1 2 ISSN 2229-547X विदेह मैथिली लघुकथा (विदेह-सदेह ६, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक ५१-१००) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ लघुकथाक एकटा समानान्तर संकलन) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मण्डल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक: नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद: पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग: विनीत उत्पल। श्रुति प्रकाशन ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रतिएवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नहिकएल जा सकैत अछि। ISBN : 978-93-80538-64-8 ISSN: 2229-547X मूल्य : भा. रू. १००/- संस्करण : २०१२ © श्रुति प्रकाशन श्रुतिप्रकाशन रजिस्टर्ड आॅफिस : ८/२१, भूतल, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- ११०००८. दूरभाष- (०११) २५८८९६५६-५८ फैक्स- (०११) २५८८९६५७ Website : http://www.shruti-publication.com e-mail : shruti.publication@shruti-publication.com Printed at : Ajay Arts, Delhi-110002 Typeset by : Umesh Mandal. Distributor : Pallavi Distributors, Ward no-6, Nirmali (Supaul). मो.- ९५७२४५०४०५, ९९३१६५४७४२ Videha Maithili Laghu Katha : Anthology of Maithili Short Stories. अनुक्रम गजेन्द्र ठाकुर- गद्य साहित्य मध्य लघुकथाक स्थान आ लघुकथाक समीक्षाशास्त्र मीना झा- ब्रेस्ट कैंसर रोशन जनकपुरी- अग्निपुष्पक गुच्छासब महाप्रकाश- संभावना वसंत भगवंत सावंत- (कोंकणी कथा): मृत्युकेँ टारब बीनू भाइ- उत्ताप शम्भु कुमार सिंह- भाए-बहिनक व्यथा कथा दुर्गानन्द मण्डल- लाल भौजी वीरेन्द्र कुमार यादव- हमर समाज उमेश मण्डल- अमैआ भार नन्द विलास राय- बाबाधाम/ ऐना सुजीत कुमार झा- एकटा अधिकार सन्तोष कुमार मिश्र- मुसीबत– कामिनी कामायिनी- टुटल तारा राज नाथ मिश्र- मस्ती असगर वजाहत- (हिन्दी कथा) हम हिन्दू छी अतुलेश्वर- बसात योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’- देववाणी कुमार मनोज कश्यप- नोरक दू ठोप सतीश चन्द्र झा- हमहूँ कहाँ बुझलिऐ डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- प्रकृति सुन्दरि आ चूहर मिस्त्री/ चन्दा सत्यनारायण झा- रिटायरमेन्ट/ पलट बचेश्वर झा- संगति कपिलेश्वर राउत- थरथरी/ तरकारी/ सलाह मनोज कुमार मंडल- घासवाली अनमोल झा- अबकी बेर फतंग/ गामक बताह शिव कुमार झा- लेबर पेन/ कब्जियत दूर भगाउ प्रभात राय भट्ट- रोटी रोजीक खोजी शम्भुनाथ झा “वत्स”- अतीतक घटना/ सपना/ कोसीक प्रलयंकारी बाढ़िमे भाँसल एकटा लड़कीक सत्यकथा किशन कारीगर- दाम-दिगर पंकज कुमार प्रियांशु- जीवनक अनमोल क्षण नवीन ठाकुर- मिथिला उवाच ओमप्रकाश झा- सफल अधिकारी/ डीहक जमीन / बुढिया मैयाँ/ लोकतन्त्रक माने अमित मिश्र- प्रेम नै जहर छै राजदेव मंडल- एलेक्सनक भूत गजेन्द्र ठाकुर- दिल्ली जगदीश प्रसाद मण्डल- सूदि भरना/ पड़ाइन/ न्याय चाही/ कर्ज आशीष अनचिन्हार- काटल कथा विनीत उत्पल बेसिक इंस्टिंक्ट कुमार भास्कर लछमिनीया
गजेन्द्र ठाकुर गद्य साहित्य मध्य लघुकथाक स्थान आ लघुकथाक समीक्षाशास्त्र मैथिलीमे दीर्घकथाकेँ सेहो कखनो-काल उपन्यास कहल जाइए। दीर्घकथामे जीवनक किछु पक्षक विस्तारसँ चर्चा होइत अछि मुदा लघुकथामे से पलखति लेखककेँ नै भेटैत छै। मुदा विहनि कथासँ बेशी पलखति तँ एतऽ रहिते छै। मैथिलीक लेखक आब गाम आ नग्र, देश आ विदेशमे रहैत छथि। प्रस्तुत संग्रहमे कथाक विषय वस्तुक विविधता मैथिलीक लेखकक सभ वर्गक वातावरणक प्रतिनिधित्व करैत अछि। मिथिलाक वातावरणक अतिरिक्त प्रवासी मैथिलक संघर्ष आ समस्या लघुकथाक लेल एकटा फराक समीक्षाशास्त्रक खगतापर ध्यान आकर्षित करैए। लघुकथा समीक्षाशास्त्र: मैथिली लघुकथा बुच्ची दाइ आ कनियाँ काकीसँ बहुत आगाँ बढ़ि गेल अछि। पुरान समस्या अछि, मुदा नव रूपमे। मैथिली लघुकथा ऐ नव समस्याकेँ रेखांकित करैत अछि। एतए नारीवाद (फेमिनिज्म), उत्तर आधुनिक अब्सर्डिटी, हास्य व्यंग्य, कथ्य आ शिल्पक संतुलनक माध्यमसँ लघुकथाकेँ गढ़ल जा रहल अछि। शब्दावलीक संतुलित प्रयोगसँ विषयक जड़ि धरि लेखक पहुँचि रहल छथि। गतिशीलता, उद्योगीकरण, स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद नवीन राज्यक राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्या परिवर्तन आ एकीकरणक प्रक्रिया, ई सभ कखनो काल परस्पर विरोधी अछि। सामुदायिकताक विकासमे मनोवैज्ञानिक आ शैक्षिक प्रक्रियाक महत्व छै। मिथिलाक गाममे व्यक्तिक प्रतिष्ठा अखनो स्थान-जाति आधारित अछि तँ प्रवासमे ओ प्रतिष्ठा ऐ सभ कारणसँ कखनो काल उनटि जाइत अछि। स्त्री-स्वातंत्र्यवाद आ महिला आन्दोलन मिथिलामे आ प्रवासमे अलग-अलग तरहक अछि। विधि-व्यवस्थाक निर्धन आ पिछड़ल वर्गकेँ न्याय दिअएबामे प्रयोग होएबाक चाही, मुदा से नै भऽ सकल, कारण न्याय ओतेक सुलभ नै। मुदा राजनैतिक समीकरण, जे चुनाव सभ पाँच सालमे बनबैत अछि, से ई काज कऽ रहल अछि। मार्क्सवाद सामाजिक यथार्थक ओकालति करैत अछि। फ्रायड सभ मनुक्खकेँ रहस्यमयी मानैत छथि। ओ साहित्यिक कृतिकेँ साहित्यकारक विश्लेषण लेल चुनैत छथि तँ नव फ्रायडवाद जैविकक बदला सांस्कृतिक तत्वक प्रधानतापर जोर दैत देखबामे अबैत अछि। नव-समीक्षावाद कृतिक विस्तृत विवरणपर आधारित अछि। उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कऽ विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्दात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। आइ-काल्हिक “डिसकसन” वा द्वन्द जइमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (विशेष कए षडदर्शनक- माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य) खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहिसँ विद्यमान छल। से इतिहासक अन्तक घोषणा कएनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कएने छलाह, किछु दिन पहिने ऐसँ पलटि गेलाह, कारण हुनकर पहिने सोचब रहन्हि जे रूसक कम्यूनिज्म खतम भेलाक बाद आब एक्केटा विचारधारा रहत से विचारक संघर्षक अन्त माने इतिहासक अन्त भेल; मुदा आब ओ कहै छथि जे अखनो सत्ता आ वंचितक विचारधारा अलग-अलग अछि आ तँइ विचारधाराक संघर्ष जारी रहत आ इतिहासक सेहो अन्त अखन नै हएत। उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भऽ अपन अस्तित्व बचेने अछि। साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्दात्मक प्रणाली जेकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत। कोनो लघुकथाक आधार मनोविज्ञान सेहो होइत अछि। लघुकथाक उद्देश्य समाजक आवश्यकताक अनुसार आ ओकर यात्रामे परिवर्तन समाजमे भेल आ होइत परिवर्तनक अनुरूपे होएबाक चाही। मुदा संगमे ओइ समाजक संस्कृतिसँ ई कथा स्वयमेव नियन्त्रित होइत अछि। आ ऐमे ओइ समाजक ऐतिहासिक अस्तित्व सोझाँ अबैत अछि। उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टिकोण- विज्ञानक ज्ञानक सम्पूर्णतापर टीका, सत्य-असत्य, सभक अपन-अपन दृष्टिकोणसँ वर्णन, आत्म-केन्द्रित हास्यपूर्ण आ नीक-खराबक भावनाक रहि-रहि खतम होएब, सत्य कखन असत्य भऽ जाएत तकर कोनो ठेकान नै, सतही चिन्तन, आशावादिता तँ नहिए अछि मुदा निराशावादिता सेहो नै, जे अछि तँ से अछि बतहपनी, कोनो चीज एक तरहेँ नै कएक तरहेँ सोचल जा सकैत अछि- ई दृष्टिकोण, कारण, नियन्त्रण आ योजनाक उत्तर परिणामपर विश्वास नै, वरन संयोगक उत्तर परिणामपर बेशी विश्वास, गणतांत्रिक आ नारीवादी दृष्टिकोण आ लाल झंडा आदिक विचारधाराक संगे प्रतीकक रूपमे हास-परिहास, भूमंडलीकरणक कारणसँ मुख्यधारसँ अलग भेल कतेक समुदायक आ नारीक प्रश्नकेँ उत्तर आधुनिकता सोझाँ अनलक। विचारधारा आ सार्वभौमिक लक्ष्यक ई विरोध केलक मुदा कोनो उत्तर नै दऽ सकल। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स देरीदा भाषाकेँ विखण्डित कऽ ई सिद्ध केलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नै लगा सकैत छी। आ संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास होएबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास। प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नै, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि। विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। ऐसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल। प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्य-अहि मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओइसँ पृथक ओ किछु नै अछि, स्वतंत्र होएबा लेल अभिशप्त अछि (सार्त्र)। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देल गेल। मूलतत्व जतेक गहींर हएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग। क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित कएने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकतासँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप, अन्दाजसँ निश्चित करए पड़ैत अछि। तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक “अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम” सोझे भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कऽ रहल अछि कारण ऐसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आएल अछि।जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकताकेँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जे सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नै पहुँचि सकब। लघुकथाक समक्ष ई सभ वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आएल अछि। होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करए पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत। पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नै वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नै होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा अपन विशिष्ट अर्थ नै होइत अछि। आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल। मुदा फेर नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आएल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावाद आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आएल। ई सभ आधुनिक विचार-प्रक्रिया प्रणाली ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल। पाठमे नुकाएल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लंगुएज गेम। आ ऐ सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आएल पोस्टमॉडर्निज्म। कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जइमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कऽ ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नै कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ ऐ वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरोसँ ठीक नै होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लऽ ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट! पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठनकेँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माण नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नै मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ, विखंडित भए सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था। मिकेल फोकौल्ट कहै छथि - ज्ञान आ सत्य बनाओल जाइत अछि। डेलीयूज आ गुटारी कहै छथि जे हम सभ इच्छा ऐ द्वारे करै छी कारण हम सभ इच्छा मशीन छी। मिकाहिल बखतिन भाषाकेँ सामाजिक क्रियाक रूपमे लै छथि। रूसक रूपवादी साहित्यकेँ मात्र भाषाक विशिष्ट प्रयोग मानै छथि। जीन फ्रान्कोइस लियोटार्ड कहै छथि- सत्यक आ इतिहासक सत्यता मात्र आभासी अछि। बौड्रीलार्ड कहै छथि- विज्ञापन आ दूरदर्शन सत्य आ आभासीक बीच भेद मेटा देने अछि। दुनू उत्तर आधुनिकताक मुख्य विचारक छथि। लाकानक विशेषता छन्हि जे ओ फ्रायडक पद्धतिक भाषिकी अनुप्रयोग केलन्हि अछि। ओ कहै छथि जे अचेतनताक संरचना भाषा सन छै। जखन बच्चा भाषा सीखैए तखन ओकरा एकटा चेन्ह लेल एकटा शब्द सिखाओल जाइ छै। इच्छा, त्रुटि आ आन ई तीनटा तथ्य लाकान नीक जकाँ राखै छथि। इच्छा आवश्यकता आ माँगनाइ दुनू अछि मुदा एकरा ऐ दू रूपमे विखंडित नै कएल जा सकैत अछि। आनक वर्णनमे त्रुटि आ रिक्तता अबैत अछि। विषय अर्थक क्षणिक प्रभाव अछि आ ई आन सन हएत जखन ई आभासी हएत आ त्रुटिक कारण बनत, जइसँ इच्छाक उदय हएत। उत्तर उपनिवेशवादक तीन विचारक छथि- होमी भाभा (फोकौल्ट आ लाकानसँ लग), गायत्री स्पीवाक (फोकौल्ट आ डेरीडासँ लग) आ एडवर्ड सईद (फोकौल्टसँ लग) जे उपनिवेशवादीक पूर्वक धूर्तताक, शिथिलता आदिक धारणाक लेल कएल गेल कार्य आ सिद्धांतीकरणक व्याख्या करै छथि। रेमण्ड विलियम्सक संस्कृतिक अध्ययन साहित्यक आर्थिक स्थितिसँ सम्बन्ध देखबैत अछि। नव इतिहासवाद इतिहासक शब्दशास्त्र आ शब्दशास्त्रक ऐतिहासिकताक तुलना करैत अछि। इलाइन शोआल्टर महिला लेखनक मानसिक, जैविक आ भाषायी विशेषताकेँ चिन्हित करै छथि। सिमोन डी. बेवोइर नारीक नारीक प्रति प्रतिबद्धतामे वर्ग आ जातिकेँ (जकर बादक नारीवादी सिद्धांत विरोध केलक) बाधक मानै छथि। वर्जीनिया वुल्फ नारी लेखक लेल आर्थिक स्वतंत्रता आ निजताकेँ आवश्यक मानै छथि। हिनकर विचारकेँ क्रान्तिकारी नै मानल गेल। मेरी वोल्स्टोनक्राफ्ट नारी शिक्षामे क्रान्ति आ औचित्यक शिक्षाकेँ सम्मिलित करबापर जोर देलनि। नव समीक्षा- इलिएट कवितामे भावनाक प्रधानताक विरोध कएल आ एकरा गएर वैयक्तिक बनेबाक आग्रह केलनि। समीक्षकक काज लोकक रुचिमे सुधार करब सेहो अछि। विमसैट आ वर्डस्ले कहलनि जे कविक उद्देश्य वा ऐतिहासिक अध्ययनपर समीक्षा आधारित नै रहत। ई पाठकपर पड़ल भावनात्मक प्रभावपर सेहो आधारित नै रहत कारण से सापेक्ष अछि। ओ आधारित रहत वास्तविक शब्दशास्त्रपर। फिलिप सिडनीसँ अंग्रेजी समीक्षाक प्रारम्भ देखि सकै छी- ओ कविताकेँ सौन्दर्य, अर्थ आ मानवीय हितमे देखलन्हि। जॉन ड्राइडन- प्राचीन साहित्यमे नैतिक प्रवचनपर आ एकर लाभ-हानिपर विचार केलनि। सैमुअल जॉनसन सेक्सपिअरक नाटकमे हास्य आ दुखद तत्वपर लिखलन्हि। रूसोक रोमांशवाद मनुक्खक नीक होएबापर शंका नै करैए (क्लासिकल समीक्षक शंका करै छथि मुदा नव-क्लैसिकल कहै छथि जे मानव स्वभावसँ दूषित अछि मुदा संस्था ओकरा नीक बना सकैए) मुदा संगे ई कहैए जे संस्था सभ दूषित अछि आ मात्र दूषित लोकक मदति करैए। आधुनिक स्थितिवाद (साहित्यक अवस्थितिपर कोनो प्रश्न चिन्ह नै) पर संरचनावाद प्रहार केलक आ तकरा बाद लेखक स्वयं लिखल टेकस्टक विश्लेषण करबाक अधिकार गमेलक। उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्य ओइसँ आगाँक वस्तु अछि जे संरचनावाद बुझै अछि। उत्तर-संरचनावादक एकटा प्रकार अछि उत्तर आधुनिकता। उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्यमे संरचना संस्कृति आ सिद्धान्त मध्य कार्य करैत अछि जत्तऽ किछु भाव आ सोच वंचित अछि जे निरन्तरताक विरोध करैए। विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकता उत्तर संरचनावादक बाद आएल। उत्तर उपनिवेशवाद उपनिवेशक नव रूपकेँ नै मानैए आ अव्यवस्थाक सिद्धांत जेना असफल उद्देश्यकेँ उचित परिणाम नै भेटबाक कारण मानैए। संरचनावाद दमित करैबला पाश्चात्य व्यवस्था आ समाजपर चोट करैए आ ऐ सँ मार्क्सवादकेँ बल भेटलै (अलथूजर)। आधुनिकतावादी-स्थिवादी, नव समीक्षा, संरचनावाद आ उत्तर संरचनावादक बाद विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकतावाद आएल जकरा विलम्बित पूँजीवाद कहल गेल (फ्रेडरिक जेनसन)। अठारहम शताब्दीमे आधुनिक माने छल जड़विहीन मुदा बीसम शताब्दीक प्रारम्भमे एकर अर्थ प्रगतिवादी भऽ गेल। १९७० ई.क बाद आधुनिक शब्द एकटा सिद्धांतक रूप लऽ लेलक से उत्तर-आधुनिक शब्द पारिभाषिक भेल जकर नजरिमे लौकिक महत्वपूर्ण नै रहल। आधुनिक काल धरिक सभ जीवन आ इतिहास अमहत्वपूर्ण भेल आ खतम भेल। ई सिद्धांत भेल इतिहासोत्तर, विकासोत्तर आ कारणोत्तर। सत्य आ आपसी जुड़ावक महत्व खतम भऽ गेल। जादुइ वास्तविकतावाद जइमे वास्तविक स्थितिमे जादुइ वस्तुजात घोसिआओल जाइत अछि। रचनाकार ऐ तरहक प्रयोग कऽ वास्तविकताकेँ नीक जकाँ बुझबाक प्रयास करै छथि। उत्तर आधुनिक पाश्चात्य बुर्जुआ दृश्य-श्रव्य मीडियाक प्रयोक कऽ असमता, अन्याय आ वंचितक अवधारणाकेँ मात्र शब्द कहै छथि जे समता, प्राप्ति आ न्यायक लगक शब्द अछि। गरीबी जे पाश्चात्यमे समस्या नै अछि से आइ भारतमे पैघ समस्या अछि। उत्तर आधुनिकता नारीवादक आ मार्क्सवादक विरोधमे अछि आ एकर नारीवाद आ मार्क्सवाद विरोध केलक अछि। जेना ऐतिहासिक विश्लेषणक पक्षमे मार्क्सवाद अछि आ ओइसँ ओ अपन सिद्धांत फेरसँ सशक्त केलक अछि, संरचनावाद-उत्तर-संरचनावाद आ उत्तर आधुनिकतावादक परिप्रेक्ष्यमे। मार्क्सवाद लौकिक पक्षपर जोर दैत अछि मुदा तेँ ई उपयोगितावाद आ चार्वकक दर्शनक लग नै अछि, कारण उपयोगितावाद आ चार्वकवाद मात्र शारीरिक आवश्यकताकेँ ध्यानमे रखैत अछि। नारीवादी दृष्टिकोण सेहो उत्तर आधुनिकतावादक यथास्थिवादक विरोध केलक अछि कारण यावत से खतम नै हएत ताधरि नारीक स्थितिमे सुधार नै आओत। प्लेटो- प्लेटो कहै छथि जे कोनो कला नीक नै भऽ सकैए किए तँ ई सभटा असत्य आ अवास्तविक अछि। प्लेटोक ई विचार स्पार्टासँ एथेंसक सैन्य संगठनक न्यूनताकेँ देखैत देल विचारक रूपमे सेहो देखल जएबाक चाही। सम्वाद दू तरेहेँ भऽ सकैए- अभिभाषण वा गप द्वारा। गपमे दार्शनिक तत्व कम रहत। डेरीडाक विखण्डन पद्धति ऊँच स्थान प्राप्त रचना/ लेखक केँ नीचाँ लऽ अनैत अछि आ निचुलकाकेँ ऊपर। रोलेण्ड बार्थेस लिखै छथि जे जखन कृति रचनाकारसँ पृथक भऽ जाइए आ ओकर विश्लेषण स्वतंत्र रूपेँ होमए लगै छै तखन कृति महत्वपूर्ण भऽ जाइए जकरा ओ रचनाकारक मृत होएब कहै छथि। उत्तर-संरचनावाद संरचनावादक सम्पूर्ण आ सुगठित हेबाक अवधारणाकेँ माटि देलक। सौसरक भाषा सिद्धान्त- बाजब/ लिखब, वास्तविक समएक साहित्य वा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यक शब्दशास्त्र, महत्वपूर्ण कोनो कृति वा मनुक्ख अछि, महत्ता एकटा भाव अछि, वास्तविक समएमे भाषा वा एकर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य; मुदा एकरा सेहो डेरीडाक विखण्डन सिद्धान्त उल्टा-पल्टा करए लागल। लिंग एकटा जैव वैज्ञानिक तथ्य अछि मुदा महिला/ पुरुषक सिद्धान्त सामाजिकताक प्रतिफल अछि। महिला सापेक्ष साहित्य कला पुरुष द्वारा निर्मित अछि आ पुरुखक नजरिसँ महिलाकेँ देखैत अछि। साहित्यक नारीवादी सिद्धान्त ऐ समस्याक तहमे जाइए। मिथिलाक सन्दर्भमे महिलाक स्थिति ओतेक खराप नै छै मुदा मैथिली साहित्यक एकभगाह प्रवृत्तिक कारण उच्च वर्गक नारीक खराप स्थिति साहित्यमे आएल। आधुनिकीकरण तथाकथित सामाजिक रूपसँ निचुलका जाति सभमे सेहो नारीक स्थितिमे अवनति अनलक अछि। दोसर एकटा आर गप अछि जे जाति आ धर्म नारीक अधिकारकेँ कएक हीसमे बाँटि देने अछि। नारीवादी दृष्टिकोण सेहो कहैए जे सभटा सिद्धांत पुरुष द्वारा बनाओल गेल से ओ सिद्धांत पूर्ण व्याख्या नै कऽ सकैए। सरल मानवतावाद सिद्धांतक विरुद्ध आएल मुदा ई सेहो एकटा सिद्धांत बनि गेल। सार्थक साहित्यक निर्माण एकर अन्तर्गत भेल। अत्यधिक आलोचनासँ बचबाक चाही। समीक्षककेँ अपन विद्वत्ता प्रदर्शनसँ बचबाक चाही। अत्यधिक आलोचनाक क्रममे लोक अपन विद्वता देखबऽ लगै छथि। आलोचनाक क्रममे संयम रखबाक चाही, खराप शब्दावलीक प्रयोग समीक्षकक खराप लालन-पालन देखबैत अछि। लघुकथाकेँ बिना पढ़ने समीक्षा अनैतिक अछि। उदाहरणस्वरूप कर्मधारयमे धूमकेतु लघुकथा “नमाजे शुकराना”क विषयमे तारानन्द वियोगी लिखै छथि- मिथिलाक संस्कृतिमे युग-युगसँ प्रतिष्ठापित साम्प्रदायिक सौहार्दकेँ रेखांकित करैत हिनक कथा “नमाजे शुकराना” बहुत महत्वपूर्ण थिक। (कर्मधारय, पृ. १२७) (!) लघुकथाक शीर्षक देखि कऽ ऐ तरहक समीक्षा भेल अछि कारण ऐ कथामे हाजी सैहेबक नमाजक समएमे पिंजराक सुग्गा “सीता...राम...।” बजैए आ सुग्गाक पिंजराकेँ हाजी सैहेब ताधरि महजिदक देबालपर पटकै छथि जाधरि सूगा मरि नै जाइए। सईदा कानऽ लगैए आ कथा खतम भऽ जाइए। आ ई कथा समीक्षकक मतमे साम्प्रदायिक सौहार्दकेँ रेखांकित करैए! समीक्षककेँ अति प्रशंसासँ सेहो बचबाक चाही। ई देखाओल जएबाक चाही जे ऐ विषयपर लिखल आन लघुकथासँ ई कोन रूपेँ भिन्न अछि, कोना ई रिक्त स्थलक पूर्ति करैए, ऐमे की-की छै आ ओइ विषयपर लिखल आन लघुकथासँ एकर तुलना हेबाक चाही। लघुकथाक सीमित विस्तारकेँ ध्यानमे राखि समीक्षा हजार शब्दमे हेबाक चाही। समीक्षा सम्बन्धित लघुकथाक हेबाक चाही लेखकक नै। लेखकक दोसर रचनाक विश्लेषणसँ समीक्षाकेँ भरब नीक समीक्षा नै, जे ऐ सभ लघुकथाक समीक्षित लघुकथासँ कोनो सोझ सम्बन्ध हुअए तखने ओकर प्रयोग करू। मिथिलाक विविध संस्कृति आ इतिहासकेँ देखैत –मैथिली साहित्यक एकभगाह स्थिति विशेष रूपमे- व्यक्तिगत आक्षेपक आ जिला-जबारकेँ ध्यानमे रखबाक सेहो परम्परा रहल अछि। जाति-धर्म आ क्षेत्रीयता मैथिली भाषा समीक्षामे कम्मे अबैए मुदा दोस-महीमक आधारपर नीक वा अधलाह समीक्षाक प्रवृत्ति वा आग्रहक भयंकर प्रभाव समीक्षकक मध्य छन्हि। कोनो खास समीक्षासँ ओइ लघुकथापर प्रकाश पड़ैए वा नै से देखू। ई तँ नै अछि जे ओ समीक्षा लेखकपर टिप्पणी कऽ रहल अछि वा लेखकक आन रचनापर- गहींरमे जाएब तँ बूझि जाएब जे समीक्षा लघुकथा पढ़ि लिखल गेल छै आकि नै। आलंकारिक भाषाक दिन गेल, शब्दक सटीक प्रयोग करू, अनावश्यक शब्द आ पाँतीकेँ निकालू। आत्मकथात्मक लघुकथाक समीक्षा लेल लेखकक जिनगीपर प्रकाश दऽ सकै छी। लघुकथा समीक्षामे महिला विरोधी वा जाति-क्षेत्रक बन्हनसँ बान्हल मानसिकताकेँ दूर राखू। लघुकथाक वातावरण निर्माणसँ लेखक आगाँ बढ़ैत छथि, ओकर पात्र सभक विवरण, लघुकथाक प्रारूप आ तकरा लेल लोकक आ परिस्थितिक वर्णन। ऐ मेसँ कोनो एक टा पक्ष लऽ कऽ सेहो अहाँ लघुकथा लिख सकै छी। कोनो कृति कोना उत्कृष्ट अछि आ ओइमे की छुटि गेल अछि से समीक्षककेँ देखबाक चाही। ओकर मूल्यांकन एकभगाह नै हेबाक चाही, ओइ रचनामे की संदेश नुकाएल छै, लेखक कोन दिस निर्देशित कऽ रहल अछि से समीक्षककेँ बुझबाक आ लिखबाक चाही। लघुकथाक मुख्य धाराकेँ चिन्हित करबाक चाही। अपन विचारधाराकेँ समीक्षित लघुकथापर आरोपण नै होएबाक चाही। ओइ लघुकथाक आजुक समयक सन्दर्भमे की आवश्यकता अछि से देखाउ। ओइ लघुकथाक महत्ता कोन रूपमे अछि से देखाउ, ओकर मुख्य तत्व चिन्हित करू। लेखकक जीवन दर्शन, वास्तविक, काल्पनिक आ आदर्शक सम्बन्धमे ओकर दृष्टि आ संदेहकेँ चिन्हित करू। लेखकक लेखनशैलीक कलात्मक पक्ष, ओकर गप कहबाक क्षमता, रचनाक ढाँचा आ ओकर विभिन्न भागकेँ जोड़बाक कलाक चर्चा करू, जेना नीक कमार ठोस आ कलात्मक पलंग बनबैत अछि, तँ दोसर कमारक जोर मात्र ठोस हेबापर होइ छै आ तेसरक कलात्मकतापर, तहिना। सिद्धान्तक आवश्यकता की छै? सरल मानवतावाद कहैए जे साहित्यक सिद्धान्तक बदलामे रचनाक की मानवीय दृष्टिकोण छै, ओइमे सार्थकता छै आकि नै से सामान्य बुद्धिसँ कएल जा सकैए। अपन बुद्धिक प्रयोग कऽ रचनाक गुणवत्ता अहाँ देखि सकै छी, कोनो साहित्यिक सिद्धान्तक आवश्यकता समीक्षा लेल नै छै। मैथिलीक किछु सर्वश्रेष्ठ लघुकथा: मीना झाक ब्रेस्ट कैंसर, एकटा एहेन समस्यापर अछि जे महिलाक समस्या थिक आ कोनो महिले एहेन मनोवैज्ञानिक विश्लेषणयुक्त कथा ऐ विषयपर लिखि सकै छलथि। मुदा कोनो महिलो ऐ विषयपर आइ धरि लघुकथा नै लिखने छलीह। पत्नीक ब्रेस्ट कैंसर ऑपरेशनक बाद पतिक मनोदशाक विवरण सटीक भेल अछि। रोशन जनकपुरी वंचितक संघर्षक प्रत्यक्ष गवाही प्रस्तुत करै छथि जे दोसर रूपमे जगदीश प्रसाद मण्डल सेहो आनै छथि, आ महाप्रकाश सेहो एकरा एकटा लघुकथाक कथाक माध्यमसँ कहै छथि। वसंत भगवंत सावंतक कोंकणी कथा रोजी रोटीक जीवनक भावनात्मक जीवनसँ संघर्षक कथा थिक, आ एहने कथा प्रभात राय भट्ट नव फराक परिवेशमे ओइसँ बेशी दर्दसँ कहै छथि। बीनू भाइ विश्लेषणक मास्टर छथि आ शब्दावलीक प्रयोगसँ सम्बन्धित वौस्तुजात विचारकेँ फरिछाबै छथि। शम्भू कुमार सिंह मैथिलीक स्थितिपर लिखै छथि तँ अनमोल झा, सत्यनारायण झा आ ओमप्रकाश झा गाम घर, नोकरी चाकरी आ घर-बाहरक चर्च करै छथि। जँ प्रेम कथाक चर्च करी तँ दुर्गानन्द मण्डलक लाल भौजी, सुजीत कुमार झा क एकटा अधिकार, कैलाश कुमार मिश्रक चन्दा, पंकज कुमार प्रियांशुक जीवनक अनमोल क्षण, अमित मिश्रक प्रेम नै जहर छै, कामिनी कामायिनीक टुटल तारा आ राजनाथ मिश्रक मस्ती सोझ रूपमे प्रेमकथा अछि मुदा ई सभ एक दोसरासँ भिन्न हास्य, गम्भीरता, सामन्तवादकेँ अपना तरहेँ सेहो चिन्हित करैत अछि। असगर वजाहत दंगाक समस्यापर टिप्पणी करैत छथि तँ राजदेव मण्डल एलेक्शपर आ वीरेन्द्र कुमार यादव, सतीश चन्द्र झा, अतुलेश्वर सेहो सामाजिक समस्याक विभिन्न पक्षपर चर्च करैत छथि। उमेश मण्डल, नवीन ठाकुर, किशन कारीगर, शिव कुमार झा आ बचेश्वर झा व्यंग्यकेँ नव दिशा दऽ रहल छथि। नन्द विलास राय आ कपिलेश्वर राउत व्यंग्य आ समस्याकेँ शब्दक जादूगरीसँ पहिने मिज्झर करै छथि आ फेर फराक करै छथि। सन्तोष कुमार मिश्रक कथा मुसीबत आ आशीष अनचिन्हारक काटल कथा उत्तर आधुनिक अब्सर्डिटीक उदाहरण अछि। योगेन्द्र पाठक “वियोगी” परम्परा आ आधुनिकताक द्वन्द्वक ओझरीमे ओझरा जाइ छथि (देववाणी)। मनोज कुमार मण्डल घासवाली लघुकथामे स्त्री-संघर्ष लिखै छथि आ शम्भुनाथ झा “वत्स” स्त्रीक संघर्षकेँ बाढ़िक विभीषिका संग जोड़ि अविस्मरणीय कथा कहि जाइ छथि। मैथिली लघुकथामे आएल कथ्य आ शिल्पकक विशालता आह्लादकारी अछि। मीना झा जन्म स्थान: दरभंगा, शिक्षा: बी.ए (मैथिली ऑनर्स फर्स्ट क्लास), १९७६; एम. ए (फर्स्ट क्लास) १९८० कार्य अनुभव: १९८२-१८८७ रा. रा.कैम्पस, जनकपुर (नेपाल) मैथिली विभागमे व्याख्याता, प्रकाशन: मैथिलीक विभागाध्यक्ष स्वर्गीय डॉ धीरेश्वर झा धीरेन्द्रक प्रेरणासँ पहिल निबंध नेपाक पत्रिका "सिंहावलोकन" मे प्रकाशित भेल। वर्तमान: पति डॉ. अरुण कुमार झा तथा पुत्र द्वय संगे सन १९८७ सँ इंग्लैंडमे निवास, आ ओइठाम अपन बच्चा सभक संगे आन आन मैथिल बच्चा सभकेँ सेहो मैथिली भाषा आ संस्कारक प्रति जागरूकता उत्पन्न करवामे प्रयत्नशील। Mithila Cultural Society, UK क २०११ वार्षिक अधिवेशनक प्रमुख अतिथि डाक्टर श्रीमती शेफालिका वर्माक प्रोत्साहन पाबि पुन: मैथिलीमे लिखब प्रारम्भ केलनि। ब्रेस्ट कैंसर लन्दनक थेम्स नदीक पश्चिम किनारपर नवनिर्मित सेंट थोमस अस्पतालक पाँचम मंजिलपर कैंसर वार्ड रहै। खिड़की लगक कोनाबला बेड रहनि मनोरमा सिंघक। खिड़कीक पैघ शीशासँ मनोरमाक आँखि बिग बेनक पैघ घड़ीपर अटकल छलनि। सूर्यास्तक समयमे सूरजक किरण बिग बेनकेँ मनोरम बना रहल छल मुदा मनोरमाक आँखि ऐ मनोरम दृश्यक आनंद नै लऽ घड़ीक सुइपर लागल छल जे आब ६ बाजि ३५ मिनट देखा रहल छल। हुनकर पति सुरेश आ जौंवा बेटी रश्मि आ किरणकेँ तँ अखन तक आबि जाइ कऽ चाही छलन्हि। पति अपन न्यूज एजेंटक दोकान साढ़े ५ तक बंद कऽ दैत छथिन आ बेटी सभ सेहो स्कूलसँ आबि जाइत छन्हि। ६ बजे नर्स हुनका रातुक भोजन दऽ गेलनि, ओ नै खयली, ओ अपन परिवार संगे भोजन करए चाहैत छलीह। कैंसर वार्डमे १२ टा बेड रहै, पुरुख आ स्त्रीगनक वार्ड अलग-अलग। स्त्रीगनक वार्डक सभटा बेड भरल रहै। ओना सबहक बेडक चारू कात हरियर पर्दा लागल रहै, तैँ के की कऽ रहल छल से नै पता चलै। नर्स मनोरमाक टेबलसँ भरल प्लेट लऽ गेलन्हि आ आइसक्रीम दऽ गेलन्हि। आब आइसक्रीम सेहो पिघलि कऽ चुबय लागल, जेना मनोरमाक आँखिसँ नोर। मनोरमा पिछला ३ सालमे १३ बेर अस्पतालमे भर्ती भेल छथि। जखने दर्द तेज होइन्ह वा उलटी नै रुकन्हि, अस्पतालमे भर्ती भऽ जाथि। कखनो कोनो समय ९९९ नंबर घुमाबथि, अम्बुलेंस लेबय लेल आबि जानि। ओहू दिन किछु एहिना भेल रहै। मनोरमा अपन पतिक पसंदक भोजन मकइक रोटी आ सरिसौंक साग बनौने छलीह। दुनु बेटी भोजन कऽ बैठकमे टीवी देखि रहल छलन्हि आ पति देव मुँह हाथ धोअ लेल बाथरूममे गेल छलखिन्ह। एम्हर मनोरमा दुकान बंद होबय कऽ आवाज सुनिते टेबलपर २ टा थारीमे सरिसोंक साग हरियर मिर्चीक संगे, २टा कटोरीमे दही दऽ तवाकेँ चूल्हापर राखि मकइक रोटी हाथपर गोल-गोल घुमाबऽ लगलीह। तवा गर्म होइते रोटी राखि देलखिन्ह। अपन पसंदक लाल रंगक सलवार कुरता पहिरने मनोरमा चूल्हा लग ठाढ़ छलीह, मुदा हुनकर आँटा लागल दहिना हाथ रोटीकेँ उनटाबय लेल उठि नै रहल छलन्हि। अचानक हुनका दहिना छातीमे दर्द उठल जे बाहींसँ होइत हाथ धरि पहुँचि गेल। दर्दसँ छटपटा उठलीह मनोरमा। भानस घर सौंसे धुँयासँ भरि गेलै, स्मोक अलार्म बजै लागल। घरक सभ लोक भानस घर दिस दौड़लाह। रोटीसँ धधरा निकलि रहल छल। मनोरमा अपन बामा हाथसँ दहिना हाथ पकड़ने चिचिया रहल छलीह। ओही दिन अम्बुलेंस संगे फायर ब्रिगेड सेहो आएल छल। ३ बरख पहिने मनोरमाकेँ कैंसर डैगनोस भेल रहनि, बामा ब्रेस्टमे, जे ६ मासक इलाजक बाद ठीक नै भेलन्हि, तैँ डॉक्टरकेँ हुनकर ब्रेस्ट काटि हटाबय पड़लन्हि, जइसँ शरीरक आर भागमे कैंसरक कीटाणु नै फैलैक। मुदा हुनका रेडिओ थेरापी भेलन्हि आ कतेक तरहक दवाइ सेहो खाइत छलीह, तइ सभसँ कैंसर कण्ट्रोलमे छलन्हि। नव दवाइ आ दवाइक खुराकमे फेर बदल कएलापर साइड इफेक्ट बढ़ि जाइत छलन्हि तैँ अस्पतालक बेर-बेर चक्कर लगाबय पड़ैत छलन्हि। ऐबेर ओ तेरहम बेर अस्पतालमे भर्ती भेल छलीह। डॉक्टर सबहक अथक प्रयासक बादो मनोरमाक दहिना ब्रेस्टमे सेहो कैंसर भऽ गेल रहनि। हुनकर सबहक सलाह रहैक जे दवाइसँ ठीक नै हएत। ओइ लेल ओपरेसन मात्र उपाय अछि। मनोरमा बड्ड असमंजसमे छलीह। ओपरेसन करा लेने हुनका किछु दिन आर जिनगी भेट जयतनि मुदा की ओ जिनगी मृत्युसँ कम भयावह हेतन्हि। मनोरमा लेल निर्णय लेब बहुत कठिन लागि रहल छलन्हि। जौँ ओ ओपरेसन नै करौतीह तँ कैंसर सौंसे शरीरमे पसरि जेतन्हि आ जौं करौतीह तँ हुनकर स्त्रीत्व समाप्त भऽ जेतन्हि। मोनमे उथुल-पुथल मचल छन्हि। पहिल बेर ओपरेसन करौने छलीह तहियासँ सुरेश शराब पीयब शुरू कऽ देलखिन। शराबक लत तेहन लगलन्हि जे आब भोरका चाहक बदला शराबक गलास हाथमे रहए लगलन्हि। आमदनीक एक मात्र जरिया न्यूज एजेंटक दोकान रहनि, तकर आधा कमाइ ओ अपन सिगरेट आ शराबमे खर्च कऽ दैत छलखिन। शराब पिला बाद हुनका तामस सेहो बहुत होइत छलन्हि। बेटी सभपर सेहो कहियो काल हाथ उठा दैत छलखिन। ओपरेसनक बादसँ सुरेश बेडरूममे मनोरमा संगे सुतब छोड़ि देलन्हि, बेशी काल शराब पिबैत-पिबैत बैठकमे लुढ़कि जाइत छलाह। अपना लेल नै तँ अपन दुनो बेटी लेल तँ जीबय पड़तन्हि। दुनु बेटी “ए” लेवल कऽ रहल छलन्हि, आगाँ साल एकटा बेटी मेडिकल कॉलेजमे जेतन्हि आ दोसर लॉ पढ़तनि। मनोरमा ओपरेसन करा लेलीह। बेटीक भविष्यक लेल ओ अपन भविष्य दावपर लगा लेलीह। ममताक आगू सभ बात छोड़ि देलखिन, बेटी सभकेँ कॉलेज जाइत देखी से सपना रहनि। मनोरमाक आधा खुजल आँखिसँ नोर झर-झर बहि रहल छल। माँ-बाप, भाइ-बहिन सभसँ एतेक दूर अपनाकेँ बहुत असगर महसूस कऽ रहल छलीह। बिग बेनक घड़ीमे ७ क घंटा बाजल। मनोरमाक मोन आशंकित भऽ रहल छन्हि जे अखन धरि बेटी आ पति किए नै अएलखिन। मनोरमा आइ भोरेसँ अस्पतालसँ डिस्चार्ज भऽ घर जाय लेल व्यग्र रहथि, जइ घरमे पिछला २० सालसँ एक-एक टा वस्तु कीनि सजौने रहथि। आगूमे पैघ दोकान रहनि आ पाछूमे भंडार घर, भानस घर आ स्नान घर रहनि। ऊपरमे २ टा सुतयबला घर, एकटा स्नान घर आ एकटा पैघ बैठक आ तइसँ लागल छोट सनक बालकोनी। मनोरमाकेँ ई घर बड्ड पसिन्न छलन्हि कारण इंग्लैंडमे बालकोनीबला घर बहुत कम भेटै छै। ओहुना आब जीवाक इच्छा जेना समाप्त भऽ गेल रहनि, बेटी सभक खातिर ओ घर जाय चाहैत छलीह। जइ कोठरीमे ओ पति संगे कतेओक मधुर पल बितौने छलीह, आब ओ कोठरी हुनका काटय दौड़ैत छलनि। मनोरमा अपनाकेँ पति द्वारा तिरस्कृत महसूस करैत छलीह। सुरेशक सहयोगक बदला उदासीनता हुनकर मोनकेँ आर आहत करैत छलन्हि। मनोरमाक विवाह बड्ड धूमधामसँ बनारसमे भेल रहनि। माँ-बापक बड्ड दुलारू रहथि। पिता अपने आइ.ए.एस. ऑफिसर रहथिन। चारु भाइ बहिनक शिछा दीक्षा कॉन्वेंटमे भेल रहनि। मनोरमा देखै-सुनैमे निक, मुदा चंचल रहथि। मनोरमा ७-८ सालक रहथि, तइ बेर दिवाली दिन फटाका छोड़ै कालमे छुरछुरी घूमि गेलै, जइसँ हुनकर दहिना बाँही केहुनी तक आ दहिना गाल निक जकाँ पाकि गेलन्हि, कतेक दिनक इलाजक बाद ठीक भेलथि मुदा दाग नै छुटलनि। ऐ दागक कारण सर्वगुण संपन्न होइतो मनोरमाक विवाह नै भऽ रहल छलनि जइसँ माँ-बाप बड्ड चिंतित रहैत छलखिन। मनोरमाक उम्र सेहो ३० पार कऽ गेल छलनि, सुरेशसँ हुनका अपन एकटा दोस्तक घरमे भेँट करायल गेलनि। सुरेशक अपन अंग्रेज पत्नीसँ तलाक भऽ गेल रहनि, ओहो सुशील कनियाँक खोजमे इंडिया आएल रहथि। दुनो गोटाक बात मिलि गेलन्हि। चट मंगनी आ पट विवाह भऽ गेलनि। विवाहक बाद मनोरमा अपन घर गृहस्थीसँ बड्ड प्रसन्न छलीह। बेटी भेला बाद दुनो गोटा आर प्रसन्न रहै जाइ लगलाह। काजक बाद सुरेशकेँ जे समय भेटन्हि ओ अपन बचिया संगे बिताबथि। कहियो काल बेटी सभकेँ लेगोलैंड, डिजनीलैंड घुमाबथि आ कहियो मेला सभमे। बेटी पैघ भेलन्हि तखन पेरिस आ स्विटजरलैंड सेहो घुमा देलखिन। ३ साल पहिने हिनका सबहक ख़ुशीमे जेना ग्रहण लागि गेलन्हि। जहियासँ मनोरमाकेँ कैंसर डैगनोस भेलन्हि, सभ बात उलट-पुलट भऽ गेलनि। मनोरमा ऐ बातसँ बड्ड आहत महसूस करैत छलीह जे सुरेश हुनकर व्यथा कोना नै बुझि रहल छथिन। हुनका लागैत छलन्हि जे ओ हुनकासँ नै हुनकर शरीर मात्रसँ प्रेम करैत छलखिन। ककरो पदचाप सुनि मनोरमाक आँखि खुजि गेलनि। बाहर अन्हार भऽ गेल रहै, हुनकर आँखिक नोर सुखा गेल रहनि। हुनका आगू हुनकर दुनो बेटी नोराएल आँखिये मुँह लटकौने ठाढ़ छलखिन। मनोरमा धरफरा कऽ बैसैत पुछलखिन, “अहाँ सभ कखन अएलहुँ?” “अखने मम्मी” - दुनु बेटी धीरेसँ जवाब देलकन्हि। मनोरमा चारू कात तकैत पुछलखिन- “अहाँक पापा कतए छथि?” दुनु बेटी एक दोसराक मुँह ताकए लागल। “की बात छै बेटा? अहाँ सभ एना गम सुम किए छी?” मनोरमा व्याकुल होइत बजलीह। “मम्मी ... पापा.......” “हाँ बेटा पापा के की भेलनि?” मनोरमा आतुर होइत बजलीह। हुनकर चिंता बढ़ि गेलनि। की बात भेलै? बच्चा सभ कानि किए रहल अछि? हुनकर आँखि सुरेशकेँ ताकि रहल छलनि। तखने दुनु बेटी हुनकर गर पकड़ि कानए लगलनि। ओ दुनु बेटीक पीठपर हाथ फेरैत पुचकारैत कहलखिन,- “अहाँ सभ एना बच्चा जकाँ किए कानि रहल छी?” रश्मि कनैत बाजल- “मम्मी, पापा हमरा सभकेँ छोड़ि चलि गेलाह?” “कतए चलि गेलाह बेटा?” हतप्रभ होइत मनोरमा बजलीह। हुनकर करेजक धड़कन तेज भऽ गेलनि। “हम सभ जखन स्कूलसँ अएलहुँ तँ पापा दोकानक भीतर खसल छलाह। ओ नींदक दवाइ खा आत्म हत्या कऽ लेलनि।” किरण सिसकैत बजलीह। “की............?” मनोरमा चिचिया उठलीह। “निचाँ इमरजेंसी रूममे पापाकेँ रखने छन्हि। हम सभ अम्बुलेंसमे पापाक संगे अएलहुँ।” किरण हिचकैत बाजल। मनोरमा अवाक रहि गेलीह। रोशन जनकपुरी अग्निपुष्पक गुच्छासब दुश्मनक नाइट भिजन हेलिकप्टरसँ राति भरि बमबारीक बादो जनसेना द्वारा कएल गेल घेराबन्दी नै टुटल रहै। जेना सिनेमामे होइ छै, चहु दिस पसरल अन्हारमे एम्हर बम खसि रहल अइ, ओम्हर बम खसि रहल अइ आ लोकसभ दौग रहल अइ, चलि रहल अइ , तहिना शाही सेनाक घेराबन्दी कएने जनसेना मुख्य मोर्चापर लड़ि रहल छल। युद्ध मोर्चामे एकटा खपरैल स्कूलक एकटा कोठरीकेँ प्राथमिक अस्पताल बना कऽ घाइल जनसैनिक सभक प्रारम्भिक उपचार कऽ कऽ युद्धक्षेत्रसँ बाहर पठाओल जा रहल छल । ई काजरोसँ कारी अमवस्याक रातिबला अन्हरिया राइतक बमक विस्फोट आ स्वचालित हथियार सभसँ कखनो निरन्तर कखनो रूकि रूकि कऽ फूलझड़ी जकाँ निकलल गोली सभक लाल पियर बैगनी इजोत मात्र प्रकाशित करैत छल। नै तँ लम्बा मीलो पसरल सुखलका नदीक ओ क्षेत्र अन्हारेमे युद्धक साक्षी बनि रहल छल। युद्धक मुख्य मोर्चा बनल चूरे पर्वत श्रेणीक ओइ टिलासँ आबि रहल बम, मसिनगन आ विविध आग्नेयास्त्रक समवेत भयावह आवाज एना बुझाइत छल जेना अनेको ज्वालामुखी एक साथ फूटि रहल हुअए। आ अोतऽ उठि रहल आर्त चित्कार, क्रन्दन, नरकक आभास दैत छल। ठीके युद्ध नरके होइत अछि ।–एकटा घाइल जनसैनिककेँ स्ट्रेचरपर सुता कऽ दू गोटेक कन्हापर रखैत हम बजलौं । अहाँ ठीक कहलौं, मुदा ऐ नरकक समाप्तिक हेतु ई बाध्यात्मक युद्ध अछि। हमरा सहयोग कऽ रहल प्रारम्भिक अस्पतालक रेखदेखक लेल नियुक्त कएल गेल कमाण्डर बाजल। बगलसँ निर्देशनात्मक आवाज आएल,–ठाढे ठाढे नै, बेन्ड भऽ क डाँड़ मोड़ि कऽ। अन्हारमे आँखि चियारि कऽ देखलिऐ, स्थानीयबासी सभ आबाल वृद्ध युद्धक्षेत्रसँ बाहर भागि रहल छल आ जनसैनिक आ युद्ध सहयोगी सभ ओकरा सभकेँ सुरक्षित पड़ाइनमे सहयोग कऽ रहल छल। करिब आधा किलोमीटर चौड़ाइबला ऐ सुख्खल नदीक पछियारी किनारा सुरक्षित छल। ओकरा ओइकात एकटा छोट गाम छल जतऽ शरण लेल जा सकैत छल। फायरक गर्जनयुक्त आदेश संगे शुरु भेल लड़ाइ, भोरक करिब साढे तीन बजे तक चलल। भोरका इजोत शाही सेनाक अतिरिक्त बल मँगाबएमे सहयोगी भऽ सकैत छल आ शायद ऐ दुआरे रिट्रीट (लौटबाक) आदेश आएल। युद्धक मुख्य मोर्चापर निरन्तर विस्फोट आ फायरिंगक लयबद्धता टुटि रहल छल। स्वास्थ्य मोर्चापर नियुक्त आ सहयोगी व्यक्तिसभ लौटैत जनसैनिक सभकेँ अन्हारमे ठिकिया कऽ चिन्हबाक कोशिस कऽ रहल छल। ओकर चिन्हल लौट रहल अछि कि नै ? ई प्रश्न आ उत्सुकता सबहक चेहरापर नाचि रहल छल। युद्ध मोर्चाक समाचार आब चारुदिस पसैर रहल छल। जनसेनाक तीन तरफा मजबूत घेराबन्दीमे पड़ल शाही सेनाक एक सय अठारह जवानबला जत्थामे सँ कमसँ कम चौंसठ गोटे मारल गेल छल। ओ तँ करिब एक्के डेढ़ बजे दुश्मन निःसहाय भऽ कऽ आत्मसमर्पणक मुद्रामे एकटा कोनामे दुबैक गेल छल। हम सभ तँ दू घण्टासँ अन्हारेमे अपनेमे फायरिंग कऽ रहल छलौं। जाँघमे छर्रा लागि कऽ घाइल एकटा सैनिक बाजल,–नै तँ जीत िनश्चित छल। युद्धकेँ अधूरा छोड़बाक चिरचिराहट प्रायः सभक चेहरापर छल, जे लौटैत आ घाइल सैनिकक स्थलगत देखरेखमे भेल तिल मात्र कोताहीक बाद क्रोध पूर्ण व्यवहारमे प्रकट भऽ रहल छल। ऐ भीषण युद्धमे जनसेना दिस चालीससँ बेसी घाइल भेल छल आ पचीस गोट शहादत प्राप्त कएलक। जनसेनाक ई सिपाही सभ जनताक ओइ वर्गक धियापुता सभ अछि जे शासन आ अभिजात्य तथा सम्पन्न वर्गक पकड़बला समाजद्वारा युग युगसँ कछेरपर ठाढ कऽ देल गेल अछि। एकरा सभकेँ नै कोनो दरमााक मोह नै कोनो निजी सुख सुविधाक मोह। बस एक्केटा आस जे जनयुद्ध सफल हएत तँ घूरत। सुखक दिन टुटली मरैया तक पहुँचत। लूट आ शोषण बला शासनक अन्त हएत। लाल सलाम, जनताक सर्वोत्तम धीया पुता सभ। लाल सलाम, महान शहीद सभ।–अपने आप हमर कसल मुठी सलामीक मुद्रामे अकाश दिस उठि गेल। भोरका इजोत होबऽ लागल छल। नदीक पछियारी काते काते दक्षिण दिस जाइत हम सभ युद्ध मोर्चासँ क्रमशः दूर होइत जा रहल छलौं। दुश्मनक अतिरिक्त बल हेलिकप्टरसँ पहुँच चुकल छल। मुदा शाइद जनसेनाक वीरतासँ संत्रस्त दुश्मनक फाइटर हेलिकप्टर अकासमे घुमि-घुमि कऽ अखनो तक बम खसाइए रहल छल। हमरा संगे चलि रहल एकटा कम्पनी कमाण्डर पाछूसँ हमर पिठ्ठी थपथपएलक। अकास दिस उठैत हमर कसल मुठ्ठी ओ देखि नेने छल। उनैट कऽ हम तकलौं। शाइद ओ हमरा मनमे उठैत भावकेँ पढ़ि लेने छल। राति भरिक युद्धक थकान संगहि ओकरा आँखिमे उदासी सेहो छल। शाइद ओकरो मनमे हमरे जकाँ भावसभ उमरि-घुमरि रहल छलै। ओ कमाण्डर छल युद्ध मोर्चाक। ओकरो नेतृत्वमे युद्ध भेल छल जइमे सेहो शहीद आ घाइल भेल छल कइएकटा जनसैनिक। के सभ शहीद भेल? की ओ जनैत अछि? ....निश्चय ओ जनैत अछि। ओकर आँखिक उदासी सएह कहैत अछि। के सभ भऽ सकैत अछि? मन भेल पुछितिऐ, मुदा पुछलौं नै, आ चलैत रहलौं चुपचाप। ऐ सुखलाहा नदीक पछयारी कातक जंगलमे युद्धक तैयारी आ प्रशिक्षणक अन्तिम क्षणमे जनसेनाक जवान सभक एकटा बटालियनक सलामी स्वीकार करैत आ जवान सभसँ गर्मजोशी पूर्ण कड़गर हाथ मिला कऽ बिदा करैत काल मनमे उठल भाव याद पड़ल, ऐ मेसँ के लौटत के नै लौटत? चिन्हल चेहरा सभ एक एक कऽ आँखिक आगू घूमए लागल। महोत्तरीक बुधनी, जकर पार्टी नाओं छल कमरेड उषा। तीन वर्ष पहिने पार्टी प्रवेश करैत कालक अन्तरमुखी विधवा आ सम्पत्तिक कारण अपन सासुरसँ प्रताड़ित बुधनी युद्ध प्रशिक्षणक क्रममे एक दिन हमरा कहने छलीह,–कमरेड, सुबोध कमरेड हमरा प्रेम प्रस्ताव कएने अछि। कमाण्डरकेँ हम सभ संयुक्त आवेदन सेहो देने छी। जौं सभ ठीक रहल तँ तीन महिनाक बाद हम सभ बिआह करब। अहाँ जतऽ रही, अहाँकेँ आबऽ पड़त। गोर, हँसमुख रेशबहादुर मगर याद पड़ल, धनुषामे जकर पत्थर कूटएबाली विधवा बुढिया माए कनैत कहने रहै, बौआ, तोँ तँ पहाड़मे लड़ऽ चलि जाइ छेँ, मुदा हमरा केओ देखैबला नै रहि जाइए। बोखार लगलापर दबाइयो देबए बला केओ नै रहि जाइए। मुदा ओ युद्धसँ नै लौटल। एकटा कवितामे ओ लिखने रहए;–माए, हम नै चाहै छी कोनो माए पत्थर कूटौ, तँए हम युद्धमे छी। हमरा याद पड़ल ओ नेवारनी करिकबी दुबर पातर कमरेड कामिनी, जकरा मजदूर पतिकेँ शाही सेना सभ माओवादी होबऽक शंकामे निर्ममतापूर्वक पीटिपीटि कऽ मारि देलकै। आ ओ अपन दू टा अबोध बच्चाकेँ नाना नानी गऽ धऽ कऽ जनसेनामे शामिल भऽ गेली। हमर अनेको चिन्हल जानल सभमेसँ ई करिकबी नेवारनी अत्यन्त प्रिय छलीह। ओ हमरे नै सबहक प्रिय छलीह। कम मुदा मृदुभाषी, प्रत्येक मोर्चापर सभसँ आगू बढ़ि कऽ लड़निहारि। तँए सभ कमाण्डर सभ हुनका अपने समूहमे राखऽ चाहैत छल। एकबेर हम बेमार भेल छलौं, बेहोश रहलहुँ कए दिन। एहेन अवस्थामे ओ हमर सभ तरहक सेवा कएने रहथि। दोसर हुनक वर्गीय प्रेम आ बौद्धिकता हमरा हुनका संगे भावनात्मक सम्बन्ध बना देने छल हम दाई(भैया) छलौं आ ओ छलीह बहिनी(बहिन)। दाई , आइ हमरे क्याम्पमे खाउ ने।–युद्धसँ एक दिन पहिने ओ हमरा नेओत देने छलीह। हम हँसि कऽ आगू बढ़ि गेलौं, मुदा ओ दौग कऽ हमरा मूँहमे माँउसक एकटा टुकड़ा राखि देलनि आ हँसऽ लगली।..... एहेन बहुत रास चिन्हल चेहरा आँखिक आगू नाचऽ लागल। ककरो चिन्हलिऐ की? के सभ शहीद भेल? रहल नै गेल, आ संगे चलैत कम्पनी कमाण्डरसँ हम पुछिए लेलिऐ। ओ किछु बाजए आेइसँ पहिने हम दोसरो प्रश्न कएलिऐ, जइमे हमर चिन्हल जानल कतेको नाओं छल। भावना जेना हमरा गरसि रहल छल। रातिक युद्ध मोर्चाक कमरेड हम एकटा सामान्य मानवमे बदलि रहल छलौं। ओ किछु नै बाजल। ओकर आँखिक उदासी ओहिना गंहीर छल। ठोर जेना कसि कऽ बन्द छल। ओ निःशब्द चलैत रहल। दोसर दिन। किछु शहीद सभक लाश प्राप्त भेल छल। हमरा जानकारी भऽ चुकल छल,–रेश बहादुर आ कमरेड कामिनी शहीद भऽ जाइ गेल छलाह। कमरेड कामिनी बाँचि सकैत छलीह मुदा एकटा घाइल जनसैनिककेँ सहारा दऽ कऽ लबैत काल हुनका गोली लागल छल। हमर मन भावनासँ भरि गेल छल। कमरेड कामिनीक स्मृति हमरा विचलित कऽ रहल छल। निर्मम युद्धकेँ भावनासँ कोनो मतलब नै होइ छै। सभ शहीद सभक लाश सभकेँ हसुवा हथौड़ीबला झण्डा ओढ़ाओल गेल, सलामी देल गेल आ शहीदक चिता धुधुवा उठल। थाकल पएर आ भारी मनसँ हम सभ सेल्टर दिस लौटलौं। मन नै लागि रहल छल। ओ कम्पनी कमाण्डर हमरा संगे छल। ओ अखनो उदास आँखि नेने चुप छल। भावनासँ द्रवित मन एना भरल छल जेना सभ किछु रुकि जाएत। अपन क्याम्पमे प्रवेश केलौं तँ किछु पुरुष आ दूटा युवती प्रतिक्षा करै जाइ छलाह। हमर सहायक जानकारी करौलक जे ई सभ जनसेनामे शामिल भेल नव कार्यकर्ता अछि। मूड़ी उठा कऽ एकटा युवतीकेँ पुछलिऐ,–की नाओं अछि? -रुपकुमारी। दोसरकेँ सेहो पुछलिऐ, आ अहाँकेँ की अछि? -कामिनी। हम ओकर मूँह तकैत रहलौं, किछु काल निर्निमेष। फेर फूर्तिसँ क्याम्पसँ बहार निकललौं आ ओइ कम्पनी कमाण्डरकेँ जोड़सँ बजेलिऐ आ कहलिऐ,–आउ कमरेड, देखियौ, कामिनी जीविते अछि। हँ, कमरेड। शहीद सभ अमर होइत अछि।–ओ बाजल। गोर मुँहबाली मैथिलानी कामिनी क्याम्पक द्वारपर सँ हमरा देखि रहल छलीह। आ हम देखि रहल छलौं क्याम्पक आगूमे फरफराइत ललका झण्डाकेँ, मैथिलानी कामिनीकेँ आ एम्हर ओम्हर गतिशील आ पुनः लयबद्ध होइत जनसेनाक पंक्ति सभकेँ। हमर सहायक धीरेसँ बाजल,–शाही सेनामे मरऽबलामे एकटा हमर सबहक कम्पनी कमाण्डरक जेठ भाय सेहो छल। आब हमर दृष्टि ओइ कमाण्डरपर स्थिर छल। ओकर आँखिक गँहीर उदासीक अर्थ आब हमरा लागि रहल छल। ललका झण्डा अकाशमे फरफराइए रहल छल, आस्था मनमे आर गँहीर भेल जा रहल छल। आ बिसवासपर एकटा आओर ईंट रखा गेल। टुटली मरैया सभक जीत िनश्चित अछि। महाप्रकाश १९४६- जन्म: बनगाँव, सहरसा, बिहार। वरिष्ठ कवि ओ कथाकार। प्रकाशित कृति: कविता संभवा, संग समय के (कविता संग्रह)। संभावना ओ आबिते तपाकसँ पुछलनि- हाथी देखने छह, अर्थ बूझल छह? ओ अपन ऐ प्रश्नक संग टेबुलपर झुकि आएल रहथि। हुनकर चानिपर उम्र आ अनुभव केर चमक रहनि। गज्जोभायक ऐ प्रश्नसँ कनेक अकबका गेल रहथि जयवर्धन। हुनक आँखिमे देखैत उतारा देलनि जयवर्धन- हँ हौ... हाथीकेँ के पूछए, हम तँ ऐरावत सेहो देखने छी- अर्थ सेहो बूझल अछि। उत्तर सुनैत गज्जोभायक आँखि जेना फाटि गेलनि। विस्मय आ अविश्वाससँ भरि अएलाह- ऐरावत! कतऽ देखलह? -किए, बड़द देखऽ लेल अहाँ पशुपतिनाथक ओतऽ जाउ से भऽ सकैत अछि आ हम ऐरावत देखऽ इन्द्रक ओतऽ जाइ से संभव नै! -इन्द्र तोरा कतऽ भेटलह? गज्जोभायक अविश्वास अस्वभाविक नै रहनि। -इन्द्र तँ अहाँकेँ कत्तहु भेटत... ध्यानसँ देखहक ने... नै भेटतह तँ विष्णु! वि-शिष्ट अणु –वि-शेष अणु-विलक्षण अणु- बिष्णु नै भेटतह- इन्द्र तँ आब जतऽ ततऽ- जयवर्द्धनक स्वरमे विश्वास रहनि। गज्जोभाय जोरसँ हँसलाह- तोँ ज्ञानी लोक छह, आब जँ तोँ इन्द्रकेँ चिन्हैत छह तँ राजाकेँ चिन्हैत छह, जमीन्दार-सरकारकेँ सेहो चिन्हैत छह.. नीक बात.. तोहर यएह गुण हमरा विवश करैत अछि जे हम तोरा एकटा कथा सुनाबी.. समय देबहक? बाहर विकट रौद रहै। कार्यालयसँ अधिकांश कर्मचारी जा चुकल छल। रौदमे थोड़बे काल चललासँ जयवर्द्धनकेँ पेशाब रुकि जाइ छनि। वीर रहथि। अतएव हुनका कथा सुनबेक छल। बजलाह- समय अछि, समय हमरा लेल पोस्ट कार्ड थिक जे जतबा लिखि..। -बस्स-बस्स भऽ गेलै.. गज्जोभाय बजलाह- राजाक मूल होइत अछि भय आ शंका.. बूझल छह? ओ उपरका हो अबैत मोंछ राशिकेँ दूअ दिससँ सम्हारैत हाथ फेरलनि- मुस्टंड गवरू छौंड़ा रोज देखैत छल, जमींदारक हाथी सबार, परोपट्टामे घुमैत, दर्पसँ धधकैत जमींदार, ओकर हाथीक मस्तान चालि.... वाम-दहिन मूड़ी आ झारैत। ओ देखय आ मोन मसोसि कए रहि जाए। ओकरा रहि-रहि कए जमींदारक सूनल, देखल-मोगल कथा वृत्तान्त व्यथित करै...। मुदा एक दिन... बाहर रौद अखनो प्रचण्ड रहै आ हवा सेहो उठि गेल रहै, जयवर्द्धन खिड़कीसँ बाहर देखलनि। विमछैत बजलाह- खिस्सामे मोन नै लागैत छह, ध्यान नै देबहक तँ कहबाक कोन प्रयोजन.. - नै-नै, ....एहेन कोनो बात नै- हबरब नै देखैत छहक.. केना आ कतेक गोंगिया रहल छै.. जयवर्द्धन किंचित म्लान मुख भेलाह। - धूः बुड़ि- हवाक रुख आकि बिगड़ैत पर्यावरणकेँ की तोँ बदलि देबहक.. की हम बदलि सकै छी समयक गतिकेँ, अकानैत रहऽ आ बस्स.. भोगैत रहऽ। वस्स..। जयबर्द्धनकेँ राजनीतिक पर्यावरणक सेहो स्मरण, मुदा आब ओ कथा रसमे व्यतिक्रम नै चाहैत रहथि- आगू कहह... “मुदा एक दिन ओइ गवरु मुस्टंडकेँ नै रहल गेलै, जहिना ओ हाथीपर सवार दर्पसँ धधकैत जमींदार- सरकारकेँ देखलक ... ओकरा छातीमे जेना लहरि उठलै... ओकर पहिल इच्छा भेलै जे ओ सीधे जमींदारपर छड़पए आ हौदाक संगे जमीनपर पटकए.. मुदा एतेक ऊँच ओ फानि नै सकैत छल.. अथच ओ हाथीक नाङरि पकड़ि अपन पएर जमीनपर अंगद जकाँ रोपि देलक... वाम दहिन, आजू बाजू देखैत... हाथीपर सवारकेँ आघात भेलै, हाथीक मस्तान चालिमे व्यवधान अएलै.. हाथी चिंघाड़ कएलक ....महावत जोरसँ बमकल... गज लए छौड़ापर उठल.... ”। भयाक्रान्त जयवर्द्धनक मुँह खुललनि, एकदम्मे अंतिम प्रश्न कएलनि- “छौड़ा बजलै की नै?” -हँ हौ, जमींदार पढ़ल लिखल लोक रहथि शिक्षित लोक.. हनकर पुरखा सभ सेहो विदेशी विद्यालय आ विश्वविद्यालय सभमे पढ़ने रहनि... अपनो कैंबरिज कि हावर्डमे पढ़ने रहथि... हुनका भाषाक महिमा आ वाणीक प्रभावक विशेष ज्ञान रहनि। अतएव क्रोधकेँ घोंटलनि आ शांत स्वरेँ महावतकेँ वरजलनि- “छोड़ह अबूझ छै… नेदरमति छै”। किछु दिन हुनक चित्त अशांत रहलनि। किछुए कालक उपरान्त राज्यक सीमा रेखाकेँ दूरेसँ देखैत, चिंतितमना राजमहलमे घूमि अएलाह। प्रात:काल ओ अपन दीवानसँ पुछलनि- “किनक बालक छल ओ ...? दीवान साहेबकेँ समग्र कथा बूझल छलनि। बजलाह- “श्रीमन् ओतऽ फल्लामांक बेटा थिक- बजाउ की? किछुए कालक उपरान्त फल्लांमाकेँ उपस्थित कएल गेल। भयाक्रान्त.. थरथर कांपैत.. धोती प्रायः तीतल। जमींदार साहेबकेँ देखिते मुलुंबित किंवा शाष्टांग दैत, निहोरा करैत बाजल- “सरकार... अपराध क्षमा कएल जाउ”। “नै.. नै कोनो अपराध नै... बहुत करेजगर छथि अहाँक बालक... बहादुर... वाह रे वाह, संभावनासँ भरल... अपार संभावना अछि अहाँक बालकमे...”, जमींदार साहेब शांत किन्तु गम्भीर स्वरमे बजलाह। फल्लांमाकेँ किंचित भरोस भेलै। हाथ जोड़ने ठाढ़ भेल— “छौड़ा उकपाती छै.. निश्चये कोनो अपराध केने हएत.. हम ओइ अबंडसँ तंग छी सरकार.. जे सजा हो हुकुम... ओ घौना खसौने ठाढ़ रहल। “नेना सँ कियो तंग हुअए! कोनो अपराध नै कएलक अछि अहाँक बालक, किन्तु आब ओ विहनजोग भेल.. ओकर ब्याह कऽ दियौ... व्याह कऽ देबै तँ घर गृहस्थीमे लागत.. चित्त शान्त रहतै। शांत किन्तु आदेशात्मक स्वरमे बजलाह जमींदार साहेब। “सरकार... के करतै ओइ अवंडसँ ब्याह... की हैतै ओकर ब्याह करा कऽ... करमे फूटल छै...”, विलाप कएलक फल्लामां मरड़..। “आब अहाँ जाउ, व्याहक मोन बनाउ ..हम देखैत छिऐ”, जमींदार सरकार आदेश कएलनि। फल्लांमाक गेलाक उपरान्त जमीन्दार साहेब उपस्थित दीवानसँ पुछलनि— “ककर बेटी छै रानी मुखर्जी आ कैटरीना सन, पता करु तँ... ओकरासँ ऐ छौड़ाकेँ व्याहि देबाक छै ..।” जयवर्द्धनकेँ अपन हँसी रोकि नै भेलनि... गरीबक बेटी की रानी मुखर्जी आ कैटरीना सन होइत छै- ओ चकित रहथि। “ऐमे हँसबाक कोन बात... जकरा जे बूझल रहतै से सएह ने बाजत... तोँ रोटी कहबह ओ ब्रेड बाजत... ओना तोँ बिसरि रहलह अछि जे महाराज शान्तनुकेँ मल्लाहेक बेटी पसिन्न पड़ल रहनि...।” गज्जो भायक उत्तरसँ जयवर्द्धन निरुत्तर भेलाह। चिल्लामांक बेटी बड़ सुन्नरि। बड़ दिव्य। पाकल धान सन-ए। अगहनक दुपहरिया सन चमक। कोशीक धार सन चंचल। प्रायः सभकेँ बूझल रहै। तेँ... दरबारमे चिल्लामांकेँ बजाओल गेल। अपराध बोघक बोझसँ ठाढ़ नै रहि पाबैत छल। हवोढेकार कानैत बाजल— “से बिनु मायक बेटी छै... जरुरे कोनो अपराध कएने छै हएत, लोकक झाड़ी फानब ओकर आदति भऽ गेलै अछि.. अवस्से कोनो दिन कएने हएत... हम सरकारेक सोझाँमे ओकरा दोखरि देबै.. चिल्लामांक नोरक कोनो छोर नै रहै। सरकार ओकरा अपन पाँजमे भरि कऽ उठौलनि। बजलाह- “कोनो बात नै छै... पहिने नोर पोछह, चित्त शांत करऽ, बात किछु नै छै... हम सुनलौं जे तोहर बेटी आब वियाह जोग छह, फल्लांमाक बेटा पट्ठा जवान... कहलक क्यो जे नीक जोड़ी हेतै, तँ से नीक बात... तोँ व्याह लेल तैयार हुअ तेँ, खरचाक कोनो चिन्ता नै... हम सभ देखबै... हम छी.. सभटा मददि करबह..। चिल्लामां किछु बाजऽ चाहलक। मुदा बाजि नै भेलै। कदाच् जमींदार सरकारक उदारता आ दान सभक स्मरणसँ ओकर कंठनली अवरुद्ध भऽ गेल रहै। गज्जोभाय आगाँ कहलनि— “भेल... फल्लामांक आ चिल्लामांक बेटीक ब्याह सबहिक सहज सहमतिसँ भेल। सरकार—जमींदार ओकरा सबहिक समाजिक स्थिति अनुकुल खैयाल रखलनि। समाज कतोक बर्ख धरि हुनकर ऐ कथा-व्यवहारक सोहर गावैत रहल। क्यो जमीन्दारक सवारी रोकबाक कोनो हिम्मति नै कएलक। लोक तँ आइयो सरकार जमींदारसँ बहुत रास आस राखैत अछि। संभावनाक आस आकि आसक संभावनामे समाप्त नै होइ छै.. किछु कुकुर भुकैत अछि, मुदा किछुए.., अधिकांशक गरमे पट्टा लागि गेलैक अछि... कतोककेँ गरदनिमे तँ सोनाक जींजीर छै, किछु भुकैत मारलो गेल... जानि नै कतेक...” “ अँए हौ भाय ....ओइ छौड़ा आ छउड़ीक की भेलै?”, जयवर्द्धन जिज्ञासा कएलनि। गज्जोभाय एतवा सुनिते क्रुद्ध भऽ गेलाह..? यएह छिअह तोहर पाखण्डी रुप.. तोरा की नै बूझल छह।” “हमरा किए बूझल रहत... कथा तोहर.. कहलऽ तोँ आ बूझल रहत हमरा?”, जयवर्द्धन गज्जोभायकेँ लपेटलनि। “हेतै की ..दुहू छौड़ा-छउड़ीक एक आश्रम भेलै- आगाँ कालक लीला—बिसरा गेल रंग रभस, बिसरा गेल छउँड़ी.. तीन चीज यादि रहल, नोन-तेल लकड़ी, से दुनू नोन तेलमे लागल रहल.. बाजारमे व्योपारमे, चौअन्नी-अठन्नीकेँ के पूछए...टाका पचटकही धरि प्रमुख भऽ गेलै... समय एकदम्मे बदलि गेलै.. देश-काल। मन मोहनी छतरी तर आबि गेलै... टोपीपर टोपी.... टोपी टोपी... लोक टोपीक रंगे देख कऽ नेहाल, किछु दिनक उपरान्त सुनल जे छौड़ा रोजी रोटीक खोजमे दिल्ली कि हरियाणा कि कुरुक्षेत्र चलि गेलै, आइ धरि नै घूमलै-ए।” “कतेक बर्ख भेलै?”, जयवर्द्धनक स्वर म्लान रहनि। “किए... हम बड़ बकलेल जे जिनगीक कैलेंडर राखी? तोरे सन मूर्ख जिनगीक कैलैंडर राखैत अछि”, गज्जोभाय किंचित उत्तेजित आ खिन्न भेलाह”। “एम्हर फल्लामां आ चिल्लामां, बान्ह जे टुटलै ओही बाढ़िमे कतहु बहि गेल... आब छउँड़ीक दिन पहाड़ भेलै आ राति प्रेतग्रस्त। हेमनिमे सूनल अछि जे छउँड़ी प्रतिदिन राष्ट्रीय राजमार्ग १९४७ पर जाइ छै- जतऽ दुनियाँ जहानक बस-ट्रक आबि कऽ रुकै छै, छौड़ी जाइ छै, ऐ आस आ सम्भावनामे जे ओ छौड़ा औतै.. कोनो दिन, कोनो दिशासँ औतै ..”। गज्जोभाय अन्ततः मौन भेलाह। जयवर्द्धनकेँ कोनो प्रश्न नै फुरलनि। (गजेन्द्र ठाकुर लेल सस्नेह) वसंत भगवंत सावंत कोंकणी कथा : मर्णताळणी, मूल कथाकार: हिन्दी अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह ओ श्री सेबी फर्नांडीस: मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह मृत्युकेँ टारब “कनिष्ठ अभियंताक जीप आबि रहल अछि..... सभ कियो काजपर लागि जाउ।” गाछपर चढ़ि मौध निकालबाक प्रयास कऽ रहल फ्रांसिस पहाड़ीक बाटे हपसैत अबैत जीपकेँ देखि सभ मजदूरकेँ चेतएबाक स्वरमे चिकरल आ स्वयं सेहो शीघ्रहिं नीचाँ उतरि गेल। बीड़ी पीबाक बहन्नासँ काम बन्न कऽ कए गप्प करएबला आ लगपासमे बैसल सभटा मजदूर हाँइ–हाँइ उठि हाथमे दबिया लऽ कऽ गाछ–बिरीछ काटए लागल। आइ भोरहिसँ मजदूर सभ मोन लगा कए काज नै केने छल। हमरा सभकेँ दाणे पहाड़ दए चढ़िकए अबैत–अबैत साढ़े नओ बजि गेल रहए। आइ हम स्वयं ओकरा सबहक समक्ष ठाढ़ भऽ कए काज नै लऽ रहल छलौं, ऐ लेल ओहो सभ नहुएँ–नहुएँ काज कऽ रहल छल। बिना काजक दिन खेपैत देखियो कए हम ओकरा सभपर गोस्सा नै कऽ सकलौं। आइ हमर मोन नीक नै रहए। भोरहिंसँ हम पहाड़क टिल्हापर सातनक गाछक नीचाँ बैसल रही। हम जतए बैसल रही ओतएसँ नीचाँ सलावली नहरक काज चलैत रहै, जे साफ झलकैत रहै। बहुतो रास मशीनक हल्ला होइत रहै। नहरक काज आधासँ बेसी भऽ चुकल छलै। आगूक पाँच–छओ बरखक भीतरहिं काज पूर्ण भऽ जएबाक उमेद रहै आर अोइ नहरक पानि पीबा आर आन प्रयोगक लेल ऐ दाणे पहाड़पर ट्रिटमेंन्ट प्लान्ट बनऽबला रहै। हमरा एतुका कार्यभार भेटबासँ पूर्वहिं निरीक्षण भऽ गेल रहै। यएह किछु दिनमे काजक ठीका निकालि ठिकेदारकेँ काज संपन्न करएबाक आदेश दऽ देल गेल रहै। अगिले सप्ताह मुख्यमंत्रीक हाथेँ शिलान्यास हेबाक रहै। ऐलेल अोइ जमीनकेँ चिह्नित करबाक लेल कार्यपालक अभियंता साहेब एतेक मजदूरकेँ लगा कए ऐ महत्वपूर्ण जमीनकेँ साफ करबाक लेल कहने छलै। काल्हि आ परसू तँ मजदूर सभकेँ लड़ा–चड़ा कए हम नीक जकाँ काज करा लेने रही मुदा आइ हमर मोन काजमे नै लागि रहल छल। कनिष्ठ अभियंताक जीप पहाड़ीक बाटे एम्हरे आबि रहल छलै आ अोइसँ आबए बला आवाजसँ हमर बेचैनी बढ़ल जा रहल छल। सभ मजदूर दौग कए काज करबाक नाटकमे लागि गेल, मुदा हमरा उठि कए ठाढ़ होएबाक साधंस नै भेल। हमरा बुझाइत छल जेना हमरा देहसँ प्राण निकलल जा रहल हुअए। काल्हि भोरहिं तँ कनिष्ठ अभियंता द्वारा कार्यस्थल केर निरीक्षण कऽ लेल गेल छलै, तखन अखन दिनक बारह बजे ओ किए आबि रहल छलै? निश्चित रूपेँ ओ हमरा बाबूजीक मृत्युक खबरि लऽ कए आबि रहल हेताह, हमरा लागल। “आइ काजपर नै जाउ” भोरहिसँ हमर घरक लोक सभ कहैत छलाह। बाबूजी कखन अपन अंतिम साँस लेताह भरोस नै। ओछाओनपर पड़ल बाबूजीक हालति एकदम खराप भऽ गेल छलनि। मुदा दाणे पहाड़केँ साफ करएबाक काज हमरा भेटल रहए। जँ ऐकालमे कोनो प्रकारक व्यवधान भेलै तँ हमरा नोकरीसँ निकालि देबाक धमकी कार्यपालक अभियंता पहिनहिं दऽ देने रहए। हम कनिष्ठ अभियंताक व्यवहारसँ नीक जकाँ अवगत रही ऐलेल हम घरक लोक सबहक कथनी नै मानि डिब्बामे दूटा रोटी राखि काजपर चलि देलौं। हमरा दाणे जंक्शन धरि पहुँचतहि आठ बजि गेल छल। सभ मजदूर अपन–अपन दबिया आ डिब्बा लऽ कए हमर बाट देखैत छल। दाणे पहाड़ दिस जाएबला ट्रक सबहक बाट नै देखि हम सभ पएरे चलब आरंभ कऽ देलौं जे जँ बाटमे कतौ ट्रक भेट गेल तँ ओकरा हाथ दऽ देबै। मुदा कुर्डे पहुँचऽ धरि हमरा सभकेँ एक्को टा गाड़ी नै भेटल। ओतएसँ एक पेरिया बाटे अएबाक कारणेँ हमरा सभकेँ बड्ड विलम्ब भऽ गेल। मरणशय्यापर पड़ल हमर बाबूजीक चिन्ता आर पैदल चलिकए अएबाक थकानक कारणेँ हमर प्राण कंठ धरि आबि गेल छल। आ अखन हमरा बाबूजीक मृत्युक खबरि लऽ कए आबऽबला जीपकेँ देखि कए हमरा आँखिक सोझाँ तारा नाचए लागल। गाड़ी ऊपर आबि रहल छल। केहनो हृदैविदारक समाद हो हम ओकरा सुनबाक लेल अपना मोनकेँ एकाग्रचित्त केलौं आ आँखि मुनि लेलौं। हमरा आँखिक समक्ष चित्र सभ नाचए लागल, ‘आब ओ जीप ठहरत..... कनिष्ठ अभियंता जीपसँ उतरि जेताह..... काज करएबला मजदूर सभसँ “पर्यवेक्षक कतए छथि ?” पुछताह..... ओ लोकनि गाछ दिस आँगुर देखेतनि, अभियंता घुमिकए हमरा दिस उपर अओताह..... हमरा कान्हपर हाथ राखि बजताह..... मिस्टर नायक...... हमसभ अखन सांगे केर कार्यालय जाएब।’ हम चुप रहब। अहाँक लेल एकटा खबरि अछि.... इट इज नॉट मच सिरियस..... (ओतेक चिंताजनक नै अछि.....) मुदा अहाँकेँ शीघ्रहिं घर बजाओल गेल अछि। हम जीप लऽ कए ओम्हरे जाएबला छी..... ओतहिसँ अहूँकेँ छोड़ि देब। कनिष्ठ अभियंता जानि-बूझिकए हमरासँ बाबूजीक मृत्युक खबरि नुका रहल अछि, ई हमरा पता लागत..... हमर करेज फाटि जाएत, हमरा आँखिमे नोर आबि जाएत। यू इडियट (बदमाश)....., एमहर आउ! राजा जकाँ बैसल छथि.... नॉनसेन्स (बेकूफ)। अहाँकेँ देल गेल काजक कोनो परवाहि नै अछि? आब अहाँकेँ घरहिं पठा देब.....। सोचलौं की आ क्षणहिंमे भऽ गेल की, हमरो पता नै चलि सकल। आँखि खोलिकए देखलौं तँ कनिष्ठ अभियंताक जीप लऽ कए आएल कार्यपालक अभियंता हमरापर डाँट–फटकारक बरखा केने जा रहल छल। अपना समक्ष राक्षस सदृश ठाढ़ कार्यपालक अभियंताकेँ देखि हमर तँ हड्डी काँपि गेल। हे भगवान, ऐ ब्रह्म बबाक चाँगुरसँ हमरा मुक्ति दिया दिअ। मोनहि–मोन भगवानसँ प्रार्थना करैत हम कार्यपालक अभियंताक समक्ष ठाढ़ रहलौं। अहाँक ओकादि एतेक बढ़ि गेल? मजदूर सभपर धियान नै राखि, हमरा अबैत देखियहुकेँ ओतए साहूकार जकाँ बैसल रहलौं? ई सभटा काज चारि दिनक भीतरहि ने संपन्न करएबाक लेल कहने रही, कमीना नहितन? एना तँ अहाँ हमरहु संकटमे दऽ देब.... ठहरू ! एखने हम अहाँकेँ सबक सिखबैत छी.... हम एखने कार्यालय जा कए, अहाँक ‘टर्मिनेशन ऑर्डर’ निकालि दै छी...। क्षण भरिक लेल हमरा एहेन बुझाएल जेना एकटा अल्सेशियन कुकुर हमरापर भूकैत एम्हरे आबि रहल अछि। हमरा मुँहसँ एक्कहुटा शब्द नै निकलि सकल। साहेब, हिनक बाबूजी बहुत बेराम छन्हि.... ऐ लेल ओ कनेक कालक लेल बैस गेल छलाह, एकटा मजदूर हमर पक्ष लैत कार्यपालक अभियंताकेँ समझएबाक प्रयास कएलक, मुदा साहेबपर हुनक बातक कोनो असरि नै भेलनि। बेराम छथि तँ होमए दियौ, जीवैत तँ छथि ने? ऐ तरहक बहन्ना बना कए अहाँ काजपर सँ बेसी नागा नै रहल करू, नै तँ सभदिनक लेल घरहिं बैसा देब। कार्यपालक अभियंता हमरापर आर भड़कि गेलाह। अोइ भरल दुपहरियामे हमरा आँखिक समक्ष तरेगन झिलमिलबए लागल। यूजलेस सुपरवाइजर.... (बेकाम पर्यवेक्षक....) एतए आउ.....देखू ई सभटा गाछ–बिरीछ कटबा लेब। परसू धरि ई सभटा साफ भऽ जएबाक चाही। मंगल दिन सी.एम. (मुख्यमंत्री) अओताह, आेइसँ पहिने कनिष्ठ अभियंताकेँ चिन्हित करबाक लेल ई जगह साफ–सुथरा भेटबाक चाही। जँ ठीक समैपर ई काज नै भेल तँ हम अहाँकेँ देखि लेब। अहूँ सभ कियो सुनि लेलौं की नै? सभ मजदूरकेँ सुनएबाक लेल ओ ओकरा दिस देखलक आ जा कए जीपमे बैस गेल। पल भरिक लेल हमरा एहेन लागल जेना ढलानसँ उतरएबला ओइ जीपक पाछू हमरा डोरिसँ बान्हि घिसियाओल जा रहल अछि। हमरा आँखिमे नोर आबि गेल। नोकरीसँ निकालि देबाक धमकीसँ हमर सौंसे देह सुन्न भेल जा रहल अछि, हमरा एहेन बुझाएल। ऐ नोकरीसँ हाथ धो लेब हमरा बसक गप्प नै छल। बी. कॉम. कएलाक बाद लगभग दू वर्ष धरि हम बेरोजगार रही। पछिले साल बाबूजीकेँ लकवाक प्रकोप भेल छलनि ओ तहिएसँ ओछाओन पकड़ि नेने छथि। बाबूजीक दवाइ, कॉलेजमे पढ़एबला अपन छोट भाय आर मैट्रिकमे पढ़एवाली अपन छोटकी बहिनक सभटा दायित्व हमरहिं कन्हापर छल। कतेकोक पएर पकड़लाक पश्चात् हमरा हिसाब-किताबक काज भेटल छल, मुदा डेढ़ दुइ सय टकासँ बेसी हमरा कहियो नै भेट सकल। कतेको पैरवीक केलाक पश्चात् हमरा बारह टकाक दैनिक मजदूरीपर सुपरवाइजर (पर्यवेक्षक)क ई काज भेटल छल। हमर दुब्बर-पातर कद-काठी देखि कनिष्ठ अभियंता हमरा सुपरवाइजरक नोकरी देबाक लेल किन्नहुँ राजी नै छल, मुदा ओकरा लग लऽ जाएबला हमर शुभचिन्तक हमर विषम परिस्थिति आ लचारीक तेना ने बखान कएलनि जे नहियो चाहैत ओ हमरा ई नोकरी दऽ देलक। हमर छोटो छिन गलतीकेँ लऽ कए ओ हमरा सदिखन उँच-नीच कहैत रहै छल। पछिला तीन माससँ तीन-सवा तीन सय टकाक महिनवारी दरमाहासँ हम साधारण रूपेँ अपन जिनगी चला रहल छलौं। ऐ सप्ताह बाबूजीक तबीयत बिगड़ि जेबाक कारणेँ हमरा लग जतेको पाइ छल, सभटा हुनक दबाइ आ डागदरक पाछू खर्च भऽ गेल। जँ बाबूजीक संग किछु भऽ गेलनि तँ हम केना की करब, से सोचबाक साहस आब हमरामे नै रहि गेल छल। हम अंतर्द्वन्द्वमे फँसि गेल रही। कार्यपालक अभियंता हमरा नोकरीसँ निकालि देबाक धमकी दऽ कए गेल छल। हमरा बुझाइत छल जेना हमर हड्डीक मज्झा जमल जा रहल अछि। कोनो मजदूर दौग कए हमरा थाम्हि लेलक आ गैलनमे भरल पानिसँ हमरा आँखिपर छिच्चा देलक नै तँ हम ओतहिं अचेत भऽ कए गिर जैतौं। खएलाक पश्चात् हम भारी मनसँ ओतए आबि ठाढ़ भऽ गेलौं जतए आन मजदूर सभ काज करैत रहथि। हमर नजरि घूमि-फिरि ओइ बाटक दिस जा रहल छल। बाबूजीक मरबाक खबरि लऽ कए जीप आब आएल तब आएल, यएह सोचैत-सोचैत हम आधा दिन बिता देलौं। हमर ऐ स्थितिपर दया करैत मजदूर सभसँ जतेक संभव भऽ सकलै ततेक काज कऽ देलक। जँ मजदूर सभ एहने लगनसँ काज करैत रहल तँ ई काज काल्हि धरि पूरा भऽ जेतै, हमरा बुझाएल। साँझुक पहर हम जल्दीए निकलि कए पहाड़ीक बाटे उतरैत नीचाँ आबि गेलौं। लकड़ी लऽ जाएबला ट्रक भेट गेलाक कारणेँ हम राति हेबासँ पहिनहिं बजार पहुँचि गेलौं। झटकि कए चलि हम घरक बाट पकड़लौं। पिचरोड खतम भेलाक बाद गलीबला माटिक सड़कपर हमर चालि कने मद्धिम भऽ गेल। ऐ गलीक ओइ छज्जाकेँ पार कएलाक बाद हम अपन वार्डमे पहुँचि जैतौं। हम सोचए लागलौं जे हमरा आँगनमे हमर किछु पड़ोसी लोकनि हाथपर हाथ धऽ ठाढ़ छथि। हमरा देखतहिं ओ लोकनि अपनामे गप्प करए लगलाह। हम जेना-जेना घरक दिस बढ़ैत रही तहिना-तहिना कानबाक शोर बढ़ैत जा रहल छल। जहिना हम अँगना पहुँचब, एकटा पड़ोसी आबि हमरा गल-बाँही दऽ घर लऽ जेताह। घरमे बाबूजीक प्राणहीन लहास पड़ल रहतनि। एकटा कोनमे कानि-कानि कए बेदम भेल हमर माए आ बहिनकेँ सम्हारबाक लेल पड़ोसक औरत लोकनि बैसल हेतीह। हुनका सोझाँ सोडाक बोतल आ काटल पेयाजु राखल रहतनि। बाबूजीक लहासक समक्ष एकटा दीप राखल हेतनि। एक दिस तश्तरीमे अगरबत्ती राखल रहत। लगहिमे एकटा पात्रमे चीनी राखल रहत। आेइमे लोक सभ द्वारा चुट्टासँ उठाओल गेल चीनीक चेन्ह हएत। हमहूँ आेइमे सँ एक चुट्टा चीनी उठाएब आ बाबूजीक फुजलका मुँहमे धऽ देबनि आ “बाबा” कहि जोरसँ कानए लागब। जखन हम आँगन पहुँचलौं तँ हमरा कियो नै देखनामे आएल। घरसँ ककरहुँ बाजबाक आवाज आबि रहल छलै। हम जूता खोललौं आ नहुएँ-नहुएँ पएर राखैत भीतर चलि गेलौं। आउ बाउ! शायद अहींक खातिर हिनकर प्राण कंठ धरि आबि कए अटकि गेल छन्हि। आब हिनका ऐ कष्टसँ मुक्तिए भेट जेबाक चाहियनि, हमरा भीतर अबैत देखि हमरा माए लग बैसलि एकटा औरत बाजलि। हम बाबूजीक ओछाओन दिस देखलौं। जइ गतिएँ हुनक छाती उपर-नीचाँ होइत छलनि, हमरासँ देखल नै जा रहल छल। मुँहसँ निकलैबला शब्द सुनएमे नै आबि रहल छल। आँखि खुजले छलनि। बाबूजीक ई स्थिति देखि हमरा बुझा पड़ल जेना ओ सरिपहुँ हमरहिं बाट जोहि रहल छलाह। हमर छोटकी बहिन हमरा चाह देलनि। चाह पीब हम अँगपोछासँ अपन मुँह झाँपि बाबूजीए लग बैस गेलौं। देखापर चाही, जँ आजुक राति ई काटि लैत छथि तँ..... नै जँ आइ रातिए किछु भऽ गेलनि तँ एहना स्थितिमे एमहर-ओमहर दौगब नै, काल्हि भोरहिं उठिकए संबंधी लोकनिकेँ समाद पठा देबनि, की ठीक ने? हमरा भरोस देबाक लेल एकटा पड़ोसिन कहलथि। अंगपोछासँ झाँपल अपन माथ डोला हम हँ कहलियनि। राति बढ़ल जा रहल छलै मुदा हमरा निन्न नै आबि रहल छल। हम ओतहि बैसल रहलौं। रातिक बारह बाजि गेल रहै मुदा बाबूजीक घर्र-घर्र केर आवाज अखनो नै कम भेल रहनि। घरक आन सभ सदस्य एमहर-ओमहर कोनमे सूति रहल छलाह। राति तीन बजे धरि बाबूजीक हालतिमे कोनो सुधार नै भेलनि। मुदा भोर होइतहिं हम द्वन्द्वक स्थितिमे आबि गेलौं। आब की करी? नोकरीपर जाइ, वा नै? काज एकदम अनिवार्य रहै आ जँ हम नै गेलौं तँ कार्यपालक अभियंता हमरा छोड़त नै। जँ कार्यपालक अभियंताक डरे नोकरीपर चलियो गेलौं आ एमहर बाबूजीक संग किछु खराप भऽ गेलनि तखन की हएत? माए.... हम नोकरीपर चलि जाउ? हम साहस कऽ कए माएसँ पुछलौं। माए तँ किछु नै बाजलीह मुदा एखने हमरा घर आएल हमर किछु पड़ोसी सभ हमरापर अपन गोस्सा निकालए लगलाह। साँचे अहाँक दिमाग ठौरपर अछि कि नै? एतए अहाँक बाबूजी मरण-शय्यापर पड़ल छथि आ अहाँकेँ नोकरी सूझैत अछि? नै, नै, हमर कार्यपालक अभियंता बड्ड खरूस छथि। ओ शैतान छथि की? नीक-बेजाए केर ओकरा ज्ञान नै छन्हि? हम चुप भऽ गेलौं। दुपहर होइत-होइत घर्राहटि आर बढ़िते गेलनि। चलू नीके छै.... आइ बृहस्पति दिन छै, प्राण छोड़बाक लेल आजुक दिन उत्तम अछि। हमर बूढ़ पड़ोसिन बाजलथि। एतबा सुनतहि हमर माए आर जोर-जोरसँ कानए लगलीह। साँझ होइत-होइत हमरा मोनमे आर डर समा गेल। जँ आइयो बाबूजीक प्राण नै निकललनि आ हुनक मृत्यु नै भेलनि तँ ‘काल्हि काजपर किएक नै आएल छलौं?’ एकर स्पष्टीकरण हम कनिष्ठ अभियंताकेँ केना देबनि? बाबूजी मरि गेलाह तकर पहिलुक दिन अहाँ काजपर किएक नै एलौं? ऐ तरहक प्रश्न सभ पुछि-पुछि ओ हमर पिंड नै छोड़ताह.....जँ हम नोकरीपर नै गेलौं आ मजदूर लोकनि काजकेँ आर बेसी घिच लैक तखन ....? आ ऐ गोस्साक कारणेँ जँ ओ हमर ‘टर्मिनेशन आर्डर’ निकालि देलक तखन ...? कार्यपालक अभियंताक काल्हुक पल-पल केर दृश्य हमरा आँखिक सोझाँ नाचए लागल। दू बजेक पश्चात् खराप नक्षत्र आरंभ होइ बला रहै, आेइसँ पहिनहि हुनका मुक्ति भेट जएबाक चाहियनि ...! कियो एहेन बाजलथि। मुदा हमरा बुझाएल दू बजे नै बारह बजेसँ पहिनहि हुनक प्राण जएबाक चाहियनि, ताकि बाबूजीक मृत्यु बृहस्पतिए दिन भऽ गेल छलनि, कार्यपालक अभियंताकेँ बतएबामे हमरा सुविधा हएत। राति आठ बजे हम एक बाटी मरगिल्ला खा बाबूजी लग बैस गेलौं। काल्हि राति भरिक जगरनाक कारणेँ हमरहुँ आँखि निन्नक बाट जोहि रहल छल। अखन हमर आँखि लागलहि छल कि कियो हमरा हाथ लगा उठा देलक। घरमे सात-आठ पड़ोसी लोकनि ठाढ़ छलाह। हुनका सबहक आँखि बाबूजीपर स्थिर भऽ गेल छलनि। बाबूजीक मुँहसँ होमएबला घर्र-घर्र केर आवाज आर बेसी भऽ रहल छलनि। हम जल्दीसँ उठिकए बैस गेलौं। बाबूजीक आवाज आर बढ़ि गेलनि। क्षण भरिक लेल हुनक सौंसे देह हिललनि आ अचानक सभ किछु शांत भऽ गेल। कतेक बाजि रहल छै, कने धियानसँ देखियौक कियो? कियो बजलाह। कियो आगू बढ़ि पलंगसँ लटकल बाबूजीक हाथ सीधा कऽ कए हुनक फुजल आँखि बन्न कऽ देलकनि। हमर माए आ बहिन एक्कहि सँग जोरसँ चिकरैत बाबूजीक लहासपर हाथ राखि कानब शुरू कऽ देलथि। अखन धरि ठाढ़ भए हमरा बाबूजीकेँ देखएबला हमर भाए झुकिकए गिरहिबला छल कि तखनहि कियो हुनका पकड़ि लेलकनि आर ओकरा मुँहपर पानिक छिट्टा देलकनि। मुदा हमरा तँ नीक लागल। हम एकटा दीर्घ निसाँस लेलौं आर देखलौं..... हमर बाबूजी..... हमर खून, हमरहि सोझाँ मरल पड़ल छथि..... , हमर साक्षात् बाबूजी हमरा सदाक लेल छोड़ि कए चलि गेल छलाह। हम ई देखतहिं रहि गेलौं। ने जानि कोन-सन अनुभूति हमरा करेजसँ बाहर आबि गेल, बाबूजीकक लहास पकड़ि हम फूटि-फूटि कए कानब शुरू कऽ देलौं ..... हम्मर बाबूजी.........। बीनू भाइ उत्ताप सभटा मिथ्या थिक! कियो कतौ नै देखाइत अछि। कियो तुरंते एलीह एवं देखिते चोटहि भागि गेलीह। चिन्हियो नै सकलियनि। अकार चिन्हारे सन छलनि। माथपर नुआक संग अधा कपार तक घोघ छलनि। विदीर्ण मोने उल्टे डेग बाहरे पड़ेलीह। तखन्हि दु गोटा दौगलि एलीह। पएर छूबि छगुंतैल चट घुरि गेलीह। एक गोटा हाक देलथिन। समर्थ सन कियो दौगले एलाह। देखलनि। घोकरी सँ मोबाइल लगौलनि। विष्णुकेँ। कहलथिन्ह स्कूटरसँ तुरंते जाइ लेल। विनयानन्द नै होथि तँ सनटिटहा पएटघाटबलाकेँ संगहि नेने अबै लेल। विनयानन्दे एलाह। छूबि कऽ देखलनि। तर्जनी-औंठासँ दुनू पलक सटा देलनि। मुँह बिजका चल गेलाह। आशाहीन कि निरस्त मोने। तथापि देखाइ पड़िये रहल छल, जेना एतीकालसँ श्रवण काज करैत छल मुदा बुझिऐक नै जे के की बाजि रहल छथि, कारण धियान कतौ छल। दृष्टिपर केन्द्रित। धियान अंतः रहलासँ समक्ष आँखि कान नाक खुजलहु रहला संता कार्य नै करैत छै अर्थात श्वाँस तक ठमकल रहै छै। धियानमे। घरक किछु-किछु जुटि चुकल छल। विष्णु एवं सागर जुमि चुकल छलाह। हँय-हँय समान उठौलनि। धँय सँ वस्तु बाहर लऽ गेलाह जइसँ कियो ई नै बुझए जे घरेमे.....। सबहक बओल मुँहसँ बुझाइत छल जे सभ कियो रोदन कऽ रहल अछि। चारि गोटा जहाँ रोदन करै छै तँ शेषकेँ स्वतः कना जाइते छै, भलहि डाहे माखे रहउ तथापि। तहिना चारि गोटाकेँ प्रसन्न भेलासँ खुशीक प्रभावो सम्पर्क लोकपर लक्षण होइ छै। सुगुन छल जे ओऽ नै छलीह। कतौ नै छलीह। नै तँ मुर्छापर मुर्छाक दृश्य होइत। परम पहपटि भऽ जइतैनि सभकेँ। भन्नहि नै छथि! कतौ! कोनो समान दू गोटासँ घरसँ बाहर कि बाहरसँ घर होइत छै तँ भरिगर बुझाइते छै। निष्प्राण वस्तु तँ विशेष। मुदा एहेन समान घरसँ बाहर करैत काल चिंतन रहै छै जे अखन प्राण छै। प्राण बाहरमे जेबाक चाही तेँ धीयो-पुता हल्लुक जकाँ उठा लै छथि हूबापर। ‘बी’ तँ अल्पहारी भऽ गेलीह, साठिक पश्चाते जे ‘बच्चा’ सभकेँ भारी नै लगथिन। बाहर होइत भांतर नेमटेम प्रारम्भ। हरबासल, जितिया, एकादशी, गंगाजल, गोदान। कतेक लोक तँ सामान भऽ चुकल रहैत छथि। वस्तु देखै हेतु लोक गोलिया जाइत अछि छनाक सँ। बानर बनरी नाच सन। मदारी निपत्ता मुदा एकटामे सभ आनन्दित तँ दोसरमे हाक्रोश करैत। परम सत्य एकेटा! से आइ विश्वास भऽ रहल अछि। पहिनौं कदाच से अभरय मुदा मरीचिका सन मृगतृष्णा जकाँ। कड़गर कि उत्कंठा सँ नै। तँइ एक गोट परम सत्य जँ पहिने पक्का पक्की बूझि जैतिऐक तँ कमसँ कम घरहट सन जंजाल काज कदापि नै ठनितौं।पजेबा सीमेंट सुर्खी छड़ कोजैक टाइल्स माखुल आ बाँस कोड़ो बत्ती करची खाम्ह, फ्लैटक कर्ज लऽ सूदपर सूद चुकता करैमे डँर तोरी। राजो महराजोक अट्टालिका हक्कन कनैत रहि जाइ छन्हि। ऐ सँ नीक वृक्षा-रोपण। बेसी पूंजीपगहोक हाहे बेरबा नै। एकोटा गाछ रोपि कऽ पोसि लेलौं। संतानो सँ नीक बुझैत। अपनौं फल खा सुख करू आनहुँ युग युग तक सुख करताह। फल पात जाड़निसँ। नै किछु तँ छायासँ। छाया जेँ बड़ प्रिय होइ छै तँए जिनगी भरि संग नै छोड़ै छै। सबहक। कोनो भेदभाव नै। मनुष्य़ छी कि वनस्पति! सूर्यहु केँ संग नै छोड़ैत छथि। हुनकहि संग निपत्ता। हुनकहु वएह छथिन्ह। सहचरणीय। ऋषि मुनि सभकेँ कुटी पसीन छलनि, बोन-झाँखुर जंगलमे। ज्ञानी छलाह तँए । राजो महराज निंघुरैत छलथिन कुटी प्रवेश काल। सभसँ उकठ्ठी जीव मनुष। यमराजोक तस्वीर घीच लेलक। अत्यंत विकराल भयावह। जखन कि कतौ किछु नै। समान जकाँ पड़ल रहू। गाछक ढेंग सन। सेहो नै। ढेंग सड़ैत छै तँ पहिने कोकनैत छै तथापि विकट दुर्गन्ध नै। तइ भभक दुआरे जड़ा देल जाइ छै आ खूब गहींरमे गोड़ि देल जाइ छै तेल फुलेल चानन लगा कऽ। समानकेँ। एहेन समानकेँ जे सड़लासँ बोकरए लागत केहनो तन्दरूस्त लोक। समाज डराइ छै एहेन एकटा समानसँ। तखन ऐंठी। कियो अवंच नै। सब दिक भऽ देल अछि। भगवानो भगवतीक खिस्सासँ। कथो पिहानीमे सभ प्रेम तकै छै। ओ प्रेम नै। सिनेमाबला प्रेम। दैहिक संभोगबला, बिआह भऽ जाइबला। बिआह संस्थाकेँ थकुचयबला। ई की भेलइ! पहिने वरदान फेर वध करै लेल अपस्याँत। एके खेड़हा मात्र! सभ भगवानक। हुँह! मुदा ई कियो नै बूझि पबै छै तथापि जे अहंकार-वध बेर-बेर देखौल जाइ छै, जे सभकेँ बेर-बेर मोन पड़ैक अपनहुँ अहंकार! जेकर मर्दन करी। तमसेबाक बदला जँ से साधि लितौं तखन तँ बुधियार एवं ब्रह्मज्ञानी भऽ गेल रहितौं, याज्ञवल्क्य लोकनि सदृश। कतबहु देखलौं खिस्सा-टीली-सिनेमा आ वध; से कहाँ बुझलिऐ। आब बुझाइये। से गूढ़ विषय। एकटा सत्य! सभटा हुसि गेलाक पश्चात्। एकटा सत्य! अठारहो पुरान छोड़ू। व्यासक दुनू वचन भारी बुझाइत अछि तँ एकेटा मानू। एकेटा सँ गति भेट जाएत। परोपकार टा करू। ताहूमे जँ बड़ शोणित सोखैत बुझाइये तँ तहू सँ हल्लुक एकेटा बात अवधारि लिअ जे किनकहु अधलाह नै करब संज्ञान। बैसल ठाम बिनु मेहनतिक तप। एकपर विश्वाससँ सिद्धि भेटत। ई एक सभसँ शीर्ष थिक जतए पहुँचए आरम्भमे दू, तीन, चारि, पाँच....। अर्थात् ..... पाँच, चारि, तीन, दू तत्पश्चात् एक। सभ आ लगभग सभ, दूइयेमे लेपटाएल बीत जाइ छथि। जँ दू सँ एकक अनुभूति भऽ गेल तँ लक्ष्य भेट गेल। इएह प्रेम छी। दोसर शब्द मे ई प्रेमक अतिरिक्तहु सभ किछु छी। तँए सभ किछु प्रेमे छी। एकानन, चतुरानन, पंचानन; ....। पता चलैत अछि बाँसक फठ्ठीक बिछानपर पाड़ि टांग हाथ ममोड़ि जौड़सँ सक्कतसँ बान्हि जेना भागि ने जाए कहीं, तखन। कुमारिल भट्ट तँ जीविते अग्निक तापकेँ शीतल सिद्ध केलनि। शेष ओहिना नियति सँ स्थान विशेषपर जड़ैत छी, दुर्वाशाक श्रापे नै। भोजघारा कि दैनिक चुल्हा पजड़ैत नै रहत। मुदा ई समान काँचे बीजू आमक फेंण संगे स्वतः एना धधकैत अछि कि स्वयं धृत, धूमन, सरड़ रहए। भरि जीवन जे तेल घी चपने रहैत अछि। जतबे-ततबे, मुदा सएह धू-धू धधकैत अछि। मुदा कोनो तापबोध नै। से तँ मनुखक ललाटपर लिखल रहै छै किंवा धस्सल। जे चेतनावस्थामे अछि। आतंकवादी कि खूनियाँ चेतनावस्थामे नै होइत अछि। ओ निशामे होइत अछि। वा हुनक रक्त दूषित होइ छन्हि, जइ रक्तक ग्रूप पता लगेबाक ज्ञान अखन तक किनकहु नै। यएह कहि सकैत छी जे एहेन कुलंगार आंतरिक रूपें सामाजिक प्राणी नै होइत अछि तँए समाजमे अछैत ओ अपराध करैत अछि, जानि बूझि कऽ अपहरण, हत्या, गर्दनि रेतनाइ करैत अछि। भारद्वाज सन त्रिकाल दर्शी वैज्ञानिक एहेनकेँ देखिये कऽ बारि दितथि। अग्नि सन पवित्र! शीतल! लहलह करैत एवं धधराक संग। पुनः छाउर। फेर माटि। आ चुट्टीक भोजन भऽ पुनः क्षारित भऽ माटि। एकहि बात भेल। तथापि अस्तित्व रहिते छै। माटि भऽ जाइत अछि पाथर। पाथरसँ मूर्त्ति। जीवंत मूर्त्ति। मुक्ति कहाँ! आ माटिक संग अनंत सूक्ष्म जीव बनि जाइत अछि। एकटा बड़का जीव अंततः अमीबासँ। माटियोमे उर्वरा शक्तिक उर्जा समाहित रहै छै। ई अटल विश्वास जे समान बनैसँ पूर्व तइसँ किछु निस्सन होइ छै; नि:सृत। प्राण कि आत्मा आ जे किछु। से मात्र कल्पना अद्यावधि। कोनो प्रमाण नै। जे नि:सृत भऽ ब्रह्ममे विलीन भऽ जाइ छै। वशिष्ठ नीतिज्ञ कहै छथि। अदृश्य सत्ताक तँ ढेर अस्तित्व आ प्रमाण अछि। विद्युत, चुम्बकत्व, ध्वनि, प्राणवाच प्रभृत्ति अदृश्य सत्ताक रूप छी। देखबामे यएह अबै छै जे समान मँहक अंतर्निहित क्रिया रूकि गेलैक अछि। जेना कोनो चलैत मशीन बन्द भऽ जाइत छै तँ मशीनसँ किछु भगैत नै छै। मुदा मशीन पुनः चलौल जाइ छै, कारण ओकर रहस्य मनुष्यकेँ माने वैज्ञानिक मनुष्यकेँ मनुखक अपन रहस्य अद्यावधि सोलहन्नी ज्ञात नै। जे ज्ञात करैत अछि ततबे व्याधि सँ आर ओझराएल जा रहल अछि। सकरी, लोहट, हायाघाट, समस्तीपुर कि सिन्दरीक मशीन तँ जंग-लोहा सँ माटि भइये गेल सन लगैत अछि। चिकित्सा विज्ञानसँ आब पुनः भोग विज्ञान। चहुँ दिस रहस्य जानए वपहिं बपहिं। ग्रहपर तक। सृष्टि केना बनल। केहन विस्फोट भेल छलै ओ? एना संतोष लेल चारि पाँच तरहक गाछ रोपण। तेँ भीष्म पितामहबला गाछ थोड़े भेटत। कते रास ईँटा-तींटा पकिला कारबार बूझि करैत छथि। फेर वएह बात! जखन राजा महराजाक अट्टालिकाओ धूल धुसरित भऽ जाइत अछि तखन ई.....। केहन-केहन मन्दिर गिरिजाघर मस्जिद काल कलवित भऽ जाइछ। आब की जमीन्दार! ठाकुर! महराजपर अठ्ठावज्जर करै छी उद्योग पतिक बदला। जनिक मोटका-मोटका गगनचुम्बी स्तंभ कलांतरे पताल लोक आ नङटे अकाश मुँहे ठार रहि जाइत अछि। कालचक्र! सागरमे पहाड़ डुबा दैछ कि समुद्रपर पहाड़ ठार कऽ दैछ। ई की भेलै? अकाश ठेकल मन्दिरमे एक बीतक मूर्त्ति। मस्जिदमे तँ सेहो नदारत। छुच्छे ढ़ं ढ़ं। ऐसँ नीक स्कूल। अंग्रेजीबला नै। तइमे तँ पाइबला धनिकहाक बच्चा महान बनैत अछि। मनुख बनबैबला पाठशाला। बोर्डहु लागि गेलै। बीनू भाय बाल मन्दिर। कालांतरे चपा गेल। अंग्रेजी स्कूलक उत्कर्षसँ। सभ अंग्रेजीक गुलाम। बड़का गौरबबला बात। बोकबा अझरूद्दीनहुँ कऽ टऽ कऽ केँ बाजए लगलाह। विश्वस्तरीयो ख्याति फीका बिनु अंग्रेजी बजने। गुलामीक। द्विभाषककेँ रोजी भेट जेतैक ने! श्री संत पर्यंत! ऐ बीर्ड़ोमे बोर्डहु उड़ि कऽ कत्तऽ गेल पता नै। स्कूलोक पता नै। मात्र लेखामे। दू गोटा मुदा दरमाहा उठबैत चुपेचाप जा कऽ पूर्णियाँ, आब ककरो अनका पतो नै जे बीनू भाय नामे स्कूल चलै छै। कहुखनकेँ लागत जे परशुरामक सिद्ध मन-गतिये कलियुगमे सभ किछु विपरीत चलै छै। जखन मनुष्य वस्तु भऽ जाइत! तइमे एकटामे जीव नै रहैछ एवं नष्ट भऽ जाइछ मुदा दोसर जीवंत समान। बुढ़ारीमे जखन छलौं तँ सामाने छलौं मुदा प्राण कि हुकहुकी रहए। एसगर बगुला सन टकटक तकैत। कियो पूछनिहार नै ने, फुरसतिक अभावे। दया आबए मुदा वएह उल्टे दयाक पात्र बुझए। अहाहा! झुनकुट भऽ गेलथिन। सत्तरि टपि गेलनि। की दवाइ दौरीमे! बेकार कऽ! ऐ सँ नीक जे आब ...। वर्षीमे, पाँच वर्षी तक जाइत जाइत अकच्छ! तिथि, पतरा, महापात्र, गाम गेनाइ, छुट्टी लेनाइ। धुत्! अंग्रेजी गुलाम लेल ऐ सँ सुनीनगर नीक फस्ट जनवरी, मैरिज डे, बर्थ डे, भेलेनटाइन डे। हरिबाशर कि जितिया व्रत! बाप रे बाप! बर्थ डे, मैरीज डे … बारहो महिना! जतेक मोन हुअए! धुर छी, गुलाम! तिथि बूझिते नै छथिन डेटपर जेता! छोछनए छोड़ि कऽ पोछनए। लोक आब करोड़मे महवारी पबैत अछि! ई एतनीमे फुच्छ! खबाशीमे! अहिना एक दिन जा कऽ सोलहनी गुलाम भऽ जाइत अछि, लेकिन मार्क्स लोकनिक चोला लगा वेद वाक्य सर्वे भवंतु सुखिनः, वसुधैव कुटुम्बकम्, ...नारी पूज्यंते रमंते... देवता... सार्वभौमिक वैश्वीकरणक सनातनी मत सभकेँ हरकुचि थकुचि। दोसर महात्मा गान्धी जन्मताह! से, बाट तकिते तकिते दाँत खिशोटि देब। से गीठ्ठ बान्हि लिअ। ओना बाबा रामदेव अवतरित भेलाह अछि घोधिबलाक धोधि फोड़इ लेल, खेलहाकेँ बोकरबइ हेतु। तहिया तँ भूलचुक सँ आँखिमे अमेरिकन लेंस एवं हृदैमे अमेरिकन स्टैंट लगबाबए पड़ल। कपालभाथी सँ बाहर ने फेका जाएत तकर भय छले। मुदा हुनका कोन जे पोलीस्टर चाउर, लेमिनेटेड भट्ठा कि दस दिनमे जन्मौल एक हाथक गेन्हारी कि सुइया देलहा सजमनि कदीमा अनरनेबा खाइ छी। फुलकोबीक नामे सुनि गैस कि भरोड़ दिअ लगैत अछि! सभटा देखि रहल छी। बूझि रहल छी! अकानियो रहल छी। टॉंट, जाड़नि सन पजड़ैत। तथापि ने कुहड़नए आने उत्ताप। एक मिशिया चिनगी उड़ि पड़ला सँ लोककेँ लहरए लगै छै। काँच जाड़नियो कानि कऽ नोर बहबए लगैत अछि। धू धू धुधुऐतो शीतलताक बोध भऽ रहल अछि हमरा! कारण जीवनमे ऐसँ उत्कट ताप छलै डाह मारब, ईर्ष्या, पश्चाताप, क्रोध, अहंमे समावेशी नीति आरक्षणसँ भिन्ने अपमान बोध। प्रोन्नतियोमे। आबऽबबा बले फौदारी नै। अपनेमे लड़ि कटि मरि जाउ। पाटलीपुत्रो अपने कहाँ ठठला! आर्यावर्त्त केँ डुबबैत अपनहुँ स्वाहा। गर्त्तमे कर्त्ता। मैथिलीयो केँ साठि वर्षे दयाक भीख! संत महात्मा ब्रह्मचारी कालमे। बाबा बले होइते तँ कहिया ने भेटल रहितै ई। पुनः एकटंगा देने रहुआ अपने मोने गज्जैत रहू। चारि गोटा। चानन ठोपबला। फोल्डिंग शीष-सूत्रबला। मिथिला सासुरबला १०८ श्री श्री भगवान राम माँ मैथिली केँ ततेक सधलथिन जे विष्ठो देखि मिथिलावासी कहए लगलाह, राम राम! आब कहए पड़त-त्यज गोविन्दम् त्यज गोविन्दम्। मात्र माँ शक्तिक शरणम् मैथिली शरणम्। मनुज प्रेम सूत्रसँ बीनल मात्रकेँ कथा कहैत छथि। महाकवि लोकनि तहिया जँ रति क्रीड़ाक श्रम जलक बदला श्रमिकक श्रमजल परखने रहितथि तँ आइ श्रम जलधारी पिछड़लाहा श्रमजीवी मैथिलीसँ दूरस्थ नै भऽ सभसँ बेसी संख्यामे समाजक आगाँ रहितथि। भगवान रामकेँ सीता माँ सँ प्रेम आकि काट? से रामकथा कहैत अछि। वएह काट कि विधान-निर्णय प्रेमक प्रतीक, प्रेमक परिभाषा। राधा विरहक नोर प्रेमक प्रथम दृष्टांत। तेँ एहेन विषादसँ पृथक संसारो निस्सन प्रेम थिक। जे पढ़ल हुअए। जे पढ़ैमे नीक लागए। जे एकोरत्ती उत्तम संदेश हुअए। प्रज्वलित शिखो मध्य हार्दिकतासँ अर्पित हुअए। सभ तँ छाया सहित भस्म होइते छथि। सबहक छाया भास्कर संग साँझ होइत-होइत भरि राति लेल निपत्ता भऽ जाइछ तथापि हम यथावत छी। लहकैतहु भस्म नै भेलौं अछि। भगवतीक दया मायासँ हमर छाया सेहो अद्यावधि अहर्निश सङ छथि जे गीता सेहो थिकीह एवं प्रेमवश गीतू अर्थात् ऐ प्रेम कथाक राधा! जाउ सभ अपन-अपन नीन्न गबए लेल! शेष अगिला जनममे! शुभ कलियुग! शम्भु कुमार सिंह जन्म: १८ अप्रील १९६५ सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, १९९५] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषयपर पी-एच.डी. वर्ष २००८, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समए- समेपर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-६ मे कार्यरत।—सम्पादक भाए-बहिनक व्यथा कथा हुनका दुनूकेँ एकटा थाकल-हारल बटोही मानि सकैत छी। दुनूक चेहरा झमारल। आँखि सूजल। एकदम श्रीविहीन। हुनका दुनूमे की संबंध रहनि वा संबंधक निर्धारण केना भेल हेतै, से कहब कने कठिन मुदा संबोधनसँ बुझाइत छल जे दुनू गोटे भाए-बहिन जकाँ रहथि। बैसतहि मैथिली वरसँ पुछलथि- “कहू भाय की हाल-चाल! एहेन बगए किएक बनौने छी?” वर: बीज रूपमे हम कहिया ऐ धरतीक गर्भमे पड़लौं, केना हमर अंकुरण भेल, से सभ हमरा एकदम स्मरण नै अछि। हँ, हमरा अपन नेनपनक किछु बात सभ स्मरण अवश्य अछि। तइ दिन हमर उमिर यएह कोनो छओ मासक लगधक रहल हएत। तखन हम एकदम छोट रही, ऐ लेल हमरा माल-जालसँ बचएबाक लेल यएह जगरनाथ मिसर (शिव मंदिरक प्रमुख पुजेगरी) चारू दिससँ जाफरीसँ घेर देने छलाह। तइ दिन मंदिरमे शिव आराधनाक लेल जतेको लोक-बेद अबैत छलाह, लोटाक बाँचल जल हमरा जड़िमे उझलि दैत छलाह। शिव-प्रांगणमे रहबाक परताप बुझू वा हमर अपन भाग्य, किछु महिला लोकनितँ हमरहुँ जड़िमे जल-फूल-अच्छत केर चढ़ौआ चढ़बए लागलीह। देखिते-देखिते हम अपन पूर्ण यौवनकेँ कहिया प्राप्त कऽ लेलौं से हमरो पता नै चलि सकल। भीमकाय हमर देह। हरियर-हरियर पातसँ आच्छादित दूर-दूर धरि पसरल हमर डारि। जखन मंदिरमे शिव नचारी गाओल जाइक तँ पूरा वातावरण संगीतमय भऽ जाइक। बसात उन्मत्त भऽ कए हमरा पात सभकेँ एक्कहि संग झंकृत कऽ दिअए आ आेइसँ निकसल मेहीं सुर जेना नचारीक सुरसँ मिलि-जुलि एकटा मनोहर दृश्य उत्पन्न कऽ दैक। हमरा डारि-पातक छाहरिमे जेठक दुपहरिमे भरि गामक बूढ़-बुजुर्ग ओइ मचानपर बैस शीतलताक अनुभव करै छलाह। नेना सभ कतौ खो-खो तँ कतौ बुढ़िया कबड्डी खेलाइत रहैत छल। हे ओइ कातमे भरि गामक माल-जाल सबहक लेल विश्रामस्थल छलै। सालमे एकबेर बरसाइत (बटसावित्री) दिन हमर नव रूपेँ श्रृंगार कएल जाए। ओइ दिन हमर सौंसे घरे बुझू जे लाल-पीयर जनौसँ लदि जाइ छल। हम गर्वोन्मत्त रही। हमरा बुझाइत छल जे सभदिन एहिना हमर जिनगी कटि जाएत। (एकटा दीर्घ निःश्वास छोड़ैत) ....मुदा हमरा सुन्दरताकेँ ककरो नजरि लागि गेल। हमरा घमंडकेँ घून लागि गेल। एकबेर अही गामक लत्तर खाँक छोटका बेटाकेँ सौंसे देह खौजली भऽ गेल रहै। भरि सहरसाक डागदर-बैदसँ देखेलाक पश्चातो ओकरा कोनो लाभ नै भेलै। किओ हुनका कहलकनि जे ‘पाँज भरि अमरलत्तीकेँ जँ तीन-चारि दिन धरि हुनका पएरसँ मोलबा दियौ तँ खौजली जड़िसँ उपटि जाएत।’ लत्तर खाँ कतए-कहाँसँ भरि पाँज अमरलत्ती आनलनि आ बेटासँ पएर तरेँ मोलबौलथि। खौजली उपटलनि कि नै से नै जानि मुदा हम ओइ अमरलत्तीसँ अवश्य पाटि गेलौं। भेलै ई जे ओइ अमरलत्तीक एकटा टुकड़ी लत्तर खाँ हमरा गाछक उपर फेकि देलथि। आ ओ अमरलत्ती, जे ओहुना परजीवी होइत अछि हमरा सन हरियर गाछ पाबि धन्य भऽ गेल। आइ तँ हमरा सौंसे देहपर ओकरहि राज छै। ओइ आयातित सौंदर्यक नीचाँ हमर नैसर्गिक सौंदर्य फड़फड़ा रहल अछि। हमर तँ दम निकलल जा रहल अछि। बूढ़-बुजुर्ग लोकनि अखनो अबै छथि, नेना-भुटका सभ अखनो बुढ़िया कबड्डी आ खो-खो खेलाइत अछि मुदा हमर अस्तित्वविहीन भऽ जएबाक परबाहि किनको नै छन्हि। अहाँ तँ देखितहि छी जे हमर विशालकाय गाछ गामक प्रवेश द्वारपर अछि, तँए भरि गाममे बिआह-द्विरागमन, जनौ, मूड़न सन जतेको आयोजन होइत अछि, सभमे लोक एत्तहिसँ तोरणद्वार बना अपन-अपन घर धरि भुकभुकिया बल्ब लगा कए बाटकेँ झकझबैत अछि। एहेन सभ अवसरपर हमरा कतेक कष्ट होइत अछि से हम नै कहि सकैत छी। हमरा डारि-पातपर गत्तर-गत्तर भुकभुकिया बल्ब सभ लगा देल जाइत अछि जे भरि राति छिनार छौंड़ा-छौंड़ी जकाँ कनखी मारैत रहैत अछि..भुक...भुक...भुक...भुक। हमर तँ गत्तर-गत्तर झरकि जाइ ऐ। एकदिन भोगल पहलमान गामक लोक सभकेँ हमरहि गाछतर बजाकए प्रार्थना केने छलाह जे- “ऐ बरक गाछपर सँ सभटा अमरलत्तीकेँ उजाड़ि-उपारि देल जाए नै तँ ओ दिन दूर नै जखन ई परजीवी अइ बर गाछकेँ नेस्तनाबूद कऽ देतै” मुदा गामक अधिकांश लोकक कहब रहै जे- “ई कि कोनो लतामक गाछ छिऐ जे सूखि जेतै! बर छिऐ बर....” बर तँ हम सरिपहुँ छी, मुदा जँ एहिना ई अमरलत्ती सभ हमरा डारि-पातक खून चोसैत रहत तखन कतेक दिन धरि हम जीबि सकब से भगवतीए जानथि.....। एतबा कहि बर फेर उदास भऽ गेलाह। मैथिली: हमरो दशा तँ किछु एहने अछि भाय! हमरहुँ जनम कहिया भेल, कहिया हम लोक सबहक जीभसँ उच्चरित भेलौं से सभ हमरो स्मरण नै अछि। हमरा तँ अहाँ जकाँ अपन नेनपनो स्मरण नै अछि। असलमे नेनपनमे हमरा समस्त मैथिल समाजसँ ततेक ने दुलार-मलार भेटैत रहल जे हमर नेनपन अल्हड़पनहिमे बीत गेल। हमरा तँ जे किछु स्मरण अछि से अपन जुआनिएक। जेना अहाँ अपन पूर्णयौवनावस्थामे भीमकाय देह आ अपन विस्तीर्ण डारि-पातपर गर्व करैत छलौं तहिना हमहूँ अपन जुआनीमे मिथिलाकेँ के कहए अपन पड़ोसक राज आसाम, बंगालसँ लऽ कए नेपाल (विदेश) धरि अपन श्रुतिमाधुर्य गुणक बले पसरल छलौं। साहित्यक कोनो एहेन विधा नै जइसँ हमर श्रृंगार नै भेल हो। ज्योतिरीश्वर, विद्यापति, उमापति, चन्दा, मनबोध। हरिमोहन, यात्री, मधुप, ईशनाथ, राजकमल, प्रबोध।। प्रभृति सहस्त्रों कवि-लेखक लोकनि द्वारा हमर साहित्य-संसारक श्रृंगार कएल गेल छल। ई संभवतः १९म शताब्दीक उत्तरार्ध रहल हेतै जखन मिथिलोपर अंग्रेजी शासन आ शिक्षाक प्रभाव पड़ए लागलै। नाओं कथी लेल कहब (भऽ सकैछ तइ दिन ओ हमरा लेल शुभे सोचने हेताह) अंग्रेजी साहित्यसँ प्रतिस्पर्धा करबाक कारणे सभसँ पहिने ओ हमर अपन लिपि तिरहुता, जे हमर अस्तित्वक प्रतीक चिह्न छल तकरा उतारि कए फेकि देलथि आ हमरापर देवनागरी थोपि देल गेल। तहिया के जनैत छलै जे ई देवनागरी हमरा एकदिन साँस लेब कठिन कऽ देत? आइ हमरा सौंसे देहपर ओकरे प्रभाव अछि। ओकरा तरमे हम फरफरा रहल छी। एकर एकटा उदाहरण हम अहाँकेँ दऽ सकैत छी- अहाँ भारतक कोनो कोनमे चलि जाउ आ लोकक समक्ष बंगलाक कोनो पाठ्य सामग्री प्रस्तुत कऽ कए पुछियौनि जे “ई कोन भाषा थिक? तँ ओ कहता जे बंगला” आ जँ से नै तँ बेसी सँ बेसी कहताह- असमियाँ वा उड़िया, मुदा हुनकहि समक्ष कोनो मैथिलीक पाठ्य सामग्री राखि दियौ तँ ओ फट्ट दऽ कहता जे ‘हिन्दी’। आब अहाँ कल्पना कऽ सकै छी जे तखन हमर मनोदशा केहन भऽ जाइत छल हएत। आर तँ आर जखन कखनो हम अपन आन सखी-बहिनपा (बंगला, असमी, उड़िया आदि)क संग कहियो काल बैसै छी तँ ओ लोकनि हमरा तेना ने फजीहति करै छथि से नै कहि सकै छी। हुनकासभ (बंगला, असमी, उड़िया आदि)क कहब छन्हि जे- “देखू हमर धिया-पुता सभ विश्वक कोनो कोनमे किए नै होथि, कोनो भाषाक जानएबला किए नै होथि मुदा आपसी संवाद ओ लोकनि अपने भाषामे करै छथि आ एकटा अहाँक धिया-पुता सभ छथि.......” साँच पुछू तँ ई सभ उपालम्भ सूनि करेज कटि जाइत अछि। जो रे दैब! जो रे हमर कपार! हमरा (मैथिली) के कहए ओ लोकनि अपन मैथिल संस्कृतिओ केँ तँ तहिना ताकपर रखने जा रहल छथि- धोती, तौनी, पाग, जनौ..., सोहर, समदाउन, बटगमनी, लगनी...., तिलौरी, अदौरी, तिसिऔरी, तिलकोर..., सभटा हेराएल जा रहल अछि...। अपन ऐ सभ दुर्दशाक चर्चा जखन कहियो काल आन-आन भाषा लग करैत छी तँ जनैत छी ओ लोकनि हमरा की कहैत अछि? ओ सभ कहैत अछि- तोँ ईष्यालु छेँ, तँए तोरा आन-आन भाषा सभसँ ईर्ष्या होइत छौक, तोँ आन-आन सभ्यता आ संस्कृतिसँ डाह करैत छैँ, समैक संग जँ नै चलबेँ तँ एहिना पिछड़ल रहि जेबेँ आदि-आदि। आब अहीं कहू भाय! ई सभ तँ व्यर्थेक दोषारोपण छै ने? दुनियाँक कोन एहेन माए हेतै जकरा अपन धिया-पुताक सुख नै सोहाइत हेतै। अहाँ तँ हमर भाय थिकहुँ, अहाँ सँ हम जे किछु कहब से साँच आ हृदैसँ। हमर धिया-पुता सभ जे आइ विश्वक अनेको कोनमे पसरल छथि, ओ सभ जखन सूट-बूट-टाइ पहिरि निकलै छथि आ फर्र-फर्र अंग्रेजी, जापानी, स्पैनिश, जर्मन, फ्रैंच आदि भाषा बौलैत छथि, फिल्मी गाना गबैत छथि, नीक-नीक होटलमे जा कए काँटा-छूरी सँ खाइ छथि तँ ई सभ देखि सरिपहुँ हमर करेज जुड़ा जाइत अछि। भगवतीसँ गोहारि करैत रहैत छियनि जे “हमर धिया-पुता सभ एहिना अखिल विश्वमे कला, संगीत, साहित्य, राजनीति सभ क्षेत्रमे अपन-अपन नाओं आ जस करथु”। यएह परसूका गप्प थिक, फ्रैंकफर्टमे विज्ञानक क्षेत्रमे कएल गेल कोनो पैघ उपलब्धिक लेल हमरहि एकटा ‘सपूत’ केँ पुरस्कृत कएल जाइत रहै, सौंसे दुनियाँक मीडियाबला सभ ओइ समारोहक कवरेज करैत रहै, अपन सपूतक उपलब्धिपर गर्व करबाक लेल हमहूँ कोहुना ओत्तए पहुँच गेल रही, जहिना-जहिना हुनका सम्मानमे किछुओ बाजल जाइ, तहिना-तहिना हमर करेज गर्वसँ पसरल जा रहल छल, मोनमे होइत छल जे ओत्तहि मंचपर जा कए हम चिकड़ि-चिकड़ि कऽ लोक सभकेँ कहि दिऐक जे- देखू हम ईर्ष्यालू नै छी, हमरा विश्वक कोनो विषय, भाषा, समुदाय, सभ्यता, संस्कृतिसँ कोनो प्रकारक परहेज नै...... मुदा कार्यक्रमक अंतमे जखन हमर ओइ सपूतसँ पूछल गेलनि जे- अहाँक मातृभाषा की थिक? तँ हुनका मुँहसँ बहरेलनि अंग्रेजी!!! सरिपहुँ कहैत छी भाय! ई सुनितहि हमर करेज...., एतबे नै घर एलापर हुनकासँ हुनक पचमा किलासमे पढ़एबला बेटा पुछलकनि- “बाबूजी! बाबा तँ कहैत छथि जे हमरा सबहक मातृभाषा मैथिली थिक, तखन अहाँ अंग्रेजीक नाओं किएक लेलौं? जँ अहाँ सन-सन लोक सभ अपन मातृभाषाकेँ एना अछूत बूझैत रहताह तखन तँ मैथिलीक भविष्य.....।” बाप कहलकनि- चुप रह बुड़ि, ई कोनो आन भाषा थिकै? मैथिली थिकै मैथिली, एकर जड़ि पताल धरि पसरल छै……। आब की कही भाय! हम अपन ऐ सपूतक अटुट विश्वासपर विश्वास करी वा हुनक छोट बालक द्वारा कएल गेल हमर भविष्यक चिंताक प्रति आशा...! एतबा कहैत-कहैत मैथिलीक दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लागलनि। बर, मैथिलीकेँ सांत्वना दैत रहलथि, हुनका मैथिलीसँ आर किछु सुनबाक अपेक्षा रहनि मुदा मैथिलीक मुँहसँ जेना बकारे नै बहराइत रहनि, ओ कपसि-कपसि कए कानि रहल छलीह....। दुर्गानन्द मण्डल लाल भौजी पछिला अड़तालिस बर्खक सभ रेकार्ड घ्वस्त करैत ऐबेर क जाड़ पाछाँ छोड़ि देलक। कहबी छै जाड़ मासमे रुइये आकि दुइये मुदा रुइ ततेक महग जे बेसाहब कठिन। जँ दाम पुछबै तँ माघो मास सौंसे देह पसीनासँ तर-बत्तर भऽ जाएत। जहाँ धरि दूइएक सवाल अबैत अछि तँ ई सुख प्रायः सबहक कपारमे लिखले नै अछि। जँ कियो किशोरावस्थाक बालक-बालिका छथि तँ राति सपनाइते बितैत छन्हि, आ बुढ़हा-बुढ़िक तँ कथे नै पुछू किऐक तँ आइ ने ओ बुढ़ भेलाहहेँ मुदा एहेन कतेको जाड़केँ ओ लोकनि देखने छथि आ खेपने छथि। तँए फलक रुपमे केराक घौड़ जकाँ हथ्थे-हत्थाक असथानपर गन्डाक-गन्डा धिया-पुता सोहरल छन्हि। बाल-बच्चाक समर्थ रहबाक कारणे, ओकरा सभकेँ तँ अपने खाए-खेलाएसँ पलखति नै। तहूपर सँ जँ कोनो पाहुन-परख चल आबथि तँ घरक सर्वर्था अभावे। सभ घरकेँ बेटा-पुतोहु अलगे छेकने। तँए बुढ़ा-बुढ़िक लेल तँ माघ मासक जाड़ प्राणक हार बनल रहै छन्हि। कोनो तेहन अवसरे नै भेट पबै छन्हि जे समए सँ ओइ कहबीसँ किछु लाभ उठाबथि। तँए ओम्हर बुढ़ि कोनेा कोनमे धोकरी लगा पुआरमे घोसिआइल रहै छथि आ एम्हर बुरहा दलानक कोनो केानमे पोता पोतीक संग जाड़सँ संर्घष करैत रहै छथि। कोनो तरहेँ दुनू परानी (बुरहा-बुढि) राति खेपक लेल मजबुर। मुदा से कते दिन धरि? एक दिन मौका पाबि़ बुढ़ा बुढ़िकेँ हाक दैत छथिन- ‘‘सुनै छै, हाथ-पएर जाड़े ठिठुरि रहल अछि, कनी कोनो मालीमे लहसुन तेल पका कऽ लेने आबौ तँ। बुढ़ि आंगनेसँ उतारा दैत छथिन, हँ हँ सुनै छिऐ, एते जोरसँ किए हाक दइ छै, कोनो की हम बहीर छी? लेने आबै छिऐ। ताबे माले घरमे आगि तापौ। बुरहा पुनः बाजि उठै छथि- ‘‘हे जल्दी सँ औतै, हम माले घरमे छी।’’ बुढ़ि करीब दस मिनटक बाद मालीमे लहसुन तेल पका दुरुखेसँ हाक दैत छथिन- ‘‘कतए छै हइया लौ।’’ बुरहा फेर बाजि उठै छथि- ‘‘एम्हरे लेने आबौ ने हइया छिऐ।’’ बुढ़ि लग अबैत बाजि उठै छथि- ‘‘ई किछो नै बुझै छै? जे बेटी-पुतोहुबला अंगना-घर भेलै। सुतौ तेल लगा दैत छिऐ।’’ बुरहा पुआरक बिछौनपर ओंघरा जाइ छथि आ बुढ़ि तेलक मालीश करए लगै छथिन। कने कालक बाद बुढ़ा तेल लगबैत गरमा जाइ छथि। प्रेमसँ बुढ़िकेँ पुछै छथिन- ‘‘भानस भातमे देरी छै की? बच्चा सभकेँ अंगना दऽ आबौ, खा पी कऽ सुइत रहतै आ ई एत्ते आगि तापौ।’’ बुढ़ि आंगन जा धिया-पुताकेँ पुतोहु सभकेँ दैत अपने बुरहा लग आबि जाइ छथि आ मालक घरमे पजरल घुरा लग बैस आगि तापए लगै छथि। दुनू परानी गप्प-सप्प करैत बुरहा हाथ-पएर सुगबुगबए लगैत छथि। आ अपन दहिना हाथ बुढ़िक बामा हाथपर दैत बाजि उठै छथि, एकरा एक्को रत्ती कोनो बातक घ्यान नै रहै छै। कहौ तँ कतेक जाड़ होइ छै..... कहैत बुढ़िकेँ पाँजमे उठा आ पुआरक बिछौनपर ओंधरा जाइत छथि। कनिये जाकि लट्टा-पटी होइत आकि तखने आंगनसँ पोता-पोती खा कऽ सुतैक लेल बाबा किलोल करैत मालक घर दिस दौग पड़ैत अछि। बुढ़ि बाजि उठै छथि- ‘‘छोड़ौ ने, छोड़ौ धिया-पुता सभ आबि रहल छै।’’ आ दुनू परानी माने बुढ़ा-बुढ़ि गरमाएले अवस्थामे एक-दोसरासँ धड़फड़ा कऽ अलग भऽ जाइत छथि। रहल जबान-जुआनक गप्प, जबानीक धाह पाबि जाड़ो गरमाएले रहैत अछि। बुझू तँ दू परानी जबान-जुआन होथि आ उपरमे रजाइ पड़ल हो तँ जाड़ोकेँ जाड़मे पसीना छुटए लगैत छै। मुदा प्रकृति तँ स्थिर रहत नै। ओ तँ अपना कालक्रमे चलैत रहत। बीतल जाड़ मास आएल सरस्वती पूजा उड़ए लागल वातावरणमे रंग-अबीर चारु कात डारि-पातपर चिड़ै-चुनमुनी चहकए लागल। कोइली धीया-पुताकेँ मुँह दुसब शुरु कऽ देलक। आमक गाछ मंजरसँ महमह करए लागल। मुनगा फूल धरए लागल। राइ, तोड़ी, तीसी आ सरिसबमे पीअर-पीअर फूल सेहो लहलहाए लागल। वातावरण किछु दोसरे रंगक भऽ गेल। चारु कात महमह करैत। कथा-कुटमैती शुरु भऽ गेल। कथकिया सभ ठाम-ठाम जाए-आबए लगलाह। कथा फरिछैला उत्तर लाल-पीअर धोती आ तइपर लाठी हुरबला लाल-लाल ठप्पा अपन मैथिल सभ्यताक परिचए दिअए लागल। नेना-भुटका सभ फगुनहरि गीत गाबए लागल- ‘‘यै बड़की भौजी करियौ बिचार, कतै दिन रहबै आब हम कुमार दैखैत देखैत हमरा ई भऽ गेलै अहाँ बहिनसँ हमरा लभ भऽ गेलै। हरबाहो-चरबाहो सभ फगुआसँ सम्बन्धित मैथिली गीत गाबए लागल। बाध-बोनमे मालो-महिस चराबए आ घर-घसबहिनीकेँ देखैत ई गीत गाबए- ‘‘तोहर लंहगा उठा देव रीमौटसँ....।’’ घसबहिनीयो सभ उत्तारा देनाइ नै बिसराए ओहो सभ गाबए ई गीत- ‘‘रओ छौड़ा बज्जर खसतौ....।’’ बुझू जे जाड़क खुमारी लोक सभ फागुनेमे उताड़ए चाहैत। जिनका परिवारमे नव बिआह भेल रहनि, बुझू तँ हुनकर छओ आंगुर घीएमे। आखिर ऐ समैसँ भला गोधनपुर गामक रामदेव बाबूक छोटका बचबा उगन किए ने लाभ उठबितथि। किएक तँ अहीबेर बाइस दिसम्बर २००९मे हुनक अग्रज दुर्गानन्द जीक बिआह दरभंगा जिलाक बरुआरा गाममे सम्पन्न भेल छलनि। तँए भैयासँ तँ डर जरूर रहनि मुदा नवकी कनियाँ अर्थात लाल भौजीसँ खूब रंग-रभस होइत छलनि। उगनक भौजी सेहो करीब एक्कैस बर्खक छलीह। बीस बसन्त तँ सुखले-साखले बितौलनि मुदा एक्कैसम वसन्त बुझू जे ओ तँ रससँ उगडुब करैत छलीह। बेस पाँच हाथ नमहर-छड़गर, देहो दशा बेस भरल-पुरल, गाल तँ बुझू हाइ ब्रीड टमाटर जकाँ लाल टरैस आ बेस गुदगर। आँखि एहेन कटगर जे जेकरा दिस एकबेर ताकि देथिन तँ बुझू सोनित एक्को ठोप नै खसैत मुदा ओ बेचारे घाइल भऽ जाइत। हुनकर जुट्टी तँ बुझू सुच्चा गहुमन साँप जकाँ फुफकार छौड़ैत छलनि। नव विवाहित भेलाक कारणे सदिखन भरि बाँहि चूड़ी आ भरि हाथ मेहदी, आरतसँ रंगल पएर, भरि आँखि काजर आ भरि माङ सेनुर लाल टुहटुह करैत। कियो जँ धोखहुँसँ देखैत तँ आँखि चोन्हरा जाइत। सभसँ सुन्दर हुनक वस्त्राभूषणक पहिरब आ ओढ़ब छन्हि। एक तँ गोड़ि नारि, तइपर सँ सुगा पंखी रंगक साड़ी आ बेलाउज आ ओइ तरमे उज्जर धप-धप करैत ब्रेसिअर जे पहिरथि ओकर उज्जरका फिता, से देखि देखि उगनकेँ तँ मौगति भऽ जाइत छलनि। ओ मने-मन विचारथि जे ऐबेर फगुआमे लाल भौजीकेँ सभ तरहेँ लाल कऽ देबनि। दिन बितैत कोनो कि देरी लगैत छै। संयोग एहेन जे ऐबेर फगुओ पहिले मार्चमे छल। जेना-जेना फगुआ लगिचाइल जाए उगनक मन तेना-तेना लाल भौजीक जुआनीसँ बौराइल जाइत छलनि। फगुआसँ एक दिन पहिने उगन दरभंगा अपना डिपटीपर सँ गाम अबैत छथि। किलो दुइ मधुर नेने किलो एक अंगुर, आसेर काजू आ दू पैकिट किशमीस आ चारि-चारि पैकिट हरियर लाल रंग सेहो हाथमे टंगने आएल, संग-संग दू शीशी रम सेहो नेने आएल। पीठपर एम.आर. बला बैग। उगन आंगनसँ ससरि ओसारपर जाइत छथि आ ओतैसँ हाक दइ छथिन- ‘‘भौजी, यै लाल भौजी कतए गेलौं, आउ-आउ लग आउ, हम छी उगन।’’ लाल भौजी पलंगपर सँ उठि बाहर अबैत छथि। तात उगन पीठपरक बैग निचाँ राखि एक हाथे मधुरक पैकिट लाल भौजीक हाथमे दैत आ दहिना हाथमे पहिनेसँ घोरल लाल रंग लाल भौजीक बामा गालपर लगबैत आ दहिना गालमे चुम्मा लइत बाजि उठैत छथि- ‘‘अधला नै मानब फगुआ छी। भौजी यै भौजी, आब कहू मन केहन लगैए?’’ लाल भौजी चौबनियाँ मुस्की दैत बाजलि- ‘‘धूर जाउ, हमरा अहाँक ई चालि नै सोहाइए।’’ बाजि लाल भौजी अपना पलंगपर चलि जाइत छथि। आ उगन अपन कोठलीमे। राति भरि उगनक आँखिमे नीन नै भेल। सुतलीयो रातिमे रहि-रहि मन पड़ि उठैत छन्हि भौजी, लाल भौजी........। वीरेन्द्र कुमार यादव ग्राम- घोघड़रिया, पोस्ट- मनोहपट्टी, भाया- निर्मली, जिला सुपौल हमर समाज बिन्नू आ बीरू बालसंगी छलाह। दुनू गोटे कोशीक कछेर गाम घोघड़रियामे मरूआक रोटी आ पोठी माछक चटनी जलखै खाइत छल। रेडियो बाजि रहल छल जे “लिंक रोड निरमलीमे विष्णु महायज्ञ शुरू अछि, जइमे गणेशजी महाराज लोक सभकेँ लड्डू दैत छथिन्ह।” ई सुनितहि बिन्नू अपन भजार बीरूकेँ कहलखिन- “यार, घोर कलियुगमे गणेशजी लड्डू बँटैत छथि। एक दिन चलु आ अपनो सभ प्रसाद लए आबी।” दुनू भजार आश्चर्य करितौं यज्ञ मेला देखबाक िनश्चए कएलक। ओइ बीच गामक ठकनी काकी मुँहमे पान गलठैत, हाथमे बजैत रेडियो नेने लगमे आबि बजलीह- “यौ बिन्नू बौआ, ऐ रेडीमे कहलक जे लिंक रोड ईटहरीमे गणेश भगवान लड्डू बँटैत छथिन, अपनो सभ चलै चलू गणेशक लड्डू लए आबी।” बीरू बजलाह- “गै काकी धैरज धर, हम रेलगाड़ीक भाँज करै छियौ, गामक सभ गोटे रेलपर चढ़ि गणेशजीक प्रसाद लेबाक लेल अवश्य जाएब।” ठकनी काकी कने ठमकि कऽ बजलीह- “रौ बकलेलहा, ऐ गाममे बस, मोटर चलबाक तँ रस्ते नै अछि, तोँ रेल मंगबैत छैँ।” बीरू हँसैत बजलाह- “गै काकी जहन माटिक मुरूत गणेशजी लड्डू बाँटि सकैत छथि, तखन बिनु पटरीक रेल किएक नै आओत?” बीरूक बात सुिन बिचहिमे बिन्नू कहलखिन- “अहाँ सभ बकझक जुनि करू, धर्मक काज देखबा, सुनवा आ कएलासँ स्वर्ग होइछ। हम सभ मिलि देवी पूजा पाठ आ दर्शन करए एक दिन अवश्य जाएब।” गामक पैघ आ देहोदशासँ भरिगर पंडित कमलशेखर बाबूसँ भेँट कए दुनू भजार शुभ दिन तकौलक आ भाड़ाक बदलामे तेलपर परमाबाबूक ट्रेक्टर भाँज कएलक। जेठ मासक रौदमे ठकनी काकी, बीन्नू, बीरू आ गामक लोक सभ ट्रेक्टरसँ यज्ञमेला देखबाक लेल प्रस्थान कएलक। उबड़-खाबड़मे ट्रेक्टरक झोलामे झुलैत, रंग-विरंगक गप-सप्प करैत रज्ञ स्थल माने मेला पहुँच गेल। यज्ञ स्थलपर अनगिनित लाउडस्पीकरक आवाजसँ भारी शोर-शराबा होइत छल। ऐ बीच साइकिल स्टेंडसँ एगो चीकन युवती समतोला रंगक समीज सलवार पहिरने, आँखिपर रंगीन गोगुल्स धरौने, हाथक मोबाइलसँ फोटोग्राफी करैत ठकनी काकीपर नजरि पड़ितहि बजलीह- “मौसी अहाँ आबि गेलौं, बढ़ियाँ भेल, भेँट-मुलाकात भऽ गेल। हम तँ प्रचारे सुनि अएलौं। एतेक लोकक भीड़ तँ ऐठाम कॉलेज परिसरमे देशक प्रधानमंत्री बाजपेयीजी आएल छलाह, ओहूमे नै भेल छल।” ई सोलह बरिसक बाला प्रेमलता जे हालहिमे पत्रकारितासँ जुड़लीहेँ सएह छथि। ऐ यज्ञ मेलामे अनेको लोक-लुभावन कार्यक्रममे भोरुकवा रेडियो स्टेशन एफ.एम ९२.८, राजविराज (नेपाल)सँ आएल मैथिली भाषी कलाकार सभ मैथिली भाषाक विकासक लेल आ समाजकेँ प्रगतिमूलक शिक्षाक हेतू बढ़िया कार्यक्रम देखौलक। ठकनी काकीक संगे प्रेमलता आ गामक लोक कार्यक्रमक आनंद लैत मुरूतक दर्शन करए आगू बाढ़लाह। सभसँ पहिने घोर कलियुगमे सतयुगक कामधेनु गाए देखितहि प्रेमलता बजलीह- “मौसी, कामधेनुक थनसँ चुबैत दूधक पान करू आ जिबतहि स्वर्गक बदलामे मोक्ष प्राप्त करू।” प्रेमलताक एतेक सुिन बीरू बाजि उठल- “काकी कामधेनुक चारू दिस आँखि खोलि कऽ ताकू। ई बुइधिक कमाल आ व्यवसायक धार्मिक तरीका छी। जइपर कोनो तरहेँ ऑंगुर नै उठए आ शांतिसँ पाइक संचय हुअए। ई सभटा पाइ िहन्दु धर्मक ठीकेदार बाबा आ पंडितजीक पाकिटमे जाएत, जइसँ बाबा आ पंडितक जिनगी शान-शौकत आ भोगविलासमे बीतत।” ठकनी काकी लोकक एतेक भीड़ रहितौं ठेल-ठालि कऽ अमृत पान कएलक आ लोको सभकेँ करौलक। बीनू कहलखिन- “आेइठाम लाेकक बड्ड भीड़ छै, ओतए चलि देखू कोन देवता की बाँटैत छथिन।” सभ गोटे ओइ भीड़ लग गेल। श्रद्धालु भक्तगण गणेश भगवानसँ टाका दए प्रसाद माने लड्डू लेबाक मुड़ कटबैत छल। प्रेमलता मुरूतक सजाओल दृश्यक फोटो खींचैत यज्ञशालाक बगलमे ठाढ़ छलीह आ मोनमे रहनि जे किछु श्रद्धालुजनसँ साक्षात्कार करी आ संवाद प्रेषित करी। ताबत काल माथपर भाेगारसँ उजरका आ सिनुरिया चानन घसल गेहुमा रंगक मोटगर लोक उजरका धोती पहिरने प्रेमलताक सोझाँ आएल। प्रेमलता पुछि देलखिन- “पंडितजी, ई की भए रहल अछि?” जोरसँ ठहाका दैत पंडित जी बजलाह- “ई घोर कलियुग बीत रहल अछि। मनुखक गप्प छोड़ू, आब तँ देवता लोकनि सेहो पाइक लेल दोकान खोलि देलक। िहन्दु धर्मक चादरि ओढ़ि अधार्मिक, अनैतिक काज करबा लेल हमरा समाजक प्रतिष्ठित व्यक्ति सभ कतेक तत्पर अछि से सभ आँखि खोलि देखबाक लेल आएल छी। दुनियाँक लोक सभ चाँदपर बसबाक लेल प्रयासरत अछि, आ हमरा समाजक लोकसभ साहुकार गणेशक लड्डू पाइ दऽ कऽ पबैत अछि।” ठकनी काकी प्रेमलताक लग आबि बजलीह- “गै छौड़ी, केकरासँ गप्प करै छेँ, चल ऐठामसँ आब गामो जाएब।” मौसीकेँ विदा होइसँ पहिनहि प्रेमलता वीरू दिस मुस्की दैत बजलीह- “अपने किछु कहब?” वीरू झटसँ कहलखिन- “किए नै? सभ लोककेँ धार्मिक होएबाक चाही, मुदा ऐठाम जतेक आडम्बर कएल गेल अछि से उचित नै। आजुक वैज्ञानिक युगमे ढ़ाइ-तीन लाख रूपैया खर्च कए ऐ तमाशासँ वातावरणक शुद्धि, भक्तिमय माहौल आ गामक नाओं ऊँच केलक, एकर अलावा की प्राप्त हएत? समाजक एतेक रास रकमक खर्च आधुनिक सोचसँ गरीबक बच्चाकेँ पढ़बा-लिखबामे, बेमारीसँ पीड़ित लोकक इलाज करेबामे, गामक विकासमे हेबाक चाही। जइसँ हमरो समाजक धीया-पुताकेँ नोबेल पुरस्कार प्राप्त करबाक अवसर भेटए। धार्मिक कार्यक्रमक उद्देश्य बदलि गेल अछि। सभटा खेला पाइ हँसोथबाक लेल भऽ रहल अछि। एना कएलासँ हमर समाज आगू नै बढ़ि पाओत। अपितु पाछूए रहत। ई हमरा सबहक लेल हास्यास्पद बात छी।” प्रेमलता मुस्कुराइत हाथ आगू बढ़बैत बीरूसँ हाथ मिलाए मौसीसँ विदा लेलनि। वीरू प्रेमलता दिस आ प्रेमलता वीरू दिस घुिर-घुिर तकैत चलि गेल। विन्नु भाय, अपन भजार वीरूक मुस्कुराइत चेहरा टुकुर-टुकुर तकिते रहि गेल। तत्पश्चात् ठकनी काकी विन्नु, वीरू आ गामक लोक सभ ट्रेक्टरपर चढ़ि गाम दिस विदा भेल। उमेश मण्डल पिताक नाओं- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, गाम- बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी, बिहार। जन्म तिथि : ३१.१२.१९८० प्रकाशित पोथी- निश्तुकी (मैथिली कविता संग्रह), मिथिलाक संस्कार गीत, विध-बेबहार गीत आ गीतनाद (मिथिलाक सभ जाति-धर्मक लोकमे प्रयुक्त मैथिली लोकगीतक पहलि संकलन)। विकीपीडियामे मैथिलीक स्थानीयकीकरणमे योगदान, मिथिलाक जीव-जन्तु/ वनस्पति आ जिनगीक डिजिटल सचित्र ऑनलाइन संस्करण, मिथिलाक सभ जाति-धर्मक लोकमे प्रयुक्त लोकगीतक रेकार्डेड ऑनलाइन ऑडियो और वीडियो डिजिटल संकलन। अमैआ भार कलपर सँ कुरुड़-आचमन कऽ पक्षधर बाबा दरवज्जाक सीढ़ीपर पहिल पएर दइते रहथि कि चाहक गिलास नेने लालकाकीकेँ आंगनसँ निकलि कोनचर लग अबैत देखलखिन। काजक संयोग देखि मन फुदकि गेलनि। जाधरि लालकाकी ओसारक सीढ़ी लग अबैथ तहिसँ पहिनहि बाबा ओसारक चौकीपर पसरल मोथीक बिछानक ओठ पकड़ि दुइ बेर झाड़ि-बिछा, देवालसँ ओंगठि चौकीपर बैस गेलाह। बैसतहि लालकाकी चौअन्नियाँ मुस्की दैत हाथमे चाहक गिलास पकड़ा देलकनि। भफाइत हार्ड-लीकर (कड़गर) चाह आ लालकाकीक मुस्की बाबाक मनकेँ जहिना बच्चाक फेकल गेन गुड़कैत तहिना गुड़का देलकनि। मुँहमे चाह लइसँ पहिनहि टूसि देलखिन- “मन बड़ छिटकल बूझि पड़ैए। कतौ किछु पेलौंहेँ की?” पतिक बातक उत्तर दइसँ लालकाकी अनसुन करए चाहलनि, कारण जाधरि चाह मुँहमे नै लऽ लैत छथि ताधरि घरक कोनो बात कहब उचित नै। हो न हो जँ कहीं अधले लगनि। हम तँ कोनो हाकिमक घरवाली नै छी जे आमद-खर्चक फाइल खाइए-पीबै काल उल्टा देबनि। आब भगवान दिन बदललनि तँए ने बीअनि डोलबैक दुख भागल नै तँ केहन भारी दुखक तरमे रहै छलौं। पत्नी तँ पतिक ओहन खेलक संगी छियनि जे दिन-राति खेलैत रहैए। चाहक चुस्की लइतहि लालकाकीक मुँहसँ खसलनि- “एगारह सए रूपैया समैध पठा देलनिहेँ।” रूपैयाक नाअँो सुनितहि बाबा चौंकि गेलाह। मनमे उठलनि, किअए रूपैया पठौलनि? अखन रूपैयाक कोन काज अछि? तहूमे कहने तँ नै छेलियनि। पतिक टहलैत मनकेँ देखि लालकाकी दोहरा देलखिन- “रूपैयाे आ चिट्ठियो बौआकेँ भोरे डाक-पीन दऽ गेलनि। नवका समैध पठौने छथि।” नवका समधिक नाओं सुनितहि पक्षधरक मनमे धक्का लगलनि। मुदा तैयो संयमित होइत पुछलखिन- “िचट्ठीमे की सभ लिखल छलै?” “यएह जे, काजक धुमशाही एत्ते बढ़ि गेल अछि जे अमैया भारक लेल पाइऐ पठा रहल छी। गाम आएब मोसकिल अछि।” अमैया भारक नाओं सुनितहि बाबाकेँ तेलिया साँपक बिख जकाँ सन्न दऽ आँखियेपर बिख पहुँच गेलनि। बिखसँ कारी होइत पतिक देह देखि लालकाकी बूझि गेलीह। सोझासँ ससरैक गर अँटबए लगलीह। जेना कियो अंगनासँ सोर पाड़ने होन्हि तहिना अंगना दिस देखि बजलीह- “अबै छी कनियाँ।” कहैत चुपचाप ससरि गेलीह। मुदा देह थरथराइते रहनि। पति-पत्नी रहितौं दुनूक बीच वैचारिक मन-भेद रहिते रहनि। लालकाकीक विचार जे सबहक संगे मिलि-जुलि चली जहन कि बाबाक विचार छन्हि जे जहिना जंगलमे अनेको िकस्मक गाछ कोनो-कोनो कोढ़िला जकाँ तन्नुक अछि तँ कोनो-कोनो लोहा जकाँ सक्कत। जँ दुनूकेँ एक रंग बूझि किछु बनौल जाए तँ कते दिन चलत। जे तन्नुक अछि ओ लगले नष्ट भऽ जाएत जहन कि जे सक्कत अछि ओ ओहिना तना-उताड़ रहत। तहिना तँ मनुक्खोक बीच अछि। चाह सठबो नै कएल रहनि कि तहिक बीच क्रोध नाकपर आबि गेलनि। क्रोधे मन उनटए-पुनटए लगलनि मुदा किछु बाजथि नै। शुरूहेसँ परिवारो आ टोलोक लोक शान्तीकेँ लालकाकी कहैत रहनि जे अखनो धरि कहिते छन्हि। क्रोधसँ बाबा अधे-छिधे चाह पीब चौकी तरमे गिलास रखि दलानक भितुरका चौकीपर पड़ि सोचए लगलाह। अमैया भार कि आइएक छी आकि साबिकेसँ अबैत अछि। कोनो कि अपने नै पुरने छी जे नइँ बुझल रहत। जूइड़ेशीतल पावनिसँ शुरू कऽ आद्रा धरि पुरैत छलौं। चटनी खेबासँ लऽ कऽ कसौनी-अँचार होइत बरिसाइतसँ पाकल आमक भार पुरने छी। शुरूमे रोहनिया सरही आ बमै, गुलाबखास जरदालूसँ शुरू करैत छलौं, कृष्णभोग, लड़ूबा, मालदह होइत कलकत्तियापर पहुँचै छलौं। बरखो खसैत छलए आ आमो लगिजाइत छल। अन्तमे मोहर ठाकुर, राइर, फैजली, सिक्कूलक भार पुरि समाप्त करैत छलौं। ई कि भेल जे आमक भारक तरे रूपैया पठा देलौं? हम कि रूपैया नै देखने छी आकि कर्जा मंगलियनि? ऐसँ नीक जे नै पठबितथि। तइले केकरा के डाँड़-बान्ह करैए जे करितियनि। ई कि बुइध-बधिया केलनि। भारपर आएल वस्तु समाजमे बेन स्वरूप बिलहल जाइत अछि, से कि बिलहब? केहन समए चलि आएल केहन नै, देखै छी जे जेकरा खूँटापर चरि-चरि थान महीसिक रहैत छल सेहो सभ आब बजरूए दूधक दही पौड़ि चौरचनक हाथ उठबैए। एहेन पावनि केनहि की? तरे-तर मियादि अगिया गेलनि। अांगन आबि शान्ती माने लालकाकी पुतोहु लग बजलीह- “बूढ़ा बिगड़ि गेल छथि।” अंगनाक सभ सुनलनि, तँए सभ दरवज्जा दिस जाएबे छोड़ि देलक। तइ काल बाबासँ भेँट करए सुशील आएल। दरबज्जापर नै देखि सुशील आंगन िदस तकलक। आँखिक इशारासँ लालकाकी सुशीलकेँ बजा कहलखिन- “भाय सहाएब बगदल छथि।” अचंभित होइत सुशील पुछलकनि- “किअए?” “समधियाैरसँ अमैआ भारक रूपैये समैध पठा देलखिनहेँ, तँए....।” मुस्कुराइत सुशील आंगनसँ निकलि जोर-जोरसँ दरवज्जाक आगूमे बजए लगल- “भाय सहाएब, यौ भाय-सहाएब।” ककरो उत्तर नै सुनि घरेसँ पक्षधर बजलाह- “के, सुशील।” “हँ भैया, मन-तन गड़बड़ अछि की?” ओसारपर आबि पक्षधर बजलाह- “मन कि गड़बड़ हएत, तेहन-तेहन काज देखै छी जे नीको मन अधलाह भऽ जाइए।” “से की?” “किछु नै।” चौकीपर बैसैत सुशील बाजल- “कि कहब भाय सहाएब, बे-ठेकानक गाम सभ भए गेल अछि। फागुनक लगनमे बरिआती गेल रही बरकेँ दुअार लगबए, दाइ-माइ सभ चंगेरामे दूभि-धान, चरिमुखी दीप जरौने पहुँचलीह। ले बलैया, तखने बरिआतीक अंग्रेजी बाजा फिल्मी धुन शुरू केलक। कि कहू भाय, बुढ़-बूढ़ानुस सभ तँ पूर्वते गीत गबैत रहलीह मुदा जते नवतुरिया सभ रहए ओ सभ डान्स करए लगल।” सुशील बजिते रहै कि बिचहिमे ठहाका मारि पक्षधर बजलाह- “ई तँ आन गामक बात भेल। दुनियाँ बड़ीटा अछि। सौंसे दुिनयाँमे ने एक रंग लोक अछि आ ने चालि-ढालि। अपन कल्याणक लेल सभकेँ अपन-अपन जिनगी बुझए पड़तै।” बाबाक विचार सुनि सुशील अपन विचार मोड़ैत बाजल- “भाय चाह नै पीलौंहेँ, मूड भंगठल बूझि पड़ैए।” दरवज्जाक अढ़सँ लालकाकी सभ बात सुनैत रहथि। पतिक ठहाका सुनि मन असथिर भेलनि। आंगन िदस देखि पक्षधर जाेरसँ बजलाह- “कने चाह बनौने आउ?” पानि पीब हाथमे चाहक गिलास लैत पक्षधर बजलाह- “तेहन मनुख सभ बनि रहल अछि जे एको-दिन जीवैक मन नै होइत अछि।” पक्षधरक बातकेँ मोड़ैत सुशील बाजल- “एह भाय, अगुता जाइ छी। दुिनयाँ सबहक सझिया छिऐ कि ककरो खानगी। कियो अपन जिनगीक मालिक अछि आकि दोसराक। जाबे ऐ धरतीक सुख-भोग आ अन्न-पानिक हिस्सा बचल अछि ताबे मरबो नीक हएत।” “हँ, से तँ ठीके कहलह।” पक्षधरक समर्थन देखि सुशील बाजल- “अपने गामक घटना कहै छी, मटकन भाइयक बेटाक कोजगरा रहनि। बम्बैयेसँ समैध भातिज दियए रूपैया पठा देलकनि। सेहो चौबीसम घड़ीमे। कोजगरे दिन। बेर झुकैत मटकन भाय आबि कऽ कहलनि जे सुशील तोँ बड़ जोगारी छह। कने सम्हारि दाए। भाइक बात सुिन कोनो गरे ने सुझाए, किएक तँ अनका ऐठाम पुछि-पुछि खाजा-लड्डू आ दही पबैत छथिन। मनमे आएल जे समाजक लेल पान-मखानक तँ जोगार भइयो सकैए। मुदा जिनकर-जिनकर भोज खेने छथिन तिनका-तिनका कि खाइले देथिन। केना दही पौरल जाएत आ खाजा-लड्डू बनत। एहेन स्थितिमे अनेरे पड़ि दोखक मोटरी कपारपर लेब। मुदा एकटा बात मनमे उपकल।” “की?” “जखन माए-बाबूक भारसँ लऽ कऽ बाल-बच्चा धरिक उतरिये गेल अछि तखन अनेरे जंजालमे पड़ब नाक-कान कटाएब छोड़ि आरो कि भऽ सकैए? तइसँ नीक जे कियो अपने केलहाक फल ने पाओत।” सुशीलक बात सुिन पक्षधर बाबा गुम्म भऽ विचार करए लगलाह। नन्द विलास राय जन्म- 02.01.1957ईं.मे, शिक्षा- बी.एस.सी. (गणित), आइ.टी.आइ. (टर्नर)। गाम+ पोस्ट- भपटियाही, टोला- सखुआ, वाया- नरहिया, जिला- मधुबनी, िबहार। बाबाधाम बोल-बम बोल-बम। बोलबम-बोलबम ई आवाज कमलीक कानमे पड़ल तँ ओ घास काटब छोड़ि सड़क दिस तकलक। एकटा बसमे पीयर-लाल कपड़ा पहिरिने लोक सभकेँ देखलक। बसक भीतर आ छतपर लोक सभ बैस कऽ बोलबम-बोलबमक नारा लगबैत छल। बस तेजीसँ सड़कपर दौड़ रहल छल। कमलीक खेत सड़कक कातेमे छल। ओ खेतक आरिपर घास काटि रहल छलि। कमली सोचए लगली- कतेक लोक बाबा धाम जाइत अछि मुदा हमर तँ भागे खराप अछि। कतेक दिनसँ विकलाक बापकेँ कहैत छी मुदा ओ अछि जे धियाने ने दैत अछि। कमली आ लखन दू परानी। एकटा बेटा िवकला। विकला सातमे पढ़ैत। लखनक माए-बाप सत्तर अस्सी बर्खक बूढ़। लखनकेँ पाँच बिघा खेत, एक जोड़ा बड़द आ एकटा महीसो। लखनकेँ कतौ जाइक लेल सोचए पड़ए। किएक तँ सत्तर बर्खक बूढ़ माए आ अस्सी बर्खक अथवल बापकेँ छोड़ि कतए जाएत। तइपर सँ एक जोड़ा बड़द आ महीसोक देख-रेख। पाँच बिघा खेतमे लागल फसलक ओगरवाही। असगरे कमलीसँ केना पार लागत? तैं कमलीक बाबाधामबला बातपर लखन धियान नै दैत छल। लखन सोचए, कमलीकेँ गामक लाेक संगे बाबा धाम भेज देब तँ भानस के करत? घास के आनत? असगरे हम की सभ करब? बेटा विकला पढ़िते अछि। ओकरा स्कूलसँ छुट्टी होइत अछि तँ ओ टीशन पढ़ै लए चलि जाइत अछि। बिना टीशन पढ़ने केना परीक्षा पास करत। सरकारी स्कूलमे की आब पढ़ाइ होइत अछि? मास्टर सभ बैस कऽ गप लड़बैत रहैत अछि। चटिया सभ कोठरीमे बैस कऽ गप करैए अथवा लड़ाइ-झगड़ा। मास्टर सबहक लेल धनि सन। लखन अपन खेती गृहस्थीक संगे माए-बापक सेवा नीकसँ करैत अछि। माए तँ थोड़े थेहगरो छथिन मुदा बापकेँ उठबो-बैसबोमे दिक्कते छन्हि। हुनका पैखाना-पैशाव लखनेकेँ कराबए पड़ैत अछि। पौरकाँ साल फागुनमे लखनक पिताजीकेँ लकबा मारि देलकनि। मिश्रा पॉलीक्लिनीक दरभंगामे इलाज करेलासँ जान तँ बचि गेलनि मुदा अथवल भऽ गेलाह। भगवान लखन जकाॅँ बेटा सभकेँ देथुन। ओ तन मन आ धनसँ माए-बापक सेवा करैत अछि। लखनक एकटा संगी अछि। नाओं छी सुकन। सुकन लखनसँ बेसी धनीक अछि। दूटा बेटा अछि सुकनकेँ। दुनू बेटा सातवाँ तक पढ़ि दिल्लीमे नौकरी करैत अछि। मासे-मासे बेटा सबहक भेजलाहा ढौआ सुकनकेँ भेट जाइत अछि। सुकनोक माए-बाबू जिबते छथिन। सुकनक माए कम देखैत छथिन। हुनका रातिकेँ सुझबे नै करैत छन्हि। एक दिन सुकनक माए रातिकेँ ओसारपरसँ गिर गेलखिन, हुनका पएरमे मोच पड़ि गेलन्हि। लखनकेँ पता चलल तँ ओ सुकनक माएक जिज्ञासा करै लए गेल। सुकनक माए लखनकेँ अपने बेटा जाहित मानैत छेलखिन। लखन सुकनक माएसँ पुछलक- “माए केना कऽ ओसारपर सँ गिर गेले?” सुकनक माए बाजलि- “बौआ, आब हमरा सुझै नै अछि। राति कऽ तँ साफे नै देखैत छी। बेचू बाबूक छोटका कनटीरबा दरभंगामे डाकडरी पढ़ैत अछि। ओ फगुआमे गाम आएल छल, हुनका कहलिऐ तँ ओ हमर दुनू आँखि देखलक आ कहलक जे दुनू आँखिमे मोतियाविन भऽ गेलौहेँ। कहलक जे ऑपरेशन करेलासँ ठीक भऽ जाएत आ नीक जहाति सुझए लगत।” हम सुकनकेँ कहलिऐ तँ ओ कहलक जे एखन ढौआ नै अछि। ढौआ हएत तँ लहान लऽ जा कऽ ऑपरेशन करा अनबै। मुदा फागुनसँ भादो आबि गेल, ऑपरेशन नै करा आनलक। सुनै छिऐ चौठचन्द्रक परात दुनू परानी बाबाधाम जाएत। सुकनक बाबूजी सत्तरि बर्खक छथिन। ओ नामी गिरहत छलाह। तरकारी उपजा कऽ बेचै छलाह। तरकारी बेचि कऽ पाँच बिगहा खेत किनलाह। आब उमर बेसी भेलासँ काज करै जोकर नै रहलाह। हुनका चाह पीबाक आदति भऽ गेल छन्हि। भोर आ साँझ चाह हेबाके ताकी। एकटा आदति आओर छन्हि, खैनी खाइक। सुकन अपनाबाबूजी केँ चाह आ खैनी नै जुमाबैत अछि। कहैत छन्हि- कैंसर भऽ जेतह। मुदा अपने पान-पराग, सिगरेट, दारू सबहक सेवन करैत अछि। एक दिन लखन सुकनक दलानक पाछाँसँ जाइत छल तँ सुकनक जोर-जोरसँ बाजब सुनि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सुकनक दलानक पाछाँसँ सड़क गुजरै छै। सड़केपर सँ लखन सुनए लागल। सुकन बजै छल- “हरदम चाह-चाह रटैत रहैत छहक। किछु बुझबो करै छहक? चीनी चालीस टके किलो भऽ गेल। चाहपत्ती जे बारह टाकामे भेटै छलै आब बीस टाकामे भेटै छै। पानिबला दुध पन्द्रह रूपैये गिलास। के जुमत चाहमे। आ तोरा भोर-साँझ चाह हेबाके चाही। हम नै सकब तोरा चाह जुमबैमे।” बूढ़ा किछु नै बजैत रहथि। लखनकेँ कोनो जरूरी काज रहै तँए ओ आगाँ बढ़ि गेल। सुकन अपना पड़ोसिया ओइठाम माए-बाबूक भोजनक जोगार लगा कऽ चौठचन्द्रक विहाने दुनू परानी बाबाधाम विदा भऽ गेल। सुलतानगंजमे गंगाजल भरि कामौर लऽ बाबाधाम पहुँचल। एकादशीकेँ बाबाकेँ जल चढ़ा वासुकीनाथ, तारापीठ होइत ओतएसँ कलकत्ता चलि गेल। एमहर एे बीच सुकनक बाबूजी बेमार पड़ि गेलखिन। हुनका बोखर लागि गेलनि। लखनकेँ समाद भेटल जे सुकनक बाबूजी दुखित छथिन। लखन ओइठाम जा डाक्टरकेँ बजा कऽ अपना दिससँ खर्च कऽ बूढ़ाक इलाज करौलक। जाबे धरि सुकन दुनू परानी बाबाधामसँ आपस नै आएल ताबे धरि लखन दिनमे एकबेर सुकनक माए-बाबूक भेँट करबाक लेल निश्चित जाए। दुनू गोटेक लेल अपना दिससँ चाह आ खैनीयोक जोगार लखन कऽ देने छल। सुकन जितिया पावनिसँ तीन दिन पहिने गाम आएल। सुकनकेँ बाबाधाम आ कलकत्तासँ आपस अएलाक दोसर दिन भिनसरे चौकपर चाहक दोकानपर लखनक भेँट सुकनसँ भऽ गेल। सुकन चाहक दोकानपर बैस कलकत्ताक वर्णन करैत छल। लखन सुकनसँ रास्ता-पेराक समाचार पुछलक। तँ सुकन कहलक- “रौ दोस, बाबाक कृपासँ सभ किछु नीके रहलौ। दुनू पानी कलकत्तो घुमिये लेलियौ। तोँ खाली बैंकमे ढौआ राख ने। तोँ की बुझबेँ धरम-करम। तोरा जँ ढौआक आमदनी हेतौ तँ तोँ खेत भरना लेमे नै तँ बैंकमे रखमे। हम दुनू परानी दस बर्खसँ कामोर लऽ कऽ बाबाधाम जाइत छी।” सुकनक बात लखनकेँ नै सोहाएल। ओ सोचलक जे एखन एकरा जबाब देनाइ ठीक नै हएत। लखन- “रौ दोस, से तँ ठीके कहै छी। हम धरम-करम की बूझब। मुदा हम अपन माए-बापक सेवा तन-मन-धनसँ करै छी। हमरा लेल तँ बाबाधाम हमर माइये-बाबू छथि। हमरा लेल तँ हमर बाबूजी साक्षात् महादेव आ माए पार्वती छथि। हुनके दुनू गोटेक सेवा करब बाबाधाम कामोर लऽ कऽ जाएबसँ बेसी नीक बुझै छी। ककरो अधलाहो नै सोचै छी आ ने करै छी। तोँ कह जे माइक मोतियाविन्दक ऑपरेशनक लेल तोरा ढौआ नै छौ। बाबूजीक चाह पियाबैक लेल तोरा ढौआ नै छौ। मुदा बाबाधाम जेबाक लेल ढौआ छौ। कलकत्ता घुमैक लेल ढौआ छौ। दारू पीबैले ढौआ छौ। माएकेँ सुझै नै छौ। राति कऽ ओसारापर खसलखिन तँ पएरमे मोच पड़ि गेलनि। जँ तोँ अपन माइक मोितयाविन्दक ऑरोशन करा आनने रहितेँ तँ ओ ओसारापर सँ नै खसितथिन। अपने दुनू परानी बाबाधाम गेलाह मुदा माए-बाबूक भोजनक जोगार पड़ाेसिया ओतए लगा कऽ गेलेँ। तोहर बाबूजी बेमार पड़ि गेलखुन तँ डॉक्टर बजा हम इलाज करौलियनि। तोँ बूढ़ माए-बाबूकेँ एकोटा टाका नै देने गेल रहेँ। अपना दुनू परानी बापक अरजलहा सम्पत्ति आ बेटा सभक कमाइसँ ऐश-मौज करै छेँ। मुदा माए-बाप एक कप चाहक लेल काहि कटै छौ। धुर बूरि तोँ की बजमे।” लखनक बात सुनि सुकन गुम्म पड़ि गेल। ओकरा कोनो जबाबे नै फुराएल। ओरका भेल जेना बीच बाजारमे कियो नंगट कऽ देलक। ऐना हम अपन सारक बेटाक बिआहमे गेल छलौंहेँ। हमर सारक बेटा रेलवेमे इंजीनियर अछि। ओ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालसँ इंजीनियरिंगक डिग्री लेने अछि, ओकर नाओं ललन थीक। ओ देखबा-सुनबामे वड्ड सुन्नर अछि, गोर वर्ण, पाँच हाथक जवान। दोहरा कद-काठी। जेहने ओ सुन्नर अछि तेहने ओ पढ़ैओ-लिखैयोमे तेज छल। ललनक बिआह पाँच लाख टाकामे बेरमा गामक बुच्चन ठाकुरक बेटीसँ तँइ भेल छल। बुच्चन ठाकुर मध्य विद्यालकमे शिक्षक छथिन। अपना बेटीकेँ इन्टर पास करौने छथिन। हमर सार महेशकेँ लड़की पसन्द भेल आ ओ ललनक बिआह बुच्चन ठाकुरक बेटीसँ पक्का कए लेलक। बुच्चन ठाकुर चारि लाख टका तँ हमर सार महेशकेँ दए देलक मुदा एक लाख टका बाँकी रहि गेल। बुच्चन ठाकुर कहलखिन- “जेतेक टाका बाँकी अछि बिआहक दू दिन पहिने भेट जाएत” मुदा बिआह दिन जखन टका नै पहुँचल तँ हमर सार हमरासँ कहलनि- “पाहुन, टका तँ बुच्चन बाबू अखन तक नै भेजलकहेँ। की कएल जाए?” हम कहलिएनि- “आइ बिआह थीक। आब की कएल जाए सकैत अछि। बिआह तँ हेबे करत। भऽ सकैत अछि जे बुच्चन बाबूकेँ कोनो मजबूरी भऽ गेल होएतनि। चलू शुभ-शुभ कऽ बिआह करेबाक लेल।” हम सभ दुल्हा आ बरातीकेँ लऽ सात बजे साँझमे बैरमा गाम पहुँच गेलौं। बारातीकेँ सवेरे पहुँचलापर बैरमा गामक समाज आ बुच्चन बाबूक सर-कुटुम सभ बड्ड प्रसन्न्ा भेलाह। बुच्चन बाबू हमर सार महेशकेँ कातमे लऽ गेलाह, संगमे हमहूँ छलौं। कहलखिन- “हम समैपर टका नै भेज सकलौं तइ लेल अपने सभ लग लज्जित छी। मुदा वादा करैत छी, कनियाँ विदागरीसँ पहिने अहाँक टका दऽ देब।” हमर सार किछु नै बजलाह। हम कहलियनि- “ठीक छै, अहाँ अपना वादापर कायम रहब आ विदागरीसँ पहिने टका महेश बाबूकेँ दए देबनि।” बुच्चन बाबू बजलाह- “अवश्य-अवश्य।” अवश्य-अवश्य बजैत ओ आंगन चलि गेलाह आ हम सभ वासापर आबि बैसलौं। जलखै-नाश्ता, चाह-पान आदि सभ चलए लगल। संगहि तिलकक ओरिओन हुअए लगलै। बरातीक स्वागत बड्ड नीक जकाँ भेल। खान-पानमे कोनो कमी नै भेल। शुभ-शुभ कऽ बिआहो सम्पन्न भेल। मुदा बुच्चन बाबू अपन वादाक मुताबिक कनियाँ विदागरीसँ पहिने बकियौताबला एक लाख नै दऽ सकलाह। हमर सार महेशकेँ बड्ड दुख भऽ गेलै। ओ बाजल तँ किछु नै मुदा अबैत खान समधी मिलन नै केलक। हमरा ई गप्प नै पसीन भेल। हम समझेबाक प्रयास केलौं मुदा ओ हमरा गप्प नै मानि फटफटियापर बैस कऽ चल गेलाह। हम कनियाँकेँ विदागरी करा कऽ अपन सासुर मैलाम पहुँचलौं। हमरा अपना सारपर बड्ड तामस छल। हम हुनका दरबज्जापर जाइते अपन संतुलन नै राखि सकलौं आ महेशकेँ देखिते कहलिऐ- “......” जे अहाँकेँ कनियो मानवता नै अछि। अहाँ अव्यवहारिक लोक छी। एके लाख टकाले अपन परिचए दए देलिऐ। कि कहैत अछि बेरमा गामक लोक आ बुच्चन ठाकुरक सर-कुटुम सेहो सोचलिऐ? जखन बिआह भए गेल तखन समधी मिलन नै केलासँ कि फएदा भेल। आरो बहुत किछु कहि देलियनि। महेश कहलाह- “यौ पाहुन सभ एक-दोसरकेँ उपदेश दै छै। अपन मुँह कनेक सन ऐनामे तँ देखौ।” हम निरूत्तर भऽ गेलौं। आ हमरा सामने हमर बेटा गणेशक बिआहक दृश्य नाचए लागल। हमर बेटा गणेश मैट्रिकमे दू-बेर फेल कएने छल। तेसर बेरमे मैट्रिक पास कएलक। कॉलेजमे पढ़बाक लेल कहलिऐ तँ दिल्ली भागि गेल। दिल्लीसँ तीन वर्षक बाद गाम अाएल। पता चलल जे सेल्समैनक काज करैैत अछि। तीन वर्षक बाद एलाक उपरान्तो एकोटा टाका हमरा आ अपना माएकेँ नै देलक। हमर पत्नी कहलक- “गणेशक कतौ नीक लड़की देखि कऽ बिआह कए दियौ। भऽ सकैत अछि बिआहक बाद सुधरि जाए।” तइपर हम कहलियनि- “एहेन अवण्ड लड़कासँ के अपना बेटीक बिआह करत? करबो करत तँ किछु नै देत।” गणेशक माए बाजलि- “किछु देत नै देत तँ कि हेतै, हमरा गणेशक बिआह करबाक अछि। हमरा पुतोहु आनि दिअ।” हम गणेशक कथा लेल दू-चारि गोटे लग चर्चा केलौं तँ हमर सार महेशक प्रयाससँ कैथिनियाँ गाममे टुनटुन बाबूक बेटी संग दू लाख टाकामे कथा पक्का भेल। टुनटुन बाबू साधारण गृहस्थ छथि। ओ एक लाख टाका बिआहक पन्द्रह दिन पहिने दए गेलथि। मुदा एक लाख टका बिआहक तीन दिन पहिने भेज देबाक लेल वादा केलनि। मुदा बिआहक तीन दिन पहिने जखन टाका नै भेजलाह तखन हम मोबाइलसँ सुचित कऽ देलियनि। जे काल्हि बारह बजे दिन धरि हमरा टाका नै पहुँचत तँ हम बराती लऽ कऽ नै अाएब। भोरे टुनटुन बाबू आ हुनकर मित्र अएलाह आ पच्चास हजार टाका हमरा गिनलाह। हम कहलियनि- “बाकी पचास हजार कखन देब?” टुनटुन बाबू बजलाह- “बड्ड परियासे ई टाकाक प्रबन्ध कएलौंहेँ। आब जे बाकी रहल ओ द्विरागमनमे देब।” हम स्पष्ट कहलियनि- “बिआहसँ पहिने हमरा टाका नै देब तँ बिआह नै हएत। काल्हि भिनसरे आठ बजे तक बकियौता टाका नै दऽ जाएब तँ बरात लऽ कऽ नै आएब।” टुनटुन बाबू आ हुनक मित्र लाख निहोरा करैत रहलाह मुदा हम नै मानलयनि। अन्तमे टुनटुन बाबूक मित्र कहलखिन ठीक अछि अहाँकेँ काल्हि भाेर आठ बजे पचास हजार टाका पठा देब अहाँ बिआहक तैयारी करू। एक बीघा खेत भरना राखि टुनटुन बाबू पचास हजार टाका हमरा भेजलक तखन हम गणेशक बराती लऽ कऽ कैथिनियाँ पहुँचलौं। आइ हमरा आँखिक आगाँ सभ पुरनका दृश्य नाचि रहल अछि, हमरा अपने-आपपर ग्लानि होइत अछि। सुजीत कुमार झा एकटा अधिकार बहुत भयंकर हृदए छल्ली करएबला हवाइ दुर्घटना छल। विराटनगरसँ काठमाण्डू आबैबला हवाइ जहाजमे लैंड करए काल अचानक आगि लागि गेल आ जहाज रनवे शुरु होबएसँ पूर्व एकटा आगिक गोला बनि जमीनपर छिटा गेल छल। बारुण यन्त्रकेँ पहुँचए तक भीमकाय विमान जरि कऽ छाउर भऽ गेल छल। समाचार मिलिते बारुण यन्त्रक अतिरिक्त पुलिस, एयरलाइन्स आ एयरपोर्टक अधिकारीक संग संग अपन प्रियजनकेँ लेबए एयरपोर्ट आएल लोक सेहो दुर्घटनास्थल पहुँच गेल छल। जतए हवाइजहाज खसल छल ओतएक दृश्य तँ बहुत बीभत्स छल। चारु दिस जड़ल जहाजक टुकड़ा, मानव शरीरक अधजरु अंग बैग लगायत ओहिना पड़ल छल। माउस आ रबरकेँ जड़य कऽ मिलल जुलल गंधसँ वातावरण पूरा भरल छल। नाकपर रुमाल बँधने रेस्कयू (राहत) टीमक लोक गरम ढेरमे तत्परतासँ लाश खोजि रहल छल। अहूसँ बेसी कठिन आ संवेशनशील काम ओइ अधिकारीक छल जे यात्रीक परिवारक पूछताछक जवाब दऽ रहल छल। नम्रता आ शालीनता बनाबए राखए कऽ अथक प्रयासक बावजूद हुनक सबहक व्यवहारमे खिसियाएब झलकि रहल छल। विक्षिप्त सन लागि रहल एक युवककेँ लागातार हिचिकयसँ ओतए कऽ वातावरण आओर विह्वल भऽ रहल छल। आखिर युवकक पालो आएल तँ कहलक, हमरा जकर खोजी अछि ओ हरियर रङ्गक साड़ी पहिरने छल। अखन धरि जतेक शव भेटल अछि सभ क्षत-विक्षत अछि। हरियर साड़ीबला कोनो व्यक्ति नै मिलल अछि। मृतक सबहक गहना, पेन, मोबाइल, घड़ी लगायत कऽ समान अलग कऽ कऽ राखल जा रहल छल। यात्रीक निकाललाक बाद जे समान मिलत ओ यात्रीक करकुटुम्बकेँ देखाएल जाएत। मुदा हम हुनकर सम्बन्धी नै छी। युवक सिसकल, ‘हम ओइ साड़ीक माध्यमसँ मात्र हुनकर अन्तिम झलक देखए चाहैत छी। शायद ओहो हमर हिस्सामे नै अछि .........।’ ‘धैर्य राखु’, अधिकारी कोमल स्वरमे कहलक ‘जे शव निकलैत अछि ओकरा कीयो देखि सकत। अपने जतए शव उठा कऽ राखल जाइत अछि ओतए जा कऽ आ शव आबए कऽ प्रतीक्षा करु।’ युवक थाकल जकाँ चलैत लाइनसँ बाहर निकलि गेल। दोसर युवक सेहो यात्री सूची देखलाक बाद आँखि पोछैत लाइनसँ बाहर आएल। पहिल युवककेँ असमंजसक स्थितिमे एक दिस ठाढ़ देखि ओ हुनका लग गेल। हुनका नै जानि किए ओइ नितांत अपरिचित व्यक्तिसँ सहानुभूति भऽ रहल छल। ‘एतए कखन धरि ठाढ़ रहब? ओम्हर चलू, चबुतरापर बैस लाश आबए कऽ प्रतिक्षा करी।’ ‘ककरो अपनकेँ लाश कहब केहन लगैत अछि?’ पहिल दोसरकेँ संग चलैत पुछलक। ‘प्राण लेबएबला, मुदा अओर की कहू? हवाइ जहाजक हालत देखैत ककरो बचएकऽ उम्मीद नै अछि। ओना हमर कनियाँ सुरक्षा जाँचमे जाएसँ पूर्व हमरा फोन कएने छल मुदा हम तैयो ऐ निर्मृूल आससँ, कि भऽ सकैत अछि, अन्तिम समैमे ओ अपन निर्णय बदलि लेने हुअए, यात्री सूची देखए गेल छलौं। लिस्टमे दोसर नाओं हुनके छल। आब तँ बस, हुनकर शवक प्रतीक्षा, अन्तिम संस्कार आ फेर जीवन भरि हुनका स्मरण करए कऽ अतिरिक्त किछु नै बँचल हमर जीवनमे।’ -तैयो अन्तिम संस्कार तँ कऽ सकब। हम तँ शायद अन्तिम दर्शन सेहो नै कऽ सकी? ककरो अओरकेँ देखएसँ पहिनहि हुनकर घरबला गिद्ध जकाँ लपकि कऽ शव लऽ जेता। ‘ओ एतए आएल छथि ?’ ‘जे लोक सभसँ आगू ठाढ़ छथि, अवश्य ओइमे सँ एक हेता।’ -हुनका चिन्हैत नै छिऐ? ‘नै ओना हुनकर पर्समे हरेक समए तस्वीर रहैत छल, मुदा हमरा देखैक कहियो इच्छा नै भेल।’ ‘किए?’ ‘हुनका सँ लगातार ई सुनि कऽ, हुनको की पसिन छन्हि, ओ आइ भोरमे की कहने छलाह, कोन चुटकुल्ला सुनौलथि, बोर भऽ जाइत छलौं। तस्वीर देखि लइतौं तँ शाइद ओ एलबमे लाएब शुरु कऽ दैतैथ देखाबए लेल।’ ‘जखन हुनका घरबला सँ एतेक लगाव छलनि तँ ओ अपने संग केना अटकि गेली, एकतरफा प्रेम छल अपनेक?’ ‘शाइद हम हुनकासँ एतेक नै कऽ पबैत छलौ जतेक प्रेम ओ हमरासँ करैत छलि, बहुत बेसी।’ ‘आ अपन घरबलासँ?’ ‘पागलपनक हद तक। तखनने हमरासँ एतेक लगाब भेलाक बादो ओ हुनका छोड़ए लेल तैयार नै छली।’ ‘बच्चाक इच्छा छलनि हएत।’ ‘बच्चा तँ छलै नै। हुनकर घरबला हुनका किनको संग बाँटए लेल तैयार नै छल। ही वाज भेरी पजोसिव, टू दऽ लिमिट ऑफ सफोकेशन परहैप्स (ओ हुनका लऽ कऽ बड्ड व्यक्तिगत छल, शाइद घुटन धरि)।’ तखन ने शाइद ओ अपनेसँ प्रेम करए लागल छली। ‘जौं वशमे होइत तँ कहियो ने कैरती। हुनका घरबलाक पोजेसिव होबए कऽ कोनो शिकाइत नै छल। मुदा प्रेम ओ चीज अछि, बिना इच्छोकऽ भऽ जाइत अछि आ बहुत इच्छा भेलाक बादो नै होइत अछि।’ ‘मुदा प्रेम भेल केना? हमर मतलब अछि, भेटघाँट वा प्रारम्भ केना भेल?’ ‘हवाइ जहाजमे। बड़ा संयोग अछि ने जे प्रेम कहानी हवाइ यात्रामे शुरु भेल छल आ हवाइ यात्रामे समाप्त भऽ गेल। जे हुअए, हम दुनू टुरपर पोखरा जा रहल छलौं। बराबरक सीटपर बैसल छलौं। ऐ दुआरे बातचितक शुरुआत भऽ गेल। संयोगसँ हमरा दुनूकेँ बराही होटलमे रुकए कऽ छल। अही दुआरे एके टैक्सीमे होटल गेलौं आ फेर साँझखन होटलक लौवीमे दोबारा भेँट भऽ गेल। हम हुनका होटलमे डिनरक निमन्त्रण देलौं, ओ मानि गेली। खाना खाइत पता चलि गेल, काल्हि भेने ओ रारा ताल देखए जेती। फेर हमहुँ ओतए जाए कऽ कार्यक्रम बनेलौं। ओ तँ प्रात भिने काठमाण्डू फिर्ता चलि एली मुदा हमरा काम छल तेँ एक दू दिन रुकए पड़ल। नै ओ अपन फोन नम्बर देली आ ने हमर लेली। मात्र एतेक बुझल छल, काम कतए करैत छथि।’ ‘एतए फिर्ता भेलाक बाद एक दिन हुनक ऑफिस गेलौं। ओ बहुत खुशी भेलथि, लागल जेना हुनको हमर प्रतीक्षा छल। बस अही प्रकारे भेटक क्रम बढ़ैत गेल आ सम्बन्ध सेहो।’ ‘हुनक बिआह भऽ गेल छल ई कहिया पता चलल?’ ‘पहिले भेटमे, अपन परिचय संगहि ओ अपन घरबालाक जन्मपत्री सुना देली। हुनक चर्चा कएने बिना तँ कोनो गप्पे पुरा नै होइत छल।’ ‘आ फेर अहाँ हुनका सँ प्रेम करए लगलौं?’ ‘कहलौं ने प्रेम कएल नै जाइत अछि, भऽ जाइत अछि ।’ ‘मुदा रोकल तँ जा सकैए।’ ‘रोकए कऽ बहुत प्रयास केलौं मित्र, ओ सेहो आ हम सेहो। अनेक बेर नै भेटए कऽ प्रण केलौं मुदा तैयो हम जेना कोनो वशीकरणमे बन्हल जकाँ स्थानपर चलि जाइत छलौं। आ ओ सेहो प्रतीक्षा करैत रहैत भेट जाइत छलि। हारि कऽ हम नै भेटए कऽ व्यर्थ कोशिस करब छोडि देलौं।’ ‘हुनक घरबलाक पता नै चलैत छल कि अपने सँ भेँटए अबैत छथि?’ -ओना तँ ओ हुनका आबएसँ पहिने घर पहँुच जाइत छलि, कहियो अबेर भेलापर ऑफिसक पार्टी, बहुत कामक बहाना बना दैत छली।’ ‘मुदा तैयो मुँहक हाव भाव, उद्विग्नतासँ पता चलिए जाइत अछि। हमर कहए कऽ अर्थ प्रेम छिपाएब आसान नै होइत अछि।’ ‘हँ मुदा ओ हुनकर प्रेममे ऐ प्रकारे डुबल छलाह जे हुनक चिन्ता, हुनक अकुलाहट सभ अपने लेल सम्झैत छलाह।’ ‘जखन हुनक घरबला हुनकासँ एतेक प्रेम करैत छल तखन कोनो अन्यसँ प्रेम करए कऽ की आवश्यकता छल?’ ‘कोशिस कऽ कऽ या सोचि समझि कऽ प्रेम बिआहक बाद कएल जाइत अछि। सहीमे प्रेम तँ वएह होइत अछि जे अनजानमे नै चाहैत भऽ जाइत अछि। लगैत अछि अपने कहियो किनकोसँ प्रेम नै केलौं अछि?’ ‘केलौ तँ अछि मुदा मात्र अपन कनियासँ, बिआहक बाद, मुदा सोचि-समझि वा नापितौल कऽ नै। बिआहसँ पहिने पढाइ आ फेर काममे एतेक व्यस्त छलौं कि केकरो देखए कऽ फुरसत नै छल आ बिआहक बाद तँ हुनक अतिरिक्त केकरो दिस ताकए कऽ अवसरे नै भेटल वा कहीं मने नै भेल। पूर्ण सन्तुष्ट छलौं हुनक प्रेममे। भऽ सकैत अछि अपनेक प्रेमिका अपन घरबलाक प्रेमसँ सन्तुष्ट नै हुअए।’ ‘एहेन बात नै छल। ओ हुनकासँ सर्वथा सन्तुष्ट छलथि। बहुत पसिन करैत छली ओ हुनका।’ ‘फेर एतेक प्रेम करएबला घरबलाकेँ एतेक धोका केना दैत छली?’ ओ एकरा धोका नै मानैत छली। किएकि जखन ओ हुनका संग होइत छली तँ पूर्णतया हुनका प्रति समर्पित होइत छली आ हुनका घर फिर्ता होबएसँ पूर्व घर पहुँच जाइत छली। यानी हुनक समए ओ कहियो हमरा लेल नै दैत छली। हुनक कहब छलनि कि ऐसँ हमरा घरबलाक कोनो नोकशान नै होइत अछि। हँ, हमरा संग न्याय नै कऽ पबैत छली, अहिकऽ लेल हरेक समए ग्लानि आ पश्चातापक आगिमे सुलगैत रहैत छली बेचारी।’ ‘अपनेकेँ तरस नै अबैत छल हुनकापर?’ ‘बहुत अबैत छल, मुदा की करितौं, दिलक हाथ मजबुर छलौं। छोड़ि नै सकैत छलौं हुनका।’ ‘अपनेकेँ स्वयंपर यानी अपन पुरुषत्वपर तामस नै अबैत छल। बहुत स्मार्ट छी, जीवनमे सेहो लगैत अछि, सुव्यवस्थित हैब, लड़की सभ सेहो अपनेपर अवश्य मरैत हएत। फेर अपने किए एकटा विवाहित महिलाक संग अटकल छलौं, जिनका संग अपने इच्छा अनुसार समए सेहो नै बिता सकैत छी?’ कनी काल इम्हर उम्हर तकैत ओ कहला- प्रेम एकरे नाओं छै, मुदा.....’ ‘हम तँ कहब, छुटि गेल दू नावपर एक संग सवार होबए कऽ यंत्रणासँ।’ -मुदा ओ एकरा यन्त्रणा नै गुलाबक संग उगल काँट कहैत छली। गुलाबक रङ्ग आ आकर्षण दूरसँ देखल जा सकैत छल मुदा गमक सुंघय कऽ लेल तँ ओकरा छुबहे पड़तै आ काँटक चुभन सेहो झेलहे पड़तै। ‘यानी हुनका चुभन पसिन छल?’ ‘हुनका प्रेम पसिन छल आ ओइसँ जुड़ल हरेक चीज सेहो।’ ‘यानी ओ हालतसँ प्रसन्न छली?’ ‘हमरा लग सँ जाए काल ओ दुखित भऽ जाइत छली मुदा हरेक समए प्रसन्न रहैत छली। हंसैत छली, गुनगुनगुनाइत छली?’ -ताकि ओ हुनकर गममे बताह भऽ जाए? नै हुनक बिना जी सकैत छली आ ने हमरा। हमर समस्या एहेन छल मित्र, जेकर कोनो समाधान नै छल। हमरा हुनका संग जीबए कऽ छल आ जिबियो रहल छलौं। आब हुनका गेलासँ हमरा जीवनमे जे अभाव भऽ गेल अछि ओ कहियो नै मरत। नै जनैत छी, जीवियो सकैत छी वा नै हुनका बिना?’ ‘आ हुनक घरबला?’ ‘हुनको लेल तँ आसान नहिए हएत.... उम्हर देखू, ओइ गाड़ीसँ किछु अओर शव निकालल जा रहल छै।’ ‘चलू देखैत छी।’ आ दुनू जतए शव आनि राखल जाइत छलै ओतए चलि गेला। अहि बेर निकालल जाइबला लाश शाइद ओइ व्यक्तिक छल जे ढेरमे दबि कऽ मरि गेल छल आ पुरे जकाँ जरैसँ बचल यानी पहचानल जा सकैत छल। एक स्ट्रेचरपर राखल व्यक्ति, हरियर साडीक किछु भाग देहपर रहल, सेहो छल। ओना पुरे शरीर पुरे झुलसि गेल छल मुदा झुलसल मुँहकेँ पहचानल जा सकैत छल। पहिल युवक लाशकेँे देखि कऽ खसि पड़ल। दोसर हुनका उठेलनि, तोक भरोस देलनि। ‘अपने हुनकर अन्तिम संस्कार करए चाहैत छी ने, अपनेक घरक लोक करए देत?’ ‘घरक लोक एतए नै अछि। हम असगरे रहैत छी, मुदा ऐसँ की फर्क पड़तै? हम कोन अधिकारसँ हुनकर बॉडी क्लेम कऽ सकैत छी।’ -प्रेमक अधिकारसँ। हुनका घर लऽ जा सकैत छी, हुनका मनभरि कऽ छू सकैत छी, हुनका जतेक चाही पकड़ि कऽ कानि सकैत छी....।’ ‘एना हमरा के करए देत?’ ‘हम करए देब......।’ ‘अपने कोन अधिकारसँ?’ ‘हुनकर घरबला होबए कऽ अधिकारसँ।’ ‘अँए..........।’ जेना कोनो करेन्ट लागि गेल हुअए। फेर अपनाकेँ संयमित करैत हुनका दिस तकलथि आ फेर ओ तकैत रहि गेलथि ओइ महापुरुषकेँ। सन्तोष कुमार मिश्र मुसीबत– दुरागणे दिनसँ जे कननी–रोइनी ओकरापर सबार भेलै से अखन धरि छुटल नै छलै। तेँ हम साँझखन कऽ जखन कतौसँ आबी तँ सबहे दिन लोड–सेडिङ्गक कारणे अन्हार ताहुमे ओ असगरे कनैत। कहियो मैन (मुख्य) बत्ती बड़ैत तँ कहियो अपने बारए पड़ै छल। हुनका कनैत देखि कऽ हम मैन बत्ती लऽ कऽ हुनकर मुँहक चारु दिश घुमबैत कहए लगितीऐ- “आको मइया चाको, पहलाद मइया राखो, संझा मइया तारणी, सभ दुःख निवारणी…. हँसनी–खेलनी आगु आउ, डिठ–मुठि नजरि–गुजरि सभ पाछु जाउ, .........” एते कहिते ओ छमसिया बच्चा जकाँ खिलखिला-खिलखिला कऽ हँसए लगितथिन। हम तँ कनही बिलाइ, मारे तिरपित। हुनका हँसिते हमर सुप सन करेज भऽ जाइ छल। आ हम खुशीसँ दङ्ग पड़ैत कहितिऐ “सो डारलिङ्ग ह्वाट टु डू ? (प्रिय, तखन की करी?)” जेना बापक जिमदारी हुअए तहिना ओ तखनसँ काज अढ़ाबएकेँ शुरु करै छलखिन। हम तँ धोखासँ अंग्रेजीमे बजै छली आ तकर बाद ओकर अंग्रेजी शुरु होइ छल। इहे तँ बात छै, कहूँ माथपर बैसल तँ सोचि लिअ, दिशा करबाक चान्स बेशी रहत। समए एहिना बड़ निकसँ शुद्ध पत्नीवर्ता पुरुष जकाँ चलैत रहए। मुदा एकबेर ऑफिसक काजसँ काठमाण्डू जाए पड़ल। समए तँ किछु बेसिए लागएबला रहै। करीब एक महिना। आ सबहे दिन फोनपर बात करब, से वचन सेहो देनेहे रही। आबए बेरमे ओ बेर–बेर कहैत रहथिन,–“काठमाण्डूमे ठंढा बेशी छै, अहाँकेँ मिसेज डि–कोल्ड कऽ आवश्यकता पड़त।” हम बेर–बेर जबाब दिऐ, “अच्छा, जरूरत बुझएतै तँ किन लेबै।” हमर जबाब ओ सुनिते हँसि दै। मुदा ई बात, जखन बसमे हमरा ठंढ़ा लागल, तखन महसूस भेल जे ओ डिकोल्डक आगूमे मिसेज किए लगेलकै? ओ तँ अपना लेल कहए। तखन मतलब साफ नजरि आएल जे हुनको काठमाण्डू आबए कऽ मोन छलनि। काठमाण्डू पहुचलाक बाद एक दिन पहिने बात कएने रही मुदा काल्हिखन दिन भरि फोन लागले नै रहए। जखन फोन लगबिऐ तँ आवाज अबै–“तपाइले .....” मतलब सम्पर्क नै हएत। मुदा तकरे प्रातः कलंकीसँ कनियाँक फोन आएल, “हम अग्नी बसक काउन्टर लग ठाढ़ छी, जल्दीसँ लेबए आउ।” ओ माइ गॉड (हे भगवान), अखन तँ साढ़े चारिए बजलैए। पुछलिऐ टेक्सीक बारेमे, तँ जबाब आएल जे आइ उपत्यका बन्द छै। कनियाँ आएल काठमाण्डू, एकटा मुसीबत। उपत्यका बन्द, दोसर। हम होटलक स्टाफक खुशामद कऽ कऽ गाड़ी तँ मंगलहुँ मुदा ओ कलंकीमे मात्र छोड़त ओतएसँ फिर्ता नै आओत, से शर्त लगेलक। कहाँदोन हड़तालमे टुट-फुटक इन्स्योरेन्स कभर नै करै छै। हम कलंकी पहुँचली। हुनका देखलियनि, ओते ठंढ़ामे पातर ओढ़नामे। मुदा ओढ़ना जतबे पातर छलै लोलमे लिपस्टिक ओतबे मोट। तै सँ ओतबे मोट लाठीसँ हुनका पिटए कऽ सेहो मन भऽ गेल । मुदा..... । हम हुनक नजदीक जा कऽ बड़ प्रेमसँ मुस्कैत कहलिऐ -“चलु डारलिङ्ग, ... अहाँक बेग कतए अछि?” ओ क्लोज–अप स्माइल दैत अप्पन ह्याण्ड बेग दैत कहली,–“हम तँ एतबे लऽ कऽ आएल छी।” ओ तँ काठमाण्डू आबि कऽ बड़ खुश मुदा हमर मन तँ हुनक बेग देखि कऽ खौंझा गेल। तैयो हम सभ आगू बढ़लौं। किए तँ पैदले जाए कऽ आश छल। करीब एक किलोमीटर चललो नै रही कि ओ कहए लगली,–“चाह पिअब।” कनिके आगू जा कऽ देखलिऐ, एकटा महिला टेबुलपर स्टोभ धऽ कऽ चाह बेचैत छली। हम दुनू गोटे ओतै चाह पिलौं। आ ओतएसँ बिदा भेलौं। ओतएसँ बिदा भेला दुइयो मिनट नै भेल रहए कि ओ अपन पेटपर हाथ हौस्तैत कहऽ लगली,–“हे यौ ....यौ सुनू ने, एहेन रस्ता दने चलू जतए लगमे ट्वाइलेट हुअए।” आब ई परेशानी संग पकड़लक। मतलब जे हम भोर खन कऽ हिनका बेड टी दइ छलियनि तखन ई ट्वाइलेट जाइ छलखिन। आदतिसँ लाचार, की करु। जखन–जखन जोरसँ लगैन तखन–तखन मुँह घोकचऽबैत पेट पकड़ैत बजथिन,–“आहऽऽऽ।” आ जखन कने ठीक जकाँ जे हुऐन तँ बजथिन,–“दरएऽऽ, बज्जरखसो ऐ काठमाण्डूमे, एकटा ट्वाइलेटो नै।” फेर कने आगू सएहे ताल। करीब एक किलोमीटर आगू जा कऽ कालीमाटीक पुलक निचाँ एकटा सार्वजनिक शौचालय भेटल। मुदा ओतौ खाली नै। मुदा हुनक छटपटाहट देखि कऽ एकटा ट्वाइलेटक केबार हम ढकढका देलिऐ। आ कने दूर हटि कऽ ठाढ़ भऽ गेलीऐ। तुरत्ते एकटा मोटचोट महिला ओइ ट्वालेटमे सँ निकलली आ एक थप्पर हुनका माइर कऽ फेर आेइमे पैसि गेली। हुनकर मुँह तँ लाल रहबे करै, आब कि? कनिके देर बाद एकटा दोसर ट्वाइलेटमे सँ एकटा पुरुष निकलल आ ओ आेइमे गेली आ शाइद ओतै ओे उपत्यका बन्द सन पावनिकेँ सेलीब्रेट कएली । -कामिनी कामायिनी टुटल तारा अखन फरिछ हेबामे किछुए विलंब छल ।क्षितिज धाे माँजि कऽ अपन रतुका कारीख साफ करबामे लीन। चैती बयार गाछ बिरीछक पातकेँ हल्लुकेसँ छुबैत दुलराबैत सहलाबैत बहि रहल छल आ संगहि बढ़ि रहल छल़ जमुना नदीक पार्श्ववर्ती बिरीछपर रैन बसेरा करैत खग विहगक मधुर कलरव गान। उम्हर रश्मिरथीक सुआगतक तैयारी चलि रहल छल, इम्हर अंतःपुरमे रत्न जड़ित बड़का पलंगपर सूतल सुल्तानक आँॅखि फूजि गेलै़। पार्श्वमे सूतल चंपाक खिलल खिलल कली सन मृग नयनी अपन सुतवा नाक गुलाबक फूल सन लाल लाल ठाेर ललाटपर कमानी सन सजल भाैंसँ अलाैकिक आभा पसारने। साैंदर्यक साक्षात प्रतिमूर्तिकेँ देखि वजीरे आजम भाव विभाेर भऽ उठला़। आे हुनका अपन आगाेशमे भरि लेलनि। सुन्नरी जागि रहल छलीह मुदा लाथ केने पडल़ सुल्तानक बलिष्ठ बाँॅहिमे कसमसाइत सन पड़ल नहू-नहू मनुहा़रि करैत किछु प्रेमक फकड़ा दाेहराबैत रहली़। काेनमे आतिशदान जड़ैत रहल छल। खिड़कीसँ अकासक कालिमा छँटैत देखि रूपसी हड़बड़ा कऽ उठि बैसली। “जहाँपनाह अन्नदाता बड़ विलंब भऽ चुकल अछि आब हमरा यथाशीघ्र प्रस्थानक आज्ञा देल जाउ।’ सम्राटक आँॅखिमे पीड़ाक लहरि स्पष्ट देखार भऽ गेल छलै। मुदा तत्क्षण हुनक हाथ फराक भऽ गेल छलैन्ह आ आे एकदम माैन खिड़कीक बाहर नदीमे दूरसँ आबि रहल काेनाे कश्तीकेँ देखबामे लागि गेल छलाह। सुन्दरिक विदाइक पछाइत आेही रत्न जड़ित महलक दराेदिवार जेना एकदम बे-राैनक, सून सून सन, लागए लगलै़। सुल्तान एतेक उदास भऽ गेल छलथि जेना कियाे हुनक माथसँ ताज छीन नेने होइनि। बड़ असहाय हारल जुआड़ी सन। मस्तिष्कक साेर गुल कम करबा लेल आे पलंगसँ उतरि अपन पएरमे बेस कीमती नागाेरी जुत्ती पहीर, सुन्दर सुवासित बागीचा दिश टहलए जेबा लेल प्रस्तुत भेला मुदा नै जानि माेनमे काेन तरंग हिलकाेर मारि रहल छलन्हि। पएर दीवाने खासक विपरीत संगमरमरक श्वेत धवल झराेखा दिस बढ़ैत गेलनि जिम्हर जमुनाक कारी कचाेर पानि बड शांत भावसँ कश्ती बलाकेँ मधुर रससँ भरल गीत सुनैत बहि रहल छल। कनि विलमैत नहूँ नहूँ आे वाटिका दिस अग्रसर भेला। सुन्नर महल एखनो औंघाएल अलसाइत सन पड़ल छल। जाैवनसँ प्रफुल्लित पुष्पदलपर मँड़राति भमरा सबहक गुंजन आ नदीक धीर गंभीर हहराइत स्वर ऊपर अकासमे भाेरक रूहानी़ आध्यात्मक ताकत़ चिड़ै चुनमुनीक मधुर तान मुदा सुल्तानक गमे इश्कपर किछु मरहमक काज नै कऽ सकल। कत्ताे क्षण मात्र नै बिलमइत। जेना छरपट्टी लागि गेल हाेन्हि। उद्विग्न हृदैसँ आे खुदाक इबादत करबा लेल माेती मस्जिद दिस बढ़ि गेल छलाह। दूरस्थ मस्जिदसँ आबैत अजानक स्वर हुनक हृदएकेँ छूने बिनु दशाे दिशामे झहैर झहैर कऽ विलुप्त भेल चलल जाइत छल। बड़ कुमनसँ कहुना कऽ अपन आसन बिछा ठेहुन मोड़ि नमाज पढ़लनि। काँॅच पाकल अपन नाम नाम दाढ़पर हाथ फेरैत अतीतमे डूमल भसियाएल सन स्नान करबा लेल आे हमाम दिश मुड़ि गेलाह। चढ़ैत सुरूजक संग दिवसक क्रिया कलाप प्रारंभ करए लेल दीवाने आममे दरबार सजए लागल। आब नै आे गुल रहल आ नै आे गुलशन। सुल्तानक आे बुलंद साख सेहाे नै बाँॅचल छल मुदा तैयाे बड़का नाओंक टेग तँ लागले छल लाल किलाक संग। राजकाज सीमिते मुदा छलै तँ अवस्स। बेसकीमती वस्त्राभूषण आे राजमुकुट पहिर राजसिंहासनपर बैस राजकीय माेहर लगबैत प्रशासक प्रबंधक आ न्यायाधीशक भूमिका निभाबैत निभाबैत आे जेना फेरसँ नशामे मातल बहकल बहकल सन व्यवहार करए लागल छलाह। चतुर सुजान मंत्रि सबहक नजरिसँ ई नै बाँचि सकल छल। किंकर्त्तव्यविमूढ आे सभ। आखिर करितथि तँ की? लाल़ टरेस उन्मत्त आँॅखि आ नशाक आगाेशसँ सुन्न हाेइत दिमागक तंतु तंतु केँ सुरा आ सुन्नरि अपन हुश्नक हुकुमतमे बंधक बनाैने नचा रहल छल। हुस्न जाम आ इश्कक भमरमे घेराइलि उबचुभ हाेइत माेहित नजरिसँ आे अपन चारू कात देखलक। सम्पूर्ण दरबार दरबारी़ प्रजा आ मंत्रिपरिषद हुनका शत्रुसम दृष्टिगाेचर हाेमए लागल छल़। मस्तिष्कक खाेहमे तँ मंडीलक घंटी आ मस्जिदक अजान सन एकेटा स्वर प्रतिध्वनित हाेमैत रहल छल, इम्तियाज इम्तियाज इम्तियाज। हुनक वश चलितनि तँ सम्पूर्ण संसारक मिल्कियत आेकरा नाओं लिख आेकरा मल्लिकाए तरन्नुम बना विश्व मानचित्रपर अमर बना दैतथि। शनैः शनैः बढ़ैत प्रचंड धूप हुनक बेचैनीकेँ, अनमनस्कताकेँ आआेर बेलगाम करए लागल छल। तखने विशाल विशाल कारी चारि टा अश्व अपन वीर जाेद्धा संग आेतए पधारल। सहायककेँ घेाड़ा साैंपि सैनिक सभ जहाँॅपनाहक खिदमतिमे अपन आदाब अर्ज करैत बड़का बड़का डेग भरैत दीवाने खास दिसि मुड़ि चुकल छल। संर्पूण मंत्रिमंडल संग कनिकाल लेल सुल्तान सेहाे चिंताक अथाह सागरमे डूमि गेल छलथि। गुप्तचर सभ काेन सनेस लऽ एहेन व्यग्र भऽ पहुँॅचल अछि? आे सभ यथाशीघ्र ओइठामक कार्यवाही समाप्त कऽ उठि चुकल छलाह। तीन साै बरखसँ जे साम्राज्य जनमानसमे घुसिक कऽ आेकर रग रगमे अपन जड़ि जमा चुकल छल़, जेकर असीम सत्ता आ प्रचुर दाैलत साेन-चानी हीरा जवाहरात लाेकक हृदैमे भय वा इज्जतक कारण बनल छल, जेकर विराट न्यायप्रियता़ वा क्रूरताक शासन प्रबंधक चारूकात पताका फहरा रहल छल़, ओइ विख्या़त साम्राज्यक हाथसँ एकक बाद एक कऽ रियासत सभ निकलल जा रहल छल। चारूकात विद्राेहक अग्नि प्रज्ज्वलित हाेमए लागल। ऊपरसँ विदेसी आक्रमण घाघ आ शातिर खेलाड़ी इस्ट-इंडिया कपनी तँ बड़ चालाकीसँ टामस राे केँ पठा जहाँगीरेक शासनकालमे व्यापार करबाक अनुमति लइत शनैः शनैः अंगुरि पकैड़ कऽ पहुँचा पकड़नाइ प्रारंभ कऽ देने छलै। मैत्रीक नाओंपर एते पैघ छलावा। आइे पहिल अंगरेजक पछाति कत्तेक रास राजकेँ अपन भ्रामक महाजालमे फँसबैत चलल गेल़ ऐतिहासिक दस्तावेज ऐ दुर्भाग्य पूर्ण गाथाक प्रत्यक्ष प्रमाण अछि जे भारत भूमिक अनेकानेक राज रजवाड़ाक कूप मंडूकता आपसी इरखा़ द्वेष आ अदूरदर्शिताक लाभ उठबैत सभसँ फराक फराक संधि करैत, आेकर नाओं देलकै “ट्रीट्री फाॅर फ्रेन्डशिप ट्रीट्री एडाेप्टेशन।” चलाकीसँ कखनाे संधि कखनाे खेलमे हार जीतक बहाने हथियाबैत रहल सभटा राज्य। उम्हर अंगरेजक सतर्क चुस्त दिमाग, इम्हर अभाग्यक प्रतीक ई सुस्त़ सूतल सुल्तान। लाेक चकाेर सन हिनका दिश ताकि रहल छल़, सल्तनतक पुरान कला़ रणनीति देखाबए लेल, मुदा एतए तँ नजारे किछु आर। दीवाने खासमे गुप्तमचर सभसँ वार्ता कऽ आपसी विचार विमर्श कऽ पश्चात दरबार उठि चुकल सुल्तानक कार्य अकुशलता क़र्त्तव्यहीनता आ विलासितासँ उदास मंत्रिगण माथ झुकाैने अपन अपन घर दिसि प्रस्थान तँ हाेमए लगला़ मुदा नाना विध दुश्चिन्तासँ आशंकासँ भरल मस्तिष्क पएरमे जेना भारी भारी पाथर बाँधि देने छल़। कहुना कऽ घिसिया घिसिया कऽ आगाँ बढ़ैत रहला अकस्मात बड़ हिम्मत वृद्ध वजीर हाजी मियाँ अपन भारी भरकम कनी बझल बझल सन स्वरमे बाजि उठल छलाह, ‘दाैलते आजम, विपत्तिक कारी कारी घनगर बादरि आब शाही आकाससँ बेशी दूर नै छै। खुदा माफ करथि मुदा किछुए दिनमे ई लाल सुर्ख इमारत, सुसज्जित वैभव पूर्ण किला, अंधार श्मशान घाट बनैत कालक तीव्र प्रवाहमे नै विलुप्त भऽ जाए। अपने किछु फरमान जारी करितिऐ ऐ विपत्तिमे, आखिर कएल की जाए। सेना सभकेँ कत्तेकाे माससँ दरमाहा नै भेटलै, अेाकराे सबहक माेनमे आक्रोशक लुत्ती प्रज्ज्वलित भऽ रहल छै। तइयाे जहाँॅपनाहक आदेशपर आेकरा सभमे नव स्फूर्ति नव ऊर्जा उत्पन्न कएल जा सकैत अछि।’ नै जानि काेन गपपर सुल्तान एकदम हत्थासँ उखड़ि गेला, खाैंझाइत बाजि उठला ‘खुदाक इबादत करू, सभ मिलि जुल कऽ पाक कुरान शरीफ पढू, उपरबलाक रहमाेंकरमसँ सभ विपत्ति टलि जेतै। अहाँॅ सभ व्यर्थ भयाक्रांत भऽ कऽ काफिर जकाँ गप कऽ रहल छी।’ हाजी मियाँक नजरि पहिनेसँ झूकल, आब आर झुकि गेल छल। ओइ वृद्ध बुद्धिमान पुरूखकेँ संग देबएबला कत्तेकाे अमीर उमरा। कत्तेक षङयंत्र भऽ रहल छलै़ सभतरि। शाही सेनाक जांबाज सेनापत़ि कत्तेक बेर हाजी साहब दिसि सक्षम नेतृत्वक उम्मेदसँ तकने रहै़ मुदा पुरान लाेक कृतज्ञताक चासनीमे डूमल सुल्तानसँ बगावतक गप साेचियो नै सकैत छल़। राजघरानामे काेनाे सक्षम नेतृत्व दूर दूर धरि नजरि नै आबि रहल छल। गुप्त षडयंत्रक माध्यमसँ आेइ सुन्नरिकेँ जानसँ मारबाक कत्तेक प्रयास कएल गेल, आेइ निशाबद्ध सुतली रातिमे आेकर घरकेँ आगि लगा सुपुर्दे खाक कऽ देल गेल रहै़। मुदा किस्मत आेकर, आे तँ ओइ राति अपन भवनमे नै भऽ कऽ हवेलीक नर्म नाजुक अलंकृत पलंगपर शाेभायमान छल। ऐ अग्नि कांडसँ सुल्तानक शरीरमे अपन पूर्वजक वीर खून प्रवाहित हाेमए लगलै। तामसे मुँहसँ झाग फेन बहराए लगलै, चारू कात गुप्तचर सतर्क भेल, आखिर ई काेन आदम जातक करिस्तानी अछि। कएक दिन धरि आेहाे राज काज ठप्पा रहलै। चारू कात मचल भयानक डर आशंका आ अस्थिरताक बीच फरियादी सभ छाती पिटैत कानैत कल्पैत आपस जाइत रहलै। ई तँ आआेर विकट माहाैल। आखिर कूटनीतिक चालि चलि आेइ नर्तकीकेँ समझा बूझा कऽ सुल्तानसँ कहाआेल गेल जे आगि आर कियाे नै आेकर अपने असावधानीसँ जड़ैत मशालसँ लागि गेल छलै, हवा तेज रहै आ खिड़की खुजल। इएह सभ साेचैत हाजी मियाँ आसमानमे रूहानी ताकत दिसि आससँ तकने छलथि। सुरूजक भीषण तापसँ बचवा लेल तँ ओइ संगमरमरक वृहदाकार भवनमे जमुनाक पानि झींक कऽ भीतरे भीतर शीतल बनेबाक साधन तँ वर्त्तमाने छलै़ मुदा तैयाे खस़ चाननक लेप आ विविध ठंढा सरबतक मध्य ओइ सहस्त्र जीव्हा बला धाहकेँ राेकबाक भरिसक प्रयास कएल जा रहल छल। उम्हर प्रचंड भास्कर नहूँ नहूँ कऽ अस्तगामी हाेबाक फेराकमे छलथि। इम्हर साँझमे सुल्तानक मनाेरंजनक लेल रंगमहलक फर्शकेँ, झाड़फानूसकेँ, राेशनदानकेँ, दरो-दीवारकेँ धाे पाेछि कऽ चमका चमका कऽ सुसज्जित कएल जा रहल छल। रंगशालाक देवारमे चुनैल बेशकीमती पाथर हीरा माेती़ पन्ना जवाहरात़ कदीलक राेशनीमे स्वर्गक सुषमा बखानि रहल छल। जमुना दिसिसँ अबैत शीतल मद्धिम बयार इत्र फुलैल केवड़ा, रातरानी़क गंधसँ मह-मह करैत सुखमय वातावरण। मशालची तबलची ढाेलकिया तानपूरा़ सितार सराेद पखावज जलतरंग सारंगी, अपन अपन वाद्य यंत्र नेने विशेषज्ञ सभ अपन निर्धारित स्थान धऽ नेने रहथि। हारमाेनियमपर राग छेड़ल जा चुकल छल।अपन ख्वाेबगाहसँ निकसि रात्रिपरिधानमे सुल्तान बड़का भव्य फाैवारासँ कनि मध्य राखल गाव-तकियापर स्थान ग्रहण कऽ चुकल छलाह कि तखने मुनहरि साँझमे संध्या सुन्नरि जकाँ छम छम पाजेब खनकाबैत़ अवगुंठनसँ मुँह झँपने नर्तकीक प्रवेश़ भेलै। कनि झुकि कऽ माेहिनी अदासँ सुल्तानकेँ सलाम पेश करैत घाेघ उठा कऽ फेंकलक, भरिदिन आैंधाएल चिन्तातुर मुखमंडलपर जेठमे जेना सावनक हरियरि आबि गेलै़। आे मुस्कैल आ महफिल धन्य धन्य भऽ गेल। नामी गिरामी मुँह लगुआ अमीर उमरा, झराेखासँ झकैत़ गुलाम किन्नर दास दासीगण। माैधसँ सनल स्वर लहरी हवामे तूर जकाँ दूर दूर धरि छितरै लागल छल़, ‘माेहब्बत ््ऽ््ऽऽ््््््।’ बनल ठनल दू टा सुन्नरि अंगड़ाउर लैत सुल्तान लग नमगर बड़ दीव नक्कासीबला सुराहीदार स्वर्ण पात्रसँ सुवर्णक गिलासमे भरि भरि कऽ शराब पराेसि रहल छल। गजल़ ठुमरी कजरी नृत्य व गानसँ भरल माहाैलमे जामपर जाम पीबैत सुल्तान आ अमीर। जखने शुरू कएल ‘जिद ऽ्ऽऽ’ आ सुल्तान गिलास हाथमे नेने ठाढ़ भऽ झूमै लगला। रूपकुँवरिक स्वर रंगशालासँ उछैल उछैल जमुनाक विस्तृत पाटपर विलीन हाेमैत रहलै। किछु शायर लाेकनि सेहाे अपन शेरसँ ओइ रंगमे आर रंग मिलाबैत रहला। कनि कालमे सुन्नरीक साेझाँ ताेहफाक ढेर लागि गेल रहै। भीतर बैसल बाहरसँ झकैत अमला सबहक राेम राेम सिसकि रहल छल, महलक बाहर चारू कात विद्राेह स्वर सुनाइ दैत छलै, राजकर्मचारीकेँ पकड़ि-पकड़ि लाेक मारै। आकुल व्याकुल जनानी सभ महलसँ पड़ेबाक ब्याेंतमे लागल। कत्तेकाे नाह कश्ती किलाक सुरंगमे तैयार, केहनाे आपद स्थितिमे जमुना बाटे पड़ेबा लेल। अन्तःपुरसँ नित्यकप्रति कन्ना राेहटक आवाज, आे असहाय स्त्रीगण दास दासीक मुँहसँ बाहरक गप सुनि मृत्युंभयसँ कँपैत, जाेर जाेरसँ घाना पसारबा आ इबादत तजि आर की कऽ सकैत छलीह। मनाेरंजन खेनाइ पिनाइक बाद गहराइत रातिमे अपन आराम गाहमे पसरल़ रूप सुंदरिक रंगमे मातल सुल्तान आइ आेकरा अपन घर नै जाए दऽ रहल छल। “आब अओर नै, क्षणभरिक अलगाव हमरा पागल कऽ दैत अछ़ि। कहू तँ ई लाल किला, ई संपूर्ण सम्पत्ति, अहाँक नाओं लिख कऽ ओइपर शाही माेहर लगा दैत छी।’ ‘आलमपनाह हम अपने संग ऐ वैभव विलासमे तँ अपार आनंद आ हर्षक संग रहि सकैत छी, ई तँ हमर अहाे भाग्य हएत मुदा आे दुर्दिनक हमर सखी जे महलक बाहर खरभुजा बेचैत अछ़ि हम आ आे दू शरीर एक प्राण आे काेना जीतै़, बिलटि जेतै ओ।’ सुन्नरिकेँ अपन आगाेसमे नेने मत्त-उन्मत्त प्रेमी सुल्तान आँखि कनी खाेलने खाेलने बाजल छलाह ‘हम अहाँक संगीकेँ अहाँक दासी मुर्करर कऽ रहल छी आब तँ खुश ऽ्ऽ्ऽ्।’ सुल्तान अपन छातीसँ आेकर मुँह उठा कऽ पुछने छल़, कारी कजरारी बड़का बड़का, पिपनी फड़फड़ाबैत आे इत्मी्नानसँ मुस्कैल छल, जेना आेकर बड़ पाकल गुरक इलाज भऽ गेल हुअए। आरामगाहक काेनमे जड़ैत मशाल सल्तनतक ऐ दुर्भाग्यपर फफैक फफैक कऽ कानलाक बाद मिझा गेल छलै। दूर कत्तेकाे नढ़िया गीदड़ कुकूरक कननाइ प्रारंभ भऽ चुकल रहै। चारू दिशा भीषण अंधकारमे विलीन ऊपर आकासमे आइ चान सेहाे नै। भयंकर अंधेरिया़ अपन आधिपत्य कायम कऽ चुकल छलै़, तखने दच्छिन दिसक आकाससँ एक गाेट लहकैत टुटल तारा महलक प्रांगणमे खसि पड़ल छलै। राज नाथ मिश्र मस्ती रातिक पहिल पहर बीत गेल छल। अलसाएल मदमातलि राजकुमारी रौशनआरा मसनदपर लुढ़कलि पड़ल छलि। चिन्ताग्रस्त प्रतीत होइत छलि। मुदा कामोत्तेजित वासनाक तीव्र चमकसँ ओकर आँखिमे एक विशिष्ट रंगत स्पष्ट परिलक्षित भऽ रहल छल। उत्तेजनाक पराकाष्ठाक कारणे ओकर गोर वर्णीय चेहरा असाधारण ढंगसँ रक्ताभ भऽ उठल छल । केराक बीर सनक धानी रंगक मलमलक पोषाकमे ओकर मांसलता झिलमिला रहल छल, जेना कि शीसाक स्वच्छ आ पारदर्शी बोतलमे मदिरा देखि पड़ैछ । ई पोशाक ओकर यौवनक मनोरम छटाकेँ बहुगुणित कए किछु अधिके कमनीय बना रहल छल। कामसुन्दरि रौशनआरा अप्रतीम यौवनक मलकानि छलि। ओकर रूपसागरमे किछु एहेन माधुर्य छल जे देखए बलाक मन अनायासे उन्मत्त भऽ उठैत छल। अंग-प्रत्यंग साँचमे ढलल-कोमलताक पराकाष्ठा कमनीयताक उत्तुंगता। मुख-माधुर्य विलाससँ परिपूर्ण कारी कारी केश, मदमातलि रतनार नयन। गौरवर्ण चेहराक रंग जेना दूधमे सिन्दूर घोरल। ठोर लालटेस, डाँर पातर, उन्नत उरोज, पुष्ट नितम्ब, कामाग्नि दहकाबएबला। ओकर सुषमा ओ लावण्य ककरहु मुर्छित करबा हेतु पर्याप्त। धानी वस्त्रपर सोनहुला जरी बड्ड फबि रहल छल। केश-पाश बड़ सुरूचिपूर्ण रूपेँ गाँथल छल, जइमे सँ निकलैत फुलेलक मधुर सुगंधि वातावरणकेँ मादक बना रहल छल आ तइमे चोटीमे गाँथल सुविकसित बेला फूलक मालासँ निकलैत सुवास तइ मादकताकेँ अभिवृद्धि कए रहल छल। माथपर कनेक लापरवाहीसँ राखल फिरोजी रंगक जरीयुक्त मलमलक ओढ़नी। गरामे लालरंगक मणिमालाक संगहि श्वेत मोतीमाल आपसमे ओझरा कऽ उन्नत उरोजसँ टकरा-टकरा कऽ खेल कए रहल छल। दुहू कानमे बेस भरिगर सोनाक कर्णफूल आ तइमे जड़ल हरित पन्ना। छातीपर चित्रमय विचित्र हार, तइमे अनेक हीरा जड़ल छल। नीलम जड़ल पहुँची हाथक शोभा बढ़ा रहल छल। अँगुठा छोड़ि सभ आँगुरमे अँगूठी, जइमे रंग-बिरंगा जवाहरात चमकि रहल छल। डाँरामे तीन आंगुर चाकर सोनाक डरकस। कोमल पएरमे चानीक पाजेब, जइमे लटकल छोट-छोट घुंघरूक संग श्वेत मोतीक लड़ी। संपूर्ण पोषाक अतरसँ सराबोर। सल्तनते मुगलियाक शाही मुगल खानदानक दू गोट विशेषता खानदानक स्त्रीगणक दृष्टिएँ अति विशिष्ट रहल अछि। प्रथम ई जे शाही खानदानक स्त्रीगण लोकनि परदाक अभ्यन्तर रहैत छलि। मुदा सात परदाक तरमे रहितो राजनीति ओ कूटनीति सतरंजक माहिर खेलाड़िन सभ छलि। आ ऐ खेलमे पूर्ण दक्षता ओ चातुरीसँ हिस्सा लैत छलि। आ द्वितीयतः मुगल राजकुमारी -शाहजादी- लोकनिक बिआह नै होइत छल। यद्यपि शाहजादी लोकनिक अभिसार आ अनुचित गुप्त प्रेम प्रसंगक कथा कतेको बेर चर्चित होइत रहल छल मुदा मुगल बादशाह कहियेा ककरहु अपन जमाए नै बनबथि। ई निअम शहंशाह अकबर बनौलनि आ एकर अनुपालन सभ कियो परवर्ती मुगल बादशाह लोकनि कएलनि । ... कामवासनामे दहकैत रौशनआरा किछु काल मसनदपर ओङठल रहलि। फेर थपड़ी बजाए नौरिनिकेँ बजौलनि। राजकुमारीक इशारा पाबि नौड़िनि मदिराक सुराही ओ स्वर्ण प्याली प्रस्तुत कएलक। कामरसक पाँच-सात प्याली जखन कंठक नीचा उतरबाक छल कि राजकुमारी मदमस्त भए उठलि आ नौड़िनिकेँ गीत गौनिहारिकेँ बजएबाक आदेश देलनि। किछुए कालक पछाति स्वर लहरीक पंचम चतुर्दिक अपन साम्राज्य पसारि लेलक। मुदा मनक अशान्ति बढ़ैत गेल। उष्ण होइत शरीरकेँ शीतलता प्रदान करबामे मदिराक मादकता ओ संगीतक सरगम दुहू निष्फल रहल। उनटे उद्दीपन ओ उताप्ततामे आरो जुआरि आबि गेल। कामाग्निक बाढ़ि जखन हदक बान्ह तोड़बा हेतु आतुर भऽ गेल तखन ओ हाथक इशारासँ गीतगाइन लोकनिकेँ जएबाक आदेश देलनि। कामोत्तेजनासँ मुखाकृति आरो अधिक रक्ताभ भए उठल छल। श्वास-प्रश्वास तीव्रसँ तीव्रतर होइत होइत, बिरड़ो जेना आबि गेल रहए। खासमखास नौड़िनि नसीमबानूक बजौहटि भेल । ओ उपस्थित भए चुपचाप मूड़ी झुकौने आदर भावे ठाढ़ि छलि। --बादशाह सलामत अखन की कऽ रहल छथि? --हुजूर ! अखन ओ दरबार-ए-खासमे आबि गेल छथि। --की वाकयानबीस अपन रोजनामचा सुना देलक? --अखन नै। अखन बादशाह सलामत बड़ी बेगम साहिबाक संग किछु अंतरंग बिचार-विमर्शमे लागल छथि। --सुन तों जो। आ सुनने अबै। वाकयानवीस किछु नव खबरि सुनबैत छथि कि नै। --बेस सरकार, जे हुकुम। खास नौड़िनि नसीमाबानूक गेलाक उपरान्त राजकुमारी अपनहि हाथे मदिरा ढारि आेइमे गुलाबजल फेँटि पीबए लागलि। किछु क्षण टकटकी लगौने जड़ैत मोमबत्ती देखलनि आ फेर नौड़िनि बजएबाक हेतुए थपड़ी बजौलनि। पहरेदारिन नौड़िनि उपस्थित भेल। --रजिया कतए अछि? --सरकारक आज्ञाक प्रतीक्षामे बैसल छथि। --ओकरा पठा दही आ देख ऐ बीचमे कियो भीतर नै आबए। -- आदेश। माथ झुकबैत पहरेदारिन बाहर भेल। रजिया आबि सलामी देलक। अलसाएल नजरिए ओकरा दिस तकैत राजकुमारी पुछलनि- --काज भेलौ? --जी सरकार। --ज्योतिषीजी भेटलखुन? --जी, जी हँ। --सभ बात हुनका नीक जकाँ बुझा देलहुन। --जी सरकार, आज्ञाक अपुरूपे सभ ठीक ठाक भऽ गेल। --तोरा बुझेलाक अनुरूपे दारा शिकोहकेँ भ्रमित करबामे की ओ सफल रहलाह? --जी सरकार। सोलहो आना राजकुमारीजीक इच्छानुसारे सभ किछु रहल । राजकुमारी देह परसँ ओढ़नी उतारि फेकैत पुनः मसनदपर ओलरि गेलि। किछु क्षण सोचलनि। पुनः मदिराक प्याली उठबैत चुस्की लेलनि। --आ दोसर काजक की भेलौ? --ओ हो भऽ गेल सरकार। --सुभीतासँ? --जी हुजूर। --के छौ? --एकटा अफीमची अछि हुजूर। बहुत दिनसँ जनैत छिऐक ओकरा। --काज संवेदनशील छौक, से बुझै छही? --सरकार हुजूर, अपने बेफिकिर रहियौ ने। सभटा नीक जकाँ हेतै। --बेस तँ ठीक छौ। बनो एक प्याली। आज्ञा पाबि रजिया प्यालामे मदिरा ढारलक। तइमे गुलाबजल फेँटलक आ सेवामे प्रस्तुत कएलक। मातलि राजकुमारी किछु विहुँसैत- -- बेस आ तेसर काज? --सेहो भऽ गेल हुजूर। --कतए छौक? --सरकारक खास कोठरीमे। मुगल शाहजादी राजकुमारी रौशनआरा अपन गरास मोतीमाल उतारि रजियापर फेंकलनि। आ मुस्की दैत मदिरा दिस इशारा कएलनि। रजिया देबए लागलि। ताबतहि नसीमबानू उपस्थित भेल। झुकि-झुकि कोर्निस करैत आदाब बजौलनि। राजकुमारी आँखिक इशारासँ रजियाकेँ बाहर जएबाक आदेश देलनि। मातलि रौशनआरा नसीमा दिस तकलनि। --बादशाह सलामत ख्वाबगाह गेलाह? --जी नै सरकार। अखन धरि तँ नै। --खबरनबीस रोजनामचा सुनौलनि? --जी हुजूर । --कोनो खास विन्दु? --जी राजकुमार, दारा शिकोह ओइ चालीस कैदीक हाथ कटबा देलनि अछि जे शहजादा शुजाक संग लड़ाइमे बन्दी बनाओल गेल छल। --आर? --पछाति सरकारे औलिया आ शाहजादा दारामे खूब थुक्कम फजीहत भेल। --कोन बातपर? --बादशाह सलामतक कथनी छलनि जे तुरत सुलेमानकेँ आपस बजबा लेबाक चाही, मुदा दारा ऐ बातपर अड़ल रहथि जे सुलेमान शहजादा शुजाकेँ बंगाल धरि खिहारथि। रौशनआरा बिहुँसि उठलि --दिव्य, बड़ सुन्दर। नसीमा तों बादशाह सलामतकेँ ख्वाबगाह जेबाकाल धरि ओतहि उपस्थित रहि सभ देख सुन। --बड़ बेस सरकार। कहैत नसीमबानू चलि गेलि। थपड़ी पड़ल, रजिया आएलि। --अच्छा तँ तोँ ई बतो जे ज्योतषी शाहजादा दाराकेँ की कहलकै? --सरकार, शाहजादा दाराकेँ ज्योतिषी नीक जकाँ बुझा देलनि अछि जे सुलेमान शिकोह ऐ अभियानमे विजयी भए लौटताह। अखनुक ग्रह-गोचर स्थिति पूर्णतया अनुकूल अछि। तँहि अखनहि बंगाल, बिहार, उड़ीसापर दखल कऽ लेल जाए। --वाह, वाह, बेजोड़। --जी सरकार। सभ तँ हुजूरेक उर्वरा मस्तिष्कक उपजा थिक। --रजिया। --सरकार। --तोँ कहलेँ जे ओ बहुत मनभावन अछि। --जी सरकार, खनदानी थिक हुजूर। --अच्छा एक प्याली पिओ। रजिया प्याली भरलक। शाहजादी रौशनआरा ओकरा एकहि साँसमे गटकि गेलि। प्याली ओंघरा देलनि। उठलि। ऊपरसँ नीचा धरि ऐंचैत, देह तोडै़त उठलि। बाजलि-- लऽ चल खास कोठरीमे, देखी आजुक रातिक शिकार केहन चुनलेँ अछि। नौड़िन रजियाकेँ सहारा दैत उठौलक, शाहजादी रौशनआरा डगमगाइत खास कोठरीमे चलि गेलि.... असगर वजाहत- हम हिन्दू छी- हिन्दी कथाक मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल द्वारा हम हिन्दू छी एहेन कन्नारोहट जे मुर्दो कब्रमे ठाढ़ भऽ जाए। लागल जे अबाज सोझे कान लगसँ आएल अछि। ओइ स्थितिमे हम कूदि कऽ बिछौनपर बैसि गेलौं, अकासमे अखनो तरेगन छल.. किंशाइत रातिक तीन बाजल हएत। अब्बोजान उठि कऽ बैसि गेला। कन्नारोहट फेरसँ सुनाइ पड़ल। सैफ अपन अखड़ा खाटपर पड़ल चिकड़ि रहल छल। अंगनामे एक दिससँ सभक खाट लागल छलै। “लाहौलविलाकुव्वत (भूत प्रेत भगबैले वा घृणा प्रकट करैले प्रयोग). . .', अब्बाजान लाहौल पढ़लन्हि “खुदा नै जानि ई किए सुतलेमे किए चित्कार करऽ लगैए।” अम्मा बजली। “अम्मा एकरा राति भरि छौड़ा सभ डरबैत रहै छै. . .” हम कहलिऐ। “ओइ सरधुआ सभकेँ सेहो चेन नै पड़ै छै. . .लोक सभक जान आफदमे छै आ ओकरा सभकेँ बदमाशी सुझाइ छै”, अम्मा बजली। सफिया चद्दरिसँ मुँह बहार कऽ बाजलि, “एकरा कहू छतपर सुतल करए।” सैफ अखन धरि नै जागल छल। हम ओकर पलंग लग गेलौं आ झुकि कऽ देखलौं जे ओकर मुँहपर घाम छलै। साँस खूब चलि रहल छलै आ देह थरथरा रहल छलै। केस घामसँ भीजल छलै आ किछु केस माथपर सटि गेल छलै। हम सैफकेँ देखैत रहलौं आ ओइ छौड़ा सभक प्रति मोनमे तामस घुरमैत रहल जे ओकरा डराबैए। तखन दंगा एहेन नै होइत छल जेहेन आइ काल्हि होइए। दंगाक पाछाँ नुकाएल दर्शन, ईलम, काजक पद्धति आ गतिमे ढेर रास बदलेन आएल अछि। आइसँ पच्चीस-तीस साल पहिने नहिये लोककेँ जिबिते भकसी झोका कऽ मारल जाइ छलै आ नहिये सौंसे टोल-मोहल्लाकेँ सुनसान कएल जाइत छलै। ओइ जमानामे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री आ मुख्यमंत्रीक आशीर्वाद सेहो दंगा करैबलाकेँ नै भेटै छलै। ई काज छोट-मोट स्थानीय नेता अपन स्थानीय आ क्षुद्र स्वार्थ पूरा करै लेल करै छला। व्यापारिक प्रतिद्वंद्व, जमीनपर कब्जा करै लेल, चुंगीक चुनावमे हिंदू वा मुस्लिम वोट समटैले इत्यादि उद्देश्य भेल करै छल। आब तँ दिल्ली दरबारपर कब्जा करबाक ई साधन बनि गेल अछि, सांप्रदायिक दंगा। संसारक सभसँ पैघ लोकतंत्रक मुँहमे जाबी वएह पहिरा सकैए जे सांप्रदायिक हिंसा आ घृणापर शोनितक धार बहा सकए। सैफकेँ जगाएल गेल। ओ बकरीक असहाय बच्चा सन चारू दिस ऐ तरहे देखि रहल छल जेना माँकेँ ताकि रहल हुअए। अब्बाजानक बेमात्रे भाइक सभसँ छोट सन्तान सैफुद्दीन प्रसिद्ध सैफ जखन अपन घरक सभ लोककेँ चारू दिस घेरने देखलक तँ ओ अकबका कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सैफक अब्बा कौसर चचाक मरबाक खबरि लेने आएल कोनमे कटल पोस्टकार्ड हमरा अखनो नीक जकाँ मोन अछि। गामक लोक सभ चिट्ठीमे कौसर चचाक मरबाके टा खबरि नै देने छला संगमे ईहो लिखने छला जे हुनकर सभसँ छोट सन्तान सैफ आब ऐ दुनियामे असगर रहि गेल अछि। सैफक पैघ भाइ ओकरा अपना संग बम्बै नै लऽ गेल। ओ साफे कहि देलन्हि जे सैफ लेल ओ किछु नै कऽ सकै छथि। आब अब्बाजानक अलाबे ओकर ऐ दुनियामे कियो नै छै। कोन कटल पोस्ट कार्ड पकड़ि अब्बाजान बहुत काल धरि चुपचाप बैसल रहथि। अम्मासँ कएक बेर झगड़ा केलाक बाद अब्बाजान पैतृक गाम धनवाखेड़ा गेलथि आ बचल जमीन बेचि, सैफकेँ संग लऽ घुरलथि। सैफकेँ देखि हमरा सभकेँ हँसी आएल रहए। कोनो देहाती बच्चाकेँ देखि अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटीक स्कूलमे पढ़ैवाली सफियाक आर की प्रतिक्रिया भऽ सकैए, पहिले दिन ई बुझा गेल जे सैफ खाली देहातिये नै वरन् अर्द्ध-बताहसन सोझ वा मूर्ख छल। हम सभ ओकरा कबदाबैत आ फुचियाबैत रहै छलिऐ। एकर एकटा फाएदा सैफकेँ एना भेलै जे अब्बाजान आ अम्माक हृदय ओ जीत लेलक। सैफ खूब मेहनति करए। काजसँ ओ देह नै नुकाबए। अम्माकेँ ओकर ई व्यवहार खूब पसिन्न पड़ै। जँ दूटा रोटी बेसी खाइए तँ की? काज तँ सेहो देह झारि कऽ करैए। सालक साल बितैत गेल आ सैफ हमर सभक जिनगीक अंग बनि गेल। हम सभ ओकरा संग सामान्य होइत गेलौं। आब मोहल्लाक कोनो बच्चा जँ ओकरा बताह कहि दै तँ हम ओकर मुँह नोंचि लै छलिऐ। हमर भाइ अछि ई, एकरा तूँ बताह कोना कहै छेँ? मुदा घरक भीतर सैफक की स्थिति रहै से हमरे सभ टाकेँ बुझल छल। नग्रमे दंगा ओहिने शुरू भेल छल जेना भेल करै छल, माने मस्जिदसँ ककरो एकटा पोटरी भेटलै, जइमे कोनो प्रकारक माउस छलै आ माउसकेँ बिन देखने ई मानि लै जाइ छल जे किएक तँ ई माउस मस्जिदमे फेकल गेल छल तेँ ई सुग्गरक माउस हेबे टा करत। तकर बदलामे मुगल टोलमे गाय काटि देल गेल आ दंगा शुरू भऽ गेल। किछु दोकान जड़ि गेल मुदा बेसीकेँ लुटल गेल। छूरी-चक्कूक ढेर रास घटनामे मोटा-मोटी सात-आठ गोटे मुइलाह आ प्रशासन एतेक संवेदनशील छल जे कर्फ्यू लगा देल गेल। आइ-काल्हिबला बात नै छल जखन हजारक हजार लोकक मुइलाक बादो मुख्यमंत्री मोंछपर ताव दैत घुमैत छथि आ कहैत छथि जे, जे किछु भेल ठीक भेल। दंगा किएक तँ लगपासक गामोमे पसरि गेल छल तइ दुआरे कर्फ्यू बढ़ा देल गेल छल। मुगलपुरा मुसलमानक सभसँ पैघ मोहल्ला छल से ओतऽ कर्फ्यूक प्रभाव छल आ जिहाद सन वातावरण सेहो बनि गेल छल। मोहल्लामे तँ गली-कुच्ची होइते छै मुदा कएकटा दंगाक बाद ई अनुभव कएल गेल जे घरक भीतरसँ सेहो रस्ता हेबाक चाही। माने आप्तकालक व्यवस्था। से घरक भीतरसँ, छातक ऊपरसँ देवारकेँ तड़पैत किछु एहनो रस्ता बनि गेल छल जे ओकरा जानैबला मोहल्लाक एक कोनसँ दोसर कोन आरामसँ जा सकैत छल। मोहल्लाक लोक तैयारी युद्ध जकाँ केने छल। एहेन बेबस्था रहै जे जँ एक्को मास धरि जँ कर्फ्यू जाइए तैयो जरूरतक बौस्तुजात मोहल्लेमे भेटि जाए। दंगा मोहल्लाक छबारी सभकेँ अद्भुते उत्साह देखेबाक मौका दैत छल। रौ.. हम सभ तँ ऐ हिन्दू सभकेँ गर्दा फँका देबै.. की बुझि राखने अछि ई धोती बान्हैबला सभ.. धुर्र डरपोक होइ जाइए ई सभ।.. एक मुसलमान दस हिन्दूपर भारी पड़ैए.. हँसि कऽ लेने छी पाकिस्तान, लड़ि कऽ लेब हिन्दुस्तान.. एहने सन वातावरण बनि जाइ छल। मुदा मोहल्लासँ बाहर निकलैक नामपर सभक जान निकलऽ लागै छलै। पी.ए.सी.क चौकी दुनू दिस रहै। पी.ए.सी.क बूट आ राइफलक हत्थाक मारि कतेको गोटेकेँ मोन रहै, से मौखिक धरि तँ सभ ठीक रहै मुदा ओइसँ आगाँ…. संकटमे लोक एकता सीखि लैत अछि, एकता अनुशासन आ बेबहार। सभ घरसँ एकटा छौड़ा पहरापर रहत। हमर घरमे हमरा अलाबे, हम २५ बरख पार कऽ गेल रही से हमरा छौड़ा नै कहल जा सकैत छल, छौड़ा सैफ टा छल, से ओकरा रतुका पहरापर रहऽ पड़ैत छलै। रतुका पहरा छातपर होइत छल। मुगलपुरा किएक तँ नग्रक सभसँ उपरका हिस्सामे छल, से छातपरसँ सम्पूर्ण नग्र देखाइ पड़ैत छल। मोहल्लाक छौड़ा सभक संग सैफ पहरापर जाइत छल। ई हमरा लेल, अब्बा लेल आ साफिया लेल बड्ड नीक गप छल। जँ हमरा घरमे सैफ नै रहितए तँ शाइत हमरे रातिमे धक्का खाए पड़ितए। सैफक पहरापर जेबाक कारणसँ ओकरा किछु सुविधा सेहो देल गेल रहै, जेना आठ बजे धरि ओकरा सूतऽ देल जाइत रहै। ओकरासँ बाढ़नि नै दिआएल जाइत रहै। ई काज सफियाक जिम्मा भऽ गेल छल जे सफियकेँ एक्को रत्ती पसिन्न नै रहै। कखनो-कखनो रातिमे हम सेहो छातपर चलि जाइत रही, ओतऽ लाठी, लकड़ी आ पजेबाक ढेरी एम्हर ओम्हर लागल रहै छलै। दू चारिटा छौड़ा लग देशी पेस्तौल आ बेसी लग चक्कू रहै। ओइमे सँ सभ छोट-मोट काज करैबला कारीगर छल। बेशी गोटे तालाक कारखानामे काज करै छल। किछु दर्जीक आ किछु काठ-लकड़ीक काज करै छला। एम्हर बजार बन्न छल से हुनकर सभक काज सेहो बन्न छल। ऐमे बेशी गोटेक घरमे कर्जासँ चूल्हि जरि रहल छलनि। मुदा ओ सभ प्रसन्न रहथि। छातपर बैसि कऽ ओ सभ दंगाक नव खबरिपर टीका-टिप्पणी करै जाइ छला आ नै तँ हिन्दू सभकेँ गारि पढ़ै जाइ छला। हिन्दूसँ बेशी गारि ओ सभ पी.ए.सी.केँ दैत छला। पाकिस्तान रेडियोक सभटा कार्यक्रम हुनका सभकेँ जबानी मोन छलन्हि आ कम अबाजमे ओ सभ रेडियो लाहौर सुनल करथि। ऐ छौड़ा सभमे दू-चारि गोटे जे पाकिस्तान गेल रहथि, हुनकर सभक इज्जति हाजी सन छल। ओ सभ पाकिस्तानक रेलगाड़ी “तेजगाम” आ “गुलशने इकबाल कॉलोनी”क एहेन खिस्सा सुनबैत रहथि जे लगै छल जे स्वर्ग जँ कतौ अछि तँ ओ पाकिस्तानमे अछि। पाकिस्तानक बड़ाइसँ जखन हुनकर सभक मोन भरि जाइ छलन्हि तखन ओ सैफ संगे हँसी करै जाइ छला। सैफ पाकिस्तान, पाकिस्तान आ पाकिस्तानक वर्णन सुनलाक बाद एक दिन पुछि देने रहए जे ई पाकिस्तान अछि कतऽ? ऐपर सभ गोटे ओकरा संग बड हँसी केने रहथि। ओ किछु बुझने रहए मुदा ओकरा ठीकसँ ई पता नै चललै जे पाकिस्तान अछि कतऽ? ई पहरुआ छौड़ा सभ सैफकेँ मजाकमे डरबैत रहथि, “देख सैफ, जँ हिन्दू तोरा देख लेतौ तँ बुझै छहीं की करतौ? पहिने तोरा नाङट कऽ देतौ।” छौड़ा सभकेँ बुझल रहै जे सैफ अर्द्ध बताह हेबाक बादो नंगटे भेनाइकेँ बड खराप आ अधला गप बुझै छल, “तकर बाद हिन्दू सभ तोरा तेलसँ मालिश्त करतौ।” “किए, तेल-मालिश्त किए करत?” “किएकि जखन ओ सभ तोरा बेंतसँ मारौ तँ तोहर खाल निकलि जाउ। तकर बाद धीपल छड़सँ तोरा दागै जेतौ।…” “नै”, ओकरा बिसवास नै भेलै। रातिमे ओकरा डरौन आ मारि-काटि बला जे खिस्सा सुनाओल जाइ छल, ओइसँ ओ खूब डरा गेल छल। कखनो काल ओ हमरासँ भसियाएल गप करऽ लागै छल। हमरा रञ्ज होइ छल आ ओकरा चुप करा दै छलौं, मुदा ओकरा मोनक प्रश्नक उत्तर नै भेटि पाबै छलै। एक दिन ओ पूछऽ लागल- “भैया, पाकिस्तानमे सेहो माटि होइ छै की?” “किए? ओतऽ माटि किए नै हेतै?” “ओतऽ खाली सड़के सड़क नै छै? ओतऽ टेरीलीन भेटै छै.. ओतऽ सस्त छै.. आ” “देखू ई सभटा मोनक गढ़ल गप अछि… तूँ अल्ताफ आ ओकर संगी सभक गपपर काने नै दए।” हम ओकरा बुझेलिऐ। “भैया, की हिन्दू आँखि बहार कऽ लै छथि..” “फूसि.. ई तोरा के कहलकौ?” “बच्छन।” “फूसि।” “तखन चरसा सेहो नै खिचैत छथि?” “ऊँह.. ई की सभ पूछि रहल छेँ..” ओ चुप भऽ गेल, मुदा ओकरा आँखिमे सैकड़ाक संख्यामे प्रश्न छलै। हम बाहर चलि गेलौं। ओ सफियासँ यएह सभ गप करऽ लागल। कर्फ्यू बढ़िते गेल। रतुका पहरेदारी सेहो चलैत रहल। हमर घरसँ सैफे जाइत रहल। किछु दिन बाद एक दिन अनचोक्के सुतलमे सैफ चिकड़ऽ लागल। हम सभ घबड़ा गेलौं मुदा ई बुझबामे भाङठ नै रहल जे ई सभ ओकरा डराएल जएबाक कारणसँ अछि। अब्बाकेँ छौड़ा सभपर बड्ड पित्त लहरल छलन्हि आ ओ मोहल्लाक एकाध मुँहपुरुख लोकनिकेँ ई गप कहनहियो रहथिन्ह, मुदा तकर कोनोटा असरि नै भेल। छौड़ा सभ आ सेहो मोहल्लाक छौड़ा सभ किए ऐ मनोरंजनकेँ छोड़ितथि? बात कतऽसँ कतऽ धरि पहुँचि गेल अछि एकर कनियो अंदेशा हमरा ओइ दिन धरि नै भेल जहिया सैफ हमरासँ खूब गम्भीर भऽ पुछलक, “भैया, हम हिन्दू बनि जाउ?” प्रश्न सुनि हम गुम्म पड़ि गेलौं, मुदा तुरत्ते हमरा बुझऽ मे आबि गेल जे ई रातिमे डरौन खिस्सा सुनाओल जएबाक परिणाम अछि। हमरा तामस उठि गेल, फेर सोचलौं जे बताहपर तामस केलासँ नीक जे तामस पीबि जाइ आ ओकरा बुझेबाक प्रयत्न करी। हम पुछलिऐ, “किए? अहाँ हिन्दू किए बनऽ चाहै छी? बचबा लेल? एकर माने भेल जे हम नै बचि पाएब?” “तँ अहूँ बनि जाउ..”, ओ बाजल। “आ तोहर कक्का, हमर अब्बा”, हम अपन अब्बा आ ओकर कक्काक गप पुछलिऐ। “नै.. हुनक सभकेँ…”, ओ किछु सोचऽ लागल। अब्बाजानक उज्जर आ नमगर दाढ़ीमे कतौ ओ ओझरा गेल छल। “देखलौं, ई सभ छौड़ा सभक किरदानी छी जे अहाँकेँ भटकाबैए। ई जे ओ सभ अहाँकेँ कहै छथि, से सभटा झूठ अछि। रौ, महेशकेँ नै चिन्है छेँ?” “ओ जे स्कूटरपर अबै छथि…” ओ प्रसन्न भऽ गेल। “हँ हँ, वएह।” “ओ हिन्दू छथि?” “हँ हिन्दू छथि”, हम कहलिऐ। पहिने तँ ओकर मुँहपर निराशाक छाह एलै फेर ओ गुम्म भऽ गेल। “ई सभ उचक्का सभक काज छी.. नहिये हिन्दू लड़ैत अछि आ नहिये मुसलमान… उचक्का सभ लड़ैत अछि, बुझलौं?” दंगा शैतानक अँतड़ी सन नमड़ैत गेल आ मोहल्लामे लोक सभ परेशान हेबऽ लगला- भजार नग्रमे दंगा करैबला हिन्दू आ मुसलमान उचक्का सभकेँ जँ मिलाइयो देल जाए तँ कतेक हएत.. बेशीसँ बेशी एक हजार, चलू दू हजार मानि लिअ। तँ भाइ दू हजार गोटे लाख लोकक जिनगी नर्क बनेने अछि आ हम सभ घरमे सुटकि कऽ बैसल छी। ई तँ वएह भेल जे दस हजार अंग्रेज कोटि हिन्दुस्तानीपर राज करैत छला आ सम्पूर्ण सरकार ओकर अन्तर्गत चलैत छल, आ फेर ऐ दंगासँ फएदा ककर अछि, फएदा? औ जी, हाजी अब्दुल करीमकेँ फएदा अछि जे चुंगीक चुनाव लड़त आ ओकरा मुसलमान वोट भेटतै। पंडित जोगेश्वरकेँ हेतै जकरा हिन्दूक वोट भेटतै। आब तखन हम की छी? तूँ वोटर छेँ, हिंदू वोटर, मुसलमान वोटर, हरिजन वोटर, कायस्थ वोटर, सुन्नी वोटर, शिया वोटर, यएह सभ होइत रहत ऐ देशमे? हँ, किए नै? जतऽ लोक मूर्ख अछि, जतऽ भाड़ापर हत्या केनिहार भेटै छै, जतऽ राजनीतिज्ञ अपन गद्दी लेल दंगा करबै छथि ओतऽ आर की भऽ सकैए? भजार, की हम लोक सभकेँ पढ़ा नै सकै छी? बुझा नै सकै छी? हह- हह- तूँ के होइ छह पढ़बैबला, सरकार पढ़ेतै। जँ चाहत तँ सरकार आ जँ नै चाहत सरकार तँ ऐ देशमे किछु नै भऽ सकैए? हँ.. अंग्रेज हमरा सभकेँ यएह सिखेने अछि.. हम एकर अभ्यासी छी.. चलू छोड़ू, तखन दंगा होइत रहत? हँ होइत रहत। मानि लिअ जे ऐ देशक सभटा मुसलमान हिन्दू भऽ जाथि? लाहौलविलाकुव्वत ई की कहि रहल छी? बेस तँ मानि लिअ जे ऐ देशक सभटा हिन्दू मुसलमान बनि जाथि? सुभान अल्लाह केहेन चोटगर गप कहलौं.. तखन की दंगा रुकि जाएत? ई तँ सोचबा जोग गप अछि। पाकिस्तानमे शिया सुन्नी एक दोसराक जानक पाछाँ छथि.. बिहारमे ब्राह्मण दलितक छाहसँ बचैत छथि.. तँ की भजार लोक आकि मनुक्ख कहू सार अछिये एहेन, जे लड़िते रहऽ चाहैए? ओना देखू तँ जुम्मन आ मैकूमे बड़ दोस्तियारी छै। तँ किए ने मैकू आ जुम्मन बनि जाइ… एह, केहेन बात कहि देलौं, माने… माने… माने… हम भोरे-भोर रेडियोक कान अमेठि रहल छलौं, सफिया बहारि रहल छलि आकि राजाक छोट भाइ अकरम भागैत भागैत आएल आ फूलल साँसकेँ रोकबाक असफल प्रयत्न करैत बाजल, “सैफकेँ पी.ए.सी. बला सभ मारि रहल अछि।” “की? की कहि रहल छी?” “सैफकेँ पी.ए.सी. बला मारि रहल अछि”, ओ कने रुकि कऽ बाजल। “किए मारि रहल अछि? की बात अछि?” “की जानी.. चौबटियापर..” “ओतऽ जतऽ पी.ए.सी.क चौकी अछि?” “हँ, ओतै।” “मुदा किए…”, हमरा बुझल छल जे आठ बजे सँ दस बजे धरि कर्फ्यू खुजऽ लागल अछि आ सैफकेँ आठ बजेक करीब अम्मा दूध अनबा लेल पठेने छलि। सैफ सन बताहोकेँ बुझल रहै जे जल्दी-जल्दी आपस एबाक अछि, आब तँ दस बाजि गेल अछि। “चलू हम चलै छी।”, रेडियोसँ बहराइत अनटोटल अबाजक चिन्ता केने बिनु हम तेजीसँ बहरेलौं। बताहकेँ किए मारि रहल अछि पी.ए.सी.बला सभ, ओ कोन एहेन कर्म केलक अछि? ओ कइये की सकैत अछि? ओ अपने एहेन भयभीत रहैत अछि जे ओकरा मारबाक आवश्यकते की.. फेर की कारण भऽ सकैए? पाइ, औजी ओकरा तँ अम्मा दू टका देने अछि। दू टका लेल पी.ए.सी. बला सभ ओकारा मारत? चौबटियापर मुख्य सड़कक बराबर कोठापर मोहल्लाक किछु गोटे जमा रहथि। सोझाँमे सैफ पी.ए.सी.बलाक संग ठाढ़ छल। ओकर सोझाँमे पी.ए.सी.क जवान सभ छल। सैफ जोर-जोरसँ चिकड़ि रहल छल, “हमरा तूँ सभ किए मारलेँ.. हम हिन्दू छी.. हिन्दू छी…” हम आगाँ गेलौं। हमरा देखलाक बादो सैफ बजिते रहल, “हँ, हँ, हम हिन्दू छी..”, ओ थरथरा रहल छल। ओकर ठोढ़क कोनसँ शोनितक एक बुन्न निकलि कऽ टघरि कऽ ठोढ़ीपर ठाढ़ छल। “तूँ हमरा मारलेँ कोना.. हम हिन्दू..”। “सैफ… ई की भऽ रहल छी… घर चलू।” “हम.. हम हिन्दू छी।” हमरा बड्ड आश्चर्य भेल.. की ई वएह सैफ छी, जे ई छल.. एकर तँ रूपे बदलि गेल अछि। ई एकरा भऽ की गेल अछि? “सैफ, होशमे आउ”, हम ओकरापर जोरसँ तमसेलिऐ। मोहल्लाक लोक सभ नै जानि केकरापर भितरे-भीतर दूरसँ हँसि रहल रहथि। हमरा पित्त चढ़ल। सार, ई सभ ई तँ नै बुझै छथि जे ओ बताह अछि। “ई अहाँक के अछि?”, एकटा पी.ए.सी. बला हमरासँ पुछलक। “हमर भाए छी.. कनेक मानसिक परेशानी छै एकरा।” “तँ एकरा घर लऽ जाउ”, एकटा सिपाही बाजल। “हमरा सभकेँ बताह बना देलक”, दोसर बाजल। “चलू… सैफ घर चलू। कर्फ्यू लागल अछि, कर्फ्यू..”। “नै जाएब… हम हिन्दू छी.. हिन्दू.. हमरा… हमरा…”, ओ हबोढकार भऽ कानऽ लागल। “मारलक… हमरा मारलक.. हमरा मारलक.. हम हिन्दू छी.. हम”, सैफ चितंग निच्चाँ खसल.. शाइत बेहोश भऽ गेल छल.. आब ओकरा उठा कऽ लऽ गेनाइ आसान छल। अतुलेश्वर बसात आइ झंझारपुर बजार मे बहुत दिनक बाद माधव झा भेटल छलाह। भेँट होइतहि ओ शुरु भऽ गेलाह अपन आन्तरिक गप्प बँटबामे। जेना-तेना छुटकारा भेटल आ हम अपनामे लगलौं। मुदा हुनक कहल बहुतो रास बात अखनो घुरिया रहल अछि। बेर-बेर मोन पड़ि जाइछ माधव झाक व्यथा। माधव झाक बेटा विवेक मध्यम कोटिक छात्र छल, मुदा रहए मेहनतिआ आ तैँ ओकर आकांक्षा रहै जे इंजीनियर बनी। माधव झा सेहो मध्यम आयक लोक, मुदा सन्तानक आकांक्षाकेँ पूरा करबाक लेल अपना भरि प्रयास करैत रहनिहार। समाज मध्य बसात तेहन बहि रहल छै जे जत-तत अर्थक काज। तैओ ओ अपना लेखेँ ऐ प्रयासमे हरदम लागल रहै छलाह जे जेना-तेना बेटाक आकांक्षा पूरा होइक। मोन पड़ैत अछि जखन इंजीनियरिंग पढ़ाइक जाँच-परीक्षा परिणाम आएल रहै आ हमहीं हुनक पुत्रक रिजल्ट देखने रहिअनि, ओ परिणाम सूनि निराश भए गेल रहथि, कारण विवेकक पोजीशन बड्ड निम्न स्तरक छलै। परिणामक हिसाबे ओकर एडमिशन कोनो नीक इंजीनियरिंग कॉलेजमे नै सम्भव रहै आ मनोनुकूल प्रभाग भेटबाक सम्भावना बहुत कम रहै। हम कहने रहयनि जे औ जी, आइ-काल्हि सभ गोटा अपन सन्तानकेँ इंजीनियरे बनएबामे व्यस्त छथि, हमरा जनैत किछु दिनमे ओकर हाल ठीक नै रहतै। तैँ अपन पुत्रकेँ प्रतियोगिता परीक्षाक हेतु तैआर करु आ सम्प्रति कॉमर्स रखबाक हेतु कहियौ। हमर गप्प सुनि माधवजी तँ सहमत भेलाह मुदा पुत्रक आकांक्षा ओ नै तोड़ए चाहैत छलाह। ऐ बीच पुत्र सेहो दिल्लीसँ परीक्षा दऽ घुमि आएल रहनि, कारण जे आब तँ एडमिशनक बेर भऽ गेल छलै। ई कथा ओ माधव झाकेँ सेहो कहलक, संगहि इहो जे काल्हि हम मुजफ्फरपुर जाएब, जतए ओकरा कॉनसिलींगमे बजौने छै। प्रातः ओ मुजफ्फरपुर गेल आ एम्हर चिन्तित माधवजीकेँ हम कहने रहियनि जे जखन छात्र स्वयं एतेक उत्सुक अछि तँ ओइ उत्सुकताकेँ रोकब उचित नै। किछु दिनक अभ्यन्तर पुनः ओ झंझारपुर बजारमे भेटलाह। हमर जिज्ञासापर ओ चिन्तित चित्तेँ चाहक दोकान दिस घीचैत कहलन्हि- गप्प कने माहूर भऽ गेल अछि आ ई गप्प ठाढ़े-ठाढ़ नै कहि सकैत छी। दूगोट चाहक आग्रह करैत हम पुछलियनि जे कि बात छै, अपने की कहैत छलौं? ओ अत्यन्त गम्भीर भऽ कहए लगलाह- की कहू! किछु नै फुरा रहल अछि, एक दिस सन्तानक मोह आ दोसर दिस हमर आर्थिक स्थिति। पता नै जे कोना दुनूक बीच सामंजस्य हएत। गप्पकेँ फरिछबैत कहलनि जे- काल्हि मुजफ्फरपुरसँ अएलापर ओ खुशीपूर्वक कहलक जे कागज-पत्तरक कार्य भए गेल, हमर नामांकन उड़ीसाक एकटा इंजनियरिंग कॉलेजमे होएबाक अछि। हम सभ क्षण भरिक लेल सुन्दर सपना देखनहि छलौं कि ओकर अग्रिम पंक्ति झकझोड़िकेँ राखि देलक। ओकर कहब छलै जे ऐ लेल कमसँ कम पाँच लाख टाका चाही। पाँच लाख टाकाक गप्प सुनितहि लागल जेना हमर शरीरसँ सभटा खून सोखि लेल गेल हुअए, मोनमे तत्कालहि आएल जे ने राधाकेँ नओ मन घी होएतनि आ ने राधा नचतीह। आँखिक आगाँ अन्हार भए गेल छल, आगाँ कोनो इजोत देखबामे नै आबि रहल छल। किंकर्त्तव्यविमूढ़क स्थिति छल। मुदा बेटाक ई शब्द सुनि जे आब बैंक सभ पढ़बाक हेतु कर्ज दै छै, किछु आशा जागल। हम व्यग्र भए पूछि बैसलिऐ जे ऐ हेतु हमरा सभकेँ की करए पड़त? ओ सहज रूपेँ कहलक जे ऐ हेतु जमीनक कागज बैंकमे जमानति रूपमे जमा करए पड़त। ई गप्प सुनि बाबूजी बजलाह, कोना हएत, कारण जखन हमरा तीनू भायमे बँटवारा नै भेल अछि तखन जमीनक कागज बैंकमे कोना जमा कएल जाए सकैछ। हमर मुँहसँ अनायास निकलि गेल जे ई तँ असम्भव अछि। आ विवेक ई गप्प सुनतहि भनभनाइत ओतएसँ उठि चल गेल आ अपन माएसँ कहि बैसल- ‘लगैत अछि हमर कैरियर हिनके सभ जेकाँ अही खोनहीमे सड़ि जाएत’ आ ई कहैत घरमे जा कऽ सूति रहल। हमर स्थिति विकट छल, ने ओइ पार ने ऐ पार, बीच समुद्रमे डुबैत एकटा निरीह प्राणी, जकर जीवनक कोनो आस नै। एतबा कहैत ओ किछु कालक हेतु रुकलाह, हम हुनका विभिन्न तरहेँ आशान्वित करैत अपन-अपन बाट धएल। माधवजीकेँ किछु अति आवश्यक कार्यवश गाम जाए पड़लनि, जतए भेँट भए गेलखिन एकटा मित्र। मित्रक ममियौतकेँ सेहो इंजीनियरिंग पढ़बाक लेल चुनाओ भेल छलनि आ ओहो हुनके सन समस्यामे पड़ि समाधान ताकल आ नामांकन कराओल। हुनकहि द्वारा ताकल समाधानक बाटे माधवजी सेहो पार उतरलाह आ बेटाक नामांकन कतेओ ढ़क-पेँचक बाद भोपाल मे भऽ गेलै। पछाति अपन पेट काटि बेटाकेँ पढ़बैत रहलाह। कतेको दिनक बाद एकबेर फेर हुनकासँ झंझारपुरहिमे भेँट भेल, ओ खूब प्रसन्नचित्त बुझएलाह। हमर भोज-भातक आग्रहपर अत्यन्त आह्लादित होइत तत्काल तैआर भए गेलाह, मुदा चाह-पान खाइत अपन-अपन घर दिस बिदा भए गेलौं। हुनकासँ हेँठ होइतहि नाचि उठल अपन छात्र-जीवन। सोचए लगलहुँ जे यदि हमरो सभक समय एतेक सहज रहितै तँ आइ एम.ए. क केँ सूप महक भट्टा बनल नै रहितौं। मुदा ओएह गप्प, आब सोचिए कऽ की! परञ्च, भूत तँ पाछाँ छोड़निहार नै, तेँ पुन: स्मरण भए आएल अपन रोटी जोगाड़, आइ ऐ ठाम तँ काल्हि ओइ ठाम, कोनहुना जीवनक गाड़ी घीचि रहल छलौं। ईएह दौगा–दौगीमे पहुँचि गेल रही कर्नाटक। गामक सभ खुशी- अहा बेचारा बड्ड दिनसँ बौआ रहल छल, ऐ बेर ओकर जोगड़क काज भेटलै। मुदा जे भेटल, केहन भेटल ओ तँ हमहिंटा जनैत छलौं, मुदा किछु संतोषजनक तँ अवश्य छल। एतेक दूर अएलाक पश्चात गामसँ सम्पर्क कमि गेल आ अपनाकेँ नव परिवेशमे घुला लेलौं। आइ कतेको सालसँ कर्नाटकमे रचल-बसल छी, मुदा गाम तँ गाम होइ छै। किछु दिनक अवकाशपर गाम पहुँचल छलौं। गाम जाए झंझारपुर बजार नै जाएब ई सम्भव नै। संयोग एहन जे झंझारपुर जाइतहि भेटि गेलाह माधवजी। कुशल क्षेम पुछैत, कतऽ छी, बहुत दिनक बाद भेटलौं, आदि प्रश्नक झड़ी लगा देलनि। हम कहलियन्हि जे एतेक प्रश्नक उत्तर ठाढ़े-ठाढ़ नै दऽ सकैत छी। तइपर ठहक्का मारैत बाजि उठलाह- अहाँ तँ हमर मुँहक गप्प छीनि लेलौं आ ई कहैत हम दुनू गोटे चाहक दोकानमे पैसि गेलौं। चाहक चुसकीक सङ अपन कथा हुनका सुनबैत गाम सँ एतेक दूर, तइपर सँ निश्चितता नै, ई गप्प–सप्प कहैत छियैन्ह। मुदा ओ आशाक पोटरी खोलैत कहलनि- भगवती सभ आशा पूर्ण करतीह। गप्प बढ़बैत हम विवेकक इंजीनियरिंग पढ़ाइक जिज्ञासु भेलौं, सङहि छुट्टीमे गाम अएबाक विषयमे पूछि बैसलिएनि। हमर गप्प सुनि ओ एकबेर हमर मुँह दिस ताकि आकाश दिस ताकए लगलाह। जेठक मास, तैँ भगवान भास्कर अपन रौद्र रूपमे धरतीबासीकेँ अपन प्रतापेँ जरा रहल छलाह, तैओ ओ हुनके दिस ताकि उठलाह। एकटा पैघ निसाँस लैत कहलनि- ‘हँ गाम आएल अछि, लगभग आठ दस दिन भेल हेतै।’ एकटा पैघ श्वास छोड़ैत कहि उठैत छथि- “मोनमे बहुत दिनसँ एकटा गप्प घुरिया रहल छल आ मोन होइत छल जे ककरो कहिऐ, मुदा केओ ओहन विश्वस्त भेटिए नै रहल छल, आइ संयोगसँ अहाँ भेँट भऽ गेलौं, होइत अछि जे ई गप्प अहाँकेँ कहि मोनकेँ हल्लुक करी।” हमर प्रतिक्रियाक प्रतीक्षा बिनु कएनहि ओ शुरु भए गेलाह– “जीवनक ऐ यात्राक धारमे कतेक ठोकर लागत से नै कहि। मोने मोन प्रसन्न छलौं जे हम अपन लक्ष्य पाबि गेलौं, जीवनमे नव किरिणक आशा देखए लगलौं, मुदा एकाएक सम्पूर्ण भविष्य मेघाच्छादित भए गेल।’’ ई कहैत दहो-बहो नोरमे डूबि गेलाह। बादमे बहुतो बुझौलापर ज्ञात भेल जे एक दिन सभ गोटा सङहि भोजन कए रहल छलाह। माधवजीक बाबूजी विवेकसँ पुछलखिन्ह जे ओतए कोना कि हौ। ऐपर ओ एकटा संक्षिप्त उत्तर देलक, सभटा ठीके ठाक। आ बाबूजी वाह! वाह! कहए लगलाह। गप्प बढ़ैत गेल आ ऐ क्रममे विवेक एकटा एहन गप्प कहलकनि जे सभक मोन तीत अकत्त कए देलकनि। ओ कहलकनि जे ओतए सभ किछु तँ ठीक ठाक छै मुदा हमरा ई कहैत लाज होइत अछि जे हमर पापा कोनो कार्य नै करैत छथि आ नै तँ कोनो पैघ व्यापारी छथि। ओकर कहब छलै जे एतेक धरि हम पहुँचलौं अछि ओ तँ अपन विश्वाससँ, नै तँ हमरहुँ पापा जेकाँ पाँच लाख टाकाक लेल पढ़बा आ नौकरी करबासँ पहिने अपन सन्तानकेँ कर्जदार बनबए पड़ितए। आगाँ ओ दादाजीसँ कहि बैसल- अहाँ तँ बहुत पैघ पंडित छी तखन ई कखनो अहसास नै भेल जे अहाँसँ कम पढ़ल-लिखल पंडित जागे झा अपन दुनू बेटाकेँ कतऽसँ कतऽ पहुँचा देलन्हि, हमरा तँ अहाँक ऐ बुद्धिपर हँसी लगैत अछि जे अहाँक बेटा सभ हाथ-पएरक अछैतो लुल्ह-नांगर बनि बैसल रहि गेलाह, जइसँ सम्पूर्ण परिवार काहि काटि रहल अछि। माधवजी ओ हुनक बाबूजीकेँ किछु फुरिऐ नै रहल छलनि, मुदा विवेक लेल धनि सन, ओ बुदबुदाइत रहल- कोन घरमे जन्म भऽ गेल, से नै जानि। माधवजीकेँ शान्त करबामे ठीके बहुतो समय लागल, यद्यपि छगुन्तामे अपनो पड़ल छलौं। पान हुनक हाथमे दैत मात्र एतबहि कहि सकलिएनि- माधवजी, ई नवका बसात छिऐ, आ ऐ बसातमे अपने जे संवेदना तकबै ओ असम्भव। बुझियौ जे हमरा लोकनि एकटा चिड़ै छी जे अपन बच्चा सभक लेल अपन सभ आकांक्षाकेँ आगिमे झोकि ओकर सभक आकांक्षा पूरा करैत रहै छी ऐ आशामे जे एकटा नव बिहान अओतै। ठीक तइ बेरमे हमर गाम जाएवाली गाड़ी खुजबाक लेल पुक्की मारि रहल छल आ हम हुनकासँ विदा लैत चलि पड़ैत छी आ रास्ता भरि अपस्याँत माधवजी हमर आगूमे नचैत रहैत छथि आ हम सोचए लगैत छी ई नवका बसात......! योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ देववाणी हम ई नवका पंडितजीक कने परीक्षा लऽ रहल छी। पंडित जी जे पुरना छलाह से तँ कहिया ने स्वर्गवासी भेलाह।ओ परोपट्टामे नामी लोक छलाह, पंडित संस्कार नाथ मिश्र। पंडितजी व्याकरणाचार्य, साहित्याचार्य, आयुर्वेदाचार्य आर नै जानि कोन कोन विषयक आचार्य छलाह। हमरा गाम अर्थात् माहीपुरमे महामाया संस्कृत विद्यालय हुनके प्रयासेँ स्थापित भेल छल जइमे सुनैत छिऐ महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह स्वयं उद्घाटन करबा लेल आएल छलखिन्ह आ विद्यालय प्रांगणमे एकटा आम आ एकटा पीपरक गाछ रोपने छलखिन्ह। आमक गाछ तँ सन् सत्तावनक बाढ़िमे सुखा गेलै मुदा पीपर तँ एखनो छैके जे अहूँ सभ देखिते छिऐ। नवका पंडित जी भेलाह हुनकर प्रपौत्र। पंडित संस्कार नाथ मिश्र जी केँ चारिम बियाहमे एकटा बालक भेलखिन्ह। तइसँ पहिने तीन बियाहमे चारि चारि टा कन्या रत्न प्राप्त भेलन्हि जेना लक्ष्मी सरस्वती सीता गौरी सभ अपन अपन सखी बहिनपाक संग अवतरित भेल होथि। पंडित जी जिद्दी लोक। चारिम बियाहसँ पूर्व जखन किछु आत्मीय सभ हुनका बुझबए गेलखिन्ह जे “देखू आब वयसो भऽ गेल। ऐ बारह टा बेटीक पालन पोषण आ कन्यादान आदिमे अपनेक जे दशा भऽ रहल अछि से तँ अपनहि जनैत छिऐ। तेँ हमरा सबहक कहब जे फेर बियाह करबाक ई विचार छोड़ि दियौ। मानि लिअ जे बेटा भाग्यमे नै अछि।” तँ पंडित जी खिसिया कए बाजल छलखिन्ह “देखू, ई भक्त आ भगवानक लड़ाइ छिऐ। यदि भगवान केँ जिद्द लागल छन्हि जे बेटा नहिए दऽ कए परीक्षा लिऐ तँ भक्तक सेहो प्रतिज्ञा छन्हि जे बेटा लइए कए रहताह। हमरा ई लड़ाइ लड़ए दिअ आ अहाँ सभ कातसँ तमासा देखैत रहू।” अस्तु जेना कि पौराणिक कालसँ होइत रहलैक अछि, सुच्चा भक्तक सोझाँ भगवाने हारि मानैत रहलखिन्ह अछि, सएह भेलै अहू बेर आ चारिम बियाहक बाद करीब पचपन वर्षक उमेरमे पंडितजीक तपस्या सफल भेलन्हि आ आइ-माइ सभ गौलन्हि सोहर “ललना रे घर घर बाजे बधाइ कि कृष्णजी जन्म लेल रे…” । नवजातक नाम पंडित संस्कारनाथ मिश्र अपनहि चुनलन्हि। परोपट्टाक लोक तँ हुनकासँ नामकरण करबैत छल, ओ कतए जइतथि। से नाम राखल गेल भूजानाथ। आब जे सूनए सएह हँसए। सभ बूझए लागल जे सत्तेमे पंडितजी सठिया गेलाहए। कियो कियो ईहो अर्थ लगाबए जे पंडितजी केँ भूजा बड़ पसिन्न छन्हि। किछु ईहो बाजए जे ऐसँ नीक तँ ‘अनाथ’ नाम होइतै, किछु अर्थ तँ रहितै। जखन चारू कात खिधांस होअए लगलन्हि तँ नवकी पंडिताइने एक दिन टोकलखिन्ह जे बारह टा बेटीक बाद तँ एकटा बेटा भेल तकर की नाम राखि देलिऐ जे सौँसे गाम हँसैत अछि। पंडितजी कने दुअनियाँ मुसकी दैत नवकी केँ बुझेलखिन्ह “लोक की बुझतै? ओकरा सभकेँ ज्ञाने कते छै? देखू ई नाम अपूर्व छै। एकरा एनाकए बुझियौ: भू ट्ट जा ट्ट नाथ। भू माने पृथ्वी, जा माने तइसँ उत्पन्न अर्थात् भूजा भेलीह सीता आ भूजानाथ भेलाह साक्षात् भगवान राम। अहीं सोचियौ यदि सोझे राम नाम राखि दितिऐ बच्चाक तँ संस्कार नाथ मिश्रक ज्ञानक कोन काज? फेर ओहेन नाम तँ हरेक टोल परोसमे भेटत आ थोड़बे दिनमे राम भऽ जइतथि रमुआ। रमुआ ककरो हरबाह, रमुआ कोनो बोनिहार, रमुआ ककरो चाकर आ रमुआ कोनो पंडितक बच्चा। फेर अन्तर की भेलै?” आब जे ई व्याख्या सूनए सएह कहए वाह वाह, पंडित संस्कारनाथ मिश्र सन व्याकरणाचार्य केँ छोड़ि कऽ एतेक सुन्दर नाम के सोचि सकैत छल? नामकरणमे हुनकर ख्याति आर बेशी बढ़ि गेलन्हि। मुदा सभ किछु होइतो ऐ परिवारमे आगू दू पुस्त तक व्याकरण आ साहित्य केँ के कहए संस्कृत पढ़बो बन्द भऽ गेल। भेलैक एना जे संस्कारनाथ मिश्र भगवानसँ एकटा बाजी तँ जीत गेलाह परन्तु पूरा खेल तँ हुनका बूझल छलन्हि नै। भूजानाथ केँ तीन टा बड़का माए आ बारह टा बहीन। सभ मिला कए ऐ सोलह स्त्रीगणक ओ अति दुलारू बच्चा। लिखब पढ़बसँ ओ तहिना पड़ाथि जेना नवका बियाह भेलापर पंडितजी पुरना कनियाँ सभसँ पड़ाथि। ऐ शोकसँ बुझू आकि उमेरक गुण दोष, पंडितजी अस्वस्थ रहए लगलाह। पाँचम वर्षमे भूजानाथक उपनएन भेलन्हि आ तकर किछुए दिनक बाद पंडितजी भगवानसँ भेँट करए स्वर्ग चल गेलाह। भूजानाथ भठ्ठा नहिए धेलन्हि। भूजानाथ बढ़ैत गेलाह आ ओतबे बेशी अबंड होइत गेलाह। हुनका पहुनाइ करऽमे आ तिलकोर तोड़ैमे बेश आनन्द अबन्हि। जमीन जाल तँ पिताजी बारह टा कन्यादानमे प्रायः शेषे कऽ देने छलखिन्ह तेँ घर गृहस्थीक चिन्ते कोन। बारह टा बहिनक सासुर आ चारि टा मात्रिकमे बूलि बूलि ओ पहुनाइ करथि। भरदुतियामे ओ बेशी परेशान भऽ जाथि। एक दिनमे बारह गाम कोना जेताह? कोन बहिनसँ नोत लेथिन्ह आ किनकर उपराग सुनताह? मुदा एकरो संयोगे कही जे पंडितजी अपन बारहो बेटीक बियाह जइ गाम सभमे केलन्हि से सभटा गाम रेलबे लाइनक दुनू कात सकरीसँ निरमलीक बीच आकि सकरीसँ जयनगरक बीच एक कोससँ कमे दूरपर। फेर बहीने सभ अपनामे विचार कऽ कए हुनका रस्ता बता देलखिन्ह जे एक बरखमे ओ चारि ठाम जाथि। भरदुतियासँ एक दिन पहिने एक गोटे ओतए पहुँचि जाथि आ ओतए अगिला दिन एकदम सकाल नोत लऽ कए दोसर गाम पहुँचि जाथि। ओतए नोत लऽ कए फेर बरहबजिया गाड़ी पकड़ि बाकी दू बहिनक गाम जा कए नोत लेथि। एवम् प्रकारेँ दिन अछैते ओ सभ ठाम पार पुरि लेताह। ऐ प्रकारेँ हर चारिम बरखमे सभ बहिनकेँ भाइकेँ नोतबाक सऽख पूर होइत रहतन्हि। ऐमे भूजानाथ केँ एकटा नफा ई भेलन्हि जे भार दोरक झंझट खतम भऽ गेलन्हि। चारि चारि ठामक भार तँ एक संगे लऽ जइतथि नै। मुदा पैघ घाटा ई भेलन्हि जे भरि दिन एक गामसँ दोसर गाम दौड़ैत रहलासँ कत्तौ इच्छा भरि तिलकोर नै खा पबैत छलाह। अस्तु, उचित समयपर भूजानाथक बियाहो भेलन्हि। अबंड छलाह आकि संस्कृत नै पढ़लन्हि तै सँ की? मिथिलामे ने कोनो वर कुमार रहलैए आ ने कोनो कन्या कुमारि रहलैए। लूल्हि नाङर कनियाँ आ आन्हर बहीर आकि ढहलेल बकलेल वर, सबहक बियाह भेबे केलैए, घटक टा होशियार रहल चाही। तखन भूजानाथ तँ पंडित संस्कार नाथ मिश्रक पुत्र छलखिन्ह। घटक दरिद्र नारायण चौधरी ऐ काजमे सहायक भेलखिन्ह। कोसिकनहा कातक एकटा मसोमातक लूल्हि किन्तु सुन्दरी कन्या स्वर्गीय पंडित संस्कार नाथ मिश्रक पुतोहु बनिकए माहीपुर एलीह। ओ फेर घूरि कए नैहर तँ नै गेलीह, माइए मास दू मासपर खोज खबरि लेबा लेल आबि जाइत छलखिन्ह। समय पाबि भूजानाथकेँ पहिले प्रयासमे पुत्र भेलन्हि। हुनका पिता जकाँ तपस्या नै करए पड़लन्हि। मुदा ऐ समय एकटा दोसरे विचित्र घटना भेलै। सौरीसँ बहराइते एकटा अगलटेंट छौंड़ी बाजि उठल जे उएह मुसरी भेलै। ई मात्र ओइ बच्चाक लिंग निर्धारण सूचक शब्द छलै। मुदा से ओइ बच्चाक नामकरणे भऽ गेलै आ ओ मुसरीए भऽ कए रहि गेल। नाम किछु विचित्र तँ जरूर छलै मुदा मिथिलाक गौरवमय इतिहासमे कतेको मुसरी भऽ गेल छथि से तँ अहूँ सभ जनिते छिऐ। आ नामो सभ एकसँ एक विचित्र जेना कि खुद्दी, फुद्दी, तिनकौड़ी, पलटू, सलटू आदि। तेँ ऐ बातपर कोनो बेशी ध्यान नै देल गेलै। ओना स्वर्गमे पंडित संस्कारनाथ मिश्र अपन पौत्रक ऐ नामकरणपर की सोचने होएताह से हमरा सभ कहियो बूझि नै सकब। मुसरीक माए लूल्हि जरूर छलखिन्ह मुदा छलखिन्ह होशियार। हुनका अपना बच्चाकेँ पढ़ेबापर बेशी ध्यान छलन्हि। मुसरी स्कूल जाए लगलाह। संस्कृत विद्यालय नै, गामक सरकारी प्राथमिक विद्यालय। रजिस्टरमे नाम लिखाएल मुसरीनाथ मिश्र। आ तकर बाद हुनकर नाम लिखाएल गेल माहीपुरसँ करीब डेढ़ कोस दूर सरपतिया चऽरक पुबरिया सीमापर स्थित गाम कनकटोलीक माता यशोदा हाइ स्कूल जे हमरा सबहक नवका एम. एल. ए. यादव जी किछुए बर्ष पहिने स्थापित कएने छलाह। मुसरी गामहिसँ स्कूल जाइत अबैत छलाह। मुसरी पढ़बामे कोनो बेशी कुशाग्रबुद्धि नै छलाह। लागल लागल कहुना दसवीं पास केलन्हि। आगू पढ़बाक ने इच्छा रहन्हि आ ने साधन। रोजीक ताकमे गामेक किछु लोकक संग ओ पहिने कलकत्ता एलाह आ ओतएसँ एकटा ठीकेदारक संग कोरबा चल गेलाह जतए बड़का बड़का थरमल पावर स्टेशन बनि रहल छलै। एतए ओ ठीकेदारक मुन्सीक असिस्टेंट भऽ गेलाह आ नाम भऽ गेलन्हि श्री एम. एन. मिसरा जी। नाम छोट करैक ई अंगरेजिया तरीका सेहो कमालक छै। हमर एम. एन. मिसराक ठीकेदार मकान आदि बनबैत छलाह। मिसराजीक काज भेलन्हि मजदूर सभक पाछू रहब। मजदूर सभ ठीकसँ काज करए, सूति बैसि नै रहए आ किछु सामान चोरा नै लिअए, तकरे देखभाल करब भेल काज हुनक। मुन्सी अपने तँ टेन्टमे आराम करथि आ एम. एन. मिसराकेँ रौद बसात पानि बिहारिमे मजदूरक संगे रहए पड़न्हि। गाममे खबरि गेलै जे भूजानाथक बेटा केँ नीक नौकरी भेटि गेलन्हि। घटक दरिद्र नारायण चौधरी बूढ़ो भेलापर सक्रिय छलाहे। ओ आबि भूजानाथ केँ मनौलन्हि आ किछु साधारण टाकाक लोभ दऽ कए हुनक बेटाक बियाह ठीक करा देलखिन्ह। समयपर मुसरी अर्थात् एम. एन. मिसराक बियाह भेलन्हि आ फेर पितामहक तपस्याक फलेँ पुत्ररत्नक प्राप्ति सेहो। नाम राखल गेल दिलीप कुमार। नव परम्पराक अनुसार पारिवारिक नाम ‘मिश्र’ हटा देल गेल। ………………………….. आब आउ असली खिस्सापर जे पंडित संस्कारनाथ मिश्रक प्रपौत्र ऐ आधुनिक कम्प्यूटर युगमे पंडित कोना भऽ गेलाह। एम. एन. मिसरा जखन कोरबामे रौद बसात पानि बिहारिमे मजदूर सबहक ओगरबाही करैत रहथि तखन हुनका डेराक बगलमे हरलाखी लगहक कोनो गामक एकटा पाँड़ेजी रहैत छलखिन्ह, जे ओतए पंडिताइ करैत छलाह। पाँड़ेजी कम्मे पढ़ल लिखल किन्तु व्यावहारिक लोक।अपन पंडिताइमे संस्कृत कम हिन्दीएसँ बेशी काज चलबैत छलाह। हनुमान चालीसा पढ़ि कए ओ महादेवक पूजा सेहो कऽ दैत छलखिन्ह आ कतेक ठाम कन्यादान सेहो। मुदा तैयो खूब व्यस्त रहैत छलाह आ नीक टाका कमा लैत छलाह। एम. एन. मिसरा जी दसवीं पास आ ठीकेदारक मुन्सीक असिस्टेंट मात्र पाँच हजार कमाइत छलाह आ पाँड़ेजी सुखारो ऋतुमे पचीस तीस हजार उठा लैत छलाह। भादव, कातिक, माघ, बैसाख आदि मासमे तँ पचासो हजार पार कऽ लैत छलाह।टाका तँ जे से, मान सम्मान सेहो खूब बेशी। यजमान सभ अपन अपन वित्तक अनुसार रिक्सा वा गाड़ी पठा हुनका बजबैत छलखिन्ह। तेँ रौद बसातक झंझट हुनका कहियो नै पड़न्हि। पाँड़ेजीक कमाइ आ मान सम्मानसँ एम. एन. मिसरा जी बहुत प्रभावित भेलाह। एक दिन पाँड़ेजी हुनका लग अपन विचार व्यक्त केलखिन्ह “ देखियौ मिसरा जी, आइ कालि सबहक बेटा बेटी कम्प्यूटर इंजिनीयर भऽ रहलैए। सभ बंगलोरेमे नौकरी करए चाहैत अछि आकि अमेरिके जाए चाहैत अछि। मुदा पंडितक संख्या कतेक कम भऽ गेलैक अछि। एतेक टा कोरबामे हम सभ मात्र दस गोटे छी आ हरदम एक यजमानसँ दोसरक ओइ ठाम दौड़ैत रहैत छी। पंडित सभ कम्प्यूटर इंजिनीयरसँ कोन कम कमाइत छथि यदि अपने ठीक सँ जोड़ियौक। सुनै छी अहाँक पितामह नामी पंडित छलाह से अहूँक परिवारसँ ई परम्परा उठि गेल। हमरा तँ लगैत अछि अगिला पुश्तमे पंडित जातिए विलुप्त भऽ जाएत।” एम. एन. मिसरा जीक पुत्र दिलीप कुमार गामहिमे सरकारी प्राथमिक विद्यालयमे पढ़ैत छलखिन्ह आ अगिला साल हुनकर विचार छलन्हि माता यशोदा हाइ स्कूलमे भर्ती करेबाक। ऐ समय पाँड़ेजीसँ प्रभावित भए ओ एकटा क्रांतिकारी निर्णय लेलन्हि जे बेटा केँ महामाया संस्कृत विद्यालयमे पढ़ौताह आ अपन पितामहक सुयश केँ पुनः स्थापित करताह। दिलीप कुमार महामाया संस्कृत विद्यालयमे भर्ती भऽ गेलाह आ लगलाह लघु सिद्धान्त कौमुदी आ अमरकोष रटए। मुदा हुनक प्रपितामहक युगसँ ऐ युग तक बहुत परिवर्तन भऽ गेल छलै जइमे संस्कृत विद्यालय आ मदरसा आदिमे सरकार नवका पाठ्यक्रम लागू करा देने छलै। नवका पाठ्यक्रमक अनुसार विद्यार्थीकेँ आनो बिषय जेना गणित, इतिहास आ विज्ञान आदि सेहो पढ़ए पड़ैत छलन्हि। उचिते, संस्कृतक प्राथमिकता कने कम भऽ गेल छलै। मध्यमा पास केलाक बाद दिलीप कुमार आबि गेलाह कोरबा आ पाँड़ेजीक संरक्षणमे लगलाह पंडिताइक व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करबामे। अथवा कहू अपरेन्टिस भऽ कए प्रशिक्षण लेबए लगलाह। पाँड़ेजी दिलीप कुमारक पढ़बा लिखबाक ज्ञानक परीक्षा किछुए क्षणक गपसपमे लऽ लेलखिन्ह। तकर बाद ओ एक प्रकारक क्रैश कोर्सक पाठ्यक्रम बनौलन्हि जइमे सत्यनारायण पूजा आ दुर्गा शप्तशती पाठ मूल संस्कृतमे छलै। आ सभ देवी देवताक प्रार्थना सेहो संस्कृतेमे। बाकी हनुमान चालीसा आ रामचरित मानसक विभिन्न उद्धरण छलै। एकर अतिरिक्त किछु छिटफुट वेदपाठ सेहो। ई सभ दिलीपकेँ कण्ठस्थ करबाक छलन्हि। ऐ किताबी ज्ञानक अतिरिक्त व्यावहारिक ज्ञानक लेल पाँड़ेजी दिलीपकेँ अपना संगे किछु किछु ठाम आयोजन सभमे लऽ जाए लगलखिन्ह। ओतए दिलीप हुनकर असिस्टेंट जकाँ काज करथि, जेना यजमानसँ विभिन्न वस्तुक ओरिआओन कराएब, पूजाक सामग्री सजाएब, आदि। पाँड़ेजीक अनुभव छलन्हि जे जतेक विस्तृत रूपेँ सामग्री सजाओल जाए, यजमान वर्गपर ओतबे बेशी प्रभाव पड़ै छै। विन्यासक लूड़ि सीखब मंत्र सीखबसँ बेशी महत्वपूर्ण। एकर अतिरिक्त दिलीप पूजाक समय पाँड़ेजीक प्रत्येक भाव भंगिमाक सूक्ष्म अध्ययन करथि। सत्यनारायण पूजामे कथाक समय भाषा टीका द्वारा हिन्दीमे लोक केँ ओकर महत्त्व बुझाएब पाँड़ेजीक विशेषता छलन्हि। समय जरूर बेशी लगै छलै मुदा ऐ सँ पाँड़ेजीक पांडित्यक धाख बढ़ैत छलन्हि। ओ दिलीपकेँ गर्वसँ सुनबथिन्ह “गामपर पूजा होइ छै तँ कथाक समय यजमान आ आनो लोक सभ बैसल बैसल ओंघाए लगैत छथि, मात्र पुरहितजी अपने कथा बँचैत रहैत छथि। हमरा कथा बँचैत काल अहाँ देखियौ, लोक आनन्दसँ झूलैत रहैत अछि। बीच बीचमे हमरा संगे सत्यनारायण भगवानक जयजयकार सेहो करैत रहैत अछि। कारण स्पष्ट छै। संस्कृतमे कथा भेलासँ ककरो किछु बूझऽमे तँ अबैत नै छै। पुरहितजीक सस्वर पाठ ओहने होइ छन्हि जेना बच्चाकेँ सुतबै कालक लोरी गीत। कथा एहेन भाषामे कहियौ जे लोक बूझए। बस, अपनहि सभ अहाँक संगे एकाकार भऽ जाएत।” दिलीप एक दिन मन्द विरोधक स्वरमे कहलखिन्ह जे संस्कृत तँ देववाणी छिऐ। तै पर पाँड़ेजी हुनका बड़ नीक जकाँ बुझेलखिन्ह “ देखियौ, संस्कृत देववाणी तखन छलै जखन सभ लोक संस्कृते बजैत छल। देवताक कोनो वाणी नै छन्हि। हमरे अहाँक वाणीसँ देवता बजैत छथि। वाल्मीकि रामायण छै संस्कृतमे आ तुलसीदास रामयण लिखलन्हि हमरा अहाँक भाषामे। लोक ककरा बेशी पढ़ै छै? एखन अहाँ भगवानक आरती गबैत छी कि लक्ष्मीजीक आरती कि आन कोनो देवताक आरती। सभटा तँ अपने भाषामे छै आ कत्ते आनन्द अबै छै लोककेँ आरती गबैत। एकरे संस्कृतमे बना दियौ, कम्मे लोक बचत अहाँकेँ संग दै बला।” दिलीप बूझि गेलाह असली गप्प। एवम् प्रकारेँ ओ ट्रेन्ड होबए लगलाह। छोटछीन आयोजन सभमे यजमानक हैसियत देखि पाँड़ेजी दिलीपकेँ एकसरे पठबए लगलखिन्ह। हुनका अतीव खुशी छलन्हि जे लुप्तप्राय पंडित प्रजातिमे एकटा सदस्य जोड़ा रहल अछि। एक दिन पाँड़ेजी एम. एन. मिसरा जीसँ दिलीप कुमारक भविष्यक लेल विचार विमर्श केलन्हि। हुनकर विचार छलन्हि जे दिलीप कोरबा छोड़ि कोनो नव जगह चल जाथि। एतए ओ पंडिताइ सिखलन्हि अछि। बाड़ीक पटुआ तीत होइते छै। अपना इलाकामे कोनो विद्वानकेँ यश नै भेटैत छन्हि। तेँ विद्वानकेँ विदेशमे अपन विद्वत्ताक प्रचार करबाक चाही। तहिना पंडितकेँ अपरिचित जगहमे यजमनिकाक प्रसार करबाक चाही। शूरवीर केँ अनचिन्हार लोकक बीच जा कए राज करैक चाही। बाहरक लोककेँ गुण अवगुणक थाह जल्दी नै लगै छै। तेँ ई सभ दीर्घायु होइ छै जेना अपना देशमे अंग्रेजक राज। करीब दू साल तक व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त केलाक बाद पंडित दिलीप कुमार पहुँचि गेलाह सिलबासा जे एकटा नवका औद्योगिक केन्द्र भऽ रहल छलै। ओतए किछु दिन स्थानीय हनुमान मन्दिरपर एकसरे दिन राति हनुमान चालीसा, किछु रामायणक उद्धरण आ विभिन्न देवी देवताक प्रार्थना संस्कृतमे सस्वर पाठ करैत रहलाक बाद शनैः शनैः यजमान सभ भेटए लगलन्हि। एतए ओ नवका पंडितजी नामसँ विख्यात भऽ गेलाह। ……………………………………… हम सभ सिलबासा आएल छी जतए हमर जमाए एकटा फैक्ट्रीमे इंजीनियर छथि। ओ एकटा नवका फ्लैट लेलन्हि अछि तकरे गृहप्रवेशक पूजा छिऐ। अही आयोजनमे नवका पंडितजी बजाओल गेल छथि। हमर बेटी कहलन्हि जे नवका पंडित छथि हमरे ग्रामीण दिलीप कुमार, स्वर्गीय पंडित संस्कारनाथ मिश्रक प्रपौत्र। ओना मुम्बइमे हमर दीर्घ प्रवासमे गामक ई एकटा परिवर्तन हमरा बूझल नै भेल छल। हम पूरा आयोजनमे हुनकासँ नजरि बचा कए हुनकर व्यवहारक अध्ययन कऽ रहल छी। हुनका ईहो नै बूझल छन्हि जे हम हुनकर ग्रामीण छियन्हि। ओ अपन काज एकटा नीक प्रोफेसनल जकाँ सम्पादित करैत छथि जइमे संस्कृत कम अपने भाषा बेशी रहै छै। एकटा आमंत्रित बूढ़ व्यक्ति हुनका टोकैत छथिन्ह “पंडितजी, अपन भाषामे जे अर्थ बुझेलिऐ से तँ नीक लागल मुदा संस्कृतमे पूजा पाठक विशेषता किछु भिन्ने छै। हमरा बुझने तँ संस्कृते बेशी रहितै तँ नीक।” पंडितजी बड़े संयत भावेँ हुनका कटलखिन्ह “एतए प्रायः साठि सत्तरि लोक छी। बताउ कते गोटे संस्कृत बूझै छी ?” सभ चुप। पंडितजी आगू बजलाह “देखू देववाणीसँ लोकवाणी बेशी प्रमुख होइ छै। ईएह बात तँ कवि विद्यापति कहि गेलाह। जे बुझिऐ सएह वाणी। नै तँ हम संस्कृतमे पूजा करी आकि तमिलमे, दुनू एक्के।” नवका पंडितजी अपन पांडित्यक प्रभाव बना लेलन्हि। हमरा ई देखि खुशी होइत अछि जे अपन प्रपितामहक पंडिताइक किछु अंश जरूर दिलीप कुमार जी बचा रहल छथि। ओना हमरा ई नै बूझल अछि जे देववाणीक ई परिवर्तित रूप स्वर्गमे विराजमान पंडित संस्कारनाथ मिश्रकेँ केहन लागल हेतन्हि। कुमार मनोज कश्यप नोरक दू ठोप कोटकेँ उतारि कऽ सोफापर फेक जकाँ देलिऐ आ पएर टेबुलपर राखि कऽ हम आँखि बन्न कऽ लेने रही। थाकल-ठेहियाएल कतौसँ आबि कऽ टेबुलपर पएर राखि कऽ बैसनाइ हमर प्रिय आदति रहल अछि, शुरूहेसँ। एहेन गुमारमे दिन भरिक भाग-दौड़़़, कोर्टक ऐ रूमसँ ओइ रूम, कखनो पुस्तकालय तँ कखनो मुवक्किल सभसँ किछु बुझैत वा ओकरा सभकेँ किछु बुझबैत़़ भरि दिन, यएह करैत-करैत मोन असोथकित भऽ जाइत अछि आ शरीर बेजान। एहनेमे कखन आँखि लागि गेल से बुझबो ने केलिऐ। कनियाँ जगओलनि - 'जा निन्न पड़ि गेलिऐ! चाह सेरा रहल अछि।' हम हड़बड़ा कऽ उठलौं आ जल्दी-जल्दी चाह सुड़कि गेलौं। गरम-गरम चाह पीयब हमरा नीक लगैत अछि, जतबा काल कियो एक-दू घोंट चाह पिबैत अछि ततबा काल हमर कप खाली भऽ कऽ नीचा रखा गेल रहैत अछि। हम फ्रेश भऽ लॉनमे आबि गेल रही। कनियाँ पहिनहिसँ ओतए हमर बाट जोहि रहल छलीह। एम्हर-ओम्हरक गप्पक बाद बात केस-मोकदमाक एलै। “भने मोन पाड़लौं, आइ एकटा बुढ़ी अहाँक ठेकान पुछैत-पुछैत आएल छल़़, बड़ अभागलि अछि ओ! अपने जनमाओल बेटा अपडेर देने छै बेचारीकेँ! हे हम नेहोरा करै छी़, ओकर केस लड़ियौ, आहाँ देखलासँ तँ ओ बड़ निर्धन बुझाएल हमरा। फीस तँ शाइत नहिये दऽ सकत़़ मुदा एकटा सामाजिक सरोकार बूझि मदति कऽ दियौ बेचारीके।”, कनियाँ नेहोरापर नेहोरा केने जा रहल छलीह। “मुदा केस की छै से तँ पहिने बुझिऐ?” “केस की छै, एकटा भावनात्मक अत्याचार छै ओइ अबला मसोम्मातिपर। हे हमरा सद्यः विश्वास अछि, अहाँ ई केस जितबे करब! खाली अहाँ हँ' कहि दियौ़। जीवन भरि ओ आशीर्वाद दैत रहत बाल-बच्चाकेँ।” “पहिने केस तँ बताउ, ओहिना बुझौअल बुझेने जा रहल छी।”, हमर स्वरमे कनेक खौंझाहटि आबि गेल छल। “केस तँ मामूलिये छै, ओइ बुढ़ीकेँ एक्केटा बेटा छै़। ओकर बेटा जखन दुइये सालक रहै तखने ओकर घरबला मरि गेलै। कहुना-कहुना कऽ बुढ़ी ओइ बेटाकेँ पढ़ा-लिखा कऽ समर्थ बनेलकै़। अखन बेटा बैंकमे कोनो नीक पदपर काज कऽ रहल छै। बेटा पुतोहुक कहलमे आबि कऽ बुढ़ माएकेँ अपना संगे नै राखए चाहि रहल छै। बुढ़ीक कहब छै जे जइ बेटाक लेल हम अपन सभ किछु गमा लेलौं ओइ करेजाक टुक़डासँ हम मरबा काल केना दूर रहि सकैत छी। ओना ओकर बेटा ओकरा अपनासँ दूर घर दऽ नीक-सँ-नीक सुख-सुविधा देबाक हेतु तैयार छै। मुदा बुढ़ी अपन बेटासँ दूर नै रहए चाहि रहल छै।” “केस मनलग्गू छै, भावनात्मक छै। ओकर ’मास अपील’ छै, ओकर निर्णयक दूरगामी प्रभाव समाजपर पड़ि सकैत छै।” हम मामलामे अपनाकेँ विभोर केने जाइत रही। कनियाँ हमरा सोचमे पड़ल देखि कहलनि- “काल्हि रविये छै, भोरके पहरमे ओकरा बजेने छिऐ। अपने सभटा पुछि लेबै। बेचारीक आँखिक नोर नै सुखाइत छलै। झाँट धरू एहेन बेटा के, जे माए ओकरा परवरिस कऽ कऽ एतेक टा बनेलकै़ मनुख बनेलकै़, ओ अपन माएकेँ नै डेब सकलै। हे हम पएर पकड़ैत छी़, अहाँ नामी ओकील छी़। बुढ़ीकेँ न्याय दिया दियौ।” कनियाँ फेर अनुनय-विनयपर उतरि गेल छलीह। केस हमरो रोचक लागल रहए। दोसर, कतेको मामलामे कोर्टक निर्णय आएल छै जे संतानक दायित्व बनैत छै जे ओ अपन माए-बापक परवरिस करए, तँए केस साधारणे छलै। साँच पुछी तँ कोनो बुड़िबको ओकिल ई केस जीत सकैत छल। छुट्टीक दिन हम अपन निन्नक सभटा बैकलॉग कोटा पूरा करैत छी। दिन माथक ऊपर आबि गेल छलै। कनियाँ सिरमामे बैस कऽ हमर केसमे अपन आंगुर फेरैत हमरा जगौलनि- “ओ बुढ़ी आबि कऽ कखनसँ ने बैसलि अछि। आब उठि जाउ। फेर दिनमे सुति रहब। ऐ प्रचंड रौदमे बुढ़ीकेँ पएरे दू कोस गाम जाइ कऽ छै।” चाहक चुस्कंी संग हम ओइ बुढ़ीकेँ सभटा बात धियानसँ सुनैत रहलौं। अपन जुनियर सिन्हाकेँ कहलिऐ- “ड्राफ्ट अप्लीकेशन बना कऽ लऽ आउ। काल्हि केस फाइल कऽ देबै।” कनियाँ बुढ़ीकेँ किछु पानि पीबय देने रहथिन। हम आन केस सभमे व्यस्त भऽ गेल रही। केसमे उम्मीदसँ बेसी जीरह चलि रहल छै। हमर कहब रहए जे एकमात्र संतान हेबाक कारणे बुढ़ीक बेटाकेँ पूरा-पूरा जिम्मेदारी छै जे ओ अपन बुढ़ माएक देखभाल करए। हम अपन बातपर जोर दैत बजलौं- “मी लॉर्ड! मेंटीनेंस एंड वेलफेअर ऑफ पैरेंट्स एंड सिनियर सिटीजन एक्ट, २००७ केँ पारित भेलासँ संतान अपन बुढ़ माए-बापकेँ पालन-पोषणक जिम्मेदारीसँ भागि नै सकैत अछि। ऐ सम्बन्धमे कतेको न्यायाधिकरण आ न्यायालयक रूलिंग उपलब्ध अछि। हमर मुवक्किलकेँ ओकर एकमात्र बेटा जे ओकर जायदादक एकमात्र वारिस सेहो छै, केँ पूर्ण जिम्मेदारी बनैत छै जे अपन बूढ़ माएक उचित देखभाल करए। अहू सभसँ पैघ बात मी लॉर्ड जे, जे माए केना-केना अपन पेट काटि बेटाकेँ पालि-पोसि ऐ लायक बनेलकै, ओइ माएकेँ जँ बेटा पेट नै भरि सकए, ओकरा दू हाथ वस्त्र नै दऽ सकए, ओकर दवाइ-विरो नै करा सकए तँ ओ बेटा, बेटा कहेबाक कथमपि योग्य नै।” “ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड! ई आरोप सरासर फुसि अछि जे हमर मुव्वकील बुढ़ माएकेँ परवरिश नै कऽ रहलाह अछि। सत्य तँ ई अछि माई लॉर्ड जे ई अपन माएकेँ नीक-सँ-नीक सुख-सुविधा दऽ रहल छथि आ भविष्योमे दैत रहबाक वचन दैत छथि। हुनका कोनो तरहक असुविधा वा कष्ट नै होन्हि तइले एकटा फुल टाइम नोकरनी राखि देल गेल छन्हि, नियमित डॉक्टरी जँाच आ दवाइ-विरोक व्यवस्था कएल गेल छन्हि, घरमे सभ सुख-सुविधा उपलब्ध कराओल गेल छन्हि। केवल हमर मुवक्कंील अपन माएकेँ अपना संगे नै राखि रहल छथि, तकर कारण छै सासु-पुतोहुमे दिन-राति झगड़ा़। दुनू सासु-पुतोहु एक दोसराकेँ फुटलियो आँखि नै देखए चाहैत छथि। एनामे घरकेँ नर्क बनेबासँ तँ नीक जे बुढ़ी अलग रहथि। ऐसँ ओहो शाँतिसँ रहतीह आ हुनकर बेटा- माने हमर मुवक्कंील सेहो।” “मी लॉर्ड ! जे माए बेटाकेँ नान्हिटा सर्दी-बोखार भेलापर भरि-भरि राति जागि कऽ बिता देने हुअए, जइ माएक लेल दुनियाँक सभसँ प्रिय वस्तु ओकर करेजाक टुकड़ा हुअए, जे माए अपन बेटाक खातिर अपन सर्वस्व लुटा देने हुअए, आइ मरन-कालमे ओइ माएकेँ कहल जाए जे ओ अपन बेटासँ दूर रहए तँ ई एकटा माएक ममतापर सरासर कुठाराघात नै तँ आर की भऽ सकैत छै? तँए हमर ई हाथ जोड़ि कऽ निवेदन अछि जज साहेब जे हमर मुवक्कंीलकेँ मरन कालमे अपन बेटाक संग रहबाक अंतिम इच्छाकेँ पूरा कऽ दियौ। हमर क्लाईंटकेँ सुख-सुविधा, नोकर-चाकर किछु नै चाही, बस एकेटा अंतिम इच्छा जे अपन करेजाक टुक़ड़ाकेँ देखैत प्राण त्याग करी़।” बजैत-बजैत हमर गला भरि गेल छल, आँखिमे नोर डबडबा गेल छल। चश्मा निकालि कऽ रूमालसँ हम अपन आँखि पोछि फेरसँ चश्मा पहीर लै छी। कोर्टक महौल भारी भऽ गेल छलै। दुनू पक्ष-विपक्षसँ तर्कक वाण चलैत रहलै़। जज साहेब किछु-किछु नोट करैत रहलाह़। लोक सबहक जिज्ञासा बढ़ले जाइत रहलै। आब फैसलाक घड़ी आबि गेल छलै़। सभ साँस रोकने सुनि रहल छल। जज साहेब खखसि कऽ गला साफ केलनि आ फैसला सुना देलनि – “घोड़ाकेँ पानि पियेबाक लेल घाटपर तँ लऽ कऽ जाएल जा सकैत छै, मुदा ओकरा पानि पीबाक लेल बाध्य नै कएल जा सकैत छै। तहिना जौं हम प्रतिवादीकेँ आदेश कइयो दिऐ जे ओ वादीकेँ अपने संगे अपने घरमे राखए तँ परिणाम भऽ सकैछ जे वादी-प्रतिवादी दुनूक जीवन अशांत भऽ जाए। ऐ स्थितिसँ नीक जे प्रतिवादी स्वयं निर्णय लेथि। तँए हम प्रातिवादीयेपर ई मामला छोड़ैत छियनि़, जन्म देनिहारि माए तँ आखिर हिनके छियनि।” कहि कऽ जज साहेब फुर्तीसँ अपन कुर्सीसँ उठि कऽ चलि गेलाह। कोर्ट-रूममे लोकक बीच घोल-फचक्का शुरू भऽ गेलै़। जतेक मुँह तते तरहक बात। ओ बुढ़ी हमरा निरीह आँखिये ताकैत कोर्ट-रूमसँ बहरा रहल छलीह। हमरा लागल़़, हमर ओकालतिक ई सभसँ पैघ हारि अछि। हम झट्टसँ बाहर निकलि कऽ कऽल जोड़ि कऽ बुढ़ीक आगूमे ठाढ़ भऽ गेलौं- “माताजी ! अहाँ चिंता जुनि करू। हम काल्हिये केस फाइल बना कऽ हाई-कोर्टमे अपील करैत छी। हमर जीत निश्िचते हएत़़।” ओ बुढ़ी बामा हाथसँ हमरा कात करैत बिना किछु बजने आगू बढ़ि गेलीह। ओ अपन रस्तापर जा रहल छलीह। हम अबाक भेल हुनकर रस्ता दिस तकैत रहि गेल छी़, अपलक, माटिक मूर्ति जकाँ स्थिर। नोरक दू ठोप टघरि कऽ गालपर आबि गेल अछि। सतीश चन्द्र झा, राम जानकी नगर, मधुबनी हमहूँ कहाँ बुझलिऐ- चान! चान! हे यै चान ! सुतले रहब। केबार खोलू ने । हम कुशुम छी। हर्ष खुशीमे डूमल स्वर कानमे पड़िते निन्न खुजि गेल। भोरक किछु हेराएल सपना फेरसँ हेरा गेल.. आ हम उठि कऽ बैस गेलौं। आँखि मलि कऽ दुनू हाथकेँ जोड़ि दर्शन करिते केबाड़ खोलए दौड़ि गेलौं। की बात छौ ? एते भोरे ..? प्रश्न पूरा नै भेल मुदा ओ बाजल दीदी ..आइ हमर बिआह अछि। रातिमे बाबू कतौसँ ठीक कएने अएलै। पाँचमा पास छै आ दिल्लीमे कोनो काज सेहो करै छै। अहाँ अवश्य आएब। नै जानि ओ की की बाजि रहल छल, मुदा हम तँ ओकर पहिल शब्द बिआह सुनि ततेक ओझरा गेलौं जे किछु आओर नै पुछि सकलिऐ आ ओ दौगल चलि गेल। .. हँसैत ..एकटा अबोध हँसी . निर्विकार चेहरा ..। मुदा हम! हमर चेहरा तनावपूर्ण। लागल जेना हृदैमे किछु गरम चीज सन्हिया गेल हुअए आ हमर संपूर्ण रक्तमे एकटा अपरिचित झुनझुन्नी बनि कऽ दौड़ि रहल हो .सरपट.. अति तीव्र गतिसँ। अचानक शरीरक बोझ उठाबएमे पएर असमर्थ भऽ गेल आ हम धम्मसँ धरतीपर बैस गेल रही।. सुन्न भेल.. मुदा भीतर लड्डू जकाँ किछु नचैत रहल .. नचैत रहल .. अविराम । नै जानि कखनो कऽ एकटा आश्चर्य एतेक भएभीत किए कऽ दै छै .एकर उतर ने तहिया भेटल ने आइ धरि बुझबामे आएल । मोनक किछु बातक अभिव्यक्तिक माध्यम अखनो नै छै। शब्द तँ किन्नहँु नै। हँ आँखिक नोर कखनो कऽ हृदैमे चुभैत कोनो भावनाकेँ बूझि जाइ छै। गाम घरक जीवन। छल-प्रपंचसँ वंचित समतल धरती जकाँ समटल आचरण, जतए छोट-छोट सपना देखि ओकरे परिपूर्ण करबा लेल छटपटाइत आत्मा। ओही श्वच्छ परिवेशमे हम आ हमर कुशुम संगी बनि कऽ अखन धरि रहैत छलौं। ओ हमर हरबाहक बेटी छल। छोट लोकक बेटी, मुदा तखन ई बात नै बुझलिऐ जखन पहिल बेर ओकरा अपन आँगनमे देखि हाथ पकड़ने दौड़ि गेल छलौं दलानपर। नेनपन कहाँ बूझि पबै छै जाति पाति आ उच्च निचक बात। ई तँ उमेर बढ़लासँ समाजक व्यवस्था आ मोनक अहंमे लोक भसिया जाइत अछि। मुदा दोस्ती तँ मोनक एकटा मिठ्ठ संबंध छै, एकरा समाज आ परिवारसँ की मतलब। एक बएसक कतौ दू टा अबोध एक दोसरक अँाखिकेँ पढ़ि लेलक आ बन्हि गेल एकटा शब्दहीन संबंधमे। आइ फेर नै जानि किए जीवनक बीतल संपूर्ण हवा बसात मोनमे प्रचंड बिरड़ो उठा देने छल आ हम ओइमे एकटा छोट फतिंगा जकाँ उड़ियाइत अपन अस्तित्वकेँ बचाबएमे संघर्षरत छी। यएह तँ जीवन छै- सतत संघर्ष आ अपन अस्तित्वक रक्षा। मुदा कहाँ भेल अस्तित्वक रक्षा। आलोकसँ बिआह भेलाक बाद लागल जेना जीवनक संपूर्ण सपना मूर्त रूप लऽ लेत। स्नेहक संबंध प्राणमे एकटा नव स्फूर्तिक संचार करै छै। विचारक धरातलपर पति-पत्नी एक दोसरकेँ सम्मान दै छै। मुदा बिआहक दू मासक बादे सभ किछु उल्टा लागए लागल। प्रेमक निर्वाध गतिसँ बहैत शीतल जलमे दुर्गंध आबि गेलै। आलोकक अहंमे अपन अस्तित्व कतए हेराएल जे अखनो धरि नै भेटल। पिताक एक मात्र संतान छलौं हम। स्नेहक कतौ कमी नै अनुभव भेल। शिक्षाक मर्यादा सदैव जीवनकेँ बान्हि कऽ रखलक। घरक संस्कार जाति समाजक कठोर बंधन कहियो स्वतंत्रता नै दऽ सकल जे अपन पतिसँ विद्रोह कऽ सकी आ अपन जीवनक ठमकल दुर्गंधित पानिकेँ समुद्रमे बहा कऽ निर्मल कऽ ली। आइ बुझाइत अछि जे शिक्षा आरो कमजोरे करै छै। लोक की कहत? सम्मानक रक्षा केना हएत? समाजमे लोक की की बाजत? सभटा बिचार मोनमे उठिते हम अपनाकेँ बहुत कमजोर अनुभव करए लगैत छी आ अपन संपूर्ण व्यथाकेँ सहर्ष स्वीकार करैत अकासमे नुकाएल देवतासँ मृत्युक वरदान मंगैत प्रतिदिन अपन बान्हल दिनचर्यामे लागि जाइ छी। कमजोर नारिक कमजोर विचार। शिक्षित नारी आ एते कमजोर आत्मविश्वास। जखन कऽ ई विचार अबैत अछि तँ मोनक कारी वेदना स्वेत मुखमंडलपर ततेक ने अपन रेखाचित्र खिंचि दैत अछि जे ओकरा भरब असंभव भऽ जाइत अछि। मोनक आँखिसँ फेर किछु देखैत छी तँ लगैत अछि जे हमर कुशुम कहाँ कमजोर छल। दशमीमे पढ़ैत-पढ़ैत बिआह भेल रहै। बिआहक बाद एक दू बेर सासुर सेहो गेल। ओकर घरबला दारू पीब कऽ ओकरा संग बहुत मारि-पीट करै छलै। एक दिन ओकर सूतल स्वाभिमान जागि गेलै आ ओकरा छोड़ि देलक। ओ अपन विगतक संपूर्ण पसरल स्याहीपर उज्जर पिठारसँ फेर कोबर लीखि लेलक। जीवनक निर्णय लेबामे ओ कतौ कमजोर नै पड़ल। फेरसँ ओ अपन दोसर पतिक संग प्रेम करैत दुनियाँक टेढ़-मेढ़ बाटपर चलि पड़ल। एक दिन हमरो कहलक दीदी अहाँ एतेक कष्ट उठा कऽ केना अपन पतिक संग निर्वाह कऽ लै छी? ओना तँ अहाँ हमरासँ बेसी पढ़ल लिखल छी। नीक संस्कार अछि। स्वयं कमा कऽ खा सकै छी। तखन किए?’’ तँू नै बुझबिही’’! ओ चुप भऽ गेल। मुदा हमहूँ कहाँ बुझलिऐ ? ओ तँ कम पढ़ल छल। छोट जाति .. ताहूपर गरीब.....। मुदा हम तँ पढ़ल लिखल उच्च जाति ..पैघ लोक ..नीक संस्कार! लेकिन कहाँ बूझि सकलिऐ एकर कारण ? की एकर कारण संस्कार छै? अथवा सुशिक्षा? पता नै केना बुझबै एकर रहस्य। हम एम.ए. पास कऽ कऽ नौकरी करबा लेल पिताजीसँ अनुमति चाहैत छलौं लेकिन ओ कहलथि जे हम अहाँक बिआह लेल चिन्तित छी। एकटा पिताक सभसँ पैघ बोझ पुत्रीक कन्यादान होइ छै तँए ओ ऐसँ मुक्त होएबा लेल जतए ततए प्रयत्नशील रहथि। हमर सहमति तँ एकटा मात्र हुनका लेल स्नेहक अभिव्यक्ति छल जइमे कर्तव्यक एकटा निर्वहन सेहो छलै। हम अपन सहमति स्नेहक प्रतिदान स्वरूप दऽ देलियनि। गामसँ किछु दूर एकटा धनाढ्य पढ़ल-लिखल परिवारक एकलौता पुत्र आलोक संग हमर बिआह भऽ गेल। दान दहेजक मांग नै सुनि हमर पिताकेँ लगलनि जे आजुक युगमे निश्चय ओ लोकनि भगवान छथि मुदा किछु दिनक बाद ज्ञात भेल जे ओइ भगवानक संपूर्ण आत्मा कलुषित छल। धनाढ्य आ सुशिक्षित नींवमे सौंसे दिबार लागि गेल छल आ ओही दिबारक मजबूती लेल हमरा बलिदान देबाक छल। आलोकक एकटा अओर बिआह भऽ चुकल छलनि। संभवतः पाँच छः साल पूर्वहि मुदा संतान नै होएबाक कारणे अपन वंश आ अहंकारक गाछकेँ आगाँ बढ़ाबए लेल एकटा सुशील कन्याक खोज रहन्हि। तखन हमरे संग प्रपंच भेल। जीवनक एक एकटा नुका कऽ पौतीमे राखल हमर सुन्दर कल्पना हेरा गेल। आ हेरा गेल हमर संपूर्ण अस्तित्व, जकर रक्षा करब हमर बसक बात नै रहल। एकटा हारल मनुख। मात्र बच्चा पैदा करबा लेल आनल गेल छल। इच्छा वा अनिच्छा किछु कतौ नै। अपन घर नै। अपन किछु सपना नै। विद्रोह करबा लेल हिम्मति नै, एकदम कमजोर ..हम ..चान। मुदा हमर संगी कुशुम .. अपन जीवनक उतार चढ़ावमे अपन अस्तित्व अखनो धरि बचौने .. खूब होशगर आ ठोस कुशुम। डॉ. कैलाश कुमार मिश्र प्रकृति सुन्दरि आ चूहर मिस्त्री छोटानागपुर अर्थात आजुक झारखण्ड केर धरती, पहाड़, झरना, जंगल, नदी वन्यजीव आ अन्तत: निश्छल निष्कपट जनजातिसँ हम जेना नेनपनेसँ एक अटूट सम्बन्ध स्थापित कऽ लेने रही। हरदम अपना-आपकेँ जनजातीय वर्गक बच्चा एवं उमरगर लोक सभ लग हम सुरक्षित अनुभव करैत रही। कुनो संशय अथवा भय कहियो नै भेल। मुदा जखन-जखन माए हमरा सभ लग सेन्हा रहए लेल अबैत छलीह तँ अनेरे परेशान भऽ जाइत छलीह। हम्मर माएकेँ अगल-बगलक स्त्रीगण सभ कहलकनि जे अतए केर आदिवासी, विशेष रूपेँ उराँव धानक बीया छीटैसँ पहिने ग्राम्य देवता, स्थान देवता, कृषि देवता एवं कुल देवताकेँ प्रसन्न करबाक लेल प्रथम सात बाकुट धानकेँ मुर्गा, कुनो आरो चिड़ै, चाऊरसँ निर्मित स्थानीय शराब- हँड़िया आ अन्तत: मनुक्खक शोनितसँ सानि ओइकेँ अभिमंत्रित कए ओकरा सर्वप्रथम गामक प्रधानक हाथसँ खेतमे बाउग करैत अछि। मनुक्खोमे बच्चा सभकेँ खूनक प्रयोगक उत्तम मानल जाइत छै। ऐ लेल चोरा कऽ कुनो बच्चाकेँ पकड़ि ओकर घेटक टेटुआकेँ तेजगर चक्कूसँ काटि ओकर रक्तकेँ बाँसक फोफीमे निकालि ओइ रक्तसँ पूजा कएल जाइ छै। ऐ प्रक्रियामे जै बच्चाकेँ गर्दनिक टेटुआकेँ काटल जाइ छै तकर मृत्यु ओतै भऽ जाइ छै। टेटुआकेँ पूजामे प्रयुक्त होबाक हेतु काटक परम्पराकेँ स्थानीय भाषामे ओरका कहल जाइ छै। हलाँकि अप्पन जीवनक २३ वर्ष धरि हम कहियो कुनो घटना अपना आँखिसँ नै देखलिऐ। लोक-सबहक मुँहेँ ऐ विषयमे चर्चा करैत अनेको बेर सुनने अवश्य रही। हम्मर कारी भेनाइ शाइद हमरा लेल एकटा वरदान छल। छोटानागपुरक आदिवासी सभ हमरा कारी हेबाक तथा घुरमल-घुरमल केस हेबाक कारणे अपने समुदायक सदस्य बुझैत छल। उपरसँ सेन्हा तथा सेन्हाक अगल-बगलक लगभग १५ गाममे आदिवासी महिला सभ चर्खा चलबैत छलीह। पिताजी खादी भंडारक व्यवस्थापक छलाह, तै कारणे सेहो आदिवासी महिला-पुरूष हमरा बड्ड सिनेह करैत छल। हम सदतिकाल कोनो-ने-कोनो बहाना बना गामे-गाम घुमैत छलौं। कखनो-काल माए सेहो कहैत छलीह- “जो राधव, बगलक आदिवासी गामसँ खेतक टटका हरियर तरकारी लऽ आ।” आ हम अही सभ चीजक फिराकमे रहिते छलौं, चटदनि कुनो आदिवाी गाम दिस विदा भऽ जाइत रही। केवल धनरोपनीक समैमे हमर माए साकांक्ष भऽ जाइत छलीह। साफे मना कऽ दै छलीह- “देख राघव, कुनो परिस्थितिमे भरि रोपनी तोँ कुनो गाम दिस नै जएबैं। हमरा कतेको लोक सभ कहलक अछि जे अही समैमे आदिवासी सभ ओड़का पूजै छै। हम तोरा पिताजीकेँ सेहो बुझा देने छियनि जे ऐ एक-डेढ़ मास धरि तोरा कतौ असगरे नै भेजथुन्ह।” हम्मर परिवारमे माइक आज्ञाक अवहेलना करबाक हिम्मत हमर कुनो भाए-बहिनकेँ नै छल। पिताजी सेहो हरदम माइक बातकेँ सर्वोपरि मानैत छलथिन। हमरा लेल तँए ओ एक-डेढ़ मास बड्ड बेकार होइत छल। हम रोपनीक समैमे अपना-आपकेँ जहलमे कैद, लाचार अपराधी मानै छलौं। मुदा दोसर कुनो उपायो तँ नै छल। आदिवासी महिला सभ चर्खा हमर पिताजीक अथक प्रयासक कारणे कटनाइ प्रारम्भ केलनि। हुनका सभकेँ हरेक पनरह दिनपर सेन्हा खादी भण्डारपर बजा कऽ बीट करा कऽ तूरक पोला देल जाइत छलनि। पोला जोखि कऽ देल जाइ छलै। जखन महिला सभ ओइ पोलाकेँ चरखापर चढ़ा ताग बना लैत छलीह तँ हरेक १५ दिनपर ओइ तागकेँ जोखि कऽ खादी भण्डारमे लऽ लेल जाइत छलै। मिहनताना तागक एकबद्धता तथा सूक्ष्मताक आधारपर देल जाइ छलै। सूक्ष्मताक माप ४० अंकसँ प्रारंभ भऽ १६० अंक धरि चलै छलै। जतेक कम अंक भेटतै ततेक मोट आ उखरल सूत मानल जेतै। किछु एहेन बेबस्था छलै। आ जतेक पातर आ समरस हेतै ततेक बेसी नम्बर भेटतै अर्थात् ई जे कम नंबर वालीकेँ कम मिहनताना जा ज्यादे पातर या सूक्ष्म ताग तैयार करैवालीकेँ ज्यादे मिहनताना। चर्खाक मरम्मत, रखरखाव, लोक सभकेँ सेन्हा मुख्य खादी भण्डार तथा गाम-गाम जाइक जानकारी देबाक जिम्मेवारी खादी भण्डारक छलै। खादी भण्डारमे ई कार्य एकटा कार्यकर्ता श्री मंगनू ठाकुर करै छलै। मंगनू ठाकुरक अवस्था ओइ समए करीब ५२ वर्ष छलै। ओ जातिक बढ़इ तथा समस्तीपुरक कुनो गामक छल। दुबर-पातर चेरा सन शरीर आ श्याम बरण केर छल मंंगनू ठाकुर। नशामे केवल तम्बाकू चुसै छल। महाकंजुस। सदतिकाल पैसा बचेबाक प्रवृत्तिमे मग्न रहैत छल। ओकर जेठ बेटाक वियाह-दान भऽ गेल रहै। खादी भण्डारक तमाम चर्खा तथा ओकर कल-पूर्जाक बड्ड नीक जानकारी छलै मंगनू ठाकुरकेँ। अपन धंधा अर्थात चर्खा विशेष रूपसँ अम्बर तथा पेटी चर्खाक महारथी छल ओ। यएह कारण छलै जे हमर पिता ओकरा दोसर ठामसँ स्थानान्तरण करा अपना लग सेन्हा अनने छलथिन। इम्हर पाँच वर्षमे दू बेर मंगनूकेँ स्थानान्तरणक आदेश प्रधान कार्यालय, छोटानागपुर खादी ग्रामोद्योग संस्थान, तिरील, राँचीसँ अएलै मुदा दुनू बेर हमर पिताजी अपन प्रभुत्वक बलपर ओकरा सेन्हासँ कतौ आनठाम नै जाए दलथिन। जनजातीय समुदायसँ हमर आत्मीयता बढ़ाबैमे मंगनू ठाकुर केर भूमिका बड्ड पैघ रहल छै। ओ अनेको जनजातीय गाम सभमे जखन चर्खा निरीक्षण मे जाइत छल तँ हमरा कहैत छल- “बउओ, अहूँ चलब?” आ हम अपन माए लग निवेदन करए लगैत छलौं। मंगनू दरवारी प्रवृतिक आदमी छल। ओकरा बूझल रहै जे अगर मैडम (हमर माए) प्रसन्न रहती तँ मैनेजर साहेबसँ कुनो कार्य आसानीसँ भऽ जएतै। आ माएकेँ प्रसन्न करबाक लेल हमरासँ पैघ कुनो हथियार नै भऽ सकै छलै ओकरा लेल। ओ माए लग आबि कहए लागैत छल- “जाय दियौक बउओकेँ मैडम! कुनो दिक्कत नै हेतै। हम अपना संगे साइकिलपर बैसा कऽ लऽ जाइ छिऐ आ अपने संगे तीन-चारि घंटाक भीतर वापस लेने अएबै। अतए ओहुना तँ बच्चा सभसँ मारि-पीट करैत रहैत अछि। ओतए लोक सभ लग एकर मोनो बटा जेतै।” अन्तत: हमर माए किछु ना-नुकुर केलाक बाद मंगनू हमरा लऽ जेबाक हेतु अनुमति दऽ दैत छलथिन। पिताजीसँ आज्ञा लेबाक कहियो प्रयोजन नै पड़ल। ओ हमरा प्रति हरदम लिबरल रहैत छलाह। आ ऐ तरहेँ हम अनेको बेर सेन्हाकेँ अगल-बगलमे बसल जनजातीय गाम सबहक भ्रमण मंगनू ठाकुर संग करैत रही। साइकिलक पाछाँमे बैस कऽ पहाड़ी इलाकामे भ्रमण करबाक एक अलग तरहक आनन्द अबैत छैक- परमानन्द! उबर-खाबर पगडंडी, ऊँच-नीच रस्ता। कतेको ठाम मंगनू ठाकुर साइकिल चलबैत-चलबैत हाँफय लगैत छल। कतेको ठाम ओकरा इंच चढ़ाइपर डबल लोडमे साइकिल नै हाँकल होइ छलै। ऐ स्थितिमे साइकिलपर सँ अपनो उतरि जाइत छल आ हमरोसँ पैघ आत्मीय ढंगसँ कहैत छल- “बौआ, उतरि जो। आगाँ बड्ड चढ़ाइ छै। जखने चढ़ाइ समाप्त भऽ जेतै तखने पुन: साइकिलपर हमरा लोकनि चढ़ि जाएब।” हमर चंचल मोन मंगनू ठाकुरक ऐ तरहक प्रस्ताव बिना कुनो प्रश्न आ उत्तरक मानि जाइ छल। हम तुरन्ते साइकिलपर सँ उतरि जाइत रही। आ जखने चढ़ाइ समाप्त होइ छलै तँ हमरा साइकिलक पाछाँमे बैसा ढलानपर मंगनू मस्तीमे एक-आध पैडल मारि साइकिलपर झुमैत हर-हराएल चलल जाइत छल। मुदा एहेन रास्ताक लेल साइकिलकेँ पछुलका आ अगुलका दुनू ब्रेककेँ बिल्कुल फीट आ टंच भेनाइ जरूरी, जैसँ कुनो बेलैंस बिगड़लापर अथवा रस्तामे कुनो तरहक बाधा अक्समात अएलापर साइकिल सवार ब्रेक मारि अपन तथा अन्य लोकक सुरक्षा कऽ सकए। एक बेर तँ हम कालक गालमे जाइत-जाइत बचि गेल रही। भेलै ई जे हम्मर साइकिलकेँ दुनू ब्रेक ढील भऽ गेल रहए। हम एकटा बिल्कुल नीचा दिस ढलकैत सड़कपर अपन साइकिल चलेने तीव्र गतिसँ जाइत रही। साइकिलकेँ आरो तेज करबाक रोमांसमे रोमांचित होइत हम आरो जोर-जोरसँ पैडलकेँ अपन पएरसँ चलाबए लगलौं। लगैत छल साइकिलक बदला कुनो फटफटिया चला रहल छी। एकाएक नीचामे टी प्वाईंट-क्रॉस सेक्सन-पर एकटा ट्रक तेजीसँ जाइत रहै। हम ट्रकक बिल्कुल लग आबि गेल रही। झटाक दऽ ब्रेक मारि साइकिलकेँ काबूमे करबाक प्रयास केलौं। मुदा बेकार। ब्रेक कार्य नै केलक। आब लागल जे मृत्यु अवश्यम्भावी अछि। मुदा के नै अपन प्राणक रक्षा करए चाहैत अछि? हमहूँ बिना एकौ क्षण बरबाद केने टांग-हाथ, मुँह-कान टुटबाक चिन्ता केने चलैत साइकिलपर सँ कुदि गेलौं। साइकिलकेँ एना धक्का देलिऐ जैसँ ओ कातक खत्तामे खसि गेलै। हम स्वयं सड़कक कछेरमे खसलौं। पाँच मिनट धरि किछु पते नै चलल। जखन होश आएल तँ देखलौं जे हमर पिताक एक मित्र हमरा लग बड़ा चिन्तित अवस्थामे ठाढ़ छथि। हुनकर चेहरापर क्रोध स्पष्ट परिलक्षित छलनि। हमरा लागल जे आब ई हमरा नीक जकाँ बेइज्जत करताह। मुदा से नै भेल। ओ केवल अतबे कहलनि- “राघव, आइ अहाँ कालक गालसँ बचि गेलौं। बच्चा छी बच्चा जकाँ साइकिल चलाउ।” हम पश्चातापक स्वरमे कहलियनि- “की कहू काकाजी, एकाएक ब्रेक कार्य केनाइ बन्द कऽ देलक। साइकिलमे दुनू ब्रेक ढील भऽ गेल रहै तकर जानकारी हमरा नै छल। आब जिन्दगीमे एहेन गलती नै करब।” ओ कहलनि- “कुनो बात नै। पहिने उठि कऽ ठाढ़ होउ। देखू कतौ चोट तँ नै आएल अछि?” ई कहैत ओ हमरा उठबए लगलाह। मुदा हम अपने फुरफरा कऽ उठलौं। खास चोट नै लागल छल। केवल ठेहुन आ कौहनी कनी छिला गेल रहए। साइकिल उठेलौं तँ ओकर हैंडल कनी टेढ़ भऽ गेल रहै। काकाजी साइकिलकेँ ठीक करैमे मदति केलनि मुदा कहलनि- “राघव, पहिने अहाँ साइकिलक ब्रेक ठीक कराउ तखने ऐपर चढ़ब।” हम अपन गर्दनि हिला हुनकर आज्ञा मानबाक स्वीकृति दैत साइकिल गुड़कबैत लऽ गेलौं। चली आब कथाक प्रसंग दिस। मंगनू मिस्त्री हमरा बच्चा सभ लग छोड़ि स्वयं घरे-घरे लोकक चर्खाक मरम्मति करए लगैत छल। लोक सभ हमरा बड्ड सिनेह करैत छल। हमर घरक नीपा-पोता तथा बरतन-बासन धोइवाली चेरी जकरा झारखण्डमे लोक दाइ कहै छै, एक उराँव महिला छलि। ओकर बेटा-बेटी हमरा संगे खेलाइत छलै। दाइ सेहो हमरा माइये जकाँ सिनेह करैत छलि आ हमर धियान रखैत छलि। ओकरा सबहक संगतिमे हम उराँव भाषा धाराप्रवाह बाजब सीख गेल रही। तँए कुनो उराँव बहुल गाम अथवा इलाकामे हमरा सम्प्रेषणमे कुनो तरहक समस्या नै छल। बीच-बीचमे मंगनू ठाकुर हमर खोज-खबरि लैत रहै छल। वापस जाइकाल हमरा लोकनि अपना संगे बहुत रास हरियर तरकारी, फल इत्यादि लऽ जाइत रही। जे महिला सभ चर्खा कटैत छथि, तनिका लोकनिकेँ खादी भण्डारक शब्दवलीमे कतिन कहल जाइ छलै। ओ सभ हरेक पन्द्रह दिनपर अपन काटल सूत-ताग-लऽ सेन्हा अबैत छलि। बीटमे सूतक नम्बरक आधारपर ओकरा सभकेँ मेहनताना देल जाइ छलै। कुल आयमे सँ बांगक पैसा काटि लेल जाइ छलै आ बचल आमदनीक चारि अना हिस्साक खादी भण्डारमे जमा कऽ लेल जाइ छलै, जकरा एवजमे ओ सभ साल भरिक भीतर कखनो कुनो खादीक वस्त्र यथा चद्दरि, कम्बल, धोती, कुर्ता, लुंगी, ओछाइन इत्यादि किंवा वस्तु जेना कि सरिसबक तेल, मधु, साबुन, अगरबत्ती आदि लऽ सकैत छलि। बाद बाकी बारह अना हिस्साक पैसा तुरत भुगतान हमर पिताजी अपना सामने करबा दै छलथिन। ओइ कतिन सभमे एक कतिन छलै- राजकुमारी। ओ सेन्हासँ करीब ८ किलोमीटर दूरक गामसँ पन्द्रह दिनपर पैदल आबैत रहै मुदा ओकर बियाह नै भेल रहै। बाइस बर्खक अवस्थामे ओकरा बियाह नै भेल रहै से कुनो आश्चर्यक बात नै रहै। कारण ई जे उराँव जनजातिक लोक पूरा बएस भेलाक बादे अपन लड़का अथवा लड़कीक बियाह करैत अछि। राजकुमारी बड़ा शांत आ गंभीर स्वभावक महिला छलि। चेहरामे हरदम एक प्राकृतिक हँसीक भाव लेने तथा चुपचाप अपन काजमे मग्न। यएह छलै राजकुमारीक व्यक्तित्व। ओ सांवरि छलि। नाक कनी पिचकल, चाम अन्य आदिवासी बालाक तुलनामे कनी साफ, कनी चमकगर, कनी रमनगर। वस्त्र ओ बड़ा तल्लीनतासँ धारण करैत छलि। कहियो ओकरा उटपटांग वस्त्र पहिरने तथा अपन शरीक कुनो अंगकेँ देखार केने नै देखलिऐ। राजकुमारी स्वभावसँ अतेक शांत छलि जे अगर ओकरा संगे वार्तालाप केनिहार दस आखर बजैत तँ राजकुमारी एक आखर। मुदा ओ अपन उपस्थितिसँ लोककेँ अवश्य प्रभावित करैत छलि। राजकुमारी सेन्हा मिडिल स्कूलसँ सातवी धरि पढ़ल छलि। आगाँ शायद आर्थिक तंगी आ अगल-बगलमे हाइ स्कूल नै हेबाक कारणे नै पढ़ि सकलि। हमरा आश्चर्य हरदम ऐ बातक होइ छल जे ओकर नाम राजकुमारी किए छलै। एक दिन यएह प्रश्न हम अपन पितासँ पुछलियनि। हमर पिता कहलाह- “राजकुमारीक माता-पिता कुनो विशेष कारणसँ एकर नाम राजकुमारी राखि देने हेथिन।” मुदा अपन पिताक जवाबसँ हम संतुष्ट नै भेलौं। हमर पिता सेहो बुझि गेला जे राघव ऐ उत्तरसँ संतुष्ट नै अछि। हमर पिता हमरा लोकनिक प्रसन्नतासँ आनन्दित आ हमरा लोकनिक कष्टसँ दुखी होइत छलाह। ओ झटदनि कहलनि- “ठीक छै राघव। अहाँ चिन्ता नै करू। ई प्रश्न हम राजकुमारीक पिता करमा उराँवसँ पुछबै, फेर अहाँकेँ बताएब।” एक दिन जखन राजकुमारी अपन पिताक संग खादी भण्डार आएलि तँ हम दौगल अपन पिताजी लग गेलौं। हमरा देखते पिता जीकेँ याद एलनि। ओ हमरा दिस देखैत हँसए लगलाह आ करमा उराँवकेँ पुछलखिन- “करमा उराँवजी, अहाँ अपन बेटीक नाओं राजकुमारी किए रखलौं?” करमा उराँव कहलकनि- “श्रीमान, हमरा सेन्हा स्कूलक हेड मास्टर एकटा बड्ड सुन्दर कथा सुनौलनि। ओइ कथाक मुख्य पात्र एक गंभीर आ सुन्दरि कन्या छलै। ओइ पात्रक नाओं छलै राजकुमारी। ई नाम जेना हमरा हृदेमे रचि-बसि गेल। ओइ कथाक दू वर्षक बाद जखन भगवान हमरा बेटी देलनि तँ हम झटदनि एकर नाओं राजकुमारी राखि देल। श्रीमान, नामे अनुसार एकर व्यक्तत्व भऽ गेल छै। बड्ड गंभीर, बुझनुक आ मिलनसार अछि हमर राजकुमारी। बेटा नालायक भऽ गेल अछि। सदतिकाल नशामे धुत्त रहैत अछि। मुदा हमर ई बेटी बेटोक भूमिका करैत अछि हमरा सभ लेल। ऐ सभ कारणे एकर बियाह एखन धरि टालि रहल छी। अनेको रिश्ता लड़काबलासँ आबि रहल अछि। मुदा डर भऽ रहल अछि जे कहीं ई चलि गेल तँ हमर सभक की हाल हएत? इहो कहैत अछि, बाबा! हमरा िबयाह नै करक अछि। हम अहाँ सबहक सेवा करए चाहै छी। मुदा श्रीमान एना कहीं भेलैक अछि? बियाह तँ करेबे करबै। राजकुमारीक माए हमरा आब सदतिकाल खोचारैत रहैत छथि। कहै छथि- कियो बेटीकेँ भला अपना सुख लेल बिना ब्याहने अपना लग जिनगी भरि रखै छै? लोक की कहत? राजकुमारी नेनमतिमे ई बात कहि रहलि अछि जे बियाह नै करब। हमरा अहाँकेँ मृत्युक पश्चात एकरा के देखतै? आ श्रीमान हमरा राजकुमारीक मायकेँ बात कुनो अनरगलो नै लगैत अछि। हम तँ राघवजीक माएसँ सेहो निवेदन केलियनि अछि जे ओ राजकुमारी केँ बियाह लेल मनाबथि। राजकुमारी अहाँ लोकनिक बात मानैत अछि।” पिताजीक राजकुमारीक पितासँ वार्तालाप चलि रहल छलनि। आब हमरा राजकुमारीक नामक रहस्यक पता चलि गेल छल। राजकुमारी एहेन संस्कारी बेटी अछि जे अपना माता-पिताक कारण बियाहो नै करए चहैत अछि, ई जानि राजकुमारीक प्रति हम्मर श्रद्धा बढ़ि गेल। हमर पिता सेहो राजकुमारी आ ओकर व्यक्तिवसँ बड्ड प्रभावित भेलाह। क्रम अहिना चलैत रहलै। किछु दिनक बाद हम एक दिन ई अनुभव केलौं जे मंगनू मिस्त्री राजकुमारी दिस किछु बेसी आकर्षित भऽ रहल छल। ठीक एकर विपरीत राजकुमारी ओकरासँ दूर हेबाक प्रयास करैत छली। जखन हमरा मंगनू मिस्त्री देखलक तँ ओकरा अपन गलतिक अनुभूति भेलै। कहलक- “बौओ। अहाँकेँ मैनेजर साहेब ताकि रहल छलाह। हमरो पुछैत छलाह कि राघव कतए गेल अछि? अहाँ जल्दीसँ हुनका लग जाउ। शायद किछु अत्यावश्यक कार्य छन्हि। जाउ बउओ जल्दी जाउ।" हमरा भेल जे पिताजी हमरा तकने हेताह। आ हम तुरत पिताजी लग विदा भेलौं। हम जखने पिताजी लग जाए लगलौं तँ मंगनू मिस्त्रीक मोन प्रसन्न भऽ गेलै आ राजकुमारी किछु परेशान आ विवश बुझना गेल। तथापि हम पिताजी लग चलि गेलौं। आब चर्खाक कार्यशालामे राजकुमारी आ मंगनू मिस्त्रीक अलावे कियो नै छलै! राजकुमारीक व्यक्तिवमे किछु विशेष अवश्य छलै। ओ हमेशा बड्ड साफ-स्वच्छ वस्त्र धारण केने रहैत छलि। ओकर केश बड्ड नमहर आ झमटगर रहै। आँखि छोट मुदा पनिगर, दाँत दूध जकाँ उज्जर सफेद, गसल-गसल, शरीर ने मोटे आ ने पतरे, कद करीब पाँच फीट-पाँच ईंच। कनीक शिक्षा प्राप्त करबाक कारणे राजकुमारी स्नो-पोडर इत्यादि लगबैत छलि। ओ आन आदिवासी लड़की सभ जकाँ अपन शरीरमे कतौ गोदना नै गोदेने छलि। ओकर हाथ, गर्दनि, छातीक किछु भाग, नाभि प्रदेशक िकछु भाग आदि देखलासँ एना बुझना जाइ छलैक जेना ओकर समस्त शरीरमे कुनो दाग वा धब्बाक नामो निशान नै छै- Spotless beauty (स्पॉटलेस ब्यूटी, बिना दागक सौन्दर्य)!!! ओ हमरा हरदम अप्पन छोट भाए जकाँ सिनेह करैत छलि। यदा-कदा हमराले अपन गामसँ मधु, आम, खीरा, ककरी, नेबो एवं अन्य चीज अवश्य आनैत छलि। एक दिन मंगनू मिस्त्रीक संगे हम पुन: साइकिलपर चढ़ि राजकुमारीक गाम घुमए गेलौं। मंगनू मिस्त्री हमरा गामक मध्यमे बच्चा सभ लग छोड़ि देलक। हमहूँ ओइ बच्चा सभ संगे पाकल-पाकल बीजू आम तोरए लगलौं। एक कतिन बड्ड सिनेहसँ अप्पन बारीसँ कुन्दरी देलक आ कहलक- “राघव, अहाँ ई कुन्दरी मैनेजर साहेबले लेने जाउ। हुनका नीक लगै छन्हि।” हम कुन्दरीबला झोरा उठा लेलौं। पता चलल जे मंगनू राजकुमारीक घर गेल अछि ओकर चरखा ठीक करक हेतु। हमहूँ एक हम-वयस्क आदिवासी किशोर संगे राजकुमारीक घर दिस विदा भेलौं। हमरा लोकनिकेँ रस्तामे राजकुमारीक पिता करमा उराँव भेटल। ओ कहलक- राघवजी, हम तँ जंगल दिस जाड़नि लाबए जा रहल छी। मिस्त्री साहेब हमरे घरमे राजकुमारीक चरखाक भङठी कऽ रहल छथि। अहूँ सभ ओतए जाउ। करमा उराँव अप्पन हाथमे तेजगर आ भरिगर कुरहरि लेने छल। ओकर पत्नी चारिटा रस्सी लेने ओकरे संगे जंगल जाए रहल छलै। खएर, हम मस्तीमे चलैत राजकुमारीक अंगना लग एलौं। अंगनामे अबैत मातर बहुत विचित्र स्थितिक सामना करए पड़ल। एहेन स्थिति जकर कल्पनो नै केने रही। अंगनामे अबैत मातर देखै छी जे राजकुमारीक घरक दरबज्जा आधा ओटाएल आ आधा खुजल। राजकुमारीक कानक आवाज आबि रहल छलै। हमरा लोकनि जखन ओतए गेलौं तँ देखलौं जे मंगनू मिस्त्री राजकुमारीक संग बलजोरी शारीरिक सम्बन्ध स्थापित कऽ रहल अछि। राजकुमारीकेँ अपना बाँहपाशमे दबेने!! बिल्कुल हिंसक पशु जकाँ! अचानक राजकुमारीक धियान हमरा दिस गेलै। हम अपन गर्दनि मोड़ि वापस जाए लगलौं। राजकुमारी बहुत जोरसँ धक्का मारि मंगनू मिस्त्रीकेँ अपनासँ अलग केलक। मंगनू मिस्त्री पूर्णत: वस्त्रहीन छल। अतबा काल धरि हम आ आदिवासी किशोर राजकुमारीक अंगनासँ बाहर चलि आएल रही। लगभग १० मिनटक बाद मंगनू मिस्त्री हमरा लग आएल। साइकिल निकालैत कहलक- “चलू बउओ, आब वापस सेन्हा चलै छी। नै तँ अन्हारमे अनेरे परेशानी हएत। जंगल दने रस्ता छै। लोक सभ कहैत छल जे कखनो काल बाघ-भालू, हाथी आदि रस्तापर आबि जाइ छै।” हम बिना किछु कहने ओकर साइकिलक पाछाँ बैस रहलौं। आन बेर राजकुमारी जाइकाल हमरा भेँट करए अबै छलि। ओइ दिन नै आएलि। हमहूँ भगवानसँ यएह मनबैत रहलौं जे 'हे भगवान आइ हमरा राजकुमारीसँ दर्शन नै हुअए तँ बड्ड उत्तम।' मंगनू मिस्त्रीक साइकिलपर पाछाँ बैसल हम चुपचाप ओकरा संगे सेन्हा आबि रहल रही। रास्तामे कुनो तरहक वार्तालाप नै भेल। हमरा मोनमे मंगनू मिस्त्रीक प्रति घोर घृणा उत्पन्न भऽ गेल छल। ओ हमरा मनुक्ख कम राक्षस बेसी लगैत छल। मोन होइ छल ऐ पापीक घेंट दबा दी आ एकर जीवनक अन्त कऽ दी। मोनमे राजकुमारीक प्रति दयाक भाव सेहो आबि रहल छल। ओकर विवशता आ लाचारीपर चिंतित छलौं। होइ छल केना कऽ राजकुमारी अप्पन चेहरा हमरा देखाओत आ केना कऽ हम ओकरासँ बात करब!! मोनमे घृणा, आक्रोश, लाचारी, विवशता- तमाम भाव एक संगे आबि रहल छल। एकाएक मंगनू मिस्त्री साइकिल रोकि उतरि गेल। हमरा कहलक- “बौओ, कनी नीचाँ उतरू।” हम उतरि गेलौं। मंगनू हमरा कनीक डेराएल लागल। परेशान चेहरा, घामसँ तर-बतर, आँखि लाल-लाल, समस्त मुखाकृतिपर पश्चातापक भाव। ओ हमर हाथ पकड़ि बड़ा आत्मीय भावसँ जोरसँ दबेलक आ छोट बच्चा जकाँ कानए लागल। दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर झहड़ए आ मुँहसँ निकलए लगलै- “बउओ, अहाँ तँ हम्मर दुनू बेटासँ छोट छी। हमरासँ गलती भऽ गेल। माफ कऽ दिअ। हम अहाँक पएर पकड़ै छी। राजकुमारी सेहो अप्पन माथ-कपार पीट रहल छलि। बउओ, अगर अहाँ ई बात अप्पन माए-बाबूजीसँ कहबनि तँ हम आत्महत्या कऽ लेब। राजकुमारी सेहो अप्पन जीवनक अन्त कऽ लेत।” हम कहलियनि- “अहाँ एहेन काज किए केलौं?” तैपर मंगनू कहए लागल- “बउओ, गलती भऽ गेल। ई हम्मर जीवनक प्रथम आ अन्तिम गलती थिक। भविष्यमे आब कहियो एहन नै हएत। अहाँ अप्पन माए-बाबूजीसँ ऐ बातक चर्चा नै करबनि। हम अहाँक पएर पकड़ै छी।” हमरा मंगनू मिस्त्रीपर दया आबि गेल। हम कहलियनि- “ठीक छै, हम अप्पन माए-बाबूजीसँ ऐ सम्बन्धमे कुनो चर्चा नै करबनि।” हमर ऐ अश्वासनपर मंगनूक जान-मे-जान एलै। ओ हमरा नीक जकाँ जनैत छल, जे हम एकबेर जे बाजि देलौं से ब्रह्म-लकीर होइत छै। एकर बाद हमरा लोकनि सेन्हा आबि गेलौं। मंगनूक प्रति हमर मोनक घृणा आइयो धरि नै कम भेल अछि। ऐ घटनाक बाद हम दू मास धरि राजकुमारीक गाम नै गेलौं। घटनाक बादक १५5म दिनक बीटमे राजकुमारी नै अएलै। सूत लए बीट करक हेतु ओकर पिता करमा उराँव असगरे अएलै। करमा पिताजीकेँ कहलकनि जे राजकुमारीक तबियत ठीक नै छै। किछु दिनक बाद हम एक वर्ष लेल अपन गाम आबि गेलौं। गामेक स्कूलमे भैया नाओं लिखा देलनि। पुन: एक वर्षक पश्चात सेन्हा गेलौं तँ पता चलल जे राजकुमारीक बियाह भऽ गेलै आ ओ आब अपन पतिक संगे अप्पन सासुरमे रहैत अछि। चरखा ओ सासुरोमे कटैत छलि। सामान्यतया ओकर पति बीटक दिन केँ सूत लऽ कऽ आबि जाइ छलै। एक दिन एक महिला पाछाँसँ हमरा टोकलक- “राघवजी”! हम पाछाँ तकलौं तँ राजकुमारी छलि। एकदम पातर, रोगी जकाँ शरीर, आँखिक पानि गाएब, चेहराक लालिमा समाप्त, केश ओझराएल, फाटल मैल सनक नुआ पहिरने.....। पहिने तँ चिन्हेमे नै आएलि। फेर ओ स्वयं कहए लागलि- “बिमार पड़ल छी। डाक्टर कहैत अछि टी.वी. भऽ गेल अछि। बड्ड महग इलाज छै। कौहुना चला रहल छी। राघवजी, अहाँ कोना छी?” राजकुमारीक बगे देख हमर मोन खिन्न भऽ गेल। भेल एक लहलहाइत फूल असमैमे केना मुरझा गेलै? भगवान एकरा की केलथिन? अतबे कहलिऐ- “हम ठीक छी। कहियो अहाँक सासुर अवश्य आएब। जल्दीये आएब किएक तँ पिताजीक तबादला होबएबला छन्हि।” ई कहि हम अप्पन संगी सभ लग खेलाइले चलि गेलौं। तकर बाद करीब चारि मास धरि हम सेन्हा रहलौं। मुदा हम कहियो राजकुमारी लग नै गेलौं। आब हम राजकुमारीक ओइ मुरझाएल, बिमार आ आभाहीन मुखमण्डलकेँ नै देखए चाहै छी। एक दिन भोरे-भोर करमा उराँव हमर माए लग आबि कानए लागल। ओकर बूढ़ शरीर हीलए लगलै। माए पुछलथिन- “की भेल?” तँ करमा उराँव आरो जोरसँ ठोहिपाड़ि कानए लागल। बड़ी-कालक बाद टुटैत स्वरमे कहलकनि- “की कहू मालकिन, हमर राजकुमारीक दुनियाँ उजड़ि गेल। ओकर सर्वनाश भऽ गेलै।” हमरा माएकेँ भेलनि, शाइद राजकुमारीक पतिक देहान्त भऽ गेलै। चिंतित एवं व्यग्र होइत पुछलथिन- “साफ-साफ बाजू ने की भेलै राजकुमारीकेँ? अहाँ जमाएकेँ तँ ने किछु भेल?” तैपर करमा उराँव कहलकनि- “ओइ कसइयाकेँ किए किछु हेतै मालकिन। पहिने तँ हमरा बेटीकेँ दुखित कऽ देलक। फेर अवहेलना। तकर बाद दोसर बियाह कऽ लेलक। आब हम्मर जमाए आ ओकर सगही बहु, दुनू मिल कऽ राजकुमारीकेँ अपना घरसँ मारि-पीट कऽ भगा देलकै।” हम्मर माता-पिता एवं हम स्वयं करमा उराँवक ऐ व्यथासँ बड्ड द्रवित भेलौं। मुदा की कऽ सकै छलिऐ। कनी-कालक बाद भोजन बनलै। माए ओकरा बलजोरी भोजन करा देलथिन। एकटा नव नुआ, ब्लाउज, साया तथा तीन खण्ड पुरान नुआ राजकुमारीकेँ पहिरैले देलखिन। पिताजी किछु नगद सेहो देलखिन। एक मासक बाद पिताजीक स्थानान्तरण सेन्हासँ राँची भऽ गेलनि। हम सभ राँची आबि गेलौं। करीब एक वर्ष बीत गेलै। एक दिन राँची किछु समान लेबाक लेल मंगनू मिस्त्री अएलै। ओ हम्मर माएसँ भेँट करए अएलनि। अनेक तरहक बात भेलै। अन्तत: माए पुछलखिन- “राजकुमारीक की हाल? दोसर बियाह केलकै कि नै?” मंगनू मिस्त्री कहलकनि- “बियाह की करत बेचारी। ओ तँ ऐ दुनियेसँ विदा भऽ गेल। राजकुमारीक मरला करीब पाँच मास भऽ गेलै। पहिने बाप मरलै बादमे अपने दवाइ दारूक बेतरे कुहरि कऽ मरि गेल।” ई बात सुनि हम्मर माए बड्ड दुखी भेलीह। हमरा भेल- 'चलू नीक भेलै, बेचारीकेँ कष्टसँ मुक्ति भेट गेलै।' हँ मंगनूपर घोर तामस होइत छल। भेल ई आदमी १० बरिससँ टी.बी.सँ ग्रसित अछि मुदा नीक वस्तु सभ खा पी कऽ दवाइ लऽ कऽ सामान्य जीवन जीब रहल अछि। ई नीच, चरित्रहीन आ चूहर मिस्त्री अप्पन बिमारी राजकुमारीकेँ पटा देलकै। एक्के संग ओकर परिवारक सर्वनाश कऽ देलकै। भगवान एकरा किए नै कुनो दण्ड दैत छथिन!!! रातिमे हम असगरमे बड्ड कनलौं। मुदा अन्तत: ऐ बातक चैन जरूर छल जे आब बेचारी राजकुमारी संसारिक कष्ट आ यातनासँ आजाद भऽ गेल। पुनर्जन्मक बारेमे हमरा किछु नै बूझल अछि। अगर पुनर्जन्म होइ छै तँ हम भगवानसँ यएह प्रार्थना करबनि जे हे भगवान राजकुमारीकेँ अगिला जनममे कुनो राजाक घरमे सत्तेमे राजकुमारी बना देबै आ अगर संभव हुअए तँ ओकर बाप करमा उराँवकेँ राजा बना देबै आ तकरे बेटी राजकुमारीकेँ बनेबै। हे भगवान अगर राजकुमारीकेँ राजा घर नहियो जन्म देबै तँ ठीक मुदा ओकरा चूहर मंगनू मिस्त्री सनक घटिया आदमीसँ दूर रखबै। चन्दा राघवकेँ चन्दाक संगति सोहनगर लगैत छलन्हि। राघव आ चन्दा समवयस्क रहथि- लगभग पंद्रह बर्खक। दू-चारि मासक दुनूमे कियो छोट तँ कियो पैघ। चन्दा छलीह सांवरि, सुन्दरि। शरीरसँ पुष्ट मुदा लोथगर नै। सांवरि चाम मुदा चमकैत। आँखि मध्यम कदक मुदा रसगर। ठोर मोट मुदा चहटगर। नाक पातर आ नोक लेने। शाइद राघव केर दृष्टिमे सुन्दरताक नीक विवरण यएह छलन्हि। चन्दा छलीह चंचल, कनीक ठसकसँ भरल आ ऐ गुमानमे तनल जे ओ दबंग पिता एवं दबंग परिवारसँ छथि! चन्दाकेँ केवल दू बहिन आरो छलथिन्ह। एक्को भाइ नै। तँइ चन्दा अपनाकेँ बेटा बुझैत छलीह। पन्द्रहम वयसिमे अएलाक उपरान्तो चन्दा अपन उन्नत वक्षकेँ नै झपैत छलीह। ऐमे हुनक उदेस अपनाकेँ कामुक बनेबाक नै छलन्हि बल्कि बेटा जकाँ बेटी छथि तइ बातक गुमान छलन्हि! मुदा जुआनीक दरबज्जा खटखटबैत वक्ष, नाक, आँखिक गुमानसँ की मतलब! चन्दाक गुमानमे हुनकर शारीरिक अंग अपन कामुकताक भावकेँ अनेरे प्रदर्शन करए लगैत छलन्हि। आर-तँ-आर चन्दा राघव एवं अन्य समवयस्की छौड़ा सभ संगे कखनो कबड्डी तँ चोरा-नुक्की खेलाए लगैत छलीह। जखन कबड्डी खेलाइत छलीह तँ चेतऽकऽबऽड्डी..... डी...डी...डी... करैत हुनकर वक्ष सेहो शब्दक लयक संग संगीतक धुनमे मस्त भऽ ऊपर-नीचा होमए लगैत छलन्हि। कतेको बेर जखन चन्दा कबड्डी पढ़ैत राघव दिस अबैत छलीह, राघवकेँ मारबाक हेतु, तँ राघव चन्दाकेँ पकड़बाक प्रयास करैत छलाह। प्रयास ई जे चन्दाक साँस टूटि जाइन्हि। मुदा चन्दा ऐ प्रयासमे, जे बिना साँस तोड़ने राघवकेँ छू ली, आ बिना राघवक चंगुलमे कबड्डी पढ़ैत अपना दिसि आपस भऽ जाइ। एक-आध बेर चन्दा अपन रणनीतिमे सफलो भेलीह। मुदा अन्तत: छलीह लड़की। केना सकितथि, राघवक ठोस, बलिष्ठ कद-काठीक समक्ष? अधिकतर समैमे राघव चन्दाकेँ पकड़ि लैत छलथिन्ह। आब चन्दा राघवसँ अपनाकेँ छोड़ेबाक हेतु पूरा प्रयास करैत छलीह। राघव सेहो अपनाकेँ एे प्रयासमे लगा लैत छलाह जे बिना साँस टुटने चन्दा नै छुटथि। ऐ नोक-झोकमे बिना कुनो गलत भावनाक कतेको बेर छीना-झपटी करैत राघव केर हाथ अनायास चन्दाक वक्षपर लागि जाइत छलन्हि। चन्दा बुझैत छलीह जे राघव कुनो दोसर विचारसँ ई सभ नै कऽ रहलाह अछि। तँए चन्दाक मुँहपर कुनो तामस, लज्जाक भाव, प्रतिकार, घृणा आदिक भाव नै अबैत छलन्हि। बिल्कुल स्वभाविक रहैत छलीह। मुदा कहि नै किए राघवक कठाेर हाथक स्पर्शकेँ अनुभव करैत छलीह। हुनका किछु-किछु होमए लगैत छलन्हि। आँखि अनेरे आनन्दातिरेकमे मुना जाइत छलन्हि। की होइत छलन्हि तकरा ओ शाइद केवल अनुभव कऽ सकैत छलीह, ओकर बखान शब्दक माध्यमसँ संभव नै। एहने हालति राघवोक होइत छलन्हि। नहुु-नहु राघवकेँ एना लागए लगलन्हि जेना चन्दाक बगैर जीवन अर्थहीन हुअए। चन्दासँ जइ दिन राघव भेँट नै करथि तइ दिन मोन खिन्न भऽ जाइन्हि। चन्दा सेहो राघवसँ ओतबे सिनेह करैत छलीह। मुदा राघव आर चन्दाक सिनेह छल निश्छल! राघव छलाह आर्थिक रूपसँ विपन्न ब्राह्मण कुलक बालक। एकर ठीक विपरीत चन्दा छलीह एक सुभ्यस्य ब्राह्मण कन्या। चन्दाक पिताकेँ तेरह बीघा ठोस खेतिहर जमीन छलन्हि आ खूब नीक लगानी केर कार्य चलैत छलन्हि। चन्दाक पिताक नाओं छलन्हि बुलेसर। बुलेसर बलंठ छलाह। छह फुट्टा मर्द, पहलवान, केवल अपन नाओं आ संख्याक ज्ञान छलन्हि। लगानीक ललका बहीकेँ कऽ-टऽ कऽ लिखैत-पढ़ैत छलाह। गरीब लोक सभकेँ सूदिपर टाका दैत छलथिन्ह। बन्धकमे गहना, बर्तन, जमीनक कागत इत्यादि राखि लैत छलथिन्ह। सूदिक-दर-सूदि जखन गरीब लोक सभ आसिन-कातिक मासमे भूखे मरए लगैत छल तँ बुलेसर बाबू ओतए सबैया-डेओढ़ापर धान अथवा आन अन्न लेमए जाइत छला। बुलेसर बाबू अपने हाथे अन्न जोखैत छलाह। एक मोनक बदला हमेशा ३८ सेर दैत छलथिन्ह। ओहूमे अनाजमे धूल-माटि मिलल। छाँटल पखरा अथवा आन कुनो मोटका धान। आ लेबए काल एक मोनक बदला ४१ सेरक आसपास लैत छलाह। कतेको लोक पाइ दैयो दैत छलन्हि, तैयो अपन लगानीक ललका बहीसँ नाओं नै कटैत छलथिन्ह। चारि-पाँच बर्ख चुप भऽ जाइत छलाह। फेर एकाएक एक दिन बही लऽ कऽ ओइ व्यक्तिक घरपर महाजन बनि पहुँचि जाइत छलाह, तगेदा हेतु। बेचारा परेशान! मुदा अपन बलंठीसँ चूर बुलेसर बाबू ओइ व्यक्तिक गरदनि अपन गमछासँ जकड़ि लैत छलाह। फेर ओकरा लाचार कऽ दैत छलथिन्ह पंचैती बैसेबाक लेल। पंच की तँ छह-सात चमचाक दल। सभ बुलेसर बाबूक हँ-मे-हँ मिलबैबला। सभ हुनके सबहक बात कहएबला। बेचारा असहायक बातकेँ के सुनैत अछि? लाचार कऽ ओइ व्यक्तिसँ ओकर जमीन आर गहना इत्यादि हथिया लैत छलाह। अही प्रक्रियासँ चारि बीघासँ तेरह बीघा जमीन भऽ गेल छलन्हि बुलेसर बाबूकेँ। एकबेर तँ बुलेसर बाबू एहेन काज केलन्हि जेकरा लोक अखनो धरि नै बिसरल अछि- नृशंसकारी, जघन्य, हत्या समान, बल्कि साक्षात हत्या! एना भेलैक जे टुनटुनमा मलाह बुलेसर बाबूसँ अपन पत्नीक इलाजक हेतु तीन सए टाका सूदिपर लेलकन्हि। ई कहि जे छह मासमे सूदिक संग आपस कऽ देतन्हि। मुदा किछु कारणवश एक बर्ख धरि आपस नै कऽ सकलन्हि। एक दिन प्रचण्ड जाड़सँ कपैत टुनटुनमा राघवक दरबज्जापर आबि राघवक पितामह संगे घूर तापि रहल छल। ओ तमाकुल चुना राघवक पितामहकेँ देलकन्हि आ अपनो खेलक। किछु कालक बाद अपन एक लठैतक संग बुलेसर बाबू सेहो राघव केर दरबज्जापर घूर तापऽ आबि गेलाह। टुनटुनमाकेँ देखैत मातर हुनका तामस चढ़ि गेलन्हि। वीभत्स गारि देमए लगलथिन्ह ओकरा- “रौ बहान ...ोद! तूँ एखन धरि पाइ आपस नै केलेँ?” टुनटुनमा कहए लगलन्हि- “मालिक! हमर हाथ तंग अछि। बेटा कलकत्तासँ आबैबला अछि। अबिते मातर दऽ देब, बिथुत नै करब।” मुदा बुलेसर बाबूक तामसे दुर्वासा बनल छलाह। आरो गारि पढ़ैत गमछा टुनटुनमाक गरदनिमे फँसा उठा लेलथिन्ह। टुनटुनमा लाचार भऽ घेँघयाए लागल। बुलेसर बाबू सोहाइ चमेटा ओकरा कानक जड़िमे मारलथिन्ह। हे भगवान! जाड़क मास बुढ़ शरीर, भुखाएल पेट, जीने काया, बेचारा टुनटुनमाक कानसँ खून बहए लगलै। मुदा तखनो बुलेसर बाबूकेँ संतोष नै भेलन्हि। गमछासँ टुनटुनमाकेँ घिसियाबए लगलाह। ई देखि राघवकेँ पितामहकेँ भेलन्हि जे कहीं टुनटुनमा हुनके दरबज्जापर नै मरि जान्हि। ओ बीचमे आबि गेलाह आ कहलखिन्ह- “हौ बुलेसर! ई हमरा दरबज्जापर आएल अछि। मरि जएतै। अतए किछु नै करहक।” ऐ बातपर बुलेसर बाबू कहलखिन्ह- “ठीक छै कारी कक्का, हम ऐ सार मलहाकेँ धोबिया गाछी लऽ जाइ छी।” ई कहि टुनटुनमा गरदनिमे फँसाओल गमछा घिचैत ओकरा धोबिया गाछी दिसि लऽ गेलन्हि। मरैत कि नै करत, बेचारा टुनटुनमा जेना कसाइ लग गाए जाइत अछि तहिना बुलेसर बाबूक संग विदा भेल। आ बुलेसर बाबू जखन धोबिया गाछी गेलाह तँ एक लात मारि टुनटुनमाकेँ धरतीपर पाड़ि पुन: एक ऐँर मारलखिन्ह। फेर अपन ठेंगा ओकर निकासमार्ग -गुदामार्ग- मे घुसा देलथिन्ह। खूनक फुचुक्का निकलि पड़लैक। बेचारा ओतहि कनैत बेहोश भऽ गेल। मुदा बुलेसर बाबूक चेहरापर अफसोस पसरि गेलनि आ मुँहसँ निकलन्हि- “ठेंगो अपवित्र भऽ गेल!” टुनटुनमाकेँ ओतहि ओही हालतिमे छोड़ि ओ अपन घर दिसि विदा भऽ गेलाह। लगभग आधा घंटाक पछाति ऐ घटनाक जानकारी टुनटुनमाक बेटाकेँ भेलै। ओ ओकरा उठा कऽ घर लऽ गेलै। पैसा नै रहै तँए देसी दबाइ प्रारम्भ केलकै। भरि पेट खेबाक सेहो सामर्थ्य नै, तइ मनुक्खपर एहेन अत्याचार! बेचारा टुनटुनमा १० दिनक भीतर कराहि-कराहि कऽ मरि गेल। मनुक्खपर मनुक्ख द्वारा एहेन अत्याचार! हे भगवान किए नै देखै छी एहेन लोक सभकेँ। किछु अही तरहक विचार राघव लेल किशोरक मनमे अएलन्हि, जखन टुनटुनमाक सम्बन्धमे पता लगलन्हि। मुदा बुलेसर बाबूक हृदैपर कुनो प्रभाव नै पड़लन्हि। ओ अपन बलंठगिरीमे लागल रहलाह। बुलेसर बाबूक दू व्यक्तित्व छलन्हि। लहनाक मामलामे ओ बलंठ, हृदैहीन, कसाइ आ कईंया छलाह। ठीक एकर विपरीत पिताक रूपमे स्नेहशील, उदार आ अनुरागी। राघवकेँ चन्दाक नेनपनक दृश्य यादि आबए लगलन्हि। जखन चन्दा चारि-पाँच बर्खक छलीह तँ बुलेसर बाबू सदिकाल चन्दाकेँ अपना कन्हापर चढ़ेने रहैत छलाह। दुलारक अन्त नै। चन्दाकेँ सदिकाल चन्दा बेटा कहि सम्बोधित करैत छलाह। चन्दा अगर कुनो कारणे रूसि जाइत छलीह किंवा कनैत छलीह तँ बुलेसर बाबू चन्दाकेँ कोरामे उठा गीत गाबि-गाबि बौसैक प्रयास करैत छलाह। गीतक आखरि किछु ऐ प्रकारक होइ छलै- “चन्दा तोरे देबौ गे सभ धन तोरे देबौ गे तेरह बीघाक जोता चन्दा तोरे देबौ गे गहना तोरे देबौ गे सोना-रूपा तोरे देबौ गे....।” आ गुमानसँ तनल चन्दा शनै: शनै: कानब बन्न कए अपन पिताक चौरगर छातीसँ चिपकि जाइ छली। पिता-पुत्रीक अगाध प्रेम। एहेन प्रेम जइमे प्रेमाधिक्य आ सिनेहक धार सदिखन बहैत रहैत छल। राघवक किशोर मनमे बुलेसर बाबूक प्रति धोर घृणा उत्पन्न होमए लगलन्हि। मन होन्हि जे बुलेसराकेँ उठा कऽ पटकि दी बीच चौबट्टियापर, लाते-लाते खनि दी। मुदा ई हुनका नीक जकाँ ज्ञात छलन्हि जे बुलेसर बाबूक समक्ष हुनकर परिवारक अस्तित्व शून्य छलन्हि। आर-तँ-आर राघव केर पिता सेहो बुलेसर बाबूसँ ऋण लेने छलथिन्ह। फेर राघवकेँ विचार अएलन्हि जे किए नै चन्दासँ बात कएल जाए? मुदा फेर ओ अपनाकेँ चेतलाह। चन्दा तँ थिकीह अन्तत: बुलेसरेक बेटी ने। साँपक गर्भसँ कुनो हंस जन्म लेलकैक अछि। साँपक नेना साँपे जकाँ डसबे करतै। चन्दाकेँ कहने की लाभ? ऊपरसँ अगर चन्दा अपन पितासँ शिकाइत करतीह तँ हमरो घरमे विपत्तिक भूकम्प आबि जाएत! ...ई सोचैत राघव चुप्पी साधि लेलन्हि। मुदा जखन-जखन टुनटुनमा बेटाकेँ बापक कर्म करैत देखैत छलाह तखन-तखन घृणा आ पश्चातापक ज्वारिमे जरए लगैत छलाह। मुदा छलाह बेवश! लचार!! मरैत लोक की नै करैए!!! कहि नै किए चन्दा राघवक बिना अपनाकेँ अनेरे बेचैन अनुभव करए लगली। एकबेर राघव आठ दिनक हेतु मातृक गेलाह, चन्दाकेँ बिना कहने। चन्दा राघव केर घर लगका पोखरिमे नहाए अएलीह। जखन राघवकेँ नै देखलन्हि तँ मनमे ई भेलन्हि जे राघव कतौ इम्हर-उम्हर चलि गेल छथि किछु क्षणक हेतु। मन तँ नै लगलन्हि। चुप-चाप जल्दी-जल्दी स्त्रगनाही घाटपर जाए पोखरिमे डुम देलीह। एक लोटा अछिंजल लए ओतुक्के पंचमुखी महादेवपर आधा मनसँ जल ढारलन्हि। राघवसँ भेँट नै भेलन्हि ऐ बातक कचोट करैत घर चलि गेलीह। घर जाए आधा मनसँ आधा-छीधा अन्न खेलीह आ सोझे आमक गाछी आम ओगरए लेल चलि अएलीह। आमोक गाछीमे चन्दाकेँ मन नै लगलन्हि। चन्दा मोने-मन भगवानसँ प्रार्थना करए लगलीह- “हे भगवान! जल्दी-जल्दी राति करू। सूति रही। जल्दी-जल्दी भोर करू जे राघव भेट जाए।” मुदा राघव तँ आठ दिनक हेतु गामेसँ बाहर भऽ गेल छलाह। खएर! चन्दा मुन्हारि साँझक बाद घर अएलीह। माय पुछलखिन्ह-“चन्दा, अतेक देरीसँ किअए अएलेँहँ?” चन्दा बजलीह- “चोरा सभ आम तोड़बाक फिराकमे छल। सोचलौं जखन मखना रखबार आबि जाएत तखने कलम छोड़ब।” चन्दाक ऐ जबाबसँ प्रसन्न भऽ बुलेसर बाबू अपन सीना चौड़ा करैत पत्नीकेँ कहलखिन्ह- “बुझलिऐ, कतेक ज्ञानी आ बुझनुक अछि अप्पन चन्दा? चन्दा सन भगवान अगर बेटी देथि तँ बेटाक कुन प्रयोजन?” तइपर चन्दाक माय कहलखिन्ह- “अहाँ अनेरे बजैत छी। लड़कीकेँ कुनो हालतिमे साँझ भेला उत्तर घरसँ बाहर नै रहबाक चाही। समए-साल खराप चलि रहल छै। कुनो ऊँच-नीच भऽ गेलै तँ की हेतै।” मुदा बुलेसर बाबू कतए चुप हुअएबला छलाह। कहलखिन्ह- “की बाजि रहल छी? केकरा हिम्मति छै जे हमर चन्दा संग कनीकबो बद्तमीजी करए। जे सोचबो करत तकर आँखि निकालि लेबै।” मुदा चन्दा अपन माता-पिताक वाक्-युद्धमे हिस्सा नै लेलन्हि। बिना कुनो हर्ष-विषादक चुपचाप ठाढ़ि रहलीह। चन्दा मोने-मन प्रसन्न भेलीह- “चलू, बाबूजी हमरा अतेक सिनेह करैत छथि। हे भगवान! जन्म-जन्म भरि एहने पिता देब। ओना माइयो कुनो अधलाह नै कहलनि। अतेक साँझ धरि आमक गाछीमे हमरा नै रहबाक चाही।” मुदा माता-पिताक प्रसंगसँ चन्दाकेँ एक लाभ ई भेलनि जे चन्दा राघवक कमीकेँ किछु क्षणक हेतु बिसरि गेलीह। भोजन-भात करैत रातिक आठ बाजि गेलै। चन्दा अपन दू छोट बहिन सबहिक संग सूति रहलीह। कनीकाल राघवकेँ स्मरण एलन्हि। तामसो चढ़लन्हि- “कतए चलि गेलाह राघव! भेँट नै भेलाह।” फेर भेलन्हि, “भऽ सकैत अछि कुनो प्रयोजनसँ कतौ गेल होथि। काल्हि तँ भेँट भइये जाएत। मोन भेलन्हि, राघवकेँ पुछबनि जे कतए गेल रही। मुदा लोक अगर सुनत तँ की कहत। राघव सेहो की सोचताह! फेर विचारलन्हि, किछु नै कहबन्हि।” अही तरहक अनेक विचारक श्रृंखलामे चन्दा तल्लीन भऽ गेलीह। पता नै सोचैत-सोचैत कखन निसभेर भऽ गेलीह। भोरे उठि चन्दा नवका पोखरि दिस स्नान करक हेतु विदा भेलीह। सोमक दिन रहै। माय कहलथिन्ह- “चन्दा, पंचमुखी महादेवकेँ आइसँ हरेक सोम एगारह लोटा अछिंजल चढ़ाउ। गंगेश पण्डित कहलन्हि अछि जे ऐसँ अहाँक कल्याण हएत।” बुलेसर बाबू पत्नीसँ पुछलखिन्ह- “गंगेश पण्डितजी कल्याणक अर्थ की कहलन्हि?” चन्दाक माय- “कल्याणक अर्थ ई भेल जे चन्दाकेँ योग्य घर-वर भेटतनि। सोम दिन महादेव आ पार्वतीक दिन छन्हि। सोमक जल ढारक बड्ड महत छै। तइसँ सोचलौं, गंगेश पण्डित जीक उक्तिसँ चन्दाकेँ अवगत करा दियन्हि।” बुलेसर बाबू पत्नीक बातकेँ स्वीकृति गर्दनि हिला देलखिन्हि। किछु बजलाह नै। मोने-मन भोलानाथसँ व्याहुत बेटी लेल नीक वरक वरदान अवश्य मंगलन्हि। सभकेँ ठसकसँ लगानीपर द्रव्य आ वस्तु देनिहारक हाथ आइ भगवान भोलानाथ लग आर्त-भावसँ लेबाक लेल पसरल छलन्हि। कनीक क्षण लेल अनुभव भेलन्हि जे बेटीक बाप भेनाइ केकरा कहैत छैक!! खएर! चन्दा फुलडाली, फुलही लोटा, वस्त्र, बांसक कर्चीक दतमनि लऽ नवका पोखरि दिस विदा भेलीह। एकपेरिया रस्तामे चलैत मोने-मन उमंगमे डूमल जे आइ राघवसँ भेँट हएत। उल्लसित मोनसँ चलैत नायिका सेहो एकपेरिया रस्तापर अपन शरीर आ सोचक संग एक अनुपम सामंजस्य स्थापित कऽ लैत अछि। मोन जेना-जेना अपन सोचमे उतार-चढ़ाव, गति, उद्वेग, तरंग अनै छै, तहिना शरीरक अंग सभ प्रदर्शन कए मोनक भावनाकेँ व्यक्त करै छै। चन्दो संग सएह भेलन्हि। भरि रस्ता चन्दा कखनो राघव तँ कखनो अपन माइक कहल आदेशक सम्बन्धमे सोचैत रहली। राघवपर चन्दाकेँ तामस आ सिनेहक भाव एक्के संग आबए लगलन्हि। तामस ऐ हेतु जे राघव कतए गेला बिना कहने। सिनेह ऐ दुआरे जे राघव बड्ड नीक लोक अछि। सोचलन्हि- गरीब तँ छथि राघव, मुदा छथि व्यवहार आ विचारसँ नीक। चन्दाकेँ एक क्षण लेल पहिल बेर ई एहसास भेलन्हि जे शायद राघव हुनका जीवनमे बहुत पैघ स्थान रखैत छथिन्ह। चन्दाकेँ यादि आबए लगलन्हि कबड्डी आ नूका-चोरी। चन्दाकेँ यादि एलन्हि तीन-चारि वर्ष पूर्वक एक घटना जखन चन्दा किछु आर लड़का-लड़की संगे मिलि कऽ कनिया-पुतराक खेल खेलाइत छलीह। राघव सेहो अइ खेलक पात्र छलाह। राघवक घरमे कियो नै रहन्हि। दुपहरियाक समए छलै। पाँच-छह नेना सभ कनिया-पुतरा खेलाए लागल। भेलै ई जे ऐ खेलमे एक वर आ एक कनिया हेतै। कनियाक पिता आ माता हेतै। वर आ कनियाक बिआह हेतै। गीत-नाद आ विधि बेवहार हेतै। चन्दा बनलनि कनिया आ राघव बनला वर। दुनुक बिआह भेलन्हि। गीत-नाद भेलै। चतुर्थी भेलन्हि। कोहबर बनलै। कोहबर घरमे चन्दा आ राघव वर कनिया बनि आराम करए गेलाह। कोहबर घर की तँ राघवक पिताक मच्छरदानी टांगि ओकर चारू कात नूआसँ झांपि देल गेलै। राघव आ चन्दाकेँ कोहबर घरमे राखि सभ बच्चा सभ थोड़ेक कालक हेतु बाहर चलि गेल। राघव आ चन्दा अपना-आपकेँ ठीकेमे वर-कनियाँ मानि एक दोसरकेँ पकड़ि सूति रहला। कनीक-कालक बाद बच्चा सभ आबि गेलै। चन्दा यएह सभ सोचैत-सोचैत नवका पोखरि दिस जाइत छलीह। कखनो कमर लचकन्हि तँ कखनो वक्ष हिलए लगन्हि। कखनो नितम्ब डग-मग करए लगन्हि तँ कखनो आनंदातिरेकमे अबिते चलबाक गति तेज भऽ जाइन्हि। जखन तेज चलथि तँ वक्ष आ जखन नहु-नहु आनन्दित होइत चलथि तँ नितम्ब डोलए लागन्हि। दुनू अवस्थामे चन्दा लगैत छलीह सुन्दरि, आकर्षक......। फेर चन्दाकेँ भेलन्हि जे राघव तँ हमर कुनो मूलो-गोत्रक नै छथि। तखन की चन्दा आ राघवक बिआह भऽ सकैत छन्हि? फेर सोचलन्हि, केना हेतै? एक्के टोलमे जे छी। आर राघव तँ गरीब घरसँ छथि। हमर पिता कखनो ऐ लेल तैयार नै हेताह। ई सोचैत चन्दाक चालि मध्यम भऽ जाइन्हि। माथपर पसीना आबए लगलन्हि। चेहरा उदास भऽ गेलन्हि। मुदा सुन्दरता अपन दोसर रूपमे प्रस्फुटित होइत रहलन्हि। नितम्ब नहु-नहु उभार प्रदर्शित करए लगलन्हि। आब चन्दा अपन बिआहक संबंधमे सोचए लगलीह। केकरासँ बिअाह हएत? ओ लड़का केहेन हेतै! हमरा संग ठीक बेवहार करत की नै? छोटकी बहिन सभक जिम्मेवारी माय असगरि केना सम्हारतीह। आदि-आदि। फेर चन्दा अपना-आपकेँ भगवान भोलानाथपर छोड़ि देलन्हि। मोने-मन गाबए लगलीह- “पूजाक हेतु शंकर, आएल छी हम भिखारी।” यएह सोचैत-सोचैत चन्दा आबि गेलीह नवका पोखरि लग। पोखरिसँ ठीक पहिने राघव केर दलान। दलानपर राघवकेँ पुन: नै देखलखिन्ह। मोन रोष आ अव्यक्त विरहसँ विदग्ध भऽ गेलन्हि। चारू कात देखलनि। मुदा राघव कतौ नै। चन्दाक मुँह ओइ फूल जकाँ मुरझा गेलन्हि जकरा तोड़ि लोक जेठक प्रचण्ड रौदमे छोड़ि दै छै। निष्ठुर राघव किए कतौ बिना कहने चलि गेलै? खएर! चन्दा चारू कात राघवकेँ तकलन्हि। मुदा राघव जखन घरपर रहतथि तखन ने चन्दाकेँ भेट होइतन्हि। अन्तमे चन्दा मन्दिरक पाछाँ फुलवारीमे फूल लोढ़ए गेलीह। चम्पाक गाछमे पीअर-पीअर रमनगर आ सुगन्धित चम्पा फुलाएल रहै। रहैक मुदा बड़ उँचका ठाढ़िपर फुलाएल। चंदा सोचलीह, चलू अही बहाने राघवक घर जाइत छी। ई सोचैत चंदा राघवक घरपर आबि गेलीह। राघवक मायकेँ पुछलखिन्ह- “काकी, हमरा चम्पा-फूल पंचमुखी महादेवकेँ चढ़ेबाक अछि। मुदा फूल तँ बड्ड उँचका डारिपर फड़ल छै। हम नै पबैत छी। कनी राघवकेँ कहबनि जे किछु फूल तोड़ि देताह?” राघवक माय कहलखिन्ह- “बुच्ची, राघव तँ मातृक काल्हि भाेरे गेल। कलकत्तासँ ओकर छोटका मामा-मामी सपरिवार आएल छथिन्ह। कहि कऽ गेल अछि जे सात-आठ दिनक बाद आओत। आब अहीं कहू जे केना फूल टुटत?” फेर किछु देर सोचैत राघव केर माय अंगनासँ एक गोट पाहुनकेँ बजेलखन्हि। जे जरैलसँ अपन बहिन लग आएल छलाह। ओइ पाहुनकेँ कहलखिन्ह- “यौ पाहुन, ई थिकीह चन्दा, हम्मर गामक बेटी। हिनकर पिता बड्ड कलामा। ई भगवान पंचमुखी महादेवकेँ चढ़ेबाक लेल किछु चम्पा फूल तोड़ए चाहैत छथि। मुदा फूल गाछक फुनगीपर लागल छै। कनी अहाँ हिनका फूल तोड़ि दियौन्ह। फूल तोड़ैबलाकेँ सेहो फूल चढ़बैबला अतेक धर्म होइ छै। राघव रहैत तँ कुनो बाते नै। ओ मातृक गेल अछि। कनी, अहीं फूल तोड़ि दियौन्ह चन्दाकेँ।” पाहुन हाथमे लग्गी लऽ बिना किछु कहने चम्पा फूल तोड़ए लेल चन्दा संग बिदा भेलाह। चन्दाक मुँह जेना लटकि गेलन्हि। गाल जेना सियाह भऽ गेलन्हि। आँखि नोराह भऽ गेलन्हि। ठोर सुखाए लगलन्हि। छाती धरकए लगलन्हि। मुदा जवानी केर दरबज्जापर आबि गेल चन्दा सोचलनि जे कनिया काकी अर्थात् राघवक मायकेँ धन्यवाद अवश्य देल जाए। जाइत-जाइत कहनखिन्ह- “कनियाँ काकी, पाहुन खराप तँ नै सोचताह?” राघवक माय झट दऽ उत्तर देलखिन्ह- “की सोचै छी बुच्ची? पाहुन आन कियो नै छथि। जरैलवाली कनियाँक भाय छथिन। बहिनक ननदि लेल फूल कनी तोरि देलखिन्ह तँ की भऽ जेतन्हि। अहाँ निश्चिन्तसँ जाउ।” चम्पा फूल अपन फुलडालीमे राखि चंदा स्त्रीगनाही घाटमे स्नान केलनि। माइक आज्ञाकेँ मानैत डोले-डोले अछिंजल लऽ एगारह लोटा जल पंचमुखी महादेवक ऊपर ढाड़लनि। लगभग १५ मिनट धरि महेशवानी, नचारी इत्यादि सेहो गौलीह। आ अन्तत: घर दिस बिदा भेलीह। घरपर माय पुछलखिन्ह- “चन्दा, पंचमुखी महादेवकेँ जल चढ़ेलौं बेटी?” चन्दा बिना किछु कहने गर्दनि हिलबैत हँ कहि देलखिन्ह। माइक मोन तिरपीत। जल्दीसँ चन्दाक आगूमे भोजन परसि देलखिन्ह। मुदा चन्दा मोनसँ नै खेलीह। राघवक यादिमे डुमल रहलीह। केकरो लग नै बजलीह अपन वेदना। समए बीतए लगलै। एक दिन बुलेसर बाबूक पत्नी अर्थात् चन्दाक माय बुलेसर बाबूकेँ कहलखिन्ह- “सुनै छी, चन्दा आब बिआह जोगरक भऽ गेल अछि। हमरा सभक बेटा ई तीनू बेटिये अछि। तँए नीक घर-वर ताकि ऐ तीनूक बिआह कऽ दिऔ। सम्पति राखि की करब? जखन तीनू बेटीक बिआह भऽ जाएत आ ओ सभ अपन-अपन सासुर बसए लागत तँ घराड़ी आ किछु कलम छोड़ि तमाम सम्पति बेच, सभ पैसाकेँ बैंकमे राखि अपने दुनू प्राणी काशी चलि जाएब। बैंकक सूदिसँ जीवन चलत। नौमनी तीनू बहिनकेँ बना देबै। मुदा ई सभ तखन सम्भव अछि जखन अहाँ जीमन, लगानी, वस्तु, पैसा इत्यादिक बँटवारा कऽ लेब। कहियनु कन्हाइ बाबूकेँ जे बाँटि कऽ सभ वस्तु व हिस्सा बराबरि कऽ कऽ दऽ देथि।” बुलेसर बाबू कहलखिन्ह- “हँ, हँ। कन्हैया किए नै देत। ओकरा तँ तरीकासँ हमरा जेठांस देमाक चाही। बपौती सम्पतिक अलाबे जे अर्जन भेल अछि तइमे हम्मर योगदान कन्हैयासँ बहुत बेशी अछि। हम काल्हिये कन्हैय्या लग ई प्रस्ताव राखैत छी।” बुलेसरकेँ पत्नी कहलखिन्ह- “जखन कन्हाइ बाबू दऽ देताह तखने कहब। कहि नै किएक हम मोन बड्ड घबरा रहल अछि।” बुलेसर बाबू बजलाह- “अहाँ अनेरे घबराइ छी। स्त्री छी स्त्रीगन जकाँ रहू। जाउ भोजन-भात बनाउ गऽ। हम काल्हिये कन्हैया लग ई प्रस्ताव राखब आ एक मासक भीतर सभ चीज बाँटि लेब। फेर नीक जकाँ तीनू बेटीक बिआह करब। आब ऐ केर अलाबा हमरा सभक कार्ये की?” दोसर दिन दुपहरमे बुलेसर बाबू दरबज्जापर अपन छोट भाए कन्हाइ बाबू लग बैसल रहथि। कन्हाइ बाबू कनीक बुलेसर बाबूसँ ज्यादा पढ़ल छलाह। मुदा पाँचसँ ज्यादे नै। एक नम्बरक घुइयाँ आ कइयाँ। कन्हाइ बाबूकेँ चारि बालक आ दू बालिका। बालक सभ पढ़ैमे भोथ मुदा कन्हाइ बाबू घरेमे मिडिल स्कूल केर एक मास्टर साहेबकेँ रखैत छलाह। हुनका मुफ्तमे भोजन आ रहबाक व्यवस्था कऽ देने छलखिन्ह। कखनौं कालकेँ किछु आर्थिक मदति सेहो कऽ दैत छलखिन्ह। कृतज्ञ मास्टर नियमित रूपसँ कन्हाइ बाबूक भोथ आ नालायक बेटा सभकेँ पढ़बैत रहैत छलाह। कन्हाइ बाबू चोरा-चोरा कऽ पैसा इत्यादि अपन पत्नी तथा बेटा सबहक नामसँ गामक पोस्ट आॅफिस तथा अपन सासुरमे रखैत छलाह। ऐ बातक जानकारी बुलेसर बाबूकेँ नै छलन्हि। कन्हाइ बाबू मोने-मोने ई प्लान कऽ रहल छलाह जे बुलेसर बाबूक बेटीक बिआह कुनो सामान्य परिवारमे करा बुलेसर बाबूक तमाम जमीन आ चल-अचल सम्पतिकेँ हथिया लेताह। बुलेसर बाबू कहलखिन्ह- “कन्हैया, हम आ तूँ दुनू भाँइ एके संग रहलौं। मिल कऽ सम्पति बनेलौं। तोरा भगवान चारिटा लड़का देने छथुन्ह। मुदा हमरा तीनटा बेटिये अछि। ई तीनू बेटी हमरा लेल बेटासँ कम नै अछि। आब चन्दा बिआह जोगरक भऽ गेल अछि। आनो सभ उपरे-नीचाँ छै। चन्दाक माय हमरा सदिखन एकर सबहिक बिआह करा देबक हेतु कहैत रहैत छथि। हम सोचैत छी, जे मरला उत्तर हम्मर सम्पतिक हकदार यएह सभ हएत। फेर हम अपन जिबैत सम्पति बेचि एकरा सभकेँ नीक घरमे किए नै बिआह करा दिऐ? मुदा हमरा तँ अधिकार केवल अपन हिस्सापर अछि। सझिया-साझपर नै। तँए दुनू भाँइ अपन तमाम सम्पतिक बँटवारा कऽ लैत छी। तोहर की विचार, तों अनेरे चिन्ता नै कर।” ई बात होइते रहैक तावतेमे चन्दाक माय आंगनसँ दरबज्जापर आबि गेलीह। कहए लगलखिन्ह- “सभ चीज ठीक छै कन्हाइ बाबू। मुदा बँटवारा तँ भऽ जेबाक चाही। सझिया-साझमे हमरा समस्या अछि, कुनो चीज करहौक मन हएत तँ मोन मसौसि कऽ रहए पड़त। बिआह-दानक बाद जे सम्पति रहतै से अहुना अहींक बच्चा सभक रहत। अहाँ हमरा सभकेँ सभ सम्पति बाँटि दिअ।” कन्हाइ बाबू ऐ बातपर चिचिआइत बजलाह- “भौजी! अहाँ आंगन जाउ। हमरा दुनू भैयारीमे अहाँ नै बाजू। हमरा सभकेँ जेना हएत तेना करब। अहाँ जाउ। लप्प दनी दरबज्जापर आबि जाइत छी। जएब की नै?” बुलेसर बाबू बीचेमे अपन पत्नीक बातक समर्थन करैत बाजि उठलाह- “कन्हैया, भौजी तँ वएह बात कहै छथुन्ह जे हम कहि रहल छिअह। तों तामस नै करऽ आ सम्पति बाँटि लए। सभटा लहनाक बही, द्रव्य-जात, पैसा इत्यादि एकठाम करऽ आ बाँटऽ।” कन्हैया तामसे घोर भऽ गेलाह। कहए लगलखिन्ह- “भैया, लगानीमे बारह अना हम्मर अछि, केवल चारि अना तोहर। तों घरमे जोखैत छेँ, खेती करैत छेँ। हम चारू बापुत गामे-गामे, घरे-घरे जा कऽ तगादा करैत छी आ डुमल पाइ वापस लबैत छी।” बुलेसर बाबूकेँ आँखिक आगू अन्हार भऽ गेलन्हि। बजलाह- “हम की नै केलौं। कर्म-कुकर्म सभ। राति-दिन तोहर संग देलियौ। लोक सभसँ झगड़ा-फसाद केलौं। आब कहैत छेँ जे द्रव्य-जात एवं पैसापर हम्मर हक केवल चारि आना? हे भगवानक डांगसँ डर कन्हैया!!! चल पाँचटा पंच बैसबैत छी। काल्हिये ऐ बातक निबटारा भऽ जेबाक चाही।” कन्हैया कहलखिन्ह- “निबटारा की हेतै भैया, निबटारा भेले बूझऽ। तोरा चारि आना हिस्सा भेटतऽ द्रव्य-जात अा लहनामे।” ई कहि कन्हैया अपन बड़ाका बेटाकेँ लगानी बला सन्दूकक चाभी देमए लगलाह।” ई चीज बुलेसर बाबूकेँ बरर्दास्त नै भेलन्हि। तुरत झपटि कऽ चाभी छीनि लेलन्हि आ बाजए लगलाह- “रे ककर मजाल छै जे हमर आधा हिस्सा रोकि लेत। तकरा कुट्टी-कुट्टी काटि देबै।” बुलेसर बाबू सन्दूकक चाभी छीनि घर दिस बिदा भेलाह। पाछाँसँ कन्हाइ बाबू हुनका भरि-पाज कऽ पकड़लन्हि आ हुनकर हाथसँ चाभी छीनए लगलाह। बुलेसर बाबू छलाह बलिस्ठ। एकै बेरमे कन्हाइकेँ उठा कऽ पटकि हुनकर छातीपर चढ़ि गेलाह। मुदा पाछाँसँ कन्हाइ केर ई बालक लाठी लऽ ताबर-तोर बुलेसर बाबूपर प्रहार कऽ देलकन्हि। कपार फूटि गेलन्हि। माथक शोनित पोछए लगलाह। अतबेमे कन्हाइ बाबू हुनकर हाथसँ चाभी छीनए लगलथिन्ह। मुदा बुलेसर बाबू चाभी नै देलखिन्ह। आब कन्हाइ बाबू तीनू-बाप बेटा मिल बुलेसर बाबूपर प्रहार करए लगलखिन्ह। हत्थम, लत्तम, जुत्तम आ लाठीक प्रहार। असगर बुलेसर बाबू की करितथि? देह चूर-चूर भऽ गेलन्हि। चाभी सेहो छिना गेलन्हि। बेचारी पत्नी लाचार भऽ अपन देअर आ देअरक बेटा सभकेँ गारि दैत रहलीह। सरापैत रहतीह। “निपुत्रापर हाथ उठेलक अछि। सर्वनाश भऽ जएतै। तड़पि-तड़पि कऽ मरत कन्हैया सरधुआ! कुस्टी फुटतै। वाक् बन्द भऽ जएतै। देहसँ गन्ध निकलतै। अपन संतान आ घरवाली तक काज नै अएतै।” बुलेसर बाबूक पत्नी गारि पढ़ैत रहलीह आ अपन ढेर भेल पतिकेँ मरहम पट्टी करैत रहलीह। कनीक कालक बाद चौकसँ जीतू कम्पाउण्डर अएलाह आ बुलेसर बाबूकेँ मल्हम-पट्टी केलन्हि। दर्द बड्ड रहन्हि, तकर निवारण हेतु दूटा सूइ आ बहुत रास दवाइ सेहो देलकन्हि। बुलेसर बाबू कराहैत रहलाह। छटपटाइत रहलाह। चंदा पाथर भेल ठाढ़ छलीह। आँखिसँ नोर दहो-बहो खसैत रहलन्हि। गुमान जेना धरासाइ भऽ गेली। जखन ऐ घटनाक जानकारी राघवकेँ भेटलन्हि तँ राघव मोने-मोन बड़ प्रसन्न भेलाह। राघवकेँ भेलन्हि जे आइ टुनटुन मलाहक अपमान आ ओकरा सतेबाक बदला बुलेसरकेँ नीक जकाँ भेटलन्हि। हलाँकि भोरे-भोर जखन पोखरिक कछेरपर चन्दाक मुँहकेँ देखलनि तँ कनीक कष्ट जरूर भेलन्हि। सदतिकाल गुमान आ ठसकसँ चूर चन्दा आइ ग्लानि आ वेदनाक मुद्रामे छलीह, खिन्न आ शान्त। शाइद असहाय सेहो। फेर यादि अएलन्हि बेचारा लाचार मल्लाहक दशा- आइ गाय जकाँ जे ई जनैत अछि जे ओ कसाइ लग बाध्य हेबाक लेल जा रहल अछि। तथापि ओ लाचार भऽ डंटाक भयसँ जाइत अछि कसाइखानामे। तहिना अपन फँसल गर्दनिक संग असहाय भय टुनटुन बुलेसर बाबू संगे अखाड़ा गाछी गेल छल। आ ओतए एहन यातना भेटलै जे ओही बेथे तड़पि-तड़पि कऽ प्राण तियागि देलक। जखन राघवकेँ ई बात सभ स्मरण अएलन्हि तँ फेर मोन प्रसन्न भेलन्हि। सोचलाह- “नीक भेल सार बुलेसरेकेँ! कसाइ बनैत छल। अपन तागति आ सम्पतिक नाशामे बतहा कुकुड़ बनल छल। आब बुझह।” मुदा राघव चन्दाक प्रति प्रेमक भाव रखैत छलाह। कहि नै किए चन्दा सेहो राघवसँ कम सिनेह नै करैत छली। ऐ घटनाक तीन दिनक बाद चन्दा दुपहरमे नवका पोखरिपर आबि पंचमुखी महादेवक मन्दिर केर पाछाँ फुलवारीमे अएलीह। राघव ओतय पहिनेसँ छलाह। आर कियो नै छलै। राघवकेँ देखैत चन्दा कहलखिन्ह- “राघव, अहाँकेँ एगो बात बूझल अछि?” राघव बजलाह- “की?” चन्दा कहलखिन्ह- “कन्हाइ काका हम्मर पिताकेँ बड्ड मारलखिन्ह अछि। हमर पिता छलाह असगर आ कन्हाइ काका तीन बापुत। गलती हमर पिताक केवल एतेक, जे ओ कहलखिन्ह जे तमाम सम्पतिक बँटबारा कऽ लिअ। ओ सभ जानवर जकाँ मारलकन्हि। कपार फोड़ि देलकन्हि। शरीरमे कम-सँ-कम २५ लाठी लागल छन्हि। पपियाहा चण्डेश्वर पंच जे अपनाकेँ सरकार बुझैत अछि, हमर पिताकेँ थाना नै जाए देलकन्हि। कहलकन्हि जे ऐसँ कन्यादानमे व्यवधान हएत। की ई हेबाक चाही?” राघव बजलाह- “हँ चन्दा, हमरा सभ बात काल्हि जखन हम मातृकसँ एलौं, तँ ज्ञात भेल।” एकाएक राघव केर धियान चन्दा दिस गेलन्हि तँ देखैत छथि चन्दाक आँखिसँ नोर खसि रहल छन्हि। राघव केर मोनमे चन्दाक प्रति दयाक भाव उमरि गेलन्हि। चन्दा लग गेलाह आ अपन गमछासँ चन्दाक नोर पोछए लगलाह। फुलवारीमे राघव आ चन्दाक अलाबे आर कियो नै छलै। चन्दो राघवकेँ पकड़ि कानए लगलीह। राघव चन्दाकेँ भरि पाँज कऽ पकड़ि लेलन्हि। राघवकेँ चन्दाक हृदैक धरकन स्पष्ट सुनाइत छलन्हि। बुझेलनि जेना चन्दा आ राघव हमेशाक लेल एक भऽ गेल छथि। चन्दा सेहो राघवक बाहिसँ ग्रसित भऽ अपनाकेँ सुरक्षित बुझैत छलीह। मुदा कनीकबे कालक बाद दुनू अलग भऽ गेलाह। भेलन्हि लोक देखत तँ की कहत??? कन्हाइ बाबू पंच लोकनिकेँ कहलखिन्ह- “अहाँ सभ चारिम दिन बैसारमे आउ। हम आब बुलेसर भैय्यासँ बँटबारा कऽ लेब।” इम्हर कन्हाइ बाबूक बेटा आ पत्नी सभ मिलि कऽ दलाल रूपी लोभी पंच सभकेँ किछु-किछु प्रलोभन दऽ सभकेँ अपना पक्षमे कऽ लेलन्हि। ऐ तमाम प्लॉटसँ बुलेसर बाबू अनजान छलाह। िनर्धारित दिन आ समैपर पंच सभ अएलाह। पंचायत शुरू भेलै। पंच सभ काचेँ गाए खेलाह। केवल ३० प्रतिशत लहना आ नगदी हिस्सा बुलेसर बाबूकेँ भेटलन्हि। खेत-पथार-घड़ारी इत्यादिमे आधा हिस्सा जरूर भेटलन्हि। चन्दाक माय भरि इच्छे पंच सभकेँ गारि पढ़लन्हि- “एक कप चाह, एक सेर तेल, पाँच सेर धानमे अपन इमान बेचैत अछि सरधुआ पंच। आ ई चन्द्रशेखर सरकार। ई तँ साक्षात यमराज अछि। बहुखौका! जवानीमे घरवालीकेँ खा गेल। दिन भरि चौकपर चाहक जोगारमे लागल रहैत अछि। बेटा कचरी-मुरही आ चाह बेचै छै। ओहीसँ गुजर चलै छै। सरधुआकेँ जरूर कन्हैयाक बहु सए-सैकड़ाक प्रलोभन देने हेतै। अगर भगवान कतौ हेताह तँ गुँह गीज कऽ मरत सरधुआ सरकार!!” बँटबाराक बाद बुलेसर बाबूक पहिल उद्देश्य छलन्हि चन्दाक बिआह। एक दिन ओलारपर बैसल छलाह बुलेसर बाबू, तँ बाध दिससँ लूटन एलखिन्ह आ कहलखिन्ह- “बुलेसर भाय, अहाँ कन्हाइ लेल की नै केलौं। से कन्हाइ सम्बन्धक मर्यादाकेँ िबसरि गेल। अपने तँ मारबे केलक, बेटा सभसँ सेहो मरबेलक अहाँकेँ। एहेन जधन्य कृत्य! फाटू हे धरती!” बुलेसर बाबू कनैत बाजए लगलाह- “की कहू लूटन भाय, ई भाए नै कसाइ थिक। हम साँपक पोवाकेँ पोसलौं। कुन-कुन कर्म नै कएल कन्हैया लेल। सभ बिसरि गेल। हे महादेव जनिहेँ तूहीं। जहिना हमरा कना रहल अछि तहिना ओहो कानत।” लूटन बाबू बजलाह- “भाय, एक बात कहू? जटैतक बंगट पहलमानक दोसर बेटाक पहिल कनियाँ मरि गेल छै। प्रथम पत्नीसँ मात्र एक पुत्र छै, अपार संपति छै। लाठी केर जोरगर ओ सभ सेहो अछि, अगर अहाँ कही तँ चन्दाक बिआहक चर्चा करी। अगर ई काज भऽ गेल तँ कन्हाइ औकातमे आबि जएताह। अहाँ ताकतवर भऽ जाएब। चन्दा आ लड़कामे करीब चौदह बर्खक अन्तर छै। तइ लेल कुनो बात नै। पहलमान छै, अपना उमेरसँ दस बर्ख कम्मे लगै छै। आ चन्दो तँ ऊँचाइमे ठीक अछि। लूटन केर प्रस्ताव बुलेसर बाबूकेँ नीक लगलन्हि। बजलाह- “कन्हैयाकेँ औकात देखेनाइ जरूरी।” फेर कहलखिन्ह- “लूटन भाय, ई कार्य हमरा पसन्द अछि। चन्दा सभ तरहेँ ओइ घरमे राज करत। नौकर-चाकर सभ छै। कुनो वस्तुक कमी नै छै। लड़काकेँ पहिल पत्नीसँ एक बेटा छै तँ की भेलै? मुदा हमरा ऐ सम्बन्धमे कनिक चन्दाक मायसँ विमर्श करबाक अछि। हमरा विश्वास अछि ओ मना नै करतीह। काल्हि हम अहाँकेँ निचाेड़ बता देब।” घर जाइते मातर बुलेसर बाबू चन्दाक मायसँ जरैलक बंगट पहलमानक बेटाक सम्बन्धमे बात केलन्हि। दोती-वर छैक, ई जानि चन्दाक माय कनी दुखी भेलीह परन्तु जखन आरो बातक जानकारी भेलन्हि तँ मानि गेलखिन्ह। फेर की छल, १५ दिनक अन्दर चन्दाक बिआह भऽ गेलन्हि। जहिया चन्दाक बिआह रहन्हि तहिया राघव सेहो सरियाती दिससँ छलाह। जखन राघव चन्दाक वरकेँ देखलखिन्ह तँ मोन दग्ध भऽ गेलन्हि। १७ बर्खक चन्दाकेँ ३१ बर्खक वर। बाँहि सभपर गाँठ पड़ल। चौरगर हाथ। माथपर तलवार आ कटबाक चारि निशान! हे भगवान! चन्दा तँ बानरक हाथमे नारिकेर भऽ गेलीह। खएर! पीअर परिधानमे सजलि चन्दा बड्ड आकर्षक लगैत छलीह। बिआहमे बुलेसर बाबू तीन बीघा खेत बेचलाह। छह मासक बाद चन्दा सासुर गेलीह। इम्हर राघव दिल्ली आबि गेलाह। राघव जखन चारि-पाँच बर्खक बाद गाम गेलाह तँ संयोगसँ चन्दा सेहो आएल छलीह। हलि कऽ काँट-काँट भेल! लोक सभकेँ पुछलखिन्ह तँ पता चललन्हि जे चन्दाकेँ कुनो असाध्य बिमारी भऽ गेल छन्हि जकर इलाज संभव नै छै। चन्दा श्रीहीन भऽ गेल छलीह। अधिकांश समए नैहरमे बितबैत छलीह। चन्दाक छोट बहिनक बिआह सेहो भऽ गेल छलन्हि। छह मासक बाद चन्दा मरि गेलीह। चन्दाकेँ कुनो संतान नै भेलन्हि। चन्दाक मृत्युक समाचार सुनि बुलेसर बाबू ओछाइन पकड़ि लेलन्हि। लुटन बाबू एक बेर फेरो चन्दाक माय लग आबि कहलखिन्ह जे चन्देक वरसँ चन्दाक सभसँ छोट बहिनक बिआह करा देल जाए। चन्दाक माय मानि गेलीह। बुलेसर बाबू सुधिहीन भऽ गेलाह। चन्दाक छोट बहिनक बिआह चन्दाक दोती-वरसँ भऽ गेलन्हि जे चन्दाक बहिन लेल तृती वर छलखिन्ह। बिआहक सोल्हमे दिन द्विरागमन भऽ गेलै। द्विरागमनक दस दिनक भीतर बुलेसर बाबू प्राण त्यागि देलाह। चन्दाक माय नीकसँ श्राद्ध केलथिन्ह। आब लगभग चारि बीघा जमीन आ घराड़ी शेष छलन्हि। चन्दाक माय सभ बेचि दरिभंगामे एक कमरा भाड़ा लऽ चलि गेलीह। पैसा बैंकमे राखि देलथिन्ह। ओही पैसाक सूदिसँ गुजर चलए लगलन्हि। इम्हर कन्हाइ बाबूकेँ कंठमे घाव भऽ गेलन्हि। पैघ ऑपरेशन कराबए पड़लन्हि। जखन ऑपरेशन भऽ गेलन्हि तँ पता चललै जे कैंसर छन्हि। धीरे-धीरे आबाज समाप्त भऽ गेलन्हि। गर्दनिसँ सदरिकाल पीज चूबए लगलन्हि। मुँह आ गर्दनिसँ दुर्गन्ध गन्हाए लगलन्हि। बड़ बेटा-पुतोहु कियो आगाँ लग नै आबन्हि। धन्य कही एक बेरोजगार नातिकेँ, जे नानाक किछु-किछु सेवा करन्हि। वाकहीन कन्हाइ बाबू सन्दूकसँ चोरा कऽ अपन पाइमे सँ लाख टका अपन नातिकेँ दऽ देलथिन्ह। बहुत किछु बाजए चाहैत छलाह कन्हाइ बाबू मुदा वाक् बन्द भऽ गेल छलन्हि। घावमे पिलुआ सेहो फरि गेल छलन्हि। शायद ओ मोनहि मोन अपन कर्मपर पश्चाताप करैत छलाह। ऐ घोर कष्टमे सेहो कन्हाइ बाबू नौ मास छटपटाइत रहलाह आ जीलाह। अन्तत: एक दिन कन्हाइ बाबू अपन शरीरक त्याग केलन्हि। शरीरसँ अतेक गन्ध अबैत छलन्हि जे एग्यारह आदमी कठियारीमे जएबाक लेल तैय्यार नै। राघव संयोगसँ गाम आएल छलाह। माय कहलथिन्ह- “राघव, अहाँ जाउ। हमरा लोकनि ऐ समाजमे रहैत छी। अहूँ नै जएबै तँ अहूँक माता-पिता बेरमे कियो नै आएत।” राघव माइक आज्ञाकेँ सम्मान करैत कन्हाइ बाबूक दाह संस्कारमे गेलाह। जखन मृतक केर शरीरमे आगिक ज्वाला बढ़लै तँ राघवकेँ लगलन्हि जेना ओतए ओइ मृत्युपर टुनटुन मल्लाह, बुलेसर बाबू आ चन्दा जेना समवेत रूपसँ जश्न मना रहल छथि। टुनटुन मल्लाह जेना डंटा उठा बुलेसर बाबू आ कन्हाइ बाबूकेँ डांग मारि-मारि अपन बदला लऽ रहल हुअए। आ चन्दा टुनटुन मल्लाहसँ अपन पिताक रक्षाक निवेदन करैत छलीह। अही प्रक्रियामे कन्हाइ बाबूक शरीर खाकमे विलीन भऽ गेलन्हि। सबहक संग राघव सेहो कठियारीसँ आपस आबि गेलाह। मोने-मोन सोचए लगलाह राघव- स्वर्ग नर्क तँ अतहि अछि। जे जेहेन करत से तेहेन पाओत। सत्यनारायण झा रिटायरमेंट सोनभद्र नदीक तट। साँझक समय छै। सुरज डुबि रहल छै। नदीमे जल करतल ध्वनिक वेगसँ बहि रहल छै। पश्चिम दिस आकाश सिनुरिया रंगक देखा रहल छै। लगै छै जेना भगवान भास्कर दुनियाँक सभटा दुखक ताप अपनामे समेट प्रस्थान कऽ रहल छथि। मलयानिल मद्धिम मद्धिम चलि रहल छै। सत्येन बाबू एनीकटपर बैसल किछु सोचि रहल छथि। एनीकट अंग्रेज शासन द्वारा बनाएल गेल छै। ऐ इलाकाक लोक बड़ गरीब छलै। सोनभद्र नदीकेँ एनीकट बाँध द्वारा बाँधि देलकै आ पूर्वी आ पश्चिमी नहर निकालि ऐ इलाकामे हरित क्रान्ति आनि देलकै। यद्यपि एनीकट आब भग्नावशेष छै तथापि एतए चहल पहलमे कोनो कमी नै अएलैक अछि। एनीकटसँ १५ कि० मी० दूर इन्द्रपुरी बराज भारत सरकार द्वारा बना देल गेलै आ लिंक नहरसँ पूर्वी आ पश्चिमी मुख्य नहरकेँ जोड़ि देल गेलैक अछि। मुदा साँझक समय एखनो लोक एनीकटेपर घुमय लेल जाइत अछि। साँझक समय ऐठामक दृश्य बहुत मनोहर रहै छै। सत्येन बाबू तँ सभ दिन साँझक समय एतए बैसैत छलाह। ओही सोन प्रणालीमे विगत तीन बरखसँ सत्येन बाबू पदस्थापित छलाह। आ ६० बरख भऽ गेलनि तैँ काल्हि रिटायर भेलाह अछि। सोनभद्राक तटपर एकटा विशाल कलोनी छै। ओही कलोनीमे सत्येन बाबू सपत्नीक रहैत छथि। एखन किछु दिनसँ पत्नी दीपमाला अपन पुत्री इन्दुबाला लग बंगलोर गेल छथिन, से सत्येन बाबू एनीकटपर बैसल जल तरंगकेँ देखैत छथिन जे कोना तरंग उठै छै आ कोना खतम भऽ जाइ छै। अपनो जीवन ओही जलतरंग जकाँ बुझा रहल छनि। काल्हि तक कतेक उफान छलै जीवन मे, मुदा आइ सभटा शांत भऽ गेलै। यएह सोनभद्राक तट छै जतए प्रत्येक दिन जल तरंगकेँ कल-कल छल-छल करैत देखि आनन्दित होइत रहैत छलाह। अभियंता छथिए आ बेशी समय नहरक नौकरीमे बितेलनि, तैँ अभियंत्रण काजसँ बेशी लगाव छलनि। मुदा आइ ओ बेशी गंभीर छलाह। काल्हिये ने रिटायर भेलाह अछि। कतेक रूटीन लाइफ छलनि। मुदा आब रिटायरमेंटक जीवन कोना कटतनि? यएह सोचि रहल छलाह एखन। मोन नै लगलनि। थोड़बे कालक बाद चलि देलाह अपन डेरा। डेरापर सेहो तँ अखन असगरे छथि। चुपचाप लॉनमे कुर्सी लगा बैस जाइ छथि। आ पुनः अतीतमे चलि जाइ छथि। याद पड़ैत छनि अपन बचपन। घरमे माय बाबूजी, पित्ती- पितियाइन सभ रहथिन। सभ पितयौत आ सभ बहीन मिलाकय बहुत पैघ परिवार रहै। सभ कतेक खुशी रहै। सत्येन बाबू बचपनमे कतेक खेल सभ ने खेलाथि। चोरा नुकी, झिझिरकोना, चोर सिपाही, कतेक खेल सभ रहै। एक बेर लिलियासँ कतेक झगड़ा भऽ गेल रहनि, तँ ओकर हाथे मरोड़ि देने रहथिन, तँ कोना काकीसँ मारि खुआ देलकै। ओ छौड़ी बड़ बदमास छल मुदा हमरा सहोदरोसँ बेशी मानैत छल। कोनो चिंता नै, कोनो फिकिर नै। भरि भरि दिन महराजी पोखरिपर गेंद खेलाइत छलाह आ पोखरिमे चुभकी मारैत छलाह, मुदा धीरे धीरे बचपन समाप्त भऽ गेलनि। बाबूजी मरि गेलखिन। कतेक कानल रहथि सत्येन बाबू। बहुत स्नेह रहनि बाबूजीसँ। क्रमहि सभ पित्ती मरि गेलखिन। अराध्यदेवी माय सेहो स्वर्ग चलि गेलखिन। सत्येन बाबू सोचैत छथि, जावे माय जिबैत रहथिन, कहियो अपनाकेँ पिता नै बुझैत छलाह। संतान लग पिता जरुर छलाह मुदा माय लग पहुँचैत बेटा बनि जाइत छलाह। आत्मा तृप्त भऽ जाइत छलनि मुदा आब ओ जिनगी कहाँ देखैत छथिन। सत्येन बाबूकेँ कतबो तकलीफ, दर्द होइत छलनि मायक एकटा स्पर्श दुःख –दर्दकेँ तुरंत समाप्त कऽ दैत छलनि। मायसँ आत्मीय प्रेम रहनि। जीवनमे कतेक तूफान अएलनि, कतेक समस्या रहलनि, मुदा सत्येन बाबू कहियो हतोत्साह नै भेलाह, तेकर कारण एक संजीवनी-बूटी माय छलखिन। कतेक पारिवारिक समस्या होइत छलनि मुदा मायक विचारसँ कहियो कोनो समस्या बुझेलनि? सत्येन बाबू पारिवारिक परिवेशमे सेहो बहुत संतुलित छलाह। समग्र परिवारसँ अपनापन छलनि। जइ माटि-पानिमे जन्म छलनि तइसँ अत्यधिक प्यार छनि। मुदा आबक जीवन कोना बिततनि से बुझा नै रहल छनि। “सर बजारसँ की अनबाक अछि? रामझुमनी आ कदीमा तँ भोरे अनने रही।” सत्येन बाबूक तन्द्रा टुटलनि। नौकर बनबारी आगूमे ठाढ़ रहनि। कहलखिन्ह- जखन तरकारी अछिये तँ छोड़ू बजार गेनाइ। पहिने नेबोक चाह बना कऽ आनू। देखू, तुलसी पात देनाइ नै बिसरब। बनबारी चाह बनाबए चलि गेलनि। सत्येन बाबू लॉनमे टहलऽ लगलाह। गेंदा, चमेली, सिंगरहार, गुलाब तथा रातरानी फूलसँ पूरा लॉन भरल छै। काते कात कतेक गाछ जेना आम, कटहर, धात्री, अशोक आदि सभ छै। अनवर माली हरदम किछु ने किछु करिते रहै छै। गुलाबक फूल कइएक रंगक छै। कोनोमे कली देने छै तँ कोनो अर्द्धविकसित छै तँ कोनो पूरा फुलाएल छै। ऐ लॉनक बीचमे एकटा चबूतरा बनाएल छै। ई चबूतरा अंग्रेज शासन द्वारा निर्मित छै। नवमे कतेक रमणीय लगैत हेतै? सत्येन बाबू जखन कोनो आत्म चिंतनमे रहैत छथि तखन अही फूलक बीचमे चलि अबैत छथि। चारुकातसँ नीक नीक सुगंध लगैत छनि। सुगन्धित वातावरणमे चिंतन सेहो सकारात्मक भऽ जाइत छनि। चारुकात फूलसँ आच्छादित चबूतरापर बैस जाइ छथि। ताबे बनबारी चाह बना कऽ आबि जाइ छनि। बनबारी सत्येन बाबूक संग बहुत दिनसँ छनि। ओ गाड़ी सेहो चलबैत छनि आ किचेनक काज सेहो करैत छनि। ओकर माय जखन ओ दू सालक छल तखने मरि गेलै। बनबारी टुगर भऽ गेल। पैघ भेल तँ सत्येन बाबूकेँ ओकरापर दया आबि गेलनि। राखि लेलखिन्ह अपना लग। से ओ बनबारी सत्येन बाबूक बहुत सेवा करैत छनि। सत्येन बाबू अखन बेचलरे रहै छथि। तैँ सत्येन बाबू बनबारीपर पूरा निर्भर रहैत छथि। चाह पिबए लगै छथि। तुलसी पात देलासँ चाहक स्वादे बदलि जाइ छै। सत्येन बाबूक तुलसीक चाह विभागमे प्रसिद्ध भऽ गेल छनि। चाह पिबैत पिबैत पुनः अतीतमे विचरए लगै छथि। १९७१ मे सत्येन बाबूक ब्याह एकटा छोट मुदा संभ्रांत परिवारमे दीपमाला संग भेल रहनि। सत्येन बाबूपर घरक प्रत्येक आदमीक दृष्टि रहनि। ओइ समयमे कतौ कतौ इंजीनियर होइत छलै। सत्येन बाबूकेँ इंजीनियर होइते परिवारक पृष्ठिभूमि बदलि गेल रहनि। सत्येन बाबूपर पारिवारिक जिम्मेदारी रहनि। सत्येन बाबूसँ कियो रुष्ट नै रहथिन। आइ सत्येन बाबू सोचैत छथि, जइ व्यक्तिकेँ पत्नी संग नै छै ओ व्यक्ति समाज, परिवारक दृष्टिमे हीन भऽ जाइ छै। कहावत छै, सभ सफल व्यक्तिक पाछू एकटा स्त्री होइत छै। ओ पत्नी, माय, बहीन या कियो आनो भऽ सकैत छै। मुदा सोसल स्टेटस (सामाजिक अवस्था) पत्नीक व्यवहारपर निर्भर छै। पत्नीक महत्व जिनगीमे बहुत छै। ओ स्वर्गो देखा सकैत छै आ नर्को। आइ सत्येन बाबू सफल बेटा छथि, सफल पति छथि, सफल पिता छथि एवं सफल सामाजिक प्राणी छथि, ओइमे हुनकर पत्नी दीपमालाक पैघ हाथ छनि। मुदा आबक समय सत्येन बाबूकेँ कठिन बुझा रहल छनि। ६० बरख भऽ गेलनि। बुढ़ारी दस्तक दऽ रहल छनि। नौकरीसँ रिटायर कऽ गेल छथि। आब संतानक जरुरत बुझा रहल छनि। सत्येन बाबूकेँ तीनटा संतान छनि। दूटा बेटा आ एकटा बेटी। सुकांत बाबू चौदह सालसँ नौकरी करैत छथिन। बहुत प्रतिभावान। ओ अपना जीवनक अपन लक्ष्य प्राप्त करबामे लगा देने छथिन। लक्ष्य प्राप्त करबाक लेल कतौ दोसर दिस देखबाक पलखति नै छनि। ब्याह भऽ गेल छनि। एकटा पुत्र रत्न छनि। पारिवारिक दृष्टिसँ सुव्यवस्थित छथि। दोसर बेटा निशिकांत मेधावीक संग अपन काजमे व्यस्त छथि। नीक नौकरी करै छथि। हुनको ब्याह भऽ गेल छनि। पत्नीक संग प्रसन्न छथि। दुनू भाइक पढ़ाइमे सत्येन बाबू कमी नै केलखिन। धीयापुताक पढ़ाइ एवं पारिवारिक तथा अन्य सामाजिक काज करए कऽ कारण सत्येन बाबू सतत अभावक जिनगी जीलनि। तैँ सत्येन बाबू आधुनिक सुखसँ वंचित रहलाह। जिम्मेदारीक बोझसँ दबल रहलाह, तथापि आत्मीय सुखक कमी नै रहलनि। जतबे रहनि ओतबेमे संतोष रहनि। अपन दुनियाँ ततेक ने बढ़ा लेलनि जे अपना लेल किछु नै रखलनि। सभसँ चिंता इन्दुबालाक ब्याह रहनि। मुदा भगवानक इच्छा, इन्दुबालाक ब्याह सेहो नीक भऽ गेलनि। इन्दुबाला आ अंशुमान बाबूक जोड़ी बहुत नीक। अंशुमान बाबू बहुत उदार प्रकृतिक छथि। जेहने प्रतिभा तेहने विलक्षण स्वभाव। ज्ञानी तँ नीर क्षीर हंस जकाँ आ विवेकी महान। सत्येन बाबू बहुत खुशी भेलाह। सत्येन बाबूक भाग्य देखि कतेककेँ ईर्ष्या होइ छै। सत्येन बाबूकेँ सभ संतानसँ समान प्यार छनि। मुदा इन्दुबालाक संग २५-२६ बरख तक रहलासँ सत्येन बाबू बेटीपर बेशी निर्भर भऽ गेल छलाह। बेटी सासुर चलि गेलनि तहियासँ सत्येन बाबू कमजोर भऽ गेलाह। यद्यपि जहियासँ बेटा बेटी बाहर चलि गेलनि तहियासँ सत्येन बाबूक देख रेख हुनक पत्नी दीपमाला करैत छथिन मुदा इन्दुबालाक विछोह सत्येन बाबू आइ तक नै बिसरि सकलाह अछि। इन्दुबालाक संगीत सत्येन बाबूक रोम रोम मे बसल छनि। इन्दुबालाक संगीत सत्येन बाबूक प्राणदायनी छनि। इन्दुबाला कहियो नै बुझि सकलीह मुदा सत्य छै जे इन्दुबालाक अवाजपर सत्येन बाबू किछु काल लेल मृत्युकेँ भगा देथिन। संतान तँ सभ एके रंग होइ छै। मुदा संतानक अपन अपन दुनिया छै, तैँ कोनो कोनो संतान भौतिक सुखमे माय बापकेँ बिसरि जाइ छै। युग अनुसार धर्म बदलि जाइ छै। ओना माय बापकेँ सेहो बेटा दिस टकटकी नै लगेने रहबाक चाही। ओइसँ संतानक उन्नति प्रभावित होइ छै। संतानकेँ स्वतंत्र छोड़ि देबाक चाही। जतेक मोह होइत छै ओतेक कष्ट होइ छै। ऐ जीवनक कोन मोल तैँ सुख दुःखक अनुभूति बेकार। बस जे होइ छै से होइते रहतै। सत्येन बाबू मस्तिष्ककेँ एकटा झटका देलखिन्ह। की सभ सोचए लगलौं। सत्येन बाबूकेँ एकटा घटना याद अबिते हँसी लागि गेलनि। इन्दुबाला छोटेसँ बहुत नटखट छलै। ओकरा अपना बाबूजीसँ असीम प्यार छलै। सत्येनबाबूक सहरसा जिलान्तर्गत कोसी परियोजनामे पोस्टिंग रहनि। ओइठाम सत्येन बाबू केनाल एस.डी.ओ. रहथि। केनालक गप्प डेरापर ततेक ने होए जे घरक बच्चा सभ सेहो मुख्य, शाखा, लघु आ जलवाहा नहर बुझए लगलै। डेराक आगाँमे निशि, इन्दुबाला आ कालोनीक अओर छोट छोट बच्चा सभ मुख्य, शाखा आ लघु नहरक निर्माण खुरपीसँ जमीन कोड़ि कोड़ि कऽ करैत छलैक। नहरक निर्माणक बाद लोटा, गिलास, मगसँ पानि भरि कऽ नहरमे जलश्राव करैक आ नहरमे पानि जखन एक नहरसँ दोसरमे बहए लगैक तँ सभ बच्चा थोपड़ी पारि नाचए लगै। ऐ बीच इन्दुबाला एकटा लघु नहरकेँ तोड़ि थोपड़ी पाड़य लगै जे नहर टुटि गेलै। फेर ओही बच्चा सभमे कियो चीफ इन्जीनियर, कियो एस.ई., कियो एस. डी. ओ. बनि कऽ कमीटीक गठन करै आ मामलाक जाँच होइक। कमीटी द्वारा इन्दुबालाकेँ दोषी ठहराएल जाइक। दोषीक आँखिपर पटटी बान्हि चोर घोषित कएल जाइक। इन्दुबाला चोर बनए लेल तैयार नै होइत छलै, तखन सभ मिलि कऽ ओकरा मारि खुएबाक लेल सत्येन बाबू लग अनबाक प्रयास करैक। मुदा इन्दुबाला सभकेँ धमकी दैत सभकेँ कहै- तोरा सभकेँ नै बुझल छौक जे बाबूजी हमरा किछु नै कहै छथि, आ दौड़ कए भागि कऽ उल्टे सभ बच्चाक शिकाइत सत्येन बाबू लग करैक। बच्चेसँ कतेक कंफिडेंस अपना बाबूजी पर रहै इंदुकेँ। इन्दुबाला आब अपना घर गृहस्तीमे लागल छै, तथापि सत्येन बाबूकेँ लगैत छनि जेना ओ अखनो हुनका गरदनिमे लटकल छन्हि। संतान तँ वएह छै जेकरा अपना माय बापक सेंटीमेंट्स अनायास बुझा जाइ छै। इन्दुबाला सत्येन बाबूक आत्मामे बैसल छै। जीवनक ढलानपर सत्येन बाबू पहुँच गेल छथि। सूर्यक प्रखर तेज आब सत्येन बाबूमे नै छनि। आब तँ केखनो रात्रिक अन्हार सूर्यक लालिमाकेँ झाँपि देतैक। सत्येन बाबू केखनो कऽ उदास भऽ जाइत छथि। सत्येन बाबू अतीतक यादसँ वर्तमानमे अबैत छथि। ऐ समय की करक चाही? रिटायरमेंटक सदमा तँ सभ नौकरी पेशा लोककेँ होइ छै। तखन सत्येन बाबू किए चिंतित छथि? हुनका तँ चारु तरफ अपन बच्चा सभ ठाढ़ छनि। हुनका किए असुरक्षाक भावना मोनमे अएलनि? तकदीरमे जे लिखल हेतै सएह हेतै। अपना बच्चा सभकेँ संस्कार तँ ओ स्वयं देने छथिन। तखन एतेक डराएल किए छथि? डेराएल छथि ओ समयसँ। डेराएल छथि ओ आजुक सभ्यतासँ। समयमे बहुत परिवर्तन भऽ गेलैक अछि। भौतिकवादी युगमे सभ अर्थपर विशेष जोर देने छै। केकरो फुर्सत नै छै जे कतौ दोसर दिस देखतै। चारुकात त्राहि त्राहि छै। मुदा मोनकेँ आत्म संयमित करक छै। हर माय-बापकेँ सोचबाक चाही जे हमर समय बीति गेल। जेकर समय छै ओकरा सोचए कऽ छै। सत्येन बाबू विचार मग्न रहथि। एतबेमे पुनः बनबारी आबि गेलनि आ कहलकनि “सर” खाना तैयार भऽ गेल। सत्येन बाबू देखलनि, ९ बाजि गेलै। डेराक भीतर गेलाह। खाना टेबुलपर लगाएल छै। सत्येन बाबू भोजन केलनि आ बिछौनपर पड़ि रहलाह। नींद शीघ्रे भऽ गेलनि। निद्रामे देखै छथि जे हुनके हमशक्ल एकटा दोसर सत्येन ठाढ़ भऽ हुनका देखि हँसि रहल छनि। सत्येनबाबूकेँ देखि आश्चर्य भेलनि। पुछलापर कहलकनि, ओ सत्येन बाबूक आत्मा छिऐ। ओ कहलकनि जे देख हमर दोस्त, जिनगी तोहर नै छियौ। जिनगी तँ तोरा देल गेल छौक। जहिया तोहर काज समाप्त भऽ जेतौक तोरा देहसँ हम निकलि जेबौ आ तोहर देह निर्जीव भऽ जेतौ। तैँ तू बेकार किछु सोचैत छेँ। तोरा अपना दऽ किछु नै बुझल छौ। तोहर शरीरक कोनो महत्व नै छौ। महत्व छै हमर अर्थात आत्माक। ई कहि छाया सत्येन चलि गेलै। सत्येन बाबू अवाक रहि गेलाह। ताबे बनबारी उठेलकनि। ‘सर’ उठू, भोर भऽ गेल। चाय सेहो बना देने छी। तुलसी पात सेहो धऽ देने छी। सत्येन बाबू आँखि मिड़ैत उठैत छथि आ देवालपर लागल दर्पणमे अपन मुँह देखै छथि आ अस्थिरेसँ मुसकिया दै छथि। पलट बेटाक ब्याहक तैयारीमे लागल रही। पत्नीक संग बाजारसँ डेरा पहुँचलौं। डेराक गेटक ताला खोलबाक प्रयास करए लगलौं। मोबाइलपर रिंग होमए लगलै। ताला खोलब छोड़ि मोबाइलक स्क्रीनपर देखए लगैत छी। मन्नुक कॉल रहनि। सोचए लगैत छी जे कतेक समयक बाद मन्नू फोन केलनि अछि। याद नै पड़ल जे ऐसँ पहिने ओ कहिया फोन केने छलाह। पटनामे सासुर छनि। सालमे तीन चारि बेर अबैत जाइत रहैत छलाह मुदा कहियो कोनो संपर्क नै केलनि। अचानक फोन देखि भेल जे प्रायः धोखासँ नंबर डायल भऽ गेल हेतनि, तैँ पुनः ताला खोलए लगलौं। जहिना रूममे पएर रखैत छी की लैंड लाइनपर फोनक घंटी फेर घनघनाय लागल। हेलो ---बाबूजी, हम मन्नू गाँधीनगरसँ बाजि रहल छी। आ मन्नू जोर-जोरसँ कानऽ लगलाह। हमरा भेल जे तीन चारि सालसँ कोनो संपर्क नै रखबाक कारणे पश्चातापे कना गेलनि अछि। आखिर हमहूँ तँ पित्तिये छियनि। हमरा मन्नूसँ कतेक स्नेह छल। ओहो कतेक शांत स्वभावक लोक छलाह। कतेक सुकुमार छलाह। बाजब तँ एहन रहनि जेना मिश्री घोरि कऽ पीने रहथि। मन्नूसँ बहुत लगाव छल। मन्नुक ब्याह मन्नुक पिताश्री ठीक केलखिन्ह। ब्याह जेतए ठीक भेल रहै ओ कोनो तरहेँ ने मन्नू लेल आ ने परिवार लेल उपयुक्त रहै, तैँ हम ओइ ब्याहक समर्थनमे नै रही। ब्याह तँ दू परिवारक कड़ीकेँ जोड़ैत छै मुदा ऐ ब्याहसँ परिवार टुटबाक खतरा रहै। बादमे सएह भेलै। हमर इच्छा रहए जे मन्नू ऐ ब्याहकेँ रोकि देथि। मन्नू कोनो साधारण व्यक्ति नै छलाह। योग्य अभियंता छलाह।नीक आ बेजाय ओ बुझैत छलाह, तथापि बियाहक लोभे ओ चुप भऽ अपन मौन स्वीकृति दऽ देलखिन्ह। ओ नै सोचलनि जे आखिर ‘हमरा नै मे’ की निहितार्थ छै। मन्नूसँ जे आशा छल ओकर विपरीत ओ अपन रूप देखेलनि। मोन तृष्णासँ भरि गेल। मन्नुक ब्याहसँ कात भऽ गेलौं। आब तँ ब्याहोक कइएक बरख भऽ गेलै। मन्नू आ मन्नुक पिताश्री पलट सँ संपर्क टूटि गेल। मोन बहुत खिन्न रहैत छल। मुदा धीरे धीरे सभटा बिसरि गेलौं आ हमहूँ अपन काजमे लागि गेलौं। प्रारम्भमे पलट सेहो हमरासँ दूरी बढ़ा लेलनि मुदा जखन ऐ ब्याहक कुपरिणाम धीरे-धीरे सामने आबए लगलनि तहन हुनका आँखि फुजलनि। आब बुझाए लगलनि जे भाइ किए मना करैत रहथिन। आब कोन मुहेँ ओ हमरा सामने अओताह। लाजे दुरे रहैत छलाह। कइएक ठाम बजैत छलाह जे भाइक बात नै मानि अनर्थ कऽ लेलौं। एक दु बेर फोनो केलाह मुदा हम अपनाकेँ दूरे रखलौं। कतेक स्नेह पलटसँ छल। पलट हमरासँ दू बरखक छोट छलाह। पलट एके मासक छलाह तँ माय मरि गेलखिन्ह। हमरे माय पलटकेँ पालि-पोसि कऽ ठाढ़ केलखिन्ह। पलट आ हमरामे कोनो अंतर नै छल। पलटक पढाइ लिखाइ हमरा संगे भेलै। एम. कम. कऽ पलट नीक प्रतिष्ठित शिक्षक बनि गेलाह। पलटसँ अंतरंगता हमरा बच्चेसँ छल। एके संग स्कूल जाइत छलौं। हर समय संग रहैत छलौं। पलटक उन्नतिसँ हमरा आत्म सुख भेटैत छल। मुदा मन्नुक ब्याह हमरा दुनूक बीच दूरी बढ़ा देलक। हमरा जेना पलटसँ वितृष्णा भऽ गेल तैँ हम हटले रहैत छलौं। ओना पलट कहियो कऽ अपन भौजीसँ बात कऽ लैत छलाह आ हमहूँ कहियो हिनका मना नै करैत छलियनि, आखिर संबंधक डोरी तँ कतौ बान्हल रहैक जइसँ हमरो आत्मसंतोष भेटैत छल, हिनके द्वारा पता चलैत छल जे पलट अपन पारिवारिक समस्यासँ परेशान रहैत छलाह। मन्नूकेँ कनैत देखि क्षण भरि तँ चुप रहलौं मुदा तत्क्षण कहलियनि- मन्नू किए कनैत छी? जिनगीमे कतेक गलती होइत छै। अहाँकेँ पश्चाताप भेल, बुझू सभटा गलती माफ भऽ गेल। हम हुनका बुझबैत रहलियनि आ ओ अओर जोर जोरसँ कनैत रहलाह। हम कहलियनि-–मन्नू चुप भऽ जाउ। कहलनि- चुप कोना भऽ जाउ। पापा आब ऐ दुनियामे नै रहलाह------ जबरदस्त झटका लागल। पूरा शरीर थरथर काँपए लागल। पसीना देबए लागल। हृदयपर जेना वज्र खसि पड़ल। की? पलट आब दुनियामे नै छथि? की भेलनि? मात्र एतबे सुनलौं जे हार्ट अटैक भेलनि। आइ सत्ते पलट चलि गेलाह। आब हुनकासँ ऐ जन्ममे भेँट नै हएत? मोनक बात मोने रहि गेल। पलट हमरासँ छोट छलाह। हम जिबिते छी आ ओ ऐ दुनियासँ चल गेलाह? ओ कहियासँ बीमार छलाह सेहो कहाँ बुझलिऐ। मोनकेँ हम सम्हारि नै सकलौं। लागल जेना आँखिक आगू अन्हार भऽ गेल। तत्क्षण पलटक चेहरा दिमागमे घुमय लागल। पलटक चालि ढालि, बाजब भूकब, सभटा चल चित्र जकाँ आँखिक आगू घुमए लागल। भगवान की दय ऐ संसारमे पलटकेँ पठेलखिन्ह। ओ अपना जिनगीमे कतेक दुःख सहलनि? हम आ ओ एक दोसरक पर्यायवाची छलौं। पलट हमर कतेक आत्मीय छलाह से पलट आइ हमरा छोड़ि ऐ दुनियासँ चलि गेलाह। दुखक अथाह सागरमे डूबि गेलौं। बेटा ब्याहक सभ अरमान हवामे उधिया गेल। बिछौनपर एकाएक खसि पड़लौं। बेहोश भऽ गेलौं। घरमे सभकेँ डर भऽ गेलै। कियो बुझि नै सकलै जे हम केकरासँ गप्प करैत छलौं। ‘हुनकर’ आवाज सुनि सभ धीया पुता अगल बगलसँ दौड़ल। सभ पूछए लागल मुदा हमरा आँखिसँ अविरल अश्रुपात भऽ रहल छल। मोन घूमि फिरि कऽ पलटक चेहरापर चल जाइत छल। जीवनक एक एक क्षण मानस पटलपर उभरए लागल। हृदयक गति असामान्य भऽ गेल छल। संज्ञा शून्य भऽ गेल रही। केकरो बातक जबाब नै दैत छलिऐक। एकटक सँ शून्यमे तकैत रही। सभकेँ बुझा गेलै जे कोनो पैघ दुर्घटना भेलैक अछि। सभ हमरा झकझोरि कऽ पूछए लागल। की भेलै? बजै किए नै छी? केकर फोन आएल अछि? पत्नी जोर-जोरसँ हमर देह पकड़ि पुछए लगलीह। एक क्षणक लेल तंद्रा टुटल। कनेक होश भेल। देखलिऐ जे घरमे सभ विचलित अछि। हमरा आँखिसँ नोर रुकबाक नाम नै लैत छल आ ओही अवस्थामे मुँहसँ एक शब्द निकलल जे पलट आब ऐ दुनियाँमे नै छथि। हमरासँ ई शब्द निकलिते पूरा घर निःशब्द भऽ गेल। सभकेँ जेना एके बेर काठ मारि देलकै। हमहूँ अपनाकेँ सम्हारि नै सकलौं आ ओछौनपर बेहोश भऽ खसि पड़लौं। जखन होश भेल तँ देखैत छी, हम एकटा अस्पतालक बेडपर पड़ल छी। लगमे कियो नै छल। शुन्य दिस एकटकसँ ताकि रहल छी। मानस पटलपर पलट देखा रहल छथि आ देखा रहल अछि पलटक सम्पूर्ण व्यक्तित्व। छत दिस तकैत-तकैत नींद भऽ गेल। नींदमे जेना कियो कहि रहल अछि, भाइ अहाँ सुतल छी, हमरा दिस ताकू। लागल जेना निंद फुजि गेल। आगूमे पलट ठाढ़ छलाह। केस पैघ पैघ, दाढ़ी बढ़ल, मैल खटखट, फाटल चिटल कपड़ा पहिरने। हाथमे एक मुठ्ठी बालु आ बालुसँ चेन्ह पाड़ैत ओ बिदा भऽ गेलाह। पाछू-पाछू हमहूँ बिदा भेलौं। बहुत दूर गेलाक बाद जंगल आबि गेलै। जंगल बहुत डरावना रहै। बाघ, सिंह प्रच्छन्न भऽ घूमि रहल छलै। पलटक पाछू-पाछू हमहूँ आगाँ बढैत गेलौं। आगू बहुत पैघ पहाड़ रहै। पहाड़ पार केलाक बाद एकटा कन्दरा भेटल। कन्दरा बड पिच्छर रहै। ओकर बाद एकटा पैघ नदी अएलै। नदीमे बहुत उफान रहै। भसियाइत-भसियाइत बहुत दूर गेलौं। तेकर बाद पलट नदीमे डुबकी लगेलनि। हमहूँ हुनके पाछू-पाछू डुबकी लगेलौं। कतेक कालक बाद एकटा मंदिर भेटल जेकर चारु दरबाजा फुजल रहै। मंदिर खूब सजाएल रहै। चारु कात दीप जरैत रहै। बीचमे स्वर्ण रचित दूटा आसन लागल रहै। हम आ पलट ओइ घरमे एक कोनमे ठाढ़ भेलौं। तखने एकटा चमत्कार भेलै। जगतनंदनी लक्ष्मी जी संग हमर मातेश्वरी ओइ आसनपर बैस रहलीह। मातेश्वरीकेँ देखि हम तँ अवाक भऽ गेलौं। मातेश्वरीकेँ देखि पलट बजलाह- मातेश्वरी, हम अहाँक भेँट करए आयल छी। मातेश्वरी टुकुर-टुकुर पलट दिस तकैत छलीह। मातेश्वरी अपना लगसँ हमरा नै हटाउ। हमर जीवन अहाँ बिना शून्य अछि। भाइकेँ हम सेहो नेने आएल छी। ई कहि पलट जोर-जोरसँ कानए लगलाह। हमहूँ कानए लगलौं। सत्ते कानए लगलौं। कनैत हमर आँखि फुजि गेल। सामने पलटक निर्जीव शरीर पड़ल छै आ सभ लोक कानि रहल छै। बचेश्वर झा- निर्मली, सुपौल। संगति प्राय: जीवनक आरंभसँ आइ धरि अनेक प्रकारक लोकक संगति प्राप्त भेल अछि। संगतिक कारणे कटु-मुधु दुनू तरहक अनुभव भेल, मुदा एहनो अनुभव भेल जे जीवन पर्यन्त मोन रहत। हम जइ मोहल्लामे रहैत छलौं ओइ बगलमे कोशी परियोजनाक सरकारी कॉलोनी छल। सरकारी सेवक लोकनि आेइमे रहैत छलाह। पड़ोसियाक कारणे हेम-क्षेम नीके छल। खास कऽ अमीन सहाएबसँ बेशी आपकता रहए किए तँ ओ एकान्तवासी जीवन बितौनिहार रहथि। आन्तरिक खिचाव बुझू जे अमीन सहाएबक संगति सायं-प्रात: रहै छल। अमीन सहाएब कंजूशक शिरोमणि रहथि। सोलह आना दरमाहा बचएबाक चेष्टा करथि। एक साँझ किछु बना पाबि लैथि अन्यथा अधिकांश राति चुड़-फक्की करथि, कहबाक तात्पर्य जे एक-आध मुट्ठी चूड़ा फाँकि कए रहि जाथि। ई रहस्य बड़ थोड़ लोक जनैत छलनि। अपन ऐ कमजोरीकेँ ओ गप्पक आवरणसँ अनभिज्ञ लोककेँ लखे नै देथि। यएह कारण छल जे सम्पूर्ण क्वाटरमे एकसरे रहै छलाह, दोसरकेँ संग राखब वा रहए देब मान्य नै छलनि। कार्यरत लोक अमीन सहाएबसँ फराक रहबाक प्रयास करथि, किएक तँ केहनो अगुताएल लोक अमीन सहाएबक गपौढ़ामे लटपटा जाइत छलाह। हमहूँ जखन उदास आ कार्यरहित अपनाकेँ पबैत छलौं, तखने हुनका अह्लादपूर्ण अबाजमे टोकैत रहियनि आ ओहो भाव बूझि मनलग्गू गप कहए लागथि। टेंसगर चाह हुनके मुँहसँ सूनल अछि। सायं-प्रात: एक कप चाह हुनका पिआयब आ चाह चलीसाक पाठ हमरा सभक अभ्यास बनि गेल छल। संयोगवश! एक मास्टर सहाएब कतौसँ ओइ मोहल्लामे एलाह। हुनका डेराक प्रयोजन भेलनि। बगएवानि तँ खटाशे सन रहनि, मुदा विद्या विभूषण रहथि। मोहल्लाक लोक नेनाक हेतु उपयुक्त बूझि मास्टर सहाएब हेतु डेराक ताकमे घुमथि। मास्टरो सहाएब एकसरे रहथि तँए आपकताक आकर्षण तँ नै, मुदा विवशताक बन्धनमे आबि संग रहए पड़लनि। किछु दिनक पश्चात् एक दोसरकेँ रूमेट कहए लगलाह। जखन दुनूमे सहबासक सिनेह बढ़लनि तँ मास्टर सहाएब स्वयं पाकी होएबाक प्रस्ताव रखलनि। अमीन सहाएब भविष्यक लाभ सोचि कऽ तैयार भऽ गेलाह। शुरूमे तँ पाक काज दुनू मिलि कऽ करथि। बादमे मास्टर सहाएब भानस बनाएब अमीने सहाएबपर छोड़ देलखिन। मास्टर सहाएब ठीक भानसक समए पूजाक आसन पकड़ि लैथि। ऐ बीच ज्याँै अमीन सहाएब किछु पूछथि तँ मास्टर सहाबक हूँ, हूँक शब्द अमीन सहाएबक लेल अंकुशक काज करनि। मोने मोन गुम्हरि कऽ अमीन सहाएब रहि जाथि। ऐ बीचमे जौं कियो अपरिचित लोक आबि जाथि तँ मास्टर सहाएबक पूजाक अवधि बढ़ि जाइत रहनि, संगहि मन्त्रोचार जोड़-जोड़सँ करए लागथि। आगाँक परसल अन्न गर्गट भऽ जाइन्ह अमीन सहाएबकेँ, पित्त लहरि जाइन। तखन ओ अर्दर बाजए लागथि। आडम्बरी पूजाक अन्त कऽ मास्टर सहाएब अपन हे! हे! मे अमीन सहाएबक क्रोधकेँ पीब जाथि। मास्टर सहाएबमे अमोघ सहन शक्ति सेहो छलनि। अमीन सहाएबक गन्जन आ मोहल्लाक लोकक वाककेँ अँगेज नेने छलाह। मास्टर सहाएबमे और तँ जे गुण दोष रहनि, मुदा किछु एहनो गुण छलनि जे पैघ दुगुर्ण कहल जा सकैछ। मास्टर सहाएब डेरामे दिनो कऽ अर्द्ध दिगम्बर रहैत छलाह आ राति कऽ पूर्ण दिगम्बरे। नव मे तँ अमीन सहाएब संकोच करथिन, जखन मास्टर सहाएबक ई गतिविधि नै बदललनि तँ अमीन सहाएब- रूमेट ई ठीक नै- कहि चेतबैत रहथिन। अमीन सहाएब चूल्हि फूकैत आ भानस करैत अपन स्वछन्द जीवनमे परतंत्रक अनुभव करए लगलाह। आब ओहो पाक काजसँ उचहि गेलाह। रूमेटक आलोचना-प्रत्यालोचना हुनक मुख्य विषए भऽ गेलनि। मोहल्ला लोकक प्रति आक्रोश रहबे करनि। एक दिन विक्षिप्त मुद्रा देखि हम हुनकासँ सिनेह पूर्वक कहलियनि- “हम एकसरे रहैत छलौं सएह ठीक, संगतिक प्रभावसँ संतप्त भऽ गेल छी।” एक दिन मास्टर सहाएब देह उजागर करबाक हेतु टॉनिक अनलनि जइमे चारि अना अलकोहल लिखल छलै। हम कहलियनि- अमीन एेमे सँ आध कप जौं मास्टर दितथि तँ मोन बुलन्द भऽ जाइत। कहैत-कहैत हम शीशीसँ चारि चम्मच करीब ढारि मुँहमे दऽ देलियनि, ऐपर मास्टर सहाएब गिद्ध जकाँ झपट्टा मारि टॉनिकक शीशी लऽ क्रोधाभिभूत भऽ गेलाह। दू बर्षक अन्तरालमे प्रथम बेर एहेन तामस देखल। मास्टर सहाएब सम्पूर्ण शीशी पीब गेलाह। मध्य रातिमे जखन खौंत फेकि देलकनि तखन ओ चेतना हीन भऽ फर्शपर ओंघरनिया देबए लगलाह। अमीन सहाएब पूर्ण चिन्तित भऽ हमरा लग दौगल एलाह। हमहूँ ओतए गेलौं। नतीजा भेल जे चारि बजे भोरमे जाऽ कए मास्टरकेँ चैन भेलनि तखने हमरो लोकनि चैन भेलौं। बादमे मास्टरकेँ पूछलोत्तर जबाब भेटल जे अपने सभ चखैत-चखैत पीब लितौं तँए हम सभटा एके बेरमे पीब लेल। अस्तु! आगाँ पुछबाक साहस नै भेल। एक दिन मास्टर सहाएबक दिगम्बर अवस्थाक निवार्णार्थ हम हुनका पलंगक तरमे जाऽ कऽ बैस गेलौं। अमीन सहाएब हमर सहयोगी रहथि। लालटेमक प्रकाश मन्द कऽ जखन मास्टर सहाएब ओछाइनपर लम्बायमान भेलाह, निन्न आएले छलनि तखन हम पलंगक भीतरसँ खट्-खट् अावाज कएल आ अमीन सहाएब कागज सभकेँ फर-फरा देलथिन। हम सभ चुपे रही कि मास्टर सहाएब चोर-चोर बजलाह। हमहूँ सभ संग दऽ देलियनि। ओ फानि कऽ बाहर भेलाह जोर-जोरसँ चोरक हल्ला कएलनि, मोहल्लाक नर-नारी चाेर शब्द सुिन अमीन सहाएबक डेरा दिस दौग गेल। मास्टर सहाएब तावत काल धरि बेसुधिये रहथि जखन अनेको हथबत्तीक इजोत हुनाकपर एक संग पड़ल, तखन मास्टर सहाएब संकोचसँ गर्हित भऽ बैस गेलाह। सभ हुनका लू-लू थू-थू करए लगलनि। अन्तमे अपन तोलिया फेकि हुनका दिगम्बर रूपकेँ श्वेताम्वरमे परिणत कएल। ओइ रातिक घटनाक बाद मास्टर सहाएब पुन: मोहल्लाक भीतर नै देखल गेलाह। मुदा हुनक चर्चा सबतरि अनेको दिन तक होइत रहल। अमीन सहाएब ऐ संगतिसँ मुक्त भऽ फेर पुरना बाटक बटोही भऽ गेलाह। हमरा प्रति हुनक निष्ठा भऽ गेलनि किएक तँ हम आश्वासनकेँ पूरा कऽ देलियनि। संगतिक संकटसँ मुक्त भऽ गेलाह। कपिलेश्वर राउत थरथरी ओना तँ ऋृतु छह टा होइत अछि, गृष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशिर आ वसन्त। मुदा व्यवहारमे लोक तीनटाकेँ मानै छै गर्मी, वर्षा आ जाड़। सभ ऋृतुक अपन अलग-अलग गुण अवगुण होइत छै। मुदा जाड़क एकटा अलगे गुण-अवगुण अछि। कोन भगवान जाड़केँ जन्म देलनि से नै कहि। अान ऋृतु तँ लोक हर्ष-विषम, रंगरभस आ वर्षाक फुहारक आनन्द लऽ कऽ िबता दै छै मुदा जाड़ तँ कोढ़केँ कँपा दै छै। गरीबक वौस्तु मारूख आ धनिकक वौस्तु विलासक ऋृतु होइ छै। घुटर एक दिन एहने समैमे सुरेश बाबूक खेत जे मनखप केने छल, पटबैले गेल। समए छलै माघ मासक शुरूआतक। जहिना २००३ई. मे शीतलहरी छलै तहिना अहू बेर भेलै। पछिया बहैत, जाड़ सुसकारी दैत। सुरूजो भगवान कतए नुका रहला तकर ठेकान नै। कुहेश लागल। पानिक बुन्द जकाँ बर्फ खसैत। लोक हरदम घुरे लग आगि तपैत। ठिठुरल घास-पात खेलासँ माल-जालक पीठ पाँजर बैस गेलै। आ बिमारो पड़ए लागल। तनुक चिरै-चुनमुनी सभ जहिंपटार मरए लागल। साँप सभ कोनो बिलमे तँ कोनो आरिक कातमे मूइल पड़ल। लोककेँ जीनाइ कठीन भऽ गेलै। एक पनरहियासँ जे शीतलहरी चलल से लधले रहि गेल। एहने समएमे घुटर मनखप गहूम केने छल। तकरा पटबै लेल गेल। जोखन बोरिंग चलबै लेल गेल, बोरिंगमे जहन पम्पसेटसँ पानि धराबए लागल पानि धऽ लेलकै। पलास्टिक पाइपसँ पानि लऽ गेनाइ छलै से जहाँ कि पाइप पम्पसेटमे धराबए लागल आकि पानि दोसर दिसामे फुचुक्का मारलक, आकि घुटर आ जोखन दुनू गोटाकेँ नहा देलक। तथापि कोनो तरहेँ पाइपकेँ बान्हि लेलक। जाड़े दुनू गोटे थरथर काँपए लागल। घुटर खेत जा एक कियारीमे पानि खोलि देलकै आ आगिक जोगारमे घुटर बगलमे जे कलमबाग छलै, ओतए नार राखल छलै, ओतएसँ एक पाँज नार थरथराइते अनलक। आब जखने सलाइसँ आगि धराबए लगल आकि तेहेन जाड़ होइत रहै जे सलाइक काठी खरड़ले ने होइत होइ। थरथरीसँ सलाइक काठी मिझा जाइ। जँ काठीमे आगि धरै तँ नारमे धरबेकाल मिझा जाइ। खएर, कोनो तरहेँ आगि धरौलक, आगि धधका दुनू गोटे आगि तापए लागल। थोड़ेक कालक बाद होश भेलै। सुरेश बाबू खेत देखक लेल पएर लग तक कोट देने, पएरमे मोजा-जुत्ता लगौने, जाँघमे ट्रोजर देने, कानमे मोफलर लगौने, तइपर सँ माथमे टोपी आ आँखियोमे चश्मा छलनि, तैयो ओ जाड़े थरथराइत छलाह। जखन बोरिंग लग एला तँ देखलखिन जे दुनू गोटे आगि तापि रहल अछि। सुरेशो बाबू हाथ महक दस्ताना निकािल आगि तापए लगला। आ बजला- “घुटरा केहेन समए भऽ गेलै जे केतनो कपड़ा देहमे दैत छिऐ तैयो जाड़ जेना जाइते ने अछि। तूँ सभ केना कऽ रहैत छेँ।” घुटर बाजल- “याै मालिक, गरीबक जिनगी कोनो जिनगी छिऐ। एक तँ दैविक मारल छी, दोसर सरकारोक व्यवस्था तेहेन ने छै जे की कहब। कमाए लंगोटीबला आ खाए धोतीबला। देहमे देखैत छिऐ जेतने कपड़ा अछि तैसँ रातिक जाड़मे गुजर करैत छी। घरवाली परसौती भेल अछि। एकेटा रहैक घर अछि। दोसर बकरी आ गाए लेल अछि। तइमे एक कोनमे जारैन-काठी रखैत छी। सेहो बकरीबला घरक टाट टुटल अछि।” सुरेश बाबू बजला- “तब तँ बर दिक्कत होइत हेतौ?” घुटर बाजल- “यौ मालिक, की कहू। खएर जाए दियौ। हमरा सभले तँ एकटा उपरेबला छथि। मुदा हे एकटा बात कहैत छी जे केतनो अहाँ सभ कपड़ा लगाएब, बिजलीक गर्मीमे रहब मुदा तीन बेर अहूँ सभकेँ जाड़ पछारबे करत।” सुरेश बाबू अकचकाइत पुछलाह- “कन्ना रौ।” घुटर कहए लगल- “नै बुझै छिऐ, नहाइ, खाइ आ झारा फिरै कालमे।” सुरेश बाबू- “ठीके कहै छेँ।” घुटर- “मालिक, हमरा सभकेँ कोन अछि। खूब मोटगर कऽ लार बिछा दइ छिऐ तइपर सँ कुछो बिछा दइ छिऐ आ चद्दैर ओढ़ि लै छी आ तखनो जँ जाड़ होइए तँ झट्टासँ बनेलहा पटिया ओढ़ि लै छी। बगलमे गोरहन्नी आ खरड़न-मरड़नकेँ ओरिया कऽ रखने रहै छी। नै भेल तँ ओकरो पजारि दइ छिऐ। भरि राति सुनगैत रहल घर गरमाएल रहल। अहाँकेँ तँ बुझले हएत जे बोरैसक आगि केहेन होइ छै। ठाठसँ सुतै छी।” “तहन तँ एअर-कण्डीशन बना कऽ घरमे रहै छेँ। बड़ नीक एहिना जाड़सँ बचैक कोशिश करिहेँ। नै तँ सत्तो डाक्टर जकाँ हेताै, बेचारा काल्हिखिन पैखानासँ अाएल, कलपर कुरूड़ करिते रहए आकि ठंढा मारि देलकै। टांगि-टुंगि कऽ डाक्टर लग लऽ गेलै। तँए कहलियौ जे जाड़सँ बचि कऽ रहिहँ। बकरी आ गाएकेँ सेहो झोली ओढ़ा कऽ रखिहँ।” सुरेश बाबू कहलखिन। मुँड़ी डोलबैत घुटर बाजल- “ठीके कहै छी मालिक।” सुरेश बाबू- “रौ घुटर, धियो-पुतोकेँ हाँटि-दबािर दिहेँ जे ठंढासँ बँिच कऽ रहतौ।” घुटर- “से छौड़ा मानिते नै अछि। खन गुल्ली डण्टा, खन क्रिकेट तँ खन कबड्डी खेलाइते रहैए। की करबै। हम तँ कहबे ने करबै मालिक।” सुरेश बाबू- “सएह हम कहबौ ने।” घुटर- “हम तँ भरि दिन काम धन्धामे लागल रहलौं। अहीं सबहक बॅसबिट्टीमे बाँसक ओधि उखारि चीर-फार कऽ लै छी। जैसँ देहमे घाम फेकैत रहैए। आ राति कऽ बौरेसबला आगि गरमेने रहैए।” सुरेश बाबू- “ठीक करै छेँ। जान छौ तँ जहान छौ। शरीर नै तँ किछु नै। अच्छा एकटा कह जे योगासन करै छेँ आकि नै?” घुटर- “यौ मालिक, हम मूर्ख आदमी की जानए गेलिऐ योगासन आकि प्रणायाम। हमरा सभले देहे धुनब योगासन आ परनियाम होइत छै। खटनियौ सँ ने देह दुहाइत रहैए।” सुरेश बाबू बजलाह- “इहो बात ठीके छौ।” घुटर बाजल- “मालिक अगहनमे मारि-घुसि कऽ कमेलौं, खूब धान कटलौं जैसँ घरमे एक कोठी धानो अछि आ थोड़ेक चाउरो अछि। खेतसँ खेसारी साग, बथुआ साग, सेरसो साग, तोरी साग सबहक तीमन कऽ लै छी। कहियो काल अल्लू, कोबी, भट्टा, मुरै सेहो सबहक तीमन खा लै छी आ बम-बम करैत रहै छी।” सुरेश बाबू- “तहन तँ नीके वस्तु सभ खाइ छेँ।” घुटर- “अहाँ सभ जकाँ की अण्डा, मौस-तौस आकि दूध-दही हमरा सभकेँ भेटैत अछि। हमरा सबहक देह तँ वैसाख जेठक रौद, भादवक वर्षा आ माघ मासक जाड़सँ ठाेकाएल-ठठाएल अछि। अहाँ सभ जकाँ की गैद परहक बाँस जकाँ मोटगर नै ने अछि जे तागत किछु ने। केहनो भिरगर काज देखा दिअ कऽ देब। हँ अहाँ सभ जकाँ पोथी-पतरा नै ने पढ़ने छी। थमहू खेत देखने अबै छी।” कहि खेत आबि दोसर कियारीमे पानि खोलि फेर घूर तर चलि आएल आ गप-सप्प केलक। बाजल- “यौ मालिक, अहाँ सभ जकाँ की हमरा सौ बीघा खेत अछि। लऽ दऽ कऽ अपन दस कट्ठा खेत अछि। कनीमे तरकारी-फरकारी, कनीमे दलिहन-तेलहन, कनीमे साग-पात केने छी। धान-गहूम तँ अहीं सबहक खेतमे मनखप कऽ कए गुजर करै छी।” सुरेश बाबू- “एकटा कहावत छै जे लड़ा-चड़ा धन पाउ बैठे देत के। हे बड़ जाड़ होइ छै जल्दी खेत पटा लए आ घरपर जा। हमहूँ आब अधिक घुम फिर नै करब घरेपर जाइ छी।” घुटर कहलक- “जँ गपे-सप्प करै छी तँ एकटा गप अओर सुनि लिअ। हम तँ पंजाब-भदोही आकि दिल्ली-बम्बइ नै ने कमाइले गेलौं। देखै छिऐ जे ढबाहि लागल लोक देासर मुलुक जाइत अछि। हँ ओतएसँ पाइ तँ अनैए मुदा परिवारसँ हटल रहैए। जबकि सरकारो खेतीपर विशेष धियान देलकैहेँ। खेत अफर-जात पड़ल अछि, केनिहारक चलैत। कम उपजा भेने तंगी तँ बढ़बे करत गाममे माए-बाप से हकन कनै छै। मािलक अहीं अपन दशा देखियौ ने, एते खेत अछि आ धिया-पुता सभ विदेशमे नोकरी करैए। मालकिन बूढ़मे कन्ना कऽ भानस भात करैत हेती से वएह जनैत हेती।” सुरेश बाबू बजला- “से तँ ठीके कहैत छेँ। कखनो कऽ हमरो मनमे होइत अछि जे कथीले एते कमेलौं आ एते जमा केलौं। अच्छा छोड़ ई सभ बात। हम जाइ छियौ।” कहि सुरेश बाबू घर दिस विदा भेला। आ घुटर अंतिम कियारीमे पानि काटए लगल। तरकारी खेती
गणेश्वर नाथ महादेव स्थानमे हाट लगैत छलै। हाटपर लोकक करमान लागल छल। गणेश्वर नाथ महादेवक स्थापना गणेश झाक पोता जे एस. पी. भेल छला, बाबाक नाओंपर महादेवक स्थापना कऽ एकटा भव्य मंदिरक निर्माण करौलनि। अगल-बगलमे दोसरो-तेसरो भगवानक मंदिर अछि। आगाँमे पोखरि सेहो अछि। पोखरिक रकबा बिघा पाँचेकसँ उपरे अछि। वएह पोखरिक पुबरिया मोहारपर हाट लगैत अछि। एकटा प्राइमरी स्कूल सेहो उत्तरबरिया मोहारपर अछि, बरसातक समैमे रौद आ पानिसँ बचबाक लेल एकरा पैघ बनौल गेल अछि, ऊपरमे सिमटीक चदरासँ झाँपल अछि। ललन हाटपर कोबी बेचबाक लेल आएल अछि। हाटपर रंग-विरंगक समान सभ रहै छै, से रहए। करीब दस कट्ठामे हाट लगैत अछि। नून तेलसँ लऽ कऽ कपड़ा-लत्ता, सिनुर-टिकुली, चन्द तरहक मसल्ला सभ, मास-माउस तकक बिकरी होइत अछि। माघ मास बित रहल छल आ फागुनक चढ़ंत रहए। कोबी, भाँटा, सीम, टमाटर, सलगम, आलू, मुरै, फर माने अरुआ, पालक साग, बथुआ, सरसो, तोरी, कोबी, लौफा इत्यादि ओइ दिन खूब पहुँचल छल जे पएर रक्खेक जगह नै छल। कोबी भाव दस रुपैये पसेरीसँ लऽ कऽ बीस रुपैये पसेरी छल। कोबीबला सभ माथा हाथ देने छल। आेइमे एक शिबलाल आ ललन सेहो। ललन शिबलालकेँ पुछलक- ‘‘कि हौ भाय, की हालत छै?’’ शिबलाल कहलक- ‘‘धू, सभ चौपट्ट भऽ गेल। दुइये कट्ठामे ऐबेर मगही कोबी केने छलौं, बड़ मेहनत भेल रहए। दस किलो डी.ए.पी, पाँच किलो पोटास, एक किलो जिंक आ छौड़-गोबर लेल देने रहिऐ। तखन कोबी रोपने छलौं। दू बेर पानि से देलिऐ। कोबियो नीक भेल। देखि कऽ मन बड़ खुश रहए। दू किलोसँ छ-छ किलो धरि एकहक गो छत्ता अछि। मुदा भाव देखिते छहक जे पुजिओ उपर हएत कि नै। सुनै छी जे पंडित सभ ऐबेर लगन नै बनौने अछि। किछु लगन छैहो से जेठ-अखाढ़मे।’’ ललन बाजल- ‘‘हमरो हालत तँ सएह अछि। तँू तँ दुइये कट्टामे केने छह। हमर तँ पाँच कट्टामे कएल अछि। मुदा किछु रुपैया नैै भेल।’’ थोड़े काल उदास रहल मुदा चौंकेत शिबलाल बाजल- ‘‘हे पियौजक बिआक हालत ठीक अछि। दू कट्ठामे पियौजक बिआ पाड़ने छी, अखन सोलह रुपैयेसँ लऽ कऽ पच्चीस रुपैये तक अछि। तहन दुनूकेँ मिला कऽ घाटा नै लागत। मुदा जे चाहैत छलौं से नै भेल।’’ ललन बाजल- ‘‘हुअ, तोरा मिला-जुला कऽ पुँजी बँचलह।’’ दुनूक बीच गप-सप्प होइते छल आकि तखने बगलमे बैसल रामरुप पुछलक- ‘एना किए मुँह लटका कऽ दुनू गोटे गप-सप्प करै छह। की बात छिऐ?’’ ललन उत्तर देलक- ‘‘ऐँह, कोबीक भावक बारेमे गप-सप्प करै छी।’’ रामरुप- ‘‘धू, एहिक लेल कियो चिन्ता करए। खेती छिऐ हौ। एकटामे जाएत तँ एकटामे आओत, हम तँू खेती करैत छह जँ ओकरा छोड़ि देबहक तँ कि करब। कोनो कि बाहरक आमदनी छह जे आेइसँ गुजर जेतह। १९८७ई. मे बाढ़ि एलै तँ सभटा दहा भसिया कऽ लऽ गेलै। मुदा लोक सभ कहाँ कोनो खेती छोड़ि देलकै। ऐबेर पानक हाल देखहक ने, ततेक ने पाला खसलै जे इलाकाक पान सुड्डाह भऽ गेलै। तैयो पानबला सभ पानक खेती छोड़ि देलकै। कहाँ ककरो मुँह मलीन छै। हँ तहन एकटा बात छै जे खेती एक्के रंगक नै करक चाही। जेना तरकारीये उपजाबै छह तँ दू कट्ठामे कोबी, तँ दू कट्ठामे बैगन, कम-सँ-कम दस धूरमे मुरै, दस धूरमे टमाटर, किछुमे पियौजक बीआ, एहिना थोड़ेक-थोड़ेक आनो-आनो खेती करक चाही। लाटमे इहो सभ रहत ने तँ मुँह मलीन कहियो नै हेतह। केहेन बढ़ियाँ शिबलाल कहलक हेन जे पियौजक बिआक बिक्रीसँ नीक आमदनी भेल। तँए तरीकासँ काज मेहनत करह।’’ ललनकेँ रामरुपक बात जँचलै। मने-मन विचारलक जे आगूसँ सभ तरहक खेती करब। सलाह फागुन बीत रहल छल आ चैतक आगमन भऽ रहल छल। समए तेहन ने बिकट जे बातरस बलाक लेल बर उकड़ू छल। फागुन चैतमे जेहने गर्मी तेहने हार तक डोलबैबला जाड़। तँए ने एकटा कहावत छै जे एकटा ब्रह्मण गाए बेच कऽ चैतमे कम्बल खरीदने रहथि। तेहने समए अहू बेर छल। बातरसोक जन्म एहने समएमे होइत छै। िकसुनकेँ बातरस जागि गेल छलै जइसँ बेचारा अफसियाँत छल। गाम घरक डाक्टरसँ लऽ कऽ दरभंगा तकक डाक्टरसँ देखौलक मुदा बेमारी ठीक नै भेलै। बातरस आब गठियाक रूप धऽ लेलकै। उठबैसँ लऽ कऽ खेनाइ-पिनाइ तकमे असोकर्य होमए लगलै। एक दिन पड़ोसी-बालगोविन्द कहलकै- “हौ िकसुन, तोरा देखि कऽ हमरा बड़ दया अबैत अछि जे एहेन धुआ-कायामे ई की भऽ गेलै। हमर विचार अछि जे बेटा दिल्लीमे छहे, ओतइ जा कऽ एक बेर देखा आबह।” िकसुन बजला- “ठीके कहै छह भाय, दू-चारि दिनमे चलि जाएब।” दिल्ली जा कऽ एम्स असपतालमे जाँच करा कऽ एक महीना दवाइ खेलक। िकछु असान भेल, गाम चल आएल। गाम आबि कऽ जखन दवाइ खाए तँ दवाइ जखन तक असर रहै ताबे तक ठीक रहै आ जखन दवाइक असर खतम भऽ जाइ तँ बेमारी बढ़ि जाइ। बेचारा असोथकित भऽ असमंजसमे दलानपर बैसल छल िक सुमन जी जे गामे स्कूलमे मास्टरी करैत छला, ओही टोल दऽ कऽ अबैत छला अाकि नजरि किसुन दिस गेलनि। कुशल पुछलखिन, बेचारा झमानसँ खसल। धूर, हम िक अपन कुशल कहब। हम तँ वातरससँ हरान छी। सुमन जी बोल भरोस दैत कहलखिन- “अहाँक बेमारी ठीक भऽ जाएत। हम जेना कहैत छी तना-तना करू आ आयुर्वेदिक दवाइ बता दैत छी से करैत रहू, बेमारी ठीक भऽ जाएत।” बेचारेकेँ कतौसँ प्राण एलै। बाजला- “एतेक केलौं तँ एकबेर इहो अजमाएब।” सुमनजी बजला- “हम जेना-जेना कहै छी तेना-तेना करू। सीधा भऽ कऽ बैसू। एक नम्बर, पएर पसारू आ अंगुरीकेँ मोड़ू आ सोझ करू। दोसर, पएरक पंजाक अंगुरीकेँ मोड़ू आ सोझ करू। तेसर, पंजाकेँ आगाँ झुकाउ आ सोझ करू। आब दुनू पएरकेँ सटा कऽ गोल कऽ कऽ घुमा, पाँच बेर एक मुँहेँ तँ पाँच बेर दोसर मुँहेँ। चारिम, जाँघमे हाथसँ गहुआ लगा कऽ छावाकेँ जेना साइिकल चलबैत छी तेना चलाउ, उपरसँ नीचाँ मुँहेँ आ नीचाँसँ उपर मुँहेँ, इहो पाँच बेर। आ हे याद राखब रीढ़क हड्डी सीधा रहक चाही। पाँचम, पलथा मारि कऽ बैस जाउ आ दुनू हाथकेँ पसारू आ दुनू हाथक अोंगरीकेँ सोझ करू, कसि कऽ मुट्ठी बान्हू, दस बेर करू। छअम, हाथक पंजाकेँ आगू झुकाउ आ सोझ करू १० बेर। सातम, दुनू कलाइक मुट्ठी बान्हि कऽ गोल कऽ कऽ घुमाउ, ऊपरसँ नीचाँ आ नीचाँसँ ऊपर मुँहेँ। आठम, हाथकेँ सीधा कऽ कऽ पंजाकेँ पाँखुरपर भिराउ आ सोझ करू। नवम, पंजाकेँ पाँखुरपर भिड़ा कऽ कोहुनीकेँ सटाउ आ गोल कऽ कऽ ऊपरसँ नीचाँ आ नीचाँसँ ऊपर मुँहेँ १० बेर करू। दसम, गरदनिकेँ आगू झुकाउ आ फेर पाछू झुकाउ, पाँच बेर फेर दुनू पाँखुरमे पाँच बेर कानकेँ सटाउ आब गोल कऽ कऽ चारूभर घुमाउ आगूसँ पाछू आ पाछूसँ आगू पाँच बेर। एगारहम, पएर पसारू आ ठेहुनकेँ मोड़ि कऽ पएरपर बैस जाउ आ दुनू हाथ ऊपर उठा कऽ आगू मुँहेँ झुकू आ नाककेँ जमीनपर सटाउ आ हाथकेँ सीधा जमीनपर पसारि दियौ। पेटसँ हवा निकालि दियौ। जखन साँस लेबाक हुअए तखन सोझ भऽ जाउ आ साँस लिअ। ई पाँच बेर करू। बारहम, ठेहुन भरे डाँड़केँ सोझ करू आ दुनू हाथसँ पएरक तरबाकेँ पकड़ू, ईहो पाँच बेर करू।” बिच्चेमे किसुन बजला- “ई तँ बड्ड भिरगर अछि।” सुमनजी- “सभ दिन साँझ-भिनसर करैत रहब ने तँ कोनो भिरगर नै बुझाएत। हँ तँ अगिला आसन सभ सुनू। ततेक ने आसन छै जे करैत रहब तँ भिनसरसँ साँझ पड़ि जाएत। अहाँ लेल जे जरूरत अछि ओतबे देखबै छी। तँ सुनू चित भऽ कऽ सुति रहू, दुनू टांगकेँ सटा कऽ ऊपरसँ नीचाँ मुँहेँ आ नीचाँसँ ऊपर मुँहे चलाउ। फेर दुनू टाँगकेँ सटा कऽ ओहिना चलाउ।” िकसुन बजला- “ई तँ आरो भिरगर अछि।” सुमनजी कहलखिन- “नै, जहन लगातार करए लगब ने तँ सभ हल्लुक भऽ जाएत। जहिना जनमौटी बच्चाकेँ माए आ दादी सभ टांग, हाथ, देह सभकेँ ममोरि-समोरि दैत छै जइसँ सभ अंग सक्कत भऽ जाइ छै, तहिना अहूँकेँ हएत। अहाँक खून जाम भऽ गेल अछि। ओकरा चलेबाक अछि। अहाँक तँ कमाएल-खटाएल देह छलए, बेटाकेँ नोकरी भेने काज छोड़ि देलिऐ, तँए एना भेल। जँ सभ अंग चलबैत रहब, योग-प्राणायाम करैत रहब, तँ सभ रोग-व्याधि स्वत: भागि जाएत। हँ तँ आब अगिला करू। आब पीठ भरे सुतू पहिने एक टांगकेँ डाँड़ भरे उठाउ फेर दोसरो टाँगकेँ उठाउ तकर बाद दुनू टाँगकेँ उठाउ आ राखू। एकर बाद दुनू हाथकेँ पाछू लऽ जा कऽ घुट्ठीकेँ पकड़ि कऽ छातीकेँ उठाउ। ऐसँ डाँड़क रोग समाप्त। सुबह-शाम खाली पेटे अगर नियमित रूपे करैत रहब तँ निश्चित ठीक भऽ जाएब। आब किछु प्राणायाम सेहो सिख लिअ। पद्मासनमे बैस जाउ आ कपाल भाती, उड़ियान बन्ध, अनुलोम-विलोम, भ्रामरी आ नाड़ी सोधन प्राणायाम करैत रहू। कपाल भातीमे केवल साँस छोड़ैक छै ई पच्चास बेर करू। उड़ियान बंधमे पेटकेँ सटकेबाक छै पूरा हवा पेटसँ निकालि कऽ। अनुलोम-विलोममे वामा नाकसँ साँस लिअ आ दहिनासँ छोड़ू। तहिना दहिनासँ लिअ आ वामासँ छोड़ू। ई क्रम दस बेर। भ्रामरीमे, आँखि आ कानकेँ हाथक ओंगरीसँ मोड़ि कऽ औंठा कानमे, दोसर ओंगरी कपारपर आ तीन ओंगरी आँखिपर राखू आ कंठसँ ओम शब्दक उच्चारक करू, दस बेर। नारी सोधन, वामा नाकसँ साँस लिअ आ रोकू, जहन छोड़ैक विचार हुअए तहन दाया नाकसँ पूरा छोड़ि आ बाहरे साँसकेँ रोकने रहू। जहन साँस लइक विचार हुअए तँ दायासँ लिअ। फेर रोकि दियौ आ ओहिना विपरीतसँ छोड़ू। ईहो दस बेर करू। आ हे सुबह-शाम टहलैक सेहो आदति लगा लिअ। एकटा दवाइ बता दइ छी। पहिने दवाइ बनाएब केना से सुनू, आधा किलो करू तेल, एक पौआ लहसुन, पाँचटा धथुरक फड़, दू सए ग्राम लाल मिरचाइ, दू सए ग्राम तमाकुलक पात, थोड़ेक आकक पत्ता, सए ग्राम लौंग, सभटाकेँ कुटि कऽ तेलमे डाहि दिऔ। एक मास तक जरलेहेसँ मािलश करू तखन गरलाहासँ करब आ मोन राखब जे मालिश केला बाद हाथ साबुनसँ धाेइ लेब।” किसुन लाल बजला- “किछु परहेजो-तरहेज छै?” “योग केला बाद बीस मिनट तक किछु नै खाएब। एक घंटाक बाद जलपान करब। जलपानक चारि घंटा बाद भोजन करब। खाइत काल पानि नै पीअब। खेलाक एक घंटा बाद पानि पिअब। हरिअर साग-सब्जीक खेनाइमे बेसी बेवहार करब। सूतैकाल एक गिलास सुशुम दूध पीिब लेब। जौं निअम आ संयमसँ जेना बता देलौं तेना जँ करैत रहब तँ बातरस तँ ठीके भऽ जाएत जे आनो बेमारी सभ नै हएत। जेना कफ, दम्मा, टीवी, रक्तचाप, मोटापा, गैस, कब्ज, हृदए रोग, अवसाद इत्यादि। देहसँ मेहनति करैबलाक देह केहेन सोंटल-साँटल रहै छै तहिना अहुँक भऽ जाएत।” मनोज कुमार मंडल घासवाली गामक चौबटियापर किछु दर-दोकान रहने सभ दिन साँझ-भोर बड़ भीड़ रहैत छल। गाम नम्हर रहने पंचायत छल। अड़ोस-पड़ोसक गाममे ऐ ढंगक दर-दोकान नै रहलाक कारण ओहो गामक लोक सभ अही चौबटियापर अबैत। लोक सभ चौबटियापर आबि साँझ-भाेर चाह-पान सेहो करैत आ अपन जरूरतिक साैदा सेहो कीनि-बेसाहि कऽ घर लऽ जाइत। चौबटिया गामक बीच रहबाक कारण किछु बेसिये भीड़-भार रहैत छल। छोट-पैघ गिरहस्थ आ ठर-ठिकेदार आबि जन-मजदूर अढ़बैत छल। भीड़ भेने लोक सभ चाह-पानक दोकानपर चाहो-पान करैत आ रंग-बिरंगक गप-सप सेहो। गप-सपसँ बुझाइत जेना ई चौबटिया गामक राजनीतिक अड्डा रहए। दुपहरियाकेँ चौबटिया खाली रहैत छल। लोक अपन-अपन काम-काजमे रहैत छलाह। दोकानदारो सभ अपन-अपन दोकान बन्न कऽ घर खाइले चलि जाइत छल। गामक किछु निठल्लो सभ दुपहरियामे ताश भँजैत रहैत छल। एक दिन साँझू पहर चौबटियापर बैसल रही। हमरा बगलमे किछु लोक सेहो बैसल छलाह। चौबटियापर तरकारी बेचैवाली सभ आबि अपन-अपन दोकानक बोरा बिछा-बिछा लगा रहल छलीह। चौबटियापर एकटा दुचारी घर रहए जे सदिखन खालिये रहैत छल। किछु गाजा पियाक सभ बैस गाजा पी रहल छलै। तखने गामक पुबरिया टोलसँ झुण्डक-झुण्डा बकरी निकलि रहल, चरैले जा रहल छल। बकरीक झुण्ड खूब नमहर छल। हमरा लागल तीसो-चालीसक ई झुण्ड अछि। हमरा बगलमे ओइ टोलक एक गोटे बैसल छलाह। हम हुनका पुछलियनि- “ई सभटा बकरी अहीं टोलक छी?” ओ कहला- “ई सभ बकरी तँ एक्के गोटाक छी।” सुनि हमरा बड़ आश्चर्य भेल। हमर जिज्ञासा कने आर बढ़ल। हम फेर पुछलियनि- “किनक ई सभ बकरी छी?” कहलनि- “दीपवालीक।” हम छगुन्तामे पड़ि गेल रही। संगे खुश सेहो भेल रही। सभसँ पहिने तँ हमरा भेल जे एतेक बकरी एक गोटा सम्हारैत केना अछि। आ फेर भेल जे जखनि ओ चरबए लेल जाइ अछि तँ केना बुझैत अछि जे कोन हमर छी आ कोन दोसराक। दीपवालीक घर हमरा घरसँ कनिये दूर हटि कऽ छल। दू जाति हेबाक कारणे दू टोल छल। गाममे बहुतो जाति रहए परंतु सभ जातिक घर कने अलग-अलग रहए। जातिक नाओंपर टोलक नाओं पड़ल अछि। हम दीपवालीसँ परिचित रही। दीपवाली बुधनाक कनियाँ छथि। बुधना देखबामे रोगाहे जकाँ छथि। समए-समैपर दरभंगा गिलास फैक्ट्रीमे मास-दू मास कमा कऽ किछु उपार्जन कऽ लैत छथि। जाधरि बुधना गामे रहैत साइकिलपर झंझारपुरसँ तरकारी अनैत, बाँकी समए सदिखन ताश भँजैत। चाह-पान, भाँग-गाँजा सभ किछु बुधनाक अमल। दीपवाली बड़ नमगर-छड़गर छथि। देखबामे एकदम गोर। बड़ कमासुत। नाउएँटा लऽ दीपवाली मौगी छलीह परन्तु मर्दे जकाँ हरिदम खटैत छलीह। दूटा बेटा आर एकटा बेटी छन्हि। बेटीक बिआह भऽ गेल छन्हि। बेटी विधवा भऽ गेल छन्हि जइसँ एकटा नातिक जिम्मेवारी दीपेवालीपर छन्हि। बड़का बेटा थोड़-बहुत पढ़ि माइक सहयोग करए लागल। छोटका बेटा पढ़ैत छल। एतेकटा बकरीक झुण्ड दीपवालीक मेहनतिक फल छल। भरि दुपहरिया अंगने-अंगने घूमि तरकारी बेचैत छलीह, साँझू पहरकेँ चौबटियापर बैस तरकारी बेचैत छलीह। दीपवाली बड़ मधुभाषी आ मिलनसार छथि से सभ जनैत। एक दिन बुधना तरकारी लऽ कऽ अबैत छलाह। बाटपर एकटा मोटरगाड़ीबला पाछूसँ ठोकर मारि देलकनि। जइसँ बुधना मरि गेल। हटियाक दिन रहने हमरो गामक बहुतो लोक झंझारपुर गेल छलाह। ई कथा सौंसे गाम मटिया तेल जकाँ पसरि गेल। सुनैत देरी भरि गामक लोक चौबटियापर जमा भऽ गेल। दीपवालीक घर चौबटियासँ सटले पुबरिया टोलमे छल। के बच्चा, के बूढ़, सभ साइकिल मोटर साइकिलसँ झंझारपुर दिस दौड़ पड़ल जेतए बुधनाक लाश छल। हम गुड़ घावक पीड़ासँ व्यायकुल रही, ई बात सुनि कहुना कऽ चौबटियापर गेल रही। किछुए कालक बाद हमर धियान दीपवाली आ हुनकर दुनू बेटापर पड़ल। हमरा आइ धरि मोन अछि, दीपवालीक खूलल-खूलल केश, लत्ता-कपड़ाक कोनो ठेकान नै। बताहि जकाँ जोर-जोरसँ कनैत छलीह- “डकूबा हौ, डकूबा! आब हमर जिनगी केना कटतै हौ डकूबा! आब ई दुनू बेटा केकरा बाबू कहते हौ डकूबा!” हुनकर दुनू बेटा सेहो भोकासि पाड़ि-पाड़ि कनैत छल। ई दृश्य देखि हमरा आँखिमे नोर आबि गेल। गामक दाइ-माइ दीपवालीकेँ सम्हारैत आ कनबो करैत। किछुए कालक बाद बुधनाक लाश लग पुलिस आएल। लाश उठा पोस्टमार्टमक लेल लऽ गेल। गामक लोक सभ रंग-बिरंगक बात करए लगल। सबहक बात बुधनासँ शुरू होइत छल। मुन्हाइर साँझकेँ एम्बु्लेंसपर बुधनाक लाश गाम आएल रहए। एक बेर फेर भरि गाममे हल-चल भऽ गेल। दीपवाली आर दुनू बेटा लाशपर गिर जोर-जोरसँ कनैत छलीह। गामक बूढ़-बुढ़ानुस सभ कहलनि- “ऐ लाशकेँ जल्दी़ संस्कार कऽ देल जाए। ई कोनो खुशनामा नै छी। ई हाक-डाकबला लाश छी।” कोनो तरहेँ संस्कार भऽ गेल। आब दीपवाली बेसाहारा भऽ गेलीह। दूटा बेटा आ एकटा नातिक जिम्मेवारी हुनका ऊपर। दीपवाली आब तरकारी बेचनाइ बन्न कऽ देलनि। केना नै बन्न करैत। झंझारपुरसँ तरकारी के आनत? बकरीये टा आब हुनक जीविकाक साधन रहि गेल रहनि। कहाबी अछि जे दुख जखनि अबैत अछि तँ चारू दिससँ अबैत अछि। बुधनाक मरब सालो नै लागल रहै, बरसातक समए रहए, एकटा बेमारी आएल। हुनकर सभ बकरी एका-एकी सभटा मरि गेल। दीपवाली फेरसँ दुखमे डूमि गेलीह। आब हुनका कोनो सहारा नै बचल। पन्द्रह दिन धरि दीपवाली किछु नै बाजए। फेर दीपवाली हिम्मत नै हारलनि। एक दिन हम सांत्वनाक खियालसँ कहलियनि- “की हाल अछि?” ओ कहलनि- “बौआ, विधनाक एहने मोन छन्हि् तँ हम की केओ की करत? आब हम सभ माटिमे मिलि गेलौं किंतु अहाँ सबहक माए-बापक असीरवादसँ हम हारि मानएवाली नै छी। जाबे जिअब मेहनत कऽ बाल-बच्चाकेँ देखब। मरला ऊपर जानथि विधना।” दीपवालीकेँ आब मेहनति छोड़ि कोनो सहारा नै बँचल। ओ छथि बड़ मेहनती। ओना बुधना दीपवालीक साेहाग छल किंतु दीपवालीक कमाइपर घरक सबहक ठेसी छलनि। दस धूर जमीनसँ पाँच कट्ठा भेल रहै जे दीपवालीक खून-पसेनाक फल छी। दीपवाली एक गोटासँ गाए, तेहाइपर, पोसिया लेलनि। नाति अपन गाम चलि गेल। दीपवाली आब भरि दिन गाएमे लागल रहैत छलीह। समए बीतल। छोटका बेटाकेँ कोनो तरहेँ दरभंगा पढ़ैले पठौलनि। दीपवालीक उमर सेहो नीचाँ मुहेँ भेल जा रहल छल। गाए पोसबामे एना लगल रहैत छलीह जे घासक पथिया सदिखन हुनका माथेपर रहैत छल। बड़का बेटा आब नम्हर भेल, घर-गिरहस्तीक कार्य करए लगल। गाए पोसलासँ एकटा बड़द भऽ गेल। जइसँ बड़का बेटा खेती करए लागल। दुख तँ दीपवालीकेँ बड़ भेलै किंतु दीपवालीक मेहनतिक कारण एकबेर फेर हुनकर घर-परिवार चलए लगल। भरि गामक लोक हुनका घासवाली कहए लगलनि। आइ हुनका दस थान गाए छन्हि। ओ घास आनैमे एना लगल रहैत छलीह जे भरि दिन बाधेमे रहैत छलीह। बाधसँ एलापर खेनाइ बनाबथि आ माल-जालक निमेरा सेहो करथि। एक दिन बड़का बेटाकेँ कहलीह- “बौआ, हमरा खेतसँ एबामे देरी भऽ जाइए, तोरा भूख लागि जाइत हेतह ने?” बेटा कहलकनि- “माए, भूख तँ अवश्ये लागि जाइए परन्तु तूहीं की करबीही, से नै तँ हमरा खेनाइ बनेनाइ सिखा दे।” माए बाजलि- “जरूर बौआ, लूरि कोनो खराप नै होइ छै। हम बाप-जनम कहियो घास नै छिलने रही मुदा आइ दस थान गाए घासेपर रखने छी।” ऐ तरहेँ समए बितैत गेल। दीपवाली संघर्ष करैत रहलीह। एक दिन हम भोरे-भोर चौबटियापर गेल रही। चाहक दोकानपर िकयो बजलाह जे दीपवालीक बेटा प्रोफेसर भऽ गेलै। पेपरमे आएल छै। हमरा बड़ खुशी भेल। हम हुनकर पूरा जिनगीकेँ मोन पाड़ए लगल रही। दीपवालीपर घनेरो दुख आएल परन्तु कखनो हुनक मनोबल मलीन नै भेल। ओ दुखसँ संघर्ष कऽ समाजकेँ एकटा प्रोफेसर देलखिन, ऐसँ खुशी अओर की? छोटका बेटा काओलेज ज्वाैइन कऽ लेलन्हि। पहिल तनखाह उठा माएसँ मिलबा लेल गाम एलाह। माए कहलखिन- “बेटा, हमरा बड़ खुशी अछि किंतु ई दिन आनबामे तोहर भैयाक योगदान छह। तूँ छोटेटा छेलह तखन बाप मरि गेलह। तोरा पढ़ेबा-लिखेबामे तोहर भैया हरिदम मदति केलकह। ई धियान रखियह।” कहैत दीपवालीक आँखिसँ खुशीक नोर टपकल आ तखनि दोसर दिस टगि गेल। अनमोल झा १९७०- गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, लगभग सए विहनिकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित। अबकी बेर फतंग बात से नै छलइ, बात छलइ जे कहियो गाम-घर छोड़ि बाहर नै रहलइ, बेशीसँ बेशी दू मास आ दस पाँच दिन। सभ दिन तँ सबहक बीचेमे रहि कऽ पढ़ाइयो-लिखाइ गामेपर केलक, हाइ स्कूलमे गेल तँ झंझारपुर सेहो कतेक दूर, साइकिल उठाउ तँ पन्द्रह मिनट आ पएरे जाउ तँ पाउन घंटा। ओइ छहरपर सँ नीचा खसि जाउ तँ ओइ बाधे-बाधे आधा घंटा आ राखू ओहूसँ कम समैमे चलि जाउ स्कूल आ कालेज, आ चलि आबू फेर गामपर। ओना अनिल सभ दिन गामेपर रहि पढ़लक से बात नै छलै, ओकरा आेहिना मोन छलै जखन ओ आइ कॉम फस्ट इयरमे ललित नारायण जनता कॉलेज झंझारपुरमे रहए तँ पढ़ुआ कक्का संगे, कक्के टी.सी. लऽ कए गेल रहए आर.के. कॉलेज मधुबनीमे, नाओं लिखाबए गेल रहए; आ नाओं लिखा दुनू बेटा आ पित्ती घूमल रहए मधुबनीक लॉज सभमे, एकटा डेरा लेल, डेरा ओइ दिन तँ झट दऽ नै भेट गेल रहै, तथापि गामेपर आबि जोगार पाती बैस गेल रहए। एकर गामक छोटका बौआसँ गामपर गप्प-सप्प भेलै आ ओ कहने रहै जे हमरा डेरामे एकटा सीट खाली छै, विचार हुअए तँ रहि सकैत छी, सत्तरि रूपया भाड़ा छै महिना, सेफरेट रूमक पैंतीस टका लागत, हँ एकटा चौकी लेमए पड़त। भानस-भातक जेना जे विचार हुअए अलग-अलग भानस करब तँ सभ बर्त्तन बासन सभ लेमए पड़त, नै एके ठाम करी तँ मोटा-मोटी सभ समान अछिये, आ जे नै अछि से लऽ लेब तैयो चलत आ नै लेब तैयो चलत। अनिलकेँ लगलै जे कियो एकरा लेल पहिलेसँ व्यवस्था केने हुअए तहिना सन बुझेलै ओकरा। ओ झट दऽ कहलकै, हँ हमरा विचार अछि, चलू मधुबनी आ एके ठाम रहब आ एके ठाम भानसो-भात करब, जे जेना खर्चा-वर्चा हएत आधा-आधा सएह ने? आ गेल अनिल मधुबनी ओइ लाजमे जाऽ कऽ पहिले अपन पोथी-पतरा सँथलक। छोटका बौआ, अपने आ लहटन तिनू गोटा जा चौकी कीन आनलक। ताइ दिनमे बिड़ासी आ तिरासी टाकामे चौकी देने छलै, चौकी कोनो साउख-सीसमक छलै, आमेक पाइस पउआ आ आमेक तखता, उलूके-फलूक एकजनिये टाइप। आ रहए लागल मोन लगाक ओतए। मोन लगा कऽ तँ रहए लागल अनिल, मुदा मोन लागब एकरा कहबै की? जहियासँ मधुबनीमे रहनाइ शुरू केलक तहियासँ तिला संक्रांतिक सात दिन छलै, माने एक हप्ता, मोनमे विचारने रहए, गाम नै जाएत। लोके की कहतै, देखलक हौ पढुआकेँ दस दिन नै भेलै आ हाजिर जबाब? आ अपनो नीक नै बुझेलै। ओना काल्हि हेतै तिलासंक्राति तँ संगी, जे छोटका बौआ आ लहटन छलै, पावनि करए गाम चल गेलै । एक दिन पहिने सेहो भोरे भोर, साँझ तक अनिलोक मोन कछमछा सन गेलै, मोन केनादनि रिब-रिब करए लागल रहै, असगरमे खूब कानए कऽ मोन होबए लगलै आ उठेलक एक आध टा पोथी आ एकटा झोड़ा आ साँझुका बससँ गाम आबि गेल रहए पावनि करए। माएक मोन जुड़ा गेल छै, माए कहलकै- नीक केलेँ बौआ, चल एलेँ, तोरा बिना हमरा सभ केना पावनि करीतियौ? अनिल किछु बाजल नै रहए कारण जखन मधुबनी जाए लागल रहए तँ माए पावनिमे आबए कहने रहै मुदा अनिल कहने रहै जे एहनो एनाइ होइ छै? मुदा आइ अपने अनिलक आबि गेलासँ माएक छाती सूप सन भऽ गेलै। फेर पावनि कऽ प्राते फेर मधुबनी आएल। पढ़ाइ लिखाइक क्रममे मधुबनी आ गाम अनिलक पएरे तरमे रहए। दुरे कतेक, पच्चीस आ तीस किलोमीटर छलै गामसँ मधुबनी, आ मधुबनीसँ गाम। अनिलक बाबूक तीन भाइक भैयारी छलाह, सभसँ पैघ पित्ती पढुआ कक्का गामेक स्कूलमे मास्टर साहेब छलाह। दोसर भाय बिचला अनिलक बाबूजी छलखिन जे गामेपर रहि खेतीबारी करैत छलाह आ सभसँ छोटका पित्ती कलकत्तामे कोनो प्राइभीट फार्ममे कोनो नौकरी करै छला। गामपर तीनू भाँइक साझी आश्रम खूब हेम-छेमसँ चलैत छल। सभ भैयारीमे आ सभ दियादनी सभमे सेहो ककरो कतौ दियाद बादमे झगड़ा होइ तँ अनिलक बाप पित्तीक उपमा देल जाइ छलै। गामपर लोकक भाबे तेहन जे नीक जकाँ सभक थथमारि कऽ घर आश्रम चलै छलै। ओना पारिवारिक आर्थिक स्थिति नीक नै छलै, तथापि ओतेक खरापो नै कहक चाही, “लुटी आनए आ कुटी खाइ”बला बात छलै, तथापि आेइमे बड़ दीब जकाँ दिन कटल जा रहल छलै। अखन तँ भगवानक दयासँ दू कर भोजन आ दू हाथ वस्त्र तँ भेटीते आ आ जखन अनिलक बाप-पित्ती बच्चा रहए तँ हुनका सभकेँ ओहूपर आफद भऽ जाइत छलनि। गप्पे-गप्पमे माए एक दिन कहने रहै अनिलकेँ- बुझले बौआ, कि जखन तोहर बाप स्कूलसँ पढ़ि कऽ आबथुन तँ तोहर भैया हमरा कहथि, बौआकेँ खेनाइ दऽ अबियौ आ हम लाजे नै जाइऐ खेनाइ देबए, कारण खेसारीक रोटी आ मसुरीक उसना कतौ खेनाइ देल जाइ, हमरा लाज हुअए खेनाइ दैत। तँ सएह परिस्थिति छलउ तोरा बाप-पित्तीक घरक। रातिक मसुरीक उसना खा कऽ सभ सूति रहै छलउ, आइ भगवतीक दयासँ से बात तँ नै छउ। उसना आ फुटहाबाल बात। ई सभ सूनि अनिलक माथा सुन्न जकाँ लागए लगै, मुदा से केने कोनो लाभ छलै की? चिंता केने मोन आर खराप सन लागए लगै आ अपने मोने-मोन मोनकेँ सांतत्वना दै- जे बीत गेल से बात गेल” खएर...................। अनिल मैट्रीक, आइ. कॉम आ बी. कॉम.क परीक्षाक बाद जहाँ कि परीक्षा समाप्त होइ टिकट कटा फटाकसँ कलकत्ता पहुँच जाइ छल छोटका पित्ती लग, कलकत्ता घुमए। कलकत्ता ओकरा बड नीक लगलै आ कलकत्ताक लोक सभ आ ताइमे मौगी आ छौड़ी सभकेँ देखि कऽ ओकर आँखि फाटए लगलै, एहेन उदण्ड आ एहेन उघार आ निघार, ओ मोने-मोन सोचए लागल। एकरा सभकेँ जतेक उघार ततेक फैसन लगै छै की? अनिल गामसँ कलकत्ता जता बेर आबए परीक्षा दऽ कए, सभ ठाम जाइ छल। जतए गेलो छल तत्तौ जाइ छल माने चिड़ियाखाना, विक्टोरिया मेमोरीयल, तारामण्डल, जादूघर, बिड़ला मन्दिर, बिड़ला म्यूज्यम, नेहरू चिल्ड्रेन म्यूज्यम, कालीघाट, दक्षिणेश्वर काली, बेलूड़ मठ आ आर कतए कतए नै घुमए लेल जाइत छल अनिल। आ लेक गार्डन आ एम्हर ओम्हरका पार्क आ मैदान सभ तँ धांगल छलै ओकरा। जए बेर आबए खूब घूमए; आ भरि दिन डेरापर असगर पड़ल राजा बनल रहै छल। पित्ती आफिस चल जाइत छलै आ डेराक आर लोक सभ ड्यूटीपर। एतुक्का लोककेँ एतेक ड्यूटीक प्रति सतर्कता देखि अनिलकेँ आश्चर्य लगैत छलै, चारि बजे भोरे पित्ती उठै, शोचादिसँ निवृत भऽ नहा सोना भानस भात कऽकए। छः बजे फिट। आठ बजैत-बजैत बासन खाली, माजल-धोल आ चकमक करैत रहैत छलै आ सभ लऽ कऽ पड़ाइत छलै ड्यूटीपर। फेर मुन्हारि साँझमे अबैत छलै सभ फेर। खेनाइ-पिनाइ बना सुति रहै छलै आ प्रातः भेने फेर ओहे रामा ओहे खटोलबा बला बात होइ छलै। से एकरा आश्चर्य लगैत छलै बुढ़ पित्तीक ई फुर्त्ती देखि। अनिलकेँ मोने-मोन होइ, काश एहिना आ एतहे जकाँ फूर्त्ति आ काजक प्रति एतेक सजगता गाममे लोककेँ रहितै तँ निश्चय कोनो गाम गाम नै रहितै, सभ गाम अपन नाओं शहरमे गनबऽ लगितै। जे-से..............। अनिल तँ कोनो खुट्टा गाड़ि कऽ रहै लेल कलकत्ता नै जाइ छल, ओ तँ परीक्षा-तरीक्षा कोनो भऽ जाइ मधुबनीमे तँ दस दिन मास दिन घुमि आबए छल पित्ती लगसँ। से बेचाराक मोनो खूब लगैत छलै कलकत्तामे। मुदा जखन गाम आबए कालमे पित्ती गाड़ीपर चढ़बै लेल हावड़ा अबै छलखिन तखन अनिलक बरदास्त सँ फाजिल भऽ जाइत छलै। हिचुकि-हिचुकि कानए लगैत छल, धीया-पुता जकाँ। पित्ती बुझैत छलखिन, ई आइ गाम जाइत अछि, एतए एकरा नीक लगैत छलै तँए कनैत अछि। मुदा पित्तीये की करितथिन्ह, छोट-छीन नोकरी, कलकत्ता देखू आ गामपर घर-आश्रम सेहो देखए पड़ैत छलनि आ नइहे देखए पड़ितैन तँ की सभ दिन अनिल अपन पढ़ाइये लिखाइ छोड़ि कऽ एतए पड़ल रहितै, सएह की नीक बात छिऐ? आ बोल भरोस दऽकए भातिजकेँ गाम बिदा करथि। ओना बेटा आ भातिजमे कोनो अंतर छै? बेटे जकाँ मानितो छलनिहेँ पित्ती आ देख-भाल सेहो करैत छलनिहेँ अनिलक। एम्हर गाम आ मधुबनी एलापर एक राति मोन नै लगैत छलनिहेँ बाउकेँ। होइन जे किछु हरा गेल हो कलकत्तामे, आ हरेतैन की? लगैन अपने या मोने हरा गेल हो। एक मोन इहो होइ नाओं-ताओं कटा ओतहे चलि जाइ पढ़ाइ-लिखाइ करए, से फेर मोन अछताए-पछताए सेहो लगैत छलै, मधुबनीक पढ़ाइ आ कलकत्ताक पढ़ाइ, आ मधुबनीक खर्चा-बर्चा आ कलकत्ताक खर्चा-बर्चामे अकास पातालक अंतर छलै। सेहो दम सकरब बाला बात छलनिहेँ, आ अपन बाप किछु छलै तँ गामपर गृहस्थे छलै ने, पित्तीयेपर कते कुदता, पित्तीक फेर अपनो बाल बच्चा छै ने, कोनो इएहटा नै छथिन जे चल बाबा या कोनो बड़का हाकिम मुखतारो नै छन्हि पित्ती। फेर तँ छोटे छीन कम्पनीमे काज करैत छै ने। जे से बात धीरे-धीरे सरा जाइत छलैहेँ आ फेर अपने आप मोन लागए लगैत छलै मधुबनी आ गाममे। समैकेँ बितैत देरी होइ छै? ओ तँ हबाइ जहाजोसँ तेज गतिसँ चलै छै आ देखिते-देखिते कतएसँ कतए भागि जाइ छै। मधुबनीक पढ़ाइ समाप्त भेलै आ नौकरी-चाकरी लेल खूब प्रयास आ दौग बड़हा केलक अनिल, गाम घर, पटना, दरभंगा-मधुबनी आदि-आदि ठाम। अखुनका युगमे भगवानक भेटब आ नोकरी भेटब एके दर्जाक बात भेलै। औना कऽ रहि गेला अनिल, कतौ गोटी नै बैसलनि। मोने-मोन अपने-आपपर खुँझाइत रहथि, ऐ पढ़ाइक कोन काज? ऐ मधुबनीक ओगरनाइक कोन काज? ऐ पढ़ाइक पाछाँ पाइ बहाबैक कोन काज? जखन ईएह बेरोजगारीक जिनगी, तखन एतेक तपस्ये कथीक? होइ अपन मूड़ी अपने पानिमे गोइत ली। आब आर किछु नै नीक लगै छै अनिलकेँ। मोन अनोन-बिसनोन सन लगै छै ओकरा, अपरतीब सन सेहो। पित्ती छोटका कोनो काज उद्यममे गाम आएल छलखिन, अनिल कोनो काज ताजक बारेमे गप्प केलक पित्तीसँ। पित्ती आबै काल कलकत्ता लेने एलखिन। अपना सेठकेँ कहलखिन- हमर भातिज छी आ भातिज की हमर बेटे बूझि कोनो काज एकरा दहक। पित्तीक पैरबी काज केलकै आ भऽ गेलै अनिलकेँ कोनो क्लर्केक पोस्टपर, पित्तिये ऑफिसमे काज। ट्रेनिंग भेलै आ तकरा बाद अप्वाइन्टमेन्ट आ कन्फरमेशन सेहो। आब लगभग चारि-पाँच बरखसँ काज करैत अछि कलकत्तामे अनिल। पित्ती भातिज एके नगरी आ एके डेरामे सेहो रहैत छथि। मोन नै लगबाक कोनो बाते नै। मुदा अनिलकेँ मोन नै लगैत छै आब कलकत्तामे। बात कने भटमेराह सन सभकेँ जरूर लगै छै जे जइ अनिलकेँ कलकत्ताक प्रति एतेक स्नेह आ उद्गार छलै जे हावड़ामे ट्रेन पकड़ै काल आ गाम जाइत काल कानए लगैत छल, छ मसिया चिल्का जकाँ, तकरा आइ एतए नीक किएक नै लगै छै? ओकरा नोकरी छोड़ि देबाक इच्छा होइ छै। मुदा पित्तीक मुँह आ गामक ओ नौकरी लेल बौऐनी आ छिछिऐनी मोन पड़ि जाइ छै। पित्तीक मुँह ऐ लऽ कऽ मोन पड़ै छै जे अनिलक सामनेमे दुनू हाथ जोड़ि थड़थर कपैत सेठसँ अनिलक लेल नोकरीक भीख मँगने छलै, से जँ आइ नोकरी छोड़ि देतै तँ पित्तीक कतेक मान रहतै। ओना आइ कतौ सरकारी काज आकि नीक पोस्टबला काज कतौ होइतै आ तखन जे छोड़िये देतै तँ पित्तीक अपमान नै छाती सूप सन होइतै आ कहैयो लेल होइतै ने, सरकारी काम आकि उच्च पोस्टबला काम भेटलै तेँ छोड़ि देलक, मुदा सेहो बात नै छलैहेँ। अनिल करत की, तँए काज करैत छल। मुदा ओकर मोन मिसिया भरि नै लगैत छलै। ओकरा गामक लोकसभ गामक चौक-चौराहा, कलम-गाछी, पुबारी बाड़ी, बढ़मोतर आ खोइटक खेत, कुमरी पोखरि, उसराहा आ बौअन झा पोखरि सभ मोन पड़ि जाइत छलै। ओकरा गाम, झंझारपुर आ मधुबनी सभटा आँखिक समक्ष नाचए लगैत छलै। ओकरा ई बान्हल जिनगी एकदम नै नीक लगै छलै। ई आठ-दस घण्टा ड्यूटी आ एतेक व्यस्तता सोहाइत नै छलै। ओकरा मोन होइ छलै गाम-घरमे रहबाक, कत्ता गोटा कहै, अहाँकेँ नोस्टालजिया भऽ गेलहेँ, बिछुड़ल लोक, बिछुड़ल समए आ बितल बात सभ जे एतेक मोन पड़ैत अछि, से किछु नै नोस्टेलजियाक बात छी। ओकरा मोन पड़ै छलै गामक नांङट-उघार बच्चा सभ, गामक जुगेश्वर, बालेश्वर, फतुरिया, उत्तमा, जे तीन सेर बोइन लेल सारा दिन ओही रौद आ पानिमे तितैत लोकक ओतए काज करैत छलै। ओकरा मोन पड़ै छलै गामक सभ वस्तुक दिक्कत, सड़लाहा राजनीति। लोकक कुचिष्टामे लोक लीन रहै छै। भरि पेट लोक भोजनो करतै तैयो हँसतै आ जँ भुखले रहतै तैयो हँसतै। मुदा एतेक बात बूझितो आ सुझितो आ गमितो अनिल ऑफिसमे रिजाइन दऽ दै छै आ चल अबैत अछि गाम। आ गाममे रहए लगै छै। पित्तीक सभ प्रतिष्ठा आ बातकेँ अनिल पएरक ठोकरसँ घैला जकाँ गुड़का देलकै। घैला गुड़कि कऽ फूटि गेल छलै आ पानि सौंसे बहि गेल छलै। अनिलक पित्ती मोने मोन सोचै छै, कलकत्ताक ओही डेरामे आखिर एना किए भेलै, जकरा कलकत्तामे एतेक नीक लगैत छलै तकरा एक बैग एना किए मोन भऽ गेलै। आ अनायास मोनमे आ आँखिक सोझाँ अनिलक पित्तीकेँ अपन भैयारीक ओ बच्चाबला समए मोन पड़ै छै आ देखाइ छै खेसारीक रोटी, मसुरीक सन्ना आ पेटकटारी लागल पेट आ अभावे अभाव सगरे...! गामक बताह बताह, बुरि, बकलेल पत्ता नै की-की ने गामक लोक कहै। सगर गाम इएह बात। हौ केनाकेँ ई भुसकौलहा सुभषवा मैट्रिक पास कऽ गेल आ कोन दऽ कए इंजिनीयरीमे नामों लिखा गेलै। हौ ओकर तँ एक फेजे पार छै। कहह तँ गामक छौड़ाकेँ संग कऽ कऽ पत्ता नै की-की नियार भास करैत रहैत अछि। आ छौड़ो सभ खूब, ओकर आगाँ पाछाँ करैत रहैत अछि, हमरा तँ लगैत अछि ई रूतबा रहलै तँ छौड़ा सबहक तँ छोड़ह, गामे कऽ नै उड़हारि ई चल जाएह। सबहक नजरि गाम अबैत मातर ओकरापर गड़ि जाइ छलै। आ सुभाषो एक आध दिनमे गाममे रहि, गामक हाल-चालसँ अवगत भऽ छौड़ा सबहक बैठार कऽ चल जाइत छल सिन्दरी। गाम अति पिछड़ल- गमार आ हँसी-कुचिष्टाक समुद्र छल। सबहक एक बात, एक विचार कियो तेहेन पढ़ल लिखल नै, तँइ मूर्खक लाठी बिचे कपार सेहो छल। ककरो नेना-भुटका नीक जकाँ पढ़ाइ-लिखाइमे नै भीरल छल आ जे भिरलो छल से प्रोत्साहनक अभावमे डारटुट्टु जकाँ बैसि जाइत छल। तखन पत्ता नै केनाकेँ सुभाष ओइ गाम आ ओइ समाज आ ओइ वातावरणमे रहि मैट्रिक पास कए, इन्जीनियरीमे पढ़ि रहल अछि आ पाँच हजार रूपैया स्कॉलरशिप पाबैत अछि। आ पत्ता किएक नै थालमे जे कमल फुलाइत छै से केना। जे अपने खराप रहैत अछि ओकरा सौंसे दुनियाँ खरापे लगैत छै आ ताहीमे नीक। नीक तँ आर तीत ओकरा बुझाइ छै। सएह बात छलै। सुभाष मिसिया भरि नै ककरो सोहाइ छलै। ई गामक विकास लेल गाम अबैत देरी नीक-नीक योजना बनाएब, जइमे निअम कानून छल। सभ छात्र स्वअध्यायमे लागल रहथि, दोसरोकेँ पढ़ाइ-लिखाइमे सहायता पहुँचाबथि। गामक रस्ता परहक गंदाकेँ मासमे दू बेर नै तँ एकबेर अवश्य सभ युवा वर्ग मिलि खुशीसँ साफ सुथरा करए। गामक सभ बिजली पोल सभपर चंदा लऽ बिजली लगा देल जाए। उसराहा बाबाक ढ़हैत मन्दिरपर धियान देल जाए। गाममे एकटा लाइब्रेरी होमक चाही, पत्र-पत्रिका ओतए नित्य आएल करए। गामक स्कूल मास्टरकेँ जा कऽ कहल जाए जे चटिया लोकनिपर नीक नजरि राखनिहार गामक कोनो काज श्राद्ध, उपनयन, आदि-आदिमे बिना कहने सभ ओतए जा हुनका परिश्रमसँ सेवा करए। गामक विकास लेल ब्लौकसँ सम्पर्क स्थापित कएल जाए आ ओइसँ गामक लोककेँ लाभ होइन। आदि-----आदि---। यएह छल सुभाषक बतहपन्नी आ देखितहि-देखितहि ओ एकटा नव जागरण युवा संघक गठन कऽ बैसल। आ योजना सभ लागू भऽ जएह, तइ हेतु सभ कृत संकल्पित भऽ गेल। एम्हर गामक लोक कहए "केहेन-केहेन गेला तँ मोंछ बला एला" नूनू, रामचन्द्र, गोनाइ आ गुर कते बेर एहेन-एहेन योजना बना, चक्कापर राखलक से रखले छन्हि आ हुनका सबहक केश पाकि गेलनि, दाँत टूटि गेलनि आ लाठी लऽ चलैत छथि, आ योजना-योजने रही गेलनि हूँ-----। देखैत छियनि लैटसहिबो कऽ------? बीस गोटए मुदा बीस रंगक बात। ऐबेर सुभाष गर्मीक छुट्टीमे मास दिन गाममे रहल, आ गुहकट्टीसँ लऽ कऽ मन्दिर तकमे हाथ लगा देलक। अपनेमे दस-बीस रू. प्रति माह चन्दा लऽ पत्र पत्रिका मंगबए लागल। मन्दिरमे बेस पाइ लगितै तँइ धनिक लोक ओतए संघक सभ गोटा जाए भीख माँगए, दतखिसरी कऽ दैत छल, तेना तेना कऽ मन्दिर चमकए लागल। गामक कोनो नेनाकेँ पढ़बाक समएमे बड़द-महीस किछु खोलने देखैत छल सुभाष तँ अपनेसँ खुट्टामे बान्हि अबै छल आ ओकर बाबूकेँ शिकाइत करै छलै.... हे हम अहाँक माल बान्हि देलौं अछि। उत्तर भेटै, बड़का काज केलौहेँ, हम अपना बेटासँ माल चरबै छी, अहाँकेँ मतलब। सुभाष कहैए से नै भऽ सकैत अछि, पढ़ए कऽ समैमे पढ़त दोसर समएमे अहाँ अपना बेटासँ किछु कराउ। नेनो-भुटका सभक रुचि खुजलै पढ़ै-लिखैकेँ। ओ सभ माए-बापकेँ ठाँए-पठाँए उत्तर दऽ दै, हम नै महीस खोलबौ। हमरा कोपी-किताब दे, आ कंठपर ठाढ़ भए किनबाबए। ओना जकर आर्थिक स्थिति एकदमे खराप छलै, सुभाष अपना पाइसँ स्कूलमे नाओं लिखा दै, किताब कॉपी कीनि दै आ अपने गेलापर संघकेँ भार द दै ओकर कॉपी-किताबक, सिलेट-पेंसिलक। गामक नवतुरमे अनुशासन जगजगार होमए लगलै। एक दोसरामे छोट-पैघ, अचार-विचार, उचित-अनुचित धारा फुटलै। जहाँ-तहाँसँ थोड़-थोड़ पोथी जमा भेल आ तामे एकटा टटघर बना पुस्तकालय सेहो बनि गेल। एतेक भेलाक बादो कुचिष्ट समाज कहै, यौ सुभाष बाबू हमरा सभ कऽ पैखाना करैएमे दिक्कत होइत अछि, जल्दी रस्ता साफ कराउ, तखन ने हम सभ पतियानी लगा बैसब। सुभाष कहए, जेहन अहाँ सबहक विचार। अहाँ सभ जतेक गंदा करबै, हमरा सभ ओतेक साफ करबै। कारण आब गाम अहाँ सबहक नै, हमरा सबहक छी। एकर नीक अधलाहसँ अहाँ सभकेँ कोन काज। अहाँ सभ तँ पाकल आम भेलौं ने "गेल माघ उंतीस दिन बाँकी"। समए छन-छन बितैत गेल आ किछु दिनुका बाद देखएमे आबए लागल जे गाम पूर्ण विकासमे लागि गेल आ एका एकी गाममे पोल सभपर बल्ब लागि गेल, पुस्तकालयमे बेस पोथी सभ जमा भऽ गेल, पत्र-पत्रिका बेस जुटए। बिना पुस्तकालयपर गेने छात्र सभकेँ चैन नै आबै। रस्ता दूधसँ धोल। उसराहा बाबापर जे चढ़ाएल अछत माल-जाल चटैत रहै छल से आब आेइमे खूब निसन केबाड़ लागि गेल। छतपर लाउडिस्पीकर भजन गबैत गामक मनोरमकेँ आर बढ़बै छल। ब्लौकसँ कल आएल, पहिले पुस्तकालयपर आ तकरा बाद सगर गाममे गोट बीसेक लगभग कल गरा गेल। लाउडिस्पीकर सुभाष अपन स्कॉलरशिप बला पाइसँ किनलक। धरि पुस्तकालयक ईंटाक घर ब्लौकक फण्डसँ बनाएल गेलै। आँखिक आगूमे एतेक परिवर्त्तन देखि आइ पूरा गाम छुब्द, चकित आ विस्मित अछि। केना कऽ नव जागरण संघ ई केलक? आ जँए संघ तँइ ने अछि ई सोना बनैत गाम। ऐ समाजकेँ नै आगू चलि होइ छै नै पाछू, जे काल्हि कहए सुभषवा बताह, बुरि, बकलेलहा, सएह समाज आइ कहै छै सुभाषक बुइधिक आ परिश्रमक ई परिणाम छी, चमकैत, खनकैत, हमर गाम। सएह जे गामक बताह छल, अपन हीनता अपन खिध्यांस सुनैत रहैत छल, से बताह बनि की-की ने कए देलक। मुदा वास्तविक बताह के? ...सुभाष आकि गामक लोक.....? आइ गाममे घर-घर बी.ए., एम.ए. पास लोक अछि आ मैट्रिक कतेक गनाउ। पूरा गाम मात्र एकगो सुभषवाक बतहपनीसँ शिक्षित आ नोकरी-चाकरीमे लागि गेल अछि। नै तँ गामक लोकक अनुसार लोक अखनो घर सेवने रहितए। सुभाष अपन प्रतिभाक बले स्वीडनमे रिसर्च करैत अछि आ ओतसँ गाम अखनो जाइत अबैत रहैत अछि। ओकरे सन कतेक प्रतिभाशाली लोक सभ ओइ गामक गौरव बढ़ा रहल अछि। ओकर गाम आदर्श गाम भऽ गेल अछि। संघ अखनो कार्यरत अछि आ जँइ जँइ छेटगर लोक पढ़ै लिखै लेल बाहर गेलासँ गाम छोड़ने जाइत अछि, तँइ तँइ छोट तुरक बच्चा सभ ओइ क्रमकेँ आगाँ बढ़बैत रहैत अछि। सुभाषकेँ अखनो अपना गामपर गर्व छै आ पूरा गामकेँ सुभाषपर। अखनो ओकर फोन जे अबै छै विदेशसँ तँ घंटाक-घंटा गामक मादे चर्च आ पुछताछ करैत रहैत अछि ओ। शिव कुमार झा "टिल्लू" १९७३- शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू”, पिताक नाम- स्व. काली कान्त झा ‘‘बूच”, माताक नाम स्व. चन्द्रकला देवी, जन्म तिथिः ११-१२-१९७३, शिक्षाः स्नातक (प्रतिष्ठा), जन्म स्थान मातृक मालीपुर मोड़तर, जि. बेगूसराय, मूलग्रामः ग्राम-पत्रालय- करियन, जिला- समस्तीपुर, पिन: ८४८१०१, संप्रतिः प्रबंधक, संग्रहण, जे. एम. ए. स्टोर्स लि., मेन रोड, बिस्टुपुर, जमशेदपुर- ८३१ ००१, अन्य गतिविधिः वर्ष १९९६सँ वर्ष २००२ धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार-प्रसार हेतु डॉ. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न। प्रकाशित कृति- क्षणप्रभा (कविता-संग्रह) आ अंशु (समालोचना)| लेबर पेन सालक पहिल दिन। कविजी भाेरेसँ नव वर्ष मनएबाक प्रकियामे लागल छलाह। चौपाड़िपर सँ सिया झाक प्रसिद्ध पेड़ा एक पसेरी आनल गेल। सुधीर कामति नन्दन बाबाक जिरातमे फूलकोबी लगौने छलाह। ओइ खेतक टटका फूलकोबी तीन सेर कीन लेलनि। गामक किछु इष्ट-मित्र सबहक चाह पार्टीक आयोजन करबाक छलनि। कवि जीक नव रूपसँ अर्द्धांगिनी परेशान भऽ कऽ पुछलनि- “पहिने तँ नव वर्षक विरोध करैत छलौं, हमरा सबहक लेल नवका साल शक् संवत आ होरी थिक आब की भऽ गेल?” “चन्द्रकला, एना नै अकचकाउ, समैक संग हमरो चलऽ पड़त। जखन सभ लोक पहिल जनवरीकेँ स्वीकार कऽ लेलक तँ हम पाछाँ केना रहब। समैसँ आगाँ नै चलबाक चाही मुदा बेसी पाछाँ रहब सेहो ठीक नै।” कवि जीक तर्कक आगाँ श्रीमती गुम्म। दलानपर लोकक जुटान होमए लागल। पेड़ा, पकौड़ीक संग-संग मकयवाड़ी लीफक चाह। रमाश्रय जी, लक्ष्मी चौधरी, बैजू भाय, राधाबाबू, नागो बाबा, भोला साहुजी सन कवि जीक इष्ट-मित्रक संग-संग नवतुरिया पिरही आ किछु समाजक पछातिक लोक सभ सेहो टी पार्टीक आनंद लऽ रहल छलाह। गामक डाॅक्टर यशोदा पाठक दलानक आगाँसँ झटकल जाइत छलाह। कविजी हाक देलनि- “यशोदा भाय, कनेक सन जलपान कऽ लिअ।” डॉक्टर साहेब कहलनि- “भैया, हम घुुरि कऽ अबैत छी। हरिजन टोलमे सुकेशर मोचीक पुतोहुकेँ लेबर पेन भऽ रहल छन्हि, कनेक सन जल्दीमे छी।” लेबर पेनक नाओं सुनिते राधाबाबू विस्मित होइत बजलाह- “कविजी, ई लेबर पेन तँ बुझैत छी जे प्रसव पीड़ाकेँ कहल जाइछ मुदा लेबरक अर्थ होइत अछि मजदूर तखन मातृसुखक अनुभूति-पीड़ाकेँ लेबर पेन किअए कहल जाइत अछि?” कविजी फँसि गेलाह, गुम्म! लक्ष्मी चौधरी बीच-बचाव करैत बजलाह- “घबराउ नै राधा कक्का, कोनो एहेन प्रश्न बनबे नै कएल जकर उत्तर कवि जी नै दऽ सकैत छथि।” चाहक चुस्की लैत कविजी बजलाह- “अर्थयुगक आधारपर समाजक पाँच गोट वर्ग होइत अछि- कुलीन वा सामन्त जैमे समाजक अगिला पाँति रहैत छथि जेना राजनेता, पैघ-पैघ व्यापारी, अधिकारी आदि। दोसर वर्ग श्रमपोषी छैक जैमे कर्मचारी, सीमान्त खेतिहर आदि राखल जा सकैछ। तेसर वर्ग भेल श्रमजीवी- जनिक योजना मात्र एक दिवसीय होइत अछि। आजुक दिन कमाएब आ आइ खाएब ओ नै तँ भूत देखैत छथि आ ने भविष्य। चारिम वर्ग होइत अछि चाटुकार आ कोढ़ियाक। ऐ वर्गमे पहिल लोकक चमचाक संग-संग शरीरसँ दुरूस्त भिखमंगाकेँ सेहो राखल जाए। पाँचम वर्ग होइत अछि मजबूर वर्ग। ऐ वर्गमे साधन-विहीन अस्वस्थ, अपंग आ शिक्षासँ दूर यायावर लोकनि छथि। एे संसारमे व्यथित जीवन मात्र दू वर्गक होइत छन्हि। श्रमजीवी आ मजबूर वर्गक। मजबूर वर्ग तँ कोनो रूपेँ अपन जीवनसँ संतुष्ट रहैत छथि, किएक तँ कोनो विशेष चाह नै छन्हि मुदा श्रमजीवीक जीवन अत्यन्त दु:खमय। जँ कोनो दिन बीमार पड़ि जेताह तँ अगिला दिन परिवारमे उपवास। अपने दुनू परानी एकादशी मानि मात्र जल ग्रहण कऽ कहुनो रैन काटि सकैत छथि मुदा नेनाक लेल.... कोनो साधन नै।” “अंग्रेज बड़ बुद्धिजीवी जाति होइत अछि। भारत वर्ष सन गरीब राष्ट्रमे राज केलक। एक समए छल जे ब्रिटिश गन्ध लागब स्वाभाविक। श्रमजीवीक व्यथा देखि क्रूर अंग्रेजी आत्मा िनश्चित पघिल गेल हेतै। तँए संसारक सभसँ पैघ दर्द प्रसव पीड़ाकेँ श्रमजीवीक पीड़ासँ जोड़ि अंग्रेज “लेबर पेन”क आविष्कार केलक। प्रसव वेदना संभवत: सभसँ बेसी क्लिष्ट वेदना थिक। संभवत: ऐ दुआरे किएक तँ हमहूँ पुरुष छी। ठीक ओहिना श्रमजीवीक पीड़ा मार्मिक होइत अछि। जीवन भरि अगिला दिनक आशमे रैन बिता लैत छथि- श्रमजीवी। ऐ दुनू व्यथामे अनुभूति समाने होइत अछि। अन्तर अछि तँ समए कालक। मातृत्व वेदना मात्र क्षणिक मुदा श्रमजीवीक वेदना जीवन पर्यन्त।” सभ लोक गुम्म मुदा कविजी बजैत-बजैत भाव विभोर भऽ गेलाह। हमहूँ ब्रिटिश नीतिक विरोधी छी, हमरा सबहक देशकेँ ओ बर्बाद कऽ देलक मुदा किछु एहेन उपहार सेहो देने गेल जे देस कालक लेल अनिवार्य होइ छै। ओइमे सँ एक अछि- जीवन यापनक कला। तँए ने हमरा सन स्वदेशी लोक सेहो सालक पहिल दिनकेँ आइ आत्मसात कऽ लेलौं। राधा बाबू अहाँ ऐ जन्ममे लेबर पेनक आनंद नै लऽ सकैत छी, किएक तँ अहाँ ने श्रमजीवी छी आ ने नारी। तँए आग्रह जे अंग्रेजे जकाँ लेबर पेन अर्थात श्रमजीवीक व्यथापर धियान राखल जाए नै तँ मिथिलाक गाम-गामसँ रोटीक आशामे श्रमक पूर्ण पड़ाइन अवश्यंभावी अछि। कदाचित जौं एना भऽ गेल तँ प्रसव वेदनाकेँ अपन गाओं समाजमे कोनो आन नाओं ताकए पड़त। एकटा कविता तँ अपने हमरा मुखसँ पहिनौं सुनने हएब- श्रमक कोन मानि जतए बुइधक विलास छै, पेड़ा दलाल गाल श्रमक पेट घास छै।। नागो बाबा जोरसँ ठहक्का मारैत बाजि उठलाह- “कवि जी पेड़ा खुआ कऽ सूदि सहित असूलि लेलनि।” सभ आगंतुक लोकनि एक स्वरसँ कवि जीक तर्ककेँ मानि चाहक दोसर खेपक आनंद उठबए लगलाह। कब्जियत दूर भगाउ (शीर्षक श्री उमेश मंडल जीक देल अछि।) बड़की भौजी भोरेसँ आनंदक क्षीर-सागरमे गोता लगा रहल छलीह। किएक नै, हुनक बाबा जे आबि रहल छथिन्ह। दुरागमनक बाद पहिल बेर बाबाक अवाहनक आशमे रंग-विरंगक पकमानक संग स्वागत करबाक लेल ओ आतुर....। हमरा समस्तीपुर जएबाक छल, मुदा बाबूजी रोकि लेलाह। “परम प्रिय समधि आबि रहल छथि, चौरासी बर्खक भऽ गेलाह, नै जानि फेर आबि सकताह वा......। अहाँ काल्हि भरि रूकि जाउ।” पितृ आदेश शिरोधार्य, आर्द्रा नक्षत्रक बरखासँ दलानक परिसर बज-बज कऽ रहल छल तँए पुनीतकेँ सुरखी छिटबाक लेल कहल गेल। हम कोदारिसँ चिक्कन कऽ रहल छलौं। एतबामे गुंजन बिहारि जकाँ दौड़ल आबि कऽ कहलक- “सरपंच सहाएब आबि गेलाह, निसहर भुइयाँ थान लग हम देखलौं।” “हम पहिने कहने छलौं समधि भोरूक बससँ औताह मुदा हमर के सुनए, भोज कालमे कुम्हर रोपू। आब बाट साफ करबाक कोनो प्रयोजन नै, दौग कऽ जाउ आ हुनका लऽ अबियौ।” गुंजन खिसिआइत बाजल- “हुनका के आनत, बा.... बाबा तँ आबि गेलाह।” समधि मिलान भेल, तत्पश्चात बाबूजी हुनक चरण स्पर्श कएलनि। बावा असोकर्ज देखएबाक प्रयास करए लगलाह मुदा व्यर्थ। अपने हमर समधिक पिता छी तँए हमरो लेल पितृतुल्य। बाबूजीक तर्कक आगाँ सरपंच सहाएब मूक....। झट-झट सभ गोटे चरण स्पर्श करए लगलौं। असलानी चौकी, खराम, जल..... पूर्ण मिथिलाक संस्कृतिसँ अभिनंदन। बाबा गदगद होइत बजलाह- “कादम्बिनीक ऐ घर बिआह करबाक निर्णए हमर जीवनक सभसँ सोझ निर्णए प्रमाणित भेल अछि। मनुखकेँ अपन संस्कार नै छोड़बाक चाही।” कुरड़ा-अछमनिक पछाति जलपान, चाह..... ओकरा बाद प्रसिद्ध पतैलीक प्रसिद्ध पान चिबबैत गुंजनकेँ बजौलनि- “बौआ, कोन किलासमे पढ़ैत छी?” गुंजन बाजल- “छठामे.....।” गुंजनक जबाव पूर्ण भेल नै की बिचहिमे हमरा मुँहसँ निकलल- “मुदा, विद्यासँ हिनक कोनो संबंध नै, अखन धरि विचाराधीन होइत कक्षा पार कऽ रहल छथि।” ई बात सुनिते बाबूजी हमरा दिस आँखि गुरड़ि कऽ बिदबिदेलाह- “देखि लेब चारू भाँइमे छोटका सभसँ आगाँ जाएत।” सरपंच बाबूक मूक समर्थन। हँसी-ठट्ठाक बाद बाबाक आंगन प्रवेश भाव आ मर्मक अनुभूतिक साक्षात दर्शन। भौजी बाबाकेँ गोर लागि अश्रुधारसँ नहा गेली। हमरा मुँहपर मंद मुस्की मुदा गुंजन दहोबहो। भौजी अपन भावनापर अंकुश लगा कऽ गुंजनकेँ पुचकारए लगलीह। सभ व्यक्ति बूझि रहल छल मुदा सबहक ठोर जग्रनाथकक फाटक जकाँ बंद......। मातृ सुखसँ वंचित नेेना ककरो आँखिपर नोर नै देखि सकैछ। सरपंच सहाएब बजलाह- “नै हहरू, भौजीकेँ माएक रूपमे देखू।” हम मोने-मन बजलौं- “कहब अासान मुदा एना भऽ सकैत अछि? कियो कतबो मानए परंच मातृ प्रेमक आगाँ सभ अोछ।” भौजीक सिनेहमे कोनो कमी नै, ई गप्प हम बुझब, गुंजन अबोध, माएक संग पिठिया जकाँ लड़ैत छल, ओइ क्षणकेँ बिसरब असंभव तँ नै, क्लिष्ट अवश्य अछि। मझिनीक पश्चात बाबा दलानपर आबि दिवस विश्राम करए लगलाह। बाबूजी शनि पेठिया माँछ किनबाक लेल िवदा भऽ गेला। एक मनुखक कतेक रूप भऽ सकैत अछि। अपने शाकाहारी परंच पाहुनक लेल माँछ अपने आनब। पाहुन की? हमरो सबहक लेल ओ अपने माँछ अनैत छथि। अपन संतति लेल लोक की की नै करैत अछि, माटिक ढेपकेँ कुम्हार बनि कऽ घैलक रूप दैत अछि। सुधा कोष बनएबाक लेल अपन सकल मनोरथकेँ झाँपि लैत अछि। सुधाकोष आगाँ कोन रूपक हएत ककरो वशमे नै। आंगन आबि हम भौजीसँ चाह बनएबाक आग्रह केलौं- “आइ भरि हमरा छोड़ दिअ, अपने स्टोप जड़ा कऽ बना लिअ।” हमरो खराप नै लागल, अपन पिताक प्रति सिनेह स्वाभाविक अछि। माँछ तड़ैत छलीह, मात्र बब्बेटा नै खएताह, हमहूँ खाएब। ‘गह-गट्ट रौ, गहगट्ट रौ......सुनिते भागल दलान दिस अएलौं। दलानपर दसौत गामक भाट कोनो टाटक कए रहल छलाह। भाटक नाओं मोन नै मुदा सभ कियो हुनका मुकेश कहैत छथि। ओ नकिया कऽ गीत सुनाबए लगलाह- “सिनेहिया बिसरि बैसल अछि गाम....।” बाबूजी भाटक संग समधिक साक्षात्कार करौलनि। हमर बड़का बालकक ददिया ससुर छथि, अपन गामक निर्विरोध सरपंच छलाह। सरपंच सहाएबक विशुद्ध मैथिली सुनि भाट महाशय गाबए लगलनि- “रैनी-भैनी ओ रौतिनिया दीप गोधनपुर कैथिनिया पाँच गाम पचही परगन्ना उत्तम गाम ननौर तेली-सूड़ी बसए मधेपुर लंठक ठट्ठ लखनौर” “सरपंच सहाएब, हम दस-दुआरि छी तँए नीक अधलाह बुझैत छी। अपने अपन पोतीक बिआह करियन कएलौं.... इहो नीक गाम, मुदा अछि तँ दक्खिन। लेकिन अपनेक समधि मूल रूपसँ कैथिनिया गामक वासी छथि.... झंझारपुर टीशनक सटल गाम- ‘कैथिनिया’। हिनका दछिनाहा नै कहल जा सकैत अछि। ई सुनिते सरपंच सहाएबकेँ जेना बिरनी काटि लेलक....। क्षमा करू मुदा हम तँ शुद्ध दछिनाहा छी। हसनपुर चीनी मिलक पाँजरि लागल गाम शासन हमर जन्म आ कर्मभूमि।” दू क्षणक लेल मुकेश जी मूक भऽ गेलाह। मुदा छथि तँ सिद्धहस्त मैथिल, क्षणहिमे भाखा बदलि गेल। अहोभाग्य अपने सन महान व्यक्तिक दर्शन भेल। शासन गाम मिथिलाक चर्चित गाम अछि। ओइठाँक सती माताक महिमा के नै जनैत अछि? बिड़ला परिवारक द्वारा अपने गाममे सती माताक स्मृति स्वरूप तोड़ण द्वारक निर्माण कएल गेल अछि। एकटा बात पुछवाक दु:साहस कऽ रहल छी दक्खिन भरक रहितौं अपने परिमार्जित मैथिली बजैत छी..... से केना? अवश्य अपनेक मातृक पंचगामक परिधिमे हएत। “नै मातृक दक्षिणे अछि आर सासुर तँ विशुद्ध दक्षिण मंझौल गाम, बेगूसरायमे अवस्थित अछि।” बाबाक व्यथा सुिन बाबूजी अकचका गेलथि, -मुकेश बाबू दीर्धसूत्री जकाँ किए धमगिज्जरि केने छी। जौं औतुका मैथिली सुनबै तँ बहुत भलमानुषकेँ बिसरि जाएब। ऐ सबहक लेल अहाँक कोनो दोष नै, किछु लोक ऐ प्रकारक भेद पैदा कऽ मातृभाषाकेँ हथियाबए चाहैत छथि ई नै चलऽ देब। यात्रीक गामसँ उतरो कोनो गाम अछि तँ हुनको दछिनाहा मानल जाए। प्रो. सुमन जी, प्रवासी जी, आरसी बाबू, बुद्धिनाथ मिश्र, लाभ जी, हरिमोहन झा, हासमी जी, शेफालिका वर्मा इहो सभ दछिनाहा छथि तँए हिनका सभकेँ बारि दियौ। जइ महाकवि विद्यापतिक नाओंपर कूदैत छी ओ अपन महापरिनिर्वाण दक्खिनेमे कएलनि। पाप करैत छी तिरहुतमे आ पतिया कटएबाक लेल गंगाकात सिमरिया दक्षिणे अबैत छी। जा.... मुकेश जी क्षमा करू, अपनेकेँ हम ई सभ किए कहि रहल छी, अहूँ तँ दछिनाहे छी..... समस्तीपुर जिलाक दसौत ग्रामवासी।” सरपंच सहाएबकेँ संतोखक अनुभूति भेलनि, मुदा हम हुनक छोभक स्पष्ट दर्शन कऽ रहल छलौं। बाबूजीसँ मुकेश जी क्षमा याचना करैत बजलाह- “हमर दोख नै, एहेन मानसिकताक मध्य पैघ भेलौं।” सरपंच सहाएब दीर्घ श्वास लैत बजलाह- “मैथिलीक मध्य एकटा विडंबना अछि अपनाकेँ श्रेष्ठ प्रमाणित करबाक लेल दोसरकेँ मरोड़ि देबाक। हमरा सबहक ब्रह्मण समाजमे पहिने बेसी छल, आब सुधरि रहल अछि। सुरगणेकेँ सुगरगणे कहल गेल, अड़रियेक माथपर तँ पैघ कलंक- हुनका अनेड़िये कहल जाइत अछि। आन जातिक कोन कथा, हुनका सभकेँ मैथिल बुझले नै गेल।” ऐ दशापर कानी वा हँसी निर्णए नै कऽ सकलौं। आंगनसँ भोजनक निमंत्रण आएल। मुकेश जी भात नै खएबाक इच्छा प्रकट कएलनि किएक तँ कब्जियतक शिकार छथि। बाबूजी अपन कविता पाँती जकाँ चिकित्सा आयाम देखौलनि- “दस्त-दस्तावरं खातिर भक्क्षेत अमृतं फलं। (पेट साफ करबाक लेल लताम खाउ)।” सरपंच सहाएब तत्क्षण बजलाह- “जौं अहूसँ नै ठीक हो तँ ताहूसँ दस्त नै होतं तँ कूथि-कूथि मरीयते।” दोसर दिन बाबा चलि गेलाह मुदा हुनक “दछिनाहा व्यथा” हमर मोनमे जीवित छल। आब ओ संसारमे नै छथि परंच दिशा मोन पड़िते हुनक मर्मक अनुभूति प्रासंगिक अछि। प्रभात राय भट्ट रोटी रोजीक खोजी नेपालक मधेस प्रान्तमे महोतरी जिलाक धिरापुर गामक बर्ष ३० भोला एकटा निम्नबर्गीय परिवारमे जन्म लेलक। ओकर माए बाबू बड मुस्किलसँ मेहनत मजदूरी कऽ भोलाक पालन-पोषण केलक, भोलाक माए-बाबुक गरीब हेबाक कारण भोला प्रारम्भिको शिक्षासँ वंचित रहल। जेन-तेन समय बितैत गेल आ समयानुसार भोला पैघ सेहो भऽ गेल ! समयक संग संग ओकर दाम्पत्य जीवनक शुभारम्भ सेहो भऽ गेलै, भरल जुवानीक अवस्थामे दाम्पत्य जीवनक रसास्वादन एवं आनन्दमे पूर्ण रूपेण डुबि गेल। ओ अपन आर्थिक स्थितिकेँ नजैर अंदाज करैत गेल मुदा बिना अर्थसँ जीवनक गाड़ी कतेक दिन चलि सकैए ! कनियाँक सौख शृंगारक सामिग्री, भोजन भातक बेबस्था, वृद्ध माए बाबूक दवाइ दारू सभक अभाव चारू दिशसँ अखड़ऽ लगलै। तकर बाद भोलाकेँ अपन जिम्मेवारीक बोध भेलै। ओकरा किछु नै सुझाइ जे की करू आ नै करू। राति दिन बेचारा भोला घरक लचरल बेबस्था देखि कऽ बड चिंतित रहऽ लागल ! एक दिन ओ अपन मिता सुरेश कापरकेँ अपन सभटा दु:ख सुनेलक! सुरेश बड नीक सलाह देलकै- देखू मिता, अइ नेपाल देशमे स्वरोजगारीक कोनो व्यवस्था नै छै, पढ़लो लिखल मनुखकेँ नोकरी नै भेटै छै, तहन हम अहाँ कोन जोकरक छी! हम एकैटा सलाह देब, सउदी अरब चलि जाउ, ओइ ठाम बड़ पैसा भेटै छै, अहाँक सभटा दु:ख दूर भऽ जाएत। सुरेशक गप सुनि कऽ भोलाक माथमे चक्कर देबऽ लगलै!! मुदा किछु देरक बाद भोला सहमती जनौलक आ सुरेशसँ बिदा लैत घर तरफ प्रस्थान केलक! सुरेश घर पहुँचैत बजैए- कनियाँ कतऽ गेली यै- हमरा बड़ जोरसँ भूख लागल अछि, किछु खाइले दिअ ने। कनियाँक कोनो जवाब नै एला उपरांत ओ भानस घरमे गेल। कनियाँकेँ देखलक, माथ हाथ धएने आ हिचुकि-हिचुकि कऽ कानैत। अहाँ किए कनै छी यै अतराढ़वाली? की भेल, किछु बाजब तब ने हम बुझबै! कनियाँ कहलकै....हम की बाजू आ बाजल बिनु रहलो नै जाइए। अहाँ जे कोनो काम धंधा नै करबै तहन ई चुल्हा-चौका कोना चलत? एक पाउ चाबल छल जेकर मरसटका भात बना कऽ माए-बाबू आ बच्चा सभमे परसादी जकाँ बाँटि देलौं आ हम तँ उपवासो कऽ लेब मुदा अहाँकेँ तँ भूख बर्दास्त नै होइए तइसँ हमर छाती फटि रहल अछि मुदा अहाँकेँ तँ कोनो चिंता फिकिर रहबे ने करैए! तपेश्वर मालिक सेहो बड़ खिसिया कऽ द्वारपर सँ गेल। कहै छल जे ५०० टकाक हमर सूद ब्याज सहित २५००० भऽ गेल मुदा ई भोलबा अखन धरि देबऽके नाम नै लैए। -हे यै अतराढ़वाली, अहाँ आब जुनि चिंता करू, हमरापर भरोसा रखू। सभ ठीक भऽ जेतै। ई किछु दिनक दु:ख थीक। एकटा कहावत छै जे भगवानक घरमे देर छै मुदा अंधेर नै। अतराढ़वालीक मोन अति प्रसन्न भेलै आ झटसँ पुछि बैठैए- आइँ यौ रामपुकारक पापा- ई की बात अछि जे अहाँ एतेक पुरुषार्थबला गप करैत छी? -की बजली यै अतराढ़वाली। एकर मतलब अहूँ हमरा निकम्मे बुझैत छी? तँ कान खोलि कऽ सुनि लिअ। हम आब सउदी अरबिया जा रहल छी आ ढेर पैसा कमा कऽ अहाँ लेल भेजब! अतराढ़वाली ई बात सुनिते घबरा गेल आ कहऽ लागल- की बजलौं? कने फेरसँ बाजू तँ। अहांकेँ जे मोनमे अबैए सएहे बाजि दै छी। एहन बात आब बजैत नै होइब, से कहि दै छी हम.....। मोन तँ भोलाक सेहो उदास भऽ जाइए मुदा हिम्मति कऽ कनियाँकेँ समझाबक कोशिश करैए। -देखियौ कनियाँ, हम जनैत छी जे हम कोनो काम धंधा नै करै छी। तइयो अहाँ हमरासँ खूब प्रेम करै छी। आ हमहूँ अहाँ बिनु एकौ घडी नै रहि सकै छी। ई सभटा जनैत बुझैत हम मजबूरीमे बस एहन निर्णय लेलौं आ अइके अलाबा दुसर कोनो रस्तो नै अछि ! आखिर ई जीवन तँ प्रेम आ स्नेहसँ मात्र नै चलत। नै जीवनमे दुःख, सुख, भूख, रोग, शोक, पीड़ा, ब्यथा, वेदना, संवेदना, प्रेम, स्नेह, विवाह, बिदाइ, जीवन-मृत्यु, समाज सेवा, घर परिवार, इस्ट मित्र, कर-कुटुंब, नाता गोता, मान सम्मान, प्रतिष्ठा, घर मकान, खेत खलिहान, बगीचा, मचान, सत्कार तिरिस्कार, मिलन बिछोड़, ई सभटा जिनगीक अभिन्न अंग अछि, आ ई सभटाक जड़ि एकैटा थीक जेकर नाम अछि पैसा... तैँ हमरा परदेश जाहिटा पड़तै- अहाँ कनिको मोन मलाल नै करू, सबहक प्रियतम पाहुन परदेश खटै छै! -हे यौ रामपुकारक पापा। ई बात सुनि कऽ हमर छाती फटैए.. तहन अहाँ बिनु हम कोना रहि सकै छी? नै नै, हमरा नै चाही पैसा कौड़ी महल मकान। हम नुने रोटी खेबै। सेहो नै भेटत तँ साग पात खाय कऽ जिनगी काटि लेब। कहैत भोलाकेँ भरि पाँज पकड़ि कऽ हिचुकि-हिचुकि नोर बहबैत कानऽ लागैए.... मुदा भोला कुलदेवताकेँ सलामी राखैत माए-बाबुसँ आशीर्वाद लैत घरसँ प्रस्थान भऽ गेल....! …………. भोला साउदी अरबक एकटा कंस्ट्रक्सन कम्पनीमे राइतक ११ बजे पहुँचल आ भिन्सरमे ७ बजे आफिसमे हाजिर भऽ गेल। कम्पनीक मैनेजर साहब भोलासँ कबूलनामा कागजपर साइन करबौलक आ भोलाकेँ उक्त कबूलनामाक विवरण सुनौलक- १.मासिक वेतन ५०० रियाल, ड्यूटी ८ घण्टा, करार अवधि ३ वर्ष! भोला ई बात सुनि कऽ हतप्रभ भऽ गेल जेना मानू भोलाक माथपर वज्र गिर गेल। फेर भोला अपने-आपकेँ सम्हारैत मैनेजर साहबसँ कहलक- नेपालक मेनपावरक कबूलनामा अनुसार हमर पगार ६०० रियाल, खाना +२००, ओभर टाइम आ दू वर्षमे ३ मासक छुटीक शर्त भेल छल। मुदा मैनेजर भोलाक एकोटा बात नै सुनलक। तहन भोला कहलक हम सुखा ५०० मे काम नै करब। २०० खानामे खर्च भऽ जाएत। बचत ३०० रियाल, ३०० रियालक नेपाली टाका ६०० हजार मात्र होइत अछि। तइ हेतु हमरा वापस भेज दिअ! मैनेजर भोलाक सामने साम दंड भेदक सूत्र अनुसरण करैत कड़ा रूपसँ प्रस्तुत भेल। बेचारा भोला मैनेजरक चंडाल रूप आ कड़ा चेताबनीक सामने निरीह बनि गेल आ काम करबा लेल तैयार भऽ गेल! भोला अपन भाग्यक साथ समझौता करैत कम्पनीक काजमे इमानदारी पूर्वक शरीक भऽ गेल, मुदा महिना लागैत पगार हाथमे आबिते भोला हिसाब किताबमे लागि जाइत छल। खाना नास्ताक खर्च निकालैक बाद मुस्किलसँ ३०० रियाल बचै। आब भोला घरक बारेमे सोचै लागल। ३०० रियालक सिर्फ ६००० नेपाली होइत अछि जाइसँ घर परिवार चलत, कि रु.१ लाख कर्जा सधत जेकर सिर्फ ब्याज ३०० हजार चलि रहल अछि। यएह बात सोचैत सोचैत प्रात: भऽ गेल। फेर बेचारा भोला अपन दैनिक काम काजमे तटस्थ रूपसँ लागि जाए। यएह क्रम लगभग ५-६ महिना चलैत गेल। तेकर बाद भोला किछु टाका घर भेजलक, जइसँ हुनक घर खर्च चलि रहल छल! १ साल बितला बाद भोलाक घरसँ चिठ्ठी आएल। भोला उक्त चिठ्ठी पढ़ि कऽ मर्माहित भऽ गेल। चिठ्ठीमे लिखल रहै- रामपुकारक बाबूक घरक स्थिति बड़ नाजुक अवस्थासँ गुजरि रहल अछि आ अहाँ जे कर्जा लऽ कऽ गेल छी ओकर ब्याज ३६०० हजार भऽ गेल। महाजन आएल छल। कहि कऽ गेल जे आब मूल धन रु.१ लाख ३६ हजार भऽ गेल। ऐ बातपर ध्यान दिअ। भोला चिठ्ठी पढैत फेर घरक चिंतामे डुबि गेल। कर्जा कोना सधत? भोलाकेँ उदास देख हुनक संघतिया पुछि बैठल। आइयो मिता अहाँ एना सदिखन एतेक उदास किए रहै छी यौ? भोलाक ध्यान भंग भेल आ संघतियाकेँ अपन सभटा दु:ख सुनौलक! संघतिया हाथमे खैनी मलैत कहलक- रुकू, कने ई खैनी खाय दिअ, तहन हम कुनु उपाय बताबै छी। खैनी ठोरमे धरैत झटसँ एकटा गप भोलाकेँ सुनौलक। देखू हम जे कहै छी से ध्यानसँ सुनू। चुप-चाप हम आर अहाँ दुनु गोटे ई कम्पनी छोड़ि कऽ भागि चलू, कतौ दोसर ठाम जतए नीक कमाइ होइत होइक! मुदा भोलाकेँ संघतियाक गप कनियो निक नै लागल। भोला कहलक- देखू ई दोसरक देसमे भागि कऽ कतए जाएब? कहीं देहि नै भऽ गेल तहन के मदत करत, आ दोसर ऐ देसक कानून बड़ कड़ा छै। पकड़ा गेलापर जेलमे चक्की चलबऽ पड़त। तहन धोबीक कुत्ता नै घर नै घाटक होइत अछि से बुझि लिअ। हम तँहि नै जाएब। अहाँ जाएब तँ जाउ! भोला फेर अपन काम काजमे जुइट गेल आ भोलाक संघतिया मासिक १५०० पगारमे दोसर ठाम काम करै लागल। देखते देखते दुइ साल बित गेल! भोलाक घरसँ फेर एकटा चिठ्ठी आएल। भोला चिठ्ठी पढ़लक। चिठ्ठी पढ़ि कऽ खुसी होमए बजाय पुनः उदास भऽ गेल, आ गंभीर सोचमे डुबि गेल। भोलाकेँ सभसँ बड़का परेशानी रहै कर्जा, जे ओ साउदी आबऽ बेरमे लेने रहै। भोला सोचलक जे एतबा न्यूनतम पगारमे कर्जा कोना सधत। अंतत: भोला कम्पनी छोड़ि भागऽक निर्णय लेलक! भोला कम्पनीसँ भागि संघतियाक कम्पनीमे चलि गेल आ मासिक १५०० पर काज करै लागल। भोला ५ महिनामे रु १लाख टाका घर सेहो भेज देलक आ कनियासँ फोन मार्फत गप केलक। कनियासँ कहलक- ई एक लाख टाका महाजनक खतामे जमा कऽ दिअ। आ हुनका कहि दिअ जे ५ महिनाक बाद हम हुनकर सभटा पाइ चुकता कऽ देबै! आब भोला किछु प्रसन्न मुद्रामे रहै लागल आ अति प्रसन्नताक साथ सोचै लागल। लोक ठीक कहै छै जे भगवानक घर देर छै मुदा अंधेर नै। आब हमरो बिपइतक घडी टड़ि रहल अछि, मुदा बेचारा भोलाकेँ की पता जे भाग्य रेखा कियो नै देखने छै। कखन की हेतै से मनुखक कल्पनासँ बहुत दूरक चीज छै। समयचक्र कखन कुन रूप लेत ई एकैटा परमात्मा जनै छथि! बड़ मुस्किलसँ भोलाक ठोरपर मुस्कान आएल छल मुदा दैबकेँ ई रास नै एलै। भोलाक जीवनमे तेज गतिसँ एकटा बड़ भारी बज्रपातक आगमन भेलै। भोला अपन ड्यूटी खतम कऽ डेरा तरफ जाइके क्रममे रोड पार करैत समयमे भोलाक देहपर तेज गतिमे कालरुपी एकटा गाड़ी चढ़ि गेल। भोला जीवन आ मृत्युक बिच एक घण्टा लादैत रहल। अंतत: भोला अपन चेतना गुमा बैठल। ताइ समयमे उद्धार टोली आबि कऽ भोलाकेँ अस्पतालमे भरती कऽ देलक! ऐ दुखद घटनाक २० दिन बाद भोलाक घरमे खबड़ि गेल जे भोला आब ऐ दुनियामे नै रहि गेल। रोड एक्सीडेंटमे हुनक मृत्यु भऽ गेल। ई बात सुनैत बेचारी भोलाक कनियाँ मूर्छित पड़ि गेल आ गाम घरक महिला सभ भोला कनियाँक चूड़ी फोड़ि मांगक सिंदूर धोबि विधवा बनाबक काजमे एकमत भऽ गेल। तखने समाजसेवी एकटा महिला ऐ बातक घोर विरोध केलनि आ सभ महिलाकेँ समझौलनि- जाधरि कुनु ठोस पुष्टि नै भेटैए ताधरि रूकि जाउ। कहीं ई समाचार गलत होइक आ भोला जिन्दा होइक! गायत्री देवी जीक सुपुत्र प्रभात राय सेहो साउदी अरबमे रहथि ओ फोनसँ सभटा बात सुनैलथि आ प्रभात राय आश्वासन देलथि जे अहाँ सभ हमर फोनक प्रतीक्षामे रहू, हम अखने वास्तविकता की अछि, से कहै छी। प्रभात भोलाक घटना प्रति जानकारी हासिल करैमे लागि गेल! अस्पताल, पुलिस, एम्बुलेंस, ट्राफ्फिक सभ ठाम पता लगौलाक बाद प्रभातक मेहनत रंग लौलक। भोलाकेँ जिबिते अबस्थामे रियाद स्थित एकटा अस्पतालक कोमामे भरना भेल देखलक। प्रभात तुरत गाममे फोनसँ आँखि देखल पुख्ता जानकारी देलन्हि। ई बात सुनैत धिरापुर गाममे हर्सौल्लासक माहौल बनल आ गामक सभलोक प्रभातकेँ धन्यवाद दैत एकटा विनम्र अनुरोध केलथि। जते खर्चा लागतै हम सभ चंदा उठा कऽ देब मुदा भोलाक जान बचा दियौ! प्रभात आश्वासन देलथि, अहाँ सभ जुनि चिंता करी, हमरासँ जते बनि पड़त हम जरुर करब। आब भोलाक उद्धार कार्यमे प्रभात दिन राति एक कऽ देलक। तीन मासक बाद भोला अर्धचेतन अवस्थामे आएल। फेर एक महिना उपचारक बाबजूदो किछु आंशिक सुधार मात्र भेल। एम्हर अस्प्तालक खर्च सेहो जीवन बीमाक हद पार कऽ गेल। प्रभातक प्रयासमे भोला वैधानिक कम्पनी आ जीवन बीमा अस्पतालक खर्च चुकता केलाक बाद डिस्चार्ज भेल आ नेपाल पठाउल गेल! भोलाकेँ जिबिते अबस्थामे गाम आबक खबरि सुनि कऽ भोलाक परिवार लगाइत समूचा गामक लोक एकबेर पुनः खुश भेल। दू दिनक बाद भोला अपन मातृभूमिमे पहुँचल आ सबहक प्रतीक्षाक घड़ी खत्म भेल! भोलाकेँ जीवित देखैला समूचा गामक लोक आबि गेल मुदा भोला ई सभ बातसँ बहुत दूर जा चुकल रहै। ओ ऐ काबिल नै रहै जे किनकोसँ मिलनक खुशी बाँटि सकए। भोलाक अपंग आ अर्धचेतन अबस्था देख सभक मुहसँ आह निकलि गेलै! भोलाक कनियाँ अपन सोहागरूपी पति परमेश्वरकेँ अपंगो अबस्थामे भेट गेलै तेँ खुशी जरुर भेलै मुदा किछु दिन बाद अतराढ़वालीक लेल ओकर सोहाग एकटा दीर्घकालीन बोझ बनि गेलै, ओइ बोझक भार उठेनाइ बड़ मुस्किल भऽ रहल छै, किए तँ ओ आजीवन अपंग आ अर्धपागल रही गेल!! शंभु नाथ झा ‘वत्स’ अतीतक घटना/ सपना/ कोशीक प्रलंकारी बाढ़िमे भाँसल एकटा लड़कीक सत्य कथा मनोरमा आइ उठैमे देर कऽ देलक। आइ आँखि खुजिए नै रहल छलै। देबारक घड़ीपर नजरि गेलै। साढ़े छ बजि गेल। हड़बड़ाइत मनोरमा नल लग जाए आँखिमे पानिक छिटा मारलक। झटसँ पेस्ट आ ब्रश लऽ कए मुँह धोअए लागल। तावत रजनीशक अवाज सुनाए पड़लै- मनोरमा, चाह...। आँए। रजनीश पहिनहिए उठि गेल छल। फेर रजनीशक आवाज होइ छै। -हे ऐठाम टेबुलपर चाह धरि देलौंहेँ। मनोरमा मुँह-हाथ धोए कुरूड़ कऽ कमरामे प्रवेश करै छथि आकि रजनीश तैयार भऽ कऽ बाहर निकलि कऽ कहलक- हम जा रहल छी। हमर बस छूटि जाएत। अहाँ उठैमे देर कए देलौं- रजनीश बाजल। -नाश्ता कऽ लिअ, बना दैत छी।-मनोरमा बजलीह। -हम नास्ता बना कऽ खा लेलौं। अहूँ लेल धऽ देने छी। रजनीश बाजिते-बाजिते बाहर भऽ गेल। मनोरमा सकपका गेलीह। आइ हमरा की भऽ गेल छल। आँखिए नै खुजि रहल छल। रजनीश कखन उठि कऽ सभ काजसँ निवृत्त भऽ गेल। आ अपनहिसँ चाह सेहो बना लेलक आ नाश्ता सेहो? हमरा नै उठौलक। कत्तौ मोनमे दुःख तँ नै भऽ गेलैए। नै दुःख तँ आइ धरि नै केलक। हमहूँ रजनीशकेँ खुश करबा लेल कोनो कसर नै राखलौं। मुदा आइ की भऽ गेल छल जे उठैमे देरी भऽ गेल। हँ रातिमे सपना देखलौं। सपना भोरे-भोर धरि देखलौं। तँ उठबामे देर भऽ गेल। रजनीशक स्कूल दूर पड़ैत छैक। तेँ रोज साढ़े पाँच बजे उठि जाइ छै। हमरो निन्न साढ़े पाँचसँ पहिने टूटि जाइत छल। मुदा आइ हमरा की भऽ गेल छल जे आँखिए नै खुजल। रजनीश हमरा उठएबो नै केलक। मनोरमा रातुक सपनाक स्मरण कऽ अतीतमे चलि गेलीह। महाकाल रात्रि छल। कुशहा बान्ह टूटि गेलै। कोशी माए रोद्र रूप धारण कऽ भयानक गर्जन करैत गामक-गाम अपना उदरमे समाबए लगलीह। कतौक नारी-पुरुषक सुतलेमे प्राण पखेरू उड़ि गेलै। मरल बच्चा-माल-मवेशी भाँसि-भाँसि कऽ बहै लागल। सुपौल, मधेपुरा, सहरसाक किछु भाग आ पूर्णियाँ आ अररिया जिलाक पश्चिम भाग सेहो डूमि गेल। दू मंजिला मकान सभ तँ कतोके उलटि गेल। फूस घरक कथे कोन। त्रिवेणीगंज बाजार, मुरलीगंज बाजार तँ बर्बाद भऽ गेल। महाप्रलयकालीन धारा भऽ जखन कोशीक धारा दक्खिन दिसि बढ़ल तँ गाम-घर, बाग-बगान सभटा नष्ट भ्रष्ट भऽ गेलै। विशाल-विशाल गाछ-बिरीछ सभ धराशायी भऽ गेलै। चारू दिसि पानि-पानि नजरि आबए। कतौ-कतौ बाँस भरि पानि। पक्काक मकानपर बचल-खुचल आदमी सभ आश्रय लेलक। मनुक्खोमे जे राक्षसी प्रवृतिक मनुख छल, सहायताक ढ़ोंग रचि-रचि धन लोभसँ ग्रस्त भऽ महा-अनर्थ कार्य केलक। जइ गाममे पानि पहुँचैमे देर भेलै तइ गामक लोक सभ ऐ आशामे, जे आब पानि घटि जेतै, लोभसँ गाम नै छोड़लक। मुदा अओर पानि बढ़िए गेलै। जिनका सभकेँ पक्काक मकान छलै से सभ अपन-अपन टाका गहना जेवर लऽ कऽ मकानक छतपर पहुँचि गेल। तीन-चारि दिन बीति गेलै। भोजनक समस्या। बच्चा सबहक प्राण निकलए लागल। सभटा अनाज, चूल्हा-चौका, जारनि आदि तँ नीचेमे छलै। सभटा जलमग्न छलै, जिनका हाथमे मोबाइल फोन छल ओ अपन सर-कुटुमकेँ सूचना दऽ देलक। मुदा सरो-कुटुमकेँ किछु नै फुरन्हि। बल-कल तेज धारमे किनको हेलए केर साहस नै होइन्हि। एम्हर लूटे खसोटे केर मोन बला सभ नाह लऽ कऽ बचाबए केर स्वांग रचि नाहपर चढ़ा कऽ माँझ धारमे आबि सभटा माल-पत्तर गहना जेवर छीनि कए पानिमे धकेल दैत छलए। केन्द्र सरकार आ राज्य सरकारकेँ त्राहिमाम् संदेश जखन भेटलै तखन जा कऽ फौज केर नाह आएल। ऊपरसँ हेलीकॉप्टरसँ बिस्कुट आ भोजन सामग्री पहुँचाएल गेल। सहायता शिविर स्थापित भेल। ई काल रात्रि १८ अगस्त २००८ केँ आएल छल। मनोरमा सेहो अपन परिवारक संग अपन मकान केर छतपर छलि। कतेक दिन बीति गेल छल। चारू दिस पानिए पानि। कत्तो भागए केर रास्ता नै। उपरसँ झमाझम बरखा सेहो बरसै छल। भूख प्याससँ बाँचब कठिन भऽ गेल छलै। ताबत एकटा नाह लऽ कऽ तीन-चारि आदमी आबि नाहपर चढ़ा लेलक। किंतु माँझ धारमे जाए सभटा गहना जेवर टाका छीनि कऽ सभकेँ लाठीसँ मारि पानिमे धकिया देलक। मनोरमा सेहो धक्का खाए पानिमे खसि ऊब-डूब करए लगलीह। ओ बेहोश भऽ भाँसैत-भाँसैत एक किनार लागि गेलीह। मनोरमाक आँखि खुजलै- होशमे अएलीह तँ अपनाकेँ राहत शिविरमे पओलीह। राहत शिविरमे अन्यान्यो सबहक डॉक्टरक उपचार भऽ रहल छलै। मनोरमा जखन दूइ चारि दिनक बाद स्वस्थ भेलीह तँ डॉक्टर आ राहत शिविरक व्यवस्थापक मनोरमाक निर्देशसँ ओकर सूचना ममहर भेजवा देलकै। मनोरमाक पिता अवकाश प्राप्त प्रधानाध्यापक छलाह। मनोरमाक जेठ भाए युगेश कृष्णाष्टमी पूजामे गाम आएल छल। युगेश कलकत्तामे मेडिकल पढ़ि रहल छलै। मनोरमाक बिआहक कथा लागि गेल छलै युगेशेक साथी धर्मानन्दसँ। अगला माघ-फागुन मासमे बिआह होमए बला छलै। मनोरमा सेहो बी.ए. छलीह। दरवज्जेपर कृष्णाष्टमी पूजा धूम-धामसँ हरेक साल मनाएल जाइत छलै। सभ भगवानक मूर्त्ति सभ बनि कऽ तैयार छलै। पूजाक व्यवस्था जोर-शोरसँ भऽ रहल छलै ताबते ई महाप्रलयक घटना घटित भऽ गेल। माम एक छोट छिन शहरमे शिक्षकक नोकरी करए छलनि। मनोरमाक सातम आठम दिन ममहरमे रहब भेल छलै। मामीक व्यवहार मनोरमाकेँ नीक नै बुझा रहल छलै। मामी एकांतमे मामसँ कहथिन- एकरा माथपर किए बैसा लेलिऐ। आगाँ किछु सोचबो करै छिऐ। एकर बियाहो करबै पड़त। एक दिन मनोरमा मामीक मुँहसँ मामसँ ई कहैत सुनि लेलक। मनोरमा चिंतित भऽ गेलीह। बेर-बेर मामीक तानासँ अकच्छ भऽ गेल छलीह। मनोरमा शहरक मोहल्लामे घुमि कऽ सम्पर्क कऽ कऽ छोट-छोट नेना सबहक ट्यूशन करए लगलीह। मामो ओतए पूर्वसँ आवागमन रहबे करै तँए मुहल्लाक लोग सभ मनोरमाकेँ चिन्हते रहै तेँ ट्यूशन भेटैमे भाङ्गठ नै भेलै। एक दिन रघुवीर जे सम्बन्धमे ममियौत छलै मनोरमासँ कहलखिन- बहिन कोनो कान्वेन्ट धऽ लैतिए तँ बड्ड नीक होइतौ। मनोरमा बजलीह- भाए। हमर सार्टिफिकेट तँ घरेमे पानिमे नष्ट भऽ गेल। अहाँ भाए मदति कऽ दिअ। सहरसा कॉलेजसँ प्रिंसिपल साहेबसँ आवेदन अग्रसारित कराए मधेपुरा यूनिवर्सीटीसँ द्वितीयक लब्धांक पत्र सभ मंगा दिअ। हे भाए हमर सन अभागल केर किछु मददि कऽ दिअ। हमरा किछु नै सूझि रहल अछि। हम अनाथ छी।- कहि कऽ मनोरमा फफकि-फफकि कानए लगलीह। रघुवीर सान्त्वना दऽ चुप करौलक। रजनीशकेँ हाल-फिलहालमे सेंट्रल स्कूलमे नोकरी भेटल छलै। ओ छुट्टीमे अपन शहर आएल छल। रघुवीरक संग एक दिन रजनीश बाजार करएले जा रहल छल। मनोरमा सेहो किछु सहेली संग बाजार घूमि रहल छलीह। रजनीश केर नजरि जखन मनोरमापर पड़ल तँ रूप-लावण्य देखि ओ भाव विह्वल भऽ गेल। ओ रघुवीरसँ प्रश्न कएलक- रघुवीर, ई नवयुवती के थिक? नजरि हटिए नै रहल छलैक। -हमरे पिसियौत बहिन थिकीह। बाढ़िमे सभ किछु बर्बाद भऽ गेलैए। भाए, माए, पिताजी केर कोनो पता नै छै।- रघुवीर सकल वृतांत कहि सुनौलक। रजनीश ऐ दुर्घटनाकेँ सुनि व्यथित भऽ गेल। ओ मोने-मोन विचारै लागल जे एकर बिआह नीक घरमे होएबाक चाही। एहेन शिक्षित सुन्दरि जइ घर जएतीह, ओ घर स्वर्ग भऽ जेतै। प्राकृतिक विपदासँ एहेन उत्तम कुल शील वाली कन्या अनाथ भऽ गेल अछि। रजनीश विचार मग्न रघुवीरक संग आगाँ बढ़ल जा रहल छल। ताबत पाछाँसँ मधुर शब्द सुनाए पड़लै -रघुवीर भाए। ई देखू विद्या विहार कान्वेन्टमे एकटा महिला शिक्षक केर विज्ञापन छै। मनोरमा एकटा न्यूज पेपर देखइत बजलीह। -बड्ड नीक। आवेदन कऽ दियौ।- रघुवीर बाजल। -कतेक योग्यता अछि।- रजनीश हठाते पुछि देलक। -बी.ए. संस्कृत आनर्स फर्स्ट क्लास।- मनोरमा सकपकाइत बजलीह। -अहा हा! तखन तँ अहाँ कऽ निश्चिते भऽ जाएत।-रजनीश बाजल। ऐ तरहे गप्प सप्प करैत घर घुरि सभ आबि गेल। रजनीश केर मोनमे मनोरमा बैस गेल। रजनीश एक दिन प्रसंगमे माएसँ कहि देलक। -माए हम कमाबैत छी, ऐ लेल हम आदर्श बिआह करब आ एहेन लड़कीसँ जे कुलीन हुअए आ परिवार जनक सेवा कऽ सकए। सभ परिवार जनकेँ मनोरमा पसिन्न भऽ गेलीह, खास कऽ रजनीशक मोन राखए लेल। बिआह कए रजनीश मनोरमाकेँ लऽ कऽ शहर आबि गेल। गर्मीक समए, अप्रैल-मइ मास। रजनीशकेँ सबेरे तैयार भऽ नाश्ता कऽ स्कूल जाए पड़ैत छलै। बिआह कऽ शहर आएब पन्द्रह-बीसे दिन लगधग भेल छलै। दुनोक बीच अगाध प्रेम छलै। मनोरमा नित भिनसरे साढ़े चारिये बजे उठि कऽ चाह बनाबैत, दुनू गोटे संगहि पीबै छल। आ नास्ता बनाए रजनीशकेँ खुआ प्रेमसँ बिदा करै छलीह। मुदा आइ अतीतक घटनाक सपना देखैत भोरमे आँखिए नै खुजलै। तइ लेल रजनीश अपनहिसँ सभ काम कऽ लेलक आ फेर अपन स्कूल चलि गेल। किशन कारीगर दाम-दिगर टुनटुन राम टनटनाइत बाजल- ‘कहू तँ एहनो कहीं दाम दिगर भेलैए जे दोसर पक्षबलाकेँ तँ दामे सुनि कऽ चक्करघूमी लागि जाइत छै। हे बाबा बैजनाथ, अहीं कनी नीक मति दियौ एहेन दाम-दिगर केनिहार सभकेँ।’ एतबा सुनितै बमकेसर झा बमकैत बजलाह- ‘आइँ रौ टुनटुनमा, हम अपना बेटाक दाम-दिगर कए रहल छी तँ ऐमे तोहर अत्मा किए खहरि रहल छौ।’ ताबै फेरसँ टुनटुन राम जोरसँ बाजल- ‘अहीं कहू ने, अत्मा केना नै खहरत। हम जे अपना बेटा बच्चा रामकेँ संस्कृतसँ इंटरमे नाओं लिखबैत रही तँ अहाँ कतेक उछन्नर केने रही। मुदा तैयो ओ नीक नम्बरसँ पास केलक। आब हम ओकरा फूलदेवी कॉलेज अंधराठाढ़ीमे संस्कृतसँ बी.ए.मे नाओं लिखा देलिऐ।’ ई सुनि बमकेसर झा तामसे अघोर भऽ बमकैत बजलाह- ‘रौ टुनटुनमा, तँू साफ साफ कहि दे ने जे हमरा बेटाक दाम-दिगरमे बिना कोनो भंगठी लगौने तों नै मानबेँ।’ दुनू गोटेमे एतबाक कहाकही होइते रहै आकि पिपराघाटसँ पएरे-पएरे धरफराएल हम अप्पन गाम मंगरौना चलि अबैत रही। दरभंगासँ बड़ी लाइनक टेन पकड़ि राजनगर उतरल रही। ओतएसँ बस पकड़ि कहुना कऽ पिपराघाट एलौं, मुदा ओतए रिक्शाबला नै भेटल तही द्वारे पएरे-पएरे गाम जाइत रही। मुदा जहाँ गनौली गाछी लग एलौं तँ टुनटुन आ बमकेसरकेँ कहा-कही होइत देखलिऐ। उत्सुकता भेल जे दाम-दिगर कोन चिड़ैक नाओं छिऐ से बूझिए लिऐ। मोन भेल जे एखने टुनटुनमसँ पुछि लै छिऐ जे कथिक दाम-दिगरक फरिछौटमे अहाँ दुनू गोटे ओझराएल छी, मुदा बमकेसर झाक बमकी आ टुनटुनक टनटनी देखि तँ हमर अकिले हेरा गेल अओर हिम्मत जबाब दए देलक। सोचलौं जे गामपर जाइत छी तँ ओतए ठक्कनसँ ऐ प्रसंगमे सभटा गप-सप्प भए जाएत। गामपर आबि कऽ सभसँ प्रणाम-पाति भेल, तेकरा बाद नहा सोना कऽ हम ठक्कनक भाँजमे भगवती स्थान दिस बिदा भेलौं। मुदा कियो कहलक जे ठक्कन तँ सतबिगही पोखरि दिस भेटत। हुनकर नामेटा ठक्कन रहनि मुदा ओ बड्ड मातृभाषानुरागी रहथि। कहियो गाम जाइ तँ हुनकेसँ मैथिलीमे भरि मोन गप-सप्प करी। भिनसुरका पहर रहै, हम बान्हे बान्हे गामक हाइ स्कूल दिस बिदा भेलौं जे कहीं रस्तेमे भेँट भऽ जाथि। मुदा ठक्कन महराज कतौ नै भेटलाह तँ बाधे-बाधे सतबिगही पोखरि लग एलौं। दूरेसँ देखलिऐ जे ठक्कन आ परमानन दुनू गोटे गप करैत चलि अबैत रहए, अवाज हम साफ-साफ सुनैत रही। ठक्कन बाजल- आइँ हौ भैया, ई कह तँ अमीनो साहेबकेँ जे ने से रहैत छन्हि। कहू तँ, ततेक दाम-दिगर कहैत छथिन जे घटककेँ घटघटी आ घुमरी धए लै छै। बेसी दाम भेटबाक लोभमे पारामेडिकलबला लड़काकेँ एम.बी.बी.एस कहि रहल छथिन। कहऽ, ई अन्याय नै तँ आर की छी।’ परमानन खैनी चुना कऽ पट पट बाजल- ‘रौ ठक्कना, तोरो तँ गजबे हाल छौ। अमीन साहेब अपना बेटाक दाम दिगर कए रहल छथि तइसँ तोरा।’ ताबै ठक्कन बाजल- ‘हमरा तँ किछु नै तोहँए कहऽ ने। अपना चैनो उड़लपर २ लाख रूपैया गना लेलहक आ हमर मोल जोल करबा कालमे तोरा दिल्ली कमाइसँ फुरसत नै रहऽ। हौ भैया तेहेन ठकान ठकेलौं से की कहिअ। हम बिपैतमे रही आ तूँ अमीन साहेबक चमचागिरीमे लागल रहऽ।’ परमानन बाजल- ‘आसते बाज रौ ठक्कन, जँ कही अमीन सहएबक बेटाक दाम दिगर भंगठलै तँ कोनो ठीक नै। ओ हमरा जमीनक दू चारि जरी हेरा-फेरी कए देताह आ तोरो चारि सटकन दऽ देथुन।’ ठक्कन बाजल- ‘हम कोन हुनकर तील धारने छियनि। तूँ धारने छहक तँ तोरा डर होइ छह हम तँ नै मानबनि, सोहाइ लाठी हमहूँ बजाइरे देबनि की।’ दुनू गोटे एतबाक गपमे ओझराएल रहए, मुदा परमानन हमरा दूरेसँ अबैत देखलक तँ बाजल- ‘रौ ठक्कन, रस्ता पेरा चुपेचाप बाज ने। देखै नै छिही जे मीडियाबला सेहो एखने धरफराएल अछि। तूँ तेहेन भंगठीबला गप बाजि देलही से डरे झारा सेहो सटैक गेल।’ ताबै हम लगमे पहुँचि कऽ दुनू गोटेकेँ प्रणाम कहलियनि। हमरा देखि ठक्कन अकचकाइत बजला- ‘किशन जी, कहू समाचार की? आइ भोला रामक रिक्शा नै भेटल जे पएर-पएरे आबि रहल छी।’ हम बजलौं- ‘सएह बुझियौ, मुदा ई कहू जे अहाँ सभ कथिक दाम-दिगरक फरिछौटमे लागल छलौं।’ एतबामे परमानन बजलाह- ‘जाउ अखन हम सभ पोखरि दिससँ आबि रहल छी जँ बेसी बुझबाक हुएअ तँ साँझखिन ठीक पाँच बजे अमीन साहेबक दरबज्जापर चलि आएब।’ ठीक समैपर ५ बजे हम अमीन साहेबक दरबज्जा दिस बिदा भेलौं। ओतए लोक सभ घूड़ तपैत गप-सरक्का करैत छल। टुनटुन सेहो ओतए बैसल। ओ पुछलक- ‘कहू अमीन सहएब, मोन माफिक दाम भेटल की अहाँ पछुआएले छी।’ एतबामे परमानन फनकैत बाजल- ‘हौ टुनटुन भैया, बमकेसर संगे पटरी खेलकह तँ आब ऐठाम दाम दिगर भंगठबैक फेरमे आएल छह की नै।’ -रौ परमानन, तो तँ दोसरे गप बूझि गेलही। ताबै चौक दिससँ धनसेठ धरफराइल आएल आ बाजल यौ अमीन बाबा हमरो दाम-दिगर करा दिअ ने। ई सुनि अकचकाइत घूरन अमीन ठोर पट-पटबैत तमसाइत बजलाह- ‘मर बँहि तूँ किए हरबड़ाएल छैं रौ। हमरा तँ अपने बेटाक दाम दिगर भंगठि रहल अछि आ तूँ ‘हरबरी बिआह कनपटी सेनुर’ करैमे लागल छैं।’ ओ बाजल- ‘बाबा हम छी धनसेठ, आइए पूनासँ गाम आबि रहल छी।’ –-मर बहिं, मुरूख चपाट तोरा कहने रहिऐ जे संस्कृतसँ मध्यमा कए ले तँ से नै केलही। कह तँ ठक्कना सी.एम साइंस कॉलेजसँ इंटर केने अछि ओकरा कियो पूछनाहार नै भेटलै तोरा के पुछतौ रौ। सेठ महासेठ आ धनसेठ खूम गरीबक धीया-पुता तइ द्वारे नान्हिटामे परदेश कमाइ लेल चलि गेल रहए। तीनू भाँइमे सभसँ छोट धनसेठ कनी पढ़लो रहए, ओ कनी साहस कए बाजल- ‘यौ बाबा, हम पूणेमे ओपनसँ मैटीक पास कए कऽ आब इंटरमे नाओं लिखा लेलौं।’ ई सुनि अमीन सहएबक दिमाग गरम भऽ गेलनि, ओ बजलाह- ‘रौ परमानन ई ओपेन-फोपेन की होइ छै रौ। आइ तँ धनसेठो नहिए मानत।’ ताबै ठक्कन बाजल- ‘कक्का, पत्राचार कोर्सकेँ ओपेन कहल जाइ छै। अहूँ नाओं लिखा लिअ ने।’ ई सुनि सभ गोटे भभा भभा हँसए लागल मुदा अमीन सहएब तामसे अघोर भेल तमसा कऽ बजलाह, -रौ उकपाति सभ, हमर देह जरि रहल अछि अओर तूँ सभ हँसी ठिठोलामे लागल छैंह। टुनटुन बाजल- ‘कक्का, हम तँ कहैत छी जे दाम दिगरक परथे हटा दिअ ने, नै दाम दिगर हेतै ने एतेक सोचबाक काज।’ ताबै केम्हरोसँ बमकेसर झा घुमैत-घुमैत अमीन सहएब ऐठाम पहुँचलाह। ओहीठाम टुनटुनकेँ देखि बमकैत बजलाह- ‘बुझलौं की अमीन सहएब, टुनटुन द्वारे अकच्छ भेल छी।’ ई सुनि ठक्कन बाजल- ‘अपने करतबे ने अकच्छ छी। अहाँ कम्पाउण्डर बेटाकेँ प्रैक्टीसनर डागडर कहि लोककेँ ठकि रहल छिऐ, तइ द्वारे तँ घटक सभ घूमि रहल छथि, तँ ऐमे टुनटुन भैयाक कोन दोख।’ अमीन सहेब पानक पीक फेकि बजलाह- ‘मर तोरी कऽ, रौ ठक्कना, आबो सुखचेनसँ गप सुनए दे ने, की भेल औ बमकेसरबाबू।’ अमीन सहेब इशारा कऽ बजलाह। बमकेसर टुनटुनसँ भेल कहा-कही कहलखिन। अमीनो सहएब अपन दुखरा सुनौलनि। सभटा गप सुनि टुनटुन बाजल- ‘दाम दिगरक चलेनमे गरीब लोक मारल जा रहल अछि। ओ कतएसँ लड़काबला सभकेँ एतेक फरमाइसी पुराओत। बेटीक बिआह तँ सभ गोटेक छन्हि। हमरो अहँूकेँ, समाजक सभ लोककेँ। अहीं दुनू गोटे निसाफ कहू।’ बमकेसर बजलाह- ‘तूँ ई तँ सोलहो आना सच्च गप बजलह। कि औ अमीन सहएब अहाँक की विचार।’ अमीन सहएब बजलाह- ‘टुनटुन ठीके कहि रहल अछि, हमरो यएह विचार जे लेब देबक प्रथा हटा देल जाए तँ अति उत्तम। जेकरा जे जुड़तै से देतै, मुदा कोनो तरहक फरमाइस केनाइ उचित नै।’ हम ई सभटा गप बान्हेपरसँ ठाढ़ भेल सुनैत रही। लगमे जा कऽ सभ गोटेकेँ प्रणाम कहैत ठक्कनसँ पुछलौं- ‘दाम-दिगर की होइ छै कनी अहीं बुजहा दिअ ने।’ एतबाकमे टुनटुन मुस्की मारैत बाजल- ‘कहू तँ, इहो मीडियाबला भऽ कऽ अनहराएल लोक जकाँ बजैत छथि, अमीन सहरब कनी अहीं बुझहा दियौन हिनका।’ की सभ गोटे ठहक्का मारि हँसए लगलाह। अमीन सहेब हाँ हाँ कऽ खीखियाइत हँसैत बजलाह- ‘बच्चा, अखन अहाँ काँच कुमार छी, तँए जहिया अपने बिकाएब तँ अहँू बुझिए जेबै जे केकरा कहै छै दाम-दिगर।’ पंकज कुमार प्रियांशु पिता- श्री विद्याधर झा, जन्म ०३.०२.१९८५ जीवनक अनमोल क्षण जखन प्लस टू सँ इण्टर कएलाक बाद महाविद्यालयमे प्रवेश कएलौं तँ बहुत प्रयास कएलाक बाद दू गोट संगी बनल, ओहो समाज सेवा कार्यसँ जुड़लाक बाद। सुनबामे अबैत छल जे कॉलेज स्टूडेन्टकेँ कए गोट मित्र रहैत अछि- पुरुष मित्र आ महिला मित्र, दुनू। पुरुष मित्र तँ बुझएमे आएल मुदा महिला मित्र, ऐपर हमरा कनी आपत्ति छल, किए तँ हमरा बुझने पुरुष ओ महिला मात्र मित्रेटा बनि नै रहि सकैत अछि। महिला मित्र नै बनए एकरा प्रति सचेष्ट रहैत छलौं। जौं कोनो लड़कीसँ आमने-सामने गप करबाक स्थिति उत्पन्न भऽ जाइत छल तँ परेशान भऽ जाइत छलौं। ऐ बातपर हम सदिखन दृढ़ निश्चय रही जे जौं कहियो कोनो लड़कीसँ मित्रता भेल तँ ओकरा अपन जीवन-संगिनी बनबाक प्रस्ताव अवश्य देबै। मुदा तकरा लेल एकटा एहेन कियो होएबाक चाही जकर कल्पना हम कएने छी। आ हमर कल्पनामे जकर प्रतिबिम्ब छल, तकरामे एकमात्र विशेषताक आशा ई कएने रही जे ओ हमरा बूझि सकए। मुदा आजुक समए एहेन साथी भेटनाइ, ओहूमे हमरा एहेन सामान्य परिवारक लड़काकेँ, असम्भव बुझना जाइत छल। तँए ऐ दिशामे हमर कोनो विशेष प्रयास कहियो नै रहल। समए बितैत रहल आ महाविद्यालयमे नामांकन लेलौं। हमर मनकेँ जकर इन्तजार छल से शाइत ओतहि आसपास हमर प्रतीक्षामे छल, ई बात बड्ड बादमे बुझएमे आएल। एक दिन कोनो विशेष कार्यवश स्टेशन जएबाक मौका भेटल, किछु अतिथि लोकनि आएल रहथि, हुनका लोकनिकेँ ट्रेनपर बैसेबाक लेल। जइ बॉगीमे हिनका लोकनिक आरक्षण छल आेइमे नीचाँबला दूटा बर्थ खाली रहै। ट्रेन खुजबामे अखन किछु समए छल। तँए हम ओइ खाली बर्थपर बैस रहलौं। किछु समैक बाद ओइ बॉगीमे दूटा लड़कीकेँ चढ़ैत देखलिऐ। आेइमे एकटा लड़की चिन्हार सन लागल। भगवानसँ प्रार्थना कएलौं जे कम-सँ-कम किछु क्षणक लेल ओ हमरा लग आबि बैसए। हमर मन तत्क्षण पूरा भऽ गेल। जखन करीबसँ हमर नजरि ओकरासँ मिलल तँ इच्छा भेल जे सभ मर्यादा तोड़ि एकटक ओकरे देखैत रहिऐ। मुदा से नै भऽ सकैत छल। हमरा लागल, ई तँ ओएह छथि जिनका हमर आत्मा एकीकार करए लेल व्याकुल छल। किछु देर बाद ट्रेन खुजल आ एक खुबसूरत पल हमरासँ दूर होइत गेल। ओ हमरासँ दूर तँ चलि गेली मुदा हमर मन हमरा संगे नै छल। किछु दिन बाद विश्वविद्यालयक कोनो कार्यक्रममे पुनः भेँट भेल। तखन बुझएमे आएल जे ओ हमर विभागक बगलबला विभागक छात्रा छलीह। आब सप्ताहमे एक-दू दिन हुनकासँ भेँट भऽ जाइत छल। कोनो बात करबाक साहस तँ नै होइत छल मुदा जाधरि ओ सोझाँमे रहैत छलीह दुनियाँ बिसरबाक मन होइत छल। एक साल बाद ओकर सत्र समाप्त भऽ गेलै आ ओ अनचोक्के एक दिन शहरसँ दूर चलि गेली। बहुत किछु कहबाक रहए मुदा आब सभ मनेमे रहि गेल। तखन मनकेँ सांत्वना देबाक लेल तरह-तरहक बात अपने-आपसँ करए लगलौं। सोचलौं एतेक पैघ परिवारक लड़की हमरासँ दोस्ती किए करत? एतेक सुन्दर नयनाभिराम लड़कीक की पहिनेसँ कोनो दोस्त नै हेतै जकरा ओ दोस्तसँ बेसी आर किछु मानैत हएत। एहने सभ विचारसँ मनकेँ बुझबाक प्रयास करैत छलौं, मुदा आगू जा कए हमर ई सभ विचार असत्य भेल। धीरे-धीरे हम अपन कार्यमे लागि गेलौं मुदा ओ मनमोहिनी चेहरा हमरा सामनेसँ कहियो नै हटल। तीन-चारि मासक बाद संयोगसँ ओइ विभागमे जेबाक मौका लागल। ओतए सामान्य प्रयासक बाद हमरा ओकर नम्बर सेहो भेट गेल मुदा बात करबाक हिम्मति नै जुटा सकलौं। संयोगसँ ओइ विभागमे कोनो विशेष कार्यक्रमक आयोजन छल। हम ऐ कार्यक्रमक जानकारी देबए लेल हुनका फोन कएल। बहुत बेसी नै, दू-चारि मिनट गप भेल। जखन ओ दोबारा भागलपुर अएलीह तँ लगभग एक घंटा समए बितेबाक मौका भेटल। ओइ बीचमे एक-दू बेर हुनक मोबाइलपर फोनो आएल, जइमे आधा घंटा लगभग ओ व्यस्त रहलीह। हमरा ई पक्का बुझा गेल जे हुनक पहिनेसँ कोनो मित्र छल, कोन प्रकारक से नै बूझि सकलौं। ओ जखन वापस चलि गेली तँ हुनका लए परेशान रहए लगलौं। ओना आब फोनपर बातचीतक सिलसिला शुरू भऽ गेल छल। तैयो हमर मन हुनका प्रति एतेक आकृष्ट भऽ गेल छल जे एक दिन हुनका बिना बितेनाइ मोश्किल भऽ गेल छल। परोक्ष रूपसँ अपन मोनक दशा हुनकासँ गपशपक क्रममे बता दइ छलियनि। हमरा आस्ते-आस्ते एहेन लागए लागल जे शाइत ओहो हमरासँ प्रेम करैत छथि।शाइत ओ पहिने हमरा दिससँ पहलक आशा कएने छलीह। लगभग दू मासक बाद एहेन मौका लागल जे हम डराइत-डराइत अपन मनक बात कहि देलियनि। दू दिन बाद हमरा जबाब भेटल। जबाब अनुकूल छल। आब तँ हमरा लागए लागल जे हमर जिन्दगीक सभसँ बहुमूल्य वस्तु हमरा भेट गेल। विश्वास नै होइत अछि मुदा ई सत्य अछि जे आइ ओ हमर जीवन संगिनीक रूपमे संग दऽ रहल छथि। आ एक आदर्श गृहिणीक अपन जिम्मेदारी सम्हारि रहल छथि। ईश्वरकेँ धन्यवाद दैत छियनि जे हमरा एक एहेन जीवन साथी प्रदान कएलनि जे हमर जीवनक क्षण-क्षणकेँ अमृत समान पवित्र आ विशिष्ट बना देने छथि। नवीन ठाकुर, गाम- लोहा (मधुबनी ) बिहार, जन्म - १५-०५-१९८४, शिक्षा - बी .कॉम (मुंबई विद्यापीठ), रूचि - कविता, साहित्यक अध्यापन एवं अपन मैथिल सांस्कृतिक कार्यकममे रूचि। मिथिला उवाच फलना बाबू मरि गेला, बहुत नीक लोक छलाह। -के कहलक। -एखने एगो धिया-पुता बजैत जाइ छल जे फलना दिन भोज हेतै। बाहर निकललहुँ तँ ...हरिबोल-हरिबोल सुनाइ पड़ल! तूँ ...जेबहक की नै कठियारी ...हाँ हाँ किए नै जेबै! ..जाएब तँ संग कऽ लेब कने। ...फलना बाबू छी यौ, कठियारीक हकार दैत छी .... चिलना बाबू नै रहला ...! -ओहो.. ओहो ...काल्हिये तँ गप्प भेल छल हुनका संग। हमरा पोखरिपर भेटल छलाह ...आहा.. हाँ .. कहियौ...... जन्म मरणक कोनो भरोसा नै होइत छै यौ बाबू ...ठीके कहैत छिऐे काका .......! लेकिन गेलाह सभटा सुख भोगि कऽ, बेटा-पुतौह बड़ निक छनि, खूब सेवा-वारी करैत छलनि! .हाँ हाँ, किए नै करथिन, कमिये कोन छलनि ....एगो बेटा डाक्टर छनि ...एगो वन विभागक अधिकारी छनि। बेटियो सभ सुखी सम्पन्न छनि, सभ काजसँ निश्चिंत भऽ कऽ मरलाहेँ! -हँ से तँ सभ अर्थेसँ महादेवक कृपा सन भरल पुरल छथि, लेकिन काज राज ढंगसँ करता तखन ने। भगवान् कोनो कमी नै देने छनि। जवार तँ खुएबाक चाही। हँ तँ से किए नै! -चल चल देरी भऽ रहल अछि, फेर एबाको अछि, पूजा पाठ करबाक अछि! राम नाम सत्य......! हरी बोल ....हरी बोल .......! -कथीक अतेक हल्ला भऽ रहल छै यौ छोटका बाबू । -भौजी, फलना बाबूक स्वर्वास भऽ गेलनि! -ठीक छै, अहाँ चलि जाउ कठियारी, भैयाकेँक पठा दियौ कने अंगना। भोरसँ भुखले प्यासल बैसल छथि दलानपर ! -इजोरियो रातिमे टोर्च लऽ कऽ ई के आबि रहल अछि बुरलेल आदमी हौ। .. तखने मुँहपर टोर्च मारलकनि ....काका ...एकादसा- दुआदसाक नोत हकार दैत छी। ......पुरखक दफ्फा ..! ..आहा ...फलना बाबूबु ...आउ आउ, बैसू .....! -नै काका बड़ काज अछि एखन ...! -हाँ अहाँकेँ तँ एखन काजक अंगना अछि बौआ, ....बहिन सभ एलीहेँ की नै? -हाँ सभ आबि गेल ... काका छोटकी पुछै छल अहाँक बारेमे, जे काका जिबिते छथिन ने...! -हह हहह हा.. हा.. हाँ हाँ ओकरा तँ होइते हेतै, बच्चामे बड़ मारने रहिऐे ने ......! -बड़की बहिनकेँ तँ ननकिरबो छऽ ने एकटा ... -हाँ ५ सालक छै ननकिरबा ...! -भगवान् देह समांग दोउ बढ़िया .......बड़ निक ! -ठीक छै चलै छी काका .! भोजक दिन- -कए गो तरकारी छै हौ भाइ .....? -सात गो तरकारी छै काका ...! - कोन-कोन? -आलू-कोबी, भाटा-अदौरी, कदीमा, सजमैन, साग, बड़ आ बड़ी। -आह बहुत निक .......सबेर सकाल बिझो भऽ जेतै तँ ठीक रहितै ..बेसी रातिमे नै ठीक होइ छै। ...धिया पुता सब उन्घा लागै छै ...हाँ .... कनेक देख कऽ आब तँ कतऽ तक काज आगाँ बढ़लैए ...! तखने दूरसँ.....! -फलना बाबू छी यौ ....बिझो करबैत छी .! -हाँ हाँ.... ठीक छै...! -हइ बिझो भेलै ....बिझो भेलै....! -हइ छौड़ी सभ, हल्ला नै कर ....! -बाबा ......भर्तुआ सुइत रहल ...! -हइ जो ने, उठा दही ने, साँझेसँ हल्ला केने छलै भोज खाएब.. भोज खाएब .....जो जल्दी लोटा लऽ कऽ आऽ गऽ ..! दू गो लोटा लऽ लिहँ... हाँ...! -यौ एगो आउर पात दिअ ई फाटल अछि .. -हइ छौड़ी....पात खेबा की भात .....! -जाए दियौ बच्चा छै, हइ ले बौआा ...दोसर पात! -हइ भात उठबऽ ने......! मऽ तोरी, गप की करैत छऽ, उम्हर एखन धरि पत्तो नै परसला ....! दाइल लेब दाइल ..! डालना.... डालना....! -पाइनो एगोटा तँ उठा लाए कमसँ कम ....की सभ तरकारिये परसबऽ! ..हरे करिया ..एम्हर आ ..चल पाइन उठा ले तूँ .! -हइ हम पानि नै उठाएब ...! -हइ बहिन्चो पानि पिएलासँ धर्म हेतौ ....उठा ने! -हइ कात भऽ कऽ हाथ धोए जाइ जाउ। -हइ, ई के धिया-पुता अछि .....हइ, बिच्चइमे रास्तापर पाइन हरबै छऽ। ...लोक पिछड़ि कऽ खसतै। एकने चंडाल कही के ...! -बहुत नीक छल काका भोज। जय जय भऽ गेलै ..! - हौ एतबो नै करितै तँ नाक-कान कटबऽ के छलै की ...एतेक सम्पैत कतऽ कऽ रखतै ....समाजमे रहऽ के छै की नै ....! -हाँ सेहो छिऐ........देखियौ आब काल्हि की होइए। ....सुनऽमे आएलऽ जे जवार भऽ रहल अछि, पाँच गाम नोतत! -आह करबाके चाही.. अइसँ नाम होइत छै.. ..अपने नाम हेतै ने कोनो हमर थोड़े ने, हाँ ....गामक नाम सेहो हेतै किने! भोजक २-४ दिन पश्चात ......! -हौ फलना बाबुकेँ राति तबियत खराप भऽ गेलै की ....! -हल्ला सुनलिऐ काका आइ भोरमे ....ओहो लटकले छथि, पाकल आम छथि। ..... आब जे दिन जिबैत छथि से दिन! -हाँ ...हमरो जेबाक छलए बंबई लेकिन ई हल्ला सुनलिऐ तँ रुकि गेलहुँ ! -दू चारि दिन आर रूकि जाइ छी ...कहीं ओहो ने ...आब कतबो छथि तँ दियादे छथि ने ....चलि जाएब तँ बदनामिये हएत! तइ दुआरे रुकिए जाइ! - पुरवा बहि रहल अछि, चंडाल जकाँ साँइ साँइ कऽ रहल अछि, जेना दौगि रहल अछि आतुर भऽ- व्याकुल भऽ। हरा गेलैए किछु ..ताकि रहल अछि जेना! -सुखा गेल मुँह, नाक, कान सभटा। पएर तरक धरामे दरार पड़ि गेल अछि सौंसे खेतमे। छाती फाटि कऽ कानि रहल अछि जेना बुझा रहल छै सीता एखने गेलीहेँ धरतीमे फाँक दऽ कऽ! मूड़ी ऊपर उठेलहुँ तँ लागल जेना चुनरी ओढ़ा देलक कियो मुँहपर...! हे भगवान्, बज्जर खसौ ई करिया बदराकेँ। सभ दिन कऽ अपन सकल देखा कऽ, मुँह दुइस कऽ भागि जाइए! कनेकबो दर्द नै छै कोंढ़मे बेदर्दाकेँ! -आह ..हा ...नाकपर एगो शीतल बुन्न खसल ओढ़नीसँ चुबि कऽ। मोनक भ्रम अछि की? तखने दुनु पपनीपर खसल जेना कहि रहल अछि, उठू, आब नै सताएब हम अहाँकेँ, किया एतेक अन्धेर्ज भेल अछि .....संतोख भेल भीतरसँ कने! ठनका, ठनकल जोरसँ तखने! कतऽ गेल गै छौड़ी ...अमोट सुखाइ छौ अंगनामे, उठा ले ने, पाइन एलै... भिजलौ सभटा! यै भौजी, असगनीपर सँ कपड़ा उतारू सभटा ....भीजल ....(अमोट उठबैत एगो भौजीयोकेँ काज अरहेने गेल दुलरिया।) एक अछार बरिस कऽ रुकि गेल तँ निकलि गेलौं खेत दिस कने... आह हा ....हृदयक गहराइ तक उतरि गेल ओ सोन्हगर माटिक सुगंध, पहिल अछारक बाद दबने छल जे बहुत दिनसँ भीतरमे! मृग मरीचिका जेना भटकलौंहेँ कने काल, ओर ने कोनो छोर ओइ सुगंधक, सजि-धजि कऽ बैसल अछि जेना मिलनक आसमे प्रेमीक बाट तकैत... चारु दिस सुन्न पड़ल अछि खेत, नबका फसलक इंतजारमे! सरजू काका महिना भरिसँ हरक शान चढ़ा रहल छथि फराक, बड़द सभकेँ खुआ-पिया कऽ टनगर बनेने निङहारैत छलथि आकाश.. सभ दिन चारू दिशामे घूमि कऽ बरखाक आसमे, लिअ आइ बरसि पड़ल! राति भरि कतेक बरसल नै बुझि पड़ल, मुदा निन एहन पड़लौं जेना काल्हिये बोर्डक परीक्षा खतम भेल! भरि गर्मीक निन आँखिमे घुरमैत छल! भोरे उठि दलानपर बैसि कऽ चाह पिबैत रही.... चन्दन बाबू कान्हपर कोदारि नेने दौगल जाइत छलाह बाध दिस। टोकलियनि तँ इशारामे किछु कहि कऽ भागि गेला। आन दिन चाहक नामपर बिन बजेन्हो टपकि पड़ैत छलथि, आइ की भऽ गेलनि! -हे यौ, ई चन्दन बाबूकेँ की भऽ गेलनिहेँ, भोरे –भोरे। सरजू काका ओम्हरसँ अबैत रहथि, पुछलियनि। -हौ बौआ, हुनकर खेतक पाइन सभटा बहल जाइत छनि, गेलाहेँ आइड़ बान्हऽ। -ओहो सुआइत! संझाक बेर बिदा भेलहुँ पोखरि दिस .....लागल, बेंगक अज्ञातवास खतम भऽ गेल .......टर्र-टर्र करैत खत्ताक ओइ पारसँ अइ पार तक। सुर ताल देबऽबलाक कमी नै, सभ एकै साथे प्रतियोगितामे ठाढ़ भेल जेना! सबहक धानक बीया खसि पड़ल। लुटकुन बाबूक बीया बड़ जोरगर छनि ....हेतै कोना ने, बेचारा ..राति दिन एक कऽ कऽ छाउर आ गोबरसँ खेतकेँ पाटि देने छलखिन! हुनकर खेतो तँ सभसँ पहिने गाममे रोपा जाइत छनि! आइयो कादो कऽ कऽ एलैथहेँ, झौआहमे! गमछामे किछु फड़फराइत देखलियनि, पुछलियनि- काका की अछि तौनीमे? -हौ, खेतमे बड़ माछ छल, गमछासँ माँरलहुँहेँ! काल्हि निचका बला खेतमे चास देबै, भेज दिहक छोटकाकेँ, बड़ माछ छै ओहू खेतमे! -ठीक छै। -कहलियनि! मंगनीक माछ खाइमे बड़ मोन लगै छै मुँहमे पाइन आबि गेल सुनि कऽ! जल्दी अबिहेँ, मशाला पिसबा कऽ रखने रहबौ( छोटका केँ जाइत-जाइत कहलिऐ)। ओमप्रकाश झा सफल अधिकारी वातानूकुलित चैम्बरक शीतल हवा मे रिवॉल्विंग चेयर पर आरामसँ अर्द्धलेटल अवस्थामे बैसल छलाह श्री बिमलेश चन्द्र। जी हाँ श्री बिमलेश चन्द्र, जे हमर विभागक एकटा सफल आयकर अधिकारी मानल जाइत छथि। हुनकर प्रभावी व्यक्तित्वक आगाँ पूरा विभाग नतमस्तक रहैत अछि। जतए ककरो कोनो काज अटकल कि श्री बिमलेश तुरत यादि कएल जाइत छथि। की अधिकारी आ की कर्मचारी, सभ गोटे हुनकर काज कराबै केर क्षमता आ हुनकर व्यक्तित्वक लोहा मानैत छथि। आइ वएह बिमलेश जी किछ शोचपूर्ण मुद्रामे अपन कुर्सीमे घोंसिआएल छलाह। हम भीतर ढुकबाक आज्ञा माँगलियन्हि तँ बिना डोलल संकेतसँ बजेलाह आ हम ओइ सुन्नर वातानूकुलित कक्षमे प्रवेश कऽ गेलौं। एतए ई बता दी जे जहियासँ हमर विभागमे कम्प्यूटर जीक पदार्पण भेलन्हि, तहियासँ सभ अधिकारीक कक्ष वातानूकुलित भऽ गेल अछि। ओना ई अलग गप थीक जे ई वातानुकूलन कम्प्यूटर जी लेल भेल छन्हि। हम बिमलेश जी सँ चिन्ताक कारण पुछलियन्हि। ओ बजलाह- "जहियासँ मयंक सर गेलाह आ खगेन्द्र सर एलाह, तहियासँ हम चिन्तित छी।" मयंक शेखर हमर सभक आयकर आयुक्त छलाह जिनकर बदली भऽ गेलन्हि आ हुनका स्थानपर खगेन्द्र नाथ जी नवका आयुक्तक पदभार ग्रहण केलखिन्ह। हम कहलियन्हि- "यौ ऐ गपसँ चिन्ताक कोन सम्बन्ध? कियो आयुक्त रहथि, अपना सभकेँ तँ काज करै केँ अछि, से करैत रहब।" बिमलेश- "अहाँ ऐ दुआरे फिसड्डी छी आ सदिखन अहिना फिसड्डी रहब।" हम चुप रहि कऽ पराजय स्वीकार केलौं आ ऐसँ अओर उत्साहित होइत ओ बजलाह- "अहाँ बुड़िराज छी। ई जनतब राखनाइ बड्ड जरूरी अछि जे नबका सर कोन मिजाजक लोक छथि।" हम- "से किए?" ओ अपन ज्ञानसँ हमरा आलोकित करैत कहलाह- "मिजाजक पता रहत तहन ने ओइ अनुरूपे काज कएल जेतै।" फेर ओ सोझ भऽ कऽ बैस गेलाह आ एकटा नम्बर दूरभाषपर डायल करैत बजलाह जे मयंक सर केँ फोन करै छियन्हि। ओकरा बाद एकटा चुप्पी आर, फेर बिमलेश जी मुस्की दैत विनीत भावमे दूरभाषक चोगापर बाजलथि- "प्रणाम सर। हम बिमलेश।" ---------------------------------------------- "जी सब नीके छै अपनेक आशीर्वाद सँ।" ---------------------------------------------- "जी अहाँ संगे काज करए केर आनन्द किछु अओर छल। अहाँक विषयक पकड़ आ अहाँक ज्ञान--- ओ सभ मोन पड़ैत अछि।" ----------------------------------------------- "झूठ नै कहै छी। अच्छा सर अहाँक सामान सभ पहुँचल की नै? सॉरी सर, एक दिन बिलम्ब भऽ गेल, ट्रान्सपोर्टमे ट्रक खाली नै छल।" ----------------------------------------------- "जी ई अपनेक महानता अछि। नै तँ हम कोन जोगरक लोक छी। कोनो अओर काज हुअए तँ कहब जरूर सर।" ----------------------------------------------- "जी प्रणाम सर।" ई कहैत ओ दूरभाषक सम्बन्ध विच्छेद करैत हमरापर विजयी मुस्की फेकलथि आ अपन आँखि हमर आँखिमे ढुकबैत कहलथि जे कहू आर की हाल चाल। हम- "नीके छी यौ। बजबै लेल आएल छलौं। चलू नबका आयुक्तक चैम्बरमे मीटिंग अछि।" ओ तुरत हमरा संगे चलि देलथि आ हम सभ आयुक्त महोदयक चैम्बर पहुँचलौं जतए सभ अधिकारी बैसल छलाह। मीटिंग शुरू भेल। एकटा चुप्पी ओइ कक्षमे पसरि गेल। हमरो विभागमे आन सरकारी विभाग जकाँ भरि साल मीटिंग चलैत रहैत अछि। ऐ विषयपर एकटा ग्रन्थ लिखल जा सकैत अछि जे मीटिंगक कतबा फएदा अछि। खैर मीटिंगमे आयुक्त महोदय अधिकारी सभकेँ खूब पानि पियेलखिन्ह आ खराब प्रदर्शनक लेल पुरकस डाँट सेहो भेटल। कहुना मीटिंग खतम भेल आ हम सभ ओहिना पड़ेलौं जेना बिलाड़िक डरसँ मूस पड़ाइत अछि। मुदा बिमलेश जी फेरसँ अनुमति लऽ केँ भीतर ढुकलाह आ आयुक्तसँ कहलखिन्ह- "प्रणाम सर, हम बिमलेश।" आयुक्त भावरहित बजलाह- "बैसू।" हमर विभागमे कोनो नबका अफसर आबैत छथि तँ विभिन्न अधिकारी आ कर्मचारी केर खासियतसँ हुनका परिचित करेबामे किछु लोक आगाँ रहैत छथि। बिमलेश जीक (कु)ख्याति सँ आयुक्त महोदय नीक जकाँ परिचित कऽ देल गेल छलाह। भाव विहीन चेहरासँ आयुक्त महोदय बिमलेश जी केँ कहलखिन्ह- "अहाँक रेकॉर्ड तँ बड्ड खराब अछि। किछु काज नै भेल अछि।" बिमलेश जी पैंतरा बदलैत बजलाह- "सच पूछू सर तँ ऐ लेल अपनेक मार्गदर्शन लेल हम आएल छी। ऐ चार्जमे कहियो ठीकसँ काज नै भेल। आब अहाँकेँ अएलाक बाद सभ ठीक भऽ जेतै।" आयुक्त महोदय कनी नरम भेलाह आ अपन योजनापर चर्चा करए लगलाह। बिमलेश जी मन्त्र मुग्ध भऽ मुस्की दैत हाँ हूँ करैत सुनैत रहलाह। गप खतम भेलाक बाद बिमलेश जी कहलखिन्ह- "सर अहाँक डेरापर सामान उतारबाक लेल ५ टा लोक पठा देने छी आ रातिक खेनाइ डिलाइट होटलमे आर्डर कऽ देने छी।" आयुक्त महोदय किछु नै बजलाह। ओकर बाद पता चलल जे बिमलेश जी केँ नियमित बोलाहट होबए लगलन्हि आयुक्त महोदय लग। दू मासक बाद आयकर अधिकारीक बदलीक आर्डर आयुक्त महोदयक आफिससँ निकलल। श्री बिमलेश जीकेँ अपन कार्यालयमे छोड़ैत एकटा आर कार्यालय केर अतिरिक्त प्रभार देल गेलन्हि। संगहि आयकर अधिकारी (मुख्यालय) क अतिरिक्त प्रभार सेहो देल गेलन्हि। हमर पदस्थापन एकटा दूरक जिला मे कऽ देल गेल छल। साँझमे बिधुआयल मुँह लेने घर पहुँचलौं। कनियाँ मुँह फुलेने बैसल छलीह, किएक तँ हुनका पहिने बदलीक समाचार भेंट गेल छलन्हि। हमरा दिस तिरस्कारक संग देखैत बजलीह- "अहाँ तँ ओहिना बुड़िबक रहि गेलौं। बिमलेश जी केँ देखियौन्ह, कतेक सफल अधिकारी छथि। सभक पसिन्नक छथि।" हम मौन रहिकेँ हुनकर गप सुनैत अपन पराजय स्वीकार केलौं। डीहक जमीन ट्रेन सकरी टीशन सँ फूजल आ पूब दिस घुसकऽ लागल। नरेश एकटा बोगीमे अपना सीटपर बैसल अपन गामक बात सभ मोन पाड़ैत विचारमग्न भऽ गेल। बहुत दिनक बाद ओ अपन गाम जा रहल छल। भरिसक १० बरखक बाद। ओ एखन भोपालमे शिक्षा विभागमे नौकरी करैत छल अधिकारीक पदपर। गाम जाइ लेल चिकना टीशन उतरि कऽ जाए पड़ै छलै। सकरी तक बड़ी लाइनक ट्रेन चलैत अछि। ओतएसँ फेर छोटी लाइनक ट्रेन। ओकरा बोगीमे पूरा लोक कोंचल छल। चारि पसिन्जरक सीटपर सात-आठ लोक बैसल छल। हो-हल्ला आ गप-शपसँ पूरा डिब्बामे कोलाहल जकाँ छलै। मुदा ओकर दिमागमे अपन पुरनका दिन घुरियाए लगलै। सभटा दृश्य चलचित्र जकाँ ओकर आँखिक आगाँ घूमऽ लगलै। ओ अपनाकेँ २० बरख पहिनुका स्कूलमे देखऽ लागल। बस्ता लऽ कऽ नित भोरे पाठशाला जेबाक दृश्य आगाँमे नाचऽ लगलै। ओकर पिता फेंकन मरड़ हरवाह छला आ गाममे भुटकुन बाबू ओतए खेतीक आ माल-जालक काज करै छला। किछु बटाइपर खेती सेहो करै छला। अपन जमीनक नाम पर पाँच कट्ठा खेतीक जमीन आ आठ धूरक घरारी छलन्हि। हुनकर माय मरौनावाली केर नामसँ जानल जाइत छलीह। भरि दिन मरौनावाली भुटकुन बाबू ओतए घरेलू काजमे मदति करैत छलीह आ साँझे घर आबै छलीह। नरेश बच्चा छलाह आ भरि दिन एम्हर ओम्हर खेलाइत रहैत छलाह। एक दिन भुटकुन बाबू फेंकनकेँ कहलखिन्ह जे नरेशबा भरि दिन टौआइत रहै छौ, किए नै ओकरा हमरा ऐठाम चरवाहीमे पठा दैत छिहीं। फेंकन बजलाह- "गिरहत, ई गप नै कहियौ, ओ एखन मात्र चारि बरखक छै। ओकरा अगिला बरखसँ स्कूल पठेबै।" भुटकुन बाबू व्यंग्यमे बजलाह- "तौं तँ एतबे टा सँ हमरा ऐठाम चरवाही करै छलैं। तखन तोहर बाबू हरवाही करै छलखुन्ह, मोन छौ ने।" फेंकन कहलक- "जी ओ जमाना आब नै छै गिरहत। मरौनावाली एकदम जिद केने छै जे नरेशबाकेँ स्कूल पठबियौ। किछु दिन पहिने बिसेसर बाबू मास्टर साहब भेंटल छलाह। ओ कहलथि जे पढेनाइ बड्ड जरूरी छै तैं नरेशबाकेँ स्कूल पठाबहक।" भुटकुन बाबू- "जे तोहर इच्छा। हम तँ तोरे दुआरे कहलियौ। तोहर काज किछु हल्लुक भऽ जइतौ।" फेंकन- "गिरहत, हम जाधरि सकब ताधरि अहाँक काज करैत रहब।" अगिला साल नरेशक नाम स्कूलमे लिखाओल गेल। नरेश पढ़ैमे नीक छलाह आ जल्दिये मास्टर सबहक प्रिय भऽ गेलाह। दसवीं बोर्डमे ओकरा अस्सी प्रतिशत अंक आएल। ओ कओलेजमे पढै लेल दरिभंगा चलि आएल आ ट्यूशन पढा कऽ अपन खर्च निकालैत पढ़ऽ लागल। ओम्हर गाममे फेंकन आ मरौनावाली भुटकुन बाबूक काजमे लागल रहल। नरेशक पढाइ पूरा भेलै आ मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोगक इम्तिहान पास कऽ कए शिक्षा विभागमे नौकरी भेटलै। नियुक्ति पत्र गामक पतापर आएल छल आ सौंसे गाम अनघोल भऽ गेल रहै। ओइ दिन नरेश अपनाकेँ आकाशमे उड़ैत पओलक। भुटकुन बाबू जे आब वृद्ध भऽ गेल छलाह ओहो नरेशकेँ बजा कऽ आशीर्वाद देलखिन्ह। मरौनावाली तँ कानैत बेहाल छल जे बेटा आब नजरिसँ दूर भऽ जाएत। किछु दिनक बाद नरेशक बियाह भऽ गेलै। किछु दिन कनियाँ गामेमे रहलन्हि। फेर जएबाक जिद कऽ देलकै। नरेश कनियाँकेँ लऽ कए भोपाल चलि गेल। मरौनावाली ओइ दिन बड्ड कानल रहै। नरेश अपन माता पिताकेँ संगे रहै लेल बहुत आग्रह केलक, मुदा फेकन साफ मना कऽ देलकै। ओकर कहनाइ रहै जे पुरखाक डीह छोड़ि नै जाएब। नरेश कहलक जे ई आठ धूर डीह अहाँकेँ एतेक प्रिय भऽ गेल जे अपन एकलौता संतान संगे रहै लेल तैयार नै छी? ओतए नाना प्रकारक सुविधाक गप सेहो नरेश कहलकै, मुदा फेकन अपन जिदपर अड़ल रहलाह। मरौनावाली कनी जिद केलखिन्ह तँ फेकन खिसिया गेला आ कहलखिन्ह जे अहाँ चलि जाउ, हम असगरे रहब। मरौनावाली धर्मसंकटमे पड़ि गेली आ अंतमे गामेमे रहै कऽ निर्णय लेलथि। नरेश नियमित रूपसँ गाम पाइ पठबैत रहै आ ओ फेकनकेँ हरबाही जबरदस्ती छोड़ा देलक। फेकन साल दू सालपर नरेश लग जाइत रहै छलाह आ नरेश काजक अधिकता आ बच्चा सबहक पढाइ दुआरे गाम कहियो नै आबैत छलाह। आब मोबाइलक जमानामे नरेश फेकनकेँ मोबाइल सेहो कीन देने छलखिन्ह, जइसँ ओ सभ नियमित रूपसँ सम्पर्कमे रहऽ लगलाह। एक दिन फेकन मोबाइलसँ नरेशकेँ फोन केलखिन्ह आ कहलखिन्ह- "बौआ, अपन डीहसँ सटल भुटकुन बाबू केर दू कट्ठा जमीन परती पड़ल छै। ओ ओइ जमीनकेँ बेचऽ चाहै छथि। हमरा कहलथि जे तूँ जे ओ जमीन किनबऽ तँ हम तोरा पच्चीसे हजारमे दऽ देबऽ। बौआ ओइ जमीनक कीमत चालीस हजारसँ कम नै छै। नीक मौका छै। पाइ पठा दितहक तँ हम तोरे नामसँ वा तोहर कनियाँक नामसँ जमीन कीन दितिअ।" नरेश चोट्टे खिसिया गेल आ बाजल- "हमरा गामसँ कोनो मतलब नै अछि। अहाँ बलौं जमीन कीनऽ चाहै छी। हम तँ सोचै छी जे आठ धूरक डीह आ पाँच कट्ठा खेतीबला जमीन बेची आ गामसँ पिण्ड छोड़ाबी।" फेकन- "हमरा जिबैत ई काज नै हेतौ। पुरखाक जमीन बेचबाक बात तोहर मोनमे कोनाकेँ एलौ। तूँ ओइ गामसँ पिण्ड छोड़ेबाक गप करै छँ, जतए नेनामे खेलेलह, जतुक्का पानि पीबिकेँ नमहर भेलऽ, जतए तोहर बाप-दादा केर सारा छह। तूँ डीहक नबका जमीन नै कीन, मुदा पुरनका बेचैकेँ गप नै कर।" अस्तु नबका घरारी किनबाक गप एतहि खतम भऽ गेल। एक दिन नरेशक बड़की बेटी सुनन्दा, जे चौथामे पढै छल, नरेशकेँ कहलक- "पापा, जेना हम अहाँ संगे रहै छी, अहूँ तँ बच्चामे बाबा संगे रहैत हैब।" नरेश- "हाँ, रहै छलौं। सभ रहैत अछि।" सुनन्दा- "अहाँ केँ सभ गप मानैत हेता बाबा।" नरेश- "हाँ यथासम्भव मानैत छलाह।" सुनन्दा- "अहाँ बड्ड नीक छी पापा। हमर सभ गप पूरा करै छी। हमहूँ नमहर भऽ केँ अहाँक सभ गप जरूर मानब।" ई कहैत ओ खेलाइ लेल चलि गेल। ओकर अन्तिम वाक्य सुनि नरेश धक सँ रहि गेल। ओकरा अपन नेनपनक सभ गप मोन पड़य लागलै, जे कोना फेकन फाटल धोती पहिरैत रहल, कोना मरौनावाली फाटल नुआ पहिरैत रहलीह, मुदा नरेशक पढाइमे कोनो बिथुत नै हुअ देलखिन्ह। एक बेर तँ नरेशकेँ फार्म आ किताब लेल पाँच सय टका भुटकुन बाबूसँ पैंच लेबामे कोन कोन गप नै फेंकन केँ सुनऽ पड़ल छलै। नरेशक मोनमे विचारक तूफान उठि गेल। ओ घरसँ बाहर निकलिकेँ घूमऽ लागल। घुमैत पार्क दिस चलि गेल। ओतए एकटा गाछपर एकटा चिड़ै अपन बच्चा सभकेँ चोंचमे दाना दैत छल। ओकर हृदय फाटऽ लागलै। पण्डितजी केर संस्कृतक कक्षा मोन पड़ऽ लागलै जइमे ओ "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि" पर लगातार दू घन्टी पढ़बैत रहि गेल छलखिन्ह। ओ कक्षा नरेशकेँ बड्ड नीक लागल रहै। कतेक दिन धरि ओ ऐ श्लोकक पाठ करैत रहै छल। ऐ विषयपर वाद विवाद प्रतियोगितामे सेहो ओ नीक बाजल छल आ जिला स्तरपर पुरस्कार सेहो भेटल छलै। ओ एकटा निर्णय लेलक आ डेरा आबिकेँ कनियाँसँ कहलक- "हमर अटैची तैयार कऽ दिअ। हम गाम जाएब।" कनियाँ बाजलथि- "ई की बाजै छी। ओतए एखन जा कऽ की करब? दस बरखसँ ऊपर भेल गाम गेला। के चिन्हत? बाबूजीसँ नित गप होइते अछि।" नरेश- "डीहक जमीन कीनै लेल जाइत छी।" कनियाँ- "ई कोन बतहपनी धेलक अहाँकेँ।" नरेश- "बताह तँ एखन धरि छलौं। आब ठीक भऽ गेलौं। जइ मातृभूमि केर माटि-पानिसँ हमर देह पोसल अछि, जे मातृभूमि हमरा हमर पहचान देलक, ओकरा हम बिसरि गेल छलौं। माय-बाबूक आकांक्षा आ मनोरथ बिसरि गेल छलौं। एतए भोपालमे सभ सुविधा अछि, मुदा जे अपनैती हमरा गाममे भेटैत रहए तकर अभाव बुझाइत रहैए। आब गाम सालमे एक बेर तँ जरूर जाएब।" कनियाँ कनी काल घमर्थन केलकन्हि, मुदा हुनकर जिद आ दृढताक आगाँ चुप भऽ गेली। एकाएक नरेशक भक टूटल। बगलक यात्री, जिनकासँ सकरीमे परिचय भेल रहन्हि, हुनका हिलबैत कहैत रहए जे श्रीमान् चिकना आबि गेलै, कतेक सुतब, उतरू नै तँ ट्रेन फूजि जाएत। मुस्की मारैत नरेश बजलाह- "नै यौ, आब जागि गेल छी। एखन धरि सुतल छलौं।" ई कहैत ओ टीशनपर उतरि गेल आ गाम दिस चलि देलक। डेग जेना हल्लुक भऽ गेल रहै आ तुरन्ते गाम पहुँचि गेल। फेंकन एकाएक नरेशकेँ देखलक तँ आश्चर्य भेलै आ मरौनावाली भरि पाँजमे बेटाकेँ पकड़ि कानऽ लागल। नरेश फेकनकेँ गोर लागिकेँ कहलक- "बाबू, हम आबि गेलौं डीहक जमीन किनबाक अछि ने।" साँझमे दुनू बापुत भुटकुन बाबू लग गेलाह। भुटकुन बाबू नरेशकेँ आशीर्वाद दैत कहलखिन्ह- "गामकेँ कोना बिसरि गेलहक?" नरेश- "नै बाबा, बिसरल नै छलौं, कतौ हरा गेल छलौं। आब आबि गेलौं। डीहक जमीन कीनै लेल।" भुटकुन बाबू हँसैत बजलाह- "चल काल्हिये रजिस्ट्री कऽ दैत छियौ। पाइ आगाँ पाछाँ दऽ दिहऽ।" नरेश- "पाइ आनने छी बाबा।" साँझमे फेकनक छोट दलान लोकसँ भरल छल। मरौनावाली रहि रहि कऽ चाह बनाबैत छल। नरेशक गाममे आ ओकर घरमे जेना पावनि-तिहारक चुहचुही छलै। बुढ़िया मैयाँ मोबाइलपर बाबूजीक फोन आएल। हम उठेलौं तँ कुशल क्षेमक बाद बाबूजी कहलथि- "बुढिया मैयाँ स्वर्गवासी भऽ गेलीह।" हम धक दऽ रहि गेलौं। एखने दू मास पहिने गाम गेल छलौं, तँ बुढ़िया मैयाँ स्वस्थ छलीह। ओना हुनकर अवस्था ९५ बर्ख छलन्हि। पता चलल जे हर्ट अटैक आबि गेल छलन्हि आ दरिभंगा लऽ जाइत काल बाटेमे हुनकर देहान्त भऽ गेलन्हि। बाबूजीक निर्देशानुसार हम तुरत गाम चलि देलिऐ। रातिमे गाम पहुँचलौं, तँ पता चलल जे दाह संस्कार लेल कठियारी गेल छथि सभ। माताजीक निर्देशक मोताबिक काठी चढेबा लेल हमहूँ कठियारी भागलौं। बुढिया मैयाँक दिव्य आ शान्त मुख देखि एना लागल जे ओ आब उठि बैसतीह। हुनका सानिध्यमे बिताओल समय मोनमे घुरिऐ लागल। एक दिन सभ एहिना शांत भऽ जाएत। बुढिया मैयाँ कखनोकेँ कहैत रहथिन जे बौआ, आब कते दिन बुढ़िया मैयाँ, हमर जे पार्ट छल से हम खेला लेलौं, आब अहाँ सभ अपन पार्ट खेलाइ जाइ जाउ। ठीके कहै छलखिन्ह ओ। अपन पार्ट खेलाकेँ कते दिनसँ हमरा सबहक पूर्वज एहिना शांत होइत रहलाह आ नबका पात्र सभ मनुक्ख आ मनुक्खताकेँ आगू बढ़बैत रहलाह। ई खेल सतत चलैत रहत। नव-नव पौध आंगनमे आबैत रहत आ पुरान गाछ सभ अहिना धाराशायी होइत रहत। मायाक जंजालमे बान्हल हम सभ अहिना मुँह ताकैत रहब। कतेक असहाय भऽ जाइ छै मनुक्ख, जखन कियो अपन सामनेसँ चलि जाइ छै आ ओ किछु करबामे असमर्थ रहैत अछि। एहने विचार सभ मोनमे आबैत रहल आ हुनकर चिता जरैत रहलन्हि। जखन दाह संस्कार पूर्ण भऽ गेलै तँ हरिदेव कक्का कहलथि- "कोन विचारमे हरायल छी ओम बौआ। चलू आब नहा कऽ गामपर चली। ओहिनो भोर भऽ गेल। नहा-सोना कऽ कनी सुतब, रतिजग्गा भऽ गेल।" हम कहलियन्हि- "कक्का, बुढिया मैयाँ बड्ड मोन पड़ै छथि।" हरिदेव कक्का बजलाह- "छोडू ने ई सभ गप, हमरा की नै मोन पड़ै छथि? ऐ लेल गाम नै जाएब की? मोन खराप कऽ ली बिना सुतने। अरे भेलै चलू, ९५ बरख केर पाकल उमैर मे गेलथि, कते शोक मनाएब।" हम चुपचाप चलि देलिऐ गाम दिस। आबिकेँ नहा-सोना कऽ सुतै लेल गेलौं। ओतए आँखि मुइन सुतबाक उपक्रम करऽ लागलौं। आँखि मुनैत देरी बुढ़िया मैयाँ सामने ठाढ़ भऽ गेलीह। हमरा दिस सिनेहसँ ताकैत वएह पुरना सवाल पूछऽ लागली जे बौआ खेलौं। हम हुनका एकटक ताकैत रहि गेलौं। बुढिया मैंया हमर बाबाक काकी छलीह। हमर प्रपितामही लागैत छलीह। पूरा आंगनमे सभसँ जेठ आ आब तँ बच्चा सभक संग सभ गोटे हुनका बुढ़िया मैयाँ कहऽ लागल रहन्हि। पूरा आंगनक बच्चा सभक सम्पूर्ण भार हुनके पर रहै छलन्हि आ ओ एकरा पसिन्न करै छलखिन्ह। बच्चा सभसँ खूब सिनेह रहै छलन्हि हुनका। हमरा सभ केँ खुएनाइ हुनके जिम्मा रहै छलन्हि। जखने हम सभ खाइमे एको रत्ती हिचकिचाइ छलिऐ की ओ तुरत्ते तोता कौर आ मैना कौर बनाकेँ खुआबऽ लागै छलीह। माताजी गामपर पहुँचैत देरी हमरा सभकेँ हुनकर संग लगा दैत छलीह। जेना हमरा बूझल-ए, बुढिया मैयाँ ३५ बरखक आयुमे वैधव्य प्राप्त केने छलथि। हुनका तीन गोट पुत्र श्रीदेव, रामदेव आ विष्णुदेव छलखिन्ह। विष्णुदेव बाबाक पुत्र हरिदेव कक्का छलाह जिनका सँ हमरा बड्ड पटै छल। श्रीदेव बाबा खेती पथारी करै छलाह। रामदेव बाबा आ विष्णुदेव बाबा नौकरी करै छलाह आ आब रिटायर भऽ केँ गामेमे रहै छलाह। बुढ़िया मैयाँक तीनू पुत्र आ तीनू पुतौह जीविते छलखिन्ह। हम नौकरी भेटलाक बाद कखनो काल गाम जाइत छलौं तँ बुढिया मैयाँ कहथि जे भगवान हमरा उठबैमे किए देरी लगा रहल छथि, हम चाहै छी जे तीनू पुत्रक सामने आँखि मुनी। पूरा आंगनक बच्चा बच्चा बुढिया मैयाँक चेला छल। हमहूँ छलौं। किए नै रहितौं, ओ निश्छल प्रेम, ओ देखभाल सभ गोटेकेँ हुनका दिस आकर्षित करै छलै। सभ पुतौह हुनका लग नतमस्तक रहैत छलीह। बुढिया मैयाँक हुकुमक अवहेलना कियो नै करैत छल। सबहक लेल हुनका मोनमे नीक भावना छलन्हि। हम तँ हुनकर जाउतक पोता छलौं, मुदा ओ कहियो आन नै बुझलथि। एहेन बुढ़िया मैयाँक पौत्र हरिदेव कक्का केर गपसँ हमरा बड्ड छगुनता लागल छल। हम सोचैत रही जे एखन चौबीसो घण्टा नै भेल हुनका मरल आ ई सभ हुनका बिसरैमे लागि गेलाह। किए, एना किए? ठीक छै जन्म मरणपर अपन बस ककरो नै छै, मुदा जे एतेक बर्ख धरि हमर धेआन राखलक, की हम ओकरा लेल किछो दिन, किछो बर्ख धरि नै सोची। यएह सभ सोचैत कखनो आँखि लागि गेल। एकाएक हंगामासँ निन्न टूटल। जल्दी कोठलीसँ बहरेलौं। आंगनमे बुढ़िया मैयाँक तीनू पुतौह वाक युद्धमे लीन छलथि। पता चलल जे बुढ़िया मैयाँक गहना गुड़ियापर बहस होइत छल। श्रीदेव बाबाक कनियाँ एक दिस छलखिन्ह आ रामदेव बाबा आ विष्णुदेव बाबा केर कनियाँ एक दिस। बहसक विषय वस्तु छल एकटा अशर्फी। बुढ़िया मैयाँक पेटीमे १६ गोट अशर्फी छलै। तीनू पुतौह ५-५ टा हिस्सा लेलाक बाद सोलहम अशर्फीपर भीड़ल छलीह। पहिने कहा सुनी भेल आ बादमे व्यंग्य आ गारिक समायोजन सेहो भेल। हम जल्दीसँ आँगनसँ बाहर दलानपर चलि एलौं। ओतुक्का दृश्य कोनो नीक नै छल। बुढ़िया मैयाँक तीनू पुत्र हुनकर कोठलीक अधिकार विषयपर धुरझार वाक युद्धमे लागल छलाह। हमरा ई सीन किछु किछु संसद आ विधान सभाक सीन जकाँ लागै छल। तीनू भाइ अपन अपन कण्ठक उच्च स्वर प्रवाहसँ लाउडस्पीकरकेँ मात देने रहथिन्ह। एना लागै छल जे एकटा लहाश आइ खसिये पड़तै। हम बड्ड डरि गेलौं आ बाबूकेँ फोन लगेलियन्हि- "बाबूजी, एतए तँ मारा-मारीक भयंकर दृश्य उपस्थित भेल अछि। आब की हेतै।" बाबूजी कहलाह- "अहाँ नै किछु बाजब। यौ दियादी झगड़ा एहिना होइ छै। फेर मेल भऽ जेतन्हि।" मुदा हमरा नै रहल गेल आ झगड़ाक स्थान पर जा केँ हम कहलियन्हि जे बाबा अहाँ सभ क्रिया-कर्म हुअए दियौ, तकर बाद ऐ मुद्दाक समाधान कऽ लेब। विष्णुदेव बाबा बजलथि- "समाधान तँ आइये हेतै। हमहूँ तैयारे छी।" हम बजलौं- "एना नै भऽ सकैए जे ओइ कोठलीकेँ बुढ़िया मैयाँक स्मृति बनाओल जाए।" ऐ बेर श्रीदेव बाबा बजलाह- "बड़का ने एला स्मृति बनबाबैबला। बुढिया की कोनो चीफ मिनिस्टर छलै आ की कतौक प्रेसीडेण्ट।" हम गोंगियाइत बजलौं- "मुदा बाबा ओ हमरा सभक एकटा स्तम्भ छलीह। मजबूत स्तम्भ।" रामदेव बाबा मुस्की दैत हमरा दिस ताकैत बजलाह- "ई छौंडा चारि लाइन बेसी पढ़िकेँ भसिया गेलै हौ। ई नै बुझै छै जे पुरना घर खसैत रहै छै आ नबका घर उठैत रहै छै। बुढिया बड्ड दिन राज केलकै नूनू, आब हमर सबहक राज भेल, हम सब फरिछा लेब।" तीनू गोटे हमरे पर भिड़ गेलाह। हम तुरत ओइठामसँ गाछी दिस निकलि गेलौं, जतए बुढिया मैंयाकेँ जराओल गेल छलन्हि। साराझपी नै भेल छल। ओइ स्थानपर छाउर छल, जतए हुनका जराओल गेल छल। हमरा लागल जेना बुढ़िया मैयाँ ओइ छाउरमे सँ निकलि हमरा सामने ठाढ़ भऽ गेलीह आ कहऽ लागलीह- "बउआ अही माटिसँ एकदिन हम निकलल छलौं आ अही माटिमे फेरसँ चलि एलौं। अहाँ कथी लेल चिन्तित होइ छी। हमर स्मृति अहाँक मोनमे अछि, सएह हमर पैघ स्मृति अछि। जखन पुरना घर खसै छै ने, तँ ओकर मलबा एहिना कात कऽ देल जाइ छै। ओइ जगहपर नबका घर बनाओल जाइत अछि। हम पुरान घर छलौं, खसि पड़लौं, अहाँ सभ नब घर छी, जाउ उठै जाउ आ नाम करू। ऐसँ हमरो आत्मा तृप्त रहत। बिसरि गेलौं, बच्चामे अहाँ सभकेँ घुआँ-मुआँ खेलबैत छलौं तँ की कहै छलौं, नब घर उठए, पुरान घर खसए।" हमरा अपन नेनपनक खेल मोन पड़ए लागल। बुढिया मैंया अपन ठेहुनपर चढा कऽ घुआँ मुआँ खेलबै छलीह। की ई संसार एकटा घुआँ मुआँक खेल थीक। ऐमे एहिना पुरना घर खसाकेँ बिसरि देल जाइए आ नबका घर सभ अपन चमक देखबैत रहैए। हम ओइठामसँ सोझे बाजार दिस विदा भऽ गेलौं ई बड़बड़ाइत जे नब घर उठए, पुरान घर खसए। लोकतन्त्रक माने शैलेश बाबू अपन मिनी लाइब्रेरी मे बैसल किछु पोथी सबहक पन्ना उनटेने जाइ छलाह। हुनकर कनियाँ सुनन्दा आबिकेँ कहलखिन्ह- "कोन खोजमे लागल छी अहाँ। तीन घण्टासँ अपस्याँत भेल छी।" शैलेश बाबू बजलाह- "लोकतन्त्रक माने ताकि रहल छी।" सुनन्दा हँसैत बजलीह- "हुँह, कथीकेँ प्रोफेसर छी अहाँ यौ। लोकतन्त्रक माने होइ छै, बाई द पीपुल, औफ द पीपुल, फौर द पीपुल। ई गप तँ बच्चा-बच्चा बूझै छै।" शैलेश बाबू बजलाह- "ई माने तँ हमरो बूझल छल। हम लोकतन्त्रक आधार बनल किछु गोटेक हरकतकेँ व्याख्या करबाक फेरमे एकर विशिष्ट अर्थ ताकि रहल छी। जतए जाइ छी किछु ने किछु विचित्र हरकत करैबला लोक सभसँ भेँट भऽ जाइए। हुनकर सबहक लीला लोकतन्त्रक परिभाषामे आबै छै वा नै, यएह खोजमे तबाह छी।" सुनन्दा कहलखिन्ह- "छोड़ू एखन ई सभ आ चलू किछु पनपियाइ कऽ लिअ।" शैलेश बाबू पनपियाइ करैत छलाह तखने हुनकर मित्र मनोज चौधरीक फोन एलन्हि- "कहिया पूर्णिया आबै छी प्रोफेसर साहेब? ऐ बेरक दुर्गा पूजामे हमर गामक प्रोग्राम फाइनल अछि ने?" शैलेश बाबू बजलाह- "हम काल्हि चलै छी।" दोसर दिन शैलेश बाबू पूर्णिया गेलाह आ ओतए सँ मनोज जीक संग हुनकर गाम गेलाह। ओतए हुनकर गामपर जलखै कऽ केँ साँझमे दुनू दोस्त मेला घूमै लेल निकललाह। मेलामे ऐ बेर नौटंकीक बेवस्था सेहो छलै। सभ ठामसँ घूमि दुनू गोटे नौटंकी देखबा लेल पंडालमे पहुँचि अपन स्थान ग्रहण केलथि। नौटंकीक बीचमे बाइजीक नाचक सेहो प्रबन्ध छलै। एकटा बाइजी स्टेजपर आबि अपन लटका झटका देखबैत कोनो फिल्मी गानापर नाच करऽ लगलै। शैलेश बाबू मनोज जीकेँ कहलखिन्ह जे चलू, ई नाच हम नै देखब। ताबे एकटा घटना भेल, जे देखि ओ ठमकि गेलाह। नाचक बीचेमे दर्शकमे आगूमे बैसल एक गोटे उठलाह आ नाच करऽ लगलाह। ओ साँवर रंगक उज्जर कुरता पायजामा पहिरने एकटा दाढ़ीदार लोक छलाह आ हाथमे एकटा नलकटुआ रखने फायरिंग सेहो करै छलाह। मनोज जी बजलाह- "ई हमर सबहक विधायक छथि आ सभटा आयोजन हुनके सौजन्ये छन्हि।" तावत ओ विधायक मंचपर चढ़ि गेल आ बाइजी संगे फूहड़ भाव-भंगिमामे नाच करऽ लागल। शैलेश बाबू खिसियाइत बजलाह- "चलू तुरन्त। हम नै रूकब आब। ई किरदानी विधायकक, राम-राम।" ओतए सँ दुनू गोटे गामपर एलाह आ शैलेश बाबू रातिये पटनाक बस पकड़ि विदा भऽ गेलाह। दोसर दिन भोरे पटना पहुँचलाह। डेरापर बैसि चाह पीबै छलाह, तखने सुनन्दा बजलीह- "केहेन जमाना आबि गेलै। विधायक नर्तकी संगे स्टेजपर नाच करै छलै। पूरा समाचारमे यएह सभ देखा रहल छै।" शैलेश बाबू तुरंत टी.वी. दिस भगलाह आ एकटा न्यूज चैनल लगेलाह। ओइठाम यएह समाचार बेर बेर देखबै छलै। ओइ चैनलक स्टूडियोमे ऐ विषयपर बहस चलै छलै। किछु राजनीतिक लोक सभ आ किछु बुद्धिजीवी लोक सभ चर्चामे लीन छलाह। विधायक जीक पार्टीक नेताकेँ छोड़ि बाकी लोक ऐ कृत्यक घोर निन्दा करै छलाह। बीच बीचमे प्रचार आ चैनेल दिससँ ई उद्घोषणा कि सभसँ पहिने वएह ई समाचार देखौलक। ई विषय गरीबी आ भूखमरीक समस्याकेँ कतौ बिला देलकै। एना लागए लागल जे देशमे आब एकमात्र यएह समस्या रहि गेलै। शैलेश बाबू चैनल बदललाह। सभ ठाम वएह देखबै छलै। ओ बड़बड़ाय लगलाह- "कते महत्वपूर्ण समाचार भऽ गेलै ई।" ताबत एकटा चैनलपर विधायक जीक बयान आबि गेलै- "ई सभ विरोधी पार्टीक दुष्प्रचार थीक। हम ओइ नर्तकीकेँ पुरस्कार देबा लेल स्टेजपर गेल छलौं। वीडियोमे छेड़छाड़ कएल गेल अछि। ई हमरा बदनाम करै लेल विरोधी सबहक चालि थीक। हम जाँच लेल तैयार छी। एकटा कमीशन बैसाएल जाए।" शैलेश बाबू सुनन्दाकेँ कहलखिन्ह- "ई झूठ बाजैए। हम अपनहि आँखिसँ ई कृत्य देखलौं।" सुनन्दा बजलीह- "चुप रहू आ ई गप आन ठाम नै बाजब। छोड़ू ने, सिनेमाक चैनल लगाउ।" साँझमे एकटा चैनलपर "विधायक जी स्टेजपर" ऐ विषयपर जनताक बीच विधायक जी केर प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम छल। शैलेश बाबू ई देखऽ लगलाह। विधायक जी साफ-साफ कहलखिन्ह जे ओ स्टेजपर नर्तकीकेँ ईनाम दै लेल गेल छलाह। हुनकर कहनाइ रहन्हि जे वीडियोमे छेड़छाड़ कएल गेल। जनताक बीचसँ ढेरो सवाल पूछल गेल आ विधायक जी बिना तमसायल मुस्की दैत शांत जवाब दैत रहलाह। शैलेश बाबू कुनमुनाबऽ लगलाह। बाजए लगलाह जे केहेन झूठ बाजै छै। मुदा हुनकर के सुनै छन्हि। सुनन्दाकेँ ई गप बूझल छलन्हि जे शैलेश बाबू जोशमे ओतए जा सकै छथि, तैं ओ हुनकर पहरेदारीमे मुस्तैद छलीह। एकाएक जनताक बीचसँ एकटा युवक उठलै आ हाथमे एकटा चप्पल लेने मंच दिस दौड़ि गेलै। ओ चप्पल सोझे मंच दिस फेकलक जकरा विधायक जीक अंगरक्षक सभ लोकि लेलकै। ओइ युवककेँ पुलिस पकड़ि लेलक आ धुनाइ करए लागल। विधायक जी बाजए लगलाह जे देखू विरोधी सबहक कुकृत्य। हमरा नै फँसा सकल तँ आब अपन पार्टीक लुच्चा सभकेँ पठा कऽ हमरा बेइज्जत करबाक प्रयास करै जाइए। शैलेश बाबू धेआनसँ ओइ युवककेँ देखलाह तँ हुनकर मुँहसँ निकललन्हि- "अरे ई तँ धनंजय छी। अपन फूलधर बाबूक जेठका बेटा। ई कोनो पार्टीक लोक नै अछि। ई तँ डिग्री लऽ केँ घुमैत एकटा बेरोजगार युवक अछि।" शैलेश बाबू टी.वी. बन्न कऽ माथपर हाथ धेने बैस गेलाह आ सुनन्दासँ कहलखिन्ह- "कनी एक गिलास पानि पियैबतौं। हम फेर लाइब्रेरी जा रहल छी, लोकतन्त्रक माने ताकबा लेल।" अमित मिश्र , गाम-करियन, जिला –समस्तीपुर| प्रेम नै जहर छै एकटा गाम। मननपुर। भोरक समय। गामक बीच दुर्गा मंदिरसँ उठैत नारी स्वर, गीतक एहन प्रवाह, लगै छल जे स्वयं सरस्वती कमलक आसनपर बैस अपन हाथक वीणा संग मधुर भजन गाबि रहल छथिन ।यएह भजन "जय जय भैरवि....." सँ ऐ गामक मनुष्य अपन आँखि खोलै छथि। आब फरिच्छ भs गेल छै। किसान अपन बड़दक संग खेत दिश चललाह। बड़दक घेटमे बान्हल घंटी, ओही मधु भरल स्वर संग तालमे ताल मिलएबाक भरिसक कोशिश कऽ रहल छै। भोर सात बजे ऐ गामसँ ओइ नारीकेँ पहिल भेँट होइ छै। किरण, जी हँ किरण नाम छै ओकर। सोलह -सत्रह वर्षक घेट लगेने, मानू कोनो आधा खिलल गुलाबक कली। यौवनक चिन्ह आब उजागर होबऽ लागल छै। सुन्दरताक चलैत-फिरैत दोकान। ककरोसँ कोनो उपमा नै, अनुपम। एकदम मासूम मुँह, समाजक रीति-रिवाजसँ अंजान। गाममे सबहक चहेती। कोनो काज एहन नै जे ओ नै कऽ सकैए। सभ काजमे पारंगत, किरण। "किरण, गै किरण, कतऽ चल गेलही, स्कूल कऽ देर भऽ रहल छौ", सुलोचना टिफिन बन्न करैत किरणकेँ सोर केलखिन। "आबै छियौ, बस दू मिनट", कहैत किरण घरसँ बहराएल। कनेक काल ठमकि ठोरपर मुस्की नचबैत बाजल- "माँ आइ कने देरसँ एबौ, आइ ने हमर सहेली पिंकीक जनमदिन छै।" आ ई कहैत साइकिल लऽ स्कूल दिश चलि देलक। स्कूलमे एकटा लड़का छलैए, राकेश, पढ़ै-लिखैमे गोबरक चोत मुदा पाइबाला बापक एकलौता बेटा, से पाइक गरमी जरूर छलै। सभ साल मास्टरकेँ दू टा हजरिया दऽ दै आ वर्गमे प्रथम कऽ जाए। एक नम्मरक उचक्का। ओ जखन-तखन किरणकेँ देखैत रहैए। आब किरण गरीब घरक सुधरल बेटी, ओ की जानऽ गेलै जे कनखीक अर्थ की होइ छै। जहिना आन सभ छात्र-छात्रा राकेशक किनल चॉकलेट, मलाइबर्फ, बिस्कुट आदि अनेको चीज सभ खाइ छल ओहिना किरणो बिना छल-प्रपंचक राकेशक संग रहै छल। इम्हर किछु दिनसँ राकेश महगासँ महगा आ सुन्नरसँ सुन्नर चिज-बित सभ आनि कऽ किरणकेँ चुप्पे-चाप दै छलै। जइ अवस्थामे एखन किरण छल ओइमे विपरीत लिंगक प्रति आकर्षण भेनाइ स्वभाविक छै, आ जौँ पैसाक गमक लागि जाए तँ फेर बाते कोन छै। ईएह कारण छै जे राकेशक संग ओकरा आब नीक लागऽ लगलै। राकेशक जादू एहन चलले जइमे फँसि पढ़ाइ-लिखाइ सभ पाछू छुटि गेलै आ मस्ती हावी भऽ गेलै। ऐ आकर्षणकेँ ओ नाम देलक प्रेम। प्रेम, जइ शब्दकेँ एखन धरि कोनो उपयुक्त परिभाषा नै भेटल। प्रेम, जकरा विषयमे जतेक लिखब ततेक कम। प्रेम, शायरक तुकबंदी, दिलक मिलन। प्रेम, जे मौतसँ लड़बाक साहस दै छै। लैला-मजनूबला प्रेम भेल छलै आकि किछु आर से जानी नै। "आउ, आउ, आइ बड़ देर कऽ देलिऐ," किरणकेँ आबैत देख राकेश बाजल। "हँ, की करब साइकिल पंगचर भऽ गेल छल।" किरण जबाब देलक। राकेश मक्खन लगाबैत बाजल," आहा, हम्मर जानकेँ आइ बुलैत आबऽ पड़लै . . . काल्हि चलब नवका स्कूटी किन देब .. तखन नै ने कोनो दिक्कत।" किरण मुस्कुराइत बाजल,"दुर जाउ, स्कूटीपर चढ़बै तँ गामक लोग की कहतै। कहतै जे छौड़ी बहैस गेलै।" "लोक किछु कहैए कहऽ दियौ, अहाँ बताबू वेलेंटाइन डे आबि गेल छै, गिफ्ट की लेबै।" राकेश एक्के साँसमे बाजल। "हम किछु नै लेब, जखन प्रेम केलौं आ बियाह करबे करब तखन अहाँक सब किछु अपने आप हम्मर भऽ जेतै।" किरण विश्वासक साथ बाजल। कनेक काल मौन ब्रतक पालन केलाक बाद राकेश किरणक हाथ पकड़ैत बाजल,"किरण, हम चाहै छी ऐबेर वेलेंटाइन डे पर दरभंगा घुमै लेल चलब। जौं अहाँ कहब तँ एखने होटल बुक करबा दै छी।" फेर कने आर लग आबि बाजनाइ शुरू केलक- "ओतऽ खूब मस्ती करब, फिल्म देखब आ राज मैदानमे पिकनिक मनाएब, आ बहुतो रास गप्प करब।" किरण अपन हाथ छोड़बैत बाजल,"नै नै, हम असगर अहाँ संग दरभंगा नै जाएब। माँ हम्मर टांग तोड़ि देत, अहाँ जाएब तँ जाउ, हम एतै ठीक छी।" " हे . . .हे . . . हे . . . हे . . . एना जुनि बाजू।" राकेश किरणकेँ पँजियाबैत बाजल,"हम अहाँक होइबला घरबला छी आ पति संग घुमैमे कोन हर्ज छै, मात्र एक्के दिनक तँ बात छै, अहाँ कोनो बहाना बना लेब।" जेना-तेना कऽ राकेश अप्पन बात मना लेलक। तय दिन किरण आ राकेश शिवाजीनगरसँ बस पकड़ि दरभंगा दिश चल देलक। भरि रस्ता प्यार-मोहब्बतक बात बतियाइत रहल। दरभंगा आबि राज किला देखलक, श्यामा मंदिर आ मनोकामना मंदिरमे पूजा केलक, टावर चौकसँ शॉपिंग केलाक बाद साँझ होटलमे आएल। आब एक कमरा, एक बेड, दू जन। बड़ मुश्किल घड़ी छलै। राकेश कहलक, "आउ कने सुस्ता लै छी, काल्हि भोरे ऐठामसँ विदा हएब।" किरण प्यारक कारी पट्टीसँ अपन आँखि बान्हि लेने छलि। बिना किछु बाजने ओ सभ करैत गेलि जे राकेश चाहै छल। जौं कखनो बिरोधो करै तँ प्रेमक दुहाइ दऽ राकेश मना लै छलै। आ अन्ततः ओ भेलै जे नै हेबाक चाही। प्रेमक मायाजालमे फसल प्रेमक मंत्रसँ वशीभूत कएल किरण किछु नै बाजलि, शाइद अप्पन प्रेमपर हदसँ बेसी विश्वास छलै। भोरे नीन खुजलै तँ अपनाकेँ असगर देखलक। कनेक काल प्रतीक्षा केलक मुदा राकेशक कोनो अता-पता नै छलै। काउन्टरपर सँ पता चललै जे राकेश तँ तीन बजे भोरे चल गेल छल। आब बुझू किरणपर बिपैतक पहाड़ टुटि पड़लै। विभिन्न तरहक बात मोनमे आबै। माँकेँ की कहब, आगू जीवन कोना काटब, लोक की कहतै। सोचैत-सोचैत मोन घोर भऽ गेलै। गाम दिश जएबाक लेल डेगे नै उठै। कतऽ जाएब, की करब। चलैत-फिरैत लहाश भऽ गेल छलि किरण। भीड़-भाड़मे रहितो एकदम तन्हा। मनक तूफान रूकबे नै करै। बेकार, जीवन बेकार भऽ गेलै। सभटा सोचल सपना क्षणमे टुटि गेलै। सोचै, माँकेँ अफसर बनि कऽ के देखतै, भगबतीक गीत के गेतै? एतेक दिन दुर्गा माँक पूजा केलौं... तकर इनाम ई भेटल।....सभ झूठ छै,... देवी-देवता सभ बकबास छै..... गरीबक साथ कोनो देवी-देवता नै दै छै।.... सभ कहै छै, प्रेम बड़ नीक शब्द छै,..... प्रेमसँ पत्थर दिल मोम भऽ जाइ छै, .....मुदा नै......, प्रेम तँ जहर छै, जहर ... जैसँ केवल मौत भेटै छै, मौतक सिवा किछु आर नै, मौत . . मृत्यु . . मौत . . जहर . .। हम जानि-बुझि कऽ ई जहर पिलौँ।... हम अपवित्र छी, हम कुलक्षणी छी ..., हम धरती परक बोझ छी ......हमरा जीबाक कोनो अधिकार नै। हमरा सन कऽ लेल ऐ दुनियाँमे कोनो जगह नै। .....हम माँ-बापक इज्जत अओर निलाम नै करब।...... हम मरि जाएब, ककरो किछु खबर नै हेतै। ......हम अप्पन बलिदान करब। अनेको रास बातसँ माँथ लागै फाटि जेतै। ओ एक दिश दौड़ल, किम्हर से ओकरो नै पता, ओ कतऽ जा रहल छै ....., नै जानी। ....दौड़ैत-दौड़ैत भीड़मे कत्तो चल गेल। अप्पन अंजान मंजिल दिश। भोरे अखबारक मुख्य पृष्ठपर मोट-मोट अक्षरमे लिखल छल "सोलह-सतरह सालक एकटा गोर-नार युवती रेलवे पटरीपर दू टुकड़ीमे भेटल। नाम-गामक पता नै चलल अछि। पोस्टमार्टमक लेल लाश भेज देल गेलैए। अंतिम दाह-संस्कार पुलिसक निगरानीमे हएत . . .। राजदेव मंडल एलेक्सनक भूत निन्नक निशामे मातल सूतल छी आ सपना देखि रहल छी। जुलूस जा रहल अछि। इनक्लाब जिन्दाबाद.....। राजनीतिक पार्टी आ पाटीक तरफसँ ठाढ़ नेताक लेल वोट माँगएबला जुलूस। आगूमे नेताक बदला प्लाईवुडक आदमकद फोटो। दुनू जाँघक बीच मोटका लाठी धोंसिया कऽ फोटोकेँ ऊपर उठौने। गर्दमिसान करैत भीड़ निकट आबि रहल अछि। “जितबे करता- जितबे करता, हमर नेता जितबे करता। नेताजीकेँ मारि कऽ गोली, बन्न नै कऽ सकत हमर बोली।” भीड़मे एक दोसरासँ पूछैत अछि- “नेता जीकेँ गोली लगि गेलै की?” “हँ भाय, साँझमे। गोली तँ अजमा कऽ छातीमे मारलकै। लेकिन हुसि गेलै। टाँगमे गोली लगलै। होसपिटलमे पड़ल छथि। इलाज चलि रहल छै। तइ दुआरे नेता जीक फोटो लऽ कऽ प्रचार कऽ रहल छिऐ।” “सभटा एण्टी पाटीक किरदानी हेतै।” हमर धियान आदमकद फोटोपर अछि। आरे तोरीकेँ, ई फोटो तँ हमरे छी। हू बहू। लगल जेना हम उछलि कऽ फोटोमे ढुकि गेलौं। फोटोक बदलामे हमहीं ठाढ़ छी। आ ऊ अगत्ती छौड़ा लाठीपर टंगने हमरा ऊपर नीचाँ कऽ रहल अछि। दरदक अनुभव होइत अछि। बेसुमार दरद। हम िचचिया रहल छी- “हे रौ, हमरा नीचाँ राख। एना किए नाहकमे जान लैत छँ।” भीड़केँ कोनो आँखि-कान होइत छै। के सुनत हमर कानब? मुड़ी उठेलौं। आगूमे देखै छी जे एण्टी पाटीक किछु लफंगा सभ घुरिया रहल अछि। किछु लोकक हाथमे झण्डा आ डण्टा अछि। आ रे तोरीकेँ, ई सभ तँ डाँड़सँ पेस्तौल निकालि रहल अछि। कियो बम पटकि पड़ाएल। “धुम... धुम... धड़ाम।” सभ भागल जहिंपटार। हमरा लाठी सहित गन्हकैत नालीमे फेंकि देलक। ओइ भभकैत नालीमे हम लसकल छी, नाक मुनने। हल्ला कऽ कहि रहल छिऐ- “हओ, ठाढ़ हुअ। हमरो संग नेने चलह।” किन्तु के सुनत? संकटकालमे तँ लोक केहनो प्रिय बेकतीक संग छोड़ि दै छै। आ हम तँ नेता छी....। तँए हम तँ सबहक प्रिय। किन्तु कियो नै अबैत अछि। महकैत नालीमे धँसल जा रहल छी। ‘हे देव, डूबै छी। तँ हाथ पएर मारह।’ नालीसँ निकलबाक लेल हाथ-पएर जोर-जोर चलेलौं। स्त्रीकेँ झकझोरबसँ निन्न टूटि गेल। तामससँ थरथराइत पत्नी बाजि रहल अछि- “दिन कऽ गारि आ रातिमे मारि। हमरा ई जिअ नै दैत। हम आब रहि नै सकैत छी।” “देखू एना नै बाजू। पड़ोसिया सुनत तँ की कहत। हमरा तँ मोने नै रहल जे घरमे अहाँ लग सूतल छी। हम तँ सपनामे कतएसँ कतए बौआ रहल छलौं। आब अहाँ जे कही।” “अच्छा, अच्छा बुझलौं। भोर भऽ गेल छै। दुआरपर सँ कियो सोर पाड़ि रहल अछि। उठू, देखियौ।” “की देखबै। वएह सभ हेताह।” “के सभ?” “आइ तँ नमनेशन देबाक लेल जाइक छै ने। संगे-संग जाइबला संगी-साथी सभ…।” “ठीके तँ अछि। अहूँ नहा-सोना कऽ तैयार भऽ जाउ। चलि जाउ सवेरे।” “धुर, हमरा राजनेति करनाइ ठीक नै लगैत अछि। ई कोनो नीक करम नै अछि।” “हेओ, अहाँ सपनामे धसना खसैत तँ नै देखलिऐ। आकि एलेक्सनक भूत चाँपि देलक। काल्हि तक जइ राजनेतिक गुण-गान करैत छलिऐ आइ ओकरा अधलाह कहै छिऐ?” स्वरकेँ अकानैत फेर बजली- “अच्छा जाइयौ, दुआरिपर सँ सोर पाड़ैत अछि।” हाथ-मुँह धो कऽ हम दुआरिपर पहुँचलौं। देखैत छी- गौआँ-घरूआ, संगी-साथी, किछु नव सिखुआ नेता सभ एका-एकी दुआरिपर जमा भऽ रहल अछि। एकटा छोटका भीड़ सन। भीड़सँ स्वर निकलि रहल अछि- “अँए यौ, अखनी तक अहाँ तैयार नै भेलौं। कागज-पत्तर लिअ। आ जल्दी चलू। सभसँ पहिले।” “हाँ-हाँ सभसँ पहिलुक नमनेशन अपने सभक दाखिल हेबाक चाही।” “जल्दी नमगरहा कुरता लगाउ। अरे, मुँह की तकै छेँ। छिपगरहा लग्गामे झण्डा बान्ह।” हमरा ठाढ़े भेल देखि एक गोटे बजल- “रौ तोरीकेँ, नेताजी अहाँ ठाढ़े छी। जल्दी करू। साम-दामक संग चलैक छै।” तैयो हम असमंजसमे ठाढ़ छी। पछिम भर सँ चटपटिया काका अपस्यिाँत हइत पहुुँचल। भीड़केँ देखि ओकर पएर ठमकल। ओ जोरसँ बजल- “हौ, एकटा गप्प बुझलहक। पछबरिया सड़कक कातमे एकटा नेताजीकेँ टांग-हाथ तोड़ि कऽ राखि देने छै। ओ नुए बसतरे सभ करम केने पड़ल अछि।” “धुर सभटा फूिस। खाली झूठे बजै छी- अहाँ।” “नै हौ, देखि आबहक, अपनेसँ। किरिया खा कऽ कहै छिअह। कुहरै छै। अखने पानि पिआ कऽ एलिऐ।” “छोड़ ऐ गप्पकेँ। सभ एलेक्सनमे तँ अहिना होइ छै। कतेक नेता मरतै-हारतै। अन्तमे जे बचत आ जीतत तेकरे राजतिलक लगतै।” “चलू बहादूर, डर नै राखू।” “यौ ठकमुड़ी किअए लगल अछि।” हमरा लगैत अछि- ई सभ आब नै मानत। हमरा जबरदस्ती ने लऽ जाए। हम कोनो शर्तपर नै जाएब। हमरा नस-नसमे डर ढुकल जा रहल अछि। मिटिंगमे नेताजी कहने रहथि- “पहिले शिक्षा प्राप्त करू। संघर्ष करू आ तब बढ़ू सत्ता दिस।” तँ कि हम शिक्षित नै छी। एकता करबाक लेल प्रयास करैत रहलौं। आब जे समए आएल तँ सत्ता प्राप्त करैक लेल कोशिशमे लगलौं। फेर ई डर कतएसँ आबि गेल। लगैत अछि तरे-तर कण्ठ मोकने जा रहल अछि। बेकार एलेक्सनमे ठाढ़ हेबाक हवा फैला देलिऐ। सात दिनसँ सुनि रहल छी- विपक्षी सबहक गपशप। शाइत ऐ एलेक्सनमे हमर मौत लिखल अछि। गामक सम्पन्न आ दबंग मालिक सिंहजी सेहो कहैत रहए- जे हमरा बेटाक एण्टीमे ठाढ़ हएत ओकरा साफ कऽ देबै। चारिम दिन सिंह जीक भाय हमरा समझाबैत कहने रहए- “हौ धिया-पुताकेँ पढ़ाबह-लिखाबह आ घर दुआरि नीकसँ बनाबह। किए राजनेतिक फेरमे पड़ल छह। राजनेती छिऐ आन्हर बिहाड़ि। तोहर घर-परिवार तगतगर नै छह। ऐ बिहाड़िमे अपनो उड़ि जेबहक आ परिवारो नाश भऽ जेतह। तोरा पासमे राजनेति करैबला सामरथ कहाँ छह। छोट जातिमे जनमल, छोट परिवारक लोक छह। तोरा बुत्ते ई नै हेतह।” लगैत अछि हमरा धीया-पुता अनाथ भऽ जाएत आ पत्नी विधवा। संगी-साथीक की हेतै। फाँटिपर तँ हम चढ़बै। धुर नै ठाढ़ हएब हम। कहि दैत छिअह साफे-साफ। जोरसँ बजै छी- “हे यौ हम एलेक्सनमे नै ठाढ़ हएब। दोसरे गोटेकेँ ठाढ़ करू। हम समर्थन करबै।” सभ अवाक। भीड़ बजैत अछि- “गाछ चढ़ा कऽ छह मारै छेँ। कतौ मुँह देखेबाक जोग रहब हम सभ। नै, आब से नै हेतह। ठाढ़ हुअए पड़तह।” सोचै छी- हमरा पासमे बड़का माथ नै अछि। कनियो हुसि जाएब तँ जेल जाएब। आब हमरा भागए पड़त, दोसर कोनो उपाइ नै। देह जेना थर-थराए लगल। जोरसँ बजलौं- “हमरा बोखार लगि गेल। अहाँ सभ चलि जाउ। हमरा बुत्ते एलेक्सन लड़ल नै हएत।” ओतएसँ पड़ेलौं, ऑंगन आबि बिछौनपर धाँइ दऽ खसि पड़लौं। खिसिआएल लोक किछुसँ किछु बजैत एका-एकी जा रहल अछि। सभ चलि गेल तँ निचेन भऽ निसाँस छोड़लौं। पत्नी लगमे आबि हमरा निहारि रहल अछि। पुछलिऐ- “एना किअए तकै छी?” बजलीह- “देखै छी जे अहाँ मौगी छी की मरद। अहाँ एतेक मौगियाह छी, हमरा पता नै छल। आब तँ हमरा लाज होइए जे एहेन मौगाक संग केना कऽ जिनगी काटबै। अहाँ घरेमे रहू, एलेक्सनमे ठाढ़ हेबाक लेल हमहीं जाइ छी।” कहैत ओ फुरतीसँ निकलि गेली। हमरा भीतरीमे जेना तूफान सन उठए लगल। मोनमे आबए लगल किछु शब्द सभ- डेरबुक..... साफ कऽ देब...... बिहाड़ि..... परिवारक नाश..... सत्ता......... राजनेति............. मौगियाहा...........। किछु काल तक मोन औनाइत रहल। फेर जेना भीतरमे किछु उगल। मेघकेँ फाड़ि जेना सूरूज उगि गेल हो। धड़फड़ा कऽ उठलौं। कुरता पहिरिलौं। झोरा कान्हमे लटकेलौं। आ ऑफिस दिस दौगैत जा रहल छी। मुँहसँ जोरगर स्वर स्वत: निकलि रहल अछि- “चलू जल्दी चलू। हम एलेक्सनमे ठाढ़ हेबाक लेल जा रहल छी।” फेर दौड़ए लगलौं। एतेक पछुआएल छी तँ दौड़हि ने पड़त। गजेन्द्र ठाकुर दिल्ली १ पोस्टमार्टम कएल शरीर, सातटा मोटका शिल्लपर, जड़त कनीकालमे। गोइठामे आगि जे अनलन्हिहेँ सुमनजी, राखि देलन्हि नीचाँ। कनकनाइत पानिमे डूम दऽ गोइठाक आगिसँ आगि लऽ शरीरकेँ गति-सद्गति देबा लेल। आ कऽ देलन्हि अग्निकेँ समर्पित। तृण, काठ आ घृत संग। घुरि गेला सभ। लोह, पाथर, आगि आ जल नांघि, छूबि; डेढ़ मासक बच्चाकेँ कोरामे लेने छलि माए, तकड़ा छोड़ि। सभ घर घुरैत छथि। २ दिल्ली। ३१ दिसम्बरक राति। आब एक तारीख भऽ गेलै। रतुका शिफ्टमे हम छी। कोरियासँ आएल एकटा स्त्री हमरासँ पुछैए, ई नव एयरपोर्ट अछि की? हम कहै छिऐ- हँ। आ पुछै छिऐ- किए? ओ स्त्री कहैए- नै, हमरा लागल, किए तँ छह मास पहिने आएल रही। -हँ पहिने टर्मिनल दू पर अहाँ आएल हएब, ई नव टर्मिनल छिऐ, टर्मिनल- तीन। नीक लागल अहाँकेँ?-– हम पुछै छियन्हि। -बड्ड नीक लागल। एयरपोर्ट नै, होटल सन लागि रहल अछि। इण्डिया आब मजगूत भऽ रहल अछि।-– महिला बजै छथि। रतुका शिफ्टमे हम छी। तखने गामसँ एकटा फोन हमर मोबाइलपर अबैए। हमर महिला सहकर्मी हँसी करै छथि- गामसँ फोन आएल हेतन्हि, आब फेर ई मैथिलीमे गप करता, हम सभ भाषा बुझै नै छिऐ, मीठ भाषा छै, तेँ हमर सभक खिधांशो करैत हएता तँ हमरा सभकेँ पता नै चलैए। ३१ दिसम्बरक राति छिऐ। आब एक तारीख भऽ गेलै। मुदा दुर्घटना बारह बजे रातिक पहिने भेल छलै। लहाशक जेबीमे मोबाइल रहै। तीन चारिटा अंतिम बेर डायल कएल गेल फोन नम्बरपर पुलिस ओही मोबाइलसँ फोन केलकै आ सूचना देलकै जे जकर फोनसँ पुलिस फोन कऽ रहल अछि, से आब ऐ दुनियाँमे नै रहल। मध्य रात्रि। एक्स-रे मशीन आ स्निफर डॉगकेँ छोड़ि ऑफिससँ छुट्टी लऽ हम बिदा होइ छी। ई एयरपोर्ट बाहरसँ कोनो सजल-धजल नवकनियाँ सन लागि रहल अछि। रातिमे बाहरसँ हमहूँ नै देखने रहिऐ ऐ नवकनियाँकेँ। ठीके कहै छल ओ महिला। होटले लागि रहल अछि, प्रकाशमे चमचमाइत। गाड़ी आगाँ बढ़ि रहल अछि। दिल्लीक रोड एतेक चाकर कोना भऽ गेलै। दिनमे तँ तीन मिनट प्रति किलोमीटरक गति रहै छै ऐ सड़कपर। मुदा रातिमे खाली रहने चकरगर लागि रहल अछि। मुदा फेर जमुनापार अबैए, रोड पातर होइत जाइए। भजनपुरा, खजूरी खास। दिनमे तँ गाड़ी एतऽ आबियो नै सकितए। बिजली सेहो कटि गेल छै। सड़कक दुनू कात गन्दा पसरल। गाड़ी गलीक कोनमे लगा कऽ आगाँ बढ़ै छी। गली पार कऽ हिलैत सिरही बाटे अमरजीक घर पैसै छी। कन्नारोहट उठल छै। दिल्ली.. इण्डिया, मजगूत इण्डियाक राजधानीक ईहो एकटा इलाका अछि। कोरियन महिला एतऽ नै आबि सकत, भजनपुरा, खजूरी खास। भजनपुरा, खजूरी खास, एतुक्के लोक दिल्लीक चमचमाइत घर, ऑफिस, आ व्यापारक पाछाँ अछि, एकर सभक अगिला खाढ़ी भऽ सकैए फएदामे रहतै.. तै आसमे जान अरोपने अछि। पता चलैए जे लहाश गुरु तेग बहादुर अस्पतालमे राखल छै। ओतऽ सँ बिदा होइ छी। बोल भरोस देबा योग्य परिस्थिति नै छै। गुरु तेग बहादुर अस्पतालक मुर्दाघरमे मोहित बाबूक बेटाक लहास ओकर रक्तसम्बन्धीकेँ देल जेतै। पुलिस कहने रहए- पिता जीवित छथिन्ह तखन दोसराकेँ देबाक बाते नै छै, नै जिबैत रहितथिन्ह तखन देल जा सकै छल- उच्च न्यायालयक आदेश छै। पछिला बेर दऽ देल गेल रहै आ जखन असली रक्त-सम्बन्धी आबि कऽ केस कऽ देलकै तँ तीनटा पुलिसबला निलम्बित भऽ गेलै। आ कने काल लेल मानि लिअ जे पुलिस दैयो देत, मुदा डॉक्टर पोस्टमार्टमे नै करत। ३ अमोदक घरमे हरबिर्रो उठि गेलै। दिल्लीसँ एक बजे रातिमे फोन आएल छै, मोहित बाबूक बेटा अमर मरि गेलै। दिल्लीमे सड़क दुर्घटनामे मरि गेलै। अमोदक फोनपर फोन आएल छै। अमोद मोहित बाबूकेँ कोना की कहतै। तत्ता-सिहर कटा कऽ एक्केटा बेटा मोहित बाबूकेँ, चारिटा बेटीपरसँ। परुकेँ बियाह भेल छलै। अमोद मोहित ककाक दरबज्जा लग पहुँचैए। हाक दैए। काकी अबै छथि। मोहित बाबू गाममे छथिये नै। बहनोइक मृत्यु-संस्कारमे भाग लैले गेल छथि। अमोदकेँ ई गप काकी कहै छथिन्ह। -से की भेलै एतेक रातिमे?- काकी चिन्तित भऽ पुछै छथिन्ह। -नै भोरमे अबै छी।–काज छल। अमोद मोहित बाबूक घरसँ पुछारी कऽ बहरा जाइए। अमोद आगाँ बढ़ि जाइए। सरवनक दरबज्जापर जाइए। हँ एकरे कहि दै छिऐ, काकीकेँ भोरमे कहि देतन्हि। सरवन चौकीपर सूतल अछि। अमोद ओकरा उठाबैए आ सभ गप कहैए। सरवन भोरमे काकीकेँ कहि देतै आ काकाकेँ सेहो भोरेमे फोन कऽ देतै। भोरमे भरि गाम हाक्रोस ….। काकी तँ बताह भेल जाइ छथि। मोहित बाबूकेँ फोन गेलन्हि जे जहिना छी तहिना आबि जाउ, काकीक मोन बड्ड खराप छन्हि। मोहित बाबू गामपर एलाह तँ दोसरे गप। दिल्लीमे टोलक बड्ड लोक छै, मुदा पुलिस लहास ककरो नै देतै। रक्त-सम्बन्धीकेँ लहास भेटतै। मोहित बाबू दिल्ली नै जेताह, संताप देखैले नै जेताह। मुदा पुलिस लहास दोसराकेँ नै देतै। मोहित बाबूकेँ पंडितजी भरोस दै छथिन्ह। ओतऽ के कोना दाह संस्कार करतै, से पण्डीजी संगे जेताह। साँझमे पटनासँ दिल्लीक ट्रेनमे रिजर्वेशन भऽ जेतै। विधायक जीसँ अमोद गप कऽ लेने छथि, टिकट कटा, रिजर्वेशन करा कऽ अमोदक भातिज टिकटक संग पटना जंक्शनपर भेटत। दिल्लीमे पीअर बच्चाक बेटा कार लऽ कऽ स्टेशनपर आएत, करोलबागमे कैकटा दोकान छै पीअर बच्चाक बेटाक। ओ सोझे ओतऽसँ मोहित बाबूकेँ मुर्दाघर लऽ अनतन्हि … पण्डीजी आ मोहित बाबू पटनाक बस पकड़ै छथि। साँझमे दिल्लीक ट्रेन छै। काल्हि भोरमे मोहित बाबू दिल्ली पहुँचि जेताह आ बेटा जे काल्हि धरि जिबिते रहै आ आइ जे लहास बनल दिल्लीक मुर्दाघरमे राखल छै- तकर मृत शरीरकेँ लेताह। ४ ट्रेन आशाक नगरी दिल्ली पहुँचैबला छै, चिमनीक धुँआ आ फैक्ट्री सभ खतम भेलै आ बड़का-बड़का स्टेडियम, प्रगति मैदान आ की-की आबि गेलै। मोहित बाबूकेँ ई सभ बौस्तु पहिने नीक लागै छलन्हि। दिल्ली हाटमे गमैआ बौस्तु सभक स्टॉलपर बड़का गाड़ीबला सभ उतरि कऽ समान कीनै छल। मोहित बाबूकेँ हँसी लागै छलन्हि। गाममे ई सभ बौस्तु अनेरे पड़ल रहै छै, कियो किननिहार नै। ऐ परदेशी सभकेँ गामक लोक सभ एत्तऽ अनेरे ठकै छै। मुदा आइ ई दिल्ली हुनका लेल मुर्दाघरक पता बनि गेल छन्हि। गुरु तेग बहादुर अस्पतालक मुर्दाघरमे हुनकर बेटाक लहास ओकर रक्तसम्बन्धीकेँ देल जेतै। पिता रक्तसम्बन्धी बनि पहुँचैबला छथि। मोहित बाबू मुर्दाघर पहुँचि जाइ छथि, पहिने बुझलो नै छलन्हि जे दिल्लीमे सेहो मुर्दाघर होइ छै, बिजली-बत्तीबला शहर दिल्लीमे..... ५ दिल्ली। के बसेलकै, कोना बसेलकै। अंग्रेज जहिया कलकत्तासँ दिल्ली राजधानी बनेबाक विचार केलक तखन तँ एकोटा गामक लोक एतऽ नै हेतै। आ आब … मोहित बाबू पहुँचि जाइ छथि। हबोढेकार भऽ कानऽ लगै छथि। हम भरि-पाँज कऽ पकड़ि कऽ बैसि जाइ छियन्हि। -गामक छोड़ू कोन टोलक, कोन घर लोक एत्तऽ नै छै। सड़क दुर्घटना सेहो भेल छै। मुदा बचि-बचि जाइ छलै। अमरो बचि जैतै तँ कत्ते नीक होइतै। अपंगो भऽ कऽ रहितै तँ देखबो तँ करितिऐ। हे कनियाँकेँ आगि नै देबऽ देबै, डेढ़मासक बच्चा छै। बच्चा लीलो भऽ जाएत। नै, हमहीं देबै आगि.. आन देबो करतै तँ अन्तिम दिन तँ उतरी कनियाँक गरामे आबिये जेतै। तेँ हमहीं देबै आगि। -एह.. एक्कैसे बरखक तँ छै, छौंकी सन शरीर छै कनियाँक। चारिटा भाइ छै, सभ एकरासँ पैघ। ओकर जीवन कोना बिततै। ऐ बूढ़ शरीरसँ बच्चाकेँ हम कोना पोसबै। कतबो धनीक रहै छै, नोकरी लेल पठबैते छै.. पीअरो बच्चा तँ पठेने छथि अपन बच्चाकेँ। ओकरासँ बेसी के छै धनीक गाममे? हमरा तँ दस कट्ठा जमीनो नै पुरत... रौ दैब... कहै छलिऐ जे हम नै जाएब दिल्ली...... संताप देखैले की जाएब? मुदा कहलकै जे लाशे नै देत। आ आब आबि गेल छी तँ हमहीं देबै आगि। -नै, से नै हएत, बाप कतौ आगि देलकैहेँ... अहाँकेँ अश्मसानघाटो नै जेबाक अछि। सभ पुरना गप बिसरि जाउ... ओकर पितियौतकेँ देबए दियौ आगि... ऐ परिस्थितिमे पुरान गप बिसरि जाउ। -नै, से भातिजक प्रति हमरा कोनो तेहन आन भावना नै अछि। ठीक छै... सुमनजी दौ आगि। ६ एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम रातिक घटना, आ ओकर बादक भोर। मुदा नै छै कोनो अन्तर। पहिराबा आ पुरुखपातकेँ छोड़ि दियौ। महिला तँ वएह…। ऐ कनकनाइत बसातसँ बेशी मारुख। हाड़मे ढुकल जाइत अछि। कमला कात नै यमुनाक कात। हजार माइल दूर गामसँ आबि। मिज्झर होइत अछि खरड़खवाली काकीक श्वेत वस्त्र। साइठ साल पूर्वक वएह खिस्सा, वएह समाज, मात्र पहिराबा बदलि गेल, मात्र धार बदलि गेल। गोपीचानन, गंगौट, माला, उज्जर नव वस्त्र, मुँहमे तुलसीदल, सुवर्ण खण्ड, गंगाजल, कुश पसारल भूमि, तुलसी गाछ लग उत्तर मुँहे पोस्टमार्टम कएल शरीर आनल जाइए। फेर ओतऽसँ यमुना कात… कनकनी छै बसातमे, हाड़मे ढुकि जाएत ई कनकनी, पोस्टमार्टम कएल शरीर जे राखल अछि, सातटा मोटका शिल्लपर, कमला कात नै यमुनाक कात, जड़त कनीकालमे। सुमनजी सेहो नव उज्जर वस्त्र पहीरि, जनौ, उत्तरी पहीरि, नव माटिक बर्तनक जलसँ, तेकुशासँ पूब मुँहे मंत्र पढ़ै छथि आ ओइ जलसँ मृतककेँ शिक्त करै छथि, वामा हाथमे ऊक लऽ गोइठाक आगिसँ धधकबैत छथि, तीन बेर मृतकक प्रदीक्षणा कऽ मुँहमे आगि अर्पित होइत अछि। लकड़ी कोना राखल जाए तइपर दू गोटेमे बहसा-बहसी भऽ रहल अछि। लगैए झगड़ा भऽ जेतै। पहिल गोटे कहि रहल छथि- एना लकड़ी नै तोपल जाइ छै, कतबो घी कर्पूर देबै आगि नै धरत। मुदा किछु काल आर। सातटा शिल्लपर राखल ओ शरीर, अग्नि लीलि रहल सुड्डाह कऽ रहल। एकटा परिवार फेरसँ बनत आ तीस बर्खक बाद देखब ओकर परिणाम। ताधरि हाड़मे ढुकल रहत ई सर्द कनकनी, ऐ बसातक कनकनीसँ बड्ड बेशी सर्द। सभ दिल्लीयेमे रहता, दिल्लीसँ लड़बा लेल, इण्डियाकेँ महाशक्ति बनेबा लेल, अपन प्रगतिक आशामे, अगिला खाढ़ी लेल एतेक तँ बलिदान देबैए पड़त, ई सोचैत। कपास, काठ, घृत, धूमन, कर्पूर, चानन कपोतवेश मृतक। पाँच-पाँचटा लकड़ी सभ दैत छथि। कपोतक दग्ध शरीरावशेष सन मांसपिण्ड भऽ गेलापर, सतकठिया लऽ सातबेर प्रदक्षिणा कऽ, कुरहरिसँ ओहि ऊकक सात छौ सँ खण्ड कऽ, सातो बन्धनकेँ काटि सातो सतकठिया आगिमे फेकि बाल-वृद्धकेँ आगाँ कऽ एड़ी-दौड़ी बचबैत नहाइले जाइ छथि, तिलाञ्जलि मोड़ा-तिल-जलसँ, बिनु देह पोछने, मृतकक आंगनमे द्वारपर क्रमसँ लोह, पाथर, आगि आ पानि स्पर्श कऽ सभ घर घुरि जाइ छथि। जगदीश प्रसाद मण्डल जन्म ५ जुलाइ १९४७। गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथाकार (दीर्घकथा संग्रह- शंभुदास; लघुकथा संग्रह १.गामक जिनगी, २. अर्द्धांगिनी..सरोजनी.. सुभद्रा.. भाइक सिनेह इत्यादि; आ तरेगन -बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह); नाटककार (१.मिथिलाक बेटी, २.कम्प्रोमाइज, ३.झमेलिया वियाह आ ४.एकांकी-संचयन); उपन्यासकार(मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत) आ कवि (१.इन्द्रधनुषी अकास, २.गीतांजलि आ ३.राति-दिन)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। गामक जिनगी, लघुकथा संग्रह लेल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११ क मूल पुरस्कार, आ टैगोर साहित्य सम्मान २०११; आ बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह "तरेगन" लेल बाल साहित्यक विदेह सम्मान २०१२ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपेँ प्रसिद्ध) प्राप्त। सूदि भरना बालपनमे लागल चोट जहिना अधवेशू वा बुढ़ाड़ीमे उपकि जाइत तहिना डोमीकाकाकेँ बेटी बिआहक चोट मास दिनक पछाति उपकलनि। रोगाएल अवस्थामे जखन कियो जिनगी-मृत्युक मचकीपर झुलए लगैत तखन जहिना धर्मराजक दरबार लगैत तहिना हुअए लगलनि। निष्पक्ष समीक्षक जहिना साहित्यक कोण-कोणक समीक्षा करैत तहिना डोमीकाका सेहो करए लगलाह। अन्तो-अन्त अही िनर्णएपर पहुँचलाह जे गाममे रहने जीवन-यापन नै कऽ पाएब तँए बिनु परदेश गेने जीब असंभव अछि। केना नै असंभव हएत? पाँच बीघा जमीनबला डोमीकाकाकेँ दू बीघा घर-घराड़ीसँ लऽ कऽ गाछी-बिरछी, खरहोरिमे बरदाएल, बाकी तीन बीघा जोतसीम। समाजोक देखा-देखी आ कुटुमो-परिवारक स्तरक अनुकूल तँ करए पड़तनि। जहिना धरमोक स्वरूप समायानुसार बदलि जाइ छै तहिना ने समाजोमे जे बेसी लाम-झामसँ बेटीक बिआह आ माए-बापक सराध करैत ओ समाजमे ओते ऊपर होइत। ततबे नै जइ समाजमे दोससँ बेसी दुश्मन रहैत तइ समाजमे ईहो पुरौनाइ तँ जरूरिये होइत जे अनकासँ कि मोर छी। दलानक ओसारक दछिनबरिया चौकीपर चित्त भेल पड़ल, दहिना हाथ मोड़ि दुनू आँखिपर लेने डोमीकाका परिवारक बदलैत स्वरूपपर आँखि गड़ा सोचि रहला अछि। मनमे उठलनि गलती अपनो भेल। ई तँ नजरिपर आएल जे समाज आ कुटुम-परिवारक देखौंस करब जरूरी अछि मुदा ई नै आबि सकल जे ओहूमे पतिआनी लगल अछि। एकठाम सभ समटल कहाँ छथि। भैयारियोमे तँ होइते अछि जे संगे-संग जिनगी बनौनिहारि पितिऔत बहिनक बीच एककेँ इंजीनियर, डाॅक्टर संगी भेटैत तँ दोसरकेँ ऑफिसक किरानी वा स्कूलक शिक्षक भेटैत अछि। भूल भेल, आगू दिस तकलौं मुदा पजरबािह आ पाछू दिस नै तकलौं। एकरा के उचित कहत जे एक-ओद्रक बेटा-बेटीक बीच इमान-बेइमान बनि जाउ। पाँच बीघा जमीन अछि, चारू भाए-बहिन हिस्साक संग पाँचम अपनो दुनू परानीक हेबे करत। जँ से नै हएत तँ अपन जिनगी अनका हाथमे जेबे करत। मुदा गलती भेल, धड़फड़ी केने। तहूमे पत्नी आरो मन घोर कऽ देलनि। ई कहू जे अर्द्धांगिनी भऽ केहेन विचार देलनि जे ऐ गाममे कर्ज नै भेटत तँ हम नैहरसँ आनि देब। एकटा मुर्गी जँ दसठाम हलाल हुअए तँ ओकरा की कहबै? एक तँ ओहिना परिवार महजालमे ओझराएल अछि तइपर हमरा किरतबे समाजक ऊपर आन समाजक कर्ज आबि जाए, एहेन काज जीता-जिनगी नै करब। मुदा तइमे कनी औगताइ भेल। औगताइ ई भेल जे पच्चीस-तीस हजार रूपैये कट्ठाक चीज पाँचे हजार रूपैये भरना लगा देलिऐ। मुदा बीतलकेँ बिसरबे नीक। जँ से नै करब तँ भूतलग्गू जकाँ अपन देह-हाथ अपने नोचए पड़त। फेर मन भरना जमीनपर घुमलनि। केना लोक पावनि-तिहारमे सेर-पसेरी लऽ खेतो भरना लगबैए आ बेचबो करैए। मनमे खौंझ उठलनि, कानूने बनने कि सुथनी हएत जे आठ बर्खक पछाति भरना जमीन घूमि जाएत, मुदा होइ कि अछि। ततबे किअए, जहिना महाजनीक सूदिकेँ सीमामे बान्हि देल गेल जे दोबरसँ बेसी कहियो ने हएत, तहिना बैंकक कर्जकेँ किअए ने बान्हल जाइए, जे ग्रामीण-दशा (गामक लोकक जिनगी) आगू मुँहे नै ससरि पाछुए मुँहे ससरि रहल अछि। जइठाम एते महग पढ़ाइ भऽ गेल अछि, लाखक इलाज (शरीरक) भऽ गेल अछि, लाखक घर बनि रहल अछि तइठाम कि उपाए अछि। हँ एते जरूर हेबाक चाही जे जखन सभ अपने छी तखन बीचमे इमान-बेइमान नै बनए। जहिना बरसातक मासमे एक दिसुका पानिकेँ दोसर दिसुका रोकि तेसर दिसक रास्ता पकड़ैत तहिना घीचा-तीरीमे डोमीकाकाक मन असथिर भेलनि। पड़ले-पड़ल पत्नीकेँ सोर पाड़लखिन। आंगनक ओसारक शीतल पाटीपर बैसि दायरानी बिआहक उनटा गिनगी करैत रहथि। फल्लांक करौछ हरा गेलइ, ओकरा तँ कहब जरूरी अछि। जँ से नै कहबै तँ अनेरे ओ दस ठाम बाजत जे फल्लाँ करौछ राखि लेलक। कोन चीज छी जखन एते खर्च भेबे कएल तखन एकटा करौछे कि छी? जहिना जिनगी बनबैमे जिनका जेहेन कठिन मेहनति भेल रहैए तहिना ने तिनकर जिनगीयो ठाढ़ होइए। जँ से नै तँ लाखक जिनगी केना पाँच-दसमे हारि मानत। फेर दायरानीक मनमे खुशी एलनि, अपना जँ बौको डाँड़ लागल तैयो बैहरी दादीकेँ नफे भेलनि। टुटल चंगेरा लेलियनि, नवका कीनि कऽ देलियनि। केना नै दैतियनि ओ थोड़े बुझलखिन जे हमरा चंगेरामे केरा-आम छोड़ि दोसर चीज जाइबला नै अछि। ओना हमरो तँ काज चलिए गेल, भने पुरना गेल नव आएल से नीके भेल। पतिक अवाज सुनि ओसारेपर सँ एते जोरसँ बजलीह जे डोमीकाकाकेँ बूझि पड़लनि जे लगमे नै कनी हटल छथि। डोमीकाका लग तँ दायरानी काकी पहुँचि गेली मुदा मनमे अपने घिरनी नचैत रहनि। एक चालि चलि जहिना घिरनी विश्राम लैत तहिना काकीकेँ सेहो भेलनि। आँखि उठा तकलनि तँ देखलखिन जे ग्रीष्मकालीन घास-पात जकाँ कुम्हलाएल मुँह, जेठुआ गरेक मेघ जकाँ चिन्तासँ लादल आँखि, निरजन वनमे हेराएल बटोही जकाँ देखि मन सहमि गेलनि। अपन कर्तव्यक एहसास भेलनि। पियासल लेल जहिना पानि, तबधल लेल पंखाक हवाक जरूरति होइत तहिना चिन्ताएल मनक लेल सेहो मीठ बोलक जरूरत होइत अछि। आँचरसँ ढबढबाएल पतिक दुनू आँखि पोछैत बजलीह- “एहेन सकल-सूरत किअए बनौने छी?” सिकीक वाण सदृश पत्नीक बोल डोमीकाकाक हृदैकेँ बेधि देलकनि। छटपटाइत बजलाह- “उपाये कि अछि जे.....?” दायरानी- “तखन?” डोमीकाका- “परदेश जाएब। दुनू बेटोकेँ नेने जाएब, नहियो कमा कऽ देत पेट तँ पालत ने। जँ दसो हजार महीना कमाएब तँ एक बरखे नै दू बरखे, पाँचो बरखे तँ खेत छोड़ाइये लेब।” दायरानी- “तइ बीच?” डोमीकाका- “अहाँकेँ जाबे धरि बरदास हएत ताबे धरि रहब नै तँ भाएकेँ नैहर समाद पठा देबनि।” नैहरक नाओं सुनिते दायरानी बजलीह- “अहाँ सभ जखन चलिए जाएब तखन घरमे कोठिये-भरली लऽ कऽ की करब। मसोमातक चुड़ी जकाँ किअए ने ओकरो सभकेँ फोड़ि-फाड़ि कऽ फेकिये देबइ।” पत्नीक बातकेँ डोमीकाका ताड़ि गेलाह। कहलखिन- “हँसी-ठठा छोड़ू, एहेन गरूगर समए केना टपब, से विचार दिअ। आखिर अहूँ तँ अर्द्धांगिनिये छी किने?” पतिक विचार सुनि विचारवान पत्नी जकाँ दायरानी कहलखिन- “पच्चीस-तीस हजार रूपैये कट्ठाक जमीन अछि। दस-बारह कट्ठा बेचि लेब, भरना छूटि जाएत। बुझबै जे तीन बीघा जोतसीम नै अढ़ाइये बीघा अछि।” अखाढ़क पहिल बरखाक पहिल बुन पड़लासँ जे जमीनक सुगंध निकलैत ओहने सुगंध डोमीकाकाकेँ पत्नीक विचारमे लगलनि। मुस्की दैत आँखि-पर-आँखि गड़ा धन्यवाद देलखिन। पड़ाइन पछुलका बाढ़िमे खेतक फसल तँ धुआइये गेल जे मालो-चाल गामसँ उपटि गेल। अपनो दुनू बड़दो आ महींसो मरि गेल। जहिना जंगलक जानवरकेँ मेघसँ खसैत पाथरक चोट छटपटबैत तहिना ऐ साल आन-आन किसानक संग अपनो भेल। बाधसँ लऽ कऽ घर धरिक दशा सहाज करै जोकर नै रहल। बाढ़ि अबिते खेतक धान डूबि गेल। मोटाइत-मोटाइत पानि अंगना-घरमे सलाढ़ लगि गेल। नारक टाल पानिक बेगमे भसि गेल। भुसकाँर खसि पड़ल जइसँ गहुमक भूसी भसिया गेल। आश्रमक घरक संग-संग मालो घरमे पानि पहुँचि गेल। जहिना लाठीपर लाठी खाइत दशा होइत, तहिना भेल। चढ़िते कातिक अगिला खेतीक लेल सभ सूर-सार करए लगल। मुदा खेतीक तँ प्रमुख अंग बड़द छी। बिना बड़दे खेत जोताएत केना? अपनेटा गामक एहेन दशा नै, परोपट्टाक एक्के रंग दशा। किसानक बीच एक्के रंग समस्या पसरि गेल, जइसँ बचल-खुचल माल-जालक दाममे आगि लगि गेल। बड़दक दाम दोबर-तेबर भऽ गेल। एक तँ भेटैबला नै दोसर पैकार सभ जे बाहरसँ आनि-आनि बेचै ओकरो वएह हवा। अपन इलाका छोड़ि दोसर इलाकासँ बड़द कीनि अनैक विचार भेल। मुदा असगर-दुसगर आननाइयो भारी बूझि पड़ल। गाममे गप्प चलेलौं। एक्के-दुइये आठ-नअो गोटेक विचार भेल। जोड़ा कीननिहार तीन गोटे भेलौं। बाकी छबो गोटे पल्ले-पल्ला कीननिहार। हुनका सबहक विचार जे एकटा बड़दसँ हर नै जोतल जाएत मुदा जोड़ा लगा लेलासँ भजैती नीक रहत। बेजोड़ बड़द रहने एकटाकेँ बेसी भीड़ होइ छै आ एकटाकेँ कम, जइसँ साले भरिमे बड़द टूटि दाम बुरा दइ छै। तेसर दिन नवो गोटे लौकहावाली गाड़ी झंझारपुर हाॅल्टपर पकड़लौं। साढ़े बारह बजे लौकहा स्टेशन उतरि मेन रोड छोड़ि धनबदहेक उत्तर मुहेँ रस्ता पकड़लौं। कखैन सीमा टपलौं से बुझबे ने केलिऐ। एक्के रंग बाध आ बाधक उपजा। नम्हर-नम्हर बाध, खेतमे लहलाहइत धान। दुधाएल धानक सीस जइसँ जहिना धानक गाछक रंग तहिना सीसोक। ऊँचगर-चौड़गर खेतक आड़ि, जइपर फुलाइतो आ छीमियो भेल राहड़ि। टाट जकाँ राहड़िक गाछ खेत सबहक परिचए करबैत। अपन सभ जकाँ चनकी राहड़िक गाछ नै, मझोलका गाछ। खेसारी छिटैत एक गोरेकेँ पुछलिऐ तँ कहलक जे ऐ दिगारमे बेसी पये (पाया) राहड़ि होइ छै। धानोक संग-संग अगहनेमे कटाइ छै। सोहरी लागल घुरछा-घुरछे फड़ल। छीमियो नम्हर। कोला-कोली गिरहस्त खेसारी, मसुरी छिटैत। आड़ि सभपर जेरक-जेर ढेरबासँ सियान धरि घसवहिनी घास छिलैत। उपजा देखि माटि निहारलौं तँ सोलहन्नी खसिआइ माटि (कारी माटि) बूझि पड़ल। माटि देखि मन गद्गद् भऽ गेल। मुदा अपन इलाका मन पड़िते मन तिता गेल। कमला-कोसीपर खाैंझ उठल। दुनू तेहेन हेहर अछि जे इलाकाक माटिकेँ बिगाड़ि देलक। बालु भरि खेतकेँ बलुआह बना देलक। रस्ताक पछबारि भाग एकटा नमगर-चौड़गर परतीपर पचासो महींस चरैत देखि मन खुशी भऽ गेल। चरवाह सभ महींसकेँ अनेर चरैले छोड़ि अपने सभ खेलाइत। खेलो अजगुत ठेंगा-ठेंगा। कनी अटँकि देखए लगलौं। एकटा सीमा (चेन्ह) देने। ओइ सीमापर सँ रागक तर देने उनटि कऽ दुनू हाथे ठेंगा फेकैत। जेकर ठेंगा जते दूर जाए ओ ओते सुरक्षित। जेकर लग रहै ओ हारै। जे हारै ओकरा घुघुआ -पीठ- पर चढ़ि ठेंगा लग तक जाए। फेर दोहरा कऽ खेल शुरू होइ। गोबरबिछनी सेहो बैस कऽ खेल देखैत। कोनो धड़फड़ी रहबे ने करै। तीिनये चारि गोरे रहै, पथियामे कत्ते अँटतै। जहिना एकाधिकार पूँजीपतिक कारोबार निचेनसँ चलैत, कोनो प्रतियोगिता रहबे ने करैत, तहिना पचास महींसक गोबरक बीच तीनू-चारू गोबरबिछनी। मुदा एकटा देखलिऐ जे एक बेर एकटा महींस धानक खेत दिस बढ़ए लगलै तँ एक गोरे माने एकटा ढेरबा गोबरबिछनी उठि कऽ महींस घुमा देलकै। कोसक अन्दाज आगू बढ़लौं तँ हाट लगल देखलिऐ। समैयो चाइरिक करीब भऽ गेल। मनमे भेल जे कोनो ठेकानल जगहपर थोड़े जाइ कऽ अछि जे अबेर हएत। जखन एलौं तँ देखैत-सुनैत जाएब। हाट देखए बढ़लौं। गमैया हाट। कट्ठा डेढ़ेक परतीपर लगल। तीन-चारि पल्लाबला दू-तीनटा अन्न-पानिक दोकानदार, दस-बारहटा तीमन-तरकारीक, एक-एकटा माछ-मासुक दूटा झिल्ली-कचड़ी-मुरहीवाली, एकटा मनिहारा, एकटा माटिक बर्त्तन, एकटा छिट्टा-पथियाक, एकटा चाहक दोकान आ एकटा पान-बीड़ीक। मुदा खरीदारी बढ़ियाँ होइत। अन्दाज केलौं तँ बूझि पड़ल जे जते कीनिनहार अछि ओतबे समानो आ बेचिनिहारो। चाहक दोकानपर बैस चाह दइले दोकानदारकेँ कहलिऐ। चूल्हिक छाउर झाड़ि, डोमौआ बीअनिसँ हौंकि, चूल्हिपर केटली चढ़ौलक। दोकानदारसँ पुछलिऐ- “हाट सभ दिन लगैए?” दोकानदार उत्तर देलक- “ऐ पचकोसीमे चारिटा हाट लगै छै। सोम आ शुक्रकेँ ई हाट लगैए। रवि आ बुधकेँ विस्टौल लगै छै, मंगल आ वरसपतिकेँ चिकना आ शनि-मंगलकेँ परसा।” चाह बनल। सभ िकयो पीब दोकानदारकेँ पाइ दऽ विदा भेलौं। अपने गाम जकाँ गामो, अपना सबहक तँ पोखरि-इनार या तँ बालुमे भथा गेल वा मरने भऽ गेल अछि, ओइ सभमे अखनो अछिये। गोटि-पङरा ईंटाक घर। रस्ता-पेरा कच्चिये। उत्तरे-दछिने गाम सभ। जइसँ आगि-छाइसँ सुरक्षित। जँ कतौ पुरबा-पछबामे आगि लगबो कएल तँ कम घर जरल। जहिना गाम उत्तरे-दछिने तहिना अंगनो सभ। अपने सभ जकाँ लोकोक बगए-बानि आ बोलियो। जइसँ अनभुआर जकाँ बूझिए ने पड़ै। गोसाँइ लुक-झुका गेलाह। जहिना पछबा सबेर-सकाल अपन बोरा-बस्तर समेटि लैत तहिना ने परदेशियोकेँ सबेर-सकाल ठर पकड़ि लेबाक चाही। मनमे उठिते अँटकैक गर लगबए लगलौं। एक गोटेसँ पुछलिऐ- “कोन गाम छी?” “रोहितपुर।” मुदा कोनो निश्चित गाम तँ जेबाके नै छल जे दोहरा कऽ पूछितिऐ। तइ काल एक गोरेकेँ दोसर गोरे सोर पाड़लक- “मधेपुरबला हौ, हौ मधेपुरबला। कनी एम्हर आबह।” मधेपुर सुनि मन चौंकल। मुदा लगले असथिर भऽ गेल। नाम-गामक कोनो ठेकान अछि। एक-एक नामक कतेक लोको आ कतेक गामो हाेइए। मुदा मनमे तैयो घुरियाइते रहि गेल। मधेपुरबलाक घर पुबारि भाग रस्ताकातेमे। घास झाड़िते मधेपुरबला उत्तर देलक- “हाथ लागल अछि, लगले अबै छी।” कहि घास झारब छोड़ि मधेपुरबला उत्तर मुहेँ विदा भेल। लगमे अबिते पुछलिऐ- “कोन मधेपुर रहै छी?” गामक नाआें सुनि बाजल- “अहाँ सभ कतऽ रहै छी?” कहलिऐ- “हमहूँ मधेपुरे रहै छी। तँए पुछलौं।” मधेपुर सुनि ओ चौंक गेल। जेना किछु भेट गेल होइ तहिना। मुस्कुराइत बाजल- “झंझारपुरसँ पूब-दछिनक जे मधेपुर छै, ओही मधेपुर रहै छी।” अपन मधेपुर सुनि हमहूँ हँसैत बजलौं- “हमरो सबहक घर तँ ओही मधेपुर अछि।” हमरा सभकेँ दरबज्जापर बैसबैत बाजल- “लगले अबै छी। ओइ बेचारा ऐठाम पाहुन सभ आओत, डेढ़िया परक टाट लगाओत, आेकरे गर धरौने अबै छी। हमर भाग जे गौआँ-घरूआ सभ एलाह।” अपन भेटैत ठर देखि कहलियनि- “हँ, हँ भेल, आउ। समाजमे सबहक काज सभकेँ होइ छै।” काजक बोझसँ अपनाकेँ लदल देखि चेथरू रस्तेपर सँ सोर पाड़ि पत्नीकेँ कहलक- “लगले अबै छी। ताबे अहाँ एक बाल्टीन पानि आ एकटा लोटा आनि पएर धोयले दियनु।” कहि चेथरू आगू बढ़ल। भरि बाल्टीन पानि आ एकटा लोटा नेने चमेली दरबज्जापर आबि पुछलखिन- “बौआ, अहाँ सबहक घर कतऽ अछि?” कहलियनि- “मधेपुर।” जहिना अनचोकमे देहपर खढ़ो गिरिते लोक चौंक जाइत अछि तहिना मधेपुर सुनि चमेली चौंक गेलीह। अाधा मुँह झपैत बजलीह- “ऑक्सी महादेव मंदिरसँ थोड़बे हटि कऽ हमरो नैहर अछि।” चमेलीक बात सुिन दूबिक मुँहसँ छोड़ैत नव पत्ती (पात) जकाँ हृदैमे भेल। अपन तीस बर्ख पहिलुका जिनगीमे ओ -चमेली- डूबि गेलीह। मुँह शिथिल भऽ गेलनि, जइसँ किछु आगूक बकार नै निकललनि। मुदा दरबज्जापर आएल अतिथिक लेल घरवारीक रहब अनिवार्य बूझि खूँटा जकाँ ठाढ़ रहली। बेरा-बेरी हमहूँ सभ पएर धोय-धोय चौकीपर बैसए लगलौं। जहिना देवालयमे दर्शकक नजरि एकाएकी मुरती सभपर पड़ैत तहिना चमेलीक आँखि हमरा सभपर नाचए लगलनि। घुमि कऽ अबिते चेथरू पत्नीकेँ कहलखिन- “जलखइ नेने आउ। रस्ताक झमाड़ल सभ छथि। भूख लगल हेतनि।” हमहूँ सभ बेरा-बेरी कुरड़ा कऽ बैसलौं। चंगेरा भरि मुरही, नोन-मिरचाइ आंगनसँ आनि चमेली बीचमे रखि देलनि। जलखइ देखि चेथरू बजलाह- “अहाँ सभ जाबे जलखइ करब ताबे छिड़ियेलहा काज सभ समेटि लइ छी।” कहि एकटा छिट्टा आ हँसुआ नेने बाड़ी दिस चेथरू आ आंगन दिस चमेली बढ़लीह। कातिक मास रंग-बिरंगक तरकारीसँ सजल चौमास। बिना तजबीज केनहि चेथरू आठो-नवो रंगक तरकारीक छिट्टा आंगनमे रखि, लगमे आबि बैसलाह। बैसिते कहलियनि- “अपन इलाकाक जेहना खेती-पथारी उपटि गेल तहिना मालो-जाल। मुदा बिना बड़दे खेती केना करितौं। तँए एलौं। सुनै छी जे ऐ इलाकाक लोक अपना इलाकाबलाकेँ कहै छथि जे अपन कमाएल रुपैया लऽ कऽ एलौं आकि बाप-दादाक, से ठीके छिऐ?” हमर बात सुनि चेथरू तरे-तर हँसए लगलाह। मुदा अपनाकेँ दुनू ठामक पाबि कनी काल गुम रहि बजलाह- “खिस्सा-पिहानी अहिना लोक जोड़ती-जोड़ि बना लइए। एहनो-एहनो बात हुअए। कोनो धरती कर्मभूमिसँ धर्मभूमि बनैत अछि। देखै छी जे गामोमे दिल्ली-बम्बइसँ घुमि कऽ आएल कनियाँ सभ अतिथि-अभ्यागतकेँ ओतुक्के चालि-ढालिसँ स्वागत करै छथि तँ एहनो सभ छथि जे केरल-मद्रासमे रहितो गाम-घर जकाँ स्वागत करै छथि। हम-अहाँ भैयारी भेलौं। तँए भैयारी जकाँ दुख-धंधाक गप-सप्प करू।” चेथरूक विचारसँ मन खनहन भऽ गेल। हृदए बाजि उठल जे सहारा भेटल। अखन तँ धान फुटबे कएल, जखन पाकत तँ बीओ-बािल लऽ जाएब। ऐठामक बड़दो अपना ऐठामक बड़दसँ सक्कतो होइ छै आ बेसी दिन जीबो करै छै। अपना ऐठामक माल गदियाह भऽ गेल। ऐठाम ठनक जमीनक माल निरोग अछि। चुप्पा-चुप्पी देखि पुछलियनि- “अहाँ केना ऐठाम आबि गेलौं?” हमर बात सुिन चेथरूक मन पसीझि गेलनि। गपकेँ आगू नै बढ़ा बजलाह- “भानसो भऽ गेल हएत। अहँू सभ थाकल छी। जखन बड़द कीनए एलौं तँ हेबे करत। कोनो की अनतऽ एलौं। अपन घर छी। पाँच दिनमे इलक्को घुमा कऽ देखा देब। मन मोताबिक बड़दो कीनि देब।” चेथरूक बात सुनि हुँहकारी भरैत बजलौं- “हँ, हँ, से तँ ठीके। देस-कोस ने बदलैए, मनुक्ख तँ मनुक्खे रहैए कि ने।” खेला-पीला बाद संगी सभ नीनसँ सुति रहलाह। मुदा अपना नीने ने हुअए। अाधा घंटा बाद चेथरू खा-पी, मालक घरक घूर सरिया, खाइले दऽ बड़का बाटीमे शुद्ध तोड़ीक तेल नेने आबि बजलाह- “सुति रहलौं।” आरो गोटेक साँसे कहैत जे सुतल छी। बजलौं- “नै, जगले छी।” हमरा लग आबि चेथरू तेलक बाटी बढ़बैत कहलनि- “थाकल-ठहिआएल छी, पएरमे तेल औंसि लिअ।” दहिना हाथ तेलमे डुबा बजलौं- “भऽ गेल। एकरे मिला लइ छी। रखि दियौ।” एकेठाम बैस दुनू गोरे गप-सप्प शुरू केलौं। पुछलियनि- “ऐठाम एना कत्ते दिन भेल?” कनी काल चुप रहि चेथरू बजलाह- “जहिना बिनु पढ़ल-लिखल परिवारक (टिप्पणि दुआरे) बेटा-बेटी जनमोक ठेकान नै रहैत तहिना हमहूँ छी। अंदाज पच्चीस बर्खसँ उपरे भेल हएत?” “ऐठाम बेसी नीक लगैए आकि ओइठीन (मधेपुर)?” “प्रश्न सुनि चुप भऽ गेला। जहिना दुबट्टी-तिनबट्टीपर पहुँचि अपन रस्ता लोक हियाबए लगैत तहिना चेथरूओ हियाबए लगला। उठि कऽ तमाकू थुकड़ि आबि बैस बाजए लगलाह- “जतऽ बसी वएह सुन्दर। भने अखन दुइये भाँइ जागल छी। अपन गाम मन पड़ैए तँ छाती दहलि जाइए। बाबाक रोपल गाछी भुताहि भऽ गेल। बाबाक कहल सभ बात तँ मन नै अछि मुदा गोटे-गोटे मन अछि। कहने छलाह जे केना अपन गाम बसल आ अखन धरि केना परिवार चलैत रहल। दैवी चक्र एहेन चलल जे बिगड़ैत-बिगड़ैत एते बिगड़ि गेल जे वास होइ जोकर नै रहल।” कहैत-कहैत हिचुकी उठए लगलनि। गरा बझए लगलनि। चुप होइत देखि पुछलियनि- “से की? से की?” आंगुरसँ अपन मौसाक घर दिस देखबैत बजलाह- “हमरा अबैसँ पहिने ऐठाम मौसा एला।” मौसाक नाओं सुनि पुछलियनि- “ओ किअए एला?” चेथरू- “आब तँ अपने नै छथि बेटा छन्हि। वएह ऐठामक गाम-परधान छी। ओकरा दुआरपर पाँचटा धरम बखारी (धान रखैबला) छै। सौंसे गौआँ बेर-बेगरता लए धान जमा केलक। साले-साले बढ़बैत गेल। अखन तते जमा भऽ गेल अछि जे जेकरा (गामक लोककेँ) जते बेगरता होइ छै ओ ओते लइए आ पीठक-पीठ आपस करैए।” मुँहसँ निकलि गेल- “वाह! अच्छा, ओ किअए एला?” चेथरू- “मौसाकेँ अनटोटल गप आ अन्ट-सन्ट काज पसिन्न नै छलनि। सोभावे ओहने छलनि। जेकरा चलैत चारि-पाँच बेर गौआँ सभ मारलकनि। अंतिम मािरमे बेसी चोट लगलनि। मन टूटि गेलनि। जहिना एक घटनासँ कियो बैरागी बनि जाइत तँ कियो अपराधी, कियो निरमोही बनि घर-परिवार छोड़ि दैत तँ कियो सिंह सदृश गर्जन करैत रहैत अछि। तहिना गामक मोह छोड़ि खेत-पथार बेचि चलि एला।” “अहाँकेँ की भेल?” “कोनो एक्के गाम ओहन अछि। हमर गाम तँ आरो बेसी बिगड़ि गेल। एक दिस महाजनक अतियाचार तँ दोसर दिस खेत-पथारक बेइमानी-शैतानी। बलजोरी अपन नम्हर खेतमे छोटका खेतक आड़ि तोड़ि जोइत लैत। तहिना चोराइयो आ देखाइयो कऽ खेतक जजात गाए-महींससँ चरा लैत। आम तोड़ि लैत, दोसराक माए-बहिनक इज्जत-आबरूपर हाथ बढ़बैत तँ आगि-पानि ढाठि भगैक लेल उड़ी-बिड़ी लगबैत। सिन्ह काटि-काटि घरक वस्तु-जात लऽ भगैत तँ बिना किछु बजनौ दसटा बात-कथा कहि दैत।” चेथरूक बात सुनि, जहिना भूम्हुर आगिक धुआँ निकलैत अछि तहिना लहरल हृदैक गर्म साँस निकलल। पुछलियनि- “शुरूमे (एलापर) तँ बड़ दिक्कत भेल हएत?” “नै। अपना तीन कट्ठा खेत रहए। दू सए रूपैये कट्ठा बेच लेलौं। घरो बेच लेलौं। खाली अपन देहक कपड़ा आ रुपैया लऽ कऽ मौसे ऐठाम एलौं। वएह दस कट्ठा खेतो कीनि देलनि, एकटा घरो बना देलनि आ कहलनि जे जइ चीजक बेगरता हुअ, से लिहह। घरक बिचला खूँटा जकाँ ठाढ़ भऽ गेला। आब तँ अपने सभ किछु भऽ गेल। जाबे सासु-ससुर जीबै छलाह ताबे सासुर जाइ छलौं, मामा-मामी धरि मात्रिक। बहिन-बहनोइ ऐठाम जाइते छी। ओहो सभ अबिते अछि।” चेथरूक बात सुनि मन औनाए लगल। कछ-मछी आबि गेल। कहलियनि- “नीनसँ देह भसिआइए। बड़ राित भऽ गेल। अहूँ सुतैले जाउ।” “एतै ने हमहूँ सूतब।” पाँच दिन मेहमानी केलौं। छठम दिन बड़द नेने गामक रस्ता धेलौं। न्याय चाही झुनाएल धान जकाँ पचासी बर्खक शंभु काकाकेँ ओछाइन छौड़ैसँ पहिनहि मनमे उठलनि जे आब तँ चल-चलाैए छी से नै तँ जिनगीक अपन हिसाब-किताब दइये दिअनि, सएह नीक। नै तँ शासनक कोन बिसवास केकरो दोख गारा मढ़ि सजा केकरो भेटै छै। मुदा सोझाँमे एते तँ जरूर हएत जे अपन बात अपने रखि सकै छी। तइपर जँ नै मानत तँ हमहूँ नै मानबै। लड़ि मरी कि सड़ि, शेषे कि बचल अछि। जहिना नमहर काजमे समयो अधिक लगैत अछि आ छोट काजमे थोर मुदा काज तँ दुनू कहबैत अछि। कियो काहू मगन कियो काहू मगन, मगन तँ सभ अछिये। गंभीर प्रश्नमे ओझराएल शंभु काका, तँए मन-चित्त-देह एकबट्ट भेल रहनि। पत्नी कुमुदनीक मनमे उठलनि जे भरिसक सूतले तँ ने रहि जेताह। लगमे पहुँचि छाती डोलबैत बजलीह- “अखन धरि किअए बिछान पकड़ने छी?” पत्नीक स्वरलहरीमे लहराइत शंभु काका हलसि बजलाह- “अखन धरि यएह बुझै छलौं जे अपने केलहाक भागी कियो बनैए, मुदा....?” बजैत शंभु काका ओछाइनपरसँ उठि जहिना उगैत सूर्जक दर्शन लोक दुनू हाथ जोड़ि प्रणाम करैत करैए, तहिना दुनू हाथ जोड़ि पत्नी-कुमुदनीक आगूमे ठाढ़ होइत बजलाह- “माफी मंगै छी। गल्ती भेल अछि मुदा दोसराक गल्ती ऊपर मढ़ल गेल अछि।” अकचकाइत कुमुदनी, बिनु किछु सोचनहि बाजि उठलीह- “से की, से की, एना किअए भोरे-भोर पाप चढ़बै छी।” “पाप नै चढ़बै छी जिनगीक जे घटल-घटना अछि, तइ निमित्ते मांगि रहल छी।” “जखन एते कहबे केलौं तखन किअए ने मनो पाड़ि देब। अहाँ तँ बुझिते छिऐ जे बसिया भात खेनिहारि बिसराह होइए मुदा रतुका उगड़ल अन्न फेकि देब नीक हएत।” पतालसँ अबैत बलुआएल पानि जहिना छन-छनाइत पवित्र भऽ अबैत अछि तहिना कुमुदनीक विचार सुनि प्रोफेसर शंभु काकाकेँ भेलनि, बजलाह- “अपना दुनू गोटेक एक जिनगी ऐ धरतीपर रहल अछि। आकि नै?” “हँ से तँ रहले अछि। तँए ने अर्द्धांगिनी छी।” “हमर देहक अर्द्धांगिनी छी आकि जिनगीक?” “ई बात अहाँ बुझेलौं कहिया जे पुछै छी।” पत्नीक प्रश्न सुनि प्रोफेसर शंभु काका सकदम भऽ गेलाह। मुदा लगले मनमे उठलनि जे टटको घटना बसिया जाइ छै आ बसियो घटना टटका भऽ जाइ छै। ई िनर्भर करैए कारीगरपर। जेहेन कारीगर रहत तेहेन टटकाकेँ बसिया आ बसियाकेँ टटका बनबैत रहत। खएर जे होउ। पत्नीकेँ पुछलखिन- “अपना दुनू गोटे एकठाम केना भेलिऐ?” “एना अरथा-अरथा किअए पुछै छी। जे कहैक अछि से सोझ डारिये कहू। एना जे हरसीकार दीरघीकार लगा-लगा बजै छी से नै बाजू। जेकरा नीक बुझबै तेकरा नीक कहब आ जेकरा अधला बुझबै तेकरा अधला कहब। अहाँ लग जे कनी दबो-उनार भऽ जाएत तँ हारि मानि लेब। सएह ने हएत आकि छाउर-गोबर जकाँ छिट्टामे उठा बाध दऽ आएब।” जहिना पोखरिक पवित्र जलमे स्नान कऽ पूजाक मूर्ति गढ़ि मंत्र पढ़ैत दान कएल जाइत तहिना शंभु काका बड़बड़ाए लगलाह- “जखन हम चौबीस बर्खक रही तखन अहाँ चौदह बर्खक छलौं। दस बर्खक अन्तर। आइ धरि कहाँ कतौ देखि पेलौं जे पुरुष-नारीक बीच उमरोक विभाजन भेल। जँ से नै तँ....? जँ एको औरूदे दुनू गोटे जीब तैयो तँ अहाँ दस बर्ख विधबे बनि रहब। ऐ विधवाक सर्जक के? समाजमे कलंकक मोटरी देनिहार के? की ई बात झूठ जे जइ घरमे जते कम वस्तु रहै छै आगि लगलापर ओतबे कम जरै छै मुदा जइ घरमे अधिक वस्तु रहै छै, आगि लगलापर जरबो बेसी करै छै। पचास बर्खक तपल-तपाएल जिनगीक अन्त केना हएत।” दुनू हाथ जोड़ि पत्नीसँ माफी मंगलनि। मुदा जहिना बच्चाकेँ नव दाँत रहने अधिक-सँ-अधिक काज लिअए चाहैत, नव औजार हाथमे एने अधिक-सँ-अधिक काजो आ अधिक-सँ-अधिक समेओ संग मिलि बितबए चाहैत तहिना कुमुदनीक सिनेह आरो जगलनि। बजलीह- “माफी-ताफी नइ मानब? पति छी तँए पुछै छी। एहन गल्ती भेल किअए, से जाबे नै कहब ताबे किछु ने मानब।” पत्नीक प्रश्न सुनि शंभु काका स्तब्ध भऽ गेलाह। मन कछमछाए लगलनि। सत् बड़ कटु होइत अछि। मुदा जँ पत्नियो लग सत्यक उद्घाटन नै कऽ सकब तँ दुनियाँमे दोसर ठाम कइये कतए सकै छी। शम्भुकाका साँप-छुछुनरिक स्थितिमे पड़ि गेलाह। एहेन कोनो विचार मनमे उठबे ने करनि जइसँ मन मानि लइतनि जे ऐसँ पत्नी मानि जेतीह। अल्ल-बल्ल किछु बच्चाकेँ कहल जाइ दै, एक तँ सियान कि सियानोक अगिला खाढ़ीमे पहुँचल छथि, दोसर अर्द्धांगिनी सेहो छथि। कोनो विचारकेँ बलजोरी थोपि नै सकै छियनि, जँ थोपियो देबनि तँ मानिये लेतीह सेहो नै कहल जा सकैए। जेत्ते दबाब दऽ कऽ बजबाक अधिकार हमरा अछि तत्ते तँ हुनको छन्हिये। जँ किछु नै कहबनि तखन तँ आरो स्थिति बिगड़ि जाएत। जहिना हुनका मनमे गंेठी जकाँ जन्मगाँठ पड़ि जेतनि तहिना तँ अपनो मन नहिये बचत। जँ से नै बचत तँ आँखि उठा देखि केना पेबनि। जँ से नै देखि पाएब तँ पति कथीक। िसर्फ रंगे-रभस टा तँ पत्नीक संबंध नै छी। जँ ओतबे मानि बुझबनि तँ पति-पत्नीक संबंध बुझब थोड़े हएत। पति-पत्नीक संबंध तँ ओ छी, जहिना जनकक एक हाथ हवन-कुंडमे आ दोसर पत्नीक करेजपर रहैत छलनि, मुदा जहिना नव जीवनक दिशा विपत्तिक अंतिम अवस्थामे भेटैत अछि तहिना शंभुओ काकाकेँ भेटलनि। थालमे गड़ल मोती जहिना जहुरी हाथमे देखिते नयन कमलनयन बनि जाइत तहिना कक्कोक नजरिकेँ भेलनि। मन मुस्किएलनि। पतिक मुस्की देखि कुमुदनी मने-मन नमन केलकनि। जिज्ञासु छात्र जकाँ पत्नीक जिज्ञासु नजरिकेँ देखि प्रो. शंभु कहलखिन- “देखू, प्रश्न एकेटा नै घनेरो अछि, जँ एक-एक प्रश्नक उत्तरो दिअए लगब तँ प्रश्ने छूटि जाएत। जँ प्रश्ने छूटि जाएत तखन उत्तरे केना देब। किछु नै, बुढ़िया फूसि।” पतिक विचार सुनि कुमुदनी अधखिल्लू कुमुदनी जकाँ जइ अवस्थामे भौंरा फरिच्छ तँ देखैत, मुदा अधखिल्लू कपाटसँ निकलि नै पबैत तहिना कुमुदिनी असमंजसमे पड़ि गेलीह। पत्नीकेँ असमंजसमे पड़ैत देरी प्रो. शंभुक मनमे उठलनि जे जहिना माटिक ढेपा, गोला, चेका जोड़ि-जोड़ि पैघसँ पैघ बान्ह बान्हल जाइए तहिना जँ बान्हि दिअनि तँ जरूर ठमकि जेतीह। मुदा मन नै मानलकनि। पत्नीक बातमे तँ अखन धरि ओझराएल रहलौं। जरूर माए-बापक काज मानल जाएत। मुदा कि हमरे टा परिवारमे एना भेल आकि दोसरो-तेसरो परिवारमे? जँ एक समाज नै, एक गाम नै अनेक समाज आ अनेक गाममे होइत अछि तँ जरूर दोषक जड़ि कतौ अन्तै छै। अन्तए कतए छै से कहि देबनि, मानती तँ मानती नै आगू कहबनि नेति-नेति। जहिना उगैत गुज्जर, उगैत कलशकेँ कहैत जे दुनू गोटे संगे-संग रहि दुनियाँ देखब। तहिना प्रो. शंभु कहलखिन- “सुनू, सभ बात सबहक नजरिपर सदिखन नै रहै छै, भऽ सकैए जे जे बात दस-बीस बर्ख पहिने कहि देबाक चाहै छल, से नै कहलौं। अपनो धियानमे नै रहल। जहिना असगरे धान तौलिनिहार गनि-गनि तौलबो करत आ उठि-उठि लिखबो करत तँ गिनती-गिनतीमे झगड़ा हेबे करैत, जे जोरगर रहैत ओ मन रहैत जे अब्बल रहैत ओ हरा जाइत। तहिना ने अपनो दुनू गोटेक बीच अछि।” “दुनू गोटे” सुनि कुमुदनी कछमछेलीह। पाछू उनटि-उनटि देखए लगली। प्रो. शंभु बूझि गेलाह जे शिकारीक वाण सटीक बैसल। जहिना बाल-बोधक उनटा-पुनटा काज देख सियानकेँ हँसी-लगैत तहिना प्रोफेसर शंभुकेँ हँसी लगलनि। मुदा लगले मनमे उठलनि जे अपनो पछिला कएल काज मन पड़ने तँ से होइए। एकाएक मुँह बन्न भऽ गेलनि। आने-आन पुरुख जकाँ अपन पुरुषत्व देखबैत प्रो. शंभु बजलाह- “आइ धरि, अखन धरि कहियो हमरा मुँहसँ फुटल जे हम न्यायालयसँ दण्डित भेल जिनगी जीब रहल छी। कियो एको दिन पुछाड़ियो करए आएल जे केना जीबै छी। समाजमे जाधरि बूढ़-बुढ़ानुसक पूछ नै हएत, ताधरि समाजक पछिला पीढ़ी नांगरि पकड़ि वैतरणी पार केना हएत? हँ ई जरूर जे साँपकेँ डोरी नै कही, मुदा विचार तँ हेबाके चाही।” घरमे चौंकल बर्तनक ढनमनी जकाँ कुमुदनी ढनमनाइत बजलीह- “जखन अहाँ दुनियाँक नजरिमे दण्डित छी तखन....?” पत्नीक चिन्तासँ चिन्तित भऽ प्रो. शंभु कहलखिन- “अखन धरि तँ छिपेने रहलौं जे अपन दोख अहाँकेँ किअए दी।” पतिक बेथासँ बेथित भऽ कुमुदनी बजलीह- “कनी फरिछा कऽ कहू?” प्रो. शंभु- “सेवा-िनवृत्त होइसँ छह मास पहिने प्रिंसिपल बनाओल गेलौं। कॉलेजक भार बढ़ल। परीक्षा विभाग सेहो छै। सुननहि हेबै जे कते हो-हल्ला भेल। मामला न्यायालय चलि गेल। गोल-माल जरूर भेल रहए, जानकारीमे नै रहए। मुदा तैयो जबाबदेहक रूपमे फँसलौं।” कुमुदनी- “अहाँक किछु दोष नै रहए?” प्रो. शंभु- “एकदम नै।” कुमुदनी- “फैसला केना भेल?” प्रो. शंभु- “सेवा िनवृत्त लग देखि न्यायालय दोषी बना छोड़ि देलक।” कुमुदनी- “हुनका सभकेँ?” प्रो. शंभु- “कमो दोखबला बेसी सजा पौलक आ बेसियो दोखबला कम सजा पौलक।” कुमुदनी- “एना किअए भेल?” प्रो. शंभु- “जँ पहिने बुझितौं तँ ऐ भीड़ जेबो ने करितौं मुदा से नै भेल। जाधरि लिखित-मौखिक रूपमे बेवस्था चलत ताधरि एहिना हएत।” कर्ज जमीन निलामीक नोटिश पाबि बरीसलालक सभ आशा ओहिना झड़ए लगल जहिना वसन्तसँ पूर्व गाछक पतझर होइत वा फलसँ पहिने फूल झड़ए लगैत अछि। हलसैत जिनगीक आशा देखि बरीसलाल खेती लेल, बैंकसँ कर्ज लऽ बोरिंग-दमकल करौलक। मुदा समैपर कर्ज अदा नै कए पाबि, जइले कर्ज लेलक सएह हाथसँ निकलैत देखि सोगसँ सोगाएल अखड़े चौकीपर पेटकान दऽ मने-मन सोचैत जे की करैत की भेल। साओनक मेघ जकाँ दुनू आँखि नोरसँ ढबढबाएल। बीसम शताब्दीक आठम दशकमे हरित-क्रान्तिक हवा घुसकैत-घुसकैत गाम धरि पहुँचल। नव हवाक सुगंध नाके-नाक खेत-खरिहानमे पहुँचल। गामक किसानक सीमांकन शुरू भेल। ओना सीमांकन नाम-मात्रेक भेल मुदा भेल तँ। नाम-मात्र एे लेल जे सैद्धान्तिक रूपमे तँ सीमांकनक रूप रेखा तैयार भेल मुदा जमीनक ओझरी कँटहा बाँस जकाँ ओझराएल। कड़चीसँ बेसी काँट। एक-एक कड़चीमे सइयो काँट। सोरगर-मोटगर पाकल देखि भलहिं आरीसँ जड़ि काटि दियौ मुदा झोझसँ निकालब तँ असान नै। जइसँ बेवहारिक पक्ष कमजोर पड़ल। चारि श्रेणीक अन्तर्गत किसानकेँ राखल गेलनि। ढाइ एकड़सँ निच्चा एक श्रेणी, चारि एकड़सँ निच्चा दोसर श्रेणी, दससँ निच्चा तेसर आ तइसँ ऊपर चारिम। निचला किसानक लेल सरकारी खजाना खुजल। रंग-रंगक प्रोत्साहनक घोषणा भेल। सरकारी घोषणा तँए सभ लेल भेल। मुदा बैंकक माध्यमसँ भेटत। जइ माध्यमसँ भेटत सएह नगण्य। एक दिस फौज जकाँ किसान दोसर दिस जइठामसँ भेटत, सएह नै। मुदा तैयो गोटि पंगरा तँ छलैहे। सरकारी सुविधा सब्सिडीक रूपमे भेटत। तेकर कार्यालय भिन्न बनल। किसानक बीच प्रोत्साहनक घोषणासँ नव जागरणक संचार भेल। गाम-गाममे भी.एल.डब्लूक माध्यमसँ काजक सूत्र तैयार भेल। आने किसान जकाँ पाँचम किसान बरिसालोक डेग बढ़ल। एक-तिहाइ सब्सिडी सुनि केना ने बढ़ैत। जखने किसानक हाथ पानि आैत तखने चौमसिया खेती बारहमसिया बनि जाएत। जखने बारहमसिया बनत तखने ने किसान डारि-डारि झूला लगा बारहमासा गाओत। नै तँ छह मासे, चौमासे ने गाओत। जे चौमास किसानक बखारी छी, तेहीमे ने भाँग-धुथुर उपजैए। वस्तुगत काज तँ नै मुदा चौरीसँ चौमास धरिक, चारि गुणा उपजाक नक्शा तँ किसानक मनमे बनबे कएल। बीघा-एकड़क हिसाब भलहिं अखनो धरि नै फड़िआएल मुदा एकड़-हेक्टेयर तँ आबिये गेल। किछु एनए किछु ओनए कऽ किसान हिसाब तँ बैसाइये लेलक। अखन धरिक जे छोट आ मध्यम किसान महाजनीक कर्जमे डूबल छल ओइमे पूँजीपतिक प्रवेशक दुआर खुजल। कम सूदिक बात तँ आएल मुदा छह मास पछाति सूद मूड़ बनि जाइत से एबे ने कएल। अखन धरि सूदिक-सूदि प्रथा नै छल से आएल। भलहिं कतौ महाजन सप्पत खा केकरो घराड़ी लऽ लेने होइ आकि कतौ सप्पत खा कर्जा डूमल होइ, ई अलग बात। आजुक दहेज ओते भारी नै छल जते माए-बापक सराध। ओना दहेजोक जड़ि मजगूत बनि रहल छल, किए तँ शहरक आमदनी गाम दिस आबए लगल छल। गाममे छोट-सीमान्त-मध्यम-पैघ लगा किसानोक संख्या बेसी मुदा बोनिहारक संख्यासँ कम अछि। ओना सभ गामक रूपो-रेखा एक रंग नहिये अछि। कोनो गाम एहेन जइमे पाँच प्रतिशतसँ कम जनसंख्या नवे-पनचानबे प्रतिशत जमीन पकड़ने, तँ कोनो गाम एहेन जइमे दस पनरह-प्रतिशतक अंतर। एहनो किसान जिनका अपन जमीनक अता-पता नै बूझल तँ एहनो किसान जे अपने सबतूर मिलि खेती करैत। तइ संग एहनो जे खेतक आड़िपर पहुँचि जूति-भाँति तँ लगबैत मुदा अपने हाथे किछु नै करैत। गाछी-खरहोरि, बँसबाड़ि, घराड़ी लगा बरीसलालकेँ पाँच बीघा जमीन। दू बीघा बेख-बुनियादिमे फँसल बाकी तीन बीघा जोतसीम। एकटा बड़द रखने। सफटैती कऽ खेती करैत। ओहू तीन बीघा जोतसीम जमीनमे तीन मेल। पनरह कट्ठा चौरीमे मलगुजारीक संग लगतो साले-साल डुमैत। मुदा छोड़ियो केना देत, आखिर खेत तँ खेत छी। रौदी भेने ओहीमे ने उपजा होइ छै। बाकी सवा दू बीघा मध्यमसँ भीठ धरि। दसो कट्ठा भीठमे मरूआ, भदै-गदैरक संग कुरथी-तेबखा होइत। गहुमक खेती तँ आबि गेल मुदा खेतीक लेल पानि चाही। पटबैक साधन पोखरि, जइसँ करीनसँ किछु अगल-बगलक खेती होइत। लोकक बीच ने पढ़बै-लिखबैक जिज्ञासा रहै आ ने सुविधा। गनल-गूथल विद्यालय-महाविद्यालय। बरीसलालो दुनू बेटाकेँ गामक स्कूल धरि पढ़ा खेतिएक काजमे लगौने। मिथिलाक किसान खेतक ओहन प्रेमी बनल रहला जेहन पतिव्रता नारी जे बाल विधवा होइतो प्रतिष्ठाकेँ कमलक माला बना गरदनिमे लटका हँसि रहली अछि तहिना किसानो। जँ से नै रहल छथि तँ भागि-पड़ा अर्थशास्त्री बनि किअए अपन खेत-पथारकेँ सम्पति नै बूझि प्रतिष्ठाक वस्तु बूझि रहल छथि। की ओहिना खेतीकेँ उत्तम आ नोकरीकेँ मध्यमक विचार देलनि। जँ एकरा मुहावरा-कहाबी बना देखब तँ मिथिलाक चिन्तनधारा धरि नै पहुँचि पाएब। जइठाम खेतकेँ अपन अधिकारक वस्तु बूझि अपना हाथक हथिहार बना अपन स्वतंत्रताकेँ अक्षुण्ण रखैक विचार सेहो देलनि। ई तँ अपन-अपन विचार होइ छै जे कियो हथियारकेँ बम-बारूद बुझैत तँ कियो हाथक यार माने प्रेमी बूझि विचारक बाट बनबैक विचार व्यक्त करैत अछि। तहिना अस्त्र–शस्त्र सेहो अछि। मध्यम किसान वा लघु किसानक जीबैक जिनगी ब्लौटिंग पेपर सदृश बनि गेल छन्हि जेकरामे लालो रोशनाइ सोंखैक शक्ति छै आ करियो रोशनाइक। बाढ़ि-रौदी एकैसम शताब्दीक ऊपज नै अदौसँ रहल अछि। भलहिं कहि सकै छी जे धार-धूड़क बान्ह-छान्ह दुआरे हुअए लगल अछि, भऽ सकै छै कतौ होइत हेतै, मुदा प्रश्न धारेक पानिक नै अछि। तहिना रौदियो रहल अछि। धारोक कटनी-खोंटनी कम नै अछि। मिथिलांचलकेँ कोसी-कमला तेखार कऽ दुब्बरसँ धोधिगर धरि अछि। पानिक एक साधन भेल, दोसर बरखा भेल। ओहन-ओहन बरखा होइत रहल अछि जे पनरह दिन हथियाक बरखाक ओरियान कऽ कऽ पूर्वज रखैत छलाह। हथिया मात्र एक नै जेकरा बरखा ऋृतुक अंतिम नक्षत्र कहि टारि देब। ओना पानिक कोनो ठेकान नै, माघोमे पाथर खसि उपजल उपजाकेँ नाश करैत रहल अछि। अंतिमक जन्म ताधरि नै होइत जाधरि आदि नै होइत, बरखा ऋृतुक आदि आद्रा छी। तँए “आदि आद्रा अंत हस्त” ई भेल बरखाक आँट-पेट। पूर्वज सभ स्पष्ट विचार देने छथि जे बरखाक कोनो बिसवास नै, कते हएत। १९७१ ई.मे बंगला देशक लड़ाइक लगभग सालो भरि बरखा होइते रहल, ओहन-ओहन बरखा होइत रहल अछि जइमे सएक-सए घर खसैत रहल अछि। घरमे दबल बाल-वृद्ध, धन-सम्पति नष्ट होइत रहल अछि मुदा तैयो ब्लौटिंग पेपर जकाँ सोखि किअए जीबैक बाट धेने आबि रहल अछि। दुनियाँमे ने सााधकक कमी आ ने साधना भूमिक, मुदा मिथिलांचल श्रेष्ठ किअए? कतौक जाड़क साधना तँ कतौक तापक तप, जइमे तपि तपस्या करैत, तँ कतौ पानिक सौभरी ऋृषि बनि करैत। मुदा मिथिलांचल साधनााक फुलवाड़ी लगा रखने अछि। ओइ फुलवारीक फूल सजबै छलीह सीता। ने मिथिलाक भूमि बदलल, आ ने बदलल ऋृतु ऋृतुराज, बदलि रहल अछि खाली बोतलक रस। घरक समस्या कहाँ? समस्या तँ तखन उठैत जखन रहैक घरसँ घर भाड़ा असुलैक िवचार जगैत। गाछक निच्चा सात-हाथ नौ हाथक घरमे जीवन-यापन कऽ वेद-पुराण सिरजलनि। की दुनियाँ देखिनिहार मििथलांचल छोड़ि देखि रहला अछि, जँ से नै तँ समस्याकेँ कोन रूपे देखलनि। यएह ने सरकारी योजना जहिना कागजपर औषधालय बना साले-साल मरम्मतक नामपर योजना लुटाइत रहैत आ पान सालक बाद माटिपर खसा मलबा हटबैक खर्च होइत। खेतसँ उपजल खढ़, बाँस साबेक घर बना समस्याक समाधान करैत छलाह। ओ सभ अपन विचारकेँ स्वतंत्र रखि स्वतंत्र जीवन व्यतीत करैत छलाह। पढ़ै-लिखैक ओते समस्या नै, जेहन जिनगी रहत ततबे बुइधिक ने जरूरत। बेसी भेलासँ तँ लोक छड़पि-छड़पि अनको गाछक आम तोड़ए लगैत अछि। भलहिं अपन पूर्वजक घराड़ीपर नढ़िया किअए ने भुकए, मुदा दुनियाँकेँ मातृभूमि कहि सेवारत रहैत छी। ओही रूपक फूसघर बना जिनगीक गारंटी केने छलाह। अखुनका जकाँ नै जे एक दिस लग्गी लगा भाँटा तोड़ैक बाट धेने छी आ दोसर दिस हजार-दस हजार जीबैबला ऋषि-मुनिक दुहाइ दै छी। एकैसम सदीमे कियो अपनाकेँ अगिला पीढिक नजरिक पुतली बना रहल छी। जहिना बरखा, तहिना जाड़ तहिना रौद-ताप, बाल जीवनसँ लऽ कऽ वृद्ध तकक अनुभव कऽ अपन जिनगीकेँ असथिर बना नीक-नीक उमेर पबैत रहला अछि। प्रश्न उठैत जे की एहेन विचार मरि गेल आकि जीवित अछि? ने मरल आ ने स्वस्थ भऽ जीवित अछि। गाम-समाजमे लटपटाइत जीवित जरूर अछि मुदा.....। जीवित ऐ रूपे अछि जे अखनो खेतीकेँ उत्तम मानल जाइत अछि। कृषि जिनगीकेँ थाहि चलबैत अछि। तहूमे सामाजिक स्तरपर तँ आरो थाहल अछि। जँ जिनगीमे दोसराक जरूरत नै हुअए तँ ऐ सँ नीक जीवन ककरा कहबै। आजुक हवा भलहिं जते जोर मारए मुदा हवा असथिर वस्तुकेँ कहाँ किछु बिगाड़ि पबैत अछि। अनभुआर धारमे ने नमहर-नमहर जलचरक भय रहै छै किए तँ घुमैत धारमे जे गहींर-गहींर मोइन खुना जाइ छै तइमे ने डुमैक डर, जँ से नै तँ डुमैक डर कतए। तहिना ने धरतियोक बीच अछि। जहिना पानिमे गोहि, नकार आदि रहैए तहिना ने धरतियोपर बाघ सिंह, नाग बास करैए। थाहल जिनगीक अर्थ ई जे जँ तीन बीघा वा दू बीघा जमीनकेँ जँ समुचित बेवस्था कऽ खेती कएल जाए तँ युगानुकूल मनुष्य बनब बड़ भारी नै। जिनगी तखन भारी बनैत अछि जखन गरथाहमे जिनगी पड़ि जाइत अछि। किसानक जिनगीकेँ पंगु बना देल गेल अछि। जँ से नै तँ सरकारी बेवस्था कोन किसान हितैषी- जिनगीक कोन जरूरतिकेँ पूरा नै कऽ पाबि सकैए, मुदा नीको-नीको -दस बीघासँ ऊपरबला किसान- परिवार ने अपना बेटाकेँ नीक शिक्षा दऽ पाबि रहल अछि आ ने जनमारा बेमारिक इलाज कऽ पाबि रहल अछि। जहिना सुति उठि सीता-राम, राधा-कृष्ण वा सतनामक नाम लेल जाइत तहिना ने आब टाटा-पापा लैत उठै छी। मुदा कि हम सभ नढ़रा मकैक सदृश जिनगी नै जीबै छी जे भोगार गाछ रहितो अन्नक कतौ पता नै। कृषि तँ आमक बगीचा वा खीराक लत्ती सदृश अछि। जहिना गाछक पल्लवक मुँहसँ गिरहे-गिरहे पल्लव निकालि डारि बनैत रहैए, खीरा लत्तीक मुँहसँ लत्ती बनि फुलाइत-फड़ैत रहैए तहिना ने जिनगियो छी जे धरतीसँ जनमि फुलाइत-फड़ैत विसरजन करत। खेत तँ ओहन सम्पत्ति छी जे जिनगीकेँ आगू-बढ़बैक शक्ति रखैए। कतबो शक्तिशाली किअए ने आगि हुअए मुदा जँ ओइमे नव ज्वलनशील वस्तुक समागम नै हेतै, तँ कते काल ओ जीवित रहि सकैए। जाधरि धार टपनिहार वा सरोवरमे स्नान केनिहारकेँ पानिक थाह नै लगि जाएत ताधरि धार टपब वा स्नान करब तँ अथाहे अछि। जाधरि अथाह रहत ताधरि शंका रहबे करत। जाधरि आशंका रहत ताधरि विचार प्रभावित हेबे करत। मुदा एतेकक बावजूद हम किअए.....? की हम नै जनै छी जे जाधरि कृषिकेँ सर्वांगिन विकासक प्रक्रिया नै अपनौल जाएत ताधरि नचारी-सोहर कते काल सोहनगर हएत। हर आदमी हर परिवारकेँ ठाढ़ भऽ चलैक प्रश्न अछि, नै कि एक दोसराकेँ छिटकी मारि खसबैक। पाँचटा किसानक संग बरीसलाल सेहो बोरिंग-दमकलक विचारकेँ आगू बढ़ौलक। प्रखण्ड कार्यालयसँ फार्म लऽ बैंकमे आवेदन केलक। संगीक जरूरति तँ पड़बे केलै किएक तँ जिनगीमे पहिल खेप प्रखण्ड कार्यालय आ बैंक पहुँचैक अवसर भेटलै। नव योजनाक काज बैंकमे आएल। ओना गामक आ गामक किसानक हिसाबे बैंकक संख्या दूधक डाढ़िये छल, मुदा छल तँ। बरीसलालक आवेदन स्वीकृति करैत जमीनक बाैण्ड बना माइनर एरीगेशनकेँ काज करैक भार देलक। बैंक-कर्जक सूद शुरू भेल। माइनर एरीगेशनक आँट-पेट छोट। एकाएक काजमे बढ़ोत्तरी भेल। ने काज करैक औजार अधिक आ ने करैबला। तँए ठीकेदारीक चलनि। तहूमे एक अनुमंडलक बीच एकटा कार्यालय। लेनिहार हजार हाथ देनिहार एक। मुदा तैयो बरीसलालक आदेश पत्रकेँ फाइलमे लगा देल गेल। एक-तिहाइ सब्सिडीक लेल सब्सिडी कार्यालयक जरूरत। सब्सिडी कार्यालय जिलाक अन्तर्गत। दौड़-बरहा करैत बरीसलालकेँ खर्चक संग-संग साल बीत गेल। बरसातमे एक तँ धसना धसैक डर दोसर लोक खेती कहिया करत। बोरिंगक काज छोड़ि बरीसलाल खेतीमे लगि गेल। साल बीतल दोसर साल शुरू भेल। ताधरि बैंकक कर्जक चक्रवृद्धि ब्याजक दरसँ एते मोटा गेल जे सब्सिडी उधिया गेल। दोसर साल शुरूहेसँ बरीसलाल काजक -वोरिंग-दमकलक- पाछू पड़ि गेल। आइ-काल्हि करैत माइनरो-गरीगेशनक काज आ सब्सिडीयो ऑफिसक काज लटकले रहलै। चढ़ैत बैसाख -दोसर साल- बरीसलाल रघुनन्दनकेँ कहलक- “बौआ, छोड़ि दहक। बोरिंग नइ भेल तँ करजो तँ नहिये भेल। बुझबै जे एते दिन घुमबे-फिरबे केलौं।” बैंकक प्रक्रिया रघुनन्दनकेँ बूझल। बरीसलालक बात सुनि अवाक् भऽ गेल। मन कलपि उठलै बाप रे, सूदि-मूड़ लदा गेलै, कोट-कचहरीक मुद्दा बनि गेलै। दोख केकरा लगतै। कोन मुँह लऽ कऽ समाजमे रहब। ग्लानिसँ मन बिसाइन भऽ गेलै। साहस बटोरि रघुनन्दन बाजल- “काका, जँए एते दिन तँए दू मास आरो। बैसाख-जेठ बचल अछि। काल्हि चलू या तँ अपन काज वापस लेब वा हाथ पकड़ि काज कराएब। तइले जे हेतै से देखल जेतै।” रघुनन्दनक बात सुनि बरिसलाल ठमकि गेल। बाजल- “बौआ, हम तँ तोरेपर छी, आगिमे जाइले कहह आकि पानिमे तोरासँ बाहर थोड़े हएब।” बरीसलालक विचार सुनि रघुनन्दनक मनमे उत्साह जगल। दोसर दिन दुनू गोटे -बरीसलाल, रघुनन्दन- माइनर एगरीगेशनक कार्यालयसँ बोरिंग गाड़ैक सामान नेने आएल। गाड़ैक दिन तकबए गेल तँ आगूमे भदबा पड़ैत रहए। जोड़-घटाओ करैत आठ दिन पछाति बोर करब शुरू भेल। िसर्फ ठीकेदारे टा आएल बाकी सभ काज गामेक मजदूर करत। ओना बोरिंगक काजमे गामक मजदूर अनाड़िये छल मुदा अनाड़ियो तँ कते रंगक होइ छै। जते काज तते जीवनी तते अनाड़ी। जखने काजक लूरि भऽ गेल तखने जीवनी, जाधरि नै भेल ताधरि अनाड़ी। ततबे नै एक काजक जीवनी दोसर काजक अनाड़ी सेहो होइत। तँए जीवनी-अनाड़ीक भेद करब कठिन अछि। ओना काजक भीतरो जीवनी-अनाड़ी होइत। जहिना एकपर सए खड़ा अछि। कहैले तँ एक पहिल सीमा भेल आ सए दोसर सीमा मुदा दुनूक बीच अंतर ओते अछि जते एक प्रतिशत आ सए प्रतिशत। तहिना काजोक अछि। एके काजक भीतर सइयो रंगक काजक अंश हएत। किछु अंशक बादे जीवनी मानल जाए लगैत मुदा जीवनी -लूरिगर- होइतो पूर्ण लूरिगर नै मानल जाएत। पूर्ण लूरिगर तखन मानल जाएत जखन काज समए सीमाक भीतर होइत। ओना काजोक सीमाक िनर्धारण व्यास पद्धतिक अनुकूल हएत। जँ से नै हएत तँ किछु एहनो काज केनिहार होइत जे समयो-सीमासँ पहिनहि कऽ लैत आ किछु एहनो होइत जे काज तँ कऽ लैत मुदा समए सीमा टपि कऽ करैत। तँए कि ओकरा अनाड़ी कहल जेतै। मुलाइम माटि रहने सबा सए फीट बोर आठे दिनमे भऽ गेल। लेयरो बढ़ियाँ। चालीस फीट लेयर। ओना जँ नीक लेयर होइत तँ पनरहो फीटमे पाँच हार्स पावरक इंजन पूर्ण पानि दैत, मुदा लेयरोक तँ ठेकान नै। नीक-अधला संगे होइत। कोनो बालु -सौतबी- एहेन होइत जइमे पानिक मात्रा पनरह प्रतिशतक आस-पास होइत आ कोनो एहेन होइत जइमे अस्सी प्रतिशत धरि पानि रहैत। मुदा बरीसलालक बोरक लेयरक स्थिति किछु भिन्न छल। निच्चाक तीस फीट लेयरमे अस्सी प्रतिशत पानि छल आ उपरकामे कम। तँए ठीकेदार बाजल- “बरीसलालबाबू, अहाँक तकदीर नीक अछि। कहियो बोरिंग भथन नै हएत। किएक तँ तेहेन निचला बालु अछि जे सभ दिन पानि दनदनाइते रहत। तँए नीक हएत जे जहिना भीत घरमे ठेमा-ठेमा रद्दा पड़ैए तहिना किछु दिन जे बोर ठेमा जाएत तँ धँसना धसैक संभावना समाप्त भऽ जाएत। ओना केसिंग-पाइपसँ बोर कएल अछि, पाइप लोड करैमे कोनो दिक्कत हेबे ने करत, मुदा अहीं हितमे कहै छी।” ठीकेदारक मुँहसँ तकदीर सुनि बरीसलालक मन उधिया गेल। ठीकेदारक अगिला बात नीक नहाँति सुनबो ने केलक। अंतिम हितक चर्च सुनि बरीसलाल बाजल- “ठीकेदार सहाएब, अहाँ कि कियो बीरान थोड़े छी जे अधला करब। अहाँ तँ सद्य: इन्द्र भगवान छी, जेमहर ताकि देबइ तेमहर ताड़ि देबै। जेना-जेना अहाँ कहब तेना-तेना करैले तैयार छी।” ठीकेदार- “हमरो गाम गेना बहुत दिन भऽ गेल। अखन ऑफिसक छुट्टीक काजो ने अछि। किए तँ बोर करैक सीमा जते अछि तइ पूरैमे एकबेर गामसँ घूमि आएब। अहूँक काज नीक हएत आ अपनो काज भऽ जाएत।” कहि ठीकेदार गाम चलि गेल। पनरह दिन बीत गेल। जेठ चलए लगल। रोहणि नक्षत्रक आगमन भऽ गेल। संयोगो नीक रहल जे अगते विहरिया हाल सेहो भऽ गेल। जहिना भक्त भगवानक मिलन होइत तहिना बरीसलालक मनमे भेल। अपनो हाथ पानि आबि गेल, ऊपरसँ भगवानो देताह। पानिक धनिक बनि जाएब। जहिना टिकुली अपन पाँखिक होश केने बिना हवामे उधिआइत ओतए पहुँचए लगल जतए ओकर पाँखि बेकाबू भऽ टूटि जाइत। मािटक चुट्टी वा गाछक घोड़नकेँ पाँखि होइते मरैक दिन लगिचा जाइत, मुदा बूझि नै पबैत तहिना बरीसलालोकेँ हुअए लगल। रोहणिया हाल जहिना धरतीक शक्तिमे नव उर्जा दैत तहिना बरीसलालोक मनमे आएल। पत्नियो आ दुनू बेटोकेँ शोर पाड़लक। तेल विहीन बच्चाक मुँह लाली धरैत अनरनेबा जकाँ हरिअरसँ लाल होइत जाइत देखलक। तहिना पत्नियोक ओ दिन मन पड़लै जइ दिन हाथ पकड़ि जिनगीक भार उठौने रहए। मुदा, किअए ने लोक भार उठाओत? एकटा नव शब्द -वर्ड- ताधरि संग पूरैत जाधरि ओकर मथन होइत। नै तँ किअए रहत। बड़ीटा दुनियाँ छै कतौ बौरु जाएत। पत्नीक नव रूप देखि बेटाकेँ सम्बोधित करैत बरीसलाल बाजल- “बौआ, तोरा सभकेँ जहिना कोरा-काँखमे खेलेलियह तहिना हँसी-खुशीसँ जीबैक ओरियान सेहो कऽ देलियह।” पतिक बात सुनि पत्नी सुशीलाक मन पहाड़क झरनासँ झड़ैत पानिक चमकैत रेत जकाँ चमकए लगलनि। बजलीह- “सोझे दीक्षा देने नै हएत। एक-एक दिन, एक-एक क्षणक काजक बात बुझा दिऔ तखन हएत?” अखन धरि बरीसलाल कोट-कचहरी करैत बहुत किछु सीख नेने छल। गाम-गामक खेती-पथारी, गाम-गामक माल-जाल पोसब, गाम-गाम फल-फलहरी, तीमन-तरकारीक खेती, माछ पोसब इत्यादि सुनि चुकल छल। जहिना मिड्ल स्कूलक बच्चा हाइ स्कूलमे प्रवेश करैत नव-नव पोथी देखि ललाए लगैत तहिना बरीसलालक दुनू बेटाक जिज्ञासा जगल। जिज्ञासा देखि बरीसलाल बाजल- “बौआ, माटिमे धन छिड़िआएल छै, बीछिनिहार चाही।” अखन धरि दुनू भाँइ आमक टिकुलासँ लऽ कऽ पाकल आम धरि बीछि चुकल छल तँए बीछैक बात सुनि जेठका बेटा महावीर पुछलक- “केना बिछबै बाबू?” बरीसलाल बेटाक प्रश्न सुनि खुशिया गेल। आजुक बेटा जकाँ नै जे नोकरियो करैत आ नोकरो रखैत। जखन अपने काज अछि तखन अपनासँ जे समए बचत सहए ने दोसरकेँ देब। बाजल- “बौआ, अखन तँू सभ भारी काज करै जोकर नै भेलहहेँ। ओना कनी-कनी कऽ हेन्डिल मारब सीख लेबह तँ दमकलो चलाएल भइये जेतह। मुदा जँ दस कट्ठामे सालो भरि तरकारीक खेती करबह तँ ओते कोन परदेशिया कमाएत। हँ समए बदलने लोक रंग-बिरंगक वृतियो बदलि लेलकहेँ। जइसँ किछु अनाप-सनाप सेहो भऽ रहल छै। मुदा बुइधिक संग पूँजी आ पूँजीक संग बुधि नै चलत तँ अनेरे दब-उनाड़ होइत रहत।” जेठक पूर्णिमा दिन बोरिंग लोड भेल। लोड होइसँ तीन दिन पहिने अपन उषा मशीन आबि गेल रहै। बोरिंग लोड कऽ ठीकेदार-मजदूर मिलि माछक भोज खा, सोलह घंटा पानि चला काज सम्पन्न केलक। अखाढ़ चढ़िते मानसून उतरि गेल। पहिलुके दिन एहेन बरखा भेल जे खेत-पथारमे पानि लगि गेल। नीचला खेती बुड़ैक लक्षण धऽ लेलक। तेसरे दिन बाढ़ि चल आएल। पोखरि-झाखड़ि, चर-चांचर भरि गेल। पानिपर पानि आ बाढ़िपर बाढ़ि कते बेर आबि गेल। दहार भऽ गेल। एहेन दहार भेल जे नवान पावनियो लोक बिसरि गेल। मुदा कातिक अबैत-अबैत रब्बी-राय छीटब शुरू भेल। गहुमक खेती नै भऽ सकल। अन्नमे गहुमक खेती सभसँ महग खेती होइत। मुदा धान नै भेने किसानक स्थिति बिगड़ि गेल। एक तँ आेहिना बरीसलालक स्थिति दू सालक दौड़-बरहामे बिगड़ि गेल तइपर दाही आरो बिगाड़ि देलक। सालो भरि बोरिंग-दमकल बैसल रहि गेल। तरकारी खेतीक ओहन दशा बनि गेल जे बजार नै। कच्चा सौदा, नष्ट हएत। देखैत-देखैत सतासीक बाढ़ि आ अट्ठासीक भूमकम आबि गेल। जर-जर बरीसलाल फड़-फड़ करैत फड़फड़ा गेल। तही बीच बैंकक पक्षसँ जमीनक निलामीक नोटिश भेटलै। आशीष अनचिन्हार काटल कथा १० जनवरी (समय भोरक ०५:३९ मिनट)- आइ भोरे गंगासागर ट्रेनसँ दड़िभंगा रेलवे स्टेशन उतरलौं। किछु डेग चललाक पछाति बुझाएल जेना डाँड़सँ निच्चा पानि झहरैत हुअए। डाँड़सँ उपर नै, किए तँ गंजीपरसँ अंगा, अंगापरसँ अधकट्टी सुइटर आ तकरा ऊपर पूरा बाँहिक जैकेट छल। पूरा माथ गुलबंद महाराजक शरणमे। तँए डाँड़सँ ऊपर किछु नै बुझना गेल। मुदा डाँड़सँ निच्चाँ छल मात्र खौरकी हाफ जंघिया आ तइपर सँ फूल पैन्ट। तखन पानि की पाथरो बुझेतै! आब अहाँ सभ हमरा किछु कहब से हमरा बुझा रहल अछि। अहाँ सभ कश्मीरक पानिकेँ बर्फमे बदलनाइ विश्वास कऽ सकैत छिऐ मुदा ऐ गप्पकेँ नै। कारण-- ओना कारण एकर बड्ड सोझ छै आ अहाँ तँ बुझिते हेबै जे सोझ गप्प मगजमे बड्ड देरीसँ घुसैत छै। ओना जे होइक एकर कारण, छै मुदा स्वाभाविके। मनुख जइ वस्तु आ ओकर परिवर्तनकेँ आँखिसँ देखै छै ओकरेपर ओ विश्वास करै छै। बिनु आँखिक देखने केओ विश्वास करत तइ लेल माथक पसेना एड़ीसँ पोछए पड़ै छै। ओना ऐ गप्पक बीचमे हम अपन टांग अड़ाएब जे किछु गप्प देखबाक नै विश्वास करबाक होइ छै, ओनाहिते जेना की कन्यागत कहै छथिन्ह जे हमर कन्या पवित्र छथि आ वरागतकेँ विश्वास करहे पड़ै छै। ओना वरागतक विश्वास कोन जौड़सँ बन्हालए रहै छै से हम नै कहब। अस्तु कोनाहुतो जांघ-टाँगसँ पानि झहरबैत वेटिंग रूम एलौं, किछु खन बैसलौं आ फेर उठि कऽ चाहबला लग एलौं। आब अहाँ सभ अनुमान कऽ सकैत छिऐ जे ओइ ठाम हम निश्चित रूपेँ चाह पीने हएब आ से स्वाभाविके छै। व्यर्थमे केकरो दोकानपर जा कऽ ठाढ़ भऽ जेबै तँ गंजन होइत देरी नै लागत। गिलासक चाह आधा खत्म भऽ गेल छल, आधा बाँचले छल (कृप्या अहाँ लोकनि एकरा दर्शनक विषय नै बूझब) तखने एकटा विचित्र प्राणीक आगमन भेल। ओना एक गोट विद्वान कहने छथि जे मनुख अपनामे एकटा विचित्र प्राणी अछि। आब ओ विद्वान विचित्र प्राणीकेँ देखने होथिन्ह की नै मुदा आइ हम देखि लेलिऐ। आगंतुक प्राणी अहाँकेँ ने पूर्ण रूपेँ पुरुष बुझेताह आ ने स्त्री। जँ गँहिकी नजरिसँ देखबै तँ ओ अहाँकेँ हिजड़ो नै बुझेताह। आब ओ अहाँकेँ जे बुझाथि से बुझैत रहू, मुदा हमरा ऐ प्रसंगसँ उतरि हुनक बएसपर एबाक चाही। ओना ओ देखलासँ साठिक सेहो बुझेताह आ सत्तरिक सेहो, मुदा हुनक बएस चालीससँ ऊपर नै। आब अहाँ सभ ई नै कहब जे अहाँ कोनो हुनकर टिप्पनि बनेने छिऐन्हि ? सत्ते, हम तँ हुनकर टिप्पनि नहिए बनेने छिऐ मुदा जे हम कहलौं से सत्य जँ गड़बड़िओ हेतै तँ एकै-दू बर्खक। आब अहाँ सभ चाह बलाक बएस पूछू। अहाँ पूछब तँ हम उत्तर देब जे हुनकर बएस हमरासँ बीस होइन्हि की उन्नीस, छलाह हमरे बराबर। आब अहाँ सभ बोर भऽ गेल हएब। हफिआइत हएब आ केखनो खिसिआ कऽ पूछब जे ई इतिहास सुनौलासँ कोन लाभ? हँ बाबू, ओना इतिहास सुनेलासँ तँ कोनो लाभ नै छै मुदा इतिहास तँ इतिहासे होइ छै। फेर हम कहाँ भसिया गेलौं। केखनो काल कऽ हम ओनाहिते भसिआ जाइ छी जेना कि मुद्रास्फीतिक बाढ़िमे घर आ घरक बजट। हँ तँ आब सुनू- ओ विचित्र प्राणी चाह बलासँ चाह मंगलकै। चाहबला चाह छानि ओकरा हाथमे देबएसँ पहिने पाइ मंगलकै। आब तँ बाबू कहबीए छै, "घर कहाँ दरभंगा, झोड़ामे की छौ अंगा, टिकट कहाँ बाबू भिखमंगा।" आब तँ अहूँ सभ बुझिए गेल हेबै, अबूझ तँ नहिए छी। चाहबला बमकि उठल-- भाग सार-- मादर---- फादर---- बहान-- सभ विशेषण उझीलि देलकै। बमकैत बाजल--- हम जुआनकेँ भीख नै दैत छिऐ। जे सार बुढ़बा होइए... ओहीकेँ माइकेँ ओही छिन्नी साँइकेँ भीख दै छी। विचित्र प्राणी, पाँच डेग पाछाँ हटि गेल। चाहोबला पाँच डेग पाछाँ हटि गेल। हमरो चाह खत्म भऽ गेल छल, पाइ देलिऐ आ विदा भऽ गेलौं बस स्टेण्डक लेल। १० जनवरी (समय भोरक ०६:३८ मिनट)--- रेलवे स्टेशनसँ निकलि बाटपर एलौं टेम्पू पकड़बाक लेल। किछु खन प्रतीक्षा करए पड़ल। टेम्पूक नै, टेम्पूकेँ आदमीसँ भरबाक लेल। टेम्पू आब चालू भेल। कन-कन बसात आ जर्किनसँ देह परमहंसीय अवस्थामे पहुँचि गेल। ने स्वस्थ जकाँ फुर्तिगर आ ने लकवाग्रस्त जकाँ निष्क्रिय। कहुना बस स्टेण्ड पहुँचलौं आ पहुँचिते सूपक भाटाँ भऽ गेलौं। बाम-दहिन होइत-होइत पता लागल जे बसक लेल प्रतीक्षा करए पड़त, सेहो कतेक तँ पौने एक घंटा, बेस कएले जा सकैए। आब अहाँ सभ कहबे करब जे अहाँक प्रतीक्षा लेल हम किए प्रतीक्षा करू। बेस अहाँ प्रतीक्षा किए करब हम कहिए दै छी। हँ, ओइ पौन घंटामे सँ जखन शुद्ध कऽ बीस मिनट बीति गेल तखन एगो कूटक बक्सामे किछु हिन्दी पत्रिका लेने एकटा बच्चा आएल आ सुटसँ आँखिक आगाँमे एगो सरस-सलिल चमका कऽ बाजल- "लेबऽ हौ।" हम प्रतिप्रश्न करैत पुछलिऐ-- "मैथिली पत्रिका रखैत छहक।" हमर प्रतिप्रश्नक उत्तरमे ओहो प्रतिप्रश्न करैत पुछलक- "माने की?" हम कहलिऐ-- "जेना हाल-चाल छै।" ऐ बेर ओ मूड़ी डोलबैत दीर्घ "ओ" केर उच्चारण केलक आ बकसासँ एकटा पोथी निकालि देखबैत बाजल- "ईएह।" आ अनचोकेमे भोरे-भोर एकटा जुआन छौंडीक नाङट फोटो आँखिक सोझाँ आबि गेल आ संगमे गरमी थोड़ेक सेहो सनसनी आ तनतनीक अतिरिक्त। हम ओकरा फेर पुछलिऐ—“ई नै हौ, ओ जे मणिकांत झा निकालै छथिन्ह से।" ओ छौड़ा चट्ट पोथीकेँ भीतर राखैत बाजल- "नै ऊ सभ हमरा पास नै अछि।" आ सरसराइत ओ चल गेल। आ हम ओही ठाम ठंडीमे गरमीक अनुभव करैत रहि गेलौं मात्र एकटा बसक प्रतीक्षामे। १० जनवरी (समय भोरक ०७:५० मिनट)--- बस अपना नियत समयसँ लेट भऽ गेल संगहि-संग कच्छमच्छी सेहो ढ़ूकए लागल। एहने समयमे पता लागल जे हमरा गामक तँ नै मुदा हमर गामसँ तीन गाम पाछाँक बस फल्लाँव ठाम लगतै। मोनमे कच्छमच्छीकेँ लेने ओइठाम पहुँचलौं मुदा बस नै आएल छल। ओना ओकर एबाक समयो नै भेल छलै। जे-से फेर हम लगीचक चाहक दोकानमे बैसलौं आ चाह पीबाक लेल बाध्य भेलौं। चाह खत्म भेल। नियत समय सेहो पूरल। आश्चर्य, बस अपना स्थानपर आबि गेल छल। पाइ दैत फुर्तीसँ हम उठलौं आ बसमे चढ़ि आगूक सीट दफानलौं। आब जँ अहाँ सभ साकांक्ष हएब तँ हमरासँ पूछि सकै छी जे आगुएक सीट किए अहाँ बीचोमे तँ बैसि सकै छलौं। बंधु ई सत्य जे हम बीचोमे बैसि सकै छलौं मुदा जाधरि कोनो बाध्यता नै हुअए हमरा अगुअइते नीक लगैए की पछुअइते। अस्तु बसमे लोक मतलब रंग बिरही माल-जाल भरलाक पछाति कंडक्टर ड्राइवरकेँ प्रस्थान करबाक इशारा केलकै। बस तँ प्रस्थान करबे करतै मुदा अहाँ सभ नै प्रस्थान करू। आब हम फेर मतलबक गप्पपर अबै छी। बस बाघ मोड़सँ होइत बेला मोड़ आ तकरा बाद दड़िभंगा-जयनगर नेशनल हाइवे पकड़लक आ हनहनाइत चलए लागल। हनहनाइत माने ओतेक तेजी जे की रोडक कंडीशनकेँ देखैत क्षम्य छै। हँ तँ लिअ एतबे देरमे बस खिरमा चौक पहुँचि गेल आ अपन गंतव्यसँ मात्र आध घंटाक दूरीपर अछि। ऐ चौकपर एकटा जनानी बसमे चढ़लीह आ हुनक संगमे एकटा बच्चा आ मर्द सेहो। आब जनानी, बच्चा आ मर्दक बीच की संबंध छै से हमरा नै पता। भऽ सकैत अछि जे ओ दुनू पति-पत्नी होथि वा भाए-बहीन वा अन्य कोनो। किछु भऽ सकैत छै। एखनो एहन समय छै जँ कोनो युवक-युवती एक संगे देखा गेल तँ लोक ओकर संबंधक व्याख्या प्रेमेक स्तरपर करै छै। ऐ छोड़ि आरो कोनो संबंध भऽ सकैत छै ई सोचबाक फुरसति केकरो लग नै छै। ओह, हम फेर भसिआएल जाइत छी। हँ, तँ जखन बस खिरमा चौकसँ आगू बढ़ल तखन बच्चा अपन स्वभावक अनुरूपेँ चारू कात मुँह घुमेनाइ चालू केलक। आ जखन कोनो बच्चा कौतुक करए लागए तँ ओकर आगू-पाछू बलाक मोन सेहो कौतुक करए लागैत छै। चाहे बूढ़ हुअए कि जुआन। आ एकर कारण जे होइक। तँ बच्चाक देखाँउस एकटा अन्य युवक सेहो करए लागल जे पाछूक सीटपर बैसल छल। बच्चा किछु देर धरि देखैत रहल आ एकै बेर भभा कऽ हँसए लागल। हमर बगलमे बैसल एकटा युवक ऐ क्रियाकलापकेँ देखि बाजल--- देखियौ घाघकेँ। बच्चाकेँ हँसा ओकर माएकेँ लोभेतै। हम किछु नै बजलौं। जरूरते की छल। मुदा सोचबाक लेल बाध्य छलौं। की हँसी खाली स्त्रीकेँ फँसेबाक लेल होइ छै अथवा हँसबाक लेल कोनो विशेषे कारण वा समय होइ छै। हमर मोन नै मानैत छल। मुदा प्रमाण तँ युवक सद्यः देने छलाह जे हँसीक उपयोग मात्र अही सबहक लेल करैए लोक। अहाँ सभ हमर सोच, हमर विचारक खंडन करब जे एहन गप्प नै छै। आ हमहूँ मानै छी जे एहन गप्प नै छै, मुदा जखन कोनो शोधकर्ता कहलकै जे हँसी जरूरी छै स्वास्थ्यक लेल आ तकरा बाद जे लाफ्टर क्लब, शो इत्यादि चलल छै तकरा देखि मानए पड़ल जे हँसीक मात्र एकै-दूटा उपयोग छै। मनुख लग आब स्वाभाविक हँसी नै छै। स्त्री फँसेबाक नामपर वा नीक स्वास्थ्यक नामपर हदसँ बेसी हँसैत लोककेँ देखि ई विश्वास करब कठिन छै जे ऐ ठाम केओ कनितो हेतै। अमीरसँ गरीब, सभ हँसि रहल लाफ्टर शोकेँ सहारे, मुदा स्वाभाविक हँसी नै। ऐ मामिलामे पाइ कोनो विभाजक नै। दूध पिबैत लोक आ माँड़ पिबैत लोक दुनू एकै लाफ्टर शोकेँ देखि हँसैत अछि आ कामना करैत अछि जे भरि दिन भरि राति एहने सुखद हुअए। मुदा से की संभव छै? आ एकै झटकामे बस रूकल संगहि-संग हमर विचार सेहो। बसक गंतव्य आबि गेल छल मुदा हमर नै। हमरा अखन तीन गाम आरो पार कारबाक अछि। मुदा जाधरि हम ऐ तीन गामकेँ पार करैत अपन गाम पहुँची, अहाँ सभ कोनो ने कोनो लाफ्टर शोकेँ देखू, बलजोरीसँ हँसू आ ऐ भ्रममे रहू जे हमर स्वास्थ्य सुधरल जा रहल अछि। (ई कथा रहुआ-संग्राममे आयोजित " सगर राति दीप जरए" मे पढ़ए लेल रहए मुदा ओतए सभ सूति रहल रहथि। तकर विरोध करैत हम ई कथा नै पढ़ने रही।–आशीष अनचिन्हार) विनीत उत्पल बेसिक इंस्टिंक्ट मामला तँ तखने तूल पकड़ि लेलक जखन ग्वालियरक एकटा बाभन फेसबुकपर कबीरक एकटा दोहा पोस्ट कऽ देलक, "एक बूंद, एकै मलमूतर, एक चाम, एक गूदा/ एक रकत से सबहीं बने हैं को बाभन को सूदा'। मुदा गप पोस्ट करबे टाक नै छल। गप छल जातिवादकेँ लऽ कऽ झगड़ाक। यएह ओ दौर छल जखन कारगिल युद्ध भेल छल आ बरखा दत्त नामक पत्रकार राइते-राति युद्धक रिर्पोटिंग कऽ सभ छौड़ीक आइडियल बनि गेल छल। ओहिनो पत्रकार बनाबैक लेल सभ कोनटामे कुकुरमुत्ता सन मीडिया संस्थान खुजि गेल अछि आ सभटा लड़की ओतएसँ डिग्री लेबाक लेल परेशान रहैत अछि। ई ओ काल अछि जखन नोएडामे आएल अप्पन बरियातीकेँ निशा दहेजक लेल घुरा दैत अछि। ऐ कालमे झारखंडक कोडरमाक रहैवाली पत्रकार निरुपमाक मरब, हत्या वा आत्महत्या, क बीच झुलले रहि जाइत अछि। फेर मंडल आयोगकेँ लागू करएबला प्रधानमंत्री कैंसरसँ लड़ैत दम तँ तोड़ि दैत अछि मुदा तखन धरि समाजक लोक जागि गेल छल। मंडल-कमंडलक नामपर कतेक लोक मरि गेल मुदा लोकक सपना देखबासँ आ ओकरा यथार्थमे बदलबाक मेहनत करबासँ कियो रोकि नै सकल। ऐ कालमे कतेक सवर्ण एहन आएल जे सार्वजनिक जीवनमे दलितक हिमायती, स्त्रीगणक पैरोकार बनैत छल मुदा वास्तविक धरातलसँ ओ एहन मामलासँ दूरे रहैत छल। नै तँ एहन कखनो नै होइए जे हम जइ संस्कारक गप करैत छी आ कहैत छी जे ई संस्कार घरसँ अबैत अछि से ओइ घरमे नै हुअए। यएह हाल तँ ओइ छौड़ीक छल जकर बहनोइ सभटा तामझामक संग दलितक पैरोकार बनैत छल। ओकरो सपना “बरखा दत्त-टू" बनैक छल आ लंदनमे रहैबला लड़कासँ शादीक लेल मना कऽ ओ दिल्ली भागि कऽ आबि गेल छल। दिल्ली तँ ओ अप्पन करियरकेँ नव मंजिल दै लेल आएल छल। पूरा खिस्सा तँ हमरा पतो नै चलतिऐ जौँ ओइ दिन ओकर पागल हइक खबर राष्ट्रीय अखबारमे नै पढ़ितिऐ। फेर दिल्ली राजधानीसँ करीब १५०० किलोमीटर दूर जखन हम मिथिलामे अप्पन खेतमे काज कऽ रहल छी तखन दिल्लीक गप एतए कतएसँ आबि सकैत अछि। हमहूँ कहियो बड़ पैघ-पैघ सपना देखने रही आ दिल्ली आएल छलौं मुदा ओतुक्का रौनक, मंडी हाउस, मेट्रो ट्रेन, कनॉट प्लेस, हैबिटेट सेंटर, प्रेस क्लब सन जगह हमरा प्रभावित नै कऽ सकल। आ फेर हमरा सनक लोककेँ ठामे-ठाम धोखा भेटब, ई कतएसँ बान्हि कऽ राखि सकैत छल! फेर “बेसिक इंस्टिंक्स" केँ कियो नकारि सकैत अछि की? ओ नवम्बरक मास छल जखन दिल्ली विश्वविद्यालयक दक्षिणी परिसरमे तीन दिनक मीडिया वर्कशॉप भेल छल आ ओइमे हम सेहो हिस्सा लऽ रहल रही। ओ वएह तँ छौड़ी छल जे दरबज्जाक कोनटा लग ठाढ़ि छल, पीअर रंगक टी-शर्टमे ओ गुड़िया जेहन लागैत छल। हमर मित्र कमलनाथ सिंह हमरा ओकरासँ भेँट करौने छल। फेर तँ कखन हम सभ एक-दोसराक दोस्त बनि गेलौं, से पतो नै चलल। गप-शप, भेँट-घाँट रोज हुअए लागल। एक दिन पता चलल जे ओ “राष्ट्रीय उदय" मे इंटर्नशिप कऽ रहल अछि मुदा ताधरि हम एकटा राष्ट्रीय अखबारमे नोकरी करै लेल अजमेर जा चुकल रही। हँ, हम तँ ओकर नाम बताबैक गप बिसरि गेलौं। छोड़ू, ओहिनो नाममे राखल की अछि? मुदा खिस्साकेँ आगू बढ़ाबैक लेल तँ ओकर नाम बताबैये पड़त। अहाँ सभ किछु सोचै लेल स्वतंत्र छी मुदा हम ओकर असली नाम नै बताएब। एतबेटा जानि लिअ जे ओकर मोबाइलमे हमर नंबर “परेशान आत्मा" आ हमर मोबाइलमे ओकर नंबर “हाइली टेंपर" क नामसँ सुरक्षित छल। तँ साहेबान, कद्रदान, पूरा मामला “परेशान आत्मा" आ “हाइली टेंपर" क बीचक गपक छल आ सौंसे दिल्लीक मीडिया हुनका दुनूकेँ देखि रहल छल। एक दिन “परेशान आत्मा" केँ मालूम चलल जे ओकर गर्ल फ्रेंड जे ताधरि फ्रेंड टा छल, रांचीसँ छपैबला छोट-सन अखबारमे काज करए लागल अछि। ओ ओतए “अंगूठीबला बाबा" क पैरवीसँ नोकरीपर लागल छल आ हुनका कहै तँ ओ “सर" छल मुदा दुनूक सरसँ कतेक कोसीक पानि बहि चुकल छलै। दरभंगासँ आएल ओ छौड़ी दिल्लीक चकाचौंधमे डुमि चुकल छल, साँझसँ देर राति धरि इंडिया गेटपर “अप्पन सर"क संग आइसक्रीम खाएब ओकरा बड़ नीक लगैत छलै। आफिसमे ओकर भेँट रामेंद्र अशेषसँ भेल छल। ओ बड़ शांत छल आ सुसंस्कारवान सेहो। संगहि साहित्यक अनुरागी सेहो छल। “हाइली टेंपर"क नजरि ओकरापर पड़ल आ ओ सोचि लेलक जे ओ अशेषक कान्हपर चढ़ि कऽ दिल्लीक जत्रा पूरा करत। रामेंद्र अशेष अत्ते भद्र पुरुख छल जे ओकरा पते नै चलैत छलै जे के ओकरा यूज कऽ रहल अछि आ के नै। अशेषजी चुपचाप ओकर “लेख”क शब्दकेँ ठीक कऽ दैत छल आ लोक “हाइली टेंपर" क वाहवाही करैत छल। ओकर एवजमे ओ प्यारक झाँसा दैत छल। तइसँ जहिया जोशीजीक निधनपर गांधी शांति प्रतिष्ठानमे दिल्ली जर्नलिस्ट एसोसिएशनक एकटा सभा आयोजित केने छल तँ रामेंद्र ओइ छौड़ी लग ताधरि नै बैसल जाधरि ओकर बहनोइ ओकरा लग बैसल रहल। ओकर बहनोइ जहिना बीच सभामे लघुशंका लेल हॉलसँ बाहर गेल तखने हाइली टेंपरक दोसर कातक खाली कुर्सीपर ओ अप्पन आसन जमा लेलक। जखन ओकर बहनोइ अबैत अछि तखन ओ नमस्ते करैत अछि आ कहैत अछि जे ओ अखने आएल अछि। हमहूँ अलग लोक छी। कतएसँ कतए चलि अएलहुँ आ अहाँसँ कोन गप करए लगलहुँ। रांचीक लोकल अखबारक ई दफ्तर दिल्लीक कनाट प्लेसक एकटा बिल्डिंगक पाँचम तल्लापर छल। ओकर आगूमे दैनिक भारतक बिल्डिंग अप्पन चमक-दमकक संग लोककेँ आकर्षित कऽ रहल छल। मुदा ओतए बाभन सभक बड़ रास भीड़ छल। ओतए जाइतक नाम देखि कऽ लोककेँ राखल जाइत छल आकि फेर ओकरा, जे कोनो पैघ अधिकारीक थूक चाटैत छल। एहनामे परेशान आत्माकेँ नोकरी भेटबामे मुश्किल नै भेलै किए कि अजमेरमे जइ पैघ पत्रकारसँ ओकरा भेँट भेल छलै ओ दैनिक भारतमे पैघ पोस्टपर आएल छल। मुदा आब हाइली टेंपरकेँ लगलै जे जौं ओतए ओकरा नोकरी नै भेटत तँ ई बड्ड पैघ हारि हएत। ओ अप्पन परिवारकेँ ई देखाबैले चाहैत छल जे ओ अप्पन भरोसे किछु कऽ सकैत अछि। ओकरा दर्द छलै जे राष्ट्रीय उदयमे इंटर्नशिपक लेल ओकर बहनोइ बड़ पैरवी केने छल, तकर बाद ओकरा इंटर्नशिप भेटल छलै। अन्तमे ओ दिन आबि गेलै जखन नवसिखुआ स्त्रीवादी लेखिकाक चोंगा पहीर कऽ ओ छौंड़ी, बाइस मंजिलक ओइ बिल्डिंगमे आएल, ई वएह स्थान रहै, जतए ओ बाबाक संग नोकरी ताकऽ लेल आएल छल , ई वएह “बाबा"छल जकरा ओ “सर" कहैत छल। ऐ बाबाक जीवनक परिभाषा “बाभन आपन करैं बड़ाई, गागर छुअन न देहिं/ वैस्याकेँ पायन तर सोवैं, यह देखो हिंदुआई” दोहामे सिमटल छल। एतए "परेशान आत्मा” ओकरा लेल आधार तैयार कऽ चुकल छल आ बिना टेस्ट, बिना रिज्यूमे जमा केने ओकरा नौकरी भेट गेलै। पहिने तँ कहल गेल जे अहाँ दुनू गोटेकेँ जूनियर कॉपी एडिटर बनाओल जाएत मुदा जखन पत्र भेटलै तँ ओइमे "स्ट्रींगर' लिखल छलै। कहल गेल छल जे सात हजार टका सेलरी भेटत मुदा पत्रमे लिखल छल पाँच हजार। आपत्ति केलापर बॉस कहलक जे अहाँ सभ गोटे फीचर सेहो लिखू आ ओइ लेल अहाँ सभकेँ दू हजार टका भेट जाएत। ओइ काल परेशान आत्माक संग हाइली टेंपर सेहो छल मुदा बादमे हाइली टेंपर ओकरा धोखामे राखि कऽ ज्वाइनिंग लेटर राखि लेलक। मीडिया भलहि दोसरक खामीकेँ लोकक आगू राखैत अछि मुदा एकर खामीकेँ कियो कोना आगू राखत? ओइ कालमे “मोहल्ला" आकि “भड़ास"क जन्म नै भेल छल जे मीडियामे काज करैबला लोकक दर्दकेँ आगू राखि सकए। अहिनामे जतए उच्च पदपर काज करैबला तेरह टा पदपर बाभन अप्पन आसन जमौने छल ओतए निचला स्तरपर कतेक के होएत एकर अंदाजा केकरो नै छलै। अहिनामे दलित, स्त्रीवादीक खोल “हाइली टेंपर" उतारि कऽ फेंकि देलक आ सभ लोकक आगू कहि देलक जे हमहूँ तँ “'ब्राह्मण" छी। फेर तँ किछु ने किछु छल-प्रपंच करब आवश्यक छल। अइमे कोनो संदेह नै छल जे ओकरा अप्पन दलित आ स्त्रीवादीक खोलसाकेँ उतारबाक छलै, अप्पन भेदियाकेँ सेहो खत्म करबाक छलै। अहाँ तँ जनिते छिऐ जे ई भेदिया वएह “परेशान आत्मा" छल। तेँ ओ अप्पन मोबाइलमे ओकर नंबर अइ नामसँ सुरक्षित राखने छल। ओकरा डर छलै जे कहियो ओ ओकर पोल ने खोलि दिअए। एनामे एक दिस ओ परेशान आत्माक संग प्रेम बढ़ेबाक ढोंग करए लागल आ दोसर दिस लोक लग ई कहैमे कनियो टा नै सकुचाएल जे परेशान आत्मा ओकरा परेशान कऽ रहल अछि। जखन कखनो परेशान आत्मा कोनो काजसँ ओकरा फोन करैत छल तँ ओ अप्पन मोबाइल दोसर गोटेकेँ पकड़ा दैत छल आ ई देखेबाक प्रयत्न करैत छल जे ओ ओकरा परेशान करैत अछि। ओतए असगरे भेटलापर परेशान आत्मासँ कहैत छल, “अहाँ कतेक भागमन्त छी जे गर्लफ्रेंड अहाँक संग अछि, संगे-संग ऑफिसमे काज करैत अछि आ फेर एकहि संग साँझमे घर दिस अहाँ सभ घुरैत छी।" अहिनामे एक दिन दुनू गोटे अंग्रेजी फिल्म “बेसिक इंस्टिंक्ट" देखऽ गेल छल। हम एना नै कहि सकैत छी जे ओइ छौड़ामे हृदए नै छलै। ओ तँ एहन चिक्कन-चुनमुन गपमे रहि जाइत छल मुदा ओकरा लगैत छलै जे कत्तौ ने कत्तौ कोनो गड़बड़ जरूर अछि। ओइ छौंड़ीक कतेक दोस्तसँ परेशान आत्माक सेहो दोस्ती छल। ओ सभ कहैत छल जे दिल्ली विश्वविद्यालयक साउथ कैंपसमे जखन ओ पढ़ैत छलि, तखन ओकर अफेयर प्रकाश झाजी सँ छल। एक बेर तँ प्रकाश झा सेहो हुनका ई गप कहलनि। फेर 'बाबा" बला 'सर" आ ओकरा, कतेक बेर संगे खाइ-पीबसँ लऽ कऽ घुमैत-फिरैत धरि देखल गेल। ओम्हर, ऑफिस आ ओकरासँ फराक ठामपर सेहो गॉसिप होइत छल, लोक-बेद मिर्च-मसल्ला लगा कऽ गप करैत छल। आब तँ दैनिक भारतमे बॉससँ लऽ कऽ छोटो स्टाफ सभ ओकरे दुनूक गप करैत छल। फेर “हाइली टेंपर"क नाम आ चेहरा-मोहरा कनीटा दैनिक भारतक संपादकसँ मिलैत छल तइसँ ओ ओकर फाएदा सेहो उठा लैत छल। आखिरमे “हाइली टेंपर"क मेहनति रंग अनलक आ “परेशान आत्माक" ट्रांसफर इलाहाबाद कऽ देल गेल। जकर कन्हापर सवार भऽ कऽ ओइ बीस मंजिल बला दफ्तरमे नोकरी पेने छल, ओकर पत्ता साफ करै मे ओ कोनो कसरि नै छोड़ने छल। आब तँ बॉस सेहो खुलि कऽ “हाइली टेंपर" क संग दिअ लागल छल। ऑफिसक दाढ़ी बला बाबाक चमचासँ आब ओकर लटाढ़म शुरू भऽ गेल छलै। लड़कीकेँ लागै छलै जे आब ओ हुनका पार लगाएत। परेशान आत्माकेँ जतेक तंग करैक छल ओ कोनो कसरि नै छोड़ने छल। जतेक बदनाम करबाक छलै, ओ कऽ देने छल। इलाहाबादसँ परेशान आत्माकेँ जे खबर अबैत छलै ओकरामे कतेक रास गलती निकालैक काज ओ शुरू कऽ देने छल आ बॉससँ सेहो फूइस शिकाइत करैत छल। दोसर दिस ओ छौड़ा छल जे ओकर सभ गलतीकेँ माफ कऽ रहल छल। किछु दिन बाद बॉस बदलि गेल आ आब फेर पलटी मारैक बेर हाइली टेंपरक छल। नबका बॉसक कान पहिनेसँ भरल जा चुकल छल। एक दिन इलाहाबादसँ परेशान आत्माकेँ दिल्ली आबैक छलै। हुनका हाइली टेंपरक खेरहा नै बूझल छलै। ओ हाइली टेंपरक मोबाइलपर मैसेज पठेलक- "केन यू मीट मी वन्स!” (की अहाँ हमरासँ एक बेर भेँट कऽ सकै छी!) गप तँ पाँच शब्दक छल मुदा ओकर इलाहाबादसँ दिल्ली पहुँचैत-पहुँचैत ई आगि बनि गेल छल। कनॉट प्लेसक ओइ दफ्तरमे ओ सभसँ भेँट केलक, नबका बॉससँ सेहो। मुदा जखन ओ ट्रेन पकड़ि कऽ आपस आबि रहल छल, तखन ओकर मोबाइलपर घंटी बजलै। पॉकेटसँ मोबाइल निकालि कऽ देखलक तँ ओ नंबर दिल्ली ऑफिसक छल। "हेलो”। "हेलो...”। ओम्हर नबका बॉस छल। "एहन अछि जे आजुक बाद अहाँ कहियो ओइ लड़कीकेँ फोन नै करब।” जाधरि ओ किछु बुझिछि सकतिऐ ताधरि बॉस बाजल, "बिना हमर आज्ञाक अहाँ फेर कहियो ऑफिस एलौं तँ हम अहाँकेँ पाँच दिनक भीतर निकालि देब।” ताधरि परेशान आत्मा परेशान भऽ चुकल छल आ ओ कहलक, "सर, एहन कोनो गप आब नै हएत आ हम कतए जाएब आ कतए नै जाएब, तकर मालिक अहाँ नै छी। रहल नोकरीक गप आ अहाँ जे धमकी दऽ रहल छी जे पाँच दिनक अंदर निकालि देब तँ हमहीं आजुक पाँच दिनक भीतर ई नौकरी छोड़ि रहल छी।” ओ एक्के साँसमे सौंसे गप कहि कऽ फोन काटि देलक, मुँह लाल-लाल भऽ गेल छलै। आगू वएह भेल जे परेशान आत्मा बाजल छल। पाँच दिनक भीतर ओ दोसर अखबारमे सीधा स्ट्रींगरसँ सीनियर सब एडिटरक नोकरी करए लागल। दरमाहा सेहो तीन गुना बढि़ गेल छलै। कतेक जिम्मेदारी सेहो आबि गेल छलै। बियाह भऽ गेलै। बीबी-बच्चामे ओ रमि गेल छल। धीरे-धीरे बच्चा पैघ भऽ कऽ सेट्ल सेहो भऽ गेलै आ आब ओ परेशान आत्मा परेशानीसँ मुक्ति पाबि राजधानीसँ करीब १५०० किलोमीटर दूर अप्पन खेतमे काज करैत छल आ ओहनो उमेरमे देशक सभटा पत्र-पत्रिकामे लिखैत छल। ओना ई गप अलग अछि जे हाइली टेंपरक पागल होएबाक खबर आ सड़कपर लावारिस हालतिमे भेटबाक जानकारी अखबारसँ पता चललै मुदा एकर बादक गप ओकरा नै बुझल हैतिऐ जँ ओकर दोस्त ओकरा मेलसँ चिट्ठी नै लिखतिऐ। ई मेल मोटामोटी एना अछि: "डियर फ्रेंड, हम दुनू गोटे कतेको बरखसँ दोस्त छी। ई आर गप अछि जे हम दिल्लीक चकाचौंधमे फँसि कऽ रहि गेलौं आ नेना-भुटका सभ बिगड़ि गेल मुदा अहाँ हरदम सही समयपर सही कदम उठेलौं। हम तँ अहाँकेँ मेल करैएबला रही मुदा अहाँक पुरान प्रेयसीक खबरि सुनि कऽ आइ मेल करबा लेल विवश भऽ गेलौं। अहाँक दिल्लीक ओइ संस्थाकेँ छोड़ब करीब तीस साल भऽ गेल। अहाँ प्रेयसीक खिस्सा सुनि कऽ चकित नै हएब मुदा ई कहब जे भगवान दुश्मनोक संग ई नै करथि। अहाँ तँ दैनिक भारतक ओइ दाढ़ीबला बाबाकेँ तँ जानैत छलौं जे अहाँकेँ अजमेरसँ दिल्ली आबैक लेल मना केने छल। ओ ओकर चमचामे फँसि गेल छल। ओकरे संग घूमब, शॉपिंग करब ओकरा नीक लगैत छलै। ओ नशाक सेहो शिकार भऽ गेल छल। लोक तँ एते धरि कहैत छल जे मीडियाक गंदगी ओकरा लील लेलक। कतऽ ओ बरखा दत्त बनबाक स्वप्न लऽ कऽ दिल्ली आएल छल आ अब कॉल गर्लमे बदलि गेल छल। दाढ़ीबला बाबा ओइ दफ्तरमे बड़ पैघ पदपर छल आ अहाँक पुरान प्रेयसी करियरमे एकटा स्थान लेबऽ चाहै छलि। दोसराकेँ नीचाँ देखाबैक शौक तँ ओकरा शुरूहेसँ छलै, तइसँ ओ दाढ़ी बला बाबाक झाँसामे आबि गेल। एतबे टा नै, किछु साल बाद ओ आफिस कहैक लेल टा आबए लागल छल आ दारूक नशा ओकर आँखिसँ बाजैत छल, ठेग लटपटाइत छल। एनामे ओकरा जे कियो कोनो नीक सलाह दैत छल, ओकरा ओ खराप लागैत छल। अहाँकेँ बुझले हएत जे ओकरा बाजारमे ठेलापर बिकाइबला सस्ता साहित्य आ ३०-४० टाकाक ब्लू फिल्मक सी.डी .देखैमे कतेक नीक लागैत छलै। ऑफिसक स्टाफ कहैत छल जे एहने कियो हएत जकरासँ ओ सी.डी. नै मंगने हएत, चाहे ओ पालिका बाजारमे भेटैत होअए, सराय काले खां दिससँ निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन दिस जाइ बला रोडक कातक दोकान वा फेर लक्ष्मीनगरमे कैसेटक दोकानमे। लोक-बेद कहैत छल जे ओ जे पैघ नामक पाछू दौडि़ रहल छली, ओकर कारी चेहराकेँ ओ नै जानैत छल। डियर, अहाँ तँ जानिते होएब जे आइयो अप्पन गाम-घरक स्त्रीगन आ छौड़ी सभ कतबो एडवांस भऽ जाए मुदा जबर्दस्ती शील-भंग भेलापर ओकरापर की बितैत अछि, ई ओकरासँ बेसी नीकसँ कियो नै जानि सकैत अछि। अहाँक प्रेयसीक संग से भेल। हाइली टेंपरसँ हमदर्दी जताबैक संग करियरमे आगू बढ़ाबैक झाँसा दऽ कऽ के-के लोक ओकर संग की-की केलक, एकरा भगवती टा जानैत हेती। अति सर्वत्र वर्जयेत। यएह तँ भेल ओकरा संग। फिल्म "टर्निंग-३०” अहाँ देखने हएब वा नै। वएह हालत भऽ गेल छल अहाँक अंतरंग मित्रक। घरक लोक बियाह करै लेल कहैत छल आ दोसर कात मीडिया आफिसक लोक ओकरा धोखा दऽ रहल छल। एनामे ओ अहाँकेँ बड़ मोन पाड़ैत छल मुदा अहाँ तँ ओकर दुनियासँ बड़ दूर चलि गेल छलौं। एनामे ओ की करितए? दाढ़ीबला बाबाक एकटा चमचा छल, अमित अमन। ओ ओकरासँ बियाह कऽ लेलक। ओ बाभने छल। लोक कहैत छल जे हाइली टेंपर ओकर तेसर कनिया अछि। पहिलुक भूकंपमे मरल, दोसरकेँ ओ तलाक दऽ देलक आ आब ई तेसर अछि। गोसाँइ जानै जे आब एकर की हएत। ई गप आर छल जे जखन-तखन ओ आब दलित आ स्त्रीवादी लेखिकाक तौरपर लेख लिखऽ लागल छल जइमे दलित आ बाकी स्त्रीगणसँ बेसी ओकर दर्द आगू अबैत छल। मुदा ई आरो गप छल जे कियो ओकरासँ ई गप नै पुछलक जे दलित आ स्त्रीगणक हमदर्द बनि कऽ घुरैवाली हाइली टेंपर कोनो दलित छौड़ासँ बियाह किए नै केलक। सभ कियो बौक भऽ गेल छल। मुदा लोक कहैत छल जे बियाहक बादो ओकर रामेंद्रसँ संबंध छल आ आफिसमे होइ बला गप आ गासिप्स ओकरा नै बुझल छलै। फेर एक दिन एहन भेल जे ओकर वर अमित अमन ओकरा रामेंद्रक संग आपत्तिजनक स्थितिमे पकड़ि लेलक। आ फेर की छल, दुनूक संबंधमे खटास आबऽ लगलै। हम अहाँकेँ की बताबी। आब तँ जखन ओ आफिस आबैत छल तँ ओकर चेहरापर मारि-पीटक दाग होइत छलै। दोसर स्त्रीगणक दर्दकेँ लोकक आगू राखैवाली स्त्रीवादी अपने पुरुष प्रताड़नाक शिकार भऽ रहल छल। जखन एक दिन धैर्य चुकि गेलै तँ अमित अमन ओकरा छोड़बाक निश्चिय कऽ लेलक। अहाँ तँ दिल्लीमे नै रहिऐ आ अहाँकेँ दूर-दूरसँ ओकरासँ कोनो मतलब नै छल। एनामे हुनका फेर रामेंद्रक मोन पड़लन्हि। ओ हुनका लग गेल छली, निहोरा सेहो केने छली मुदा रामेंद्र नै पिघलल। ओ सोझे कहि देलक जे अहाँ जेना अप्पन करियर लेल हमरा यूज केलौं तहिना हम अप्पन दैहिक भूख लेल अहाँक शरीरक यूज केलौं। अपना-दुनूक हिसाब-किताब बराबर। आब अहाँक हाइली टेंपरक लग कोनो चारा नै छलै। घरक लोक सभ पहिनेसँ ओकरासँ दूर भऽ गेल छल। ओ अप्पन भाइ-बहीन लेल मरि गेल छली। बहिनोइ आ भाइ लग बिहारमे बड़ जमीन छलन्हि आ जातिक बाभन हेबाक कारण जमीन बचाबै लेल कम्युनिस्ट बनबाक अलाबे कोनो विकल्प नै छलन्हि। बाहरक दुनियामे ओकर परिवारक सभ गोटे दलितक मसीहा बनैत छल मुदा घरमे अप्पन जाति-बिरादरीमे बिआह करैसँ लऽ कऽ खेत बचेबाक हुलिमालि धरि चलैत छल। माँ-बाप आब ऐ दुनियामे नै छलन्हि। फरीदाबादमे जे ओ अप्पन घर लेने छल ओइपर कहिया ने अमित अमन अप्पन कब्जा कऽ लेने छल आ फेर ओ तँ ओकरा पागल सेहो घोषित कऽ देने छल। लोककेँ अप्पन बेसिक इंस्टिंक्ट सँ सरोकार कहियो नै छुटैत छै। आ अहाँकेँ एतेक पैघ मेल लिख कऽ अहाँकेँ पुरनका बात मोन पाड़ि देलौं। मुदा एक बेर जरूर सोचब ऐपर जे भारतक मीडियाक अंदरूनी हालत की अछि, जतऽ हम ठाढ़ छी। कोना छौड़ी सभकेँ प्रताड़ित कएल जाइत अछि। जाति पुछलाक बाद प्रेम कएल जाइत अछि। जाति पुछलाक बाद प्रमोशन भेटैत अछि। छौड़ा आ छौड़ी प्रभाष जोशी, पुण्य प्रसून वाजपेयी, आशुतोष, राजदीप सरदेसाइ, दिलीप पडगांवकर, प्रणव राय आदि केँ देखि दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, कटिहार, पूर्णिया आदि ठामसँ दिल्ली तँ आबि जाइत अछि मुदा एतुक्का चमक ओकरा एहन दलदलमे ठाढ़ कऽ दैत अछि जतए नहिये ओकर अप्पन माटि रहि जाइत अछि आ नहिये एतुक्का माटिपर ठाढ़ रहबा योग्य ओ बनि सकैत अछि। आशा अछि जे अहाँ अप्पन परिवारक संग निकेना हएब। अहींक...।' कुमार भास्कर लछमिनीया अनमन सासुसे सनके लछमिनीयाँ ! बूढिया–पुरैनियाँ सनके सबटा छिच्छा भाषा नवकनिए सऽ छै। साउस अजिया सबउस सब बड़ काया-कष्टसऽ धनवीत अरजने छै, आ ओहिू सऽ बेसी जे ओ सब ओकरा बचा संयोगि कऽ रखने छै। दै-दियादमके सब खेत-पथार विका गेल छै आ एकर बूढिया सब रौदियो अकालमे, शादीयो विवाहमे एकौ ओंठा जमीन बेचने नै छै। तेसरमे अपन सबटा गुण लुरि एकरा पढ़ा कऽ पास करा देने छै। तैं ईहो आइ एतेक कौजली चौतरी। ऐ बातके गुण ई अपन दुनू पुतौहके पुस्तैनीके रुपमे दिअ चाहै छै, से पढ़लाही–लिखलाही सब अपने ढाठी चलि कऽ, एकरा बात पर काने-ध्यान नै दै छै। जेहने रहै लछमिनीयाँ साउस, बात–बात पर फकरा सुनबऽ बाली, तेहने ढाठी–छिच्छा एकरो छै। ओहिना बात-बात पर मुँह सऽ फकरा-फदका निकलि जाइ छै। ओना लछमिनीयाँके घरबला परफेसर, बेटा कमैआ तैयो लछमिनीयाँके बड़ दुख। दुख खाय पियऽके, पहिरऽ–ओढ़ऽके नइ, दुख काज–राजके। जनकपुरमे रहए तऽ गामके आ गाममे रहए त जनकपुरके चिन्ता। इहे दुख रहै छै। ‘आइ गामके सब आम होतै तोड़ि लेने, सब रवी–राई होतै चरा–लेने, आ कहि जे साँचे किछ तोड़ि लेने, चरा लेने रहए त जतै सऽ देखेए ततैसऽ शुरु भऽ जाए होलियाबऽके— “कहै छलियै मरदबा के हम आइये गाम जाइ छी तऽ रोकि देलक, नइ हमरा मिटिङ्गमे जाए पड़तै कनि धोती–कुरता धो दिअ। झुठोके मिटिङ्ग–माटिङ्गमे जाइत रहैए। एको रुपैया त दै नै हइ आ ओहि मिटिङ्गला दू–दू दिन अगते सँ अपनो लिखा–पढ़ी करैत, फोन–फान करैत, बेहाल रहैय आ हमरो धोती–कुरता त इ खोजी दे त ऊ निकालि क ध दे करैत–करैत पेड़ने रहैय। हम काल्हिए आएल रहिती त अते राइ–छिइ होइत, जेहे खैति सेहो त कया–मनुवा जुड़ैति से नइ। एगो छरो जे हइ ओकरा कहैत रहै छियै से रे बौआ जो कनी गाछी–विरछी, रवी–राइ सव देखलीहे आ तुरन्ते अपन चलि अइहे से ओकरा गाम अबैत तेना बाघ गिरैत रहै हइ कि कथी से नै जाइन। लछमिनीयाँके घरबला परफेसर हइ तहुके ओकरा बड़ दुख। ओकरा हिसाबे जते काले मिटिङ्ग करतै ओते कालमे त खेत जोता लेतै किछ वाग क देतै जाहिसऽ किछ उवजो-बारी होतै, ओकरे बेचिकऽ ढौओ रुपैया होतै। अहिना सवदिन जकाँ कुहि होइत भनभनाइत जनकपुर आएल। घर लग पहुचते घरक आगू–पाछुमे रहल गाछ, लत्ती सभके ठेकानैत, बिचारैत आएत आ कहूँ कोइ किछु तोड़ने त नइ हए। आ कहि जे कोनो किछु घटल रहल तऽ घरके दुहाइरे सँ बाजऽ के शुरु करऽ लागल “देखी कहि क गेल छलियै एकरा सबके अपन अगोरा पछोड़ा तकै रहिये। तैयो अतेक लोक घरमे हइ आ एगो लक्ष्मिनिया नै हइ त सब ‘जरम–जरी सब चरा लेलक ! सबहे तोड़ि लेलकै”। सबटा हमर कएल–धएल नाश भऽ गेल। अते सुनिते बेटा–पुतहू सब हाँइ–हाँइ कऽ दौगल आब की भेलै? जेठकी पुतहू कहै— हम तकिते छीऐ। कहाँ, केउ नै किछुमे भिड़लैए। —“नै कोइजे भिरलै त ओइ लुहरीमे एगो कम केना हइ।” लक्ष्मिनिया बाजल “गाम जाए बेरमे हम देख कऽ गेल छली तऽ तिनटा छलै आ अखनि दुइएटा हइ”? बूढिया आरो नै खिसिया जाए तै डरे छोटकी पुतहू बाजल— ”ए उ त हम ओकरा सरियाबऽ गेलिऐ तऽ एगो डाढ़ि टुटि गेलै । तब जाऽ कऽ लछमिनीयाँ किछ ठण्ढाएल। भन भेलै जे तों अपने सरियाबऽ गेल छला, हे रनियाँ! नाँ गुणे लछमिनियाँ अतेक बेहाल बेटे–पुतहु ला रहए। किछ लाबए त बिछल–बिछल घरबला, बेटा–पुतहू लागि राखए। अपना कनहे–कोतरे, बसीआएल, बिगरलहे खाँ लिए। बेटाके नोकरी दोसर सहरमे भेलै त चारि–पाँच दिन अगतेसँ सर–समानके मोटा, बोरा ओरिआबऽ लागल। नून–हरदी, दालि–चाउर, बर्तन–बासन, ओछान–बिछान माने कते कहू घर परिवारमे जे जतेक चिउज-वित लगै छै तेकरा सबके ओरिआयोन बुढिआ फकरा पर फकरा पढैत कएने गेल। “एल लएली बेल लएली, छ घैला तेल लएली........ । नुन तेल सँ लऽ कऽ कपड़ा–लत्ता तक ओरिआ–ओरिआ धरऽ लागल जे कहि किछ बेटा–पुतहूके छूटि नए जाए। बेटा–पुतहू कहए कि जे चिज-वित छुटि जएतै से ओतै किन लेवै। लछमिनिया अनमनएले “ले त धर तोरा ओतै सब चिज भेटतौ त” कहलक। लछमिनीयाँके सैतल किछ कहि छुटे, मात्रे एगो घर दुहारि पोछ लागि पुरान–धुरान कपड़ा कतऽ स लाउँ। बेटा सोचलक आब घरेसऽ कोइ अएतै त ओकरे स मङा लेव जे माइके कहि दै छियै। पुतहू कहे नइ माइ कहि पित्ता जएतै। बेटा कहए एह नइ पित्तैतै। बेटा लछमिनीयाँके फोन कएलक “माइ कानो पुरान–धुरान कपड़ा घर दुहारी पोछ ला चाहि केउ अएतै त पठा दिहे” । लछमिनीयाँ बाजके शुरु कएलक “उँ तहिया कहलियौ ठकानी–ठेकानी कऽ समान सव राखऽ त नइ आखिर छुटिए गेलौ। जेहो फाटल–पुरान नुआ छलै जे हम जायनगरमे किनने रहियै सेहोके तऽ दोकानबला ठकिए लेने रहए से बला नुआके त काल्हिए ओइ बर्तनवालीसँ बदलि लेलिऐ। तेहन चुट रहै उहो बर्तनवालीसे ओतेकटाके नँ सायमे किनने रहि तेकरा एगो कटोरा मात्रे देलक उहो कते झगड़ि तब जाऽ कऽ देलक। तों पहिने कहिते। अच्छा थमः अइ छराके गंजी हइ जे उँ नै पेन्है हइ जेकरा कहै बड़ पुरान भऽ गेलै से हम पठा देवौ। आब राख फोनके बिल वेस उठतौ। एम्हर लछमिनीयााँ के बेटा जे आधा घंटा सँ पुरान कपड़ा ला फोन कएने छल से कहलक “अच्छा होतै”, ओकरो आब कोनो दोसर विषयपर किछु पुछके मन नै भेल आ फोन राखि देलक। आ अपन कनिया जे तखनसऽ लछमिनिया माइ कि कहलकै से बुझऽ लेल उत्सुक छल। तकरा दिसी घुमि कऽ अपन जेबी मेके रुमाल ओकरा दऽ कऽ कहलक “होउ ताबे अहि लऽ कऽ काम चलाउ”। विदेह मैथिली लघुकथा || 273 272 || विदेह मैथिली लघुकथा
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lace देह मैथिली लघ॒कथा 2 विदेह-सदेह ६, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक ४१-१००) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ लघुकथाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनः मानुषीमिह संस्कृतामू है कि हू लि EAC? KG y Gy — me विंदेह-प्रथम मैर्थिलीं पारधिक ई-पत्रिंका = : eed ISSN 2229-547X VIDEHA RH: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादकः उमेश मण्डल। सहायक wares: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्णी)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा fret a सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। — : सम्पादक-नाटक-रंगमंच-चलचित्र: बेचन ठाकुर। सी: सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद: पूनम मंडल आ प्रियंका झा। rt.
| a कवर आ बैक चित्र श्वेता झा चौधरी 7%) ae. ape 6 ts @ a सन —- ee Nees et? eee रण के मे © ea Z See #54 On i) «है eae श्रुति प्रकाशन दा कार्यालय: 6/29, J] राजेन्द्र नगर, दिल््ली-११०००८ FEAT: (099) २४८८६६४६-४७ BHA: (०११) २४८५८६६४८ website: http://www.shruti-publication.com E-mail: shruti.publication@shruti-publication.com कप दर a 250/- US $25