1911-1998)क काव्‍य–संग्रह चित्रा आ गल्पाञ्जलि कथा–संग्रह हुनका उपहार देलथिन, संगहि अनुरोध कएलथिन जे मैथिली भाषा आ साहित्‍यक गौरवशाली साहित्यिक परम्‍परा तेरहम शताब्दीसँ उपलब्‍ध अछि, किन्‍तु सरकारी मान्‍यताक अभावमे ई सर्वथा उपेक्षित अछि। पण्डित नेहरू ध्‍यानसँ हुनक कथनकेँ स्‍नेहपूर्वक सुनलथिन आ कहलथिन Institutional reorganization is not soul management of the richness of a language, we enjoy with sound literature. एही क्रममे हुनका ओतए भेटलथिन इलाहाबाद हाईकोर्टक चीफ जस्टिस न्‍यायमूर्ति बी. मल्लिक। ओ कहलथिन- एहि रूपेँ अहाँक मातृभाषाकेँ मान्‍यता नहि भेटि सकैछ। ओ सलाह देलथिन जे एहि लेल आन्‍दोलनक तरीका अपनाबए पड़त तख‍नहि अहाँक मातृभाषाकेँ मान्‍यता भेटि सकैछ। आन्‍दोलनक तरीका थिक जे अपन साहित्‍यक समृद्धशाली, गौरवशाली आ वैभवशाली परम्‍परासँ जनमानसक संगहि संग साहित्‍य चिन्‍तक लोकनिक‍ ध्‍यान आकर्षित करबाक उपक्रम करू। न्‍यायमूर्ति मल्लिकक सत्‍प्रेरणा आ विचारसँ उत्‍प्रेरित भऽ कए ओ इलाहाबादमे सर गंगानाथ संस्‍कृत रिसर्च इन्‍सटीच्‍यूटमे 15 दिसम्‍बर 1961 ई. केँ मैथिली पुस्‍तक प्रदर्शनीक आयोजन कएलनि तथा ओकर उद्घाटन करबाक हेतु जस्टिस मल्लिकसँ अनुरोध कएलनि तथा ओकर उद्घाटन करबाक हेतु जस्टिस मल्लिकसँ अनुरोध कएलथिन। ताधरि जस्टिस मल्लिक भारत सरकारक कमीशन फॉर माइनोरिटी लैंग्वेजेजक चेयरमैनक पदपर सुशोभित भऽ गेल रहथि। ई सुखद संयोग थिक जे उक्‍त पुस्‍तक प्रदर्शनीक उद्घाटन जस्टिस मल्लिक स्‍वीकार कएलथिन, जाहिमे आ‍ेहिठामक प्रबुद्ध साहित्‍य चिन्‍तक लोकनि मैथिली भाषा आ साहित्‍यक प्राचीनतम गौरवशाली परम्‍परासँ अवगत भेलाह, जे हुनका सभपर अपन अमिट छाप छोड़लक। एहि अवसरपर यशस्‍वी कवि वैद्यनाथ मिश्र यात्री मैथिलीमे काव्‍यपाठ कएने रहथि। इलाहाबादक पुस्‍तक प्रदर्शनीसँ अनुप्राणित आ अनुप्रेरित भऽ कए ओ सोचलनि जे एहन प्रदर्शनीक आयोजन गणतन्‍त्र भारतक राजधानी दिल्‍लीमे कएल जाए तँ निश्चित रूपेँ मैथिलीकेँ सरकारी मान्‍यता भेटबामे कोनो बाधा नहि आबि सकैछ। एकर आयोजनार्थ ओ अपन प्रोभिडेण्‍ड फण्‍डसँ लोन लऽ कए 8 आ 9 जनवरी 1963 ई. मे दिल्‍लीक आजाद भवनमे ऐतिहासिक राष्‍ट्रीय पुस्‍तक प्रदर्शनीक आयोजन कएलनि जाहिमे मिथिलांचलक विभिन्‍न क्षेत्रसँ चन्दा एकत्रित कएल गेल आ भालण्टीयर गेल रहथि। प्रदर्शनीक सजावट हृदयाकर्षक छल। बहुतायदमे पुस्‍तकादि एकत्रित कएल गेल छल जाहिमे मिथिला इन्स्टीच्यूट दरभंगा आ पटना विश्‍वविद्यालय विशेष उल्‍लेखनीय अछि। सांसद रूपमे ललितनारायण मिश्र एवं यमुना प्रसाद मंडल सहभागी भेल रहथि। भारत सरकारक संसदीय कार्य मंत्री बाबू सत्‍यनारायण सिंहक सहयोगसँ प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू एकर उद्घाटन कएलनि यद्यपि ओ पन्‍द्रह मिनट विलम्‍बसँ पहुँचलाह, किन्‍तु पुस्‍तकक अम्बार देखि हतप्रभ भऽ गेलाह। अपन भाषणमे ओ जे बजलथिन ओ कल्पनाक विपरीते अनुभव भेलनि प्रोफेसर मिश्रकेँ। भीजिटिंग रजिस्‍टरमे ओ टिप्पणी कएलथिन, I was here to inaugurate Maithili Book Exhibition and to see the large Collection of books and Manuscripts in Maithili. This demonstrated that Maithili had been for long time and is today a living language among the people of that area, the Language desires encouragement. एहि प्रदर्शनीकेँ सफल बनएबाक लेल हास्‍य-व्‍यंग्‍य सम्राट प्रोफेसर हरिमोहन झा, मायानन्‍द मिश्र (1934), रामस्‍वरूप नटुआक अतिरिक्‍त अनेको गण्‍यमान्‍य राजनैतिक, साहित्यिक, मैथिली प्रेमी उनटि कऽ प्रदर्शनी सफल बनएबाक हेतु उपस्थित भेलाह। एकर शानदार सजाबटक कारणेँ समग्र कार्यक्रमक झाँकी सिनेमा हॉलमे प्रदशित भेल जे मैथिलीक हेतु ऐतिहासिक घटना थिक। उपर्युक्‍त पुस्‍तक प्रदर्शनी एहि बातक सबल प्रमाण थिक जे ओ एक सफल आयोजक रहथि। मैथिली आन्‍दोलन एक डेग आगू बढ़ल। साहित्‍य अकादेमीक सामान्‍य परिषदमे प्रवेश विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्‍यता प्राप्‍त भारतक विश्‍वविद्यालयक अक्षरानुक्रमसँ बीस प्रतिनिधि पाँच वर्षक काला‍वधि हेतु साहित्‍य अकादेमीक सामान्‍य परिषदक सदस्‍य मनोनीत करबाक प्रक्रिया थिक, जकर नामक अनुशंसा सम्‍बद्ध विश्‍वविद्यालयक कुलपति करैत छथि। जीवनक परिणत वयमे बिहार सरकार हिनक पिता श्री महामहोपाध्‍याय डाo उमेश मिश्रकेँ सर कामेश्‍वर सिंह संस्‍कृत विश्‍वविद्यालयक कुलपति नियुक्‍त कएलक। ई सुखद संयोग छल जे हुनक कार्य कालमे साहित्‍य अकादेमीक सामान्‍य परिषद्क सदस्‍यक नाम अनुशंसित करबाक सूचना उक्‍त विश्‍वविद्यालयक कुलपतिकेँ भेटलनि। मातृभाषानुरागी कुलपतिक अतीव इच्‍छा छलनि जे एहन व्‍यक्तिक नाम अनुशंसित कएल जाए जे मैथिलीक मान्‍यतार्थ एहि भाषाक पुरातन परम्‍पराक उपस्‍थापन सबल तर्क द्वारा प्रस्‍तुत कऽ कए ओकर अध्‍यक्ष पण्डित जवाहर लाल नेहरूकेँ कनभीन्‍स कऽ सकथि अंग्रेजीमे। कुलपति कार्यालय तीन बेर प्रोफेसर जयकान्‍त मिश्रक नाम प्रस्‍तावित कऽ हुनक अनुमोदनार्थ प्रस्‍तुत कएलक, किन्‍तु कुलपति बारम्‍बार बिनु कोनो टिप्‍पणी कएने फाइलकेँ वापस कऽ देथि। हुनका एहि बातक आशंका छलनि जे जनमानस ई आरोप लगाओत जे अपन पुत्रक नाम अनुशंसित कएलनि। अन्‍तत: सामाजिक दबाबक कारणेँ कुलपति जयकान्‍त मिश्रक नाम अनुशंसित कएलथिन आ ओ अकादेमीक सामान्‍य परिषदक सदस्‍य भऽ गेलाह। सामान्‍य परिषदक सदस्‍य बनितहि ओ मैथिलीक मान्‍यतार्थ आन्‍दोलन प्रारम्‍भ कएलनि। अन्‍यान्‍य भाषा भाषी सदस्‍य लोकनिक ध्‍यान मैथिलीक गौरवशाली साहित्यिक परम्‍पराक दिशामे ध्‍यान आकर्षित करब ओ प्रारम्‍भ कएलनि। मैथिलीक मान्‍यता मैथिलीकेँ मान्‍यता साहित्‍य अकादेमी दिअए ताहि हेतु ओ फाँड़ बान्हि कऽ एकरा पाछाँ पड़लनि, तकरा पाछाँ हुनक त्‍याग आ बलिदानक इतिहास जनमानससँ नहि नुकाएल अछि। ओ सामान्‍य परिषदक माननीय सदस्‍य लोकनिक ध्‍यानकर्षित करबाक आ मातृभाषा मैथिलीक महत्त्व निरुपित करबाक निमित्त अंग्रेजीमे दू बुकलेट लिखलनि A case for Maithili एवं ..They say about Maithili तकरा सदस्‍य लोकनिक बीच वितरित कएलनि। यद्यपि दिल्‍लीक पुस्तक प्रदर्शनीमे पण्डित नेहरू जे अकादेमीक अध्‍यक्ष सेहो रहथि ओ एहि बातक संकेत देने रहथि जे एहि भाषाकेँ मान्‍यता भेटबाक चाही1 किन्‍तु दुर्भाग्यसँ हुनक मृत्‍यु भऽ गेलनि आ हुनक मृत्युपरांत प्रोफेसर सुनीति कुमार चटर्जी एकर अध्‍यक्ष बनलाह जे मैथिलीक गौरव-गरिमा आ महत्वसँ पूर्व परिचित रहथि। हुनका अध्‍यक्ष बनितहि ई अत्‍यधिक आशान्वित भऽ गेलाह जे आब मान्‍यता भेटबामे मात्र वैधानिक प्रक्रिया शेष अछि। एहि लेल एक समिति गठित कएल जाहि मे भाषाविद डाo सुकुमार सेन (1900-1992) प्रोफेसर हजारी प्रसाद द्विवेदी (1907-1979) आ डाo सुभद्र झा (1909-2000)केँ सदस्‍य मनोनीत कएल गेलनि, जकर बैठक दिल्लीमे आहूत भेल। एहिसँ पूर्व कोलकाताक प्रवासी मातृभाषा सेवी संस्‍थादिक संग मिथिलांचलमे जनजागरण भऽ गेल ओ पोस्‍टकार्ड अभियान चला कऽ एहि माँगक समर्थन कएलक। एहि दिशामे प्रोफोसर मिश्रक सत्‍प्रयास ऐतिहासिक घटनाक रूपमे सतत चिरस्थायी रहत। तिरहूता लिपिक संरक्षक अन्‍य स्‍वतंत्र साहित्यिक आधुनिक भारतीय भाषादिक समान मैथिली भाषाकेँ अपन प्राचीन स्वतन्‍त्र लिपि छैक जकरा तिरहुता वा मिथिलाक्षर वा मैथिलाक्षर वा मैथिली लिपि कहल जाइछ। तिरहुता नामसँ ज्ञान होइत अछि जे ई लिपि तिरहुत देशक थिक। जहिना भाषा आ सभ्‍यता परस्‍पर अन्‍योन्‍याश्रित अछि, तहिना लिपि आ भाषाक सम्‍बन्‍ध छैक। अपन लिपिसँ जहिना–जहिना सम्‍बन्‍ध छूटल जाएत, तहिना–तहिना भाषाक प्रति ताहि अनुपातमे आकर्षण कम होइत जाएत, तकर प्रत्‍यक्ष प्रमाण थिक मैथिली। एहि लिपिक जाननिहारक संस्‍था दिनानुदिन नगण्य भेल जा रहल अछि, जे मैथिली हेतु चिन्‍तनीय विषय थिक। एहि प्रश्‍नपर जयकान्‍त मिश्र गम्भीरता पूर्वक विचार कएलनि, जे एकर संरक्षणार्थ प्रयासक प्रयोजन अछि। साहित्‍य अकादेमी मैथिलीक मान्‍यताक प्रसंगमे एक प्रश्‍न उपस्थित भेल छल जे एकर स्‍वतन्‍त्र लिपिक अस्तित्व छैक वा नहि? ओ एकर उत्तरमे तर्क देलथिन जे एकरा अपन स्‍वतन्‍त्र लिपि छैक जकर पुरातन इतिहास छैक। हुनकर मान्‍यता छलनि जे मैथिलीक स्‍वतन्‍त्र अस्तित्व स्‍थापित करबामे जे कठिनता लिपिक कारणेँ भेलनि आ वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे भऽ रहल अछि से नहि होइत जँ हमरा लोकनि एकरा संरक्षित रखने रहितहुँ। वार्तालापक क्रममे ओ हमरा एक बेर कहने रहथि जे पुरातन कालमे समग्र मिथिलाञ्चलमे तिरहुताक संगहि कैथी लिपिक प्रचलन छलैक। दरभंगा राजक कार्यकलापमे सेहो तिरहुता लिपिक प्रयोग होइत छलैक किन्‍तु ओकरा बहिष्‍कृत कऽ कए हिन्‍दी बहुल देवनागरी लिपिकेँ लादि देल गेलैक जकर भयंकर दुष्परिणाम भेलैक जे शनै:-शनै: जनमानससँ ई विलुप्‍त होइत गेल। एकर फलस्‍वरूप मैथिली सदृश प्राचीनतम भाषाकेँ वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे हिन्‍दीक अंगक उद्घोषणा विद्धान लोकनि कएलनि जेना व्रजभाषा आ अवधीक प्रसंगमे कहल जाइछ। जँ तिरहुता लिपि प्रचलित रहैत तथा एकर साहित्‍य एही लिपिमे लिखल जाइत तँ एहन विवादक उद्भावना कथमपि नहि होइत। संस्‍कृतक हेतु वैकल्पिक रूपमे समस्‍त भारतमे देवनागरी लिपि व्‍यवहृत होबए लागल तकर प्रभाव मिथिलाञ्चलपर पड़ल आ मैथिली साहित्‍य निर्माता लोकनि तिरहुताक स्‍थानपर देवनागरी लिपिक प्रयोग करए लगलाह। यद्यपि एहि लिपिक संरक्षणार्थ कतिपय प्रयास अवश्‍य कएल गेल, किन्‍तु कोनो प्रयास सफल नहि भऽ सकल। दरभंगासँ तिरहुता लिपिमे समाचार पत्र बाहर करबाक प्रयास कएल गेलैक, किन्‍तु ओहो विफल रहल। मैथिली भाषी जनमानस तिरहुता आ कैथी लिपिमे पढ़ैत–लिखैत छल आ एहिसँ अतिरिक्‍त कोनो लिपिक प्रयोगक ज्ञान लोककेँ नहि छलैक। यद्यपि एकरा पुनर्जीवित करबाक नेयारभास पुस्‍तक भण्‍डारसँ जीवनाथ राय (1891-1964) बांगला लिपिक प्रभाव काँटा अवश्‍य बनाओल गेल आ ओ ‘मैथिलीक प्रथम पुस्तक’क रचना अवश्‍य कएलनि मुदा ओ सफल नहि भऽ सकल। जखन मैथिली कोश प्रकाशित करबाक प्रश्‍न उपस्थित भेलनि तखन ओ विशुद्ध तिरहुता लिपिक टाइप बनएबाक अथक प्रयास कएलनि, कारण हुनक बलवती इच्छा छलनि जे तिरहुता लिपिमे कोश प्रकाशित हो। एहि भावनासँ ओ उत्प्रेरित भऽ तिरहुता ककहारा (1967) नामक एक पुस्‍तक लिखलनि। दैव दुर्योग एहन भेल जे हुनक ओ प्रयास सफलीभूत नहि भऽ पौलनि। हुनक मान्‍यता छलनि जँ हमरा लोकनि एकरा अपनौने रहितहुँ तँ मैथिलीक प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन कालजयी साहित्‍यक रिसर्च अधिक सुकर होइत। वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे एकर पुनरुत्‍थान करब प्रयोजनीय अछि, रिसर्च आ सांस्‍कृतिक कार्यादिमे अलंकरणक रूपमे विशेष उपादेय। प्रत्‍येक मैथिली प्रेमी जनमानससँ आ विशेषत: मैथिली पढ़निहार छात्र समुदायकेँ एहि लिपिकेँ सिखबाक प्रेरणा देलनि ओ। परामर्श मण्‍डलक संयोजक साहित्‍य अकादेमी द्वारा मैथिलीक मान्‍यता भेटलाक पश्‍चात् समग्र मिथिलाञ्चल एवं प्रवासी मातृभाषानुरागीमे प्रसन्‍नताक लहरि परिव्‍याप्त भऽ गेल। जनमानस आनन्‍दक सागरमे डुब्बी मारए लागल आ आशांवित भेल जे मैथिलीक विकासक अवरूद्ध मार्गमे एक नव किरण विकीर्ण अवश्‍य होएत। मैथिली परामर्श मण्‍डलक प्रथम संयोजक रमानाथ झा (1906-1971)क आकस्मिक निधनोपरान्‍त जयकान्‍त मिश्रकेँ एकर संयोजक बनाओल गेल। यद्यपि ओ दू खेप परामर्श मण्‍डलक संयोजक रहला, किन्‍तु हुनक कार्यकालमे कोनो एहन उल्लेखनीय प्रकाशन नहि भेल। हुनक कार्यावधिमे निम्‍नस्‍थ पुस्‍तक प्रकाशमे आएल ओ थिक उमानाथ झा द्वारा सम्‍पादित विद्यापति गीत शती आ जयधारी सिंह द्वारा संग्रहीत मैथिली कथा संग्रह इत्‍यादि। हिनकहि संयोजक कालक दुइ घटना मैथिलीक चिरस्‍मरणीय अछि। ओ थिक अकादेमी द्वारा मैथिलीक स्‍वीकृति पश्‍चात् इतिहासकार प्रोफेसर राधाकृष्‍ण चौधरी (1924-1984)केँ अंग्रेजीमे मैथिली साहित्‍यक इतिहास लिखबाक दायित्‍व सौंपलक। ओ यथा समए ओकर पाण्‍डुलिपि साहित्‍य अकादेमीमे समर्पित कएलनि जकरा परामर्श मण्‍डलक समक्ष विचारार्थ प्रस्‍तुत कएल गेल। किन्‍तु हुनक पाण्‍डुलिपि एहन बभन पेंचमे पड़ल जे कतिपय कारणसँ ओकरा प्रकाशनसँ वंचित कऽ देल गेल। एकर प्रमुख कारण छल जे मैथिलीक इतिहास लेखनपर प्रोफेसर मिश्रक एकाधिकार छलनि। ओ अपन पूर्व प्रकाशित इतिहास प्रथम खण्‍ड आ द्वितीय खण्‍डकेँ संक्षिप्त कए अकादेमी द्वारा प्रकाशित करौलनि A History of Maithili Literature (1976)। तत्पश्‍चात् ओकर मैथिली अनुवाद मैथिली साहित्‍यक इतिहास (1988) स्‍वयं कएलनि, कारण हुनका एहि विषयक शंका छलनि जे कदाचित अन्‍य अनुवादक एम्‍हर-ओम्‍हर ने कऽ देथि। किन्‍तु उपर्युक्‍त पाण्‍डुलिपिकेँ प्रोफेसर चौधरी सेहो प्रकाशित करौलनि A Survey of Maithili Literature (1976) नामे। उक्‍त दुनू इतिहास मैथिलीमे विवादास्पद रहल। हिनक कार्यावधिमे अकादेमी एक पुस्‍तक प्रकाशित कएलक Indian Literature Since Independence (1973) जाहिमे अकादेमी द्वारा स्‍वीकृत भाषादि स्वातन्‍त्र्योत्तर कालक प्रगतिक विकास–यात्राक मूल्‍यांकन करबाक छलैक। मैथिली भाषाक स्‍वातन्त्रयोत्तर काजक विकास गतिक प्रसंगमे प्रोफेसर मिश्र आलेख प्रस्‍तुत कएलनि जे प्रकाशनोपरान्‍त साहित्‍य जगतमे एक पैघ विवादक केन्‍द्र बिन्‍दू बनि गेल। स्‍वातन्‍त्र्योत्तर मैथिलीक साहित्‍यक यथार्थ मूल्‍यांकन करबामे अज्ञानतावश वा यथार्थ सूचनाक अभावमे जे भ्रामक विचार प्रस्‍तुत कएलनि तकर विरोधमे पटनासँ प्रकाशित मिथिला मिहिरक पचीस अंकक लगधक भिन्‍न–भिन्‍न लेखक द्वारा साहित्‍यक यथार्थताक मूल्‍यांकन कएल गेल। मिहिरक सम्पादक सुधांशु शेखर चौधरी (१९२०-१९९०) वादे–वादे जायते तत्‍वबोध नामे एक सीरिज चलौलनि जाहिमे उक्‍त आलेखादि प्रकाशित भेल, जाहिमे हुनक कटु आलोचना कएल गेल। दिशा बोधक समीक्षक यद्यपि ओ जीवन पर्यन्‍त अंग्रेजी साहित्‍यक अध्‍ययन–अध्‍यापनमे निरत रहलाह जाहिमे समीक्षाक प्रचूर सामग्री उपलब्‍ध छैक, किन्‍तु मातृभाषामे समीक्षाक सर्वथा अभाव देखि ओकरा अभिवर्द्धित करबाक उद्देश्‍यसँ उत्‍प्रेरित भऽ मैथिलीमे समीक्षा लिखबाक शुभारम्‍भ कएलनि। हिनक वृहत समीक्षात्मक कृति प्रकाशमे आयल प्रोफेसर गंगापति सिंह (1894-1969)क सद्यः प्रकाशित उपन्‍यास सुशीलापर जे दरभंगासँ प्रकाशित मिथिला मिहिरक सम्पादक सुरेन्‍द्र झा सुमन ( 1910-2002) प्रकाशित कएलनि। एकर महत्व एहि कारणेँ अछि जे उपन्‍यासकार उपन्‍यासमे कतिपय स्‍थलपर मैथिली शब्‍दक बदलामे हिन्‍दी शब्‍द–समूहक प्रयोग कएने रहथि तकर ओ सतर्क प्रतिवाद कएलनि। इएह आलेख हिनकर मैथिली आलोचनामे प्रवेशक द्वार खोललक तथा हिनका यशस्‍वी बनौलक। जनमानसक ई धारणा छलैक जे मैथिलीमे जे लिखल जाइत छैक से ठीक छैक, तकर आलोचना नहि होमक चाही। एहिपर कतेक विवाद चलल। मैथिलीक युवा साहित्‍य चिन्‍तक बाबू भुवनेश्‍वर सिंह भुवन (1907-1944) हिनका अत्‍यधिक प्रोत्‍साहित कएलथिन। यद्यपि हिनकहिसँ मैथिलीमे इतिहास–लेखनक परम्‍पराक शुभारम्‍भ होइत अछि जे वस्‍तुत: समीक्षाक श्रेणीमे परिणत अछि। एहि ऐतिहासिक ग्रन्‍थक जे उपयोगिता छैक ताहि प्रसंगमे हम बिस्तार पूर्वक विवेचन कएल अछि, हिनक अनुसंधान उपशीर्षकान्‍तर्गत। तेँ एतय गाओल गीतकेँ गाएब समुचित नहि। आधुनिक परिप्रेक्ष्‍यमे तथाकथित आलोचकक कथन छनि, हुनक इतिहासमे कतिपय दोष अछि। किन्‍तु एहि बातकेँ ओ सर्वथा बिसरि जाइत छथि जे हुनका समक्ष कोनो प्रतिमान नहि छलनि जकर आलोकमे ओकर विस्‍तृत विश्‍लेषण करितथि। अपन इतिहास‍क अन्तर्गत ओ एहि विषय–वस्‍तुक विश्‍लेषण नहि कऽ पौलनि तकरा हमरा लोकनि अनुसंधान कऽ प्रकाशमे अनबाक प्रयास करी, ओ अनेक दिशा निर्देश कएलनि जाहि दिशामे वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे गहन अनुसंधानक प्रयोजन अछि जे परवर्ती पीढ़ीकेँ करबाक छैक। हिनक इतिहास मैथिली आलोचना साहित्‍यकेँ दिशा बोध करौलक जाहिसँ आगाँ हमरा लोकनि नहि बढ़ि पौलहुँ अछि, जे चिन्‍तनीय थिक। मैथिली लोक साहित्‍यसँ सम्‍बन्धित हिनक An Introdution to Folk Literature of Mithila एहि विधाक प्रथम ग्रंथ थिक, जाहिमे मिथिलाञ्चलमे हुनका लोक साहित्‍यसँ सम्‍बन्धित जतेक सूचना उपलब्‍ध भऽ पौलनि तकर लेखा–जोखा ओ दुइ खण्‍डमे प्रस्‍तुत कएलनि। प्रथम खण्‍डमे लोक गीतसँ सम्‍बन्धित प्रचुर सामग्री, लोकनाट्य सम्‍बन्धी गीत आदिक विवेचन ओ कएलनि। द्वितीय खण्डान्तर्गत लोक विश्वास, लोक परम्परा एवं कतिपय लोक कथादिक चर्चा भेल अछि। आधुनिक परिप्रेक्ष्‍यमे लोक साहित्‍यपर जतेक कार्य भेल अछि वा भऽ रहल अछि तकर प्रेरणा स्रोत उपर्युक्त समीक्षा थिक जे परवर्ती पीढ़ीक लोक साहित्‍यकारक पाथेय बनल। वैदेही समिति द्वारा आयोजित प्रथम अखिल भारतीय लेखक सम्मेलनक अवसरपर प्रकाशित रचना संग्रहमे मैथिली इतिहास सम्‍बन्‍धी किछु समस्‍या दिस जनमानसक संगहि प्रबुद्ध वर्गक ध्‍यान आकर्षित कएलनि जे दिशा बोध करबैछ जे जाधरि उपर्युक्‍त समस्‍यादिक समाधान नहि होएत ताधरि इएह स्थिति रहत। उपर्युक्‍त अवसरपर अपन अध्‍यक्षीय भाषणमे नाट्य साहित्‍यक भविष्‍यपर प्रकाश दऽ कए कतिपय नव–बिन्‍दुक संकेत देलनि आ जोर देलनि जे एकरे माध्‍यमे मैथिलीक भविष्‍य सुरक्षित रहि सकैछ जे हुनक आलोचनात्‍मक प्रवृत्तिक संकेत करैछ। हिनक समग्र उपलब्‍ध आलेखक अनुशीलनसँ आब बोध होइछ जे ओ मैथिल संस्‍कृति, साहित्यिक परम्‍पराकेँ अक्षुण रखबाक दिशा–बोध करौलनि। एहि प्रसंगमे हुनक अवधारणा छलनि जे भेष–भूषा, भाव–भाषा, कला–कौशल, चित्र–कला–संगीतकेँ उद्धार करबाक प्रयोजन अछि। एहि उद्देश्‍यक पूत्यर्थ अपन आलेखादिमे विस्‍तार पूर्वक विचार कएलनि आ संकेत देलनि जे युवा पीढ़ीकेँ अग्रसर भऽ कार्य करबाक प्रयोजन अछि। हुनक मान्‍यता छलनि जे मैथिली नाटक आ रंगमंचक माध्‍यमे एकर भविष्‍यकेँ सुनिश्चित कएल जा सकैछ। नाट्य साहित्‍य जीवित रहल,–पढ़बाक ओ सुतबाक एवं देखबाक प्रक्रियामे सजीवता छैक, मूर्तमय वस्‍तुकेँ उपस्थित करबाक क्षमता छैक तथा अभिनयमे सौन्‍दर्य ओ कलाक वास्‍तविकता, मनुष्‍यता एवं सत्‍यता छैक, से साहित्यक अन्‍यान्य विधामे भेटब असम्भव छैक। बीसम शताब्दीमे मैथिली साहित्‍यमे परिवर्त्तनक स्‍वर गुंजित भेल तकर ओ समर्थकक रूपमे अएलाह। आधुनिक शिक्षाक प्रचारसँ लोकक ज्ञान, ओकर दृष्टि विकसित भेलैक तथा मातृभाषानुरागी लेखक लोकनिक लेखनी ओहि परिवर्त्तनकेँ अंकित करए लागल जे सा‍हित्‍यमे नवीनताक संचार भेलैक। परिवर्त्तनक स्‍वरक मुखरताक कारण अछि नूतन वैज्ञानिक आविष्कारक चमत्‍कार, औद्योगिकरणक वृद्धि, एहिसँ उत्‍पन्‍न जन–जीवनक संकुलता, आर्थिक विचारक क्षेत्रमे मार्क्सवादक उदय, फ्रायडक सिद्धान्‍त, बौद्धिकता वृद्धि। साहित्‍यक क्षेत्रमे एकर प्रभाव पड़ल आ परिवर्त्तनक स्‍वर गुंजित भेल तकर ओ पक्षपाती रहथि। उपर्युक्‍त परिप्रेक्ष्‍यमे हिनक समग्र रचनादि हिनका दिशाबोधक समीक्षक रूपमे प्रमाणित कएलक। कीर्त्तनिञा नाटक A History of Maithili Literature क Volume–I मे मिथिलामे उपलब्‍ध नाटकादिकेँ ओ कीर्त्तनिञा नामे संबोधित कएलनि जाहि प्रसंगमे आपत्ति प्रस्‍तुत कएलनि रमानाथ झा अभिव्‍यञ्जनाक प्रथम अंकमे। हुनका द्वारा स्‍थापित मतक खण्‍डन करैत ओकरा कीर्त्तनिञा नाच कहलनि। एहिपर मैथिली आलोचनाक क्षेत्रमे विवादक एक परम्पराक शुरुआत भेल। प्रोफेसर मिश्र हुनक मतक खण्‍डन कएलनि उक्‍त पत्रिकाक अग्रिम अंकमे । तत्‍पश्‍चात् रमानाथ झा प्रबन्‍ध संग्रह (1371 साल)मे मैथिली नाटकपर एक बृहत् आलोचना कएलनि। इहो कीर्तनिञा नाटक (1965) नामक एक स्वतन्‍त्र पुस्‍तक अपन मतक समर्थनमे प्रकाशित कएलनि जाहिमे हुनक मतक खण्‍डनमे तर्क देलनि जे मैथिलीमे शोध कोना हो, इतिहासमे परम्‍पराक नामकरण कीर्त्तनिञा नामक सार्थकता, नटुआ आ नटकियामे भेद, नाच ओ नाटकक अभेद सम्‍बन्धी प्रमाण, नाटक शब्‍दक व्‍यापक अर्थ, मिथिलामे अभिनयक परम्‍परा, कीर्तनिञामे पात्रक प्रवेश - निष्‍क्रमण, पात्रक संख्‍या, योग्‍यता, मिथिलामे कीर्तनिञाक परम्परा, मिथिलामे नाटकक परम्पराक अभाव, कीर्तनिञा संस्‍कृत नाटक थिक तथा एकर नटुआक अयोग्‍यता आदि विषयपर प्रकाश देलनि। एहि प्रसंगमे हुनक मान्‍यता छलनि, जे ई नेपालक जगाओल धनराशि थिक। इतिहास बुझबाक हेतु बड़ तहमे जाए पड़त। हुनक कथन छलनि जे इतिहासकारकेँ इमानदार आ निष्‍पक्ष होएब परमावश्‍यक अछि- रमानाथ झा वाज ए कन्‍जरवेटिव इमैजनेटिव हिस्‍टोरियन। उपर्युक्‍त परिप्रेक्ष्‍यमे मैथिली आलोचक लोकनि दू भागमे विभक्‍त भऽ गेलाह। किछु वर्षक पश्‍चात् प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह (1942) मैथिली नाटक ओ रंगमंच (1978) एक नव बिन्‍दु दिस संकेत कयलनि जे ई ने कीर्त्तनिञा नाटक थिक ने कीर्तनिञा नाच, प्रत्‍युत एहि सब नाटकादिककेँ ओ लीला नाटक कहलनि। प्रोफेसर सिंह एहि दिशामे विचार करबाक एक नव दिशाक बोध करौलनि जे विचारणीय थिक। आन्‍दोलनक सजग प्रहरी अनुसन्‍धानोत्तर एक नव प्रवृत्तिक जागरण हुनक मस्तिष्‍कमे भेलनि जे मैथिलीक गौरव–गारिमाकैँ वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे जागृत करबाक निमित्त ओ रचनात्‍मक आ आन्‍दोलनात्‍मक मार्गक अनुसरन कएलनि। एहि लेल ओ अकर्मण्‍य निष्क्रिय, सुसुप्त, धार्मिक कट्टरता, रुढ़िग्रस्‍त जीवनक अन्‍धकूपमे डूबल समाजमे नवजीवनक संचार करबाक हेतु जनजागरणक अभियानक सूत्रपात कएलनि जे मिथिलाक सामाजिक, सांस्‍कृतिक एवं साहित्यिक जीवनमे नव चेतना अनबाक हेतु ओ रचनात्‍मक आ आन्‍दोलनात्‍मक रूख अख्तियार कएलनि जकर प्रभाव मिथिलावासीपर पड़ल। हुनक आन्‍दोलनकारी स्‍वरूपक पहिल परिचय भेटैछ जे साहित्‍यक समृद्धशाली परम्‍परासँ जनमानसकेँ अवगत करएबाक हेतु ओ इलाहाबाद आ दिल्‍लीमे दुइ बेर अति उत्‍साहित भऽ पुस्‍तक प्रदर्शनीक आयोजन कएलनि। साहित्‍य अकादेमीक सामान्‍य परिषदक सदस्‍यक मनोयननक पश्चात् अपन मातृभाषाक साहित्यिक परम्परासँ अन्य भाषाभाषीकेँ एकर महत्वसँ अवगत करएबाक निमित्त ओ संधर्ष करब प्रारम्‍भ कएलनि। हुनक एहि सकारात्‍मक आन्‍दोलनकेँ मूर्त्त रूप प्रदान करबामे मिथिलाञ्चल आ प्रवासी मातृभाषानुरागी संस्‍थादिक अपरिमित सहयोग भेटलनि जकर एतए पुनराख्यानक प्रयोजन नहि। एहि आन्‍दोलनमे मात्र हिनके नहि, प्रत्‍युत समस्‍त मैथिली भाषी जनमानसक सहयोगकेँ अस्वीकारल नहि जा सकैछ जकर परिणाम भेल भारतक सर्वोच्‍च साहित्यिक संस्‍था नेशनल लेटर्स ऐकेडमी अर्थात् साहित्‍य अकादेमी द्वारा एहि भाषा साहित्यिक परम्‍परासँ अवगत भऽ मान्‍यता प्राप्‍त होएब। बिहार एवं केन्‍द्र सरकारक उदासीनताक कारणेँ ई भाषा सर्वथा उपेक्षित देखि हुनका हृदयमे आक्रोश भेलनि आ ओ कविवर सीताराम झा (1891-1975)क निम्‍नस्‍थ पंक्तिसँ अतिशय प्रभावित भेलाह: अछि सलाइ मे आगि, बरत की बिना रगड़ने। पायब निज अधिकार, कतहुँ की बिना झगड़ने।। कविवरक उपर्युक्‍त पंक्तिक व्‍यापक प्रभाव जनमानसपर पड़लैक जाहिसँ अभिभूत ओ जन जागरणक अभिनव अभियान चलौलनि जे जनमानस अपन लेल मातृभाषाक महत्वकेँ जानए, बुझए आ अपन समुचित अधिकार प्राप्‍त करबाक दिशामे हुनका सहयोग देमक हेतु उताहुल भऽ जाए। कारण ओ अनुभव कएलनि जे मिथिलांचलवासीमे भाषा चेतनाक सर्वथा अभाव छैक। भाषा चेतनाक अर्थ थिक मातृभाषाक प्रति प्रेम, दायित्व–बोध, कर्त्तव्‍य–बोध, गौरव–बोध आदि समस्‍त विषय चेतना शब्‍दमे सन्निहित अछि। भाषाक उन्‍नति आ विकास ओहि भाषा भाषीक चेतनापर निर्भर करैछ, किन्‍तु मैथिली भाषी जनमानसमे अपन भाषा आ साहित्‍यक सर्वांगीन विकासक आकांक्षाक अभाव देखि ओ सर्वप्रथम भाषा चेतना जगएबाक निमित्त आन्‍दोलन कएलनि जे हम मैथिल छी, हमर मातृभाषा मैथिली थिक आ हम मिथिलावासी छी। एहि भावनासँ ओ उत्‍प्रेरित भऽ मिथिलांचलवासीसँ अनुरोध कएलनि जे जाति–भेद, वर्ग–भेद छिद्रान्वेषणक प्रवृतिक परित्‍यागक एक जुट भऽ मिलजुलि कऽ भाषाक विकास कार्यक प्रति सम्‍बद्ध भऽ आन्‍दोलन करी। ओ मैथिली आन्‍दोलनकेँ नव स्‍वरूप प्रदान करबाक आकांक्षी रहथि, कारण हुनक प्रबल इच्‍छा छलनि जे आन्‍दोलन सम्बन्‍धी कार्यक्रमकेँ रूपायित करबाक झुण्‍ड बान्हि कऽ ढ़ोल बजा कऽ गाम–गाममे घुमि कऽ मातृभाषाक महत्वकेँ बुझाएब। एहि लेल मुख्‍य–मुख्‍य स्थानपर मीटिंगक आयोजन करब आ मातृभाषाक वास्तविक महत्व आ तज्‍जनित विविध समस्‍यादिसँ जनमानसक ध्‍यान आकर्षित करब। एहि भाषापर एक जातिक वर्चस्‍वकेँ समाप्‍त करबाक लेल सेहो आन्‍दोलनक आवश्‍यकता अछि तकर अनुभव हुनका भेलनि। मिथिलांचलक मुसलमानकेँ आन्‍दोलनक संग जोड़ेबाक हुनक बलवती इच्‍छा छलनि। ओ एहन आन्‍दोलनक आकांक्षी रहथि जे सामान्‍य जनक वैह प्रतिनिधित्व ओहि अंचलक, ओहि क्षेत्रक, समाजक सर्वांगीन उन्‍नतिक हेतु सतत सक्रिय रहथि। किन्‍तु हुनका पीड़ा एहि बातक छलनि जे मिथिलांचलवासी आन्‍दोलनक प्रति उदासीन अछि। मैथिली आन्‍दोलनमे तीव्रता अनबाक हेतु जाधरि क्षेत्रीय सांसद आ विधायक सहयोग नहि करताह ताधरि ई धारदार नहि भऽ सकैछ। किन्‍तु ओ एहि बातसँ अत्‍यधिक दु:खी रहथि जे मिथिलांचलसँ निर्वाचित प्रतिनिधि लोकनिमे जागरणक अभाव परिलक्षित भेलनि। मैथिली आन्‍दोलनक दधीचि बाबू भोला लाल दास (1894-1977)क कथन छनि जे चुप्पचाप बैसने न्‍याय नहि भेटि सकैछ। मिथिलांचलक सर्वांगीन विकासक हेतु मिथिलावासीकेँ एकबद्ध भऽ सिंहनाद करबाक प्रयोजन अछि आ अपन अधिकारक लेल संघर्ष करबाक ओ आह्वान कएलनि यथा: अन्यायी सत्ता छी प्रलय, गगन सम अति विषम। हमरहिं लधु हुँकारसँ, महाप्रलय होइछ नियम। मैथिली आन्‍दोलनकेँ ओ नव रूप देबाक प्रयास कएलनि। हुनक धारणा छलनि जे जाधरि राष्‍ट्रीय रूप एकरा नहि प्रदान कएल जाएत ताधरि मैथिलीक विकासक सम्भावना नहि। जहिना ओड़िया भाषी, असमिया भाषी आ नेपाली भाषीकेँ अपन भाषाक प्रति अगाध श्रद्धा छैक जे अपन चिर स्‍नेही ‘अमार भाषा जननी’क नारा लगबैत अछि तहिना मैथिली भाषीकेँ अपन भाषाक प्रति स्‍नेह उत्‍पन्न करबाक लेल आन्‍दोलनक प्रयोजन अछि। जाहि–जाहि भाषाकेँ साहित्‍य अकादेमी द्वारा मान्‍यता प्राप्त छैक ओहि सभ भाषाकेँ भारतीय संविधानक अष्‍टम अनुसूचीमे नहि सम्मिलित कएल जाएत तकरा लेल राष्‍ट्रीय स्‍तरपर आन्‍दोलनक प्रयोजन अछि। एहि लेल आन्‍दोलनकेँ तीव्रतर करबाक लेल मिथिलांचलक गामक पद्–यात्रा कएल जाए आ जिला–जिलामे जन आन्‍दोलन करबाक ओ आह्वान कएलनि। मैथिली आन्‍दोलन तँ पत्र-पत्रिका, पत्रकार, साहित्‍यकार आ सहृदय मैथिली प्रेमी धरि सीमित अछि, तकरा व्‍यापक परिधिमे अनबाक आवश्‍यकता अछि। हुनक धारणा छलनि जे जाधरि एकरा राष्‍ट्रीय रूप नहि देल जाएत ताधरि एहि भाषाक कल्‍याणक सम्‍भावना नहि। जहिना पौल रोबसनक लिखल जाहि गीतकेँ लूथर किंग नामक निग्रो नेता अपन निग्रो आन्‍दोलनमे उपयोग कएलनि तहिना तकरा हमरा लोकनिकेँ भाषा समूहक संग्राम गीत घोषित करबाक आवश्‍यकता अछि: We Shall OverCome, We Shall Over Comeग् We Shall over come, Some day, o ! जाधरि मिथिलांचल वासी उपर्युक्‍त काव्‍यांशसँ अनुप्राणित नहि हैताह ताधरि हमरा लोकनिक आन्‍दोलन सफलीभूत नहि भऽ सकैछ। जयकान्‍त मिश्र मैथिलीक नामपर चलाओल आन्‍दोलनकेँ टिमटिमाइत दीप मानैत रहथि। मैथिलीक नामपर जतेक संघर्ष चलाओल जाइत अछि ओ साधारणत: हमर आन्‍दोलनकेँ उजागर करैत अछि। छोट–छोट बातकेँ लऽ कए आन्‍दोलन करब तकरा कथमपि आन्‍दोलनक संज्ञासँ नहि अलंकृत कएल जा सकैछ। मैथिली आन्दोलनकेँ चलएबाक लेल विराट शक्तिक प्रयोजन अछि। मैथिली भाषी द्वारा जे आन्‍दोलन चलाओल जा रहल अछि ओकरा एकर विकास नहि–प्रत्‍युत विनाश मानैत रहथि। मैथिली आन्‍दोलनक असफल भऽ जएबाक कारणक उल्लेख करैत हुनक कथन छलनि जे पंजाबी आ उर्दू सहश हमर भाषा कोनो धर्मक संग सम्‍बद्ध नहि अछि। मैथिली बजनिहारक संख्‍या भारतमे सातम अछि। हमर भाषाक स्वतंत्र लिपि छैक। एकर अतीत अत्यंत समुज्जवल अछि। एकर महान सांस्‍कृतिक परम्‍परा छैक। सांस्‍कृतिक अस्मिताक रक्षाक लेल आन्‍दोलन आजुक धर्म थिक। आन्‍दोलनमे तखने बल आओत जखन हम संस्‍कृतिक शंखनाद करब, जन–जन भाषिक चेतनाक हुँकार भरब। एहि प्रसंगमे ओ आरसी प्रसाद सिंह (1911-1996)क प्रसिद्ध काव्‍य बाजि गेल रनडंक क उल्लेख करैत रहथि। बाजि गेल रनडंक, ...तरूक छाँहमे बनि उदासिनी जनकनन्‍दनी? मैथिली आन्‍दोलन सतत गतिशील रहल जकर परिणम अछि जे ओ नीचाँसँ ऊपर ससरल अछि। ई एकरे परिणाम थिक जे साहित्‍य अकादेमी, भारतीय संविधानक अष्‍टम अनुसूची, संघलोक सेवा आयोग, बिहार लोक सेवा आयोग, उच्‍चत्तर माध्यमिक, विश्‍वविद्यालय स्‍तरपर अध्‍ययनक रूपमे स्‍वीकृत भेल। इएह तँ मैथिली आन्‍दोलनक अद्यतन स्थिति अछि। जतेक सुविधा हमरा लोकनिकेँ उपलब्‍ध भेल अछि तकरा ओ उपयोग करबाक मंत्र देलनि। मैथिलीक वास्‍तविक विकासक हेतु अद्यापि आन्‍दोलन अपेक्षित अछि। आवश्‍यकता अछि जे हमरा लोकनि आन्‍दोनोन्‍मुख भऽ प्रयास करबाक चाही जे राजभाषाक रूपमे एकरा स्‍वीकृति भेटैक। जीवनक परिणत वयमे ओ मिथिला राज्‍यक स्‍थापनार्थ आन्‍दोलनक हेतु संघर्ष करबाक शुभारम्‍भ कएलनि। अपन सम्‍मानक रक्षार्थ ओ पुन: एहि अग्निकेँ प्रज्‍वलित कएलनि, जे अद्यापि जनमानस संघर्षरत अछि। हुनक आकांक्षा छलनि जे राष्‍ट्रक अखण्‍डता एवं एकता रहओ, किन्‍तु अपना घरमे, अपना जिलामे, अपना प्रान्‍त वा राज्‍यमे अपन भाषा आ संस्‍कृति अक्षुण्ण राखि अग्रसर होइ। लोक भरिपोख, भरि मन जीवित रहि देशक उन्‍नतिमे सहभागी हएत। कुंठित, कलुषित, हीन, व्‍यक्तित्‍वक विकास कहियो नहि सम्‍भव छैक। मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षा शिक्षा आ भाषा दुनूक विकास परस्‍पराश्रित अछि। शिक्षा मानव जीवनक मेरुदण्‍ड थिक। शिक्षाक उद्देश्‍य ज्ञानार्जन थिक। ज्ञानार्जनक हेतु भाषा माध्‍यम थिक। अतएव कोनो भाषाक सफलता एहि बातपर अवलम्बित अछि जे कोन सीमा धरि ज्ञानार्जन आ अर्जित ज्ञानक अभिव्‍यक्तिमे सहायक होइछ जकरा द्वारा व्‍यक्तित्व तत्वक निर्माण होइछ आ आन्‍तरिक शक्तिक विकास होइछ तथा ओ एक उत्तरदायी नागरिकक रूपमे जनमानसक समक्ष अबैछ। मातृभाषाक माध्यमे प्राथमिक शिक्षाक एक सिक्काक दू पहलू थिक। अतएव प्रारम्भिकावस्‍थामे जीवनमे मातृभाषा आ प्राथमिक शिक्षा दुनूमे प्राथमिकता अपेक्षित अछि। एहि प्रसंग भारतेन्‍दु हरिश्‍चन्‍द्र (1850-1885) क कथन छनि: निज भाषा उन्‍नति अहै, सब उन्‍नति को मूल मातृभाषाक माध्‍यमे शिक्षा नहि देलाक कारणेँ हुनका हृदयमे अपार कष्‍ट छलनि। एहि लेल ओ पृथकसँ जन आन्‍दोलन चलएबाक अभियान चलौलनि, किन्‍तु हुनक ई स्‍वप्‍न साकार नहि भऽ पौलनि। बिहार सरकारक उदासीनताक कारणेँ। हमरा जनैत मिथिलावासी अपन मातृभाषाक महत्व नहि बुझबाक ई दुखद परिणाम थिक। जँ लोक अपन नेना–भुटकाकेँ मातृभाषाक महत्वसँ वस्‍तुत: अवगत करबितथि तँ एक एहन स्‍वस्‍थ वातावरणक निर्माण होइत जे बिहार सरकारकेँ बाध्‍य भऽ कए शिक्षा नीति लागू करए पड़ितैक। जखन जगन्‍नाथ मिश्र बिहारक मुख्‍यमंत्री भेलाह, तखन जयकान्‍त मिश्र अत्‍यधिक आशान्वित भेलाह, किन्‍तु ओकर कोनो फलाफल नहि बहराएल। हुनक अवधारणा छलनि जे जँ प्राथमिक शिक्षा मैथिलीक माध्‍यमे होइत तँ मिथिलांचलक अधिकांश समस्‍याक समाधान स्‍वतः भऽ जाइत। मातृभाषाक माध्‍यमे शिक्षा नहि भेटबाक कारणेँ प्राथमिक स्‍तरक नेना सभकेँ शिक्षाक प्रति अरुचि भऽ जाइछ, जकर परिणाम होइछ जे विद्यालयसँ छात्रक पलायन भऽ जाइछ। तेँ प्राथमिक स्‍तरपर मातृभाषाक माध्‍यमे शिक्षाक कार्यान्वयनक हेतु ओ सतत संघर्ष करैत रहलाह। मैथिलीकेँ प्राथमिक स्‍तरपर शिक्षा नीति लागू करएबाक हेतु ओ समस्त मिथिलांचलमे पद–यात्रा, बैसार, प्रचार तँ करबे कएलनि, एतेक धरि जे ओ कानूनी लड़ाई लड़बासँ पाछू नहि रहलाह। एहि प्रसंगमे हुनक कथन छनि- आन–आन देश उन्‍ततिक शिखरपर पहुँचल अछि तकर प्रमुख कारण थिक जे ओ सभ मातृभाषाक महत्वसँ अवगत अछि। रुस, जापान, इंग्‍लैण्‍ड, अमेरिका आदि देशमे प्राथमिक शिक्षा ओकर मातृभाषाक माध्‍यमे देल जाइछ जे प्रगतिक पथपर दिनानुदिन अग्रसर भेल जा रहल अछि। किन्‍तु मिथिलांचलमे जन जागरणक अभाव कारणेँ अभिभावक अपन भाषाक श्रीवृद्धि करबाक हेतु प्रयत्‍न नहि करैत छथि। मै‍थिल शिक्षक मैथिली पढ़एबाक हेतु प्रयत्‍न नहि करैत छथि। यावत मैथिल समाज एहि प्रश्‍नक समुचित उत्तर नहि देत, तावत मैथिलीकेँ आगाँ बढ़एबाक कोनो आन्‍दोलन सफल नहि भऽ सकत। सन् 1969 ई.मे मिथिला मण्‍डल मुम्‍बइ द्वारा आयोजित अखिल भारतीय मैथिली सम्मेलनमे विचारणीय बिन्‍दु- मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षा। ओहि सम्‍मेलनमे हमहुँ सम्मिलित भेल छलहुँ। जयकान्‍त मिश्र अपन विचार प्रस्‍तुत कएने रहथि जे निम्‍नस्‍थ अछि: 1. शैशवावस्थामे मातृभाषाक माध्‍यमे शिक्षाक व्‍यवस्‍था रहलापर ओकर मस्तिष्‍कक विकास सहज, सुगम आ विषय-वस्‍तुक ज्ञान प्रारम्मिक संस्कार स्‍थायी होइछ। ओ सुगमता पूर्वक ग्रहण करैछ जे विषय-वस्‍तु बुझबामे सहायक होइछ। एहिमे कोनो सन्‍देह नहि जे सुगमतासँ ओकर विकासक सम्भावना अछि। 2. प्रजातन्‍त्रक प्रथम शर्त थिक जे जनमानसकेँ शिक्षित करब, जाहिसँ ओ कोनो कार्य सम्‍पूर्ण शक्तिक संग सहर्ष करता ओकर शक्ति विषय-वस्‍तु बुझबामे सहायक होइछ। जतए कोनो समस्‍या उत्‍पन्‍न हएत तँ ओकर समाधान ओ आसानीसँ कऽ पबैछ। जीवित प्रजातन्‍त्रक मूल मन्‍त्र थिक प्राथमिक शिक्षा मातृभाषाक माध्‍यमे देल जाए। 3. एहिमे कोनो सन्‍देह नहि जे प्राथमिक शिक्षा मातृभाषाक माध्‍यमे देल जाए, कारण मैथिली एक प्राचीनतम जीवित भाषा थिक तेँ एकरा अनिवार्य रूपेँ लागू करबाक दिशामे प्रयासक प्रयोजन अछि आ सरकारपर एकरा लागू करबाक हेतु बाध्‍य करबाक प्रयोजन अछि। बिहार एवं झारखण्‍ड राज्‍यक अधिकांश जिलामे ई बाजल जाइत अछि, ततए अनिवार्य रूपेँ एकरा लागू करबाक हेतु सरकारपर दबाव बनाएब आवश्‍यक अछि। किन्‍तु दुर्योग विषय थिक जे सरकारक उदासीनताक कारणेँ नहि तँ मैथिलीमे प्राथमिक शि‍क्षाक पुस्‍तक प्रकाशि‍त भेल आ ओकर अध्यापनक व्‍यवस्‍था अछि जे चिन्‍तनीय विषय थिक। अतएव आवश्‍यक अछि एकर विरोधमे जनमत संग्रह कऽ कए सशक्‍त आन्‍दोलन कऽ कए बधिर सरकारकेँ जगएबाक प्रयोजन अछि। सुसुप्‍त सरकारकेँ जाधरि जगाओल नहि जाएत, ताधरि मिथिलांचलमे प्राथमिक शिक्षाक माध्‍यमसँ मैथिलीकेँ मान्‍यता नहि भेटत। मिथिला आ मैथिलीक सर्वतो भावेन विकास आ विविध समस्‍यादिक निदान ओकर निराकरण ताधरि सम्भावित नहि अछि, जा‍धरि ओहिसँ लड़बाक शक्तिक लेल मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षा अपेक्षित अछि। जयकान्‍त मिश्र द्वारा चलाओल एहि आन्‍दोलनकेँ साकार रूप देबाक हेतु घर–घरमे बच्‍चा सभकेँ प्राथमिक शिक्षा देबाक दिशामे प्रयास अपेक्षित अछि। ई विषय बुझबामे नहि अबैछ जे भारतीय संविधान, साहित्‍य अकादेमी आ अन्‍तर्राष्‍ट्रीय साहित्यिक एवं साहित्यिक संस्‍था, पी.इ.एन. द्वारा एहि भाषा आ साहित्‍यकेँ मान्‍यता प्राप्‍त भेल, तखन बिहार सरकार प्राथमिक शिक्षाक रूपमे एकरा लागू किएक नहि करैत अछि? एकरा लागू कएला सँ सरकारक प्रतिष्‍ठा बढ़तैक। नि:सारण मैथिली साहित्‍यक प्राचीनतम परम्‍पराकेँ सुदृढ़ करबाक दिशामे जनजागरणक जयकान्‍त मिश्र जे अभियान चलौलनि एकर मान्‍यतार्थ ओ जे संघर्ष कएलनि, दधीचिक समान हड्डी गलौलनि, तनिक अक्षय अवदानकेँ अक्षुण्ण रखबाक आ ओकरा अग्रगति करबाक प्रत्येक मैथिली भाषी जनमानसक पुनीत कर्त्तव्‍य थिक। एहि परिप्रेक्ष्‍यमे हुनक आलेखादि यत्र–तत्र विविध संग्रहादिमे, पत्रिकादिमे प्रकाशित अछि, वर्त्तमानमे धूलधूसरित भऽ रहल अछि, तकरा संकलित कऽ कए प्रकाशमे आनब प्रत्येक मैथिली भाषीक पुनीत कर्त्तव्‍य थिक। इएह एहि युगपुरुषक प्रति वास्‍तविक श्रद्धाञ्जलि हएत जे हुनक मातृभाषानुरागक प्रति व्‍यक्‍त विचारादि वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे प्रकाशित कऽ कए परवर्त्ती एवं भावी पीढ़ीक दिशा–बोध करएबामे सक्षम भऽ पाओत, अन्‍यथा ओ अक्षय कीर्ति कालक प्रवाहमे गिरि–गहवरमे विलीन भऽ जाएत। ई श्रेय आ प्रेय हिनके धनि जे ओ अपन सत्‍प्रयाससँ मैथिली साहित्‍यकेँ समृद्ध आ व्‍यापक स्‍वरूप प्रदान कएलनि जे मैथिलीक अस्तित्वकेँ सुरक्षित कऽ सकल। हुनका समक्ष कोनो आदर्श नहि छलनि तथापि मातृभाषाक सम्बर्द्धनार्थ ओ आदर्श पुरुष रहथि। ओ मार्ग निर्देशक बनि मातृभाषानुरागक बीजक वपन कएलनि आ ओकर उन्‍नयनार्थ अति महत्त्वपूर्ण कार्य कएलनि। ओ तप, त्‍याग, तपस्‍या, कर्मशीलता, वैचारिक स्‍तरपर सतत अटल–अडिग रहनिहार मैथिली प्रेमी जनमानसकेँ चिरन्‍तन प्रेरणा–स्रोत बनल रहता। ओ अपन अद्वितीय वैदुष्यक जे आदर्श छोड़ि गेलाह ओ मातृभाषानुरागी सतत प्रेरणा–स्त्रोत बनल रहता परवर्ती पीढ़ी पर। हिनक मातृभाषाक बहुमूल्‍य साहित्यिक अवदानसँ अतिशय प्रभावित भऽ विश्रुत भाषाशास्‍त्री प्रोफेसर सुनीति कुमार चटर्जी मैथिली शब्‍द कोशक प्रथम खण्‍डक फारवार्ड लिखलनि जे डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन (1850-1941)क पश्‍चात् भारतमे मैथिलीक सभसँ पैघ चिन्‍तकक रूपमे अजर, अमर आ अक्षुण्ण रहत- His name will be handed down to Posterity in India as the greatest benefactor of Maithili at present day after that of illustrious George Abraham Geierson, and will earn for him gratitude of sixteen millions of Maithili speakers in the first instance …वस्‍तुत: हिनका हेतु ई सौभाग्‍यक बात रहलनि जे अपन जीवन कालमे ओ मैथिलीक विकास आ विस्‍तार देखि पौलनि। डा.रमानन्द झा ‘रमण’ तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी ‘हम आगि आ हमरा प्रज्ज्वलित कएनिहार तन्त्रनाथ बसात।’ - सुभद्र झा राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्रामक आगि जेना-जेना सुनगैत, पजरैत एवं लहकैत गेल, मिथिलाक संग मिथिलाक भौगोलिक सीमासँ बाहर सांस्कृतिक मिथिलाक लोकमे अपन भाषा, साहित्य एवं संस्कृतिक विकास, प्रचार-प्रसार एवं संरक्षणक चेतना सेहो क्रमशः घनीभूत होइत रहल। एहि चेतनाक फलस्वरूप गत शताब्दीक पहिल दशक, मैथिली भाषा-साहित्यक लेल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। सांस्कृतिक मिथिलाक प्रबुद्ध मैथिल, मैथिलीमे पत्र-पत्रिकाक सम्पादन-प्रकाशन ओही दशकमे आरम्भ कएल। एहि सन्दर्भमे विद्यावाचस्पति मधुसूदन ओझा एवं म.म.मुरलीधर झाक नाम आदरक संग स्मरण कएल जाइछ। ओही दशकमे कमसँ कम एक सोड़हि मैथिलीक अवदानी साहित्यकारक जन्म भेल। ओ सभ अपन प्रतिभा अध्ययन-अनुशीलन एवं मातृभाषा प्रेमसँ मिथिला भाषाक मानकीकरण कएल। भाषा लेल विभिन्न प्रकारक प्रतिमान स्थापित कएल। हुनका लोकनिक संघर्षशील व्यक्तित्वसँ मैथिलीक आधार सुदृढ़ भेल। सरहपाद, ज्योतिरीश्वर आ महाकवि विद्यापतिक भाषा मैथिली, राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर भाषा-कुलमे गरिमापूर्ण स्थान पाबि सकल। दोसर दिश ओ सभ अपन-अपन कारयित्राी प्रतिभासँ मैथिली-साहित्यमे उत्कृष्ट विविधवर्णी रचनाक पथार लगा देलनि। हुनका लोकनिक समस्त क्षमता आ ऊर्जा मैथिली साहित्यक संवर्धन लेल तँ छलैके, एहू लेल ओ सभ चिन्तित एवं प्रयासरत छलाह जे आबएबाला युगमे अपन मातृभाषाक प्रति लोकमे सहज अनुराग रहैक, सम्बद्धता एवं प्रतिबद्धतामे कमी नहि आबए तथा साहित्य-सर्जनाक प्रवाहक गति अवरुद्ध नहि हो। एहि हेतु ओ सभ परती-पराँतहु जोति-कोड़ि पर्याप्त भूमि तैआर कए देलनि। आइ हुनके लोकनिक दूरदर्शिता, परिश्रम एवं प्रतापसँ उपजल जजात, हमरा लोकनिक बीचक कतेको गोटे काटि आ ओसा फूससँ, खपड़ा आ खपड़ासँ कोठा पीटि रहल छथि। ओहन-ओहन महानुभावक जन्म शतवार्षिकीक आयोजन निश्चिते श्लाघ्य एवं प्रेरणास्पद अछि। स्वागत योग्य अछि। आयोजकक संगहि ओ व्यक्ति धन्यवादक पात्र छथि। जनिका मनमे ई आयोजन उचड़ल छलनि वा उचड़ैत छनि। सर्वप्रथम हम मैथिली भाषा साहित्यक लेल अत्यन्त महत्वपूर्ण गत शताब्दीक पहिल दशकमे जनमल मैथिलीक साहित्यकार, यथा - अच्युतानन्द दत्त, ईशनाथझा, कालीकुमार दास, कांचीनाथझा ‘किरण’, काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’, गणेश्वरझा ‘गणेश, जयनारायण झा‘विनीत, जीवानन्द ठाकुर, जीवनाथ झा, तन्त्रानाथ झा, दामोदरलाल दास ‘विशारद’, दुर्गाधर झा, नरेन्द्रनाथ दास ‘विद्यालंकार’, प्रबोधनारायण चौधरी, बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्राी’, भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’, महावीर झा ‘वीर’, रमानाथ झा, रमाकान्त झा(नेपाल), लक्ष्मीपति सिंह, शशिनाथ चैधरी, श्रीवल्लभ झा, श्यामानन्द झा, सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, सुभद्र झा, हरिमोहन झा, हरिनन्दन ठाकुर ‘सरोज’ आदिकेँ जे मैथिली साहित्यक खंँाम्ह छलाह, वर्तमान शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम वर्षमे स्मरण करब। सुधी समाजक ध्यान एहि तथ्य दिश आकृष्ट करए चाहब जे उपर्युक्त अवदानी साहित्यकारक सूचीमे अधिकांश लोक सरिसब परिसरक छथि। अथवा सरिसब परिसरसँ अन्य प्रकारेँँ सम्बद्ध छथि वा सरिसब परिसरक शिष्यत्व ग्रहण कएलापर हुनक सर्जनात्मक प्रतिभाक अंकुर प्रस्फुटित भए पल्लवित-पुष्पित भेल अछि। अपन भाषा-साहित्यक प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण लेल सदिखन तत्पर एहि उर्वर परिसरक समागत मातृभाषा अनुरागी एवं विज्ञजनकेँ हमर प्रणाम निवेदित अछि। डा.सुभद्र झा (जन्म 09 जुलाइ, 1909 - देहावसान 13 मइ, 2000) लिखलनि अछि जे ‘हम आगि आ हमरा प्रज्ज्वलित कएनिहार तन्त्रानाथ बसात।’ सुभद्र झा एवं तन्त्रानाथ झा( जन्म 22 अगस्त, 1909 - देहावसान 02 मइ,1984)क पारिवारिक पृष्ठभूमि भिन्न छल, अध्ययन एवं अध्यापनक विषय भिन्न छल, स्वभावो भिन्न छलनि तथापि आगिक दाहकता बसातक गति पाबि तेहन ने ताप उत्पन्न कएलक जे पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृतिक बाटक कतेको ढ़ेङ जरि सुड्डाह भए गेल। प्रतिकूल स्वभाव एवं पृष्ठभूमिक लोकमे एहन समर्पण, निःस्वार्थ मित्र भाव एवं मिलि सामाजिक काज करबाक तत्परताक उदाहरण सर्वथा दुर्लभ अछि। डा.दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ लिखल अछि जे मैथिली साहित्यक सजग प्रहरी सिनेटक सदस्य तन्त्रनाथ झा, अपन अनन्य मित्र डा. सुभद्र झाक संग मैथिलीक स्वीकृतिक सभ कार्यक संयोजन कएल करथि। ओ इहो लिखल अछि जे सुभद्र झाक चतुर-प्रयाससँ तन्त्रानाथ झा सिनेटर निर्वाचित भेल छलाह। से ठीके, जँ डेग-डेग पर डा.सुभद्र झाक सहयोग तन्त्रानाथ झाकेँ नहि भेटल रहितनि तँ विश्वविद्यालयक स्तरपर मैथिलीक मान्यताक हेतु प्रयासरत संग्रामी दलक सफल नेतृत्वक जे श्रेय हुनका भेटि रहल छनि, से सम्भव नहि होइत। आ तखन मैथिली सूर्पनखाक हाथेँ कहिआ ने झपटा लेल गेल रहितथि। तन्त्रानाथ झाक अवदान तन्त्रानाथ झाक अवदानकेँ दू कोटिमे राखि सकैत छी - क.आन्दोलनात्मक एवं ख. साहित्य सर्जना द्वारा मैथिली साहित्यक संवर्धन। तन्त्रानाथ झाक आन्दोलनात्मक काज मोटामोटी चारि प्रकारक अछि - 1. पटना विश्वविद्यालयक उच्चतर कक्षामे मैथिलीक स्वीकृति, 2. शिक्षक समुदायक लेल संघर्ष, 3. शिक्षाक क्षेत्रामे विकास कार्य- चन्द्रधारी मिथिला कालेजमे विभिन्न विषयक पढ़ाइक आरम्भ होएब तथा सरिसबमे हुनक सत् प्रयाससँ कालेजक स्थापना। तथा, 4. अखिल मैथिली साहित्य परिषदक मन्त्रीक रूपमेँ मैथिली भाषा आ’ साहित्यक प्रचार-प्रसार एवं संवर्धन। सामाजिक संलग्नता, सामाजिक कार्यमे रुचिक ह्रास तथा व्यक्ति केन्द्रित विचार-धाराक प्रमुखताक परिणामसँ कतेको मैथिल वा मैथिलीक प्राध्यापक आ सरकारी एवं गैर-सरकारी सेवामे छोट-पैघ ओहदापर सेवारत लोक ई कहैत-बजैत सुनल जाइत छथि जे हमर काज पढ़ाएब थिक, हमर काज लिखब थिक, हमर काज आन्दोलन करब वा मिथिला, मैथिल, मैथिली करब नहि थिक। तन्त्रानाथ झा एवं सुभद्र झा एहि विचारक नहि छलाह जे मैथिलीक अधिकारक हेतु संघर्ष, प्राप्त अधिकारक सुरक्षाक तथा अध्यापन वा साहित्य-सर्जना करब पृथक-पृथक वर्गक लोकक दायित्व थिकैक। ओ साहित्य-सर्जना एवं मैथिलीक आन्दोलनमे सक्रियताकेँ एक दोसरक पूरक मानैत छलाह। साहित्य-सर्जना आ जागरण-अभियानमे सक्रिय कांचीनाथ झा ‘किरण’क नाम आदरक संग एही कारणसँ लेल जाइत अछि। आ इएह कारण थिक जे सभ प्रकारक सरकारी मान्यता, सुविधा, प्रोत्साहन एवं सुरक्षाक अछैतो मैथिलीेक प्राध्यापक अथवा मैथिलीक साहित्यकारक सामाजिक स्वीकार्यता सम्प्रति ह्रासोन्मुख अछि। कोंकणीक प्रसिद्ध लेखक, अङरेजीक शिक्षक एवं संघर्षरथी डा. आर.केलकर लिखल अछि जे अपन भाषाकेँ समृद्ध करबा लेल पहिने ओ सभ साहित्य सर्जना कएल, जखन बोली कहि अपमानित कएल जाए लागल तँ भाषाविज्ञानक छात्र भए गेलाह आ जखन शत्रु सभ हुनकर भाषाकेँ समाप्त करबा लेल एवं गोवाकेँ भारतक मानचित्रसँ पोछि देबाक गम्भीर चालि चलल तँ राजनीतिज्ञ बनि गेलाह। मैथिलीकेँ उचित विश्वविद्यालयीय मान्यता लेल व्यूह रचना कएनिहार एवं साहित्य सर्जक तन्त्रानाथ झा एवं सुभद्र झा हमरा लोकनिक आदर्श पुरुष छथि। तन्त्रानाथ झाक व्यक्तित्वसँ प्रेरणा लेबाक थिक जे आजीविकाक विषय भिन्न रहलहुँपर मातृभाषाक सेवामे जँ मातृभाषाक प्रति अनुराग हो, तँ कोनो बाधा-व्यवधान नहि छैक। आओरो किछु उदाहरण अछि। प्रो. हरिमोहन झा पढ़लनि आ पढ़ौलनि दर्शनशास्त्र मुदा लिखलनि मैथिलीमे। डा.जयकान्त मिश्र आ प्रो. उमानाथ झा पढ़लनि आ पढ़ौलनि अङरेजी, मुदा भंडार भरलनि मैथिलीक। प्रो. प्रबोधनारायण सिंह पढ़लनि आ’ पढ़ौलनि हिन्दी, मुदा आजीवन समर्पित रहलाह मैथिलीक लेल। सम्प्रति स्थिति एवं मानसिकता किछु भिन्न अछि। आन विषयक मैथिल प्राध्यापककेँ, अपवाद छोड़ि, मैथिली पढ़बा-लिखबामे अरुचि छनि आ’ अपन मातृभाषामे रचना करब अपन हीनता बुझैत छथि तँ दोसर दिश मैथिलीक कार्यक्रममे आन विषयक प्राध्यापकेँ मंचस्थ वा सक्रिय देखि मैथिलीक प्राध्यापक कन्हुआइ छथि। अर्थशास्त्रक प्राध्यापक तन्त्रानाथ झाक व्यक्तित्व आ’ मातृभाषा-प्रेम अनुकरणीय अछि। तन्त्रानाथ झाक अवदान - साहित्य-सर्जना तन्त्रानाथ झाक सर्जनात्मक प्रतिभाक दर्शन बाल्यकालहिमे होअए लागल छल। जकर पृष्ठभूमिमे निश्चिते हुनक मातृकुलमे पाण्डित्य एवं साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ परम्पराक प्रभाव रहल होएतनि। मुदा, तात्कालिक प्रेरक भेल छलथिन्ह अग्रज आचार्य रमानाथ झा। ओ हुनकहि प्रेरणासँ ‘साहित्य पत्रा’क लेल माइकेल मधसूदन दत्तक ‘मेघनाद बध’क आदर्शपर ‘कीचक बध’क सर्जना कएल। कोनहुँ कविक पहिल कृति उच्च कोटिक कलात्मक एवं प्रयोगशील हो, अवश्य असामान्य प्रतिभाक द्योतक थिक। तन्त्रानाथ झाक मैथिली साहित्यक सेवा गद्य एवं पद्य- दूनू क्षेत्रमे अछि। पद्य साहित्यक अन्तर्गत अछि ‘कीचक बध’ एवं ‘कृष्णचरित’ महाकाव्य, कविता संग्रहमे अछि ‘मंगलपंचाशिका’, ‘नमस्या’ एवं ‘कीर्ण-विकीर्ण’। गद्यमे अछि ‘एकांकी चयनिका’, किछु निबन्ध, ललित निबन्ध, संस्मरण आदि। ओ किछु कथा सेहो लिखल। बाल कथा लिखल। मिथिलाक्षरक प्रचार-प्रसार लेल अपन हाथेँ किछु कथा लिखि, तकरा लिथो कराए प्रकाशित कराओल। एकर महत्त्व कथा-दृष्टिसँ जतेक हो, मिथिलाक सांस्कृतिक सम्पदा, मिथिलाक्षरक संरक्षण एवं प्रचार-प्रसारक दृष्टिसँ अवश्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। ओ ‘कीर्तिलता’ एवं ‘हितोपदेश’क किछु अंशक भाषा अनुवाद एवं ‘हेमलेट,’ ‘मालती-माधव’ एवं ‘रत्नावली’क गद्यमे नाट्यसार लिखि प्रकाशित कएल। एहि सभमे तन्त्रानाथ झाक विलक्षणक गद्यक दर्शन होइत अछि। हिनक अनुसंधान परक निबन्ध, जे अङरेजी वा मैथिलीमे समए-समएपर विभिन्न पत्र-पत्रिकामे छपल अद्यावधि असंकलित अछि। ओहिमे प्रमुख अछि कवि रविनाथकृत सन 1304 सालक रौदीक वर्णन, सन्तकवि रामदास, Vishnu Puri : The Maithil Vaishnav Savant, Adventures of Maithil Pandits (Sachal Mishra and Mohan Mishra)आदि। तन्त्रानाथ झाक रचना साहित्यक विशेषताक चर्चा विस्तारसँ नहि कए मात्र एक दू बिन्दुक प्रसंग सूत्रमे उल्लेख करब- 1. प्रयोगशीलता - तन्त्रानाथ झा प्रयोगशील रचनाकार छलाह। एहिसँ मैथिली साहित्य लाभान्वित भेल अछि। ‘साहित्यपत्रा’मे महाकाव्यक पारम्परिक मानदण्डक आधारपर कविशेखर बदरीनाथ झाक ‘एकावली परिणय’ छपैत छल जे सामान्य पाठकक रसबोध लेल सरल नहि कहल जाएत। सम्भव थिक तन्त्रानाथ झा सामान्य पाठकक स्थिति बूझि गेल होथि। ओ ओही समय एकावली परिणयक भाषा-शिल्पक विपरीत मुक्त-वृत्त एवं सरल भाषामे ‘कीचकबध’ लिखि मैथिलीक मन्दिरमे अर्पित कए मुक्त-वृत्त शिल्पक मैथिलीमे श्रीगणेश कएल। मैथिलीक पाठक समुदाय लेल ‘कीचक बध’क प्रकाशन गुमकीक बाद सिहकी सन सुखद भेल। एहिना ओ सोनेट लिखल। मैथिली कथाक क्षेत्रमे शिल्प सम्बन्धी जड़ता तोड़ने छलाह। प्रो. उमानाथ झा ‘रेखाचित्र’मे संकलित कथाक माध्यमसँ। एक सर्जनात्मक प्रतिभा सम्पन्न कल्पनाशील रचनाकार साहित्यमे आएल जड़ताकेँ तोड़बाक हेतु कथ्यवर्ग एवं शिल्पवर्गमे कोना प्रयोग करैत अछि, तकर उदाहरण थिक तन्त्रानाथ झाक विपुल साहित्य। 2. तन्त्रानाथ झाक साहित्यमे समाजमे व्याप्त कुरीति, आडम्बर, अन्धविश्वासपर प्रहार अछि। एहि प्रहारक शिल्प व्यंग्यात्मक अछि। ई समस्त साहित्यमे सहज सुलभ अछि। तन्त्रानाथ झाक व्यंग्यक प्रसंग सोमदेवक लिखब समीचीन अछि: मेना-कोकिल, आ बगरामे जेना तेज अछि बाझ। व्यंग्यधारसँ पिजा चोँच छथि से तहिना कवि माँझ।4 3. नारी सशक्तीकरण - एही सरिसब गामक सुआसिन चित्रलेखा देवी5 लिखल अछि जे तन्त्रानाथ झा अनेको पोथी तथा गीत कविता लिखि केँ मैथिल समाजकेँ उठौलनि। तन्त्रानाथ झाक रचनात्मक व्यक्तित्वक प्रसंग एक महिलाक मन्तव्यमे ओहि समाजक प्रसंग तन्त्रानाथ झाक विचार आ सामाजिक स्तरपर हिनक अवदान प्रतिघ्वनित अछि। नारीक सशक्तीकरणक प्रसंग तन्त्रानाथ झाक दृष्टिक उदाहरण भेटैत अछि द्रुपद-सुताक चरित्रांकनमे। कीचकक व्यवहारसँ आतंकित द्रुपद-सुता विचारैत अछि - ‘अबला, भीरु, की हम द्रुपद-राजकुल पाओल जन्म, अबला भीरु कहाबए ? क्षत्रिय-केतु पाण्डु-बधू भए, अबला भीरु कहाए मरब’6। एहि पृष्ठभूमिमे द्रौपदीक आत्मबल जगैत छैक -‘शाद्र्दूली की कखनहु पाबए त्रास?’ आ तखन आत्मबलसँ अभिभूत भए गुम्हरैत अछि - अनल-शिखा-आलिंगन-शील विमूढ़, क्षुद्र पतंग समान होएत जरि भस्म। तन्त्रानाथ झा मानैत छथि जे स्त्राीगण हमरा लोकनिक संस्कृति ओ सभ्यताक हेतु ‘रक्षणविधान’ काज कएलनि ओ कए रहल छथि। सम्प्रति स्त्री-शिक्षाक प्रसार द्रुत गतिएँ भए रहल अछि जे सामाजिक कल्याणक दृष्टिसँ आवश्यक थिक। कोनो समाज अर्धांशकेँ अशिक्षाक अन्धकार मध्य राखि उन्नतिपथपर अग्रसर नहि भए सकैत अछि।7 डा. सुुभद्र झा सुभद्र झा अपन अनन्य मित्र तन्त्रनाथ झा जकाँ सौभाग्यशाली नहि छलाह। अन्यथा हुनकहु प्रकाशित-अप्रकाशित साहित्य आजुक पाठकक लेल सुलभ भए गेल रहैत। हमरा जनैत एकर तीनटा प्रमुख कारण अछि - 1. भाषा-साहित्यक अध्ययन-अध्यापनमे कठिन भाषा विज्ञान सुभद्र झाक कार्य-क्षेत्र छल। दुर्योग एहन जे बिहारक कोनो विश्वविद्यालयमे स्वतन्त्रा भाषा विज्ञानक विभाग अद्यावधि नहि अछि। एहन कठिन विषय के पढ़त आ पढ़ाओत? एक भाषा वैज्ञानिकक शिष्यत्व के ग्रहण करत? जँ शिष्ये नहि तँ गुरुक वैदुष्यक प्रचार-प्रसार, स्थापनाक खंडन-मंडन एवं साहित्यक संकलन-प्रकाशन कोना होएत? ओ स्वयं लिखने छथि जे हम ‘आगि’ छी। आगिक प्रयोजन तँ सभकेँ होइत छैक, मुदा पकबाक डरसँ केओ छूबैत नहि अछि, देह-हाथ सेदि कात भए जाइत अछि। 2. सुभद्र झा भाषाविद छलाह, शास्त्र-मर्मज्ञ छलाह। देश-विदेशमे एक भाषाशास्त्रीक रूपमे आदर आ सम्मान छलनि। मुदा ओ कविता, कथा, नाटक, एकांकी, उपन्यास आदि नहि लिखल। मंचपर जाए अपन हास्य-व्यंग्यक माध्यमसँ लोकक मनोरंजन नहि कएल। विद्वत्जनक बीच आदरक पात्र सुभद्र झा सामान्य पाठकक लोकप्रिय रचनाकार होइतथि कोना? तथा, 3. सुभद्रझा सन कीर्तिपुरुषक संतानमे हुनक कृतिक संरक्षण एवं प्रचार-प्रसारक प्रति अभिरुचिक अभाव अछि। एहिसँ हिनक प्रकाशित रचना दुर्लभ भए गेल। अप्रकाशित प्रकाशमे नहि आबि सकल अछि। सुुभद्र झाक कृृति: संस्कृत, हिन्दी, अङरेजी, फ्रेंच एवं जर्मन भाषाक ज्ञाता सुभद्र झाक पहिल रचना कोन थिक आ से कहिआ छपल तकर जनतब तँ हमरा नहि अछि। मुदा, हमरा जे हिनक प्रकाशित पहिल रचना देखबाक अवसर भेटल अछि से थिक मिथिला मिहिरक एकसँ बेसी अंकमे प्रकाशित ‘मैथिली भाषाक उत्त्पति’8 विषयक लेख। एहि लेखमे जाहि प्रकारेँ विभिन्न विद्वानक मतक खंडन-मंडनक उपरान्त अपन मत स्थापित कएल अछि, सुभद्र झाक गम्भीर अध्ययनक द्योतक थिक। दोसर थिक ‘मैथिलीमे संख्यावाचक शब्द ओ विशेषण’9। इहो थिक ओही मूल-गोत्रक। एहिसँ ई स्पष्ट अछि जे सुभद्र झाक प्रिय विषय भाषा विज्ञानक अध्ययन छल आ मैथिलीक भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण करब हुनक इष्ट छलनि The Formation of The Maithili Language क अनुसार ओ सर्वप्रथम पटना कालेजक डा.ए.बनर्जी शास्त्रीक निर्देशनमे काज आरम्भ कएल। मुदा समाप्त भेलनि डा.सुनीति कुमार चटर्जीक निर्देशनमे।10 सुभद्र झाक रचना दू प्रकारक अछि। पहिल कोटिमे अछि मैथिली भाषा सम्बन्धी अङरेजीमे लिखित साहित्य। एहि कोटिमे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि The Formation of The Maithili Language11 आ The Songs of Vidyapati.12 The Formation of The Maithili Language हिनक शोध प्रबन्ध थिक जाहिपर पटना विश्वविद्यालयमे डी.लिट क उपाधि भेटल छलनि तथा The Songs of Vidyapati नेपाल स्रोतक आधारपर विद्यापतिक 262 गीतक संग्रह थिक। एहिमे विद्यापति गीतक भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण एवं गीतक अङरेजी अनुवाद अछि। दोसर कोटिमे अबैत अछि मैथिलीमे सम्पादित एवं लिखित पोथी सभ। ‘विद्यापति-गीतसंग्रह’’मे विद्यापतिक 370 गीत अछि। एहि संग्रहक भूमिका लेखक छथि प्रो.आनन्द मिश्र। विदेश यात्रा वर्णनक दू टा पोथी ‘प्रवास जीवन’(1950) एवं ‘यात्रा प्रकरण शतक’(1981) छनि। ओ 27 अगस्त,1946 ई केँ दू वर्षक लेल पटना विश्वविद्यालक अनुदानपर तथा महाराज कामेश्वर सिंहसँ प्राप्त आर्थिक सहयोगसँ उच्च शिक्षा हेतु फ्रांस गेल छलाह। ओतए ओ अर्थवेदक पैप्लाद, आधुनिक भाषा विज्ञान तथा ध्वनि विज्ञानक विशेष अध्ययन कएल।13 ओही यात्राक विलक्षणक वर्णन एहि दूनू पोथीमे अछि। ‘नातिक पत्राक उत्तर’ पत्रात्मक शैलीमे कहि सकैत छी जमाहिर लालक Discovery of Indiaक शैलीमे लिखित पोथी थिक। ओ अनेको जर्मन आ फ्रेंचमे लिखित पोथीक अनुवाद हिन्दी आ’ अङरेजीमे कएने छथि।14 जे जर्मन आ फ्रेंचमे हिनक असाधारण अधिकार देखबैत अछि। मुदा हिनक एहि विद्वता एवं ज्ञानराशिक फलसँ मैथिली वंचित रहि गेल। सुुभद्र झाक महत्व: 1. यद्यपि सुभद्र झाक पूर्वहु किछु विदेशी आ किछु भारतीय भाषाविद मैथिली भाषाक अध्ययन प्रस्तुत कएने छलाह। मुदा, पहिल व्यक्ति भाषाविद डा.सुभद्र झा भेलाह जे एतेक गम्भीरता एवं विस्तारसँ मिथिला भाषाक विश्लेषण कएल जाहिसँ विश्व-भाषाक मानचित्रपर मैथिलीकेँ प्रतिष्ठापित होएबामे भाषावैज्ञानिक आधार भेटल। 2. विद्यापति गीतक भाषा शास्त्राीय विवेचन एवं गीतक अनुवाद अङरेजीमे कए विद्यापति गीतक महत्वकेँ सर्वप्रथम अन्तरराष्ट्रीय पाठकक समक्ष आनल। 3. मैथिलीक विदेश यात्रा साहित्यक पहिल लेखक छथि सुभद्र झा। सुभद्र झासँ पूर्वहु कतोक मैथिली विदेश यात्रा कएने छल होएताह। पूर्वक अपेक्षा बेसी लोक देश विदेश भ्रमण, उच्च शिक्षा वा आजीविका हेतु जाइत अछि, मुदा डा.जगदीशचन्द्र झाकेँ छोड़ि यात्राक क्रममे प्राप्त अनुभवकेँ मैथिलीमे लिपिबद्ध कए अपन मातृभाषाक यात्रा साहित्यक संवर्धन कएनिहार कम लोक छथि। आ’ सेहो एतेक सूक्ष्मता एवं व्यापक रूपसँ। 4. ‘नातिक पत्रक उत्तर’मे एक इतिहासकार जकाँ, किन्तु सरल भाषा एवं नव ढ़ंगें ओ मैथिलीक स्वीकृति हेतु कएल गेल आन्दोलन एवं विभिन्न समस्या आदिपर अपन विचार निर्भीकता एवं स्पष्टताक संग प्रस्तुत कएल अछि। एकरा जँ भाषा-आन्दोलनक विचार प्रधान इतिहासक पोथी कही, तँ अत्युक्ति नहि होएत। 5. डा.सुभद्रझा राष्ट्रीय भावना एवं मिथिला, मैथिल एवं मैथिलीक प्रेमसँ ओतप्रोत छलाह। हिनक एहि रूपक दर्शन ‘प्रवास जीवन’ एवं ‘यात्राप्रकरण शतक’सँ होइत अछि। पेरिसमे हिनक वस्त्राभरण देखि दर्शक सभ डा. एस.राधाकृष्णनक समक्षहिमे हिनकहि डा. एस.राधाकृष्णन् बूझि आकर्षित भए गेल छलाह।15 6. प्राच्य विद्याक गम्भीर वेत्ता, भाषाविज्ञानक प्रकाण्ड पण्डित, भाषाविद, सफल अनुवादक, सहजता आ सरलताक प्रतिमूर्ति, सदिखन अनुसंधानरत शोध-निर्देशक, विद्वानक बीच विद्वान एवं सामान्यक बीच सामान्य, निरअहंकारी डा.सुभद्र झा मिथिलाक सारस्वत परम्पराक एक एहन विभूति छथि जनिक नामहिसँ मैथिल समाज अपनाकेँ गौरवान्वित अनुभव करैत अछि। अन्तमे कहए चाहब जे आन्दोलनी भाषाविद साहित्यकार डा. सुभद्र झा कविता, कथा, उपन्यास आदि लिखि मैथिलीक लोकप्रिय लेखक वा मंचासीन भए श्रोता-दर्शकक आकर्षणक केन्द्र भनहि नहि भेल होथि। मुदा, राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर विज्ञजनक बीच जतेक ओ पढ़ल जाइत छथि वा उद्घृत होइत छथि, से किनसाइते मैथिलीक महानसँ महान लेखककेँ सौभाग्य भेल होनि वा होएतनि। ई मात्र डा.सुभद्र झा थिकाह जे मैथिलीक भाषा-वैज्ञानिक विश्लेषण, भाषा विज्ञान सम्मत तथ्यक आधारपर विस्तारसँ कएल एंव मिथिला भाषाक विशेषतासँ लोककेँ परिचित कराओल। मैथिली भारोपीय कुलक एक स्वतन्त्र भाषा थिक, ताहि प्रसंग पर्याप्त सामग्री एवं तर्क विश्व समुदायक समक्ष राखल। आ’ बेर पड़लापर एक नीतिकुशल कूटनीतिज्ञ जकाँ प्रतिकूलहुँ केँ अनुकूल बनाए पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृति हेतु लोकक सङोर कए अपन मातृभाषा मैथिलीक हित-साधनमे सहायक भेलाह। 1. तन्त्रनाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ,1980, पृ.सं.84 2. तन्त्रानाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ, 1980, पृ.सं. 12, डा.दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ 3. Our language was the symbol of our identity and we took to writing in this language so as to serve in its progress.When our language was insulted as being only a dialect, we turned to be students of linguistics.When finally our enemies made serious attempts to wipe out the language and very place of origin, Goa from the political map of India, then we turned to be politicians. -Planning for the Survival of Konkani. - Dr.R. Kelkar, Goals and Strategies of Development of Indian Languages,1998, CIIL Mysore./2 ............................. ४.सोमदेव- तन्त्रनाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ, पृ.सं.१४५ 5. चित्रालेखा देवी, अवोधनाथ, 2008 पृ. सं. 5 6. कीचक बध, चारिम सर्ग, तन्त्रानाथ झा अनुपम कृति, पृ.सं. 68, 7. तन्त्रानाथ झा अनुपम कृति, 2004, झा, पृ.सं. 525, 8. मिथिला मिहिर, 06 नवम्बर, 1936 9. भारती,अप्रैल, 1937. 10. The Formation of The Maithili Language, Preface, Luzac & Company , Ltd, London,1958 11. The Formation of the Maithili language is a brilliant contribution to scientific analysis of the Maithili language, which is spoken by about 2 crores people of Nepal and India. This Maithili language has been the literary vehicle of the Vaisnava poets of Bengal, Assam and Orissa and has inspired the poets of Bengal from Chandidasa upto Rabindranath Tagore. Maithili is from political point of view to be included in the dialects of Hindi, while linguistically it stands in between Bengali and Hindi and is different from both especially on account of each verb forms. It has its own structural form, although it is an Indo-Aryan language, its special features make it different from each of the literary modern Indian languages.- Luzac & Company , Ltd, London,1958- www. Vedicbooks.net 12. The Songs of Vidyapti, 1954, Motilal Banarsi Dass, Vanarasi  14.(i).Grammar of the Prakrit Language by R.Pischal - Translator- Subhadra Jha, (ii).History of Indian Literature by M.Winternitz- Transator- Subhadra Jha- Bhartiya Sahitya ka Itihas, (iii).The Abhidharmakosa of Vasubandu Chapter I & II with commentary Annoted and rendered into French from Chinese - translated into English by Subhadra Jha - K.P.Jayaswal, Patna, 4. A Descriptive Catologue of The Sanskrit Manuscripts-338 pages, 5. A Descriprtive Catologue of The Sanskrit Manuscripts-362 pages etc. @5 15. यात्रा प्रकरण शतक, 1981, मैथिली अकादमी, पृ.सं.62 - श्रीराधाकृष्णन्के ँविशुद्ध साहेबी ठाठमे बैसल देखल, ओ माथ पर मुरेट्ठा सेहो नहि बन्हने रहथि। प्रदर्शनी देखि जाहि बड़कीटा बेंचक एक छोरपर राधाकृष्णन् बैसल रहथि तकर दोसर छोरपर हम आ’ मनकूर बैसि गेलहुँ। हम मिरजइ आ’ धोतीमे रही। ते ,ँ जे आगन्तुक राधाकृष्णन् के ँ चिन्हैत रहन्हि से हुनका लग जाए भारत, भारतक सभ्यता आदिक विषयक चर्चा हुनकासँ करए आ’ जे हुनका नहि चिन्हैत रहैन्हि, से हमरे वेष-भूषाक आधार पर हमरे राधाकृष्णन् बूझि ओहि प्रसंग चर्चा करए। परिणाम ई भेलैक जे हुनका लग सात वा आठ व्यक्ति मात्रा रहलैन्हि मुदा हमरा तीन दिशासँ पचासक अन्दाज लोक घेरि लेल। आ’ हमहुँ ककरो भान नहि होअए दिऐक जे हम राधाकृष्णन् नहि छी। 16. Bachcha Thakur- Subhadra Jha - 'Close to nature, people till his very last - 'A vibrant intellectual in the midst of intellectuals, an ordinary man in the midst of the ordinary , a Maithil Brahmin in the midst of of his castemen, a casteless figure in the midst of the men of the cross-sections of the society, a progressive in the midst of progressives, a leftist in the midst of rightists, Dr.Jha epitomised the vast vistas of divergent crosss-currents in him with oceanic calm and poise.' - The Indian Nation, Patna, 22 May, 2000. श्यामसुन्दर शशि श्रद्धांजलि आह उमा ! वाह उमा ! आह उमा ! वाह उमा ! ठिक्का डेढ़ वर्ष पूर्व रेडियो टुडेक वास्ते कार्यक्रम संचालक आ समाचार वाचककेँ छनौट प्रकृयाक क्रममे पहिल बेर जनकपुर उद्योग वाणिज्यि संघके सभाकक्षमे हमरा ओकरासंग भेंट भेल छल। ओ प्रतिस्‍पर्धीक रुपमे हमरासभक सामने खाढ छलीह आ हम, जनकपुर टुडेक सम्पादक बृजकुमार यादव, संचारकर्मी तथा साहित्यमकार रमेशरंजन झा, रेडियो टुडेक प्रवन्धक निर्देशक अनुराग गिरी एवं पत्रकार महासंघ धनुषाक वर्तमान सभापति उमेश साह परीक्षककेँ रुपमे छलहुँ । तहिया ओ २३वर्षक छलीह मुदा आधुनिक युगक एहि युवतीमे आधुनिकताक नामोनिसान नहि छल। मलिछांह रंगक समीज—सलवार, सामान्य चप्पल, मेकअप विहीन सादा मुदा चमकैत मुखमण्डिल, नदी किनारमे लत्तरिक फूलल अनेरुवा गुलाव जका लागि रहल छलीह ओ। ओकर सुख्खल देह यष्टिा ओकर भीतरके पीडाक बखान कऽ रहल छल । स्नातकक अन्तिम वर्षक परीक्षाक वाद ओ व्याभवसायिक जीवनमे प्रवेश करए चाहैत छलीह । यद्यपि एहिसँ पूर्व सेहो ओकर संचार जगतसंग प्रत्यक्ष आ परोक्ष सम्बरन्धा रहैक।छापा आ विद्युतीय संचार सम्बोन्धीत अनेकौ तालिम, सभा सेमिनार आदिमे सहभागी भऽ चुकल ओहि युवतीक सपना रहैक—रेडियोक लेल समाचार संकलन करबाक आ अपन भाषा मैथिलीमे समाचार वाचन करबाक। हमरालोकनि ओकरा ई मौका सेहो उपलब्ध कराओल । साँच कही तँ ई अवसर हमरालोकनि दयासँ नहि ओकरा अपनहि प्रतिभाक वलपर प्राप्त भेलैक। हमरालोकनि निमित्त मात्र बनलहुँ। आओर बेसी कही तँ प्रतिष्पर्धी सभ मध्यओ सर्बोत्तम छलीह ।लगभग तीन वर्ष पूर्व माओवादी द्वारा पिता आ भैयाकेँ वेपत्ता बनौलाक बादसँ ओकरा बहुत किछु कहवाक छलैक। सम्भ्वतः अपन बात कहवाक वास्ते तँ ओ संचारक्षेत्रमे आवए चाहैत छलीह। अएवो कएलहि। एहि तरहे अपन सादगी आ प्रतिभाक वलपर पहिलहि भेंटमे हमरा मात्र नहि सभ परीक्षककेँ प्रभावित करए वाली ओ युवती छलीह हमर सहकर्मी आ विद्यार्थी उमा सिंह । तकराबाद एक महिने तालिम आ करीव ९महिना ओकरासंग काज करबाक मौका भेटल । हमर आठ महिने कतार प्रवासक क्रममे सेहो उमासंग बेर बेर ईन्टंरनेट मार्फत बात --चित भेल अछि । एहि बीच ओकर एकगोट उलहन रहैत छलनि—सर अहाँक गेलाक वाद हमर भाषाक शुद्धा-शुद्धी केओ नहि देखि दैत छथि । ओएह उमासिंहक विषएमे सोम दिन भोरे अत्यरन्त् अशुभ समाचार सुनलहुँ । भोरे ओछानेपर छलहुँ तखने जनकपुरक एक गोट सहृदयी मित्र फोन कऽ कऽ ई अशुभ समाचार सुनौने छलाह। मोन घोर भऽ गेल छल । एक गोट फूलके नीकसँ फूलवासँ पहिनहि निचोरि देल गेल अछि । कोन अधर्म कऽ कुदृष्टिम पडि़ गेलै एहि सम्भावनावान मज्जनरिपर? भोरेसँ घटनाक विवरण आ कारणपर गंथन मन्थनन कऽ रहल छी। मुदा एक्कहीगोट निचोडपर पहुचैत छी । जे भेल से बड़ अधलाह भेल । एकगोट अक्षम्यण अपराध । उमामे एकगोट संचारकर्मीमे होवएवला सभ गुण छल। ओ अध्ययनशील छलीह, मेहनती छलीह, निडर छलीह आ पेसाप्रति निष्‍टावान सेहो। सम्भवतः हुनकर ईहे गुण, हुनकर मृत्युक कारण बन्‍ाल। लगभग तीन वर्ष पहिने माओवादी कार्यकर्तासभ उमाक पिता रंजीत सिंह आ भैयाके सिरहाक रामनगर मिर्चैयासँ अपहरण कऽ बेपत्ता बनौने छल। दुनूगोटेक एखनोधरि कोनो अत्ता—पत्ता नहि छनि। घरक मुखियासभ बेपत्ता बनौलाक वाद उमा अपन घरक एसगर मुखिया छलीह। बेसहारा माए, भाउज, बहिन आ भतिजा—भतिजीक देखभाल आ अपहरित पिता तथा भैयाक खोजीक पहल करब हुनके जिम्मासमे आवि गेलै। बाबू आ भैयाक अपहरण पश्याछत् घरक बिगरैत आर्थिक संकटक भार सेहो ओकरेपर छलै । पारिवारिक जिम्मेवारी वोधक कारणे ओ एखनधरि विवाह पर्यन्त नहि कएने छलीह । अपन पिता आ भैयाक मुक्तिेक लेल ओ राष्ट्रिय तथा अन्तरराष्ट्रिय निकाय सभमे हार गुहार करैत आएल छलीह । जाधरि ओ सिरहामे छलीह हुनका बेर-बेर धमकी देल जाईत छलनि । धमकीक कारणसँ सेहो ओ सुरक्षित वसोवासक वास्ते। जनकपुर आएल छलीह मुदा एतहु सुरक्षित नहि रहि सकलीह । करीव दू वर्षसँ ओ जनकपुर नगरपालिका १४, रजौल स्थित एक साथीक घरमे भाड़ापर रहैत आएल छलीह। रविदिन सनध्‍याक सात वजे ओ अपन एहि डेरामे छलीह तखने हतियार धारीक एक समूह आएल आ हुनका उपर अंन्धाधुन्‍न खुकुरी प्रहार कएलक। जाहिसँ ओ गंभीररुपसँ घाइल भेलीह। रेडियो टुडेेमे कार्यरत महिला पत्रकार उमाके उपचारार्थ काठमाण्डू लऽ जाईत काल बाटेमे मृत्यु भेल छल। समाचारक बिषए लऽ कऽ हुनक हत्यार भेल हएवाक प्रारम्भिकक अनुमान अछि । नेपालमे हत्याे कएल गेल उमा पहिल महिला पत्रकार अछि। दोषीकेँ पहिचान आ गिरफ्तारी नहि होएवा धरि उमासिंहकेँ हत्यारक वास्तविक कारण पत्ता लागव कठिन अछि । वर्तमान सरकार दोषी पत्ता लगा दोषीकेँ दण्डि तँ करत तकर सम्भानवना बहुत न्युनतम अछि मुदा पत्रकार उमासिंहक बलिदान बेकार नहि जाएत कारण कलमक धार अवरुद्ध करएबला कहियो जिवीत नहि रहि सकल अछि। कलमक नीव तोडए वला सभक अस्विए वल समेत नस्टय भेल घटनाक साक्षी ईतिहास अछि । अपन देशक रक्षा वास्ते रणक्षेत्रमे मृत्युए वरण करएवला सैनिककेँ शहीद कहल जाईत अछि । ओ मृत्युन आदरण्‍ीय होईत अछि जे देशक हितमे भेल रहैत अछि । उमा ! अहाँ सौभाग्यशाली छी । समाचार लिखवाक आ पढवाक कारणसँ अहाँ प्राण गेल। मनुक्खिक नैसर्गिक अधिकारक वकालत करैत प्राण देनिहारि हे बीराङ्गणा ! अहाँ दुनियाभरिक कलमजिवी सभक मनमानसमे रहव । आह उमा ! वाह उमा ! अन्तिमे गुरुवर डा.धीरेन्द्रेक एहि पंक्ति द्वारा श्रद्धा सुमन व्यक्त करए चाहव स्वीकार करु । हे ! हमर सहकर्मी आ शिष्याग । नोरक टघारेसँ जीवन जँ निर्मित आशा केर कमल अछि हृदय केर दहमे कठिन युद्ध अछि ई तँ लडिए रहल छी । हारव ने कहियो अहंक (हमर) जीत निश्चिित । साहित्‍यकार डा. धीरेश्‍वर झा धिरेन्‍द्रक ६ ठम वार्षिकीपर विशेष नमन गुरुदेव नेपालीय मैथिली साहित्‍यक जनक एवं जनकपुरक चटिसारक अन्‍तिम प्राचार्य गुरुदेव डा. धीरेश्‍वर झा ‘धिरेन्‍द्र’क छठम् स्‍मृतिसभा पुस २७ गते सम्‍पन्‍न भेल अछि । हुनकर वरदहस्‍त प्राप्‍त कऽ एखन धुरन्‍धर खेलाड़ी बनल साहित्‍यकारलोकनि हुनका स्‍मरण कएलनि कि नहि से ओएह जानथि मुदा हुनकेँ प्रेरणासँ जन्‍मग्रहण कएने मिथिला नाट्यकला परिषद धरि हुनका अवश्‍य स्‍मरण कएने छल । एहि अवसरपर भाषण-भुषण आ किछु घोषणा सेहो भेल । सभकेँ बुझल अछि जे नेतासभक भाषण निष्‍प्रभावी भऽ रहल आजुक युगमे भाषणक प्रति आमजनकेँ विश्‍वास घटि रहल छनि । ओना हुनका कोनो मन्‍चपर चढि़क स्‍मरण करी वा मोने-मोन, कोनो अन्‍तर नहि छैक । कारण देवताक पूजा मोने- मोन सेहो कएल जा सकैए। आ असली पूजा तँ देवताक देखाओल बाटपर चलब थिक । हुनकर आदर्शकेँ पालना करब थिक । हँ जहाँधरि घोषणा करबाक गप्‍प अछि तँ एतुका वहुत संस्‍था आ व्‍यक्‍ति बहुत किछु घोषणा कऽ चुकल छथि । आव देखवाक अछि जे ई घोषणा सभ कार्यरुपमे आएल कि नहि ? हम जहन गुरुदेवकेँ जनकपुरक चटिसारक अन्‍तिम प्राचार्य लिखए लागल छलहुँ तँ मोनमे नाना प्रकारक चिन्‍ता व्‍याप्‍त छल । कारण जनकपुरमे सम्‍प्रति जे कलमजिवीसभ सकृए अछि , ओहोसभ कोनो हिसावसँ कम नहि छथि । सभक संग नाम, दाम आ मुकाम छनि । एहना अवस्‍थामे केओ कहि सकैत छथि जे ‘ओ अन्‍तिम प्राचार्य कोना भऽ गेलाह।’ मुदा एहि वास्‍ते हम मैथिली एमएक पहिल बैचक जमावड़ाक दृश्‍य उदघाटन करए चाहव । ओना उमेरक कारणे हमरा एहि भितरक तिरीभिटीक जानकारी नहि अछि मुदा हम जे देखल से कहए चाहव । गुरुदेवक भागिरथी प्रयाससँ राराव क्‍यम्‍पसमे मैथिलीमे एमएक पढाई सुरु भेल छल । मैथिलीक बादे राजनिती शास्‍त्र, अर्थशास्‍त्र किंवा अन्‍य विषएमे स्‍नातकोत्तरक पढाई शुरु भेल । सभकेँ सुखद आश्‍चर्य लागि सकैए जे मैथिलीक एमएक पहिल बैचक विद्यार्थीसभ छलाह सर्वश्री डा. राजेन्‍द्रप्रसाद विमल, जानकी रमण लाल, रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ डा. पशुपतिनाथ झा, डा. रेवतीरमण लाल, रुद्रकान्‍त झा ‘मडई’, प्रो. परमेश्‍वर कापडि, नमोनाथ ठाकुर, नागेश्‍वर सिंह आदि आदि । ताहु समएमे सभकेँ सभ अपन-अपन मुकामपर छलाह। चुकी अधिकांश विद्यार्थी नोकरियाहा छलाह तेँ कक्षा भोरमे संचालित होइत आ अधिकांश कक्षा गुरुदेवक घरेपर संचालित होइत । चाह पानक दौर चलैत आ पढाई लिखाई सेहो । हम, घुटुल आ पुटुल चाह पान लावएमे परेसान रही । हँसीक पमारा छुटैक , विभिन्‍न विषएपर गंथन-मंथन होइत आ गुरुदेव डिक्‍टेशन लिखवथिन। हमरा मोन अछि भाषा विज्ञानक कापी तैयार करैत काल गुरुदेव जानकी बाबू आ विमलसरसँ बेर-बेर राय सल्‍लाह कएल करथि । यदि अधलाह नहि लागए तँ स्‍वीकार करए पड़त जे ओएह कापीक आधारपर एखनो मैथिली एमएक विद्यार्थीसभ परीक्षामे पास करैत छथि । एखनो जनकपुरमे मैथिली विद्वानक कमी नहि अछि । मैथिलीक प्राध्‍यापककेँ सख्‍याँ सेहो पहिनेसँ बेसी अछि । कि एखन गुरुदेव द्वारा चलाओल गेल चटिसार चलैत अछि ? यदि नहि तँ हुनका जनकपुरक चटिसारक अन्‍तिम प्राचार्य कहवामे कि हर्ज ? गुरुदेवकेँ स्‍मरण करैत काल एकगोट आओर विषए मोन परैत अछि । ओ ई जे ओ मैथिली भाषाक साहित्‍यकारटा नहि छलाह । साहित्‍यकार श्रृजना करएबला ब्रम्‍हा सेहो छलाह। केओ मानथि वा नहि मानथु ओ महेन्‍द्र मलंगियाकेँ नाटक लिखवाक प्रेरणा आ सिख दुनू देलथिन । रेवती रमणलालकेँ रिपोर्ट लिखवाक आदेश देलथिन । रामभरोस कापडि़केँ कविता आ गीत एवं भुवनेश्‍वर पाथेयकेँ कविता आ कथा लिखवाक जिम्‍मेवारी देलथिन । प्रतिभा आ रुचिक अनुसार गुरुदेव द्वारा कएल गेल ई जिम्‍मेवारी विभाजनक पाछा बहुत पैघ उद्येश्‍य छल हेतनि। ओ चाहने हेताह जे नेपालीय मैथिलीमे सेहो सभ विधामे रचना हो। पाछा जा से भेवो कएल। भलेंहि भारतीय हुनकेँ किछु शिष्‍य द्वारा षडयन्‍त्र कएल गेल हो मुदा ‘नेपालीय मैथिली साहित्‍य’क नामाकरण ओएह कएने छलाह । हे गुरुदेव । अहाँ प्रेरणा दियौ जे जनकपुरमे फेरसँ गुरुकुल परम्‍परा चलि सकए । चुकी एखन साहित्‍य श्रृजनसँ बेसी मैथिल सभकेँ अधिकारक आवश्‍यकता छैक । मैथिलकेँ अपन राजपाट होईक आ अपन भाषामे काज कऽ सकए । ओना हमरा मोन अछि अपनेक ओ जीद्द नोरक टघारेसँ जिनगी जँ निर्मित आशाकेर कमल अछि हृदयकेर दहमे कठिन युद्ध अछि ई तँ लडिए रहल छी हारब ने किन्‍नहु , हमर जीत निश्‍चित ।। अपनेक अनुचरलोकनि अपनेक इच्‍छाकेँ अवश्‍य पूरा करत । नवेन्दु कुमार झा अंशकालिक सभाचार वाचकसँ अनुवादक मैथिली ’संवाद’, प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी, पटना चेतना समितिक आम सभामे नव पदाधिकारीक भेल चुनाव मिथिलांचलक प्रतिनिधि सामाजिक संस्था चेतना समिति पटनाक सम्पन्न भेल वार्षिक आम सभामे वर्ष २००९-११क लेल नव पदाधिकारीक चुनाव कएल गेल। सम्पन्न चुनावमे उपाध्यक्षकेँ छोड़ि आन पदाधिकारी निर्विरोध चुनल गेलाह। समितिक निर्वर्तमान अध्यक्ष विजय कुमार मिश्र पुनः अध्यक्ष बनलाह तँ सचिव पदपर विवेकानन्द ठाकुर निर्वाचित भेलाह अछि। उपाध्यक्षक तीन पदक लेल भेल मतदानमे प्रेमकान्त झा, प्रमीला झा आ पुरुषोत्तम झा निर्वाचित घोषित भेलाह अछि। मधुकान्त झा, सत्यनारायण मेहता आ प्राणमोहन मिश्र संयुक्त सचिव, योगेन्द्र नारायण मल्लिक कोषाध्यक्ष, जगत नारायण चौधरी, संगठन सचिव आ सुरेन्द्र नारायण यादवकेँ प्रचार सचिव बनाओल गेल अछि। भाषाई अकादमीक विकासक लेल उठल सरकारक डेग बिहारमे लोक भाषाक समृद्धि आ भाषाक विकासक लेल कतेको भाषाई अकादमी कार्यरत अछि मुदा एहि अकादमी सभक ठेकान पाता लगाएब मुश्किल अछि। बदहालीक मारि झेलि रहल अकादमी सभक जखन विकास नहि भऽ सकल तँ ओ भाषाक कतेक विकास करत ई सोचब अनुचित होएत । प्रदेशमे कार्यरत मैथिली, मगही, भोजपुरी, संस्कृत, बग्ला आ दक्षिण भारतीय भाषा अकादमी एखनो विकाससँ कोसो दूर अछि जहॉ-तहॉ चलि रहल एहि अकादमी सभ एखन धरि कोनो स्थायी ढेकान नहि अछि । न्यायक संग विकासक तीन वर्ष पूरा कऽ चूकल वर्तमान राजग सरकारक नजरि आब एहि अकादमी दिस गेल अछि। एहि संस्थान सभ काम काज पटरीपर अनबाक लेल प्रयास शुरू कएलक अछि । मानव संसाधन विकास विभागक नियंत्रणाधीन एहि संस्थान सभक विकासक लेल एकटा ब्लू प्रिन्ट विभाग द्वारा तैयार कएल गेल अछि । एहि योजनाक अन्तर्गत विभाग एहि भाषाई अकादमी सभमे शोधक काजक संगहि पाण्डुलिपि सभक प्रकाशन आ ओकर बिक्रीक व्यवस्था करबाक योजना बनाओल जा रहल अछि । राजधानीमे जत्र-तत्र चलि रहल एहि संस्थान सभक कार्यालय एक छतक नींचा अनबाक प्रयास सेहो तेजीसँ चलि रहल अछि । सभ भाषाई अकादमी एकहि परिसरमे रहए एहि लेल राजधानीमे स्थलक चयन कएल जा रहल अछि । एहि क्रममे बिहार राष्ट्र्भाषा परिषद् परिसर आ एहि लगमे स्थित संस्कृत विधालयक खाली पड़ल जमीनक चयन कएल गेल अछि । विभाग एहि दूनू स्थानमे सँ कोनो एकटा स्थानपर सभ भाषाई अकादमीक लेल सुविधा सम्पन्न परिसर बनैबापर गंभीरतसँ विचार कऽ रहल अछि । सरकारक मंशा एहि अकासमी सभक उद्देश्य पूरा करब अछि आ एहि क्रममे पहिल प्राथमिकता एहि लेल आधारभूत संरचनाक विकास करब अछि । एकर बाद स्थानीय भाषाक विकास आ शोधक काज शुरू कएल जाएत संगहि पाण्डुलिपिक प्रकाशन आ प्रकाशित पुस्तकक ब्रिक्रीक व्यवस्था कएल जाएत जाहिसँ एहि अकादमी सभकेँ आर्थिक रूपसँ मजगूत बनाओल जा सकए । कतेको वर्ष पूर्व जाहि उदेश्‍यसँ एहि संस्थान सभक गठन कएल गेल छल ओहिमे कतबा सफलता भेटल से एहि संस्थान सभक वर्तमान स्थितिकेँ देखि स्पष्ट भऽ जाईत अछि । प्रारंभिक कालमे अपन उद्देश्य दिस बढ़ल एहि संस्थान सभक गतिविधि कतेको वर्षसँ मंद पड़ल अछि । मात्र किछु गोटेक दरमाहा आ किछु साहित्यकारकेँ महिमा मंडित करए बाला एहि संस्थान सभक गतिविधि सुचारू रूपसँ चलैबाक लेल सरकार द्वारा प्रयास प्रारंभ करब स्वागत योग्य अछि । ज्यो एहि दिस सरकार इमानदारीसँ प्रयास कएलक तँ कतेको लर्ष्ध साहित्यकारक दुर्लभ पाण्डुलिपि पुस्तककार रूपमे साहित्यप्रेमीक सोझा आओत आ भाषाक विकासक रास्ता भेटत । शोध आदिक काज शुरू भेलासँ भाषाक संदर्भमे नव-नव जनतब सेहो सोझा आओत जकर लाभ साहित्यक शोधार्थी आ छात्र सभकेँ भेटि सकत । सुशान्त झा मैथिली भाषा- संस्कृतिक रक्षाक लेल एकटा संस्था जरुरी अछि यू-ट्यूवपर भटकि रहल छलहूं। नौकरी के व्यस्तता के वजह सं एतेक फुरसति नहि भेटति अछि जे यू-ट्यूबपर अपन मनपसंद गीत सुनि सकी। कोशिश रहैत अछि जे फुरसति भेटए तँ मैथिली गीत सुनी। मैथिली गीत जे सभ यू-ट्यूबपर उपलब्ध अछि ओहिमे बेसीतर बियाहक गीत आ भक्ति गीत सभ अछि। मैथिलीक विराट संसारमे जे छिडि़एल लोकगीत सभ अछि तकरा सभ कऽ एकठाम पौनाई मुश्किल अछि। दोसर बात ई जे सभ गीतक रिर्काडिंग सेहो नहि भेल छैक, भेलो छैक तँ ओकरा संकलन के काज बड्ड कठिन। गीत सभ सुनि कऽ मन नास्टेल्जिक भऽ गेल...कमला-बलानक धार आ राजनगरक मंदिर यादि आबए लगल। गजेंद्रजी के फोन केलियन्हि। हम जानय चाहै छलहुं जे की समस्त लोकप्रिय मैथिली गीत के वेबसाईट पर डालल जा सकैत छौ की। लेकिन पता चलल जे अहि में कापीराईट के संकट छैक। एखन अगर कियो मैथिली गीत संगती सुनय चाहैत अछि तँ किछ वेबसाईटपर 10-20 टा गीत छैक या नहि तँ यू-ट्यूबपर ओकरा गीत खंगालय पड़तै। हम ई खोजै छलहु जे कोनो एकटा वेबसाईट होइत जतए दिल्ली बंबईसँ लऽ कऽ अमेरिका तकमे रहएबला मैथिल अपन भाषामे गीतसंगीत के आनंद लऽ सकितथि। दुनियाँ जहि हिसाबसँ बदलि रहल अछि ओहिमे अंग्रेजी आ हिंदी कऽ भाषाई साम्राज्यवादसँ बचनाई बड्ड मुश्किल बुझना जाईत अछि। लेकिन अगर सतर्कतासँ नब तकनीककेँ उपयोग कएल जे तँ मैथिली गीतसंगीतक विराट संसारक मैथिल भाषी तक आसानीसँ पहुंचाएल जाय सकैछ। मैथिली लोकगीत, नाटक, लोककथा आ आख्यान हमर बडड् पैघ धरोहर अछि। आ एकर संयोजनक जरुरत छैक। अगर अहिसँ हम सभ आम मैथिलक जोड़ सकी तँ एखनो बडड् उम्मीद अछि। लेकिन अहि लेल हमरा सभकेँ मैथिलीक सभ रुपकेँ दिल खोलि कऽ अपनाबए पड़त अा पंचकोसीक ग्रंथिसँ बाहर आब पड़त। अहि मुद्दापर हम पहिनौ लिखि चुकल छी। दोसर बात जे आबएबला जमाना आडियो विजुअलक छैक। पूरा दुनियाँमे लोक पढ़ैमे दुर्भाग्य जनक रुपसंॅ रुचि घटि रहल छैक। लोक आडियो आ विजुअल बेसी देखए चाहैत अछि। ई आबएबला जमानामे आर बढ़त। अहिसँ इंकार नै। एखनो जे मैथिल कहिय़ो अपन जिनगीमे एकटा मैथिली पोथी नै पढ़लन्हि ओ मैथिलीक गीत सुनि कऽ विभोर भऽ जाइ छथि। आवश्यकता अहि बातक अछि हम सभ कोन प्रकारे अहि विशाल समुदाइक अपन संस्कृतिकेँ अहि मजबूत उपकरणसँ जोड़ि कऽ राखी। छिटपुट स्तरपर मैथिलीमे गीत संगीतक कैसेट बनैत अछि, फिल्मो बनि रहल अछि आ आब एकटा टीवी चैनलक सेहो सुनगुनी अछि। लेकिन एकर कोनो संस्थागत प्रयास नहि भऽ रहल अछि। संविधानमे भाषाक स्थान भेट गेलाक बादो हम सभ सरकारसँ बड्ड उम्मीद नहि कऽ सकैत छी। लेकिन अगर अहि दिशामे कोनो गैरसरकारी प्रयास इमानदारीसँ कएल जाई तँ एखनो बहुत काज कएल जा सकैत अछि। अहि दिशामे गजेंद्रजी के प्रयास वास्तवमे स्तुत्य छन्हि जे बुहत मेहनत कऽ कए अहि दिशामे काज कऽ रहल छथि। मैथिल बुद्धीजीवी सभकेँ अहिपर विचार करक चाहिएनि आ कोनो तरीका खोजक चाहिएनि। अहिमे बादमे सरकारी अनुदान आ विदेशी अनुदानसँ लऽ कऽ वैयक्तिक अनुदानक कमी नहि रहत-ई हमर दृढ़ निश्चय अछि। कोनो ट्रस्ट या सोसाईटीक अधीन अगर ई काज कएल जाय आ नया विचार सामने आबए तँ ओ स्वागत योग्य कदम होएत। हमर सपनाक मिथिला हमर सपनाक मिथिला केहन अछि...हम भविष्यक दीस टकटकी लगा कए देखि रहल छी आ एकटा सुन्दर आ समृद्ध इलाकाक तस्वीर मोने-मोन बना रहल छी। हमर सपनाक मिथिलामे एखन तक किछुए रंग भरल गेल अछि-जेना दरभंगामे एकटा यूनिवर्सिटी आ मेडिकल कालेज, जयनगर तक बड़ी लाईन आ नेशनल हाईवे कऽ तहत बनएबला चारि लेनबला सड़क जे मिथिलाक हृदयस्थली बाटे गुजरत। हम कल्पना कऽ रहल छी जे एहि हाईवे कऽ किनारमे दर्जनों इंजिनीयरिंग आ मेडिकल कालेज खुजि जाएत। हम ई सोचि रहल छी जे झंझारपुरक बायोट्कनालाजीक कालेजमे केरलक बच्चा सभ जखन एडमिशन लेत तँ कतेक नीक हेतै। हम ओहि दिनक कल्पना कए रहल छी जखन नार्थ-इस्ट आ दक्षिण भारतक बच्चा सभ गाड़ी रिजर्व कऽ काठमांडूक टूरपर निकलत तखन लौकहा-जयनगरक नजदीक कोनो ढ़ावापर ओकरा सभकेँ डोसा खाइक सीन केहेन हेतैक। एखन जकरा हमसभ कस्बा कहैत छियैक से झंझारपुर, निर्मली, सकरी, सुपौल आ उदाकिसुनगंजमे ढेररास उद्योग धंधा खुजि जाएत। हम सोचि रहल छी जे ओ दिन केहन हेतैक जखन मिथिलाक इलाकामे अपन घर लग सभकेँ रोजगार भेटि जेतै, सभकेँ अपने घर लग इंजिनीयरिंग आ एम.बी.ए कालेजमे एडमिशन भेटि जएतैक आ बड़का बड़का कंपनी अपन कार्यालए दरभंगा आ पूर्णियामे खोलत। हम ई सोचि रहल छी जे हमर मखानक दुनियाँ भरिमे ब्रांडिग भऽ जेतैक आ ओकरा ईस्ट-वेस्ट कारिडोर बला हाईवेक द्वारा गोवाहाटी आ ओतएसंॅ इंडोनेशिया तक भेजल जा सकैछ। कखनो ई सोचैंत छी जे हाईवे बनि गेलाक बाद सिक्किम आ दार्जिलिंग तक 3-4 घंटाक रास्ता भऽ जेतैक। तखन मिथिलाक बच्चा सभ सेहो दार्जिलिंग पढ़ए जा सकत, आ युगल लोकनि हनीमून मनबए लेल सिक्किम। हमर मिथिलामे मानव श्रमक कोनो कमी नहि, पाइनि‍क कोनो कमी नहि, मेधाक कोनो कमी नहि- कमी अछि तँ नियोजनक। अगर हम अपन मानवशक्तिक रोजगार प्रदान कऽ दी तँ हमरासँ बेसी विकसित कियो नहि भऽ सकैत अछि। कोसीपर रेलवे पुल सेहो बनि रहल अछि, आ हाईवे के तहत सड़क पुल सेहो बनबे करत। एहि तरहे ई दुनू पुल फेरसंॅ मिथिला कऽ जोड़ैबला साबित होएत-कोसी नदी मिथिला कऽ दू फांकमे बांटि कऽ राखि देने छल। हम ई सोंचैत छी जे एही तरहक एकटा फोर लेन हाईवे अगर मोकामासंॅ जयनगर तक भाया समस्तीपुर बनि जएतैक तँ केहेन बढ़िया होएतैक। सरकारकेँ चाही जे मुजफ्फरपुरसंॅ बरौनी आ आगू गोहाटी जाएबला हाईवे नंबर 28 क सेहो फोर लेन बना दैक-ताकि अहि इलाकाकेँ समग्र विकास संभव भऽ जाईक। हम ईहो कल्पना कऽ रहल छी जे नेपालमे जल्दीए शांति आ सुव्यवस्था काएम भऽ जेतैक आ नेपालसंॅ प्रचुर मात्रामे बिजली मिथिलाक इलाका जगमगाएत। नेपाल आबैबला अंतराष्ट्रीय टूरिस्ट लोकनि सेहो मिथिलाक रुखि करताह। लेकिन हुनका सभकेँ आकर्षित करैक लेल हमरालोकनिकेँ अपन पर्यटन स्थलक विकास करए पड़त। मिथिलामे बहुत रास ऐतिहासिक स्थल नहि छैक-लेकिन हमसभ अपन संस्कृतिकेँ नीक पैकेजिंग कऽ कए टूरिस्ट लोकनिकेँ आकर्षित कऽ सकैत छी। सीताक जन्मस्थान आ मिथिलाक प्राचीन राजधानी जनकपुर, वैशाली आ पाटलिपुत्र-बोधगया-नालंदा कऽ जोड़एबला सर्किट कऽ ढ़ंगसँ विकास कएल जाए तँ झुंडक झुंड टूरिस्ट सभकेँ आकर्षित कएल जा सकैत अछि। मिथिलाक लोककला, गीत आ पेंटिंगपर आधारित कार्यशाला आ म्यूजियम बनबैके आवश्यकता छैक। हमरा इलाकामे पोखरिक कोनो कमी नहि। हम अगर एकरा ढ़ंगसँ व्यवस्थित करी तँ ई माछ-मखानक उत्पादनक पैघ आधार तँ भइये सकैए, संगहि एकरा सौन्दर्यीकरण कऽ हम कए तरहक आर्थिक गतिविधिकेँ सेहो बढ़ावा दऽ सकैत छी। हम इहो कल्पना कऽ रहल छी जे दरभंगा आ पूर्णिया मेडिकल हब के रुपमे उभरत आ मुजफ्फरपुर निर्णाण आ मोटर उद्योगक केंद्रकेँ रुपमे। भागलपुर फेरसंॅ सिल्क आ हस्तकलाक क्षेत्रमे ख्याति अर्जित करत आ मधुबनीमे कलापर आधारित पैघ-पैघ अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार हएत। कखनो कऽ हम सोचैत छी जे अगर कोसीक बाढ़िपर काबू भऽ जएतैक तँ केहेन बढ़िया सोलो भरि कोसीमे स्टीमर चलैत जा सकैत छलैक-एकटा एहने स्टीमरमे हम अपन सभसँ प्रिय मित्र के संगे कलकत्ता तक के यात्रा करितहुंॅ। भारत-आ नेपालक बीच ओहने संबंध भऽ जएतैक जेहेन अमेरिका आ कनाडाक बीच छैक-आ दूनू देशक संसाधनक उपयोग इलाका कऽ विकासमे कएल जएतैक। मैथिलीकेँ लऽ कऽ किछु असुविधाजनक प्रश्न... कखनो कऽ सोचैंत छी जे मैथिली भाषा और मिथिलांचलक विकास ओहि रुपमे किएक नहि भऽ सकलै जेना दोसर प्रान्त आ आन भाषा सभ तरक्की कऽ गैलै। एखुनका परिदृश्य अगर देखी तँ बुझाइत अछि जे मैथिली साहित्यकेँ विकास आ एतुक्का विकासकेँ लऽ कऽ चिंता सिर्फ किछु मुट्ठी भरि लोकक दिमागी कसरत छैक-आम मैथिलके एहिसँ कोनो सरोकार नहि। हालत तँ ई अछि जे मैथिल लोकनिकेँ धियापुता दरभंगो मधुबनीमे मैथिली नहि ,हिंदीमे बात करैत छथि। एकर की कारण छैक आ एना किएक भैलैक। अगर एकर तहमे जाइ तँ एहि भाषाकेँ संग सभसंॅ पैघ अन्याय ई भेलैक जे एकरा किछु खास इलाकाकेँ मैथिली बनएबा के आ किछु खास लोकक भाषा बनएबाकेँ प्रयास कएल गैलैक। मैथिलीकेँ दरभंगा मधुबनी आ खासकए ओतुक्का ब्राह्मणक भाषा बनाकए राखि देल गेलैक। मधेपुरा-पूर्णियाक बात तँ दूर दरभंगो मधुबनीक विशाल जनसमुदाय ओ भाषा नहि बजैत अछि जे किताबी मैथिली के रुप मे दर्ज छैक। ओना ई बात दोसरो भाषाकेँ संगे सत्य छैक लेकिन कमसंॅ कम ओतय ओहि भाषाकेँ स्थानीय रुपकेँ हिकारत या हेय दृष्टिसंॅ नहि देखल जाई छैक। मैथिलीमे एहि तरहक कोनो प्रयोग कऽ बर्जित कऽ देल गेलैक। मिथिलाक खेतिहर, मजूर, मुसलमान आ निम्नवर्ग ओहि भाषामे तस्वीर कहियो नहि देखि सकल। जखन मिथिला राज्यक मांग उठल तँ हमसभ मुंगेर तक कऽ अपनामे गनि लैत छी, लेकिन जखन भाषाक बात हेतैक तँ ओ सिर्फ मधुबनीक पंचकोसी या मधुबनी झंझारपुर तक सिमटि कऽ रहि जाईछ। हमरा याद अछि जे कोना सहरसा या पूर्णियाक लोकक भाषा कऽ मधुबनीक इलाकामे एकटा अलग दृष्टिसँ देखल जाई छैक। इलाकाई भिन्नता कोनो भाषामे स्वभाविक छैक लेकिन यदि ओ अहंकारवोधसंॅ ग्रस्त भऽ जाइ तँ ओहि भाषाकेँ भगवाने मालिक। फलस्वरुप जखन भाषाई आधारपर राज्यक मांग उठलैक तँ मिथिलांचलक विराट जनसमुदाय ओहिसँ अपनाकेँ नहि जोड़ि सकल आ ओ आन्दोलन लाख संभावनाक बावजूद नहि उठि सकल। रहल सहल कसरि राज्यसरकारक मैथिली विरोधी रवैया पूरा कऽ देलक। मैथिलीकेँ बीपीएससीसँ हटा देल गैलैक, आ मैथिली अकादमीकेँ निर्जीवप्राय कऽ देल गेलैक। लेकिन एहिकेँ लेल सत्ताक दोष कियेक देबै, जखन जनताक दिससंॅ कोनो प्रवल प्रतिरोध नहि छलैक तँ सत्ता तँ अपन खेल करबे करत। ओना तँ ई कहिनाई मुनासिब नहि जे मैथिलीमे आम जनताक लेल या प्रगतिशील चेतनाक स्वर नहि मुखरित भेलैक लेकिन ओ ओहि तरीकासंॅ व्यापक नहि भऽ सकलै जेना आन भाषामे भेलैक। मैथिलीकेँ रचनामे ओ मुख्यधारा नहि भऽ सकलै। दोसरबात ई जे कहियो मिथिलामे कोनो समाज सुधारक आंदोलन नहि भेलैक जेना बंगाल वा महाराष्ट्रमे देखल गेलैक। तखन ई कोना भऽ सकैछ जे सिर्फ भाषाकेँ तँ विकास भऽ जाए लेकिन समाजकेँ दोसर क्षेत्रमे ओहिना जड़ता पसरल रहैक। मिथिलाक इतिहासकेँ देखियौक तँ एतए येह भेलैक। दोसर बात ई जे मिथिला या मैथिलीक लेल जे संस्था सभ बनल ओकर कामकाजक समीक्षा सेहो परम आवश्यक। मैथिलीकेँ विकासक लेल दर्जनों संस्था बनल जाहिमे चेतना समितिक नाम अग्रगण्य अछि। लेकिन ओ चेतना समिति की कऽ रहल अछि आ जनतासंॅ कतेक जुड़ल अछि एकर विशद विवेचना हुअक चाही। सालाना जलसा आ सेमिनारक अलावा एकर मैथिली भाषाक लेल की योगदान छैक तकर विशद समीक्षा हेवाक चाही। मैथिली बजनिहार भारतेमे नहि नेपालोमे छथि, लेकिन दूनू दिसक भाषाभाषी कऽ जोड़ैले कोनो ठोस उपाए एखन तक दृष्टिगोचर नहि। एखन जहियासंॅ मैथिलीकेँ संविधानमे मान्यता भेटलैक अछि तहियासंॅ साहित्य अकादमीकेँ किछु बेसी गतिविधि देखएमे आबि रहल अछि। लेकिन मैथिलीकेँ जखन तक आम जनता आ ओकर सरोकारसंॅ नहि जोड़ल जाएत एकर आन्दोलन धार नहि पकड़ि सकैत अछि। एकर सभसंॅ पैघ जिम्मेवारी ओहि बुद्धिजीवी लोकनिपर छन्हि जे मैथिलीक पुरोधा कहबै छथि। हुनकासंॅ ई उम्मीद तँ जरुर कएल जा सकैछ जे ओ एकर ठोस, सर्वग्राही आ समीचीन समाधान सामने लाबथु आ ओहिपर समग्र रुपे चर्चा हो। डॉ.शंभु कुमार सिंह जन्म : 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहारसँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषएपर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहारसँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।–सम्पादक। आलेख: आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित : निर्धनताक समस्या भारत गरीबक देश थिक। एतुका अधिकांश जनता एखनहुँ गाममे रहैत छथि जे कि कृषि कार्यपर निर्भर छथि आ बरखापर। फलस्वरुप अनियमित बरखा सरकारी उपेक्षा ओ अशिक्षा तथा पिछड़ापनक कारणेँ गामक लोक गरीबीक जीवन बिता रहल छथि। यैह गरीब किसान ओ गामक लोक जखन कमएबा हेतु शहर जाइत छथि तँ मजदूर वा बोनिहार कहबैत छथि। ओतहुँ हुनका सभकेँ नारकीय जीवन जीवाक लेल बाध्य होमए पड़ैत छैक। भारतक कुल आबादीक पैंतीस प्रतिशतक लगपास लोक एहन छथि जे जीवनोपयोगी न्यूनतम आवश्यकताक पूर्ति करबामे अक्षम छथि। निर्धनता मनुक्खकेँ बेवस लाचार आ शक्तिहीन बना दैत अछि। निर्धन मनुक्ख पिछड़ल, दीन-हीन बाधाग्रस्त आ सदैव दोसरक दयारपर जीबए लेल बाध्य भ’ जाइत अछि। मानव जीवनक भयंकर अभिशाप थिक निर्धनता वा गरीबी। जाहि मनुक्खकेँ दू-साँझक रोटी नहि, पहिरए लेल शरीरपर वस्त्र नहि, रहक लेल घर नहि, बीमार भेलापर दवाय-दारूक उपाए नहि, ओ जँ आत्माक उच्चताक दावा करत तँ ओ मिथ्याक सिवाय किछु नहि भ’ सकैत अछि। ओ स्वतंत्र कोना भ’ सकैत अछि? ओ कोनहुँ बड़का काज कोना क’ सकैत अछि ? ओ अपन विचारकेँ स्वतंत्र रूपसँ कोना प्रकट क’ सकैत अछि ? निर्धनताक कारणेँ मनुष्य तंगदिल, तुच्छ, ओछ, कमजोर आ अपन ईच्छाक मारएबला बनि जाइत अछि। मैथिली नाट्य साहित्य मध्य एहि समस्याक विश्लेषण निम्नस्थ नाटकमे भेल अछि। जीवनाथ झाक ‘वीर –वीरेन्द्र’ (1956) भाग्य नारायण झाक ‘मनोरथ’ (1966) बाबूसाहेब चौधरीक ‘कुहेस’ (1967) गुणनाथ झाक ‘कनियाँ – पुतरा’ (1967) महेन्द्र मलंगियाक ‘ओकरा आँगनक बारहमासा’ (1980) नचिकेताक ‘नायकक नाम जीवन’ (1971) अरविन्द कुमार ‘अक्कू’ क ‘आगि धधकि रहल छै’ (1981) गोविन्द झाक ‘अन्तिम प्रणाम’ (1982) गंगेश गुंजनक ‘बुधिबधिया’ (1982) आदि। मनोरथमे लक्ष्मीनाथ अपन निर्घनताकेँ कोसैत छथि। ओ कहैत छथि---- “हमर नाम तँ दरिद्रनाथ होमक चाही ने कि लक्ष्मीनाथ। एकठाम नाट्यकार गरीबक धीया-पुताक संबधमे कहने छथि जे ओ कोनो काज सोचि समझि क’ करैत अछि ओ अपन सुख-सुविधाकेँ त्यागि दैत अछि। एहि परिप्रेस्थमे मैथिली नाट्यालोचक डॉ. प्रेम शंकर सिंहक कथन छनि--- “आर्थिक दशाक क्षीणताक कारणेँ मनुष्यकेँ केहन संकटापन्न समस्याक सामना करए पड़ैछ तकरे दिग्दर्शन एहि नाटकमे होइत अछि।”1 गरीबीक ई पराकाष्ठा छैक जे क्यो खाइत-खाइत मरैत अछि तँ क्यो कमाइत-कमाइत। एतय समुचित व्यवस्थाक आभाव अछि। एतय अधिकांश नेनाक स्थिति एहने अछि जे जन्मोपरान्त रोजी-रोटीक जोगाड़मे लागि जाइत अछि। ‘नाटकक लेल’ मे एहि समस्याकेँ उजागर कएल गेल अछि---- “कतेको लोक एक किनारमे पड़ल कूड़ाक ढेरसँ की सभने बीछि रहल छल, क्यो दू एकटा रोगाएल बच्चाकेँ डेंगा रहल छल”2 निम्नवर्गक यर्थाथ चित्रणक दृष्टिसँ ‘ओकरा आँगनक बारहमासा’ मैथिली नाट्य साहित्यमे अद्वितीय स्थान राखैत अछि। एहि नाटकक केन्द्रबिन्दु थिक सर्वहारा वर्गक यातनापूर्ण जीवन, वासन्ती पवन, ग्रीष्मीय निदाध, बर्षाक रिमझिम हेमन्तक शीत आ शिशिरक सिहकी समटा गरीबक हेतु, फुसि थिक। एहिमे एकटा गरीब एरिवारक बारहो मासक दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण कयल गेल अछि, जाहिमे कातिक मासक एकटा बानगी प्रस्तुत अछि----- “कातिक हे सखि बोनियो ने लागै छै, अन्नक नहि कोनो बाट यौ। पेटक ज्वाला राम सहलो ने जाइ छै, घर-घर हुलकए राड़ यौ।”3 वस्तुत: कातिक मास खेतिहर मजदूरक लेल दुखक मास होइत अछि। एहि समएमे अन्नाभाव भ’ जाइत छैक एहन स्थितिमे निम्नवर्ग स्थिति दयनीय भ’ जाइत छैक – “दू गोट कोकड़ा पकबिति पियास लागल हय।”4 गरीब लोकक लेल खएबाक हेतु भरिपेट अन्न वस्त्र आ आवासक एकटा जटिल समस्या भ’ गेल अछि एहि समस्या दिस नाटकारक ध्यान जाति छनि--- “अन्न बिना पेट जरिते हय, बस्तर बिना ठिठुरबे केली आ घर त’ दखते छी” 5 प्रो. प्रेमशंकर सिंह एहि नाटककेँ “मिथिलाक निम्नवर्गीय समाजक अलबम कहने छथि।”6 “जाहि आँगनक बारहमासा एहिमे टेरल गेल अदि तकर ध्वनि खाली ओहि आँगनसँ नहि आबि रहल अछि, प्रत्युत मिथिलाक लाख-लाख आँगनसँ उठैत ओकर रोस, हाहाकार करैत सोझे मर्मकेँ बेधि देमएबला अछि।”7 आर तँ आर आइ समाजमे एहन गरीबी व्याप्त छैक जे गरीबकेँ मुइलाक उपरान्त कफन किनबाक लेल टका नहि रहैत छैक। “अंतिम प्रणाम” मे समाजक एहन दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण द्रष्टव्य थिक--- “ठीके तँ कहै छिऐ। हमरा आरू गरीब छी मुदा आनिपर दस गोटए मिलि जाए तँ की ने क’ सकैत छी।”8 ‘बुधिबधिया’ मे सेहो गरीबीक दृष्टान्त भेटैत अछि। देशमे कतेको व्यक्तिक स्थिति सोचनीच अछि। किछु व्यक्ति अपन जीवन-यापन विलासितापूर्वक ढगसँ व्यतीत करैत छथि, मुदा सरकारक ध्यान गरीब लोकक दिस नहि जाइत छैक। जँ सरकार द्वारा किछु व्यवस्था कयलो जाइछ तँ ओकर लाभ गरीब लोक घरि नहि पहुँचि सकैत अछि--- “एकरा देहपर एक बीत वस्त्र नहि, एकर अंग-2 उघार अछि।”9 समाजक अधिकांश लोक गरीबी रेखाक नीचाँ अछि। महगी अकाश छुबि रहल अछि। सामान्य लोक अपन परिवारक हेतु भोजन, वस्त्र आवास जुटएबामे परेशान अछि। ‘अंतिम प्रणाम’ मे मुरारीक कथन अछि--- “तीन-तीनटा बच्चोकेँ भुखले सुतैत देखैत रहैत छी----घरवालीकेँ फाटल वस्त्रमे देखैत छी---अहू सँ बेसी किछु अशुभ भ’ सकैत अछि।”10 वर्तमान युगमे सामाजिक चेतनाक निरन्तर बढ़ैत गतिशीलता ओ परंपरागत रूढ़ि व्यवस्थाक जड़ताक बीच एकटा भयंकर संघर्ष आ तनावक स्थिति बनल अछि। आधुनिक सामाजिक मैथिली नाटकक मूल-स्वर एहि प्रकारक विभिन्न संघर्ष, तनाव आ अनेक सामाजिक समस्या आदिसँ भरल अछि। सामाजिक जीवनक यथार्थक अभिव्यक्ति नाटककारक सामाजिक दृष्टि आ रचना दृष्टि पर आधारित होइत अछि। मिथिलांचलक समाजमे आर्थिक विपन्न जीवनक अस्तव्यस्तता स्वाभाविकतामे परिवर्तित भ’ गेल अछि। संदर्भ 1. मैथिली नाटक परिचय, डॉ. प्रेम शंकर सिंह, पृष्ठ—96 2. नाटकक लेल, नचिकेता, पृष्ठ—54 3. ओकरा आँगनक बारहमासा, महेन्द्र मलंगिया, पृष्ठ--1 4. वएह, पृष्ठ—2 5. वएह, पृष्ठ--46 6. मैथिली नवीन साहित्य, सं. डॉ. बासुकीनाथ झा, पृष्ठ--28 7. वएह, पृष्ठ—28 8. अंतिम प्रणाम, गोविन्द झा, 9. बुधिबधिया, डॉ. गंगेश गुंजन 10. अंतिम प्रणाम, गोविन्द झा, आशीष अनचिन्हार- अन्हारपर इजोतक कहिओ विजय नहि (आलोचना) शीर्षक पढैते देरी पाठक लोकनि एकर रचियताकेँ निराशावादी घोषित क’ देताह आ फतवा देताह जे समाजक एहन -एहन वकतव्यसँ दूर रहबाक चाही। मुदा हमरा बुझने पाठक लोकनि अगुता गेल छथि, आ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि। मुदा इहो एकटा सुपरिचित तथ्य थिक जे लोककेँ जतेक उपदेश दिऔक ओ ओतबे तागतिसँ ओकर उन्टा काज करत। मुदा तैओ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि आ ता धरि नहि अगुताथि जा धरि शीर्षक पूर्ण वाक्य नहि भ’ जाए। आब अहाँ सभ टाँग अड़ाएब जे शीर्षक तँ अपना आपमे पूर्ण छैहेँ तखन अहाँ एकरा अपूर्ण कोना कहैत छिऐक ? मुदा नहि, कोनो वस्तु बाहरसँ पूर्ण होइतो भीतरसँ अपूर्ण होइत छैक। इहए गप्प एहि शीर्षकक संग छैक। अच्छा आब हम अपन विद्वताक दाबी छोड़ी आ अहाँ सभकेँ पूर्ण वाक्यक दर्शन कराबी - "अन्हारपर इजोतक कहिओ विजय नहि, सरकारपर जनताक कोनो धाख नहि"। मैथिली साहित्यमे बहुत रास बिडंबना छैक, प्रवंचना छैक, वंदना छैक अर्थात सभ किछु छैक मुदा तीन गोट वस्तुकेँ छोड़ि-- १) मैथिलीमे व्यंग प्रचुर मात्रा (गुण एवं परिमाण) मे नहि लिखाइत अछि, २) जँ झोंक- झाँकमे लिखाइतो छैक तँ स्तरीय आलोचना नहि होइत छैक, ३) आ जँ भगवान भरोसे स्तरीय आलोचना अबितो छैक तँ हरिमोहन झाकेँ शिखर मानि सभकेँ भुट्टा बना देल जाइत छैक । एहि तीन टाकेँ छोड़ि एकटा आर महान बिडंबना छैक जे आलोचक आलोचना करताह फल्लाँ बाबूक अथवा हुनक कृतिकेँ मुदा समुच्चा मैथिली अलोचनामे हरिमोहन बाबू तेना ने घोसिआएल रहता जे पाठक एहन आलोचनाकेँ हरिमोहने बाबूक आलोचना बूझैत छथि। आलोचनाक स्तरपर मैथिली व्यंगमे रुपकांत ठाकुर एकटा बिसरल नाम थिक। एकर पुष्टि 2003 मे साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित पोथी "ली कथाक विकास" मे प्रो. विद्यापति झा द्वारा लिखित लेख "मैथिली कथा साहित्यमे हास्य-व्यंग" पढ़ि होइत अछि। प्रो. झा पृष्ठ 168 पर 1963 सँ 1967क मध्य प्रकाशित हास्य-व्यंगक व्यौरा दैत रुपकांत ठाकुरक मात्र 6 गोट कथाक चर्च कएलथि अछि ( किछु आलोचक मात्र इएह लीखि कात भ’ गेलाह जे रुपकांत ठाकुर सेहो नीक व्यंग लिखैत छथि ) ।एहि क’ अतिरिक्त ने 1963 सँ पहिनेकमे हुनक व्यौरामे हुनक नाम छन्हि ने 1967क पछाति। अर्थात रुपकांत ठाकुर मात्र 6 गोट हास्य-व्यंगक रचना क’ सकलाह। जखन की वास्तविकता अछि जे रुपकांत ठाकुर 1930 मे जन्म-ग्रहण क’ 1960क लगीच रचनारत भेलाह एवं 1972 मे मृत्युकेँ प्राप्त भेलाह। कुल मिला क’ ठाकुरजी मात्र बारह बर्खमे अनेक असंकलित कथा एवं लेखकेँ छोड़ि हुनक पाँच गोट पोथी प्रकाशित छन्हि--1) मोमक नाक (कथा संग्रह) 2) धूकल केरा (कथा संग्रह) 3) लगाम (नाटक) 4) वचन वैष्णव (नाटक) 5) नहला पर दहला (उपन्यास)। मात्र बारह बर्खमे एतेक रचना आ उल्लेख मात्र 6 गोट कथाक। आब अहाँ सभकेँ थोड़ेक-थोड़ शीर्षकक अर्थ लागए लागल हएत। मुदा अहाँ सभ घबराउ जुनि । ई शीर्षक ठाकुरेजीक रचनासँ लेल गेल अछि। मतलब जे भविष्यक संकेत क’ गेल छथि। आब किछु गप्प करी मैथली व्यंगमे राजनीतिक व्यंगपर। कोन चिड़ियाक नाम छैक राजनीतिक व्यंगइ हमरा जनैत मैथिली व्यंगकार नहि जनैत छथि। ओना व्यंग केकरा कहल जाइत छैक सेहो बूझब कठिन। हमरा जनैत मैथिलीमे 93% व्यंग लिखल जाइत छैक मुदा 93% आलोचक ओकरा हास्य मानि आलोचना करैत छथि। सभ व्यंगकार ओहीक मारल छथि, चाहे शिखर-पुरुष हरिमोहन बाबू होथि वा रुपकांत ठाकुर। सुच्चा व्यंग लिखला पछातिओ हरिमोहन बाबू कहेलाह हास्य-व्यंग सम्राट। अर्थात हास्यकार पहिने आ व्यंगकार बादमे। बाद बाँकी 7% हास्य लिखाइत अछि जकर प्रतिनिधि छथि पं. चन्द्रनाथ मिश्र "अमर" । हँ तँ फेर आबी हम राजनीतिक व्यंगपर। हमरा जनैत जाहि व्यंगमे अपन समकालीन अथवा पूर्वकालिक राजनीति, शासन-व्यवस्था, ओकर संचालक आदिपर निशाना साधल गेल हो ओकरा राजनीतिक व्यंग कहाल जाइए। ओना ई अकादमिक परिभाषा नहि अछि। तँ फेर हम अहाँ सभकेँ रुपकांत ठाकुर लग ल’ चली, आ हुनक एक गोट पोथीक परिचए करा हुनक राजनीतिक चेतनाकेँ देखाबी। जाहि पोथीसँ हम अहाँकेँ परिचए कराएब ओकर नाम छैक "मोमक नाक"। एहि व्यंग-संग्रहमे नौ गोट कथा थिक। परिचय शुरु करेबासँ पहिनहि कहि दी जे ई कोनो जरुरी नहि छैक जे हम अहाँकेँ नओ कथा कहब आ ने जरूरी छैक जे संग्रहक पहिल कथासँ हम शुरू करी। ई निर्णय हमर व्यत्तिगत अछि आ अहाँ एहिसँ सहमत भइओ सकैत छी आ नहिओ भ’ सकैत छी। हँ तँ हम शुरू करी संग्रहक अंतिम कथा "मर्द माने की" सँ। जेना की शीर्षके सँ बुझाइत छैक लेखक अवस्स एहिमे मर्दक परिभाषा देने हेथिन्ह। से सत्ते, लेखक जखन शुरुएमे कहैत छथिन्ह जे " लोटा ल' क' घरवालीक लहटगर देहपर गदागद ढोल बजौनिहार एहन सुपुरुष कतए भेटत?"। तँ सभ अर्थ स्पष्ट भ’ जाइत छैक। मुदा लेखक एतबेसँ संतुष्ट नहि भ’ आगू कहैत छथि " मर्द माने कमौआ, आ कमौआ माने विआहल,आ विआहल माने बुड़िबक आ बुड़िबक माने बड़द"। सुच्चा मैथिल अभिव्यत्ति। एखनो अर्थात 2009 धरि मैथिल समाजक ई धारणा छैक जे कमौए मर्द होइत अछि, आ जहाँ कहीं कोनो मर्द देखाइ पड़ल लोक ओकर विआह करबाइए क’ छोरैए। आ जहाँ धरि गप्प रहल बिआहल माने बुड़िबक से तँ हम नहि कहब मुदा बुड़िबक माने बड़द अवश्य होइत छैक। खाली खटनाइसँ मतलब। अधिकारक प्रति निरपेक्ष। आब हम एहिसँ बेसी नहि कहब एहि कथाक प्रसंग। बस एतबेसँ लेखकक चेतनाक अनुमान क’ लिअ। "ठोकल ठक्क" मे लेखक ओहन भातिज आ जमाएक दर्शन कराबैत छथि जनिकर काजे छन्हि कमीशन खाएब आ एहि लेल ओ अपन पित्ती एवं ससुरोकेँ नहि छोड़ैत छथिन्ह। आ जँ एही कथाक माध्यमे अहाँ तात्कालीन रजनीतिक देखए चाहब तँ रुपकांत एना देखेताह-"सरकारपर जनताक कोनो धाख नहि"। अर्थात बेशर्म, निर्लज्ज, हेहर,थेथर सरकार। भारतक समकालीन विकास जँ अहाँ देखबाक इच्छा होइत हो तँ रुपकांत ओहो देखेताह। कनेक पढ़ू "जय गंगा जी" जतए रेलगाड़ीकेँ बढैत देखि लेखक टिप्पणी करैत छथि-"कांग्रेसी नेता जकाँ लोककेँ अपन पेटमे राखि क' ओकर सुख-दुख अथवा उन्नति-अवनतिकेँ बिसरि गाड़ी मात्र आगू बढब जनैत छल। अपना बले नहि कोइला आ पानिक बलें। परन्तु पवदानपर चढ़ल यात्री कतऽ छलाह?" ई सवाल जतेक भयावह लेखकक समएमे छल ततबे भयावह एखनो अछि। लेखक सरकारक डपोरशंखी योजनाक लतखुर्दन एही कथामे करैत छथि-" कोन टीसन केखन बितलैक से मोन राखब पंचवर्षीए योजना सभमे उन्नतिक कागजी आकड़ा मोन राखब थिक"। बेसी प्रशंसात्मक उद्धरण देब हमरा अभीष्ट नहि मुदा तैओ एकटा उद्धरण देबासँ हम अपनाकेँ रोकि नहि पाबि रहल छी। एही संग्रहक दोसर कथा थिक "फूजल ऊक"। बेसी अपन वक्तव्य नहि कहि उद्धरण सुनाबी-"मात्र सुधारवादी दृष्टि रखला मात्रसँ सुधार कथमपि नहि भ’ सकैछ"। जँ लेखकक भावनाकेँ बचबैत हम लिखी जे "प्रगतिशील विचार लिखला मात्रसँ प्रगतिशीलता कथमपि नहि आबि सकैछ" तँ ई स्पष्ट भ’ जाएत जे रुपकांत कतए व्यंग क’ रहल छथिन्ह आ केकरापर क’ रहल छथिन्ह। ठाकुर जी एकपक्षीय व्यंगकार नहि छथि। ओ दूनू पक्षकेँ हूटसँ मानसिक आ बूटसँ शारिरिक प्रताड़ाना दैत छथिन्ह। तकर प्रमाण ओ एहि संग्रहक पहिल कथा जे पोथीक नामो छैक अर्थात " मोमक नाक" मे देखेलैन्ह अछि। हुनकहिं शब्दमे " आजुक युगमे भला आदमीक परिभाषा उनटि गेल छैक। जनता जनता अछि जे से सभ मोमक नाक जकाँ लुजबुज। जखन जाहि दिस नफगर रहै छैक तिम्हरे लोक घूमि जाइछ" स्वतंत्रे भारत नहि हमरा विचारे जम्बूदीपक जनतासँ ल’ कए एखुनका भारतीय जनताक चारित्रिक विशेषता ई उद्धरण देखबैत अछि। आ एतेक देखेलाक पछातिओ आलोचक रुपकांतक नाम बिसरि गेल छथि। भने आलोचक नाम बिसरि गेलखिन्ह मुदा पाठकक मोनमे एखनो धरि रुपकांत ठाकुरक रचना खचित छैन्ह। हमरा जनैत कोनो प्रथम आ अंतिम सफलता इएह छैक। आ रुपकांत ई सफलता अपन रचनाक माध्यमें प्राप्त केलन्हि ताहिमे संदेह नहि। हृदय नारायण झा, आकाशवाणीक बी हाइग्रेड कलाकार। परम्परागत योगक शिक्षा प्राप्त। मिथिलाक लुप्तप्राय गीत गर्भसँ छठिहार धरि सोहर आ खेलउना पर आधारित संस्कार गीतक बानगी मिथिलाक गौरवमयी श्रेष्ठ संस्कृति एवं परम्पराकेँ सुरक्षित रखबाक श्रेय मैथिली लोकगीतकेँ अछि। परम्पराक सूत्रधार पूर्वजलोकनि मैथिल समाजक जन सामान्यकेँ अपन मूल संस्कृति ओ परंपराक प्रति उदार बनाबए लेल तदनुकूल लोकगीतक परंपरा विकसित कएलनि । कालान्तरमे अनेको विद्वान गीतकार ने अपन कृतिमे मैथिली लोकगीतक भण्डारकेँ अत्यन्त समृद्ध बनओलनि । देश ,काल और परिस्थितिमे परिवर्तनक संग संग लोकगीतक रचनामे सेहो विविधता आएल । मुदा आदर्श आचारपर आधारित लोकगीतक परंपरा लोककण्ठमे स्थान पबइत रहल जे आइयो मिथिलाक आचार आदर्शसँ परिचए करबइत अछि । सर्वविदित अछि जेे लोकगीतोमे कृत्रिमतानहि होइत अछि । समाजमे प्रचलित सामान्य बेवहारक अभिव्यक्ति होइत अछि । मैथिली लोकगीतक अवलोकनसँ मिथिलाक सभ्यता ,संस्कृति , रीति रिवाज ,पर्वत्योहार ,कला ,साहित्य सामाजिक उन्नति आ मानवीय आकांक्षाक यथार्थ रूप आइयो अनुभव करबा योग्य अछि । मिथिलामे जन्मसँ लऽ कऽ विआह धरि सभ बिध बेवहार गीतक संग सम्पन्न होइत अछि । बारहो मासमे प्रचलित पर्व त्योहार व्रत पूजन आदि परंपराक लेल अलग अलग गीत अछि । ) तुक अनुसार मैथिली लोकगीतक अपन विशेषता रहल अछि मिथिलामे । विआह ओ उपनयन आदि संस्कारक गीतमे खास प्रकारक रागक प्रयोग भेल अछि जे अन्य़त्र नहि देखल जाइछ । धर्म प्रधान क्षेत्र हेबाक कारणे मिथिलामे प्रातः जागरण सेहो पराती लोकगीतसँ होइत रहल अछि । जहँ तक मैथिली लोकगीतक प्रकारक प्रश्न अछि अनेको प्रकारक लोकगीत आइयो लोककंठमे रचल बसल अछि। पुत्रकामना, जन्मसँ संबंधित सामान्य व्यवहार एवं लोकाचारक सहज अभिव्यक्ति सोहर, खेलउना , छठिहार , पीपर पिलाई , आँख अंॅजाई , बधैया , आदि नामसँ प्रचलित लोकगीत सभमे अछि । एहिमे लौकिक एवं भक्ति प्रधान विषएपर आधारित गीतक समावेश अछि । एक भक्त हृदय स्त्रीक पुत्रकामना व्यक्त करइत सोहर अछि - पॉंच गाछ रोपल आप पॉंचे गाछे इमली रे । ललना तइयो ने सोभय बगीचबा एकहि चनन बिनु रे ।। नहिरा में छथि पॉच भइया आओर पॉच भातिज रे । ललना तइयो ने भावए नइहरबा एकहि अमा बिनु रे ।। ससुरा में छथि पॉच जाउत आओर पॉच जइधी रे । ललना एक नहि भाबए सासुरबा अपन होरिला बिनु रे ।। गंगा पइसी नहइतहुॅ हरिवंश सुनितहुॅ रे । ललना सूति उठि लगितहुॅ गोर कि दैव सहाय हएत रे ।। ललना एकहि पुत्र दैव दीतथि जिउरा जुड़बितहुॅ रे ।। बच्चा जन्मक समए प्रसव पीड़ासँ विह्वल स्त्रीक मनोदशाक वर्णन सेहो स्वाभाविक लगइत अछि । एहि प्रसंगक सोहर अछि सोहर गीतमे । प्रसव पीड़ाक वेदनामे स्त्री अपन सासु, जेठानी आ ननदियोकेँ स्वार्थी आ कठोर बूझए लगैत अछि आओर पुत्र प्राप्तिक बाद सभ कष्टकँे बिसरि जाइत अछि । पुत्र जन्मक खुशीमे ओकरा सभक बेवहार नीक लगइत अछि । एहि भावकेँ व्यक्त करइत सोहर अछि - अपन माए मोरा रहितइ , मुुंहवां निहारितइ ,दरद बॉटि लीतइ हो । ललना पिया जी के माए निरमोहिया होरिला होरिला करइ हो ।। अपन भाउज मोरा रहितथि डॉड़ लागि बइसतथि हो । ललना पिया जी के भाउज निरमोहिया भानस भानस करइ हो ।। आधा राति बीतल पहर राति आरो भिनसर राति हो । ललना होइते भिनसर पह फाटल होरिला जनम लेल रे ।। ललना पुत्र फल पाओल से देखि सब दुःख बिसरल रे ।। मिथिलामे जन्मक प्रथम उत्सव छठिहार होइत अछि । एहि उत्सवमे ननदि आ भाउजक बीच हास परिहासक जे स्वाभाविक रूप मिथिलामे अछि तकर अभिव्यक्ति खेलउना और बधइया गीतमे अछि । ननदि आ भाउजक बीच मधुर संबंधकेँ व्यक्त करइत एक खेलउनामे छठिहारक अवसरपर ननदिकँे बजाबए लेल पतिसँ आग्रह करइत भावव्यक्त होइत अछि - पिया तोर गोर लागूॅ ननदी मॅगा दे । जब रे ननदिया नगर बीच आएल । पूरी मिठाई बड्र्र्र्ऱा मीठ लागे ।। पिया तोर गोर लागूॅ जब रे ननदिया दुअरे बीच आएल । बिछिया बाजे बड़ा मीठ लागे ।। पिया तोर गोर लागूॅ जब रे ननदिया आॅगन बीच आएल । ननदी के बोली बड़ा मीठ लागे ।। पिया तोर गोर लागूॅ जब रे ननदिया सोइरी बीच आएल । बेसरि मॉगे बड़ा तीत लागे ।। पिया तोर गोर लागूॅ ननदी मॅगा दे ।। आओर भाउज आ ननदिक बीच हास परिहास एहनो होइत अछि जाहिमे ननदि इनामक मांग करइत अछि आ भाउज ओहि मांग क’ अपना तर्कसँ टारबाक कोशिश करइत अछि । ननदि- सब गहना में नथिया बड़ा महराजा हो राज ।। भाउज- नथिया ने लेइ ननदिया हो महराजा हो राज ।। ;ननदि बच्चा कंे उठाकऽ चलि दैत अछि । तखन भाउज कहइत अछि द्ध लय गेलइ बबुआ उठाय हो महराजा हो राज । दए जाहु ननदी बउआ हमार महराजा हो राज ।। लए जाहु भइया उठाय हो महाराजा हो राज । ननदि- हम लेबइ भइया के राज हो महाराजा हो राज ।। भाउज- जौं तोहें लेब ननदी भइया के राज महाराजा हो राज । की लेतइ बउआ हमार हो महाराजा हो राज ।। भाउजक तर्कक समक्ष ननदि हारि जाइत अछि तखन ननदि बधैया गबइत अधिकार पूर्वक भाउज सॅ कहैत अछि - बधइया हम लेबउ भउजी हे ।। अॅउठी आ मुनरी हम नहि लेबइ। जड़ाउदार कंगना भउजी हे ।। बधइया बाली आ कनफूल हम नहि लेबइ । मीनादार नथिया भउजी हे ।। बधइया बाजू बिजउठा हम नहि लेबइ । घॅुघरूदार पायल भउजी हे ।। बधइया रेसम के सरिया हम नहि लेबइ । लहरदार चुनरी भउजी हे ।। बधइया हम लेबइ भउजी हे ।। मुदा आब एहि सभ तरहक गीतक परंपरा लुप्त प्राय: अछि तेँ ई गीत सभ सेहो लुप्त भऽ रहल अछि । एहि सभ गीतक परंपरा लुप्त भेलासँ लौकिक परंपरागत संबंधक मधुरता कोन रूपमे प्रभावित भऽ रहल अछि विचारणीय अछि संगहि इहो विचारणीय अछि जे ओहि आदर्शकेँ बचाबए लेल विकल्प कोना खोजल जाए । हृदय नारायण झा, आकाशवाणीक बी हाइग्रेड कलाकार। परम्परागत योगक शिक्षा प्राप्त। मिथिलाक लुप्तप्राय गीत विआह संस्कारक लुप्तप्राय गीत मिथिलामे अत्यंत व्यापक रहल अछि विआह संस्कार गीतक परंपरा । विआहपूर्वहिसँ गीतक रीत अछि मिथिलाक लोक जीवनमे । विआह योग्य कन्याक हेतु जखन सुयोग्य वर खोजऽ लेल पिता आ अन्य संबंधी लोकनि जाइत छथि तखन जे गीत गाओल जाइत अछि से सम्मर, कुमार, लगन आदि गीतक नामसँ जानल जाइत अछि । एहने एकटा सम्मर के बानगी अछि जकर विषए सीता स्वयंवरसँ संबंधित अछि । मिथिलाक बेटी रूपमे सर्वमान्य सीताक विआहक ओ सम्मर एखनहुॅ बीज रूपमे, लोककण्ठमे सुरक्षित किन्तु लुप्तप्राय अछि । से गीत अछि - जानकि अंगना बहारल धनुखा उठाओल हे । आहे पड़ल पिता मुख दृष्टि पिता प्रण ठानल हे ।। राजा राज ने भावय भाखथि रानी हे । आहे बेटी बियाहन जोग सुजोग वर खोजह हे ।। जे इहो धनुखा कॅे तोड़त देव लोक साक्षी हे। आहे राजा हो आ कि रंक ताहि देव जानकि हे ।। देश हि विदेश केर भूप स्वयंवर आयल हे । आहे धनुखा तोड़ल सीरी राम मंगल धुनि बाजल हे ।। विआह सुनिश्चित भेलापर आंगनमे लगनक गीत गेबाक परंपरा रहल अछि । विआहसँ पूर्व कन्याक जे कोनो विध बेवहार होइत अछि ताहिमे लगनक गीत स्त्रीगण लोकनि द्वारा समूहमे गाओल जाइत अछि । एहन पारंपरिक गीतक पद आ धुन आबक विआह संस्कारमे लुप्तप्राय अछि । लोककण्ठसँ प्राप्त एहने एकटा गीत अछि - राजा जनक जी कठिन प्रण ठानल आहो राम रामा । दुअरहि राखल धनुखिया हो राम रामा ।। जे इहो धनुखा केॅ तोड़ि नराओत आहो राम रामा । सीता केॅ व्याहि लय जाएत आहो राम रामा ।। देश हि विदेश केर भूप सब आएल आहो राम रामा । धनुखा केॅ छुबि छुबि जाय आहो राम रामा ।। लंकाधिपति राजा रावण आएल आहो राम रामा । ओ हो रे घुमल आधि बटिया हो राम रामा ।। मुनि जी के संग दुई बालक आएल आहो राम रामा । धनुखा तोड़ल सीरी राम आहो राम रामा।। विआहक संबंध निश्चित कऽ बाबा अबै छथि आ विवाहक दहेज आ अन्य अनुष्ठान सभक चिन्तामे सोचैत आॅंखि मूनि बिछानपर पड़ि रहै छथि । आंगनमे सभक मोनमे विआह सुनिश्चित हेबाक आनन्द आ उत्साह अछि । ई देखि बेटी क’ जिज्ञासा होइ छै ओ बाबासँ हुनक एहि भावक कारण पुछैत अछि । एहि भावक एकटा ‘कुमार ‘गीत अछि जाहिमे बाबा आ बेटी विआहक संबंधमे परस्पर जिज्ञासाक समाधान अछि। पारंपरिक कुमार गीतक से पद आ धुन लुप्तप्राय: अछि । ओहने एकटा गीत अछि - बेटी- नदिया के तीरे तीरे बाजन बाजल किए बाबा सूतह निचिन्त हे । बाबा- किछु बाबा सूतल किछु बाबा जागल किछु रे बियाहक सोच हे ।। के हे सम्हारत एते बरियात , के हे करत कन्यादान हे । बेटी -भइया सम्हारत एते बरियात , बाबा करता कन्यादान हे ।। कथिए बिना बाबा खीरीयो ने होअए ,कथी बिनु होम ने होय हे । कथिए बिना इहो सइरा अन्हार भेल , कथी बिनु होमा ने होए हे ।। बाबा-दूध बिना बेटी खिरीयो ने होअए , घीउ बिनु होम ने होय हे । बेटा बिना इहो सइरा अन्हार भेल , धिया बिनु धर्म ने होय हे।। मिथिलाक विवाह संस्कार मे परिछन गीतक बहुतो पारंपरिक गीत आ धुन लुप्तप्राय अछि। ओहेन किछु धुनक परिछन गीतक उदाहरण एहि रूपेॅ देखल जा सकइछ । बेटी के लछमी आ जमाय के विष्णु रूप मे व्यक्त करैत पारंपरिक परिछन अछि - सखी हे लछमी के दुलहा लगइ छनि कोना ? जेना विष्णु उतरि अएला अंगना ।। सखी हे दुलहा के चानन लगइ छनि कोना ? जेना बिजुरि तरंग छिटकु नभ ना ।। सखी हे दुलहा के केस लगइ छनि कोना ? जेना साओनक श्याम घटा घन ना ।। सखी हे दुलहा के हाथ सोभय कंगना । जेना हरि केर हाथ सुदर्शन ना ।। सखी हे नहूॅ नहॅू दुलहा चलइ छथि कोना । जेना सिंह चलय निरभय वन ना ।। परिछनक बिध जखन आरंभ होइत अछि तॅ सभसँ पहिल बिछ होइछ धुरछक अर्थात् दुलहाक स्वागतगीत। एहिमे एक सोहागिन स्त्री माथपर कलश लऽ कऽ दुलहाक समक्ष ठाढ होइत अछि आ परिछनक डाला सजओने विधकरीक सँग स्त्रीगण लोकनिक समूह धुरछक के गीत गबइत अछि । ओहि गीतमे दुलहासँ जलपूर्ण घटमे द्रव्य अर्पित करबाक संकेत होइत अछि। एहन एक गीत अछि - सुन्दरि नवेली ठाढ़ि धुरछक गाबथि हे सोहाओन लागे । सोना के कलसिया नेने माथ हे सोहाओन लागे ।। आनन्द बधावा बाजे नृप जनवासा हे सोहाओन लागे । दशरथ बिराजथि सुत के साथ हे सोहावन लागे।। सुनल अवधपति दुलहा के स्वागत सोहाओन लागे । कलशा मे देल मानिक सात हे सोहाओन लागे ।। तखन वशिष्ठ मुनि देल अनुशासन हे सोहाओन लागे । करू जाय सिया के सनाथ हे सोहाओन लागे ।। धुरछक के बाद जे परिछनक बिध होइत अछि ताहिमे अरवा चाउरक पीसल चानन, सिन्दुर, काजर, ठऽक , बऽक, बेसन , भालरि ,राई ,लवण आदि विविध उपचारसॅ सजाओल डाला होइत अछि बिध बेबहारक रीत परिछन गीतमे व्यक्त होइत अछि । एहने एक परिछन अछि - सखिया परीछू दुलहा हरषि अपार हे । जेहने सलोनी धीया तेहने कुमार हे ।। चानन सजाउ सखि ऊॅचे रे लिलार हे । काजर लगाउ सखी नयना किनार हे ।। निहुछू लवण राई टोनमा जे टार हे । बिहुॅसब चोराबे चित दिअ पान डार हे ।। लखिये हरैये सुधि बुधियो हमार हे । कनक परीछू खोलि अन्तर दुआर हे ।। एहन गीत गबइत दुलहाकेँ परीछि क’ आॅगन विआहक वेदीक समीप ल’ जेबाक परंपरा अछि । दुआरसॅ आॅगनमे प्रवेश भेलापर दुलहाक आॅगनमे स्वागत होइत अछि शुभकामनाक परिछन गीतसँ । एहि भावक शुभकामनासँ भरल परिछन गाबि गाइनि लोकनि दुलहा दुलहिन लेल शुभ शुभ कामना गीतमे व्यक्त करैत छथि । एहन एक गीत अछि - परीछि लिअ वर केॅ शुभे हो शुभे दूभि अक्षत निछारू शुभे हो शुभे ।। दधि केसर सम्हारू शुभे हो शुभे लगाउ निल दिठौना शुभे हो शुभे ।। लागे जइ सॅ नइ टोना शुभे हो शुभे नीहछू लौन राई शुभे हो शुभे ।। नैन करू आॅजनाइ शुभे हो शुभे फूल माला सजाउ शुभे हो शुभे ।।े पान बीड़ा पवाउ शुभे हो शुभे घ्राण बासू अतर दय शुभे हो शुभे ।। गाल सेदू शिला दय शुभे हो शुभे मूज लए मूजिआऊ शुभे हो शुभे ।। रही लऽ रहियाऊ शुभे हो शुभे धन्य सीता सहेली शुभे हो शुभे ।। ब्रह्म पाओल घरहि मे शुभे हो शुभे राखु हिय कोबरहि मे शुभे हो शुभे ।। आब आगॉ लऽ चलियनु शुभे हो शुभे बिध आगॉ करबियनु शुभे हो शुभे ।। मिथिला मे पर्वतराज हिमालय केॅ राजा , गौरी आ भगवान शिव केॅ जमाय रूप मानि कऽ बेटीक विवाह मे शिव विवाहक परिछन गीतक परंपरा समृ( रहल अछि । शिव विवाहक एक परिछन अछि - शुभ दिन लगन बियाहन गौरी बनि ठनि दुलहा अएला हे । कंठ गरल नर उर सिर माला कंठ नाग लपटएला हे ।। शुभ दिन लगन ..... भाल तिलक शशिपाल लगैला जटा मे गंग बहएला हे । बूढ़ बड़द असवार सदासिब डमरू डिमिक बजएला हे ।। शुभ दिन लगन ..... भूत परेत डाकिन साकिन संग जोगिन नाच नचएला हे । अन्हरा लुलहा बहिरा लंगरा अगनित भेस सोभएला हे ।। शुभ दिन लगन ...... स्वान सुगर सिर जाल मुखर तन संग बरियतिया लएला हे । नगरक लोक सब सुनि सुनि बाजनि कोठा चढ़ि कऽदेखएला हे ।। शुभ दिन लगन ..... बजर परौ बरियात भयंकर सब कोई देखि पड़ैला हे । साहस करि सब सखियन संग भए परिछन मैना कएला हे ।। शुभ दिन लगन ..... नाग छोड़ति फुफुकार डेरएला खसति पड़ति घर अएला हे । सब बरियतिया हुलसति छतिया सब जन बासा गएला हे ।। शुभ दिन लगन..... कन्यादानक वैदिक कर्मकाण्डीय विधिक बीच कन्यादानक गीतक परंपरा सेहो नवतुरिया पीढ़ीक बीच लुप्तप्राय अछि । एहन गीतमे शिव पार्वतीक विआहक कन्यादान गीत गेबाक परंपरा अछि । एहन एक गीत अछि - देखियनु देखियनु हे बहिना जनक सुनयना मणिमंडप पर सुता दान दए ना ।। जनु मएना हिमगिरि पुनि अएला पुण्य सुकृत अयना । देखु दुलह दुलहिन के जोड़ी चारू रती मएना ।। पुलकित तन हुलसैछ मगन मन फूटनि नहि बएना । कर पर करतै पर फल अक्षत शंख सुसोहय ना ।। सदानंद मृदु मंत्र पढ़ावथि करथि लोक विधि ना । सियाराम वात्सल्य भाव रस हिय मे उमड़य ना ।। देखियनु देखियनु हे बहिना ।। सीता राम विआहक जे कन्यादान गीत अछि ताहिमे बेटीक वियोगक करूणा भाव व्यक्त अछि । बेटीक प्रति माएक भाव एहन गीतमे व्यक्त होइत अछि। मुदा आबक विआहमे ई गीत सभ लुप्तप्राय: अछि । कन्यादानक एहन एक गीत अछि - जॅघिया चढ़ाए बाबा बैसला मण्डप पर बाबा करू ने धीया दान हे । वर कर कंजतर ललीकर ऊपर ताही मे सोहत फल पान हे ।। गुरू वशिष्ठ जी मंत्र उचारथि मंत्र पढ़थि सीरी राम हे । सब सखियन मिलि मंगल गाबथि फुलबरिसत वहु वार हे ।। सिसकि सिसकि कानथि मातु हे सुनैना आब बेटी भेल वीरान हे । जाहि बेटी लेल हम नटुआ नचओलहुॅ सेहो बेटी भेल मोर वीरान हे ।। चुपे रहू चुपे रहू मातु हे सुनयना ई थिक जग बेवहार हे ।। बरियातीक भोजनक समएमे प्रचलित ‘जेवनार ‘ गीत सेहो लुप्तप्राय: अछि । परंपरासॅ ई प्रचलन रहल जे जखन बरियाती भोजन जेमय बैसथि तॅ हुनक स्वागत जेवनार गीत सॅ कएल जाए । एहि गीतमे हास्य विनोदक शब्द ,स्वर आ प्रस्तुतिसॅ परिपूर्ण बरियातक भोजन सेहो देखए जोग होइत छल । आब ओहन पद सभक गायन लुप्तप्राय: अछि। ओहने एकटा ‘जेवनार‘ गीत अछि - भोर भए मिथिलापति मंदिर समधी जेमन आयो जी ।। खोआ के गिलाबा बना के बरफी के इटावा जोरायो जी । इमरती जिलेबी के जॅगला लगायो गुलजामुन के खंभा लगायो जी ।। भोर भए.... पापड़ के सखी छवनी छवायो निमकी के फाटक बनायो जी । दही चीनी के चूना पोतायो रचि रचि महल बनायो जी ।। भोर भए ...... पूड़ी कचैड़ी बिछौना बिछायो मलपूआ के चनमा टॅगायो जी । लड्डू के लटकन लटकायो खाजा के झाड़ लगायो जी ।। भोर भए .... मंदिर मे बइसल समधी जन बाजे आनन्द बधाबा जी । छप्पन भोग बत्तीसो बेअंजन भरि भरि सोने के थारी जी ।। भोर भए मिथिलापति मंदिर समधी जेमन आयो जी ।। दुलहामे धैर्य, विनम्रता आ सहिष्णुताक भाव जगाबए लेल ‘डहकन ‘गीतक परंपरा रहल अछि। मान्यता अछि जे मिथिलामे भगवान श्रीराम सेहो विआहमे मैथिलानीक गारि सुनि कऽ प्रसन्न भेल छलाह तेॅ ई परंपरा निर्बाध प्रचलित रहल । श्री राम ललाकेँ जे गारि डहकनमे सूनऽ पड़लनि तकर पद अछि - राम लला सन सुन्दर वर केॅ जुनि पढ़ियनु कियो गारि हे ।। केवल हास विनोदक पुछियनु उचित कथा दुई चारि हे ।। राम लला .... प्रथम कथा ई पुछियनु सजनी गे कहता कनेक विचारि हे । गोरे दशरथ गोरे कोशिल्या राम भरत किए कारी हे । । राम लला .... सुनु सखी एक अनुपम घटना अचरज लागत भारी हे । खीर खाय बेटा जनमओलनि अवधपुरी के नारी हे ।। राम लला .... अकथ कथा की बाजू सजनी हे रघुकुल के गति न्यारी हे । साठि हजार पु़त्र जनमओलनि सगरक नारि छिनारी हे ।। राम लला ..... मिथिलामे दुलहासॅ हॅसी मजाकक परंपरा सेहो डहकन गीतमे अछि । दुलहाक समक्ष विवाहक विविध विध बेवहार सम्पन्न कराबए लेल उपस्थित गाइनि लोकनि डहकन गाबि कऽ दुलहासॅ मजाक करैत छथि आ सभ लोक हठाका लगाकए एकर आनंद लैत अछि । एहने एक गीतमे दुलहाकेँ संबोधित गाइनि लोकनिक भाव अछि - दुलहा गारि ने हम दइ छी बेवहार करइ छी । हम्मर बाबा छथि कुमार अहॉ के दाई मॉगइ छी ।। दुलहा गारि ने हम दइ छी एकटा बात कहइ छी । हम्मर बाबू छथि कुमार अहॉ के माई मॉॅगै छी ।। दुलहा गारि ने हम दइ छी एक विचार पूछै छी । हम्मर भइया छथि कुमार अहॉ के बहिन मॉगै छी ।। विवाहक पश्चात् दुलहा दुलहिनक शयन कक्ष कोहबर मे चारि दिन तक रहबाक जे परंपरा अछि तकर पोषण करैत अछि कोहबर गीत । एहि तरहक गीत मेे कोहबरक बिलक्षण वर्णन होइत अछि जे दुलहा दुलहिन मे परस्पर प्रेम भाव केॅ बढ़ाबऽ बला भाव जगबइत अछि । सीता रामक कोहबर गीत मिथिलाक विवाह संस्कार गीत मे विशेष प्रसि( रहल अछि । मुदा आब ई गीत आ धुन लुप्तप्राय अछि । एहने एक गीत अछि - कंचन महल मणिन के दियरा कंचन लागल केबाड़ रे बने बॉस के कोहबर ।। गज दन्त सेज आ फूलक बिछौना । रतन के बनल श्रृंगार रे बने बॉस के कोहबर ।। ताहि पर सूतथि रघुवर दुलहा । सीता दुलहिन संग बाम रे बने बॉस के कोहबर ।। यों मुख फेरि सोवे रघुवर दुलहा । दुलहिन सोवे करि मान रे बने बॉस के कोहबर ।। दुलहा दुलहिन अंग परसि परस्पर । हरषि नयन जल छाय रे बने बॉस के कोहबर ।। मिथिलामे विआह संस्कारक अभिन्न अंग अछि मधुश्रावणी। एहि पर्वमे नवविवाहिता तेरह दिनक व्रत अनुष्ठान एकभुक्त पूर्वक करैत छथि। नित्य दिन अपराह्णमे फूल लोढ़ि कऽ आनबाबक परंपरा अछि। एहि परंपरामे गाम भरिक नवविवाहिताक टोली फूल लोढ़बाक गीत गावि मनोरंजनपूर्वक व्रत निष्ठाक पालन करैत अछि । नाग नागिनक पूजा कएल जाइत अछि ताहि बीच बिसहाराक गीत गाओल जाइत अछि । ई दूनू तरहक गीत आब लुप्तप्राय: अछि । फूल लोढ़एसॅ संबंधित गीत अछि - दुई चारि सखी सब सामर गोरिया कुसुम लोढै़ लेै चललि मालिन फुलवरिया कुसुम लोढ़ै लए चलली मालिन फुलबरिया ।। मॉग मे सिन्दुर सोभे माथे पे टिकुलिया पोरिया पोरिया ना सोभे अॅउठी मुनरिया पोरिया पोरिया ना । हाथ मे लेल सखी फूल के चॅगेरिया से रहिया चलइ ना ताके तिरछी नजरिया रहिया चलै ना ।। फूल लोढ़ऽ के गौरीगीत विशेष प्रचलित रहल अछि । इ गीत परंपरा सॅ आबि रहल अछि आ वर्तमानहु मे प्रचलित अछि मुदा नवतुरिया पीढ़ीक बीच लुप्तप्राय अछि । एहन एक गीत अछि - गौरी फूल लोढ़ऽ गेली फुलबरिया संग मे सहेलिया ना ।। केओ सखी आगॉ आगॉ चलली केओ सखी पाछॉ पाछॉ चलली । केओ सखी बीचे बीचे गेली फुलबरिया संग मे सहेलिया ना ।। राधा आगॉ आगॉ चलली सीता पाछॉ पाछॉ चलली । गउरी बीचे बीचे चलली फुलबरिया ।। संग मे... केओ सखी डाली भरि लोढ़लनि केओ फुलडाली भरि लोढ़लनि केओ सखी लोढ़ि लेलनि भरि फूल डलिया ।। संग मे..... राधा डाली भरि लोढ़लनि सीता फुलडाली भरि लोढ़लनि गउरी लोढ़ि लेलनि भरि फूल डलिया ।।संग में..... केओ सखी कृष्ण वर मॉगलनि केओ सखी राम वर मॉगलनि केओ सखी मॉगि लेलनि तपसी भिखरिया ।। संग मे..... राधा कृष्ण वर मॉगलनि सीता राम वर मॉगलनि गउरी मॉगि लेलनि तपसी भिखरिया संग में सहेलिया ना ।। मधुश्रावणी पूजामे पवनइतिन जखन नाग नागिनक पूजा करइ छथि तखन हुनक सुहागक शुभकामना व्यक्त करइत बिषहारा गीत गेबाक परंपरा अछि । विषहारा गीत कथी के घइला बिषहरि कथीके गेरूलि राम कथी केर डोरी सॅ भरब निरमल जल ।। सोना के घइला विषहरि रूपा के गेरूलि राम रेशमक डोरी सॅ भरब निरमल जल ।। घइला भरि भरि बिषहरि असरा पुराएब राम एहि पर नाग बाबूू करथि असनान ।। ओहि पार बिषहरि माइ रोदन पसार राम छोरू छोरू आहे नाग आॅचर हमार ।। राम रोबइत होयतीह सेवक हमार ।। लबे लब नबेरिया भइया लबे बॉस खेब राम कोने भइया खेबनहार किये होयती पर ।। लबे लब नबेरिया भइया लबे बॉस खेब हे भैरव भइयार खेबनहार बिसहरि होयती पार।। जहिना जुड़ाएलि सुहबे तहिना जुड़ाउ राम तोरो कन्त जीबउ गेे सुहबे लाख बरिस ।। लुप्तप्राय: अछि विआह संस्कारक समदाउन । समदाउनक गायन बेटीक द्विरागमनक अवसरपर स्त्रीगण लोकनिक समवेत स्वरमे होइत अछि । नवतुरिया पीढ़ीक बीच करूणा प्रधान उदासी ओ समदाउन गीतक पद आ भास प्रायः लुप्तप्राय अछि। दू विभिन्न भासक गीत उल्लेखनीय अछि - गोर लागूूॅ पैयॉ परूॅ सुरूज गोसइयॉ बेटी केे जनम जुनि देब ।। बेटी के जनम जुनि देब हे विधाता निरधन कोखि जन्म जुनि देब ।। निरधन कोखि जन्म जॅओ देब हे विधाता रूप अनूप जुनि देब ।। रूप अनूप जॅओ देब हे विधाता पुरूख मुरूख जुनि देब ।। कहरिया भासक एक समदाउन मे सीताक नहिरा सॅ बिछोहक करूणा भाव व्यक्त अछि - सुभग पवित्र भूमि मिथिला नगरिया । हमरा केॅ कहॉ नेने जाइ छेॅ रे कहरिया । बेला ओ चमेली चम्पा मालती कुसुम गाछ । आब कहॉ देखबई हाय रे कहरिया।। सुन्दर सुन्दर वन सुन्दर सुन्दर घन सुन्दर सुन्दर सब बाट रे कहरिया । केरा ओ कदम्ब आम पीपर पलास गाछ । आब कहॉ देखबइ हाय रे कहरिया ।। किनकर नयना सॅ गंगा नीर बहि गेल किनकर हृदय कठोर रे कहरिया । माएक नयना सॅ गंगा नीर बहि गेल बाबू के हृदय कठोर रे कहरिया ।। केहि मोरा सॉठल पउती पेटरिया । केहि मोरा देल धेनु गाय रे कहरिया । माए मोरा सॉठल पउती पेटरिया । बाबू मोरा देल धेनु गाय रे कहरिया ।। बाबा के मुॅह हम देखबइ कोना आब काकी कोना बिसरब हाय रे कहरिया । भाइ भतीजा आओर सखिया सलेहर आब कहॉ देखबई हाय रे कहरिया ।। आगॉ आगॉ रामचन्द्र पाछॉ भाइ लछुमन पहुॅचि गेल झटपट अवध नगरिया। महल मे कोसिला रानी आरती उतारए लगली अयोध्या बाजए बधाई रे कहरिया।। मिथिलाक व्यावहारिक लोकगीतमे परस्पर सहयोग एवं श्रम प्रधान गीत ‘लगनी ‘;जॅतसार प्रसि‍द्ध गृहस्थीक अभिन्न अंग रहल अछि । ई गीत जॉत चलबइत दू स्त्रीक स्वरमे गायनक परंपरा रहल अछि । लगनी गीत भक्तिभाव , करूणा आ व्यवहार प्रधान हेबाक कारणे परस्पर संबंधकेँ समृद्ध ( बनेबामे सहायक अछि । मशीनीकरणक युगमे जॉतक चलन प्रायः बन्द भऽ गेल , मुदा दूर देहातमे एखनहुॅ कतहुॅ कतहुॅ लोक कण्ठमे सुरक्षित अछि लगनीक गीत आ एकर भास। राधाकृष्ण भक्तिपर आधारित किछु लगनी गीत साहेबदास पदावलीसँ संकलित कए प्रस्तुत अछि । ;1द्ध बसहुॅ वृन्दावन मोर जीवन धन आ रे कान्हा सुनि सुनि छतिया मोरा सालय रे की ।। जौं तोहें जएबह हरि जियबइ ने एको घड़ी । आ रे कान्हा हमर सपथ तोहि माधव रे की ।। जाहु जुनि मधुबन तेजि कहुॅ मोहन । आ रे कान्हा हमर सपथ तोहि माधव रे की ।। कंस के जान हॅति दइए अधम गति । आ हे राधा साहेब आओत कृष्ण माधव रे की ।। ;2द्ध काहि कहब दुःख वचन ने आबए मुख । आ रे उधो धइरज धएलो नहि जाइछ रे की ।। किए तेजि हरि गेल कुबुजी अधीन भेल । आ रे उधो केओ ने कहए एहि गोकुल रे की ।। शरण धएल जन्हि दुःख न पाओल तनि । आ रे उधो सत्य निगम गुण गाओल रे की ।। कत गुण गएबउ कत नित हम रोएबउ । आ रे उधो कओन साहेब हरि आनब रे की ।। ;3 कत दूर मधुपुर जतए बसए माधव । आ रे सजनी वन वन माधव मुरली टेरए रे की ।। अनबो मे चनन काठी लिखबो मे भाति भाति । आ रे सजनी दुख सुख लिखियो बनाइए रे की ।। एक अंधियारी राति हरि बिन फाटय छाती । आ रे सजनी कोइली शबदे हिया मोरा सालय रे की ।। साहेब गुनि गुनि बैसलहुॅ सिर धुनि । आ रे सजनी जगत जीवन नियरायल रे की ।। मिथिला मे प्रचलित )तुप्रधान गीत मे मलार गीत आ धुन सेहो लुप्तप्राय अछि । मिथिला मे मलार गीतक परंपरा समृ( रहल अछि । वर्तमान मे मलारक ओ गीत आ धुन लुप्तप्राय अछि । मलार गीतक किछु पद साहेबदास पदावली सॅ संकलित प्रस्तुत अछि । 1 अली रे प्रीतम बड़ निरमोहिया ।। आतुर वचन हमर नहि मानए । परम विषम भेल रतिया ।। कॉपत देह घाम घमि आवत । ससरि खसत नव सरिया ।। आवत वचन थिर नहि आनन । बहत नीर दुहू अॅखिया ।। रमानन्द भामिनि रहूॅ थिर भए । सुख बीच कहू दुःख बतिया ।। 2 हे उधो लिखब कओने विधि पाती ।। अंचल पत्र नयन जल काजर । नख लिखि नहि थिर छाती ।। चन्द्र किरण बध करत एतय पिय । ओतय रहहु दिन राति ।। रेशम वसन कनक तन भूषण तेसर पवन जिबघाती ।। कहथि रमानन्द सुनु विरहिनि तोहे । आओत श्याम विरहाती ।। हे उधो लिखब कओने विधि पाती ।। 3 हे उधो बड़ रे चतुर घटबरबा ।। दूर सॅ बजओलनि नाव चढ़ओलनि । खेबि लए गेल मॅझधरबा ।। नाव हिलओलनि मोहि डेरओलनि । कएलनि अजब खियलबा ।। आॅचर धएलनि मोहि झिकझोरलनि । तोड़लनि गजमोति हरबा।। सुकविदास कह तुम्हरे दरस को । जुग जुग जीबए घटबरबा ।। प्रेम, श्रृंगार आ रति भावक अभिव्यक्तिसॅ परिपूर्ण बटगमनी गीतक परंपरा सेहो लुप्त प्राय: अछि । ओना एखनहुँ मांगलिक अनुष्ठानमे जखन स्त्री गण लोकनिक समूह ग्राम देवता डिहबार, ब्रह्मस्थान , माटिमंगल , आम महु बियाह आदि विधि लेल ढोल पिपही बाजाक संग निकलैत छथि तॅ बाटमे बटगमनी गीत गबइ छथि । मुदा नब पीढ़ीक मैथिल ललनाक बीच ओहि उमंग उत्साह आ प्रगल्भताक अभाव तँ अछिए , ओहन गीतक प्रति उदासीनताक कारणे ओ बटगमनी गीत सभ लुप्त प्राय अछि । ओहने किछु संग्रहित बटगमनी प्रस्तुत अछि । स्नेहन, चुम्बन, आलिंगन, राग आ अनुराग युक्त संभोगक वर्णन नायिकाक उक्तिमे प्रस्तुत बटगमनी अछि - कॉच कली पहु तोड़थि सजनी गे , लए कोरा बैसाए सजनी गे ।। अधर सुधा सम पीबथि सजनी गे , यौवन देखि लोभाय सजगी गे ।। लए भुजपाश बान्हि दुनू सजनी गे, जखन करथि बरजोरि सजनी गे ।। तखनुक गति की कहिए सजनी गे, पहु भेल कठिन कठोर सजनी गे ।। नहि नहि जौं हम भाखब सजनी गे , तौ राखिए मन रोख सजनी गे ।। पति जखन बहुतो दिन पत्नी केॅ विरह मे व्याकुल केलाक बाद अबैत अछि तॅ पति सॅ मिलनक उत्साह केहन भऽसकैत अछि ? बहुत दिनक बाद परदेश सॅ आएल पति सॅ मिलन हेतु की की तैयारी आ साज श्रृंगार करबाक उत्कंठा होइत अछि , तकर वर्णन करैत बटगमनी अछि - कतेक दिवस पर प्रीतम सजनी गे आएल छथि पहु मोर सजनी गे ।। मन दए नेह लगाएब सजनी गे , रचि रचि अंक लगाएब सजनी गे ।। पहु थिक चतुर सयानहि सजनी गे , हम धनि अंक लगाएब सजनी गे ।। ई दिन जौं हम काटब सजनी गे , तखन करब बर गान सजनी गे ।। गाबि सुनेबनि हुनकहुॅ सजनी गे , पहु करता बड़ मान सजनी गे ।। जयकान्त मिश्रपर विशेष १. डॉ. गंगेश गुंजन २. विद्या मिश्र डॉ. गंगेश गुंजन जयकांत बाबूक निध्अन मैथिली-मिथिला आ मैथिलक एक महान पोथीक पुस्तकालयमे सजा देबाक ऐतिहासिक शोकक अवसर जेकाँ थीक। पोथी, अध्याय नहि, पोथी। सम्प्रति तँ बहुत महान क्षति। हुनक मौलिकता मैथिलीक लौकिक एवम शास्त्रीय बुद्धि समंवय आ व्यवहारक अति दूरगामी दृष्टांत बनल। उर्दूक आधुनिक गालिब फिराक गोरखपुरी गर्वोक्ति छनि "आने वाली नस्लें तुम से रश्क करेंगी हम असरो जब होगा मालूम उन्हें तुम ने फिराक को देखा है"। हमरा लोकनिक पीढ़ी जयकांत बाबूक स्नेह शिक्षाक अपन एहि सौभाग्यपर अवश्ये क्रितार्थ बनत। संस्था सेहो मरि जाइत छैक। किताब जीवित रहैत छैक। कतोक गोटेकेँ संभव जे नहियो रुचन्हि हमर ई कथन मुदा हमारा अपन अंतःकरणसँ ई कहि रहल छी जे जयकांत बाबू मैथिलीक आधुनिक वेद छथि! विद्या मिश्र भाइजी काका- डॉ. जयकान्त मिश्रक स्मरण हम बहुत छोट रही, भरिसक स्कूलक दिन छल, जखन कखनहु हमर घरमे अंग्रेजीक विद्वान, कवि, मैथिली लेखकक चर्चा होइत रहए, लोक सदिखन डॉ. जयकान्त मिश्रक चरचा करिते रहथि। ओ ओहि समएमे हमर सभसँ पैघ मामाजीक साढ़ू रहथि। नेनपनमे हम मैथिल आर मिथिलाक विकास आ उन्नतिक प्रति हुनकर समर्पण आ साहित्यमे हुनकर योगदानसँ बड्ड प्रभावित रही। ओ हमरा लेल आदर्श रहथि..प्रशंसा करी आ सदैव हुनकासँ भेंट करबाक आ देखबाक लेल लालायित रही। हम अपन स्नातक विज्ञानक द्वितीय वर्षमे रही जहिया डॉ. जयकान्त मिश्रक सभसँ छोट बेटा अपन पितियौतक घरपर धनबाद आएल रहथि। आ हमर बाबूजी तहिया ओतहि पदस्थापित रहथि, से ओ सभ हमरो सभक अहिठाम भेँट करबाक लेल आएलाह। हमरासँ भेँट कएलाक बाद, गप कएलाक बाद ओ हमर बाबूजीसँ कहलन्हि...अहाँ किए नहि हमर पितियौत हेमकान्त मिश्रसँ बिन्नी (हम) क विवाहलेल प्रस्ताव अनैत छी। आ एतए देखू.. हमर डैड हुनका सभ लग प्रस्ताव रखैत छथि आ एक मासक भीतरे हम हेमक संग विवाहित भऽ जाइत छी। जखन हम सुनलहुँ जे हमर विवाह डॉ. जयकान्त मिश्रक भातिजक संग होमए जा रहल अछि..हम बड्ड प्रसन्न भेलहुँ आ शीघ्रहि हुनकर संग हमर सम्बन्ध परिवर्तित भऽ गेल किएक तँ हम आब ओहि परिवारक पुतोहु रही, विद्वान आ लेखकक परिवारक। हम डॉ. हरिवंश राय बच्चनसँ बहुत नजदीक रही, पत्राचार माध्यमसँ, हुनकर परामर्श अवसरपर भेटए आ पारस्परिक रुचि हमरा सभ बाँटी। ओना तँ ओ हमरासँ बड्ड पैघ रहथि मुदा तैयो हमरा सभ एक दोसारासँ गप बाँटी आ एक-दोसराक चिन्ता करी, से हम हुनका कहलहुँ जे अहाँ प्रसन्न होएब जे हम इलाहाबादक डॉ. जयकान्त मिश्रक भातिजक संग विवाहित होमए जा रहल छी। हमरा जवाब भेटल जे हमर विवाह एकटा विद्वानक परिवारमे होमए जा रहल अछि, ई वैह छथि जिनका हम इलाहाबाद विश्वविद्यालयक अंग्रेजीक विभागाध्यक्षक अपन प्रभार देने रहियन्हि आ ओ सर्वदा हमरा अपन गुरु मानैत छथि। आ हुनकर पिता डॉ. उमेश मिश्रकेँ हम अपन गुरु मानैत छियन्हि। ओहि परिवारक ओ जे प्रशंसात्मक वर्णन कएलन्हि से आह्लादकारी रहए आ तकरा सोचैत एखनो हम उत्फुल्लित भऽ जाइत छी। हम सभ १९९९ ई. मे संयुक्त राज्य अमेरिकामे बसि गेलहुँ मुदा हमरा सभक हृदय, आत्मा आ मस्तिष्क सर्वदा इलाहाबादमे रहैत छी आ त्रिवेणीपर भेल सभ कर्मकेँ अनुभव करैत छी हमरा सभ ओ सभ छोट-छीन काज करैत छी जे परिवारक प्रति आदर आ प्रेमक भाग अछि। हुनकर समर्पण, परम्परा, सरलता आ संस्कृतिक प्रति लगाव अनुकरणीय अछि। हम सभ हुनकर परिवारक मुखिया, गुरु आ भाइजी काकाक रूपमे क्षति सदैव अनुभव करब। ई परिवार आ समाजक लेल एकटा पैघ क्षति अछि। डा. चन्देश्वर शाह होलीक संदेश होलीक रंग–अबीरक खेल खेल्बासँ पहिने सम्महत जराएब (होलीका दहन) आवश्यक होइत छैक । शास्त्रीशय वर्णन अछि जे भक्ते प्रह्लादक विष्णु भक्त्तिकसँ रुष्ट भेल हुनकेँ पिता देवराज हिरण्यकश्य्पु जे स्वयं ईश्वर मौनत छल, भक्त‍ प्रह्लादकेँ मारि देवाक लेल अनेक प्रयत्न कएलाक बादो जखन असफल होइत गेल तँ अपन बहिन होलिकाकेँ बरदानमे प्राप्तल भेल। आगिमे नहि जरएबला चछरिक उपयोग करैत अपन स्वाोर्थ पुरा करबाक लेल प्रह्लाद सहित आगिमे प्रवेश करबाक लेल आज्ञा देलक, भगावनक कृपासँ ओ चछरि अपन प्रभावसं प्रह्लादक रक्षा कएलक आ होलिका ओही आगिमे भष्म भऽ गेल। एही प्रकारसँ होलिकाक अवसानपर लोक खुशी मनौलक जे एखन एकटा पर्वक रुपमे समाजमे विद्यमान अछि‍। एहि पर्वक प्रसंगमे इएह कथा सम्पूकर्ण नहि अछि, आनो कतेक कथा एहि प्रसंगमे कहल जाइत अछि तथापि एहि कथाक प्रचार आन कथासँ आधिक अछि। होली पर्वक एहि कथासँ अपना-अपना बुद्धि विवेक अनुरुप अनेक तरहक संंदेश ग्रहण कएल जा सकैत अछि । जेना आसुरी प्रवृतिक होलिका जे समाजकेँ अपन स्वाभाव अनुरुप अनेक तरहक कष्ट दैत छलैक, तकर मृत्युं भेलापर लोक खुशी मनौलक। अर्थात जे किओ व्यक्ति समाजमे अन्या‍य अत्याचार करत, समाजक लोक तत्काल यदि विरोध नहियो करैत छैक तँ तकर ई मतलब नहि छैक जे ओ समाज ओकर अत्याचार सहर्ष स्वीकार करैत छैक। दोसर बात जे अन्यायी, अत्याचारीकेँ अकाल मृत्यव प्राप्त होइत छैक। यदि होलिका प्रह्लादकेँ आगिमे जरएवाक लेल उद्यत नहि होइत तँ अकालमे ओकर मृत्यु नहि होइतैक। तेसर बात जे एहि कथाक मुख्य पात्र हिरण्यकश्यृपु जे अपन धन बलसँ प्राप्तत सुख भोगसँ एतेक माति गेल छल जे ओकरा बुझाइत छलैक जे धनक बलसँ सभ किछु सम्भव छैक, ईश्वतरकेँ एहिसँ बेसी की प्राप्त छैक, जे हमरा प्राप्त नहि अछि । जखन सभ तरहक सामर्थ्य हमरा प्राप्त अछि तखन ईश्वपर हमरासँ पैघ नहि अछि, हमहीं ईश्वनर छी । ओ ईश्वकरीय सत्ताक विरोध कैरत गेल आ अन्तमे ओकर की दशा भेलैक से सवकेँ बुझले अछि। अर्थात् अहंकारीक अहम् सबदिन नहि रहैत छैक। चारिम बात ईश्विरीय शक्ति अथवा आशीर्वाद जँ ककरो प्राप्त होइत छैक तँ ओकर उपयोग जनकल्यारणमे करबाक चाही नहि कि जनविरोधी कार्यमे। होलिकाकेँ जे चहरि बरदानमे प्राप्तय भेल छलैक ओहिसेँ आगि ओकरा लेल संतापक बस्तु नहि छलैक, परन्तु जखन होलिका एकर प्रयोग दोसराक जान लेवाक लेल कएलक तँ ओकर अपने जान चलि गेलैक। एहि तरहेँ होलिका आओर प्रह्लादक अग्निे प्रवेशक सन्दर्भमे जे कथा प्रचलित अछि ताहिसेँ अनेको संदेश ग्रहण कएल जा सकैत अछि‍ । होलीक कथा प्रसँगकेँ ध्यानमे राखि ओहिसँ सँदेश ग्रहण करैत अपना जीवनमे सफलता प्राप्तिक लेल सभकेँ सचेत रहबाक चाहि । जेना होली मनएबाक प्रसंग अछि जे होलीसँ पहिलुका रातिमे सम्मेत् जराओल जाइत । सम्मत् जरएबाक लेल लकड़ी–काठीक जरुरत होइत छैक, ई लकड़ी–काठी कानो एक वेकती नहि दैत छैक । होलीक सम्मकत् जरएबाक लेल टोलक किछु सक्रिय वेकती कतहुँ-कतहुँसँ लोकक लकडी़–काठी अथवा ओइने चीज उठा कऽ चुप्पेो अनैत अछि । यदि किओ ककरो घर बनएबाक लेल कतौ राखल लकडी लाबी कऽ जरा दैत छैक, चाहे एक गोटाक बहुत लकडी़–काठी लऽ अबैत छैक तँ ओकर समाजमे केहन प्रभाव हैतैक ताहिपर ध्यान देबाक चाहि। तहिना होलीक दिन पर्वक दिन छैक । नीक भोजनक नामपर यदि किओ ऋण करैत अछि अथवा मस्तिक नामपर भाँग धथुर, दारु–तारीक अधिक प्रयोग करैत अछि, तँ ओकर प्रतिफल सभकेँ देखल नहियो हएत तँ सुनल जरुर हएत, तेँ सचेत रहव सबहक लेल कल्यािणकारी बात छैक । तहिना रंग–अबीर खेलबाक नामपर किओ अलकतरा तँ किओ इनामेल सनक रंगक प्रयोग कऽ बहादुरी वा मस्ती करैत अछि तेँ प्रयोग कएनिहारक मस्तीन आ ओहीसँ प्रभावित वेकतीपर तकलीफ कोन अधिक छैक से तराजूपर नहि जोखल जा सकत, एकटा अनुभव करबाक लेल नीक भावना रहल हृदयक जरुरत छैक। यदि किओ कोनो बिमार, व्यक्तिकेँ बलपूर्वक रंंग अबीर लगा कऽ ओकर रोग बढा दैत छैक अथवा एहने कोनो अप्रिय काज भाँगक जोश के करैत अछि तँ ओकरा नीक किओ नहि कहतैक। अर्थात कोनो काज करबाक लेल सीमाक भीतर काज सम्परन्नन करब बुद्धिमानी छैक । सभ तरहक बन्धन, बाधाव्य वि‍धान रहितहुँ जेना लोककेँ अपन लक्ष्यपर आगू बढब आवश्यक होइत छैक, तहिना अपन संस्कृति परम्पराक रक्षा आ निरन्तरता देब सेँहो दायित्व बनैत छैक। एहने अवस्थाधक मार्गदर्शन महाकवि विद्यापतिक एकटा गीतमे अछि— आजु नाथ एक व्रत महासुख लागत हे तोँहेँ शिव धरु नटवेश नाँच देखाबहु हे । पार्वतीक एहि आग्रहपर महादेव अपन बात करैत छथिन्ह जे जोँ नाँचब तँ शिरक गंगाक धार बहि जाएत धरती जलमग्न भऽ जेतैक, गलाक सर्प चारु दिस जहिँ तहिँ भऽ जाएत अनर्थ भऽ जेतैक । एहिसँ अनेक व्यहवधानक सुनबैत छथिन्ह। ई सभटा बात सत्य छै, एहन सम्भ्व छलैक मुद्दा ओही गीतक अंतिम पँक्तीमे विद्यापति लिखने छथि जे ‘राखल गौराक मान कि नाँच देखावल हे ।’ अर्थात हमरा सभक क्रियाकलाप बुद्धिमानी पूर्वक अपन आ समाजक हितमे होएबाक चाहि । होली पर्वसँ सभकेँ ई सन्देश ग्रहण करबाक चाहि । विद्या मिश्र होलीपर विशेष मैथिल रंग बरसे (यू. एस. मे मैथिलक होली) हमर सभक एहि बेरक होली हमर घरमे मनाओल गेल...25-30 टा परिवार रहथि। सभ मैथिल रहथि जाहिमे प्रोफेसर हरिमोहन झाक नाति आ डॉ. रमा झाक पुत्र प्रतीक झा सेहो रहथि, ओ हमरा सभक न्ईक मित्र सेहो छथि। हमर सभक प्रयास रहैत अछि पाबनि-तिहारकेँ पारम्परिक रूपमे मनेबाक जाहिसँ अगिला पीढ़ीक बच्चा एकर अनुकरण कऽ सकए, अनुभव कऽ सकए आ अर्थ बुझि सकए। पछिला साल सभ बच्चा सभ अपन लिखल नाटक हिरण्यकश्यप/ होलिकाक मंचन कएने रहथि। कमसँ कम हुनकासभकेँ होली पाबनि कोना आ किएक मनाओल जाइत अछि तकर पूर्ण ज्ञान छन्हि। किएक हम सभ रंग लगबैत छी आ गरा मिलैत छी, पारम्परिक खानपान आ होली गीत..सभटा। मैथिल लोकनि भाग लेबाक लेल न्यू-जर्सी, विर्जिनिया, वासिंगटन डी.सी आ मेरीलेण्डसँ अएलाह, से 4-5 गोट स्टेट्स मैथिल रहथि। एहि बेर सभसँ नीक उत्तर प्रतियोगिता रहए, सर्वोत्तम ड्रेस-समन्वय आ पार्सल देबाक प्रतियोगिता रहए आ एहि सभमे मिथिला संस्कृतिसँ सम्बन्धित गहन प्रश्न रहए।सर्वोत्तम उत्तरक लेल हम सभटा उत्तर पढ़लहुँ आ तखन वोट देलहुँ??? सभ गोटे एहि अवसरक लेल बड्ड उत्साहित रहथि आ एहि अवसरक प्रति उत्सुक सेहो। एतए यू.एस.ए. मे बसंतक छुट्टी रहैत अछि से स्कूल कॉलेजक बच्चा सभ अएलाह आ एहि पारम्परिक होली उत्सवमे भाग लेलन्हि...आ हुनका ई एतेक नीक लगलन्हि जे अगिला बरिख सेहो एहिमे सम्मिलित होएबाक सोचलन्हि.... आ अंतिममे होलीक आशीर्वचन हमर लिखल। डॉ. गंगेश गुंजन कविक आत्मोक्तिः कविताक अएना-विनीत उत्पलक कविता संग्रहपर कविक आत्मोक्ति : कविताक अएना विश्व बजारी एहि समाजमे भाषा-साहित्य सभक संसारमे सेहो बजारे जकाँ मंदी पसरल अछि। लगभग इएह परिस्थिति बेसी कला-विधाक बुझाइछ। साहित्यमे किछु आर विशेषे। ताहूमे कविताक विधा आओरो अनठिआएल अछि, किछु स्वयं कात करोट भेल आ किछु कएल जा रहल अछि। प्रकाशके टा द्वारा नहि, स्वयं संबंधित भाखा-भाखी अधिसंख्य लोक समाज द्वारा सेहो। जतए स्वयं कविक द्वारा, से अवश्य खेद करबाक विषए। कविता व्यक्तिकेँ अपन समाजमे एकटा आओर प्रतिष्ठा मात्र दिअएबाक मूल्यपर बेशी दिन जीवित नहि रहि सकैत अछि। अर्थात् कोनो सम्भ्रान्त व्यक्तिक भव्य ड्र्ाइंग रूममे एकटा आओर इम्पोर्टेड दामी वस्तुक प्रदर्शनीय नमूनाक माल कविता नहि बनाओल जा सकैत अछि, जे कि दुर्भाग्यसँ भऽ रहल अछि। भाषा वैहटा ओतबे जीवित अछि वा रहएवाली बुझा रहल अछि जे मात्र अपन भाषिक उपयोगिता बा कही अपन क्रय-विक्रय-मूल्यक बलेँ जीवित रहि सकए। ग्लोबल बजारमे भाषा अपन प्रवेश- जतेक दूर आओर गहींर धरि करबाक क्षमता रखने अछि, ताहि सामर्थ्यक उपयोगितेपर, ओतबे दुआरे जीवित राखल जा रहल अछि, कोनो अपन काव्य-सम्पत्ति, सांस्कृतिक अस्मिता आ भाषाक प्राचीनता बा महानताक जातीय स्वाभिमानक आधारपर नहि। तें दुर्भाग्यवश ई समए अपन-अपन भाषाक महानता लऽ कऽ आत्म गौरवसँ भरब तँ फराक, जे मुग्ध पर्यन्त होएबाक समय नहि बाँचि गेल अछि। हँ, भाषाक ‘दाम’ लऽ कऽ निश्चिन्त रहबाक बा कम बिकाएब लऽ कऽ चिन्तित होएबाक समय अछि। मुदा कवितामे भाषाक आशय आ अस्तित्वकें एहन तात्क्षणिक बूझि लेब कोनो भाषा-साहित्यक मूलसँ छूटि कऽ आगाँ बढ़बाक बुद्धिकेँ अवसरवाद छोड़ि, दोसर किछु ने मानल जा सकैत अछि। समकालीन समस्त कविकेँ, नवागन्तुककेँ तँ अनिवार्यतः बजार आ कविता भाषाक बीचक एहि भेदकेँ नैतिक बुद्धियेँ बूझिए कऽ एकर बाट चलबाक प्रयोजन । अन्यथा ई कविता सेहो एकटा नव पैकेटक नव उत्पाद बनि कऽ दोकानमे रहत। पोथीक दोकानमे नहि। साज-शृंगारक कोनो मॉलमे, जतए जनसाधारण लोकक पहुँचबो दुर्लभ ! आब से बजार आ कविताक भाषाक एहि द्वन्द्वसँ निकलैत भाषाक ई यात्रा कोन नीति-बुद्धिसँ कएल जएबाक प्रयोजन ताहि विषयपर गंभीरतासँ मंथन करए पड़त। स्वविवेक। ई त्वरित चाही। उत्पल जीक एहि कविता-पाण्डुलिपिक लाथेँ, ई चर्चा हमरा अभीष्ट भेल आ संभव, एकर श्रेय तेँ हम हिनके दैत छियनि। कविता भाषाहिक सवारीपर लोक धरिक अपन यात्रा करैत छैक। जेहन सवारी, जेहन सवार तेहन यात्रा। ताहीमे गन्तव्य, काव्यबोध, युग आ जीवन-दर्शन समेत बहलमानी कही, कोचमानी कही, बा ड्र्ाइभरी-पॉयलटी तकर कर्म कुशलता, ई सभ तत्व अंतर्निहित छैक। बल्कि कएटा अन्यान्यहुँ विषए जे कोनो कवि अपना साधनाक प्रक्रिया आ स्वविवेकसँ निरन्तर अपने विकसित करैत जाइत अछि। मुदा तकरा यथावत शब्दमे कहि सकब, प्रायः एखनो हमरा बुतेँ संभव नहि। कए दशकसँ कविता लिखि रहल छी। हिन्दी सन व्यापक भाषाक स्थापित नीक-नीक स्वनामधन्य कवि पर्यन्त अपन कविता-पोथी अपने छपा रहल छथि। बिकाइ छनि तँ बेचि रहल छथि। कोनो ब्रांड प्रकाशकसँ खामखा छपबहि चाहैत छथि तँ ओकरा पुष्ट मात्रामे धन दैत छथिन। सरकारी पुस्तकालय सभमे थोक मात्रामे ‘खपबा’ देबाक वचन दैत छथिन, तखन अपन गुडविल दैत छनि। वा अपने अर्थ सक्षम कवि-लेखक अपना पुस्तकक संपूर्ण प्रकाशन-व्यय स्वयं करैत छथि। तेँ पाठक आइ धनिके कवि टा केँ, ब्रांड प्रकाशन सभमे पढ़ि सकबाक सौभाग्य पबैत अछि । मैथिलीक स्थान निरूपण तँ सहजहिं कएल जा सकैए। मैथिलीमे तँ ओहिना प्रायः सभटा साहित्ये लेखक-कविकेँ अपना अपनी कऽ अपने छपबावए पड़ैत छैक। महाकवि यात्रीजी पर्यन्त विषए आबहु जीवित, अति पुरना किछु लोक आ यात्रीजीक स्नेही-श्रद्धालु पाठक समेत हमरा खाढ़ीक हुनक स्नेह-समीपी किछु रचनाकारकेँ बिसरल नहि हेतनि। पोथीक प्रसार आ विक्रयसँ मैथिल लेखकक केहन उद्यम जुड़ल रहलैक अछि ! प्रकाशक कतए ? अर्थात् कविता आ साहित्य कवि आ साहित्यकारहिक संसारमे जीवित अन्यथा मृत नहियोँ तँ अनुपस्थित तँ अनुभव कएले जा रहल अछि। ई युग यथार्थ एकदम देखार अछि। एहनामे एकटा मैथिल युवक अपन समस्त ऊर्जा-उत्साहक संग दिल्लीमे कोनो संध्या बा प्रात: अपन मैथिली कविताक पाण्डुलिपि दैत अपनेकेँ ‘भूमिका’ लिखि देबाक आग्रह करथि तँ केहन लागत ? मतलब जे प्रथम दृष्टया केहन अनुभव हएत? हमरा तँ युवक दुस्साहसी बुझएलाह। ओना जकरा साहस नहि हेतैक से कविताक बाट धइयो कोना सकैये ! किंचित असमंजस तँ भेबे कएल। भूमिका-लेखन-काज सेहो एहि युगमे अपन धर्मान्तरण कऽ लेलक अछि। हमर प्राथमिकतासँ तेँ बाहरे अछि। तथापि यदि कोनो मैथिली कविताक भविष्य एना सोझाँ उपस्थित हो तँ स्वागत कोना नहि हो ! पाण्डुलिपि पढ़वाक बाद कवि प्रतिभाक अनुभव, प्रिय आ आश्वस्तिकारक बुझाएल। स्वागत तेँ कहल अछि। उत्पलजीक प्रतियें उद्गारमे। कविक प्रस्तावना हिनक कविताक संसारकेँ बुझबामे विशेष सहायक अछि जे ई बड़ स्पष्ट बुद्धियेँ आ पूर्ण मनोयोगसँ लिखलनिहेँ। हिनकर रचनाक बुनियादी वर्तमान आ सरोकारक उद्घोष जकाँ छनि। से मात्र वयसोचित उच्छ्वास नहि, बल्कि अपन वचनबद्धताक स्वरूपमे कहल गेल छनि। सभ समएक नवीन पीढ़ी रचनाकारक सम्मुख अपन वर्तमाने प्रायः सभसँ प्रखर चुनौती रहैत छैक। अतीत आ भविष्य तँ अढ़मे रहैत छैक। रचनाकारक रूपमे अतीतक वास्ते ओकर नीक-बेजायक वास्ते ओकरा उत्तरदायी नहि बनाओल जा सकैए। यद्यपि ताही तर्कसँ भविष्यक लेल ओकरा छोड़ि सेहो नहि देल जा सकैए। कारण समाजक भविष्य निर्माणक प्रक्रियामे अन्य सभ सामाजिक कारण आ प्रेरक परिस्थिति सभ समेत, समकालीन रचनाकारहुक परोक्ष मुदा प्रमुख भूमिका रहबे करैत छैक। तेँ कविक दायित्व लऽ दऽ कऽ अपन समकालीनताक ज्ञान आओर अनुभवकेँ विवेक सम्मत सम्वेदनाक रूपमे विकसित करैत अग्रसारितो करए पड़ैत छैक। जाहि सघनता आ व्यापकतासँ कवि युगक अतीत-ताप अर्थात् जीवनक दुःख-द्वन्द्व आ यथार्थकेँ बूझि-पकड़ि पबैत अछि आ तकरा अपन रचनामे दूरगामी प्राणवत्ताक कलात्मक शिल्प दऽ पबैत अछि, सैह ओकर प्रतिभाक सामर्थ्यक रूपमे दर्ज कएल जाइत छैक। कोनो रचनाकार अपना कृतिमे बहुत युग धरि रहबाक सहज आकांक्षी होइतहिं अछि। तेँ हमरा जनैत मनुक्खक जिजीविशा आओर कविताक जिजीविशामे तात्विक किछु भेद नहि। कवि जे अंततः मनुक्खे होइत अछि। तेँ दुनूक आशक्ति अन्योनाश्रित होइछ। विनीतजीक कविता मोटामोटी हमरा तीन अर्थ छायासँ वेष्ठित अनुभव भेल, कवितामे अपन कथनक कोटि, तकर पकड़ आ प्रयोगक विधि। एहि टटका, ऊर्जावान-संवेदनशील कविक पथ प्रशस्त हेतनि से विश्वास अछि। बहुत-बहुत स्नेह-शुभाशंसाक संग, कालजयी कविताक आशामे। रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’, अध्यक्ष ः साझा प्रकाशन, ललितपुर। जन्म-बघचौरा, जिला धनुषा (नेपाल)।बन्नकोठरी: औनाइत धुँआ (कविता संग्रह), नहि, आब नहि (दीर्घ कविता), तोरा संगे जएबौ रे कुजबा (कथा संग्रह, मैथिली अकादमी पटना, १९८४), मोमक पघलैत अधर (गीत, गजल संग्रह, १९८३), अप्पन अनचिन्हार (कविता संग्रह, १९९० ई.), रानी चन्द्रावती (नाटक), एकटा आओर बसन्त (नाटक), महिषासुर मुर्दाबाद एवं अन्य नाटक (नाटक संग्रह), अन्ततः (कथा-संग्रह), मैथिली संस्कृति बीच रमाउंदा (सांस्कृतिक निबन्ध सभक संग्रह), बिसरल-बिसरल सन (कविता-संग्रह), जनकपुर लोक चित्र (मिथिला पेंटिङ्गस), लोक नाट्य: जट-जटिन (अनुसन्धान)। संचार एवं साहित्य क्षेत्रमे समावेशी स्वरुपक अपेक्षा वि.स. १९५८ मे प्रारंभ भेल गोरखापत्र समाचारपत्रक प्रकाशनसँ नेपाली पत्रकारिताक विधिवत शुरुआत मानल जएबाक चाही। मुदा इहो समाचारपत्र मात्र नेपाली भाषा आ नेपाली भाषी सभक हेतु पृष्टपोषणक काज करैत आएल अछि । ई एक सए आठ वर्षक नेपाली पत्रकारिताक इतिहासेमे नुकाएल अछि समस्त नेपालक पत्रकारिताक व्यथा कथा । राजनीतिकर्मी लोकनि भले दू सए चालिस वर्षक गोरखासँ लऽ नेपालक शाह वंशीय राजघराना धरिक समए कालमे मधेशवासीक शोषणक बात करैत हो, सत्य तँ ई अछि एहि समस्त अवधिसँ लऽ एखन धरिक गणतंत्र नेपालमे समेत अवस्था उएह छैक आ ओ चाहे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक हुअए अथवा साहित्य एवं संस्कृति क्षेत्र हुअए। मधेश आन्दोलनक बाद जे किछु आंगुरपर गनएबला परिवर्तनक संकेत आएल अछि से धनि‍ सन । हम पहिने संचार क्षेत्रक बात करी । गोरखापत्रक सय वर्षसँ उपरक इतिहासमे पहिल बेर कोनो मधेशी किंवा मैथिल नि. प्रधान सम्पादकक जवावदेह पदपर जा सकलाह अछि । एहिस पूर्व सम्पादक आ काका अध्यक्षक वाते नहि आने महाप्रबन्धक । नीति निर्माणक तहमे मैथिल किंवा मधेशीक पहुंच शून्य रहल अछि । गणतन्त्रो नेपालक संचार कर्मी सभक हेंजमे जवावदेह पदपर मधेशी आबि पओताह–तकर आशा कम्मे अछि । नेपाल टेलिभिजनक महाप्रबन्धक भले नोकरीक वरिष्ठताक कारणें कोनो मधेशी तपानाथ शुक्ला भऽ जाथु । एखनो सरकारक मनोनयनमे सरकारी संचार क्षेत्र मधेशी विहिन अछि । कहियो काल देखएबालेल सचिवक अध्यक्षता बला संचालक समितिक सदस्यक रुपमे रेडियो नेपालमे कोनो मंगल झा किंवा रोशन जनकपुरी भले नियुक्त कऽ देल जाइत हो । ने अवधि पूर्ण ने नितिनिर्माणमे कोनो अहमियत । नेपाल टेलिभिजनक हालति सएह छैक । संचालक धरिमे कोनो मधेशी नहि । बड कठिनसं आ प्रायः घनघोर प्रसव वेदनाक संग राससक उचिते प्राप्तकर्ता महाप्रबन्धक पदपर महतोजी वैसाओल गेलाह अछि, मुदा का.मु.क संग । राससक अध्यक्षक कुर्सि सदैब मधेशी सभक हेतु आकासक तरेगन भऽ कए रहि गेल अछि । प्रेस काउन्सिलक अध्यक्ष धरि मधेशीक पहुंॅच एखन धरि भऽ नहि सकल अछि । ४१ वर्ष पूर्व गठन भेल प्रेस काउन्सिल तहियासं आइधरि उएह नेपाली भाषी सभक हाथमे राखल गेल आ वात कएल गेल काठमाण्डू आ तराईक पत्र–पत्रिका विकासक । परिणाम भेलै एखनो धरि प्रेस काउन्सिल मधेशक पत्र–पत्रिकाकेँ पक्षपातपूर्ण आ द्वैध चरित्र देखा दबबैत रहलैक अछि, सतबैत रहलैक अछि । प्रत्येक नियुक्तिमे एक-आध गोटे मधेशी सदस्य बना देल जाइत छथि, जनिका सम्भवतः चलितो किछु नहि छन्हि । सरकारी संचार क्षेत्र जाहिने नेपालक आनोक्षेत्र खास कऽ मधेशीक कर आ मालपोतक रकम लागल छैकमे कोनो समावेशी स्वरुपक अवधारणा शासक लोकनि किएक ने राखि सकलाह । गणतन्त्र नेपालक संचार मंत्री द्वारा गठित प्रेस काउन्सिल लगायत आन संचार क्षेत्र मधेशी पदाधिकारीसं किए शून्य भऽ गेल अछि । नहि लगैए ? – समावेशी मात्र नारा आ सहमति–समझौताक विषए भऽ कए रहि गेल अछि । तकरा कार्यरुपमे परिणत करबाक कोनो प्रयोजन सत्तापक्ष नहि वुझैत अछि। सरकार सूचना आयोग बनौलक, एक्कोटा मघेशी किएक राखत। सरकारी संचार माध्यम जाहिपर सभक अधिकार मानल जाइत अछि, तकर ई हालति अछि तँ निजी क्षेत्रक वाते करब की । एत्त तँ आर दुर्गति छैक । मधेश, मधेशी, मैथिल, मिथिला आ मैथिलीक चर्च एहि निजी पत्र–पत्रिका आ संचार माध्यमक हेतु कुनैनक गोली जकांॅ गलामे अरघैत नहि छैक। तखन व्यवसायिक बाध्यतावश किछु मधेशी, मैथिल लोकनि किछु संचार माध्यमक महत्वपूर्ण पदपर आसीन राखल गेलाह अछि । नेपाली भाषी सभक नियंत्रणक ओहि प्रतिष्ठान सभमे हिनका सभकें की चलैत हयतनि–अनुमान कएल जा सकैछ। आब आबी साहित्य दिश। नेपालमे तत्कालीन प्रधानमंत्री चन्द्रशमशेर ज.व.रा. (१९०१–१९२९, प्रधानमंत्रीत्व काल) जखन नेपालमे राणाशासन विरुद्ध सुगबुगाहट देखलनि आ चोरानुकी राणा विरोधी साहित्य प्रकाशनक बात महशूस कएलनि तँ १९१३ ई. मे ‘गोरखा भाषा प्रकाशिनी समिति’ नामक संस्थाक गठन कएलनि । फरमान जारी कएलनि–कोनो साहित्य वा रचना एहि समितिक स्वीकृति विना प्रकाशित नहि हएत । एहि तरहें राणा प्रधानमंत्री जे अपन गद्यी बचएबालेल समिति बना नियम चलौलनि ओ आइधरि परिवर्तित रुपमे अर्थात् पहिने गद्यी बचएबा लेल आब मात्र नेपाली भाषा बचएबा लेल तेहने जालसभ विनल गेल अछि । ओ चाहे तत्कालीन राजा महेन्द्रक कृपासं गठन भेल नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान होए आ अथवा २०२१ सालमे गठन भेल साझा प्रकाशन होअए । नेपालक जनसंख्या अनुसार मैथिली भाषीक संख्या १३ प्रतिशत अछि २०५८ सालक तथ्यांक अनुसार । दोसर भाषा अछि नेपालीक बाद । मुदा सरकारी संरक्षण विहिन अवस्था छैक । तहिना भोजपुरी, अबधी, थारु आदि भाषा छैक, जकरा प्रारंभसँ उपेक्षाक शिकार होबए पडल छैक । साहित्यक रक्षामे लागल प्रतिष्ठान सभमे समेत ई अवस्था शाहीकालसँ एखन धरि छैक जे दुखद मानल जएबाक चाही । मधेशी सेहो संचारमंत्री भेल छथि, मुदा की कएलनि ! शुरुमे हम संचारक्षेत्रक बात कएल अछि । सरकारी संचार क्षेत्रक गोरखापात्र, रेडियो नेपाल, नेपाल टेलिभिजन आदिमे नियमित साहित्यिक प्रकाशन व प्रसारण होइत अछि । कतेक स्थान नेपाली इतर भाषा, साहित्यक छैक । गोरखापत्र एम्हर ‘नयां नेपाल’ परिशिष्टमे देशक विभिन्न भाषाक पृस्ट देबए लागल अछि । नीक प्रयास थिक। मुदा दू पृस्टसँ एक कऽ देल भाषाक ओ पृस्ट भाषाक विशिष्टताक आधारपर नहि समावेशीक नामपर हक अधिकारकेँ कटौती कऽ कए देल जा रहलैक अछि । आनो पृस्टपर छापबला रचना सभमे नेपाली भाषाक लेखकक अतिरिक्त आन भाषा–भाषी लेखक किंवा उक्त भाषाक साहित्य सम्वन्धी आलेख छापबामे परहेज कएल जाइत रहल अछि । गोरखापत्रक शनिवारीय परिशिस्टांक आ मधुपर्क साहित्यिक रचनाक प्रकाशन अछि । जँ नियमित पाठक छी तँ महिनौंक वाद किछु मैथिल किंवा मधेशी लेखकक रचना अति उपेक्षित रुपेँ कोनो कोनमे अभरत । वस, तकरा बाद उएह देखले–पढले नाम आ भाषा–रचना सभ । कतबो समावेशीक बात केओ कऽ लिअए–मजाल अछि एहि पत्रिका सभमे मैथिली, भोजपुरी, अबधी, थारु भाषा साहित्यक रचना व विकास यात्रा सम्वन्धी आलेख छापालेब । कहियो काल ‘भनसुन’ कएला पर भले अपवादमे देखि पड़ए । नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक गप तँ आर निराला अछि । नेपाली भाषा वाहेक आन भाषामे काज नहि करबाक जेना सप्पत खएने होए एकर पदाधिकारी लोकनि । एक तंॅ एहिमे पहिने तीसटामे एक मधेशी सदस्य आ उएह कार्यसमिति अर्थात् परिषद्ो राखल जाइत छलाह । से भाषा, संस्कृति, साहित्य आदि विधाक अन्तरगत । ताही महक किछु पाइ कबारि एक आधटा पुस्तक मैथिलीयोमे बहार भऽ गेल अछि तँ ई महान कृपा भेल छैक मैथिलीपर। एकरालेल कोना विभाग छुटिआओल नहि गेल अछि । हालेमे गठित आ भंगठित प्रज्ञा–प्रतिष्ठानसँ पूर्वक गठनमे एकमात्र मधेशी मैथिली साहित्यकार अवसर पबितो परिषद्मे राखल नहि गेलाह । तथापि प्रज्ञा प्रतिष्ठानक इतिहासमे पहिल बेर ‘आंगन’ गतगर पत्रिका मैथिलीमे निकलल। किछु काज आगां बढल रहए, परिषद् भंग आ दीर्घअन्तरालक बाद जंॅ गठनो भेल तंॅ एहन जे शपथग्रहण लेवासंॅ पूर्वे तहस–नहस भऽ गेल । अदालत आ जनता दुनू द्वारा वहिष्कृत भऽ कए रहि गेल अछि । तए “एकरासँ ने पहिने आशा छल, आ ने आब करी से तकर वातावरण बनैत देखल जा रहल अछि । कोना डा. योगेन्द्र प्र. यादव जहिया एकर सदस्य रहथि तहियासं ‘सयपत्री’ पत्रिकाक प्रकाशन शुरु भेल रहए जे वास्तविक रुपमे समावेशी स्वरुप रहैक । आब साझा प्रकाशनक गप करी । पहिने चर्च भऽ आएल अछि राणा प्रधानमंत्री अपना विरुद्धक साहित्यकेँ प्रकाशनसँ रोकबाक हेतु १९१३ ई. मे जे गोरखा भाषा प्रकाशिनी समिति (नेपालके समीक्षात्मक इतिहास–डा. श्री रामप्रसाद उपाध्याय, (२०५५), पृ–३१७ साझा प्रकाशन)क गठन भेल उएह समिति तत्कालीन राणा प्रधानमंत्री जुद्धशमशेर द्वारा नेपाली भाषा प्रकाशन समिति (वि.स. १९९०)क रुपमे परिणत कऽ देल गेल तकरे उत्तराधिकारीक रुपमे २०२१ साल अगहन १७ गते साझा प्रकाशनक स्थापना भेल । एकरो संचालक लोकनि नेपाली वाहेक आन भाषामे प्रकाशन करब सोचने ने छलाह आ साझा प्रकाशन विगत ४५ वर्षसँ नेपाली साहित्यक भण्डारकेँ विना कोनो सरकारी अनुदान, अपनेसँ कमा कऽ अथवा घाटा सहि कऽ भरैत रहल अछि । जंॅ कि एहि संस्थामे सरकारक लगानी ६० प्रतिशत अछि तए “एकर अध्यक्ष लगाएत तीन संचालक सरकार दिशसंॅ मनोनित होइत रहलाह अछि । मुदा केओ एकरा नेपाली भाषासँ आगांॅ लाबि नेपाली जनताक करक अंशसँ चलैत एहि संस्थाकेँ समावेशी नहि बना सकल। सहकारीक कारणेँ ई कृषि-मंत्रालय अन्तरगत अछि आ एहिसँ पूर्वो वहुतो मधेशी कृषि मंत्री होइत रहलाक अछि । मुदा आइ, लाभ शून्य साझा अध्यक्षक पदपर धरि कोनो मधेशीकेँ लएबाक जरुरति महशूस नहि कएल गेल । ४५ वर्षक बाद एहिबेर पहिल मधेशी एकर अध्यक्ष पदपर आएल अछि । साझाक नेपाली भाषा मुखी सम्पूर्ण क्रियाकलापकेँ समावेशी बनएबाक प्रयास जारी अछि। किछु प्रकाशनक तैयारी चलि रहल अछि। मैथिली व्याकरण, मैथिली वालकथा, मैथिली कथा संग्रह आदिक प्रकाशन प्रगतिपर अछि तंॅ महाकवि विद्यापतिक चित्र प्रकाशित भऽ चुकल अछि । भोजपुरी, अवधी, थारु, नेपाल भाषा, तमाङ आदि भाषामे काज करबाक गृहकार्य चलि रहल अछि । मुदा ई सभ काज नगण्य स्तपरपर अछि। नेपाली भाषाक काजक आगांॅ ओत्तए नेपाली मानसिकतासँ उबरि सकबामे जे कठिनाइ लगबाक चाही, लागि रहल अछि । तथापि किछु साहित्यिक संचालक लोकनि समावेशीक वर्तमान रुपान्तरणमे साझाकेँ मात्र नेपालीक घेरामे राखब उचित नहि, कहि उदारता देखा रहलाह अछि । परिणाम दूर तँ अछि मुदा पहुॅंचसँ ततेक दुरो नहि । साझाक पत्रिका ‘गरिमा’ एखन नेपालसँ, प्रकाशित साहित्यक पत्रिकामे अग्रणी रखैत अछि। ओकरो समावेशी स्वरुपमे लाओल जा रहल अछि । लेखकीय घेराकेँ तोडैत मधेशक लेखक लोकनि द्वारा मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारु आदि साहित्य सम्वन्धी आलेख प्रकाशन प्रारंभ भ’ चुकल अछि, आहवान कएल जा रहल अछि । एकर अतिरिक्त निजी क्षेत्रक पत्र–पत्रिकामे समावेशी रचना सभक उपस्थापन कमजोर अछि । रचना’, ‘अभिव्यक्ति’, शारदा’ ‘मिर्मिरे,’ ‘नेपाल’ लगायतक पत्र–पत्रिका सभमे नियमित रुपमे भाषान्तरक रचना, साहित्यक समीक्षा समालोचना, अनुवाद, मौलिक आदि प्रकाशित होइत रहबाक चाही । एहि सम्वन्धमे उक्त पत्र–पत्रिका द्वारा प्रयास कएल गेल हो से हमरा ज्ञात नहि अछि । एहि तरहेँ देखलापर स्पष्ट रुपेँ देखि पडैछ जे राजनीतिए जकाँ भाषा, साहित्य किंवा संचारक क्षेत्रमे मधेशी उपेक्षित रहल अछि । ओ राज्य द्वारा तँ सभसँ बेसी अछिए, निजी क्षेत्र द्वारा सेहो कम अबडेरल नहि गेल अछि । परिणाम छैक मैथिलीभाषा, साहित्यमे विभिन्न विधा आ धाराक गतिविधि चरमपर होइतो नेपाली संसार ताहिसँ अनभिज्ञ अछि आ समकालीन साहित्य यात्राक उपलव्धि अपने धरि सिमित भऽ कऽ रहि गेल अछि । तहिना संचारक्षेत्र एतेक आगांॅ बढि गेल अछि, मुदा एहि क्षेत्रमे अपन योग्यता, क्षमता प्रदर्शित कऽ सकबाक अवसर कोनो ‘ज्ञानी’ मधेशी पाबि नहि रहलाह अछि । ई व्यक्तिक मात्रे नहि राष्ट्रकेँ क्षति सेहो भऽ रहलैक अछि । आ तए“ राष्ट्रियताक सूत्र कहियोकाल ढील पडैत वूझि पडैत छैक । आबो समावेशी नहि तँ फेर कहिया !!! यात्रा प्रसंग हमर कल्प्नाक सेती..... बहैत..... अविचल ! बहुत पहिने डा. धीरेन्द्र एकटा कथा लिखने रहथि। हिचुकैत बहैत सेती । कोनो सन्दर्भमे पोखरा अएलाक बाद हुनका सेती मनकेँ छुने रहनि आ तखन ई कथा आएल रहय । जनकपुरमे रहनिहार डा. धीरेन्द्रिकेँ हृदयकेँ झकझोड़ि देब बाली नदी सेतीमे आखिर की विशेषता रहल हयतैक हम तहिया खूब सोचने रही । हमरा मोनमे सेती तहिए बसल नहि, देखबाक चाही सेतीकेँ । समए एम्हर काफी ससरि गेल अछि । डा. धीरेन्द्र सेहो आब नहि छथि । जहिया ओ पोखरा गेल छलाह से पोखरा आब नहि अछि । नीक विकास भेलैए एकरा । विगतक चारि दशकमे ई पर्यटकीय गन्तव्यिक आकर्षक ठाम भऽ गेल अछि । वहुत किछु बदलि गेलैए । जँ नहि बदलल अछि तँ सेती । लगैए एकर व्यथा–कथा सुननिहार केओ नहि भेलै। सेतीक किन्हेलरपर बसल पहाडी़ गाम सभमे गाओल जाइत लोकगीत सभमे सेतीक कथा अवस्से। आएल हएत । हमरा एम्हरका लोक संस्कृातिक अध्ययन नहि अछि । मुदा नदी सभक प्रभाव जेना लोकगीत सभमे अबैत रहल अछि, एहि क्षेत्रक प्रसिद्ध नदी सेती अवस्यअ सौनाएल हएत । पोखरामे देखबा लाइक बहुत किछु छैक । घुमबाक हेतु जे केओ काठमाण्डू अबैत अछि पांच–छव घंटाक वस यात्रासं पोखरा अवश्य आबि जाइत अछि । एत्त देखबा योग बहुत किछु छैक – अन्न पूर्णहिमाल श्रृंखला, माछापुच्छ्े (माछक नांगरि सन) हिमालय, चर्चित फेवा ताल, महेन्द्र गुफा, डेविड्स फौल, संग्रहालय सभक संग बराही, विन्य्ेवासिनी, भद्रकाली मंदिर, विश्‍वशांतिस्तूहप, तीव्वातीय गाम, पुरना बाजार आदि । पाइ हय तं छोटकी हवाई जहाज जे उडन खटोला वेसी लगैत अछि, मे चहरि पोखरा नगर, फेवा ताल, हिमाली श्रृंखला सभकेँ आनन्दि लऽ सकैत छी । साइकिलसँ पहाड़पर चलि सकैत छी । वर्फमे चलबाक आनन्द, लऽ सकैछी। वहुत किछु भऽ सकैछ मुदा से डलरमे । दिनहुँ विदेशी पर्यटक दर्जनोक संख्यादमे अबैत अछि । वर्षाती मौसम सभसँ नीक होइछ अकासमे उड़बाक लेल ओना जनबरीसँ जून उत्तम मानल जाइछ । मुदा हमरा लेल पता नहि किए पोखराक प्रथम दृश्या वलोकन सेती नदीक हेतु निर्धारित छल । डा. धीरेन्द्र क सेतीक खासियत खोजबाक लेल मनमे अनेको तरंग उठैत रहल अछि । सेती माने नेपालीमे होइछ उज्ज। उज्जरर धप–धप नदी । हं, ठीके सेती उज्ज। रे पानिक संग बहैत अछि। पोखराक हृदय प्रदेश भऽ कऽ बहैत सेती, अपना भितर अनेको स्ुन्देर, कुरुप प्रसंग सभक एकांत साक्ष्यी। कर्णाली प्रदेशमे बहए बाली प्रसिद्ध हिमाली नदी सेती जे बझाङ, डोटी, डडेलधुरा धनगढी होइत भारतके उत्तर प्रदेशमे सन्हिीया जाइत अछि, जे माछापुच्छ्रेर हिमालसँ निःसृत होइत अपना संगे चूना लेने पोखरा उपत्यभकामे प्रवेश करैत दक्षिणमे त्रिशूली आ नारायणीमे मीलि जाइत अछि। तीन दिनक हेतु मात्र हम पोखरामे छी। साझा प्रकाशनक कार्यालय निरिक्षणक क्रममे एत्त आएल होइतो हमर प्राथमिकता सेती दर्शन अछि। क्षे.शा. प्रवन्धरक रिलामीक संग हम महेन्द्रापुल पहुंचैत छी । पुलक उत्तर आ दक्षिण दुनू कात भयंकर झारपात, गाछक विचनिरिह, असमर्थ, प्रताडित सेती.....। लगभग ४० मिटर निचां कोनो विधवाक सुन्नप, उज्ज, र सिउँथ जका वहैत सेती.....। दुनूकातक किन्हेडरपर घर सभ बनल आ तकर शौचालयक नालीक दुर्गन्ध आ गन्दैगी उद्यैत सेती....। नगरक गन्दगीकेँ आंचरमे सजेवापर विवश सेती । अपराधी सभक कुकृत्यतकेँ सेहो अपन छातीपर लोकबा लऽ बाध्य भऽ सेती । निचाँ, भयानक, डेराओन, देखिते देहमे सिहकी पसरि जएबाधरिक कुरुप सेती....आ डा. धीरेन्द्रनक सपनाक सेती ! नहि, हमरा नहि लगैत अछि डा. धीरेन्द्र् तहिया एहि सेतीकेँ देखने होथिन्ह । मधेशमे रहनिहार, नदीक संस्काारकेँ अपन जीवन पद्धतिमे अंगेजनिहार व्यरक्तित्वत एहन कुरुप सेतीकेँ कोना सहि सकैत छलाह होइत । हम तँ पुरे निराश भऽ जाइत छी । हमर मान्यनता आ धारणा सभ खण्डि्त होइत जा रहल अछि । हम अगुता कऽ रिलामी जीकेँ पुछैत छिऐक की इएह रुप छै सेतीकेँ ? ओ हमर आसय वुझैत अछि आ हडबडा़ कऽ बजैत अछि हैन, सर ! नहि, हजूर ! नगरमे प्रवेश करैत काल आ निकलैत काल ई अपन स्वभाविक रुपमे रहैत अछि । हमरा कनेक ठाढ़स होइत अछि । दक्षिण दिशसँ स्वधच्छु, उज्जर पानि देखने छी । मुंगलीन–काठमाण्डू़ बाटमे निचाँ बहैत उज्जर सेती तनहु मे त्रिशुलीमे मिलैत अछि । राफ्टींग कएनिहार सभ एही स्व्च्छ पानिमे रमल रहैत अछि । नदीक बहैत क्रम सेती– त्रिशूली–नारायणी । हम एकर प्रवेश दिश बढैत छी । बगरमे ई गहिराईमे चल जाइत अछि । पोखरा नगरके उत्तर पश्चिम भाग जत्तए शहरक अन्त। होइत अछि ओत्त के आई सिंह पुलसँ सेती नदीक सुन्दर, कलकल, स्वोच्छक, उज्जीर स्वररुप देखल जा सकैछ । ई फेर नगरक विचमे अवस्थि तँ रामघाटपर देखार होइत अछि । फैलगर मुदा पानिक मात्रा कम । ओत्तए सँ नगरमे वालुक आपूर्ति कएल जाइछ । ठिकेदार सभक भीड़ । एकटा राम मंदिर अछि आ वगलमे श्मशान घाट । नगरसँ निचाँ नदी दिश प्रवेश करैत काल एकटा द्वार बनल छैक – वैकुण्ठटद्वार । नदी आगाँ जा फेरसँ उएह सए मिटर गहिंराई बला स्वलरुपमे बदलि जाइत अछि, जकरा पृथ्वीस चौकसँ नीक जकाँ देखल जा सकैछ । तकरा कनेके दक्षिण गेलापर नगर समाप्त भऽ जाइछ आ सेती जेना सभ पीड़ासँ मुक्त भऽ स्वेच्छलन्दा, अपन स्वीरुप आ गतिमे आबि जाइत अछि । सेती एखन पर्यटन व्य्वसायी सभक दूधगरि गाए भऽ गेल अछि । रफ्टिंगसँ लाखो कमाइ अछि । मुदा नगर भितरमे भयावह आ कुरुप रुपमे वहैत सेतीकेँ स्वच्छ, आकर्षक आ सुरक्षि‍त मत बनएबाक प्रयास होइत कहाँ देखल गेल अछि । ने सरकार ने व्यवसायी सभ आ ने उपमहानगरपालिका । कएलहुँ हएतैक तँ हमरा ज्ञात नहि अछि। ओना हम एत्तए तकर रत्तियो भरि छाप नहि देखि पौलहुँ अछि । हम सेतीक नगर प्रवेश स्थतलपर छी.....मंत्रमुग्धर, स्तरव्धँ आ रोमांचित सेहो । वास्तविक सेती अपन सम्पूर्ण सौन्दर्यसँ एतए उपस्थित छथि । वर्फक पानिसँ बनल उज्जतर सेती कल–कल निनादक संग गन्तव्य दिश बहैत। अपना भितर रहल सभ गन्दिगी, पीड़ा, प्रेम, स्नेह, मिलन आ विछोहक सभकथा सभकेँ समेटने बहैत । सेतीक एहि स्वनच्छयन्द , शांत बहाबमे कतहु उपेक्षा, तिरस्काेर आ शोषणक पीड़ा सेहो हम महशूस करैत छी। आ तखन कतौ ने कतौ डा. धीरेन्द्रक हिचुकैत बहैत सेतीपूर्ण आकारमे हमरा सोझाँ ठाढ भऽ जाइत अछि । संसारक हेतु अपन सेवा देनिहारि सेती जखन ताही संसारी सभसँ उपेक्षा पबैत अछि, शोषणमे पड़ैत अछि तँ आत्माज छहोछित हएबे करतै। सम्भवतः सेतीक इएह पीड़ा चारि दशक पूर्व डा. धीरेन्द्रा महुशूस कएने छल हएताह..... । तँ हमरा आब नगरमे पैसबामे डर लगैत अछि । अपन कल्पनाक स्व‍च्छर, सुन्दर सफा आ स्वेत नदी सेतीक अगिला विकृत रुप देखबाक साहस हमरामे नहि अछि । हम तँ एत्तहि बैसि अपन कल्प‍नाक, अपन चिंतनक, अपन रुचिक सेतीकेँ निद्वंद, साफ, प्रफुल्लित बहैत देख चाहैत छी । वस. एत्तहि बैसि... ! साझा प्रकाशनमे विद्यापति हम २०६५ साल पुस २ गते साझा प्रकाशनमे अध्यक्षक रुपमे नेपाल सरकारसँ नियुक्त भेलहुँ । साझा प्रकाशन सरकार आ किछु निजी क्षेत्रक शेयर होल्डर सभक राष्ट्रिय प्रतिष्ठान अछि जे अपन पुस्तक आ पत्रिका तँ छपिते अछि नेपाल अधिराज्य भरि एक कक्षासँ लऽ दश कक्षा धरिक सरकारी विद्यालयक पाठ्य पुस्तक वितरण आ विक्री करैत आएल अछि । लगभग ९० करोड़क कारोबार करएबला आ तीन सएसँ उपर कर्मचारीक संलग्नतामे देशभरिमे २८ गोट शाखा, उप–शाखा, क्षेत्रिय शाखा सभक संजाल कार्यरत् अछि । एकर स्थापना २०२१ सालमे भेल अछि आ एखन धरि नेपाली साहित्यकार वाहेक केओ एकर अध्यक्ष आ महाप्रबन्धक नहि बनाओल गेल छलाह । देशमे बदलैत राजनीतिक अवस्था आ समावेशी लोकतंत्रक प्रादुर्भाव भेलापर मंत्रालयमे मधेशक मंत्री लोकनिक प्रवेश भेल आ तखन खूजल ४५ वर्षक बाद बज्जर केबार। हम पहिल मधेशी, मैथिली साहित्य प्रेमी एहि गरिमामए पदपर बैसाओल गेलहुँ । ई संस्था सालमे ३०–४० गोट साहित्यिक पुस्तक प्रकाशित करैत अछि । ईसभ साहित्यिक कृतिक सभा भाषा मात्र नेपाली । ई नेपाली भाषा वाहेक आन भाषामे पुस्तक नहि छपैत छल । हमरा गेलाक बाद माहौल बनओलहुँ आ तखन निर्णय भेल जे नेपाली वाहेककेँ भाषामे सेहो पुस्तक छापल जाए । बड़ कुहरि कऽ भेलो निर्णयकेँ कार्यान्वयनमे काज बढाओल गेल । जाहिमे सर्वप्रथम विद्यापति’क पोस्टर चित्र बहार करबाक निर्णय कराओल । विद्यापतिक प्रचलित चित्रकेँ साझा प्रकाशनक कलाकारकेँ देखा बनएबाक कतेको आग्रह ओ पुरा नहि कऽ सकल। कारण छलै तत्काल उपलव्ध छोटचित्रमे देखाओल विद्यापतिक पागक गणित ओकरा समझसँ बाहरक होएब । नेपालक चर्चित कलाकार छथि टेकवीर मुखिया साझाक प्रत्येक पुस्तकपर हुनकेँ डिजाइन रहैत छनि । हमरा जनकपुर अएबाक रहए आ ताहिसँ पूर्व चित्रकेँ सार्वजनिक करबाक हमर इच्छा । बड़ मुश्किलसँ हम पाग खोजलहुँ । साझा प्रकाशनक एकटा कर्मचारीकेँ पाग पहिरा बुझा कलाकार लग पठएलहुँ, तखन ओ पागकेँ देखि स्केच कएलक आ तैयार भेल कलर विद्यापतिक चित्र, जे मिथिलाञ्चलक विक्री कक्षसँ किछु मासमे विक्री भऽ चुकल छैक । दोसर खेप छापबाक तैयारी चलि रहल छैक, एहिमे कागजमे सुधार कऽ विद्यापतिक चित्रकेँ आर निखारल जएबाक योजना छैक । ई चित्र हम पटनामे जा जवावदेह व्यक्तित्व सभकेँ दऽ आएल छीयनि, मुदा ओ लोकनि एकटा समाचारो पत्रिकामे देबाक जरुरति नहि बुझलनि। एमहर भाद्र मसान्तमे मैथिली भाषाक पहिल पुस्तक वालकथाक बहार भऽ गेल अछि । “बगियाक गाछ” नामसँ छपल ई पुस्तक साझा प्रकाशनक इतिहासमे नेपाली वाहेकक प्रथम मैथिली पुस्तक भऽ गेल अछि । राजविराजक देवेन्द्र मिश्रक संकलनमे १५ गोट वालकथाक एहि संग्रहमे कथा सम्वन्धित चित्र सभ सेहो मिथिला लोकचित्रमे अछि । आब साझा प्रकाशनक दरबज्जा खुजि गेलैए, आनो साहित्यकार ओ मैथिली, भोजपुरी, अबधी, थारु, गुरुङ, आदि भाषाक किएक ने हो अपन अधिकारक हेतु लड़ि सकैत छथि । मैथिली व्याकरण लिखबाक काज प्रारंभ भऽ गेल अछि – भाषाविद् डा. योगेन्द्र प्र. यादवक नेतृत्वमे । मैथिली कथा संग्रह, भोजपुरी कथा संग्रहक प्रकाशन योजना प्रगतिपर अछि । साझा प्रकाशनक नेपाली भाषाक स्तरीय पत्रिका ‘गरिमा’ मे आब मैथिली, भोजपुरी, अबधी भाषा साहित्य सम्वन्धी समालोचना, निबन्ध आबए लगल छैक । ई सभ परिवर्तनक संकेत अछि । दुनू देशमे मैथिली गतिविधिक जे किछु घटना होइत अछि, तकरा सूचना प्रवाहक संकट छैक । भारतीय क्षेत्रक लेखक अपनामे सिमित भऽ गेने नेपालक गतिविधिपर नजरि राखब जरुरी नहि बुझैत छथि । परिणामतः बहुतो सूचना अपूर्ण रहल अछि । ने प्रयास कएल जाइछ, ने जरुरीए बूझल जाइछ । नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान विगत चारि वर्षसँ राजनीतिक शिकार भेल अछि । गठन नहि भेने बहुतो काज रुकल पड़ल छैक । पंक्ति लेखकक प्रधान सम्पादकत्वमे निकलल ‘आंगन’ पत्रिका (जकर चर्च भारतीय पत्र–पत्रिकामे कहियो ने भेल) ठमकल अछि, कतेको मैथिली परियोजना अपूर्ण राखल छैक । तहिना एहि विच दर्जन भरि मैथिली पुस्तक छपल रहैत, से नहि भऽ सकल अछि । आ ई तखने आबो संभव हयत जँ प्रज्ञाक गठन होइक । पा्रज्ञ लोकनिक ई पद राजनीतिक कार्यकर्ता सभ हथिअएबा मे जुटि गेलासँ ई निष्प्रभावी बनल निरिह पड़ल अछि । एकरा राजनीतिसँ मुक्त जंॅ कऽ देल जाए तंॅ अवश्य इहो मैथिली समेतकेँ नीक सहयोग तँ पहुंॅचा सकैत अछि । ‘गोरखापत्र’ दैनिक एक पृष्ट मैथिलीमे दैत छैक, मुदा ओहो पृष्ट मैथिलीकेँ कतेक उपकार करैत अछि से देखले पर पता चलत । तखन मैथिली भाषामे छैक ई सन्तोषक बात । निजी चैनल सभ सेहो मैथिलीमे समाचार शुरु कएलक अछि । माहौल बनि रहल छैक । उपराष्ट्रपतिक हिन्दी शपथ विवादसँ मैथिली प्रति जनमत वृद्धि भेलैए, ई उपलव्धिए मानल जएबाक चाही । जे से मैथिलीक नीक संभावना छै नेपालमे–संघीय सम्विधान बनलाक वाद तंॅ आओर । जंॅ कि हम साझा प्रकाशनमे छी ओत्तसंॅ नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहासक प्रकाशनक योजना बनाओल गेल अछि । नेपालक मै.सा.क इतिहास लिखनिहार डा. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौनकेँ हम पत्रद्वारा आग्रह कऽ चुकल छीयनि जे आधुनिक कालकेँ कनेक अपडेट कऽ देथि । हुनक स्वीकृति आ पाण्डुलिपिक प्रतिज्ञा अछि । एम्हर पुस्तक सभ सेहो खुबे आएल अछि । ‘भ्रमर’क नेपाली भाषामे “मैथिली लोक संस्कृति” काठमाण्डूसँ छपि कऽ बाजारमे अछि । धीरेन्द्र प्रेमर्षिक गजल संग्रह (नेपालीमे) बाजारमे अछि । रमेश रंजनक कविता संगह आबि रहल छैक तंॅ रामानन्द युवाक्लव द्वारा कथा संग्रह बहार भऽ रहलैक अछि । हिमांशु चौधरीक कविता संग्रह आएल अछि । रेवती रमणक नाटक संग्रह अएलनि अछि तंॅ ‘भ्रमर’क सम्पादनमे नाटक संग्रह जल्दीए प्रेससँ बहार हएत। आवश्यकता छैक छपल पुस्तक सभकेँ उचित प्रचार प्रसार आ समालोचना समीक्षा। जे आन भाषा जकाँ मैथिलीमे दुर्लभ अछि । कनेक उदार होबए पड़त तखने पुस्तक प्रकाशनक सोकाज लगतै लोककेँ । संभव थिक आबएबला काल्हि खुशनामा होइक मैथिली प्रकाशनक लेल । डा. कल्पना मणिकान्त मिश्र, पिता डा. शिव कुमार झा, गाम राटी, सासुर-गजहारा। विगत ३०-३२ बरससँ मुम्बईवासी। मेडिकल शिक्षा जे.जे. होस्पीट्ल/ग्रान्ट मेडिकल कॉलेजसँ सम्पन्न कए स्त्री-रोग विशेषज्ञ रुपमे कार्यरत। मातृभाषा मातृभाषाक प्रेम, बहुत किछ पढल आ सुनल अछि। अहूँ सभ सुनने होएब कतेक बेर मुदा स्वयं अनुभव करबाक अवसर किछुयेक लोककेँ भेटैत छन्हि।हम सभ बम्बई आएले रही। ओना तँ एहि गप्पक एक युगसँ बेसी भऽ गेल मुदा बिसरबाक हिम्मत नहि करि सकैत छी। आर कियैक बिसरु? महानगरीक चकाचौन्धमे हराएल रही, कतौउ भटकि नहि जाइ से चिन्ता रहए। १९८० दशकमे संजय गाँधीक एकटा योजना आएल छल, बेरोजगार ग्राजुएट लेल बैंकसँ किछु सुविधा २०,००० रुपया देबए लेल। हमहुँ बेरोजगार डाक्टर रही। आवेदन केलहुँ तँ लोन तुरते भेट गेल। मुदा आब ओहि पैसाक हम की करु? अपन रोजगार जेना दवाईखाना, कोनो छोटसन घर आदि भविष्यमे अपन क्लीनिक खोलि सकी, जे कि ओहि समएमे अति सुलभ आर सम्भव छल, आब तँ सपना रहि गेल। ओही पाइसँ निवेश करि हम अपन भविष्य सुरक्षित करि सकैत छलहुँ, गहना-गुड़िया बना अपन सोख-सेहनता पूरा करि सकैत छलहुँ वा भारत भ्रमण कऽ सकै छलहुँ। मुदा नहि ! हमर पतिक (डा. मणिकान्त मिश्र) इच्छा छ्लन्हि जे मैथिली भाषाक पत्रिका निकाली। हम दुनु गोटे मिली कऽ ’विदेह’ नामक मैथिली पत्रिकाक शुरुआत केलहुँ। पत्रिका तँ छपए मुदा के कीनत आर के पढत ई बड पैघ समस्या छल। कोनाहु करि कए अपन घरक पूँजी लगा कए २ बरख तँ पत्रिका चलेलहुँ। फ़ेर हमरा सभकेँ बन्द करए पडल किएक तँ दुनु गोटे डाक्टरी व्यवसायमे लागल रही, घर-अस्पताल-पारिवारिक झन्झट सम्हारैत बड़ मुश्किल छ्ल। बम्बईमे नबे-नबे रही। तहूमे एतेक दुस्साहस कोनो साधारण आदमी नहि करि सकैत अछि सिर्फ आर सिर्फ डा मणिकान्त मिश्रा करि सकैत छ्लाह। किएक तँ मैथिलीक प्रति हुनका जुनूनी लगाव छ्लन्हि। बम्बईक आपाधापी भरल जीवन एवम स्वास्थ्यक उतार-चढाव किछु हुनकर मैथिली प्रेमक उत्साहकेँ कम नहि कए सकलन्हि आर बीस-बाईस बरखक पश्चात ओ अपन सभटा पूँजी शरीर-समांग समेत मैथिलीक फिल्म "आउ पिया हमर नगरी" बनौलनि। फिल्म बड सुन्दर बनलै, अहाँ सभ देखने होएब। यदि नहि तँ एक बेर अवश्य देखी। फिल्म बनाबएमे जे कष्ट आर अनुभव भेल से हम एखन वर्णन नहि करि सकै छी। आर कखनो।।।।! मुदा एहिसब प्रकरणमे माँ मैथिली अपन लायक पुत्रसँ हरदम लेल बिछुडि़ गेली। अछि कोनो मात्रभाषा भक्त-पुत्र जे अपन माँ-मैथिलीक हृदयक पीडा़क अनुभुति करि हुनका लेल अपन सभ किछु समर्पित करि दिअए। मखानक खानि ई मिथिला- भीमनाथ झा मिथिलाक लोक एतेक सरस, मैथिली भाषा एते मृदुल, एहि ठामक भूमि एते उर्वर, उपवन एते सघन आ हरियर कंचन अछि- तकर कारण की? की ई नहि जे एतए जलाशयक आगार अछि, नदी पोखरि डबरा अपार अछि? मिथिलामे समुद्र नहि छै, तेँ एहि भूमिक वासीक स्वभाव नोनछराइन नहि लागत, लोक “अथाह” नहि भेटत। मिथिलामे गंगा बहै छथि, तेँ समाज पवित्र अछि; मधुर जलक प्रवाह चलै छै, तेँ लोकोमे मधुरताक तरंग उछलैत देखब। पानिक एतए कमी नहि, लोकक आँखियोमे “पानि” भेटि जाएत। कवीश्वर चन्दा झा मिथिलाकेँ नदी-मातृक देश ओहिना नहि कहने छथि- नदी-मातृक क्षेत्र सुन्दर शस्य सौं सम्पन्न समए सिरपर होय वर्षा बहुत संचित अन्न दयायुत नर सकल सुन्दर स्वच्छ सभ व्यवहार सकल विद्या-उदधि मिथिला विदित भरि संसार नदिए नहि, पोखरियोक प्रधानता अछि एतए। एहन कोनो गाम नहि, जतए दू-चारि दस-बीस छोट-पैघ पोखरि नहि हो। सैकड़ो वर्ष पुरान एहन-एहन सयक धक पोखरि एखनो एतए अछि जकरा “दैता पोखरि” कहल जाइछ, माने कोनो दैत्य आबिकए ओकरा खुनने छल! मनुक्ख बुते कतहु ओतेटा पोखरि खूनल होइ! तहिना, बड़का पोखरिमे “महराजी पोखरि” सभ अछि। छोट-मोट तँ कैयन हजार होएत। तेँ, मिथिलामे जलकरक चलनि बेसी। जलक सर्वप्रधान फसिल थिक- मखान। मखान- ई शब्द ध्यानमे अबितहि मिथिलाक अनुपम व्यक्तित्व साकार भऽ उठैछ। एहन व्यक्तित्व जकर जोड़ नहि- अद्वितीय। मखान, कहल जाइछ, स्वर्गोमे नहि भेटैछ। देवतासभकेँ मखानक तस्मै लेऽ, पाग कएल मखानक फोँका ले मन जखन ललचाए लगै छनि तँ मिथिलामे जन्म लै छथि आ जीहकेँ जुड़बै छथि। मिथिलाक एक खास पाबनि थिक कोजगरा- उल्लासक पाबनि, उमंगक पाबनि, लक्ष्मीक आराधनाक पाबनि। ओहि दिन मखान परसबाक प्रथा अछि। से मिथिलेमे अछि। मखान मिथिलाक खास वैशिष्ट्य बनि गेल अछि। तेँ, एहि ठामक साहित्योमे मखान प्रवेश कऽ गेल अछि। अनेक साहित्यकार कोनो-ने-कोनो प्रसंगमे एकर नाम लेने छथि। जाहि रचनामे मखान शब्द आबि गेल अछि, ओ रचना ओहने ललितगर-देखनगर, ओहने कोमल-निर्मल, ओहने हुलसगर-सुअदगर भऽ गेल अछि। कविवर सीतारामझाकेँ भगवानस रामक सुयशक निर्मलता आ महिमाक व्यापकता देखयबाक भेलनि तँ कहि उठला- आश्विनीक चान जकाँ दही ओ मखान जकाँ राम-यश प्रान जकाँ विश्वमे पसरि गेल। कविवर सीतारामझा एक आनो प्रसंगमे, लक्ष्मी-पूजाक नैवेद्यक अंग-रूपमे, मखानक नाम लेने छथि- पूजथि लक्ष्मी-पद नबेद दय मधुर मखानक। अपनहुँ खाथि प्रसाद भाग धनि ताहि किसानक॥ मखानक उल्लेख कयनिहार मैथिली साहित्यकारक कमी नहि अछि, किन्तु एतऽ तीन कविक मात्र चर्चा करए चाहब। पहिल छथि कविचूड़ामणि मधुप, जनिक अविस्मरणीय कविता “कोजगराक मखान” अछि। दोसर छथि मंत्रेश्वर झा, जनिक गीतपोथीक नाम थिकनि- “पान एतैए मखान एलैए”। तेसर थिका गोपालजी झा “गोपेश” जे अपन पोथी “मखानक पात” सँ कतेको गोटेक मुहँ पोछए चाहलनि। मधुपक “कोजगराक मखान”क विषए वस्तु उच्च वर्ग द्वारा दलितपर कएल गेल अत्याचारपर आधृत अछि। ई कविता वर्ग-वैषम्यकेँ उघारिकए राखि देने अछि। मधुप करुणरसक महान कवि थिका। एतए एक फोँका मखानसँ कवि करुणाक निर्झरिणी बहा देने छथि। किन्तु, ताहिसँ पहिने उत्सवक जीवन्तता देखल जाए- आबालवृद्ध जुटि रहल- आसमर्दे विदीर्ण जनु युग्म कान मिलि हमहुँ ताहि मानव-निधिमे बहि गेलहुँ न गुनि अपमान-मान, कहुँ दू फोँका, कहुँ एक कतहु नहि सेहो तेहन महगिक विधान, किछु हो, आजुक निशिमे कहुना निश्चय थिक खाइ मखान पान। ता कि ओही भीड़मे एक अवांछित छौँड़ा सन्हिया गेलै। चीन्हि गेलापर छ्रपिटा देल गेलै। कविक नजरि पड़लनि- जाकए समीप देखल निगाहि, देखितहिँ हिय कहलक आहि! आहि! गोविन्द त्राहि! ई आबि मखानक हेतु, गेल, नहि पाबि सकल एको फोँका, सौँसे शरीरमे छैक किन्तु ककरो कुकृत्य-निर्मित फोँका! एहि करुण प्रसंगक बाद उल्लासक चर्चा उचित थिक। सर्वाधिक मखानक बखान गीतकाव्यमे भेल अछि। मंत्रेश्वरझाक मखान-प्रेम तँ हुनक गीतपोथीक नामेसँ झलकैत अछि- “पान एलैए मखान एलैए”। कोनो करतेबताक अवसरपर ग्रामवासिनी मिथिलाक मध्यवर्गीय परिवारमे रहरहाँ देखब ई हूलिमालि- बड़की पिसिया कुम्हरौड़ी अँचार बनाबथि बैसल बुढ़बा काका दरबज्जापर पान चिबाबथि ओङठल लछमन एलैए कि राम एलैए टोल-पड़ोसक घर-घर के समाङ एलैए पान एलैए मखान एलैए धीया के बियाहके सामान एलैए। मखान जहिना स्वच्छ कोमल चिक्कन होइछ, मखानक पात तहिना कँटाह खड़खड़ आ मैल मुँह। एहिपर कहबियो प्रसिद्ध भऽ गेल- मखानक पातसँ मुँह पोछब। एकक आकांक्षा जखन दोसराकेँ सोहाइ नहि छै तँ अपन खौँझ एहू तरहेँ व्यक्त करैछ। अर्थात, बड़ नीक-निकुत चाहै छथि तँ बुझथु, तेहन उपाए करबनि जे नोचैत रहिहथि अपन मुँह! एहि कहबीक प्रयोग व्यंग्योमे होइ अछि। शीर्षक- कवितामे कवि तिलक-दहेज लेनिहार बाप, समाजक चरित्रहीन मुँहपुरुष, स्वार्थी नेता, छद्मवेशी भद्रजन एवं समाजकेँ गर्तमे ठेलनिहार जते तत्व अछि, सभकेँ मखानक पातसँ मुँह पोछि देबए चाहै छथि। आइ प्रयोजन अछि- जे ओहन-ओहन शिखण्डीक मुँह मखानक पातसँ पोछि दी जे बेटाकेँ विक्रीक वस्तु बूझि कए तिलक-दहेजकेँ बढ़बइत अछि कन्यागत करेज खखोरि कए अपन इष्टदेवताक अर्घ्य चढ़बइत अछि। ................... बन्धु! तेँ आइ प्रयोजन अछि जे समग्र परिवर्तन आनब सर्जन लेल कोनो अवरोधक तत्त्वक मुख मखानक पातसँ पोछि दी जे कार्यपालिका, न्यायपालिका आ विधायिकाक गरिमाकेँ भंग करैछ आ विधि-व्यवस्थामे आस्था रखनिहार शान्तिप्रिय लोककेँ अकारणहुँ तंग करैछ। मखान जे जलतलमे, पंकक परिसरमे जन्म लै अछि, से अपन गुणसँ भगवानपर माला बनि चढ़ैत अछि, भोग बनि अर्पित होइ अछि, श्रेष्ठ पदार्थक मापदण्ड बूझल जाइ अछि, ततबे नहि, मुहाबरा बनिकए दुर्जनकेँ चेतौनियो दै अछि, अपन “पात”सँ कुत्सित तत्त्वक मुहोँ पोछै अछि। संसारक एहन दुर्लभ पदार्थ, जे मिथिलामे सुलभ अछि, तकर “मान” कतौ मैथिल साहित्यकार लोकनि नहि देथि! डॉ. बी. झाक धुनपर गुनगुनएबाक हेतु ककर मन नहि मचलि उठैत होयत?— चन्द्रमा उतरल गगनसँ चांदनीसँ नहाउ औ! धान-पान-मखान-पूजित मैथिलीकेँ जगाउ औ! ३. भीमनाथ झा-चन्दा् झा, हरिमोहन झा मिलि कऽ कवीशवर चन्दाा झा महाप्रयाण कयलनि 1907मे तथा संसारमे हरिमोहनझाक आगमन भेलनि 1908मे। आधुनिक युगक प्रवर्तक अपन काज सम्पान कऽ लेलनि तँ ओहि काजकेँ आर विस्ताअर देबा लेल मानू ओहि लोक जा कऽ हरिमोहन झाकेँ एहि लोकमे पठा देलनि। कवीश्वकर मैथिली साहित्यन लेल बहुत-किछु कएलनि, की-की कएलनि तकरा दोहरएबाक प्रयोजन नहि। किन्तुु, ई कहब एतऽ प्रासंगिक अछि जे ओ साहित्यककेँ जनताक बीच पसारि देलनि। पसारलनि तँ सभसँ अधिक विद्यापति, तकर दिनक बाद मनबोध सेहो, मुदा चन्दाधझा तकरा ओलि-फटीक कऽ चुनौटा बना देलनि। झाक समएमे मिथिलामे लेखनक भाषा बड़ अव्य वस्थित भऽ गेल छल । एक दिस संस्कृित ह्रासोन्मख भऽ रहल छलैक। एहनामे मिथिलाक जे अपन भाषा छलेक मैथिली, तकरापर भारी आबए लगलैक। चन्दा। झाक सोझाँ अपन मातृभाषाक सुच्चारपनकेँ बचाकए राखब सभसँ बड़का चुनौती बनिकऽ ठाढ़ भऽ गेलनि। अपन भाषापर एहन विकट संकटक सामना हुनक पूर्ववतीकेँ नहि करऽ पड़ल छलनि जेहन कवीश्वरकेँ करए पड़लनि। जँ अपन भाषे नष्ट भऽ जाएत तँ साहित्यक मोल भेनहि को? तेँ ओ मैथिली लेखनमे साहित्यिक मूल्य वत्तासँ कनेको कम नहि, कतहु-कतहु तँ अधिके भाषाक शुद्धतापर सावधान देखबामे अबैत छथि। ताहूसँ आगाँ बढि़कए ओ ईहो प्रमाणित करए चाहैत छलाह जे मैथिलीमे से सामर्थ्य़ छैक जे केहनो जटिल भावकेँ मौलिक भंगिमामे सहजेँ अभिव्यसक्त‍ कऽ सकैछ। यैह कारण थिक जे ओ स्थालनीय लोकोक्ति-कहबी आ देशज शब्दतक सौन्दसर्य भरि मैथिली भाषाकेँ आर मोहक बना देलनि। सर्वथा विपरीत परिस्थितिमे मै‍थिलीमे से सामर्थ्यी लोकोक्ति-कहबी आ देशज शब्दिक सौन्द‍र्य भरि मैथिली भाषाकेँ आर मोहक बना देलनि। सर्वथा विपरीत परिस्थितिमे मैथिलीकेँ माजि-चमकायसँ, ओकरा आर क्षिप्र बनाए एक दिस जनसामान्यसँ जोड़बाक आ दोसर दिस अन्य रचनाकारक समक्ष भाषाक आदर्श नमूना प्रस्तुत कऽ लेखन दिस प्रवृत्त करबाक काजक कारणहुँ, केवल ओहू टाक कारणहुँ, ओ युगप्रवर्तकक आसनक अधिकारी छथि। किन्तु से कएलनि पद्यक माध्यदमे। ओ समये तेहन छलैक जे जनता गद्य दिस कनडेरियो नहि तकितैक। से ओ भाँफि लेलनि। साहित्यजक माने होइक पद्य, जे बहुधा गीतक रूपमे अभिव्यिक्तय होइक। से गीत गहना बनि गेलैक, ओहन गहना, जकरा काजे-तिहारमे पहिरल जाइक। अनदिना कन्तोिड़ीमे बन्द रहैक। चन्दायझा पद्यकेँ ‘गुआ-पन’बनौलनि, जे लोकक अमलमे आबि गेलैक। विषए चुनलनि समसाचमयिक। लोक-आस्थानक अनुकूल रामायण लिखलनि। रामचरितमानसक प्रचार तहिया मिथिलामे ओतेक छलैक नहि। संस्कृत जनसामान्यसँ दूरे भऽ गेलैक। अंगरेजक दु:शासनसँ सीदित लोककेँ परितोष सेहो ओ देलथिन, महगीक मारिसँ पीडि़तक प्रति सहानुभूतियो देखौलथिन, धर्मक हानि दिस संकेतो कएलथिन। एतावता अपन समाजकेँ भगवत् भजनमे लागल रहि आस्त्कि जीवन जीवाक सन्देेश देब ओ अपन कविकर्मक उद्देश्या बनौलनि। मुदा, हुनक कविता काज ओहिसँ बहुत बेसी कऽ गेल, मैथिली साहित्यकेँ नव दिशा दऽ गेल, नवयुगक आगमनक शंखनाद कऽ गेल। ई सभटा भेल काव्यीक माध्य मे-पद्यमे, गीतमे। गद्यकेँ ओ छूलनि टा, तकर छविकेँ निखारि‍तथि, लोककेँ गद्योन्मुमख करितथि- ततबा पलखति नहि भेटि सकलनि। हुनका जाए पड़लनि। ओ संसार छोडि़ चल गेलाह। आ, अपन ताही छूटल काजकेँ सम्हारबा ले’ लगले हरिमोहनझाकेँ पठा देलनि। 1929मे हरिमोहनझा ‘मिथिला’क माध्यहमे मैथिलीमे उतरलाह आ मै‍थिलीकेँ साक्षर-निरक्षरक जीहपर चढ़ा देलनि, मिथिलाक घर-घरमे पहुँचा देलनि, ततबे नहि, एकर सौरभकेँ भारत भरिमे पसारि देलनि। ई चमत्कार कएलनि ओ गद्यक माध्यिमे। लिखिकए टाल नहि लगौलनि ओ, मुदा लोकप्रियताक हिमालय ठाढ़ कऽ देलनि। अपन आ मैथिली-दुनूक लोकप्रियताक। चमत्कामर भऽ गेल। एहन चमत्काआर पूर्वमे कहियो ने भेल छल। विद्यापतिक चमत्कालर लोक बुझैत-बुझैत बुझलका, हुनक गेलाक सए-सए वर्षक बाद बुझलक, मुदा हरिमोहनझाक चमत्कारर तँ हिनक प्रवेश करितहि बुझए लागल। हिनक साहित्यि समाजमे पसरल दू तरहेँ—एक तँ पाठकक व्यापक समर्थनसँ, दोसर तीव्र विरोधसँ। विरोध कएनिहार मिथिलाक सनातनी पण्डित रहथि, कर्मकाण्डी रहथि, जे हनिमोहनझा द्वारा अपन अन्धिविश्वाकसपर होइत प्रहारसँ तिलमिला उठथि आ ओकर घनघोर विरोध करथि। विरोधक कारणेँ आर ई पढ़ल जाथि । आइ ओ विरोध कालक गालमे समागेल अछि, आ हिनक साहित्यर कालातीत मानल जाए लागल अछि। मुदा एकटा बात एखनो, किछु गोटे छथि जनिका कचोटैत छनि जे हरिमोहनझा अंगरेजी पढ़लनि तँ अंगरेजक समर्थक भऽ गेलाह, ओकर सभ बात-विचार प्रिय भऽ गेलनि आ अपना लोकनिक सभ शास्त्रर-पुराण फूसिक पुलिंदा बुझाए लगलनि। हुनका लोकनिकेँ दुख बातक छनि जे जतेक ई अपन ‘थाती’क खिधांस कयने छथि ततेक भरिसक कोनो साहित्यअमे ओकर अपन साहित्यककार नहि कएने होएतैक। तहिना, जतेक ई देशक दुश्ममन अंगरेजक बात-विचारक गुणगान कएने छथि ततेक क्योश अपन दुश्मंनक रीति-रेबाजक प्रशंसा नहि कएने होएत। सभसँ पहिने तँ ई जे अंगरेजी पढि़योकऽ ओ अंगरेज नहि भेलाह, अंगरेजक रहल-सहन नहि अपनौलनि। सूट नहि पहिरलनि, सिगरेट-चुरुअ नहि पीलनि, शराब नहि छू‍लनि, घरमे गंगरेजी नहि चलौलनि। धोती-कुर्त्ता पहिरैत रहलाह, माछ-भात खाइत रहलाह, हास्यध-विनोदक गप करैत रहलाह। दोसर, ओ मानैत छलहा जे अंगरेज तावते धरि हमर शत्रु छल जाधरि हमरापर शासन करैत छल। ओ भारत छोडि़कए चल गेल, अध्यातय लागि गेलैक। शास्त्री, साहित्य, वैज्ञानिक बोध, प्रगतिक ललक-ककरो शत्रु नहि होइत छैक। ओ जँ शत्रुदेशोक छैक ओ नीक छैक तँ तकर प्रशंसा होएबाक चाही, तकर अनुकरण होएबाक चाही। ई नहि जे शत्रुदेशक थिक तँ केहनो नीक थिक, तकरा दिस ताकी नहि, ओकरा छूबी नहि। ओहि दिस नहि ताकब, ओकरा नहि छूअब तँ प्रगति कोना कऽ सकब, संसारक संग डेगमे डेग मिलाकए चलि कोना सकब? तहिना, अपन जे वस्तु अछि, शास्त्रत-पुराण अछि, तकरा समएक निकणपर रगड़ब नहि, समकालीन सन्दर्भमे तकर पुनर्मूल्यांकन नहि करब तँ की होएत? ओहीमे ओझराकए खपि जाएब, आगाँ बढि़ नहि सकब। अपन वस्तुब खराप अछि, से के कहैत अछि? ओ तँ बहुमूल्य गहना थिक, ओकरा कन्तोड़मे जोगाकए राखू। सौंसे देहमे ओकरा छाडि़ लेब तँ अक‍ार्यक भऽ जाएब। आन दूसत। हँसत। हरिमोहनझा बस एतबे कहलनि अछि, आ सभसँ स्प ष्टततासँ ‘खट्टर ककाक तरंग’मे कहलनि अछि। ओहिमे अपन किछु अन्ध परम्पतराकेँ उघारिकए राखि देलनि अछि आ तकरा सभकेँ आजुक सन्दधर्भमे अनुपयोगी सिद्ध कएलनि अछि। मुदा, एहि पाछाँ अपन शास्त्रन-पुराणपर अनास्थाक कि अपन संस्कारक प्रति अवहेलना-भाव नहि छनि। एहि बातक छनि- ‘’खट्टर ककाक तरंग’क द्वितीय संस्क्रणक भूमिकामे कऽ देलनि अछि। जखन पुछल जाइत छनि- ‘’खट्टर कका, एकटा बात कहू? अहाँ ई सभ भितरिया मनसँ करैत छिऐक कि केवल लोककेँ हँसाबक हेतु? ‘’ ताहिपर ओ कहैत छथिन- ‘’आब तोँ हमर सभटा भेद एक्के दिनमे बुझि लेबह? ’’हुनक मुँहसँ बहराएल ई ‘भेद’ शब्दे। कहैत अछि जे हुनका ‘वेद’ सँ विरोध नहि छलनि। तहिना, पश्चिमक आचार-व्यवहार सभटा नीके थिक-सेहो ई नहि मानैत रहाथि। ओकरो खिल्ली’ उड़ौने छथि। पाशचात्यट सभ्यता नीत अनेको व्यरवहारपर कते तीक्ष्यीण कटाक्ष ई कयने छथि, तकरो प्रमाण ‘खट्टर ककाक तरंग‘मे भेटि जाइत अछि। ‘खट्टर ककाक टटका गप्पम’सँ निम्नालिखित उद्धरण प्रस्तुात कएल जा रहल अछि- ‘’खट्टर कका-भोजक अर्थ होइ छल ‘भरि पेट’। पार्टीक अर्थ ‘भरि प्लेट’। अर्थात् एक फक्काा दालमोट ओ एकटा सिंहारा। ई सिंहारा आबिकए सोहारी-तरकारीक संहार कऽ देलक। पहिने अढ़ेयामे चरण अखरि कऽ एक अढ़ैया मधुर आगाँ राखि दैत छल। आब अढ़ाइ चम्मलच चीनी एक चुकरीमे दऽ ऊपरसँ गोमूत्र-रंगक काढ़ा चुआ दैत अछि। हम-हँ, आब तँ सभ ठाम ‘टी’..... खट्टर कका-हौ, यैह टी तँ सभक टीक काटि लेलक। पहिने सौजन्यकक अर्थ छलैक अट्ठारहटा बाटी। आब केवल ‘टी’ टा रहि गेलैक। आधुनिक सभ्यथतामे ठोर दागि दैत छैक, भफाइत इन्हो्र लऽ कऽ। आचमनीयम् क स्थाोनमे चायमानेयम्। पहिने विआहमे टाका भेटैत छलै। आब भेटे छैक ‘टा टा’। टी पिया कऽ टा टा कऽ देतौह। अर्थात् टिटकारी दऽ देतह। आइकाल्हुचक सभ्याता बूझह तँ ट अक्षरपर चलैत अछि। टोस्ट , टी, टेरेलिन, ट्रैंजिस्टरर ओ टा टा। स्वा‍इत लोक टिटिया रहल अछि। हम-धन्य छी, खट्टर कका। अहाँकेँ तँ सभ बातमे विनोदे सुझैत अछि। उनटे गंगा बहा दैत छिऐक। खट्टर कका-हम बहबैत छिऐक कि आधुनिक महर्षि फ्रायडक चेला लोकनि बहबैत छथुन्ह? हुनका लोकनिक सिद्धान्तह छैन्हि जे चोला छूटए, लेकिन चोली नहि छूटए। कदम्बगसँ कदीमा धरि, सभ प्रतीके सुझैत छैन्ह। इन्द्रिय निरोधक स्थालनमे गर्भनिरोध करै छथि। ‘मेन लाइन’ छोडि़ तेहन ‘लूप लाइन’ धैलन्हि अछि जे भावी पीढ़ी कूपमे जा रहल अछि। हम-वास्तैवमे आब सभ बात उनटि रहल छैक। खट्टर कका-ताहिमे कोन संदेह। पहिने पुत्रजन्महक उत्सिव होइत छलैक, आब जन्ममनिरोधक उत्सव होइत अछि। आधुनिक नारी ‘पुत्रवती भाव’क स्थानमे ‘रूपवती भव, लूपवती भव’ आशीर्वाद चाहैत छथि। पहिने स्वाकमी स्त्रींक माँग भरैत छलाह। आब स्त्रीम स्वाूमीक माँग पुरैत छथिन्हर। स्वायं कमा कऽ। कतिपय ‘पति’ मे ‘तँ’ अक्षरक योग सेहो भऽ जाइत छन्हि। पहिलुक चेला चैला चिरैत छल, आब छैला बनल फिरैत अछि। छौँड़ा सभ छीट पहिरए लागल अछि, छौँड़ी सभ सूट कसए लागल अछि। चित्त-पटपर चित्रपट अंकित रहैत छैक। रानी सभ लीडरानी बनि गेलीह। राजनेत्री लोकनि अभिनेत्रीक कान काटि रहल छथि। पहिने अप्सरा होइ छलीह, आब अफसरा होइ छथि। ‘फैशन’ ओ ‘पैशन’ दिनदिन बढ़ल जाइत अछि। ..... तहिना, ‘अंगरेजिया बाबू’ नामक कथामे अंगरेजियतक भद्दा नकलपर जबर्दस्त उपहास कएल गेल अछि। अतएव ई कहब जे हरिमोहन झा अंगरेजी पढि़ कऽ अंगरेजी सभ्यतापर लट्टू भऽ गेलाह आ अपन संस्कृेतिकेँ निखट्टू मानि लेलनि-सत्यसँ दूर होएत। ई विशेषत: ध्यान देबाक बात थिक जे कवीश्वरर भाषाकेँ मजबाक महत् काज जे पद्यक माध्यगमसँ कएलनि, तक रा हरिमोहनझा अपन गद्य द्वारा आश्चवर्यजनक रूपसँ आकाश ठेका देलनि। -प्रकाश रंगदृष्टि; दिल्ली बांग्ला नाटक लेल कोलकाता आ मराठीक लेल मुम्बई, तहिना पहिने मात्र हिन्दीक लेल दिल्ली जानल जाइत छल । मुदा आब सम्पूर्ण भारतवर्षमे विविधतापूर्ण नाटक मंचनक लेल दिल्ली केन्द्रमे आबि चुकल अछि, ताहिमे कोनो शंखा नहि । दिल्लीक मंडी हाउस स्थित विभिन्न प्रेक्षागृहमे नित्य कोनो-ने-कोनो भाषाक नाटक मंचित होइते रहैत अछि । एहि ठाम हिन्दी, मराठी, बंगाली मात्र नहि बल्कि मणि पुरी, असमिया, उर्दू, पंजाबी, मैथिली, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाक नाटक देखबाक मौक़ा प्राय: भेटैत रहैत छैक । एहि बीच दिल्लीक प्रेक्षक केँ एकटा अत्यंत सुखद अनुभव भेलनि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालयक प्रांगणमे । मराठी नाटककार विजय तेंडुलकर लिखित प्रसिद्ध नाटक जात ही पूछो साधु की आ बांग्ला लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर लिखित अचलायतन; दुनूक मंचन हिन्दीमे, जेना तीनू रंगमंचक संगम भ’ रहल हो । जात ही पूछो साधु की राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडलक कलाकारक संग प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक राजिन्दर नाथ आ अचलायतन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वितीय वर्ष छात्रक संग युवा निर्देशक शांतनु बोस कएने छलाह । नाटक जात जी पूछो साधु की एकटा स्वस्थ हास्य-व्यंग नाटक अछि। एहिमे महीपत नामक व्यक्ति कहुना क’ एम.ए. पास करैत अछि - थर्ड डिविजनसँ । बहुत दिन बेरोज़गार रहला बाद सिफारिशिज़्मक टेकनिक सीख कोनो कॉलेजमे लेक्चरर बनैत अछि आ नाटकक अंतमे कतेको उथल-पुथलक बाद एक बेर फेर बेरोजगार भ’ जाइत अछि । एहि सोझा-सोझी कथ्यक लेल नाटकक संवादमे नाटककार ततेक ने द्वन्द ओ उत्सुकता भरि देने छथि, जे प्रेक्षक एकाग्र भ’ महीपतक सोलो लौगीमे हेराएल रहैत छथि । ई नाटककारक विशेषते ने जे आइसँ 40 वर्ष पहिने लिखल कथ्य आजुक संदर्भ सेहो समकालीने बुझना जाइछ। संवाद सेहो तेहेन ने चोटगर आ तीक्ष्ण छैक जे प्रेक्षागृहमे बैसल दर्शककेँ बेधैत अछि। हास्यक पुट द’ नाटककार अपन सभ गप्प कहि दैत छथि आ दर्शक ओकरा सहर्ष ग्रहण करैत छथि । एक तँ सबसँ बेसी तेण्डुलकरजीक नाटकक मंचन सम्पूर्ण भारतमे भेलन्हि अछि ताहुमे जात ही पूछो साधु की नाटकक मंचन सबसँ’ बेसी भेल अछि । निर्देशकक रूपमे राजिन्दर नाथ जीक नाम हिन्दी रंगमंचक सुपरिचित नाम अछि। विजय तेण्डुलकरक प्राय: सभ नाटकक हिन्दीमे मंचन राजेन्दरजी कतेको बेर कएलथि अछि। एहि नाटक लेल मंचपर नाटकक संप्रेषणक जे विधि राजिन्दर नाथ अपनेने छथि ओ अति सरल अछि । मुदा, अभिनेताक अभिव्यक्तिपर अत्यंत बारीकीसँ कार्य कएल गेल अछि । मंचपर तीनू कात तीनटा दरवाज़ा, आधा मंच पर मात्र एक फूट ऊँच प्लेटफॉर्म आ सात-आठटा ब्लॉक मात्रसँ एतेक जीवंत प्रस्तुति निर्देशकक दूर दृष्टिक परिणाम थिक । प्रस्तुतिमे प्रकाश परिकल्पना गोविन्द यादवक छनि । गोविन्दजी सेहो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालयसँ प्रशिक्षित छथि । महीपत बनल अम्बरीश मात्र दू कदम चलि जखने दोसर प्रकाश बिम्बमे प्रवेश करैत छथि कि समुच्चा परिदृश्ये बदलि जाइत छैक । मात्र प्रकाशक प्रभावसँ मंच कखनो समाचार पत्रिकाक दफ्तर, कखनो निछछ देहात तँ कखनो गामक कॉलेज वाकि पिकनिक स्थलमे परिवर्तित होइत रहैत अछि । एहिना वस्त्राभूषण सभ सेहो तर्क संगत अछि । जेँ सभ किछु संतुलित अछि तेँ नाटक देख सभ दर्शक भरपूर पूर्णताक संग प्रेक्षागृहसँ बहराइत छथि । आब दोसर प्रस्तुति : अचलाएतन । ई प्रस्तुति छात्रक प्रशिक्षणक हिस्सा अछि तेँ प्रस्तुतिमे तकनीकी पक्षपर बेसी ध्यान गेल । भ’ सकैत अछि बहुतो दर्शककेँ ई प्रस्तुति बहुत बेसी आकर्षित नै केने होइन, मुदा ई प्रस्तुति तकनीकी दृष्टिए उत्कृष्ठ तँ अछिए । नाटक देखबाकाल अभिनेता-अभिनेत्रीक शारीरिक शक्तिक क्षमता, देह गति, आवाज़ संतुलन आ पात्रक मानसिक अभिव्यक्ति रोमांचित करैत छल । रवीन्द्रनाथ जीक लिखल एतेक पुराण कथाकेँ आजुक संदर्भमे प्रस्तुत केनाइ अति कठिन कार्य छल, जकरा निर्देशक अपन दृष्टिसँ समकलीन बनेबाक भरपूर कोशिश केलनि अछि । अचलायतन के कथा सार ई जे एहि नामक एकटा शिक्षा संस्था अछि जतए शिक्षाक रूपमे सालों-साल पुरान रुढ़िकेँ जीवित रखनाए मात्र अछि । मुदा किछु नव सोचक विद्यार्थी आ गुरुक प्रयाससँ एहि परम्पराकेँ तोड़ि देल जाइत छै आ एकबेर फेरसँ अचलायतन के पुन: स्थापित करैत अछि । नाटक जे प्राय: कंभेंशनल फॉर्ममे कएल जाइत अछि तकरा तोड़बाक पूरा-पूरा कोशिश केलनि अछि शांतनु बोस । शांतनु बोस लगातार एहि विधामे कार्य क’ रहल छथि । मुदा एखन एहि फॉर्मकेँ सामान्य दर्शक स्वीकारबाक लेल तैयार नै छथि । नाटक जात ही पूछो साधु की अत्यधिक यथार्थवादी अछि जाहिमे समाजक जे रूप आइ जै स्थितिमे अछि ओकरा ओही रूपमे लेखक रखलन्हि अछि आ ओकरा हम सभ सहर्ष स्वीकरलहुँ अछि जाहिमे समजाक सभरूप एक्केठाम देखबामे अबैत अछि । तथाकथित सभ्य समाज आ निरक्षर समाज दुनूक वार्तालापमे आकाश-पतालक अंतर । नाटककार आ समीक्षक आ दर्शक; सभकेँ यथार्थवादक रूपमे एकरा स्वीकार करबाक चाही । हँ ! मिथिलाक लोक जीवन एकरा कहिया ने स्वीकारि चुकल अछि । एहि फॉर्ममे मैथिलीमे सेहो कतेको रचना भेल जेँ उत्कृष्ठ अछि मुदा एखनो तक मैथिल तथाकथित सभ्य साहित्यकार ओकरा स्वीकारबाक लेल तैयार नहि भेलखिन्ह । एहना स्थिति के की कहल जा सकैत अछि ? मिथिलामे रंगकलाक समकालीन दृष्टि - प्रकाश सभ कलामे श्रेष्ठतम कला मानल गेल अछि रंगकर्मकेँ । से आइ नै, प्राचीने कालसँ। इहो कोनो खास सभ्यतामे नै बल्कि विश्वक सभ सभ्यतामे । जँ रंगकर्मकेँ कलासँ संज्ञापित कएल जाय तँ सिवाय रंगकलाकेँ दोसर कोनो कला - चाहे ओ चित्रकला होइ वा संगीतकला वा नृत्यकला; अपना छोड़ि दोसर कोनो प्रोफेशनमे (आजुक समएमे सेहो ) सपोर्टिभ नहि होइत छैक। सभ कला मात्र सीमित क्षेत्रक लेल उपयुक्त होइछ संगहि व्यक्तिगत बेसी । मुदा रंगकर्म व्यक्तिगतसँ बेसी सामाजिक होइछ, तेँ रंगकर्म के आन कोनो दोसर कलामे श्रेष्ठ कला मानल गेल अछि । हमरा समाजक समाजशास्त्रीक ई अंभिज्ञता या अज्ञानता बूझी, जे सर्व साधारण तक एहि कलाक विशेषताकेँ नहि प्रचारित क’ एकर विपरित प्रचार प्रसार कएल गेल । परिणाम हमरा सबहक समक्ष अछि, जे आइ विश्वकेँ एक्कैसम शताब्दीमे होबाक बाबजूद, सूचना तंत्रक क्रांतिक होबाक बादो हमर समाज रंगकलासँ जीविकाक प्रश्न करैत अछि वा एहि क्षेत्रक जानकारीमे अपन असमर्थता देखबैत अछि । आखिर एहन स्थितिकिएक? ई सवाल हमर अपन समाजशास्त्री आ समाजक अगुवा माननिहार लोकनिसँ अछि । नाटक वा रंगमंचक संदर्भमे मिथिला समाजक अधिकांश व्यक्ति अखनहु तक अत्यंत असमनजसमे छथि । ई विधा कतेको रास तर्क कुतर्कसँ घेरल अछि । जिनका जतेक कम ज्ञान छनि ओ ओतेक ज्ञानिक अभिनय क’ एहि विधाकेँ अपना हिसाबे तोड़ि-मड़ोरि क’ समाजक आगू प्रस्तुत करैत छथि । एहि रंग विधाक प्रकृति की अछि, ई कोन व्याकरणक आधारपर चलैत अछि एहिसँ संबंधित बहुत थोड़ तथ्य उजागर भेल अछि वा ई कही जे ओहि दिस कम्मे लोकनिकेँ ध्यान गेलन्हि अछि । रंगमंचकेँ आइयो गम्भीरतासँ नहि लेल जा रहल अछि । जे किछु लिखल वा कहल गेल सेहो ततेक ने शास्त्रीय भ’ क’ जे ओ आरो बुझौबलि बनि समाजक बीच व्याप्त रहि गेल । एहिसँ कनी आरो आगू बढ़ी । जँ रंगमंचकेँ मैथिली साहित्यकार लोकनि साहित्यक कोनो विधा हेबाक प्रमाणपत्र दैत छथिन तँ ओहू सभ विधामे नाट्यकर्म अन्य दोसरासँ बेसी फलदायी अछि । तकर सबूत देबाक आवश्यकता हमरा नहि बुझना जाइत अछि । एहि एक्कैसम शताब्दीमे होमाक बादो जँ किछु तथा कथित गणमान्य व्यक्तिमे शंकाव्याप्त छनि तँ हुनका समक्ष हम किछु तथ्य, किछु उदाहरण आ किछु प्रश्न प्रस्तुत करबाक प्रयास करैत छियनि, जाहिसँ हुनका सबहक बीच नाट्यविधाक लेल व्याप्त भ्रम दूर भ’ सकनि । किनको द्वारा ई कहि हीन देखाएब जे रंगमंचमे कोनो तरहक जॉब नहि छैक, नाट्यकलाकेँ पेट भरबाक सामर्थ्य नहि छैक आदि आदि । ई एहि क्षेत्रकेँ गंभीरतासँ अध्ययन नहि होबाक परिणाम थिक । हम आइ एतेक तक कहि सकैत छी, जे एहि तरहक भ्रमकेँ मिथिला समाजमे प्रचारित करब एकटा सोचल समझल रणनीति मानल जएबाक चाही । मिथिलामे एहन तरहक काज बेसी संख्यामे ओहन व्यक्ति द्वारा भ’ रहल अछि जे अपना आपकेँ साहित्यकार घोषित केने छथि । आजुक समएमे कियो सज्जन पूर्णरूपेण ई दावा नहि क’ सकैत छथि जे ओ अपने (वा कोनो फलां धारे बाबू) मात्र कविता वा कथा वा उपन्यास लिखी क’ अपन आ अपन परिवारक भरन-पोषण करैत छथि । अहाँ सभ हमरा जनतबकेँ कनि फरिछा सकैत छी तँ कहू जे कवि / कथाकार / उपन्यासकार / नाटककार / शिल्पकार / चित्रकार आदि लोकक अपन एहि कलामे महारथ हेबाक केहन प्रभाव हुनकर समसामयिक काजपर पड़ैत छनि ? की एकटा नीक कवि नीक शिक्षक भ’ सकैत छथि तकर कोन गारंटी अछि । एकटा नीक कथाकार नीक अधिकारी हेबे करताह से के कहि सकैत अछि ? एकटा नीक शिल्पकार वा की चित्रकार नीक वक्ता, प्रवक्ता, अधिवक्ता वाकि नेता हेताह से के दाबा संग कहि सकैत छथि? प्राय: ई देखल गेलैक अछि ओ मैथिलीएमे नहि दोसरो-दोसरो भाषामे जे एकटा शिक्षक जँ कविता लिखता तँ नीके लिखताह, एकटा प्रवक्ता कथा लिख देलाह तँ ओ नीके होएत, एकटा अधिकारी कोनो फोटो बनेलाह तँ सभसँ पैघ चित्रकार कहाबए लगताह । आ मैथिलीमे प्रोफेसर साहेब (जे किनको प्रासादसँ एहि पदपर आसीन छथि, कोनो प्रतियोगिता परीक्षा वा की यू.जी.सी. आदिसँ चयनित नहि भेल छथि ) तँ सफेद कागजपर किछु घँसियो देताह तँ समीक्षक वा हुनकेँ समगोत्री लोकनिकेँ ओहिमे आर्ट / कविक प्रखरता / कथाक गंभीर कथ्य / उपन्यासक जटिलता / नाटक मे प्रयोगात्मक्ता देखा जाइत छनि । एकर ठीक विपरीत अछि रंगविधा । एकटा व्यक्ति जँ रंगकर्मी छथि वा कि कहियो कम-सँ-कम एक्को महीनाक लेल सघन रूपसँ रंगकर्म केने छथि तँ हुनकर जीवनकप्राय: सभ क्षेत्रमे एकर प्रभाव देखार भ’ जाइत अछि । ई हुनकर जीवनक अंतिम क्षण तक संग रहैत अछि । जँ ओ रंगकर्मी छलथि / छथि तँ ओ छात्रक नजरिमे एकटा नीक शिक्षको हेताह से गारंटी अछि । ओ एकटा अनुशासित अधिकारी, नीक वक्ता, नीक प्रवक्ता, नीक अधिवक्ता वाकि नीक नेता हेताह से कहल जा सकैत अछि । एकटा शिक्षक जँ अभिनय करताह तँ ओ नीके करताह से किन्नौ नहि मानल जा सकैत अछि । एकटा अधिकारी वा प्रोफेसर नीके नाटक लिखताह / नीके अभिनय करताह / नीके निर्देशन करताह तकर संभावना नगन्ये मात्र होएत । उपर्युक्त तथ्य जँ कनियो सत्य लगैत अछि तँ कहल जाओ जे कोन विधा महत्वपूर्णअछि जीवनक लेल; रंगकर्म वा कि कोनो दोसर ? हँ रंगकर्म ततेक ने अनुशासन सिखबैत छैक जे ओ रंगकर्मी अपन जीवनोमे आवश्यक्तासँ बेसी अनुशासित भ’ जाएत अछि । तकर प्रभाव अखन तक मिथिलामे साफ उल्टा भेलैक अछि । कियो किम्हरोसँ अबैत अछि आ एक सिंह नाट्यकर्मकेँ मारि चलि जाएत अछि । ई कतौसँ उचित नहि । बिडम्बना तँ ई अछि जे जाहि विधापर ई लोकनि अपन अपन तर्क-वितर्क वाकि कुतर्क करैत छथि ओहि समूहमे पहिनेसँ रंगकर्मसँ जूड़ल व्यक्तिकेँ बजाएब आ हुनकर सहमति वा अहमति लेबाक कोनो प्रयोजनो नै महसूस करैत छथि । बंद कोठलीमे निर्णय लैत छथि आ सम्पूर्ण समाजक पाईसँ बनल संस्था सभसँ मोटगर-मोटगर ग्रंथ छापि नुका रहैत छथि । एहन लोकनिकेँ लेशमात्र ग्लानि नहि होइत छनि जे नबका पीढ़ी के ओ की द’ रहल छथिन वा जहिया कहियो नवका सभहक समक्ष सत्य ओतैत तखन एहि सभ ग्रंथपर छपल नामक प्रति ओ सभ की प्रतिक्रिया करतैक । ओ पीढ़ी आजुक पीढ़ीसँ बेसी प्रतिक्रियावादी हेतैक से हमरा सभ के मोन राखक चाही । रंगकर्म एकटा एहन कला अछि जाहिमे सभसँ बेसी जोर होइत अछि ई जे ‘अपना आपकेँ चिनहू/बूझू/जानू । जीवनोक यैह मूल मंत्र अछि । अहाँ अपना आपकेँ, अपन सामर्थ्यकेँ जतेक नीक जेना बूझब अहाँ ओतेक सफल होयब अपन जीवनमे । तेँ अति आवश्यक अहि जे सभ व्यक्तिकेँ एहि बिधासँ जूड़ि लाभ उठाबए चाहिएनि । मिथिला समाजमे रंगकर्मक महत्ताकेँ प्रचारित प्रसारित करबाक अति आवश्यकता अछि । एहि दिस सभ विद्वानकेँ आगू अएबाक चाहिएनि। संस्कार गीत/ लोक गीत नाद- जगदीश प्रसाद मंडल संस्कार कल्पना थिक। हमरा सबहक बीच संस्कारक प्रयोग विभिन्न रूपमे विभिन्न जगहपर होइत अछि। ओना जहि रूपमे संस्कारक प्रयोग हमरा सबहक बीच होइत, ओ मन्द आ कुषाग्र रूपमे सेहो होइत। मुदा विचारणीय प्रश्‍न अछि जे मन्द तँ किऐक? आ कुषाग्र तँ किऐक? एखन हम एहि प्रश्‍नक उत्तर नहि दऽ शास्त्रीय प्रयोग दि‍ि‍श नजरि दैत छी। गर्भजनित वातावरण जन्य कतिपय अपदार्थकेँ दूर करैक हेतु संस्कारक कल्पना कएल गेल अछि। कहल गेल अछि जे एहिसँ शरीर आ मन परिष्कृत होइत अछि। शालीनता आ शिष्टता मनुष्यताक परम सिद्वि थिक आ ओकर प्राप्तिक साधन थिक संस्कार कर्म। दशर्न शास्त्रक अनुसार भोग्य पदार्थक अनुभूतिक छाप थिक संस्कार कर्म। मनुष्यक अव्यक्त मनपर अुभवक जे छाप पड़ैत छैक, समए अएलापर ओ प्रकट भऽ जाइत छैक। यैह छाप थिक वासना आ यैह कहबैत अछि जन्मान्तक संस्कार। धर्मशास्त्री लोकनि संस्कारकेँ शारीरिक, मानसिक आ बौद्धिक गुण-दोषक प्रक्रियाक रुप ग्रहण कएलनि अछि। आष्वलायन अपन गृहसूत्रमे एगारह तरहक संस्कारक वर्णन केने छथि। जखन याज्ञवल्क्य बारह तरहक। गौतम भिन्न-ि‍भन्न दैवयज्ञकेँ संस्कारमे परिगणित कऽ अड़तालिस संख्या धरि लऽ गेल छथि। भारत सरकारक 1901 इसवीक जनगणना प्रतिवेदनक अनुसार ओहि समए हिन्दूमे बारह संस्कार प्रचलित छल। मिथिलामे सोलह तरहक संस्कारक विधान मान्य अछि ई थिक गर्भधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राषन, चूड़ाकर्म, कर्णबेध, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, सन्यास आ अन्त्येष्टि। एखन सिर्फ पाँच तरहक- जन्म, मूड़न, उपनयन, विवाह आ मृत्यु संस्कारक चलनि अछि। मुदा इहो सभ जातिमे समान नहि अछि। जेना उपनयन सिर्फ समाजक अगुआइल जातिक बीच अछि। मूड़नोक रुपरेखा एकरंगक नहि अछि। तेँ जँ सभकेँ नजरिमे राखि देखैत तँ सिर्फ तीनियेटा संस्कार जन्म, विवाह आ मृत्यु अछि। संस्कारक कल्पना आ ओकर चयन वा नामकरणक पाँछा सामाजिक कारण सोहो प्रमुख रहल। स्पष्ट अछि जे संस्कारक शासन जीवन पद्धतिकेँ खास ढ़ंगसँ नियंत्रित आ आदर्षोन्मुखी बनएवाक लेल देल गेल। शुद्धताक अपेक्षा सुनियोजित जीवन व्‍यवस्थाक आवश्‍कता अथवा स्थितिक उपस्थिति दिि‍श संकेत करैत अछि। कहैक तात्पर्य जे आर्य-अनार्यक घालमेलसँ उपजल सामाजिक स्थितिमे संस्कारक माध्यमसँ अपन अस्मिताकेँ सुरक्षित रखवाक ब्राहम्णवादी चिन्तनक परिणाम थिक संस्कार। मध्यकालमे संस्कारक पालनपर बेसी जोर देल गेल। ओना दोषक निवारण आ गुणक अंगिकार करब अधलाह बात नहि थिक। इतिहास साक्षी अछि जे भौतिक परिस्थितिक प्रभवक कारणे समाजमे कखनो बेटिक तँ कखनो बेटाक मोल बढ़ैत रहलैक अछि। आइ जकरा मैथिल संस्कृति कहल जा रहल अछि, से की वस्तुतः मिथिलाक संस्कृति थिक? एहि लेल मिथिलाक इतिहास दिशि‍ देखए पड़त। मिथिलाक धरती हिमालयक माटि-बालूसँ बनल अछि। नदी प्रदेशक एहि भूभागपर किरात आ कोल रहैत छल। आर्यीकरणक अभियानमे जे किछु बहरबैया लोक सभ एहिठाम अएलाह ओ द्विज बनि कऽ एहि प्रदेशपर सत्ता स्थापित केलनि। क्षत्रिय राजसत्ता कब्जा केलनि आ ब्राह्मणक हाथमे समाज सत्ता आएल। वैश्‍लोकनि अर्थसत्ताक स्वामी बनलाह। मूलवासी अर्थात आदिवासी अन्त्यज बनि गेलाह। बहरबैया लोक कम संख्या मे आएल रहथि तेँ कृषि कर्यक लेल वा आनो प्रयोजनसँ प्रतिलोम विआह जोर पकरलक। जकर चर्चा मनुस्मृति आ मिथिलाक इतिहासमे बिस्तारसँ अछि। द्विजक संख्या कम रहने, एहि ठामक आदिवासीक देवी-देवता, पावनि-ति‍हार आ नेम-तेम अपनौलनि। जहिसँ ब्राह्मणीकरण भऽ गेल। समाजक सत्ता ब्राह्मणक हाथमे छलनि तेँ हुनके जीवनशैली संस्कृति बनल। बहुसंख्यक मूलवासीपर एकटा नव संस्कृति आरोपित कएल गेल। औझुका जेँका प्रचार-प्रसारक माध्यम तँ नहि छल, मुदा जे किछु छल ओ हुनकेँ सभक बीच छलनि। लिखैक-पढ़ैक सुविधा आ सामर्थ्‍य रहने हुनकेँ (द्विजिक) संस्कृति सम्पूर्ण मिथिलाक संस्कृति रसे-रसे बनि गेल। मुदा मूलवासीक जीवनशैली आ रीति-नीतिक पूर्ण विलयन ने तँ संभव छल आ ने से भेल। आइयो ओ (मूलवासी) दूबि बनि माटि पकड़ने छथि। जकर संस्कृति लोक संस्कृत कहल जाइत छैक। मूड़न आ उपनयन, आब सेहो काम्य संस्कारक कोटिमे अबैत जा रहल अछि। अखनो मिथिलामे ढेरो जाति बसल अछि। किछु जाति छोड़ि बहुसंख्यक जातिक बीच उपनयन प्रथा नहि अछि तेँ उपनयन कऽ मिथिलाक संस्कार कोना मानल जाए? हाँ, खंडित संस्कार कहल जा सकैत अछि। तहिना मूड़नोक अछि। एक रुपमे मूड़नोक चलनि नहि अछि। केयो देवस्थान जा मूड़न करबैत तँ क्यो गंगाकात जा। केयो गामेमे कबुला-पाती दऽ करबैत तँ केयो बिना गीते-नाद, पूजे-पाठ केने, करैत। केयो समाजमे खीर-ि‍टकड़ी बाॅटि करैत तँ क्यो भोज-भात कऽ। तेँ सभ मिला कऽ देखलापर प्रश्‍न उठैत जे मुड़नक कोन रुप मानल जाए? तहिना विआहोक संबंधमे प्रश्‍न उठैत? कुमार बर आ कुमारि कन्याक संग विआह प्रचलित अछि। मुदा द्वितीय बर आ कुमारि कन्याक संग विआह होइत जखन कि बहुसंख्यक जातिमे द्वितिय बर-कन्याक विअाह सेहो होइत। द्वितिय कन्याक संग कुमार बर कऽ सेहो होइत अछि तहिना मृत्यु संस्कारमे सेहो एकरुपता नहि अछि। मृत्युकेँ शोक बुझि गीति-नाद नहि होइत। मुदा प्रश्‍न उठैत जे मृत्यु शोकेक संस्कार किऐक थिक? हँ, असामयिक मृत्युकेँ शोकक श्रेणीमे राखल जा सकैए। मुदा उचित आयु बीतला परक मृत्युकेँ शोक किऐक मानल जाए? जहिना प्रकृतिमे देखैत छी जे अपन पूर्ण आयु पाबि स्वतः नष्ट भऽ जाइत अछि तहिना तँ मनुष्यो थिक। मुदा ढेरो प्रश्‍न उठलाक उपरान्तो समाज, विआह आ मृत्युकेँ व्यवहारिक संस्कार रुपमे अपनौने अछि। छिट-फुट ढ़गसँ जे किछु होइत हो मुदा समुद्र रुपी समाज, सभ कुछ अपना पेटमे समेटि लैत अछि। व्यक्तिगत जीवनक समस्यासँ ऊपर उठि कऽ सार्वजनिक जीवन जीवाक एहि अभ्यास कालक महत्व आइयो अछि। सन्यास यैह थिक। ब्रह्मचर्य जीवन ज्ञान अर्जनक होइत। गृहस्ताश्रम व्यवहारिक जीनगी होइत, जे उपार्जन कऽ जीवन जीवाक माध्यम होइत। नव परिवारक सृजन होइत। जहिसँ समाज आगूओ बढ़ैत आ समृद्धो होइत। तेसर अवस्था वा अंतिम संन्यास अवस्था तक पहुँचैत-पहुँचैत ज्ञान आ कर्मसँ पूर्ण मनुष्यकेँ अज्ञान आ अबोध मनुष्यक सेवामे लगि जाएब, बेजाय नहि। वास्तवमे ओ जरुरियो अछि। संस्कार गीतक अर्थ थिक विभिन्न संस्कारक प्रसंग मे गाओल जाएबला गीत। ई लोक प्रचलित गीत थिक। तेँ एहिमे लोक गीतक आत्मा बसैत अछि। लोक गीतक मनोहर फुलवाड़ीमे यदि संस्कार गीतकेँ हटा देल जाए तँ ओ निष्प्राण भऽ जाएत। यैह कारण थिक लोकगीतक, प्रायः समस्त विषेषता संस्कार गीतमे उपलब्ध अछि। मृत्यु संस्कारकेँ छोड़ि अन्य सभ संस्कार आनन्दोत्सवक माहौलमे मनाओलमे जाइत अछि। उमंगमय वातावरणमे नारी कंठसँ निकलैत स्वरलहरी देहमे थिरकन, हृइयमे झंकार आ मस्तिष्कमे चुलबुली उत्पन्न कऽ दैत अछि। गीति गाएव मिथिलाक सभ नार-नारीक सहजात गुण रहल अछि। जेना दखैत छी जे मूड़न, उपनएन, विआह इत्यादिक समए सभ नारी समवेत स्वरमे गीति गबैत छथि। जे मिथिलाक धरोहर छी। तहिना पुरुषो पावनि आ धार्मिक कार्यमे सभ मिलि गबैत छथि। संस्कार गीत लाकगीतक अंग थिक। कहल जाइत अछि जे लोकगीतक रचनाकार नहि होइत छथि, ओ सार्वजनिक रचना होइत अछि। एकर वास लोक कंठमे अछि। एक कंठसँ दोसर कंठ धरि जाइत-जाइत गीतक स्वरुप बदलि जाइत। ततबे नहि! गीतक भास सेहो बदलैत। एक्के गीत भास बदलि-बदलि कत्ते रुपमे गाओल जाइत। तेँ संस्कार गीतमे एकरुपताक अभाव भेटैत अछि। स्वभावगत एहि स्थितिक दोसर परिणाम थिक भनिताक बेलगाम प्रयोग। गीत गौनिहारि सभ अपने फुरने कोनो गीतमे कोनो रचनाकार नाम भनिताक रुपमे जोड़ि दैत छथि। विद्यापतिक रचना उमापतिक भऽ जाइत तँ कखनो उमापतिक चंदा झाक वा मनबोधक। ततबे नहि मैथिली क्षेत्रसँ बाहरोक रचनाकार जना तुलसी, सूर दास, मीरा इत्यादि मिथिलाक माए-बहीनिक कंठमे आबि मिथिलेक आ मैथिलिऐक गीतिकार बनि जाइत छथि। जे उचित आ अनुचित दुनू थिक। उचित एहि लेल जे हुनकर लोकप्रियता विनयपत्रिता, रामायण, सुरसागर माध्यमसँ एतेक अधिक प्रचलित भऽ गेल अछि जे अपन बनि गेल छथि। जहाँ धरि शब्द टूटैक प्रश्‍न अछि ओ ज्ञान-अज्ञानक बीचक बात थिक। भाषाक जन्म आम जनक बीच होइत। किछु नव शब्दो जन्म लैत अछि आ शुद्व शब्द टूटि कऽ नवो बनि जाइत अछि। तेँ कोन गीत किनकर लिखल थिकन्हि, संस्कार गीतमे वुझब कठिन भऽ जाइत अछि। स्पष्ट अछि जे संस्कार गीत मैथिल-महिलाक परिष्कृत सांस्कृतिक चेतनाक परिचायक थिक। मिथिलामे संस्कार गीत अनौपचारिक शि‍क्षाक माध्यम अछि। मैथिल समाजमे नारीक लेल औपचारिक शि‍क्षा वर्जित छल। सिर्फ नारिये नहि माटि परक लोकक लेल सेहो छल। कहल जाइत अछि जे वेद वा गीता पढ़लासँ ओ बताह भऽ जाइत। नारीमे विदुषी होइत छलीह। संस्कार गीतक संबंध संस्कृति आ साहित्यसँ तँ अछिये, समाजसँ सेहो अछि। संस्कृति, साहित्य आ समाजक अन्तरावलम्वनकेँ जत्ते नीक जेँका संस्कार गीत प्रकट करैत अछि तत्ते एहि प्रकारक आन कोनो घटक नहि। संस्कार गीतक संकलन-प्रकाशनसँ मौखिक परम्परा साहित्य समेटल जाइत अछि आ ओ साहित्य अघ्ययन-ि‍वश्‍लेष्णक आधार प्रस्तुत करैत अछि। मिथिलामे संस्कार गीतक श्रीगणेश होइत अछि गोसाउनिक गीतसँ। एहिसँ मैथिल समाजक धर्म भावनाक ज्ञान होइत अछि। किन्तु प्रश्‍न अछि जे संस्कारक अवसरपर ई धर्म-भावना मुख्यतः गोसाउनिऐक गीतमे किऐक प्रकट होइत अछि? स्पष्ट अछि जे एहिठाम गोसाउनि गोसाइसँ बेसी महत्वपूर्ण छथि। भगवानोक गीत मिथिलामे गाओल जाइत अछि मुदा संस्कार कर्मक अवसरपर जे प्रधानता भगवती गीतक अछि से भगवानोक गीतक नहि! आब प्रश्‍न उठैत जे मिथिलामे देवी-पूजाक प्रमुखता किऐक अछि? सभ जनैत छी जे देवी-पूजा तंत्रसाधनासँ सम्बद्ध अछि। किछु इतिहासकारक मत छन्हि जे तंत्रसाधना असंस्कृत जनजातिक समाजसँ आएल अछि। जकरा कालान्तरमे ब्राह्मणवादी लोकनि अपना लेलनि। बहुत दिन धरि तंत्रसाधना अवैदिक कार्य बूझल जाइत छल। रसे-रसे अपनवैत-अपनवैत सनातन धर्ममे जोड़ा गेल। वैदिक धर्मावलम्बी सभ सेहो तंत्रसाधना अपना देवी पूजा दिशि‍ आकृष्ट भेलाह। एहिसँ अतिरिक्त मिथिलाक समाजमे शैव-धर्मक प्रमुखता छल अथवा शाक्त धर्मक। जे विवाद विद्वत मंडलीमे बहुत दिन धरि चलल। पनचैतीसँ फरिआएल जे मिथिलाक लोक पंचदेवोपासक होइत छथि। ई मान्यता पुरानकालक समन्वयवादी धार्मिक जीवनक देन थिक। संस्कार गीतक मध्यकालीन चरित्रकेँ देखार करैत अछि। गीत संस्कारमे मैथिली गीतक अपन इतिहास अछि। लोचनक ‘रागतरंगिणी’ मे मैथिल गीतक जे इतिहास लिखने छथि तदनुसार एकर जन्म तेरहम-चौदहम शताब्दीमे भेल। शि‍व सिंह आ विद्यापति समकालिन छलाह। हुनकेँ पितामह सुमति मैथिली गीतक परम्पराक प्रारंभकर्ता छलाह। एहि प्रकारे मिथिलाक देशी गीत परम्पराक स्थापना भेल। ऐतिहासिक आाधारपर यैह मानल जाइत अछि मुदा गीत गेवाक प्रवृति मनुष्यक विकासक संग जुड़ल अछि। जहि आधारपर आरो पुरान कहल जा सकैत अछि। गीत गेवाक ढ़ंग, जकरा राग कहल जाइत, मिथिलामे भास कहल जाइत छैक। मिथिला भासक अपन विशि‍ष्टता छैक। संस्कार गीत एहि भासक भंडार छी। हँ, किछु त्रुटिपूर्ण बात सेहो अछि जे कम जनने एक्के गीत (समदाउन) खुशीक समएमे सेहो गवैत छथि आ शोकक समए सेहो जखन कि दुनूक लेल अलग-अलग विषएवस्तु होइछ। तहिना बेटाक विआहमे कुमार गीत आ बेटीक लेल कुमारि गीतमे सेहो अंतर होइत अछि। जनमक समए खेलौना आ सोहरमे सेहो अंतर अछि। ... पंचानन मिश्र मऊ वाजितपुरसँ विद्यापतिनगर परिवर्त्तन-यात्रा मऊ वाजितपुर गाम समस्तीतपुर जिलाक अन्तर्गत सुदूर दच्छिन भागमे बसल अछि। एकर लगीचहि दक्खिनवरिया कोनपर कहियो गंगाक अविरल धार बहैत रहल होएत। आजुक तिथिमे नदीक छारनिटाए बाँचि गेल अछि। गंगाक इएह दियारा क्षेत्रमे इतिहास प्रसिद्ध गाम थिक चौथम। सामाजिक संरचनाक दृष्टिऐ सम्प्रति राजपूत ओ यादव बहुल जाति चौथमक ‘माइनजन’ थिकाह मुदा अत्यतन्त पिछड़ल समुदायमे परिगणित 261 अत्यन्त पिछड़ल समुदायमे कैक जातिक अवस्थिति सेहो अछिये। अनुसूचित जातिक सदस्‍यहुँसँ गाम निमुन्नि नहिये अछि। तैयो चोथमक प्रसिद्धि आ ऐतिहासिक महत्त्व रहल अछि महाकवि विद्या-पतिकेँ लऽ कए। किंवदन्तीय अछि जे महाकवि अपन निम्न रचनाक उपरान्तेद गंगालाभक सवेच्छा‍ व्यक्त। कएने रहथि- सपन देखल हम शिव सिंह भूप बतीस बरखपर सामर रूप। बहुत देखल हम गुरूजन प्राचीन आब भेलहुँ हम आयु विहीन। आओर लोकमान्य ताक जनतब कहैछ जे बिस्फीसँ जीवनक महाप्रयाणक चलल महफा एही चौथमे गाममे महाकविक आदेशसँ राखल गेल छल जतए गंगा अपन मुख्यी धारसँ बहराए हिनक नश्वर शरीरकेँ जल स्पर्शक अवसर प्रदान करैत लगले अपन मुख्यधारमे घुरि गेल छलीह। चमथाक निकट स्थान मऊ वाजिदपुर गाम आजुहुँ ओही स्थातनपर स्थित अछि। पूर्व मध्यक रेलवेक सोनपुर मण्डिलक हाजीपुर-बछवाड़ा स्टे्शनक पतियानीमे विद्यापतिनगर स्टे्शनसँ चौथम बड़ लगीचहि अछि। एहि स्थानकेँ पथ निर्माण विभाग चारि दिससँ पक्की सड़कसँ जोड़ने अछि। एक सड़क बछवाड़ामे जा कए राष्ट्रीय उच्चर पथसँ जा मिलैत अछि। दोसर मोहिउद्दीननगर होइत महनार-विदुपुरसँ हाजीपुर धरि गेल अछि। तेसर दलसिंहसराय-नरहन रोसड़ा-बहैड़ी क मार्गसँ लहेरियासरायकेँ जोड़ैत अछि आ चारिम सड़क सरायरंजन-समस्तीहपुर दुनू स्थानकेँ छूबैत अछि। मऊ वाजिदपुर गामक एक पैघ भू-खण्ड आब विद्यापतिनगर नामसँ बूझल जाइछ। तैयो बूढ़-पुरान लोक द्वारा विद्यापतिनगर के ‘वाजिदपुर बाबा धाम’ कहि सम्बोधन कएनिहारक संख्या तँ अछिये। महाकविक समाधि भूमि होएबाक करणे बरोबर लोकक आबाजाही लागल रहैत अछि तँ विद्यापतिनगरकेँ प्रखण्ड एक स्तर प्रदान कएल गेल अछि जे समस्तीबपुर जिलान्तहर्गत थिक। एतय ‘विद्यापति भवन’ नामक सामुदाथिक भवन निर्मित अछि। बिहार सरकारक पर्यटन विभाग स्थायनक ऐतिहासिकतामे देखैत ‘पर्यटन सूचना’ केन्द्रा तँ वनौने अछि मुदासँ मात्र औपचारिकतावश। राजस्वक ग्राम मऊ वाजिदपुर इएह विद्यापतिनगर क्षेत्रमे महाकविक समाधि भूमि अछि। एहि स्था्नक विडम्बवना रहल अछि जे एकर इतिहासपरक अनुसंधान अन्वेमषण आ विवेचन करबाक प्रयोजन कहियो-कोनहुँ स्तरपर नहि भऽ पाओल अछि। हम सभ बिस्फी आ एखनुक विद्यापतिनगरक महा‍कविक कालजयी व्यपक्तित्विक संदर्भमे स्थािनयताक दृष्टिसँ भौगोलिक परिवेशक संदर्भमे तखनुक सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्यमे अध्ययन करब आवश्यक नहि बूझि सकलहुँ अछि। ते विद्यापतिसँ जुड़ल स्थान ‘स्ट्रेफोर्ड ओवेन आन’ नहि बनि सकल अछि। वर्ड्सवर्थसँ सम्ब्द्ध स्थानपर कैक तथ्यात्मदक आलेख अभाव हम सभ आइ धरि किंवदन्ती लोककथन आ परम्पसरागत आस्थाकेँ स्वीकार करैत रहलहुँ अछि जे तथ्यक निष्पक्षतापर प्रश्न ठाढ़ करैत रहल अछि, लोकमान्यताक विसंगातिकेँ देखार करैत रहल अछि इतिहासक मापदण्डैकेँ आघार भूमि नहि प्रदान कऽ सकल अछि। तेँ आइ चौथम आ विद्यापतिनगर प्रसंगमे जतेक मुंॅह ततेक वाणी। विद्यापतिनगरमे महाकविक समाधि भूमि अछि। तकर समीपहि पीपरक एवं अजोध गाछ एखनहुँ अछि। कहल जाइछ जे चमथा अएला उत्तर ओ एही गाछक नीचां विश्राम कएने रहथि। क्यो। ईहो कहैछ जे इएह बुढ़वा पीपर हुनक समाधिस्थक साक्ष्य अछि। जे-से। आजहुँ एहि गाछ के महाकविसँ जुड़ल रहबाक आस्थाक अछि। तेँ लोक अपन संतानकेँ संस्कार वृद्धि लेल ताविज एहिमे बन्हैत अछि। जतए महाकवि समाधि‍स्थ् भेल छलाह आ मां गंगा अपन अमोध सलिलामे हुनका जलमग्नो कऽ देने रहथिन ततए आइ एक विशाल प्रस्तलर मन्दिर अछि। लाल रंगक मंदिर एहि मंदिरक गर्भ गृहमे महाकवि विद्यापति ओ महादेवक प्रस्ततर प्रतिमा छेन्हि । दुनू प्रतिमा कारी पाथरक अछि। कहल जाइछ जे ई दुनू प्रतिमा स्वेत: स्फुमट अछि। एकरा महाकविक महाप्रयाणक दोसर दिन देखल गेल छल। महाकविक एहि विशाल मंदिरक पूर्व भागमे उत्तरसँ दच्छिन भागमे चारि छोट-छोट मंदिर अछि। मुख्य मंदिरक वहिर्गमन द्वारसँ बहरएला उत्तर पार्वती मं‍दिर अछि। श्वेत प्रतिमामे पार्वती ठाढ़ मुद्रामे छथि। एकर वाम भागमे श्वेत पाथरक महावीरजीक विशाल मूर्त्ति अछि। तकर बाद बसहा आ अंतिम काल भैरव कऽ मूर्ति जे कारी पाथरक विचित्र ओ भयावह लगैछ। कला सौष्ठहव ओ धार्मिक अनुष्ठाजनक दृष्टिसँ ई मंदिर एवं एतूका प्रतिमा सभ मूर्तिकला ओ वास्तुकलाक अनुपम उदाहरण अछि। सामने एक नौलखा प्रवेश अछि जे गाम मलकलीपुरक सम्पसन्नत लोक द्वारा बनाओल गेल अछि। वर्त्तमान विद्यापति मंदिरक संग कैक सत्यकथा संलग्ने अछि। कहल जाइछ जे महाकविक महाप्रयाणक बाद पाथरक दू प्रतिमा विद्यापति ओ शिवलिंग स्वंत: स्फुइट भैल छल। एकर सटले पीपरक नव अंकुर कोपरि सेहो निकलि आएल छल। पछाति एतए धार्मिक कृत्य होमए लागल। तखन दुलारपुर महन्थक तखनुक मैनेजर दिससँ टीनक छोट-छीन मंदिर बनबौलनि। बादमे बछवाड़ाक कोनो व्यक्ति ई मंदिरक निर्माण करौलनि। एहि समए दलसिंहसराय थानाक केवटा गामक भेषधारी चौधरीकेँ पचहत्तरि वर्षक अवस्थाम मे मंदिरक कृपासँ पुत्र भेल छलन्हि। एक बेर तखनुक नोर्थ बंगाल रेलवे एहि मंदिर ओ पीपर गाछ के ध्वमस्ता करबाक प्रयास कएने छल मुदा ओहि अंग्रेज अफसरकेँ काल कवलित होमए पड़ल छल। मंदिरक निकट एक ब्रजगिरा टीला अछि। कहल जाइछ कोनो मुगलकालीन बादशाह महाकविक समाधिक पशास्ति सुनि क्रोधित भऽ गेल छलाह। मंदिरक प्रशस्ति गाथा सुनि कए एकरा ध्वंस करवाक नीयतसँ ओ हजारक संख्यामे सैनिक पठौलनि। सैनिक सभ पड़ाव दऽ रहल छल कि भयंकर वर्षाक संग ठनका खसल आ सौनिक विजय नहि भऽ सकल। एहि मन्दिरक परिसरमे शिवराति ओ वसन्तल पंचमीक अवसरपर पैघ मेलाक आयोजन होइछ। हमर जनैत विद्यापतिसँ जुड़ल स्थाननकेँ पर्यटनक दृष्टिऐ विकसित करबाक योजना आइ धरि राज्य सरकार किंवा मैथिली सेवी संस्‍थाक स्त्रपर नहि बनाओल गेल अछि। आइ ‘बुद्धिष्टव सर्किट’ क माध्यैमसँ राज्यमे भगवान बुद्धसँ जुड़ल प्रमुख स्थानकेँ चिन्हित कएल गेल अछि। ‘विद्यापति सर्किट’ मे बिस्फी उगना स्थान आ विद्यापति नगरकेँ जोडि़ पर्यटनक संभावना ताकल जा सकैछ। पंचानन मिश्र विद्यापति जयन्ती (31 अक्टूाबर 09) क अवसरपर मिथिलाक कतिआएल सिद्धपीठ आसिनक शारदीय नवरात्र मिथिलाक सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक अस्मिताक विशिष्टताकेँ जोगाए रखने रहल अछि। अदौमे ई प्रधानत: घरैया-पूजाक स्वतरूप ग्रहण कएने छल तहुखनहो एकरामे एकात्मकता, संस्कारात्मकता ओ अंशधरि सामाजिकता विद्यमान छल। आब तँ डेगे-डेग ई सार्वजनिक स्था‍पन भऽ दुर्गा मूर्त्ति पूजाक प्रवर्त्तक मिथिला भूपति राजा कंसनारायणक स्मृतिकेँ जग जियार कए रहल अछि। अभिप्राय जे सम्पूतर्ण मिथिलांचलमे मूर्त्ति स्थांपित कए किंवा प्रस्तजर प्रतिमाक पूजाक माघ्ययमसँ जीवनकेँ क्रियाशील रखवाक परम्परा रहल अछि। राजेश्वरी (दोखर मधुबनी), गिरिजास्था्न (फुलहट मधुबनी), भुवनेश्वअरी (भगवतीपुर मधुबनी), भद्र कालिका (कोइलख मधुबनी), चामुण्डाथ स्थाकन (पचही मधुबनी), सोनामाइ (जनकपुर नेपाल), योगमित्रा (जनकपुर नेपाल), कालिका देवी (जनकपुर नेपाल), राजेश्वारी देवी (जनकपुर नेपाल), छिन्ननमस्तिका (उजान आ मिर्जापुर दरभंगा), वनदुर्गा (खरड़क मधुबनी), सिंधेश्वेरी देवी (सरिसव मधुबनी), देवी स्थाआन (अंधराठाती मधुबनी), कंकाली देवी (रामबागपैलेस दरभंगा), उग्रतारा (महिषी सहरसा), दुर्गास्था्न (उच्चैठ मधुबनी), जयमंगला स्थाकन (मुँगेर), पूरन देवी (पूर्णियाँ), काली स्थान (हाजमा चौराहा दरभंगा), कात्यारयणी स्थाान (वदलाघाट सहरसा), बासठि योगिनी (सहरसा) आदि (स्त्रोचत कुरूक्षेत्रम् अन्तयर्मनक: गजेन्द्र ठाकुर) स्थानपर आसिन आ अन्यहुँ समयावधिमे भेल आयोजन भनहि प्रसिद्धि पओने रहल अछि मुदा अन्यतहुँ कैक स्थान जतए शताब्दीयोंसँ पूजाक आयोजन सेहो इतिहासक अंशहि बूझल जएबाक चाही। एहि संक्षिप्तँ आलेखमे मेनस्ट्रीम सँ विलग किछु स्थानहिक चर्च भेल अछि जकर स्थाि‍पत्य क महत्ता अछि, लोक परम्परा अलग छवि बनौने रहल अछि, सांस्कृतिक प्रतिमानक गढ़नि कैक रूपमे गढ़ल जाइत रहल अछि। मधुबनी जिलाक फुलपरास अनुमंडलक न्योपर गामसँ डेढ़ किलोमीटर उत्तर सखड़ामे सखड़ेश्वरी भगवतीक भव्य मन्दिर अछि। ई मन्दिर धार्मिक, सांस्कृतिक ओ सामाजिक एकताक जाग्रत प्रतीक थिक। एकर प्राचीनताक प्रसंग कहल जाइछ जे मिथिलाक कर्णाटवंशीय राजा नान्यदेव जखन शासनाच्युत भऽ गेलाह तँ अपन कुलदेवी कुर्जा भवानीसँ रक्षार्थ प्रार्थना कएलनि। मां कुर्जा स्वप्नमे हुनका आदेश देलीह जे प्रात: स्नान करैत काल नदीमे जे कोनहुँ वस्तु। भेटय ओ उठा कए चोट्टे पड़ा जाएब आओर जाहि स्थानपर ई वस्तुँ खसि पड़य ततहि अपन शासन स्थाुपित करी। ताहि अनुसारेँ जनकपुरसँ सोलह माइल पश्चिम सिमरौनगढ़मे कर्णा वंशक राज्य पुन: स्थापित भेल जे पांच खाढ़ी धरि शासक रहैत गेलाह अन्तिम शासक सक्रदेव सिंह एहि भगवतीकेँ यंत्रक सिंहासनपर मन्दिर बनाए स्थापित कएलनि। 1934 ई. क भूकम्पमे मूल मन्दिर तँ खसि पड़ल मुदा अलौकिक शक्तियुक्त सिंहासन आजहुँ विद्यमान अछि। सखड़ेश्वरी वा सक्रेश्वंरी भगवती राजा सक्रदेव सिंहक स्‍मृतिमे नामित अछि। मुजफ्फरपुर जिलाक मीनापुर प्रखण्डक पश्चिम छोरपर गण्ड्क नदीक कतबइमे पानापुर गाममे विख्यात भष्मीदेवीक मन्दिर अछि। भगवती भष्मीक मूर्त्ति एकहि पाथरसँ तराशि बनाओल गेल अछि जकर दिप्तीत आइयो मंद नहि भेल अछि। साइत मिथिलांचलमे इएह एक भगवती थिकीह जनिका सोझाँ पड़वाकेँ पूजो परान्‍त मुक्ताकाशमे विचरण करबाक लेल छोडि़ देल जाइछ। एतूका हवन कुंड्सँ प्राप्त भभूतमे चर्म रोगसँ मुक्तिक विश्वावस पाओल जाइछ। पुरातात्विक दृष्टिसँ पूर्णत: उपेक्षित ऐतिहासिक - सांस्कृतिक धरोहरकेँ सुरक्षित रखने दरभंगा जिलाक मनीगाछी प्रखंडक मकरन्दा-भंडारिम गाम स्थित मांॅ वाणेश्वरी एखनहुँ आस्था एवं विश्वासक केन्द्र थिकीह। मनीगाछी प्रखण्ड मुख्यालयसँ 5 किलोमीटर दक्खिन-पश्चिम कोनमे डीहपर स्थित ई तांत्रिक साधना स्थिल सामान्य धरातलसँ अनुमानत: 10 फीट ऊँच अछि। किछु अन्वेिषक एहि डीहकेँ कर्णावंशीय शासकक प्रशासकीय स्थल मानैत छथि तँ किछु राजा शिव सिंहक गढ़। जे-से। मां वाणेश्व्रीक प्रार्दुभावक सम्बन्धमे कैक मान्यता थिक। कहल जाइछ जे वाण नामक भगवतीक एक उपासकक घर पुत्रीक जन्म भेल। जनिक रूप-गुणक प्रशंसा सुनि तखनुक यवन राजा बलजोडि़ वाणक पुत्रीकेँ अंगीकार करबाक लेल दूत पठौलनि जकर प्रतिक्रिया स्वरूप वाण-पुत्री स्वेयंकेँ प्रस्तरमे परिवर्त्तित कऽ जल समाधि लऽ लेने छलीह। आजहुँ एहि परिसरमे ओ ‘परसाइन पोखरि’ अवस्थित अछि जाहिमे सँ पाथरक मूर्ति निकालि पूजा-अर्चना आरम्भ भेल छल। एखनुक मंदिर निर्माणक सम्बिन्धमे कहल जाइछ जे महाराज लक्ष्मीिश्वर सिंह पत्नी रानी लक्ष्मीवती द्वारा एहि भगवतीक पूजोपरान्त अपन भाए श्रीनाथ मिश्रक घर पुत्र होएबाक याचना कएने छलीह जे फलीभूत भेल छल आ 1916 ईo मे मन्दिर बनवाओल गेल। पश्चिम चम्पारण जिलाक रामनगर प्रखंडन्तर्गत सोमेश्वीरमे मांॅ कालिका देवीक प्राचीन मंदिर अछि। हेवनि मे मंदिरक ऊपर नेपाली झंडा आ मंदिरक प्रवेश द्वारपर नेपाली भाषामे ‘हाम्रो अमर’ शिलापट्ट देखि विवाद उत्पंन्न भऽ गेल छल। दरभंगाक बेनीपुर अनुमण्डल मुख्यालयसँ पांच किलोमीटर उत्तर-पश्चिम अवस्थित नवादा गाममे हयहट्ट देवी दुर्गाधाम सिद्धपीठ मानल जाइछ। एहि पीठक उत्पत्ति शिव प्रियासतीसँ जुड़ल थिक। तंत्र चूडामणिमे सतीक अंगसँ संबंधित कुल 52 शक्तिपीठक चर्च अछि। जाहिमे ईहो परिगणित अछि। देवी भागवत पुराण एवं मत्य्ुपुराणक अनुसार सतीकेँ वाम स्‍कन्ध एतोहि खसल छल। कहल जाइछ जे लगभग 600 वर्ष पूर्व राजा हयहट्ट द्वारा एतय जगदम्बाहक मूर्ति स्थापित भेल। बहेड़ी प्रखंडक हावीडीह गामक एक साधक प्रतिदिन देवीक साधना-आराधना लेल अबैत छलाह। पछाति वृद्धावस्थामे दुर्बल कायाक कारण भगवतीक प्रेरणासँ सिंहासनसँ मूर्त्ति उठाकए हावीडीह चलि गेलाह जतए आइयो ओहि मूर्तिक पूजा कएल जाइछ। पछाति हावीडीहसँ नवादा मूर्ति अनबाक लेल संघर्षक स्थिति बनि गेल। अन्तत: नवादाक सिद्धपीठमे अगवे सिंहासन शेष रहल जकरहि पूजा होइत रहल अछि। दरभंगाक घनश्यामपुर प्रखंड मुख्यालयसँ 8 किलोमीटर पर मां ज्वालामुखीक भव्य मंदिर एहि क्षेत्रमे भगवती डीहक नामसँ प्रसिद्ध थिक। एतय मांक पिंडीक पूजा कएल जाइछ। कसरौर गामक पनचोभ मूलक ब्राह्मण परिवारक घरकेँ कुल देवी एकहि ठाम भगवती डीहमे विराजमान थिकीह। कहल जाइछ जे 600 वर्ष पूर्व उफरौल गाम वासी स्व. लखनराज पाण्डेयकेँ हिमाचल प्रदेशक भिंडी जिलाक नगरकोटसँ दैवीय दर्शन भेल छलन्हि। कालक्रमें कसरौरमे पिण्डल बना पूजा होमए लागल । जकरा स्व. पाण्डेक स्थापना मानल जाहछ। मां ज्वालामुखीक दर्शनसँ रोग निवारणक आस्थायव्त कएल जाइछ। मधुबनी जिलाक जयनगर अनुमण्डल मुख्यालयमे प्रान्तक सभसँ ऊँच दुर्गा मन्दिर अछि। एतए दुर्गा पूजाक अवसरपर जमीनक भीतर रहि कऽ साधना करबाक परिपाटी अछि। सुपौल बजारक रामनगर दुर्गास्थानमे आब बलि नहि, छागरक परीक्षा लेल जाइछ। जौं छागर परीक्षाक क्रममे दुर्गा कबूला स्वीिकार करैत छथि तखनहि बलि प्रदान होइछ। स्नाौनोपरान्त। छागरकेँ कान पकडि़ उपर दिस उठा कऽ पुन: जमीनपर राखि देल जाइछ । छागर सिराकेँ हिला दैछ तखनहि बलि देल जाइछ अन्यथा नहि। बेगूसराय जिलाक मंझौल अनुमण्डलक विक्रमपुर गाममे पछिला 400 वर्षसँ फूल, वेलपात ओ कलशक सहायतासँ माता जयमंगला देवीक प्रतिकृति बना कऽ दुर्गा पूजा करैत जाइत छथि । लगभग छ: हजारक आबादीबला एहि गाममे रोस्टूर सिस्टमसँ फूल एवं वेलपात जमा कएल जाइछ। कहल जाइछ जे एतूका लोक जयमंगलागढ़मे दवीक रूपमे दुर्गाक समक्ष बलि प्रदान करैत छलाह। पहसाराक ग्रामीणमे सर्वप्रथम बलि प्रदान देबाक प्रश्नपर विवाद भऽ गेल। रातिमे माता जयमंगलाक स्वप्न भेल। विक्रमपुरहिमे वेलपात-फूलसँ हमर आकृति बना कऽ पूजा करैत जाइ। चम्पारण जिलाक सेमरा रेलवे स्टेिशनसँ 2 किलोमीटर पश्चिमोत्तर एक विशेष देवी शक्तिपीठ, जकरा वनसती देवी स्थाान कहल जाइछ। सहरसाक सोनबरसा प्रखण्डमे वराँपुरमे चण्डीमाताक मंदिर थिक। मंदिरपर सर्व सिंहदेवक नाम अंकित अछि। चण्डीपूजासँ पूर्व लोक ‘बुधाँई’ क पूजा करैछ। ओ दुसाध जातिक देवांशी पुरुष छल। एहि स्थलकेँ राजा विराटक स्थान मानल जाइछ। मानसी-सहरसा रेलवे खण्डक बीच धमहारा घाट स्टेशनक निकट हरौकतानेथान शक्तिपीठ अछि जकरा कात्यायनी थान सेहो कहल जाइछ। कहल जाइछ जे महादेवक भार्या सती जखन राजा दक्षक यज्ञमे जरि गेल छलीह तँ हुनक अधजरुआ लाश अधि महादेव हरिद्वारसँ कामाख्याा जाइत काल सती (कात्यायनी) क ‘कत्ता’ एतहिये खसि पड़ल छल जाहि कारणेँ एकर नामकरण ‘कतानेथान’ पड़ल। मधुबनी जिला मुख्यागलयसँ 14 कि.मी. पर स्थित कोइलख गाममे भद्रकाली कोकिलाक्षीक मन्दिर अछि जे हिनक मंदिरसँ पश्चिम प्रवाहित कमला नदीसँ बहराएल छलीह। हिनकहि नामसँ गामक नामकरण भेल अछि। मिथिलाक संथाली लोकनि दशहरामे इराकेँ पूजा करैत जाइत छथि। इरा संथालक देवी थिकीह। प्रतिदिन एक-एक इराक अलग-अलग स्वरूपक आराधना दस दिन कएल जाइछ। विष्णु पुराणक अनुसारसँ महर्षि कश्यपक एक पत्नी इरा छलीह जनिका संथाली देवीक रूपमे अदौसँ पूजैत रहलाह अछि। सम्पूँर्ण मिथिलांचलमे भगवती वाराही देवीक मूर्त्ति मात्र बहेड़ामे अछि। जतए आसिन मासमे बेस जमघट रहैछ । दुर्गा पूजाक अवसरपर अन्य उद्देश्यक संगहि ओकर स्था्नीय माहात्यमसँ परम्पषरागत स्वणरूप स्थाि‍पत्य विवेचन आदि जौं हमर एजेंडामे होइ तँ एक सकारात्म्क प्रयास मानल जाएत। २.-गोपाल प्रसाद फराक मिथिला राज्यक गठन किएक नहि ? ................................................................... जखन पृथक तेलंगाना राज्यक गठन भऽ सकैत अछि तँ फराक मिथिला राज्यक गठन किएक नहि? मिथिलांचलकेँ पूर्ण न्याय एखन धरि कोनो उद्योग एही क्षेत्रमे प्रारंभ नहि काएल गेल अछि | सभ क्षेत्रमे मिथिलांचलकेँ घोर उपेक्षा भऽ रहल अछि | केंद्र सरकार ओ बिहार सरकार एखन धरि कोनो उद्योग एही क्षेत्रमे प्रारंभ नहि काएल गेल अछि, जाहिसँ एही क्षेत्रक लोक पलायन लेल मजबूर अछि | असमान विकासक करने दशक पिछरल राज्य बिहारमे मिथिला अति पिछरा क्षेत्र बनि कऽ रही गेल अछि | बिहार सरकारकेँ ध्यान मात्र पटना आ नालंदा कऽ विकसित केनाई रहि गेल अछि | मिथिलामे पर्यटन ओ खाद्य प्रसंस्करण कऽ भरपूर संभावना कऽ बाबजूदो मिथिलाक संग नकारात्मक रवैया अपनओल जा रहल अछि| एही क्षेत्रक भाषा मैथिली आ मैथिली अकादेमी अपन अस्तित्व हेतु संघर्ष कऽ रहल अछि | बिहार सरकारकेँ युवा महोत्सव आ दिल्लीक प्रगति मैदान स्थित बिहार पवेलियनमे आई आई टी एफ कऽ दौरान आहूत सांस्कृतिक कार्यक्रममे मैथिलीकेँ घोर उपेक्षा कएल गेल | जाहिसँ सरकारक नीति ओ नीयत मिथिलावासी लोकनिकेँ समझमे आबी गेल अछि | एहि सभ समस्याक निदानक एकमात्र विकल्प फराक मिथिला राज्य अछि | बिहार सरकार प्रवासी बिहारी लोकनिकेँ सुरक्षा, रोजगार आ न्याय दियाएबमे पूर्ण तरहे विफल रहल अछि आ एकर आ एकर ज्यादातर शिकार मिथिलाक लोक सभ रहल अछि | महाराष्ट्र, दिल्ली आ पंजाबकेँ बाद मध्यप्रदेशक राजनेता लोकनि सेहो बिहारी लोकनिक संग असंवैधानिक रूख अप्नौलानी आ बिहार सरकार मात्र बयांडीक अपन कर्त्तव्यक इतिश्री कऽ लेलनी | बिहार सरकारकेँ योजना विभाग, केद्र सरकारक योजना विभागमे बिहार टास्क फ़ोर्स आ बिहार फौन्डेसनक बाबजूद मिथिलाक बिहारमे पर्याप्त तवज्जो किएक नहि भेटल? आधारभूत संरचनाक विस्तारक बिना मिथिला कटल कटल जकाँ अछि | पूर्व लोक सभा अध्यक्ष पी. ए. संगमाकेँ ओ बयान स्वागत योग्य अछि जाहिमे ओ कहने छलाह जे " क्षेत्रवाद - नक्सलवाद असमानताक उपज अछि जाहिसँ छोट राज्यक गठन कऽ दूर कएल जा सकैत अछि " मिथिलाक लोकनि बाढ़ झेलए आ विकासक धारा अन्य क्षेत्रमे बहे ई नहि चालत आई भारतक समस्त मिथिला वासी लोकनिकेँ एकरा लेल आन्दोलन करए परत फराक मिथिला राज्य लेल अंतर राष्ट्रीय मथिली परिषद् द्वारा कानपूरमे २३-२४ दिसंबरकेँ मिथिलाक बुद्धिजीवी, स्वैक्षिक संगठनकेँ सम्मलेन भेल जाहीमे आंदोलनक दशा दिशा तँइ कएल गेल| एहि वास्ते दिल्लीकेँ जंतर मंतरपर सेहो धरना देल गेल जाकर पूर्ण समर्थन भेटल| गोपाल प्रसाद -हिंदी ,मैथिली , मिथिला , बिहार ओ मैथिल लोकनिसंॅ अपेक्षा हिंदीक प्रचार-प्रसार ओ विकासक लेल केंद्रीय हिन्दी निदेशालय निरंतर प्रयासरत अछि| अपन विभिन्न महत्वपूर्ण योजना सभ आ कार्यक्रमसँ हिन्दीकेँ वैश्विक धरातलपर प्रतिष्ठा दिलएबाक दिशामे सार्थक प्रयास कऽ रहल अछि| निदेशालय द्वारा द्विभाषी, त्रिभाषी आ बहुभाषी कोष आ वार्तालाप पुस्तिका सभकेँ सीडी रूपमे पाठक लोकनिकेँ उपलब्ध कराओल गेल अछि | अष्टम अनुसूचीमे शामिल प्रमुख भारतीय भाषा मैथिलीसंॅ सम्बंधित कोनो कार्यक्रम , मैथिली भाषी लोकनिकेँ हिन्दीसंॅ जोड़वाक प्रक्रिया, हिन्दी-मैथिली-अंग्रेजी कोष वा हिन्दी मैथिली वार्तालाप पुस्तिकाकेँ प्रकाशनक हमारा एखन धरि जानकारी नहि अछि| केंद्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा कोनो संविधान प्रदत्त भारतीय भाषाक प्रति सौतेला व्यवहार की न्यायोचित अछि? हम माए सीताक जन्मभूमि मिथिला क्षेत्रक दरभंगा जिलाक निवासी छी| दिल्लीमे विगत १२ वर्षसंॅ बेसी कालसंॅ पत्रकारिता ओ साहित्य सृजनक संगहि संग एकटा आईटी कम्पनी ''नर्मदा क्रिएटिव प्रा. लि. द्वारा प्रकाशित ऑनलाइन हिन्दी मासिक पत्रिका "समय दर्पण " केर संपादकक रूपमे कार्यरत छी|पटनासंॅ प्रकाशित मैथिली त्रैमासिक पत्रिका ' मिथिला महान " केर प्रबंध संपादकक रूपमे सेहो योगदान देने छलहुँ | ओहि कालक्रममे प्रमुख लेखक/ कवि लोकनिक रचनाक संग-संग भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्संॅ प्रकाशित पत्रिका " गगनांचल" केँ छ्टा आलेखक मैथिली अनुवाद सेहो कयलहुंॅ | " मिशन मिथिला " केर संयोजक केर रूपमे मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतक संरक्षण-संवर्धन ओ मैथिली अस्मिताक भान करेनाई ओ जागरूकताक अभियानमे प्रयासरत छी| किछु काल पूर्व मिशन मिथिलाक दिससंॅ केंद्रीय हिन्दी निदेशालय (दिल्ली ) , भारतीय भाषा संस्थान ( मैसूर), साहित्य अकादेमी आ मैथिली -भोजपुरी अकादेमीकेँ कएकटा मांग पत्र पठाओल गेल | मीडियामे सेहो काले काल मैथिली ओ मिथिलाक विकासक लेल प्रखर स्वर अनुगूंजित कएल गेल | बिहार सरकार मैथिलीक विकासमे बाधा उत्पन्न कऽ रहल अछि | इंटरमीडीएटमे पहिने अनिवार्य भाषाक रूपमे मैथिलीकेँ स्थान नहि भेटल मुदा बादमे ऐच्छिक बिषयक रूपमे शामिल कऽ एकर महत्त्वकेँ समाप्त करबाक कुचक्र रचल गेल, जाहिसंॅ अधिकांश छात्र मैथिलीक पढाईसंॅ बिमुख भऽ गेल| ग्याराहमक लेल सरकार द्वारा निर्धारित पोथीक जे नाम देल गेल ओकर प्रकाशन परीक्षा होएबाक मात्र तीन दिन पहिने बाजारमे उपलब्ध भेल जाहिसंॅ बेसी कठिनाई भेल आ मैथिली विषएकेँ घोर आघात लागल | बारहवीं क लेल "तिलकोर भाग-२" केर प्रकाशन सेहो बड्ड बाद मे भेल | ई पोथी नहि तँ छात्र लोकनि देखलक आ नहि तँ शिक्षक लोकनि देखलनि किएक तँ पोथी छपले नहि छल | फरवरीमे एकर परीक्षा भेल आ तखन ई पोथी बाजारमे उपलब्ध भेल | सम्पूर्ण बर्ष बीत गेल , फॉर्म भरल जा चुकल छल मुदा पोथी नहि रहबाक कारणे महाविद्यालयमे एकर पढौनी नहि भेल| एकरा संगे दोसरो पोथी जुडल अछि | बी. पी. एस. सी. पाठ्यक्रम सेहो मैथिलीक लेल उपयुक्त नहि अछि, जाहि मादे प्रश्नकर्ता आ छात्र दुनू के असुविधा भऽ रहल अछि | राजकमल चौधरीक " ललका पाग " छात्र लोकनि मात्र एकटा कथा ललका पाग पढ़य वा सम्पूर्ण पोथी पढ़ए , एकर जिक्र कतहु नहि अछि | पोथीक उपलब्धताक कमी पूर्ण करबामे मैथिली अकादेमी, साहित्य अकादेमी सक्षम नहि अछि | यू. पी. एस . सी सेहो उटपटंगे अछि | महाकाव्य सम्पूर्ण होएबाक चाही | मात्र दत्तवती क दूटा सर्ग देबाक की तुक अछि ? जखन की एकर पाठ्यक्रम स्नातकोत्तर स्तरक होयबाक चाही , तीन चारिटा महाकाव्यक नाम होएबाक चाही, जाहिसँ विद्यार्थी लोकनिकेँ छूट भेटए | बड्ड रास उच्च स्तरीय रचनाकार लोकनिकेॅं स्थान नहि भेटल अछि, जकर पुर्नावलोकन अत्यावश्यक अछि | यू.जी.सी., यू.पी.एस.सी. कें चाही जे सभ विश्वविद्यालय सभसंॅ मैथिलीक शिक्षकक सूची उपलब्ध होबय जाहिसँ बिषएसँ सम्बंधित समस्या सभक त्वरित निदान भऽ सकए | स्नातक प्रथम सत्रमे कला, विज्ञान, वाणिज्य संकायमे नीता झा केर कथा "बाय-बाय अंकल " कें स्थान दऽ कऽ देवशंकर नवीनक संपादकत्वमे एन.बी.टी. द्वारा प्रकाशित एक सए पचीस टाकाक दूटा पोथी पचास अंकक पढाई लेल बोझ डालल गेल एकर कियो विकल्प नहि देल गेल| प्रतिष्ठाक स्तरपर स्नातकोत्तर स्तरक पोथी राखल गेल अछि जखन की अन्य लेखक लोकनिक उच्च कोटिक पोथी उपलब्ध छल | इग्नू, बी.पी.एस.सी., यू.पी.एस.सी., साहित्य अकादेमी , भारतीय भाषा संस्थान आ यू.जी.सी. केर मैथिलीक कमिटीमे एकटा विशेष कॉकस हाबी अछि | नाम गिनल चुनल अछि - भीमनाथ झा ,नीता झा , अमरजी, रामदेव झा , विद्यानाथ झा विदित, वीणा ठाकुर, अमरनाथ, विभूति आनंद, रमण झा | की ब्रह्मण वर्गकेँ अतिरिक्त मैथिलीमे विद्वान् नहि अछि? दिल्लीक मैथिली - भोजपुरी अकादेमी सेहो काईस्तवादमे जकरल अछि| की ऐनामे मैथिलीक सर्वांगीण विकास होयत? प्रश्न ई अछि जे एकरामे कालक्रम अनुसार परिवर्तन किएक नहीं होएत अछि? एहि लेल मैथिलीसंॅ जुडल सभ लोकनिकेँ जागए पडत | सभसँ नीक होएत जे मैथिलीक शिक्षा देनिहार वा जुडल सभटा सरकारी वा गैरसरकारी संस्था ऑनलाइन भऽ जाए, किएक तँ जखन धरि मैथिली , नव तकनीक इन्टरनेटसंॅ नहीं जुड़त ओकर चुनौती बढ़बे करत | एहि लेल मैथिल संस्था सभकेँ पुरान शैलीक स्थानपर नव राहपर चलए पड़त| (लेखक "मिशन मिथिला " केर संयोजक आ ऑनलाइन हिंदी मासिक पत्रिका "समय दर्पण " केर संपादक छथि) प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी (१५ फरबरी १९२१- १५ मार्च १९८५) अपन सम्पूर्ण जीवन बिहारक इतिहासक सामान्य रूपमे आ मिथिलाक इतिहासक विशिष्ट रूपमे अध्ययनमे बितेलन्हि। प्रोफेसर चौधरी गणेश दत्त कॉलेज, बेगुसरायमे अध्यापन केलन्हि आ ओ भारतीय इतिहास कांग्रेसक प्राचीन भारतीय इतिहास शाखाक अध्यक्ष रहल छथि। हुनकर लेखनीमे जे प्रवाह छै से प्रचंड विद्वताक कारणसँ। हुनकर लेखनीमे मिथिलाक आ मैथिलक (मैथिल ब्राह्मण वा कर्ण/ मैथिल कायस्थसँ जे एकर तादात्म्य होअए) अनर्गल महिमामंडन नहि भेटत। हुनकर विवेचन मौलिक आ टटका अछि आ हुनकर शैली आ कथ्य कौशलसँ पूर्ण। एतुक्का भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ संस्कृतिक कट्टरता ई सभटा मिथिलाक इतिहासक अंग अछि। एहिमे सम्मिलित अछि राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म, दर्शन आ साहित्य सेहो। ई इतिहास साहित्य आ पुरातत्वक प्रमाणक आधारपर रचित भेल अछि, दंतकथापर नहि आ आह मिथिला! बाह मिथिला! बला इतिहाससँ फराक अछि। ओ चर्च करैत छथि जे एतए विद्यापति सन लोक भेलाह जे समाजक विभिन्न वर्गकेँ समेटि कऽ राखलन्हि तँ संगहि एतए कट्टर तत्त्व सेहो रहल। हुनकर लेखनमे मानवता आ धर्मनिरपेक्षता भेटत जे आइ काल्हिक साहित्यक लेल सेहो एकटा नूतन वस्तु थिक ! सर्वहारा मैथिल संस्कृतिक एहि इतिहासक प्रस्तुतिकरण, संगहि हुनकर सभटा अप्रकाशित साहित्यक विदेह द्वारा अंकन (हुनकर हाथक २५-३० साल पूर्वक पाण्डुलिपिक आधारपर) आ ई-प्रकाशन कट्टरवादी संस्था सभ जेना चित्रगुप्त समिति (कर्ण/ मैथिल कायस्थ) आ मैथिल (ब्राह्मण) सभा द्वारा प्रायोजित इतिहास आ साहित्येतिहासपर आ ओहि तरहक मानसिकतापर अंतिम मारक प्रहार सिद्ध हएत, ताहि आशाक संग।-सम्पादक अध्याय – 1 मिथिला क इतिहास वैदिक युग प्राचीन वैदिक साहित्यमे अंग मगध और मिथिलाक कोनो स्पिष्ट, उल्लेाख नहिं भेटइत अछि। ऋग्वेनद संहितामे उपरोक्तअ तीनू खण्डकमे सँ कोनो खण्डाक नाम उल्लिखित नहिं अछि। ऋग्वे्द क तेसर अष्टककक पूउम सूक्तक चौदहम ऋचामे ‘कीकट’ क उल्लेखख अछि आर ओहिठामक राजा ‘ प्रमगन्दष’ क संबन्धकमे बहुत रास निन्दटनीय बात सेहो। यास्क क अनुसार‘कीकट’ देशमे अनार्थ लोकनिक निवास छल। सायणाचार्य अहि मतसँ सहमत होइत हुँ आगाँ कहैत छैथ जे ‘कीकट’ क निवासी नास्तिक छलाह आ योग, दान, होम इत्यादिपर हुनका लोकनिकेँ एक्कोरत्ती विश्वासँ नहि छलैन्ह। ओ लोकनि इहलोकिक छलाह आर परलोकमे हुनका लोकनिकेँ कोनो प्रकारक विश्वाीस नहि छलैन्ह। ओ लोकनि भौतिकवादी छलाह। वायुपुराणक गया महातम्यवसँ कहल गेल अछि-- ”कीकटेषु” गया पुण्याय नदी पुण्या पुन: पुन: च्यछवनस्याट श्रमं पुण्यं पुण्यंज राज गृहं वनम्” आहिसँ स्पष्ट अछि जे ‘कीकट’ दक्षिण विहारमे छल आर ओहिठामक निवासी भौतिकवादी दर्शनमे विश्वास रखैत छलाह। ‘कीकट’क संबधमे वैदिक विद्वान लोकनिक मध्यस मतभेद अखनो बनल अछि आ आहि विवादमे पड़ब हमरा लोकनिक हेतु एतए आवश्याक नहि बुझना जाइछ। एहन मानल जाइत अछि जे संहिता कालमे आर्य-सभ्य‍ताक प्रधान केन्द्र सरस्वती आ ह्रषद्वली नदीक मध्यामे छल आर ओहि स्थाआनके मनु ब्रह्मावती कहने छथि। ब्राह्मण कालमे आहि संस्कृमतिक केन्द्र छलकुरू-पाँचल्ल जकरा मनु ब्रह्मर्षि देश कहने छथि। शतपथ ब्राह्मणमे कुरू पाँचल्ल देशक विशेष प्रशंसा भेल, अछि आर ऐतरेय ब्राह्मणमे आर्य देशक हेतु अस्ँासक श्रुवायां प्रतिष्ठावयां विशेषणक प्रयोग भेल अछि। सदानीरा नदी (गण्डशक) पार क कऽ जखन आर्य लोकनि मिथिलाक क्षेत्रमे उतरलाह तखन अत्यंलत द्रूतगतिसँ आर्य संस्कृतिक प्रसार आहि क्षेत्रमे भेल आ मिथिला विदेह समस्तल पूर्वी भारतमे आर्य सभ्यँताक प्रसार-प्रचारक एकटा प्रधान केन्द्र बनि गेल। कोनो संहितामे स्पिष्टग रूपे विदेहक उल्लेरख नहि भेटइत अछि। तैत्तिरीय आर काठक संहितामे “वैदेह्य ”, “वैदेही” एवं “वैदेह” शब्दक प्रयोग भैटेत अछि परञ्च आहि सभहिक व्यवहार गाए आर बरदक हेतु भेल अछि। ऐतरेय ब्राह्मणमे जाहिठाम आर्य देशक चर्चा भेलो अछि ताहुठाम “ विदेह’’ शब्दक पृथक उल्लेख नहि भेटैत अछि। काशी, कोशल, मगध, अंग,आदि शब्द संग ‘विदेहो’ केँ प्राच्य देशमे साटि देल गेल अछि। ‘विदेह’क पृथक उल्लेख स्पुष्टश रूपें शतपथ ब्राह्मणमे भेटैत अछि ओहिठाम ई कहल गेल अछि जे विदेघ माथव अपन पुरोहित गौतम राहूगणक संग वैश्वाशनर अग्निक अनुशरण करैत-करैत सरस्वती नदीक तीरसँ सदानीरा क तीर धरि पहुँचलाह। अहिसँ पूर्व आर्य लोकनि सदानीराकँे पारकर पूब दिसि नहि गेल छलाह तै तँ ई एक महत्वच पूर्ण घटना मानल जाइत अछि। वैश्वानर विदेघ माथवकेँ सदानीरा टपबाक आदेश देलथिन्हत । विदेघ अपन पुरोहितक संग आकरा पार केलन्हि आर तखनेसँ ओ देश ‘विदेह’ कहबे लागल। सदानीरा विदेह आर कोशल कवीचक सीमा रेखा बनल। ताहिदिनसँ विदेह आर्य सभ्यहताक प्रधान केन्द्र बनि गेल। शतपथ बाह्मणक शेष अध्यायमे जनकक दरबारक कथा सुरक्षित अछि। मिथिलाक राजा जनक अपना ओहिठाम देशक विभिन्नर भागसँ ब्रह्मज्ञानी लोकनिकेँ आमंत्रित कऽ कऽ बजबैत छलाह, आर हुनक दरबारमे तँ कुरू पंचलिसँ बरोबरि ऋषि-मुनि लोकनि आबिते रहैत छलाह॥ ऋषि याज्ञवल्मय विदेहमे रहैत छलाह आर ताहु हेतु मिविला क प्रसिद्ध समस्त आर्यावर्तमे छल। जनक याज्ञवलम्यछ तँ बुझु जेना आर्य संस्कृतिक धोतक बुझल जाइत छलाह आ ब्रह्मज्ञानक क्षेत्रमे हिनका लोकनिक कोनो ककरोसँ तुलना ताहि दिनमे नहि छल। कुरु पाँचालक ऋषिगणक कुटियामे शिक्षित रहितहुँ याज्ञवलम्यँ जखन जनकक ओहिठाम शास्त्रांर्थमे पहुँचलाह तखन ओ ओहिठाम उपस्थित कुरू पाँचलिक ऋषि गणकेँ शास्त्रार्थमे पराजित केलन्हि आर अपन विदूताक प्रकाश सेहो। हुनक वचन मात्र अध्याात्मम विघेटा मे नञ अपितु वैदिक क्रियाकलापमे सेहो सर्वथा प्रामाणिक मानल जाइत छल। परंपरामे हिनका शुक्लम यजूर्वेदक प्रवर्तक मानल गेल अछि। शतपथ ब्राह्मण एवं बृहदा रण्यकोपनिषदक अनेकानेक स्थलपर जनक- याज्ञवलम्यिक ब्रह्मज्ञानक विवैचनाक वर्णन अछि आर ठाम-ठाम विभिन्नस ऋषि लोकनिक शास्त्रार्थक सेहो। ब्रह्मज्ञानक हेतु तैतिरीय ब्राह्मणमे सेहो राजा जनकक प्रशंसा कैल गेल अछि। जनक ब्रह्मज्ञानक हेतु केहेन प्रसिद्ध रहल हेताह तकर एकटा सामान्यय संकेत हमरा लोकनि के कौशीतकी उपनिषदक एक कथामे भेटइत अछि जाहिमे कहल गेल अछि कि गर्गवंशक ‘बाल्मकि’ नामक एक ब्रह्मज्ञानी काशीराज अजानशुत्रक ओतए ब्रह्मज्ञानक निरूपणकेँ जखन पहुँचलाह तँ राजा हुनकासँ प्रसन्नब भए एक हजार गाए देलथिन्हु आर कहलथिन्ह जे देखु तइयो लोक सब “जनक-जनक’’ चिकैरि रहल अछि। वैदिक युगमे ब्रह्मज्ञानक चरम उत्कतर्ष विदेहमे भेल छल। ब्रह्मज्ञान आर्य संस्कृगतिक चरम उत्करर्ष बुझल जाइत छल-वैदिक मंत्रक उत्थाकन ब्रह्मावर्तमे, क्रिया कलापक विकास ब्रह्मर्षि देशमे एवं “ब्रह्मविद्या”क विवेचन विदेह मे भेल। अहि हेतु ताहि दिनसँ समस्ता आर्यावर्तक लोककेँ विदेह आवए पडैत छलैन्हह। विदेह पूर्वी भारतमे वैदिक कालमे आर्य सभ्यपताक प्रधान केन्द्रा छल। आहिठाम क्षत्रिय सेहो वेदवक्ता होइत छलाह। संस्कृत साहित्यर मध्य मिथिला, विदेह एवं तीरभुक्ति क वर्णन:- बालकाण्ड‍ (बाल्मीरकि) मे मिथिलाक वर्णन एवं प्रकारे अछि - रामायण (बालकाण्डब) - “रामोडपि परमांपूजाँ गौतमस्यत महामन:” सकाशाद् विधिवत् प्राप्य जगाम मिथिलाचलः॥ अनर्ध राधव मे (अंक २) “श्रृणोछि विदेहषु मिथिला नामनगरीम” जयदेव - प्रसन्नद राधव (अंक २) “तादह मिथिलायां पंचरात्र निवासेन श्रमोपनेतव्य । प्रसंगादयां राजा जनको द्रशः” रघुवंश - (सर्ग – ११) ”संन्यामन्व्यन सम्यृवत हेतु मैथिलः स मिथिलां व्रजन वशी। “ नैषधीयचरित - (सर्ग – १२)- ”अपीयमेनं मिथिला पुरन्दरं निपील दृष्टि: शिथिला स्तुते वरम् ” ‘रामायण चम्पूट’ (बालकाण्डम) “ अथ मिथिलां प्रात प्रास्थान: कौशिकस्तअ मित्थ म कथयतू ” दशकुमार चरित (उतरपीढिका – उक्छवास ) “ एषो ब्रह्मस्मि पर्य्यटने कदा गतो विदेहषु मिथिलाम प्रावस्यैव” कथासरित सागर ( जम्बक उ, तरंग – ५) ” हदो वैदेह देशे च राज्यं गोपलिकायसः। सत्कार हेतोहंति पतिः श्वसुर्यायानुगच्छतेः॥ भृंगदूत (गंगानंद झा) - १७ म शताब्दी। “ गंगाती रावधि रधि गता यद भुओ भृंग भुक्ति र्नाम्ना सैव त्रिभुवन तले विश्रुता तीर भुक्तिः॥ भृंगदूत मे दरभंगा क वर्णन एवं प्रकारे अछि – नस्यापाथः परमाविमणं सांतिपियाभिरामा – गारांकामायुध दरभंगा राजधानी - मुवैयाः॥ रघुवीर कवि –“ लक्ष्मीश्वरोपायन” मे – “देशः संतु सहस्त्रोपि ममतु स्वाभाविक प्रीतये, श्रेयान देश बिशेष एवं मिथिलानामा क्षमा मंडले।” बदरी नाथ झा - ‘ गुणेश्वर चरित चम्पू’ “ आस्ति स्वस्ति समस्त भूमि बल श्रेय प्राशासी श्रुता प्रत्यार्थ स्मय मन्थना प्र मिथिला नामाडभिरामा कृति:। प्रेक्षाशालिविपा चिदालिल लिनो त्संगा डिभिषंगार्दिनी , नीवृद वृन्दम, चर्चिका र्चितलर श्रे स्तीरभुक्तिः सदा । गंगा गण्डकी संगमसँ पश्चिम सुप्रसिद्ध सोनपुर टीसनक समीप जे हरिहर क्षेत्र अछि तकरो उल्लेख भृंगादूतमे भेटेइत अछि। अहि भृंगदूतमे गाण्डवीश्वर स्थान , ब्रह्मपुर , वाग्वती (वाग्मती) एवं कमला नदीक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। कहबी छैक जे गाण्डवीश्वर महादेव राजा जनकक दक्षिणक द्वार पलि रहथिन्ह आर ओ स्थान सम्प्रति जोगिआरा टीशनक समीप अछि। ओना मिथिला नामसँ प्राचीन जनक राजक राजधानीक ओध होइछ परञ्च एतए स्मरण राखबि आवश्यक जे मिथिला, तेरभुक्ति, विदेह, अछि शब्द एक एहन भौगोलिक इकाईक धोतक थिक जे गंगाक उत्तरमे छल आर विभिन्न छोट-छोट गणराज्यमे बटल छल। प्राचीन कविक बिहारमे गंगाक दक्षिण मेछल अंग आर मगध आर उत्तरमे छल मिथिला जकर अंतर्गत कैकटा छोट छीन राज्य सभ छल। जातक कथा आर जैन साहित्यक अतिरिक्त वृहद विष्णु पुराणक मिथिला महात्मयमे मिथिलाक जे वर्णन अछि ताहिसँ एकर महत्व एवं जन प्रियताक पता लगेइयै। अहि मिथिलाक अंतर्गत छल तँ प्राचीन कालक वैशाली जकर विस्तृत विवरण रामायण, रामायण चम्पू एवं भृंगादूतमे भेटैत अछि। प्राचीन ‘ विशाला ’ नगरिये बौद्ध कालक वैशाली थिक। विशालाक नामक अद्धत्तन “बिसारा” परगनासँ होइत अछि । अहि क्षेत्रमे एकटा भैरव स्थान सेहो छल जकर चर्च भृंगादूतमे भेल अछि। नहिंयारी गाँव (कमतौल टीसन)सँ अघुना एकर बोध होइछ। भृंगदूत मे “ सरिसव” ग्राम आर कोहिश्वर महादेव क उल्लेख सेहो भेटइत अछि। नाम एवं मिथिला क भौगोलिक सीमा : - शतपथ ब्राह्मणक अनुसार नदीक बहुलताक कारणे मिथिलाक भूमि दलदल जकाँ छल। कहल जाएछ जे अग्निदेवक आज्ञासँ माथव विदेघ आर गोतम राहुगण सदानीरा (गण्डकी)क पूबमे जाक बसलाह आर और क्षेत्र इतिहासमे मिथिला, विदेह, तीरभुक्ति एवं तिरहुतक नामसँ प्रसिद्ध भेल। दलदल भूमिकेँ अग्निदेव सुखाकेँ कठोर बनौलन्हि आर जंगलकेँ जरा कऽ अहि पूर्वी भूमिकेँ रहबा योग्य स्थान सेहो। आर्य ऋषि लोकनि ओहिठाम अगणित यज्ञक आयोजन केलन्हि आर असंख्य यज्ञ आर होम होएबाक कारणें ओहिठाम भूमि रहबा योग्य बनि सकल। नदीक बाहुल्यक कारणे संभव जे अहि क्षेत्र के तीरभुक्ति कहल गेल छल। प्राचीन कालमे तीरभुक्ति समस्त उत्तरी बिहारक धोतक छल आर एकर सीमा पश्चिम मेश्रावस्ती भुक्ति आर पूबमे पुण्डवर्धन भुक्तिसँ मिलैत जुलैत छल आर एकर अहि विशालता क परिचय हमरा आयनी अम्बरीमे वाणैत तिरहुत सरकारक महलक नाम सभ भेटइत अछि। परंपरा गत साधनमे मिथिलाक जे विवरण उपलब्ध अछि तकर सिंहावलोकन करब अपेक्षित। ओहि वर्णनमे एतिहासिकताक दुर कतबा दूर धरि अछि से नहि कहि सकैत छी तथापि पौराणिक आर आनक महत्व तँ एतिहासिक संक दृस्टिये अछिये अहिमे संदेहक कोनो गुंजाइश नहि। भविष्य पुराणक अनुसार अयोध्याक महाराज मनुक पुत्र निमि अहि यज्ञ भूमिमे आवि अपनाकेँ कृत्य – कृत्य बुझलन्हि आर ओहिठामक ऋषि लोकनिक लय आर यज्ञसँ लाभान्वित भेलाह। निमि कपुत्र ‘मिथि’ एक शक्तिशाली शासक भेलाह आर ओ अपन पराक्रमक प्रदशनार्थ ओहिठाम एकटा नगरक निर्माण केलन्हि जे ‘ मिथिला’ क नामसँ प्रसिद्ध भेल। अहिमे कहलगेल अछि जे पुरी निर्माता होएबाक कारणें मिथिलाक दोसर नाम ‘जनक’ पड़ल। भविष्य पुराण : - निमः पुभस्तु तत्रैव मिथिला मे महान स्मृतः । प्रथमः भुजबलैयेन तैरहूतस्थ पार्श्वतः ॥ निर्म्मित स्वीयनाम्ना च मिथिला पुरमुन ममू। पुरी जनन सामथ्यज्जिनकः सच कीर्तितः॥ वाल्मीकीय रामायण : - राजा भृतिषुलोकेषु विश्रुतः खेनकर्मणा निमि परमधर्मात्मा सर्व तत्व वतांवरः । तस्य पुत्रो मिथिर्नाम जनको मिथिपुत्रक कथन अछि जे जखन वशिष्ठ यज्ञाभिलाषी निमिक निमंत्रण अस्वीकार कए इन्द्रक पुरोहिताई करबाक हेतु स्वर्ग गेलाह तखन वशिष्ठक अनुपस्थितिमे भृगु आदि आस्थिन ऋषि मुनि लोकनिक सहायतासँ निमि अपन यज्ञक संपादन केलन्हि। वशिष्ठ स्वर्गसँ घुरलापर जखन यज्ञकेँ सम्पादन भेल देखलन्हि तखन क्रुद्ध भए ओ राजा निमि के “विदेह ” राजेबाक श्राप देलन्हि। वशिष्ठक अति श्रापसँ चारूकात हाहाकार मचिगेल प्रजा लोकनि घबरा उठलाह। अराजकताक स्थिति देखि आस्थिन ऋषि गणनिमिक मृत शरीरकेँ मथे लगलाह ओर मथला उत्तर जे शरीर उत्पन्न भेल तकर “मिथिल” अथवा “विदेह”क संज्ञा देलगेल। बाद मे“जनक” नामसँ सेहो प्रसिद्ध भेलाह। श्रीमदभागवत : - जन्मना जनकः सोऽभूद्धै वेह स्तु विवेहजः मिथिलो मथनाज्जातो मिथिला येन निर्म्मिता॥ देवी भागवत: - सँ ज्ञान होइछ जे निमिक उन्नेसम पीढी मे राजर्षि सीरध्वज जनक भेल छलाह और श्रीमद - भागवतसँ ई बुझल जाइत अछि जे जनक वंशक शासक लोकनि एहेन वातावरण बना देने छलाह जे हुनक पार्श्ववती गृहस्थ सेहो सुख-दुःखसँ मुक्त भऽ गेल छलाह। ‘विदेह’ जे कि महत्वपूर्ण कल्पना छल आर जकर प्राप्तिक हेतु लोग ललायत रहैत छल से ओहि देशक नामक संकेत सेहो दैत अछि जाहिठाम जनक वंशक लोग अपन राज्यक स्थापना करने छलाह। शुक्रदेव जी ( व्यासक पुत्र ) जखन अपन पितासँ तपश्याक हेतु आज्ञा माँगलन्हि तखन हुनका योगिराज जनकक दृष्यांत दैत ई कहल गेलन्हि जे ओ घरोमे रहिकेँ तपस्या कऽ सकैत छथि। शुक्रदेव जी असंतुष्ट देखि व्यास हुनका राजार्षि जनकक ओतए पठा देलथिन्ह। देवी भागवतः - वंशेऽस्मिन्येऽपि राजा नस्ते सर्वे जनकास्तथा। विख्याता ज्ञानिनः सर्वे वेदेहाः परिकीर्निताः॥ वर्षद्वयेन मेरूंच समुल्लङ्घ्य महामनिः। हिमालये च वर्षेण जगाम मिथिलां पति॥ प्रविष्टो मिथिलां मध्ये पश्यंसर्यद्धैमुतम्। प्रजाश्र्चः सुखिता सर्वाः सदाचाराः मुखन स्थताः॥ देवी मद् भागवत: - एते वै मैथिला राजन्नात्म विद्या विशारदाः योगेश्वर प्रसादेन द्वन्दै मुक्ता गृहष्वेपि॥ मिथिला क सीमा क सबंध मे देवी भागवतमे निम्नांकित विवरण अछि। एवं निमि सुतो राजा प्राथतोजन कोऽभवित। नगरी निर्मिता तेन गंगातीरे मनोहरा। मिथिलेति सुविख्याता गोपुरा हाल संयुता धनधान्य समायुक्ताः हद्यशाला विराजिता॥ शक्तिसंगम तंत्र : - गण्डकी तीरमारभ्य चमोआरण्यंतंग शिवे। विदेहभूः समाख्याता तीर भुतयमिधः संतु॥ स्वद पुराण : - गण्डकी कौशिकी चैव तयोमध्ये वरस्थलम्। बृहद विष्णुपुराण : - कौशिकीन्तु समारभ्य गण्डकीमधिगम्यवै। योजनानि चतुविशंद व्यायामः परिकीर्तितः॥ गंगा प्रवाह मारभ्य यावद्धैमवतंवनम्। विस्तारः षोडश प्रोक्तो देशस्य कुलनन्दन। मिथिलानाम नगरी तत्रास्ते लोक विश्रुता॥ अगस्त्य रामायण : - वैदेहोपवनस्यांते दिश्यै शान्यां मनोहरम्। विशालं सरस्वतीरे गौरी मंदिर मुतमम्॥ वैदेही वाटिका तत्र नाना पुष्प सुगुम्फिता। राक्षनामनलिकन्यामिः सर्वतु सुखदा शुभा॥ मिथिलाक उत्तरमे हिमालय, दक्षिणमे गंगा, पूवमे कौशिकी आर पश्चिममे गण्डकी अछि। चन्दा झा :- गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि, पूर्व कौशिकी धारा पश्चिम बहथि गण्डकी, उत्तर हिमवत बल विस्तारा। प्राचीन मिथिलामे आधुनिक दरभंगा, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, (दरद – गण्डकी देश), सहरसा, पुर्णियाँ, बेगुसराय, कटिहार, विहपुर, एवं नेपालक दक्षिणी भाग सम्मिलित छल। नदीक प्रधानता हेवाक कारणे मिथिलाकेँ तीरभुक्ति सेहो कहल गेल छैक – वृहद विष्णु पुराण : - गंगा हिमवतोर्मध्ये नदी पञ्च दशांतरे। तीर भुक्तिरिनति ख्यातो देशः परम पावनः॥ तीरभुक्ति नाम होएबाक निम्नलिखित कारण बताओल गेल अछि। i. ) शाम्भकी, सुवर्ण एवं तपोवन सँ भुक्तमान होएबाक कारणे ई तीरभुक्ति कहाओल। ii. ) कौशिकी, गंगा आर गण्डकी क तीरधरि एकर सीमा छलैक तै एकरा तीरभुक्ति क संज्ञा देल गेलैक। iii.) ऋक, यजु आर शाम तीनटुक वेद सब सँ आहुति देवऽबला ब्राह्मण समूहक निवास सँ त्रि आहुति अर्थात तिरहुतक नाम सँ ई स्थान प्रख्यात भेल। १६–१७ म शताब्दीक निव्वती यग्त्री लाभा तारनाथक विवरणमे तिरहुतकेँ “तिराहुति ”कहल गेल अछि। आर आयनी अकबरीमे तँ सहजहि एक विस्तृत विवरण भेटिते अछि। एतिहासिक दृष्टिकोणसँ भुक्ति शब्द प्रयोग गुप्त युगसँ प्रारंभ भेल आर शिलालेखमे एकर उल्लेख भेटैत अछि। वैशालीसँ प्राप्त कैकटा मोहरपर तीरभुक्ति शब्दक उल्लेख अछि आर संगहि कहरासँ प्राप्त अभिलेख, नारायण पालक भागलपुर अभिलेख, वनगाँव ताम्रपत्र अभिलेख आदिसँ ‘तीरभुक्ति’ पर प्रकाश पडैयै आर ई बुझि पडैयै जे ताहि दिन मेतीरभुक्ति समस्त उत्तर विहारक धोतक छल जकरा पश्चिममे छल आधुनिक उत्तर प्रदेश और पूवमे बंगाल। महानंदाक पश्चिम आर गण्डकीक पूवक समस्त भूमि तीरभुक्तिकहबैत छल, अहिमे कोनो संदेह नहि। जातकमे मिथिलाक क्षेत्र जे वर्णन अछि आरआयनी अम्बरीमे वर्णित तिरहुत सरकारक विवरण हमर उपरोक्त मतक समर्थन करैए। देशक भूगोल आर सीमा राजनैतिक उथल- पुथलक कारणे बदलैत रहैत छैक आर मिथिलाक राजनैतिक इतिहासमे सेहो एहेन कतैक परिवर्तन भेल छैक तथापि एकर जे एकटा साँस्कृतिक स्वरूप अछि से आविच्छन्न रूपें चलि आवि रहल अक्चिइ आर उवैह रूप एकर भौगोलिक सीमाक स्पष्ट आभास दैत अछि। प्राचीन साहित्यमे मिथिला आर जनकपुर नाम भेटैछ परञ्च गुप्तयुगसँ तीरभुक्ति नाम प्रशस्त भऽ गेल। ___ “ प्राग्ज्योतिषः कामरूपे तीरभुक्तिस्तु निच्छविः विदेहा चाथ कश्मीरे ” = लिंग पुराण :- “ तीर भुक्ति प्रदेशेतु हलुविर्त्ते हलेश्वरः ” प्राचीन मिथिला क पुरातत्वक विश्लेषण एवं अध्ययन अखनोधरि अपेक्षिते अछि। नेपालक सीमा जे सम्प्रति जनकपुर अछि तकरे प्राचीन विदेह मानल गेल अछि। सुरूचि आरगौधार जातकमे विदेह एवं मिथिलाक भौगोलिक सीमाक विवरण भेटइत अछि। विदेहक चारू मुख्य फाटकपर चारिटा बाजार छल। महाजनक जातकमे तँ विदेहक राजधानी ‘मिथिला’ क भव्य वर्णन अछि। मिथिलाक नगरी कऽ सोभा, वाजार आर राज दरबारक शोभा, सामान्य लोगक पहिरब, ओढब, खान, पान, रहन, सहन, सैनिक, संगठन, रथ, हाथी, घोडा, आदि एहेन कोनो अंश धुल्ल नहि अछि जकर वर्णन ओहिमे नहि भेटइत छै। अयोध्यासँ मिथिला पहुँचबामे विश्वामित्रकेँ चारि दिन लागल छलैन्ह परञ्च राजा दशरथक ओतए जनक जाहि दूतकेँ पठौने छलाह तकरा मात्र तीन दिन लागल छलाह। दशरथ चारि दिनमे अयोध्यासँ मिथिला पहुँचल छलाह। महावीर एवं बुद्धक समएमे विदेहक सीमा एवं प्रकारे छल – ___ लम्बाईमे कौशिकीसँ गण्डक धरि २४ योजन – ___ चौडाईमे हिमालयसँ गंगा धरि १६ योजन – ___ मिथिला वैशाली ३५ मील उत्तर पश्चिम दिसि छल। ___ जातक कऽ अनुसार विदेह राज्यक सीमा ३००० लीग छल, आर राजधानी मिथिलाक ६ लीग ___ मिथिला जमुद्वीप क एकटा प्रधान नगर छल। ___ सदानीरा नदी बुढी गण्डक क धोतक छल। ___ तीरभुक्ति नाम क संदर्भ मे भृंगादूत मे कहल गेल अछि – “ गंगा तीरा वधि रधि गता यदभुओ भृङ्गा भूक्तिनिमा सैब त्रिभुवन तले विश्रुताः तीरभुक्ति आर शक्ति संगम तंत्र मे – गण्डकी तीरमारभ्य चम्पारण्यांतकं शिवे विदेहभूः समाख्याता तीरभुक्ति मिधो संतुः। ’भुक्ति’ शब्दसँ प्रान्तक ओध होइछ आर गुप्त युगमे समस्त मिथिला तीरभुक्ति नामसँ प्रसिद्ध छल आर आहिसँ समस्त उत्तर विहारक बोध होइत छल। भोगौलिक दृष्टिये मिथिलाक निम्नलिखित नाम सेहो महत्वपूर्ण अछि – विदेह, तीरभुक्ति, तपोभूमि, शाम्भवी, सुवर्णकानन, मालिनी, वैजयंती, जनकपुर इत्यादि परञ्च अहि रूपमे विदेह, मिथिला, तीरभुक्ति आर तिरहुत विशेष प्रचलित अछि। चारिम शताब्दीमे तीरभुक्ति नाम प्रसिद्ध भऽ चुकल छल। त्रिकाण्डशेष, गुप्त अभिलेख आर बारहम शताब्दीक एकटा अभिलेख एवं अन्य अभिलेख सभमे ‘तीरभुक्ति’ क नाम भेटइत अछि। (iv.) मिथिला भूमि : - सम्प्रति जे मोतिहारी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सहरसा, पूर्णियाँ, अररिया, बेगुसराय, आदि क्षेत्र अछि सैह प्राचीनकालमे मिथिला, विदेह, तीरभुक्ति, कहबैत छल और वैशाली एकर अंतर्गत छल। गण्डकीसँ महानंदा आर हिमालयसँ गंगाधारक क्षेत्रक अंतर्गत मिथिला छल। मिथिलाक सीमा लगभग २५००० वर्ग मील छल। हिपुए नस्मं जें ‘पूरा भारत’ क वर्णन कैने छथि ताहिमे मिथिलो लऽ उल्लेख अछि। मिथिलाक नाम उत्पत्तिक संबधमे निम्नलिखित श्लोक प्रसिद्ध अछि – “ निमिः पुवस्तु तत्रैव मिथिनमि महान स्मृतः प्रथनं भुजबलेयैन त्रैहूतस्य पार्श्वलः। निर्म्मितं स्वीय नाम्नाच मिथिलापुर मुलम् पुरीजनन सामध्यति जनकः सच कीर्तितः ॥ (शब्दकल्पद्रूम-iii.७२३) वृहद विष्णुपुराणक मिथिला महात्म्य खण्ड – मिथिला नाम नगरी नमास्तं लोक विश्रुता पंचभिः कारणैः पुण्या विख्याताजगतीत्रये पाणिनिः- मन्यते शत्रओ यस्यां = मथ+”मिथिलादयश्च” इति दूलच अकारस्यत्वं निपात्यते स्वनाम ख्यातनगरी। सातु जनकराज पुरायथा। विदेहा मिथिलाप्रोक्ता। इति हलायुधः- मिथिला भूमिक विशेषता ई अछि जे अहिठाम नदीक बाहुल्य कऽ कारणे जमीन उपजाउ अछि आर सभ प्रकारक अन्नक खेती एतए होइत अछि। अहिठामक जनसंख्याकेँ विशेष भाग अहुखन खेतीपर निर्भर करैत अछि। प्रतिवर्ष अहिठाम नदीक बाढि़ अबैत अछि, गाम घर दहा जाइत अछि, लोग वेलल्ला भजाइत अछि तथापि अपन माँटि-पानिक प्रति अहिठामक लोककेँ ततेक प्रेम आर आशा तत्त छैक जो ओ एकरा तैयो छोडवा लेल तैयार नहि अछि आर ओहि माँटि-पानिसँ सटिकेँ रहब अपन जीवनक सार बुझैत अछि। गण्डक, वाग्मती, बलान, लखनदेई, कमला, करेहा, जीवछ, काशी, तिलयुगा, गंगाक मारि मिथिलाक लोग जन्म- जन्मांतरसँ सहैत आवि रहल अछि। नदीक बिना मिथिलाक भूमिक कल्पने नहि भऽ सकैए। नदीक कारणे तँ मिथिलाक नामो तीरभुक्ति पड़ल छल कहियो। नदीमे सप्तगण्डकी आर सप्तकौशिकीक उल्लेख अछि आर एकर श्रोत नेपालमे अछि। अवि हुनु नदीकेँ निमांत्रत करबाक हेतु कौशी आर गंडक योजना बनल अछि आर आन-आन नदीकेँ पालतु बनेबाक प्रयास भऽ रहल अछि। मिथिला भूमिक बनावट एकरा कैक अर्थमे सुरक्षा प्रदान करैत छैक। एक दिसि हिमालय पर्वत छैक तँ तीन दिसि नदी आर तैं अहिठामक लोक किछु विशेष स्वभावक होइत छथि जकर संकेत विद्यापतिक पुरूष परीक्षामे अछि। नदीक पूजा अहिठाम ओहिना होइछ जेना कोनो देवी देवताक आर सभ नदीक पूजा कऽ गीत सेहो उपलब्ध अछि। पावनि तिहारपर नदीमे स्नान करब आवश्यक बुझल जाइत अछि। अक्षय-तृतीया (वैशाख शुक्ल) क दिन नदीमे स्नान करबाक परम धार्मिक मानल गेल अछि। मिथिलाक लोग अपन देश, संस्कृति, भाषा आर संस्कारक प्रति बड्ड कट्टर होइत छथि। भौगोलिक दृष्टिये मिथिलाक क्षेत्र एकटा राजनैतिक ईकाईक रूपमे प्राचीन कालहिसँ बनल रहल अछि आर तेँ एकर साँस्कृतिक वैशिष्टय अखनो बचल छैक। v) मिथिला क निवासीः- जे केओ मिथिला अथवा मैथिल सँस्कृतिसँ अपरिचित छथि हुनका ‘मिथिला’ सँ मात्र मैथिल ब्राह्मणक बोध होइत छन्हि परञ्च ई वोध हैव भ्रामक थिक कारण मिथिला एकटा भौगोलिक सीमाक धोतक थिक आर ओहि सीमाक अंतर्गत रहनिहार प्रत्येक ओहि भौगोलिक ईकाई कऽ अंग भेलाह चाहे हुनक जाति, वर्ण, अथवा वर्ग जे हो। मिथिलाक रहनिहार प्रत्येक व्यक्ति मैथिल कहौता अहिमे कोनो संदेह नहि रहबाक चाही। धार्मिक क्षेत्रक प्रधान आर आध्यात्मिक रूपेँ प्रभुत्व रहलाक कारणेँ ब्राह्मणक प्रधानता रहलैन्ह आर लगातार ७००–८०० वर्ष ब्राह्मण राजवंशक शासन रहबाक कारणेँ ब्राह्मणक राजनैतिक महत्व सेहो बनल रहल। ई फराक कथा जे सामान्य ब्राह्मण गरीब छथि परञ्च ई बातक सोच जे ब्राह्मणक राज्य रहलासँ राजनीतिमे ब्राह्मणकेँ विशेष प्राधिकार भेटलन्हि आर ओ लोकनि सामंतवादी युगसँ अधावधि सभ क्षेत्रमे महत्व केलन्हि। स्मरणीय जे आन वर्णक तुलनामे मिथिलामे ब्राह्मणक जनसंख्या बहुत कम अछि। ब्राह्मणक अतिरिक्त मिथिलामे क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र (सभ प्रकार), कायस्थ, मुसलमान, ईसाई आदि सभ वर्णक लोग रहैत छथि। मिथिलाक विशाल क्षेत्रमे सूरी, तेली, कलवार, यादव, राजपूत, वर्णसँ कम धनी आर शक्तिशाली नहि छथि। मिथिलामे कतेक वर्नक लोग मध्य युगमे रहैत छलाह तकर विश्लेषण ज्योतिरिश्वर ठाकुरक वर्णरतिकरसँ भेटैछ। मुसलमानोमे सैयद , पाठान, मोमिन, शेख, आदि शाखा सम्प्रदायक लोगक वास छैन्ह। जमीन्दारमे ब्राह्मणक अतिरिक्त, भूमिहार ब्राह्मण, राजपूत, और यादव लोकनि एक्को पैसा कम नहि छथि। यत्र-तत्र कायस्थ लोकनिकेँ सेहो जमीन्दारी छलैन्ह मुदा ओ लोकनि आव विशेषतः कलमफरोतीमे रहि गेल छथि। मिथिला क्षेत्रमे मुसलमानो जमीन्दार कैकटा छलाह। बाकि हिसाबे मिथिलामे मूलरूपेण दूटा वर्ग अछि। गरीबक वर्ग आर धनिकक वर्ग। जे केओ धनमान छथि (चाहे जाति कोनो होहि) ओ धनी वर्गमे छथि। आर गरीबक वर्ग। दुनु वर्गक बीच संघर्ष चलि रहल अछि। जमीन्दारी उठलाक उपरांत ई संघर्ष आर तीव्र भगेल अछि कारण आर्थिक हिसाबें मिथिला तुलनात्मक द्रष्टिये विशेष शोषित आर पीडि़त अछि। उत्तर भारतक अन्नागारक पदवीसँ विभूषित रहितहुँ मिथिलाक सामान्य लोगकेँ अहुँखन पावभरिक अन्न आर पाँच हाथक वस्त्र नहि भेटैत छैक आर ओ अपन पेट भरवाक लेल चारू कात बौआइत रहैत अछि। मिथिलाक निम्नवर्गक सामाजिक श्रृखंला करीब-करीब टुटि चुकल अछि आर ओ शोषण यंत्रमे नीक जकाँ पीसा रहल अछि। ई स्थिति आव क्रांतिक आह्वान जहिया करे। मिथिलाक उत्तरी आर उत्तर-पूर्वी सीमापर इण्डो-मंगोलाइड जातिक लग सेहो बसैत छथि जे घास कहबैत छथि। हुनका लोकनिकेँ रहन-सहन अहुखन पुराने छन्हि यद्धपि ओ लोकनि परिश्रम करबामे ककरोसँ कम नहि छथि। शुद्धमे शुद्ध आर अशुद्ध (अछूत) दुनु तरहक लोग अवैत छथि। डोम, चमार, दुसाध, मुशहर, हलाल खोर, धानुक, अमाढ, केओट, कुरमी, कहार, कोइरी आदि सेहो पर्याप्त संख्यामे मिथिलामे वसैत छथि। जनसंख्या कहि सवें यादव सभसँ आगाँ छथि, दुसाध, कोइरी, चमार, कुरमी आदिक जनसंख्या जोडि़ देलासँ तथाकथित पिछडावर्गक जनसंख्या तथाकथित अगुआवर्गक जनसंख्यासँ वेसी अछि। जनगणनाक आधारपर निम्नलिखित जातक ज्ञान होइछ – ___ गोप (यादव), ब्राह्मण, राजपूत, दुसाध, कोइरी, चमार, शेख, भूमिहार, कुर्मी, मल्लाह, जोलहा, तेली, कन्दु (कानू), नोनिया, धानुक, मुशहर, तांती, कायस्थ, धोबी, कलवार, केओट, सोनार, कहार, कुँजरा, सुनरी, पठान, हलवाइ, तमौली, इत्यादि – ॥ अमन कुमार झा - काठमाण्डू २०६६।०७।१४गते शनि दिन, काठमाण्डू । आइ तराइ रिर्पोटर क्लावक आयोजनामे एक “संचार सहकार्य तथा बिकासको निम्तिठ संचार सम्बामद” नामक बिचार गोष्ठिोक आयोजना कएल गेल। जाहिकेँ आयोजक युनिर्भसल टाइम्स रहल एहि कार्यक्रक सभापत्तिक आशन ग्रहन तराइ रिर्पोटर क्लिवक अध्यभक्ष ई. कामेश्वर प्रसाद शाह आ अतिथी युनिर्भसल टाइम्सोकेँ सम्पाजदक श्री राम मनोहर पन्थो छलैथ। डा. रपोवर्ट टितलक प्रमुख आतिथ्यपके भेल एहि कार्यक्रममे ओ समाजिक आ मानवीय सम्बवन्धपर जोर देने छलाह। बिभिन्न वक्ता सभ संचार क्षेत्रमे भऽ रहल अपराध तथा मधेशक मुदापर जोर देने छलाह । एहि क्रमे मैथिली साहित्यनकार श्री सन्तोष कुमार मिश्र झूठ समाचार लिखनिहार पत्रकारकेँ सजाएक ब्य्वस्था होवाक चाहि कहलनि । — सुनिल मल्लिक सफल व्यक्ति आब मिथिला ग्रामक तयारी (प्रस्तुति- सुजीत झा) समए २०३६ सालक एक रातिकेँ। जनकपुरक प्रसिद्ध जानकी मन्दिरक प्राङ्गणमे मिथिला नाट्य कला परिषदक एकटा सांस्कृतिक कार्यक्रम भऽ रहल । दर्शक दीर्घासँ एकटा बालक हमहुँ गाएब कहि उदघोषक भोला दासकेँ चिटपर चिट दऽ रहल । मुदा भोलाक मन नहि डोलि रहल । दर्शकसभ उठए लागल छल । इम्हर ओ बालक दशम वेर हमहुँ गाएव कहि चिट पठौलन्हि । उदघोषककेँ मन डोलि गेल। वालक मञ्चपर ऐलाह आ अपन गीत सुरु कएलन्हि । अपन अपन घर जा रहल दर्शकसभ फिर्ता आबए लागल आ मञ्चक आगामे बैसि गेल । ई कोनो उपन्यास आ कथाक अंश नहि अछि। ओ बालक रहथि सुनिल मल्लिक। हुनकेँ सँग ई घटना भेल अछि । कहियो मिनापक मञ्चपर चढ़एक लेल चिटपर चिट देवएबला व्यक्ति आई मिनापक अध्यक्ष छथि । फेर एकटा चर्चित गायक , संगीतकार, सफल कर्मचारी, व्यवसायी आदि विशेषणसँ युक्त छथि । आइ जँ सफल व्यक्तिक खोजी कएल जाए तँ ओ अग्रणीमे अवैत छथि । कहियो एक समए छल जे ओ दुरसँ दुरक यात्रा साइकलसँ करथि मुदा स्थिति बदैल गेल अछि । हुनका घरमे चारिटा मोटरसाइकि‍ल, एकटा जिप सहितक साधन छन्हि । आई अफिसो चढ़ए लेल गाडी़ देने छन्हि। सुनिलक प्रगतिमे हुनक पिता कामेश्वर मल्लिककँे मार्ग दर्शन आ हुनक अपन लगन दूनु ओतवे काम कएने सुनिल नजदिकक व्यक्तिसभ कहैत छथि। कहियो वड़का गीतकार आ संगीतकार बनब सपना देखएबला सुनिल ओहि क्षेत्रमे बहुत बडका स्थानपर तँ नहि गेला मुदा अपन भाए सभके ओहि लाइनमे देलन्हि । सुनिलक छोट भाए प्रवेश संगीतक दुनियामे अपन स्थान खोजएमे लागि गेल अछि । कहल जाइत छैक प्रवेश कऽ ओहि लाइनमे पठाबएमे सुनिलक बहुत योगदान अछि। २०२४ आसिन १० गते भारतक खजौलीमे माता सुशिला मल्लिक आ पिता कामेश्वर मल्लिककेँ जेष्ठ पुत्रक रुपमे जन्म लेनिहार सुनिल एमएससी, पिएचडी इन साइन्सक अध्ययन कएने छथि । सुनिलक विषएमे कहल जाइत छैक ओ सात कक्षामे पढैत रहथि तहिए म्युजिकक धुन बनौने रहथि । एकदम कम उमेरमे ओ मञ्चसभ पर गाबए लागल रहथि। महोत्तरीक सुगामे कृष्णाष्टमीमे हिनका स्पेशली बजाओल जाइत छल। एक बेर ओहि गाममे मञ्चपर गीत गएलाक बाद दर्शकसभ हिनकापर पैसाक वर्षा कऽ देने छल। सुनिलक अनुसार ३० वर्ष पूर्व तेरह सए रुपैया भेल छल। ओ मञ्चपर गावएकेँ एतेक क्रेजी रहथि जे छोकरवाजी नाचपाटी होइ वा कोनो कार्यक्रम ओ कपड़ा पहिर बिदा भऽ जाइत छलाह। पैसा के देत के नहि हुनका अहिसँ सरोकार नहि छल । मैथिलीक चर्चित गीतकार सियाराम झा सरसक शब्दमे मिथिलाञ्चलमे म्युजिकके जे सेन्स सुनिलमे अछि बहुतोमे नहि अछि। कहल जाइत छैक सुनिलक पिता एकटा बढी़या गायक रहथि तहिना हुनक बाबा मुसद्दी लाल मल्लिक चर्चित तबला बादक। फेर हुनक दू पुत्री आ एक पुत्र सेहो गीत गबैत छन्हि । चर्चित गायिका नेहा प्रियदर्शनीक पिता होवएके सेहो सुनिलकेँ गौरब प्राप्त छन्हि । सुनिल छौड़ा तोरा बज्जर खसतौ , गीत घर घर के, हमर धकधकी बढैए, लेहुएल आँचर, खोता सिंगार, आर्शिवाद, मुटुभरी माया सहितक एलबममे संगीत देने छथि। गायनक अतिरिक्त किछु एलबममे हुनक लिखल गीत सेहो अछि । एक दिस गीत संगीत क्षेत्रमे ओतेक आगा छथि तँ दोसर दिस शैक्षिक तालिम उपकेन्द्र धनुषाक प्रमुख छथि । ओ तालिम केन्द्र धनुषा, महोत्तरी, सिरहा, सर्लाही, सिन्धुली, जिल्लाक शिक्षकसभकँे तालिम दैत अछि । किछ वर्ष पूर्व ओ शिक्षक सेहो रहथि । ओहि क्रममे ट्युशनिया सभके हुनका घरमे भिड लागल रहैत छल । सुनिल व्यवसायी सेहो छथि जनकपुरक क्याम्पस चौकपर विज्ञानक समान विक्री केन्द्र सेहो हिनके छन्हि । विज्ञान सामग्री विक्री केन्द्र जनकपुरमे नव व्यवसाय छल। नव व्यवसायकेँ चुनौती स्वीकार कएलन्हि आ ओ व्यवसाय एखन नीक अवस्थामे अछि । गीत रेकर्डिङ्ग स्टुडियोकेँ सेहो हुनक सोच छन्हि । जकर तैयारी ओ सुरु कऽ देने छथि। फेर मिनापक वात करी तँ प्रमुख प्रोजेक्ट सभकेँ मिनापसँ जोडयमे हुनक महत्वपूर्ण योगदान अछि। अखन ओ नाटकघर निर्माणमे लागल छथि । फेर मिथिला ग्रामक परिकल्पना सेहो हुनक छन्हि। ओ कहैत छथि– ‘एकटा एहन स्थान होए जतए नाटकघर हुए, मिथिलाक संग्रालय हुए मिथिलाक प्रमुख भोजनसभ ओतए भेटए, एहन चिजक आवश्यकता छैक ।’ मिथिला ग्रामक लेल विभिन्न क्षेत्रक व्यक्तिसभ सँगे परामर्श सुरु कऽ देने प्रसंगक क्रममे सुनिल कहलन्हि । (प्रस्तुति- सुजीत झा) सुजित सुजीतकुमार झा जनकपुरधाम, । ६अम शताब्दीक लोक नायक वृत चित्रमे ६अम शताब्दीुमे मिथिलामे विशेष कऽ तिब्बती आ भुटानी आक्रमण बढ़ल छल । उत्तर क्षेत्रसँ तिब्बमतीक आक्रमण बढल छल। ओहि समएमे सिरहाक महिसौथा (बर्तमानमे नेपालक सिरहा जिल्ला ) मे जन्मि लेनिहार सलहेश किराँती सभ संग समन्वपय कऽ संयुक्त शैन्या दस्ता् बनौलन्हित आ कुशलता पूर्वक लडाइ लडि अपन देशक सीमा बचौने रहैत । सीमाकेँ रक्षा कऽ मिथिलामे राज्यक करएबला दुसाध (पासवान ) जातिक ओहे लोक नायकक रुपमे चिन्ह्ल जाएबला सलहेशक विषएमे रंगकर्मी रमेश रञ्जरन झा वृत्तचित्र बनौलन्हि अछि। जनकपुरक लोक सञ्चार नामक संस्थाक प्रस्तुति रहल सलहेश वृत्तचित्रमे हुनक जिवन, योगदान आ ओहि समएमे बाहिरी आक्रमणसँ मिथिलाकेँ बचौने इतिहास समेटल गेल अछि। २४ मिनेटक ओ वृत्तचित्र फेरसँ सलहेशक सम्पूिर्णव्य क्तित्वृकेँ आम जनता लग स्मरण करा देलक मिथिलाञ्चलक वरिष्ठर रंगकर्मी मदन ठाकुर कहैत छथि। वृत्तचित्रक लेखक एवं निर्देशक रमेश रञ्जंन झाक अनुसार सलहेशक मिथिलाञ्चिल भरि मात्र नहि जतए कतौ मैथिल सभ रहैत छथि ओतएकेँ लोक हुनक योगदान आ कतेको शताब्दी पूर्व बिकेन्द्रीकरण निति लागु कऽ जनताकेँ न्याय देने स्म‍रण करैत पुजैत आबि रहल अछि। ओहन व्य‍क्‍ति‍सँ अखनकेँ देश चलाबए बला नेता सभ सिखए बहुत आवश्य‍क रहल हुनक कथन अछि । सलहेशक इतिहास ६अम–७अम शताब्दीमे मिथिलाक महिसौथा स्थातनमे सलहेशक जन्म भेल छल । सलहेशक जन्मअक समएमे मिथिलामे सामाजिक आ राजनीतिक आरजकता व्यााप्त छल । छोट-छोट ग्राम पिता बिचक अन्तरद्वन्देमे आम जनता पिचाएल छल। सलहेश तात्कातलिन सामन्तट विरुद्ध सुसंगठित शक्तिक निर्माण कऽ सभकेँ परास्त करैत राज्य स्थापनाक कएलन्हि। पूर्वमे कोशी आ पश्चिमममे गण्ड़तकी उत्तरमे चुरे पर्वत शृंखला आ दक्षिणमे गंगा तक मैदानी भागमे सलहेशक शासन सत्ता स्थाणपना भेल। बाहरी आक्रमणकारीसँ अहि क्षेत्रकेँ सुरक्षित बनाबए सलहेश अत्यनन्त कुशल आ युद्धकलामे निपुण शैन्यशक्तिक स्थािपना कएलन्हि। आम जनताक जिविकाक माध्यणम कृषि आ पशु पालन तथा प्राकृतिक स्रोत साधनमे आम जनताक पहुँच सुनिश्चित कएलन्हि। किराँत सँगक सम्ब‍न्धक मिथिलामे सलहेशक राज्य स्थापना भेलाक बाद सभसँ बड़का चुनौती जनताकेँ एकजुट बनाएब आ इहेबलमे सीमाकेँ सुरक्षित पारब रहल छल । मिथिलाकेँ गण्डक, गंगा आ कोशीसँ एक प्रकारक सुरक्षा चक्र प्रदान छल । उत्तर दिससँ मात्र मिथिलाक आक्रमण होएबाक बेसी खतरा छल । तिब्बएत आ भुटानक नरेश सँग संलग्नता आ मिथिलाक खुँखार डाकु चुहर मलक सहयोगमे बेर-बेर आक्रमण भऽ रहल छल। मिथिलाक मैदानी भूमि अन्नह आ पशुधनक दृष्टिसँ अत्यन्त समृद्ध भेलाक कारण आक्रमणकारी सभक अहि क्षेत्र उपर दृष्टि छल। आक्रमण कऽ फिर्ता होबएबला तिब्बती सैनिक सभ महाभारत पर्वत श्रृंखलामे रहल किराती सभकेँ सेहो लुटपाट करैत छल। अर्थात मिथिला आ किराँत दूनु समान्या रुपमे आक्रमणक पीडासँ ग्रस्त छल। ओहि समएमे मैथिल आ किराँत संयुक्त सैन्य निर्माण करब आ सामुहिक प्रतिबाद करब सलहेसक प्रस्ताब किराँती सैन्यपति केवला किराँत स्वीककार कएलन्हि । किछ दिनक वाद पकरियागढ आ तरेगना गढ़ लडा़इमे तिब्बत भुटान आ चोहरमलक संयुक्त सैन्य शक्तिकेँ परास्त कऽ भुटानी नरेश सुंगकेँ सलहेस बन्दी बनाबए सफल भेल रहथि। अर्थात किराँत सँगक संयुक्त सैन्यभ निर्माणक वाद बाहरी आक्रमणकारी पराजित होबए लागल छल। सलहेसक उपासक सभ हुनका देवताक रुपमे पूजा करए लागल छल। तकर निरन्तरता अखनो जारी अछि । सलहेसक समाजमे प्रभाव तत्कालिन समाजमे सलहेस अत्यन्त न्याय प्रेमी शासक मानल जाइत छलाह । जातिय द्वन्द्व बढ़ल समएमे सलहेस सभ गोटेके संगठित कएलन्हि । सभ जातिकेँ लोक सलहेसक नेतृत्वनकेँ स्वीकार कएलन्हि। मिथिला समाजमे सलहेस आ हुनक सहयोगी पात्रकेँ सयौ वर्ष वितलाक बादो कियो नहि विसरि सकल। सलहेसकेँ न्याियक प्रतिमूर्ति मानल जाइत अछि। कोनो इच्‍छा विमारी, भुख, ऋण , पीडासँ मुक्तीक लेल अखनो सलहेसक कोवला कएल जाइत अछि। सलहेसक भाए मोतीरामकेँ पहलमान सभ स्मरण कऽ मात्र अखाड़ामे उत्तरैत अछि। जंगलमे लकरी आ अन्य उत्पादित समान लाबए जाएबला सभ हिसक जानवरसँ बचए सलहेसक भगि‍ना कारिन्हार आ वहिन वनसप्तीकेँ पूजा करैत अछि। अर्थात मिथिलाक समाजिक जिवनमे सलहेसक प्रभाव एखनो अत्यधिक अछि। रामलोचन ठाकुर समकालीन मैथिली-कथाक यथार्थ-उर्फ यथार्थक-कथा आइ प्राय: समस्त समीक्षक- समालोचक लोकनि कहैत छथि, आ से उचिते कहैत छथि, जे समकालीन मैथिली कथा भारतक कोनो भाषाक समकालीन कथाक समकक्ष अछि। अपन गुणवत्ताए नहि गुणात्मकताक आधारपर समकालीन मैथिली कथा आ कविता अन्याोन्य विघासँ आगू अछि, ताहिमे संदेहक कोनो अवकाश नहि। आ ई गुणवत्ता थिक ओकर यथार्थपरकता जे आजुक मिथिलाक यथार्थ थिक। एहिठाम’ स्पष्ट कऽ दी जे मिथिलाक यथार्थसँ हमर तात्पर्य मात्र भौगोलिक मिथिलाक (जे वर्तमानमे अछिए नहि) रौदी–दाही, पाबनि–तिहार, भोज–भात, वर्ण–विद्वेष, अभाव–अभियोग, इच्छा –आकांक्षा धरि–सीमित नहि अछि अपितु राज्य-केन्द्र्सरकार द्वारा वंचित-अवहेलित मि‍थिलाक जलबल, जे अपन उदर पूर्ति आ परिवारक भरण–पोषण हेतु प्रवास पलायन लेल बाध्य अछि, असम पंजाब, मुम्बइ, मध्यप्रदेशसँ भारतक राजधानी दिल्ली धरि अवांक्षित- उपेक्षित गारि-मारि खाइत- जीवन व्यतीत–करबा लेल बाध्य अछि, तकरो–यथार्थ अछि; यद्यपि समकालीन कथा-साहित्ययमे ई विषय-बात तेना भऽ कऽ देखार रूपमे नहि आयल बुझना जाइछ। मैथिलीमे कथा-लेखन बेस विलंबसँ प्रारंभ भेल। डॉ. जयकान्त मिश्रक अनुसार 1920 ई. धरि लोककेँ ई बोधे नहि छलैक जे कथा की थिक, वा कथा ककरा कही? डॉ रमानन्द झा ‘रमण’क अनुसार मैथिलीक प्रथम कथा थिक श्री कृष्ण ठाकुर ‘चन्द्र प्रभा’ जकर रचनाकाल 1880 ई.सँ पूर्वक थिक। डॉ. जयकान्त मि‍श्रक अनुसार ‘चन्द्र्प्रभा’ 1885ई.क रचना थिक जकर रचनाकार छथि-श्रीकृष्ण सिंह ठाकुर। मोहन भारद्वाज जनार्दन झा ‘जनसीदन’क ‘ताराक वैधव्य’केँ प्रथम ज्ञात मौलिक कथा होएबाक गप कहैत छथि, ई विडम्बना थिक मैथिली साहित्यक इतिहासक। विमर्शसँ ज्ञात होइछ जे विगत शतीक चारिम दसकसँ कथा-लेखन गति पकड़लक। मुदा ताहि कथा सभमे मिथिला नहि छल, मिथिलाक यथार्थ नहि छल। एहिमे संदेह नहि जे मैथिल समाज खंड-खंडमे विभक्त छल मुदा वृहत्तर मैथिल समाजक यथार्थमे साम्य‍ तँ छलैके, जे विषय-बात मात्र कथा नहि, हमर समस्त साहित्यसँ असंभव रूपेँ अनुपस्थित छल। हमर समस्त साहित्यक एक विशेष वर्गक, जकर संख्या दस शतांशसँ वेशी नहि छल, धुरखुर ओगरिते रहल। एकरा विडम्बना नहि तँ आर की कहल जाएत जे हमर लोकजीवनक यथार्थ, हमर साहित्य-संस्कृति, हमर कला-कौशल बाहरक लोककेँ आकर्षित- उद्वेलित करैत छैक, प्रेरित-प्रभावित करैत छैक, मुदा हमरा लोकनि लेखेँ धनसन। हमर लोक साहित्य देखि ग्रियर्सन मुग्ध भेल छलाह, हमर चित्रकला देखि विलियम आर्चर अभिभूत भेल छलाह, हमर लोक जीवनक यथार्थ बंगला साहित्यकार सतीनाथ भादुरीसँ विभूतिभूषण मुखोपाध्याय धरिकेँ प्रेरित-प्रभावित कएने छल, परंच हमर सर्जक प्रतिभा एहि सभसँ विमुख साँझ पराती भोर बिहाग राग ढ़ेरबामे व्यस्त आ मस्त छलाह। कोनो विषय-वस्तु पर लिखबाक लेल ई आवश्यके नहि अनिवार्य थिक जे ताहि विषय-वस्तुक बोध हो! आ से होएब निर्भर-करैत अछि लेखकक स्थिति अवस्थापर, ओकर सामाजिक सरोकार आ संवदेनापर। कपोल कल्पित कथाक तँ तथाकथित यथार्थ पाठकीय विश्वसनीयता अर्जित कऽ पाओत ओकरा प्रभावित कऽ पाओत ताहिमे संदेह। एहि दृष्टिमे वि‍चार कएने पबैत छी जे मैथिलीक आरंभिक कथाकार लोकनिक अपन सीमा सरहद छलनि, जकर अतिक्रमण कऽ पाएब हुनका लोकनिक लेल संभव नहि छल। एहि सीमाक अतिक्रमण कएने छलाह काञ्चीनाथ झा ‘किरण’। वस्तुतः किरण जीक कोनो सीमा छलन्हिए नहि, ओ सीमातीत छलाह। हिनक समाज छल वृहत्तर मैथिल समाज जाहिमे सभ जाति, सभ धर्मक लोक छल आ सभक संग हिनक सामाजिक सरोकार छलनि। 1941 ई.मे हिनक ‘धर्मरत्नाकर’ कथाकेँ एहि सन्दर्भमे बानगीक रूपमे देखल जा सकैत अछि। किरण जीक प्राय: समस्त कथा तत्कालीन मिथिलाक लोकजीवनक यथार्थक बानगी थिक। हिनक सर्वाधिक चर्चित-परिचित कथा थिक–मधुरमणि- एक चित्रक चर्च विरले देखल-सुनल जाइछ। मुदा एहिमे लोक-जीवनक यथार्थ जाहि तरहेँ प्रखर मुखर भेल देखल जाइत अछि से अदभुते अछि। वस्तुतः किरण जी दस प्रतिशत उच्च वर्गीय अकर्मण्य् लोकक विकृत विलास बहुल जीवन चरित नहि नब्बे प्रतिशत लोकक जीवनेच्छा –जिजीविषा, श्रम- संधर्षक कथा-गाथा लिखबाकेँ श्रेयष्ककर बुझैत छलाह। जेना कि डॉ रमानन्द झा ‘रमण’ लिखैत छथि- ‘किरणक सम्पूर्ण कथा साहित्य यथार्थक धरतीपर सुदृढ़ अछि। फलतः अपन चारूकात पसरल दीन दुखीक समस्याकेँ, जन-बोनिहारक समस्याकेँ, ओकर अन्तरक हाहाकारकेँ आशा-निराशाकेँ आ संघर्षशीलताकेँ अपन साहित्यक प्रेरणा स्रोत बनाओल अछि। चारुकात पसरल कथ्यकेँ अपन विशिष्ट शैलीमे उतारल अछि। एहि लेल कल्पनाक उड़ान आ विजातीय परिवेशक संस्कार हिनक-कथामे नहि भेटैत अछि। अपितु भेटैत अछि सदिखन अपने टोल-पड़ोसक मानवीय समस्याक प्रभाव शाली अभिव्यक्ति आ अपने धरतीक सोहनगर महमही आ ओकरे आशा-आकांक्षाक संतुलित टिपकारी। वस्तुतः- किरण जी-मैथिलीक प्रथम कथाकार छथि, जिनकर कथामे लोक जीवनक यथार्थ जकरा प्रकारान्तरसँ समाजिक यथार्थ सेहो कहल जा सकैत अछि, एते प्रखर प्रगाढ़ रूपें चित्रित भेल अछि। एहिठाम लिखब प्रायः अनर्गल नहि होएत कि हिनक कथा तेँ मात्र सामाजिक यथार्थक कथा थिक अपितु सामाजिक चेतनाक सेहो अप्रतीम उदाहरण थिक जकर ई प्रयोक्ता–प्रवक्ता छथि, रूपकार छथि। विगत शतीक उत्तारार्धमे एहन प्रचुर कथा लिखल गेल अछि जाहिमे मिथिलाक लोकजीवनक यथार्थ अपन समग्रता–सम्पूर्णतामे चित्रित भेल अछि। अफवाहकेँ छोड़ि दी तँ प्राय: समस्त चर्चित प्रतिष्ठित कथाकारक एहिमे थोड़-बहुत योगदान-अवदान अछि। मोहन-भारद्वाज अपन-आलेख मैथिली कथामे सामाजिक चेतनामे एक सूची देने छथि। हम एहिठाम कथा वा कथाकार सूची दए आलेखकेँ दीर्घायित नहि कए वर्तमान शतीक किछु टटका प्रकाशनसँ बानगी प्रस्तुत कऽ रहल छी जाहिसँ विषय सुस्पष्ट‍ भऽ पाबए । 2009 ई.मे प्रकाशित भेल सुभाष चन्द्र यादवक कथा संग्रह ‘बनैत बिगड़ैत’। एहिमे एक कथा अछि ‘हमर गाम’। ई गाम लेखकेक नहि ई मिथिलाक कोसी अंचलक एक गाम थिक जे हमरो भऽ सकैए, अहुँक भऽ सकैए। एहि गामक एक घरक चित्र देखल जाए- घरक एककात दूटा चौकी लागल छै। चौकीपर मैल खट-खट भोटिया बिछाओल छै। चौकीसँ सटले दच्छिन गाय, भैंस, बकरी सभ रहैत छै। नाकमे निरंतर गोबर आ गोंतक दुर्गन्ध अबैत रहैत अछि। कोसिकन्हाक अधिकांश लोक एहिना रहैत अछि। जानवरक संग। जानवरक समान। जानवरक हालतमे। आ ई कोनो नव बात नहि थिक। साठि वर्ष भारतकेँ स्वाधीन भेलाक पश्चातो जखन कि नितहु लाख-लाख टाका खर्च कए सरकारी, अर्ध सरकारी प्रचारतंत्र देशक बहुमुखी विकासक इन्द्रिधनुषी छवि देखबैत अछि, हमर मिथिलाक स्थिति आर बदतर भेलए। ‘बहुत-पहिने जहिया कौआ, कास आ पटेरक जंगल रहै, तहिया अनेक तरहक जल आ थल चिड़ै अबैत रहै। पूर्णियाक शिकारी चिड़ै बझबैत रहै आ सुपौलमे बेचैत रहै। आब कौआ उकनि गेल छै आ कास-पटेर उकनल जा रहल छै। पहिने लोक कौआ, कास-पटेर बेचि कऽ किछु कमा लैत छ्ल। जंगलमे झुंडक झुंड गाय-महींस पोसि कऽ जीविका चलबैत छल। खढि़या हरिन माछ, काछु आ डोका मारि कऽ खाइत छल। आब सब किछु खतम भऽ गेल छै आ जीबाक साधन दुर्लभ भऽ गेल छै। मुदा एहि अभाव अभियोग यंत्रणा वंचनाक अवस्थाओमे मानवीय संवेदना, सामाजिक सरोकार छैक ‘डोम चमार मुसहर दुसाध तेली यादव सब एके कलसँ पानि भरैत अछि एके पटिया पर बैसैत अछि’। आ जूड़शीतल दिन जेठ चानिपर पानि दैत जुड़ाएल रहबाक आशीष देब नहि बिसरल छथि। समकालीन कथाक विरल विलक्षण हस्ताक्षर सुभाषक मादे महाप्रकाश उचिते कहैत छथि- ‘हुनक रचनाकार समयक समुद्रमे डूबि-डूबि मोती माणिक ताकि अनैत अछि। एहि तरहेँ सुभाषक लेखन यथार्थक अमूल्य दस्तावेज बनि जाइत अछि’। आइ समय बड़ तेजीसँ बढ़ि-बदलि रहल अछि। महानगरीय प्रदूषण आ वैश्वीकरणक प्रभावमे ग्राम्य परिवेश प्रदूषित भऽ रहल अछि। सरकारी अवहेलनाक शिकार मिथिलाक प्रतिभा श्रम पलायन लेल बाध्य अछि, आ जखन ओ गाम अबैए, अपना संग विजातीय विकृत संस्कृति नेने अबैए। प्रदीप बिहारीक ‘उग्रास’ कथा एहि विकृतिक स्पष्ट चित्रांकन थिक जे समकालीन लोकजीवनक यथार्थ बनल जा रहल अछि वा बनि चुकल अछि। शिक्षितो वर्गक धर्मभीरुता, अंधविश्वाास आ कुसंस्कार तथा पाछूकेँ प्रतिष्ठाकक मानक बूझि तकर प्रदर्शन जतबा चिन्तनीय किएक ने हो मुदा आजुक सत्य होइत देखल जा रहल अछि। राम भूषण बाबू अपन पुतहु आ पोताकेँ घरमे कते दिन राखि पाओत। मिथिला-गामक देश थिक। सहजता-सरलता आ सामाजिकता गामक विशेषता रहलैए। मुदा आइ ग्रामीण जीवनक ई विशेषता विल्उप्त भेल जा रहलए। नव खाढ़ीमे ई परिवर्तन बेस तीव्र आ त्वरित भेल देखल जाइत अछि। औदार्यक अभाव ओ स्वार्थपरता संक्रामक व्याधिक रूप लेने जा रहल अछि। तेँ कोनो पुतहु अपन वृद्ध ससुरक मादे निधोख बाजि सकैत अछि, अइ कमासुतकेँ सखमे देखै जाही। ओइ दिनमे कहलिऐ जे बियाह कए लैह तँ नहि केलक। आब जे अइ उमरमे रंडीबाजी करत तँ से हम चलए देबै? बेचारा घूरन बुढ़बाकेँ बेकल भऽ गेनाइ स्वाभाविक छैक। फलतः ओ अपन गरीब विधवा भाउजकेँ अंग झँपबाक लेल नुआ की देत, भाउजोकेँ त्यागि दैछ। तारानन्द वियोगीक एहि कथाक भयावहता चरमपर तँ तखन पहुँचैए जखन घूरन मझिली पुतहु कहैत छैक ‘बेसी लबर लबर करबह तँ तते चप्पल मारबह जे चानि परहक सभटा केश खहरि जेतह....’। अपन ससुरक खुलेआम एहन अवज्ञा अपमान चौंकाबएबला बात रहितो आजुक यथार्थ थिक जे वैश्वीकरणक प्रभावें हमर सांस्कृतिक क्षरणक प्रतीक थिक। एहिठाम हम एक गोट आर कथाक चर्च करए चाहब। से थिक विभूति आनन्दक ‘संक्रान्ति’ कथा। मन पड़ैए सकल विधा उदधि मिथिला विदित भरि संसार। आ ताहि मिथिलामे शिक्षाक की स्थिति अछि तकर जीवंत छवि थिक ई कथा। एक तँ शिक्षक लोकनि पढ़बए नहि चाहैत छथि, मुदा जँ केओ चाहितो छथि तँ ताहि लेल मन औनाइते रहि जाइत छनि, छात्रक दर्शन नहि होइत छनि, जखन कि रजिस्टरमे छात्रक अभाव नहि। प्रधानाचार्यक कक्षमे गिलास आ बोतलक हल्लुक सन संगीतक भयावहता भावानात्मक स्तरहिसँ बुझल जा सकैत अछि, शब्दमे व्याख्या करब सहज संभव नहि। एहि कथाक दोसर पक्ष तँ आर हृदय-द्रावक अछि। प्रवासी बालक पिताकेँ कम्प्युटर सीखबा लेल कहैत छथि जे पितासँ संभव नहि भऽ पबैत छनि, ई तते सहज छैको नहि जतबा किशोर युवा लेल। मुदा बालकक तर्क तँ देखू- ’....अरे कम्प्युटर, नेट आदिक जानकारी रहत तँ दिन-दुनिया सँ जुड़ल रहब....हमरो सभसँ सम्बन्ध बनल रहत। ‘अएँ! की कहलह? ‘ठीके तँ कहलौं! ककरा एते समय छै जे....। तँ ई थिक आजुक सत्य! आइ फलकेँ अपन पितासँ बात करबाक पलखति नहि छैक! हमरा लोकनि सरोकारक बाट करै छी, संवेदनाक बात करै छी’। कथाक सत्यक, ओकर आत्मा होइत अछि कथावस्तु । शिल्पक स्थापन तकर बादे छैक जे कथावस्तुक प्रयोजनानुसार सहज स्वाभाविक रूपेँ अबैत अछि। शिल्पक मोह जे बाह्य आवरण–आभूषण मात्र थिक, कथाक सत्यकेँ ओकर आत्माकेँ आवेष्ठित आच्छन्न कऽ लैत अछि आ अकसर पाठक लोकनि शिल्पक चाकचिक्यमे ओझरा मूलधरि पहुँचबासँ वंचित रहि जाइत छथि। साहित्यक अर्थ होइत अछि सहित, सभक संग, सभक हित, अर्थात समाजक हित आ इएह समाजक हित-साधन साहित्यक उद्देश्‍यो थिक। ई भनहि कहियो ‘टाइम पास’ करबाक लेल विनोद सामग्रीक रूपमे रचल जाइत रहल हो। आजुक साहित्यकार अपन कर्त्तव्यक प्रति पूर्ण सचेत आ सचेष्ट छथि, उद्येश्य साधनक प्रति प्रतिबद्ध छथि। एक दिस अपन सामाजिक स्थिति अवस्थाक सम्यक ज्ञान आ दोसर दिस विभिन्न भाषाक समकालीन साहित्यक अध्ययन अनुशीलन हुनक दृष्टिबोधकेँ रचनाशीलताकेँ प्रेरित प्रभावित करैत अछि। निष्कर्षतः कही जे समकालीन मैथिली कथाक यथार्थ आजुक मिथिलाक यथार्थ थिक। एकरा दोसर तरहेँ हम यथार्थक कथा सेहो कहि सकैत छी। आयामक विस्तार सामाजिक सरोकार आ संवेदनाक निखार एकरा महत आ महत्वपूर्ण बनबैत अछि। सहायक ग्रंथ-1. अखियासल-डॉ. रमानन्द झा ‘रमन’, 2. मैथिली साहित्यक इतिहास (सा. अकादेमी) डॉ. जयकान्त मिश्र, 3. एकल पाठ-मोहन भारद्वाज,4. बाङला कथा साहित्ये बिहारेर लोक जीवन-बारिद बरन चक्रवर्ती, 5. कथा किरण-डॉ. कांचीनाथ झा ‘किरण’, 6. बनैत बिगड़ैत-सुभाष चन्द्र यादव, 7. सरोकार-प्रदीप बिहारी, 8. मिथिला दर्शन, जुला.-दि. 2005, संपा.-रामलोचन ठाकुर, 9. मिथिला दर्शन, जुला.-अग.2009 संपा.-रामलोचन ठाकुर बिपिन झा, CISTS, HSS, IIT, Bombay आवश्यकता अछि मैथिली शब्दतन्त्र निर्माणक शब्दतन्त्र जेकरा सामान्य रूपसँ Word-Net रूपमे कहल जाइत अछि, ई एखन धरि मैथिली भाषा हेतु तैयार नहि भऽ सकल अछि। एहि लेखक माध्यमसँ समस्त मैथिली प्रियबन्धुगणकें एहि दिस आगू बढबाक हेतु उद्यत करए चाहैत छी। सभसँ पहिने शब्दतन्त्र एहि पदसँ की अभिप्राय ई स्पष्ट करब उचित बुझैत छी। शब्दतन्त्र एकटा Lexical Database होइत अछि जे शब्दकेँ पर्यायवाची चयन करबामे अथवा शब्दक विवरण शीघ्रतासँ क्षण भरिमे तकबामे उपयोगी होइत अछि। एकर उपयोग एतबा धरि सीमित नहि अछि अपितु एकर उपयोग संगणकीय भाषाविज्ञान आ कृत्रिम प्रज्ञान हेतु सेहो कएल जा सकैत अछि। शब्दतन्त्रक परिचय आओर विस्तृत विवरण हेतु विक्कीपीडिया द्रष्टव्य अछि[1]। आब प्रश्न उठैत अछि जे कोन-कोन भाषा हेतु शब्दतन्त्र बनल अछि आओर मैथिली हेतु किएक आवश्यक अछि। अंग्रेजी[2], संस्कृत[3], उडिया[4], हिन्दी[5], आओर मराठी[6] हेतु शब्दतन्त्र निर्माण हेतु प्रयास कएल गेल अछि| मैथिली हेतु शब्दतन्त्र निर्माणक दिशामे आइ धरि प्रयास नहि कएल गेल। यदि मैथिली शब्दतन्त्र साफ्टवेयरक रूपमे उपलब्ध भऽ जाएत तँ संगणकीय दृष्टिसँ मैथिलीक महत्व अवश्य बढत संगहि उपयोगकर्ता हेतु ई भाषा सहजतम भऽ जाएत। कोनो भाषा तखने धरि जीवन्त रहैत अछि जाधरि ओ उपयोगमे रहैत अछि। ई शब्दतन्त्र मैथिलीकेँ उत्कर्षपर पहुँचेबामे समर्थ सिद्ध होएत। आजुक संसार एतेक आगू बढैत जा रहल अछि जतए भाषा बाधक नहि रहत। एक भाषासँ दोसर भाषामे अनुवाद यन्त्र द्वारा[7] संभव अछि। यदि मैथिली भाषा हेतु निरन्तर प्रयास नहि कएल जाएत तँ एकर एहि भागि-दौडमें पाछू छुटबाक संभावना अधिक अछि। अस्तु शब्दतंत्र निर्माणक दिशामे प्रयास हो, ई आवश्यकता अछि। एहि सन्दर्भमे ध्यान आकर्षित करए चाहब- The Global WordNet Association[8] दिस, जे संसारक समस्त भाषा हेतु शब्दतन्त्र सम्बन्धमे एक महत्त्वपूर्ण प्लेटफार्म दैत अछि। अस्तु, एहि दिशामे कार्य हो एवं यथाशीघ्र मैथिली शब्दतन्त्रक निर्माण हो, तकर जरूरत अछि। यदि एहि क्षेत्रमे कतहु कार्य हो तँ विदेहक माध्यम सँ सभकेँ अवगत कराओल जाएत, ई आशा अछि। [1] http://en.wikipedia.org/wiki/WordNet [2] http://wordnet.princeton.edu/ [3] CISTS, HSS,IIT, Bombay, Sanskrit Word-Net निर्माण हेतु प्रयासरत अछि [4] http://www.onlineordbog.dk/wordnet/en/af/oriya.php [5] http://www.ling.helsinki.fi/filt/events/conferences/2004/msg01267.html [6] http://www.alphadictionary.com/directory/Languages/Indo,045Iranian/Marathi/ [7] यान्त्रिक अनुवाद द्वारा [8] http://www.globalwordnet.org/ शीतल झा जनकपुर, धनुषा, सुगा मधुकरही–५, नरहिया गामक अधिकारी....भैया....पोखरि....चम्पा फूल.... हम नान्हिटा रही कहियो-कहियो बाबू संगे पोखरिमे नेहाए जाइ। बाबू पानिमे डूबऽसँ पहिने एक बाकुट माटि पोखरिमे सँ कोड़ि कऽ मोहारपर फेकि देथिन्ह। एक दिन हम पूछलिऐन्ह- एकर कारण। हुनकर उत्तर रहन्हि “बौआ हम सभ गरीब छी, पोखरि नहि कोड़ा सकै छी। जिन्दगी भरि जौं एक मुट्ठी कऽ माटि पोखरिमे सँ कोड़ि कऽ बाहर फेकि दै छी तँ एकटा पोखरि कोड़ाओलाक फल भेटै छै। बाबूक एहि धारणामे की रहन्हि, अध्यात्मिक, नैतिक, सामाजिक नहि जानि मुदा एकटा बात तँ स्पष्ट भेल जे पोखरिक महत्व बहुत कारणसँ छै। पोखरि कोड़ाबएबलाकेँ धर्म होइ छै, दश लोक स्नान करै छै, माल जाल पानि पिबै छै, इत्यादि। हम जाहि पोखरिक चर्चा कऽ रहल छी, ओकर की की काज छलै से हमरा मोन पड़ैए। सौंसे गामक लोक ओहिमे स्नान करैत छल, एखनो करैत अछि। एकटा घाटपर पुरूष, दोसर घाटपर स्त्रीगण कपड़ा खिचै छल। लगभग आधा गामक मालजाल पानि पीबैत छल। पोखरिक एकटा कोनमे शौच करैत छल जे शुद्धताक पहिल प्रतीक मानल जाइत अछि। गाममे कोनो नमहर भोज होइत छलै तँ एहि पानिसँ दालि रन्हाइत छलै, जे केहनो दालि गलि कऽ घाटि भऽ जाइत अछि। वर्षाक पानिक अभावमे पोखरिसँ नजदीकक खेतमे पानि पटाओल जाइत छलै, जाहिसँ किछु उपजा अवश्य भऽ जाइत छलै। पोखरिमे हेलब एकटा शौक छलै जे वास्तवमे एकटा सुखद व्यायाम छै आ खास समएक संकट पार करबाक उपाय। पोखरिक मोहार, खरिहान, दाउनक लेल बहुतोक प्रयोगमे अबैत छलै। मोहारपरक बड़का पिपरक गाछतर गर्मीमे सभ छाहरि पबैत छल, गामक नमहर पंचैती होइत छलै। मनुष्यकेँ जीबाक लेल, आ ई कहू जे जन्म लेबासँ पहिनेसँ जाहि अति आवश्यक चीजक आवश्यकता होइ छै ओ पानि पोखरिमे भण्डारण कएल जाइत छलै। करीब करीब वर्ष दिनक पानिक लोकक आवश्यकताक पूर्त्ति पोखरि करैत छै। आइ धार्मिक भौतिक आ वैज्ञानिक कोनो आधारपर देखलापर भेटैत अछि जे हावा आ पानिक विकल्प नहि अछि। एहि दूटाक लेल मनुष्यकेँ प्रकृतिएपर निर्भर करए पड़तै। ताहि जीवन तत्वकेँ संरक्षण करैत अछि पोखरि सभा। चिकित्सक कहैत छथि जे शरीरमे कखनो ८०% पानि चाही नहि तँ लघु रोग मात्र नहि दीर्घ सेहो लागि सकैत अछि। अध्यात्मिक ज्ञान तँ कहैत अछि जे शरीर बनएमे जे पाँच तत्वक आवश्यकता अछि, ताहिमे एकटा पानियो अछि अर्थात बनियो गेल पानिसँ आ रिकाब पड़ैछै सेहो पानिसँ। एहन आवश्यक जीवन रसकेँ पौराणिक कालसँ प्रस्तुत कऽ रहल अछि आ आपूर्त्ति कऽ रहल अछि पोखरि आ नदी। तहिआ पोखरिमे माछ रहै छलै–स्थानीय माछ। सामूहिक रूपमे माछ बिका कऽ आमदनी होइत छलै। एखन तँ आओर विकासी माछ पालल जा रहल छै। पोखरिसँ लाखों आमदनी छै। प्रत्येक वर्ष दुर्गापूजामे ओहि आमदनीसँ खर्च होइ छै, धूमधामसँ पूजा होइछै। पोखरिक जीर्णोद्धार भऽ रहल छै। मोहारपर होइत सड़क गेलैए। ओ पोखरि आयमूलक सेहो भेलैए। पोखरि नया कोड़ाओल होइक कि पुरानकेँ माटि कोड़ा कऽ गहींर कएल गेल होइक, पोखरि मोहारपर जौं वृक्षारोपण नहि हेतै तँ पोखरि पुनः जल्दी भत्थन भए जेतै। आ पोखरि कार्यक नहि हेतै। तैं पोखरिकेँ मोहाड़पर, पोखरिक धरिमे जौं सघन वृक्षारोपण कएल जाइ छै, घासपात लगाओल जाइ छै तँ पोखरिक आयु निश्चित रूपसँ दीर्घ हेतै। तैं गाछ वृक्ष लगाओलासँ ओकर जड़ि माटिकेँ कसि कऽ पकड़ि लैतै छै आ भू-क्षयक नियंत्रण करै छै। जीवित जंतुक लेल आवश्यक आक्सीजन तत्व आपूर्त्ति करैछ आ हवाक तत्वकेँ संतुलित करैत अछि। बहुत रोचक बात छै जे गाछ वृक्ष माटिकेँ पानि ग्रहण करबाक क्षमताक वृद्धि करैत अछि। आवश्यक बुझनाइ ई छै जे पर्यावरणक बहुत रास प्राकृतिक प्रक्रियाक निर्धारण ई करैत अछि आ संतुलनमे रखैत अछि। एतबे नहि अनेक प्रकारक चिड़ै–चुनमुनक बासक व्यवस्था इएह करैत अछि आ प्राकृतिक सुन्दरता लबैत अछि आ बढ़बैत अछि। औषधि जन्म झारपातक महत्व तँ कहले नहि जा सकैए। पुनः वृक्षारोपणसँ अन्धरक समस्याक सेहो किछु हदतक समाधान होइत अछि। पोखरिक मोहारपर चम्पा फूलक आवश्यकता छै। चम्पा फूलक गाछ होइत अछि, झारपात नहि, घासक आकारक नहि, एकटा वृक्षाकारमे होइत अछि। ई करीब २० फुट तक उँच भऽ सकैत अछि एकर जड़ि सेहो बहुत गहींरतक जाइत अछि। गाछ डाढ़िपातसँ सघन होइत अछि। एकरामे सुगन्ध होइत छैक मुदा उत्कट नहि, मनमोहक घ्राणनीय। वातावरणकेँ बहुत नीक जकाँ सुगन्धित कएने रहैत छैक। गर्मीमे पोखरिकेँ ठण्ढ़ा हवा आ एकर शीतल छाहरि ओहिना कोनो थाकल पथिककेँ आकर्षित करैत अछि। पर्यावरणकेँ प्रदूषित होबएसँ बचावक कार्य पोखरि आ वृक्ष मिलि कऽ करैत अछि। पोखरि खुना कऽ वृक्षारोपण केनाइ कोनो मैदानी क्षेत्रक वासीक जीवनक पछाति मात्र नहि वरन ई तँ जीवनक आधार अछि। हमर संस्कृति अछि जे धर्म परम्परा आ जीवन शैलीसँ मात्र जुड़ल नहि अछि परंतु ई जीवनक मूल तत्वकेँ पकड़ने अछि आ पर्यावरणकेँ चेतना दऽ रहल अछि। जखन कार्तिक मासमे शुक्ल पक्षमे अन्हार सांझमे किछु समूह गत कन्या लोकनि, विवाहिता लोकनि एकटा डालामे किछु छोट छोट माटिक मूर्त्ति, एकटा मूर्त्तिमे किछु खर कोंचल, एकटा मूर्त्तिमे किछु सन ठूसल, आ दीप बड़ल रास्तापर गीत गबैत आंगनसँ निकलि कए आ समूहमे मिश्रित भऽ फुलोकलयमे लोकगीत गाबए तँ उत्तर संस्कृतिक लोक कोना बुझि सकैए जे एहि गीतमे भाए बहिनक अतुलनीय प्रेम आ ममता प्रतिध्वनित अछि, भाएक आयुक हार्दिक कामना प्रतिबिम्बित अछि, भाएक वीर होएबाक प्रेरणा मिश्रित अछि। भाएक बहुत तगड़ा होएबाक शुभकामना आ आशीर्वाद अछि। सुखी सम्पन्न होएबाक चाह अछि। चुगलखोरसँ सतर्क रहबाक चेतावनी अछि। चूगलाक मूँहमे कारी पोति दण्ड देबाक न्याय पद्धति अछि। दुनू बाँहिकेँ जराए निर्मम दण्डक न्याय व्यवस्था अछि। अर्थात् झगड़ लगा व्यक्तिकेँ, चुगलखोरकेँ, ग्राम कंटककेँ कोन रूपे मिथिला देखैत अछि आ मिथिलाक नारी वर्गमे ओकर कोन स्थान छैक? गोंदमे आगि लगैक बाते छोड़ू जौं वृन्दावनमे आगि लगैक तँ ओकर भाए मिझएबाक लेल साहसी होइत अछि, पर्यावरणक रक्षा करैक बहिनक इच्छापूर्ण निर्देशन छै। जाहि लोक सांस्कृतिक गीतमे ननदि भाउजक परम्परागत परिहास छैक आ ओहि परिहास द्वारा भाएक सुखमय दाम्पत्य जीवनक कामना छै। तैं महिला लोकनि कर्णयुद्ध श्वरमे गबैत छथिन्ह– ‘सामाक गीत’ “गामक अधिकारी अहो मोहन भैया यौ, भैया दस हाथक पोखरि खुनाए दियौ यौ, चम्पा फूल लगाए दियौ यौ”। काश! एहन लोकगीतक मर्म आशय प्राचीन मिथिलाक राजधानी जनकपुरक संत महंथ पुजारी व्यापारी कर्मचारी बुझथि आ बुझथि ओ सेहो जे करै छथि ठेकेदारी आ नेतागिरी आ बचा देथि जनकपुरक पोखरि चारू मोहार सहित। कुमार राधारमण संक्षिप्त परिचयः-श्रम आ रोज़गार मंत्रालय,नई दिल्लीमे बतौर अनुवादक कार्यरत। आकाशवाणी दिल्लीमे नैमित्तिक समाचारवाचक सेहो। विविध विषयक पांच सएसँ बेसी रचना प्रकाशित।मैथिली साहित्यमे वर्ग-पहेलीक सूत्रधार। दैनिक हिंदुस्तान,पटनाक रीमिक्स परिशिष्टमे शनिकेँ फिल्मपर स्थायी स्तंभ प्रकाशित।शिक्षा-एम.ए. हिंदी, एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त)। सम्प्रतिःएम.ए.(भोजपुरी)मे अध्ययनरत।मूलतः बघांत (मनीगाछी,दरभंगा) निवासी,किंतु पालन-पोषण बनमनखी(पूर्णिया) सँ। पाकिस्तान मे सेक्स-विचार "बीमार" एन डी तिवारीसँ फेर प्रमाणित भेल जे सेक्सवृत्ति नहि जाइत छैक। स्वर्गीय एन.टी.रामारावक मुइलापर बड्ड खिस्सा सभ बहराएल छलैक जे कोना ओ प्रतिमाह कतेक हजार टका उत्तेजक दबाइ सभ किनबा लेल खर्च करैत छलाह। सुनबामे आएल अछि जे ओही रामारावपर रामगोपाल वर्मा एकटा फिल्म सेहो बना रहल छथि जहिमे अपन बिहारी बाबू मुख्य भूमिकामे छथि। देखा चाही जे ओहि फिल्ममे एहि एंगलसँ किछु नव तथ्य प्रकाशमे अबैत अछि आकि नहि ।एम्हर खुशवंतो सिंह अपन बहुचर्चित कॉलम बुरा मानो या भलामे स्वीकार कएलन्हि जे ओ एतेक बूढ भेलहुँपर एखनो रूमानी कल्पना करैत छथि। सेक्स दिया इएह धारणा छैक जे करू आ बुझू खूब मुदा बाजू किछु नहि। सकदम भेल रहू । ओशो जहिना बजलाह आकि आध्यात्मिकसँ हटा सेक्सगुरूक टैग दऽ देल गेलनि। आब ई गप्प दोसर छैक जे आइयो हुनकर संभोग से समाधि की ओर सभसँ बेसी पढल गेल भारतीय पुस्तक छैक। कखनो पढबामे अबैत छैक जे सऊदी अरबमे सेक्स चर्चापर आधारित एक कार्यक्रममे शामिल हेबाक कारणेँ एंकरकेँ 60 कोड़ा लगएबाक सजा स्थानीय अदालत सुनओलक। सूडानमे स्कर्ट पहिरलापर एकटा किशोरीकेँ 50 कोड़ा लगौलक। ईरानमे जनानी सभमे मेकअप कऽ कए टीवीपर अएबाक मनाही छैक । देवबंद दारुल उलूमक कहब छैक जे कंडोमक इस्तेमाल उचित नहि छैक। आओर तँ आओर, इंडोनेशियामे बनल एक ताजा कानूनक मोताबिक अगिला साल जँ कोनो जनानीकेँ टाइट जींसमे देखल जेतैक तँ ओकरा ओही ठाम तुरंत स्कर्ट पहिरएबाक बंदोबस्त कएल जेतैक।एनामे के बाजत सेक्सपर। थोड़ बहुत जँ बजितो छथि तँ पुरुखे सभ। मुदा एम्हर एकटा तथ्य प्रकाशमे आएल छैक जे जाहि पाकिस्तानमे तालिबान द्वारा महिला सबहक लेल बुर्काक अनिवार्यता अथवा एक लिमिटसँ बेसी नहि पढबाक तालिबानी फरमान जखन-तखन जारी होइत रहैत छैक, ओही पाकिस्तानमे सेक्स विषयक (यद्यपि एहिमे राजनीतिपर सामग्री सेहो रहैत छैक) एकटा पत्रिका धमगिज्जर मचा देने अछि। एहि पत्रिकाक रूपमे पाकिस्तानी महिला लोकनिकेँ एकटा एहन मंच भेट गेल छन्हि जाहिमे ओ सेक्सपर खुलि कऽ चर्चा कऽ सकैत छथि। एहि मैगजीनक प्रबंधक लोकनिक लेल पत्रिकाक वेबसाइटपर पाठकीय प्रतिक्रियाके सम्हारब मोसकिल भऽ रहल छैक। पछिला साल ई मैगजीन लाहौरक दू कन्या- कैला पाशा आ साराह सुहैल द्वारा शुरू कएल गेल छल। नाम छैक- 'चे मैगजीन'। पाकिस्तानमे "चे" ओहिना छैक जेना हिंदीमे 'च' । 'च' सँ बिखिन-बिखन गारि सभ शुरू होइत छैक आ मैगजीन एही 'च' अक्षरसँ जुड़ल विडंबनाकेँ देखाबए चाहैत छैक। वेबसाइटक कहब छैक जे सेक्सपर बाजब बेजाए बूझल जाइत छैक, तेँ दैनिक जीवनक अप्रसन्नता, हिंसा, शर्म, तनाव आ सामाजिक कष्टकेँ जाहिर करबाक लेल ई मैगजीन शुरू कएल गेल छैक। ओना,मैथिलीयो साहित्यमे सेक्स कोनो नव विषय नहि छैक। कविकोकिल विद्यापति एहन कतेको रचना कऽ गेल छथि जनिका देया महिला प्रोफेसर लोकनिकेँ ऩहि बुझबामे अबैत छन्हि जे ओ कोना पढाओल जाए। वामरति पर अभिनव जयदेव लिखै छथिः- "किंकिनि किनि-किनि कंकन कन-कन घन-घन नूपुर बाजे रतिरणे मदन पराभव मानल जयजय डिंडिम बाजे" चंदा झा एहि तरहक रचना सभ पर खिसिआएल छलाह आ ओ एहन रचनाकार लोकनिकें "बोतुक" कहबामे संकोच नहि केलनि। बोतुक अर्थात् एहन जीव जकर दाढी तँ पाकल जा रहल छैक मुदा उमरक ख्याल नहि कए संभोगवृतांतमे व्यस्त अछि। मुदा सेक्स विषयक लोकप्रियतामे संदेह नहि। ई एकटा तथ्य छैक जे इंटरनेटपर सभसँ बेसी सर्च सेक्स विषय पर भऽ रहल छैक। मोहल्ला ब्लॉगपर सविता भाभीकेँ लऽ कए बड्ड हो-हल्ला मचलैक। हालहिमे कनाडामे भेल एकटा सर्वेक्षणक निष्कर्ष-http://krraman.blogspot.com/2009/12/blog-post_03.html-छैक जे पोर्नसँ केओ नहि बाँचल अछि। बाहर गुरू-गंभीर बनलासँ की, सभ केओ कखनहु ने कखनहुँ कंप्यूटरपर पोर्न देखनहि छथि। सेक्स संबंधी आलेखक प्रतिक्रियामे कतेको पाठक लिखैत छथि जे पूरा आलेख पढि गेलहुँ मुदा कोनो "ठोस" सेक्स-चर्चा नहि पाबि निराश भेलहुँ, समए "खराप" भऽ गेल। मिथिलोमे एखन कंप्यूटरक पसार ओतेक नहि भेल छैक, तेँ किछु गोटे बांचल छथि। पाठकलोकनिक रुचि जँ नहि रहितनि तँ सभ अखबारमे किएक रंगीन तस्वीर समेत रोज़ कोनो ने कोनो सेक्स संबंधी खबरि छपितैक? आइयो समय-साल पत्रिकामे जे लतिका जीक लेख छपैत छनि, तेकर पाठकीयता बड्ड छैक। शारदा सिन्हा कतबो कहथु जे अश्लीलता लोकगीतक आत्माकेँ मारि दैत छैक, मुदा लोकगीतमे प्रारम्भहिसँ अश्लीलताक पुट रहल छैक। विवाहो-दानमे जे गीतनाद होइत छैक, ताहिमे बड़का गामबला सभ तँ किछु मर्यादा रखैत छथि मुदा कनेक कम परिचय बला गामक अथवा आन जातिक बियाहमे गीत-नाद सुनि कए देखियउ। गहे-गहे सेक्स भरल छैक। संसदीय समिति भने कहने हुअए जे स्कूलमे सेक्स-शिक्षा उचित नहि हएत मुदा कोलकाता विश्वविद्यालयक हिंदी विभागक प्रोफेसर श्री जगदीश्वर चतुर्वेदीक कहब छन्हि जे "सेक्स" इच्छाक सघनीकरण, रूपान्तरण आ संशोधन करैत छैक। एहिसँ सेक्सक दायरा बढ़ैत छैक। सेक्स विमर्शक दायरासँ बाहर नहि हेबाक चाही। एकर गोपनीयता भंग भेलहिसँ चुप्पीकेँ कम कएल जा सकैत छैक। फूकोक कहब रहनि जे सेक्स कोनो एहन चीज नहि छैक जकर अहाँ मूल्यांकन कऽ सकैत छी। बल्कि सेक्स एहन चीज छैक जकरा निगमित करए पड़ैत छैक । ओकर क्षमता सार्वजनिक होइत छैक। एकरा लेल प्रबंधन प्रक्रियाक जरूरत होइत छैक। सेक्सपर पुलिसिया पहरा ओकरा "टैबू" बना दैत छैक। सम्पूर्ण नेटवर्क सेक्सक इर्द-गिर्द घूमि रहल छैक । कोनो ने कोनो रूपमे थोड़- बहुत फर्कक संग समस्त किस्मक विमर्शपर ओकरा थोपि देल जाइत छैक। सेक्सकेँ नव दृष्टिसँ देखब जरूरी भऽ गेल छैक । हम सभ अहू तथ्यसँ परिचित छीहे जे खासकए मुस्लिम महिला लोकनिक ई समस्या गंभीर छनि जे हुनकर पति खाड़ी आ अरब देशमे कतेको साल धरि बीवी-बच्चा सभकेँ छोड़िकए नौकरी करैत छथि, जखन कि इस्लाममे कहल गेल छैक जे पतिकेँ अपन पत्नीसँ चारि महीनासँ बेसी अलग नहि रहबाक चाही। सेक्स दिया जत्तेक बात हेतैक, ओकर ओतबे स्वत:-स्फूर्त्त उपकरण आगू आओत। एतबा जरूर जे ई काज सीमित आ सतर्क ढंगसँ संहिताबद्ध हेबाक चाही। श्रीमती कुमुद झा उम्र ५१ वर्ष, ग्राम अरेड़ डीह टोल, जिला मधुबनी (बिहार) उच्चैठ भगवतीक महात्म मधुबनी जिला अंतर्गत रहिकासँ लगभग २० किलोमीटर दूर भगवतीक स्थान छनि। कहब अछि जे वर्षो पूर्व पोखरि जे एखन अछि ओ नदी छल। नदीक उत्तर संस्कृत विद्यालय रहैक, ओहि विद्यालयमे निअम रहैक जे प्रति दिन दू लड़का राति कऽ काली जीक आरती करैक लेल नदी पार कऽ कऽ आबैत छलाह आ आपस गेलाक बादे छात्र सभ रातिक भोजन करैत छलाह। एक दिन नदीमे बाढ़ि आबि गेल छलैक, कियो छात्र आरती करए लेल नदी पार करबाक हिम्मत नहि केलक। अंतमे हेड पंडित कहलथिन जे आइ आरती छोड़ि दियौ आ सभ गोटे भोजन करै जाऊ। ओहि ठाम कलिया नामक एकटा नोकर छल, ओ कहलकैक जे हम आरती करए जाएब आ आरतीक बादे सभ दिन जकाँ भोजन हेतैक। जेना तेना नदीकेँ पार कऽ कऽ कलिया माताजीक दरबारमे आरती करए लेल पहुँचल। आरतीक विधि ओ नहि जनैत छल। कलिया आरतीक समान सभ भगवतीक मुँहमे लेप देलकनि। ओहिपर माता बहुत प्रसन्न भेलीह आ कलियाकेँ कहलथिन जे तू हमरासँ वरदान माँग। कलिया माताजीकेँ कहलथिन जे हे माता, हमरा सभ मूर्ख कहैये, से हमरा विद्वान बना दिअ। माताजी वरदान देलखिन जे जतेक किताब तूँ आइ रातिमे छू सकबह, सभ तोरा याद भऽ जेतौक। कलिया विद्यालयमे सभ छात्रकेँ भोजन करा, विद्यालयमे जतेक किताब उपलब्ध रहै सभकेँ राति भरिमे छू लेलक आ कलिया विद्वान भए गेल। तकरा बाद कलिया पूर्ववत विद्यालयमे कार्य करैत रहल। लेकिन छात्र सभ गलती पढ़ै छलाह तँ कलिया टोकि दैत छलन्हि आ छात्र सभसँ मारि खाइत छलाह। एक दिन पण्डित जी वेदक कोनो अध्याय याद करए लेल छात्र सभकेँ कहलथिन। उच्चारण गल्ती भेलापर कलिया टोकलकनि तँ छात्र सभ तमसा कऽ कलियाकेँ बहुत मारलखिन, अंतमे पण्डित जी हल्ला कऽ एलाह। बात सभ बुझलापर पण्डित जी कहलथिन, कलिया ठीक कहैत छैक। पण्डित जी आश्चर्यचकित भेलाह जे वेदक ई अध्याय कलिया कोना जनलक। पण्डित जी कलियाकेँ अपन कक्षामे बजा कए आरतीक वृतांत सुनलन्हि आ ओ कलियासँ कालीदास भेल। कलियाकेँ आदरपूर्वक विदाइ दऽ कऽ विद्यालयसँ बिदा केलखिन। वास्तवमे कलियाक बियाह राजकुमारी विद्योतमासँ शास्त्रार्थमे भेल छलनि। किंतु विद्योतमा तुरंत जानि गेलीह जे कलिया मूर्ख अछि। ओकरा देशसँ निकलि जएबाक सजा भेटलाक उपरांते कलिया भगवती स्थानक विद्यालयमे पहुँचल छल। उच्चैठ भगवती स्थान काफी प्रसिद्ध अछि, सभ दिन दर्शनार्थीक भीड़ लगैत छैक आ जे कामनासँ अहाँ ओतए जाएब, माँ भगवती सभक मनोरथ पूर करैत छथिन्ह आ बारहो मास ओतए बलिप्रदान सेहो होइत अछि। खास कऽ कऽ आसिनक दुर्गा पूजामे अष्टमीक दिन बहुत प्रसिद्ध मानल जाइत छलै। हम सभ ओहिठाम बराबर जाइत छलौं। आ माताक दर्शन कऽ कऽ गीत गबैत छलौं। पूजा पाठ कऽ खाना खा कऽ हम सभ पूरा परिवार घर वापस आबैत छी। एहि तरहेँ उच्चैठ भगवतीक ई कहानी अछि। भगवतीक गीत (संकलन कुमुद झा) हमर दुःखक नहि ओर हे जननी, हमर दुःखक नहि ओर जहिया साँ माता जन्म जे देलाँह दुःख छोड़ि सुख नहि मेल जननी हमर दुःखक नहि ओर, जहिया साँ माता पुत्र जे देलौहु दुःख छोड़ि नहि भेल हे जननी हमर दुःखक नहि ओर .....२। जहिया सा माता सम्पत्ती जे देलोंह दुःख छोड़ि सुख नहि भेल हे जननी .....२। माताकेँ सब पुत्र बराबर पण्डित मुर्ख गँवार हे जननी हमर दुःखक नहि अओर .....२। भगवतीक दोसर गीत हम तय जनै छी माता अहाँ बरी दुर हे दुअरे पर आवि हे माता भये गेल कसुर हे। एकटा जे पुत्र देतौ धनकेँ सिंगार हे सेहो पुत्र होयत माता सेबक तोहार हे। गंगा जमुन साँओ जल भरि लायब हे भोर होइतहि माता पिढ़िया निपायब हे। मलिया आँगन साओ फुलबा मँगायब हे भोर होइतहि माता फुलबा चढ़ायब हे, पटवा दोकान साँओ आँचरी मँगायब हे। नित उठि आहे माता। आँचरी टँगायब हे। हाट बाजार साँओ धूमन माँगायब हे साँझ हेते माता धूप–दीप देखायब हे। शम्भू झा वत्स गार्हस्थ जीवनक समस्या गार्हस्थ जीवन बड़ संघर्षमय होइछ। शंकरो भगवान एहि संघर्षसँ उद्धेलित भए गेल छलाह। तारकासुरकेँ ब्रह्मा जीसँ वरदानमे सैह प्राप्त भेल छलैक जे शंकरसँ उत्पन्न छ: सालक बालक हमरा मारि सकैछ। आओर केओ देव गन्धर्व-राक्षसादि नहि मारि सकैछ, जखन तारकासुर ई वरदान प्राप्त कए उन्मत्त भए देवता सभकेँ मारि भगा स्वर्गपर शासन करए लागल। तखन देवता लोकनि सभ एकत्रित भए पितामह ब्रह्मा जीक समक्ष उपस्थित भेल आ अपन दु:खक सम्पूर्ण वृतान्त् कहि सुनौलक। ब्रह्माजी देवता सभकेँ आश्वस्त कहि किछु दिन धैर्य धारण करबाक लेल कहलथिन। शंकर भगवान ब्रह्मचारी तपस्वी भय माया-मोहसँ मुक्त छलाह, तेँ तारकासुर एहेन वरदान माँगने छल जे हमरा शंकरजीसँ जन्मल ६ वर्षक बालके मारि सकैछ। आओर केओ नहि। नहि शंकर विवाह करताह आ नहि हुनका बालक होएतन्हि। तँ से तारकासुर निश्चिन्त छल मृत्युसँ। ब्रह्माजी देवता लोकनि सभ गोटे शंकरजीक समक्ष जाए करबद्ध प्रार्थना केलन्हि। हे महादेव? हमरा सभक उद्धार करू। नहि तँ देवता सभ आब नहि बचत। आब हमरा सभक कल्याण हेतु बियाह करू। शंकरजी तँ गार्हस्थ जीवनकेँ कठिन बुझि तहूसँ मुक्त रहै चाहैत छलाह, मुदा देवता सभक कष्ट मेटाबए लेल प्रथम सती दक्ष प्रजापतिक पुत्रीसँ बियाह केलन्हि। बादमे पार्वतीक रूपमे दोसर जनम जे सतीक भेल छलैक। ताहि सँ पुनः बियाह भेलन्हि। शंकरजीक समक्ष आब गार्हस्थ जीवनक समस्या उपस्थित होए लगलन्हि, पार्वती जी एलथि तँ “ऐसना-पोडर, लिपस्टिक”क मांग होमए लगलन्हि। शंकर जी कहलथिन्ह-– ए पार्वती? हमरा तँ भसमे छाउरसँ काज चलैत छल, अहाँकेँ हम ऐसनो-पोडर कतएसँ देब। पार्वती बजलीह- ई सभ कहने काज नहि होएत। नारीक श्रृंगार तँ इएह सभसँ होइत छैक। “एहि लेल तँ धन व्यय होएत? मुदा हम धन कतएसँ आनब? हम तँ बाबाजी छी”- शंकर जी बजलाह। “बाबाजी भेलेसँ काज नहि होएत। हम की खाएब? धिया-पुता की खाएत? त्रिशूल-कमण्डल राखू। पासैन- कोदारि धरू। बौनि बुता करू”- पार्वती झुँझुहाति बजलीह। शंकरजी पार्वतीक एहेन प्रचंड रूप देखि सहमि गेलाह। हुनका स्मरण भए गेलन्हि-यत्र नार्यस्तु पूज्यंन्ते रमन्ते तत्र देवता। यत्रैतास्तुी न पूज्यजन्ते तत्र सर्वाफला क्रिया- इयैह विचारि पार्वती जे जे कहथिन्ह से से करए लगलाह। शंकरजीक पारिवारिक समस्या बढ़ले गेल। ध्यान-मनन-चिन्तनक समय कम पड़ि गेलन्हि। शंकरजीक दूइ टा बालक सेहो तेहने भेलन्हि। गणेशजी लम्बो-दर गज-बदन मनोहर। शंकरजी जे कमाए, तहिमे गणेशजी केर पेट नहि भरन्हि। कएक दिन तँ शंकर जीकेँ उपासे करए पड़न्हि। एक दिन शंकरजी स्नान-कए ध्यान चिन्तन कए रहल छलाह। हुनका पहिरनामे बाघक छाल छलन्हि। साँपक डाराडोरि आ साँपक जनोऊ छलन्हि। शंकरजी ध्यानमे मगन छलाह। एम्हर अवसर पाबि कार्त्तिकजीक वाहन मोर साँपपर दौड़ल। साँप डाँरसँ ससरि पड़ा गेल। एम्हर पार्वतीक वाहन बाघ बसहा-बड़दपर दौड़ल। बसहा बड़द होकाँहि-होकाँहि डिकरैत भागल। शंकरजी हड़बड़ा कए त्रिशुल लए दौड़ल की तावत डाँड़सँ बाघक छाल ससरि खसि पड़ल। शंकर जी झुँझुआए गेलाह। “हमरा सभ तबाह करएमे लागल अछि। केओ सुख देनिहार नहि। स्त्री-बेटा सभ तँ सभ, ओकर वाहन धरि हमरा दु:खे दैत अछि। नहि। आब तँ अइसँ बढ़िया भीखे मांगि–चांगि खाएब आ बोन–जंगलमे जीवन बिताएब।” ताहि दिनसँ शंकरजी भीख मांगि आनथि आ रातिमे भीतपर खुट्टीमे टांगि देथि। जखन सभ सूति जा‍थि तखन रातिमे गणेशक वाहन मूषिक सभटा झोराक भीख फाँकि जाए। शंकरजी आब पगलाए गेलाह। “नहि, केओ नहि सुख देनिहार।” आब हम आक–भांग धथूर खाए कए रहब आ श्माशान वास करब।” स्वयं सुरेश: श्वगसुरो नगेश:, सखा धनेशस्तगनयो गणेश:। तथापि मिक्षाटनमेव शम्भो, वलीयसि केवल मिश्व रेक्षा। शंकर जी स्वयं देवसँ ऊपर महादेव छलाह, ससुरो पहाड़क राजा हिमालय, दलिदर नहि, हुनकर मित्र मण्डली सेहो धन-कुबेर, बेटा सेहो गणेश अग्रपूज्य, ऋद्धि सिद्धि दायक, तैयो शंकरजी भिखमंगे? कहल गैल छैक जे ईश्वरक इच्छा बलगर होइत अछि, गार्हस्थ जीवनमे जौं हुनको दुर्दशा भोगए पड़लन्हि तँ हमरा लोकनिक गप्पे कोन। सं. सा. सं.- प्रस्तुति अध्यक्ष (सं. सा. सं) नागेश्वर लाल कर्ण गायन, कथक, सितार वादन- गाजियाबादक शालीमार गार्डेन स्थित गायत्री भवनमे श्री चित्रांश कर्ण समाज द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रममे संगीतज्ञ डा. नागेश्वर लाल कर्णक निर्देशनमे गायन, सितार वादन एवं नृत्यक प्रस्तुति भेल। श्री नईम आओर मीनाक्षी द्वारा गायन, सिमरन द्वारा कथक नृत्य जे तीनताल आओर रास तालमे प्रस्तुत कएल गेल, सारंगीपर रऊफ अहमद छलाह। सुनील सक्सेना एवं हुनक पुत्र स्पर्श सेहो सितार वादन केलन्हि, डा. नागेश्वर लाल कर्ण तबला संगति केलन्हि। संस्था द्वारा कलाकार सभक अभिनंदन कएल गेल। सांस्कृतिक कार्यक्रम–गिटार–वादनक प्रस्तुति- नई दिल्ली, श्रीवास्तव वेलफेअर एसोशिएसन द्वारा पूर्व सांस्कृतिक केन्द्रमे वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन भेल। संगीतज्ञ डा. नागेश्वर लाल कर्णक निर्देशनमे गायन, वादन एवं नृत्यक प्रस्तुति भेल। श्री राजेश चन्द्रा, सीमा एवं मीनाक्षी द्वारा गायन, गुरू प्रसाद श्रीवास्तव द्वारा तबला संगतिक बाद सिमरन द्वारा कथक नृत्य तीनतालमे प्रस्तुत कएल गेल। जाहिमे सारंगीपर रऊफ अहमद आओर तबलापर डा. कर्ण कुशलतासँ तबला संगति केलन्हि। मुख्य अतिथी पूर्व मंत्री माननीय सुनील शास्त्रीक कर कमलसँ हिनक अभिनंदन कएल गेल। कोलकाताक युवा गिटार वादक रितोम सरकारक विगत तीन दिवसक लगातार कार्यक्रम सम्पन्न भेल। अपन स्लाइड गिटारपर सोलो वादनमे लोधी रोड स्थित ‘लोक कला मंच’ क सभागारमे क्रमशः राग कौंसी–कान्हड़ा, राग जोग, किडवाणी एवं हँसध्वनीमे आलाप, जोड़–झाला, विलंबित तीनताल, मत्त ताल, मध्यलय एवं द्रुत तीनतालमे निबद्ध तथा धुनक प्रस्तुति केलन्हि। ‘संगीतज्ञ बाबा अलाउद्दीन खाँ म्युजिक फाउण्डेशन’ द्वारा–पूर्व सांस्कृतिक केन्द्, लक्ष्मीनगरमे राग बागेश्वरी जे विलंबित तीनताल, मत्त ताल, मध्यलय, एवं द्रुत तीनतालमे निबद्ध छल तकर प्रस्तुति केलन्हि। अरविन्दो आश्रम, महरौली रोड स्थित ‘ध्यान सभागार’मे राग बागेश्वरी जे तीनताल, मत्त ताल, एकताल आओर तीनतालमे निबद्ध छल, पुनः राग हँसध्वनीमे धुन बजौलन्हि। हिनक संग दिल्लीक तबला वादक डा. नागेश्वर लाल कर्ण कुशलतासँ तबला संगति केलन्हि। एहि अवसरपर उपस्थित गण्य–मान्य नागरिक देशी विदेशी श्रोता–दर्शक वृन्द दुनु कलाकारक प्रभावशाली प्रस्तुतिक खूब सराहना कएल। डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी विद्यापतिक फोटोकेँ लोक सभामे लगएबाक मांग– जमशेदपुर (झारखंड)। महाकवि विद्यापतिक चित्र लोकसभाक केन्द्रीय कक्षमे लगबाओल जाए, एहि लेल झारखंड मैथिली आन्दोलनक सजग प्रहरी आ दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक मैथिली साहित्यकार मंच, झारखंडक प्रदेश संयोजक डा. रवीन्द्र कुमार चौधरी एक ज्ञापन लोकसभाक अध्यक्षा श्रीमती मीरा कुमारकेँ देलनि, जकर प्रति लोकसभाक उपाध्यक्ष सांसद करिया मुंडा सहित झारखंड आ बिहारक कतेको सांसदकेँ देलन्हि। एल.बी.एस.एम. कॉलेज, जमशेदपुरमे मैथिलीक प्राध्यापक आ साहित्य अकादमीमे मैथिली परामर्शदातृ समितिक सदस्य डा. चौधरी विद्यापतिक फोटोक संग प्रेषित ज्ञापनमे कहलन्हि जे मैथिलीक महाकवि विद्यापति अपन गीतक बलपर समस्त पूर्वोत्तर भारतमे काव्य रचनाक एक विशिष्ट परम्परा स्थापित केलनि। बंगालक महर्षि अरविन्द आ विश्वकवि रवीन्द्र नाथ टैगोर धरि हुनकर प्रतिभासँ प्रभावित रहथि। एहन महान कविक चित्र संसद भवनक केन्द्रीय कक्षमे लगलासँ देश भरिक मैथिलीभाषी सम्मानक अनुभव करतनि आ हुनक अपार आस्था लोकसभाक सदस्यक प्रति बढतनि। डा. चौधरी एहो कहलन्हि जे जँ महर्षि अरविन्द आ टैगोरक फोटो संसदक केन्द्रीय कक्षमे लागल अछि तँ विद्यापतिक फोटो लगेबामे कोनो आपत्ति नहि हेबाक चाही। ज्ञातव्य अछि जे डा. चौधरीक अथक प्रयासक कारणेँ झारखंडक राँची विश्वविद्यालयमे मैथिलीक पाठ्यक्रमक निर्धारण आ पढाइ प्रारंभ भऽ सकल। विश्वविद्यालय द्वारा गठित मैथिली बोर्ड ऑफ स्टडीजक सदस्य-सचिव स्वयं हिनका रहला कारणेँ ई पाठ्यक्रमक प्रकाशन सेहो लगले करबा लेलन्हि। डा. चौधरीक आगामी कार्यक लक्ष्य छन्हि राँची विश्वविद्यालयसँ हालहिमे विभक्त भेल कोल्हान विश्वविद्यालय, चाइबासामे स्नातकोत्तर मैथिली विभाग खोलाएब आ झारखंडक क्षेत्रीय भाषाक सूचीमे मैथिलीकेँ सम्मिलित कराएब। हुनक कहब छन्हि जे जखन राज्यक क्षेत्रीय भाषाक सूचीमे मैथिली आबि जाएत तँ स्वतः जे.पी.एस.सी.मे मैथिली मान्य भऽ जाएत आ सरकारी नौकरीमे सेहो सुविधा भेटत। मैथिली समीक्षाक आवश्यक तत्व-गजेन्द्र ठाकुर मैथिली कथा-कविताक समीक्षाक आवश्यक तत्वपर विचार करए पड़त। नव वातावरणमे अवस्थित नव समस्याकेँ चिन्हित करब, व्यक्तिगत अनुभवकेँ सार्वजनिक जीवनसँ जोड़बाक प्रयासकेँ चिन्हित करब, सूत्रबद्धता अछि वा नहि, कारण विवादित वस्तुकेँ घोसिआएब, वादक प्रतीक-चिन्हकेँ ठूसि कऽ साहित्यमे देबाक प्रवृत्तिक आधारपर ब्लैकमेलर साहित्यकेँ चिन्हित करब, अपन व्यक्तिगत प्रशंसा आ दोसराक प्रति आक्षेपक कथा-कवितामे ब्लैकमेलर साहित्यकार द्वारा प्रयोग करबाक गुंजाइश रहैत अछि। मुदा तथ्यपूर्ण मूल्यांकन एहि प्रवृत्तिकेँ चिन्हित करत। हीन भावनासँ ग्रस्त साहित्य कल्याणकारी कोना भऽ सकत? बदलैत सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक-धार्मिक समीकरणक परिप्रेक्ष्यमे एकभग्गू प्रस्तुतिक रेखांकन कथाकार-कविक व्यक्तिगत जिनगीक अदृढ़ता, चाहे ओ वादक प्रति होअए वा जाति-धर्मक प्रति, साहित्यमे देखार भइए जाइत छैक। आ एहने साहित्य बेर-बेर अपनाकेँ परिमार्जित-परिवर्धित करितो मूल दोषसँ दूर नहि भऽ पबैत अछि। जातिवाद-सांप्रदायिकतावाद आबिये जाइत छैक, तकरा चिन्हित करब। गपाष्टक आ समीक्षाक अंतरकेँ चिन्हित करब। एकर मुख्य लक्षण – “कियो हुनका कहियो पुछलकन्हि, सुनैत छिऐ जे ओ ई करए चाहैत रहथि ..” आ एहि तरहक आर गप सभ। संगहि हिनकर रचनाकेँ पाठक नहि बूझि पबैए- समीक्षक सेहो नहि बूझि पबैए- मुदा हिनकामे असली गप ई छन्हि। ई फलनाक बेटा छथि तेँ नीक आकि अधलाह लिखै छथि, ई एहि पदपर छथि तेँ नीक आकि अधलाह लिखै छथि। ई पाइबला छथि, होटल छन्हि तेँ साहित्यकार नहि छथि आ ई पर्चा फेकै छथि, पत्रकार छथि तेँ महान साहित्यकार छथि। ई सहरसा-सुपौलक छथि तेँ नीक आकि अधलाह आ ई दरभंगाक सोति आकि ब्राह्मण-कायस्थ तेँ नीक आकि अधलाह लिखै छथि। एक पाँतिक वक्तव्य- एहि रचनाक हम विरोध आकि समर्थन करै छी। ई हमरा लेल नीक लोक छथि तेँ नीक लिखै छथि। ई हमर जातिक छथि वा हमरा भविष्यमे फाएदा पहुँचेताह तेँ अद्भुत लिखै छथि। हिनकर हम प्रशंसा करबन्हि तँ ईहो हमर प्रशंसा करताह। एहि सभ प्रवृत्तिकेँ चिन्हित करब। मूल्यांकनमे ककरो प्रति पूर्वाग्रह वा घृणा राखब। ओकर सम्पूर्ण गप बुझबासँ पूर्वे निर्णय सुनाएब। एहिकेँ चिन्हित करब। मैथिली साहित्य, जतए पाठकक संख्या शून्य छैक, एक साहित्यकार दोसराक समीक्षा करैत अछि आ एतए व्यक्तिगत अहम् आ ब्लैकमेलिंगक पूर्ण गुंजाइश छैक। अहाँ दू-चारिटा कवि-कथाकार सम्मेलनमे चलि जाऊ, उद्घोषकक उद्घोषणा आ थोपड़ी उद्घोषकक आ साहित्यकारक पूर्वाग्रहकेँ चिन्हित कऽ देत। जेना गौरीनाथ लिखै छथि जे हिन्दीयोमे -प्रेमचन्द, मोहन राकेश आ उत्तराखण्डी- एना कऽ कए संग्रह अबैत अछि जेना उत्तराखण्डी प्रेमचन्द आ मोहन राकेशक कोटिक हिथि। तहिना मैथिलीमे कुलानन्द मिश्र-हरेकृष्ण झा आ ई; वा यात्री-राजकमल आ ओ, वा राजकमल-ललित आ ई , मात्र यैह कवि कथाकार छथि एहन सन वक्तव्य अबैत अछि आ एहि मे ई आ ओ क प्रति देखाओल पूर्वाग्रहकयुक्त दुटप्पी चिन्हित भए जाएत। खूब साहित्य पढ़ू- भारतक अ नेपालक दुनू दिसुका मैथिली साहित्य। आ एहि क्रममे जे रचना आ जे रचनाकार नीक लागथि आ जे तथाकथित स्थापित रचनाकार वा रचना अधलाह लागए तकरा चिन्हित करू, विसंगतिकेकेँ सेहो। आ से बिना भएक, कारण ब्लैकमेलर आ गोल बना कऽ कविता-कथा रचनिहारक दिन खतम करबाक लेल साहस जरूरी अछि। बिना पाठकक ई लोकनि मैथिली साहित्यकेँ सोंगरपर रखने छथि, एकटा छद्म वातावरण बना कऽ। १२.      स्वतंत्रता/ आरक्षण- एहि दूटा पर घमर्थन। स्वतंत्रता सतही छल, मतदान नकली अछि आ आरक्षण भेदभावपर आधारित, ई घमर्थन करैत शोषक वर्ग। स्वतंत्रता मतदानकेँ जन्म देलक आ पाँच सालपर ई सामाजिक परिवर्तनक ढेर रास नव समीकरणकेँ जन्म दैत अछि- से शोषित वर्ग लेल हितकारी। असमान सामाजिक स्तरकेँ समान अधिकार देबाक कोनो मतलब नहि। तँ शोषक वर्ग कहत- ओहू आरक्षित वर्गमे ऊँच नीचक जन्म भऽ रहल अछि। मुदा से जातिक आधारपर तँ नहि भऽ रहल अछि आ पहिनेक तुलनामे कम भऽ रहल अछि। जे शूद्र ऋषि कवष ऐलूष वैदिक ऋचाक द्रष्टा छथि, जे महिला अपाला वैदिक ऋचाक द्रष्टा छथि, से करोटमे किएक ठाढ़ रहथि ? पुरातन व्यवस्थाक जातिक भीतरक स्तरीकरण, कर्णकायस्थ आ मैथिल ब्राह्मणक भीतर पञ्जी-प्रथा द्वारा कएल गेल स्तरीकरण, पाइ-पैरवी लऽ दऽ कऽ होइत स्तरीकरणक स्थितिमे नीचाँ ऊपर केनाइ। समाजक बाल-विवाह पक्ष आ विधवा-विवाह विपक्ष आधारित आ पञ्जी आधारित बतहपनीक प्रतीक रूपमे रहैत आइ काल्हिक व्यवस्था सभ। आत्मकेन्द्रित, भाषा-संस्कृति छोड़ैत समाज- कारण एहि सभसँ प्रेम मात्र प्रतीक रूपमे ओ बाल्यकालसँ देखने अछि। पढ़ाइक रूप एखनो असमानतापर आधारित अछिये मुदा पुरनका तुलनामे अकाश पतालक अंतर अछि। कियो पढ़ि-लिखि कऽ अपन समाजमे उच्चसँ उच्चतम स्तर प्राप्त कऽ सकैत अछि आ तखन ने ओकरा पाँजि चाही आ ने किछु आर। फेर ओ ग्राम पंचाएतसँ लऽ कऽ संसद सदस्य धरि पहुँचैत अछि। ठिकेदारी करबासँ लऽ कऽ बस-टेम्पू धरि चला-चलबा सकैत अछि। हम एहि द्वारे नहि पढ़ि सकलहुँ, कलक्टर नहि बनि सकलहुँ कहलापर आब लोक कहैत अछि जे तखन फलनांक बेटा कोना से बनि गेल। १३. शोषक द्वारा शोषितपर कएल उपकार वा अपराधबोधक अन्तर्गत मरड़पर लिखल जाएबला कथा-कवितामे जे पैघत्वक (जे हीन भावनाक एकटा रूप अछि) भावना होइ छै, तकरा चिन्हित कएल जाए। १४.      मेडियोक्रिटी चिन्हित करू- तकिया कलाम आ चालू ब्रेकिंग न्यूज- आधुनिकताक नामपर। युगक प्रमेयकेँ माटि देबाक विचार एहिमे नहि भेटत, से एहि अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्यक, बुश-सद्दामक आलोचनामे धार ओहि कारणसँ नहि आबि पबैत अछि। कोनो मन्दिर-मस्जिदकेँ जे ओ समर्थन-विरोध करैत छथि वा कोनो नन्दीग्राम-लालगढ़क सेहो तँ ओहिमे सेहो ताहि तरहक धार नहि अबैत अछि। दारू पीबि मँतल मानववाद, धर्मनिरपेक्षतावाद, वामपंथ आ दक्षिणपंथपर हुनकर विचार लागत ओंघाएल। युगक सभ शब्दावली भरताह आ कविता-कथा तैयार। अमेरिकाक आलोचनामे धार कोना आओत आ वामपंथक पक्षमे सेहो- जखन अपन आजीविका दक्षिणपंथक मदतिसँ चलि रहल अछि। संघर्षक अभाव सृजनात्मकताक स्तरकेँ समए बढ़लासँ बढ़ेबाक बदला घटबैत अछि। युगक अनुरूप सभ चलैए, ओकर विपरीत चलब तखन ने सृजनात्मकताक संग चाही। दोसराकेँ पलायनवादी कहनिहार एहि तरहक सुविधावादी तत्वकेँ चिन्हित करू, गहींर पैसब जिनका लेल संभव नहि। इतिहाससँ जुड़ाव ऐतिहासिक मनोभावनासँ जोड़ि सकत। वर्तमान सामाजिक व्यवस्थाकेँ माटि देबामे धारक अभाव- हीनभावनाग्रस्त आ अपराध भावसँ भरल लेखकसँ संभव नहि। न्याय वैशेषिक आ सांख्य-योगक वस्तुवाद, बाह्यक यथार्थ आ मायाक विरोध, गृहस्थ जीवन, लोक हित। कला आ साहित्यक कृति, आत्माक भीतरक ज्ञान प्रज्ञापर आधारित होइत अछि जे अखण्ड अछि- गति, स्वतंत्रता, सर्जनात्मक परिवर्तन। इतिहास वा साहित्यक इतिहास हम बदलि नहि सकैत छी आ एतए उच्च आ मध्यवर्गक स्मृति आधारित मिथिलाक स्वर्णयुग। मुदा तकर महत्व दूरदर्शन आ चलचित्र टामे भऽ सकैत अछि। उदारवाद। औद्योगिकरण आ तकर आर्थिक विकासक सफलता-असफलता। सामाजिक रूपमे समाजक पिछड़ल वर्गक विरोधकेँ आरक्षण आ स्वतंत्रता पसारि देलक मुदा संगहि एकर तीव्रता कम केलक से चाहे ओ नक्सलवाद होअए वा माओवाद वा मर्क्सवाद-लेनिनवाद। बुर्जुआ वर्गक लेल ई फाएदा रहल। बुर्जुआ वर्गक राजनैतिक आ सांस्कृतिक संगठन पसरल आ सर्वहारा वर्ग धरि पहुँचए से प्रयास आ महिला लोकनिकेँ एहिमे सम्मिलित करबाक प्रयास। पाइ आ सुविधा अपना संग परम्परागत नैतिकताकेँ तोड़लक। कम्पनी अपन स्वतंत्र अस्तित्व बनेलक आ परिवार आ व्यक्ति एहि तरहक कम्पनीकेँ नौकरीपेशा लोकक संग चलबए लागल। प्रकृतिपर नियन्त्रण आ मानवीय व्यवहारक अवलोकन। काजक लेल अन्न आ काजक बदला पाइ, रोजगार गारन्टी कार्यक्रम, जनवितरण प्रणालीक दोकान। रोजगार लेल देश-विदेश छोट होएब, परिवारक आधारपर आघात। पूँजीवादी विश्व अर्थव्यवस्था, परिवर्तन आपरूपी नहि वरन् संघर्ष आ प्रयाससँ भेटत। स्वतंत्र मानवीय संवेदना जे नीक भविष्यक गारंटी नहि दैत अछि तँ ई अधलाहक सेहो गारंटी नहि दैत अछि। हमरा लग विकल्प अछि आ मैथिली साहित्यक पुनर्जीवनक जे किछु प्रमाण भेटि रहल अछि से कम नहि अछि। विकल्प हमरा सभकेँ तकबाक अछि जे सनसनी पसारी आकि कार्य करी। १५.  भारतमे राजनीतिक क्रान्तिक बाद औद्योगिक आ सामाजिक क्रान्तिक संकल्प कएल गेल, विकसित देशमे औद्योगिक क्रान्तिक पहिने सामाजिक क्रान्ति भेल। ताहि कारणसँ हमरा सभकेँ कठिन परिस्थितिक सोझाँ हेबऽ पड़ल। लोकाचार, चिन्तन क्रम आ दृष्टिकोणक अलाबे पोषण, स्वास्थ्य, सफाइ, चिकित्सा, शिक्षा, आयु-प्रत्याशामे वृद्धि, मृत्युदरमे कमी। आधुनिकीकरण, लोकतंत्रीकरण, राष्ट्र-राज्य संकल्पक कार्यान्वयन, प्रशासनिक-वैधानिक विकास, जन सहभागितामे वृद्धि, स्थायित्व आ क्रमबद्ध परिवर्तनक क्षमता,  सत्ताक गतिशीलता,  उद्योगीकरण। १६.  समाजक धनाढ्य आ निर्धनमे विभाजन- दुनू वर्गक आकार, स्तर आ बीचक दूरी। १७.  स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद नवीन राज्य राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्या-परिवर्तन आ एकीकरणक प्रक्रिया, कखनो काल परस्पर विरोधी। मानवशास्त्रीय, जातीय, धार्मिक, भाषिक- प्राथमिक आ लघु निष्ठा- स्थानिक, जातीय, धार्मिक-भाषिक आस्था। सामुदायिकताक विकास, मनोवैज्ञानिक आ शैक्षिक प्रक्रिया। १८.  आदिवासी- सतार, गिदरमारा आदि विविधता आ विकासक स्तरकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि। प्रकृतिसँ लग, प्रकृति-पूजा, सरलता, निश्छलता, कृतज्ञता। दिनकर, सामाजिक-धार्मिक उत्सव, सूर्य-चन्द्र-वृक्ष-पर्वत पूजा, पृथ्वी स्तुति आ जलाशय आ नक्षत्रक प्रति आस्था, जनक माने जन (विश)सँ निकलल, मिथिलावासीमे सेहो ई आस्था। १९.  व्यक्तिक प्रतिष्ठा स्थान-जाति आधारित। किछु प्रतिष्ठा आ विशेषाधिकार प्राप्त जाति। किछुकेँ तिरस्कार आ हुनकर जीवन कठिन। अनुसूचित जाति (११००, पहिल सरकारी सूची) +पिछड़ल जाति ३७४३ (मंडल आयोग)= ४८४३. वर्ण-व्यवस्था धार्मिक नहि सामाजिक प्रथा जकर आब कोनो उपयोग नहि। विघटनकारी तत्वक रूपमे विदेशी मानसिकता आ जड़ मानसिकता द्वारा उपयोग संभव। २०.  महिला आ बाल-विकास- महिलाकेँ अधिकार, शिक्षा-प्रणालीकेँ सक्रिय करब, पाठ्यक्रममे महिला अध्ययन, महिलाक व्यावसायिक आ तकनीकी शिक्षामे प्रतिशत बढ़ाओल जाए। गतिशील प्रबन्धन, विकास-प्रक्रियामे स्थान। स्वतंत्रता आन्दोलन आ पर्यावरण आन्दोलन, दहेज-विरोधी आन्दोलनमे सहभागिता, आर्थिक समानता लेल संघर्ष, महिला श्रमिकक बच्चा लेल बालाश्रय-गृह, बालवाड़ी, आंगनवाड़ी। प्रतिद्वंदिताक कारण कम वेतन, काज करबाक दशा प्रतिकूल, सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिसँ महत्वहीन स्थान। २१.  स्त्री-स्वातंत्र्यवाद, महिला आन्दोलन। २२.  धर्मनिरपेक्ष- राजनैतिक संस्था संपूर्ण समुदायक आर्थिक आ सामाजिक हितपर आधारित- धर्म-नस्ल-पंथ भेद रहित। धर्म-आस्था वा सामाजिक मूलक आधारपर व्यक्ति वा समूहक बीच विभाजन अस्वीकार। सभ समुदाय शक्तिक उपयोग उत्तरदायित्व आ कर्तव्यक निर्वहन जेकाँ, माने वितरणात्मक न्याय। धर्म-आस्थाक आधारपर कोनो भेद नहि आ राज्य धर्म द्वारा नियंत्रित नहि होएत। २३.  टैगोरक कलात्मकतावाद, गाँधीक नैतिकतावाद, अरविन्द घोषक रहस्यवादी आध्यात्म दर्शन, विवेकानन्दक व्यावहारिक वेदान्तवाद। २४.  विकास आर्थिकसँ पहिने जे शैक्षिक हुअए तँ जनसामान्य ओहि विकासमे साझी भऽ सकैए। एहिसँ सर्जन क्षमता बढ़ैत अछि आ लोकमे उत्तरदायित्वक बोध होइत अछि। सामुदायिक आ राष्ट्रीय जीवन। २५.  विज्ञान आ प्रौद्योगिकी विकसित आ अविकसित राष्ट्रक बीचक अंतरक कारण मानवीय समस्या, बीमारी, अज्ञानता, असुरक्षाक समाधान- आकांक्षा, आशा सुविधाक असीमित विस्तार आ आधार। एहिसँ वैयक्तिक आ राष्ट्रीय शक्तिक अभिवृद्धि होइत अछि। २६.  विधि-व्यवस्थाक निर्धन आ पिछड़ल वर्गकेँ न्याय दिअएबामे प्रयोग होएबाक चाही। न्याय पंचायतकेँ पुनःजीवन। २७.  नागरिक स्वतंत्रता- मानवक लोकतांत्रिक अधिकार, मानवक स्वतंत्र चिन्तन क्षमतापूर्ण समाजक सृष्टि, प्रतिबन्ध आ दबाबसँ मुक्ति। अधिकारक उत्पीड़नसँ बचाव। २८.  प्रेस- शासक आ शासितक ई कड़ी- सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक जीवनमे भूमिका, मुदा आब प्रभावशाली विज्ञापन एजेंसी जनमतकेँ प्रभावित कएनिहार। व्यवस्थामे स्थायित्व आ लोकतंत्रक प्रहरी आ संरक्षक। उद्योगपति प्रेसक मालिक आ सरकार शासन संचालक- प्रेसक स्वतंत्रताकेँ खतरा। नेपाल-भारत सन देश लेल ई खतरा आर बेशी। २९.  नव संस्थाक निर्माण वा वर्तमानमे सुधार, सामन्तवादी, जनजातीय, जातीय आ पंथगत निष्ठाक विरुद्ध, लोकतंत्र, उदारवाद, गणतंत्रवाद, संविधानवाद, समाजवाद, समतावाद, सांवैधानिक अधिकारक अस्तित्व, समएबद्ध जनप्रिय चुनाव, जन-संप्रभुता, संघीय शक्ति विभाजन, जनमतक महत्व, लोक-प्रशासनिक प्रक्रिया-अभिक्रम, दलीय हित-समूहीकरण, सर्वोच्च व्यवस्थापिका, उत्तरदायी कार्यपालिका आ स्वतंत्र न्यायपालिका। ३०.  जल थल वायु आ आकाश- भौतिक रासायनिक जैविक गुणमे हानिकारक परिवर्तन कए प्रदूषण, प्रकृति असंतुलन। ३१.  कला- एहि लेल कोनो सैद्धांतिक प्रयोजन होएबाक चाही ? सामाजिक संवेदनाक आ मानव क्रियाक एकटा रूप अछि कला। जगतक सौन्दर्यीकृत प्रस्तुति अछि कला। सौंदर्यक कला उपयोगिताक संग। कलापूर्णताक कलाक जीवन दर्शन- संप्रदाय संग। ३२.  भावनात्मक वातावरण- सत्यक आ कलाक कार्यक सौंदर्यीकृत अवलोकन, सुन्दर-मूर्त, अमूर्त। प्रकृति कलाविशिष्ट प्रभावशाली स्थिति, शोकजनक, हास्य, मानवक सौंदर्यक अनुभव ओकर अनुभव बिना सम्भव नहि। एहिसँ समाजक सौंदर्यीकरणक प्रति दृष्टिकोण सोझाँ अबैत अछि। ३३.  मानसिक क्रिया- मनुष्य़ सोचैबला प्राणी, मानसिक आ भौतिक दुनूक अनुभूति करएबला प्राणी। शरीर आ मस्तिष्क, दिनुका काज आ रातुक स्वप्न। ३४.  विरोधाभास वा छद्म आभास- अस्पष्टता। सैद्धांतिक लाभ। ३५.  काण्टक दर्शन- मछहरमे दू इंचक अवकाश बला जाल फेकब तँ दू इंचसँ कमबला माँछ नहि भेटत, तखन ई निर्णय जे एहि पोखरिमे दू इंचसँ छोट माँछ नहि! समीक्षकक जाल जतेक महीन होअए ततेक नीक। ३६.  बाल-किशोर साहित्य- जे बच्चा किशोर पढ़त तँ बादोमे भाषाक प्रति घुरत- नोकरी-चाकरी स्थिर भेलाक बाद। कारण स्कूल-कओलेजमे जकर विषए मैथिली नहि अछि वा मैथिली बाल साहित्य नहि पढ़ने अछि से किएक मैथिलीसँ प्रेम करत- अहाँ ओकरा लेल नहि तकबै तँ ओहो नहि ताकत। ३७.  सगर राति दीप जरए आ मैथिली समीक्षा- युद्धक कारण- सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक आ तात्कालिक। मात्र तात्कालिक रटि लिअ आ आर सभमे सभटा खरापे-खराप लिखि दियौ- आर्थिक स्थिति खराप- सामाजिक स्थिति खराप आदि। मुदा जे फ्रांसीसी क्रान्तिमे से लिखि देबै तँ ओहि समए ओतुक्का किसानक आर्थिक दशा इंग्लैंडसँ नीक रहै आ सैह फ्रांसकेँ क्रान्ति लेल सक्षम बनेलकै, प्रतिकार लेल सक्षम बनेलकै। तहिना  सगर राति दीप जरएमे समीक्षा होइए- शिल्प नीक कथ्य नीक...। ३८.  दलित साहित्य- महेन्द्र नारायण राम, बिलट पासवान विहंगम आदि केँ छोड़ि दियन्हि तँ मैथिलीमे दलित लेखक आ दलित साहित्य शून्य अछि। ३९.  खेसारी / माघ / आम आ शरद ऋतु / धूमकेतु  मोड़पर / यात्रीक उपन्यासमे आषाढ़क आ दोसर मासक तिथि दुइये पृष्ठक अन्तरपर / मोहन भारद्वाज । कुमार पवन मोड़पर पृष्ठ १- एक पाँतीसँ ठाढ़ आ कतौ अरड़ा कऽ ओलड़ि गेल धानक सीस- कोसक कोस पसरल हरियर कचोर खेसारीक गद्दा ( माने अंतिम स्थिति)- मुदा खेसारी तँ अगहनक बाद (धानक बाद- गद्दरि तँ आर पहिने होइए) होइत अछि। यात्री समग्र-पृ.२२० जेठ सुदी चतुर्दशी कऽ रहनि पीसाक वर्षी। पहिले वर्षी..पृ.. २२२- ..कहाँ जे एको दिनक खातिर जाइ, कर्ता बना, अषाढ़ बढ़ि तृतियाक तिथिपर पहिल। बलचनमाक समीक्षामे मोहन भारद्वाज लिखै छथि- क्यो यात्रीजीकेँ पुछलकन्हि जे बलचनमाक दोसर भाग लिखबा लेल..यात्री कहलखिन्ह जे बलचनमाकेँ तँ आब धोधि भऽ गेल होएतैक। यात्रीकेँ के पुछलकन्हि (काल्पनिक प्रश्नोत्तरी)- फेर जे बलचनमा पढ़ने छथि तिनका बुझल छन्हि जे बलचनमाकेँ मारि कऽ पाड़ि देल गेलै से मृत बलचनमाकेँ धोधि हेतै से यात्रीजी ओहि काल्पनिक प्रश्नकर्ताकेँ किएक कहथिन्ह। कुमार पवनक पइठ सर्वश्रेष्ठ मैथिली कथा मुदा अहूमे अन्त दुनू भाइक लड़ाइ आदि..एकर बदला दोसर लक्ष्य होएबाक चाही-जेना शोषण। संपादकीय –गजेन्द्र ठाकुर प्रस्तुत अछि २६अम सँ ५० अम अंकक चुनल संपादकीय आ रचना समग्र। २६. रामाश्रय झा “रामरंग” प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे जीक मृत्यु- हिन्दुस्तानी संगीतक गायक, शिक्षक आ वाग्यकार/ शास्त्रकार श्री रामाश्र झा “रामरंग” जीक मृत्यु १ जनवरी २००९ केँ कोलकातामे भऽ गेलन्हि। ओ ८० बरखक छलाह। संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्लीक २००५ मे पुरस्कार प्राप्त श्री रामरंगकेँ यू.पी. संगीत नाटकक फेलोशिप सेहो प्रदान कएल गेल छलन्हि। श्री रामाश्रय झा “रामरंग”क जन्म १९२८ ई. मे मधुबनी जिलाक खजुरा गाममे भेलन्हि। हिनका संगीतक प्रारम्भिक शिक्षा अपन पिता सुखदेव झासँ भेटलन्हि। बादमे ओ वाराणसीमे नाटक कम्पनीमे बहुत दिन धरि संगीत देलन्हि फेर पं भोलाराम भट्टसँ एलाहाबादमे संगीतक शिक्षा प्राप्त कएलन्हि। इलाहाबाद विश्वविद्यालयक संगीत विभागमे ई प्रोफेसर आ हेड रहलाह। रामरंग ढेर रास खयाल रचना बनओलन्हि आ कतेक रास नव रागक निर्माण कएलन्हि। हिनकर पाँच खण्डमे नव आ पुरान रागक वर्णन आ समालोचना “अभिनव गीताञ्जलि” हिनक बड्ड प्रसिद्दि प्रदान कएलकन्हि आ ई “अभिनव भातखण्डे” नामसँ प्रसिद्ध भऽ गेलाह। अपन ध्रुपद आ खयाल रचनाक आधारपर श्री “रामरंग” हनुमानकेँ समर्पित “संगीत रामायण”क रचना सेहो कएलन्हि। मैथिलीमे “विदेह” ई पत्रिका लेल पठाओल हिनकर “राग विद्यापति कल्याण”, “राग तीरभुक्ति”, “राग वैदेही भैरव” आदि नव राग आ ओहिपर आधारित मैथिली भाषाक रचना पाठकक मोनमे एखनो अछि। हुनकर स्मरण: एहि पंक्तिक लेखकक संग वार्तालापमे रामरंग जी अपन जीवनक समस्त अनुभव कहि सुनेने रहथि। रामरंग जीकेँ हजारो रचना कंठस्थ मोन छलन्हि मुदा बादमे हुनकर हाथ थरथड़ाइत छलन्हि आ ओ वार्ताक क्रममे कहनहिओ छलाह जे- के सीखत आ के लिखत। २७ मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली द्वारा गणतंत्र दिवसक अवसरपर कविता महोत्सवक आयोजन कएल गेल। मैथिलीमे रमण कुमार सिंह, सारंग कुमार, रवीन्द्र लाल दास, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, कामिनी कामायनी आ गंगेश गुंजन जीक काव्य-पाठ भेल। मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली द्वारा मैथिलीमे विद्यापति सम्मान आ भोजपुरीमे भिखारी ठाकुर सम्मान एक-एकटा, जे प्रत्येक 51-51 हजार टाकाक सम्मान राशिक होइत, साहित्यकार/ कलाकार/ संस्कृतिकर्मीकेँ देल जाएत। अकादमी द्वारा मैथिली आ भोजपुरीमे अलग-अलग पत्रिकाक सेहो प्रकाशन होएत जाहिमे कथा, कविता, लेख, निबन्ध, समीक्षा आ सर्जनात्मक टिप्पणी प्रकाशित कएल जाएत। मैलोरंग सेमीनारमे सुभाषचन्द्र यादवजी फील्डवर्कक आधारपर लोककथा लिखबाक आग्रह कएने छलाह कारण अपन दादी-मैयाँसँ सुनल कथा क्षेत्रमे पसरल कथाक विभिन्न स्वरूपकेँ ग्रहण करबामे सक्षम नहि होइत अछि। विदेह द्वारा एहि सम्बन्धमे काज शुरू भ' गेल अछि आ शीघ्र एकर परिणाम ई-पत्रिकामे देखबामे आएत। २८ मैथिलीक पुरोधा जयकान्त मिश्र (1922-2009) क 3 फरबरी 2009 केँ सात बजे साँझमे निधन भ' गेलन्हि। मैथिली साहित्यक एकटा बड़ पैघ विद्वान डॉ. जयकांत मिश्र 1982 ई. मे इलाहाबाद विश्वविद्यालयक अंग्रेजी आ आधुनिक यूरोपियन भाषा विभागक प्रोफेसर आ हेड पदसँ सेवा निवृत्त भेल छलाह। तकरा बाद ओ चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालयमे भाषा आ समाज विज्ञानक डीन रूपमे कार्य कएलन्हि। स्व. मिश्र अखिल भारतीय मैथिली साहित्य समिति, इलाहाबादक अध्यक्ष, गंगानाथ रिसर्च इंस्टीट्यूट, इलाहाबादक अवैतनिक सचिव आ सम्पादक, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयागक प्रबन्ध विभागक संयोजक आ साहित्य अकादमी, नई दिल्लीक मैथिली प्रतिनिधि आ भाषा सम्पादक रहल छलाह। मैथिली साहित्यक इतिहास, फोक लिटेरेचर ऑफ मिथिला, कीर्तनिया ड्रामा सभक क्रिटिकल एडीशन, लेक्चर्स ऑन थॉमस हार्डी, लेक्चर्स ऑन फोर पोएट्स आ द कॉम्प्लेक्स स्टाइल इन एंगलिश पोएट्री हिनक लिखित किछु ग्रंथ अछि। हिनकर वृहत मैथिली शब्द कोष मात्र दू खण्ड प्रकाशित भए सकल, जाहिमे देवनागरीक संग मिथिलाक्षर आ फोनेटिक अंग्रेजीमे सेहो मैथिली शब्दक नाम रहए। ई दुनू खण्ड मैथिली शब्दकोष संकलक लोकनिक लेल सर्वदा प्रेरणास्पद रहत। डॉ. रामभरोस कापड़ि “भ्रमर” जीकेँ नेपालक एकमात्र सरकारी प्रकाशन संस्था “साझा प्रकाशन”क चेयरमैन नियुक्त कएल गेल छन्हि। साझा प्रकाशनक ४५ बरखक इतिहासमे ई पहिल बेर भेल अछि जे कोनो मधेसीकेँ ई सम्मान भेटल छन्हि। भ्रमर जीक कार्यभार सम्हारिते विद्यापतिक फोटो प्रकाशित कएल गेल अछि आ आगाँ नेपालीक लेल मात्र काज केनिहार एहि संस्थासँ मैथिलीमे व्याकरण, शब्दकोष, बालकथा, कथासंग्रह आदि प्रकाशित कएल जएबाक योजना अछि। २९ सामाजिक तथा सांस्कृतिक विषए वस्तुपर केन्द्रित हेल्लो मिथिला कार्यक्रम प्रत्येक शनि कऽ नेपाली समयानुसार राति ९.३० बजेसँ ११ बजेधरि आ राजनीतिक विषए वस्तुपर केन्द्रित चौबटिया कार्यक्रम प्रत्येक सोम कऽ राति १० सँ ११ बजेधरि प्रसारण होइत छैक। स्मरणीय अछि जे नेपाली समए भारतीय समएसँ १५ मिनट पाछाँ अछि। ई कार्यक्रम इन्टरनेटपर www.kfm961.com पर सुनल जा सकैत अछि। शनि दिन हम एकरा सुनलहुँ बिना कोनो व्यवधानक। दिनांक 16.02.2009 केँ मैथिली मंडनक तत्वावधानमे 'मैथिली युवा लेखन दशा आ दिशा' विषएपर शहीद भगत सिंह कॉलेज, नई दिल्लीमे एकटा संगोष्ठीक आयोजन कएल गेल। एहि अवसरपर देशक विभिन्न भागसँ आएल टटका पीढीक सक्रिय भागीदारी रहल। बनारससँ आएल 'नवतुरिया' केर संपादक अरुणाभ, कटिहार (बिहार) सँ रोहित झा, दिल्लीसँ अलोक रंजन, मिथिलेश कुमार राय, फिरदौस, धर्मवत चौधरी, देवांशु वत्स, सेतु कुमार वर्मा प्रमुख वक्ता छलाह। ऑडियो कोंफ्रेंसिंग क' जरिये गाजियाबादसँ मैथिली आ हिंदीक प्रख्यात कथाकार - संपादक अनलकांत ( गौरीनाथ ) आ सहरसासँ चर्चित युवा कथाकार - कवि अखिल आनंद सभा स' जुड़लैथ. संगोष्ठीक संचालन युवतम रचनाकार कुमार सौरभ केलथि। ३० स्व. अनिलचन्द्र ठाकुर जीक जन्म 13 सितम्बर 1954 ई.केँ कटिहार जिलाक समेली गाममे भेलन्हि। 1982 ई.मे हिन्दी साहित्यमे स्नातकोत्तर केलाक बाद नवम्बर '93 सँ नवम्बर '94 धरि "सुबह" हस्तलिखित पत्रिकाक सम्पादन-प्रकाशन कएलन्हि आ कोशी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकमे अधिकारी रहथि। मैथिली, अंगिका, हिन्दी आ अंग्रेजीमे समानरूपेँ लेखन। मृत्युक पूर्व ब्रेन ट्यूमरसँ बीमार चलि रहल छलाह। प्रकाशित कृति: आब मानि जाउ(मैथिली उपन्यास)- पहिने भारती-मंडन पत्रिकामे प्रकाशित भेल, फेर मैलोरंग द्वारा पुस्तकाकार प्रकाशित भेल। कच( अंगिकाक पहिल खण्ड काव्य,1975)। ३१ २९ मार्च २००९ केँ मैथिली-भोजपुरी अकादमी द्वारा दिल्लीमे सेमीनार भेल, जाहिमे समकालीन रचनाकारक दायित्वपर गोष्ठी भेल। मोहन भारद्वाज, विदित, प्रदीप बिहारी, नीता झा आदि वक्ता भाग लेलन्हि। सांझमे मिथिलांगन द्वारा रोहिणी रमण झा लिखित आ संजय चौधरी द्वारा निर्देशित नाटक "किंकर्तव्यविमूढ्" मंचित भेल। ३२ मैथिली भाषा-भाषी मध्य काठमाण्डू, ललितपुरमे भेल अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलनक बेश चरचा भेल। राजनैतिक एजेन्डाक अतिरिक्त ओहि अवसरपर प्रधानमन्त्री प्रचण्ड द्वारा मैथिली भाषा, संस्कृतिमे योगदान देनिहार व्यक्तित्वकेँ सम्मानित कएने रहथि । सम्मेलनमे संस्थागत सुदृढिकरणकर्ता मुखीलाल चौधरी, रंगकर्मी रन्जु झा आ मैथिली पढाइ उत्प्रेरक कार्यदल राजविराजकेँ सम्मानित कएल गेल । तहिना भारत बिहारक रहिका निवासी मैथिली आन्दोलन अगुवा चुनचुन मिश्र आ लोकसाहित्यकार डा महेन्द्रनारायण रामकेँ सम्मानित कएल गेलनि।काठमाण्डूमे मैथिलीक महाकवि विद्यापतिके स्मारक बनएबामे सहयोग करबाक प्रतिबद्धता ओ व्यक्त कएलनि ।नेपाल पत्रकार महासंघक अध्यक्ष धर्मेन्द्र झा देशमे संघीय राज्यप्रणाली हएबाक तय रहल अबस्थामे मिथिला राज्यपर जोड देल जएबाक चाही से कहलनि ।सम्मेलनमे मधेशी जनअधिकार फ़ोरमक सह अध्यक्ष एवं कृषि तथा सहकारीमन्त्री जयप्रकाश प्रसाद गुप्ता मधेशीक मूल समस्या आन्तरिक औपनिवेशीकरण रहल बतौलनि ।अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषदक उपाध्यक्ष तथा प्रवक्ता धनाकर ठाकुर कहलनि 'मिथिलावासीक संघर्षसँ मात्र मिथिला राज्यक स्थापना हएत' ।परिषदक अध्यक्ष भुवनेश्वर गुरमैताक सभापतित्वमे भेल उदघाटन कार्यक्रममे सम्मेलनक संयोजक रामरिझन यादव सम्मेलनक औचित्यक विषएमे बाजल रहथि । तहिना कमलकान्त झा, सम्मानित महेन्द्र नारायण राम, मुखिलाल चौधरी अपन मन्तव्य व्यक्त कएने रहथि । उदघाटन कार्यक्रमक बाद मैथिली सास्कृतिक कार्यक्रम भेल छल । ओतुक्का नव सविधान सभामे मिथिला राज्यक अस्तित्वमे अनबाक प्रयास जोरपर अछि मुदा भारतमे विभिन्न कारणसँ ई प्रयास शिथिल अछि। प्राथमिक शिक्षा यावत धरि मैथिलीमे नहि देल जाएत तावत धरि कोनो तरहक बौद्धिक आ सांस्कृतिक लगाव मैथिलगणमे नहि जगतन्हि। रोजी-रोटीक जोगाड़मे सभ किछु गौण पड़ि गेल अछि। ३३ मैथिली पत्रिका “मिथिला दर्शन". नव रूप-रंगमे संपूर्ण पारिवारिक पत्र जाहिमे आर्थिक लेखक संग नेना-भुटका लेल कथा-कविता, महिला स्तम्भक अन्तर्गत भानस-भात आ साज-श्रृंगार, समीक्षा-लेख, पोथी-परिचय, सुश्रुषामे डॉक्टरी सलाह आ नियमित कथा-कविता सम्मिलित अछि। एहि पत्रिकाक स्थापना १९५३ ई.मे भेल रहए आ प्रतिष्ठाता सम्पादक- प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह आ डॉ. अणिमा सिंह रहथि । आब एकर प्रधान सम्पादक- नचिकेता आ कार्यकारी सम्पादक- रामलोचन ठाकुर छथि। कला सम्पादक छथि डॉ. रमानन्द झा’रमण’। श्री शम्भु कुमार सिंह आ श्री अजित मिश्र एहिमे सम्पादकीय सहयोग द' रहल छथि। आ सम्पादकीय उपदेष्टा छथि पन्ना झा, रामचन्द्र खान, भीमनाथ झा, सुभाष चन्द्र यादव आ कुणाल। चित्रकार छथि चन्दन विश्वास। डॉ. अणिमा सिंह द्वारा ई प्रकाशित आ मुद्रित कएल जा रहल अछि। ३४ आ जे समाज बदलत तँ सामाजिक मूल्य सनातन रहत? प्रगतिशील साहित्यमे अनुभवक पुनर्निर्माण करब, परिवर्तनशील समाज लेल। जाहिसँ प्राकृतिक आ सामाजिक यथार्थक बीच समायोजन होअए। आकि एहि परिवर्तनशील समएकेँ स्थायित्व देबा लेल परम्पराक स्थायी आ मूल तत्वपर आधारित कथाक आवश्यकता अछि। व्यक्ति-हित आ समाज-हितमे द्वैध अछि आ दुनू परस्पर विरोधी अछि। एहिमे संयोजन आवश्यक। विश्व दृष्टि आवश्यक। कथा मात्र विचारक उत्पत्ति नहि अछि जे रोशनाइसँ कागतपर जेना-तेना उतारि देलियैक। ई सामाजिक-ऐतिहासिक दशासँ निर्दिशित होइत अछि। ३५ कवि-कथाकार मैथिलीकेँ अपन कैरिअर बना लेलन्हि, घरमे मैथिलीकेँ निष्कासित क' सेमीनारक वस्तु बना देलन्हि। तखन कतए पाठक आ कोन विवाद! जे समस्या हम देखि रहल छी जे बच्चाकेँ मैथिलीक वातावरण भेटओ आ सभ जातिक लोक एहि भाषासँ प्रेम करथि ताहि लेल कथा आ कविता कतए आगाँ अछि? कएकटा विज्ञान कथा, बाल-किशोर कथा-कविता कैरियरजीवी कवि-कथाकार लिखि रहल छथि। आ ओ घर-घरमे पहुँचए ताहि लेल कोन प्रयास भ' रहल अछि? सए-दू सए कॉपी पोथी छपबा क' तकर समीक्षा करबा क' सए-दू सए कॉपी छपएबला पत्रिकामे छपबा क' तकर फोटोस्टेट कॉपी घरमे राखि फोल्डर बना कऽ पुरस्कार लेल राखि रहल छथि। सिलेबसमे अपन किताब लगेबा लेल कएल गेल तिकड़मक वातावरणमे हमर आस गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखकपर जा कऽ स्थिर भऽ गेल अछि। ३६ श्री ताराकान्त झाकेँ २००८ केर साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार "संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र"-गोपीचन्द नारंग, उर्दूसँ मैथिली अनुवादपर प्रदान कएल गेल छन्हि। श्री ताराकान्त झा पत्रकारितासँ जुड़ल छथि। पत्र-पत्रिकामे निबन्धक अतिरिक्त बंगलासँ हिन्दी आ बंग्लासँ मैथिलीमे एकाधिक पोथी प्रकाशित भेल छन्हि। श्री ताराकान्त झा संप्रति मैथिली दैनिक "मिथिला समाद"क सम्पादक छथि। ३७ पॉँच करोड़ मैथिल भाषीक् लेल: "सौभाग्य मिथिला " मैथिलीमे आब 24x7 चैनल आबि गेल अछि। प्रारम्भ भेल अछि सौभाग्य मीडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा। आब ई'सौभाग्य मिथिला' चैनल पाँच करोड़ मैथिल भाषीकेँ ध्यानमे राखि आनल गेल अछि आ ई चैनल संपूर्ण मैथिली इंटरटेनमेंट चैनल अछि। मैथिल परंपरा, बोली, साहित्य,संस्कृति, गीत-संगीत आ लोक जीवनकेँ संपूर्णताक संग एहि चैनलपर उतारल गेल अछि। सभ उम्र आ वर्गक लोककेँ ध्यानमे रखैत प्रोग्राम तैयार कएल गेल अछि। एहि मैथिली मनोरंजन चैनलपर दू घंटा भोजपुरी कार्यक्रम सेहो प्रसारित कएल जाएत। सौभाग्य मिथिलापर संपूर्ण मैथिल रामायण प्रसारित कएल जाएत। एकर अतिरिक्त'फूलडालि','मैथिली मजा', 'खटमिट्ठी', 'सिंगरहार', 'भनहि विद्यापति', 'मैथिली मिक्स मसाला', 'डियर भावज', 'अंग्रेजी कका', 'सास-पुतोहु', 'अटकन-भटकन' आदि कार्यक्रम सेहो देखाओल जाएत। एहि चैनलक दिल्लीमे आफिस ए-6/1, मायापुरी फेज-1 मे अछि आ एकर अन्तरजाल पता http://sobhagyamithilatv.com/ आ ई-पत्र संकेत info@sobhagyamithilatv.com अछि। ३८ वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा ६ जुलाइ २००९ केँ प्रस्तुत भारतीय बजट २००८-०९ मे आर्थिक विकास दर ६.७ प्रतिशत रहल होएबाक सम्भावना व्यक्त कएल गेल अछि। एहि बेर करदाता लेल बेसिक छूट एक लाख ५० हजार टाकासँ बढ़ाकऽ एक लाख ६० हजार कएल गेल अछि। आयकरपर दस प्रतिशत सरचार्ज हटा लेल गेल अछि। सरकार नोट छापिकऽ निवेश करत। रोजगार गारंटी योजनामे विस्तार कएल जएत, २५ किलो अनाज तीन टाका प्रति किलोक दरपर उपलब्ध कराओल जएत। किसान आ लघु उद्योगकेँ सस्ता कर्ज भेटत। निर्यात दबावमे रहने अर्थव्यवस्थामे सुस्ती अछि। खाद आ डीजलपर राहत देल जएत। प्रत्येक राज्यमे एक केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करबाक योजना अछि। नव आई.आई.टी. आ एनआईटी लेल ४५० करोड़ टाका खर्च करबाक योजना अछि। आयमे कृषिक हिस्सा जे १९४७ मे ५६ प्रतिशत छल से आइ १८ प्रतिशत भऽ गेल अछि। बजटक आर मुख्य विशेषता एहि प्रकारेँ अछि:-लॉ फर्मपर सर्विस टैक्स, आयकर छूटक सीमा महिला लेल भा.रु. १,९०,०००/- आ वरिष्ठ नागरिक लेल भा.रु.२,४०,०००/- कएल गेल, ग्रामीण सड़कक लेल १२,००० करोड़ रु. आबंटित, हृदय रोग सम्बन्धी दवाइ सस्ता हएत, बायो-डीजलपर कस्टम ड्यूटी घटत आ सोना-चानीपर बढ़त, कॉमनवेल्थ गेम लेल १६,३०० करोड़ रु. देल गेल, राष्ट्रीय गंगा प्रोजेक्ट लेल ५६२ करोड़ रु. आबंटित, यू.आइ.डी.(यूनीक आइडेन्टिफिकेशन प्रोजेक्ट) नंदन नीलेकनीक अध्यक्षतामे शुरू कएल जएत, अप्रैल २०१० सँ गुड्स आ सर्विसेज टैक्स प्रारम्भ आ पुनः ९% आर्थिक विकास दर प्राप्त कएल जएत। नेपालमे सेहो वित्तमंत्री सुरेन्द्र पाण्डेय १३ जुलाई २००९ केँ प्रस्तुत अपन बजट(२००९-१०, वि.सं.२०६६-६७) मे किसान लेल ५००० लाख ने.रु. सब्सिडी लेल देलन्हि। मैथिली, भोजपुरी, थारू, लापचा, लिम्बू आ धीमाल भाषायी क्षेत्रमे कला-गामक विकास करबाक योजना अछि। २५०० लाख ने.रु. जनकपुर, राजबिराज, हुमला, मुगु, कालीकोट आ डोलपा हवाइ अड्डाक विकासार्थ देल गेल अछि। नव संविधानक ड्राफ्ट तैयार करबामे सभक सहयोग लेबाक आ शान्ति प्रक्रिया आगू बढ़ेबाक संकल्प सेहो व्यक्त कएल गेल। बिराटनगर रिंग रोड आ जनकपुर परिक्रमा (रिंग रोड) सड़ककेँ नीक बनाओल जएत। जनकपुरमे राजश्री जनक विश्वविद्यालयक स्थापना कएल जएत। धालकेबार-जनकपुर रोड अगिला वित्त वर्षधरि पूर्ण कऽ लेल जएत। डोम, मुसहर, चमार, दुसाध, खतबे आ गरीब मुस्लिम लेल सिरहा, सप्तरी आ कपिलवस्तु जिलामे एक-एक हजार घर (पूरा ३००० घर) बनाओल जएत। दलित आ गरीब मुसलमानक अठमा पास बालिका लेल (परसा, बारा, रौतहट, सरलाही, महोत्तरी, धनुषा, सिरहा आ सप्तरी जिलामे) स्कॉलरशिप देल जएत जाहिसँ ओ अपन पएरपर ठाढ़ भऽ सकथि। जाहि कोनो तकनीकी इंस्टीट्यूटमे ओ नामांकन लेमए चाहतीह ओहिमे हुनकर एडमिशन कम्पलशरी रूपेँ लेल जएतन्हि। उत्तर दक्षिण हाइवे (कोशी, कंकाली आ गंडकी कोरीडोर)क निर्माण कएल जएत। सिरहा, सप्तरी, उदयपुर आ सुनसरीमे कृषिक विकासक संग शिवालिक आ चूड़ पर्वत श्रृंखलाक संरक्षणपर ध्यान देल जएत। मैथिली भाषा, साहित्य आ संस्कृतिक विकासक लेल काज केनिहारकेँ पुरस्कृत करबाक लेल एक करोड़ ने.रु.क योगसँ महाकवि विद्यापति पुरस्कार गुथीक स्थापना कएल गेल अछि। ३९ "हम मैथिल" मैथिली त्रैमासिक कोलकातासँ लोकार्पित भेल अछि, जकर प्रधान सम्पादक श्री रामलोचन ठाकुर आ सम्पादक मनमोहन मिश्र 'चंचल' छथि। १२ जुलाइ २००९ कें कोलकाता सम्पर्कक मासिक बैसार नियमानुसार मासक दोसर रविकें भेल। ४० १५ अगस्त १९४७ आ १५ अगस्त २००९ मे भारतक रूपमे बहुत रास परिवर्तन आएल अछि। भारत आइ विश्वक सोझाँ एकटा एहन रूप लेने अछि, एहन छवि बनेने अछि, जकर अस्तित्व विश्वक आर्थिक मन्दीमे सेहो अविचल छैक। मुदा बहुत रास समस्या एखनो विकराल अछि। असामान्य नगरीकरण जाहिमे मात्र महानगरपर बोझ बढ़ल अछि, छोट-छोट नगरक विकास अवरुद्ध भऽ गेल अछि। गाम बिला रहल अछि। स्वाइन-फ्लू जतए कतहुसँ आएल होअए, भारतमे ई एकटा विकट रूप लऽ लेने अछि। बढ़ैत जनसंख्याक संग हमरा सभ सए-पचास नागरिकक मृत्युक बादो टेमी-फ्लू दवाइ दोकान सभमे बिक्री लेल नहि दऽ सकल छी। सरकार द्वारा जारी डॉक्टर सभक मोबाइल नम्बरक सूची, जाहिमे एम्स आ आर पैघ हॉस्पीटल सम्मिलित अछि, आश्चर्यजनक रूपसँ स्विच-ऑफ रहैत अछि, तखन विज्ञापनपर ओतेक पाइ खर्च कऽ के की होएत? देखू.. ४१ पञ्जी डाटाबेस-(डिजिटल इमेजिंग /अंकन/ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यंतरण/ संकलन/ सम्पादन- गजेन्द्र ठाकुर,नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा प्रणीत एहि पुस्तकक कारण आवरण देवानन्द प्रसिद्ध छोटी झा पञ्जीकारजीक हस्ताक्षर जे १७६६ केर अछि, केर सेहो प्रयोग भेल अछि आ हुनक पितामह पज्ञीकार रघुदेव झाक लिखल माण्डर मूलक पोथीक प्राचीनतम डिजिटल इमेजिंग सेहो अछि। आर्यभट्टक विवरण- (27) (34/08) महिपतिय: मंगरौनी माण्डैर सै पीताम्ब र सुत दामू दौ माण्ड्र सै वीजी त्रिनयनभट्ट: ए सुतो आदिभट्ट: ए सुतो उदयभट्ट: ए सुतो विजयभट्ट ए सुतो सुलोचनभट (सुनयनभट्ट) ए सुतो भट्ट ए सुतो धर्मजटीमिश्र ए सुतो धाराजटी मिश्र ए सुतोब्रह्मजरी मिश्र ए सुतो त्रिपुरजटी मिश्र ए सुत विघुजटी मिश्र ए सुतो अजयसिंह: ए सुतो विजयसिंह: ए सुतो ए सुतो आदिवराह: ए सुतो महोवराह: ए सुतो दुर्योधन सिंह: ए सुतो सोढ़र जयसिंहर्काचार्यास्त्रस महास्त्र विद्या पारङगत महामहोपाध्या य: नरसिंह:।। 584(A) ४२ पञ्जीमे उपलब्ध किछु तथ्य:- महाराजाक हेतु निहुछल कन्यासँ अपन पाँजिक रक्षार्थ कन्या चोराकेँ बिआह केलापर राजा द्वारा पञ्जीकार लोकनिकेँ बजाए हुनकर नाममे तस्कर उपाधि जोड़ब, नैय्यायिक गंगेश उपाध्यायक जन्म पिताक मृत्युक ५ सालक बाद होएब, महेशठाकुरक बहिनक विआह कूच-बिहारक राजकुमारसँ होएब, कविशेखर ज्योतिरीश्वरक उपाधिक संग उल्लेख (हुनकर पाण्डुलिपि नेपालक पुस्तकालयसँ प्राप्त होएबासँ पूर्व), ओकर अतिरिक्त ढेर रास ढाकाकवि आ कवि शेखर लोकनिक विवरण, मुस्लिम आ चर्मकारसँ विवाहक विवरण आ समाजमे ओहिसँ भेल सन्ततिक प्रति कोनो दुराग्रहक अभाव, ई सभ पञ्जीमे वर्णित अछि। आर्यभट्टक विवरण- (२७) (३४/०८) महिपतिय: मंगरौनी माण्डैर सै पीताम्ब र सुत दामू दौ माण्ड्र सै वीजी त्रिनयनभट्ट: ए सुतो आर्यभट्ट: ए सुतो उदयभट्ट: ए सुतो विजयभट्ट ए सुतो सुलोचनभट (सुनयनभट्ट) ए सुतो भट्ट ए सुतो धर्मजटीमिश्र ए सुतो धाराजटी मिश्र ए सुतोब्रह्मजरी मिश्र ए सुतो त्रिपुरजटी मिश्र ए सुत विघुजटी मिश्र ए सुतो अजयसिंह: ए सुतो विजयसिंह: ए सुतो ए सुतो आदिवराह: ए सुतो महोवराह: ए सुतो दुर्योधन सिंह: ए सुतो सोढ़र जयसिंहर्काचार्यास्त्रस महास्त्र विद्या पारङगत महामहोपाध्या य: नरसिंह:।। ५८४(A)। चैतन्य महाप्रभु: रमापति उपाध्याय करमहे तरौनी मूलक छलाह। ओ बंगाल चलि गेलाह, हुकर शिष्य रहथि चैतन्य महाप्रभु।गंगेश उपाध्याय-छादन छादन, उदयनाचार्य-ननौतीवार ननौती (करियन, समस्तीपुर), महेश ठाकुरक मातृक काश्यप गोत्री सकराढ़ी मूलमे रुद झा। रमापति उपाध्याय प्रसिद्ध विष्णुपुरी, परमानन्दपुरी वत्सगोत्री करमहा मूलक तरौनी गामक चैतन्यक गुरु।बल्लाल सेनक समयमे हलायुध आ लक्ष्मणसेन-उद्योतकर। सिंहाश्रम मूलक म.म. हलायुधसँ १२ पुस्त पूर्व माण्डर मूलक बीजी म.म. त्रिनैन भट्ट (४०० ए.डी.लगभग) एहि पोथीक प्रस्थान बिन्दु अछि(पृष्ठ १८)। हलायुध आ नरसिंह समकालीन छलाह। नरसिंह (माण्डर मूल)सँ १२ पुस्त पूर्व त्रिनैन भट्टमे। ४३ नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कविता संकलन अक्खर खम्भा (सम्पादक देवशंकर नवीन) केँ सर्वश्रेष्ठ प्रोडक्शनक पुरस्कार प्रगति मैदान दिल्लीक 2009 अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेलादिससँ देल गेल अछि। अक्खर (अक्षर ) खम्भा (संचयन) [तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा। माने जे अक्षररूपी स्तम्भ निर्माण कए ओहिपर (काव्यरूपी) मंच नहि बान्हल जाए तँ एहि त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लता (वल्लि) प्रसारित कोना होयत।] मे नामक अनुरूप ६१ कविक २९५ टा कविता संकलित अछि, अन्तमे कवि लोकनिक संक्षिप्त परिचय सेहो देल गेल अछि। एहिमे काशीकान्त मिश्र “मधुप” ( अनुक्रममे नाम बोल्डफेस नहि रहने सोझाँक पृष्ठ संख्या नहि आएल अछि) आ शिवेन्द्र दास (हिनकर संक्षिप्त परिचय सयोगसँ छुटि गेल छन्हि) सेहो सम्मिलित छथि। ४४ हर्टा मुलरकेँ २००९ ई.क साहित्यक नोबल पुरस्कार रुमानियामे जनमल जर्मन लेखिका हर्टा मुलरकेँ २००९ ई.क साहित्यक नोबल पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेल अछि। १९५३ ई.मे जनमल मुलर निकोल चौसेस्कूक शासनक अप्रिय परिस्थिक निरूपणक लेल बेस चर्चित छलीह। स्टॊकहोमक स्वेडिश एकेडमी कहलक अछि जे हुनकर गद्य आ पद्य दुनू प्रशंसनीय अछि। एकेडमी कहलक अछि जे लेखिका गरीब-गुरबाक परिस्थितिक वर्णनमे पारंगत छथि। रुमानियाक जर्मन अल्पसंख्यक समुदायमे जनमल मुलर १९८७ ई. मे जर्मनी आबि गेलीह। १९८२ ई. मे हुनकर पहिल जर्मन भाषाक लघु-कथा संग्रह नादिर्स रुमानियाक जर्मन भाषी गामकेँ केन्द्रित कऽ कथा कहैत अछि, ई पोथी रुमानियामे प्रतिबन्धित कऽ देल गेल। तकर बाद ओप्रेसिव टैंगो प्रकाशित भेल। मुलर मात्र अपन मातृभाषा जर्मनमे लिखैत छथि। हुनकर द एप्वाइन्टमेन्ट उपन्यास फ्लैशबैकमे भूतकालक वर्णन करैत अछि जखन ओ ट्रामसँ रोमानियन पुलिसक इन्टेरोगेशन लेल जाइत छथि। हुनकर स्विन्गिंग ब्रेथ उपन्यास हुनकर नव्यतम रचना अछि। हुनकर पिता द्वितीय विश्वयुद्धमे भाग लेने छथि आ हुनकर माता पाँच बर्ख धरि सोवियत वर्क कैम्पमे कटने छथि। हुनकर आन पोथी सभमे द पासपोर्ट, द लैंड ऑफ ग्रीन प्लम्स आ ट्रैवलिंग ऑन वन लेग अछि। आत्म-केंद्रित आ आइ-माइमे लागल अमेरिकी साहित्य लेल साहित्यक नोबल पुरस्कारक लगातार तेसर बर्ख यूरोपकेँ जाएब एकटा चेतौनीक रूपमे देखल जा रहल अछि। नोबल पुरस्कार 2009-वेंकटरमन रामकृष्णन भारतीय मूलक अमेरिकी नागरिक वेंकटरमन रामकृष्णनकेँ 2009 ई.क रसायनशास्त्रक नोबल पुरस्कारसँ संयुक्त रूपसँ सम्मानित कएल गेल अछि। हुनका ई पुरस्कार हुनकर एहि रिसर्च लेल जे सभ सेलमे जीनक ब्लूप्रिंट होइत अछि जकरा राइबोजोम जीवित पदार्थमे बदलैत अछि जे प्रोटीन बनबैत अछि। एहिसँ एंटीबायोटिक रिसर्चमे प्रगति होएत। अल्मोड़ा, उत्तराखण्डमे जनमल रोनाल्ड रॉसकेँ हुनकर मलेरियापर खोज लेल 1902ई.मे मेडिसीनक नोबल भेटल। बम्बैमे जनमल ब्रिटिश रुडयार्ड किपलिंगकेँ 1907 ई.क साहित्यक नोबल भेटल। 1913 ई. मे रवीन्द्रनाथ ठाकुरकेँ गीतांजली- (बांग्ला पद्य-संग्रह) लेल जकरा संवेदनशील, नव आ सुन्दर पद्य कहल गेल रहए-साहित्यक नोबल भेटल रहए। 1930 ई. मे चन्द्रशेखर वेंकटरमन केँ भौतिकीक नोबल- "प्रकाश किरणक बिन नमरएबला पसार"पर देल गेल। 1968 ई. मे भारतीय मूलक अमेरिकी नागरिक डॉ. हरगोविन्द खुरानाकेँ मेडिसीनक नोबल हुनकर गेनेटिक कोडक विश्लेषण आ ओकर प्रोटीन- संश्लेषण संबंधी कार्यपर देल गेल। 1979 ई. मे अल्बानिया मूलक भारतीय नागरिक मदर टेरेसाकेँ शांतिक नोबल हुनकर गरीबी आ दुखसँ संघर्ष लेल- जे शांतिक लेल खतरा अछि, देल गेल। अविभाजित भारतमे जनमल अबदुस सलामकेँ इलेक्ट्रोवीक यूनीफिकेशन पर 1979 ई. मे भौतिकी नोबल भेटल। 1983 ई. मे भारतीय मूलक अमेरिकी नागरिक सुब्रह्मण्य़म चन्द्रशेखरकेँ भौतिकी नोबल तरेगणक सैद्धांतिक स्वरूप आ निर्माण-विसाकपर देल गेल। 1998 ई.क अर्थशास्त्रक नोबल भारतीय अमर्त्य सेनकेँ कल्याणकारी अर्थशास्त्र लेल देल गेल। 2001 ई. मे साहित्यक नोबल भारतीय मूलक त्रिनिदादमे जन्मल ब्रिटिश वी.एस.नैपॉलकेँ भेटल। 2007 ई. मे संयुक्त राष्ट्र संघक मौसम परिवर्तनक पैनेलकेँ शांतिक नोबल भेटल जकर अध्यक्ष आर.के.पचौरी छलाह। ४५ एहि बर्खक (२००९) यात्री-चेतना पुरस्कार श्री प्रेमशंकर सिंहकेँ देल गेल अछि। चेतना समितिक संस्थापक आ वरेण्य अक्षरपुरुष वैद्यनाथ मिश्र “यात्री”क स्मृतिमे चेतना समिति द्वारा स्थापित मैथिली भाषा आ साहित्यक क्षेत्रमे महत्वपूर्ण अवदान लेल वर्ष २००० ई.सँ प्रतिवर्ष यात्री चेतना पुरस्कार देल जाइत अछि। एहि पुरस्कारक राशि पाँच हजार टाका अछि। पूर्वमे ई पुरस्कार २००० ई.मे पं.सुरेन्द्र झा “सुमन”, दरभंगा; २००१ ई. लेल श्री सोमदेव, दरभंगा; २००२ लेल श्री महेन्द्र मलंगिया, मलंगिया; २००३ लेल श्री हंसराज, दरभंगा; २००४ लेल डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्मा, पटना; २००५ लेल श्री उदय चन्द्र झा “विनोद”, रहिका, मधुबनी; २००६ लेल श्री गोपालजी झा गोपेश, मेंहथ, मधुबनी; २००७ लेल श्री आनन्द मोहन झा, भारद्वाज, नवानी, मधुबनी; २००८ लेल श्री मंत्रेश्वर झा, लालगंज, मधुबनीकेँ देल गेल अछि। कवि कीर्तिनारायण मिश्रक परिवारक सदस्य द्वारा चेतना समितिक नामे जमा निश्चित राशिपर ब्याजसँ २००८ ई.सँ मैथिलीमे प्रकाशित आधुनिक बोधक उत्कृष्ट मौलिक कृतिपर कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान २००८ सँ प्रारम्भ भेल अछि। एकर अन्तर्गत ११,००० टाका देल जाइत अछि। कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान २००८ ई. लेल ई श्री हरेकृष्ण झाकेँ हुनकर कविता संग्रह “एना तँ नहि जे” आ २००९ लेल श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”केँ हुनकर नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश लेल देल गेलन्हि। नो एण्ट्री: मा प्रविश विदेहक ८म सँ १५म अंक धरि ई-प्रकाशित भेल छल आ एकरा पाठकक अपार स्नेह भेटल रहैक। ४६ अपन सफलताक आकलन अनका प्रति कएल सेवासँ नापू नञि की ओहि वस्तुसँ जे अहाँ अनका हानि पहुँचा कऽ प्राप्त केने छी। धोखा देनाइ खराप गप छियै् धोखा खेनाइ नहि। साक्षात्कार केना लेबाक चाही ओहिमे की की आवश्यक बिन्दु छै से अवश्य सीखू। अफवाह सुनू मुदा अपना दिससँ ओहिमे कोनो वृद्धि वा योगदान नहि देल करू। अपन बच्चाक चिन्ता वा भएपर ध्यान देल करू। अपन माएक संग बहस नहि करू। सभटा सुनलाहा चीजपर विश्वास नहि करू। अहाँ लग जतेक पाइ अछि ओहिमेसँ किछु बचा कए खर्च करू। बूढ़-पुरानक संग भद्र व्यवहार करू। बुराइ आ अन्यायकेँ कखनो बर्दास्त नहि करू। प्रशंसात्मक पत्रकेँ सम्हारिकेँ राखू। कोनो सेमीनारमे भाषण देलाक बादे छपल भाषण वितरित करू। बिआहक बादेसँ अपन बच्चाक शिक्षा लेल पाइ बचेनाइ शुरू कऽ दिअ। माता-पिता अपन बच्चाकेँ आत्मनिर्भर रहनाइ सर्वदा सिखाबथु। अहाँ तखने मानसिक रूपसँ स्वतंत्र भऽ सकब जखन अपन समस्याक समाधान लेल दोसराक मुँहतक्की नहि करब। विआह वा बच्चाक पोषण ओतेक भरिगर चीज नहि छैक। जखन अहाँ हँसब तँ स्वतः अहाँ सुन्दर देखा पड़ब, खूब हँसू।जाधरि अहाँ नव-नव काज नहि करब ताधरि नव-नव चीज कोना सीखब? जे अहाँ कोनो काज बिना त्रुटिक करए चाहब तँ ओ काज कहियो नहि भऽ सकत। कोनो खराप भेल सम्बन्धकेँ सुधारबा लेल कतबो देरी भेलाक बादो प्रयास करबाक चाही। मानवीय भावना कोनो काज करबामे आ कतबो कठिन परिस्थितिकेँ पार पएबामे सफल होएत। कोनो मार्गक,कोनो विचारक आ कोनो कार्यक जानकारी ओहिपर आगाँ बढ़लासँ पता चलत, ओहिपर बहस कएलासँ नहि। एकटा दोस वैह अछि जे अहाँक सभ गुण-दुर्गुणसँ अवगत रहलाक बादो अहाँकेँ पसिन्न करैत अछि। ४७ अपन ज्ञान आ अनुभवकेँ सर्वदा बाँटू आ अपन वाक्, कर्म आ निर्णयमे हरदम नम्र रहू। अहाँक मित्रक लेल जे कियो नीक शब्दक प्रयोग करै छथि तँ तकर जनतब मित्रकेँ अवश्य कराऊ। जे अहाँ बुझने सही काज छैक तकरा अवश्य करू। पहिचान बनबए लेल काज नहि करू वरन् तेहन काज करू जकरा लोक चीन्हि सकए आ मोन राखए। जीवनक पैघ-पैघ परिवर्तन बिना कोनो चेतौनीक अबैत छैक। अपन बच्चाकेँ ई सिखाऊ जे कोनो व्यक्तिक कमीकेँ कम कऽ कए नहि मूल्यांकन करए। जे कोनो काज अहाँ करै छी तकरा मोनसँ करू। कोनो नाटक खतम भेलापर थोपड़ी बजबैमे सर्वदा आगू रहू। सोचू, ओहिपर विश्वास करू, सपना देखू आ ओकरा पूर्ण करबाक साहस राखू। ४८ श्री उमानाथ झाक (1923-2009)निधन 07-12-2009 केँ भऽ गेलन्हि। जन्म:-01-01-1923, मृत्यु07-12-2009 महरैल, भधुबनी ।भूतपूर्व अङरेजी विभागाध्यक्ष एवं प्रति-कुलपति मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा । रचना:-रेखाचित्न, अतीत (कथा संग्रह); मैथिली नवीन साहित्य, इन्द्र धनुष, विद्यापति गीतशती (सम्पादन)। ४९ मैथिली लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार 2009- स्व.मनमोहन झाकेँ कथा संग्रह गंगापुत्रपर देल गेल छन्हि। मनमोहन झाक जन्म 1918 ई. मे सरिसबमे भेलन्हि आ मृत्यु 2009 ई. मे भेलन्हि। हिनकर रचना सभ छन्हि- अश्रुकण, वीरभोग्या, मिथिलाक निशापुरमे, गंगापुत्र। एहि बेरसँ पुरस्कार राशि बढ़ा कए एक लाख टाका कऽ देल गेल अछि। पुरस्कार 16 फरबरी 2010 केँ देल जाएत। ५० मैथिलीक स्वॉट Strenghth- Weakness- Opportunity- Threat (SWOT) एनेलेसिस आ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन मैनेजमेन्टमे एकटा विषए छैक स्वॉट अनेलिसिस। मैथिलीक वर्तमान समस्याकेँ आ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनक कार्ययोजनाकेँ एहि कसौटीपर कसै छी। Strenghth- शक्ति, सामर्थ्य, बल – मैथिली लेल हृदएमे अग्नि छन्हि, से सभक हृदएमे, परस्पर एक दोसराक विरोधी किएक ने होथु। जनक बीचमे एहि भाषाक आरोह, अवरोह आ भाषिक वैशिट्यकेँ लऽ कऽ आदर अछि आ एहि मे मैथिली नहि बजनिहार भाषाविद् सम्मिलित छथि। आध्यात्मिक आ सांस्कृतिक महत्वक कारण सेहो मैथिली महत्वपूर्ण अछि। एहि भाषामे एकटा आन्तरिक शक्ति छै। बहुत रास संस्था, जाहिमे किछु जातिवादी आ सांप्रदायिक संस्था सेहो सम्मिलित अछि, एकर विकास लेल तत्पर अछि। एहि भाषाक जननिहार भारत आ नेपाल दू देशमे तँ रहिते छथि आब आन-आन देश-प्रदेशमे सेहो पसरल छथि। Weakness- न्यूनता, दुर्बलता, मूर्खता – प्रशंसा परम्परा जाहिमे दोसराक निन्दा सेहो एहिमे सम्मिलित अछि, एकरे अन्तर्गत अबैत अछि- माने आत्मप्रशंसाक। परस्पर प्रशंसा सेहो एहिमे शामिल अछि। सरकारपर आलम्बन, प्राथमिकताक अज्ञान- जकर कारणसँ महाकवि बनबा/ बनेबा लेल कवि समीक्षक जान अरोपने छथि- जखन भाषा मरि रहल अछि। कार्ययोजनाक स्पष्ट अभाव अछि आ जेना-तेना किछु मैथिली लेल कऽ देबा लेल सभ व्यग्र छथि, कऽ रहल छथि। स्वयं मैथिली नहि बाजि बाल-बच्चाकेँ मैथिलीसँ दूर रखबाक जेना अभियान चलल अछि आ एहिमे मीडिया, कार्टून आ शिक्षा-प्रणालीक संग एक्के खाढ़ीमे भेल अत्यधिक प्रवास अपन योगदान देलक अछि। मैथिलीक कार्यकर्ता लोकनिक कएक ध्रुवमे बँटल रहबाक कारण समर्थनपरक लॉबिइंग कर्ताक अभाव अछि। मैथिलीकेँ एहिअँ की लाभक बदला अपन/ अप्पन लोकक की लाभ एहि लेल लोक बेशी चिन्तित छथि। मैथिली छात्रक संख्याक अभाव। उत्पाद उत्तम रहला उत्तर सेहो विक्रयकौशलक आवश्यकता होइत छै। मैथिलीमे उत्तम उत्पादक अभाव तँ अछिए, विक्रयकौशलक सेहो अभाव अछि। Opportunity- अवसर, योग, अवकाश – विशिष्ट विषएक लेखनक अभाव, मात्र कथा-कविताक सम्बल। मैथिलीमे चित्र-शृंखला, चित्रकथा, विज्ञान, समाज विज्ञान, आध्यात्म, भौतिक, रसायन, जीव, स्वास्थ्य आदिक पोथीक अभाव अछि। ताड़ग्रन्थक संगणकक उपयोग कऽ प्रकाशन नहि भऽ रहल अछि। छात्र शक्तिक प्रयोग न्यून अछि। संध्या विद्यालय आ चित्रकला-संगीतक माध्यमसँ शिक्षा नहि देल जा रहल अछि। दूरस्थ शिक्षाक माध्यमसँ/ अन्तर्जालक माध्यमसँ मैथिलीक पढ़ाइक अत्यधिक आवश्यकता अछि। मैथिलीमे अनुवाद आ वर्तमान विषय सभपर पुस्तक लेखन आ अप्रकाशित ताड़ ग्रन्थ सभक प्रकाशनक आवश्यकता अछि। मैथिलीक माध्यमसँ प्रारम्भिक शिक्षाक आवश्यकता अछि। प्रवासी मैथिल लेल भाषा पाठन-लेखन-सम्पादन पाठ्यक्रमक आवश्यकता अछि। Threat- भीषिका, समभाव्यविपद् – हताशा, आत्महीनता, शिक्षासँ निष्कासन, पारम्परिक पाठशालामे शिक्षाक माध्यमक रूपमे मैथिलीक अभाव, विरल शास्त्रज्ञ, ताड़पत्रक उपेक्षा आ विदेशमे बिक्री, भाषा शैथिल्य, सांस्कृतिक प्रदूषण आ परिणामस्वरूप भाषा प्रदूषण, मुख्यधारासँ दूर भेनाइ आ मात्र दू जातिक भाषा भेनाइ, शिक्षक मध्य ज्ञान स्तरक ह्रास, राजनैतिक स्वार्थवश मैथिलीक विरोध ई सभ विपदा हमरा सभक सोझाँ अछि। विदेहक मैथिली साहित्य आन्दोलन मैथिलीकेँ जनभाषा बनएबाक प्रक्रममे लागल अछि। पाक्षिक रूपेँ मासमे दू बेर एहिपर विचिन्ता होइत अछि। नकारात्मक चिन्तन, परदूषण आ अभाव भाषण द्वारा ई आन्दोलन नहि अवरोधित होएत आ एकरा न्यून करबाक आवश्यकता अछि। ई सभटा ऊपरवर्णित बिन्दु प्रबन्धन-विज्ञानक कार्ययोजनाक विषए अछि, आ भाषणक नहि कार्यक आवश्यकता अछि आ से हम सभ कऽ रहल छी। सम्भाषण, मैथिली माध्यमसँ पाठन, नव सर्वांगीन साहित्यक निर्माण लेल सभकेँ एकमुखी, एक स्तरीय आ एक यत्नसँ प्रयास करए पड़त। धनक अभाव तखने होइत अछि जखन सरकारी सहायतापर आस लगेने रहब। सार्वजनिक सहायताक अवलम्ब धरू, दाताक अभाव नहि स्वीकारकर्ताक अभाव अछि। प्रबोध सम्मान २०१० जीवकान्तकेँ भेटलन्हि। एहि बेरुका पुरस्कार चयन प्रक्रियामे २१ गोटेक शुरुआती दौड़मे छलाह। पहिल बेरमे ७ गोटे बहार भेलाह (लेबल १), दोसर बेर आठ गोटे बहार भेलाह (लेबल २), तेसर दौड़मे मात्र छह गोटे बचलाह (लेबल ३)। ओहि छह गोटेक क्रम एहि प्रकारसँ रहल:- जीवकान्त: ४८ अंक सोमदेव: २२ अंक भीमनाथ झा: १७ अंक रमानन्द रेणु: १७ अंक चन्द्रभानु सिंह: १२ अंक चन्द्रनाथ मिश्र अमर: १२ अंक जज एहि प्रकारेँ रहथि: एल-१- १०/१० एल.२- ९/१० एल.३- १०/१० सभ मिला कऽ २९/३० जज जाहिमे २६ गोट जज रिपीट नहि छलाह, माने २६ विभिन्न गोटे जज छलाह। सभटा वोट एहि तरहेँ रहल: ३०*३=९० आ ३०*२=६० आ ३०*१=३० = १८० वोट छहटा कम माने १७४ टा देल गेल, जाहिमे छह गोटे जे ऊपरमे रहलथि हुनका एहिमे सँ १३१ टा वोट भेटलन्हि। जीवकान्तकेँ १७४ मे ४८ वोट भेटलन्हि-२७.५९% ( संगहि १३१ मे सँ ४८ भेल- ३६.६४%) अंतिम लेबलमे दसमेसँ आठटा जज हुनका पहिल वोट देलन्हि। जीवकान्तजीकेँ बधाई। मैथिली पत्रकारिताक विकासकेँ ध्यानमे राखि तथा युवा पत्रकारकेँ प्रोत्साहित करबाक उद्दश्यें वर्ष २०१० सँ ५०००/- टाका राशिक मिथिला दर्शन पत्रकारिता पुरस्कार आरभ कएल गेल अछि। समकालीन समस्या सम्पर्कित साहित्येतर आलेख जे मिथिला दर्शनमे प्रकाशित हएत तकरे आधारपर ई पुरस्कार देल जाएत. साल भरिक विभिन्न अंकमे प्रकाशित आलेखमे जे सर्वोत्तम होयत तेकर लेखककेँ पुरस्कृत काएल जाएत. एहि सन्दर्भमे सम्पादक मंडलक निर्णय अंतिम होयत. प्रथम मिथिला दर्शन पत्रकारिता पुरस्कार स्वस्ति foundation प्रदत प्रबोध साहित्य सम्मानक संगहि फरवरी २०११ मे प्रदान कएल जाएत. समसामयिक विषएक रचनाकार लोकनिसँ आग्रह अछि जे ओ अपन २००० शब्द तक सीमित आलेख मिथिला दर्शनक कार्यकारी सम्पादक, श्री रामलोचन ठाकुर, क पता: 2 - M , चिराग अपार्टमेन्ट, 4 इतालिगाछा रोड, कोलकाता - ७०००२८ पर पठाबथि. रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्ति 09 प्रथम : प्रियंका झा (जनकपुर ) सुश्रीप्रियंका झाक जन्म प्राचीन मिथिलाक राजधानी जनकपुर धाम नेपालमे भेलन्हि। संगहि जनकपुरेकेँ ई अपन कर्मभूमि बनेली। त्रिभूवन विश्वविद्यालयक जनकपुर कैम्पस स’कॉमर्स विषए स’अंतरस्नातक तक अहाँ अपन पढ़ाई केलहु। प्रियंकाकेँ रंगमंच धरोहरिक रूपमे हुनकर पिता श्री रमेश झासँ प्राप्त भेलन्हि। हिनक पिता मैथिली रंगमंचक अति महत्वपूर्ण हस्ताक्षर छथि । प्रियंका अपन जीवनक छोटपनेसँ मैथिली रंगमंचपर अपन महत्वपूर्ण उपस्थिति देबए लगलीह। अहाँ प्रस्तुति विधाक लेल कतेको तरहक प्रशिक्षण प्राप्त केने छी जाहिमे महत्वपूर्ण संस्थान अछि गुरुकुल, आरोहण, एक्सन एड, शिल्पी आदि। संगहि मैथिली रंगमंचक सुप्रसिद्ध संस्था मिनाप, जनकपुरसँ लगातार मैथिली रंगकर्म कऽ रहल अि‍छ। प्रियंका अखन तक लगभग 6 टा मैथिली नाटकक लगभग 37 टा प्रस्तुति आ 10 टा मैथिली सड़क नाटकक लगभग 5 सौ सँ बेसी प्रस्तुति कऽ चुकल छथि । हिनका द्वारा कएल गेल प्रमुख नाटक अछि : ओ खाली मुँह देखै छै, छुतहा घैल, ओकरा ऑगनक बारहमासा, सुनिते करैये हरान, हाय रे हमर घरबाली आ बगिया। संगहि सड़क नाटक अछि : चिन्हियौ नेपाल, लेहुआयल आँचर, नै आब नै, ककर लाल, कोंटा सिंगार आदि । द्वितीय : रूपम श्री ( सहरसा ) सुश्री रूपम श्रीक जन्म सहरसामेँ भेलन्हि। अहाँ स्नातकमे पढ़ैत छी संगहि संगीतसँ सेहो प्रभाकर कऽ रहल छी । रंगमंचसँ लगाव अहाँकेँ सुजीक प्रयाससँ 1995 सँ भेल । रूपम श्री विभिन्न संस्था संग रंगमंच कऽ रहल छथि । जाहिमे प्रमुख अछि इप्टा, पंच कोसी। हिनका द्वारा कएल गेल महत्वपूर्ण नाट्य प्रस्तुति अछि : मधुश्रावणी, कनियाँ पुतरा, पाँच पत्र । रूपम श्रीक प्रिय नाटककार छथि महेन्द्र मलंगिया आ प्रिय निर्देशक छथिन उत्पल झा। मैथिली रंगमंचमेँ काज क’र’ मे नीक लगैत अछि । 2003 मे खगौल, पटनामे अहाँकेँ सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्रीसँ सम्मानित कएल गेल, तरंग महोत्सवमे उत्कृष्ठ नृत्यक लेल द्वितीय पुरस्कार राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा सिंहदेवी पाटीलसँ अहाँ ग्रहण केलहुँ । तृतीय : कल्पना मिश्रा ( दिल्ली ) सुश्री कल्पना मिश्राक जन्म मिथिलाक नागदह गाममे भेलन्हि । बच्चेसँ कल्पना जीक लगाव संगीतसँ भऽ गेलन्हि । अहाँ शास्त्रीय संगीतक प्रशिक्षण प्रयाग विद्यापीठ संगीत समिति, इलाहाबादसँ प्राप्त केलहुँ। अहाँक शिक्षा दिक्षा बेगूसरायमे भेल। पहिने हिनक झुकाव मैथिली संगीत दिस भेल, तत्पचात ई अभिनय दिस सेहो आकर्षित भेलीह । अहाँ दिल्ली स्थित मिथिलांगन संस्थासँ रंगकर्म कऽ रहल छी। मैथिलीक संग भोजपुरी, हिन्दीमे सेहो अहाँ लगातार अपन पहचान बनेबामे सफल भेलहुँ अछि। रंगमंचक संग अहाँ लगातार फिल्म, टेलीविजनक लेल काज कऽ रहल छी। कल्पना जी कतेको मैथिली नाट्य प्रस्तुतिमे अपन अभिनय प्रतिभा देखा चुकल छथि। जाहिमे प्रमुख अछि : जट जटिन, उगना हॉल्ट, सामा चकेबा आदि। हिनक इच्छा छनि जे महिला कलाकारक प्रति मिथिला समाजक नजरियामे बदलाव अएबाक चाही। कल्पना जीक प्रिय निर्देशक छथि संजय चौधरी आ प्रिय नाटककार महेन्द्र मलंगिया । सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (http://www.box.net/shared/75xgdy37dr)बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... पंकज पराशरकेँ बैन कए विदेह साहित्य आन्दोलनसँ। निकालल जा रहल अछि। कारण नीचाँक लिंकपर देल गेल अछि। http://www.box.net/shared/75xgdy37dr विदेहमे किछु अनोनिमस ई-मेल अएलाक बाद ओकर इन्क्वायरीक बाद चेतना समिति द्वारा पंकज पराशरकेँ देल सम्मानकेँ वापस लेबा लेल आ एहि लेखककेँ बैन करबा लेल ई हमर (चेतना समितिक आजीवन मेम्बरक हैसियतसँ) आधिकारिक अनुरोध अछि आ इन्क्वायरीक विस्तृत विविचन नीचा देल जा रहल अछि। कृपया चेतना समिति एहि विषयपर अपन आपात बैसकी करए आ उचित निर्णय लए से अनुरोध। -गजेन्द्र ठाकुर इन्क्वायरीक विवरण: पाठकक सूचनाक बाद ई पता चलल अछि (आ ओकर सत्यापन कएल गेल) जे एहि लेखकक ई एहि तरहक पहिल कृत्य नहि अछि। ई लेखक पहिने सेहो Douglas Kellner क Technopolitics क पंक्तिशः अनुवाद मूल लेखकक रूपमे नामसँ ज्ञानरंजनक हिन्दी पत्रिका "पहल"मे धोखासँ छपबओलक। तकर पता चललाक बाद "पहल"मे एहि लेखकक रचनाक प्रकाशन बन्द भऽ गेल। एहि सम्बन्धमे विस्तृत आलेख विदेहक अगला अंकक सम्पादकीयमे देल जाएत। २.एहि सभ घटनाक बाद पंकज पराशरकेँ विदेहसँ बैन कएल जा रहल अछि। विदेह आर्काइवसँ "विलम्बित कइक युगमे निबद्ध" पोथीकेँ हटाओल जा रहल अछि । प्रकाशककेँ सेहो उचित पुलिसिया कार्यवाही (यदि आवश्यक हुअए तँ) लेल एहि समस्त घटनाक्रमक सूचना दऽ देल गेल अछि। ३.पाठक डगलस केलनरसँ ई-मेल kellner@gseis.ucla.edu पर "पहल" पत्रिका वा तकर सम्पादक श्री ज्ञानरंजनसँ editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in वा info@deshkaal.com पर आ दैनिक जागरणसँ nishikant@jagran.com, response@jagran.com, mailbox@jagran.com, delhi@nda.jagran.com पर सम्पर्क कए विस्तृत जानकारी लऽ सकैत छथि। डगलस केलनरक आर्टिकल गूगल सर्चपर technopolitics टाइप कए ताकि सकै छी आ पढ़ि सकै छी। पहल पत्रिकाक वेबसाइट www.deshkaal.com पर सेहो पहल पत्रिकाक पुरान अंक सभ आस्ते-आस्ते देबाक प्रारम्भ भेल अछि।

विस्तृत जानकारीक लेल सुधी पाठकगण अहाँक धन्यवाद। भविष्यमे सेहो एहि घटनाक पुनरावृत्ति नहि हुअए ताहि लेल अहाँक पारखी नजरिक आस आगाँ सेहो रहत। एहि तरहक कोनो घटनाक जानकारी हमर ई-पत्र ggajendra@gmail.com पर अवश्य पठाबी। blackmailer pankaj parashar ke viruddha google ke likhit complain usa sthit karyalaya me official channel se patha del gel chhai aa google ke Douglas Kellner se sampark karbak lel kahi del gel chhai. ehi blackmailer ke sabhta pseudo id identify kay lel gel achhi. 2. blackmailer pankaj parashar dvara pseudo id se kholal blog http://matipani.blogspot.com/ delete bhay chukal achhi. muda ee te maatra prarambh achhi. In Indian Constitution we all have certain rights, If somebody in the name of freedom of expression, in the name of Literary Criticism(????) and in the name of freedom on web is blackmailing you or abusing you then remember that the freedom is available to you too and all these are punishable cognizable offences. SAY NO TO BLACKMAIL. FOR FURTHER INFORMATION contact me at ggajendra@gmail.com 2.ANNOUNCEMENT:NATASHA FOR KIDS: IN MAITHILI WE HAVE CHEATS LIKE PANKAJ PARASHAR BUT AT THE SAME TIME WE HAVE CREATIVE PEOPLES TOO LIKE DEVANSHU VATS. VIDEHA ANNOUNCES FIRST EVER MAITHILI COMICS NATASHA BY DEVANSHU VATS- the pdf version will be sent through email to you all in a few days, the print version is available (48 cartoon sories) for just Rs. 50/- HOWEVER THE PDF VERSION can be downloaded and printed without any restriction. SO SHARE THIS NEWS WITH ALL THE MAITHILI SPEAKING KIDS IN YOUR VICINITY. and congratulate Devanshu Vats on email devanshuvatsa@gmail.com 3.VIDEHA LANGUAGE AND LITERATURE MOVEMENT IS HERE TO STAY. WE CARE FOR YOU BUT AT THE SAME TIME WE ARE STERN WITH THE INTELLECTUAL PROPERTY RIGHT THIEFS. LET THEM TRY AGAIN WE WILL EMERGE EVEN STRONGER. REGARDS GAJENDRA THAKUR VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...

अन्तर्जालपर ब्लैकमेलिंग विरुद्ध गूगल, चिट्ठाजगत आ ब्लोगवानीकेँ सूचित करू, साइबर क्राइम आ ब्लैकमेलिंग रोकबा लेल सेहो ढेर रास प्रावधान छै, विशेष जानकारी ggajendra@gmail.com पर सम्पर्क करू। अहाँसँ पत्रकार, न्यूजपेपर, पत्रिका आ हिन्दीक गणमान्य लेखकगण/ प्रोफेसर/ विश्वविद्यालय आदिकेँ एहि घटनासँ सूचित करेबाक अनुरोध अछि। विशेष जानकारी लेबाक आ देबाक लेल ggajendra@gmail.com पर सूचित करू। Reply 01/26/2010 at 01:56 PM 2 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...

you may also brought this episode before sanjay@jagran.com Thanks readers. Reply 01/26/2010 at 12:25 AM 3 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...

But this time he has not used his name as maithil, mithila aa subodhkant but as Pankaj Parashar pparasharjnu@gmail.com Reply 01/25/2010 at 09:48 PM 4 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...

The same blackmail letter has been sent by the blackmailer to my email address which has been spammed through ISP ISP address 220.227.163.105 , 164.100.8.3 aa 220.227.174.243 and has been forwarded for taking Police action immediately. Reply 01/25/2010 at 09:45 PM 5 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...

Professor Kellner has thanked me for this detective work, but it all your efforts dear reader. Reply 01/25/2010 at 08:21 PM Douglas Kellner Philosophy of Education Chair Social Sciences and Comparative Education University of California-Los Angeles Box 951521, 3022B Moore Hall Los Angeles, CA 90095-1521

Fax  310 206 6293 Phone 310 825 0977 http://www.gseis.ucla.edu/faculty/kellner/kellner.html 6 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...

pahal=- 86, aarambh -23 aa arunkamalak naye ilake me ka sambandhit prishtha pathebak lel dhanyavad pathakgan. Reply 01/25/2010 at 08:16 PM 7 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...

http://www.gseis.ucla.edu/courses/ed253a/newDK/intell.htm ehi link par douglas kellner ke lekhak anuvad pahal-86 ke page 125-131 par achhi- soochnak lel dhanyad pathakgan. Reply 01/24/2010 at 08:16 PM 8 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...

ehi ghatnakram me kono pathak lag je Arun Kamal jik kavita "Naye Ilake Me" hoinh aa Aarambh (ank 23, maithili magazine editor Sh. Rajmohan Jha (March 2000) me prakashist maithili kavita "Sanjh Hoit Gam Me" te kripya ggajendra@gmail.com par soochit karathi- Dhanyavad. Reply 01/24/2010 at 08:02 PM 9 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...

ehi ghatnakram me bahut ras aar jankari aa dher ras samarthan debak lel dhanyavad pathakgan. Reply 01/23/2010 at 11:40 PM 10 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...

विदेहक पाठकक सूचनाक बाद ई पता चलल अछि (आ ओकर सत्यापन कएल गेल) जे एहि लेखकक ई एहि तरहक पहिल कृत्य नहि अछि। ई लेखक पहिने सेहो Douglas Kellner क Technopolitics क पंक्तिशः अनुवाद मूल लेखकक रूपमे नामसँ ज्ञानरंजनक हिन्दी पत्रिका "पहल"मे धोखासँ छपबओलक। तकर पता चललाक बाद "पहल"मे एहि लेखकक रचनाक प्रकाशन बन्द भऽ गेल। एहि सम्बन्धमे विस्तृत आलेख विदेहक अगला अंकक सम्पादकीयमे देल जाएत। २.एहि सभ घटनाक बाद पंकज पराशरकेँ विदेहसँ बैन कएल जा रहल अछि। विदेह आर्काइवसँ "विलम्बित कइक युगमे निबद्ध" पोथीकेँ हटाओल जा रहल अछि आ एकटा इनक्वायरी द्वारा एहि पोथीक ( डगलस केलनर बला घटनाक्रमक बाद) जाँच किछु चुनल लेखक-पाठक द्वारा कएल जएबा धरि रहत। प्रकाशककेँ सेहो उचित पुलिसिया कार्यवाही (यदि आवश्यक हुअए तँ) लेल एहि समस्त घटनाक्रमक सूचना दऽ देल गेल अछि। ३.पाठक डगलस केलनरसँ ई-मेल kellner@gseis.ucla.edu पर "पहल" पत्रिका वा तकर सम्पादक श्री ज्ञानरंजनसँ editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in वा info@deshkaal.com पर आ दैनिक जागरणसँ nishikant@jagran.com, response@jagran.com, mailbox@jagran.com, delhi@nda.jagran.com पर सम्पर्क कए विस्तृत जानकारी लऽ सकैत छथि। डगलस केलनरक आर्टिकल गूगल सर्चपर technopolitics टाइप कए ताकि सकै छी आ पढ़ि सकै छी। पहल पत्रिकाक वेबसाइट www.deshkaal.com पर सेहो पहल पत्रिकाक पुरान अंक सभ आस्ते-आस्ते देबाक प्रारम्भ भेल अछि।

विस्तृत जानकारीक लेल सुधी पाठकगण अहाँक धन्यवाद। भविष्यमे सेहो एहि घटनाक पुनरावृत्ति नहि हुअए ताहि लेल अहाँक पारखी नजरिक आस आगाँ सेहो रहत। एहि तरहक कोनो घटनाक जानकारी हमर ई-पत्र ggajendra@gmail.com पर अवश्य पठाबी। Reply 01/22/2010 at 12:03 PM 11 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...

out of these three addresses of the spammer i.e. pkjpp@yahoo.co.in, pparasharjnu@gmail.com and pkjppster@gmail.com the address pkjpp@yahoo.co.in, is fails verification test and addresses pparasharjnu@gmail.com and pkjppster@gmail.com stands verified and confirmed. Reply 01/21/2010 at 10:00 PM 12 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...

the htpps host matches reliance communications and the corresponding email gamghar at gmail dot com and maithilaurmithila at gmail dot com is fake ids related with the actual spammers id i.e.pkjpp@yahoo.co.in, pparasharjnu@gmail.com and pkjppster@gmail.com Reply 01/21/2010 at 08:50 PM 13 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...

The office premise has been located, the blackmailer works in Dainik Jagran, Process to file complaint against Cyber Crime Act is being initiated and the organisation being taken into confidence. Reply 01/21/2010 at 06:13 PM 14 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...

maithil, mithila aa subodhkant nam se abhadra aa blackmail karay bala blackmailer ke cheenhi lel gel achhi,ISP address 220.227.163.105 , 164.100.8.3 aa 220.227.174.243 aa ban kayal ja rahal achhi, agan ohi organisation se seho sampark kayal jaayat jatay se ee email aayal achhi. Reply 01/18/2010 at 11:19 PM 15 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...

comment moderation lagoo kayal ja rahal achhi Reply 01/18/2010 at 09:27 PM 16 सुबोधकांत said...

ist Pankaj Parashar told Pranav (Son of Maithili Story writer Sh. Pradip Bihari) to translate that article (and also one by Noam Chomsky) and he promised him to publish that hindi article as translation.The young boy translated it and handed over to him but after six months Pankaj Parashar told Pranav that the translation was not upto mark and was rejected and the translation of Noam Chomsky was misplaced. Then Pranav by chance saw that article in Hindi magazine PAHAL (86th issue) and started weeping, then when everybody saw it it was detected that Pankaj Parashar was shown as author of that article, the editor of Pahal banned him and said that a pirated article of Noam Chomsky that was sent to him by Pankaj Parashar will not be published. Arun Kamal's Poem and its blatant translation in Maithili and a series of these act by Pankaj Parashar led me to ban him the he started abusing me through false ids like gamghar@gmail.com, and maithilaurmithila@gmail.com and ISPs 220.227.163.105 , 164.100.8.3 aa 220.227.174.243

2.from ISP 220.227.174.243 of Dainik Jagran he abused many times earlier too to others .doc is attached. अविनाशकेँ सेहो 220.227.174.243 आइ.एस.पी.सँ एहि प्रकारक ई-पत्र अबैत रहै मुदा ओ मामिला खतम कs देने रहथिन। ओ टिप्पणी सभ एतेक घृणित छैक जे एतए नहि देल जा रहल अछि। मैथिली साहित्य आन्दोलन मैनेजमेन्टमे एकटा विषए छैक स्वॉट अनेलिसिस। मैथिलीक वर्तमान समस्याक लेल अपन गुरुजी चमू शास्त्रीजीक सँग कएल कैम्पक योगदानकेँ स्मरण राखैत विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनक कार्ययोजनाकेँ एहि कसौटीपर कसै छी। मैथिलीक स्वॉट Strenghth- Weakness- Opportunity- Threat (SWOT) एनेलेसिस

मैथिलीक स्वॉट Strenghth- Weakness- Opportunity- Threat (SWOT) एनेलेसिस आ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन

मैनेजमेन्टमे एकटा विषए छैक स्वॉट अनेलिसिस। मैथिलीक वर्तमान समस्याकेँ आ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनक कार्ययोजनाकेँ एहि कसौटीपर कसै छी।

Strenghth- शक्ति, सामर्थ्य, बल –

मैथिली लेल हृदएमे अग्नि छन्हि, से सभक हृदएमे, परस्पर एक दोसराक विरोधी किएक ने होथु। जनक बीचमे एहि भाषाक आरोह, अवरोह आ भाषिक वैशिट्यकेँ लऽ कऽ आदर अछि आ एहि मे मैथिली नहि बजनिहार भाषाविद् सम्मिलित छथि। आध्यात्मिक आ सांस्कृतिक महत्वक कारण सेहो मैथिली महत्वपूर्ण अछि। एहि भाषामे एकटा आन्तरिक शक्ति छै। बहुत रास संस्था, जाहिमे किछु जातिवादी आ सांप्रदायिक संस्था सेहो सम्मिलित अछि, एकर विकास लेल तत्पर अछि। एहि भाषाक जननिहार भारत आ नेपाल दू देशमे तँ रहिते छथि आब आन-आन देश-प्रदेशमे सेहो पसरल छथि।

Weakness- न्यूनता, दुर्बलता, मूर्खता –

प्रशंसा परम्परा जाहिमे दोसराक निन्दा सेहो एहिमे सम्मिलित अछि, एकरे अन्तर्गत अबैत अछि- माने आत्मप्रशंसाक।

परस्पर प्रशंसा सेहो एहिमे शामिल अछि। सरकारपर आलम्बन, प्राथमिकताक अज्ञान- जकर कारणसँ महाकवि बनबा/ बनेबा लेल कवि समीक्षक जान अरोपने छथि- जखन भाषा मरि रहल अछि। कार्ययोजनाक स्पष्ट अभाव अछि आ जेना-तेना किछु मैथिली लेल कऽ देबा लेल सभ व्यग्र छथि, कऽ रहल छथि। स्वयं मैथिली नहि बाजि बाल-बच्चाकेँ मैथिलीसँ दूर रखबाक जेना अभियान चलल अछि आ एहिमे मीडिया, कार्टून आ शिक्षा-प्रणालीक संग एक्के खाढ़ीमे भेल अत्यधिक प्रवास अपन योगदान देलक अछि। मैथिलीक कार्यकर्ता लोकनिक कएक ध्रुवमे बँटल रहबाक कारण समर्थनपरक लॉबिइंग कर्ताक अभाव अछि। मैथिलीकेँ एहिअँ की लाभक बदला अपन/ अप्पन लोकक की लाभ एहि लेल लोक बेशी चिन्तित छथि। मैथिली छात्रक संख्याक अभाव। उत्पाद उत्तम रहला उत्तर सेहो विक्रयकौशलक आवश्यकता होइत छै। मैथिलीमे उत्तम उत्पादक अभाव तँ अछिए, विक्रयकौशलक सेहो अभाव अछि।

Opportunity- अवसर, योग, अवकाश –

विशिष्ट विषयक लेखनक अभाव, मात्र कथा-कविताक सम्बल। मैथिलीमे चित्र-शृंखला, चित्रकथा, विज्ञान, समाज विज्ञान, आध्यात्म, भौतिक, रसायन, जीव, स्वास्थ्य आदिक पोथीक अभाव अछि। ताड़ग्रन्थक संगणकक उपयोग कऽ प्रकाशन नहि भऽ रहल अछि। छात्र शक्तिक प्रयोग न्यून अछि। संध्या विद्यालय आ चित्रकला-संगीतक माध्यमसँ शिक्षा नहि देल जा रहल अछि। दूरस्थ शिक्षाक माध्यमसँ/ अन्तर्जालक माध्यमसँ मैथिलीक पढ़ाइक अत्यधिक आवश्यकता अछि। मैथिलीमे अनुवाद आ वर्तमान विषय सभपर पुस्तक लेखन आ अप्रकाशित ताड़ ग्रन्थ सभक प्रकाशनक आवश्यकता अछि। मैथिलीक माध्यमसँ प्रारम्भिक शिक्षाक आवश्यकता अछि। प्रवासी मैथिल लेल भाषा पाठन-लेखन-सम्पादन पाठ्यक्रमक आवश्यकता अछि।

Threat- भीषिका, समभाव्यविपद् –

हताशा, आत्महीनता, शिक्षासँ निष्कासन, पारम्परिक पाठशालामे शिक्षाक माध्यमक रूपमे मैथिलीक अभाव, विरल शास्त्रज्ञ, ताड़पत्रक उपेक्षा आ विदेशमे बिक्री, भाषा शैथिल्य, सांस्कृतिक प्रदूषण आ परिणामस्वरूप भाषा प्रदूषण, मुख्यधारासँ दूर भेनाइ आ मात्र दू जातिक भाषा भेनाइ, शिक्षक मध्य ज्ञान स्तरक ह्रास, राजनैतिक स्वार्थवश मैथिलीक विरोध ई सभ विपदा हमरा सभक सोझाँ अछि।

विदेहक मैथिली साहित्य आन्दोलन मैथिलीकेँ जनभाषा बनएबाक प्रक्रममे लागल अछि। पाक्षिक रूपेँ मासमे दू बेर एहिपर विचिन्ता होइत अछि। नकारात्मक चिन्तन, परदूषण आ अभाव भाषण द्वारा ई आन्दोलन नहि अवरोधित होएत आ एकरा न्यून करबाक आवश्यकता अछि। ई सभटा ऊपरवर्णित बिन्दु प्रबन्धन-विज्ञानक कार्ययोजनाक विषय अछि, आ भाषणक नहि कार्यक आवश्यकता अछि आ से हम सभ कऽ रहल छी। सम्भाषण, मैथिली माध्यमसँ पाठन, नव सर्वांगीन साहित्यक निर्माण लेल सभकेँ एकमुखी, एक स्तरीय आ एक यत्नसँ प्रयास करए पड़त। धनक अभाव तखने होइत अछि जखन सरकारी सहायतापर आस लगेने रहब। सार्वजनिक सहायताक अवलम्ब धरू, दाताक अभाव नहि स्वीकारकर्ताक अभाव अछि। हमरा गाममे एकटा सुरजू भाइ रहथि। लोक जखन कहैत छलै जे सरकार रोड नञि बनबैत अछि तँ ओ कहै छलखिन्ह जे गाममे सभ गोटे जकर घर सड़कक कातमे छै अपन-अपन घरक आगाँक सड़क भरि देत तँ अपने सौँसे गाममे सड़क बनि जएतै। आ हुनकर खेत बाधमे दुरगरोसँ झलकैत भेटितए- गोबर-खादसँ ऊँच कऽ कऽ भरल। सुरुजु भाइकेँ भोरसँ कड़गर रौद भेला धरि पथिये-पथिये गोबर उघैत हम देखने छी। मालवीय जी झोड़ा लऽ कऽ निकलि गेल छलाह आ विश्वविद्यालय बना लेलन्हि। हमरा सभ सेहो ओही लगनसँ कार्य करी। पंकज पराशर उर्फ.....डगलस केलनर उर्फ अरुण कमल उर्फ... डगलस केलनरक नीचाँक आलेखकक पंकज पराशर द्वारा चोरि सिद्ध कएलक जे एक दशक पहिने एहि लेखक द्वारा अरुण कमलक चोरि सँ आइ धरि हुनकामे कोनो तरहक परिवर्तन नहि आएल छन्हि। हँ, आब ओ पटना विश्वविद्यालयक प्रोफेसरक रचना चोरेबासँ आगाँ बढ़ि गेल छथि आ कैलिफोर्निया वि.वि.क प्रोफेसरक रचना चोराबए लागल छथि। एहि सन्दर्भमे हमरा एकटा खिस्सा मोन पड़ैत अछि। २०-२२ बरख पुरान सत्य कथा। दरभंगामे रहैत रही, छतपर हम आ हमर एकटा पिसियौत भाइ साँझमे ठाढ़ रही। सोझाँमे सरवनजीक घरक बाअड़ीमे खूब लताम फड़ल छलन्हि। हमर पिसियौत भाइ हुनका इशारा दऽ कहलखिन्ह जे दस टा लताम आनू। ओ बेचारे दसटा लताम तोड़लन्हि आ आबि रहल छलाह आकि रस्तामे हमसभ देखलहुँ जे एकटा छोट बच्चा संग हुनका किछु गप भेलन्हि आ ओ पाँचटा लताम ओहि बच्चाकेँ दऽ देलखिन्ह। जखन सरवन जी अएलाह तँ कहलन्हि जे ओ बच्चा हुनका भैया कहि सम्बोधित कएलकन्हि आ पाँचटा लताम मँगलकन्हि- से कोना नञि दितियैक- सरवनजीक कहब छलन्हि। आब पंकज पराशर प्रसंगमे की भेल से देखी। प्रदीप बिहारीजीक बेटा प्रणवकेँ पंकज पराशर नोम चोम्स्की आ डगलस केलनरक रचना दैत छथिन्ह आ तकर अनुवाद करबा लेल कहै छथिन्ह। बेचारा जान लगा कऽ अनुवाद कऽ दैत छन्हि, ई सोचि जे जिनका ओ चच्चा कहै छथि- जे क्रान्तिकारी विचारक छथि (मार्क्सवादी!!!) से कोनो नीक पत्रिकामे ई अनुवाद छपबा देथिन्ह। मुदा छह मासक बाद चच्चाजी कहै छथिन्ह जे नोम चोम्स्की बला रचना हेरा गेल आ डगलस केलनर बला रचनाक अनुवाद नञि नीक रहए से रिजेक्ट भऽ गेल। मुदा क्रान्तिकारी कवि (चोरुक्का सेहो विवरण नीचाँमे अछि) दुनू रचना पहल पत्रिकामे पठा दै छथि- पहल-८६ मे डगलस केलनर बला रचना छपितो छन्हि (आ से अनुवादक रूपमे नहि वरन् मूल लेखकक रूपमे) आ ओ बैन सेहो कऽ देल जाइ छथि। हमर सरवन जी एकटा बच्चा द्वारा भैया कहलापर पाँचटा लताम ओकरा दऽ दै छथिन्ह मुदा हमर पराशरजी भातिजोक पाँचटा लताम निर्लज्जतासँ छीनि लैत छथि। आ हम हुनकर खिजबीन तखन करै छी जखन ओ विदेहंमे आइडेन्टिटी बदलि हमरा गारि पढ़ैत छथि- हुनकर रियल आइडेन्टीटी नाङट करै छी। फेर सभसँ गप करै छी  आ पाठकक सहयोगसँ आरम्भ, पहल क पुरान अंक भेटि जाइत अछि जतए हिनकर कुकृत्य छन्हि।। नीचाँक लिंकपर नीचाँक सभटा आर्टिकल आ कविता आ तकर पंकज पराशर द्वारा चोरिक रचनाक पी.डी.एफ. फाइल डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। http://www.box.net/shared/75xgdy37dr सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि। Douglas Kellner Philosophy of Education Chair Social Sciences and Comparative Education University of California-Los Angeles Box 951521, 3022B Moore Hall Los Angeles, CA 90095-1521

Fax  310 206 6293 Phone 310 825 0977 http://www.gseis.ucla.edu/faculty/kellner/kellner.html Intellectuals, the New Public Spheres, and Techno-Politics The category of the intellectual, like everything else these days, is highly contested and up for grabs. Zygmunt Bauman contrasts intellectuals as legislators who wished to legislate universal values, usually in the service of state institutions, with intellectuals as interpreters, who merely interpret texts, public events, and other artifacts, deploying their specialized knowledge to explain or interpret things for publics (1987; 1992). He thus claims that there is a shift from modern intellectuals as legislators of universal values who legitimated the new modern social order to postmodern intellectuals as interpreters of social meanings, and thus theorizes a depoliticalization of the role of intellectuals in social life. ....... अरुण कमल Arun lives in Patna where he teaches English at the Science College of Patna University. नए इलाके में जहाँ रोज बन रहे नये नये मकान मैं अक्सर रास्ता भूल जाता हूँ खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़ खोजता हूँ ढहा हुआ घर और ज़मीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बायें मुड़ना था मुझे फिर दो मकान बाद बिना रंग वाले लोहे के फाटक का घर था इकमंजिला चल देता हूँ या दो घर आगे ठकमकाता रोज कुछ घट रहा है यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया जैसे वसंत का गया पतझड़ को लौटा हूँ जैसे वैशाख का गया भादो को लौटा हूँ और पूछो - क्या यही है वो घर? आ चला पानी ढहा आ रहा अकास शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देख कर पतचट्टा पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर  उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... कऽ रहल अछि भाषा भूमिक मोल

मैथिली भाषा-साहित्य के पाठक आ लेखक बंधु केँ की एहि प्रश्न सबहक उत्तर अवश्य जानबाक चाही।पतचट्टा पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर  उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... नामक एहि व्यक्तिक बहुत रास कच्चा चिट्ठा –जेना एम.ए.मे प्रथम श्रेणीमे सर्वोच्च स्थान?? पत्रकारिताक कोर्स?? ई  सभ नटबरलालक तर्जपर!! जे.एन.यू.क लड़कीसँ हिन्दी अनुवाद कराएब जे एहिसँ पतचट्टा पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर  उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ.....केँ नोकरी भेटि जएतैक आ फेर तकरा अपना नामसँ छपबा लेब, प्रणवसँ डगलस केलनरक आ नोम चोम्स्कीक अनुवाद करबाएब आ अपना नामसँ छपबा लेब, अरुण कमल, श्रीकान्त वर्मा, इलारानी सिंह। ई पतचट्टा पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर  उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... सभ लेखक सभसँ हुनकर परिवारजनसँ कहै छन्हि जे अनुवाद लेल कथा-कविता दिअ आ फेर तकरा चोरा कऽ अपना नामसँ छपबा लैत अछि। हिन्दीमे बैन भेलाक बाद मैथिलीक सेवा! गौरीनाथकेँ पहिने गारि पढ़ै छन्हि आ फेर लिखित माफी मँगै अछि। क्लेप्टोमेनियासँ ग्रसित पतचट्टा पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर  उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... क ई हाल छै जे रमण कुमार सिंहकेँ ओकरापर कविता लिखै पड़ै छन्हि ..ककरासँ की चोरेने छी जे अनिद्रा पैसि गेल? अविनाश केँ गारि  , श्रीधरम आ अनलकान्त केँ गारि , रामदेव झा केँ गारि , राजमोहन झा आ राजनन्दन लाल दास केँ गारि , सुभाषचन्द्रयादव-केदार कानन- तारानन्द झा तरुण- प्रोफेसर महेन्द्र- रमेश सभकेँ गारि- मैथिली सर्जनामे रामदेव झाकेँ गारि पढ़ैत सहरसा चिट्ठी आ सहरसा सभक साहित्यकारकेँ गारि पढ़ैत रामदेव झाकेँ चिट्ठी, ई दुनू चिट्ठी संगे छपल!! चोरक सीना जोड़बाक एहिसँ नीक उदाहरण भेटब मोश्किल।यएह छी   पतचट्टा पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर  उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ.....क यथार्थ। #  आख़िरी सफ़र पर निकलने तक / पतचट्टा पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर  उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... # पुरस्कारोत्सुकी आत्माएँ / पतचट्टा पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर  उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... # बऊ बाज़ार / पतचट्टा पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर  उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... # मरण जल / पतचट्टा पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर  उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... # रात्रि से रात्रि तक / पतचट्टा पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर  उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... # साला सब हँसकर निकल जाता है अपुन को अकेला चीख़ता छोड़कर / पतचट्टा पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर  उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... # हस्त चिन्ह / पतचट्टा पंकज झा पराशर उर्फ पंकज पराशर  उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... नयनसुख इंसाफी मरड़ उर्फ ब्लैकमेलर पंकज पराशर उर्फ पतचट्टा उर्फ अरुण कमल उर्फ श्वान रूप संसार है भूंकन दे झख मार उर्फ कुफ्र कुछ चाहिए ...की रौनक के लिए उर्फ गोयबल्स उर्फ कारेल चापेक उर्फ अपन कारी मुँह उर्फ मोहल्ला लाइव उर्फ पतनुकान उर्फ उदय प्रकाश उर्फ पहल उर्फ रवि भूषण उर्फ निराला उर्फ वर्चुअल स्पेस।  Mr Pankaj Parashar alias Pankaj Jha Parashar alias Douglas Kellner alias Arun Kamal alias Sreekant Verma alias Ilarani Singh alias Udayakant alias ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 alias.....the new Natwar lal of Maithili literature got  a book translated Hindi by a JNU girl colleague and got it published in his own name, he got translated Noam Chomsky’s article and Douglas Kellner’s article translated into Hindi by a young boy and got it published in Hindi Magazine PAHAL-86 in his own name and was banned!! His bio-data has many exotic and false things First class First in M.A. !!! Gold Medalist!!! journalism etc. the person is kleptomaniac and a literary cheat and has copied articles, poems of Douglas Kellner , Arun Kamal , Sreekant Verma , Ilarani Singh पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... १.डॉ. जेकील आ मिस्टर हाइडक कथा अंग्रेजी विषएमे स्कूलमे पढ़ने रही। एकटा वैज्ञानिक रहथि डॉ. जेकील हृदएसँ कलुषित। मोन करन्हि जे चोरि-उच्क्कागिरी करी। से एकटा द्रवक खोज कएलन्हि जकरा पीबि कऽ ओ मिस्टर हाइड बनि जाथि आ रातिमे चोरि-उच्क्कागिरी करथि। एक रातुक गप अछि जे मिस्टर हाइड ककरो हत्या कऽ भागि रहल रहथि मुदा भोर भऽ गेल रहै से लोक सभ हुनका खेहारए लगलन्हि। ओ डॉ.जेकीलक घरमे पैसि गेलाह (कारण डॉ.जेकील तँ ओ स्वयं छलाह) आ केबार भीतरसँ लगा लेलन्हि। लोक सभ चिन्तित जे डॉ. जेकीलकेँ ई बदमाश मारि देतन्हि से ओ सभ केबार पीटए लगलाह। मिस्टर हाइड द्रव पीअब शुरु केलन्हि मुदा ओहि दिन दवाइमे रिएक्शन नहि भेलैक आ हुनकर रूप डॉ. जेकीलमे नहि बदलि सकलन्हि। आब एहि कथाक अन्तमे मिस्टर हाइड माथ नोचि रहल छथि जे हुनका अपन समस्त पापक प्रायश्चित मिस्टर हाइड बनि करए पड़तन्हि। २. पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... हिनकर रियल आइडेन्टिटी हम नाङट करै छी आ ई आब अभिशप्त छथि अपन शेष जीवन मिस्टर हाइड रहि अपन कुकृत्यक सजा भुगतबाक लेल। ३.मैथिलमे ई एकटा तथ्य छै जे चुपचाप जे गारि सुनै अछि तकरा कहल जाइ छै जे ओ बड्ड नीक लोक छथि। मुदा समए आबि गेल अछि मिस्टर हाइड सभकेँ देखार करबाक आ ओकरा कठोर सजा देबाक। मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि। मैथिलीमे बहुत गोटे छथि जे हिन्दीमे बैन भेल लेखककेँ पोसै छथि (मैथिली सेवाक लेल) जे जखन ककरो गारि पढ़बाक होए तँ ओ तकर प्रयोग कऽ सकथि। ४.एहि ब्लैकमेलरक डॉ. जेकील आ मिस्टर हाइड बला चरित्र मैथिल सर्जनाक विरोधमे मैथिल-जन पत्रिकामे एक दशक पहिने उजागर भऽ गेल छल मुदा लोक हिनका पोसैत रहल। ५.आरम्भमे सेहो ई एकटा चिट्ठी मैथिलीक सम्पादकक विरोधमे देलन्हि जे छपि गेल आ ओकर घृणित भाषाक कारण भाइ साहेब राजमोहन झाकेँ माफी माँगए पड़लन्हि आ फेर ई मिस्टर हाइड सेहो ओहि सम्पादकसँ लिखितमे माफी मँगलन्हि। ६.एकटा आग्रह आ आह्वान: सुभेश कर्ण आ समस्त मैथिली-प्रेमी-गण- एहि मिस्टर हाइडक ब्लैकमेलिंग आ एब्युजक द्वारे अहाँ सभकेँ मैथिली छोड़ि कऽ जएबाक आवश्यकता नहि अछि, कारण पापक घैला भरि गेलाक बाद ई आब अभिशप्त छथि अपन शेष जीवन मिस्टर हाइड रहि अपन कुकृत्यक सजा भुगतबाक लेल। जे.एन.यू.मे छात्र-छात्रा सभसँ पोस्टकार्ड पर साइन लऽ ओहिपर अपन रचना लेल प्रशंसा-पत्र पठबैत घुमैत अपस्याँत कथित गोल्ड मेडेलिस्ट(!!!) मिस्टर हाइडकेँ चिड़ैक खोता तोड़बाक सख शुरुहेसँ छन्हि। पहिल कथा गोष्ठीमे जखन ई सहरसामे सभसँ पुछने फिरै छथि जे साहित्यकार बनबासँ की-की सभ फाएदा छै तखन ई एकटा पाइ आ पुरस्कारक लेल अपस्याँत मैथिल युवा-पीढ़ीक प्रतिनिधित्व करै छथि, जे राजमोहन झा जीक शब्दमे मैथिलीसँ प्रेम नञि करैत अछि। ई मिस्टर हाइड सेहो ओहि सम्पादकसँ लिखितमे माफी मँगलन्हि आ जखन ओ माफ कऽ देलखिन्ह तखन फेर हुनका गारि पढ़ब शुरु कऽ देलन्हि। हमरासँ लिखित मेल-माफी अस्वीकार भेलाक बाद मिस्टर हाइडक माथ नोचब स्वाभाविके। मिस्टर हाइड ककरो इनकम टैक्स, कस्टम वा सरकारी नोकरीमे देखै छथि, सुनै छथि तँ पाइक मारल जेकाँ हिनका मोनमे ब्लैकमेलिंग कुलुबुलाए लगै छन्हि, प्रायः आनन्द फिल्मक एक गोट कलाकार जेकाँ- जे एहने मिस्टर हाइड लेल कहै अछि- जे ई डॉक्टर रहितए तँ किडनी बेचितए, से ओ जतए छथि ओतहु ब्लैकमेलिंगक धन्धा शुरू कैये देने छथि। मुदा चिड़ैक खोता उजाड़ैत-उजाड़ैत मधुमाखीक छत्ता उजाड़बाक गल्ती एहेन ब्लैकमेलर कैये दैत अछि। जे सरकारी नोकरी वा इन्कम-टैक्स, कस्टममे ई ब्लैकमेलर रहितए तँ देश जरूर बेचि दैतए। kellner@ucla.edu" Dear Gajendra thanks for the detective work. was there a response? best regards, Douglas Kellner Philosophy of Education Chair Social Sciences and Comparative Education University of California-Los Angeles Box 951521, 3022B Moore Hall Los Angeles, CA 90095-1521

Fax  310 206 6293 Phone 310 825 0977 http://www.gseis.ucla.edu/faculty/kellner/kellner.html

dear Gajendraji, apnek mail milal. Pankajjik kritya janike bar dukh bhel. Ahi se maithilik nam kharab hoyat achhi. Apnek kadam ekdum uchit achhi. Rajiv K Verma These People are hellbent to bring down the literary discourse down to the gutter. Now you have been receiving mails like one. We are with you and i have forwarded your mails to Maithili speaking people all across the country  

-- VIJAY DEO JHA dhanyvad. muda ehne lok sabjagah aadar pabait achi shridharam

अहां कें सूचनार्थ पठेने छी जे पंकज पहिनेहो इ सब काज करैत रहय छलैए। aavinash

Dear Gajendra g

You are doing very well in the field of collecting all the documents related to the Maithili. Videha. Com realy a adventureous collection. I will also find some time to learm the article published through the videha. Now your detective style theft the sleeping of many of the so called literary personnel. Go a head jai Maithili jai Mithila Sunil Mallick President MINAP, Janakpur

Dear Gajendra g

You are doing very well in the field of collecting all the documents related to the Maithili. Videha. Com realy a adventureous collection. I will also find some time to learm the article published through the videha. Now your detective style theft the sleeping of many of the so called literary personnel. Go a head jai Maithili jai Mithila

Sunil Mallick President MINAP, Janakpur

your efforts are commendable. Anysuch ghost writer or fake identity holder must be boycotted from literature at once Thanks.

shyamanand choudhary

Namaskar. Chetna samitik sachiv ken mailak copy hastgat kara del achi. Dr. Ramanand Jha' Raman' गजेन्द्र जी , चेतना समिति हिनका सम्मानित कएलक अछि सेहो हमरा ज्ञात नहिं | यद्यपि हमहू चेतना क  स्थाई सदस्य | जे हो. मुदा निंदास्पद घटना तं ई थिके तें दुखी कयलक |  कतिपय नव मैथिल-प्रतिभाक आकलन-मूल्यानकनक हमर अपन स्नेग्रही स्वभाव, एहि दुर्घटनाक बाद तं आब  चिंता मे ध' देलकय|    देखी, सस्नेह ---गं गुंजन     प्रिय गजेंद्रजी हम अपने विस्मित भेलहुँ| बहुत दु:खद दृश्य | सृजन विरूद्ध साहित्यिक सन्दर्भ मे ई घटना आधुनिक मैथिलीक बहुत कुरूप प्रसंग क' क'  स्मरण कैल जायत सस्नेह, गंगेश गुंजन. PRIYA MAITHILJAN APPAN BHASHA- SANSKAR-SANSKRITI KE ASMARAN KARU AA EHAN VIVADAASAPAD LEKANI B KARANI KE VIRAM DIYA. ESWAR KE SAKCHI MANI - DIL PAR HATH RAKHI AA KULDEVI KE ASMARAN K-K YAD KARU KI SACHHAI KE KATEK KARIB CHHI.NIK BATAK LEL MANCH KE UPYOG KARI TA UTTAM. DHANYABAD. SAPREM,PK CHOUDHARY Gajendra babu pankaj puran chor achhi. Ham sab okar likhit ninda das sal pahine aarambh me kene rahi. Okra ban k kay ahan nik kayal. Chetna samiti ke seho samman wapas lebak chahi aa okar ninda karbak chahi. subhash Chandra yadav प्रिय ठाकुरजी! (माननीय संपादक) “विदेह ई-पत्रिका” [मैथिली] एखन धरिक उपलब्ध साक्ष्यक आधार पर हम अपनहिक संग जाएब पसिन्न करब। शंभु कुमार सिंह Sir I have sent the link of Parashar's duplicacy to several people along with Pranabh Bihari who had traslated that article. I had telephonic conversation with him also and he was quite upset over Parashar;s duplicay Pranav is my junior and a good friend of mine. since you have referred Pranav who had traslated that article it is unfortunate that he was misused by Parashar. But i must congratulate you for exposing scam run by Parashar and his team. Parashar, though must not be blamed if he lifted the article of Nom Chomskey . Now i must doubt the artistic sensibility of Parashar who is now a pseudo-- intellectuals. I am amazed that how did he dare to publish the article of Nom Chomskey as his own. God bless him no more        Vijay Deo Jha Dear Gajendraji, I fully agree with you that we must fight against blatant cases of wrongful appropriation. हां अपन मेल में लिखने छी जे विदेह आर्काइव से संबंधित लेखक'क सबटा रचना हटा लेल जायत। अहि से आर्काइव सं ई प्रसंग सेहो, एकर साक्ष्य  सेहो मेटा जायत। हमर मत ई जा साक्ष्यब रहबाक चाही निक आ अधलाह दुनु तरहक काज'क। अहां अप्पसन कामेंट आ र्निणय सेहो आर्काइव मे जा के संबंधित रचना के पोस्टा-स्क्रिाप्टर के रुप मे भविष्या'क पाठक'क लेल सुरक्षित राखि सकैत छियन्हिि। ई दोहरेबाक बहुत औचित्यक नहि जे विदेह निक लागि रहल अछि आ अहांक परिश्रम एकदम देखा रहल अछि। ईति, सदन।

Sadan Jha Sadan Jha

Thank you and same to you.

Nishikant Thakur

Thanx Gajendraji, for your immediate response. I must congratulate you for the work you have done to save the sanctity of the literature world as a whole.

I feel proud for the person like you who shows the courrage to bell the cat. If the so called writers like Parasharji are there to spoil the sea, on the other side it is very hopeful sight to have a person like you who is alert enough to take care of such filth & keep the sea clean.

Thanx for enlightening me on the subject.

Regards, Bhalchandra Jha.

पंकज पराशरकेर एहन कार्य पर स्मरण अबैत अछि करीब बीस-पचीस साल पहिलुक घटना, जहिया आकाशवाणी दरभंगासँ म,म,डॉ, सर गंगानाथ झाक एकमात्र मैथिलीक कारुणिक पदकेँ एक गोट कवि द्वारा अपन कहि प्रसारित कए देल गेल छल, जे बादमे (सजग श्रोता द्वारा सूचना देलाक बाद) आजन्म बैन कए देल गेलाह । कहबाक तात्पर्य जे जँ हम मैथिल दरभैगा- मधुबनीमे गंगानाथ बाबूक पदकेँ अपन कहि सकैत छी तँ ई कोन बड़का गप । निश्चये एहन रचनाकारकेर सङ्ग कड़गर डेग उठाएब आवश्यक । ajit mishra

Dear Gajendrajee, We should take strong step to prevent such intellectual cheats. My support is always with you. K N Jha This seems to be a dangerous trend and we should also try and refrain from publishing anything from such authors. Regards, Prof. Udaya Narayana Singh प्रियवर ठाकुर जी, मैथिल साहित्यकार आब साइबर क्राइम सेहो क रहल छथि, ई जानि अपार प्रसन्नता भेल | पंकज पराशर  के नकारात्मक बुद्धिक पूर्ण उपयोग करबाक लेल हम नोबेल प्राइज सा सम्मानित कराय चाहैत छी | बुद्धिनाथ मिश्र Sampadak Mahoday Apne ehi prakarak durachar rokwak lel je prayash ka rahal chhee ohi lel dhanyabad.Ehen blackmailer sa maithili ken bachayab aawashyak achhi Sadar SHIV KUMAR JHA

गजेन्द्र भाई, नमस्कार ! मैथिली मे एहि तरहक काज लगातार भ' रहल अछि । किछु व्यक्ति एहि धंधा मे अग्रसर छथि । मैथिलीक सम्पादक लोकनिक अनभिज्ञताक फायदा कतेको अंग्रेजी पढ़निहार तथाकथित साहित्यकार लोकनि उठा रहल छथि । पंकज जीक पहल मे छपल लेख के हम सेहो पढ़्ने र्ही आ किछुए दिनक बाद हम नेट पर मूल लेखकक आलेख के सेहो पढ़लहु । हमरा त' आश्चर्य लागल छल जे पंकज जी आलेखक कम स कम शीर्षक त' बदलि लैतथि मुदा हुनका एतेक ज्ञान रहितनि तखन की छल । 

एतबे नहि , हिनक बहुत रास कवितो अंग्रेजी साहित्य स' हेर-फेर कयल गेल अछि । खैर ! जे करथि ... । मुदा एहि बेर कहाबत ठीक होबाक चाही " सौ सोनार के त' एक लोहार के " । प्रकाशन मे जे भी कियो व्यक्ति गलती क' रहल छथि हुनका गंभीर क्रिमिनल बुझबाक चाही ।

धन्यवाद एहि लेल अहाँ के जे एतेक जोरदार तरीका स' एहि गप्प के उठैलहु ।

अहाँक

प्रकाश चन्द्र । pankaj parashar vala prasang bar dukhad laagal ,, kamini Gajendr jee, maamailaa ke tool jatabe debainhi, sabhak oorjaa otabe svaahaa hetai. हमर मनतब एतबे, जे एक बेर अहां देखार क देलहुं, आब छोडि देल जाओ. हिन्दीयो मे एहिना भ रहल छै. बेर बेर आ खराब भाषा मे लिखल मोन के दुखी करैत अछि. फेर लागैत अछि जे अहि मे समय कियैक नष्ट करी? हिन्दुस्तान मे जाति आ सेहो मैथिली से जाति नयि जाएत. हम एकरा नयि मानैत छलहुं मुदा आब 30 बरख से मैथिली मे लिखनाक बाद आब देखल जे एक ओर 1 मैथिली साहित्य मे लिली जी, उषा जी आ शेफलिका जी के बाद यदि किओ नाम लैत अछि त हमर. 2 एखनो कोनो पत्रिका बै छै त हमरा लेल रचनाक आग्रह होइते छै. 3 एखनो हम ओतबे सक्रिय छी आ निरंतर लिखि रहल छी. 4 दुखद जे हमरा बाद (सुस्मिता पाठक आ ज्योत्स्ना मिलन के हम अपने तुरिया बुझैत छी) के बाद एहेन कोनो सशक्त कोन, महिला लेखने नयि आएलए. 5 ई स्थिति रहलाक बादो, आब जहन हम देखै छी, त पाबै छी जे हमरा पर, हमर रचना यात्रा अथव हमर रचना पर किछु नयि लिखल गेलए, चाहे ओ मोहन भारद्वाज रहथु अथवा आन किओ. जहन हमर दशक केर चर्च होइत छै, तीन चारिटा नाम पर सविस्तार चर्चा होइत छै, जाहि मे हमर नाम नयि रहैत छै. हमर नाम मात्र सन्दर्भ लेल जोडि देल जाइत छै. 6 एतेक दिन मे मात्र रमण जी हमरा पर एक गोट लेख लिखलन्हि. हम ओकरा पुन: टाइप करबा के अहां लग पठायब. 7 जाति पाति धर्म आ द्वेष पर कहियो ध्यान नयि देलाक कारणे त कही हमर ई स्थिति नयि छै, आब हमरा ई सोचबा मे आबि रहल अछि. 8 हमर शिक्षक, जे स्वयं हिन्दी के ख्यातिलब्ध कथाकार छथि, हमरा बुझेने रहलाह जे हम मैथिली मे लिखब बन्न क; दी, कियैक त हम गैर मैथिल (जाति विशेष) से नयि छी, तैं हमर लेखन के कहियो मैथिल सभ नयि नोटिस करताह, कहियो किछु नयि करता.. अपन भाषाक प्रति प्रेम के आगरह कारणे हम हुनकर बात नयि मानलियै, लिखैत गेलहुं, मुदा आब लागि रहलअए जे हुनकर कहबी सही छलन्हि की? 9 एखनो की हाल छै मैथिली मे, देखियो. ओकरा विरुद्ध किछु करियु. मैथिली मे जे पैघ पैघ संस्था चाइ, चेतना समिति सनक, सभ बेर विद्यापति पर्व मनबैत छथि. लाखो खर्च करै छथि, मुदा नीक लेखक केर पोथी सभ बेर 5-7 टा निकालैथु, से नयि होबैत छन्हि. 10 हमरा भेटल जानकारी के मोताबिक विद्यापति हॉल किराया पर चढै छै. तकरा मे कोनो आपत्ति नयि, यदो ओकरा से किछु आय होबै. मुदा ओकरा मैथिलीक काज अथवा नाटक आदि लेल मांगल जाएत, त; नयि भेटै छै. यदि ओकर शुल्क चुका दी, तहन त किरायाके रूप मे किऊ ल' सकि छै. एकरा सभ के उजागर करी. 11 व्यक्ति से संस्था पैघ होइत छै. जतेक संस्था सभ छै, तकरा पर लिखी, साहित्य अकादमीक मैथिली विभाग सहित. 12 लिली रेक सभटा रचनाक अनुवाद अधिकार हमरा देने छथि. हुनक साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त पोथी 'मरीचिका' केर हिन्दी अनुवाद लेल पिछला 2-3 साल से हम लिखि रहल छी.  साहित्य अकादमीक पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य" मे हम पिछला 25 साल से अनुवाद सहित छपि रहल छी. मुदा हमरा से अनुवादक नमूना मांगल गेल. ओहि कुर्सी पर जे स्वनाम धन्य बैसल छथि, हुनका हमरा मादे नयि बूझल त कोनो मैथिल साहित्यकार से पूछि सकैत छलाह. ई तहिने भेलै, जेना एक बेर एक गोट चैनल ऋषिकेश मुखर्जी से हुनकर बायोडाटा मंगने छल आ एखनि पढल समाचारक अनुसारे आ. जानकी वल्लभ श्हस्त्री से हुनकर बायोडाटा पद्मश्री लेल मांअगल गेलैय. 13 अपन विनम्रता दर्शाबैत हम लिली जीक दू तीन टा कथाक हिन्दी अनुवाद हम पठा देलियन्हि. तैयो अई पर कोनो विचार नयि. लिखला के बाद हमरा कहल गेल जे हम लिली जी से साहित्य अकादमी के अनुवादक अधिकार दियाबे मे मददि करी. आरे भाई, अहां के अनुवाद से मतलब अछि ने, आ जहन हम अनुवाद क; के देब' लेल तैयार छी तहन अकादमी के किअयैक अधिकार चाही? अई लेल जे अकादमी अपन पसीनक आदमी के अनुवाद लेल द; सकय. एखनि धरि ओकरा पर निपटारा नयि भेलैये. अकादमी से फेर कोनो पत्र नयि आएल अछे. अनुवाद तैयार राखल छै. लिली जी आब बहुत बुजुर्ग भ; गेल छथि. हुनक मात्र इयैह इच्छा छै (आ बहुत स्वाभाविक) जे हुनकर पोथी सभ हुनका सोझा मे प्रकाशित भ; जाए. 14 लिली जी के पोथी हिन्दी मे आनबाक श्रेय हमरे अछि, ई मनितहुं ओकरा रेकॉर्ड केनाए मैथिल समीक्षक आवश्यक नयि बुझैत छथि. एकरा पर लडू. 15 मैथिली के भारतीय ज्ञानपीठ से पुस्तक प्रकाशन लेल हमही आगां एलहुं आ प्रभास जी आ लिली जी के पोथी बहार भेलै.भारतीय ज्ञानपीठ से मैथिली  पुस्तक प्रकाशन के श्रेय हमरे छन्हि, ईहो मनैत ओकरा रेकॉर्ड केनाए मैथिल समीक्षक आवश्यक नयि बुझैत छथि. एकरा पर लडू. गजेन्द्र जी, मैथिलीक ई सभ मानसिकता पर आन्दोलन करी जाहि से रचनाकार आ वरिष्ठ रचनाकार सभ के अपमानित नयि होब' पडै. अहां चाही त' एकरा विदेह पर द' सकै छी. हम दोसर बात सेहो लिखि के पठायब. मुदा हम फेर कहब, जे हम व्यक्ति के नयि संस्था आ व्यक्ति के मानसिकता के दोष देबन्हि. लोक पढथु आ पूचाथु ई स्वनामधन्य सभ से जे जकरा से अहां के गोलौंसी अछे, तकरा पर अहां लिखब आ जकरा से नयि अछे, जे मौन भावे लिखि रहलए कोनो विविआद मे पडल बगैर, हुनका लेल ई व्यवहार? -विभा रानी. Shri gajendraji

good work.

Anha sa ehina neer khshir vivekakak ummeed lagatar banal rahat.

chor ke ehina dekhar kelak baad dandit seho karbak prayas karbaak chahi. anha bahut raas neek pahal ka rahal chhi.

Saadhuvaad.

manoj pathak. We should be greatful to Pankaj Parashar that he did not lay claim on the magnum opus of Kavi Vidyapati. I know him very well and his group as well. They have no love for Maithili in fact they are the moles planted by vested Hindi writers to damage maithili. Parashar and likes are the distructive lots and they are the culprits for agonising senior writers of Maithili those who dedicated their life for Maithili language and literature. I have no sympathy for him. I cant say, even, God bless them.- Chitra Mishra Recently Some Maithil Brahmin Samaj Organisation has started selling prizes in the name of Yatri (Vaidyanath Mishra, Nagarjun) and Kiran (Kanchinath Jha) at Rahika. There has been trend recently to grant these prizes to those intellectual thiefs who are basically opposed to the ideology's of Kiran and Yatri (Nagarjun). The caste based organisations are killing the spirit of Yatriji and Kiranji, recently the fraud Pankaj Jha alias Pankaj Kumar Jha alias Pankaj Parashar alias Dr. Pankaj Parashar) was stage managed to get this casteist award, The lecturer of Hindi at Aligarh Muslim University, just appointed as adhoc staff, will teach now how to lift verbatim articles of Noam Chomsky and Douglas Kellner and poems of Illarani Singh and Arun Kamal to his students. His Samay ke akanait (समय केँ अकानैत) is lifted from Magadh of Srikant Verma (श्रीकान्त वर्मा- मगध) and his Vilambit Kaik Yug me Nibaddha (विलम्बित कइक युग मे निबद्ध) is collection of pirated poems of Illarani Singh Srikant Verma and others. We deplore the selling of these prizes to a person who has brought respect of Maithili to a lower level.

गौरीनाथ (अनलकान्त))- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे- हँ, दंद-फंद करैवला किछु लोक सब ठाम पहुँचि जाइ छै आ तेहन लोक एतहुँ अपन धूर्तता आ चोरि कला देखबै छथि। मुदा तकरो असलियत उजागर करब असंभव नइँ रहल। "विदेह"क गजेन्द्र ठाकुर एहन एक "युवा" (पंकज झा उर्फ पंकज पराशर) क असली चेहरा हाले मे देखोलनि। गौरीनाथ (अनलकान्त))- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे- हँ, दंद-फंद करैवला किछु लोक सब ठाम पहुँचि जाइ छै आ तेहन लोक एतहुँ अपन धूर्तता आ चोरि कला देखबै छथि। मुदा तकरो असलियत उजागर करब असंभव नइँ रहल। "विदेह"क गजेन्द्र ठाकुर एहन एक "युवा" (पंकज झा उर्फ पंकज पराशर) क असली चेहरा हाले मे देखोलनि।

पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ...

कतेक उर्फ एहि लेखकक बनत नहि जानि... राजकमल चौधरीक अप्रकाशित पद्य (आब विदेह मैथिली पद्य २००९-१० मे प्रकाशित पृ.३९-४०) “बही-खाता”क एहि धूर्तता, चोरि कला आ दंद-फंद करैवला पंकज पराशर..उर्फ..उर्फ.. [गौरीनाथ (अनलकान्त)क एहि चोर लेखकक लेल प्रयुक्त शब्द- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे-] द्वारा “हिसाब” नामसँ छपबाओल गेल- देखू

राजकमल चौधरी

बही-खाता

एहि खातापर हम घसैत छी

संसारक सभटा हिसाब

...

...

हमर सभटा अपराध, ज्ञान...सँ लीपल पोतल

अछि एक्कर सभटा पाता

ई हम्मर लालबही थिक जीवन-खाता

जीवन-खाता

पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ...

द्वारा एकरा अपना नामसँ एहि तरहेँ चोराओल गेल

हिसाब

हिसाब कहिते देरी ठोर पर

उताहुल भेल रहैत अछि

किताब

जे भरि जिनगी लगबैत छथि

राइ-राइ के हिसाब-

दुनिया-जहान सँ फराक बनल

अंततः बनि कऽ रहि जाइत छथि

हिसाबक किताब।

२००६ संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ जनबरी २०१०) ९३ देशक १,०४२ ठामसँ ३६,७१७ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,१९,८९१ बेर  देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।-–गजेन्द्र ठाकुर संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११.श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। ..सुभाष चन्द्र यादवक कथापर अहाँक आमुखक पहिल दस प‍ंक्तिमे आ आगाँ हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्द अछि (बेबाक, आद्योपान्त, फोकलोर..)..लोक नहि कहत जे चालनि दुशलनि बाढ़निकेँ जिनका अपना बहत्तरि टा भूर!..( स्पष्टीकरण- अहाँ द्वारा उद्घृत अंश यादवजीक कथा संग्रह बनैत-बिगड़ैतक आमुख १ जे कैलास कुमार मिश्रजी द्वारा लिखल गेल अछि-हमरा द्वारा नहि- केँ संबोधित करैत अछि। कैलासजीक सम्पूर्ण आमुख हम पढ़ने छी आ ओ अपन विषयक विशेषज्ञ छथि आ हुनका प्रति कएल अपशब्दक प्रयोग अनुचित-गजेन्द्र ठाकुर)...अहाँक मंतव्य क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि।..तखन लोक तँ कहबे करत जे अपन घेघ नहि सुझैत छन्हि, लोकक टेटर आ से बिना देखनहि, अधलाह लागैत छनि.....ओना अहाँ तँ अपनहुँ बड़ पैघ धंधा कऽ रहल छी। मात्र सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://www.videha.co.in/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि आ किएक रखने छथि वा आगाँसँ दाम नहि राखथु- ई सभटा परामर्श अहाँ प्रकाशककेँ पत्र/ ई-पत्र द्वारा पठा सकै छियन्हि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाइ स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम अंग्रेजी भाषाक सभ प्रकाशक बिना अपवादक प्रूफ ईडरक संग लैंगुएज एडीटर सेहो रखैत छथि। मुदा मैथिलीमे से नहि रहने प्रूफ रीडिंग आ लैंगुएज एडीटिंग दुनू एक्के विधा बुझल जा रहल अछि। प्रस्तुत अछि एहि दिशामे एकटा प्रयास। मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ इआद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दालान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे

71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करैऔ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग  121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि

181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ /करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलो 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/नइँ/ नञि/नहि 226.है/ हइ 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए(अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह(बिकारी)क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझ छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि।वक्तव्य/ वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.बाली/ (बदलएबाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय २.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश,बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश,वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी,जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत,योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु,तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले,चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन),पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य 

एखन  ठाम  जकर,तकर  तनिकर  अछि 

अग्राह्य  अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं। 

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि) से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए- सकै-ए मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- संजोगने केँ- के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे राम के/ राम कऽ सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- राम सऽ रामकेँ- राम कऽ राम के केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि।आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचाएक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एत्स्हो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do)

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