SADEHA — 7

Publication: SADEHA · Issue: 7
Open original PDF at Internet Archive

1 2 ISSN 2229-547X विदेह मैथिली पद्य (विदेह-सदेह ७, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक ५१-१००) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मण्डल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक-नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद: पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक-अनुवाद विभाग: विनीत उत्पल। श्रुति‍ प्रकाशन ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍ एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। ISBN : 978-93-80538-65-5 ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. २००/- संस्‍करण : २०१२ © श्रुति‍ प्रकाशन श्रुति ‍प्रकाशन रजि‍स्‍टर्ड आॅफि‍स : ८/२१, भूतल, न्‍यू राजेन्‍द्र नगर, नई दि‍ल्‍ली- ११०००८. दूरभाष- (०११) २५८८९६५६-५८ फैक्‍स- (०११) २५८८९६५७ Website : http://www.shruti-publication.com e-mail : shruti.publication@shruti-publication.com Printed at : Ajay Arts, Delhi-110002 Typeset by : Umesh Mandal. Distributor : Pallavi Distributors, Ward no-6, Nirmali (Supaul). मो.- ९५७२४५०४०५, ९९३१६५४७४२ Videha Maithili Padya : Anthology of Maithili Verse. अनुक्रम गजेन्द्र ठाकुर- पद्य साहित्य आ ओकर समीक्षाशास्त्र अंजनी कुमार वर्मा “दाऊजी”- आत्मबल/ ओजक भोज/ समस्या/ वासंती गीत/ दुइ गोट भूख/ सुखाएल अतीत/ बेरोजगारक आत्मा/ प्रजा आ तंत्र/ कोसी मिथिलेश कुमार झा- खब्बरदार/ गजल बलराम साह- आकि‍ नीन टूटि‍ गेल गजेन्द्र ठाकुर- [टनका-वाका/ हाइकू/ शेनर्यू/ हैबून/]-२/ रुबाइ/ कता १-२/ गजल १-२/ कुण्डलिया १-४/ कटिहारी रवि भूषण पाठक- हाइकू/ कि भेलए एकरा?/ ऐ‍ बेर छठिमे/ मरणोपरांत/ बर्फ भोर/ देश आ गेयर/ पॉंच केबी/ दोस महिम/ मनोज भाय क चिट्ठी/ बियाह आ मोंछ/ प्‍लेटो आ हमर कनियाँ/ टिप्‍स फ्राम खट्टरकका/ बर्फ पानि भाफ / बस तीने दिन/ उत्‍थर लोक/ चमारक ऋण/ दीवाली क पहिले/ धनतेरस राति/ हम पुरहितिया/ चालीसक बात/ राजेश मोहन झा “गुंजन”- मि‍झाइत दीप/मूड़नक भोज/ थेथर नेता/ केहेन खेल/ गरम जमाना/ चाहक महिमा/ आजुक लोक/ पलायन/ उनटा-पुनट/ अंतरकलह आ विचार/ बैसल-बैसल सोची मनमे/ पादुका वि‍योग/ सुगर फ्री नवीन कुमार "आशा"- सुनू सुनाउ अपन खबरि/रोटी/ हमरा भेटल शंभु नाथ झा ‘वत्स’- उग्रवादी बनि जाइ अजित मिश्र- नव वर्ष डॉ. शेफालिका वर्मा- इजोरियाक भाषा/ उपेक्षित/ देश/ विधाता/ बच्चा आ बेवस्‍था / स्मृति-शेष/ नव वर्ष सतीश चन्द्र झा- चुनाव१-२/ भाषा आ राजनीति/ सत्यक जीत/ भूखल पेट/ पाँच साल/ सौंसे बिहार एखनो बेहाल/ नेन्ना तेतरी सुबोध कुमार ठाकुर- विडम्बना/ प्रतीक्षा किशन कारीगर- दौगल चलि जाएब गाम/ एकटा तँ ओ छलीह राम वि‍लास साहु- कोइली कूहकै आमक डारि‍/ प्रीतक गीत पंकज कुमार झा- भाई रे अना नै परो पंकज कुमार झा- उद्वोधन/ रीढ़ विहीन पुरुष/ सहजता/ आउ सुनु कने बात हमर मुन्नाजी- हाइकू/ शेनर्यू/ बोनिहार/ माटिक ललकार ज्योति सुनीत चौधरी- हाइकू-टनका/ ब्रह्मास्त्र/ मोनक गति/ प्रवासी पक्षी/ आसमानी अकास/ भ्रष्टाचार/ जीतक परिभाषा/ प्रजातन्त्रक खेल/ दूबिक भाग/ स्वतंत्रता दिवस/ पोखरिक कमल/ विचित्र श्रद्धा/ मिथिलांचलक रूपान्तरण/ बचपन/ मिथिला चित्रकला अन्नावरन देवेन्दर- तेलुगु पद्य- अंतिम शब्द गिरीश चन्द्र लाल- नील अकास/ शुभ प्रभात/ मन मे भेल अछि भोर/ एक रंग अनेक रंग गंगेश गुंजन- (आजाद गजल- १/२)/ स्वतंत्रता दिवस २०१० मनीष झा "बौआभाइ"- भेल एहेन अवतार छल लालबाबु कर्ण- जन्मभूमि चन्‍द्रशेखर कामति- आइ काल्हुक छौंड़ा सभ/ दुनू परानी फूकि-फूकि पी/ गीत मनोज झा मुक्ति- हाइकू/ देखाबटी छोड़ि‍ दे राजेन्द्र चौधरी- श्रीकृष्ण भजन/ माँ ताराक भजन रमाकान्त राय “रमा”- वन्दना प्रकाश प्रेमी- गीत सुमन झा "सृजन"- कैक्‍टस जकाँ दि‍ल/ बलि शि‍वकुमार ि‍मश्र- भलमानुस समाज डॉ. बचेश्वर झा- भेँट/ भावाञ्जलि श्यामल सुमन- सत्‍य जय प्रकाश मंडल- उपराग/ भूल कतए भेल सत्येन्द्र कुमार झा- दस गोट क्षणिका कपिलेश्वर साहु- कोसी राधा कान्त मंडल ‘रमण’- स्वागत गीत धीरेन्द्र प्रेमर्षि- किछु रंग फगुआक/ फगुआ गीत/ गजल १-२ सरोज ‘खिलाडी’- गीत नन्‍द वि‍लास राय- गीत १-२/ जनसंख्या विनीत ठाकुर- शान्ति दूत परवा इन्द्रकान्त झा- गीत १-२ मनोज कुमार मंडल- जिनगी/ फैशनक धमाल/ चाह/ मि‍थि‍ला/ जि‍नगीक बाट/ अखन बि‍हार/ वि‍श्वास/ बेटी/ नारी चरि‍त्र डॉ राजीव कुमार वर्मा आ डॉ जया वर्मा- हमर  गाम रामभरोस कापडि भ्रमर- – गजल/ गीत कामिनी कामायनी- वसंत/ बाजारमे स्त्री/ बंजारा मोन बेचन ठाकुर- गीत रमण कुमार सिंह- दिल्लीमे... विद्यानन्द झा (विदू)- हमर मिथिला/ दहेज इन्द्रभूषण कुमार- सफलता हमर रानी/ हमर नगरक दास्तान/ एना किएक होइत अछि?/ हम की करू?/ दहेज/ सहास/ विवेकानंद झा- नोरमे अछि बेस संभावना/ हे सिंगरहार/ खत्म करऽ चाहैत छी जिनगी/ प्रिये !/ हम/ किए प्रिये?/ ना होइत रहतै/ बहुत दिनक बाद/ कविता कविते होइत छैक/ एक दिन अनचोकहिं लिखऽ लागलहुँ कविता/ ढहल ढनमनाएल गाम/ अहाँक मौलाइल अस्तित्व/ अरुणिमा आ इजोरिया/ कहियो गलती सँ/ मऽन मे सदिखन रहैत छी अहाँ/ राति स्वप्न मे प्रिय !/ अहाँ नै जाएब नारायणपट्टी गाम/ देबै ने चिनगी?/ ओ प्रेमहि छल...!/ हम जी रहल छी/ तोरा मे हम/ जतऽ रहैत छैक लौलसा ओकर/ एकांत मे अहाँ/ रहैत छी अहीं मात्र रूप बदलि कऽ/ ऐ संजोग सँ हम करैत छी प्रेम/ हाइकू- शेनर्यू रोशन झा- किछु हाइकू/ गजल प्रबीन चौधरी प्रतीक- किछु हाइकू- क्षणिका/ गजल सुभाष चन्द्र- क्षणिका रवीन्द्र कुमार दास- क्षणिका कुसुम ठाकुर- हाइकू/ शेनर्यू रमा कान्त झा ‘सौराठ’- घर ने पथार अछि टुटल मरैया/ चल चल रे हवा, पूब दिसा/ खिल रे बदन मृदुला प्रधान- एकटा आपबीती/ ओइ दिन / मिथिलाक माटीमे/ कतए गेल  गणतंत्र –दिवस/ यमुनाजी/ अंति‍म/ प्रवीण कश्यप- आच्छादन अरविन्द ठाकुर- आजाद गजल-१-२ धी‍रेन्‍द्र कुमार- हमर गाम अखिलेश कुमार मण्डल- ट्रेनक चोरबा कालीनाथ ठाकुर- अभिशाप बापक पाप- कुण्डलिया १-७ / एक श्रद्धाञ्जलि—कोकिलकेँ/ सत्यानंद पाठक- जाड़ चलि गेल! दयाकान्त- मैथि‍ल रमेश- गद्य कविता- डॉ. काञ्चीनाथ झा ‘किरण’ क नामक अद्वैत मीमांसा शिवशंकर सिंह ठाकुर- रुबाइ/ गजल/ लगै छी अहाँ सोना जकाँ/ श्रद्धान्जलि / इरा मल्लिक- भोर भेलै/ आँखि सुतल नै रातिभरि/ किछु हाइकू/ शेनर्यू/ टनका/ जीवन विनीता झा- हम छी बुद्धिक थोड़ अक्षय कुमार चौधरी- वाणिक लैस जगदीश चन्द्र ठाकुर “अनिल”- गजल १-१२ विकास झा रंजन- नजरि/ गजल अनिल मल्लिक- गीत/ आजाद गजल १-३/ हम कहि दैत छी/ स्वीकारोक्ति आनंद झा "मैथिल"- पंचैती/ हमरा भेटल एक टा चिट्ठी प्रभात राय भट्ट- जन्म लेलौं हम जतए सीता माएक अछि गाम/ यात्रा अमित मोहन झा- कोना जीवन बिततै/ आएल  राखीक त्योहार गुलसारिका- संतोख अछि/ जाहि बएस हमर बहिना फूल लोढ़ै छलीह/ अहाँक जीवनक भावना नवीन- आजाद गजल- १-४ मिहिर झा- रुबाइ १-१२/ बन्द/ कसीदा १-२/ टनका/ हाइकू/ शेनर्यू/ बदरा घुमि घुमि आउ/ गजल/ चक्रव्यूह डॉ॰ शशिधर कुमर- की  इएह कहाबैछ   सुन्नरता ?? अमरेन्‍द्र कुमार मि‍श्र- नेता सुबोध झा बतहिया/ शाइरी १-५/ मनबतिया/ संस्कृति ओ संस्कार/ जिनगी मो. गुल हसन- सभटा कि‍सानमे हमहीं बकलेल... प्रीति‍ प्रि‍या झा- बेटी पवन कुमार साह- प्रेम/ गीत-१-२ स्तुति नारायण- मन पड़ैत अछि स्वाती शाकम्भरी- पिताजी अरविन्द रंजन दास- क्षणिका बि.पि.उदासी- एलै जिबनक आहार प्रमोद रंगीले- देखियौ अपन देशमे रवि मिश्र “भारद्वाज”- अन्तिम क्षणमे/ मरहम/ मतदान/ कलेश/ आजाद गजल१-५/ नवकी बहुरिया मधुपनाथ झा- धरती हमरासँ खिसिआएल अछि/ आएल वसंत उल्लास लए बृषेश चन्द्र लाल- टनका/ हाइकू-शेनर्यू/ जीवन सपना/ किछु हाइकू/ शेनर्यू आशुतोष मिश्र- गीत १-३/ आजाद गजल १-२ इप्सिता सारंगी- ओड़िया कविता- हिलकोर मनोज कुमार झा- शासक लोकनिसँ (बाढ़िक सन्दर्भमे) शान्तिलक्ष्मी चौधरी- हाइकू/ गद्य कविता/ तिलकोर, बथुआक तीमन, गजल १-८ शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’- हाइकू/ क्षणप्रभा नवीन ठाकुर- अंत- एक अनुभूति/ अनुभव डॉ अरुण कुमार सिंह-   सोधनपाल/ प्रियवर सम्पादकजी कुन्दन कुमार- आँखि झूठ नै बजैत अछि झा हेमन्त बापी- माधुरी- एक नारी/ दोषी/ धिया/की कहू/ दानव/ जेकर नै कएल जाएत बखान राहुल राही- हमर प्रियतम! जवाहर लाल कश्यप- खाइ/ समयक धार/ छी धन्य हम, हम्मर मिथिला/ अन्ना जी भऽ गेलथि चुप/ काटि लिअ कोना दुनू पाँखि/ हम पुछलियन्हि के छी बाबू? अच्‍छेलाल शास्‍त्री- की देख रहल छी?/ दू हजार दस श्रावणक दृश्‍य सत्यनारायण झा- पत्र/ गंगाकातमे/ धारक कछेर मे बैसल टुकुर टुकुर तकइत छी शिवशंकर श्रीनिवास- गीत १-२ विनीत उत्पल- राजनीति/ भाषा/ शंका/ स्मृतिलोप/ प्रश्न/ बेटी/ गजल १-२ निक्की प्रियदर्शिनी- मन्तव्य/ समाजक प्रश्न/  अहाँ अहीं सन/ दर्द आँखिमे नै मनमे नारायण झा- सरकार/ जाड़ गणेश कुमार झा "बावरा"- बड़का काका/ संघर्ष/ अहाँ बिनु परिचय दास- भोजपुरी कविता- बेसीकाल शब्द जखन स्वाती लाल- गजल १-२ मुकुन्द मयंक- गजल १-३ आशीष अनचिन्हार- बन्द १-२/ कता १-४/ नात/ सोझ बाट पर चलैत-चलैत/ सेनूरदानक गीत पवन झा “अग्निवाण”- चलियौ अप्पन गाम, जगत-जननी सीता के धाम प्रवीण नारायण चौधरी- सभ सँ सस्ता कविता!/ नीक लगै तोहर मुस्कान संजीव कुमार ‘शमा’- क्रांति‍ दीप सुधीर कुमार ‘सुमन’- समए उपेन्‍द्र नारायण ‘अनुपम’- दुख हम्‍मर/ घी कनी/ परदेसि‍या प्रि‍यतम डॉ. शि‍व कुमार प्रसाद- निर्मलीक निर्मलतामे/ तैं कि‍छु ने कि‍छु लि‍खैत जाउ प्रो. राजकुमार नीलकंठ- स्रष्टा राजदेव मण्डल- देश-गीत/ जुलूसक पछुआ/ कनेक सुनू/ असल मरद/ पोसा परबा/ हेलवार/ कलीक प्रश्न/ कुहेस/ जय हे कि‍सान जगदीश प्रसाद मण्डल- जरनबि‍छनी/ दि‍न-राति‍क खेल/ कि‍छु ने बूझै छी/ चल रे जीवन/ बौड़ाएल बटोही/ साँझ/ घोड़ मन/ मन-मणि‍/ रहसा चौर/ गीत १-६ मुन्नी कामत- समाजक वि‍डम्‍बना/ बेटी/ जिंदगीक मरीचिका/  ताकैत जिनगी कूड़ा ढ़ेरमे/ संकल्प/ ठमकल शब्द/ दहेजक बिहाड़ि/ हराएल हमर रूप/ विदाइ सुनील कुमार झा- टनका-हाइकू/ गजल १-२ जगदानन्द झा “मनु”- हजल/ रुबाइ १-२/ गजल१-४/ एक दिन हमहूँ मरब कुन्दन कुमार कर्ण आजाद गजल १-३ अमित मिश्र- हजल/ गजल १-५ चन्दन कुमार झा- रुबाइ/ हजल/ गजल १-३ रुबी झा- गजल अनुप्रिया योग- किछु क्षणिका सद्रे आलम गौहर- गजल/ अना हजारेसँ अनसन तोड़बाक अनुरोध/ मैथिल सभकेँ ईद मुबारक बिनोद मिश्र- प्रेम पुष्प रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार- झारु ओम प्रकाश झा रुबाइ १-२/ गजल १-४ त्रिपुरारी कुमार शर्मा- आजाद गजल १-२ राजीव रंजन मिश्र- भक्ति गजल दीप नारायण विद्यार्थी- आजाद गजल उमेश मण्डल- भोगी/ श्रोता उमेश पासवान- गबहा संक्राति संजय कुमार मंडल- मीता हमरा मोन पड़ैए/ परदेसिया/ शीतलहरि रूपेश कुमार झा ‘त्योंथ'- खाएब की/ हम छी आजुक नेता कामोद झा- कि‍यो नै कपि‍लेश्वर राउत- मातृभाषा जीबू कुमार झा प्रार्थना गीत/ पहिल भेंट अनामिका राज नवका बाट प्रो. चम्पा शर्मा डोगरी कविता- स्नेह-भरल सनेस मोहन प्रसाद आउ करी नव मिथिलाक निर्माण नगीना कुमारी झा  साहसक डोरी/ मोन पड़ैए/ दहेज प्रथा लालबाबू मण्डल जुलुश संदीप कुमार साफी- भकजोगनी/ वसन्त पंचमी

गजेन्द्र ठाकुर पद्य साहित्य आ ओकर समीक्षाशास्त्र साहित्यक दू विधा अछि गद्य आ पद्य । छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओ गद्य थीक। छन्द माने भेल एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए । हरिमोहन झा “अकविताक प्रति : कविताक उक्ति” लिखै छथि आ गोपाल जी झा “गोपेश” “हे कवि कोकिल आजुक युग मे अहाँ जे होइतहुँ” मे कहै छथि –-अपनहि लिखितहुँ अपनहि बुझितहुँ- आ से कहि अपन अपन मत स्पष्ट करै छथि। मुदा ऐसँ ई नै बुझबाक चाही जे आजुक नव कविता गद्य कोटिक अछि कारण वेदक सावित्री (गायत्री छन्दमे) मंत्र सेहो शिथिल/ उदार नियमक कारण गायत्री छंदमे परिगणित होइत अछि, जेना यदि अक्षर पूरा नै भेल तँ प्रत्येक पादमे एक आकि दू अक्षर बढ़ा लेल जाइत अछि, य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना- वरेण्यम्=वरेणियम् आ स्वः= सुवः। मैथिली पद्य साहित्यक समीक्षाशास्त्र: कविताक लय, बिम्बपर विचार करए पड़त संगहि कविताक खण्डकेँ कविताक मुख्य शरीरसँ मिलान करए पड़त। आजुक नव कविताक संग हाइकू लेल मैथिली भाषा आ लिपि व्यवस्था सर्वाधिक उपयुक्त्त अछि। गजल, रुबाइ आदिमे वार्णिक आ मात्रिक दुनू छन्द व्यवस्था कारगर अछि आ बिनु बहर (छन्दक) आजाद गजल सेहो लिखल जाइत अछि। कोनो रचना अप्रासंगिक नै होइत अछि आ जौँ ओ अहाँकेँ हिलोड़ि दिअए तँ ओ रचना सार्थक कोना नै हएत? प्लेटो- प्लेटो कहै छथि जे कोनो कला नीक नै भऽ सकैए किएक तँ ई सभटा असत्य आ अवास्तविक अछि। प्लेटोक ई विचार स्पार्टासँ एथेंसक सैन्य संगठनक न्यूनताकेँ देखैत देल विचारक रूपमे सेहो देखल जएबाक चाही। ओ काव्य/ नाटकक ऐ रूपेँ विरोध केलन्हि जे सम्वादकेँ रटि कऽ बाजैसँ लोक एकटा कृत्रिम जीवन दिस आकर्षित हएत। अरिस्टोटल कविताकेँ मात्र अनुकृति नै मानै छथि, ओ ऐ मे दर्शन आ सार्वभौम सत्य सेहो देखै छथि। प्राचीन ग्रीसमे कविता भगवानक सनेस बूझल जाइत छल। एरिस्टोफिनीस नीक आ अधला, ऐ दू तरहक कविता देखै छथि तँ थियोफ्रेस्टस कठोर, उत्कृष्ट आ भव्य ऐ तीन तरहेँ कविताकेँ देखै छथि। कविता आ संगीत अभिन्न अछि। मुदा यूरोपक सिम्फोनी, जइमे ढेर रास वादन एके संगे विभिन्न लयमे होइत अछि, सिद्धांतमे अन्तर अनलक। फिलिप सिडनीसँ अंग्रेजी समीक्षाक प्रारम्भ देखि सकै छी- ओ कविताकेँ सौन्दर्य, अर्थ आ मानवीय हितमे देखलन्हि। नव समीक्षा- इलिएट कवितामे भावनाक प्रधानताक विरोध कएल आ एकरा गएर वैयक्तिक बनेबाक आग्रह केलनि। रोमांशवाद कविताक व्यक्तिगत अनुभव होएबाक बात कहैए। बार्थेज संरचनावाद-उत्तर-संरचनावादक सन्दर्भमे लेखकक उद्देश्यसँ पाठकक मुक्तिक लेल लेखकक मृत्युकेँ आवश्यक मानै छथि- लेखकक मृत्यु माने लेखक रचनासँ अलग अछि आ पाठक अपना लेल अर्थ तकैत अछि। जादुइ वास्तविकतावाद जइमे वास्तविक स्थितिमे जादुइ वस्तुजात घोसिआओल जाइत अछि, रचनाकार ऐ तरहक प्रयोग कऽ वास्तविकताकेँ नीक जकाँ बुझबाक प्रयास करै छथि। उत्तर आधुनिक पाश्चात्य बुर्जुआ दृश्य-श्रव्य मीडियाक प्रयोग कऽ असमता, अन्याय आ वंचितक अवधारणाकेँ मात्र शब्द कहै छथि जे समता, प्राप्ति आ न्यायक लगक शब्द अछि। गरीबी जे पाश्चात्यमे समस्या नै अछि से आइ भारतमे पैघ समस्या अछि। उत्तर आधुनिकता नारीवादक आ मार्क्सवादक विरोधमे अछि आ एकर नारीवाद आ मार्क्सवाद  विरोध केलक अछि। जेना ऐतिहासिक विश्लेषणक पक्षमे मार्क्सवाद अछि आ संरचनावाद-उत्तर-संरचनावाद आ उत्तर आधुनिकतावादक परिप्रेक्ष्यमे ओइसँ ओ अपन सिद्धांत फेरसँ सशक्त केलक अछि। मार्क्सवाद लौकिक पक्षपर जोर दैत अछि मुदा तेँ ई उपयोगितावाद आ चार्वक दर्शनक लग नै अछि, कारण उपयोगितावाद आ चार्वकवाद मात्र शारीरिक आवश्यकताकेँ ध्यानमे रखैत अछि। नारीवादी दृष्टिकोण सेहो उत्तर आधुनिकतावादक यथास्थिवादक विरोध केलक अछि कारण यावत से खतम नै हएत ताधरि नारीक स्थितिमे सुधार नै आएत। आधुनिकतावादी-स्थितिवाद, नव समीक्षा, संरचनावाद आ उत्तर संरचनावादक बाद विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकतावाद आएल, जकरा विलम्बित पूँजीवाद कहल गेल (फ्रेडरिक जेनसन)। आधुनिक स्थितिवाद (साहित्यक अवस्थितिपर कोनो प्रश्न चिन्ह नै) पर संरचनावाद प्रहार केलक आ तकरा बाद लेखक स्वयं लिखल टेकस्टक विश्लेषण करबाक अधिकार गमेलक। संरचनावाद दमित करैबला पाश्चात्य व्यवस्था आ समाजपर चोट करैए आ ऐ सँ मार्क्सवादकेँ बल भेटलै (अलथूजर)।उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्य ओइसँ आगाँक वस्तु अछि जे संरचनावाद बुझै अछि। उत्तर-संरचनावादक एकटा प्रकार अछि उत्तर आधुनिकता।  उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्यमे संरचना संस्कृति आ सिद्धान्त मध्य कार्य करैत अछि, जत्तऽ किछु भाव आ सोच वंचित अछि जे निरन्तरताक विरोध करैए। विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकता उत्तर संरचनावादक बाद आएल। उत्तर उपनिवेशवाद उपनिवेशक नव रूपकेँ नै मानैए आ अव्यवस्थाक सिद्धांत सन असफल उद्देश्यकेँ उचित परिणाम नै भेटबाक कारण मानैए। काव्यक भारतीय विचार: मोक्षक लेल कलाक अवधारणा, जेना नटराजक मुद्रा देखू। सृजन आ नाश दुनूक लय देखा पड़त। स्थायी भावक गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनब- आ ऐ सन कतेक रसक सीता आ राम अनुभव केलन्हि (देखू वाल्मीकि रामायण)। कृष्ण भारतीय कर्मवादक शिक्षक छथि तँ संगमे रसिक सेहो। कलाक स्वाद लेल रस सिद्धांतक आवश्यकता भेल आ भरत नाट्यशास्त्र लिखलन्हि। अभिनवगुप्त आनन्दवर्धनक ध्वन्यालोकपर भाष्य लिखलन्हि। भामह ६अम शताब्दी, दण्डी सातम शताब्दी आ रुद्रट ९अम शताब्दी, एकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। रस सिद्धान्त: भरत:- नाटकक प्रभावसँ रसक उत्पत्ति होइत अछि। नाटक कथी लेल? नाटक रसक अभिनय लेल आ संगे रसक उत्पत्ति लेल सेहो। रस कोना बहराइए? रस बहराइए कारण (विभाव), परिणाम (अनुभाव) आ संग लागल आन वस्तु (व्यभिचारी)सँ। स्थायीभाव गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनैए, जकर स्वाद हम लऽ सकै छी। भट्ट लोलट:- स्थायीभाव कारण-परिणाम द्वारा गाढ़ भऽ रस बनैत अछि। अभिनेता-अभिनेत्री अनुसन्धान द्वारा आ कल्पना द्वारा रसक अनुभव करैत छथि। लोलट कविकेँ आ संगमे श्रोता-दर्शककेँ महत्व नै दै छथि। शौनक:- शौनक रसानुभूति लेल दर्शकक प्रदर्शनमे पैसि कऽ रस लेब आवश्यक बुझै छथि, घोड़ाक चित्रकेँ घोड़ा सन बूझि रस लेबा सन। भट्टनायक कहै छथि जे रसक प्रभाव दर्शकपर होइत अछि। कविक भाषाकेँ ओ भिन्न मानैत छथि। रससँ श्रोता-दर्शकक आत्मा, परमात्मासँ मेल करैए। रसक आनन्द अछि स्वरूपानन्द। आ ऐसँ होइत अछि आत्म-साक्षात्कार। रस सिद्धान्त श्रोता-दर्शक-पाठक पर आधारित अछि। ई श्रोता-दर्शक-पाठकपर जोर दैत अछि। ध्वनि सिद्धान्त: आनन्दवर्धन ध्वन्यालोक- साहित्यक उद्देश्य अर्थकेँ परोक्ष रूपेँ बुझाएब वा अर्थ उत्पन्न करब अछि। ई सिद्धान्त दैत अछि परोक्ष अर्थक संरचना आ कार्य, रस माने सौन्दर्यक अनुभव आ अलंकारक सिद्धान्त। आनन्दवर्धन काव्यक आत्मा ध्वनिकेँ मानैत छथि। ध्वनि द्वारा अर्थ तँ परोक्ष रूपेँ अबैत अछि मुदा ओ अबैत अछि सुसंगठित रूपमे। आ ऐसँ अर्थ आ प्रतीक, ई दूटा सिद्धान्त बहार होइत अछि। ऐसँ रसक प्रभाव उत्पन्न होइत अछि, ऐसँ रस उत्पन्न होइत अछि। न्याय आ मीमांसा ऐ सिद्धान्तक विरोध केलक, ई दुनू दर्शन कहैत अछि जे ध्वनिक अस्तित्व कतौ नै अछि, ई परिणाम अछि अनुमानक आ से पहिनहियेसँ लक्षणक अन्तर्गत अछि। आ से सभ शब्द द्वारा वर्णित हएब सम्भव नै अछि। स्फोट सिद्धांत: भर्तृहरीक वाक्यपदीय कहैत अछि जे शब्द आकि वाक्यक अर्थ स्फोट द्वारा संवाहित अछि। वर्ण स्फोटसँ वर्ण, पद स्फोटसँ शब्द आ वाक्य स्फोटसँ वाक्यक निर्माण होइत अछि। कोनो ज्ञान बिनु शब्दक सम्बन्धक सम्भव नै अछि। ई भारतीय दर्शनक ज्ञान सिद्धान्तक एकटा भाग बनि गेल। अर्थक संप्रेषण अक्षर, शब्द आ वाक्यक उत्पत्ति बिन सम्भव अछि। स्फोट अछि शब्दब्रह्म आ से अछि सृजनक मूल कारण। अक्षर, शब्द आ वाक्य संग-संग नै रहैए। बाजल शब्दक फराक अक्षर अपनामे शब्दक अर्थ नै अछि, शब्द पूर्ण हएबा धरि एकर उत्पत्ति आ विनाश होइत रहै छै। स्फोटमे अर्थक संप्रेषण होइत अछि मुदा तखनो स्फोटमे प्राप्ति समए वा संचारक कालमे अक्षर, शब्द वा वाक्यक अस्तित्व नै भेल रहै छै। शब्दक पूर्णता धरि एक अक्षर आर नीक जकाँ क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए आ वाक्य पूर्ण हेबा धरि शब्द क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए। सांख्य, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा आ वेदान्त ई सभ दर्शन स्फोटकेँ नै मानैत अछि। ऐ सभ दर्शनक मानब अछि जे अक्षर आ ओकर ध्वनि अर्थकेँ नीक जकाँ पूर्ण करैत अछि। फ्रांसक जैक्स डेरीडाक विखण्डन आ पसरबाक सिद्धान्त स्फोट सिद्धान्तक लग अछि। अलंकार सिद्धान्त: भामह अलंकारकेँ समासोक्ति कहै छथि जे आनन्दक कारण बनैए। दण्डी आ उद्भट सेहो अलंकारक सिद्धान्तकेँ आगाँ बढ़बै छथि। अलंकारक मूल रूपसँ दू प्रकार अछि, शब्द आ अर्थ आधारित आ आगाँ सादृश्य-विरोध, तर्कन्याय, लोकन्याय, काव्यन्याय आ गूढ़ार्थ प्रतीति आधारपर। मम्मट ६१ प्रकारक अलंकारकेँ ७ भागमे बाँटै छथि, उपमा माने उदाहरण, रूपक माने कहबी, अप्रस्तुत माने अप्रत्यक्ष प्रशंसा, दीपक माने विभाजित अलंकरण, व्यतिरेक माने असमानता प्रदर्शन, विरोध आ समुच्चय माने संगबे। औचित्य सिद्धान्त: क्षेमेन्द्र औचित्य विचार चर्चामे औचित्यकेँ साहित्यक मुख्य तत्व मानलन्हि। आ औचित्य कतऽ हेबाक चाही? ई हेबाक चाही पद, वाक्य, प्रबन्धक अर्थ, गुण, अलंकार, रस, कारक, क्रिया, लिंग, वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात माने फाजिल, काल, देश कुल, व्रत, तत्व, सत्व माने आन्तरिक गुण, अभिप्राय, स्वभाव, सार-संग्रह, प्रतिभा, अवस्था, विचार, नाम आ आशीर्वादमे। कंपायमान अछि ई ब्रह्माण्ड आ ई अछि कंपन मात्र। कविता वाचनक बाद पसरैत अछि शान्ति, शान्ति सर्वत्र आ शान्ति पसरैत अछि मगजमे। अपन व्यक्तिगत प्रशंसा आ दोसराक प्रति आक्षेपक कवितामे ब्लैकमेलर साहित्यकार द्वारा प्रयोग करबाक गुंजाइश रहैत अछि। मुदा तथ्यपूर्ण मूल्यांकनसँ लेखकक ऐ प्रवृत्तिकेँ समीक्षक चिन्हित करैत छथि। जातिवाद-सांप्रदायिकतावाद आबिये जाइत छैक, तकरा समीक्षक चिन्हित करैत छथि, हीन भावनासँ ग्रस्त साहित्य कल्याणकारी कोना भऽ सकत? समीक्षक ई सेहो चिन्हित करैत छथि। मैथिली साहित्य, जतए पाठकक संख्या शून्य छलै, एक साहित्यकार दोसराक समीक्षा करैत छल आ एतए व्यक्तिगत अहम् आ ब्लैकमेलिंगक पूर्ण गुंजाइश छलै, अखनो सुखाएल मुख्यधारा (!)क पद्यमे ई लक्षण भेटैत अछि। अहाँ दू-चारिटा सुखाएल मुख्यधारा (!)क कवि सम्मेलनमे चलि जाउ, उद्घोषकक उद्घोषणा आ थोपड़ी, उद्घोषकक आ साहित्यकारक पूर्वाग्रहकेँ चिन्हित कऽ देत, माने ब्लैकमेलिंग आ ब्लैक-मार्केटिंग द्वारा कविताक पुरस्कार लेल लिखल जाएब। मुदा बुकर आ नोबल साहित्य पुरस्कार प्राप्त साहित्य सेहो कालातीत नै रहि पबैत अछि, बहुत रासकेँ तँ लोक मोन रखैत अछि मुदा ढेर रास विस्मृत भऽ जाइत छथि आ पाठक ओकर मूल्यांकन ऐ तरहेँ कऽ दैत छथि। पद्य लोक कम पढ़ैत अछि। संस्कृतसन भाषाक प्रचार-प्रसार लेल कएल जा रहल प्रयास अन्तर्गत सम्भाषण-शिविरमे सरल संस्कृतक प्रयोग होइत अछि। कथा-उपन्यासक आधुनिक भाषा सभसँ संस्कृतमे अनुवाद होइत अछि मुदा पद्य ओइ प्रक्रियामे बारल रहैत अछि। कारण पद्य कियो नै पढ़ैत अछि आ जइ भाषा लेल शिविर लगेबाक आवश्यकता भऽ गेल अछि, तइ भाषामे पद्यक अनुवाद ऊर्जाक अनर्गल प्रयोग मानल जाइत अछि। मैथिलीमे स्थिति एहन सन भऽ गेल अछि, जे गाम आइ खतम भऽ जाए तँ ऐ भाषाक बाजएबलाक संख्या बड्ड न्यून भऽ जाएत। लोक सेमीनार आ बैसकीमे मात्र मैथिलीमे बजताह। मैथिली-उच्चारण लेल शिविर लगेबाक आवश्यकता तँ अनुभूत भइए रहल अछि (जातिवादी रंगमंचक नाटक देखि लिअ, ई स्पष्ट भऽ जाएत जे हमरा सभकेँ सुखाएल मुख्यधारा (!)क लेल मैथिली उच्चारणक लेल शिविर लगाबए पड़त)। तँ ऐ स्थितिमे मैथिलीमे पद्य लिखबाक की आवश्यकता आ औचित्य ? समयाभावमे पद्य लिखै छी, ऐ गपपर जोर देलासँ ई स्थिति आर भयावह भऽ सोझाँ अबैत अछि। एहना स्थितिमे आस-पड़ोसक घटनाक्रम, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, आक्षेप आ यात्रा-विवरणी यएह सुखाएल मुख्यधारा (!)क मैथिली पद्यकक विषय-वस्तु बनि गेल छल। मुदा ऐ सभ लेल गद्यक प्रयोग किए नै? कथाक नाट्य-रूपान्तरण रंगमंच लेल कएल जाइत अछि मुदा गद्यक पद्यमे रूपान्तरण कोन उद्देश्यसँ? समयाभावमे लिखल जा रहल ऐ तरहक पद्य सभक पाठक छथि गोलैसी केनिहार समीक्षक लोकनि आ स्वयं आमुखक माध्यमसँ अपन पद्यक नीक समीक्षा केनिहार गद्यसँ पद्यमे रूपान्तरकार महापद्यकार लोकनि ! पद्य सर्जनाक मोल के बूझत ! व्यक्तिगत लौकिक अनुभव जँ गहींर धरि नै उतरत तँ से तुकान्त रहला उपरान्तो उत्कृष्ट पद्य नै बनि सकत। पारलौकिक चिन्तन कतबो अमूर्त रहत आ जँ ओ लौकिकसँ नै मिलत तँ ओ सेहो अतुकान्त वा गोलैसी आ वादक सोंगरक अछैतो सिहरा नै सकत। मनुक्खक आवश्यकता अछि भोजन, वस्त्र आ आवास, आ तकर बाद पारलौकिक चिन्तन। जखन बुद्ध ई पुछै छथि जे ई सभ उत्सवमे भाग लेनिहार सभ सेहो मृत्युक अवश्यंभाविताकेँ जनै छथि? आ से जँ जनै छथि तखन कोना उत्सवमे भाग लऽ रहल छथि! से आधुनिक मैथिली पद्यकार जखन अपन भाषा-संस्कृतिक आ आर्थिक आधारक आधार अपना पएरक नीचाँसँ विलुप्त होइत देखै छथि आ तखनो आँखि मूनि कऽ ओइ सत्यकेँ नै मानैत छथि, तखन जे देश-विदेशक घटनाक्रम आ वाद पद्यमे घोसिआबए चाहै छथि, देशज दलित समाज लेल जे ओ उपकरि कऽ लिखऽ चाहै छथि, उपकार करऽ चाहै छथि, तँ तइमे धार नै आबि पबैत अछि। तँ पद्यकेँ उत्कृष्टता चाही। भाषा-संस्कृतिक आधार चाही। ओकरा खाली आयातित विषय-वस्तु नै चाही, जे ओकरापर उपकार करबाक दृष्टिएँ आनल गेल छै। ओकरा आयातित सम्वेदना सेहो नै चाही जे ओकर पएरक नीचासँ विलुप्त भाषा-संस्कृति आ आर्थिक आधारकेँ तकबाक उपरझपकी उपकृत प्रयास मात्र हुअए। नीक पद्य कोनो विषयपर लिखल जा सकैत अछि। बुद्धक मानवक भविष्यक चिन्ताकेँ लऽ कए, असञ्जाति मनकेँ सम्बल देबा लेल, नै तँ लोक प्रवचनमे ढोंगी बाबा ऐठाम जाइते रहताह। समाजक भाषा-संस्कृति आ आर्थिक आधारक लेल सेहो, नै तँ मैथिली लेल शिविर लगाबैए पड़त। बिम्बक संप्रेषणीयता सेहो आवश्यक, नै तँ पद्यकार लेल पहिनेसँ वातावरण बनाबए पड़त आ हुनकर पद्यक लेल मंचक ओरिआओन करए पड़त, हुनकर शब्दावली आ वादक लेल शिविर लगा कऽ प्रशिक्षण देल जएबाक आवश्यकता अनुभूत कएल जाएत आ से किछु पद्यकार लोकनि कइयो रहल छथि!  मिथिलाक भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ सांस्कृतिक कट्टरता; आ राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म आ दर्शन सेहो पद्यमे अएबाक चाही। आ से नै भेने पद्य एकभगाह भऽ जाएत, ओलड़ि जाएत, फ्रेम लगा कऽ टंगबा जोगड़ भऽ जाएत। पद्य रचब विवशता अछि, साहित्यिक। जहिया मिथिलाक लोककेँ मैथिली भाषा सिखेबा लेल शिविर लगाओल जएबाक आवश्यकता अनुभूत हएत, तहिया पद्यक अस्तित्वपर प्रश्न सेहो ठाढ़ कएल जा सकत। आ से दिन नै आबए तइ लेल सेहो पद्यकारकेँ सतर्क रहए पड़तन्हि, आ से ओ सभ सतर्क छथि। पद्यमे जे पैघत्वक (जे हीन भावनाक एकटा रूप अछि) भावना होइ छै, तकरा चिन्हित कएल जाए। मेडियोक्रिटी चिन्हित करू- तकिया कलाम आ चालू ब्रेकिंग न्यूज- आधुनिकताक नामपर, युगक प्रमेयकेँ माटि देबाक विचार ऐमे नै भेटत, से ऐ अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्यक, बुश-सद्दामक आलोचनामे धार ओइ कारणसँ नै आबि पबैत अछि। कोनो मन्दिर-मस्जिदक जे ओ समर्थन-विरोध करैत छथि वा कोनो नन्दीग्राम-लालगढ़क सेहो, तँ ओइमे सेहो तइ तरहक धार नै अबैत अछि। दारू पीबि मँतल मानववादी, धर्मनिरपेक्षतावादी, वामपंथवादी आ दक्षिणपंथवादी, हिनकर विचार लागत ओंघाएल, युगक सभ शब्दावली भरताह आ पद्य तैयार। अमेरिकाक आलोचनामे धार कोना आओत आ वामपंथक पक्षमे सेहो- जखन अपन आजीविका दक्षिणपंथक मदतिसँ चलि रहल अछि! संघर्षक अभाव सृजनात्मकताक स्तरकेँ समए बढ़लासँ बढ़ेबाक बदला घटबैत अछि। युगक अनुरूप सभ चलैए, ओकर विपरीत चलब तखन ने सृजनात्मकताक संग चाही, दोसराकेँ पलायनवादी कहनिहार ऐ तरहक सुविधावादी तत्वकेँ चिन्हित करू, गहींर पैसब जिनका लेल संभव नै। इतिहाससँ जुड़ाव ऐतिहासिक मनोभावनासँ जोड़ि सकत। वर्तमान सामाजिक व्यवस्थाकेँ माटि देबामे धारक अभाव- हीनभावनाग्रस्त आ अपराध भावसँ भरल लेखकसँ संभव नै। न्याय वैशेषिक आ सांख्य-योगक वस्तुवाद, बाह्यक यथार्थ आ मायाक विरोध, गृहस्थ जीवन, लोक हित, कला आ साहित्यक कृति; आत्माक भीतरक ज्ञान प्रज्ञापर आधारित होइत अछि जे अखण्ड अछि- गति, स्वतंत्रता, सर्जनात्मक परिवर्तन। इतिहास वा साहित्यक इतिहास हम बदलि नै सकैत छी आ एतए उच्च आ मध्यवर्गक स्मृति आधारित मिथिलाक स्वर्णयुग(!); मुदा तकर महत्व दूरदर्शन आ चलचित्र टामे भऽ सकैत अछि। उदारवाद, औद्योगिकरण आ तकर आर्थिक विकासक सफलता-असफलता, सामाजिक रूपमे समाजक पिछड़ल वर्गक विरोधकेँ आरक्षण आ स्वतंत्रता पसारि देलक मुदा संगहि एकर तीव्रता कम केलक से चाहे ओ नक्सलवाद हुअए वा माओवाद वा मर्क्सवाद-लेनिनवाद। बुर्जुआ वर्गक लेल ई फाएदा रहल। बुर्जुआ वर्गक राजनैतिक आ सांस्कृतिक संगठन पसरल; आ सर्वहारा वर्ग धरि ई पहुँचए से प्रयास; आ महिला लोकनिकेँ ऐमे सम्मिलित करबाक प्रयास। पाइ आ सुविधा अपना संग परम्परागत नैतिकताकेँ तोड़लक। कम्पनी अपन स्वतंत्र अस्तित्व बनेलक आ परिवार आ व्यक्ति ऐ तरहक कम्पनीकेँ नौकरीपेशा लोकक संग चलबए लागल। प्रकृतिपर नियन्त्रण आ मानवीय व्यवहारक अवलोकन, काजक लेल अन्न आ काजक बदला पाइ, रोजगार गारन्टी कार्यक्रम, जनवितरण प्रणालीक दोकान, रोजगार लेल देश-विदेश छोट हएब, परिवारक आधारपर आघात, पूँजीवादी विश्व अर्थव्यवस्था, परिवर्तन आपरूपी नै वरन् संघर्ष आ प्रयाससँ भेटत। स्वतंत्र मानवीय संवेदना जे नीक भविष्यक गारंटी नै दैत अछि तँ ई अधलाहक सेहो गारंटी नै दैत अछि। हमरा लग विकल्प अछि आ मैथिली पद्यक पुनर्जीवनक जे प्रमाण भेटि रहल अछि से आह्लादित करैबला अछि। विकल्प हमरा सभकेँ तकबाक अछि जे सनसनी पसारी आकि कार्य करी। समीक्षाक प्राच्य आ पाश्चात्य सिद्धांत सभक आलोकमे समीक्षा: (सिद्धान्त आ प्रयोग) बूच जीक किछु कविताकेँ समीक्षाशास्त्रक सिद्धान्त आ प्रयोगक पाठशाला लेल हम चुनने छी। आउ आगाँ बढ़ी आ देखी:- जेठी करेह: बूच जीक कविता जेठी करेह, कवितामे कवि कहै छथि जे ई भोरमे उधिआइत अछि, बर्खा हेठ भेलोपर उपलाइत अछि। खतराक बिन्दु बड्ड ऊपर छै तखन ओ किए अकुलाइत अछि? आ आखिरीमे कहै छथि जे बान्ह तोड़ि ई प्रलय मचाओत से बुझाइत अछि! ई भेल ऐ कविताक सामान्य पाठ। आब एतए एकरा संरचनावादी दृष्टिकोणसँ देखी तँ लागत जे करेह सवेरे उधिआइत अछि तँ आशा करू जे आन बेरमे ई नै उधिआइत हएत। बरखा हेठ भेने उपलाइत अछि मुदा से नै हेबाक चाही। इन्होर पानिक चमकब, मोरपर भौरी देब आ तकर परिणाम जे डीहक करेजकेँ ई अपनामे समा लैत अछि। ओकर रेतक बढ़लासँ कविक धैर्य चहकै छन्हि। आब कने संरचनावादसँ हटि कऽ एकर ऐतिहासिक विश्लेषणपर आउ। ई नव युगक लेल एकटा नव अर्थ देत। खतराक बिन्दु जे कविक समएमे उँचगर लगैत हएत आब बान्हक बीचमे भेल जमा धारक मवादक चलते ओतेक उँच नै रहि गेल। से नव पीढ़ी लेल कविक कविता कविसँ फराक एकटा नव स्वरूप लऽ लैत अछि। आब कने संरचनावादसँ हटि कऽ विखण्डनवाद दिस आउ। विखण्डनवादी कहत जे संरचनावादीक ध्रुव दार्शनिक स्वरूप लैत अछि। बर्खा हेठ भेलै, तैयो उपलायब, बान्ह बनबैबला इंजीनियरक करेहकेँ बान्हबाक प्रयासक बुरबकीक रूप लेब आ कविक करेह द्वारा बान्ह तोड़ि प्रलय मचेबाक भविष्यवाणी स्वयं कविक ध्रुवीकरणक स्थायी वा क्षणिक होएबापर प्रश्नचिन्ह लगेबाक प्रमाण अछि। आब फेर कने कविताक ऐतिहासिकतापर जाउ। जादू-वास्तविकतावादी साहित्यमे भूतकालमे गेलापर हम देखै छी जे ६०क दशकमे बान्ह बनेबाक भूत सवार रहै, बान्ह, ऊँच आ चाकर, जे धारकेँ रोकि देत आ मनुक्ख लेल की-की फाएदा ने करत! ओइ स्थितिमे जादू-वास्तविकताबला साहित्यक पात्र लग ई कविता जाएत तँ ओ ऐ कविताक तेसरे अर्थ लगाओत। कविक अस्तित्व ओतए खतम भऽ जाएत आ शब्दशास्त्र अपन खेल शुरू करत। जादू-वास्तविकताबला साहित्यक ओ पात्र जे भविष्यमे जीयत तकरा लेल सेहो ई एकटा अलगे अर्थ लेत, ओ धारक खतराक निशानक ऊँच होमएबला गप बुझबे नै करत आ कविक कविताक भावक ताकिमे रहत। आब फेर विखण्डनवाद दिस आउ आ आगाँ विखण्डन करू। ई तकरा बाद अपने जालमे फँसि जाएत, बहुत रास बात नै रहत मुदा बहुत रास बात रहत। बरखा रहत, धार सेहो परिवर्तित रूपमे रहबे करत, रौदमे ओकर पानि इन्होर होइते रहत। उधियेनाइ आ उपलेनाइ रहबे करत। स्वागत गान: स्वागत गानक सामान्य पाठ- कवि सभक स्वागत कऽ रहल छथि मुदा मिथिलाक उपटैत धरतीक करुण क्रन्दनक बीच उल्लासक गीत कोन हएत। भ्रमर पियासल, फलक गाछ मौलायल, तखन ऐ समारोही गोष्ठीसँ की हएत? कविताक संग लाठी आ रसक संग खोरनाठी लिअए पड़त। कविताक नीचाँमे सूचना अछि- विद्यापति स्मृति पर्व समारोह १९८४, ग्राम-बैद्यनाथपुर, प्रखंड-रोसड़ा, जिला-समस्तीपुरमे आगत अतिथिक स्वागत। ओ कालखण्ड मिथिलासँ पड़ाइनक प्रारम्भ छल। हाजीपुरमे गंगा पुल बनि गेल छल। विकासक प्रतिमान लागल जेना विफल भऽ गेल। पैघ बान्हक प्रति मोहभंग भऽ गेल छल। कृषिक आ कृषकक दुर्दशाक लेल बाढ़िक विभीषिका छल तँ स्थानीय फसिल आधारित औद्योगीकरण निपत्ता छल आ शिक्षाक अभियान कतौ देखबामे नै आबि रहल छल। आ ताइ स्थितिमे समारोही गोष्ठीक स्वागतक भार कविजी सम्हारने रहथि। स्वागत गानक ध्वनि सिद्धान्तक हिसाबसँ पाठ: विद्यापति शिव स्वरूप मृत्युंजय मऽरल छथि कहि कवि अर्थ आ प्रतीक दुनू सोझाँ अनै छथि। ध्वनि सिद्धान्तक न्याय दर्शन विरोध केलक मुदा नैय्यायिक उदयनक गाम करियनक कवि बूच जी दार्शनिक नै छथि, कवि छथि। ओ ध्वनिक जोरगर संरचना सोझाँ अनै छथि- हमरा सबहक अभाग अजरो भऽ जऽड़ल छथि, आ मात्र ई समारोही गोष्ठी सँ की हेतै ? आगाँ ओ कहै छथि- काव्य पाठ करू मुदा कान्ह पर लिअ लाठी, एक हाथ रसक श्रोत दोसर मे खोर नाठी। ऐ प्रतीक सभसँ भरल ई कविता सुगठित रूपे आगाँ बढ़ैत अछि आ अभ्यागतक स्वागत करैत अछि। मार्क्सवादी दृटिकोणसँ देखलापर लागत जे कविक काजकेँ ऐ कवितामे काव्यपाठसँ आगाँ भऽ देखल गेल अछि। ऐमे सकारबाक भावक संग ओकरा फुसियेबाक, पुरान आ नव; आ विकास आ मरण दुनूक नीक जकाँ संयोजन भेल अछि। स्वागत गान अपन परिस्थितिसँ कटि कऽ आह-बाह करऽ लगैत तँ मार्क्सवादी दृष्टिकोणसँ ई निम्न कोटिक कविता भऽ जाइत (जकर भरमार मैथिलीक सुखाएल मुख्यधाराक स्वागत आ ऐश्वर्य गान गीत सभमे अछि), मुदा कवि एकरा एकटा गतिशील प्रक्रियाक अंग बना देलन्हि आ ई मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ स्वागत गान बनि गेल। बेटी बनलि पहाड़: बेटी बनलि पहाड़ कविताक सामान्य पाठ: दुलरैतिन बेटी घेंटक घैल बनल छथि। बेटी अएलीह तँ उड़नखटोला चढ़ि कऽ मुदा हरि गरुड़केँ त्यागि कार माँगि रहल छथिन्ह। पैंतीस ग्राम सोना पुड़ेलन्हि मुदा आब बियाह रातिक खर्चा चाही आ बरियाती दस गाही अओताह; सौँसे बल्ब जड़ि रहल अछि मुदा माझे ठाम अन्हार अछि। दशरथ एको पाइ नै मंगलन्हि, रामो किछु नै बजलाह। इतिहास तँ कृष्णक प्रेमक छल मुदा तैसँ की। जनक वर्तमानमे हाहाकार कऽ रहल छथि। बेटाक कंठ बाप पकड़ने अछि आ घरे-घर बूचड़खाना बनल अछि आ गामे-गाम बजार लागल अछि। बेटी बनलि पहाड़ कविताक समाजशास्त्रीय समीक्षा पद्धतिक दृष्टिसँ पाठ: ई कविता काटर प्रथाक विरोधक कविता अछि। समाजमे ओइ कालमे (अखनो) काटर प्रथाक कारण उड़नखटोलापर चढ़ि कऽ आयलि दुलरैतिन बेटीक बाप अपस्याँत छथि। करूण गीत: करूण गीत कविताक सामान्य पाठ: कोकिलक करुण गीत सुनि श्रवित लोचनसँ कुसमित कानन देखब! सुवर्णक शौर्य शिखरपर शान्ति सागरक सुलभ जीत! जहिना किछु आलिंगन करै छी अनेको वक्रशूल भोका जाइत अछि। सुषमा दू क्षणक लेल आयलि, (आ चलि गेलि!) प्रेमक मधु तीत भऽ गेल। रजनीक रुदन विगलित प्रभात! करूण गीत कविताक रूपवादी दृष्टिकोणसँ पाठ: कुसुमित काननक श्रवित लोचन द्वारा देखब, श्रृंगार सेज पर ज्वलित मसानक रौद्र रूपक आएब आ सुवर्णक शौर्य शिखर पर - शांति सागरक सुलभ जीत केँ देखू। भाषाक अनभुआर पक्षक कवि नीक जकाँ उपयोग करै छथि। आ अहीसँ हुनकर कवितामे कवित्व आबि जाइत अछि। विरोधी शब्द सभक बाहुल्य आ संयोजनक अनभुआर प्रकृति शब्दालंकारसँ युक्त भाषा ऐ कविताकेँ विशिष्ट बनबैत अछि। फूलक शूल सन ढुकब आ एहने आन संयोजन ऐ कविताकेँ रूपवादी दृष्टिकोणसँ श्रेष्ठ बनबैत अछि। गामे मोन पड़ैए: गामे मोन पड़ैए कविताक सामान्य पाठ: गाममे रोटी एकोण रहए आ बथुओ साग अनोन रहए मुदा तैयो कलकत्तामे गामे मोन पड़ि रहल अछि। करेहक पानि पटा कऽ मोती उपजाएब तँ बच्चा सभ बिलटत? हुगलीक बाबू रहब नीक आकि कमला कातक जोन रहब? ईडेन गार्डनसँ नीक कमला कातक बोन अछि, पति पत्नीकेँ ईडेन गार्डनमे माला पहिरा रहल छथि मुदा कमला कातक बोनमे तिरहुतनी अपन भोला लेल धतूर अकोन ताकि रहल छथि! नारीवादी दृष्टिकोणसँ गामे मोन पड़ैए कविताक पाठ: प्रवासक कविता अछि ई। तिरहुतनी अपन भोला लेल धतूर अकोन ताकि रहल छथि, आ भोला प्रवासमे छथि। अस्तित्ववादी दृष्टिकोणसँ देखी तँ ई भोला अपन दशा लेल, असगर जीबा लेल, चिन्ता लेल अपने जिम्मेदार छथि। सोन दाइ: सोन दाइ कविताक सामान्य पाठ: सोन दाइक जीवनमे ने हास रहतन्हि आ ने विलास, मुदा से किए? बाल वृन्द जा रहल छथि, नव युवको चलल छथि आ तकरा बाद बूढ़-सूढ़ गलि गेल छथि। तैयो किए विश्वास छन्हि सोन दाइकेँ? ऐ सभक उत्तर आगाँ जा कऽ भेटैत अछि, देसकोस बिसरि ओ प्रवास काटि रहल छथि। आ जौँ-जौँ उमेर बढ़तै, कहिया धरि सोन दाइक घरमे वास हेतै। नारीवादी दृष्टिकोणसँ सोन दाइ कविताक पाठ: नारीक लेल वएह सिद्धान्त, किए ने ओ काव्येक सिद्धान्त हुअए, जे पुरुष केन्द्रित समाजमे पुरुष लोकनि द्वारा बनाओल गेल अछि, समीचीन नै अछि। सोन दाइ देसकोस बिसरि ककरा लेल प्रवास काटि रहल छथि? अकाल: अकाल कविताक सामान्य पाठ: अकालक वर्णनमे कवि नाङरिमे भूखक ऊक बान्हि ओकर चारपर ताल ठोकबाक वर्णन करैत छथि। अनावृष्टिसँ अकाल आ तइसँ महगीक आगमन भेल, तइसँ जड़ैत गामक अकास लाल भऽ गेल। भारतमे लंका सन मृत्युक ताण्डव शुरू भेल अछि मुदा ऐबेर विभीषणक घर सेहो नै बाँचत कारण ओकर मुंडमाल डोरीसँ बान्हल अछि। माए भरि-भरि पाँज कऽ धरती पकड़ि रहल छथि। दशानन अपन बीसो आँखि ओनारि माथ हिला रहल छथि। अकाल कविताक औचित्य सिद्धान्तक हिसाबसँ पाठ: ई अकाल नहि, महाकाल अछि, भूखक ऊक बान्हि नाड़रि सँ, चारे पर ठोकैत ताल अछि मिथिलाक काल-देशमे अकालक ई वर्णन कविक कविताक औचित्य अछि। रावण तँ उपटबे करत, विभीषण सेहो नै बाँचत। तोहर ठोर: तोहर ठोर कविताक सामान्य पाठ: पानक ठोर आ सुन्नरिक ठोर। सुन्नरि द्वारा बातक चून लगाएब आ कऽथक सन लाल बुन्न कपोल सजाएब! मुदा प्रेमक पुंगी कतए? भोरक लाली सुन्नरिक ठोर सन, बिनु सुन्नरि व्याकुल साँझ जेकाँ। बधिक जे बनत सुन्नरिक वर तँ हम बनब विखण्डित राहु। स्वर्गोमे सुधा कम्मे अछि, तहिना सुन्नरिक ठोर सेहो कतऽ पाबी! सकरी मिल महान बनत जे हम विश्वकर्मासँ विज्ञान सीखब, आ ओइ मिलसँ बहार हएत माधुर्य। कुसियारक पाकल पोर सन सुन्नरिक ठोर अछि। पुनर्जन्ममे सेहो धान आ चिष्टान्न बनि सुन्नरि हम अहाँक लग आएब। मुदबा एतबा बादो शब्दसँ उद्देश्य कहाँ प्रगट भेल। अलंकार सिद्धान्तक हिसाबसँ तोहर ठोर कविताक पाठ: बातक चून लगाएब अप्रस्तुत; कऽथक सन लाल बुन्न कपोल, पानक ठोर आ सुन्नरिक ठोर, भोरक लाली सुन्नरिक ठोर सन, कुसियारक पाकल पोर सन सुन्नरिक ठोर, ई सभ उपमा कवि द्वारा प्रयुक्त भेल अछि। मुदा कतऽ छह प्रेमक पुंगी हूक? मे सादृश्य-विरोध अछि। अहाँ बिनु व्याकुल वाटक माँझ मे रूपक प्रयुक्त भेल अछि। रस सिद्धान्तक हिसाबसँ तोहर ठोर कविताक पाठ: लगौलह बातक पाथर चून । आ सजौलह कऽथ कपोलक खून । विभाव अछि आ ऐ कारणसँ देखि कऽ लहरल हमर करेज अनुभाव माने परिणाम बहार होइत अछि। स्फोट सिद्धांतक आधारपर तोहर ठोर कविताक पाठ: आब नैय्यायिक उदयनक करियनक धरतीपर रहबाक अछैतो न्याय सिद्धान्तक स्फोट सिद्धान्तकेँ नै मानब कविक कविताकेँ नै अरघै छन्हि। मने मे रहल मनक सभ बात  कहि ओ अलभ्य चित चोर सँ सुन्नरिक ठोरक तुलना कऽ दै छथि। उदयनक गामक कवि बूच कहै छथि भऽ रहल वर्ण - वर्ण निःशेष, शब्द सँ प्रगटल नहि उद्य़ेश्य; एतए शब्दसँ नै मुदा स्फोटसँ अर्थक संप्रेषण कवि द्वारा तोहर ठोर आ ऐ संग्रहक आन कविता सभमे जाइ तरहेँ भेल अछि, से संसारक सभसँ लयात्मक आ मधुर भाषा मैथिली (यहूदी मेनुहिनक शब्दमे) मे विद्यापतिक बादक सभसँ लयात्मक कविक रूपमे बूचजी केँ प्रस्तुत करैत अछि आ मैथिली कविताकेँ ऐ रूपमे फेरसँ परिभाषित करैत अछि। मैथिलीक किछु सर्वश्रेष्ठ पद्य: अंजनी कुमार वर्मा “दाऊजी” क ओजक भोजमे आत्मीयताकेँ मृगमरीचिका कहल गेल अछि, तँ समस्या मे ओ पूछै छथि जे लोक कोना उल्लसित हएत? आत्मबलमे हुनक मानब छन्हि जे जखन अपन वा अनकर जानक मोह खतम भऽ जाइए तखने अभिमन्युबला खून आबैए। बलराम साह केँ सभ नीक गप अजूबा लगै छन्हि, आ हुनकर नीन टूटि जाइ छन्हि। रवि भूषण पाठक आ विवेकानन्द झा बहुत रास गपकेँ फड़िछाबैत छथि। ऐ बेर छठिमे मे रवि भूषण पाठक सुरुजक उगबाक स्थानक एकटा नूतन बिम्ब लऽ सोझाँ आएल छथि- भगवान तँ ऐ‍बेर दुसधटोलीक पाछूसँ उगि रहल छथि /……दुसधटोलीक पाछू अकास टकाटक लाल छलए....। विवेकानन्द झा हम कवितामे लिखैत छथि- हमही अहाँक फूलडाली सँ उझिक कऽ खसल कनेर/ हमही कोशीक नव-जल भसिआएल काँट कुश अनेर। सतीश चन्द्र झा बाल दिवसपर नेन्ना तेतरीक व्यथाकेँ सुरमे लिखै छथि आ ओ सुर आ लय राजेश मोहन झा गुंजन आ शिव कुमार झा टिल्लू मे सेहो छन्हि। मुन्नाजी बोनिहार आ माटिक ललकार मे पद्यकेँ वर्तमान समस्यासँ जोड़ैत छथि। ज्योति सुनीत चौधरी विचित्र श्रद्दा मे लिखै छथि- ईश्वर अहाँ जौं भेटितौं तँ पुछितौं/ नीक लागैत अछि की एहेन सत्‍कार । अमित मिश्र, चन्दन कुमार झा, जगदानन्द झा मनु, ओमप्रकाश झा आ आशीष अनचिन्हार, ई सभ बहरमे गजल लिखै छथि आ पुरान गजलकार सभक बहर अज्ञानताकेँ देखार करै छथि। जगदानन्द झा मनु शेर कहै छथि- बरखा खुबे बरिसय तँ  गरजय बदरबा/ छतिया दगध भेलै हिया कानै हमर।  हिनकर सभक गजलमे जे तीव्रता अछि, स्तर अछि, से बएसमे पैघ राजेन्द्र विमल आ अरविन्द ठाकुरक (२०११ मे दुनू गोटेक आजाद गजलक संग्रह आएल छन्हि) शिथिल गजल सभसँ स्तरमे बड्ड आगाँ अछि। सूर्यास्तसँ पहिनेमे राजेन्द्र विमल बहरक नाम तँ गनबै छथि मुदा बहुत तकलोपर ऐ संग्रहक गजलमे बहरक दर्श नै होइत अछि, ई मोटा-मोटी सियाराम झा सरसक ओइ उक्ति जे ओ स्वयंक विषयमे लिखने रहथि जे ओ (सियाराम झा सरस) गोर-बीसेक बहरमे लिखै छथि, सँ मेल खाइत अछि, कारण सरस जी सेहो राजेन्द्र विमल जकाँ आजाद गजले टा लिखै छथि। जीवन युगक आन आजाद गजलकार लोकनिक शिथिल गजल लेल सेहो ई सभ गजलकार एकटा पैघ चुनौती साबित हेता। नवीन कुमार आशा मे आगाँ बढ़बाक लक्षण छन्हि। किशन कारीगर हास्यसँ गम्भीर दिस आएल छथि आ दुनूमे आगाँ जा रहल छथि। जँ गीत गेबाक हुअए तँ चन्द्रशेखर कामति, जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, जगदीश प्रसाद मण्डल, श्यामल सुमन, प्रकाश प्रेमी, रमाकान्त राय रमा, नन्द विलास राय, बेचन ठाकुर आ राम विलास साहुक गीत-गजल पढ़ू-गाउ। जयप्रकाश मण्डल लिखै छथि- एशियाड ओलोपिंकमे नामो घिनेलौं/ धनि ई मल्लेश्वरी जे काँस्य एगो पएलौं । सत्येन्द्र कुमार झा क क्षणिका सभ नीक छन्हि- श्मसानोमे आब कहाँ छै खाली परती/ धरती सभपर कएक बेर कएकटा लाश जरल छै-/ आब तँ आबैबला प्रत्येक शव/ अपना संग अपन पूर्वोजोकेँ/ एक बेर फेर जरा दैत अछि। पंकज कुमार झाक उद्वोधन आ सहजता समाजसँ कविताक जुड़ाव देखबैत अछि। जँ मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ हाइकू/ टनका पढ़बाक अछि तँ वृषेश चन्द्र लाल आ ज्योति सुनीत चौधरीकेँ पढ़ू। मनोज कुमार मण्डल लिखै छथि- अप्‍पन लगाओल गाछ पतझड़ लेलक। अन्नावरन देवेन्दरक तेलुगु कविता, चम्पा शर्माक डोगरी कविता, परिचय दासक भोजपुरी कविता आ इप्सिता सारंगीक ओड़िया कविता सेहो अलग-अलग विषयपर अछि। अन्नावरन देवेन्दरक कविता आत्महत्याक पहिने किसानक उद्गार अछि तँ चम्पा शर्माक कविता सैनिकक प्रति समर्पित अछि। इप्सिताक दार्शनिक कविता छोट मुदा घनगर बिम्ब लेने अछि। मिहिर झाक रुबाइ मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रुबाइ अछि, छेद भेल करेज मे शराब कोना राखी/ बहकल दिमाग मे हिसाब कोना राखी/ जड़िऐल सिनेह छल सात जनमक/ बितल उलहनक जवाब कोना राखी। मनोज झा मुक्ति लिखै छथि, जौं शुरुएमे भगबे तँ भागि जो । कपिलेश्वर साहु कोसी कवितामे लिखै छथि, बास डीहकेँ कुण्ड बनौलथि, बाँस नै लैत अछि थाह। इन्द्रभूषण कुमार सहास कवितामे लिखै छथि- अचानक मंचपर अवतरित भेल एक नारी/ जेहने देखैमे कारी/ … भय नै, जँ कहि हुसब/ श्रोता सभ भरिमन दूसत …. नै आबैत छल ओकरा शब्दक जाल बुननाइ । मृदुला प्रधान जतेक लिखलनि से खुलि कऽ लिखलनि, हुनकर कवितामे किछु चमत्कार तँ अवश्ये अछि, ओ लिखै छथि.. कलमक माध्यमसँ,/ कुमरपतक गाम-घरमे,/ विचरण करबाक लोभ। कालीनाथ ठाकुरक दहेजपर लिखल कुण्डलिया सभ अद्भुत अछि। निक्की प्रियदर्शिनी लिखै छथि- स्त्रीकें देखक, व्यवहार करइक, अहाँ स्त्री छी ई एहसास सदिखन,कहाँ बदलल अछि। मो. गुल हसन लिखै छथि, एहेन सुन्दर गहुम काका पाड़ा चरि‍ गेल/ दौगू-दौगू यौ काका जुलुम भऽ गेल। रमेश आ शान्तिलक्ष्मी चौधरीक गद्य कविता विलक्षण अछि। मुन्नी कामत लिखै छथि- भऽ जाएब विलीन कतौ/ रूकि जाएत ई कलम/ आर/ हरा जाएत शब्द कतौ। मैथिलीक पहिल जनकवि रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदारक झारू सभ ऐ कविक भावनाक नैसर्गिक उद्गार अछि, आ तेँ लोक हिनका मैथिलीक भिखारी ठाकुर कहऽ लागल छन्हि, देखू एकटा झारू, हमरासँ पहि‍ले कोनो नै शासन, नै छै कोनो धर्मक वि‍धान। हमरा बि‍नु जगत सुन्ना छै, हतैबला छै पशु समान।।। रवि मिश्र भारद्वाज लिखै छथि- बेचैन भऽ कऽ कानए लागल/ हमरेपर जखन हमर आँखि/ हँसि कऽ लोक हमरा देखऽ लागल। प्रमोद रंगीले लिखै छथि- दर्दक बाजैत ताल देखियौ।/ मरदा पर फेकैत जाल देखियौ। राजदेव मण्डल, जे २१म शताब्दीक सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविता संग्रह अम्बरा क लेखक छथि, लिखै छथि- जेना करैत अछि‍ खुनि‍याँ बड़द/ तामसे करैत गरद आइसँ बनलौं असल मरद। उमेश मण्डल, उमेश पासवान, अनामिका राज आ सन्दीप कुमार साफीमे कविताक मर्म छन्हि, शब्दावली छन्हि, भोगल यथार्थ छन्हि आ तँए ऐ चारू गोटेक हाथमे कविताक रासि छन्हि, जखन जइ दिशामे ई सभ कविताक गुड्डी उड़ेताह सएह मैथिली पद्यक दिशा हएत, जतेक आगाँ साहित्य, समाज आ पद्यकेँ ई सभ लऽ जाए चाहताह, लऽ जेताह। अनामिका राजक कविता नवका बाट मे ई पाँती देखू- बोनिहार आकि नारी!/ दुनू सामन्त कि पूँजीवादी द्वारा/ भोगबाक चीज बनि रहि जाइछ/ आ/ भोगनिहार एकर/ मर्दन करैत/ अपन पुरुषारथ देखेबाक माउग प्रयास करैए। ऐ पद्य संग्रहमे कविता, गीत, गद्य-कविता, गजल, आजाद गजल (बेबहर), भक्ति-गजल, रुबाइ, कता, हजल, नात, बन्द, कसीदा, हाइकू, टनका-वाका, हैबून, शेनर्यू, कुण्डलिया (दोहा+रोला), कसीदा आ झारू सभ किछु भेटत। नारीवादी स्वर हुअए वा दलित विमर्श, मार्क्सवाद हुअए वा मानवतावाद वा उत्तर आधुनिक विचारधारा सभक समूह, सभ ठाम ऐ संग्रहक माध्यमसँ एकटा स्तर प्राप्त कएल गेल अछि। ई संग्रह मैथिली पद्यक लेल एकटा दिशा तँ निर्धारित करबे करत, सभ विधा लेल ई जे एकटा बेन्चमार्क बनेने अछि ओइसँ आगाँ बढ़बाक मार्ग सेहो खुजि जाएत। अंजनी कुमार वर्मा “दाऊजी”, सहरसा। आत्मबल

संघर्षमय जिनगीसँ फराक रहब नीक अछि अइ बिगड़ल समाजसँ सुनसान जंगले नीक अछि मुदा कतेक दिन धरि? उचितक बातपर नै कऽ सकैछ धनुषाकार आत्मबलकेँ राखि देखू आत्मबलक इतिहास धनुषाकारक बाद भऽ जाइछ जनजागरण क्रांतिक विकराल रूप कऽ लैछ धारण जगविदित अछि क्रांति केर की की होइछ परिणाम रौद्र रूप धारण कए जखन लैछ तीर-कमान नै अप्पन प्राण केर भय होइछ नै दोसराक प्राणक मोह तखैन देहमे आबि जाइत अछि अभिमन्यु केर खून सोइच लिअ हे पथभ्रष्ट जयद्रथ हएत कोन उपाय कतेक दिन धरि सहन करत दुखिया केर समुदाय लौह-भुजा आब फड़कि रहल अछि प्राण-प्राण लेल तड़पि रहल अछि क्रांतिक ज्वाला भड़कि रहल अछि आब सोचू अप्पन उपाय नै मानत पीड़ित समुदाय क्रान्तिये ठीक अंत उपाय.......... ओजक भोज ई आत्मीयता थिक मृगमरीचिका जइ पाछू आम लोक सदृश स्थितिकेँ खुआ रहल छी ओजक भोज झाँपल हाड़ भऽ गेल बहार वसन तरसँ दऽ रहल अछि देखार ई कर्तव्यक द्वार, केयो नै पाबैछ पार गलब अछि सहज मुदा स्वर्ण बनब कठिन ई सम्बन्ध अछि अनंत ई आत्मीयता अभिन्न..... समस्या

आबक लोक की करत वसंतक अनुभव की सुनत कोइलीक गीत की घुमत पुष्प वाटिकामे, कपारपर राखल करिया पागकेँ उघैत-उघैत बनल रहैछ बताह नै पाबि सकैछ थाह नै सुति सकैछ सुखसँ नै बाजि सकैछ दुःखसँ गोंताह पानिमे डूबल रहैछ कंठ धरि छटपटाइत रहैछ, बऊआइत रहैछ मन सपनहुँमे देखैछ सदिखन दुःख-धंधा घेंटमे लागल फंदा, नै रौदक चिंता अछि, नै पानिक मात्र चिंता अछि सभकेँ अप्पन पेटक फंदा लागल घेँटक .... वासंती गीत

कोइली कुहू -कुहू कुहुकै हो रामा वन उपवनमे नव किसलयसँ गाछ लागल अछि मंजरि गम-गम गमकि रहल अछि रंग बिरंगक फूल गाछमे प्रकृति कएल श्रृंगार हो रामा वन उपवनमे ...... टिकुलासँ अछि झुकि गेल मंजरि नेना सभ हर्षित अछि घर -घर गाछ-गाछपर विरहिणी कोइली कुहू-कुहू पियाकेँ बजाबै हो रामा वन उपवनमे .... श्वेतवसन कचनार पहिरि कए भ्रमर आँखि केर काजर बनि कए कामदेवकेँ लजा रहल अछि बढ़बै रूप हजार हो रामा वन उपवनमे ..... महुआ गम-गम गमकि रहल अछि नेना चहुँदिसि दौड़ि रहल अछि डाली-झोरीमे अछि महुआ गाबए चैत बहार हो रामा वन उपवनमे ...... दुइ गोट भूख

खसि गेलैक-ए आँखिक पानि आब लोक चौबटियापर बेच दैछ अप्पन अस्तित्व, खोलि दैछ नीबी-बंध किएक तँ पेटक होम कुंडमे देबए पड़ैछ आहुति ... बढ़ले जा रहल अछि दिनानुदिन अनंत दिशामे वासना केर भूख वासनाक भूखल कीनि लैछ रोटीक लेल छटपटाइत लोकक अस्तित्व लोकमे आब कोन वृत्ति आबि गेल अछि दानवी, पाशविक आ की कोनो तेसर ...... एकर वर्गीकरण करब अछि असंभव दुनू भुखक सम्बन्ध भऽ गेल अछि अन्योन्याश्रय ..... सुखाएल अतीत दीप तँ लेसैत छी मुदा बातीये सुखाएल अछि हमर ख़ुशी तँ हुनक उदासीमे नुकाएल अछि.... कतेको बसंत आएल आ चलि गेल बएसकेँ समेटि आशा-अभिलाषाक पूनम लऽ लेलनि ऐमे समेटि गीत तँ गाबऽ चाहैत छी मुदा राग भोथिआएल अछि हमर ख़ुशी तँ हुनक उदासीमे नुकाएल अछि.... मृगतृष्णा केर पाछू तँ हम सदिखन दौगि रहल छी श्वेत वसन केर कारिखकेँ सदिखन ढोइ रहल छी डेगहि डेगपर अछि शंका मुदा संगी हमर पछुआएल अछि हमर ख़ुशी तँ हुनक उदासीमे नुकाएल अछि.....! बेरोजगारक आत्मा

आँखि खुजतहि हेरए लगलौं छाँह सरकारी शासनसँ मारवाड़ीक बासन धरि मुदा साँस स्थिर होइतहि हमरा भेट गेल ओइ बहुरंगी अश्मशानक आगिमे...... प्रजा आ तंत्र

लोहासँ लोहा कटै अछि विष काटै अछि विषकेँ, मुदा भ्रष्टसँ कहाँ उखड़ै अछि भ्रष्टाचारक ओइध ...? निज स्वार्थ हेतु आश्वासनसँ सागरमे सेतु बना दै अछि, रामक दूत स्वयं बनि सभ मर्यादाकेँ दर्शाबै अछि, जनमत केर हार पहीर कऽ ओ रावण दरबार सजाबै अछि, जौं करब विरोध तँ शंकर बनि ओ तेसर नेत्र देखाबै अछि, थिक प्रजातंत्र तेँ रावणोकेँ भेटल अछि समता केर अधिकार, हमरे सबहिक शोणित-पोषित थिक प्रजातंत्रक सरकार.....

कोसी

हिमगिरीक आँचरसँ ससरि, मिथिला केर माटिमे पसरि दुहु कूल बनल सिकटाक ढेर, पसरल अछि झौआ कास पटेर मरू प्रान्त बनल कोसी कछार, निस्सिम बनल महिमा अपार सावन भादो केर विकराल रूप, पाबि अहाँ यौवन अनूप उन्मत्त मन, मदमस्त चालि, भयभीत भेल मानव बेहाल की गाम-घर, की फसल-खेत, की बंजर भू, लए छी समेटि प्रलयलीन छी अविराम, मानव बुद्धि नै करए काम कतए कखन टूटै पहाड़, भीषण गर्जन अछि आर-पार तहियो हम सभ संतोष राखि, कर्तव्यलीन भेल दिन-राति वर्षा बीतल हर्षित किसान, खेतीमे लागल गाम-गाम लहलहाइत खेत देखै किसान, कोसी मैयाकेँ शत-शत प्रणाम ....... मिथिलेश कुमार झा, पिता- श्री विश्वनाथ झा, जन्म-१२-०१-१९७० केँ मनपौर(मातृक) मे पैतृक-ग्राम-जगति, पो-बेनीपट्टी,जिला-मधुबनी, पिन- ८४७२२३, शिक्षा: प्राथमिक धरि- गामहिक विद्यालय मे। मध्य विद्यालय धरि- मध्य विद्यालय, बेनीपट्टी सँ। माध्यमिक धरि- श्री लीलाधर उच्च विद्यालय, बेनीपट्टीसँ इतिहास-प्रतिष्ठाक संग स्नातक-कालिदास विद्यापति साइंस काँलेज उच्चैठ सँ, पत्रकारिता मे डिप्लोमा, पत्रकारिता महाविद्यालय(पत्राचार माध्यम) दिल्ली सँ, कम्प्युटर मे डी.टी.पी. ओ बेसिक ज्ञान। टीस (विहनि कथा संग्रह) प्रकाशित। खब्बरदार हे यौ ! ऐ महान जनतंत्रक नेता, ऐ देशक जनता बुझि गेल अहाँक चालि-प्रकृति-फूटनीति, गमि लेलक अहाँक गामसँ गद्दीक धरिक सस्त बेबहार… बैसलाक धार; तैं सरकार, खब्बरदार! जनतंत्रक जनताकेँ बुझिऔ जुनि निमूधन… शक्ति सँ हीन; जनताक संगठित शक्ति बनत प्रचण्ड बिहाड़ि अहाँकेँ पछाड़ि गढ़त इतिहास रहत साक्षी धरा-आकाश!! गजल उन्नति केलक गाम आब शहर लगैए लोक-लोकमे भेद आ जहर बढ़ैए निधोख बुलै अछि चोर रखबार दम सधने औंघाएल कोतबाल धरि पहर पड़ैए निट्ठाह पड़ल अछि रौदी जजाति जड़ै अछि पानि ने फानए धार से छहर पड़ैए अमावस्याक राति की इजोतक आशा सगरो पसरल धोन्हि दुपहर बितैए अपनो गाँवमे लोक बनल अनचिन्हार सन अनटोला केर लोक देखि कऽ कुकुर भुकैए बलराम साह, जन्‍म- २१.११.१९७३, पि‍ताक नाओं श्री जीबछ साह, गाम- नौआबाखर, पत्रालय-हटनी, भाया-घोघरडीहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार)। संप्रति‍- अधि‍वक्‍ता, जि‍ला न्‍यायालय, मधुबनी। आकि‍ नीन टूटि‍ गेल काजक थाकल वि‍चारक मारल आ चि‍न्‍ताक टुटल ओछाइनपर रही पड़ल आँखि‍ लागि‍ गेल देखलौं एकटा सपना आकि‍ नीन टूटि‍ गेल। सपना छल वि‍चि‍त्र देखलौं जे गामक रधि‍या जे अछि‍ दैवक मारल मसोमात ओकरा भेटलै इन्‍दि‍रा आवास ओहो बि‍ना घूसकेँ आकि‍ तखने हमर नीन टूटि‍ गेल। गाममे भेलै मारि‍ चलल लाठी आ फरसा भेलै लठम-लठ जाति‍-जाति‍क एकता बैसल एकटा पंचैती अओर हाकि‍म-दरोगा मि‍लि‍ सभटा झगड़ा मेटा देल आकि‍ हमर नीन टूटि‍ गेल। जखन नीनमे नि‍नवासले रही पढ़ल-लि‍खल बेटा करैत छथि‍ बापक सेवा पढ़ल पुतोहू करैत रहथि‍ सासुक उत्‍कृष्‍ट सेवा भाय-भायमे छल मि‍लानी जाबत देखतौं आगू की भेल ताबत हमर नीन टूटि‍ गेल। गामक बेटी पढ़लक-लि‍खलक गरीबीसँ लादि‍ लेलक बी.ए.क डि‍ग्री बगलक गामक मास्‍टर सहएबक बेटा सेहो बनल हाकि‍म आ बि‍ना दहेजक दुनूक बिआह भऽ गेल आकि‍ ताबत हमर नीन टूटि‍ गेल। यौ समाजक की हएत, हमर सपना हएत साँच कहि‍यो कि‍एक तँ हमर नीन टूटि‍ गेल। गजेन्द्र ठाकुर, पिता-स्वर्गीय कृपानन्द ठाकुर, माता-श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर,जन्म-स्थान-भागलपुर ३० मार्च १९७१ ई., मूल-गाम-मेंहथ, भाया-झंझारपुर, जिला-मधुबनी (बिहार)। शिक्षा: एम.बी.ए. (फाइनेन्स), सी.आइ.सी., सी.एल.डी., कोविद। लेखन: कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्ड- खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना, खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि), खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर), खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ), खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण), खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन), खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत। Learn International Phonetic Alphabet through_Mithilakshara, Learn MithilakShara, Learn Braille through Mithilakshara. दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ । जगदीश प्रसाद मण्डल (बायोग्राफी)। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२)। सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् । गल्प गुच्छ क बाद दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् । संकर्षण क बाद दोसर नाटक उल्कामुख। त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद तेसर गीत-प्रबन्ध नाराशं॒सी । नेना-भुटका आ किशोरक लेल तीनटा नाटक- जलोदीप। नेना-भुटका आ किशोरक लेल बाङक बङौरा। नेना-भुटका आ किशोरक लेल खिस्सा-पिहानी संग्रह- अक्षरमुष्टिका । मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोषक ऑन लाइन आ प्रिंट संस्करणक सम्मिलित रूपेँ निर्माण। पञ्जी-प्रबन्धक सम्मिलित रूपेँ लेखन-शोध-सम्पादन आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यंतरण "जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.)-मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध" आ एकर दोसर खण्ड जीनियोलोजिकल मैपिंग -मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध भाग-२ नामसँ। मैथिलीसँ अंग्रेजीमे कएक टा कथा-कविताक अनुवाद आ कन्नड़, तेलुगु, गुजराती आ ओड़ियासँ अंग्रेजीक माध्यमसँ कएक टा कथा-कविताक मैथिलीमे अनुवाद। उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) क अनुवाद अंग्रेजी, कोंकणी, कन्नड़ , संस्कृत, मराठी आ तुलुमे। संगहि ऐ उपन्यास सहस्रबाढ़निक मूल मैथिलीक ब्रेल संस्करण (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक) सेहो उपलब्ध अछि। कथा-संग्रह(गल्प-गुच्छ) क अनुवाद संस्कृतमे। पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर) क अनुवाद अंग्रेजीमे। उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ क अनुवाद आ अपन किछु कथाक अनुवाद लेखक स्वयं अंग्रेजीमे कऽ रहल छथि। अंतर्जाल लेल तिरहुता आ कैथी यूनीकोडक विकासमे योगदान आ मैथिलीभाषामे अंतर्जाल आ संगणकक शब्दावलीक विकास, मैथिली विकीपीडियाक संस्थापक आवेदक। गूगल मैथिली ट्रान्सलेटमे योगदान। संस्कृत वीथी नाटकक निर्देशन आ ओइमे अभिनय। शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ: १.सहस्रबाढ़नि आ स॒हस्र॑ शीर्षा॒ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर उपन्यास,२.मिथिलाक इतिहास- भाग-२, ३. A Survey of Maithili Literature- Vol.II- GAJENDRA THAKUR। सम्पादन: अन्तर्जालपर ई-पत्रिका “विदेह” http://www.videha.co.in/ ISSN 2229-547X क सम्पादक जे आब प्रिंटमे (देवनागरी आ तिरहुतामे) सेहो मैथिली साहित्य आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि- विदेह: सदेह:१(देवनागरी आ तिरहुता):२:३:४:५:६:७:८:९:१० प्रकाशित। विशेष: अन्तर-महाविद्यालय क्रिकेट प्रतियोगितामे "मैन ऑफ द सीरीज" (१९९१), सम्प्रति अमेच्योर गोल्फर। ई-पत्र संकेत- ggajendra@videha.com मोबाइल नं.०९९११३८२०७८ कुण्डली १ छत्ता घुरछा पल्लौसँ, भेल दिने अन्हार। दिन बितलापर घर घुरी, काल भेल विकराल॥ काल भेल विकराल, पोरे-पोर सिहरैए। सुनत केओ सवाल, बोल बगहा लगबैए। ऐरावत बेहाल, बोल कतऽ भेल निपत्ता। घुरियाए बनि काल, पैसि बिच घोरन छत्ता।। २ सत असत मे भेद करू, राखू नै किछु रोख ततमत नै करू कनियो, जे छै होनी लेख जे छै होनी लेख, हुए से नीक निकेना सत्यक जीत हएत , जँ करबै अकसतिकसने डर संग असत केर, डर ढाहू मध्य हृदयक ऐरावतक बुझैत, यएह छी असत्यक सत ३ विजय बिन गर्व हएत जँ, बुझू तखन ई नीक हारि भेने घबराउ नै, बात बुझू ई मीत बात बुझू ई मीत, हुअए जँ एक झमेला हारि मानि बढ़ि जाउ, करू ने फेर बखेरा भेल काज प्रसन्न जतऽ, नीक अछि टा सएह मोन ऐरावत बुझि, देखि ली हारि-विजय ४ बोल वचन हुअए नीक, बूझि बाजी जँ बात गुम्म रहनाइए ठीक, हुए जँ नमहर जाल हुए जँ नमहर जाल, लेत ओ लप दऽ भीतर हल्ला बनि जाएत, नै अछि जँ बेर उचित पर सुनू हमर ई बात, बात होइए अनमोल ऐरावत कहि जाय, कहू नै ओल सन बोल टनका/ वाका- हाइकू- शेनर्यू १ प्रकृति रोष कुश तिल जलसँ विधवा बनि सधवा की विभेद दूबि अक्षत जल (टनका/ वाका) करबीरसँ घर गाछ पहाड़ घेरल अछि (हाइकू) बनैया लोक घरक पनिबह बिदति नहि (शेनर्यू) करहड़ उपारि कऽ खाउ, प्रकृतिकेँ घरमे बसाउ, फुलवारी बनाउ, पहाड़क फोटो बना कऽ घरमे लटकाउ। आ भऽ जाउ प्रकृति प्रेमी। गामकेँ नग्रमे लऽ आउ, चित्रकारीसँ, कलाकारीसँ, बुधियारीसँ। खेलाइ हम करियाझुम्मरिमे नीचाँ अकास एकपेड़िया सड़क कतऽ पाबी आब, आब तँ चारि लेन सेहो कम चकरगर मानल जाइए। छह लेन, आठ लेन। अकास मलिछोंह, गाछक हरियरी मलिछोंह। मोन मलिछोंह। मुदा सड़क, घर, सभ फोटो सन चिक्कन चुनमुन। लिखी चित्रसँ घरक खाका आइ छी जङलाह (हैबून) २ ई फूल फल चढ़ैत जाइ आगाँ कम होइए उनटि देखी फेर लगमे कम दूरे बेशी (टनका/ वाका) तागि प्रकृति ताकैले भेलौं पार सुखल पात (हाइकू) रंग छाड़ल पहाड़ आर गाछ मुदा जीवन (शेनर्यू) झझायल रंग कतेक वर्णक। बच्चाक किताबोसँ बेशी चमकैए ई प्रकृति, फूल, पात, बाट आ अकास। आ एकरा सभकेँ तँ छोड़ू ई बरफ, जे रेगिस्ताने ने छी, बालुक बदला बरफ। मुदा नै अछि ऑक्सीजन आ नहिये फूल-पात। मुदा एकर सेहो देखियौ शान। जइ रस्तासँ अबै छलौं से ओतेक कहाँ चमकै छलए। जखन ओइ प्रकृतिक लग छलौं तँ कहाँ ओकर रूप निङहारि पाबै छलौं। कियो दूरसँ देखैत हएत तँ निङहारि पबैत हएत हमरो, प्रकृतिक बीचमे हमहूँ प्रकृति बनल हएब। मुदा ऐ शिखरपर आबि जे सनगर लगैए ई प्रकृति! गाछ भेल छै असगरुआ बौआ पात भेल छै खिलौना प्रकृतिक शिखर देखि मुदा आब ऐ शिखरपर एलाक बाद लगैए जे बेकारे एलौं एतऽ। ऐ शिखरकेँ ओइ ठामसँ देखै छलौं तँ कतेक सुन्नर लगै छल ई शिखर। मुदा शिखरपर एलाक बाद आब तँ वएह गाम नीक लगैए। तुलना तखने ने हएत जखन गामक प्रकृतिकेँ शिखरसँ देखबै। गामसँ शिखर आ शिखरसँ गाम! मुदा लिलसासँ, हाइ रे हाइ। आब चलै छी शिखरक ओइ पार। देखै छी ओइ दिसुका लोक समाज। दूरसँ लगैए दुनू कातक गाम नीक, तराउपड़ी। मुदा ओइ कातक गामसँ शिखर ओतेक सुन्नर लागत जतेक ऐ पारक गामसँ लगैए! नै ठाढ़ होउ चलू चली घुरैले बनिजार छी लोकक बीचमे छी जाइत घुरैत छी (हैबून) …………….. रुबाइ कारी अनहार मेघ आ नै होइए कत्तौ बलुआ माटि खा नै होइए दाहीजरती देखि हिलोरै-ए मेघ भगजोगनी भकरार जा नै होइए कता १ एक्केटा गप बुझबैत साँझ भेल बुझाइए झूरो झमाने इजोरियो तँ कएल बुझाइए ऐमे तँ अन्हरिये नीक कारी छल गुजगुज नै कोनो रातिक आ नै दिनक मेल बुझाइए २ सबहक सपना समेटल आ आगाँ बढ़लौं ई सत्यक पथ छै निकलल सभ चलै चलू निन्नोक बाद खुजल रस्ता बिन लीखक जे छै से धांगल आब बाट बनल सभ चलै चलू गजल १ बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठ–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – चारि बेर उचरि नव रूप अपन लिखैब तखन किने उतर दछिन डगहर बहैब तखन किने कनकन करत बनत सदिखन तलिया यौ सुअद पैब जौँ अहँ झखैब तखन किने मनक भूख असगर नुकैब बुझल अछि अपन बोल-वाणी घुरैब तखन किने खधाइ गढ़ अछि भरल सभतरि दहारे जलक धार बिच घर भरैब तखन किने निमहतासँ निभता निभैब सिखल नहि नव युग कनिक उगल बुझैब तखन किने पड़ाइनपर कनैत अछि भाग जँ कतौ गजेन्द्र मन बूझै हियैब तखन किने २ बहरे मुतकारिब बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठ–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – चारि बेर अहाँ बूझि लै छी जुआरी अनेरे जिबै कोन बैबे नियारी अनेरे हहारो उठेलौं उदासी गबेलौं सिहाबै किए छी मदारी अनेरे जतेको नबारी छबारी बुरैए घुरेबै कियो नै सुतारी अनेरे घरोमे उपासे बहारो निरासे दहारे अकाले नचारी अनेरे चलै छी खटोली उठा ऐ भरोसे भसाठी अबैए विचारी अनेरे कटिहारी कनकनी छै बसातमे हाड़मे ढुकि जाएत ई कनकनी पोस्टमार्टम कएल शरीर जे राखल अछि सातटा मोटका शिल्लपर, जड़त कनीकालमे गोइठामे आगि जे अनलनि‍हेँ सुमनजी राखि देल नीचाँ कनकनाइत पानिमे डूम दऽ गोइठाक आगिसँ आगि लऽ शरीरकेँ गति-सद्गति देबा लेल कऽ देलनि‍ अग्निकेँ समर्पित तृण, काठ आ घृत समेत घुरि कऽ जएताह सभ लोह, पाथर, आगि आ जल नांघि, छूबि डेढ़ मासक बच्चाकेँ कोरामे लेने माएकेँ छोड़ि घर सभ घुरत एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम रातिक भोरमे मुदा नै छै कोनो अन्तर पहिराबा आ पुरुखपातकेँ छोड़ि दियौ महिलाक अवस्था देखू ऐ‍ कनकनाइत बसातसँ बेसी मारुख हाड़मे ढुकल जाइत अछि कमला कात नै यमुनाक कात हजार माइल दूर गामसँ आबि मिज्झर होइत अछि खरड़खवाली काकीक श्वेत वस्त्र साइठ साल पूर्वक वएह खिस्सा वएह समाज मात्र पहिराबा बदलि गेल मात्र नदी-धार बदलि गेल सातटा शिल्लपर राखल ओ शरीर अग्नि लीलि रहल सुड्डाह कऽ रहल एकटा परिवार फेरसँ बनबए पड़त आ तीस बर्खक बाद देखब ओकर परिणाम ताधरि हाड़मे ढुकल रहत ई सर्द कनकनी ऐ‍ बसातक कनकनीसँ बड्ड बेसी सर्द ........... गोपीचानन, गंगौट, माला, उज्जर नव वस्त्र मुँहमे तुलसीदल, सुवर्ण खण्ड गंगाजल कूश पसारल भूमि तुलसी गाछ लग उत्तर मुँहे पोस्टमार्टम कएल शरीर सुमनजी सेहो नव उज्जर वस्त्र पहीरि जनौ, उत्तरी पहीरि, नव माटिक बर्तनक जलसँ तेकुशासँ पूब मुँहे मंत्र पढ़ै छथि आ ओइ जलसँ मृतककेँ शिक्त करै छथि वामा हाथमे ऊक लऽ गोइठाक आगिसँ धधकबैत छथि तीन बेर मृतकक प्रदीक्षणा कऽ मुँहमे आगि अर्पित होइत अछि कपास, काठ, घृत, धूमन, कर्पूर, चानन कपोतवेश मृतक पाँच-पाँचटा लकड़ी सभ दैत छथि कपोतक दग्ध शरीरावशेष सन मांसपिण्ड भऽ गेलापर सतकठिया लऽ सातबेर प्रदक्षिणा कऽ कुरहड़िसँ ओइ ऊकक सात छौसँ खण्ड कऽ सातो बनहनकेँ काटि सातो सतकठिया आगिमे फेकि‍ बाल-वृद्धकेँ आगाँ कऽ एड़ी-दौड़ी बचबैत नहाइ लेल जाइ छथि तिलाञ्जलि मोड़ा-तिल-जलसँ बिनु देह पोछने आ फेर मृतकक आंगनमे द्वारपर क्रमसँ लोह, पाथर, आगि आ पानि स्पर्श कऽ घर घुरि जाइ छथि एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम रातिक भोरमे। रवि भूषण पाठक, गाम करियन, जिला समस्तीपुर। “रिहर्सल” (नाटक) प्रकाशित)। हाइकू ई खचरहबा खोजि रहल छओ भाग फतिंगा कि भेलए एकरा?

रौ बहि! रौ बहि! कि भेलए एकरा? माँगलियइ रोसड़ा आ दऽ देलकए तेघड़ा रौ बहि ! रौ बहि ! कि भेलए? एकरा पटनाक बात छोड़ू, दिल्लीक बखरा! रौ बहि! रौ बहि! कि भेलए एकरा? सोचैत रहौं मंत्री बनब, शुरूएमे खतरा रौ बहि! रौ बहि! कि भेलए? एकरा हरम-महल-अंतःपुर वा छुपल घरघुसरा! रौ बहि! रौ बहि! कि भेलए? एकरा दस लाखक टिकट छल, केकरासँ बात करी अल्सेसियन आँखि देखबए, दाँत देखबए झबड़ा! रौ बहि! रौ बहि! कि भेलए  एकरा? ऐ‍ बेर छठिमे ऐ‍ बेर छठिमे पहिले छठिमे सूर्यदेव उगैत छलाह या तँ खुटेरी बाबूक गाछीक पाछू या निसहरा पोखरिक पाछू कोनो-कोनो बेर शशि बाबूक गाछीक बीचसँ आ कोनो बेर मझिला कक्काक बँसबिट्टीक पाछू एहन बात तँ कहियो नै भेलए कि ओ टेलीफोन टावरक पाछूसँ उगथि या डाक्टर साहेबक दुमहलाक पाछूसँ ऐ‍ बेर स्कूलक मोटका हेडमास्टर आश्वस्त छथि मध्याहन भोजनक पहिल कौर भगवान खाइ छथि हमरे घरक पाछू किए ने उगताह? मुक्खनकेँ जोतखी जी कहने छथिन भगवान अहाँकेँ छोड़ि कऽ कतए जेताह? भुटकुन बाबू आ मुंशी जी डराएल छथि कि भगवान रस्ता बिसरि जेताह? बच्चा बाबू एकटक लगेने छथि सभसँ पहिले ओ भगवानकेँ देखि‍ कऽ खूब जोरसँ चिकरताह देखियौ देखियौ भगवान तँ ऐ‍बेर मन्दिरक पाछूसँ निकललाह। जुआएल कुहेस आ भफाइत पोखरिमे सभ भक-चक छथि तखने बटोरन बाजल- ‘भगवान तँ ऐ‍बेर दुसधटोलीक पाछूसँ उगि रहल छथि मुक्खन मुखिया, डाक्टर आ मास्टर साहेब दुसधटोली दिस देखि‍ रहल छथि सूर्यदेव उगैबला छथि दुसधटोलीक पाछू अकास टकाटक लाल छलए...........। मरणोपरांत- १ कामना हुनकर मृत्युक कामना के करैत अछि जखन कि कतेको वृद्ध जवान विदा भऽ गेलाह। बिला गेलइ कतेको सरकार बन्हा गेलइ कतेको बाँध आ मिटा गेलइ बाढ़ि भूकम्पक छोट नमहर निशान । जीवनशतक तरफ अग्रसर ऐ धतालबूढ़ सँ के डराइत अछि कोन पंडित आ के कवि चऽर चांचड़क सठ लण्ठ कतऽ के ज्योतिष आ कहिया के कहबैका परोपट्टाक पुरनिया आंगन टोलक अज्ञविज्ञ दियाद फरीक जजिमान पुरहित सेवा सँ पूतोहू आ मर्यादा सँ बेटा अपन अपन नौकरी आ बालबच्चा कऽ पोसैत पोता नाती के धखाइत अछि बाभन कि सोलकन डीही कि भगिनमान जिरात कि नाशी गाछी कि मचान ककरा की चाही ? समाचार दलान पर खोखैत रस्ता दिस देखैत छोटका बाबू कतेको गणना केँ असफल करैत अड़ल रहथिन्ह दोसरक दिन गुणैत जोगीभाइ विजय बाबू हारि गेलाह अंदाज लगबैत डाक्टर लोकनि थाकि गेलाह आला लगबैत गौंआ घरूआ बिसरि गेलाह कि केओ वृद्ध मरणासन्न छैक बेटा पोताक सेवा जिज्ञासाक संगे जमल रहलखिन्ह छोटका बाबू। जिजीविषाक आगाँ हारि गेलाह यमराज हृदयाघातक दू-दू प्रयासक बाद पस्त भेलाह। मुदा छोटका बाबू हारि गेलाह उपेक्षाक कल्पनासँ सहि नइ सकलाह अपन रोपल फुलवाड़ी मे वृथा कांट कूश अमरबेलक लत्ती सोहराय जहरफूस।

ई ब्रेकिंगन्यूज नइ अछि नब्बेपार बूढ़क मरला मे कोन आश्चर्य कथीक दुख आ केहन असौकर्य मृत्युक एकाधिक बेर अफवाह सँ अइ समाचारक सेंसेशन खतम रहए बेटा भतीजा पोता नाती तैयार पहिनहि सँ छुट्टीक जोगाड़ काननाइ पीटनाइ आ लोरक दिशा पहिनहि छल भ्रमित। मृतकक औदात्य ओकर मांगलिकता पर नइ भेलइ यथेष्ट चर्चा पता नइ ई कोन किसिमक कंजूसी भेलइ। समाचार मिलला पर ई जत्ते अंतिम संस्कार रहए ततबे अंतिम रूढ़ि छोटका बाबू वरक गाछ जकाँ शताधिक जड़िकेँ समेटने छलखिन्ह तीन भाइ, पाँच बेटा चौदह जवान नाती पोताक परिवार आ भातिजक अलगे खूट पितियौतक तीनटा बेटा सेहो ततबे नजदीक जमाए भागिन बहिनोइक बात नइ पूछू एकटा महान मध्यविन्दु परिवारक गुरूत्वकेंद्रक समाप्तिपर जे जहिना छल तहिना भागल सिमरिया घाट । सिमरिया घाट पर कवि दिनकरक घर सँ कोस भरि पूरब चैत क्रुद्ध भऽ जेठ भेलइ दुखी सूर्य झुकि गेलखिन्ह गंगा मे खसब की ? दुपहरिया बालू आगि उगलैत छल साबुत माटि कतौ नै जरल लकड़ी रूइया कपड़ा हड्डीक टुकड़ा बाउल पन्नी घीक डिब्बा आ फूल चकमकिया कपड़ा जिंदगीक सभ ऊँच-नीच केँ धकियाबैत। जड़बए सँ पहिले अनुपात बिसरि गेलखिन्ह घरवारी कत्ते मून लकड़ी कत्ते घी आ कत्ते चंदन चिंताक कोनो बात नइ अस्सी पार जोगी भाइ जे कून हप्ता नइ आनैत छथिन्ह एकटा लहाश सत्तर केँ लगभगबैत रामाश्रय बाबू आ तहिना मजगूत जगदीश आ संतोष बिना चालीसे के शंभूपंडी जी कंे आदत भऽ गेलइ जरैया चिरैया गंध लेबाक गाँवक शताधिक व्यक्ति भऽ गेलखिन्ह म्ूकसाक्षी अंतिम दर्शन प्रारम्भ भऽ गेलइ जड़बैत काल कतेको अनुभवी भीड़ि गेलखिन्ह मचान बनऽ लागलइ अपन अपन बाप माए केँ जारए बला केओ केओ अपन कनिया आ भाए केँ एक दू टा महाअभागा जे जरेने गाड़ने रहए अपन संतानकेँ सबहक ध्यान महादाहक सफलता दिसि जोगी भाइ चेरा बिछबऽ लागलाह रामाश्रय बाबू दोहराबऽ लागलाह उठऽ जगदीश बायाँ सँ मजगूत करह रूकू संतोष पतरका चेरा उपर मे देबइ गणेश भाइ चारू खंभा ठोकऽ लागलाह गंगेश जी कहलखिन्ह मुँह पर चेरा नइ राखियौ मुखाग्नि पड़तै सुरेश जी टोकलखिन्ह मात्र विध छैक केवल सटएबाक काज चंद्रदेव भाए जीपे मे रहलाह यमक डरे वा थाकल हारे घनश्याम जी एगो केँ डाँटि देलखिन्ह खड़ही केँ हाथ नइ लगाबहक औखन बड्ड काज छैक ओ अलगे रूसल “हमहूँ देखब कोना लहाश जरत!” अंतिम परिक्रमाक बाद मुखाग्नि पड़लै आ अग्नि खींचऽ लागलखिन्ह दिशांतक कोणांतक हवा सूर्यदेव माथ पर आबि गेलाह गंगाक धार प्रशांत भऽ गेलइ परिजन निश्चिंत भेलाह एकटा नवतुरिया खोललक बिस्लेरी टो टापि कऽ शीतल जल बँटऽ लागल मुँहगर सभ जुड़बऽ लागला अपन कण्ठ पेट एकाएक दछिनबरिया कोना लचि गेलइ सभ एक दोसर पर बाजऽ लागलइ “हम तँ पहिले कहैत छलियइ दछिनबरिया कोना फलाँ बाबू बनेलखिन्ह हओ बाबू आँचक दिशा बदलऽ लाबऽ पतरका चेरा संठी ढ़ैंचा घी तूँ ओमहर सँ बाँस भिराबह हे हे उत्तर सँ देह उघार भेलइ देखियौ तँ हाथ पएर अकड़ि रहल छइ कि ओ आर्शीवादक हाथ छैक ? बूढ़बा अखनो तमसाइल छैक”

विदेहक धरती पैकबंद बोतल केँ फुजिते बदलि गेलइ मौसम जेना कि मृत्यु नइ कोनो जन्मक उत्सव हो विदेहक ई धरती देहक मजाक उड़बऽ लागल रंग रंगक चुटकुला हवा बसात क्षेत्रक वर्गक गामक अलग अलग अनुभव। जगह धुँएने रहए मुदा कठिहारीक यात्री नहबऽ लागला रगड़ि-रगड़ि़ कऽ देहांतक बात बिसरि आ दस मिनट बाद खाए लागलाह चूड़ा-दही जिलेबी पूरी गरम गरम मसाला नमकक चर्चा करैत ओएह पेटक लेल ओएह देहक लेल ऐ विदेहक धरती पर ऐ सिमरिया मे मात्र देहे नइ धर्म आ धनहु क प्रति विरागक लेल तैयार रहू ऐ गंगाक माटि मे एकहि ढाँचाक आदमी बाँध सँ घाट तक। घाटक डोम आ पंडित सभ लोकनि एके संख्या कहताह एक हजार एक आ तहिना होटलबला नाम लिअ अन्नपूर्णा विद्यापति मिथिला वैष्णव शंकर आदि आदि सभ मिला कऽ एके बात एक हजार एक चर्चाक विषय चर्चाक विषय ई नइ छैक कि छोटका बाबू कत्ते परहल लिखल कत्ते बड़का विद्वान ज्योतिषी केाना कऽ पढ़ेलाह धिया पूता केँ कि ओ चाहैत छलाह कि पओलाह आ कि मूने रहि गेलन्हि चर्चा ई छैक कि कोना मरलखिन के सेवा केलकए आ के अनठेलकए ककरा कि देलखिन्ह आ के की चाहैत अछि कोना हेतै श्राद्ध आ कोना कोना भोज के सम्हारतै आ के चौकी बजारतै हरेक गौंआ घरूआक हाथ मे छैक चित्रगुप्तक धर्मदण्ड ओ नापि तौलि रहल छैक आ आबि रहल छैक निर्णय बदलि बदलि कऽ सभ चौकस अछि के एलै के बिसरलै अएबाक कारण आ बिसरबाक बात पर भऽ रहल छैक गोल गोलैसी घिन घिन घोंघाउज ।

मरणोपरांत-२ की केना मतलब ई जे भोजक कोन व्यवस्था? गौंआरी वा छगमिया केवल भात कि चूड़ा या दूनू दिन इस्त्रगने पुरखे वा सबजाना एकजानाक बाते जुनि करू भोजक सभ रिकार्ड टूटि जेतइ जकरा घर मे पाँच टा सरकारी मास्टर आधा दरजन इंजीनियर से कि ओहिना मानि जेतइ ओ तँ गाँववला के पानियो पियेतइ आ पानि पियाए कऽ मानतइ मुदा बात एतबे नइ भात के खाएत या नइ एकर निर्णय तँ अलग अलग खूट लेत तइ दुआरे हे पंचोभय बुधवारय पगुलवारय आ आनोआन खूटक म्ुखिया आ ठीकेदार आबू आ निर्णय लिअ । जेना जगदीश बाबू कहलथिन्ह “एना त कहियो ने भेलइ घरवारी किछु कहलक आ नौत किछु आर भऽ गेलइ कतेको बेर बात घचपचा गेलइ तइ दुआरे स्पष्ट कहू ककरा कही आ ककरा छोड़ू सबजाना कि इस्त्रगने पुरखे आ नौतक संगे बिजौ बस हम उतरबाइ टोलक भागी” नौत देलाक बाद घुमल जगदीश बैसि कऽ धात्री गाछक नीचाँ कहऽ लागलाह अपन बात “ओ जखने कहलक की कथीक व्यवस्था हम कहलियन्हि, अओ बाबू ओइ घर मे छऽ छऽ टा इंजीनियर चारि टा तरकारी पाँच टा मधुर आ बीस बेशी सौ मन दूधक दही चारि साल पुरनका चाउर राहड़िक दालि बरी सकरौड़ी घी पापड़ कत्ते खाएब उपरो सँ नीचो सँ खुएताह खाउ ने कत्ते खाएब” जगदीश झुठे छाँटैत रहलाह सभ बूझैत अछि ओ एत्ते नइ बाजैत छथि फेर बिजौक बात पर कहऽ लागलाह “हम कहि देलियन्हि आब कून बिजौ आ कोन विनय जेहने खुएनहार तहिना खेनिहार” हे सूर्य हे भास्कर आइ माथ पर नइ आएब बादले मे रहब जोन मजूर खबास भनसीया पनिभरनी सभ तपि जेतीह तँ काज के करत हे पवनदेव आइ मंद मंद बहब खाउ हनुमान सप्पत आइ पूरबे रहब एमहर आएब तँ तीमन तरकारी भात दालि सभमे माटि बाउल खपटी सना गोजा जाएत। हे इंद्रदेव अहाँक जरूरी आइ खेत मे छैक गाँव मे नै अहाँ आइ शचीए लग रहू अहाँ आएब! तखन कोना अओताह गौआँ घरूआ टोल समाज ब्राह्मण महाब्राह्मण। हे देवगण आइ अंतरिक्षे मे व्यस्त रहू आइ लिअ दिअ प्रकृतिक स्वाद आइ रमऽ दिअ समाज मे आइ बैसऽ दिअ जमीन पर आइ माँगऽ दिअ पानि केराक पात आइ सूँघऽ दिअ महकौआ चाउरक भात । जेना मन्नू बाबू कहलखिन्ह तीने बजे पड़ि जाए आलू उसनए लेल चारिए बजे बनऽ लागए चटनी भोरे बनए बरी सकरौड़ी सात बजे तक जमा भऽ जाए बालटीन डोल गमला करछुल चंगेरा। आठ बजे हुअ लागइ तरकारीक सूर सारि दस बजे बीड़ी बनि जाइ बारह बजे तक नौत निमंत्रण एक बजे पत्ता कटा जमा भऽ जाइ दलान पर। दू बजे चढ़ि जाइ भातक पहिल खेप तीने बजे सँ रतरत करए गाँव टोलक नबका बारीक। अइ होटल आ केटररक जमाना मे अहाँ कोन सामाजिकताक बात करइ छियइ आठ बजे एलियइ आ दूनू बापुत बैसि गेलियइ कोना कऽ निबाहबए गाँव टोलक मरजाद।

अशोकक गाछ कामकाज मे पाछू मुदा ललकारए मे आगू ओ नमगर छीटधारी युवक आलोक बाबूक सार छथि। चलबा बाजबाक तरीका सँ स्पष्ट रहए ओ कोनो डी.एस.पी.ए क बेटा हेथिन्ह चलाकी पकड़ेला पर ईमानदार भऽ गेलाह “हमरा लोकनि भेलौं अशोकक गाछ ने फूल देब ने छाया ने फल बीज ने आरोग्यक चीज। मुदा हम दलान पर बनल रहब हम छी शोभा काटबा हटेबाक वस्तु नइ प्रतिष्ठोऽपकरण।”

मरणोपरांत-३ मरनाहर केँ यादि करू हे चन्द्रदेव, राम, भूषण आ कृष्णमोहन मरनाहर केँ यादि करू जेेना मंदिरक निरमाल बीतल सम्मेलनक पोस्टर आरती पूजाक बाद शालिग्राम। ई नइ कि ई देलाह आ ई नइ देलाह रोड पर अपने घर बनेलाह आ हमरा बँसबिट्टी देलाह अपने भीठा आ हमरा उसरौठी देलाह भाइ पर कम आ बेटा पर बेशी ध्यान देलाह ई आहक तुकबन्दी बंद करू मरनाहर ककरो सँ किछु नइ लेलक भले ककरो किछु कम देने हुअए। तइ दुआरे आबू आ काजमे रमि जाउ जमीन जाल खेत मकान गाछी बाँस रहबे करतइ काल्हि सँ बाँटब आ बाँटिते रहब। हयउ इंजीनियर साहेब बजाबू खुआबू विनय सँ ई धरती हरदम नीचाँ आ अकाश हरदम ऊपरे रहै छै अहाँक पुरूषार्थ सँ अविचलित मूड़ी कनि नीचाँ आ छाती बिन उतान केने आनू मुँह पर कनि विज्ञापित नकली मुसकान गौआँ घरूआ निमंत्रित छथिन्ह ई नइ छथिन्ह खबास आ जोन ई नइ छथिन्ह पुल बान्हक ठीकेदार बिसरि अपन नाम पद स्वागत करू सभ केँ। चाहे केओ कतबो खगल कपड़ा लत्ता फाटल चीटल झुकि जाउ स्वागत मे सम्मान, मर्यादाक तमघैल कहिया ले राखब खुलि कऽ खर्च करू संचित प्रतिष्ठाक बेन बनाउ आउ, झुकि जाउ भोज काल पसरि गेलइ सुअन्नक गंध आबऽ लागलाह निमंत्रित घुसकऽ लागलइ बिलाइ कुकुर चौकस कौआ उल्लू बनबिलाइ बैसऽ लागलइ पाँतिक पाँति आबऽ लागलइ जेरिक जेर विदा भेलाह गौआँ दियाद नून तीमनक मीमांसा करैत सुपारी चून लैत कुरता खोलि गरदनि पर राखैत साफ करऽ लागलइ जोन खबास पाँति मे गिरल पत्ता भात दालि दही बरी फाटल पात छिट्टा मे जाइतो जाइत गिरि जाइ किछु भात किछु दही दहीक विषैन गंध दालि तरकारी मे मिलि बना देलकए भोजैन! भोजैन! भोजगंध अलसियाबऽ लागलइ दौड़ऽ लागलइ गोला करिया कुकुर हा हा करऽ लागलाह दामो सुरेश चिकरऽ लागलाह बैजू बाबू गंगेश जी मन्नू बाबू “जल्दी ला रे खर्रा पानि झाड़ू उठाबू अओ पात लाबू भात कहाँ गेलइ तरकारी दालि दूनू तरकारी एक साथ उठाबू आब बरी भऽ गेलइ बस दही उठाउ ओमहर सँ के उठि रहल अछि बैसू ! बैसू ! बैसू ! देखब कुकुर पाँति मे नइ घुसए हओ एमहर दही छूटि गेलइ चलू आब पातिल राखू भंडार घर बन्द करू ”

………………………………. बर्फ भोर सूर्यदेव कतऽ लुप्‍त भेला कोन अंतरिक्ष, मंदाकिनी मे या जाड़ हुनको खेहाड़इ छइ देखियौ ने कुम्‍हरबा मटकूरी नइ बनाबै छइ । बनाओत की मटकूरी घैल चुक्‍का पातिल तौला उगता नइ सूर्यदेव लेब की हम बमभोला। तहिना पसरल अन्‍हार कुहेसा हड्डियो कंपकंपाइ छइ बीलटबा सूतले-सूतल ओछैने पर खाइ छइ। रूकल जीवन स्‍पंदन गाय भैंस कुकुर बकरी डोलबै छै गरदनि डोलबै नांगरि पुछड़ी कानए बिना नोर दांत देखबै छै। बंद भेलै विद्यालय बंद कटनी रोपनी एहन बर्फ भोरोमे नहा कऽ छुन्‍नू पंडित पहिर ओढ़ि काजल टीका तीन कोस जजिमनिका साइकिल केँ गरूड़ बूझि घंटी डोलबै छइ देश आ गेयर देश सुस्‍ता रहल छइ या पनहा रहल छइ चाही एकरा तेल ग्रीस मोबिल आ तहिना साहित्‍य आ सम्‍बन्‍धो मे पहिले हमरा पढ़ैत देखि माँ आनइ छली चाय पानि बाबू तमाकू चुनबैत चलि जाइत छलाह अकाश सँ आगू आ कनिया पहिरैत छली चूड़ी ,पायल नि:शब्‍द झनझनाहट सँ भंग नइ हुअए हमर ध्‍यान हवा बिहाड़ि सेहो बहैत छलए पूछि कऽ। हमरे खोंखी सँ खोंखियाइ पूरा दुनियाँ हमरे सपना सपनाइत उगैत छलइ चान सुरुज। ओ आर जमाना छलए नेता जी यादि अछि अहाँक एक संकेतपर देश बिछ जाइत छलइ अहाँ मतलब देश आ देश मतलब अहाँ नेताजी आब दोसरे हवा बहि रहल सभ अपना विषयमे सोचि रहल स्‍त्री, सोलकन, जाम्बिया, भूटान, लातेहार, पलामू सभकेँ पता छइ अपन हित अपन बात देश, सम्‍बन्‍ध, साहित्‍य चढ़ाइ पर चलि रहल चाही बेशी दम गेयर नम्‍बर चारि बेशी गति बेशी तेल पानि या फेर बच्‍चाक बिछिये जँका बढ़ा दियौ लेवेल धूर्तता, छल, धोखाक लेवेल बढ़बऽ पड़त चाही नया नया मुखौटा मोबिलाइजेशन प्रोपेगंडा पाखंडक अद्यतन संस्‍करण दोसरे हवा बहि रहल छैक  देश दुनिया जागि रहल छइ पॉंच केबी इंटरनेटक मंद गति आ सुन्‍नरि तोहर फोटो ससरैत बढ़ैत लहरि जेना स्‍वर्गक परदा खुलैत हो धीरे धीरे सितार पर राग भैरवीक साथ पॉंच केबी मे माथ दस मे कपार पंद्रह मे आँखि पिपनी डिम्‍मा सहित फेर रूकि गेलइ नेट पता नइ आइ देखि सकब आँखिक निचला ढलान अरे आँखियो देखा गेलइ आँखियो सँ नीचाँ सिंधु-गंगाक विशाल मैदान कनि नाक तँ देखियौ हिमालयक बहिन बनल जाइ देखियौ तँ नेटक नरहेरपनी केवल वामे देखाइ छै दहिना तँ गिड़ने जाइ छै की दहिनो ओतबे पवित्र ओहिना गंगाजल।

नेटकंपनीक लेल निकृष्‍टतम पंचाक्षरी गारि केँ घोंटैत बंद करैत हम जाल जंजाल सत झूठ आ खेहारने अनेरे कवि यात्री आध फाँक आँखि आ आध फाँक नाक दोस महिम कखनो जातिक लसैर लगबैत कखनो कुल गोत्रक सोंगर नेने उपकारक पंजी समेटने बीतल युग पर टीका करैत कोनो चित्र पर सँ जाल मकरी साफ करैत आबि गेलखिन दोस ओ कहथिन आ कहिते र‍हथिन ओ सुनबा ले नइ आएल छथिन हुनका मोल चाही ओ तौल रहल छथिन अतीतक सिनेहकेँ ओ खोजि रहल छथिन सभसँ बड़का अंक जे अचूक हुअए आ बटखराक बदला राखि देने छथिन बीतल युगक दोसतियारी २ आब दोस डेली बतियाइ छथिन सामना सामनी नइ तँ फोने सँ थाहइ छथिन कोन नस कत्‍तऽ सँ पकड़ी थाहैत छछारैत मुस्कियाइ छथिन हम दबि रहल छी हुनकर जानकारी सँ कालिदास मैथिली मोहम्‍मद रफी आब हुनको प्रिय विषय अछि पहिले मिलबा सँ बचैत रही आब नइ आबइ छथिन तँ कोनादिन लागैत अछि दोस तमाकू जकाँ ठोर कब्जियेने जाइ छथि आ भांग जकाँ दिमाग की कही दिमाग तँ पहिले सँ हफीमियाइल अछि दोस एता ओ कहता आ हम करब यद्यपि नफा नुकसान जनइ छी मुदा दोस शिष्‍ट बना गेला बाजइ भूकइक तरीका नीक जकाँ सिखा गेला ३ गीत गाबैत श्‍लोक पढ़ैत उद्धरणक बरसा करैत कखनो प्रेरक प्रसंग कखनो वेद पुराण तहिना अर्थ-राजनीति कखनो भकुआइ अकछी कखनो दोस देवता देखाथिन दया बेचैत ओ छली फरेबी वंचक बहुरूपिया छलइ कखनो कालिदास विद्यापति जपइ छलइ महान ज्ञानी नइ जानकार छलइ फँसा लै छलै कोनो चरचा मे मनबा लै छलै बात भऽ जाइ छलिऐ चित्‍त पटो मे किछु नइ करैत छलिऐ ओ कखनो बीमा कखनो कविता कखनो किताब बेचि पड़ा जाइत छल। ओ आब चुप अछि ने दुश्‍मनीक बात ने दोस्‍तीक चर्चा छइ काल्हि फेर आएत कोनो नया डिब्‍बा पेटी किताब मोबाइल स्‍कीम नेने हम फेर चित्‍त हेबइ ओ फेर भुतिया जाएत अपन बटुआ सम्‍हारैत। मनोज भायक चिट्ठी की भाय आबो राजदूत उड़बै छियइ सौ पर की भाय आबो हंसइ छियइ ओहिना हहा कऽ की भाय आबो देखइ छियइ रौद बरखा केँ ओहिना प्रेम सँ की भाय आबो कचकूह आम देखि पानि आबैत अछि मुँहमे अपन गाछी आ दोसरक आम एखनो नीक लागैत अछि की भाय जालंधरो करियने जकाँ छै कोना साधै छिऐ उदयनाचार्य आ जालंधरनाथकेँ एक साथ नव्‍य-न्‍याय आ नाथपंथक सूत्र कतऽ मिलैत अछि या हमरे जकाँ उलझैत देरी छोड़िछाड़ि निवृत्‍त भऽ जाइ छी सही कहलौं भाइ विदेहो तँ हमरे छथि आ हम पूरा दुनिया मे पसरलाक बादो ओतबे लोकल छी सक्‍कत माटि खींचैत अछि हमरा आ दरिद्र-छिम्‍मरि रहितौं ओतबे सामंतवादी छी संग मे अछिए की, जे दुनिया छीनत तैयो पकड़ने छी अपन दूबिकेँ बकुट्टा मे छोड़ू ई सभ की  ओतौ एहिना गामघर गीतनाद धूपदीप यादि आबै छी हम, गाम आ समाजक लोक बड़ी, ‍सिंगराही, नबकी नौला पोखरि बड़ियाही, बलहा घाट ककरहा, ठकुरनीया, महिसर बाध कखनो सुनइ छी प्राती, नचारी, समदओन चाखै छी नबका चूड़ा पर छलिऐल पूष मासक टटका दही हँसए कऽ बात पर हँसै छी आ कानइ कऽ मौका पर गिरैत अछि नोर या अहूँ केँ मारि देलक समय जेना हमरा मारलक सम्‍हरल डांग सँ बियाह आ मोंछ ओ बियाह नइ, मोंछक लड़ाइ छलइ आ सभक अपन अपन प्‍लान रहए बाबू, माँ, दोस, सासु-ससुर संस्‍कार कम, नाच बजार छलइ। बाबूए पढ़ेने लिखेने रहथिन तेँ बिआह हुनके पसिन्‍नक जगह, लड़की आ तिथिकेँ निश्चित छलै भैयाक लेल ई छलए अचूक मौका साबित करबाक लेल बहुत रास चीज तेँ केवल नवका चमचम गाड़ीक जखीरा रहए आ यदि ऐ साल बियाह नइ हेतइ तखन बाबूक मोंछ आ माथ नीचा भऽ जेतनि। यदि हम काजर लगेबा सँ रोकबाक प्रयास करतिऐ तखन जनानी सभक नजरिमे माँ बहुत छोट भऽ जेतइ आ ससुर महराज सेहो लगेने रहथिन बाजी ककरो सँ तेँ दिसम्‍बर पक्‍का रहए आ ने हमर उमेर कम रहए ने हम बेरोजगार रहिऐ तेँ ससुरक ससुर जाँच करबा लेल पहुँच गेलखिन बागमती सँ केन कहीं कोनो जनानाक चक्‍कर तँ नइ छइ आ बियाह मे जरूरी रहए दारू पीनाइ आ नाचनाइ किएक तँ वीडियो गड़बड़ा जेतइ आ धियान देने रहए बहुत लोक गिद्धो सँ बेशी हम हुसिऐ आ ओ प्रारम्‍भ करए। प्‍लेटो आ हमर कनिया अंतत: प्‍लेटोकेँ योग्‍य शिष्‍या मिलिये गेलनि हे मैथिलीक स्‍वर्गीय कविगण बता देबनि प्‍लेटोकेँ ओ एकटा युवा महिला छथिन्‍ह आ जहिना प्‍लेटो दौड़ैत छलथिन्‍ह कविता दिसि राजदंड लऽ कऽ तहिना ललकारैत छथिन्‍ह ई एकटा नवोदित कविकेँ आ पुछैत छथिन्‍ह एकटा अस्‍थापित कवि सँ की हेतओ ऐ कविता लऽ कऽ काज रोजगारि छोड़ि किए बताह भेल छेँ सजमनि छीलैत आटा सानैत फोड़न दैत छौंकक मेंजन तैयार करैत बच्‍चाक मुँहमे कौर दैत नेटा काँची पोछैत नाना प्रकारक मुखाकृति भाव भंगिमा खुसुर फुसुर खौंझाइत बड़बड़ाइत गारि गीत जकाँ कखनो गायत्री मंत्र कखनो सप्‍तशती कखनो कोनो अतुकांत वैदिक ऋचा अरबीक अबूझ नेमाज जकाँ। आ प्‍लेटा जे नइ कऽ सकला मंत्री पद अछैत बधाइ प्‍लेटो। अहाँक योग्‍य शिष्‍य अरस्‍तू वा हमर कनियाँ ओ निर्णय निकालि नेने छथि एहिना फिफियाइत रहब हिहियाइत रहब किछु देखने सुनने ऐ दुनिया मे सभ केओ अछि आ दुनिया ढन्‍नूक लालसँ नइ चलैत अछि मुदा ई दुनिया ढन्‍नुको लालक छै। टिप्‍स फ्राम खट्टरकका न्‍यूटनक निअममे किछु जोड़ि घटा देबहक कोनो दोसर भाषा कोनो आन फाण्टमे किछु शब्‍द बदलि कऽ क्रम बदलि कऽ तखन की ओ निअम तोहर भऽ जेतऽ नइ ने मुदा साहित्‍यमे ई फ्राड खूब लोकप्रिय अछि टीपू आ छपि जाउ बूझलहो वौआ आ केओ पकड़ि लए तखन कहि दहो हम तँ हुनका सँ प्रेरणा लेने छी आ बूड़िभकुआ तैयो नइ मानऽ तखन जोरसँ बाजिहऽ ओकर कान तीरैत कानिहऽ खीजिहऽ अपनो मुँह कान नोचैत ओकरो केश टीक तीरने साल दू साल तँ बिताए देबऽ साहित्‍यो विज्ञान होइछ तावत केओ आन कतउ सँ टीपतइ ओ मंच पर आबि जेतइ आ फेर नया सिरासँ तीरमतीरा प्रारंभ भऽ जेतइ बर्फ पानि भाफ देह ओकर बर्फ छलइ मोन ओकर पानि छलइ स्‍वप्‍न ओकर भाफ छलइ देह मोन स्‍वप्‍न ओकर बर्फ पानि भाफ छलइ उमेर ओकर तेहने सन सतरह अठारह छलइ मोनक उन्‍नीस बीस जिनगी केर पैघ छोट जाउ कनि एमहर वा ओमहर लजाति छलइ मुसकाबैत मंद मंद आँखि नाक तीर तारि नहू नहू डेग ओकर कखनो बिहाड़ि छलइ इतिहासक घंटी मे गणिते बुझाइत रहइ रामजीक सासुर अयोध्‍या देखाइत रहए । बस तीने दिन लागि रहल पटना दरभंगा तीन दिन लसेर अओ जुटि रहला बड़ बड़ महन्‍थ सेर केओ सवा सेर अओ सुनु सुनु रंगबिरही बाजा बौआ पटना कक्‍का झाझा पाउडर काजर खूब लगेने कविक राग बहेर अओ लस्‍सी पेप्‍सी मुरगा माछक पन्‍नी शीशी  हड्डी काँटा लागि रहल अछि ढ़ेर अओ बस तीने दिन जय विद्यापति जय मिथिला के फेर अओ फेर बौआ तहिना दिन रहतइ कानिपीट केँ भागऽ पड़तइ जगत जानकी सासुर बसतइ बस तीने दिन दिनक फेरा बिसरत सभ नरहेर अओ उत्‍थर लोक जेहने हम तेहने हमर ई उत्‍थर शब्‍द करिया माटिक बड़का चेका सुक्‍खल बज्‍जर सन हर बड़दक बात छोडू ट्रेक्‍टरोक चक्‍का धसैत छै आ कखनो भुसभुसिया उस्‍सर पनिसोखिया बलुआही कनियो लैस नइ की चापलूसी कोन कृतज्ञता नोकगर खतरनाक सटला पर घोंपएबाक गारंटी कखनो लाल लाल जेना माटि खूनक दोस्‍ती हुअए सुल्‍तानगंज भागलपुरक जमीन अलगे उपज जेजात बूझू कोनो गऽरक लोक नइ अहाँ उपकार करब हम हस्‍तक्षेप मानब अकछियाएब अलगे हम छी उत्‍थर लोक परिधि पर रहए बला। चमारक ऋण बहुत नमहर मोट पुरान रजिस्‍टर छै  चमार सभक संगमे  हँ हँ सभक संगमे छै  ककरो जिल्‍द रंगगर छै  ककरो सादा  तहिना नव पुरान सेहो  केओ छंद निछंद  सभ्‍यासभ्‍य  सभपर छै क्रोधक निशान  कोनो कोनोमे प्रतिहिंसाक आगि, लोहा, पाथर केओ तर्कक साथ ई तर्क तर्कशास्‍त्रक उधार नइ विज्ञानक छै आ कखनो फूले, अंबेदकर कखनो कर्पूरीक फोटो सजा गेलइ ई रजिस्‍टर ई केओ चोरा नइ सकै छै केओ जरा गला नइ सकै छै एकर सभ शब्‍द चमार सभक ह्रदयपर अंकित छै पाथरक शब्‍द लोहाक शब्‍द कोनो आर भरिगर वस्‍तु होइ तँ कहब दीवालीक पहिले दीवाली सँ पहिले कोदारि सँ खूनैत करिया माटि  पानि दऽ छछारैत सानैत मिलबैत कुम्‍हार  चाक पर बैसा कऽ गाँरि काटैत कुम्‍हार कखनो हवा बसातसँ बचबैत रौद मे सुखबैत कुम्‍हार गोइठा जारन कोइला सँ जरबैत कुम्‍हार लाल लाल दीप देखि मोंछ पिजाबैत कुम्‍हार धनतेरस राति बहुतो रास दूटकिया लॉटरी अखबारक ईनामी कूपन सभ दू नम्‍मरसँ छूटैत डिवीजन तीनू बेर बेटिये बेटी। तैयो साहस करैत घुसलउँ बजार सोना चानीक कोन बात टिनही लेल भेल प्रात डोलैत करौछ छोलनी बेलना सभ जेना डरबए लेल नाच करैत छल कठौत टुकुर टुकुर ताकैत रहए जेना हमहीं सनेबए उसनए कऽ नौत दैत छल उ फूलही डेकची अओ बाबू आइ तँ भांगो नइ खेलिऐ ई कूकर कथी लेल सीटी मारइ छइ अरे बाप चूल्हियो कहाँ पजारल छइ धुर जो ई की भेलइ हमरा किछु ने किछु तँ खरीदनाइ जरूरिए चलू थारी खरीदल जाए छोट छोट बच्‍चा छइ तीन चारि खाना वला थारी नाना विधि व्‍यंजन नइ छप्‍पन भोग नइ नवान्‍नो तँ हेतइ एकटा मे रसदार एकटा भूजिया एकटा मे अँचार पापर आँखि नइ लगबू जीअ दिअ हमरा जाइ छी गाम पर अहूँ जाउ। हम पुरहितिया इजोत सँ अन्‍हारक अनंत यात्रा हँ हँ पूर्णिमा सँ अमावस्‍या बुझू पतरा देखैत दिन गुनैत पतिया कटैत सभ शुभाशुभ जेना हमरे पाछाँ लागल अछि ठीके चिन्‍हलउँ हम छी मिथिलाक पुरहितिया बाभन। सुरजो सँ पहिले शहरियो सँ पहिले जोतुआ बड़द बहलमानो सँ पहिले मियॉं जीक मुरगाक बांगो सँ पहिले सभसँ पहिले उठि कऽ पूजऽ चाहैत छी अपन कम दोसरक भगवानकेँ बेशी पाप पुण्‍य व्रत विधि सभ दोसरे लेल मिलबो करैछ दोसरेकेँ आ हम नित्‍य नित्‍य  घुमि रहल छी कखनो पैदल कखनो साइकिल हमरो दुनियाँ खूब जमल अछि जजिमनिकाक ऐ तीन गाम सँ प्रति साँझ हम आबइ छी पाव भरि गहूम आसेर मकइ किलो धानक पोटरी लऽ कऽ संगहि-संग एक मटकूरी दही लेने पंडिताइन खोलइ छथिन ई पोटरी जेना रानी खोलइ पड़ोसी रानीक भेजल उपहार। वा कुबेरक कनियाँ जेना देखथि घरबलाक कृत-कृत्य। आ कहियो राति बारहो एक जिन्‍न सभसँ बतियाइत ब्रह्मराक्षसकें चून तमाकुल दैत चुड़ैल सभकेँ धकियाबैत पछुआबैत ब्रह्मडाकिनीकेँ सरियाबैत अपन मटकूरी। आ बौआ बड कठिन छइ जजिमानी बचेनाइ कम देबहो तैयो रूसनाइ मना छइ बेशी देबहो तैयो प्रशंसा नइ सुनबहक गमि लेबहक तों सभ सभ बड़ा बढ़िया खूब नीक चलि रहल छइ भगवानक माया छइ। चालीसक बात तेरह साल पहिलेक बात छइ ओ सभ ओ सभ बात आब तँ हमहूँ चालीसक लगभगाएल छी तोहूँ जरूर चौंतीस पैंतीसक भऽ गेल हेबेँ कहाँ पूछि सकलियौ तोरासँ कोनो बात आब तँ प्रश्‍नो सभ बिसरि गेलौं जे यादि केने छलियौ तोरासँ पूछए लेल  हवाक साथ दइबला केश हमर  किछु उड़ि गेल  किछु पाकि कऽ डरा रहल अछि हँसीक साथ निकलइबला धवल दाँतक पाँति किछु टुटि गेल किछु हिल रहल अछि तहिना गोरनार चमरो ई भेल कारी बदरंग तूँ केहन भऽ' गेलेँ कतौ देखबौ तँ कोना चिन्‍हबौ ई कहनाइ तँ बिसरिये गेलियौ हमरा दू टा बच्‍चो अछि तोरा कएक टा छौ आ तोँ कतऽ रहैत छेँ की तूँहूँ हमरे जकाँ नौकरी करैत बनरा गेलेँ आबो सुनइ छेँ रातिक रेडियो आ लिखै छेँ पोस्‍टकार्ड की तोरो कोनो पता नइ छौ ई निरर्थक गद्य बस तोरे लेल तूहीं बूझबीही छंदक भयानक दुनिया मे तुकहीन पद मे छुपल एकटा नीरव एकांत अर्थ राजेश मोहन झा “गुंजन” मि‍झाइत दीप बि‍नु वातीक दीप बनल छी मोती बि‍नु ति‍रस्‍कृत सीप बनल छी कहब की बि‍नु टाकाक गरीबक बेटी ने ताज ने राज महीप बनल छी साज सौन्‍दर्य रहि‍तो मुदा बि‍नु लक्ष्‍मी शारदा की करती मोनक बेथा केकरासँ कही ति‍लक सि‍न्‍धुक ि‍नर्जन द्वीप बनल छी आत्‍मो भावे तन अछि‍ जहि‍ना बि‍नु सोनक श्रृंगार अछि‍ तहि‍ना जनकक हृदए पझाइत भुस्‍सी सन सौराठ-सभामे अपरतीप बनल छी नोरक धारसँ आँखि‍ सुखाएल वि‍द्या गुणक पुष्‍प मौलाइल ऐ धनक वसन्तमे जेठक दुपहरि‍याक वि‍रह गीत बनल छी आगाँ बढ़ू नव तरूण सभ मि‍लि‍ कऽ नै मौलाइत स्‍वर्ण पुष्‍प धन बि‍नु मि‍झाइत दीपमे भरू सि‍नेह-सर करू आलोकि‍त बुझब अकासदीप बनल छी.....। मूड़नक भोज रसगुल्‍लामे बि‍च्‍ची, जि‍लेबी काँच, गरम तरकारीपर बैसला पूरी पाँच मूड़नक भोज कएलनि‍ इंजि‍नि‍यर, हाथे लोटा बि‍गड़ल इंटीरि‍यर। जेठक दुपहरि‍यामे भागम भाग, धांगलौं मूंग आ पलाँकी साग। पेटमे मिठका टीस उठैए जहि‍ना मकइया सीस झड़ैए।। हेल्‍थ वि‍भाग लगौलनि‍ अनुमान, गरजक संग बौछार समान। बाजू मोनसँ केहन लगैए, सूइया पहाड़पर कंकड़ गड़ैए।। बि‍रेन्‍द्र बचावू, मुन्‍ना बचावू, आब एहन नै भोज देखाउ। इंजि‍नि‍यर मास्‍टर केर कुचक्रमे, अन्‍हारे हाथे लोटा धेलौं।। आब एहन नै खाएब जि‍लेबी, हजम चूर्ण आ जमैनक सेवी। भगवान अहाँक आमद बढ़ाबथु, आगाँ बढ़ि‍याँ भोज खुआबथु।। सि‍द्ध अन्न खाएब अहाँ घर जहि‍या उऋ‍न हएब भोज दोससँ तहि‍या। सुनू औ कतबो वेतन बढ़तनि‍, मुदा नै खानदानी स्‍वभाव बदलतनि‍।। थेथर नेता गुड्डी फँसलै, गुड्डी फँसलै देखही बौआ, नेता खसलै। जोर लगावह उठावह हि‍नका साहि‍ दहुन डूबैत केर ति‍नका।। मोन कनैए, आँखि‍ भरैए, हि‍नका कारणे प्रजा मरैए। भारी भरकम मंत्री संत्री गण, पेट भूखल आ गहुम सड़ैए।। आइ.सी.सी. आ एफ.सी.आइ., कतेको आइमे ‘यू’ नि‍मत्ता। एक मासमे बनौता दि‍ल्‍ली, तोड़ि‍ जोड़ि‍ मचोड़ि‍ केर सत्ता।। हऽर घऽर आ बेट खरि‍हार, मंत्री रहि‍तो ज्‍योति‍ष केर जान। कुटि‍ल मुस्‍कान लए सदन चलाबथि‍, भोजन पानि‍ बि‍‍नु गंगा स्‍नान।। हमर सनेश ई सभ जनता केर, मंहगी बढ़त सम्‍हारू धोती। लोकक गरदनि‍मे फाँस लगौलनि‍, पहि‍रथि‍ अपने माला मोती।। कहथि‍ सुदामा सुनू मुरारी, एहन थेथर नेता नै भारी। बुधि‍‍ हरण भेल भूखे मरै छी, दौड़ू लाउ संग सस्‍ता थारी।। केहेन खेल खेल-खेल धुरखेल-खेल एहेन खेलमे कतेको खेल खेल संस्‍कृति‍क नाओ हँसाबथि‍ बना कऽ छज्‍जी नीव डोलाबथि‍ कहथि‍ तीस दि‍न आरो चाही बनावथि‍ कोठी गंडा गाही खेतक बि‍च्‍चे बाट बनौलनि‍, पानि‍ भरल पोखरि‍क उड़ाही सोनक सि‍ल्‍लसँ पि‍रही बनाबथि‍ बि‍नु पौदानक सि‍रही बनाबथि‍ कलमाटी आइ डंडा मारि‍ कऽ शि‍तलहरीमे ए.सी. चलाबथि‍ चमकैत दि‍ल्‍लीकेँ देखत दुनि‍याँ इसकूल खाली भागल सभ मुनि‍याँ हटा कऽ झुग्‍गी फि‍लैट बनाएब मेलवोर्नसँ बेसी नाओ कमाएब एकपर एक मि‍नेजर आ प्‍लेयर सभटा धनमे सबहक शेयर भगवान बचाबथु नाक देखि‍ केर बादमे बूझब खर्च क्‍लेश केर गरम जमाना औ बाबू ई गरम जमाना । नगर सिनेमा आर चौवाट, अधिकारक झंडा नेने हाथ, ठोकथि ताल नेत्री गण मिलि कऽ पुरुष जाति सभ बनल बेगाना ।। प्रतिशत तैंतीस जल्दी चाही नेना भूखे वरू काटथि काही, खसावथि वज्र लगाबथि अगराही, अप्पन जन भऽ गेल बेगाना।। ममता रखैत छथि कोठीक कान्हपर, सम्मेलन करती पुनमा बान्हपर सगर नियोजन हिनके चाही, मर्द बनल फाटल पैजामा ।। साड़ीमे नै हिनका देखबै, बेलऽ पड़त सोहारी तखने बुझबै जौं बैसलहुँ वेदी वर कहियो, जीवन भरि भरबै हर्जाना ।। चाहक महिमा जखन चाह कंठ तर गेल सरस तामरस हृदए उर भेल फुलायलि वनलता गमकल उपवन केना कहू कते प्रफ्फुलित मन साँझ-भिनसर चाहे चाही नै भेटत तँ काटब काही चीनक अम्यागत भारतक श्रृंगार अछि अंगरेजिया अवरूप उपहार वौकूबाबू अरू जुगेसर राधाजी संग निकालथि आह बड़का कक्का काटैत सुपारी चाहक महिमा सुनैत छलाह वएस जखन होउ चालीस पार चाह करथि बड़ तन उपकार एकरा छोड़ब नै सोचू बाबू हएत जीवनक पैघ गुनाह अपन गरिमा सुनि चाह भफाए राखल-राखल गेल सेराए वेश तँ ठंढो चाहकेँ पीअब दौगब नै बरू किछु तँ जीअब आजुक लोक मानव छथि मानवता नै छन्‍हि‍, केना चलत जगतक दुहू चक्का? बूझि नै पड़ैए कखनो-कखनो, घीचै छथि वा दइ छथि धक्का।। झूठ प्रपंचक खेल सगरो दिन, अपराधक भाभट बढ़ा रहल छथि। अपने हाथे तन्मयतासँ, प्रियंजनक चचरी सजा रहल छथि। चिड़ै चिन्त छथि चिलका उड़ि कऽ प्रकृतिकेँ ललकारि रहल छथि। मुदा मनुक्ख निश्चि‍न्‍त भऽ विनाश लीलाकेँ हकारि रहल छथि।। कनैत आत्मा कोने-कोनेमे, अचला अबला बनि सिसकि रहल छथि। कहै छथि द्रुतगामी बनि गेलौं, जुनि पुछू सभ घुसकि रहल छथि।। आबहु जागू सचेतन बनि कऽ नै भेल विलम्ब ऐ‍ सत्यकेँ जानू। बढ़ू कने चमत्कार करू औ, वसुधैव कुटुम्ब छथि एकरा मानू ।। पलायन प्रश्‍न- औ बाबू अहाँ कतए रहैत छी? उत्तर- भरैए पोख जतए ओतए रहैत छी। प्रश्‍न- ओ कोन ठाम अछि‍, कोन देश अछि‍ की भाषा अछि‍ की भेष अछि‍? उत्तर- ने कोनो परि‍चए नै कि‍छु पहि‍चान आन देश थि‍क भाषा आन देशक नाम सौराष्‍ट्र जुनि‍ बूझब सौराठ कतेक राज लाठी नेने करैत छथि‍ अपन मोनक राज लोकक बेथासँ हुनका नै मतलब मानवतासँ नै कि‍छु काज प्रश्‍न- कि‍ए गेलौं परदेशी भेलौं छोड़ि‍ कऽ अपन माटि‍- ई मि‍थि‍ला उत्तर- नै काज भेटैए नै पेट भरैए मि‍थि‍ला आब बनि‍ गेली शि‍थि‍ला प्रश्‍न- शस्‍य श्‍यामला घटा अछि‍ अपन खूब मेहनति‍ करू खूब उपजाऊ उत्तर- सभटा सुन्न कए देलनि‍ अछि‍ कोसी ककर सेवा करू की उपजाऊ? बेश तँ जाइत जाउ छोड़ि‍ कऽ गाम नि‍र्णए- मुदा! नै बि‍सरब अपन भाखा अपन ठाम आ अपन गाम।।। उनटा-पुनटा कोइली काली बगुला गोर हे भगवान ई केहेन अन्‍होर ताड़ खजूरक मान बढ़ल छै पीपर आमक प्राण उड़ल छै। कलयुग एकरे कहल जाइत छै उनटा-पुनटा सभ सटल जाइत छै सोन बनल छै टलहा चानी प्रजा भुक्‍खल नेता खाथि‍ वि‍रयानी। छूटल साँस टुटल आश छै सभ ठाढ़ि‍पर उल्‍लूक वास छै फगुआ बनल जेठक दुपहरि‍या अनाहूत उपेक्षि‍त मधुमास छै। कंठी माला माथे चानन अपने आइना अपने आनन हाथमे पोथी देखि‍ रहल छी दुहू जेबी भरल ताश छै। धर्म-अधर्मक अंतर गाएब जतेक लगाएब ओतेक पाएब बि‍नु ढौआक फाइल छै रुकल प्रजातंत्रमे कतेक वि‍श्वास छै। अंतरकलह आ विचार जुनि पुछू हमर हाल हम छी भऽ गेल बेहाल देखि‍ ई समाजक कुरीति मन भऽ जाए आगि बनैत ई कीड़ाक खाधि बना कऽ आचार। बनल अछि ई चर्चा छपल अछि जगमे पर्चा भगलए यौ फेर एकटा बेटी फेर ककरो संग यौ ऐमे नै लिअल मजा ई तँ अछि एकटा सजा जँ भागल दोसरक बेटी ओकरो बुझियौ अपन सुता। बदलू ऐ कुरीतिकेँ बेटा होथि वा बेटी दियौन्ह हुनका ज्ञान जुनि बनु अज्ञान आइ जँ लेब मजा फेर बनत ओ सजा। ई अछि जगक रीति निक काजमे नै देत संग अधला लेल आओत आगू जखन करब अहाँ किछु अधला बनि जाएत ओ पिछला फेर नै देत संग भऽ जाएत अपनेमे मग्न बना लेत ओकरा चर्या कऽ देत अहाँक पुर्जा-पुर्जा। केना बदलत ई समाज जकर होइ अछि नाश निक गप्प नै करए कि‍यो अधला लेल सदैब तैयार। की भेल जाइत छै ऐ‍ समाजकेँ अपन सभ्यता सभ कि‍यो बिसरए पश्चिमी हुअए हावी की हएत भावी समाजकेँ चिन्तित मन सोचै अछि। आजुक धिया-पुता नै बुझए ओकरा आरो किछु नै सुझए नै सोचए घरक मान ओकरा बस अछि अपन धि‍यान सजा कए माइ-बापक अर्थी बनि जाए ओ स्वार्थी नै सोचए हुनका बारेमे जे हुनकर करथि पालन। देखि‍ समाजक ई कुरीति मोन भऽ जाइ अछि पागल जा धरि नै मिलत समाज नै अछि तावए इलाज। केना बदलत ई परिभाषा केना बदलत ई समाज जकर करै नव पीढ़ी नाश लाबए पड़तै हुनका सड़कपर कहए पड़तै हुनका बेधड़क जुनि करू पूर्वजक अपमान हुनकर तँ राखू मान। बैसल-बैसल सोची मनमे बैसल-बैसल सोची मनमे मुदा नै लत्ता तनपर आगि बड़ैत ऐ‍ गर्मीमे बैसल हम उघार आंगनमे सूर्यक तपिस ने झेलल जाए ने अधलाह किछु देखल जाए जा धरि नै उठाएब डंडा नै भेटत मनकेँ ठंढ़ा आब ओ गेलै जमाना जइमे होइ तराना सभ दिस अछि दू मुँहा रस्ता ई जीवन नै अछि सस्ता सभ दिस अछि एकटा मोल जँ अछि पाइ तँ अहाँ अनमोल बदलल जाए प्रेमक परिभाषा अछि जँ क्षमता तँ करू आशा भ्रष्टाचार अछि पएर पसारैत शिष्टाचार गेलै कहाँदन आब नै अछि बेटा बापक हाथमे किछु दिन बाद हएत ई बेटाक आगाँ बाप झुकाएत माथ बेटा बैसत कुर्सीपर बाप डोलाएत पंखा देखी जे ई फड़ैत विष सोची मनमे हरदम केना हएत ऐ समाजक विकास कतौ ने एकटा आस सभ दिस होइक निन्दा ऐ‍सँ होअय शर्मिन्दा बैसल बैसल सोची मनमे। पादुका वि‍योग भरल फगुनहटि‍ गंगाक बसात छल प्रदीप भैयाक वि‍याहक परात छल बाबू शि‍वदानीक भरल दलानपर बरि‍आती सभ मारै छल ठहक्का झणहि‍ंमे अएला मास्‍टर साहेब सरि‍आती मध्‍यक पाहुन अनूप सटकल चट्टीमे दड़बर‍ मारैत गंगाक बालुसँ मोन छन्‍हि‍ तप्‍त हँफैत अपसि‍याँत कान्‍हपर गमछा टुटल पादुका लेलनि‍ नुकाए नवका सैन्‍डि‍ल ताकि‍ रहल छथि‍ कतौ भेटत तँ लेब चोराए तखने नजरि‍ पड़लनि‍ एक जोड़ि‍ नवका चप्‍पल छल बड़ सोहनगर बढ़ि‍याँ हएत एकरे पएर लगावी सभ दि‍न हवाइएपर चललौं आबहु गर्दभ छान छोड़ाबी हाथमे लऽ कऽ फुलही लोटा नव चप्‍पल पहि‍रि‍ नदी कात चललथि‍‍ देखते चट्टी चोरि‍ लुटकुन बाबू पंकज संग चोरकेँ दौग खेहाड़लनि‍ सभ बरि‍आती लग पहुँि‍च गेल ई चप्‍पल तँ टि‍ल्‍लूक थि‍क खोलि‍ दि‍यौ औ मास्‍टर साहेब कतेक दि‍न काटब लऽ आनक चीज बतीसी नि‍पोरि‍ मास्‍टर बजलथि‍‍ गलती भऽ गेल देखू उदर बेगमे बूझि‍ गेलौं ई हमरे चप्‍पल लोटा लऽ चललौं उद्वेगमे दुरजी साहेब फूसि‍ बजै छी जोरसँ बजला पंकज झट दऽ टुटल चट्टीमे अहाँ गामसँ अएलौं केना पहि‍रलौं नैका खट दऽ कि‍नै छी सभ दि‍न सड़ले आलू महकल भट्टा भरि‍ कऽ बोरी की पढ़बै छी नेना सभकेँ अपने शि‍क्षक मुदा करै छी चोरि‍ देखू महादेव केहेन अभ्‍यागत अहाँक दलानक नाम हँसेलनि‍ पाहुन तँ छथि‍ बरि‍आतक गामे केर ई कहि‍ महादेव अप्‍पन जान छोड़ैलनि‍ उदयन गामक छथि‍ पुरुष ई अपरूप जीवन छन्‍हि‍ काज महान टुटल चप्‍पल फाटल छन्‍हि‍ धोती बि‍नु टीकट रामदीरीमे गंगा स्‍नान।.....। सुगर फ्री सुगर फ्री सभ सुगर फ्री आब चीनी सेहो सुगर फ्री संवतक पूआ गेल पनि‍आएल गनि‍ कऽ हूरथि‍ श्रीमती आ श्री। आँखि‍ आँखि‍पर गि‍लास गार्ड छै, भरि‍ गेल मधुमेह वार्ड छै चूड़ा-दही संग टेबलेटक डि‍ब्‍बा खाइत रहू वन-टू-थ्री ‘ि‍नरामया' भेल जीवनक मील मुँहक चक्कीमे टीश उठल छै जमैन सोंफ संग देखू पान-बीड़ी देहक पलंगमे उड़ीस भरल छै जोड़क झटका धीरे लगथि‍ लस्‍सी पुष्‍प रससँ नेना सभ भागथि‍ बर्गर-चि‍प्‍सक एलै जमाना बढ़ि‍ रहल चाउमीनक बि‍क्री गाम धरमे डॉक्टर भरल नाली बन्‍द पाॅलीथीन सभ पड़ल दूधमे सोतीक पानि‍ लबालब सोमरस मदि‍रा सभ टेक्‍स फ्री आंग्‍ल वाणी श्रृंगार बनल छै मातृभूमि‍केँ बि‍सरि‍ रहल छै अपन मैथि‍ली अछि‍ मधुराएल ई नै‍ बूझब सुगर फ्री। नवीन कुमार "आशा" (१९८७-) पिता श्री गंगानाथ झा, माता श्रीमती विनीता झा। गाम- धानेरामपुर, पोस्ट- लोहना रोड, जिला- दरभंगा। सुनू सुनाउ अपन खबरि नै बनू अहाँ बेखबर बेखबर बनैक नै समए अछि मीत अखन गाउ संगीत संगीतक नै करू अभेलना ओकर सभ स्वरमे अछि तान ओकरा नै करू अनजान जँ आइ फेरब ओकरासँ मुँह फेर जीनाइ भऽ जाए दुरूह एखन अछि बेर संघर्षक ओकरा नै दियौ विराम जँ आइ लगाएब अहाँ विराम नै बनि पाओत अहाँक पहिचान कते दिन लोक पहिचानत छथिन ओ हुनकर सन्तान किछु तँए करू प्रत्यत करू तखन अपनाकेँ संयत रचथु भऽ संयत ई अछि सत्य यौ मीत जँ अहाँ छी निर्बल नै देत अहाँकेँ कियो बल जँ अहाँ किछु करब अपने तखन बनि पाओत पहिचान हमर ऐ गामक राखब धि‍यान देबनि माता पिताकेँ सम्मान ऐ सँ नै बनू अनजान जँ आइ कनी हएत अपमान नै राखू अपन मान बस देखू एकटा लक्ष्य ओकरा जुनि करू भक्ष जे आइ होइ अपमानित तँ तँए राखू ई धि‍यान लीअए चाही ई शपथ नै हएब ऐ मे दू मत जखन अहाँ पाएब सम्मान नै करब ककरो अपमान आब आशा गपकेँ विराम लगाबथि अपनो आब पहि‍चान बनाबथि सुनू सुनाउ अपन खबरि। (मित्र पी.एस.ठाकुर “बबलू” लेल) रोटी रोटी लेल तिलमिल करै अछि भूखल प्यासल हमर प्राण प्राण अखन हमरासँ कहए हमरा दिअ दू चुरुक पाइन पाइन पीबि भूख मेटाए रोटी ने चाही हमरा भाइ कतबो बुझाबी अन्तर्मनसँ किछु ने किछु हेतै जोगाड़ ओ तखनो नै हुअए तैयार रोटी लेल तिलमिल करै अछि भूखल प्यासल हमर प्राण भोर बितल साँझ बितल पसेनासँ कपड़ा तीतल आब पसेना सेहो देलक जवाब ओहो माँगै अछि हमरासँ जवाब भूखसँ लागैए जाएत जान डगमग-डगमग करैए प्राण रोटी लेल तिलमिल करै अछि भूखल प्यासल हमर प्राण आजुक अछि ई व्यथा जँ भेटैत जूठन हमरा लागत घुरि आएल प्राण रोटी लेल तिलमिल करै अछि भूखल प्यासल हमर प्राण तखने दूर देखाइ देलक आस जागल जेना मिटत प्यास बटै छलै मैयाक प्रसाद लगबै छला पुजारीजी अबाज “आशा” कहला अपना मोनसँ लगलौ आजुक रोटीक जोगाड़ आजुक भूख तोहर मेटेतौ नै जानि आब फेर कतेक दिन सहेतौ रोटी लेल तिलमिल करै अछि भूखल प्यासल हमर प्राण “आशा”क अछि एकटा विनती जुनि करी खेनाइक अपमान ओकरो अछि सम्मान अछि ओकरा अपनापर अभिमान रोटी लेल तिलमिल करै अछि भूखल प्यासल हमर प्राण हमरा भेटल हमरा भेटल एकटा विषय ओइ लेल भेटल किछु समए कहल गेल हमरासँ मीत लिखू युवा वर्ग लेल गीत फेर माँगल किछु समए आ युवा मंचमे पैसल हम देखि‍ हुनकर स्फूर्ति मन भऽ जाए प्रसन्न ई देखि‍ कही मनसँ ई छथि देशक भविष्य ऐसँ नै कियो अनजान एतए सोचि बढ़ल मन फेर आएल दममे दम फेर कलम आगू बढ़ल आब केलक किछु लिखैक मोन युवाक मन हम जानी हुनकर दुख-दर्दकेँ जानी‍ कि हुअए हुनकर अभिलाषा जँ युवा आगू बढ़ता तँ समाजक सम्मान बढ़त फेर राज आओत युवा वर्गक ऐमे नै संदेह रहत हमरा भेटल...। शंभु नाथ झा ‘वत्स’, गाम-बहोरा, जिला- पूर्णिया। उग्रवादी बनि जाइ की कहब यौ लल्लूबाबू, देश-गाम केर हाल। केतौ बाढ़ि केतौ अछि सूखल, मजूर-गृहस्थ बेहाल। महगीक मारि-हारि जीवनसँ, कृषक तजै अछि प्राण। तेयौ नारा बुलंद करै छी, हम्मर देश महान॥ जेकर वोटसँ राज करै अछि, तेकर फाटल लत्ता। सांसद सदनमे छोड़ि समस्या, बढ़बए वेतन भत्ता॥ जेकर श्रमसँ देश पालित अछि, तेकर जिअब अछि धनि सन। अपराधी जँ सदन पहुँचि गेल, तेकर आजीवन पेंशन॥ नेता सभ केर करनी देखि‍ कए, किछु नै फुरए उपाय। मोन होइये जे कलम छोड़ि कऽ, उग्रवादी बनि जाइ। डॉ. अजीत मिश्र, जन्म स्थान- नबटोल(मात्रिक), पैत्रिक- ‘आदित्य वास’, पाहीटोल, सरिसब-पाही, मधुबनी। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दड़िभङ्गासँ स्नातकोत्तर(मैथिली) कएलाक बाद १९९४ सँ २००६ धरि आकाशवाणी, दड़िभङ्गामे आकस्मिक मैथिली अन्तरवार्ताकार ओ समाचार-वाचक रुपमे कार्य। पछाति भारत सरकारक अन्तर्गत भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरमे मैथिलीक प्रवेशक उपरान्त मैथिलीक पहिल प्रतिनिधिक रुपमे पूर्वी प्रादेशिक केन्द्र, भुवनेश्वरमे पाहुन प्राध्यापक भए १० जुलाइ, २००६सँ कार्य प्रारम्भ। एतए लगातार तीन वर्ष धरि कार्य सम्पादनक बाद भारत सरकारक राष्ट्रीय ज्ञान आयोगक अनुशंसा पर राष्ट्रीय अनुवाद मिशन केर गठनक उपरान्त मैथिलीक मुख्य शैक्षिक सलाहकारक रुपमे मइ, २००९ सँ भारतीय भाषा केन्द्र, मैसूरमे कार्यरत। नव वर्ष शुभ-शुभकेँ नव वर्ष तुलाएल भगवति वन्दन दृष्टि समाएल होएत चहु दिस नीक धमाल नवता रुपमे करब कमाल बनि जाएब सभ मालोमाल वर्ष एगारहकेँ मणिमाल एम्हर-ओम्हर सभ खुशहाल गाएब मन भरि मचे धमाल रहब ने कि‍यो कतहु पमाल हमर मनोरथ पूरए ई साल सुन्दर मनगर पर्व महान सुन्दर मनगर पर्व महान खाजा मुंगबा भरे जहान सुनगल उकक करे भसान कण-कणमे जत नव उठान राजा- रंकसभ एक समान तीत-मीठ आ बिसरि गुमान दिआबाती पर्व महान आन-अपन, एक जुटान बाटए चहु, ई मुसकान तीरथ सुख भरे-जहान डॉ. शेफालिका वर्मा, जन्म:९ अगस्त, १९४३,जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा: एम.ए., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय), ए. एन. कालेज, पटना मे हिन्दीक प्राध्यापिका पदसँ सेवानिवृत्त। २००४ ई. मे यात्री-चेतना पुरस्कार। यायावरी (यात्रावृत्तान्त), अर्थयुग (कथा संग्रह), एकटा अकास (कथा संग्रह), भावांजलि (गद्य गीत), नागफांस (उपन्यास), किस्त-किस्त जीवन (आत्म कथा) प्रकाशित। नव वर्ष अंकक बदलि गेनाइ बरिसक बदलि गेनाइ नव वर्ष थिक की? एकटा कैलेण्डर हटैत अछि दोसर लाि‍ग जाइत अछि आ बरस बदलि जाइत अछि ... मोनक तहमे डूबल शब्दक रसमे तीतल राति वएह, दिन वएह कैक्टसमे खिलल फूल जकाँ बरस बदलि जाइत अछि... चारु दिस भीड़ भरल, सभ किछु  ऐंठाएल चेहरापर चेहरा ओढ़ने लोग केना जिबैत अछि की मोन नै हुनक कचोटैत अछि? सभटा खाली-खाली लगैत अछि बरस बदलि जाइत अछि ... दिनपर दिन बीत‍ रहल नै बीत रहल बाट भागि‍ रहल, नै भागि  पबैत छी हम कखनो बाट हमर, कखनो बाट हमहीं बनि जाइत छी खत्म नै हएत साँस हमर बाट खतम भऽ जाइत अछि बरस बदलि जाइत अछि ... नै कोनो कामना नै कल्पना एकटा बस ‘एहसास' अछि छाउर  जकाँ ठोरसँ लागल एकटा आर साल उदास  अछि काँटमे बिहुँसल जेना  गुलाब अछि ........ इजोरियाक भाषा चलु, परछाहींक पार हम घुइम आबी.. लिखल जे साँसक गाथा मौनक भाषामे ओकरे हम गुनगुनाबी... दर्द प्राणमे अहाँक स्मृति केर बिलखि-बिलखि छटपटा रहल आहत गीत उमड़ि‍-उमड़ि‍ बैस अधरपर कुहरि रहल! साँझुक दम तोड़ैत बेला चैती बयारक कम्पन चांदनी बैसि हमर अहाँक लिख रहल ओ भाषा जे नै कहि सकलौं हम अहाँकेँ नै कहि सकलौं अहाँ हमरा चलु, तखन इजोरियासँ पूछि आबी अपन अहाँक मूक गाथा मौनक भाषामे ओकरे हम गुनगुनाबी...। उपेक्षित अपन सोचक बेडिंग दिमागक कम्पार्टमेंटमे रिजर्व बर्थपर दैत छी पसारि कल्पनाक रंग विरंगी बिछोना बेडिंगमे से गेल बहिराए! आ हृदैक नयन टुक टुक तकैत अछि‍ के आबि‍ ऐ‍ भावक बेडिंगकेँ अपनाओत??? मुठ्ठीसँ रेत जकाँ समए ससरि‍ जाइछ आ सोचक बेडिंग ओहिना पड़ल रहि‍ जाइछ उपेक्षित अनछूअल...। देश हे बौआ! की बाबा? सुनैत छी गाँधी फिलिम लागल अछि‍ बड़ नीक, बड़ दीब अछि चलू ने देखि‍ अबै छी.... जेना लुत्ती लागि गेल बौआकेँ हुँह.. आंधी लागल छल बाबा जइ‍मे हीरो हिरोइन दुनू छल से हम देखबे नै केलौं आ ओइ बुढ़बाकेँ देखै लेल पाइ आ समए बर्बाद करी.. हे एना नै बाजुबाबू आइ ई देश स्वतंत्र भेल गाँधीक कारण हम अहाँ देशभक्तिक स्वादमे डूबल रहैत छी गाँधीक कारण देश देश देश....। ओ स्कूली बच्चा चिचिया उठल जेना कुनैन गरमे आबी गेलैक... बाबा, हम तँ कतौ देश नै देखैत छी नै तँ देश्भाक्तिक कोनो गीत कत्तौ सुनैत छी देश शब्द पढ़ैत छी किताबमे देशभक्तिक शब्दार्थ बूझैत छी किताबसँ अहाँ किदन कहाँ बजैत छी..... बाबाक आँखि पनिआए गेल, सूनमे तकैत पीठपर मारल गोराक कोड़ाक दर्द फेर शुरू भऽ गेल..... विधाता हम नारी छी, ई अपराध हमर तँ नै हँ हम नारी छी। अहाँक लेखनी हमरा संस्कृतिक उत्कर्षपर पहुँचा देलक धरतीक प्राणी नै देवी धरि बना देलक किन्तु, अहाँ बनाए देलौं पातालक छाती विदीर्ण करएवाली एकटा चि‍त्रकार प्रकृति-पटीपर उमड़ैत कोसीक हाहाकार! ठोरपर अबैत अछि‍ कखनो शरद-प्रात, कखनो पूसक सर्द राति; दर्पणमे जखन-जखन अपन चेहरा देखैत छी अचक्के सीताक व्यथित परछाही पलकक कोरपर थरथरा जाइत अछि हमर आँचर चान तारासँ नै राहु-केतु सँ भरि‍ जाइत अछि मुदा, आब नै, आब हवा छूबि‍ नारीक मैल नै करत हाड़-मांसक एे देहमे किछु नै जकरासँ अहाँ बनल छी, हम बनल छी प्रकृति कुसुमार बनल अछि तखन दोषी हमहीं किए? अहाँ निक हमहूँ निक आब जमाना बदलि गेल, नारीक अंतरमे उतरि गेल एकटा तीव्र, प्रखर रौद पसरि‍ गेल घर-बाहर जगमग करैत अकास छुबाक परिकल्पनासँ सिहड़ैत परंपरा-अपरम्पाराकेँ ध्वस्त करैत नव निर्माणक अकासमे नवल सूर्योदयक रंग भरैत नारी आगू बढ़ि‍ रहल अछि ‘अहम् ब्रह्मास्मि’क भावसँ ग्रसित हमर समर्पण अहाँ देखि‍ नै पबैत छी सभ किछु सहैत जनम अहींकेँ दैत छी सृजन हम  करैत छी विधाता अहाँ बनैत छी, तँए आइ पुरुष-विमर्श छोड़ि‍, नारी-विमर्शक गप करैत छी ....। बच्चा आ बेवस्‍था छोट छोट नेनाकेँ देखू बेवस्था  कतेक भारी  अछि झुकि रहल कान्ह लचकि रहल पीठ ई बस्ता कतेक भारी अछि! समस्त देशक ज्ञान नुकाएल विदेशक भंडार भरल अछि अंग्रेजी हिसाबक गप नै पुछू प्रकाशक प्रेसक धूम मचल अछि निरीह आँखि‍सँ तकैत नेना की पढ़ी की नै पढ़ीमे हेराएल नेना.... फुर्सत नै माए-बापकेँ समए नै हुनका लेल केकरो के सम्झाओत, केना सम्झाओत घरोमे तँ चैन नै भारी भारी बस्ता देखू लंच, बोतल पानिक देखू प्राइवेट स्कूलक धूम मचल जन जनमे होड़ मचल ककर बच्चा कतेक तेज केकरा कतेक आएल अंक आनक नेना आनकेँ भाएल बच्चा फँसल बेवस्थाक पंक किन्तु, ऐ‍  शिक्षाक की अर्थ एतए इंजीनियर करैत ठेकेदारी डाक्टर खोलल दोकान सड़कपर की हश्र ऐ‍ नौनिहालकेँ की भविष्य  देशक कर्णधार केँ...???? स्मृति-शेष आइ वटवृक्षक मधुर छाहरि कतए दनुजताक लंकामे अंगदक अटल पएर कतए? काल पथपर चलि गेलाह जे सिनेह हुनक ससराबैत अछि मोन प्राणक भ्रमित दिशाकेँ बाट वएह देखाबैत छथि‍ चिर मंगलमय छल लक्ष्य महान जीवन एक, पग एक समान! स्निग्ध अपन जीवनक क्षार करैत रहलाह आलोक प्रसार श्रृष्टिक ई अमिट विधान मिटबामे सएह वरदान... सुनि‍ हुनक हुंकार नव यौवन बल पाबैत छल माथपर बाँधि‍ कफन कर्मक्षेत्रमे आबि अत्याचार मेटाबैत छल हुनक सहास देखि‍-देखि‍ तरुण सिंह लजाइत छल! ऐ मानवताक धवल आकास कतए मानव एक मानवता गुण, बतबैबला धाम कतए हे विश्व! अहीं बताउ भारतवर्ष सन गाम कतए??? सतीश चन्द्र झा चुनाव-१ बजि उठल चुनावक रणभेरी पसरल जय हो! के तुमुल नाद। सभटा दल उतरल महल छोड़ि‍ कऽ उठल विजयकेँ शंखनाद।

हिंसा, हत्या, तृष्णाक आगि पसरत सगरो जड़तै बिहार। इतिहास बनत छल बल धनसँ। नै जानि ककर छै जीत हार।

साकांक्ष भेल जन जन सगरो भयसँ जीवन की त्राण लेत! ई घृणा, द्वेषक महापर्व नै जानि कतेक प्राण लेत!

प्रतिपक्ष अगिला सरकारक गद्दी लए अछि बुनि रहल जाल। सत्ता सुख सबहक परम लक्ष्य के देखि‍ सकत रौदी अकाल!

भरि गाँव टोल सगरो घुइम-घुइम बोधत कहुना जीतत चुनाव! सामर्थ्यवानक संग लेत भूखलसँॅ एकरा की लगाव!

सम दोष एक दोसरकेँ दऽ छीनत भविष्यक पाँच साल। सुख दुख ओहिना, जीवन ओहिना जहिना छल बीतल पाँच साल! चुनाव-२ छल केहन हवा आएल उदंड। तृष्णाक आगि पसरल प्रचंड। सभ जाति धर्मक फेर बाँटि कऽ देलक समाजक खंड-खंड।

सत्ता सुख, धन बल मान लेल। निज स्वार्थ धर्म सम्मान लेल। विष घृणा द्वेष सगरो दऽ कऽ सभ भोट समटि कऽ ससरि गेल।

उन्मादक तेज हवा उठलै। उधिया कऽ केकरा की भेटलै? छुच्छे बातक जल बृष्टि छलै पोखरि इनार सौंसे भरलै।

बड़काकेँ कहि कऽ मधुर बोल। छोटका लोकक जड़ि गेल टोल। अछि कतेक तुच्छ मानव एखनो जीवनक नै छै कतौ मोल।

कहियौ ओकरा की हेतै लाज। नै भेल गाममे कतौ काज। अछि बाट ताकि कऽ थाकि गेल बासठि बरखक जीवित समाज।

अछि राजनीतिमे के सुयोग्य? अस्सी प्रतिशत एखनौं अयोग्य। ओ केना हमर उद्धार करत ओकरा लए छै ई देश भोग्य। जड़ि गेल झड़कि कऽ कतेक देह। मरि गेल हृदेसँ प्रेम सि‍नेह। देलक की हमरा प्रजातंत्र? दुख विपदा अछि ओहिना सदेह।

जनमत अधिकारक मोल भाव। घर घर छिड़ियाएल बैर भाव। सभ बेर कतेक बलिदान लेत अछि रक्त पिपासू ई चुनाव। भाषा आ राजनीति

अछि घातक आतंकवादसँ बढ़ि कऽ ई भाषाक झगड़ा। कखन कतय ई आगि लगाएत केना एकर पहिचानब चेहरा।

अछि रहस्यमय राजनीतिक क्रिया कलाप कर्म मन वाणी। छापि रहल अछि पत्र पत्रिका प्रतिदिन एकरे एक कहानी।

कखनो बाँटत जाति जातिकेँ कखनो सीमा शरहद भारी। कखनो बात धर्मक कहि कऽ लगा देत सौंसे चिनगारी।

कतेक होइत छइ चेहरा एकरो जानि सकल नै कियो एखन धरि। सपथ लैत अछि ‘सेवा धर्मक’ समटि लेत धन आँजुर भरि भरि।

स्वार्थ कते धरि खसत खाधिमे कते आओर लज्जित क्षण आएत। हिन्दीपर लागल कलंक जे केना एकर इतिहास मेटाएत।

सीख लेथु सभ भूखल जन-जन अलग अलग सभ प्रांतक भाषा। तखने भरतनि पेट आब नै रहलै हिन्दी देशक भाषा।

सत्ता पक्ष विपक्ष कानमे केना तूर छथि धऽ कऽ सूतल। सीख रहल अछि आइ मराठी टैक्सी चालक भयसँ कलबल।

जतए देशमे छै एखनो धरि लाखो लोकक रोटी सपना। सड़क कात छतहीन जिन्दगी कंकर पाथर घास बि‍छौना।

की मतलब छै ओकरा की छै? भाषा, भेष कतए की बान्हल। बिना परिश्रमसँ औतै नै भात दालि थारीमे सानल।

जनहितक कल्याण आब नै राजनीतिसँ रहलै आश। छल प्रपंचकेँ अस्त्र शस्त्रसँ सत्ता सुख सभकेँ अभिलाष।

भले लेथु ई शपथ मंचपर विश्वक प्रचलित सभ भाषामे। नै बदलत तकदीर देशक जन जन ठाढ़ रहत आशमे। सत्यक जीत किछु विलंबसँ मुदा सत्यकेँ जीत होइत छै। बुन्द-बुन्दसँ सागरक निर्माण होइत छै। कतबो बादल झाँपि देत दिनकरकेँ नभमे जागत तैयो प्रात, राति नै अमर होइत छै।

नै भेटत अधिकार माँगि कऽ इएह विधान छै। बाँटि सकी जे जते, सत्यक असल ज्ञान छै। अपनेसँ अनुरोध सि‍नेह दुख सुख सभ बाँटी अपने दइ छै संग, विपतिमे आन-आन छै।

एखनो धरि मिथिलाक नित अपमान होइत छै। अधिकारक संघर्ष करब सम्मान होइत छै। एक डेग सभ चलब मैथिली बढ़तै आगाँ अपने भाषापर सभकेँ अभिमान होइत छै।

लिअ आइ संकल्प करब संघर्ष फेरसँ जय मिथिलाक शंखनाद हम करब फेरसँ। छटतै लागल धुइन बाटपर चलबै जखने फुटतै अपने किरिण भलहि‍ं किछु विलंबसँ।

जे छी जतय ओतैसँ आगाँ चलू झटकि कऽ। अछि सम्मानक बात लेब हम कहियो लड़ि कऽ। एक बेर सभ लिअ प्रतिज्ञा स्वच्छ मोनसँ अपने भुस्सा हएत बाटक बाधा जड़ि कऽ। भूखल पेट सड़कक काते गली-गलीसँ पन्नी कागत बीछ-बीछ कऽ। जीब रहल अछि एखनो मानव दृश्य ठाढ़ अछि केहन विकासक।

रद्दी-फद्दी, डिब्बा-डुब्बी जे भेटल लऽ गेल समटि कऽ। गंदा-गुन्दी किछु नै बूझत लऽ जाएत सभ ताकि हेरि कऽ।

जड़तै तखने ओकरो चुल्हा भरतै पेट रातिमे कहुना। शिक्षाक अधिकार करत की छै एखनो जे रोटी सपना।

फाटल साटल वस्त्र देहपर लाज अबोधक कहुना झाँपल। जाएत केना स्कूल पीठपर शीशी बोतल दइ किछु बान्हल।

छोट छोट नेन्ना उठि भोरे दौग जाइत अछि रौद बसाते। भरतै पेट केना परिवारक अछि गरीब अक्षरसँ काते।

मासक मास अभाव सुअन्नक एक साँझ किछु खा कऽ जीबए। अछि धिक्कार समाज राज्यकेँ आबो किछु भूखल सूतय। पाँच साल छल भेल प्रफुल्लित गाम गाम जहिया जड़ शासन अंत भेल। स्वागतमे जन जन छलै ठाढ़ सुन्दर भविष्यक स्वप्न लेल।

बदलल प्रदेशक किछु बसात सुख शांति फेरसँ उतरि गेल। चलि पड़ल विकासक विवध चक्र जीवनक जड़ता लुप्त भेल।

लऽ सकल मुदा नै चित्र अपन संपूर्ण सुभग सुन्दर स्वरूप। भऽ सकल नष्ट नै एखनो धरि भ्रष्टाचारक दानव स्वरूप।

बनि रहल योजना नित नव नव घुरि रहल जिलासँ देल पाइ। ऑफीसर लागू करत केना नै छै जइमे एकरा कमाइ।

प्रतिपक्ष अगिलका सरकारक गद्दी लए अछि बुनि रहल जाल। वातानुकुलित घरक जीवन नै किछु बुझतै रौदी अकाल।

छै आबि गेल ओ समए फेर धन बलसँ सभ जीतत चुनाव। सामर्थ्यवानक संग लेत भूखलसँ एकरा की लगाव।

सभ दोष एक दोसरकेँ दऽ छीनत फूसला कऽ पाँच साल। सुख दुख ओहिना जीवन ओहिना जहिना छल बीतल पाँच साल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल दुख व्यथा बिहारक बाँटि सकय ओ जन्म कहाँ लऽ सकल लाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल।

बीतल चुनाव सरकार बनल मत पड़ल विकासक आशामे, जातिक टुटल सभ समीकरण डूबल प्रतिपक्ष निराशा मे।

उतरल नभमे नव आशाक जागल प्रभात नव किरिण लाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल।

अछि भाग्यहीन सत्ते बिहार नै बदलि सकल तकदीर एकर। रौदी अकाल बाढ़िक प्रकोप दाहर सुखार तस्वीर एकर।

नै जानि विधाता छथि लिखने की लऽ बिहारक वक्र भाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल। नक्सलवादीक बंदुकसँ पसरल अछि सगरो केहन आगि। छै राजनीतिक खेल बेल नै तँ ई जइतै कतौ भागि।

जौं नै रोकत सरकार आब रक्तिम भऽ उठतै नदी ताल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल।

उतरत उद्योग एतय कहिया बिजली कहिया चमकत सगरो। मजदूर जाएत नै दूर देश रोजगार एतय भेटत सगरो।

भूखल दूखलक जीवनमे कहिया लौटत सगरो सुकाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल।

साहित्य हमर मरि रहल आइ अछि कहाँ सृजनता ओ पहिलुक। सम्मान लेल छथि लीख रहल अधिकांश लोक व्यर्थे एखनुक।

अप्पन भाषाक मान लेल कहिया जागब बाँटब गुलाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल। नेन्ना तेतरी नोकर चाकर गाड़ी बंगला रोब दाब हाकिम छथि बड़का। सौ सैकड़सँ कम नै सेवक अछि लागल सेवामे हिनका।

आप्त सचिव छथि ई मंत्रीकेँ व्यस्त लोक दिनचर्या भारी। उच्च पदक अभिमान देहमे उज्जर देह मोनसँ कारी।

पोछि रहल छल ओत्तहि पक्का नेन्ना तेतरी रगड़ि-रगड़ि कऽ। व्यस्त छला बाबू लिखबामे काल्हिक भाषण किछु गढ़ि-गढ़ि कऽ।

मंत्रीक भाषण छल काल्हिये अपन क्षेत्रमे बाल दिवसपर। शिक्षा भोजन वस्त्र गरीबक बाल मजूरी-पाप विषयपर।

उड़लै किछु पन्ना बाबूकेँ भीजल पक्कापर उधिया कऽ। तेतरीकेँ दऽ दोष क्रोधमे दौग गेला बाबू चिचिया कऽ। पड़लै थापर ओकर पीठपर माइक बला आबि गेल छल। सीखि रहल छल काज गरीबक कानि कानि कऽ लाल भेल छल।

मेटा गेल छल कागतपर सँ बाल दिवसक शब्द उखड़ि कऽ। जीब रहल अछि सि‍नेह भावना सभ कागतपर मात्र उतरि कऽ। सुबोध कुमार ठाकुर, गाम- हैंठी-बाली, जिला मधुबनी। पेशा- सी.ए.। विडम्बना के सुनत विचार मोनक केकरा कहबै उद्गार मनक सभ जेना बनल करकरेत छै सभ आपसे दंशमे अचेत छै मनमे चलैत छै रस्सा-कस्सी छोड़ि जाउ आब हम कोन बस्ती सगरे एकै रंगक रेगिस्तान आर बहैत रेत छै सभ जेना बनल करकरेत छै कतए गेल वसुन्धराक हरियरी जतए होइत छल प्रकृतिक विवाह बिनु विधकरी नै जानि किएक नै भेटए आब रसिक सावनक सनेस छै सगरे एक्के रंगक रेगिस्तान आर रेत छै जीबैक आब ढंग बदलि गेल जीबैक आब रंग बदलि गेल उद्देश्य आर उमंग बदलि गेल नै जानि कंटिरबा आ कंटिरबीमे एखनो किएक भेद छै सभ बनल जेना अचेत छै नै भेटैत अछि केकरो आब शान्ति मनक जीब रहल सभ कलाहन्त मनसँ, कैंचा लेल सभकेँ लागल रहैत सदिखन उद्वेग छै सभ अपनेमे अचेत छै। महगाइक सत्ता अछि गरीबक पेट निपत्ता अछि चाउरमे आँकर की आँकरमे चाउर नै जानि केना फेटम-फेट छै तैयो केहन विडम्बना छै सरकार बनल करकरेत छै, सुनू हे शिष्टिक सृजनहार, कवि सुबोधक हृदैक चीत्कार करू अनुकम्पा एहेन जइसँ सभ लोक जाइ चेत छै जे बनबै कुनू देशकेँ श्रेष्ठ छै...। प्रतीक्षा भेल जखन-जखन किछु इच्छा करए पड़ल तखन-तखन प्रतीक्षा जिनगीक बाटमे सगरे भेटल चौबटिया जाएब केम्हर किछु फुराइत नै छी एकसरे नै संग सह-बटोहिया काटल कतेक राति गुज-गुज अन्हरिया सनक जे आएत किछु दिन उपरान्त खिल-खिलाएत, राति इजोरिया सनक जुनि पूछू हाल, एखनो धरि देमए पड़ए अछि परीक्षा कए रहलौं अछि एखनो धरि ओइ क्षणक प्रतीक्षा उठैए बेर-बेर सवाल मनमे फँसै छी सदिखन अही अन्तर्द्वन्द्वमे जे केहेन निःशोख आ निर्लज्ज होइ छै इच्छा जे करए पड़ै छै जेकरा लेल प्रतीक्षा जे जोगी बनए वा बनए संत नै छोड़ए ओकरो अही प्रतीक्षाक फन्द रहए ओकरो परम धाम पाबैक इच्छा करए पड़ै ऐ लेल तप आ प्रतीक्षा जन्म बालक जे लए तँ ओकरा माइक दूधक इच्छा जे किशोर भेल ओकरा खेल आ उमंगक इच्छा जे जवान भेल ओकरा सुन्दर रमणीक इच्छा तँए कहैए सुबोध दैत ई शिक्षा जँ चाह अनन्त आ अद्वितीय इच्छा तँ करए पड़त निश्चय प्रतीक्षा किअए कि जिनगीक माने छिऐ प्रतीक्षा। किशन कारीगर दौगल चलि जाएब गाम मनुक्ख दौग रहल अछि मचल अछि आपा-धापी जतए केकरो कियो ने चिन्ह रहल अछि एहेन नगर आ पाथर हृदैसँ दूर एखने होइए जे दौगल चलि जाएब गाम।। लोहाक छड़ आ सीमेंट कंक्रीटसँ बनल ओना तँ ई एकटा आधुनिक महानगर अछि मुदा शहरक ऐ‍ आपा-धापीमे मनुक्खक हृदए जेना पाथर भऽ गेल अछि।। किएक मचल अछि आधुनिकताक ई हरबि‍र्ड़ो? कि भेटत ऐ‍सँ कियो ने किछु बूझि रहल अछि जेकरे देखू रूपैयाक ढेरी लेल अपसियाँत रहैत अछि पाथर हृदए मनुक्ख मानवताक मूल्य केने अछि जीरो।। लिफ्ट लागल उ दसमंजिला मकान एक्के फलैटपर रहितौ लगैत छी अनजान ओ अड़ोसी हम पड़ोसी मुदा एक दोसर केँ नै कोनो जान-पहि‍चान।। कहू एहेन कंक्रीटक शहर कोन काजक आधुनिकताक काल कोठरी अछि साजल ऐ‍ चमचमाइत कोठरीमे कियो ने केकरो चिन्ह रहल अछि रूपैयाक खातिर आबक मनुक्ख की कि ने कऽ रहल अछि।। इति‍यौत-पितियौत ममियौत-पिसियौत जेकरा देखू अपनेमे मगन चिन्हा परिचेसँ कोन काज आधुनिकताक काल कोठरीमे आब अनचिन्हार भऽ गेलाह जन्मदाता बूढ़ माए-बाप।। शहरक एहेन अमानवीय आपा-धापी देखि‍ कऽ पसीज गेल हमर हृदए एहेन अनचिन्हार नगर छोड़ि कऽ मोन होइए एखने आब दौगल चलि जाएब गाम।। हे यौ भलमानुस आधुनिक मनुक्ख एहेन अनचिन्हार नगर ने नीक ऐ‍ कंक्रीटक महलसँ एक बेर तँ देखू गामक कोनो टुटली मरैया बड्ड नीक।। मनुक्ख एक दोसरकेँ चिन्ह रहल अछि चिड़ै चुनमून चूँ चूँ कए रहल अछि रस्ता-पेरा निश्छल प्रेमक धार बहि रहल अछि हरियर-हरियर खेत-पथार आइ सोर कऽ रहल अछि।। टुटलाहा टाट खर-पतारक किछु घर जतए नै कियो अनचिन्हार नै कोनो डर चौबटिया लग फड़ैत अछि खूम आम एहने नगरकेँ औ बाबू लोग कहैत छैक गाम।। एकटा तँ ओ छलीह कनैत छलौं माए गे माए- बाप रौ बाप हे रौ नंगट छौंड़ा रह ने चुपचाप नूनू-बाबू कऽ ओ हमरा चुप करा दैत छलीह एकटा तँ ओ छलीह। बापे-पूते कऽ कनैत छलौं कखनो तँ ओ हमरा दूध-भात खुआ दैत छलीह बौआक मूहँमे घुटूर-घुटूर कहि ओ अपन आँखिक नोर पोछि हमरा हँसबैत छलीह। खूम कनैत-कनैत केखनो हम बजैत छलौं माए गे हम कोइली बनि जेबउ नै रे बौआ नीक मनुक्ख बनि जो ने आओर कोइली सन बोल सभकेँ सुनो ने। केखनो किछु फुराइत छल केखनो किछु नाटकमे जोकर बनि बजैत छलौं बुढ़िया फूसि मुदा तैयो ओ हँसि‍ कऽ बजैत छलीह किछु नव सिखबाक प्रयास अओर बेसी करी। रूसि कऽ मुँह फुला लैत छलौं तँ ओ हमरा नेहोरा कऽ मनबैत छलीह कतौ रही रे बाबू मुदा मातृभाषामे बजैत रही अपना कोरामे बैसा ओ एतबाक तँ सिखबैत छलीह। मातृभाषाक प्रति अपार सि‍नेह गाम आबि नान्हिटामे हुनकेसँ हम सिखलौं गाम छोड़ि परदेशमे बसि गेलौं मुदा मैथिलीक मिठगर गप नै बिसरलौं। अवस्था भेलाक बाद ओ तँ चलि गेलीह ओतए जतएसँ कहियो ओ घूमि कऽ नै औतीह मुदा माएक फोटो देखि‍ बाप-बाप कनैत छी मोनमे एकटा आस लगेने जे कहियो तँ बुढ़िया औतीह। समाजक लोक बुझौलनि नै नोर बहाउ औ बौआ बुढ़िया छेबे नै करथि ऐ‍ दुनियाँमे तँ कि आब ओ अपना नैहरसँ घूरि कऽ औतीह मरैयो बेरमे बुढ़िया अहाँकेँ मनुक्ख बना दऽ गेलीह। बुढ़ियाक मुइलाक बाद आब मइटुग्गर भऽ गेल ‘किशन’ ओइ बुढ़ियाकेँ हम करैत छी नमन अपन बिपति‍ केकरासँ कहू औ बौआ कियो आन नै ओ बुढ़िया तँ हमर माए छलीह। राम वि‍लास साहु, “रथक चक्का उलटि चलै बाट” (कविता, हाइकू, टनका आ शेनर्यू संग्रह) प्रकाशित)। कोइली कुहकै आमक डारि‍ कोइली कूहकै आमक डारि‍ सुनि‍ हमर मनुआ घबराए पि‍या हमर रहि‍तए तँ धीरज दैतए बन्‍हाए अन्‍हरि‍या राति‍ हम बाट देखैत दुनू आँखि‍ नि‍हारि‍ इजोरि‍या राति‍ हम चान देखैत चकवा-चकोर बनि‍ जाइ चन्‍दा बादल लुक-छुप खेले पि‍या रहि‍तए तँ हमहूँ संगे खेलतौं बहि‍ने कोइली बोलीसँ हमरा दि‍लमे लगैए गोली पि‍या रहि‍तए तँ कि‍छु कहबो करितौं अनका केना कि‍छु कहबै पि‍या परदेशि‍या बड़ नि‍रमोहि‍या कहि‍या बनत हमर रखबैया कोइली बोली सुनि‍ हमर देह भऽ जाइए बही‍र केकरा कहबै ई दुखक बात कोइली कुहकै आमक डारि‍।। प्रीतक गीत फागुन मास हमर बि‍तए यौवनमा हमर दुख कहि‍या हरत सजनमा गौना कराए लि‍अ एबकी फगुनमा आमक गाछपर बैसल कोइली प्रीतक गीत सुनबए एबकी फगुनमा चैत मास जेना टपकै महुआ ओहि‍ना टपकै हमर यौवनमा सावनक मेघ भि‍जबए बदनमा बि‍जली चमकए बादल बरसै देहसँ छुटै पसि‍नमा बरखा बरसै घनघनमा पि‍या बनल अछि‍ बैमनमा उमरल नदि‍या, दरद जगाबै दरदक दुख केना केकरो कहबै आबि‍ते सजनमा दरद हरि‍ लैत फगुनमा गौना कराए लि‍अ एबकी फगुनमा प्रीतक गीत सुनबै छी सजनमा। पंकज कुमार झा भाई रे अना नै परो भाई रे अना नै परो, दहेज मुक्त मिथिला चाही तँ, दहेज मुक्त मैथिल बनि जो, भाई रे अना.......... जौँ ललचेवे टका तूँ लेवे, जिनगी बनी जेतौ पनिसोह, अपनों कनवे कनियो कनतौ, ताइ अंतरात्मा केँ नै जरो, भाई रे अना........ कनियासँ वियाह कर मनियासँ नइ, मनिया नचेतउ कनिया सजेतउ, मनियाक मोहसँ अपना आपकेँ बचो, कनियाक स्नेहमे तोउँ डूबि जो, भाई रे अना............. जिनगी रहलौ तँ पाइ बड़ कमेवे, अपनों उड़ेबे हमरो बजेबे, जौँ कियो कहतौ ससुरबला पाइ छनि, तखन कहए ककरा मुँह देखेबे, अखनो छउ मौका आब तँ सुधरि जो, कल्लर केँ ठाढ़ कर गीत गुण गुणो, भाई रे अना...... बाबूकेँ मोन छनि लाथ नइ ई करए, एक गलतीसँ जिनगी नइ ई सड़ए, तोहर जिनगी छउ तूँ बाबू केँ बूझो, उज्वल भविष्य केँ अपने नइ सुतो, भाई रे अना नै परो दहेज मुक्त मिथिला चाही तँ, दहेज मुक्त मैथिल बनि जो, भाई रे अना............... पंकज कुमार झा, पिता-श्री महेंद्र मोहन झा, माता-श्रीमती अम्बी देवी झा : माड़र, जितबारपुर, मधुबनी, बिहार ८४७२११, पंकज जी एच.सी.एल.मे सोफ्टवेयर इंजिनीयर छथि। उद्वोधन कहियो पूर्णिमा सन आलोकित, मैथिल, मिथिला आ मैथिली, आइ घोर अन्हरियामे हराओल अइ, किछ दूर टिमटिमाइत तारा सन, किछ मिटैल पगडण्डी, आरि-धुरिमे ओझराएल अइ, सभ्यताक सूर्य, कहिया परिचयकेँ बदलि देलक, किछ आभासो नै भेल, मुदा! जहन-जहन पाछू तकैत छी, हृदैमे किछु उथल-पुथल, बहराइ लेल व्याकुल अइ, मुदा! भीतरे-भीतर घुटि जाइत अइ, स्वच्छन्दता-स्वतंत्रता नै अइ, अपन अहंग, सैहबी डोरीमे बन्हाएल, जाबी लगौने, बड़द जकाँ ऑफिसक दाउनमे लागल छी, अपन सहजता-सरलतासँ डेराइत, जे पाछू नै भऽ जाइ, अपन परिचयसँ भागैत, नव परिचय बनाबैमे लागल छी, मुदा! ओ स्वर्णिम गौरव गाथा, केना लिखब, माता-पिता आ पूर्वजक प्रति श्रद्धा बिनु, भाषाक प्रेम सिनेह बिनु, कोन रंगसँ रंगब अपन कैनवासकेँ..... कोन गीतसँ सजाएब अपन जीवनकेँ …… मुदा! हम सूतल नै छी, मरल नै छी, जागल छी, हमर अल्हड़ता, हमर सहजता, हमर नम्रता हमर परिचय अइ, सभ्यातक आलोकसँ आलोकित, आइ आब हम समर्थवान छी, तँ किएक ने अपन समृद्धिसँ, अपन परिचयकेँ सींची, अतीत तँ स्वर्णिम छल, आब आइ आ आबैबला काल्हिकेँ सेहो स्वर्णिम बनाबी, सभ गोटे मि‍लि‍ कऽ, एक दोसरकेँ मैथिलीक रसपान कराबी। रीढ़ विहीन पुरुष पुरुषक पुरुषार्थ कतए हेराएल अइ, नै बुझना जाइत अइ, दहेजक बैशाखी पकड़ि, अमरलत्ती जकाँ, रीढ़ विहीन, परिचय..... सुनैत छलौं, स्त्रीक नोरक समुद्रमे, पुरुषार्थक नाह हेलैत छैक, मुदा! जँ नाहमे भूर भऽ गेल, तँ ओ पुरुष आ समाज दुनूकेँ डुमा दैत छैक, मुदा! रीढ़ विहीन पुरुषार्थक नाहे की, जेकर कोनो पतबारे नै अइ, दिशा हीन, ऊर्जा विहीन, दोसरक धनसँ सिंचित भऽ, अपन स्वाभिमान बनाबएमे लागल अइ, बिना सुगंध, कृत्रिम फूल जकाँ, सोझे सजाबट लेल....... सृजनात्मकतासँ दूर, प्रकृतसँ विमुख, सिनेमाक रील जकाँ, अपन जीवन बितबैत अइ, हे विधाता! अहीं तँ रचने छी, पुरुष पहाड़-पर्वतकेँ छाती चीरि, स्त्री नदी सृजनक सुन्दर संसार रचैत छथि, तँ किएक ने आइ, दहेजक दावानलमे, पुरुषक रीढ़ वि‍हीन पुरषार्थकेँ जरा कऽ, ओकर समूल विनाश कऽ, पुनः मेघक घोर गर्जनमे, शिवक तांडवसँ, पुरुषक पुरषार्थकेँ ठाढ़ करी, आ झर-झर बुन्नी बसातमे, नव कोपलक संग, मधुर गीतक गुंजनमे, स्वाभिमानी रीढ़युक्त समाजक परिचय बनी। सहजता ज्ञान आ विज्ञान, अनुसंधानेसँ बढ़ै छै। साहित्यक सृजन, मंथनेसँ होइ छै। चाहे रूप गढ़ू, आकि रंग घोरू, प्रेम करू, वा नोर बहाउ, मोनक उद्वेग, संयमेसँ रुकै छै। पीड़ा हृदैक, सहजतेसँ कमै छै। आउ सुनु कने बात हमर आउ सुनु कने बात हमर, नै पकड़ू अहाँ कान हमर, कहै छी हम आइ कनी अप्रियगर, मुदा पिबहे पड़त क्रोधक जहर, अहंकार आ क्रोध केँ, कंठेमे धरु, अहाँ आब नीलकंठ बनू, जेकरा पुजैत एलौं सभ दिन, वएह महादेव बनू अहाँ, ध्यान करू, कनी ज्ञान करू, विज्ञानक अहाँ संग धरु, परंपराकेँ बुझू अहाँ, तर्क तथ्यसँ तौलू अहाँ, कसौटीपर कसलाक बादे, ओकरा अहाँ अंगीकार करू, अंध मोहि धृतराष्ट्र जकाँ, आ  गांधारी ने बनू अहाँ, हिसाब करू, कनी विचार करू, अलग अलग विधासँ साक्षात करू, अध्ययन करू, निर्माण करू, सृजनात्मक्ताक अहाँ आयाम बनू, तास छोडू, भांग छोड़ू, बिना बातक बात छोड़ू, अपन बड़ाइक राग छोड़ू, दलानक बैसार छोड़ू, राजनीतक कौचर्य छोड़ू, आब समय नै भोज भातक, आब समय अइ समय संग चलैक, उच्च अध्ययनमे पाइ लगाउ, व्यपार वाणिज्यसँ हाथ मिलाउ, अपन सहजता अपन सरलता, अपन दर्शनकेँ आर बढ़ाउ, इतिहासमे नै, आब बर्तमान केँ, अपन कर्मठतासँ सजाउ, विज्ञानक ज्ञाता बनू, दर्शनमे छलौं अग्रणी, आब विज्ञानक बारी अइ, पूजा पाठकेँ विज्ञानसँ जोड़ू, निअम निष्ठाकेँ स्वास्थ्यसँ जोड़ू, तहने टा कल्याण हएत, जहने पान माछ मखानसँ उबरब, खेबा टाक सिर्फ बात नै करब, साँस साँसमे ध्यान करब, आ बात बातमे विज्ञान, गणित गणितक  चर्चामे, तकनीकक आधुनिकतामे, समय अपन पूरा बितैब, कनी याद करू, सीता उठाबै छलीह शिव धनुष, आ अहाँ दबल छी दहेजक  ज्वालासँ, गाम गाम नशामे डूबल, कुंठाक निक्षेपसँ भरल, आरोप आ प्रत्यारोपसँ उबरु, अपनाकेँ अहाँ कलासँ जोड़ू, आब समय विश्रामक नै अइ, आब परिश्रमक अइ जरूरत, जनकक गीते टा नै गाउ, फेर जनक जकाँ विज्ञानक हर चलाउ, ज्ञानक मटकूरमे सीता निकलतीह, लक्ष्मीसँ भरपूर धरती, राम पुरुषार्थ स्वयं औताह, सीताक वरन करताह, कतौ दुखक दरस नै हएत, सबहक मोन निर्मल भऽ जाएत, माता पिता नै डराएल रहताह, बाल बच्चाकेँ पढ़ाएल करताह, गाम गाममे हएत विज्ञानक चर्चा, हर्षित मोनमे खुशहालीक बर्षा, खेल खेलमे गणितक पाठ, बैसारीमे कविता कहानी, पुनः मैथिल ज्ञान विज्ञानसँ आलोकित, करताह पूरा जगमे इजोत। मुन्नाजी, मूलनाम मनोज कुमार कर्ण, जन्म–२७ जनवरी १९७१ (हटाढ़ रूपौली, मधुबनी), शिक्षा–स्नातक प्रतिष्ठा, मैथिली साहित्य। वृत–अभिकर्त्ता, भारतीय जीवन बीमा निगम। पहिल विहनि कथा–‘काँट’ भारती मण्डनमे १९९५ मे प्रकाशित। पहिल कथा–कुकुर आ हम, ‘भरि रात भोर’मे १९९७ मे प्रकाशित। एखन धरि दर्जनो विहनि कथा, लघु कथा, क्षणिका, गजल आ विहनि कथा सम्बन्धी आलेख प्रकाशित। प्रतीक (विहनि कथा संग्रह) आ माँझ आंगनमे कतिआएल छी (मैथिली गजल संग्रह) प्रकाशित। मुख्यतः मैथिली विहनि कथाकेँ स्वतंत्र विधा रूपेँ स्थापित करबाक दिशामे संघर्षरत। हाइकू/ शेनर्यू नाम बदलि/ साइबर क्राइम/ पकड़ा गेला गहींर दोस्ती/ जग कैल विध्वंश/ खुशीए भेल बाढ़ि आएल/ मुख्यमंत्री धनिक/ चूड़ा बटल अइंठ धो कऽ/ कोठा कोठामे भेल/ प्रतिष्ठा पैघ मुसक बिल/ सत्तामे भागीदारी/ वास साँपक निसाँ चढ़ल/ से सत्य कहलनि/ लोक छै सभ्य छुच्छे प्रचार/ जातिक फुटौव्वल/ मिथिला राज्य अल्लाक देन/ पेट भरैले मारि/ सड़क छाप गारि गञ्जन/ पेट भरैए एतै/ कान मुनै छी जतन भरि/ पोसि पालि रखलौं/ निभरोस छी एहेन पढ़/ दूटा बरु समाज/ बचौ घर अंग्रेजी लेल/ मैथिली बिसरल/ चाही मिथिला नवका पीढ़ी/ तकनीकीक जोर/ संस्कारहीन आक्रान्त नग्र/ सरकार उदास/ असगरे छी घटल स्थान/ बनै बीस मंजिला/ लोक बढ़ल पूत कमाउ/ बढ़बैए इज्जत/ शेष बेकार बढ़लै मन/ मंगलपर लात/ नै प्रदूषण सुख सुविधा/ बढ़बैए बीमारी/ गमैये नीक पाइक जोर/ वासमति चर्चित/ भाते भूखल तुम्माक फेरी/ सटक सीताराम/ नाम गाएब बोनिहार चेन्नैयोमे आब जखन आओत यौवना, मानू इहो दिल्लीये जकाँ खास भऽ जेतै। सभ भइया जहिया घुरि जएत स्वराज्य, बुझू लुधियाना, मुम्बइ मसोमात भऽ जेतै। “राज”क राज कहिया धरि टिकतै मराठामे, श्रमशक्तिमे पुरे हमर धाख भऽ जेतै। हम बनि कऽ राजा रहब, राजस्थानक, श्रमशक्तिमे जखन ठाठ भऽ जेतै। उल्फाक सुल्फा हेतै भीतर, असमोकेँ हमरा हटने पक्षाघात भऽ जेतै। सगरो घुइम-घुइम देखल, छै ओतैक रीति, मुदा सौंसे देशमे कहियो मिथिलेक रेवाज भऽ जेतै॥ माटिक ललकार रहै खुटेसल, जेना छलैहेँ नै तँ जाबीसँ मुँह जाबि देबौ। सभ मिलि कानि रहल छेँ भोरेसँ, तँ मिथिला राज्यक झुनझुना आनि देबौ। मुदा तोँ तँ छेँ नै खढ़-पात बीछएबला, बाढ़िक प्रकोप छौ शनि जकाँ ठाढ़। तिलक-चानन लगा, पिछलगुआ जुटबै दु-चारि, जन्तर-मन्तरपर माइकक बोले, छौ नै कोनो फरक पड़ैबला॥ जोर-जोर तोँ माटिक लोककेँ। तखन निजगुत हेतौ स्वर। माँग-विकास, माध्यम मैथिली, शिक्षाक बढ़ा घरैती संसाधन, दहीं एतै सभकेँ रोजगार तखने बुझिहेँ जे। राज्यक माँग भऽ सकतौ स्वीकार। ज्योति सुनीत चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान- बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ. सी. डबल्यू. ए. आइ. (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के। पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँ www.poetry.com सँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता आ हाइकू संग्रह “अर्चिस्” प्रकाशित। हाइकू धुनल रुइ/ उड़ैत हवा संग/ बदरी बनि परदेश मे/ अपन संस्कृति केँ/ मान भेटल भीड़क बीच/ कतेक असगर/ प्रत्येक जन फुर्सत कहाँ/ ई व्यस्त शहरक/ भागदौड़ मे धारमे भेल/ आकाशक देवकेँ/ अर्घ्य अर्पण मोनक छवि/ सिंगार केने अछि/ कैनवासकेँ बड़ी वीरान/ रेतक जहाजकेँ/ भेल थकान स्वप्न उड़ैए/ कखनो दूर धरि/ कखनो लग नीलमणिक/ अंतरिक्ष भ्रमण/ लागल पंख टनका ठोस बरफ ठिठुरल बसात तरल पानि चमकैत आकाश प्राणीक नहि आस ब्रह्मास्त्र अन्तर्जालक सुविधा छल तँ बड़ नीक ऐ मेल सँ दुनिया भऽ गेल छल नजदीक प्रतिद्वंदितामे दामो भऽ गेल छल ठीक ऑनलाइन ज्योतिष धेने पाखंडीक टीक

समाचार हुअए वा हुअए मनोरंजनक बात वेबसाइट देने छल टी.वी. रेडियो केँ मात मोनक माफित घरे बैसल करू बजार हाट शौक सँ सीखू आ सिखाउ भानसभात

मुदा अवगुणक मेल रहिते अछि गुणक संग हैकरक उद्दण्डता सँ व्याकुल रहल मन उपाय बड़ नीक सूझल फेर ब्रहास्त्र सन पासवर्ड मे लिखलौं हैकरक नामपर डहकन।। मोनक गति असगर बैसल एक कोठलीमे दृष्टि कैद छल चारू देवारमे मुदा मोन जा चुकल छल दूर अपन चालिसँ मजबूर विचारि रहल छल बीतल काल सोचैत अानकेँ आनक हाल एक-एक प्राणि जकरासँ भेटल सबहक चिन्ता अपनेमे समेटल जँ जे भेलै से नै भेल होइतै तँ ऐ कऽ की हाल होइतै सत्‍यक संग प्रयोगक साहस कल्पनामे आन्हर भऽ केने बास समैक मोलसँ अपरिचित कतेको दिन राति रहल छल बीत एक एहेन उज्ज्वल भाेर चाही छल जे असत्‍यक नींदमे जे सूतल छल तइ मोनकेँ झकझाेरि कऽ जगाबए वास्तविकताक सुन्दरता बुझाबए सत्‍यक संग कराबैत साक्षात्‍कार काल्पनिक जीवनक प्रतिकार आशावादिता जकर मूल धारणा आगाँ बढ़क एक अद्भुत प्रेरणा प्रवासी पक्षी प्रवासी पक्षी अफ्रीकासँ आएल कएक मील उड़ि कऽ गर्मीमे जीवनयापन लेल नम्हर दिवस पाबि कऽ भोजन ताकत बेसी समए भोजनो बेसी उपलब्ध रहए भागल अपन देश छोड़ि भीषण गर्मीसँ निदान भेटए अपन जन्मस्थानसँ भिन्न ककरो लागल दुइ तीन दिन थम्हि-थम्हि कऽ आबैमे कियो लेलक महिना दिन रंग-बि‍रंगक आकार प्रकार प्रकृतिक अतिथि ग्रीष्मकाल साल भरिसँ प्रतीक्षा कएल भीड़ लगेने सभ देखनिहार। आसमानी अकास ऋतुक बदलैत रूप संग धरैत भिन्न भिन्न रंग बीत रहल मानवक जीवन सभ दिन देखैत नव परिवर्तन समस्याक आगमन बिनु सूचना अवधि सेहो अज्ञाते जेना स्वयमकेँ कालानुसार रमौने ध्येयपर मुदा आँखि टिकौने विपरीत काल समाधान ताकैत बाधाकेँ एक-एक कऽ छाँटैत धैर्य आ परिश्रमकेँ हाथ धऽ असंभवोकेँ बनाओल सम्भव अनेक दिनुका अनवरत प्रयास स्वच्छ विशाल आसमानी अकास भ्रष्टाचार भ्रष्टाचारपर आरोपक इच्छा छल लेखनी पकड़लौं तइ कारणे कतएसँ प्रारम्भ करू से समस्या अकर समावेश लागल सभ क्षेत्रमे खेती बारीसँ जोगा कऽ अपन पेट काटि कऽ एक गरीब किसानक पूँजी निपटल बेटाक पढ़ाइमे ने प्रयासमे कमी आ ने बुइधि‍‍ कम विलक्षण पैघ लोलक पैरवी चाही महाविद्यालयक नामांकनमे पढ़ाइ तक कहुना पार लागल तँ अतिरिक्त मुद्रा आवश्यक नौकरीक बहालीमे अतेक तरबदुतक बाद जँ नौकरी लागल माता-पिता भिड़ला नगद वसूलीमे एक संस्कारी पुतौहक प्रतीक्षा करैत बस हेराफेरी संस्कारक परिभाषामे एहेन संस्कार जे घर बदलि दिऐ सभ प्रगति रुकल दहेजक आशामे। जीतक परिभाषा जीतक परिभाषा ताकि रहल छी स्पर्धासँ भरल जुगमे अर्थक संचयमे विजय अछि भौतिकताक पगमे आकि ज्ञानक प्राप्तिसँ जीतब भावुकताक ठगने बाहुबलसँ बलवान घोषित हएब हाथ रांगि रक्तक रंगमे आध्यात्मक प्रपंच सीख धर्मगुरू बनब ढोंगक ओढ़ना ओढ़ने सत्ता पाबि कऽ देशकेँ लूटब भ्रष्ट नेताक रूपमे सबहक महत्ता क्षणभंगुर अछि बितैत समैक संगमे सत्य आ विवेकसँ जीवनयापन शान्ति अन्तर्मनमे। प्रजातन्त्रक खेल शुरू भेल फेर प्रजातन्त्रक खेल तानाशाहीक सबतरि बिगुल बाजल ऐसँ नीक अवसर कतए अशिक्षितकेँ राेजगार लागल आइ.ए.एस. बनए लेल लाेक पाेथी रटि रटि नै थाकल आेतै देशक प्रशासन हथियाबैमे अशिक्षित मूर्ख भऽ रहल पागल जे आत्‍मविश्वास आ दृढ़तासँ खूब रचि-रचि मिथ्या बाजल सभकेँ बागडाेर सम्हारए लेल नेता बनि कऽ अछि जागल पाँच साल धरि सूतत जी भरि अपन तिजाेरी नीकसँ सम्हारत नै तँ बीचेमे चुनाव करा जनताक काेष फेरसँ झारत दूबिक भाग घासक फुन्गीपर बैसल दूबि सोचैत अपन भाग केहेन गति हएत की जानि अन्त लीखल ककर हाथ जँ पुजारीक हाथ लागत खोंटत सभ सम्हारि कऽ श्रद्धासँ अर्पित करत पूजामे ईश्वरक नाम लऽ दुर्गति नै कोनो आन एहन पड़त लोकक बाटमे जँ पिसाएत अन्त हएत तखन बाट बटोहिक पएरसँ चरवाहा केँ धि‍यान पड़लापर लऽ जाएत घर उखाड़िकऽ नै तँ अपन माल जाल चराएत ओतए आनि कऽ। स्वतंत्रता दिवस स्वतंत्रता दिवस आएल छल देशभक्‍तिक अभिव्यक्‍तिक दिन देशक शहीदकेँ श्रद्धांजलि देबक जकर ऋणी हम सभ प्रतिदिन एक सदीक प्रयासक बाद सफल साढ़े तीन सए साल रहल पराधीन वीर वीरांगणा पुरुष स्त्रीक बलिदान केलक फिरंगीकेँ शक्‍तिविहीन एक स्वतंत्र प्रजातंत्रक निर्माण भेल एक-एक तिनकासँ बिन-बिन सभ जनहितक कानून बनल मुदा ज्ञाता वएह जे छथि उच्च पदपर आसीन देशक आर्थिक सहायताकेँ भोगैत उद्योगपति अपन तिजोरी भरैमे लीन सत्ताक ताकत लेबऽ लेल प्रयासरत नेता केने श्वेत वर्दीकेँ मर्यादाहीन स्वयंकेँ शक्‍तिशाली बनेनाइ प्राथमिक राष्ट्र विकासक स्थान जेना हुअए सभसँ अंतिम पोखरिक कमल सरकारी कर्मचारी किए निठल्लू जखन कखनो ई प्रश्न उठल एक व्यक्‍ति की करत नीक भऽ जतए सभ भ्रष्ट अछि भरल सुनैत सुनैत ऐ जवाबकेँ रहैत छलौं मोने मोन कुहरल दलदल सन दूषित पानिमे कीट पतंगसँ मचल हलचल शीतल कोमल पल्लव समेट‍ने मोन मुस्काइत अछि कमल ओ गुणे की जे अपन महत्ता सभमे प्रमाणित नै कऽ सकल मोजर नै ओइ सिद्धान्तक जे परीक्षाकाल नै अविचलित रहल विचित्र श्रद्धा एक दिस देश डूबल पानिमे बाढ़िसँ दहाइत घरद्वार दोसर ठाम लाखक लाख लागल मूर्तिपूजन आ पाबनि‍ त्योहार केहेन विचित्र श्रद्धा अछि ई किए बिसरि रहल छी परोपकार ईश्वर अहाँ जौं भेटितौं तँ पुछितौं नीक लागैत अछि की एहेन सत्‍कार पाइक जोर अहूँकेँ बदलने अछि कि अखनो सुनैत छी पावन पुकार एक सिद्धान्तवादी लेल धनार्जन कतेक दुर्लभ भेल से अछि देखार भ्रष्टाचारक लूटल पाइसँ भऽ रहल अछि अहाँक सिंगार दिनोदिन संघर्ष कऽ रहल अछि मात्र जीबए लेल कर्म करनिहार जौं अहाँ सच्चे मोनमे बसै छी तँ मोन नै करैत अछि स्वीकार धूप जरा कऽ आडम्बर किए कर्त्तव्य पूर्तिमे अहाँक जय जयकार सभमे सत्‍कर्मक शक्‍ति भरितौं तँ होइतै वास्तविक चमत्‍कार। मिथिलांचलक रूपान्तरण स्वप्‍न छल जे मिथिलांचलक रूपान्तरण होइतै ठामठाम सड़क आ भव्य भवन ठाढ़ रहितै कर्म-सुर्कमक एकटा बड़का विमान पत्तन सुगमतासँ बढ़ितै अमीर लाेकक आवागमन स्थानीय बेराेजगार लाेककेँ लगितै राेजगार अखन भटकि रहल अछि इम्हर उम्हर बेकार नाैकरी लेल छाेड़ पड़ि रहल अछि अपन गाम टैक्‍स सहित सभ खर्च दाेसर राज्यक नाम जखन धि‍यानमे आबैत छल प्राकृतिक प्रकाेप सदैव कम पड़ि जाइत छल सरकारी काेष आब जखन विश्वबैंकसँ भेटल अछि ऋण दुरूपयाेगक संदेह बढ़ि रहल अछि दिनाेदिन पहिल अविश्वास जे राजनेता की करता फेर नै ज्ञात जे उद्याेगपति कतेक पचेता तकनीकक कमी आकि अकुशल कारीगर दिल्लीमे नवनिर्माण ढहि रहल अछि धराधर बरसातमे निर्माण केनाइ बड़ मुश्किल छथि कहैत बाहर कतेकाे जगह सभ दिन बरसाते अछि रहैत तैयाे पूरा देश कन्क्रीटक बनि गेल अछि बरसाताेमे ने काेनाे रस्ता रूकैत अछि बचपन उठिते देरी परातमे दिवसक पहिले पुकारमे दूबिपर छितराएल ओसक मोतीकेँ धांगि धांगि माटिमे मिलाबै छल

दिनक रौद तपलाक बादमे कुसियारकेँ पकड़ने हाथमे जड़ैत अकासमे मिझाइत सुर्यकेँ सांझक सांझ निहारै छल

कनिया पुतराक खेलमे संगी सबहक मेलमे पूरा विन्याससँ वियाह रचाबैत नम्हरो दिनकेँ पछाड़ैत छल

छतपर ठाढ़ भेल कातमे रातिक गहन अन्हारमे बड़का पसरल बाधक सन्नाटापर दूर दूर नजर दौड़ाबै छल

जाड़मे आकि आममे बीतल अछि जे गाममे घुरि कऽ फेर नै आएत कहियो बचपनक ओ बीतल पल मिथिला चित्रकला एकटा कैनवास पड़ल उज्जर रिक्‍त ताकैत छल मुँह बड्ड जिज्ञासासँ तूलिका उठेलौं रंगसँ कऽ सिक्‍त घाेर मनन करए लगलौं तल्लीन भऽ अनकर पन्ना सेहाे  केलौं अंगीकृत प्रेरणा लऽ नीक करक अभिलाषासँ।। लियोनादो बढ़िया कलाकारी गढ़ि गेला मोनालिसाक प्रसिद्ध रहस्यमयी मुखाकृति तर्क वितर्क करैत रहल छविकारक मेला इतिहासक ललकार बनल ओ कलाकृति ईश्वरक कृति बच्चाक निश्छल मुस्कान देखल ओइसँ अद्भुत आर कोन अभिव्यक्‍ति।। धि‍यान आएल एब्सट्रैक्‍टक नव पैटर्नक मोन भेल किछु करी आधुनिक  ढंगमे भेटल अमूर्त एब्सट्रैक्‍ट रूप चित्रक उड़ैत भागैत रंग बिरंग तितलीक पंखमे विचार आएल जखन विधा फैशनक शानदार सज्जा छल सीप आ शंखमे।। किछु नवीन करक इच्छा रूकि जाइ छल जखन देखै छलौं अपन चारू कात ईश्वरक बनाआेल ऐ दुनियामे भेटल सभ तरहक उपलब्ध छल सर्वश्रेष्ठ  करामात स्वयं ईश्वरक वि‍याहमे जे सजाएल रहल साेचलौं मिथिला कलाकेँ करी आत्‍मसात। अन्नावरन देवेन्दर तेलुगु पद्यक अंग्रेजी अनुवाद-पी.जयलक्ष्मी आ मैथिली अनुवाद-गजेन्द्र ठाकुर

कवि अन्नावरन देवेन्दर आन्ध्र प्रदेशक करीमनगर जिलासँ छथि आ तेलुगु भाषाक तेलंगाना बोलीमे तेलंगाना राज्यक संवेदना आ संस्कृति आ ओकर अलग राज्यक लेल संघर्षकेँ स्वर दैत छथि। हुनकर छह टा कविताक संग्रह छपल छन्हि। ओ महात्मा जोतिबा फुले फेलोशिप २००१, रंजनी कुन्दुरती कविता पुरस्कारम् २००६, डॉ. मलयश्री साहिति पुरस्कारम् २००६, रांगिनेनी येनम्मा साहित्य पुरस्कारम् २००७ पुरस्कारसँ सम्मानित छथि। ओ जिला परिषद, करीमनगरक पंचायती राज विभागमे सीनियर असिस्टेन्ट छथि। पी.जयलक्ष्मी, ओस्मानिया विश्वविद्यालयक, निजाम कॉलेज हैदराबादमे अंग्रेजी विभागक अध्यक्ष आ एसोसिएट प्रोफेसर पदसँ सेवानिवृत्त भेल छथि, विगत ३० बर्खसँ अंग्रेजीक अध्यापन केने छथि। हुनकर विशेषज्ञता अंग्रेजीमे भारतीय कविता, अनुवाद आ अनुवादशास्त्र अछि। २००३ मे भार्गवी रावक संग मि‍लि‍ कऽ शीला सुभद्रा देवीक “सितम्बर ११ आ ओकर परिणाम”पर तेलुगु काव्यक अंग्रेजीमे वार अ हर्ट्स रैवेज नामसँ अनुवाद। २००७ मे गोपीक ननीलू (छोट सभ) केर अंग्रेजी अनुवाद। फार्मलैण्ड फ्रेगरेन्स नामसँ अन्नावरम् देवेन्दरक कविताक अंग्रेजी अनुवाद, २०११। फ्रेण्ड्स फोरेवर नामसँ पी. अशोक कुमारक तेलुगु उपन्यास जिगरी क अंग्रेजीमे अनुवाद, २०१२। अंतिम शब्द (तेलंगानाक किसान द्वारा आत्महत्यासँ पहिने पत्नीसँ कहल) “लछम्मा, प्रिय! हम छोड़ि कऽ जा रहल छी हमर शिक्षा मोन राखू... अपन बच्चाक नीक पालन करब ई हमरा सकमे नै अछि- जीब कर्ज देनिहार सभ बनि गेल छथि यम। आइ-काल्हिक समए नै अछि किसानक लेल हम छोड़ि कऽ जा रहल छी ओ सभ हमरा नै छोड़ताह जीवित हम कतबो चाही ई जिनगी कोन तरहक, जतए अन्न नै अछि खएबाक लेल महाजन सभ तीरि रहल छथि कर्जदाता हमर सम्मानकेँ लज्जित कऽ रहल छथि हम नै जीब सकब लछमी, नै, नै आब आर! एकटा बीस वा चालीस हजार हमरापर कर्ज छै समाजक- सुनै सएह छी आर पचासेक देबाक अछि साहूकारकेँ आ एकर अलाबे, सुनू! ऋण मारिते रास एत्तऽ आ ओत्तऽ अपनासँ घृणाक अनुभूति ऐ‍ जिनगीकेँ जीबाक विचार मात्रसँ छी लज्जित। ऐ‍ ऋण सभकेँ प्लेग जकाँ बढ़ैत देखि‍! ऋण देनिहार सभ आबए लागल छथि घर सेहो रोकए लागल छथि बाटे-घाटे पछोड़ धऽ लैत छथि जखने तखने अपन जिनगीक बाद जतए कतहु हम जाएब जिबैत अपन मुख, बार्लिस सन पातर की हम करब आ केना हम जीब? ई समए नै अछि छोड़ि कऽ ऐ‍ जगकेँ जएबाक कतहु पानि नै मुदा नोर बहैत हुहुआइत पोखरि कहियासँ ने सुखाएल इनारमे हरियरी देखाइत बोरवेलसँ पाइ मात्र जाइत खुनैत सए फीटसँ बेसी, पाताल धरि कोनो टा मे मुदा पानि नै हम पिटैत हाथसँ कपार खुनल माटिक पहाड़ देखैत हँसीक उद्गम सबहक लेल! बोरवेल लेल एकड़क-एकड़ बेचैत जे एना अछि तँ कतए अछि कटही गाड़ी आ कतए अछि खेती आ केना जिबै अछि बच्चा सभ? आउ आब! बरखा नै हएत नहिये जाएत अकाल आकि भुखमरी पानि नै बहत नहिये जाएत अपन नोर खेत सभ तपि कऽ सुखाएल समए सेहो उनटि अछि गेल बरखा जइसँ नै खसै अछि एक्कोटा बुन्न बीआ बाओग करैत काल सएह बहैत अछि मोनसँ कटनीक समैमे जे एकाध टा दाना रहए बचल बहि गेल बाढ़िक पनिमे जे दाना जाइत कंठमे से बहि गेल नालामे कपासक खेती सेहो तेहने कीड़ा.. सभटा कीड़ा, खतम भेल दहो-दि‍सि‍ बीआसँ रसायन धरि धोखा... धोखा.. बेइमानी चारू दिस बेइमानी बोनिहारसँ सभटा क्षति, जेम्हरे देखू तेम्हरे हानि.. आ ओहूसँ बड़का हानि ओकरा दबेबा लेल बिनु प्रयोजन कतबो बरिखसँ करैत होइ खेती बिनु प्रयोजन हमर बच्चा सभ अछि पैघ भऽ रहल किसान सभ अछि मरि रहल हमरा ई कहए दिअ, हम सेहो छी मरि रहल हम नै जीब सकब आर अधिक काल हे लच्छैय्या! छी हम जा रहल! हाल-फिलहालमे पाइ के अछि मँगने? की ओ सभ चाहै छथि जे किसान बन्न कऽ देअए खेती? जकरा चाही दरमाहा जीबाक लेल? केना जीब आ केना मरब.. केना कऽ भरब कर्जक अम्बार.. अपनो बेच कऽ की चुका सकब? की अपन खेतिहर भूमि सेहो बेच दी? मुदा से ऐ‍ अकालमे कीनत के? जे हमर जीवन-संघर्ष तेहेन अछि सुनलौं धनिक लोक सबहक ओहेन शब्द-सभ? “मरैत अपच होइत जे ओ सभ लेने छथि”। हमर बाउ! कतएसँ आनै छी ओ सभ दाना जे अहाँ खाइ छी? एक बेर फेर, ई अछि हिस्टीरिया रोग! जे खेतीकेँ बदलि देलनि‍ रोगमे? जे खेतीकेँ बदलि देलनि‍ जुआमे? आ बढ़ा लेलनि‍ अपन धोइध? की अहाँ नै देखि‍ पाबि रहल छी किसानक अँकड़ल पेट? की अन्न देनिहार भऽ गेल रोगी? नै एकटा चातकक माउस ओकरा देहमे, हमर बाउ! धानक खेतीसँ पोसल ई देश आ आब हमरा दाना देबासँ मना कऽ देलौं अहाँ, नै की? ओ कहै छथि हम मरि रहल छी अनुकम्पा राशि लेबाक लेल ओ केना ई कहि सकै छथि... एहन शब्द सभ? की अहाँ देखने छी, हमर लच्छैय्या? ई शब्द सभ दाह उत्पन्न करैत अछि हमरा देहमे, अहाँक पाइक खगता? केकरा छै ई खगता? हम सभ गाए जकाँ छी पवित्र, अहाँसँ कहै छी। अहाँ सभ मरब हमरा सबहक शाप माथपर लेने हम सभ नै छी ऋणखौक हृदए राखू.. हम सभ छी स्वाभिमानी मनुक्ख मरि जाएब से एतए फेर लेब जन्म एतए अपन जिनगी काटल गंगासन पवित्रतासँ हम सभ छी ऋणमे डूमल आ ऋणदाता सभ बनि गेल छथि यम, प्रिय हम आब नै.. हम आब नै.. छी जा रहल ............................. लच्छय्या! लच्छय्या! अहाँ एना किएक छी कलपि रहल? ई अछि लिखल अपना सबहक भाग्यमे ततेक दिन जीब जतेक दिन अछि लिखल हम जा रहल छी जहिया हमरा जेबाक छल ......................... हमर दिनक गणती शुरु अछि भऽ गेल नै स्वीकार करब लच्छैय्या, अनुकम्पा राशि हमरा गेलाक बाद सरकार ई देबाक गप करत ओ नै कहैत अछि जे, हम जे छी मरि रहल से, जे खेलौं तकर अपच भेलासँ छी मरि रहल? ओकरा लऽ जाए दियौ ओ पाइ अपना सारामे? धिक् ओइ घरकेँ। हम जा रहल छी... अहाँकेँ हानिमे दैत, लच्छा! बच्चा सबहक लेल नै कियो आर हम जा रहल छी.. जा रहल छी ऋण देनिहार सबहक द्वारे” (मनकम्मा थोटा लेबर अड्डासँ “आखरी माता”) गिरीश चन्द्र लाल, काठमांडू, नेपाल। – गिरीश जी नेपालक सर्वोच्च न्यायालयमे न्यायाधीश छथि। नील अकास जीवनकेँ शुन्य समैमे अकास दि‍सि‍ देखू, अकास, नील अकास आ निराकार अकास, निश्छल, शान्त आ निरामय! जेना सभ आ सभटा हेरा गेल हुअए। सूर्यक सप्तरंगी छवि आ चानक इजोरिया, निवीड़ अन्धकारकेँ चीरक प्रयास करैत, अनन्त अकासमे थाकल खद्दोत जकाँ, थाकल, ठेहियाएल आ भन-भन करैत अछि। के छथि सूर्य, के छथि चान आ के छथि तरेगन सभ? किछु रहथि‍ तखन ने परिचए हुअए। उठा लाबी, बजा लाबी, आ बैसा ली अपन आंगनमे। आदि नै, अन्त नै आ मध्य जकर नै अछि, तकर ठाम कोन एकठाम खोजू। आ केना जोडू अपन नाम ओइ नामसँ जकर नाम सभ नाम आ सभ नाम जकर नाम छैक। शुभ प्रभात उदयाचल पर होइत अरुणिमाक आरोह आशा आर विश्वासक संग तन मन एवं जन जन मे पूर्व संचित अभिलाषाकेँ साकार करक लेल भेल अछि स्वागत अछि हे शुभ प्रभात, स्वागत अछि अहाँ हमर धरती पर नव प्राणक संचार हेतु अपन सभटा शुभेच्छा संग अएलहुँ स्वागत अछि। मुदा ई नै बुझब जे आबो अहाँक यात्रा निर्विघ्न चलबे करत समय केर धवल एवं कृष्ण पट किनको चलऽ देलकन्हि अछि निष्कन्टक? बिसरि गेलहुँ किछुए दिन पहिलका इतिहास अहाँक अनन्त यात्राक क्रममे किछुए दिन पहिले तँ राम अवतरित भेल छलाह वनवासक क्लेश पत्नीक अपमान आ की की नै सहऽ पड़लन्हि। तहिना कृष्ण कतबो हँसला कतबो बजला मुरली पर गीत गौलथि, रथ पर गीता रचलथि मुदा जखन एकटा शिकारीक गुलेटी पर यएह धरती सँ प्रयाण कएलथि तखन हुनक सुदर्शन कतऽ रहथिन ईशा जइ शूली पर मसीहा बनलाह से तँ मोने हएत ओइ शूलीक रंग एखनो भटरंग नै भेल अछि कर्बलाक शहीद तँ अहाँक नोरेमे छथि तैं हे प्रभात। अहाँ सदिखन एहने शीतल आ निश्छल नै रहब से जनितहुँ बुझितहुँ अहाँक यात्राक मंगल कामना कऽ रहल छी अहाँ तँ निरन्तर अपन प्रिय प्रकाशक संग पूर्व सँ पश्चिम आ पश्चिम सँ पूर्व सतत चलैत हमरो धरती पर अएलहुँ स्वागत अछि हे शुभ प्रभात ! स्वागत अछि । मन मे भेल अछि भोर मन मे भेल अछि भोर प्रभुजी। मन मे भेल अछि भोर। अर्पण अछि ई नोर प्रभुजी। अर्पण अछि ई नोर। नयन भेल छल पाथर पाथर। पथ हेरैत छल आखर आखर। शून्य हृदय मे प्रगट भेल अछि रुनझुुन रुनझुन शोर। मन मे भेल अछि भोर प्रभुजी। मन मे भेल अछि भोर। चैन चैन केँ आस लगौने। सुखक मनसा मनमे धैने। चलैत चलैत हम श्रान्त भेल छी नै अछि कोनो छोर। नै अछि कोनो छोर प्रभुजी। नै अछि कोनो छोर। अर्पण अछि ई नोर प्रभुजी। अर्पण अछि ई नोर। अयन अयन मे व्याप्त अहाँ छी। सभक अंगमे रंग जकाँ छी। पाबि रहल नै नयन हमर अछि अहाँक कोनो ओर। अहाँक कोनो ओर प्रभुजी। अहाँक कोनो ओर। मन मे भेल अछि भोर प्रभुजी। मन मे भेल अछि भोर।

एक रंग अनेक रंग एक रंग अनेक रंग रंगक ई खेल बुझैत बुझैत जिनगी सभक शेष भेल। ओर नै छोर नै कोरक कोनो पोर नै भेदक यएह खेल मे साँझ नै भोर नै एक रंग सभक संग सभक संग एक रंग एक रुप अनेक रुप एक एक भेल। एक रंग अनेक रंग................... धरती अछि नभक संग नभक अंग रंग रंग चलैत चलैत संग संग मनक तार भेल दंग भूतल आर सागर मे खेत आर रेत पर खोज नित नव नव प्रगट प्रगट भेल । एक रंग अनेक रंग ............... फूलपर पातपर गाछ सभक हाथ पर बीजक परिवर्तन पर प्रकृतिक समर्थन पर एक फूल अनेक तुल तुल तुल धूल धूल धूल संग तुल मिलि फूल फूल भेल । एक रंग अनेक रंग.............. गंगेश गुंजन, १९४२- , जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल १९९४ मे साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। आजाद गजल १ कोन एहन त्रुटि भऽ गेल हमरा अहाँ जकर गीरह  बन्हने छी ककरो कोनो समाद तँ नहिये चि‍ठी-पत्री बंद केने छी सभटा युगसंभव मानय मोन  बजारकेँ हमहूँ चिन्हने छी ककर सि‍नेह आ कोन समर्पणक ऐ‍ युगमे निष्ठा धेने छी करी हिसाब तँ की हासिल यौ ह्रदए अहाँ जेहो पओने छी सभ अभाव-अभियोग कातमे मन जाँति‍ सभ अनठा देने छी भरि संसार वस्तुएक बाजार किछुए मुदा हमहूँ किनने छी अपनो वस्ती ओहने शो-रूम किछु ने किछु अहूँ सजने छी दाम पास नै रहल आब तँ पुरने सभटा अङेजने छी मानल अहाँ! बहुत देलौहेँ किछु तँ हम कहियो देने छी यएह नियति तँ यएह हो सही अहाँक देल सभटा धेने छी कहाँ एलनि गुंजनकेँ गनऽ अहूँ तँ भरिसक्के गनने छी २ कोनो एक क्षण केना कखन इतिहास बनैत छै बूझल भेल आब जीवनक ऐ‍ पहरमे सौंसे दुनिया अपन-अपन आकांक्षाक अन्हड़ कऽ रहलए निर्यात सोहनगर वस्तु घर-घरमे

लोकगुणक, बोधक विवेक सबहक परिभाषा गढ़ल जा रहल नव संस्कृति मधु मि‍लि‍ जहरमे आब गाम सन गामो बनल धर्मक हिंसागृह सम्प्रदाय-दंगा-धर्मक छल जे बसल शहरमे

निष्ठा-प्रेम-प्रसंग भेल गेलय राजनीतिक चर्या भोरे पहरक कएल प्रतिज्ञा बिसरल बेरु पहरमे सम्वेदना सड़ल अचार फुटल बुआममे राखल सभ स्वाद-रस-आस्वादन आश्रय लेलक अवसरमे

कूटनीति आ राजनीति विश्व-नैतिक तेहन प्रबंधन अफसर भेटत राजनीतिमे नेता सभ अफसरमे ओ छथि कतौ प्रवासी कोनो यू.के.- यू. एस.ए.मे जनिक भूमि ई से निष्क्रिय छपकल अपना घरमे

बुधि‍ काज ने करनि गुंजनकेँ लागल ठकमूड़ी ऐ‍ षडयंत्रक मोशकिल काटब जाल असकरमे स्वतंत्रता-दिवस २०१० गुदरी-चेथरी सीबैए बड़ दिब जनता जीबैए जेहने ई पवित्र पावनि तेहन अछिन्जल पीबैए नव मलिकाना ढब पसरल घोड़ी-घास छीलैए कखनो राजा आ महराज एखन अंगरेजसँ मीलैए जखन चलय परिवर्तन चक्र सभसँ अवसर छीनैए अपन बिलासी बजटक भार जनताक कान्हपर धरैए सुनैत छी आब अपनो देश मंगल ग्रहपर चढ़ैए भरि संसारक यूरो-युद्ध लोकक भूखे लड़ैए दाना-दानाक लोक बेहाल गहुम गोदाममे सड़ैए फुटपाथी दोकानमे ठाढ़ पुरने बस्त्र मौलबैए देशक नायक सभा समेत ध्वजा ऊँच फहरबैए लोकगीत-नादक नामे रॉक एन रॉल करबैए गाम भरिक अनेक घरमे दीपो कहाँ आब जरैए सभ जेना मिझाएल मुरझल दिल्ली जगमग करैए संभव छैक पटनो हो इजोत गाम बिहारक कानैए ई महान राष्ट्रक त्योहार धरती रौदसँ जरैए लोक कर्जमे डूबल अछि किसान लोक सभ मरैए अमेरिकामे जे डॉलर फ्राँसमे यूरो फरैए हमरा गामक बाध समस्त धहधह जेना कि धधकैए ओतए उमेद आ आश्वासन बाट देखैत लोक मरैए जानि ने कहियाक चलल रिलीफ हमरो बस्ती पहुँचैए छीन लेलक से बड़ सुभ्यस्त ठाढ़ रहल भीख माँगैए शहरक सभ लाल बत्ती भीखक हाथ पसारैए आजुक दिनक खोराकीक खोज साधारण जन लड़ैए देश शीर्षपर होइत परेड चैनल सभ दरसबैए एक-एक पल डेगक झाँकी दुनियाकेँ झलकबैए ई नै अपने देखय ओ जे किछु सभटा करैए केहन विकट द्वन्द्व आगाँ जीअय लोक ने मरैए सोझाँक शक्ति विरुद्ध अछैत तैयो किएक ने लड़ैए भरिसक नैतिक दुविधा-द्वन्द्व सभ संबंधीए लागैए तहियाक समए छलय दोसर बूझल विदेशी छलैए आइ तँ ई नवका अंग्रेज सोहोदर-मसियौत लगैए तँए एहनो महान ई दिन आत्मामे नै उतरैए हो जिनकर ई देश रहौ हमरा तँ नै अरघैए आब लागय गुंजन सभ युग मुँह देखि‍ मुँगबा परसैए (१५ अगस्त, २०१०ई.) मनीष झा "बौआभाइ", मूल नाम- मनीष कुमार झा, पिता- पं. श्री नारायणजी झा, पितामह- स्व. पं. सत्यदेव झा, जन्मतिथि- २५ अगस्त १९८१ ईं., जन्म स्थान/ स्थायी पता : ग्राम+पोस्ट- बड़हारा, भाया- अंधरा ठाढी, जिला-मधुबनी (बिहार), पिन-८४७४०१ भेल एहेन अवतार छल भारत केर ऐ‍ पावन धरतीपर कलियुगमे भेल एहेन अवतार छल जे राष्ट्रपितासँ संबोधित भेलाह व्यक्तित्‍वे आजादीक आधार छल सत्य-अहिंसा-सहयोगक बलपर प्रेमक डेग बढ़ेने गेलाह शांत स्वभावक परिचए दऽ कऽ सदिखन उचिते निर्णय लेलाह विश्व बंधुत्वक सिद्धांत बना कऽ मानवतापर बड़ पैघ कएल उपकार छल कलियुगमे भेल एहेन अवतार छल तूर तागलन्हि जे चरखापर देलनि‍ सभ केँ एकर शिक्षा जुनि बिसरू कि‍यो संस्कृति अप्पन जे देने गेलाह दीक्षा स्वाभिमानमे जीबू सभ कि‍यो छल-प्रपंचसँ दूर जिनक संसार छल कलियुगमे भेल एहेन अवतार छल द्वापरमे भऽ श्रीकृष्ण जनमलौं त्रेतामे बनि श्रीराम सतयुगमे श्रीहरिश्चंद्र बनल छी कलियुगमे गाँधी नाम ओइ सिद्धपुरुषकेँ "मनीषक" पुष्पांजलि जिनकर हृदए स्वच्छ आ निर्विकार छल कलियुगमे भेल एहेन अवतार छल। लालबाबु कर्ण जन्मभूमि पावनमय ई जन्मभूमिकेँ सतसत कोटि प्रणाम करै छी माँ केर लाज राखए लेल हम बेर-बेर कवूल करैत छी जानकी हमर सुपुत्री मिथिला केर त्राही-त्राही माम किए करै छी? बाप–भायकेँ कर्तव्य पुरा लेल सभकेँ हम आह्वान करै छी। उठू यौ मैथिल मिथिलावासी हाथ जोड़ि‍ हम विनय करै छी युवा शक्ति एकवद्ध भऽ लाल खूनक लाज रखै छी। चन्‍द्रशेखर कामति, १९५९- ,शि‍क्षा- एम.ए. (राजनीति‍शास्‍त्र)‍, पि‍ता- स्‍व. योगेन्‍द्र कामति‍, गाम-पोस्‍ट- करि‍यन, भाया- इलमास नगर, थाना- रोसड़ा, जि‍ला- समस्‍तीपुर, बि‍हार। संप्रति‍-प्रखण्‍ड सहकारि‍ता प्रसार पदाधि‍कारी (बेनीपट्टी)। आइ काल्हुक छौंड़ा सभ बाप रौ बाप, ऐ‍ दुनि‍यामे अन्‍हार भ‍ऽ गेलै नयका-नयका छौंड़ा सभ बेकार भऽ गेलै गरम भ्रष्‍टाचारक बजार भऽ गेलय-२ पढ़ल-लि‍खल बैसल-बैसल माछी मारै छै, जानय घोड़ा-घास ने से अंग्रेजी झारै छै काज-धंधा छोंड़ि‍-छोड़ि‍ कऽ छौंड़ा टल्‍ली मारै छै लि‍ख लोड़हा पढ़ पत्‍थर बेटा दि‍ल्‍ली मारय छै घरमे भुज्‍जी भांग नै सरकार भऽ गेलै, नयका-नयका छौंडा सभ बेकार भऽ गेलै गरम भ्रष्‍टाचारक बाजार भऽ गेलय-२ पढ़ल-लि‍खल बैसल-बैसल माछी मारै छै जे ने पढ़ल-लि‍खल से फुटानी झाड़ै छै दुइऐ दि‍नमे ई बेटा होशि‍यार भऽ गेलै शूट-बूट लगौने दि‍लीप कुमार भऽ गेलय गरम भ्रष्‍टाचारक बाजार भऽ गेलै-२ बापक जेबी काटै छै सलि‍या देखै छै माइक्रोसॉफ्ट गहना बेचै छै माेहब्‍बत करै छै ढक्का-ढनमन लगबै छै फुटानी करै छै गुपचुप-गुपचुप ई छौंड़ा पि‍हानी करै छै घरसँ ताला तोड़ि‍ कऽ फरार भऽ गेलै नयका-नयका छौंड़ा सभ बेकार भऽ गेलै गरम भ्रष्‍टाचारक बाजार भऽ गेलै-२। दुनू परानी फूकि-फूकि पी सारि नाम लड्डू सरहोजि नाम घी सासु ससुरकेँ कहबनि की बकरीक दूधमे चाहो बनैत छैक दुनू परानी फूकि-फूकि पी॥ सूति उठि लिअ श्रीमतीजीक नाम छोड़ू कहनाइ बाबी जय सियाराम छुच्छे फुटानी इजोरियामे टॉर्च सठि गेल अन्हरियामे सभ बैटरी॥ मोट-मोट रोटी खेसारीक दालि जलखैमे तोड़ै छलौं मकइक बालि घिवही कचौड़ीपर चोटे करै छी मौगीक बड़द बेकार बनै छी॥ भऽ गेल दुरागमन की ठेही भेल दूर देखू गृहस्थी आ फाँकू चनाचूर राति दिन तेरहो तरेगन गनै छी कनै अछि मौगी मेटाएलि सिनूर देखू ने चेहरापर तेरह बजैए रोटीपर नीमक अचार गनै छी॥ गीत टिकली करय चमचम मुँह छै महिसक चाम सन देखि‍ क‍ऽ पड़ेलौं कनियाँ लागय कारी झाम सन कारी-कारी मुँह बड़-बड़ आँखि टुकुर-टुकुर अन्हरियाक कीड़ी जकाँ बड़य भुकुर-भुकुर ठोरो लागय जरल-जरल चिनिया बदाम सन...॥ नीपल-पोतल नाक तैपर खुट्टा सन-सन बुट्टा हब्बर-हब्बर बाजब मुँहमे पानक गुलुट्ठा पेटोक कटनि लागय टिनही डराम सन...॥ मधमोंगर सन देह लगैए डम्फा सन-सन डाँर नाकोसँ चुबैए जेना पसबए कि‍यो माँड़ हाथो पएर लगै छन्‍हि‍ जेना टिटहीक टांग सन...॥ मनोज झा मुक्ति, काठमाण्डू। हाइकू दुहु बकरी खेलू खूब छकरी दन्दन करु

देखाबटी छोड़ि‍ दे – लगबे तँ लागिजो भगबे तँ भागिजो लगबे तँ सफल होएबे या तँ मरि जएबे । मरलापर तोहर मायकेँ गर्व हेतै तोरा शहादतपर ओकर करेज जुरेतै । जौं शुरुएमे भगबे तँ भागि जो । जौं भगबे तँ, तोहर माय ओते दुखीत नै हेतौ, तोरा कमजोरीकेँ सहर्ष स्वीकार करतौ। जहन नामेक लेल लड़ैत छेँ देखाबटी ढोंग करैत छेँ तँ, तों अपराधी छेँ अपन, अपना मायकेँ। जहन तोहर माय ई बात बुझतौ तँ तोहरा वास्ते धारण कएने, नौ महिना धरि सहेजि कऽ रखने अपना ‘गर्भ’ प्रति ओ पछतेतौ। जे करबे से करैत जो, द्वैध चरित्रकेँ छोड़ैत जो, सत्तसँ नाता जोड़ैत जो माएकेँ अपना हँसबैत जो तँए, आब साँचहि पड़तौ, एकटा निर्णए करहि पड़तौ । करबे की? लगबे तँ लागिजो भगबे तँ भागिजो । राजेन्द्र चौधरी, (बी.ए. आनर्स), ग्रामः- चरैया, पो. मगंलवार चरैया, थानाः- भरगामा, जिलाः- अररिया, (बिहार) श्रीकृष्ण भजन देवकी नन्दन, यशोदाक लाल। सुदामाक संगी, राधाक प्यार॥ ऋषिक नारायण, व्रजक गोपाल। उद्धव सखा, गोपि सबहक यार॥ राजेन्द्रक मुरली मनोहर, मीराक विशाल। भक्तक भगवन, दुष्टक काल॥ केना जाउ श्याम, तोहर नगरिया, ओढ़ि कऽ मैल चदरिया। विकल अछि मन-प्राण, तोरासँ मिलन लेल श्याम-सांवरिया। दऽ दिअ हमरा भक्ति अपन, तूँ पति रधिया। केना जाउ श्याम.....। हे गोविन्द हे गोपाल, आबि गेल छी तोहर द्वार। हे गोविन्द हे गोपाल, लाजक नाह तोरे हाथ, चाहे करू ओइ पार वा राखू मझधार। हे गोविन्द हे गोपाल, राजेन्द्र करैए पुकार, हे तारक हमरा तार, हे गोविन्द हे गोपाल.....। माँ ताराक भजन भव सागर करू पार हे तारा भव सागर करू पार हे तारा आएल छी हम अहींक शरणमे हमर करू उद्धार हे तारा भव सागर करू पार हे तारा बीच भँवरमे नाह फसल अछि, हमर करू उद्धार हे तारा भव सागर करू पार हे तारा.....। रमाकान्‍त राय “‍रमा”, १९४७- , प्रथम रचना- बटुक, बाल मासिक प्रयाग, कथा वि‍शेषांक द्वि‍तीय भागमे १९६४ई., प्रकाशि‍त कृति‍-(क) ती‍नटा बाबाजी-(रूसीसँ मैथि‍लीमे मैथि‍लीमे टाल्‍स्‍टायक कथाक अनुवाद-१९६७ई.मे, (ख) फूलपात, कवि‍ता संग्रह १९७८, (ग) भांगक गोला (२००४ ई.मे), (घ) कटैत पाँखि‍ : हँसैत आँखि‍ , कथा संग्रह-२००५, कृष्‍णकान्‍त मि‍श्र (विनि‍बन्‍ध), २०१२, साहि‍त्‍य अकादेमी नई दि‍ल्‍ली। प्राय: डेढ़ सए रचना (कथा-नि‍बन्‍ध कवि‍ता) मैथि‍ली हि‍न्‍दीक पत्र-पत्रि‍का, आकाशवाणी एवं दूरदर्शनसँ प्रकाशि‍त/ प्रसारि‍त। साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा आयोजि‍त कवि‍ सम्‍मेलनक आयोजनक क्रममे रेलक चपेटमे पड़ि‍ दहि‍ना पएर छाबा धरि‍ गमा वि‍कलांग। सेवा नि‍वृत अध्‍यापक (उच्‍च वि‍द्यालय)। सम्‍पर्क- श्री रमानि‍वास, मानाराय टोल पो. नरहन (समस्‍तीपुर)। वन्‍दना जननि‍, कने दि‍यौ वीण बजाय सुनि‍ जकर झंकार जन-मन आश कुसुम फुलाय पवनमे गति‍, तपन ओ शशि‍ जनि‍क नेह नहाय! ककर कम्‍पन दनुज उर-बि‍च प्रलय दैछ मचाय? जकर स्‍वरसँ सकल सृष्‍टि‍क पाप क्षणहि‍ं दुराय! सून नभ उर ककर करूणा वारि‍सँ भरि‍ जाय जइ तारक खग वि‍हग कल-कंठ सुधा बसाय! जनि‍क तरजनि‍ अग्र भागे सृष्‍टि‍ रहल नचाय अथि‍र-थि‍र नर-नारी उर जे प्रणय लय सि‍रजय! अज्ञ ज्ञान वि‍हीन मानव तूँ दयामयि‍ माय मृदुल तव पद कमल वंदन करी माथ झुकाय! प्रकाश प्रेमी, जनकपुर गीत सुनैत छी फुलबारीमे प्रेम रस बहै छै नित्य कली संग भमरा नचै छै। चुमि नचै छै भमरा कलीकेँ कोमलता मुस्कै छै कली आ निखरै छै सुन्दरता ।। सिनेहियाकेँ बाट हम सदि‍खन तकै छी प्रेम रस पिबैले कछमछ करै छी आउ सिनेहिया जुड़ा दिअ मनकेँ परती अछि अंग भिजा दिअ तनकेँ वसन्तक बहार हमर मन तरसाबए कोइलीकेँ कुहकी जिया ललचाबए मधुआएल मज्जर नै टिकुला कोषा भेल आम हम डमरस लगै छी प्रेम रस पिबैले कछमछ करै छी साउन सरधुवा अगन लगाबे रिमझिम बदरिया हमरा सताबे बएसक उमंग आब रहलो नै जाइए प्रेमक अगन आब सहलो नै जाइए भमरा हमर अहाँ कतए बैसल छी प्रेम रस पिबैले कछमछ करै छी प्रेम राग रससँ गगरी भरल अछि बांटैले सदि‍खन जिया तरसल अछि आबि घनश्याम प्रीतसँ नहा दिअ तृप्त होइसँ रस हमर पिया दिअ ब्याकुलता सहेजने पिपहिया बनल छी प्रेम रस पिबैले कछमछ करै छी।। सुमन झा "सृजन", गाम+पोस्‍ट- ि‍नर्मली, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- मधुबनी, (बि‍हार) कैक्‍टस जकाँ दि‍ल अपन शहरक कात-करोटमे चलैत अहाँ बुझए लगलौं जि‍नगीक रस्‍ता अछि‍ एतबे असान झि‍स्‍सी-बुन्नीकेँ देखि‍ ‍ बि‍सरि‍ गेलौं अछारबला बरखाकेँ मुस्‍कुराइत लोककेँ देख‍ ि‍बसरि‍ गेलौं प्रकृति‍क क्रूर मजाककेँ घरमे बैस‍ कवि‍ता लि‍खैत‍ भेल अहाँकेँ भ्रम गरीबकेँ चि‍न्‍हैक मुदा, नै चलि‍ सकलौं अहाँ कि‍छुओ डेग जि‍नगीक वि‍रानक रौदमे नै सुति‍ सकलौं अहाँ एक्को राति‍ गि‍रैत घरक डरसँ कोठरीमे नै दऽ सकलौं अहाँ संग भूखल आ सुखल मुँहक मुस्‍कीकेँ आ, छोड़ि‍ असकर चलि‍ गेलौं अहाँ ओइ‍ दि‍लकेँ जे अछि‍ कैक्‍टस जकाँ जेकर कोमलता लऽ उगि आएल अछि‍ काँट जेकरा छूबए लेल सभ हाथ भऽ जाइत लहूलुहान आ हरेक बेर‍ आनि‍ लैत अछि‍ दि‍ल अपन जलैत चेहरापर एकटा मुरझाएल मुस्‍कान। बलि‍ चुपचाप ठाढ़ भऽ देखने छल ओ जखन ओकरा शहरमे भेल छल पहि‍लुक बेर‍‍ दू जाति‍क बीच तकरार खामोश छल ओ तखनौं जखन अाबि‍ गेल छल हाथमे तलवार रुकले रहल ओ तखनौं भोरे-भोर आ सभ भि‍नसर हत्‍याक खबरि‍सँ सजए लगल छल अखबार। शि‍वकुमार ि‍मश्र, गाम- बेरमा, पोस्‍ट बेरमा, वाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी, बि‍हार, पि‍न ८४७४१० भलमानुस समाज बेवहारि‍क लोककेँ घाटा होइत छैक मरनोपरान्‍त ओकर नाअों लैत छैक सोनमा हमरा गामक सबहक काज करैत छैक तकरेपर सभ खूब गरजैत छैक बेवहारि‍क लोककेँ घाटा होइत छैक। कॉमरशि‍यल लोककेँ घाटा सुझैत छैक सामाजि‍क लोक घाटा नै बुझैत छैक समाज आओर सामाजि‍कताक परि‍भाषा लोक दैत छैक मुदा, ओ लोक कि‍एक नै समाजसँ जुडै़त छैक बेवहारि‍क लोककेँ घाटा होइत छैक शि‍वजी अपन भावनापर नोर पोछैत छैक ककरो कि‍एक नै अपन बुझैत छैक जाति‍-पाति‍क ढि‍ढ़ोरा सेहो पि‍टैत छैक तेकरा सरकारमे कि‍एक स्‍थान दैत छैक बेवहारि‍क लोककेँ घाटा होइत छैक। डॉ. बचेश्वर झा, जन्‍म- १५ मार्च १९४७ईं, एम.ए, पी.एच.डी., पूर्व प्राचार्य, नि‍र्मली महावि‍द्यालय नि‍र्मली। भेँट की कहू केहन लोकसँ भेल भेँट, उम्र सि‍यानी मधुरीवाणी, ति‍नकर थि‍क ई कि‍रदानी, लारि‍ चुगली काटि‍ रहल छथि‍, सबहक घेँट की कहू केहन लोकसँ भेल भेँट। कार्य कलापसँ पकि‍या नारद, अपन हि‍त छन्‍हि‍ अनका मारब, उजर केश, दया-धर्मक नै लेश, छथि‍ कंजूस बेवहारमे ठेंढ़ेश की कहू केहन लोकसँ भेल भेँट। वि‍द्या बल नै प्रखर तरक भरकमे छथि‍ अग्रसर रंग-बि‍रंगी परि‍धान वान भऽ रखने छथि‍ ई समैक टेक पीब उम्रकेँ बनल युवक छथि‍, गामक पीपरहुँसँ जेठ की कहू केहन लोकसँ भेल भेँट। अपन प्रशंसा अपने करबामे नै छथि‍ ककरोसँ झूस आदर पएबा लेल बजैत सदि‍खन सुच्‍चा झूठ की कहू केहन लोकसँ भेल भेँट। भगवान ने करथि‍ एहन लोकसँ हुअए पुन: भेँट। भावान्‍जलि चि‍र प्रती‍क्षि‍त मैथि‍लक छल सतत् मांग, जकरा हेतु कतेको गमओलक जान। राजनेता सभ मि‍थि‍लाक नै देलनि‍ धियान, माय मैथि‍लीक आँचल सतत् रहल म्‍लान। नि‍ज मातृभाषाक सभ तरहेँ भेल अपमान, तथापि‍ मैथि‍लीक अस्ति‍त्‍वक नै भेल अवसान। धन्‍य! धन्य! वाजपेयी जे मैथि‍लीक कएल सम्‍मान, आइ मैथि‍ली पओलक अष्‍टम् सूचीमे स्‍थान। समए तुलाइल अछि‍ सभ मि‍लि‍ करू मैथि‍लीक उत्‍थान, कवि‍, लेखक ओ साहि‍त्‍यकार वन्‍धु करू योगदान कोटि मैथि‍ल नि‍ज मातृभाषाक बढ़ाउ सान! सबहक जि‍ह्वापर बसथि‍ मैथि‍ली ई हो अरमान, पूब-पछि‍म बँटल मि‍थि‍लाक जोड़ल नीति‍श देल अवदान, तेँ वि‍कास पुरुष कहबैत ओ छथि‍ महान् हुनक अमर कीर्ति सतत् रहए दुनू अइठाम पुलकि‍त कहल धरा धाम जय मि‍थि‍ला! जय मैथि‍ल! स्‍वीकार करी बचेश्वरक‍ सत्-सत् प्रणाम। श्यामल सुमन, गाम- चानपुरा (सहरसा), सम्प्रति जमशेदपुरमे। सत्‍य कहू कि फूसि बजै छी? गप्पेटा हम नीक करै छी सभटा उनटा काज ऐ‍ कारणसँ टूटि रहल अछि मैथिल सकल समाज। कहू कि फूसि बजै छी? टाका देलौं बेटी देलौं केलौं कन्यादान ओइ टाकासँ फुटल फटाका मनमे भरल गुमान दाता बनल भिखारी देखियौ केहेन बनल अछि रीत केना अयाची केर बेटा सभ माँगि देखाबथि शान। कहू कि फूसि बजै छी? माछ मांस केर मैथिल प्रेमी मचल जगतमे शोर सम्हरि सम्हरि कऽ घरमे खेता सानि-सानि कऽ झोर बरियातीमे झोर किनारा काली मांसक बुट्टी, मिथिला केर बेवहार केना कऽ बनल एहेन कमजोर। कहू कि फूसि बजै छी? नै सम्हरब तँ सच मानू जे भेटत कष्ट अथाह जाति-पातिकेँ छोड़ि कऽ बेटी करती कतौ बियाह तखन सुमन केर गोत्र मूल सभ करब केना पहि‍चान बचा सकी तँ बचाऊ मिथिला बनि कऽ अपन गवाह। कहू कि फूसि बजै छी....। जय प्रकाश मंडल, अधिवक्ता, निर्मली अनुमण्डल कोर्ट बिहार, एम.ए., एल.एल.बी., ग्राम- मझौरा, निर्मली, जिला- मधुबनी।

उपराग हम दइ छी उपराग हे यौ समाजक लोक जाति धरम अहाँ किए बनौलिऐ जन-जनमे अहाँ लड़ौलिऐ केलिऐ केहन ई खोज, हे यौ समाजक लोक हम दइ छी उपराग.....।

दहेज प्रथा अहाँ कि‍अए चलेलिऐ नारीकेँ अहाँ पाइये जोखलिऐ देलिऐ केहन ई नोर हे यौ समाजक लोग हम दइ छी उपराग.....।

हिन्दु, मुस्लिम, सिख, इसाइ अपनामे सभ भाइ-भाइ मंदिर मस्जिद लेल झगड़ि गेलिऐ हे यौ समाजक लोक हम दइ छी उपराग.....।

भूल कतए भेल बड़ नीक गप कहलौं ई बुझलौं यौ अपन देश अछि‍ महान सेहो मानलौं यौ मुदा घोटालामे देश भेल दिवाला कहू भूल कतए भेल। सएमे नब्बे बेइमान फेर देश ई महान हम रटै छी गाँधी गौतम केर नाम हम बेचै छी, असमाने जँ फाटत तँ दरजी कि सीयत जतए मंत्री बइमान ओतए प्रजा कि करत यौ भूल कतए भेल कहू सुधि कतए भेल। खेलोमे आब धोखेबाजी चलैए क्रिकेटमे आब सट्ेबाजी चलैए एशिया ओलोपिंकमे नामो घिनेलौं धनि ई मल्लेश्वरी जे काँस्य एगो पइलौं भूल कतए भेल यौ, सुधि कतए गेल। सत्येन्द्र कुमार झा, जन्म ०१.०१.१९६९ संकटमोचन नगर, मधुबनी। कवि, कथाकार, अभिनेता। पोथी- अहींकेँ कहै छी (विहनि कथा संग्रह), मैथिली फिल्म पिरितिया, दुलरुआ बाबू आ श्यामा दर्शन आ सौभाग्य मिथिलाक सीरियल डॉ. टोपीवाला मे अभिनय। आकाशवाणीमे कार्यरत। दस गोट क्षणिका १ शहरमे पैघ लोक छोट आस्थाक संग जीबै छथि । गाममे छोट लोक पैघ आस्थाक संग जीबै छथि । जीबै दुनू छथि मुदा जीबामे अंतर छै । लोक आ आस्थाक छोट-पैघ भेने जीवनमे फर्क एबे करतै ने। २ श्मसानोमे आब कहाँ छै खाली परती धरती सभपर कएक बेर कएकटा लाश जरल छै- आब तँ आबैबला प्रत्येक शव अपना संग अपन पूर्वोजोकेँ एक बेर फेर जरा दैत अछि। ३ अहाँ लिखै छी ढाकीक ढाकी मुदा किए नै पढ़ै छै समए तेकरा एकसर अन्हार कोठरीमे अहाँक सभ पाँति ‘सफोकेशन’क शि‍कार भऽ पड़ले रहि जाइत अछि अहाँ छोड़ू लिखनाइ आ पहिने मिला दियौ इन्द्रधनुषकेँ संगीतक सारेगामाक संग। ४ सूरजक स्थानपर यदि मनुक्ख ठाढ़ रहितै एको किरण रोशनीक धरतीपर नै पड़ऽ दैतै। सूरज सेहो अपन रोशनीक संग बिनु बतौने मनुक्खकेँ दिन राति जरिते रहितै आ- मनुक्ख अपन रोशनीकेँ पीब सूरजक रोशनीमे आधा हिस्सा मांगितै। ५ नारी यदि भोग्या छै तँ ठीक छै कोनो हर्ज नै/ भोगैत रहू मुदा एतबा तँ सत्य अछि जे अहाँकेँ एखन धरि नै भेटल अछि अपन माइक देहक गंध। ६ अकासमे मेघ पसरल जा रहल छै धरा धरि कारी-कारी मेघक परछाँहि एखने बरसतै मूसलाधार बरखा बाहर पसारल गोट-गोट कपड़ा समेटि‍ एलौं, दलानपर सूतल बाबूटा मात्र छूटि गेला। ७ केस बढ़ल, कटा लेलौं नह बढ़ल, काटि लेलौं कतौ देहमे भरि रहल छै एकटा विषकुम्भ, अमाशयक नीचाँ सभ कहैछ- जुनि हटाबऽ ऐ‍ कुम्भकेँ प्राणो जा सकै छह अदौसँ जीबिये रहल छै मनुक्ख- ऐ‍ विषकुम्भक संग। ८ छोटका लत्तीमे भरिपोख जल ढारैत छी लत्ती क्रमश: बढ़ल जा रहल छै। एकटा बाँसक फट्ठी लगा देने छिऐ लत्ती ओइमे लपटा रहल छै। बगलमे ठाढ़ एकटा पुरान पीपरक गाछ समैसँ पहिने उपेक्षित भेल ‘ठाढ़’ अछि। ९ कविता सि‍नेह अछि, भूख अछि सत्कार अछि, बेवहार अछि। मुदा- नै अछि कविता रोटी, कपड़ा, मकान आ नचैत/नचबैत बजार।

१० भूख सभकेँ लगै छै भूख सबहक लेल छै भूख सबहक मेटाइत छै मुदा मायक भूख नै खत्म होइत छै कखनो बेटाक थारीमे अपन हाथक बनल तिलकोरक तरूआ दैत बेटाक भूख माइयेमे सन्हिया जाइ छै। प्रो. कपिलेश्वर साहु, जन्म- ०२.१२.१९६२, ग्राम-कड़हरबा, पोस्ट-बेलही भवानीपुर, जिला- मधुबनी (बि‍हार), शिक्षा- स्नातकोत्तर (मैथि‍ली), संप्रति‍- अशर्फी दास साहु-समाज महि‍ला इण्‍टर महावि‍द्यालय, निर्मली, सुपौल।

कोसी हे माइ कोसकी हम करै छी अहाँकेँ प्रणाम् हम विकल भऽ बैसल छी अहाँक कछेरमे हम जाएब केना अपन गाम, हे माइ। बहुत दिनसँ बहैत अछि कोसी, छै नाजुक भेल स्थिति बेचारीकेँ! अखन काटि रहल अछि- निर्मली, भपटियाही, दिधिया, दुधैला, बेला अरु मझाड़ीकेँ। हरल-भरल छल वाग बगीचा ओ सोना कटोरा सन खेत देखि‍-देखि‍ कऽ हिया फटैत अछि सगरे भरल अछि रेत। जतए चलै छल जानकी एक्सप्रेस सन गाड़ी ततए बहैत अछि जल अथाह बास डीहकेँ कुण्ड बनौलथि, बाँस नै लैत अछि थाह। अपनो आएल कोसी मइया कएने आएल अन्देश, पिलही, बोखार, मलेरिया लेने आएल सन्देश। कतएसँ लाएब दवाइ कुनाइन गाएक दुध अरु धान कतएसँ लाएब साबूदाना केना कऽ बचतै प्राण। जतए उपजै छल नाजीर, कनकजीर, करियाकामौर ओ पलिया धान। तइ गामक नर-नारिकेँ अल्हुआ रखने अछि प्राण। दरभंगा, मधुबनी, सुपौल सहरसा, मधेपुरा, पूर्णियाँ लगैत छल सभा केर ढेर। छओ जिलापर राज करैत अछि झौआ, काश, पटेर। हे माइ कोसि‍की समेटू अपन भाभट आ दए दिअ हमर हरियरका खेत नै तँ कनिये दिनक बाद अपनेक ऊपरसँ चलि देत गंगा यमुना एक्सप्रेस। हमर करुण क्रन्दनकेँ सुनि करियौ समस्याक निदान वहए छी हमर समाजवादी नेता आ वहए छी मिथिलाक भगवान। हे माइ कोसि‍की हम करै छी अहाँकेँ प्राणाम्। राधा कान्त मंडल ‘रमण’, जन्म- ०१.०३.१९७८, पुत्र श्री तुरन्त लाल मण्डल, गाम- धबौली, लौकही, भाया- निर्मली, जिला-मधुबनी, (बि‍हार)। शि‍क्षा- स्नातक।

स्वागत गीत हे अयोध्या वासी श्रीराम अहाँ स्वागत हमर स्वीकार करु हे दिव्य पुत हे शान्ति दूत निज काम भावसँ बढ़ैत रहू, अहाँ सत्य मार्गपर चलैत रहू हे अयोध्या वासी श्रीराम अहाँ स्वागत हमर... धन्य माए ओ पिता धन्य अछि जिनक अहाँ सन भेल संतान जनकपुरी आबि धनुष भंग कऽ सीताक रखलौं अहाँ प्राण धन्य-धन्य छी अहाँ अयोध्या वासी अहाँ अयोध्या वासी श्रीराम अहाँ स्वागत हमर स्वीकार करु हे अयोध्या वासी श्रीराम अहाँ स्वागत हमर...। धीरेन्द्र प्रेमर्षि, १९६७, सिरहा, नेपाल। वि.सं.२०२४ साल भादब १८ गते सिरहा जिलाक गोविन्दपुर-१, बस्तीपुर गाममे जन्म लेनिहार प्रेमर्षिक पूर्ण नाम धीरेन्द्र झा छियनि। कान्तिपुरसँ हेल्लो मिथिला कार्यक्रम प्रस्तुत कर्ता जोड़ी रूपा-धीरेन्द्रक धीरेन्द्र। “पल्लव” मैथिली साहित्यिक पत्रिका आ “समाज”मैथिली सामाजिक पत्रिकाक सम्पादन। किछु रंग फगुआक कोन रूप फगुआ खेलाएब? दिनभरिक पसेनासँ राति हमर पेट भरए जिनगीक चितापर सेहन्ताक लाश जरए होड़ी केना हम गाएब! कोन रूप फगुआ खेलाएब! परुकेँक देल वचन खूब खाएब पूआ बौआ लए अङ्गा, आ घरनी लए नूआ जेठक इनारसँ घीचैए पानि श्रम गगरी कखन भरि पाएब! कोन रूप फगुआ खेलाएब! आश लेने हिरदय नै कहियो जुड़ाएल साँसक चिड़इ एतबा मुफतहि उड़ाएल चूरि–चूरि पाथर थुराएल अछि हाथो आब केना डम्फा बजाएब! कोन रूप फगुआ खेलाएब! मधुसनक बोलहुटा हमराले गीत हएत सन्तोषक मुस्की अभावोक मीत हएत नेह भरल जिनगी थिक सतरङ्गी इन्द्रधनुष कोन काज रङ्गे उड़ाएब! एहिना हम फगुआ खेलाएब। फगुआ गीत नायकः एमकी होरीमे गोरी मचेबै हुड़दंग कि‍यो कहै मतवाला कि कहै रे मतंग नायिकाः एमकी होरीमे जोड़ी चढ़ेलौं कि भंग किए हमरा सताबैत, करै छी एना तंग नायकः होरीक ई बलजोरी गोरी प्रेमक बस इजहार छै आलिंगनमे अहाँ छी तइसँ फगुओमे ई बहार छै नायिकाः बड़ लागए सोहनगर ई प्रेमक तरंग मुदा कटि ने जाए ककरो नजरिसँ पतंग नायिकाः मदमातल ई पवन बहैए, चिनगी जुनि सुनगाउ यौ झुलसए नै ई प्रेमचिड़ैया, लऽग ने आरो आउ यौ नायकः अहाँ हमरा बूझै छी किएक अवढंग हम तँ प्रेमक बजाबै छी मन–मिरदंग नायकः रंगक नै उत्सव ई खाली जिनगीक सेहो वसन्त छै रंगि ली मनकेँ प्रेमक रंग तँ केहनो पतझड़ अन्त छै नायिकाः एना हियामे पिया नै जगबू उमंग नै तँ सैंतल ई मनमे छिलकि जाएत रंग असली रङ्ग उड़ेलिऐ ना पुरुषः बिहुँसैत फगुआ फेरो आएल मनमे नव उमङ्ग समाएल डम्फा बजैबे, होरियो रे गेबै, छाती जुड़ेबै ना हम तँ रङ्ग उड़ेबै ना स्त्रीः बिहुँसैत फगुआ फेरो आएल मनमे नव उमङ्ग समाएल नचबै नचेबै, गेबै गबेबै, छाती जुड़ेबै ना हम तँ रङ्ग उड़ेबै ना पुरुषः नव–पल्लव लऽ गाछ पनुघलै नैनकेँ चहुँदिस फूले सुझलै स्त्रीः दैव रे की भऽ गेल ई हमरा सबतरि देखी भमरे भमरा पुरुषः गोरीक छमछम बाजैत पायल कऽ गेल सोझे हमरा घायल मरबै कि जीबै, प्रेमरस पीबै, छाती जुड़ेबै ना हम तँ रङ्ग उड़ेबै ना स्त्रीः मन–मन्दिर ई छल अजबारल तोरहि मुरुतसँ गेल अजबारल स्त्रीः सैंतल सेजौट गेल धङिआएल तोहर बातसँ मन भड़िआएल पुरुषः एमकीक होरी, धारि गेल गोरी छाती जुड़ेलिऐ ना असली रङ्ग उड़ेलिऐ ना गजल १ जोर जुलुमसँ जे ने झुकए से भले लगए पिअरगर यौ इन्द्रधनुषी ऐ‍ दुनियामे लाले लगए पिअरगर यौ ठोरे जँ सीयल रहतै तँ गुदुर बुदुर की हेतै कपार! एहन मुर्दा शान्तिसँ तँ बबाले लगए पिअरगर यौ कुच्ची–कलमक रूप सुरेबगर रहलै, रहतै सबदिनमा जखन अन्हरिया पसरल होइक, मशाले लगए पिअरगर यौ खालि शब्दक जाल बुनल नइ चाही आब जवाब कोनो नगर–डगरमे गुञ्जैत सबल सबाले लगए पिअरगर यौ जुड़शीतलकेर भोरहरियामे धह–धह जरए कपार जखन जलथपकी नइ, तखन जाँघपर ताले लगए पिअरगर यौ माथा बन्हबैत कफन, उड़ाबए लाल गुलाल अकाशे जँ हमरा तँ ओहि‍ समए–सुन्दरीक गाले लगए पिअरगर यौ साल–सालपर अबैत रहैए, सगरो दुनिया नवका साल नवयुगक मुहथरि खोलैत नव साले लगए पिअरगर यौ। २ देखू कतबा तील बहै छी, नइ जाउ हम्मर काँतिमे खिच्चड़िमे कने घीओ चाही, आब तिला-सकराँतिमे जइ तिलाठकेँ तपैत गिरहतनी देह अहाँसुन सेदै छी ओहो छियै हमहीँ जनमओने घाम सिँचिकऽ माटिमे हँ यौ मालिक खूब जनै छी, शासनके तरजू की होइ! भँटा-मुरइसन हमरासुनके अहीँ बँटलियै जातिमे धरम नामके अफिम सुँघाकऽ परदादा-परनानाकेँ छी धपाएल अहाँ करऽ उगाही परपोता-परनातिमे ई नइ बुझबै पहिनहिसन सभ दँतखिसठीमे ठाढ़ अछि अप्पन अधिकारक लेल सभक्यो मिलिकऽ बैसल पाँतिमे २०६२/१०/०१, तिला-सकराँति सरोज ‘खिलाडी’, नेपालक पहिल मैथिली रेडियो नाटक संचालक। गीत भोरका किरण सन अहाँकेँ रुपरंग कतेक निक सुन्‍दर मुस्‍कान अइ अहाँकेँ हँसिए तँ हमर जान अइ-२ चन्‍द्रमासँ गिरल चन्‍द्रमाकेँ टुकड़ा ओ बनि गेल अछि अहाँक मुखरा स्‍वर्गक परि अहाँ आकऽऽऽऽऽऽऽ स्‍वर्गक परि अहाँ दुखिकेँ सपना अहाँ छी सबहक मुस्‍कान अइ अहाँकेँ हँसिए तँ हमर जान अइ-२ भोरका किरण सन अहाँकेँ रुपरंग कतेक निक सुन्‍दर मुस्‍कान अइ अहाँकेँ हँसिए तँ हमर जान अइ-२ नै देखि‍ अहाँकेँ तँ मन नै लगैए देखी‍ जँ अहाँकेँ तँ मन नै भरैए खिलैत गुलाब अहाँक खिलैत गुलाब अहाँ कविक रचना अहाँ छी गजलक भाव अइ अहाँकेँ हँसिए तँ हमर जान अइ- २ भोरका किरण सन अहाँकेँ रुपरंग कतेक निक सुन्‍दर मुस्‍कान अइ अहाँकेँ हँसिए तँ हमर जान अइ- ३ नन्‍द वि‍लास राय, जन्‍म- ०२.०१.१९५७ ईं., शि‍क्षा- बी.एस.सी. (गणि‍त), आइ.टी.आइ. (टर्नर)। गाम-पोस्‍ट- भपटि‍याही, टोला- सखुआ, वाया-नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी, ि‍बहार। गीत १ कतेक दि‍नसँ हम चि‍ट्ठी लि‍खै छी, कथीले रूसल छी पि‍या, ि‍कए ने अबै छी बीत गेलै दुर्गापुजा, ि‍बतलै दि‍यारी, ि‍बरहा सतबैए हमरा राति‍ कारी-कारी, एक दि‍न ि‍जबै छी पि‍या, एक दि‍न मरै छी, कथीले रूसल छी पि‍या, कि‍अए ने अबै छी। जहि‍यासँ परदेश गेलौं अहाँ, दि‍लकेँ नै अछि‍ चैन यौ, कनेको नै दै छी अहाँ हमर गप्‍पक माि‍न यौ, नि‍नो नै अबै राति‍केँ तारा गि‍नै छी, कथीले रूसल छी राजा ि‍कअए नै अबै छी। गाछ सभमे लटकल अछि‍ एमकी रंग-बि‍रंगक आम यौ आम खाइले पि‍या हमर, आबि‍ जाएब गाम यौ, भाेरसँ हम साँझ धरि‍ अहाँक रास्‍ता तकै छी, कथीले रूसल छी पि‍या, कि‍अए नै अबै छी। अपन शरीरपर पि‍या देबै अहाँ धि‍यान यौ, दुि‍नयाँमे नै अछि‍ हमरा, अहाँ छोड़ि‍ आन यौ, अहाँकेँ दीर्घायु खाति‍र पूजा करै छी, कथीले रूसल छी पि‍या, कि‍अए नै अबै छी बुच्‍चीकेँ ओझा आनलक लहंगा-पटोर यौ, आँखि‍सँ झहरै हमरा दि‍न-राति‍ नोर यौ, बुच्‍चीकेँ दुल्‍हा देखि‍-देखि‍ हम जरै छी, कथीले रूसल छी पि‍या, कि‍अए नै अबै छी। हमरा नै चाही राजा लहंगा-पटोर यौ, आम खाइले आएब मुदा, अहाँ श्‍योर यौ, चि‍ट्ठीसँ नै एलौं अहाँ, फोन करै छी, कथीले रूसल छी पि‍या, ि‍कएक नै अबै छी। २ सभसँ पावन ि‍मथि‍ला धाम यौ, ि‍मथि‍ला सन नै आन यौ जइठाम बहै कोसी, कमला अओर वागमती बलान यौ, पावन ि‍मथि‍ला धाम यौ, ि‍मथि‍ला सन नै आन यौ। जइठाम सीतासन भेलीह नारी, राजा जनक सन सदाचारी, मानव सेवा करब बड़का काम यौ, ि‍मथि‍ला सन नै आन यौ। छथि‍न सखरामे माए सखेश्वरी, अओर ठाढ़ीमे माए परमेश्वरी, जइठाम बरहम बाबा गामेगाम यौ, ि‍मथि‍ला सन नै आन यौ। जइठाम आद्रा, चौठचन्‍द्र, जि‍ति‍या भाए-बहि‍नि‍क सि‍नेह पावनि‍ अछि‍ भातृ-द्वि‍तीया। जइठाम कोजगराकेँ बड़ नाम यौ, बाँटथि‍ पान-मखान यौ, ि‍मथि‍ला सन नै आन यौ। जइठाम कि‍यो ने भेटत लफंगा, सभसँ नीक शहर दरभंगा। ओइ‍ठाम पैघ-पैघ दोकान यौ, भेटत सभ समान यौ, मि‍थि‍ला सन नै आन यौ। नेहरा, सरि‍सव ओ पोखरौनी, कोइलख, पि‍लखबाड़, मंगरौनी। आेइ‍ठाम पैघ-पैघ भेल वि‍द्वान यौ, ि‍मथि‍ला सन नै आन यौ। जइठाम नामी माछ-मखान, अओर अछि‍ फलक राजा आम। जइठाम जमाए छथि‍न भगवान यौ, अओर पहुनाकेँ भेटए सम्‍मान यौ, ि‍मथि‍ला सन नै आन यौ। भेलाह ललि‍त बाबूसन नेता, ि‍मथि‍लाकेँ सच्‍चा बेटा। ि‍वकासक खाति‍र देलथि‍न्‍ह अपन प्राण यौ, ि‍मथि‍ला सन नै आन यौ। ि‍मथि‍ला वि‍भूति‍ सूरजबाबू सन पैघ-पैघ भेला नेता, आजादीकेँ लड़ाइ लड़बामे रसि‍क, अनन्‍त, गुरमैता, देशकेँ अजाद करबामे ऐ‍‍ घरतीकेँ बड्ड योगदान यौ, पावन ि‍मथि‍ला धाम यौ, ि‍मथि‍ला सन नै आन यौ। ि‍मथि‍ला पेन्‍टींग मधुबनीकेँ दुनि‍याँमे बड्ड नाम छै, खादी भंडार मधुबनीकेँ भाँति‍-भाँति‍क काम छै, जइठाम सुग्‍गा बजैत सीताराम यौ, ि‍मथि‍ला सन नै आन यौ। ि‍मथि‍लाक कला, ि‍मथि‍लाक साहि‍त्‍य, ि‍मथि‍लाकेँ संस्‍कृति‍ नीक, फूसि‍ नै बाजब दान करब ई मैथि‍लकेँ प्रवृति‍ छी। अन्‍न-वस्‍त्र, वर्तनक संगहि‍ करैए लाेक गोदान यौ, पावन ि‍मथि‍ला धाम यौ, ि‍मथि‍ला सन नै आन यौ। बड्ड मधुर अछि‍, सुनब-बाजबमे ि‍मथि‍लाक मैथि‍ली-भाषा, ि‍मथि‍लाकेँ वि‍कास हुअए खूब, हमरो अछि‍ अभि‍लाषा। ि‍मथि‍लाक वि‍कासक खाति‍र हमहूँ देब योगदान यौ, पावन ि‍मथि‍ला धाम यौ, ि‍मथि‍ला सन नै आन यौ। जनसंख्‍या बढ़ल जनसंख्‍यासँ स्‍थि‍ति‍ भेल वि‍कराल, सभ क्षेत्रमे पड़ि‍ गेल भयंकर आकाल पैघ-पैघ घर सबहक हाल भेल बेहाल जे खाइत छलाह तीनसला चाउर आब लगैत छन्‍हि‍ नै पूरा साल। लोक बढ़ैत गेल जोत कमैत गेल जे छल गोरहा खेत उ भेल घराड़ी जे करैत छलाह लगानी, भि‍रानी आइ खाइत छथि‍ बेसाह उधारी बढ़ल जनसंख्‍यासँ बढ़ि‍ गेल बेकारी। तँए परि‍वार नि‍योजनक साधन अपनाउ आ परि‍वारकेँ छोट बनाउ महि‍ला बन्‍ध्‍याकरण आ पुरुष नसबंदी कराउ से नै करब तँ पुरुष नि‍रोध अपनाउ वा महि‍ला कॉपर टी लगाउ। छोट परि‍वार सुखक आधार नै खाएब बेसाह नै लेब उधार। परि‍वारकेँ छोट बनाउ धि‍या-पुताकेँ पढ़ाउ-लि‍खाउ आ स्‍वच्‍छ नागरि‍क बनाउ समाजकेँ बचाउ देशकेँ बढाउ। विनीत ठाकुर, मिथिलेश्वर मौवाही–६, धनुषा, कविता संग्रह- बाँकी अछि हम्मर दूधक कर्ज प्रकाशित। शान्ति दूत परवा एे शान्ति दूत परवा उड़ि कऽ आ अपन देशमे फैलऽवै तोँ शान्ति हिमाल, पहाड़ आ मधेशमे सभ दिनसँ एतएकेँ नर–नारी शान्तिक पुजारी सहत केना हिंसा पसरल अछि समस्या भारी हिमालक अमृत जलमे मिलि‍ गेल शोणि‍त धारा भेल अछि अखन शसंकित जनता नेपाली सारा परवा छँए तोँ सहासी प्रिय सबहक विश्वासी बुझै तोँ सबहक समस्या रहए नै केवल वनवासी दू भाँइ बीच अपन समस्याकेँ जितत के हारत माइक दुःखिया नयन नोर कतेक आब झारत हटादे रे परवा भाय-भाय बीच मोनक दूरी नाहकमे नै उजरै सधवाक माङ्ग सिन्दुरी। इन्द्रकान्त झा (१९४३- ) गीत १ बेइमान जकरा कहब गारिए पढ़त। बलगर होएत मारबो करत। थाना दौड़ाओत इज्जत उतारत। जेबी खाली करत जेबी भरत। मुदा, जेलक खिचड़ी खोआओत। इमानदार केकरा कहब जकरा कहब स्वागत करत। अनका बेइमानक बखारी कहत भ्रष्टाचारक अखारा बुझत अपनाकेँ गंगा, यमुना आ त्रिवेणीक संगम कहत॥ २ चल चल गुजरिनी मिथिलाक धाम गै जतए कौशिकी मैयाकेँ खल खल बहैत देखिहेँ अनकर विनाशपर हँसैत देखिहेँ माछ-काछु घड़ियालकेँ उछलैत देखिहेँ जलजन्तुकेँ लड़ैत देखिहेँ मुदा, सभकेँ संस्कृत बजैत सुनिहेँ तूँ रुकि जहिहेँ गै देखिहेँ तूँ कोसीक पेटमे बहैत गाम घरकेँ घरोमे मुर्दा बाहरोमे मुर्दा मुर्दा मुर्दाकेँ झगड़ैत देखिहेँ खेरातक अन्नपर कुत्ताकेँ भूकैत सुनिहेँ मुसोकेँ देखिहेँ बोरा कुतरैत गै मुदा नेताकेँ देखिहेँ घरकेँ भरैत गै सम्बन्धीकेँ पढ़बैत गै कफनक कपड़ा चोरबैत गै चल जहिहेँ सरकार दरवार गै कहि दिहैन नेताक हाल-चाल गै घूमि जहिहेँ मिथिलाक गाम गै चल चल गुजरिनी मिथिलाक धाम गै। मनोज कुमार मंडल, गाम- बेरमा (जिला मधुबनी), सम्प्रति बंगलोर मे। जिनगी असगर आएल असगरे जाइत अछि ऐबा व जाइक बीच जिनगी कहाइत अछि ई जिनगी फूलक बिछाओन नै दुखक समुद्र नै सुख-दुखक सामना करए पड़ैत अछि ई जिनगी संग्राम कहाइत अछि असकर आबि दुनियाँक संग प्रीत होइत अछि सदिखन मिलबामे सुख आ बिछड़बामे दुख होइत अछि ई सत्य भूलि संसारक संग रमि कऽ जेबाक बात भूलैत अछि सभ झूठ साँचमे बझैत अछि संबंधक जाल बना कऽ सभ अपने जालमे फसैत अछि कर्तव्य बोध बिसरि फूसिक पर्दा लगबैत अछि सत्य सत्ये रहत जाए सभकेँ पड़त ई बात की फूसि छी? अइठाम आबि किछु सभ लेल कर्तव्य करी ओकरे सभ नाम जपैत अछि एतने टा दुनियाँमे नाना प्रकारक काज अछि ई करबा लेल सभ अबैत अछि कि‍यो आन ने कियो अपन छी की आँखिक देखल अपन छी बाँकि सभ बिरान छी उठू, जागू अपन कर्तव्य बुझू सभ कियोकेँ अपन बना जिनगीक रास्ता तँइ करु ई जिनगी, जिनगी छी। फैशनक धमाल बाबू सैदखन कहैत छलाह पहि‍ने बड़ तकलीफ रहैत छल जाड़ कप्‍प-कप्‍पबैत रहैत छल, दाँत कट-कटबैत रहैत छल हमर कहब तूँ नै पति‍एबऽ, एक्‍केटा धोती पहि‍रब-ओढ़ब छल। हमरा सुनबामे नि‍मन्न लगैत छल, ओना आब ओ कष्‍ट नै छल, दि‍ल्‍ली-बम्‍बइक बाट खुजल, सबहक हाथ पाइसँ भरल। गरीबी तँ एखनो अछि‍। ि‍कन्‍तु आब ओ तकलीफ नै रहल। जाधरि‍ बाबू सभ लेल कपड़ा लौलनि‍‍, इंचो तन उघार नै रहए, एकर सतत धि‍यान रखलनि‍। हरदम कहैत छलाह जँ तोरा सबहक तन उधार रहतह लोक हमरा की कहत? बाबू बाट पर हम चली‍, ई हुनकर सम्‍मान छल। फैशनक आब दौड़ चलल, ि‍बनु पाइबलाकेँ तन झाँपल छल। दीनताक कारण उघारो छल। पाइबलाक आब नै पूछू, देहपर कपड़ा घटल छल, सगर देह उघारे छल। हम अचम्‍भामे पड़लौं, बाबूक कथा आब पाछू भेल, फैशनक धमाल रंग चढ़ेलक तनपर कपड़ा खाली भेल बुचकट शब्दक शोभा बढ़ि‍ गेल, कहू बाबूक उक्‍ति‍ याद राखब? चाह बड़ सोचि‍ पड़ल नाम चाहक चाह, चाह, चाह अनघोल भऽ गेल उठैत जाह, बैठैत चाह, मन भकुआएल तखन चाह, चाहक चाह कि‍यो आएल तँ चाहे चाह। चूल्हि‍पर बनल गि‍लासमे पड़ल, फुकि‍-फुकि‍ पीयक भेल चाह। बनल बाहर, जाएत भीतर, तखनो नै मेटाएल चाह। बाहर तँ छि‍रि‍आएल चाह पानि‍, दूध, चीनी-पत्ती, मि‍लत तखने चाह। समटल रहैत चाह। चाहेसँ सृष्‍टि‍ बनल जि‍नगीक पग-पगपर चाह बनले रहल बाहरि‍ जग चाहसँ बनल मि‍टल नै अन्‍दरक चाह। चाह रुकत ठमकत सृष्‍टि‍। ि‍जनगीक नै रहत ठेकान। बाहरक चाहसँ तृप्‍ति‍ नै हएत अन्‍दरक चाहक स्‍वाद भेटत अन्‍दर तखन नै रहि‍ जाएत चाह। मि‍थि‍ला मि‍थि‍लाक मंगल आंगनमे अन्नक लागल ढेर छल कृषकक परि‍वार भरल आर राजा जनक मि‍थि‍लेक छल। सरस्‍वती छलीह बान्‍हल बेटी, लक्ष्‍मी कतए बाहरैत घर-आंगन केतौ दर्शनक प्‍यास छल सदाचारी, इमानदारीक दि‍व्‍य ज्‍योति‍सँ सबहक वि‍वेक जगल छल। जनक मि‍थि‍लाक मनीषी बनि‍, जगमे अपन कृतक झंडा लहराबैत छल। मैथि‍लीक आँॅचर तर भेटैत सभकेँ शीतल छाँह छल। गाए-महीस घर-घर बान्‍हल, हर, कोदाइरक पहि‍चान बनल छल। ज्ञान, मुक्‍ति‍, बैरागक वि‍षएपर हरदम करैत वि‍चार छल। ि‍मथि‍लाक बेटी अवला नै। उठबैत शि‍व धनुष छलीह। मनक सरलता एतबा लगैत, जेना बागक कोमन फूल छल। उच्‍च-नीचक वि‍चार नै कोनो समतामूलक समाज बनल छल। जाति‍-धरमक बात नै पुछू मरमे सबहक बाप छल। लि‍खलाह तुलसी, वाल्‍मि‍कीजी ओ सद् ग्रंथ रामायण छल। ई कथा फूसि‍ नै कहैछ अष्‍ठावक्र गवाह छल। जि‍नगीक बाट मनुख, मनुखेटासँ नै प्रेम करए सबहक संग सि‍नेह रखए मनुख, तइ‍ लेल मनुखक सृजन भेल सभसँ बुधि‍‍गर जीव बनल तँए जग चीनहक अधि‍कार भेटल नीक बाटे मनुख चलए ओ मनुख नै देवता अधलाह बाट धऽ चलत मनुख, मनुख रहि‍तो शैतान बनत हम मनुष्‍य नै, मनुख हमर सृजन छी हम सभ सभमे रहैत बाघ, बकरी, कुकुर छी। हमरे रचल अछि‍ सभ जीव, हमरे बसाओल ई जग छी हमरे गढ़ल सुन्‍दर काया, तकरे हम राति‍-दि‍न हँकै छी माया नगरीमे दौगबैत-दौगबैत, साँस रहए की बन्न भऽ जाए हम कखनो नै थाकै छी श्रद्धा राखि‍ आशा धरू, आशेपर टि‍कल जिनगी अछि‍। वि‍सबासक डोर थामि‍ अहाँ, कर्मक बाट पकड़ि‍ आगू बढ़ू बाटपर ठाढ़ भऽ राह देखैत छी, कखन मि‍लब हमरासँ अहाँ कने चूक भेने राह हेराएत, हम अहाँक, अहाँ हमर, तखनो नै हम भेटब अहाँकेँ। अखन बि‍हार समए बदलल बि‍हारक वि‍कासक गति‍ कि‍छु सम्हरल कि‍छु आगू बढ़ल संगे शि‍क्षक-शि‍क्षि‍का बढ़ल, बि‍हारक स्‍थि‍ति‍ बदलए लागल भारतक अर्थनीति‍ बदलल बि‍हारक असपतालमे डाक्‍टर बढ़ल शनै: शनै: रोगी बढ़ल ई अलग जे रोग-व्‍याधि‍ सेहो बढ़ल जेना वि‍कास होमए लागल सड़कक नामपर बुढ़ि‍या-फूइस अखरल गि‍ट्टी गड्ढा छल गड्ढा भरए लागल सड़कपर रोड़ा-पथ्‍थल गि‍रए लागल लोकक नजरि‍ सड़कपर पड़ल बि‍हार आब बदलए लागल एतबामे सरकारक मन डोलल एन.एच. ५७ क घोषणा भेल सड़कक नाप-जोख होमए लागल घरमे चेन्‍ह-चाक लागए लागल पेराकातक घर रहने लोक आब पछताए लागल जमीनक टाका भेटए लागल चमचा आर चौबनि‍याँ नेता जि‍लाक दफ्तर दौगए लागल दफ्तर भ्रष्‍टाचारीक मंदिर बनल आर चोर उचक्‍का पुजारी बनए लागल झोड़े-झोरा टाका भेटए लागल घर-द्वार लटकौने रहल जेना मोन जे आब नै टुटल एकाएक बुलडोजर आबए लागल लोकक भीड़ होमए लागल लोकसँ बेसी पुलिस भरल सबहक घर टुटए लागल लोक बेघर हुअए लागल बाटपर माटि‍ पड़ए लागल चौड़गर बाट बनए लागल बि‍हारक दशा बएलए लागल। वि‍श्वास वि‍श्वाससँ चलत जि‍नगी केकरापर ि‍वश्‍वास करी अप्‍पन लगाओल गाछ पतझड़ लेलक बेरानक गाछतर छाँह पाबि‍‍ कोन कसौटीपर परखब वि‍श्वासेसँ वि‍श्वासी पाएब शोणि‍तक संबंधकेँ सभ मानैत की ओ वि‍रान नै अछि‍ बनैत दोसर वंश गलत भऽ सकैत अपनेपर केना वि‍श्वास करी कुल कोनो बापेक होइत माएक वंश तँ दोसरे होइत कोन पैमानापर नापी मधुर मि‍लन तँ संयोगे होइत। बेटी बेटी धनक सि‍ंगार अछि‍ मान, प्रति‍ष्‍ठा, इज्‍जत, आवरू सजल सरक ताज अछि‍ भेटल मि‍थि‍लाक मैथि‍ली बेटी रूप मुस्‍कान अछि‍। कतबो सताबैत बेटीक सुध गाए बनि‍ सुनैत रहैत सुख-दुखमे सम बनि‍ माए-बापक मान रखैत अछि‍ बुझि‍तो पराया बनब अप्‍पन बनल रहैत अछि‍। पुरखक समाज अबला कहलनि‍‍ बनि‍ अबला ओ रहैत अछि‍ गुलाबक पंखुरी जकाँ टन-दि‍न भखरैत अछि‍ स्‍वाभि‍मान, इज्‍जतक प्रश्‍नपर नागीन बनि‍ उभरैत अछि‍। बेटा-बेटीक अंतर रहि‍तो अपन अधि‍कार समटैत अछि‍ माए-बाप मनक बुझि‍तो भायसँ प्रेम करैत अछि‍ बापोक ठोह फाटए लगैत जखन हृदैसँ टुकड़ा अलग होइत अछि‍। नारी चरि‍त्र शक्‍ति‍क प्रतीक नारी रहल धनसँ भड़ल बखारी वि‍द्याक सागर बनल दुर्गा, सरस्‍वती, लक्ष्‍मी कहाइत पूजा होइत रहल। माए-बहीन, भौजाइ-ननदि‍ काकी, दादी, नानी, बनल बेटी बनि‍ माए-बापक हृदए जुराबैत‍ रहल आर जगमे ओ पुजाइत रहल। श्रद्धाक प्रतीक इज्‍जतक मान रखने रहल नारीक कर्मसँ पुरुष सदासँ अपन मोछ फरकबैत रहल अपन छाती तनने रहल। पुरुखक भीड़मे नि‍त अबला-अबला सुनैत रहल लता बनि‍ हरदम अवलम्‍ब खोजैत रहल आँखि‍ अपन सि‍कुरैत रहल। जैधी मौसी, मामी एक्‍के नारी सास बनल केकरो चरण छुएलक केकरो गारि‍ सुनैत रहल केकरो लेल देवी बनल केकरो जाँघतर पड़ल रहल। सजल सँवरल बनैत मरूत रूप-अलंकारसँ देवी नाम पड़ल दया, ममता, सि‍नेह, प्‍यारक जीवन भरि‍ सुमन ि‍बखरैत‍ रहल। धी‍रज हेरा डुबाबैत‍ अधर पुरुखक मन ललचाबए लगल खुट्टा तोड़ि‍ जखन बौराएल देवीसँ कुल्‍टा बनल समाज नीचताक प्रकाष्‍ठापर अपन टांग गरौने रहल। धन जीवन अनि‍वार्य टाका नै जीवन बनत जइ‍ टाकासँ मान रहत टक्‍के लेल मान घटबैत रहल। कुल स्‍वाभि‍मानी बनैत पुरुखक ओ पाग बनैत कोन दुरकाल मनमे उठल जे कुल कलंकक भार बनल नारी ममताक सागर ओ केना नर काल बनल। डॉ राजीव कुमार वर्मा आ डॉ जया वर्मा डॉ. राजीव कुमार वर्मा, डुमरा, सहरसा। जन्म २१.०७.१९६३, एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास, दिल्ली वि.वि.। कतेको अनुवाद खास कऽ श्रीमती शेफालिका वर्माक “बोल्डनेसक लहास”क “कोर्प्स ऑफ बोल्डनेस”-स्पैरो, मुम्बै द्वारा प्रकाशित आ श्रीमती शेफालिका वर्माक उपन्यास “नागफाँस”क अंग्रेजी अनुवाद (विदेह ई-पत्रिकामे धारावाहिक रूपे)। डॉ. जया वर्मा, जन्म १६.०२.१९६४. एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास, दिल्ली वि.वि.। “महाकाव्य आ पुराणमे नारी” आ “जेन्डर स्टडीज”पर विशेष अध्ययन। श्रीमती शेफालिका वर्माक उपन्यास “नागफाँस”क अंग्रेजी अनुवाद (विदेह ई-पत्रिकामे धारावाहिक रूपे)। हमर  गाम हमर नाम की हमर गाम की पुछलौं अपनासँ हमर पहि‍चान की

चान देखलौं, सूरज देखलौं तरेगन सेहो देखलौं लागल गामक मुदा एतेक कोलाहल एतेक गाड़ी, एतेक प्रदूषण नै नै ई हमर गाम नै छी

बड़का मैनक मखान पोखरक कबै माछ भुट्टा आ छिमीक बीच मचान ओरहा आ पिआउज आ अचारक संगे चाउरक रोटी सभ छुटि गेल

ब्रह्मक थानक देवता भगवान शंकरक मंदिर कनैलक फूल इनारसँ डोले डोल पानि सभ छुटि गेल

कोसी बाँधक साँझ चौरचनक दही सामा चकेवा इजोरिया रातिक नाहपर झिलहरि‍ सभ छुटि गेल

मंगला कुजराक केरा घूरक पकाएल अल्हुआ ताशक बाजी चाहपर चाह सभ छुटि गेल

अाब तँ देखै छी नहरक छठि‍ ड्राइंग रूमक मधुबनी पेंटिंग सिनेमा हौलक  पोपकोर्न बिनु रंगक होली सोसाइटीक बेस्वाद दिवाली

केकरासँ मैथिली बाजू अाब तँ विदेहसँ आस अछि विदेहक रचनामे गामक तलाश अछि गाम भेटत तँ अपन पहिचान पाबि लेब। रामभरोस कापड़ि भ्रमर, १९५१-। जन्म-बघचौरा, जिला धनुषा (नेपाल)। बन्नकोठरी: औनाइत धुँआ (कविता संग्रह), नहि, आब नहि (दीर्घ कविता), तोरा संगे जएबौ रे कुजबा (कथा संग्रह, मैथिली अकादमी पटना, १९८४), मोमक पघलैत अधर (गीत, गजल संग्रह, १९८३), अप्पन अनचिन्हार (कविता संग्रह, १९९० ई.), रानी चन्द्रावती (नाटक), एकटा आओर बसन्त (नाटक), महिषासुर मुर्दाबाद एवं अन्य नाटक (नाटक संग्रह), अन्ततः (कथा-संग्रह), मैथिली संस्कृति बीच रमाउंदा (सांस्कृतिक निबन्ध सभक संग्रह), बिसरल-बिसरल सन (कविता-संग्रह), जनकपुर लोक चित्र (मिथिला पेंटिङ्गस), लोक नाट्य: जट-जटिन (अनुसन्धान)। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता- श्री राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' (२०१०)। गजल

समुद्रक गहिंरइ अपना भितर नुकौने कतेको आश इच्छाकेँ भरिसक दबौने मुस्कीक इजोतमे फतिंगाके फॅसबैत, भ्रम दीपक देखा मुँह सुरसाक बनौने। हा, प्रकृति किए मुरुत गढलौं एहन, छुरी भोंकितो सदैब जे छातीसँ लगौने । रुप भिनसर हो कि बेछप सांझ करिया, राजमार्गोकेँ अनेरे एकपेरिया बनौने। सक्क छै जकरा निमाहत गऽ प्रीत नेह, आमंत्रण बटैत रही छिटकिल्ली लगौने। मायाजाल फंदामे बेरबेर घुरिआइछ भ्रमर, बुझी आगाँ छै कुण्ड तैयो चली डेग बढौने। गीत ओ पवन, झिहिर झिहिर बहैत जाउ छूबि बताउ कने, पिया छथि कतए केकरा संग वर्षहु गेला भेलनि‍, सुधिबुधि किछु ने छन्‍हि‍! दिन भेल पहाड, दुख भेल जीवनक अंग। निष्‍ठूर समाज चाहे, नोचि नोचि खाइ जेना शेरक भूख बनल जवानीक तरंग जेना चारुभर शिकारी ताकमे बैसल अछि रहल ने कोनो उमंग! ओ पवन, पिया छथि कतए केकरा संग!! अधिकारक बात सभ लागु ने भेल कखनो नारीक बेथा-कथा कमैनीक धंधा एखनो जान जोखिम बनल कतए धरि घींचब त्‍यागब प्राण वियोगे कन्‍त! ओ पवन, पिया छथि कतए केकरा संग!! जानि जानि आगिसँ खेली केना हम शक्ति भरल मुदा तौली केना हम शील, सुशील मिथिला केर ललना पतिक परोक्ष भेल शिथिल तरंग! ओ पवन, पिया छथि कतए, केकरा संग!! कामिनी कामायनी वसन्त नाचि रहल नव नव तरंग नूतन वसंत नूतन वसंत। नव ताल वृन्द नव छाग फाग नव गेह देह नव पात साग। नव बाट हाट नव प्रीत गीत नव लाेभ क्षाेभ नव हास्य रूदन नवनीत रूप नव कमल नयन। मन हर्षित भऽ नितराति कहल आएल वसंत नवका वसंत। नव सखी सखा नव मधुर रास नवका सूरूज नवका प्रकाश। नव तालमेल नव धूर खेल नव जान माल नव वृद्ध बाल। सभ तर मदमातल छै अनंग नव नव वसंत नूतन वसंत़। नव स्वप्‍न नयनमे उठल उठल उल्लास हियमे भरल भरल। रज कणसँ झाँकैत अछि पर्यन्त नवका वसंत नवका वसंत। नव कुसुम कली सकुचाए उठल मदमस्त भ्रमर मँडराए रहल कुहुक काेयलिया गाबि रहल रस रंग सुधा बरसाय रहल। अल्हड बसात चलै सनन सनन गमकि उठल नंदन कानन। आएल गाएल मन माेहि चलल नूतन वसंत नव नव वसंत। बाजारमे स्त्री आे रूप कुमरि कि‍अए ठाढ आेत्तए की छानि रहल अछि राह बाट छिटकल कारी घन केश पास हर्षित मुखमंडल  मन उदार। आँखि‍क भाखा किछु कठाेर सन दप दप चमकैत उन्नत ललाट। ताकि रहल किछु गुमल चीज बरखा बूनिमे रहल भीज। बटुआ छै कान्हसँ लटकि रहल। ऊँचका सैंडिल छै अँटैक रहल। चालि चलै छै नापि नापि रहि जाए छै धरती काँपि काँपि। कत्तेक ई उर्जावान बनल ज्ञान भरल अभिमान भरल। केकरासँ कम छै ऐ जुगमे ई अर्जुनक अभिमान ताेड़ल। वामन अवतार विराट बनल ई ताकि रहल ब्रम्हांड दिस। करै छै सभ कियाे नमस्कार देखियाै ऐ जुगक चमत्कार। ई रूप कुमरि खूब बूझि रहल। समरथक नै  छै दाेख काेनाे सहलक आेहाे बड़ बसात घाम नै लेलक क्षण भरिक विराम। आइ बल-बुधि‍‍क ताकतिपर आे रूप कुमरि अछि ठाढ़ आेत्तए। बंजारा मोन मन मस्त मतंग फकीर बनल। मन सोर करैत अछि बेर बेर मन पड़ा रहल अछि फेर फेर डोलैत जाइए मन इम्हर उम्हर ई दंड भेदसँ बाहर अछि। मन झूठ फूइस गढ़ि‍ रहल सदा मन दौड़ भाग कए रहल सदा मनकेँ परतारय लए प्राणी केहेन केहेन इतिहास गढ़ल मन ककरो बसमे आएल नै मन जोगी भऽ रमि रहल इम्हर मन भोगी भऽ पड़ि रहल उम्हर मनकेँ लाज लिहाज नै छै मन हेहर छै मन थेथ्थर छै ई चंचल पथ केर राही छै। मन भागि रहल अछि चानक लेल मन सूरूज देखि‍ उधियाए लागल मन धरतीपर छिछियाए रहल मन अनंतमे सन्हियाएल रहल़़ मन कखनो शांत प्रशांत नै। कखनो उकटा पैंचीमे कखनो बाकसमे अटैचीमे कखनो नरमे नारीमे कखनो धोतीमे साड़ीमे कखनो दादा परदादामे कखनो मान मर्जादामे हुलकी दैत अछि बेर बेर। गहनामे कखनो गुरियामे कखनो  भाँगक पुरियामे कखनो तीमन तरकारीमे कखनो कोठीमे अटारीमे मायामे उनटै बेर बेर। बिरहापर मन अछि डूबि रहल मल्हारपर अतिशय फूलि रहल मन करै छै कखनो साम गान कखनो कखनो फूसही बखान कखनो कानैत अछि नोर झोर कखनो हुलसति अछि जोर जोर। मन सज्जन छै  मन हरीफ छै मन तुलसी छै मन कबीर छै मनकेँ किछुओ अलभ्य नै ई चारू लोकक मालिक छै। मन राह बाटक राहगीर नम्‍हर चौरस वा बानवीर नृत्‍यरत अछि राति दिवस मनकेँ कखनो विराम नै मनक पाथेय छै बस चिन्तन। मन भ्रमण करै छै जुग जुगसँ ई सभ तर बूलै जुग जुगसँ मन रास विलास करैत सदा मन सन कोनो बंजारा नै मन जोगी छै नागा जोगी। बेचन ठाकुर, चनौरागंज, मधुबनी, बिहार। विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक संस्थापक। “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी” (नाटक) प्रकाशित। विश्वासघात (नाटक) प्रेसमे। गीत खेलै छेलिऐ धुपै छेलिऐ करै छेलिऐ काम-२ भद्वारमे जे छहर टुटलै, दहा गेलै सौंसे गाम। भैया हो रामै राम, रामै राम सीताराम। आहो फोकटिया नेता, लुटलक गाम। कुथि-काथि कऽ रोपनि केलनि, खेतमे हमर किसान बाढ़ि-डकुबाकेँ लाजो नै भेलै धानकेँ कएलक हरान। भैया हो......... पिपरौलिया गौवाँ रोडकेँ कटलक, बटौहीकेँ कएलक परेशान गंजबला बबूरपर सँ रोडपर बान्हलक मचान। भैया हो........ पंचायत समिति मुखिया वार्ड मेम्बर सभकेँ छुटलै घाम जिला परिषदकेँ गंजबला, बनौलक बेइमान। भैया हो.............. रिलीफमे बीस किलो चाउर, सए टका नून तेलक दाम घर-घरमे तीन किलो गहुम सेहो कएलक नाम। भैया हो.............. घरखस्सीमे गरीब हेतु, घरक आएल अभियान मुदा पाँच सए टाका जे देताह हुनके होएत काम। भैया हो............ बड़का चोर मैझला घुसखोर छोटकाकेँ केना मकान घुसखोरी देखि‍ कहथि बेचनजी सभकेँ जाएत परान भैया हो................। रमण कुमार सिंह दिल्लीमे... सालो भरि वसंत रहै छै दिल्लीमे जे चाही सभ मोल बिकै छै दिल्लीमे मेट्रो-मल्टीप्लेक्स बनै छै दिल्लीमे डेग-डेगपर लोक कनै छै दिल्लीमे गाड़ी बंगला कोठा सोफा दिल्लीमे बाट-बाटपर मौत के तोहफा दिल्लीमे दारू समेत गुटका खैनी दिल्लीमे हरपल भागम-भाग बेचैनी दिल्लीमे नवका-नवका बाट बनै छै दिल्लीमे लोकतंत्रक खाट खड़ा छै दिल्लीमे नित नव-नव बाजार बनै छै दिल्लीमे माए-बहिनक लाज लुटै छै दिल्लीमे सालो भरि‍ वसंत रहै छै दिल्लीमे जे चाही सभ मोल बिकै छै दिल्लीमे। विद्यानन्द झा (विदू) पिताक नाम- स्व. रामशंकर झा, जन्म तिथि- २०.०१.१९६६, शैक्षणिक योग्यता-एम.ए., ग्राम-केवटा, पोस्‍ट- शुभंकरपुर, जिला-मधुबनी (बिहार)। हमर मिथिला उत्तरमे हिमराज विराजथि, दक्षिण सुरसरि गंगा पश्चिममे बहि-बहि गंडकी, पूर्व कौशिकी-बंगा बीच बसल छथि सुन्दर मिथिला, आउ हिनक गुणगाण करी मिथिलाक गरिमा हम बूझि‍, मैथिलीक सम्मान करी॥ घर-घरमे छथि एतए गोसाओन, तुलसी हर आंगनमे देवालय शिवालय अछि, हर गामक प्रांगनमे छथि धन्य हमर ई मातृभूमि, लय रज-कण हिनक प्रणाम करी मिथिलाक गरिमा हम बूझि‍, मैथिलक सम्मान करी॥ सीता उपजलि जइ भूमिसँ, जनक जनिक सम्राट भेलाह शिव-धनु राखल जइ भूमिपर, परशुराम प्रहरी भेलाह स्वर्गसँ सुन्दर मिथिला धाम, आउ हिनक हम मान करी मिथिलाक गरिमा हम बूझि‍, मैथिलीक सम्मान करी॥ रचल स्वयंवर जइ भूमिपर, विश्वामित्र संग शिष्य एलाह टुटल धनु टंकार जतय भेल, परशुराम लहड़ैत एलाह किन्तु सुनि मृदुलवाणी जँह मुनिवर, क्रोध त्यागि शीतल भेलाह रामवरण कएलनि‍ जँह सीता, आउ तिनक हम ध्यान धरी मिथिलाक गरिमा हम बूझि‍, मैथिलीक सम्मान करी॥ विद्यापतिक गाम ई मिथिला, शिव उगना बनि चाकर भेलाह जँह भगवतीक अनुकम्पासँ कालिदास विद्वान भेलाह अछि मधुर प्रेम केर सागर मिथिला, आउ एकर रसपान करी मिथिलाक गरिमा हम बूझि‍, मैथिलीक सम्मान करी॥ अछि विविध विधा केर गहवर मिथिला, किंतु उपेक्षित भऽ रहल अछि चूक अपन या शासन केर, उत्थानक मार्ग अवरूद्ध रहल आउ ऐ‍पर मनन करी आओर हिनकर उत्थान करी मिथिलाक गरिमा हम बूझि‍ मैथिलीक सम्मान करी॥ दहेज युग-सृष्टा युग दृश्य मैथिल अपना पथसँ भटकि रहल छल जकर इतिहास ओ स्वर्णिम आइ कलंकित भऽ रहल घर-घरमे बेटी मूक भऽ विलखि रहल दहेजक दावाग्निसँ मिथिला झुलसि रहल॥ अछि दहेज दारुण बनल ई दुर्भाग्यक परिचायक अछि बेटाकेँ पूँजी बूझि बैसल सभ्य समाजक नायक अछि अपनौं घर सम्भव छन्हि बेटी से छथि अपने बिसरि रहल दहेजक दावाग्निसँ मिथिला झुलसि रहल॥ मिथिलाक सम्मानक सीमा स्वयं मैथिल लांघि रहल खुलेआम बाजारमे बेटा मोल-तोल कए बेच रहल लक्ष्मी रूप जनमल जे बेटी सासुरमे ओकरा जरा रहल दहेजक दावाग्निसँ मिथिला झुलसि रहल॥ दहेज! मिथिलाक दुर्भाग्य बनल गरीबक संताप बनल कन्यादान सन पुण्य कर्मपर अवघाती अभिशाप बनल सिसकि रहल घर-घरमे बेटी होठक मुस्कान छै खिसकि रहल दहेजक दावाग्निसँ मिथिला झुलसि रहल॥ तड़पि रहल व्याकुल भऽ कन्या मन ताड़-ताड़ अछि भऽ रहल अछि चिन्तनीय बेटीक जीवन पद नीचाँक भूमि खसकि रहल देखि‍ दहेजक बर्बरता बेटी अछि कुंठित भऽ रहल दहेजक दावाग्निसँ मिथिला झुलसि रहल॥ जागू मैथिल देर ने भेल खतम करू ई दहेजक खेल स्वाभिमानसँ माथ उठाउ लेब-देबसँ ऊपर उठि कऽ आदर्शक परचम लहड़ाउ कारण! देखि‍ ई दुर्गति घर-घर केर बेटी मनहि मन अछि बिदकि रहल दहेजक दावाग्निसँ मिथिला झुलसि रहल॥ आब यदि बरतब नै संयम खतम करब नै बर्बर खेल मिटत स्मिता विश्व पटलपर शर्मनाक अछि मिथिला लेल चिन्तन-मनन करी सभ मिलि ई हमर अनुरोध रहल दहेजक दावाग्निसँ मिथिला झुलसि रहल॥ इन्द्रभूषण कुमार, पि‍ताक नाओं- स्‍व. पुलकि‍त साहु, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) सफलता हमर रानी हम छी मेहनतक राजा हएत सफलता हमर रानी। केना हएत, कि‍ए हएत, हएत कखन, पैघ नै अछि‍ बेस छोट ई कहानी। पहि‍लुक बेर जखन सुनलौं हम, कि‍नको लैत नाओं एकर, एना बूझि‍ पड़ल जेना यएह अछि‍ हमर स्‍वपन्नक रानी। भऽ कऽ बेचैन चललौं जोहबाक लेल हुनका, पर भेटल नै कतौ हुनकर नि‍शानी। सोचैत रही एम्‍हरे कतौ अगल-बगल हएत, देब आवाज, बूझि‍ कऽ हमर अपन दीवाना, आइब जाएत हमरा बाँहि‍मे हमर दीवानी। मुदा ओ जखन ओ भेटल नै कतौ, गेल हमर उत्‍साह ओहि‍ना, जना गाइब रहैत अछि‍ मरूभूमि‍मे पानि‍। जँ रहए लगलौं उदास तँ, देखि‍ कऽ हमर उदासी, बड़-बुजूर्ग सभ बुझौलक, एतबे टा गपपर छी उदास, हमरा सभकेँ होइत अछि‍ हैरानी। अहाँ केवल चाहलौं हुनका, हुनकर चाहतक नै सोचलौं, हौ, ओ हुर तँ अछि‍ परि‍श्रमक दीवानी। आब की अहाँसँ छुपाउ कि‍एक नै एक-एकटा गप बताउ, लगलौं करए हम मेहनत जइ दि‍नसँ आबए लगल नजरि‍ तइ दि‍नसँ, बाँहि‍मे नै अबैत अछि‍, मुदा रहैत अछि‍ अगल-बगल, बढ़ा उत्‍साह हमर कहैत अछि‍ हमरासँ, करैत रहू प्रयास। जइ दि‍न अहाँक परि‍श्रम हएत, अहाँक चाहत ओहन, दौगए लगल अहाँक अंक, भऽ अहाँक दीवानी। हम छी मेहनतक राजा, हएत सफलता हमर रानी। हमर नगरक दास्तान चहुँ ओर खामोशी छलै, पसरल रहै विराना। ताल-तलैया लगै ओछाउन सन, रहै कोसीक धार सिरहाना। सभ राति हुअए बदमाश सबहक आगमन, गली-कुची लागै बीआ-बान सन। होरी खेलए पड़ए कादोमे, लागै दीवालियोक राति अन्हार सन।

मुदा हिम्मत नै हारलक नगरक लोक सभ, भरोसा रहए सबहक अपन-अपन बाँहिपर। गामक बरियाति लऽ चलल खुशीक वियाह, किएक तँ रहै ओकरा सबहक उजड़ल चमन बसाएब।

चारूकात तटबंध बनल, शलीकासँ शहर बसल, विद्यालय, महाविद्यालय, कारागार, न्यायालय, भंडारगृह, चिकित्सालय, संचार केन्द्र व चित्रालय सभ निर्मित भेल। ई शेष भारते नै पूरा विश्वसँ जुटल, आब एतए भेटैत अछि सुख-सुविधाक हर समान, एकर अछि एक अपन पहि‍चान।

जे कि‍यो राखत भरोसा अपनापर, जी-तोड़ करत मेहनत, कठिनाइसँ नै डरत, भरत सफलताक पैघ उड़ान, बस यएह कहैत अछि, हमर नगरक दास्तान। एना किएक होइत अछि? जखन करऽ चाहै छी काज कोनो ओहन जकरा उपमा भेटै अकाससँ तारा तोरनाइ जइसन एक-एकटा डेग उठाबै छी सम्हारि कऽ ऊपर चढ़ि जाइत छी कतेको पायदान तक तखन आबैए एकटा झौंक बिहाड़िक उड़ा लऽ जाए नींव हमर अरमानक बाँचल अछि जे किछु आशाक तिनका सेहो बिखड़ले सन लगैत अछि एना किएक होइत अछि? कतेको बरख बीत गेल हम सपना देखनाइ छोड़ि देलौं जँ देखबो करब तँ, कथुक? हमर जिनगीमे एहन कोन हसीन पल बीतल मुदा तैयो जँ भूलोसँ कौखन कोनो ख्वाब आबए तँ ख्वाब शुरू भेल नै कि नेत्र खुजि जाइत अछि एना किएक होइत अछि?? सौचैत छी नव दिनक शुरूआत नव उत्साहसँ करब सदिखन नव आशाक संग चलब मुदा पुरनके दिनमे एक गोट नव निराशा सोझामे आबि जाइत अछि एना किएक होइत अछि??? हम की करू? जँ गाबी सभ कहैए कनै किए छिऐ? जँ कानी सभ कहैए ई की गबै छिऐ? जँ चुप रहू सभ कहैए बाजै किए नै छिऐ? जँ बाजी सभ कहैए हल्ला किए करै छिऐ? आखिर बाजू वा चुप रहू? हम की करू? कि‍यो कहैत अछि अहाँ ई किए नै करै छिऐ कि‍यो कहैत अछि अहाँ ओ किए नै करै छिऐ ई करू तँ ओ प्रसन्न होइत अछि ओ करू तँ ई रूसि जाइत अछि सभकेँ मनाउ केना हम की करू? बिना पुछने करू तँ कहैए पुछलौं किए नै जँ पुछिऐ तँ कहैए अपने किए नै सोचै छिऐ अपना समझसँ करू तँ कहैए सदिखन एना मनमरजी किए करै छिऐ अपन पक्ष सभकेँ बुझाउ केना हम की करू? दहेज होइत जनम बेटीक, धँसि जाइत अछि जमीन, फाटि जाइत अछि आसमान, मुरझा जाइत अछि किछु पहिले तक, लहलहाइत बारी-फुलवारी।

हँ, किछु अहिना होइत अछि, नै तँ किए! उभरि जाइत अछि, चिंताक रेहा सभ, बाबुजीक अखन तक चमकैत ललाटपर, उदास भऽ जाइत अछि दादा-दादी, ओइ मासूमक एक एक गोट मुस्कानपर।

लऽ कऽ कोरामे सोचैत अछि माए, लालन-पालन करब, जतए धरि सकब, पढ़ेबो-लिखेबो करब, सिखाएब सास-ससुरक सेवा केनाइ, समझाएब सभ शिल-गुण, एक पतिव्रता नारीक।

पर जुटाएब केना! अंतहीन मांग-चांगक पूर्ति करबाक लेल ....................दहेज?

सहास भऽ रहल छल आयोजन काव्यपाठक जुटल छल कविलोकनि सभ भागक समाप्त भेल औपचारिकता पढ़ए लागल कवि सभ अपन-अपन कविता। बहुत रास कवि बहुत रंगक कविता कि‍यो मोहित छल नायिकाक सुनर गालपर कि‍यो व्यथित छल प्रेयषीक बदलल बेवहारपर कि‍यो छलथि‍ क्रांतिक झंडा उठौने कि‍यो रहथि‍ भ्रष्टाचारी सभकेँ भरिमन गरियौने। अनमनस्यक भऽ कऽ हमहूँ सुनैत रहौं कि‍यो सूतल नै माने तँए निक-बहुत-निक करैत रहौं। अचानक मंचपर अवतरित भेल एक नारी जेहने देखैमे कारी पहिरनो रहै तेहने मैल‍ साड़ी। शुरू केलक अटकि-अटकि कऽ बाजनाइ नै आबैत छल ओकरा शब्दक जाल बुननाइ मुदा चेहरापर तेज छल मनमे उत्साहक अतिरेक छल भय नै, जँ कहि हुसब श्रोता सभ भरिमन दूसत। नै लय रहै ने रहै छंदक सुन्दरता तैयो सभ प्रसन्न भऽ समवेत स्वरमे केलथि हुनकर प्रयासक प्रशंसा। जे कहि नै सकल शब्द प्रयास ओकर कहलक लागत नै कठिन चाहे लक्ष्य हुअए किछु खास बस राखि भरोसा अनपनापर करी बढ़बाक सहास। विवेकानंद झा नोरमे अछि बेस संभावना ओ हमर जीवनक ठिठकल वर्ष सभ छल जखन समए मुदा कैलेंडरे टामे बदलैत रहए बिना उपद्रव बिना हो-हल्ला आ कही कि कम-सँ-कम हमरा एकर सूचना नै छल मुदा एहनो नै रहै जे नेना-भुटका सभ पैघ नै होइत छल जे कि‍यो आबि गेल छल ओ विकसितो होइते रहए चाहे दिशा जे रहल हो ओकर आ चलू इहो मानि लैत छी कि जे नै आएल रहथि हुनकामे आबि जेबाक छटपटाहटि हेतनि‍ फेर एहनो नै छल जे बेटाक बेरोजगारीपर पिता लोकनि क्रोध वा खौंझ नै देखेबाक मोन बनेने छलथि राग-विराग ओहिना पूर्ववत चलैत छल बिना उपद्रव बिना हो-हल्ला नोर चुपचाप ढबढ़बा अबैत रहै आँखिसँ हर एकांत ‌क्षणसँ गठजोर करबा लय आतुर

आ ई हमर जीवनक कलकल बहैत वर्ष अछि आ हमरा चाहलासँ की होइत छैक वा ककरो चाहलासँ समए वा नदीक प्रवाह तँ नै थमैत छैक मुदा चाहनाइ तँ रहैत अछि जे एना धड़-धड़ा कऽ जुनि बितौ ई समए मुदा सुखद क्षणक तीव्र प्रवाहमे कैलेंडरे फर्र-फर्र उड़ि रहल अछि आ कही कि हमरा पहिने नै बूझल छल जे ककरो जन्मदिन एकहि सालमे कएक बेर आबि जाइत छैक कम-सँ-कम हमरा तँ एहिना बुझना जाइत अछि हम मृत्यु दि‍सि‍ गत्वरतासँ धकिओल जा रहल छी कखनो काल एहन लगैत अछि जखन खूब आसमर्द उठल रहैत छैक कतौ जेना मेट्रो रेलमे ऑफिससँ घर घुमैत काल मुदा आश्चर्य! नेना-भुटका सभ पहिनहि सन शनैःशनैः पैघ भऽ रहल अछि हाँ, बेटीक मादे हम ई नै कहि पाएब काल्हि भोर जखन ओ स्कूल जाइत छल तँ रहरहाँ गुलजार जीक एकटा पाँति आँखिक नोर बनि कऽ उतरि गेल --‘बाजरे के सिट्टों जैसे बेटे हो जवाँ'

फेर एम्हर जे कि‍यो आबि गेल छै से विकसित भऽ नै रहल छै कएल जा रहल छै तँए सबहिक दिशा एकहि छैक सभ बजार लेल आ बजार दि‍सि‍ धकिऔल जा रहल छथि आ इहो सत्य कि जे नै आएल छथि हुनकामे आबि जेबाक छटपटाहटिसँ बेसी डॉक्टरकेँ माइक गर्भ परीक्षण करबाक वा ओकरा चीर देबाक धड़फड़ी छन्‍हि‍ सुयोग समैमे बच्चा जनबाक कामनामे जननी सेहो कएक बेर सहमतिएमे रहैत छथि बेटाक कुपात्र हेबाक भय माता सभमे बढ़ल अछि फेर एहनो नै जे बेटाक बेरोजगारीपर पिता लोकनि क्रोध वा खौंझ नै देखेबाक मोन बनेने छथि आब हुनकामे पहिने सन सामर्थ नै छोड़लनि‍‍ बेटा सभ राग-विराग ओहिना चलि रहल छै पूर्ववत हाँ आब विज्ञापन सेहो जरूरी भऽ गेल छै तँए हँसी आ नोर समए देखि‍ कऽ निकालब लोक सीख रहल छथि तेजीसँ बदलि रहल छै समए मुदा एखनो चुपचाप ढबढ़बा अबैत अछि आँखिसँ नोर प्रत्येक एकांत ‌क्षणसँ गठजोर करबा लए आतुर एक गोट बेस संभावना बनि कऽ! हे सिंगरहार कतेको बेर सुनलहुँ अहाँक मुँह सँ‍ आ पढलहुँ कतेको बेर अहाँक आँखि मे घुमरैत एकटा पाँति हम हे सिंगरहारक फूल ! मुदा तखनो नीपल अथवा अखरा कोनो रूपेँ तैयार छी सतत् अहाँकेँ स्वीकार करबा लेल कनेक चोट तँ लागत अबस्से नीक लगैत हएत अहाँकेँ आकाश दिव्य, देवतुल्य कपटी! बुझल अछि चाहियो कऽ शून्याकाश नै भेट सकत विश्राम दऽ सकब हमहि चाहे ओ जड़ता तोड़ि जड़ते मे आएब किएक ने हुअए कनेक चोट तँ पौरुषक लगबे करत देबक माथ चढ़ऽ लेल चाहे फेर ओतऽ सँ मौला कऽ बहि आबी हमरे लऽग किए नै? अंतिम निदान तँ धरतीए थिक। (२९ अक्टूबर ९४) खत्म करऽ चाहैत छी जिनगी प्रिये ! हम मऽरऽ नै चाहैत छी सबहिक जेकाँ जीवऽ सेहो नै चाहैत छी हम अहाँ बिनु हम चाहैत छी गाम मे अपन दलान पर हाथ मे ली गीता आ आद्यांत खत्म करी फेर उठाबी रामचरितमानस महाभारत आ वाल्मीकि केर गूँथल रामायण खत्म करी हम खत्म करऽ चाहैत छी रामायण आ महाभारत लगातार हम खत्म करऽ चाहैत छी अपन जिनगी हम जीवऽ नै चाहैत छी अहाँ बिनु (१८ नवंबर ९५) प्रिये ! प्रिये ! काल्हि हमर एकटा आर पूजा व्यर्थ भेल अंतिम पुरइन हाथ सँ ससरि गेल खसि पड़ल वेगवती धार मे डूमल हमर मोन अनचोकहिं कानि उठल व्यर्थहिं अहाँकेँ देखल किछु बुन्न नोर ढबकल आ एकटा आर पूजा व्यर्थ भेल अंतिम आश्वासन आँखिक सोझाँ बिलटि गेल भेल प्रकंपित हिल गेल उदास मोन डूमल पुनः हमर प्रशस्ति हमर याचना खंडित भेल हमर संपूर्ण अर्चना एक सङ काल-कवलित हमरा समक्ष हमर मनोहर स्वप्न भाङल बेकल मोन पुनः कानि उठल अवश स्तंभित नेत्र पथराएल नै निकसल एक बुन्न नोर जड़ित वदन पर झिलमिला गेल एकटा पनिसोह हँसी अहाँ देखल प्रिये ! काल्हि हमर प्रश्नक जे उत्तर अहाँ देल ओ हमर दरकार नै छल अछि खूब अहाँकेँ बूझल हमरा अहाँक कोन उत्तर चाही जे जी सकी हम मुदा तखनहुँ एकटा आस तँ बाँचल अछि कखनहुँ कि जाएत अहाँक मोन बदलि कि अहाँकेँ हमही चाही प्रिये ! एना कत्तहु होइत छै जेना प्रेम मे विकल्प... दुनिया अपन चालि खराप कऽ लिए तेँ कि प्रेम मुदा ई की भऽ गेल अछि अनचोकहिं जे प्रेम मे पूजा प्रारंभ कऽ देने अछि मोन हमर अहाँक चरण मंगैत अछि आब अहाँ देवी भऽ गेल छी हमर प्रिये ! एम्हर एकटा दुनियाँ निर्मित भऽ गेल अछि हमरा चहुँदिश जे एकदम नवीन अछि हमरा लेल एकदम हल्लुक हम आब जत्तऽ चाही उड़ि कऽ जा सकैत छी भऽ सकैत छी पुष्प गुच्छ, अहाँ पुष्प अहाँक ठोढ़ भऽ सकैत अछि मेघ अहाँक केश आ हमर नेत्र, भऽ सकैत अछि आसमान अहाँक आँचर विद्युल्लता प्रकंपित अहाँक चुंबन अशेष भऽ सकैत अछि किछुओ आब संपूर्ण चराचर हमरा हाथ तर सिवाय अहाँक... (१० अप्रैल १९९६) हम अहाँक श्वेत नूआ मे ललका कोर जकाँ हम अहाँक स्मृति मे जाड़क भोर जकाँ हमही अहाँक फूलडाली सँ उझिक कऽ खसल कनेर हमही कोशीक नव-जल भसिआएल काँट कुश अनेर हमही अहाँक कोबर खसल लहठीक टूक छी हमही अहाँक हृदए-मर्यादल वासनाक हूक छी हमही तँ छी अहाँक पोथी मे सहेज राखल फूल हमही तँ छी अहाँक एड़ी सँ रगड़ि निकसल धूल देखैत अहाँक सौंदर्य मे ब्रह्माक विवेक हम अहींक वाणी-वीणा मे मधुर गीतक टेक हम हमही अहाँक गौरी लग गाड़ल धूपकाठी छी पोखरि नहाएल आएल रूपसी कन्या अहाँ लसकि हृदए फाँक भेल मनोलोकक कन्या अहाँ केश सँ झड़ैत बिंदु हम निर्विकार छी मुँहे पर ठाढ़ हम गर्भ गृह पैसैत अहाँ कोनो विहंगम दृश्य सन मऽन मे बसैत अहाँ बाबा पर ढेराइत हम अछिंजलक टघार छी ग्रीष्मक दुपहरिया मे ठमकल बसात जकाँ आततायी रौदक प्रचंडतम प्रमाद जकाँ हुलसि आएल संजीवनि सिहकल बयार पर मूनल विभोर नैन भोगक आधार छी (१९९६ मे कहियो) किए प्रिये? काल्हि साँझ जखन इजोरियाक गर्भ मे छटपटाइत रहै अन्हरिया आगू बढ़ि हम खोंसि देने छलहुँ अहाँक जूड़ा मे एकटा शब्द ओकरा सँ अहाँक गप्प भेल? पुनः आइ जखन हमरा आँखिक अन्हरिया मे वएह इजोरिया चुपचाप एकदम चुपचाप किलोल कऽ रहल छल हम अहाँ सँ पूछि उठलहुँ अपराजिताक गाछ मे लटकल हमर ओइ शब्दक हाल जकरा अहाँ ओत्तहि छोड़ि आएल छी आ जे पछिला जाड़क गप्प थिक अहाँ केँ मोन अछि? ओ अन्हार जखन हाथ हाथ सँ अदेख अजान छल हमर प्राण अपन केहन तँ आँखि सँ एक दोसरा केँ तकैत-तकैत कोसीक दू छोर भऽ गेल प्रिये ! अन्यथा जँ नै ली तँ पूछी एकटा गप्प? ओइ शब्द सँ अहाँक किछु जवाब-तलब भेल ओ ओ जे अछैत जाड़ आ जाड़क कुहेस पड़ाएल छल घूर लग सँ अकस्मात एकटा कठिन भोर मे जा कऽ ठाढ़ भऽ गेल छल थान तर अहाँक लऽग जतऽ उज्जर नूआ मे अहाँ नहुए-नहुए फूलडाली भरैत छलहुँ...? तखन तँ ओहो शब्द ओहिना टप-टप खसैत रहि गेल हेतै पारिजात पुष्पक सङ निस्संदेह लाज सँ गरि गेल हेतै ओइ निपलाहा धरती मे आब ओ पूजा योग्य नै रहल जे ओकरा अहाँ नै टोकलिऐ, प्रिये ! आ ओकर की भेलै प्रिये ! ओ ओ जे बरख भरि सँ अहाँक गेरुआ तऽर दहो-बहो कानि रहल अछि अहाँ सँ अतेक निकट रहितो ओकर भाग्य किए नै बदललै किए प्रिये ! एना किए होइत छैक हमरा शब्दहुँ सङ जेना हमरा स‍ङ भेलै ...! (११ अप्रैल ९६) ना होइत रहतै एक मुट्ठी अबीर हाथ मे लऽ एकटा निरर्थक आवाज निकालैत हम हवा केँ लाल कऽ दैत छिऐ अबीर उड़ै छै हवा मे ‌क्षण भरि हवा होइत छै लाल हम देखैत छिऐ हम देखैत छिऐ आ प्रयास करैत छिऐ ओइ जिनगी केँ लाल करबाक जे जिनगी मुट्ठी मे नै अबैत छै आ जतऽ ई नेनपनि होइत छै ओत्तहि होइत छै हमर प्रेम आ जतऽ होइत छै हमर प्रेम ओत्तहि हमर मूर्खता मे एकटा सतरंगी परदा होइत छै किछु स्मृति, किछु फूल, किछु काँट आ ओइ सभ सँ अपन अंग-वस्त्र बचबैत अबैत अहाँ होइत छिऐ पुनः लहलहाइत खेतक मध्य हमर स्मृति मे कलकल बहैत एकटा धार होइत छैक एम्हर बहुत दिन सँ ओतऽ मृत्यु बसैत छैक ई कतेक नीक छै जे जतऽ नै होइत छी अहाँ ओतऽ भोरक कुहेस जकाँ खसैत छै ठरल मृत्यु आस्ते-आस्ते लोक केँ ई बूझक चाही बूझल रहक चाही जे एक बेर- दू बेर हम खूब जोर सँ चिचिआएब अबस्से जे जाधरि सतरंगी परदाक पाछू सँ हमर मूर्खता मे अहाँ अबैत रहब होइत रहत अहिना अगनित जन्म धरि जे अहाँ रहब, हम रहब लहलहाइत खेत सबहिक बीच सँ बहैत एकटा धार रहत समयक वज्रपात रहत आ हम चिचिआएब कि जाधरि सतरंगी परदाक पाछू सँ अहाँ अबैत रहब स्वप्ने मे बरू एना होइत रहतै (१७ जनवरी ९७) बहुत दिनक बाद आइ प्रातः इजोतक यात्रा सँ पूर्व हमर पदचाप सुनि कनेके काल पहिने सूतल हमर मोहल्लाक खरंजा अपन गाढ़ निन्न सँ जागि उठलै बहुत दिनक बाद हमर आँखि मे अरुणिमा पहिने उलहन देत आ बाद मे मुसकिआएत बहुत दिनक बाद मऽन पड़ल एकटा पाँति “अलस पंकज दृग अरुणमुख तरुण अनुरागी प्रिय यामिनी जागी” (१२ अक्टूबर ९४, लालबाग, दरभंगा) कविता कविते होइत छैक परीब हुअए की पूर्णिमा इजोरिया इजोरिए होइत छैक पाँति दू हुअए की दस कविता कविते होइत छैक जखन हम कहैत छी कविता तँ ओकर मतलब हमर-तोहर किछु नै होइत छैक बस होइत छैक एके टा मतलब बस कविता ओइ काल मऽन मे जे अबैत छैक से अपन पूर्ण वैभवक संग कविता होइत छैक जेना एखन मऽन मे अबैत अछि किछु पाँति “कहियो रहल हेतै गुरु शिष्य परंपरा छौ ताग तीन प्रवर मुदा आब तँ...” एक दिन अनचोकहिं लिखऽ लागलहुँ कविता एक दिन अनचोकहिं लिखऽ लागलहुँ कविता आ ई शताब्दीक अंतिम दशकक शुरुआती बर्ख छल आ पुनः कतेको बर्ख आँखिक सोझाँ सँ बीतैत गेल एक दिन, एक दिन करैत आ एक दिन लागल कविता लिखबाक सामर्थ्य नै रहल शेष लागल हम प्रतिगामी आ खराप लोक भऽ गेल छी तेँ तँ रूसि रहली कविता हमरा सँ मुदा आब पुनः ओ सटल चलि आबि रहल अछि तँ लगै अय जे हम फेर सँ नीक लोक बनि रहल छी हृदए हमर फेर भगवती घर केर निपलाहा धरती बनि रहल अछि आ एखन इक्कीसवीं सदीक पहिल दशक खत्म हुअ लेल अपन अंतिम बर्खक शुरुआतमे जुटि गेल अछि उमेद करैत छी अइ निपलाहा माटि पर खसतै पुनः कविताक सिंगरहार आ पुनः सुवासित हेतै ओकर, हमर, हमरा सबहक दुनियाँ ईएह परिचए थिक अमूर्त सन ठोस ई जे गाम अछि बाथ जे मधेपुर थाना अंतर्गत पड़ैत छै तमुरिया स्टेशन उतरै छलहुँ जखन जाइत रही गाम मुदा आब कहाँ... ढहल ढनमनाएल गाम हमरा दलानक सोझाँ साफ पानिक छोट सन पोखरि मे हेलैत छोट-छोट माछ अहाँ आब नै देख सकब आ नै देख सकब दूर टढ़िहा बान्ह धरि लगातार पसरल खेत मे लहलहाइत धान आब ओ नै रहल पुरनका गाम खलिहान मे जे रमा बिहुँसल छली ओ पछिला दशकक गप्प थिक आब केओ नै दौड़ैत छै खरिहान मे केओ नै हँसि पड़ैत छै हमरा गाम मे ओना बिसंभर कका भेट जएताह अबस्से टुटलाहा चौकी पर खोंखी करैत एक सोह मे भेट जाएत अबस्से बाहर जंग लागि कऽ सड़ैत मिशीन सभ दुर्लभ नै छै बड़ऽद विहीन खूँटा आ लादि चार खसल बड़ऽदक घर मैल आ पुरान नूआ मे हमर नवकी भौजी असक्क काकी आ खोताक छिरिआएल समस्त खढ़ एम्हर विगत किछु बरख सँ केकर शापक छाह मे हुकहुक कऽ रहल अछि अप्पन गाम आकि मरि गेल अछि अप्पन गाम नै बूझल नै बूझल इहो जे बुढ़बा-बुढ़िया कएँ भोजन रान्हि कऽ खुआवैत जवान नवकनियाँ सुहासिनी कखन धरि बाट जोहैत रहतीह अप्पन-अप्पन मदनक कखन धरि ?...! (२५ नवंबर ९४) अहाँक मौलाइल अस्तित्व अपन मज्जागत संस्कारक मनहूस छाँह मे मौलाइल अहाँक अस्तित्व देखलहुँ अहिंक देहरी पर आइ बुझलहुँ अहाँकेँ कमल फुसिए बुझने रही ओइ दिन अहाँमे कमलक पाँखुरि सन शाश्वत प्रतीक होएबाक दम नै अछि (०७ दिसंबर ९४) अरुणिमा आ इजोरिया आइ काल्हि सदिखन बोझिल पलक पर आकि अनिद्रा सँ फाटल आँखि मे एकटा छिटकल चानक इजोत एकटा धड़कैत व्याकुलता अपना कोर मे लऽ लैत अछि कखन हमरा नै बूझल आ फेर प्रांगण मे प्रातः किलोल करैत कऽल मोन पाड़ैछ जे मुक्त हएब छौ तोरा मुदा तखनहुँ टटका-टटकी आँखि मे साँस लैत अरुणिमा कऽ दैछ तैयार हमरा पुनः एकटा मनोहर इजोरिया लेल कहियो गलती सँ कहियो गलती सँ सौभाग्य की दुर्भाग्य सँ देख लैत छी साँझ शहर मे तँ नै रहल होइत अछि शहर मे मऽन पड़ैत अछि गामक मुनहारि साँझ आ भगवती घर सँ बहराइत काकी आँचरक ओट मे लेने दीप आ नहुँए-नहुँए आङनक दोसर कोन धरि जाइत तुलसी चौरा लग ठोढ़ पटपटबैत आ जे की बाद मे बुझलिऐ करैत छल हमरे सबहिक उन्नतिक कामना तहिना कहियो गलती सँ सौभाग्य की दुर्भाग्य सँ देख लैत छी भोर शहर मे तँ नै रहल होइत अछि शहर मे मऽन पड़ैत अछि गामक साकांक्ष भोर चापाकऽल पर घऽरक समस्त बरतन-बासन मांजैत माइ कऽल चलबैत काकी अङना नीपैत बड़की बहीन तत्परता सँ चूल्हा पजारैत छोटकी आ जे की बाद मे बुझलिऐ करैत छल हमरे जलखइक तैयारी ओकरा सभकेँ नै छलैक अपन कोनो फिकिर आ एम्हर जखन हम शहर मे रहैत छी देवलोक सँ हमर माइ आ काकी तँ कोनो-कोनो गामक संघर्षलोक सँ हमर बहीन सभ सतत करैत रहैत अछि हमर कुशलक कामना बूझल अछि हमरा फेर कहियो गलती सँ सौभाग्य की दुर्भाग्य सँ देख लैत छी दुपहरिया शहर मे तँ नै रहल होइत अछि शहर मे मऽन पड़ैत अछि गामक प्रचंड रौद आ अटट्ट दुपहरिया ओइ काल कतहु सँ हहाएल-फुहाएल घुरैत बाबाक मुँह सँ झहरैत चन्दा झा केर पाँति- अरे बाबा दावानल सदृश लंका जड़ैये आ हम बहीन आ माइक आँखि बचा कऽ निकलि जाइत रही लंका मिझबऽ लेल आ उमकी धार मे ताधरि जाधरि आँखि लाल नै भऽ जाइत छल अरहुल फूल सन तखन मन पड़ैत छल माइ जे करैत हएत चिन्ता जोहैत हएत गाम पर बाट आ जखन हम जाएब अङना तँ ओ तमसा कऽ खसि पड़त पएर पर हमर आ जे की बाद मे बुझलिऐ ओकर एहन उनटल प्रतिक्रिया हमर जीवैत रहबाक कामना छल आ राति तँ सभ दिन देखते छी शहर मे वस्तुतः शहरक मतलब रातिए होइत अछि शाइद एहन राति जइ मे तरेगन नै होइत छैक स्याह आकाश सेहो नै कहियो शहरक रातिक आकाश भरि पोख देखू तँ सही बुझाएत शहर माने की होइत छैक तखन मऽन पड़त अहूँ केँ अपन गाम फूल-पात, खेत-खरिहान, मऽन पड़त अपन बाध-बऽन आ ओइ मे तीन तनुक बाती पर टाङल खढ़क खोपड़ि ओकर मुँह पर भुकभुक जड़ैत-मिझाइत डिबिया आ ओकर महत्व मऽन मे सदिखन रहैत छी अहाँ मऽन मे सदिखन रहैत छी अहाँ हे कविता जेना जीवनक लौलसा हुअए मृत्युशय्या पर पड़ल कोनो व्यक्तिक करेज मे जेना मुक्तिक उजास अनुकूल समयिक फिराक बनि नुकाएल हुअए कोनो कैदीक अन्हार मे मुदा हम की करी जे एकटा एहन समए मे जखन टूटि कऽ खसि रहल छै एक-एक टा पात विवेक-विचारक टूटि-भाङि रहल छै एक-एकटा डाढ़ि परंपरा-विश्वासक ऐ पतझड़ि मे बसात बड़ तेज बहैत छै तखन हम रहि नै पबैत छी समयिक वर्तमान प्रवाह मे डूमैत-उपराइत आ नहिए रहि पबैत छी ओइ मे हाथ धोबा लेबा लेल तत्पर आ चलि अबैत छी बहुत पाछू ओइ समय मे जकरा बादहिँ सँ सभ किछु बहुत तेजी सँ लगलै बदलऽ संघनक केर युक्तिक लय-ताल पर नचैत हम देखलिऐ जे जखन सौंसे दुनियाँ केँ लागल रहै एकमात्र चिन्ता जे केना रमौने रहतै कंप्यूटर अपन असंख्य अधुनातन प्रशंसक केँ अपन वर्चुअल दुनिया मे टू-के केर मध्यरात्रिक पश्चात की तखन हमर माय संघर्ष करैत छलीह भरि पोख साँस भरि लेबा लेल अपन छाती मे आ जखन २००० केर ३१ दिसंबरक अंतिम मिनट खत्म होइत-होइत भरि पोख साँस भरि देलकै सौँसे दुनियाक कंप्यूटरप्रेमी लोकनिक छाती मे गौरवक की हम हैंग भऽ गेल रही हमर माइ असमर्थ भऽ गेल छल अपन बीमार फेफड़ा सँ खींच सकबा मे, आ ओइमे भरि सकबा मे ओकर एक कोन भरि साँस एकटा एहन समए मे जखन गणितक असंख्य जोड़-घटावक बल पर लोक कऽ सकैत अछि किछुओ बना सकैत अछि रोबोट केँ द्रोणाचार्य आ जे की तय छै आब आवश्यकता नै पड़तै बालकक उपनयन केर नै रहतै गुरु-शिष्य परंपरा छौ ताग-तीन प्रवर नै जुटतै भौजी-काकी-मैयाँ गाबऽ लेल शुभै हे शुभै आ केओ नै जेतीह ब्रह्मक थान आ बूढ़-पुरानक आँचर मे नै खसतै-समटेतै केश मुंडन केर सुदीर्घ लोक-परंपराक नेटवर्क भाङि जेतै अकस्मात सभ लेल बेसी महत्वपूर्ण भऽ जेतै समुद्रक अतल गहराइ मे लटकल ऑप्टिकल फाइबरक मोटका तार लसकल रहतै सदिखन हमर चिन्ता मे एकटा फाँक बनि कऽ आब आतंकवादी ओकरा नष्ट करबाक करतै ओरियान आ कंप्यूटर केर उपयोग-उपभोग मे इतराइत हम बिन प्रयासहिँ नष्ट कऽ देबै अपन असंख्य स्मृति-अपन असंख्य आख्यान मुदा ईहो तय जे कोनो द्रोणाचार्य नै काटि सकतै कोनो एकलव्यक औँठा तेँ हम विरोधी नै बनि सकबै नव गति-नव संचारक बस अफसोस रहतै एतबे जे कहिया एतेक कऽ लैबे प्रगति हम सभ जे कंट्रोल-ऑल्ट-डिलीटक बटन केँ बेर-बेर हौले-हौले दाबि कऽ लेबै अपन जिनगी केँ रीस्टार्ट जखन जरूरति पड़तै बेर-बेखत जखन केओ तोड़ि देतै हृदए आ हैंग भऽ जेतै जिनगी तँ बेर-बेर हौले-हौले दाबि उठबै की पैडक कंट्रोल-ऑल्ट-डिलीट बटन केँ हम सभ आ रीस्टार्ट कऽ लेबै अपन ठमकल समए-ठमकल जिनगी बेर-बेर रीफ्रेश करैत रहबै माउस केँ राइट क्लिक करैत मुदा तखनो जेहन हुअए हमर-अहाँक दुनियाँ हम हँसबै तँ कविता बनतै हम कनबै तँ कविता बनतै सतत करैत रहबै प्रेम कविता सँ आ सबहिक प्रेम बनल रहतै कविता सँ एम्हर एतबा धरि अवश्य अछि विश्वास जे ओकरा नै पड़तै आवश्यकता कोनो कंट्रोल-ऑल्ट-डिलीटक बटन केर बेर-बेखत हौले-हौले फूल सन कोमल स्पर्शक औनाइत, की प्रफुल्लित मऽन मे ओ बनैत रहतै नव अवसर-नव विधानक रूप-रेखा खींचैत राति स्वप्न मे प्रिय ! राति स्वप्न मे कविताक द्वि पाँतिक मध्य अहाँक टिकुली आबि हमरा आँखि मे गरि गेल आ गरिते चलि गेल भीतर धरि आ जे की हरदम भेलै अय हमहुँ ओकर पछोर धएने घसिटाइत चलि गेल छलहुँ बहुत गहीँर धरि एकटा अद्भुत लोक देखलिऐ हमर ई पहिल अनुभव नै थिक एहन लोक देख सकैत अछि एकटा बताहे आ एकटा बताहेक करेज मे साँस लऽ सकैत छै एहन लोक एतए सभ किछु छलै महानगर छलै ओकर त्रास छलै नगर छलै ओकर घुटन छलै गामो छलै ओकर महक सेहो छलै ओ धार सेहो छलै जे अपन सम्पूर्ण वैभवक संग बहैत अछि हमरा स्मृति मे आ तइ पर एकटा झलफल पर्दा छलै अहाँक ललका ओढ़नी सऽन आ जे की बाद मे बूझलिऐ ओ अहीँ छलहुँ हमर समस्त स्मृति केँ झँपने अपना ओढ़नी सँ हम आगू बढ़ि बहुत दूर निकलि आब अपना गाम आबि दलान पर छलहुँ ठाढ़ कि बसात सिहकै छलै थलकमलक झमटगर गाछ पर आ ओइ पर लटकल रहै थोकाक-थोका फूल आ सोझाँ पोखरि मे कास छलै एम्हर बड़की टा बास छलै आ ओ सभ किछु छलै जे समयिक जोल सँ अनवरत संघर्ष कऽ रहल छै आ ओइ पर पुनः एकटा लाल पर्दा छलै आ जे की बाद मे बुझलिऐ ओ अहीँ छलहुँ अहीँक ओढ़नी छलै । हम आगू आबि अपन पिता लग छलहुँ ठाढ़ जिनक माथा पर समयिक अद्भुत चित्रकारी छलै हम सोचिते रही जे समए एकटा अद्भुत चित्रकार अछि आ की एकटा लाल पर्दा छलै जइ तऽर सँ एक जोड़ी पनिगर आस सँ भरल आँखि हमरा हेरैत छल आ ओइ दया पर ओइ करुणा पर एकटा लाल पर्दा छलै आ जे की बाद मे बुझलिऐ ओ अहीँ छलहुँ अहीँक ओढ़नी छलै । ई आँखि हमर माइक थिक जे हमर बाल्यकालहि सँ हमरा लेल एहने अछि कि हमर माइ संभवतः बूझैत छथिन्ह जे ऐ छौड़ाक आत्मा पर पछिला जन्मक बोझ छै पापक आ हमरा अपन माइक ऐ आँखि सँ डर लगैत अछि हम पसेना सँ भरि उठैत छी आ रातियो ओहिना भेल हम जागि उठलहुँ पसेना-पसेना भऽ जे सभसँ पहिने किछु मन पड़ल ओ लाल ओढ़नी छल आ जे की बाद मे बुझलिऐ ओ अहीँ छलहुँ अहीँक ओढ़नी छलै । एम्हर एखन हम आगू बढ़ि आएल छी पाछू रहि गेल अछि भोर कहिए कि हम दिल्ली मे छी जतऽ एकटा मोहल्ला छै एकटा तिनमंजिला छै बुढ़िया मकान मलिकानिक झौहैर छै आ दोसरे क्षण प्रेमक ओकर अभिनय छै पुनः एकटा विश्वविद्यालय छै ओकर सड़ल-गलल अंगांग छै भिनकैत माछी जकाँ हम सभ छिऐ आ एकटा झलफल पर्दा छै आ जे हम बाद मे बूझैत छिऐ ओकर रङ लाल छै उखड़ैत लोक- बसैत लोक पड़ाइत लोक- हेराइत लोक ठमकल-ठहिआएल लोक मुदा फिराक ओकर आँखिक अतल मे की मौका भेटओ आ ओ छप दऽ ककरो गरदनि काटि लेअए ऐ टहाटही दुपहरिया मे ओ सभटा वस्तु-जात छै जे साल दरि साल हमरा भाङि रहल अछि घृणित राजनीति छै आ छै हरेक दृष्टि सँ पहिने सुनिश्चित ई शब्द घृणा सर्वत्र छै आ सङहि एकटा नवका पीढ़ी छै जकरा पुरान पीढ़ी कोन मे लऽ जा कऽ कान मे किछु बुझा रहल छै आ एकटा झलफल पर्दा छै आ जे की बाद मे बुझैत छिऐ ओकर रङ लाल छै। एम्हर विगत किछु वर्ष सँ हम अपन सभटा सरोकार सामजिक भोगि रहल छी एकटा फाँस मे जे कत्तहु हमरा हृदए मे एकटा फाँक बुनि रहल अछि एम्हरहि हमर आँखि कमजोर भेल अछि कनैत-कनैत एना भऽ जाइत छै कहने छली हमर मैंयाँ हम नेनपनि मे बड़ कनैत रहिऐ। आब सौँसे दुनिया आ दुनियाक सौँसे फरेब आ बाद मे जा कऽ ओकर सौँसे कष्ट हमरा लाल बुझना जाइत अछि निस्संदेह हमर आँखि कमजोर भऽ गेल अछि आब हम दिनहुँ मे सूति रहैत छी ऐ द्वारे नै जे काज नै अछि हमरा लऽग आब हमरा राति मे बेसी सुझाइत अछि तेँ काल्हि राति स्वप्न मे पहिल बेर अहाँक टिकुली हमरा आँखि मे नै गरल छल प्रिय! पहिनहुँ बहुत दिन सँ हमरा सभ किछु लाल बुझाइत रहए मुदा राति जे प्रत्येक दृष्टि पर एकटा लाल पर्दा छलै पहिल बेर बुझलिऐ ओ अहीँ छलहुँ अहीँक ओढ़नी छलै... अहाँ नै जाएब नारायणपट्टी गाम अहाँ केँ बड़ नीक लागल ने नारायणपट्टी गाम? सभकेँ नीक लगैत छै नारायणपट्टी गाम! बशर्ते जे देखऽ जएबाक हुअए गाम अहाँ कहियो भोगने छी गाम? पैंचक इजोत मे इतराइत चान नै थिक नारायणपट्टी गाम! शहरक सौभाग्य लेल अपन ठेहुन पर जरैत टेमी मिझबैत-मिरबैत अहिबाती थिक गाम ! अहाँ आब कहियो नै जाएब नारायणपट्टी गाम किएक तँ हम नै हेराय चाहैत छी अपन एकटा आर अनमोल वस्तु जेना हेरा गेल हमर अस्मिता जेना हेरा गेल हमर स्वप्न ओइ नारायणपट्टी गाम मे आ नै बूझल कतेक लोक कतेक नारायणपट्टी गाम मे हेरा लेने होएताह स्वयं केँ हमरा जकाँ देबै ने चिनगी? औनाइत मऽन जखन तकैत छै ठौर तखन हृदएक रिक्तता अन्हार आ कुंठित मऽन संग बहार करैत छै मनक-मन कोइला अपन अथाह पेट सँ एकटा आस लऽ कऽ मात्र जे भरि जन्म बहार कएल कोइला सँ कम-सँ-कम एकटा हीरा तँ निकलतै अबस्से किन्तु नहियो निकलओ हीरा कोइलाक आगि तँ उष्मा देबे करत अहाँ सभ केँ आ जँ काज पड़लै तँ दहकबो करतै ओ आ अनर्गल वस्तु-जात जारि पएबै अहाँ बस एकटा चिनगी मात्र देबै ने अहाँ? ओ प्रेमहि छल...! प्रातः केर स्वर्णिम आभा मे पटिया पर सरिया कऽ राखल तानपूरा, हारमोनियम आ तबला-डुग्गीक मध्य अहाँक कोरा मे फहराइत कापीक पन्ना आ एमहर-ओमहर छिरिआएल हमर किछु शब्द अहाँक आँखि मे सेतु बनएबाक प्रयास कऽ रहल छल आ अहाँ खिड़की सँ बाहर विद्यापीठ दिस देख रहल छलहुँ कि हम आएल रही ...., एकटा पिआसल दुपहरियाक एकांत मे वाद्ययंत्रक मिश्रित तान मे हमर शब्द सभ केँ बहुत सेहंता सँ अपन ठोर पर अहाँ रखनहि छलहुँ कि हम आएल रही ...., पुनः एकटा श्यामवर्णी साँझ मे दीप केर ज्योति किछु कहि उठल छल कि अहाँक ठोर पर तखने हम अंकित कऽ देने रही वाद्ययंत्र सँ निकसल मिश्रित संगीत आ देखलहुँ अहाँक आरक्त नेत्र मे आ अहाँक गाल पर नचैत अप्रतिम धुन कि हम आएल रही !..,.. ओ प्रेमहि छल...! हम जी रहल छी धानक दूध भारी आ ठोस होइत रहलै आ शीत संग हौले-हौले बहैत रहलै समय आ व्याकुल मोन आ आँखिक सोझाँ रिक्त होइत रहलै खेत आ भरैत रहलै खरिहान गहूम सँ आ पुनः जलमग्न होइत रहलै अहाँक अत्यंत मनोहरताक परिपार्श्व मे ई आँखि गेंदा, तीरा, सिंगरहार आ थलकमल लुटाइत देखैत रहलै खसैत रहलै कओखन अहाँक फूलडाली सँ तँ कओखन अहाँक आँचर सँ हमर आँखि छोट-पैघ यात्रा करैत रहलै अहाँक अत्यंत मद्धिम मनोहरताक परिपार्श्व मे अनुखन नव पाँखि लगा उड़ैत रहलै ई आँखि छाती मे नेने एकटा गाम, एकटा धार, एकटा माय थान तर केर जाड़क भोर बदलल आकास मे दृश्य बदलैत रहलै मुदा अहाँक अत्यंत मद्धिम मनोहरताक परिपार्श्व मे लसैक कऽ ठमकल छै छोट-छोट कालक एकटा कोंढफट्टू दृश्यालोक...., हम जी रहल छी...!?... तोरा मे हम तोँ कत्तऽ छैँ बहिन ! कत्त रहबेँ काल्हि साँझ तखन जखन सुरुज घर मे घुसि भीतर सँ लगाबक ओरियान मे रहतै अपन दरबज्जा? हम तोरा छूबि कऽ देखऽ चाहबौ जे कतेक रास बचल छी एखनो हम तोरा मे जखन कनेके काल बाद होमऽ बला हेतै राति घनघोर!.... जतऽ रहैत छैक लौलसा ओकर अहाँकेँ लगैत अछि जखन कि हम अंतः छी कत्तहु तखन हम रहैत छी अहीँक आँचर तऽर झलफलाइत दीप सन जरैत आ आलोकित होइत स्नेहक आधिक्य आ ढबकैत इच्छाक उछाह सँ अहाँकेँ बूझक चाही जे लोक सदिखन रहैत छै ओत्तहि जतऽ रहैत छैक लौलसा ओकर ! एकांत मे अहाँ बेर बेर... बेर बेर हमर चेतना मे अहाँ आबि जाइत छी गीतक टेक जकाँ मोन रहैत छी जीवित हमरा ठोर पर... अहाँ प्रायः हरेक बेर, हरेक समए देखैत रहैत छी हमरा ढरकल आँचर की करी... की करी जे... कौखन तानपूराक खुट्टी मे लसकि तँ कौखन हरमुनियाँक तर मे दबि उघार करैत रहैत अछि हमरा... प्रिय ! अहाँक नजरि निविड़ एकांत मे लजा दैछ... एम्हर विस्मय सदिखन पछोड़ धएने रहैछ हमर ओत्तहु जतए अहाँ नहियो रहैत छी सद्यः हम किए आँचर सरिया लैत छी साकांक्ष भऽ... बेर बेर... किए...! रहैत छी अहीं मात्र रूप बदलि कऽ नीक जकाँ पर्दा सँ घेरल वातानुकूलित डिब्बा मे यात्रा दूरी मे नै समए मे कटैत छै दू विपरीत दिशा मे पड़ाइत विभिन्न संयोग-वियोगक झलफलाइत स्मृतिकण सँ बनल अमूर्त पटरी पर खिड़की सँ बाहिरक बन्न दुनियाक केबाड़ फुजबाक कोनो उपाय नै देख खुलि जाइत छैक मोनक गह्वर पबैत छिऐ ओइ मे रहैत छी अहीं मात्र रूप बदलि कऽ नव-नव मानू अन्हार कक्ष मे जरैत एसगर दीप केर बातीक लौ लहराइत हुअए अहाँक आँचरक हवा सँ आ अहाँक स्मृति मे थरथराइत हुअए पीपरक सहस्र पात ओइ गह्वरक रक्तरंजित देबाड़ पर प्रेमक विस्मयकारी स्तंभित अवकाश आ विछोहक निर्मम दुराग्रही क्रियाशीलता बनि कऽ ऐ संजोग सँ हम करैत छी प्रेम एकटा एहेन समय मे जखन स्वयं ई समय सभसँ पैघ चिन्ता हुअए सबहिक हम अपन भाषाक मादे अपस्याँत छी फिकिर करैत छी अपना पर खसैत प्रश्नक ओइ फुहारक जे केओ आखिर किए लिखैत छै कविता ओइ भाषा मे जेकर पाठकक संख्या विश्व मे शाइत सभसँ कम छैक ? आ हम ऐ प्रश्नक उत्तर नै देबा लेल कृतसंकल्प छी हुनका जनिक तर्कसंपन्न विभ्रमित दिमाग मे ई प्रश्न लहराइत छनि कोनो विजयपताका-सदृश मुदा मऽन मे जवाब तँ उठिते छैक समयिक धकिआएल हऽम सौभाग्यवश सटल छी प्रेमक गिलेबा सँ चुनायल विश्वास-विचारक मजगूत देबार सँ हमरा भेटल अछि सहारा आ जे की हमरा हाथ मे नै छल आ ने हमरा माइक हाथ मे आ नहिए हमर नानी आ नानीक नानी केँ हाथ मे जे ओ चुनि सकितै अपन मातृभाषा आ विद्यापति केँ अपन कविश्रेष्ठ ई एकटा संजोग छल आ ऐ संजोग सँ हम करैत छी प्रेम आ लोक ईर्ष्या कोनो भाषा नै चुनैत छै अपन कवि आ अपन भाषा-भाषी आ कोनो भाषाक क्षमता तय नै करैत छै समए ओ तँ कविक कान्ह पर पड़ल छै ठोस जिम्मेदारी बनि कऽ ऐ अतिसुंदर संजोगक की हम मैथिल छी आ जइ पहिचानक बिना काज तँ चलै छै मुदा तहिना जेना ऐ देशक सत्तैर प्रतिशत जनताक काज चलैत छै २० टका रोज कमा क‍ऽ हाइकू/ शेनर्यू दुर्लभ दृश्य/ असम्भव एतए/ गाम भऽ आबी जलक बोझ/ सँ लकदक देखू/ कृषक-नेह जनादेश ई/ वाष्पकणक थिक/ मंगलकारी प्रेमप्रवाह/ लजधि सँ छानल/ ई नभचारी उच्छवास ई/ प्रेमीयुगल केर/ धवलप्रीति चिडैँ पाँखि सँ/ तौलि रहल अछि/ देस दुनियाँ धरती पर/ नभ लाठी टेकल/ इंद्रधनुषी पसरल छै/ हरियर धरती/ तक आकास रोशन झा, जनकपुर। हाइकू प्रकृति नारी/ दऽ रहल संदेश/ व्यायाम करू शीतल इन्दु/ शीतलताक वर्षा/ हँसैत धरा कदीमा लत्ती/ फूले-बतिये तर/ खोँटल मूड़ी गामक कथा/ वेदना नोर व्यथा/ ककरा कहू सागर मध्य/ जल-क्रीड़ामे मग्न/ ई शांत पुंज गजल धड़कलै छाती राति, बहुत दिन बाद मिता जरलैए दिया बाति, बहुत दिन बाद मिता

छलैए सुखल जड़ि जे परुका रौदीमे फुल फुलेलै साइद, बहुत दिन बाद मिता

आब पएर कहाँ धरती उड़ी आकाश जे हम निशामे गेलिऐ माति, बहुत दिन बाद मिता

करै कोनो जोगार, तुहीँ छैं आश हमर देखहि कोनो साइत, बहुत दिन बाद मिता

देखिते ओकरा मुग्ध भेलै जे गृष्म रोशन जुड़िते गेलै पाँति, बहुत दिन बाद मिता प्रबीन चौधरी प्रतीक, जनकपुर। किछु हाइकू रोकने ठाढ़/ समुद्री आपदाकेँ/ हम छी नील गगल/ जीवनक जोगर/ हरित धरा क्षणिका हरित उपवनमे निर्मल सरित बनि पहरेदारी करैत गजल जवानीकेँ सहेजकऽ किए बैसल छी सजनिया चुनि लिअ एकटा हजारोमे अपन साँवरिया

ओकरे सौंपि हृदए आहाँ बनि जाउ महारानी तखन खन-खनाएत पाएरमे पैजनिया

देखब कहीं बिति ने जाए एहु बेरक लगन एखनेसँ जोड़ि लिअ प्रेमीसँ प्रीतक सिनेहिया

जवानीकेँ सहेजकऽ किए बैसल छी सजनियाँ चुनि लिअ एकटा हजारोमे अपन साँवरिया वर्ण ....१८ सुभाष चन्द्र क्षणिका पाथर पर बैसि टुकुर-टुकुर ताकि रहल संगे सोचि रहल किएक हमर संख्या कम भऽ रहल? रवीन्द्र कुमार दास क्षणिका अरुणक आभा श्वेत हिमालय मेरु सदृश ई स्वर्णिम कान्ति कुसुम ठाकुर हाइकू/ शेनर्यू हाइकू छैक/ विधा सरल तैयो/ रचि ज्यों पाबि। हमरा लेल/ गर्वक गप्प बस/ हमहुँ  जानि। नहि‍ बुझै छी/ ई विधाक लिखब/ कोन आखर। सलिल जीक/ ई मार्ग प्रदर्शन/ भेटल जानी। मोन प्रसन्न/ भेटल नव विधा/ छी तैयो शिष्या। डेग बढ़ल/ सोचि नहि‍ छोड़ब/ ज्यों दी आशीष। आस बनल/ अछि अहाँक अम्बे/ हम टूगर। ध्यान  धरब/ हम केना आ नहि‍/ सूझे तइयो। पाप बहुत/ हम कएने छी हे/ अहिंक धीया। जाएब कतए/ आब नहि‍ सूझए/ करू उद्धार। रमा कान्त झा ‘सौराठ’, सौराठ मधुबनी (बिहार) घर ने पथार अछि टुटल मरैया भैया नेने अएला सुन्दर बहुरिया, बुढ़ो जवान भेल देखि‍ कऽ बहुरिया, नेनाक चालि चले नवकी कनियाँ, दिन हुअए राति बैसल सदिखन लाबैत रहत बात, निकलथि जखन बजार तखन सिटी बाजे हजार, घर ने पथारी अछि टुटल मरैया, सभ मि‍लि‍ ताना मारए,  ई जुल्मी नजरिया, राति कऽ सिटी बजबैए, पीब तारी अओर दारू। चल चल रे हवा, पूब दिसा मिथिला राज्य बनाबी, जतए सीताक नगरी, ओतहि खिलए सभ रंग फुल, चहु दिस हरियर हएत खेत, नै तूँ करिहेँ ककरोसँ भेँट, चल चल रे हवा मिथिला देस, गंगा कोसी कमला बलान, नै करती ककरो कलेश, सबहक कमना पूरा करती, मिथिलाक नरेस, सभ दिन पूजब अहाँक भेस, चल चल हवा मिथिला देस! खिल रे बदन आएल वसंत नव नव खिल  रे बदन , पुरनका पात खसै जमीनपर, हरस मन देखै दिगंत , थिक आली वसंत, हरु जुनि हे मन अहुँकेँ, एक दिन आएत वसंत, रूप सिंगारक सजत तन, गाछ जनका फेर जाएत तन, अहुँकेँ आएत वसंत, बिसु जाएत जखन मन, अहुँकेँ आंगन खेलता, परम पीरियेक संग, अहुँकेँ आएत वसंत। मृदुला प्रधान एकटा आपबीती इलाइ-बिलाइ खूब खेलक गंभीर श्रोता बैसले रहलाह, अनचिन्हार लोकक भेड़िया-धसानमे, मुख्य अतिथि बिनु खैने गेलाह। ओइ दिन ओइ दिन.. सभासँ अबैत काल ओझा भेटलाह, कहए लगलाह- मैथिली बजैत छी तँ मैथिलीमे कि‍अए ने लिखैत छी? एतबा सुनितहि कलम जे सुगबुगाएल से रुकबाक नामे नै लैत अछि, किन्तु बचपनमे सुनल, दू-चारिटा शब्दक प्रयोगसँ की कविता लिखब संभव थिक? सएह भाव जुटाबए लगलौं डायरीमे, नाना प्रकारक बात, कुसियारक खेत इजोरिया राति, भानस-घर तँ भगजोगनीक बात। नेना -भुटकाक धम-गज्जड़मे कोइलीक बोली सुनए लगलौं, भिनसरे उठि कऽ एम्हर-ओम्हर टहलए लगलौं..... बटुआमे राखि कऽ सरोता-सुपारी, हातामे बैस कऽ तकैत छी फुलबारी। सेनुरिया आमक रंग सतपुतिया बैगनक बारी, चिनिया केराक घौड़ गोबरक पथारी। पाकल छै कटहर, सोहिजन जुआएल छै, अड़हुल-कनैल बीच नेबो गमगमाएल छै। कविताक बीचमे ऐ‍ सबहक की प्रयोजन? अनर्गल बातसँ ओझा बिगड़ियो जेताह, थोड़-बहुत जे इज्जत अछि, सेहो उतारि देताह. गाए, नेरु, कुकुड़, बिलाड़ि‍ सबहक बोलियोक बारेमे लिखल  जा सकैत छै किन्तु से सभ, पढ़एबला चाही, सौराठक मेलाक प्रसंग लिखू तँ बुझएबला चाही। कखनो हरिमोहन झाक ‘बुच्ची दाइ' आ ‘खट्टर कका'क बारेमे सोचैत छी तँ कखनो ‘प्रणम्य-देवता'क चारू ‘विकट-पाहुन’केँ ठाढ़ पबै छी। कखनो लहेरियासराइक दोकानमे, ससुर-जमाए-सारक बीच कोट लऽ कऽ तकरार, तँ कखनो होलीक तरंगमे, ‘अंगरेजिया बाबूक सिंगार। सभटा दृश्य, आँखिक सोझाँ एखन पर्यन्त नाचि रहल अछि। ‘कन्यादान 'सँ लऽ कऽ ‘द्विरागमन' तक, खोजैत चलै छी कविताक सामग्री, अंगना, ओसारा, भि‍ंडा, पोखरि चुनैत चलै छी, कविताक सामग्री . शनैः शनैः शब्दक पेटारी, नापि-तोलि कऽ भरि रहल छी, जोड़ैत-जोड़ैत अइठाम-ओइठाम, हेर-फेर करि रहल छी . जइ दिन , अहाँ लोकनिक समक्ष, परसै जकाँ किछु फुइज जाएत , इंजुरीमे लऽ कऽ, उपस्थित भऽ जाएब, यदि कोनो भांगठ रहि जाए तँ हे मैथिल कवि-गण, पहिनहि छमा दऽ दै जाएब। मिथिलाक माटीमे मधु श्रावनिक, हास-परिहास एवं मिठास, घोरैत-घोरैत, कखन ऐ भाषामे लिखए लगलौं, बूझिये नै पड़ल, बूझिये नै पड़ल...... घर-गृहस्थिक मथ-भुक्कीमे दही-चुड़ा-बैगनक भारसँ प्रभावित , जमबैत, कुटैत, तौलैत, कोन बेर कागज-कलम, माथपर सवार भऽ गेल, समदाउनिक गीत सुनि कऽ, विद्यापतिक कविता पढ़ि‍ कऽ, खबासक अनुपस्थितिमे चुल्हा पजाड़ि कऽ, अदौड़ी, तिलौड़ी, दनौड़ी, पाड़ि कऽ, कखन कविता पाड़ए लगलौं, बूझिए नै पड़ल......... सावन-भादोक झींसीसँ नुका कऽ, नेना-भुटकाकेँ कोरमे, बैसा कऽ, गोनू झाक गप्पसँ सभकेँ हंसा कऽ, पितरिया कजरौटामे काजर, सेक कऽ, कखन कविता सेकय लगलौं, बूझिए नै पड़ल............ भिनसरहे भानस-भात पसाए कऽ, तीमन-तरकारिक कठौती, सजाए कऽ, अंगना-ओसारा-चबूतरा, बहारि कऽ, गमगम घीउमे, सोहारी छानि कऽ, कखन कविता छानए लगलौं, बूझिए नै पड़ल.......... मूल बात ई जे एे भाषाक, विदुषि तँ नहिये छी किन्तु घोर-मठ्ठा करैत-करैत, अनचोक्के, ‘ई-विदेह' सँ परिचए, भऽ गेल, लोकक उद्गार चमत्कारिक साबित भेल, आ देखिते-देखिते, मिथिलाक पैघ समाजक कोनमे, हमरो प्रविष्टि भऽ गेल। कतए गेल  गणतंत्र –दिवस कतए गेल गणतंत्र-दिवस, झंडाक गीत कतए सकुचाएल, दृश्य सोहनगर, देखबैए छथि, कतए नुकाएल, लालकिला आर कुतुब मिनारक के नापओ ऊँचाइ, चिड़िया-घर जंतर-मंतरक छूटल आबा-जाही, पिकनिकक पूरी-भुजिया, निमकी, दालमोट, अचार, कलाकंद, लडूक डिब्बा लय, मित्र, सकल परिवार, कागजक छिप्पी-गिलास थर्मसमे भरि-भरि चाह, दुइ-चारिटा शतरंजी वा चादर लिअ, बिछाए ई सबहक दिन बीत गेल, आब ‘मॉल' आर ‘मल्टीप्लेक्स', दही-चुड़ा छथि मुँह बिधुऔने, घर-घर बैसल ‘कॉर्न-फ्लेक्स', कम्प्यूटर पीठीपर लदने, मुठ्ठी मे मोबाइल, अपनेमे छथि सभ कि‍यो बाझल, यएह नवका ‘स्टाइल'। यमुनाजी यमुनाजी तँ छथि उफनाएल, कहू वागमती, अहाँ केहन छी? एतक हाल.... कादो, माटि आर जल अथाहसँ, डूबल गाम, फँसल व्यापारी, ततेक गंदगी, कूड़ा-करकट कोने-कोने मच्छर भारी, ट्रैफिक जामक हाल ने पूछू एहन मचल छैक रेलम-पेल, बस, गाड़ी, ऑटो रिक्शाक सड़के-सड़के ठेलम-ठेल डबरा-डुबरी लांघि-लांघि कए राशन-पानी सेहो अनैत छी सरकारी सभ चाल-चलन तँ, ठीक अहाँ जनिबे करैत छी मंथर गति, कछुओ लजाएल नाला-नाली सभ डबडबाएल कटल-फटल दिल्लीक नक्शा सभ लोक-वेद छितराएल छी यमुना जी तँ छथि उफनाएल कहू वागमती, अहाँ केहन छी? अंति‍म हे ‘कॉमन वेल्थ गेम', अहाँक खोराक, हमरा जकाँ मूढ़ लोकक, समझसँ बाहर भऽ गेल स्वागतक थारीमे, केहन-केहन ज्योनारि, भाँपि-भाँपि कए दिमागे डोलि गेल परसनपर परसन, परसनपर परसन, के एतबा खा सकैए? किन्तु अहाँक साम्यर्थक बलिहारी, सुनि-सुनि कए गारी, निर्विकार भावसँ, खेने जाइछी, कनी बताउ तँ, केना पचबै छी? इंग्लैंडक महरानीक खास अर्दली भऽ कए एलौं, जहाँ छूरी-कांटासँ कटैत-घोंपैत, छोट-छोट ग्रास नफसत देखबैत, नैपकिनसँ ठोर  पोछैत, भोजन करबाक प्रथा छैक, अहाँ दुनू हाथसँ, निरंकुश व्यभिचारी जकाँ लपा-लप, खेने जाइत छी, दोसर देशमे जा कऽ केहन निर्लज्ज भऽ गेल छी अनपच, अजीर्ण, अफारा, चालीस करोड़क गुब्बारासँ, मात भऽ गेल, एहन पाचन-शक्ति, देखनिहारकेँ दाँती लागि गेल वुद्धि‍जीवी निरुपाय छथि, जनता निस्हाय, हे ‘कॉमन वेल्थ गेम', आर कतेक खाएब? इठलाइत बजलीह... धैर्य राखू, अंतिम चरण थिक, आब तँ बस मधुरेन समापयेत, किछु खाएब, किछ लऽ जाएब, एतए लोक कुदैत रहओ, भुकैत रहओ, अतिथि देवो भव:, गबैत रहओ  आर किछु नै सूझए तँ जय हो मृदुला प्रधान ई तँ बुझू अपना गोरपर अपने, कुल्हाड़ी मरनाइ भऽ गेल दऽ देलिऐक टिप्पणी मैथिलीमे एे भाषाक कवितापर बस..... बुझलौं जे भऽ गेल, मुदा से नै भेल भेल ई जे एकटा नवका द्वार, मुँह बौने, आँखिक आगाँ, अनायास ठाढ़ भऽ गेल पाठकगण तक भरि‍सक संकेत पहुंचल- ‘निश्चय मैथिल भाषी छथि' फलस्वरूप लिखबाक आग्रह लऽ कऽ आबि गेल सि‍नेह-सम्मानसँ भरपूर ‘ई-मेल' आ हमरा भाव-विह्वल होएबाक, पूर्ण बेवस्‍था भऽ गेल अपनो दोष कम नै अछि, कलमक माध्यमसँ, कुमरपतक गाम-घरमे, विचरण करबाक लोभ, टालए नै सकलौं आ किछु ने किछु लिख-लिख कऽ, निर्दिष्ट ठेकानपर, पठाबए लगलौं अब आगाँक यथार्थ ई जे बाल्यकालसँ किशोरावस्था पर्यन्त पढ़ल चारिटा किताब प्रणम्य-देवता, कन्यादान, द्विरागमन, चर्चरी आ भनसाघरसँ, रसोइया बबाजीक मैथिल स्वर-लहरी एतबे लऽ कऽ फुरफुराएल छलौं ‘येन-केन-प्रकारेन' एे सभसँ अर्जित शब्द-कोषक, लिपा-पोति करैत-करैत, किछु दिन पार लागि गेल किन्तु आब कि..... आब कि लिखू? यएह गुन-धुनमे अन्हरौखेसँ, चिकैर-चिकैर कऽ सोचैत रहैत छी, हे माँ सरस्वती, विनती करैत छी, उठाउ अपन वरद हस्त, किछु जोगाड़ कए दिअ, जइमे छवि‍ बनल रहए लेखनीमे एहन किछु भरि दिअ। प्रवीण कश्यप आच्छादन ई हवा हमरेसँ बहि कऽ अहाँ धरि जाएत अपन बहावमे ई हमर पुरुषार्थक गंधसँ अहाँक स्त्रीत्वक रजोगुणकेँ जगाओत। ई हवा हमरेसँ बहि कऽ अहाँ धरि जाएत अपन सड़ल गर्मीमे जँ-जँ सूरज अपन तापसँ हमर गर्मी आ गंधकेँ बढ़ाओत तँ-तँ ई उत्ताप मात्रा अहाँक अधरकेँ हमर लवणीय उन्मादसँ बहकाओत! ई हवा हमरेसँ बहि कऽ अहाँ धरि जाएत किंचित ऐ‍ मेघाच्छादित अकासक प्रसव-घड़ी नै आएल अछि मुदा वृष्टिक वेदना संजोगने एकर नीन्न उड़ल अवश्य छैक! नीन्न उड़ल अछि हमरो सबहक मुदा शुष्क नै पूर्णतः आर्द्रता व्याप्त अछि अपन भुजबंधमे। ऐ‍ रससिद्ध श्वेदक अतिवृष्टि अपन देहात्मीय प्रेमक सि‍नेह कताकेँ आओर कोमल बनाओत। ई हवा हमरेसँ बहि कऽ अहाँ धरि जाएत किछु हिंसक प्रश्नक दिशा जे अहाँ अपना दिस केने छी! प्रिया! अहाँ छोड़ू अपन जिद्दकेँ किएक तँ ऐ‍ सर्प वाणक वि‍षदंत हमरे अस्थिमज्जाकेँ गला कऽ अहाँ धरि पहुँचत। ई हवा हमरेसँ बहि कऽ अहाँ धरि जाएत ई हवा हमरेसँ.........। अरविन्द ठाकुर, १९५४- , परती टूटि रहल अछि (कविता संग्रह) आ अन्हारक विरोधमे (कथा संग्रह) प्रकाशित। आजाद गजल १ छिछिआइछ उत्कंठा हमर खन आर लग, खन पार लग हमर लिखल उजास सबहक मोल की संसार लग जाल मुँहमे बोल नै, छपय बहेलिया के बयान चिड़ैक बोली बुझत से नै लूरि छै अखबार लग रंगबिरही जिनीससँ ठाँसल रहै सभटा दोकान किन्तु जन-बेचैनी क औषधि नै रहै बजार लग एक समझौतासँ शासन वामनक सरकस बनल नै छलै पट्ठा कोनो दमगर बचल दरबार लग बुन्न मे सागर भरल, अणु मे भरल ऊर्जा अपार बिन्दु सरिपहुँ लम्बवत भए ठाढ़ होइछ आधार लग लोक-लादल नाह बाढ़िक पानि मे अब-तब मे छै ओ घिंचाबय छथि फोटो बान्हपर पतवार लग नफा क वनतंत्र मे पग-पग बिचौलिया रक्तबीज अकिल गुम्म अछि, केकर मारफत अर्जी दी सरकार लग उपरचन्ती माल क चस्का चढ़ल “अरबिन” एतेक बनल छी लगुआ कि भिरुआ, जायब नै अधिकार लग २ जनहितक ऐ‍ बजटमे एखन वित्तीय-क्षति अनुमानेपर अछि हमरा एना किए लगैछ जे संकट हमर प्राणेपर अछि अयोध्या मे रामलला लेल किए पड़ल भुइयाँ के संकट भू-अर्जन क अखिल भारतीय भार जखन हनुमानेपर अछि सगर देशक सभ इनार मे बैमानीक भांग घोराएल बनखांट मे बैमानीक जाँच-भार बैमानेपर अछि लूटि-कूटि कए, भीख मांगि कए पेट भरैए लोक, तखन संविधान केँ आत्मघातसँ तोड़ैक दोष किसानेपर अछि मार्क्स आर एंजेल्स केँ पीयल, घोँटल लाल-किताब मुदा मोनक कोनो अन्तर्तम मे बस भरोस भगवानेपर अछि गजल कहैत “अरबिन” जेना हम परकाया-प्रवेश केलौं ने निज केँ अछि बोध, ने अपन चित आ अकिल ठेकानेपर अछि धी‍रेन्‍द्र कुमार, वार्ड नं ०८, नि‍र्मली, जि‍ला- सुपौल।(हि‍ंदी वि‍भाग, सी.एम. बी. कॉलेज, डेवढ़, मधुबनी) (बि‍हार)। हमर गाम हमर गामक बीचोबीच अछि‍- एकटा इनार ओइ‍मे शोभायमान अछि‍ वि‍राजमान अछि‍ गामक परंपरा आ विधानसँ पदासीन छथि‍- कांकोड़, पेटफुल्‍ला माछ चौबटि‍ मारने-अजगर, कड़करैत, गेहुमन जे कि‍यो खसबैत अछि‍ डोल चूबि‍ जाइत अछि‍-पानि‍ हाथ लग अबैत-अबैत जकर जरूरति‍ अछि‍ गामकेँ गाममे बसएबला लोककेँ चूबि‍‍ जाइत अछि‍ पानि‍ हाथ लऽग अबैत-अबैत ठोरसँ नै सटैत अछि‍ पानि‍ आँजुर रहि‍ जाइत अछि‍ छुछे पानि‍क उपर‍ आनक प्रयास भऽ जाइत अछि‍- व्‍यर्थ गाममे अन्‍हार ककरो कि‍छु नै सुझैत छैक सभटा अछि‍ नपुंसक तखन करैत अछि‍ प्रयास बेर‍, बेर‍‍ घोषणा होइत अछि‍ बेर‍‍-बेर‍‍ “सभकेँ रोटी सभकेँ काज‍” गाम सुनैत अछि‍, अकास सुनैत अछि‍ आ सुनैत अछि‍ चौबटी परक पीपर आ हँसि‍ पड़ैत अछि‍- गामक घूरना आ नाचए लगैत अछि‍- कठघोरबा नाच गाबए लगैत अछि‍- “सभकेँ रोटी सभकेँ काज‍” इनारमे होइत अछि‍- ब्रेक डांस जश्‍न, कैबरे खुशहाल आ बेफि‍क्र प्रतीक अछि‍ हमर गामक। कि‍- हमर गाम अछि‍- एहने मस्‍त आ खुशहाल राखल अछि‍ इनारपर खलि‍या डोल आ ठोर अछि‍- सुखाएल। अखि‍लेश कुमार मंडल, पि‍ताक नाअों- श्री सुरेश मंडल, छात्र- अन्‍तर-स्‍नातक, जनता काओलेज, झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी। ट्रेनक चोरबा यौ भाय जुलुम भऽ गेल “कि‍ यौ भाय कि‍ भऽ गेल?” यौ भाय, हमर तँ पाँच हजारक बौगलीये कटि‍ गेल यौ भाय, और नै ने कि‍छु गेल भाय कनैत बाजल जे बक्‍सा-पेटी सभ चलि‍ गेल ट्रेनक लोक पुछलक जे एना कि‍ए भेल तँ दोसर आदमी पुछलक- समानपर धि‍यान नै गेल जे बौगली सहीत समान छि‍ना गेल भाय बाजल जे यौ समानपर तँ धि‍यान गेल मुदा, समान छि‍नैत काल हमर दि‍मागे पगला गेल भाय झंझारपुर अबैत-अबैत पुरा बेमत भऽ गेल झंझारपुरमे ट्रेनक मेल-भेल ओतएसँ भायकेँ नेमुआ हाल्‍टपर आनल गेल नेमुआमे भायकेँ भरपुर सेवा भेल नेमुआक प्रसि‍द्ध जानो-मानो बुथपरसँ भायक गाम फोन भेल भायक गामसँ हरबराएल तीनटा आदमी गेल ओतएसँ भायकेँ रोगी जकाँ रि‍क्‍सापर आनल गेल तुरत्ते भायकेँ डॉक्‍टरसँ इलाज भेल गामक प्रसि‍द्ध डॉक्‍टर बुधन बाजल जे एकरा तँ दि‍मागमे नि‍शाँ ढुकि‍ गेल भायकेँ तुरत्ते नि‍शाँ तौड़ैक सुइया देल गेल नि‍शाँ भूत जकाँ उतरि‍ गेल नि‍शाँ उतरि‍‍ते‍ समान तकैले घर वि‍दा भेल भाय समान नै देखि‍ घरमे लटुआ कऽ गि‍र गेल गाममे ई घटना बाढ़ि‍क पानि‍ जकाँ पसरि‍ गेल भायक ऐठाम मुखि‍या, सरपंच सभ पहुँच गेल मुखि‍या जी पुछल- भाय ई घटना कतए भेल भाय जबाब देलक- सोकरीमे हमरा चकलेटपर मोन गेल भाय चकलेट आनैले वि‍दा भेल भायकेँ चकलेट दोकानपर सी.आइ.डी. लागि‍ गेल सोकरी आ मनीगाछीक बीच ई घटना भेल तब सरपंच सहाएब पुछलकनि‍, भाय सभ चीज छि‍ना गेल नै सरपंच सहाएब फोन नम्‍बरबला डायरी बँि‍च गेल एकटा मोबाइलो रहए सेहो छि‍ना गेल कि‍ कहुँ मुखि‍याजी हमर तकदि‍रे बुडि‍़या गेल भायकेँ दू दि‍न बाद मन शांत भेल दहों-दि‍सि‍सँ फोन गेल फोन केनि‍हार सभ भरोस दइमे लागि‍ गेल भायक सार ई घटना सुि‍न तुरत्ते दौगल आबि‍‍ गेल सार भरि‍ पेट खा कऽ ससरि‍ गेल भौजी कहलखि‍न छोड़ू आब जे भेल से भेल मुदा एत्ते तँ भेल जे बुधि‍‍ बढ़ि‍ गेल बुधि‍‍ तँ बढ़ि‍ गेल मुदा अहाँले जे साया, साड़ी, बेलोज, सेंडि‍ल आ एगो पर्श अनै छेलौं सेहो छि‍ना गेल। तखन भौजीओक हृदैमे धक्का लागि‍ गेल। कालीनाथ ठाकुर, सर्वसीमा, दरभंगा, बिहार। अभिशाप बापक पाप कुण्डलिया १ पण्डितजी दण्डित भेलाह जखनहि कन्या पाँच पूर्व जन्मक कर्म फल, वा विधिक कोनो ई जाँच। विधिक कोनो ई जाँच, यएह चर्चा भरि गामक लाबथु नोट निकालि जत्ते सम्पत्ति छन्हि मामक। पनही गेलनि‍ खियाए, कतौ नै बैसलनि गोरा धन्यवादक पात्र छथि ‘‘कलियुि‍ग”क घोड़ा। २ सत, रज, तम, सभ व्यर्थ थीक शिक्षा शील स्वभाव गुण एकहि अछि अर्थ गुण अवगुण अर्थाभाव अवगुण अर्थाभाव भाव नै अछि गुण रूपक कन्या कारी, गोर, मूर्ख वा दिव्य स्वरूपक। मायक दूधक दाम जोड़ि‍ गनबौता टाका पुत्र हुनक गामक गौरव से कहलथि काका ३ बीतल शुद्ध आषाढक अगहन वैशाख। पहिल कुलच्छन बुझलनि, जखने घुरि एला सौराठ॥ घुरि एला सौराठ हाट करथु बेचारे विधिक लिखल के मेटल आब रहि जेता कुमारे॥ छोरलनि बीस हजार, लोभमे तीस हजारक। कए रहला गणना जोतखी, ऐ‍ साल बजारक ४ सुनलनि जखनि सुषेणसँ, दहेज निरोधी न्यूज तखनहि जेना दिमाग केर ढिबरी भऽ गेल फ्यूज ढिबरी भऽ गेल फ्यूज बराति कन्यागत दुनू घटकैती के करत घटक केर हाल ने सुनू बरक हाथ कनियाँ बरियातीक हाथ हथकड़, सरियी सभ करथु दौग-बड़हा कचहरी। ५ लूटन झा तँ लूटि गेला कए दूइ कन्यादान मोछ पिजौनहि रहि गेलाह करता की बरदान? करता की बरदान चोट छन्हि नगदी नोटक उजरल बरदक हाट प्रथम ई बात कचोटक घटक राज केर संग करथु बरु तीर्थयात्रा करथु मन्त्रणा गुप्त मुक्त भऽ सफल सुयात्रा ६ जाति जनौ बाँचत केना? कुल मर्यादा मान अन्तर्जाति ि‍वयाहमे घोषित नकद ईनाम घोषित नकद ईनाम संग सर्विस सरकारी कहय शास्त्र ओ वेद मात्र द्विज छथि अधिकारी करथु ग्रहण ककरो कन्या हो डोम चमारक मन डोललनि पण्डित जी के जे उच्च विचारक ७ भेल मनन मन्थन बहुत, ई समाज केर पाप!! की दहेज बनले रहत समाजक अभिशाप!! समाजक अभिशाप ब्याज ई पूँजीवादक। बेच आत्मसम्मान स्वांग धरि कुल मर्यादक सिद्धान्त नै बेवहारो केर करू प्रदर्शन तखनहि तँ भऽ सकत रोग उन्मूलन॥ (सन १९६८ईं.मे रचित दहेज विरोधी रचना) एक श्रद्धाञ्जलि--कोकिलकेँ हे कवि किरीट "मैथिल कोकिल, एलौं मनबए पुनि" स्मृति-पर्व"। सभ दिनुका ई गोरखधंधा; "हमहूँ मैथिल छी" मात्र गर्व॥१॥ सभ वर्ष तोहर वरषी मनाए, कए बेर कते संकल्प लेल। छी अखनौं ओहिना पछुआएल; आगूक जनमल जनु कतए गेला॥२॥ बिस्फी कनैछ महिषी कनैछ, छह कानि रहल अप्पन भाषा। तोहरे सभ पँच कोसी कनैछ; चुप करबो ले तोहरे आशा॥३॥ बचलनि एखनौं कए कोटि पूत, परनाति नाति घर आँगनि भरि। तोहरे बिछोहसँ कोर सुन्न; माइक ममता छह बजा रहल॥४॥ ई इंद्रधनुषकेँ देखि‍-देखि‍, अपनहि जड़िकेँ खोदि रहल। घर एकहि अछि तेरह चुल्हा; की बना सकब सपनाक महल॥५॥ कर्तव्य नाम "खाली लिफाफ" अछि स्वार्थ सिद्धि केर मन्त्र प्रबल। ई तीन पाँच केर समावेश; की बना सकब? सपनाक महल॥६॥ श्रद्धाक सुमन मौलाए गेल, अछि दग्ध भेल माइयक छाती। आकांक्षा आ आदर्श छुच्छ; बिनु तेलक की दीया-बाती॥७॥ सत्यानंद पाठक, गुवाहाटी। आह! जाड़ चलि गेल! कहलखि‍न बाबू सहाएब तँ हुनक आहमे देखलौं कतेक रास दुख कतेक रास अफसोस आ ओइ संग पसरल बोतल सभ, बसिया थारी जइमे काँट-कूश ओंघराएल कहि रहल छल कथा जाड़क आह! जाड़ चलि गेल। बाबू सहाएब कहलखि‍न जाड़ सन सोहनगर आर कुनो मौसम नै घरे रहू सभ किछु अगाँ पाछाँ घरक आगाँमे घूर घरमे घुरक सामान बस! बाबू सहाएबकेँ की चाही। दिन जखन आँखि बन्न कऽ लैत छलैक आ चढ़ैत रातिमे ठिठुरन तेज भऽ जाइत छलैक तँ बाबू सहाएब गरमाए लगैत छलाह आ जाधरि आँखि फुजल रहैत छलनि देह गरमाएल रहैल छलनि आ दिनकेँ सेहो ओहने हवा-बसात ओहने करियौन मेघ तँ दिन सेहो घरमे गरमाएल रहैत छलैक मुदा आइ भोरे जखन आँखि फुजलनि‍ तँ नुकाएल सूरज भक्क दऽ सुझलनि‍। आह! जाड़ चलि गेल। चहकि उठल जकांताक बेटा बेटी आ कनियाँ तखन काजमे लागल छलथिन्ह जकांताक बेटा सूरज देखिते फुर्र दऽ घरसँ निकलल। माए-बहिन अचरजमे ई छौड़ा-एक माससँ घरमे छल दुबकल। केना फुर्ती आबि गेलै। आ जकांताक बेटा घरसँ सड़कपर आबि दुनू हाथ ऊपर उठा कहि रहल छल आह! जाड़ चलि गेल। ई जाड़ ओइ जाड़सँ बेसी कनकनीबला छल। दिन-राति एक्के ढंगसँ अनवरत बहैत बसात। तीरोसँ चोख सोझे जेना छाती- पेट, पएरसँ होइत। पंजरामे धँसि जाइत छलैक बाबू सहाएबक दरबज्जापर अनवरत सुनगैत घूर दूरेसँ देखि‍ संतोष करए पड़ैत छलैक। जारनिसँ चूल्हि जड़त घूरक लेल कतएसँ आएत तँ साँझ पड़ि‍ते जखन बसात तेज भऽ जाइत छलैक दाँत ठिठुरए लागैत छलैक जकांताक बेटा फलालैन केर फाटल गंजीसँ उघरल देहकेँ झाँपक प्रयास करैत चुल्हाक आगाँमे बैसल माइक पाँजड़ि‍सँ सटि जाइत छल। पटियापर देहकेँ संकोचने आ पटिया ओढ़ने जकांताक परिवार बेढ़बला घरमे एक दोसराकेँ सटने राति काटि लैत छलैक मुदा, जकांताक बेटा अपन बापसँ कहियो ई पुछबाक साहस नै केलक जे अतेक जाड़े ओ अन्हरोखे दाउन करए किएक चलि जाइत छलैक ओढ़ैबला पटिया तखन से नै भेटैत छलैक। मुदा आइ सभ खतम किएक तँ सुनू कहैत अछि जकांताक बेटा आह! जाड़ चलि गेल। आह! जाड़ चलि गेल! दयाकान्त, गाम- नरुआर (जिला- मधुबनी)। मैथि‍ल ई छी मैथिलक पहि‍चान भरि दिन चुन-तम्बाकू खेता चिबबैत रहता गुटका, पान जम्हरे देखु थुकैत रहता मार्केट, ऑफिस हो वा मकान ई छी मैथिलक पहि‍चान

बात-बातपर झगड़ैत रहता नै बजबाक कोनो ठेकान एकबेर दोसर डपिट दनि‍ तँ लगताह भीजल बिलारि‍ समान ई छी मैथिलक पहि‍चान

गाम छोड़ि‍ परदेस बसै छथि‍ तखनो नै दोसरसँ मिलान भरि दिन दोसरक निंदा करता टांग घिचाइमे सतत प्रधान ई छी मैथिलक पहि‍चान

मैथिली बजबामे परहेज करता नै छन्‍हि‍ दोसर भाषाक गि‍यान कहबनि‍ ई शब्द एना बाजु तँ कहता हम छी कोनो अकान ई छी मैथिलक पहि‍चान

अप्पन मेहनत लगनक बलसँ कऽ लैत छथि कंपनीमे नाम परमोसनक बेरमे सदिखन नै रहैत छन्‍हि‍ बॉससँ मिलान ई छी मैथिलक पहि‍चान

सरकारी हुअए वा गएर सरकारी भेटत मैथिल उच्च स्थान कोनो कजाक आस राखब तँ नै हएत पुरा कोनोठाम ई छी मैथिलक पहि‍चान

सफल प्रत्याशीक लिस्टमे सभसँ आगू मिथिलाधाम हिनक लगन, प्रतिभाक आगू दैत अछि सभ दंडप्रणाम ई छी मैथिलक पहि‍चान

नै मैथिल ककरोसँ पाछू पाछू अछि मिथिलाक गाम रहलै हमर भूगोलमे सदिखन जीबछ, कोसी, कमला बलान ई छी मैथिलक पहि‍चान

हमर मैथिली भाषा सन मिठगर नै अछि कोनो दोसर ठाम आपसमे सभ मैथिली बाजू चाहे लोक मुनैए कान ई छी मैथिलक पहि‍चान रमेश १९६१- ,जन्म स्थान मेंहथ, मधुबनी, बिहार। चर्चित कथाकार ओ कवि। प्रकाशित कृति: समांग, समानांतर, दखल (कथा संग्रह), नागफेनी (गजल संग्रह), संगोर, समवेत स्वरक आगू, कोसी धारक सभ्यता, पाथरपर दूभि (काव्य संग्रह), प्रतिक्रिया (आलोचनात्मक निबंध)। गद्य कविता डॉ. काञ्चीनाथ झा ‘किरण’क नामक अद्वैत मीमांसा अहाँ स्वभिमानी छी, तँ किरण जी छी। जनमानसक पक्षमे सामाजिक छी, तँ किरणजी छी। अहाँ किरणजी छी, तँ मह-महाइत मिथिला छी। अहाँ मह-महाइत मिथिला छी, तँ निश्चिते कह-कह भुम्‍हूर सन किरणजी छी। अहाँ मानसिकता आ मोहविरामे ‘सोइत’ छी, तँ किरणजी नै छी। मोहविरामे पञ्जी-प्रबन्धक ‘बाबू साहेब’ छी, तँ किरणजी नहिए टा छी। अहाँ वास्तवमे ‘जयवार’ छी, तँ चलू कहुना कऽ किरणजी छी। जँ ब्राह्मण-वर्गीकरणमे कत्तहु टा नै छी अहाँ, तँ जरूर किरणजी छी। आ जँ दसो दिकपालमे सँ कि‍यो अहाँक पैरबीकार नै छथि, तँ ध्रुव सत्य मानू, अहाँ आर कि‍यो नै, किरणेजी टा छी। अहाँक मन-बन्ध सुमनजी-अमरजी सँ हुअए, तँ भऽ सकैए, संज्ञा रूपें अथवा मोहविरामे अहाँ साहित्यिक आ धार्मिक ब्राह्मण भऽ जाइ। अहाँक मन-बन्ध मधुप जीसँ हो, तँ निश्छल भक्त-हृदए मैथिल जीवनक लोकगायक अहाँकेँ मानबामे कोनो असौकर्य नै। जँ मणिपद्धजी सँ मन-बन्ध हुअए, तँ, अपनाकेँ मिथिलाक लोक-संस्कृति-चेताक उदात्त उदाहरण बूझि सकैत छी। आ जँ अहाँक मन-बन्ध किरणेजी टासँ हो, तँ सय प्रतिशत मनुक्खक अलावा अहाँ आर किछु भैय्ये नै सकैत छी। कविवर सीताराम झाक अन्योक्ति-वक्रोक्ति आइयो मिथिलाक जड़ता-जटिलतापर मूड़ी पटकि रहल अछि। अपन मुक्तिक प्रसंग तकैत आइयो राजकमल मिथिलाक ‘महावन’मे अहुरिया काटि रहल छथि। बाबा बैद्यनाथकेँ पाथर कहैत आइयो किरण-शिष्य यात्रीक अनवरत ब्रह्माण्ड-विलाप जारी अछि। धूमकेतु ‘मनुक्खक देवत्वे’पर एखनो ‘रिसर्च’ कऽ रहल छथि। मुदा साक्षात् किरणजी आइयो मनुखताक उपेक्षापर गुम्हरैत, पुरातनपंथीकेँ कान पकड़ैत/ माटिक महादेवकेँ छोड़ि मनुक्ख-पूजनक सुस्पष्ट उद्घोषणा कऽ रहल छथि। अहाँ खट्टर कका छी, तँ, माङुरक झोड़सँ चरणामृत लऽ सकैत छी। मुदा किरणजी जकाँ माङुरक ओही झोड़सँ सर्वहारा वर्गक अरूदा बढ़ेबाक बैदगिरी नै कऽ सकैत छी। अहाँ कञ्चन-जंघासँ कूच-विहार धरिक यात्रा कऽ सकैत छी, मुदा डोमटोलीसँ मुसहरी धरिक नै। अहाँ समाजिक सरोकारमे सुधारवादी भऽ सकैत छी, मुदा, किसान-आन्दोलनकेँ मिथिलाक जमीनपर उतारि परिवर्त्तनकामी नै। अहाँ भाङ पीब वसंतक स्वागत करब, तँ, अहाँकेँ, बताह कहबामे हुनकर संघर्ष-गीतक भास कनियो बे-उरेब हेबाक प्रश्ने कहाँ अछि? जहिना रूसोक पृष्ठभूमि बिना फ्रांसीसी क्रांति संभव नै छल, तहिना ‘मधुरमनि’क पृष्ठभूमि बिना ‘जोड़ा-मन्दिर’क अस्तित्व संभव कहाँ छल? ‘जगतारानि’ नै तँ ‘बाँसक ओधि’ की? माटिक अभ्यर्थना नै आ जनोन्मुखी सोचक सर्जना नै तँ आलोचनाक राज हंसक धोधि की? ओ प्राचीन गीतक ‘लाउड-स्पीकर’ बनि सकैत छलाह, नवीन गीतक सी.डी.क उद्गाता नै। ओ राज-सरोवरक हंस बनि नीर-क्षीर-विवेक(?) सँ आभिजात्य मीमांसाक पथार लगा कऽ साहित्यालोचनक खुट्टा गाड़ि सकैत छलाह। मुदा नव-चेतनाक प्रगति-शील गीतक गाता आ ज्ञाता नै। ओ किरणजीकेँ काव्योपेक्षाक दंश दऽ सकैत छलाह, मुदा हुनका काल-निर्णए आ आगत-पीढ़ीक ‘मूड’ अज्ञात छल। ओ वस्तुतः ‘शास्त्रीय’ छलाह, आ किरणजी ‘तृणमूल’क कार्यकर्त्ता। ओ ‘उरोज’केँ सरोजक उपमान बना श्रृंगार-काव्यक प्राचीन परंपराकेँ सम्पुष्ट कऽ सकैत छलाह। मुदा धानक उरोजमे दूध भरबाक सामर्थ्य हुनका कतए? ओ हुनकर जीवनक जड़त्व आ साहित्यक सीमा छल। अहाँ भासा-मंचपर लोक-चेतनाक सर्जक छी- तँ किरणजी छी। साहित्यिक-मंचपर सामाजिक-चेतनाक पोषक छी- तँ किरणजी छी। संस्कृतिक मंचपर जन-संस्कृतिक गायक छी- तँ किरणजी छी। राजनीतिक मंचपर दिशाहारा-वर्गक पुष्टिवर्द्धनमे ‘महराइ’ गबैत छी- तँ किरणजी छी। विद्यापतिक-मंचपर जनवादी गीत-संस्कृतिक उद्घाटक छी- तँ किरणजी छी। अहाँक जीवन-दर्शन सुचिंतित ऊर्ध्वगामी अछि- तँ किरणजी छी। जीवन आ साहित्यमे समरूप दृष्टिकोण हुअए- तँ अहाँ किरणेजी टा भऽ सकैत छी। शिवशंकर सिंह ठाकुर रुबाइ ठोर सँ ठोर सटए जाम टकराइ अछि नैन सँ नैन मिलए प्रेम कहाइ अछि दूर सँ हुनका जे देखलौंह एक बेरि ने हुनका सुधि रहल अपनो हराइत अछि गजल

किए रूइस कऽ चलि गेली ओ हमरासँ कोन अपराध जाने भेल हमरासँ

कत चलि गेली जिनका हम चाहै छलौं नेह लगा कऽ रूइस गेली हमरासँ

जिम्हर सँ जाइ छी देखै छी हुनके हम मोनक आशा ओ छीन गेली हमरा सँ

छाती पर पाथर हम राखि कऽ चलै छी हमरे जान छीन कऽ लऽ गेली हमरा सँ

भूख ने प्यास ने नींद लगइए हमरे चैन ओ छीन गेली हमरासँ

हुनकर प्रेम नस-नस मे रमल अइ की करू आब, हारि गेली हमरासँ

फुसिये हम मोनकेँ रहि-रहि पारताड़ै छी प्रेम बिना हम निरसल छी हमरासँ

राइत- दिन तड़पै छी मिलै लेल हुनकासँ ओ छथि जे हमरे नीन चोरा लऽ गेली हमरासँ

कतबो कहै छथि शिव शंकर जे मानि जाउ हमरे 'प्रेम' चोरा लेली ओ हमरासँ लगै छी अहाँ सोना जकाँ चन्द्रमा सन चेहरा अहाँ केँ, चानन सन शीतल छाँव अहाँकेँ , निकलै छी अहाँ जँउ कतउ सँ, गम्कैत छी अहाँ फूल जकाँ....

रून- झुन, रून- झुन पायल बजै अछि, चंचल अहँक नैन लागै अछि, देखि जिम्हर सँ अहाँ जाइ छी, ताकै छी अहाँकेँ हिरण जकाँ....

जूड़ा बना कऽ जे घरसँ निकलै छी, लागै छी अहाँ सोना जकाँ, अपन अदासँ जे अहाँ देखै छी, चमकै छी अहाँ बिजुली जकाँ...

राति इजोरिया नीक लगै अछि, लागै छी अहाँ चानी जकाँ, चोर नजरिसँ जे हमरा देखै छी, लागै छी अहाँ बादल जकाँ.....

"प्रेम अहाँ सँ हम करै छी" बाजू अहाँ कनी नीक जकाँ, जिनगी हमर हएत स्वर्गसँ सुन्दर, राखब अहाँ केँ रानी जकाँ.... श्रद्धान्जलि  आइ पुनः आएल ई दिवस अछि, हमर अहाँक आइ मिलन अछि, आइयेक दिन हम अहाँ एक सूत्रमे बन्हल रही  प्रेमक फूल अहाँक बाड़ीक  हमर जीवनमे आइ खिलल छल , आ हमर मिलन सेहो तँ प्रिय  आजुक पावस दिवसमे कतेको साल पहिने खिलल छल !!!

कतेक बढ़िया छल ओ दिन  आ अहसास हमर मिलनक, जखन अग्नि केँ साक्षी मानि कऽ, हम अहाँ आइये प्रणय-सूत्रमे बन्हल रही, ओ राति किछु खास छल, चाँदनी मे नहाएल छल, हमर अहाँक मिलनक गवाह बनल छल !!!

हम समर्पित भऽ गेल रही अहाँक अंकमे ओइ राति, आ अहूँ तँ अपना आपकेँ हमरा समर्पित कऽ देने रही प्रेमक रसमे हम दुहु गोटे सराबोर भऽ गेल रही, ओइ राति हमर दिल कतेक जोड़ सँ धड़कि रहल छल, आ धौंकनी जकाँ धधकि रहल छल हमर सम्पूर्ण देह, घाम सँ लथपथ ,एक दोसराक बाहुपास मे सिमटल रही, ओइ राति हम हम नै रही,अहाँ अहाँ नै रही, दुहू गोटा एक भऽ गेल रही !!!

हमर बाड़ीक तीनू फूल आइ पैघ भऽ गेल, कतेक सुन्दर लागि रहल अइ , अहाँ रहितौंह तँ देखितौंह आ हमरा चिकौटी काटितौंह, ई तीनों तँ अहींक 'प्रेम' गाछक फूल अइ, एकरा देखबाक खुशी कते पैघ होइत छैक , से तँ अहाँ बुझबे करैत छी, एकरा तँ व्यक्त नै कएल जा सकैछ, ई तँ अव्यक्त होइत अछि, आखिर मे ई शरीर तँ सेहो स्थूल भऽ जाइत अछि !!!

आइ अहाँ नै छी तैओ हमरा लगैए, जे अहाँ किम्हरो सँ हमरा देखि रहल छी, हमर खुशी आइ अपूर्ण लागि रहल अछि, तैयो हमर खुशीमे मानू अहाँ अपन खुशी ताकि रहल होइ, आइ हम कतेक असगर लागि रहल छी, रहि-रहि अहाँक स्मरणमे कोर काँपि रहल अइ, हमर मोनक भावना केँ कियो अनुभव कऽ सकैछ , हमरा लेल आइयो अहाँ ओतबे स्नेहपूर्ण छी !!!

अहाँ दऽ जखन हम सोचै छी, अहाँक संग बिताएल एक एक क्षण, एक एक पल  केँ स्मरण कऽ कऽ हम प्रफुल्लित भऽ जाइ छी, कोना कऽ अनझोके सँ हम अहाँ टकरा गेल रही, अहाँ कनी बेशी तमसा गेल रही, ओकर बाद तँ हमर अहाँक भेँट-घाँट होइते रहल, आ हमर अहाँक प्रेम बढिते गेल, फेर दुहु गोटे प्रणय -सूत्र मे बन्हि गेलौंह !!!

आजुक ई दिन अति पावन अइ, आब जखन की अहाँ नै रहलौंह, हम की करू ,आजुक दिनकेँ कोना कऽ मनाउ,  से नै फुरा रहल अछि, पहिने तँ दुहु गोटा मिल कऽ आजुक दिनकेँ मनबैत रही, अही दिन केँ विशेष रूप सँ यादगार बनबैत रही , ओतेक हिम्मत आब हमरा नै रहि गेल !!!

हम धीरे धीरे आब टूटऽ लगलौंह अछि , आब जखन कखनो अहाँक याद अबै अछि  हम चुप्पे सँ कानि लै छी, फेर बच्चा सभ केँ देख कऽ  अपन काननाइ रोकि लैत छी, मोन मे गबधी मारि लैत छी, भीतर सँ अशान्ते रहैत छी, मोन मे लललाहा आगि के देखैए? अहाँ तँ सदिखन हमर मोने मे रहब , तैयो आइ अहाँक बहुत याद अबैए , अकुलाइतो हम चुप छी , बुझाइए जे ई चुप्पी हमर साँसक संगे टूटि पाएत , मोनक बात मनहि रहि जाएत,  अपन बात आइ एतहि सम्पन्न करैत छी, आजुक ई कलम अहींकेँ समर्पित करै छी!!!

हमर ई फूल अहाँ स्वीकार करू, हमर ई नोर, ईएह श्रद्धांजलि अइ, गलती केँ माफ करैत , एकरा स्वीकार करू !!! इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा। भोर भेलै भोर भेलै, घरनीक तँ हाल बड़ा बेहाल छै, तहियो ओ नेहाल छै। घरनी धुरी छथि गृहस्थीक। आँखि मिरैत उठि पुठि भोरे, भनसाघर ओ दौड़ै छथि, चाय बनाबक छन्हि हुनका, केतली चूल्हापर चढ़बै छथि, नास्ता संग तैयार करैत छथि, दिनभरिक दिनचर्या, घरनी धुरी छथि गृहस्थीक। घर भरि कानमे तूर तेल लेने, एखनो निसभरि सूतल छथि, पतिदेव आ नेनाकेँ, जगेनाइ एखैन तँ बाँकी छै, ऑफिस आ स्कूल भेजबाक, सरंजाम केनाइ तँ बाँकिये छै, तहियो भोरतरंगक खुशी, समेटि आँचर मे बान्है छथि, घरनी धुरी छथि गृहस्थीक। जीवनक अइ आपाधापीमे, खुशीक फूल लोढ़ै छथि, ओइ फूलक सुरभित मालासँ, परिवारक बगिया सजबै छथि, जीवनक शृंगार बसल, सुंदर हिनक गृहस्थीमे, संगीतक सुर तान बसल अछि, मनभावन हिनक गृहस्थीमे, घरनी धुरी छथि गृहस्थीक! आँखि सुतल नै रातिभरि आँखि सुतल नै रातिभरि, मोन भटकैत रहल जिनगीक, बितल कल पर, कखनो आइ पर! मोनक गति विचित्र छैक, छन मे अइठाम, पलमे ओइठाम, यादि अबैत अछि अपन बचपनक, मधुर, सुंदर, सोहनगर बात, माँक लोरी, बाबीक प्यार, दुलार भैयाक बहिनक नेह, कनियाँ पुतराक ब्याह, देर तक, दूर तक, बस खेलहि खेल, निर्बाध स्वच्छंद!!! किताबक बस्ता, स्कूलक रस्ता, सभ यादि अछि। बरसाक पानि, कागजक नाव, गरमीक रौद, आमक टिकोल, जाड़क मास, थरथराइत गात, सभकिछु पाछू छुटि गेल। छुटि गेल ओ मेला ठेला, पावनि तिहारक अपनत्व रंग, बाग बगीचा, अंगना झूला, सभ किछु अछि ओहिना अंकित, हमर मोनक कोनामे, किन्तु एकहि पलमे जी उठैछ, अंतर्मनक शिशु आइ, मचलि उठल, आँखिमे भरि लैत छी, कतेको सुंदर रंग, आ समेट लैत छी, अपन आँखिमे, पलकमे बंद कऽ दै छी, अपन बचपन! अपन नेनपन!! किछु हाइकू/ शेनर्यू/ टनका टनका १ जीवनक ई रंग ग्राम्य जीवन मे पेबै अहाँ घोर गरीबीयो मे सभ व्यस्त आ सभ मस्त २ गरजितोम्भि सागर जल अइ धरती नभ सभ काँपि उठल देखि सिन्धुक कोप ३ निर्भीक टापू विशाल समुद्रमे मानू कहैत नर सुदृढ़ बनू कर्तव्य पथपर ४ आतुर भेल अइ घटा घनसँ मिलन लेल परबत प्रहरी निहारि रहल-ए ५ बिलाड़ि राज देबारपर बैसू या बैसू कतौ मूस नञि आओत कतबो करू घात ६ कलकलक सुमधुर गानमे उठि खसैत निर्झरक तानमे सुन्दर जलरूप हाइकू/ शेनर्यू यै बिल्लो रानी/ कहू तँ अहाँ लेल/ माँछ आनि दी बाग बगीचा/ सुन्दर जलधारा/ नीक नजारा जीवन जीवन अछि, आह, कराहक सिलसिला, पीड़ा आ दर्दक रंगीन, मनमोहक कथा! सभ किछु, भ्रम, स्वप्न, मिथ्या, प्रवंचना! दुनियाँक सभ रिश्ता अछि, ममताक मृगतृष्णा!

जीवनकेँ, सिर्फ अपना लेल जिनाइ, अपन लेल सोचनाइ, हमर जीवन, बस हमरे लऽ? नै नै, एना सोचबै तँ हएत स्वार्थ हमर, नितांत स्वार्थ! जीवनक किछु अर्थ भेनाइ, तँ जरुरी छैक, जीवनक एक लक्ष्य भेनाइ, तँ बेहद जरुरी छैक। ओ लक्ष्य, भऽ सकैत अछि, भिन्न भिन्न। ककरा हम कहबै, सत्य ककरा हम, असत्य ठहरा सकैत छी। किन्तु एक सत्य, मानव जीवनमे, आनि सकैत अछि, अथाह शान्ति असीम आनन्द! ओइ सत्यकेँ बुझबाक, हम प्रयास करैत छी निरंतर! हमरा लेल हमर जीवनमे, सभसँ पैघ वैभव, ओ स्वर्गिक सुख अछि, जे दैत अछि अपूर्व संतोष, मानव सेवामे छिपल अछि, हमर अंतर्मनक ओ, अलौकिक सत्य! मानव सेवा आ परोपकार संग, जी उठैत अछि, हमर आत्मा, तृप्त भs जाइत अछि मोन, ओइ आत्मिक सुखक आगू, दुनियाँक सभ सुख बुझाइत अछि छोट, छोट, बहुत छोट!! मानव सेवा आ परोपकार, यएह अनंत निधि अछि, यएह नितांत सत्य अछि, यएह एक लक्ष्य अछि, हमर जीवनक!! विनीता झा, पति-श्री गंगानाथ झा, धानेरामपुर, पो.लोहनारोड, जिला- दरभंगा। हम छी बुद्धिक थोड़ हे मैया हम छी बुद्धिक थोड़ हे मैया हम छी बुद्धिक थोड़ एलौं शरणमे माँ जगदम्बे झुकबैले अपन शीस जँ भेल मैया गलती हमरासँ क्षमा करू अपराध हे मैया मैया नै जानी पूजा जप-तप नै करी अहाँक ध्यान हे मैया नै करी अहाँक ध्यान तैयो मैया पूरा करू हमर मनोरथ लऽ कऽ एलौं आस हे मैया लऽ कऽ एलौं आस बहुत बिपति पड़ल अछि मैया नैय्या डूबि रहल अछि हे काली हे जगजननी मैया हमरो नैय्या पार लगाउ जे फँसल अछि बीच मझधार हे मैया.. असुर संहारिनी दुष्ट विनाशिनी हे भवतारिणी मैया आस लगेलौं एलौं मैया छोड़ि अपन घर संसार हे मैया छोड़ि घर संसार विनीता करै अछि विनती हे मैया करू ओकर विनति स्वीकार हे मैया करू विनति स्वीकार हे मैया हम छी बुद्धिक थोड़ अक्षय कुमार चौधरी, पिता राजनारायण चौधरी, ग्राम+पोस्ट: महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला: सहरसा। संप्रति दिल्ली स्कुल आ‌‍फ इकोनोमिक्स मे अन्वेषक आ समाजशास्त्री छथ॥ हिनक "Dowary among the Maithil Brahmins: aspects of Change and contitunity" बिषय पर पी. एच. डी. आओर "Marriage among the Maithil Brahmins" विषय पर एम. फिल. केर अन्वेषण काज छन्हि। वाणिक लैस उत्तराहा कहलथिन दखिनाहा कैं- रौ, तोरा माटि मे लैस छौ मुदा वाणि मे लैस नै. ...उत्तराहा? ...दखिनाहा? वाणिक ऐव तँ ऐव छैक! ...कैव तँ कैव छथि!! ओलक कब-कब उपजै छै गंगोतिओ माटि-पानि पर! कोशिकन्हो माटि-पानि पर!! बोल, भाव, स्वभाव, केर मिठास कि मोल भेटय बजार मे? वाणिक लैसक कि मतलब उत्तर, दखिन, शिक्षा, विदुता सँ! वाणिक तेख तँ तेख छैक! ... कैव तँ कैव छथि!! जगदीश चन्द्र ठाकुर “अनिल”, जन्म: २७.११.१९५०, शंभुआर, मधुबनी । सेवा निवृत बैंक अधिकारी। तोरा अङनामे -गीत संग्रह-१९७८; धारक ओइ पार-दीर्घ कविता-१९९९ प्रकाशित। गजल १ पढबाक मोन होइए, लिखबाक मोन होइए किछु ने किछु सदिखन सिखबाक मोन होइए अन्हड़ जे रातिखन एलै, सभ गाछ डोलि गेलै टिकुला कतेक खसलै बिछबाक मोन होइए सासुर इनार होइए आ डोल थिकहुँ हमहूँ किछु ने किछु एखनहुँ झिकबाक मोन होइए अहाँ आबि जे रहल छी सुनिकऽ बताह भेलहुँ गोबरसँ आइ आंगन निपबाक मोन होइए दुइ ठोर थीक अथवा तिलकोर केर तड़ुआ होइत अछि लाज लेकिन चिखबाक मोन होइए कोनो ऑफिसक चक्कर लगबऽ ने पड़ै ककरो ई बीया विचार-क्रान्तिक छिटबाक मोन होइए आजादीक लेल एखनहुँ संघर्ष अछि जरूरी व्यर्थ गेल सभ मांगब छिनबाक मोन होइए २ जै खातिर मारा-मारी अछि भात-दालि-तरकारी अछि छात्र गरीबक धीया-पूता विद्यालय सरकारी अछि ई जे उल्लू देखि रहल छी लक्ष्मी मैयाक सबारी अछि सदाचारके शिक्षा सभठां सभठां चोरबजारी अछि भोज करत रसगुल्लाके बड़का ई भ्रष्टाचारी अछि घूस, दहेजक चस्का बूझू छूआछूतक बीमारी अछि देश द्रौपदी, हम भीष्म छी हमरहुँ ई लाचारी अछि ३  गीत गजलमे लागल छी ओ बुझैत छथि पागल छी हम रातिकेँ राति कहै छी तेँ भरि गामसँ बारल छी अहाँ बाढिएसँ तबाह छी हम रौदी केर मारल छी हम स्वयंकेँ नहि चिन्हलौं देखू केहेन अभागल छी अहाँ कहै छी कविता सूनू हम यात्राक झमारल छी ऐ खेलाके यैह नियम छै सभ जीतल आ हारल छी पाइ प्रतिष्ठा पद नै चाही प्रेमक हम पियासल छी

४ कुदने की फनने की अन्हराकेँ जगने की सड़क आ ने बिजली कुरसी पकड़ने की पाप बढि गेल अछि गंगाजीकेँ बहने की शासन बहीर अछि कहने की सुनने की मोन अछि झमेलामे राम राम रटने की सभ ठाम सुखराम अन्नाजीकेँ सहने की शीलक विचार करू कुंडली टा देखने की

५ काँट-कूस अछि भरल बाट पर जहाँ-तहाँ नढ़िया कूकुर मरल बाट पर जहाँ-तहाँ

ई राजा कनिमोझी आ कलमाडीक युग छी केने छथि सभ दखल बाट पर जहाँ-तहाँ

हेय दृष्टिसँ देखि रहल अछि नर-नारी केँ साँढ़ आ महिस पड़ल बाट पर जहाँ-तहाँ

ऐंठन एखनहुँ धरि ओहिना के ओहिना अछि जौड़ कते अछि जड़ल बाट पर जहाँ-तहाँ

खोपडी ठाढ़ छलै अनगिनती बिला गेलै ठाढ़ भेल अछि महल बाट पर जहाँ-तहाँ

बूझि पड़ैये जीत गेल छथि पुत्र पिता सँ रंग बहुत अछि उड़ल बाट पर जहाँ-तहाँ

आइ हजारो अन्ना केर आवश्यकता अछि सत्य बहुत अछि गड़ल बाट पर जहाँ-तहाँ

६ अपने छी एत्तऽ आ मोन कतहु टांगल अछि जानि नहि देखऽ ले की की सभ बाँचल अछि

सभठां बिलाइ छै आ सभ ठाम रस्ता घूरब कतेक बेर सभ बाट काटल अछि

कर्जा पर कर्जा आ रसगुल्लाक भोज ओझा बताह आ कि भरि गाम पागल अछि

मुंबइमे बेटा आ दिल्लीमे कनियाँ बूढ़ मोन दूटा हजार ठाम बाँटल अछि

जीवकान्त, गौहर, वियोगी, विहंगम देखू असंख्य फूल मालामे गाँथल अछि

गाम-गाम देखू ई दृश्य महाभारतक शतरंजक खेलमे सभ हाथ बाझल अछि

जहिया समयलीह सीता ऐ धरतीमे तहिया सँ धरती हजार बेर फाटल अछि ७ अगहन के धान छी अहाँ पूर्णिमाक चान छी अहाँ

दौड़ि-दौड़ि थाकि गेल छी दूर आसमान छी अहाँ

बेर-बेर छी पढ़ैत हम वेद आ पुराण छी अहाँ

काँट अछि भरल बाट पर दूभि आओर धान छी अहाँ

जीबितहिं स्वर्ग देखि लेल पान आ मखान छी अहाँ

जिनगीमे प्रश्न अछि कते सबहक निदान छी अहाँ

८ कर्जाक मोटा माथ पर उठेलहुँ कतेक बेर बैंकक गाड़ी देखि कऽ पड़ेलहुँ कतेक बेर

जमायक बात सूनि आइ करेज फटैए सासु-ससुर केँ हमहूँ कनेलहुँ कतेक बेर

बाँचि गेलहुँ चोर आ उचक्का सँ दिल्लीमे मुदा अपनहि घरमे ठकेलहुँ कतेक बेर

नियारि कतहु जायब से पार नहि लागल तत्कालहि के टिकट कटेलहुँ कतेक बेर

सुंदर सँ सुंदर शब्दक तलाशमे रहलहुँ लीखि-लीखि अपनहि मेटेलहुँ कतेक बेर

आइ चुरूक भरि पानिमे डूबैत छी किए बाढ़िमे कतेक लोक केँ बचेलहुँ कतेक बेर

९ मन्दिर सँ हम उतरि गेलहुँ सत-सत बाजब बिसरि गेलहुँ

दू टा कन्यादान शेष अछि एकहिटामे उजड़ि गेलहुँ

आबि रहल छल चन्दा मांगऽ बाध दीस हम ससरि गेलहुँ

कजरी लागल छलै बाट पर नहि देखलियै पिछड़ि गेलहुँ

अहाँक आँखि केर नोर भेलहुँ हम अहँक गाल पर टघरि गेलहुँ

हमहूँ हाट छलहुँ भरि गामक साँझ पड़ल तँ उसरि गेलहुँ

१० आएब नीक लागल, छिड़ियैब नीक लागल दू-चारि दिन बिताकऽ घुरि जैब नीक लागल

सत्य बाजि कऽ कियो मुइल कहाँ कहियो ईशा जकाँ शूली चढ़ि जैब नीक लागल

जहाँ-तहाँ गहुमन सोझाँमे ठाढ़ भेटल कात दऽ कऽ आगाँ बढ़ि जैब नीक लागल

भाफ जकाँ कखनहुँ सागरसँ उड़ि गेलहुँ मेघे जकाँ कखनहुँ झड़ि जैब नीक लागल

हँसिए कऽ कटलहुँ पताल केर जीवन आकाश जखन भेटल उड़ि जैब नीक लागल

ओम्हर छल परसल छप्पन प्रकार व्यंजन एम्हर अहाँक चिट्ठी पढ़ि जैब नीक लागल ११ हमर-अहाँक कसूर बहुत अछि दिल्ली एखनहुँ दूर बहुत अछि

कीट नियंत्रण अछि आवश्यक ऐ घरमे झिंगूर बहुत अछि

डाकनि दऽ कऽ सुनबऽ पड़तै  बहुत कानमे तूर बहुत अछि

बास साँप केर निश्चित बूझू ऐ कोठलीमे भूर बहुत अछि

जहाँ-तहाँ सोहरल अछि चुट्टी घरमे छीटल गूर बहुत अछि

नोर भरल मैथिलीक आँखिमे एखनहुँ महग सिन्दूर बहुत अछि

१२ आगि बोनमे पसरि गेल अछि लोक सड़क पर उतरि गेल अछि

कुरूक्षेत्रमे देव दनुज छथि उठापट्टक बजरि गेल अछि

रंग विरंगक छल फुलवारी असमय सभटा उजरि गेल अछि

चौंसठि बरखक वरक गाछ ई झखड़ि गेल अछि हहरि गेल अछि

नौजवान चौहत्तरि बरखक थाकब सूतब बिसरि गेल अछि

भारत माँ केर आँखि नोरायल नोर गाल पर टघरि गेल अछि विकास झा रंजन नजरि नजरि बचा कऽ नजरिसँ देखै छी, देखी ने अहाँ डेरा कऽ देखै छी! जखनो देखै छी मुदा नवे लगै छी, तैं नित नजरिसँ नुका कऽ देखै छी! सोझाँमे अबितौं बाटे तकै छी, नजरिमे अहींक छाही देखै छी! नजरिसँ सभटा खेरहा करैत छी, चुप्पे मुदा हम सभटा देखै छी! अहाँक रूपक किताबो पढ़ै छी,  जुनि सोचू गलत नजरिसँ देखै छी! गजल मोन मुंगबा फुटइए मीत हमर सोझा अबैथ जखन प्रीत हमर

हुनक जूट्टीमे गूहल भबित हमर हुनक गजरा गछेरने अतीत हमर

खाम्ह कोरो बनल मोन चीत हमर हुनक लेपट सौं छारल अइ भीत हमर

हुनक नख शिखमे नेह निहीत हमर हुनक कोबरे करत मोन तिरपित हमर

हम हुनके सिनेह ओ सरीत हमर हुनक मुस्की सौं जागे कबीत हमर अनिल मल्लिक, बिराटनगर। गीत एकटा काल खण्ड, एतहि जिलौं हम यथार्थक हलाहल, एतहि पिलौं हम मेटायल तृष्णा, यश मान धनक ओह! क्षुधा कहाँ मेटाएल, हमर मनक यतऽ चिक्कन रस्ता, वातानुकुलित अट्टालिका, गतिशील सभ किछु ओतऽ खरंजा, खपड़ा, कड़गर धुपमे ठाढ़ ताड़क गाछ, आर नै किछु शर्द सीसा, उच्छवाशक भाफ सियाही, आंगुर अछि कलम अहिना महिशारीसँ मेलबॉर्न यात्रा, लिखैत मेटबैत छी हम दिग्भ्रमित उदिग्न मन नै अछि, आब स्पष्ट अछि, करब कि एहन करब, मातृ ऋण सँ उऋण भऽ जाएब, बेसी हम कहब कि विरक्त भऽ आएल छलहुँ, भेटल दुनियाँ रंग बिरंगी पएलहुँ एतहि हुनको, पग पग साथ दैत जीवन संगी चुपचाप देखैत रहैत छलथि, असगरे अपनासँ लड़ैत हमरा कि भेलै नै जानि, कखैन ओ एलथि, देलथि कन्हाक सहारा अश्रुपुरित, बाजि उठलथि धीरे सँ, आब चलू केओ यतए रहए तँ रहौ पलटि कऽ हम देखलहुँ हुनका, चमकि उठल बच्चा जकाँ आँखि.. ओहो! मेघाच्छादित भादब मास, घुप्प अन्हार, जेना भेल अचानक प्रकाश चहुँओर हजारो चिड़ैकेँ एकसाथ चिड़बिड़ चिड़बिड़, जेना भऽ रहल होइ नव जीवन भोर बहुत भेल, पिअब नै ई चमकैत हलाहल, आब पिअब अमृत प्याला मन मलङ्ग अछि, चललहुँ हम सभ, बजा रहल प्रेमक मधुशाला आजाद गजल १ जखनसँ खसल आँचर देखलहुँ हम मोन पर धरल पाथर पयलहुँ हम भूख सँ बिलखैत कोरामे नवजात छलै नयन मे साओन भादव देखलहुँ हम जिन्दा लहाश सभक आँखि चमकैत छलै मनुखक भेष मे राक्षस देखलहुँ हम बुझू जेना घेरने, दुश्साशनक भीड़ छलै पाण्डव भेल जेना  आन्हर देखलहुँ हम तखने दूध नूआ लेने आएल एगो बच्चा ओकरे कृष्ण युग  द्वापर बुझलहुँ हम २ मय मयखाना साकी प्याला, केओ हमरा सन पिबै बाला टुकड़ी टुकड़ी भेल जीवनक हमरा सन जीबै बाला

चन्द्रमुखी आम्रपाली हटलै पाकिट मे जे पाइ घटल पारोकऽ अर्पण ने हम देखलौं नित दर्पण देखै बाला

निशा छटल निसाँ टुटल पएलौं घर नै कोठरी छल पारो छल नव राह पकड़ने हारलौं हम जितै बाला

अर्थक अर्थ नै बुझलौं अनर्थ हेतै कहाँ बुझल छल सगरो जिनगी बीकि रहल अछि मारि करै कीनै बाला

छद्म छुअन सँ हर्षित तन आत्माक स्पर्श बुझलक नै टोकिऐ तँ हमही बौराएल कहाँ केओ अछि मानै बाला

रंग रभसक भरम मे छै जे जुआनी उजड़ि रहल जीवन रंग लूटि रहल नित नव रंगक मधुशाला ३ ने भूत लिखू ने भविष्य लिखू चलु आब अहाँ वर्तमान लिखू असगर नै सभ संग चलू  करब अहाँ नव निर्माण लिखू

कि भेल औ भेल किए कएलक के जर्जर  आब बिसारि दियौ जइ पर सन्तति गर्व करए लौटेबै अतीतक मान लिखू

ने बाट जाम ने मगज जाम आब नै ना-नुकुर बिसारि दियौ उमंग भरु तरंग भरु आब चलतै नव अभियान लिखू

विश्वास राखू इच्छा शक्तिपर चलू दंभ अहं केँ बिसारि दियौ अगड़ा पिछड़ा कि होइछै यौ लेब सभ मैथिलक साथ लिखू

विचार रखियौ स्पष्ट जखैन राज भेटत तँ प्रारुप केहन दूर करु शंकाकेँ अहाँ राखब सम-भाव देब सम्मान लिखू

गान्धीगिरी चलू पुरान भेल अन्नाक जोर तँ मनबै ने अहाँ ने रक्त बहै  ने नोर झरै  ने हेतै किन्हको अपमान लिखू

एफ.डी.आइ सँ खतरा कि सहकारिता पर चलू ध्यान दियौ सबल हेतै अर्थतंत्र अही सत्य केँ करब आत्मसात लिखू

प्रतिभा पलायन किए नव अवसरक चलू सृजन करु नव सोच लाउ कि लौटथि सभ लगबथि माटिकेँ माथ लिखू

पाथर पथ पर प्रचंड अछि डगर मानलौं उटङ अछि सागर बान्हि सकै छी अहाँ नव इतिहासक शुरुआत लिखू

तन सँ मन सँ अहाँ प्रसन्न रहू स्वस्थ स्पर्धा मे भेद नै होए बढ़ू आगाँ शुभकामना अछि नव बर्ष सँ नव प्रभात लिखू हम कहि दैत छी आइयो सजल छी पुतरी जेहन हम, लऽ कऽ जेबन्हि हम फेरो चाय लाख मना केलहुँ हम फेरो, चलल हमर नै कोनो उपाय फेर अओलथि देखबा लेल हमरा, पुत्र, पिता आ संगे माय बजता, भुकता, देखता, सुनता फेर निकलता कहिते बाय फेर असमंजसमे कटत समय किछु, चिन्तित रहता बाबु, भाय भोर मन्दिरमे सांझे चौरा, सदिखन प्रार्थना करती माय रंग, रुप, गुण चाही विलक्षण, संगे जथगर जोगार भऽ जाए मिन-मेख हमरेमे निकालथि, अपन पुत्रक खुब बड़ाइ हमरा देखता एना की कहथि, चलु प्रोडक्टक डिस्प्ले भऽ जाए सोचि बुझि कऽ ने जाइ छी कतहु यौ, बेर बेरक झमेला किए भाइ? कहिया धरि एहन सहब हम, आब करब हम ठोस उपाय कलम बनल अछि शस्त्र हमर, आ माँ शारदे छथि सहाय यश, कीर्ति, धन, मान, प्रतिष्ठा, सभकेँ लेब हम आब रिझाय पीड़ा की होइ छै तखन ओ बुझता, जखन हुनका हम देब घुमाय आजुक बाद ने सजब एना हम, ने लऽ कऽ आब जाएब हम चाय किछु दिन बाद ओ चाहता "अपोइन्टमेन्ट", हमरा संग पिबै के चाय !! स्वीकारोक्ति आखर आखर शब्द लिखै छी, शब्द अर्थ औ मर्म लिखै छी मात्र लिखै छी, मर्म ने बुझलहुँ, केलहु हम एहन कुकर्म लिखै छी आत्मा हमर कराहि रहल अछि, पश्चाताप जेना डाहि रहल अछि समधीयाना उजाड़ि कोठा भरलहुँ, भेल बड़का अधर्म लिखै छी पुत्रक पिता छलहुँ, दम्भ भरल छल, डुबल लालच मे आकंठ लिखै छी बएसश ढलल, बिष दन्त झरि गेल, देलहुँ जे दहेजक डंक लिखै छी पुत्रवधु छथि माता सीया सन, साउस ससुरक ध्यान रखै छथि देखि कए हुनकर सेवा औ समर्पण, लज्जासँ भिजैत नयन लिखै छी साउसो धीया छलथि, ननैदो धीया छलीह, दहेज ने कोनो रीत लिखै छी सीया सन धीया, घर घर मिथिलामे, होइ धीया के जीत लिखै छी 'वैष्णव जन....पीर पड़ाइ..' बिसरलहुँ, अपराधबोध दिन रैन लिखै छी अन्त समए निकट आबि रहल अछि मुदा मोन मे नै अछि चैन लिखै छी प्रेम लिखै छी, प्रीत लिखै छी, कहियो बिरहक गीत लिखै छी अपराध हमर क्षमा करु “माँ मिथिला”, हम ई धीयाक जीत लिखै छी साँझ दुपहरिया भोर लिखै छी, सन्तापक नै कोनो छोर लिखै छी किन्हको ने हुअए येहन पीड़ा पछतावा, विनती हम कर-जोर लिखै छी सुनि सभ व्यथा “दद्दा” केँ अएलहुँ अछि, हुनक मात्र बयान लिखै छी वर्ण विन्याश मे छी हम अज्ञानी, गलतीक देब क्षमादान लिखै छी कहए सुनए मे सहज लगै अछि मुदा आब करु दृढ संकल्प लिखै छी "आत्म-लोकपाल" देत मुक्ति ई तक्षक सँ, नै अओर कोनो विकल्प लिखै छी आखर… आखर… शब्द…! आनंद झा "मैथिल" पंचैती एक बेरक बात कहै छी गाममे होइत रहै पंचैती अप्पन खुट्टा एतै गारब तइ ले भेल फरिछैती

सुखु बाबु अध्यक्ष बनला पुछलनि की भेल बात टुनमा-मुनमा चला रहल छल एक दोसरपर हाथ मंगरू कहलक यौ पंडी जी कोना कऽ छुटतै झगरा एकरा दुनुमे मुनमा सदिखन करैत रहै छै रगरा

मंकुआ केँ  रहल नै गेलै कहलक मंगरुआ चुप रह मुनमा संग तोरो झगरा छौ अखन कने तों गुम्म रह

भोला बाबू झट दऽ  बजला कोन काजमे लागल छी बहत्रम साल हमर चढ़ि रहल अछि बिन बियाह हम अभागल छी

कोरियानी सँ छप्पन महतो हरबड़ हरबड़ आएल सभ पञ्च केँ कल जोड़ि कऽ बैसल छल सरियाएल

मोती काका जोर सँ बजला टुनमा मुनमा सुनि ले जत्तऽ जत्तऽ खुट्टा गारबें दुन्नू खद्धा खुनि ले

अहजव शाहू चट दऽ बजला दुन्नू बंद करू ई नाटक हमरो टोलमे सुनरी काकी चला रहल छै टाटक

केम्हरो सँ  पहलमान जी केँ  देखलौं लाठी लेने दौड़ला सुखु बाबू लंक लऽ कऽ देखते ओतऽ सँ भगला पंचैती टूटि गेल तखने टुनमा-मुनमा देखलक छोड़ ई झगड़ा बंद ई रगरा दुनू भैयारी सोचलक

टुनमा कहलक सुन रौ मुनमा खंती आ खुट्टा लऽ कऽ आबए जतए मोन छौ छोट भाइ छें खुट्टा ओतए धसाबए

मुनमा केँ रहल नै गेलै कहलक, भैय्या.. हम सभ की करै छलहुँ , एक ठाम जँ नै जीबै तँ कोन जहर पीबै छलहुँ

छुटल झगड़ा मिटा गेल रगरा दुन्नू हाथ मिलेलक अंतमे बाजल यएह छै मिथिला सबहक नाम बढ़ेलक हमरा भेटल एक टा चिट्ठी हमरा भेटल एक टा चिट्ठी, किछु नुनगर किछु छल खटमिट्ठी, छल लिखल दू-दू हाथ तूँ कऽ ले, अपन ताकत आजमाइस तूँ कऽ ले।

पहिले हम मोनमे मुसकेलौं, चौबीस घंटा बाद हम गेलौं, सोचलौं संगी सभ की जाएत, हमरा देखते ओकर भूत पड़ाएत,

कदम पड़ैत ओ चोर नुकाएल, देलौं लात बिलसँ बहराएल, जाइत देरी ओ छोड़लक फोंफ, झट धेलौं हम ओकर झोंट।

बाप बाप कऽ केलक चित्कार, सुनू सुनू मिथिला दरबार, पएर पड़ै छी सभ गोटे कऽ, सभ सुनू ई करुण पुकार।

चेला ओकर खूब मुसकायल, मारिक डरे गुरु पड़ायल, गुरुजी लागल गरियाबऽ कनही पिल्ली जेना चिचियाबऽ,

भागिते ओकर ढेका खुजल, लागै जेना कुनो बिलाड़ि भीजल, मुँह धऽ ओकरा खूब थोपड़ेलौं, मिथिलाक हम मान बढ़ेलौं।

मिथिलाक ई नाम डुबेलक, झूठे-मुठे घाम चुएलक, कहलक हम छी बड्ड प्रतापी, लेकिन अछि ई खल संतापी।

अपनाकेँ बुझए लाल बुझक्कर, एकरासँ ज्ञानी अछि खच्चर, कौआ सन हरदम चिचियाय, गीदर सन सौंसे हुलकाय।

बागर जकाँ मुँह लगै छै, चुहरमल सन काज करै छै, गिरगिट सन ओ रंग बदललक, मैथिलक ओ पाग खसेलक।

कहलक हम छी मैथिल महान, लेकिन अछि छाँटल शैतान, आनंदक सभ सुनु ई वाणी, नादिमे धऽ बनेलिऐ सानी।

आनंदसँ भागी के कतऽ पड़ाएत, त्रिभुवनोमे बाट ने पाएत, जेना जयंत गेल पुनि राम शरण, ओहो आएत पुनि हमर शरण। प्रभात राय भट्ट, पिता श्री गंगेश्वर राय, माता श्रीमती गायत्री देवी, गाम-धिरापुर, महोतरी, अस्थाइ बसोबास-जनकपुरधाम, नेपाल। जन्म लेलौं हम जतए सीता माएक अछि गाम जन्म लेलौं हम जतए सीता माएक अछि गाम माए गै हमरा एतेक बता दे की अछि हमर नाम किए कहैए हमरा सीसी बोतल आर बिहारी धोती आफद भऽ गेल खाएमे हमरा अपने देशमे दू छाक रोटी अपने देश बुझाइए परदेश शासक बुझैए हमरा विदेशी नै छौ तोहर कोनो नागरिक अधिकार तूँ भेले मधेसी भूख सँ मोन छटपट करैए भेटए नै किछु आहार दया धर्म इमान नै छै शासककेँ किए करैए तिरस्कार की ई हमर राष्ट्र नै अछि? या हम सुकुम्बासी छी? बौआ हमर नुनु यौ कान खोइल कऽ दुनू सुनू यौ अहाँ छी मधेशक धरतीपुत्र हम अहाँक मधेस माए निठुर शासक केँ हाथ बन्धकी परलछि देलौं सभ किछु गमाए तन मन धन सभ लुटलक आब करैए खून पसीना शोषण आशा केर दीपअहि अछि हमर वीरपुत्र करू मधेस रोशन मधेसमे जन्म लेली जे कियो, फर्ज तेकरा निभाबऽ पड़त नेपालसँ मधेस माएकेँ मुक्त कराबऽ पड़त सुन्दर शांत स्वतंत्र एक मधेस एक परदेश बनाबऽ पड़त मंगला सँ तँ भेटल नै आब छीन कऽ लेबए पड़त लड़ऽ पड़त आजादीक लड़ाइ देबऽ पड़त बलिदान तखने भेटत मान समान आ बनत मधेस महान यात्रा मरलो उपरांत रहैए ओ आत्मा जीवंत जिनकर यात्रा होइत अछि अनन्त अनबरत चलैत रहू लक्ष्यक डगर पर मिलए नै मंजिलक ठेगाना जाधरि पाछू कखनो घुइर नै ताकू डेग पर डेग बढ़ाउ आगू पाथैर कंकर पर चलऽ पड़त काँटक चुभन सहऽ पड़त भऽ सकैए संगी सेहो साथ नै दिऐ एसगर जिनगीक यात्रामे चलऽ पड़ए रहि-रहि मोनमे उठए जोर टीस जुनि कियो नै ताकत अहाँ दिस भऽ सकैए अपनो सम्बन्ध पराया साथ छोड़ि सकैए स्वस्थ काया मुदा टूटए नै अटल विश्वास एक दिन बुझत मोनक प्यास भेटत अहाँकेँ अपन मंजिलक ठेगाना जिनगी अनंत यात्रा छै बुझत जमाना मरलो उपरांत रहैए ओ आत्मा जीवन्त जिनकर यात्रा होइत अछि अनन्त अमित मोहन झा, ग्राम-भंडारिसम (वाणेश्वरी स्थान), मनीगाछी, दरभंगा, बिहार, भारत। कोना जीवन बिततै ताकै छी नैना भरि भरि काटै छी अहुरिया अहाँ बिन तड़पइत बीतए कोना कऽ उमरिया कोना जीवन बिततै यौ कोना जीवन बिततै बाटपर लागल अछि नजरिया कोना जीवन बिततै। जखने सँ सोलह चढ़लै पिया निर्मोहिया बनलै कोना कऽ हमरा बिसरलै कोना कऽ नेहा टुटलै कोना जीवन बिततै यौ कोना जीवन बिततै एलै यौवनक दुपहरिया कोना जीवन बिततै। चिठ्ठियो नै पाँती पेलौं रातियो तरेगन गनलौं यादिमे कुहकैत कुहकैत गाछीक कोयली बनलौं कोना जीवन बिततै यौ कोना जीवन बिततै नहिये एला हमर साँवरिया कोना जीवन बिततै सुनू अमित आनंदक नजरिया कोना जीवन बिततै। आएल  राखीक त्योहार आएल  राखीक त्योहार छाएल खुशीक संसार, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरियामे, हे बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरियामे। रोली कुमकुम तिलक सजाएब, माथ भैयाकेँ लगाएब, उठल स्नेह तरंग मोर मनमा मे, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरियामे। अरिपन अंगनामे बनाएब, ठाँव पीढ़ीसँ सजाएब, प्रेम अश्रु भरि आओत, नयनमामे, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरिया मे। सोनक थारमे राखी लाएब, भाइ-बहिनीक उरकेँ जुड़ाएब, पीढ़ी भैयाकेँ बैसाएब, अंगनमामे, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरियामे। भाइजी हाथमे राखी बान्हब, हुनकर आरती उतारब, संगहि मुँह मिठाएब, भवनमा मे, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरिया मे। भैया जीबहु लाख बरीष, दै छी हृदएसँ आशीष, सावन लऽ कऽ आएल प्रेम, परनमा मे, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरिया मे। भाइ-बहिनक ई त्योहार, महिमा एकर अपार, अमिट राखब बहिनक लाज, त्रिभुवनमा मे, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरिया मे। भाइजी बहिन केँ जुनि बिसराएब, अपन हृदएसँ जुनि बिलगाएब, अमित राखीमे फेर आएब, सावनमा मे, बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरिया मे। हे बहिनी मिल-जुलि चलियौ, भैयाक नगरिया मे। (ऐ गीतक रचनाक श्रेय हम दुनू छोट बहिन कल्याणी एवं कल्पना केँ दऽ रहल छियन्हि, जिनकासँ हमरा अमूल्य भावनात्मक सहायता भेटल आ ई गीत लिखबाक आमंत्रण हमरा श्रीयुत दीपक जी सँ भेटल तइ लेल हम हुनकर अपन हृदएक अंतर्तम बिन्दुसँ आभारी छी। ऐ रचनाकेँ वर्तमान रूपमे प्रस्तुत करबामे पूज्यनीय श्याम शेखर झा भाइ जीक अहम योगदान छन्हि। विश्वक समस्त भाइ-बहिनक अमर प्रेमपर लिखल हमर एक लघु प्रयास एक टा गीतक रूपमे अपने सबहक समक्ष प्रस्तुत अछि एवं विश्वक समस्त भाइ-बहिनकेँ हमरा दिससँ ई छोट उपहार।) गुलसारिका संतोख अछि बाँहि केर डारि सँ खसला पर जँ देह मे खोंच लागियो जाए तँ संतोख अछि सम्हारबाक चेष्टा तँ कएलहुँ अहाँ भरिसक हमरे जकाँ अहिना कोनो युग मे धरा उधियाएल होएतीह आ अम्बर हुनक डेन धरबाक चेष्टा मे हुनकहिं उपर ओंघरा गेल होएताह क्षितिज देखि तँ अहिना लगैए क्षितिज भ्रम नै अनुपम सत्य थिक किएक तँ क्षितजक पार कोनो सत नै कोनो असत नै सृष्टि नै ब्रम्हांड नै अतः विध्वंसो नै तेँ हमर हे सनातन अधिष्ठाता तर्क छोड़ू तर्कक गाछ पर सिद्धांतक फड़ पकै छै सेहो आस्था विश्वास आ प्रेमक पात झड़ि गेलाक बाद तेँ आब जखन हम प्रश्नशून्य छी तँ आँखिक आगू उत्तरोत्तर उत्तरक बाढ़ि अछि भसिया ने जाइ तेँ आँखि मुनने स्वयं मे लीन संकल्प दोहरबैत छी ठाढ़ जे आब एकहु डेग आगाँ नै एकहु डेग पाछाँ नै अहीं तँ छी हमर पूर्णविराम जाहि बएस हमर बहिना फूल लोढ़ै छलीह केसक जुट्टी मे हम तारा गुहलहुँ जाहि बएस हमर बहिना गौर पुजलनि हमहुँ अपन सीथमे सेनुरक बान्ह बन्हलहुँ ओ इनार सँ हम अकासगंगा सँ घैलक घैल भरलहुँ तैयो रौदीमे जेना पियास सुखा गेल आ आ साओनमे आँखिक धरनि चूबए लागल ऐ बेरका जाड़ सोचने छी किछु आर हमर बहिना सुइटर बुनतीह हम दू जोड़ बाँहि आ एक जोड़ साँस बुनब अहाँक जीवनक अहाँक जीवनक हमहीं सपता आ विपता अहिना डोरा घुमैत रहत हम गीरह बनैत रहब अहाँ गृहस्थीक धानक खोंइछा छोड़बैत रहब चलू आजुक इजोरियामे धो आबी अपन अपन मुँह आ कान चिन्हबाक करी प्रयत्न जे एखन धरि हम आ अहाँ कतेक भेलहुँ अपन आ कतेक छी आन कनी देखी अहाँक तरतत्थीक रेखा आ माथा परहुक रेघा सभ ठाम तँ संगहि छी कतहु टेढ़ तँ कतहु सीधा जँ नै लागए बेजाए तँ कहि दी बुझाए सप्तपदीक अनुबन्धसँ बहुत पैघ होइत छै प्रकृति आ पुरुष केर बन्ध अहाँ अहिना बाँहि पुजबैत रही मोँछ पिजबैत रही सीता जेकाँ हम ठिठियाइते रहब आ लक्ष्य दिस धकियबिते रहब ओना तँ टांगल छीहे अहाँक कान्ह पर पहिरल गंजी वा पुरना गमछा जेकाँ घुसिया जैब कोनो कोन तँ भरोस अछि मोने मोन उपालम्भ दैतो नील आ टीनोपाल दऽ फेर पहिरिये लेब तेँ हे नाथ जुनि करी मोन छोट संघर्षक पजारल चूल्हि पर खौलऽ दिअ अदहन अहाँ बढ़ू आगू कंगुरिया धेने हम पाछुए  रहब ठाढ़ भावना नवीन आजाद गजल १ हुनकर प्रेमक तरीका विचित्र अछि कनि मोन उदास कनि स्थिति विचित्र अछि

बहल जा रहल अछि लहरिक दिशा मे कागजक नावक भाग्य विचित्र अछि

दुश्मनक हरेक दावक हम देलौं जवाब लेकिन अहाँक हरेक अंदाज विचित्र अछि

नै टूटलौं हम हजार दुःख सहलाक बादो पाथर सन भेल हमर “भावना” विचित्र अछि

आबैत रहल काँटक यादि राति भरि फूल-पातक सजल ओछौन विचित्र अछि २ अहाँक मुस्की हमरा नीक लागल लजा गेलौं अहाँ हमरा नीक लागल

जाने कहिया अहाँसँ हेतिऐ मिलनाइ अचक्के एनाइ अहाँक हमरा नीक लागल

रही तँ हमरा लेल अहाँ अनचिन्हार अहाँसँ बतियेनाइ हमरा नीक लागल

चलि गेलौं अहाँ "भावना" मे बहि कऽ हमर अहाँक यादिमे कननाइ हमरा नीक लागल ३ जिनगी एकटा दुखक गीत अछि सदिखन गुनगुनाबए पड़त दर्द बड्ड भारी अछि मुदा ऐ मे हमरा मुस्कुराबए पड़त

बुझि रहल अछि दिया प्रेमक बढ़ि रहल अछि अन्हार बड्ड ई नेहजोत आब हमरा लहूलुहान दिल सँ जराबए पड़त

रूसलो किएक अहीं बुझैत छी हम तँ एतबे जनैत छी  रुसि गेलौं जे अहाँ हमरा सँ हमरे अहाँकेँ मनाबए पड़त

लाज रखबा लेल अपन प्रेमक तोड़ब हम सभ बंधन दिल नै खाली हमरा बाजीयो जान केर लगाबए पड़त

उदास भऽ अहाँक अंगना सँ जे हमरा उठि कऽ जाए पड़त अपन "भावना" क अर्थी अपनहि उठाबए पड़त ४ अहाँ सँ मिलबा लेल आएल छलौं  आबि बहुत पछतेलहुँ हम 

सोचि दूरी ऐ असगरपन केँ  ओहि राति बड देर धरि जागलौं हम 

पुरबैया केर झोँक जकाँ लोक कतेक  आएल कतेको सँ ओकताएलहुँ हम 

जइ सोच मे ओ डूबल छलाह  ओहि “भावना” सँ घबरेलहुँ हम मिहिर झा रुबाइ १ किछु मीत भेटल किछु प्रीत भेटल चहकैत नभमे किछु गीत भेटल जन्म लेब नै छल हाथ मे अपन जगकर्म करैत किछु रीत भेटल २ बहुत पी लेलौं आब अओर जिद नै करू बहुत जी लेलौं आब अओर जिद नै करू टूटि रहल करेज हमर किश्त किश्त मे बहुत सी लेलौं आब अओर जिद नै करू ३ छेद भेल करेज मे शराब कोना राखी बहकल दिमाग मे हिसाब कोना राखी जड़िऐल सिनेह छल सात जनमक बितल उलहनक जवाब कोना राखी ४ भीजल केशसँ खसल बुन्न शराबक गिलासमे शराबो निशामे माति गेल मिलनक अभिलाषमे रहितौं जँ महादेव पचा लैतौं यौवनमद देखिऐ आब तृप्त भेलौं अनंत नित्य उल्लासमे ५ ऊँच नीचक भेद मिटबै छै शराब दुश्मनो केँ तँ दोस्त बनबै छै शराब लड़ै कतबो बैसि टेबुल पर मुदा डोलैत संग संग निकलै छै शराब ६ शराब तँ पानि छै निशा एकर अहीं तँ छी सिनेह तँ ठाम छै दिशा एकर अहीं तँ छी छैक शराबी संग टुटल करेजक गाथा शराब पीबै कोइ खिस्सा एकर अहीं तँ छी ७ अहाँ छोड़ि गेलौं हमरा देखू दारू बजा रहल अछि लाल रंग मे रंगि आइ देखू हमरा सजा रहल अछि अस्पताल एक्केटा करेजक चोटक दुनियामे मिहिर सिनेह देखि शराबक देखू दुनियाँ लजा रहल अछि ८ शराब देखि किछु मोन पड़ैए बबूरक काँट करेज गड़ैए छोड़ि ने जाए ई शराबो हमरा तुरंत एकरा पीबए पड़ैए ९ लोक कहै जीबै ले पीयै छी शराब मोन कहै पीबै ले पीयै छी शराब सुनै बुझैक ज्ञान बचल नै आब करेज केँ सीबै ले पीयै छी शराब १० हमर मोन झुमिते रहल हुनक गीतपर दुनियाँ डाह करिते रहल एहेन मीतपर अगिला जन्म लऽ उधार लुटाएल हुनका पर समस्त हारि गबिते रहल हुनक जीतपर ११ मचोड़ल करेज देखि चान हँसि देलक खूनक नोर देखि शमशान हँसि देलक प्रीत केलौं एकदिसाहे हम प्रीतम सँ पुछलौं जे दोष भगवान हँसि देलक १२ सौ पटकनिया लगा देत हम्मर आँखिक काजर सौंसे नगरिया घुमा देत हम्मर आँखिक काजर पाछू पाछू डोलि हमर जनू करू समए बर्बाद बीच बजरिया लुटा देत हम्मर आँखिक काजर बन्द चंचल यौवन लैत उफान छैक कुंदन वसन भरै गुमान छैक अंजन रंजित नयन वाण हरि लेलक ई सभक प्राण शस्त्र एहेन केलौं निर्माण त्राहिमाम हे देव करू त्राण चाह नै ई तँ विधि विधान छैक कसीदा १ कसीदा -ए- विदेह जग घूमल सर्वत्र मुदा त्राण पाएल विदेह पर सभ गाम स्वाद चीखि चीखि लोक आएल विदेह पर

गजल कता रुबाइ हाइकू छन्द कविता वा होउ रोला मातृभाषामे लिखल देखि प्राण बाजल विदेह पर

सभ जाति धर्मक मैथिल जे एकत्र भेला एक ठाम अप्पन मोनक भाव कहै धूम जमल विदेह पर

रगड़ा झगड़ा आदर मान छैक अप्पन लोक जकाँ शुभारंभ साहित्य विधाकेँ सौंसे देखल विदेह पर

दुर्लभ छथि जे गुरुजन अन्यथा ज्ञान भेटैक नै पाबि मार्गदर्शन कविगण नित्य बनल विदेह पर

देश विदेश गूँजल गान माय मिथिला भेली प्रसन्न गूगल नतमस्तक भेल मिथिला सजल विदेह पर

छद्म साहित्य खसल पिछड़ि लोक केलक बहिष्कार समानान्तर अकेडमी छै शान बनल विदेह पर २ कसीदा -ए- वैदेही मूल्य बुझि माटिक अहाँ जन्म खेते लेलौं वैदेही नारी मान बढ़ाबए लेल स्त्री रूप धेलौं वैदेही

धनुष उठा नीपैत पोछैत अहाँ पूजल भोले केँ ओही धनुष लऽ कऽ अहाँ स्वयंवर केलौं वैदेही

देश विदेशक राजा आएल देखबै अपन जोर देखि रामकेँ दूरे सँ ईश्वर अहाँ पेलौं वैदेही

कमला कोसी बागमती तजि नेह भेल सरजू सँ आइ अयोध्या भेल धन्य एतऽ अहाँ एलौं वैदेही

ससुर महात्मा ईश्वर राम सासुर बनल धाम तीन सासु दिअर संग पूर्ण अहाँ भेलौं वैदेही

पिता वचन केँ राखि मान देश तजि चलला राम संस्कारकेँ पाठ गुनैत संगे अहाँ गेलौं वैदेही

निश्छलताक लाभ उठाए रावण ठकबा आएल देखि जटायु पंखहीन छुछे नोर देलौं वैदेही

भोर साँझ लऽ प्रणय निवेदन रावण आबै रोज पर पुरुख बाजू कोना, त्रिन ठोढ़ धेलौं वैदेही

अग्निपरीक्षा देल तखनो धोबिया भरलक कान मिथ्या आरोप बुझितो पतिक मान केलौं वैदेही

जीवन छोड़ि कर्तव्य लेल गेहलौं जंगल कुटिया सूर्य समान दुहु पूत केँ कोना पोसलौं वैदेही

कतेक बर्छा भोँकल करेज अओर कतेक छै बाकी पुनर्परीक्षा देखि सोझा धरती पैसलौं वैदेही टनका/ हाइकू/ शेनर्यू टनका १ कतऽ गेलहुँ जगत चरवाहा औ भगवान चरैत असगर छोड़ि हमरा अहाँ २ सत्रह वर्ण सभटा समेटब कठिन छैक एकरे कहैत छै जापानी मे हाइकू ३ मनुख मात्र जगत विनाशक हे महादेव सद बुद्धि दियौक धरोहर बचाउ ४ हमर देश हमर परंपरा स्वागत अछि भारत भूमि मध्य अतिथि देवो भव ५ ई बदहाली हे मानव किएक केलहुँ अहाँ प्रदूषित कए कऽ अम्ल वर्षा कराए ६ समेट कऽ साहस नव शुरुआत ले अवर्णनीय ईश्वर चित्रकार अगम कला हाइकू- शेनर्यू हम नृतक/ टोपी नीचा राखि कऽ/ करै छी मान सर्वदा देल/ मांगल किछु नहि/ तैयो ई गति हम छी नग्‍न/ पत्र पुष्प विहीन/ कनैत वृक्ष खूटियाएल/ दाढ़ी जेकाँ ई गाछ/ हजाम कतऽ नारी वा पशु/ भोजन देला बाद/ छैक संतुष्ट भोजन करी/ सदिखन शांति मे/ पूर्ण तृप्ति ले हमर लाल/ तंदूरस्ती बढ़ाउ/ रक्षाक लेल माय एलहु/ दूध पियोलकहु/ भूख बिलेलौ देक्खैमे पशु/ कर्तव्य माय सन/ जय गोमाता सर्वोच्च धन/ ई अनादि काल सँ/ अछि गोधन हम दधीची/ सर्वत्र दान कैल/ प्रसन्न रहू नृत्य करैत/ दर्शन भेल प्रभु/ नतमस्तक प्रकृतिक ऐ/ क्रीड़ांगण मे नाचै/ छै वेवलेट भ्रष्टाचारक/ पसरल भूमि मे/ सत्यक खुट्टा गाछ छलहुँ/ पाथर भऽ गेलहुँ/ जमाना देखि एहि रौदी मे/ हमही छी अहाँ ले/ छायाक स्रोत ठाढ़ रहब/ टूटलो उपरांत/ हम हजारे अथाह जल/ थाह भेटला बाद/ अछि संतुष्‍ट एक सहारा/ पहुँचा सकैत छै/ आकाश तक क्रुद्ध सागर/ पाथरो केँ तोड़ि कऽ/ केलक बालु आसक दीप/ जरल आकाशमे/ आगू बढ़ि कऽ आदिवासीक/ जीवन प्रांगणमे/ एला पाहुन घोड़ाक लीद/ जे कि खाद बनत/ उर्वरता ले धनरोपनी/ सृजनक समय/ नवजीवन नील नीलाभ/ हरियरीक छाप/ स्वप्न स्वर्ग छी सत्रह वर्ण/ सभटा समेटब/ कठिन छैक सघन वन/ शांत जल मंडल/ अलौकिकता भूमि पुत्रक/ निर्वासन जल मे/ ई जिनगी छै नील आकाश/ स्वर्णिम पर्वत/ विस्तृत धरा समुद्र छैक/ सुंदरता संजोने/ हृदय मध्य अद्भुत दृश्य/ अगम सागर मे/ अवर्णनीय रत्न भेटत/ गहींरे गेला पर/ करू प्रयत्न समुद्र तल /छैक पैरक दाग /मुसबा केर नील कागज /पसरल छै सौंसे /नारंगी रंग बदरा घुमि घुमि आउ बदरा घुमि घुमि आउ हरियर हरियर दूबिक बिछौना अहाँ आबि भिजाउ बदरा घुमि घुमि आउ। देश अएला हमर सजना चंचल भेल हमर नयना अओर नै तड़पाउ बदरा घुमि घुमि आउ। पिया छथि हमर एखने आएल बरख सँ आगि अछि देह मे लागल आबि अहाँ मिझाउ बदरा घुमि घुमि आउ। गजल बात जे झँपबै तँ ओ जड़िएबे करत चुल्हि चढ़ल खापड़ि करिएबे करत

कतबहु दाबब गप केँ दबत नहि लोक तँ लोक छैक ओ चरिएबे करत

तनला सँ सेहो चलत नहि कोनो काज मुस्टंडा मानत नहि फरिएबे करत

नहि पड़ू मुखिया ओ पंचक चक्कर मे ओकर तँ काज छैक भरिएबे करत

आपस मे गप करू करू राफ ओ साफ धीरज धरू मामिला सरिएबे करत चक्रव्यूह निर्विकार निराकार उन्मुक्त पदार्थ रंग रूप जाति सँ विमुक्त यथार्थ मनुष्य हमरा कहै प्रेत हम घुमै छी खेते खेत। भेल एक टा जोरगर प्रहार जन्म लेलौं करैत चीत्कार देव! जखन उठाएल मुँह देलौं हमरा ई चक्रव्यूह पढ़ल लिखल भूजा फाँकी पहिल व्यूह टुटल पेट झाँकि हँसैत छल सुनि हमर कथा के बूझत मोनक व्यथा? व्याह भेल परिवार भेल उत्तरदायित्व साकार भेल बन्हलौं हम कोलहुक बड़द कोनो कष्ट आब की गरत तोड़ल दोसर व्यूहक तार हे भगवान लगाउ पार। धीया पुता पढ़ि लिख गेल व्याह दानसँ फुर्सत भेल राम राम हम पढ़ि रहल छी अंतिम व्यूहसँ लड़ि रहल छी  फेर सँ आब हम भेलौं चेत  भनहि छलौं हम बनल प्रेत। डॉ. शशिधर कुमर की  इएह   कहाबैछ   सुन्नरता ?? तन गोर, नयन  हिरणी सनि हो, हो  अंग   अंग  मे  चञ्चलता। दुहु  ठोर  पात तिलकोरहि  सनि, पातर  कटि  मे  हो  लोचकता ।। हो पीनि पयोधर  शिरिफल  सनि, मुस्कान  भरल   हो   मादकता। दाड़िम  दाना  सनि  दाँत  जकर, हो  केश   मे  मेघक  पाण्डरता।। हर  अलंकरण   सज्जित  तन  पर, हर  चालि-चलन  मे  अल्हरता। की  एतबहि  सँ ओ सुन्नर अछि? की  इएह   कहाबैछ   सुन्नरता?? अमरेन्‍द्र कुमार मि‍श्र, पि‍ताक नाओं- श्री वि‍नोद मि‍श्र, गाम- बेरमा, भाया- तमुि‍रया, जि‍ला-मधुबनी, (बि‍हार) नेता गामक नेता देशक नेता राज आ समाजक नेता होइत अछि‍ कमजोर आ होशि‍यार अप्‍पन नकली बात बना कऽ करैत अछि‍ जनतासँ प्‍यार नेता मूर्ख हुअए वा गमार कहैत अपने-आप बुधि‍यार चौक-चौराहा भाषण दऽ कऽ मचा रहल अछि‍ भ्रष्टाचार गामक नेता....। ई नेताजी जुर्मक बेटा जनता सभकेँ लोभा लेता बान्‍ह-सड़कमे माल बनेताह मजदुरि‍योपर ई टेक्‍स लगेताह करताह हरदम अत्‍याचार जनता लग रखता खाली वि‍चार गामक नेता..................। जखन आएत चुनावक बेर परचा आ भाषणक बेर गाम-टोल घुमि‍-फि‍र ओ जनताक आगू शीस नवेता लोभक रस जनताकेँ पि‍येता वैलेट पेपर हाथमे थम्‍हेता मकराक जालमे सभकेँ फँसेता गामक नेता देशक नेता राज आ समाजक नेता। सुबोध झा (१९६६- ), पिता श्री त्रिलोकनाथ झा। बतहिया साँझ भेलै भोर हेबे करतै। आँखि छै नोर हेबे करतै।। पिया विरह मे छै मोन दग्ध। की करतै मनःरोग हेबे करतै।। आब अपनो सभ तँ कहै छिऐ ओकरा विक्षिप्त। ओकर मोन नै भऽ सकलै कहियो प्रेम सँ तृप्त।। आँखि जोहैत छै बाट सदिखन। मोन पड़ै छै बीतल दिन भरि क्षण।। हमरा नै अछि आशा घूरिकेँ औतै ओ। फेर सँ ओकर प्रेमक दीप जरौतै ओ।। मुदा ककरा बूझल छै ओहो घूमि रहल अछि भेल विक्षिप्त। के मिलौतै दुनूकेँ सभ अछि अपनहिं आप मे लिप्त।। ककरा छै एकरा दुनूक लेल खाली समए। सभ लागल अछि खाली करबामे धन संचय।। जीअब तँ देखबै कतेको सामाजिक अन्याय। माय बाप भाइ बहिन केओ नै हेतै सहाय।। हे समाजक कर्ता धर्ता छोड़ू ई ताण्डव नृत्य ओ कुकर्म। जीबऽ दियौ सभकेँ अपना ढंगसँ आ करू सुकर्म।। सभ कहैत अछि भऽ गेलै आब प्रजातन्त्र। हमरा जनें ई थीक पाइ बलाक षडयन्त्र।। पाइ बलाक षडयन्त्र पाइ बलाक षडयन्त्र।।।। शाइरी १ हमरा नै देखल छल हुनक गाल परहक तिल आ ठोढ़ परहक लाली। कहियो नै देखलियन्हि हुनक कानमे लटकैत सोनक बाली।। घोघ उठल आँखि मिलल लागल जे ओ तिल छल हुनक सुन्दरताक प्रहरी। ठोढ़ छल मदिरा आ बालीकेँ देखिते खसि पड़लौं लागल दिल्लीक शीतलहरी।। दिल्लीक शीतलहरी, दिल्लीक शीतलहरी…… २ नारी कण्ठ सुनतहिं अनायसे बढि जाइत अछि डेग ओमहर। चूड़ीक खनकब सुनतहिं ताकए लगैत छी जेमहर तेमहर।। आब तँ कान मे स्वतः बजैत अछि पायलक खनकब। रहि रहि कऽ मोन पड़ैत अछि प्रथम स्पर्श मे चूड़ीक चनकब।।

३ निहारैत रहलौं जनम भरि हुनक मुखमण्डल। तैओ नै भऽ सकल जिनगी हमर सफल।। हम तँ भऽ गेलौं हुनकर मुदा ओ नै छथि हमर। की दोष छल हमरा मे से नै जानि आब जीअब भेल दूभर।।

४ हुनकर कजराएल डोका सन आँखि देखिते मारलक मोनमे हिलकोर। ताकए लगलौं ओहिना जेना चानकेँ ताकए लगैत अछि चकोर।। ओइ आँखिकेँ हम कोना बिसरब जे बेधि देलक एकहि बेर मे हमर हृदए। जाइतो जाइत नै हँसलीह मोन मसोसैत पहुँचि गेलौं मदिरालय।। ……… पहुँचि गेलौं मदिरालय।। ५ हुनक तीतल केश सँ चुबैत पानि सँ मेघो केँ भऽ रहल छै लाज। हुनक गौरवर्ण स्वरूप देखि चन्द्रमा कहथि इजेरियाक कोन आब छै काज। हुनक आँखिक पिपनी खसब उठब सँ होइत अछि साँझ आ भोर। जिनगीक दुइयो डेग चलितथि हमर संग तँ भरए दितौं ऐ मे नोर।। … खाइत छथि सप्पत नै खसए दितौं एकहु ठोप नोर एकहु ठोप नोर।।

मनबतिया मनबतिया छल बड़ सुन्नरि आ सुकुमारि सभ देखै छलै गिद्ध जकाँ आँखि फारि फारि कतेको दिन पश्चात मनबतियाक घर बसल हमरा पर तँ जेना हड़हड़ी वज्र खसल। अन्हार होइतहिं अनायसे उठि जाइत छल डेग फेर भेटत ओ मोन मे बढ़ि जाइत छल उद्वेग डर होइत छल तेँ सतत ई बात नुकबैत रहलौं अपना बुझैत जेना जाति आ पाँजि बचबैत रहलौं। सामाजिक बन्धन जाँत जकाँ बान्हल छल ओकरहि पर हरदम मोन टांगल छल सोचिते रहलौं आइ ओ जा रहल अछि नै भेल हम्मर ओ ई बात खा रहल अछि। कहिया हटत ई जातिक भेदभाव से नै जानि कतेको मनबतिया मरत आ जीअत कानि कानि ओकरा की दोख देबै हमहीं जातिक देबाल नै खसेलौं आब कनने की हएत अप्पन जिनगी अपने मेटेलौं। हमहीं नै कतेको एहिना अन्हारक चुप्पीक बाट तकैत छथि अप्पन सभ किछु उजरलाक बादो बौक बनि बैसैत छथि सिनेहक दीप मिझाएल जनिकर ओ भेल विक्षिप्त घूमैत छथि विरहक आगि मे झरकाएल मोन मनबतियाकेँ ताकैत छथि। कतेको भेटत जकर करेज जातिवादक भारसँ थकुचाएल हुअए ठोढ़केँ रहए सीने करैत जेना अपनहि सँ सवाल जबाब हुअए पढ़ला लिखला सँ की जखैन ऊँच नीचक देबाल मनुक्खे बनबैत अछि बिसरि जाइत अछि जे सभ मनुक्ख माइए केर कोख सँ जनमैत अछि। संस्कृति ओ संस्कार पुरूष पातर सभ बिसरि गेलाह सन्ध्यावन्दन एकोदिष्ट ओ तर्पण। आंगन दिसि बिसरि गेलीह हरिसों तुसारी सामा ओ अरिपन।। आजुक छौंडी सभ की बुझतै बरसाइत पचाइक आ भ्रातृद्वितिया। बूढ़ पुरान सभ टा करैत अछि घॉंटो सपता विपता आ खरजितिया।। आब तँ गामोमे विरलेक भऽ रहल अछि छठि आ चौरचन। घरक लोको केँ मुइला पर ने कटबैत अछि केश आ ने बारैत अछि नोन।। अष्टमी मे लुप्त भेल जा रहल अछि पातरि आ कुमारिक पूजन। नै होइत अछि पार्थिव लिंगक पूजन, कान तरसि गेल सुनबाक लेल डहकन।। सभ होमए चाहैत अछि सामाजिक बन्धन सँ स्वतन्त्र। सभ बिसरल अछि दुर्गासप्तशती आ दूर्वाक्षतक मन्त्र।। विलीन भऽ गेल पूजापाठ आ निशापूजाक महक जगरना। सुखरातीक ऊक फेरब आ जूड़शीतलक मॉंथपर पानि लेब भेल सपना।। उपनयन चूड़ाकर्ण आ विवाहक निअम राखल गेल ताक पर। तर्क करबाक लेल नवयुवक सभ बैसल अछि बात बात पर।। बिलाएल जा रहल अछि सलहेसक पूजा आ भगताक प्रभाव। लहाश पड़ल अछि आगि देनिहार पुत्र केर अछि सर्वथा अभाव।। आब तँ सत्यनारायण पूजाक शालिग्राम लए बौआइत छी भरि गाम। खसैत संस्कारकेँ देखि लगैत अछि बिसरब संस्कृति जल्दीए ऐठाम।। हे भगवान कतए छी दियौ मनुक्खकेँ सदबुद्धि अहॉं तँ छी अन्तर्यामी। कलयुगक पाप सँ सभकेँ बचाउ आब तँ भेला सभ केओ अज्ञानी।। इतिहास बनल जा रहल अछि मिथिलाक संस्कृति। जल्दीए पूजब एकरा बनाए माटिक मूर्ति।। यदि बॉंचि जाएत कतहु कतहु ऐ संस्कृतिक भग्नावशेष। तखन तकलो पर नै भेटत कतौ एकर अवशेष।। जिनगी जिनगी छल बड छोट। ऐ बातक रहल सतत कचोट।। यदि कएने रहितौं लोकक उपकार। तँ नाम लितए सगर संसार।। पसेनाक पाइ जइ लेल रहलौं जिनगी भरि बेहाल। बैंकबला सभ भेल रहल ओइ पाइसँ मालामाल।। आब तँ घरोबला नै करैत अछि चर्च अप्पन जानि। बहा रहल अछि संचित धन जेना बुझि पड़ैत हुअए पानि।। पाप मे रहलौं डूबल बिसरलौं देवता पितर। तेँ मुइलाक बादहु घुमैत छी जँहतर पँहतर।। सभ बन्द केलक डिब्बा मे कहलक सूतू भऽ चेन। नरको मे नै भेल जगह भेल छी बेचेन।। यदि कऽ लेने रहितौं ओइ पाइ केर गरीबीमे उपयोग। तँ नै मरितौं पाबि एहन असाध्य रोग।। आब मोन मसोसिकेँ की भेटत हृदए पर जे लागल चोट। खाली रहि रहि केँ भऽ रहल अछि कचोट।।

वाह रे कपार हमरा की चाही… लाल झूड़ झूड़ तिलकोर तरल। बारी बला अरिकोंच झोड़ सँ भरल।। भुन्ना मॉंछक पलइ देखितहिं अबैत अछि मुँह मे पानि। मुदा जर्दा आमक सुगन्ध सभकेँ कऽ दैत अछि पानि पानि।। कनियाँ हुअए तँ “अन्जेलीना जोली” केर रूप लेने। बेटा जनम लए सोनक चमचा मुँह मे लेने। सदिखन रही आकाशमे जहाज मे उड़ल।। बैंक हुअए तँ गहना आ नोट सँ भड़ल।। मुदा वाह रे हमर जड़ल कपार। एकहु टा सपना नै भऽ सकल साकार।। बनि जइतौं नेता कहिबइतौं सरकार। गबितौं गति वाह रे कपार वाह रे कपार।।

मो. गुल हसन, गाम-बेरमा, पत्रालय-बेरमा, भाया-तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) पि‍न- ८४७४१०

सभटा कि‍सानमे हमहीं बकलेल... अंगना सन जोति‍-जोति‍  खेत हम बनेलौं  डी.ए.पी. पोटास संग गहुम बुनलौं सभटा कि‍सानमे हमहीं बकलेल  दौगू-दौगू यौ काका जुलुम भऽ गेल।

एहेन सुन्दर गहुम काका पाड़ा चरि‍ गेल  दौगू-दौगू यौ काका जुलुम भऽ गेल।

कच्ची आध कोस धरि‍ पाइपो पसारलौं  महग पानि‍ कीनि‍ गहुम पटेलौं  नै जानि‍ दैवा ई वि‍पत्ति‍ कि‍अए देल  दौगू-दौगू यौ काका डाका पड़ि‍ गेल। 

अहीं सरपंच काका आँखि‍ खोलि‍ देखि‍यौ घसबहि‍नी-चरबाहाक उपद्रवकेँ देखि‍यौ  खर्चा जोड़ैत-जोड़ैत  हमर खून सूखि‍ गेल  दौगू-दौगू यौ काका गहुम बकरी चरि‍ गेल। 

लि‍खैत ई बात गुल हसन कहैए  कि‍ कहू काका आब कि‍छु ने फुड़ैए।  केलहा-धेलहा सभटा पानि‍मे चलि‍ गेल  दौगू-दौगू यौ काका डाका पड़ि‍ गेल। प्रीति‍ प्रि‍या झा, पि‍ता- श्री वि‍जय चन्‍द्र झा, माता- श्रीमति सीमू झा, जन्म ति‍थि‍- ०१.०३.१९९४, सम्‍प्रति‍- छात्रा कथा १२म, केन्‍द्रीय वि‍द्यालय टाटा नगर, आवासीय पता- गोलपहाड़ी मेन रोड, गायत्री मंदि‍रक नि‍कट, जमशेदपुर, पैतृक गाम- धनखोरि‍, फुलपरास, मधुबनी। मातृक-  घोघरडीहा, मधुबनी। बेटी जन्‍मय काल, आमक मज्‍जर खुशीक पेटार घरक लक्ष्‍मी बेटी मुदा मंचेटा पर सभ कहै छइ बेटी-बेटा एक समान तँ कि‍अए दुख मनबैत छी कन्‍याक जन्‍मपर कि‍अए नै जन्‍माओल जाइ छइ बेटी एकटा पुत्रक आशामे सात-सात बेटी ककरो तनपर साफ वस्‍त्र नै मुदा एकटा बेटा- वएह- बौआ, बाबू, सुग्‍गा-नूनू दोष ककरा देल जाए? सबहक मति‍मे पुत्रमोह, ति‍लकक लोभ ककरो मति‍ तँ बदलल नै जा सकैछ बाप बेपारी आ बेटा वस्‍तु बनि‍ बजारमे पसरल अछि‍ बि‍कबाक लेल तैयार चाम-मोट मुदा दाम चमनगर जखन बेटीक बाप- तखन कनैत छी मुदा! जखन बालकक पि‍ता तँ भगवानक समान आदर चाही बेटी सभ मारल जाइ छै नीके हएत, बेटी खतम भऽ जाएत रहि‍ जेता सभटा बालक कुमारे प्रकृति‍केँ चुनौती दि‍अ? वाह आर्यावर्तक पूत!! पवन कुमार साह, जन्‍म– ०२.०२.१९८७, पि‍ता- श्री वासुदेव साह, गाम- खाप, पोस्‍ट- अन्‍धारवन (वासुदेवपुर), थाना- लाैकहा, जि‍ला- मधुबनी, (बि‍हार)। शि‍क्षा- एम.ए. (अंग्रजी), एल.एम.एन.यू, दरभंगा। प्रेम की पाप छल प्रेम हमर की गुनाह छल प्रेम हमर लगि‍ गेल कि‍ए एकरा एहेन नजरि‍ की पाप छल प्रेम..... जौं प्रेम पाप छी तँ ई पाप हम करबे करब कि‍यो मि‍लए ने दि‍अए चाहैए हमरा मुदा हम ओकरासँ मि‍लबे करब सभ कि‍छु ओकरा लेल मेटा गेल हमर की पाप छल प्रेम...... सुनि‍ लि‍अ यौ प्रेमक दुश्‍मन मि‍लैसँ हमरा नै रोकू कऽ देलौं ओकरे नव जीवन हमरा आब कि‍यो ने टोकू व्‍यर्थ भेल जि‍नाइ जि‍नगी हमर की पाप छल प्रेम..... गीत १ उड़ि‍ गेलै ओ हमर दि‍ल एना तोड़ि‍ कऽ उड़ि‍ जाए पक्षी जेना पि‍ंजरा तोड़ि‍ कऽ उड़ि‍ गेलै.... अपना ओ पक्षी समझलक हमरा दि‍लक पि‍ंजरा छोड़लक जखन संग हमर तड़पए लगल जि‍यरा मारलक तीर दि‍लमे एना जोड़ि‍ कऽ उड़ि‍ जाए पक्षी जेना पि‍ंजरा तोड़ि‍ कऽ उड़ि‍ गेलै..... पि‍ंजराकेँ कोनो दर्द ने होइए दि‍ल बेगरि‍ दर्दक ने रहैए पक्षी तँ गगनमे उड़ैए संगी हमरा चमनमे घुमैए जीलौं ओकरा बि‍नु हम एना मरि‍ कऽ उड़ि‍ जाए पक्षी जेना पि‍ंजरा तोड़ि‍ कऽ उड़ि‍ गेलै....। २ अहाँ बि‍नु हम केना रहब हमरा बता दि‍अ अहाँ बि‍नु हम जीअब कि‍ मरब हमरा बता दि‍अ अहाँ बि‍नु...... अहीं चैन छी हमरा अहीं तँ नि‍न्नि‍या सुख-दुख हमर अहीं तँ सजनि‍याँ अहीं जीवन हमर अहीं तँ परनि‍या सभ कि‍छु छी हमर अहीं तँ सजनि‍याँ सजनी बि‍नु हम केना रहब हमरा बता दि‍अ अहाँ बि‍नु......... देखू हमर चेहरा केहेन भऽ गेलए मि‍लैक बि‍नु अहाँसँ मुरझा गेलए सूरति‍ अहाँक हमर जिगरमे गड़ि‍ गेलए मि‍लैक लेल दि‍ल तरसि‍ कऽ रहि‍ गेलए अहाँसँ हम केना मि‍लब हमरा बता दि‍अ अहाँ बि‍नु.....। स्तुति नारायण मन पड़ैत अछि... मन पड़ैत अछि पोखरि-झाँखरि, अपना गामक बान्ह अपना गामक खेत-पथार टेढ़-मेढ़ ओ बाट मन पड़ैत अछि महमह गमकैत, मोजरल आमक गाछ भोर अन्हारे महु बिछि आनब, लोढ़ब फुल-बेलपात मन पड़ैत अछि लुधकल जामुन, लीची, बैर, अनार आमक कुच्चा, सागक मोचरा, इमली आर अचार रनै-बनै कतऽ फिरै छँ, माँक झिड़की डाँट चल सभ बच्चा कलम चलै छी पिताक सहज दुलार टोला परके धिया पुता आर कलमक ऊँच मचान गप-सप आ हँसी-हँसी मे सीखब जीवन पाठ...। स्वाती शाकम्भरी पिताजी पिताजी वर्तमान दुनियाँ ऐ चाँद पर मुदा अहाँ मचान पर बैसल हमर भविष्यक चिंता किए करै छी हमर भविष्य हमरे पर छोड़ि दिअ आबो अपन अनरगल सोच सँ मनकेँ मोड़ि लिअ नारी आब अनाड़ी नै दुत्कारल कोनो भिखाड़ी नै हम दबल कुचल कौनो अबला सन रक्षक केर बाट निहाड़ी नै हम स्वयं लड़ब ओइ दानव सँ ममता विहीन ओइ मानव सँ जे नारीत्व धर्म केर शोषक छै कोमल भावक भक्षक छै हम विवश वीरक वनिता नै हम दुःखीता द्रौपदी सीता नै हम रणचंडी दुर्गा काली छी दानवीय भाव संहारी आ मानवीय सकल प्रतिपाली । अरविन्द रंजन दास क्षणिका अछि हमरो अस्तित्व प्रकृति मे हमहूँ क्षुधा परोसल छी हमहूँ सौन्दर्य सुवासल आ सौन्दर्य पियासल ........ अछि हमरो अस्तित्व प्रकृति मे बि.पि.उदासी एलै जिबनक आहार करिया बादल सभ  पंख फिजबैत एक दुसर मे  झुल्ला झुलइत शास्त्रीय संगीतक  शीतल धुन संग  धीरे धीरे  क्रम रुप सँ  चरिओर फिजबैत नचैत गाबैत  ऐब गेलै भखारिक मुँह एलै जिबनक आहार 

केहन लीला अछि  ई धरती माइक  हर प्राणीक लेल  सेवामे समर्पित अछि  रमझम रमझम  मानू ई धरती दूध-कुण्ड अछि  हिमाल डुबि जाएत मुदा  कहानीमे अमृत कुण्ड अछि  कोनो शुभ काजमे देखल  सोंपल सपना नै अछि  ई सपना आ बिपना  ई तँ निरन्तर मेहनत पसीनाक फल अछि  साल दिनक जीबाक आहार अछि कतेक नीक ई असार  एलै जिबनक आहार !! प्रमोद रंगीले देखियौ अपन देशमे दर्दक बाजैत ताल देखियौ। मरदा पर फेकैत जाल देखियौ। हँसी पर परल छाल देखियौ। मृत्यकेँ टांगल पाल देखियौ। आँखि सँ लोर बहैत बवाल देखियौ। शान्ति कहिया- एकेटा सवाल देखियौ। डरि-डरि कऽ जनता भेल बेहाल देखियौ। चहुदिस चिखपुकार सँ मचल अकाल देखियौ। घायल सँ भरल अस्पताल देखियौ। निर्दोष बनल तलवारक ढाल देखियौ। अन्याय ओढ़लक बाघक खाल देखियौ। जीवनक कम भेल मोल देखियौ। खलनायक केँ करैत रोल देखियौ । गर्दनिमे बान्हल हिंसाक ढोल देखियौ। जनताक बन्द छै, म’हक बोल देखियौ। हत्या बनल एकटा खेल देखियौ। जीवनक परीक्षामे सभ भेल फेल देखियौ। हाहाकार सँ पड़ल अकाल देखियौ। दिन दिन समस्या भेल विकराल देखियौ। भाइ भाइमे नै छै मेल देखियौ। सभतैर बनैत बकलेल देखियौ। आदमी बनल अभागल देखियौ। जीव रहल छै जीवन ककरो सँ उधार मांगल देखियौ।  ज्ञानी सभ बनि गेल पागल देखियौ। डरक ठप्पा सभमे लागल देखियौ। रवि मिश्र “भारद्वाज”, पिता श्री पशुपति मिश्र, गाम- ननौर, जिला- मधुबनी। अन्तिम क्षणमे काल्हि किछु काल असगरेमे हम केलौं अपनासँ किछु बात पुछलौं अपनासँ बिना मतलबक की ककरो तोहर छौ आस कियो नै भेटल जे चाहितै, सुनितै हमरासँ हमरा भाव-विभोर कऽ, चाहलक तँ सभ कियो हमरा, मुदा नै देखलक हमर आँखिक नोरकेँ बेचैन भऽ कऽ कानए लागल हमरेपर जखन हमर आँखि हँसि कऽ लोक हमरा देखऽ लागल ऐ उमरोमे एना कि कियो देखावा कऽ सकै छै हँसऽ लगलौं हमहूँ हुनका देखि कऽ दुख अपन हँसीमे नुका कऽ मरहम जखन कखनो ककरो दर्द केँ बुझै छी अपन दर्दकेँ जेना हृदै जाइ अछि सहमि आँखिसँ आबि जाइत अछि पानि सोचै छी काश होइत हमरा पास किछु आर देबऽ केर खाली भरोसा आ दिलासाक पाबऽक कनेक अपन सुख आ आराम लोक एना किए बिसरि गेल अपन लोकक पहिचान ओ जे कखनो कहै छल जिनका अहाँ छी हमर जान बिसरि गेल अइ हुनकर नाम मतदान लिअ मतदान फेर आबि गेल सफेद पोशाकमे किछु भेड़ आबि गेल बड़ा दुविधामे छी भैया किनका चुनू नेता की भरोसा जितबाक बाद हमर विकासक फण्ड खेता कतेक निर्लज्ज अछि किछु नेता आबि गेल फेर चमकेने कुर्ता आबि गेल माँगऽ भीखमे फेर भोट यौ झोलीमे तँ नै कोनो भेद यौ मुदा छै बड़का टा छेद यौ विनती अछि अहाँसँ भैया नै करू गलती ऐबेर दियौ वोट कर्मठ नेता केँ अहाँक गलती केर कारण की अन्ना फेर अनसन करतै अही उमेरमे भूखे मरतै कलेश करेजा मे घुसल एहेन कलेश पल मे बदलि गेल सुन्दर रुप आ भेष एहेन बज्र खसौलक विधाता तोड़ि देलक जिनगी केर डोर इजोतो मे सिर्फ अन्हार अछि संतोष धरब ककरा पर रोकने नै रुकैए आँखिक नोर हे सखी पहिने आबि रांगल जिनगी केर रांगै छलौं करम हमर फूटल अपनसँ संग छूटल अहूँ किए फेरै छी मुँह कनेक खुशी देबए मे किए लागैए अबूह जी कऽ जेना रोज मरै छी ककरा देखाएब ई नोर रोज आँचर मे धरै छी ई नोर नै निकलैत अछि सिर्फ, अपन दुखमयी जिनगी आ दशा पर बल्कि किछु लोकक अवहेलना आ कुदशा पर शुभ काज सँ राखल जाइए हमरा दूर किछु लोकक मोन अछि कतेक क्रुर हे सखी हमहूँ अहीं जेना नारी छी मुदा भेद अछि सिर्फ एतबा लोक कहैत अछि हमरा विधवा

आजाद गजल १ तैयार छै लुटै लेल बेटीबला तँ लुटेबे करतै बिन दहेज ने उठतै डोली तँ रकम जुटेबे करतै

प्रेम रस मे डुबल मोन आ जुड़ल हाथ बिच मे एतै दहेज तँ जुड़ल हाथ छोड़ेबे करतै

फोकटो मे जे ने छै विवाहक लाइक दुल्हा खरीदार भेटतै तँ ओहो दुल्हा बिकेबे करतै

पानि सँ लबलबाएल भरल छै जे पोखरि अकाल रौदी एतै तँ भरल पोखरि सुखेबे करतै

चोरक हाथ जँ देबै समानक रखवारि मौका भेटतै तँ चोर समान चोरेबे करतै

जँ भरल गिलास छै पानि सँ ओइ मे भरबै पानि तँ पानि नीचाँ हरेबे करतै

जँ दहेजक लालचमे हाथ धरि बैसतै बाप बेटाक जरतै मोन तँ ओ चक्कर चलेबे करतै

पर्दाक पाछू जे भऽ रहल छै दहेजक खेल पर्दा नै उठतै तँ खेलबार खेल खेलेबे करतै

माय केर कोखि सँ हटायल जा रहल बेटीक भ्रूण दहेज ने रुकतै तँ माय बेटीक भ्रूण हटेबे करतै २ छोड़ि दियौ हाथ देखिऔ केम्हर जाइ छै इजोत मे सदिखन मुदा अन्हारो मे खाइ छै

अपना सँ छोड़ा कऽ हाथ भागै छै जोड़ै छै हाथ ओम्हर जेम्हर देखैत पाइ छै

एतेक भारी खदहा कोड़ने अछि ई हाथ कोशिश केलौं भरै कऽ मुदा नै भराइ छै

तंग अछि लोक जइ नेता सँ देख हाथमे नोट ओकरे  पाछू पड़ाइ छै ३ सजबै अहाँ एना तँ दिन मे चान उगि जेतै देखि अहाँकेँ हमर करेजा मे उफान उठि जेतै

अहाँक झलक पावक लेल बैसै छी जे दलान पर लोक कहीं बुझि गेलै तँ ओ दलान छुटि जेतै

मोन हमर बहुत चंचल तइ पर ई यौवन एना जे नैना चलेबै तँ हमर ईमान झुकि जेतै

हमर जान जुड़ल जा रहल-ए अहाँक जान सँ जँ अहाँ आब रोकबै तँ ई नादान रुठि जेतै ४ अहाँक चौवनियाँ मुस्की केलक घायल मोन हरौलक अहाँक छमछमाइत पायल

केलक एहेन जादू अहाँक नैनाक तीर यै देखलौं बहुत मुदा कियो दोसर नै भायल

कतए चोरौलौं अहाँ हमर मोन यै कने कहू कतए अछि हमर मोन हरायल

आँखि सँ चोरा कऽ नुकौलौं करेजामे फँसल एना ककरो घिचने ने बहरायल ५ जिनगी किए एना तंग लागैए रांगल तँ छी मुदा बेरंग लागैए बचपन बितेलौं रेतमे जवानी खेतमे कोना कटतै बुढापा एकटा जंग लागैए जे दोस्त बनि दुश्मन भेल छल दूर बेचारा भेल लाचार आब तँ ओहो संग लागैए मोजर नै केलौं जकरा कहियो भेल शक्ति छिन्न आब ओहो दबंग लागैए नवकी बहुरिया शहर सँ एली नवकी बहुरिया पुरनकी देखि काटै अहुरिया पहिरने जिंस तइ पर टप्स गजबे घुमए सौंसे चौक चौबटिया पुरनकी देख काटए अहुरिया जेहने ढीठ तेहने निर्लज टुकुर टुकुर देखि हँसए बुढ़िया पुरनकी देखि काटए अहुरीया के जान आ के अनजान लागए जेना सभ हुनक संगतुरिया पुरनकी देखि काटए अहुरिया कतेक करब गुनगान हुनक मुँहमे राखैत सैदखन पुड़िया पुरनकी देखि काटए अहुरिया बुढ सासुसँ काज कराबथि ठोकने रहैत दिनो केँ केवरिया पुरनकी देखि काटए अहुरिया मधुपनाथ झा धरती हमरासँ खिसिआएल अछि धरती हमरासँ खिसिआएल अछि आकाश सेहो तमसैल अछि नेह हम की केलौं अहाँसँ सभ कहए ई तँ काल अछि अपन दिलक दर्द, जखनसँ कहलौं दोस्त सभ बिगड़ल अछि, अपनो लोक आब पड़ा गेल अछि अनेरो बाबूजी खिसिया कऽ बिगड़ि देलखिन चारि दिन भऽ गेल माँ हुनकासँ रुसल अछि एक दिन फुलवारीमे जा काँटसँ हाल पूछि लेलौं फूल सभ खिसिआएल अछि, बगीचाक मुँह फुलल अछि किछु सिक्काक लेल अपन धर्म बेच देलौं पेट पापी प्रसन्न अछि परंच आत्मा घबराएल अछि ओना तँ अहाँ सँ पहिल भेंट अछि अनेरो खिसिआएल छी, किए सभ तमसाएल अछि ??? आएल वसंत उल्लास लए आएल वसंत उल्लास लए कोमल धुनि सँ भेल वातावरण उन्मत्त पिय-पिय गाबथि कोयल रानी सुनि हर्षित भेल मिथिलाक नारी  कुम्हलाएल गाछमे आएल हरियाली पलटल प्राण, जीवन नव पाओल मदमत्त भमर केँ देखू घूमि रहल अछि रस पिबऽ पतिक प्यासी छथि, कोयल रानी गुलाब, जूही, चमेली गमकि रहल सभकेँ मस्त कएने अछि वन-उपवन बुलि रहल नव रंग अछि, नव तरंग नव उमंग लए आएल वसंत हमहुँ लूटि रहल छी आनंद ......... बृषेश चन्द्र लाल, जन्म २९ मार्च १९५५ ई. केँ भेलन्हि। पिताः स्व. उदितनारायण लाल,माताः श्रीमती भुवनेश्वरी देवी। नेपालमे लोकतन्त्र लेल निरन्तर संघर्षक क्रममे १७ बेर गिरफ्तार। लगभग ८ वर्ष जेल। सम्प्रति तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक राष्ट्रिय उपाध्यक्ष । माल्हा- कथा संग्रह, आन्दोलन- कविता संग्रह आ बी.पी. कोइरालाक प्रसिद्ध लघु उपन्यास मोदिआइनक मैथिली रुपान्तरण तथा नेपालीमे संघीय शासनतिर नामक पुस्तक प्रकाशित। विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि। टनका मरब अहाँ जीअत लौसँ रक्त चूसएबला अहाँ मुरझाएब आ ओ अमरबेल!! हाइकू/ शेनर्यू लैअ छाल/ लोक हरियरीकेँ/ जारनि लेल नभ आ धरा/ शिव-शक्तिक मेल/ सृष्टि हएत सटल शान्त/ चूसैत छै छातीकेँ/ अमरबेल हे, अनन्तोकेँ / अस्तित्व बोध लेल/ चाही किनारा! गवाह ठूँठ/ अपने पैरपर/ कुरिहरिक! दिव्य सन्देश/ क्षितिजसँ अनंत/ अस्तित्वकेर! हवामे कल्पनाक/ भरै उड़ान/ चरैअ घोड़ा! आनि कऽ आश/ सोझाँमे फुसलाए/ धरैअऽ घोड़ा! आशे तँ छैक/ जीवन जगतमे/ कहैअ घोड़ा! उर्वर भूमि/ श्रम आ पसीनासँ/ गर्भाइत छै! कृत्रिमतामे/ आदिवासी आनन्द?, किन्नहुँ नइ! नेने छै पानि/ बेबूझ लोक लेल/ भू खोँइछमे। साँझ आ भोर/ शुरुआत आ अन्त/ शान्त रंगीन! दैत्यक खोड़र/ जल जीवनाधार/ सृष्टिक खेल! गन्हा जाइछ/ घेराएल समुद्रो/ थुनएलासँ! ढहनाइत/ मुदा गर्वे आन्हर/ अछि मिथिला! बेवकूफ छै/ मस्त बेफिक्र एना/ मनुख लेल! सटले लग/ पिआसल दू मोन/ मिलन लेल। प्राणदायिनी/ पिघलैत सिंचैत/ फटैत धरा। धुआँइत छी/ पानि छातीक ताओ/ भफादैअए। जलमे मुदा/ कोँचल आगि खाली/ ठंढएतैक? कतेक उड़ू/ कसाइक हाथसँ/ शान्तिक नामेँ। खिन्न छै शान्ति/ अशान्त दुनियाँसँ/ कते उड़ओ! भरल पेट/ शान्त रखैत अछि/ बाघो सिंहकेँ। धूर्त आ लोभी/ भेटत नुकाएल/ चुप्पे सोन्हिमे। जड़ाभिसप्त/ गति लेल निर्मल/ प्रतीक्षारत। देखह लोक/ बलत्कृत प्रकृति/ शान्त आ चुप। शान्त करेज/ अछि ऊर्जावाहक/ कोटि नमन। भाफए हिम/ धरतीक तापसँ/ सोचू मानव उठलै मेघ/ भुइयाँक जहर/ खंगहारए। चिन्तित शिव/ आधुनिक माहुर/ कोना गिड़थु?! टोनि रहल/ कटानक हिसाब/ धौआ झड़तैक। जीवन सपना किछु सपना एहन होइत अछि ने छोड़ैत अछि ने जोड़ैत अछि। निन्नमे आबि मुदा देखू नव आश जीवनमे कोड़ैत अछि।। जौं टुटि जाइछ जीवनधारा सपने जीवनकेँ ढोइत अछि। कहुँ लोरीसँ कहुँ होरीसँ जीवनकेँ सपना धोइत अछि।। मगन प्रेममे सपनामे कहुँ खिलखिल कऽ मुस्काइत छी। कहुँ डरसँ थरथर कनैत–कनैत कहुँ तपमे खूब भफाइत छी।। सपना जीवन की जीवन सपना ई भेद बड अछि भेदी भैया। ने एतए नाओ मझधार विकट ने ओतए केओ अछि खेवैया।। चलू सपनामे जीबू मनसँ जीवन सपने सन भऽ जाओ। ई सुख दर्द केर सागरमे दुनू अपने सन भऽ जाओ।। ने भेद रहए सपनासँ जौँ जीवन अनन्त भऽ जाइत अछि। ने रहैछ तखन सीमा बन्धन। ई हम दिगन्त बनि जाइत अछि ।। आशुतोष मिश्र गीत १ चुप चाप एक राइत सपनामे अबिहेँ। छोड़ि छाड़ि सभ किछु हमरा उठबिहेँ। दु:ख सुख सभ किछु हमरा तूँ कहिंए। तूँ अपन नोर सभटा हमरा दऽ जहिंए। हँसि-हँसि कऽ तूँ कनी हमरो हँसबिहें। बिसरि कऽ सभ किछु तूँ हमर भऽ जहिंए। चुप चाप एक राइत सपना मे अबिहें। छोड़ि छाड़ि सभ किछु हमरा उठबिहें। २ काल्हि छइ राखी, राखी नइ एलै बहिन सभ हमरा कोना बिसरि गेलइ तकै छी हम बाट कहुँ अखन एतै राखी केँ देख ई भैया हर्खित हेतइ दिन राखी केँ हम अपन हाथ तकै छी बितलै दिन आब हम नोर पोछै छी काल्हि छइ राखी, राखी नइ एलै बहिन सभ हमर कोना बिसरि गेलइ ३ चमकैत तोहर दाँत मुदा लिपिसटिक कमाल छौ  शोभै छौ सभ मुदा आँखिक काजर बबाल छौ 

चलै ने सदिखन तूँ एना मटकि मटकि  देख लेल भगतै सभ कहुना खसैत पड़ैत 

नाकमे फूल कानक बाली कमाल छौ  घनगर छौ केस तोहर जुट्टी धमाल छौ 

बोली छौ आगि तोहर आँखि कटार छौ  सजि धजि कऽ छल तोहर ओढ़नी लहकदार छौ 

चमकैत तोहर दाँत मुदा लिपिसटिक कमाल छौ  शोभै छौ सभ मुद्दा आँखिक काजर बबाल छौ आजाद गजल १ आइ हमरा निन्न भैए ने रहल अछि हमर सपनो अखन संग ने रहल अछि भोर होइ जल्दी तँ ठाम कोनो देखबै समय सेहो अखन संग ने रहल अछि सोचि कऽ किछु मुदा निन्न कनी आबै राति अखन पहार सन जे पड़ल अछि भुकै कुकुर कोइली ने कतउ कुहकै राइत अन्हरिया चंडाल ने अड़ल अछि २ एना लगैए जेना कतौ देखने छेलौं अहाँकेँ सालो सँ जेना करेज मे सटने छेलौं अहाँकेँ

लग आबऽ कऽ लेल मोन हरबड़ाएल छल गुम रहितो जेना किछु कहै छेलौं अहाँकेँ

कोन जन्मक स्नेह अओर भाब छल मोनमे डेग बढ़बैत घुरि- घुरि देखै छेलौं अहाँकेँ

धीरे धीरे हम बहुत दूर आबि गेनौं जेना रहि-रहि कऽ हमर मोन तकैत छल अहाँकेँ इप्सिता सारंगी इप्सिता सारंगीक ओड़िया कविता- ओड़ियासँ इंग्लिश इप्सिता सारंगी द्वारा स्वयं, इंग्लिशसँ मैथिली  गजेन्द्र ठाकुर द्वारा हिलकोर कियो नै सिखेलक कहियो एक ठोप माहुर देनाइ बासनमे निर्दोख सरलताक। हम पूर्ण रूपेँ हारि गेलौं। फूसिक मरैत पानि सुच्चा सत्यमे- वा दोसर, जीवन नै अछि जीवन, किंशाइत। हम हेरा गेलौं। कोन माहुर विश्वासकेँ संक्रमित केलक, जे लागल सदिखन मात्र टुकड़ी-टुकड़ी हेबा लेल। अकाशक टुकड़ी चिड़ैक दहाइत पाँखिमे; नहिये अकाश नहिये छाह छल एकर चांगुरमे। विश्वास, जेना पूर्णिमाँक रातिक समुद्र जे घुरबैए सभटा लेल बौस्त जखन ओ घुरबैए हिलकोर। की हिलकोर घुरैए विश्वासक आरि छोट हाथसँ बालुपर बनल? की हिलकोर घुरा सकैए एकान्त जिनगीमे निराउ बर्खा? पनिसोखाक द्वीपसँ स्वप्न आवेशसँ छोट कागचक नाहमे? आ, जीबाक स्थितप्रज्ञ अभिलाषा समयसँ ध्यान हटा कऽ? की हिलकोर घुरा सकैए- पराजय? आ, हेरा गेनाइ? (इप्सिता सारंगीक ओड़िया कविता "धेउ कान") मनोज कुमार झा, जन्म- ०७ सितम्बर १९७६ ई., दरभंगा जिलाक शंकरपुर-माँऊबेहट गाममे। शिक्षा - विज्ञानमे स्नातकोत्तर। लेखन: विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकामे कविता-आलेख प्रकाशित। चॉम्सकी, जेमसन, ईगलटन, फूको, जिजेक इत्यादि बौद्धिकक लेखक अनुवाद प्रकाशित। एजाज अहमदक किताब ‘रिफ्लेक्शन ऑन ऑवर टाइम्स’ क हिन्दी अनुवाद प्रकाशित। सराय/ सी. एस. डी. एस. लेल ‘विक्षिप्तों की दिखन’ पर शोध। शासक लोकनिसँ (बाढ़िक सन्दर्भमे) फूसि कहै छी - बाढ़ि प्राकृतिक कोप थिक । वस्तुतः ई; हमरा सभक सीना पर दागबा लेल तोड़बा लेल हमर सबहक आत्मबल कें लूटबा लेल हमर श्रम सिंचित संसाधन अहाँ सभक शस्त्रागारक बेस जोरगर तोप छी । किन्तु जानू, भूख लगला पर मनुख टूटबे टा नै करै छै, लड़बो करै छै, कते एफ.सी.आइ, कते बाजार समितिक दुर्गद्वार तोड़बो करै छै। रक्त केर जे बिन्दु खसै छै ऐ धरापर ओ कतेको स्वप्नदर्शी रक्तबीज रचबो करै छै, कोनो राजा, कोनो रानी कोनो जैक वा कोनो जोकर डरा कऽ वा हँसा कऽ कतेक दिन धरि लाखो करोड़ो पृथ्वी संततिकेँ कर्तव्यपथसँ विमुख राखत।

चूड़ा दही बेसी खेला सँ शोणित ठंढ़ा कतौ भेलैए! मानि ली, ई बात सत्यो सत्य तँ इहो छै विज्ञानसम्मत वस्तु जे जतेक ठंडा वातावरण केर तापक असरि ओकरा पर ओतबिये बेशी पड़ै छै।

तैं कहै छी कान दी गंगा, कोसी, कमला केर संतति सभक हुंकार दिस तात्कालिक लाभ-हानिक छोड़ि चिन्ता आक्रोश-प्लावित भेला सँ पूर्वहिं शासक लोकनि बाढ़िक निदानक करथु चिन्ता लोक सभ चहुँ दिस कहै छै। फुसि कहै छी बाढ़ि प्राकृतिक कोप थिक। श्रीमति शांतिलक्ष्मी चौधरी, ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी आ राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री, अओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी आ दिल्ली स्कूल ऑफ इकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक आ समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनी छथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी आ एकटा समाजशास्त्री सँ सानिध्यक कारण आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु आ खास कऽ महिलाजन्य सामाजिक समस्या आ प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक। हाइकू दृश्य विलोपित/ सहेजू ई चित्र/ नवपीढ़ी लेल गद्य कविता १ भिन्न भाव-भंगिमा लऽ कऽ (गर्दनि सँ उपर) प्रकृतिक बहुमुखी रूप: एकटा सामने सँ (ऊपरबला) अपन उजरल बसुधा केँ देखि रौदाएल कौआ जकाँ अवाक मुँह बउने। दोसर सामने सँ (निच्चाबला) अपन निःशक्तता आ किंकर्तव्यविमूढ़ता लेल निरीह गाय जकाँ मुँह मन्हुऐने। तेसर किनार सँ (पैघ मुँहबला) कोनो घड़ियाल सन जंगली प्राणी, तमसाएल, बड़का उत्पाद लेल मोन बनबैत। २ जीवनक घुप्प अन्हारमे, मस्तिष्क सघन तन्तु-जालमे, एहिना भिनसरबाक डरौन-भुतहा जंगल जकाँ सघन डारि-पातक मध्य सँ कतहु-कतहु सँ आशाक थोड़ेक किरण आभासित होइत छैक, जकरा बले लोक अपन खराप दिन कटै छथि। तिलकोर छी विदेह बाड़ीक ई अखंड सोहाग भाग मिथिला-संस्कृति पर पलरल अमरलत्ती घरक पछुआर मे ओहिना कचरैत भेटैत तरूआ पातक तिरहुतिया तिलकोर लत्ती

बलबूतबला महराजा दरभंगा होइ कि गाम समाजक किओ कमजोर सभक लिलसा पुरेबाक उदार-दानी भरि साल सुलभ रहताह ई तिलकोर

चौका मे तरूआ अल्लुक होइ आकि कदीमा फूल, तग्गर, कुम्हर-सिस्कोढ़ रमतोरइ, भाटा, वा कि मिरचाइ होइ बुझु सभ छै सुन्न बिन एक तिलकोर

गरम गरम करूगर माछक तीमन होइ की कबकब ओल, बूटक-बड़ी, कुम्हरौड़ सबहक स्वाद तखने शोभए उत्तम सन जखन संग उपलब्ध होइ एक तिलकोर

सुन्दर हींग देल कदीमाक तरकारी होइ वा कि सरिसौं देल अरिकंचनक झोर चिकना देल सजमैन खाहे केहनो बनै सभक सुलाज राखै छथि एक तिलकोर

समधि, जमाय सन गरिष्ठ पाहुन होइथ वा कि मुहलग्गू भौजीक भाय मुँहचोर मामा, मौसा, पीसा, सभक सुमान अधुर पाहुन केँ जँ नै परसलिऐ गरम तिलकोर

गरम गरम लोहिये मे तरूआ टुभटुभ सुगंधे सँ मोन मे होइत रहत हिलकोर मिथिलावासीक छैक ई खोज अनुप-सन नै पता मिथिला ऐला कोना ई तिलकोर

नीम-हकीमी के तँ आब गप्पे छोड़ू आब तँ पहुँचलाह ई एम्स आरोग्य बड़का पढ़लका एम.डी. केर कान काटै बाड़ी-बैसल चीनीक डाक्टर ई तिलकोर

बथुआक तीमन

मिथिला बाधक अनेर मोथा-बथुआ, शहरी तरकारी बजारक अनमोल! जर-जजातक हरमुठ हरमादी, पौष्टिक आहारक छथि सिरमोर!!

गामक भनसाघरक चीज अनुप, परदेसी धीयापुताक किलोल! केहनो मरल भुख केँ जगा दिए, आमील देल बथुआक सग्ग्भट्टा झोर!! गजल १ १ छाती तानि ठाढ़ सैनिक दुश्मनक तोप बरसाबैत अंगोरा लहास घिसियाबैत कुत्ता पढ़ि कवैती शेर केँ कहै भगोरा सात कोनटाक मरचट्टा बदलै कोन-कोन रंगक नै झण्डा बलिदानीक सारा लागल पाथरकेँ की बुझतै ओ लिकलोढ़ा सौ मुनसाक संग जे खेल करी राति-दिन खेलावै रसलीला सून बाट चलैत छौड़ी केँ कहलकै गे बज्जर खसतौ तोरा जँ बातक नहि ठीक तँ बापोक नहि ठीक के छै सत्ते कहबी उनटा-पुनटा गप्पक सतखेल करै ई कुर्सीक चटकोरा नौ सौ मुस खाए केँ बिलाइ साधु नाहैत चानन ठोप लगौने सुसुम खुन चाटए सुंघि-सुंघि करै ई लाकर आदमखोरा "शांतिलक्ष्मी" माथ धएने बैसल देख रहलै हेँ सभटा छिछा लोकतंत्रक अस्मिता लुटए बेकल कोना देसक कुलबोरा ............वर्ण २३........... २ दिन सुदिने बुझाइत ई कुहेस मे देस फँसल अछि घोटाला आ केसमे लोकतंत्रक राजा जनता-जनार्दन जनते सुतए तँ तंत्र पेसो-पेस मे पाप पराकाष्ठ होइ जनमै श्रीकृष्ण मीडीया छथि जागल ऐय्यार भेष मे छुलाह पहिनौ पापक माल खेलकै न्यायक आँखि आइ पड़ल उधेस मे जनता छाती ठोकि आब लड़ै भीड़ल लोकपालक अस्त्र देखि चोरो क्लेश मे "शांतिलक्ष्मी"केँ सभ किछु शुभे बुझाबै कृष्ण, चाणक्य, गाँधी, आ अन्नाक देस मे ..............वर्ण १४............ ३ क्षणे मे एना कोना अजबे क्षनाँक भऽ गेलय  सुतली बुढ़ी क्षणे मे कोना टनाँक भऽ गेलय 

ई देह आकि प्राणोक छैक गजबे महत्तम  हँसैत-खेलैत साँस क्षणे मे जाँक भऽ गेलय 

निरोग बुढ़ीकेँ मरै मे छैक किछु गरबड़ की कहू जखन जनमले बुराँक भऽ गेलय 

कुटौन-पिसौन कय बुढ़ी बेटाकेँ पोसलनि  वैह माय बेटाक लेल दम नाँक भऽ गेलय 

बच्चा मे बेटा सभ तँ रहै बड़ सुसंसगर आँखि-पाँखि भेलै बेटा सभ उराँक भऽ गेलय 

बुढ़ी केँ बेटा सभ सँ रहै बड़ बड़ सेहन्ता  हुनक सभटा लिलसा फाँक-फाँक भऽ गेलय 

"शांतिलक्ष्मी"केँ शंके भेनय कहियौ की बजती  दुनियाँ बड्ड दुष्ट जालिम चलाँक भऽ गेलय ४ पुत कपुत एना हेबै तँ कोना चलतै माय विदेह केँ कनेबै तँ कोना चलतै

माय मरै भुक्खे, पड़ै अहाँकेँ की अंतर मोन केँ एना जँ बौरेबै तँ कोना चलतै

परदेस भल्हौं होइ अहाँ मुँहपुरुख निजदेस सँ जँ पड़ेलै तँ कोना चलतै

मानलौं माय भेली पिछिता अहाँ अधुना माय केँ तेँ दुतकरबै तँ कोना चलतै

पड़ोसी भेली धनुखैनि माय दलिदर तेँकि माय केँ जँ छोड़वै तँ कोना चलतै

अपनाकेँ खोरनाठी अनका सिक्कीपंखा ई दुइ रीत जँ चलेबै तँ कोना चलतै

माय-बापे सँ होइ छै सुजन परिचय माय-देसक नै ठेकानै तँ कोना चलतै

बुझलौं जे रोटी लेल छै ई सभ चटुता कर्ज दुधेक नै चुकेबै तँ कोना चलतै

अपना मोने मे छै नीति अनीतिक रीत पुत सुमातेक बोहेतै तँ कोना चलतै

"सभ्य" केर कुभाखा मोन केँ लागै सुन्दर भाखा मैयेक जँ हरेलै तँ कोना चलतै

भाखा आन खेलकै कते सरकारी टाका मैथिली खैराते बिलेलै तँ कोना चलतै

"शांतिलक्ष्मी" कहती अहाँसँ बस एतबे स्वगौरव अहीं दबेबै तँ कोना चलतै .................वर्ण १५............... ५ पले पल अपन अंतर्मनक आगि मे सुनगैत अंशुमाला भऽ गेलहुँ  खने हर्ख स्मृतिक, खने दुखक आगि मे पजरैत, अंशुमाला भऽ गेलहुँ 

जीवनक बदलैत मौसमक डुबैत-उगैत चान सुरुजक रूप धऽ  खने स्याह अन्हार, खने इन्द्रधनुखक बिहुसैत अंशुमाला भऽ गेलहुँ

अल्हड़ कुमारिक सिहरैत सर्दी मे जाधरि गुदगुदी रहैक मुस्कैत  लोक कहै हम ओसाइत इजोरियाक ठहकैत अंशुमाला भऽ गेलहुँ 

मधुगंध आ नव आस लऽ कऽ जखन आएल बियाह राति केर बसंत  मोन मे रहै भ्रम हम उखा-अरूषक बिहुसैत अंशुमाला भऽ गेलहुँ 

प्राणक प्यास आ टुटल आस लऽ कऽ जखन आएल गुरदा-रोगक ग्रीष्म  पीबि विश्वासघातक प्रचंड दुपहरी मे जड़ैत अंशुमाला भऽ गेलहुँ 

शुभेच्छुक आशीख आ मायक वात्सल्य बरखा आपस अनलथि पावस  हम घुरि नव उम्मेदक दियाबाती मे टिमकैत अंशुमाला भऽ गेलहुँ 

"शांतिलक्ष्मी" कहथि स्त्रीशक्तिक पावनि तिहार लऽ घुरि आएल अछि जाड़  मानु हे सखि, अहाँ तँ धुमन आरतीमे गमकैत अंशुमाला भऽ गेलहुँ  .........................वर्ण २७.................... (अपन अनचिन्हार सखि अंशुमाला झा केँ समर्पित। ऐ गजल मे अंशुमाला शब्दक प्रयोग व्यक्तिवाचक नै अछि। शाब्दिक अर्थक अनुसार शब्दक प्रयोग प्रकाशक लड़ीक रूप मे भेल अछि।) ६ ओ मुनसा हाथ मे भरल लबलब लबनी लेनै बैसल छै पसीखाना मे खोंता मे मुँह बेने बैसल बगराक बच्चा कोनाकेँ छै आस लगौने दाना मे मौगी जे भिनसरबे गेलइ घुरि एखन धरि नै एलइ देखै चिलका केँ नै जानि काजक कत्तै जपाल पड़ल छै जीमीदार घरक जपलखाना मे हेबै मड़रक मेटिया आ रोटीक दौरी चोरेलकै राति मौगीक सतबेटा सभ कियो लपड़ाबैत थपराबैत घिचकेँ लऽ जाइत छै गामक थाना मे भागक राजा निसाँ मे उठलै टग्गैत, झुकैत, ऐंठैत, अकरैत, खखसैत कंठ फँसल सुलय भाष केँ जोड़ै छै आँखिक तीर तरुआरि बला गाना मे मौगीक सौतिन, नै जानि के छिऐ अइ सलीम केर खुआबक अनारकली संग जकरा लै मस्त पड़ल छै रस्ता कातक रातिक पसरल पैखाना मे शांतिलक्ष्मीयो केँ निअमक आड़ि तोड़ि मस्ती लुटब बुझाइत छै बड़ सस्त बड़ा कठिन छै यौ मुदा संयम मे बसनाइ, रहनाइ अपन सीमाना मे ..वर्ण २८.. शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’, १९७३- , पिताक नामः स्व. काली कान्त झा ‘‘बूच”, माताक नामः स्व. चन्द्रकला देवी, जन्म तिथिः ११.१२.१९७३, शिक्षाः स्नातक (प्रतिष्ठा), जन्म स्थानः मातृक- मालीपुर मोड़तर, जि. - बेगूसराय, मूलग्रामः ग्राम-पत्रालय - करियन, जिला - समस्तीपुर, पिन: ८४८१०१, संप्रतिः प्रबंधक, संग्रहण,जे. एम. ए. स्टोर्स लि.,मेन रोड, बिस्टुपुर जमशेदपुर- ८३१००१, अन्य गतिविधिः वर्ष १९९६ सँ वर्ष २००२ धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार-प्रसार हेतु डॉ. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न। प्रकाशित कृति: क्षणप्रभा-कविता-संग्रह, अंशु-समालोचना। हाइकू सूतल जग/  दिनकर लालिमा/ जगा देलक रविक लाली/ /ऐ सूतल जहाँकेँ/ जगा देलक बर्खाक बाद/ खहखह पाइन/ वसुधा तृप्त क्षणप्रभा सभ दि‍स सर्द कि‍यो नै बेपर्द देह सि‍हकल रेह ठि‍ठुरल पोखरि‍-इनार ठमकल पूस रमकल श्‍याम असर्ध शीतक बीच टक टक कएने आश कखन भरत मोनक पि‍यास कबदबैत चम्‍पा मुस्‍कैत पलाश सूर्यमुखीक दशा देखि‍ ओकरासँ कि‍अए करैत छी सि‍नेह जे कुन्‍तीकेँ ठकि‍ लेलक ओकर कौमार्य नष्‍ट कऽ देलक आइ आगि‍क ढेपपर के करत वि‍श्वास? झाँपू मर्यादा बचाउ गेह भावक आगाँ प्राप्‍ति‍क कोन मोजर एतबेमे मेघ उड़ि‍ गेल शीत लुप्‍त भेल क्षणप्रभा बनि‍ रवि‍क अर्चिस सूर्यमुखीक, कोमल कोंपरमे समा गेल ज्‍योति‍पुंजकेँ आदि‍त्‍यक चरण मानि‍- सूर्यमुखी अपन सेंथुमे भस्‍मीभूत कऽ लेलीह अखण्‍ड सौभाग्‍यवतीक आशीषक संग कि‍रण ससरल कली फूल बनि‍ पसरल हम तँ उभय लि‍ंगी छी नै रहि‍तौं तैयो करि‍ति‍यनि‍ सुरूजसँ प्रेम...... सभ कि‍अए दैत छी हुनकापर दोख ने डूमैत छथि‍ ने उगैत छथि‍ सभ पि‍ण्‍ड घूमि‍- हुनकापर डूमि‍ जएबाक कलंक लगबैत अछि‍- जखन अपनामे दृढ़ता नै तँ दोसरपर दोष केहेन? बि‍नु बजौने सभ लग अबैत छथि‍ आठो याम जरैत छथि‍ कुन्‍ती सभ जनैत कि‍अए कएली वरण- ज्‍योति‍पुंजकेँ बान्‍हब ककरासँ भेल संभव? आदि‍त्‍य सि‍नेहक तापस लगले तप्‍पत, लगले वि‍द्रूप कोना भेला छलि‍या? सि‍नेहक अर्थ सुधि‍ प्रभंजन नै स्‍पर्श एकर नै अवसान नै उत्‍कर्ष... क्षणप्रभा जकरापर खसल ओ जरल ओ मरल मुदा! सि‍नेहक क्षणप्रभा वासना मात्र नै- शाश्‍वत स्‍पंदन... जकरामे केलक प्रवेश ओकरा रोम-रोम शेष-अशेष एकर भंगि‍मा वएह कहत जकरामे संवेदना रहत....। नवीन ठाकुर, गाम- लोहा (मधुबनी ) बिहार, जन्म -१५-०५-१९८४, शिक्षा- बी .कॉम (मुंबई विद्यापीठ)। अंत -एक अनुभूति आब कतऽ अछि जिनगी कतऽ अछि जान आब किए नै करैत अछि कियो हरान थमि गेल सभटा उजड़ि गेल सभटा रुधिरक प्रवाह रुकल छूटल प्राण आब कतऽ अछि जिनगी कतऽ अछि जान ! देहक पीड़ा , अस्थिक जकरण नै छी आब कथू सँ परेशान अछि ने अन्हार आ नै इजोत सभटा बुझि पड़ैए एकै समान आब कतऽ अछि जिनगी कतऽ अछि जान ! व्यंजन नाना प्रकारक बनल तैयो बुझि पड़ैए मोन अछि भरल नै कोनो ललसा नै कोनो लोभ कथी पर करब आब ओतेक शान आब कतऽ अछि जिनगी कतऽ अछि जान ! कतऽ अछि आब लहर ओ उमंग ठहरि गेल जिनगी शिथिलताक संग नै कोनो लाज नै कोनो शर्म नै कोनो हकीकत नै कोनो भ्रम नै अछि अंगना हमर नै अछि दलान आब कतऽ अछि जिनगी कतऽ अछि जान ! अनुभव जे कियो नै रहल हेता असगर हुनका की मालूम जे की छिऐ डर ओ अनुभव की छिऐ सम्वेदना की छिऐ अकेलापन खामोशी, सरसराहटि , आहटि, सूनापन भरोसा कोना हेतनि अपना आप पर जे कियो नै रहल हेता असगर ! ऐनामे मुँह नै देखने हेता ओइ रुपे नै पहचान हेतनि अपन स्वरुप के..... एकटा जिन्दा सुगबुगाहटिक तलाशमे सुतलोमे.... नै जगेने हेतनि ....बिछौन जे कियो नै रहल हेता असगर ! हुनका की बूझल जे की छिऐ दूर सँ अबैत आटा चक्कीक हृद्य-कम्पन .. पुक-पुक, ओ जेठक दुपहरियामे चिल्काक हकरब टुक -टुक तकैत बगरा केँ देखैत ....आकि अंगनामे पथार गहुम- मड़ुआ पसरल जे कियो नै रहल हेता असगर ! हुनका की मालूम जे की छिऐ डर ओ अनुभव ! ! डा.अरुण कुमार सिंह, सम्प्रति मैसूर। सोधनपाल एकटा छथि गोपाल गोपाले सन मस्त रंगो गोपाल सन स्वभावो छन्हि बएसानुकूल पढबाक नाम पर छथि प्रतिकूल जैताह नीक स्कूल लिखताह नै पढ़ताह मारि धरि खौताह तैयो बिहुँसल स्कूलसँ घुरताह एक दिन अनचोकेमे दलानक बगलेमे लागल लारक ढेरीमे लगोलन्हि सलाइसँ आगि भऽ तँ जाइत जुलूम मुदा कौहुना आगि मिझाओल गेल सौंसे गौआँक नजरिमे गोपालसँ भेलाह सोधनपाल। प्रियवर सम्पादकजी प्रियवर सम्पादकजी यथोचित अहिना सम्पादकीय लिखैत रही मने-मन हर्षित हम होइत रही सत्यसँ भेंट करैत रही शब्दक अर्थ बुझैत रही गरल मुर्दाकेँ उखाड़ैत रही नव-नव इतिहास बनाबैत रही मिथिला, मैथिली एवं मैथिलकेँ परिभाषित करैत रही युग-युगसँ परिव्याप्त गलतफहमीकेँ सुधारैत रही परिवारवादसँ मैथिलीक रक्षा करैत रही वर्त्तमानक कुचक्र चालिक पर्दाफाश करैत रही मैथिलीक हत्याराकेँ सजा दिआबैत रही मैथिल, नन-मैथिल एवं सोइतक झगड़ाक फरिछौँठ करैत रही मैथिलीक आवाजकेँ जनता-अदालत धरि पहुँचाबैत रही आक्रोशितक आक्रोशकेँ आशीर्वचण बुझि अपनाबैत रही मैथिलीकेँ लहटा दिस जएबामे मदति करैत रही मैथिलीक प्रकाण्ड विद्वान प्रोफेसरकेँ शुद्ध-शुद्ध उच्चारण सिखाबैत रही कब्रमे लटकल पएरकेँ अपन प्रतिष्ठा बचैबाक पाठ पढ़बैत रही अवसरवादीक अवसरवादिताकेँ बाँचैत रही वैशाखी छोड़ि अपना बलेँ ठाढ़ होइत रही मिथिलाक्षरकेँ पुनरस्थापित करबाक प्रयास करैत रही विधि, विज्ञान, वाणिज्य एवं नव-नव प्रौद्योगिकीक संग मैथिलीकेँ जौड़ैत रही मिथिला, मैथिलीक विकासमे सदति लागल रही सम्पूर्ण विश्वमे अपन स्थान निर्धारित करैत रही कुन्दन कुमार आँखि झूठ नै बजैत अछि आँखि झूठ नै बजैत अछि, राज हृदयक आँखि खोलैत अछि। पुछलिऐ कतेको बेर,  ऐ दिल! कनी बताउ हमरा, ओ कोन घड़ी छल, ओ केहेन पल छल! जइ पल मे , हम दऽ देने छलौं, अहाँकेँ, आनक हाथ, करु नै धोखा, नै करु प्रपंच, बता दिअ हमरा,  हृदए हारैक कारण! नीलामी तँ नै लगा कऽ, बैसल छलौं हम, हाय लटकि गेलौं हम, ई केहेन फंदा मे, अनजान सफर अछि। अनजान अछि रास्ता, मंजिलक कोनो ठेकान नै, चलल जा रहल छी हम कतए, तैयो! हमरा लऽ, तीख रौद रहितो, मस्त पवनक झकोर बुझि. मोन सँ कहैत छी, सुहाना सफर अछि अपन, कहैत छैक, चलनाइ जीवन थिक, निरन्तर, लगातार, अनवरत! झा हेमन्त बापी माधुरी (एक नारी) मस्टर साहेबक असगरे बेटी छलथि माधुरी। संगे सतबा भाइ, भाउज रहै छलथि माधुरी। आन्हर मस्टर साहेबक इजोत छलथि माधुरी। खाइलै माधुरी, नित्यक्रिया ले माधुरी। चलैले माधुरी, फिरैले माधुरी। हुनकर बुढ़ारीक ठेंगा, बनल छलथि माधुरी। तइयो हुनकर जानक जपाल छलथि माधुरी। सदिखन हुनकर मूहेँ, अपशब्द सुनै छलथि माधुरी। तखनो खुशीसँ रहै छलथि माधुरी। हँसै छलथि माधुरी, गाबैत छलथि माधुरी, खेलाइत छलथि माधुरी। मैटूअर तँ छलैथे, एक दिन बपटुअरो भेलथि माधुरी। भाइ भाउज कहलथि माथ बथायल माधुरी। सदिखन घरक काजमे अढ़ल रहै छलथि माधुरी। दुनु गोटेकेँ खुश करैमे भिड़ल रहै छलथि माधुरी। तखनो भाइक आँखिमे गड़इ छलथि माधुरी। एक दिन कहुना बियाहि कऽ सासुर गेलथि माधुरी। पियक्कड़ पतिक संग उसनाइत छलथि माधुरी। साँझ, भोरे, दिन, राइत मारि खाइ छलथि माधुरी। साउस ससुर वरक सेवामे, मिझाइत छलथि माधुरी। मोनक सपना मोनेमे पिस कऽ, औनाइत छलथि माधुरी। समए बितल एक बेटाक माय भेलि माधुरी। सोचलथि आब नीक सँ, समए बिताएब, माधुरी। शराब बनौलक हुनका मसोमात, कानैत छलथि माधुरी। साउस ससुरसँ आब धिक्कारल जाइ छलथि माधुरी। तखनहुँ आँखिक तारा बनैक प्रयास करै छलथि माधुरी। कहियो दिन फिरत सोचैत छलथि माधुरी। चौदह बरख टकटकी लगा कऽ, निमाहि लेलथि माधुरी। बेटा भेल सियान तँ आश केलन्हि माधुरी। बहुरल दिन मोनमे बास केलन्हि माधुरी। साउस ससुरकेँ बहकेलासँ बेटासँ गारि सुनल माधुरी। फुइट फुइट कऽ कानए लगली देख विपदा माधुरी। कि एहिना जनमे बितत विधाता, सोचि पड़ेली माधुरी। अखन राहे, बाटे घुमै फिरै छथि माधुरी। पहिने सँ बेसी हँसै, गबै छथि माधुरी। बुधियार लोक सभ कहै छथि "बताहि" भऽ गेल माधुरी। मुदा "बापी" क आँखिक नोर बनल छथि माधुरी। जे सभ ठाम खसि रहल अछि बनि एगो माधुरी। की नारिक इएह परिभाषा थिक?

दोषी छथि सोचिमे लल्लन बाबू, धऽ माथापर हाथ। सौँसे गाँवसँ घुरि कऽ एलाह, नै टाका भेलनि हाथ। काल्हि बुचिया केर सगुन उठत, पूरा पाइ नै पास। बाप पुते सभ प्राणी घर, बैसल भेल उदास। माल जाल खेती बाड़ी बेच, किछु तँ पाइ जोगेलथि। गहना गुड़िया बेच घरक, दहेजक सामान जुटेलथि। सोचलनि पाग राखि पएर पर, वर पछ केँ बुझेबनि। होइते पाइक व्यवस्था हम, किछुए दिनमे पहुँचेबनि। घरक भीतर केवाड़ पाछूसँ, सहमल बुचिया ताकै अछि। कोइस रहल खुदकेँ विधाताकेँ, अप्पन भाग्यपर कानै अछि। पहुँच लड़काक घरपर, भेल सभ बिध बेबहार। मुदा लल्लन बाबुकेँ आँखिक आगाँ बुझल अन्हार। देबू बाबू कहला बजा क​ए, समधि कनी इम्हर अबियौ। लेन देनक बात तँ अहाँ, पहिने तँ फरिछबियउ। हाथ जोड़ि बजला लल्लन बाबू, नै भेल अखन जुगाड़। किछु बेरक समय देल जाउ, सधा देब सभ उधार। हम व्यापारी नै छी, सभ टा चाही एखने। पूरा पाइ जे देब तँ सगुन, सगुन उठत आब तखने। हाथ जोड़ि कऽ पएर धरि कऽ, लल्लन बाबू गोहरैला। आरो सभ लोक बुझेलकनि, देबू टससँ मस नै भेला। हारि थाकि कऽ गमा कऽ इज्जति, लल्लन बाबु अएला घर। वज्रपात भेल सभक उपर सुनि कए ई खबर​। कानैत बजलाह लल्लन बाबू, एकरा कारणे इज्जति गेल​। कथिले जनमल घर ई छौड़ी, जनमिते किए नै मरि गेल​। सुनि बापक बज्जर सन बोल, बुचिया नै सहि पौलक। चुप्पे चाप अपन कोठरीक, केवाड़ बन्द क​ए लेलक​। बोझ बनि बापक उपर, जिअब हम कथी ला। लगा कऽ फसरी बुचिया अप्पन शेष केलक इह लीला। जत​ए शुभक गान होइत छल, मचल ओत​ए कोहराम। बलि चढ़ल एक अओर नारि के, लऽ कऽ दहेजक नाम। "बापी" एक्कर के अछि "दोषी", केकरा फाँसी चढ़ाएब। लड़का या लड़काक बाप, या पुरा समाजपर दोष लगाएब। धिया सुनि सौँसे घर मचल कोहराम सन्न भऽ रहि गेलौ सभ ठामे ठाम सुनाइ पड़ल घर जनमली धिया हमरे घर ऐला अभगली कीया

नै बटल मिठाइ नै केलौं दान माथ पकड़ि कहलौं हे भगवान कोन जनमक पाप की कैलौं तकर फल हमरा अहाँ देलौं

दैतहुँ पूत जे संगहि रहैत हमर बुढ़ारीक ठेंगा बनैत ई कि देलौं जिनगीक झर पड़ाए जाएत जे अनकर घर

तिलक दहेज लेल टाका जोगाउ या एकरा इस्कुल पठाउ कतबो ई पढ़तै लिखतै चौका चुल्हा तँ करहे पड़तै जै सँ रहै छलौं पड़ाएल सेहै हमर माथा बथाएल सदिखन इज्जत केर सोची बेर बेर माथा हम नोची

सुनु आब बापी केर विचार तजु मोन सँ घिनायल विकार पूत एक कुलक दीपक होइए बेटी दू कुलक इजोत करैए

खोलू मगज आ करु विचार कनी जौँ जुग नै रहैत जनी तँ हम अहाँ कोना कऽ रहितौं सृष्टि केर कि कल्पना करैतौं की कहू सैदखन समए पड़ा रहल अछि नै बन्हबाक कोनो जोगार आब नै काटल कटि रहल अछि जिनगी बनल पहाड़

जाधरिर छल समङ्ग देह मे नै केकरो गोहरेलौं खसल शरीर जे आएल बुढ़ारी निज घर सँ बहरेलौं

दुःखसँ माथ पकड़ि कनै छी केओ नै नोर पोछैए जेकरा हम बजनाइ सिखेलौं ओ देख दशा हँसैए

बड़का बौआ कहथि जोरसँ किछु नै अहाँ बुझै छी मझिला, छोटका दुत्कैर रहल अछि नै जानै कोना जिबै छी

पोता पुतोहु नै आब टेरैए केओ घुइरो कऽ नै ताकए कुहैर कुहैर कऽ जीब रहल छी प्राण नै निकसै केहु बाटे

नै सुझबाक, नै सुनबाक दुःख नै दुःख एतबे मोन होइए जिनक लेल जीलौं जिएलौं सेहे अप्पन फास बुझैए

चारि पाँच धिया पुताकेँ मै-बाप सहज सुलभ पालैए मुदा सभ मीलि जुइल कऽ मै-बापकेँ नै रखैए

कहै बापी जुनि करु एना अहुँक समय आबैए ईहो जुग मे जे जेना करैए तेहने फल पबैए दानव जगदम्बासँ उपजल धरती बनल निठुर आ भऽ गेल परती फाइट रहल मिथिलाक करेज जनमल ऐठाम असुर दहेज घरे घर पैसि गेल ई दानव हैवान बनल मिथिला केर मानव घरेसँ धूआँ उड़ा रहल छी बेटी सन पुतोहुकेँ जरा रहल छी नित बहिन बेटीक बलि मंगैए कते केँ खा गेल मुदा एकर पेट नै भरैए हम सभ एकरा खुआ रहल छी घरेमे राछस पालि रहल छी अनका सँ कहै छी एकरा त्यागू अपना बेर मे सभ सँ आगू पहिर लेलौं निर्लज्जक भेष बेटा केँ बुझै छी नगदी कैश कानि रहल मिथिला केर धीया ई धरती पर जनमलौ कीया बनि गेलौ घऽरक अभिशाप पड़ल सोइचमे भाइ, माँ, बाप एकरा जे सभ बढ़ा रहल छथि मिथिलाकेँ ओ सभ जरा रहल छथि कहि दै छी ई नै आब पड़ाएत एक दिन अहुँक घर जड़ाएत दिने दिन ई बढ़ले जाइए सुरसा जेना मुँह फारने जाइए आकार एकर भऽ गेल अनन्त मिथिला संस्कारक कऽ देलक अन्त किरिया ऐ एकरासँ सभ जूझू अनकर वैदेहीकेँ अप्पन बूझू सभ गोटे करु एकरासँ परहेज भगवती सप्पत नै लेब आ नै देब दहेज "बापी" आबो सभ चेत जाउ आउ सभ मिल ऐ दानवकेँ बैलाउ फेर घरे घर एती माँ सीया धन्य बुझब जे घर एती धीया जेकर नै कएल जाएत बखान विद्यापति सन जतए कवि महान मण्डन मिसरक जनमक थान जे अछि विदेह जनक केर धाम

मिसरी सन वणी जइ ठाम के बनला पाहुन राम ओइ ठाम के जननि जतए माँ सिया भेली जइ ठाम गंगा चलि कऽ एली जतए छल-छल बहि रहल अछि कमला, कोसी, जीबछ, बलान

हर आङन तुलसीक चौड़ा घर घर होअए चण्डी पाठ जतए माँ सरस्वतीक बास जइ ठाम एहन सुन्नर कहू ठाठ कतए

दही चूड़ाक भोग जतए  भिनसरे लैथि भगवान सगरे जगतमे कतए भेटैए रसगुल्ला, माँछ, पान, मखान

कतौ सोहर कतौ बटगबनी कतौ चैता, फगुआ, बरहमासा समदाओनक राग कतौसँ कतौ साँझ, पराति, छमासा छठि, दिवाली, दुर्गापूजा फगुआ आ सौराठक मेला कतै पाएब साम-चकेवा आ झिझियाक खेला स्वर्ग सनक ई नगरी बापी नै पाएब दोसर ठाम गर्व सँ कहू जै मिथिला, जै मैथिली,  जै जै मिथिला धाम राहुल राही, पिता- श्री हरिश्चंद्र झा, गाम- माऊंबेहट, मनीगाछी, दरभंगा, स्थायी निवास - दरभंगा, बिहार, वर्तमान निवास- सेलम, तमिलनाडु। हमर प्रियतम ! प्रियतम ! अहाँ कतेक नीक छी। कतेक विश्वासी आ अपन कहल पर सटीक छी, कि हम आँखि बंद कए,  कऽ  सकैत छी अहाँ पर विश्वास। कि जहिना पछिला जन्म मे, ओकर पछिला जन्म मे, आ जन्म-जन्मान्तर सँ हर जन्म मे, अहाँ हमरा सँ भेंट करैत एलौं, अपन वचनक अनुसार, आ हमरा मिलाबैत एलौं, ओइ परम आनंद सँ, जतए कोनो दर्दक अनुभूति नै रहि जाइत छै, कोनो अपूर्ण इच्छाक टीस नै रहि जाइत छै, एकटा तृप्ति होइ छै जीवनकेँ जी लेबाक, आ संतुष्टि होइ छै अहाँकेँ पाबि सभ किछु बिसरि जेबाक। जेना अहाँ कहियो हुसलौं नै अपन वचन सँ, जेना अहाँ कहियो भटकलौं नै अपन कर्त्तव्य सँ। ओहिना जखन कोनो अप्पन कऽ बिछड़बाक दुःख गहींर उतरि कऽ करेजा मे भूर करए लगै, जखन ककरो उपकारक कर्ज मन-ओ-मस्तिष्क केँ अपना बोझक निच्चा दाबि मरदए लगै, जखन ककरो वचन दऽ अंतिम समय पर नै भेंट कऽ पेबाक टीस अपराध-बोधक आगिमे जराबए लगै, आ जखन ककरो लेल किछु करबाक प्रेममय तीव्र इच्छा दम तोड़ि मिसिया-मिसिया कऽ मरबा लऽ बाध्य करए लगै, तखन अहाँ आएब आ हमरा सम्हारि लेब, देखू हमरा तिल-तिल कऽ मरए नै देब। हमरा विश्वास अछि, अहाँ आएब आ हमरा सम्हारि लेब, अहाँ हमरा मिसिया-मिसिया मरए नै देब। किएकि हमर तँ जिजीविषाक श्वास-नलिये टूटि गेल छल, तखन सँ अहींक देल भरोसाक साँस पर तँ जीबि रहल छी। कतेक अहाँक प्रशंसा करू, कोना अहाँकेँ धन्यवाद कहू, किछु बुझबामे नै आबि रहल अछि, मुदा अहाँ समय सँ आबि जाएब, देखू, आबै मे देरी नै लगाएब। हे हमर प्रियतम! हे हमर मृत्यु! जवाहर लाल कश्यप (१९८१- ), पिता श्री- हेमनारायण मिश्र, गाम फुलकाही, दरभंगा। खाइ एकटा लड़की छै लडकी नै, परी छै रंग ओकर दूधमे केसर मिलाएल नैन ओकर रुपमे अछि ओझराएल होइत अछि मोन ओकरा सँ करी बात बहुत रास मीठ मीठ बात मुदा हिम्मत नै भेल ओहो हमरा रोज देखैत अछि देखि हँसैत अछि किछु कहि दैत अछि मुद हम  किछु कहि नै सकलौं रहैत अछि हम्मर बिल्डिंगमे हम्मर बिल्डिंग जे हम्मर नै अछि हम ओइ बिल्डींगमे वाचमैन छी ओतेक टा बेटी अछि हम्मर रहैत अछि गाम मे माय आ बुढ़ी दायक संग हम अप्पन परिवारसँ दूर परदेसमे पेटक आगिमे सभ सुख होमादि कऽ जीने जा रहल छी आबैत अछि वएह लड़की लेने एकटा गुड़िया कहैत अछि मीठ बोल “अंकल देखू नेन हमर डॉल कते नीक अछि दस हजारक अछि” ओतेक सैलरी नै अछि हम्मर हम ओकरा छू नै सकलौं गोदमे उठा नै सकलौं जइ खाइकेँ देवदूत पार कऽ चुकल हम ओकरा पार नै कऽ सकलौं समयक धार अहाँकेँ याद हएत वा नै एकटा आमक गाछ छलै रस्ता कात मे, पोखरि पर खूब झमटगर ओकरे छाँह मे खेलै छलै भोर आ साँझ, कबड्डी वा किरकेट मोन पड़ैत अछि, बहुत रास बात पूसक शीतलहरि, माघक मज्जर कोयलक कू, होलीक पू कलम गाछी, बड़द बाछी फुलही थाड़ी, कटही गाडी चौरचन आ जितिया, ठकुया पीड़िकिया बाध बोन, तितलीक पाछाँ उड़ैत मोन धानक लावा, दूधक डाबा बिआहक चुमान, कोजगराक मखान विधक गीत, बचपनक मीत पुरहर आ पाती, दीयाबाती छैठक पूजा, चाउरक भुसबा गामक भोज, याद आबए रोज समयक धार मे भसिया गेलै बहुत रास बात देखैत रहि गेलौं हम मूक दर्शक, निरीह प्राणी जकाँ समएक संग भसिया गेलौं हम आब ने ओ गाछ अछि, ने बहुत रास बात छी धन्य हम, हम्मर मिथिला ई जिंजीर तोड़ि, स्वीकार करु सबल छलौं, अबल भेलौं सबल बनब संकल्प करु नव गीत लिखू, नव बात कहू आ नवयुगक संधान करु जागि अहाँ हुंकार करु आ मंगल  दिश  प्रस्थान करु नै बात बनाउ, नै घात लगाउ पीठक पाछाँ अपमान करु सत्य कहू, सम्मान पाउ आ दोसर केँ सम्मान करु भागू नै नेताक पाछाँ नै करु भीखक अभिलाषा आत्मबलकेँ संग लए दुनियाँ पर अहाँ राज करु अन्ना जी भऽ गेलथि चुप अन्ना जी भऽ गेलथि चुप आशाक जे एक किरण छल ओहो कतहु भऽ गेल गुम राजनीतिक दाव पेंच देख निकालए खूब अनका मे मीन मेख अप्पन दामन कियो नै देखए जइमे अछि हजारो छेद निकलैत सुरज डुबि गेल भऽ गेल आब अन्हार कुप्प अन्ना जी भऽ गेलथि चुप काटि लिअ कोना दुनू पाँखि अहाँक सौंदर्यमे, ओझरा कऽ हम अप्पन आँखि काटि लिअ कोना दुनू पाँखि, काटि लिअ कोना दुनू पाँखि चन्द्र राशि केँ तजि कऽ हम, केश राशिमे कोना भटकि जाउ संसारक हम गूढ़ प्रश्न तजि, बाहुपाशमे कोना अटकि जाउ अओर-अओर अन्यान्य सत्यकेँ अपना सँ हम दूर हाँकि काटि लिअ कोना दुनू पाँखि, काटि लिअ कोना दुनू पाँखि हम छलौं उन्मुक्त, तन-मन हम्मर निर्बन्ध छल उड़ैत पवन संग उड़ैत छलौं, आ गति नीर सन चंचल छल व्यस्त छलौं हम मस्त छलौं हम, बेकारीक धूल फाँकि काटि लिअ कोना दुनू पाँखि,  काटि लिअ कोना दुनू पाँखि दुर्लभ मानव तन अछि भेटल, गूढ रहस्य खोजबा लेल ध्वंशक विगलित व्यवस्था, नव निर्माण करबा लेल अहाँ कहै छी थम्हि जाउ, मुदा बैस कोना जाउ, हारि-थाकि काटि लिअ कोना दुनू पाँखि, काटि लिअ कोना दुनू पाँखि हम पुछलियन्हि के छी बाबू? हम पुछलियन्हि के छी बाबू? उज्जर चक-चक कुर्ता पहिरने, अंदर कतेक दाग छुपेने अपने ओ मुसकाय रहल छथि, अप्पन गुण ओ गाबि रहल छथि हम पुछलियन्हि के छी बाबू? ओ कहलथि चुप रह बेटा हम छी अइ देशक नेता संगमे चारिटा गुण्डा लेने पुलिसक दू बंदा लेने अप्पन रोब जमाए रहल अछि सभकेँ ओ हरकाए रहल अछि हम पुछलियन्हि के छी बाबू? ओ कहलथि नै छी कियो आर हम छी अइ देशक ठीकेदार सत्यक राह बहुत दुख देबा, जान दियौ वा खाउ मेवा सोचने रही सिस्टम केँ बदलब, सिस्टम संग अपने बदललौं हम पुछलियन्हि के छी बाबू? ओ कहलथि नै पूछू सर हम छी देशक अफसर महगाइ बढ़ि गेल बहुत छै, मुस्किल सँ आब पेट भरै छै उपरे उपरे सभ सेटिंग छै, घुसकि भेटत सभ फिटिंग छै हम पुछलियन्हि के छी बाबू? मुस्किल सँ चलैत अछि दाना पानी हम छी अइ देशक किरानी तोन्द हुनक छन्हि सेहो निकलल, मोछ हुनक छन्हि सेहो फड़कल हाथ मे लेने छथि ओ डंटा, करथि हलाल अनेको बंदा हम पुछलियन्हि के छी बाबू? ओ कहलथि चुप रह फुलिश हम छी अइ देशक पुलिस गाड़ीमे लागल अछि बत्ती, सबहक गुम अछि सिट्टी पिट्टी लागि जाइत अछि ओतए मेला, जतए सँ गुजरैत अछि काफिला हम पुछलियन्हि के छी बाबू? ओ कहलथि चुप रह ससुरी, हम छी अइ देशक मन्तरी राजपथ पर भेटल भिखमंगा, दरिद्रक संतान भूखा नंगा मालगोदाम मे अन्न सड़ै अछि, तैयो लोक भूखे मरैत अछि हम पुछलियन्हि के छी बाबू? ओ कहलथि तेहन सभसँ पड़ल वास्ता हम छी अइ देशक जनता अच्‍छेलाल शास्‍त्री (१९५६- ), गाम- सोनवर्षा, पोस्‍ट- करहरी, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार)। की देख रहल छी? गाम-गाममे अछि‍ पसरल झगड़ा। लोभी बैमान करैत अछि‍ नखड़ा।। घर बि‍गाड़ू करैत देखू बखड़ा। सभ कि‍छु जानि‍ रहल मैया सखड़ा।। झगड़ घर बि‍गाड़ू लगा रहल अछि‍। बूतल आगि‍केँ सुनगा रहल अछि‍।। फुसि‍ गप कोना पति‍या रहल अछि‍। कनफुसकी कऽ ओ बति‍या रहल अछि‍।। की कही घर-घरमे अछि‍ तँ यएह दुख। देख जड़ैत एक दोसरक सुख।। सभटा खेला करैत टोल प्रमुख। एक दोसरकेँ प्रगति‍क खएबाक भुख।। मुर्दाकेँ उखाड़ि‍ गन्हका रहल अछि‍। भायपर भायकेँ सनका रहल अछि‍।। जन धन-क्षण कोना गमा रहल रहल अछि‍। परि‍वारक प्रगति‍ तँ जा रहल अछि‍।। एे लेल मि‍लल देशक आजादी। गलती करबाक लोक भेल आदी‍।। लड़ैत मरैत वादी प्रति‍वादी। देशक जन-धन-क्षण हुुअए बर्बादी।। कहू तहन ऐमे गलती कि‍नकर। हि‍नकर कि‍ हुनकर देख रहल दि‍नकर।। दू हजार दस श्रावणक दृश्‍य सुखि‍ गेल पोखरि‍ डाबर घर। पूर्वा बहैत जाड़ बेजाड़।। लागल दमकल फट-फट करैए। चर चाँचर सभ छट-छट करैए।। सगर डगर बाट गर्दा उड़ैए। दुपहर चलक नै मन करैए।। खेतक बीआ सुखल बीरार। ने कादो आ ने होइत गजार।। श्रावण लगैत बैशाख मास। धान नै लागल सकल चास।। बाधक बाध चरैत अछि‍ माल। कि‍ कहतन्‍हि‍ कि‍यो हाल-चाल।। कखनो हवा शान्‍त रौद गुमार। केहेन अछि‍ खेतिहर कपार।। लागल तागत सभटा बुड़ल। दाहीपर अछि‍ रौदी घूड़ल।। कि‍सान पि‍सान दुख नै बुझत। अपना दि‍स तँ सभकेँ सुझत।। शीघ्र करू सरकार जोगार। सुखि‍ गेल पोखरि‍ डाबर धार।। सत्यनारायण झा पत्र लिखि रहल छी आखर हम, प्रिये अहींक नाम गेल छलौं पूजा मे, हम अपना गाम।१ गामक माटि छलै, ओहिना गमकैत, फूल पात सभ गाछमे, छलै ओहिना झुलैत।२ छौड़ा सभ गाछ पर, झूला झुलैत छल, सिनेह-प्रीतिक गीत सभ, ओहिना गबैत छल।३ यारक दलान एखनो पूबे मुँहे छल, बाबाक आँगन, सुन सान लगैत छल।४ एकोटा लोक नै, एकोटा बेद नै, साँझे सँ अंगनामे कुकुर भुकैत छल।५ की कहू हाल हम, भैया भउजी केर, बेटाक मारि सँ, बेदम रहथि फेर।६ गामक हालात छैक एकदम खराब, टोले टोल भेटत आब बोतल शराब।७ नै छलै ब्रह्मस्थानमे ओ पाकरिक गाछ, नै छलै ओकरा आब, वरक गाछक साथ।८ महराजी पोखरिक छैक, आब हालत बेहाल घाट सभ टुटल छैक, रूप विकराल।९ आँगनमे आब, एकटा हवा बहल छै, सबहक पुतौहु आब, रौदा तपैत छै।१० बाध बोनक हाल एखनो हरियर लगैत छैक, घास काटए एखनो घसविहनी भेटैत छैक।११ देखलौं आँगन मे, गबैत सामाक गीत, पोखरिक मोहार पर, भेटल छला मीत।१२ कहलनि भजार, अहाँ काज कएल नीक, गाम आबि गेलौं से, भेलै बड़ ठीक।१३ की कहू हम आब, गामक कथा, लिखि नै सकै छी, गामक व्यथा।१४ माफ करब अहाँ हम, घूमि नै सकब, गामक हालात जावे, किछु नै सुधरत।१५ मोन हुअए तँ गाम, अहूँ आबि सकै छी, गामक सुधारमे, संग दँ सकै छी।१६ गंगाकातमे ओ भेट भेल छली हमरा, गंगाकातमे। रामनामी ओढ़नी ओढ़ने, फुलडाली हाथमे नेने, तुलसी माला गरमे धेने, धवल शुभ्रा वस्त्र पहिरने, ओ जाइत छली गंगाजल लाबए, गंगाकात मे, ओ भेट भेल छली हमरा, गंगाकातमे। मांग उजरल सिउथ उज्जर, लहठी टुटल अबला सन, सन्यासिनीक रूप, दुखक मूर्ति बनल, ओ जाइत छली गंगाजल लाबए, गंगा कातमे, ओ भेट भेल छली हमरा, गंगा कात मे॥ मृग नयनी छली, पिक बयनी छली, गजगामिनी छली, चित चोरनी छली, कतेक मनोहारणी छली, कतेक मनोभावनी छली रूपक रानी छली, मोहनीये नै अद्भुत छली, से भेट भेल छली हमरा गंगाकातमे, ओ जाइत छली गंगाजल लाबए, गंगाकातमे॥। हुनक आभा देखि सूर्य उगैत छल, हुनक गंधसँ लोक गमकैत छल, हुनक मादकता देखि लोक हँसइत छल, से आइ बनल छनि एहन दशा, देखि मोनमे उठल व्यथा, एहन दशा मे भेट भेल छली ओ हमरा, गंगाजल लाबए गेल छली ओ गंगाकातमे, भेट भेल छली ओ गंगा कातमे॥॥ हुनक दुःख देखि हृदए सुन्न भेल, हुनक कांति देखि मोन खिन भेल, पाथर सन कठोर ई संसार, तेहने कठोर ओ रचनाकार, तैं ओ अपन अरमान बहाबए, नहू नहू जाइत छली, ओ गंगाकातमे ओ भेट भेल छली हमरा, गंगाकातमे॥॥। धारक कछेरमे बैसल टुकुर टुकुर तकइत छी धारक कछेरमे बैसल टुकुर टुकुर तकइत छी, तकइ छी ऐ धारकेँ, तकइ छी ओइ पारकेँ’ यएह ओ धार छैक? सभक करेज पर छुरी चलबैत छल जवानों कऽ दिल धरकबैत छल। एकर जखन जवानी रहैक, कतेक उफनैत छलै, कतेक फनकैत छलै जेना एकरा आगाँ कियो नै छै एकरा डरे कियो सुतैत नै छल ई कखन की करत, एकर कोनो ठेकान नै? गामक गाम सुन्न कऽ देलक, पोखरि, इनार, गाछी-विरछी सभ नाश केलक, ई गामक जेठरैयत छल, गामक पटवारी छल एकर आगमने सुनि लोक कपैत छल। बाप रे फेर डकुबा एतैक, ऐबेर नै जानि की करतैक? समूचा गामकेँ सुड्डाह केलक, घर, आंगन, दलान तोड़लक। धीयापुता कलोल करैत छल, भूखे पेटकान धेने, बेजान रहैत छल। मुदा ऐ डकुबाकेँ कनेको दया नै, विवेक नै, निष्ठुर हिरदय, कर्कश स्वर अगिया बेताल छल, ई धारे नै, महाकाल छल। कतेक कऽ मांग पोछलक, कतेक कऽ लहठी तोड़लक। कतेक कऽ कोखि उजारलक, ई राक्षसे नै, पैघ भक्षक छल। एकर प्रवाह तेज होइते, लोक सिहरि जाइ छल, केखनो सीधा दौड़इत छल, पाछू घुमैत छल, चक्कर कटैत छल, विकराले नै, भयानक लगैत छल। समय चक्र उनटलइ, एकरो अंत एलइ एकरा बुझल नै छलैक, एकरो काल घेरतइक इहो एक दिन निष्प्राण हेतैक। एकरा करेज पर लोक घर बान्हि देलकै, ई निर्जीव भेल पड़ल, नङटे ओंघराएल छैक, जतेक पाप केलक, सभक फल पेलक। एकर हाल भिखमंगनी जकाँ छैक, एकरा देह पर गुदरी लादल छैक , हुक हुकी छैक, मगर टुकुर टुकुर तकइ छैक हमरे जकाँ, जेना हम तकइ छी एखन एकरे जकाँ। शिवशंकर श्रीनिवास, १९५३- , जन्म स्थान लोहना मधुबनी, बिहार । चर्चित कथाकार ओ आलोचक । गीत ओ कविता सेहो कहियो काल लिखैत छथि । प्रकाशित कृति : त्रिकोण, अदहन, गाछ-पात, गामक लोक (कथा संग्रह), बदलैत स्वर (कथापर समालोचना)। गीत १ रोटी भातक नै छै पत्ता अगबे हर-हर गीत। इमान मुखौटा लगा बहादुर लऽ रहल छै जीत॥ औ जी बुद्धिक छै बलिहारी। कहै छै दूध, मुदा छै ताड़ी॥ जतहि हथौरब कतहु किछु नै अगबे चाले-चाल। छुच्छ हाथमे कतहु किछु नै जिनगी भेल बेहाल॥ पेपर लिखै बम बम बम टीबी नाचै छम छम छम औजी अद्भुत छै अपियारी। कहै छै दूध मुदा छै ताड़ी॥ करौछ छिपाओल गरम पानिमे कऽ रहल छै छनाक-छनाक हूले-ले ले, हूले-ले ले भऽ रहल छै दनाक-दनाक औजी अद्भुत छै बुधियारी। कहै छै दूध मुदा छै ताड़ी॥ २ आउ श्रमिक जन आउ। अपन गाम घुरि आउ॥ कनियाँ औती बच्चा आओत जागत गामक प्राण॥ आउ श्रमिक जन आउ। अपन गाम घुरि आउ। नव ज्योति जे छिटकि रहल अछि ओकरा आनू खेत नदी पानि जे छै बौआएल ओकरो मोड़ू रेत महमह चास वासमे प्रातीक सूनब टान। आउ श्रमिक जन आउ। अपन गाम घुरि आउ॥ अहाँ बिना ई गाम उदास कानै रन्ना माय दूध भात केँ अङना खेतै कनने चन्ना जाए। अहाँ आएब तँ ठुमकत आङन हँसता मामा चान आउ श्रमिक जन आउ अपन गाम घुरि आउ। सुकरातीक आङनमे अरिपन फेर लिखेतै, आँचर तर हे दीप नेह दुलारल जेतै॥ वासमती आ जलबा गमकत लौकत मड़ुआ धान। आउ श्रमिक जन आउ। अपन गाम घुरि आउ॥ विनीत उत्पल, १९७८- आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक। "हम पुछैत छी" कविता संग्रह प्रकाशित। उदय प्रकाशक हिन्दी उपन्यास “मोहनदास” क मैथिली अनुवाद (साहित्य अकादेमी, दिल्ली प्रेसमे)। राजनीति कतेक रास गप करैक अछि अहाँ सँ जिनगीकेँ लऽ कऽ घर-बाहर केँ लऽ कऽ साहित्य केँ लऽ कऽ राजनीति केँ लऽ कऽ एकटा गप पुछैत छी की हमर आपन सबहक जिनगी राजनीतिक बिसातमे जकड़ल अछि शतरंजक मोहरा जना हम सभ छी जे जेना खिलाड़ी चलत तना हम चलब घर मे राजनीति भाय-भौजाइक-भाबौक राजनीति बहिन-बहिनाय-साढ़ूक राजनीति कका-काकी-बाबाक राजनीति खाना खाइक, बड़ी-भातक राजनीति खेत मे राजनीति बाँट-बटेदार, खेत-पथारक राजनीति पानि पटैबा, बिआ बुनइक राजनीति फसल चराबैक, फसल चोराबैक राजनीति फसल काटैक, फसल बेचबाक राजनीति ऑफिस मे राजनीति प्रमोशन, डिमोशनक राजनीति कर्मयोगी, अकर्मयोगीक राजनीति बॉसक आगाँ-पाछाँ करैक राजनीति तेल लगाबैक राजनीति मुदा, एकटा गप मन मे आबैत अछि ई सभ राजनीति कोन राजनीति अछि आ एकर स्थान कतए अछि जखन साहित्यक राजनीति धरगर भऽ रहल अछि साहित्यक नाम पर सरकारी संस्थासँ पाइ वसूलैक राजनीति बेटी-बहिनकेँ बदनाम कऽ आपन धौंस आ ब्लैकमेलिंगक राजनीति एन.जी.ओ. बनाकऽ संस्थाक नाम पर पाइ उघाबैक राजनीति नाटक, गीत-नाद, कला आ संस्कृतिक नंगा नाच देखबाक राजनीति जखन एहन राजनीति दमगर अछि तखन देशक विकास आ शासनक राजनीतिक स्थान कतए अछि गांधी आ अंबेडकरक देसमे ईहो राजनीतिक हिस्सा अछि जेकरा कोनो स्कूलमे नै पढ़ाओल जाइत अछि मुदा हम वा अहाँ सभ नेनासँ घोंटि-घोंटि कऽ पीने छी तइसँ रग-रगमे अछि राजनीति। भाषा भाषाक एकटा इतिहास होइत अछि जहिना-जहिना दंड-पल बदलैत अछि तहिना-तहिना भाषामे सेहो बदलाव आबैत अछि ओहिनो कोस-कोसपर भाषा तँ बदलिते अछि मुदा भाषा की होबाक चाही, एकर उत्तर के देत? भाषाक विकृतीकरण एकटा शब्द अछि जेकरा लेल विद्वानजन गहींर-गंभीर अछि कियो हिंदीक पाछाँ भागैत अछि केकरो अंग्रेजीक नशा चढ़ल अछि ओना हिंदीक लोक हिंग्लिशसँ तंग अछि मुदा मैथिलीमे कोनो “मैथिलीश" क कोनो कांसेप्ट नै अछि भाषाक परिवर्तन वा परिमार्जनक गप बेसी गंभीर अछि परिवर्तन गतिशील अछि आ संस्कृतिकरण सेहो एकटा शब्द अछि एकटा भाषाकेँ दोसर भाषामे घुसपैठ आ अंतरंगता कोनो मुद्दा नै अछि अंग्रेजी आ हिन्दीक आधिपत्य स्वीकार करहि बला संस्कार जखन रग-रगमे विचरण कऽ रहल अछि तखन अहाँ की कऽ सकैत छी आ की कहि सकैत छी? मैथिलीक विद्वतजन जखन घरमे हिन्दी वा अंग्रेजीमे टिपिर-टिपिर करैत अछि लंद-फंदसँ जागत, लंद-फंदसँ सुतत़ जकर हर सांसमे अछि लंद-फंद प्रगतिशील कहाबैक लेल पर-गतिक बाटपर अछि तखन भाषाविद कतेक गंभीर भऽ सकैत अछि, एकरा आशंका जताएल जा सकैत अछि। शंका दुनियाँमे अछि बड़ रास बीमारी माथ दुखा रहल अछि केकरो तँ कियो अछि पेट गुड़-गुड़सँ तंग आँखिसँ नोर बहि रहल अछि तँ कानमे दर्द अछि केकरो सूगर बेसी भेल तँ जिनगी भरि मीठ नै खा सकैत छी सूगर कम भेल तँ तुरंते अहाँकेँ गुलकोज पीबए पड़त केकरो हाइ ब्लड प्रेशर अछि तँ केकरो लो कियो एड्ससँ ग्रसित अछि तँ कियो कैंसरमे जकड़ल जतेक रास बीमारी अछि ततेक रास दवाइयो कियो नीम-हकीम लग जाइए तँ कियो कराबैए एलोपैथी, होमियोपैथी आ आयुर्वेदिक इलाज। दुनिया भरिक डॉक्टर आ वैज्ञानिक नब-नब रोग आ ओकर छुटाबैक दवा बनाबैमे लागल अछि मुदा हमरा जानल एकटा एहन बीमारी अछि जकर इलाज नै आजुक बाजारवाद, तथाकथित प्रगतिशीलवाद जुगमे बाप करैए बेटा पर शंका बेटा करैए बाप पर शंका माय करैए पुतोहु पर शंका पुतोहु करैए माय पर शंका ननद करैए भौजाइ पर शंका भौजाइ करैए ननद पर शंका जतए देखी ओतए शंके शंका घर मे शंका, ऑफिस मे शंका बॉस केँ शंका, कर्मचारी केँ शंका किनै मे शंका, बेचै मे शंका रौद मे शंका, मेघ मे शंका पानि मे शंका, दूध मे शंका प्रेम मे शंका, घृणा मे शंका दोस्ती मे शंका, दुश्मनी मे शंका साँस मे शंका, पलक झपकै मे शंका खाइ मे शंका, पीबै मे शंका बुलै मे शंका, सुतै मे शंका नोचै मे शंका, खुजलाबै मे शंका शंके शंका, सनातन शंका शंका ब्रह्मा, शंका विष्णु, शंका देवो महेश्वर शंका साक्षात परम ब्राह्म, तस्मै श्री शंकायै नम:। जोर सँ बाजू शंका रहए मन मे शंका रहए तन मे शंका खाएब, शंका पीअब, शंका सुतब, शंका मूतब एक-दोसर पर शंका करब, हम नै प्रेमसँ रहब ओम शंकाय नमः । स्मृति लोप हमर स्मृति लोप भऽ रहल अछि ई गप एतेक धरगर अछि जइ सँ हम कतेको काज सँ बरजि जाइत छी एकरा सँ हमरा कियो चरियाबै नै अछि आब हमर धर्म भऽ गेल अछि, काज कम बपराहटि बेसी। हमर जे मनक मुताबिक नै होइत अछि ओकरा लेल सीधे फूइस बाजि दैत छी जे हमरा कोनो काज-धाज ख्याल नै रहैत अछि ई कहि कऽ हम घर संगे ऑफिस मे दयाक पात्र बनैत छी एकरा सँ देहक आराम भेटि जाइत अछि किएकि हमर देह आ मोन आब कामचोर बनि रहल अछि। काल्हि कार्यालय मे हमरा एकटा भारी-भरकम काज देल गेल छल ओतेक भारी नै जतेक हम वर्णन कऽ रहल छी महत्वपूर्ण गप ई जे आब हम बूढ़ा गेलौं मन आ तन दुनू सँ किए कि हमरा आब कोनो प्लानिंग नै अछि जिनगीक तइसँ दोसर दिन कहि देलौं जे हमरा ख्याल नै रहल। ओना अइ “स्मृति लोप" क पाछाँक खेला बड़ पैघ अछि एकर आर मे नै जानि कतेक रास गप अछि कोनो नीक गपक लेल लेल कोनो आहटिक जरूरतो आब नै अछि मुदा अधलाह गप तँ स्मृति मे मृत नै होइत अछि आइ धरि हमर कक्का, काकी, बाबू, माय, बहिन-भैयारी की केने अछि, की बाजल अछि, सभटा ख्याल अछि। हम नेना मे जेना ककहरा कक्षा मे सुनाबैत छलौं तहिना हम सभटा गप सुना सकैत छी जे कियो हमरा संग नीक काज करलक ओकरा तँ जरूर बिसुरि गेल छी मुदा अधलाह काज, अधलाह गप सभटा ख्याल अछि हमरा सेहो गपक ख्याल अछि जे अपना हिसाबे हमरा संग नीक करलक मुदा हम ओकरा अधलाहे लेलौं आ बुझलौं। प्रश्न अहाँ केँ बुझल अछि एकटा प्रश्नक उत्तर अहाँ प्रश्न सुनि कऽ कहब जे ई कोनो प्रश्न अछि अहाँ बुरबक छी जे एहन प्रश्न करैत छी बुझि गेलौं जे अहाँ पढ़ल-लिखल भेलाक बादो अज्ञानी छी मुदा, हम सत कहैत छी एकटा प्रश्न हमर आँखि केँ चौन्हरा रहल अछि हमर शांतिकेँ नाश करए मे लागल अछि हमरा नीन नै होइत अछि ओइ प्रश्नक उत्तर ताकहि मे बताह भऽ रहल छी हमर प्रश्न बड़ सोझ अछि मुदा ओकर उत्तर ततबे ओझराएल अछि तइ सँ कतेको रास प्रयत्न करबाक बादो हम ओकरा सोझराबै मे सफल नै भेलौं ओझराएल आ सोझराएल शब्द मे हमहूँ हेरा गेल छी प्रश्न कतेको रास भऽ सकैत अछि अहाँ खाइत किए छी अहाँ बाजैत किए छी अहाँ गाइर किए दैत छी अहाँ फूइस किए बजैत छी अहाँ दोष आरोपित किए करैत छी अहाँ पाइक लेल हाइ-हाइ किए करैत छी अहाँ केकरो बेटीकेँ बदनाम किए करैत छी जखन अहाँ एक दिन मरबे करब अहाँ केँ बुझले हएत जे मरलाक बाद अंतिम संस्कार लेल बस चारि हाथ धरती चाही आ ओकर दाम आना मे होइत अछि अहाँ जइ दाममे मकान बनेबाक लेल जमीन रजिस्ट्री करेलौं ओइ दामक तुलनामे ई किछु नै अछि मुदा जहिया श्मशान ओइ चारि हाथ जमीनक दाम रजिस्ट्रार ऑफिस तँय करए लागत तहिया अहाँ केँ कोन ठाम स्थान भेटत, ई कनी सोचू यएह प्रश्न अछि जे हमरा देह-दिमागकेँ सुन्न कए रहल अछि अहाँ की सोचए लागलौं, कनी एकर उत्तर दिअ। बेटी साइठ साल बाद कोशी माय बदलने छलि अप्पन धार सौ बरख सँ एकहि बाट सँ बहैत तंग भऽ गेल छलि समाजक मूल्य/ वितृष्णा सँ भरि गेल छलि आ अपन सभटा रौद्र रूप देखा देली लोककेँ बता देलनि जे ओ तहस-नहस कऽ देती जौँ नै सुधरत लोक। मुदा आन माय कहिया बदलत अप्पन सोच आ विचार कहिया ओ देखाओत अप्पन रौद्र रूप कहिया विचलित हेती देखि कऽ समाजक रूप कहिया कम करती बेटी आ बेटा मे फरक बेटाक जन्म पर बजैत अछि थारी बेटी भेला पर सुखैत अछि लाली सरकार चलाबैत अछि लाडली योजना बेटी हएत तँ करत माय जितिया कोना बेटाक लेल मारि देल जाइत अछि बेटी केँ बेटी भेल तँ अभागिन कहल जाइत अछि मायकेँ बेटा भेला पर ओ मानल जाइत अछि सौंसे ब्लैंक चेक कहियो कियो देखने अछि बहूक करेज अइ देश मे आरुषि मरल जेसिका लालक हत्या कियो नै केलक भैंसक दाम पर बिकाएल कमला रोज मरैए रिंकी आर विमला नै बदलल हमर समाजक धार एखनो अछि बेटी भार अइ लोकतंत्रमे चलैत वएह कानून अछि जइ मे बलात्कारीकेँ कोनो सजा नै अछि अपराधक निअम होइत अछि जे अपराधीक मुँह नुकाएल होइत अछि मुदा बलात्कारक निअमक परिभाषा अलगे अछि पीड़िताक मुँह नुकाएल होइत अछि आ बलात्कारी सीना तानि कऽ रहैत अछि बलात्कारक होइए पैघ परिभाषा मुदा पीड़ितक नै होइए कोनो भाषा हे हे मंगरौनीवाली दिल्ली एहन शहर मे आब कोठाक गप पुरान भेल, कॉलगर्लक कंसेप्ट जवान भेल मुन्नी केँ लोक करैत अछि बदनाम उछलैत-कूदैत शीला भऽ जाइत अछि जवान एक बेटीक विशेषण अछि निरासी, धोंछी आदि जखैन निकलैत सड़क पर शारीरिक भौगोलिक स्थितिक नापजोख रहैए जारी सुधरि जाउ, सुधरि जाउ, हे यौ देशवासी एहन पाप कऽ बनब बेटीक नाशी नै भेटत मोक्ष जौं बसब काशी हमर संवेदना खत्म भऽ रहल अछि भावनाक कछमछी आब शोनितमे नै बहैत अछि सभटा आक्रामकता आ जज्बा यमुनाक धारमे बहि गेल अछि जे बचल छल ओ भीतमे मिल गेल अछि तँए तँ कहैत छी बेटी बचाउ, धरती बचाउ। गजल १ अहाँ क आहटि लेल, ठाढ़ अछि जिनगी निनाएल आँखि भेल, ठाढ़ अछि जिनगी अहाँले तड़पि रहल छल रोम रोम सिहकाबैत आएल, ठाढ़ अछि जिनगी अहाँ क हम सदिखन बाट जोहैत छी बाइ मे बनलौं रेल, ठाढ़ अछि जिनगी चांद सन ई चेहरा, हिरणी सन चालि नाटकक ई छै खेल,  ठाढ़ अछि जिनगी सोचने रही अहाँ ताकब ऐ उत्पलकेँ मिथिला भेलि कुभेल, ठाढ़ अछि जिनगी (१५ वर्ण) २ तात-तात औ तात, सभ दिश अछि भ्रष्टाचार देखै छी के राजा के रंक, सभक यैह अछि शिष्टाचार देखै छी

घूस दिअ, घूस लिअ, घूस पिबू, घूस  खाइ जाउ यौ घूस अछि हमर ब्रहम, ई अछि सदाचार देखै छी

घूसं ब्रह्मा, घूसं विष्णु, घूसं देव महेश्वरः सुनै छी घूसं जीवन आ मरणं, एत्तेक छी हम लाचार   देखै छी

हाय पैसा, हाय पैसा, सभ किछु अछि पैसे-पैसा  किए ई धर्म करू, कर्म करू, छोडू ई सभटा दुराचार देखै छी

आजुक कालमे व्याकुल उत्पल कहि रहल   अछि  नीक काज नै करब, नाम पर हएत मूत्राचार  देखै छी निक्की प्रियदर्शिनी, सम्प्रति भागलपुर। मन्तव्य व्यापार आ शिकार असगर करी, आदर आ उपकार सभक करी, प्रेम आ कल्पना मनसँ करी, कपट आ छल कखनो नै करी, कष्ट आ दुःख मे संयमसँ रही, खेत आ खरिहान मे काते-कात चली, विचार आ खण्डन अवश्य प्रकट करी। समाजक प्रश्न ? समाजक प्रश्न स्त्रीक कतेक सीमा? आब तँ भेल आब कतेक आगाँ? की आब बना देबैक अमेरिका आ इंग्लैण्ड? मुदा कहाँ बदलल अछि मानसिकता? स्त्रीकें देखक, व्यवहार करइक, अहाँ स्त्री छी ई एहसास सदिखन, कहाँ बदलल अछि। देखला सँ की होइत अछि ? आ देखला सँ की भऽ जाइत अछि? एकर अतिरिक्त, उचित व्यवहार, उचित स्थान, कहाँ देल गेल अछि? जरूरत बुझि पड़ैत अछि? समान अधिकार, समान महत्व आ समान प्रेमक, कतए? समाजमे कागज पर नै।

३ अहाँ अहीं सन अहाँ अहीं सन, छोट, कोमल आ शान्त हृदए सन, सुन्दर आ सौम्यतासँ प्रस्फुटित पुष्प सन, अमावस्याक धोर अन्हार गुज्ज राति सन, दुःख आ विवसतासँ भरल घैल सन, अहाँ अहीं सन, क्रोध आ निर्दयताक अग्निमे जरैत काठ सन, सजीव रहितो निर्जीव वस्तु सन, जानकी, मन्दोदरी आ उर्मिलाक त्याग सन, माँ, बेटी, बहिन, पत्नी आ प्रेमिकाक स्वभाव सन, अहाँ अहीं सन, आधुनिकता आ पौराणिकताक धूरि पर लटकैत पिण्ड सन, कुल आ मर्यादाक कहार सन, नदीक दू किनार सन, बढैत आ घटैत गंगाक धार सन, अहाँ अहीं सन, मनोरथक लेल बलिदानक निरीह छागर सन, जीवन आ मृत्युक अनुभव करैत संसार सन, दया, करूणा आ प्रेमक महासागर सन, सम्पूर्ण जगतक मातृत्वक भंडार सन, अहाँ अहीं सन। दर्द आँखि मे नै मन मे आँखि समबोधक अछि तँ मन विचारक, आँखि प्रश्न अछि तँ मन उत्तर, आँखिमे आशा अछि तँ मनमे संवेदना, दर्द आँखि मे नै मनमे होइत अछि, दर्द केँ देखि आँखि तँ बन्द भऽ जाइत अछि, मुदा मनमे ओ अविस्मरणीय जकाँ जाइत अछि, आँखिक सीमा सीमित अछि मुदा मनक सीमा नै जानि कतेक, परम्परा आ आधुनिकता एक-दोसरक पूरक अछि, आधुनिकताक देखि आँखि ओकरा मे समाहित भऽ जाइत अछि मुदा मन परम्पराक विचार करैत रहैत अछि, मन चंचल अछि आ आँखि अति चपल, तेँ आवश्यकता अछि प्रेम, करूणा आ सौहार्दक ताकि मन विचलित नै हुअए आ आँखि स्थिर नै। नारायण झा, गाम-पोस्‍ट- रहुआ संग्राम, प्रखण्‍ड- मधेपुर, जि‍ला- मधुबनी, बि‍हार- ८४७४०८ सरकार पर्चा-पर्चा पसरल चर्चा ऐ सरकारक वि‍कासक चर्चा। अखबारक सुरखी जाइत अछि‍ समेटल माटि‍पर देखब तँ कि‍छु नै भेटल। शि‍लान्यास-पर-शि‍लान्यास होइत सभ दि‍ने देखल जाइत अछि‍ अखबारमे हुनका दोगे-कोने। नाम-यश समेटि‍ रि‍कार्ड बनबैत छथि‍ योजनाक राशि‍पर नाच करैत छथि‍। नूतन प्रयोगक वि‍ख्यात सरकार सभ दि‍न नव योजनाक हुअए वि‍चार। ठेका प्रणालीक छथि‍ महानायक फुसि‍याँ देखबैत वि‍कासक स्वप्न भयानक। बि‍जली बि‍गड़ल, पानि‍ पछड़ल शि‍क्षा अछि‍ समुच्चे दड़कल। डकैती, महगाइ अओर भ्रष्टाचार दि‍नो-दि‍न बढ़ैत ई दुराचार। वि‍कासक सपना होइत तखन साकार। आकाससँ उतरि‍, जमीनसँ देखि‍ आकार। पर्चा-पर्चा पसरल चर्चा ऐ सरकारक वि‍कासक चर्चा। जाड़ आबि‍ गेल जाड़ गरीब-गुड़बाक काँपए लागल हाड़ सि‍रसि‍राइत अछि‍ तन कलुषि‍त रहैत अछि‍ मन।। एखनो धरि‍ कि‍छु तन उघार फाटल-पुरानक करैत जोगार जोगार होइछ बड़का घूरक भगबैत अछि‍ जाड़केँ।। मोन पड़ैत अछि‍ ओइबेरूका राइत पूसक बुढ़-बच्‍चाक लेल होइत अछि‍ फौती जेना एकरा नोतने कि‍यो बेल न्‍योति‍ नै मानैत घर कोठा आ फूसक।। की कहू ऐ हरशंखा जाड़केँ फाड़ैत अछि‍ हाड़केँ जड़बैत अछि‍ मनकेँ मसुआबैत अछि‍ सभ काजकेँ।। एकर अंत करैत फगुनि‍या बसात जखन उगैत छथि‍ सुरूज घटैत अछि‍ बि‍सबीसी तखन नाइच उठैत शहरो-देहात।। आबि‍ गेल जाड़ गरीब-गुड़बाक काँपए लागल हाड़ सि‍रसि‍राइत अछि‍ तन कलुषि‍त रहैत अछि‍ मन।। गणेश कुमार झा "बावरा", गुवाहाटी। बड़का काका बड़का काका छलाह नामी- गामी मुदा छलाह बड्ड कंजूस, चारिटा छलन्हि बेटा हुनका मुदा नै छलन्हि एकोटा सपूत। जखन हुनक घर खसलनि बेटा सभ लेलकनि बटुआ छीन, जकरा लेल पेट काटि जमा केलनि वएह सभ केलकनि हुनका भिन्न। बड़का काका ओछाइन पर पड़ल गुँह-गिञ्जन भेला अपन देख ई दशा अपना भाग्य पर कनैत छलाह। जखन मृत्यु काल समीप छलन्हि वाक-नाड़ी सभ बंद छलन्हि बेटा सभ देलकनि बेतरनी कराए पुतौहु सभ झौहट पारि कानै लगलनि नाती-पोता सभ देलकनि धार कात पहुँचाए। बड़का काका केँ बड्ड भाग्य- जीवैत नै लगौलनि कहियो तेल मुदा मुइला उपरांत लगलनि सौंसे देह घृत, ओछाइन पड़ला तँ पानि नै भेटलनि मुदा मुइला उपरांत गंगा-स्नान, जीवैत कहियो गाएक दूध नै पिला मुदा मुइला उपरांत वैदिक श्राद्ध, जीवैत नै भरि पेट खेला भात मुदा मुइला उपरांत गामक भोज। बड़का काका केलनि आकाशवाणी- जुनि करू एहन व्यवहार जीअल मे केलहुँ औंघराए कात मुइला उपरांत लुटाबइ छी खोलि दुनु हाथ...!! संघर्ष हम पथक पथिक एसगरी छोड़ि देलक सभ संग हमर मुदा हम स्वयं केँ नै छोड़लौं .. नै निराशा सँ कहियो घबड़ेलौं नै असफलता सँ मानलौं हारि जे भेटल स्वीकार केलौं आ आगू बढ़ैत गेलौं किएकि स्वयं पर छल भरोस... सिखने छलौं हम समुद्र सँ केनाइ संघर्ष जनने छलौं हम आगि सँ जरनाइ महसूस केने छलौं हम वायुक गति नपने छलौं हम आकाशक ऊँचाइ बुझल छल हमरा सूर्यक सत्य हुनक उगनाइ-डुबनाइ ऐलेल हम नै छोड़लौं कहियो अपन कर्मक पथ सदा करैत रहलौं संघर्ष....

अहाँ   बिनु अहाँ  केहन छी तकर कोनो खबरि नै अहाँ आएब कहिया तेकर कोनो तिथि नै.... हम एतए बताह भेल छी जिनगी हमर निराश लगैए बिनु अहाँ हमर जिनाइ हमरा व्यर्थ बूझि पड़ैए... अहाँ आउ जल्दी आउ आब विलम्ब  करू जुनि देखू! हम अहाँक बाटमे अपन नयन ओछेने छी.... पल-पल हर एक पल हम अहाँ केँ याद करी जखन हम एकसरि रही अहाँक छवि नयनमे निहारी... एकटा कथा जनै छी? हम अहीं सँ प्रेम करै छी सपनहु मे हम दोसर केँ नै देखैत छी.... हम जनै छी अहाँ केँ हमर ई कथा मिथ्या बुझाइत हएत सएह सोचि होइए व्यथा... मुदा एक कथा सच थिक- हमर प्रेम हम अहाँ सँ बहुत प्रेम करैत छी बहुत- बहुत प्रेम...... परिचय दास परिचय दासक भोजपुरी कविताक मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल द्वारा बेसीकाल शब्द जखन हम विश्वविद्यालयक प्रेक्षागृह मे बैसल रही, आएल छल अज्ञेय जी, ओ करूणामय बुद्धकेँ निवेदित अप्पन कविताक केलखिन पाठ हम्मर बगल मे बैसल सज्जन हमरासँ कहलक- वात्स्यायनजी केँ सुनि कऽ एहन लागैत अछि, जेना मौन शब्द बुनल गेल अछि। वात्स्यायन जीक मौन नामी छल। साहित्य अकादमी मे भेल छल व्याख्यान विषय छल- संगीत आ विचार, संगीतक संबंध राग आ छंदसँ ओहिना अछि, जेना वात्स्यायन जीक मौन, ओ सेहो चर्चाक केंद्र मे उपस्थित छल, मौन कोनो निठल्लाक इतिश्री नै अछि- ओ सकारात्मक क्रियाक सहज पूर्व भूमिका अछि। बहुधा शब्द जखन अप्पन गति बिसुरि जाइत अछि तखन मौन आगू अबैत अछि। खाली शब्द केँ हम सभ कियो विचारक अभिव्यक्ति दऽ कऽ देखिऐ तँ भावमुद्रा शब्दसँ बेसी बलवती आ वेगवती होइत अछि। बिहारीक नायिका “भरे मौन मे नैनन ही सौं बात” करैत अछि। कहैक अंदाज देखू- कहत नयन रीझत-खिझत भरल मौन मे करैत अछि नैनन ही सौं गप, सुन्न-मसानक एकटा छंद होइत अछि, एकटा छंद मौनक, मौन मे अपंगता नै होइत अछि- माने समर्थ केँ मौन नीक लगैत अछि बिलकुल चुपचाप, घाघराक तट पर, साँझक बेला मे पीब लिअ शब्दहीन, हम बौआ रहल छलौं ओतए कि कोनो छौड़ा (बहलगंज चाहे दोहरी घाट मे कत्तौ हएत) विरह मे छल- बालू आ  रेत पर, डेग कोना चलब बालूक रेत, भगवान भास्करक रश्मिसँ तरेगन जेहन चमकि रहल छल। मिनट-दू-मिनट बाद सूर्यदेवता भारतसँ लऽ कऽ अमेरिका धरिक यात्रा पर चलि जाएत। हम अपलक देखि रहल छी- एतबा सोना! रश्मि स्वर्ण!! बजारमे सोनाक दाम जेत्ते हुअए ई सोना तँ अमूल्य अछि! आजुक पेशेवर विचारक बहुमूल्य विचार दैत अछि मुदा अमूल्य नै! मुदा विचारे टा सँ की हएत समकालीन दुनियाक संकट ई अछि जे विचार आ कर्मक सामंजस्य नै अछि। शुभ आ लाभक समन्वय नै अछि अइसँ किताब पुस्तकालयमे राखल कुहरि रहल अछि आ विचार कर्महीनताक चक्रव्यूहमे। पैघ-बुजुर्ग कहैत रहथिन सिद्धजन बड़ नीक नै देलक भाषण, ओ जे कहलखिन नीक करबाक केलक प्रयास, अइसँ हुनकर शब्द ब्रह्म बनल ब्रह्म कोनो वायवी अवधारणा तँ नै अछि। ओ तँ अपना सभक आत्मीय जरूरत अछि जेहन शब्द, तेहन मौन। अइ संसार मे जखन किछु मंगल आ शुभ होइत अछि ओकर एकटा छन्द होइत अछि माघक कुहासा छेक लेलक बाट हम ओकरा पार करबाक प्रयास केलौं! राति मे बैसलौं तँ बुढ़िया माय साग-भात देलक खाइ लेल। हम ओकरा चुल्ही पर गरम करैले कहलौं हम कोनटा लग बैसि गेलौं। तखैन घर भरन आएल आबैत किछु कहलखिन हम जानि लेलौं जे ओ गाम भरिक गपक खबरि राखैत अछि किछु लोक हुनका नारदो कहैत अछि। ओ कहैत अछि- “ऐँ यौ, बाबू सुनि लियौ जे परमुआँक घर मे “हुड़ार" आयल छल," ओकरा “हुड़ार" शब्द पर जोर दैत हम बुझि गेलौं जे मामला किछु अओर अछि, हम मौन रहलौं, ओ फेर कहब शुरू केलक- देखू ने, गाम मे यएह आइ-कालि भऽ रहल अछि, आब  अप्पन सभक कोना इच्जत बचत। दोसर दिन कियो हमरा कहलक जे अपने घर भरना परमुआंक घर मे घुसल छल। हम सोचलौं: शब्दसँ धोखेबाजी एनाहिये कएल जाइत अछि। हम जौँ नाम लऽ लैत छी, तँ भऽ जाइत छी बदनाम, ओ मारि दैत अछि, तैयो चर्चा नै होइत अछि। मारीच सेहो लेने छल शब्दक सहारा अश्वत्थामाक केस मे सेहो लेल गेल छल, जौँ ऐ केर आश्रय नै लेल गेल हएत तखन गप ई नै कहल जाइत “कारण कवन नाथ मोहि मारा, मैं बैरी, सुग्रीव पियारा।" --------------------------- ई कहि कऽ हम मारीच चाहे बालिक वकालतनामा नै प्रस्तुत करै छी। ओना माइकेल मधुसूदन दत्त मेघनादक पक्ष लेने रहथि। हम तँ मात्र शब्दक आचार-विचारक प्रश्न कऽ रहल रही हमरा सभक उपस्थिति शब्दक बाहरी आवरणक लेल खाली नै हेबाक चाही। हमरा सभकेँ ओकर न्यूक्लियस चिन्हबाक चाही। शब्दक छलना-वर्जनाकेँ एगो सात्विक प्रतिक्रिया देबाक चाही। सभ सँ नीक अछि : मोनकेँ मधु बना लिअ- मौन मधु भऽ जाए। गप आ अपन बीचक तटस्थता जरूरी अछि। वात्स्यायन जी अपना आ देवताक बीचमे दूरी राखैक गप कहने रहथि। आइ देवता सभक प्रति नव दृष्टि बनि रहल अछि। उपिनषद् मे एक ठाम तर्क  केँ गुरु  मानल गेल अछि। आधुनिक युगक नव देवताक भूमिकामे चिरंतन दृष्टिए भऽ सकैए शमशेर बहादु सिंहक शब्द लेल जाए - -बात बाजी, हम नै भेद खोलत बाते। हम शब्द आ मौनक द्वन्द्वमे पड़ि कऽ सैकत भूमि पर नै जानि निकलि गेलौं कतऽ ! किछु गोटे कहि सकैए कि जतऽ नै पहुँचैए रवि ओतऽ पहुँचैए कवि.... किन्तु हम तँ एहेन ठाम देखने छी, जतऽ नहिये कवि पहुँचैए, नहिये रवि ! सरयूक तटपर बनल मलाह आ पंडाक घर देखै छी ... सिमसिमाएल .... नै ऐठाँ कहियो कवि पहुँचल नहिये रवि। बालूक चमकैत कण-राशि, हुनके आमंत्रण देलौं। स्वाती लाल, नेपाल। गजल १ मिथिला राजके माँग जे उठलै नकाब ओकरा उतारैत देखलौं कहै छलै हमर धर्म छै मिथिला नया धर्म अपनाबैत देखलौं

समाज केना सहि रहल छै तालिबानी पएर पसारैत देखलौं निर्दोष सभक खूनसँ ओकरा अपन पियास बुझाबैत देखलौं

ककरो अखण्ड ककरो खण्ड-खण्ड स्वतंत्र टुकड़ा माँगैत देखलौं तरह तरहक मदारी सभकेँ डम डम डमरु बजाबैत देखलौं

अपन स्वार्थक खातिर किछुकेँ नित नव सपना बाँटैत देखलौं हमरो चाही हमरो चाही किछु केँ सपना माँगैत देखलौं

“रा-वन” सभकेँ फेसबुक पर राम कथा हम बाँचैत देखलौं राजनीतिक केसिनो मे मानवता के हारैत देखलौं

आनक घरक "भगत" शहीद हुअए देश राग हम गाबैत देखलौं शहीद सभक लास पर चढि कऽ ओकरा कुर्सी पाबैत देखलौं

फुटलै चूड़ी माँग उजड़लै करेज हम हुनकर फाटैत देखलौं राम ने औता घुरि कऽ तैयो आस मे सीया केँ कानैत देखलौं

कहिं कोनो बच्चा ने होइ फेरो टुग्गर मने मन डराइत रहलौं एक तरफ फेरो भीड़ छै लागल ओहने मंच सजाबैत देखलौं २ बहन्ना ओकर कत्तेक सुनिऐ बड निष्ठुर मन मीत हमर अछि बदलैत मौसम डर लगैए बड ब्याकुल सन प्रीत हमर अछि कहब सुनब किछु ने बाँकी राखब हृदएक भीतर आब तँ हम जीबन पथ पर साथ चलब हम ओकरे संग हीत हमर अछि बितल मास बसन्ती राग बसन्ती पतंग बनी उड़ि पहुँचितौं हम लोक लाजसँ पएर उठल नै केहन समाजक रीत हमर अछि पूर्ण चन्द्र छै मुदा लगैत अमाबस अन्हार बड राति बितत कोना प्रकाशपुँज बनी आएल जौं बुझब तखन हम जीत हमर अछि चानक इजोरियासँ मनक अन्हरिया दूर कोना कऽ भगबिऐ हम फेर उठल दरद मन मे बिरह भरल बस गीत हमर अछि (बर्ण- २६) मुकुन्द मयंक गजल १ एक बेर नजरि मिला झुका लेलिऐ किए मिला नैन सँ नैन अहाँ हँसि देलिऐ किए अहाँकेँ किछु कहबाक मोन होइत छल फेर किछु सोचि चुप भऽ अहाँ गेलिऐ किए नाम तँ नहि अछि बुझल अहाँक हमरा मुदा नैन देख किछु सोइच लेलिऐ किए सभ दिन तँ देखी अहाँकेँ जाइत आबैत आइ नै देख हम व्याकुल भऽ गेलिऐ किए अहाँ सभ दिन चुपे चाप चलि जाइत छी आइ मुकुंद कने मुस्किया कऽ गेलिऐ किए वर्ण-१६ २ अहाँ आबि कऽ चलि गेलौं किए ई बात हम बुझी नै बिसरल मोन पाड़ि देलौं किए ई बात हम बुझी नै हमरा अहाँ संग कोन सम्बन्ध अछि से हम जानि नै जिनगी बाट जोहि बितेलौं किए ई बात हम बुझी नै बहुतो भीड़ छल तैयो अहीं पर नजर गेलै किए अहाँ देख मुँह फेर लेलौं किए ई बात हम बुझी नै अहाँ हमरा लेल सोचितो छी की नै के बताएत आब अहीं टा लेल सोचैत एलौं किए ई बात हम बुझी नै अहाँ हमरा अपनाएब कि नै से नै जानै छी प्रितम मुकुंद अहाँ केँ अपनेलौं किए ई बात हम बुझी नै वर्ण -२० ३ देखियौ यौ बदलि गेलै जमाना सभ जन कऽ रहल मनमाना छोट-पैघ सभ आइ काल्हि भैया रुपैया कए सभ भेल दिवाना छोटका बच्चा कहैए दूर छी जो नहि खेबै साग रोटी बला खाना की करतै मनुखो एहि जग मे महगाइ छै मनुखक दिवाना भूखल रहब मुदा गामे धऽ कऽ मुकुंद खाएत मिथिलेक खाना (बर्ण-१२) आशीष अनचिन्हार, जन्‍म- १९८५, गाम-भटराघाट, बि‍स्‍फी। पि‍ताक नाओं- श्री कृष्‍ण चन्‍द्र मि‍श्र। माता- श्रीमती गम्‍भीरा मि‍श्र। अनचिन्हार आखर (गजल संग्रह) प्रकाशित। बन्द १ गजलसँ सजल अछि विदेह शेरसँ भरल अछि विदेह प्रेमसँ जड़ल अछि विदेह मोनसँ जुड़ल अछि विदेह सभठाँ घुसल अछि विदेह आब तँ अचल अछि विदेह २ पहिने जोड़ू सए कमलकेँ तैमे जोड़ू हजार गुलाब तकरा बाद जे बनि जाएत से निशानी हएत प्यारकेँ कता १ नेता केँ गरा मे बान्हल घैल बुझू डूबल देशक नाम कहबै तँ भारत हएत दलाल आ गुंडाक हाथ फैल बूझू लूटल देशक नाम कहबै तँ भारत हएत २ जँ आँखि हमर नै थकैए देखबा सँ तँ अहीं कहू सजनी हम की करू जँ मोन नै भरैए संग रहबा सँ तँ अहीं कहू सजनी हम की करू ३ रामे जानथि आब करेजक की हएत अहाँक नजरि सँ ओ तबाह भऽ गेल रामे जानथि आब मोनक की हएत अहाँक नजरि सँ ओ घबाह भऽ गेल ४ जकर अगैंठीमोड़ एतेक सुन्दर तकर देहक हिलकोर केहन हेतै जकर आँखिक नोर एतेक सुन्दर तकर हँसी भरल ठोर केहन हेतै नात (इस्लाममे कुरानक बाद सभसँ पवित्र काव्य रूप छै ई नात।) तँ प्रेमसँ कहू सुभानअल्लाह मिथिलाकेँ बना देबै मदीना हम दुनियाँकेँ देखा देबै मदीना हम पापी-नरकी सबहक स्वागत छै सभकेँ तँ घुमा देबै मदीना हम पहिने जोड़ू सए कमलकेँ तैमे जोड़ू हजार गुलाब तकरा बाद जे बनि जाएत से निशानी हएत प्यारक डेगे-डेग बसा देबै मदीना हम सोझ बाट पर चलैत-चलैत दीर्घ कविता १ सोझ बाट पर चलैत-चलैत पहुँचि जाइत छी अकादारूण बनमे अनचिन्हार लक्ष्यक संग नै भेटैत अछि अपेक्षित लक्ष्य बी.बी.सी. सुनला उतरो प्रतियोगिता किरण पढ़लो सन्ता नै भऽ पबैत छी कोनो सरकारी चपरासी मानलौं कननाइ कोनो समस्याक समाधान नै मुदा हँसनाइए कोन समस्याक समाधान छै? मजबूरीमे बौक जकाँ चुप्प रहनाइ नियति बनि गेल छै लोकक टाट खरहीक हुअए की सीसाक ओ मात्र टाटे होइए ओकर काजे छै सीमा निर्धारण ई गप्प भिन्न जे सीसाक आर-पार देखाएत इहो गप्प भिन्न जे टाटकेँ काटि हाथ मिला सकैत छी मुदा भावनाक आदान-प्रदान केनाइ ओतबए संभव छै जतेक की बड़दक दूधसँ खीर बनेनाइ देहक हाड़-पाँजर फाटि रहल बाँसक गीरह जेना पाकल बाँस भने नै होइ मुदा काँचो नै छी बेछिल्ले बाँस करएबला बेसी अछि बाँसक अनुपातमे लोक गनगुआरि वा सहस्त्रबाहु हुअए की नै हुअए मुदा काज सुतारबाक लेल हजार-हजार टा हाथ-पएर भऽ जाइ छै आ हरेकक आँगुरमे बान्हल रहै छै स्वचालित पिस्तौल आ गोली लोक छाती पर नै पीठ पर खाइए सोझ बाट पर चलैत-चलैत २ सोझ बाट पर चलबासँ पहिने कऽ लिअ अपन टाँगकेँ टेढ़ कारण सोझ टाँगे सोझ बाट पर चलब केखनो नीक नै ठीक नै आ अहाँ जखन देखिए रहल छिऐ जे नेङरा सभ दौड़मे प्रथम स्थान लेलकै तखन हमर सलाह पर आपत्तिक कोनो प्रश्ने नै सभ लोक बामने टा बनबाक जोगारमे उगह चान की लपकह पूआ केर जाप करैत हरेक मनुख जोहि रहल अछि बाट अर्ध-सत्यक अधभूखल रहबासँ बेसी दुखदायी अछि अध-नङटे रहब दूभि खेनिहार बकरी भोगि रहल अछि जाबी आ शेर खा रहल जिंदा मासु अधपहरा आ अधकपारीक संयोगसँ जन्मल छी हम अर्ध-मनुख क्षणिक शांति लेल दीर्घ अशांतिक निर्माण करब ऐसँ बड़का छल कोनो नै भेड़िया-धसान होइत संसदमे पूर्वज आ वंशज इएह दूनू देखाएत आम कार्यकर्ता आब नै बनि पाओत कोनो मंत्री प्रधानमंत्री राष्ट्रपति टुटलो हथिसार नौ घरक साङह होइ छै हमरा नै संदेह ऐपर संदेह तँ अछि हाथीक बल पर जे आब एक बेरमे एक टन खाओ लेला पर एकै मिनटमे हकमि जाइत अछि ओना हकमैए तँ कुकुरो मुदा ई ओकर जन्मजात गुण छै आ बड़दक? खटनाइ सएह ने चलू सहमत छी हम अहाँक गप्पसँ सोझ बाट पर चलैत-चलैत ३ सोझ बाट पर चलैत-चलैत अहाँ ई नै बुझि सकैत छिऐ जे छोट-छोट गप्प पैघ कोना भऽ जाइत छैक अहाँ इहो नै बुझि रहल छिऐ जे एक किलो तूर कोना बदलि जाइ छै पहाड़क रुपेँ सोझ बाट पर चलैत-चलैत अहाँ इहो नै बुझि पबैत छिऐ जे कोना लाशक नाम पर बैंक-बैलेंस बढ़ि जाइ छै जीति जाइ छै नेता कोना लाखक-लाख भोटसँ अहाँकेँ इहो नै बुझल हएत जे मनुखक आत्मा मरलैए नै मारल गेलैए बम आ गोलीक सहारासँ लोकसँ धूनि नै फटि पबै छै मुदा लोककेँ छाती महँक दूध फाड़ए अबै छै येन-केन-प्रकारेण अम्मत घोरि कऽ एहन परिस्थितिमे जखन कि धनिकक बच्चा बड्ड जल्दी जबान होइ छै कामशास्त्र आ कोक शास्त्रक कतेक महत्व छै से नै बूझि पेबै प्रतिघंटामे कतेक बच्चा होइ छै तकर आँकड़ा लेब अहाँक लेल असंभव नै मुदा प्रति सेकेण्डमे कतेक कंडोम बिकाइ छै तकर थाह अहाँकेँ नै लागत अहाँकेँ इहो थाह नै लागत जे खाली समएकेँ कटबाक लेल कतेक युवा कतेक मिनटमे कतेक बेर वीर्यपात करै छै कतेक अभिसारिका अभिसार करैत छथि गुरुजनसँ चोरा कऽ एकरो थाह नै लागत अहाँकेँ सोझ बाट पर चलैत-चलैत ४ सोझ बाट पर चलैत-चलैत छटपटाइत अछि कटल मुर्गी जकाँ जखन ओकरा बुझाइ छै जे हम कोनो राकसक फेरमे छी छटपटाइत-छटपटाइत ओ दैए चकभाउर मोने-मोन जपैए सावित्री मंत्र पढ़ैए हनुमान चलीसा मुदा काज नै अबै छै ई सभ आ बेहोस भऽ जाइ छै अंतमे भोरक पहिल पहरमे निन्न खुलला पर मोन पड़ै छै जे पीने छलौं शराब भ्रमक भरिपोख आ निकलि पड़ल छलौं बजारमे उत्तर आधुनिकता आ भूमंडलीकरणक संग ग्लोबल विलेजक निर्माण करबाक लेल ई सभ मोन पड़ै छै सोझ बाट पर चलैत-चलैत ५ सुतबाक लेल नै जगबाक लेल खाइ छी निन्नक गोली आ जखन जगले-जागल देखै छी जे वास्तवमे कोनो अंतर नै होइ छै सरकारक कागती विकास आ साहित्यकारक कागती प्रगतिशीलतामे तखन हमर पएर तरसँ बिला जाइत अछि रमणगर सोझ बाट मायावी राक्षस जकाँ आ खसैत छी हम यथार्थक पतालमे छद्मक घोघ तर मनुख कतेक सुन्नर होइ छै एकर आकलन कोनो सौंदर्यशास्त्री नै कऽ पौताह मुदा कतेक रूप होइ छै मनुख-छद्मक आवरणमे तकर निर्धारण जानवर तुरंत कऽ देत सोझ बाट पर चलैत-चलैत ६ सोझ बाट पर बनल एकटा घरक हरेक कोड़ो-बातीमे लटकल छै बादुर सन्हिआएल छै कड़ैत घरमे राखल दाना-दाना पर लिखल छै प्रेतक नाम दाना-दानामे छै शोणितक सुआद ओइ घरमे बसै छै डाइन जे डनिपन सिखबाक लेल दऽ देलकै बलि अपन पूत-भतार देआद सर-समांगकेँ हरेक अधरतिआमे नङटे नचै अछि डनियाँ हरेक राग-रागिनीक लय ओ ताल पर केखनो ओ गाबऽ लगैत अछि प्रखर सेक्युलर राग तँ केखनो अंधराष्ट्रवाद रागिनी आ नचबाक लेल बाध्य कइए दै छै ओ सभ भूत-प्रेत-बैतालकेँ ऐ राग-रागिनीक लय-ताल पर नै समता कऽ सकताह नटराज ऐ नाचसँ अपन नाचकेँ उचित छन्हि हुनका जे ओ छोड़ि देथु अपन पदवी नटराजक सोझ बाट पर चलैत-चलैत ७ बाट ओ बाट नै रहल भने ओ सोझ हुअए की टेढ़ बनि गेलै ओ राजगद्दी बटोहिओ आब बटोही नै रहल भने ओ अहदी हुअए कि कमासुत बनि गेल ओ राजा प्रजा नै छै ऐ सोझ बाटक नगरीमे सबहक पोनमे छै लस्सा लागल जइमे सटल छै कुर्सी मुदा एकटा गप्प बुझबै हरेक कुर्सीमे पोसा रहल छै धामन साँप बस देरी छै मात्र गुदा मार्ग द्वारा मगजमे घुसबाक जे काज गहुमन आ नाग नै कऽ सकल से ई बिखहीन धामन देखाओत ओना बिखहीन हुअए कि बिखाह साँप अंततः साँपे होइ छै से हमरा बुझा रहल अछि सोझ बाट पर चलैत-चलैत सेनूरदानक गीत कारी केश बीच कोसी-कमला सन सींथ ताही मे देथिन्ह सेनूर अनचिन्हार रे---------- अपन धियाकेँ पोसने छी बड़ा रे जतनसँ करेजा साटि रखने छी बड़ा रे जतनसँ दुलहा आगू आब अहूँ रखबै विचार रे सेनुरेबै जते नीकसँ यौ दुलहा बाबू रहब दूनू तते नीकसँ यौ दुलहा बाबू विष्णु बनि करिऔ हमर ललनाकेँ उद्धार रे सियाराम सन जोड़ी जुगल बैसल आंगनमे देखबा लेल सगरो टोल पैसल आंगनमे पाहुन सेनुरेलथि भेलथि चिन्हार अनचिन्हार रे...... पवन झा “अग्निवाण”, सम्प्रति- कोलकाता।

चलियौ अप्पन गाम, जगत-जननी सीताक धाम विस्मृत जुनि करियौ मिथिला केँ यौ मिथिलाक संतान घूमि देश-परदेश कमेलौं खूब टका, सम्मान देशी सा-साहब तक बनलौं, बदलि अपन परिधान प्रतिभाक कायल अछि दुनियाँ खूब करए गुणगान लेकिन सोचियौ मिटा रहल अछि मिथिलाक पहिचान चलियौ अप्पन गाम, जगत-जननी सीताक धाम खेती-बाड़ी छूटल गामक, फूटल घर, दलान भाइ-भाइमे माथ-फोरौव्वल, लागथि शत्रु समान अपन बोली तीत कतेक प्रिय अछि बोली आन ई मूरखता के के रोकत अस्त भेल दिनमान चलियौ अप्पन गाम, जगत-जननी सीताक धाम। जनकसुताक नगरमे देखू नारीक अपमान जतऽ रचाओल गेल स्वयंवर ओतए दहेजक दाम कानि रहल अछि मिथिलाक नारी बिका रहल स्वाभिमान कोन विधिसँ चुका रहल छी संस्कृतिक प्रतिदान? चलियौ अप्पन गाम, जगत-जननी सीताक धाम अओर कतेक दिन सुतल रहब जागू यौ श्रीमान आबो नै जागब तँ बुझू संकट हएत महान विकसित करियौ मिथिला केँ आ राखू अपन मान तखने भावी पीढ़ी करत मिथिलाक जयगान चलियौ अप्पन गाम, जगत-जननी सीताक धाम प्रवीण नारायण चौधरी, सम्प्रति बिराटनगर। सभसँ सस्ता कविता! देखि रहल छी हाट-बाजार- घूमि रहल छी गाम-शहर, धूम मचल अछि, शोर मचल अछि, सभसँ सस्ता कविता!

ई कविता जे केवल रचब, केवल वाचब, केवल लिखब, करए बेरमे नांगरि सुटका केँ-कैँ करैत पछुवैत पराएब, एहेन भूसक बखाड़ीसँ नै पेट भरत यौ मैथिल कवि, रचनामे जँ दम नै होइ तँ अजगर बनल अजोधक भीड़, धूम मचल अछि.... जहाँ दू दिनक फुर्सत भेटत लिखब कोनो रचना नीक, अपना दहीकेँ खट्टा सुनि कऽ पिअब मेरचाइक झोरे तीख, ई नै सोचब जे रचना सँ रचल जाइछ सुन्दर संसार, लोकक जीवनक हर क्षणमे जेकर बनैछ सुन्दर आधार, धूम मचल अछि..... पथियामे जेना काँकौड़ खिंचए टांग दोसरक सुनू यौ मीत, अगबे गपक भंडारा सँ अनोन बनल मिथिलाक सभ रीत, जौं कर्ता आब वक्ता बनता कहू जे करतै के सभ काज, अहिना सभ दिन कविता रचबै कहू जे चलतै कोना कऽ राज.... धूम मचल अछि.....

नीक लगै तोहर मुस्कान आँखि खोलि की हम आइ देखी प्रिय, बन्द आँखि अहाँकेँ हम देखैत छी। सुन्नरि हे सलोनी संगिनी प्रिय, ... नीर प्रेमक अहींकेँ हम पिबै छी। पहिले देखल हम सपनामे, ताकि-ताकि थकल मन विपनामे। चुपचाप रही बस नयन हेरी, कहियो तँ देखब हम विपनामे। जीवनक अनेको पल बितल, बस आइ देखि हम फूलल छी। आँखि खोलि की हम..... जानी नै एहेन कोन जादू छै, आँखि देखि एना हम डूबल छी। ई केश घना रेशम अछि प्रिय, मदमस्त छटासँ पागल छी। आइ सभ सुखक ओ सागरमे, भरने हम सुधा केर गागर छी। आँखि खोलि की हम.... प्रेमक मन्दिर अछि अहीं सँ बनल, मूर्ति देवी केँ निहारैत रही। कल जोड़ि विनय बस एतबी टा, जिनगी भरि जे सिधारैत रही। कहियो जँ मिलन केर आश टूटए, तैयो हमरे संग नेह भरी। आँखि खोलि की हम.... देखू आइ कपारो ‘किशोर’क, जीवन रहितो ज्योति चलि गेल। तैयो ‘ज्योति’ केर ज्वाला सँ, जीवनक रौशनी अछिये बनल। ईशक लीला अछि एहेन अजीब, जिनगीक मोल लेल कायल छी। आँखि ....... संजीव कुमार ‘शमा’ १९७५- , एम.ए. (संगीत, हिन्दी आ पत्रकारिता), एल.एल.बी., पी.एच.डी. लेल शोधरत (संगीतमे)। सम्प्रति-अधिवक्ता सिविल कोर्ट, झंझारपुर। गाम- रतुपार, पोस्‍ट- ताजपुर, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, (बि‍हार) क्रांति‍ दीप आउ क्रांति‍वीर बनि‍ मि‍थि‍लाकेँ बचेबाक लेल जराउ क्रांति‍ दीप जतए भूमि‍ अछि‍ रहबाक लेल। ली जल-ति‍ल समैकेँ पकड़ि‍, जे हाथसँ नै ससरए एकताक ठोसगर मापदंड अपन एतए नै फूटए मैथि‍लीक प्रचार, जन-जनकेँ जगेबाक लेल। बड्ड भेल! आब कते काल धरि‍ बेइज्जजत होइत रहब, माँ मि‍थि‍लाकेँ आजाद कराएब से संकल्प दोहराबैत रहब, चलू चलल फि‍रङ्गी चालि‍केँ, मि‍टेबाक लेल... बजा देने छथि‍ बैजू बाबू वि‍जयक बि‍गुल, भीषण हंुकार जकाँ, मचि‍ गेल अछि‍ शोर चहुँदि‍श, स्वतंत्रताक पुकार जकाँ आगूमे जे ठाढ़ अछि‍ पहाड़, चलू खसेबाक लेल डरपोक बनि‍ कतेक काल धरि‍ डरल रहब आब कहि‍आ भट्ठीक आगि‍ जकाँ धधकब धधकल छथि‍ शमा मि‍थि‍लांचलक दीप जड़ेबाक लेल। सुधीर कुमार ‘सुमन’, पि‍ता- श्री सत्यदेव ‘सुमन’, गाम- लकसेना, पोस्ट- महि‍न्दवार, भाया- तुलापतगंज, जि‍ला- मधुबनी, (बि‍हार) समए समैकेँ सदि‍खन धि‍यानमे राखि‍ जि‍नगीकेँ धरतीसँ जोड़ि‍ लुच्चा –लौफरक बातमे ने आबी अपन बीतल बात पसारैत समाजक मर्यादाक मान बचाबी अपन चि‍न्ताकेँ चि‍न्ता ने मानि‍ मैथि‍ल-संस्कृति‍क मान बचाबी साँझ पड़ैत ठंढ़ अबैत लोक ि‍नहाड़ए अपन बाटकेँ वि‍द्वान, वि‍दुषी मैथि‍ली भाषी अपन चमत्कार ि‍नखाड़ए देखाबए ठंढ़ा पानि‍ आजुक दि‍न सपना भरल छै हँसी-हँसीमे समए बीतल छै समए पकड़ि‍ आगू बढ़ू भैया सभ अपन सपनाकेँ साकार करै छै। उपेन्द्र  नारायण ‘अनुपम’, गाम- भुतहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी। संप्रति‍- व्याख्याता (मनोवि‍ज्ञान वि‍भाग), अशर्फी दास साहु-समाज महि‍ला इण्‍टर महावि‍द्यालय, ि‍नर्मली, सुपौल। दुख हम्म‍र कतेक आब दुख सहब ककरा ई बात कहब घर-घरमे अछि‍ झगड़ा सभकेँ सभसँ अछि‍ रगड़ा। झगड़ा तँ हटत नै रगड़ा तँ मिटत नै मि‍टत नै आश बेचरा हएत नि‍राश आशक आब डोर टुटल नि‍राशासँ ठोर सुखल छूटल अपन साम-दाम बाबू गि‍ड़ल धराक-धड़ाम पहि‍ले बड़का गाछ गि‍ड़ैत अछि‍ तब कहीं छोटका पात उड़ैत अछि‍ उड़ि‍ जाइत अछि‍ सभ तृण एक दि‍न दुनि‍याँसँ हएब भि‍न्न। सुखक जननी दुखे होइत अछि‍ दुखक बादे सुख अबैत अछि‍ दुख जाएत, सुख आएत जरूर-जरूर एक दि‍न कहब। दुखसँ नै घबराउ दुखसँ खूब टकराउ दुखसँ पाबू पार गुड़ गंजन बादे मि‍श्री जेना तैयार ओहने स्वादव, अओर की कहब। अनुपम-सुशीला ई बेथा सुना कऽ जन-जन तक अपन वणी पहुँचा कऽ उहो लेत एक दि‍न दम ई बात नै अछि‍ कम। घी कनी ई कनी घी ओही लेल केलौं ने की-की साँझ-भिनसर-भोर बड्ड लगेलौं जोर मटकुरी, रेही लाबि‍ कऽ पीढ़ीपर बैस कऽ मथए लगलौं जोर। पसेना आएल, मथा गेल छालही जमा भऽ गेल मक्खन-मट्ठा-घोड़ आनि‍ कराही आँॅच दि‍अए लगलौं खशीसँ नेना भेल वि‍भोर। आँच बढ़ल कराही कड़कल मक्खन हुअए लगलै थोड़ घी बना बेचि‍ कऽ लाएब चूड़ी-साया-साड़ी घी बनल कराही उतरल वि‍चार आएल छल बेजोड़। कराही उतरल, मन छल छनगर कराही चटकल घी बहल रहि‍ गेल दारही थोड़। फुसुर-फुसुर भेल आबए लगल लोक धूर, केहेन छथि‍न अभागलनी कोनो घी बनबैपर मन छलनि‍ थोड़े मन छलनि‍ गाछपर तन हुनक खाटपर घीक कोनो नै कसूर भेल घी हरा गेल छाती पीटैत रहि‍ गेलि‍ दुलहि‍नि‍या भोरे-भोर। अनुपम-सुशीला घी खातिर नयनसँ बहबए लगलै नोर ई दीन-कथा घी गरीबक पसरि‍ गेल चहुँ ओर। परदेसि‍या प्रि‍यतम तँू चनचल छेँ, रौ मन चि‍त्त लऽ गेल हम्मर चोर सावन केर जब अइहेँ महि‍ना आँखि‍सँ बहए नोर तँू छलि‍या परदेशी बालम टुकुर-टुकुर तकैत भेल साँझ-सँ-भोर। भादव केर जब अइहेँ महि‍ना असगर लागए डर बि‍नु बालम केर नीक नै लगए कनैत-कनैत भऽ गेल राति‍-सँ-भोर। बेंग टर्र-टर्र, झि‍ंगुर झुन-झुन अंगनामे नाचए मोर बि‍नु साजन केर खि‍लत कोना कली बीतल जवानी फुलबा ने कोर। अनुपम-सुशीला कहए केहेन परदेशि‍या गै प्रीति‍ कहि‍यो-ने-कहि‍यो तँ मि‍ल जाएत अप्पन मक्खन चोर। डॉ. शि‍व कुमार प्रसाद, वरीय व्याख्याता, हि‍न्दी वि‍भाग, ि‍नर्मली काॅलेज, ि‍नर्मली।जन्म‍- १२.११.१९५६, गाम+पोस्ट- सि‍मरा, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, (बि‍हार)। ि‍नर्मलीक ि‍नर्मलतामे ि‍नर्मलीक ि‍नर्मलतामे मनक मलाल सभ मेटा रहल अछि‍। शि‍क्षाक ऐ महापंकमे गामक जि‍नगी लेटा रहल अछि‍। कैंचा-पैसा जोरि‍-जोरि‍ कऽ माए-बाप सभ पठा रहल अछि‍। कोचि‍ंग, वि‍द्यालय, कओलेजमे एक-एक जन आइ लुटा रहल अछि‍। गामक जि‍नगी..............। के पठाओत ककरा लग जा कऽ नेना भुटका पढ़ि‍ रहल अछि‍। नै सुधि‍ बुइध केकरो छैक अपने झंझट ओझराएल अछि‍। गामक जि‍नगी....। दौगैत-दौगैत चटि‍या सभटा पढ़बैत-पढ़बैत बड़का सर सभ अपन-अपन भाँजमे सभ कोइ डोढ़ि‍ छुबए लेल अपसि‍याँत अछि‍। गामक जि‍नगी लेटा रहल अछि‍। मनक मलाल सभ मेटा रहल अछि‍। तैं कि‍छु ने कि‍छु लि‍खैत जाउ लि‍खैत-लि‍खैत लि‍खि‍ये देबै मैथि‍लीक उपकारी हेबै तैं कि‍छु-ने-कि‍छु नि‍त लि‍खैत जाउ। छपैत-छपैत छपि‍ये जेबै एकदि‍न लेखक बनि‍ए जेबै मंच आर इनामो भेटत तैं कि‍छु-ने-कि‍छु लि‍खैत जाउ। मौलि‍कता ककरा कहैत छी कि‍नकामे मौलि‍कता देखल सभ कि‍यो एक्के बात लि‍खैत छथि‍ सबहक नीयत साफ देखाइत अछि‍ तैं कि‍छु-ने-कि‍छु लि‍खते जाउ। नीर-क्षीर वि‍वेक कि‍नका छन्हि! लि‍खि‍नि‍हारमे हंस के छथि‍!! पुर्जा-पुर्जी जोड़ि‍-तोड़ि‍ कऽ कि‍छु-ने-कि‍छु अहाँ घसैत जाउ तैं कि‍छु-ने-कि‍छु लि‍खैत जाउ। प्रो. राजकुमार नीलकंठ, अवकाश प्राप्त  प्रोफेसर, हि‍न्दी‍ वि‍भाग, ि‍नर्मली महावि‍द्यालय, ि‍नर्मली। गाम- बेलही, जि‍ला- सुपौल। स्रष्टा अहाँ जतऽ कतौ जनमलौं अपनहि‍ शवकेँ गुरू-चरण तर दबाए ऊर्जित-उत्तनि‍त यष्टि अानत मुख, नमि‍त दृष्टि‍‍ ठाढ़ रहलौं एक ि‍नर्मम प्रश्नवाचक। आ, फेरसँ शून्यमे पसरि‍ गेल दि‍गन्तमे सहस्र-दल नव रङे रंजि‍त नव नामे संज्ञि‍त, अहाँक सर्प-यज्ञमे देशसँ, देशान्तरसँ ससरि‍-ससरि‍, छि‍हुलि‍-छि‍हुलि‍ आएब अनि‍वार्य भेल हएब अनि‍वार्य भेल अनर्थकेँ अहाँसँ उत्तरि‍त अहाँसँ अन्तत: अहाँसँ अमुक्‍त। ठाढ़ रहलौं अहाँ तोड़लौं तँ कि‍छु नै‍ टूटि‍ गेल सभ अपनहि‍-आप अपनहि‍ अनुत्तरक नागफणि‍ वनमे लोटि‍-अरूछा कऽ, जोड़लौं तँ कि‍छु नै‍ सभ जुटि‍ गेल अपनहि‍-आप अपनहि‍ विवर्तसँ अपनहि‍ नाङरि‍क पाछाँ-पाछाँ धावि‍त। अहाँक हएब मात्रसँ नग्नता भेल पूर्ण। अहींक दृष्टि-आवरणसँ पुन: छपि‍ गेल सम्पूर्ण। एक तीक्ष्ण  अटकनपर चि‍तकाबर केचुआ उतारि‍ ससरि‍ गेल शंकि‍त ओ- अनि‍र्वचनीय वृद्ध अजगर स्यात् कोनो अन्य घाटीक खोजमे शापि‍त करए सुख-मग्न तृति‍या। (साभार- मि‍थि‍ला मि‍हि‍र, जून, १९६९ईं.) राजदेव मण्‍डल, अम्बरा (कविता-संग्रह) आ हमर टोल (उपन्यास) प्रकाशित। देश-गीत आउ बन्‍धु आउ स्‍वतंत्रताक गीत गाउ श्वेत-श्‍याम नर-नार मि‍ल एकता बनाउ ऊसर धरा केँ श्रमसँ सींच उर्वर शीघ्र बनाउ आउ बन्‍धु आउ स्‍वतंत्रताक गीत गाउ संस्‍कृति‍-सभ्‍यताकेँ नभ तक पहुँचाउ सम्‍पन्नताकेँ दि‍यौ आमंत्रण वि‍पन्नताकेँ दूर भगाउ ति‍मि‍र दुर्गकेँ तोड़ि‍ ज्ञानक ति‍रंगा लहराउ भारत भू केँ विश्वक अग्रणी देश बनाउ आउ बन्‍धु आउ स्‍वतंत्रताक गीत गाउ। जुलूसक पछुआ हजारक-हजार टांग-हाथ कि‍न्‍तु एकेटा अछि‍ माथ ठमकैत आ बमकैत बढ़ि‍ रहल अछि‍ आब गरजैत सड़कपर इनकि‍लाब नै अछि‍ कान-आँखि‍ तैयो लगल अछि‍ जेना पाँखि‍ एकगोटे केलक बकटेटी अखैन केना सुनत अपन हेठी केना सुनतै एखन गारि‍ बात जखैन छै हजार साथ पकड़ि‍ ओकर तोड़ि‍ देलक गात तोड़ए लगल तान कंठ मोंकि‍ लऽ लेलक प्राण बढ़ि‍ गेल सभ आगाँ जेना लगल हो धागा नै छै पता आगू की भेल बात पाछूसँ सभ देने संग साथ लहाशकेँ फेंकि‍ देलक बाटक कात हम तँ खरिदुआ अंग मात्र चलैक छै संग-संग बनल छी पछि‍ला हि‍स्‍सा चलि‍ रहल छै आपसी खि‍स्‍सा ओकर कुकृत्‍यकेँ हम जानि‍ रहल छी नचार भऽ मने-मन कानि‍ रहल छी बि‍ना जरि‍माना केना भेटत माफी भीड़क अंग छी तँए हमहूँ पापी। कनेक सुनू १ खेतक ऊपर उधि‍याइत लगनी गीत मोन पड़ल जि‍नगीक गीत गमकि‍ उठल मनक दुआरि‍ ठाढ़ छी सम्‍हारि‍ ओइ आरि‍। २ बैसल रहि‍ गेलौं पछताइत जि‍नगी भऽ गेल अन्‍हरि‍या राति‍। ३ प्रेम नै केलौं केलौं चोइर हमरा जि‍नगीमे देलौं जहर घोइर ४ जि‍नगी नै अछि‍ कि‍छु तैयो अछि‍ सभ कि‍छु कतबो काँट गड़ै तैयो फूल बिछू। असल मरद अंगना गारि‍ पढ़ैत अछि‍ कानि‍-कानि‍ जेना बि‍लमि‍-बि‍लमि‍ गाबैत हो गाइन आगू की हएत से नै जानि‍ सुनि‍ कुबाइन देहकेँ तानि‍ अपन गलती केना लेबै मानि‍ सींगमे लगौने खून गरजि रहल छी अपने धुन जेना करैत अछि‍ खुनि‍याँ बड़द तामसे करैत गरद आइसँ बनलौं असल मरद। पोसा परबा परबा मानि‍ लेलक आब पोस पूरा परि‍वार बनि‍ गेल दाेस सभसँ भऽ गेल जान-पहि‍चान दाना दऽ कऽ राखऽ मान खाइत अछि‍ आब बासमती चाउर ठामहि‍-ठाम मारैत अछि‍ भाउर लग आबैत छल धीया-पुताक बातपर बैसि जाइत छल हाथ-आ-माथपर कालक गति‍शील आँखि‍, दौड़ैत-फड़फड़ाइत परबाक पाँखि‍ मांसक माँगपर बजए पड़ल “परबाक छै भाग्‍ये जरल एहेन अति‍थि‍ जँ पहुँचल दुआरी पोसा परबाकेँ दि‍यौ आइ मारि‍ एहेन लोक कहि‍या आएत से नै जानि‍ फेर हेतै परबा बात लि‍अ मानि‍।” पानि‍मे डुबाकेँ जखैन लेलक जान परबाकेँ भेल मनुक्‍खक पहचान। हेलवार घुच्‍ची भरि‍ पानि‍मे कऽ रहल छी खेलवार कखनो एेपार कखनो ओइपार बनए चाहै छी असली हेलवार संकटमे करए पड़त धार-पार धारक पेट हो अगम-अपार जखैन छुरी फनकै रहि‍-रहि‍ धारा सनकै देख कऽ डरे मन झनकै ठमकल बटोहीक माथ ठनकै तखैन जँ करब पार तब ने बनब हम असली हेलवार। कलीक प्रश्न कली पूछैत अछि‍ कलीसँ एतेक दुखि‍त कि‍ए छी भेल गुन-गुन गान सुनबैत छल हरपल ओ भ्रमर कतए गेल सुनू-सुनू गप्‍प गुनू दुख आएल तँ सुख चलि‍ गेल हमरा छल हृदैक मेल ओकरा लेल धुरखेल अहूँक समए आएत एहेन तँ जानब भ्रमरक खेल। कुहेस कतौ ने कि‍छु बचल अछि‍ शेष चारूभर पसरल कुहेस कठुआ गेल देह भीजल अछि‍ केश अधभि‍ज्‍जू सन भेल सभटा भेष घुरि‍या रहल छी ठामहि‍-ठाम कि‍यो ने दैत अछि‍ समैपर काम टुटल जा रहल सभ आस ऊपरसँ लगि‍ गेल दि‍शाँस कुहेस आर भऽ गेल सघन इजोत लगैत अछि‍ टीका सन खेत-खरि‍हान, घर जंगल-झाड़ सभटाकेँ घोंटि‍ गेल अन्‍हार उनटि‍ गेल जेना माथ छूटि‍ गेल सभ संग-साथ नै भेटैत अछि‍ बाट नै अपन घाट लगे-लग औनाइत मन भेल उच्‍चाट सभ गोटे धऽ लेने छी खाट देखा दि‍अ जाएब कोन बाट कहि‍या फटत ई कुहेस भेटत अपन घर परि‍वेश हे सुरूज कि‍रणकेँ जगाउ आबो तँ ऐ कुहेसकेँ भगाउ। जय हे कि‍सान परतीकेँ कोड़ि‍ ढेपाकेँ फोड़ि‍ कण-कणकेँ कोड़ि‍ जलसँ घोरि‍ कएलौं कादो माह भादो रोपलौं धान जय हे कि‍सान- जय हे कि‍सान कतेक बेर चास-समार पड़लौं बेमार बि‍नु उपचार अपन-आन सभ बैमान अहाँक लेल सभ समान जय हे कि‍सान- जय हे कि‍सान माघक बदरी कनकनी बसात जीवा-जन्‍तुक ठि‍ठुरैत गात जीअन-मरण खेतक साथ अँही बुते उपजत धान जय हे कि‍सान- जय हे कि‍सान बैशाखक रौदमे जरैत रहै छी दि‍न भरि‍ गुमसड़ैत धरतीकेँ सि‍ंचि‍त करबाक लेल अपने पि‍यासे रहै छी मरैत रौदी-दाही वा फाटए आसमान फलक कोनो चि‍न्‍ता नै कर्ममे लगौने जी-जान जय हे कि‍सान- जय हे कि‍सान अपना अभि‍लाषाकेँ डाहि‍ जारि‍ करम करैत छी नि‍त सम्‍हारि‍ सफलता पकड़ने रहैत अछि‍ पाइर धेने एकहि‍ तान, गाबै छी कजरीगान जय हे कि‍सान- जय हे कि‍सान अहाँ छी देशक अभि‍मान तैयो सहैत छी नि‍त अपमान बचबैत छी जन-जन प्राण अपन दैत बलि‍दान जय हे कि‍सान- जय हे कि‍सान हरकेँ नाशपर सभकेँ आश चहुँदि‍श छि‍टकल हरि‍यर प्रकाश ऊसर धरतीपर अहाँ ि‍लखैत छी नव-नव इति‍हास अँही कऽ सकैत छी अन्नदान जय हे कि‍सान-जय हे कि‍सान। जगदीश प्रसाद मण्‍डल, जन्म ५ जुलाइ १९४७। गाम-बेरमा, भाया- तमुरि‍या, जिला-मधुबनी। एम.ए. (हिंदी एवं राजनीति‍ शास्‍त्र)। कथाकार (दीर्घकथा संग्रह- शंभुदास; लघुकथा संग्रह १.गामक जिनगी, २. अर्द्धांगि‍नी..सरोजनी.. सुभद्रा.. भाइक सिनेह इत्‍यादि; आ तरेगन -बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह); नाटककार [(१.मिथिलाक बेटी, २.कम्प्रोमाइज, ३. झमेलि‍या बि‍आह आ ४.पंचवटी (एकांकी-संचयन)]; उपन्यासकार- (मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत) आ कवि (१.इन्द्रधनुषी अकास, २.गीतांजलि आ ३.राति-दिन)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। गामक जिनगी, लघुकथा संग्रह लेल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११ क मूल पुरस्कार, आ टैगोर साहित्य सम्मान २०११; आ बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह "तरेगन" लेल बाल साहित्यक विदेह सम्मान २०१२ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपेँ प्रसिद्ध) प्राप्त। जरनबि‍छनी जरनबि‍छनी, जि‍नगी बूझि‍ हथि‍यार संग रणभूमि‍ चलैत। गाछी-बि‍रछी ओ बँसबि‍‍ट्टी ठहुरी-कड़ची बीछि‍-बीछि‍ रखैत। साँप-कीड़ाक डर कहाँ छै बोन-झाड़ हाथ बढ़बै छै। काँच-सुखल बेड़ा-बेड़ा सजि‍-सजि पथि‍या रखै छै। बि‍सरि‍ गेल कहि‍या कतए नुआ होइ-छै नांगट बचाएब। सि‍हकल, मसकल फटल मैल चेफड़ी सटल इज्‍जत बचबैत। जहि‍ना लोहि‍या ओढ़ि‍-ओढ़ि‍ जुग बि‍तौलनि‍ लोमस बाबा। चोंचा खोंता सि‍र सजि‍ तूँ मुँह छि‍ड़अबै छै मकइक लाबा। कनी सुन गै जरनबि‍छनी नाओं-ठेकान बतौने जो? स्‍वतंत्र देशमे तहूँ बसै छेँ से कनी-मनी कहने जो। तोरो देश स्‍वतंत्र भेलौ आकि‍ भेलौ स्‍वतंत्र पुरखा। देवी-दुर्गा कोइ ने देखलकौ से कनी कहने जो। दि‍न-राति‍क खेल अपने हाथक खेल मीत यौ अपने हाथ खेल। संगे-संग दुनू चलैए। इजोत-अन्‍हार बनैत रहैए। हँसि‍-हँसि‍ कानि‍-कानि‍ पटका-पटकी करैत रहैए। एके गाछक डारि‍ छी दुनू सुफल-कुफल फड़ैत रहैए। रस रंग सुआद गढ़ि‍-गढ़ि‍ तीत-मीठ बनबैत रहैए। अपने हाथक खेल मीत यौ संगे-संग खेलैत रहैए। लपकि‍-लपकि‍ कतौ-कतौ इजोत-अन्‍हार दबैत रहैए पीट्ठी चढ़ि‍ पीठि‍या-पीठि‍या एेरावत सजबैत रहैए। तँए कि‍ अन्‍हार हारि‍ मानि‍ हरदा कहि‍यो कबूल करैए। जहि‍ना झपटि‍ बि‍लाइ बाझकेँ जि‍नगीक खेल देखबैत रहैए। अपने हाथक खेल मीत यौ संग मि‍लि‍ संगे चलैए। मंत्र एक रहि‍तो दुनूक वि‍धा दू कहबैत चलैए। वि‍धि‍-वि‍धान रचि‍-बसि‍ दुनू गद्य-पद्य गढ़ैत रहैए। चढ़ि‍ गाछ तनतना-तनतना गीत-कवि‍त्त सुनबैत रहैए। ताना दऽ दऽ वि‍हुँसि‍-वि‍हुँसि‍ मारि‍ तानि‍ हँसि‍-हँसि‍ कहैए। एके गाछक खेल मीत यौ संगे मि‍लि‍ दुनू खेलैए। बजा पीहानी नाचि‍-नाचि‍ रंगमंच दुनि‍याँ सजबैए। कंठ कोकि‍ल कवि‍त्त कवि‍ कवि‍काठी बजबैत रहैए। कतौ ने कि‍छु छै दुनि‍याँमे मन मानव गढ़ैत चलू। मानव मनुख खरादि‍-खरादि‍ राति‍-दि‍न बनबैत चलू। अपने हाथक खेल मीत यौ हाथ-हथि‍यार बदलैत चलू। कि‍छु ने बूझै छी के केकर हि‍त के केकर मुद्दै दि‍न-राति‍ देखैत रहै छी। गरदनि‍ पकड़ि‍ जे कानए कलपए पकड़ि‍ गरदनि‍ तोड़ैत देखै छी। कि‍छु ने बुझै छी। हि‍त बनि‍ मि‍लि‍ संग चलैए मुद्दै बनि‍-बनि‍ लड़ैत रहैए। सोझमति‍या चालि‍ पकड़ि‍-पकड़ि‍ झाँखुर-बोन ओझराइत रहैए। डारि‍-पात देखैत रहै छी कि‍छु ने बुझै छी। छत्ता-मधु दुनू बसि‍-बसि‍ वि‍ष मधु गढ़ैत रहैए। हि‍त मुद्दै बनि‍-बनि‍ दुनू राति‍-दि‍न झगड़ैत रहैए। देखि‍ झगुंंता पड़ल रहैए छी कि‍छु ने बुझै छी। संग मि‍लि‍ पाथर तोड़ए जे पाथर ऊपर फेकैत रहैए। पाथर मन गढ़ि‍-मढ़ि‍ पाथर बूझि‍ देखैत रहैए। पथराएल पथ देखैत रहै छी कि‍छु ने बुझै छी। आगि‍ चढ़ि‍ अन्न जहि‍ना पथरा पाथर बनैत रहैए। जीवन दाता कुहुकि‍-कुहुकि‍ पेट पाथर बनैत रहैए। वि‍षमि‍त भेल बि‍सबि‍साइत रहै छी कि‍छु ने बुझै छी। चल रे जीवन चल रे जीवन चलि‍ते चल। संगी बनि‍ तूँ संगे चल जौवन चल जुआनी चल जि‍नगानी संग मर्दगानी चल चि‍ंतन संग दि‍लेरी चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल। यात्रीकेँ आराम कहाँ छै यात्रा पथ वि‍श्राम कहाँ छै। ओर-छोर बि‍नु जहि‍ना जि‍नगी तहि‍ना ई दुनि‍यो पसरल छै। पकड़ि‍ मन तूँ चलि‍ते चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल। ग्रह नक्षत्र सभटा चलै छै सूर्ज तरेगन सेहो चलै छै दोहरी बाट पकड़ि‍ चान अन्‍हार-इजोतक बीच चलै छै। देखा-देखी चलि‍ते चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल। बाटे-बाट छि‍ड़ि‍याएल सुख छै संगे-संग बि‍टि‍याएल दुख छै। काँट-कुश लहलहा-लहलहा गंगा-यमुना धार बहै छै। परखि‍-परखि‍ तूँ चलि‍ते चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल। कि‍छु दैतो चल कि‍छु लैतो चल कि‍छु कहि‍तो चल कि‍छु सुनि‍तो चल कि‍छु समेटि‍तो चल कि‍छु बटि‍तो चल कि‍छु रखि‍तो चल कि‍छु फेकि‍तो चल बि‍चो-बीच तूँ चलि‍ते चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल। समए संग चल ऋृतु संग चल गति‍ संग चल मति‍ संग चल। गति‍-मति‍ संग चलि‍ते चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल। गति‍ये संग लक्ष्‍मी चलै छै सरस्‍वती मति‍ये चलै छै। वि‍श्वासक संग अशो चलै छै तही बीच जि‍नगीओ चलै छै। साहससँ संतोष साटि‍-साटि‍ धीरज धारण करि‍ते चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल। टूटए ने कहि‍यो सुर-ताल हुअए ने कहि‍यो जि‍नगी बेहाल। जहि‍ये समटल जि‍नगी चलतै बनतै ने कहि‍यो समए काल। बूझि‍ देखि‍ तूँ चलि‍ते चल चल रे जीवन चलि‍ते चल। की लऽ कऽ आएल एतए, की लऽ कऽ जाइत अछि?‍ सभ कि‍छु एतए छोड़ि‍-छाड़ि जस-अजस लऽ पड़ाइत अछि‍। नि‍खरि‍-नि‍ख‍रि‍ कऽ चलि‍ते चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल। बौड़ाएल बटोही जहि‍ना कोबर कनि‍याँ-नुकाइत तहि‍ना बाटो नुकाएल छै। अछैते घरमे रहि‍तो रहैत नजरि‍सँ कति‍याएल छै। चुटकी बजा जेना कनि‍याँ तहि‍ना धकचुकबए बाटो बटोही। आँखि‍क सोझ रहि‍तो रहैत पाबए ने थाह राही-बटोही। दि‍न-राति‍ चलि‍तो-चलैत देखए ने कखनो खुजैत कपाट। पट्टामे पट्टा सटि‍-सटि‍ सदि‍खन बन्न रहैत दुआरि‍। आठो पहर दि‍न-राति‍ घुमै छै देखि‍ ने पबैत पड़ाएल पथि‍क। कखैन केम्‍हर घुसुकि‍-फुसकि‍ पाबि‍ ने पाबए पथ पथि‍क। बन्न आकि‍ खुजल केवाड़ नुकाएल नजरि‍ नै ताकि‍ पबैत। संगे-संग चलि‍तो चलैत ठेल-ठेल सदि‍खन कति‍यबैत। बि‍नु देखल अनभुआर कहबैए देखि‍नि‍हार कहबै छै भू-आर। अनुभुआर भुआर बीच सदएसँ होइत आएल करार। अपन-अपन सभ लुरि‍ये-बुधि‍‍ये जनम लैत धरतीपर। माए-बापक पुन-परसादे पबैत पथ पृथ्‍वीपर। अद्भुत खेल खेलैये दुनि‍याँ दुनि‍याेक भरमार छै। जेहने खेल खेलेनि‍हार खेलाड़ी हारि‍-जीत पड़ाइत छै। ऊपर-नि‍च्‍चाँ सि‍र ससरै छै कतौ नि‍च्‍चाँ कतौ ऊपर। होनी-अनहोनी कहि‍-सुनि‍ बदलि‍ खसैत धरतीपर। सात तल जहि‍ना छै ऊपर तहि‍ना नीच्‍चोँ नि‍चि‍याएल छै। शि‍खर पहाड़ चढ़ैले बाटो-घाट ढेरि‍याएल छै। बाटे बीच बटोही बनि‍-बनि‍ बाटे-बाट बौआइ छै। हँसैत-खेलैत चलैत साँझू पहर ठेहि‍याइ छै। कि‍यो जाए चाहए सुरलोक स्‍वर्गक बास कि‍यो चाहए। कि‍यो चाहए बैकुण्‍ठ जाइले तँ कि‍यो चाहै गौलोक। बाटे बि‍ला बुइध‍ बाटे बि‍सरि‍ गेल। जेम्‍हरे जे चलल तेम्‍हरे पहुँचि‍ गेल। छूटि ‍ गेल मनोकामना छूटि‍ गेल कामनाक भूमि‍ कामनो‍ कमि‍-कमि‍ छि‍छलि‍ गाबए झूमि‍-झूमि‍। साँझ जि‍नगीमे साँझ कहाँ छै छी दि‍न-राति‍क मि‍लन बेल। एक सि‍रजन दोसर उसरन बदलब छी मात्र खेल। अपन गति‍ये सभ चलै छै चाहे सुर्ज हो वा ग्रह-नक्षत्र। तहि‍ना देवो-दानव चलै छै बनि‍ रक्षक चाहे भक्षक। चाहे गंगा हो वा जमुना धार पेट धारण करै छै। तह‍ी मध्‍य ने सरस्‍वती साँझ-प्रभाती सेहो गबै छै। आलय-हि‍मालय ओ कैलाश वि‍श्राम भूमि‍ बनल छै। बाट-घाट ओ तीर्थ-वर्त अनवरत बनि‍ पड़ल छै। सभ दि‍नसँ आबि‍ रहल बाल-सि‍यान बदलैत रहल। उमेरे आकि‍ बाल बोधे अनि‍र्णित प्रश्न बनल रहल। जहि‍ना सोर पाड़ि‍ साँझ कहए सुतैक इशारा दइए तहि‍ना ने आँखिसँ जागैक सुर-पता सेहो भेटैए। घड़ी कहाँ कहि‍यो बुझलक साँझ-भोरक कि‍रदानी एके चालि‍ये चलि‍-चालि‍ मुस्‍कुराइत गबए जि‍नगानी। बि‍नु जि‍नगानीक जि‍नगी मनुख ठठ्ठर कहबै छै। जहि‍ना कौआ खएल मकै खेत ठठेर कहबै छै। घोड़ मन १ घोड़ मन घोड़छान तोड़ि‍ चौदहो लोक भरमए लगल। सातो-सोपान पताल टपि‍ सातो अकास उड़ए लगल। समए संग जहि‍ना बि‍लगैए मि‍सरी-मक्‍खन ओ ि‍नर्मल जल हंसा उड़ि‍ परमहंसा बनि‍-बनि‍ तहि‍ना उड़ैत मन देह-स्‍थल। स्‍थूल-सूक्ष्‍म बँटि‍-बँटि‍ जहि‍ना दृश्‍य-भाव कहबैए। एक्के आँखि‍ये दुनू देखै छी। अचेत मन भरमैए। नि‍कलि‍ देह धारण करैए आत्‍म-परमात्‍म दर्शन पबैए। पबि‍ते दर्शन मगन भऽ भऽ सूर-तान, वीणा धड़ैए। मथि‍ते मथानी जहि‍ना घी-पानि‍ बि‍लगए लगैए। जले बीच दुनू समाएल उठि‍ एक सि‍र चढ़ए लगैए। लोहि‍या चढ़ल आगि‍ बीच जहि‍ना मक्‍खन नाचए लगैए। काह-कूह फेकि‍-फेकि‍ पेनी बीच बैसि‍ जमैए। २ गोबर घोड़ाइते पानि‍ जहि‍ना गोबराह रूप धारण करैए गोबरेक गंध पसारि‍-पसारि‍ गोबरछत्ता बनि‍-बनि‍ छि‍ति‍राइए। सुवि‍चार कुवि‍चारो तहि‍ना छने-छन छीन होइत चलैए। गि‍रगि‍ट रंग पकड़ि‍-पकड़ि‍ गि‍रगि‍टि‍या चालि‍ चलए लगैए। गि‍रगि‍टि‍या मनुक्‍खो तहि‍ना दि‍न-राति‍ बदलैत चलैए गिरगि‍टेक जहर सि‍रजि‍-सि‍रजि‍ बीख उगलैत चलैए। भेद-कुभेद मर्म बि‍नु बुझने देखा-देखी ओढ़ैत चलैए ओढ़ि‍-ओढ़ि‍ ओझरा-पोझरा डुबकुनि‍या काटि‍ मरैए। गाछक ऊपर डारि‍ बीच जहि‍ना बाँझी अपन बास करैए झड़मनुखो मनुख बीच तहि‍ना उपरे-ऊपर चालि‍ मारैए। सात समुद्र बीच मनुख दसो दि‍शाक दर्शन पबैए चीन्‍हि‍-पहचीन्‍हि‍ केने बि‍ना जि‍नगीक बाट पकड़ैए। ३ प्रकृतोक तँ प्रकृत गजब छै सुगंध-कुगंध फूल खि‍लबैए। सु-पारखी सुरखि‍-परखि‍ कु-पारखी दि‍न-राति‍ मरैए। परखि‍नि‍हारो परखि‍ कहाँ परखि‍-परखि‍ बि‍लगा चलैत धार-मझधार बीच पि‍छड़ि‍-पि‍छड़ि‍ नहि‍ये खसैत। बेबस मन बहटि‍-बहटि‍ सीरा-भट्ठा बि‍सरए लगैत जान बँचबैक धरानी कोनो लपकि‍-लपकि‍ पकड़ए चाहैत। सत्ताक भत्ता छि‍ड़ि‍आएल छै फानी, फनकी बनि‍ लागल छै। चि‍ड़चि‍ड़ीक फड़ जकाँ चूभि पएर टीको‍ नोछड़ै छै। बि‍नु पाँखि‍क हंसा जहि‍ना तीनू लोक वि‍चरण करैए। दि‍न-राति‍क भेद बूझि‍-बूझि‍ अज्ञान-ज्ञान-सज्ञान बनैए। ४ आँखि‍ मि‍चौनी पास बैसि‍ ब्रह्म-जीव माया खेलैए। समए पाबि‍ तहि‍ना ने अज्ञानो-सज्ञानक चालि‍ चलैए। होइत आएल आदि‍येसँ अज्ञान-ज्ञान बीच संघर्ष ताधरि‍ चलि‍ते रहत जाधरि‍ अन्‍हार इजोत बनत। पछुआ छोड़ सम्‍हारि‍-सम्‍हारि‍ अगि‍ला पकड़ैत चलू। अतीत केर स्‍मृति‍ बना समद्रष्‍टा बनैत चलू। एक छोड़क बाट देखि‍ भूत-वर्तमान देखैत चलू। भवि‍ष्‍य तँ भवि‍ष्‍ये छी भवि‍ष्‍य-वर्तमान बनबैत चलू। डेंगी नाह जहि‍ना यात्री धार पार करैए। डगमगाइत देह मड़मड़ाइत मन जीवन धाम पहुँचैए। मन-मणि‍ मढ़ि‍-मढ़ि‍ मणि‍ मनकेँ प्रज्‍वलि‍त करू तनकेँ धुआ-काया पकड़ि‍-पकड़ि‍ दि‍व्‍यभूमि‍क चि‍न्‍हू धनकेँ। जखने मन मणि‍ बनत छि‍टकत ज्‍योति‍ धरतीपर। अपन बाट अपने देखब हँसैत चलब पृथ्‍वीपर। कानि‍-कानि‍ दुख मेटबए सभ नाचि‍-नाचि‍ नचारी गबैए। आर्त स्‍वर गाबि‍ आरती अपन-अपन बेथा सुनबैए। छी अमूल्‍य मानव तन चि‍न्‍ह बि‍ना औषधि‍ भारी। चेतू-चेतू आबो चेतू कहै छी अपने भैयारी। श्रेष्‍ठ जीव मानव कहबै छै मानवता उदेश्‍य जेकर। मनुख-मनुखक भेद-वि‍भेद मेटबैक छी धर्म ओकर। रहसा चौर भीतर मि‍थि‍लाक ओ भूभाग चौड़गर एकटा चौरी छै। दूर-दूर धरि‍ पसरल-पसरल बि‍‍सवासू खेतीक भूमि‍ नै छै। नअो मास पानि‍ये गुड़गुड़ा हि‍आ-हारि‍ कनबो करैए। माटि‍योक कर्मक फल तेहने अपने बेथे चि‍चि‍आ रहल-ए। तीन मास सुखा सुख पाबि‍ करमी, केशौर कोढ़ि‍ला सजबैए। जि‍नगी-मृत्‍युक भय मेटा, संग मि‍लि‍ सभ भाँज पुरबैए। चारि‍ गामक बीच बसल नमगर-चौड़गर सीमा घेरैत चारू कातक पानि‍ गुड़कि‍ अद्रेसँ झील बनबैत। गामक माटि‍क जँ दशा एहेन मि‍थि‍ला राज केहेन बनतै। बाहरे-बाहरक सुसकारीसँ गहुमनक बीख केना झड़तै। वि‍चार इमानक केकरा कहबै खोलि‍ देखू मातृकोष। अपने-आप प्रश्न पूछि‍ वि‍चार करू सम्‍हारि‍ होश। गीत १ हाल-बेहाल देखि‍ राग-रागनि‍क कुशल फूल सजबैत रहै छै। रंग चढ़ि‍ करि‍या कारी भ्रमर रस पान करैत रहै छै। हाल-बेहाल देखि‍ राग-रागनि‍क कुशल फूल........। डगडगाएल हाल पाबि‍ उस्‍सरक फूल उस्‍सर सि‍रजैत रहै छै। घूरि‍ ताकि‍ नै भरमए भौरा दि‍वा रसराज कहबैत रहै छै। हाल-बेहाल देखि‍ राग-रागनि‍क कुशल फूल........। आसनसँ सिंघासन बनि‍-बनि‍ चटाइ नाओं धड़बैत रहै छै पूजा आसन बनि‍ सदए लोक सुर सजबैत रहै छै। हाल-बेहाल देखि‍ राग-रागनि‍क कुशल फूल........। उठि‍ अंजलि‍ चढ़ि‍ मंजलि‍ मंगल गीत गबैत रहै छै। हाल-बेहाल देखि‍ राग-रागनि‍क कुशल फूल........। २ रंग सि‍याही रोशनाइ बनि‍-बनि‍ रेहे-रेहे सियाह घोराएल छै। भाव-अभाव कुभाव बनि‍-बनि‍ गीत प्रेम लि‍खाइत रहै छै। रंग सि‍याही रोशनाइ बनि‍-बनि‍ रेहे-रेहे........। गहराएल गहन पुनि‍ चान जहि‍ना इजोत-अन्‍हार बनहाएल छै। तहि‍ना ने दि‍नो-दीनानाथ भक-इजोत भऽ कनखि‍आइत रहै छै। रंग सि‍याही रोशनाइ बनि‍-बनि‍ रेहे-रेहे........। कहि‍ रोशन टघरि‍ सि‍याह लेख कर्म लि‍खैत रहै छै। ति‍ले-ति‍ल ति‍लकि‍ जअ जहि‍ना हवन कुंड जरैत रहै छै। रंग सि‍याही रोशनाइ बनि‍-बनि‍ रेहे-रेहे........। भाव-अभाव कुभाव बनि‍-बनि‍ गीत प्रेम लि‍खाइत रहै छै। रंग सि‍याही रोशनाइ बनि‍-बनि‍ रेहे-रेहे........। ३ गामसँ कि‍अए डरै छी भाय यौ, गामसँ कि‍अए डरै छी। सदि‍काल गामक चर्च करै छी राति‍-दि‍न प्रशंसो करै छी। तखन कि‍अए भगै छी गामसँ कि‍अए डरै छी भाय यौ........। बाप-पुरुखाक पुरुषार्थ गाबि‍-गाबि‍ छाती-तानि‍ हामी भरै छी नानी-दादीक खि‍स्‍सा-पि‍हानी सुना-सुना मोहैत रहै छी गामसँ कि‍अए डरै छी भाय यौ........। जइ मातृभूमि‍ ममतासँ हृदए गंग बहबै छी गामे-गाम पसरल छै मि‍थि‍ला गामेसँ कि‍अए मुरुछल छी, गामसँ कि‍अए मुरूछल छी गामसँ कि‍अए डरै छी भाय यौ........। ४ बेढब रूप गढ़ि‍-मढ़ि‍ जि‍नगी बेढब गीत गबै छै। बेढब कुचालि‍ सुचालि‍ पकड़ि‍ बेढब पाठ पढ़ै छै। बेढब गीत गबै छी भाय यौ, बेढब........। जीत जि‍नगी ठाढ़ छै जंगल मंगल आस भरै छै। कहि‍ सुमंगल कुमंगल बनि‍ मंगल दंभ भरै छै भाय यौ, मंगल........। बेढब गीत गबै छै। जहि‍ना कार्बन कागज चढ़ि‍ कागज कार्बन कहबै छै। तहि‍ना कार्बन चढ़ि‍ जि‍नगी पक्ष अन्‍हार कहबै छै भाय यौ, अन्‍हार........। बेढब गीत गबै छै। दोहरी पक्ष जि‍नगी चलै छै अन्‍हार-इजोत कहबै छै। दुख सागर बीच सुखसागर अमवसि‍या पूर्णिमा कहबै छै भाय यौ, अमवसि‍या........। बेढब गीत गबै छै। ५ गाछक रंग बदलि‍ रहल छै मौसम संग सुधरि‍ रहल छै। थल-कमल जकाँ कहि‍यो गाढ़-लाल-उज्‍जर बनै छै। तहि‍ना फूल-फल कोढ़ी‍ जकाँ झरि-झरि‍ कोनो फलो बनै छै‍। गाछक रंग बदलि‍ रहल छै मौसम संग.......। आशा आश लगा-लगा जीत अपराजि‍त बनैत रहै छै। सुधरि‍ रूप बदलि‍ चालि‍ कारी काजर चमकि‍ उठै छै। गाछक रंग बदलि‍ रहल छै मौसम संग.......। लत्ती पानि‍ रूप बदलि‍ थल-कमल कहबैत चलै छै तहि‍ना लत्ती अपराजि‍त गाछ बनि‍ गछाड़ि‍ धड़ै छै। गाछक रंग बदलि‍ रहल छै मौसम संग.......। ६ झोंक जुआनी झोंकए लगै छै उष्‍मा पाबि‍ उमसए लगै छै। झोंक जुआनी.......। जाधरि‍ सि‍र सृजै शि‍शि‍र छै हार-मासु सि‍हरैत रहै छै। सुनि‍ते कोकि‍ल कुहुकि‍ वसंती भनभनाइत मन तनतनाए लगै छै। झोंक जुआनी.........। रंग-वि‍रंगक वन-उपवनमे रंग-रंगक फूल खि‍लए लगै छै पाबि‍ रस मधुमाछी सि‍रजए कोनो बि‍ख चुभकैत रहै छै। झोंक जुआनी.......। मुन्नी कामत, पि‍ता श्री दि‍लीप वर्मा, दादा स्‍व. रामनन्‍दन, भंडारी। गाम-पोस्‍ट- परसा, भाया नि‍र्मली, मधुबनी (बि‍हार) समाजक वि‍डम्‍बना देखि‍ कऽ ई समाजक वि‍डम्‍बना वि‍याहब आब हम धि‍या केना चारपर खढ़ नै पेटमे अन्न नै नै अछि‍ संगमे एक्को अाना मांग भेल ड्राइवरकेँ लाख मास्‍टर आ डाक्‍टरक नै पुछू बात दि‍नक उजयारि‍ भेल कारी भेल घनगर राति ई हमरेटा नै जन-जनक दुखरा अछि‍ बेटीबलाकेँ मलि‍छ बेटाबलाकेँ खि‍लल मुखरा अछि‍ नन्‍हि‍टा धि‍या हमर भेल आब सयानी ति‍लकक ऐ‍‍ युगमे बि‍आहब केना बि‍टि‍या रानी बहि‍ रहल यऽ अरमान सभ, जेना मुट्ठीमे पानी‍। बेटी जनम भेल तँ कहलक दाइ भेल धरती दू हाथ तर कोइ नै सोचलक हमहूँ जान छी कहलक दही नून तरे-तर। बाबू कपार पिटलनि‍ माए भेल बेहोश जँ हम जनि‍तौं तँ नै अबि‍तौं ऐ‍‍ लोक। आँखि‍ अखन खुलल नै कान अखन सुनलक नै आ बना देलक हमरा आन कहलक केना अट्ठारह बरख रखबि‍ही एकर मान। ने केकरो कि‍छु लेलौं हम ने केकरो कि‍छु देलौं हम जे माए हमरा जनम देलक ओकरो मुँह नै देखि‍ पबलौं हम अजीब दुनि‍याँ अछि‍ ई अछि‍ गजबक लोक। कि‍ए करैत अछि‍ एना कि‍ए भेजैत अछि‍ बेटीकेँ परलोक अबैत ऐ‍‍ धरतीपर इजोतसँ पहिने भेल अन्‍हार हमहूँ डुबि‍ गेलौं आ डुबि‍ गेल संसार। समाज बनल हत्‍यारा बाप बनल जल्‍लाद बसैसँ पहि‍ने उजारि‍ देलनि‍ बेटीक संसार। जिंदगीक मरीचिका लटैक रहल छल गुच्छा गाछमे रसभरल मीठ आमक शरारती मन ललचाइत जी कहलक तोड़ि खाइ अकरा मुदा कि करी भय छल पहरेदारेक। मन नै मानलक पाइन मुँॅहमे भरि गेल फेर सोचलूँ बस एगो तोरू तँ डर केहन यएह तँ निअम अछि संसारक। सभ खाइत अछि छुपि कऽ कखनो घरमे तँ कखनो बाहरमे ऊँच, नीच सँ बनै यऽ अतऽ सभ अपन यएह पथ पर तँ चलैत अछि सभक सभ। पर सच जे अनभिग अछि सभसँ ई अछि ई मीठ फल नै जहर अछि कोनो जे बदलि रहल अछि हमर नियत आ हमर संस्कार जे दऽ कऽ अपन मिठासक लालच झोंकि रहल अछि धधकैत भट्ठीमे। जिन्दगीक राहमे अएत नित्य कतेक मरीचिका पर सिखब हम अकरेसँ संघर्षक रोज नया सलीका । ताकैत जिनगी कूड़ा ढ़ेरमे देह सुखल पेट हाड़ी आँखि दुनू लाल छल। टुकुर, टुकूर ताकैत छल हमरा दिस ओ ओकरा मुखमे अनंत सवाल छल। पटनाक रेलवे लाइन पर ठार एगो मासूम बच्चा फटल पुरान लटकौने टांगने छल एगो बोरा अपन पीठ पर देखि कऽ ओकरा एना लागल जेना ताकि रहल अछि अपन जिन्दगी गन्दगीक ढेरमे। पर नै जानि कतेक मासूम कहिना पनपैत अछि अइ संसारमे। नित ताकैत अछि अपन मंजिल, अपन भविष्य अहिना कूड़ाक ढ़ेरमे। संकल्प छोड़ि जाएत माझी पतवार उफनैत जिन्दगीक राहमे अछि हसरत हुनकर कि, थामैय पतवार हुनके अंश अइ मजधारमे। छी जँ अहाँ कृति हुनकर तँ राही बनू अइ राहक उठाउ पतवार आ माझी बनू जिन्दगीक अपन राहक। ऐल छी अहाँ जतऽ तक ओइसँ आगूक कल्पना करू देख रहल अछि राह मंजिल अहाँक मुस्कुराइत ओइ पारमे। छोड़ि कऽ मोह वट वृक्षक सामना करू हवा आ पानिक तब बनत व्यक्तित्व अहाँक अहाँक नामसँ अइ संसारमे। अहाँ अगर अंश छी हुनकर तँ बुझाइ नै कहियो ई दीप जे छोड़ि गेल अपन सभ कुछ बस एगो अहींक विश्वासमे। ठमकल शब्द रूकि जाइत ई हवा ई नजारा ई बहार, दुनियाँक हम भऽ जाएब विलीन कतौ रूकि जाएत ई कलम आर हरा जाएत शब्द कतौ। नै उठत वेदना मनमे नै उमड़त भावना कोनो। जब जाएब खामोश अतऽ सँ तँ मेटा जाएत सभ हसरत दिलक ने आएब हम याद ककरो ने करब हम याद किनको ओइ अज्ञात सफरमे नै मिलत हमराही कोनो बरसैत मेघ, चिलमिलाइत धूप सबहक बीचमे रहब हम असगर ठार ने लऽ जएब, ने छोड़ि जाएब किछो बस एगो दिया जे जरत अइ ठाम सदखन, सबहक मनमे हएत ओ हमर कृति, हमर करमक ज्योत। दहेजक बिहाड़ि कहिया तक रहबै हम समान यौ भइया कहिया मिटतै ई अभिशाप यौ हमरो तँ परमतमे भेजलक मुदा अबैत ऐ संसारमे सभ हेय सँ देखलक कोइ कुलच्छनि तँ कोइ कलंकनी कहलक। भइयाकेँ दुलार केलक हमरा धुतकाइर कऽ माय भगौलक दिन-राइत हम मायक हाथ बटै छी बाबू-दायक सेवा करै छी तइयो किए ई फटकार सुनै छी सुनि रहल छी सबहक मुॅंहसँ दहेज बिनु नै हएत हमर व्याह जे थामत हाथ हमर बाबू भरत पहिले जेब ओकर। हम बेटी छी आ कि समान जे गाम-गाम सँ आउत लोग करै लऽ हमर दाम छाम। आब सजबऽ पड़त सभ बेटीकेँ अपन आत्मदाहक साज आर कहिया तक पिसाइत रहतै बेटीक समाज। हराएल हमर रूप जब एलौं तँ रूइ छेलौं कोमलताक सागरमे डूबल छेलौं प्यार सँ छुबै छल सभ हमरा हम सपनामे सूतल छेलौं। अंजान छेलौं दुनियाक हकीकत सँ ऐ शोर शराबा, ऐ धधकैत भट्ठीसँ छिन गेल ओ स्वरूप देलक दुनिया हमरा नया रूप। देख कऽ दुनियाक रंग कॉंइप रहल अछि हमर अंग छल, कपट, धोखाधरी सभ अछि सबहक संग। कतेक अरब रामक ऐमे पड़त करै लेल अतऽ सँ पापक अंत देख कऽ ई हम छी दंग आइ सबहक मनमे बसल अछि हजारो रावणक अंग। विदाइ जो गै बेटी, आब कि निहारि रहल छी नोराइल आँखिसँ ककरा ताकि रहल छी। अतै तक लिखल छेलै साथ अतै तक छेलियौ हम तोहर बाप। एक जनम तूँ अतऽ गमेलऽ हमरा संगे सभ सुख दुख हँसि कऽ बितेलऽ अहिना तूँ ओतौ रहिअ खुशीक दीप जराइयहँ केलियौ आइ हम तोरा पराइ मन रोबैत अछि ठोर हँसैत अछि कऽ रहल छी आइ तोहर विदाइ। सुनील कुमार झा, सोनवर्षा राज, सम्प्रति- दिल्ली। टनका स्वर्ण समान/ चमकि रहल-ए/ ई हिमखंड/ लागैत जेना यऽ/ लहकैत अंगोरा नाचैत मोन/ जंगल देखि-देखि/ स्वर्ग समान/ मोन करए अछि/ बनि जाउ मोरनी ऊँच पहाड़/ एहन लागए यऽ/ सीना तानने/ दुश्मन केर आगू/ सिपाही ठाढ़ छैक एतेक नीक/ नै देखलौं कतउ/ नील पहाड़/ एहन लागए यऽ/ उतरि गेल स्वर्ग पेटक लेल/ घूमि घूमि गाम मे/ की की करता/ अपना कानियो कऽ/ दोसरकेँ हँसैत रुइया जकाँ/ नभ शिखर तक/ छारल हिम/ लागैत धरा पर/ स्वर्ग उतरि गेल कारी पहाड़/ पानियो कारी छैक/ बियावानमे/ लागए छैक जेना/ भूतक रहै डेरा तपि रहल/ मरुभूमिक बालू/ एतेक जोर/ कनी देर ठमकू/ फेर बढ़ब आगू घुरि रहल/ घुमौआ बनि कए/ सर्पिल पथ/ लागए महादेवक/ अछि कंठक हार जीवन नीर/ पहाड़ सँ घिरल/ पुछैत प्रश्न/ शांत कोना रहब/ हम गतिशील छी जलक रानी/ सोचि रहल अछि/ मोने मोनमे/ जतेक उछलब/ ततेक तर जैब खसैत नीर/ पहाड़क कोखसँ/ पृथ्वीक गोद/ एहन यऽ लागैत/ छलनी कए देत अनंत लोक/ चक्क सँ चमकल/ जननी अछि/ जतए जनमल/ हम अओर अहाँ बताबैत यऽ/ ई दुनु टा पर्वत/ की अथाह नै/ किछु दुनिया मे यऽ/ ई जानि लिअ सभ ई हरियाली/ पुछैत यऽ सभसँ/ मोन मलीन/ कोन गलती भेल/ किए काटए अछि क्षीर समुन्द्र/ देखि कए एकरा/ पुलकित यऽ/ मयूर जकाँ नाचै/ हमर अहि मोन खोजैत बाट/ ई महींसक झुण्ड/ जंगल बीच/ किछु अकुलाएत/ किछु क्रीडा करैत ई म्याउ म्याउ/ आँखि चमकाए कऽ/ ताकैत बाट/ की कोन बाटे एता/ मुसक महराज ऊँच आ नीच/ उबड़ आ खाबड़/ आकाश तोर/ खड़ा छैक तानि कऽ/ अपन करेज ओ अथाह बन/ जइ बीच झरैत/ शीतल जल/ सभ कियो मिटाउ/ अपन क्षुधा कए बंजर भूमि/ तखनो खोजैत यऽ/ भेड़क झुण्ड/ की किछु भेटि जाए/ क्षुधा शांतिक लेल जेकर नोर/ नेता केँ मात दैए/ वैह थीक ई/ कनी सोचियौ ई की/ ई मगरमच्छ छी आएल बाढ़ि/ डूबि गेलनि खेत/ देखियौ हाल/ गामक बथानक/ एहने हर साल भुखाएल छी/ तखने यऽ भरैत/ बच्चाक पेट/ ई प्रेम यऽ मायक/ की भविष्यक स्वार्थ धुंध एहन/ तखनो मुस्काबैत/ पहाड़ी फूल/ खेलैत ओस संग/ मस्तीसँ झूमि कए चलू कऽ लिअ/ नावक सवारी यौ/ शहर बीच/ चांदनी राति बीच/ चमकौवा नावमे दैत सनेश/ ई जे आमक गाछ/ रहू झुकल/ जौं बेसी यऽ अहाँक/ नै तँ टूटि जाएब हाइकू झूमि झूमि कऽ/ चलल गजराज/ जंगल बीच जंगल बीच/ गम्हराएल अछि/ आमक बौर अहाँ खेबए/ भरत मोर पेट/ यैह सन्देश लहरैत यऽ/ ई हरियर खेत/ गामक बीच अति सुन्दर/ आ नयनाभिराम/ नौका विहार शांत समुन्द्र/ तखनो यऽ तकैत/ बटोही बाट संगम अछि/ ई आकाश पानिक/ जंगल बीच ललका माटि/ आ करिया पहाड़/ घरक पार घात लगौने/ चौकन्ना बैसल यऽ/ कारी बिलाड़ चीर देलक/ पहाड़क करेज/ ई अछिंजल अनुपम ई/ हरियर आ लाल/ प्रकृति लीला प्रकृति प्रेम/ खोजि रहल छैक/ बियाबानमे गरजैत ई/ क्षीरक कछारमे/ हहराबैत शांत समुन्द्र/ कपाड़ उठौने यऽ/ दुनू पर्वत मनुख लेल/ प्राकृतिक रचना/ स्वर्ग समान देखलौं नञि/ एहन भयानक/ पानिक रूप अथाह नै यऽ/ किछु ऐ दुनियामे/ ई जानि लिअ पंख फुलौने/ गुटुर गुटुर गूँ/ बैसल शांत हरियर नै/ पहिल बेर देखलौं/ करिया तोता कट्टमकट/ करैत गजराज/ जंगल बीच बियावान मे/ गजराजक क्रीडा/ अभूतपूर्व अथाह खोह/ पतनाला बनल/ हिमक तीर नील गगन/ आ नील सागरक/ अद्भुत मेल बहि रहल/ पहाड़क कोखसँ/ वसुधा नीर प्रकृति केर/ अद्भुत रचना ई/ वृक्ष मनुख बैसल सुग्गा/ खोझाँए रहल यऽ/ अपनेपर अथाह जल/ ई पानि आ पाथर/ प्रकृति माया अन्हार भेल/ चन्द्रमाक प्रतापे/ सौँसे धरती मस्त पड़ल/ प्रकृतिक गोदमे/ आदमखोर लागल दाग/ हमर पृथ्वी पर/ सूर्य प्रताप नुकाएल यऽ/ कुनू धूर्त चतुर/ जीव आ जंतु अद्भुत दृश्य/ नयनाभिराम ई/ अथाह क्षीर कतेक नीक/ नभ कए चुमैत/ ई हरियाली अनंत दिस/ देखाए रहल यऽ/ पृथ्वीक बच्चा जलक रानी/ मारैत हिलकोर/ छप्प-छप्प कऽ धरातलमे/ जीवन वसुधा यऽ/ शांत पड़ल सर्पिल पथ/ देखलौं नै कतउ/ एतेक नीक सड़क लेल/ चीर देलक अछि/ समुन्द्रक करेज चललौं बड़/ कनी टा रुकि जाउ/ फेर चलब बियावानमे/ पतनाला जकाँ यऽ/ कारी गंडक उडै़त धूल/ ललका पहाड़सँ/ कनी सोचियौ अद्भुत दृश्य/ कहलो नै जाइ यऽ/ एकर छटा हरित बन/ हरियरका गाछ/ हर्षित मोन आगिक गोला/ चमकि कऽ खसल/ अनंत बीच ई डगहर यऽ/ चमकैत यऽ जेना/ आगिक लुत्ती कोना जीवन/ काटब एहिठाम/ एते ठंढमे पसरल यऽ/ दूर दूर धरि ई/ उज्जर हिम उज्जर हिम/ नख सँ शिख तक/ छारल अछि नटुआ सभ/ करि रहल छैक/ मिलकऽ हल्ला देखियौ कला/ देहरी चौबटिया/ कलाकारक जगाऽ रहल/ गाम गाम घूमि कऽ/ लोक सभकेँ नाचि रहल/ ढोल कऽ धुन पर/ छोड़ा आ छौड़ी करैत हल्ला/ नुक्कड़ नाटक सँ/ गली मोहल्ला रिलीफ लेल/ टूटी पड़ल छैक/ कछार पर कोशीक डोड़ि/ भागि रहल छैक/ उचास पर तम्बू गाड़ने/ जीवनक निर्वाह/ करि रहल साँझक बेर/ सूर्य देवक आगाँ/ जोड़ैत हाथ लहराएब/ झंडा राम राज्यक/ देश विदेश विदेश सेहो/ करैत प्रचार यऽ/ रामायणक दुहि रहल/ पेट भरए लेल/ ऐ बकरी केँ करियौ कृपा/ करैत छी नमन/ हे छठी माइ सड़के कात/ बेचि रहल छैक/ हाथक कला दूर नै यऽ/ बस चारि कदम/ मंजिल लेल भेटल मान/ चहकि रहल यऽ/ दुशाला ओढ़ि कोना कऽ बची/ हलाहल पानिसँ/ सोचि रहल हरियरका/ हरके गाछ पर/ लटकल यऽ पातर गाछ/ लटकि रहल यऽ/ कतेक नीक मोहक दृश्य/ पहाड़केँ छापने/ नीलका मेघ खोजि रहल/ जमीनक हिसाब/ कते कटल मचान पर/ जमघट लगौने/ बहैत नोर नील मेघसँ/ उतरि कऽ बैसल/ नील गौरैया कोनाक खाउ/ सोचि रहल छैक/ नील गौरैया अम्बर तर/ हरियर वनमे/ बसल गाँव कलाकार केँ/ देखइ लेल नाटक/ जुटल भीड़ स्वर्गक सीढ़ी/ बनाए देलक यऽ/ विधना लेल सुस्ताबै लेल/ रेतक समुन्द्र मे/ बैस गेलाह थाकि गेला जे/ रेत मे दौड़ी कए/ बैस गेल यऽ अपन कला केँ/ प्राकृतिक रंग सँ/ भरि देलक जंगल बीच/ बयारक डर सँ/ उड़ै पक्षी साँझक बेर/ हकरैत आकाश/ जंगल बीच फेनिल पानि/ कल कल करैत/ देत डुबाए धरती पर/ उतरि रहल यऽ/ नभ प्रकृति जीवन केर/ जीबैक इच्छा/ मरितो काल हिमक वर्षा/ चारू कात/ सौँसे अन्हार निर्मल पानि/ शांत पड़ल छैक/ यऽ किछु बात ठूँठ गाछमे/ अकुलाइत चिड़ै/ प्यासल चोंच प्रकृति केर/ उकेर देलक यऽ/कलाक प्रेमी बंजर भूमि/ महकि रहल यऽ/ लाल फूलसँ फुलवारीसँ/ गगनमे खुशबू/ फैल रहल यऽ मोहक दृश्य/ प्राकृतिक रचना/ इन्द्रधनुषी गजल १ हुनका सँ कऽ बाजलौं तँ हल्ला मचि गेल हुनक मुँह दिस ताकलौं तँ हल्ला मचि गेल

रूपक चन्द्रमाकेँ कारी अमावस केने रहै चमकैत पूर्णिमा कऽ देलौं तँ हल्ला मचि गेल

ओ नैनक कटार सँ सभकेँ यऽ घाइल केने हम नजरिसँ जे ताकलौं तँ हल्ला मचि गेल

हुनक रूपक लाइट भक्क-भक्क जरैत यऽ सबहक डिबिया मिझेलौं तँ हल्ला मचि गेल

ओ आँखिक इशारा जे मारलक मुंडेर पर हम जे देबार फाँगि गेलौं तँ हल्ला मचि गेल

अहूँ लिखू गजल ओ कहैत रहै सदिखन करिया कलम जे उठेलौं तँ हल्ला मचि गेल २ चमरपट्टीमे गाय मरल तँ कोनो बात नै बभनपट्टीमे बेंग मरल तँ हल्ला मचि गेल

हमर झोपड़ी खसा कऽ ओ महल बना लेला फेर सँ दुछत्ती जे बनेल तँ हल्ला मचि गेल

ओ नोटक जोड़ पर बड़का नेता बनि गेल हमर ईमान नै बिकल तँ हल्ला मचि गेल

विदेशो मे रहि, नै बिसरल अपन माँटि केँ एतऽ गामोमे मैथिली बाजल तँ हल्ला मचि गेल

नै बिसरब अपन माँटिकेँ करियौ ई प्रण जे सुनलक हमर कहल तँ हल्ला मचि गेल जगदानन्द झा “मनु” हजल गदहराज धन्य छी दिअ सदबुद्धि हमरो अहाँ उपर लदने बोझ नै आँखि देखाबी ककरो अहाँ धियान मग्न रहि मधुर तान ढेंचू-ढेंचू करै छी मन्त्र जनैत छी शास्त्रीय गायन कए सगरो अहाँ मनुख पबैत सम्मान विशेष नाम अहीँक लऽ कऽ बिन आपति बर्दास्त करी नहि करी झगरो अहाँ स्वर्ग गेलौं लागले छान ई कथा जगजाहिर अछि करु पैरबी कनी हमर बियाहक जोगरो अहाँ गृहस्थक जुआ कान पर 'मनु' खटब आब कोना दिअ गदहपन जँ बुझलौं अपन हमरो अहाँ (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१९) रुबाइ १ ढोलक  धम-धमा-धम बजैत किएक छै घुघरू  खन-खना-खन खनकैत किएक छै दुनू भीतर सँ छैक एक्केसन  खाली दुनू अपन गप नहि बुजहैत किएक छै २ गोरी तोहर काजर तँ जान मारैए  छौंड़ा सभ सबतरि हाय  तान मारैए  पेलक की भाग ई काजर विधाता सँ  तोहर आँखिमे ई गजब  शान  मारैए गजल १ किछु एहन काज करब हमहूँ नै फोटो मे टाँगल रहब हमहूँ एलहुँ जन्म लए कए दुनियाँ मे एक नै एक दिन मरब हमहूँ कुकूर बिलाइ जकाँ पेट पोसैत आब जुनि ओहेन बनब हमहूँ आगू बढि नवका समाज बनाबी नै पाछू आब आगू चलब हमहूँ खाक छानि  'मनु' बहुत बौएलहुँ आब अपने घर रहब हमहूँ (सरल वार्णिक बहर, वर्ण -१३) २ गजल नहि लिखतौं तँ हम करितौं की गजल बिन जिनगी अपन  जिबितौं की शराब  मे  निसा  छैक   बुझलहुँ हमहूँ शराब  नहि पीबितौं तँ हम पीबितौं की सभ  कहलक नहि दिमाग हमरा मे एहि सँ बेसी लए कए हम करितौं की दुनियाँ मे  सभतरि भऽ जाए सोने सोना तँ कहू सोनाकेँ कियो कनिको पूछितौं की मन मारने मनु  बैसल छी  नहि   बुझू एते हल्ला मे बजितौं तँ अहाँ सुनितौं की (सरल वार्णिक बहर, वर्ण - १५) ३ बेदरदिया नहि दरदिया जानै हमर  टाका सँ जुल्मी प्रेमकेँ गानै हमर 

सदिखन जरैए मन विरह केँ आगि मे  तैयो पिया नहि किछु दरद जानै हमर 

साउन बितल घुरियो कऽ नहि एला पिया  नहि खीच हुनका  प्रेम लऽ कऽ आनै हमर    

बरखा खुबे बरिसय तँ  गरजय बदरबा  छतिया दगध भेलै हिया कानै हमर 

बसला पिया मनु दूर बड़ परदेश मे  झरकल हिया कनिको तँ  नहि मानै हमर 

(बहरे रजज, मात्राक्रम- २२१२) ४ घोर कलियुग घड़ी केहन आबि गेलै    एकटा कंस घर घर मे पाबि गेलै  

बनल अछि रक्षके भक्षक आब  सगरो    विवश जनताक हक सभटा  दाबि गेलै 

अन्न खा थाह पेटक किछु नै पएलक   मालकेँ सगर भूस्सा चुप  चाभि गेलै  

शहर नै गाम आ  घर-घर आब देखू  पूब देशक हबा मे सभ आबि गेलै 

आजु  फैशन कए नव पोसाक  मे डुबि एक गज मे अरज देहक पाबि गेलै  

(बहरे असम, मात्रा क्रम- २१२२-१२२२-२१२२) एक दिन हमहूँ मरब एक दिन हमहूँ मरब दुनियाँक सुख-दुख छोड़ि कऽ निश्चिन्त हेबा हेतु देखै हेतु दुनियाँमे अपन प्रतिबिम्ब कियो ख़ुशी होइए कियो दुखी होइए एक दिन हमहूँ मरब देखै लेल समाज मे हमर की स्थान छल देखै लेल किनका हृदएमे हमर की स्थान छल एक दिन हमहूँ मरब करए लेल अपन पापक हिसाब हमर पाप सँ कियो कुपित छल कियो क्रोधित छल कियो द्रवित-चिंतित छल कियो खुशी छल कियो दुखी-व्यथित छल एक दिन हमहूँ मरब परखै हेतु अपन हृदए अपन स्नेही-स्वजनक हृदए अपन मितक हृदए अपन अमितक हृदए कुन्दन कुमार कर्ण, नेपाल। आजाद गजल १ जइ प्रेममे दर्द नै तइ प्रेममे मजा की प्रेमसँ बढ़ि कऽ मजा नै मुदा धोखासँ बढ़ि कऽ सजा की जबरदस्तीक मुसकीसँ ओ मोन पतिऔलक जइ मुसकीमे चुसकी नै तइ मुसकीक मजा की खोटसँ भरल प्रेमकेँ जिनगी भरि पुजलौं जइ प्रेममे श्रद्धा नै तइ प्रेमक पूजा की दिलमे जेहो रानी छल सेहो केलक बैमानी जइ दिलमे रानी नै तइ दिलक राजा की तालमे रहल जिनगी जेना बेताल भऽ गेल जइमे सुरताल नै हुअए तेहन धुनक बाजा की २ नयन नै रहितए तँ काजरक चर्चा नै होइतै ठोर नै रहितै तँ मुस्कीक बर्षा नै होइतै

फुटि कऽ एना मजड़ि गेल अहाँक मादक यौवन यौवन जौँ नै रहितै तँ तनमे उर्जा नै होइतै

लज्जावती जकाँ लजाइ छी मुस्काइत घोघ तानि कऽ लाज नै रहितै तँ घोघसन पर्दा नै होइतै घाइल कऽ देलौं कतेक केँ बरु नयनक तीरसँ एक तीर हमरो जौं मारितौं तँ कोनो हर्जा नै होइतै

मोन होइए हमर अहाँकेँ अपन छातीमे सटा ली हमर र्इ बात जौं मानितौं से अहाँपर कर्जा नै होइतै

शब्दक सागर कम पड़ि गेल अहाँक बयानमे र्इ बयान नै करितौं तँ समए खर्चा नै होइतै

आर कतेक लिखू हम अहाँपर भावनामे बहि कऽ र्इ गजल नै लिखितौं तँ गजलकारक दर्जा नै होइतै ३ पागल बना देलौं हमरा जिअ नै देलौं मरऽ जौं चाहलौं जहर पिअ नै देलौं

बेदर्दी एहन बनलौं अहाँ जानि-जानि कऽ अपन प्रेमक सागर मे अहाँ डुबऽ नै देलौं

कचोटसँ भरल दिलक हाल आँखिसँ बहैत छल मुदा कानितो काल आँखिसँ नोर चुबऽ नै देलौं

के सुनत? ककरा सुनाएब? जौं अहीं नै सुनलौं चुप जौं रहऽ चाहलौं ठोर अहाँ सिअ नै देलौं

सपना देखा-देखा कऽ कल्पनामे डुबेलौं किछु मांगऽ जौं चाहलौं अहाँ लेबऽ नै देलौं

सारा जग भेल उदास हमर अन्तिम पल देखि कऽ मुदा मरितौ काल हाथ अपन छुबऽ नै देलौं अमित मिश्र, गाम- करियन, समस्तीपुर। नव अंशु (गजल-हजल, रुबाइ संकलन) प्रकाशित। हजल लागि जाए जखन बुद्धिमे दिवार यौ अहाँ ऐरावत जीसँ लिअ विचार यौ चढ़ि हास्यक महल पर चिकड़ता सोचबाक लेल छड़पता पहाड़ यौ बान्हि कऽ लंगौटा पाकल मोछ राँगि कऽ लड़ा दै छथि शेर गीदर बीमार यौ नाक सँ पानि खसैए हाथ काँपि जाए भोजमे आगू रूप बनल चुहार यौ मारि पैना टांग हाथ छोरा दै तर्कक तर्क सँ "अमित" भेलौँ लरपुआर यौ (वर्ण-१४) गजल १ गजल छी गीत छी छी अहाँ प्रीत छी

रंग सभ भरल तन मीठ छी तीत छी

आड़ि नै बनल छै सेभ दिशक जीत छी

शान छी जान छी छी अहाँ मीत छी (फाइलुन 212 – 212 बहरे मुतदारिक) २ आखर जखन रूपक लिखल उपमा सजल फूलक लिखल आदर्श छी रूपक बनल काजर नयन कातक लिखल सरगम अहाँक स्वर सजल मुस्की नगर तानक लिखल कहलौँ करेजक सभ कहल किछु बात हम राजक लिखल

चमकैत नभ मे छी चान तारा गजल हाटक लिखल

(मुस्तफइलुन-मफऊलातु 2212-2221 बहरे- मुन्सरह) ३ किछु बात एहन भेल छै घर घर तँ रावण भेल छै

बम फोड़ि छाउर देश छै जड़ि देह जाड़न भेल छै

प्रिय नै विरह जनमै बहुत सजि दर्द गायन भेल छै

जिनगी भऽ गेल महग कते झड़कैत सावन भेल छै

दस बात सूनब की "अमित" सभ ठाम गंजन भेल छै

(मुतफाइलुन 11212 दू बेर बहरे –कामिल)

४ आशक डोर टूटल हार भेले बुझू डरलौँ पूसमे बड जाड़ भेले बुझू

चलबै बाटपर रोड़ा तँ भेटत बहुत ठेससँ डरब बेरा पार भेले बुझू

गाछो घर बनै टापू जँ निर्जन रहल खेबै मांस नै फलहार भेले बुझू

कतिआएल लोकक पूछ नै आब छै जोहब बाट जतऽ उद्धार भेले बुझू

बेसी नीक नै छै सत्यवादी बनब बदलब नै तँ कारागार भेले बुझू

(मफऊलातु-मफऊलातु-मुस्तफइलुन 2221 2221-2212 बहरे कबीर) ५ गजल नै नै गीत लिखलौँ जँ लिखलौँ तँ प्रीत लिखलौँ

दरद सीमा पार केलक तँ मरहम घसि मीत लिखलौँ

उलट बातसँ नीक लागै गरम केँ हम शीत लिखलौँ

बयानसँ पलटब तँ इज्जत जँ नेता सन गीत लिखलौँ

बरसबै नै मेघ बनबै ढहल आंगन भीत लिखलौँ

बहू सासुक भेल झगड़ा मधुर संगे तीत लिखलौँ

बचब नै यौ प्रलय हेतै फँसल साँसक जीत लिखलौँ

"अमित" देखल अपन नैनसँ समाजक सभ रीत लिखलौँ

(मफाईलुन-फाइलातुन 1222-2122 बहरे-मजरिअ) चन्दन कुमार झा, मोनक बात (गजल, हजल,बाल गजल, रुबाइ आ कताक संकलन) प्रकाशित। रुबाइ नील नैन बिच साजल काजर करिया रूप लगैए अनमन धवल इजोरिया निश्चय अहाँ जनैत छी टोना-टापर भेल बताह छै तैँ गामक नवतुरिया. हजल गुरूजी बैसलाह खोलि खटाल चेलवा बनलनि गुरू घंटाल । घूर जरौलन्हि पोथी केर टाल दूध बेचि कऽ देखू भेला नेहाल इसकुल जाऽ कऽ भेलाह कंगाल माल पोसि कऽ भेलाह मालामाल पशुगणना कऽ फुटलनि भाल पशुपालन सँ रुपैयाक टाल घी-दूध पीबि भेलनि देह लाल आब अखाड़ा बिच ठोकथि ताल गुरुआनिक गजबे रंगताल ठोरक संग-संग रांगथि गाल गुरुजी बैसलाह खोलि खटाल ज्ञानक पूँजीओ गेलनि पताल -------वर्ण-१२----------- गजल १ मोनक बात मोनहि मे रखैत छी चुप्पी लाधि हम जिनगी कटैत छी चकमक जगत, लागल चौन्ह लोककेँ घर अन्हार चैनक निन सुतैत छी झूठक लेल आमिल लोक छै पिने हम सत्तो जनेबा ले कुथैत छै पिने बेचल खेत-डाबर-डीह गुजर ले तैयो केस कित्ता दस लड़ैत छी जुन्ना जड़ल ऐंठन एखनो बचल "चंदन" बोल तै ऐंठल बजैत छी २२२१ २२२१ २१२ २ रोटी महग, महगे नून भेलछै बोटी सुलभ सस्ता खून भेल छै सौँसे शहर सहसह लोक गज्जले गामक दलानो-घर सून भेल छै प्रगतिक पथ भ्रष्टाचार अड़ल छै नेता समाजक जनु घून भेल छै खेती करय जे से दीन भेल छै बइमान बेपारी दून भेल छै करनी अपन नहि देखैत लोक छै "चंदन" फुसिक खातिर खून भेल छै २२१२ २२२१ २१२ ३ आखर-आखर गानि-गानि की लिखबै हम मात्रा-बहरे फानि-फानि की लिखबै हम मायक भाषा पूज्य जानि की लिखबै हम अप्पन छाती तानि-तानि की लिखबै हम कविकोकिल केँ मान राखि की लिखबै हम मिथिला-मैथिल युद्ध ठानि की लिखबै हम फगुआ-चैती गाबि-गाबि की लिखबै हम रौदी-दाही कानि-कानि की लिखबै हम भासल सपना छानि-छानि की लिखबै हम "चंदन" भावहि सानि-सानि की लिखबै हम (222-2212-1222-2) रूबी झा, बेगूसराय, सम्प्रति गुजरात। गजल आबए अछि मजा रसिक पर कलम चलाबए सँ बनि गेल जे गजल हुनक चौअन्नी बिहुँसाबए सँ

प्रेम होए मे नहि लगैत छैक बरख दस बरख भऽ जाइ छैक प्रेम बस कनेक नजैर झुकाबए सँ

जँ प्रेम मे कपट होए टूटितो नहि लागै छैक देर जेना टूटि जाइ छैक काँच कनीके हाथ लगाबए सँ

जँ नहि बुझि पेलौं आँखिक कोनो इशारा कहियो अहाँ आइए की बुझब आँखि सँ हमर नोर बहाबए सँ

ताग टुटल जोरबा सँ पड़ि जाइ छैक गीरह जेना रूबी ओझरैब ओहिना बेर बेर प्रेम लगाबए सँ

(आखर -२०) अनुप्रिया योग, सुपौल, सम्प्रति- दिल्ली। किछु क्षणिका १ आकाश गंगाक गर्भमे किलकैत नवजात पृथ्वी २ भरल अछि सौन्दर्य आ जीवनसँ प्रकृतिक छवि ३ सूर्यक रथ बढ़ि रहल यऽ हिम शृंखलासँ ४ प्रकृति केर अद्भुत अनुभव रूप मन मुग्ध-मुग्ध ५ टुटल यऽ कोनो तारा या प्रकाश स्तम्भ प्रकृति केर सभ लीला ६ ई मेघ नै मनक उड़ान छी नीलाम्बरमे ७ जीवनक अद्भुत संघर्ष अकथ कथा ८ धर्म संस्कृति अभिनव महान भरत जयगान ९ मध्यम वर्गक घर कही या, नीन्दमे हँसैत बालक १० संस्कृति केर रक्षामे उतरल नव पीढ़ी ११ अपन संस्कृति केर स्वागतमे नव पीढ़ी १२ अमृत धार जीवन अद्भुत हँसैत जीवन १३ छठि पर्वमे सूर्य आराध्य अद्भुत अछि श्रद्धाक भाव १४ मुग्ध करैत प्रकृतिक रूप जीवन युक्त १५ ई मिलन अछि भिन्न संस्कृति भिन्न पहिरावा केर १६ हरियर कचोर जीवनक पल्लवित रंग रूप १७ उगि आएल मेघक गाछ श्यामापर १८ डूबि रहल उम्मीद पानिमे १९ डूबि रहल उम्मीद केर नाव पानिमे २० पहाड़क कोरा मेघक छाह हँसैत गाम २१ कोमल पाँखि अथाह नीलाभ २२ थाकल तन भीतर प्यास मनमे मुदा भरल आश २३ जमघट मेला रोजी-रोटी खूब जिन्दगी २४ स्वप्नसँ भरल मनक उड़ान अथाह गगनमे २५ एक दोसराक अंकमे लजा रहल यऽ श्याम आ हँसि रहल यऽ गगन २६ ठोप-ठोपमे जीवन बसैत अछि २७ नंग धरंग जीवन केर छवि कहू या जीवन केर आसमे नेनपन केर प्रश्न २८ सूर्यक आभामे मंजिल देखा गेल जीवन केर नव रूप २९ सूर्यक आभामे मुखरित जीवन सद्रे आलम गौहर, गाम-पुरसौलिया, भाया- जयनगर, जिला मधुबनी। मैथिली गजल लेल गजल-कमला-कोसी-बागमती-महानन्दा सम्मान २०११ प्राप्त। गजल १ जे घुसखोरी भागत बहुत नीक लागत

लगेने रहू एहिना अन्ना जी तागत

जे सभ आगू अउता करै छिअनि स्वागत

ईमनदार नेता के बूझू नियामत

सफलता जँ पायब तँ विश्वास जागत

समर्थन दियौ ऐमे नहि कानो लागत

भष्टाचार कऽ देत भारत केँ गारत

देशवासी बढ़बियौन अन्नाजीक तागत २ (अन्ना हजारेसँ अनसन तोड़बाक अनुरोध)

अनशन तोड़ि दियौ अन्ना जी जीत अहाँ कऽ भइए गेल

सत्ता कऽ गलियारा दहलल पक्ष विपक्ष नतमस्तक भेल

सत्य अहिंसा पर डटल छी डोला सकल नहि अहाँ केँ जेल

असफल अहाँ कए देलिऐक भ्रष्टाचारी सभक खेल

भारत कऽ बच्चा बच्चा सभ देखियो आई अहीँके भेल ३ (मैथिल सभकेँ ईद मुबारक) दिन आएल अछि ई उदगारक मैथिल सभकेँ ईद मुबारक

दान धरम कऽ ई त्योहार छोट बड़ सभकेँ भेटै प्यार हमर अहाँक प्यार मोहब्बत कुरान आ गीताक अछि सार

मानवताक इएह उद्धारक मैथिल सभकेँ ईद मुबारक

हिन्दू मुस्लिम बादमे छी हम सभसँ पहिने मैथिल छी हम

दुनू मिलि कए साबित कए देब नहि दुब्बर ककरो सँ छी हम

संघर्षक हएत क्षमता मारक मैथिल सभकेँ ईद मुबारक बिनोद मिश्र, डॉ. बिनोद मिश्र सम्प्रति आई  आई  टी रूड़की,  उत्तराखंडमे अंग्रेजी पढ़बैत छथि आ हिनक कविता संग्रह  Silent Steps and Other Poems प्रकाशित भेल छन्हि। एकर अतिरिक्त ई अंग्रेजीमे आलोचनाक क्षेत्रमे आठ टा पोथी संपादित  केने छथि। हिनक पोथी Communication Skills for Engineers and Scientists बहुतो  इंजीनियरिंग संस्थानमे पाठ्य पुस्तक रूपमे पढ़ाओल जाइत अछि। प्रेम पुष्प सैंतैत अछि  ओ नित- दिन अपन एयरबैग ओना काजमे अनैछ अपन सभ वस्तु तैयो  सरिअबैत अछि अपन एयरबैग जेना अभ्यास कऽ रहल हो घर गृहस्तीक प्रारम्भिक पाठ । ओकर एयरबैग पर्याय अछि संतुलन आ आर्थिक समायोजनक ओकर  एकमात्र सहचर  छात्रावासक  घुरती यात्रामे । ओकर एयरबैगक एक खलमे छैक  पोथी आ दोसरमे पाथेय एक टा छोट  खलमे छैक ओकर साज-सज्जाक सामग्री जे बढ़ा देत ओकर सौंदर्य ओकर लैपटॉप  छैक एक टा टैरो कार्ड जे घटा सकैछ ओकर दहेज---- की ई सभ ताकि सकैछ ओकरा लेल एक टा सुयोग्य वर? मूक अछि ओकर उच्च आ बहुमूल्य  शिक्षा विवाह केर बाजारमे ताकि रहल अछि बेसीसँ  बेसी द्रव्य दान आ दहेज। असहाय ओकर शिक्षित मोन पूछि रहल अपन अस्तित्वक अर्थ की प्रेम पुष्प भऽ सकत प्रस्फुटित ऐ क्रय-विक्रय केर बाजार मे? मौलाएल पुष्प हुकहुकी भरैत की निभा सकत वेदीक शपथ  ? रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार, “हमरा बिनु जगत सुन्ना छै” (गीत आ झारूक संग्रह) प्रकाशित। (मैथिलीक भिखारी ठाकुरक नामसँ प्रसिद्ध मैथिलीक पहिल जनकवि रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’क किछु झारु प्रस्तुत अछि।-सम्पादक) झारू- मानवता हमरासँ पहि‍ले कोनो नै शासन, नै छै कोनो धर्मक वि‍धान।। हमरा बि‍नु जगत सुन्ना छै, हतैबला छै पशु समान।। झारू- ज्ञान कऽ रहलौं वन्‍दना सभकेँ, हम अज्ञानी नीच नादान। कऽ कऽ क्षमा सभ भूल-चूककेँ, सभ मि‍लि‍ देबै अभयकेँ दान। झारू- कर्म बहुत कोइ देलकै ऐ दुनि‍याँकेँ, बाबा बनि‍-बनि‍ कऽ उपदेश। दऽ की सकै छी हम झारूदार, सूनि‍ लि‍अ कर्मक सन्‍देश।। झारू- रामायण ओइ घरकेँ तँ अयोध्‍ये मानू, जइ घर करए रामायण बास।। कर्म रँगल होइ रामायणसँ, दुख नै रहतै तेकरा पास।। ति‍याग- महा झारू जीवन कोन सर्वोत्तम होइ छै, बाबू सोचू करू वि‍चार। नाम अमर होइ धरा-धाममे, ति‍यागक सभ पकरू आधार।। पुलि‍स सुधारक महा झारू पुलि‍स शब्‍द स्‍पेनि‍श भाषा, भीतर एकरा छह उद्देश्‍य। अही लेल शासक अपनौलनि‍, ऐ धरतीक सभटा देश।। ओम प्रकाश झा, डेओढ़ (मधुबनी)। रुबाइ १ कखनो तँ हम अहाँ केँ मोन पड़िते हैब यादिक दीप बनि करेज मे जरिते हैब बनि सकलौं नै हम फूल अहाँक कहियो यै मुदा काँट बनि नस नस मे तँ गड़िते हैब २ कोना कऽ रंगलक करेज केँ ई रंगरेज रंग छूटै नै नैन पिआसल छोड़ि गेल मुदा आस मिलनक टूटै नै हमरा छोड़ि तड़पैत पिया अपने जा बसला मोरंग बूझथि विरहक नै मोल भाग्य ई ककरो एना फूटै नै गजल १ जन-गणक सेवक भेल देशक भार छै जनताक मारि टका बनल बुधियार छै

चुप छी तँ बूझथि ओ अहाँ कमजोर छी मुँह ताकला सँ कहाँ मिलल अधिकार छै

बिन दाम नै वर केर बाप हिलैत अछि घर मे गरीबक सदिखने अतिचार छै

हक नै गरीबक मारियौ सुनि लिअ अहाँ जरि रहल पेटक आगि बनि हथियार छै

झरकल सिनेहक बात "ओम"क की कहू सगरो पसरल जरल हँसी भरमार छै (बहरे-कामिल) मुतफाइलुन(ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ)- ३ बेर प्रत्येक पाँति मे २ कहू की, कियो बूझि नै सकल हमरा हँसी सभक लागल बहुत ठरल हमरा

कियो पूछलक नै हमर हाल एतय कपारे तँ भेंटल छलै जरल हमरा

करेजा सँ शोणित बहाबैत रहलौं विरह-नोर कखनो कहाँ खसल हमरा

तमाशा बनल छी, अपन फूँकि हम घर जरै मे मजा आबिते रहल हमरा

रहल "ओम" सदिखन सिनेहक पुजारी इ दुनिया तँ काफिर मुदा कहल हमरा बहरे-मुतकारिब फऊलुन (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ) - प्रत्येक पाँति मे चारि बेर ३ तकियौ कनी कानैए उघारल लोक गाड़ब कते दुख मे बड्ड गाड़ल लोक

धरले रहत सभ हथियार शस्त्रागार बनलै मिसाइल भूखे झमारल लोक

छै भरल चिनगीये टा करेजा जरल अहुँ केँ उखाड़त सभठाँ उखाड़ल लोक

लोकक बले राजभवन ई गेलौं बिसरि खाली करू आबैए खिहारल लोक

माँगी अहाँ "ओम"क वोट मुस्की मारि पटिया सकत नै एतय बिसारल लोक बहरे-सलीम दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व, दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मफऊलातु (पाँति मे एक बेर) ४ नैनक छुरी नै चलाबू यै सजनियाँ कोना कऽ जीयब बताबू यै सजनियाँ

नै चोरि केलौं किया डरबै हम-अहाँ सुनतै जमाना सुनाबू यै सजनियाँ

छी हम पियासल अहाँ प्रेमक धार छी आँजुर सँ हमरा पियाबू यै सजनियाँ

बेथा करेजक किया नै सुनलौं अहाँ हमरा सँ नेहा लगाबू यै सजनियाँ

छटपट करै प्राण तकियो एम्हर अहाँ "ओम"क करेजा जुड़ाबू यै सजनियाँ बहरे-सगीर मुस्तफइलुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ त्रिपुरारी कुमार शर्मा, समस्तीपुर। सम्प्रति- दिल्ली। आजाद गजल १ ओ गजल नीप रहल छथि हम तस्वीर लिखै छी अपने हाथ सँ अपन तकदीर लिखै छी फाटि गेल सम्बन्धक जुआन कोमल नस फेर महकैत नजरक तीर लिखै छी चिखैत अछि आहट कानैत अछि सन्नाटा जखन तड़पैत तन्हाइकेँ जंजीर लिखै छी ई हम नै कहै छी केओ अओर कहै छथिन कि जतबे लिखै छी बेनजीर लिखै छी हम दुनू गोटा मिल कऽ ई की करै छी अहाँ साँस लिखै छी हम शरीर लिखै छी २ कऽ रहल छी आइ विनती वेदना गवाह अछि कतेक प्रेम हमरा अहाँ सँ गोदना गवाह अछि आएल हाथ शंख सितुआ मोतीक ललायल छी आँखिक नीनमे डूबल कल्पना गवाह अछि साँप लोटै छै जेना तहिना धड़कि गेल छाती विश्वास करू हमर अहाँ कंगना गवाह अछि एक मिसिया मुस्किया कऽ की कऽ देलि हमरा नाम जपै छी अहाँक बिधना गवाह अछि भऽ गेल इजोरिया आब अन्हरिया दुर्गम राति चंद्रमा जागल राति भर सजना गवाह अछि आँखि मिला कऽ हमरा सँ राह पकड़ लेलि अहाँ कोना कटै अछि दिन आब रचना गवाह अछि राजीव रंजन मिश्र, सम्प्रति बंगाल। भक्ति-गजल १  हे श्याम सुन्दर राधावर गिरधारी यौ हे मुरली मनोहर गोबर्धन धारी यौ घोर बिप्पति पड़ल छै सगरो धरती  बिनबै छी प्रभु एक बेर अवतारी यौ 

आबू फेरो हे यशोदा नंदन छाल्ही चोर  हम देब माखन मिसरी भरि थारी यौ 

ब्रज भूमि सरिस देश सुन्न पड़ल छै  ज्ञान बिनु अकुलाएल छै नर नारी यौ 

हे कान्हा केशव रास रचैय्या प्रगटू नऽ  भीड़ पड़ल अछि सन्तन पर भारी यौ 

जनमल कंस दुर्योधन सगरो महि  नहि देखल अर्जुन भीम गदाधारी यौ 

बसन हीन भेल छैक अबला भारत  लाज बचाबू चीर बढ़ा कृष्ण मुरारी यौ 

सहस्त्र कालिया बैसल छै छत्र काढ़ने  गंगा जमुना कोसी गंडक भेल कारी यौ 

ने आब अहाँ बिनु आस कोनो नंदलाला कन्हैय्या नटवर नागर बनवारी यौ 

कल जोरि यैह टा बस विनबै "राजीव" ने तोहि बिसरि होइ हेहर मुरारी यौ  (सरल वार्णिक बहर वर्ण-१५) २ कन्हैया अहाँ प्रगटू नऽ फेर एक बेर यौ  नंदलाला अहाँ जन्मू नऽ महि पर फेर यौ देखू भीड़ पड़ल संतन पर चहुँ दिसि  निर्दयी भए किएक अहाँ केने छी देर यौ 

दुनिया दारी सभटा बिगड़ल उजरल  लागल छैक दुर्योधन आ कंसक ढेर यौ 

अर्जुन हारल आ भीमो तँ भागि पड़ाएल  युधिष्ठिर बिन छै सौंसे मचल अन्हेर यौ 

अबला नारी घर घर बिलखि रहल छै  चीर बढ़ाबू कृष्णा भारतक नारी केर यौ 

प्रलय पड़ल अछि बिनबैत बुझबैत  अहीं छी नंदलाला भक्त जनक सुसेर यौ 

"राजीव" करैत अछि विनती यदुनंदन  हे मनमोहन जगत मे करु उबेर यौ  (सरल वार्णिक बहर,वर्ण-१६) ३ प्रगटल कृष्ण कन्हैय्या सभ गाबै बधैय्या छथि  मंगल दीप जराबै जन्मल रास रचैय्या छथि नारद जी नाचथि आर संग मे ब्रम्हा जी नाचथि  तिर्पित सभ छै शंकर जी नाचै ता ता थैय्या छथि 

गोकुल मे सभ मिलि ढोल बजाबै मगन भए  नर नारि बिहुँसि कऽ सगरो गाबै सवैय्या छथि 

नन्दराय दुन्नू हाथे लुटाबै छथि हीरा आ मोती  स्नेह विभोर भऽ निहुँछथि यशोमति मैय्या छथि 

साधू संत सभ हरषि धाओल चहुँ दिसि सँए  कष्ट निवारणले आएल माखन खबैय्या छथि 

सगरो ब्रज गोकुल हरिआओल रातहिं राति  मोर मुकुट धारी तँ संसारक रखवैय्या छथि

चेतथि अपना केँ कंस आ दुर्योधन सभतरि आएल मनमोहन कालिया नाग नथैय्या छथि 

"राजीव" मगन भए मनबए कृष्ण जन्मोत्सव  दैत सभकेँ सगरो कृष्णाष्टमीक बधैय्या छथि  (सरल वार्णिक बहर,वर्ण-१८) दीप नारायण विद्यार्थी आजाद गजल अहाँ नै एलौं हम तही सँ तबाह छी जिबै छी जिनगी जही सँ तबाह छी आर किनकोसँ नै हमरा उलहन-परतर हम तँ एक गोट प्रिये अही सँ तबाह छी. दुश्मनी केर कोनो नै चिंता-फिकिर सत्य जे दोस्तीक बतकही सँ तबाह छी नेहक सिवा आर की दऽ सकैत छी हम हम तँ गरीब आर गरीबी सँ तबाह छी दू गोट "दीपक"कोना जराउ सनेह केर प्रिये हम तँ अपने ज्योतिसँ बूझी तबाह छी उमेश मण्डल, पिताक नाओं- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, एम.ए. (मैथि‍ली) बी. आर. अम्‍बेदकर बि‍हार वि‍श्ववि‍द्यालय, मुजफ्फरपुर। माता- श्रीमती रामसखी देवी, भाय- श्री सुरेश मण्‍डल, श्री मि‍थि‍लेश मण्‍डल। गाम- बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी, बिहार। संप्रति‍- वार्ड नं. ०६, ि‍नर्मली, जि‍ला-सुपौल। जन्म तिथि : ३१.१२.१९८० प्रकाशित पोथी- निश्तुकी (मैथिली कविता संग्रह), मिथिलाक संस्कार गीत, विध-बेबहार गीत आ गीतनाद (मिथिलाक सभ जाति-धर्मक लोकमे प्रयुक्त मैथिली लोकगीतक पहिल संकलन), विकीपीडियामे मैथिलीक स्थानीयकीकरणमे योगदान, मिथिलाक जीव-जन्तु/ वनस्पति आ जि‍नगीक डिजिटल सचित्र ऑनलाइन संस्करण, मिथिलाक सभ जाति-धर्मक लोकमे प्रयुक्त लोकगीतक रेकार्डेड ऑनलाइन ऑडियो और वीडियो डिजिटल संकलन। ई-पत्र संकेत- umeshberma@gmail.com भोगी नाच करए बानर चाउर खाए मदारी बीचमे तँए अछि‍ सरोकारी। वि‍कासक नाओंपर भऽ रहल अछि‍ नाच। मानसि‍कता, मानसि‍कता, मानसि‍कता पसरल अछि‍ चारूकात नीक बात! कि‍एक नै हुअए वि‍कास। बीक रहल अछि‍ चारूकात ब्‍लडप्रेशर-डायबि‍टीजक गोली संगे-संग तैयो मदारीये बनल छथि‍ ति‍यागी भरि‍ जीवन भोजन केलनि‍ बैसारी ऊपरसँ दवाइयोकेँ बढ़ौलनि‍ बेपारी। भोग करैत-करैत भेल छथि‍ अघोर तइपरसँ रटना लगेने छथि‍ ताबड़तोर स्‍वर्ग जाए चाहैत छथि‍ सोरपोर। हमरा बीचमे हुअए कोनो नै बाधा हम सभ दि‍न रहलौं जे मधुशाला! बनले तँ अछि‍ वि‍चारशाला जइमे लटकल अछि‍ बड़का ताला। श्रोता भागवत वाचन शुरू भेल श्रोता सभ आबि‍-आबि‍ जगह लेल। चारि‍ तरहक श्रोता बैसल छथि‍ अपन-अपन काज-धि‍यानमे लगल छथि‍ बाचको आ श्रोतो। एक तरहक श्रोता भागवत सुनि‍ नीकक प्रचार करै छथि‍ दोसरोकेँ नव गप्‍पसँ अवगत करबै छथि।‍ दोसर श्रोता अंगीकार करै छथि‍ मुदा बजै नै‍ छथि‍ बि‍ना पुछने। तेसर श्रोताकेँ देखियौ बैसल छथि‍ भागवत प्रवचनमे मुदा धि‍यान छन्‍हि‍ व्‍यापार मंडलमे घुरि‍आइत-नुरि‍आइत। स्‍पष्‍ट अछि कि‍छु नै पेला ई प्रसादेटा खेला ई। चारि‍म श्रोतापर करू वि‍चार ई छथि‍ मुदा सदाचार सुनि‍तो छथि‍ आ गबि‍तो छथि‍ अपन जि‍नगीक क्रि‍यासँ मि‍लबि‍तो छथि‍। ओतबे नै‍ डेन पकड़ि‍ पछुएलहाकेँ खीं‍चि‍तो छथि‍ आ, ठमकलहाकेँ धक्का सेहो लगबै छथि‍। उमेश पासवान, पि‍ताक नाओं स्‍व. खखन पासवान, माता श्रीमती अमि‍रका देवी। गाम आ पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार)। वर्णित रस (कविता संग्रह) प्रकाशित। गवहा संक्राति‍ बड़ अनचि‍त भेल गृहस्‍त सबहक संग ऐबेर खेतीमे लगाउ खर्चा मेहनति‍-मजदुरी सभ बाढ़ि‍क चपेटि‍मे चलि‍ गेल पावनि‍-ति‍हारमे सेहन्‍ता लगले रहि‍ गेल आजुक दि‍न गवहा संक्राति‍ अछि‍ अन्न-धनक घरमे कमी देखै छी केना कऽ अही बेर खेतक आड़ि‍पर जा कऽ कहब सेर-बरोबरि‍ उखैर सन बीट समाठ सन सि‍स जेम्‍हर देखै छी खाली खेत खसल अछि‍ चारू दि‍स प्रश्न कऽ रहल अछि‍ हमरासँ खेतक आड़ि‍ आ मेर खेतमे अगबे अछि‍ बालुक ढेर केना कऽ गुजर चलत उपजा कऽ कास-पटेर बड़ अनचि‍त भेल गृहस्‍त सबहक संग ऐबेर। संजय कुमार मंडल, पुत्र श्री रामदेव मण्‍डल गाम- गोधनपुर, पोस्‍ट सुखेत, थाना- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, (बि‍हार) मीता हमरा मोन पड़ैए मीता हमरा मोन पड़ैए जखन नेना रही माएक कोरामे नुकाइत रही पापा बाबाकेँ घोड़ा बना घोड़सवारी करैत रही। रूसैत रही, फुलैत रही टॉफी बि‍स्‍कुट नै भेटलापर भूइयाँमे ओंघराइत रही। जखन पहि‍ल बेर स्‍कूल गेलौं खूब उछल-कूद धूम मचेलौं टि‍फि‍नक वेलामे ति‍तली केर पाछाँ दौग पड़लौं जन्‍म दि‍वसक हर अवसरपर ढेर सारा उपहार हम पएलौं। ओहो दि‍न मोन पड़ैए जखन मैट्रीक परीक्षामे फेल केलापर भागि‍ पड़ा हम ि‍दल्‍ली गेलौं फैक्‍ट्रीमे मजदूर सबहक संग ओवरटाइम कऽ खूब कमेलौं। गाम एलापर बि‍याह केलौं साले भरि‍मे बाप बनि‍ गेलौं आब कनि‍याँ नोन तेल लइले सदि‍खन हमरा गाड़ि‍ पढ़ैए मीता हमरा मोन मड़ैए। बपटुग्‍गर रहबे करी, माए सेहो मरि‍ गेलि‍‍ जइ बेटा लेल खूब कमेलौं जमीन खरीद मकान बना देल सोचने रही बुढ़ापा केर सहारा बनत सेवा सुश्रुषा करत ओहो बाप-माएकेँ छोड़ि‍ दि‍ल्‍ली चलि‍ गेल। प्‍लास्‍टि‍क फैक्‍ट्रीमे खटैत-खटैत हमरा टी.बी. बेमारी भऽ गेल हम मजबूर भऽ नोकरी छोड़ि‍ देल पथो-पानि‍ले हमरा करजा करए पड़ैए छौड़ा दि‍ल्‍लीमे दारू मुर्गा कचरैए मीता हमरा मोन पड़ैए। तीन माससँ बि‍छौन धेने छी एक घोंट पानियोले दोसराक मुँह तकै छी रोटी-भात के पुछैए, आब दवाइयो नहि‍ये घोटाइए मीता हमरा मोन पड़ैए। तकलीफ खूब होइए-प्राणो नै नि‍कलैए दुर्भाषा केना कहि‍ये- सोचैत छी आखि‍र तँ बेटे छी। ओहो दि‍न यादि‍ अबैए हम पत्नीक इंतजारमे छी ओ हमर माएक पएर जतैए हमर बेटा-पुतोहु, साँझे बि‍लैया ठोकि‍ समदाउन गबैए मीता हमरा मोन पड़ैए। जीवन भरि‍ बाहरे बि‍तेलौं सर-समाजसँ दूर रहलौं आइ वएह समाज उठा-बैसा दइए हमर दुर्दशापर दुखी होइए। एक दि‍न प्राण छुटि‍ गेल सौंसे टोल जमा भऽ गेल अर्थीपर हमरा सुता देल गेल समाजक चारि‍ गोट कान्‍हा देल बरि‍याती सभ राम-नाम सत् बजैए बेटा कोहामे आगि‍ लए आगू चलैए भने बुढ़बा मरि‍ गेल सोचि‍ रहल अछि‍ झुठे-फुसे घड़याली नोर बहबैए नि‍पुत्रो समाजे बीच रहैए हँसी-खुशी सभ बाँटि‍ जीबैए दु:ख-सुखमे एक दोसराकेँ काज अबैए बेकार मनुख अपना-अपनीले बाप-बाप करैए मीता हमरा मोन पड़ैए। आब ई एहसास करै छी जीवन कर्तव्‍य केर पथ छी जि‍म्‍मेवारीक रथ छी नि‍रन्‍तरताक सड़क छी। जौं फेर मनुख जीवन पाएब समाजक उपकार जरूर चुकाएब सोजहेंमे हमर चि‍ता जरैए मीता हमरा मोन पड़ैए मीता हमरा मोन पड़ैए।। परदेसि‍या असगर मनुख जाधरि‍ युवा रहैए पढ़ैए-लि‍खैए, खेलैए-धुपैए पढ़ाइ समाप्‍त कऽ बि‍याह करैए परि‍वारि‍क जि‍म्‍मेवारीक हेतु दूर-देश जा नोकरी-चाकरी करैए भोरे उठि‍ टि‍फि‍न लऽ ड्यूटी जाइए अधि‍क रूपैयाक लोभे ओभर-टाइम खटैए बेचाराकेँ नवकी कनि‍याँक यादि‍ अबैए सभ रवि‍ कऽ सासुर फोन करैए कनि‍याँ आ सारि‍-सरहोजि‍सँ घंटा-घंटा भरि‍ गप्‍प करैए “‍कहि‍या गाम आएब?” कनि‍याँ पुछै छै माघक शी‍तलहरी कन्ना बि‍तेलौं, कहै छै अहाँ नि‍र्दय छी, हमर हाल नै जनै छी भरि‍-भरि‍ राति‍ हम करौट फेड़ैत जगै छी की कहतै कि‍छु नै फुड़ै छै ओ बेवस्‍थाक जंजालमे ओझराएल फि‍रै छै डेढ़े मास बाद होली पावनि‍ छै होलीमे नै आएब तँ कहि‍यौ ने आएब एक्के बेर हमरा मुइलाक बाद अाएब मरल मुँह देखि‍ एकटा लकड़ी चढ़ाएब कनि‍याँक बोली सुनि‍ तिलमि‍ला उठैए उनटि‍ अपन शहरी जीवन दि‍सि‍ तकैए कहि‍यो बर्गर, कहि‍यो छोला-भटोरा कहि‍यो बड़ा-पाउ खा राति‍ बि‍तबैए कौड़ी-कौड़ी, छि‍द्दी-छि‍द्दी जोड़ि‍ महि‍ने-महि‍ना हजार रूपैया बाबुकेँ पठबैए वि‍डम्‍बना देखू, मनुख सालक तीन सए तीस दि‍न जतए जी‍बैए, ओढ़ना-बि‍छान छोड़ि‍ कि‍छुओटा ने कि‍नैए सभ दि‍न बि‍ना सि‍रहौनेक सुतैए गाम एबाक लेल ठि‍केदारसँ एडभांस उठबैए आधा रूपैयासँ साड़ी-धोती, साबुन-शेम्‍पू, सेन्‍ट कि‍नैए आधा रूपैया बचा गाड़ी पकड़ि‍ गाम अबैए सुनि‍ते महाजन आबि‍ दरबज्‍जाक माटि‍ खुनैए पनरह दि‍न धरि‍ खूब मासु-माछ कचरैए अबै काल मासुलक लेल फेर महाजनक दरबज्‍जा ओगरैए जाइत देरी रूपैया पठा देब महाजनकेँ गछैए केकरा कहतै के पति‍येतै परदेसि‍या मनुख केना जीबैए बाप सदि‍खन कहै छै ई छौड़ा तँ फाउ खैलाइए। शीतलहरि‍ हम छी पछि‍या शीतलहरि‍ हम छी पछि‍या शीतलहरि‍ जन मानसपर हम ढाहब कहरि‍ कहि‍ रहल चि‍करि‍-चिकरि‍ हम छी पछि‍या शीतलहरि‍.... जौं कनि‍यो अछि‍ जानक फि‍कड़ि‍ हमरा सोझासँ हटि जाउ नै तँ हम बेध देब, सेद देब हाथ पाएर सुइसँ छेद देब हम नै बुझब छी अहाँ बूढ़, बच्‍चा आकि‍ सि‍यान जौं करब कनि‍याें जुआनि‍क अभि‍मान हम एक्के झोंकामे देब पटैक एक बेर रमकब तँ कऽ देब लुल्ह-नाङर जखन हएत पेरेलाइसि‍स एटैक जल्‍दी कोनो कोनमे रहू दुबैक अपन नाङरि‍केँ राखू सुटैक हम छी पछि‍या शीतलहरि.... हम अहि‍ना रमकब-उमकब जे आओत सोझा ओकरेपर बमकब हम छी पछि‍या शीतलहरि....। रूपेश कुमार झा ‘त्योंथ', पिता : श्री नवकांत झा, पितामह : स्व हरेकृष्ण झा, साहित्यिक नाम : रूपेश कुमार झा ‘त्योंथ' (मैथिली कविता) ओ नवकृष्ण ऐहिक (आलेख/व्यंग्य)। साहित्यिक प्रकाशन : मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे दर्जनो कविता ओ मैथिली दैनिक मिथिला समादमे ‘खुरचन भाइक कछ्मच्छी' स्तम्भ केर अंतर्गत, तीन सएसँ बेसी व्यंग्य लेखन-प्रकाशन, शिक्षा : स्नातक (कंप्यूटर अप्लिकेशन), कार्य : पूर्वमे विभिन्न दैनिक पत्रमे कार्य-अनुभव, मैथिली साप्ताहिक झलक मिथिला केर संपादन, वर्त्तमानमे कोलकाताक एक प्रतिष्ठित उच्च शैक्षणिक प्रकाशनक शोध ओ संपादन विभागमे कार्यरत। स्थायी पता: ग्राम+पत्रालय : त्योंथागढ़, भाया : खिरहर, जिला: मधुबनी (मिथिला॥ खाएब की नै फुराइए लए कतए नुकाउ संकटमे पड़ल निज जान औ जी। डाँड़ तोड़ि‍ आब प्राण मंगैए धय ठोंठ ठिठियाइए महगी।

आध पेट खा दिनराति ढेकरै छी भरि लोटा जल पी। सुखा गेल बिनु बतिये चार परक सजमनि लत्ती।

हार काँपए जाइत हाट हमर साधंश नै लेब  तरकारी। महगीक ई विकट धाह ढन-ढना देलक भोजनक थारी।

लोक करत की अछि कानि रहल मुदा सरकार नचैछ बजा पिपही। परिवार बनल हुअए जेना पहाड़ टेकब केना हम बनि टिटही।

चिंतित छी जे केना जुड़त पोथीक टाका सेनूर टिकुली। एहनामे की छोड़ा सकब सोनरासँ हुनक हार हँसुली।

महगी बना देलक अछि हमरा अयोग्य निरीह ओ अपराधी। भेल अवस्था एहन हमर अपनेसँ अपनाकेँ दुत्कारी।

घर अबिते ताकए हमरा दिस बैसल विवश बेटा बहु-धी। लागए जेना ओ पूछि रहल हो खाएब की खाएब की। हम छी आजुक नेता हम छी आजुक नेता, नै नीक हमर नेत फूसिक खाद प्रपंचक पानिसँ, हरियाइछ हमर खेत बेच रहल छी निज आदर्श, लगा जोर के लेत निःशब्द भेल लोक ताकि रहल, छी चला रहल हम बेंत शोणित पियासल शेर हम, लऽ फिरै छी मुँहमे घास नव-नव खुराफातिक तिकड़म, अछि हमरा लग बहुते रास निज स्वार्थक लेल सदा अनेरे, खसा सकै छी लाश चाही हमरा सत्ता मात्र, खाहे दशक भऽ जाए नाश करिखा सन कारी मोन हमर, पहिरै छी अंगा उजरा भाँति-भाँति केर सुविधा संग, चाही व्यंजन, दारू ओ मुजरा छी ठानि लेने नै मानब हम, मारब जन-जनकेँ हुकरा मुदा बोल बजै छी मिठगर, जेना जिलेबीक टुकड़ा चालि चलैमे माहिर हम, जँ खेल हुअए पोलिटिक्स कनखी-मटकी संग देखा कऽ करतब, जीत करै छी फिक्स भजै छी बल्ला आँखि मुनि, होइए नो बालपर सिक्स मजा अबइए जखन विरोधियो, हमरा संग होइए मिक्स दूध-माछ दुनू खएबामे, नै अछि हमरा हर्ज भाषण टा देब हम जनै छी, से थिक हमर मर्ज तूर-तेल धऽ कानमे, सूतब अछि हमर फर्ज गरियाबए कि‍यो वा गाबए फकड़ा, लगा कऽ कोनो तर्ज देखि‍ अहाँक भरल पेटी, अफरैछ हमर पेट कहू कतए कखन ककर, कटबाक अछि घेँट चाभी हमरा हाथमे, बन्न पड़ल विकासक गेट जखन चाही हमरा कीनी, लगा उचित रेट दान करू मत केर अहाँ सभ, थिक लोकक ई अधिकार सत्ता लेल सौदा करब हमर, भऽ गेल अछि व्यापार घपला केर मुंगरीसँ एहिना, फोड़ैत रहब देशक कप्पार आँखि चीर कऽ देखू फेरो, हमहीं पहिरब पुष्प-हार हमर शैतानी चालिसँ, डूबि जाओ लोकतंत्रक नैया हाहाकार आ क्रंदन सुनि, नाचब हम ता-ता-थैया भ्रम भेल हएत अहाँकेँ किन्तु, हम नै छी खेबैया कहब ने हमरा जखन अहाँ, करब दैब रौ-दैया नै कोनो हमरा फिकिर, हिलि जाओ देशक चौहद्दी आगि लगौ खसौ बज्जर, मुदा हिलए ने हमर गद्दी आब तँ बूझि गेल हएब अहाँ, छी हम कतेक अहद्दी हमर किरदानिक पोथा नै, छल तँ मात्र रद्दी कामोद झा कि‍यो नै

कि‍यो नै अछि कि‍यो नै अछि बन्द आ हड़ताल समाप्त केनिहार कि‍यो नै अछि भाय कि‍यो नै अछि ।

भ्रष्टाक नीक पत्ता लगा कऽ कि करब? कारवाही करएबला कि‍यो नै अछि कल्याणीक कल्याण करएबला कि‍यो नै अछि पैघ हाइड्रोपावर चलाबैक लोडसेडिङ्ग अन्त कएनिहार कि‍यो नै अछि मेलम्चीक पानीक सुविधा देनिहार सभासद तँ ६०१टा अछि, मुदा संविधान बनाबएबला कि‍यो नै अछि देश भाँड़मे जाए, सम्हारएबला कि‍यो नै अछि नेता तँ हजारक हजार अछि, मुदा देशक नेता कि‍यो नै अछि सहमति आ सहकार्य करएबला कि‍यो नै अछि कि‍यो नै अछि भाय कि‍यो नै अछि कपि‍लेश्वर राउत मातृभाषा माइक ओद्रमे जे भाषा सि‍खलक परदेश जा सभ बि‍‍सरलक। गाम आबि‍ काहे-कुहे बजैए लोक कहैत आब बड्ड बुझैए। पढ़ल-लि‍खल तँ आर बि‍‍गारलक बाल-बच्‍चाकेँ कनभेन्‍ट धरेलक। चालि‍-ढालि‍ अंग्रेजि‍या पकड़ि‍ मातृभाषाक खि‍ल्‍ली उड़ौलक। अप्‍पन भाषा बि‍सरि‍ बहरबैया भाषा अपनौलक। अहाँ मैथि‍लीकेँ केना आगू केलौं अपने तँ गेबे केलौं बच्‍चोकेँ भँसि‍एलौं। जेतबो इज्‍जत गौआँ दइए परदेशी ओकरा थकुचैए। गौआँ-घरूआ मैथि‍ली जि‍‍याबए परदेशि‍या बाहर भगाबए। कनि‍ये अंग्रेजि‍या जोर लगबि‍औ मैथि‍लीकेँ आगाँ देखबि‍औ। जनक आ सीताक भाषा अपनाउ कर्म छोड़ू नै अपनाकेँ बनाउ। वि‍द्यापति‍ आ यात्री कहि‍ गेला मण्‍डन आ अयाची कर्मवीर भेला। अप्‍पन भाषा सभ जन मि‍ठ्ठा एकरा नै बुझू हँसी ठठ्ठा। माइक ओद्रमे जे भाषा सि‍खलक परदेश जा सभ बि‍सरलक। जीबू कुमार झा, गाम- मेंहथ (मधुबनी)। सम्प्रति- दिल्ली। प्रार्थना गीत शक्ति स्वरूपा माँ अम्बे, हमर छी प्रणाम, घूरि अबियौ अहाँ आब, मिथिलाक गाम। कनडेरिये अहाँ जँ, ताकियो देबै, महमहाँ भऽ उठतै, मिथिलाक गाम॥ विन्ध्यवासिनी अहाँ कहेलौं मैया, दयाक सागर अहाँ बहेलौँ मैया। क्षणहि चण्डी रूप धारण केलौंहेँ माँ। संग महिषासुरकेँ पहुँचेलौं सुरधाम।.. काली लक्ष्मी अहाँ छी वीणावादिनी, संहार करिते कहेलौं महिषमर्दिनी। आर्त भऽ हम पुकारै छी, माँ अम्बे, आब “मिथिला”क करियौ अहीं कल्याण॥ पहिल भेंट पहिल भेंट छी प्रियतम मिलनक ई राति यौ धीरेसँ दबाएब अहाँ कोमल ई हाथ यौ पकड़ि ठेललक जखन, ऐ घरमे सखी साँस फूलि गेल हमर, देखि एक अजनबी चुपचाप बैसलौं हम एक कात यौ... चौकलौं देखि हम बढ़ल दुइ हाथ यौ धीरेसँ उठाएब पिया, कोमल कली यौ देह सिहरि उठल, थर-थर काँपए छाती यौ धीरे… मूड़ी गोंति बैसलौं हुनके बगलमे पुछलनि नाम हमर, लाज भेल मोनमे धीरेसँ बजलौं हम “फूलकुम्मरि” यौ धीरे... हमरा छोड़ि किए अहाँ पड़ेलौं यै अपने-जखने अहाँ भागि गेलौं यै जीवन रेखा पोति देलौं यै.. ओ सुन्दर सजल कोबर घर तै मे नव-नव कनियाँ वर पाछू-पाछू अंगुरी धेने छलौं तकरा बिचहि मोचरि देलौं यै... पहिल रातिक ओ मधुर मिलन ठोढ़ लाल ओ सजल नयन हाथ जखनहि अपन बढ़ेलौं हम अंगुरी किए तोड़ि देलौं यै.. अहाँ देखने हमर नै मोन मानै रूसि भागलौं तखन कोन ज्ञाने तखन होइत छल, जे की करी नै करी दर्दक सभ नोर पीबि गेलौं यै.. हमरा छोड़ि अहाँ... अनामिका राज जन्म तिथि ०७.०५.१९८६, शिक्षा एम.एस.सी. वनस्पति विज्ञान, गाम- विषनपुर (खगड़िया), पिता- दामोदर राम (प्रोफेसर भौतिकी विभाग), पति- अशोक राज (परीवीक्षण अधिकारी, पंजाब नेशनल्ल बैंक, खगड़िया)। विशेष: मैथिली नाटकमे अभिनय। नवका बाट आशा आ विश्वासक बीचमे फाँसल, गर्त होइत जिनगी भोगनिहार दुइये लोक होइछ बोनिहार आकि नारी! दुनू सामन्त कि पूँजीवादी द्वारा भोगबाक चीज बनि रहि जाइछ आ भोगनिहार एकर मर्दन करैत अपन पुरुषारथ देखेबाक माउग प्रयास करैए। आब उलटबासी काज करए लागल अछि। फूटए लगलैए बोल बोनिहारक आ कमा कऽ घर चलबै जोगरक भऽ गेल अछि नारी अगिला बाट एकरे हाथमे आबि कऽ अटकि गेल अछि। प्रो. चम्पा शर्मा प्रो. चम्पा शर्माक डोगरी कविताक हिन्दी अनुवाद: श्रीमती रजनी शर्मा आ मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह प्रो. चम्पा शर्मा, अवकाश प्राप्त संस्थापक अध्यक्ष, स्नातकोत्तर डोगरी विभाग, जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू। डॉ. शंभु कुमार सिंह, जन्म: १८ अप्रील १९६५ ई. सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत। डोगरी कविता स्नेह-भरल सनेस बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? रहबाक अहाँक नै कोनो ठेकान, आइ ‘सियासी’ काल्हि ‘पुलगामा’ आँखिएमे अहाँ काटी राति, जड़कल्ला आकि हुअए बरसात। पठाबी स्नेहक मनि-आडर, ‘पूँछ’ ‘रजौरी’ ‘डोडा’ ‘पाडर’ अहाँ लिखि भेजू, कतए पठाबी, अहाँक नाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? कनहा पर सभ दिन बोझ उठौने, ठाम-कुठाम अहाँ डेग बढौने। गरम सीरकमे हम सभ सूती, अहाँ छातीसँ बन्दूक लगौने। एक बरोबरि दिन आ राति, की साँझ आ की परात। कतए करै छी अहाँ विश्राम? कोन ठाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? ‘सियाचीन’मे कोना रहै छी, बर्फ-बिछौना कोना सहै छी? सहैत हएब अहाँ बहुत ठंढ नहाएब तँ बुझू हएत दंड। नीक-सन एकटा पैटर्न चुनि कए, स्नेहक एकटा स्वीटर बुनिकए छी रखने, बाजू कतए पठाबी अहाँक नाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? उत्तरलाई आ जैसलमेर भेल अहाँक ड्यूटी कैक बेर। चलैत बलुआही तुफान भेल हएब अहाँ केहन हरान? करैत अमावस-सन अन्हार, अपनो चेहरा भेल अनचिन्हार। स्नेह भरल हम चान चढ़ाबी अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? जहाज उड़ाएब भऽ जाए सरल, सदिखन सीमान पर आँखि गरल। दुश्मन बैसल अछि ताकमे, नै ओकर इरादा पाक अछि। छल-कपट करि ओ घेरए नै, अहाँक मति ओ फेरए नै। स्नेहक हम बरखा बरसाबी, अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? कोच्चि, गोवा, विशाखापट्टनम् अंडमान आ चेन्नइ दक्खिन। जल-सेना केर बेड़ा तारल, देशक दुश्मनकेँ अहाँ मारल। विश्व प्रशंसक अछि अहाँक, स्वयं वरूण छथि रक्षक अहाँक। ऐसँ बढ़ि कए हम कहि की सकै छी? अहाँक नाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? साहस ऊँच, जेना की ‘पीर’ कारगिल जाउ आकि कश्मीर। रक्षा अहाँक करताह महेश, गौरी-नन्दन श्रीगणेश। देश बचाएब, धरम निभाएब, ‘जोरावर’ सन यश अहाँ पाएब। आशीर्वचनक खाता फुजाबी अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? खाखी, चिट्टी, लीलहा वर्दी अछि सरिपहुँ हमरा हमदर्दी। माथ सँ लऽ कए पएर धरि, बुझू ईश्वर केर रूप अनेक। मिलत जखन वीरता केर तगमा, रचब एकटा सुन्नर-सन नगमा। तार मुबारक केर पठाएब अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? जखन सुनै छी अहाँक फोन, प्रमुदित भऽ उठैछ हमर मोन। चिन्तामुक्त भऽ हम सुतै छी, मुक्त गगनमे हम उड़ै छी। सभ कुछ लागए हमरा मीत। मोन करए लिखू कोनो गीत, अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? यौ विक्की, गुरदीप कि तारक, होमए अहाँकेँ जनम दिन मुबारक। समए भेटए तँ गौशाला जाएब, हरियर घास गायकेँ ओगारब। घूरि कए करब फोन जलंधर, दादी संग एखन जाइ छी मंदिर। अशेष स्नेह लेल धूप जराएब अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? भुल्ली भैंसक दूधक घी, सेहो छी हम संजोगने । कुलदेवता केर पूजासँ पहिने, खा ने केओ सकता जे हुअए। श्री-पुलाव अहाँकेँ भाबए, ‘जल्दी बनाउ’ आबि कही ‘माए’! सभ इच्छा हम पूर करब खाइत छी किरिया हम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? बहुतो दिनसँ एकादशीक हम व्रत छी रखने, करब उद्यापन आएब अहाँ घूरि घर जखने, काज तँ अओरो.... छैक घर पर दिल खोलि हम ककरा देखाउ? हम्मर प्राण! बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? पागल-सन भेल अछि अहाँक बहिन, कुशल पूछैत छथि ओ सभ दिन। ‘राहड़ा’* करैत छथि अहाँक नामक, चर्च करैत छथि अहाँक काजक। वीर हमर युद्ध जीतकेँ औताह, कबुला करथि जा कए बाहवे। देवी माँ केँ भेंट चढ़ौती अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? युद्ध जीत कए अहाँ जे आएब, करब यज्ञ आ भोज कराएब। ठाम-ठाम पर फूल बिछाएब, रंगोलीसँ घर-द्वार सजाएब। अमृतसर, बाहवे, सतवारी जाएब ओतए हम बेरा-बेरी। पीर-मजार पर रोट चढ़ाएब अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? देखि अहाँकेँ चान चढ़ए, केतनो किए नै काज बढ़ए। देखी अहाँक सूरत कोमल, सदिखन रहए मोन अति हुलसल, चहुँ-दिस आबि जाएत बहार, बसात गबै अछि मेघ-मल्हार। गीत प्रीत केर गबै अछि कोयल अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? *‘राहड़ा’ (जम्मू क्षेत्रमे मनाओल जाएवला भाय-बहिनक एकटा महत्वपूर्ण पर्व) मोहन प्रसाद आउ करी नव मिथिलाक निर्माण आउ करी नव मिथिलाक निर्माण करी संस्कारक दान बाँटी अनुभवक दान करी रोटीक दान आउ करी नव मिथिलाक निर्माण आउ करी नव मिथिलाक निर्माण करी संस्कारक दान बाँटी अनुभवक ज्ञान करी रोटीक दान कऽ रक्तक दान आउ करी नव मिथिलाक निर्माण बिलखि-बिलखि कानि रहल छै कमला कोसीक प्रवाह बहि रहल छै अन्हरियामे अन्हरा गेल अछि आउ करी संस्कारक दान आउ करी नव मिथिलाक निर्माण बिन बरखा थलाह भेलै अछि बिन जाड़क थरथरा रहल अछि बहै जखन कखनो पछबा हृदए ओकर कपकपा रहल अछि आउ बाँटि अनुभवक दान आउ करी नव मिथिलाक निर्माण पेट पाँजरमे सटि रहल छै फाटल धोती लटकि रहल छै माघमे छठि जकाँ हाफि रहल अछि दूटा रोटी लेल जद्दोजहद कऽ रहल अछि आउ करी रोटीक दान आउ करी नव मिथिलाक निर्माण तन उधिया रहल छै पवनक झकझोर पीरा सहि-सहि पीअर झाम झिंझोर आब खसत तब खसत भीजल माटिक जड़ि एकटा दूटा के कही भरल बीमारीक घर खून बनल छै मदिराक पानिसँ आउ दियौ जीवनदान अपन रक्तक दान मान बढ़ाउ करि कऽ सभ संभव महादान आउ करी नव भारत निर्माण कोनो जाति नै कोनो पाति नै आत्मा तँ अजर अछि अमर अछि सभ जीवन एक्के छी सभक सम्मान करू आउ नव मिथिलाक निर्माण करू नगीना कुमारी झा ‎साहसक डोरी बहुत भऽ गेल सभक अत्याचार नै सहि सकब आब आइ अपराध कतेक सहि कऽ नोर झाड़ि हम बैसू आँखिक गहना कतेक हम सुखाउ

सभक बात रहलै एहने सभ दिन कहियो नै ने भेल गेल परिवर्तन जीवनक धारक बाट भेल दू तीर काँटो सँ बेसी बिझल बोलीक तीर

नै चाहितो भरियाक भेल छी भार नै सोची तँ फसल छी बिच जीवनक जाल ऋण पहाड़ बनि रहल कर्तव्यक उपहास उठि रहल लिखल भवितव्यक

डरक मारल भऽ नै जीबि सकब सिमरक रुइ जकाँ नै उड़ि सकब बहुत सभाक उपहास सहलौं आब नै बहुत सँ मोनक चोट खेलौं आब नै

रीतिक बन्धन सीमा देखु नंघाओल मोनक बोझक भारी तैयो रहि गेल देखियौ साहसक डोरी तँ आब टुटि गेल सभक कर्जा सेहो उधारे अपने रहि गेल मोन पड़ैए मोन पड़ैए ओ गोरहा आ ओ चेरा सभ जरि रहल खूब, धाह दऽ रहल ओ चिन्बारक चुलहाक धधकैत आगि मोन पड़ैए विवश एक नारी ढहल गोरहा सन रहथि ओ बेचारी फाड़ल चेरा सन जीवनक हुनक साड़ी सन्दुकक पौआ संग बन्हल ओ अबोध शाइद ओकर चिचियाहटिमे छल प्रतिशोध शाइद ओ छल दूर मायक दसधार दूध मोन पड़ैए ओ चकला आ बेलना गोलमटोल सूप भरि कऽ गेटल सोहारी अपना लेल ओ ठोकती मरुआक रोटी मोन पड़ैए फेर ओ सन्दुकक पौआ तरसैए ओ जीवन अन्तिम क्षण, जेना शाइद ओ सोचए अइमे हमर दोष कोना? दहेज प्रथा नओ महिना दुख झेल माय गर्भवती भेली आश करैत पुत्र केर जन्मा लेल बेटी सपना टुटल देखि बाबु माथ पर हाथ धेला कर्म जरल सोचि अपन भाग्यकेँ सरापता धीयाक जन्म घरमे बढ़ए लगल चिन्ता बढ़ैत बेटीक उमेर धेलकन्हि बिआहक चिन्ता धीयाक स्वरुप अछि कम नै अप्सरा लेकिन मारैए बेटी बलाकेँ दहेज प्रथा केकर दोष देब आह कहू मैथिल समाज पढ़ि लिखि धीया बनल अछि सर्वगुणी काका घुमता गाम गाम ताकबाक लेल जमाय बाबू झमारि खसता सुनि बड़द सँ वरक महगी वाह मिथिलाबासी अहाँकेँ कोना करी बखान उपहार स्वरुप अहाँ देलौं दहेज प्रथाक नाम शाबाश अहाँकेँ, बनबैत छी बेटी बलाकेँ बदनाम वाह कि गौरव बेटाक मोलमोलाइ करी तँ लाज शर्म मर्यादा मानवाताकेँ भूली की करै छी मानव भऽ मानवक तनिको दुखक आभाष नै करै छी स्वार्थमे डुबी अबला बना नारीकेँ शूलीपर चढ़ाबै छी हर समय दृश्यमे नारीकेँ किए कुदृष्टिसँ देखै छी निर्मल सीतापर किए शंका करै छी दुःशासन दुर्योधनसँ द्रोपदीकेँ किए नै बचबै छी शंका आ बदनामी हुनकर बड़का अपमान सभ दर्द सहथिन मुदा नै कलंकित अफवाह सुनु ध्यानसँ अहूँ सभ छी एकटा बेटीबला अए, केहन प्रथा बोझ बनेलक बेटीक समान धिया बेटा बला सँ अनुरोध दहेजक करी विरोध नै लेब नै देब कहि कऽ आबो करी अस्वीकार लालबाबू मण्डल, सिरहा जुलुश जनताकेँ खाइला नै नून रोटी नेता पीबए ह्विस्की-जूस बुढ़ोमे नेता जुआन बनैए जनताकेँ खा कऽ खुश तइपर निकालै जनता जुलुश जनता नुकैल डरे जेना नुकैल बिलमे मुस। अपने नेता फर्देबाल घुमैए जापान, इण्डिया, रूस तइपर निकालै जनता जुलुश … नेताकेँ कोठा सोफा जनताकेँ टुटली मड़ैआ फुस जनता सुतैए भुइयाँपर काटि रहल अछि मच्छड़ भुस तइपर निकालै जनता जुलुश चिजबिज रहलासँ होइए ठंढियोमे गरमी महसूस कपड़ा नै भेलासँ जनता मरैए माघ पूस तइपर निकालै जनता जुलुश संदीप कुमार साफी, जन्म ७ जून १९८४ पिता श्री सीताराम साफी, माता- श्रीमती सीता देवी, गाम- मेंहथ, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी। शिक्षा- बी.ए. (प्रतिष्ठा), मैथिली। भकजोगनी भुकुर-भुकुर बत्ती बड़ै राइतक अन्हरियामे हाथ-हाथ नै सुझैए जेबाक अछि टोलपर कुक्कुर भुकैए झाउ-झाउ-झाउ साँझक बजैए छअ हाथमे नै अछि लाठी-ठेंगा नरहिया करैए सोर मैझला बाबा गबैए निर्गुण तमाकुलपर मारै चोट बौआ कनैए भगजोगनी लए बड़ैए चहूँ ओर पकड़ रोउ, भुल्ला, होकवा ठहा- ठहइ अन्हरियामे लुत्ती नेने माथपर नारक आँटी थरथराइ छी हम पछुआरमे वसन्त पंचमी सरस्वती पूजा सभ साल जेना हरेक सालमे आबैए विद्यार्थी सभ हर्ष उमंगसँ माता लग शीस झुकाबैए माघ मासक शुक्ल पक्षमे ई सुन्दर पबैन आबैए हरियर-हरियर तीसी-मौसरी सरिसौकऽ फूल फुलाइए जोर-जोरसँ पछबा हबा धऽ कऽ गर्दा उड़ाबैए देखियौ आम आ देखियौ महुवा सभ मिल सुगन्ध सुंगहाबैए गाछमे हरियर नवका पत्ता रौदामे चमक देखाबैए नहू-नहू बहए पुरबा हाबा होलीक गीत सुनाबैए धिया-पुता सभ बैठ आइर पर गहुम गोइढलाक ओरहा पकाबैए बसन्त पंचमी सभ लोककेँ अपनामे मिलाबैए। विदेह मैथिली पद्य || 639 638 || विदेह मैथिली पद्य

AN s ] YS | Le <a Zan

Ly ee lm 9

. । |

m ‘> La i Ape Magy * eg tt? i १ ही XM. Vike \

Y-% | Ved ez nae: me = FS, = Bx so Se

कम | EFy .- if —_ iy gZ T if

हि

कप . fe

9 डा

“कब

| “i

ही | भर : . ~*~ 4 *

“4 a हल 9 We

: . oe a Be ae 7™ ve Hany कर ३ हा. ae eee y i ss 0000 \ \

| 7; wo गाए! ‘ 4 = * Cy : ve | दि मु बन पर बडा... 2 : es me ie - गला कि... न eA ७. \ SRST S ~ FRE oft ss. Ts i, “ge ih ‘@ ay a) Why

é ‘/- y

i" ; Wall 2/7

2 a a ib, ~ न L os » “79 on ie ae दि / रे “5 ८2 - f eS, q — x कं r oy ee i

i —~ : हे... और . . |

| & ANANTH

~ et वा: |, .'

विंदेह मैथिली CET विदेह-सदेह ७, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक ४१-१००) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ पदक एकटा समानान्तर संकलन 9520,°%0 हि. Shes) Cay ¢ wig tale een OH TO) he: Pa OS OD Z SSS a a7 Wy A 2:55 2 %« ? srl) “Ne SNE (KR \ Gy), | NS श्र It ip OE, Wows aaa PA, i YN ? Lr (os, o- A SST SS AY CE | iN —— — Vast Zo re Va / ls 2a \ ar . ~29 ey VLOxewrrn ( अर, le 2:0 © omy आउट जा “UU Wy 7 थी हि / Saree | ७ 4 pes 2 (० प्र (रे ee ae ee Neo ai", डे Sees Fd Ms NN DEP ah 6 Sees के RRS G हि, iy! (है SI | \ WS Se ek sess Oey E®& 4 \% ue ii is पा @ Bigs fe FI Veg. “SS SARE Se DB \ A py ° 2 we Ors कक. \ CH 4 dy), ON ue HX WY, G, iS] an < जे कै 4 (2 lop “ >> Se (Se ew. ~~ #« Pe aa -_ विंदेह-प्रथम मैथिली पाशिक ई-पत्रिका —— pe ISSN 2229-547X VIDEHA —* सम्पादक: गजेन्द्र TH सह-सम्पादकः उमेश मण्डल। । सहायक Tes: शिव कुमार झा aT FAH (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पउ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा... तप सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक-नाटक-रंगमंच-चलचित्र: TIT ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद: पूनम मंडल आ प्रियंका झा। मय उपकरण कर सम्पादक-अनुवाद विभाग: विनीत उत्पल। हि मना Se) थक Ser’

au F. ach. कवर आ बैक चित्र श्वेता झा चौधरी श्रुति प्रकाशन — कार्यालय: 6/29, J] राजेन्द्र नगर, दिल्‍्ली-११०००८ FEAT: (099) २४८८६६४६-४७ BHA: (०११) २४८५८६६४८ website: http://www.shruti-publication.com E-mail: shruti.publication@shruti-publication.com eee a 350/- US $25