ISSN 2229-547X विदेह मैथिली विहनि कथा (विदेह-सदेह ५, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक ५१-१००) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ विहनि कथाक एकटा समानान्तर संकलन) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल।सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। श्रुति प्रकाशन ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नहि कएल जा सकैत अछि। ISBN : 978-93-80538-63-1 ISSN: 2229-547X मूल्य : भा. रू. १००/- संस्करण : २०१२ © श्रुति प्रकाशन श्रुति प्रकाशन रजिस्टर्ड आॅफिस : ८/२१, भूतल, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- ११०००८. दूरभाष- (०११) २५८८९६५६-५८ फैक्स- (०११) २५८८९६५७ Website : http://www.shruti-publication.com e-mail : shruti.publication@shruti-publication.com Printed at : Ajay Arts, Delhi- ११०००२ Typeset by : Umesh Mandal. Distributor : Pallavi Distributors, Ward no- ६, Nirmali (Supaul), मो.- ९५७२४५०४०५, ९९३१६५४७४२ Videha Maithili Vihani Katha : Anthology of Maithili Seed Stories. अनुक्रम आलेख- गजेन्द्र ठाकुर- गद्य साहित्य मध्य विहनि कथाक स्थान आ विहनि कथाक समीक्षाशास्त्र आलेख- मुन्नाजी- सामाजिक सरोकारकेँ छुबैत विहनि कथा ज्योति सुनीत चौधरी- नबका पीढ़ी/ घर दिसका रस्ता/ पानिमे खेती/ मैथिल बिआह/ हिमदूत दुर्गानन्द मंडल- किसना मुट्ठी/ पोस्टमार्टम/ प्रदूषण कपिलेश्वर राउत- कलियुगक निर्णए धीरेन्द्र कुमार- राम-कथाक समापन राजदेव मंडल- बढ़िया गप्प/ ठोकर बेचन ठाकुर- आत्महत्या/ फुसिक फल राम प्रवेश मंडल- पछतावा/ बुरबक/ झगड़ा खतम/ मूल-मंत्र भारत भूषण झा- प्रेम मानेश्वर मनुज- ई/ स्त्री-लिंग/ आप/ लोरी/ भूख-भूख भाकुर उमेश मण्डल- दोस्ती/ आधा भगवान/ रूपैयाक ढेरी/ जेहन मन तेहन जिनगी डॉ. शेफालिका वर्मा- आनक बड़ाइ जगदीश प्रसाद मण्डल- थल-कमल/ घरडीह/ खाता-खेसरा/ सबूत/ कौआक मैनजन रामकृष्ण मण्डल ‘छोटू'-बाबूजी लेल मुन्नाजी-दरेग/ भूख/ विजातीय/ राष्ट्रभक्ति/ रेवाज रामलोचन ठाकुर- गिरगिट/ भारत रत्न परमेश्वर कापड़ि- सतबरती अमरनाथ- देह/ पियास/ स्वीच ऑफ/ गिरगिट/ फोंफ चण्डेश्वर खाँ- चेकिङ/ कछमछी/ बिसवास रघुनाथ मुखिया- इण्डियन/ जुलुम/ नियति/ मुँहलगुआ/ ग्रीनहाउसमे कुकूर ऋषि वशिष्ठ- प्रमाण-पत्र/ मनमौजी शिव कुमार झा “टिल्लू”- फूसि नै बाजू मिथिलेश कुमार झा- झीक सत्येन्द्र कुमार झा- लेटेस्ट नवनीत कुमार झा- गाम आबह कौशल कुमार- दूमुँहा/ प्रार्थना आ आस्था/ अपन इज्जति अनमोल झा- चेतना कुमार मनोज कश्यप- मरीचिका/ परजा/ बदलैत समए/ जरल पेट/ जीतक आगू विनीत उत्पल- श्री गुरुवै नम: डॉ धनाकर ठाकुर- हमरा एकर एक बायोडाटा चाही आशीष अनचिन्हार- नर्क/ निशान/ लक्ष्मी/ अंतर सतीश चन्द्र झा- नोकरी गजेन्द्र ठाकुर- शारदानगर भवनाथ झा- ऊँचका डीह/ हेराफेरी राम विलास साहु- परिश्रमक भीख मुन्नी कामत- हमर संस्कार/ करैलाक मीठ गुण डॉ. शंभु कुमार सिंह- जेठ आ पूस/ सौदागर/ गरमी संजय कुमार मंडल- अनट्रेन्ड घुसखाेर डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्रक दुइ गोट संस्कृत विहनिकथा (अनुवाद योगानन्द झा)- वीरभोग्या वसुन्धरा/ अति सर्वत्र वर्जयेत् मिथिलेश मंडल- विदेशी बाबू प्रदीप बिहारी सत्संगी- थापड़ लक्ष्मी दास- बूड़िबकक बूड़िबक/ दाढ़ी अमित मिश्र- इशारा/ सरधुआ जगदानन्द झा 'मनु'-मसोमात/ रहस्य चन्दन कुमार झा- सद्गति/ अनकर दुर्गति ओमप्रकाश झा- कपारक लिखल/ स्पेशल परमिट सन्दीप कुमार साफी- अन्ध विश्वास जवाहर लाल कश्यप- हम्मर माय तोहर माय/ अर्द्धसत्य/ लहास/ भगवानक भाग्य/ गिद्ध मिहिर झा- १०० टाका रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार- अल्लूक चुमौन प्रेमचन्द्र पंकज- क्रमश:.... अखिलेश कुमार मंडल- टीटनेस मैथिली विहनि कथाक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. तारानन्द वियोगीसँ मुन्नाजीक भेल गप्प-सप्प देवशंकर नवीन- विहनि कथा लेखनमे अवरोधक तत्व गजेन्द्र ठाकुर गद्य साहित्य मध्य विहनि कथाक स्थान आ विहनि कथाक समीक्षाशास्त्र गद्यक विभिन्न विधा जेना प्रबन्ध, निबन्ध, समालोचना, कथा-गल्प, उपन्यास, पत्रात्मक साहित्य, यात्रा-संस्मरण, रिपोर्ताज आदिक मध्य कथा-गल्प, आख्यान आ उपन्यास अनुभव मिश्रित कल्पनापर विशेष रूपसँ आधारित अछि। जकरा हम सभ खिस्सा-पिहानी कहै छिऐ ताहिसँ ई सभ लग अछि। कथा-गल्प, आख्यान आ उपन्यास आ किछु दूर धरि नाटक आ एकांकी मनोरंजनक लेल सुनल-सुनाओल-पढ़ल जाइत अछि वा मंचित कएल जाइत अछि। ई उद्देश्यपूर्ण भऽ सकैत अछि वा ऐमे निरुद्देश्यता-एबसर्डिटी सेहो रहि सकै छै। जिनगीक भागादौड़ीमे निरुद्देश्यपूर्ण साहित्य सेहो मनोरंजन प्रदान करैत अछि। विहनि कथा कहने एकटा एहेन विधा बनि सोझाँ आएल अछि जे पहिने कथा थिक फेर विहनि कथा। अंग्रेजीमे सेहो लम्बाइक आधारपर शॉर्ट-स्टोरी/ नोवेलेट/ नोवेला/ नोवेल क विभाजन कएल जाइत अछि। मैथिलीमे सभ विधामे शब्द संख्याक घटोत्तरी-बढ़ोत्तरी अंग्रेजी वा दोसर यूरोपियन भाषासँ बेशी होइत अछि, ओना अंग्रेजी वा दोसर यूरोपियन भाषामे सेहो सभ विधामे लेखकक व्यक्तिगत रुचि आ कथ्यक आवश्यकताक अनुसार घटोत्तरी-बढ़ोत्तरी होइते अछि। तहिना वन-एक्ट प्ले भेल एकांकी आ प्ले भेल नाटक। से विहनि कथा कथा तँ छीहे। अहाँक अनुभवमिश्रित कल्पना अहाँसँ किछु कहबा लेल कहैत अछि। आ ई कथ्य हास्य-कणिका वा अहास्य-कणिका बनि सकैत अछि। लोक अहाँकेँ कहि सकै छथि जे अहाँकेँ गप्प बड्ड फुराइए, अहाँ हाजिर जवाब छी। आ तकर बाद अहाँक हिम्मत बढ़ैत अछि आ अहाँ ओहि कथ्यकेँ शिल्पक साँचामे ढलैय्या कऽ विहनि कथा बना दै छी। हास्य-कणिकाक संग सभसँ मुख्य अवरोध छै जे अहाँक सुनाओल हास्य-कणिका घूमि-फिरि अहीं लग आबि जाएत, माने मौलिकता कतौ हेरा जाएत। हास्य-कणिका सेहो एक-दू पाँतीसँ आध-एक पृष्ठ धरिक होइत अछि। कथा-उपन्यासमे एकर समावेश कएल जा सकैत अछि मुदा विहनि कथा एकर पलखति नै दैत अछि। मुदा कथा-उपन्यासमे जेना कएल जाइत अछि जे एकरा कोनो पात्रक मुँहसँ कहाबी वा कोनो आन प्रसंगसँ जोड़ि सार्थक बनाबी तँ से अहाँ विहनि कथामे सेहो कऽ सकै छी। गल्प आख्यानसँ बहराइत अछि आ नैतिक शिक्षा, प्रेरक कथा आ मिस्टिक टेल्स सेहो लघुसँ दीर्घ रूप धरि जाइत अछि। एकर लघु रूप विहनि कथा नै भेल सेहो नै। विहनि कथामे जे त्वरित विचारक उपस्थापन देखल जाइत अछि से कथा-गल्प आ उपन्यासमे सेहो रहैत अछि। मुदा जे त्वरित विचारक उपस्थापन नै रहलासँ ओ विहनि कथा नै रहत सेहो गप नै। उनटे जखन विहनि कथाक समीक्षा करए लागब तखन समीक्षकक ध्यान स्थायी तत्व दिस होएबाक चाही नै कि त्वरित उपस्थापन दिस। त्वरित विचारक उपस्थापनक प्रति बेसी झुकाव ओकरा अहास्य-कणिका बना दैत अछि, ओ विहनि कथा तँ रहत मुदा श्रेष्ठ विहनि कथा नै रहत। विहनि कथा झमारि देत तँ ओ विहनि कथा वा श्रेष्ठ विहनि कथा भेल आ जे ओ झमारि नै सकत तँ ओ विहनि कथा भेबे नै कएल- ई गप नै छै। कोनो त्वरित विचार आएल, ओकरा कागचपर लिखि लेलौं, ऐ डरसँ जे कतौ बिसरा ने जाए- एतऽ धरि तँ ठीक अछि। मुदा हरबड़ा कऽ एकरा विहनि कथा बना देबासँ पहिने विचारकेँ सीझऽ दियौ। ओइमे की मिज्झर करब तँ ओइमे स्थायी तत्व आबि सकत तइपर मनन करू। ओना बिना सिझने जे झमारैबला विहनि कथा लिखि देलौं तँ ओ विहनि कथा तँ भेल मुदा श्रेष्ठ विहनि कथा ओ सेहो भऽ सकत तकर सम्भावना कम। ई ओहिना अछि जेना कोनो झमकौआ गीत अपन प्रभाव बेसी दिन रखबे करत से निश्चित नै अछि तहिना कथाक ई स्वरूप ट्वेंटी-ट्वेंटी सन नै भऽ जाए तइपर विचार करए पड़त। उपन्यास तँ एक उखड़ाहामे नै पढ़ल जा सकैए मुदा लघुकथा एक उखड़ाहामे पढ़ल जा सकैए। एक उखड़ाहामे अहाँ कएकटा विहनि कथा पढ़ि सकै छी। उपन्यासमे लेखक वातावरणक, प्लॉटक, व्यक्तिक जाहि विशदतासँ वर्णन कऽ सकैए से लघुकथामे सम्भव नै। ओ एकटा पक्षपर, जौँ कही तँ एकटा घटनापर केन्द्रित रहैए आ ऐ क्रममे वातावरण आ व्यक्तिक जीवनक एकटा मोटामोटी विवरणात्मक स्केच मात्र खेंचि पबैए। विहनि कथामे वातावरण आ व्यक्तिक जीवनक एकटा मोटामोटी विवरणात्मक स्केच सेहो नै खेंचि सकै छी, से पलखति विहनि कथा अहाँकेँ नै देत, हँ तखन विहनि कथा सेहो एकटा पक्षपर वा एकटा घटनापर केन्द्रित रहैए। आ ई पक्ष वा घटना तेहन रहत जे लेखककेँ ललचबइत रहत जे एकरा स्वतंत्र रूपसँ लिखू, एकरा लघुकथा वा उपन्यासक भाग बना कऽ एकर स्वतंत्रता नष्ट नै करू। तखन उपन्यासक प्लॉटसँ कथाक प्लॉट सरल होएत आ विहनि कथाक लेल तँ एकर आवश्यकते नै अछि, पक्ष वा घटनाक वर्णन शिल्पक साँचामे ढलैय्या केलौं आ पूर्ण विहनि कथा बनि कऽ तैयार। विहनि कथाक समीक्षाशास्त्र विहनि कथाक समीक्षा कोना करी? दू-पाँतीसँ डेढ़-दू पन्ना धरिक (पाँच पन्ना धरि सेहो) अनुभवमिश्रित काल्पनिक खिस्सा विहनि कथा कहएबाक अधिकारी अछि। लघु आकारक कथामे कोनो कथा पूर्ण रूपसँ कहल गेल तँ फेर ओ विहनि कथा नै कहाओत। हँ जे ओइमे एकटा घटनाक शृंखलाक वर्णन एकटा कथ्य कहक लेल आवश्यक अछि तँ शृंखला पूर्ण होएबाक चाही। ऐ शृंखलाक कड़ी कनेक नमगर भऽ सकैए। त्वरित उपस्थापनाक हरबड़ी ऐ शृंखलाकेँ कमजोर कऽ सकैए। सदिखन उल्टा धार बहाबी आ त्वरित उपस्थापना आनी- ई पद्धति किछु गणमान्य विहनि कथा लेखकक फार्मूला बनि गेल अछि। एकाध-दूटा विहनि कथामे ई सिनेमाक “आइटम गीत” सन सोहनगर लगैत अछि मुदा फेर समीक्षकक दृष्टि एकरा पकड़ि लैत अछि, कारण ई प्रो-एक्टिव होएबाक साती रिएक्टिव बनि जाइत अछि। स्थायी प्रभाव ऐसँ नै आबि पबै छै, विहनि कथा लेखकक प्रतिभाक कमी ऐमे प्रतीत होइ छै। विहनि कथा वएह श्रेष्ठ हएत जे एकटा घटनाक शृंखलाक निर्माण करत आ अपन निर्णय सुनेबाक लेल पाठककेँ छोड़ि देत। फरिछेबाक पलखति विहनि कथाकेँ नै छै, मुदा तकर माने ई नै जे दू-चारि पाँतीमे बात कएल जाए। मुदा लेखक जौँ दू-चारि पाँतीक गपकेँ विहनि कथा कहै छथि तँ समीक्षक ओकरा विहनि कथा मानबा लेल बाध्य छथि मुदा ओ श्रेष्ठ विहनि कथा हएत तकर सम्भावना घटि जाइत अछि। विहनि कथाक वर्ण्य विषय मात्र चलैत-फिरैत घटना नै अछि। विहनि कथा-लेखककेँ बच्चाक लेल, नैतिक शिक्षा आ धार्मिक विषयपर सेहो विहनि कथा लिखबाक चाही। ट्रेनमे बसमे जाइ छी, घरमे दलानपर घूरतर गप करै छी आ तकर अनुभव मात्र विहनि कथामे आबि रहल अछि। सामाजिक आ आर्थिक समस्या सेहो एकर स्थायी वर्ण्य विषय भऽ सकैत अछि। राजनैतिक प्रश्न आ प्राकृतिक आपदाकेँ वर्ण्य विषय बनाओल जा सकैत अछि। विहनि कथा समीक्षक समीक्षा करबा काल पौराणिक समीक्षा नै करथि माने शिव पुराणमे सभसँ पैघ शिव आ गरुड़ पुराणमे सभसँ पैघ गरुड़, ऐ तरहक समीक्षा नै करथि। माने ई नै होमए लागए जे, जे अछि से विहनि कथा, चाहे ओ जेहेन हुअए। जेना उपन्यासमे लेखककेँ अपन पूर्ण प्रतिभा देखेबाक लेल पलखतिक अभाव नै रहै छै से लघुकथामे नै रहै छै आ विहनि कथामे तँ से आरो कम रहै छै। मुदा विषयक विस्तार कऽ पाठकक माँगकेँ पूर्ण कएल जा सकैत अछि। कथोपकथनक गुंजाइश कम राखि वा कोनो उपस्थापनासँ पहिने राखि विहनि कथाक कथाकेँ सशक्त बनाओल जा सकैत अछि, अन्यथा ओ एकांकी वा नाटक बनि जाएत। विहनि कथाक समावेश कथा-उपन्यासमे भऽ सकैए मुदा विहनि कथामे हास्य-कणिकाक समावेश नै हुअए तखने ओ समीक्षाक दृष्टिसँ श्रेष्ठ हएत, कारण एक तँ कम जगह, तइमे जे कथोपकथन आ हास्य कणिका घोसियेलहुँ तखन ओकर प्रभाव दीर्घजीवी नै हएत, भनहि ओ बिठुकट्टा विहनि कथा बनि जाए। नीक विहनि कथा त्वरित उपस्थापनक आधारपर नै वरन ओइमे तीक्ष्णतासँ उपस्थापित मानव-मूल्य, सामाजिक समरसताक तत्व आ समानता-न्याय आधारित सामाजिक मान्यताक सिद्धान्त आधार बनत। समाज ओइ आधारपर कोना आगू बढ़ए से संदेश तीक्ष्णतासँ आबैए वा नै से देखए पड़त। पाठकक मनसि बन्धनसँ मुक्त होइत अछि वा नै, ओइमे दोसराक नेतृत्व करबाक क्षमता आ आत्मबल अबै छै वा नै, ओकर चारित्रिक निर्माणक आ श्रमक प्रति सम्मानक प्रति सन्देह दूर होइ छै वा नै- ई सभटा तथ्य विहनि कथाक मानदंड बनत। कात-करोटमे रहनिहार तेहन काज कऽ जाथि जे सुविधासम्पन्न बुते नै सम्भव अछि, आ से कात-करोटमे रहनिहारक आत्मबल बढ़लेसँ हएत। हीन भावनासँ ग्रस्त साहित्य कल्याणकारी कोना भऽ सकत? बदलैत सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक-धार्मिक समीकरणक परिप्रेक्ष्यमे एकभग्गू प्रस्तुतिक रेखांकन, कथाकार-कविक व्यक्तिगत जिनगीक अदृढ़ता, चाहे ओ वादक प्रति होअए वा जाति-धर्मक प्रति, साहित्यमे देखार भइए जाइ छै, शोषक द्वारा शोषितपर कएल उपकार वा अपराधबोधक अन्तर्गत लिखल जाएबला कथामे जे पैघत्वक (जे हीन भावनाक एकटा रूप अछि) भावना होइ छै, तकरा चिन्हित कएल जाए। मेडियोक्रिटी चिन्हित करू- तकिया कलाम आ चालू ब्रेकिंग न्यूज- आधुनिकताक नामपर नै चलत। विहनि कथा एक पक्ष वा घटनाक वर्णन अछि आ ई आवश्यक नै जे ओकरा एक्के पृष्ठमे लिखल जाए। अहाँ ओहि घटनाकेँ ३-४ पृष्ठमे सेहो लिखि सकै छी आ ओ विहनि कथा रहबे करत। जेम्स जॉयसक “डब्लाइनर” लघु-कथा संग्रहक सभ कथा एकटा घटनासँ अनचोके कोनो वस्तुक त्वरित ज्ञान दर्शबैत अछि। १५ टा शॉर्ट-स्टोरीक संग्रह जेम्स जॉयसक “डब्लाइनर” २०० पृष्ठक अछि आ मैथिली विहनि कथाक सभ विशेषतासँ युक्त अछि खास कऽ एक्केटा “एपीफेनी” नाम्ना तत्व एकरा विहनि कथा सिद्ध करैए। तहिना खलील-जिब्रान आ एंटन चेखवक ढेर रास शॉर्ट-स्टोरी नमगर रहितो विहनि कथा अछि। अंग्रेजीमे वा यूरोपियन साहित्यमे शॉर्ट-स्टोरी आ स्टोरीक प्रयोग कखनो पर्यायवाचीक रूपमे होइत अछि। नॉवेल जकरा बांग्ला आ मैथिलीमे उपन्यास आ मराठीमे कादम्बरी कहै छिऐ-क विस्तार बेशी होइ छै। मैथिलीमे ५०-६० पृष्ठसँ उपन्यास शुरू भऽ जाइत छै जे अंग्रेजीक शॉर्ट-स्टोरी / नोवेलेट/ नोवेला/ ऐ सभक ऊपरी सीमाक्षेत्रमे अबैत अछि। मुदा मैथिलीक स्थिति अंग्रेजीसँ फराक छै, ऐमे बालकथा कैक राति धरि चलैत अछि तँ पैघ लोकक कथा मिनटमे सेहो खतम भऽ जाइत अछि। मैथिलीक सन्दर्भमे ई तथ्य आब सोझाँ आबि गेल अछि जे विहनि कथाक सीमा एक पृष्ठ, लघुकथाक तीन-चारि पृष्ठ, दीर्घकथाक १५-२० पृष्ठ आ उपन्यासक ६०-५०० पृष्ठ अछि। ऐमे विहनि कथाक पृष्ठ सीमा १-४ पृष्ठ धरि करबाक बेगरता हम बुझै छी। मैथिलीक किछु सर्वश्रेष्ठ विहनि कथा: मैथिली विहनि कथाक कथ्य आ शब्दावलीमे बड्ड रास गुणात्मक परिवर्तन आएल अछि। ओइ दृष्टिकोणसँ जँ विहनि कथा सभकेँ देखी तँ ज्योति सुनीत चौधरीक “नबका पीढ़ी” आ “घर दिसका रस्ता” विषयवस्तुक दृष्टिसँ २१म शताब्दीक विहनि कथा थिक। नबका पीढ़ीक बच्चा सभ वृद्ध दम्पतिक मोन खराप भेलापर चिन्तित होइ छथि तँ बाहर रहि रहल बेटा, बेटा जकाँ नै डॉक्टर जेकाँ गप करऽ लगैए। “घर दिसका रस्ता”मे बिसलेरी पानिसँ एयरपोर्ट होइत, माटिक ढिमकाकेँ काटि बनल विद्यालय आ समाजक विकृतिकेँ उज्जर मटमैल रंगमे टंगने विधवा युवती धरिक चर्च भेटि जाएत। हिनकर “पानिमे खेती” विज्ञान विषयक मैथिलीक पहिल विहनि कथा अछि। दुर्गानन्द मण्डल जीक “किसना मुट्ठी” विहनि कथा लेल खाँटी शब्दावलीक बेगरता देखबैत अछि। अंग्रेजी शब्द भण्डारक दक्षतापूर्ण प्रयोग जेना आर. के. नारायण करै छथि तहिना दुर्गानन्द मण्डल मैथिली शब्दावलीक दक्षतापूर्ण प्रयोग करै छथि। रामप्रवेश मण्डल अही तरहक शब्दावलीक प्रयोगसँ साधारणो विहनि कथाकेँ असाधारण बना दै छथि। राजदेव मण्डल जेहने कविता लिखै छथि, तेहने उपन्यास आ तेहने विहनि कथा, सभ तरा-उपरी। कथ्य आ शिल्पक संतुलन लेल ओ ओहिना प्रसिद्ध नै छथि। बेचन ठाकुर अंधविश्वासक सामाजिक उपादेयतापर विहनि कथा लिखि जाइ छथि (फुसिक फल)।उमेश मण्डलक रुपैयाक ढेरी नारी सशक्तिकरणपर मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ विहनि कथा अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल, परमेश्वर कापड़ि, कौशल कुमार, भवनाथ झा, शम्भु कुमार सिंह, जगदानन्द झा “मनु”, लक्ष्मी दास आ रामलोचन ठाकुरक विहनि कथामे जेम्स जॉयसक एपीफेनी स्पष्ट रूपसँ दृष्टिगोचर होइत अछि जे आन मैथिली विहनि कथाकारमे ओत्ते स्पष्ट रूपमे नै देखबामे अबैत अछि। आशीष अनचिन्हार, अमित मिश्र आ चन्दन कुमार झा नवका पीढ़ीक विषय परिवर्तन आ प्रयोगक साक्षी छथि। ओमप्रकाश झा क “स्पेशल परमिट” आ मिहिर झा क “१०० टाका” कथ्यक नूतनता आ भिन्नताक कारण मैथिली विहनि कथाक इतिहासमे खास स्थान राखत। सन्दीप कुमार साफीक “अन्ध विश्वास” बेचन ठाकुर जीक “फुसिक फल”क उल्टा अछि, आ ई दुनू विहनि कथा अपन प्रभावसँ देखबैत अछि जे कोना अन्धविश्वासक पक्षमे आ विपक्षमे रहि कऽ दुनु गोटे कोना अपन-अपन विहनि कथाकेँ सोद्देश्यता प्राप्त करबैत छथि। मुन्नाजीक “रेवाज” विहनि कथा लिअ। गाम घरमे मसोमातकेँ लोक डाइन कहै छै मुदा मुइलाक बाद घराड़ी लेल ओकरा आगि देबा लेल उपरौंझ होइ छै। एतऽ मुदा विहनि लेल जे बीआ छीटल गेल छै से कने उच्च स्तरक छै। एतऽ मृतककेँ बेटा नै छै मुदा पत्नी आ बेटी छै। से जखन मृतकक भाइ कोहा उठबऽ चाहैए तँ विधवा ओकरा रोकै छै आ बेटीकेँ कोहा उठबैले कहै छै। आ संग के देत ऐ नव रेवाजमे, जे आइयेसँ प्रारम्भ भेल अछि। तखन उत्तरो भेटैए- निपुतराहा सभ। जवाहर लाल कश्यपक “हम्मर माय तोहर माय” आ “भगवानक भाग्य” अद्भुत रूपेँ कथ्यकेँ प्रस्तुत करैत अछि। मैथिली विहनि कथा संसारक संख्यात्मक आ गुणात्मक अभिवृद्धि हर्खित करैबला अछि। मुन्नाजी सामाजिक सरोकारकेँ छुबैत विहनि कथा जिनगीमे उठैत उकस-पाकसकेँ सम्वेदनापूर्ण मानवताक संग सरियबैत रचनाकार पत्र-पत्रिकासँ समाज आ पाठकक मोनमे बैसि गेलाह अछि। रेशम आ सूतीक बीच फाँक भेल जिनगीकेँ स्पष्ट करैत, आरामदायक आ सुखद अनुभवकेँ सोझाँ आनब आब रचनाकार अपन रचनाधर्म बुझि गेलाह अछि। तेँ आजुक समस्त रचनामे जिनगीक उतार-चढ़ाव, खसैत-उठैत सम्बन्ध सुखाइत सन सिनेह सभकेँ अपना हृदएमे बसा रचना रचैत छथि लेखक। ऐ युगक रचनाकारकेँ आब गरीब बाभनबला किताबी खिस्सा आ राजा-रानीबला पिहानीसँ ऊपर उठि अपन सामाजिक समरसताक निस्सन निशानीक बोध भऽ गेल बुझाइत अछि। मैथिली विहनि कथा सभ सेहो लोकक जिनगीक गहींरता नपैत ओकर सुख-दुखक फाँटक बीचसँ निकलि ओइ फाँटकेँ भरैत ओकर एक-एक अंश धरि जुड़ि जिनगीक दर्शन करबैत, सोझाँ आबि रहल अछि । मोम आ पाथर पहिने एक दोसराक विपरीत जिनगीकेँ आरेखित करैत रहल। मुदा आब नै, आब तँ एक्कै हृदएमे क्षणक बदलैत गतिक संग मोम आ पाथर दुनूक समन्वयक बनि जिनगीक सभ अन्तरंगताकेँ छुबैत उद्वेलित कऽ बेरा-बेरी मुदा एक्कै ठाम केन्द्रित भऽ देखार भऽ उठैत अछि। आजुक मानवक संवेदना एतेक परिवर्तनीय भऽ गेल अछि जे एक्के संग अहाँक चरित्रमे मोम आ पाथर दुनूक रूप दृष्टिगोचर होइत, रचनाकार सोझाँ आनि ओकर सत्यकेँ साबित कऽ रहलाह अछि। सत्य! एकटा काल्पनिक विजय मात्र नै थिक, सत्य कतौसँ अनायास नै टपकि पड़ैए। सत्य पूर्णतः मानव जीवनक यथार्थ थिक। सत्य मानवकेँ अनुचित कार्यसँ रोकबाक वा विधर्मी हेबासँ बचेबाक श्रीयंत्र जकाँ अछि, जकरा आजुक रचनाकार अपना रचनाधर्मितासँ लोकक हृदए धरि छुआ ओकर यथार्थ बोध करौलनि अछि। पहिनुक विहनि कथा सभ दहेजक दानवकेँ उघार कऽ, दहेज पीड़िताक मर्मकेँ वा दहेजसँ भेल परिणामकेँ अपन केन्द्रमे आनि सम्वेदित करैत छल। ओइसँ इतर चुटुक्का वा हास्य-कणिका लऽ तत्कालीन नेता सबहक विपटावादी चरित्रकेँ उजागर कऽ अपन रचनाक इतिश्री बुझैत छला। एहेन नै छलै जे तहियाक रचनाकारक सोच संकुचित छल। ओहो सभ दूर धरि सोचैत छला, गमै छला आ तखन ओकरा सोझाँ अनै छला। मुदा ई परिवेशक दोष सेहो कहल जा सकैए जे तहियाक रचनाकार सभ विषए-वौस्तुकेँ संकुचित कऽ मैथिली विहनि कथाकेँ सेहो संकुचित कऽ देलनि। २०म सदीक छट्ठम-सातम दशकमे प्रायः ओहने परिवेश संरचित छल। जकर परिणामे विहनि कथा मात्र नै वरन् आनो विधा यथा कथा/ नाटक/ उपन्यास आदिमे वएह दहेज आ खिस्सा आ नेताजीक करनीकेँ सोझाँ आनल जाइत रहल छल। आब परिवेश बदललै, दृष्टिगत फरिछता एलै, सामाजिक समरसता पसरलै। तहन समाजक छुआछूत मात्रक अवलोकन होइत छलै। मुदा आइ ओइ छुआछूतसँ भेल परिणाम, जाति-पातिमे बान्हल लोकक दृष्टि-परिवर्तन, आर्थिक सम्पन्नता, पैघक संग सभ बिन्दु, विषय वा स्थानपर ओहो अछोप सन, निंघेस बनल लोकक सहचर बनब, सभकेँ देखाओल जाए लागल आजुक लोककथामे। आब विषय विस्तार स्वतः सभ तरहक घटनाकेँ छुबैत कागचपर आबऽ लागल अछि। आबक परिवेशमे दहेजक पसार भऽ गेल अछि। एहेन पसार जकरा आब विशेष मुद्दा नै बना, बल्कि ओकरा जीवनक सामान्य क्रियाकलाप बुझि, परम्पराकेँ उघबाक प्रक्रियाकेँ दर्शाओल जाए लागल अछि। तहिया दहेज दानव जकाँ छलै। जे रचनाकारक लेल प्रमुख विषए छल। आइ दहेज दानव मात्र नै महादानव बनि ठाढ़ अछि मुदा परिवेश बदलल छै, माने कि आब तहियाक अपेक्षा आर्थिक सम्पन्नता बढ़ि गेलैए तेँ लोककेँ ई महादानव अपन जीवनक एकटा अंग बनि गेल अछि, कोनो बड्ड पैघ समस्या नै। आब तँ ओइसँ पैघ-पैघ समस्या रचनाकारकेँ उद्वेलित करैत अछि। यथा बिआहक खुजल रस्ता, कियो कोनो जाति-धर्मसँ बिआह कऽ सकैए आ ओकरा न्यायालय प्रमाणित तँ करिते अछि। सरकारी संरक्षण सेहो भेटै छै। ओइसँ ऊपर दहेज उन्मूलनक दिशामे समलिंगी बिआह समाजकेँ जतऽ डेरा रहल अछि, ओतै रचनाकारकेँ एकटा नव दृश्यांकनक अवसर दऽ रहल अछि। पहिने लोकक विपन्नता सेहो दृष्टि संकुचनक पर्याय छल। ई स्वाभाविक छै जे पेट भरल रहतै तखने लोकक सोच ओइसँ दूर धरि जेतै। नै तँ सभटा सोच भूखसँ उत्पन्न भेल आकुलतामे समाहित भऽ रहि जाएत। आब स्थिति उनटल अछि। आर्थिक उदारीकरण आ वैश्वीकरणक आएल चलनसारिमे। आब लोक आर्थिक रूपेँ सम्पन्न भेल अछि। आर्थिक सम्पन्नता आब पेटक भूखसँ इतर आन-आन भूख जगेलक अछि। जइ कारणेँ चोरि, हत्या आ बलात्कारकेँ सेहो बढ़ावा भेटल अछि, जे ओकरे रूप अछि, प्रतिरूप बदलि गेल अछि। तँ आजुक लेखककेँ कलम चलेबा लेल आ बदलल प्रतिरूप हथियारक रूपमे भेटि गेल आ रचनाकार सभ ऐ सभ अपराधकेँ अपन कलमक माध्यमे नवीनीकरण कऽ सोझाँ आनि रहल छथि। सम्प्रति रचनाकार सभ पदयात्रासँ ऊपर उठि मंगलग्रह यात्रापर जा रचनारत छथि। पहिलका जमानामे लोक शुद्ध दूध ग्रहण करैत छल, आब दूध तँ दूर पानिक समस्या लोककेँ घेरने जा रहल छै। कतौ पानिक कमीसँ हाहाकार मचैए तँ कतौ लोक बाढ़िक कोप भाजन बनि भूखे बिलबिलाइत नाङट भेल छतविहीन लोकक असरा तकैए। आ लेखक ऐ सभपर अपन दृष्टिए नजरि गरा कागचपर अनैए। भारतमे सम्विधान सम्मत पितृसत्तात्मक परिवारकेँ उघबाक निमित्ते पुत्रक पैदाइशकेँ बढ़ावा देल जाइत रहल अछि। ओना तँ आइयो लोक बेटाक लिलसामे बेटीक हत्या (भ्रूण हत्या) कऽ रहल अछि जे दुनू अवस्था मैथिली विहनि कथा लेखकक कलमक धारकेँ पिजौलक अछि। मुदा ऐ सबहक बावजूद जे मुद्दा लेखककेँ मसाला देलक ओ अछि नारी सशक्तिकरण। पहिने मौगीक मूँह जाबि कऽ ओकर सुरैतकेँ घोघमे नुकाएल रखबाक परिपाटी छल। मुदा आइ पुरुष सभ अपन कमाइकेँ द्वितीयक आ मौगीक नोकरीकेँ प्राथमिकता दऽ रहल अछि। शहरक कोन जे गाम देहातक मौगी सभ आब सरकारी नोकरी राजनीतिमे आगाँ बढ़ि कऽ आबि रहल अछि आ घरबला सभ पिछलगुआ बनि जीवन बिता रहल छथि, जकरा मैथिली विहनि कथाकार सभ अपन कलमक माध्यमे भजा रहल छथि। महिलाकेँ आरक्षण दऽ एक दिस सरकार अप्पन कुर्सी बचबैए तँ दोसर दिस पुरुष सभ अपन घर बचेबा लेल संघर्षरत देखाइत छथि, जइ सभ क्रियाकलापपर कलमकारक वक्र दृष्टि अछि। उपरोक्त बदलावक अतिरिक्त सभसँ पैघ परिवर्तन देखल जा रहल अछि तकनीकी चलनसारि। आइ मोबाइल इन्टरनेट डिश टी.वी./ एल.सी.डी. आ लेड टी.वी. लोकक जीवनकेँ एगदमसँ चलायमान बना देलक अछि। तेँ लोक धरतीक भीड़ आ भार कम करबाक लेल चान दिस नजरि दऽ रहल अछि। आजुक मैथिली विहनि कथाकार सेहो उपरोक्त सभ बिन्दुकेँ छुबैत अपन रचनाक एक-एक सूक्ष्म गतिविधिक सुन्दर वर्णन करैत देखार भऽ रहलाह अछि। समाजक बदलैत घटनाक्रमक प्रत्येक बिन्दुपर चाहे ओ सामाजिक समरसता हुअए, परिस्थितिगत बदलैत परिवेश हुअए, तकनीकी चलनक प्रभाव हुअए, आर्थिक सम्पन्नता- वैश्वीकरण- वा कोनो अन्यान्य खाँहिसँ जनमल कोनो समस्या हुअए। आजुक मैथिली विहनि कथाकार ओइ प्रत्येक बिन्दुकेँ अपन कलमसँ उठा कागचपर आनि सोझाँ अनैत छथि। जइसँ सामाजिक सरोकारसँ जुड़ल एक घटना मैथिली विहनि कथाक विषय बनि लोकक सोझाँ आबि रहल अछि। ऐ सँ ई स्पष्ट होइए जे पहिनुका मैथिली विहनि कथा वा विहनि कथाकारक एकटा सीमामे बान्हल सोचसँ आगू बढ़ि आजुक रचनाकार मैथिली विहनि कथा भण्डारकेँ एना भरि रहलाह अछि जइसँ कोनो उमेरक कोनो लोकक कोनो सोचक खाहिसँ पूरा भऽ सकए। तेँ समाजक सभ प्रकारक गतिविधिकेँ समेटकऽ चलि रहल छथि मैथिली विहनि कथाकार। अमरनाथ छठम दशकमे विहनि कथा लिखब शुरू केलनि आ सातम दशकमे अपन लघुकथा संग्रह- “क्षणिका” (१९७५ई.) लऽ उपस्थिति दर्ज करौलनि, जे हमरा जनतबे मैथिलीक प्रारम्भिक विहनि कथा संग्रह मे सँ एक थिक। ऐ सँ पहिने हंसराजक विहनि कथा संग्रह "जे किने से" १९७२ ई. मे प्रकाशित अछि। ऐ पुरान पीढ़ीक बादक मध्यम पीढ़ी जे कथा साहित्यमे नवसंचार अनलक आब सुस्ता गेल अछि, लगैए ओ सभ आब अपन कएल परिश्रमक पारिश्रमिक यानी पुरस्कार ग्रहण मात्रक सोद्देश्ये सक्रिय अछि। पहिल मैथिली विहनि कथा गोष्ठीक आयोजन:- २० फरवरी १९९५ ई. केँ चित्रगुप्त प्राङ्गन हटाढ़ रुपौली (मधुबनी)मे भेल छल। संयोजकद्वय मुन्नाजी आ मलयनाथ मण्डन। अध्यक्षता- श्री भवनाथ भवन, मंच संचालन- कुमार राहुल। उपस्थित- १९ गोट विहनि कथाकारक २६ गोट विहनि कथा पाठ भेल। उपस्थित जनमे- पं.मतिनाथ मिश्र, पं.यन्त्रनाथ मिश्र, श्री श्यामानन्द ठाकुर, उमाशंकर पाठक, ललन प्रसाद, सचिदानन्द सच्चू, मुन्नाजी, कुमार राहुल, अतुल ठाकुर, प्रेमचन्द्र पंकज, मलयनाथ मण्डन, मीरा भारती कर्ण एवं सुनील कर्ण अपन रचना पाठ केलनि। विदेहक विहनि कथा विशेषांक ६७म अंक कतेक दशकक उकस-पाकस एवं स्वतंत्र विधाक उहाफोहक बीच विहनि कथाकेँ मैथिलीमे स्वतंत्र विधा हेतु स्थिर केलक। “विहनि कथा” विहनि अर्थात् बीआ। हम एकरा मैथिलीक स्वतंत्र नामेँ आगू बढ़ेबाक प्रयास १९९५ ई. मे मैथिली मासिक “विचार” (सहयात्री प्रकाशन, लोहना, मधुबनी) द्वारा केने रही। वर्ष १९९५ मे ‘सहयात्री मंच’ लोहना, मध्ुबनीक साहित्यिक विमर्श प्रस्ताव रखलौं। जकरा हुलसैत सहृदये मैथिलीक कवि, कथाकार श्री राज द्वारा समर्थन कएल गेल। ई अंग्रेजीक शॉर्ट-स्टोरीसँ इतर एकटा बीज-कथा (विहनि कथा, सीड स्टोरी) अछि। उड़ियामे क्षुद्रकथा (खुद्र कथा), पंजाबीमे “मिन्नी कथा”, बांग्लामे “एक मिनिटेर कथा”, मलयालममे “निमिषा”, तहिना मैथिलीमे “विहनि कथा”। विहनि कथा मादेँ वरिष्ठ कथा/ लघुकथाकार श्री “राज”क मत छनि- जेना एकटा छोटछीन बीआमे गाछक सम्पूर्णता निहित अछि, तहिना विहनि कथा अपने-आपमे कोनो कथाक सम्पूर्णताकेँ समेटने अछि।” आ फेर १० दिसम्बर २०११केँ ‘सगर राति दीप जरय’क ७५म कथा गोष्ठीक आयोजन पटनामे कएल गेल, ऐ अवसरपर मुन्नाजी द्वारा मैथिलीक पहिल विहनि कथा पोस्टर प्रदर्शनी कएल गेल छल। विहनि कथा आब स्थापित अछि आ ई शब्दावली पाठकक मोनमे पैसि गेल अछि, आ ऐसँ विहनि कथाकार लोकनिपर एकटा पैघ दायित्व सेहो आबि गेल छन्हि, दायित्व एकर स्तरकेँ नीचाँ नै हेबऽ देबाक आ उत्तरोत्तर बढ़ैत सामाजिक-राजनैतिक आ आर्थिक चुनौतीकेँ स्वीकार कऽ श्रेष्ठ विहनि कथा लिखबाक। ज्योति सुनीत चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर१९७८; जन्म स्थान-बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा-स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल टिस्को साकची गर्ल्स हाइ स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, जमशेदपुर; माता- श्रीमति सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँ www.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। नबका पीढ़ी फेर पहिने जकाँ लिफ्टक केबाड़ खुजल की नै दफ्तर आ विद्यालय जाएबला लोक सबहक भीड़ नीचा जाए लेल लिफ्ट दिस लुधैक गेल। बच्चा तँ बच्चा़ वयस्कोमे सँ ककरो लग समए नै रहए ऐ दुनू वृद्ध पति-पत्नीसँ नमस्कार पाती करए लेल। रहै तँ ई सभ दिनुका बात मुदा आइ बूढ़ी कनी बेसिये खिसिआएल रहथि “ई अछि आजुक पीढ़ी़ कोनो संस्कार नै।” भोरे भोर भ्रमणपर निकलनाइ हिनकर सबहक बिगड़ल स्वास्थ्यक प्रति सचेत रहक प्रयास छलनि जेक़ि डॉक्टर बेटाक परामर्श छलनि। बड प्रयत्नसँ बेटाकेँ पढा़ लिखा चिकित्सक बनेलनि। भेलनि बेटा कोनो बड़का कम्पनीमे सिफ्ट ड्यूटी करत आ खूब कमाओत। मुदा बेटाकेँ आर पढ़ाइक भूत कहिया लगलै से बुझबे नै केलखिन। बिआह भेलै़, बच्चो भेलै़ मुदा ओ सदिखन व्यस्ते रहल। पिछला तीन सालसँ माए बापक इच्छा रहनि जे ओ दुर्गा पूजामे किछु दिन अवकास लऽ कऽ हिनका सभ संगे रहए किन्त़ु संयोग नै मिलै छल। सभ बेर अन्तमे आबि कऽ कोनो जरूरी काजक बहन्नासँ कार्यक्रम रद्द भऽ जाइत छल। ऐ बातपर ओ दुनू बूढ़ा-बूढ़ी वाद विवाद करै छलथि जे ओ ऐबेर आएत की नै। घूरिकऽ घर एलापर बूढ़ीक सीनामे दर्द उठलनि। प्रेसरक मरीज छली, तँए पतिदेव तुरन्त डॉक्टरकेँ फोन केलखिन। डॉक्टर सभ जाँच केलकनि आ कहलकनि जे चिन्तासँ दूर रहू आ सभ दवाइ समैपर खाउ। हुनका सभकेँ तँ बहन्ना चाही छल बहस करै लेल। फेर दुनू गोटे एक दोसरपर आरोप-प्रत्यारोप करए लगलथि। विराम तखने लागल जखन फोनक घंटी बाजल। बेटाक फोन छलनि। माएक स्वास्थ्य बिगड़ल सुनि ओ बेसी बात करए लागल। नै तँ आन दिन कहाँ अतेक समए रहैत छल? प्रश्न ततेक जे बुझनाइ मुश्किल जे बेटाक फोन छल आकि चिकित्सकक। बाप सभटा कहलखिन तँ इहो शुद्ध चिकित्सकक भाषामे समैपर दवाइ खाए कऽ उपदेश पियौलकनि। बूढ़ाकेँ ऐ बातचीतमे ज्ञात भेलनि जे बेटा कोनो तेहेन शोध कार्यमे लागल अछि जे आब पूरा होइपर छै आ एकर सफलतासँ सम्पूर्ण मानव समुदायकेँ बड़का कल्याण हेतैक। ओना अतेक डर तँ बूढ़ाकेँ जॉबक पहिल इंटरव्यूमे सेहो नै भेल रहनि, जतेक पत्नीक तबियत गड़बड़ेलापर बेटासँ बात करैमे होइत छन्हि। खएर समए बीतल आ बूढ़ी फेर पहिने जकाँ बाजऽ लगली। घुमनाइक दिनचर्या फेर प्रारम्भ भेल। फेर बीस मिनट सड़कक काते-कात पार्क तक आ पार्कसँ फेर घर वापिस। बूढ़ी जखन बेमार होइत छली तँ बेटाक भावनात्मक सत्कार बड नीक लागैत छलनि। तखने तँ लागैत छलनि, बेटा अखनो हुनका सभकेँ नै बिसरने छन्हि। तकर बाद जैने ई सभ ठीक की ओ फेर बिगड़ल। यएह सभ सोचि दुनू खुश छलथि। लिफ्टमे चढ़लथि घर पहुँचय लेल। लिफ्ट रुकल की दुनू कात भऽ गेलथि। मुदा ई की - ओ सभ पुछैत छलनि जे अतेक दिन कतए छलथि- घूमए किए ने गेलथि आदि आदि। ओकर सबहक भागैत स्थितिक अनुसारे दुनू शीघ्रतासँ संक्षिप्त जबाब देलखिन। आइ बुझेलनि दुनूकेँ जे नवपीढ़ीकेँ प्रतिस्पर्द्धासँ भरल युगमे जीबै लेल अतेक भागादौड़ी करए पड़ि रहल छै जइ कारणे औपचारिकताक समए नै छै मुदा सभमे भावुकता अखनो जीवित छै। घूमिकऽ लौटलाक बाद बूढ़ी दुनू गोटे लेल कॉफी बनाबैत छली आकि फोन बाजल। बूढ़ा फोन उठेला आ कनिये देरक बाद फोन राखि देलथि। हुनकर मुँहक उदासी कनियो नाटकीय नै बुझाइत छल। कप पकराबैत बूढ़ी बजली़ “की फेर कुनो काज लागि गेलै।” बूढ़ा हॅंसैत बजला़ “ओ तँ नै आबि रहल अछि मुदा हमरा सभ लेल टिकट पठा रहल अछि। अहिबेर हम सभ पूजामे संगे रहब। हम सभ बेटाक घर जाएब आ बेटा पुतोहु सहित पोती संगे पावनि मनाएब।” फेर की छल आब कॉफीक एक एक चुस्की आगाँक कार्यक्रम बनाबैमे बीतल। घर दिसका रस्ता कतेक नीकसँ ऑंखि लागल छल, अतेक हरानी भेल छल गामपर। फेर गामसँ पटनाक यात्रा, पटनाक बादो तँ डोमेस्टिक एयरलान्स अन्तःराष्ट्रीय हवाइसेवा छल। तुरन्त अन्तर बुझा जाइत छै ऐ दुनूमे, किन्तु एकबेर गामपर ई बात बजा गेल तँ संगी सभ कहलक जे बड पाइ अछि तँ चार्टर्ड प्लेन कऽ लिअ। आब लैण्डिंगमे मात्र बीस मिनट छल से एयरहोस्टेस -विमान सेविका- सभ खिड़की खोलि देलक आ सभ बत्ती जड़ा देलक। बुझु तँ दूइए मिनिटमे अन्हरिया रातिसँ दुपहरिया भऽ गेल। नास्ता चाय संगे इमिग्रेसन फॉर्म -आप्रवासन प्रपत्र- सेहो बाँटल गेल। यन्त्रवत सभ तैयारी कऽ लेलौं कारण कोनो पहिल बेर तँ छल नै। आब तँ तेहेन आदति भऽ गेल अछि जे कतौ नाओं लीखक आवश्यकता हएत तँ नाओं संगे पता, जन्मतिथि, व्यवसाय, पासपोर्ट नम्बर आदि सभ लिखा जाएत। व्यवसाय लेल तँ सालमे कएक बेर हवाइ जहाजक पाला पड़ैत अछि आ चारि सालसँ जहियासँ विदेश एलौं एकबेर गाम तँ जाइते छी। पत्नीमे समए आ परिस्थिति संगे हिलमिल जाइक ततेक नीक गुण छन्हि जे दोसरे बेरसँ गाम नै जएबाक शपथ लेली। जखनसँ स्वावलम्बनक आत्मविश्वास भेलनि हुनकर दुरदर्शिता कहलकनि जे गामक प्रगति कहियो नै हएत। ओइठाम जाइ आबएमे जे खर्चा करैत छी तइमे पूरा दुनियाँ घुमनाइ भऽ जाएत। हमरा अपन जन्मस्थानसँ तेहेन आसक्ति अछि जे सभ बेर परेशान होइत छी मुदा गेनाइ नै छोड़ैत छी। एकबेर पूरा चौहद्दीक चक्कर जरूर काटै छी। सभ दिस ताकैत रहै छी जे कनी प्रगति देखा जाए। वएह अपन छोट भायकेँ कोरा लेने बचिया महिसपर सवार बच्चा, समाजक विकृतिकेँ मटमैल उज्जर रंगमे टंगने विधवा युवती, नाटक नौटंकीक तैयारीमे अपन बेरोजगारीक दुःख नुकाबैत नवयुवक़, घरपर खाइक आफद मुदा जमाय लेल तिलकोड़ा तरैत बेटीक माए, पुतोहुपर कटाक्ष करैत बुढ़िया, टुटल आरिपर चलैत मोक्षक मार्गपर शास्त्रार्थ करैत बुजुर्गवर्ग, ई सभ हमर पत्नीक बुद्धिमत्ताक गवाही दैत अछि। जखन माटिक ढिमकाकेँ ढ़ाहिकऽ उच्चविद्यालय बनैत देखलिऐ तँ अपन नेनपनक दिन सभ भाइ-बहिन, संगी सभ संगे ओतऽ लुकाछिपी खेलेबाक याद मिटाइक कनिको दुःख नै भेल। खुशी भेल जे आब जाड़क भोरमे वा गरमीक गुमारमे वा बरसातक पिच्छड़मे बच्चा सभकेँ साइकिलसँ पाँच पाँच किलोमीटर नै जाए पड़तै। हम सभ तँ पएरे जाइ छलौं, फेर बाबूजी अठमासँ छात्रावासमे दऽ देलथि। तखन सँ जे घर छूटल से छुटले रहल। कॉलेज लेल दरभंगा, फेर तकनीकी शिक्षा लेल मुजफ्फरपुर आ नौकरी लागल अन्तरराष्ट्रीय कम्पनीमे, ई सभ घर परिवार छोड़ाइए देलक। बाबूजीक सपना पूरा भेलनि, हमरा अभियन्ता बनैत देखिकऽ। फलक चिन्ता केने बिना कर्म करैक पाठ जे गीतामे कहल गेल अछि तइपर हमर माता-पिता पूर्णतः अनुसरण करैत छथि। बस स्वयंकेँ विदेशमे रहैबला अभियंताक अभिभावक कहि कऽ खुश भऽ जाइ छथि। अपन उपजाबाड़ी, दियाद आ समाजकेँ छोड़िकऽ कतौ नै जाइ लेल प्रतिबद्ध छथि। “बस तँू आनन्दसँ रहऽ सएह चाहै छी”, यएह जबाब भेटैत अछि जखन अपना संगे जाइ लेल कहै छियनि। गाम भरिमे विख्यात अछि जे हमर समानमे कपड़ा कम आ पानिक बोतल बेसी रहैत अछि। सभ पटनामे भरि कऽ लऽ लैत छी। गामपर लोककेँ खूब हँसी आबैत छै। सभ डेराबैत रहैत अछि जे डुप्लीकेट होइत अछि। गामक लोकक ज्ञान ऐ सभमे बहुत विलक्षण होइत छै। अपने फटेहाल रहत मुदा कोट पैण्ट बलाकेँ तेहेन-तेहेन बात कहत जे ओ तुरन्त ड्राइवास बला लग भागत। जाबे पढ़ैत रही ताबे नौकरीक दुर्गमतापर ई लोकनि बड्ड चिन्तित रहैत छलथि, आब जखन नौकरीमे छी तँ हमर व्यस्ततापर सहानुभूति छन्हि। गामसँ विदा होइत छी तँ सभ आबै छथि अपन आशिष दइ लेल। हिनकर सबहक यएह स्नेह हमरा फेरसँ आबैक निमंत्रण दैत अछि। पैघ कतार छल प्रवासनक पूछताछ लेल, तइपर सँ स्त्री, बच्चा आ बुजुर्गक जे विशिष्ट सुविधा छै तइसँ आर देर हेबाक आशंका छल मुदा सभ जल्दिये भऽ गेल। कनिक समए कस्टमसँ निकासीक बाद समान आबैमे लागि रहल छल। कन्वेयर बेल्ट चलनाइ शुरू भऽ गेल छलै आ समानो आबए लागल छल। मोबाइलक बीपक संग अपन धियान टुटल तँ देखलौं जे हमर समान सेहो आबि गेल छल। पिछला किछु देरमे हम प्रत्येक मिनटमे एक सालक यात्रा कऽ लेने रही। समान लऽ कऽ विदा भेलौं आगाँ। मोबाइलपर समाद छल जे पत्नी अराइवल गेट आगमन द्वारपर हमर प्रतीक्षा कऽ रहल छथि। फोनसँ यथार्थमे आनि देने छली आ जखन भेँट हेती तखनसँ भविष्यक सैओटा योजना सुनेती। फेर कहियो फुरसतमे रहब तँ अतीतक ओइ भागक यात्रा करब जे अखन छूटि गेल, फिलहाल तँ हम घर दिस विदा भेलौं। पानिमे खेती विवेक बाबू एक ग्रामीण कृषक परिवारसँ छथि। बच्चेसँ राेपनी, पटौनी, कटनी, दाउन, यएह सभ देखि कऽ पैघ भेलथि। बहुत तरहक विवादक ओ बड्ड नजदीकसँ सामना केने छथि। दमकल लगेलक कियाे आ कियाे आर बिन पुछने आरि काटि कऽ अपन खेतमे पानि भरि लेलक, पाेखरिमे जीरा पड़ल की नै, बच्चा सबहक बंसी खेलेनाइ शुरू अछि, बान्ह बनाबै काल ककराे दिसका जमीन बेसी नै चलि जाए तइ लेल कलह, ई सभ छाेटमाेट हलचल तँ ओतुक्का दिनचर्यामे शामिल छल। ऐ सभसँ हाेइत विवेक काॅलेज पहँुॅचि गेला।जखन गामक लाेककेँ ज्ञात भेलनि जे ओ कृषिविज्ञानक अध्ययन कऽ रहल छथि, तँ आश्चर्य भेलनि। सभकेँ भेलनि जे ऐ विषयमे हमरा लाेकनिकेँ पढ़ाइक की आवश्यकता? फेर सभकेँ भेलनि जे विवेक बाबू नव-नव प्रजातिक बीआ नव-नव तरहक खाद, काेन माटिमे काेन तरहक उपजा बारी नीक आदिक विषयमे खूब बतियाैता। सभ बेर जखन छुट्टीमे विवेक बाबू गाम आबैत छलथि, लाेकक कानमे बात जाए, तइसँ पहिने घुरि जाइ छलथि। अन्ततः अहिबेर ओ सभकेँ भेटलथि। संगी कक्का, बाबा सभ कियाे घेर लेलखिन हुनका। अपन विषयमे बाजैमे विवेकबाबूकेँ सेहाे काेनाे असमंजस नै छलनि। मुदा हुनका लग जे ज्ञान रहनि से लाेक सबहक आशासँ काेसाे हटि कऽ छलनि। असलमे विवेक बाबू हाइड्राेपाेनिक कल्टीवेसन -पानिमे खेती- क पढ़ाइ पढ़ि रहल छलथि। विवेक बजलाह “आब एहेन तकनीकक विकास भऽ गेल अछि जे मात्र पानिमे खेती भऽ सकैत अछि।” सभ पुछलखिऩ “मात्र पानिमे । माटिक काेनाे आवश्यकता नै?” “नै माटिक काेनाे आवश्यकता नै।” “तँ गाछ ठाढ़ काेना रहैत छै?” “पाइपमे भूर कऽ गाछकेँ ठाढ़ कएल जाएत छै। पाइपमे बहैत पानिमे सभ आवश्यक तत्व मिला देल जाइत छै, जइ लेल गाछ पहिने माटि आ खादपर आश्रित छल। जड़ि पाइपक अन्दर बहैत पानिसँ सभ पाैष्टिक तत्व ग्रहण कऽ लैत अछि। गाछक शेष भाग पाइपक भूर बाटे बाहर रहैत अछि। काेनाे काेनाे गाछकेँ ओकर आकारक अनुसार बाउल आ छाेटकी पाथरक सहारे सेहाे राखल जाइत अछि।” “आमक कलम लागि सकैत छै की एनामे?” “अखन तक तँ नै, मुदा जॅं विशेष संकर आ अल्पाकार प्रजाति विकसित होए तँ सेहाे भऽ सकैत अछि”। कनिक कालक चुप्पीक बाद कृषि-विज्ञानक ई संगाेष्ठी समाप्त भेल। लाैटैत काल सभकेँ ज्ञात रहनि जे ऐ व्यवस्थाक खर्चा पुछनाइ ओ बिसरि गेला मुदा अफसाेस नै रहनि। कारण जतए सभ किछु प्रकृतिपर आश्रित अछि, जे सुविधा उपलब्ध अछि तकराे प्राप्ति नै अछि, ओतए एहेन चमत्कारक संकल्पना एक असंभव स्वप्न सन छल। बेर-बेर सरकारक दाेस ताकि-ताकि सभ थाकि गेल रहथि। ऐ ज्ञानपर तँ विवेक बाबूकेँ बाहरेे राेजगार लगतैन। गामक एकटा आर प्रतिभा अनका अर्पित भेल। मैथिल बिआह रित्सिका जीक परिवारकेँ अमेरिकामे एक समृद्ध मैथिल परिवारमे गिनती छलनि। मुख्य शहरसँ कनिये दूरपर सबर्ब्स इलाकामे अपन बड़का टा मकान लेने छली। घरमे पति आ दू टा बच्चा छलनि। पड़ोसमे विश्वक सभ दिसुका लोक छलनि जइमे सभसँ बेसी सम्पर्क बगलक अमेरिकी परिवारसँ छलनि। रित्सिका जीकेँ घर परिवारक देखरेखक बाद जे समए भेटै छलनि तइमे इवेण्ट मैनेजमेंटक काज करै छलथि। ओ मुख्य रूपे मैथिल उपनयन, बिआह, कोजगरा आदिक प्रबन्ध कराबैत छलथि मुदा कखनो कऽ अमेरिकन बिआह सेहो सम्हारैत छलथि। अच्छा, तँ हुनकर गोरकी अमेरिकन पड़ोसी कार्ला। कार्ला कुनो तरहे रित्सिकाकेँ पिछड़ल साबित करैमे लागल रहैत छलथि। मुदा रित्सिका तेहेन मुँहफट छली जे मुँह चुप करा दैत छलखिन। कार्लाक पतिक किछु मैथिल संगी सेहो रहनि। एकदिन कार्ला एकटा मैथिल बिआहक भोजमे गेली। ओतए हुनका रित्सिका भेटलखिन। ओ परिहास करैत बजलीह, “की कहू। बिआहक नाओंपर एतए तँ मानू कोनो पूजा पाठ होए। आ भोजमे कनियाँ वरसँ बेसी तँ आन सभ आह्लादित छथि। आने आन नाचि गाबि रहल अछि। कनिया वर की मजा लेता?” रित्सिका बजली- “किए? अहाँ सभमे बिआह मौन रूपमे मनाओल जाइत अछि? अहूँ सभ बिआहमे धार्मिक स्थल चर्चमे अथवा पादरीक उपस्थितिमे करैत छी। अहँू सभमे बिआहमे पार्टी होइत अछि। परिवारक जुटान होइत अछि। बल्कि अहाँ सभमे तँ बेसी काल पार्टीयोक तैयारी कनिया वर अपना मोने करैत छथि। एनामे ओ सभ कोन अपन बिआहमे बेसी मजा लैत हेता। पूरा बिआहमे यएह चिन्ता रहैत हेतैन जे बिआहक समारोह ठीकसँ सम्पन्न भऽ जाए। अपन साज-सज्जाक धियान आ आत्मविश्वास जतेक मैथिल आ दक्षिणी एशियन महिलामे अछि तेहेन तँ आन सभमे दूर-दूर तक नै अछि। हमरा सभमे बिआहमे पूरा परिवारसँ सम्बन्ध जोड़ल जाइत अछि। ई एक पारिवारिक समारोह होइत अछि। कन्यादान एक पुण्य कार्य मानल जाइ छै। बिआहक साल भरि पाबनि होइत अछि जइमे पूरा परिवार सम्मिलित होइत अछि आ कनिया वरकेँ सेहो मनोरंजन होइत छन्हि।” कार्ला- “आर कनिया वरकेँ अपन हेलमेल बढ़ाबयक कुनो अवसर नै भेटै छन्हि।” रित्सिका “बिआह दुरागमन मिलाकऽ सभ पाबनिमे मुश्किलसँ एक महीना जाइत अछि। ऐ कऽ अतिरिक्त पूरा समए अपना लेल रहैत अछि।” कार्ला “अनचिन्हार लोक सभ केना बिआह कऽ लैत छथि?” रित्सिका- “अचिन्हारसँ कहियो बिआह नै होइत छन्हि। हँ, पहचान परिवारक माध्यमसँ होइत छन्हि। परिवार आ समाजकेँ मान दैत अपन निजी खुशी देखनाइये मैथिल बिआह अछि।” कार्ला ठीके देखने छली जे केना बुजुर्गसँ पूछि-पूछि बिआहक विधि पूरा कएल गेल छल। भोजमे सेहो की पुरुष आ की महिला, सभ सुसज्जित छलथि। आन सिंगार संगे पारम्परिक परिधान, टिकली, चूड़ी, गहना आदिक सज्जामे महिला सभ चमकि रहल छलथि। फेर हाथक मेहदी आ केशक सज्जा आर अद्भुत छल। ओइ तुलनामे हुनकर महग डिजायनर ड्रेस बड सादा लागैत छलनि। खसैत आत्मविश्वासकेँ सम्हारैत कार्ला अपन जिद्दी स्वभावक कारण बजली- “हम कनियाक अपमान नै करए चाहैत छलौं तँए हुनकासँ बेसी सुन्दर नै लागय चाहै छलौं।” रित्सिका “तँ अहाँ मैथिल सुन्दरता केँ ललकारि रहल छी जतए सीता देवीक बिआह लेल बड़का स्वयंवर रचल गेल रहनि । अहुना भारतीय मॉडेल सभ विश्वसुन्दरी क खिताब जीति रहल छथि।” कार्ला अपन मोबाइल कॉल रिसीव करए कऽ बहन्ने कात आबि गेली। हिमदूत हेमन्तजी नौकरीक कारणे परिवारसँ दूर असगर अमेरिकामे रहैत छलथि। जाड़क प्रकोप अपन पराकाष्ठापर छल। तोरक तोर बर्फक बरखा सभ भूमिपर चाँदीक ओढ़ना ओढ़ेने छल। तइपर सँ हुनकर तरबामे कनिक क्रैक भऽ गेल छलनि, से बहुत दिनसँ प्लास्टर छलनि। नेङरा कऽ चलि चलि कहुना अपन जरूरी काज करैत छलथि। अतेक दिनसँ ऑफिस नै जा रहल छलथि से ओतौसँ सूचना आबि गेल रहनि जे यथाशीघ्र दफ्तर औनाइ प्रारम्भ करू। छुट्टीक कारण देरसँ उठैत छलथि आ जखन बाहर ताकैत छलथि तँ हिमदूतक छाप देखाइत छलनि जे नेन्ना भुटका सबहक टोली भरिसक बाहर बर्फपर सूतिकऽ हाथ पएर हिला हिलाकऽ बनौने छल। ई देखि हुनका अप्पन बाल्यकाल धियान आबि गेलनि जखन हिमदूतक खिस्सा सभ सुनैमे हुनको खूब मजा आबैत छलनि। अखनो मोन तँ बड्ड छलनि जे बाहर जा कऽ बच्चा सभ संगे बच्चा बनि खेल करथि मुदा पएरक प्लास्टर आइये कटल रहनि। डॉक्टर अखनो सतर्क रहै लेल कहने छलनि। आब आर कार्यालय नै गेनाइ ठीक नै छलनि से हेमन्तजी अपन तैयारी प्रारम्भ केला। ओ अतेक दिन बाहरक सफाइ नै कऽ सकल छलथि से अनुमान रहनि जे गैरेजक आगू जे बर्फक भरमार भऽ गेल हेतैन जकरा कार निकालै लेल साफ केनाइ अनिवार्य भऽ गेल छलनि। से सभसँ पहिने कहुना नेङड़ाइत फड़सा लऽ बाहर गेला। बाहरक दृश्य विस्मित करैबला छल कारण पूरा रस्ता आ द्वारक भाग साफ छल। बड आश्चर्यचकित छलथि जे ई केना भेल। नै किछु तँ पिछला दस दिनसँ लगातार बरफ खसि रहल छल। फेर बच्चा सभ जे हिमदूतक छाप बनौने छल सेहो बिना बर्फक मोट ढेरक बिना केना सम्भव छल? कहीं ई हिमदूतक अस्तित्व सच तँ नै, हेमन्त जी सोचला। दोसर दिन हेमन्तजी काजपर जाइ लेल जल्दी उठला तँ अपन द्वार लग किछु हलचल लगलनि। खिड़कीसँ तकला तँ देखला जे बच्चा सभ मिलि कऽ हुनकर जगह साफ करैत छलनि। जखन ओकरा सभकेँ टोकलखिन तँ ओ सभ कहलकनि जे हुनकर अस्वस्थता सभकेँ बुझल छलै तइ द्वारे बच्चा सभ प्रतिदिन खेलाइ काल हुनकर रस्ता साफ कऽ दैत छलनि। हेमन्तजीक हृदए भावविभोर भऽ अपन आभार व्यक्त करएमे असमर्थ भऽ गेल छलनि। आइ हेमन्तजीकेँ असली हिमदूतक दर्शन भऽ गेल छलनि। दुर्गानन्द मंडल किसना मुट्ठी मरनी भिनसुरके पहर बेलाराही चौरीसँ एक गैलन काकोड़ बीछि अनने रहए। मेला-ठेलाक समए रहै तैं, काेठीसँ दू मुजेला काटू निकालि अंगनामे सुखैले देलकै। ओकर बाद नहा-सोना आ खाए कऽ सुतैले खेन्हरा लऽ डेढ़ियापर चल गेल। पुरबा हलफी दैत छले, निन्न टुटलै। आँखि मिड़ते उठल आ हाँइ-हाँइ कऽ काँटू डेंगाबए लागल। डेंगा-ठठा लेलाक बाद सुपसँ फटकि माएक तहवनमे बान्हि माएसँ नुका कऽ धऽ अाएल कोठिक दोगमे। झल अन्हार भेलै तँ भगबत्ता दोकानसँ बेच अनलक। तीन सेर भेलै। आठ अने दरसँ डेढ़ गो टाका भेलै। ओ भगवतेसँ कहि सुनि कऽ चारि गो चौवन्नी आ दू गो अठन्नी भजोखा लऽ चुपे-चाप आंगन चल गेली। विहान भेने मेला छलै ‘किसना मुट्ठी’। मरनी तरे-तर हिसाब लगोने जे चारि-चारि आना पाइ दुनू छोटकी बहिन अभेलिया आ सुगियाकेँ देबै। चारि आनामे बौआले एकटा कठपुतरी किन लेब आ एकटा फूका। चारि आनाक कचौरी आ चप कीनि लेब। ओकर तँ मने छलै चप-चप। आठ आनामे एकटा अलता आ फीता लऽ लेब। घुरती काल आठ आनाक जिलेबी कीनि लेब। भोरे विहान फेर ओ अपन गैलेन लऽ चलि गेल चौर आ बीछ लेलक एक गैलेन काँकोड़। आंगन आबि बकरी घरमे गैलेन राखि ओ नहाइ-सोनाइले चलि गेल आ नहा-सोना, खा-पी कऽ सुति रहल। एम्हर नेहेबा काल ओकरा माएकेँ तहबन नै भेटलै तँ औना कऽ एम्हर-ओम्हर तकलक तँ देखलक, ओ तँ कोठी दोगमे फेकल अछि- आ मड़ुआक किछु दाना लागल छलै। कोठी मुन्ना से फुटल। से देखि ओकरा आगि लेस देलकै। ओकरा हरलै ने फुरलै सुतलेमे मरनीकेँ गट्टा पकड़ि लात्ते-मुक्के धुनि देलकै। गारि पढ़ि-पढ़ि पूछए लगलै- “बाज सौतीन बाज की केलही पाइ मरूआ बेच कऽ?” अबोध बच्चा कनैत बाजल- “माए गै माए, मेला देखैले जेबै बलवा परतीपर मेला।” माए तामसे अघोड़ रहबे करै फेर बाजलि- “बाज सौतीन बाज कथीक मेला।” माए, गै माए, मेला देखैले जेबै मेला- किसना मुट्ठीक मेला। पोस्टमार्टम रामेश्वरबाबू गामक लब्धप्रतिष्ठित व्यक्ति, सभ तरहेँ सुखी-समपन्न, कथुक कमी नै। कनियाँ गामक प्राइमरी स्कूलमे शिक्षिका। छठम बेतन भेने दरमोहो बढ़ियाँ। अपने एकटा उच्च विद्यालयमे प्रधानाध्यापक पदपर वर्तमानमे कार्यरत। कुल मिला कऽ मासिक आमदनी लाखोसँ ऊपर! लहना-पातीसँ आमदनी अलगे। स्वयं जतए कतौ रहलाह प्रधानाध्यापक रहबाक कारणेँ औटी आमदनीक जोगार सदिखन लगौने रहैत छलाह। आन-आन काज करबाक लेल आरो शिक्षकगण। मुदा आरम-फारम भर्ती-काल शुल्कादिसँ उपरी आदमनी अपनहि जेबीमे। सहयोगी शिक्षक आ छात्रो सभसँ बननि नै। हप्ता दस दिनपर किछु-ने-किछु रमन-चमन होइते रहैत छलनि। तखने हुनकर मन ठीक-ठाक रहैत छलनि। कएक बेर कौमनरूम, शौचालय, बोड आदिक लेल तोड़फोर भेल मुदा हुनका लेल धैनसन! एक दिनक समए छल। समैसँ घंटी लागल, प्रार्थना भेल, शिक्षक लोकनि अपन-अपन वर्गमे गेला। रामेश्वरबाबूक सेहो कक्षा दसमे वर्ग छलनि। बच्चा सबहक आग्रहोपर वर्ग दसमे जेबाक लेल तैयार नै भेलाह तँ सभ बच्चा वर्गसँ निकलि हिनका ऑफिससँ खीचि बाहर आनि कहा-सुनीक बाद, लाते-मुक्के गत्र-गत्र फोड़ि देलकनि। आब कहबीक परि ‘अपने करनी, गै मुसहरनी’ भऽ गेलनि। प्रात भने गारजियन सभ बजाओल गेलाह। स्कूलपर बैसार भेल। मनधनबाबा मास्सैबसँ पुछलखिन- “मास्सैब, किएक हमरा लोकनिकेँ बैसौलौं अछि?” रामेश्वरबाबू सभ बात कहलकनि। मनधनबाबा आँखि मुनने निचेनसँ सुनि उत्तर देलकनि- “अहाँ अपने गुरू छी बच्चासँ समाज धरि शिक्षा देबक अधिकारी छी ओहो मात्र समाजे नहि सरकारोक नजरिमे। तखन....?” प्रदूषण आजुक भैतिकवादी युगमे विभिन्न प्रकारक संसाधनादिक उपभोगसँ मानव जीवन त्रस्त अइ। कतौ मिनटो भरिक लेल चैन नै। बढ़ैत जनसंख्या, गाड़ी-घोड़ा, रिक्शा-तांगा, जर-जनरेटरक आवाजसँ कान बहीर! शांतिपूर्ण ढंगसँ कम मीठ आवाजमे बाजब, स्वच्छ हवा लेब कठिन! फलस्वरूप नाना प्रकारक रोग-व्याधिक साम्राज्य पसरल अछि। घरे-घर नेना-भुटका सभ कोनो-ने-कोनो प्रकारक रोग-व्याधिसँ ग्रसित अछि। तात्पर्य, सुख लेल एतेक संसाधन होइतो कियो सुख-चैनसँ जीब नै रहल छथि। दोसर दिस सहोदर होइतो सहोदराक संग भैयारी नै निभा दुश्मनी राखब, प्रेमसँ नै रहि झग्गर-झाटीमे फँसि जाएब। ने सुखसँ अपने रहब आ ने दोसरकेँ रहए देब। रोगहू पुछलक मोल्हुसँ- “भाय, तोँ तँ पढ़ल लिखल लोक छह। एकटा बात कहह, औझका मनुखमे एतेक अलगाउ किएक?” मोल्हु बाजलाह- “से नै बुझहक, ऐ सबहक जड़ि बाहरी प्रदूषण नै, अपितु मनुखक भितरी प्रदूषण थिक।” कपिलेश्वर राउत कलियुगक निर्णए सतयुग-त्रेता बीत गेल छल। द्वापरक समए पुरा भऽ गेल छलैक। कलयुगक प्रवेश हुअए बला छलैक। कलियुग अपन राज-पाट चलैबा लेल सोचि रहल छल। बिचेमे तीनू युगक देवता सभ कलयुग लग आबि हाथ जोड़ि ठाढ़ भऽ गेला आ कलियुगो हाथ जोड़ि ठाढ़ भेल। जखन विचार-विमर्श शुरू भेलै तँ तीनू युगक देवता सभ कहलखिन- “हम सभ तँ कहुना तीन युगक राज-पाट चलेलौं आब अहाँक पारी अछि तँए चिन्तामे छी जे अहाँ केना कऽ राज-पाट चलाएब। किएक तँ हम सभ देवासुर संग्राम, वृतासुर संग्राम कोन-कोन ने केलौं। स्वर्ग-नरकक फेरा सभ केलौं। मुदा लोक सभ आर उडण्ड होइते गेल। ऐ लेल अहाँ लग एलौं। अपने केना चलाएब।” कलियुग बजलाह- “हे देवगण, हम अहाँ सभ जकाँ फाइल नै राखब, मुन्सी पेसकार नै राखब। हमर फैसला तुरंते हेतै। जे जेहन काज करता तकर भोग हुनका तुरंते भेटतै। अगुआएल-पछुअाएल जनमक फेरा नै राखब। स्वर्ग-नरकक फेरा नै रहए देबै।” तीनू युगक देवता कलियुगक विचार सुनि गुम्म भऽ गेला। फेर कलियुग बजलाह- “हम कृष्णक किछु अंश लए कऽ चलब आ लोक सभकेँ कहबै जे ‘कर्म करू, फलक इच्छा नै करू, जेहन कर्म करब ओहेन फल भेटत।” ई सुनि तीनू युगक देवता अपन-अपन लोक विदा भऽ गेलाह। धीरेन्द्र कुमार राम कथाक समापन पूर्णिया जिलाक एकटा गाम-कन्हरिया। गाममे वकील, शिक्षक प्रोजेक्ट प्रोफेसर आ प्रबुद्ध किसान। गामक पूवारि दिस बान्ह आ बान्हक किनछरिमे महानंदा नदी। कोठा-सोफा नीक-निकुत घर। बड़का-बड़का बखारी आ दुआरिपर गाए-माल-जाल। गाममे मोटर-साइकिल, ट्रेकटर। जिलाक प्रसिद्ध गाम। गाममे आयोजन भेल- राम-कथाक। भखरी, कन्हरिया अबथि आ कथासँ लाभ उठा विदा होथि। औरतक संख्या बेसी। गामक कुटुम-पाहुनक पदार्पणसँ गाममे उत्सवी माहौल भऽ गेल। हमरो नोत छल। हमहूँ कथासँ लाभ उठा रहल छी। प्रवचन कर्त्ता गेरूआ वस्त्र धारण केने, कन्हापर गेरूआ गमछा, वाणीमे मधुरता आ राम-कथाक वाचन। हमरो नीक लागए। नीक-निकुत दुनू साँझ भोजन आ कथाक लाभ। सात दिनक आयोजन समिति। सभ दिन गुलाब बागसँ फल-फलहरी आबए, प्रवचन कर्त्ता महाराज सदासुख रामलाल जीकेँ भोजन होइक। भोरखन युवकमे होर आबि गेल- अाइ महाराजक सेवा के करत? धूमनक आहूतिसँ गाम मह-मह करए। बूझि पड़ए जे इलाकामे रामराज स्थापित भऽ गेल। गाम बाजए- “सतयुग आबि गेल।” हमर मोन साँझक पहरि अकछा गेल। चोरा कऽ गामक दोकानपर एकटा सिगरेट-सलाइ लेलौं आ बाध दिस विदा भेलौं। खेतक बीचसँ बैलगाड़ीक लीक। चारूकात धान आ उँचगर खेतमे भाटा। समए अन्हरा रहल अछि। सूर्य अस्ताचल िदस नुका गेल छथि। चिड़ै-चुनमुन्नी अपन-अपन खोंता दिस विदा भऽ गेल अछि। काल्हि सातम दिन अछि- अहिना शांति पसरि जाएत आ लाैडिस्पीकर अवाज सेहो बन्न भऽ जाएत। जेबीसँ सिगरेट-सलाइ बहार कऽ सिगरेट सुनगबैत नदी दिस विदा होइत छी। कने-कालक पछाति सुनै छी- ‘हक्का-बक्का, हक्का बक्का बगिया खा हौ कक्का आउरो खेतोमे आऊर-बाऊर, आऊर-बाऊर हमरा खेतमे छुछै चाउर-छुछै चाउर हक्का-बक्का, हक्का-बक्का बगिया खा हौ कक्का’ खेत दिस देखैत छी- थारीमे बगिया आ अगरबत्ती नेने कियो कक्काकेँ पूजि रहल अछि। हमर सिगरेट समाप्त भऽ रहल अछि आ हमरा बुझना जाइत अछि जे राम-कथाक समापन भऽ गेल अछि। राजदेव मंडल, शिक्षा- एम.ए.द्वय, एल. एल. बी., पता- ग्राम-मुसहरनियाँ, रतनसारा (निर्मली, मधुबनी)। प्रकाशित कृति- अम्बरा- (कविता संग्रह), हमर टोल (उपन्यास) । १ बढ़िया गप्प गोपी मड़र सभ बापूत दुआरिपर बैसल अछि। दिन ठेका गेल छै। चारि दिनक बाद बेटाक बिआह हेतै। नवका समधी दहेजक टका देबाक लेल आएल छै। गोपी मड़रक लबरा-भाए फोंकी लाल बाजल- “समधी जी, लेन-देनक गप्प पहिले फरिछाएल रहै छै से नीक। बिआहक कालमे जे दहेजक गप्प उखड़ै छै, से तँ बुझू जे थुकम फझैती। ऐठाम सभ समांग अपने छी। निकालल जाए टाका।” “हँ, हँ ओहिक सम्बन्धमे तँ कहबाक लेल आएल छी, कोनो तरहेँ कुहरैत।” फोकीलाल बाजल- “कतेक तँ बेटी बिआहमे मरि जाइत अछि। अहाँ तँ कुहरैत छी। बढ़िया गप्प। निकालल जाए।” समधी कहल- “बढ़िया गप्प ई जे काल्हि हमरा बेटीकेँ नौकरीक लेटर भेट गेल।” “अहाँक बेटीकेँ नै, हमरा पुतोहुकेँ। हमरासँ सम्बन्ध भेलापर देखियो फएदा। बढ़िया गप्प।” “बढ़िया गप्प ई जे आब अहाँसँ बेसी सम्पतिबला आ नीक वर बिनु दहेजक बिआह करबाक लेल तैयार अछि।” “आ पहिले कियो नै पुछैत छल।” “अहुँ तँ नहिए पुछै छलौं। दहेजक लोभमे तैयार भेलौं। आब तँ हमरा बेटीक कमाइपर अहाँक बेटा पलत।” “अपन-अपन भाग्य। बढ़िया गप्प।” समधी बाजल- “आब जँ ई सम्बन्ध करबाक अछि तँ जतेक हमरा कहने रही ओतेक दहेज अहाँकेँ लगत, काल्हि टका लऽ कऽ हमरा दुआरिपर आउ।” “ई कोन गप्प।” विदा होइत समधी बाजल- “टका लऽ कऽ आबी तँ बढ़िया गप्प। नै लऽ कऽ आबी तैयो बढ़िया गप्प।” २ ठोकर चमकैत शहरक भीड़ भरल सड़क। सहरैत गाड़ी-घोड़ा, लोक-बेद। आठ बजि गेल छलै। घर पहुँचबामे राति बेसी ने भऽ जाए तइ दुआरे साइकिलकेँ उड़ौने जा रहल अछि घोरनमाँ। आकि एकटा मोटर साइकिल धड़ाक दऽ ठोकर मारलक। थकुचाएल साइकिल तँ सड़केपर रहि गेल किन्तु घोरनमाँ उछलि कऽ फुटपाथपर धड़ाम दऽ गिरल। बाप-माए करैत कुहरि रहल अछि। कलेजाक चोट प्राण घिचने जा रहल छै। परन्तु आेइठाम के केकरा देखनिहार। ओइ बाटे जाइत एकटा पाॅकिटमारकेँ दया लागि गेलै। ओ लग जा कऽ कुहरैत घोरनमाँक लहु पोछए लगल। फेर अपन काजक मोन पड़लै तँ घोरनमाँ क सभ जेबीक तलाशी लेलक। किन्तु किछु नै भेटलै। फनकैत पॉकिटमार उठल आ बाजल- “रे बेकुफ, मरितोकाल दस टका जेबीमे रखितँए से नै। भिखमंगा कहीं के, सगुण खराब कऽ देलक।” कुहरैत घोरनमाँ बाजल- “रे मुरख, दस टका जँ जेबीमे रहितै तँ हमहूँ ने दोसराकेँ ठोकर मारितौं।” “ईह, भेष देखहक आ उपदेश सुनहक।”- घुनघुनाइत पॉकिटमार बिदा भऽ गेल। बेचन ठाकुर, गाम: चनौरागंज, मधुबनी। प्रकाशित कृति: बेटीक अपमान आ छीनरदेवी (नाटक); एक दर्जनसँ बेशी नाटक प्रकाशनक प्रतीक्षामे। आत्महत्या ऐ संसारमे ईर्ष्या-द्वेषक भावना अति व्याप्त। सद्भावनाक डिबियामे तेल सधल जकाँ अछि। लोक अपन दुखसँ ओतेक दुखी नै अछि जतेक अनकर सुखसँ। कर्तव्य अपन गाम छोड़ि आन ठाम बौआए रहल अछि। बेचाराकेँ कतौ जगह नै भेटै छै। बारह बर्खक बेटी पूनम आर नौ बर्खक बेटा सुमन बड्ड नीक ढंगसँ भाए-बहिनक भूमिका अदाए कए रहल अछि। पूनमक बाप मंगल अपन ताड़ीक धंधामे व्यस्त अछि। भिनसरसँ साँझ धरि तार वा खजूरसँ ताड़ी उतारैमे लागल रहैत अछि। कहियो-कहियो खेनाइयोपर आफत। विसराम तँ दिन भरि दिल्ली दूर। मुदा पूनमक माए हीरा ताड़ी बेच फुटानीमे ओतेक मस्त अछि जे सामाजमे केकरो सोहाए नै रहलि अछि। कारण ओ अपन पति आ संतानक पियारकेँ बिसरि अपन पसीनक सुखक लेल टिंकुक संग रहि रहलि अछि। मुदा पापक घैला एक ने एक दिन अवश्य फुटै छै। एक दिन दिनहिमे मंगल हीराकेँ टिंकुक संग रंगल हाथ पकड़ि लेलनि। बेचारे सोचलनि- “हम ऐ दुनियाँमे बेकार लए छी। जखन हमरा कोनो मोजरे ने दैए।” क्रोधित भऽ ओ बाजि उठला- “सभसे बड़ो समाज। समाज हमरा जे जेना फैसला देथि।” साँझहि पंचैती भेल। पंचक फैसला भेल- “टिंकुकेँ एक हजार एक टाका जुर्माना लगतै आ आइंदा ओ एहेन गलती नै करतै, जँ केलकै तँ भरल सभामे ओकरा दू खण्ड काटि, गाड़ि देल जेतै।” फेर पंच हीराकेँ बजा सेहो पुछलनि- “अहाँ हीरा, एना किएक केलिऐ, इज्जत प्रतिष्ठा कोठिक कन्हापर राखि देलिऐ की?” हीरा बाजलि- “इज्जत-प्रतिष्ठा हम की कोठी कन्हापर राखब, हमर बापे राखि देलनि। हम मुरूख आ कुरुप छी तँए कि हमरा तँ स्मार्ट घरबला चाही ने।” पंचक मुड़ी निच्चॉं खसि पड़ल। फेर सामाजिक बंधनक खियालसँ ओ सभ चुप नै रहि सकल- “अहाँक बाप गलती केलनि तेकर फल मंगलाकेँ हेतै, हमर समाज िधनाए? अहाँ आइसँ चेत जाउ। नै तँ समाजसँ पैघ कियो नै अछि।” कहबी छै- “चालि, प्रकृति, बेमाए तीनू मुइनेहि जाए।” हीरा पिंकु अपन कुकर्म नै छोड़लक। अपितु सहचेती बर्तलक मुदा छुपल कहाँ रहल। दुनू बेटा-बेटी पकड़िये लेलक। हल्ला केलक तँ दुनू दुनूसँ मारिओ खेलक। मुदा समाज ऐ बेर मामलाकेँ गंभीरता पूर्वक लेबाक निर्णए केलक। टिंकु कहुनाकेँ गाम छोड़ि पड़ा गेल। पंच सोचलनि- “सजाएक भागी दुनू अछि। मुदा टिंकु पराएल अछि। तँए ऐ जनानीकेँ तारन देल जाए।” बिचार काल्हि साँझक भेलै, तइ बीच दिनेमे ओ फसरी लगा आत्महत्या कऽ लेलक। पुलिस खबड़ि पाबि घटना स्थलपर पहुँचल। बेचारी पोस्टमार्टम भऽ धौजन-धौजन भए गेल, मामला भरिआ गेलै। निर्दोष पड़ोसी विजय ओइ समए बाबा धाममे रहितौं केसमे चिक्कनसँ लटपटा गेल आ पति मंगलकेँ तीस सालक जहलक सजाए भेटल। दुनू भाए-बहिन टौआ-बौआ रहल अछि। आगू नाथ ने पाछू पगहा छै ओकरा सभकेँ। २ फुसिक फल संत कबीर दासक पाँति आछि- “साँच बराबर तप नहीं, झुठ बराबर पाप, जाके हृदए साँच है, ताके हृदए आप।” तात्पर्य अछि- “सत्यमेव जयते।” एक गोट फुसिकेँ बचाबए हेतू सहस्त्र फुसि बाजए पड़ैत अछि। मुदा ओ स्थायी रूपसँ नै पचि सकैत अछि कने देरे सही, फुसि फुसिए प्रमाणित होइत अछि। गीतामे कृष्ण कहने छथिन- “जेहन कर्म तेहेन फल।” मोहनक छोट भाए सोहन मैट्रीकक बोर्ड परीक्षा दऽ कऽ मधुबनीसँ घर आबि रहल छलै। दुनू भाँइ संगे छल। रस्तामे बिना टिकट रेलगाड़ीसँ किछु दूरी तँइ केलक मुदा किछु दूरी तँइ करए हेतु ट्रेकर-मैक्सी पकड़बाक खगता भेलै आ दुनू भाँइ मैक्सीपर चढ़ि गेल। सोहनक अभिभावक मोहन लग भाड़ाक पाइ नै छलै। ओ सोचलक- “जँ हम साँच बाजि दइ छी तँ कन्टेक्टर मैक्सीसँ उतारि देत। हम घर केना जा सकब। जँ झुठ जोरसँ बाजि दैत छी तँ ओकरा हमरा लऽ जेनाइ मजबुरी भऽ जेतै।” कन्डक्टर भाड़ा ओसलैत-ओसलैत मोहन लग आबि कहलनि- “श्री मान् कतए जाएब।” मोहन जबाव देलक- “झंझारपुर।” कन्डक्टर- “भाड़ा दियौ।” झट मोहन बाजि उठल- “भाड़ा देलौं से?” कन्डक्टर- “अहाँ भाड़ा नै देलिऐ, मन पाड़ू।” मोहन- “मने-मन अछि। मन की पाड़ू? भाड़ा हम अहाँकेँ दऽ देलौं।” कन्डक्टर सोचलनि- भऽ सकै छै, एकरा लग पाइक मजबुरी होए। मुदा एकरा फुसि नै बजबाक चाही। बजलाह- “जौं अहाँ लग भाड़ा नै अछि तँ बाजू हम ओहिना लऽ जाएब। मुदा बेकूफ नै बनाउ।” मोहन- “एेमे बेकूफक कोन गप्प? हम अहाँकेँ भाड़ा देलौं, अहाँ मन पाड़ू।” कन्डक्टर खिसिआ कऽ पुछि बैठलाह- “बाजू बेटा मरि जाए, हम भाड़ा दऽ देलौं।” मोहन- “बेटा मरि जाए, हम भाड़ा दऽ देलौं।” कन्डक्टर कहलनि- “बेस चलु, आब भाड़ा नै मांगब।” सोहन अपन भैयाक फुसि गप्पपर बड्ड आश्चर्यमे पड़ल छल। मुदा बाजत तँ बाजत की? गाम आबि मोहन किछुए दिनक बाद बोकारो गेलाह। कनियाक बड्ड जिद्द केलाक बाद हुनको संग लए गेलाह। संगमे दुगो बेटो छलनि। परिवारक संग पहिले खेप बाहर गेल छलाह। ओना ओ बोकारो पाँच साल पूर्वहिसँ रहैत छलाह। तीन महिनाक अंदर मोहनक छोटका बेटा रमन बेमार पड़ल। बोकारोमे बड्ड इलाज भेल मुदा ओ चंगा नै भेल। फेर ओ सपरिवार गाम आबि गेल। गामोमे बड्ड इलाज भेल मुदा ओ बचि नै सकल, मृत्युकेँ प्राप्त भेल। परिस्थितिवश सोहनकेँ ओकरा आगि दिअए पड़लै। आओर मोहनकेँ ओकर उचित कर्मो करए पड़लैक। एगो कहबी छै- “गज भरि नै हारी, थान भरि फारी।” राम प्रवेश मंडल पछतावा महाजन गैरखड़ रहए। ककरोसँ गप करैत काल पहिने गारि पढ़ि दैत छल। जंगला आ मंगला दुनू गोटे एक्के गाम बेरमाक वासी छलए। अन्नक खरीद बिक्री करैत छल। दुनू िमलि विचार केलक जे महाजनसँ ऐ गारिक बदला केना सठाएल जाए? बड़ी काल धरि ऐ विषएपर िवचार करैत रहल। निर्णए भऽ गेल। अगिला दिन दुनू गोटे महाजन लग पहुँचल। महाजन गारि पढ़नाइ शुरू करैत तइसँ पहिने जंगल आ मंगल आपसमे थप्पर-मुक्का चलबैत गारि पढ़ैत महाजनक देहपर खसि पड़ल। हाँ-हाँ करैत महाजन उठल। दुनूक बीच-बचाव करए लगल। बात तँ विचारे छल। जंगल मारै मंगलकेँ आ मंगल मारै जंगलकेँ। सभटा चोट खसए महाजनपर। तरगुमका घुस्सासँ महाजन चितंगे खसल आ बेहोश भऽ गेल। महाजनक चाकर सभ ओकरा अस्पताल लऽ गेल दवाइ-विड़ो चलए लगल। िकछु खनक बाद जंगल मंगल पहुँचल। महाजनकेँ लगसँ देखलाक बाद अस्पतालक ओसारपर आबि फुसराहैट करैत आ हँसैत-हँसैत बाजल- “सारकेँ गारि पढ़बाक आदति आइसँ छूटि जाएत।” ताबत महाजनक बेहोशी दूर भऽ गेल छल ओ जंगल आ मंगलक सभटा गप्प सुनि लेलक। िकछु पलक बाद दुनू -जंगल आ मंगल- महाजन लग आबि पुछलक- “कहू महाजन, आब नीके छी ने?” महाजन बाजल- “आब हम गारि ककरो नै पढ़बै मुदा, तोहूँ सभ ऐ करमकेँ नै दोहरबिहक।” तीनूक चेहरापर हँसी आबि गेल। बुरबक रेलगाड़ीसँ दिल्लीक यात्रा करैत रही। संध्याक सात बजै छल। स्टेशनपर गाड़ी ठाढ़ भेल। एकटा युवक आबि हमरा सबहक बीच बैठला। हमरा हुनका देखतहि शंका भऽ गेल। ओ अपन झोरासँ विभिन्न प्रकारक पोथी निकालि सबहक दिस बढ़ाबैत बाजल- “पढ़ै जाउ नीक पोथी अछि।” किछु खनक बाद झोरासँ देवी मैयाक प्रसाद निकालैत बाजल- “चारि चक्काक ड्राइवरी लाइसेंस निकलल। मनोकामना पूर्ण भेल। ओइ लेल प्रसाद चढ़ेलौं। अहुँ सभ लिअ।” सभ कियो प्रसाद लेलक मुदा हम नै लेलौं। तखन सबहक सोझाँमे नीकसँ बुरबक बनलौं। गाड़ी चलैत रहल। राति होएबाक कारण निंदियादेवी अपन माया पसारलक। सभ कियो सुति रहला। किछु लोककेँ नीन खुजलाक बाद हल्ला भेलैक- हमर समान नै अछि। हमरो समान नै अछि। प्रसाद बाँटैबला युवक बीचसँ पहिले निकलि गेल रहए। प्रसादमे नशा देल रहैक। सभ कियो उदास भऽ गेल। हम पुछलौं- “ आब कहु हम बुरबक आकि अहाँ सभ बुरबक?” झगड़ा खतम भूखसँ बच्चा किनैर मारैत अछि। पगली प्रसव पीड़ाक बाद अर्द्धचेतन अवस्थामे पड़ल अछि। भाग दौगक जिनगीमे ककरो कियो देखनिहार सुननिहार नै। दूटा शराबी लड़खड़ाइत आबि रहल अछि। बच्चाक कननाइ सुनि पहिल पुछलक- “मीता, एतेक अन्हार आ सुनमसानमे बच्चा कतऽ कनैत अछि?” दोसर बाजल- “चलू, चलि कऽ देखै छी।” दुनू मीता पहुँचल। पहुँचतहि बच्चा चुप भऽ गेल। दुनू मिता विचार केलक- बच्चा उठा कऽ अपना घर लऽ चलू, भलहि बच्चाक माए सूतल अछि। बच्चाकेँ लैत दुनू गोटेमे झगड़ा उठल। फेर समझौता भेल- पहिने एकर नाओं राखल जाए। पहिल मीता बाजल- “राम।” दोसर बाजल- “रहीम।” दुनू गोटेक आवाजमे ताइस रहए। मारि पीटक स्थिति भऽ गेल। तावत् रतुका गस्ती पुलिस पहुँचल। दुनू गोटेक बात बुझैत आ झगड़ा देखैत पुलिस बाजल- “एकर नाओं न राम, आ न रहीम, एकर नाओं मनुख।” हँ रौ मीता बढ़िया बात ई तँ सोचनहि नै छलौं। ले झगड़ा खतम। मूल-मंत्र तीन दिनसँ ऑफिसक चक्कर काटि रहल छी मुदा अखनो धरि प्रमाण पत्र बनैक आशा नै बुझना जाइत अछि। चाकरी निमित आवेदन करब, समए बड़ कम अछि। ककरो पूछैत छी काज केना हएत तँ कहैत अछि- “कखनो हाकिम नै तँ कखनो किरानी नै।” काज केना होएत? तखन बीरू भाय आबि पुछलक- “अहाँ किए उदास भऽ बैसल छी?” बीरू भायकेँ अपन व्यथा कथा कहि सुनौलौं। हुनक गंजीपर लिखल रहए- ‘होएबाक चाही ई मूलमंत्र भ्रष्टाचारक हुअए अंत’। बीरू भाय बाजल- “हँ! काज भऽ जाएत मुदा चाह-पानक खरच लगत? हाकीम नै अछि तँ कोनो बात नै। अहाँक काज भऽ जाएत।” चाह-पानक खरच कतेक पाँच नै दस टका आओर की, सोचैत हम बजलौं- “काज करा दिअ। समए बड़ कम अछि।” बीरू भाय सभटा कागज लऽ कऽ ऑफिस जाइत बजलाह- “चाह-पान कऽ किछु कालक बाद अहाँ आपस आबि प्रमाण पत्र लऽ जाउ।” किछु खनक बाद पहुँचलौं। बीरू भाय प्रमाण पत्र दैत बाजल- “लाबह चाह पानक खर्चा?” एकटा दस टकही सिक्का निकालि बीरू भाय दिस बढ़ेलौं। बीरू भायक क्रोध आसमानपर चढ़ि गेल, ओ बाजल- “एक सए चाहक, एक सए पानक, दुइ सए टाका निकालह नै तँ ऐ कागजकेँ खण्ड-खण्ड कऽ फेंक देबह।” कोनो उपाए नै देखैत लाचार भऽ बीरू भायकेँ दुइ सए टाका दिअ पड़ल आ तखन हमरा समझमे आएल, की होइत अछि ऐ मूलमंत्रक मतलब! भारत भूषण झा प्रेम कदम गाछक छाहैरमे हम, ललन जी, नरेन्द्र आ एक दू गोटे आर बैसल गर्मीसँ परेशान भऽ आरामक अनुभूति करैत एक दोसरापर गप्पक नहलापर दहला मारैत आनन्दक अनुभव करैत रही, तखने ओतए एकटा कुकुर आएल। ओकरा देखि हमर मन चिन्तित होमए लगल, कारण जे ओतए बैसल बकरी आ ओकर बच्चाकेँ कहीं ओ काटि ने लै। कुकुर धीरे-धीरे बकरी बच्चाक लग जा ओकरा संग खेलऽ लागल जेना एक दोसराक जिगरी हुअए। एतबीमे ललन जी हमरा मुँह दिस देखि बजला- “औ जी अहाँ कोन दुनियाँमे छी, हमरा सभ तखैनसँ अहाँपर कते गप्प कऽ रहल छी आ अहाँकेँ तँ कोनो ध्याने नै।” हुनक गप्प सुनि कहलियनि- “यौ जी, अपन सबहक गप्प तँ होइते रहत एतए देखियौ कुकुर आ बकरीक प्रेम। हमरा अहाँसँ तँ नीक यएह सभ, जकरामे कोनो भेद-भाव नै छै। दुनू दू जातिक आ प्रेम अपनोसँ बेसी।” वास्तवमे जिनगी तँ एहने हेबक चाही जइमे कोनो भेद-भाव नै रहए। मानेश्वर मनुज ई रक्षा-बन्धन पर्वक बितला तीन मास भऽ गेल छलै। देवानजी अखनो राखीकेँ तावीज जकाँ बन्हले रखने छलथि। हम पुछलियनि, “देवानजी, एतेक दिनक बादो ई हाथमे रखने छी। किएक?” जवाब देबक बदला ओ हमरे पुछि देलनि, “ई की छैक।” हम कहलियनि, “राखी।” ओ कहलनि- “जखन एकर नामे छैक राखी तखन फेकी किएक? राखी मर्यादाक बन्धन अछि, तँए राखी।” स्त्री-लिंग “हिन्दीक पचास प्रतिशत शब्द स्त्रीलिंग आ पचास प्रतिशत शब्द पुलिंग अछि।” “नै, पचास प्रतिशतसँ किछु बेसी पुलिंग होइत अछि।” “नै, उल्टे अहाँ बाजि गेलौं। पचाससँ किछु बेसी प्रतिशत शब्द स्त्रीलिंग होइत अछि।” “जइ शब्दक बारेमे नै बुझल रहैत छैक से पुलिंग भऽ जाइत छैक, फेर पुलिंगक प्रतिशत बेसी किएक ने हेतैक?” “आ जइमे सन्देह होबय ओकरा स्त्रीलिंग कहि दी, तँ स्त्रीलिंगक प्रतिशत बेसी किएक ने हेतैक?” “स्त्रीलिंगपर लोक बेसी साकांक्ष रहैत अछि तँए स्त्रीलिंगक प्रतिशत बेसी छैक आ होबहोक चाही।” आप रत्नेश्वर स्कूल जाइत छल कि चूड़ीबला रोकि पुछलकैक, “कैसे हो रत्नेश्वर “तुम”?- (केना छँ रत्नेश्वर तूँ?) रत्नेश्वर ओकर सम्बोधनपर खिसिया कऽ कहलकैक, “आप कहो”।–- (अहाँ कहू।) चूड़ीबला सवाल जानि उत्तर देलकैक- “मैं तो ठीक हूँ, तुम कहो”।- (हम तँ ठीक छी, अहाँ कहू।) फेर रत्नेश्वर खिसियाइत बाजल, “तुम नै आप कहो, मैंने कहा न, तुमसे”। -(तूँ नै अहाँ कहू, हम कहलियौ ने तोरा।) “तो ठीक है”। -(तखन ठीक अछि।) आ गुनधुन करैत ओ आगाँ बढ़ि गेल। ओकरा किछु समझि अएलैक? लोरी रेलवे-स्टेशनक बगलमे रेलक टुटल-फाटल क्वार्टर, झोपड़पट्टी सन रेल कॉलोनी। खाटघरसँ आएल श्यामानन्द कहलनि, “झाजी, खाटघर बड़ सुन्दर जगह अछि। साँझ खन कऽ ओतए एहेन लगैत छैक जेना स्वर्ग नै पृथ्वीपर उतरि गेल होइक।” हम कहलियनि, “मुदा जाए आ आबक कतेक भारी समस्या छैक। एक तँ हार्वर लाइनक नहू चलऽवाली गाड़ी आ तइपरसँ दादरमे चेन्ज कऽ चर्चगेट जाएब।” “दादरसँ चेन्ज किएक। नरीमन प्वाइन्ट जेबाक लेल सोझे छत्रपति शिवाजी चलि जाइत छी।”- ओ कहलनि। हम कहलियनि, “हमरा लेल तँ दहिसरक रेल क्वार्टरे सभसँ उत्तम।” “मुदा रेलक पटरीसँ सटल रेलक क्वार्टर। आवाज कतेक अबैत छै। सदिखन निन्द हराम रहै छै।” हम कहलियनि, “नै एहेन बात नै छै। हमरा तँ रेलक आवाज संगीत लगैत अछि। जावत तक गाड़ी सभ चलैत रहैत अछि चैनक निन्द अबैत अछि। मुदा जखन कखनो गाड़ी रुकि जाइत अछि फटसँ निन्न टूटि जाइत अछि, जेना माँक लोरी बिच्चेमे बन्द भऽ गेल हुअए।” ओ कहलनि, “अहाँ रेल-कर्मचारी तँ ने छी? ” भूख-भूख भाकुर मड़ुआक महीना छलै मुदा खेतमे मड़ुआ नै। धानक महीना एलै मुदा खेतमे धान नै। आँसुक महीना गेलै मुदा खेतमे आँसु नै। न्योतक महीना छलै मुदा कतौसँ न्योँत नै। खेबाक समए छलै मुदा घरमे अन्न नै। खेलबाक महीना छलै मुदा घरमे उमंग नै। ओ चितंग सूतल छल कि धरनिपर कतौ पाँच लिखल लगलै। पाँच यानी पाँच फूल। पाँच यानी पाँच लोटा जल। पाँच यानी पाँच आँगुर। मुदा ओकर भूख खीचि कऽ ओकरा पाँच राखीपर लऽ गेलैक। ब्राह्मणक बेटा माने पवित्र लोक। भोजनक समस्या मुदा स्वभाव सुन्दर। पढ़ाइमे कनियो आसकैत नै। ब्रह्मचर्यक सभ गुणसँ परिपूर्ण मुदा पेटमे ज्वाला। तुर नै, ताग नै। कतए सँ आनत राखी। लड्डू बाबाक फाटल सीरकमेसँ कनेक तुर आ थोड़ ताग घिचलक आ बना लेलक राखी। राखी सन नै लगै मुदा राखिये छलै। रंग नै छलै घरमे तँ फूल तोड़ि फूलक रंग ओइ तुर आ तागपर लगौलक। मुदा राखी बनलै खाली चारि। पाँच नै पुरलै। राखी पुरान सन लगै। भेलै राखी लेबऽ सँ कियो मना ने कऽ दिअए। एहेन कतौ राखी भेलैए। एक राखी वैद्यजी केँ पहिराबए लागल तँ वैद्यजी कहलथिन्ह, “ पहिने श्रीकृष्णजीक मूर्तिमे बान्हि आउ।” श्रीकृष्णजीक लग जा थोड़ेक काल ठाढ़ भऽ वापिस आबि गेल कारण राखी तँ छलै सिर्फ चारि। श्रीकृष्णजी तीन दिनक भूखल पेटमे की अन्न देथिन। वापस आबि रक्षाबन्धन रक्षाक हेतु एकटा राखी सुमनजीकेँ, एकटा मदनजी केँ, एकटा रमणकेँ आ एकटा बैद्यजीकेँ बन्हलक। बदलामे किछु अनाज भेट गेलै। मोन उत्साहसँ भरि गेलै। निराहारकेँ लगलै जेना भूखक टाइपमे भाकुर आबि गेलै। खेतमे फसिल नै, घरमे अन्न नै मुदा मोन उमंगसँ भरि गेलै। उमेश मण्डल पिताक नाओं- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, गाम- बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी, बिहार। जन्म तिथि : ३१.१२.१९८० प्रकाशित पोथी- निश्तुकी (मैथिली कविता संग्रह), मिथिलाक संस्कार गीत, विध-बेबहार गीत आ गीतनाद (मिथिलाक सभ जाति-धर्मक लोकमे प्रयुक्त मैथिली लोकगीतक पहिल संकलन), विकीपीडियामे मैथिलीक स्थानीयकीकरणमे योगदान, मिथिलाक जीव-जन्तु/ वनस्पति आ जिनगीक डिजिटल सचित्र ऑनलाइन संस्करण, मिथिलाक सभ जाति-धर्मक लोकमे प्रयुक्त लोकगीतक रेकार्डेड ऑनलाइन ऑडियो और वीडियो डिजिटल संकलन। ई-पत्र संकेत- umeshberma@gmail.com दोस्ती एकटा गाममे दूटा दोस्त छल। एकटाक नाओं आत्मा आ दोसराक नाओं शरीर छलै। दुनूक दोस्ती बच्चेसँ छल। दुनूक बीच एहेन दोस्ती रहै जे आन कियो बुझबे ने करै छल, जे दुनू दू छी। किएक तँ सदिखन दुनू संगे रहैत। संगे खाइत, संगे सुतैत आ संगे टहलैत-बुलैत। दुनू निश्चय केने छल जे जिनगी भरि प्रेम आ मित्रता निमाहब। एक दोसराक मदति सदति काल करैत रहब। शरीर परदेश जा व्यापार करए लगल। खूब धन अर्जित केलक। धन भेने ऐश-मौजक सभ सुविधा बना लेलक। नमगर-चौड़गर कोठी, एअर कंडीशन गाड़ी, टी.बी. मोबाइल इत्यादि सभ किछु कीनि लेलक। आत्माकेँ जखन जानकारी भेलै तँ मने-मन खूब खुशी भेलै। एक दिन आत्मा शरीरसँ भेँट करए विदा भेल। शरीर लग पहुँचिते, अत्मो शरीरकेँ चिन्हलक आ शरीरो आत्माकेँ। मुदा अनचिन्हार बनि शरीर आत्माकेँ पुछलक- “अहाँकेँ छी, कतए रहै छी, हम नै चिन्हलौं?” शरीरक बात सुनि आत्मा मने-मन सोचए लगल जे भरिसक एकरा धनक मद आन्हर बना देलकै, तँए एहेन बात बजैए। मन मसोसि आत्मा कहलक- “दोस, सुनैमे आएल जे अहाँ आन्हर भऽ गेलौं, तँए जिज्ञासा करए आएल छलौं। मुदा ऐठाम आबि प्रत्यक्ष भऽ गेल जे अहाँ सचमुच आन्हर भऽ गेल छी। आब जाइ छी।” आधा भगवान परोपट्टामे श्रमपुराकेँ छोड़ि एक्कोटा गाम एहेन नै अछि जइ गाममे ऐबेर धानक खेती भऽ सकल। एकर कारण भेल रौदी। कतेक गाममे तँ धानक विहनि बिरारेमे पानि दुआरे जरि गेल। श्रमपुरामे धानक खेतीक सुतरैक कारण अछि जे ऐ गामक किसान मेहनती छथि, आशावान छथि। ऐ गामक किसान आपसमे तालमेल कऽ कऽ लगभग चारि बीघापर एकटा बोड़िंग गरौने छथि। तइपर सँ जोताँॅसक जमीन थोड़े निचरस सेहो छै। श्रमपुराक लोक साहसी आ मेहनती होइ छथि से परोपट्टाक लोककेँ बुझल छन्हि। विशेसर श्रमपुरेक एकटा किसान जे आइ अपन सासुर भिठपुर विदा भेल। भिठपुरक सीमानेपर एकटा बाबन बीघाक पोखरि। पोखरि महारेपर स्कूल सेहो अछि। आेइठाम नवाह होइत देखि विशेसर सोचलक जे दर्शन करैत जाएब। जौं कहीं सार भेट जेताह तँ संगे निकलि जाएब। सएह केलक। मंडपक आगूमे विशेसर ठाढ़ भेल। तखने कीर्तन मंडलीसँ निकलि जीयालाल विशेसरकेँ पुछल- “पाहुन की हाल-चाल...। घरपर सँ एलिऐ आकि गामसँ आबिये रहल छिऐ?” अपन सार जीयालालकेँ चिन्हैत विशेसर बाजल- “गामेसँ अबै छी, अहीं आेइठाम जाएब।” “अच्छा-अच्छा चलू।” कहैत जीयालाल परसाद बलाकेँ शोर पाड़ैत कहलक- “हे यौ श्रीमोहनबाबू, कने परसाद देल जाउ, पाहुन छथि।” परसादबला श्रीमोहन चङेरा नेने आबि विशेसरक हाथमे दैत जीयालाल दिस देखैत पुछलकनि- “कोन गाँ पाहुन रहै छथि?” जीयालालक बाजबसँ पहिनहि विशेसर कहि देलकनि- “श्रमपुरा रहै छी।” “अच्छा...ऽ, आब चिन्हि गेलौं, ऐबेर अहुँ सभकेँ तँ रौदिये भऽ गेल किने। धान तँ नहिऐ भेल हएत?” श्रीमोहनक मुँह दिस देखैत विशेसर कहलकनि- “धान किएक ने हएत? हम सभ अपनो अदहा भगवान छी से नै बुझल अछि।” विशेसरक जबाब सुनि श्रीमोहन किछु बजला नै। बगलमे ठाढ़ पान-सात आदमीकेँ देखि टहैल परसाद बाँटए लगला। जीयालाल आ विशेसर दुनू सारे-बहनोइ घरपर विदा भेलाह। रास्तामे जखन लाउडस्पीकरक अाबाज कमलै तखन असथिरसँ जीयालाल विशेसरकेँ पुछल- “पाहुन, अहाँ जे कहलिऐ हम सभ अदहा भगवान अपने छी से केना?” विशेसर- “बरनी, पहिने अहाँ ई कहू जे नवाह अहाँ सभ किए ठनने छिऐ?” जीयालाल जबाब सुनैक प्रतिक्षामे तुरत जबाब देलक- “देखै नै छिऐ, पानिक चलैत एक्को अना धानक खेती नै भेलैहेँ।” विशेसर मुस्कुराइत बाजल- “हमरा सबहक आठ अनासँ दस-बारह अना तक धानक खेती भेल अछि। अहीं कहू जे हम सभ अदहा भगवान भेलौं की नै?।” रूपैयाक ढेरी फुदकैत फुलिया किताब-काँपीक बस्ता माटिक रैकपर राखि माएकेँ ताकए लगली। माए आंगनमे नै छली। पछुआरमे गोरहा पाथै छली। ओना गोरहा पाथैक समए नै छल तँए फुलियाक मनमे गोरहा पाथैक बात ऐबे नै कएल छल, नै तँ ओ तकबो करैत आ शोरो पाड़ैत। आंगनसँ निकलि जखने फुलिया डेढ़िया लग आयलि की गोरहा मचान लगसँ माएक बाजब सुनलक। गोरहा मचान लग पहुँचिते फुलिया देखलनि जे माए गोरहा पाथि रहलीहेँ। मनमे तामस उठए लगलनि जे एक तँ कातिक मास, तहूमे सूर्यास्तक समए, ई कोन समए भेल? अनेरे ठंढ़ लगतनि। मन खराब हेतनि। मुदा किछु बाजलि नै। अप्पन बात बाजलि- “माए, परसू मधुबनी जाएब। लड़की सबहक बीच महिला सशक्तीकरणक विषयक प्रतियोगिता अछि। सौंसे जिलाक छात्रा सभ रहती। हमहूँ जाएब। तइले कम-सँ-कम पच्चीस टा रूपैयाक ओरियान कए दे।” मधुबनीक नाओं सुनि अपन सभ सुधि-बुइध बिसरि गेलीह। हाथ गोबरपर रहनि, आँखि बेटीक आँखिपर; अा मन अकासमे कटल धागाक गुड्डी जकाँ उड़ए लगलनि। पँजरामे बैसि फुलिया कहए लगलनि- “माए, हमरा जरूर इनाम भेटत।” अकाससँ माएक मन धरतीपर खसि पड़ल, मने-मन सोचऽ लगली जे पच्चीस रूपैया कतऽ सँ आनब? कहलखिन- “बुच्ची, ताबे ककरोसँ पैंच लऽ लएह, किए तँ जुग-जमाना बदलि रहल अछि, बिनु पढ़ल-लिखल लोकक कोनो मोजर रहतै? तँए कोनो धरानी रूपैयाक ओरियान कऽ लएह। गाए बिआएत तँ दूध बेचि कऽ दऽ देबै।” माएक बात सुिन फुलिया मुस्कुराइत कहलकनि- “धुर बुढ़िया नहितन, तीन रूपैये गोरहा बिकाइ छै, दसेटा बेच लेब तहीमे तँ तीस रूपैया भऽ जाएत। तइले ककरोसँ मुँह-छोहनि किए करब? ई तँ रूपैयाक ढेरी छियौ। जखैन जत्ते रूपैयाक काज हेतौ, तखैन तत्ते बेच लिहेँ। तोरा कि कोनो हेलीकोप्टर कीनैक छौ?” जेहन मन तेहन जिनगी सभ दिनेक समयानुसार एकटा साधु सबेरे स्नान करए लेल नदीक पानिमे पैसलाह। डॉंड़ भरि पानिमे पहुँचि पूब मुँहेँ सूर्य दिस तकलनि। जहिना माटिक तरक बीजक अंकुर बीजसँ निकलि धरतीक उपर अबैत रहैत तहिना सूर्यो अन्हारक गर्भसँ निकलि अकास दिस चढ़ैत रहथि। जहिना धरतीक उपरका परत अंकुरक पाग सदृश बनि जाइत तहिना सूर्यक िकरिण अन्हारक पाग पहीिर लेलक। तइ काल ओ साधु एकटा मुसरी माने चुहियाकेँ पानिक वेगमे भसैत अबैत देखलनि। अवग्रहमे पड़ल मुसरीकेँ साधु हाथसँ उठा ऊपर आबि राखि पुन: स्नान करऽ पानिमे पैसलाह। स्नानक उपरान्त ओकरा अपना संगे कुट्टीमे अनलनि। कुट्टीमे मुसरी रहए लागलि। साधुक क्रिया-कलाप देखैत िकछु मासक उपरान्त मुसरी नमहर भेल। ओकरो साधुक बरदान पबैक मन भेलै। अवसर पाबि मुसरी साधुकेँ कहलकनि- ‘‘आब हम जुआन भेलौं। जुआनक पछाति बुढ़ हएब। बुढ़ भऽ मरि जाएब। मुइलाक पछाति तँ वंश समाप्त भऽ जाएत। तँए बिआह करा दिअ?’’ सूर्यकेँ देखबैत साधु कहलखिन- ‘‘एकरासँ बिआह करब?’’ आगि जकाँ धधकैत सूर्यकेँ देखि मुसरी बाजलि- ‘‘ओ तँ आगिक गोला छिऐ। हमरा शान्त स्वभावक चाही।’’ बादलकेँ देखबैत साधु कहलखिन- ‘‘ओ तँ ठंढ़ो अछि आ सूर्यसँ नम्हरो अछि। देखैते छहक जे सूर्योकेँ झॉंपि दैत छन्हि?’’ मुसरीक मनमे नै जँचल िकएक तँ ओ ओहूसँ नम्हर पति जाचैत छलि। बाजलि- ‘‘नै, ओहूसँ नमहरसँ करा दिअ।’’ पवनकेँ देखबैत साधु कहलखिन- ‘‘ओ तँ बादलोसँ नमहर अछि। िकए तँ बादलोकेँ एम्हरसँ ओम्हर उड़बैत अछि।’’ मुसरीकेँ ओहो पसिन्न नै भेल। अपन नापसन्दगी साधुकेँ जनौलक। तखन मुस्कुराइत साधु पहाड़केँ देखबैत कहलखिन- ‘‘ओ तँ पवनोकेँ रोकि दैत अछि।’’ फेर अपन नापसन्दगी मुसरी व्यक्त केलक। तखन पहाड़मे िबल खुनैत मूसकेँ देखबैत साधु पुछलखिन। मुसरीकेँ पसिन्न भऽ गेल। चौवन्नियाँ मुस्की दैत बाजलि- ‘‘बिल्कुल पसिन्न अछि। कदो एकरंगाहे अछि। छोट कद रहितौं। पहाड़केँ खुनि खोखला बनाओत। जखने पहाड़ खोखला बनत तखने जेमहर गुड़कबैक मन हेतइ तेमहर गुड़कौत।’’ मूसकेँ बजा मुसरीसँ बिआह करबैत बरिआती सभकेँ साधु कहलखिन- ‘‘जिनगीमे सभकेँ एहिना रंग-विरंगक अवसर अबैत अछि। मुदा, ओ अपन मनेक अनुरूप अपन पति चुनि जिनगी िबतबैत अछि।’’ डॉ. शेफालिका वर्मा आनक बड़ाइ भटकैत भुटकैत एकटा बड पुरान शिष्य अपन गुरु लग पहुँचल। गुरु अपन शिष्यकेँ देखि आह्लादित भऽ उठला ... की हाल छै शिष्य सुन्दरम, जीवन केना बीति रहल अछि अहाँक? हम तँ बड अभागल छी महाराज... कलपैत शिष्य बाजल। की भेल? अहाँ तँ ज्ञानक पोटरी लऽ कऽ ऐठाम सँ गेल छी। हम जइ वस्तुक कामना करै छी वएह हमरासँ दूर भऽ जाइत अछि, नै तँ हम अर्थोपार्जन केलौं आ नै तँ जीवनक कोनो सुख भोगलौं। स्नेह भरल स्वरे गुरु बजलाह ..अहाँ पहिने देबा लेल सिखु ,तखन लेबाक लेल सोचब। हम की देब भगवन ! हमरा अछिए की ? नै तँ धन दौलत, नै तँ घर-गाड़ी, नै कपड़ा लत्ता देब तँ की देब? -निराश स्वर छल। अहाँ लग बहुत किछु अछि, अहाँ चाही तँ लोककेँ बहुत किछु दऽ सकैत छी। चौंकि उठल शिष्य -की अछि जे दऽ सकै छी हम? अहाँकेँ भगवन सुन्दर बोली देने छथि, अहाँ चाही तँ ओकर उपयोगसँ लोकक तारीफ कऽ सकै छी। दोसर केर बड़ाइ कऽ ओकर हृदैमे ख़ुशी भरि सकै छी, मुदा अहाँ तँ एतेक दरिद्र छी जे जइमे एको पाइ नै खर्च होइत अछि, ओहो नै कऽ सकै छी। आदमीकेँ कंजूस नै हेबाक चाही, भगवान जे देने छथि ओकरा जतेक बाँटब ओतेक बढ़त.. ककरो बड़ाइ करब तँ अहाँकेँ अपने सम्पन्नताक भान हएत, मोनमे उदारताक भाव रहत। अहाँ लग वाणीक धन अछि, ह्रदयकेँ विशाल बनाउ। एक बात जानि लिअ, ककरो बड़ाइ केनेसँ ओ पैघ नै होइ छै वरन बड़ाइ करऽबला लोगक दृष्टिमे पैघ भऽ जाइत अछि। अहाँ खाली पएबा लेल जनै छी तँए दुखी रहै छी। जे दैत छथि ओ देवता छथि आ देवता कहियो अभावग्रस्त नै रहै छथि। शिष्य गुरुक पएरपर खसि पडल। जगदीश प्रसाद मण्डल, जन्म ५ जुलाइ १९४७। गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथाकार (दीर्घकथा संग्रह- शंभुदास; लघुकथा संग्रह १.गामक जिनगी, २. अर्द्धांगिनी..सरोजनी.. सुभद्रा.. भाइक सिनेह इत्यादि; आ तरेगन -बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह); नाटककार (१.मिथिलाक बेटी, २.कम्प्रोमाइज, ३.झमेलिया वियाह आ ४.एकांकी-संचयन); उपन्यासकार(मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत) आ कवि (१.इन्द्रधनुषी अकास, २.गीतांजलि आ ३.राति-दिन)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। गामक जिनगी, लघुकथा संग्रह लेल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११ क मूल पुरस्कार, आ टैगोर साहित्य सम्मान २०११; आ बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह "तरेगन" लेल बाल साहित्यक विदेह सम्मान २०१२ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपेँ प्रसिद्ध) प्राप्त। थल-कमल जहिना अगुरबार दरमाहा उठा परदेशी घरक काज सम्हारैक लेल पत्नीकेँ पठबैत आ ओइ रूपैयासँ, टावरक किरदानीसँ अकछि तेसर मोबाइल कीनए जाइत, तहिना झंझारपुरक हाटक चाउर-दालिक बजारमे ठकाइ देहरादून चाउरक दोकानक आगूमे ठाढ़ भऽ आँखि गरौने। थालमे जनमल कमलक भौंरा सदृश ठकाइक मनमे उठलै- सात दिनसँ दुनू संझी नवका गहूमक रोटी खाइत एलौं, भूसीपर पाइ उठा चाउर कीनए एलौं, जे सस्त हएत सहए ने कीनब। मुदा लगले थल-कमलक बिढ़नी जकाँ मन घुनघुनाएल- चाउर तँ चाउरे छी, तहन नीक किअए ने कीनब। ओझराएल मने ठकाइ सइओ रूपैयामे किलो भरि चाउर कीनि, गमछाक खूँटमे बान्हि, तमाकू चुनबैत घरमुँहा भेल। बीघा भरि बटाइ खेतक उपजासँ छह मासक बुतात निकलि जाएत। बैशाखक पूर्णिमाक दिन। गहूमक लरती-तरती आबि गेल आ धान-चाउरक चलि गेलै। बाड़ीक तरकारी निङहटि गेल छलै, लऽ दऽ कऽ पटुआक साग टा छलै। सेहो रोटी दुआरे छोड़िये देने। पटुआ सागसँ नीक नोन-मेरचाइ। हाट जाइये काल परसुका ढोलहो ठकाइकेँ मन पड़ल। मन पड़िते मुँहसँ हँसी निकलल। मुदा हँसी रुकल नै, मोकरक पानि जकाँ बहिते रहि गेल। बाटो चलै आ असकरे हँसबो करै। तइ बीच एकटा अधवयसू स्त्रीगण माथपर छाउरक पथिया नेने देखलनि तँ मने-मन घुनघुनेलीह- “पुरूख छी की पुरूखक नांगड़ि। केदैन हँसला कीदैन देखि।” मुदा किछु बजलीह नै। ठकाइक खुशीक कारण छलैक जे ढोलहो दऽ सोरहा केलक जे ईंटा-सिमटीक घर, पानि पीबैले कल, खाइक उपाए एक सए पच्चीस रूपैयाक प्रतिदिन काज, रोग-व्याधिक लेल खरतुआ दवाइ सभकेँ भेटत। जखन सभ चीजक उपाए भइये गेल तखन किअए लोक अनेरे मनकेँ भरयौने रहत। तँए मन खुशी। दरदे ने ककरो माथ टनकै छै जौं दर्द रहबे ने करतै तँ माथ किअए टनकतै। गामक सीमान टपिते ठकाइक मनमे उठल। देवियो-देवता हारि मानतीह। बड़ दइ छेलखिन तेँ एक दिआरी साँझमे समांग, विद्या, धन दइ छेलखिन। ईंटा-सिमटीक घर, पानि पीबैक कल आकि सवा सौक बोइन तँ नै दइ छेलखिन। किलो भरि चाउरक मोटरी देखि आंगन बाहरैत बिलटी बाढ़ब छोड़ि, हाथमे बाढ़नि नेनहि तरंगि कऽ पतिकेँ पुछलक- “हाटमे चाउर नै छलै जे छुछे हाथे घुमि गेलौं?” मुस्की दैत ठकाइ बाजल- “आँखिमे रतौनी भेल अछि जे चाउरक माटरी नै देखै छीऐ।” आँत मसोसि बिलटी मने-मन सोचए लागलि जे जेहने पटुआ साग गलनमा होइए तेहने अरबा चाउर। तहूमे मोटका चाउर पाँच दिन चलबो करैत, ई तँ एक्को दिन नै चलत। घरडीह आध पहर रातियेसँ, जहिना हथिया आ आन नक्षत्रक सतैहिया लधल रहैत तहिना मास दिनसँ सासु- पुतोहुक बीच झगड़ा लधल आबि रहल अछि। ने बाप उधो किछु बजैत आ ने बेटा फोकचा। फाँक जगह पाबि दुनू -सासु आ पुतोहु- भरि मन उखला-उखली करैत। डेढ़ियापर बैसल उधो सोचैत जे जहिना पत्नी तहिना पुतोहु। धधकल आगिमे आड़ि कना देब, तँए चुप। तहिना फोकचोक मनमे उठैत तँए ओहो चुपचाप ओसारपर बैसल तमाकु चुना मुँहमे देने रहए। दस सालसँ दुनूक -सासु-पुतोहुक- मधुर संबंध रहने कहियो हर-हर-खटखट परिवारमे नै भेल। अनायास हवा बदलि गेल। पाँच गोटेक परिवारमे- बाप-माए, बेटा-पुतोहु आ एकटा पोता। संबंध िबगड़ैक कारण भेलै इन्दिरा आवास। जेहने टाँस बोली नवानीवाली सासुक तेहने रहुआवाली पुतोहुक। सौंसे गामक लोक सुनैत। अपना घरक मुँहथरिपर ठाढ़ भेल मेहथवाली कबिलपुरवालीकेँ कहलकनि- “पेट बोनिया लोककेँ सदिकाल किछु ने किछु खगले रहै छै। तँए....।” मुँह बिजकबैत कबिलपुरवाली बजली- “गामक लेखे ओझा बताह आ ओझा लेखे गाम।” कलपर नवानीवाली रहुआवालीकेँ देखि चिकारी देलखिन- “भगवान पुतोहुओ देलखिन तँ दीदीकेँ।” आँखि उनटबैत रहुआवाली- “अहिना निमूधनकेँ लोक दुसै छै कियो अपन घेघ देखए तब ने।” डेढ़ियापर बैसल उधोक हृदए कुही होइत। कखनो मुँहसँ हँसी निकलैत तँ लगले बिधुआ जाइत। मनमे उठलै- घराड़ीक कागज-पत्तर तँ अछिये नै आ ईंटा-सिमटीक घरले झगड़ा। खाता-खेसरा ओना इन्दिरा आवासक अंतर्गत दू-चारि घर कतेक सालसँ बनैत अबै छै। मुदा ऐ साल हवा उड़िआएल जे सभकेँ बनतै। चरि-चरि रूपैये फार्मक बिक्री तत्ते भेल जे प्रेसबला सभ तेहरा-तेहरा छपलक। गामसेवकक सभ फार्म भरा-भरा ब्लौक पहुँचि गेल। हाथमे अपन-अपन फार्म नेने, अगनैत परतीमे पतिआनी लगा ठाढ़ भऽ गेल। नम्बर अबिते घुसका फार्म बढ़ौलक। फार्म देखि बीडीयो बाजल- “खाता-खेसरा?” चुपचाप घुसका आगूमे ठाढ़। बगलमे फार्म रखि बीडीयो फेर बाजल- “पतिआनीसँ कात जाउ?” घुसका- “सबहक फारमपर लिख देलिऐ आ हमर रखि देलिऐ?” बीडीओ- “बिना खेसरा नम्बर चढ़ौने पास नै हएत।” घुसका- “पहिने खेसरेक ओरियान किएक ने केलिऐ?” सबूत तीन दिनसँ गामक रोहनिये बदलि गेल। जहिना रोहनिमे आमक चिष्टा-चार, रंग-रूप, बसंत पाबि मनुष्यक। तहिना दस पहिया ट्रकपर तीनि-तीनि आदमीक बोझ। ट्रेक्टरपर झुलैत कुर्सीक बाबू। कैल, चरक, सिलेब, गोल, गहुमन, चितकाबरसँ सभटा भरि गेल। गौआँ चौक छोड़ि गाम पकड़ि लेलक आ आनगौआँ आबि चौक पकड़ि लेलक। मुदा जे हउ, चाहक दोकानक ब्रेंच कखनो खाली नै रहल। साढ़े छह बजैत-बजैत सभ हाटक दोकान जकाँ ठौर पकड़ि लेलक। कियो नव परिधानमे सजि तँ कियो सर्फमे साफ कएल वस्त्रसँ सजि भोंटक बुथपर नम्बरमे ठाढ़ भऽ गेल। भुटकुमरा सेहो पतिआनीमे ठाढ़ भेल। जेना-जेना आगूक इंजिन खिचै तेना-तेना अपन अधिकार देखि भुटकुमराक पेटमे गुदगुदी लगैत। जहिसँ मन तर-ऊपर करैत। ससरैत-ससरैत अगिला मुँहरापर पहुँच पुरजी बढ़ौलक। पुरजी लैत प्रजाइडिंग अफसर बाजल- “फोटो पहचान पत्र?” किछु नै बाजि भुटकुमरा खुशीसँ मुँह नै खोलि वेबसीक दाँत िचआरि देलक। जेना फोटो खिचबै लए सावधान भऽ गेल हुअए। दोहरबैत प्रजाइडिंग अफसर बाजल- “ड्राइभरी लाइसैंस?” “सरकार हम हरबाह छी।” बकझक करैत देखि गेटक चितकबरा सिपाही आबि भुटकुमराक गट्टा पकड़ि घीचने-घीचने सीमासँ बाहर कऽ देलक। भुटकुमरा बुदबुदाएल- “कोन लपौरीमे पड़ि गेलौं।” कौआक मैनजन जहिना अखन आरक्षणक माध्यमसँ बेसियो उम्रबला शिक्षक बनि गेला तहिना राजशाहीमे मैनजन सबहक बहाली भेल छलनि। कुरसी पबिते जहिना पावर नचए लगैत, तहिना कौओ-मेना, हरिणो-सुगर आ कुकुड़ो-बिलाइक मैनजनकेँ पावर टिकपर चढ़ि गेल। गाम महराजकेँ बाँटि कए बखरो हुअए लगल। मैनजनीक पावर पाबि बिलाइ गोरसपट टक-धियान लगबए लगल। जेहन उक नै तेहन फूक भारी। जे ने बड़द जकाँ हर बहि सकैए आ ने खस्सी-बकरी जकाँ खाएल जा सकैए मुदा नजरि सदतिकाल दूधे-छालहीपर! जहिना अपन बेरादरीमे हरिण-सुगर, कुकुड़-बिलाइ करैत तहिना कौओ उक फेड़ए लगल। दोसराक जुआन कनियाँ देखि उनट-फेरी कऽ अपना घर अनए लगल। मन मसोसि सभ बरदास करैत। अपन कनियाँकेँ बलजोरी घरसँ लऽ जाइत देखि बदलू कौआक हृदए दहकि गेलै। किछु बजैक आ करैक साहसे ने होइ। मुदा मन दलमलित हुअए लगलै। सोचैत-िवचारैत अपन दुखनामा कानि-कानि सभकेँ कहलक। बेरादरीमे बेसी ओहन जे परोछमे उचित बजैत मुदा मैनजनक सोझामे सरस्वतीये हरा जाइत! बदलू चालाकी केलक। मन दहकले रहै, बुढ़बा सभकेँ छोड़ि समरथका कौआ सबहक जेर बना कहलक- “भाय, जेहन दशा हमर भेल तेहने तँ सभकेँ हेतह?” काँव-काँव करैत सभ बाजल- “एहेन अन्याय सभकेँ जाबे रोकब नै ताबे एका-एकी सभकेँ हएत।” जेरक संग बदलू मैनजन ऐठाम विदा भेल। जेर देखि मैनजन डोलि गेल, घबड़ा गेल! तइ काल जइ कौआकेँ छीन कऽ लऽ गेल रहै ओ अंगनेमे मैनजनक बियौहती कनियाँकेँ झोंट पकड़ि लिड़ी-बिड़ी करए लगलै। मैनजन भगैक ओरियान करए लगल। तइ बीच गट्टा पकड़ि बदलू पुछलक- “कतए पड़ाइक ओरियान करै छेँ?” थरथर कपैत मैनजन बाजल- “भैया, अपन कनियाँ लेने जा। पएर पकड़ै छिअ, जान छोड़ि दाए।” कलपैत मैनजनक बात सुनि बदलूक मन ठमकि गेल। जहिना धधकैत आगिमे पानि पड़लासँ मिझा जाइत मुदा गरमी (ताव) रहबे करैत तहिना बदलूओकेँ भेल। रसे-रसे गरमी कमिते रहै आकि तइ बीच अपन कनियाँ मुस्की दैत दरबज्जापर आएल। बदलू मैनजनकेँ पुछलक- “एहेन काज फेर ने ते करबह?” “नै।” बदलूक पत्नी बाजलि- “जहिना सीता महरानी लंकामे रहितो पवित्र रहली तहिना हमहूँ छी।” दोसर कौआ बदलूकेँ कहलक- “दिन भरिक हराएल जँ साँॅझू पहर घुरि कऽ घर आबि जाए तँ ओ हराएल नै बुझल जाइत। तहिना....।” रामकृष्ण मण्डल ‘छोटू' पुत्र श्री भरत मण्डल गाम- िनर्मली, वार्ड- १२, जिला- सुपौल बाबूजी लेल हबलदार गोरचंदक ऐठाम आइ फेर गुम-शुमक माहौल बनल छै। आइ हुनकर एकलौता बेटा बलदेवक इंटरक रिजल्ट निकलैबला अछि। कनी देरक बाद बलदेव मुँह लटकेने हाथमे रिजल्ट लऽ कऽ प्रवेश केलक। बलदेवकेँ एते हिम्मत नै जे बाबूजीसँ आँखि-मे-आँखि मिलाबैत। एकठाम बलदेव मुँह लटकेने ठाढ़ अछि। जेना कोनो पत्थरक मुरूत। आ एम्हर गोरचंदक आँखि लाल-लाल जेना बुझाइत दुगो आगिक गोला ओकरा चेहरापर अछि। बलदेवक माए श्यामवती, स्थितिकेँ भाँिप पतिक गुस्सा याद करैत सिहरि उठै छथि। श्यामवती तुरन्ते बलदेव लग जा बलदेवक हाथसँ रिजल्टबला पर्ची लऽ चहैक उठल, आ पति दिसन ताकि बाजलि- “यौ-यौ देखियौ, अपन बलदेव सकेण्ड किलाससँ पास भेल।” गोरचंद रिजल्ट छीन बाजल- “हम जानै छी, ई आवारा, बकलेल हम्मर नाक कटाओत, हम्मर सभ अरमानपर पानि फेर देत। हम सोचने रहौं ई हम्मर नाओं रौशन करत। तब हमहूँ गर्वसँ सीना फुला कऽ कहितिऐ कि हमरो बेटा दोसरक बेटा जकाँ इंजिनियर, डॉक्टर, दरौगा अछि। मगर-मगर ई कहाँ.... नसीब हमरा।” कहैत-कहैत कानए लगल गोरचंद। जेना-तेना बलदेवक एडमिशन शहरक एगो कॉलेजमे भेल। ओइ कॉलेजमे बी.ए. इतिहाससँ पढ़ाइ करए लगल। हँसैत-हँसैत साल बित गेलै। मगर बलदेवमे कोनो परिवर्तन नै भेल। उ ओनाहिए रहल। मुदा पढ़ाइक समए बीत गेल। पार्ट-वनक परीक्षा भेल। ऐबेर जेना-तेना परीक्षामे देकसी मारैत पास तँ भऽ गेल। घरपर बापक डाँट-फटकारसँ ओकरा कानपर तँ जूऔ ने टिकै। समए फेर बितैत गेल। आब बलदेव पार्ट-टू केर विद्यार्थी भेल। ऐबेर कॉलेजक किछु विद्यार्थी आगरा ताज महल देखए वास्ते जाइक प्रोग्राम बनेलक। जइमे बलदेव अपनो नाओं लिखाओत। तइले सभ विद्याथीकेँ एक-एक हजार रूपैया जमा करए पड़त। बलदेव अपन बाबुजीकेँ कहलक मुदा ओ साफे मना कऽ देलखिन। माएकेँ बहुते कहि बलदेव अपन बाबूजीकेँ मनेलक। ओ दिन आबि गेल। आइ दुबजिया गाड़ीसँ यात्रा कएल जेतै। एमहर गोरचंद अपन बलदेवसँ कहलक कि ओ बारह बजे ओकरा एक हजार रूपैया कतौसँ, केनाहिओ व्यवस्था कऽ दऽ देतै। पर ई कि बारह बजि गेलै, अखैन तक गोरचंद थानासँ आपस नै आएल। घरपर बलदेव गुस्सासँ अपन बापकेँ बहुत भला-बुरा कहए लगल। माए श्यामवती जवान बेटाक मुँहसँ, अपन भगवान जकाँ दुल्हाक बारेमे जली-कुट्टी सुनि आँखिसँ मोती जकाँ नोर गिरबए लगलि। तखने बलदेवक जोरदार अवाज- “माए-माए, देखलिहीं बाबूक करतुत, हम्मर बेइज्जत करा देलक, पुरे कॉलेजमे। आब... आब हम केना कॉलेजमे.....?” गुस्सामे बलदेव अपन साइकिल निकालि चलि पड़ल थाना तरफ। थाना पहुँचैत बलदेव देखै छै। ओकर बाबूजी एगो दरोगाक गोर दाबैत छै आ बजै छै- “हुजुर-हुजुर भऽ सकै तँ पानसौ रूपैया पैंचा दऽ िदअ। आ हुजुर आइ हमरा कनी जलदीए घर जेबाक अछि। हम्मर बेटा आइ दुबजिया गड़ीसँ आगरा जाइ छै।” दरोगा गोरखनाथ अपन रौब झाड़ैत- “चुप सार, बढ़ियासँ जाँतैले आबै नै छौ आ बेटाकेँ आगरा घुमैले भेजै छेँ। आ ई की जखैन देखू तखैन बेटाले पैसा मांगए लगै छी। कहियो ओकर एडमिशनले तँ कहियो कपड़ाले कहियो साइकिलले, ई- ई की छिऔ। एतए तोहर बापक खजाना नै छौ बड़ा मेहनतसँ आ बड़ा रिक्सपर घूसक पैसा आबै छै, हराममे नै। चल सिकरेट धरा।” गोरचंद फफकि-फफकि कानए लगल- “हुजुर एक्के घंटा बचल छै हम्मर बेटा....।” “चुप चल सिकरेट धरा। भाँड़मे जाउ तोहर बेटा। हूं, बड़ा आएल आगरा घुमबैबला। चल-चल जाँॅत आ सुन, ई ले एकसौ रूपैया। बाजारसँ किछु सब्जी कीन कऽ हम्मरा घर पहुँचा आ आ कनी हम्मर बेटा गोलुआकेँ स्कूलसँ लाइब लिहैं।” कनीखन रूकि कऽ फेर बाजल- “तब देखबै साँझमे कुछ पैसा बेबस्था करबौ। जो-जो भाग....।” एते सुनि बलदेवक भोँह फरकि उठल ओकर सभ बाप परक गुस्सा दरोगापर आबि गेल। मन मानि होइ ओकरा बगलक बंदूक उठाए धाँइ-धाँइ गोली दरोगाक भेजामे उतारि देत। पर बेचारा कि कऽ सकैत। चुपचाप घरक दिस विदा भेल आ कसम खा लेलक। आइसँ पढ़ब आ सिर्फ पढ़ब। अपन बापक ऐ अपमानक बदला हम कलक्टर बनि कऽ लेब। आब ने जानि बलदेवमे कोन शक्ति आबि गेलै, सभ किछु छोड़ि सभसँ नाता तोड़ि सिर्फ किताबसँ नाता जोड़ि लेलक। मुन्नाजी दरेग कारक पट्टा खुजिते चिल्काकेँ ओकर दादीमाँ आह्लादित होइत कोरामे लेलनि। अहा! देखियौ तँ कते फकसियारि काटि रहल अछि नेना। एगदमसँ लहालोट भऽ गेल अछि। -ऐँ यै कनियाँ, बौआकेँ दूध लगा लेबै से नै? -माँ, दुध कहाँ होइ छै, ओ तँ कहिया ने सुखा गेलै। -तँ डॉक्टरसँ नै पुछलिऐ दुध हेबाक उपाए? -ओ तँ बतौलक, मुदा...! जखन बजरुआ दुधसँ पलाइये जाएत तँ चिन्ता कोन? -ऐँ यै, कतेक निसोख छी अहाँ, कहू तँ अप्पन दुध केना छोड़ा देलिऐ? -माँ, ई नै बुझथिन ने, दुध पियेलासँ फिगर खराब भऽ जाइत छै। -हँ यै, हम अंग्रेजिया शब्द तँ ठीके नै बुझबै। मुदा एतेक जरूर बुझबामे अबैए जे दुध नै सुखेलैए। ओ तँ कोनो ने कोनो रूपेँ सभ ठाम भेटिये जाइ छै।...जँ सुखा गेलैए तँ माएक ममता। भूख सतबरतीक मोहर अपनापर लगेबाक लेल ओ नै जानि कतेको साउस आ माएकेँ आरोपित कएलक। एतेक धरि जे कोनो कनियाँ-बहुरियाकेँ सेहो नै छोड़लक। ओकरापर संदेह तँ भरि गौँआ करए मुदा ओकर छुटल मुँहक सोझाँ सभ अप्पन-अप्पन मुँह बन्न राखैमे बुधियारी बुझए। असलमे ओकर घरबलाक सेनाक नोकरीसँ छुट्टीक अभाव आ ओकर सुन्नरता गामे भरि नै, अनगौंओं छओँड़ा सबहक आकर्षणक केन्द्र बनि गेल छल। एक दिन गाम भरिक बुजुर्ग आ काबिल लोक सभ बैसारमे बजा ओकरा खूब ज्ञान देलक। ओ निश्चय कएलक जे हम ऐ नरकसँ मुक्ति हेतु ऐ गामकेँ छोड़ि देब। मुदा अपन कर्कश शब्दवाण छोड़ैत गौँआ सभकेँ सुनौलक- एँ, ऐ गामक कोन घरक बेटी, पुतोहु हाट-बजार आकि मेला जा कऽ नै घुमि अबैए। मुदा हम तँ आइ धरि अपन घरसँ दुरापर तक नै अबै छी। कहू तँ कियो पाहुन-परक वा भेँट केनिहार अबैए तँ कि ओकरा अपन घरसँ भगा दिऐ? -यै, ककरो घर अएबासँ नै रोकबै, मुदा ओकरा संग अपन रंग-रभसकेँ तँ रोकि सकैत छी। मुखियैन दबले जीहे मुँह खोलने छलीह। फेर हँ, सबहक बेटी, पुतोहु अपन साउस माएक संग कतौ जा घुमैए आ फेर घरमे इज्जतिक संग वास करैए। ककरो किछु नै भेलैए आइ धरि। -अहाँ तँ घरे भरिमे रहि पेट कऽ लेलौं। छीः छी, नै जानि जे कोन जाति धर्मक बीआ बागल हएत। अहाँक घरबला पछिला साल दियाबातीक छुट्टीमे आएल छल आ फेर अगिला मास दियेबातीमे आओत। की अहाँ ओकरा सोगाइतमे देबाक लेल रखने छी ई अनजनुआ चिल्का। -बुझा देथुन ने ईएह सभ। हम तँ तार पठा, फोन कऽ थाकि गेलौं जे नोकरी तँ बुढ़ारी धरि हेतै मुदा जुआनी फेर घुमि कऽ किन्नौ नै एतै। हम पेट तँ मेटा लेब मुदा जखन देहक भूख लगतै तँ ओ फेर छोड़ि चल जेतै नोकरीपर। हमरा के सम्हारत? विजातीय पुरे पहाड़ीपर शुन्यता पसरि गेल छल। ऊपर मेघमे स्याहपन, हवाक साँए-साँए स्वर जोड़ीकेँ आओर मजेदार समैक अनुभूति करा रहल छल। -यौ ठीके कहै छलिऐ, हम तँ एतेक दूर धरि कल्पनो नै करै छलौं जे पहाड़ आ जंगल जिनगीकेँ खुशनुमा बना सकैए। -आह! कतेक मजेदार क्षण। बिआह जिनगीकेँ नवदर्शन दैछ आ तकर पछातिक दिन-राति प्रकृतिक कोरामे जीवनक सम्पूर्णताक सुन्दर अनुभूति करा रहल अछि। -यै, अहाँकेँ ई बुझल अछि जे चोरा कऽ कएल प्रेम बिआह आनन्दक पछाति स्वर्गक रस्ता सेहो खोलि छोड़ैए। -हँ यौ, तँ किएक ने ऐ समाजक डांगसँ अपनाकेँ बचा, ऐ क्षणकेँ जीवनक अन्तिम क्षण बना ली। सोहाग तँ अचल रहत। राष्ट्रभक्ति सीमाक मानवीय कटु सम्बन्ध ओकरा आलोचनाक पात्र बना देने रहए। एकसर आ स्वतंत्र मुदा मस्त जीवन जीबामे प्रसन्न रहै छल। बिआहक पछाति एकबेर फेर ओ सामाजिक आलोचनाक शिकार भऽ गेल। किएक तँ ऐ नव दम्पतिक घर खुजैत सभ नै देखि पबै। आइ पतिक जेबाक छट्ठम मास बीति रहल छलै कि ओ सुन्दर पुत्रक जन्मसँ प्रसन्न भऽ पतिकेँ सूचनार्थ पत्र लिखैत मोनमे सोचि रहल छलि- ऐ चिट्ठीकेँ डाकघर धरि पहुँचाओत के? किएक तँ ओकर एकाकी जीवन पति मात्रपर केन्द्रित हेबाक कारणे सभ ओकरा समाजक सुन्दर कार्टुन मात्र बुझै। “डाकिया...” शब्द सुनि ओ दुन्ना डेगे सोइरी घरसँ बहराएल। डाकियाक पत्र देबाक लेल बढ़ल हाथ ठमकिते ओ बिजलीक करेन्टक गतिये पत्र लऽ फाड़लक- “खेद अछि- अहाँक पतिक रणक्षेत्रमे शहीद भऽ गेलासँ हम सभ एकटा वीरपुत्र हेरा लेलौं अछि।” बाप रे! करुण चित्कार...! घरबैया, सर-समाजक सांत्वनाक बीच मीडियाकर्मीक प्रश्न...प्रतिक्रिया जनबाक लेल। पत्रकार सबहक प्रश्नक उतारा दैत- “नै, भारत माँ अपन रक्षार्थ एकटा आओर सैनिक ठाढ़ कऽ लेलक अछि।” रेवाज रूक....। ऊँक नै लगा सकै छँ तोँ। रामरीत पासवानक मुइलाक पछाति, भरि गामक लोक ओकर अंगनासँ दुरा धरि सोहरल छल। विधवाकेँ सांत्वना देबाक लेल। मुदा ओकर दियादवादकेँ लगलै कठाइन। दरअसल मालिक मुत्तारक ई भीड़ तँ जुटल रहै बजरंगीक सहयोगमे। बजरंगी, रामरीतक छोट भाए, मालिक-मुक्तारक पाछु चटुआ आ अखनुक वार्ड सदस्य। ओ भैयारी निभेबाक नै, घराड़ी हड़पबाक फेरमे छल, किएक तँ रामरीतकेँ बेटा नै छलै। ओकर नजरि रहै रामरीतक छः कट्ठा घरारी पर, तेँ सभकेँ जुटा लेने छल, गवाहक रूपमे, भविष्यक लेल। आ लहास उठेबासँ पहिने फरमान सुना देेने छल- आगि जे देतै आ श्राद्ध जे करतै, घरारीक अधिकारी तँ उएह ने हेतै। समवेत स्वीकृतिये मुड़ी डोलल छल- हँ...। चलु-चलु लहास उठबै जाउ, बेशी विलम्ब नीक नै। बजरंगी, कोहा उठाबऽ। नै, किन्नहुँ नै। विधवाक आक्रोशक स्वरकेँ सुनि सभ शांत भऽ गेल। मंजुला, कोहा उठा आ आगि ले। अपन पिताक हृदयक एक मात्र टुकड़ी अछि ओ। आगि उएह देत। ठीक छै, चलु...। मुखाग्नि हमहीं देब पिता हमर छथि, हुनक अंश हम छी, बजरंगी कक्का तँ हुनक सम्बन्धी मात्र छथिन। ईह... जेना रामरीतक बेटा रहथिन, अधिकार जताबऽ एलीहे। दबल स्वर भीड़क बीचमे सँ सुनाएल। बेटा नै छी तेँ कि, हम तँ हुनके रक्तबीजक पदार्पण छी। ओ निपुत्र छथि, मुदा निःसंतान नै। आइ सँ अही रेवाजक शुरूआत बुझू। आ संग के देतौ? निपुतराहा सभ। रामलोचन ठाकुर जन्म १८ मार्च १९४९ ई.पलिमोहन, मधुबनीमे। वरिष्ठ कवि, रंगकर्मी, सम्पादक, समीक्षक। भाषाइ आन्दोलनमे सक्रिय भागीदारी। प्रकाशित कृति- इतिहासहन्ता, माटिपानिक गीत, देशक नाम छल सोन चिड़ैया, अपूर्वा (कविता संग्रह), बेताल कथा (व्यंग्य), मैथिली लोक कथा (लोककथा), प्रतिध्वनि (अनुदित कविता), जा सकै छी, किन्तु किए जाउ(अनुदित कविता), लाख प्रश्न अनुत्तरित (कविता), जादूगर (अनुवाद), स्मृतिक धोखरल रंग (संस्मरणात्मक निबन्ध), आंखि मुनने: आंखि खोलने (निबन्ध)। अनुवाद लेल भाषा-भारती सम्मान २००३-०४ (सी.आइ.आइ.एल., मैसूर) “जा सकै छी, किन्तु किए जाउ”- शक्ति चट्टोपाध्यायक बांग्ला कविता-संग्रहक मैथिली अनुवाद लेल प्राप्त। विदेह सम्पादकक समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०१२ अनुवाद पुरस्कार “पद्मानदीक माझी”- बांग्लासँ मैथिली अनुवाद, बांग्ला-उपन्यास - मानिक बंद्योपाध्याय, लेल प्राप्त। गिरगिट बैशाखक ठहाठही दुपहरियामे अपन आ अपन गर्भवती स्त्रीक आहारक जोगार कए जखन श्रीमान गिरगिट अपन डेरा घुरलाह तँ देखैत छथि जे पत्नी घोघना लटकओने बैसल छथिन। बेर-बेर एकर कारण पुछला उत्तर पत्नीक मओन भंग नै भेलनि तँ ओ खिसिया कऽ बजलाह- एहिना घोघना फुलओने रहब तँ लोक कि अगरजानी जनैए जे अहाँक मनक बात बूझि लेत। पत्नी ओहिना विधुआएल भनभनेलीह- लोक बुझिए कऽ की करत? जँ सरिपहुँ लोककेँ हमर कचोटक चिन्ता छै तँ सत्त करओ। -एक सत्त, दोसर सत्त, तेसर सत्त, अहाँक कहल जे नै करए से असी कुंड नर्कमे पड़ए। आबो तँ बाजब? गिरगिट आत्मसमर्पण कऽ देलनि। पत्नी खखास करैत बजलथिन- चलू हमरा लोकनि अखन एइ देशसँ चलि चली। गिरगिट छगुन्तामे पड़ि गेलाह। “आखिर कून एहेन बात भेलैक जे हमरा लोकनिकेँ अपन जन्मभूमि छोड़ि चलि जेबाक चाही?” पत्नीक पारा गर्म भऽ गेलनि। “कनियो जे ज्ञानक छूति रहैत तँ ई पूछए नै पड़ैत। आखिर कुनू जाति जन्तुक अपन परिचय रहैत छैक, विशेषता रहैत छैक। जँ सएह ने बचतै तँ लोककेँ लाजे मरि नै जा हेतैक? -अहाँक कहबाक अर्थ हमरा नै बुझैमे आएल। हमरा लोकनि अपन रंग बदलाक लेल विख्यात छी। परिवेशक अनुसार रंग बदलबाक पटुता हमरा लोकनिमे जन्मजात होइए... -मुदा ताहूमे हम सभ पाछू पड़ि गेलौं...पत्नी बीचेसँ लोकि लेलथिन। -अहाँ कि नेता लोकनिक बात कऽ रहल छी?- गिरगिटक प्रश्न भेल। -तँ आर ककर? आइ-कालिक नेता लोकनिक बराबरी करबाक दक्षता कि हमरा लोकनिमे रहि गेलए? गिरगिटकेँ बड़ जोरसँ हँसी लागि गेलनि। ओ ठहाका दैत बजलाह- तँए ने कहैत छैक स्त्रीगणक बुइध। हमरा लोकनिकेँ तँ ऐ मे प्रसन्नता हेबाक चाही। कहबीयो छैक जे दस टके नै नितराइ, दस समाङे नितराइ। भारत रत्न मृत्यु शय्यापर पड़ल-पड़ल भीष्म पितामह सोचि रहल छलाह जे अन्यायी कौरवक संग दऽ ओ नीक नै केलनि। आगामी इतिहास हुनका कहियो क्षमा नै करत। अन्तमे ओ फेर हथियार उठेबाक आ पाण्डव दिससँ लड़बाक घोषणा केलनि। ई गप्प जखन दुर्योधनक कान तक गेलै तँ पहिने तँ ओ घबड़ाएल किन्तु पश्चात् शकुनीक संग परामर्श कए दोसर दिन हस्तिनापुरमे विराट सभाक आयोजन केलक। ऐ सभामे ओ भीष्म पितामहकेँ एगो पैघ प्रशस्तिक संग “भारत रत्न”क उपाधिसँ अलंकृत केलक। कहल जाइछ जे तकर बाद जे भीष्म पितामह मओन व्रत धारण केलनि से जा जीलाह मुँह नै खोललनि। परमेश्वर कापड़ि सतबरती आभा आ मनुक प्रेम जगजाहिर छल। दहेज दुनूक बिआहमे भदवा बनि गेल। आभाक बाबू ओकर बिआह सुमनसँ कऽ निफिकिर भऽ गेलाह। -अनकोसँ प्रेम चलै छल तैयो सतवरतीए छी आभा? -तँ की। प्रेम लोक मनसँ करैछ। हम कोनो देह समर्पण केलिऐ। -आब जँ मौका भेटौ? आभा मौला जाइछ- धुर छोड़ बिसरल राग।...कहाँ के बात कहाँ बिला गेल। -तँ ठीके बिसरि गेलही? -ईस्स! शूल कहु बिसरइ।...ओहो हियाक कीयामे बन्द। अमरनाथ, १९७५ ई. मे "क्षणिका" विहनि कथा संग्रह प्रकाशित। हास्य कथाकार। देह साँझक लुकझुकमे लाल भौजीकेँ घामसँ नहाएल धरफड़ाएल चल अबैत देखलियनि। रुकलौं। पुछलियनि- “भौजी अहाँ? ” “की पुछैत छी! मंगल छै से हनुमानजी मन्दिर गेल रही। बुझलिऐ नै, साँझ भऽ गेलै। ” हुनका डेराएल देखि कऽ कहलियनि- “से ठीके! सुनसान सड़कपर लुटपाट बढ़ि गेल छै। ” अपन शरीर दिस देखैत कहलनि- “से कोन गहना पहिरने छी? ..कोन रुपैय्या रहैए?... ” “तखन? ” “तखन? अहाँ की बुझबैक!...मौगीक लेल देहे जंजाल छै!” पियास “हे, कने एक ग्लास पानि दिअ। ” “घैलामे पानि ठरि गेल हेतै। चुपचाप सुति रहू। देखू तँ, पएर उघारे अछि। कम्बल ओढ़ा दैत छी। बाहरमे पाला खसै छै। मन माइर कऽ सुति रहू।” “पचासी वर्षक भेलौं। अहाँ एना कहियो उपदेश देने छलौं! बएस बढ़ल तँ पत्नीक धर्म बिसरि गेलौं। ” “आब लिअ, निशाभाग रातिमे धर्म बुझबए लगलाह। उकासी होइए। ठरल पानि पीयब तँ हफनी बढ़ि जाएत। सुति रहू।... कहू तँ, जाड़मे कतौ लोककेँ एते पियास लगलैए।” “आब हिनका के बुझौतनि? एकटा पियासे तँ छै जे नै मेटाइ छै। ” स्वीच ऑफ मोबाइलमे इजोत भेलै। कने पहिने घनघनेलै। अथवा दुनू एके संगे भेलै। देखलनि तँ पत्नीक एस.एम.एस. छलनि- “मोबाइलक अदला-बदली भऽ गेल। अहाँक मोबाइल हमरा लगमे अछि। आेइमे रंग-बिरंगी महिला सबहक फोटो अछि।...अहाँ हमरा एते दिन अन्हारमे रखने छलौं। आेइमे स्वीटी अग्रवालक सेहो फोटो छै, जकर आँखि नचैत रहै छै। हम बैसल रहैवाली महिला नै छी जे नेप चुबबैत सहि लेब। से बूझि लिअ! ” पहिने नस तनेलनि। क्रोधमे हिनकर नाक फड़कऽ लगलनि। मोबाइलक बटनकेँ दबलनि। जबाब टाइप करए लगलाह- “अहाँ तँ छोटसन बातपर धरती-आसमान एक कऽ देलिऐ। एहेन सन क्रम जे अहाँक सिउँथमे सिनुर देलौं तँ सौंसे अहींक इच्छासँ चली।... जे जे मौगी नीक लगैत गेल, फोटो लैत गेलिऐ। तकर कैफियत की? ”..पठा देलथिन एस.एम.एस.। तत्काले पत्नीक जबाब अएलनि, “अहाँ तँ तिलकेँ ताड़ बना देलिऐक। मन सुगबुगाएल तँ पुछबो नै करू। ओना वएह लड़ैए जकर पएरमे ताकति रहैत छै! से हमरामे जहिया होएत, जबाब देब। ” एस.एम.एस. दू बेर पढ़लनि आ मोबाइलक स्वीच ऑफ कऽ लेलनि। गिरगिट एसकरे रहथि। बाजार जाइले बरामदापर अएलाह तँ जेना लगलनि जे “भट” आबाज भेलैक। पहिने बाँहिपर गिरगिट खसलनि आ फेर नीचाँमे खसि पड़लैक। मरि गेलैक? नै, संचार भेलैक, ससरि कऽ देबालपर चल गेलैक। कटलकनि तँ ने! फेर भेलनि जे कटने रहितनि तँ बिसबिसाइत रहितनि। तथापि गिरगिट खसै छै तँ किछु होइ छै! ...किछु होइ छै? मरबाक पूर्व सूचना सेहो भऽ सकै छै। मन पाड़ऽ लगलाह, पंडित बाबा रटौने रहथिन- पतति जौं पल्ली...पतति जौं पल्ली...आगाँ मोन नै पड़लनि।...ओह, ई सभ पुरना बात भेलै। पएरपर कि कतहु खसै छै तँ धनक क्षति होइ छै। पीठपर कि माथपर तँ लोक मरि जाइये ...ओह, फेर वएह पुरना बात! मोन पड़लनि गिरगिट खसै छलै तँ लोक गंगाजल छिटैत छल। आब लिअ, ई गंगाजल कतए सँ अनताह? देबालपर एक-दूटा गिरगिट रहए। ई चिन्हबाक प्रयास करए लगलाह जे कोन गिरगिट खसल रहनि। गिरगिटकेँ देखैत-देखैत लगलनि जे हिनकर मनमे गिरगिट ससरि रहल छन्हि। फोंफ “गै धोछिया खोल केबाड़ी! ...खोल, खोलै छैँ कि तोड़ि दियौ केबाड़ी।”, कहैत-कहैत लुढ़कि गेल। उठल। केबाड़ी खुजलै। एकर मुँह भभकैत रहए। बाजल- “ला जे देबेँ दू मुट्ठी अन्न, से दे!...जल्दी कर, नै तँ ठोंठी दाबि देबै।” कतेक झाड़-फूक भेलै, टोना-टोटका करौलकै मुदा एकर पीनाइ नै छुटलै। घरवालीक मन अपरतिभ भऽ गेलै। कहलकै- “जे कमाइ छैँ से उड़ा लै छैँ! रोटी कतए सँ जुटतै? ” “गै छुछनरिया, ला जएह छौह सएह ला। एक धारी माटिये ला, सएह भकसि लेबै।” भीतर गेलि। दालि गरम कएलक। छिपलीमे रोटी आ बाटीमे दालि लऽ कऽ आएलि। बाजलि- “जा, आब की करबै? मरदबा भुइयेँमे पड़ले-पड़ल फोंफ काटए लागल।” चण्डेश्वर खाँ चेकिङ बजार दिससँ आबि थाना चौक होइत, ट्रेजरी दिस जाइत रही। थाना चौकपर भीड़ देखि किछु कालक लेल हमहूँ ठमकि गेलौं। ओना थाना चौकपर बरोबरि भीड़ होइत रहैत छैक, कहियो काल कऽ किछु अपराधी पकड़ि कऽ आनल जाइत अछि तँ किछु कालक लेल भीड़ होइत अछि। कहियो काल कऽ हड़तालीक गिरफ्तारीक लेल भीड़ होइत अछि। मुदा आइ से सभ नै छल। बहुत रास मोटर साइकिल थाना परिसरमे पकड़ा कऽ राखल छलै आ जकर सभ कागच-पता ठीक-ठाक तकरा छोड़ि देल जाइत रहै। थानाक गेटपर दर्जनसँ बेसी सैपक जवान आ किछु बिहार पुलिस। ओइ बाट धऽ कऽ जतेक मोटर साइकिल चलैत छल, सभकेँ रोकैत छल आ कागच-पता देखल जाइत रहै। कागज-पता देखबा लेल फराकसँ पुलिस हाकिम सभ छला। ओना किछु लोककेँ कागच-पता ठीक-ठाक रहला बादो किछु कालक लेल बिलमा लैत रहै, बादमे ओकरा सभकेँ केना छोड़ल जाइत रहै से नै कहब। एकटा बीस-बाइस वर्षक जुआन छौड़ाक मोटरसाइकिलक चेकिङ गेटपर भऽ गेल रहै, ओकर सभ कागच-पत्तर ठीक-ठाक रहै, तैयो ओकरा भीतर लऽ गेलै। ओ छौड़ा गरजऽ लागल, जखन हमर सभ कागच-पत्तर ठीक अछि तखन ई किएक। ओकरा जोरसँ बजलापर आेइमे सँ एकटा हाकिम तरा-तरि पाँच थापर लगा देलकै आ थानाक हाजतमे ठेल देलकै। ओ जहाँ-तहाँ फोन कएलक। ता हम ट्रेजरी दिस बिदा भऽ गेल रही। आधा घंटाक बाद घुरलापर देखल जे थाना चौकपर साफ सुन्न-साम भऽ गेल छल। कछमछी कर्मचारी सबहक महासंघक आह्वानपर आइ पचास दिनसँ हड़ताल चलि रहल छल। समझौता होएबाक कोनो नामे नै रहै। सभ दिन धरना-प्रदर्शन चलैत रहै। बेसी दिन हड़ताल रहलासँ कर्मचारी सभ दुबरा गेल छल। बनिया-बेकाल मास दिन धरि तँ कहुना कऽ कऽ उधारी दऽ कऽ सम्हारने रहै। मुदा आब ओहो सभ थस लऽ लेने रहै। कर्मचारी सभ, सभ दिन अखबार आ रेडियो समाचार देखैत आ सुनैत अछि। मुदा कोनो नीक समाचार नै देखि कछमछा जाइत छल। मुदा की करत? जँ कियो बीचमे हड़ताल तोड़ि काजपर घुमत तँ ओ कर्मचारी, कर्मचारीक नजरिमे बेइमान कहाओत। मुदा तइसँ की, बइमानो कहओलापर तँ दरमाहा नै ने भेटतैक। से छोटका कर्मचारी सभ कछमछीमे पड़ल अछि। भोलाक पत्नी बेसी दिनसँ दुखिताहि छैक। दवाइ दोकानसँ दवाइ उठौना लैत अछि। मुदा दोकानदारक तीन मासक उधारीक चुकता नै कएने छल। तँए टाकाक व्यवस्था कऽ कऽ दवाइ अनबा लेल गेल छल। दोकानदारकेँ पुरजा दऽ दवाइ देबा लेल कहलक। दोकानदार पुरजा उनटा-पुनटा कऽ देखि कहि देलकै- ई दवाइ सभ हमरा दोकानमे नै अछि। भोला बाजल- अखन हम नगदी लेब। ई सूनि दोकानदारकेँ कछमछी लागि गेलै। बिसवास हमर पत्नी तीन बरखसँ दुखिताहि छथि, गैस्टीकक रोग छन्हि। एकपर एक डागदरक इलाज चलल अछि मुदा ठीक नै भऽ रहल छन्हि। मुदा ऐबेर एकटा पैघ डागदरसँ देखा रहल छियनि। जाँचे-पड़तालमे हजारसँ बेसी लागि गेल अछि। डागदरकेँ सभ बात पत्नी कानि-कानि कऽ कहने रहथि। डागदर साहेब कहलनि- ऐबेर निरकटेल भऽ कऽ ठीक भऽ जाएत। जेना-जेना हम कहलौं तहिना करब। डागदर साहेबक कहब रहनि- दिनमे कम-सँ-कम चारि-पाँच बेर थोड़-थोड़ भोजन करब। दवाइ कहियो नै छोड़ब। डागदरक मोताबिक सभ बात चलि रहल छै। मुदा काल्हि रवि छै। से पत्नी रविक तैयारीमे लागल छलीह। हम पत्नीकेँ बुझबैत कहलियनि- डागदर साहेबक बात मोन अछि ने, ओ कहलनि- हँ हँ, डागदर साहेबक सभ बात मोने अछि, मुदा रवि केना छोड़ि दी। बाल बच्चा आ अहाँ छी। डागदर तँ डागदरे होइत छै। ओ कोनो भगवान नै छथि। रघुनाथ मुखिया इण्डियन ई अछि नेपालक जनकपुरधाम। बिआह मंडपक फुलवाड़ीमे युक्लिप्टसक गाछ देखि ऋषि वशिष्ठ बजलाह- ई तेजपातक गाछ अछि की? हम नजरि पड़िते चिन्ह गेलौं आ बजलौं- नै-नै भाय, ई तेजपात नै, युक्लिप्टस अछि। एकर पातकेँ मीरकेँ सुंघलासँ विक्स जकाँ गमकैत अछि। वशिष्ठजी पात तोड़बाक लेल अपन डेग उठौलनि कि नजरि पड़ि गेलनि विष्ठाक चोतपर आ बजलाह- “लगैए एत्तौ इण्डियन आबै छै। नै? ” जुलुम लोकसभा चुनावक प्रचार-प्रसार शुरू भऽ गेल रहए। स्पीकरक गर्दमिशान करैत अबाज “छौंड़ीकेँ देलकौ धक्का माइर”क अबाज सुनिते काजक सूरि टूटि गेलै। गेनमा आ चुल्हाय सदाक कोदारि रुकि गेलै। गेनमा आड़िपर जा कऽ डाँर सीधा करए लागल। चुल्हाय गमछासँ पसेना पोछि तमाकू चुनबैत पुछलकै- अँय रौ गेनमा! जीतै लऽ जौं एक्के थारीमे गाए आ सुगरक मासु खाए पड़ि जाए तँ ओ के सभ खेतै रौ? गेनमा तमाकूक लेल हाथ पसारैत बाजल- हौ कका! एत्तेटाक दुनियाँमे एहेन एक्केटा जाति होइ छै- “नेताजी।” आ तइमे जँ हिसाब करबहक जे ई नेता खेतै की ओ नेता, से तँ जुलुमे ने करबहक। नियति कॉमरेड गनेसर कामति भोरे-भोर बलहा बाजारपर एलाह। हुनका संगमे सिंहजी रहनि। दुनू गोटए बनारसी पासीक घर धरिक कएक फेरी लगेलक। फेर मन्दिरक आगाँमे ठाढ़ भेल। आब एकटा करिया चश्माबला भीमकाय कायाधारी मिसरजीकेँ इशारा करैत बाजए लागल- घरो तोरे, पिनसिलो तोरे, लौनो तोरे, बीपैलो तोरे। बढ़मोत्तर तोरे, शिवोत्तर तोरे। आएल-गेल सेहो सभटा तोरे। तब अहीं कहियौ ने। हम गरिबाहा सभ की लेबै- “बापक हुरिया”। मिसरजी अपन जीहकेँ दाँतसँ कुचैत मुसकिएला। अपन डाँड़सँ एकटा कागचक पुड़िया आ आंगुर भरिकऽ चीलम निकालि कॉमरेडक हाथमे थम्हा देलक। मुँहलगुआ अँय रौ गणेश! ई हड्डी भरि राति चौबट्टीपर एहिना राखल रहि गेलै। नढ़ियो-कुकुर नै छुलकै। ई केना भेलै रौ। लागैए जे ई हड्डी कोनो शेरक ठमाएल छै। डरे नढ़िया-कुकूर नै छुलकै, नै? गणेश मौन भंग करैत बाजल- नै, नै। शेरक ऐंठाएल हड्डी-गुड्डी तँ सभ दिनेसँ नढ़िया-कुकूर चोभैत अइलैए, भाय साहेब। हमरा बुझने इहो हड्डी कोनो ने कोनो नढ़ियेक राखल छिऐ। तँए अखन धरि डरे किओ सुंघबो धरि नै केलकैए। कारण जे आब तँ साहेबसँ बेसी मुँहलगुएक डर होइ छै नै। ग्रीनहाउसमे कुकूर दिसम्बरक अन्त। आइ ४८ डिग्री तापमान होएबाक सम्भावना अछि। कृपया अपन माथपर बरफ लपेटि लेल जाउ। किएक तँ भुस्सामे शीघ्रहि आगि पकड़बाक सम्भावना रहै छै। जेना माटिकेँ माटि खाइत अछि, लोहाकेँ लोहा कटैत अछि। माहुरकेँ माहुर, हीराकेँ हीरा आ सोनाकेँ सोना कटैत अछि। तँए अहाँकेँ कुकूर कटैत अछि। ऋषि वशिष्ठ प्रमाण-पत्र बड्ड भारी समारोहक आयोजन कएल गेलै। जिलाक बड़का-बड़का पदाधिकारीक जुटान गाममे भेल छलै। जिलाधिकारी तँ जिलाक नेतागण। भाषण-भूषण खतम भेलै तँ जिला शिक्षा अधीक्षक गामक मुखिया दिस एकटा कागज बढ़बैत बजलाह-“ मुखियाजी अपने ऐ पर दस्तखत कऽ दियौ, अहाँक पंचायत पूर्ण साक्षर भऽ गेल, तकरा लेल ई प्रमाणपत्र अछि।” मुखियाजी सकुचाइत बजलाह- “मुदा हम तँ औंठा छाप देब, हमरा तँ दस्तखत करए नै अबैए? ” अधीक्षक एम्हर-ओम्हर तकलनि आ बाजि उठलाह- हौउ, औंठो चलतै! कनेक जल्दी करू।” मुखियाजी कजरौटामे औंठा रगड़ि कऽ निशान लगौलनि। ओ औंठाकेँ माथक केशमे पोछैत बजलाह- “अहोभाग्य हमर आ हमरा पंचायतक।” अधीक्षक मंचपर गरजैत घोषणा केलनि-“गर्वक संग घोषित कऽ रहल छी जे अहाँक पंचायत संपूर्ण साक्षर भऽ गेल।” मुखियाजी खन ओइ प्रमाणपत्र दिस तकैत छथि खन अपन करियाओल औंठा दिस। मनमौजी महादेव मंदिरक आगाँ कनैल फूलक गाछतर गँजेरी, भंगेरी आ तरिपिब्बा आपसमे बहस करैत छल। गँजेरीक कहब छलै जे- “शेर अंडा दै छै।” तरिपिब्बाक कहब छलै जे- “शेर बच्चा दै छै।” बात बढ़ैत गेलै आ बातसँ बतंगर भऽ गेलै। विवाद बढ़िकऽ हाथापाहीक नौबत आबि गेलै। जखन भंगेरीकेँ दुनूक कटाउझ असहाज भऽ गेलै तँ ओ बाजि उठल- “तोँ दुनू अनेरे लड़ै छह। ..हौ एतबो नै बुझै छहक जे शेर जंगलक राजा होइ छै, ओकरा लेल कोन छै? जखन मोन हेतै तँ अंडा देतै आ जखन मोन हेतै तँ बच्चा देतै। जखन मोन हेतै तँ शाकाहारी बनतै आ जखन मोन हेतै तँ काँचे माउस चिबेतै।” तरिपिब्बाकेँ जेना भक्क टुटलै। ओ बाजि उठल- “जा, से केना हेतै हौ! बच्चा तँ देतै शेरनी। शेर केना बच्चा देतै?” भंगेरी बिहुँसैत बाजल- “धुर बतहा, एतबो नै बुझै छही जे ओ भेलै सरकार! आ सरकार कोन!..ओकर अपन मनमौजी छै, जे चाहतै से करतै।” शिव कुमार झा “टिल्लू” फूसि नै बाजू आंगनमे राखल चौकीपर शंकर शान्त बैसल छल। माए आबि कऽ पुछलनि- “की भेल, किए उदास छी”? शंकर कानए लागल- “कृष्णचन्द्र भैया जखन देखैत छथि तँ कहैत छथि जे फूसि नै बाजू। एना किए कहै छथि?” शंकर कथा सुनबए लागल। टोलक किछु नेना क्रिकेट खेलबाक लेल गाछी गेल छल। विकेट नै रहए तँए कैलाश कक्काक राहड़िक खेतसँ रंजीत किछु राहड़िक मोटगर गाछकेँ उखाड़ि विकेट बनौलक। क्षणहिमे कैलाश कक्का गाछी दऽ कऽ जाइत छलाह। अपन खेतक दशा देखि सभसँ पुछलनि जे राहड़िकेँ के उखाड़लक? कियो नै बाजल। ओइ दिन साँझमे पंचैती बैसाओल गेल। रंजीतकेँ पता छल जे मास्टर साहेब मात्र हमरेटासँ पुछताह। तँए हमरा धमकी देलक- जौँ हमर नाओं कहबेँ तँ मारबौ, ललवाकेँ फँसा दही। हमहूँ डरक मारे ललवाक नाओँ बकि देलौं। ओकर बड़का भाए कृष्णचन्द्र भैया ओकरा बड़ माइर मारलनि। जखन ओ सत्यकेँ बुझलनि, तखनसँ खिसिआएल रहथि। शंकरक व्यथा सुनि माए अवाक रहि गेली।–“अहाँ बड़ पैघ गलती कएलौं। लाला अहाँक प्रिय मित्र छथि, जाउ आ हुनकासँ माफी माँगि लिअ। भविष्यमे एहेन गलती नै करब। जइ व्यक्तिसँ डर होइत अछि ओकरा संग मित्रता किए करै छी? निर्दोषक आत्मापर चोट नै पहुँचेबाक चाही। प्रण करू जे सदिखन सत्य बाजब, जौँ कतौ समस्या हुअए तँ चुप्प रहि जाएब मुदा झूठ नै बाजब।“ माएक प्रेरणासँ शंकर सत्य हरिश्चन्द्र तँ नै भऽ सकल मुदा ओहेन झूठ नै बजैत अछि जइसँ ककरो आत्माकेँ दुःख पहुँचए वा सत्य कलंकित हुअए। मिथिलेश कुमार झा झीक “अँए गे माए, पोखरिभीरावालीक मुँह आइ भोरेसँ लटकल देखै छिऐ। की भेलैए? ” “गइ हेतै की! आइ कए दिनसँ साँएक फोन नै एलैए ने, तँए ।...गइ हम सुन्दरकान्तक माए छिऐ से किच्छु नै आ एकरा माइले फटै छै। ओ एकोरत्ती गुदानै छै नहिए।...एकटा बेटी भेला छः साल भऽ गेलै आ तकरा बाद जेना कोखिए जरि गेलै। कथीपर गुदान्ता करौ! गइ ओकर तँ वंशे बुरएपर लागल छै।” माए बेटीक फदका कनियाँ सुनलनि तँ कोंढ़ फाटि गेलनि। घरसँ बहरा सासु-ननदिक मुँहमे झीक दैत बजली- “हे, एम्हर कियो बाँझ नै छै। बेटाकेँ थितगर नोकरी नै छन्हि तँए भेल जे एकेटाकेँ जौं मनुख बना सकी तँ सएह बहुत। आ वंश बुरए क बात करै छथि, जौं मनुख नै भेल तँ बेटोसँ वंश बुरि जाइ छै आ बेटी लछमी हुअय तँ आनो गाँ मे वंशक नाँ चलै छै, बुझलखिन! ” सत्येन्द्र कुमार झा लेटेस्ट एकटा इलेक्ट्रॉनिकक नव दोकान। मध्य आय वर्गक एकटा व्यक्ति दोकानमे प्रवेश करैत अछि। कतेक दिनसँ कनी-कनी पाइ जमा कऽ मोबाइल किनबाक हेतु आएल अछि। दोकानदारसँ सभसँ “लेटेस्ट” मोबाइल किनलक। पाइ दऽ कऽ मोबाइल लेने अति उत्साहक संग बिदा भइये रहल छल कि एकटा दोसर ग्राहक दोकानमे प्रवेश करैत अछि। ओ सेहो दोकानदारसँ “लेटेस्ट” मोबाइल देखेबाक फरमाइश करैत अछि। दोकानदार कार्टूनमे सँ एकटा मोबाइल निकालि सोझाँ राखि दैत अछि। पहिल व्यक्ति देखैत अछि- “ई तँ हमरबला मोबाइल नै अछि।” ओ दोकानदारसँ जिज्ञासा करैत अछि। दोकानदार कहैत अछि- “ई सेट अखनहि उतरल अछि...अहाँक किनलाक बाद...।” ओ अपन मोबाइल दिस तकैत अछि। ओकरा अपन मोबाइल पुरान सन लगैत छैक। कोनमे राखल “लैण्ड फोन”क चोंगा भभाकऽ हँसऽ लागल छल। नवनीत कुमार झा गाम आबह प्रमोद कोनो जरूरी काजमे लागल छलाह। मूड़ी गोतने लीखि रहल छलाह। भीतरसँ कनियाँ कहलखिन- सुनै छी, गामसँ बाबू फोन केने छलाह। कागज-पत्रकेँ समेटि आेइपर पेपरवेट राखि देलनि आ कनियाँसँ पुछलनि- की सभ कहि रहल छलाह। कनियाँ ठोड़े नाक-भौंह चमकबैत कहलखिन- कहता की, कहलनि जे कनियाँ, बौआकेँ कने गाम एबाक लेल कहबनि। प्रमोद कने तमसाएल जकाँ होइत भनभनाए लगलाह- ईह, एकटा हमहीं भेटै छियनि बूढ़ाकेँ, चारि बेटामे आर ककरो किछु नै कहथिन। आब अखन तँ हमरा फुर्सति नै अछि जे हम गाम जाएब। कनियाँ प्रमोदकेँ तमसाएल देखि प्रसंग बदलि देबाक लेल पुछलखिन- अच्छा छोड़ू ऐ प्रकरणकेँ, कॉफी पीब, बनाउ की? कनियाँ बड़ होशियारि छथिन। प्रमोदक उत्तर देबासँ पहिने ओ भनसाघर चलि गेलि आ कॉफी बनाबए मे लागि गेलि। कॉफीकेँ चुस्कियबैत प्रमोदक केशमे आंगुर चलबैत कनियाँ कहै छथिन- एकटा बात कहू, नै होइए तँ चलि ने जाउ गाम। जहियासँ ई छौंड़ी काज छोड़ि देलकए तहियासँ असगरे सभटा काज करैत-करैत हम अपस्याँत भेल रहै छी। घुरनी जँ तैयार भऽ जाए अएबाक लेल तँ ओकरो लऽ आनब आ नवका मूँग भेल हेतै, सभटा खेती-बाड़ी बाबू देखै छथिन, तखन हमरा सभकेँ चुटकी भरि किछुओ नै भेटैत अछि आ सझिला बौआ- छोटका बौआ सभटा अपने बाँटि-चुटि लै जाइ छथि। -ऐखन अप्पन बच्चा सबहक कैरियर देखू कि हम ई दियादी-पटेदारी फरियबैत रहू। प्रमोद ई कहि पुनः अपन काजमे व्यस्त भऽ गेलाह। प्रमोद गाम नै गेलाह। दू-तीन सप्ताह बीति गेलै। अचानके मंगल दिन साँझमे जटाशंकर भाय फोन केलखिन- -प्रमोद, तोहर बाबू नै रहलखुन! -ऐं! की भेलै, ऐना केना भेलै, अखन तँ थेहगरे छलाह। -तोरा किछु नै बुझल छउ, विनोद आ कामोद दुनू गोटे पन्द्रह-पन्द्रह दिनक पार बाँटि देने छलखिन। कक्का दुनू बेटा कोतए पन्द्रह-पन्द्रह दिन भोजन करै छलखिन। रवि दिन जखन ओ नहा कऽ एलखिन तँ हुनका ई मोन नै रहलनि जे आइ कामोद कोतए पार छन्हि। दुआरिपर बैसल कक्काकेँ विनोदक स्त्री कहलखिन जे बाबू आइ हिनकर पार कामोद बौआ आेइठाम छन्हि, ओतहि जाथु। कक्का के की भेलनि की नै ओ कामोदक आेइठाम नै गेलाह, माहुर खा कऽ हमेशाक लेल सूति रहला। खैर जे भेलै से भेलै, आब तोँ जल्दी गाम आबह, जेठ बेटा छहुन। कौशल कुमार दूमुँहा आइ मिथिलाक लोकक छाती गर्वसँ चौड़ा भऽ रहल छल आ सिया बाबूक चर्चा सुनि कऽ आओर हुनका ऊपर विमर्श करैत अह्लादित छल लोकक हृदए। सिया बाबू चर्चित समाज सेवक आ लोकसेवक छथि, आइसँ दस बरख पहिने हुनका लग किछु नै रहनि मुदा आइ अपना जिला मुख्यालयक अलाबा पटना आ दिल्लीमे अपन कोठी छन्हि आ बेस जन समर्थन आओर राजनीतिक रुतबा सेहो। परसू रातिमे एकटा स्थानीय कागतक ठोंगा, झोरा आओर लिफाफ बनबएबला इकाइसँ ओ सत्रहटा बन्धुआ बाल मजदूरकेँ मुक्त करौलनि, तइ लेल मीडिया हुनकर डंका दू दिनसँ पीट रहल अछि। हमहूँ, हुनका अपन समाजसेवाक क्षेत्रमे आदर्श मानि कऽ काज करएबला, एकटा समाजसेवी छी आ नारी उत्थानपर एकटा कार्यक्रमक आयोजन कऽ रहल छी। कार्यक्रमक प्रधान अतिथि के बनता एकर विचार संगठनमे कऽ कए सिया बाबूकेँ प्रधान अतिथि बनबाक हेतु हुनका कोठीपर आग्रह कऽ आएल छी। झक्क-झक्क झलकैत कोठीकेँ सुनियोजित सलीकासँ सजाओल अतिथि कक्षमे गहींर नक्काशीदार मूर्ति सभ जकर प्रत्येक गह-गह झलकैत सियाबाबूक धवल व्यक्तित्व जेना प्रदर्शन कऽ रहल हो। हमरा पता लागल, सिया बाबू घरक सफाइ अपने हाथे करै छथि। ऐ सभमे हम ओझराएल रही कि सियाबाबू श्वेत दन्तराशिक मधुर मुखरित मुस्कानक संग पधारलनि। हम अपन कार्यक्रमक रूपरेखा बतबैत रहलियनि आ ओ शालीनतासँ सुनैत रहला। अही मध्य एकटा बच्चा जूसक दूटा गिलासक संग एकटा नक्काशीदार शीसाक जगमे पानि आ एकटा खाली गिलास सेहो एकटा ट्रेमे लऽ कऽ आएल। ओ हमरा सभकेँ जूस लै लेल कहलनि आ अपने पानि ढारि कऽ पीलनि। हम सभ गप्प करिते रही तावत फेर कने कालक बाद वएह बच्चा चुपचाप आएल आ सभ खाली गिलास आ जग ट्रेमे लऽ कऽ चलि गेल। कने कालक बाद झनाक दऽ एकटा अबाज भीतरसँ आओल, लागल जेना किछु शीसाक खसलै। सियाबाबू हमरा सभकेँ आश्वासन दऽ कऽ कने हड़बड़ीमे भीतर चलि गेला। हमहूँ अपना सेक्रेटरीकेँ, जे नेता चिपकू लोक छला, चलबाक लेल उद्यत केलौं। तावत एकटा जोरक चित्कार कानमे पड़ल जेना ककरो जिब्बह कएल जाइत हो। हमरा रहल नै गेल, बाहर जा कऽ जुत्ता पहिरैक बदला कने भीतर दिस हुल्की देलिऐ तँ सिया बाबूकेँ देखलौं जे ओही बच्चाक दुनू कान पकरने हवामे लटकौने जेना उखाड़ि लेथिन आओर आँखिमे बहशीपन रहनि जेना ओ हुनक सभसँ पैघ दुश्मन हो। ई दृश्य हमरा लेल असह्य छल, हम पाछाँ मुड़ि कऽ जल्दीसँ जुत्ता पहीर अतिथि कक्षक बाहर आबि किंकर्तव्यविमूढ़ ठाढ़ रही तावत सियाबाबू अपन ओही मुखरित मुस्कानक संग हाथमे स्मारिकाक लेल अपन पत्र लेने प्रकट भेला। हम सभ विदा लऽ बिदा भेलौं। कोठीसँ बाहर निकलबाक समए वएह बच्चाकेँ देखलौं जे हाथमे झोड़ा लेने सम्भवतः बजार जा रहल छल। चुँकि हमर चालि तीव्र छल तँए हम सभ ओकरासँ आगाँ निकलि गेलौं मुदा ओकरा दिस देखलौं तँ ओकरा गालपर छल पाँचो आंगुरक छाप आ गालपर नीपल नोर संगहि कान दुनू लगै छल जेना रक्तरंजित हो, ततेक लाल। हम क्षुब्ध रही, की ईएह दुमुँहा व्यक्तित्व हमर आदर्श अछि? प्रार्थना आ आस्था भगवतीक वंदनाचरण भऽ रहल छलनि, लोक सभ पूर्ण उत्साहसँ गाबि रहल छलथि, जिनका श्लोक मोन नै रहनि ओ गाबैक भाभट करैत मुँह चलबैत आ ठोर पटपटाबैत रहथि। अही भीड़मे एकटा चारि-पाँच वर्षक बच्चा सेहो आगाँमे ठाढ़ भेल कल जोड़ने पता नै कखन आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। जखन त्वमेव माता च पिता... हेबए लगलै तँ ओहो खूब जोर-जोरसँ संग देलकै, फेर ओकर बाद बेचाराकेँ चुप भऽ जाए पड़लै। सभ गबैत वा गाबैक ढोंग करैत मुदा ओ सबहक मुँह तकैत ठाढ़ रहल। कने कालमे वन्दना खत्म भेलै तँ ओ आरती लऽ कऽ आ प्रसाद लऽ कऽ हाथमे रखने रहल आ जखन भीड़ कम होमऽ लगलै तँ भगवतीक मूर्तिक आओर लगमे जा कऽ अ आ सँ लऽ कऽ य र ल व ज्ञ धरि पढ़ि देलकै आ हाथ महक प्रसाद प्रणाम कऽ कऽ कने खा लेलक आ कने मुट्ठीमे रखने बिदा भेल। ई सभ देखि पूजा-आयोजक-परिवारक एक गोट जे बढ़ि-चढ़ि कऽ स्तोत्र पाठ कऽ रहल छला, बच्चासँ व्यंग्ये पुछलखिन- ऐं रौ, भुटका त्वमेव माता च पिता... तँ तोँ बड्ड टहंकारमे कहलहीं आ ओकर बाद एसगरमे ई अ आ किए भगवतीकेँ पढ़बए लगलहुन? बच्चा कने डेराइत तोतराइत बाजल- हमरा इस्कूलमे त्वमेव माता...पढ़बै छथिन मास्साब... आ अ आ किए पढ़लहीं? सज्जन फेर चुटकी लेलखिन। तावत छटैत भीड़ फेरसँ उत्सुकतामे संगठित होमऽ लागल। ओ तँ ऐ लेल जे.. बच्चा साँस भरैत बाजल- भगवती अपने छ सभसँ नीक कविता बना लेतिन... लोक ठठा कऽ हँसल मुदा पुछनिहार झेप गेला- आ ई प्रसाद केकरा लेल लऽ जाइ छहक?- सज्जनकेँ अखनो उत्सुकता छलनि! -ओ हमल पिल्लाक माए मलि गेलैए, ओकला खुआ देबै तँ ओ जीब जेतै।- बच्चा बाजल आ ओम्हर दौग गेल जेम्हर ओकर पिल्लाक माए पड़ल छलै। सभ अवाक ओकरा देखैत रहल। अप्पन इज्जति भरल देहक पन्द्रह वर्षक नवयौवना कहियौ वा बच्चा? नवयौवना नीक लगै छै कहैयोमे आ सुनैयोमे, गाड़ी काकरघाटी स्टेशनपर रुकलै तँ हमरा बगलमे सीट खाली भेलै तँ रेलमपेल बोगीमे बैस गेल। जाड़क मास रहै मुदा शीतलहरीमे जैकेट-टोपीक बादो ठण्डा लगैत छल तँए हाथ छातीपर बन्हने गुड़मुड़ाएल बैसल रही। एकटा सीटपर सातगोटे बैसल रही तैयो कोनो असुविधा नै बुझा रहल छल कारण हाथ-पएर पसारैमे भले असुविधा रहै मुदा कने जाड़ तँ कम लगै छल। जखन ओ श्यामवर्ण नवयौवना गाँती बन्हने बगलमे बैसल तँ जेना करेँट लागल आ देहमे गर्मीक एकटा लहरि दौड़ि गेल। हम जे हाथ छातीपर बन्हने रही से ओकर कठिन उभारसँ सटि गेल। कने काल हम पूर्ववत रहलौं मुदा जखन लागल ओकरा कोनो आपत्ति नै छै तँ हम्मर हिम्मति बढ़ि गेल आ हम गाँतिक अढ़मे अपन हाथ ओकरा छातीपर फेरए लगलौं, तैयो ओ किछु नै बाजलि आ पूर्ववत रहलि तँ अप्पन हाथ ओकर ब्लाउजमे सन्हिया देलिऐ। समैक संगे हम्मर मोन आ हिम्मति बढ़ैत गेल मुदा ऐसँ बेसी किछु सम्भव नै छल तँए एतबे अति कऽ रहल छलौं तावत गाड़ी उगना हाल्टपर पहुँचि गेलै। एकटा प्रौढ़ जकाँ व्यक्ति तावत ओइ नवयौवनाक हाथ पकड़ि कऽ उठबए लगलखिन तँ ओ उठि गेलि, तँ दोसर व्यक्ति जे शाइत कने हुनकर परिचित रहथिन, पुछलखिन- इहे बच्चा छिऐ लछुआक? ओ प्रौढ़ हँमे मूड़ी डोला देलखिन आ गेट दिस नवयौवनाकेँ लऽ कऽ ससरए लगला भीड़मे। दोसर व्यक्ति रिक्त स्थानपर बैसैत हमरा चिन्हैत टोकलनि- की मास्टर साहेब? कतए सँ आबै छी? आब हमहूँ हुनका चिन्हलौं, ओ पण्डौलक रमेसर रहथि। उमेरक प्रभाव कने जल्दी हुनका लिबा देने रहनि। हम पुछलियनि- के रहै ओ बच्चा? आशय छल कहियो फेर मौका भेट सकए तँ! अखन हम पूर्ण आन्हर भेल छलौं। हमर पोस्टिंग लगेमे सलेमपुर स्कूलमे छल। -ओ लक्ष्मणक बेटी छलै, अहींक नानी गामक पुरहितक पोती। ओकरा स्कूलक नवका मास्टर ओकरा संगे केना ने केना फुसला कऽ जबर्दस्ती केलकै। तहियासँ मथसुन्न आ बौक छै। किछु नै बुझै छै आ ने बाजै छै। अहाँ सभ सन लोक खानदानी आनक बेटी-पुतोहु आ बच्चाकेँ अप्पन इज्जति बुझए बला लोक आब थोड़े रहलै माटसाब... रमेसर बजैत रहल मुदा हम्मर दिमाग सुन्न भेल जा रहल छल...। एक्केटा शब्द अहाँ सभ आनक बेटी-पुतोहुकेँ अप्पन इज्जति बुझै छिऐ...दिमागमे फेर-फेर घुमि रहल छल। अनमोल झा चेतना -गिरहत पाँच सए रुपैय्याक पाँच सए सूदि केना भेलै। -रौ बहिं! जे तोरा बाप-पुरखाकऽ कहियो साहस नै भेलै पुछैक से तूँ पूछै छेँ? -ओ दिन बिसरि जइयौ गिरहत! छह मासमे एतेक सूदि नै होइत छै। अबै छै दलुआ हम्मर स्कूलसँ तँ करत हिसाब! कुमार मनोज कश्यप, जन्म मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। बाल्य काले सँ लेखनमे अभिरुचि। कएक गोट रचना आकाशवाणीसँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालयमे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित। मरीचिका “हे हर, हमरहुँ करहु प्रतिपाल”- भवानीबाबूक मुँहसँ निकलल ऐ गीतक भावार्थ मुहल्लाक अबाल-वृद्ध प्रायः सभकेँ बुझल छलै। एते तक कि नेनो-भुटको सभ बूझि जाइत छल जे भवानीबाबू आब भोजनक प्रतीक्षा कय रहलाह अछि। भवानीबाबू जिला परिषदक सेवा-निवृत बड़ा बाबू। सस्ती जमानामे भवानीबाबू एक-एक टा रुपैया जमा कऽ कऽ शहरमे जमीन खरीद लेलनि। मुदा घर टा बनि सकलनि सेवा-निवृतिक बादे। सेवा-निवृतिपर भेटल सभ पाइकेँ लगा कऽ बनलनि चारि कोठलीक पक्का-पुख्ता मकान। जहिया मकान बनि कऽ पूरा तैयार भऽ गेलनि तहिया भवानीबाबू बाहर ठाढ़ भऽ कऽ बड़ी काल तक जोहैत रहलाह ओइ मकानकेँ। जतबा खुशी शाहजहाँकेँ ताजमहल बनबा कऽ नै भेल हेतैक, ओइसँ कएक गुण आत्मिक खुशी भवानीबाबू केँ भेट रहल छलनि अपन मकान केँ देखि कऽ । हाथक सभ पाइ खतम भऽ जेबाक सेहो आइ कोनो दुख नै बुझा रहल छलनि हुनका। दुख भेलनि तँ बस एतबे जे कनियाँ ऐ मकानकेँ देखबा लेल नै रहि सकलखिन। चारु कोठली दुनू बेटामे आपसमे बँटा गेल- दू टा कोठली दुनू बेटा-पुतोहुकेँ आ दू टा पोता-पोती लेल। पूजा, स्टोर,पाहुन-परख ऐ सभ लेल घरक कमी रहिये गेल। आब भवानीबाबू कतए जाथु? अंतमे दुनू बेटा-पुतोहु सर्व-सम्मतिसँ निर्णय कऽ कऽ हुनका आश्रय देलकनि बालकनीक एकटा कोनमे। कनियाँ तँ पहिनहि स्वर्गवासी भऽ चुकल रहथिन। भवानीबाबू अपने बनाओल घरमे आन बनि बालकनीक एक कोनमे टुटलहवा चौकीपर समए काटए लगलाह। हद तँ तखन भऽ गेल जखन एक दिन भवानीबाबूक पेट सेहो बँटा गेलनि, एक महिना जेठका बेटाक घर सँ तँ दोसर महिना छोटका बेटा घरसँ। आइ भवानीबाबू बड़ी काल धरि नहा-धो कऽ बैसल गीत गबैत रहि गेलाह- बीच-बीचमे नजरि याचक भावसँ दुनू भाँइक भनसा घर दिस सेहो बेरा-बारीसँ जाइत रहल। गीत अंतरा धरि पहुँचि गेल। स्वर मद्धिम पड़ऽ लागल- उदास- थाकल- हारल- हे हर, हमरहुँ करहु प्रतिपाल़़। परजा बड़का भैयाक दलान, दलान नै गामक चौक बुझू़। देश-दुनियाँ, खेत-पथार, नीति-राजनीति सभपर गर्मागरम बहस एतए सुनबा लेल भेटत। चुनावक समैमे कोनो आन टॉपिकपर बहस हुअय से कने अनसोहाँत हएत। सभ जुटल लोक चुनावक एक-एक मुद्दापर तेना बिक्षा-बिक्षा कऽ खोंइछा छोड़ा रहल छला जे कोनो सेफोलोजिस्ट टी. वी.पर की करताह। बौबू-बाबूक कहब रहनि जे ऐबेर सत्ता परिवर्तन हेबे टा करत। सभ सत्तारूढ सरकार सँ नाखुश अछि, तकर औल ओ सभ ऐबेर चुकेबे करतनि। ऐपर नन्हवू बमकैत बाजल- कक्का अहाँ कतए छी! लोकक आँखि बट्टम नै छिऐ जे चहुँकात होइत विकास केँ नै देखतै। अपने गाममे देखियौ ने जे कतेककेँ सरकार पक्का मकान बना देलकै, क़तेक कऽल गड़ा गेलै़, गामक लेल रोडो तँ सैंक्शन भइये गेल अछि। बौवूबाबू प्रतिवाद केलनि-- कोन घर आ कऽलक बात करैत छह? जा कऽ ओकरा सभसँ पुछहक गऽ ने जे कतेक जोड़ी पनही खिया कऽ आ कतेक घूस दऽ कऽ घर आ कऽल भेलैए? फेर बजलाह- हौ ई सरकार पाँच साल तक जनताकेँ मुर्ख बना कऽ अपन धोधि बढ़बैत रहल। भल होअय जँ लोक ऐ चोरबा सभक जमानत जब्त करा दिअय ऐबेर। ई वाद-प्रतिवाद चलिये रहल छल कि मखना बिचहिमे बाजल- यौ मालिक! अहाँ आउर कथीले बेकारेमे बतकटाझु करै जाइ छी। हमर मुर्खाहा बुइध तँ एतबे बुझैत अछि जे कियो जीतए, कियो हारए, हम सभ तँ परजा छी, परजे रहब। दलानपर कनी कालले चुप्पी पसरि गेल छलै। बदलैत समए आइसँ दस वर्ष पहिने जखन ऑफीससँ घर घुमैत छलौं तँ हमर नवका कुक्कुर भुकि कऽ आ नवकी कनियाँ गऽर लागि कऽ हमर स्वागत करै छली। आब काल करोट फेरि चुकल अछि, हमर पोसुआ कुक्कुर आ कनियाँ दुनू अपन आदति अदला-बदली कऽ लेलनि। आब घर आबिते हमर कनियाँ हमरापर भुकि कऽ आ हमर पोसुआ कुक्कुर हमर गऽर लागि कऽ हमर स्वागत करैत अछि। समए एहिना बदलै छै। जरल पेट जेठक प्रचंड दुपहरियामे जखन छाँहों छाँह तकैत छै, घामसँ लथपथ चिप्पी लागल मैल पढ़िया नुआ, जे ओकर लाजकेँ झँपबामे मुश्किलसँ समर्थ भऽ रहल छलैक, पहिरने एकटा स्त्री कोरमे एकटा दू-तीन बरखक नेनाकेँ लऽ कऽ हमरा सोझाँ ठाढ़ भऽ जाइत अछि। किताबपर सँ हमर नजरि ओकरा दिस जाइत अछि। ओ स्त्री हमरासँ याचना करैत अछि, किछु खेबा लेल देबाक। कहैत अछि, जे काल्हि रातिये सँ ओकरा दुनू माए-बेटाक मुँहमे अन्नक एकोटा दाना नै गेलैक अछि। हमरा दया आबि जाइत अछि ओकरापर। आँगन जा कऽ माएकेँ कहैत छिऐ। माए भनसा घरमे जा कऽ देखैत अछि- पोछि-पाछि कऽ दू मुट्ठी भात भेलै, कनेके दालि बाँचल छै। तरकारी तँ बचबे ने केलै। कतए छै ओ? कहीं जे बारीसँ केराक दू टुक पात काटि अनतै। अपना बासनमे तँ नै देबै खाय लेल। ओ स्त्री केराक पात लऽ कऽ दुरूक्खामे छाँहमे बैस गेल। माए भात आ दालि ओकरा आगूमे परसि देलकै। हमर आग्रहपर कनेक आमक कुच्चो दऽ देने छलै। ओ स्त्री अपन नेनाकेँ अपना हाथसँ खुआइये रहल छलै तैयो ओ अनभरोस नेना अपने दुनू हाथ लगा कऽ भकोसए लागल रहै। तखने ओ स्त्री अपन बामा हाथसँ नेनाकेँ दुनू हाथ पकड़ि कऽ कात कऽ देलकै आ अपने पैघ-पैघ कौर गीड़य लगलै। नेना भुइयाँमे ओंघरिया मरैत रहलै । जीतक आगू छहरिमे कनेक तँ कटारि भेलै कि देखिते- देखिते सौंसे गाम दहा गेलै। छातीसँ उपर पानि ठेकि गेलै आर बढ़िते जा रहल छलै। लोक वस्तु-जात जे समेटि सकल से समेटलक, नै तँ जान बचा कऽ पड़ाएल। दस-पाँच टा लोक जकरा कोठा छलै से तँ छतपर जा कऽ प्राण बचेलक। भुखनाकेँ पड़ेबाक कोनो रस्ता नै सुझलै तँ अपन भीत घरक चारपर चढ़ि गेल। पानिक ओइ मारुक लहरिमे भीतक घर कतेक काल ठठितै, अरड़ा कऽ खसि पड़लै। चारपर बैसल भुखना आब पानिक हिलकोरमे ऊब-डुब करैत भसियाएल जा रहल छल। हाकरोस कऽ कऽ लोक सभसँ नेहोरा करैत रहलै बचेबा लेल। सभकेँ तँ अपन जान कऽ पड़ल छलै, ओकरा के बचाबओ? जीवन-मरनक बीच झुलैत भुखना चारकेँ कसिया कऽ पकड़ने भासल जा रहल छल। ओ जीवन हारिये देने छल कि चार एकटा पैघ नीमक गाछसँ टकरा कऽ कनेक काल लेल विलमलै। ओ फुर्तिसँ भरि पाँज कसिया कऽ गाछकेँ पकड़ि लेलक। चार फेरसँ ओहिना भसियाइत चलि जाइत रहलै। ओ अपना शरीरमे बल अनलक आ पिछड़ैत-चढ़ैत गाछपर चढ़िये गेल। गाछक एक फेड़पर पएर राखि कऽ दोसर सँ अड़कि कऽ उसास छोड़लक, लगलै जेना पुनर्जन्म भेल होइ ओकर। गाछपर ठाढ़ ओ बाढ़िक लीला देखैत रहल। ओहिना ठाढ़े-ठाढ़ कखन ओकर आँखि लागि गेलै से अपनो नै बुझलक ओ। भोरमे जखन सुरूजक लाली छिटकलै आ फरीछ भेलै तँ ओकर आँखि खुजलै। चारू कात तकलक ओ। सगरो पानिये-पानि़। कतहु कतौ दूर- दूरमे कोनो टा गाछ किंवा कोनो कोठाक घरक आधा भाग टा मात्र देखबामे एलै। अंगैठी-मोर करैत ओ अपन माथक उपर तकलक। तकिते घिघियाय लागल। साक्षात यमराजकेँ अपना माथक ऊपर देखलक ओ। एकटा कारी-भुजुंग सुच्चा गहुमन सँाप उपरका डारिमे लपटाएल। एकबेर मृत्युक मुँहमे जेबासँ बाँचल तँ दोसर मृत्यु लगमे ठाढ़। गहुमनक डँसल तँ पानियो नै मंगैत छै। ओकरा आँखिक आगू अन्हार होमय लगलै। आब ओकर प्राण जेबामे कोनो टा भाँगठ नै। आँखि मुनि लेलक ओ आ आसन्न मृत्युक प्रतीक्षा करए लागल। कि एकबेर फेर कतौसँ हिम्मत जगलै ओकरामे। नहुँए-नहुँए ओ दोसर डरिपर आबि गेल़। गाछक एकटा डारि तोड़लक आ समधानि कऽ गहुमनक माथपर दऽ मारलक। निशान सटीक रहलै। सँाप अचेत भऽ कऽ पानिमे खसि पड़लै आ धारक संग बहि गेलै। भुखना विजयी भावसँ चारू कात तकलक। ओकर वीरता देखैबला ओतए के छलै ? विनीत उत्पल, 1978- आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बी.एस.सी. (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक। "हम पुछैत छी" कविता संग्रह प्रकाशित। “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास, लेखक उद्य प्रकाश)क मैथिलीमे अनुवाद। श्री गुरुवै नम: गुरुर्ब्रह्मा, गुरु र्विष्णु, गुरु र्देवो महेश्वर:। गुरु साक्षात परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवै नम:। नेनासँ ई श्लोक मास्टरजी लेल सुनैत रही। हमरो एहने मास्टर साहब भेटल जे कहैत छलाह, खूब पढ़ू। पढ़हिक संग अपन जीवनमे सेहो ईमानदार रहू। ईमानदार रहबै तँ शुरूमे दिक्कत हएत, मुदा बादमे एकर गर्व महसूस करब। समाजमे इज्जत भेटत। झूठ नै बाजू। अपन बातपर रहू। जुबानक पक्का रहू। संगे-संग भगवान रामक कथा सेहो बतौलथिन जे -रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाय पर वचन न जाई- आ राजा हरिश्चंद्रक कथा सेहो क्लासक बाद सुनाबैत रहए। एते सालसँ ई सभ गप सुनैत आ पिताकेँ ऐ मार्गपर देखैत हमरोमे ई सभ गुण आबि गेल। ईमानदार रहलौं तँ क्लासमे फर्स्ट करैत रही। नीक स्कूल-कॉलेजमे एडिमिशन सेहो भऽ गेल। पढ़ाइ खत्म केलाक बाद नीक सन नौकरियो भेट गेल। गामसँ दिल्ली आबि गेलौं। दिल्ली बला भऽ गेलौं मुदा बेइमान नै भऽ सकलौं, जकरा लेल दिल्ली जानल जाइत अछि। तइसँ दिल्ली लेल लोक कहैत अछि, -बिनु दिल के अछि दिल्ली। संजोगसँ मास्टर लड़कीसँ बिआह भेल। गाममे रही। सोचहि लागलौं, की करी, कनियाकेँ नौकरी कराबी कि नै। एक दिन मचानपर गामक लोक लग बैसल रही। तखने इलाकामे प्रतििष्ठत ५५ सालक मास्टरजी शंकरदेव एलाह। गप-ठहाक्काक बीच कनियाँक नौकरीक गप आएल। ओ सलाह देलखिन, एँ यौ, कनियाकेँ किए नौकरी छोड़ाएब? देखैत नै छिऐ मुखियाक पुतोहुकेँ। ओ कहाँ कहियो स्कूल जाइत छै। मुखिया अप्पन पुतोहुक बदलामे एकटा मौगीकेँ राखि देने छै। ओ गरीब अछि। ओकरा मुखिया दू हजार टका दैत अछि। ऐ कलयुगमे कियो एकरा देखनियार अछि? ईमानदारीक जमाना नै अछि आब। एकरासँ ओइ गरीबक कल्याण भऽ जाइत अछि आ काजो भऽ जाइत अछि। अहूँ किए नै ओहिना कोनो गरीबक कल्याण कऽ दै छी? ई गप सुनि कऽ लागल जेना हमरा सौंसे देह काठि माड़ि देलक। हमरा अपना मास्टरजीक कहल आ पिताक आचार-विचार आँखिक आगू घूरय लागल। डॉ. धनाकर ठाकुर हमरा एकर एक बायोडाटा चाही यद्यपि बौआ झा व्यस्त छलथि ओ निर्णय लेने छलथि जे आइ ओ प्रोफेसर प्रसादक डेरा तकिये कऽ रहता। ओहुना सारि शारदा कहने छलथिन जे हुनक सखी उमा, जे गोल्ड मेडलिस्ट छलखिन पिताक विषय भौतिकीमे, से ने तँ नौकरी केल्खिन्ह ने बियाहे। बौआ झा हर साल रेडियो स्टेशन दिस हुनक पूर्ण डेरा ताकैले जाथि मुदा हड़बड़ीमे वापस पटना चली जाइ छला। अहू साल गेला मुदा कोनो थाह पता नै। ओ एक उमेरगर लोक लग गेलाह जे सड़क कात ठाढ़ छलाह। "यौ, अहाँ प्रोफेसर प्रसादक डेरा बताएब?" "कोन प्रसाद, एतए तँ तीन- तीन प्रसाद छथि- गणितबला, दबाइबला की किताबबला?" "अहाँकेँ की कहू , ओ तँ पैघ विद्वान छलथि जिनक किताब हमर पिताजी छपैत छलखिन।" "तँ अहाँक पिताजी छापाखाना बला।" "सएह बुझू।" "देखू, एक भलमानुष किताबबला प्रसादक खोजमे कियो कियो प्रोफेसर अबैत रहैत अछि- बड़का-बड़का प्रोफेसर।" "हँ यौ वएह, हुनके तँ हम तकैत छी।" "अहाँ चलि जाउ, ओही बड़का पोखरी कात जतए कोणपर एक मकान होएत।" बौआ झा परेशान, पोखरिक हर कोनपर मकान। मुदा आइ ओ ताकिये कऽ रहताह। फेर एक आदमी- मकान नै फ्लैट कहने हएत- चलि जाउ सीधा एक किलोमीटर। ओतएसँ दहिनामे एक फ्लैटमे एक बूढ़ प्रोफेसर जरूर अछि, जकर एक बिनु बिआहल बेटी छै, सेवा करै छै माए बापक, बेटा पुतोहु अमेरिकामे।" बौआ झा जा कऽ निचला फ्लैटक घंटी बजेलाह। एक महिला निकललीह जे हुनका सारि जकाँ बुझेलीह। "केकरासँ भेँट करक अछि?" "तोहर पिताजीसँ।" "अहाँक की नाओं?" "नै बताएब- हुनके बताएब।" "बताउ ने, हमहूँ पी एच डी छी। " "से जरूर हएब, पैघ प्रोफेसरक बेटी। " "अहाँक की नाओं?" ताबत हुनक माए निकललीह- "देखू माँ, ई अपन नामो नै बतबैत छथि आ तुम-ताम करैत छथि। " "जरूर कियो लगके छथुन्ह। " "बताउ अपन परिचय?" "प्रोफेसरहिकेँ बतेबन्हि।" "की बात- की होइत अछि?" प्रोफेसर निकललाह। " अहाँ के?" "चिन्हू" "नै चिन्हलौं।" "चिन्हू, हम वएह जे १० बरख पहिने तक हर साल रेडियो स्टेशनबला डेरा अबैत छलौं, सालमे एकबेर।" "हम बूढ़ भेलौं, माफ करू नै चिन्हलौं।" "मुदा हम नै बताएब, नै चिन्हब तँ हम एहिना चलि जाएब।" "बोली तँ सुनल लागैत अछि.. .. ओ अहाँ झाजीक बेटा।" "हँ।" उमाक माइ सेहो चिन्हलनि: "झाजीक बेटा, तूँ, तोहर पिताक उपकार हम सभ नै बिसरबौ, ...तोरा नै चिन्हलिऔ।" "कोन उपकार, ओ तँ कहियो किछु नै कहलाह.. हुनक मरनो आब १२ साल भेल।" प्रोफेसर- “ओ बाजएबला नै छलाह किछु।" उमाक माँ- "जखन प्रसादजी इंग्लैंड छलाह, हमरा सभकेँ कियो देखनिहार नै, चिट्ठी देलियनि तँ ओ झाजीकेँ लिखलनि आ झाजी आबि कऽ चालीस हजार रूपया दऽ गेलाह आ हमरा कहलाह जे हुनको नै कहबन्हि, ई रूपया हुनक किताबक रोयाल्टीमे धीरे-धीरे चुकि जेतैक वा फेर ओ दोसरो किताब लिख देताह। प्रोफेसर- "जौं आेइमे हमरा आर देबाक हो तँ कहू, हम अपन बता कऽ लिखबैक वा पेंसन सिक्स्थ पे रिविजन भेलापर पठबा देब।" बौआ झा- "नै यौ, हमरा तँ बाबूजी किछु नै कहलाह कहियो। अहाँ तँ विद्वान छी, हमर पिता तँ अनेक समांगकेँ लेखक बनबा देलथि लिखबा लिखबाकऽ। हुनके नाओंपर तँ हमहूँ सभ जिबैत छी। हम तँ अहाँक दर्शन लेल आएल छलौं, ओना उमा जँ अहाँक पोथीकेँ रिवाइज कऽ देती तँ फेर हम छापि देब आ ओहो चलैत रहत। आ एक कातमे जा कऽ उमाक माँकेँ कहलखिन - "हमरा एकर एक बायोडाटा चाही"। "किएक? "नै बताएब" बूझि गेलौं। उमा ऐ बीच घसकि गेल, जल्दी दोसर कमरामे अपन कएल शीऊथिकेँ शीसामे देखैत आ सोचैत- हमर वृद्ध माता-पिताकेँ के देखतन्हि, जइ लेल हम लक्ष्मीक कहलो उत्तर लेक्चररशिप छोडि देलौं? आशीष अनचिन्हार, मैथिलीक पहिल बहरयुक्त गजल संग्रह “अनचिन्हार आखर” प्रकाशित।
नर्क "हे रौ, खा ले पूरा। ऐंठ नै छोड़।" " ऊँ...ऊँह......नै आब नै खाएल हेतौ हमरासँ। पेट भरि गेलै। " " हे देखही, ऊपरसँ भगवान देखै छथन्हि जे लोक जतेक बेर ऐंठ फेकै छै तकरा नर्कमे जाए पड़ै छै आ ओइठाँ ओकरा ओतेक दिन भूखल रहए पड़ै छै। " " नै हमरा भूख नै छौ ।" आ माए ओही छीपीमे अपनो हिस्सा लऽ खाए लागैए। बच्चा तव जबान भेलै, हिस्सक वएह मुदा बहन्ना दोसर------ " छोड़ भगवान-तगवानकेँ। ओ कोनो देखै छै। सभ झुट्ठे छै ।" आ पिज्जा भरल पेटसँ आधे थारी खा उठि जाइत अछि। कालक्रमे जबान बूढ़ भेल। बेटा-पुतहु बाहरे। खाली अपने आ बुढ़िया घरपर। जहिया बुढ़िया बेमार पड़ै तहिया उपासे सन लागै। ओना कहिओ काल देआद सभ सेवा कऽ दै मुदा ओहो सभ तेरहे -बाइस। आ उपासे सन एकटा साँझमे बूढ़ाकेँ पड़ोसिया घरसँ सुनाइ पड़लन्हि "हे देखहीं। उपरसँ भगवान देखै छथिन्ह जे लोक जतेक बेर ऐंठ फेकै छै तकरा नर्कमे जाए पड़ैत छै आ ओइठाँ ओकरा ओतेक दिन भूखल रहए पड़ैत छै। " आ की ई सुनिते बुढ़बाक रोंआ ठाढ़ भऽ गेलै। मोन पड़ि गेलै ओकरा अपन माएक गप्प। ठीक इएह तँ कहै छलै। आ सिहरैत-सिहरैत बूढ़ा अपन वर्तमानमे आबि गेलाह आ हिसाब लगाबए लगलाह जे ओ कते दिन कतेक बेर ऐंठ छोड़ने छथि। निशान
हाथमे माइक, गरामे फूलक माला, आँखिमे तेज, वाणीमे जोश। नेता जी मंच पर ठाढ़ भए कए धूआँधार भाषण दए रहल छलाह---- खाली एकबेर हमरा जितएबाक कष्ट करु, हम समस्त जनताक कष्ट केँ अपन कष्ट बुझब। भ्रष्टाचारकेँ मेटा देबै। गुंडा-लफंगाक नामो-निशान खत्म कए देबैक------- ऐ अंतिम आश्वासन केँ खत्म होइतहि श्रोतामे सँ कियो चिचिआ उठल-------
नेता जी जखन अहाँ गुंडा-लफंगाक नामो-निशान मेटा देबैक तँ अहाँक निशान कतए रहत। आ नेता जी गप्प केँ जानि-बूझि अनठा कए मंचसँ उतरि विदा भए गेलाह। लक्ष्मी परिछन--- भगवती गीत--- हास-परिहासक गीत। बच्चा सभ अनेरो औना रहल छल। दरवज्जापर धमगज्जर मचल। तुमुल हास-ध्वनि। नाना प्रकारक गप्प-सरक्का। वरक बाप कन्याक बापसँ कहलथिन्ह--- " आह बूझि लिअ समधि जे हमरा घरमे लक्ष्मी देलहुँ अहाँ-- । कन्याक बाप कहलखिन्ह "हँ से तँ ठीके" आ कहिते आँखि झुकि गेलन्हि आ मोने-मोन बजलथि--"एखन तँ लाखक-लाख टका संगमे अनलीहए ने, लक्ष्मी तँ बुझेबे करतीह। जखन खत्म भए जाएत तखन इएह लक्ष्मी कुलच्छनी बनि जाएत।" (मुन्ना जीकेँ समर्पित) अंतर किछु बर्खक पछाति मैरिज सेरेमनीक शुभ अर्धनिशाभाग रातिमे बर अपन कनियाँसँ पुछलखिन्ह----- कहू तँ हमर सासुर आ अहाँक सासुरमे की अंतर भेटल ? कनियाँ औंघाएल मुदा चोटाएल स्वरे कहलखिन्ह-- "इएह जे अहाँ अपन सासुरमे मालिक रहैत छी आ हम अपन सासुरमे बहिकिरनी।" (मुन्ना जीकेँ समर्पित) सतीश चन्द्र झा नोकरी पिताक आकस्मिक निधन रमेशक मोनमे एकटा नव आशाक किरण जगा रहल छलै। दुखी तँ छल मुदा भविष्यक आशामे एकटा पूर्णताक सेहो अनुभव भऽ रहल छलै। एकटा बेरोजगार व्यक्ति थाकि हारि कऽ बैसल पिताक नौकरीपर पूर्णतः आश्रित छल मुदा भगवानक इच्छा, पिता सरकारी नोकरीमे रहिते प्रस्थान केलनि आ रमेशकेँ अनुकंपापर नोकरी भेट गेलनि। हुनका बैसलमे सरकारी नोकरीक तगमा भेट गेलनि। दू बेकती अपने एकटा नेन्ना एकटा छोट भाय आ एकटा बहिन संगहि समैसँ पहिने बृद्ध होइत हुनक माता। माएक भीजल आँखिमे किछु संतोषक आभा प्रवेश कएलक। परिवार चलब आब फेर कठिन नै रहत। पिताक बदला ज्येष्ठ पुत्र अपन कर्तव्यक परिवहन अवश्य करताह तकर पूर्ण विश्वास। मुदा आठ दस मास बितिते परिवारक संपूर्ण चित्र अस्पष्ट होमय लागल। जीवनक समटल गतिमे व्यवधानक बसात प्रवेश करए लागल। घर खर्च, छोट बेटाक पढ़बाक खर्च, दोकान दौरीक खगता सभटा अपूर्ण रहय लागल। क्षणिक आएल हर्षमे एकटा फेर व्यवधान। एकदिन माएक सहनशक्ति टूटि गेलनि तँ रमेश के कहलथि, बौआ एना किअए भऽ रहल अछि, बाबू जाधरि छला सबहक आवश्यकता पुरौलथि मुदा अहाँ नोकरी करितो सभटा पाइ कौड़ी की करै छी से किछु नै बूझि पबै छी। माए! तँू की बुझबिही! आब पहिलका समए नै छै। पाइ कौड़ीक कोनो मोल नै छै। झण दऽ खर्च भऽ जाइ छै। ओना तोरो लग तँ बाबूक भविष्यनिधि आ एल. आइ. सी. आदिक पाइ तँ छौहे, किए नै खर्च करै छैँह। तँू की करबैं पाइ लऽ कऽ। बहीनक बिआह तँ जेना जे हेतै से हेबे करतै। माए तँ सत्ते नै बूझि सकलीह। साले भरिमे केना एतेक परिवर्तन भऽ गेलै। नै जानि समैक दोष छै अथवा संसारक, देखा देखी बनि रहल नव परंपरा जइमे पुत्र अपन परिवारक रूपमे मात्र अपन पत्नी आ बच्चाकेँ बुझैत छथि। नै जानि लोक पुत्रक अभिलाषामे अतेक किअए विचलित रहैत अछि। सोचैत सोचैत अपन पतिक फोटोक समक्ष ठाढ़ भऽ ओ अपन बीतल समैकेँ ताकय लगली । गजेन्द्र ठाकुर शारदानगर दुर्गा पूजाक नाटकक दू दृश्यक बीच नर्तकीक नाच। “शारदानगरक ढोढ़ाँइ दस टाका तहे-तहे दिलसँ दइ छथि”- नर्तकी रुखसाना बजै छथि। “बनारसक छै रौ।” “धुर, मुजफ्फरपुरसँ लऽ अनै छै आ झुट्ठो बनारसक..”। “हौ मुदा ई शारदानगर कोन गाम छै”। “बुझलही नै। पट्टी टोलक जे पाइबला सभ रहै, से सड़कक आेइपार टोल बना लेलकै आ लक्ष्मीपुर नाओं राखि लेलकै, जे पट्टी टोलक हम सभ नै छी। लक्ष्मी आ सरस्वतीक झगड़ा बुझल नै छौह। से भगवानक झगड़ाकेँ सोझाँ अनने अछि। पट्टी टोल गाम गरिबहा सबहक अछि, सभटा अछि महिसबार सभ। मुदा भगवानक झगड़ामे गामक नाओं सरस्वतीक नाओंपर शारदानगर राखि लै गेल अछि।” “चल नर्तकीकेँ तँ अही बहन्ने पाइ दइ जाइ छै”। भवनाथ झा ऊँचका डीह राम बाबूक पुरखा बड कलामी रहथिन। नदी कातक वास रहनि तेँ खूब ऊँच कऽ डीह भरने रहथि। ततेक माँटि देल गेल रहै जे पूबमे पोखरि आ दच्छिनमे डबरा खुना गेल रहनि। ओही डीहपर चौसार घर, खरिहान, बाड़ी, झाडी सभटा ले जगह रहए। परुकाँ साल बाढि आएल रहए तँ चूड़ा आ चीनीक पैकेट हवाइ जहाजसँ खसाओल गेल। हिनका अपन डीहपर खूब फबि गेल रहए, जावत आन कियो पानिमे हेलैत हिनकर डीहपर आएल ताधरि इच्छाभरि कोठीमे ढारि नेने रहथि। आ मनहि मन अपन पुरखाकेँ प्रणाम कएने रहथि। ऐबेर सेहो बाढि आएल। मुदा ऐबेर राहत-सामग्री नावसँ घरे घरे बँटबाक व्यवस्था भेल रहए। रामबाबू बाढिसँ प्रभावित नै रहथि तेँ हिनका कियो किएक देतनि! रामबाबू मसोसि कऽ रहि गेलाह। हरलनि ने फुरलनि पुरखाकेँ उकटैत अपनहि ऊँचका डीहपर बनल घरकेँ डेङबए लगलाह। हेराफेरी दुर्गापूजाक तैयारी दुनू गाममे चलि रहल छल। खूब चंदा भेल रहए तेँ सबहक इच्छा छलनि जे हमर गामक पूजा बेसी नीक हुअए। पहिल चर्चा उठल जे ऐबेर अपन गामक जे पंडितजी छथि हुनका बदलल जाए। आ जँ हुनका गामक पंडितजी आबि जैतथि तँ बड नीक होइतए। अपन पंडितजी तँ बकलेल छथि! दुनू गामक दुर्गापूजा समितिमे एके चर्चा छल। दुनू दिससँ लोक सभ पंडितजीकेँ पोल्हबै ले आबए-जाए लगलाह। दुनू गामक पंडितजी मसियौते रहथि तँए बेसी दिक्कत नै भेलनि। एक दोसराक घरमे पहुनाइ करैत पूजामे लागल रहलाह मुदा ओते दिन हुनका दुनूक अपन-अपन गोसाउनि सीरपर दीप नै जरलनि!! नबोनारायण मिश्र १९५५- पिता-श्री गोविन्द मिश्र, माता- श्रीमति अढ़ूला देवी। गाम- कुशमौल, पो.नागदह-बलाइन, भाया-अरेड़हाट, जिला-मधुबनी। मैथिली रंगमंचसँ "कोकिल मंच" संस्थाक माध्यमसँ सम्बद्ध। घमंडक फल बद्रीबाबूकेँ काबिलक बड़ दाबा छलनि। चारि भैयारी मूर्खक बीच एकमात्र पढ़ल लिखल रहबाक कारणे परिवारमे वर्चस्व भेनाइ स्वाभाविके आ ऐ वर्चस्वक प्रतिफल जे आश्रम साझी नै रहि सकल। पैतृक सम्पत्तिक अतिरिक्तो किछु जमीन अर्जित केने छलाह। सरकारी नौकरीमे रहबाक कारणे आमदनीक स्रोत बढ़ियाँ छलनि तँए शानसँ कहथिन्ह जे गाममे हमरासँ पैघ के अछि? खर्चोक नाओंपर एकमात्र कन्यादान छलनि जे सस्तेमे सुतरि गेलनि। तीनटा बालकमे दूटा छोट-छीन, एकमात्र ज्येष्ठ बालक कौलेजमे पढ़ैत छलनि। समाजमे बद्री बाबूक घमंडक चर्चा जोर पकड़ने छल कारण जे साधारणो बातमे लोककेँ कहि दैत छलखिन जे तोरा हम गामसँ उजाड़ि देबह। गामक लोक अवसरक प्रतीक्षामे छल। आमक गाछ लेल अपना पटीदारीमे झगड़ा बढ़लै आ लोक दुनूकेँ पीठ ठोकि कऽ केस मोकदमामे फँसौलक। बद्रीबाबूसँ लोककेँ बदला लेबाक ऐ सँ नीक आर कोन अवसर भेटितै? गाममे बद्रीबाबूकेँ एकहुटा गवाही नै भेटलनि तँए सिविल कोर्टसँ हाइकोर्ट धरि केस हारिते गेलाह। केस मोकदमामे फँसि गेलाक कारणे आर्थिक स्थिति जर्जर भऽ गेलनि। अनका गामसँ उजारैत-उजारैत अपनहि उजरबाक बाट धऽ लेलनि आ मुँहमे स्वतः लगाम लागि गेलनि। राम विलास साहु रथक चक्का उलटि चलै बाट (हाइकू-टनका आ पद्य संग्रह) प्रकाशित। परिश्रमक भीख सोमना बोनिहार अपन परिश्रमसँ परिवारक भरण-पोषण करैत छल। सभ दिन अपन मजदूरिक बोनिसँ खाइत-पीबैत जिनगी बितबैत छल। सोमना जेतबे परिश्रमी ओतबे इमानदार सेहो छल। सोमनाकेँ जइ दिन काज नै भेटैत छल, माने बैसारी रहि जाइत छल, ओइ दिन बिना भोजने पत्नी आ बाल-बच्चा पानि पीब अपन टुटली मरैयामे सुति रहै छल। एक दिन एहिना भेल रातिमे सभ परानी पािन पीब सुित रहल। भोर भेलापर काज खोजलक मुदा कोनो काज नै भेटलै। सोमना भुखक मारल थािक कऽ दलानपर बैसल छल। पत्नी आ बच्चाकेँ भूखसँ पेट-पीठ एक भऽ गेल रहै। सोमना सभ परानी आँखिसँ नोर बहबैत भगवानसँ याचना करैत कहलक- “हम एत्ते गरीब छी मुदा काजो नै भेटैत अछि जे परानो बचत। आब हम सभ भूखे प्राण तियागि देब।” सोमना माथपर हाथ रखने बैसल छल। तखने एकटा हट्ठा-कट्ठा भिखारी आबि कऽ भीख मँगलक। सोमनाकेँ भीख देबाले किछु बँचल नै छल। सोमना कहलक- “भीख तँ हम नै दऽ सकै छी, हम दऽ सकै छी परिश्रम।” भिखारी मने-मन सोचमे डूमि गेल, ओ सोचलक जे हम शरीरसँ ठीक छी तँ किएक ने हमहूँ परिश्रम करब तँ भिखारीक जीवनसँ छुटकारा पाबि जाएब। भिखारी खुश भऽ बाजल- “आब हमहूँ भीख नै माँगब, अहाँक वचन सुनि हमरो लागल जे आखिर परिश्रमसँ तँ धन भऽ सकैत अछि। बेकार हम भीखक फेरमे पड़ल छी। आब हम परिश्रमेसँ अपन पेट भरब।” मुन्नी कामत हमर संस्कार आंगनमे बैस बिट्टू कखैनसँ ने चारू भर चौकन्ना भऽ सभ घरकेँ निङहारैत छलाह। पता नै कतैक सवालसँ अपन माथकेँ ओझरौने छला। ओ सदिखन सोचै छला- किए होइत भिनसर घरमे बगड़ा फुदकए लगैत अछि। आखिर ओकर प्राण हमरे घरमे किए लटकल रहैत अछि। किए नै ओहो आन चिड़ै जकाँ गाछ-बिरीछपर रहैत अछि? एक दिन बाबासँ बिट्टू पुछलक- “बगड़ाकेँ हमरा सभसँ िकएक नै डर होइत छै? हम तँ ओकरा कखनो नोकसान पहुँचा सकै छी।” बाबा बिट्टूक बात सुिन मुस्कुराइत बजलाह- “बौआ, हमर ऊँच संस्कारक पहचान यएह बगड़ा छी, जे नीकसँ बुझैत अछि जे हमर संस्कार एकरा नोकसान नै पहुँचा सकैत अछि। मिथिलाक समर्पणक खिस्सा विश्व भरिमे पसरल अछि। जहिना बच्चाकेँ जकरासँ दुलार भेटैत अछि ओ ओकरे अपना बुझए लगैत अछि। एहिना ई बगड़ा मिथिलाक घर-घरमे दुलार पबैत अपन घर बसबैत अछि।” करैलाक मीठ गुण सासु-पुतोहुक नाता तँ खटगर-मीठगर होइत अछि। रगड़-झगड़क बीच पिसाइत ई संबंध हमरा समाजमे एक प्रतिष्ठित ऊँचाइ पबैत अछि। ऐ टकराउक मुख्य कारण ई होइत अछि- ने सासु पुतोहुकेँ बेटी जकाँ दुलार करैत अछि आ ने पुतोहु सासुकेँ माए जकाँ सम्मान। प्रियांसी बी.ए. पास नव विचारक महिला अछि। जे सासुरमे पएर रखैत सासु-पुतोहुक ऊँच-निचक दीवारकेँ खदेर देलक। ओकरा नैहरसँ ई बात मनमे गड़ि गेल छल जे सासु माने हुनकर माए, कहैक मतलब ई जे ओकरा नजरिमे सासु आ सतौत माए दुनू एक्के सिक्काक दू परत छी। ऐ सँ प्रियांसी सोचलक जे सासुर जाइत ई बुढ़िया अपन सासुगिरी करैत ऐ सँ पहिले हम एकर लगाम तनने रहब। तखने हमरा ई सासुर बसए देति। कोहबरसँ निकलैत प्रियांसी डाँरमे ऑंचरक खुट खोंसैत तइपर दुनू हाथ धऽ सासुकेँ कहलक- “सुनि लौथु हम जेना नैहर रहैत छलौं तहिना रहबनि, हम सासुरक जहलमे नै खटबनि, मंजूर छन्हि तँ कहौथ नै तँ हमरा दुनू परानीकेँ अखने अलग कए दौथु।” घोघ तरसँ बाजि उठल कनियाँक ई बोली सुनि सासु तिलमिला गेली। मुदा मर्यादाक सम्मान आ कुटुमक ख्याल करैत बजली- “आब ई राज-पाट अहींक छी। एकरा अहाँ जेना राखी, आइसँ ऐ परिवारक मान-सम्मान हम अहाँकेँ सौंपैत छी।” प्रियांसी अपन व्यवहारसँ सासुरक लोककेँ नाकोदम कए देलक। जएह गरम मिजाज नैहरमे छल सएह तेवर सासुरोमे काइम करैत ओ उधियाइ छेलीह। ने भैंसुरक लेहाज आने ससुरक इज्जत, ओकरा लेल सभ ओकर दिअर जकाँ छल। घरबलाकेँ तँ गणेशीए बुझैत छलि। ओ अपना आगाँ सभकेँ हीन बूझि हँसि दैत छलि। एकर ऐ व्यवहारकेँ लाेक ओकर मतिछीन्नू बुिझ चुप रहि जाइ छल। कोइ ओकरासँ मतलब नै रखैत छल। ओकर घरबला सेहो ओकरासँ हरिदम रूझाइल-रूझाइल रहैत छल। किछु मासक बाद प्रियांसीकेँ अपन व्यवहार आ परिवारमे अपन स्थितिक नीक जकाँ ज्ञान भऽ गेलै, ओ बूझि गेलि जे लड़कीकेँ हरदम बेटीए नै पुतोहुओ बनि कऽ रहबाक चाही। एगो नीक मनुखक निर्माण बदलैत परिस्थिति आ समऐ करैत अछि। अगर नदीमे बाढ़ि नै आबै तँ तलाबक पानि समुद्रक गहराइकेँ केना जानि सकैत अछि। तहिना बेटीकेँ उछलैत पएरमे मान-मर्यादा, परिवार, समाज आ देशक दायित्वक बेड़ी बान्हि ओकरा अपन कर्तव्यक ज्ञान कराओल जाइत अछि। सासु बेटीसँ बनल पुतोहुकेँ फूलक पगरी सौंपैत अछि। जइमे ओ अपन ई काज कुमहार जकाँ करैत अछि। जेना कुमहार माटिक बर्तनकेँ पीट-पीट आ भट्ठीमे पका कऽ दुनियाँ योग बनबैत अछि। ओहिना सासु कखनो मिठगर तँ कखनो तितगर बोलीसँ मक्खनसँ पालल बेटीकेँ दुनियाँक अनुरूप बना कऽ ओकर व्यक्तित्वक निर्माण करैत अछि। डॉ. शंभु कुमार सिंह जन्म: १८ अप्रैल १९६५ सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ। आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान), एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, १९९५] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी.एच.डी. वर्ष २००८, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-६ मे कार्यरत। जेठ आ पूस जेठ १० हजार टका जमा केनाय रामदीनक लेल पहाड़ तोड़ऽ सन कठिन काज छलै मुदा ओ बेचारा कओ की सकै छल? जँ ओहो बुचकुन माँझी जकाँ अपन बेटीकेँ जनम लेतहिं खैनी चटा कए माइर दितै तँ आर गप्प रहितै। ओ तँ बड़ जतनसँ ओकरा पालि-पोसि पैघ केने रहए से आब ओकर बिआह करबाक लेल दहेज-दानवक क्रूर सपना तँ ओकरा पूरा करहि पड़तै। ओहो धून केर पक्का लोक निकलल, गामक बीचोबीच बनएबला नव सड़कक लेल ओ हथौड़ीसँ दनादन-दनादन पाथर तोड़ि गिट्टीक ढ़ेर लगौने जा रहल छल। ओ भरि दिनमे तीन-चारि बेर अपन धोतीक गेंठसँ टका निकालए आ गनए— एक, दू, तीन.....। बस कोनो तरहेँ ३x१५ केर एकटा आर ढेरी भऽ जाइक तखन तँ.....। लोग सभ कहै जे रामदीन पागल भऽ गेल छै, तखनहि तँ जेठक एहेन दुपहरिमे ओ अपना-आपकेँ जरा रहल अछि! मुदा रामदीन ककरहुँ बातक कोनो जबाब नै दै, बस मोने मोन कहै— ‘औ लोकनि! ऐ समाजमे जिनका किनकहुँ हमरा सन कुमारि कन्या छन्हि तिनकासँ पुछऔन्ह जे बेटीक बिआहक लेल जेठक ई दूपहरि केहन शीतलता दैत छैक?’ पूस हौ दैब, हौ दैब! एकटा बाछीक कारणेँ ओ सभ हमरा बेटीक हत्या कऽ देलक। रामदीनक घरवाली जोर-जोरसँ अपन छाती पीटैत छली। बगलमे ठाढ़ रामदीनक १० बर्खक बेटा हक्का-बक्का भऽ कए ठाढ़ छल। अपन बहिनक हत्यारा सभकेँ सबक सिखेबाक लेल पूसक ओइ सर्द रातिमे ओकर खून खौलैत रहै। सौदागर सभदिन साँझकेँ ओ अपन दिनभरिक कमाइ केर हिसाब-किताब करै छल आ भोजन-भातक पश्चात् जखन ओ अपन ओछाओनपर जाइत छल तँ एकबेर ई अवश्ये सोचैत छल जे ओकर ई धन्धा अनैतिक छै, मुदा सभदिन ऐ प्रश्नक जवाबो ओकरा एक्कहि रंगक भेटै— पाइ कमेबाक लेल सभ किछु उचित अछि। ने जानि ओकरा सन प्रतिभावान ओ मेधावी लोक एहेन धन्धामे केना आबि गेल? ओ सुन्नर-सुन्नर युवती लोकनिकेँ टकाक लोभ देखा फँसबैत छल आ शहरक नामी-गिरामी होटलक मालदार ग्राहक धरि पहुँचबैत छल। सबहक लेन-देन केलाक पश्चात् ओकर जे कमीशन बनै ओ राशि लगभग ३,००० सँ ३,५०० धरि प्रतिदिन भऽ जाइ छलै। संक्षेपमे ओकर महिनवारी आमदनी लगभग १ लाखक लगधक पहुँच जाइ छलै जकर उदाहरणों ओ प्रस्तुत केने छल। पछिले साल ओ अपन एकलौती बहिनकेँ, अपन शहरसँ बहुत दूर एकटा महानगरक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेजमे जथगर डोनेशन दऽ कए नाओं लिखवा देने छलैक। आइ साल भरिक पश्चात् ओ अपन बहिनसँ भेँट करबाक लेल ओइ शहर पहुँचल छल। अपना-आपकेँ ओ एकटा बिजनेसमैन बुझैत छल से अहु शहरमे अपन धन्धाक संभावना ताकबाक हेतु ओ निकलि पड़ल। बेस छानबीन केलाक उपरान्त ओकरा ऐ शहरक एकटा उच्चस्तरीय वेश्यालय केर पता लागलै। सौदा तए करबाक क्रममे ओकरा ओतुका दलालसँ कहासुनी भऽ गेलै। दलाल कहैत रहै— औ जी! अहाँकेँ अपन देहक लेल एकटा देह सएह चाही ने! तखन फेर ओकर चेहरा आ बोलीसँ अहाँकेँ कोन मतलब? जँ मंजूर हुअए तँ.....। ओ एक-एक कऽ कए सबहक गदराओल देहक तजबीज करैत छल। आेइमे सँ एकटा देहपर ओकर नजरि ठहरिए नै रहल छलैक.....ओ इशारा केलक.....हे ई.....। युवतीक चेहरापर नकाब रहै। एतबो धरि स्पष्टे छल जे ओ सेहो अपना समक्षक लोककेँ नै देखि सकैत छली आ मुँह तँ किओ खोलिए नै सकैत छल। कहबाक तात्पर्य जे दुनूक बीच केवल स्पर्शक एहसास हेबाक रहै। .....सी.....सी..... अलबत्ते ई आबाज दुनूक मूँहसँ एक्कहि संग बहरेलै। दुनूक देह आब निष्क्रिय भऽ गेल रहै मुदा दिमागमे बिजुरी चमकैत रहै। दुनूकेँ एक दोसराक आबाज जानल-पहिचानल लागलै। अन्तर्द्वन्द्व एतेक बढ़ि गेलै जे ओ युवती उनटा मुँहेँ ठाढ़ भऽ कए अपन नकाब उठा एनाक छाँहमे अपन सौदागरक चेहरा देखिए लेलकै। क्षणहि भरिमे सौदागर सेहो अपन बहिनकेँ चीन्हि गेल। ने जानि दुनूमे सँ के अपना-आपकेँ पाथरक सदृश कठोर होइत अनुभव केलक! गरमी -बाबूजी, अहाँ हमरा कॉन्वेन्टमे किए पढ़ा रहल छी? -किएक तँ हमरा मुन्नाकेँ पढ़ि-लिख पैघ लोक बनबाक अछि तँए । -मुदा सौम्या तँ कहै छली जे ई स्कूल खाली पैघ बापक धिया-पुताक लेल छै? -नै बेटा, हुनका बातपर अहाँ धियान नै दिअ, जँ एहेन रहतैक तँ अहाँक नाओं फादर लिखितथि? बाजू! -अपन घरक सोझाँ उतरैत प्रतीक बाजलाह—बाबूजी, बाबूजी, आइ बहुत जोरक शीतलहरी छै, चलू घरहिमे आराम करब। एहेनमे सवारियो तँ नहिए भेटत। -नै बेटा, अखन हाट-बजारक समए छै, दुइयो चारिटा सवारी तँ भेटिए जाएत, अहाँ घर जाउ। हम जँ काज नै करब तखन हमरा मुन्ना राजाक लेल किताब-कॉपी ओ महग ड्रेस सभ केना आओत? आ हमरा जाड़ लगितो कहाँ अछि? हम जखन उचकि-उचकि कए रिक्सा चलबै छी तखन अपनहि देहमे गरमी आबि जाइत अछि। -अहाँ फूसि बाजि रहल छी बाबूजी, उचकि-उचकि कए रिक्सा चलएलासँ गरमी नै अबैत छै, घूस लेलासँ गरमी अबै छै। आइ भोरमे सौम्याक माए सेहो बी.डी.ओ. अंकलकेँ ऑफिस जेबासँ मना केने छली मुदा ओ कहलनि जे आइ पच्चीसटा लोककेँ इंदिरा आवासक पाइ भेटबाक छै, सभसँ हमरा ५०० सय टकाक दरसँ घूस भेटएबला अछि, तखन ने मुट्ठी गरम रहत? ऐ बेर रामदीन बिनु किछु बजनहि अपन रिक्सा आगू बढ़ा लेलथि आ मोनहि मोन सोचय लगलाह— हँ बेटा, गरमीएक परिभाषाकेँ बुझबाक लेल तँ हम अहाँकेँ पढ़ा रहल छी। संजय कुमार मंडल गाम- गोधनपुर, मधुबनी। अनट्रेन्ड घुसखाेर पाँच मिनटक भीतरे गामसँ लऽ कऽ बम्बै दिल्ली धरि समाचार पसरि गेल जे बड़ा बाबूकेँ घुसखोरीमे सी.आइ.डी. पकड़ि लेलकनि। साँझ-भोरक नढ़िया जकाँ गाममे जेम्हर-तेम्हर अवाज उठए लगल- “दुश्मनीसँ फँसाओल गेलनि।” “सी.आइ.डी. की कोनो हाड़-गोबर गीजैए जे बिनु देखिनहि पकड़ि जहल पठा देलकनि।” “सुनै छी जे एकटा मंत्रीक भागिनक काजमे टाल-मटोल केलखिन, वएह धरा देलकनि” “लाखक-लाख जे बेटीक िवआहमे खर्च केलनि से कि दरमहेक पाइ छलनि।” “बेटाकेँ जे पाँच लाख रूपैया डोनेशन दऽ बंगलोरमे नाओं लिखौलनि से कि खेत बेच कऽ केलनि।” “देखले दिन अछि जे बाप दिन खाइ छलनि तँ रातिले झकै छलनि आ राति खाइ छलनि तँ दिनले झकै छलनि। तेकर बेटा गामक महाजन भऽ गेल?” “पसीनेक पाइ जकाँ सूदि कड़गड़ छन्हि।” ऑंफिसमे गदमिशान हुअए लागल। “बड़ाबाबू बननहि कि हेतनि, बुइधो ने चाही। बुइध रहि गेलनि नवका किरानी जकाँ आ बनि गेला बड़ाबाबू।” “जिनगी भरि तँ बान्ह-सड़कक नक्शा पास करैत रहलाह आ लुरि भऽ जेतनि पाइ कमाइक।” “जखन कोट-कचहरीक चक्कर लगौताह तखन ने ट्रेन्ड हेताह।” “मुदा जाबे सीखताह-सीखताह ताबे तँ रिटायरे कऽ जेताह। तीनिये मास नोकरी बँचल छन्हि तइ बीच जहलोसँ निकलताह कि नै।” “जखन लूड़िक काज छलनि तखन लूड़िये ने भेलनि आ जखन लूड़ि हेतनि तखन काजे ने रहतनि।” डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्रक दुइ गोट विहनिकथा -लेखिकाक संस्कृत विहनिकथा संग्रह “लघ्वी”सँ मैथिली रूपान्तर:डॉ. योगानन्द झा वीरभोग्या वसुन्धरा दुर्भाग्यसँ गृहस्वामी देवदत्तक मृत्यु भऽ गेलनि। लगले हुनक दुनू पुत्र हुनक श्राद्धादिक कर्मक बाद आपसी बाँट-बखरा कऽ लेलनि। ज्येष्ठ रमेश स्वभावसँ किसान छल। ओ अपन काजक व्यवस्था स्वयं संचालित करए लागल। मुदा छोट पुत्र सुरेश परम आलसी छल। ओकर खेती-बाड़ी जन-मजूरपर आश्रित रहए लगलै। तँए ओकर उपजा-बाड़ी अत्यल्प भऽ गेलै। क्रमशः ओ अत्यन्त दरिद्र होइत चल गेल। एक दिन ओ अपन भाइसँ पुछलक- भाइजी यौ, हमर खेत सबहक उपजा-बाड़ी किए कम होइत चल गेल? हमरासँ कोन त्रुटि भेल अछि? हमहूँ तँ अहींक संगे समयेपर रोपनी-पटौनी आदि करैत अएलौं अछि मुदा तैयो हमरा खेतमे पहिने जकाँ उपजा नै भऽ पाबि रहल अछि। आखिर कोन ढंगक दोष हमरासँ भऽ रहल अछि? रमेश बाजल- सुरेश! तोँ किछु करए नै चाहैत छेँ। तोहर खेती-बाड़ी जने-मजूरपर टिकल छौ। ई जानिले जे जाधरि तोँ स्वयं अपन खेतमे परिश्रम नै करबेँ ताधरि पर्याप्त अन्न नहिये उपजतौ। सनातनसँ ई नीतिवाक्य प्रचलित छैक- “वीरभोग्या वसुन्धरा”। अति सर्वत्र वर्जयेत् कोनो दुर्घटनामे महेशक अकालमृत्यु भऽ गेलनि। तखन हुनक युवती पत्नी माधुरी आ दुइ गोट छोट-छोट नेना अकस्मात् अनाथ भऽ गेलनि। पर-परिजन सभ हुनका सभकेँ सांत्वना दऽ अपन-अपन काजमे लागि गेल। केशव महेशक बालसंगी छल। ओ माधुरीक सहायताक हेतु कृतसंकल्पित भेल। ओ सरकारी कार्यालयमे वरीय लिपिक छल। ओ अपन माइक संग माधुरीयेक पड़ोसमे रहैत छल आ निराश्रिता माधुरीक धियान राखैत छल। ओ माधुरीक हेतु बजार जाय खाद्य सामग्री कीनि कऽ अनैत छल आ ओकर आनो आवश्यकताक पूर्तिक हेतु कटिबद्ध रहैत छल। ओकर ऐ प्रकारक प्रयासक कारणे माधुरी कहियो कष्टक अनुभव नै कऽ सकल। केशवक माए सेहो माधुरीक धिया-पुता सबहक ताक-छेम कएल करथि। ई सभ देखि कऽ लोकापवाद प्रचलित होमऽ लगलै- “ई सभ कोनो परोपकारक भावनासँ नै कएल जा रहल अछि। माधुरीक युवावस्था ओ सौन्दर्य एकर मूल कारण अछि। केशव माधुरीपर आकर्षित भऽ गेल अछि आ ओकरासँ प्रेम करए लागल अछि”। ऐ तरहक सन्देहक दृष्टि सर्वत्र व्यापक होइत चल गेल। से सभ देखि केशवक माए बजलीह- बेटा, आइसँ माधुरीक घर जाएब बन्न करू। कहलो गेल अछि- “अति सर्वत्र वर्जयेत्”। लोक निरंकुश होइत अछि। मिथिलेश मंडल विदेशी बाबू अमेरिकासँ चलला विदेशी बाबू। बाटमे सोचैत रहथि- मिथिला केहेन अछि घुमि कऽ देखि ली। सत्तर-पचहत्तर सालक भऽ गेलौं पाकल आम जकाँ छी, कखन छी कखन नै छी तेकर कोनो ठीन नै। मधुबनी पहुँचला तावतमे कनियाँ फोन केलकनि- “यौ हमर छोटकी बहीन मधुबनीयेमे रहैए।” पता करैत हुनका घरपर पहुँचला। हुनकर सारि घरपर छलि मुदा साढ़ू नै। परिचए दैत बैसला तखन साढ़ू दऽ सािरकेँ पुछलखिन- “साढ़ू कतए गेलाहेँ।” चाह हाथमे दैत सारि बजलि- “तावे अहाँ चाह पीबू, हम बजौने अबै छियनि।” तखने पैखाना तरफसँ साढ़ू अबिते छलाह पत्नीकेँ देखि पुछलखिन- “की बात?” “बड़का पाहुन ऐलाहेँ चलू।” “घरेपर तँ जाइ छी। तावे अहाँ बहरू, अबै छी।” घरपर ऐला साढ़ूमे साढ़ू कुशल-छेम भेल। हाथ महक लोटा देखि बड़का साढ़ू कहलकनि- “पहिने लोटा मटिया लिअ।” ई गप्प सुनिते कलपर जा लोटा मटियेला। हाथ-पएर धोय लगमे आबि बैसला। फेरसँ चाहक आग्रह केलनि आ विशेष कुशल समाचार हेतु पुछलखिन- “केमहर सुरूज उगलै यौ साढ़ू जे अपने हमरा ऐठाम.....।” बड़का साढ़ू बजला- “यौ साढ़ू, हमरा मोन भेल जे मिथिला घुमि कऽ ली। सत्तर-पचहत्तर बरख भऽ गेल। कखैन छी कखैन नै। कन्नी अहाँ संग दिअ घुमैमे।” छोटका साढ़ू अपन परेसानीपर सोचैत बजला- “यौ साढ़ू, अहाँकेँ मिथिला घुमाएब तँ हमर फर्ज भऽ जाइत अछि। मुदा अहाँ तँ करोड़पति छी आ हम रोज बोनि करै छी आ रोज खाइ छी। मुदा चलू जहाँ धरि होइए चलै छी। मिथिला तँ बहु दिन लगत घुमैमे।” छोटका साढ़ूक गप्पक भावकेँ जेना बूझितो धियान नै देलखिन सटाक दन कहि देलखिन- “चलू, चलू।” एकसँ दू गाम घुमला तखन करीब दू बजैत रहए। बड़का साढ़ू सोचला जे चारि घंटाक बाद तँ साँझ पड़ि जाएत। कत्तऽ रहब। मने-मन सोचतो रहथि आ चलितो रहथि। एते धरि सोचि लेलथि जे कतौ नीक ठीम रहब। ताबे धनुक टोली पार करैत रहथि। मुदा एक्कोटा मकान नै देखि सोचैत रहथि जे अगिला टोलमे रहब कोनो मकानबला घरमे। ताबे दक्षिणवारि टोल पहुँच गेला जइ टोलमे खाली मकाने-मकान रहए। मकान देखि तँ खुश होथि मुदा सभ मकानमे कदीमा लटकल रहए। जे देखि हिनक मन नै भाबनि। अगिला घर माने गामक अंतिम भागमे एकटा फूसक घर रहै जइ चारपर सीमक लत्ती पसरल आ घौदे-घौदे सीम फरल। छोटका साढ़ू कहलकनि- “आब साँझ पड़ि गेल अगिला गाम चलब आकि कतौ रहि जाएब?” बड़का साढ़ू बजला- “सहए तकतान करै छी हमहूँ जे कतए रहब। हमर मोन कहैए जे अही घरवारी ऐठाम रही।” “ई घर छिऐ छितन मल्लीकक, ऐठाम कन्ना रहब। कहितौं तँ पाछूए रहि जेतौं। एत्त हम किन्नहुँ नै रहब।” प्रदीप बिहारी १९६३- जन्म स्थान कन्हौली मल्लिक टोल, खजौली, मधुबनी, बिहार। चर्चित कथाकार, उपन्यासकार ओ रंगकर्मी। प्रकाशित कृति: गुमकी ओ बिहाड़ि, विसूवियस (उपन्यास), औतीह कमला जयतीह कमला, खण्ड-खण्ड जिनगी, सरोकार (कथा संग्रह)। २००७ मे सरोकार (लघु कथा संग्रह) लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त। सत्संगी तीन मासक बाद घरमे एकटा टहला अएलै। पहिलुक टहलाकेँ गेेलाक बाद मोसकिल भऽ गेल रहै। दुनू दियादिनी खटैत-खटैत अपस्याँत भऽ जाइ छलीह। जेठकी अपन पतिक संग सत्संगमे जाइत छलीह- सप्ताहमे दू दिन। ओइ दुनू दिन छोटकीपर काजक बोझ बेसी पड़ि जाइ छलनि। ओ अपन नैहर फोन करै छलीह। पहिलुक टहला सेहो हुनके नैहरसँ आएल छलनि। ओम्हर भेट जाइत छै काज कएनिहार। छोटकीक बहिन सबहक आेइठाम नैहरेसँ गेल छन्हि टहला। जेठकी दुनू प्राणी किछु सामाजिक काज सभसँ सेहो जुड़ल छथि तेँ टहलाक नै भेने बेसी मोसकिल भऽ जाइत छन्हि। संयुक्त परिवारक मनोविज्ञान सेहो बुझए पड़ैत छन्हि। एक्कहि गोटेपर बेसी भार देब उचित नै। बाढ़िक विभीषिका समाप्त भेल रहै। छोटकीक नैहरसँ फोन अएलनि, ‘‘बाढ़ि सटकि गेलैए। कने रूक्ख होमए दहक। काज कएनिहार भेटिए जेतह कोनो।’’ फोनक किछुए दिनक बाद छोटकीक भाय एकटा टहला अनलनि। खिआएल सनक नओ-दस बर्खक छौंड़ा। बड़की बजलीह, ‘‘ई तँ कुपोषणक शिकार अछि। काज की करत?’’ ‘‘पोसए पड़त दीदी।’’ ‘‘यएह तँ विडम्बना छै। ई सभ नमहर होमए धरि कतौ रहत। पोसा-पला जाएत आ तकर बाद भागत दिल्ली-लुधियाना।’’ जेठकी बजलीह। ‘‘ई नै जाएत। अपने जनक बेटा अछि।’’ ओइ राति साढ़े नओ बजे सत्संगसँ घुरल रहथि बड़की दुनू प्राणी। टेप रेकॉर्डरपर गीत बजैत रहै, ‘‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, पीर परायी जाने रे....।’’ पति पुछलखिन ओइ छौंड़ासँ, ‘अएँ रे मनसुक्खा! तों कोन जातिक छही?’’ ‘‘दुसाध।’’ लगलैक जेना घरमे ठनका खसल होइक। तामसे माहुर भऽ गेलाह सत्संगी। ओइ शांत वातावरणमे हुनक एकमात्र स्वर सुनल जाइत छल, ‘‘हम सभ दिन कहलौं। परम झुट्ठा अछि परतापुरबला सभ। केना कहने छल जे मंडल अछि ई। आब तँ बहुत किछु बचा कऽ राखए पड़त मनसुक्खासँ।’’
थापड़ ओ छौंड़ा पेट्रोल पम्पपर माला बेचैत अछि। पहिने पॉलिथिन बैगमे रखै छल, मुदा आब मूजक चंगेरीमे रखैत अछि। खोराक लेबए आबए बला वाहन सभकेँ माला अर्पित करबा लेल उताहुल रहैत अछि। हमहूँ अपन स्कूटरक खोराक ओही पेट्रोल पम्पपर लैत छी। एकटा साँझखन हम पेट्रोल लेबए पम्पपर गेल रही। ओ छौंड़ा दौगल आएल आ हमरा स्कूटरक माथ बाटें माला पहिराबए लागल। हम मना केलिऐक। छौंड़ा बाजल, ‘‘सर! आइ बोहनियो ने भेलै हन। एक्के रूपाक तँ बात छिकै।’’ छौंड़ाक आकृति परक दयनीय भावसँ हम द्रवित भऽ गेलौं। जेबीमे हाथ घोसिएलौं। आँगुरसँ खुदरा पाइ गनलौं। मात्र साठिटा पाइ छल। कहलिऐ, ‘‘खुदरा नै छौक।’’ ‘‘कोन नोट छिकै? दियौक ने सर! पम्प बला नमरियोक खुदरा कए दइ छै।’’ एक टकाक माला। हमरा जेबीमे दसटकही। भजाएब उचित नै लागल। के चानचुन राखत जेबीमे? मुदा छौंड़ाक आग्रह। कने काल इथ-उथमे रहि गेलौं। मुदा खनहि जेबीसँ साठि पाइ बहार कऽ छौंड़ाकेँ दैत कहलिऐ, ‘‘ई साठि पाइ ले आ माला सेहो राखि ले।’’ छौंड़ा पाइ नै लेलक। माला अपन चंगेरीमे रखैत बाजल, ‘‘हमे हथउठाइ नै लै छिकियै साहेब!’’ आब हमर लिलसाक बादो ओ छौंड़ा हमरा स्कूटरकेँ माला पहिराबए नै अबैत अछि। लक्ष्मी दास मिथिलाक किसानी आत्म निर्भर संस्कृतिक संरक्षण लेल विदेह सम्मान- २०१२ प्राप्त। बूड़िबकक बूड़िबक जेठ मासक तीन बजे दुनू बापूत गरमा धान रोपैले खेत पटा कऽ आएल रही। गरमीसँ मन तबधल रहए। मैट्रीकक बेटा कहलक- “बाबू नहाइले जाएब से साबून नैए।” एक तँ जेबीक पचस टकहीक गरमी दोसर तबधल मन। कहलिऐ- “जेबीमे छै लऽ लाए गऽ।” हमरा मनमे भेल जे पँच टकही लाइफबुआ लेत। बाँकी पाइसँ खाद लऽ आनब। छौड़ा चालीस रूपैयाबला पीयर्स साबून आनि निचेनसँ नहाएल। हम जखन नहाइले विदा भेलौं तँ बौआकेँ पुछलिऐ- “कतेक पाइ बचलह?” कहलक- “दस रूपैया।” सुनिते मन जरि गेल। मुदा अपन हारल केकरा कहितिऐ। एक तँ बुड़िबक ओ जे हमर दुख नै बुझलक। दोसर अपनो तँ अहूसँ टपि गेलौं जे ओकरा कहि नै देलिऐ। दाढ़ी एहेन समधीन सबहक फेरमे विवेक कक्का कहियो नै पड़ल छलाह जेहेन काल्हि पड़लाह। जहिना-जहिना ऋृतु बदलै छै तहिना-तहिना रिता गेलापर विचारो बदलै छै। मुदा एना किअए होइ छै? क्षुब्ध भेल विवेक कक्काक अत्मा झहरए लगलनि। विचार करए लगलाह जे पहिने दाढ़ी कटा समधिऔर अबै छलौं तँ मानो-दान बेसी होइ छलए आ समधिन सभ गालपर चुटकियो बजबै छली। एक तँ पाकल दाढ़ी तहूमे आठ-नअ दिनक। जहिना पाकल बाँस बेलैस भऽ जाइ छै। तहिना तँ ने बेलैस भऽ गेलौं। एक तँ दस-बारह दिनपर दाढ़ी कटबै छी तैयो कटनिहारकेँ घंटा भरि लगै छै, तइपर जँ अखुनका लोक जकाँ सभ दिन कटबए लगब तहन तँ आरो गरदनिकट्टी करब। गुम्म भेल कक्काकेँ मन कहलकनि- “साल भरिक दाढ़ी कटाइ कमाइल एक पसेरी धान होइ छै जे एक दिनक बोइन भेल। एक िदनक बोइनमे सालो भरि काज कराएब कते उचित अछि।” दोसर मन कहलकनि- “कियो बत्तू बुझए आकि साँढ़ बिना कमाइ बढ़ौने ऐसँ बेसी काज कराएब अन्याय छी।” अमित मिश्र इशारा चर्र .र . र . . । केबार खुजल । एकटा कारी छाह घर मे प्रवेश केलक । लड़खड़ाइत डेग । पूरा घरमे सस्तौआ शराबक गंध पसरि गेल। घरक एगो कोनमे देबालपर माँछ-बाँस पाड़ल छल आ ओकर नीचाँ अहिबातक दीपमे लाल साड़ी चमकि रहल छल। लाल साड़ीवाली नारी ओइ कारी सायाकेँ खसैत देख दौड़ल। धम्म . . । जा धरि पहुँचल ताधरि पीठे भरे खसल छल ओ साया। ओ नारी ओइ सक्कत देह बला मर्दकेँ पाँजमे पकड़ि उठेलक आ बैसेलक कोहबरक ओछैनपर। घंटो पंखा हौँकलक तखन जा कऽ होश एलै ओइ मर्दकेँ। मुदा ई की? होश आबिते नोचि लेलक कानक बाली। हँसैत बाजल- काल्हि ऐसँ दारू पिअब। नाकपर साड़ि राखने छलि ओ नारी। मुदा अपन गहना लेल विरोध केलक। अथक विरोध। एकर बराबर सजा देलकै ओ बेदर्दी मर्द। ओ नारीक पीठपर लाठी मारि चामकेँ लाल कऽ देने छलै। ठोर आ कानसँ खून बहि रहल छल। अचेत पड़ल ओ नारी सोचि रहल छलि। ऐ जीवनमे ऐसँ बड़का दुख भेटतै, ई तँ मात्र दुखक पहाड़क दिस एकटा छोट इशारा छलै । सरधुआ धम्म. . . . । हम चौँक गेलौँ, तखने फेर चिन्हार सन आबाज आएल, "सरधुआ, श्राद्ध कऽ देबौ।" हम झट पिछु घुमलौँ, हमरा सामने लिची आ आमसँ लुबधल गाछी छोड़ि आर किछु नै छल। हम जखन ७ वर्षक रही तँ ऐ गाछीमे देखने रही, उज्जर केश आ मात्र एकटा साड़ीमे सोन काकीकेँ। हुनक नामे मात्र सोन छल, बाँकी पूरा देह खूनक कमीसँ उज्जर चानी भऽ गेल छल। देखने छलौं बम्बइ आम तर खोपड़ीमे ईंटा जोड़ि जलखइ बनबैत। माए कहैत छली जे बड़का जमीनदारक बेटी आ कनिया छथि सोन काकी। जखन जखन गाछीमे धम्म. . होइ हम सभ छौड़ा आम लूझऽ लेल दौड़ै छलौं आ तखने सुनै छलौं, "सरधुआ , श्राद्ध कऽ देब. .." तहिया एकर अर्थ नै बुझैत छलौं तँए हुनक ई बाजब नीक लागैत छल। हुनक चारू बेटा सभटा जमीन अपन नामे करएबाक लेल सोन काकीकेँ जीविते जड़एबाक कोशिश केने छल तहियेसँ ऐ गाछीमे रहि रहल छथि सोन काकी, आ शाइद हिनक बेटा समयसँ पहिले काकीक श्राद्ध करऽ चाहै छल आ तँए ई सभकेँ गारि पढ़ै छथि, "सरधुआ, श्राद्ध कऽ देब . . . आइ १५ वर्षक बाद गाम जा रहल छी। आम पाकबाक समय छै। गाछी देख पहिलुक सभ बात मोन पड़ि रहल छल। भूखसँ तड़पैत सोन काकीक मुँह आ हुनक प्रतिज्ञा जे हमरा घाटक डोम आगि देत से मंजुर, मुदा कोनो हालतमे बेटा हमर लाश नै छुअत। तखने गाछीमे आबाज पसरलै, धम्म . . . हम बैग राखि गाछी दिश दौड़लौं। तखने शाइद भ्रम मे आबाज एलै सरधुअ . . . जगदानन्द झा “मनु” मसोमात चारि बरखक बाद, गामक माटि-पानि जेँ देहमे बहि रहल अछि, हिलकोर मारलक तँ सभ काज-बाज छोड़ि नोकरीसँ सात दिनक छुट्टी लऽ कए गाम विदा भेलौं। जेना-जेना गामक दुरी कम भेल जाए तेना-तेना हृदयक बेग आओर गामक माटिक गंध दुनू तेज भेल जाए। ट्रेन आ बसक यात्रा क्रमसँ खत्म भेलाक बाद गामक चौकसँ पएरे गाम हेतु विदा भेलौं जेकर दुरी करीब एक किलोमीटर रहै। ओनाहितो असगर समानक नामपर कन्हापर एकटा बैग आ दोसर गाम देखक लौलसा, रिक्सा छोड़ि पएरे चलैक लेल प्रेरित केलक। अपन टोलमे प्रवेश करिते सभसँ पहिले छोटकी काकीपर नजैर पड़ल। ओना गामक सम्बन्धमे ओ हमर बाबी लगैत छलथि मुदा गाममे सभ कियो हुनका छोटकी काकी कहि सम्बोधित करैत छलनि। तइँ हमहुँ हुनका छोटकी काकी कहैत छलियैन। उज्जर पढिया सारी पहिरने आँचरसँ माथ आ एकटा खूटसँ नाक तक मुँह झपने। रस्तासँ आंगन जाइत घरक कोन्टापर ओहो हमरा देखलथि, जा हुनका गोर लागि आशीर्वाद लेलौं। "के?... बच्चू", छोटकी काकीक मुँहसँ खरखड़ाइत अबाज निकलल- "हँ काकी।" "कहिया एलऽ?" "एखन आबिए रहल छी काकी।" "एसगरे एलऽ हेँ। " "हँ।" "आ दिल्लीमे कनियाँ, धिया-पुता सभ ठीक?" "अहाँक आशीर्वादसँ सभ कुशल-मंगल, अहाँक की समाचार, नीके छी?" ई प्रश्न सुनिते हुनकर आँखिसँ नोर झहरऽ लगलनि। नोर रोकैक असफल प्रयास करैत - "कि बौआ, ऐ मसोमातकेँ की नीक आ की बेजाए, बेजाए तँ ओइ दिन भऽ गेलौं जहिया अहाँक काका नबाड़ियेमे छोड़ि स्वर्ग चलि गेला, आब तँ ऐ बुढ़ारीमे कियो धूओ नै देखए चाहैए, देखलासँ सभकेँ अमंगल होइत छै। नै जानि विधाता ऐ अभागनिकेँ आर कतेक औड़दा देने छथि। आइ महीनोक बाद ककरोसँ दूमुँह गप्प केलौं आ कियो हमरो दऽ पुछलक .....।" ई कहैत काकी अपन नोरकेँ नुकबैत कोन्टासँ अँगना दीस चलि गेली आ हमहुँ गामक जिनगीक, विधवा, मसोमात, बुढ़ारी सोचैत आगु बढि गेलौं। रहस्य बाबा-बाबीक विवाहक चालीसम बर्षगाँठ। दुनू गोटे अपन सम्पूर्ण परिवारक बिच घेराएल बैसल। चारूकात एकटा खुशीक वातावरण बनल। सभक मुँहपर हँसी, खुशी आ प्रशन्ता झलकि रहल छल। बाबीक पंद्रह बरखक पोती, बाबीक गरदनिपर पाछूसँ लटकि कए झुलैत पुछलक- "बाबी एकटा गप्प पुछू?” बाबी- "हँ, पूछै।" पोती- "बाबा-बाबी हम अहाँ दुनूकेँ कहियो झगड़ा करैत नै देखलौं, एकर की रहस्य छै?" बाबी लजाइत अपन पोतीकेँ कन्हासँ उतारैत- "चल पगली, एकरा ई की फुरा गेलै?" बाबीक छोटका बेटा- "नै माए ई तँ हमरो बुझैक अछि, ओनाहितो हमर नव-नव विवाह भेल-ए ई मन्त्र तँ चाहबे करी।" बाबी- "चल निर्लज, सभ एक्के रंग भऽ गेलैं, अपन बाबूसँ पूछै, हुनका सभ बुझल छनि।" छोटका बेटा बाबूसँ- "हँ बाबू, अहीं कहू ने अपन सफल वैवाहिक जीवनक रहस्य। हमहुँ अहाँ दुनूमे कहियो झगड़ा होइत नै देखलौं, ई मन्त्र हमरो दिअ ने।, ( अपन कनियाँ दिस देख कऽ), देखू ने निर्मल तँ सदिखन हमरासँ लड़िते रहैत अछि।" बाबा एकटा बड्डकाटा साँस लैत जेना अतीतकेँ देखैक प्रयास कए रहल छथि। छोटकाकेँ माथपर स्नेहसँ हाथ सहलाबैत बजला- "एकरा कियो झगड़ा कहैत छैक? अहाँ दुनूमे जे स्नेह अछि ओइमे किछु नोक-झोंक भेनाइ सेहो आवश्यक छै। जेना भोजनमे चटनी तेनाहिते जीवनमे सभ पक्षक अपन-अपन महत्व छै, मुदा हँ ई मात्र नोक-झोंक तक रहबाक चाही, झगडा नै, नै तँ ऐसँ आगू जीवन नर्क भऽ जाइत छै। पति-पत्नीक बिचक आपसी सम्बन्ध नीक अछि तँ स्वर्गक कोनो जरुरी नै आ यदि सम्बन्ध नीक नै अछि तँ नर्कक कोनो आवश्यकता नै, ओइ अवस्थामे ई जीवने नर्क अछि।" सभ कियो एकदम चुप एकाग्रतासँ हुनक गप्प सुनैत। चुप्पीकेँ तोड़ैत बाबा आगू बजलाह- "रहल हमर आ तोहर माएक बिचक सम्बन्ध तँ ई बहुत पुरान गप्प छै, जखन हमर दुनूक विवाह भेल आ हम दुनू एक दोसरकेँ पहिल बेर देखलौं तखने हम तोहर माएसँ वचन लेलौं जे जखन हमर मोन तमसाए तँ ओ नै तमसेती आ जखन हुनकर मोन तमसेतनि तखन हम नै तमसाएब। बस ओ दिन आ आइ तक हमरा दुनूक बिच नोक-झोंक भेल झगड़ा कहियो नै।" चन्दन कुमार झा सद्गति अनहेर भऽ गेलै.... कोनाकेँ आब कटतै ओकर परिवारक दिन.....? कंठ लागल बेटी छै घरमे...... दूटा संतानमे बेटीए जेठ छै......कोना हेतइ ओकर बियाह? किशन.. असेसरक बेटा... चौदहे बरखक छै... कोना कऽ सम्हारतै घर? कोना करतै बहिनक बियाह? बेशी जथो-पात नै छै जे बेच लेत। पाँचे कट्ठा खेत छै। ओकरो यदि बेच लेत तखन खेतै कथी? अनेको प्रश्न.. अनेको मुँह... सगरो संवेदना... सगरो गाम एकहि टा बात.. जुलुम भऽ गेलै... भरल जुआनी मरि गेल असेसर......चालीसे बरखक अबस्थामे... नै जानि कोन बेमारी धेलकै.. ओह ....कन्नारोहट... नै देखल जाइछ किशुनमा मायक कानब ..हे भगवान... ई की भऽ गेलै? हाक-डाक छै...... के जेतै कठियारी...... एगारह गोटे हिम्मत कऽ कए विदा भेल। आगाँ-आगाँ किशन हाथमे आगिक कोहा नेने विदाह भेल... मुखाग्नि देलकै.. धधकि उठल अछिया.. कक्का .....हबोढकार भऽ कानए लागल किशुनमा हमरा कान्ह पर मूड़ी रखने। संतोष बान्ह..... नै भेल ऐसँ आगाँ किछु कहल हमरो.. कंठ बाझि गेल जेना। तीन दिन बीतल। बैसार छै आइ, कोना हेतै काज। गंगे कातमे बढ़िया हेतै- कहलिऐ हम। "नहि-नहि, ई ठीक नइ हेतइ"- चट दऽ कहलखिन्ह पढुआ कका। चुप भऽ गेल रही हम। "कनियाँ, अहाँ कोनो तरहक चिन्ता नै करू.. हमरा लेल जेहने हमर अप्पन बेटा-पुतोहु अछि तहिना अहूँ छी। हम करबै असेसरक श्राद्ध। ओकर श्राद्ध गामेमे हेतइ। अहाँक जतेक खर्च करबाक हो से करू। अहाँक जे केने संतोष भेटै से करू। कोनो तरहक बिथुति नै रहतै।" -असेसरक कनियाँकेँ कहलखिन्ह पढुआ कका। केबारक अढ़मे बैसलि किशुनमा माय आ दरबज्जापर बैसल किशन, किछु नै बाजल रहय। "हाँ-हाँ, नीक जेकाँ श्राद्ध तँ हेबाके चाही जइसँ मृतककेँ सद्गति प्राप्त हुअए।"- बजलथि पण्डित कका। पंचदान श्राद्ध आ दुनू साँझ सौजनियाँ होयब निश्चित भेल, एकादशा... द्वादशा... बड़.. बड़ी.. पचमेर.. बड्ड नीक काज भेलै। जेहने पवित्र असेसरक मोन रहै तेहने पवित्र काज भेलै। सभ सामग्री एक पर एक... जस दैत नोतहारी... सौँसे गाम। माछ-मौसक प्रात, आगाँ-आगाँ किशुन आ पाछाँ ओकर मायकेँ चौक दिससँ अबैत देख मोनमे शंका भेल। लग अबितहि पुछलिऐ- कतऽ सँ अबैत छह? "झंझारपुर सँ"- कहलक किशुन। मोनक शंका आर बढ़ि गेल। तखनहि पाछाँसँ पढ़ुआ ककाकेँ अबैत देख सभ शंका दूर भऽ गेल छल। -रजिस्ट्री आफिस सँ?... मुँह सँ बहरा गेल हमरा.. मूड़ी झुका लेलक किशुन.. किशुनक हाथमे झुलैत रसगुल्ला भरल पन्नी देख अनायास मुँहसँ बहरा गेल- "सद्गति भेट गेल असेसर केँ।" अनकर दुर्गति हाथमे झोड़ा नेने, मोने मोन किछो गुनधुनमे पड़ल हम बजार दिस चलि जाइत रही। एतबेमे हमर लंगोटिया भजार भुटकुन सोझाँमे आबि गेलाह। ओ बम्बमसँ घर घुमल छलाह। दहिना हाथमे अटैची रहैन्ह आ बामा कान्हपर बेश भरिगर बैग। नीक कमाइ छथि से सुनैत छलौं मुदा आइ हुनकर पहिरन-ओढ़न देख सबुत भेट गेल। लगीच अबितहि भरि पाँज पकड़ि लेलाह... की हाल-समाचार छौ रौ भजार.. बाप रे कतेक दिनुका बाद भेँट भेल अछि.. एह धन्य भऽ गेलौं.. बजलाह। हमरो मोन हुनकर ऐ मित्रता आ हमरा प्रति स्नेह देखि गद-गद भऽ गेल। पुछलियैन्ह ..की हाल छह.. बहुत दिनुक बाद गाम मोन पड़लह। बिहुँसैत बजलाह, काज-राजमे व्यस्त रहैत छी.. समये नै भेटैत अछि जे गाम आयब। ई तँ आठम दिन बियाह छी तँइ आबए पड़ल। हम पुछलियैन्ह- ठीके? ओ गंभीर होइत बजलाह- हँ, एहिठाम बगलेमे रखबारी... फेर पुछलाह- मुदा तोँ एना किए पुछलैह "ठीक्के"? हम कने अनमनस्क होइत बजलौं- नै, नै, अहिना। हमरा तँ बिसबासे नै भऽ रहल अछि... ओना ई साल बड्ड शुभ छै। देखहक ने। बिदेसराक सेहो बियाह भऽ गेलै। आब ओ हम्मर बात बुझि गेल रहए। बिहुँसैत बाजल- ऐ रौ, तुँ हमरा बुढ़ बुझैत छैह जे हमर गिनती ओइ पैंतालिस बरखक बिदेसरासँ करैत छैँ। हम हँसैत कहलियन्हि- नै...नै .. अरे हमरा कहने हेतै तँ हम तँ तोरा एखनो अहू पैंतिस बरखक अवस्थामे अठारह बरिखक छौड़ा कहबह। मुदा ई तँ गौआँ सभ कहैत रहैत छह। भुटकुन हँसैत बाजल- हाँ... हाँ.. ठीके कहबी छै ने जे अप्पन बियाह भऽ गेल तँ लगने खतम। हम कहलियैन्ह - नै.. नै। ई कहबी बिल्कुल गलत अछि। हमरा बुझने कोनो विवाहित व्यक्ति ई नै चाहैत हएत जे अनकर विवाह नै हुअए। भुटकुन आश्चर्यचकित होइत बाजल- से किएक? दोसरक दुर्गति के नै देखए चाहैत अछि?- हम कहलियैन्ह। ओ भभा कऽ हँसय लगलाह। ओमप्रकाश झा कपारक लिखल शर्माजीक आफिस शनि आ रवि सप्ताहमे दू दिन बन्न रहै छन्हि। आइ शनि छल। आफिस बन्न छल आ शर्माजी दरबज्जापर बैसल छलाह। तावत एकटा भिखमंगा दरबज्जापर आएल आ बाजल- "मालिक दस टाका दियौ। बड्ड भूख लागलए।" शर्माजी बजलाह- "लाज नै होइ छौ। हाथ पएर दुरूस्त छौ। भीख माँगै छैं। छी छी छी।" भिखमंगा बाजल- "यौ मालिक, पाइ नै देबाक हुअए तँ नै दिअ, एना दुर्दशा किए करै छी? हम जाइ छी।" ओकरा गेलाक बाद शर्माजी खूब बड़बड़यला। देशक खराप स्थितसँ लऽ कऽ भिखमंगाक अधिकताक कारण आ नै जानि की की, सभ विषयपर अपन मुख्य श्रोता कनियाँकेँ सुनबैत रहलाह। दुपहरमे भोजन कएलाक उपरान्त आराम करै छला की कियो गेट ठकठकाबऽ लगलै। निकलि कऽ देखैत छथि एकटा त्रिपुण्ड धारी बबाजी ठाढ छल। हिनका देखैत ओ बबाजी बाजऽ लागल- "जय हो जजमान। दरिभंगामे एकटा यज्ञक आयोजन अछि। अपन सहयोगक राशि पाँच सय टाका दऽ दियौक।" शर्माजी- "हम किए देब?" बबाजी- "राम राम एना नै बाजी। पुण्यक भागी बनू। फलाँ बाबू सेहो पाँच सय देलखिन्ह। अहूँ पुण्यक भागी हेबा लेल टाका दियौ।" शर्मा जी- "हमरा पुण्य नै चाही। हम नरक जाइ चाहै छी। अहाँ केँ कोनो दिक्कत? बड़का ने एला हमरा पुण्य दियाबैबला।" ओ बबाजी बूझि गेल जे किछु नै भेटत आ ओतएसँ पड़ा गेल। साँझमे शर्माजी लाउनमे टहलै छला। सामनेसँ तीनटा खद्दरधारी ढुकल आ हुनका प्रणाम कऽ कहलक- "विधान सभाक चुनाव छै। दिल्लीसँ फलाँ बाबू एकटा रैली निकालबाक लेल आबि रहल छथि। ऐमे बड्ड खरचा छै। अपनेसँ निवेदन जे दस हजार टाकाक सहयोग करियौ।" शर्माजी बिदकैत बाजलाह- "ऐ लाउनमे टाकाक एकटा गाछ छै। अहाँ सभ ओइमे सँ टाका झारि लिअ।" एकटा खद्दरधारी बाजल- "हम सभ मजाक नै कऽ रहल छी आ आइ कोनो बहन्ना नै चलत। टाका दियौ अहाँ। अहाँक बूझल अछि ने जे हमरे सभक पार्टीक सरकार छै। अहाँक बदली तेहन ठाम भऽ जाएत जे माथ धुनबाक अलावा कोनो काज नै रहत।" शर्माजी गरमाइत बाजलाह- "ठीक छै हम माथ धुनबा लेल तैयार छी। अहाँ सब जाउ आ बदली करबा दिअ। निकलै छी की पुलिस बजाबी?" खद्दरधारी सभ धमकी दैत ओतएसँ भागि गेल। रातिक तेसर पहर छल। शर्माजी निसभेर सुतल छलाह। एकाएक हुनकर निन्न ठकठक आवाजपर उचटि गेलन्हि। कनियाँकेँ उठा कऽ कहलखिन्ह जे कियो दरबज्जाक गेट तोड़ि रहल अछि। दुनू परानी डरे ओछाओनमे दुबकि गेलथि। तावत गेट टूटबाक आवाज भेलै आ टुटलहा गेट दऽ कऽ सात टा मोस्चंड शर्माजीकेँ गरियाबैत भीतर ढुकि गेल। सभ अपन मूँह गमछीसँ लपेटने छल। एक टाक हाथमे नलकटुआ सेहो छलै। बाकी दराती, कुरहरि, कचिया आ लाठी रखने छल। एकटा लाठी बला आबि कऽ हुनका जोरगर लाठी पीठ पर दैत कहलकन्हि- "सार, सबटा टाका आ गहना निकालि कऽ सामने राख। नै तँ परान लैत देरी नै लगतौ।" शर्माजी गोंगियाइत बजलाह- "हमरा नै मारै जाउ। हम हार्टक पेशेन्ट छी। ई लिअ चाबी आ आलमीरामे सँ सभ लऽ जाउ।" ओ सभ पूरा घर हसौथि लेलक। पचास हजार टाका आ दस भरी गहना भेटलै। फेर हिनकर घेंट धरैत डकूबाक सरदार बाजल- "तौं तँ परम कंजूस थीकैं। कतौ खरचो तक नै करै छैं। एतबी टाका छौ। सत बाज, नै तँ नलकटुआ मूँहमे ढुका कऽ फायर कऽ देबौ।" ई कहैत ओ नलकटुआ हुनकर मूँहमे ढुकेलक। ओ थरथर काँपैत बाजऽ लगलाह लैट्रिनक उपरका दूछत्ती मे दू लाख टाका आ बीस भरि गहना राखल छै। लऽ लिअ आ हमरा छोड़ि दिअ। सरदार दू जोरगर थापर दैत कहलकन्हि- आब लैन पर एले ने, आर कतऽ छौ बाज। शर्माजी किरिया खाइत बजलाह आब किछो नै छै बाबू, छोडि दिअ हमरा। डकैत सभ सभटा सामान समेटि कऽ विदा भऽ गेल। थोड़ेक कालक बाद हिम्मति कऽ कऽ ओ चिचियाबऽ लगलाह- "बचाबू, बचाबू डकूबा........।" अड़ोसी पड़ोसी दौगल एलथि। कियो पुलिस बजा लेलक। पुलिस खानापूर्ति कऽ कऽ चारि बजे भोरबामे चलि गेलै। शर्माजी अपन माथ पीटैत बाजै छलाह- "आइ भोरे सँ शनिक कुदृष्टि पड़ि गेल छल। कतेकोसँ लुटाइ सँ बचलौं, मुदा कपारक लिखल छल लुटेनाइ से लुटाइये गेलौं।" स्पेशल परमिट एक दिन सिनेमा देखबा लेल सिनेमा हाल सपरिवार गेल रही। ओतए सिनेमाघरक मैनेजर गाड़ीसँ उतरैत देरी स्वागतमे लागि गेल। ओ हमरा चिन्हैत छल। सिनेमा शुरू हएबामे किछु देरी छल। ओ हमरा अपन कक्षमे बैसा कऽ चाह-पान करबऽ लागल। सिनेमाक शो शुरू भेलाक बादो हालमे बीच बीचमे नाश्ता पानी पूछैत रहल। हमर छोटकी बेटी ई सभ अचरजसँ देखैत छल। सिनेमा समाप्त भेलाक बाद मैनेजर आदरपूर्वक हमरा गाड़ी तक अरियाइति देलक। डेराक बाटमे हमर छोटकी बेटी हमरा पुछलक- "पापा, ई मैनेजर अहाँक एतेक खातिर बात किए करै छल? ओतए तँ आरो लोक सभ छल, मुदा ककरो दिस ताकबो नै करैत छल।" हम बजलौं- "बेटी, अहाँ नै बूझब। हमरा स्पेशल परमिट अछि।" छोटकी बाजल- "तखन तँ अहाँकेँ आरो ठाम ई स्पेशल परमिट भेटैत हएत।" हम अपन बहादुरीमे कहलौं- "हाँ-हाँ, आरो ठाम भेटैए।" ऐपर छोटकी बाजल- "तखन काल्हिसँ हमरा अहाँ इसकूलक भीतर तक गाडीसँ छोड़ू। प्रसून नित्य गाडीसँ भीतर तक आबै छै आ बड्ड शान देखाबै छै। अहाँ तँ हमरा बाहरे गाड़ीसँ उतारि दै छी।" हम सकपकाइत बजलौं- "बेटी, प्रसून कलक्टरक बेटा अछि। कलक्टरकेँ हमरासँ पैघ स्पेशल परमिट भेटल छै। हमरा अहाँक इसकूलक स्पेशल परमिट नै भेटल अछि।" छोटकी रूसि गेल आ कहलक- "नै, अहाँ हमरा फूसि कहै छी। हमहुँ गाड़ीसँ इसकूलक भीतर तक जाएब।" हम आब ओकरा की बूझैबतिऐ। हम चुप रहि गेलौं। सन्दीप कुमार साफी जन्म ७ जून १९८४ पिता श्री सीताराम साफी, माता- श्रीमती सीता देवी, गाम- मेंहथ, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी। शिक्षा- बी.ए. (प्रतिष्ठा) मैथिली। अन्ध विश्वास -काकी गोर लगै छियनि, बैसथु। -के, उड़ीसावाली कनियाँ। -हँ काकी, निके रहै छथि? -की ठीक रहब कनियाँ, तैयो ठीक छी। बुढ़-पुरान भेलौं, हमरा सभकेँ तँ ई पुरबा हवा जान लेबऽ लगैए। सौँसे डाँर ठेहुन बातरससँ कनकनाइए। कोनो दवाइ नै काज करैए। -आबथु, बैसथु। एक तँ कतेक दिनपर भेँट भेलथियऽ। -नै कनियाँ। आँगनमे बड्ड काज छै। आइँ यै कनियाँ, भुखनो बच्चा आएल अछि? -हँ काकी, मरनीक बाबुओ एलखिन। -कनियाँ बच्चा सभ सेहो एलन्हि। -नै काकी। अखैन बच्चा सभक गरमीक परीक्षा चलै छै, तइ दुआरे ओकरा सभकेँ नै अनलिऐ। आब गर्मी छुट्टीमे सभ आम लिच्ची खाइ लए अबै छन्हि। -आँइ यै कनियाँ, मरनी तँ आब बियाहैवाली भऽ गेल हएत। -हँ काकी, ओकरे कतौ लड़का ताकै गेल छथिन। काकी माँथ केहेन लागै छनि। आबथु कनी तेल दऽ दै छियनि। -नै कनियाँ। आइ जाए दिअ, आउर दोसरो दिन आएब। -माँथ फहराइ छनि तेल बिनु। -से तँ ठीके कहै छी कनियाँ। हमर रुसना डिल्लीसँ हमरा लए एगो नवरतन तेल ठंढ़ाबला, पाँचटा साबुन नहाइ बला, दू किलो सर्फ पठा देलक, जे माय लगा आ जे किछु घटतौ तँ फोन करिहिएँ। ने अखैन कनियाँ रवि रायकेँ समय छै, भूसा गर्दा सभ माथमे भरि जाइत छै। -बड्ड गपशप केलौं कनियाँ, आब कनी जाए दिअ कनियाँ। -ठीक छै काकी जाथु। हमहूँ भानस करऽ जाइ छी काकी। काकी हिनका भनसा भऽ गेलनि। -नै कनियाँ। हमहूँ जाइ छी। कनीक पछुआरमे सँ भोरे अरिकौंछ तोड़लिऐ, तकरे चक्का बना कऽ झोरेबै, कनीक आमिल दऽ कऽ। तेहन हमर पुतोहु भेल कनियाँ जे अखैन तक दालि तरकारी नून से नून-जाउर बना दैए, कहियो अनूने। कहियो अन तीमन नीक नै बनबैए। कनियाँ अहाँकेँ नीक लगैए अरिकौंछ। -हँ काकी, हमरा सबकेँ ई कतऽ पाबी। -ठीक छै तऽ हम अपना छोटा नातिन दिया पठा देब बाटीमे। जाइ छी कनियाँ। … -बड़की दीदी, बड्ड गप्प सरक्का चलै छलै रुसना माएसँ। की बात छै, अहूँकेँ गुण जादू सिखबाक अछि की? -नै छोटकी। तोरा सभकेँ यएह पपियाहा मन सभ दिन मन खराप राखै छौ। -नै यै दीदी। एको महिना नै भेलै, सुगौनावालीकेँ देहपर पाँचटा देवी पठौने छलै। कतेक ओझा गुणी एलै, तखन जा कऽ कनीक अन्न-पानि खाए लगलैए। सभ कहै छै हकल डाइन छै। छोटका बेटाकेँ मारि कऽ सिखलकैए। -छोड़ ई सभ बात। तूँ सभ गामघरमे रहि कऽ अहिना सभकेँ डाइन आउर जोगिन कहै छिहिन। ई सभ अन्धविश्वास छिऐ। समाजमे ईएह सभ बातसँ झगड़ा होइत रहैए आउर एक दोसरकेँ डाइन कहैए। जवाहर लाल कश्यप (१९८१- ) पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा। हम्मर माय तोहर माय बेमार बुढ़ मायक ठीका अहीं लेने छी, औरो बेटा छन्हि ने, हुनकर कनियाँ सभ चैनसँ रहथि आ हम बुढ़ आ बच्चामे परेशान रहू। ई नै हएत। कनियाँक बात सुनि हम सोचलौं जे छोटकाकेँ फोन कऽ कहि देब जे मायकेँ छ महिना अपना लग राखि लहक, तोरो तँ माय छथुन्ह। तखने बचपनक एकटा बात मोन पड़ि गेल ,बच्चामे दुनु भाय झगड़ा करैत छलौं जे हम्मर माय- हम्मर माय आ आब ओकरासँ पिन्ड छोड़ा रहल छी तोहर माय- तोहर माय। अर्धसत्य (एकटा युवक इंटरभ्यु देबय लेल ऑफिसमे प्रवेश करैत अछि। अप्पन बायोडाटा ऑफिसमे बैसल व्यक्तिकेँ दैत छथि।) व्यक्ति: (बायोडाटा दिस देखैत) अहाँक नाम? युवक: देवकीनन्दन। व्यक्ति: केवल देवकीनन्दन आओर कोनो सरनेम नै? (ई कहि बायोडाटा पर नजरि गड़ा दैत छथि)। बायोडाटामे पिताक नाम नै अछि। केवल माताक नाम अछि देवकी ताहि कारण अहाँ देवकीनन्दन। युवक: जी हँ। व्यक्ति: मुदा पिताक नाम आवश्यक अछि। युवक: ईसामसीह केर माता मरियमकेँ सभ जनैत अछि। कृष्णक नाम देवकीनन्दन तखन हम्मर किए नै? व्यक्ति: ओ विशिष्ट व्यक्ति छथि। साधारण लेल पिताक नाम आवश्यक. . . युवक: (बीचमे टोकैत) हमरा पता अछि हम भारत मे रहि रहल छी, आर्यावर्तमे नै। व्यक्ति: हम नै बुझलौं अहाँ की कहए चाहै छी? युवक: आर्यावर्तक अर्थ आर्यजतिक लोकक रहयबला स्थान। चाहे ओ स्त्री हो वा पुरुष। ओइ समय समाजमे दुनुकेँ समान स्थान प्राप्त छल, दुनुमे कोनो भेद नै छल। कालांतरमे पुरुषवादी मानसिकता हावी भेल आ मातृभूमिक नाम एकटा पुरुष भरतक नामपर राखि देल गेल। (बीचमे साँस लेबए लेल रुकैत अछि) हमरा पता अछि, अहि तरहे जवाब देबाक कारण हमरा ई नौकरी नै भेट सकैत अछि। मुदा हम पूर्ण सत्यक स्थानपर अर्धसत्यकेँ स्वीकार नै कऽ सकैत छी। लहास सड़कक बीचो-बीच एकटा लहास राखल छै। ओ कोनो सुनसान बाट नै अछि, मोहल्लाक ओइ रोडपर कतेक रास दोकान आ घर अछि। किछु लोक ओइ लहासकेँ घेरने ठाढ़ अछि, आ बहुत लोक अगल-बगल ठाढ़ भऽ घटनाक अंदाज लगा रहल अछि। अंदाज कि लगाएत, सच तँ सभकेँ बुझले छै। मात्र एक घंटा पहिले ओकर हत्या रोडपर सभक सामने भेलै। चारि आदमी, कियो लाठी आ कियो रडसँ मारि रहल छल। ओ बचावमे हाथ उठेलक, ओकर हाथ तोड़ि देल गेलै। ओ भागैक कोशिश केलक, ओकर पएर तोड़ि देलकै। ओ अपाहिज भऽ लोकसँ गुहार केलक मुदा कियो नै आएल। सभ चारुकेँ चिन्हैत छल, ओ टुन्ना सिंहक आदमी छल आ ककरोमे ओकरासँ अराड़ि लेबाक हिम्मत नै छलै। ओ रोडपर खसि पड़ल। चारु रडसँ मारि ओकर कपार फाड़ि देलक। ओ चित्कार कऽ उठल, पूरा रोड खुने-खुनामे भऽ गेल। गोटेक सय आदमी देखि रहल छल, चारि टा हत्यारा ओकरा मारि रहल छल, मारने जा रहल छल आ तावत धरि मारलक जावत ओ मरि नै गेल आ गोटाक सय आदमी लहास बनि देखि रहल छल। भगवानक भाग्य हम आ हम्मर दोस्त चौक पर चाह पिबैत रही। बात पर बात चलैत रहै। कर्म आभाग्यपर बात चललै। कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा। तुलसी दासक पंक्ति कहि एकटा बुढा कर्मक प्रशंसा केलथि। हम्मर दोस्त कहलक- एकर मतलब अहाँ भाग्यकेँ नै मानै छी? नै- बुढ़ा कहलथि। दोस्त कहलक मानियौ वा नै, भाग्य तँ भगवानोक होइत छन्हि। अपनो गाममे एकटा हनुमानजी छथि जे पाखैर गाछ केर नीचामे बरखामे भीजैत, जाड़मे ठिठुरैत आ गर्मीमे अपस्याँत भेल रहै छथि। चाउरमे दुटा दाना चिनी मिला भोग लगै छन्हि। एकटा पटनामे हनुमानजीक मन्दिर अछि जिनका सवामन लड्डु एक दिनमे भोग लागैत छन्हि। हुनकर गप्प सुनि सब चुप भऽ गेलाह। गिद्ध बात बहुत छोट छलै, ढोराइक महीस भीमनाथ बाबुक जजात चरि गेलै। मुदा छोट बात छोट नै रहि गेलै। भीमनाथ बाबु क्रोधमे ढोराइकेँ मारि बैसलखिन्ह। हुनकर खाएल पील मजबुत शरीरक एक मुक्का कमजोर ढ़ोराइ नै सहि सकल आ मरि गेल। खेतक आरिपर ओकर लाश राखल अछि आ समग्र समाजमे हल्ला भऽ गेल। समाजमे बहुत लोक दुखी छल मुदा बहुत गिद्ध अप्पन अप्पन हिस्सा लेल जोर घटाव कऽ रहल छल। हरिश्चन्द्र झा अप्पन हिस्सा लेल कोर्टमे झुठ गवाही देबए लेल तैयार छल। महावीर यादव जे एरियाक दादा छल अप्पन हिस्सा लेल ढोराइक घरक लोकपर प्रेसर बनबए लेल तैयार छल जे केश नै कर। मुखियाजी अप्पन हिस्साले पंचायतमे केशकेँ रफा दफा करय लेल तैयार छथि। दरोगा रामप्रसाद बाबु अप्पन हिस्साले केश कमजोर करए लेल तैयार अछि। डाक्टर लक्ष्मी अप्पन हिस्साले पोस्टमार्टममे हेराफेरी करए लेल तैयार अछि। वकील मोहन बाबु अप्पन हिस्साले कोर्टमे दाँव पेँच देखबए लेल तैयार अछि। महामहिम जज महादेव बाबु अप्पन हिस्साले भीमनाथ बाबुकेँ बचाबए लेल तैयार छथि आर बहुत रास गिद्ध अप्पन अप्पन हिस्सा लेल जोर तोर कऽ रहल छथि। मिहिर झा १०० टाका ओइ साँझ जखन हम ऑफिससँ देर राति घर एलहुँ तँ हमर बेटा हमरा लग सटि कऽ आएल आ हमर हाथ अपन हाथमे लऽ कए पुछलक "पापा, अहाँक एक घंटाक दरमाहा कतेक अछि?" प्रश्न हमरा कनी अटपटा लागल लेकिन ध्यान देने बिना हम कहि देलिऐ- "१०० रुपय्या"। कनी काल गुम रहलाक बाद आ ओंगरीपर किछु जोड़लाक बाद ओ हमरा कहलक- "पापा, अहाँ हमरा ३० रुपय्या दऽ सकै छी?" ऑफिससँ थाकल ठहियाएल आएल छलौं, मोन पिता गेल। ओकरा हम बहुत जोरसँ बिगड़ि कऽ भगा देलिऐ। किछु कालक बाद जखन मोन ठंढाएल तँ ओकरा लग जा कऽ ३० टाका दैत पुछलिऐ जे कोन खिलौना किनबाक छौ। ओ कहलक जे एक मिनट रुकु। तकिया तरसँ ओ किछु मोचरल टाका निकालि गिनय लागल। हमरा ई देखि फेर सृंग चढ़ि गेल जे जखन ओकरा लग टाका छलै तँ हमरासँ किए मंगलक? तावत ओकर गिनती खतम भऽ गेलै आ ओ हमरा १०० टाका दैत कहलक- "पापा, ई लिअ अहाँ अपन एक घंटाक दरमाहा। काल्हि अहाँ ऑफिससँ एक घंटा पहिने आबि जाउ आ हमरा संग गेंद खेलाउ।" हमर मुँह फक्के रहि गेल। रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार मैथिलीक भिखारी ठाकुरक नामसँ प्रसिद्ध मैथिलीक पहिल जनकवि रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’क किछु गीत आ झारुक संग्रह "हमरा बिनु जगत सुन्ना छै" नामसँ प्रकाशित छन्हि। अल्लूक चुमौन निरमली बाजारसँ डेढ़ियापर पहुँचले रही कि दुनमाकाका पुछलनि- “झारू, बड़ चलती देखै छियह। कि बात छिऐ?” गोसाँइ डूमि गेल मुदा अन्हार नै भेल रहए। एक तँ नहेनौ ने रही से खौंत दैत रहए दोसर चाइनिक झमारसँ सेहो पस्त रही। विचार रहए जे नहा कऽ किछु खाएब तखने मन असथिर हएत। कहलियनि- “कक्का, बजारेसँ अबैमे अबेर भऽ गेल। बरियाती जेबाक अछि।” महिना अजमबैत दुनमाकाका कहलनि- “केकर?” कहलियनि- “अल्लू भायक।” “ओकरा तँ परोड़ियाहीवाली काकी छेबे करै तखैन दोहरा कऽ करत।” “नामे ले ने छन्हि। पकि गेलखिन किनेे?” “पकि गेने क्यो छोड़ि दइ छै?” “से कहलियनि। मुदा ओ मानैले तैयारे नै छथि। कहै छथि जे पुरूखक हड्डी छी किने। चमड़ा घोकचने कि हेतै। अखनो उसैन खोंइचा सोहि कोबीक महफामे बैसा दिअ। तखन जँ उन्नैस भऽ जाएब तब जे कहब मानि लेब।” प्रेमचन्द्र पंकज क्रमश: .... आइ दरमाहा बढ़ल रहनि। दरमाहा की बढ़तनि कप्पार। एक पाइ बढ़लनि दरमाहा, तीन पाइ बढ़लै महगी। सभ चीजक दाम अकास छूने छै। तखन? गुनधुन करैत ऑफिससँ डेरा एला। कपड़ा फेरलनि। सोफापर धम्मसँ बैस गेला। माथ भारी बुझेलनि। पंखा चला देलथिन। चाह पीबाक इच्छा भेलनि। चाह बनाबए कहलथिन। आँखि मूनि लेलनि। माथपर पंखा नाचि रहल छलनि। बेटी चाह लऽ कऽ पहुँचलनि। आँखि खुजलनि। बेटीकेँ देखलनि। बेटी बीस वर्षक भऽ गेलनि। अएँ, बीस वर्षक! आँखि उनटि गेलनि। सोफापर ओंघरा गेला। पंखा नचिते छै। नचिते रहतै? अखिलेश कुमार मंडल टीटनेस इजोरिया झलफलाइत रहए। कोइली कुचड़ए लगल कि बुधनीक नीन टुटल। इजोरिया झलफलाइत देखि बुधनीकेँ भेल जे आइ उठैमे अबेर भऽ गेल। मुदा तैयो धरफड़ाएल उठि कऽ बिछान समेटि अलगनीपर राखए लगलि आकि कपड़ा लागि गेलै। चारमे खोंसल हँसुआ बुधनीक माथेपर लटपटाइत गिरल। हाँसू भोंका गेलै। बुधनीक माथासँ फुच्चूका माइर खून बहए लगल। बुधनी बुदबुदाएल- “हे भगवान, कोन हमरासँ गलती भेल जे एतेक बरका दुख बुढ़ारीमे देलौं। मरब की जीअब आब घा जल्दी छूटत?” खूनसँ साड़ी भिजए लगल। मोनमे एलै जे आब बिदेशर(बेटा)केँ उठा दइ छिऐ। नै तँ किनसाइत होतसँ होतांग भऽ जेत्ते। बुधनी बिदेशरकेँ हाक दिअ लगलि- “रौ बौआ बिदेशर, उठ।” दुनू परानी एक्के हाकमे अकचकाइत उठल। घरेसँ बाजलि- “कि भेलौ माए?” “कनी एम्हर आ हँसुआ भोका गेल।” बुधनी कहलक। दुनू परानी करू तेल लैऐ कऽ आएल, सोचलक जे चोट बेसी लागल हेतै तँ ससारि देबै। मुदा बिदेशर देखलक, खूनसँ ओसरा पटल। माइयक साड़ी सेहो भीजल। मोनमे एलै जे माएकेँ बेसी हालत खराब अछि। से नै तँ डाक्टरकेँ बजौने अबै छी। बिदेशर पत्नीकेँ कहलक- “ताबे अहाँ माएकेँ देखभाल करू। हम डाक्डर बजौने अबै छी।” -कहि बिदेशर डाक्टर लग विदा भेल। डाक्टर बजौने आएल। बुधनीक घाउ देखि डाक्टर बजलाह- “बूढ़ी दिमागी जखन बेसी अछि, केना भेल।” बिदेशर तमसाइत बाजल- “बुढ़ियाकेँ भोरे उठैक आदति अछि। बिछान समेटि अलगनीपर राखए लगल आकि हाँसू माथेपर खसल।” गमैया डाक्टर मलहम-पट्टी कऽ देलक, टिटनेसक सूइयो नै देलक। मुदा िबदेशरकेँ कहलक- “घा छुटैमे बीस-पच्चीस दिन लागत। बाँतर-खोँतर किछु नै देबनि खाइले। नै तँ ऊनसँ दून भऽ जाएत।” बुधनी डॉक्टरक बात सुनि पथ-परहेज करए लागलि। बुधनीक घाउक जखम देखि बिदेशर कखनो काल तमशाइयो जाइ आ बजै- “कोन जरूरी रहै छलौ भोरे उठै कऽ।” मुदा कखनो काल आँखिमे नोर चलि अबै, कहुना छी तँ माए छी। तहुमे बुधनीक घाउ कखनो ब्लड प्रेशर जकाँ टीस मारै लगए। बिदेशर माइयक तबाही देखि भरि-भरि राति जगले रहै छलए। सात-आठ दिन भऽ गेल। बुधनीक घाउ दिनो-दिन बढ़ले चलि गेल। दुखेनाइ नै कम भेल। जहिना मनुखक संग मनुखक चालि नै छोड़ैत, तहिना बुधनीक संग कखनो दुखैनाइ नै छोड़ैत। बुधनी दसम दिनक बाद खेनाइ-पिनाइ पुरा तियागि देलक। बिदेशर कलहन्त होइत पहुँचल डॉक्टर लग। कहलक डॉक्टरकेँ- “डाॅक्टर सहाएब, माएक घाउ बढ़ले जा रहल अछि। दुखैनाइ कहियो कमे नै होइ छै। आब खेनाइ-पिनाइ सभटा तियागि देलक।” डॉक्टर फेर पहुँचलथि बुधनी लग। घाउकेँ बिस्तार भेल देखि डॉक्टर बाजलाह- “भोकेलहा हाँसू कनी देखाउ।” बिदेशर दौगल भनसा घरसँ हाँसू आनि कऽ देलक। हाँसू देखि डॉक्टर बजलाह- “बूढ़ीकेँ टिटनेस भऽ गेलनि।” बिदेशर बाजल- “डॉक्टर सहाएब हँसुआ देखि कऽ केना बूझि गेलिऐ। जे टिटनेस भऽ गेलै। हँसुआ कोनो मशीन छिऐ?” “नै बिदेशर हँसूआ मशीन नै छिऐ मुदा एेमे बीझ लागल अछि तँए टिटनेस पकड़ने अछि।” मैथिली विहनि कथाक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. तारानन्द वियोगीसँ मुन्नाजीक भेल गप्प-सप्प मुन्नाजी:अपनेकेँ सर्वप्रथम बाल साहित्यपर अकादेमी पुरस्कारक लेल बधाइ। अहाँ जहिया विहनि कथा लेखन प्रारम्भ केलौं मैथिली विहनि कथा कतऽ छलै, अहाँक विहनि कथा लेखन दिस कोना प्रवृत्ति जागल। तारानन्द वियोगी:हम जहिया विहनि कथा लिखब शुरू केने रही, एक विधाक रूपमे मैथिली विहनि कथाक कोनो मोजर नै रहै। ई बात जरूर छल जे छोट-छोट कथा सभकेँ विहनि कथा मानि कऽ “मिथिला मिहिर”क विशेषांक सेहो बहार भऽ गेल छल। अनियतकालीन पत्रिका सभमे छोट-छोट कथा सभ यदा-कदा प्रकाशित होइत रहैत छल। मुदा एकर सभक औकाति “बोझ परहक आँटी” सँ बेसी किछु नै छल। पत्रिका सभ, “मिथिला मिहिर” सेहो, ऐ कोटिक रचनाकेँ खाली बचल जगहकेँ भरबाक लेल “फीलर”क रूपमे उपयोग करै छल। कथाकेँ अंग्रेजीमे शॉर्ट-स्टोरी कहल जाइ छै। तकर शब्दानुवाद “लघु कथा” मैथिलीक विद्वान लोकनि, आलोचक लोकनिमे प्रचलित छल। आचार्य रमानाथ झा शॉर्ट-स्टोरीकेँ लघु कथा की कहि देलनि जे मैथिलीमे भेड़ियाधसान परिपाटी चलि पड़ल। ओहुनो भारतीय कथा-साहित्यक तुलनामे मैथिली कथाकेँ जँ देखबै तँ पाएब जे आकारक दृष्टिमे मैथिलीक कथा छोट होइत अछि। आचार्य लोकनिक मतेँ यएह भेल लघु कथा। तखन आइ जइ साहित्यकेँ अहाँ विहनि कथा कहैत छिऐक तकरा लेल मैथिली लगमे कोनो स्पेस नै छलै। ने साहित्यमे, ने विद्वान लोकनिक मगजमे। विभिन्न देशी-विदेशी विहनि कथा सभकेँ यत्र-तत्र पढ़ैत-गुनैत हमरा कथा आ विहनि कथाक पार्थक्यक अवगति भेल। हम देखलौं जे ई दुनू रचना विधामे ने मात्र आकारमे, अपितु उत्स, स्वभाव आ प्रभावमे सेहो एक दोसरासँ सर्वथा भिन्न अछि। मैथिलीक भंडार दिस ताकलौं तँ देखल जे अनेक वरेण्य साहित्यकार जानैत-अनजानैत ऐ क्षेत्रमे किछु सर्जनात्मक काज कऽ गेल छथि। हमरा सभसँ पहिने ई जरूरी लागल जे विहनि कथा विधाक संरचना, स्वरूप आ स्वभावपर किछु बात स्पष्ट करी। ऐ सन्दर्भमे हम कएकटा लेख लिखलौं। स्वयं हम मूलतः एक सृजनात्मक लेखक छी, तेँ अपनहुँ विहनि कथा लिखऽ लगलौं। तइ समय (१९८३-८५) मे हम “कोसी-कुसुम” पत्रिकाक संग जुड़ल रही। बातकेँ स्पष्ट आ जगजिआर करबाक लेल हम “कुसुम”क एक विशेषांक विहनि कथापर सम्पादित कएल। बादमे “हालचाल”क संग जुड़लहुँ, तँ ई क्रम आर आगू बढ़ल। मुन्नाजी:विहनि कथाक स्वभाव की अछि? ओइ सन्दर्भमे मैथिली विहनि कथा कतऽ देखाइए? कथाकार-कवि लोकनि विहनि कथा रचना आन्दोलनक प्रारम्भमे जुड़लाह मुदा समयान्तरे हुनकर ऐ सँ दूर होइत गेनाइ की प्रदर्शित करैत अछि? तारानन्द वियोगी:विहनि कथा आत्यन्तिक रूपमे एक “प्रो-एक्टिव” विधा थिक। ओहुनो अहाँ देखबै जे, जे रचना जतेक सरल आ संप्रेषणीय होइत अछि, ओकरा पाछू लेखककेँ ओतबे बेसी परिश्रम करऽ पड़ै छै। विहनि कथाक तँ एतेक “सेन्सिटिव” मिजाज होइ छै जे एक वाक्य जँ अहाँ फालतू लिखि गेलौं तँ ओ दूरि भऽ जाइत अछि। एतेक परिश्रम के करत, जँ करत तँ तइमे निरन्तरता कोना बनौने राखि सकत? एखनो अहाँ देखिते छिऐक जे एक सुव्यवस्थित विधाक रूपमे विहनि कथाकेँ मैथिलीमे प्रतिष्ठा नै भेटि सकलैक अछि। फल अछि जे लोक दोसर-दोसर विधामे, जे प्रतिष्ठित अछि आ जइसँ ओकरा सहज रूपेँ स्वीकृति भेटि सकैक, तइमे कलम अजमबैत छथि। यएह मुख्य कारण भेल जे लेखक लोकनि विहनि कथा-लेखनमे निरन्तरता नै बनौने राखि सकलाह। विहनि कथापर केन्द्रित एक पत्रिका जँ मैथिलीमे हो तँ ऐ स्थितिकेँ पार कएल जा सकैत अछि। हमर अप्पन स्थिति अछि जे चहुँ दिस हमरा काजे-काज देखा पड़ैत अछि, अपन सक्क भरि तकरा सभकेँ सम्हारबाक, स्थिति स्पष्ट करबाक, जतबा जे प्रतिभा अछि तदनुरूप एक मानदंड गढ़बाक काजमे लागल रहैत छी। अहाँ सभ आगू बढ़ब तँ निश्चिते हमरा संग लागल पाएब। मुन्नाजी:२०म सदीक अन्तमे अहाँ सभ (प्रदीप बिहारी सेहो) मैथिली विहनि कथाक संग्रह आनि अपन निश्सन उपस्थिति दर्ज केलौं, मुदा कथा आलोचक द्वारा एकरा निङ्गेश बुझि टारि देल गेल, एकर की प्रमुख कारण छल? तारानन्द वियोगी:देखू मुन्नाजी, हमरा सभक पीढ़ी बहुत संघर्ष कऽ कए आगू बढ़ल अछि। पुरातनपंथी लोकनि सेहो हमरा सभक विरुद्ध आ कम्यूनिस्टकेँ सेहो हमरा सभसँ दुश्मनी। साहित्यमे नवाचार दुनूकेँ समान रूपेँ नापसिन्द। एहना स्थितिमे किनकासँ हम मोजर मांगब आ के हमरा मोजर देताह? मैथिली आलोचना बहुतो तरहेँ अनेक सीमासँ घेराएल रहल अछि। ऐ कारणेँ बहुतो लोक एकरा अविकसित धरि कहैत छथि। ऐ सीमा सभक अतिक्रमण आब शुरू भेल अछि। हमहूँ थोड़े काज “कर्मधारय”मे आ आनो ठाम केलौं अछि। हमरा पीढ़ीमे प्रदीप बिहारी विहनि कथा लिखलनि, देवशंकर नवीन, विभूति आनन्द लिखलनि। शिवशंकर श्रीनिवास, अशोक, रमेश लिखलनि। हिनका सभक रचनाकेँ आइ पढ़ब तँ अहाँकेँ आक्रोश हएत जे तइ दिनमे किएक ने एकरा बूझल-गुनल गेलै? खएर, जे भेल से भेल। आइ आरो सघनता-गम्भीरताक संग काज करबाक बेगरता छै। अहाँ सभ आब उल्लेखनीय काज करब तँ अवश्ये मोजर हएत। बदलल परिस्थितिक अहसास अहूँ सभकेँ जरूरे होइत हएत। मुन्नाजी:२१म सदीक प्रारम्भमे मध्यम पीढ़ीक रचनाकार द्वारा ठाढ़ कएल आधारकेँ आगू करैत नव पीढ़ी एकरा जगजियार कऽ रहल छथि। अहाँ एकर वर्तमान दशा आ आगूक दिशा मादे की कहब? तारानन्द वियोगी:विहनि कथाक क्षेत्रमे गम्भीरताक संग काज करएबला लोकक अखनो अभाव छै, से हमरा प्रतीत होइत अछि। किनकहुँ एक रचना जँ सुन्दर देखैत छियनि तँ लगले दोसर रचना औसतसँ नीचाँक देखा पड़ि जाइत अछि। एना किए होइ छै? स्पष्ट अछि जे बोध आ श्रमक मानक ओ लोकनि बनौने नै राखि पाबि रहल छथि। दोसर बात जे हमरा जरूरी लगैत अछि- भने बत्तीसे पेजक किएक ने हो- प्रत्येक रचनाकारक एक संग्रह जरूर एबाक चाही। कोनो उत्साही लोक ऐ दिस सचेष्ट होथि तँ विहनि कथापर एक लेखन-कार्यशालाक आयोजन कएल जाए। तात्पर्य जे सांस्थानिक उत्साहक संग ऐ दिशामे काज करबाक बेगरता छै। मुन्नाजी:मैथिलीये विहनि कथा सन पंजाबीक “मिन्नी कथा”, ओड़ियाक “क्षुद्र कथा”, तमिलक “निमिषा”, मलयालमक “क्विन्तेर” राष्ट्रीय स्तरपर स्थापित होइत देखाइए मुदा मैथिली ऐ पगपर अन्हराएल सन? एकर पाछाँ की कारण अछि, वा कमी अछि? तारानन्द वियोगी:मैथिलीमे मानक काजक अभाव नै छै, आ ने भाषामे वा भाषाकर्मी लोकनिमे क्षमताक अभाव छै। सांस्थानिक रूपसँ थोड़बे दिन काज कऽ कए देखियौ ने, भारतीय साहित्यक उपवनमे मैथिली विहनि कथाक फूल सेहो तेहने भकरार लागत जेना पंजाबी, उड़िया वा मलयालमक। मुन्नाजी:जहिना अहाँ सभकेँ (अहाँ आ बिहारीजी केँ) उपेक्षित रखबाक प्रयास भेल, तहिना आइयो कथालोचक द्वारा नवका पीढ़ीक ऊर्जावान रचनाकार वा विहनि कथाक प्रति समर्पित रचनाकारक कोनो नोटिस नै लेल जा रहल अछि। ऐमे कोनो कुटीचालि अछि वा आर किछु? तारानन्द वियोगी:ऐ प्रश्नक उत्तरमे हम दूटा बात कहब। पहिल तँ ई कहब जे के लेत अहाँक नोटिस? ककरा मोजर देने अहाँ मोजरबला लोक हएब? एतेक विवेकी आ क्रान्तिदर्शी लोक अहाँकेँ के देखाइत छथि? हम तँ साँच-साँच कहै छी मुन्नाजी जे हमरा एहन लोक क्यो नै देखाइत छथि। पहिने गुलामीक समय रहै तँ महाराज दरभंगाक मोजर देने राताराती लोक मोजरबला भऽ जाइ छला। आब ई भिन्न बात छै जे ऐ भ्रममे महाराजक विवेकसम्पन्नता जिम्मेवार होइ छल आकि कोनो आन स्वार्थ? साहित्य अपन स्वभावेसँ क्रान्तिकारी होइत अछि, जँ ओ वास्तवमे एक सही साहित्य हो। एहेन साहित्य किछु लेबाक लेल नै अपितु सदैव देबाक लेल लिखल जाइत अछि। दोसर बात हम ई कहब जे अहाँ मोजर वा नोटिसक ख्याल केने बिना काज करू। कोनो सार्थक रचना जँ कलमसँ बहराए तकर संतोषकेँ सेलिब्रेट करू जे “जइ धरतीक अन्न-तीमन खेलिऐ तँ ओकरा लेल काजो केलिऐ”। ओना ईहो कहि दी जे हमरा सभक लेखनारम्भ कालमे जतेक कुहेस आ जाली पसरल रहै, तइमे आब बहुत परिवर्तन भेलैए। आलोचनोक परिदृश्य बदललैए आ पाठकक व्याप्ति सेहो बढ़लैए। इन्टरनेट तँ ऐमे कमाल केने अछि। मुन्नाजी:वर्तमानमे रचनाकार सबहक मैथिली विहनि कथाक प्रति रुझानक बादो मैथिलीक विभिन्न समिति-संस्थाक प्रतिनिधि सबहक एकरा प्रति विरोध की दर्शाबैए? मैथिली विहनि कथाकेँ आर समृद्ध करबा लेल आर की सभ काज कएल जाए? मैथिली विहनि कथाक भविष्य की देखैत छी? एकरा स्थापित करबा लेल कोनो विशेष रुखि? तारानन्द वियोगी:विहनि कथाक भविष्य हम बहुत नीक देखै छी। मैथिली विहनि कथाक सेहो। अहाँ पुछब जे तकर कारण? कारण ई नै जे लोक आब बड्ड व्यस्त भऽ गेलैए तेँ छोट रचना बेसी पठनीय साबित भऽ सकत। वास्तविकता तँ ई अछि जे एखनो दुनियाँ भरिमे सभसँ बेसी उपन्यासे विधाक रचना पढ़ल जा रहल अछि। विहनि कथाक भविष्य वस्तुतः एकर स्वभावक कारणेँ उज्जवल छै। ऐमे निहित व्यंग्य आ मार्मिकता आजुक सन्दर्भमे अति प्रासंगिक अछि। आजुक लोकक संवेदना क्षमता जइ हिसाबे भोथ भेल अछि, एक सही विहनि कथाक ओज ओकर ओंघी उतारि सकैत अछि। देवशंकर नवीन विहनि कथा लेखनमे अवरोधक तत्व विहनि कथा साहित्य-पदार्थक एहन परमाणु अछि, जइमे ओकर सभटा भौतिक आ रासायनिक गुण उपस्थित रहै छै, आ परमाण्विक स्थितिमे ओकर रासायनिक प्रभाव तीक्ष्णतर भऽ जाइ छै। विहनि कथा जादूक एहन औँठी अछि जे पाठकक मानस-पटलसँ टक्कर लैत देरी ओकर निश्चेष्ट मानसिकताकेँ क्रियाशील कऽ दैत अछि, भोथर सम्वेदनाकेँ सक्रिय बना दैत अछि। विहनि कथा चरित्र-चित्रण, कथोपकथन, कथानक सन पूर्णाहारक बदलामे विटामिनक गोली अछि, जे सम्पूर्ण ऊर्जासँ युक्त होइत अछि। वास्तविकतामे शब्द स्वयं महत्वपूर्ण नै होइत अछि, महत्वपूर्ण अछि ओकर प्रयोग-प्रक्रिया। प्रयोगक आधारपर शब्द अपन अर्थ-ग्रहण करैत अछि। विहनि कथा मूल रूपसँ व्यंग्य ध्वनित करैत अछि। अस्तु एकर वाक्यमे शब्दक प्रतीकात्मक प्रयोग विशिष्ट अस्मिता रखैत अछि। ऐ अर्थमे ऐमे शब्द-विधान अहम् भऽ जाइत अछि, मुदा तकर कोनो मानक सीमा नै छै। रचनाकारक शब्द-विधाने एकर मानक सीमा अछि। तइ द्वारे हम कहि सकै छी जे विहनि कथा, कथाक अपेक्षा कवितासँ बेसी लग अछि। आकारमे लघु भेलाक बादो एकर व्यंजना विराट होइत अछि। गानल-गूथल शब्दमे जीवनक सभटा विद्रूपताक एहन प्रस्तुति विहनि कथा अछि जकर रंग शीसापर सेहो जमल बिना नै रहि सकैत अछि। व्याकरण जौँ भाषा आ साहित्यक आचार-संहिता अछि, तँ विहनि कथाक आचार-संहिता खाली ‘शब्द’ अछि। शब्दक सहयोगसँ रचल जीवनक विद्रूपताक प्रतीक चित्र, सएह विहनि कथा अछि। विहनि कथामे मूल रूपसँ ‘कथ्य’ आ ‘शब्द’ क बड़ महत्ता होइत अछि। एकर संहितामे भाषा-विधान लेल कोनो विशेष स्थान सुरक्षित नै छै। शास्त्र-पुराणादिमे एकर उत्स स्पष्ट देखाइत अछि मुदा तकर बादो विहनि कथाक वर्तमान तेवर, विशुद्ध रूपसँ आधुनिक सभ्यता-संस्कृति आ बदलैत साहित्यिक प्रतिमानक प्रतिफल अछि। ओना तँ स्रोत ताकी तँ विष्णु शर्मा विरचित पंचतन्त्र वा फेर गुणाढ्यक बड्डकहा आकि आर पाछू जाइ तँ वेदमे वर्णित उपदेशपरक उपकथामे एकर सूत्र बड्ड सरलतासँ भेटैत अछि। काव्य-विषयक प्राचीनतम विधानमे एकरा लेल अलगसँ कोनो स्थान नै राखल गेल छल। तइ कारणसँ ओइ सभ पारम्पारिक काव्य कसौटीपर एकर परीक्षण नै भऽ सकैत अछि, एकरा लेल नव समीक्षा शास्त्रक निर्माण अपेक्षित अछि। विहनि कथा-लेखन एकटा खतरनाक वृत्ति अछि। ‘सतर्कता गेल आ दुर्घटना भेल’ क फार्मूला ऐपर पूर्णतः लागू होइत अछि। दुर्घटना माने असफलता आकि उत्थरपना। एकर बाद संयोजनमे सेहो पर्याप्त कलात्मकताक आवश्यकता होइत अछि। ऐ कलात्मकताक कमजोरीसँ एकर प्रभावोत्पादकता चल जाइत अछि आ फेर विहनि कथा अपन मूल उद्देश्यसँ भटकि जाइत अछि। विहनि कथा-लेखनकेँ बहुत रास लोक द्वारा सिनेमामे आओल फैशनक रूपमे अपनाओल गेल अछि। औकाति होअए वा नै, जे ई युगक फैशन भऽ गेल अछि से लोक हास्य-कणिका लिखि कऽ सेहो ओकरा विहनि कथा कहि दै छथि। आ से ऐ अत्याधुनिक मुदा खतरनापूर्ण विधा लेल बड्ड मोश्किलक गप अछि। एकरासँ बचबाक बड्ड जरूरति अछि। लिखबाक कला नै होअए तँ ई काज नै करबाक चाही। नकलची लेखकसँ विहनि कथाकेँ भयंकर नोकसान ई भेल जे ढेर रास लोक आइ हास्य-कणिका आ लुघकथामे अन्तर नै कऽ पबैत छथि। एत्ते धरि जे बहुत रास पाठक सेहो एहने सन मनःस्थिति बना लेने छथि, से विहनि कथाक स्वर किछु रूपमे भटकि-सन गेल अछि। तैयो बहुत-रास नीक-नीक विहनि कथा आबि रहल अछि। साओनक बेंग सन टर्रा कऽ बिलाइत लोकक संख्या कोनो विधामे कखनो कम नै रहल, से जौँ विहनि कथा-लेखनमे सेहो एहने भऽ रहल अछि तँ कोनो आश्चर्य नै। नीक विहनि कथाक पाठकीयता आ सम्प्रेषणीयता समएक संग गहींर होइत जाएत। साहित्यक कोनो अंशक मान्यता आ स्थापना ओकर ‘प्रकाशन’ आ ‘समीक्षा’ पर निर्भर अछि। विहनि कथाक प्रकाशन तँ क्रमसँ खूब भऽ रहल अछि, मुदा ऐपर आलोचनाक साहित्यक अत्यन्त अभाव अछि। ओना तँ किछु साहित्यिक ठेकेदार ऐपर आलोचनाक कऽ अत्याचार सेहो केने छथि। एहन आलोचना विहनि कथाक विस्तार लेल स्वास्थ्यकर नै अछि। मिला-जुला कऽ विहनि कथाक सम्भावना, स्वरूप आ विस्तारसँ आश्वस्त भेल जा सकैत अछि। ई विधा क्रमसँ जड़ि धेने जा रहल अछि। बेंग सभक आ शौकिया आलोचकक संग एकर उपेक्षा सेहो आस्ते-आस्ते मेटाइत जाएत। निश्चयेन ऐपर नीक-नीक आलोचना सेहो लिखल जाएत। विहनि कथा लेखन बीजगणितक हिसाब नै अछि जे हल कएल एकटा उदाहरण देखि कऽ दोसर सवाल बनि जाएत। 2 46
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विंविह मैथिली विंहनिं Onell विदेह-सदेह ४, विदेह www.videha.co.in Tet (अंक 49-900) 4, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ विहनि कथाक एकटा समानान्तर संकलन a ae . LF 3 ASS a Si Re Whe {af f ey Groh Reo =a ois) Ge Aa Ree hi eee Paes | weaned दर ् न / We ES) 20 eA. Na rnd ed eS i Veer पे yi se ७-6 a y [4 0 cy हक ak Sy ee a . | Ow. i कि 7 at SF ae Ay 4 SF | = , ay INAS PEAS = 5 DPE ea | AO J | ; ee i Ae व किन ee: ~ SD Ag As SON Opa ar 2 Sf, a 4 — Pe ak ll विंदेह-प्रथम मैथिली पाशिक ई-पत्रिका ता —— a ISSN 2229-547X VIDEHA an सम्पादक: THT ठाकुर। सह-सम्पादकः उमेश मण्डल। | > सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्राजी (मनोज कुमार कर्ण) भाषा-सम्पादन: APS कुमार झा आ पउ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा... तप सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक-नाटक-रंगमंच-चलचित्र: बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद: पूनम मंडल आ प्रियंका झा. ब्ल्ल न ae सम्पादक-अनुवाद विभाग: विनीत उत्पल। हे &
| au कवर आ बैक चित्र श्वेता झा चौधरी TS ‘Gq (J = oy, e a 5 C \ Yb = # a Wey i a श्रुति प्रकाशन a कार्यालय: 6/29, J] राजेन्द्र नगर, दिल््ली-११०००८ FEAT: (099) २४८८६६४६-४७ BHA: (०११) २४८५८६६४८ website: http://www.shruti-publication.com E-mail: shruti.publication@shruti-publication.com aes a 50/- US $25