SADEHA — 8

Publication: SADEHA · Issue: 8
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1 2 ISSN 2229-547X विदेह मैथिली नाट्य उत्सव (विदेह-सदेह ८, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक ५१-१००) सँ, मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक गतिविधिक संकलन) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मण्डल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक: नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद: पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग: विनीत उत्पल। श्रुति‍ प्रकाशन ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। ISBN : 978-93-80538-66-2 ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. २००/- संस्‍करण : २०१२ © श्रुति‍ प्रकाशन श्रुति‍प्रकाशन रजि‍स्‍टर्ड आॅफि‍स : ८/२१, भूतल, न्‍यू राजेन्‍द्र नगर, नई दि‍ल्‍ली- ११०००८. दूरभाष- (०११) २५८८९६५६-५८ फैक्‍स- (०११) २५८८९६५७ Website : http://www.shruti-publication.com e-mail : shruti.publication@shruti-publication.com Printed at : Ajay Arts, Delhi-110002 Typeset by : Umesh Mandal. Distributor : Pallavi Distributors, Ward no-6, Nirmali (Supaul). मो.- ९५७२४५०४०५, ९९३१६५४७४२ Videha Maithili Drama Festival : Maithili Parallel Theatre Archive. अनुक्रम गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली नाटक आ ओकर समीक्षाशास्त्र/ जातिवादी रंगमंचक प्रतिनिधि नाटक- छुतहर- छुतहर घैल- छुतहा घैल/ चारिटा अंग्रेजी नाटक- डॉक्टर फॉस्टस, सैमसन एगोनिस्टेस, मर्डर इन द कैथेड्रल आ स्ट्राइफ हम पुछैत छी- बेचन ठाकुरसँ मुन्नाजीक गपशप/ बेचन ठाकुर द्वारा मैथिली नाटकक निर्देशन/ मंचन विदेह सम्मान २०११-१२ ज्योति सुनीत चौधरी- केसर मुन्नी कामत-   अंधविश्वास धीरेन्द्र कुमार- उदय नारायण सिंह “नचिकेता” क नाटक नो एंट्री : मा प्रवि‍श/ जड़ैत मोमबत्ती शिव कुमार झा- भफाइत चाहक जिनगी/ मि‍थि‍लाक बेटी/ मैथि‍ली नाटकक वि‍कासमे आनंद जीक योगदान/ गजेन्द्र ठाकुरक नाटक संकर्षण/ विभारानीक नाटक बलचन्दा रवि भूषण पाठक- विभारानीक नाटक भाग रौ शम्भू कुमार सिंह- मैथिली सामाजिक नाटकक मूल केन्द्र बिन्दु- नारी समस्या/ आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित निर्धनताक समस्या दुर्गानन्‍द मण्डल- नाटक बेटीक अपमानपर एक नजरि‍ आशीष अनचिन्हार- बेचन ठाकुरक नाटक छीनरदेवी/ बेटीक अपमान सुजीत कुमार झा- मिथिला नाट्यकला परिषद (मिनाप) मिथिलेश कुमार झा- मैथिली नाटक प्रस्तुति (मधुबनी जिलाक पजुआरिडीह टोल)-ऐतिहासिक संकलन हम पुछैत छी- मुन्नाजीसँ रमेश रंजनक अन्तर्वार्ता सरोज खिलाड़ी- बोतल राम/ सोच/ ललका कपड़ा किशन कारीगर- आब मानि जाउ ने (हास्य रेडियो नाटक) मैथिली रंगमंचक गतिविधिक संकलन उमेश मण्डल- मैथिलीमे ई-पत्रकारिता/ विदेह गोष्ठी मिथिला नाट्यकला परिषद (मिनाप), जनकपुरक बौवाबुच्चीक लेल क्रियाप्रधान नाटक "बुधियार छौड़ा आ राछस" (रिपोर्ट रोशन झा) जानकी नवमीपर जनकपुरमे बम विस्फोट द्वारा संस्कृतिकर्मी सभक हत्या- (रिपोर्ट पूनम मण्डल) मैथिली नाटक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न (रिपोर्ट सुजीत कुमार झा) लोकोत्सव १०-१५ जून २०१२ (रिपोर्ट गजेन्द्र ठाकुर) गोविन्द झाक मैथिली नाटक "अन्तिम प्रणाम" आब संस्कृतमे जीवन झाक सुन्दर संयोग, सामवती पुनर्जन्म आदिक मंचन मैथिली नाटककारकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कारक सूची मैथिला भाषाक सड़क नाटक प्रदर्शन- रिपोर्ट सुजीत कुमार झा उपप्रधानमन्त्री मिनापमे (रिपोर्ट सुजीत कुमार झा) मिथियात्रिक-झंकार (रिपोर्ट दिनेश मिश्र) विदेह मैथिली नाट्य उत्सव (रिपोर्ट उमेश मण्डल) युवा नाट्यकला परिषद परवाहा देउरी द्वारा बिक्रमी शम्वत २०६९क पूर्व सन्ध्यामे अन्तरराष्ट्रिय मैथिली नाटक महोत्सव आयोजित (रिपोर्ट श्यामसुन्दर शशि) नचिकेताक "एक छल राजा"क मंचन (रिपोर्ट श्री जितेन्द्र कुमार झा "जीतू") मैथिली फिल्मक लिस्ट आशुतोष अभिज्ञकेँ शैलबाला पुरस्कार आ रीतू कर्णकेँ कामेश्वरी देवी पुरस्कार (रिपोर्ट श्री सत्यनारायण झा) बेरमामे ''अप्पन कर्मक फल'' नाटक मंचि‍त भेल नाटककार आनन्द कुमार झा केँ साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार २०११ (रिपोर्ट गजेन्द्र ठाकुर) "भोरक भुथलायल"-लेखक जवाहर लाल कश्यपक मंचन मैथिलोत्सव २०११ (मुन्नाजीक रिपोर्ट) नाटककार जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ हुनकर मैथिली लघुकथा संग्रह "गामक जिनगी" लेल टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ (रिपोर्ट पूनम मण्डल) “‍बाप भेल पि‍त्ती” ओ “‍अधि‍कार” नाटक'क सफल मंचन (रिपोर्ट मनोज कुमार मण्‍डल) झिझिया प्रस्तुति (रिपोर्ट बृषेश चन्द्र लाल)

गजेन्द्र ठाकुर नाट्य साहित्य, समानान्तर मैथिली नाटक आ रंगमंच; आ नाट्य साहित्यक समीक्षाशास्त्र मैथिली नाटकक एकटा समानान्तर दुनियाँ रामखेलावन मण्‍डल गाम- कटघटरा, प्रखण्‍ड– शि‍वाजीनगर, जिला- समस्तीपुर, हिनके संग बिन्देश्वर मण्‍डल सेहो छलाह। उठैत मैथिली कोरस आ माँ गै माँ तूँ हमरा बंदूक मंगा दे कि‍ हम तँ माँ सि‍पाही हेबै- एखनो लोककेँ माेन छन्‍हि‍। एे मंडली द्वारा रेशमा-चूहड़, शीत-वसन्‍त, अल्हाऊदल, नटुआ दयाल ई सभ पद्य नाटि‍का प्रस्‍तुत कएल जाइत छल। पूर्णियासँ पि‍आ देसाँतर (मैथि‍ली बि‍देसि‍या)क टीम सुपौल-सहरसा-समस्तीपुर आदि ठाम अबैत छल। हसन हुसन नाटि‍का होइत छल। रामरक्षा चौधरी नाट्यकला परि‍षद, ग्राम- गायघाट, पंचायत करि‍यन, पो. वैद्यनाथपुर, जि‍ला- समस्‍तीपुर वि‍द्यापति‍ नाटक गोरखपुर धरि‍ खेलाएल छल। ऐ मंडली द्वारा प्रस्‍तुत अन्‍य नाटक अछि- लौंगि‍या मेरचाइ, वि‍द्यापति‍, चीनीक लड्डू आ बसात। अंकिया नाटमे प्रदर्शन तत्वक प्रधानता छल। कीर्तनियाँ एक तरहेँ संगीतक छल आ एतौ अभिनय तत्वक प्रधानता छल। अंकीया नाटकक प्रारम्भ मृदंग वादनसँ होइत छल। सभ साहित्यिक विधा दू प्रकारक होइत अछि। लोकधर्मी आ नाट्यधर्मी, लोकधर्मी भेल ग्राम्य आ नाट्यधर्मी भेल शास्त्रीय उक्ति। ग्राम्य माने भेल कृत्रिमताक अवहेलना मुदा अज्ञानतावश किछु गोटे एकरा गाममे होइबला नाटक बुझै छथि, आ बुझै छथि जे गमैया नाटक दब होइ छै। लोकधर्मीमे स्वभावक अभिनयमे प्रधानता रहैत अछि, लोकक क्रियाक प्रधानता रहैत अछि, सरल आंगिक प्रदर्शन होइत अछि, आ ऐ मे पात्रक से ओ स्त्री हुअए वा पुरुष, तकर संख्या बड्ड बेसी रहैत अछि। नाट्यधर्मीमे वाणी मोने-मोन, संकेतसँ, आकाशवाणी इत्यादि द्वारा होइए आ नृत्यक समावेशसँ, वाक्यमे विलक्षणतासँ, रागबला संगीतसँ, आ साधारण पात्रक अलाबे दिव्य पात्रक आगमन सेहो ऐमे रहैए। कोनो निर्जीव/ वा जन्तु सेहो संवाद करऽ लगैए, एक पात्रक डबल-ट्रिपल रोल, सुख दुखक आवेग संगीतक माध्यमसँ बढ़ाओल जाइए। वैदिक आख्यान, जातक कथा, ऐशप फेबल्स, पंचतंत्र आ हितोपदेश आ संग-संग चलैत रहल लोकगाथा सभ। सभ ठाम अभिजात्य वर्गक कथाक संग लोकगाथा रहिते अछि। ऋगवेदक शिथिर, दूलभ, इन्दर आदि शब्द जनभाषाक साहित्यीकरणक प्रमाण अछि। ओना एकर प्रारम्भिक प्रयोग अशोकक अभिलेखसँ तेरहम शताब्दी ई. धरि भेटि जाएत मुदा पारिभाषिक रूपमे जइ प्राकृतक एतए चर्चा भऽ रहल अछि ओ पहिल ई.सँ छठम ई. धरि साहित्यक भाषा दू अर्थे रहल, पहिल संस्कृत साहित्यक नाटकमे जन सामान्य आ स्त्री पात्र लेल शौरसेनी, महाराष्ट्री आ मागधीक (वररुचि चारिम प्राकृतमे पैशाचीक नाम जोड़ै छथि) प्रयोग सेहो भेल (कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्रम्, शूद्रकक मृच्छकटिकम्, श्रीहर्षक रत्नावली, भवभूतिक उत्तररामचरित, विशाखादत्तक मुद्राराक्षस) आ दोसर जे फेर ऐ प्राकृत सभमे साहित्यक निर्माण स्वतंत्र रूपेँ होमए लागल। फेर ऐ प्राकृत भाषाकेँ सेहो व्याकरणमे बान्हल गेल आ तखन ई भाषा अलंकृत होमए लागल आ अपभ्रंश आ अवहट्ठक प्रयोग लोक करए लगलाह, ओना अपभ्रंश प्राकृतक संग प्रयोग होइत रहए, तकर प्रमाण सेहो उपलब्ध अछि। मोटा-मोटी गद्य लेल शौरसेनी, पद्य लेल महाराष्ट्री आ धार्मिक साहित्य लेल मागधी-अर्धमागधीक प्रयोग भेल। नाटकमे स्त्री-विदूषक बजैत रहथि शौरसेनीमे, मुदा पद्य गाबथि महाराष्ट्रीमे, नाटकक तथाकथित निम्न श्रेणीक लोक मागधी बजैत छलाह। मैथिली नाट्य साहित्य आ नाट्य साहित्यक समीक्षाशास्त्र बच्चा आ पैघ नाटकसँ शिक्षा लैए, लोककेँ आ वातावरणकेँ बुझबाक प्रयास करैए। मन्दिरक उत्सव आ राजाक प्रासादमे होइबला नाटक स्वतंत्र भऽ गेल आ एकर उपयोग वा अनुप्रयोग दोसर विषयकेँ पढ़ेबामे सेहो होमए लागल। दोसर विषयक विशेषज्ञक सहभागिता आवश्यक भऽ गेल। स्वतंत्र रूपेँ सेहो ई विषय अछि आ एकर अनुप्रयोग सेहो कएल जाइत अछि। पारम्परिक नाटक पेशेवर नाटकसँ जुड़त, उदाहरण स्वरूप कएल गेल नाटक, मंचक साजसज्जा, आ असल नाटकक मंचन रंगमंचक इतिहास बनत। मुदा ऐ सँ पहिने रंगमंचक प्रारम्भिक ज्ञानक संग नाटक पढ़बाक आदतिक विकसित भेनाइ सेहो आवश्यक अछि। आ से पढ़बा काल एकर मंच प्रबन्धन आ अभिनयक दृष्टिसँ तकर विश्लेषण सेहो आवश्यक अछि। बच्चा आ पैघ नाटक आ रंगमंचसँ जुड़त तँ जिम्मेवार नागरिक बनत, आर्थिक रूपेँ आत्म-निर्भर बनत आ सक्रिय नागरिक सेहो बनत। नाट्य शास्त्रमे वर्णन अछि जे नाटकक उत्पत्ति इन्द्रक ध्वजा उत्सवसँ भेल। नाट्य शास्त्र नाटककेँ दू प्रकारमे १.अमृत मंथन आ २.शिवक त्रिपुरदाह, मानैत अछि। एहेन लगभग दस टा दृश्य वा रूपकक प्रकार भरत लग छलन्हि (दशरूपक) आ ओइमे नृत्य, संगीत आ अभिनय सम्मिलित छल; आ ऐ दशरूपकक अतिरिक्त श्रव्य गीत सभ सेहो छल। पाँचम शताब्दी ई. पू. मे पाणिनी शिलालिन् आ कृशाश्वक चर्चा करै छथि जे नट सूत्रक संकलन केने रहथि। नट माने अभिनेता आ रंग माने रंगमंच। नटक पर्यायवाची होइत अछि, भरत, शिलालिन् आ कृशाश्व! मैथिली नाटक जे आइ धरि मात्र नृत्य-संगीतसँ बेशी आ चित्रकला आ दस्तकारीसँ मामूली रूपसँ जुड़ल छल, से समानान्तर रंगमंचक हस्तक्षेपक कारण आब भौतिकी, जीव विज्ञान, इतिहास, भूगोल, आ साहित्यसँ सेहो जुड़ि रहल अछि, तकर आर प्रयास हेबाक चाही। ज्योतिरीश्वरक धूर्तसमागम, विद्यापतिक गोरक्षविजय, कीर्तनिञा नाटक, अंकीयानाट, मुंशी रघुनन्दन दासक मिथिला नाटक, जीवन झाक सुन्दर संयोग, ईशनाथ झाक चीनीक लड्डू, गोविन्द झाक बसात, मणिपद्मक तेसर कनियाँ, नचिकेताजीक “नायकक नाम जीवन, एक छल राजा”, श्रीशजीक पुरुषार्थ, सुधांशु शेखर चौधरीक भफाइत चाहक जिनगी, राम भरोस कापड़ि भ्रमरक महिषासुर मुर्दाबाद, गंगेश गुंजनक बुधिबधिया, नचिकेताक नो एण्ट्री: मा प्रविश; माने ज्योतिरीश्वरक धूर्तसमागमक अबसर्डिटी सँ नचिकेताक नो एण्ट्री: मा प्रविश क उत्तर आधुनिक अबसर्डिटी; मैथिली नाटकक एकटा वृत्त सम्पूर्ण भेल। उत्तर आधुनिकताक लक्षण: एके गोटेक कएक तरहक चरित्र निकलि बाहर अबैत अछि, कोनो घटनाक सम्पूर्ण अर्थ नै लागि पबैत अछि, सत्य कखन असत्य भऽ जाएत तकर कोनो ठेकान नै। उत्तर आधुनिकताक सतही चिन्तन आ तेहन चरित्र सभक भरमार लागल अछि, आशावादिता तँ नहिए अछि मुदा निराशावादिता सेहो नै अछि। जे अछि तँ से अछि बतहपनी, कोनो चीज एक तरहेँ नै कएक तरहेँ सोचल जा सकैत अछि- ई दृष्टिकोण विद्यमान अछि। कारण, नियन्त्रण आ योजनाक उत्तर परिणामपर विश्वास नै, वरन संयोगक उत्तर परिणामपर बेशी विश्वास दर्शाओल जाइत अछि। गणतांत्रिक आ नारीवादी दृष्टिकोण आ लाल झंडा आदिक विचारधाराक संगे प्रतीकक रूपमे हास-परिहास सोझाँ अबैत अछि, तेँ नारीवाद आ मार्क्सवाद उत्तर आधुनिक दृष्टिकोणक विरोध केलक अछि। नीक-खराबक भावना रहि-रहि खतम होइत रहैत अछि। सभ मुखौटामे रहि जीबि रहल छथि। भारत आ पाश्चात्य नाट्य सिद्धांतक तुलनात्मक अध्ययनसँ ई ज्ञात होइत अछि जे मानवक चिन्तन भौगोलिक दूरीकक अछैत कतेक समानता लेने रहैत अछि। भारतीय नाट्यशास्त्र मुख्यतः भरतक “नाट्यशास्त्र” आ धनंजयक दशरूपकपर आधारित अछि। पाश्चात्य नाट्यशास्त्रक प्रामाणिक ग्रंथ अछि अरस्तूक “काव्यशास्त्र”। भरत नाट्यकेँ “कृतानुसार” “भावानुकार” कहैत छथि, धनंजय अवस्थाक अनुकृतिकेँ नाट्य कहैत छथि। भारतीय साहित्यशास्त्रमे अनुकरण नट कर्म अछि, कवि कर्म नै। पश्चिममे अनुकरण कर्म थिक कवि कर्म, नटक कतौ चरचा नै अछि। अरस्तू नाटकमे कथानकपर विशेष बल दै छथि। ट्रेजेडीमे कथानक केर संग चरित्र-चित्रण, पद-रचना, विचार तत्व, दृश्य विधान आ गीत रहैत अछि। भरत कहैत छथि जे नायकसँ संबंधित कथावस्तु आधिकारिक आ आधिकारिक कथावस्तुकेँ सहायता पहुँचाबएबला कथा प्रासंगिक कहल जाएत। मुदा सभ नाटकमे प्रासंगिक कथावस्तु हुअए से आवश्यक नै, नो एण्ट्री: मा प्रविश नाम्ना उत्तर-आधुनिक नाटकमे नहिये कोनो तेहन आधिकारिक कथावस्तु अछि आ नहिये कोनो प्रासांगिक, कारण ऐमे नायक कोनो सर्वमान्य नायक नै अछि। कोनो पात्र कमजोर नै छथि आ समय-परिस्थितिपर रिबाउन्ड करैत छथि। कथा इतिवृत्तिक दृष्टिसँ प्रख्यात, उत्पाद्य आ मिश्र तीन प्रकारक होइत अछि। प्रख्यात कथा इतिहास पुराणसँ लेल जाइत अछि आ उत्पाद्य कल्पित होइत अछि। मिश्रमे दुनूक मेल होइत अछि। अरस्तू कथानककेँ सरल आ जटिल दू प्रकारक मानैत छथि। अरस्तू इतिवृत्तकेँ दन्तकथा, कल्पना आ इतिहास ऐ तीन प्रकारसँ सम्बन्धित मानैत छथि। अरस्तूक ट्रेजेडीक चरित्र यशस्वी आ कुलीन छथि- सत् असत् केर मिश्रण। भरत नृत्य संगीतक प्रेमीकेँ धीरललित, शान्त प्रकृतिकेँ धीरप्रशान्त, क्षत्रिय प्रवृत्तिकेँ धीरोदत्त आ ईर्ष्यालूकेँ धीरोद्धत्त कहैत छथि। भारतीय सिद्धांत कार्यक आरम्भ, प्रयत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति आ फलागम धरिक पाँच टा अवस्थाक वर्णन करैत अछि। प्राप्त्याशामे फल प्राप्तिक प्रति निराशा अबैत अछि तँ नियताप्तिमे फल प्राप्तिक आशा घुरि अबैत अछि। पाश्चात्य सिद्धांतमे अछि आरम्भ, कार्य-विकास, चरम घटना, निगति आ अन्तिम फल। प्रथम तीन अवस्थामे ओझराहटि अबैत अछि, अन्तिम दू मे सोझराहटि। कार्यावस्थाक पंच विभाजन- बीया, बिन्दु, पताका, प्रकरी आ कार्य अछि। पताका आ प्रकरी अवान्तर कथामे होइत अछि। बीआक विकसित रूप कार्य अछि, अरस्तू एकरा बीआ, मध्य आ अवसान कहैत छथि। आब आउ सन्धिपर, मुख-सन्धि भेल बीज आ आरम्भकेँ जोड़एबला, प्रतिमुख-सन्धि भेल बिन्दु आ प्रयत्नकेँ जोड़एबला, गर्भसन्धि भेल पताका आ प्राप्त्याशाकेँ जोड़एबला, विमर्श सन्धि भेल प्रकरी आ नियताप्तिकेँ जोड़एबला आ निर्वहण सन्धि भेल फलागम आ कार्यकेँ जोड़एबला। पाश्चात्य सिद्धांत स्थान, समय आ कार्यक केन्द्र तकैत अछि। अभिनवगुप्त कहैत छथि जे एक अंकमे एक दिनक कार्यसँ बेशीक समावेश नै हुअए आ दू अंकमे एक वर्षसँ बेशीक घटनाक समावेश नै हुअए। त्रिकक विरोध ड्राइडन कएने छलाह आ शेक्सपिअरक नाटकक स्वच्छन्दताक ओ समर्थन कएलन्हि। भारतमे नाटकक दृश्यत्वक समर्थन कएल गेल मुदा अरस्तू आ प्लेटो एकर विरोध कएलन्हि। मुदा १६म शताब्दीमे लोडोविको कैस्टेलवेट्रो दृश्यत्वक समर्थन कएलन्हि। डिटेटार्ट सेहो दृश्यत्वक समर्थन कएलन्हि तँ ड्राइडज नाटकक पठनीयताक समर्थन कएलन्हि। देसियर पठनीयता आ दृश्यत्व दुनूक समर्थन कएलन्हि। अभिनवगुप्त सेहो कहने छलाह जे पूर्ण रसास्वाद अभिनीत भेला उत्तर भेटैत अछि, मुदा पठनसँ सेहो रसास्वाद भेटैत अछि। पश्चिमी रंगमंचक नाट्यविधान वास्तविक अछि मुदा भारतीय रंगमंचपर सांकेतिक। जेना अभिज्ञानशाकुंतलम् मे कालिदास कहैत छथि- इति शरसंधानं नाटयति। सैमुअल जॉनसन सेक्सपिअरक नाटकमे हास्य आ दुखद तत्वपर लिखलन्हि। प्लेटो- प्लेटो कहै छथि जे कोनो कला नीक नै भऽ सकैए किएक तँ ई सभटा असत्य आ अवास्तविक अछि। प्लेटोक ई विचार स्पार्टासँ एथेंसक सैन्य संगठनक न्यूनताकेँ देखैत देल विचारक रूपमे सेहो देखल जएबाक चाही।  काव्य/ नाटकक ओ ऐ रूपेँ विरोध केलन्हि जे सम्वादकेँ रटि कऽ बाजैसँ लोक एकटा कृत्रिम जीवन दिस आकर्षित होएत। अरिस्टोटल कविताकेँ मात्र अनुकृति नै मानै छथि, ओ ऐ मे दर्शन आ सार्वभौम सत्य सेहो देखै छथि। ओ नाटकक दुखान्तकेँ आ अनुकृतिकेँ निसास छोड़ैबला कहै छथि जे आनन्द, दया आ भयक बाद अबैत अछि। सम्वाद दू तरेहेँ भऽ सकैए- अभिभाषण वा गप द्वारा। गपमे दार्शनिक तत्व कम रहत। प्राचीन ग्रीसमे कविता भगवानक सनेस बूझल जाइत छल। एरिस्टोफिनीस नीक आ अधला ऐ दू तरहक कविता देखै छथि तँ थियोफ्रेस्टस कठोर, उत्कृष्ट आ भव्य ऐ तीन तरहेँ कविताकेँ देखै छथि। कविता आ संगीत अभिन्न अछि। मुदा यूरोपक सिम्फोनी जइमे ढेर रास वादन एके संगे विभिन्न लयमे होइत अछि, सिद्धांतमे अन्तर अनलक। यएह सभ किछु नाटकक स्टेज लेल सेहो लागू भेल। नाटकमे भावनापूर्ण सम्वाद आ क्रियाकलापक योग रहत। जीवन झा मैथिली नाट्य साहित्यमे हुनका द्वारा आनल नूतन कथ्य-शिल्प लेल मोन राखल जाइत छथि, संस्कृत आ पारसी तत्वक सम्मिश्रण नीक जकाँ जीवन झा केने छथि। उत्तर आधुनिकता: ई तार्किकता आ आधुनिकताक वस्तुनिष्टताकेँ ठाम-ठाम नकारैत अछि, विज्ञानक ज्ञानक सम्पूर्णतापर टीका अछि ई, जे देखि रहल छी से सत्य नै सपनो भऽ सकैत अछि, सत्य-असत्य, सभ अपन-अपन दृष्टिकोणसँ तकर वर्णन करैत छथि। ई आत्म-केन्द्रित हास्यपूर्ण होइत अछि आ नीक-खराबक भावना रहि-रहि खतम होइत रहैत अछि। लोक मुखौटामे रहि जीबि रहल छथि, कोनो घटनाक सम्पूर्ण अर्थ नै लागि पबैत अछि, सत्य कखन असत्य भऽ जाएत तकर कोनो ठेकान नै, उत्तर आधुनिकताक सतही चिन्तन आ तेहन चरित्र सभक भरमार लागल रहैए उत्तर आधुनिक नाटकमे जतए आशावादिता तँ नहिए अछि मुदा निराशावादिता सेहो नै अछि। जे अछि तँ से अछि बतहपनी, कोनो चीज एक तरहेँ नै कएक तरहेँ सोचल जा सकैत अछि- ई दृष्टिकोण एतए विद्यमान अछि। कारण, नियन्त्रण आ योजनाक उत्तर परिणामपर विश्वास नै वरन संयोगक उत्तर परिणामपर बेशी विश्वास दर्शाओल गेल अछि। गणतांत्रिक आ नारीवादी दृष्टिकोण आ लाल झंडा आदिक विचारधाराक संगे प्रतीकक रूपमे हास-परिहास सोझाँ अबैत अछि। दर्शक कथानकक मध्य उठाओल विभिन्न समस्यासँ अपनाकेँ परिचित पबैत छथि। जे द्वन्द ऐ तरहक नाटक मे रहैए जीवनमे तइ तरहक द्वन्दक नित्य सामना लोक करैत छथि। भरतक नाट्यशास्त्र: १९५६ ई. संगीत-नाटक अकादेमी द्वारा प्रथम राष्ट्रीय नाट्य उत्सव- कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम् (संस्कृत) सँ उत्सवक प्रारम्भ (गोवा ब्राह्मण सभा द्वारा) भेल, नाटकक कालखण्डक अनुरूप मंच आ पहिराबाक अध्ययन हेबाक चाही। पारसी नाटकक किछु प्रसिद्ध नाटक जेना इन्दर सभा, आलम आरा आ खोन्ने नहाक (सेक्सपियरक हेमलेट आधारित) सिनेमा बनि सेहो प्रस्तुत भेल। नाटक दू प्रकारक लोकधर्मी आ नाट्यधर्मी, लोकधर्मी भेल ग्राम्य आ नाट्यधर्मी भेल शास्त्रीय उक्ति। नाट्यधर्मक आधार अछि लोकधर्म। लोकधर्मीकेँ परिष्कृत करू आ ओ नाट्यधर्मी भऽ जाएत। लोकधर्मीक दू प्रकार- चित्तवृत्यर्पिका (आन्तरिक सुख-दुख) आ बाह्यवस्त्वनुकारिणी (बाह्य- पोखरि, कमलदह)। नाट्यधर्मी-सेहो दू प्रकारक कैशिकी शोभा (अंगक प्रदर्शन- विलासिता गीत-नृत्य-संगीत) आ अंशोपजीवनी (पुष्पक विमान, पहाड़ बोन आदिक सांकेतिक प्रदर्शन)। सम्पूर्ण अभिनय- आंगिक (अंगसँ), वाचिक(वाणीसँ), सात्विक(मोनक भावसँ) आ आहार्य (दृश्य आदिक कल्पना साज-सज्जा आधारित)। आंगिक अभिनय- शरीर, मुख आ चेष्टासँ; वाचिक अभिनय- देव, भूपाल, अनार्य आ जन्तु-चिड़ैक भाषामे; सात्विक- स्तम्भ (हर्ष, भय, शोक), स्वेद (स्तम्भक भाव दबबैले माथ नोचऽ लागब आदि), रोमांच (सात्विकक कारण देह भुकुटनाइ आदि), स्वरभंग (वाणीक भारी भेनाइ, आँखिमे नोर एनाइ), वेपथु (देह थरथरेनाइ आदि), वैवर्ण्य (मुँह पीअर पड़नाइ), अश्रु (नोर ढब-ढब खसनाइ, बेर-बेर आदि), प्रलय (शवासन आदि द्वारा); आ आहार्य- पुस्त (हाथी, बाघ, पहाड़ आदिक मंचपर स्थापन), अलंकार (वस्त्र-अलंकरण), अंग-रचना (रंग, मोंछ, वेश आ केश), संजीव (बिना पएर-साँप, दू पएर-मनुक्ख आ चिड़ै आ चारि पएरबला-जन्तु जीव-जन्तुक प्रस्तुति) द्वारा होइत अछि। दूटा आर अभिनय प्रकार- सामान्य (नाट्यशास्त्र २२म अध्याय) आ चित्राभिनय (नाट्यशास्त्र २२म अध्याय): चतुर्विध अभिनयक बाद सामान्य अभिनयक वर्णन, ई आंगिक, वाचिक आ सात्विक अभिनयक समन्वित रूप अछि आ ऐ मे सात्विक अभिनयक प्रधानता रहैत अछि। चित्राभिनय आंगिकसँ सम्बद्ध- अंगक माध्यसँ चित्र बना कऽ पहाड़, पोखरि चिड़ै आदिक अभिनय विधान। नाट्य-मंचन आ अभिनय: कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाट्य निर्देशकक लेल पठनीय नाटक अछि। रंगमंच निर्देश, जेना, रथ वेगं निरूप्य,  सूत पश्यैनं व्यापाद्यमानं, इति शरसंधानम् नाटयति, वृक्ष सेचनम् रुपयति, कलशम् अवरजायति, मुखमस्याः समुन्नमयितुमिच्छति, शकुन्तला परिहरति नाट्येन, नाट्येन प्रसाधयतः, कहि कऽ वास्तविकतामे नै वरन् अभिनयसँ ई कएल जाइत अछि। नाट्येन प्रसाधयतः, एतए अनसूया आ प्रियम्वदा मुद्रासँ अपन सखी शकुन्तलाक प्रसाधन करै छथि कारण से चाहे तँ उपलब्ध नै अछि, चाहे तँ ओतेक पलखति नै अछि। तहिना वृक्ष सेचनम् रुपयति सँ गाछमे पानि पटेबाक अभिनय, कलशम् अवरजायति सँ कलश खाली करबाक काल्पनिक निर्देश, रथ वेगं निरूप्य सँ तेज गतिसँ रथमे यात्राक अभिनय, इति शरसंधानम् नाटयति सँ तीरकेँ धनुषपर चढ़ेबाक निर्णय, सूत पश्यैनं व्यापाद्यमानं सँ हरिणकेँ मारि खसेबाक दृश्य देखबाक निर्देश, मुखमस्याः समुन्नमयितुमिच्छति सँ दुश्यन्तक शकुन्तलाक मुँहकेँ उठेबाक इच्छा, शकुन्तला परिहरति नाट्येन सँ शकुन्तला द्वारा दुश्यन्तक ऐ प्रयासकेँ रोकबाक अभिनयक निर्देश होइत अछि। भरतक रंगमंच: ऐ मे होइत अछि- पाछाँक पर्दा, नेपथ्य (मेकप रूम बुझू), आगमन आ निर्गमनक दरबज्जा, विशेष पर्दा जे आगमन आ निर्गमन स्थलकेँ झाँपैत अछि, वेदिका- रंगमंचक बीचमे वादन-दल लेल बनाओल जाइत अछि, रंगशीर्ष- पाछाँक रंगमंच स्थल; मत्तवर्णी- आगाँ दिस दुनू कोणपर अभिनय लेल होइत अछि आ रंगपीठ अछि सोझाँक मुख्य अभिनय स्थल। अभिनय मूल्यांकन माने नाट्य समीक्षा: अध्याय २७ मे भरत सफलताकेँ लक्ष्य बतबै छथि, मंचन सफलतासँ पूर्ण हुअए। दर्शक कहैए, हँ, बाह, कतेक दुखद अन्त, तँ तेहने दर्शक भेलाह सहृदय, भरतक शब्दमे, से ओ नाटककार आ ओकर पात्रक संग एक भऽ जाइत छथि। नाट्य प्रतियोगिता होइत छल आ ओतए निर्णायक लोकनि पुरस्कार सेहो दै छलाह। भरत निर्णायक लोकनि द्वारा धनात्मक आ ऋणात्मक अंक देबाक मानदण्डक निर्धारण करैत कहै छथि जे- १.ध्यानमे कमी, २.दोसर पात्रक सम्वाद बाजब, ३.पात्रक अनुरूप व्यक्तित्व नै हएब, ४.स्मरणमे कमी, ५.पात्रक अभिनयसँ हटि कऽ दोसर रूप धऽ लेब, ६.कोनो वस्तु, पदार्थ खसि पड़ब, ७.बजबा काल लटपटाएब, ८.व्याकरण वा आन दोष, ९.निष्पादनमे कमी, १०.संगीतमे दोष, ११.वाक् मे दोष, १२.दूरदर्शितामे कमी, १३.सामिग्रीमे कमी, १४.मेकप मे कमी, १५. नाटककार वा निर्देशक द्वारा कोनो दोसर नाटकक अंश घोसियाएब, १६.नाटकक भाषा सरल आ साफ नै हएब, ई सभ अभिनय आ मंचनक दोष भेल। निर्णायक सभ क्षेत्रसँ होथि, निरपेक्ष होथि। नाटकक सम्पूर्ण प्रभाव, तारतम्य, विभिन्न गुणक अनुपात, आ भावनात्मक निरूपण ध्यानमे राखल जाए। स्टेजक मैनेजर- सूत्रधार- आ ओकर सहायक –परिपार्श्वक- नाटकक सभ क्षेत्रक ज्ञाता होथि। मुख्य अभिनेत्री संगीत आ नाटकमे निपुण होथि, मुख्य अभिनेता- नायक- अपन क्षमतासँ नाटककेँ सफल बनबै छथि। अभिनेता- नट- क चयन एना करू, जँ छोट कदकाठीक छथि तँ वाणवीर लेल, पातर-दुब्बर होथि तँ नोकर, बकथोथीमे माहिर होथि तँ बिपटा, ऐ तरहेँ पात्रक अभिनेताक निर्धारण करू। संगीत-दलक मुखिया- तौरिक- केँ संगीतक सभ पक्षक ज्ञान हेबाक चाही जइसँ ओ बाजा बजेनिहार- कुशीलव- केँ निर्देशित कऽ सकथि। मैथिली नाटक: बड्ड रास भाषण मैथिली आ आन नाटकक प्राचीनसँ आधुनिक काल धरि रहल तारतम्यक विषयमे देल गेल अछि। मुदा सत्य यएह अछि जे भारत वा नेपालक कोनो कोनमे रंगमंच आ रूपकक निर्देश भरतक नाट्यशास्त्रक अनुरूपेँ उपलब्ध नै अछि, ओकर पुनः स्थापन भरिगर काज तँ अछिये, मुदा समानान्तर रंगमंच एकर प्रयास केलक अछि। बिनु ज्ञानक कालिदासक नाटकक लघुरूप भयंकर विवाद उत्पन्न करैत अछि। लोक नाट्यक नाट्यशास्त्रक अनुरूप निरूपण कऽ उपरूपकक मंचनक सम्भावना मैथिलीमे अछि। बेचन ठाकुर जीक निर्देशनमे विदेह नाट्य उत्सव २०१२ ऐ दिशामे एकटा प्रयास छल। मैथिली नाटक आ रंगमंच लेल एकटा समीक्षाशास्त्र: गद्यमे कथा होइत अछि आ विस्तारक अनुसार ई लघुकथा, कथा आ उपन्यासमे विभक्त कएल जाइत अछि तइ सन्दर्भमे उपन्यास (वा बीच-बीचमे नाटक) क पद्य रूपान्तरण महाकाव्य कहल जाएत। जँ ऋगवैदिक परम्परामे जाइ तँ महाकाव्यकेँ गीत-प्रबन्ध कहल जएबाक चाही। लक्ष्मण-परशुराम सम्वाद हुअए वा मंथरा आ कैकेयीक सम्वाद आकि रावण आ अंगदक सम्वाद, सभ ठाम नाटकक सम्वाद शैली सन रोचक पद्य अहाँकेँ भेटत। कथा-गल्प, आख्यान आ उपन्यास आ किछु दूर धरि नाटक आ एकांकी मनोरंजनक लेल सुनल-सुनाओल-पढ़ल जाइत अछि वा मंचित कएल जाइत अछि। ई उद्देश्यपूर्ण भऽ सकैत अछि वा ऐमे निरुद्देश्यता-एबसर्डिटी सेहो रहि सकै छै- कारण जिनगीक भागादौड़ीमे निरुद्देश्यपूर्ण साहित्य सेहो मनोरंजन प्रदान करैत अछि। वन-एक्ट प्ले भेल एकांकी आ प्ले भेल नाटक। कथोपकथनक गुंजाइश कम राखि वा कोनो उपस्थापनासँ पहिने राखि लघुकथा आ कथाकेँ सशक्त बनाओल जा सकैत अछि, अन्यथा ओ एकांकी वा नाटक बनि जाएत। भरत:- नाटकक प्रभावसँ रस उत्पत्ति होइत अछि। नाटक कथी लेल? नाटक रसक अभिनय लेल आ संगे रसक उत्पत्ति लेल सेहो। रस कोना बहराइए? रस बहराइए कारण (विभाव), परिणाम (अनुभाव) आ संग लागल आन वस्तु (व्यभिचारी)सँ। स्थायीभाव गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनैए, जकर स्वाद हम लऽ सकै छी। सर्जनात्मक साहित्यमे नाटक सभसँ कठिन अछि, फेर कविता अछि आ तखन कथा, जँ अनुवादकक दृष्टिकोणसँ देखी तखन। नाटकमे नाटकक पृष्ठभूमि आ परोक्ष निहितार्थकेँ चिन्हित करए पड़त संगहि पात्र सभक मनोविज्ञान बूझए पड़त। कालिदासक संस्कृत नाटकमे संस्कृतक अतिरिक्त अपभ्रंशक प्रयोग गएर अभिजात्य वर्गक लेल प्रयुक्त भेल तँ चर्यापदक भाषा सेहो मागधी मिश्रित अपभ्रंश छल। आइ आवश्यकता अछि जे मैथिली नाटक आ रंगमंचमे जातिवादी शब्दावली ककरो अपमानित करबा लेल प्रयोग नै कएल जाए। पुरान लोककथा वा आख्यान नव सन्दर्भमे उपयुक्त तखने भऽ सकैए जखन नाटककारमे सामर्थ्य हुअए। नाटक आ रंगमंच जातिभेदकेँ दूर करबाक आ सामंजस्य उत्पन्न करबाक हथियार भऽ सकैए मुदा यावत लोक ओकरा देखत नै तावत कोना ई हएत? ऐ लेल नाटककार आ रंगमंच निर्देशकमे प्रतिभा हेबाक चाही जइसँ ओ गूढ़ विषयकेँ सोझरा कऽ राखि सकथि। मात्र विषय वा मात्र मनोरंजन श्रेष्ठताक आधार नै बनि सकत। जातिवादी रंगमंच मनोरंजनक नामपर जे खेल खेलाएल तकर परिणाम मैथिलीकेँ भेटि चुकल छै। समस्या, समाधान, मनोरंजन आ शिल्पमे सामंजस्य बनाबए पड़त। आधुनिक मैथिली नाटक: मैथिली नाट्य संस्था आ नाट्य निर्देशक धूर्त्तसमागम: तेरहम शताब्दीमे ज्योतिरीश्वर ठाकुर द्वारा रचल गेल जे संस्कृत आ मैथिलीमे उपलब्ध अछि। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक संस्कृत धूर्त्तसमागममे सेहो मैथिली गीतक समावेश अछि। ई प्रहसनक कोटिमे अबैत अछि। मैथिलीक अधिकांश नाटक-नाटिका श्रीकृष्णक अथवा हुनकर वंशधरक चरितपर अवलंबित आ हरण आकि स्वयंवर कथापर आधारित छल। मुदा धूर्त्तसमागममे साधु आ हुनकर शिष्य मुख्य पात्र अछि। धूर्त्तसमागमक सभ पात्र एकसँ-एक धूर्त छथि। तइ हेतु एकर नाम धूर्त्तसमागम सर्वथा उपयुक्त अछि। प्रहसनकेँ संगीतक सेहो कहल जाइए तइ हेतु ऐमे मैथिली गीतक समावेश सर्वथा समीचीन अछि। ऐमे सूत्रधार, नटी, स्नातक, विश्वनगर, मृतांगार, सुरतप्रिया, अनंगसेना, अस्ज्जाति मिश्र, बंधुवंचक, मूलनाशक आ नागरिक मुख्य पात्र छथि। सूत्रधार कर्णाट चूड़ामणि नरसिंहदेवक प्रशस्ति करैत अछि। फेर ज्योतिरीश्वरक प्रशस्ति होइत अछि। ऐमे एक प्रकारक एब्सर्डिटी अछि जे नितांत आधुनिक अछि आ ऐमे जे लोच छै से एकरा लोकनाट्य बनबै छै। विश्वनगर स्त्रीक अभावमे ब्रह्मचारी छथि। शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु मृतांगार ठाकुरक घर जाइत छथि तँ अशौचक बहाना भेटै छन्हि। विश्वनगर शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु सुरतप्रियाक घर जाइत छथि। फेर अनंगसेना नामक वैश्याकेँ लऽ गुरु-शिष्यमे मारि बजरि जाइ छन्हि। गुरु-शिष्य अनंगसेनाक संग असज्जाति मिश्र लग जाइ छथि, मिश्रजी लंपट छथि जे जुआ खेलाएब आ संगम ईएह दूटाकेँ संसारक सार बुझै छथि। असज्जाति मिश्र पुछै छथि जे के वादी आ के प्रतिवादी? स्नातक उत्तर दै छथि- अभियोग कहबाक लेल हम वादी थिकौं आ शुल्क देबाक हेतु संन्यासी प्रतिवादी थिकाह। विश्वनगर अपन शुल्कमे स्नातकक गाजाक पोटरी प्रस्तुत करै छथि। विदूषक असज्जाति मिश्रक कानमे अनंगसेनाक यौनक प्रशंसा करैत अछि। असज्जाति मिश्र अनंगसेनाकेँ बीचमे राखि दुनूक बदला अपना पक्षमे निर्णय लैत अछि। एम्हर विदूषक अनंगसेनाक कानमे कहैत अछि- ई संन्यासी दरिद्र अछि, स्नातक आवारा अछि आ ई मिश्र मूर्ख तेँ हमरा संग रहू। अनंगसेना चारूक दिशि देखि बजैछ- ई तँ असले धूर्तसमागम भऽ गेल। विश्वनगर स्नातकक संग पुनः सुरतप्रियाक घर दिशि जाइ छथि। एमहर मूलनाशक नौआ अनंगसेनासँ साल भरिक कमैनी मंगैए। ओ हुनका असज्जाति मिश्रक लग पठबैत अछि। मूलनाशक असज्जाति मिश्रकेँ अनंसेनाक वर बुझैत अछि। गाजा शुल्कमे लऽ असज्जाति मिश्रकेँ गतानि कऽ बान्हि तेना मालिश करैत अछि जे ओ बेहोश भऽ जाइत छथि। ओ हुनका मुइल बुझि कऽ भागि जाइत अछि। विदूषक अबैत अछि आ हुनकर बंधन खोलैत अछि आ पुछैत अछि जे हम अहाँक प्राणरक्षा कएल अछि आ जे किछु आन प्रिय कार्य हुअए तँ से कहू। असज्जाति कहैए- जे छलसँ संपूर्ण देशकेँ खएलौं, धूर्त्तवृत्तिसँ ई प्रिया पाओल, सेहो अहाँ सन आज्ञाकारी शिष्य पओलक, ऐसँ प्रिय आब किछु नै अछि, तथापि सर्वत्र सुखशांति हुअए तकर कामना करैत छी। विद्यापति ठाकुरक गोरक्षविजय नाटक- ऐसँ पहिने -धूर्तसमागमकेँ छोड़ि- कृष्णपर आधारित नाटकक प्रचलन छल। ऐ अर्थमे ई सेहो एकटा क्रांतिकरी नाटक कहल जाएत। नाथ संप्रदाय किंवा गोरक्ष संप्रदायक प्रवर्त्तक योगी गोरक्षनाथक कथा लऽ ऐ नाटकक कथावस्तु संगठित भेल अछि। गोरक्षनाथक गुरु मत्स्येन्द्रनाथ योग त्यागि कदलिपुरमे राजा बनि १८ टा रानीक संग भोग कऽ रहल छथि। गोरक्ष आ काननीपादकेँ द्वारपाल रोकि दैत अछि। मंत्री ढोलहो पिटबा दैत अछि जे योगी सभक प्रवेश कतौ नै हुअए आ रानी सभकेँ राजाक मोन मोहने रहबाक हेतु कहल जाइत अछि। गोरक्ष आ काननपाद नटुआक वेष धरैत छथि आ मोहक नृत्य राजाकेँ देखबैत छथि। ऐ बीच राजाक एकमात्र पुत्र बौधनाथ खेलाइत-खेलाइत मरि जाइत अछि। राजाक शंका नट पर जाइ छै आ ओकरा मारबाक आदेश होइ छै। नट बच्चाकेँ जिआ दैत अछि। राजा हुनकर परिचय पुछैत छथि तखन ओ हुनका अपन पूर्व जन्मक सभटा गप बता दै छन्हि, जे अहाँ तँ जोगी छी भोगी नै। ऐ नाटकक पात्रमे महामति(राजाक मंत्री) आ महादेवी-मत्स्येन्द्रनाथक ज्येष्ठ रानी सेहो छथि। मत्स्येन्द्रनाथ कदलीपुरक राजा आ पूर्व जन्मक योगी छथि। मत्स्येन्द्रनाथ अंतमे कहैत छथि जे गोरक्ष जेहन शिष्य हुअए आ महादेवी जेहन सभ नारी होथु। जीवन झा जीवन झा लिखित नाटक सुन्दर संयोग, (1904), मैथिली सट्टक (1906), नर्मदा सागर सट्टक (1906) आ सामवती पुनर्जन्म (1908), ऐ चारू नाटकक सामवेद विद्यालय काशीमे कएक बेर मंचन १९२० ई.सँ पहिनहिये भऽ चुकल अछि, "सुन्दर संयोग" एतैसँ प्रकाशित सेहो भेल। सुन्दर संयोगक किछु आर मंचन: १९७४ ई. माली मोड़तर (हसनपुर चीनीमिलक बगलमे), लक्ष्मीनारायण उच्च विद्यालय परिसरमे- निर्देशक श्री कालीकान्त झा "बूच", मुख्य अतिथि श्री फजलुर रहमान हासमी। दुर्गापूजामे। आयोजक देवनन्दन पाठक चीफ इन्जीनियर, आ केशनन्दन पाठक (ऑडीटर टीका बाबू), उद्घाटन: उदित राय मुखिया। १९७६: करियन, समस्तीपुर। निर्देशक: कामदेव पाठक। १९८१: पण्डित टोल, टभका (दलसिंहसरायक बगलमे): संयोजक डॉ उमेन्द्र झा "विमल", पूर्व प्रो. भाइस चान्सलर, का.सि. संस्कृत वि.वि. आ म.म. चित्रधर मिश्र जे दरभंगा किलाक भीतरक शंकर मन्दिरक अधिष्ठाता रहथि आ म.म. उमेश मिश्र आ म.म. गंगानाथ झा हिनकर शिष्य रहथिन्ह। १९८३:मउ बाजितपुर (विद्यापति नगरक बगलमे)। संस्कृत परम्परा आ पारसी थियेटरक गुणसँ ओतप्रोत जीवन झाक ऐ नाटक सभक अन्यान्यो ठाम मंचन भेल अछि। जातिवादी रंगमंचक ई दुष्प्रचार अछि, ऐ नाटकक पहिल मंचन मलंगिया जीक संस्था करत, जखनकि हुनकर जन्मसँ पहिने कएक बेर ऐ नाटक सभक मंचन भऽ चुकल छै। मलंगिया जीक संस्थाक पुनर्लेखन "सुन्दर संयोग" नाटक केँ सेहो जातिवादी तँ नै बना देतै, मलंगिया जीक इजाद कएल तथाकथित राड़बला मैथिली आ ब्राह्मणबला सामन्तवादी मैथिली आ दोसर "खदेरन की मदर" वा "बुझता है कि नहीं" बला भ्रष्ट हिन्दीक संगम कए कऽ, ई शंका व्यक्त कएल जा रहल अछि। मलंगिया जीक जातिवादी रंगमंचक सरकारी फण्ड लै लेल पहिल मंचनक ई झूठ पसारल जा रहल अछि। ईशनाथ झा उगना: ई नाटक सभ महाशिवरात्रिकेँ गौरीशंकर स्थान, जमथुरिमे खेलाएल जाइत अछि। विद्यापति शिव-भक्त, हुनकर गीत-नचारी सुनबा लेल महादेव विद्यापतिक घरमे उगना नोकर बनि आबि गेला। एक बेर विद्यापति यात्रापर छला आ उगना संगमे छलन्हि। रस्तामे पियास लगलापर उगना जटाक गंगधारसँ पानि निकालि विद्यापतिकेँ पियेलन्हि मुदा विद्यापतिकेँ ओइमे गंगाजलक स्वाद भेटलन्हि आ ओ उगनाक केश भीजल देखि सभटा बुझि गेलाह। उगना अपन असल रूपमे एलाह। मुदा उगना कहलखिन्ह जे विद्यापति ई गप ककरो नै कहताह नै तँ ओ अन्तर्धान भऽ जेताह। पार्वती चालि चललन्हि, विद्यापतिक पत्नी उगनाकेँ बेलपत्र अनबा लेल पठेलन्हि आ देरी भेलापर ओ उगनापर बाढनि उसाहलन्हि, विद्यापति भेद खोलि देलन्हि आ उगना बिला गेलाह। चीनीक लड्डू: सुधाकांत-प्रेमकांतक पिता गुजरि जाइ छथि आ से देखभाल मामा धर्मानन्द ट्रस्टी जकाँ करै छथि आ हुनकर सभक समर्थ भेलाक बाद सुधाकांतकेँ भार दऽ घुरि जाइ छथि। सुधाकांतक मुंशी बटुआ दास प्रेमकांतक पत्नी चण्डिका आ खबासनी छुलहीक सहयोगसँ बखरा करबा दै छथि, सुधाकान्त अपनो हिस्सा प्रेमकान्तकेँ दऽ दै छथि। सुधाकांत, पत्नी सुशीला आ बेटा सुकमार घरसँ बाहर कऽ देल जाइ छथि। सुधाकांतकेँ टी.बी. रोग मारि दै छन्हि। बटुआ दासक संगति प्रेमकांतकेँ सेहो दरिद्र कऽ दैत अछि। माम धर्मानन्द सुकमारकेँ अपन सम्पति लिखि दै छथि कारण हुनका सन्तान नै छन्हि। प्रेमकांत आ बटुआ दास सुकुमारकेँ मारबाक प्रयत्नमे बिख मिला कऽ चीनीक लड्डू सनेसमे सुकमारकेँ दै छथि मुदा ओइसँ बटुआ दास मरि जाइए, आ भेद खुजैए। उदय नारायण सिंह नचिकेता नायकक नाम जीवन : नवल नव विचारक अछि, शक्तिराय धनिक, कलुषित अछि आ अपन सहयोगी विनयपर चोरिक आरोप लगा ओकर बेटीक अपहरण आ बलात्कार करबैए। विनय आत्महत्या कऽ लैए। नवल आ ओकर मित्र प्रकाश आ दीपक सभटा भेद खोलैए। ओकर प्रेमिका बलात्कारक परिणामस्वरूप आत्महत्या करैए। नवल विक्षिप्त भऽ जाइए। एक छल राजा: एकटा राजा अभिमान कुमार देवक दिन मदिरा आ वैश्याक पाछाँ खराप भेलै। ओकरा एक्केटा बेटी मोहिनी छै, टकाक अभावमे ओकर बिआह नै भऽ पाबि रहल छै। मुंशी विरंची, सेवक चतुरलाल आ धर्मकर्मवाली पत्नी संगे नाटक आगाँ बढ़ैए। मोहिनी आ शिक्षक शुभंकरक बीच प्रेम होइ छै। नो एण्ट्री: मा प्रविश: पोस्टमोडर्न ड्रामा, जकर एबसर्डिटी एकरा ज्योतिरीश्वरक धूर्त समागम लग घुरबैए। स्वर्ग आकि नर्कक द्वारपर मुइल सभ अबै छथि आ खिस्सा-खेरहा सुनबै छथि, बादमे पता चलैए जे चित्रगुप्त/ धर्मराज सभ नकली छथि आ द्वारपर लागल अछि ताला, नो एण्ट्री। गोविन्द झा बसात: कृष्णकांत पिता द्वारा ठीक कएल युवती पुष्पा संग विवाह नै करै छथि, ओ शिक्षितसँ विवाह करऽ चाहै छथि, लिलीसँ प्रेम करै छथि। हुनकर पिता घर त्यागि दै छथि। पुष्पा घर छोड़ि महिला जागरणमे लागि गेलथि। पिताकेँ ताकैमे कृष्णकान्त असफल होइ छथि, लिलीकेँ छोड़ि रेलगाड़ीसँ कटऽ चाहै छथि, आश्रमक लोक हुनका बचा लै छन्हि, ओतए पिता, पुष्पा सभसँ भेँट होइ छन्हि, लिली सेहो बताहि भेलि ओतऽ आबि जाइ छथि। सुधांशु शेखर चौधरी भफाइत चाहक जिनगी: महेश बेरोजगार अछि, ओ चाह दोकान खोलैए ओ कवि सेहो अछि। इंजीनियर उमानाथक पत्नी चन्द्रमा दोकानपर देखलन्हि जे पुकार भेलापर महेश कविता पाठ लेल जाइए, चन्द्रमा चाह बेचऽ लगै छथि, उमानाथ तमसा जाइ छथि। महेशक संगी सरिता, जे आइ.ए.एस.क पत्नी छथि, आबै छथि। लेटाइत आँचर: दीनानाथक एकेटा पुत्री ममताकेँ पति काटरक कारणसँ छोड़ि दै छन्हि। मुदा पुत्र मोदनाथक विवाहमे दहेज लेबाक प्रयत्नपर पुत्र हुनका रोकै छन्हि। गुणनाथ झा गुणनाथ झा "लोक मञ्च" मैथिली नाट्य पत्रिकाक संचालन- सम्पादन केने छथि। मैथिलीमे आधुनिक नाटकक प्रणयन। हुनकर नाटक कनियाँ-पुतरा, पाथेय, ओ मधुयामिनी, सातम चरित्र, शेष नञि, आजुक लोक आ जय मैथिली सभक बेर-बेर मंचन भेल अछि। बाङ्गला एकाङ्की नाट्य-संग्रह- ऐमे बांग्लाक २४ टा नाटककारक २४ टा नाटकक संकलन ओ सम्पादन अजित कुमार घोष केने छथि आ तकर बांग्लासँ मैथिली अनुवाद श्री गुणनाथ झा द्वारा भेल अछि। कनियाँ-पुतरा- गुणनाथ झा जीक ई पहिल पूर्णाङ्क नाटक थिक। नाटक बहुदृश्य समन्वित करैबला घूर्णीय मञ्चोपयुक्त अछि। कथा काटर प्रथापर आधारित अछि आ तकर परिणामसँ मुख्य अभिनेता आ मुख्य अभिनेत्री मनोविकारयुक्त भऽ जाइत छथि, तइ मनोदशाक सटीक चित्रण आ विश्लेषण भेल अछि। मधुयामिनी: एकाङ्क नाट्य शैलीमे दूटा पात्र, पुरुष संयुक्त परिवारक पक्ष लेनिहार आ स्त्री तकर विरोधी। संयुक्त परिवारक पक्ष लेनिहारक सामंजस्यपूर्ण विजय होइत अछि। ई "लोक मञ्च" मैथिली नाट्य पत्रिकामे प्रकाशित अछि। पाथेय: एकाङ्क नाट्य शैलीमे रचित, मुदा पूर्णाङ्कक सभ विशेषता ऐमे भेटत। मुख्य अभिनेता मिथिलाक अधोगतिसँ दुखी भऽ गामकेँ कर्मस्थली बनबैत छथि, स्वजन विरोध करै छथि। मुदा बादमे पत्नी हुनकर संग आबि जाइ छथिन्ह। भाषा मधुर आ चलायमान अछि। लाल-बुझक्कर: एकाङ्क नाट्य शैलीमे रचित। दाही रौदीसँ झमारल निम्न आ मध्य-निम्न वर्ग स्वतंत्रताक पहिनहियो आ बादो जीविकोपार्जन लेल प्रवास करबा लेल अभिशप्त छथि। माता-पिता विहीन लाल बुझक्करजी कनियाँकेँ नैहरमे बैसा कऽ आ सन्तानहीन पित्ती पितियैनकेँ छोड़ि नग्र प्रवास करै छथि। सातम चरित्र: एकाङ्क नाट्य शैलीमे रचित। मैथिली रंगमंचपर महिला अभिनेत्रीक अभाव, सातम चरित्रक प्रतीक्षामे पूर्वाभ्यास खतम भऽ जाइत अछि। ई "लोक मञ्च" मैथिली नाट्य पत्रिकामे प्रकाशित अछि। शेष नञि: आधुनिक सामाजिक पूर्णाङ्क नाटक। पिता-माताक मृत्युक बाद अग्रजक अनुजक प्रति पितृवत व्यवहार। अनुज चाकरी करै छथि, परिवर्तनशील सामाजिक परिस्थितिक शिकार भऽ अचिन्तनीय कार्यकलाप करै छथि आ अग्रज प्रतारित होइ छथि। मुदा अग्रज मरणासन्न पत्नीक प्राणरक्षार्थ साहसपूर्ण डेग उठा लैत छथि। आजुक लोक: पूर्णाङ्क नाटक। विषय निम्नमध्यवर्गीय बेरोजगारी आ बियाहक दायित्वक बोझ। जय मैथिली: पूर्णाङ्क नाटक। मिथिलाक भाषिक-सांस्कृतिक समस्या एकर कथावस्तु अछि। महाकवि विद्यापति: विद्यापतिक नव विश्लेषण। जगदीश प्रसाद मण्डल मि‍थि‍लाक बेटी- प्रथम दृश्‍य- महगीक वि‍रोधमे कर्मचारीक हड़ताल। महगीक कारण अछि नोकरी दि‍स झुकनाइ आ खेतीक ह्रास। भू-सम्‍पत्ति‍क ह्रास, दान दहेज झर-झंझटक बढ़ोतरी। बिआहक लाम-झाम, पैसाक दुरूपयोग। कला प्रेमी धन सम्‍पत्ति‍केँ तुच्‍छ बुझै छथि। कौरनेटि‍याक संग कओलेजक लड़की, जे नाच-गान सि‍खैत, चलि‍ गेलि‍। झर-झंझटमे पोकेटमारी सेहो, सरकारी पदाधि‍कारीक बाजैपर रोक। अपहरणक बढ़ोत्तरी, रंग-वि‍रंगक अपहरणोक कारण ि‍सर्फ पाइये नै जानोक खेलवाड़। सरकारी अफसरक नैति‍क ह्रास। चम्‍मछक घटना, सरकारी तंत्र कमजोर भेने असुरक्षाक वृद्धि‍। समाजक वि‍घटनमे जाति‍, सम्‍प्रदाय इत्‍यादि‍क योगदान, जइसँ इज्‍जत-आवरू धरि‍ खतरामे। सि‍नेमाक प्रभावसँ नव पीढ़ी अपन सभ कि‍छु- कुल-खनदान-बेवहार छोड़ि‍ बाहरी हवाक अनुकरणमे पगला रहल अछि‍। ढहैत सामंतमे संस्‍कारक छाप। इनार-पोखरि‍ स्‍त्रीगणक झगड़ाक अड्डा। मि‍थि‍ला नारी शक्‍ति‍क प्रतीक सीता। दहेजक मारि‍मे जाति‍-पाँति‍क नास। धन-सम्‍पत्ति‍ आचार-वि‍चार नष्‍ट करैत कोट-कचहरीक चपेटमे समाज, आपसी झगड़ाक कुप्रभाव। नवयुवकमे आत्मबलक अभाव, नारीक बीच असीम धैर्य, बाल-वि‍धवा मनुष्‍यपर समाजक प्रभाव। पढ़लो-ि‍लखल कारगरो लड़कीक मोल दहेजक आगू चौपट अछि‍। ओना पुरूषक अपेक्षा नारीक महत्‍व, पुरूष प्रधान व्‍यवस्‍थामे कम रहल गहना-जेबर सेहो अहि‍तकर। नव पीढ़ीक नारीमे नव उत्‍साहक जरूरत। नव-नव काज सि‍खैक हुनर। दोसर अंक- सामंती व्‍यसन- भांग। नव पीढ़ी सेहो प्रभावि‍त। श्रम चोर मि‍हनतसँ मुँह चोराएब। भाग्‍य-भरोसपर बि‍सवास। धनक प्रभावसँ परि‍वारक बि‍खरब। पि‍ता-पुत्रक बीच मतभेद बलजोरी वा फुसला कऽ लड़का-लड़की बिआह। खेतक लेन-देनमे घोखाधड़ी। जबूरि‍या, दोहरी रजि‍स्ट्री, घुसखोरी, कमाइ, प्रति‍ष्‍ठा। माइयो-बापक इच्‍छा रहैत जे बेटा घुस लि‍अए। नोकरीक वि‍रोध, पुरूष प्रधान व्‍यवस्‍थामे नारीक रंग-बि‍रंगक शोषण। पढ़ौने आरो समस्‍या। तेसर अंक - बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनीक कृषि‍पर दुष्‍प्रभाव, देशी उत्‍पादनक अभाव। दहेज समर्थक समाज आ दहेज वि‍रोधी समाज, दू तरहक समाज। परम्‍परा आ परम्‍परा वि‍रोधी नव जाग्रत समाज। खण्‍ड-पखण्‍डमे समाज टूटल। नव मनुष्‍यक सृजन, नव तकनीक, नव सोच आ नव काज पकड़ने बहुराष्‍ट्रीय प्रभावसँ परि‍वार, समाज आ कला संस्‍कृति‍पर दुष्‍प्रभाव, बेबस्‍था बदलने समाज बदलत। चारि‍म अंक- पाइ भेने वि‍चारोमे बदलाव जइसँ नव समाजक सूत्र पात-जन्‍म सेहो होइए। रामवि‍लास (मि‍स्‍त्री) मनुष्‍यक महत्‍व दैए जइसँ दहेजकेँ धक्का लगैए। पहि‍नेसँ मि‍थि‍लांचलक लोक बंगाल, असाम, नेपाल, ढाका, धरि‍ धनकटनी, पटुआ कटनीक लेल जाइत छल। शि‍क्षाक वि‍संगति‍, ओकरा मेटाएब। पाँचम अंक- आदर्श बिआह। नव चेतनाक जागरण जे बेबस्‍था बदलत। कम्‍प्रोमाइज- सामंती समाजमे टुटैत कृषि‍ आ कि‍सानी जीवन, नव पूँजीवादी समाजमे कृषि‍केँ पूँजी बनेबाक बेबस्‍था, बुद्धि‍जी‍वी आ श्रमिकक पलायनसँ गामक बि‍गड़ैत दशा, समन्‍वयवादी वि‍चार-दर्शन। झमेलि‍या बि‍आह- मि‍थि‍लाक समाजमे अबैत बि‍आह-संस्‍कारक प्रक्रि‍यामे रंग-बि‍रंगक बाहरी प्रभाव, बाहरी प्रभावसँ रंग-बि‍रंगक वि‍वाद, झमेलक जन्‍म, झमेलि‍याक रूपमे बि‍आह प्रक्रि‍यामे होइत वि‍वादक वि‍षद चर्च। वीरांगना- ग्रामीण जीवनक बजारोन्‍मुख हएब, सस्‍ता श्रम-शक्‍ति‍ भेटलासँ पूँजीपति‍ वर्ग द्वारा शोषण, श्रमक लूटसँ ग्रामीण लोक जानवरोसँ बत्तर जि‍नगी जीबए लेल मजबूर, रूपैयाक लालचमे नीच-सँ-नीच काज करबाक लेल तैयार लोक। तामक तमघैल- ढहैत सामंती समाजमे छि‍न्न-भि‍न्न होइत परि‍वार, रीति‍-नीति‍ एवं परि‍वारि‍क सम्‍बन्‍ध, छि‍न्न-भि‍न्न होइत परि‍वारक आर्थिक आधार। सतमाए- कोनो संबंध दोषपूर्ण नै होइ छै बल्‍कि‍ मनुष्‍यक बेबहार आ वि‍चारमे दोष होइत छैक, तही बेबहार आ वि‍चारक सम्‍यक चर्च करैत ‘सतमाए’क आदर्श-रूप प्रस्‍तुत कएल गेल अछि‍। कल्‍याणी- दि‍न-देखारे होइत अन्यायक प्रति‍ सजगताक उल्लेख करैत नारी जागरणक चि‍त्रण, बुनि‍यादी समस्‍या दि‍स इशारा करैत समस्‍याक समाधान हेतु पैघसँ पैघ दाम चुकबए पड़ैत अछि, तेकर चि‍त्रण। समझौता- समाजमे कृषि‍केँ पूँजी बनेबाक लेल टुटैत कृषि संस्‍कृति‍क बुनि‍यादी समस्‍याक वर्णन आ तकर नि‍दान लेल समझौता हेतु सम्‍यक सोचक जरूरति‍पर प्रकाश दैत ओकर महत्व ओ आवश्‍यकताक वर्णन। बेचन ठाकुर बेटीक अपमान आ छीनरदेवी: भ्रूण हत्या, महिला अधिकार (बेटीक अपमान) आ अन्धविश्वास (छीनरदेवी) पर आधारित दुनू नाटक मैथिली नाटककेँ नव दिशा दैत अछि। अधिकार: इन्दिरा आवास योजनाक अनियमितताकेँ आर.टी.आइ.(सूचनाक अधिकार) सँ देखार करैबला आ रिक्शासँ झंझारपुरसँ दिल्ली जाइबला असली चरित्र मंजूरक कथा अछि। विश्वासघात: नेशनल हाइवेक जमीनक मुआवजामे ढेर रास पाइ देल जाइ छै आ ओकरा हड़पै लेल पारिवारिक सम्बन्धक बलि चढ़ि जाइ छै। विदेह नाट्य उत्सव २०१२ मे भरत नाट्य शास्त्र आधारित नाटक रंगमंच संकल्पना आधारित गजेन्द्र ठाकुर लिखित आ श्री बेचन ठाकुर निर्देशित जादू-वास्तविकतावादी “उल्कामुख” मंचित कएल गेल, जे मैथिलीमे ऐ तरहक पहिल प्रयास छल, ऐमे मत्र अभिनेत्री लोकनिक माध्यमसँ नाटक मंचन भेल, ऐमे पुरुख पात्रक अभिनय सेहो महिला कलाकार द्वारा भेल। भरत नाट्यशास्त्रक आधारपर रंगमंचक ड्राइंग श्रीमती एस.एस.जानकी क छल। ऐ तरहक एकटा प्रयास संस्कृत रंगमंचपर चेन्नैमे कएल गेल छल। बेचन ठाकुर जी आधुनिक समकालीन विषयपर नाटक लिखै छथि आ उच्च कोटिक निर्देशक छथि। भरतक नाट्यशास्त्रपर आधारित मंच संकल्पनाकेँ पहिल बेर ई विदेह नाट्य उत्सव २०१२ मे मूर्तरूप देलन्हि। हिनकर अनेक प्रयोगमे एकटा प्रयोग अछि पूर्ण रूपेण अभिनेत्री लोकनिक माध्यमसँ नाटक मंचन करब, जइमे पुरुख पात्रक अभिनय सेहो महिला कलाकार द्वारा भेल। आ ई ओ कतेको बेर केने छथि। आनंद कुमार झा टाटाक मोल : काटर प्रथापर आधारित नाटक। गरीबनाथ आ सुमि‍त्राक 'पुत्र कामनार्थ' पाँच गोट कन्‍या‍। पहि‍ले बेटीक वि‍वाहमे हुनकर बहुत खेत बि‍का गेलनि‍। दोसर बेटीक कन्‍यादानक लेल मात्र बारह कट्ठा जमीन बाँचल छन्‍हि‍। बेटी प्रभा कॉलेजमे पढ़ैत छथि‍, अपन बहि‍नक देओर प्रभाकरसँ सि‍नेह करै छथि‍, छोट मांगल-चांगल भाए महीस चरबैत छन्‍हि‍। कलह :  आकाश बेरोजगार छथि‍। वि‍भाता सुमि‍त्रा अपन पुत्र राजीव लेल ज्‍येष्‍ठ पुत्रक संग यातना दैत छथि। एकटा अबोध नेनाक जन्‍म भेल.....। बदलैत समाज :  एकटा ब्‍लड कैंसर पीड़ि‍त घूरन जी अपन बीमार पुत्रक वि‍आह करा दैत छथि‍। हुनका ओना बूझल नै छलनि‍ जे पुत्र अवधेश ब्‍लड-कैंसरसँ पीड़ि‍त अछि‍। भजेन्‍द्र मुखि‍याक पुत्र अवधेशक मृत्‍युक भऽ गेलनि‍। अंतमे वि‍धवा शोभाक एकटा सच्‍चरि‍त्र युवक वीजेन्‍द्रसँ पुर्नवि‍वाहक कल्‍पना कएल गेल। धधाइत नवकी कनि‍याँक लहास : कि‍छु गहनाक खाति‍र शि‍खाक आत्‍महत्‍याक प्रयास। हठात् परि‍वर्त्तन : देशभक्‍ति‍ नाटक। नाट्य रंगमंच समिति सभ मिथियात्रिक(कोलकाता), झंकार (कोलकाता), मिथियात्रिक-झंकार (मिथियात्रिक आ झंकार क विलय उपरान्त बनल कोलकाताक संस्था), भंगिमा, पटना ; चेतना समिति, पटना, जमघट-, मधुबनी; मिथिला विकास परिषद, कोलकाता; अखिल भारतीय मिथिला संघ, कोलकाता; मिथिला कला केन्द्र, कोलकाता; मैथिली रंगमंच, कोलकाता; कुर्मी-क्षत्रिय छात्रवृत्ति कोष, कोलकाता; आल इण्डिया मैथिल संघ, कोलकाता; कर्ण गोष्ठी:जयन्त लोकमंच, कोलकाता; मिथिला सेवा संस्थान, कोलकाता; मिथि यात्रिक, कोलकाता; वैदेही कला मंच, कोलकाता; कोकिल मंच, कोलकाता;  मिथिला कल्याण परिषद, रिसरा, कोलकाता (निर्देशन मुख्य रूपसँ श्री दयानाथ झा द्वारा १९८२ ई.सँ। सम्प्रति श्री रण्जीत कुमार झा निर्देशन कऽ रहल छथि, ०८.०१.२०१२ केँ हुनकर निर्देशनमे तंत्रनाथ झा लिखित “उपनयनक भोज” मंचित भेल।) ; झंकार, कोलकाता; मिथिला सेवा समिति बेलुर, कोलकाता; उदय पथ, कोलकाता। मिथिला नाट्य परिषद (मिनाप), जनकपुर; रामानन्द युवा क्लब, जनकपुरधाम; युवा नाट्य कला परिषद (युनाप), परवाहा, धनुषा; आकृति (उपेन्द्र भगत नागवंशी), जनकपुर; रंग वाटिका, नेपाल; चबूतरा, शिरोमणि मैथिली युबा क्लब, गांगुली, भैरब, मैथिली सांस्कृतिक युबा क्लब, बौहरबा, श्री सरस्वती सांस्कृतिक नाट्य कला परिषद, गाम तिलाठी (सप्तरी, नेपाल); अरुणोदय नाट्य मंच, राजबिराज; सरस्वती नाट्य कला परिषद, मेंहथ, मधुबनी; मैथिली लोकरंग (मैलोरंग), दिल्ली; मिथिलांगन, दिल्ली। मधुबनीक पजुआरिडीह टोलमे श्रीकृष्ण नाट्य समिति श्री कृष्णचन्द्र झा रसिक, शिवनाथ झा आ गंगा झाक निर्देशनमे मैथिली नाटक मंचित होइत रहल अछि। सांस्कृतिक मंच, लोहियानगर, पटना; चित्रगुप्त सांस्कृतिक केन्द्र, जनकपुर; गर्दनीबाग कला समिति, पटना; मिथिलाक्षर, जमशेदपुर; मैथिली कला मंच, बोकारो; उगना विद्यापति परिषद, बेगूसराय; मिथिला सांस्कृतिक परिषद, बोकारो स्टील सिटी; भानुकला केन्द्र, विराटनगर; आंगन, पटना; नवतरंग, बेगूसराय; भारतीय रंगमंच, दरभंगा; भद्रकाली नाट्य परिषद, कोइलख, मिथिला अनुभूति दरभंगा, सरस्वती सांस्कृतिक नाट्यकला परिषद्, तिलाठी (सप्तरी); श्री हरगौरी नाट्य कला परिषद, तिलाठी(सप्तरी), अरुणोदय नाट्य मंच (राजबिराज), विदेह अंतर्राष्ट्रीय मैथिली ई-जर्नलक नाट्य उत्सव। निर्देशन: कालीकान्त झा "बूच", कामदेव पाठक, श्री कमल नारायण कर्ण (चीनीक लड्डू-ईशनाथ झा/ चारिपहर- मूल बांग्ला किरण मैत्र, मैथिली अनुवाद- निरसन लाभ), श्री श्रीकान्त मण्डल (चन्द्रगुप्त मूल बांग्ला डी.एल.राय, मैथिली अनुवाद- बाबू साहेब चौधरी/ पाथेय- गुणनाथ झा/ नायकक नाम जीवन- नचिकेता); श्री विष्णु चटर्जी आ श्री श्रीकान्त मण्डल (निष्कलंक- जनार्दन झा); प्रवीर मुखोपाध्याय; वीणा राय, मोहन चौधरी, बाबू राम सिंह, गोपाल दास, कुणाल, रवि देव, दयानाथ झा, त्रिलोचन झा, शम्भूनाथ मिश्र, काशी झा, अशोक झा, गंगा झा, गणेश प्रसाद सिन्हा, नवीन चन्द्र मिश्र, जनार्दन राय, श्री कृष्णचन्द्र झा रसिक, शिवनाथ झा, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, अखिलेश्वर, सच्चिदानन्द, रमेश राजहंस, मोदनाथ झा, विभूति आनन्द, जावेद अख्तर खाँ, कौशल किशोर दास, प्रशान्त कान्त, अरविन्द रंजन दास, मनोज मनु, रोहिणी रमण झा, भवनाथ झा, उमाकान्त झा, लल्लन प्रसाद ठाकुर, रघुनाथ झा किरण, महेन्द्र मलंगिया, कुमार शैलेन्द्र, विनीत झा, किशोर कुमार झा, कुमार गगन, विनोद कुमार झा, के.अजय, छत्रानन्द सिंह झा, नीलम चौधरी, काजल, मनोज कुमार पाठक, आशनारायण मिश्र, श्री श्रीनारायण झा, प्रमिला झा, तनुजा शंकर, केशव नन्दन, ब्रह्मानन्द झा, संजीव तमन्ना, किसलय कृष्ण, प्रकाश झा, मुन्नाजी संजय कुमार चौधरी, कमल मोहन चुन्नू, अंशुमान सत्यकेतु, श्याम भास्कर, प्रेम कुमार, संगम कुमार ठाकुर, एल.आर.एम. राजन, भास्करानन्द झा, आशुतोष कुमार मिश्र, आनन्द कुमार झा, मनोज मनुज, संजीव मिश्र, स्वाति सिंह, स्वर्णिम, आशुतोष यादव अभिज्ञ, अशोक अश्क, दिलीप वत्स, तरुण प्रभात, माधव आनन्द, नरेन्द्र मिश्र, भारत भूषण झा, किशोर केशव, बेचन ठाकुर, उपेन्द्र भगत नागवंशी, अनिल चन्द्र झा, अंशुमान सत्यकेतु, आनंद कुमार झा, हेमनारायण साहू, रामकृष्ण मंडल छोटू, धीरेन्द्र कुमार,उत्पल झा, अभिषेक के. नारायण, चन्द्रिका प्रसाद, नागेन्द्र झा। जातिवादी रंगमंचक प्रतिनिधि नाटक- छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल -(समीक्षा गजेन्द्र ठाकुर) छुतहा घैल मैथिलीक जातिवादी रंगमंचक स्वघोषित सेक्सपियर महेन्द्र मलंगियाक नवीन नाटकक नाम छन्हि। ऐ छोटसन नाटकक भूमिका ओ दस पन्नामे लिखने छथि। पहिने ऐ भूमिकापर आउ। हुनका कष्ट छन्हि जे रमानन्द झा “रमण” हुनका सुझाव देलखिन्ह जे “छुतहर घैल”केँ मात्र “छुतहर” कहल जाइ छै। से ओ तीन टा गप उठेलन्हि- पहिल- “तों कहियो पोथी के लेखी, हम कहियो अँखियन के देखी।” दोसर- यात्री जीक विलाप कविता- “काते रहै छी जनु घैल छुतहर आहि रे हम अभागलि कत बड़।” आ कहै छथि जे ओइ कविताक विधवा आ ऐ नाटकक कबूतरी देवीकेँ शिवक महेश्वरो सूत्र आ पाणिनीक दश लकारसँ (वैदिक संस्कृत लेल पाणिनी १२ लकार आ लौकिक संस्कृत लेल दस लकार निर्धारित कएने छथि..खएर…) कोन मतलब छै? तेसर ओ अपन स्थितिकेँ कापरनिकस सन भेल कहैत छथि, जे लोकक कहलासँ की हेतै आ गाम-घरमे लोक “छुतहर घैल” बजिते छैक!! मुदा ऐ तीनू बिन्दुपर तीनू तर्क मलंगियाजीक विरुद्ध जाइ छन्हि। “अँखियन देखी” आ लोकव्यवहार “छुतहर” मात्र कहल जाइत देखलक आ सुनलक अछि, घैलचीपर छुतहरकेँ अहाँ राखि सकै छी? लोइटसँ बड़ैबमे पान पटाओल जाइ छै तखन मलंगियाजीक हिसाबे ओकरा “लोइट घैल” कहबै। घैल, सुराही, कोहा, तौला, छुतहर, लोइट, खापड़ि, कुड़नी, कुरवाड़, कोसिया, सरबा, सोबरना, ऐ सभ बौस्तुक अलग नामकरण छै। फूलचन्द्र मिश्र “रमण” (प्रायः फूलचन्द्रजी “छुतहा घैल” शब्दक सुझाव हँसीमे देने हेथिन्ह, आ जँ नै तँ ई एकटा नव भाषाक नव शब्द अछि!!)क सुझाव मानैत मलंगिया जी “छुतहर घैल” केँ “छुतहा घैल” कऽ देलन्हि, ई ऐ गपक द्योतक जे हुनका गलतीक अनुभव भऽ गेलन्हि मुदा रमानन्द झा “रमण”क गप मानि लेने छोट भऽ जइतथि से खुट्टा अपना हिसाबे गाड़ि देलन्हि। आ बादमे रमानन्द झा “रमण” चेतना समितिसँ ओइ पोथीकेँ छपेबाक आग्रह केलखिन्ह आ, चेतना समिति मात्र २५टा प्रति दैतन्हि तेँ ओ अपन संस्था मैलोरंगसँ एकरा छपबेलन्हि, ऐ सभसँ पाठककेँ कोन सरोकार? आब आउ यात्रीजीक गपपर, यात्रीजीकेँ हिन्दी पाठकक सेहो ध्यान राखऽ पड़ै छलन्हि, हुनका मोनो नै रहै छलन्हि जे कोन कविता हिन्दीमे छन्हि, कोन मैथिलीमे आ कोन दुनूमे, से ओ छुतहर घैल लिखि देलन्हि, एकर कारण यात्रीजीक तुकबन्दी मिलेबाक आग्रहमे सेहो देखि सकै छी। आ फेर आउ कॉपरनिकसपर, जँ यात्री जी वा मलंगिया जी “घैल छुतहर”, “छुतहर घैल” वा “छुतहा घैल” लिखिये देलन्हि तँ की नेटिव मैथिली भाषी छुतहरकेँ, “घैल छुतहर”, “छुतहर घैल” वा “छुतहा घैल” बाजब शुरू कऽ देत? से कॉपरनिकस सेहो मलंगियाजीक विरुद्ध छथिन्ह। कॉपरनिकसक किंवदन्तीक सटीक प्रयोग मलंगियाजी नै कऽ सकलाह, प्रायः ओ गैलिलीयो सँ कॉपरनिकसकेँ कन्फ्यूज कऽ रहल छथि, कॉपरनिकसक सिद्धान्तक समर्थन पोप द्वारा भेल छल आ कॉपरनिकस पोप पॉल-३ केँ अपन हेलियोसेन्ट्रिक सिद्धान्तक चालीस पन्नाक पाण्डुलिपि समर्पित केने रहथि। मलंगियाजी सनसनीखेज साहित्य पढ़बामे रुचि लै छथि, अमिताभ बच्चनक शराबी आदि फिल्मक डायलोगक दर्श हुनकर नाटकमे भऽ जाएत, प्रायः ओ ई नाटककेँ चहटगर बनबैले करैत हेता! खएर मलंगियाजीक विज्ञानक प्रति अनभिज्ञता आ विज्ञानक सिद्धान्तकेँ किवदन्तीसँ जोड़बाक सोचपर अहाँकेँ आश्चर्य नै हएत जखन अहाँ हुनकर खाँटी लोककथा सभक अज्ञानताकेँ अही भूमिकामे देखब। “अली बाबा आ चालीस चोर”- सम्पूर्ण दुनियाँकेँ बुझल छै जे ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि जे “अरेबियन नाइट्स (१००१ कथा)” मे संकलित अछि आ ओइमे विवाद अछि जे ई अरेबियन नाइट्समे बादमे घोसियाएल गेल वा नै, मुदा ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि, ऐ मे कोनो विवाद नै अछि। बलबनक अत्याचार आदिक की की गप साम्प्रदायिक मानसिकता लऽ कऽ मलंगिया जी कहि जाइ छथि से हुनकर लोककथाक प्रति सतही लगाव मात्रकेँ देखार करैत अछि। “मिथिला तत्व विमर्श” वा “रमानाथ झा”क पंजीक सतही ज्ञान बहुत पहिनहिये खतम कऽ देल गेल अछि, आ तेँ ई लिखित रूपसँ हमरा सभक पंजी पोथीमे वर्णित अछि जे गोनू झा संस्कृत आ अवहट्ठ बला ब्राह्मण विद्यापति ठक्कुर सँ ३०० बर्ख पहिने भेलाह आ मैथिली पदावली बला नौआ ठाकुर महाकवि विद्यापति सँ २०० बर्ख पहिने। मुदा मलंगियाजी ५० साल पुरान गप-सरक्काक आधारपर आगाँ बढ़ै छथि। हुनका बुझल छन्हि जे गोनूकेँ धूर्ताचार्य कहल गेल छन्हि मुदा संगे गोनूकेँ महामहोपाध्याय सेहो कहल गेल छन्हि, से हुनका नै बुझल छन्हि!! गोनू झाक समयमे मुस्लिम मिथिलामे रहबे नै करथि तखन “तहसीलदारक दाढ़ी” कतऽ सँ आओत, लोकक कण्ठमे छुतहर छै ओकरा “छुतहा घैल” कऽ दियौ, लोकक कण्ठमे “कर ओसूली”करैबलाक दाढ़ी छै ओकरा “तहसीलदार”क दाढ़ी कहि साम्प्रदायिक आधारपर मुस्लिमकेँ अत्याचारी करार कऽ दियौ, आ तेहेन भूमिका लिखि दियौ जे रमानन्द झा “रमण” आ आन गोटे डरे समीक्षा नै करताह। एकटा पैदल सैनिक आ एकटा सतनामी (दलित-पिछड़ल वर्ग द्वारा शुरू कएल एकटा प्रगतिवादी सम्प्रदाय)क झगड़ासँ शुरू भेल सतनामी विद्रोह औरंगजेबक नीतिक विरोधमे छल आ ओइमे मस्जिदकेँ सेहो जराओल गेलै, मुदा गोनू झाक कर ओसूली अधिकारी मुस्लिम नै रहथि, लोककथामे ई गप नै छै, हँ जँ साम्प्रदायिक लोककथाकार कहल कथामे अपन वाद घोसियेलक आ लिखै काल बेइमानी केलक तँ तइसँ मैथिली लोककथाकेँ कोन सरोकार? फील्डवर्कक आधारपर जँ लोककथाक संकलन नै करब तँ अहिना हएत। से मलंगियाजी बलबनक अत्याचार क कथा “अलीबाबाक..”क कथाकेँ कहै छथि! महेन्द्र नारायण राम लिखै छथि जे लोककथामे जाइत-पाइत नै होइ छै, मुदा मलंगियाजी से कोना मानताह। भगता सेहो हुनकर कथामे एबे करै छन्हि। आ असल कारण जइ कारणसँ ई मलंगिया जीक नाटकक अभिन्न अंग बनि जाइत अछि से अछि हुनकर आनुवंशिक जातीय श्रेष्ठता आधारित सोच। हुनकर नाटकमे मोटा-मोटी अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक घीच तीरि कऽ सत्रहटा दृश्य अछि, जइमे पन्द्रहम दृश्य धरि ओ छोटका जाइतक (मलंगियाजीक अपन इजाद कएल भाषा द्वारा) कथित भाषापर सवर्ण दर्शकक हँसबाक, आ भगताक भ्रष्ट-हिन्दीक माध्यमसँ छद्म हास्य उत्पन्न करबाक अपन पुरान पद्धतिक अनुसरण करै छथि। कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह ओ सोलहम दृश्यसँ करै छथि मुदा बाजी तावत हुनका हाथसँ निकलि जाइ छन्हि। आइ जखन संस्कृत नाटकोमे प्राकृत वा कोनो दोसर भाषाक प्रयोग नै होइत अछि, मलंगियाजीक भरतकेँ गलत सन्दर्भमे सोझाँ आनब संस्कृतसँ हुनकर अनभिज्ञताकेँ देखार करैत अछि आ भरत नाट्यशास्त्रपर हिन्दीमे जे सेकेण्डरी सोर्सक आधारपर लोक सभ पोथी लिखने छथि, हुनका द्वारा तकरे कएल अध्ययन सिद्ध करैत अछि। मलंगियाजीक ई कहब अछि जे नाटक जँ पढ़बामे नीक अछि तँ मंचन योग्य नै हएत, वा मंचन लेल लिखल नाटक पढ़बामे नीक नै लागत? हुनकर संस्कृत पाँतीकेँ उद्घृत करबासँ तँ यएह लगैत अछि। जँ नाटक पढ़बामे उद्वेलित नै करत तँ निर्देशक ओकर मंचनक निर्णय कोना लेत? आ मंचीय गुण की होइ छै, अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक सत्रहटा दृश्य, तथाकथित निम्न वर्गकेँ अपमानित करैबला जातिवादी भाषा, भगताक “बुझता है कि नहीं?” बला हिन्दी आ ऐ सभक सम्मिलनक ई “स्लैपस्टिक ह्यूमर”? आ जे एकर विरोध कऽ मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक परिकल्पना प्रस्तुत करत से भऽ गेल नाटकक पठनीय तत्त्वक आग्रही आ जे पुरातनपंथी जातिवादी अछि से भेल नाटकक मंचीय तत्वक आग्रही!! की २१म शताब्दीमे मलंगियाजीक जाति आधारित वाक्य संरचना संस्कृत, हिन्दी वा कोनो आधुनिक भारतीय भाषाक नाटकमे (मैथिलीकेँ छोड़ि) स्वीकार्य भऽ सकत? आ जँ नै तँ ऐ शब्दावली लेल १८०० बर्ष पुरनका संस्कृत नाटकक गएर सन्दर्भित तथ्यकेँ, मूल संस्कृत भरत नाट्यशास्त्र नै पढ़ैबला नाटककार द्वारा, बेर-बेर ढालक रूपमे किए प्रयुक्त कएल जाइए? माथपर छिट्टा आ काँखमे बच्चा जँ कियो लेने अछि तँ ओ निम्न वर्गक अछि? ओकर आंगनक बारहमासामे ओ ऐ निम्न वर्गकेँ राड़ कहै छथि, कएक दशक बाद ई धरि सुधार आएल छन्हि जे ओ आब ओइ वर्गकेँ निम्न वर्ग कहि रहल छथि, ई सुधार स्वागत योग्य मुदा ऐ दीर्घ अवधि लेल बड्ड कम। बबाजी कोना कथामे एलै आ गाजा कोना एलै आ ओइसँ बगियाक गाछक बगियाक कोन सम्बन्ध छै? मलंगियाजी अपन जाति-आधारित वाक्य संरचना, आ भ्रष्ट-हिन्दी मिश्रित वाक्य रचना कोना घोसिया सकितथि जँ भगता आ निम्न वर्गक छद्म संकल्पना नै अनितथि? ई तथ्य ओ बड्ड चतुराइसँ नुकेबाक प्रयास करै छथि, आ तेँ ओ मेडियोक्रिटीसँ आगाँ नै बढ़ि पबै छथि। निम्न वर्गक स्त्रीक जांघक तिल गोनूकेँ देखेबा लेल आ स्वयं देखबा लेल मलंगिया व्यग्र छथि, थोपड़ी चाही!! ऐ तरहक जातिवादी नाटकक शृंखलाक पाँती लगेने छथि मलंगिया, आ हुनकर जातिवादी रंगमंचसँ मैथिलीकेँ जतेक नुकसान पहुँचबाक छलै, जे भोग मैथिलीकेँ भोगबाक छलै ओ मैथिली प्राप्त कऽ लेने अछि! गुणनाथ झा ठीके कहै छथि जे आशा छल जे मलंगियाजी उमेरक संग आधुनिक नाटक आ रंगमंचकेँ बुझि जेता, मुदा से नै भऽ सकल। मलंगियामे ऐ नाट्य-कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह तँ छन्हि मुदा सामर्थ्य नै आबि पबै छन्हि। गजेन्द्र ठाकुर चारिटा अंग्रेजी नाटक- डॉक्टर फॉस्टस, सैमसन एगोनिस्टेस, मर्डर इन द कैथेड्रल आ स्ट्राइफ ऐ‍ निबन्धक आधार अछि परशुराम झाक “डाइमेन्शन्स ऑफ पीस इन इंग्लिश ड्रामा- स्टडीज इन डॉक्टर फॉस्टस, सैमसन अगोनिस्टेस, मर्डर इन द कैथेड्रल एण्ड स्ट्राइफ”। परशुराम झा १९३८- गाम- मेंहथ (मधुबनी), कृति- डाइमेन्शन्स ऑफ पीस इन इन्गलिश ड्रामा, क्रिश्चियन पोएटिक ड्रामा। परशुराम झा अंग्रेजी साहित्यक आजीवन अध्यापन केने छथि। डॉक्टर फॉस्टस एलिजाबेथ युगक, सैमसन एगोनिस्टेस एज ऑफ रीजनक, मर्डर इन द कैथेड्रल आधुनिक युगक नाटक अछि। ई तीनू मुख्यतः धार्मिक नाटक अछि। स्ट्राइफ आधुनिक धर्मनिरपेक्ष नाटक अछि, ई सिद्ध करैत अछि जे धर्मनिरपेक्षता धर्मसँ निकलल अछि, कम-सँ-कम धर्मक नैतिक सन्दर्भसँ। डॉक्टर फॉस्टस (द ट्रैजिकल हिस्ट्री ऑफ द लाइफ एण्ड डेथ ऑफ डॉक्टर फॉस्टस) क्रिस्टोफर मारलोवे (१५६४-१५९३) लिखित अछि। क्रिस्टोफर मारलोवे सेक्सपियर(१५६४-१६१६)क समकालीन छलाह। क्रिस्टोफर मारलोवेकेँ कोनो आपत्तिजनक पाण्डुलिपि लेल प्रिवी काउन्सिल द्वारा वारन्ट जारी कऽ बजाओल गेल आ तकर दस दिन बाद हुनकर चक्कू मारि हत्या कऽ देल गेल, तखन ओ मात्र २९ बर्खक छलाह। ओ जँ अपन सम्पूर्ण जिनगी जिबितथि तँ सेक्सपियरसँ पैघ नाटककार होइतथि वा नै से इतिहासक गर्भमे नुकाएल रहि गेल। ई नाटक ब्लैंक वर्स आ गद्य मिश्रित अछि। ब्लैंक वर्समे मीटर रहै छै मुदा लय नै। मारलोवेक जीवन कालमे एकर मंचन भेल मुदा एकर प्रकाशन हुनकर मृत्युक एगारह बर्खक बाद भेल। सैमसन अगोनिस्टेस (सैमसन, प्रतियोगी-योद्धा) जॉन मिल्टन (१६०८-१६७४) लिखित दुखान्त क्लोजेट पद्य-नाटक अछि। क्लोजेट नाटक तकरा कहल जाइत छै जे मंचन लेल नै वरन् असगर पढ़बा लेल लिखल जाइ छै वा किछु गोटे संगे जोर-जोरसँ पढ़ि कऽ सुनबा-सुनेबा लेल। मर्डर इन द कैथेड्रल टी.एस. इलियट (१५६४-१५९३) लिखित पद्य-नाटक अछि। स्ट्राइफ (कटु संघर्ष) जॉन गाल्सवर्दी (१८६७-१९३३) लिखित नाटक अछि। डॉक्टर फॉस्टस - क्रिस्टोफर मारलोवे १५९२ ई.मे “इंग्लिश फाउस्ट बुक”मे किछु घटोत्तरी-बढ़ोत्तरी कऽ “डॉक्टर फाउस्टस” नाटक रचित भेल, जे आेइ युगक वास्तविकताकेँ देखबैत अछि। डॉक्टर फॉस्टस “मेडिएवल मिस्ट्री प्ले”, "मोरेलिटी प्ले” आ “इन्टरल्यूड”सँ सम्बन्धित अछि- कथ्य आ रूप दुनूमे। फेर फॉस्टसक “असीमित ज्ञान”, “लौकिक आनन्द” आ “शक्ति”क लेल अदम्य लालसा ऐ‍ नाटककेँ पुनर्जागरणक आत्माक निकट लऽ जाइत अछि। फॉस्टसक पहिल प्रवेश ओकरा लेल दूटा विकल्प लऽ अबैत अछि। ओकरा आध्यात्मिक जीवन चुनबाक छै आकि लौकिक। ओकरा नै खतम हुअएबला आनन्द चाही आकि आध्यात्मिक अंधकूप आ मुत्यु। ओकरा अपन इच्छाक पालन करबाक छै आकि भगवानक। ओ ज्ञानी अछि, एरिस्टोटलक तर्क चिन्तन ओ पढ़ने अछि, रोग-व्याधि दूर करैबला चिकित्साशास्त्र ओ जनैत अछि। ओ धर्मशास्त्रमे डॉक्टरेट अछि। मुदा ई सभ ज्ञान ओकरा शान्ति आ आनन्द नै दै छै। मुदा ओ चुनैए जादू आ लौकिक इच्छाक तृप्तिक रस्ता। ऐ‍ जादूक चयन कऽ ओ “भरोस”पर भरोस छोड़ि दैए। फॉस्टसक लौकिक इच्छा छै वेस्ट इंडीजक आ अमेरिकाक (जे मारलोवेक समैमे इंडिया कहल जाइ छल) सोना, पूर्वक मोती, नीक फल। ओकर इच्छाक लेल जादूगर वाल्डेस आ कॉरनेलियस छै। नाटकक बादक भागमे मेफिस्टोफिलिसक आगमन होइ छै- फॉस्टस ओकरासँ कहैत अछि जे ओ लूसीफरकेँ सूचित करए जे फॉस्टस अपन आत्माक बदलेन लौकिक भोग लेल करबाक लेल तैयार अछि। “नीक दूत”क फॉस्टसकेँ सुझाव जे ओ स्वर्ग आ स्वर्गीय वस्तुक विषयमे सोचए, फॉस्टस “खराप दूत”क सलाह मानि धनक इच्छा करैए। अपन आत्माक निलामीक बंधकपत्र अपन खूनसँ लिखैत अछि फॉस्टस। लूसीफरकेँ अपन आत्मा समर्पित कऽ दैत अछि ओ। मेफिस्टोफिलिस ओकरा नर्कक विषयमे कहैत अछि मुदा ओ आेइपर धि‍यान नै दऽ “सुतनाइ”, “खेनाइ” आ “चलनाइ”पर धि‍यान दैत अछि। बहस केनाइ, ज्ञानक संचय, खगोलशास्त्र आ वनस्पतिशास्त्रक ज्ञान आ सौन्दर्यशास्त्र ई सभ मेफिस्टोफिलिसक सहयोगसँ फॉस्टस प्राप्त करैत अछि। फॉस्टसक लैंगिक इच्छाक पूर्तिक पहिने मेफिस्टोफिलिस ओकरा बुझबैत अछि मुदा ओकर मानलापर ओ एकटा “खराप आत्मा”केँ स्त्री बना फॉस्टसक पत्नीक रूप दैत अछि। “खराप आत्मा” कोनो मृत व्यक्तिक अनुकरण कऽ सकैए मुदा स्वयं जीवित नै भऽ सकैए। से तकर परिणाम ई भेल जे ओकर ठोढ़ फॉस्टसक आत्माकेँ चूसि लैत छै। “खराप आत्मा”सँ संसर्गक पाप फॉस्टस करैए आ परिणाम छै ओकर आध्यात्मिक मृत्यु। ओ भगवानसँ दूर भऽ जाइए आ ओ “खराप आत्मा” संगे चौबीस बर्ख बितेबाक लेल रस-रंगमे डूमि जाइए। मुदा जखन ओकर मृत्युक बॉन्डक समए निकट अबै छै, ओ कहैए- “हम जे जिबितौं एकरा सबहक संग तँ स्थिर जीवन जिबितौं मुदा आब मरब तँ सदा लेल मरि जाएब”। आ ओकर अन्तिम क्षण- जखन ओकर मृत्यु हेबाक छै तकर पूर्व- बारह बजेक घड़ीक टिकटिक। ओ दुखी भऽ कहैए- “ओकर आत्मा अखनो जीबए नर्कमे रहबाक लेल” मुदा... ओ विद्वान् सभकेँ कहैए- ओ साँप जे ईवकेँ प्रलोभित केलक से बचि सकैए मुदा फॉस्टस नै। ओ पश्चातापो नै कऽ सकैए, ओकरा क्षमा नै कएल जा सकै छै, पवित्र नै कएल जा सकै छै। ओ स्वीकार करैए जे ओ भगवानकेँ अपमानित केने अछि। सैमसन एगोनिस्टेस- जॉन मिल्टन नाटकक प्रारम्भमे सैमसनकेँ आन्हर कऽ गाजाक जेलमे श्रम मजदूरी लेल हेबाक आ एक गोटे द्वारा जेलक सोझाँक चमकैत किनारपर लऽ जएबाक दृश्य अछि। ई एकटा छुट्टीक दिन छल, कारण छल फिलिस्तीनक भगवान डेगोनक, जे अदहा मनुक्ख आ अदहा माँछ छथि, केर भोज छै। बसात लगलासँ सैमसन अपनामे ऊर्जाक संचार पबैए। ओकरामे स्वर्गसँ भेटल शक्ति छै जे फिलिस्तीनक परतंत्रतासँ इस्रायलकेँ मुक्ति दिएबा लेल छै। मुदा तखने ओकरा लगै छै जे भगवान ओकरा जतेक शक्ति देलनि ततेक बुद्धि नै देलनि, नै तँ ओ ओतेक जल्दी अपन शक्तिक रहस्य डेलिलाकेँ नै बतबितै। मुदा भगवानक बुद्धिपर ओ कोनो बहस कोना कऽ सकैए, जे कि इच्छा छै ओकर। ओकर पिता मनोआ सैमसनकेँ जेलसँ बाहर निकालबाक एकटा योजना लऽ अबैत अछि। ओकर योजना जे फिलिस्तीनक सामन्तकेँ पाइ दऽ सैमसनकेँ छोड़बाबी, ई सैमसनकेँ नीक नै लगै छै, नै मानै अछि ओ। मनोआ ओकरा कहै छै जे फिलिस्तीन सभ भोजक क्रममे डेगनक प्रशंसा करत आ इस्रायलक भगवानक अपमान करत। ई सुनि सैमसन दुखी भऽ जाइए। ओ मनोआकेँ कहै अछि जे ओकरा कोनो आशंका नै छै जे इस्रायलक भगवान डेगोनपर विजय करत। मनोआक गेलापर ओ कोरसमे मुदा ई कहैए जे मुदा ओ कोना भगवान लेल काज कऽ सकत? डेलीला अबैए आ सैमसनकेँ कहैत अछि जे ओ फिलिस्तीनी सामन्तकेँ कहि ओकरा छोड़बाओत मुदा सैमसन ओकरा रहस्यकेँ खोलैवाली कहैए। हराफा सैमसनकेँ कहैत अछि जे भगवान सैमसनकेँ छोड़ि देने छथि। अधिकारी अबैत अछि आ ओ फिलिस्तीनक सामन्तक आदेश अनैत अछि जे सैमसनकेँ अपन करतब डेगनक भोजक अवसरपर देखेबाक छै। पहिने ओ मना करैए फेर किछु सोचि कऽ मानि जाइए। मिल्टन फिलिस्तीनीकेँ लौकिक आनन्दमे खसल आ डेगनकेँ आेइ लौकिक आनन्दक देवताक रूपमे देखबैत छथि। सैमसन दूटा खाम्हक बीचमे जाइत अछि, प्रार्थना करैत अछि आ भवनकेँ खसा दैत अछि। दूतक ऐ‍ वर्णनसँ सैमसनक पितामे शान्त प्रतिक्रिया होइत अछि। ओ कहैत छथि- दुखी होएबाक समए नै अछि। ओ अपन मुत्युसँ इस्रायल लेल सम्मान आ स्वतंत्रता अनने छथि। मर्डर इन द कैथेड्रल- टी.एस. इलियट मर्डर इन द कैथेड्रल कैंटरबरीक महिलाक कोरस स्वरसँ प्रारम्भ होइत अछि जइ‍मे प्रकृतिक स्वरूपक हितकारी नै हएब आ सुरेब नै हएब वर्णित अछि। दूत आर्कबिशपक इंग्लैंड आगमनक  सूचना दैत अछि। बेकेट फ्रांसमे सात बर्ख रहलाक बाद कैंटरबरी घुरैत छथि। एतए हुनका लेल बाहरी आ आन्तरिक दुनू स्तरपर संघर्ष छै। राज्यक आ धर्मक, राजा आ आर्कबिशपक संघर्ष तँ छैहे, आन्तरिक संघर्ष सेहो छै जे भीतरक इच्छा छै। ओ अपन भूतकालकेँ, जइ‍मे बैरन सबहक मित्रता आ चान्सलरशिप अबैत अछि, केँ “छाह” कहै छथि, ऐ‍सँ सेहो हुनका संघर्ष करबाक छन्हि। बेकेटक बाहरी शत्रु चारिटा “नाइट” तरुआरि भँजैत अबैत छथि। बेकेट तावत अपन आन्तरिक शत्रुपर विजय प्राप्त कऽ लेने छथि आ ओ शान्तिसँ “नाइट” सभकेँ कहै छथि- “अहाँ सबहक स्वागत अछि, चाहे अहाँक उद्देश्य जे हुअए”। ओ कहै छथि जे हुनका कहियो इच्छा नै भेलनि जे ओ राजाक पुत्रक मुकुट छीनि लैथि। नाइटक राजाक आदेश सुनेलापर जे ओ देश छोड़ि देथि, बेकेट कहै छथि जे आब नै। सात साल ओ अपन लोकसँ दूर रहलाह, सएह बेशी। ओ अपन हत्या कएल जएबासँ पूर्व नाइट सभसँ कहै छथि- “हमर अहाँ जे चाही करू मुदा हमर लोक अहाँकेँ छूबो नै करताह”। पुरोहित सभ हुनकर इच्छाक विरुद्ध हुनका जबरदस्ती कैथेड्रलक भीतर लऽ जाइ छथि आ चर्च बन्द कऽ दै छथि। मुदा बेकेट कहै छथि- “चर्च सर्वदा खुजल रहबाक चाही, शत्रुक लेल सेहो”। जखने चर्चक दरबज्जा खुजैत अछि मातल “नाइट” सभ बेकेटक हत्याक उद्देश्यसँ पैस जाइ छथि। बेकेटक हत्या भऽ जाइ छन्हि, पुरहित सभ भगवानकेँ धन्यवाद दइ छथि जे ओ कैंटरबरीमे एकटा आर सन्त देलनि। स्ट्राइफ- जॉन गाल्सवर्दी ट्रेनार्था टिन प्लेट वर्क्समे एकटा औद्योगिक विवादक कारण अक्टूबरसँ श्रमिकक हड़ताल प्रारम्भ भेल। चारि मासक बाद ७ फरबरीकेँ एकटा विशेष बोर्ड मीटिंग ऐ‍पर भेल, मैनेजर फ्रांसिस अंडरवुडक, जे कम्पनीक चेयरमेन जॉन एन्थोनीक जमाए छथि, डाइनिंग रूममे। ऐ‍ मीटिंगमे डाइरेक्टर फ्रेडरिक एच. वाइल्डर, विलियम स्कैंटलबरी, ओलीवर वैंकलिन आ एंथोनीक छोट पुत्र एडगर सेहो छथि। एडगर श्रमिकक दशासँ आहत छथि। मुदा वाइल्डर उग्र छथि कम्पनीक शेयर नीचाँ गेलासँ आ पचास हजारसँ बेसी घाटासँ ओ चिन्तित छथि। स्कैंटलबरी अहिंसाक पथिक छथि तँ वैंकलिन मध्यमार्गी छथि। एंथोनी मुदा श्रमिकक लेल कोनो सहानुभूतिक विरुद्ध छथि। वाइल्डर सुझाव दै छथि जे सेंट्रल यूनियनक हारनेसकेँ विवाद दूर करबा लेल कहल जाए मुदा एंथोनी मना करै छथि। वर्कमेन कमेटीक आन सदस्यक संग छथि रॉबर्ट्स, ओ एंथोनीक विरोध करै छथि। हारनेसक विपरीत ओहो उग्र छथि। एंथोनीक पुत्री एनिड पिताक वर्गान्तरक विरुद्ध छथि। हुनकर खबासनी एनी रोबर्ट्ससँ बिआहल छन्‍हि, एनीक सहायता एनिड करए चाहै छथि। एनिडक भेँट रॉबर्ट्ससँ ओकर झोपड़ीपर होइ छन्हि। ओ ओकरा समझौता लेल कहै छथि मुदा ओ एंथोनीकेँ आततायी कहै छथि। कहै छथि जे एंथोनी मरैत रहत आ रॉबर्ट्सक हाथ उठेलासँ जे ओकर जान बचि जेतै तँ रॉबर्ट्स अपन कंगुरिया आँगुरो नै उठाओत। श्रमिक मीटिंगमे रॉबर्ट्सक समर्थक इवान्स आ जॉन बलगिनमे झगड़ा भऽ जाइ छै। हेनरी थॉमस आगू अबैए आ कहैए–“लाज होइए तोहर “स्ट्राइफ”पर। बेरू पहरक मीटिंगमे ओ श्रीमती रॉबर्ट्सक मृत्युक सूचना दैत अपन सदस्यतासँ इस्तीफा देबाक गप करैत अछि। मुदा एंथोनी कहैए- युद्ध तँ युद्ध होइ छै। रॉबर्ट्स बोर्ड मीटिंगमे कनेक देरीसँ अबैए, ओकरा पता लगै छै जे ओकर श्रमिक सभ ओकरा हटा देलकै। आ एंथोनीकेँ सेहो निदेशक सभ हटा देलकै। हारनेसक नेतृत्वमे समझौताक गप आगाँ बढ़ै छै। हेनरी टेक, कंपनीक सचिव संतुष्ट छथि। हम पुछैत छी: विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक संस्थापक मैथिली नाटक आ रंगमंचक आइ धरिक सभसँ पैघ नाम बेचन ठाकुरसँ मुन्नाजीक गपशप गमैया नाटकक परि‍वेशजन्य आधुनिक मैथिली समानान्तर नाटक आ रंगमंचक सृजनकर्त्ता एवं नि‍स्वा‍र्थ भावनासँ रचनारत श्री बेचन ठाकुर जीसँ हुनक रचनात्मक प्रक्रि‍या मादे युवा विहनि कथाकार मुन्नाजी द्वारा कएल गेल वि‍भि‍न्न प्रश्नक उतारा अहाँ सबहक समक्ष देल जा रहल अछि‍। मुन्नाजी- प्रणाम ठाकुरजी! बेचन ठाकुर- प्रणाम मुन्ना भाय! मुन्नाजी- साहि‍त्यक मुख्य‍: दू गोट वि‍धाक एतेक रास प्रकारमे सँ अपने नाटकक सर्जनकेँ प्राथमि‍कता देलौं कि‍ए? एकर कोनो वि‍शेष कारण तँ नै अछि‍? अहाँक समानान्तर रंगमंच जे आन्दोलन शुरू कएने अछि ओकर मादेँ किछु कहए चाहब। बेचन ठाकुर- मुन्नाजी, अहाँकेँ तँ बुझले हएत जे मैथिलीमे जातिवादी रंगमंच, खास कऽ महेन्द्र मलंगिया (ओकर आंगनक बारहमासासँ लऽ कऽ छुतहा घैल धरिमे ई जातिवादी शब्दावली भरल अछि) आ हुनकर विचारधाराक लोक, कोन तरहेँ पत्र-पत्रिकाक माध्यमसँ आ सरकारी आ गएर सरकारी फण्ड आ सहयोगक माध्यमसँ गएर सवर्णक प्रति गारि आदिक प्रयोग कऽ रहल छथि, ओकर संस्कृतिकेँ तोड़ि कऽ प्रस्तुत कऽ रहल छथि, ओकरा लेल एहेन मैथिलीक प्रयोग कऽ रहल छथि जकरासँ ई सिद्ध हुअए जे ओ सभ मैथिली भाषी छथिए नै, कतौ बाहरसँ आएल छथि। आब मलंगियाक संस्था ई काज हिन्दीसँ मैथिलीमे अनूदित नाटकमे सेहो केलक, रामेश्वर प्रेमक नाटकक मैथिलीमे “जल डमरू बाजे” रूपमे घृणित अनुवाद आ मंचन भेल, गएर सवर्ण लेल तथाकथित छोटहा मैथिलीक प्रयोग कएल गेल, हिन्दीमे रामेश्वर प्रेम ऐ तरहक प्रयोग नै केने छथि, रामेश्वर प्रेम सेहो ई हेबऽ देबा लेल दोषी छथि। हिन्दी सन कोनो भाषा आ मैथिलीकेँ मिश्रित कऽ ओ लोकनि ई सिद्ध करबामे लागल छथि जे ईएह मिश्रित भाषा मिथिलाक भाषा छी, आ ऐ तरहेँ मैथिलीकेँ मारबा लेल बिर्त छथि; किछु थोपड़ीक लोभेँ सेहो ओ ई कऽ रहल छथि। ओना तँ जइ पत्रिका आ सरकारी-गएर सरकारी माध्यममे एकर चर्च होइए ओकर पढ़निहारक संख्या तँ शून्ये अछि मुदा ओ सभ जँ अहाँ पढ़ू तँ लागत जे जे अछि से जातिवादी रंगमंचे अछि, ओना ओ वास्तविकतामे मैथिली रंगमंचक दसो प्रतिशत नै अछि। आ यएह सभ कारण शुरूसँ विद्यमान छल जइ कारणसँ हम समानान्तर रंगमंच पछिला २५ सालसँ चलबैत रहलौं। मुदा एकर कोनो विवरण मैथिलीक जातिवादी पत्रिकामे नै आएल। मुदा जखन पहिल विदेह मैथिली नाट्य उत्सव २०१२ भेल तँ ९०% लोकक समानान्तर रंगमंचक धाह ओइ जातिवादी रंगमंचकेँ/ मानसिकताकेँ बुझा पड़ऽ लगलै। रामदेव झा अपन दूटा पुत्र विजयदेव झा आ शंकरदेव झाक संग मैदानमे आबि गेलाह आ अपशब्दक प्रयोगक शुरुआत केलन्हि। मलंगिया जी अपन दुनू पुत्र ललित कुमार झा आ ऋषि कुमार झाक संग मैदानमे आबि गेलाह आ अपशब्दक प्रयोगक शुरुआत केलन्हि। तँ दुनू गोटेमे (रामदेव झा आ महेन्द्र झा मलंगियामे) समानता फेर सोझाँ आबि गेल। जातिवादी रंगमंच साहित्य अकादेमी पुरस्कारक लेल मलंगियाक नाम उठेलक, कमल मोहन चुन्नू नाटककारकेँ नाटक लेल पुरस्कार देबाक गप केलन्हि आ महेन्द्र मलंगिया लेल ऐ पुरस्कारक अनुशंसा केलन्हि, ओ कहलन्हि जे आइ धरि ई नै भेल अछि जे मैथिलीमे नाटककारकेँ नाटक लेल पुरस्कार भेटल अछि, ओ रामदेव झाकेँ भेटल पुरस्कारकेँ खारिज करैत कहलन्हि जे रामदेव झाकेँ जइ नाटक- एकांकी लेल पुरस्कार भेटलन्हि से कथाकेँ कथोपकथनमे लिखल मेहनति मात्र अछि (मिथिला दर्शनमे हुनकर लेख)। आ जखन महेन्द्र मलंगियाकेँ जातिवादी रंगमंचक “मैथिली एकांकी संग्रह”क ठेका साहित्य अकादेमीसँ चन्द्रनाथ मिश्र “अमर”-रामदेव झा (ससुर-जमाएक जोड़ी)क अनुकम्पासँ भेटलन्हि तँ ओ मैथिलीक (जातिवादी रंगमंचक) १९ टा सर्वश्रेषठ एकांकीमे रामदेव झाक “पिपासा” लेने रहथि, आब लिअ, रामदेव झा सर्वश्रेष्ठ नाटककार भऽ गेलाह!! आ ओइ पोथीक भूमिकामे ओ चन्द्रनाथ मिश्र “अमर”-रामदेव झा केँ खुश रखबा लेल गोविन्द झा आ सुधांशु शेखर चौधरीक मजाक तँ उड़ेनहिये छथि संगमे राधाकृष्ण चौधरी आ मणिपद्मकेँ किए ओ ऐ संग्रहमे शामिल नै केलन्हि, ओइ लेल हास्यास्पद तर्क सेहो देने छथि। गुणनाथ झाकेँ ओ शामिल किए नै केलन्हि!! सर्वहाराक रंगमंचकेँ ओ शामिल किए करितथि, ई संकलन तँ जातिवादी रंगमंचक छल किने!! आ जँ अहाँ जातिवादी रंगमंचक विरोध करब तँ मलंगिया जीक दुनू बेटा ललित कुमार झा, ऋषि कुमार झा फोन नम्बर +२३४८०३९४७२४५३ सँ अहाँकेँ धमकी देत जेना ललित कुमार झा उमेश मण्डल जी केँ देलन्हि वा विजयदेव झा +९१९४७०३६९१९५ नम्बरसँ धमकी देत जेना ओ उमेश मण्डल जी केँ २६ अगस्त २०१२ केँ धमकी देलन्हि। आ आब अहाँ सोचमे पड़ि जाएब जे ई लोकनि कखन एक दोसराक पक्षमे आबि जाइ छथि आ कखन विरोधमे, कखन रामदेव झा नाटककार बनि जाइ छथि आ कखन खारिज भऽ जाइ छथि। जातिवादी रंगमंच आपसमे खण्ड-पखण्ड अछि, मुदा विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन आ विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक विरोधमे ई सभ एक भऽ जाइत अछि। कमल मोहन चुन्नूकेँ नाटककार जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ लघुकथा संग्रह “गामक जिनगी” लेल टैगोर साहित्य सम्मान भेटलासँ एतेक कष्ट भेलन्हि जे ओ एक बेर फेर “घर-बाहर”मे मलंगिया जीकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटए, से फतवा जारी कऽ देलन्हि ई कहि कऽ जे मलंगिया जी मैथिलीक (जातिवादी रंगमंचक दृष्टिकोणसँ) सर्वश्रेष्ठ नाटककार छथि, मुदा ऐबेर ओ ई सतर्की केलन्हि जे सर्वश्रेष्ठ समालोचक, लघुकथाकार आ कविक नाम सेहो जोड़लन्हि, आ हुनको सभकेँ साहित्य अकादेमी भेटए से चर्च कऽ देलन्हि, जे आरोप नै लागए। कहबाक आवश्यकता नै जे ऐ लिस्टक सभ समालोचक, लघुकथाकार आ कवि चुन्नू जीक ब्राह्मण जातिक छथि आ दोसरक हुनका पढ़ल नै छन्हि। सर्वहारा वर्ग नीक जेकाँ बुझि गेल जे ई साहित्य आ ई रंगमंच ओकरा लेल नै अछि, से ओ अपनाकेँ ऐसँ कात कऽ लेलक, आ जँ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन आ विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंच नै अबितए तँ मामिला खतमे छल। हम आगाँ २५ साल धरि ई समानान्तर रंगमंच चलबैत रहब। पछिला २५ सालमे जतेक सफलता भेटल अछि ओइसँ हम उत्साहित छी, अगिला पचीस सालमे जँ हम जातिवादी रंगमंचक किरदानीक कारण मैथिलीसँ भागल सर्वहारा वर्गक किछु आर गोटेकेँ मैथिलीसँ जोड़ि सकब आ जे काज हमरासँ छूटि जाएत से अगिला पीढ़ी करत। जातिवादी रंगमंच आब सरकारी आ गएर सरकारी संस्थाक हथियार बनि कऽ रहि गेल अछि, ई ढहब शुरू भऽ गेल अछि, किछु ऊपरी सुधार, नामे लेल सही, ई कऽ रहल अछि। हमर लक्ष्य अछि जे अगिला पचीस सालमे ई जड़िसँ खतम भऽ जाए। मुन्नाजी- अहाँक नाटकक कथानकमे केहेन स्थिति वा परि‍वेशक समावेश रहैए। बेचन ठाकुर- जखन हम परि‍वारक संग वा पड़ोसीक संग गमैया नाच वा नाटक देखैले जाइत रही तँ हुनके सभसँ प्रेरि‍त भऽ नाटकक प्रति‍ अभि‍रूचि‍ जागल आ दि‍नोदि‍न बढ़ैत रहल आ तँइ हमर नाटकक कथानकमे समाजक स्थिति-परि‍स्थिति आ ओकर यथासंभव समाधानक परि‍वेश रहैए। मुन्नाजी- अहाँ जहि‍या नाटक लेखन प्रारम्भ केलौं, कहू जे तहि‍या आ आजुक सामाजि‍क, सांस्कृिति‍क उपस्थापन वा बदलावक प्रति‍ अहाँक नजरि‍ये केहेन स्थि़‍ति‍ देखना जाइछ? बेचन ठाकुर- कओलेज जीवनसँ कि‍छु-कि‍छु लि‍खैक प्रयास करैत रहलौं जैमे नाटक मुख्य रहल। नाटकक दृष्टि‍एँ प्रारंभि‍क सामाजि‍क आ सांस्कृतिक स्थिति तथा आजुक स्थितिमे बड्ड अंतर देखना जाइए। गमैया नाटक जस-के-तस पड़ल अछि‍, कनी-मनी आगू घुसकल अछि‍। मुदा शहरी नाटक अपेक्षाकृत आगू अछि, मुदा ओतए सोचक अभाव अछि‍। मुन्नाजी- आइ नाटक कथानक, शि‍ल्प एवं तकनीकी दृष्टिकोणे उम्दा स्तरक प्राप्तिक संग थि‍येटरमे आबि जुमल अछि‍, अहाँ थि‍येटरमे प्रदर्शित आ गमैया नाटकक बीच कतेक फाँट देखै छी। आ कि‍ए? बेचन ठाकुर- कथानक, शि‍ल्प एवं तकनीकी दृष्टिएँ थि‍येटर आ गमैया नाटकमे बड्ड फाँट देखै छी। दर्शकक आ कलाकारक साक्षरता, स्त्री-पुरूषक भूमि‍का, साज-बाजक ओरि‍यान, इजोतक जोगार इत्यादि‍मे बड्ड फाँट अछि‍। फलस्वरूप गमैया नाटक अपेक्षाकृत पछुआएल रहि‍ गेल अछि मुदा विषय वस्तुमे ई आगाँ अछि‍। मुन्नाजी- गाममे आइयो बाँस-बत्ती आ परदाक जोगारे नाट्य प्रदर्शन होइछ आ दर्शक सेहो जुटैछ तँ अपने गमैया नाटक अतीतक दशा आ भवि‍ष्यक दि‍शा मादे की कहब? बेचन ठाकुर- गमैया नाटकक प्रदर्शनमे दर्शकक भीड़ रहैए। कारण गाम-घरमे मनोरंजनक साधनक सामूहि‍क स्तरपर अभाव छै। शहरक देखादेखी आब गामो-घरक स्थितिमे सुधार भऽ रहलैए। तैं गमैया नाटकक दशा भवि‍ष्यमे अवश्य सुधरत, वि‍श्वास अछि‍। मुन्नाजी- अहाँ एतेक रास वि‍भि‍न्न तरहक नाटक लि‍ख मंचन कैयौ कऽ हेराएल वा बेराएल रहलौं, कि‍ए? मलंगिया जीक रंगमंचक एकटा निर्देशक प्रकाश झा हमरा कहलन्हि जे अहाँ भरि दिन केश कटैत रहैत छी, रंगमंच अहाँ किए ने गेलिऐ! बेचन ठाकुर- हम एकटा नि‍जी शि‍क्षकक दृष्टिएँ अपन वि‍द्यार्थीक बौद्धि‍क वि‍कास हेतु अपन कोचिंगक प्रांगणमे कोनो वि‍शेष अवसरपर, तैमे खास कऽ सरस्वती पूजामे, रंगमंचीय सांस्कृति‍क कार्यक्रमक बेबस्था‍ करै छी जैमे अपन निर्देशनमे वि‍द्यार्थी द्वारा कार्यक्रम संपादि‍त होइए। ओइ तरहेँ दर्जनो नाटकक मंचन सराहनीय ढंगसँ भऽ चुकल अछि‍। मलंगियाजीक जातिवादी रंगमंचक विरोधमे समानान्तर रंगमंच अछि तँ अहाँ हुनका लोकनिसँ की आशा करै छी! (हँसैत) ओना हमर ठाकुर टाइटिल सँ हुनका लोकनिकेँ भेल हेतन्हि जे हम नौआ ठाकुर छी, तेँ ओ ई बाजल छथि। मुदा जँ किओ ई काज कऽ रहल छथि आ अपन संस्कृतिक रक्षा कऽ रहल छथि, जेना नौआ ठाकुर लोकनि, तँ की हर्ज। विद्यापति ठाकुर, जे बिस्फीक नौआ ठाकुर रहथि, केँ बिदापत नाचक माध्यमसँ जिआ कऽ राखलन्हि नौआ ठाकुर लोकनि, विद्यापति आ मैथिलीकेँ हजार साल धरि जिआ कऽ राखलन्हि, तँ ऐमे ककरो किए कष्ट छै? आब तँ ओ लोकनि विद्यापतिकेँ ब्राह्मण बनेबामे लागल छथि। ओना हम बरही जातिक छी, से महेन्द्र झा मलंगिया जी आ प्रकाश झा जीकेँ अहाँ भेँट भेलापर कहि देबन्हि। सूत्रक अभावमे हम हेराएल रही।  मुदा आब प्राप्त सूत्र आ बेबस्थाक कृतज्ञ छी। मुन्नाजी- अहाँ नाटकक अति‍रि‍क्त अओर की सभ लि‍खै छी, सभसँ मनलग्गू कोनो वि‍धाक कोन प्रकारक अहाँ प्रेमी छी आ कि‍ए? बेचन ठाकुर- हम नाटकक अति‍रि‍क्त विहनि कथा, लघुकथा, राष्ट्रीय गीत, भक्तिगीत, कवि‍ता, टटका घटनापर आधृत गीत इत्यादि‍ लि‍खबाक प्रयास करैत रहै छी। गोष्ठीमे उपस्थित भऽ कऽ कथा पाठो केलौंहेँ। सभसँ मनलग्गू वि‍धा  हमर संगीत अछि‍। ओना हमर प्रति‍ष्ठाक वि‍षय गणि‍त अछि‍। मुन्नाजी- जाति‍-वर्ग वि‍भेद अहाँक रचनाकेँ कतेक प्रभावि‍त कऽ पौलक अछि‍, अपने ऐ जातीय वि‍षमताक टापर-टोइयामे अपनाकेँ कतऽ पबै छी? बेचन ठाकुर- जाति‍-वर्ग वि‍भेद हमर रचनाकेँ अंशत: प्रभावि‍त केलक। ऐमे हम अपनाकेँ अपन जगहपर अड़ल पबै छी। मुन्नाजी- नाटक वा अन्यान्य रचनात्मक सक्रि‍यताक मादे अपनेक अगि‍ला रूखि‍ की वा केहेन रहत? बेचन ठाकुर- नाटक वा अन्यान्य रचनात्मक सक्रि‍यताक मादे अपन अगि‍ला रूखक संबंधमे कि‍छु नि‍श्चि‍त नै कहल जा सकैए, समानान्तर रंगमंच तँ चलिते रहत। इच्छा प्रबल अछि‍। जतए धरि‍ संभव भऽ सकत करब। मुन्नाजी- अपनेक अमूल्य उतारा हेतु बहुमूल्य समए देबाक लेल हार्दिक धन्यवाद! बेचन ठाकुर- अपनेक प्रश्नक यथासंभव जबाबसँ अपनाकेँ गौरवान्वित बुझि‍ अपनेकेँ हार्दिक धन्यवाद ज्ञापि‍त करैत हमरो अपार हर्ष होइए। बेचन ठाकुर द्वारा मैथिली नाटकक निर्देशन/ मंचन (भाग-१) सरस्‍वती पूजा १९९५ केर अवसरपर नाटक मंचन नाओं- रमेश डीलर स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज ि‍नर्माता ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र, कलाकार, पि‍ता आ गामक नाओं १. रमेश प्रधान          रामबाबू साह,          पि‍ता स्‍व. वि‍श्वनाथ साह, गाम- चनौरागंज २. सीताराम तेली      वि‍जय कुमार पासवान    पि‍ता स्‍व. कारी पासवान चनौरागंज ३. सुकन पासवान      बुद्धदेव कुमार          श्री पंचू महतो   .....    बेरमा ४. ढोलहा            रामकुमार पंजि‍यार      स्‍व. गोपाल पंजि‍यार     चनौरागंज ५. भोलाराम मण्‍डल     नवीन कुमार          श्री कामेश्वर मण्‍डल      चनौरागंज ६. मो. वासील        रामस्‍वरूप पासवान      श्री कपि‍लेश्वर पासवान    चनौरागंज ७. गुलाव चन्‍द्र ठाकुर    केशव कुमार          श्री हेमनारायण साह     नरहि‍या ८. श्‍याम मण्‍डल       चन्‍द्रदेव महतो         स्‍व. लक्ष्‍मी महतो        बेरमा ९. एम.ओ            रामनारायण राउत       श्री जागेश्वर राउत      चनौरागंज मंचनक सहयोगकर्त्ता- हारमोनि‍यम संगतकर्ता-   श्री भीखन महतो       चनौरागंज ढोलकि‍या-            श्री कारी पासवान       चनौरागंज मनोज कुमार पुर्वे       श्री रामावतार पुर्वे             चनौरागंज अमरेन्‍द्र कुमार         श्री ब्रज कि‍शोर साह    चनौरागंज शत्रुध्‍न प्रधान          श्री लक्ष्‍मी प्रधान        चनौरागंज गणेश ठाकुर          श्री लक्ष्‍मी ठाकुर       चनौरागंज वि‍जय कुमार महतो     स्‍व. परमेश्वर महतो      चनौरागंज कृष्‍ण देव ठाकुर        श्री रामखेलावन ठाकुर    मझौरा वि‍शेष सहयोगकर्त्ता व प्रेरक... सामान्‍य पढ़ाइक गुरू-          श्री शुभ चन्‍द्र झा (मोहना) संगीत गुरू.............          श्री रामवृक्ष सि‍ंह (फुलबरि‍या) साहि‍त्‍य गुरू.........            श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल (बेरमा) नाट्यकलाक गुरू.....          प्रो. पुलकि‍त कामत (पौराम) रचना प्रकाशन प्रश्रय............     श्री गजेन्‍द्र ठाकुर नि‍जी वि‍द्यालयक सलाहकार...     श्री अजय कुमार मण्‍डल (बि‍शौल) वि‍द्यालय एवं कोचि‍ंग मकान दाता... श्री महावीर साह (चनौरागंज) कार्यक्रम अभि‍भावकत्‍व................ श्री ब्रज कि‍शोर साह (चनौरागंज) बेचन ठाकुर द्वारा भेल नाटकक मंचन (भाग-२) सरस्‍वती पूजा १९९६ केर अवसरपर मंचि‍त एकांकी- महावीरलाल स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र           कलाकार,            पि‍ता           गाम १. महावीरलाल        रामबाबू साह          पि‍ता स्‍व. वि‍श्वनाथ साह,  चनौरागंज २. हनुमान           संजीव कुमार मण्‍डल     श्री रामवि‍हारी मण्‍डल     चनौरागंज ३. वासील           अाफताब आलम        मो. मुखतार आलम       चनौरागंज ४. पुरहीत           अमरेन्‍द्र कुमार मि‍श्र     श्री वि‍नोद मि‍श्र          बेरमा ५. छब्‍बीस नम्‍बर      मोहन कुमार ठाकुर      श्री महाकान्‍त ठाकुर      चनौरागंज सहयोगकर्त्ता- हारमोनि‍यम संगतकर्ता-   श्री भीखन महतो       चनौरागंज ढोलकि‍या-            श्री कारी पासवान       चनौरागंज राम कि‍शोर पासवान     श्री कपि‍लेश्वर पासवान    चनौरागंज पवन कुमार           श्री रामबहादुर ठाकुर     चनौरागंज इन्‍दू कुमारी           श्री राजेन्‍द्र यादव       चनौरागंज प्रति‍मा कुमारी         श्री ब्रज कि‍शोर साह    चनौरागंज राहुल कुमार          श्री शत्रुघ्‍न साह        चनौरागंज अशोक कुमार राउत     स्‍व. जगदीश राउत     चनौरागंज बेचन पासवान         श्री ति‍रपि‍त पासवान     चनौरागंज रामनाथ मण्‍डल        श्री वि‍न्‍देश्वर मण्‍डल      चनौरागंज बेचन ठाकुर द्वारा भेल नाटकक मंचन (भाग- ३) सरस्‍वती पूजा १९९७ केर अवसरपर मंचि‍त एकांकी- कि‍सुन बम स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र            अभि‍नय कर्ता       पि‍ताक नाओं        पता १. कि‍सुन बम         श्रवन कुमार पासवान     पि‍ता स्‍व. भोला पासवान   चनौरागंज २. राजेन्‍द्र महतो       साकेत वि‍हारी राउत     श्री रामसेवक राउत       चनौरागंज ३. शि‍वकारक         रामबाबू साह          स्‍व. वि‍श्वनाथ साह        चनौरागंज ४. मो. इंताज         नदीम आलम          मो. वकील हक          चनौरागंज ५. पहि‍ल घटक       रहबरे आजम          मो. ईषा आलम          चनौरागंज ६. दोसर घटक       रामकि‍शोर पासवान      श्री कपि‍लेश्वर पासवान     चनौरागंज सहयोगकर्त्ता- हारमोनि‍यम संगतकर्ता-    श्री भीखन महतो       चनौरागंज ढोलकि‍या-            श्री कारी पासवान       चनौरागंज भगीरथ प्रधान               श्री महावीर प्रधान       चनौरागंज अशोक कुमार पोद्दार     श्री रामसेवक पोद्दार      चनौरागंज पवन कुमार           श्री रामवहादुर ठाकुर     चनौरागंज राहुल कुमार          श्री शत्रुघ्‍न साह        चनौरागंज आफताब आलम        मो. मुखतार आलम      चनौरागंज बैजू कुमार मण्‍डल      श्री जगदीश मण्‍डल      चनौरागंज इन्‍दू कुमारी           श्री राजेन्‍द्र यादव       चनौरागंज रामानन्‍द प्रसाद        श्री बैद्यनाथ प्रसाद साहु   चनौरागंज राम नारायण राउत      श्री जागेश्वर राउत      चनौरागंज शमशाद आलम        मो. ईषा आलम        चनौरागंज अजय कुमार          प्रो. पुलकि‍त कामत      पौराम बेचन ठाकुर द्वारा भेल नाटकक मंचन/नि‍र्देशन (भाग- ४) सरस्‍वती पूजा १९९८ केर अवसरपर मंचि‍त चारि‍म एकांकी- लक्ष्‍मी मण्‍डल    स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज दि‍नांक- ०१/ ०२/ १९९८ (रवि‍ दि‍न) नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर

  पात्र      कलाकार       पि‍ता       गाम १. लक्ष्‍मी मण्‍डल       संजीव कुमार         श्री योगेन्‍द्र प्रधान        चनौरागंज २. राजेन्‍द्र मण्‍डल      आफताब आलम      मो. मुखतार आलम      चनौरागंज ३. जोगी प्रधान         राहुल कुमार          श्री शत्रुघ्‍न साह         चनौरागंज ४. मो. ईषा आलम      रहबरे आजम        मो. ईषा आलम        चनौरागंज

मंचनक सहयोगकर्त्ता-

हारमोनि‍यम संगतकर्ता-   श्री भीखन महतो       चनौरागंज ढोलकि‍या-                श्री कारी पासवान      चनौरागंज पुष्‍पा कुमारी             श्री लक्ष्‍मण साह        चनौरागंज सुलेखा कुमारी          श्री भरत साह         चनौरागंज दि‍गमंबर यादव          श्री जीबछ यादव       चनौरागंज समीम आलम            मो. वकील हक        चनौरागंज अर्जुन कुमार राम       श्री सीयाराम राम        चनौरागंज राजराम पासवान        श्री लक्ष्‍मी पासवान      चनौरागंज बेचन ठाकुर द्वारा भेल नाटकक नि‍र्देशन/मंचन (भाग- ५) सरस्‍वती पूजा १९९९ केर अवसरपर मंचि‍त पाचि‍म एकांकी- भाए-बहि‍न स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज दि‍नांक- २२/ ०१/ १९९९ (शुक्र दि‍न) नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र, कलाकार, पि‍ता आ गामक नाओं... १. अमर            हीरा कुमारी     श्री दयाकान्‍त पोद्दार     गाम- चनौरागंज २. बनबारी           गुंजा कुमारी    श्री भरत साहु         चनौरागंज ३. हेमन्‍त            कि‍रण कुमारी   श्री नारायण प्रधान      चनौरागंज ४. मोहन            कंचन कुमारी    श्री गौड़ी शंकर राउत    चनौरागंज ५. सोहन            अर्चना कुमारी   श्री रामसेवक राउत     चनौरागंज ६. श्‍याम            पि‍ंकी कुमारी    श्री सोहन दास        कनकपुरा ७. सोनू             सुधा कुमारी    श्री महेन्‍द्र पोद्दार        चनौरागंज ८. रेखा             कि‍शोरी कुमारी श्री कपि‍लदेव यादव     चनौरागंज मंचन केर सहयोगकर्त्ता- हारमोनि‍यम संगतकर्ता-   श्री परमानन्‍द ठाकुर     जगदर ढोलकि‍या-            श्री बुच्‍ची महतो       नवानी धीरेन्‍द्र कुमार          श्री ब्रज कि‍शोर साहु    चनौरागंज संजीव कुमार          श्री चेत नारायण साह    चनौरागंज रंजीत कुमार          श्री भरत साह         चनौरागंज शशि‍ रंजन           श्री नन्‍द कि‍शोर गुप्‍ता    चनौरागंज रामस्‍वरूप पासवान      श्री कपि‍लेश्वर पासवान    चनौरागंज रामाशीष यादव        श्री तीरथ यादव        चनौरागंज कुमुद रंजन          श्री नागेश्वर कामत      पौराम पवन कुमार मण्‍डल      श्री राजेन्‍द्र मण्‍डल      चनौरागंज छोटे कुमार यादव      श्री सुकन यादव        चनौरागंज गणेश कुमार यादव      श्री उत्तम लाल यादव    कनकपुरा बेचन ठाकुर द्वारा भेल नाटकक मंचन/ नि‍र्देशन २०००सँ २००४ (भाग- ६) सरस्‍वती पूजा २००० केर अवसरपर मंचि‍त छठीम एकांकी- कौआसँ गेल्ह बुधि‍यार स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज दि‍नांक- १०/ ०२/ २००० (वृहस्‍पति‍ दि‍न) नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र,             कलाकार,          पि‍ता             पता-... १. सोमन            हीरा कुमारी           श्री दयाकान्‍त पोद्दार      गाम- चनौरागंज २. बुधन             सुनीता कुमारी         श्री रघुवीर यादव       चनौरागंज ३. भूखन            रूकमि‍नी कुमारी        श्री दि‍नेश झा (पंडीजी)   कनकपुरा ४. शोभा            संजीत कुमार पासवान    श्री भोला पासवान       चनौरागंज ५. राधा             वीभा कुमारी          श्री उपेन्‍द्र कामत       पौराम ६. गोपी             संजय कुमार          श्री महावीर कामत      पौराम ७. रीता             कंचन कुमारी          श्री गौड़ी शंकर राउत    चनौरागंज ८. कि‍शन            श्रीराम पासवान         श्री लक्ष्‍मी पासवान      चनौरागंज ९. मखना            रवि‍न्‍द्र कुमार साफी     श्री लक्ष्‍मी साफी        चनौरागंज १०. बच्‍चा सुनील       पि‍ंकी कुमारी          श्री सोहन दास        कनकपुरा ११. जुआन सुनील      रामकरण यादव        श्री हरेराम यादव       चनौरागंज मंचन केर सहयोगकर्त्ता- हारमोनि‍यम संगतकर्ता-    श्री परमानन्‍द ठाकुर     जगदर ढोलकि‍या-            श्री बुच्‍ची महतो       नवानी संतोष कुमार महतो      श्री सूरत महतो       चनौरागंज पवन कुमार दास       श्री दया कान्‍त दास     कनकपुरा मुरली कुमार मण्‍डल     श्री कामेश्वर मण्‍डल      चनौरागंज मुकेश कुमार पासवान    श्री बौधू पासवान       चनौरागंज कमलेश कुमार        श्री उपेन्‍द्र साह         चनौरागंज रामबाबू यादव         श्री बि‍लट यादव        चनौरागंज अनील कुमार पासवान    श्री सुशील पासवान      चनौरागंज रामकुमार यादव        श्री अबध यादव        चनौरागंज रामआशीष महतो        श्री कुशेश्वर महतो       चनौरागंज सरस्‍वती पूजा २००१ केर अवसरपर मंचि‍त साति‍म एकांकी- सि‍मरीयाक पंडा स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज दि‍नांक- २९/ ०१/ २००१ (सोम‍ दि‍न) नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र, कलाकार, पि‍ता आ गामक नाओं... १. पंडि‍त लंगट मि‍श्र अभि‍नव कुमार सागर श्री हनुमान पोद्दार गाम- चनौरागंज २. झामलाल यादव संजीत कुमार पासवान श्री भोला पासवान चनौरागंज ३. रामलाल यादव संजय कुमार महतो श्री राजाराम महतो चनौरागंज ४. यदू झा रामबाबू यादव श्री बि‍लट यादव चनौरागंज मंचन केर सहयोगकर्त्ता- हारमोनि‍यम संगतकर्ता- श्री परमानन्‍द ठाकुर जगदर ढोलकि‍या- श्री बुच्‍ची महतो नवानी बि‍क्‍की कुमार मंडल श्री जगदीश मंडल चनौरागंज कमलेश प्रसाद श्री रामचन्‍द्र साहु चनौरागंज ममता कुमारी श्री नागेश्वर कामत पौराम अशोक कुमार महतो श्री रामअवतार महतो चनौरागंज रेखा कुमारी श्री हरेराम यादव चनौरागंज दुर्गानन्‍द ठाकुर स्‍व. भरत ठाकुर चनौरागंज रामआशीष महतो श्री परमेश्वर महतो बेरमा सरस्‍वती पूजा २००२ केर अवसरपर मंचि‍त आठि‍म एकांकी- होनहार चेला स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज दि‍नांक- १७/ ०२/ २००२ (रवि‍‍ दि‍न) नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र, कलाकार, पि‍ता आ गामक नाओं... १. रामष रामशरण यादव श्री दयाकान्‍त पोद्दार गाम- चनौरागंज २. बुधन सुनीता कुमारी श्री रघुवीर यादव चनौरागंज ३. भूखन रूकमि‍नी कुमारी श्री दि‍नेश झा (पंडीजी) कनकपुरा ४. शोभा संजीत कुमार पासवान श्री भोला पासवान चनौरागंज ५. राधा वीभा कुमारी श्री उपेन्‍द्र कामत पौराम ६. गोपी संजय कुमार श्री महावीर कामत पौराम ७. रीता कंचन कुमारी श्री गौड़ी शंकर राउत चनौरागंज ८. कि‍शन श्रीराम पासवान श्री लक्ष्‍मी पासवान चनौरागंज ९. मखना रवि‍न्‍द्र कुमार साफी श्री लक्ष्‍मी साफी चनौरागंज १०. बच्‍चा सुनील पि‍ंकी कुमारी श्री सोहन दास कनकपुरा ११. जुआन सुनील रामकरण यादव श्री हरेराम यादव चनौरागंज मंचन केर सहयोगकर्त्ता- हारमोनि‍यम संगतकर्ता- श्री परमानन्‍द ठाकुर जगदर ढोलकि‍या- श्री बुच्‍ची महतो नवानी संतोष कुमार महतो श्री सूरत महतो चनौरागंज पवन कुमार दास श्री दया कान्‍त दास कनकपुरा मुरली कुमार मण्‍डल श्री कामेश्वर मण्‍डल चनौरागंज मुकेश कुमार पासवान श्री बौधू पासवान चनौरागंज कमलेश कुमार श्री उपेन्‍द्र साह चनौरागंज रामबाबू यादव श्री बि‍लट यादव चनौरागंज अनील कुमार पासवान श्री सुशील पासवान चनौरागंज रामकुमार यादव श्री अबध यादव चनौरागंज रामआशीष महतो श्री कुशेश्वर महतो चनौरागंज सरस्‍वती पूजा २००३ केर अवसरपर मंचि‍त नवम एकांकी- तेतैर‍ गाछमे आम कोना स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज दि‍नांक- ०६/ ०२/ २००३ (वृहस्‍पति‍ दि‍न) नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र, कलाकार, पि‍ता आ गामक नाओं... १. चंदुबाबू रेखा कुमारी श्री अशर्फी महतो गाम- चनौरागंज २. नंदु सोनी कुमारी श्री रमेश प्रधान चनौरागंज ३. राम वीभा कुमारी श्री उपेन्‍द्र कामत पौराम ४. श्‍याम नूतन कुमारी श्री भागवत महतो चनौरागंज ५. मोहन आरती कुमारी श्री वि‍पीन साह चनौरागंज ६. धीरेन्‍द्रनाथ सुधा कुमारी श्री महेन्‍द्र पोद्दार चनौरागंज ७. शुभकान्‍त मुन्‍नी कुमारी श्री शंभू मण्‍डल चनौरागंज ८. चंदन सरि‍ता कुमारी श्री सत्‍यनारायण महतो चनौरागंज ९. कुन्‍दन ज्‍योति‍ कुमारी श्री रमेश प्रधान चनौरागंज १०. रंजन अनीता कुमारी स्‍व. लखन महतो चनौरागंज ११. रामलाल हीरा कुमारी श्री दयाकान्‍त पोद्दार चनौरागंज १२. रि‍ंकु गुड़ि‍या कुमारी श्री देवेन्‍द्र मण्‍डल चनौरागंज १३. टि‍ंकु अनुराधा कुमारी श्री नन्‍द कि‍शोर गुप्‍ता चनौरागंज मंचन केर सहयोगकर्त्ता- हारमोनि‍यम संगतकर्ता- श्री परमानन्‍द ठाकुर जगदर ढोलकि‍या- श्री बुच्‍ची महतो नवानी अमरेन्‍द्र कुमार श्री ब्रज कि‍शोर साह चनौरागंज रंजीत कुमार श्री भरत साह चनौरागंज रामस्‍वरूप पासवान श्री कपि‍लेश्वर पासवान चनौरागंज राम शरण पासवान श्री कुशेश्वर पासवान चनौरागंज राजीव कुमार श्री चेतनारायण साह चनौरागंज सरस्‍वती पूजा २००४ केर अवसरपर मंचि‍त दसम नाटक- सपूत स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज दि‍नांक- २६/ ०१/ २००४ (सोम दि‍न) नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र, कलाकार, पि‍ता आ गामक नाओं... १. सोमन अनुराधा कुमारी श्री नन्‍द कि‍शोर गुप्‍ता गाम- चनौरागंज २. बुधन ज्‍योति‍ कुमारी श्री रघुवीर यादव चनौरागंज ३. भूखन रूकमि‍नी कुमारी श्री दि‍नेश झा (पंडीजी) कनकपुरा ४. शोभा संजीत कुमार पासवान श्री भोला पासवान चनौरागंज ५. राधा वीभा कुमारी श्री उपेन्‍द्र कामत पौराम ६. गोपी संजय कुमार श्री महावीर कामत पौराम ७. रीता कंचन कुमारी श्री गौड़ी शंकर राउत चनौरागंज ८. कि‍शन श्रीराम पासवान श्री लक्ष्‍मी पासवान चनौरागंज ९. मखना रवि‍न्‍द्र कुमार साफी श्री लक्ष्‍मी साफी चनौरागंज १०. बच्‍चा सुनील पि‍ंकी कुमारी श्री सोहन दास कनकपुरा ११. जुआन सुनील रामकरण यादव श्री हरेराम यादव चनौरागंज मंचन केर सहयोगकर्त्ता- हारमोनि‍यम संगतकर्ता- श्री परमानन्‍द ठाकुर जगदर ढोलकि‍या- श्री बुच्‍ची महतो नवानी संतोष कुमार महतो श्री सूरत महतो चनौरागंज पवन कुमार दास श्री दया कान्‍त दास कनकपुरा मुरली कुमार मण्‍डल श्री कामेश्वर मण्‍डल चनौरागंज मुकेश कुमार पासवान श्री बौधू पासवान चनौरागंज कमलेश कुमार श्री उपेन्‍द्र साह चनौरागंज रामबाबू यादव श्री बि‍लट यादव चनौरागंज अनील कुमार पासवान श्री सुशील पासवान चनौरागंज रामकुमार यादव श्री अबध यादव चनौरागंज रामआशीष महतो श्री कुशेश्वर महतो चनौरागंज बेचन ठाकुर द्वारा नाटक मंचि‍त २००५ ईं.मे (भाग-७) सरस्‍वती पूजा २००५ केर अवसरपर मंचि‍त छठीम एकांकी- राखीक लाज स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज दि‍नांक- १३/ ०२/ २००५ (रवि‍ दि‍न) नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र, कलाकार, पि‍ता आ गामक नाओं... १. उदयशंकर         अनि‍ता कुमारी         प्रो. पुलकि‍त कामत     पौराम २. श्‍याम सुन्‍दर        सावि‍त्री कुमारी         श्री सूर्यनारायण कामत    पौराम ३. मालती           ज्‍योति‍ कुमारी         श्री वि‍पीन कुमार साह    चनौरागंज ४. प्रि‍यंका           अनुराधा कुमारी        श्री नन्‍दकि‍शोर गुप्‍ता     चनौरागंज ५. सुन्‍दरलाल         मुन्‍नी कुमारी          श्री शंभू मण्‍डल        चनौरागंज ६. मोनू             संगीता कुमारी         श्री सत्‍यनारायण महतो   चनौरागंज ७. टोनू            प्रीती कुमारी          श्री रमेश प्रधान         चनौरागंज ८. शंकर            मीना कुमारी          श्री उपेन्‍द्र कामत        पौराम ९. प्रेमनाथ           रानी कुमारी          श्री बैद्यनाथ साह        सि‍मरा १०. मोहन           शीला कुमारी          श्री परमेश्वर साह       चनौरागंज ११. रामलाल         पूजा कुमारी          श्री लालबहादुर यादव     चनौरागंज १२. मदनलाल        सुलेखा कुमारी         श्री हरेराम यादव        चनौरागंज १३. कमलकांत       रेखा कुमारी          श्री अशर्फी महतो         चनौरागंज १४. गजानंद          गुड़ि‍या कुमारी         श्री देवेन्‍द्र महतो       चनौरागंज १५. राम दुलारी       अनि‍ता कुमारी         स्‍व. लखन महतो       चनौरागंज मंचन कार्यक सहयोगकर्त्ता- वि‍जय कुमार          श्री बैद्यनाथ साह        सि‍मरा (मधुबनी) कन्‍हैया कुमार         श्री कामेश्वर मंडल      चनौरागंज प्रदीप कुमार          श्री शत्रुध्‍न साफी       चनौरागंज मुरली कुमार मण्‍डल     श्री कामेश्वर मण्‍डल      चनौरागंज सि‍द्धार्थ सौरभ         श्री जगदीश मण्‍डल     चनौरागंज बेचन ठाकुर- सरस्‍वती पूजा २००६ केर अवसरपर मंचि‍त एकांकी- उगना (भाग-८) सरस्‍वती पूजा २००६ केर अवसरपर मंचि‍त छठीम एकांकी- उगना स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज दि‍नांक- ०३/ ०२/ २००६ (शुक्र दि‍न) नाटककार- ईशनाथ झा ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र, कलाकार, पि‍ता आ गामक नाओं... १. महादेव           अनि‍ता कुमारी,        स्‍व. लखन महतो,      पौराम २. वि‍द्यापति‍          रेखा कुमारी          श्री अशर्फी महतो             चनौरागंज ३. गौरी             पूजा‍ कुमारी          श्री श्रीलाल महतो       चनौरागंज ४. पि‍पासा           शीला कुमारी         श्री परमेश्वर साह      चनौरागंज ५. रामा             सुलेखा कुमारी         श्री हरेराम यादव       चनौरागंज ६. अभि‍मान          ज्‍योति‍ कुमारी         श्री रमेश प्रधान        चनौरागंज ७. साधू            सुधा कुमारी          श्री महेन्‍द्र पोद्दार        चनौरागंज ८. शुद्र             अनुराधा कुमारी              श्री नन्‍द कि‍शोर गुप्‍ता    चनौरागंग ९. सुधीरा           सरि‍ता कुमारी         श्री सत्‍य नारायण महतो   चनौरागंग मंचन कार्यक सहयोगकर्त्ता- अध्‍यक्ष-       श्री ब्रज कि‍शोर साह          चनौरागंज सचि‍व-         प्रो. पुलकि‍त कामत             पौराम उपाध्‍यक्ष-       श्री रामसेवक यादव             चनौरागंज कोषाध्‍यक्ष-      श्री प्रदीप कुमार साफी           चनौरागंज उपकोषाध्‍यक्ष-    श्री कुमुद रंजन                चनौरागंज स्‍वागताध्‍यक्ष-    श्री कन्‍हैया कुमार              चनौरागंज उद्घोषक-        श्री मनोज कुमार पोद्दार          चनौरागंज २००७ सँ २००९ धरि बेचन ठाकुर द्वारा निर्देशित नाटकक विवरण (भाग-९) सरस्‍वती पूजा २००७ केर अवसरपर मंचि‍त तेरहम नाटक- श्रवण कुमार स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज दि‍नांक- २३/ ०१/ २००७ (मंगल दि‍न) नाटककार- पंडि‍त वि‍ष्‍णु कुमार दीपक ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र, कलाकार, पि‍ता आ गामक नाओं... १. श्रवण कुमार ‍       अनुराधा कुमारी        श्री नन्‍द कि‍शोर गुप्‍ता    चनौरागंज २. शॉत्‍वन           ज्‍योति‍ कुमारी         श्री वि‍पीन कुमार साह    चनौरागंज ३. श्रानवती          चॉदनी‍ कुमारी         श्री हरि‍नारायण महतो    चनौरागंज ४. ज्ञानदेव           आशा कुमारी          श्री रामसेवक पौद्दार     चनौरागंज ५. दशरथ           रानी कुमारी         श्री सत्‍य नारायण महतो  चनौरागंज ६. वि‍द्या             संगीता‍ कुमारी         श्री सत्‍य नारायण महतो  चनौरागंज ७. ब्रह्मा            रेखा कुमारी          श्री अशर्फी महतो       चनौरागंज ८. पहिल व्‍यक्‍ति‍             सवीता कुमारी         श्री महेन्‍द्र साफी        पसटन ९. दोसर व्‍यक्‍ति‍             गीता कुमारी          पंडि‍त खुशीलाल महतो   चनौरागंज १०. पंडा                  सपना कुमारी          श्री देवराज मण्‍डल            चनौरागंज १२. वि‍ष्‍णु           पूजा कुमारी          श्री लालबहादुर यादव    चनौरागंज १३. महेश           रूबी कुमारी          श्री दयाकान्‍त पौद्दार     चनौरागंज १४. फकीरचन्‍द्र        ज्‍योति‍ कुमारी         श्री रमेश प्रधान        चनौरागंज १५. ि‍नर्मला          मुन्नी कुमारी           श्री शम्‍भू मण्‍डल        चनौरागंज १६. चमेली           अनीता कुमारी         स्‍व. लखन महतो       चनौरागंज सहयोगकर्त्ता- अध्‍यक्ष-             श्री ब्रज कि‍शोर साह    स्‍व. महावीर साह       चनौरागंज (मधुबनी) सचि‍व-              प्रो. पुलकि‍त कामत                       पौराम उपाध्‍यक्ष-            श्री वि‍जय कुमार       श्री बैद्यनाथ साह             सि‍मरा कोषाध्‍यक्ष-            श्री श्री कन्‍हैया कुमार    श्री कामेश्वर मण्‍डल      चनौरागंज मंच उद्घोषक-         श्री कुमार पौद्दार        श्री दयाकान्‍त पौद्दार     चनौरागंज सरस्‍वती पूजा २००८ केर अवसरपर मंचि‍त चौदहम एकांकी- सत्‍यवान सावित्री (दि‍नक कार्यक्रम) स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज नाटककार- भोला प्रशान्‍त मैथि‍ली अनुवाद- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र, कलाकार, पि‍ता आ गामक नाओं... १. सत्‍यवान  ‍       पूजा कुमारी          श्री लालबहादुर यादव    चनौरागंज २. द्युमत्‍सेन          बेबी कुमारी           श्री दयाकान्‍त पौद्दार     चनौरागंज ३. अश्‍वपति‍          आशा कुमारी          श्री रामसेवक पौद्दार     चनौरागंज ४. नारद            पूज कुमारी           श्री महेन्‍द्र साह         चनौरागंज ५. यमराज           शि‍ल्‍पी कुमारी         श्री लक्ष्‍मण झा         चनौरा गोठ ६. शाल्‍वन           रूबी कुमारी          श्री दयाकान्‍त पौद्दार     चनौरागंज ७. यमदूत          गीता कुमारी          पंडि‍त खुशीलाल महतो  चनौरागंज ८. सुमति‍            प्रि‍यंका कुमारी         श्री बैद्यनाथ साह       सि‍मरा ९. दुर्मति‍            लक्ष्‍मी रंभा           श्री हरि‍ नारायण महतो   चनौरागंज १०. भगवती          इंदु कुमारी           श्री राजेन्‍द्र मंडल             चनौरागंज १२. सैनि‍क          वि‍भा कुमारी          श्री अमर राम         चनौरागंज १३. प्रहरी           प्रीति‍ कुमारी          श्री रमेश प्रधान              चनौरागंज १४. सावि‍त्री          संगीता कुमारी         श्री सत्‍यनारायण महतो   चनौरागंज सहयोगकर्त्ता- श्री ब्रज कि‍शोर साह    स्‍व. महावीर साह       चनौरागंज (मधुबनी) प्रो. पुलकि‍त कामत     स्‍व. जगदीश कामत     पौराम मनोज कुमार पौद्दार     श्री दयाकान्‍त पौद्दार     चनौरागंज दयानंन कुमार         श्री दुनि‍लाल महतो            बेरमा राजाराम ठाकुर        श्री महाकान्‍त ठाकुर     चनौरागंज राघव कुमार          श्री लक्ष्‍मण झा         चनौरागंज स्‍वेता कुमारी          श्री बालेश्वर कामत      पौराम सुलेखा कुमारी         श्री हरेराम यादव       चनौरागंज अमि‍त रंजन          श्री नागेश्वर कामत            पौराम सरस्‍वती पूजा २००८ केर अवसरपर मंचि‍त पन्‍द्रहम एकांकी- छीनरदेवी (राति‍क कार्यक्रम) स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र, कलाकार, पि‍ता आ गामक नाओं... १. सुभाष  ‍          रमणजी             श्री दयाकान्‍त पौद्दार     चनौरागंज २. ललन            राधवेन्‍द्र झा           श्री लक्ष्‍मण झा         चनौरागंज ३. पवन             पप्‍पू कुमार महतो             श्री अशर्फी महतो             चनौरागंज ४. मटुक            रौशन कुमार          स्‍व. श्रवण साह        चनौरागंज ५. राजू             वि‍काश कुमार महतो     श्री प्रमोद कुमार महतो  चनौरागंज ६. संजय            सागर कुमार ठाकुर     श्री वि‍जय ठाकुर       चनौरागंज ७. सुखल          मि‍थि‍लेश कुमार महतो    श्री रासधारी महतो      चनौरागंज ८. यदुलाल           वि‍ष्‍णु वि‍भाकार         श्री हरि‍नारायण महतो    चनौरागंज ९. सोमन            सुभाष कुमार साह      श्री बाबू सहाएब साह     चनौरागंज १०. परबति‍या         सोभा कान्‍त महतो            श्री रामावतार महतो     चनौरागंज १२. घटकराज        सुनील कुमार महतो     श्री वि‍नोद महतो       बेरमा १३. बलदेव          रंजन कुमार महतो            श्री महादेव महादेव महतो  चनौरागंज १४. वि‍नोद           राजाराम ठाकुर        श्री महाकान्‍त ठाकुर     चनौरागंज १५. मीरा            रजनीश कुमार         श्री वि‍पि‍न कुमार साह    चनौरागंज १६. सुकनी          शि‍वकुमार शि‍व        श्री बचनू मण्‍डल       सि‍मरा १७. मालती          रामबाबू भारती         श्री अमरनाथ राम      चनौरागंज १८. अंनु अंजना       लालू कुमार यादव      श्री वि‍ष्‍णुदेव यादव      चनौरागंज सहयोगकर्त्ता- श्री संजय कुमार       श्री बैद्यनाथ साह       चनौरागंज (मधुबनी) शि‍वकरण यादव        श्री हरेराम यादव       चनौरागंज देव सुन्‍दरी कुमारी            श्री मोहन राम         चनौरागंज अंजली प्रि‍यदर्शिनी      श्री गणेश ठाकुर       चनौरागंज दुर्गानन्‍द ठाकुर        स्‍व. भरत ठाकुर       चनौरागंज रमेश कुमार          श्री भागवत महतो       बेरमा शोभाकान्‍त महतो             श्री रामअवतार महतो    चनौरागंज सरस्‍वती पूजा २००९ केर अवसरपर मंचि‍त सोल्हम एकांकी- बेटीक अपमान दि‍नांक- ३१/ ०१/ २००९ (शनि‍ दि‍न) स्‍थान- न्‍यू लोटस इंग्‍लि‍श स्‍कूल परि‍सर- चनौरागंज नाटककार- बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- बेचन ठाकुर पात्र, कलाकार, पि‍ता आ गामक नाओं... १. दीपक चौधरी  ‍     शि‍ल्‍पी कुमारी         श्री लक्ष्‍मण झा         चनौरा गोठ २. मोहन चौधरी       वि‍भा कुमारी          श्री अमरनाथ राम      चनौरागंज ३. गोपाल चौधरी       पि‍यंका कुमारी         श्री बैद्यनाथ साह             सि‍मरा ४. प्रदीप            गीता कुमारी          श्री खुशीलाल महतो     चनौरागंज ५. बलवीर           आशा कुमारी          श्री रामावतार यादव     कनकपुरा ६. महेन्‍द्र            सपना कुमारी          श्री देवराज मंडल       चनौरागंज ७. गंगाराम          लक्ष्‍मी रंभा           श्री हरि‍नारायण महतो    चनौरागंज ८. चन्‍देश्वर           पूजा कुमारी          श्री महेन्‍द्र साह        चनौरागंज ९. वीणा             नेहा कुमारी           श्री बोधकृष्‍ण दास      चनौरा गोठ १०. सुनीता          देवसुन्‍दरी                  श्री मोहन राम         चनौरागंज १२. संजू            स्‍वेता कुमारी          श्री बालेश्वर कामत      पौराम १३. राधा            संगीता कुमारी         श्री सत्‍यनारायण महतो   चनौरागंज सहयोगकर्त्ता- श्री संजय कुमार       श्री बैद्यनाथ साह       चनौरागंज (मधुबनी) दुर्गानन्‍द ठाकुर        स्‍व. भरत ठाकुर       चनौरागंज रमेश कुमार          श्री भागवत महतो       बेरमा वेदप्रकाश            श्री सूर्यनारायण कामत    पौराम अमि‍त रंजन          श्री नागेश्वर कामत      पौराम रामकुमार ठाकुर        श्री लि‍लाधर ठाकुर      चनौरागंज दयानंद कुमार         श्री दुनि‍लाल महतो      चनौरागंज लालू कुमार यादव      श्री वि‍ष्‍णुदेव यादव      चनौरागंज विदेह सम्मान २०११-१२ क घोषणा विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, लघुकथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, लघुकथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास, बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) बाल साहित्य पुरस्कार २०१२- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (“तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभि‍नय मुख्य अभिनय सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उम्र- १७, पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा श्री शोभा कान्‍त महतो, उम्र- १५ पि‍ता- श्री रामअवतार महतो, हास्‍य-अभिनय सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उम्र- १६, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- २३, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर नृत्‍य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- १६, पि‍ता- श्री हरेराम यादव श्री अमित रंजन, उम्र- १८, पि‍ता- नागेश्वर कामत चि‍त्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- २३, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्‍द ठाकुर, उम्र- ३०, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- ४५, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र-५५, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक, उम्र-५०, गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडि‍त, उम्र-४५, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया, पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, उम्र- ५५ किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा १ फाइल फोटो श्री परमानंद ठाकुरकेँ वि‍देह हारमोनि‍यम कला सम्मान- २०१२ क प्रशस्ति पत्र प्रदान करैत श्री नन्‍द कि‍शोर गुप्‍ता। परि‍चए- श्री परमानन्‍द ठाकुर, पि‍ताक नाओं- श्री नथुनी ठाकुर, गाम- जगदर, पोस्‍ट- कछुबी, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला-मधुबनी, बि‍हारक स्‍थायी नि‍वासी छथि‍। ३० वर्षीय परमानन्‍द एखन पंचायत शि‍क्षक छथि‍। ऐसँ पहि‍ने ओ बैंड पार्टीमे कैसि‍यो मास्‍टरक कार्य करैत छलाह। ढोलक सेहो बजेबाक कला छन्‍हि‍। ओना हारमोनि‍यम कलासँ दर्शक-श्रोताकेँ मंत्र-मुग्‍ध करैत रहला अछि‍। हि‍नक कलाकेँ झंझारपुर क्षेत्रमे सभ सराहै छन्‍हि‍‍। जे.एम.एस. कोचि‍ंग सेन्‍टर, चनौरागंजक प्रांगणमे सरस्‍वती पूजाक अवसरपर नाट्य उत्‍सवमे हि‍नक कलाक प्रदर्शन नीक होइत रहलनि‍ अछि‍। हि‍नक कलामे आशातीत उन्नति‍ हेतु वि‍देह परि‍वार हि‍नका वि‍देह कला सम्मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त करैत अपनाकेँ गौरवान्‍वि‍त महसूस कएलक अछि‍। परमानन्‍द ठाकुर (परमानन्‍द ठाकुर केँ वि‍देह संगीत कला सम्‍मान (हारमोनियम) - २०१२ देल गेल। बेचन ठाकुर हुनकासँ साक्षात्कार लेलनि।) बे.ठाकुर- अहाँकेँ ऐ कार्यक प्रति रुचि केना आ कहियासँ जगल? प.ठाकुर- ऐ कार्यक प्रति‍ १९७१ ई. सँ रुचि जगल। वि‍द्यालय प्रांगणमे अचानक एक सांस्‍कृति‍क कार्यक्रमक आयोजन भेल, ओइमे हमहूँ भाग लेलौ। हमरा ओही कार्यक्रमसँ झुकाव भेल। बे.ठाकुर- ऐ कार्य करबामे अहाँकेँ के प्रोत्साहित करैत अछि? प.ठाकुर- ऐ कार्यकेँ करबामे हमरा सभसँ बेसी प्रोत्‍साहि‍त माता-पि‍ता एवं अभि‍भावक करै छथि‍। बे.ठाकुर- अहाँकेँ कार्य करबामे की प्रोत्साहित करैत अछि? प.ठाकुर- हमरा ई कार्ज करबामे सबहक सहयोग अओर असीरवाद भेटैत अछि‍। जखन हम ऐ कार्यक प्रति‍ नि‍ष्‍ठा अर्पित करैत छी तँ सबहक सहयोग नीकसँ भेटैत अछि। बे.ठाकुर- पहिल बेर कोन कृति/ काजसँ अहाँ आरम्भ केलौं आ कहियासँ? प.ठाकुर- पहि‍ल बेर हम संस्‍कार भारती पब्‍लि‍क स्‍कूल झंझारपुरसँ कार्य आरम्‍भ केलौं। वि‍द्यालयक शि‍क्षक दि‍ली‍प बाबू हमरा प्रोत्‍साहि‍त केलाह आ प्रि‍ंसपल बालेश्वर बाबू सम्‍मानि‍त केलनि‍। ओ कार्यक्रम छल नुक्कर नाटक जे सरस्‍वती पूजाक अवसरपर आयोजि‍त छल। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजमे १.“सोच”, २.“कोनो पुरान वा नव लीख” वा ३ “शिल्प” ऐ तीनूमे सँ केकरा प्रधानता दै छी? प.ठाकुर- ऐ काजमे हम अपन सोचकेँ प्रधानता दैत छी। हमर सोच हरदम बनल रहैए जे हम नीकसँ नीक कृति‍ करैत रहूँ। बे.ठाकुर-अहाँ जइ विधामे लागल छी ओकर की व्यक्तिगत विशेषता छै, ई ऐ क्षेत्रमे कार्यरत दोसर लोकक काजसँ कोन अर्थे भिन्न छै? प.ठाकुर-हम जइ काजमे लागल छी ओकर पहि‍ल वि‍शेषता अछि‍ अपन कला-संस्‍कृति‍सँ जुड़ल रहब। दोसर ई अछि‍ जे कोनो मंचपर अपन बात रखबामे कनिक्को दि‍क्कत महसून नै करब। बे.ठाकुर-अहाँक विधाक क्षेत्रमे आन के सभ छथि आ ओ कोन तरहक विशिष्ट काज कऽ रहल छथि? प.ठाकुर-राम देव ठाकुर, बालगोवि‍न्‍द दास, जागेश्वर राउत, भागवत प्रसाद सोति‍, रमानन्‍द पासवान, बनारसी राम, राज कुमार राम, दुखन महतो, रामेश्वर महतो, रमण कि‍शोर झा, जोगेन्‍द्र ठाकुर इत्‍यादि‍ बहुतो गोटे छथि‍।  लगभग सभ गाममे हारमोनि‍यम, ढोलक, तबला, रसनचौकी इत्‍यादि‍क कलाकार सभ छथि‍। वि‍ि‍शष्‍ट तँ अछि‍ये जे गाम-घरमे सांस्‍कति‍क कार्यक्रम हुनके सभपर ि‍नर्भर अछि‍, बचल अछि। बे.ठाकुर-की अहाँक काज अहाँक जीवन-यापनक काजमे, घरेलू काजमे बाधा होइए वा सहायता पहुँचाबैए? प.ठाकुर-कोनो बाधा नै पहुँचबैए, हम अपन दैनि‍क काजसँ समए नि‍कालि‍ये कऽ ऐ सभमे दइ छी। बे.ठाकुर-अहाँ अपन आन रुचिक विषयमे बताउ। प.ठाकुर-संगीत सुनब, भजन सुनब आदि‍ हमर रूचि‍ अछि‍। बे.ठाकुर-कोनो संदेश जे अहाँ देबए चाही। प.ठाकुर-हम संदेश देबाक योग्‍य तँ नै छी। हम अपन एकटा बात व्‍यक्‍त करैत कहै छी जे मि‍थि‍लांचलक वि‍कासमे हम पाछू नै हटब। २ फाइल फोटो-१, सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारीकेँ वि‍देह अभि‍नय सम्‍मान- २०१२ क प्रशस्ति पत्र प्रदान करैत डॉ. उषा महासेठ। फाइल फोटो-२, वि‍देह अभि‍नय सम्‍मानसँ सम्मानि‍त शि‍ल्‍पी कुमारीकेँ उपहार प्रदान करैत डॉ. उषा महासेठ। परि‍चए- सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, पि‍ताक नाओं श्री लक्ष्‍मण झा, पता- गाम-चनौरागोठ, पत्रालय- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, (बि‍हार)। १७ वर्षीय शि‍ल्‍पी दसम वर्गक छात्रा छथि‍। पंचायत, प्रखण्‍ड आ अनुमण्‍डल स्‍तरपर अपन प्रति‍भासँ कतेको बेर पुरस्‍कृत भऽ चुकल छथि‍। जे.एम.एस. कोचि‍ंग सेन्‍टर, चनौरागंजमे सभ क्षेत्रमे हि‍नक नीक प्रदर्शन रहलनि‍ अछि, खास कऽ अभि‍नय कलाक मादे दर्शक लोकनि‍क बीच बड्ड सराहल गेलीह। वि‍देह अभि‍नय सम्‍मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त करैत वि‍देह परि‍वार हर्षित अछि‍। शि‍ल्‍पी कुमारी (शि‍ल्‍पी कुमारीकेँ वि‍देह अभि‍नय सम्‍मान- २०१२ देल गेल। बेचन ठाकुर हुनकासँ साक्षात्कार लेलनि।) बे.ठाकुर-अहाँकेँ ऐ कार्यक प्रति रुचि केना आ कहियासँ जगल? शि‍ल्‍पी-हमरा ऐ कार्यक प्रति‍ रूचि‍ ओइ दि‍नसँ भेल जइ दि‍न हम बेचन सर अहाँक नाटक देखलौं, तँ हमरो मनमे भेल जे हमहूँ सर लग पढ़ि‍तौं आ नाटकमे भाग लितौं आ बढ़ि‍यासँ नाटकमे भूमि‍का नि‍भैतौं। वर्ष २००८ ई. मे बेचन सरक कोचि‍ंगमे प्रवेश केलौं। सति‍ सावि‍त्री नाटकमे यमराजक भूमि‍का अदा कएल आ हमर भूमि‍का बेसी बढ़ि‍या रहल। ओही दि‍नसँ हमरा ऐ कार्यक प्रति‍ रूचि‍ जागल आ बढ़ल। बे.ठाकुर-ऐ कार्य करबामे अहाँकेँ के प्रोत्साहित करैत अछि? शि‍ल्‍पी-ऐ कार्य करबामे हमरा बेचन सर अहाँ बेसी प्रोत्‍साहि‍त केलौं आ‍ आ करै छी‍। बे.ठाकुर-अहाँकेँ कार्य करबामे की प्रोत्साहित करैत अछि? शि‍ल्‍पी-हमरा ऐ कार्य करबामे मोन प्रोत्‍साहि‍त करैत अछि‍। बे.ठाकुर-पहिल बेर कोन कृति/ काजसँ अहाँ आरम्भ केलौं आ कहियासँ? शि‍ल्‍पी-पहि‍ल बेर हम सत्‍यवान सावि‍त्री नाटक केलौं। ई नाटक २००८ ई.मे चनौरागंजमे भेल। बे.ठाकुर-अहाँ अपन काजमे १.“सोच”, २.“कोनो पुरान वा नव लीख” वा ३ “शिल्प” ऐ तीनूमे सँ केकरा प्रधानता दै छी? शि‍ल्‍पी-हम कार्यमे शि‍ल्‍पकेँ प्रधानता दइ छी। बे.ठाकुर-अहाँ अपन काजक दिशाकेँ, रूपक एक पाँतिमे कोन रूपमे वर्णन करब। शि‍ल्‍पी-हम जे कि‍छु केलौं बेचन सर जी अहींक कृपासँ केलाैं। बे.ठाकुर-अहाँक काजक समाजमे कोन स्थान छै? की ऐसँ समाजमे परिवर्तन एतै? शि‍ल्‍पी-हमर ऐ काजक समाजमे बड़ पैघ स्‍थान अछि‍। हमर नाटक देखि‍ कऽ समाजक बुजुर्ग लोक आनंदि‍त भऽ हमरा लोकनि‍केँ प्रोत्‍साहि‍त करैत छथि‍। ऐसँ समाजमे परि‍वर्तन अवश्‍य हएत। ऐ काजक समाजमे बड़ पैघ स्‍थान छै जेकरा देखलासँ दोसरो बच्‍चा सभकेँ मनमे ऐ काजक प्रति भावना जागत। ऐसँ हमरा जीवनमे आगू बढ़बाक साहस हएत। नाटक करैत-करैत हम एक दि‍न बड़ पैघ नायि‍का बनि‍ सकैत छी। बे.ठाकुर-अहाँ जइ विधामे लागल छी ओकर की व्यक्तिगत विशेषता छै, ई ऐ क्षेत्रमे कार्यरत दोसर लोकक काजसँ कोन अर्थे भिन्न छै? शि‍ल्‍पी-हम जइ वि‍धामे लागल छी ओकर व्‍यक्‍ति‍गत वि‍शेषता अछि‍। ऐ क्षेत्रमे ई काज दोसर लोकक काजसँ ऐ तरहेँ भि‍न्न अछि‍ जे नाटक एक कला अछि‍। जे नाटक कला सबहक समक्ष प्रदर्शित कएल जाइत अछि‍। जखन कि‍ सभ काज सबहक समक्ष नै कएल जाइत अछि‍। बे.ठाकुर-अहाँक विधाक क्षेत्रमे आन के सभ छथि आ ओ कोन तरहक विशिष्ट काज कऽ रहल छथि? शि‍ल्‍पी-हमर ऐ वि‍धाक क्षेत्रमे बेचन सर आ हुनक वि‍द्यार्थी सभ छथि‍। हमर गुरुजीक (श्री बेचन ठाकुर) मुख कार्य पढ़ेनाइ छन्‍हि‍। एकर अलाबा, नाटक, कवि‍ता, गीत आदि‍ लि‍खैत छथि‍। हमर गुरुजी लगभग सभ कलामे नि‍पुण छथि‍। ओ संगीतकार, नाटककार, चि‍त्रकार आदि‍ सभ छथि‍। अपन बच्‍चा सभसँ अपना कलाकेँ प्रदर्शित कराबैत छथि‍ आ समाजमे अपन प्रति‍ष्‍ठा पबैत छथि‍। बे.ठाकुर-की अहाँक काज अहाँक जीवन-यापनक काजमे, घरेलू काजमे बाधा होइए वा सहायता पहुँचाबैए? शि‍ल्‍पी-हमर ई काज जीवन-यापनक क्षेत्रमे बाधा नै सहायता पहुँचाबैत अछि‍। घरेलू काज करबाक लेल माँ आ बहि‍न छथि‍। घरेलू काजक चि‍ंता हमरा नै रहैत अछि‍। हमरा ऐ काजमे कि‍यो बाधा नै पहुँचबैत अछि‍। बे.ठाकुर -अहाँ अपन आन रुचिक विषयमे बताउ। शि‍ल्‍पी- हमरा सभसँ बेसी पढ़बामे रूचि‍ अछि‍। जे पढ़ि‍-लि‍खि‍ कऽ पैघ बनी। बे.ठाकुर- कोनो संदेश जे अहाँ देबए चाही। शि‍ल्‍पी- एकटा संदेश जे हम अहाँकेँ देबए चाहै छी, नाटकमे तँ रूचि‍ हमरा अछि‍ये मुदा पढ़बामे सेहो अछि‍। हम यएह संदेश दइ छी जे हम एक गरीब वि‍द्यार्थी छी। अहीं सबहक कृपासँ हम आगू बढ़ैत रहब, हमरा आगू बढ़ेबामे अहाँ सभ मदति‍ करू। ३ फाइल फोटो-१, श्री अमित रंजनकेँ वि‍देह नृत्‍यकला सम्‍मान- २०१२ क प्रशस्ति पत्र प्रदान करैत श्री कपि‍लेश्वर राउत (वामसँ) एवं श्री जगदीश झा (दहि‍नासँ)। फाइल फोटो-२, वि‍देह नृत्‍यकला सम्‍मानसँ सम्मानि‍त अमित रंजनकेँ उपहार प्रदान करैत श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल। परि‍चए- श्री अमित रंजन, पि‍ताक नाअों- श्री नागेश्वर कामत, गाम- पौराम, पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, बि‍हारक स्‍थायी नि‍वासी छथि‍। १८ वर्षीय अमि‍त १२म कक्षाक छात्र छथि‍। अनुमण्‍डल स्‍तरपर नृत्‍यकलामे हि‍नका प्रथम पुरस्‍कार भेटल छन्‍हि‍। जे.एम.एस. कोचि‍ंग सेन्‍टर, चनौरागंजक प्रांगणमे आयोजि‍त सांस्‍कृति‍क कार्यक्रममे नृत्‍य लेल सराहल जाइत रहला अछि‍। वि‍देह नृत्‍यकला सम्‍मान- २०१२ सँ सम्‍मानि‍त करैत वि‍देह परि‍वार प्रसन्नता महसूस करैत अछि‍। अमि‍त रंजन (अमि‍त रंजन केँ वि‍देह नृत्‍यकला सम्‍मान- २०१२ देल गेल। बेचन ठाकुर हुनकासँ साक्षात्कार लेलनि।) बे.ठाकुर- अहाँकेँ ऐ कार्यक प्रति रुचि केना आ कहियासँ जगल? अमि‍त- जखन हम सभ कोइकेँ मंचपर नृत्‍य करैत देखलौं तँ हमरा इच्‍छा भेल जे एना हमहूँ करि‍तौं। २००५ ई.क ओ समए रहए। बे.ठाकुर- ऐ कार्य करबामे अहाँकेँ के प्रोत्साहित करैत अछि? अमि‍त- श्री बेचन ठाकुर जीक प्रोत्‍साहन हमरा सभकेँ भेटैत रहल अछि‍। ओ हमर गुरुजी सेहो छथि‍। बे.ठाकुर- पहिल बेर कोन कृति/ काजसँ अहाँ आरम्भ केलौं आ कहियासँ? अमि‍त- पहि‍ल बेर हम गीत गेलौं। स्‍कूलमे। शुरूमे बेसी गीते गबैत छलौं। धीरे-धीरे नृत्‍यमे सेहो भाग लि‍अए लगलौं। ओना हमरा नृत्‍यमे बेसी प्रोत्‍साहन भेटल। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजमे १.“सोच”, २.“कोनो पुरान वा नव लीख” वा ३ “शिल्प” ऐ तीनूमे सँ केकरा प्रधानता दै छी? अमि‍त- हम ऐ तीनूमे सोचकेँ बेसी प्रधान्‍ता दइ छी। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजक दिशाकेँ, रूपकेँ एक पाँतिमे कोन रूपमे वर्णन करब। अमि‍त- हम अखन बी.ए. पार्ट-वनमे पढ़ैत छी। हि‍न्‍दी ऑनर्स अछि‍। दसमामे मैथि‍ली एच्‍छि‍क वि‍षयमे पढ़ने छी। मैथि‍लीसँ प्रेम अछि‍। मौका भटैत रहत तँ आरो कि‍छु-कि‍छु करैत रहब। बे.ठाकुर- अहाँ जइ विधामे लागल छी ओकर की व्यक्तिगत विशेषता छै, ई ऐ क्षेत्रमे कार्यरत दोसर लोकक काजसँ कोन अर्थे भिन्न छै? अमि‍त- संगीसँ सि‍नेह अछि‍। गबैयोमे बड्ड मन लगैए। बे.ठाकुर- की अहाँक काज अहाँक जीवन-यापनक काजमे, घरेलू काजमे बाधा होइए वा सहायता पहुँचाबैए? अमि‍त- हमर जीवन-यापनमे घरेलू काज कोनो महत्‍वपूर्ण नइए। हम ओइ सभसँ अलग छी। खाली पढ़ै-लि‍खैक रहैए। तँए हमरा कोनो बाधा नै अछि‍। घरसँ बहुत सहायता भेटैए। बे.ठाकुर- अहाँ अपन आन रुचिक विषयमे बताउ। अमि‍त- संगीसँ सि‍नेह अछि‍। गबैयोमे बड्ड मन लगैए। ४ फाइल फोटो-१, श्री बहादुर रामकेँ वि‍देह संगीत कला सम्‍मान- २०१२ क प्रशस्ति पत्र प्रदान करैत श्री उमेश मण्‍डल वायासँ एवं दहि‍नासँ श्री बेचन ठाकुर। फाइल फोटो-२, वि‍देह संगीत-कला सम्‍मानसँ सम्मानि‍त बहादुर रामकेँ श्री बेचन ठाकुर उपहार प्रदान करैत एवं मंच संचालन करैत श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल। परि‍चए- श्री बहादुर राम, पि‍ताक नाओं स्‍व. सरजुग राम, गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, बि‍हार केर स्‍थायी नि‍वासी छथि‍। हि‍नक उम्र ६० बर्ख छन्‍हि‍। विगत ४० बर्खसँ रसनचौकी बजबैत छथि‍। समाजक सभ वर्णक लोकक मध्‍य हि‍नक उक्‍त कला लेल वि‍शेष मांग रहैए। पढ़ल-लि‍खल तँ नै छथि‍ मुदा रसनचौकी कलासँ गाम-घरमे लोकप्रि‍य व्‍यक्‍ति‍ छथि‍। आर्थिक रूपसँ नि‍म्न रहि‍तो मि‍थि‍लाक सांस्‍कृति‍क धरोरहकेँ अक्षुण्ण रखने छथि‍। एतदर्थ हि‍नका वि‍देह संगीत कला सम्‍मान- २०१२ सँ सम्‍मानि‍त कऽ वि‍देह परि‍वार हर्षित भऽ रहल अछि‍। बहादुर राम (बहादुर राम केँ वि‍देह संगीत कला सम्‍मान (रसनचौकी) - २०१२ देल गेल। बेचन ठाकुर हुनकासँ साक्षात्कार लेलनि।) बे.ठाकुर- अहाँकेँ ऐ कार्यक प्रति रुचि केना आ कहियासँ जगल? बहादुर राम- पि‍ताजी सँ बाजा बजेनाइ सि‍खलौं, रसन चौकी बजेनाइ सि‍खलौं। तइघड़ी हमर उमर रहए १८ बरख। बे.ठाकुर- ऐ कार्य करबामे अहाँकेँ के प्रोत्साहित करैत अछि? ब.राम- रसनचौकी बजेनाइ हमर जीवि‍का छी। पाँच गामक लोक साटा बनबैए। बे.ठाकुर- पहिल बेर कोन कृति/ काजसँ अहाँ आरम्भ केलौं आ कहियासँ? ब.राम- हम १८ बर्खक रही, चारि‍ आदमी मि‍लि‍ पहि‍ल बेर भगवानक पूजामे बजेने छेलौं। बे.ठाकुर- अहाँक विधाक क्षेत्रमे आन के सभ छथि आ ओ कोन तरहक विशिष्ट काज कऽ रहल छथि? ब.राम- लगभग सभ गाम लोक छथि‍ जे ई काज करै छथि‍। संगमे खेती-बाड़ी सेहो करै छथि‍ जे वि‍शि‍ष्‍ट भेल आ अलग महत सेहो रखैए। बे.ठाकुर- की अहाँक काज अहाँक जीवन-यापनक काजमे, घरेलू काजमे बाधा होइए वा सहायता पहुँचाबैए? ब.राम- कखनो-कखनो बाधा होइए। बे.ठाकुर- अहाँ अपन आन रुचिक विषयमे बताउ। ब.राम- सहनाइ- पिपही बजबैमे सेहो रूचि‍ अछि‍। बे.राम- कोनो संदेश जे अहाँ देबए चाही। ब.राम- सहनाइ, रसनचौकी आदि लुप्त नै हुअए,‍ बजैत रहए समाजमे। ५ फाइल फोटो-१, श्री शोभा कान्‍त महतोकेँ वि‍देह अभि‍नय कला सम्‍मान- २०१२ क प्रशस्ति पत्र प्रदान करैत श्री कपि‍लेश्वर राउत। फाइल फोटो-२, वि‍देह अभि‍नय कला सम्‍मानसँ सम्मानि‍त शोभा कान्‍त महतोकेँ माल्‍यार्पण करैत श्री उमेश मण्‍डल। परि‍चए- श्री शोभा कान्‍त महतो, पि‍ताक नाओं श्री राम अवतार महतो, गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, बि‍हारक स्‍थायी नि‍वासी छथि‍। १६ बर्खक शोभाकान्‍तजी नवम कक्षाक छात्र छथि‍। वि‍देह नाट्य उत्‍सवक संग-संग जे.एम.एस. कोचि‍ंग सेन्‍टर, चनौरागंजक प्रांगणमे आयोजि‍त सभ कार्यक्रममे हि‍नक प्रदर्शन बढ़ि‍या रहैत छन्‍हि‍। नाटकमे हि‍नक अभि‍नयसँ दर्शक वृन्‍द प्रसन्न भऽ सराहैत रहलखि‍न अछि‍। पंचायत एवं प्रखण्‍ड स्‍तरपर सुन्‍दर अभि‍नय लेल हि‍नका पुरस्‍कृत कएल गेल छन्‍हि‍। वि‍देह अभि‍नय कला सम्‍मान- २०१२ सँ सम्‍मानि‍त कऽ वि‍देह परि‍वार हर्षित भऽ रहल अछि‍। शोभा कान्‍त महतो (श्री शोभा कान्‍त महतोकेँ वि‍देह अभि‍नय कला सम्‍मान- २०१२ देल गेल। बेचन ठाकुर हुनकासँ साक्षात्कार लेलनि।) बे.ठाकुर- अहाँकेँ ऐ कार्यक प्रति रुचि केना आ कहियासँ जगल? शो.का.म- हम जखन केकरो गीत गबैत, नाटकमे पाट खेलैत देखैत रही तँ हमरो मन होइत छल जे हमहूँ नाटकमे भाग ली आ अपन कलाकेँ प्रदर्शित करी। मुदा अपन कलाकेँ प्रदर्शित करितौं कतए। स्‍कूलमे जखन कोनो कार्यक्रम होइ छल आ शनि‍केँ गीत नादक कार्यक्रम होइ छल तँ हम गीत गाबए लगी। हमरा वि‍शेष रूपसँ रूचि‍ तहि‍या जागल जहि‍या हम छअम कक्षामे पढ़ैत रही। बे.ठाकुर- ऐ कार्य करबामे अहाँकेँ के प्रोत्साहित करैत अछि? शो.का.म- हमरा ई कार्य करबामे हमर माँ-बाबूजी आ जेठ भाय संगे हमर गुरूदेव श्री बेचन ठाकुर जी वि‍शेष रूपसँ हमरा प्रोत्‍साहि‍त करैत छथि‍। बे.ठाकुर- अहाँकेँ कार्य करबामे की प्रोत्साहित करैत अछि? शो.का.म- हमरा ई कार्य करबामे सभ लोक तथा गुरूदेव जी प्रोत्‍साहि‍त तँ करि‍ते छथि‍। जखन हम कोनो काज करबामे हि‍चकि‍चाइ छी तँ हमर मनसुबाकेँ बढ़ेबाक हेतु हमरा ओ खुद सि‍खबै छथि‍न आ हमरा हुनका द्वारा कतेक बेर सम्मान समारोहमे पारि‍तोषिक सेहो भेटल अछि‍। बे.ठाकुर- पहिल बेर कोन कृति/ काजसँ अहाँ आरम्भ केलौं आ कहियासँ? शो.का.म- हम पहि‍ल बेर गुरुदेव जीक रचि‍त नाटक “छी‍नरदेवी”मे एकटा परबति‍या कोइर नामक मनोवैज्ञानि‍कक अदामे २००९ ई.मे आरम्‍भ केलौं। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजमे १.“सोच”, २.“कोनो पुरान वा नव लीख” वा ३ “शिल्प” ऐ तीनूमे सँ केकरा प्रधानता दै छी? शो.का.म- हम अपन काजमे कोनो पुरान वा नव लीखकेँ ऐ तीनूमे सँ बेसी प्रधानता दइ छी। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजक दिशाकेँ, रूपकेँ एक पाँतिमे कोन रूपमे वर्णन करब। शो.का.म- जखन हम रंगमंचपर रहै छी हमरा बड़ आनन्‍द भेटैए, लेकि‍न हम हरदम वएह सोचैत छी जे हम अपन कलासँ दर्शककेँ भरपूर मनोरंजन दी। बे.ठाकुर- अहाँक काजक समाजमे कोन स्थान छै? की ऐसँ समाजमे परिवर्तन एतै? शो.का.म- हमर काजक समाजमे एगो महत्‍वपूर्ण स्‍थान छै, हम देखैत छी जे ऐसँ समाजमे कि‍छु परि‍वर्त्तन भेलैए तँए हम कहब जे ऐसँ समाजमे परि‍वर्त्तन एतै। बे.ठाकुर- अहाँ जइ विधामे लागल छी ओकर की व्यक्तिगत विशेषता छै, ई ऐ क्षेत्रमे कार्यरत दोसर लोकक काजसँ कोन अर्थे भिन्न छै? शो.का.म- हम ऐ वि‍धामे लागल छी मुदा हम दशम कक्षा (२०१२)क छात्र सेहो छी। ई काज ऐ क्षेत्रमे कार्यरत दोसर लोकक काजसँ भि‍न्न छै जे कलाक क्षेत्रमे लोक बहुत कमे अबैत अछि‍। लोक पाइ कमाइ खाति‍र दोसर काज करए लगैत अछि‍। जइसँ लोकक धि‍यान ऐ क्षेत्रपर पड़ि‍ते नै छै। ऐ क्षेत्रमे लोकक एगो वि‍शेष पहचान छै। बे.ठाकुर- अहाँक विधाक क्षेत्रमे आन के सभ छथि आ ओ कोन तरहक विशिष्ट काज कऽ रहल छथि? शो.का.म- हमरा वि‍धाक क्षेत्रमे हमर गुरुदेव बेचन ठाकुर सेहो छथि‍न। ओ एगो बड़ नीक काज कऽ रहल छथि‍न जे अहु क्षेत्रक सभ वि‍द्यार्थीकेँ, जेकरामे कलाक कि‍छु गुण छै ओकरा अपन कला प्रदर्शन करबाक मौका दैत छथि‍। ओ हरेक साल माँ सरोसतीक पूजा दि‍न कार्यक्रम करै छथि‍न। हुनका हमर आग्रह जे ई कार्यक्रमकेँ सभ दि‍न बरकरार रखथि‍ आ मि‍थि‍लामे कलाक वि‍स्‍तार करथि‍। बे.ठाकुर- की अहाँक काज अहाँक जीवन-यापनक काजमे, घरेलू काजमे बाधा होइए वा सहायता पहुँचाबैए? शो.का.म- हमर काज हमरा जीवन यापन काजमे ने तँ सहायता पहुचाबैए आ ने बाधा। बे.ठाकुर- अहाँ अपन आन रुचिक विषयमे बताउ। शो.का.म- ऐ केँ अलाबा हमरा पढ़ैमे वि‍शेष रूचि‍ अछि‍। बे.ठाकुर- कोनो संदेश जे अहाँ देबए चाही। शो.का.म- हम सलाह देबए योग्‍य नै छी मुदा हम तँ हरेक व्‍यक्‍ति‍ समाजकेँ यएह सलाह देबए चाहब जे समैकेँ सही उपयोग करी। कि‍एक तँ जे समैक सही उपयोग करैए वएह महान बनैत अछि‍। एगो कहबि‍यो छै, समैकेँ पालन करै बलाक पास वि‍द्या छै आ वि‍द्याक पास धन छै कि‍एत तँ Time is money and money is everything आ धनसँ सभ कि‍छु पूरा कएल जा सकैत छै तथा अनुशासनमे रहि‍ अपन जीवन-यापन करी कि‍एत तँ कहल गेल छै- Money is lost nothing is lost. Character is gone everything is gone. धनकेँ चलि‍ गेने ओ पुन: आनल जा सकैए मुदा चरित्रकेँ गेने आपस नै भऽ सकैए। कि‍एक तँ चरित्र ओ वस्‍तु नै छी जे अहाँ बाजारसँ कीनि‍ लेब। इज्जत बनाबए पड़ैत छै। संगे अपना मनमे इज्‍जतक भावना कोनो दोसर आदरणीय व्‍यक्‍ति‍क प्रति‍ रखने रही। कि‍एक तँ बि‍ना आदरक सि‍ढ़ीपर चढ़ने सफलताकेँ कोइ नै छुलक। अगर आइ अपने केकरो आदर करै छी तँ आबएबला जि‍नगी अपनेक आदर करत। अपन मि‍थि‍लासँ वि‍लुप्‍त होइत मैथि‍लीकेँ बचाउ आ मैथि‍लीकेँ एकटा महतपूर्ण स्‍थान भेटए ऐ खाति‍र हमेशा सम्‍पूर्ण मि‍थि‍ला वासीकेँ जागृत कऽ अनेको अनेक कार्यक्रम कऽ सभकेँ जागृत करी। धन्‍यवाद। ६ फाइल फोटो, श्री जगदीश मल्लि‍ककेँ वि‍देह हस्‍तकला सम्‍मान- २०१२ क प्रशस्ति पत्र प्रदान करैत श्री बेचन ठाकुर। परि‍चए- श्री जगदीश मल्‍लि‍क, पि‍ताक नाओं- स्‍व. स्‍वरूप मल्‍लि‍क, गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) केर स्‍थायी नि‍वासी छथि‍। शि‍ल्‍पकलामे हि‍नक प्रति‍ष्‍ठा छन्‍हि‍। हि‍नक बनाओल पथि‍या, कोनि‍याँ, चंङेरा, बि‍आहक डाला इत्‍यादि‍ प्रशंसनीय होइत छन्‍हि‍। वि‍देह हस्‍तकला सम्‍मान- २०१२ सँ सम्‍मानि‍त करैत वि‍देह परि‍वार प्रसन्नता महसूस कएलक अछि‍। जगदीश मल्लि‍क (श्री जगदीश मल्लि‍ककेँ वि‍देह हस्‍तकला सम्‍मान- २०१२ देल गेल। बेचन ठाकुर हुनकासँ साक्षात्कार लेलनि।) बे.ठाकुर- अहाँकेँ ऐ कार्यक प्रति रुचि केना आ कहियासँ जगल? जगदीश मल्लि‍क- पथि‍या, कोनि‍याँ, चंङेरा, बि‍आहक डाला बनेनाइ हमर खानदानी पेशा अछि, बच्चेसँ ई सिखाएल गेल। बे.ठाकुर- ऐ कार्य करबामे अहाँकेँ के प्रोत्साहित करैत अछि? जगदीश मल्लि‍क- हमरा लेल ई काज हमर जीविका अछि, हमर माए-बाबू वि‍शेष रूपसँ हमरा प्रोत्‍साहि‍त करैत रहथि‍। बे.ठाकुर- अहाँकेँ कार्य करबामे की प्रोत्साहित करैत अछि? जगदीश मल्लि‍क- लोककेँ हमर काजक महीनी नीक लगै छै, सएह हमरा प्रोत्‍साहि‍त करैत अछि‍। बे.ठाकुर- पहिल बेर कोन कृति/ काजसँ अहाँ आरम्भ केलौं आ कहियासँ? जगदीश मल्लि‍क- पथि‍या, कोनि‍याँ, चंङेरा, बि‍आहक डाला, बिअनि, घिरनी, फिरकी, गुड़चल्ला, बच्चेसँ बनबै छी। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजमे १.“सोच”, २.“कोनो पुरान वा नव लीख” वा ३ “शिल्प” ऐ तीनूमे सँ केकरा प्रधानता दै छी? जगदीश मल्लि‍क- हम अपन काजमे शिल्पकेँ ऐ तीनूमे सँ बेसी प्रधानता दइ छी। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजक दिशाकेँ, रूपकेँ एक पाँतिमे कोन रूपमे वर्णन करब। जगदीश मल्लि‍क- हमर शिल्प लोककेँ नीक लगै छै, हमरा लोक बिसरि जाइए मुदा हमर शिल्पकेँ मोन राखैए। बे.ठाकुर- अहाँक काजक समाजमे कोन स्थान छै? की ऐसँ समाजमे परिवर्तन एतै? जगदीश मल्लि‍क- लोकक आवश्यकताक पूर्ति होइ छै, हम सभ अखनो समाजसँ अलगे छलौं मुदा हमर सभक शिल्प अछूत नै अछि। बे.ठाकुर- अहाँ जइ विधामे लागल छी ओकर की व्यक्तिगत विशेषता छै, ई ऐ क्षेत्रमे कार्यरत दोसर लोकक काजसँ कोन अर्थे भिन्न छै? जगदीश मल्लि‍क- हम ऐ वि‍धामे लागल छी, ऐ क्षेत्रमे लोकक एगो वि‍शेष पहचान रहबाक चाही छलै मुदा से नै छै। सुन्दर कलाकृति बनेनहार अछोप छै!! बे.ठाकुर- अहाँक विधाक क्षेत्रमे आन के सभ छथि आ ओ कोन तरहक विशिष्ट काज कऽ रहल छथि? जगदीश मल्लि‍क- हमरा वि‍धाक क्षेत्र जातीय आधारपर अछि आ एकसँ एक बस्तु सभ बनबै छथि। बे.ठाकुर- की अहाँक काज अहाँक जीवन-यापनक काजमे, घरेलू काजमे बाधा होइए वा सहायता पहुँचाबैए? जगदीश मल्लि‍क- हमर यएह जीवन यापन छी तेँ ई सहायता पहुँचाबैए। बे.ठाकुर- अहाँ अपन आन रुचिक विषयमे बताउ। जगदीश मल्लि‍क- ऐ केँ अलाबा हमर सभक पुश्तैनी सुअर पालनक व्यवसाय अछि, मुदा नव पीढ़ी पढ़ि सेहो रहल अछि। बे.ठाकुर- कोनो संदेश जे अहाँ देबए चाही। जगदीश मल्लि‍क- ऐ सभसँ की हएत। लोकक दिमागमे जे खेला छै तकरा दूर करए पड़त। सभकेँ समाजक अंग बुझए पड़त। शिल्पीकेँ सम्मान देबए पड़त, कोनो काजकेँ खास कऽ हाथसँ करैबला काजकेँ सम्मान देबए पड़त। कतेक शिल्पी मरि खपि गेला। मि‍थि‍लामे कलाक वि‍स्‍तार केना हएत जखन सुन्दर वस्तु बनबैबलाकेँ असुन्दर मानि बहिष्कार करब‍। अहाँ लोकनि हमर शिल्पकेँ सम्मान देलौं ओइ लेल आभार। पढ़ाइ लिखाइ आ बदलल सोच दिमागी खेलाकेँ दूर कऽ सकत, गलत सोचकेँ पटकनियाँ दऽ सकत, तखने शिल्प आ शिल्पकार आ हाथसँ काज केनिहारकेँ सम्मान भेटतै। अहाँ सभ जीती तकर शुभकामना दै छी। ७ फाइल फोटो-१, श्री झमेली मुखि‍याकेँ वि‍देह वस्‍तुकला सम्मान- २०१२ क प्रशस्ति पत्र प्रदान करैत श्री हेमनारायण साहु। फाइल फोटो-२, वि‍देह वस्‍तुकला सम्मानसँ सम्मानि‍त झमेली मुखि‍याकेँ उपहार प्रदान करैत श्री अजय कुमार दास। परि‍चए- श्री झमेली मुखि‍या, पि‍ताक नाओं- स्‍व. मुंगालाल मुखि‍या, गाम+पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) जन्‍म– लगभग १९५०, शि‍क्षा- नि‍रक्षर, बेवसाय- बरहीगि‍री, मुखि‍याजी वाल्‍यकालहि‍सँ शि‍ल्‍पी (वस्‍तुकला)क कार्य कऽ परि‍वारक भरन-पोषण करैत रहला अछि‍। ऐ लेल सामाजि‍क संघर्ष सेहो करए पड़लनि‍‍। मुदा आब एक तरहसँ अनुकरणीय व्‍यक्‍ति‍क रूपमे समाजमे जानल-मानल जाइ छथि‍। वि‍देह वस्‍तुकला सम्मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त कऽ वि‍देह परि‍वार गौरव महसूस कऽ रहल अछि‍। झमेली मुखि‍या (झमेली मुखि‍याकेँ वि‍देह वस्‍तुकला सम्मान २०१२ देल गेल। राम वि‍लास साहु हुनकासँ साक्षात्कार लेलनि।) रा.वि‍.सा- अहाँकेँ ऐ कार्यक प्रति रुचि केना आ कहियासँ जगल? झमेली मु- हम भूमिहीन छलौं। आने-आनक खेत सभमे खेतीक-बाड़ीक काज करै छलौं। कोनो कारणे काज छुटलापर बैसारी भऽ जाइ छलए। गामेमे हमर पड़ोसि‍ये बरही छथि‍ जि‍नका सभकेँ देखि‍ लकड़ी काज सि‍खलौं। बादमे अपने कारबार करै छी। आइ तीस बरखसँ ई काज हम कऽ रहल छी। रा.वि‍.सा- ऐ कार्य करबामे अहाँकेँ के प्रोत्साहित करैत अछि? झमेली मु- ऐ काज करैमे हम आत्‍मनि‍र्भर छी, केकरो ऐसी-तैसीमे नै रहए पड़ैए। आ सएह हमरा प्रोत्‍साहि‍त करैए। रा.वि‍.सा- अहाँकेँ कार्य करबामे की प्रोत्साहित करैत अछि? झमेली मु- हमरा काज करबामे हमर हुनर आ आत्‍मबल प्रोत्‍साहि‍त करैत रहल। हमरा अपना काजपर वि‍श्वास अछि‍ जे ई काज सभ दि‍न चलैत रहत आ कहि‍यो भुखमरी नै रहैए आ ने रहत। रा.वि‍.सा- पहिल बेर कोन कृति/ काजसँ अहाँ आरम्भ केलौं आ कहियासँ? झमेली मु- पहि‍ल बेर हम चौकी, चौकैठ, केबाड़, कुर्सी-टेबुल आ काठक बक्‍सा बनेनाइ शुरू केलौं। हम पढ़ल-लि‍खल नै छी। तँए दि‍न-तारीख नै बता सकै छी, लगभग तीस बरखसँ ई काज करै छी। रा.वि‍.सा- अहाँ अपन काजमे १.“सोच”, २.“कोनो पुरान वा नव लीख” वा ३ “शिल्प” ऐ तीनूमे सँ केकरा प्रधानता दै छी? झमेली मु- हमरा अपन काजमे हम अपन सोचकेँ प्रधानता दै छी। रा.वि‍.सा- अहाँ अपन काजक दिशाकेँ, रूपकेँ एक पाँतिमे कोन रूपमे वर्णन करब। झमेली मु- लकड़ी काजमे रोजगारक सभ दि‍न अवसर रहै छै। पहिलैयो छल आ बादमे सेहो रहत। रा.वि‍.सा- अहाँक काजक समाजमे कोन स्थान छै? की ऐसँ समाजमे परिवर्तन एतै? झमेली मु.- हमर काजक, बरहीगीरीक स्‍थान समाजमे मुख्‍य छै। समाजमे रहैबला सबहक घरमे लकड़ीसँ बनल समानक जरूरत पड़ै छै। जइले लकड़ी मि‍स्‍त्रीक जरूरत छै। ऐ काजमे बेसी रोजगार भेटै छै तँए समाजमे परि‍वर्तन अवस्‍स हेतै। रा.वि‍.सा- अहाँ जइ विधामे लागल छी ओकर की व्यक्तिगत विशेषता छै, ई ऐ क्षेत्रमे कार्यरत दोसर लोकक काजसँ कोन अर्थे भिन्न छै? झमेली मु- हम जइ वि‍धामे लागल छी ओकर व्‍यक्‍ति‍गत वि‍शेषता छै। जे ई काज मेहनति‍या होइ छै। मुदा काजमे कहि‍यो रौदी-दाही नै होइ छै। रख मजदूरी चोखा काम। दोसर वि‍शेषता छै जे काज करैमे ने रौदक आ ने बर्खाक समस्‍या छै। घर बैठल काज होइ छै। ई काज सभ नै करै छै तँए दोसर लोकक काजसँ भि‍न्न छै। रा.वि‍.सा- अहाँक विधाक क्षेत्रमे आन के सभ छथि आ ओ कोन तरहक विशिष्ट काज कऽ रहल छथि? झमेली मु- ओना तँ ऐ वि‍धामे बरही जाति‍क लोक काज करै छथि‍ मुदा हम तँ मलाह छी। हम सभ जाति‍क लोककेँ ऐ काज लेल प्रोत्‍साहि‍त करै छि‍यनि‍ आ जे मौका देलक ओकरा काजक लूरि‍ सि‍खेबो करै छी। हम अपन चारू बेटाकेँ सेहो इएह काजक लूरि‍ सि‍खौने छी, ओ सभ खूम नीक मि‍सतिरि‍आइ करैए, रूपैया सेहो कमाइए। रा.वि‍.सा- की अहाँक काज अहाँक जीवन-यापनक काजमे, घरेलू काजमे बाधा होइए वा सहायता पहुँचाबैए? झमेली मु- हमर काज जीवन-यापनक काजमे सहायता पहुँचाबैए। घरेलू काजमे बाधा कि‍अए हएत। कोनो बाधा नै। रा.वि‍.सा- अहाँ अपन आन रुचिक विषयमे बताउ। झमेली मु- हमर अपन आन रूची गाए-भैंस पोसनाइ अछि‍। जइसँ परि‍वारमे दूध, दही, घी आ गोइठा-करसीक भरपाइ भऽ जाइए। रा.वि‍.सा- कोनो संदेश जे अहाँ देबए चाही। झमेली मु- हम एहन संदेश दइले चाहै छी जे कमो पूंजीमे लोक अपन काज ठाढ़ कऽ अपने काज करए। ८ फाइल फोटो-१, श्री रमेश कुमार भारतीकेँ वि‍देह चि‍त्रकला सम्मान- २०१२ क प्रशस्ति पत्र प्रदान करैत मो. समसाद आलम। फाइल फोटो-२, वि‍देह चि‍त्रकला सम्मानसँ सम्मानि‍त रमेश कुमार भारतीकेँ उपहार प्रदान करैत वरीय उपसमाहर्ता सह प्रभारी एस.डी.ओ. चेतनारायण राय एवं साहि‍त्‍यकार जगदीश प्रसाद मण्‍डल। परि‍चए- श्री रमेश कुमार भारती, पि‍ताक नाओं- श्री मोती मण्‍डल, जन्‍म ति‍थि‍- १० मार्च १९८६, शि‍क्षा- अन्‍तर स्‍नातक, गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार), पि‍न- ८४७४१० रमेश कुमार भारती (रमेश कुमार भारतीकेँ वि‍देह चि‍त्रकला सम्मान- २०१२ देल गेल। बेचन ठाकुर हुनकासँ साक्षात्कार लेलनि।) बे.ठाकुर- अहाँकेँ ऐ कार्यक प्रति रुचि केना आ कहियासँ जगल? रमेश- बच्‍चेसँ ऐ काजक प्रति‍ रूचि‍ अछि‍। खेत-खरि‍हान अादि‍क दृश्‍य देखि‍ कागजक पन्नापर बनबैत फोटोकेँ देखि‍ कएक गोटे धन्‍यवाद दैत छलाह। हमर रूचि‍ बढ़ैत गेल। बे.ठाकुर- ऐ कार्य करबामे अहाँकेँ के प्रोत्साहित करैत अछि? रमेश- ओना तँ समाजोक लोक मुदा मुख्‍य रूपसँ हमर गुरु श्री सुमन ठाकुर जि‍नक घर रैयाम छि‍यनि‍। हमरापर ओ बहुत धि‍यान रखैत छथि‍। जखन-कखनो हुनका लग जाइ छी तँ प्रोत्‍साहि‍त करैत रहै छथि‍। बे.ठाकुर- अहाँकेँ कार्य करबामे की प्रोत्साहित करैत अछि? रमेश- नीक करबाक भावनासँ उपजल एकाग्रता। बे.ठाकुर- पहिल बेर कोन कृति/ काजसँ अहाँ आरम्भ केलौं आ कहियासँ? रमेश- पहि‍ल बेर हम पेन्‍सि‍ल आ सादा कागजपर स्‍क्रेचि‍ंग केलौं जखन हम छठा वर्गमे पढ़ैत रही। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजमे १.“सोच”, २.“कोनो पुरान वा नव लीख” वा ३ “शिल्प” ऐ तीनूमे सँ केकरा प्रधानता दै छी? रमेश- हम अपन पेंटि‍ंग कार्यमे सभसँ पहि‍ल सोचकेँ प्रधानता दइ छी। बे.ठाकुर- अहाँक काजक समाजमे कोन स्थान छै? की ऐसँ समाजमे परिवर्तन एतै? रमेश- कलाक अर्थ अछि‍ सुन्‍दरता जे कोनो चीज देखबामे नीक लगै वा सुन्‍दर लगै ओ कला छी। व्‍यवसायक क्षेत्रमे बहुत मायने रखैत अछि‍, एक-दोसरकेँ दि‍सा बतबैत अछि‍, देशक कोन-कोनमे एक दोसराकेँ सही समानक पहि‍चान कराबैत अछि‍ जइसँ समाजमे परि‍वर्तन होइत अछि‍। बे.ठाकुर- की अहाँक काज अहाँक जीवन-यापनक काजमे, घरेलू काजमे बाधा होइए वा सहायता पहुँचाबैए? रमेश- कोना बाधा नै, सहायता पहुँचबैए। बे.ठाकुर- अहाँ अपन आन रुचिक विषयमे बताउ। रमेश- हमर दोसर रूचि‍ अमानत कार्य आ कम्‍प्‍यूटर अछि‍। बे.ठाकुर- कोनो संदेश जे अहाँ देबए चाही। रमेश- सम्‍बन्‍धि‍त क्षेत्रक कलाकारसँ आग्रह अछि‍ जे ओ अपना क्षेत्रमे रोजगार लेल मांग करथि‍, तत्‍पर होथि‍। जाधरि रोजगारक अवसर नै औत, मि‍थि‍लोक स्‍कूल-काॅलेजमे पेंटि‍ंग-पढ़ाइक बेवस्‍था नै हेतै, ताधरि‍ समुचि‍त वि‍कास केना हेतै। मुदा तइले संघर्षक जरूरत‍ अछि‍। ९ फाइल फोटो-१, श्री पनक लाल मण्‍डलकेँ वि‍देह चि‍त्रकला सम्‍मान- २०१२क प्रशस्ति पत्र प्रदान करैत श्री हेमनारायण साहु। फाइल फोटो-२, वि‍देह चि‍त्रकला सम्‍मानसँ सम्मानि‍त पनक लाल मण्‍डलकेँ सम्मानि‍त करैत वरीय उपसमाहर्ता सह प्रभारी एस.डी.ओ. चेतनारायण राय एवं कवि‍ जनक कि‍शोर लाल दास। परि‍चए- श्री पनक लाल मण्‍डल, पि‍ताक नाओं स्‍व. सुन्‍दर मण्‍डल, गाम एवं पत्रालय- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार), बेवसाय- चित्रकला। जन्‍म ति‍थि‍- ०५/ ०९/ १९६७, शि‍क्षा- बी.ए. (१९९३-९५), चि‍त्रकलासँ इलाकामे प्रसि‍द्ध छथि‍। वि‍द्यालय, महावि‍द्यालय, अनुमण्‍डल कार्यालय इत्‍यादि‍मे अनेको चि‍त्र बना अपन पहि‍चान एकटा नीक चि‍त्रकारक रूपमे बनौनो छथि‍। वि‍देह चि‍त्रकला सम्‍मान- २०१२ सँ सम्‍मानि‍त करैत वि‍देह परि‍वार प्रसन्नता महसूस कएलक अछि‍। पनक लाल मण्‍डल (पनक लाल मण्‍डलकेँ वि‍देह चि‍त्रकला सम्‍मान- २०१२ देल गेल। राम वि‍लास साहु हुनकासँ साक्षात्कार लेलनि।) रा.वि‍.सा- अहाँकेँ ऐ कार्यक प्रति रुचि केना आ कहियासँ जगल? प.ला.मं.- ऐ कार्यक प्रति‍ लूड़ि‍ हमर बड़-भाय श्री रामदेव मण्‍डलसँ मि‍लल। हुनके संगे १९८४ ई. सँ कार्य केनाइ शुरू केलौं। रा.वि‍.सा- ऐ कार्य करबामे अहाँकेँ के प्रोत्साहित करैत अछि? प.ला.मं- ऐ कार्यकेँ करबामे हमर आत्‍मबल आ अपन वि‍श्वास अछि‍। रा. वि‍. सा- अहाँकेँ कार्य करबामे की प्रोत्साहित करैत अछि? प.ला.मं- हमरा ऐ कार्यक प्रोत्‍साहनमे हमर नीक-काज माने स्‍तरीय ि‍चत्रक योगदान अछि‍। रा. वि‍. सा- पहिल बेर कोन कृति/ काजसँ अहाँ आरम्भ केलौं आ कहियासँ? प.ला.मं- १९८९ ई. मे हम इण्टर परीक्षा दइले दरभंगा गेल छलौं। ओहीठाम एक पेंटरकेँ “तुम मेरे हो” फि‍ल्‍मक पोस्‍टर-वैनर बनबैत देखलौं। तही दि‍नसँ हमरोमे इच्‍छा जगल। रा.वि‍.सा- अहाँ अपन काजमे १.“सोच”, २.“कोनो पुरान वा नव लीख” वा ३ “शिल्प” ऐ तीनूमे सँ केकरा प्रधानता दै छी? प.ला.मं- हम अपन काजमे शि‍ल्‍पक प्रधानता दइ छी। हमरा बुझने, शि‍ल्‍पक जौंआ-भाए छि‍ऐ पेंटि‍ंग। रा.वि‍.सा- अहाँ अपन काजक दिशाकेँ, रूपकेँ एक पाँतिमे कोन रूपमे वर्णन करब। प.ला.मं- हमर जे पेंटि‍ंग कलाक काज अछि‍ तइमे हम साफ देखि‍ रहल छी जे बहुत पैघ रोजगारक अवसर छै ऐ फि‍ल्‍डमे। ई कला सभ दि‍नसँ छै आ आगूओ रहत। रा.वि‍.सा- अहाँक काजक समाजमे कोन स्थान छै? की ऐसँ समाजमे परिवर्तन एतै? प.ला.मं- हमर पेंटि‍ंगक स्‍थान समाजमे नीक अछि‍। हमरा कखनो छुट्टी नै होइए। तइसँ बुझै छी जे अर्जनक बढ़ि‍या संभावना छै। जखने अर्जन हेतै तँ समाजमे बदलाब हेबे करत। रा.वि‍.सा- अहाँ जइ विधामे लागल छी ओकर की व्यक्तिगत विशेषता छै, ई ऐ क्षेत्रमे कार्यरत दोसर लोकक काजसँ कोन अर्थे भिन्न छै? प.ला.मं- हम जइ वि‍धामे लागल छी ओकर वि‍शेषता ई छै जे ऐ काजक हुनर सभकेँ नै होइ छै कला ईश्वरीय देन होइ छै तँए ई काज सभ नै कऽ सकै छै। ऐ लेल ई काज दोसर लोकक काजसँ भि‍न्न छै। आन-आन काज सभ दि‍न नै होइ छै मुदा हमर ऐ काज करबाक मौका सभ दि‍न भेटै छै। आन काेनो काजमे जे मजदूरी आ सम्मान भेटै छै ओइसँ बेसी मजदूरी आ मान-सम्‍मान ऐ काजमे भेटै छै। रा.वि‍.सा- अहाँक विधाक क्षेत्रमे आन के सभ छथि आ ओ कोन तरहक विशिष्ट काज कऽ रहल छथि? प.ला.मं- हमरा वि‍धामे माने चि‍त्रकलामे सभ जाति‍ धर्मक लोक जुड़ल छथि‍। कि‍एक तँ ई वि‍धा कोनो खास जाि‍त वा धर्मक खरि‍दल नै छि‍ऐ। ई काज करैबलामे एक वि‍शि‍ष्‍ट गुण होइ छै। महीनसँ-महीन चि‍त्रकेँ सुन्‍दर आकर्षक आ नम्‍हर चि‍त्रमे सेहो बदलऽ पड़ै छै। ऐ क्षेत्रमे एक-सँ-एक सराहनीय आ वि‍शि‍ष्‍ट काज करैबला छथि। राम.वि‍.सा- की अहाँक काज अहाँक जीवन-यापनक काजमे, घरेलू काजमे बाधा होइए वा सहायता पहुँचाबैए? प.ला.मं- हमर काज हमरा जीवन-यापनक काजमे कोनो बाधा नै, सहायक होइए। राम.वि‍.सा- अहाँ अपन आन रुचिक विषयमे बताउ। प.ला.मं- हमर अपन आन रूचि‍ पढ़नाइ, संगीत सुननाइ आ समाजक दसनामा काजमे अछि‍। राम.वि‍.सा- कोनो संदेश जे अहाँ देबए चाही। प.ला.मं- हम तँ ओइ योग्‍य नै छी मुदा ई जरूर कहब जे ऐ क्षेत्रमे वि‍भि‍न्न तरहक अवसर छै, तँए धैर्य आ बि‍सवास राखि‍ आगू मुँहे समैकेँ परेखि‍-परेखि‍ चलैक चाही। १० फाइल फोटो-१, श्री लक्ष्‍मी दासकेँ वि‍देह कि‍सानी आत्‍म नि‍र्भर संस्‍कृति‍ सम्मान- २०१२क प्रशस्ति-पत्र प्रदान करैत श्री जगदीश झा। फाइल फोटो-२, वि‍देह कि‍सानी आत्‍म नि‍र्भर संस्‍कृति‍ सम्मानसँ सम्मानि‍त लक्ष्‍मी दासकेँ सम्मानि‍त करैत एवं उपहार प्रदान करैत श्री बेचन ठाकुर एवं दुर्गानन्‍द मण्‍डल। परि‍चए- श्री लक्ष्‍मी दास, पि‍ताक नाओं स्‍व. फनी दास, गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी बि‍हारक स्‍थायी नि‍वासी छथि‍। गाममे रहि कृर्षि कार्यसँ जीवन-यापन करैत रहला अछि‍। डीहक अलाबे कट्ठा पाँचेक जमीन रहने आवश्‍यकता अनुसार बटाइ खेती-वाड़ी करबामे अपन गुंजाइश कएलनि‍। अपने अल्‍प शि‍क्षि‍त रहि‍तो बेटा-बेटीकेँ नीक शि‍क्षा दि‍एबामे गाममे अनुकरणीय व्‍यक्‍ति‍ छथि‍। एतदर्थ हि‍नका वि‍देह कि‍सानी आत्‍मनि‍र्भर संस्‍कृति‍ सम्मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त कऽ सम्‍पूर्ण वि‍देह परि‍वार प्रसन्न अछि‍। लक्ष्‍मी दास (श्री लक्ष्‍मी दासकेँ “कि‍सानी आत्‍म नि‍र्भर संस्‍कृति” लेल वि‍देह सम्मान २०१२ देल गेल। बेचन ठाकुर हुनकासँ साक्षात्कार लेलनि।) बे.ठाकुर- अहाँकेँ ऐ कार्यक प्रति रुचि केना आ कहियासँ जगल? लक्ष्‍मी दास- शुरुएसँ, बेरमामे कथा गोष्‍ठीसँ ऐपर लोकक ध्यान गेलै। बे.ठाकुर- ऐ कार्य करबामे अहाँकेँ के प्रोत्साहित करैत अछि? लक्ष्‍मी दास- बेरमामे साहि‍त्‍यि‍क प्रेमी बहुत गोटे छथि‍ जेना श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री कपि‍लेश्वर राउत आदि‍। हुनके सबहक संग हमरो जि‍ज्ञासा जागल। बे.ठाकुर- अहाँकेँ कार्य करबामे की प्रोत्साहित करैत अछि? लक्ष्‍मी दास- वामपंथी वि‍चार। बे.ठाकुर- पहिल बेर कोन काजसँ अहाँ आरम्भ केलौं आ कहियासँ? लक्ष्‍मी दास- कट्ठा भरि खेतमे खेती शुरू केलौं आ नव विधिसँ ई सम्भव भऽ सकल। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजमे १.“सोच”, २.“कोनो पुरान वा नव लीख” वा ३ “शिल्प” ऐ तीनूमे सँ केकरा प्रधानता दै छी? लक्ष्‍मी दास- बामपंथी सोच आ नव वि‍चार। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजक दिशाकेँ, रूपकेँ एक पाँतिमे कोन रूपमे वर्णन करब। लक्ष्‍मी दास- श्रमि‍क छी श्रमि‍कक प्रति‍ प्रेम रहैत अछि‍, ओही दि‍शामे काज करैत छी। बे.ठाकुर- अहाँक काजक समाजमे कोन स्थान छै? की ऐसँ समाजमे परिवर्तन एतै? लक्ष्‍मी दास- मजदूर वर्गकेँ लाभ होइत छै, ओकरे ऊपर छाप छै। बे.ठाकुर- अहाँ जइ विधामे लागल छी ओकर की व्यक्तिगत विशेषता छै, ई ऐ क्षेत्रमे कार्यरत दोसर लोकक काजसँ कोन अर्थे भिन्न छै? लक्ष्‍मी दास- कम पढ़ल लि‍खल रहने दोसर वि‍धामे असुवि‍धा भऽ रहल अछि‍ लेकि‍न अपन वि‍चार व्‍यक्‍त करै दुआरे ऐ वि‍धामे कार्यरत छी। बे.ठाकुर- अहाँक विधाक क्षेत्रमे आन के सभ छथि आ ओ कोन तरहक विशिष्ट काज कऽ रहल छथि? लक्ष्‍मी दास- ऐ क्षेत्रमे श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री कपि‍लेश्वर राउत, श्री उमेश मण्‍डल, श्री शि‍व कुमार मि‍श्र और बहुत गोटे बहुत तरहक काज कऽ रहल छथि‍। बे.ठाकुर- की अहाँक काज अहाँक जीवन-यापनक काजमे, घरेलू काजमे बाधा होइए वा सहायता पहुँचाबैए? लक्ष्‍मी दास- परि‍वारक कार्यसँ जे समए बचैए तइमे काज करै छी, तँए कोनो बाधा नै बुझै छी। जहाँ तक कि‍छु लाभे होइए। बे.ठाकुर- अहाँ अपन आन रुचिक विषयमे बताउ। लक्ष्‍मी दास- वि‍हनि‍ कथासँ शुरू केलौं आ पहि‍ल कथा छल ‘झुटका’। पढ़ैक रूचि‍ तँ सभमे अछि‍, मुदा लि‍खै छी अहीटामे। बे.ठाकुर- कोनो संदेश जे अहाँ देबए चाही। लक्ष्‍मी दास- संदेश यएह देबए चाहै छी जे पढ़ै-लि‍खैक रूचि‍ सभ गोटे जगबथि‍। ११ फाइल फोटो-१, सुश्री प्रि‍यंका कुमारीकेँ वि‍देह हास्‍य अभिनय सम्‍मान- २०१२ क प्रशस्ति पत्र प्रदान करैत श्रीमति नीतू देवी। फाइल फोटो-२, वि‍देह हास्‍य अभिनय सम्‍मानसँ सम्मानि‍त प्रि‍यंका कुमारीकेँ सम्मानि‍त करैत डॉ. उषा महासेठ। परि‍चए- सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, पि‍ताक नाओं श्री बैद्यनाथ साह, गाम- सि‍मरा, पत्रालय- सि‍मरा, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार)। १६ वर्षीय प्रि‍यंका दसम वर्गक छात्रा छथि‍। पंचायत स्‍तरपर अपन नीक प्रदर्शन लेल पुरस्‍कृत भऽ चुकल छथि‍। जे.एम.एस., कोचि‍ंग सेन्‍टर, चनौरागंज केर प्रांगणमे सरस्‍वती पूजाक अवसरपर आयोजि‍त सांस्‍कृति‍क कार्यक्रममे हास्‍यक क्षेत्रमे हि‍नका प्रति‍ष्‍ठा भेटलनि‍। वि‍देह हास्‍य कला सम्‍मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त करैत वि‍देह परि‍वार प्रसन्न अछि‍‍। प्रि‍यंका कुमारी (प्रि‍यंका कुमारीकेँ वि‍देह हास्‍य अभिनय सम्‍मान- २०१२ देल गेल। बेचन ठाकुर हुनकासँ साक्षात्कार लेलनि।) बे.ठाकुर- अहाँकेँ ऐ कार्यक प्रति रुचि केना आ कहियासँ जगल? प्रि‍यंका- हमरा ऐ कार्यक प्रति‍ आेइ दि‍न रूचि‍ जागल जखन हम छोटे धि‍या-पुता छलौं। देखैत छलौं जे नाटकमे केना लड़ि‍की केकरो बेटा बनि‍ गेल तँ माए बनि‍ गेल। एनाहि‍ते सभ लड़ि‍की मि‍लि‍ कऽ नाटक करैत छलीह। ई सभ देखलापर हमरा बुझैमे आएल जे कोनो लड़ि‍की दस गोटेक बीच बजैमे सुकुचाइत रहैए। मुदा ओही लड़की सभकेँ जखन सबहक सामने कनिये दि‍नक बाद नाटक खेलाइत देखलौं, सबहक सोझाँमे बजैत देखलौं, धाक टुटैत देखलौं, नीक-नीक रौल करैत देखलौं तँ हमरो मनमे आएल जे हमहूँ दस गोटेक बीचमे बाजी। आ धीरे-धीरे ई काज शुरू केलौं। आइ ओकर फल हमराे भेट गेल। आइ हमहूँ दस गोटेक बीच बाजए लगलौं। बे.ठाकुर- ऐ कार्य करबामे अहाँकेँ के प्रोत्साहित करैत अछि? प्रि‍यंका- ऐ कार्य करबामे पहि‍ने तँ हमर घरक गारजन प्रोत्‍साहि‍त करै छथि‍ जे ओ ऐ कार्य हेतु आज्ञा दैत छथि‍। जौं ओ कोनो काजक महत नहि‍यो बुझै छथि‍ तँ कोनो बुजूर्ग द्वारा बूझि‍-समझि‍ कऽ ओकर महत हमरो बुझा प्रोत्‍साहि‍त करै छथि‍। बे.ठाकुर- अहाँकेँ कार्य करबामे की प्रोत्साहित करैत अछि? प्रि‍यंका- हमर मन, इच्‍छा आ लगाउ। बे.ठाकुर- पहिल बेर कोन कृति/ काजसँ अहाँ आरम्भ केलौं आ कहियासँ? प्रि‍यंका- २००५ ई. मे पहि‍ल बेर हम नाटकमे ओ रौल लैत रही जइमे मंचपर बाजए नै पड़ए। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजमे १.“सोच”, २.“कोनो पुरान वा नव लीख” वा ३ “शिल्प” ऐ तीनूमे सँ केकरा प्रधानता दै छी? प्रि‍यंका- मि‍लि‍-जुलि कऽ कार्य करएबला सोच। ‍बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजक दिशाकेँ, रूपकेँ एक पाँतिमे कोन रूपमे वर्णन करब। प्रि‍यंका- ऐ तरहक कार्यक्रम एनािहये जारी रहए, हमरा संग आरो सखी-बहि‍नपा सोझाँ औतीह, कला-संस्‍कृति‍क वि‍कास सामुहि‍क रूपेँ हएत। बे.ठाकुर- अहाँक काजक समाजमे कोन स्थान छै? की ऐसँ समाजमे परिवर्तन एतै? प्रि‍यंका- हमरा सनक लोककेँ देखि‍ जि‍ज्ञासा बढ़तै, वि‍श्वास जगतै। परि‍वर्तन हेतै। बे.ठाकुर- अहाँ जइ विधामे लागल छी ओकर की व्यक्तिगत विशेषता छै, ई ऐ क्षेत्रमे कार्यरत दोसर लोकक काजसँ कोन अर्थे भिन्न छै? प्रि‍यंका- कोंचि‍गमे पढ़ै छी बेचन सर लग, वएह ई कार्यक्रम करबै छथि‍। सुवि‍धा अछि‍, माँ-बाबू जीक सहयोग भेटैए। तँए ई हमरा लेल वि‍शेष अछि‍। बे.ठाकुर- अहाँक विधाक क्षेत्रमे आन के सभ छथि आ ओ कोन तरहक विशिष्ट काज कऽ रहल छथि? प्रि‍यंका- संबंधि‍त वि‍धाक क्षेत्रमे बहुतो गोटा छथि‍ जेना कि‍ श्री बेचन ठाकुर। बे.ठाकुर- की अहाँक काज अहाँक जीवन-यापनक काजमे, घरेलू काजमे बाधा होइए वा सहायता पहुँचाबैए? प्रि‍यंका- हमरा ऐ कार्यसँ हमर जीवन-यापनक कार्जमे कोनो बाधा नै पहुँचैत अछि‍ बल्कि‍ सहायता होइत अछि‍। बे.ठाकुर- अहाँ अपन आन रुचिक विषयमे बताउ। प्रि‍यंका- पढ़ैमे आ घरेलू काजमे सेहो रूचि‍ अछि‍। बे.ठाकुर- कोनो संदेश जे अहाँ देबए चाही। प्रि‍यंका- अहू कार्यकेँ आवश्‍यक बूझक चाही। १२ फाइल फोटो-१, श्री यदुनन्‍दन पण्‍डि‍तकेँ वि‍देह शि‍ल्‍प कला सम्मान- २०१२क प्रशस्ति पत्र प्रदान करैत श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल। फाइल फोटो-२, वि‍देह शि‍ल्‍प कला सम्मानसँ सम्मानि‍त यदुनन्‍दन पण्‍डि‍तकेँ सम्मानि‍त करैत पूर्व जि‍ला पार्षद सदस्‍य बलराम साहु एवं कवि‍ जनक कि‍शोर लाल दास। परि‍चए- श्री यदुनन्‍दन पण्‍डि‍त, पि‍ताक नाओं- श्री अशर्फी पण्‍डि‍त, गाम+पोस्‍ट- बेलाराही, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) केर स्‍थायी नि‍वासी छथि‍। उम्र ५० बर्ख। हि‍नका बचपनसँ कुम्हारक कार्यमे अभि‍रूचि छन्‍हि‍। माटि‍क बर्तन-बासन आदि‍क अति‍रि‍क्‍त वि‍भि‍न्न देवी-देवताक मूर्ति बनेबामे सि‍द्धस्‍त छथि‍। उक्‍त कलासँ ई इलाकामे प्रसि‍द्ध छथि‍। सरस्‍वती सनक देवीकेँ दूगो हाथ काटैबला कुम्हारकेँ कलाक संग मजाक बुझै छथि‍, मुदा अपने चारि‍ हाथवाली प्रति‍मा बना अपन क्षेत्रमे प्रसि‍द्धि‍ हासि‍ल कएने छथि‍। वि‍देह शि‍ल्‍प कला सम्मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त कऽ वि‍देह परि‍वार हर्षित अछि‍। यदुनन्‍दन पंडि‍त (यदुनन्‍दन पंडि‍त केँ वि‍देह शि‍ल्‍प कला सम्मान- २०१२देल गेल। बेचन ठाकुर हुनकासँ साक्षात्कार लेलनि।) बे.ठाकुर- अहाँकेँ ऐ कार्यक प्रति रुचि केना आ कहियासँ जगल? य.पंडि‍त- हम ई काज माने मूर्ति बनेनाइ आ कुम्‍हारक जे वर्तन होइए, बच्‍चेसँ यानी कि‍ ताबए दसे बरखक रही तहि‍येसँ करै छी। ई काज हम पि‍ताजी आ नानासँ सि‍खलौं। बे.ठाकुर- ऐ कार्य करबामे अहाँकेँ के प्रोत्साहित करैत अछि? य.पंडि‍त- ऐ कार्य करबामे हमरा ग्राहकक संतुष्‍टि‍ आ जश प्रोत्‍साहि‍त करैए। बे.ठाकुर- पहिल बेर कोन कृति/ काजसँ अहाँ आरम्भ केलौं आ कहियासँ? य.पंडि‍त- शुरूमे हम छोट-छोट काज जेना हाथी बनेनाइ, घोड़ा बनेनाइ शंकरजी, सरस्‍वती मूर्ति इत्‍यादि‍सँ काज शुरू केलौं यएह सभ प्रथम काजमे अछि‍ हमर। ओइ समैमे हम लगभग चौदह बर्खक रही। बे.ठाकुर- की अहाँक काज अहाँक जीवन-यापनक काजमे, घरेलू काजमे बाधा होइए वा सहायता पहुँचाबैए? य.पंडि‍त- हमर काज हमरा जीवन-यापनक काजमे सहायता पहुँचाबैए चूँकि‍ ई काज हमरा समाजक जन्‍मजात वृत्ति‍ अछि‍, ऐ काजसँ पूरा परि‍वारक भरन-पोषन होइए। ई हमर जीवि‍का छी। १३ फाइल फोटो, श्री बुलन राउतकेँ वि‍देह वाद्यकला (ढोलक) सम्मान- २०१२क प्रशस्ति पत्र प्रदान करैत श्री प्रेम प्रकाश एवं श्री भगी‍रथ प्रधान। परि‍चए- श्री बुलन राउत, पि‍ताक नाओं स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत, गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी, बि‍हारक स्‍थायी नि‍वासी छथि‍। उम्र ५० बर्ख। बुलनजी पानक खेती कऽ जीवन यापन करैत छथि‍। ढोलक बजौनाइक रूचि‍ हि‍नका आइ नै, वरण बच्‍चेसँ रहल छन्‍हि‍। अपना इलाकामे उक्‍त कलाक मादे चर्चित छथि‍। लय-तालक अन्‍दाज बेजोर छन्‍हि‍। ई अपन कीर्तन मंडलीक रीढ़ मानल जाइत छथि‍। वि‍देह वाद्यकला (ढोलक) सम्मान- २०१२सँ सम्मानि‍त कऽ वि‍देह परि‍वार हर्षित अछि‍। बुलन राउत (बुलन राउतकेँ वि‍देह वाद्यकला (ढोलक) सम्मान- २०१२ देल गेल। बेचन ठाकुर हुनकासँ साक्षात्कार लेलनि।) बे.ठाकुर- अहाँकेँ ऐ कार्यक प्रति रुचि केना आ कहियासँ जगल? बु-राउत- बचपनेसँ ई रूचि‍ हमरा अछि‍। धीरे-धीरे भजन-कीर्तनमे रमि‍ गेलौं। बे.ठाकुर- ऐ कार्य करबामे अहाँकेँ के प्रोत्साहित करैत अछि? बु.राउत- नाल वादनमे हमर जेठ भाय श्री बाल गोवि‍न्‍द दास प्रोत्‍साहि‍त केलनि‍। बे.ठाकुर- अहाँकेँ कार्य करबामे की प्रोत्साहित करैत अछि? बु.राउत- जखन हम नाल बजबै छी तखन हम आनन्‍दमग्‍न रहै छी। बे.ठाकुर- पहिल बेर कोन कृति/ काजसँ अहाँ आरम्भ केलौं आ कहियासँ? बु.राउत- सभसँ पहि‍ल हम बचपनेसँ नाल बजबैक शौकीन रही। गाममे भजन-कीर्तनमे हम खूब भाग लैत रही। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजमे १.“सोच”, २.“कोनो पुरान वा नव लीख” वा ३ “शिल्प” ऐ तीनूमे सँ केकरा प्रधानता दै छी? बु.राउत- हम अपना काजमे सभसँ बेसी सोचकेँ प्रधान्‍ता दै छी। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजक दिशाकेँ, रूपकेँ एक पाँतिमे कोन रूपमे वर्णन करब। बु.राउत- नाल बजा कऽ हम आनन्दक दि‍शामे अपनो जाइ छी आ संगीयो सभकेँ लऽ जाइ छी। बे.ठाकुर- अहाँक काजक समाजमे कोन स्थान छै? की ऐसँ समाजमे परिवर्तन एतै? बु.राउत- हमरा काजसँ समाजमे सांस्‍कृति‍क वि‍कासक संग प्रेमक फूल खि‍लैत अछि‍। बे.ठाकुर- अहाँ जइ विधामे लागल छी ओकर की व्यक्तिगत विशेषता छै, ई ऐ क्षेत्रमे कार्यरत दोसर लोकक काजसँ कोन अर्थे भिन्न छै? बु.राउत- हम ऐ क्षेत्रमे ई देखलौं जे लोकक व्‍यक्‍ति‍त्‍व बढ़ि‍ जाइ छै। आन क्षेत्रक काजसँ ई काज भि‍न्न अछि‍। बे.ठाकुर- अहाँक विधाक क्षेत्रमे आन के सभ छथि आ ओ कोन तरहक विशिष्ट काज कऽ रहल छथि? बु.राउत- श्री उपेन्‍द्र चौधरी, दुखी कामति‍, बासू चौपाल, संतोष चौधरी तँ बेरमेक छि‍याह आ रमेश कुमार मण्‍डल, छोटकनि‍ मुखि‍या, कार्तिक कुमारजी इत्‍यादि‍ पड़ोसी गामक छथि‍। ई सभ गोटा नाल वादनक नीक ज्ञान रखै छथि‍ आ अपन कलाक प्रदशर्न करै छथि‍। बे.ठाकुर- की अहाँक काज अहाँक जीवन-यापनक काजमे, घरेलू काजमे बाधा होइए वा सहायता पहुँचाबैए? बु.राउत- नाल वादनसँ हमरा घरमे कि‍छु बधो होइए आ कि‍छु सहायतो होइए। बे.ठाकुर- अहाँ अपन आन रुचिक विषयमे बताउ। बु.राउत- नाल वादनसँ तँ हम खूश छि‍हे मुदा हमर रूि‍च अछि‍ भगवानक भजनमे। बे.ठाकुर- कोनो संदेश जे अहाँ देबए चाही। बु.राउत- श्री बेचन जीकेँ हम असीरवाद देबए चाहै छी जे कला केर ऐ क्षेत्रमे सभ वर्गक सभ लोककेँ प्रोत्‍साहि‍त करै छथि‍। हमर संदेश यएह अछि‍ ऐ तरहक आन जे कि‍यो छथि‍ ओहो सभ कलाकारक गोत्रपर धि‍यान नै दैथि‍। कलाकेँ बि‍ना कोनो जाति‍वादी सोचसँ आगाँ बढ़ाबथि‍, अवसर देथि‍न। १४ फाइल फोटो-१, श्री दुर्गानन्‍द ठाकुरकेँ वि‍देह हास्‍य अभिनय सम्मान- २०१२क प्रशस्ति पत्र प्रदान करैत वामासँ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल एवं दहि‍नासँ श्री नन्‍द कि‍शोर गुप्‍ता। फाइल फोटो-२, वि‍देह हास्‍य कला सम्मानसँ सम्मानि‍त दुर्गानन्‍द ठाकुरकेँ सम्मानि‍त करैत अवकाश प्राप्‍त शि‍क्षक हरि‍नारायण झा एवं वरीय उपसमाहर्ता सह प्रभारी एस.डी.ओ. चेतनारायण राय। परि‍चए- श्री दुर्गानन्‍द ठाकुर, पि‍ताक नाओं- स्‍व. भरत ठाकुर, गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, बि‍हारक स्‍थायी नि‍वासी छथि‍। दुर्गानन्‍दजी अंग्रेजी वि‍षयसँ बी.ए. कएने छथि‍। आर्थिक रूपसँ पछुआएल रहलाक कारणे निजी अध्‍यापन कार्य करैत परि‍वारक भरन-पोषन करैत छथि‍। जे.एम.एस. कोचि‍ंग सेन्‍टर, चनौरागंजक वि‍श्‍वसनीय छात्रमे अग्रगण्‍य छथि‍। हि‍नक हास्‍य प्रदर्शन दर्शक वृन्‍दकेँ बड्ड चोटगर लगैत छन्‍हि‍। वि‍देह हास्‍य सम्‍मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त करैत वि‍देह परि‍वार प्रसन्नताक अनुभव कएलक अछि‍। दुर्गा नन्‍द ठाकुर (दुर्गा नन्‍द ठाकुर जी केँ वि‍देह हास्‍य अभिनय सम्मान- २०१२ देल गेल। बेचन ठाकुर हुनकासँ साक्षात्कार लेलनि।) बे.ठाकुर- अहाँकेँ ऐ कार्यक प्रति रुचि केना आ कहियासँ जगल? दु.न.ठा- ऐ कार्यक प्रति‍ हमरा बचपनेसँ लगाउ अछि‍, जखन हम छठा-सतमामे पढ़ैत रही। गुरुदेव श्री बेचन ठाकुर जीक वि‍द्यालयमे पढ़ैत रही जतए प्रति‍ वर्ष कार्यक्रम होइत अछि‍। आेइ कार्यक्रमकेँ देखि‍ कऽ हमरो मनमे अभि‍नय करबाक इच्‍छा भेल। एकबेर हम अपन गुरुदेवकेँ ‘उगना’ नाटकमे उगनाक पाट खेलैत देखलौं जइसँ हम काफी प्रभावि‍त भेलौं आ हमरो मनमे हास्‍य अभि‍नयक रूचि‍ जागि‍ गेल। बे.ठाकुर- ऐ कार्य करबामे अहाँकेँ के प्रोत्साहित करैत अछि? दु.न.ठा- ऐ कार्य करबामे हमरा हमर गुरुदेव बेचन ठाकुर प्रोत्‍साहि‍त करै छथि‍। बे.ठाकुर- अहाँकेँ कार्य करबामे की प्रोत्साहित करैत अछि? दु.न.ठा- हमरा ऐ कार्य करबामे हमर गुरुजी बेचन ठाकुर जीक मार्गदर्शन आ प्रोत्‍साहन हमरा प्रोत्‍साहि‍त करैए। बे.ठाकुर- पहिल बेर कोन कृति/ काजसँ अहाँ आरम्भ केलौं आ कहियासँ? दु.न.ठा- पहि‍ल बेर लगभग सात-आठ साल पहि‍ने अही रंगमंचपर एकटा व्‍यंग्‍यात्‍मक कवि‍तासँ आरम्‍भ केलौं। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजमे १.“सोच”, २.“कोनो पुरान वा नव लीख” वा ३ “शिल्प” ऐ तीनूमे सँ केकरा प्रधानता दै छी? दु.न.ठा- हम अपन काजमे सोचकेँ प्रधानता दइ छी। बे.ठाकुर- अहाँक काजक समाजमे कोन स्थान छै? की ऐसँ समाजमे परिवर्तन एतै? दु.न.ठा- हमर काजसँ समाजमे व्‍याप्‍त तनाव कि‍छु कालक लेल कम भऽ जाइत अछि‍। अगर हमरा काजसँ एक्को आदमीक मन प्रसन्न होइत अछि‍ तँ हम बुझै छी जे हम कि‍छु वि‍शि‍ष्‍ट कार्य केलौं। अखुनका समैमे लोककेँ दुखे-दुख आ तनावे-तनाव अछि‍। तँए अगर लोक एक-दोसरकेँ प्रसन्न कऽ दैत अछि‍ तँ हम बुझै छी जे ऐ काजसँ समाजमे परि‍वर्त्तन जरूरे हेतै। बे.ठाकुर- अहाँ जइ विधामे लागल छी ओकर की व्यक्तिगत विशेषता छै, ई ऐ क्षेत्रमे कार्यरत दोसर लोकक काजसँ कोन अर्थे भिन्न छै? दु.न.ठा- हमर ऐ वि‍धामे व्‍यक्‍ति‍गत वि‍शेषता ई अछि‍ जे सदि‍खन लोककेँ खुश रखैक प्रयास करैत छी। जेना हमर जीवन-यापनक पेशा अध्‍ययन-अध्‍यापन अछि‍ आ ऐ क्षेत्रमे हम सेहो अपना वि‍द्यार्थीकेँ हँसा-खेला कऽ पढ़बैत छी। ऐ क्षेत्रमे कार्यरत कि‍छु लोक पाइ लेल काज करैत छथि‍ तँ कि‍छु प्रति‍ष्‍ठाक लेल मुदा हम अपन आ दोसराक मनोरंजन लेल ई काज करै छी। बे.ठाकुर- अहाँक विधाक क्षेत्रमे आन के सभ छथि आ ओ कोन तरहक विशिष्ट काज कऽ रहल छथि? दु.न.ठा- हमरा वि‍धाक क्षेत्रमे दयानन्‍द, संजय आदि‍ ऐ संस्‍थानक छात्र सभ अछि‍ ओ सभ अखन इंजी‍नि‍यरि‍ंग कऽ रहल छथि‍। बे.ठाकुर- की अहाँक काज अहाँक जीवन-यापनक काजमे, घरेलू काजमे बाधा होइए वा सहायता पहुँचाबैए? दु.न.ठा- हमर ई काज घरेलू अा जीवन-यापनक काजमे कोनो बाधा नै पहुँचबैए। ई काज हम सदि‍खन नै बल्कि‍ मौका भेटलापर करै छी आ ऐ काजसँ हमरा सहायता ई भेटैए जे हमहूँ तनावमुक्‍त भऽ जाइ छी। बे.ठाकुर- अहाँ अपन आन रुचिक विषयमे बताउ। दु.न.ठ- हमर आन रूचि‍, अखबार पढ़नाइ आ काॅमेडी शो देखनाइ अछि‍। बे.ठाकुर- कोनो संदेश जे अहाँ देबए चाही। दु.न.ठ- हम संदेश देबाक योग्‍य तँ नै छी मुदा एतेक जरूरे कहब जे हमरा सभकेँ अप्‍पन मातृभाषाक वि‍कासमे पूर्ण योगदान देबाक चाही। १५ फाइल फोटो, सुश्री सुलेखा कुमारीकेँ वि‍देह नृत्‍यकला सम्मान- २०१२क प्रशस्ति पत्र प्रदान करैत डॉ. उषा महासेठ। परि‍चए- सुश्री सुलेखा कुमारी, पि‍ताक नाओं श्री हरेराम यादव, गाम आ पत्रालय- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार)। १६ वर्षीय शि‍ल्‍पी, श्री हरेराम यादवक द्वि‍तीय पुत्री छथि‍। नवम वर्गक छात्रा छथि‍। पंचायत आ प्रखण्‍ड स्‍तरपर नृत्‍य कलाक लेल कतेको बेर पुरस्‍कार भेटल छन्‍हि‍। जे.एम.एस. कोचि‍ंग सेन्‍टर, चनौरागंजक प्रांगणमे आयोजि‍त सांस्‍कृति‍क कार्यक्रममे ई दर्शक लोकनि‍क मन मोहैत रहली अछि‍। वि‍देह नृत्‍य कला सम्‍मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त करैत वि‍देह परि‍वार गौवान्‍वि‍त महसूस करैत अछि‍। सुलेखा कुमारी (सुलेखा कुमारीकेँ वि‍देह नृत्‍यकला सम्मान- २०१२ देल गेल। बेचन ठाकुर हुनकासँ साक्षात्कार लेलनि।) बे.ठाकुर- अहाँकेँ ऐ कार्यक प्रति रुचि केना आ कहियासँ जगल? सुलेखा- हम चौथा क्‍लाशमे पढ़ैत रही। टेलीवि‍जन देखैमे बड़ नीक लगैत रहए। हमरा लगैए जे हम दूरदर्शनसँ प्रभावि‍त भेलौं। बे.ठाकुर- ऐ कार्य करबामे अहाँकेँ के प्रोत्साहित करैत अछि? सुलेखा- ऐ काज करबामे हमर जेठ बहि‍न रेखा कुमारी हमरा सभसँ बेसी प्रोत्‍साहि‍त करै छथि‍। बे.ठाकुर- अहाँकेँ कार्य करबामे की प्रोत्साहित करैत अछि? सुलेखा- ऐ काज करबामे माने नृत्‍य करैमे जे सम्मान भेटैए वएह हमर प्रोत्‍साहनक जड़ि‍ छी। बे.ठाकुर- पहिल बेर कोन कृति/ काजसँ अहाँ आरम्भ केलौं आ कहियासँ? सुलेखा- पहि‍ल बेर, कक्षा चारि‍मे वि‍द्यालय स्‍तरपर सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम आयोजि‍त छल तइमे हम नृत्‍य केने रही। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजमे १.“सोच”, २.“कोनो पुरान वा नव लीख” वा ३ “शिल्प” ऐ तीनूमे सँ केकरा प्रधानता दै छी? सुलेखा- सभसँ पैघ मनुक्‍खक वि‍चार होइए। तँए हम पहि‍ल प्रधानता ‘सोच’केँ दै छी। बे.ठाकुर- अहाँ अपन काजक दिशाकेँ, रूपकेँ एक पाँतिमे कोन रूपमे वर्णन करब। सुलेखा- जेना नृत्‍य सम्‍पूर्ण शरीरकेँ परि‍वर्तन करैत अछि‍ तहि‍ना ज्ञानी सम्‍पूर्ण दुनि‍याकेँ परि‍वर्तन करैत अछि‍। बे.ठाकुर- अहाँक काजक समाजमे कोन स्थान छै? की ऐसँ समाजमे परिवर्तन एतै? सुलेखा- फि‍लहाल हमर ऐ कार्यक ऐ समाजमे कोनो खास महत नै अछि‍। मुदा हमरा सबहक काजक आबैबला पीढ़ीपर अवस्‍स पड़त। बे.ठाकुर- अहाँ जइ विधामे लागल छी ओकर की व्यक्तिगत विशेषता छै, ई ऐ क्षेत्रमे कार्यरत दोसर लोकक काजसँ कोन अर्थे भिन्न छै? सुलेखा- आगू अबैबला पीढ़ीमे नृत्‍यक वि‍शेषता बड़ छै। आब नृत्‍य हरेक आदमीक सख बनल जा रहल छै। ई काज ऐ क्षेत्रमे कार्यरत दोसर लोकक कार्यसँ भि‍न्न छै। जे दोसर लोक एकरा मनोरंजन बुझै छथि‍ मुदा हमरा लेल ई ‘काज’ छी‍। बे.ठाकुर- अहाँक विधाक क्षेत्रमे आन के सभ छथि आ ओ कोन तरहक विशिष्ट काज कऽ रहल छथि? सुलेखा- हमर गुरुजी श्री बेचन ठाकुर जे नाटक लि‍खबो करै छथि‍ आ ि‍नर्देशन सेहो करै छथि‍। सखी-सहेली-बहि‍नपा आदि‍ बहुत गोटे सभ छथि‍। बे.ठाकुर- की अहाँक काज अहाँक जीवन-यापनक काजमे, घरेलू काजमे बाधा होइए वा सहायता पहुँचाबैए? सुलेखा- हमर ई काज जीवन-यापनक काजमे कोनो बाधा नै पहुँचबैए। बे.ठाकुर- अहाँ अपन आन रुचिक विषयमे बताउ। सुलेखा- गीत गौनाइ आ सुननाइमे रुचि अछि‍। बे.ठाकुर- कोनो संदेश जे अहाँ देबए चाही। सुलेखा- हमर संदेश अछि‍ जे मैथि‍लीकेँ वि‍श्व स्‍तरपर पहुँचबैले संघर्ष समि‍ति‍ बनाएल जाए। आ हमहूँ अपनाकेँ ओइ संघर्ष समि‍ति‍क एकटा सदस्‍यक रूपमे देखए चाहै छी। ज्योति सुनीत चौधरी एकांकी केसर पात्र सूत्रधार वा पार्श्वध्वनि- (ई महिला वा पुरुख कोनो स्वर भऽ सकैए, महिला स्वर रहए तँ बेशी नीक) पुरुष पात्र: पिता महिला पात्र : कैश (माने केसर) वृद्धा विदेशी मूलक सैम्युएला माने सैम नवयुवती ग्राहक (घरक दृश्य, दूटा कुर्सी लगेलासँ सेहो काज चलि जाएत। पार्श्वसँ रेडियो वा टी.वी.क अबाज सन अबाज कऽ दियौ वा दू चारिटा बासन ढनमना दियौ तँ सेहो ठीक रहत।) पार्श्वध्वनि::  केसर एक मध्यम वर्गीय परिवारक उच्च महत्वाकांक्षी। ओइ हजारक हजार प्रवासी भारतीय किशोरीमे सँ एक छथि जे बड्ड अभिलाषासँ सीमा टपै छथि। खाली देशक नै वरन भारतीय हिन्दू वैवाहिक संस्थाक नामपर जे हुनका सभकेँ सामाजिक बन्धन रूपी पिछड़ापन लागै छनि, तइ मानसिकताक सेहो। बहुत प्रतीक्षाक बाद स्टुडेण्ट (विद्यार्थी) वीसा आ स्कॉलरशिप भेटलनि। माता-पिता जखन अपन चिन्ता व्यक्त करै छलखिन, जखन ओ सभ अपन परामर्श दैत रहै छलखिन, तखन केसर अपन स्वप्नक उड़ान भरैत रहै छली। पिता: भारतमे एकसँ बढ़ि कऽ एक संस्थान छै, तखन विदेश लेल अतेक किए मोन लागल अछि? भारतक पढ़ल लोक सभकेँ विदेशी कम्पनी सभ प्राथमिकतासँ बहाली करै छै, सेहो चिक्कन वेतन संगे। तखन अहॉंकेँ विदेशमे पढ़ै लेल एतेक किए मोन लागल अछि? कैश: हम जइ विषयमे शोध करब तकर बढ़िया संस्थान विदेशेमे छै आ जखन हमरा खर्चा भेटि रहल अछि तखन अहॉं सभकेँ कोन परेशानी अछि? माँ: मात्र खर्चे महत्वपूर्ण नै छै। अतेक दूर आन देशमे असगर कोना रहबें? कैश: अरे मॉं, सभ साल कतेको विद्यार्थी बाहर जाइ छै। बहुत भागसँ एहेन अवसर भेटै छै। हम ऐ अवसरकेँ बेकार नै होमए देब। माँ: तोहर तुरिया सभक बियाहो भऽ गेलौ। कतेकोकेँ बच्चो भऽ गेलै। कैश:  अरे मॉं, यएह तँ अहॉं सभ नै बूझि रहल छिऐ। हम अपन जिन्दगी खेनाइ, पकेनाइ, पति, सासु-ससुरक सेवा, बच्चा पोसनाइ ऐ सभमे नै व्यर्थ करए चाहै छी। हमरा आर्थिक रूपसँ स्वाबलम्बन चाही। हम अपन अस्तित्व बनाबए चाहै छी। (पुनश्च पार्श्वध्वनि शुरू हएत। एकर उपयोग माँ आ पिताजीक प्रस्थानसँ कऽ सकै छी। माँ-पिताजीक पार्ट खेलनिहार कुर्सी सहित प्रस्थान करथु।) पार्श्वध्वनि: बेटीक ऐ महत्वाकांक्षाक सोझाँ माता पिता नतमस्तक भऽ गेला। अन्ततः विदेशक एक महाविद्यालयमे  शोधकार्य लेल नामांकन भऽ गेलनि। एकटा सम्बन्धी सेहो रहनि ओइ ठाम जे आग्रह केने रहनि पेइंग गेस्ट बनि कऽ रहै लेल। मुदा हिनका अपन स्वाधीनता बेसी प्रिय छलनि जे ओइ सम्बन्धियोकेँ बेसी सुविधाजनक लगलै शाइत। केसरसँ कैश तँ ओ भारतेमे भऽ गेल छलथि, एतौ मानसिक रूपसँ पूर्णतः पढ़ाइपर ध्यान दै लेल एक डिपार्टमेण्टल स्टोरक काउण्टरपर पार्ट टाइम कैशियरक काज पकड़ने छलथि। विद्यालयसँ भागैत-भागैत काज लेल पहुँचैत छलीह। रस्तामे सभ दिन एकटा वृद्धा भेटैत छलखिन। कनी वार्तालाप सेहो भऽ जाइन। (मंच खाली। कैश आ वृद्धाक प्रवेश।) कैश:  नमस्कार, केहेन छी? वृद्धा:– बढ़िया। धन्यवाद, अहॉं अपन कहू। कैश: हमहूँ ठीक छी। धन्यवाद। अहॉंकेँ बहुत दिनसँ देखैत छी, अहॉं असगर घुमैत रहैत छी। परिवार कतए अछि? वृद्धा:– पतिक देहान्त भऽ गेल अछि आ बॉंकी परिवारमे बेटा, पुतहु, बेटी, जमाय, नाती, पोता सभ अछि। सभ अपन-अपन घरमे रहैत अछि। कैश: कतेक दुःखक बात छै जे अहॉंकेँ असगर रहए पड़ैत अछि। वृद्धा:–नै, ई हमर अपन निर्णय अछि। जहिना हुनका सभकेँ अपन निजी जिन्दगीक गोपनीयता पसन्द छनि तहिना हमरा अपन स्वाधीनता पसन्द अछि। फेर जरूरत पड़लापर सभ एक दोसरकेँ देखिते छिऐ। (केसर अपनेसँ आब बजतीह, तइ बीच बूढ़ीक प्रस्थान हएत। एकटा दोकानक दृश्य आओत, मॉल सन चहल-पहल। नै हुअए तँ पर्दापर एहन चित्र बना कऽ वा प्रोजेक्टर द्वारा ई प्रभाव उत्पन्न कऽ सकै छी। पार्श्वध्वनिसँ दोकानक दृश्य सेहो उत्पन्न भऽ सकैत अछि, दोकानक काउन्टर एकटा टेबुल राखि बनाओल जा सकैए जे विदेशी मूलक सैम्युएला वा सैम लऽ आबि सकै छथि, संगमे दूटा बार-कोड स्कैनर/ रीडर सेहो चाही। नै हुअए तँ दूटा कारी लोहाक छोट रौडसँ काज चलाउ। स्कैन करबाक स्वांग करू आ पार्श्वसँ क्लिक-क्लिकक ध्वनि करू।) केसर (स्वगत): हमर नानी-दादी सभ तँ अपन समस्त जिनगी परिवारक नामे कऽ देने छली। परिवारक पसिन्नक खेनाइ पकौनाइ, परिवार लेल पूजापाठ, बच्चा सभक ध्यान राखनाइ, आजीवन परिवार लेल खटैत रहनाइ, यएह सभ हुनकर जिनगी छलनि। हुनका सभकेँ तँ अपन स्वतंत्रता एतेक प्रिय नै छलनि। मुदा हुनकर सबहक ऐ गुण लेल सभ हुनकासँ एतेक स्नेह करैत छलनि। (दोकानक काउण्टर पर पहुँचैत देरी केसर अपन काज पूरा तत्परतासँ करए लगली आ संगमे अपन सहकर्मी विदेशी मूलक सैम्युएलासँ बात सेहो करैत छली।) कैश:  नमस्कार सैम, केहेन छी ? (कैश ई पूछि बार-कोड रीडरसँ समान स्कैन करए लगली।) सैम: बहुत नीक कैश, हमर बच्चाकेँ नर्सरीमे मंगनीमे जगह भेट गेल। (तखने एकटा नवयुवती ग्राहक अबै छथि। कैशक ध्यान अपन नवयुवती ग्राहक पर नै गेलनि जे हुनकर सबहक बात सुनैत छलनि। ओ भारतीय मूलक छल से रूप रंगसँ बुझाइत छल मुदा जनमल आ पढ़ल लिखल विदेशक छल।) कैश: वाह, एतेक दिन बड्ड तकलीफ छल अहॉंकेँ। बच्चाकेँ संगी सभ लग निहौरा कऽ राखए पड़ै छल। सैम: ओतबे नै, संगियोक बच्चा सभकेँ कखनो कऽ देखए पड़ै छल हमरा। सप्ताहान्तमे सेहो बुझू तँ हम काज करैत छलौं। कैश: चलू से नीक भेल, आब आगॉं की? सैम: हम अपन पुरूष मित्रसँ रिश्ता तोड़ि रहल छी। कैश: ओह, तँ बच्चा ककरा लग रहत? सैम: हमरा लग। कैश: अहॉं तँ पढ़ाइक खर्चेसँ परेशान छलौं, आब बच्चाक पालन पोषण केना करब? सैम: ओहो कोन कमाइ छल, ओ तँ संगे पढ़ने छलौं तैं दोस्ती छल। बच्चाक नामपर सरकारी सहायता भेटत, फेर एकटा कुक्कुर सेहो पोसने छी तकरो लेल सरकारसँ मदति भेटत। (कैश कनी काल चुप्प भऽ गेली फेर कनिये देर बाद बजली।) कैश: कहिया धरि अहॉंक पढ़ाइ पूरा भऽ जाएत? सैम: अगिला छह मासमे, तकर बाद ट्रेनीक कार्य भेटत जइमे दरमाहा सेहो भेटत। कैश: चलू तखन ई सभ तँ सम्हरि गेल। बस अहॉंक निजी जिनगी कनी गड़बड़ा गेल। सैम: नै-नै, हम एक जगह बात कऽ रहल छी। अगिला सप्ताह तक ओकर नोकरी पक्का भऽ जेतै, तकर बाद डेटपर जाइक इरादा अछि। (कैश दोसर बेर कने काल लेल चुप भेलथि।) कैश:  ओह, बढ़िया, शुभकामना। सैम:   धन्यवाद। (तखने ओइ नवयुवती ग्राहकपर कैशक ध्यान गेलनि जे हुनकर सबहक बात सुनैत छलनि। ओ भारतीय मूलक छल से रूप रंगसँ बुझाइत छलि मुदा जनमल आ पढ़ल लिखल विदेशक छलि, से बोलीसँ बुझाइत छल। ओकर समानमे वाइनक बोतल छल।) कैश: (नवयुवती ग्राहककेँ आँखि माड़ैत) मजा करू। नवयुवती ग्राहक: ई हमर बॉस लेल अछि। सैम: किए, अहॉं नै लै छी की ? नवयुवती ग्राहक: नै, हमर माता-पिता एकर अनुमति नै देने छथि। कैश: तँ अहॉं नोकरी करै छी? जँ खराब नै मानी तँ हम बूझए चाहब जे अहॉंक पुरूष मित्र अछि आकि अहाँ बियाहल छी? नवयुवती ग्राहक: पुरूष मित्र अछि, बियाहल नै छी। कैश: (मुस्कुराइत) ओहो। नवयुवती ग्राहक: ऐमे आश्चर्य की? मित्रता तँ भारतीय संस्कृतिक सुन्दरता अछि। कियो मित्र जे पुरूष अछि से पुरूष मित्र भेल ने। कैश: नै, हमर इशारा एतुक्का चलन दऽ छल। नवयुवती ग्राहक: भारत कोनो आब ऐ चलनसँ दूर अछि की ? लागैए एतुक्का चलन तँ अहॉंकेँ एकदम नै बूझल अछि। एतए हम सभ दू पीढ़ी पहिनेसँ बसल छी मुदा कोनो पाबनि नै बिसरै छी। यथासम्भव अपन पारम्परिक परिधान सेहो पहिरै छी। अपन मातृभाषा सेहो नै बिसरल छी। विवाह सेहो माता-पिताक इच्छासँ करबाक इच्छा राखै छी। एतुक्का भारतीय समाज तँ अपन संस्कृतिकेँ जीवन्त राखैले पूरा प्रयास करैत अछि मुदा जे नवतुरिया सभ भारतसँ आबैत छथि सएह कलंकित करै छथि। कैश: अहॉं एतुक्का बसल सम्पन्न परिवारसँ छी तैं विदेशोमे रहि कऽ अपन रीति रेवाज मानैकऽ साहस अछि आ स्वयंकेँ सभ्य बनाकऽ रखने छी। बेसी सुविधा ककरा ने आकर्षित करैत छै। जे नवतुरिया आबै छथि से जौं एतुक्का सुविधामे रहऽ चाहती तँ हुनका किछु समझौता तँ करए पड़तनि। जे एतुक्का निवासीसँ बियाह करती, एतए अपन बच्चाकेँ जन्म देती तँ हुनका सरकारसँ सभ सुविधा भेटतनि आ कहियो हुनका आ हुनकर बच्चाकेँ अशिक्षा, अकुशलता आ बेरोजगारीक दुःख नै बर्दाश्त करए पड़तनि। नवयुवती ग्राहक: सरकारी निअम तँ अहॉं अपन देशमे सेहो परिष्कृत कऽ सकै छी, आखिर प्रजातन्त्र छै ओतए। हमरा सभकेँ अपन देशक उन्नति लेल योगदान देबाक चाही, ओइसँ पड़ेबाक नै चाही। हम प्रशिक्षण विभागमे कार्य करैत छी आ यदा कदा समए निकालि भारतीय संस्था लेल सेहो अवैतनिक काज करैत छी। आवश्यकताक अन्त नै छै। तखन तँ निर्णय अहॉंकेँ लेबाक अछि जे अहॉं कैश बनए चाहैत छी आकि केसर। मुन्नी कामत अंधविश्वास प्रथम दृश्य (मंचपर चौकीपर शंकर सुतल अछि, गंगाक प्रवेश।) गंगा- बउआ-बउआ, सुतल छहक की, देखहक बाबू दरबाजा पर बजबै छऽ। शंकर- कि, आ..हू हू हू…। गंगा- कि भेलऽ? एना किए कराहै छहक। माय गे, माय हो, देेह तँ झरकैत छह। बउआ आँखि खोलऽ, (रूदन स्वरमे) हयौ सुनै छिऐ, दौड़ू यौ, देखियौ बउआ कऽ कि भेल। यौ, आँखि ताँखि उलटेने छै यौ, जल्दी आउ ने। (रामाक धोती सम्हारैत आंगनमे प्रवेश।) रामा- एना चिकरनाइ भोकरनाइसँ काम नै चलत। जाउ दौड़ कऽ गोसाईं घरसँ गंगाजल नेने आउ। (गंगा दौड कऽ जाइत अछि आ गंगाजलक डिब्बा नेने अबैत अछि आ कनैत-कनैत कहैत अछि।) गंगा- हे काली माइ, हमरा कोइखक लाज राखब। हमर लालकेँ ठीक कइर दिअ। हम सहि कऽ साँझ देब। रामा- पहिले गंगाजल लाउ ने तब कोबला-पाती करैत रहब। (रामा अपन पत्नीकेँ हाथसँ झटैक कऽ गंगाजलक डिब्बा छीन लैत अछि आ शंंकरक उपर गंगाजल छीट हुनकर मुॅंह वएह जलसँ धोइ दैत अछि।) रामा- बउआ उठऽ, केना लगै छऽ आब। शंंकर- बाबूजी, हमर माथा दर्दसँ फाटल जाइत अछि आ जाड़ सेहो होइत अछि। रामा- अच्छा लए, ई कम्बल ओढ़ि कऽ सुइत रहऽ, कनिकबे कालमे सभ ठीक भऽ जेतऽ। यै सुनै छिऐ शंकरक माय। गंगा- कि कहै छिऐ? रामा- बउआक माथपर पीरी परहक भभूत लगाउ आ अकरा अराम करऽ दियौ। पटाक्षेप दोसर दृश्य (पति-पत्नी अपन कक्षमे बेटाक हालत पर विचार विमर्श करैत।) गंगा- की भेल, किए अहाँ काल्हिसँ चुप छिऐ? की कोनो अभास भऽ रहल अछि? कहू ने, के भइडाही केने छइ। एक बेर अहाँ नाम कहि दिअ, अखने झोटा पकड़ि पोटा निकालि देबै आ घिसियाबैत पूरा गाम ओंघरेबै। सँइखोउकी बेटखोइकी सभ ककरो नीक देखै लेल नै चाहै छइ। रामा- (जोरसँ) बन्द करु अपन सत्यनरायलनक कथा। ई ककरो केलहा नै अपने घरक गोसाँइ अछि। आइ तक ककरो एहेन बोखार देखने रहिऐ। अपन देहमे अतेक आगि देविये रखैत अछि। जरूर हमरासँ कोनो गलती भेल जे हमरा पर मइया तमसा गेलखिन। हमरा हिनका शांत करै लेल गुहार लगबइये पड़त। गंगा- अहाँ तँ अपने भगत छी। कौल्हका दिन निक अछि, काल्हिये बैसकी बैठाउ। हम जाइ छी, पूजाक सामग्री जुटबै लेल। (गंगाक प्रस्थान होइत अछि आ रामा गम्भीर सोचमे डुबल रहैत अछि।) पटाक्षेप तेसर दृश्य (एगो दौरामे पूजा सामग्री एकट्ठा करि गंगा आ शंंकरक आगमन, हुनके पाछू दू-चाइर लोकनी सेहो अबैत अछि।) गंगा- बउआ बाबू आबै छऽ, ताबे तूँ पूजा करऽ। ई फूल अक्षत चढ़ा कऽ धूप देखबऽ। शंकर- (फूल जल चढ़बैत कहैत छथि) आब की करब? गंगा- अतऽ कल जोइड़ बैठू। (रामाक संगे चारि लोग जे ढोल आ झाइल लेन अछि, हुनकर प्रवेश।) रामा- शंकरक माय, सभ तैयारी कऽ लेलौं? गंगाजल संगेमे राखने रहब। (रामा गोसाँइ निपैत अछि आ फूल अक्षत चढ़ा कऽ माँक प्रार्थना करऽ लगैत अछि। चारू लोकनी डाला बिचमे रखैत माँक गुहार लगबैत अछि आ ढोल झाइल सेहो बजबैत अछि।) चारू लोकनी- तोहरे दुआरे मइया हम अर्जी लगैलियइ हेऽऽऽऽऽऽऽऽऽ हूंऽऽऽऽऽऽऽ बोल जय गंगे, बोल जय गंगे, बोल जय गंगे। बोल की कष्ट छउ, किए बजेलऽ हमरा, बोल, बोल, की भेलउ? गंगा- हे मइया, की गलती भेल हमरासँ आ हमरा घरबलासँ। सभ दिन तँ अहींक पिरी निपैत आँखि खुलैत यऽ हमर, कि अपराध भेल जे हमरा बेटाकेँ अहाँ चारि दिनसँ मतेने छी। रामा- अहिना भूइज कऽ खेबउ। अपना खाय छऽ छप्पन प्रकार आ हमरा लऽ फूल अक्षत। एक दिशसँ सभकेँ भूइज-भूइज खेबउ। गंगा- एना किए कहै छऽ, अगर हमरासँ कोनो कुघटी भेल तँ हमरा माफ कइर दिअ, अहाँ जे कहब हम सभ करै लेल राजी छी। रामा- तँ ठीक छइ, हमरा जानक बदले जान चाही। हमरा हर अमावश्याक राइतमे इकरंगा खस्सीक बैल देबही तँ तोहर कल्याण भऽ जेतउ। ले ले, लेह अक्षत, बोल बोल जय गंगे, बोल बोल जय गंगे, बोल बोल जय गंगे। गंगा- अहिना हएत भगवान, हम जानक बदले जान देब। रामा- होऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ हएऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ बोल जय गंगा, बोल बोल जय गंगे, बोल बोल जय गंगे। आब हम चलै छी। पटाक्षेप चारिम दृश्य (ग्रामीणक बीचमे) गंगा- हयोउ, जब घरक देवता बैल मांगै छइ तँ अहाँकेँ दइमे कि हिचकिचाहट भऽ रहल अछि। बउआ दिश देखियौ तँ, आइ पॉंच दिन भेल, बेदरा एक बेर नै आँखि खोलइ यऽ। रामा- आब अपन गहबरमे बैल नै पड़ैत अछि, हमर बाबा अपन अंगोरिया आंगुर चिर कऽ बैल सौपने रहथि, ओही कऽ बदले लरू चढ़बैत रहथि। केना फेरोसँ बैल दी वएह सोचै छी। गंगा- अहाँकेँ बेटाक चिंंता नै अछि? हम बैल देबै, हम वचन देने छी। एगो ग्रामीण- हो रामा, किए अतेक सोचै छऽ तूँ। अपना मने तँ नइ दै छऽ। माँ मांगलकऽ। जाधरि तूँ बैल नइ देबहक शंंकर ठीक नइ हेतऽ। बेटा लऽ दऽ दहक। गंगा- सुगनी लग एक रंगा खस्सी छइ। लऽ आनू गऽ। हम कहने रहिऐ तँ कहलकै, लऽ जाउ। पटाक्षेप अंतिम दृश्य (ग्रामीणक भीड़क बीच बेहोस अवस्थामे शंंकर।) गीत- काली मइया हे कनिये, काली मइया हे कनिये होइयो न सहायऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ रघुनाथ- हयोउ, कि बात छिऐ। यौ रामा, कक्काक अइठाम अतेक भीड़ कथी कऽ छिऐ। एगो ग्रामीण- हुनका बेटा कऽ देहमे काली समैल छइ, कहै छइ कि जानक बदले जान नइ देबही तँ अकरा भूइज कअ खेबउ। अखन वएह बइल दैत अछि, ओकरे भीड़ छिऐ। रघुनाथ- कहिया तक ई अंधविश्वास रहत अइ गाममे। चलू चलि कऽ देखै छी। (रामाक घरमे रघुनाथक आगमन।) रघुनाथ- काकी, कतऽ अछि बउआ, देखू। गंगा- रघुनाथ बउआ, आइब गेलहक सहरसँ। अए, देखहक ने आइ छऽ सात दिन भऽ गेलैए, आँखि नइ खोलै छइ। जाधरि बइल नइ देबइ, नइ छोड़थिन मइया। (रघुनाथ शंंकरक नब्ज देखैत आ सिर पर हाथ राखि आँखि देखैत कहैत छथि।) रघुनाथ- काकी अहाँ सभ अपन मूर्खताक कारण अकरा जानसँ माइर देबइ। अकरा दिमागी बुखार भेल अछि। अगर इलाजमे देर करबै तँ बेटा कतौ नइ मिलत। रामा- बेसी तूँ इंगलिस नइ बतिया, ई कोनो बुखार नइ देवीक केलहा छिऐ, हमरा अपन काज करऽ दए। रघुनाथ- हौ कक्का, एगो बातक जबाब तूँ सभ ग्रामीण मिल कऽ दए। तोरा दुगो पुत्र छऽ, एगो बिमार छऽ तँ कि तूँ एगो पुत्रक जान लऽ कऽ दोसर पुत्रक जान बचेबहक, नइ ने। तँ फेर माँ काली ई कोना करथिन। हुनका लेल तँ अइ संसारमे रहैबला हर जीव माँक संतान छी। फेर ओ ई कोना करथिन। अंधविश्वासक चादरमे नइ लिपटल रहऽ। जागऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ आबो तँ जागऽ। रामा- तूँ आइ हमर आँखि खोइल देलहक। चलऽ बउआकेँ अस्पताल लऽ चली। जानक बदले जान देनाइ अछि ई अंधविश्वासक बाइन करी परन हम सभ ई कि नइ लेब आब ककरो प्राण। इति। धीरेन्‍द्र कुमार-१९५४, नि‍र्मली, सुपौल, बि‍हार। (हि‍ंदी वि‍भाग, सी.एम. बी. कॉलेज, डेओढ़, मधुबनी) उदय नारायण सिंह “नचिकेता” क नाटक नो एंट्री : मा प्रवि‍श नाटक अधुनातन अछि‍। समैक संगे लेखन, वि‍षए-वस्‍तु, पात्र काल सभमे परि‍वर्त्तन होइत अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ अधुनातन हेबाक चाही, तइ आकांक्षाक ई नाटक पूर्ति करैत अछि‍। नाटककारकेँ एकर सम्‍यक बोध छन्‍हि‍ तँए मैथि‍ल होएबाक कारणे हम आभार व्‍यक्त करैत छी। समाजमे जे घटि‍त होइत अछि‍ रचनाकार प्राय: ओकरे चि‍त्रण करैत छथि‍। नाटककार स्‍वर्ग-नरकक अवधारणापर नाटक लि‍खने छथि‍ मुदा नाटकक वि‍षए-वस्‍तु प्रासंगि‍क धरतीक वि‍द्रूपता अछि‍। ऐ वि‍द्रूपताक माध्‍यम बनौने छथि‍, भागम-भाग, क्‍यू, वर्ण-व्‍यवस्‍था समाजसँ उपजल चाेरि‍, बेरोजगारी आ धूर्तता सन समस्‍या, जे ऐ नाटकमे संयोजि‍त अछि‍। नाटकमे पात्रक संख्‍याक अनुकूल वि‍षए-वस्‍तु जे उठैत गेल अछि‍ ओकरा नाटककार ऐसँ कमो पात्रमे मंचपर आनि‍ सकैत छलाह। पात्रक आधि‍क्‍य मंचपर सफल ि‍नर्देशककेँ सुलभ हेतनि‍, मि‍थि‍लामे एकर अभाव हएत। भऽ सकैत अछि‍ हुनकर दृष्‍टि‍मे संपूर्ण धरती हुअए। समस्‍याकेँ मंचपर आनबे पूर्ण सफलता होइत अछि।‍ ओकरा तीक्ष्‍णता संगे राखब जइसँ दर्शकक हृदैपर प्रभाव पड़ए तइमे कमी अनुभव होइत अछि‍। कोनो रचना जँ हमरा बान्‍हि‍ लि‍अए तकर ऐमे अभाव अछि‍। नाटकक संवादमे शब्‍दक खेल कतौ-कतौ देखएमे अबैत अछि‍ पृष्‍ट सं- २०-२१ द्रष्‍टव्‍य अछि‍। संवादकेँ बान्हल नै जा सकल अछि‍। नाटककार अतीतक प्रत्‍यंचापर भवि‍ष्‍यक वाण चढ़ा शर-संधान करैत अछि‍। समाजक स्‍थि‍ति‍सँ ओकर वि‍संगति‍ लक्ष्‍य छन्‍हि‍। “‍चोर सि‍खावय बीमा-महि‍मा पाकेटमारो करै बयान! मार उच्‍चका झाड़ि‍ लेलक अछि‍ पाट-कपाट तऽ जय सि‍याराम।।” समाजक छद्म, राजनीति‍क उलटा-फेर आकर्षक ढंगसँ व्‍यक्‍त अछि‍। नाटककारकेँ नवीन आकांक्षा छन्‍हि‍- आऊ पुरातन, आऊ हे नूतन। हे नवयौवन, आऊ सनातन।। प्राण-परायण, जीर्ण जरायन। नाटकमे गीतक प्रयोग श्‍लाध्‍य अछि‍। संगीत दर्शककेँ बान्‍हि‍ कऽ रखैत अछि‍ तइमे नाटककार सफल छथि‍। हास्‍य जइ ढंगे मुखर अछि‍, करूण तेना मुखर नै अछि‍। नाटककारकेँ संस्‍कृतक नीक ज्ञान छन्‍हि‍- नाटकसँ उद्भाषि‍त होइत अछि‍। काल-बोध आ वास्‍तवि‍कतो चि‍त्रणमे जतए उपयोगी अछि‍ ततहि‍ं आम दर्शक लेल बोधगम्‍यतामे अशक्‍त अछि‍। ओना श्री गजेन्‍द्र ठाकुर जी वि‍चार व्‍यक्‍त केने छथि‍। पाश्चात्‍य आ भारतीय काव्‍यशास्‍त्रीय दृष्‍टि‍कोणसँ हुनकर वि‍चार स्‍वागत योग्‍य अछि‍। कोनो रचनामे गुण-अवगुण दुनू होइत अछि‍। तइ दृष्‍टि‍कोणसँ हम सशक्त भऽ सकैत छी नाटक सफल अछि‍ आ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक एकटा उपलब्‍धि‍ अछि‍। जड़ैत मोमबत्ती (मंचपर बादक नाटकक शुरू होएबाक पूर्वक वाद्य-यंत्र बजि रहल अछि‍। बंठा दर्शक दि‍सि‍ पीठि‍ केने गुड्डी उड़ा रहल अछि‍। वादक दीर्घा दि‍सि‍ हल्‍ला होइत छैक।) गांधी: हे यौ, नाटक कि‍ए नै‍ शुरू होइ छै। बटेसर: यौ नटकि‍या सभ गाँजा पिबैत हेतै। रंजि‍त: सि‍नेमा देखऽ चलि‍ गेल हेतै। बटेसर: अच्‍छा, ओ सभ नै छै तँ की‍ भेलै, कि‍यो तँ शुरू करू। गांधी: पि‍आरे गणमान्‍य लोकनि‍। अहाँ सभ ध्‍यान लगा कऽ बैसल छी नाटक देखैले। मुदा नाटक ओहि‍ना थोड़े भऽ जाइ छै। पहि‍नेसँ मोन बनाउ, योजना बनाउ, षडयंत्र करू, तखने नाटक होइत अछि‍। अहाँ सभ तँ नाटक हरेक समए देखतै रहैत छी। हालेमे बि‍हार वि‍धान सभामे नाटक भेलै, अभूतपूर्व नाटक- जूता टुटलै, चप्‍पल टुटलै, गमला टुटलै आ टुटलै ओ प्रति‍ज्ञा जे बि‍हार वि‍धान सभाक सदस्‍यता ग्रहण करए लेल ओ सभ लेने रहथि‍। आइ-काल्हि‍ सपत्तक कोनो महत्‍व थोड़े रहि‍ गेल अछि‍। लि‍अ, आब हमहीं नाटक शुरू करैत छी आ हम बनि‍ जाइ छी गांधीजी। (मंचेपर गांधी आँखि‍पर चश्‍मा रखैत अछि‍। पहि‍नेसँ पहि‍रने धोतीकेँ गांधी स्‍टाइलमे राखि‍ हाथमे लाठी लऽ मूर्तिवत ठाढ़ भऽ जाइत अछि‍। गुड्डी उड़बैत-उड़बैत बंठा पाछू मुहेँ भगैत अछि‍ आ गांधीसँ टकरा कऽ खसैत अछि‍, डराइत अछि‍ आ मूर्तिवत गांधी जीक स्‍पर्श करैत अछि।‍) बंठा: अहाँकेँ थि‍कौं? गांधी: बच्‍चा, हम गांधी जी छी। महात्‍मा गांधी। मोहनदास करमचंद गांधी। बंठा: के महात्‍मा गांधी? अहाँ सनक लोक तँ भीख मंगैत अछि‍। मुदा हमरा लग पाइ नै अछि‍। गांधी: हम भीख नै मंगैत छी। आइ तों जइ‍ देशमे जीबि‍ रहल छह ओकरा आजादी देनि‍हार हम छी। बंठा: आजादी की होइ छै? कोन दोकानमे भेटै छै। हमरा तँ नै भेटल आजादी? गांधी: बच्‍चा, आजादी कोनो बस्‍तु नै छै। भारत अंग्रेजक गुलाम छल ओकर अपन निअम, कानून रहए, जइ‍सँ हम सभ बान्‍हल रही। हम अपन इच्‍छासँ कि‍छु नै कऽ सकैत रही। हमर सभ अधि‍कार अंग्रेज छीनि‍ लेने रहए। ओ हमरापर अत्‍याचार करैत रहए, हमर शोषण करैत रहए। बंठा: निअम, कानून, अत्याचार तँ आइयो भऽ रहल अछि‍। इंदि‍रा आवासमे पाँच हजार टाका, वृद्धा पेंशनमे दू सए टाका; कागचपर सड़क बनैत अछि‍। मकान, पुल तैयार होमएसँ पहि‍ने खसि‍ पड़ैत अछि‍। ई सभ तँ अखबार पढ़एबला लोक बुझैत अछि‍। गांधी: यएह काज अंग्रेज करैत छल। अपन मोन आ निअमसँ हमर शोषण करैत छल। अंग्रेजक अनुज छथि‍ ई सभ। जनताकेँ जागरूक होमए पड़तै, गलतक वि‍रोध करए पड़तै। सभकेँ शि‍क्षि‍त होमए पड़तै, सत्‍य बाजए पड़तै, चाेरि‍ नै करए पड़तै। दया-भाव-करूणाकेँ अपनाबए पड़तै, तखने हम कृत्रि‍म गुलामीसँ बाँचि‍ सकैत छी। (दू पात्र, सि‍द्धांत, अधि‍कारी आ नि‍यमनक बीचेमे प्रवेश, गांधीजी बजिते रहै छथि।) हम अंग्रेजक खि‍लाफत केलौं, अहि‍ंसात्‍मक आंदोलन चलेलौं। समस्‍त भारत वर्षमे स्‍वराज अलख जगेलौं, सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम, भगत सि‍ंह, चंद्रशेखर आजाद सन सैकड़ो लोक अंग्रेजसँ लड़ाइ लड़लाह, तखन बड़ मोसकि‍लसँ हमरा आजादी भेटल। हम अपन देशसँ खुश नै छी। स्‍वर्ग-नरक दुनूमे स्‍वतंत्रता दि‍वसपर ई खबरि‍ धौलाइए ने भारतक पतन भऽ रहल अछि‍। तँए एक घंटाक छुट्टी लऽ आएल छी। आउ हम अपने अपन संदेश ऐ‍ गीतक माध्‍यमसँ सुना दै छी- बच्‍चा सभ अहूँ सभ हमरा संगे गाउ- बौआ बुच्ची बात सुनू देशक रक्षा आब करू भेटल स्वतंत्रता मुश्किलसँ एक्कर रक्षा अहाँ करू बौआ बुच्ची बात सुनू देशक रक्षा आब करू (बच्चा सभ गीत गाबऽ लगैए।) गांधी: बच्‍चा तोहर की नाम छह। सि‍द्धांत: सि‍द्धांत। गांधी: तों की करैत छह। सि‍द्धांत: (बीड़ी बहार करैत) हम चोरी करैत छी। गांधी: (नि‍यमनसँ) आ तों? नि‍यमन: जतेक अपहरण होइ छै, ओकर जासूस छी। टेलीफोनसँ खबरि‍ करैत छि‍ऐ, के कतऽसँ कतेक पाइ लऽ कऽ जा रहल अछि‍, के कतऽ अछि‍। आ ऑफि‍सर सभकेँ दारू पहुँचबैत छी। मुि‍खया सरपंचक जी-हजूरी करै छी। गांधी: हे राम। एतेक छोट बच्‍चा सभ एहन काज करैए, पता नै समर्थ लोक सभ की करैत हेताह। नि‍यमन: बाबा, अहाँ सनक लोककेँ पुलि‍स आतंकवाद, चोरि, उचकपनामे पकड़ि‍ लै छै। अहूँकेँ पकड़ि‍ लेत। पड़ा जाउ एतऽसँ। गांधी: बच्‍चा, आब बूझि‍ पड़ैए हमरासँ ई हि‍न्‍दुस्‍तान नै सुनत। अंग्रेजी भगा देलौं, आब अपने बेटा सभ ई काज करैए। आब हमरो आरामे करऽ दएह। सि‍द्धांत: बाबा, अहाँ बजैत छी जे अहाँक नाम गांधी अछि‍। गांधी शब्‍दक प्रयोग गाड़ि‍ रूपमे होइत अछि‍। जेना बाप बजै छै, बेटा-बड़का गांधी भऽ गेलहेँ। जाउ बाबा, पड़ा जाउ। (गांधी नमहर डेग उठबैत अछि‍। तीनू पात्र हँसैत अछि।) सि‍द्धांत: गेल, भागल बतहा। नि‍यमन: रौ बाप, हमर दि‍माग गरम भऽ गेलौ हि‍नकर गप्‍प सुनैत-सुनैत। सि‍द्धांत: हमर माथ टनटनाए लगलौ। ला एकटा ि‍सगरेट ला। बंठा: ले, गाँजा भर। चऽल एकटा गाना गबैत छिऔ, सभ डान्‍स कऽर। (पाछाँसँ गीत आबऽ लगैए, सभ नाचऽ लगैए। नाच समाप्‍त होइत अछि‍। सभ हपसैत अछि‍। अधि‍कारीक प्रवेश) अधि‍कारी: की रौ, नाचि‍ लेलेँ ने। कहू तँ, ई देश कोना सुधरत। मंदि‍रमे टि‍कट कटाउ तँ भगवानक दर्शन हएत। अहाँकेँ पाइ नै अछि‍- लाइनमे लागल रहू। अहाँकेँ उचि‍त काज अछि‍, दक्षि‍णा दियौ। मृत्‍यु प्रमाण चाही तँ टाका ि‍दयौ। अहाँ जीवि‍ते छी, सरकारी रेकर्डमे मरल छी। भोंट मांगए औत तँ हम सभ टाका लेबइ। ठीकेदार सड़क बनाओत तँ हम ओकरासँ रंगदारी मंगबै। सड़कक ईंटासँ अपन घर जोड़ब, सड़क नै‍ राखब। सरकारी मकानक गि‍ट्टीसँ नादि‍ बनाएब। सामुदायि‍क भवनकेँ मुखि‍याजी दलान बनौताह। बेटीकेँ वि‍आह करब तँ बेटाबलाकेँ पाइ दि‍यौ। गरीब छी, दुख अछि‍, जहर कीनब, खएब, सुतब, भाेरे जीवि‍ते रहब। डॉक्‍टर बेहोशीक सुइया देत, पेट चीरए लागत तँ बाप-बाप करब। सभ ि‍कछु नकली। कतए जाएब, की करब? राष्‍ट्रीय त्‍योहार दि‍न झंडा फहराएब, राष्‍ट्रीय गीत गाएब। लालकि‍लासँ भाषण सुनब। हमर उत्तरदायि‍त्‍वक समाप्‍ति भऽ जाएत। दरी-जाजि‍म झाड़ब आ वि‍दा भऽ जाएब अपन गाम, आ लागि‍ जाएब सड़ककेँ भाेकसैमे, अलकतरा पीबैमे। स्‍पैक्‍ट्रमकेँ पेटमे रखैमे। ठीके छै, हम सभ कोनो देशक ठीकेदारी नै नेने छी। नि‍यमन: रौ सार, तों नेता भऽ गेलेँ? सि‍द्धांत: एकरो रोग लागि‍ गेल छै, मलेरि‍या, लबेरि‍या, नेतगेरि‍या। नि‍यमन: पागलखाना जाएत। सि‍द्धांत: पागल लेल कोनो जगह छै, ओत्तौ नो एंट्रीक बोर्ड टांगल छै। बंठा: पकड़ सारकेँ आ लऽ चल। नि‍यमन: पकड़ पकड़, नै तँ पुलि‍स गि‍रफ्तार लऽ लेतौ। (सभ कि‍यो ओकरा पकड़ि‍ कऽ मंचसँ बाहर लऽ जाइत अछि‍। भारत माताक प्रवेश। हाथमे ति‍रंगा। अस्‍त-व्‍यस्‍त हालत। हँसैत पागल सदृश।) भारत माता: हम जर्जर भऽ चुकल छी। एक समए रहए जखन सैकड़ो सपूत अपन कुर्वानी दए हमरा आजाद करौलक। आजुक तों सभ कपूत छँह। हमरे आंचरकेँ तों सभ कलंकि‍त कए रहल छँह। हमर जग हँसाइ भऽ रहल अछि‍। की तोहर सभक यएह कर्तव्‍य छौह। तों सभ ज्ञानक लेल नै पढ़ै लि‍खै छँह, तोरा धन चाही। रूपैये तोहर माए-बाप भऽ गेल अछि‍। की भऽ गेलह तोरा सभकेँ। आब माइयक अभि‍मानकेँ नष्‍ट नै करऽ, नै करऽ। (बजैत-बजैत हि‍चुकि‍-हि‍चुकि‍ कनैत बजैत अछि‍। पर्दा आस्ते-आस्ते खसऽ लगैत अछि।) शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ भफाइत चाहक जि‍नगी सम्‍पूर्ण मैथि‍ली भाषामे आधुनिक नाटक वि‍धाक प्रारंभ पंडि‍त जीवन झा कृत नाटक ‘सुन्‍दर संयोग’सँ सन् १९०४ ई. मे भेल। ऐ‍सँ पूर्व मैथि‍लीमे उमापति‍, रामदास, नन्‍दीपति‍ आदि‍ सेहो नाटकक रचना कएलनि‍, मुदा ओ सभ पूर्ण मैथि‍लीमे नै‍‍ लि‍खल गेल। सुन्‍दर संयोगसँ लऽ कऽ श्री नचि‍केता रचि‍त ‘नो एन्‍ट्री मा प्रवि‍श’, श्रीमति वि‍भारानी कृत ‘भाग रौ आ बलचंदा’ आ श्री जगदीश प्रसाद मंडल कृत ‘मि‍थि‍लाक बेटी’ धरि‍ मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे वि‍वि‍ध वि‍धाक नाटकक ढेर रास संग्रह उपलब्‍ध अछि‍। आेइ‍ समग्र नाटकक मध्‍य कि‍छु नाटक बड़ लाेकप्रि‍य भेल अछि‍ ओइमे श्री ईशनाथ झा रचि‍त ‘चीनीक लड्डू’, पंडि‍त गोवि‍न्‍द झा लि‍खि‍त ‘बसात’, श्री मणि‍पद्म रचि‍त “झुमकी”, श्री ललन ठाकुर लि‍खि‍त ‘लौंगि‍या मि‍रचाई’, प्रो. राधा कृष्‍ण चौधरी लि‍खि‍त ‘राज्‍याभि‍षेक’, श्री सुरेन्‍द्र प्र. सि‍न्‍हा रचि‍त ‘वीरचक्र’, श्री वि‍न्‍देश्वरी मंडल रचि‍त ‘क्षमादान’, श्री उत्तमलाल मंडल रचि‍त ‘इजोत’ आ श्री गौरीकान्‍त चौधरी ‘कांत’ (मुखि‍या जी) रचि‍त ‘वरदान’क संग-संग सुधांशु शेखर चौधरी रचि‍त ‘भफाइत चाहक जि‍नगी’ प्रमुख अछि‍। स्‍व. सुधांशुजी मूलत: मैथि‍ली साहि‍त्‍यक उपन्‍यासकारक रूपमे प्रसि‍द्ध छथि‍। अर्थनीति‍केँ आधार बना कऽ लि‍खबाक शैलीक कारण मैथि‍लीमे हि‍नक एकटा अलग स्‍थान अछि‍, एकटा कलाकार जौं अपन कलाक प्रदर्शन नाट्य रूपमे करए तँ कोनो अजगुत नै‍‍। भफाइत चाहक जि‍नगीमे ओ समाजक सामान्‍य बि‍म्‍बकेँ वि‍लक्षण रूपसँ बि‍म्‍बि‍त कऽ हास्‍य आ मर्मक सम्‍यक् तारतम्‍य स्‍थापि‍त कएलनि‍। चाहक जि‍नगी कतेक क्षणक होइत अछि‍, भाफ उपटलासँ एकर अस्‍ति‍त्‍व लुप्‍त भऽ जाइछ, मुदा जौं भनसि‍यामे आत्‍म वि‍श्वास हुअए तँ आेइ‍ अस्‍ति‍त्‍ववि‍हीन चाहमे नीर-क्षीर मि‍श्रि‍त कऽ ओकरा फेरसँ सुस्‍वादु बनाओल जा सकैत अछि‍। नाटकक नायक महेशक जि‍नगी भफाइत चाहक जि‍नगी जकाँ अछि‍। एकटा सुशि‍क्षि‍त व्‍यक्‍ति‍ कर्मक प्रति‍स्‍पर्धाक गति‍‍मे सफल नै‍‍ भेलापर समाजक अधलाह मानल गेल कर्मकेँ अपन जीवनक डोरि‍ बना कऽ ततेक आत्‍मबलसँ जीवैत अछि‍ जे दीर्घसूत्री दृष्‍टि‍कोणक लोक सेहो ओकरा लग नतमस्‍तक भऽ गेल। नाटकक कथा चेतना समि‍ति‍ पटनाक कार्यक्रमक मध्‍य घुरैत अछि‍। महेश चाहक स्‍थायी वि‍क्रेता छथि‍, मुदा अधि‍क बि‍क्रीक आशक संग मि‍थि‍ला-मैथि‍लीसँ सि‍नेहक दुआरे त्रि‍दि‍वसीय कार्यक्रममे अपन दोकान लगौलनि‍। हुनक दोकानक पांजड़ि‍मे गेना जीक पानक दोकान, मात्र मैथि‍लीक पावनि‍ धरि‍क लेल। सम्‍पूर्ण नाटक ऐ‍ दू दोकानक दृश्‍यमे बि‍म्‍बि‍त अछि। चेतना समि‍ति‍क कार्यक्रमक प्रदर्शन मात्र नेपथ्‍यसँ कएल गेल। महेश-गेनाक शीत बसंतक बसातक संयोग जकाँ वार्तालापक क्रममे कार्यक्रमक कार्यकर्त्ता गोपालक प्रवेश होइए। हि‍नक उद्देश्‍य चाह पीबाक संग कार्यक्रममे चाह पहुँचएबाक सेहो अछि‍। पान मंचपर अवश्‍य चाही, कि‍एक तँ ई मैथि‍ल संस्‍कृति‍क प्रतीक अछि‍। गोपालक संग दि‍गम्बरक गप्‍प-सप्‍पमे अनसोहाँत कटाक्ष शैलीक वि‍वेचन नीक बुझना जाइत अछि‍। अध्‍ययन सम्‍पन्‍न कऽ लेलाक पश्‍चात् दि‍गम्‍बर बाबूकेँ नौकरी नै‍‍ भेटलनि‍। पटनामे ओ दस दुआरि‍ बनि‍ पेट पोसि‍ रहल छथि‍ परंच महेशक चाह बेचबासँ ओ संतुष्‍ट नै‍‍, हुनका गामक महेश चाहक दोकान खोलि‍ गामक नाक कटा रहल अछि‍। वाह-रे मैथि‍ल! भीख मांगि‍ कऽ खाएब नीक, ठकि‍ कऽ जीअब नीक मुदा छोट कर्म नै‍‍ करब। महेश तँ चाह बेच कऽ अपन परि‍वारक प्रति‍पाल करैत छथि‍, दू गोट बारह बरखक नेनाकेँ रोजगार देने छथि‍, मुदा दि‍गम्बर बाबूकेँ अपन यायावरी जीवन नीक लगैत छन्‍हि‍। मुँहगर जे स्‍वयं अकर्मण्‍य हुअए ओ गोंग कर्मक पुरूषकेँ दूसए तँ की कहल जाए? महेश चुप्‍प नै‍‍ रहलाह, अपन कर्मक गति‍क आड़ि‍मे दि‍गमबरकेँ सत्‍यसँ परि‍चए करा देलनि‍। ओना ई दोसर गप्‍प जे महेशो अपन पि‍तासँ असत्‍य बजने छथि‍। हुनक पि‍ताकेँ ई बुझल छन्‍हि‍ जे महेश पटनामे नौकरी करैत अछि‍। महेश मि‍थ्‍या बजलनि‍ मात्र अपन पि‍ताक मानसि‍क संतुष्‍टि‍क लेल, कि‍एक तँ पुरना सोचक लोक अपन ठोप-चाननेटा पर वि‍श्वास करैत छथि‍, बरू भुक्‍खे मरि‍ जाएब मुदा वि‍जातीय ओछ कर्म नै‍‍ करब। नाटकक दोसर प्रमुख पात्र छथि‍ उमानाथ आ चन्‍द्रमा, एकटा अकाश आ दोसर धरि‍त्री। उमानाथ अभि‍यंता छथि‍, नाअों टा लेल मैि‍थल, कार्यक्रम देखबाक लेल नै‍‍ अएला, मात्र अपन संगी सभसँ भेँट करबाक दुआरे चेतना समि‍ति‍क दर्शक दीर्घामे अशोकर्य लऽ कऽ पैसला‍। अपन कनि‍याँ चन्‍द्रमाटा सँ मैथि‍लीमे गप्‍प करैत छथि‍। की मजाल केयो दोसर हुनका संग मैि‍थलीमे गप्‍प करबाक दु:साहस करए, ओकरा अपन सामर्थ्‍य देखा देताह। दुनू परानी चाह पीबाक क्रममे महेशक दोकानपर अबैत छथि‍, चाह बनल नै‍‍ कि उमानाथ जीकेँ कोनो संगीपर नजरि‍ पड़ि‍ गेलनि‍। कनि‍याकेँ महेशक दोकानपर छोड़ि‍ ठामे पड़ा गेलाह। यथाक्रममे मंचसँ महेश जीकेँ कवि‍ता पाठ करबाक आग्रह आएल। चन्‍द्रमा जीकेँ बि‍नु दामे दोकानक ओगरबाहि‍ दऽ ओ मंचस्‍थ भऽ गेलाह। चन्‍द्रमा अजगुतमे पड़ि‍ गेलीह, चाहक वि‍क्रेता आ कवि‍? कालक लीला वि‍चि‍त्र लगलनि‍। दोकानपर गाहकि‍ सभ आबए लागल, चन्‍द्रमा भावावेशमे पड़ि‍ चाह बनाबए लगलीह। गंगानाथ आ दयानंद सन गाहकि‍केँ चाह वि‍क्रेता कवि‍ पचि‍ नै‍‍ रहल छल। समि‍ति‍क मंच हुनका लोकनि‍क मंच, तँए गनहा गेल। हरि‍कान्‍त बाबूकेँ आधुनि‍क रूपक कार्यक्रम नीक नै‍‍ लागि‍ रहल छन्‍हि तँ शि‍वानंदकेँ पुरातन संस्‍कृति‍सँ कोनो मोह वा छोह नै‍‍। ऐ‍ मध्‍य उमानाथ बाबू चन्‍द्रमाकेँ तकैत दोकानपर अएलाह। अपन कनि‍याकेँ चाह बनबैत देखि‍ते माहुर भऽ गेलथि‍। छोड़बाक जि‍द्द कएलनि‍ मुदा मैथि‍ल नारी अपन उतरदायि‍त्‍वसँ कोना भटकि‍ सकैत अछि‍? एक खीरा तीन फाँक! बि‍गड़ि‍ कऽ फेर पड़ा गेलाह। मोने-मोन महेशपर अगि‍नवान बरि‍सबैत छलथि‍। चन्‍द्रमा सेहो संकटक आवाहनक सशंकि‍त, मुदा की करतीह? एक दि‍स भाव आ दोसर दि‍स कर्त्तव्‍य बोध, “आँखि‍क तीरक बीख पानि‍ नोर बनि‍ झहड़ल हृदए झमान भेल।‍” कथाक अंति‍म वनि‍ता सरि‍ताक कंठ चाहक लेल सुखए लागल, तँए अपन नोकर आ छोट नेनाक संग महेशक दोकानपर अबैत छथि‍। कवि‍काठी महेश कवि‍ता पाठ कऽ फेर अपन जीवनकेँ गुनि‍ रहल छथि‍। सरि‍ताकेँ देखि‍ते स्‍वयंमे नुकएबाक असहज प्रयास करए लगला‍। वएह सरि‍ता जे कहि‍यो महेशक सहपाठि‍नी छलीह, आब एकटा आइ.ए.एस. अधि‍कारीक अर्द्धांगि‍नी छथि‍। सरि‍ता महेशसँ साक्षात्‍कार करबाक प्रयास कऽ रहलीहेँ। महेश अपन भूतकालकेँ झाँपए चाहैत छथि‍ मुदा सरि‍ता घोघट कालक वर जकाँ ओकरा उघारि‍ रहल छलीह। हुनक उद्देश्‍य सि‍नेहि‍ल अछि‍ तँए महेश टूटि‍ गेलाह। सरि‍ता अश्रुधारसँ सि‍चि‍ंत, जकर नोट्स पढ़ि‍ अध्‍ययन पथपर बढ़ैत रहलीह ओ एहेन दशामे पहुँचि गेल। चन्‍द्रमा सरि‍ताक मोहमे वि‍चरण करए लगलीह। ऐ‍ मर्मस्‍पर्शी क्षणक अंत भेल नै‍‍ कि उमानाथ आबि‍‍ महेशक गट्टा पकड़ि‍ वास्‍तवि‍क जीवनक दर्शन कराबए लगलाह। चन्‍द्रमा ऐ‍ क्षण महेशक संग दऽ रहल छलीह। मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल सभसँ वि‍लग नूतन वि‍षय वस्‍तुक मार्मिक वि‍श्‍लेषणमे शेखर जीक अतुल्‍य प्रति‍भाक झलक अनमोल अछि‍। पूर्ण रूपसँ एकरा नाटक नै‍‍ कहल जा सकैछ, कि‍एक तँ ई दीर्घ एकांकीक रूपमे लि‍खल गेल अछि‍। कथाक चि‍त्रण मात्र दू दोकानक परि‍धि‍मे भेल अछि‍ तँए दृश्‍य समायोजनमे कोनो प्रकारक वि‍ध्‍नक स्‍थि‍ति‍ नै‍‍, सरि‍पहुँ एकरा शेखरजी नाटकक रूपमे प्रदर्शित कएलनि‍। महेश सन चरि‍त्र हमरा सबहक समाजमे छथि, मुदा कर्त्तव्‍यबोधक एहेन पुरूष जौं मि‍थि‍लामे सभठाम होथि‍ तँ हम सभ साधन विहीन रहितो सम्‍यक जीवनक रचना कऽ सकैत छी। चन्‍द्रमा सन दीर्घसोची नारीक वि‍वरणमे वास्‍तवि‍कतासँ बेसी कल्‍पनाक आभास होइत अछि‍। नाटकक आत्‍मकथ्‍यमे शेखर जीक आत्‍मवि‍श्वाससँ बेसी अहंकारक दर्शन भेल। ‘नाटकक क्षेत्रमे हमर कि‍छु मोजर अछि‍’ सन उक्‍ति‍क संग बटुक भाय आ गजेन्‍द्र नारायण चौधरीक प्रति कृतज्ञता ज्ञापनमे महि‍मा मंडनक भान श्‍ोखर जीक संस्‍कारपर‍ बुझना जाइछ। कि‍यो ककरो प्रेरणासँ रचनाकार नै‍‍ भऽ सकैत अछि‍, ई तँ नैसर्गिक प्रति‍भाक परि‍णाम थि‍क। मुदा ऐ‍सँ ‘भफाइत चाहक जि‍नगी’क मर्यादाकेँ क्षीण नै‍‍ बुझल जा सकैत अछि‍। मात्र छोट-छोट ३९ पृष्‍ठक नाटक (ओहुमे सँ आठ पृष्‍ठ वि‍षय वस्‍तुसँ बाहरक) मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल मरूभूमि‍मे नीरक सदृश बनल दृष्‍टि‍कोणकेँ परि‍लक्षि‍त करैत अछि‍। ऐ प्रकारक बि‍म्‍बक सृजन शेखरजी सन माँजल रचनाकारेसँ संभव भऽ सकैछ। नि‍ष्‍कर्षत: मि‍थि‍लाक संस्‍कृति‍क मध्‍य कर्म प्रधान युगक आचमनि‍सँ नाटक ओत-प्रोत अछि‍। मात्र साहि‍त्‍यक नै‍‍, मंचनक लेल सेहो ई नाटक पूर्णत: उपयुक्‍त लागल। नाटक- भफाइत चाहक ि‍जनगी रचनाकार- पं. सुधांशु शेखर चौधरी प्रथम संस्‍करण- नवम्‍वर १९७५ मि‍थि‍लाक बेटी ईसा संवत् सन २००८ सँ लऽ कऽ वर्तमान कालकेँ अद्यतन मैथि‍ली साहि‍त्‍यि‍क आन्‍दोलनक क्रांति‍-काल कहल जा सकैत अछि‍। ऐ‍ अवधि‍मे रंग-बि‍रंगक साहि‍त्‍य सरि‍तासँ सजल पत्र-पत्रि‍काक प्रकाशन प्रारंभ भेल अछि‍। जइ‍मे प्रमुख अछि‍- वि‍देह ई-पत्रि‍का, वि‍देह-सदेह, मि‍थि‍ला दर्शन (पुनर्प्रकाशन), पूर्वोत्तर मैथि‍ल, झारखंडक सनेस आदि‍-आदि‍। ऐ‍ पत्र-पत्रि‍काक प्रयाससँ नव-नव साहि‍त्‍यकारक प्रवेश मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे भेल। जइ‍मेसँ कि‍छु साहि‍त्‍यकार तँ अपन रचनासँ मि‍थि‍लाक मानस पटलपर एहेन स्‍थान बना लेलनि‍ जइ‍सँ हुनका जौं काल पुरूष माने मैन ऑफ टाइम कहल जाए तँ कोनो अति‍शयोक्‍ति‍ नै‍‍ हएत। ऐ‍ रचनाकारक भीड़मे एकटा साम्‍यवादी आ बहि‍र्मुखी प्रति‍भासँ सम्‍पन्न रचनाकार छथि‍- श्री जगदीश प्रसाद मंडल। हि‍नक व्‍यक्‍ति‍गत जीवन कोनो रूपक हुअए मुदा साहि‍त्‍यि‍क सृजनशीलतासँ हि‍नका बहि‍र्मुखी व्‍यक्‍ति‍त्‍वक व्‍यक्‍ति‍ कहल जा सकैत अछि‍। हि‍नक लघुकथा ‘बि‍साँढ़’ आ ‘भैंटक लावा’ घर-बाहरमे आ ‘चुनवाली’ मि‍थि‍ला दर्शनमे प्रकाशि‍त होइते मैथि‍ली पत्रि‍काक संपादक मंडलक संग-संग प्रबुद्ध पाठकक मध्‍य हड़होरि‍ मचि‍ गेल। ‘पहि‍ने आउ आ पहि‍ने पाउ’क आधारपर वि‍देहक संपादक श्री गजेन्‍द्र ठाकुर हि‍नक रचना सभकेँ अपन पत्रि‍कामे छपबए लेल हथि‍या लेलनि‍। ऐ‍ प्रकारक शब्‍दक प्रयोग करबाक हमर तात्‍पर्य अछि‍ जे जगदीश बाबू कोनो नव रचनाकार नै‍‍ छथि‍, ति‍रसठि‍ बर्खक माँजल साहि‍त्‍यकार छथि‍, मुदा हि‍नक रचनाक प्रदर्शन नै‍‍ भेल छल। समग्र रचना-संसार हि‍नक पुत्र श्री उमेश मंडल जीक कम्‍प्‍यूटरमे ओझराएल छल कि‍एक तँ छपएबाक लेल कैंचा कतएसँ आएत? आदरणीय संपादक गजेन्‍द्र ठाकुरक वि‍शेष अनुग्रह आ श्रुति‍ प्रकाशनक अधि‍ष्‍ठाता श्री नागेन्‍द्र कुमार झा आ श्रीमती नीतू कुमारी जीक कृपासँ हि‍नक एकसँ बढ़ि‍ कऽ एक रचना हथि‍या नक्षत्रक गनगुआरि‍ जकाँ पाठकक आगाँ आबि रहल अछि‍। ऐ‍ पुष्‍पांजलि‍ महक एकटा फूल लऽ हम पाठकक सोझाँ राखि‍ रहल छी- ‘मि‍थि‍लाक बेटी।’ मि‍थि‍लाक बेटी एकटा नाटकक नाओं अछि‍। शीर्षकसँ स्‍पष्‍ट होइत अछि‍ जे हमरा सबहक समाजक वनि‍ताक अस्‍ति‍त्‍व आ अस्‍मि‍तासँ ऐ‍ रचनाक संबंध अछि‍। मुदा पोथीक गर्भावलोकनक बाद हमर मोनसँ ई भ्रम भागि‍ गेल। ऐमे समाजक वि‍षमताक स्‍पष्‍ट दर्शनक अनुभूति‍ भेल। जगदीशजी साम्‍यवादी वि‍चार धाराक सम्‍पोषक छथि‍, तँए समाजमे पसरल व्‍याधि‍पर श्रमक वि‍जय, श्रमजीवीक वि‍जय, दृष्‍टि‍कोणक वि‍जय, इमानक वि‍जय, सम्‍यक भौति‍कताक वि‍जय, बौद्धि‍क आ चेतनाक वि‍जय देखएबाक प्रयास कएलनि‍। पाँच अंकक ऐ‍ नाटकमे नौ गोट पुरूष पात्र आ पाँचटा नारी पात्र छथि‍। रचनाक केन्‍द्र बि‍न्‍दु छथि‍ पैंतालीस बर्खक वि‍कट पुरूष पात्र- बाबू कर्मनाथ- एकटा प्रशासनि‍क अधि‍कारी। वि‍कट ऐ‍ दुआरे कि‍एक तँ भ्रष्‍ट समाजक मध्‍य कर्तव्‍यपरायण ईमानदार व्‍यक्‍ति‍ आ बाबू ऐ‍ दुअारे कि‍एक तँ अधि‍कारी छथि‍। स्‍नातक उर्तीर्ण कएलाक बाद हि‍नक पि‍ता सोमनाथ हि‍नक बि‍आह एकटा भौति‍कवादी परि‍वारमे पक्का कए लेलनि‍। द्रव्‍य, धन धान्‍य आ बीस बिगहा जमीनक जुआरि‍मे। मुदा ओ कर्मनाथ जीक मौन समर्थनक आशमे बैसल छलाह। ऐ‍ मध्‍य जेठ मासक गरमीमे एकटा कायाहीन आ नि‍र्धन व्‍यक्‍ति‍ हि‍नक दलानपर अएलनि‍, व्‍यथि‍त आ थाकल अपन कन्‍याक हेतु वर तकबाक क्रममे सोमनाथक दलानपर अचेत भऽ गेलाह। सोमनाथसँ हुनक व्‍यथा नै‍‍ देखल गेल। आेइ‍ गरीबक कन्‍यासँ बि‍याह करबाक लेल आतुर भऽ गेलाह। कालान्‍तरमे ई बि‍आह सम्‍पन्न तँ भऽ गेल मुदा परि‍वारमे सामंजस्‍य नै‍‍ रहि‍ सकल। पि‍ता सोमनाथ आ दू भाँइ क्रमश: नूनू आ लालबाबू हि‍नक नि‍र्णएसँ दुखी भऽ गेला‍, कि‍एक तँ कुबेरक भंडारक आशपर कर्मनाथजी नोन छीटि‍ देलनि‍। प्रति‍भाशाली छात्र कर्मनाथ प्रशासनि‍क अधि‍कारी बनि‍ गेलाह परंच हि‍नक इमान भौति‍कतापर भारी पड़ि‍ गेल, जइ‍सँ नव-नव समस्‍या उत्‍पन्न भऽ गेल। पत्नी चमेली, पुत्र फुलेसर आ पुत्री द्वय चम्‍पा आ जूही- ई अछि‍ हि‍नक परि‍वार। भावक सर आ वि‍श्वासक शतदलक संग जीवन क्रम चलैत रहल। िपता सोमनाथ अदूरदर्शी व्‍यक्‍ति‍ छलाह, जइ‍सँ अन्‍य दुनू पुत्र अवण्‍ड भऽ गेलनि‍। कर्महीन नूनू आ लालबाबू जथा बेच-बेच‍ कऽ कर्मनाथक बराबरि‍ करबाक प्रयास कऽ रहल छलथि‍। पि‍तासँ महि‍मा मंडि‍त होएबाक कारणें दुनूक जीवन नारकीय भऽ गेल। परि‍वारक दशा ओ दि‍शाकेँ देखि‍ कऽ कर्मनाथक माए आशाक आश टूटि‍ रहल छल। कर्मनाथ जीक पि‍तृ परि‍वारमे मात्र हि‍नक माएक व्‍यक्‍ति‍त्‍व सोझराएल छल। कि‍एक नै‍‍ रहत, सभ माएक इच्‍छा होइत अछि‍ हुनक पुत्रक नाओंसँ समाज गौरवान्‍वि‍त हुअए। जगदीशजी ऐ‍ नाट्य कथाक नायकक स्‍पष्‍ट उद्घोषण नै‍‍ कएलनि‍ मुदा हमर मतसँ ऐ‍ नाटकक नायक छथि‍ वि‍कास, एकटा सेवा नि‍वृत्त शि‍क्षक। आदर्श आ सहज वि‍चारधाराक व्‍यक्‍ति‍ श्री वि‍कास अपन समाजक चि‍तंक छथि‍। मि‍थि‍लाक गाम एखनो वि‍कासक धारामे पाछाँ पड़ल अछि‍। शि‍क्षाक अभाव, सामाजि‍क समरसताक अभाव आ साधनक अभावक कारण वि‍कास सन प्रबुद्ध व्‍यक्‍ति‍क ग्राम्‍य समाजमे आवश्‍यकता अछि‍। गामक प्राय: नव आ अधवयसू पीढ़ी हुनक छात्र रहलनि‍ अत: हुनक सलाहकेँ मानैत छथि‍। श्रीचन कि‍सान हाटपर प्रचार करबाक लेल आएल शंकर बीज कंपनीक प्रलोभनमे आबि टमाटरक वि‍देशी बीआ खरीद लैत छथि‍। टमाटर उपजाक कोन कथा जे लत्ति‍ओ गलि‍ गेल। श्रीचन संताप आ क्रोधक मारे आकुल छलाह। वि‍कासजी हुनका सान्‍त्‍वना दैत कहलनि‍ जे प्रचारक चकाचौंधमे नै‍‍ अएबाक चाही, अपन स्‍वदेशी वस्‍तु आेइ‍ वि‍देशी समानसँ सोहनगर अछि‍। वि‍कासजीक प्रयाससँ कर्मनाथक पुत्री चम्‍पाक बि‍आह रामवि‍लास मि‍स्‍त्रीक पुत्र मदनसँ तइँ कएल गेल। ऐ‍ बि‍आहकेँ केन्‍द्र बि‍न्‍दु मानि‍ ऐ‍ पोथीक रचना कएल गेल अछि‍। आब प्रश्न उठैत अछि‍ जे ऐ‍ पोथीमे नव की भेटल? मि‍थि‍लाक बेटी नाटक ‘कर्म प्रधान वि‍श्व करि‍ राखा’ सि‍द्धान्‍तक आधारपर लि‍खल गेल अछि‍। एकटा कर्मठ आ ईमानदार व्‍यक्‍ति‍केँ समाजमे की-की सहए पड़ैत अछि‍, आेइ‍ परिप्रेक्ष्‍यक मार्मि‍क चि‍त्रण कएल गेल अछि‍। कथाक मूलमे कर्मनाथक बिआह क्रममे आएल एकटा गरीब (चमेलीक पि‍ता) व्‍यक्‍ति‍क मनोदशाक प्रस्‍तुति‍ नीक अछि‍। ओ व्‍यक्‍ति‍ गरीब छथि‍ मुदा ‘चार्वाक दर्शन’क पालक। ‘पेटमे खढ़ नै‍‍ सि‍ंहमे तेल’ जेबीमे कैंचा नै‍‍ मुदा नौ हन्नाक बटुआ जइ‍मे भोगक वस्‍तु छलि‍या सुपारी पान आ तमाकू। हमरा सबहक गाममे एहि‍ना होइत अछि‍, भोजन नै‍‍ मुदा पान अवश्‍य। पग-पग पोखरि‍ माछ मखान... मधुर बोल मुस्‍की मुख पान... नेना पढ़लक, नै‍‍ पता, कनि‍याकेँ पथ्‍य भेटल, नै‍‍ जनै छी, बेटीक लेल दूध अछि‍... नै‍‍। मुदा पान अति ‍आवश्‍यक, हाथी मरि‍ गेल, छान आ पग्‍घा लऽ कऽ बौआ रहल छी। कर्मनाथक अपन पत्नी चमेलीक संग वार्तालापमे ‘खट्टर ककाक तरंग’क दर्शन होइत अछि‍। गाममे प्रचलि‍त लोकोक्‍ति‍क हास्‍य मुदा सत्‍य प्रस्‍तुति‍। कर्मनाथ जीक पुत्रक नाओं फुलेसर, प्रशासनि‍क अधि‍कारी भऽ कऽ एहेन नाओं.....। ऐ‍सँ हुनक गामक प्रति‍ सि‍नेहक झाँकी भेटैत अछि‍। गाममे एहने नाओं सभ होइत अछि‍। अपन दुनू पुत्री आ पुत्रकेँ छायावादी रूपमे जीवनक शि‍क्षा दैत छथि‍ कर्मनाथ। एना करब आवश्‍यक कि‍ए तँ ऐ‍सँ जि‍ज्ञासा बढ़ैत अछि‍। रामवि‍लास सेवानि‍वृत मि‍स्‍त्री छथि‍। बाल्‍यकाल साधनक अभावमे आ युवावस्‍था संघर्षमे बि‍ता कऽ भौति‍क साधन प्राप्‍त कएलनि‍। जीवनक अंति‍म पड़ावमे माधुरीसँ, माने अपन पत्नीसँ, अपन जीवन-यात्राक व्‍याख्‍यान करैत छथि‍, आश्चर्यमे पड़ि गेलौं, जि‍नका संग चालीस बर्खक यात्रा कएलनि‍ ओ हि‍नक जीवन दर्शन नै‍‍ जनैत छलीह। हमरा सबहक समाजमे ऐ‍ प्रकारक घटना होइते अछि‍। गरीब नेनपनक बाद सोझे प्रौढ़ भऽ जाइत छथि‍। जे कर्मवादी छथि‍ हुनक अंति‍म अवस्‍था सुखमय नै‍‍ तँ......। अपन कर्मक नावकेँ कलकत्तामे मजगूत कऽ सोझे गाम आबि जाइत छथि‍। मातृभूमि‍क प्रति‍ सि‍नेह, गामेमे गैरेज खोलबाक योजना अछि, चौघारा घर बनाएब, दलान अवश्‍य रहत, कि‍एक तँ दलान समाजक मर्यादा थि‍क, गामक जीवन शहरसँ सुखमयी अछि‍। ऐ‍ पोथीमे पड़ाइनवादक वि‍रोध कएल गेल अछि‍। कर्मनाथक चरि‍त्र पंडि‍त गोवि‍न्‍द झा लि‍खि‍त ‘बसात’ नाटकक नायक कृष्‍णकान्‍तसँ मि‍लैत अछि‍। रामवि‍लास जीवन संघर्षमे वि‍जयी भेलाह तँए पुत्रक बिआह आदर्श करताह। वि‍कास जीक चरि‍त्र नाटकक लेखक जगदीशबाबूसँ मि‍लैत अछि‍। साम्‍यवादी, ग्रामीण सभ्‍यताक दि‍ग्‍दर्शक। ऐ‍ पोथी‍मे जाति‍वादी व्‍यवस्‍थाक वि‍रोध कएल गेल अछि‍। आन गामक स्‍वजातीयकेँ भोजमे नि‍मंत्रण देबासँ अनि‍वार्य अछि‍ अपन गामक सभ जाति‍केँ आमंत्रि‍त करब। ि‍कएक तँ बेर-कुबेरमे पाँजरि‍ लागल लोक काज दैत छथि‍, चाहे ओ कोनो जाति‍क हुअए। ऐ‍ पोथीमे जीवनक सभ रूपक व्‍यापक दर्शन कएल गेल अछि‍। कुलीन व्‍यक्‍ति‍ जनि‍क परि‍वार नीचाँ मुँहे जा रहल अछि,‍ आेइ‍ परि‍वारक कन्‍याक बि‍आह उर्ध्‍वमुखी साधारण परि‍वारक पुत्र (जे आब सम्‍पन्न छथि‍) हुनकासँ भऽ सकैत अछि‍। ऐ‍ पोथीमे अन्‍हारपर इजोतक वि‍जय देखाओल गेल अछि‍। भौति‍कतापर बौद्धि‍कता आ सम्‍यक जीवनक जीत ऐ‍ पोथीक केन्‍द्र बि‍न्‍दुमे समेटल अछि‍। पुत्रक बिआहमे ति‍लक लेबासँ बेसी अछि‍ कुलीन कन्‍याक चयन। सम्‍पूर्ण पोथीमे देशज शब्‍दक प्रयोग कएल गेल अछि‍। पोथीक अंति‍म पृष्‍ठपर श्री गजेन्‍द्र ठाकुरक कथन- मैथि‍ली साहि‍त्‍यक इति‍हास जगदीश प्रसाद मंडलसँ पूर्व आ जगदीश प्रसाद मंडलसँ- पढ़लौं, पहि‍ने तँ अनसोहाँत लागल, मुदा पोथीक अध्‍ययन कएलाक पश्‍चात् हमरा सहज लागल। भाषा अत्‍यन्‍त सामान्‍य मुदा रस, अलंकार आ छंदसँ परि‍पूर्ण अछि‍। कलात्‍मक शैलीमे जगदीशजी अंक-अंकमे अपन दर्शनकेँ सहेजि‍ लेने छथि‍। हि‍नक ई रचना कोनो वि‍शेष कथाकार वा नाटककारसँ‍ प्रभावि‍त नै‍‍। हि‍नक रचनामे राजकमलजी, पंडि‍त गोवि‍न्‍द झा, हरि‍मोहन बाबू, धूमकेतु, ललन ठाकुर सन रचनाकारक शैलीक मि‍श्रि‍त दर्शन होइत अछि‍। मि‍थि‍लाक बेटी अर्थनीति‍सँ प्रभावि‍त अछि‍ मुदा सम्‍यक अर्थनीति‍सँ। अर्थपर मानवताक वि‍जय, जगदीशजीक वि‍श्वास नीक लागल। जेना कोनो व्‍यक्‍ति‍ पूर्ण नै‍‍ भऽ सकैत अछि‍ तहि‍ना कोनो रचनाक संग होइत अछि‍। ‘मि‍थि‍लाक बेटी’ पोथीमे कि‍छु त्रुटि‍क दर्शन सेहो भेल। प्रथमत: ऐ‍ पोथीक शीर्षक अप्रासंगि‍क लागल। बेटी तँ ऐ‍ दर्शनक माध्‍यम मात्र अछि‍, स्रोत नै‍‍। ऐ‍मे मानवीयताक जीत देखाओल गेल अछि‍ बेटीक जीवन तँ घटना मात्र थि‍क। ऐ‍ नाटकक भाषा सरल आ शनै: शनै: गमनीय अछि‍, एकर कलात्‍मक मंचन कएल जा सकैत अछि‍। नि‍ष्‍कर्षत: जगदीश प्रसाद मंडलजी हमरा सबहक बीच एकटा नव जीवनक आयाम लऽ कए आएल छथि‍। बहुरंगी जीवनक आयाम आ सकारात्‍मक सोचक आयाम। मानवीय मूल्‍य एखनो धरि‍ जीवि‍त अछि‍। ऐ‍ तरहक घटना कठि‍न अछि‍ मुदा असंभव नै‍‍। वि‍श्वास आ कर्मक संग जीवन जीबाक प्रयत्‍न करबाक चाही। ऐ‍ पोथीक शब्‍द-शब्‍दमे झंकार अछि‍। भाषा प्रवाहमयी लागल। प्रकाशन दलक प्रयास नीक, शब्‍द संयोजन आ संपादन अति‍ उत्तम। पोथीक नाओं- मि‍थि‍लाक बेटी नाटककार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन राजेन्‍द्र नगर दि‍ल्‍ली। मूल्‍य- १६० टाका मात्र। प्रकाशन वर्ष- सन् २००९ पोथी पाप्‍ति‍क स्‍थान- पल्‍लवी डि‍स्‍ट्रीब्‍यूटर्स, वार्ड न.६, नि‍र्मली, सुपौल, मोवाइल न. ९५७२४५०४०५ मैथि‍ली नाटकक वि‍कासमे आनंद जीक योगदान

जखन-जखन मैि‍थली भाषा साहि‍त्‍यमे नाट्य वि‍धाक चर्च होइत अछि‍ तँ हठात् पंडि‍त जीवन झासँ लऽ कऽ झि‍झि‍रकोना आ तालमुट्ठी सन नाटकक नाटककार अरवि‍न्‍द कुमार अक्‍कू जीक वि‍वेचन स्‍वभावि‍क भऽ जाइछ। ऐ‍ एक सय छ: बरखक नाट्य रचनामे बहुत रास नाटककार वि‍वि‍ध शैलीक साहि‍त्‍यि‍क नाटकक संग-संग लोकप्रि‍यताक लेल चलन्‍त आ ओछ नाटक सेहो लि‍खलनि‍। कि‍छु रचनाकार तँ नाटककारेक रूपेँ बेस चर्चित छथि‍, संग-संग हुनका सभकेँ पुरस्‍कृत सेहो कएल गेल अछि‍। उदाहरणस्‍वरूप श्री महेन्‍द्र मलंगि‍या मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रति‍ष्‍ठि‍त सम्‍मान प्रबोध सम्‍मानसँ सम्‍मानि‍त कएल गेल छथि‍। मलंगि‍या जी बहुत रास नाटक लि‍खलनि‍- लक्ष्‍मण रेखा : खण्‍डि‍त, जुअाएल कनकनी, एक कमल नोरमे, ओकरा आंगनक बारहमासा, कमलाकातक राम, लक्ष्‍मण ओ सीता आ काठक लोक। ऐ‍ नाटक सभमे “एक कमल नोरमे” साहि‍त्‍यक समग्र बि‍न्‍दुकेँ वि‍म्‍बि‍त करएबला नीक नाटक मानल जाइत अछि‍। मुदा “काठक लोक” आदि पढ़लासँ पाठक स्‍वयं ि‍नर्णय सुनाबथि‍ जे कतए धरि‍ एकरा “मैथि‍ली नाटक” मानल जाए। बि‍म्‍व गाथा आ वि‍वेचन मैथि‍लीसँ बेसी हि‍न्‍दीमे। ओना सभ साहि‍त्‍यि‍क कृति‍मे आन भाषाक प्रयोग ठाम-ठाम कएल जाइत अछि‍ मुदा मात्र पात्रक दशा आ परि‍स्‍थि‍ति‍मे तारतम्‍य स्‍थापि‍त करबाक लेल। मलंगि‍याजी ऐ पोथीमे हि‍न्‍दीक प्रयोग कोन रूपेँ कएने छथि‍ ई गप्‍प झारखंडक अंत:स्‍थ कक्षाक (मैथि‍ली भाषी जौँ उपलब्‍ध होथि‍) छात्र-छात्रासँ पुछल जा सकैत अछि,‍ कि‍एक तँ “काठक लोक” झारखण्‍ड अधि‍वि‍द्य परि‍षद्क मैि‍थली पाठयक्रममे सम्‍मि‍लि‍त अछि‍। मैि‍थलीक संग दुर्भाग्‍य मानल जाए वा वि‍डम्बना जे कि‍छु कथाकथि‍त साहि‍त्‍यकार आ समीक्षकक दलपुंज भाषापर अपन अधि‍कार चमौकनि‍ जकाँ जमौने छथि‍। “अहाँक सोहर हम गाएब आ हमर डहकन अहाँ बि‍दबि‍दाउ” ऐ‍ परिप्रेक्ष्‍यमे कि‍छु प्रति‍भा झँपले रहि‍ गेल, कतहु कोनो चर्च नै‍। ऐ‍ वज्रपातक टटका शि‍कार छथि‍ आधुनि‍क खाढ़ीक सनसनाइत युगान्‍कारी नाटककार- “श्री आनंद कुमार झा”। आनंद जीक एखन धरि‍ पाँच गोट नाटक प्रकाशि‍त भेल अछि‍ “टाकाक मोल (२०००)”, “कलह (२००१)”, “बदलैत समाज (२००२)”, “धधाइत नवकी कनि‍याँक लहास (२००३)” आ “हठात् परि‍वर्त्तन २००५”। ऐ‍ नाटकक संग-संग आनंदजीक अप्रकाशि‍त नाटकक गणना दू अंक धरि‍ पहुँचि‍ गेल अछि‍। आनंद जीक जन्‍म १९७७ई.मे मि‍थि‍लाक सांस्‍कृति‍क सेहंति‍त भूखण्‍ड मधुबनी जि‍लाक मेंहथ गाममे भेल। जौं समस्तीपुर, खगड़ि‍या आ बेगूसराय जि‍लाक लाल रहि‍तथि‍ तँ उपेक्षाक दंश स्‍वाभावि‍क छल मुदा ठामक वासी उपेक्षि‍त भेलाह, कनेक संत्रास जकाँ लगैछ। गाम-गामसँ लऽ कऽ कोलकाता शहर धरि‍ मंचि‍त ऐ‍ नाटक सभक कोनो समीक्षा नै‍ भेल, ई सभ मात्र मैथि‍ली भाषामे संभव छै। जौं बिम्बक उपयोगि‍ताकेँ केन्‍द्र बि‍न्‍दु मानल जाए तँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रवीण नाटककारक समूहमे आनंद जीक स्‍थान नि‍श्‍चि‍त अछि‍। टाकाक मोल: आर्य भूमि‍क एकटा पैघ व्‍याधि‍ काटर प्रथाक दु:स्‍थि‍ति‍पर केन्‍द्रि‍त ऐ‍ नाटकमे मि‍थि‍ला संस्‍कृतिक‍ कोढ़ि‍क चि‍त्रण नीक ढंगसँ कएल गेल अछि‍। कन्‍याक पि‍ताक नाओ गरीबनाथ, संग-संग दरि‍द्र सेहो। अपन धर्मपत्नी सुमि‍त्राक आश पूर्ण करबाक लेल पुत्र कामनार्थ पाँच गोट कन्‍याकेँ जन्‍म देलनि‍। पहि‍ल बेटीक वि‍वाहमे डाँड़ टुटि‍ गेलनि,‍ सभटा खेत बि‍का गेलनि‍। दोसर बेटीक कन्‍यादानक लेल आतुर छथि‍, मात्र बारह कट्ठा जमीन बाँचल छन्‍हि‍। बेटी प्रभा कॉलेजमे पढ़ैत छथि‍, वि‍वाह अपना मोने नै करए चाहैत छथि‍- मात्र समाजक हेय दृष्‍टि‍सँ बचबाक लेल बेटीक वि‍आह ऐ‍ शुद्धमे करबाक लेल परेशान छथि‍। हमरा सबहक समाजक कतेक कलुष रूप अछि‍ अप्‍पन टेटर नै‍ देखि‍ कऽ लोक सभ दोसरक फोसरीपर काग-दृष्‍टि‍ लगौने रहैत छथि‍। कुमारि‍ बेटी छन्‍हि‍ गरीब झाक घरमे आ परेशान छथि‍ समाजक लोक। ऐ‍ लेल नै‍ जे मि‍थि‍लाक बेेटीक उद्धार कएल जाए, मात्र बारह कट्ठा जमीन लि‍खएबाक लोभमे। प्रभा अपन बहि‍नक देओर प्रभाकरसँ सि‍नेह करैत छथि‍, लेकि‍न आंडबरधर्मी समाज ऐ‍ सि‍नेहक मंजूरी नै‍ देत तँए चुप्‍प। गरीब झा दलाल काकासँ संपर्क करैत छथि‍। जेहन नाअो तेहने कार्य। हुनक चेला कक्कासँ बेसी पारखी। दुनूक जोड़ी शुभ्‍म-नि‍सुम्‍भ जकाँ दुष्‍ट आ धृष्टतासँ भरल। हर्षद मेहताक दलाली हि‍नका लग ओछ पड़ि‍ जाइए। बालकक पि‍ता लीलाम्‍बर बाबू वास्‍तवमे लीलाधारी छथि‍। भाति‍ज सभसँ कम कैंचा पुत्रक बि‍आहमे कोना लैतथि‍ तँए पचहत्तरि‍ हजारसँ कम टाका नै‍ चाही। दलाल काकाक मोहि‍नी मंत्रक जादूमे आबि‍ पैंसठ हजारमे बि‍आह करबाक ि‍नर्णय सुनौलनि‍। शर्त्त छनि‍ जे समाजमे पचहत्तरि‍ हजारक उद्धोष कएल जाए। दलाल काकाक कलि‍जुगी उगना ऐ‍ उद्धोषणाक लाभ लेबाक प्रयासमे सफल भेलनि‍। दलालीक दस हजार कमीशन दुनू चेला-गुरूक पेटमे। गरीब झा अपन बाँचल जमीन ५० हजारमे बेि‍च लेलनि‍। मि‍त्र गुणानंद जीसँ दस हजार टाकाक मदति‍ भेटलनि‍, शेष प्रश्‍न ओझराएल, पंद्रह हजार आब कोना हएत? येन केन प्रकारेण बरि‍याती दलान लागल। फेर धमगि‍ज्‍जड़ि‍। माथक पाग खसि‍ पड़लनि‍ मुदा बरि‍याती आपि‍स। अंतमे प्रभाकरक संग प्रभाक बि‍आह होइत अछि‍। लीलांवर जी काटरक टाका, पचास हजार, कन्‍यागतकेँ आपि‍स कएलनि‍। मुदा नाटककार ई स्‍पष्‍ट नै‍ कऽ सकला‍ जे दलाल काका दलालीक दस हजार कन्‍यागतकेँ देलनि‍ वा नै! कथानकक कि‍छु तथ्‍य वास्‍तवि‍कता नै‍ भऽ कऽ कल्‍पना मात्र लागल। गरीब नाथक बेटी प्रभा काॅलेजमे पढ़ैत छथि‍ आ छोट मांगल-चांगल भाए महीस चरबैत छन्‍हि‍। ओना तँ पुत्रक आकांक्षामे पाँच गोट पुत्रीक जन्‍म देमएबला माए-बापक अर्थव्‍यवस्‍था अव्यवस्‍थि‍त हएब स्‍वाभावि‍क अछि‍। परंच मैथि‍ल संस्‍कृति‍क ग्रामीण व्‍यवस्‍थामे रहनि‍हार माता-पि‍ताक जीवनमे संतानक रूपेँ पुत्रसँ पुत्रीक बेसी महत्‍व देब कल्‍पना मात्र छै, वास्‍तवमे तँ बेटी जन्मे‍सँ आनक धरोहरि‍ मानल जाइत अछि‍ तँए बेटा महीस चराबथि‍ आ बेटी कॉलेजमे पढ़थि, आश्‍चर्य जनक लागल। कथानकक बीच-बीचमे अंग्रेजी शब्‍दक प्रयोग कऽ नाटककार आधुनि‍कता लेपन करबाक प्रयास कएलनि‍, ई उचि‍त अछि‍ वा नै‍, पाठकपर छोड़ि‍ देबाक चाही। एकटा अनसोहाँत अवश्‍य लागल जे मैथि‍लीमे “चुकल” शब्‍दक प्रयोग कहि‍या धरि‍ रहत। नि‍ष्‍कर्षत: ई नाटक मंचनक योग्‍य अछि‍। कलह : कलह आनंदजी लि‍खि‍त दोसर नाटक थि‍क। समाजमे जीवन्‍त घटना सभकेँ एक सूत्रमे जोड़ि‍ कऽ ऐ‍ नाटकक सृजन कएल गेल। आकाश एकटा बेरोजगार नौजवान छथि‍। टाकाक लोभमे पि‍ता सुरेश्‍वर हि‍नक वि‍आह करा दैत छथि‍न्‍ह। आकाश सुरेश्‍वर बाबूक पहि‍ल पत्नीक संतान छथि‍ तँए वि‍माता सुमि‍त्राक दृष्‍टि‍मे हि‍नक कोनो स्‍थान नै‍। सुमि‍त्रा तँ अपन कोखि‍सँ जनमल पुत्र राजीव आ ओकर कनि‍याँ कोमलक लेल ज्‍येष्‍ठ पुत्रक संग यातनाक सभटा बान्‍ह लांघि‍ देलनि‍। प्रौढ़ पि‍ता मूक परिस्‍थि‍ति‍क मारल मात्र दर्शक बनि‍ कऽ रहि‍ गेलाह। कालक मारि‍सँ भटकैत-भटकैत दुनू परानीक ि‍नर्मम अंत होइत अछि‍। एकटा अबोध नेनाक जन्‍म भेल जे आकाशक अंतरंग मि‍त्र योगेशक कोरमे कथाक अंत धरि‍.....। नाटककार ऐ‍ नाटकक रचना भऽ सकैत अछि‍ जे कथानकमे संत्रास भरबाक संग-संग दर्शकक मध्‍य लोकप्रि‍य बनएबाक लेल केने होथि‍ मुदा ऐ‍ सभसँ नाटकक प्रासंगि‍कतापर प्रश्‍न चि‍न्ह नै‍ लगाओल जा सकैत अछि‍। कत्तौ-कत्तौ बिम्ब वि‍श्‍लेषण चलंत आ हि‍न्‍दी भाषाक व्‍यवसायि‍क चलचि‍त्र जकाँ लागल मुदा मैथि‍लीमे नवल प्रयोगकेँ कि‍ओ झाँपि‍ नै‍ सकैत छथि‍, जतए-जतए ऐ‍ नाटकक ि‍चत्रण हएत, अवश्‍य छाप छोड़त। बदलैत समाज : बदलैत समाज नाटकक आरंभ एकटा ब्‍लड कैंसर पीड़ि‍त बालकक अपन पत्नीक संग वार्तालापक संग होइत अछि‍। कर्जसँ मुक्‍ति‍क लेल घूरन जी अपन बीमार पुत्रक बि‍आह करा दैत छथि‍। हुनका ओना बूझल नै‍ छलनि‍ जे पुत्र अवधेश ब्‍लड-कैंसरसँ पीड़ि‍त अछि‍। भजेन्‍द्र मुखि‍याक पुत्र दीपक अवधेशक बाल संगी छथि‍। ओ पहि‍नेसँ जनैत छलाह जे अवधेशक मृत्‍युक दि‍वस नजदीक छन्‍हि‍। तथाि‍प ओ खुलि‍ कऽ नै‍ बजला कि‍एक तँ घूरन बाबू स्‍वयं बूढ़ लोक छथि‍। एकटा पि‍ता अपन कान्‍हपर पुत्रक लाशक कल्‍पना मात्रसँ सि‍हरि‍ सकैत छथि‍, वास्‍तवि‍कता...। वि‍वि‍ध घटनाक्रममे अवधेशक मृत्‍युक भऽ गेलनि‍। समाज हुनक वि‍धवा शोभापर चरि‍त्र दोष सेहो लगौलक। समाज की, जइ‍ अबलापर ओकर सासुक वि‍श्‍वास नै‍ हुअए ओकरापर आन के वि‍श्‍वास करत? नाटकक अंतमे सबहक भ्रम टुटैत अछि‍, जखन शोभा दीपककेँ भैया कहि‍ कऽ अश्रुलाप करैत छथि‍। अंतमे वि‍धवा शोभाक एकटा सच्‍चरि‍त्र युवक वीजेन्‍द्रसँ पुर्नवि‍वाहक कल्‍पना कएल गेल। ओना तँ ऐ‍ नाटकमे जात-पाति‍क कोनो चर्च नै‍ मुदा प्रसंगसँ स्‍पष्‍ट होइत अछि‍ जे सवर्ण परि‍वारक पृष्‍ठभूमि‍मे नाटक केन्‍द्रि‍त अछि‍। नाटककारक ई कल्‍पना नीक लागल जे सवर्ण घरक वि‍धवा युवतीक पुनर्विवाह भऽ सकैत अछि‍। नाटकक संवादमे ठाम-ठाम अलंकार आ लोकोक्‍ति‍क लेपन नीक लागल। “सम्‍भावनाक आधारपर मनुष्‍य कल्‍पना करैत अछि‍। मुदा प्रकृति‍क शाश्वत नि‍अमकेँ कि‍ओ नै‍ बदलि‍ सकैत अछि”, ऐ‍ संवादक माध्‍यमसँ अवधेश अपन मृत्‍युक संकेतकेँ बूझि‍ रहल छथि‍। हुनक दोसर संवादमे- “हम मृत्‍युसँ भयभीत नै‍ छी। भय अछि‍ ओइ नि‍स्‍सहाय अबला नारीक असीम दु:ख, पीड़ा आ वेदनासँ। भय अछि‍ अनजानमे हमरासँ भेल गलतीसँ।” श्रंृगारक प्रबल लालसा रहि‍तो परि‍स्‍थि‍ति‍ मनुक्‍खकेँ वैरागी बना दैछ। जनतंत्रक कुटि‍ल व्‍यवस्‍थापर सेहो ऐ‍ नाटकमे कटाक्ष कएल गेल। भजेन्‍द्रजी सन कुटि‍ल गामक मुखि‍या छथि‍ तँ वि‍पक्ष हुनकोसँ बेसी कुटि‍ल। तँए ने फुराइतो छन्‍हि‍ हुनका “ओ बनि‍याँ बुड़ि‍बक होइत अछि‍ जे पलड़ापर बटखड़ा रखलासँ पहि‍ने समान चढ़ा दैत अछि‍।'' धधाइत नवकी कनियाँॅक लहास : मात्र कि‍छु गहनाक खाति‍र शि‍खाक आत्‍महत्‍याक प्रयास अजीब कहल जा सकैछ। हठात् परि‍वर्त्तन : देशभक्‍ति‍ मूलक नाटक थि‍क। नि‍ष्‍कर्षत: ई कहल जा सकैत छथि‍ जे आनंद जीक नाटक शैलीमे गोवि‍न्‍द झाक हास्‍य समागम, ईशनाथ झाक अलंकार, जगदीश प्रसाद मंडल जीक साम्‍यवाद, अक्कूजीक आधुनि‍कता, लल्‍लन ठाकुर जीक मंचन शैली आ शेखर जीक जनभाषा कलकल अछि‍। गजेन्द्र ठाकुरक नाटक संकर्षण मात्र १६ पृष्‍ठक नाटक, सुनबामे कनेक अनसोहाँत जकाँ लगैत अछि‍ मुदा जौं तन्‍मय भऽ कऽ पढ़ल जाए तँ स्‍पष्‍ट भऽ जाइत जे हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यमे मात्र कि‍छु कथाक कथाकार श्री चन्‍द्रधर शर्मा गुलेरी जीकेँ कोना आ कि‍ए आत्‍मसात् कऽ लेल गेल? संकर्षण सन अभि‍नेता जइ‍ नाटकमे हुअए ओइ‍मे ि‍वशेष भावक उपस्‍थि‍ति‍ स्‍वाभावि‍क अछि‍। अभि‍नेताक कोनो गुण नै‍ मुदा गजेन्‍द्र जी एकरा प्रधान नायक बना देलनि‍। समाजक कुहरैत अवस्‍थाक यएह सत्‍य रूप थि‍क, एक ि‍दश महीसक चरवाह आ दोसर दि‍शि‍ कलक्‍टरक चाटुकार। मि‍थि‍लाक समाजि‍क बिम्बकेँ स्‍पर्श करैत छोट नाटक संकर्षणमे नुक्कड़ नाटकक रूप अछि‍। “हौ गोनर! पानि‍ कोना लागए देबैक एकरा। पएरक चमड़ा सड़त तँ फेर नवका आबि‍ जाएत। मुदा ई सड़ि‍ जाएत तखन कतएसँ आएत।‍” कहबाक तात्‍पर्य जे जइ‍ व्‍यक्‍ति‍केँ शरीरसँ बेसी कि‍छु कैंचाक जुत्ता वि‍शेष महत्‍वपूर्ण लगैत हुअए ओइ‍ व्‍यक्‍ति‍मे जीवनक तादात्‍म्‍यक कोन प्रयोजन? धर्मनीति‍सँ अर्थनीति‍ बेसी महत्‍वपूर्ण अछि‍। कालक बदलैत स्‍वरूपक ि‍चन्‍तन करबाक योग्‍य संभवत: ऐ‍ नाटकक यएह उद्देश्‍य थि‍क, पर्दा उठत आ आधा धंटामे नाटक समाप्‍त। जीवनक नाटकमंडलीकेँ केन्‍द्रि‍त करए बला संकर्षण चि‍न्‍तन करबाक योग्‍य लागल। सभटा नाटकमे कोनो ने कोनो रूपेँ हास्‍य आ श्रंृगारक सम्‍मि‍लन होइत अछि‍ मुदा ऐ‍ ठाँ अभाव कि‍एक तँ समाजक मनोवृत्ति‍केँ छुबैत ऐ नाटककेँ पढ़ि‍ कोनो कवि‍क एकटा कवि‍ताक एक पाँॅति‍ मोन पड़ि‍ गेल- “ठोप-ठोप चारक चुआठकेँ आंॅगुरसँ उपछैत रहल छी‍” गजेन्‍द्र जीक प्रयास छोट परंच अनुकरणीय लागल। विभारानीक नाटक "बलचन्‍दा" श्रीमति वि‍भा रानी मैथि‍ली साहि‍त्‍यक चर्चित लेखि‍का छथि‍। श्रुति‍ प्रकाशनसँ प्रकाशि‍त हुनक नाटक द्वय भाग रौ आ बलचन्‍दा पढ़लौं। भाग रौ बड़ नीक लागल, परंच बलचन्‍दा पढ़ि‍ते हृदएमे नव वेदना पसरि‍ गेल आ समीक्षा लि‍खबाक दु:साहस कऽ देलौं। वास्‍तवमे बलचन्‍दा नाटक नै छोट पोथीमे मात्र २० पृष्‍ठक एकांकी थि‍क। सभसँ पैघ गप्‍प जे वि‍भा जी वर्तमान सामाजि‍क जीवनक सभसँ पैघ समस्‍याकेँ अपन लेखनीक वि‍षय बनौलन्‍हि‍। कन्‍या भ्रुण हत्‍या वर्तमान समाजमे वि‍कट रूप लऽ रहल अछि‍। प्राय: नाटकमे पुरूष प्रधान पात्रकेँ नायक कहल जाइत अछि‍, परंच ऐठाँ रोहि‍तक भूमि‍का खलनायकक अछि‍। वि‍जातीय समाजक एक शि‍क्षि‍तसँ क्षणक आवेगमे प्रेम कएलनि‍। वि‍वाह सेहो भऽ गेल। मुदा ओइ‍ स्‍त्रीकेँ की भेटल? अभि‍यन्‍ताक शि‍क्षा ग्रहण कएलाक पश्‍चात् गृहि‍णी बनि‍ कऽ रहि‍ गेली। पुरूष प्रधान समाज तैयो पाछॉं नै छोड़लक। प्रथम संतान बालक होएबाक चाही। आश्‍चर्यक गप्‍प ई जे ऐ प्रकारक आदेश सासु द्वारा देल गेल। एक नारी द्वारा दोसर नारीसँ आबएबला नारीक नाश करबाक कुटि‍ल आज्ञा ऐ एकांकीक मूल वि‍षए-वस्‍तु अछि‍। खलनायक चुप्‍प छथि‍, कि‍एक तँ ओ मातृभक्‍त। तखन दोसर माएकेँ संतति‍ हंता कि‍ए बनाबए चाहैत छथि‍। जीवन भरि‍ संग देबाक शपथक की भेल? जखन नि‍र्वाह करबाक सामर्थ्‍य नै‍ छल तँ आन जाति‍क कन्‍याकेँ संगि‍नी कि‍ए बनौलन्‍हि‍? रोहि‍तक प्रेम-सि‍नेह नै‍ वरन् वासना मात्र छल। स्‍त्रीकेँ भोग्‍या बना कऽ राखब ओइ‍ परिवारक मूल संकल्‍प। ओइ‍ लोकनि‍केँ सोचबाक चाही जे आब ओ दि‍न बीति‍ गेल, नारी लक्ष्‍मी तँ चंडी सेहो छथि‍। रोहि‍तक स्‍त्री गर्भपातक प्रबल वि‍रोध कएलनि‍। प्रति‍ज्ञा कऽ लेली जे अबैबला तनयाक प्रति‍पाल स्‍वयं करब। ऐ एकांकीक भाषा सरल आ सुन्‍दर अछि‍। वि‍षए-वस्‍तुक सम्‍पादन सुन्‍दर आ आकर्षक। मैथि‍ल संस्‍कृति‍क व्‍यापक प्रदर्शन। जय-जय भैरवि‍सँ प्रारंभ आ समदाओनसँ इति‍ श्री। नारी व्‍यथाक मर्मस्‍पर्शी चि‍त्रणक संग जाति‍ व्‍यवस्‍थापर मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल ई नाटक नै‍ एकटा आन्‍दोलन कहल जा सकैत अछि‍। संस्‍कृति‍क रक्षाक लेल आ सामाजि‍क संतुलन हेतु साहि‍त्‍यि‍क आन्‍दोलन, वि‍भा जीकेँ नमन..। पोथि‍क नाम- भाग रौ आ बलचन्‍दा लेखि‍का- वि‍भा रानी रविभूषण पाठक विभा रानीक नाटक भाग रौ:सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ साहित्यक प्रतिमान बदलैत रहैत अछि मुदा किछु तत्वक निरंतरता बनल रहैत अछि। नाटक साहित्यमे दू तत्वक महत्व कमोबेश सभ युगमे रहल अछि। प्रासंगिकता आ रंगमंचीयता एहने दू टा तत्व अछि। पहिलक सम्बन्ध मोटामोटी विषयवस्तु आ दोसरक सम्बन्ध शिल्पसँ अछि। विभा रानी लिखित “भाग रौ”क विश्लेषण ऐ दृष्टिसँ कएनाइ उचित अछि। विभा रानी द्वारा ऐ नाटक मे भिखमंगा बच्चाक जीवन आ समाजक क्रूर दृष्टिक चर्चा कएल गेल अछि। लेखिका द्वारा चयनित विषय वस्तु मैथिलीए मे नइ बल्कि आनो-आन भाषामे विरल अछि। भिखमंगा बच्चा सभ आपसी वार्तामे समाज आ जिनगीक कतिपय क्रूर पक्षसँ परिचय करबैत अछि। समाज, सरकारक साथे-साथ भगवानोसँ उपेक्षित ई बच्चा भारतीय समाज आ राष्ट्रक महानतापर व्यंग्य करैत अछि। भिखमंगा बच्चा सभ अपन जिनगीक क्षतिपूर्ति गोविन्दा, रितिक रोशन, शाहरूख, अभिषेक आदिक चर्चासँ करैत अछि आ अपन कथात्मक सन्दर्भ मे ई जेहन करूण साबित होइत अछि, रंगमंचीय दृष्टिसँ ओहने कलात्मक। यद्यपि विद्वान लोकनिकें हीरो हीरोइनक ई अतिचर्चा अनसोहाँत लागि सकैत छन्हि मुदा अपन संदर्भक मध्य ई रूचिगर आ प्रासंगिक बुझाइत अछि। दानापुर माने दाना सँ पूरम पूरा। भाग रौ नाटकक कथा प्रसंग देशक एहने दाना दाना चुगएबला सभसँ वंचित आ कर्मठ वर्गक कथा छै। ऐ वर्गक सभसँ अभिप्सित भूख, चाह आ गंध थिकै रोटीक गंध। पेटमे मरल सनकिरबोक थाह नइ मिललइ, ई देशक नीति-निर्माता आ प्रभु वर्गपर प्रचण्ड प्रहार अछि। भूखल बच्चा ऐ समाजमे अपन स्तर आ महत्वसँ परिचित अछि, तइ दुआरे बच्चा १ कहैत अछि- प्रधानमंत्री छें जे मरि जेबें तँ देसक काजधंधा थम्हि जेतै। नाटकक भाषा विषय-वस्तुक अनुरूप करूण आ मारक अछि। तद्भव आ देशज शब्दक बाहुल्य नाटककेँ रूचिगर आ रंगमंचीय बनेने रहैत अछि। -सिटी सँ साहेब भऽ गेलै तँ हमरा अओरक भूख-पियासक रंग बदलि गेलै की?, उपरोक्त वाक्यक प्रश्नवाचकता आ कथनगत असंभाव्यता एकटा तनावकेँ जन्म दैत अछि। भिखमंगा सभ आपसी गपशपमे दूटा महिला राजनीतिज्ञक चर्चा सेहो करैत अछि आ विडंबना ई जे दुनू महिला परिवारवाद आ भारतीय राजनीतिक अनुर्वरताक पोषक छथि। बच्चा सभ कहैत अछि जे पढ़ि कऽ की बनब? ई या ई? दुर्भाग्य देखू जे दुनू महिला अपन विद्वता आ नैतिक शक्तिसँ जनमनक नेतृत्व नइ कएलक। एहन समाज आ राजनीति एकटा खास तरहक भाषाक इस्तेमाल करैत अछि। ई भाषा प्रथम दृष्टया अश्लील आ मूलतः असंवेदनशील होइत अछि। -ई डंडा एमहरसँ घुसतौ तँ मुँह दने निकलतौ। वर्चस्व, आक्रमण आ यौनविद्वेषसँ भरल ई भाषा एकटा खास सामंती आ मर्दवादी समाजक मानसिकताकेँ पोषित करैत अछि। ऐ समाजक बुद्धिजीवी एहन भाषाक उपयोग नै करैत अछि मुदा अपन अनुर्वरतामे इहो तेहने अछि। दू टा पत्रकार- युवक आ युवती- अपन शिक्षा आ संस्कारमे किछु अलग अछि मुदा इहो वर्ग सृजनशीलता आ नवोन्मेषसँ पूर्णतः रहित अछि। युवतीमे किछु नया करबाक संभावना अछि मुदा अंधकारक विराट आकाशमे ई संभव नै भेल। ऐे वर्गक भाषामे एकटा खास किस्मक नफासत अछि। तत्सम बहुलता आ अंग्रेजी शब्द आ वाक्यक बाहुल्यसँ ई वर्ग अपन विशिष्ट अस्तित्व आ रूचिपर बल दैत अछि। -नॉट ए बैड आइडिया, ही इज डफर, बी पेशेंट, सनक चालू वाक्य रंगमंचीय अछि। रंगमंचीय उपकरणक रूपमे किछु नव प्रयोग सेहो अछि। नाटकमे समवेत स्वरमे गान या बलाघातसँ किछु खास कहबाक प्रयास कएल गेल अछि। -हम सब किछु नै कऽ सकैत छी।, आ -हमसब.......मात्र पुतली भरि ; ई सभ अपन संदर्भमे बहुत अर्थवान अछि मुदा ऐठाम रंगमंचीय कौशल सेहो अपेक्षित अछि, अन्यथा अंतिम प्रभाव उड़ियएबाक संभावना अछि। भाग रौ नाटकक असफलता सेहो स्पष्ट अछि। दोसर अंकक पहिल दृश्यमे मंगतू एक पृष्ठक स्वगत बाजैत अछि। ऐ दृश्यक उद्देश्य स्पष्ट रहितो रंगमंचीयता संदिग्ध अछि। दोसर अंकमे लेखिकाक नियंत्रण नाटकपर कम अछि। भिखमंगाबला संदर्भ जतेक जीवंत अछि, ओतेक पत्रकार आ प्रेसबला नै। मध्यांतरक बाद ऐ गुरूत्वाकर्षणक कमी एकदम स्पष्ट अछि। नाटकक अंत एकटा कवितासँ होइत अछि। संयोगवश ऐ कविताक समानता आ समरूपता हिन्दी कवि शमशेर बहादुर सिंहक कविता -काल, तुझसे होड़ है मेरी, सँ बहुत ज्यादा अछि। शमशेर- काल, तुझसे होड़ है मेरी: अपराजित तू - विभा -ओ काल... अहीं सँ हँ, अहीं सँ अछि टक्कर हमर शमशेर-भाव, भावोपरि सुख, आनंदोपरि सत्य, सत्यासत्योपरि विभा-जे अछि सत्यो सँ बढ़ि कऽ सत्य शिवो सँ बढ़ि कऽ शिव अमरोसँ अमर सुंदरतोसँ सुंदर..... ई कविता नाटक “भाग रौ” क महत्वपूर्ण भाग नै अछि। तें एकर शमशेरक कवितासँ समानताक कोनो खास महत्व नै अछि। मैथिली नाटकक इतिहासमे विभारानी अपन ऐ नाटकक संग विशेष महत्वक उत्तराधिकारिणी छथि। विषयवस्तुमे नवोन्मेषक संगे-संग ट्रीटमेंटक अभिनवता “भाग रौ” नाटककेँ उल्लेखनीय बनबैत अछि। डॉ.शंभु कुमार सिंह जन्म : १८ अप्रील १९६५ सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, १९९५] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष २००८, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-६ मे कार्यरत।

मैथिली सामाजिक नाटकक मूल केन्द्र बिन्दु : नारी समस्या

स्वातंत्र्योत्तर युगक अधिकांश नाटक सामाजिक विवर्तनपर लिखल गेल अछि। ऐ नाटक सभक केन्द्र बिन्दु नारी समस्या रहल अछि। नारी वर्गमे अशिक्षा, सामाजिक बिडम्बनाक रुपमे तिलक-प्रथा, बाल विवाह एवं बेमेल विवाहक परिणामस्वरुप उपस्थित समस्याक समाधानक लेल नाटककार लोकनि प्रेरित भेलाह तथा ऐ विषय बस्तुकेँ अपन नाटकक कथ्य बना सुधारवादी भावनाक प्रचार-प्रसार कएलनि जइसँ समाज सुधारक जागरण जोर पकड़ि सकए। स्वातंत्र्योत्तर मैथिली नाटकमे समाजक अति यथार्थ प्रतिबिम्ब देखबाक हेतु भेटैछ। युग विशेषताक अनुसारेँ ऐ कालावधिक नाटकमे नारीक विभिन्न रूपक प्रतिबिम्ब हएब अत्यन्त स्वाभाविक अछि। प्रारंभिक नाटकमे नारी संबंधी सहानुभूति ओ करूणाक स्पष्ट चित्र उपलब्ध होइत अछि। किछु नाटकमे तत्कालीन नारी जीवनक, परिवारक मर्यादामे ओकर यथार्थ चित्र अंकित कएल गेल अछि। मैथिलीक कतिपय नाटकमे नारीक वेदनामय रुप परिवारक अन्तर्गत उभरि कऽ सोझाँ आएल अछि। ऐ कालक नाटककार सुधारक आँखिये समाज ओ परिवारक विभिन्न दोषकेँ देखलनि, परिवारमे नारीक दुखमय जीवन हुनक सहानुभूतिक पात्र बनलीह। नारीक सभसँ पैघ मर्यादा ओकर पति तथा वैवाहिक जीवन थिक। कन्याक जीवन मध्यवर्गीय परिवारक हेतु चिन्ताक कारण बनि जाइत अछि। दहेजक समस्या नारीकेँ योग्य वर नै भेटबामे कठिनता, कन्याकेँ ऋतुमति होएबासँ पूर्वहि विवाहक आवश्यकता जीवनक प्रत्येक क्षणमे मर्यादा रक्षाक चिन्ता, पतिक असामयिक मृत्युक कारणेँ विधवा बनि जएबाक संभावना ओ पराश्रित भऽ कए पतित होएबाक भय, असुरक्षित अवस्थामे समाजक कुदृष्टिक शिकार हेबाक आशंका, वेश्या जीवन व्यतीत करबाक बाध्यता तथा कानूनी दृष्टिएँ पुरूषक एकाधिकार इत्यादि अनेक कारण अछि जे नारी जीवनक वेदनामय, यंत्रणामय ओ पीड़ामय कथा कहैत अछि। अतः स्वातंत्र्योत्तर कालक अधिकांश नाटककार तत्कालीन सामाजिक स्थितिमे नारीक यथार्थ रूपक अंकन कएलनि जे उपर्युक्त समस्यादिक संदर्भमे नारी-जीवनक चित्रण करैत अछि।

भारतीय समाजमे नारीक स्थान समाजमे नारी आ पुरूष दुनूक समान महत्व अछि। जइ प्रकारेँ एक पहियासँ गाड़ी नै चलि सकैत अछि ओकरा चलक लेल दुनू पहियाक ठीक होएब आवश्यक अछि, ओहिना समाज रूपी गाड़ीकेँ चलएबाक लेल पुरुष आ नारीक स्थिति समान भेनाइ आवश्यक अछि। दुनूमे सँ जँ एकहु निर्बल अछि तँ समाजक उन्नति सुचारु रूपसँ नै भऽ सकैत अछि। एक समय छल, जखन भारतमे नारीक स्थान बड़ आदरणीय छल। समाजक प्रत्येक काजमे ओकरा समान अधिकार छलै। पुरूषक समानहि सभा, उत्सव आ अन्य सामाजिक काजमे भाग लेबाक ओकरा पूर्ण स्वतंत्रता छलै। धार्मिक काज तँ हुनक सहयोगक बिना अपूर्णे मानल जाइत छल। ओइ समय नारी वास्तविक अर्थमे पुरुषक अर्द्धांगिनी छलीह। कोनहु काज हुनक सम्मतिक बिना नै होइत छल। पुरूष सेहो ओकरा निरीह मानि अत्याचार नै करैत छलाह। नारी सेहो अपनाकेँ गौरवान्वित महसूस करैत छलीह तथा अपन चरित्र वा आदर्शकेँ उत्तम रखबाक प्रयास करैत छलीह। देशमे सीता आ सावित्री सन देवी घर-घरमे पाओल जाइत छलीह। समाजमे स्त्री शिक्षाक सेहो खूब प्रचार छलै। मैत्रेयी, गार्गी, अपाला, विद्यावती, भारती सन विदुषीसँ गौरवान्वित छल। ओइ युगमे नारी वास्तविक अर्थमे देवी छलीह। समाजक लेल नारी गौरवक वस्तु छलीह। ओइ समयक साहित्यमे नारीकेँ स्पष्ट रूपसँ पूजनीय मानल जाइत छल। ऐ लेल मनीषी द्वारा कहल गेल छल “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंतु तस्य देवताः” अर्थात जतए नारीक पूजा आ आदर होइत अछि ओतए देवता विचरण करैत छथि। ऐ प्रकारेँ संस्कृत साहित्यमे नारीकेँ आदर आ सम्मानक दृष्टिसँ देखबाक वर्णन अछि। समय परिवर्तनशील अछि। देशमे अनेक परिवर्तन भेल, धार्मिक, सामाजिक, आ राजनैतिक क्रांति भेल। ऐ सभक प्रभाव नारी समाज पर सेहो पड़ल। मध्ययुगमे आबि कए नारीक पूर्ववत सम्मान नै रहल। पूजनीय आ आदरणीय हेबाक स्थान पर ओ केवल उपभोगक वस्तु बनि कऽ रहि गेलीह। एमहर देशक राजनीतिक स्थितिमे सेहो महान परिवर्तन भऽ रहल छल। विदेशी आक्रमण प्रबल भेल जा रहल छल। देश पर विदेशी सभ्यता आ संस्कृतिक प्रभाव पड़ल जा रहल छल। परिणामतः आब नारी पर अनेक प्रकारक बन्धन पड़ऽ लागल जकर कोनो कल्पना धरि नै छल। हुनका पर अनेक प्रकारक सामाजिक बन्धन लागऽ लागल। हुनक स्वतंत्रता आब केवल घरक चौखटि धरि सीमित रहि गेल। आब ओ समाज आ साहित्यमे केवल मनोरंजनक वस्तु रहि गेलीह। जखन मुसलमानी शासन ऐ देशमे दृढ़ भऽ गेल, तखन नारीक पतन सीमा आर बढ़ि गेल। मुसलमान जखन निश्चिंत भऽ कऽ शासन करए लगलाह, तखन दरबारमे जतए महफिल जमए लागल, सुराक दौर चलऽ लागल ततए पायलक झनकार सेहो होमऽ लागल। नारी आब कविक लेल श्रृंगारक वस्तु बनि गेलीह। कवि आब ओकर जननि रूप बिसरि कए ओकर नख-शिखक वर्णनमे डूबि गेलाह, हुनक अश्लील चित्रक अतिरिक्त ऐ कालक साहित्यमे आर कोनहु स्थान नै रहि गेल। आधुनिक युग जागृतिक युग थिक। देशमे जतए सामाजिक आ राजनीतिक क्रांति आएल ओतए नारी समाजकेँ सेहो उन्नतिक अवसर भेटलै। वास्तवमे ई युग समानताक युग थिक। सत्य तँ ई थिक जे जाधरि नारीक उत्थान नै हएत ताधरि देश आ समाजक उन्नति असंभव थिक। एक नारीक महानता समस्त परिवारकेँ महान बना दैत अछि। हमरा देशक सभ महान विभूतिक चरित्र निर्माणमे नारीक महत्वपूर्ण स्थान रहल अछि। आब ओ समए आबि गेल अछि जे नारी समाजक संग लागल सभ कुप्रथाक अंत कएल जाए। विधवा-विवाह हुअए वा पिताक संपत्तिमे कन्याक अधिकार हुअए, शिक्षाक क्षेत्रक बाधा हुअए वा पर्दा-प्रथाक सभ क्षेत्रमे जतेको बन्धन अवशेष अछि आइ ओइ सभ कुप्रथाकेँ समाप्त करऽ पड़त। जँ समाज नारीक महत्ताकेँ स्वीकार कऽ ओकर सभ अधिकार ओकरा पुनः घुरा देत तखनहि देश पुनः ओइ गौरवकेँ प्राप्त कऽ सकत जकरा लेल ओकर जगत्ख्याति प्रसिद्ध रहलैक अछि। ऐ दिशामे जतए धरि मैथिली नाट्यकारक प्रश्न अछि, बुझाइत अछि ओ समाजक एकटा सजग प्रहरी जकाँ ऐ भूमिकाक निर्वाह कऽ रहल छथि। नारीक कारुणिक स्वरुप नारी, पत्नी वा मायक रुपमे भारतीय परिवारक मूल केन्द्रबिन्दु होइत अछि। ऐ हेतु परिवारक उत्थान ओ पतनक इतिहासमे नारीक स्थितिक समीक्षा हएब अत्यंत प्रयोजनीय अछि। वैदिक युगसँ लऽ कऽ आइ धरि परिवारमे नारीक स्थितिमे परिणामात्मक परिवर्तन भेल अछि। जतए धरि वैदिक युगक प्रश्न अछि, भारतमे अन्य सभ्यताक अपेक्षा नारीक स्थिति कतहुँ नीक छल। अन्य प्राचीन समाजमे नारीक संग निर्दयताक व्यवहार कएल जाइत छल। एतए धरि जे यूनान जे अपन संस्कृतिकेँ अति प्राचीन होएबाक दावा करैत अछि, ओतहु नारीक स्थिति नीक नै छल। इतिहासकार डेविस लिखैत छथि “एथेंस आ स्पार्टा मे नारीक सुखद स्थितिक कोनहुँ प्रश्ने नै उठैत छल। स्पार्टामे नारी पशुसँ किछुए उन्नत छल।”१ भारतीय मौलिक सामाजिक व्यवस्था, विशेष कऽ मिथिलाक संदर्भमे नारीकेँ धन, ज्ञान, ओ शक्तिक प्रतीक मानल गेल अछि, जकर अभिव्यक्तिक रुपमे लक्ष्मी, सरस्वती ओ दुर्गाक पूजा एखनो घर-घरमे कएल जाइत अछि। नारीकेँ पुरुषक अर्द्धांगिनीक रुपमे स्थान देल गेल अछि, जकरा अभावमे पुरुष कोनो कर्तव्यक पूर्ति नै कऽ सकैत अछि। मुदा आइ हमरा सभक दुर्भाग्य थिक जे वैदिक आ उत्तर वैदिक कालक पश्चात् हमरा समाजक मौलिक व्यवस्था रूढ़िक रुपमे परिवर्तित होमऽ लागल तत्पश्चात् नारीमे लाज, ममता आ स्नेहक गुणकेँ ओकर कमजोरी मानि पुरुष वर्ग द्वारा ओकर शोषण करब आरंभ भेल। पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्थामे नारीकेँ पुरुषक वासना-पूर्तिक एक साधन मात्र बुझल जाइत अछि। ई बात ओइ सभ जाति आ वर्गक लेल सत्य थिक जकर प्रणाली सामन्तवादी विचारसँ प्रभावित अछि। हमर सामाजिक जीवन मुख्य रुपसँ चारि क्रियासँ सम्बन्धित अछि- जनन, परिवारक प्रबंध, आ नेनाक सामाजीकरण। व्यावहारिक रुपमे ऐ सभटा क्रियापर पुरुषक एकाधिकार अछि। अधिकांश लोक द्वारा नारीक नोकरी करब, शिक्षा प्राप्त करब अथवा परिवारक प्रबन्धमे हस्तक्षेप करब नै केवल संदेहक दृष्टिसँ देखल जाइछ अपितु अपन अहमक विरुद्ध सेहो मानल जाइछ। एकैसम शताब्दीक तथाकथित समतावादी समाजोमे नारी पर होमऽबला अत्याचारमे कोनो बेसी सुधार नै भेल अछि, जखन की ऐ अत्याचारमे परिवर्तन अवश्यंभावी भऽ गेल अछि। नारी एवं पुरुष समाजक समविभाग अछि। प्रत्येक क्षेत्रमे दूनूक समान अधिकार अछि। किन्तु समाजक संरचना एहन अछि जे पुरुष द्वारा नारीकेँ उत्पीड़ित करबाक प्रवृत्ति मैथिल समाजमे दृष्टिगत भऽ रहल अछि। जँ हम आन-आन भारतीय समाजक तुलना मैथिल समाजसँ करी तँ बुझना जाइछ जे मैथिल समाजमे नारीक उत्पीड़न समस्या कने बेसी गंभीर अछि। ऐ कारण सँ पारिवारिक स्वरुपमे सेहो स्पष्ट परिवर्तन दृष्टिगोचर भऽ रहल अछि आ समाजमे नारीक स्थान नगण्य भेल जा रहल अछि। यथासमय खास कऽ मैथिल समाजमे नारीक स्थितिमे नारीक समताकारी मूल्यमे परिस्थिति कोन तरहेँ प्रभावित कएलक आ कऽ रहल अछि ऐ संबंधमे सामाजिक नाटकक माध्यमे विभिन्न मैथिली नाट्यकार नारीक दशाक वास्तविक चित्रण अपन-अपन नाट्यकृतिमे करबाक प्रयास कएने छथि जकर चर्चा निम्न रुपेँ कएल जा सकैत अछि।

शारीरिक प्रताड़ना शारीरिक प्रताड़नाक रुपमे हिंसाक बढ़ैत समस्या केवल भारते धरि सीमित नै अछि अपितु संसारक अधिकांश देशमे ई समस्या गंभीर भेल जा रहल अछि। “कनाडा मे प्रति चारि नारी पर एकक संग मारि-पीटक घटना होइत अछि। बैंकाकमे आधा नारी अपन पति द्वारा पीटल जाइत छथि। अमेरिका सन विकसित देश मे सेहो ई समस्या गंभीर अछि।”२ एकटा नवविवाहिता जइ संरक्षण प्रेम आ सहयोगक भावना लऽ कऽ नव घरमे अबैत अछि ओतए पति, सास वा परिवारक अन्य सदस्यक द्वारा पीटल गेलापर ओकरा कतेक असह्य वेदना होइत हेतै तकर अनुमान हम आसानीसँ नै लगा सकैत छी। नारीकेँ शारीरिक रुपसँ प्रताड़ित करबाक पाछू पारिवारिक कलह, पारिवारिक विघटन, पारस्परिक अविश्वास आ गरीबी अछि। मैथिली नाटकमे कतिपय नारीक वेदनाक रुप पारिवारक अन्तर्गत उभरि कऽ आएल अछि। मैथिली नाटककार सुधारक आँखिये समाज ओ परिवारक विभिन्न दोषकेँ देखलनि अछि। परिवारमे नारीक दुःखमय जीवन हुनक सहानुभूतिक पात्र बनलीह। गोविन्द झाक ‘बसात’ नाटक मे सुगिया अपन पतिकेँ परमेश्वर मानि सेवा करैछ। ओ सामाजिक जीवनकेँ व्यवस्थित रखबाक हेतु अपन सम्पूर्ण परिवारक भार उठौने छथि तथापि ओ अपन पति द्वारा प्रताड़ित होइत छथि- सुगियाः “मड़ुआ उलबैय छलियै। एलैय हल्ला करैत जलखै ला, जलखै ला, हम कहलियै, कोनदन कमाइ कऽ के एलाह जे जलखै दिऔन। की बस, ठामहि चेरा उठा केँ पिटपिटा देलक।”३ विडम्बना ई थिक जे ई समस्या केवल ग्रामीण, गरीब आ अशिक्षित नारिये धरि सीमित नै अछि अपितु शिक्षित मध्यवर्गीय ओ नगरीय परिवारोमे नारीक कमोबेश यएह स्थिति अछि।

यौन उत्पीड़न मैथिली नाटकक अध्ययन ओ अनुशीलनक उपरांत जे एक समस्या स्पष्ट दृष्टिगोचर होइत अछि ओ थिक नारी पर होमऽबला अत्याचार ओ शोषण। मर्यादा, चरित्र, कर्त्तव्यपरायण, त्याग, सहनशीलता, शील ओ अन्य गुण सँ महिमामंडित कऽ जइ सुन्दर ढंगसँ पुरुष समाज ओकरा संग छल कएने अछि ओइमे स्त्रीकेँ सेहो पता नै चलि सकल जे ओ शोषित भऽ रहल अछि। उत्सर्गक नामपर पुरुष ओकरासँ सभ किछु मांगैत रहल आ ओकरा लूटैत रहल। नारी कत्तौ महानतासँ विभूषित होएबाक गर्वक मोहसँ ओकरापर अपनाकेँ निछावर करैत रहल तँ कतौ परिस्थितिवश। मुदा ई स्त्रीयजनित गुण जतए ओकरा लेल एक दिस हथियार सिद्ध भेल ओतै दोसर दिस ओकर यएह गुण ओकर कमजोरी, विवशता, लाचारी ओ पतनक कारण सेहो बनल।

नारी शोषणक सभसँ घृणित रुप थिक ओकर यौन शोषण। ई एक प्रकारक गहन मानसिक शोषण थिक जे शारीरिक याततोसँ बेसी पीड़ादायक अछि। डॉ. प्रबोध नारायण सिंह द्वारा लिखित एकांकी नाटक ‘हाथीक दाँत’ क नेता महिला आश्रमक संरक्षिका बिजली देवीक सहयोगसँ खूब टकाक संग्रह करैत छथि आ जखन ओइ टकामेसँ बिजली अपन कमीशन मांगैत छथि तँ नेताजी बनावटी प्रेमीक रुप धारण कऽ बिजलीक संग आलिंगनबद्ध भऽ जाइत छथि आ कहैत छथि, कतेक टका लेब, ई कपटी नेता चरित्र भ्रष्ट अछि। ई टकाक लोभ देखा बिजलीक संग अनैतिक संबंध तँ रखनहि छथि, बिजलीयेक सहयोगसँ अपन वासनाक भूखकेँ रोहिणी नामक एक युवतीसँ शान्त करैत छथि। परिणाम स्वरुप ओ असहाय लाचार युवती गर्भवती भऽ जाइत अछि। आब ओ बिजलीकेँ परामर्श दैत छथि जे- “धुर, औषध कहि के किछु पुड़िया खोआ दियौक ने ?४ वर्तमान समाजमे उच्चवर्गक लोक द्वारा नीच वर्गक स्त्रीक संग कोना यौन अत्याचार कएल जाइत अछि तकर स्पष्ट चित्र हमरा भेटैछ कांचीनाथ झा ‘किरण’ द्वारा लिखित ‘कर्ण’ नामक एकांकीमे। यद्यपि एकांकीक कथानक आ पात्र पौराणिक अछि मुदा एकांकीकार लाक्षणिक रुपमे सूर्यकेँ उच्च वर्ग आ कुन्तीकेँ अछोप वर्ग मानि समाजमे घटि रहल यौन उत्पीड़न दिस समाजक ध्यान आकृष्ट कएने छथि। ऐ एकांकीक माध्यमे समाजमे पैघ लोक कहओनिहारक गुप्त भ्रष्टताक भण्डाफोड़ कएल गेल अछि। देव अर्थात् उच्च वर्गक लोक जे नीच वर्गक संग विवाह तँ नै कऽ सकैत अछि मुदा गुप्त रुपसँ सम्भोग आ सम्पर्क कऽ सकैछ जकर कुत्सित परिणाम भोगऽ पड़ैत छैक नीच वर्गक लोककेँ। सूर्यः हम देवता छी। देवता मनुक्खक बेटीकेँ....... कुन्तीः (उत्तेजित स्वरमे) मनुक्खक संगे भोग-विलास कयने देह नहि छूतई छनि आ देस छुति जयतनि ? सूर्यः (विरक्त स्वरमे) मनुक्ख एखन तन-मन-धन लगा कऽ देवताक पूजा करैत अछि-- मरलाक बाद स्वर्ग जयबाक लेल। जीबैत स्वर्ग जयबाक कल्पनो नहि करैत अछि। मनुक्खक बेटीकेँ स्त्री बना कऽ स्वर्ग लऽ जाय लगबैक तँ ओ भाव रहतैक? कुन्तीः (अप्रतिभ स्वरमे) तखन मनुक्खक कन्याक संग सम्पर्के किएक करैत छी ?

सूर्यः (हँसि) आनन्दक लेल ? मनुक्खकेँ मनुक्ख बना कऽ राखैक लेल। कुन्तीः (गह्वरित स्वरेँ) आ जँ संतान भऽ जाइत होइत तँ ओ मनुक्खे भऽ कऽ रहैत होयत। सूर्यः हँ, मनुक्खक पेटक देवता कोना होयत ? ५

अरविन्द कुमार ‘अक्कू’ क नाटक ‘रक्त’ (१९९२) मे अवैध सन्तानोत्पतिक भयावह परिणाम सँ समाजकेँ एकटा चेतावनी देल गेल अछि। ऐ घृणित सामाजिक विभीषिका पर नाटककार केहेन प्रकाश देने छथि से द्रष्टव्य थिक- किसुनः “तोहर तँ गप्पे अनटोटल होइछ। हौ सड़कक कातमे गरीबक नै तँ धनिकक नेना फेकल रहतैक?”६ तृप्ति नारायण लालक नाटक ‘सप्पत’ मे समाजक एक दुःष्चरित्र व्यक्ति श्रीकान्त, हरिजन युवती नीलमकेँ अपन प्रेमजालमे फँसा ओकर सतीत्व भंग करैछ जइ कारणेँ ओ समाजमे मुँह देखएबाक योग्य नै रहि जाइत अछि। अन्ततः कोठा परक नारकीय जीवन जीबाक लेल बाध्य होमऽ पड़ैत छैक। ऐ तरहेँ कहल जा सकैछ जे आधुनिक समाजमे नारीकेँ कहक लेल भनहि देवी आ दुर्गाक दर्जा देल गेल अछि, मुदा पुरुषक वासना शिकार ओ कोना भऽ रहल छथि ऐ विषय वस्तुकेँ मैथिली नाटककार बड़ सजीव चित्रण कएने छथि।

बाल विवाह बाल-विवाहक तात्पर्य विवाहक ओइ प्रथासँ अछि जइमे रजोदर्शन सँ पूर्वहि कन्याक विवाह कएल जाइत अछि। अनेक धर्मशास्त्रक नामपर मध्यकालेसँ जइ विश्वासकेँ बढ़ावा देल गेल जे कन्याकेँ रजस्वला होमऽ सँ पूर्व जँ विवाह नै कएल गेल तँ ऐ सँ माता-पिताकेँ महापाप होइ छै। एहन विवाह कतेक हास्यास्पद अछि से ऐ बातसँ स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे हमरा कोनो मूल धर्म ग्रंथमे बाल-विवाहक कोनो निर्देश नै देल गेल अछि। तथापि ई व्यवस्था आइयो मिथिलामे व्याप्त अछि। बाल-विवाहक प्रचलन मैथिल समाजमे चाहे जइ परिस्थितिसँ भेल हुअए मुदा ऐ कुप्रथाक कारणेँ आइ समाजमे कतोक प्रकारक गंभीर दोष उत्पन्न भऽ गेल अछि। एक दिस जँ कन्याक अपरिपक्व आयुमे नेनाक पालन-पोषणक भार आबि जाइत अछि तँ दोसर दिस दुर्बल स्वास्थ्य हेबाक कारणेँ लाखक लाख मायक मृत्यु प्रसवक समय भऽ जाइ छै। ऐ समस्याक कारणेँ मैथिल समाजक कन्यामे शिक्षाक दर बहुत निम्न भऽ गेल छै, किएक तँ बाल-विवाहक कारणेँ ने तँ ओ शिक्षा प्राप्त कऽ सकैत अछि आ ने एकरा जरूरी बूझल जाइत अछि। ऐ प्रथाक कारणेँ विवाह एकटा संयोग मात्र बनि कऽ रहि गेल अछि। ऐमे उमिरक असमानता हेबाक कारणेँ एक दिस जँ यौन-लिप्सा अतृप्त रहि जाइत अछि तँ दोसर दिस बाल-वैधव्य आ तकर परिणामस्वरूप वेश्यावृत्ति आदि सन समस्यासँ समाज ग्रसित भऽ जाइत अछि। एहना स्थिति मे नारीक जीवन नारकीय भऽ जाइत अछि। मैथिली नाटकमे बाल-विवाहक समस्या लऽ कऽ कतोक नाटककार अपन नाट्य रचना कएने छथि, ऐमे एकटा बानगी प्रस्तुत अछि ‘त्रिवेणी’ क नायिका दुर्गाक, जनिक विवाह छओ वर्षक उमिरमे पैंतालीस वर्षक बूढ़सँ कऽ देल जाइत छैक । कन्याक पिता मधुकान्त पन्द्रह हजार टकाक लोभमे अपन फूल सन कन्याक विवाह एहन वरक संगे कऽ दैत छथि जे विवाहक चारिये मासक पश्चात् ओ विधवा भऽ जाइत अछि। नायिका दुर्गा जखने बाल्यावस्थाकेँ पार कऽ युवावस्थामे प्रवेश करैत छथि हुनक देओर नरेश हुनका अपन वासनाक शिकार बनाबऽ चाहैत छथि जे दुर्गाकेँ मान्य नै छनि। अन्ततः ओकरा शरीर पर पेट्रोल ढ़ारि कऽ आगिमे स्वाहा कऽ देल जाइ छै। कन्याक भावी दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण हुनक माय मधुकलाक शब्दमे एना देखल जा सकैछ- मधुकला— “(उग्र भावेँ) बाप रे बाप ! एहन अन्हेर गप्प कतहुँ सुनल अछि। एक दिस छओ वर्षक पत्नी आ दोसर दिस पैंतालीस वर्षक पति। बड़ अन्हेर होइत अछि। हमर बेटीकेँ ओ बाप सदृश बुझि पड़तैक, नहि कि पति सदृश। हम अपन बेटीक विवाह ओकरासँ नहि करब।’’७ मुदा आश्चर्यक विषय थिक एखनो समाजमे बाल विवाह भऽ रहल अछि जकर दुष्परिणाम समाज भोगि रहल अछि मुदा ओकर आँखि नै फुजैत छैक।

दहेज मैथिल समाजमे घरेलू हिंसाक सभसँ व्यापक रूप दहेजक कारणेँ नारीकेँ देल गेल यातना आ ओकर हत्याक रूपमे आएल अछि। आश्चर्यक गप्प थिक जे दहेज निरोधक अधिनियम बनि गेलाक पश्चातो विभिन्न समुदायमे कन्या पक्षसँ बेसीसँ बेसी दहेज प्राप्त करबाक प्रचलन समाजमे बढ़िये रहल अछि। अधिकांश माय-बाप वर-पक्षक इच्छानुकूल दहेज देबऽ मे असमर्थ रहैत छथि। विवाहक पश्चातो विभिन्न अवसर पर कन्याक माता-पितासँ ओकर सासु-ससुर द्वारा विभिन्न वस्तुक माँग करब एक स्वाभाविक प्रक्रिया बनि गेल अछि। जँ नवविवाहिता अपन माय-बापसँ ओ वस्तु नै आनि सकैत छथि तँ ओकरा सासुर पक्ष द्वारा कतोक प्रकारक मर्मस्पर्शी ताना सुनऽ पड़ैत छैक। बात-बातमे ओकरा अपमानित कएल जाइत अछि। भाँति-भाँतिक लांछन सेहो लगाओल जाइ छै। एतबे नै ई प्रक्रिया ताधरि चलैत रहै छै जाधरि ओ सासुरबलाक इच्छाक पूर्ति नै कऽ दैछ। दहेजक कारणेँ भारतीय नारीक केहन दुर्दशा होइ छै तकर चित्रण हमरा सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी क ‘लेटाइत आँचर’ क नायिका ममताक करूण चीत्कारमे भेटैत अछि- ममता : “अहाँ हमरा खत्तामे फेकि देलौं। ओकरा रेडियो, साइकिल नै देलियै, ओ दोसर मौगी बेसाहि आनलक। बाबू अहाँ देखलिए ऐ ओकरा ? हम एतहिसँ सभ दिन देखै छियै। ओ सब दिन हमरा लग अबैए, सब दिन हमरा छाती पर आबि कए बैसि जाइए, हमरा छाती पर बैसि कए जाँत पिसैत रहैये । अहाँ ओहि मौगीकेँ कहियो देखने छियै ?” ८ पर्याप्त दहेज नै देबाक कारणेँ ममता सन नारीक केहन विक्षिप्त अवस्था भऽ जाइ छै से स्वतः अनुमान कएल जा सकैछ। एतबे नै ऐ पैशाचिक व्यवस्थाक प्रति मोनमे ततेक ने डर समा जाइ छै जे ओ दोसरोकेँ ऐ परिणामक भविष्यभोक्ता रूपमे देखि सिहरि जाइए— ममता : “भैया, बाउक ससुर जँ बाउकेँ मेटरसाइकिल नै देतै तँ बाउ अपन कनियाकेँ छोड़ि देतै ? एत’ कहियो नै आब’ देतै ?......अहाँ नै बाजै छी बाउ, तोहीं कह’ छोड़ि देबहक ?”९

जइ परिवारमे ममता सदृश दहेजक मारलि कन्या छै ओहो अपन पुत्रक विवाहमे टकाक लेन-देन उचित बुझैत छथि। तिलक दहेजक कारणेँ मैथिल ललनाकेँ एहन दुष्परिणाम भोगऽ पड़ै छै जे “कनियाँ पुतराक” नायिका सत्यानाशी दहेज प्रथाक मारिसँ बताहि भऽ जाइत अछि, जइसँ सर्वगुण संपन्न भेलो उत्तर ओकरा पति द्वारा दाम्पत्य सुख नै भेटै छै। फलस्वरूप यौवनावस्थामे ओ बताहि भऽ कनियाँ-पुतरा खेलाइत रहैत छैक। द्रष्टव्य थिक ओकर ई वेदना आ अतृप्त लालसा- निर्मला--- “ठगै छी। (मायसँ) सुनही माँ ! पिपही बाजै छै कि नहि.....? माँ कनियाँ पुतराक विवाह हेतैक की वर कन्याक ? नहि, नहि कनियाँ-पुतराक...कनियाँ-पुतराक ह- ह- ह- ह-”१० पर्याप्त दहेज नै लएबाक कारणेँ कन्याकेँ एतेक प्रताड़ित कएल जाइत अछि जे ओ प्रायः आत्महत्या धरि कऽ लैत अछि। एतबे नै कखनो-कखनो तँ दहेजक लोभमे लोक अपन पत्नीकेँ घरक आन सदस्यक संग मिलि कए हत्या सेहो कऽ दैत छैक। एहन भावनाक परिचय हमरा मणिपद्म लिखित एकांकी नाटक ‘तेसर कनियाँ’ मे भेटैत अछि जइमे दहेज प्राप्त करबाक लेल तरूण पीढ़ी एवं ओकर माय-बाप नरभक्षी बनि दू-टा कन्याकेँ सुड्डाह कऽ देलक। एतए दहेज पीड़िताक करूण चीत्कार सुनल जा सकैत अछि- षोडसीः “हम जीबय चाहै छी राजा, जीबय चाहैत छी, हमरा खोलबा दिअ। रातिए एहि रोगी वृद्धसँ हमर विवाह एहि कारणेँ भेल जे हमरा सुलक्षणा हेबाक कारणेँ ई नहि मरताह। हाय रे सुलक्षणा ! रातिमे विवाह भेल आ आइ हम जरय जा रहल छी। वृद्धाः चुप पपिनियाँ। षोडसीः हमरा बचा लिय राजा, हम जीबय चाहै छी।”११

ऐ कुप्रथा आ अनैतिक व्यापारसँ क्षुब्ध भऽ नाटककार स्वयं कहै छथि— “आरे तिलक आ दहेजक पिशाच, एहि देशक नारीत्वकेँ आ सिनेहसँ पोसल बेटी सभकेँ सुआदि-सुआदि खो।” भारतक संदर्भमे दहेजक कारणेँ घरेलु हिंसाक समस्याकेँ ऐ चौंकाबऽबला तथ्यसँ बुझल जा सकैत अछि। मानव संसाधन विकास मंत्रालयक एकटा आंकड़ासँ स्पष्ट होइछ जे एतए प्रतिदिन सोलह नारीक दहेजक कारणेँ हत्या होइत छैक, लगभग सत्तरि प्रतिशत ग्रामीण आ नगरीय परिवार एहन अछि जइमे कोनो ने कोनो रुपमे नारीक विरुद्ध हिंसा भऽ रहल छै।

वेश्यावृत्ति वेश्यावृत्ति भारतीय समाजक कैंसर थिक। ऐ ज्वलंत समस्यासँ हमर समाज तेनाने ग्रसित अछि जे ने ओकरा आत्मसात करबाक शक्ति छै आ ने ओकरा अन्त करबाक सामर्थ्य छै। एतबा तँ निर्विवाद रुपेँ स्वीकार कएल जा सकैछ जे क्यो नारी जन्मजात वेश्या नै बनैत अछि, प्रत्युत परिस्थितिक मारिक कारणेँ ओ ऐ धन्धाकेँ स्वीकार करैत अछि जकर कतिपय सामाजिक पृष्टभूमि थिक जे एकर निर्माणमे समान रुपेँ सहयोग प्रदान करैत आएल अछि। वेश्याक ने सामाजिक मर्यादा छै आ ने सामाजिक प्राणी ओकरा इज्जतिक दृष्टिसँ देखैत अछि। तथापि ओकर समाजिक पक्ष एहन अछि जे क्यो स्वेच्छया तँ क्यो परिस्थितिसँ लाचार भऽ समाजमे जीवित रहबाक हेतु ऐ धन्धाकेँ स्वीकार कऽ लैत अछि। उत्कर्ष युगक मैथिली नाटककार नारीकेँ उच्छृंखल ओ स्वच्छन्द रुपमे देखबाक आकांक्षी नै छथि, किएक तँ जीवनक गहन अध्ययनक पश्चात् ओ अनुभव कएलनि जे समाजक आधार नारी थिक। किन्तु स्त्रीक प्रति पुरुषक कुत्सित मनोवृत्तिमे अद्यापि कोनो परिवर्तन नै देखबामे अबैत अछि। पारिवारिक जीवनमे अपन अस्तित्वसँ प्रसन्नता आ संतोष उत्पन्न कएनिहारि नारीकेँ डेग-डेग पर पतिसँ समझौता करए पड़ै छै। आधुनिक समाजमे कतिपय एहन पति छथि जे पत्नीकेँ पत्नी नै बुझि केवल हार-माँस वाली नारीक रुपमे देखैत छथि। ओ अपन स्वार्थ सिद्ध करए लेल पत्नीकेँ अनुचित यौन व्यापार करऽ लेल प्रोत्साहित करैत अछि जकरा वेश्यावृत्तिक नाम देब सर्वथा उचित बुझना जाइत अछि। नोकरीमे पदोन्नति प्राप्त करबाक लेल नारीक सदुपयोग करबाक प्रवृत्तिक दिग्दर्शन हमरा नचिकेताक ‘नाटकक लेल’ मे भेटैत अछि। एकर पात्र शंकर सतीकेँ वेश्यावृत्तिक दिस धकेलि रहल छथि। सतीक संस्कार इच्छा एवं मानसिकता सर्वथा एकर विरोध करैत अछि, किन्तु पुरुष प्रधान समाजमे ओकर महत्व नै रहि जाइत अछि। ओ अपन इच्छाक प्रतिकूल पर-पुरुषक अंक-शायिनी बनैत अछि जे ओकर निरीहताक परिचायक कहल जा सकैछः- सतीः “(क्रोधसँ असंवृत भए चीत्कार करैत) अहाँ हमरा वेश्या बना रहल छी,अहाँ अपन प्रेमकेँ बेचि रहल छी, अहाँ हमरा समस्त प्रेम-प्रीतिक गला घोंटि देने छी, अहाँक हाथमे तकर चेन्ह अछि। क्षमताक लालसामे अहाँक सभ बातसँ दुर्गंध बहरा रहल अछि।”१२

नारी शोषणक विरुद्ध अपन नाटक ‘नायकक नाम जीवनमे’ नचिकेता समाजपर व्यंग्य कएने छथि।

नवलः “हम नहि जनैत रही, हमर मुहल्लाक मानल लोक सब रातिक पहरमे जाहि कोठा सबसँ घुरथि छलथि ओहि महक वेश्या सब कालू सरदारक अधीन छैक।’’१३

चौधरी यदुनाथ ठाकुर ‘यादव’ क नाटक ‘दहेज’ मे सेहो वेश्यावृत्तिक चित्र उपस्थित कएल गेल अछि। नाटकक नायक रघुनन्दन अपन विवाहिता पत्नी दुलरीकेँ छोड़ि मोती (वेश्या) क संग वेश्यागामी भऽ जाइत अछि।१४ ऐ तरहेँ हम देखैत छी, आजुक समाजमे कोना नारीकेँ विवश कएल जाइत छैक वेश्यावृत्तिक लेल। उन्मेष युगक नाटककार ऐ रोगक पर्दाफाश कएलनि, ओ संगहि चेतावनी दऽ रहल छथि ऐ कुप्रथाकेँ सुधारबाक हेतु।

स्त्री-पुरूष संबंधक नव आयाम वर्तमान समयमे हमरा समाजमे प्रत्येक स्तर पर भऽ रहल परिवर्त्तन केँ लक्षित कएल जा सकैत अछि। ई परिवर्तन नवीन विचारधाराकेँ जन्म देलक जे स्त्री-पुरूषक संबंधकेँ बेसी प्रभावित कएलक। हमरा सभक समाजक धूरि परिवार थिक आ परिवारक धूरी पति-पत्नी। ऐ तरहेँ ओकर आपसी संबंधमे आएल परिवर्तनक प्रभाव परिवार ओ समाजपर पड़ब स्वाभाविके अछि। प्रारंभमे पति ओ पत्नीक परस्पर रिश्तामे पतिकेँ ऊँच स्थान प्राप्त छलै आ ओकर तुलना परमेश्वर सँ कएल जाइ छलै। शिक्षाक अभावमे पत्नीक जीवन पूर्णरूपेँ पति पर आश्रित छलै ऐ कारणेँ ओ पतिक संग अपन संबंधमे कोनो तरहक परिवर्तन लाबऽ मे असमर्थ छलीह। जँ पति अपन अधिकारक दुरूपयोग कऽ ओकर उपेक्षा ओ तिरस्कार करैत छल तैयो ओकरामे ओतेक साहस नै छलै जे ओ अपन संग भऽ रहल अन्यायक प्रतिकार कऽ सकए।

जेना-जेना शिक्षाक प्रति नारीक जागरूकता बढ़ल गेलै आ नारी शिक्षित होमए लगलीह तहिना-तहिना पति-पत्नीक परस्पर रिश्ता सेहो प्रभावित होमए लागल। किएक तँ शिक्षा नारीकेँ अपन अस्तित्व आ अधिकारक प्रति जागरूक बनौलक। जखन ओकरामे अधिकारक प्रति जागरूकता बढ़लै तखन ओकरा लेल आवश्यक भऽ गेलै जे ओ अधिकारक रक्षा करए आ अन्याय भेला पर ओकर विरूद्ध अपन आवाज उठा सकए। आ ई तखने संभव अछि जखन ओ आत्मनिर्भर हुअए, परिणामस्वरूप नारी शिक्षित होमक संगहि-संग आत्मनिर्भर सेहो होमऽ लागल। गोविन्द झाक नाटक ‘बसात’ मे हमरा ऐ दृष्टिकोणक आभास भेटैत अछि। ऐ नाटकक नायक कृष्णकान्त एक आदर्शवादी युवक छथि। हुनक पिता फलहारीक पुत्री फुलेश्वरीसँ हुनक विवाह करऽ चाहैत छथि, मुदा कृष्णकान्त अशिक्षिता फुलेश्वरी पर अशिक्षत होएबाक कटाक्ष करैत छथि आ घरसँ पड़ा जाइत छथि। फुलेश्वरी ऐ अपमानकेँ एकटा चुनौतीक रूपमे स्वीकार करैत छथि तथा ओ घरसँ बाहर भऽ शिक्षा प्राप्त करैत अछि आ समाज सेवा करैत अछि। जोतखीजी द्वारा पुष्पा (फुलेश्वरी) क चरित्रकेँ उद्घाटित करैत छथि- बमबाबा--- “वाह वाह ! बेटी, तोहर सफलता पर आइ हमरा अपार हर्ष भऽ रहल अछि, आ कतेक अबलाकेँ सबला बना रहल अछि। आब हमरा विश्वास भऽ गेल। आइ नै काल्हि तोहर प्रतिज्ञा अवश्य पूरा हेतौ— एक दिन फेर मिथिलाक महिला भारतक आदर्श महिला कहाओत।”१५ ऐ तरहेँ हम कहि सकैत छी जे शिक्षा, पाश्चात्य संस्कृति ओ सभ्यताक प्रभाव, स्त्री-पुरूषक समानता आ स्वतंत्रताक भावना नारीमे स्वातंत्र्य भावक जन्म देलक। व्यक्तित्व विकासक संगहि संग ओकर बाहरी दुनियाँमे हस्तक्षेप बढ़ऽ लागल, ऐ तरहेँ नारीक बदलैत परिस्थिति, समाजक बदलैत मूल्य दृष्टि, नव नैतिकता बोध, स्त्री-पुरूषक परस्पर रिश्ताक आयामहि केँ बदलि देलक।

पुरूषक प्रति विद्रोहक भावना आधुनिक सामाजिक मैथिली नाटक मध्य नायिकाक चरित्र विकासमे पुरूष-समाजक प्रति विद्रोहक स्वर अनुगुंजित भऽ रहल अछि। ओ परिवार ओ समाजक बन्धनकेँ ठोकर मारबाक हेतु एकर विद्रूप ओ परिहासकेँ ध्यान नै दऽ अपन व्यक्तित्वक विकासक हेतु शिक्षा ग्रहण करबाक क्षमता दिस आकर्षित भेलीह अछि। एहन नारी अपन विचार ओ अपन व्यक्तित्वकेँ महत्व देलनि तथा वैवाहिक बन्धनकेँ तोड़बाक हेतु तत्पर भऽ गेलीह जकर परिणाम एतबा अवश्य भेल जे सामाजिक परिप्रेक्ष्यमे एहन परिवारक जीवन अत्यधिक नारकीय बनि गेल अछि। एहन नारीक ध्वंसात्मक ओ विद्रोहत्मक पक्ष अत्यंत सशक्त अछि। ऐ हेतु मात्र पुरूषकेँ दोष नै देल जा सकैछ प्रत्युत ओइ समाज व्यवस्थाक अछि जइमे हमर परंपरा बनल अछि, जकर फलस्वरूप नारी-पुरूषक स्वस्थ सामंजस्य अधुनातम संदर्भमे अत्यंत दुष्कर भऽ गेल अछि। पुरुष विरोधसँ सामाजिक व्यवस्था पर आघात करैत अछि तँ संभवतः एकांगीकता ओ विक्षिप्तताक आरोप सँ नारी बाँचि सकैत अछि। स्वतंत्र्योत्तर नाटककार किछु एहन नारी चरित्रक अंकन कएलनि जे अपवाद भूत रुपमे चतुर कर्तृत्ववान, मेधावी आ तेजस्वी छथि। पुरुष हुनका समक्ष दुर्बल ओ आत्मकेन्द्रित देखाओल गेल छथि। पत्नी, पति पर हावी रहब श्रेयस्कर बुझैत छथि- रजनीः--- “हुँह....मान मर्यादा। अहाँकेँ जतेक चिन्ता माय-बापक मान-मर्यादाक तकर दशांसो यदि हुनका लोकनिकेँ अहाँक चिन्ता रहितियन्हि तँ बुझितहुँ आइ धरि ओ की कएलनि अछि अहाँक लेल ?”१६

व्यावहारिक रुपसँ पुरूषक विरोधक परिणामकेँ अन्त धरि लऽ जा कए विचारब आवश्यक अछि किएक तँ स्वस्थ ओ मानवाली नारीक यौन-वासनाक पूर्तिक समस्या ऐसँ सम्बद्ध अछि। नारी स्वातंत्र्यक आकांक्षा संभवतः पुरूषसँ पृथक रहिकऽ पूर्ण भऽ सकैछ, किन्तु नारीक नैसर्गिक भावना कोना चरितार्थ हएत। एहन नारी व्यवहार शून्य भऽ जाइत अछि तथा परिस्थितिक अंतरंगताक अनुभव क्षमताक अभाव रहैछ जइसँ हुनक विद्वता निरर्थक प्रमाणित भऽ जाइत अछि। एहन स्वरूपक वास्तविक चित्र उपलब्ध होइत अछि परित्यकता ममताक चरित्रमे। पिताक हेतु सभ सन्तान एक समान होइत अछि मुदा ‘लेटाइत आँचर’ मे दीनानाथ अपन तीनू संतानक प्रति तीन दृष्टि रखने छथि जकर वास्तविकताक उद्घाटन ममताक कथनसँ स्पष्ट भऽ जाइत अछि- ममताः— “अहाँ बच्चा भैयाकेँ दुरदुरौने रहैत छियनि.... लाल भैयाक लल्लो-चप्पो मे लागल रहै छी....जे काल्हि डॉक्टर बनताह तनिका छनन-मनन खोअबैत छियनि।”१७ समाजक नींव परिवार छै आ परिवारक आधारशिला पति-पत्नी। पति-पत्नीक परस्पर विश्वास, समझदारी ओ सहयोगे सँ परिवार सुखी भऽ सकैछ। जँ दुनूमे सँ एको पंगु भऽ जाएत तँ परिवाररुपी गाड़ीक दुर्घटना हेबाक संभावना बढ़ि जाइत अछि। तइ हेतु आब पुरुषोकेँ सोचऽ पड़तन्हि जे नारीक संग मानसिक समायोजन आब अत्यंत आवश्यक भऽ गेल अछि।

शिक्षाक प्रति नारीक बदलैत दृष्टिकोण कोनो देश समाज अथवा जाति तावत धरि सभ्य नै बुझल जाएत जाधरि ओइ देश, समाज, अथवा जातिमे नारीक आदर नै हेतै। जँ पुरुष देशक भुजा थिक तँ नारी हृदए, जँ पुरुष देशक हेतु दीप थिकाह तँ नारी दीपकक तेल, जँ पुरुष द्वारक सुन्दरता छथि तँ नारी घरक प्रकाश, जँ एकक बिनु द्वार सुन्न लागैत अछि तँ एकक बिन घर अन्हार। वैदिक युगमे पुत्रीक शिक्षाक ओतबे महत्व छल जतबा कि पुत्रक। ऋग्वेदमे शिक्षित स्त्री-पुरूषक विवाहहि केँ उपयुक्त मानल गेल अछि। पिता द्वारा कन्याकेँ अपन पुत्रेक भाँति शिक्षित कएल जाइत छल आ कन्याकेँ सेहो ब्रह्मचर्य कालसँ गुजरऽ पड़ैत छलै। अथर्ववेदमे लिखल छै जे “कन्या सुयोग्य पति प्राप्त करऽ मे तखने सफल भऽ सकैत अछि जखन कि ब्रह्मचर्य कालमे ओ स्वयं सुशिक्षित भऽ चुकल हुअए। कतोक नारी शिक्षाक क्षेत्रमे महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त कएने छलीह। एतए धरि ओ लोकनि वैदिक ऋचा धरिक रचना कएने छलीह। लोपामुद्रा, धोषा, सिकता, निवावरी, विश्ववारी आदि ऐ प्रकारक विदुषी नारी छलीह जनिक उल्लेख ऋग्वेदमे भेटैत अछि। वैदिक यज्ञवादक प्रतिक्रियाक फलस्वरुप उपनिषद्कालमे एक नव दार्शनिक आन्दोलनक प्रारम्भ भेल। ओइमे नारीक सहयोग कोनो कम नै छल। ऋषि याज्ञवल्क्यक पत्नी मैत्रेयी परम विदुषी छलीह। ओ धनक अपेक्षा ज्ञान प्राप्तिक कामना बेसी करैत छलीह। बृहदारण्यक उपनिषदमे उल्लेख अछि जे याज्ञवल्क्यक दोसर पत्नी कात्यायनीक पक्षमे अपन सम्पतिक अधिकार छोड़ि अपन पतिसँ मात्र ज्ञानदानक प्रार्थना कएलनि। ऐ तरहेँ बृहदारण्यक उपनिषद् मे सेहो विदेहक राजा जनकक सभामे गार्गी आ याज्ञवल्क्यक मध्य उच्च स्तरीय दार्शनिक वाद-विवादक उल्लेख अछि। उत्तर वैदिक कालमे समएक गतिक संगहि-संग नारी शिक्षाक क्षेत्रमे शनैः शनैः ह्रास होमऽ लागल। कन्याकेँ सुविख्यात आचार्य ओ प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्र धरि भेजऽमे समाजक उत्साह किछु कम पड़ि गेलै, ई विचार प्रबल भऽ गेल जे घरहि पर कन्याक पिता, भाय अथवा आन कोनो निकट संबंधी हुनका शिक्षित करताह। परिणाम स्वरुप स्वाभाविक रुपसँ ओकर धार्मिक अधिकार, शिक्षाक अधिकारमे ह्रास होमऽ लागल। कालक्रमानुसारे शनैः शनैः नारीक प्रति पुरुषक बदलैत धारणाक कारणेँ नारी वर्गमे अशिक्षा व्याप्त भऽ गेल। मैथिल समाजमे अखनो नारी शिक्षाकेँ अधलाह मानल जाइत अछि। नारी जगतमे शिक्षाक अभावक कारणेँ ओकर मूल्य एको कौड़ीक नै रहि जाइत अछि। ऐ संदर्भमे ‘बसात’ केँ देखल जा सकैछ- “जे महिला आजुक युगमे देहरिसँ आगाँ पएर नै बढ़ा सकए, एको कौड़ी अरजि नै सकय, एतेक तक जे ककरोसँ भरि मुँह बाजि नै सकए तकरा जँ नाँगड़ कही, बलेल कही, बौक कही, गोबरक चोत कही तँ कोनो अनुचित नै।”१८ स्वातंत्र्योत्तर युगमे नारी मे आत्मनिर्भरताक प्रवृत्ति विशेष रुपमे देखल जाइत अछि, आब ओ गोबरक चोत बनि नै रहऽ चाहैत छथि। कालीनाथ झा ‘सुधीर’क नाटक ‘कुसुम’ क नायिका पिताक आज्ञासँ शिक्षा प्राप्त करैत छथि मुदा हुनक माय हुनका ऐलेल तिरस्कृत करैत छथि— कमला- “इ गप्प की छियैक ? हमरा वंशमे आइ धरि कोनो स्त्री नहि पढ़लक तों हमर वंशमे दाग लगौलेँ। मौगीक काज थिक भानस, गीतनाद, कसीदा आ ओइसँ बेसी भेल तँ चिट्ठी-पत्री लिखब। तोँ कि बाप जकाँ अँगरेजिया बनबैं ?”१९

‘बसात’ नाटकमे कृष्णकान्त द्वारा मिथिलाक अशिक्षित नारी पर तीव्र प्रहार कएल गेल अछि। ओ अशिक्षिता फुलेश्वरी विवाह नै कऽ पड़ा जाइत छथि। फुलेश्वरी कृष्णकान्त द्वारा अपमानित भेला पर अपनाकेँ सुधारैत छथि। शिक्षा प्राप्त कऽ समाज सेविकाक काज करैत छथि। शिक्षा प्राप्त कऽ फुलेश्वरी मैथिल नारीक मस्तक गर्वसँ ऊँच करैत छथि। हिनक चरित्र द्वारा नाटककार मैथिल ललनाक शिक्षाक प्रति जागरूकताक दिस ध्यान आकृष्ट कएने छथि। शिक्षिता फुलेश्वरीकेँ देखि जोतखी द्वारा हुनक प्रशंसा कएल जाइत अछि- बम बाबा—“वाह-वाह! --- बेटी तोहर सफलतापर आइ हमरा अपार हर्ष भऽ रहल अछि आ कतेक अबलाकेँ सबला बना रहल अछि। आब हमरा विश्वास भऽ गेल। आइ ने काल्हि तोहर प्रतिज्ञा अवश्य पूरा हेतौ- एक दिन फेर मिथिलाक महिला भारतक आदर्श महिला कहओतीह।”२० ऐ तरहेँ हम देखैत छी जे उनैसम आ बीसम शताब्दीक आरंभमे राजा राममोहन राय तथा आर्य समाजक प्रयत्नसँ जइ नारी शिक्षाकेँ आरंभ कएल गेल ओइमे आइ व्यापक प्रगति भेल अछि, आ ऐ विषयकेँ प्रतिपाद्य बना कतोक मैथिली नाटककार मिथिलाक नारीमे शिक्षाक प्रति दृष्टिकोणमे परिवर्तन आनबाक प्रयास कएने छथि। ऐ प्रयासक सकारात्मक प्रभाव आजुक समाज पर प्रत्यक्ष देखबामे आबि रहल अछि। नारीक शिक्षाक संदर्भमे ‘पणिक्कर’ लिखैत छथि। नारी शिक्षा विद्रोहक ओइ कुड़हड़िक धारकेँ तेज कऽ देने अछि जइसँ हिन्दु सामाजक जीवनक झाड़ी केँ साफ केनाइ संभव भऽ गेल अछि।२१

निष्कर्ष मैथिली सामाजिक नाटकक अध्ययन आ अनुशीलनोपरान्त हम ऐ निष्कर्ष पर पहुँचैत छी जे विशेष कऽ स्वातंत्र्योत्तर युगक मैथिली नाटककार सामाजिक विवर्तनकेँ ध्यानमे राखि लिखलनि जइमे प्रमुख स्वर रहल अछि नारी समस्या। यद्यपि एखनो मिथिलामे दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती, जानकी आदिक पूजा कएल जाइत अछि, तथापि आजुक नारी विभिन्न सामाजिक कुप्रथाक कारणेँ मजबूर छथि, लाचार छथि। ऐ उत्पीड़नक जड़ि जँ खोजल जाए तँ हमरा जनितेँ सभसँ भयावह स्थिति उत्पन्न होइत अछि दहेज आ विधवा-विवाहक समस्याकेँ लऽ कऽ। यद्यपि बाल-विवाह, वृद्ध विवाह, बिकौआ प्रथा एखनो समाजसँ उठल नै अछि तथापि ऐ दिशामे जागरुकता अवश्ये देखबामे आबि रहल अछि। मैथिली नाटककार लोकनि नारीक कारूणिक दशासँ द्रवित भऽ कऽ कतोक नाटक मध्य ऐ समस्या सभकेँ लक्ष्य बना नाटकक रचना कएने छथि जइसँ समाज-सुधारक जागरण जोर पकड़ि सकए। मुदा एतए एकटा प्रश्न उपस्थित होइत अछि जे स्वातंत्र्योत्तर मैथिली नाटकमे सामान्य नारीक प्रतिबिम्ब कतेक दूर धरि स्पष्ट अछि? ऐ कालावधिक नाटककार नारी-चित्रण आत्मीयता एवं सहानुभूतिसँ नै कएलनि, प्रत्युत पुरूषक दृष्टिएँ कएलनि। स्वातंत्र्योत्तर नाटकमे नारीक निष्प्रेम जीवनक कथा थिक जे सामाजिक प्रतिबन्धक अन्तर्ज्वालामे झुलसि कऽ नष्ट भऽ रहल अछि। पुरूषक आकांक्षा, आदर्श ओ निर्दयताकेँ टारब हुनका हेतु असंभव भऽ जाइत अछि। नारी जीवनक व्यथा, कठिनता एवं कुण्ठाक चित्रण करबामे नाटककार तत्परता देखौलनि, किन्तु ओ समाजक हेतु निष्प्रयोजनीय प्रतीत भऽ रहल अछि। ऐ कालावधिमे मैथिली नाटकमे नारीक जतेक आदर्शवादी ढंगसँ चित्रण कएल गेल अछि, ततेक यथार्थवादी दृष्टिएँ नै।

संदर्भ

१. डेविस, ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ वोमेन, पृष्ठ—१७२ २. स्वर्ण सकूजाक लेख, ‘महिला सशक्तीकरण युग में निरंतर असक्त होती नारी’, राधाकमल मुखर्जी चिन्तन परंपरा, जुलाई—दिसम्बर २००१, अंक—१ ३. बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—४३ ४. एकांकी संग्रह, सं. सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, मैथिली अकादमी, पटना, १९७७,पृष्ठ—१३३ ५. वएह, पृष्ठ—२६ ६. रक्त, अरविन्द कुमार ‘अक्कू’, शेखर प्रकाशन, टेक्सटबुक कॉलोनी, इन्द्रपुरी, पटना, १९९२,पृष्ठ—२० ७. त्रिवेणी, परमेश्वर मिश्र, मिथिला प्रेस, १९५०,पृष्ठ—४१ ८. लेटाइत आँचर, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, पृष्ठ—२५ ९. वएह, पृष्ठ—६३ १०. कनियाँ-पुतरा, गुणनाथ झा, पृष्ठ—२१ ११. तेसर कनियाँ, मणिपद्म, पृष्ठ---१६ १२. नाटकक लेल, नचिकेता, पृष्ठ—२०-२१ १३. नायकक नाम जीवन, नचिकेता, अखिल भारतीय मिथिला संघ, ९/१ खेलात घोष लेन, कलकत्ता, १९७१,पृष्ठ—९ १४. दहेज, चौधरी यदुनाथ ठाकुर ‘यादव’ पृष्ठ—४६ १५. बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—४७ १६. एना कते दिन, अरविन्द कुमार ‘अक्कू’, चेतना समिति पटना,१९८५, पृ.१६ १७. लेटाइत आँचर, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, पृष्ठ—६३ १८. बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—१८ १९. कुसुम, कालीनाथ झा ‘सुधीर’, पृष्ठ—३ २०. बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—४७ २१. के. एम. पन्निकर आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित : निर्धनताक समस्या भारत गरीबक देश थिक। एतुका अधिकांश जनता अखनो गाममे रहैत छथि जे कि कृषि कार्य पर निर्भर छथि आ बरखा पर। फलस्वरुप अनियमित बरखा सरकारी उपेक्षा ओ अशिक्षा तथा पिछड़ापनक कारणेँ गामक लोक गरीबीक जीवन बिता रहल छथि। यएह गरीब किसान ओ गामक लोक जखन कमएबा हेतु शहर जाइत छथि तँ मजदूर वा बोनिहार कहबैत छथि। ओत्तौ हुनका सभकेँ नारकीय जीवन जीवाक लेल बाध्य होमऽ पड़ै छै। भारतक कुल आबादीक पैंतीस प्रतिशतक लगपास लोक एहन छथि जे जीवनोपयोगी न्यूनतम आवश्यकताक पूर्ति करबामे अक्षम छथि। निर्धनता मनुक्खकेँ बेवस लाचार आ शक्तिहीन बना दैत अछि। निर्धन मनुक्ख पिछड़ल, दीन-हीन बाधाग्रस्त आ सदैव दोसरक दयापर जीब लेल बाध्य भऽ जाइत अछि। मानव जीवनक भयंकर अभिशाप थिक निर्धनता वा गरीबी। जइ मनुक्खकेँ दू-साँझक रोटी नै, पहिरऽ लेल शरीर पर वस्त्र नै, रहै लेल घर नै, बीमार भेलापर दवाइ-दारूक पाइ नै, ओ जँ आत्माक उच्चताक दावा करत तँ ओ मिथ्याक सिवाय किछु नै भऽ सकैत अछि। ओ स्वतंत्र कोना भऽ सकैत अछि? ओ कोनो बड़का काज कोना कऽ सकैत अछि? ओ अपन विचारकेँ स्वतंत्र रूपसँ कोना प्रकट कऽ सकैत अछि? निर्धनताक कारणेँ मनुष्य तंगदिल, तुच्छ, ओछ, कमजोर आ अपन इच्छाक मारऽबला बनि जाइत अछि। मैथिली नाट्य साहित्य मध्य ऐ समस्याक विश्लेषण निम्नस्थ नाटकमे भेल अछि। जीवनाथ झाक ‘वीर –वीरेन्द्र’ (१९५६), भाग्य नारायण झाक ‘मनोरथ’ (१९६६), बाबूसाहेब चौधरीक ‘कुहेस’ (१९६७), गुणनाथ झाक ‘कनियाँ – पुतरा’ (१९६७), नचिकेताक ‘नायकक नाम जीवन’ (१९७१) अरविन्द कुमार ‘अक्कू’ क ‘आगि धधकि रहल छै’ (१९८१), गोविन्द झाक ‘अन्तिम प्रणाम’ (१९८२), गंगेश गुंजनक ‘बुधिबधिया’ (१९८२) आदि। मनोरथ मे लक्ष्मीनाथ अपन निर्घनताकेँ कोसैत छथि। ओ कहैत छथि- “हमर नाम तँ दरिद्रनाथ होमक चाही ने कि लक्ष्मीनाथ। एकठाम नाट्यकार गरीबक धीया-पुताक संबधमे कहने छथि जे ओ कोनो काज सोचि समझि कऽ करैत अछि ओ अपन सुख-सुविधाकेँ त्यागि दैत अछि। ऐ परिप्रेक्ष्यमे मैथिली नाट्यालोचक डॉ. प्रेम शंकर सिंहक कथन छनि- “आर्थिक दशाक क्षीणताक कारणेँ मनुष्यकेँ केहन संकटापन्न समस्याक सामना करऽ पड़ैछ तकरे दिग्दर्शन ऐ नाटकमे होइत अछि।”१ गरीबीक ई पराकाष्ठा छै जे क्यो खाइत-खाइत मरैत अछि तँ क्यो कमाइत-कमाइत। एतए समुचित व्यवस्थाक अभाव अछि। एतए अधिकांश नेनाक स्थिति एहने अछि जे जन्मोपरान्त रोजी-रोटीक जोगाड़मे लागि जाइत अछि। ‘नाटकक लेल’ मे ऐ समस्याकेँ उजागर कएल गेल अछि- “कतेको लोक एक किनारमे पड़ल कूड़ाक ढेरसँ की सभ ने बीछि रहल छल, क्यो दू एकटा रोगाएल बच्चाकेँ डेंगा रहल छल”२ आर तँ आर आइ समाजमे एहन गरीबी व्याप्त छै जे गरीबकेँ मुइलाक उपरान्त कफन किनबाक लेल टका नै रहैत छै। “अंतिम प्रणाम” मे समाजक एहन दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण द्रष्टव्य थिक--- “ठीके तँ कहै छिऐ। हमरा आरू गरीब छी मुदा आनि पर दस गोटय मिलि जाय तँ की ने कऽ सकैत छी।”३ ‘बुधिबधिया’ मे सेहो गरीबीक दृष्टान्त भेटैत अछि। देश मे कतेको व्यक्तिक स्थिति सोचनीच अछि। किछु व्यक्ति अपन जीवन-यापन विलासितापूर्वक ढगसँ व्यतीत करैत छथि, मुदा सरकारक ध्यान गरीब लोकक दिस नै जाइ छै। जँ सरकार द्वारा किछु व्यवस्था कएलो जाइछ तँ ओकर लाभ गरीब लोक घरि नै पहुँचि सकैत अछि- “एकरा देह पर एक बीत वस्त्र नै, एकर अंग-अंग उघार अछि।”४ समाजक अधिकांश लोक गरीबी रेखाक नीचाँ अछि। महगी अकाश छुबि रहल अछि। सामान्य लोक अपन परिवारक हेतु भोजन, वस्त्र आवास जुटएबामे परेशान अछि। ‘अंतिम प्रणाम’ मे मुरारीक कथन अछि--- “तीन-तीन टा बच्चोकेँ भुखले सुतैत देखैत रहैत छी- घरवालीकेँ फाटल वस्त्रमे देखैत छी- अहूसँ बेसी किछु अशुभ भऽ सकैत अछि।”

वर्तमान युगमे सामाजिक चेतनाक निरन्तर बढ़ैत गतिशीलता ओ परंपरागत रूढ़ि व्यवस्थाक जड़ताक बीच एकटा भयंकर संघर्ष आ तनावक स्थिति बनल अछि। आधुनिक सामाजिक मैथिली नाटकक मूल-स्वर ऐ प्रकारक विभिन्न संघर्ष, तनाव आ अनेक सामाजिक समस्या आदिसँ भरल अछि। सामाजिक जीवनक यथार्थक अभिव्यक्ति नाटककारक सामाजिक दृष्टि आ रचना दृष्टि पर आधारित होइत अछि। मिथिलांचलक समाजमे आर्थिक विपन्न जीवनक अस्तव्यस्तता स्वाभाविकतामे परिवर्तित भए गेल अछि। संदर्भ

१. मैथिली नाटक परिचय, डॉ. प्रेम शंकर सिंह, पृष्ठ—९६ २. नाटकक लेल, नचिकेता, पृष्ठ—५४ ३. अंतिम प्रणाम, गोविन्द झा, ४. बुधिबधिया, डॉ. गंगेश गुंजन दुर्गानन्‍द मण्डल नाटक बेटीक अपमानपर एक नजरि‍ मैथि‍ली साहि‍त्यक एकटा वि‍धा नाटक अछि‍, जे वि‍धा सभ दि‍न रौदि‍याहे सन रहल। गि‍नल-चुनल नाटककारक कि‍छु नाटक जे आंगुरपर गनल जा सकैत अछि‍, दोगा-दोगी कोनो पुस्तकालयक शोभा मात्र बढ़ौलक। एकटा समए छल जइमे नाटककार जे नाटक लि‍खलनि‍ तइमे वाक्-पटुता नै रहबाक कारणे वा शुद्ध-अशुद्ध उच्चारण नै भेने वा समुचि‍त वाद-संवादक संग समदि‍याक अभाव सभ दि‍न देखल गेल। चूँकि‍ ओना हम जत्ते-जे ढकि‍ ली मुदा एकटा सत्यकेँ स्वीकार करए पड़त जे हम मैथि‍ल छी। हमरा लोकनि‍क मातृभाषा मैथि‍ली भेल। मुदा माएकेँ माँ कहैत कनेको लाज वि‍चार नै होइए। जेना कि‍ आँखि‍सँ लाजक पानि‍ खसि‍ पड़ल। तात्पर्य, मैथि‍ल होइतो दोसर भाषाक दासताक शि‍कार भेल छी आ ओकर भोग भोगि‍ रहल छी, बुझाइत अछि‍ जेना मैथि‍लीक लेल एेठामक माइटि‍ये उसाह भऽ गेल अछि‍, जइपर गदपुरनि‍ मात्र उपजि‍ सकैए। मुदा ओहेन उसाह माटि‍पर “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी” लि‍खि‍ नाटकार बेचन ठाकुर, चनौरागंज, मधुबनी, मैथि‍ली नाट्य जगतमे एकर सफल मंचन कऽ महावीरी झंडा गाड़ि‍ समस्त मैथि‍ली, मैथि‍ल आ मि‍थि‍लाक मान-सानकेँ मात्र बढ़ेबे टा नै कलनि‍ अपि‍तु चारि‍-चाँद लगा देलनि‍। ऐ लेल ठाकुर जीकेँ समस्त मैथि‍ल भाषी आ नाट्य प्रेमीक तरफसँ हम कोटिश: धन्यैवाद दैत अपार हर्ष महसूस कऽ रहल छी। हमरा वि‍श्वास अछि‍ जे अपने ई दुनू रचना जेकर मंचन अपने अपनहि‍ कोचि‍ंग संस्थानक छात्र-छात्रा लोकनि‍सँ करा, ई साबि‍त कऽ देलौं जे मि‍थि‍लाक माटिमे‍ अखनो ओतेक शक्ति बचल अछि‍ जइपर केसरो उपजि‍ सकैत अछि‍।  नाटककारक नाटकक वि‍षय अति‍ उत्तम छन्हि। वर्त्तमान शताब्दीक सभ मनुख ऐ बातसँ भि‍ज्ञ अछि‍, सरकारी सर्वेक्षणसँ सेहो स्प‍ष्टत अछि‍ जे दि‍नानुदि‍न लि‍ंगानुपात बढ़ि‍ रहल अछि‍। सभ राज्यक अनुपात थोड़े ऊपर-नीचाँ भऽ सकैए मुदा कि‍यो ऐ बातसँ मुँह नै मोड़ि‍ सकै छथि‍ जे प्रति‍ हजार लड़ि‍का-लड़ि‍कीक बीच एकटा बड़का खाधि‍ बढ़ैत जा रहल अछि,‍ जइ खाधि‍मे लड़ि‍कीक अनुपात नि‍रंतर नीचाँ मुँहेँ गि‍ड़ैत जा रहल अछि‍ आ हमरा लोकनि‍ कानमे तूर-तेल दऽ नि‍चेनसँ सूतल छी। जौं ई क्रम जारी रहल तँ आगू की हएत से तँ सोचू!! ई एकटा प्रश्नवाचक चि‍न्ह छोड़बामे नाटककार एकदम सफल रहला अछि‍। एतबे नै, आजुक वैज्ञानि‍क युगमे यंत्रादि‍क सहायतासँ ई जानि‍ जे माइक गर्भमे पलैत बच्चाक, बेटा नै बेटी छी.... ि‍नर्मम हत्‍या करबामे कनि‍क्को कलेजा नै कँपैए!! जेकर कोनो कसूर नै ओकरा कुट्टी-कुट्टी काटि‍ खुने-खुनामे कऽ माइक गर्भसँ बहार कऽ दै छि‍ऐ। जइ बेथे ओइ बच्चाक माए पनरह दि‍न धरि‍ बि‍छौन धेने रहैत अछि‍। ऐठाम एकटा गप हम फरिछा कऽ कहि‍ दि‍अ चाहै छी, ओ बेथा हुनकर ओइ बेटीक प्रति‍ये नै जेकर ओ हत्या करौलनि‍ अछि,‍ अपि‍तु शारीरि‍क बेथा छन्हि जइ लेल एत्ते आ एहेन कुकर्म करै छथि‍। ओइ ि‍नर्दोष बच्चाक माए-बाप दुनू ततबाए दोषी छथि‍। ओ ई नै बूझि‍ रहल छथि‍ जे जइ बेटीक ओ हत्याए करौलनि‍ जौं ओ बेटी आइ नै रहैत तँ की अपने रहि‍तौं? जौं बेटी नै हएत तँ सृष्टिक रचना संभव अछि‍? जौं हँ तँ केना वा नै तँ एहेन अपराध कऽ स्वयं कि‍एक एतेक पैघ हत्यारा साबि‍त भऽ रहल छी। रानी झांसी, लक्ष्मीबाई, सावि‍त्री, अहि‍ल्या, सती अनुसुइया, इन्दि‍रा गांधी, मैडम क्यूरी, मदर टेरेसा..., ईहो सभ तँ बेटी‍ये छलीह। जौं हि‍नको हत्या पूर्वहि‍मे कऽ देल गेल रहैत तँ आइ.....। तखन आँखि‍ रहैत एना हम सभ आन्हर कि‍एक? बुइध‍ रहैत मुर्खाहा जकाँ काज कि‍ए करै छी? मनुक्ख तँ मनुक्ख छी ने, छागर-पाठी आकि‍ गाए-महि‍ंस तँ नै जे कतौ कोनो.....। तहूमे साढ़े-पारा अधि‍क भऽ जाए, गाए-महि‍ंस कम, तखन की हएत? जौं हम-अहाँ ई नै सोचबै तँ के सोचताह? ऐ हत्याक पाछाँ एकटा अओर कारण अछि‍ जेकर नाओं थि‍क दहेज। मुदा उहो तँ हमहीं अहाँ लेबाल आ देबालो छि‍ऐ। अखनो समाजमे आ प्राय: गाम पाछाँ एक-आध गोटे जरूर छथि‍ जे अपन बालकक बि‍आह एकटा नीक कुल-कनि‍याँ ताकि‍ आदर्श बि‍अाह कऽ उदाहरण बनै छथि‍। ऐ काजक दोषीकेँ सजा नै दऽ ि‍नर्दोषकेँ जानेसँ मारि‍ दुनू परानी ऐ पापक भागीदारी छी। छीह.......। 

शास्त्रो एकटा बात बतबैत अछि‍ जे “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता।” मुदा ओकर पूजा की करबै, ओइ देवीक संसारमे एबाक अधि‍कारे छीनि‍ होइए, जे बड़का काज केलौं।  जतए समस्त वि‍श्व ऐ समस्यासँ जरि‍‍ रहल अछि‍ ओतए नाटककार अपना नाटकक माध्यमे एकटा साधारणो लेखक सदृश अपन लेखनीक माध्यमे समाजमे ई संदेश देबामे पूर्णत: सफल छथि‍ जे समए रहैत जौं नै चेतब तँ नाटकक मुख्य पात्र दीपक सदृश हाल हएत। जे अंतमे कनि‍याँक मुइला पछाति‍ अपनेसँ भात पसाबथि‍, कि‍एक तँ हुनक कनि‍याँ बरोबरि‍ गर्भपात करेबाक कारणे शोनि‍तक कमीसँ उड़ीस भऽ मुइलीह। एतबे नै, बेटीक अभावमे नगद गीनि‍ आ तखन पुतोहु घर अनलाह। तखन हुनका कबीर साहैबक ई पाँति‍ मोन पड़ैत छन्हि, “सन्तोक सभ दि‍न होत एक समाना।” आबो जौं नै चेतब तँ अहि‍ना टाका दऽ बेटी बेसाहऽ पड़त। नि‍रंतर चीज-बौस जकाँ बेटि‍योक दाम बढ़ैत जाएत, जेकरा कि‍नैत-कि‍नैत अहाँक प्राण नि‍कलि‍ जाएत। कि‍एक तँ अपना समाजमे एकटा नै कएक टा मरूकि‍याबला अखनो जीवि‍ेते अछि, जे चारि‍ लाख एकावन हजार टाका नगद आ सभ सरंजाम संगहि‍ बरि‍आती ऊपरसँ। चेतु हे मैथि‍ल आबो चेतु। नै तँ आब ओ दि‍न दूर नै जे गाड़ीपर नाव रहत। आब बेटी अपन अपमान बरदास नै कऽ सकैए।  ऐ प्रकारे नाटककार समाजक लेल एकटा पैघ संदेश दऽ रहल छथि‍ जे गर्भपातसँ पैघ कोनो पाप नै होइत अछि‍। तँए ऐ पापसँ बची आ बेटीक बाप बनी। अहुना बेटा आ बेटी दुनू कोइखि‍क श्रृंगार होइए। ऐ तरहेँ श्री बेचन ठाकुर जी हमरा लोकनि‍क नीन तोड़ैमे सफल रहला। जे श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक प्रेरणापूर्ण आदर्शवादी व्यक्तिक हाथ हुनका माथपर छन्हि, हम सेहो बि‍नु मंगने शुभकामना दैत छि‍यनि‍, रहबनि‍, जे अहि‍ना नाटक लि‍खैत रहथु, मंचन करबैत रहथु। धन्यवादक पात्र श्रुति‍ प्रकाशनक श्रीमती नीतू कुमारी आ नागेन्द्र झाजी केँ जे प्रकाशनक समस्त भार उठा कृतज्ञ हेबाक मौका देलखि‍न। जौं वि‍देह प्रथम पाक्षि‍क ई-पत्रि‍काक सह सम्पादक उमेश मण्डल एवं सम्पादक गजेन्द्र बाबूकेँ, जि‍नक अथक सहयोगक प्रसादे प्रकाशनक रास्ता सुगम आ प्रकाशन सफल भेल, तँए नै लि‍खब-कहब तँ अनुचि‍त। आशीष अनचिन्हार बेचन ठाकुरक नाटक छीनरदेवी ऐ नाटकक मादें किछु कहबासँ पहिने ओ गप्प कही जे प्रायः-प्रायः अंतमे कहल जाइ छै। श्रुति प्रकाशन एकटा बड़का काज ठानि लेने अछि- हीरा-मोती-माणिककेँ चुनबाक। आ ऐ मे ई कतेक सफल भेल तकर निर्धारण भविष्य करत, वर्तमान नै, कारण वर्तमान समयक नीति-निर्धारकक इमान शून्य स्तरपर पहुँचि गेल अछि। मुदा एहन-एहन समस्याक अछैतो हमर शुभकामना ऐ प्रकाशनक संग अछि आ विश्वास अछि जे जेना ई धारक दूरी पार केलक अछि तेनाहिते आब ई समुद्रक दूरी पार करत। आ संगहि-संग ऐ नाटककेँ ऊपर अनबामे जनिकर कनेकबो योगदान छन्हि से अशेष धन्यवादक पात्र छथि। जहिया सनातन धर्ममे पुराण-उपनिषदक आगमन भेल रहै, तहिया देवी-देवताक संख्या ३३ करोड़ रहै। आजुक समयमे जखनकि पौराणिक समय बितला बहुत दिन भऽ गेल तखन देवी देवताक संख्या कतेक हएत? हमरा बुझने ३३ करोड़सँ बेसिए। तथापि सुविधाक लेल एकरा यथावत् मानू। आ एतेक देवी-देवताक अछैतो छीनरदेवीक आविर्भाव किए? उत्तर हम नै देब कारण ई गप्प सभ जनैत छथि मुदा लोक ऐ उत्तरकेँ नुका कऽ रखैत अछि। आ संभवतः छीनरदेवीक ऐ रूपकेँ छिनरधत्त कहल जाइत छै। ओना एकरा बादमे हम निरुपित करब। ओइसँ पहिने एकटा आरो महत्वपूर्ण प्रश्नपर चली। जँ अहाँ श्री बेचन ठाकुर कृत ऐ नाटककेँ नीकसँ पढ़ब तँ ई बुझबामे कोनो भांगठ नै रहत जे ऐ नाटकक मूल स्वर अंधविश्वासपर चोट करब छै। आ जखने अहाँ ऐ निष्कर्षपर पहुँचब, अहाँकेँ तुरंते प्रो. हरिमोहन झा मोन पड़ि जेताह, से उम्मेद अछि। आ जखने अहाँकेँ प्रो. झा मोन पड़ताह तखने हमरा मोनमे ई प्रश्न उठत जे प्रो. झा जइ प्रबलतासँ अंधविश्वासपर कलम चलेने छलाह तकरा बाबजूदो ६०-७० साल बाद बेचन जीकेँ ऐपर कलम चलेबाक जरूरति किए पड़लनि? एकर दूटा कारण भऽ सकैत अछि, पहिल जे प्रो. झाक प्रहारक बाबजूदो अंधविश्वास मेटाएल नै (हम ई नै कहि रहल छी जे ई प्रो. झाक हारि थिक कारण हरेक लेखकक एकटा सीमा होइ छै) आ दोसर कारण भऽ सकैत अछि जे बेचन जीकेँ कोनो बिषए नै भेटल होइन्ह आ मजबूरीमे ओ ऐपर कलम उठेने होथि। मुदा आइ जखन गामे-गाम घूमै छी आ ओकर आंतरिक स्थितिकेँ परखैत छी तँ दोसर कारण अपने-आप खत्म भऽ जाइत अछि। आइयो गाम आ अर्धशहरी इलाकामे एलोपैथीक संगे-संग भस्म-विभूति आ ब्रम्हथानक माटि उपचारमे लाएल जाइत अछि। आ एकरा संगे ईहो स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे प्रो. झाक बादो ई अंधविश्वास मरल नै। आ एहने समयमे हमरा लग ई प्रश्न विकराल रूप धऽ आबि जाइत अछि जे प्रो. झाक बाद जे नाटककार भेलाह (चूँकि बेचन ठाकुर जीक विधा नाटक छन्हि तँए हम नाटकेक दृष्टिसँ गप्प करब) से एतेक दिन धरि की करैत छलाह? आब हम ऐ प्रश्न सबहक उत्तर ऐठाम नै लिखब। एकर कारण अछि जे हमरा सदासँ विश्वास रहल अछि जे साहित्यिक संदर्भमे वर्तमान समयक उत्तर जँ भविष्यमे प्राप्त हुअए तँ ओ बेसी सटीक आ सार्थक होइ छै। अस्तु श्री बेचन ठाकुर जीसँ मैथिली मंचकेँ बड्ड आस छै आ तइ आसकेँ पूरा करबाक तागति भगवान हुनका देथिन्ह तइ आशाक संग चली हम प्रेक्षक समूहमे। कोनो नाटक पहिने लिखल जाइए आ तकर बाद ओ टाइप होइए वा सोझे टाइप कएल जाइए आ तकर बाद कखन छपैए, मंचनक बाद वा मंचनक पहिने; ऐ सभमे आब कोनो अन्तर नै रहलै। जॉर्ज बर्नार्ड सॉ शॉर्टहैण्डमे लिखै छलाह आ हुनकर स्टेनो ओकरा लौंगहैण्डमे टाइप करै छलीह। बिनु छपने मैथिली धूर्तसमागम मैथिलीक पहिल पोस्ट मॉडर्न अबसर्ड नाटक अछि। ई तर्क जे छपलाक पहिने मंचन भेलासँ बहुत रास कमी दूर भऽ जाइए, ऐ सन्दर्भमे मलयालम कथाकार बशीरक उदाहरण अछि जे सभ नव छपल संस्करणमे अपन कथामे नीक तत्व अनबाक दृष्टिसँ संशोधन करै छलाह, ई कथामे सम्भव तँ नाटकमे तँ आर सम्भव। तँ सिद्ध भेल जे लिखल जेबाक वा छपि गेलाक बादे नाटकक मंचन हएत से नै; आ मंचनक बाद लिखल वा छपल दुनूमे सुधार सम्भव अछि। बेचन ठाकुरजी रंगमंच निर्देशक सेहो छथि आ विगत २५ बर्खसँ अपन गाममे मैथिली रंगमंचकेँ जियेने छथि बिना कोनो संस्थागत (सरकारी वा गएर सरकारी) सहयोगक। हिनकर रंगमंचपर हिनकर दर्जनसँ बेसी नाटकक अतिरिक्त गजेन्द्र ठाकुर आ जगदीश प्रसाद मण्डलक नाटक, एकांकी आ बाल नाटकक मंचन सेहो भेल अछि। बेचन ठाकुरक नाटक बेटीक अपमान हम व्यक्तिगत रुपेँ हरियाणाक प्रायः-प्रायः प्रत्येक कोनमे रहल-बसल छी आ तँए स्थानीय जनताक रुपमे हरियाणामे कत्तौ घुसि जाइ छी। एकर हानि हमरा जे भेल हुअए मुदा लाभ एतेक तँ जरुर भेल जे हम स्थानीय परेशानी बुझए लागल छिऐ। ओना हरियाणाक नाम सुनिते मोनमे समृद्धिक नजारा देखाए लगैत छैक। भरल-पुरल खेत सुझाए लगैत छैक। मुदा ऐठामक स्थानीय समस्या बहरिआ लोककेँ नै बुझल छै। ऐठाम हरेक साल १००-१५० लड़काक बिआह दोसर राज्यक लड़कीसँ होइ छै। जँ सोझ ढंगे कही तँ हरियाणाक सेक्स-रेसियो (लिंगानुपात) असमान अछि अर्थात १००० लड़कापर ८५०-९०० लड़की। आब अहाँ सभ हमरा हूट करबाक सोचि रहल हएब। प्रस्तुत पोथी मैथिलीक अछि आ हम हरियाणाक गप्प कऽ रहल छी से अहाँ सभकेँ उन्टा लागि रहल हएत। मुदा ऐठाम हम ई कहए चाहब जे मात्र स्थान आ मनुख बदलि जाइ छै, मनोवृति आ समस्या वएह रहै छै। आब हम अही समस्याकेँ मिथिलाक परिप्रेक्ष्यमे सोची। बेसी अंतर नै भेटत आ से ऐ द्वारे जे नेपालमे सेहो मिथिला छै। आ भारतक मिथिला आ नेपालक मिथिला दुनूमे बिआह प्रचलित छै। तथापि जँ भारतक हिसाबे सोची तँ बिहारमे १००० लड़कापर ९२१ लड़की छै (ओना जँ २०११ क जनगणनाक प्रोविजनल रिपोर्ट देखब तँ संपूर्ण भारतमे १००० लड़कापर ९४० लड़की छै)। आ जँ ऐ समस्याक परिप्रेक्ष्यमे विकसित हरियाणा आ अविकसित मिथिलाकेँ देखी तँ कोनो बेसी अंतर नै बुझाएत। अर्थात ऐ समस्यासँ दुनू क्षेत्र ग्रसित अछि। मुदा ई आब विचारए पड़त जे ई समस्या कहाँसँ निकलैत छैक? कोन मनोवृत्तिसँ ई समस्या परचालित होइ छै? आखिर ई कोन दृष्टिकोण छै जइ तहत लोक बेटी नै चाहैत अछि आ ऐ लेल भ्रूण हत्या सन पाप करबासँ सेहो नै हिचकैत अछि? मिथिलाक हिसाबे गप्प करी तँ दहेज प्रथाकेँ एकर जिम्मेदार ठहराओल जा सकैए मुदा हरियाणाक हिसाबें ई कारण ओतेक प्रभावी नै, कारण हरियाणामे दहेज प्रथा नै कऽ बराबर छै। तँए हम दहेजकेँ भ्रूण हत्याक एकटा कारण मानैत छी मुदा प्रमुख कारण नै। हमरा हिसाबे ऐ समस्याक प्रमुख कारण एखनो आधुनिक कालमे बेटाकेँ अनिवार्य मानब अछि। एकरा समाजिक आ आर्थिक दुनू पक्षमे बाँटए पड़त। समस्या आ साहित्य दुनू एकै चीजक अलग-अलग नाम थिक। बिना समस्या कोनो साहित्य नै भऽ सकैत अछि। आ अंततः साहित्ये कोनो समस्याक समाधान तकैत छैक। मुदा मैथिली साहित्य एकर अपवाद अछि। ऊपर हम देखिए चुकल छी जे कोना मिथिला भ्रूण हत्याक समस्यासँ ग्रसित अछि। तथापि ऐठामक साहित्यकार ऐपर कलम नै चलौलन्हि। घोर आश्चर्यक विषए। आश्चर्यक विषए ईहो जे एहने-एहने समस्यासँ कतिआएल साहित्यकारकेँ आलोचक आ मठाधीश सभ बढ़ाबा देलथि। कोनो समाज कोनो समस्यासँ कतिआ कऽ बेसी दिन नै रहि सकैत अछि। एकर अनुभव हमरा श्री बेचन ठाकुर लिखित नाटक "बेटीक अपमान" पढ़लापर बुझाएल। आ संगहि-संग ईहो बुझाएल जे आब बेसी दिन मिथिला सूतल नै रहत आ ने बेटीकेँ खराप बुझल जाएत । सुजीत कुमार झा मिथिला नाट्यकला परिषद जनकपुर मिनापक स्थापना २०३६ सालमे होइतो एकर पृष्ठभूमि २०२४ साल सँ शुरु भेल, मिनापक संस्थापक सभ कहैत छथि। विलट साह एण्डी, पारस प्रसाद बदामी, भरत अकेला आ योगेन्द्र साह नेपाली २०२४ सालमे जनकपुरमे आधुनिक नाट्य कला मन्दिरक स्थापना केलन्हि। प्रारम्भिक अवस्थामे अइ संस्थाक माध्यमसँ जनकपुरमे हिन्दी नाटकक प्रदर्शन होइत छल। अइ क्रममे २०२८ सालमे मैथिली भाषाक मूर्धन्य साहित्यकार डा. धीरेश्वर झा धीरेन्द्र, योगेन्द्र साह नेपालीसँ भेट कएलन्हि आ आधुनिक नाट्य कला मन्दिरक मञ्च पर मैथिली गीत सेहो गाएल जाए, से अनुरोध कएलन्हि आ तकर बादसँ ओइ मञ्चपर मैथिली गीत चलए लागल, मिनापक संस्थापक योगेन्द्र साह नेपाली मिनापक २०४९ सालमे प्रकाशित स्मारिकामे लिखने छथि। ओइ समएमे डा. धीरेन्द्रक ‘तार काटु तरकुन काटु’ आ योगेन्द्र साह नेपालीक ‘मरुआक रोटी खेसारीक दालि’, ‘देशी मुर्गी आ बेलायती बोल’, ‘हे गै सगतोरनी’ सनक गीत लिखलन्हि जे बेस चर्चा पौलक। अइ गीत सभक लोकप्रियता देखि आधुनिक नाट्य कला मन्दिरक मञ्चपर मैथिली नाटक सेहो होबए लागल। छिक प्रहसन, चमेलीक विआह, ब्रह्मस्थान सन नाटक मञ्चन भेल। ई क्रम चलिते रहल आ डा. धीरेन्द्रक सभापतित्वमे एकटा बैसार भेल जइमे योगेन्द्र साह नेपाली, बलराम प्रसाद राय, भोला दास, राम अशिष ठाकुर आ मदन ठाकुर उपस्थित भेल रहथि। निर्णय भेल जे अइ नाटय संस्थाकेँ विशुद्ध मैथिली नाटय मञ्चक रुप देल जाए, जेकर किछु गोटे विरोध कएलन्हि मुदा चारि वर्ष नै बितैत मिनाप नामक नाट्य संस्थाक गठन भऽ गेल। योगेन्द्र साह नेपाली स्मारिकामे लिखने छथि, ‘हम, धीरेन्द्र आ राजेन्द्र कुसवाहा मिल कऽ समाजसेवी राजदेव मिश्रक अध्यक्षतामे एकटा बैसार केलौं, जइमे सुदर्शन लालक नेतृत्वमे एकटा कमिटीक गठन कएल गेल। मिनापक संस्थापक के छथि? जखन कोनो संस्था बड्ड बेसी चर्चामे अबैत अछि तँ क्रेडिट लेबाक लेल होड़ चलि अबैत अछि। अहूमे मिनाप सनक संस्थाक तँ स्वभाविके अछि। डा. धीरेन्द्रक प्रेरणा आ योगेन्द्र साह नेपालीक अपन भाषा, साहित्य एवं संस्कृतिक लेल किछु करी, से सोच, एकर स्थापनामे किछु बहुत मदति कएने अछि। मिनापक संस्थापक कमिटीक अध्यक्षमे सुदर्शन लाल कर्ण, उपाध्यक्षमे योगेन्द्र साह नेपाली, सचिवमे भोला दास, निर्देशकमे वलराम प्रसाद राय, कोषाध्यक्षमे महेश साह आ सदस्यमे राम अशिष ठाकुर, मदन ठाकुर, राजेन्द्र अकेला, राजेन्द्र कुशवाहा, परमेश्वर साह, नवीन मिश्र, पुरुषोतम शर्मा आ देव नारायण जी रहथि। ओना मिनापक स्थापना सम्बन्धमे बैसार राजदेव मिश्रक अध्यक्षतामे जानकी पुस्तक भण्डारमे भेल छल। मिनापक उपलब्धि मिनाप जनकपुरमे मात्र नै नेपाल आ भारतक विभिन्न स्थानमे झण्डा गारि चुकल अछि। मैथिली सम्बन्धी कोनो नाटक वा सांस्कृतिक कार्यक्रम हुअए यदि मिनाप नै रहत तँ अपूर्ण लगैत अछि। फेर नव युवा युवती सभ सेहो ओइ रुपमे आएल अछि। अनिल चन्द्र झा, रविन्द्र झा, घनश्याम मिश्र, रंजु झा आ प्रियंका झा सनक कलाकार काइल्हो मिनापेक दिन छैक, तकर संकेत दऽ रहल अछि। फेर सांस्कृतिक टीमक एकटा फौजे मिनापक संग अछि। सुनिल मल्लिकक नेतृत्वमे प्रवेश मल्लिक, रमेश मल्लिक, नेहा प्रियदर्शिनी, संगीता देव, ललित कापर, शम्भु कर्ण, राम नारायण ठाकुर, दिगम्वर झा दिनमणि आदि छथि। मिनापकेँ सर्वनाम, रामानन्द युवा क्लव, सांस्कृतिक संस्थान काठमाण्डू सहित दर्जनो संस्था सम्मानित कएने अछि। तहिना सुनिल मिश्र, रमेश रञ्जन झा, मदन ठाकुर, रंजु झा, रेखा कर्ण सभ बहुतो बेर सम्मानित भऽ चुकल छथि। मिनापकेँ दू लाखक पुरस्कार: मैथिली भाषा, कला, साहित्य एवं सांस्कृतिक क्षेत्रमे काज करएबला अग्रणी संस्था मिथिला नाट्यकला परिषद जनकपुरकेँ फुलकुमारी महतो मैथिली साधना सम्मान पुरस्कार सँ सम्मानित करबाक निर्णय कएल गेल अछि । फुलकमारी महतो मेमोरियल ट्रष्ट द्वारा स्थापित ओ पुरस्कारक राशि दू लाख एक हजार रुपैया रहल, ट्रष्टक सदस्य सचिव एवं मैथिली साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षि जानकारी देलन्हि अछि । ट्रष्ट मिनापक अतिरिक्त फुलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कार राजविराजक मिना ठाकुर आ मोरङ्गक दयानन्द दिगपाल यदुवंशीकेँ देबाक निर्णय कएलक अछि। दुनू गोटेकेँ २५–२५ हजार रुपैया देल जाएत । गैर आवासीय नेपाली डा. उपेन्द्र महतो द्वारा अपन माय फुलकुमारी महतोक नाममे ट्रष्टक स्थापना कएल गेल अछि । पुरस्कारक सिफारिसक लेल मैथिलीक वरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र विमलक संयोजकत्वमे धीरेन्द्र पे्रमर्षि आ पुनम ठाकुर सदस्य रहल समिति गठन कएल गेल छल । डोमकछक २५म प्रस्तुति: मिनाप, जनकपुर द्वारा डोमकछक २५म प्रस्तुति देओपुरा, बेनीपट्टीमे दुर्गापूजा नवमीक रातिमे (२०११) भेल। मिनापक एकटा अओर योजना मिनाप अखन अपन भवन निमार्णमे लागल अछि। नाट्यशाला आ कार्यालय भवनक लेल नाटक मञ्चन कऽ रहल अछि। मिनापक प्राङ्गणमे अस्थायी नाटक घर बनाए टिकटमे प्रत्येक राति नाटक मञ्चन करैत अछि। मिनापक महासचिव अनिल चन्द्र झा कहैत छथि, भवनक लेल नाटक मञ्चनक क्रममे टिकटसँ प्राप्त भेल आमदनी आ अन्य व्यक्ति सभसँ सहयोग लेबए कऽ काज शुरु कएल गेल अछि। ओना पुस्तकक प्रकाशन दिस सेहो मिनाप आगाँ आएल अछि। डा. धीरेन्द्रक कथा संग्रह प्रकाशन कएलक अछि। तहिना जीवनाथ झाक कृति सेहो प्रकाशन करबाक निर्णय कएलक अछि। मिनाप अध्यक्ष सुनिल मल्लिक कहैत छथि- मिनाप मैथिलीक हरेक पक्षक लेल काज करैत रहत। अइमे डगमगाएत नै। मिथिलेश कुमार झा मैथिली नाटक प्रस्तुति (मधुबनी जिलाक पजुआरिडीह टोल)-ऐतिहासिक संकलन मधुबनी जिलाक पजुआरिडीह टोलमे १९५० ई. मे श्री कृष्ण नाट्य समितिक स्थापनाक संग नाट्य मंचन प्रथाक सुदृढ़ परम्पराक प्रारम्भ भेल जे श्री कृष्ण चन्द्र झा "रसिक"क नेतृत्वमे होइत रहल। १९६६ ई. मे "बसात" आ तकर बाद "चिन्नीक लड्डू"। १९७० ई. सँ श्री शिवदेव झा एकरा आगाँ बढ़ेलन्हि जे विद्यापति (१९६७), उगना (१९७०), सुखायल डारि नव पल्लव (१९७५), काटर (१९८०), कुहेस (१९८५)सँ आगाँ बढ़ल।

१९९० ई.सँ गाममे काली पूजा प्रारम्भ भेल, ओतए चारि रातिमे एक राति मैथिली नाटक श्री गंगा झाक निर्देशनमे हुअए लागल।

१९९०- बड़का साहेब - लल्लन प्रसाद ठाकुर १९९२- लेटाइत आँचर- सुधांशु शेखर चौधरी १९९३- कुहेस- बाबू साहेब चौधरी १९९४- समन्ध- कृष्णचन्द्र झा "रसिक" १९९५- बकलेल - लल्लन प्रसाद ठाकुर १९९६- उगना- ईशनाथ झा १९९७- अन्तिम गहना- रोहिणी रमण झा १९९८- आतंक- अरविन्द अक्कू १९९९- प्रायश्चित- मंत्रेश्वर झा २००१- फाँस- मूल बांग्ला एस. गुहा नियोगी, अनुवाद- रामलोचन ठाकुर २००२- राजा शैलेश- कृष्णचन्द्र झा "रसिक" २००३- अन्तिम गहना-- दोहरायल गेल २००४- उगना- - दोहरायल गेल २००५- किशुनजी- किशुनजी- मूल बांग्ला श्री मनोज मित्र अनु. रामलोचन ठाकुर २००६- कालिदासक बखान- ? २००७-लौंगिया मिरचाई- लल्लन प्रसाद ठाकुर २००८- पहिल साँझ- सुधांशु शेखर चौधरी २००९- कुहेस- - दोहरायल गेल २०१०- ताल मुट्ठी- अरविन्द अक्कू मुन्नाजीसँ रमेश रंजनक अन्तर्वार्ता १. अहाँक रचनात्मक प्रवृति कोना जागल ? पहिल बेर की लिखल, कि छपल ? हम लेखकसँ पहिने रंगकर्मी छलौं। मिनाप जनकपुरसँ संलग्नता छल। नाटक, ताहूमे अभिनयमे रमल रहै छलौं। मिनापक वातावरण साहित्यिक सेहो छलै। डा. धीरेन्द्र, डा. विमल सन गुरुक सानिध्य भेटल। मिनापक तत्कालीन अध्यक्ष योगेन्द्र साह नेपालीक अभिभावकत्व। ओइ कालखण्डमे श्यामसुन्दर शशि, धर्मेन्द्र झा, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, सुनील मल्लिक सन समकालीन मित्र रचना करऽ लागल छलाह। हुनका लोकनिक दवाबसँ हमहूँ किछु–किछु लीखऽ लगलौं। हमर पहिल रचना छल, कविता जकर शीर्षक छलै– कचोट, आ हमर पहिल कविते प्रकाशितो भेल छल जकर शीर्षक छलै–साकार। अइ कविताक नेपाली अनुवाद तत्कालीन नेपाल राजकीय प्रज्ञा–प्रतिष्ठानक पत्रिका समकालीन साहित्यमे प्रकाशित भेल छल। २. शुरुआतेसँ कथा लेखन केलौं? अओर की सभ लिखलौं अछि? नइ, कथा तँ हम बहुत बादमे लीखऽ लगलौं। “सगर राति दीप जरए” साहित्यिक क्षेत्रमे जागरण लाबि देने रहै। जबर्दस्त चर्चा भऽ रहल रहै। मुदा मैथिलीक केन्द्र जनकपुरमे आयोजन नइ भऽ सकल रहै। जनकपुरमे आयोजन लएबाक हेतु हमरा कथा लीखऽ पड़ल रहए। पन्द्रहम समारोह पैटघाटमे हम कथा लीख कऽ सहभागी भेलौं आ सोलहम समारोह जनकपुरमे हमरा संयोजकत्वमे सम्पन्न भेल। अओर विधामे लिखबाक बात छै तँ हम सभ ओइठामक लोक छी जइठाम संख्यात्मक रुपें लिखनिहारक अभाव रहलै। तें आवश्यकता अनुसार लिखबाक विवशता सेहो रहल। ओना कविता, कथा, नाटक, उपन्यास, आलोचना, वृतचित्र, फिल्म आ टेलीसीरियलक लेखन सेहो कऽ रहल छी। ३. अहाँक कथाक कथानक की रहैछ, आ ओकर मूल ध्येय की रहैछ? हमरा कथाक विषयवस्तुक लेल बौआए नइ पड़ैए। अपन परिवेश आ ऐ भितरक द्वन्दकेँ चिन्हित करै छी । ओकर सुख, दुःख, आनन्द, पीड़ा, संघर्षकेँ भोक्ताक रुपमे अनुभूति करै छी। एकटा चेतना हमरा निर्देशित करैत अछि ओ छै मार्क्सवादी सौन्दर्य चेतना। हमरा बुझने हमर साहित्यक ध्येयकेँ अओर स्पष्टीकरणक आवश्यकता नइ छै। ४. अहाँ अपन कथा लेखनक प्रारम्भिक दौरसँ अखन धरिक यात्रामे की परिवर्तन पबैत छी? विचारक स्तरपर खास नइ। प्ररम्भमे आवेश छल, अनियन्त्रित आवेश, आब थोड़े नियन्त्रणमे अछि। कहन शैली पहिनेसँ थोड़े परिपक्व बुझा रहल अछि। अर्थात शिल्प आ भाषाक स्तरपर थोड़े प््रभावशाली लेखन कऽ रहल छी, एहन सन बुझाइए। ५. नेपाली आ मैथिली कथा साहित्य मध्य मैथिली कथा कतऽ अछि ? दुनूमे समानता आ भिन्नता की छै? जे भारतीय मैथिलीमे हिन्दीक आगू मैथिलीक अवस्था छै। नेपाली राज्य संरक्षित भाषा छै। राज्य अपार संभावना बनौलकै ओइ भाषामे तें संख्यात्मक आ गुणात्मक दुनू रुपें पर्याप्त लेखन भऽ रहल छै। मैथिलीमे सेहो समकालीन कथा साहित्यक प्रतिनिधि कथा लेखन होइ छै, मुदा संख्या अत्यन्त न्यून छै। समानता आ भिन्नताक बात जहाँ तक छै तँ देश भितरक औपनिवेशिकताकेँ भोगि रहल अछि मिथिलाक लोक। ओ समानता चाहैए, नागरिक अधिकार चाहैए, मुक्तिक छटपटी छै मैथिली साहित्यमे। नेपाली शासक वर्गक भाषा छै मुदा नेपाली कथामे नेपालक प्रतिनिधि कथाक अभाव छै, ओ जातीय कथाक संकीर्ण घेरासँ बाहर नइ निकलि सकल अछि । ६. अहाँ रंगकर्मसँ सेहो शुरुएसँ जुड़ल रहलौं अछि। कि कोनो नाटको लिखलौं अछि? अहाँक विचारमे लेखन आ रंगकर्ममे सुलभ आ सम्प्रेषनीय ककरा मानैत छी? हँ, से तँ हम अपनो स्पष्ट कऽ चुकल छी। नाटक लिखलौं अछि। आधा दर्जनसँ बेसी मंचीय नाटक, ओतबे नुक्कड़ नाटक आ रेडियो नाटक सेहो खूबे लिखलौं अछि। हमर विचार कि सर्वमान्य विचार छै जे नाटक सुलभ आ सम्प्रेषनीय होइ छै, श्रव्य आ दृश्य गुणक कारण। ७.अहाँ अपन रंगकर्म मध्य अपनाकेँ कतऽ मानै छी ? अइमे मिनापक योगदान कत्ते मानै छी? अपना विषयमे मूल्याङकन करब कठिन होइ छै। नाटक अहूना समूह कार्य छै। तें समूहक सफलता–विफलतामे व्यक्तिक सफलता–विफलता जुड़ल रहै छै। जँ मिनाप सफल छै तँ हमहूँ सफल छी। हमरा रंगकर्मक प्रारम्भमे हमर गाम परवाहा आ हमर रंग–यात्राकेँ एतऽ धरि पहुँचाबऽमे सम्पूर्ण योगदान मिनापेक छै। ८. नेपाली रंगकर्मसँ मैथिली रंगकर्म स्तरीयताक मादे कत्तेक लग आ दूर अछि? विश्व रंगमंचक प्रयोग आ प्रविधिसँ नेपाल परिचित भऽ रहल अछि। नेपालसँ हमर अर्थ अछि कोनो खास भाषा नइ सम्पूर्ण नेपाल। जकरामे जहिना व्यावसायिक दृष्टिकोण छै, तकरामे रंगमंचीय ज्ञानक विस्तार ताही रुपें भऽ रहल छै। समकालीन नेपालक रंगमंच मध्य मैथिली अत्यन्त सम्मानित अवस्थामे अछि। मुदा नेपालीक तुलनामे मैथिलीक रंग समूह कम छै। नेपालीमे सेहो स्थायी स्वरुपक समूह बहूत थोड़ छै। मुदा एम्यचोर थिएटर कएनिहारक संख्या बहुत छै। तखन मिनाप मात्रक प्रतिनिधित्वसँ गर्व कएल जा सकैए। ९.मिनापसँ एखन सरिपहुँ अहाँक अटूट जुड़ाब देखल जा रहल अछि, एखन धरि अहाँ मिनापकेँ की देलिऐ आ मिनाप अहाँकेँ की देलक? जरुर! मिनाप हमरा सभ किछु देलक। व्यक्तिगत प्रगति आ सार्वजनिक जीवनमे सम्मानक कारण मिनाप अछि। देशक नाट्य सङ्गीत क्षेत्रक सर्वोच्च संस्था नेपाल सङ्गीत तथा नाट्य प्रज्ञा–प्रतिष्ठानक प्राज्ञ परिषद सदस्य आ नाट्य विभाग प्रमुखक नियुक्तिमे मिनापक सेहो मुख्य भूमिका छै। हम की देलिऐ तकर मूल्यांकन अन्य मित्र लोकनि करथि। हँ, एतेक जरुर कहब जे अपना जीवनक सर्वाधिक उर्जाशील समय मिनापकेँ देलिऐक अछि। १०. अहाँक अपना अगिला पीढ़ी (बेटी प्रियंका) केँ अइसँ जोड़बाक की ध्येय अछि ? की मिनापक कलाकार मिनापसँ (यथा फिल्म अभिनय) आगू जा सकल अछि? ( अपनाकेँ बाड़ि कऽ कहू) ओकरो हमरे जकाँ रंगकर्म करबाक इच्छा भेलै, हम रोकलिऐ नइ, बड़ु प्रोत्साहित केलिऐ। सामान्यतः ई कहल जाए जे हम रंगकर्मकेँ नइ तँ अछूत कार्य मानलिऐ ने निकृष्ट तें नइ रोकलिऐ। मिनापक कलाकार मिनापसँ आगू? ई कोना हेतै? मिनापक कोनो कलाकारक मिनापसँ आगूक ध्येय नइ छै। कलाक सम्पूर्ण साधना आ क्षमतमकेँ मिनापक हेतु समर्पित करऽ चाहैए मिनापक कलाकार। मिनापसँ आगू अपने फिल्म दिश संकेत केलौं अछि, तँ ई मान्यता हम स्वयं नइ रखै छी। नाट्य अभिनयसँ पैघ फिल्म अभिनय नइ भऽ सकैए। चर्चा आ व्यावसायिक सफलता आगू जएबाक मापदण्ड नइ छिऐ। ओना फिल्मसँ परहेज नइ छै मिनापक कलाकारकेँ। ओहो अभिनये छै। मिनापक अधिकांश कलाकार फिल्म क्षेत्रमे सेहो स्थापित अछि। मुदा मिनापक अधिकांश कलाकार फिल्मसँ बेसी नाटककेँ प्राथमिकता दैए। ११.मैथिली रंगकर्ममे तकनीकी सुलभताक कारण चुनौती अओर बढ़ि गेलैए? रंगकर्मक भविष्य की छै? जतऽ चुनौती छै ओत्तै संभावना छै। तकनीकक सुलभता तँ छै मुदा मैथिली रंगमञ्च ओइसँ परिचित भऽ रहल अछि कि नइ? सामान्यतः मैथिली रंगकर्म मध्कालीन अवस्थामे अछि। भौतिक पूर्वधारक अभाव छैके। मिथिलाक मूल भूमिमे रंग गतिविधि शून्य छै। अप्रवासी रंगकर्म कृतिम स्वाँस आपूर्ति मात्र छै। तें पाठ आ मंच दुनूक तकनीकी वैशिष्टयक निरन्तर अन्तरघुलन मैथिली रंगमञ्चक भविष्य निर्धारण करतै। १२. नेपालमे मैथिली साहित्यक भविष्य केहन देख रहल छिऐ, कत्ते दिन टिक पाओत? भविष्य बेजाए नइ छै। भाषिक चेतनाक स्तर उठलैए। खतरो ओतबे बढ़लैए। मुदा समग्रतामे बहुत चिन्ताजनक अवस्था नइ छै। कत्ते दिन टिक पाओत? एखन भविष्यवाणी नइ करी। ई मृत्युक समय निर्धारण जकाँ भऽ जाइ छै। भाषाकेँ मूर्त बनबै छै साहित्य कला तें ई मरब तँ स्वयंक मृत्यु छै एकर कल्पना नइ करी। १३. मैथिली साहित्यपर शुरुसँ जाति विशेषक बर्चस्व रहलै। आब झुण्डक–झुण्ड सक्रिय पिछड़ल समुदायक लोकक प्रवेशसँ एकर भविष्य केहन मानि रहल छी? ई यर्थाथ छै। मिथिलाक सामाजिक संरचना सामन्ती रहलै। कर्मकाण्डीय लोकक बर्चस्व। संस्कृतक विरुद्ध आम लोकक भाषाकेँ सिर्जनात्मक अभिव्यक्ति देबाक लेल मैथिलीक जन्म भेल छलै। मुदा संस्कृत पुनः अजगर जकाँ गछेर लेलकै। आम लोक अइ भाषासँ दूर होइत गेल। खाँटी मैथिली पिछड़ल वर्ग संगे छै। अधिकांश गाममे रहनिहार अइ वर्गक संग अभिव्यक्तिक हेतु दोसर भाषा नइ छै। संस्कारमे मैथिली छै। पूजा, पाठ, अनुष्ठान, गाथा सभमे मैथिली छै। कथित देव भाषाक प्रभावसँ बँचल अछि ओ समुदाय। तें सुच्चा मैथिल जँ मैथिलीक नेतृत्वमे आगाँ अबैत अछि तँ अइसँ आह्लादकारी अओर की हेतै? १४. की मिनाप जाति–पाँतिक फाँट मध्य टीकल अछि? की ओहो कोनो द्वन्द्वक शिकार अछि? नेपालमे अखन ई विषय प्रवेशे केलकै अछि। सामान्यतः ई बहसक विषय छै। बहस करब समस्याकेँ निरुपण करब छिऐ। कोनो गम्भीर द्वन्द्व नइ छै मिनापमे। १५.अन्तमे अपन पछिला आ नवका रचनाकार, रंगकर्मी केँ की कहऽ चाहब अहाँ? कोनो खास नइ। बहुत किछु कहि चुकल छी, आब कहब आवश्यक नइ छै। अनेरो उपदेश नइ छाँटल जाए। सरोज खिलाड़ी, नेपालक पहिल मैथिली रेडियो नाटक संचालक। बोतल राम/ सोच/ ललका कपड़ा बोतल राम (मैथिली एकल नाटक )

स्टेज एकटा सड़क अछि, जइ सड़कपर कोनो व्यक्ति गरीबक संकेतमे कपड़ा पहिरने सुतल अछि। कनीक देर तक सुतलाक बाद भोर होबऽके संकेत भेटिते ओ व्यक्ति उठैत अछि। उठलाक बाद अपना झोरासँ एकटा दारुक बोतल निकालि कऽ कुल्ला-आजा करैत अछि। कुल्ला-आजाक पश्चात अपना आगाँमे एकटा दारुक बोतल राखि कऽ अपना झोरा सँ दुऽटा अगरबत्ती, फुल-चानन निकालि कऽ पुजा-आजा करैत अछि जइ पूजामे आरती-बन्दना नेपथ्यसँ शुरु होइत अछि। (नेपथ्यसँ) हमरा अपन दारुए अमृत लगैय (कोरस)–हमरा अपन दारुए अमृत लगैय (नेपथ्यसँ)–हमरा सगुने आ सन्तरा मैगडल लगैय (कोरस)–हमरा सगुने आ सन्तरा मैगडल लगैय (नेपथ्यसँ)–हमरा अपन दारुए अमृत लगैय (कोरस)–हमरा अपन दारुए अमृत लगैय (नेपथ्यसँ)–जुरैय दुधिया तँ नै चाहि भरजीन (कोरस)–जुरैय दुधिया तँ नै चाहि भरजीन (नेपथ्यसँ)–दोसर जकाँ नै चाहि मैगडल जीन (कोरस)–दोसर जकाँ नै चाहि मैगडल जीन (नेपथ्यसँ)–हमरा जीवनक रक्षा करऽबला (कोरस) हमरा जीवनक रक्षा करऽबला (नेपथ्यसँ)–हमरा दुधिएक बोतल भगवान लगैय (कोरस) जय होकककककक (नेपथ्यसँ)–हमरा अपन दारुए अमृत लगैय

आरतीक पश्चात पूजा कएने दारुक बोतलकेँ प्रसाद मानिन कऽ ग्रहण करैत अछि। पी लेलाक बाद.. व्यक्ति ः–(शीसी फेकैत) साले, दुइए घोटमे खतम भऽ गेलै। नेपथ्यसँः–(हँसैत) चालनि दुसलक सुपकेँ जकरा ७२ गो छेद। व्यक्ति ः–(मुँह दुसि कऽ हँसैत) बाप जन्ममे नै छै कहियो हँसने, वै कुता, हँसि ले कि बाजि ले। (डेराइत) वै, तोँ के छेँ रे? नेपथ्यसँः–(गंभीर स्वरमे) हम छी दारु महराज। व्यक्तिः–(सोचैत) दारु महराज, कोन देशक राजा? नेपथ्यसँ: राजा नै रे मूर्ख। तोहर दुश्मन । व्यक्ति: हमर दुश्मन? हमर दुश्मन तँ केउ भइए नै सकैए। नेपथ्यसँ: संसारमे एहन कोनो व्यक्ति नै जकर दुश्मन नै छै। व्यक्ति: मुदा हमर दुश्मन? असम्भव। नेपथ्यसँ:–हम छियौ ने। व्यक्तिः–(डेराइत) तोँ के छेँ? नेपथ्यसँ: हम वएह छी जे तोरा सन–सनकेँ खोजैत रहै छै। व्यक्ति: (भगैत) पु–पु–पु–पु–पुलिस–पुलिस–पुलिस। नेपथ्यसँ: रुक, पुलिस नै, दारुऽऽ। व्यक्ति: (हँसैत) दाऽऽरु। तखन तँ ताें हमर दोस भेले दोस। नेपथ्यसँ:–(जोरसँ) किन्नौ नै। दोस्त रहितियौ तँ हमरा पीलाक बाद हमर शीसीकेँ गारि पढ़ि कऽ नै फेकितेँ।

व्यक्ति: दु तोरी के, वोतबा टा कऽ बात ला। नेपथ्यसँ:–बात कहुँ छोट भेलैए। बिना इरखा के मनुष्य की, बिना बिख के साँप की? व्यक्ति: वै, तँ तोँ हमरापर पिताइए कऽ कथी कऽ लेबे? नेपथ्यसँ: कऽ लेबौ नै कऽ देलियौ। व्यक्ति: (सोचैत) कऽ लेबौ नै कऽ देलियौ, वै कुता, कथी रे? नेपथ्यसँ: भिखमंगा (हँसैत) भिखमंगा, भिखमंगा। व्यक्ति: (कटहसीसँ) भिखमंगा ओहूमे हमरा? तों पागल छेँ, बुझि गेलियौ, नामलोली। नेपथ्यसँ: सोच, कनीका गंभीरसँ सोच। व्यक्ति: हटा सोच फोच, हमरासँ बेशी काबिल के छै एतऽ? नेपथ्यसँ: काबिल नै, तोँ मुर्ख छेँ, माहामुर्ख । व्यक्ति:–(गंभीरसँ दारु पिबैत) हम मुर्ख नै छी। नेपथ्यसँ: मुर्खक लक्षण तँ ताें अखनो देखा देलहीं जे कनीके टा के सोचऽ बला बातमे तोँ हमरा पिबऽ लगले, रे बुद्घि के मारल, हमरा पिलासँ हम ककरो समस्याक सामाधान नै कऽ दै छिऐ। व्यक्ति:–टेढबात नै बाज, जे कहऽ के छौ सोझसँ बाज। तोरा सन-सनकेँ अखनो दुटाकेँ देखबउ, बुझलिही की? (छाती ठोकैत मुँहे भरे खसैत) नेपथ्यसँ:–(हँसैत) देखतै हमरा सन-सनकेँ आ गिरलैए मुँहेभरे। व्यक्ति: (गंभीरसँ) गिरलियैए नै, डान्स कैलीयैए, बुझलही कि। नेपथ्यसँ:–डान्स की करबे, दैव के कपार, भिखमंगा कहीं के। व्यक्ति: (गंभीर भऽ कऽ) हम भिखमंगा कोना कऽ छी? नेपथ्यसँ:–कोना नै छेँ, रे रहऽ बला घर-घरारी सभ बिका देलियौ। तोहर खनदानकेँ उकटा देलियौ, प्रतिष्ठाक नास कऽ देलियौ, छोट–छोट भाइ सभसँ पिटबौलियौ। तोरा हम सड़कपर आनि देलियौ। (हँसैत) सड़क छाप।

नेपथ्यसँ गीत– आब हम जिनगीमेऽऽऽऽ दारुकेँ कहियो हाऽऽथ नै लगाएब-–२ घर बिका गेल घरारी बिका गेल, समाजमे प्रतिष्ठा सर कुटुम दोस्त महिम सँ खतम भेल घनिष्ठा आब हम जिनगीमे दारुकेँ कहियो .... नै लगाएब ४

व्यक्ति: (गंभीर भऽ कऽ) हम भिखमंगा, मुर्ख, चपाट छली, मुदा आब नै। ठीक कहलेहँ तोँ, तोरे कारण हमर घर-घराड़ी सभ तहस-नहस भऽ गेल। तोरा सन-सन नुका कऽ कऽ रहल समाजक बरबादीकेँ आब हम चिन्ह लेलौं। तोरा नै पिबऽ के लेल हमरा के नै समझौलक, सर–कुटुम, माय-बाप, भाइ-बहिन, समाज। सभकेँ सभ हमरा समझबैत–समझबैत थाकि गेल मुदा हम अपन थुथरइ नै छोड़लौं। तोहर बातसँ आइ हमर आँखि खुलि गेल। किए? किए तोँ समाजमे रहै छेँ? (चिचिआइत, छाती ठोकि कऽ कनैत) कतेककेँ विधवा आ कतेककेँ बविलटुवा बना देलहीं तोँ। मुदा आब नै। आइ तोरा हम खोजि कऽ समाजेसँ हटा देबौ। नेपथ्यसँ:–(खुब हँसैत) हम तोरा नै भेटबउ। व्यक्ति: हम तोरा खोजि कऽ रहबौ। नेपथ्यसँ:–(व्यंगसँ) हम तोरा नै भेटबउ। व्यक्ति: देखै छियौ ताें कोना नै भेटै छेँ। नेपथ्यसँ:–(व्यंगसँ) बच्चा, हम तोरा नै, नै भेटबउ।

(व्यक्ति चारु दिस खोजै छथि, खोजलाक बाद अपन कमीज फाड़ै छथि। वएह व्यक्तिक पुरा देहमे रंग बिरंगक दारु बान्हल रहै छै। जनौ मे सेहो २-४टा दारु बान्हल रहै छै, फेर ओ फटलका फुलपेन्ट सेहो निकालै छथि। हुनका जांघ आ छाबामे सेहो दारुक बोतल सभ बान्हल रहै छै। ओ सभटा दारुक शीसीकेँ ओही ठाम फोड़ै छथि। तखन नेपथ्यसँ खुब कानऽ के, चिचिआइके आ छटपटाइके अवाज अबै छै। व्यक्ति शीसी फोड़ैत फ्रिज…..) सोच (भैसा गामक बेरोजगार मुदा राजनीतिक पार्टीक सदस्य छथि। भैसा टेढ़-टेढ़ बात करऽमे माहिर मुदा सत्य आ इमानदार पात्र छथि, मतलब भैसा मजकिया छथि। आइ भैसा सभटा काम छोड़ि कऽ परसू बरियाती जाइ कऽ तैयारीमे जुटल छथि।) भैसाः— (गंभीर मुद्रामे क्यालकुलेटर आ कापी पेन लऽकऽ) कम सँ कम कएटा रसबरी हम खा सकै छी? फेर अओर २ मिठाइ सेहो खाइ कऽ अछि हमरा। रसबरी कनीका घटाबऽ पड़लै। दोसर कागजमे… (सोचैत) लगभग रसबरी २२० पिस मात्रे, लालमोहन तँ की खाउ? कम्मेसम खबै ११० पिस, लड्डु तँ के पुछै छै? मात्र ८० पिस। आ अओर –अओर मिठाइ मिला जुला कऽ ६० गो। दही नै खबै, मन खराब भऽ जाएत, नामक लेल मात्रे खबै, मात्र २–३ तौला। (अचानक) जा ककक। हिसाब जोरऽके चक्करमे तँ काला नुन आ जमाइनक फक्की खाइ के बिसरि गेलीऐ। (पुरिया निकालैत) जल्दी सँ खा लू। दू दिनसँ भुकले छी, मिठाइ खाएला जल्दी सँ काला नुन, जमाइन खा लू, तखन ने हिसाब किताब चुक्ता होतै। दू दिन आरो बाकिए छै, जम्मा चारि दिन भुकले रहऽ पड़त। ठिके छै, लेकिन मिठाइ नै छोड़बै। (पुरिया निकालैत) एक बेर फेर काला नुन, जमाइन खा लू। (ताबतेमे गामक छौड़ा पचासग्राम हड़बड़ाइत दौगैत भैसा लग अबैए आ..) पचासग्रामः— (हड़बड़ाइत) होउ भैसा, भैया होउ भैसा, भैया। भैसाः— (रजका फटकारैत) हइ, कथीला बाप—बाप चिचिआइ छे? कथी भेलौअ आइ? पचासग्राम (हकमैत)ः— तोरा माइकेँ तीन-चारि गो हथियारधारी छौड़ा सभ पकड़ि कऽ लऽ गेलौहँ। भैसाः— (औगता कऽ कनैत) हथियारधारी पकड़ि कऽ लऽ गेलैए? हे भगबान, आँइ रे, केमहर गेलैए उ सभ? पचासग्रामः— नदी दिसन गेलैए। भैसाः— नदी दिसन? वएह दिन आइल रहै ५—७ टा छौड़ा सभ चन्दा लेबऽ। तँ नै देलिऐ, पक्के ओहे सभ होतै। हम कोनो नै चिन्हने छिऐ? ठिक हइ, हम ओकर सबहक अड्डेपर जाइ छिऐ। देर करबै तँ कि होतै नै होतै। पचासग्रामः— हम तँ कहै छियौ नै जा, फोन—तोन करतौ तँ फोनसँ बात कऽलिहऽ। भैसाः— हइ, फोनक भरोसे बैसु? हट, हमरा जाइ दे। (भैसा हड़बड़ाइत दौगैत नदी तरफ जाइ छथि आ अड्डापर भैसाकेँ १टा हथियारधारी पकड़ि कऽ पुछैए।) हथियारधारीः— हइ, के छे तोँ? भैसाः— भैसा। तोँ सभ हमर माइकेँ अपहरण कऽ कए लैले हँ। बता हमर माइ काहाँ हइ? (हथियारधारी भैसाकेँ पकड़ि कऽ वएह ठामक इन्चार्ज लग लऽ जाइत अछि आ..) हथियारधारीः— हजुर, ओ बुढ़िया भूमी देवीके बेटा यिहे हइ। माइकेँ छोड़ाबऽ आइल हए। भैसाः— इन्चार्ज साहेब, हमरा माइकेँ छोड़ि दु। हम सभ तोहर कथी बिगारने छियौ? इन्चार्जः—(बजबैत) रे अग्नी? अग्नी ः— जी। इन्चार्जः— रे वएह दिन चन्दा माँगऽ गेले तँ कथी कहलकौ ई छौड़ा? अग्नीः— कहे, भगवान हाथ पएर नै देने छौ कमाइला? इन्चार्जः— सभकेँ अपन—अपन काम छै, हमर सभकेँ कामे छै अपहरण कर के, मारि के पिट के। (भैसापर तकैत) सुन छौड़ा, ५० हजार लऽ कऽ आ। आ माइकेँ लऽ जो। आ सुन, आइ दिनसँ ऐठाम नै अबिहे, हम सभ अपने फोन करबौ। भैसाः— लेकिन हमरा लग पाँचो सय रुपैया नै हइ। हम गरीब आदमी तोरा सभकेँ कतऽ सँ ओते रुपैया आनि दियौ? इन्चार्जः— तखन एकटा काम कर, तोँ अपन मतारीसँ हाथ धो ले। जो चलि जो घर, तोरा मतारी केँ चालिस टुकरा कऽ कऽ बोरामे बन्द कऽ कऽ नदीमे फेक देबौ, कुता-नढ़ियाक पेट भरि जएतै। भैसाः— (पित सँ) रे मरदाबा के बेटा छेँ तँ फरचीया नऽ ले अकेले अकेले। बन्दुकक बलसँ हिम्मत दखबै छेँ कायर। इन्चार्जः— की रे? तोँ हमरा चुनौती देले हँ। रे तोरा सन सन चारि टाके हम अकेले उठा कऽ फेक सकै छी, आ खेलबे, आ। भैसाः— ई तोँ अपन सभ कुताकेँ कही, कि तोँ जे हारबे तँ हमर माइकेँ छोड़ि देतौ आ गोली नै चलेतौ। इन्चार्जः— (हँसैत) सुन ले रे छौड़ा सभ, ई जीत जएतै तँ केउ गोली नै चलबीहे। बुझले? (इन्चार्ज भैसाक माय लग जा कऽ) इन्चार्जः— बुढ़िया, तोहर बेटा हमरा फरचियाबऽ के धमकी देलकौअ। (भैसापर तकैत) समझ ई गेलौ? मायः— नै ओ जएते, नै तोँ जएबा, आ कहु जएबे करबा तँ सुन कऽ होतै हमरे कोख, कोनो मायक कोख। इन्चार्जः— बुढ़िया, तोँ भावनात्मक बात नै कर, मारि देख मारि। (इन्चार्ज आ भैसा मारि करबाक लेल भीड़ि जाइत अछि। इन्चार्ज भैसाकेँ एक मुक्का दऽ कऽ मारिक शुरुआत करैत अछि। इन्चार्जक मुक्का भैसाकेँ लगिते भैसाक माय आह कऽकऽ कहि कऽ चिचयाइत अछि आ भैसाक मुक्का इन्चार्जकेँ लगिते फेरु भैसाक माय आह कऽकऽ कहिकऽ चिचियाइत छथि। भैसाक मायकेँ चिचयाइत सुनिकऽ सभ आदमीक ध्यान ओकर मायक तरफ जाइत अछि।) इन्चार्जः— गइ बुढ़िया, हम ओकरा मारलिऐ यऽ आ ओ हमरा। लेकिन तोहर मुहसँ खुन कथी ला निकलै छौ? माय:- हम तखनीए कहलियौ कि केउ मारतै ककरो तँ चोट हमरे लागत। इन्चार्जः— (हँसैत) सुनही रे ई छौड़ा सभ, पिटतै हमरा, चोट लगतै एकरा। (सभ केउ हँसै छथि।) (मारि फेरु शुरु होइत अछि। एमकी बेरक मारि लगातार पाँच मिनट चलैत अछि। पाँच मिनट तक माय आह कऽकऽ आह कऽकऽ चिचयाइत छथि। माय पाँच मिनटक बाद बेहोस भऽ कऽ खसि पड़ैत छथि। तखन…) इन्चार्जः—(माय तरफ देखैत) बाप रे, भैसाक मायके मुँहसँ खुने-खुन निकलल छै। ई कोन आश्चार्य भेलै? चोट बास्तवमे एकरे मायकेँ लगलैए। भैसाः— आब कथी तोहर माय आ हमर माय। तोरो पिटलियौअ तँ चोट लगलैए हमरे मायकेँ। तखन तँ हमर तोहर सभक माय भेलै नै? इन्चार्जः— अच्छा, एकटा बात, ओइ छौड़ाकेँ पिट कऽ देखिऐ, एकरा चोट लगै छै कि नै। (इन्चार्ज एकटा छौड़ाकेँ पिटै छथि। मुदा छटपटाइत अछि भैसाक माय। इन्चार्ज डरसँ ओकर मायक पएर पकड़ि कऽ कनैत कहै छथि..) इन्चार्जः— माय उठू, हमरासँ गलती भेल, माफ करु। अहाँ तँ पुरे नेपालक माय छी। हमर सोच गलत छल। सभक माय एके होइ छै। ककरो बेटा आ घरबला मरै छै तँ दुख होइ छै मायकेँ, नेपाल मायकेँ। हमसभ, सभ मधेशी, हिमाली आ पहाड़ी जनता एके मायक सन्तान छी। आइसँ हम ककरो अपहरण नै करब आ ककरोसँ चन्दा नै मँगबै। (कनैत.. हमरा माफ कऽ दिअ.. बजैत अछि।) ललका कपड़ा पहिल दृृश्य (रबिन्द्र बाबुक दलानपर बेटीबला आएल छै अपन बेटीक विवाहक लेल बातचीत चलाबऽ ला। दलानपर रबिन्द्र बाबु आ लिलाम्बरजी-बेटीबला- विवाहक बातचीत चला रहल छथि।) रबिन्द्रजी: (समझबैत) देखियौ, अहँा सँ सम्बन्ध करबाक लेल हम एकदम तैयार छी। अहाँक घरमे हम अपन बेटाक सम्बन्ध करब ई तँ सपनोमे नै सोचने छलौं। लिलाम्बरजी: नै–नै, अपने ई की कहल जाइ छै, अपनेसँ हम कुटमैती करब ई तँ हमरा लेल अहो भाग्य अछि। हम आइ बहुत खुश छी। रबिन्द्रजी: मुदा एकटा बात। लिलाम्बरजी: (घबड़ाइत) कोन बात? रबिन्द्रजी: हमर इच्छा अछि कि आन विवाहसँ या कही दोसर गाउँक विवाहसँ कनेक हटि कऽ अपन बेटाक विवाह करी ताकि लोको कहए कि हँ, रबिन्द्र बाबु किछु नाँयापन देखेलखिनहँ अपन बेटाक विवाहसँ। लिलाम्बरजी: कहल जाय ने तँ केहन नयाँपन? रबिन्द्रजी: देखियौ, विवाह दानमे कतौ देब लेब नै होइ छै, मुदा ऐ विवाहमे हम अहँा देब लेब करु। लिलाम्बरजी: देब लेब? (घबड़ा कऽ) केहन देब लेब? रबिन्द्रजी: (मजाक कऽ कऽ) केहन देबलेब, किछु दऽ दिअ, ५ छिट्टी मकै दऽ दिअ। मरुआ दऽ दिअ, धान दऽ दिअ, जइसँ सारा गाँउमेे ई हल्ला चलै कि फलना गाँउमे फलनाक घरमे बिवाहमे धान,मकै मरुआ सन चीज लेलकैए। लिलाम्बरजी:–(हँसैत) मकै, धान, मरुआ, ठीक छै कोनो बात नै, हम अहँाकेँ देबा कऽ लेल तैयार छी। चलू, ओमहर जा कऽ बातचीत करै छी। (दुनू आदमी उठै छथि आ आगाँ बढ़ै छथि।) रबिन्द्रजी: हमरा बिचारमे अगिला महिनामे विवाहक दिन राखल जाए। लिलाम्बरजी: जी, हमरो बिचार सएह अछि। (ओ सभ बातचीत करैत आगाँ बढ़ैत छथि। रस्ताामे एकटा घैला राखल रहैए। घैलामे कोनो राक्षसक मुँह बनाओल रहै छै। रविन्द्र बाबु बातचीत करबाक क्रममे वएह घैलाकेँ लातसँ मारै छथि आ ओ घैला फुटि जाइ छै। घैला फुटिते एकटा तुरन्तेक जन्मल मुदा आन बच्चासँ फराक किसिमक बच्चा निकलैए आ जोर-जोरसँ हँसऽ लगैए। हँसैत-हँसैत ओ बच्चा‍ उड़ि जाइ छै आ जा कऽ बैसै छै एकटा पहाड़पर।) नेपथ्यसँः–(ऐ प्रकारसँ गाउँ गाउँमे विवाहमे किछु लऽ कऽ विवाहक उत्सव मनेबाक चलन चलऽ लागल आ जन्म‍ल( बच्चाक अवाजमे) दहेज..दहेज..दहेज..।) दृश्य २ (गाउँक दृश्य अछि। साँझक समय बस्तीसँ कनेक आगाँ खेत दिस ३ टा युवा मदिरा सेवन कऽ कऽ एक दोसराक बातकेँ काटऽ पर भिड़ल छथि।) युवा १:–सुन हमर बात। हम ओहिना नै दारु पिलियौअ। अपना गाउँक खपटी बुढ़िया जे छौ ने, उ बुढ़िया चलैत-चलैत गीर पड़लैए। हमरा दाया लागि गेल आ जा कऽ ओकरा हम उठा देलियौअ, ओइ कऽ बाद ओ बुढ़िया हमरा कथी कहलक से बुझल छौ? युवा २ आ ३: (एक्केबेर)–कथी? युवा १: धन्यबाद बौआ। जहिना तोँ हमरा उठा देलेहँ, तहिना भगवान तोरो उठा देथुन। हमरा जे भगवान उठा देतै तँ हमर बाल-बच्चाकेँ के पोसि देतै? युवा २: तोहर दुख कोनो दुख नै छौ हमरा दुखक आगाँमे। सुन, हम कथी ला मदिरा सेबन कैलियौअ। हमरा घरमे एतेक मच्छर छौ। राइतमे जे हम सुतऽ जबौ, हमरा उ मच्छर सभ एतेक माया करतौ, एतेक माया करतौ कि की कहियौ। सभ मच्छर सभ मिल कऽ हमरा उठा कऽ घरक खपरा छुआबऽक प्रयास करतौ, ओमहर उड़ीस सभ मिल कऽ हमरा भीतरसँ जोरसँ पकड़ने रहतौ। बलु नै लऽ जाए देबौ। बातो ठीके हइ। मच्छर सभ जे हमरा लऽ जाएत खपड़ा छुआबऽला आ कहूँ ऊपर छोड़ि देलक तँ हम तँ गेली हाबा खाए। देह हाथ टुटि जाएत। धन्यवाद दै छी ओइ उड़ीस सभकेँ जे कमतीमे पकड़ने रहैए। राइत भरि ऐ मच्छर आ उड़ीसक लड़ाइसँ तंग भऽ कऽ हम मदिरा सेबन कैलीयौअ। युवा ३: तोहर दुनुक समस्यामे तँ–किछु नै छौ हमरा सामनेमे। (घोड़ाक अवाज अबैत अछि। तखने एकटा युवक जोर-जोरसँ बाजऽ लगैए। भागू-भागू दहेज आबि रहल अछि। हौ काका, हौ भागऽ होउ, गे दाइ गे, भाग गइ मंगलाक माइ, गे भाग गइ, दहेज आबि रहल छौ। गाउँमे कुताक भुकनाइ तक बन्द। तखने राक्षस सन मनुष्य सभक घोड़ापर प्रवेश होइत अछि। १ टा राक्षस आगाँ-आगाँ आ ६-७ टा राक्षस पाछाँ-पाछाँ घोड़ासँ अबैत अछि।) दृृश्य ३ – (राक्षस पूरा गाउँपर नजर फेरैत बजैए।) दहेज:–दहेजक ऐ गाउँमे अबिते कुताक भुकनाइ बन्द। सुन गँउवा सभ तोरा सभकेँ साइत हमरा नै समझाबऽ पड़त कि, जे हमर बात नै मानै छै  ओकर की हाल होइ छै। जखन हम सभकेँ कहि देने छियौ कि ऐ गाँउमे, पूरा देशमे, संसारमे यदि ककरो विवाह होतै तँ देब-लेब होबहीके चाही। ओइकऽ बाद सभसँ पहिले हमरा न्यौाता परऽके चाही, मुदा ऐ गाउँके चलितरा हमरा अपन माउस खाइके लेल नेयौता देलक? (बजबैत) हिरिङगा। (पाछाँसँ घोड़ापर बैसल एकटा राक्षस..) हिरिङगा: भगवान। दहेज: चलितराक घरमे जो, ओकरा पिटैत निकाल। (हिरिङगा चलितरकेँ पिटैत, धकियबैत निकालै छै आ घरक लोक चलितरकेँ छोड़ाबऽ लेल हाथ-पएर जोड़ैत, कनैत निकलैए।) हरिङगा: (दहेजसँ) भगवान, सार आबऽके लेल मानिते नै छल। दहेज: – हिमऽऽत। की रे चलीतरा, बेटाक विवाह मंगनीएमे करै छेँ, नइ? हमरा न्यौता तक नै पठौलेँ। (घोड़ापर सँ उतरैत घेटकेँ तरबारसँ उठबैत..) दहेजः–हरिङगा। हरिङगा: जी भगवान। दहेज: लाद एकरा घोड़ापर आ लऽ चल। आइ एकरे माउस आ मकैक भुटन चलतै। (घोड़ापर लदैत ओकर घरक लोककेँ लातसँ मारैत घोड़ापर बैसैए हरिङगा।) दहेज: याद कऽ ले गउवाँ सभ, जे अपन बेटाक विवाह बिना दहेजक करबेँ तकर यएह हाल होतौ। (प्रस्थान) दृश्य ४ (नेपथ्यसँ: समए बितैत गेल। बहुतो मरल, बहुतो बिलटल आ बहुतो बरबाद भेल दहेजक कारण। समय परिवर्तन होइत गेल।ं) (किछ युवा सभ क्याम्पमसक प्राङगनमे बैस कऽ छलफल करैत..) युवा १: आखीरमे कहिया तक चलतै ऐ दहेजक मनमानी। गाउँमे आबि कऽ ककरो पीटै छ,ै ककरो मारै छ,ै धमकबै छै दहेज लेबाक लेल। ऐ दहेजक कारण कतेको बेटी कुमारि बैसल छै। कतेक आत्महत्या कऽ लेलकै आ कतेक डूमि कऽ मरि गेलै। आखीर हम अहाँ सभ नै भिरबै तँ ई अत्याचार दिनक दिन बढ़ल जेतै। एकरा रोकऽ पड़तै। युवा २: खाली विचार कैलासँ किछि नै हएत। हम तँ कहै छी चलू अखन आ सभ केउ मिल कऽ ओइ दहेजक कपाड़-हाथ फोड़ि दै छी। युवा ३: नै–नै। औगता कऽ निर्णय नै कर। युवा २: अरे, भाड़मे जाए तोहर सल्लाह। (युवा तरफ) रे, ई, चल अखन सारक कपार-हाथ फोड़ि दै छिऐ। (किछु युवा सभ युवा २ क साथमे पाछाँ-पाछाँ जाइ छथि।) (दृश्‍य ५) (दहेज अपन अंगरक्षकक साथ पहाड़पर थारमे माउस राखि कऽ खाइत रहैए।) दहेज: (हँसैत) चलितराक माउस बड़ी स्वादिष्ट छौ रौ? बड नीक माउस छौ आइके। (तखने युवा सभ द्वारा दहेजपर आक्रमण होइत अछि। एकटा युवा दहेजकेँ चेरासँ १०-२० बेर कपारपर मारै छथि मुदा दहेजकेँ किछु नै होइत अछि। दहेज हँसैत रहैए। बल्कि दहेज २-३ टा युवाकेँ पकड़ि कऽ मारि दइ छै आ किछु युवा भागि जाइत अछि।) दृश्य ६ (फेरसँ किछु युवा सभक जमघट बैसल अछि।) युवा १: ओइ राक्षसकेँ कतबो मारलकैए कपारपर, किछु नै भेलैए। हमरा बुझाइए, मारला पिटलासँ ई दहेज हटऽबला नै छौ। युवा २: मारला-पिटला सँ कहाँदुन रे, ई ओकरा तरवारसँ मारलिऐए ५-६ बेर, तैयौ नै किछु भेलैए। युवा ३:–हमरा बुझाइए नै–तँ ई हटतै, नै तँ कटतै, नै तँ मरतै। युवा ४: हमरा लग एकटा उपाय छौ। (सभ युवा एक्केबेर..) युवा सभ: कोन उपाय? (युवा ४ एकटा युवाक कानमे किछु कहै अछि, ऐ प्रकारसँ सभक सभ एकदोसराक कानमे किछु कहै छथि।) दृश्य ७ (एकटा युवा दहेजक पहाड़पर जा कऽ कनीका दूरेसँ दहेजकेँ अकेले-अकेले फरछियाबऽ लेल– धमकी दै छथि। बाँकी १०-१२ टा युवा नुकाएल ढुक्का लागल रहै छथि।) युवा: रे, ई दहेज रे, मर्दाबा के बेटा छेँ तँ आ, अकेले-अकेले फरछिया ले। रे दहेज लै छै काहाँ दुन। माइ करै कुटाओन पिसाओन, पुत के नाम दुर्गादत। कोढ़िया। आ अकेले, देखै छियौ कतेक मायके दुध पीने छेँ। बत्तीसो दाँत नै तोड़ि कऽ हाथमे धड़ा देलियौ तँ देखिहेँ। दृश्य ८ (दहेज गरम लोहा जकाँ लाल भऽकऽ सभटा अंगरक्षक राक्षसकेँ आदेश दै छथि।) दहेज: हम एकरा मारि कऽ अबै छी। तोँ सभ ऐठाम रह। (दहेज अकेले दौड़ै छथि युवाकेँ मारै ला। युवा भगैत-भगैत कनेका दूर लऽ जाइत अछि। तखने १०-१२ टा युवा आदर्श विवाह लिखल बड़का लाल बैनर लऽकऽ अबैए। दहेजक ओ बैनर देखैते ओकर होस उड़ि जाइ छै। दहेजक अंगरक्षक सभ हमला करै छथि युवा सभपर, मुदा युवा सभ केउ अपना जेबीसँ रुमाल निकालै छथि तँ केउ शर्ट खोलि कऽ गंजी मात्र पहिर कऽ ठाढ़ भऽ जाइ छथि। तहिना केउ बैनर पकड़ने रहैए। गंजी आ रुमालपर आदर्श विवाह लिखल रहै छै। ओ देख-देख कऽ सभ राक्षस सभ, केउ घेट पकड़ि कऽ तँ केउ तलमला-तलमला कऽ चिचिया-चिचिया कऽ मरि जाइत अछि। दहेज भागऽ लगैए पहाड़ दिस। सभ युवा सभ दहेजकेँ खेहारऽ लगैए। खेहारैत-खेहारैत दहेजकेँ पकड़ि कऽ आदर्श विवाह लिखल ललका कपड़ासँ दहेजकेँ झाँपि सै छै आ ललका कपड़ाकेँ हटेलाक बाद ओइ ठाम छाउर मात्र रहै छै। जइकेँ देख कऽ युवा सभक मुखपर मुस्काैन आबि जाइ छै। ओ सभ आदर्श विवाहक ललका कपड़ा लऽकऽ अगाँ बढ़ैत फ्रिज भऽ जाइ छै।) किशन कारीगर आब मानि जाउ ने (हास्य रेडियो नाटक) परिचय पात:- राजेश- नायक। कमला- नायिका-राजेशक पत्नी उर्फ पाहीवाली। मनोहर- राजेशक लंगोटिया दोस्त। विमला- मनोहरक पत्नी उर्फ ठाढ़ीवाली। नीलू- विमलाक सहेली। सोनी- नीलूक सहेली। मदन- दोस्त। प्रथम दृश्य ध्वनि संगीत कमलाः- (कनेक तमसाएल भावमे) मारे मुँह धऽ कऽ, आब बाट तकैत-तकैत मोन अकछा गेल। हिनका किछु अनबाक लेल नै कहलियैन कि एकटा आफद मोल लऽ लेलौं। तखने राजेशक प्रवेश राजेश:- (दारूक निशामे बड़बड़ाइत) हे यै पाहीवाली, कतए छी यै, एम्हर आउ ने यै पाहीवाली। कमला:- (खूम खिसियाएल भावमे) लगैत अछि जेना पूरा अन्धरा बजारे खरीदने आबि रहल छथि। तइ द्वारे अन्हराएल छथि। राजेशः- हे यै पाहीवाली, अहाँ जुनी खिसियाउ। एकबेर हमर गप सुनू ने। कमलाः- हम की खाक सुनू। अहाँकेँ तँ हमर कोनो फिकिरे नै रहैए। राजेशः- (निशामे मातल गबैत अछि)  भिजल ठोर अहाँक। कमलाः- हे दैब रौ दैब, अहाँक एहेन अवस्था देखि तँ हमर ठोर मुँह सुखा गेल आ अहाँ कहै छी जे भिजल अछि। राजेशः- अहाँ फुसियाहीक खउँजा रहल छी, गीत सुनू ने। प्यासल दिल ल..ल हमर। कमलाः-( खउँजा कऽ)  हे भगवान, एतेक पीबलाक बादो अहाँकेँ पियास लगले अछि, तँ हैए लिअ, घैला महक ठंढा पानि। राजेशः- (हँसैत बड़बड़ाइत अछि) अहूँ कमाले कऽ रहल छी। पहिने गीत सुनि लिअ ने। राजेशः- कियो हमरा संगे भिनसर तक रहतै तकरा हम करबै खूम प्यार ओ...हो...ओ हो...हो...ओ..हो...हो। कमलाः- आब कि खाक प्यार करब। आब एक पहर बाद भिनसरो भऽ जेतै। राजेशः- (गीत गबैत गबैत सुतबाक प्रयास) आ सिटी बजा रहल अछि। कमला:- हे महादेव, एहेन गबैयाकेँ नींद दऽ दिऔ। राजेशः- आब हइए हम नानी गाम गेलौं, आ अहाँ अपना गामसँ जलखै नेने आउ। कमला:- अच्छा आब बुझनूक बच्चा जकाँ चुपेचाप कले-बले सूति रहू ने। राजेश:- ठीक छै पाहीवाली, जँ अहॉं कहै छी तँ हम सूति रहै छी, मुदा जलखै बेरमे हमरा उठा देब। राजेश सूति रहैत अछि। दृश्य समाप्त दृश्य-२ चिड़ै चुनमुनक चूं...चूं क ध्वनि कमला:- (राजेशकेँ उठबैत) हे यै, आब उठि जाउ ने। भिनसर भऽ गेलैए। राजेश:- पाहीवाली, अहॉं ठीके कहै छी की? कमला:- ठीके नै तँ की झूठ। कनेक अपने आँखिसँ देखू, भिनसर भऽ गेलै। राजेशः- हँ यै, ठीकेमे भिनसर भऽ गेलैए। अच्छा तँ आब हम मॉर्निंग वॉक माने घूमि-फिरि कऽ अबै छी। कमला:- अच्छा ठीक छै, तँ जाउ। मुदा जल्दीए घूमि कऽ चलि आएब। ताबैत हम चाह बना कऽ रखने रहै छी। राजेशः- बेस तँ आब हम घुमने अबैत छी। ओ. के. बाइ-बाइ। राजेशक घरसँ प्रस्थान। पार्कमे बातचीत करबाक ध्वनि प्रभाव। मनोहर:- (दौगि रहल अछि आ हाँफी लैत) भाइ, आइ काल्हि राजेश लंगोटिया देखबामे नै आबि रहल अछि। मदन:- (खैनी चुनेबाक पटपट)  से तँ ठीकेमे भाइ। ई हमरा तँ बुझना जाइए जे ओ तँ सासुरमे मंगनीक तरूआ तोड़ि रहल अछि। मनोहर:- से जे करैत हुअए मुदा भेंट तँ करबाक चाही। मदन:- (हरबड़ाइत)  हइए ए..ए.. ई लिअ, नाम लैत देरी राजेश सेहो आबिए गेल। दौगल अबैत राजेशक प्रवेश। मनोहर:- (राजेशकेँ देखैत) ओइ-होइ हमर दोस, की हाल चाल छौ। राजेशः- हम तँ ठीके छी भाइ, तूँ अपन कह, की समाचार। मदन:- राम राम, यौ लंगोटिया भाइ। राजेशः- (हँसैत) आहा हा हा, राम राम यौ चिकनौटिया भाइ। मदन:- राजेशक हाल तँ हमरासँ पूछू। बेचारा चिन्तासँ सनठी जकॉं सुखा गेल। राजेश:- की भेलैए एकरा से कहब ने, कोनो दुख तकलीफ आफद विपैत। मदन:- (राजेशसँ) हमरासँ तँ नीक जे राजेश भाइ  अपने कहिए दहक, तखन ईहो बकलेल छौड़ा बूझिए जेतै। मनोहर:- (उदास भऽ कऽ) भाइ, की कहियौ, जहियासँ ठाढ़ीवाली रूसि कऽ अपना नैहर चलि गेलैए, हमरा तँ एक्को कनमा निक्के नै लगैत अछि। राजेश:- किए, तूँ भौजीकेँ मनेलही नै? मनोहर:- हँ रौ भाइ, कतबो मनेलिऐ मुदा ओ नै मानलकै। राजेशः- से किए? एहेन की भऽ गेलैए जे भौजी मुँह फुलौने ठाढ़ी चलि गेलौ। मनोहरः- हमरा दारू पीबाक हिसक छल, ऐ द्वारे हमर ठाढ़ीवाली सपत देलक मुदा हमर हिसक छूटल नै। राजेशः- (किछु सोचैत) हमरो पाहीवाली हमरासँ रूसल रहैत अछि किएक तँ ओकर फरमाइश जे पूरा नै केलिऐ। मदनः- (खैनी चुनेबाक पटपट अवाज) हें हें, हा हा, हम तँ कहै छी, दुनू गोटे अपना-अपना कनियाँकेँ मना लिअ आ झगड़े खतम। मनोहरः- अहाँ ठीके कहलौं मदन भाइ। आब हम अपना ठाढ़ीवालीकेँ मनाएब। मदन:- हर हर महादेव, तँ झटसँ निकालू हमर सवा रूपैया दक्षिणा। मनोहरः- ओकरा सामने सपत खाएब जे आब हम दारूकेँ मुँह नै लगाएब। राजेशः- तँ देरी किए? चल ने, ठाढ़ीवाली भउजीकेँ मनेबाक लेल अंधरा-ठाढ़ी चलै छी। मनोहरः- ठीके रौ भाइ, चल। मुदा जाइसँ पहिने तूँ अपना पाहीवालीकेँ फोन कऽ दही ने। राजेश:- तूँ ठीके कहि रहल छें, हम एखने फोन लगबै छी। मोबाइलसँ फोन लगेबाक ध्वनि प्रभाव स्वर:- महिलाक अवाज हेल्लो । राजेश:- हम आ घर नै आएब। किए तँ हम मनोहर संगे ओकर सासुर जा रहल छी। स्वरः- अहॉंकेँ तँ एक्को राति हमर फरमाइश मोन नै रहैए। राजेशः- पाहीवाली, अहाँ जुनि रूसी, हम अहाँ लेल किछु ने किछु नेने आएब। स्वर:- ठीक छै तँ जाउ, मुदा जल्दीए चलि आएब। बाइ-बाइ। राजेशः- बेस, तँ बाइ-बाइ। फोन कटबाक ध्वनि। राजेशः- पाहीवाली तँ मानि गेलैए, चल आब ठाढ़ीवालीकेँ मनबैत छी। मनोहरः- हाँफैत हँ हॅं हँ, किए नै? जल्दी दौगल चल। मदनः- भऽ भऽ भाइ, हमर द द दक्षिणा। हँसैत हँसैत मनोहर आ राजेशक प्रस्थान। मदन:- (हँसि कऽ) ई दूनू गोटे तँ सासुर चलि गेल, तँ आब हमहूँ जाइ छी बाबूबरही, अपना पंडिताइनक भेँट कऽ आबी, हें हें हें। दृश्य-३ लड़कीक जोरसँ हँसबाक अवाज (नीलू आ सोनी दूनू गोटे गीत गाबि हँसी मजाक करैमे लागल अछि) नीलूः- गीत गबैत आबि जाउ, एके बेर आबि जाउ। सोनीः- केकरा बजा रहल छीही गे, आ आ आबि जाउ। नीलू-( मुस्की मारैत) केकरो नै, तोरा ओझाकेँ। सोनी:-(गीत गबैत) तँ कहीं ने, सोजहाँ आबि जाउ, एक बेर आबि जाउ। ताबे मनोहर आ राजेशक प्रवेश। नीलूः- दुनू गोटेकेँ देखि कऽ दुल्हा बाबू, आबि जाउ, एक बेर आबि जाउ। मनोहर:- अहाँ बजेलौं आ हम हाजिर। कहू समाचार। सोनीः- ठीके मे गै बहिना, देखही गे, एहेन धरफड़िया दुल्हा देखल नै। नीलूः- प्रणाम यौ पाहुन। रस्ता मे कोनो दिक्कस तँ नै भेल ने? मनोहरः- दिक्कस कि खरंजा आ टुटलाहा पिच पर साइकिल चलबैत काल हार पाँजर एक भऽ गेल। सोनी:- तँ आब मजा आबि रहल अछि। राजेशः- मजा तँ आबि रहल अछि मुदा हमरा भौजीसँ भेँट करा दितौं तँ ठीक्के मे मजा आबि जइतए। नीलू:- अहॉंकेँ नै चिन्हलौं यौ हरबड़िया पाहुन। राजेशः- हँसि कऽ हा हा हा, हमरा नै चिन्हलौं, हम अहाँक पाहुनक लंगोटिया दोस राजेश छी। (सभ गोटे ठहक्का लगबैत) सोनीः- अहॉं कतेक नीक बजैत छी। चलू ने घुमए लेल। नीलूः- हँ यौ पाहुन, चलू चलू गाछी कलम आ खेत पथार सभ देखने अबैत छी। राजेशः- हँ हँ, किए नै, चलू ने तीनू गोटे घुमने अबै छी। ठहक्का लगबैत तीनू गोटेक प्रस्थान। मनोहर:- वाह रे किस्मत। सासुर हमर मुदा मान-दान एक्कर। हाइ रे किस्मतक खेल। तखन गीत गबैत विमलाक प्रवेश। (गीतक ध्वनि- पिया परदेशसँ पजेब नेने ऐब यौ पिया) विमलाः- आश्चर्य भावसँ अ अ अहॉं। मनोहरः- हँ, अहाँ बजेलौं आ हम हाजिर छी। कहू कुशल समाचार। विमलाः- (रूसि कऽ बजैत) अहॉं के बजेलक के? जाउ हम अहाँसँ नै बाजब। मनोहरः- अहूॅं तँ कमाले करैत छी। देखू तँ, हम अहाँक लेल की सभ अनने छी। विमलाः- (आश्चर्य भावसँ) क क की अनने छी हमरा लेल?? मनोहरः- (प्यारसँ) ट...ट...ट टॉफी। विमला:- अहाँकेँ टॉफी छोड़ि आरो किछु बजारमे नै भेटल की? मनोहरः- जिलेबी सिंहारा तँ किनने छलौं अहींक लेल मुदा रस्तेमे भूख लागि गेल तँ अपने खा लेलौं। विमलाः- (उदास भऽ कऽ) अहॉंकेँ तँ एक्को राति हमर चिन्ते नै रहैए। मनोहरः- चिंता रहैए, तइ द्वारे तँ आब हम दारू पिअब छोड़ि देलौंॅ। विमलाः- (अकचका कऽ) ठीके मे? मनोहरः- हँ हँ, हम सपत खेने छी कि आब हम दारू कहियो ने पिअब। विमलाः- ई तँ बड्ड नीक गप। आब हम किछु फरमाइश करी तँ? मनोहरः- (हँसैत) अहॉं फरमाइश तँ करू, हम पूरा अंधरा बजारे घर उठौने चलि आएब। तखने नीलू, सोनी आ राजेशक प्रवेश। नीलू:- दीदी-दीदी चल ने, आइ पाहुन संगे बजार घुमने अबै छी। मनोहरः- हँ हँ, चलू-चलू देरी भऽ जाएत आइ, अहॉं सभकेँ अंधरा बजार घुमा दै छी। ठहक्का लगबैत सबहक प्रस्थान। दृश्य-४ बजारक दृश्य, बिक्रेता सभक विभिन्न अवाज। बिक्रेताः- घड़ी लऽ लिअ, रेडियो लऽ लिअ। बिक्रेता:- (डुगडुगी बजबैत) हे धिया-पुता लेल डुगडुगी लऽ लिअ, डूग-डूग। राजेशः- भाइ, हमरा एकटा रेडियो किनबाक रहै। बिक्रेताः- हइए लिअ ने, ऐठाम भेटत कम दाममे नीक रेडियो। मनोहरः- लगैए तोहर दिमाग कतौ हरा गेलौ। घरमे टी.वी. छौ तइओ? राजेशः- (अफसोस करैत) तोरा केना कहियौ कि.. विमलाः- कहू तँ, सी.डी., टी.वी.क युगमे कहू तँ कियो आब रेडियो किनतै? राजेशः- (हँसि कऽ) ई हमरा पाही वाली केँ पसीन छै तइ द्वारे तँ कीनि रहल छिऐ। मनोहर:- तखन तँ एखने खरीद ले। राजेशः- हे भाइ, एकटा बढ़िया क्वालिटीक रेडियो दिहऽ। बिक्रेताः- ई लिअ भाइ साहेब। राजेश:- हइए, ई लिअ पाइ। पाइ देबाक ध्वनि प्रभाव। मनोहर:- तँ चल, आब चलैत छी अपना गाम तोरा पाहीवालीकेँ मनेबाक लेल। नीलूः- यौ पाहुन, आ हम सभ? राजेश:- अहूँ सभ चलू ने, हमर गाम घर देखि कऽ आपिस चलि आएब। सोनीः- नै यौ पाहुन, पहिने हमरा सभकेँ घर तक छोड़ि दिअ। फेर कहियो अहाँक गामक मेला देखै लेल हम दुनू बहिन आएब। मनोहरः- ठीक छै तँ चलू, अहाँ सभकेँ गामपर दऽ अबै छी, तकरा बाद हम सभ अपना गाम चल जाएब। विमला:- ई भेल ने बुझनुक मनुक्खबला गप। ठहक्का लगबैत सबहक प्रस्थान। दृश्य-५ भनसा घरक दृश्य। कमला गीत गुनगुना रहल अछि। तखने राजेश, मनोहर आ विमलाक प्रवेश। राजेश:- सुनू ने, सुनू ने, सुनि लिअ ने। हमर पाहीवाली सुनू ..ने। कमला:- हमरा अहाँक कोनो गप नै सुनबाक अछि। राजेशः- हे यै, जुनि रूसू, सुनू ने.....सुनू ने। कमला:- कहलौं तँ, नै सुनैत छिऐ। राजेशः- अहींकेँ सुनेबाक लेल तँ बजारसँ अनलौं। देख तँ लिअ। कमला:- (खिसिया कऽ)  हम कि कोनो अहॉं जकाँ बहीर छी?? राजेश:- (अफसोस करैत) पाहीवालीकेँ हम केना बुझेबै जे ई कोनो फरमाइश केने रहै। विमला आओर मनोहर एक दोसरसँ कनफुसकी कऽ गप करैत। मनोहर- (विमलासँ) लगैए कमलाकेँ किछु बुझेबाक चाही। विमला- कमला बहिन एतेक खिसियाएल किए छी? हमरा तँ कहि सकै छी। कमला- हिनका की कहियनि बहिन। पहिल सालगीरहक दिन हिनकासँ किछु फरमाइश केने रहियनि मुदा हिनका तँ कोनो धियाने नै रहैत छनि? विमला- कहू तँ, एतबाक लेल एहेन खिसियाएब? पहिने देखियौ तँ सही, ओ अहाँ लेल कथी अनने छथि। कमला- कथी, ईहे ने अंधरा बजारक मेथी। विमला- नै यै बहिन, अहाँ एक बेर देखियौ तँ सही। कमला- (आश्चर्य भावसँ) हे भगवान ठीके मे! कमला- राजेशसँ हमरा लेल कथी अनने छी से देखाउ ने। राजेश- हे भगवान आइ अहाँ बचा लेलौं नै तँ...तँ आइ फेरसँ। कमला- की भेल अहाँ केँ? राजेश- (हरबड़ाइत बजैत अछि) अहाँ बैग खोलि कऽ देखू ने, हम कथी नेने एलौं अहाँ लेल स्पेशलमे। बैग खोलबाक ध्वनि प्रभाव। कमला- (हँसि कऽ) र...र....रेडियो। आब तँ हम मजासँ कांतिपुर एफ.एम., जनकपुर एफ.एम., दरभंगा, विविध भारती रेडियो सुनैत रहब। राजेश- अहाँक मोन जे सुनबाक अछि से सुनैत रहू मुदा आब मानि जाउ ने। कमला- (रूसि कऽ) रेडियो तँ अनलौं मुदा झुमका किए नै अनलौं? मनोहर- हे भगवान, फेरसँ एकटा नबका मुसीबत, तूहीं बचबिहऽ। राजेश- हे यै पाहीवाली, हम अहॉं लेल बरेलीबला झुमका सेहो अनने छी। आब मानि जाउ ने। सभ गोटे ठहक्का लगबैत। हँसबाक ध्वनि प्रभाव। मनोहर- वाह-भाइ, मानि गेलौं। रूसल कनियॉंकेँ मनाएब तँ कियो राजेशसँ सीखए। सभ गोटे एक संगे ठहक्का लगबैत हा...हा...। मैथिली रंगमंचक गतिविधिक संकलन उमेश मण्डल मैथिलीमे ई-पत्रकारिता/ विदेह गोष्ठी ई-पत्रकारि‍ताक प्रारम्‍भ भेने लेखक ओ पाठक वर्गमे काफी वृद्धि‍ देखल जाइत अछि‍। एकर अनेक कारणमे महत्‍वपूर्ण अछि भौगोलि‍क दूरीक अंत। जइसँ वि‍श्वमे पसरल मैथि‍ली भाषी, साहि‍त्‍य प्रेमी सभ सोझा एलाह। ऐठाम अपन वि‍चार व्‍यक्‍त करबाक पूर्ण स्‍वतंत्रा लेखको आ पाठकोकेँ भेटैत छन्‍हि‍। रचनापर त्‍वरि‍त टि‍प्‍पणी-समीक्षा-समालोचनाक सुवि‍धा सेहो इन्‍टरनेटपर अछि‍। इन्टरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थितिक रूपमे विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" ५ जुलाइ २००४ सँ http://gajendrathakur.blogspot.com/  लिंकपर उपलब्ध अछि। ओना याहू जियोसिटीजपर २००० ईं.सँ ई साइट रहए, जे याहू द्वारा जियोसिटीज बन्द कऽ देलाक बाद आब उपलब्ध नै अछि। मैथिली ई-पत्रकारिताक आरम्भक श्रेय विदेहकेँ छै आ तँए एकर नाओं अछि‍ ‘वि‍देह प्रथम मैथि‍ली पाक्षि‍क ई-पत्रि‍का’ वर्तमानमे १०३ टा अंक ई-प्रकाशि‍त अछि‍। गूगल एनेलेटिक्स डेटा केर मोताबि‍क ‘विदेह ई पत्रिका’केँ ५ जुलाइ २००४ई.सँ अखन धरि ११६ देशक १,५०२ ठामसँ ७२,०४३ गोटे द्वारा ३५,४५२ विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,३६,७०७ बेर देखल गेल अछि। विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड  http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi  पर उपलब्ध अछि। लगभग २०० सँ बेशी मैथिली पोथी देवनागरी, तिरहुता आ ब्रेल तीनू लिपिमे जे पी.डी.एफ. फाइलमे फ्री डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि अनेक रचनाकारक अलाबे जगदीश प्रसाद मंडलक 2टा कथा संग्रह, 2टा एकांकी संग्रह, 3टा नाटक, 2टा कवि‍ता संग्रह, पाँचटा उपन्‍यासक सेहो उपलब्‍ध अछि‍। एकर अतिरिक्त ११००० सँ बेशी, तिरहुतामे लिखल, ५०० बर्ख पुरान तालपत्र, विदेह द्वारा स्कैन कऽ ओकर देवनागरी लिप्यंतरणक संग ऐ साइटपर डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। सरकारी आ गएर सरकारी संस्था सभ द्वारा अखन धरि कएल समस्त प्रयाससँ ई लगभग १०० गुणा बेसी अछि। ऐ समस्त कार्यमे लगभग १०,००० घण्टाक श्रम लगाओल गेल अछि आ एतए तिरहुता, ब्रेल आ अन्‍तर्राष्‍टीय फोनेटिक अल्‍फाबेट (आइ्. पी. ए) सिखबाक सेहो बेबस्‍था कएल गेल छै आ तइ संबंधी पोथी जे श्री गजेन्‍द्र ठाकुर द्वारा ि‍लखित अछि‍ ओ फ्री डोनलोड लेल सेहो उपलब्‍ध अछि। विदेह मैथिली ऑडियो संकलन http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio , एतए विविध विधाक ऑडियो जेना कथा, कवि‍ता, गजल, हाइकू, टनका, हैबून, हैगा इत्‍यादि‍, देल गेल अछि। ऐठामक मुख्य आकर्षण अछि ५० घण्टाक ऑडियो संकलन जे मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत जे मैथिलीकेँ जाति आधारित भाषा हेबाक अवधारणापर मारक प्रहार सिद्ध कए रहल अछि। मैथिली वीडियोक संकलन http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video , एतए नाटक, सेमीनार, वर्षकृत्य, रसनचौकी, सामा-चकेबा, कवि-सम्मेलन, विदेहक नाट्य आ साहित्य उत्सवक वीडियो, मिथिलाक खोज, गीत-ंसंगीत, मैथिली वीडियो, वोकल आर्काइव, सगर राति दीप जरए, साक्षात्कार, विद्यापति पर्व, मैथिली गजल आदिक वीडियो उपलब्ध अछि। ऐठामक मुख्य आकर्षण अछि, मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीतक वीडियो, आ पहिल बेर विदेहक सौजन्यसँ सतमा कक्षाक दीक्षा भारतीक गाओल ‘गोविन्ददास’क गीत। ऐमे लगभग ५००० घण्टाक मेहनति विदेहक सदस्यगण द्वारा लगाओल गेल अछि। विदेह मिथिला चित्रकला/आधुनिक चित्रकला आ चित्र- http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/    लिंकपर उपलब्ध अछि ‘मिथिला चित्रकला, आधुनिक चित्रकला, रंगमंच, चौबटिया-सड़क नाटक सहित कएक हजारसँ ऊपर फोटो अछि जइमे २०० सँ ऊपर ि‍मथि‍लाक वनस्पति, १०० सँ ऊपर मि‍थि‍लाक जीव-जन्तु आ १०० सँ ऊपर मिथिलाक जनजीवनक किसानी आ कारीगरी संस्कृतिक फोटो सेहो अछि‍ जइमे ५००० घण्टाक मेहनति वि‍देह सदस्यगण द्वारा लगाओल गेल अछि। विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/  पर मैथिलीक सभ वेबसाइटक विवरण सहजताक लेल उपलब्ध अछि। विदेह द्वारा मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित कए http://madhubani-art.blogspot.com/  साइटपर राखल गेल अछि। एतए सत्तरि‍टा पोस्ट अछि जकरा माध्यमसँ मैथिलीक श्रेष्ठ साहित्य विश्वक समक्ष राखल गेल अछि। ऐ अनुवादमे लगभग ७०० घण्टासँ बेसी समैक श्रम खर्च कएल गेल अछि। विदेह:सदेह- पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/  ई मैथि‍ली भाषाक मि‍थि‍लाक्षरमे सज्‍जि‍त पहि‍ल वेबसाइट अछि‍। विदेह:ब्रेल- मैथिली ब्रेलमे : पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/  पर मैथिलीक पहिल साइट अछि जे क्रमश: मिथिलाक्षर आ ब्रेलमे अछि जेकारा स्‍पेशल स्‍क्रीन टच माॅनि‍टरसँ संबंधि‍त आदमी पढ़ि‍ सकै छथि‍ तहि‍ना स्‍पेशल प्रि‍ंटरसँ प्रि‍ंट सेहो नि‍कालि‍ सकै छथि‍। जइ दुनूमे लगभग हजार-हजार (१०००-१०००) घण्टाक मेहनति लागल अछि। नेना भुटका साइट मैथिलीमे बच्चा सबहक लेल एक मात्र साइट अछि जे संगीतज्ञ माँगनि खबासक नामपर- http://mangan-khabas.blogspot.com/  राखल गेल अछि। बाल साहि‍त्‍य जेना बाल कथा, प्रेरक कथा, बाल कवि‍ता आदि‍ समस्‍त बाल साहि‍त्‍यकेँ आधुनि‍क-वैज्ञानि‍क दृष्‍टकोणसँ लि‍खल श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक १२५ गोट प्रेरक कथाक अलाबे वि‍भि‍न्न लेखक केर साहि‍त्‍य ऐपर सहजताक संग उपलब्‍ध अछि‍ जेकरा वि‍श्वमे पसरल नेना, बढ़ैत नेना आ कि‍शोरक लेल फ्री डॉनलोड हेतु उपलब्‍ध अछि‍। विदेह रेडियो: मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट- ऐठामसँ मैथि‍लीमे गीत-संगीत, कथा-कवि‍ता, गजल-हाइकू, टनका-हैबूनक संग अनेक परि‍चर्चा प्रसारि‍त कएल जाइत अछि‍। साइटक नाओं अछि‍- http://videha123radio.wordpress.com/ विदेहक फेसबुक चौबटिया-फरबरी २००८सँ अछि जे पुरान फॉर्मेटमे छल https://www.facebook.com/groups/10299304978/  आ http://www.facebook.com/groups/7436498043/  पर, नव फॉर्मेटमे एतए http://www.facebook.com/groups/videha/  उपलब्ध अछि, आ फेसबुकपर मैथिलीक सभसँ पुरान चौबटिया अछि। ऐ चौबटि‍यापर ८४००सँ बेसी मैथिली भाषी सदस्य द्वारा गत साल १०,००० पोस्ट आ ११०० सँ बेसी फोटो पोस्ट कएल गेल अछि। प्रति‍दि‍न १५० टासँ ऊपर कॉमेट पोस्‍ट सभपर अबैए जइमे मि‍थि‍ला-मैथि‍ली वि‍कासपर स्‍वस्‍थ्‍य परि‍चर्चा होइए। विदेह मैथिली नाट्य उत्सव- मैथिली रंगमंचकेँ वैश्विक स्तर प्रदान केलक अछि जे श्री बेचन ठाकुरजी द्वारा http://maithili-drama.blogspot.com/  पर उपलब्ध अछि। एतए मैथिली आ अंग्रेजीमे मैथिली रंगमंचक चित्र-आ वीडियोक माध्यमसँ विस्तारसँ वर्णन १७५ पोस्टमे देलगेल अछि, ई मैथिलीक अखन धरिक  “स्लैपस्टिक ह्यूमर” बला रंगमंचक विरुद्ध विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक प्रारम्भ केलक अछि। लगभग २००० घण्टाक मेहनति ऐ वेबसाइटपर अखन धरि भऽ चुकल अछि। एतए मिथिलाक गम-गाममे होइत मैथिली रंगमंचक अतिरिक्त, कोलकाता, जनकपुर, राजबिराज, पटना, दिल्ली आदिक रंगमंचक विवरण सेहो उपलब्ध अछि। समदिया- http://esamaad.blogspot.com/  पर पूनम मण्डल आ प्रियंका झा द्वारा २००४ ई.मे शुरू भेल, साहित्यिक पत्रकारिताक लीकसँ हटि कऽ न्यूज पोर्टलक वा ई-पेपरक रूपमे मैथिली पत्रकारिताकेँ एतएसँ प्रारम्भ भेल। अखन धरि ५२५ सँ बेसी पोस्ट ऐठाम भेल अछि। सर्वश्रेष्ठ न्यूजकेँ मासक समदिया पुरस्कार देल जाइत अछि। अगस्‍त २०१२मे सर्वश्रेष्‍ठ मैथि‍ली पत्रकारकेँ ‘विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान’सँ सम्मानित करबाक घोषणा अछि‍ जे आब साले-साल सेहो देल जाएत। ऐ वेबसाइटपर अखन धरि ५५०० घण्टाक मेहनति पूनम मण्डल आ प्रियंका झा टाइपसँ लऽ कऽ समाचार अपलोड करबाक कार्यमे कऽ चुकल छथि आ ई साइट श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमरक सीरियल चोरिक भण्डाफोड़क अतिरिक्त ढेर रास उद्घाटन कऽ साहसिक सोद्देश्य मैथिली पत्रकारिताक परिचए दऽ चुकल अछि। मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/  श्री गजेन्द्र ठाकुर, श्री बेचन ठाकुर, श्री विनीत उत्पल, श्री सुनील कुमार झा आ श्री आशीष अनचिन्हार द्वारा संचालित साइट अछि, ऐपर मैथिली, अंगिका, वज्जिका आ सुरजापुरीक पूर्ण विवरण उपलब्ध अछि। एतए अखन पचाससँ ऊपर पोस्ट उपलब्ध अछि। अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ - एेपर ४८१टा गजल, २२टा कता, बन्द, नात, १२४टा रुबाइ, ७०टा करीब आलेखक अलाबे शेरो-शाइरीसँ संबंधित विडियो सेहो उपलब्‍ध अछि‍। मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ - ऐ वेबसाइट मैथिलीक साहित्यिक पत्रकारिताक प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। मैथिली हाइकू (प्राकृत दृश्‍यपर ५/७/५) टनका (प्राकृत दृश्‍यपर ५/७/५/७/७) हैबून (प्राकृत दृश्‍यपर गद्यक एक-दू या तीन अनुच्‍छेदक अंतमे ओतबे हाइकू या टनका) हैगा (तत् संबंधी चि‍त्र), शेनर्यू आदिक थ्योरी आ प्रैक्टिस सभ एतए भेट जाएत। मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ - ऐ वेबसाइटपर मैथिलीक अन्तर्जालपर मानकीकृत स्वरूप नेपाल आ भारतक मैथिली भाषाशास्त्री लोकनिक मतक अनुसार। मैथिलीक साहित्यिक पत्रकारिताक प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ पर, मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ पर, मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ पर आ मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ पर उपलब्ध अछि। विदेह गोष्ठी: (परिचर्चा आ प्रैक्टिकल लैबोरेटरीक प्रदर्शन। किछु विचार डाक आ ई-पत्रसँ सेहो आएल।)- http://esamaad.blogspot.in/p/blog-page_05.html मैथिली नाटक रंगमंच फिल्मपर: २८-२९ जनवरी २०१२ स्थान चनौरागंज,झंझारपुर। निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा आधुनिक मैथिली नाटक आ रंगमंचपर: १७-१८ सितम्बर २०११ आ २४-२५ सितम्बर २०११केँ। मैथिली गजल, कता, रुबाइपर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा: २६-२७ नवम्बर २०११ आ ०३ आ ०४ दिसम्बर २०११ मैथिली हाइकू, टनका,शेर्न्यू, हैगा, हैबून पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; १२-१३ नवम्बर २०११ आ १९-२० नवम्बर २०११ मैथिली बाल साहित्यपर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; १५-१६ अक्टूबर २०११ आ २२-२३ अक्टूबर २०११ मैथिली विहनि, लघु, दीर्घ कथा आ उपन्यास पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; २९-३० अक्टूबर २०११ आ ०५-०६ नवम्बर २०११ मैथिली प्रबन्ध, निबन्ध, समालोचना, अनुवाद, मानक मैथिली आ शब्दावली पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०१-०२ अक्टूबर २०११ आ ०८-०९ अक्टूबर २०११ मैथिली महिला आ फेमिनिस्ट लेखन पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०३-०४ सितम्बर २०११ आ १०-११ सितम्बर २०११ मैथिली कला-शिल्प-संगीत पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; २०-२१ अगस्त २०११ आ २७-२८ अगस्त २०११ मैथिली हास्य-व्यंग्य पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०६-०७ अगस्त २०११ आ १३-१४ अगस्त २०११ मैथिली गूगल ट्रान्सलेटर टूलकिट, गूगल ट्रान्सलेट, गूगल लैंगुएज टूल, मैथिली विकीपीडिया, कैथी आ तिरहुता यूनीकोडक एनकोडिंग  पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०६-०७ दिसम्बर २००८, १३-१४ दिसम्बर २००८, ०५-०६ दिसम्बर २००९, १२-१३ दिसम्बर २००९, ०४-०५ दिसम्बर २०१०, ११-१२ दिसम्बर २०१०, १७-१८ दिसम्बर २०११, २४-२५ दिसम्बर २०११ मैथिली मे प्राथमिक आ मध्य विद्यालयी शिक्षा मैथिली माध्यमसँ मिथिलामे करेबा लेल निर्मली, जिला सुपौलमे परिचर्चा; ०३ फरबरी २०१२-०४-०८ ऐ सभ गोष्ठीमे ढेर रास विशेषज्ञ, लेखक आ साहित्यप्रेमी उपस्थित रहथि। तकर बाद किछु आलेख आ रचना डाक आ ई मेलसँ सेहो आएल। नि‍ष्‍कर्षत: ऐ ई-पत्रकारितामे साहित्यिक आ राजनैतिक दुनू पत्रकारिता शामिल अछि जतए, दृश्य आ श्रव्य माध्यमक प्रचुर प्रयोग कएल गेल अछि, ई सदेह पत्रिका आ गोष्ठीक माध्यसँ पुष्ट भेल अछि। रोशन झा क रिपोर्ट-  "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" बाल नाटकक मंचन मिथिला नाट्यकला परिषद (मिनाप), जनकपुर एकटा विशेष नाटक "बुधियार छौड़ा आ राछस" बौवाबुच्चीक लेल लऽ कऽ आएल। सम्वादसँ बेशी क्रियाप्रधान ऐ नाटकक अन्तिम तैयारीक हेतु मिनाप एक सप्ताहक कार्यशाला समाप्त केलक अछि। क्रियाप्रधान हेबाक कारण ई विश्वक कोनो मंचपर प्रस्तुत कएल जा सकैत अछि कारण जे मैथिली नहियो बुझै छथि ओ ई नाटक बुझि सकै छथि। नाटक एक घण्टाक अछि। एकर आलेख अछि रमेश रंजनक आ निर्देशन अछि अनिलचन्द्र झाक। ऐ मे अभिनय कऽ रहल छथि परमेश, रवीन्द्र, प्रियंका आ रीना। मिथिला नाट्यकला परिषद् मिथिलांचलक मात्र नै नेपालक अग्रणी नाट्य संस्था अछि | अपन ३२ बर्षक यात्रा पूरा कऽ चुकल मिनाप एम्बैसी ऑफ डेनमार्कक सहयोगसँ रंगमंचक प्रसार लेल नेपालक १७ ठाम अइ नाटकक प्रदर्शन केलक। नाटकक अंतिम रूप देबएमे डेनमार्कक नाटक निर्देशन एक्सपर्ट जच्क्कुए मेदिस्सें आ सेट डिजाइनर क्रिस्टन क्रिम्स्सें २ बेर एक-एक हप्ताक प्रशिक्षण देलनि। नाटकक कथा : दंत्य कथापर आधारित अइ नाटकमे एकटा किशोर अपन गएर-जिम्मेवार व्यवहारमे कोना परिवर्तन अनैत अछि वा एकटा राक्षसकेँ मारैत अछि आ ओकर भगिनी संग विवाह करैत अछि, से देखाओल गेल अछि। नाटक सन्देशमूलकसँ बेसी मनोरंजनात्मक अछि। अइ नाटकमे एकटा राक्षस एकटा बुढ़ियाक जीविकोपार्जनक एकमात्र स्रोत ओकर गायक अपहरण कऽ लऽ जाइत अछि। माय अपन बेटाकेँ गायकेँ बचाबए नै सकलापर धुत्कारैत अछि। जंगलमे ओकरा राक्षसक भगिनी भेटै छै, दुनुमे प्रेम भऽ जाइत अछि। अंततः छौड़ा राक्षसकेँ अपन बुइधसँ मारि दैत अछि आ ओकर भगिनी आ अपन गाय लऽ कऽ चलि अबैत अछि। सरल कथात्मकता आ सरल प्रबाह अइ नाटकक विशेषता अछि। मिनाप अइसँ पहिले एहन प्रयोगक नाटक नै केने छल। जानकी नवमीपर जनकपुरमे बम विस्फोट द्वारा संस्कृतिकर्मी सभक हत्या- (रिपोर्ट पूनम मण्डल) -आइ जानकी नवमीपर ३० अप्रैल २०१२ केँ जानकी नवमीपर जनकपुरमे बम विस्फोट भेल -कमसँ कम पाँच गोटे मुइलाह, दू दर्जनसँ ऊपर घायल भेलाह। -एक गोटे ठामे, तीन गोटे जनकपुर अस्पतालमे, आ एक गोटे काठमाण्डूमे जतऽ हवाइ जहाजसँ चिकित्सा लेल किछु गोटेकेँ लऽ जाएल गेल छल, मुइलाह। -जनतांत्रिक तराइ मुक्ति मोर्चा द्वारा रामानन्द चौक, जनकपुरमे एकटा मोटरसाइकिल-बमक ई हमला संघमे मिथिला राज्य बनेबाक धरनापर कएल गेल। लगभग १५० गोटे धरनापर बैसल रहथि। -मधेशी पार्टी सभ एक मधेशक मांग कऽ रहल अछि आ मिथिला राज्यक ऐ कारणसँ विरोध कऽ रहल अछि, जे ई मधेशी जनताकेँ तोड़बाक साजिश अछि। मृतकमे रंजू झा, ३२ बर्ख- मिनाप (मिथिला नाट्यकला परिषद)क कलाकार, नाटक आ फिल्म अभिनेत्री; बिमल चरण, झगड़ू मण्डल, दीपेन्द्र दास आ सुरेश उपाध्याय छथि। मैथिली नाटक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न (रिपोर्ट सुजीत कुमार झा) प्रतिबिम्ब रंगमञ्चक आयोजनामे जनकपुरमे मैथिली नाटक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न भेल अछि। सांस्कृतिक कार्यक्रममे गीत एवं नृृत्य कएल गेल छल। गीतमे संजय यादव, अजित झा, आर.एन. शुक्ला तथा नृत्यमे केवल कमल, अमित कुमार साह, श्याम किशोर महतो, रोहित दास, दिया, रंजु, राममाया, रंजीत मण्डल, दिपा। ममता, पुजा अभिनय कएने छलथि। नृत्य निर्देेशक केवल कमल रहथि तथा संगीत अजय गुजरालक छल । लोकोत्सव १०-१५ जून २०१२ (रिपोर्ट गजेन्द्र ठाकुर) बिहार सरकार कला-संस्कृति आ युवा विभागक लोकोत्सव १०-१५ जून २०१२ धरि सम्पन्न भेल। प्रेमचन्द रंगशाला, राजेन्द्र नगर पटनामे संध्या ०६.३० बजेसँ १० जूनकेँ हिरनी-बिरनी, ११ जूनकेँ राजा सलहेस, १२ जूनकेँ सती बिहुला, १३ जूनकेँ रेश्मा चूहड़मल, १४ जूनकेँ दीना भदरी आ १५ जून २०१२ केँ बहुरा गोढ़िन लोकगाथाक मंचन लोक-नाट्य मण्डली सभ द्वारा भेल। एतए ई तथ्य ज्ञातव्य जे ई सभ लोकगाथा मिथिलासँ सम्बन्धित अछि आ विदेह द्वारा आयोजित अभिनय-पाठशाला-सह-वर्कशॉपमे हिरनी-बिरनी छोड़ि ऐ सभ लोकगाथाक अभिनय भेल छल आ चित्रकथा रूपमे एकर सभक प्रस्तुतीकरण भेल छल। मिथिलांचलक नट समाजमे प्रचलित हिरनी-बिरनीक प्रस्तुति करंट लालक टीम केलन्हि। मिथिलांचलक दूधवंशी समाजमे प्रचलित राजा सलहेसक प्रस्तुति विष्णुदेव पासवान, विन्देश्वर पासवान, रामदेव राम आ  टीम केलन्हि। मिथिलांचलक सती बिहुलाक प्रस्तुति शिवचन्द्र पासवान शिवजी आ  टीम केलन्हि। मिथिलांचलक रेशमा चूहड़मलक प्रस्तुति बेली राय आ  टीम केलन्हि। मिथिलांचलक मुसहर समाजमे प्रचलित दीना भदरीक प्रस्तुति राजो सदा, सुरेश सदा, राजेन्द्र सदा, जगदीश सदा, छोटेलाल सदा, निर्मल सदा केलन्हि आ संगीत अनिल सदा देलन्हि। मिथिलांचलमे प्रचलित बहुरा गोढ़िनक प्रस्तुति पवन सिंह पासवान आ  टीम केलन्हि। एकर अतिरिक्त राष्ट्रीय सबऑल्टर्न कला प्रदर्शनी, राष्ट्रीय परिसम्वाद आ भित्तिचित्र कार्यशाला सेहो आयोजित भेल।

(चित्र साभार दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान) बहुरा गोढ़िन दीना भदरी हिरनी-बिरनी राजा सलहेस रेशमा चौहरमल सती बिहुला सती बिहुला गोविन्द झाक मैथिली नाटक "अन्तिम प्रणाम" आब संस्कृतमे जीवन झाक सुन्दर संयोग, सामवती पुनर्जन्म आदिक मंचन जीवन झा लिखित नाटक सुन्दर संयोग, (१९०४), मैथिली सट्टक (१९०६), नर्मदा सागर सट्टक (१९०६) आ सामवती पुनर्जन्म (१९०८) ऐ चारू नाटकक सामवेद विद्यालय काशीमे कएक बेर मंचन १९२० ई.सँ पहिनहिये भऽ चुकल अछि, "सुन्दर संयोग" एतैसँ प्रकाशित सेहो भेल। सुन्दर संयोगक किछु आर मंचन: १९७४ ई. माली मोड़तर (हसनपुर चीनीमिलक बगलमे), लक्ष्मीनारायण उच्च विद्यालय परिसरमे- निर्देशक श्री कालीकान्त झा "बूच", मुख्य अतिथि श्री फजलुर रहमान हासमी। दुर्गापूजामे। आयोजक देवनन्दन पाठक चीफ इन्जीनियर, आ केशनन्दन पाठक (ऑडीटर टीका बाबू), उद्घाटन: उदित राय मुखिया। १९७६: करियन, समस्तीपुर। निर्देशक: कामदेव पाठक। १९८१: पण्डित टोल, टभका (दलसिंहसरायक बगलमे): संयोजक डॉ उमेन्द्र झा "विमल", पूर्व प्रो. भाइस चान्सलर, का.सि. संस्कृत वि.वि.; आ म.म. चित्रधर मिश्र जे दरभंगा किलाक भीतरक शंकर मन्दिरक अधिष्ठाता रहथि आ म.म. उमेश मिश्र आ म.म. गंगानाथ झा हिनकर शिष्य रहथिन्ह। १९८३:मउ बाजितपुर (विद्यापति नगरक बगलमे)। संस्कृत परम्परा आ पारसी थियेटरक गुणसँ ओतप्रोत ऐ नाटक सभक अन्यान्यो ठाम मंचन भेल अछि। मैथिली नाटककारकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कारक सूची रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी) १९९१ । नाटककार १९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास) सुधांशु शेखर चौधरी, नाटककारक केँ १९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास) लेल। गोविन्द झा , नाटककार १९९३- (सामाक पौती, कथा) साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार २०११-आनन्द कुमार झा (हठात परिवर्तन, नाटक) केँ भेटलै। जगदीश प्रसाद मण्डल, नाटककार, केँ टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११, १२ जून २०१२ केँ देल गेलन्हि, मिथिलाक बेटी (नाटक),एकांकी-संचयन, कम्प्रोमाइज (नाटक), झमेलिया बिआह (नाटक) क लेखक जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ गामक जिनगी- लघुकथा संग्रहपर ई पुरस्कार देल गेल। मैथिला भाषाक सड़क नाटक प्रदर्शन- रिपोर्ट सुजीत कुमार झा स्वस्थ्य महिला स्वस्थ्य परिवार आ स्वस्थ्य समाज मूल नाराक संग यदुकोहा आ माची झिटकहियामे सड़क नाटक प्रदर्शन कएल गेल अछि। परिवार नियोजनपर आधारित जंगलमे मंगल नामक मैथिली भाषाक ओ सड़क नाटक पिसिआइ नेपालक सहयोगमे प्रतिविम्ब रंगमञ्च जनकपुर प्रदर्शन कएलक अछि। रामेश्वर साह लिखित एवं निर्देशित ओ नाटकमे केवल कमल, श्याम प्रेमी, अमित साह, हृदय वंशाली, रंजीत मण्डल, दिपक साह, सन्ध्या चौधरी, ममता पण्डित, रन्जु लामा आ नेहा राय अभिनय कएने छलथि। मैथिली भाषाक र्इ नाटक महोत्तरीक गौशालामे सेहो प्रदर्शित भेल। उपप्रधानमन्त्री मिनापमे (रिपोर्ट सुजीत कुमार झा) उपप्रधानमन्त्री नारायणकाजी श्रेष्ठ मिथिला नाट्य कला परिषदक जनकपुरक राम चौक स्थित कार्यालयमे पहुँच निर्माणाधीन नाट्य घरक निरीक्षण कएलन्हि। गुठी कार्यालयक जमीनमे निर्माण भऽ रहल नाटक घरक जमीन मन्त्रीपरिषदसँ निर्णय करेबाक आश्वासन देलन्हि अछि । ओ मैथिली भाषा, कला-संस्कृतिक विकासक लेल सरकार गम्भीर रहल सेहो बतौलन्हि। ओइ अवसरपर मिथिला नाट्य कला परिषदक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक सहित नगरक विभिन्न क्षेत्रक व्यक्ति, राजनीतिक दलक प्रतिनिधि तथा कलाकार सभक सहभागिता रहल। मिथियात्रिक-झंकार (रिपोर्ट दिनेश मिश्र) कोलकाता रंगमंचक "मिथियात्रिक" आ "झंकार" ई दुनू नाट्यसंस्था मिलि कऽ एकटा नव नाट्य संस्था "मिथियात्रिक-झंकार" नामसँ पुनर्गठित भेल अछि। आशा अछि जे आब साल मे १-२ टा नाट्यानुष्ठान ई संस्था अबस्से करत। श्री ताराकान्त झा (मिथिला समाद), प्रो.श्री शंकर झा, प्रसिद्ध नाट्य लेखक श्री गुणनाथ झा, प्रो. राम अह्लाद चौधरी, श्री गिरीश झा, कोलकाताक हिन्दी-मैथिली फिल्म निर्देशक श्री शम्भुनाथ मिश्र, श्री संजय ठाकुर आदिक सहयोग ऐ संस्थाकेँ प्राप्त छै। विदेह मैथिली नाट्य उत्सव (रिपोर्ट उमेश मण्डल) मधुबनी जि‍लान्‍तर्गत चनौरागंजक जे.एम.एस. कोचिंग परि‍सरमे वि‍गत २८-२९ जनवरी २०१२ केँ सरस्‍वती पूजाक अवसरपर दू-दि‍वसीय ‘वि‍देह नाट्य उत्‍सव’क आयोजन वि‍देह ई-पत्रि‍काक नाट्य-रंगमंच-फि‍ल्‍मक संपादक बेचन ठाकुर जीक संयोजकत्‍वमे कएल गेल। श्री बेचन ठाकुर लि‍खि‍त ‘विश्वासघात’, श्री गजेन्‍द्र  ठाकुर लि‍खि‍त ‘उल्‍कामुख’ आ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल लि‍खि‍त ‘वी‍रांगना’ नाटकक मंचन श्री बेचन ठाकुरक ि‍नर्देशनमे भेल। नाट्य रंगमंच-फि‍ल्‍मपर परि‍चर्चा, शि‍शुकला प्रदर्शन, काव्‍य गोष्‍ठी‍, एकर अति‍रि‍क्त नाटक अभि‍नय, गीत-संगीत, हास्‍य–कला, नृत्य-कला, मूर्ति-कला, शिल्प-वस्‍तुकला, काष्‍ठ-कला, कि‍सानी-आत्‍मनि‍र्भर संस्‍कृति एवं चित्र-कला‍ क्षेत्रमे २०१२क ‘विदेह सम्मान’ सेहो प्रदान कएल गेल। ऐ अवसरपर वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍ रहथि‍ साहि‍त्‍यकार जगदीश प्रसाद मण्‍डल, कवि‍ जनककि‍शोर लाल दास, झंझारपुरक वरीय उपसमाहर्ता सह प्रभारी एस.डी.ओ. चेतनारायण राय, डी.सी.एल.आर. कुमार मि‍थि‍लेश प्रसाद सिंह, पूर्व जि‍ला पार्षद बलराम साहु, डॉ. उषा महासेठ, कुमार रामेश्वर लालदास, रामवृक्ष सिंह, ब्रज कि‍शोर साह आ अवकाश प्राप्‍त शि‍क्षक हरि‍नारायण झा। हजारो दर्शक-श्रोताक अालाबे दूर-दूरसँ आएल साहि‍त्‍य-संगीत प्रेमी सबहक उपस्‍थि‍ति‍ सेहो छल। मंचक संचालन रामसेवक ठाकुर, दुर्गानंद मंडल आ दयानंद कुमार केलनि‍। वि‍देह मैथि‍ली पोथी प्रदर्शनी मंचक दहि‍ना भाग लगाओल गेल रहए जे आकर्षक रहल। दि‍नांक २८.०१.२०१२ अर्थात उत्‍सवक पहि‍ल दि‍न दूटा नाटक क्रमश: विश्वासघात आे उल्‍कामुखक प्रदर्शन भेल। जतए पहि‍ल नाटक हालेमे एन.एच. ि‍नर्माणमे भेल घोटालासँ उपजल षड्यंत्रक प्रभावकेँ उघार केलक ओतै दोसर नाटक जादू वास्‍तवि‍कतावादी उल्‍कामुख जइमे ऐति‍हासि‍क षड्यंत्रकेँ उघारल गेल, खचाखच दर्शक-दीर्घामे दाँते ओंगरी कटबाक स्‍थि‍ति‍ बनौलक। गुरु: ब्रह्मा गुरु: वि‍ष्‍णु... मंगलाचरणसँ उद्घाटन सत्र प्रारम्‍भ भेल। वि‍धि‍वत् दीप प्रज्‍वलि‍त कऽ अवकाश प्राप्‍त शि‍क्षक कुमार रामेश्वर लाल दास उद्घाटन केलनि‍। रंगमंचीय अध्‍यक्ष डाॅ. उषा महासेठ एवं श्री ब्रज कि‍शोर साहक अभि‍भावकत्‍वमे कार्यक्रमकेँ आगाँ बढ़ाओल गेल। एकटा सुन्‍दर स्‍वागत गीतसँ सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी ओ आशा कुमारी स्‍वागत केलनि‍। नाटक मंचनसँ पूर्व काली माताक झाँकी प्रस्‍तुत कएल गेल जइमे काली केर प्रदर्शन केलीह सुश्री आरती कुमारी, हाथक सहयोग केने रहनि‍ सुश्री उजमा नि‍हकत। ऐ अवसरपर गीत गाओल गेल छल- जय जय भैरवि‍..., जेकर गायक कलाकार रहथि‍ कुष्‍ण कुमार यादव ओ कमल ि‍कशोर ‘पंकज’। एकर अति‍रि‍क्‍त जल स्‍वच्‍छता अभि‍यानपर आधारि‍त गीत ‘जल स्‍वच्‍छता बढ़बैत चलू..’ एवं जट-जटीन, ‘जब जब पढ़ए कहलि‍यौ गे जटीन.....; फगुआ ‘सरस्‍वती पूजामे नव उमंग आनल वसन्‍त.....; रागि‍नी कुमारी, वि‍भा कुमारी, ललि‍ता कुमारी आ सुधीरा कुमारी द्वारा प्रस्‍तुत कएल गेल। विश्वासघात नाटकक प्रमुख पात्र- राम कि‍शुन, बीरू, एस.पी., कलक्‍टर, उमाशंकर, गंगाराम, लक्ष्‍मी, ओम प्रकाश, बि‍लट, राजा आ हरि‍कि‍श्वर जेकर अभि‍नय केने छलाह क्रमसँ: दुर्गानंद ठाकुर, श्रवण कुमार महतो, सुनील कुमार महतो, नवीन कुमार मण्‍डल, अमि‍त रंजन, सर्व नारायण महतो, नवीन कुमार, अभि‍नव कुमार सागर, मो. टॉसि‍फ, रमेश कुमार यादव, आ जीतेन्‍द्र कुमार पासवान। उल्‍कामुख नाटकक प्रमुख पात्र- गंगेश, वल्‍लभा, देवतत्त, आचार्य सिंह, भगता आ गंगाधर। अभि‍नय केने रहथि‍ क्रमश: अंजली ि‍प्रयदर्शिनी, प्रीति‍ कुमारी, सुलेखा कुमारी, श्‍वेता कुमारी, पूजा कुमारी आ शि‍ल्‍पी   कुमारी। अंतमे हास्‍य कलाकार श्री दुर्गानंद ठाकुर द्वारा अद्भुत समाचारक प्रस्‍तुति‍ कऽ राति‍क ११ बजे कार्यक्रम शेष भेल। एहि‍ना दोसर दि‍न माने २९.०१.२०१२ क कार्यक्रम शुभारम्‍भ भेल ‘वि‍देह सम्‍मान समारोह’सँ ऐ सत्रक उद्घाटन उपसमाहर्ता सह प्रभारी एस.डी.ओ. चेतनारायण राय, डी.सी.एल.आर. कुमार मि‍थि‍लेश प्रसाद सिंह, साहि‍त्‍यकार जगदीश प्रसाद मंडल, कवि‍ जनक कि‍शोर लाल दास, डॉ. उषा महासेठ एवं अवकाश प्राप्‍त  शि‍क्षक हरि‍नारायण झा सम्‍मि‍लि‍त रूपसँ दीप प्रज्‍वलि‍त कऽ। नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प-वस्‍तुकला, काष्‍ठ-कला, कि‍सानी-आत्‍मनि‍र्भर संस्‍कृति एवं चित्रकला‍ क्षेत्रमे २०१२ क विदेह सम्मानसँ सम्‍मानि‍त प्रति‍भागी सबहक सूची ऐ तरहेँ अछि‍- अभि‍नय- सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उमेर- 17 पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा श्री शोभा कान्‍त महतो, उमेर- 15 पि‍ता- श्री रामअवतार महतो, हास्‍य-अभिनय- सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उमेर- 16, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उमेर- 23, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर नृत्‍य- सुश्री सुलेखा कुमारी, उमेर- 16, पि‍ता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उमेर- 18, पि‍ता- नागेश्वर कामत चि‍त्रकला- श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- 35, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उमेर- 23, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल संगीत (हारमोनियम)- श्री परमानन्‍द ठाकुर, उमेर- 30, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक)- श्री बुलन राउत, उमेर- 45, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत संगीत (रसनचौकी)- श्री बहादुर राम, उमेर- 55, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला- श्री जगदीश मल्लिक, उमेर 50 गाम- चनौरागंज मूर्ति- कला- श्री यदुनंदन पंडि‍त, उमेर- 45, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त काष्ठ-कला- श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, उमेर 55, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति- श्री लछमी दास, उमेर- 50, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम बेरमा। उपरोक्‍त प्रति‍भागी सभकेँ प्रशस्तिपत्र, प्रतीक चि‍न्‍ह अा मालासँ सम्‍मानि‍त कएल गेलनि‍। उपहार स्‍वरूप लगभग हजार-हजार रूपैयाक नव मैथि‍ली पोथी सेहो प्रदान कएल गेल। ऐ तरहेँ वि‍देह द्वारा ई एकटा नव डेग, जेकरा मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे पहि‍ल डेग सेहो कहबामे कोनो हर्ज नै, उठाओल गेल। दोसर सत्र कवि‍ सम्‍मेलन आ परि‍चर्चाक छल‍। ऐमे भाग लेलनि राम सेवक ठाकुर, दुर्गानन्‍द मण्‍डल,‍ नन्‍दवि‍लास राय, कपि‍लेश्वर राउत, लक्ष्‍मी दास, रामवि‍लास साहु, प्रो. उपेन्‍द्र नारायण अनुपम, जगदीश प्रसाद मंडल, जनक कि‍शोल लाल दास, राम प्रवेश सिंह, शम्‍भू सौरभ, अजय कुमार दास, बलराम साहु, राम सेवक ठाकुर, अखि‍लेश कुमार मण्‍डल, शि‍वकुमार मि‍श्र आ मो. गुल हसन आदि‍ कविमे‍ अखि‍लेश कुमार‍ मंडल आ लक्ष्‍मी दास छोड़ि‍ सभ अपन-अपन स्‍वलि‍खि‍त नूतन कवि‍ताक पाठ केलनि‍। ऐ तरहेँ दोसर सत्रक समापनक पछाति‍ तेसर सत्र जे रंगमंच-सत्र ओ वि‍देह नाट्य उत्‍सवक अंति‍म सत्र छल, आयोजि‍त भेल। अंति‍म सत्रक वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍गण रहथि‍- कामेश्वर कामति‍, नीलकांत दास, शि‍व कारक, मो. असनुद्दीन, नन्‍द कि‍शोर गुप्‍ता, कपि‍लेश्वर राउत। रंगमंचीय अध्‍यक्षता ओ मंच संचालन केलनि‍ दुर्गानंद मंडल। रूपैयाक लालचमे नीच-सँ-नीच काज करबाक लेल लोक केना तैयार होइए इत्‍यादि‍ वि‍षय-वस्‍तुपर आधारि‍त वी‍रांगना एकांकीक प्रस्‍तुति‍क पछाति‍ वि‍देह नाट्य उत्‍सवक समापनक घोषणा कएल गेल। दुनू दिन बीच-बीचमे बेचन जीक निर्देशनमे नारी सशक्तीकरण, आंगनवाड़ी आदिपर लघु नाटकक मंचन सेहो भेल आ हाइ अल्ला लघुनाटक खूब नीक रहल। “हाइ अल्ला” विद्यार्थी सभक संकल्पना, लोकगीत आ मो. मुजीबुल हसन (गाम मदना)क सहयोगसँ आ बेचन ठाकुर जीक निर्देशनमे भेल। उपरोक्‍त समाचारक फोटो व वि‍डि‍यो नि‍म्‍न लिंक सभपर उपल्‍ब्‍ध अछि‍। http://maithili-drama.blogspot.com/ http://esamaad.blogspot.com/ http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video विदेह नाट्य उत्सवकेँ मैथिलीमे समानान्तर रंगमंचक उदयक आधिकारिक आरम्भक रूपमे मोन राखल जाएत। भरत नाट्यशास्त्र आधारित एस.एस.जानकीक ड्राइंग बनाओल रंगमंचपर उल्कामुख नाटक लोक तन्मयतासँ देखलनि, यएह ऐ बेरुका थीम छल। "स्लैपस्टिक ह्यूमर" बला सस्ता लोकप्रियता बला नाटक सभक अन्तक शंखनादक रूपमे ऐ नाट्य उत्सवकेँ देखल जा रहल अछि, जइमे ने भगताक भ्रष्ट-हिन्दीक प्रयोग भेल छल आ ने जातिवादी वाक्य संरचना कतौ देखबामे आओल, ई दुनू विशेषता हिन्दीसँ मैथिलीमे अनूदित नाटक, आ मैथिली उपन्यास-कथाक नाट्य रूपान्तरण धरिमे जबर्दस्ती घोसियाओल जाइत रहल छल। जखनकि मूल हिन्दीमे ऐ तरहक जाति आधारित वाक्य संरचना नै छलै, तइयो ब्राह्मणवादी जातिवादी रंगमंच ऐ तरहक रूपान्तरण तथाकथित नीचाँक जातिकेँ अपमानित करबा लेल आ अपन अहमक तुष्टि लेल करैत रहल, आ तेँ सर्वहारा वर्ग अपनाकेँ ऐ सँ दूर रखने रहल। दुनू दिन -कार्यक्रम शुरू हेबासँ पहिनहिये आयोजन स्थल लोकसँ खचाखच भरि गेल छल। निर्धारित ११ पूर्वाह्णसँ प्रारम्भ भऽ कऽ राति एक बजे धरि दुनू दिन कार्यक्रम भेल। २०म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी सेहो ऐ उत्सवक अन्तर्गत आयोजित भेल जतऽ मैथिली पोथी देखबा आ किनबा लेल भारी भीड़ छल। विदेह द्वारा २०१३ क जनवरी-फरवरी मासमे दोसर“विदेह मैथिली नाट्य महोत्सव २०१३” आयोजित कएल जाएत। एकर थीम रहत “आधुनिक रंगमंच वास्तुकला”। युवा नाट्यकला परिषद परवाहा देउरी द्वारा बिक्रमी शम्वत २०६९क पूर्व सन्ध्यामे अन्तरराष्ट्रिय मैथिली नाटक महोत्सव आयोजित (रिपोर्ट श्यामसुन्दर शशि) झूमि उठल जनकपुरवासी युवा नाट्यकला परिषद परवाहा देउरी बिक्रमी शम्वत २०६९क पूर्व सन्ध्यामे  अन्तरराष्ट्रिय मैथिली नाटक महोत्सव आयोजन कएलक जकर उदघाटन गणतन्त्र नेपालक पहिल राष्ट्रपति डा.रामवरण यादव कएलनि। महोत्सवमे नेपाल आ भारतक आठ गोट नाट्य समूह सहभागी भेल। चारि दिवसीय महोत्सवक समापन तथा नयाँ वर्ष २०६९क स्वागतमे मिथिला नाट्य कला परिषद एवं रामानन्द युवा क्लवक कलाकार लोकनि रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम सेहो  आयोजन कएने छल जइमे मिनाप अध्यक्ष सुनिल मल्लिक, नेहा, ललित कामत, संगीता देव, नवीन मिश्र आदि गायक गायिका-लोकनि अपन स्वरक जादूसँ दर्शककेँ मन्त्रमुग्ध कऽ देने छल। महोत्सवक अन्तिम दिन मिथिला अनुभूति दरभंगा श्याम भास्कर लिखित तथा निर्देशित ‘हमर गाम’ नामक नाटक मञ्चन कएने छल तँ रामानन्द युवा क्लव अवधेश पोख्रेल लिखित तथा पि. चन्द्रशेखर आ बिएन पटेल निर्देशित ‘मर्जीवा’ नाटक मञ्चन कएने छल। दुनू नाटकमे समाजक भहरैत सामाजिक मूल्यक मान्यता आ धनक पाछाँ अपस्याँत लोकक कथा वर्णित छल। महोत्सवक तेसर दिन अर्थात वृहस्तपति दिन मञ्चित दू नाटकमे मिथिलाक दूगोट  लोकनायकक कथा वर्णित छल। बिराट मैथिली नाट्यकला परिषद विराटनगरद्वारा प्रदर्शित  ‘महाकंजुस’ नामक नाटकमे मिथिलाक लोकनायक गोनू झाक बहुचर्चित हास्य कथा वर्णित छल। ऐ नाटकक संकलन आ निर्देशन युवा प्रतिभावान नाटककार रामभजन कामत छलाह तँ चेतना अभियान जनकपुर द्वारा मञ्चित ‘भैया अएलै अपन सोराज’ मे मुसहर जातिक लोक नायक दीना आ भद्रीक कथा वर्णित छल। नाटककार रामभरोस कापड़ि लिखित तथा सुनिल यादव निर्देशित ई नाटक ऐतिहासिक महत्वक छल। दोसर दिन प्रतिविम्व नाट्य समूह अवधेश पोख्रेल लिखित ‘कम्मो डार्लिंग’ क प्रदर्शन छल। महोत्सवक पहिल दिन भारत सहरसाक पंचकोशी नाट्य समूह हरिमोहन झाक कथापर आधारित ‘पाँच पत्र’ आ मिथिला नाट्यकला परिषद जनकपुर रमेशरंजन झा लिखित तथा अनिलचन्द्र मिश्र निर्देशित ‘बुधियार छौड़ा आ राक्षस’ नामक नाटक मञ्चन कएने छल। मिनापक नाटक शिल्प आ अभिनयक दृष्टिसँ बेजोड़ छल। नाट्य महोत्सवक किछु तस्वीर: तस्वीर श्यामसुन्दर शशि, कान्तिपुर तस्वीर श्यामसुन्दर शशि,कान्तिपुर तस्वीर श्यामसुन्दर शशि,कान्तिपुर नचिकेताक "एक छल राजा"क मंचन (रिपोर्ट श्री जितेन्द्र कुमार झा "जीतू") सरस्वती पूजनोत्सव तथा वसन्त पंचमी मेला २०६८ क अवसरपर अहू बेर तिलाठीमे ४ दिन धरि बेस रंगारंग कार्यक्रम आ रात्रिकालीन नाटक प्रस्तुत कएल गेल। मुदा दुर्भाग्य जे ४ मध्य एक राति मातरे मैथिली नाटक मंचन कएल गेल कारण छल उपयुक्त मैथिली पोथीक अन-उपलब्धता। जे होउ, अथक गन्थन-मन्थन पश्चात प्राप्त भेल “एक छल राजा” नामक नाटक, जकर मैथिली अभिनय अत्यन्त सफल रहल। नाटककार उदयनारायण िसंह नचिकेता द्वारा लिखल ओइ नाटककेँ श्री सरस्वती सांस्कृतिक नाट्यकला परिषदक कलाकार लोकनि अत्यन्त कुशलता पूर्वक मंचन कएलन्हि। अखिलेश्वर झाक निर्देशन रहल, ओइ नाटकमे पंकज कुमार झा, राकेश झा, विकास मिश्र, प्रकाश मिश्र, मनिष कुमार झा, निरज कुमार निरज, प्रमेश कुमार झा, जितेन्द्र जितु, लौकेश मिश्र सहितक कलाकार लोकनि अभिनय केने छलाह। ६७ वर्ष पूर्व विक्रम सम्वत २००१ सालमे श्री सरस्वती सांस्कृतिक नाटयकला परिषदक स्थापना कएल गेल छल। रंगमंचक इतिहास पुरान होइतो अहिठाम मैथिली नाटकक परम्परा ततेक पुरान नै देखल गेल अछि। यद्यपि विगत डेढ़ दशकसँ तिलाठीमे रहल दुनु परिषदक कलाकार लोकनि मैथिली नाटकक माध्यमे मातृभाषाक विकास संगहि समाज परिवर्तनक अभियानमे सक्रिय देखल गेल अछि। क्रुर राणा शासन व्यवस्थाक समय होउ वा निरंकुश पंचायती व्यवस्था, ओइ समयक गम्भीरता आ संवेदनशीलताकेँ बुझैत तिलाठीक रंगमंच क्रान्तिक अग्रदुत बनि आगाँ आएल तँ ठीक ओइ प्रकारे पछिला किछु दशकसँ मैथिल समाजमे हावी रहल विभिन्न प्रकारक कुरीति कुप्रथा ऊपर प्रहार करैत समाज परिवर्तनक सन्देश प्रवाह करबाक हेतु ई रंगमंच अग्रणि बनि सदति क्रियाशील देखल गेल। दहेज प्रथा, विधवा विवाह, जातिपाति तथा ऊँच नीचक परम्परा, गरीबी, विकास सहितक विभिन्न परिवर्तनकारी विषय वस्तुपर आधारित विभिन्न विद्वान लोकनि द्वारा लिखल गेल मैथिली नाटक अइ ठमका कालाकार लोकनि अत्यन्त कुशलता संग प्रस्तुत कएल गेल, से इतिहास देखल गेल अछि। सम्भवतः २०५१-५२ सालमे पहिल बेर मैथिली नाटकक मंचन तिलाठीमे कएल गेल छल। श्री सरस्वती सांस्कृतिक नाट्यकला परिषदक मंचन कएल नाटकक पश्चात तिलाठीमे मैथिली नाटकक बाढ़ि जकाँ आएल। कारण छल अपन स्थानीय भाषा आ स्थानीय विषय-वस्तुक उठान देखि दर्शक लोकनि द्वारा देखाओल गेल सदभाव। ओइ उपरान्त तँ जेना हिन्दी नाटक सभक उठिवास अइ ठामसँ होमए लागल। तिलाठीमे दुनु परिषद द्वारा मंचन कएल गेल मैथिली नाटक सभमे उगना, बकलेल, टाकाक मोल, बाढ़ि फेर आओत, धधकैत नवकी कनियाँक लहास, बदलैत समाज, हठात परिवर्तन, आगि धधकि रहल अछि, प्रोफेसर वौगला बान्हलक कण्ठी, कन्यादान इत्यादि प्रतिनिधिमूलक नाम थिक। समग्रमे देखल जाए तँ विभिन्न परिवेश आ परिस्थितिमे समाज रुपान्तरणक लेल तिलाठीक रंगमंच समयानकूल परिवर्तनकारी भूमिका निर्वाह करैत आएल अछि। जइ समयमे नेपालमे निरंकुश राणा शासनक प्रादुर्भाव छल, ओइ कालमे सेहो निर्धक्क रुपेण तिलाठीमे विभिन्न क्रान्तिकारी नाटक सभ प्रस्तुत कएल जाइत छल। क्रुर राणा शासनक विरुद्ध निर्णयक आन्दोलन चलि रहलाक समयमे सेहो अइ ठमका युवा लोकनि नाटकक माध्यमसँ जागरण अनबामे सक्रिय रहला। ओइ कालमे मंचन कएल गेल व्याकुल भारत, देशभक्त जागरण सहितक नाटक स्वतन्त्रता आ लोकतन्त्रक पक्षमे एक प्रकारक आन्दोलन रहल, अवकाश प्राप्त प्रधानाध्यापक तथा रंगकर्मी स्थानीय अमरनाथ झाक कथन अछि। तदोपरान्त पंचायत कालमे सेहो पाठशालाक प्राङ्गण क्रान्तिकारी अभिव्यक्ति आ नारासँ गुन्जयमान रहल छल। ओइ कालमे तँ कतेको बेर स्थानीय प्रशासन द्वारा अइ प्रकारक नाटकक मंचन नै करबाक लेल चेतावनी सेहो देल गेल छल मुदा प्रशासनक चेतावनीक परवाह नै करैत नाटक मंचन कएल गेल। कुमर िसंह अरावलीक शेर- देशकी दुरदिन गाउँकि ओर चलो- सहितक नाटक सभक विषय वस्तु पूर्णरुपेण तत्कालीन पंचायती व्यवस्था उपर कड़ा प्रहार छल। मुदा दुर्भाग्य, क्रुर राणा शासनक अन्त तथा पंचायती व्यवस्थाक समापनक पश्चात आएल परिवर्तनसँ तिलाठी आ तिलाठीक रंगमंच कहियो लाभान्वित नै होमए सकल। तिलाठीमे रंगमंच आ नाटक, स्थानीय वयोवृद्ध पण्डित उग्रकान्त झाक अनुसार, तिलाठी स्थित संस्कृत पाठशालामे अध्ययनरत विद्यार्थी लोकनि द्वारा, सर्वप्रथम तिलाठीमे नाटक विधाक प्रारम्भ कएल गेल छल। गुरुजी पं काशीनाथ ठाकुरक सबल संरक्षणमे ओइ समयमे तिलाठी आ अन्य विभिन्न स्थानसँ अध्ययनक क्रममे पाठशालामे रहल विद्यार्थी लोकनि द्वारा सरस्वती पूजनोत्सवक अवसरपर सर्वप्रथम वीर अभिमन्यू नामक नाटक मंचन कएल गेल, पण्डित झाक कथन अछि। ओइ नाटकमे पण्डित झा सेहो सहभागी छलाह। तदोपरान्त व्याकुल भारत देशभक्त जागरण सावित्री सत्यवान सहितक नाटक सभ सेहो हुनका लोकनि द्वारा मंचन कएल गेल छल। ओइ समयमे मंचन कएल गेल नाटक सभमे तिलाठीक पण्डित विक्रम झा, पं सूर्यकान्त चौधरी, पं उग्रकान्त झा, पं गंगाधार झा, सकरपुरा, पं श्रीकान्त झा, डिमन, पं गंगाधर झा, डिमन, पं महेश्वर झा, गोविन्दपुर, पं नवसुन्दर झा, सकरपुरा, पं कुशुमनारायण झा, मुरली, पं प्रतिपाल झा, गनौली, पं इन्द्रदेव झा, वैगनी नवादा सहितक विद्वान कलाकार लोकनि विभिन्न भूमिका निर्वाह केने छलाह। अइ अतिरिक्तो बहुत रास विद्वान कलाकार लोकनिक सक्रियता ओइ कालमे देखल गेल छल, यद्यपि हुनका सभक सम्बन्धमे ठोस जानकारी नै भेटि सकलाक कारणे नाम नै समावेश कएल गेल अछि। नाटकक व्यवस्थित रुपमे निरन्तर देबाक हेतु कालान्तरमे सांस्कृतिक आयोजन हुअए, से श्री सरस्वती सांस्कृतिक नाट्य कला परिषदक गठन कएल गेल। सांस्कृतिक आयोजनक नेतृत्व प्रा उमाकान्त झा केलनि आ किछु समय उपरान्त सांस्कृतिक आयोजनक परिष्कृत रुपमे विक्रम सम्वत २००१ सालमे श्री सरस्वती सांस्कृतिक नाट्यकला परिषदक गठन कएल गेल। संस्कृत पाठशालाक विद्यार्थी लोकनि द्वारा मंचन कएल गेल नाटक सभ हुअए वा सांस्कृतिक आयोजन, श्री सरस्वती सांस्कृतिक नाट्य कला परिषदक गठन आ ओइ उपरान्त नाट्य विधा आ कला संस्कृतिक संरक्षण-सम्वर्धन, अइ सम्पुर्ण कार्यमे डा. विजयानन्द मिश्र, शोभाकान्त मिश्र, राजनारायण झा, मुनि झा, बमभोला बाबू सहितक व्यक्ति लोकनिक उल्लेख्य योगदान रहल छल। ओइ पश्चात परिषदकेँ व्यवस्थित रुप प्रदान कएल गेल। दोसर पीढ़ीक जिम्मेवारी देल गेल तत्कालीन किछु ऊर्जावान युवा लोकनिकेँ, जइ अनुरुप तारानन्द झाकेँ परिषदक महानिर्देशक, दयाकान्त झाकेँ निर्देशक तथा विशेश्वर झाकेँ उप निर्देशकक पदभार देल गेल। यद्यपि महानिर्देशक आ निर्देशकक कार्यव्यस्तातक कारणे निर्देशनक सम्पूर्ण जिम्मेवारी तत्कालीन उप निर्देशक विशेश्वर झा पर चलि आएल, जकरा ओइ समएक ओ ऊर्जावान युवक वर्तमान समएक वयोवृद्ध अवस्था धरि अत्यन्त कुशलतापूर्वक निर्वाह करैत आएल छथि। विशेश्वर झाक सम्बन्धमे एतबे कहब उपयुक्त हएत जे ओ व्यक्ति नाट्य क्षेत्रक प्रति सम्पूर्ण जीवन न्यौछावर कऽ देलनि। तहिना मोतीनारायण मिश्रकेँ परिषदक सचिव तथा बाबूनारायण झाकेँ कोषाध्यक्ष पदक जिम्मेवारी देल गेल छल। ओइ कालमे तिलाठीक रंगमंचसँ आसपासक सम्पूर्ण क्षेत्र प्रभावित छल। अइ क्षेत्रक अन्य स्थान सभमे नाट्य विधाक विकासमे सेहो अइ ठमका कलाकार तथा जानकार लोकनिक विशेष योगदान रहल अछि। ओइ काल खण्डमे विभिन्न स्थान सभमे नाट्य महोत्सवक सेहो प्रारम्भ होमए लागल छल। अइ क्रममे राजबिराजमे आयोजित नाट्य महोत्सवमे परिषद उत्कृष्ट स्थान प्राप्त कऽ तीन दृश्य पर्दा सेहो पुरस्कार स्वरुप प्राप्त करबामे सफल भेल छल। मुदा कालान्तरमे विभिन्न वादविवादपूर्ण परिस्थिति आ परिवेशमे श्री सरस्वती सांस्कृतिक नाट्य कला परिषद विभाजित भेल । नाट्य क्षेत्रक विकासक लेल तिलाठी वासी अइ विभाजनकेँ सेहो सहर्ष स्वीकार केलनि, संगहि विभाजन पश्चात एक सँ दू गोट बनल परिषद सेहो रंगमंच तथा नाट्य विधाक विकासक लेल कोनो कसरि बाँकी नै राखि अपन-अपन योगदान वर्तमान समए धरि यथावत राखने अछि। ओ वर्ष छल विक्रम सम्वत २०३६ साल जइ साल श्री सरस्वती सांस्कृतिक नाटय कला परिषदसँ एक समूह विभाजित भऽ श्री हरगौरी नाट्य कला परिषदक स्थापना भेल। जानकार सभक अनुसार हरगौरी नाट्य कला परिषद्क संस्थापक अध्यक्ष पं विक्रम झा छलाह। अइ परिषदक स्थापना कालहिसँ नागेन्द्र झा अनवरत योगदान दैत आएल छथि। अभिनय आ निर्देशनमे झा परिषदकेँ अपन योगदान दैत आएल अछि । हम सप्तरीक तिलाठी गामक श्री सरस्वती सांस्कृतिक नाट्य कला परिषदसँ आबद्ध रहि परम्परागत रुपमे मैथिली नाटक मंचन केने छी आ राजबिराजमे अरुणोदय नाट्य मंचक गठन कऽ कऽ मैथिली रंगमंचकेँ अइ क्षेत्रमे अपन पुरान अस्तित्व संग स्थापित करबाक प्रयासमे प्रयत्नशील छी। विद्यापति पर्व २०११ मे राजबिराजमे भेल मैथिली नाटक "'आइग धधकि रहल अछि" मे हम पागल नेताक अभिनय केने रही। मैथिली फिल्मक लिस्ट कन्यादान १९७१ जय बाबा बैधनाथ १९७३ भौजी माय (बांग्ला फिल्म "रामेर सुमति"क मैथिली डबिंग-रूपांतरण) ममता गाबय गीत १९८२ इजोत १९९७ सस्ता जिनगी महग सेनुर १९९९ आऊ पिया हमर नगरी २००० ममता २००१ ( निर्देशक गोपाल पाठक) सेनुरक लाज  २००४ (निर्देशक डॉ. विनीत यादव) कखन हरब दुःख मोर २००५ दुलरुआ बाबु २००५ गरीबक बेटी २००६ (निर्देशक मनोज झा, मैथिलीक पहिल डिजिटल फिल्म) खगड़िया वाली भौजी २००७ (अंगिका) सुहागिन २००८ सिन्दुरदान २००८ काजर  २००८ लक्ष्मी एलथिन हम्मर अंगना २००९ (वज्जिका) पिया संग प्रीत कोना हम करबै २०१० अंग-पुत्र (अंगिका) २०१० मायक कर्ज २०१० सेनुरिया (साउथक फिल्मक मैथिली रूपांतरण, आयुष्मान फिल्म्स मीडिया आ प्रोडक्शन हाउस- निर्माता मंजेश दुबे, सह-निर्माता बी.एन. चौधरी) २०१० माई के ममता २०११ प्रित के बाजी २०११ सजना के अंगना में सोलह सिगार २०११ मुखिया जी २०११ पीरितिया ( लेखक-निर्देशक श्याम भास्कर, प्रस्तुति सुनील कुमार झा) हम नहि जायब पिया के गाम (लेखक-निर्देशकडॉ. सुरेन्द्र झा, निर्मात्री कल्पना झा, सह-निर्माता- शुभ नारायण झा) कर्मभाग्य, २०१२ निर्माता सुजीत मल्टीमीडिया प्र. लि.,इन्दल यादव, गीत वीरेन्द्र कबीरपंथी, तुलसी मं, कमाल मंडल (जयश्री कैसेट्स) सभ दिन सासुक एक दिन पुतौहुक, २०१२, निर्देशक दीपकजी, जयश्री कैसेट्स पिया संग प्रीत कोना हम करबै, २०१२, निर्देशक सूरज तिवारी, जयश्री कैसेट्स एकता आ बसन्त (वास्तव मे ई १६ बर्ख पुरान श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमरक "एकटा आओर वसन्त"सीरियल, मिथिलांचल फिल्म्स, निर्मात्री सरस्वती चौधरी- जे अखन नेपालमे सांसद छथि, केर चोरि कएल फिल्म्स सी.डी. छी, नाम बदलि कऽ आ निर्माता गोपाल पाठक कऽ कऽ नीलम कैसेट्सकेँ श्री गोपाल पाठक बेचि देलनि। ) अहाँ छी हमरा लेल (निर्देशक गोपाल पाठक) सजना ऐहन डोली ले के (वज्जिका) सुरजापुरी  फिल्म १. "काय आपन काय पर " (पहिल सुरजापूरी फ़िल्म), निर्माता ताराचंद धानुका , अध्यक्ष सुर्यापुरी विकास मंच, किसनगंज २.तोर पायल मोर गीत ३.मोर माँ ४.नागिनेर वचन हमर सौतिन (शीघ्र प्रदर्शन हएत) मिथिलाक चारू धाम (निर्देशक मनोज झा, शीघ्र प्रदर्शन हएत) साजन अहाँ बिना की (शीघ्र प्रदर्शन हएत) हमर अप्पन गाम अप्पन लोक (निर्देशक मनोज झा, शीघ्र प्रदर्शन हएत) माइक कर्ज (निर्देशक मनोज झा, शीघ्र प्रदर्शन हएत) खुरलुच्ची (निर्देशक मनोज झा, शीघ्र प्रदर्शन हएत) अल्ला ईश्वर तोरे नाम (निर्देशक मनोज झा, शीघ्र प्रदर्शन हएत) सौतिन (निर्देशक मनोज झा, शीघ्र प्रदर्शन हएत) पिया भेल परदेशी (शीघ्र प्रदर्शन हएत) प्रीत के फूल (शीघ्र प्रदर्शन हएत) अंधेर नगरी चौपट राजा (निर्माणाधीन) फूटल ढोल (निर्माणाधीन) एकटा अन्हरीया(निर्माणाधीन) मीता (निर्माणाधीन) हमर गाम (निर्माणाधीन) गामक लाज(निर्माणाधीन) मधुश्रावणी(निर्माणाधीन) ललका पाग(निर्माणाधीन) अमावस के चान(निर्माणाधीन) हमरा लग रहब (निर्माणाधीन) नाच-गान(निर्माणाधीन) एक चुटकी सिन्दूर(निर्माणाधीन) बिजुलिया भौजी (निर्देशक मनोज झा, निर्माणाधीन) आइ लव जनकपुर (मेमोरी मिथिला फिल्मस प्रा.लि., कथा-निर्देशन- निराजन मेहता (मञ्जित), निर्माता- प्रदिप राज- कमल मण्डल, निर्माणाधीन) मैथिली लघु फिल्म (डॉक्यूमेन्ट्री)/ टेली फिल्म/ वीडियो फिल्म मिथिलाक व्यथा १९९१ ( पहिल मैथिली टेली फिल्म,नेपाल टेलिभिजनसँ प्रसारण, डा.राजेन्द्र विमलक लेखन आ लय संग्रौलाक निर्देशन,धीरेन्द्र प्रेमर्षिक अभिनय ) अबकी बेरिया रे गोपीचन (टेली फिल्म, निर्देशक प्रदीप बिहारी, केंद्रीय भूमिकामे रवीन्द्र बिहारी राजू, प्रदीप बिहारी) दहेज १९९२  (पहिल मैथिली वीडियो फिल्म,गीतः बृषेश चन्द्र लाल, संगीत निखिल-राजेन्द्र, गायकः सुनिल मल्लिक) bhaagirath चुसना-फेकना आ पोंगा पंडित २००१ (वीडियो फिल्म, निर्माता सुनील कुमार झा, बैनर जानकी फिल्म्स, निर्देशक श्याम भास्कर) सपना भेल सोहाग २००१ (वीडियो फिल्म, निर्देशक राजीव गौतम) अहाँ छी हमरा लेल २००६ (वीडियो फिल्म, निर्देशक गोपाल पाठक) रक्ततिलक २००८ (मैथिली लघु-फिल्म/ डॉक्यूमेन्ट्री) अतीतक स्वर (मैथिली लघु-फिल्म/ डॉक्यूमेन्ट्री) मल्लाह (मैथिली लघु-फिल्म/ डॉक्यूमेन्ट्री) सौराठ सभा (मैथिली लघु-फिल्म/ डॉक्यूमेन्ट्री) कारागार (मैथिली लघु-फिल्म/ डॉक्यूमेन्ट्री) बिहान (मैथिली लघु-फिल्म/ डॉक्यूमेन्ट्री) कमला (मैथिली लघु-फिल्म/ डॉक्यूमेन्ट्री, निर्देशक अमितेश शाह) भागिरथ ((लेखन सुदर्शन लाल कर्ण , टेलीफिल्म ) एकटा आओर वसंत (टेलीफिल्म, लेखन रामभरोस कापड़ी भ्रमर, ऐ मे बलात्कार सीनक फिल्मांकनक चलते सेंसर बोर्डक प्रश्न सेहो आएल , विधवा विवाह आदि सामाजिक समस्या पर विचार) प्रत्यावर्तन (लेखक उदयनारायण सिंह नचिकेता, टेलीफिल्म/ सीरियल ) कनिया (टेलीफिल्म,निर्देशक अविनाश श्रेष्ठ) महाकवि विद्यापति (लेखक- रेवती रमण लाल, निर्देशक अरुण कुमार झा , टेलीफिल्म) चमेली (टेलीफिल्म) दुमहला (टेलीफिल्म) हंसा चलल परदेश  (लेखक- राजेन्द्र विमल, निर्देशक प्रकाश सायमी , टेलीफिल्म) ईजोत  (लेखक- निर्देशक अमितेश शाह, लघु चलचित्र) ठहक्का  (लेखक- निर्देशक अमितेश शाह, टेलीफिल्म) राजा सलहेस (निर्देशक-रमेश रंजन , वृत्तचित्र ) सौराठ सभा (निर्देशक-रमेश रंजन , वृत्तचित्र ) सक्षम महिला असल नेता (निर्देशक-दीपेन्द्र गौचन , वृत्तचित्र ) गिद्ध (निर्देशक-अशु गिरी , वृत्तचित्र ) महायात्रा  (निर्देशक- अमितेश शाह , वृत्तचित्र ) शुभारम्भ (निर्देशक-अशु गिरी , वृत्तचित्र ) लबकी कनिया २००८  (पहिल महिला निर्देशक-रेणु चौधरी , वृत्तचित्र ) चौखट (निर्देशक-दीपक रौनियार , वृत्तचित्र ) मिथिला (निर्देशक सुनील पोखरेल, टेलीफिल्म) सेनैना (निर्देशक सुनील पोखरेल, टेलीफिल्म) चंगूमंगू (निर्देशक सुनील पोखरेल, टेलीफिल्म) कालाजार (निर्माता माह संचार, टेलीफिल्म) नीचाँमे श्री रामभरोस भ्रमरजीक पत्र देल जा रहल अछि, "नीलम फिल्म्स आ गोपाल पाठकक करतूत"- ई पंकज पराशर, सुशीला झा, डॉ. योगनाथ झा (उर्फ योगनाथ सिन्धु उर्फ सिन्धुनाथ झा)क कड़ीमे एकटा आर चोरक चोरिक शृंखला अछि जकर विदेह द्वारा पर्दाफास कएल जा रहल अछि। आशुतोष अभिज्ञकेँ शैलबाला पुरस्कार आ रीतू कर्णकेँ कामेश्वरी देवी पुरस्कार (रिपोर्ट श्री सत्यनारायण झा) चेतना समिति ,पटनाक तत्वाधान मे विद्यापति पर्व समारोह रात्रि दिनांक १० -११ -२०११ केँ आशुतोष अभिज्ञकेँ शैलबाला पुरस्कार एवंरीतू कर्णकेँ कामेश्वरी देवी पुरस्कार (नाटकमे सर्वोत्तम अभिनयक लेल) प्रदान कएल गेलनि जेकर ओ हकदार छलाह।

श्रीमति शैलबाला मिश्र स्मृति पुरस्कार: मधुबनी जिलाक चानपुरा निवासी, पटना कॉलेजक पूर्व प्रधानाचार्य, विश्वविद्यालय सेवा आयोगक पूर्व अध्यक्ष डॉ. सूर्यकान्त मिश्रक धर्मपत्नी श्रीमती शैलबाला मिश्रक स्मृतिमे १९८४ ई. सँ ई पुरस्कार प्रारम्भ भेल अछि। हुनक परिवार दिससँ चेतना समिति नामे जमा स्थायी निधिपर उपचित ब्याजसँ विद्यापति स्मृति पर्वक अवसरपर मंचित नाटकमे सर्वश्रेष्ठ अभिनय लेल कलाकारकेँ श्रीमती शैलबाला मिश्र स्मृति पुरस्कार प्रतिवर्ष देल जाइत अछि।

श्रीमती कामेश्वरी देवी पुरस्कार: चेतना समितिक आजीवन सदस्य आ समाज सेवी विजय कुमार मिश्र द्वारा अपन माइक नामपर चेतना समितिक नामे जमाराशिपर उपचित ब्याजसँ विद्यापति स्मृति पर्वपर मंचित नाटकमे सर्वश्रेष्ठ अभिनय लेल महिला कलाकारकेँ २००२ सँ श्रीमती कामेश्वरी देवी पुरस्कार प्रतिवर्ष देल जाइत अछि। बेरमामे ''अप्पन कर्मक फल'' नाटक मंचि‍त भेल दुर्गापूजा-२०११ केर अवसरपर मैथि‍ली-नाटक मंचन भेल- अप्‍पन कर्मक फल स्‍थान- दुर्गापूजाक मेला परि‍सर बेरमा (उत्तरवारि‍ पार) जि‍ला- मधुबनी नरेन्द्र मि‍श्र नाटककार- नरेन्‍द्र मि‍श्र ि‍नर्देशक- माधव आनन्‍द आ नरेन्‍द्र मि‍श्र पात्र-               कलाकार-            पि‍ताक नाओं-         पता- १. भि‍षन भायजी         मंजल आलम            मो. मुशलीम,            बेरमा २. कल्‍लू               वि‍जय झा              श्री प्रेमचन्‍द्र झा           बेरमा ३. शुकन               टोनी झा               स्‍व. मि‍थि‍लेश झा         बेरमा ४. चाहबला             धर्मेन्‍द्र मि‍श्र              श्री सदानंद मि‍श्र          बेरमा ५. कल्‍लू केर पत्नी        धर्मेन्‍द्र मि‍श्र             श्री सदानंद मि‍श्र          बेरमा ६. शराब दोकानदार       प्रमोद साहु              श्री गणेश साहु           बेरमा ७. समदि‍या             वि‍काश ठाकुर            श्री ब्रह्मदेव ठाकुर         बेरमा ८. चाेर-१              प्रमोद साहु              श्री गणेश साहु           बेरमा ९. चोर-२              आशीष ठाकुर            श्री ललन ठाकुर          बेरमा १०. मुन-मुन काका        वि‍काश ठाकुर            श्री ब्रह्मदेव ठाकुर        बेरमा ११. मास्‍टरजी           माधव ठाकुर            स्‍व. बेचन ठाकुर          बेरमा सहयोगकर्त्ता- अमरेन्‍द्र मि‍श्र मधुकान्‍त झा ललन ठाकुर लक्ष्‍मीकान्‍त झा अंकि‍त ठाकुर तबरेज आलम ओमप्रकाश मण्‍डल दीपक मण्‍डल शि‍वम मण्‍डल दि‍नेश मुखि‍या शंकर पासवान गुलशन अली राघव मि‍श्र नाटककार आनन्द कुमार झा केँ साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार २०११ (रिपोर्ट गजेन्द्र ठाकुर) -साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार २०११ मैथिली लेल श्री आनन्द कुमार झाकेँ हुनकर नाटक "हठात परिवर्तन" लेल देल गेल।

-श्री आनन्द कुमार झाकेँ विदेह समानान्तर युवा पुरस्कार २०११ पहिनहिये भेट चुकल छन्हि, हुनकर पोथी "हठात परिवर्तन" केँ वोटिंग लेल राखल गेल रहए आ नाटक "कलह" केँ ई पुरस्कार देल गेल रहए। हुनकर पाँचटा नाटकक पोथी प्रकाशित छन्हि। -युवा पुरस्कार २०११ लेल जूरी रहथि श्रीमती शेफालिका वर्मा, श्री गंगेश गुंजन आ श्रीमति उषाकिरण खान। - युवा पुरस्कारक सम्बन्धित वर्षक १ जनवरी (ऐ साल ई तिथि छल १ जनवरी २०११ केँ ३५ वर्ष) केँ ३५ वर्षसँ कम उमेरक रचनाकारकेँ सभ साल देल जाएत। -ऐ साल पहिल बेर ई पुरस्कार शुरू कएल गेल अछि।

-पुरस्कारमे पचास हजार टाका आ ताम्र प्रशस्ति-पत्र देल जाएत। "भोरक भुथलायल"-लेखक जवाहर लाल कश्यपक मंचन "भोरक भुथलायल"-लेखक जवाहर लाल कश्यपक मंचन फुलकाही गाममे सरस्वती पूजा २०१२ क शुभ अवसरपर भेल। नवल, किसलय, अभिषेक आ दीपाक अभिनय प्रशंसनीय रहल। मैथिलोत्सव २०११ (मुन्नाजीक रिपोर्ट) २० दिसम्बर २०११ केँ भारतक राजधानी दिल्लीमे मलंगिया जीक “मैलोरंग” द्वारा मिथिलोत्सव-११ क संचालन श्रीराम सेन्टर, मण्डी हाउस दिल्लीमे कएल गेल। ऐ अवसरपर स्व. राजकमल चौधरीक प्रसिद्ध कथा “ललका पाग”क नाट्य रूपान्तरण प्रस्तुत कएल गेल, जइमे नाटकक सभ तरहक तकनीकक संयोजन आ प्रदर्शन देखेबाक प्रयास भेल, आधुनिक प्रयोगक नामपर अतिप्रयोगसँ सामान्य दर्शककेँ कतेको बेर अगुताइत देखल गेल। संगहि मंचकेँ आवश्यकतासँ बेशी देर धरि छोड़ि देल जाइत छल जे संयोजनक कमीकेँ देखार करैत रहल। लिटिल चैम्प नेना सुश्री मैथिली ठाकुरक “जय जय भैरवि..” सभ दोसर क्रियाकलापपर भारी रहल आ कर्णप्रिय रहल। गम्भीर अस्वस्थताक पछाति स्वस्थ भऽ पहिल बेर अंशुमाला जीक प्रस्तुति “पिया मोर बालक” लोककेँ मोहलक। मुदा हुनकर अस्वस्थ अवस्था अखनो हुनकर चेहरापर नजरि आएल जे मोनकेँ कचोटलक। नाटककार जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ हुनकर मैथिली लघुकथा संग्रह "गामक जिनगी" लेल टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ (रिपोर्ट पूनम मण्डल) नाटककार जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ हुनकर मैथिली लघुकथा संग्रह "गामक जिनगी" लेल टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११। कार्यक्रम १२ जून २०१२ ई. केँ कोच्चि (केरल) मे भेल। ई पुरस्कार दक्षिण कोरियाक एम्बैसी (स्पॉन्सर सैमसंग इण्डिया लिमिटेड) क आग्रहपर साहित्य अकादेमी द्वारा शुरू कएल गेल अछि। टैगोर साहित्य  पुरस्कार  गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुरक १५०म जयन्तीक उपलक्ष्यमे शुरू भेल छल। सभ साल ८ टा भाषा आ तीन सालमे साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त सभटा २४ भाषाकेँ ऐमे पुरस्कृत कएल जाइत अछि। मैथिली लेल ई पुरस्कार पहिल बेर देल जा रहल अछि। ऐ सम्बन्धमे गजेन्द्र ठाकुर फेसबुकपर लिखलन्हि: साहित्य अकादेमीक टैगोर लिटरेचर अवार्ड २०११, मैथिली लेल श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ हुनकर लघुकथा संग्रह "गामक जिनगी" लेल देल जाएत। मैथिली लेल विवादक अन्तक कोनो सम्भावना नै देखबामे आबि रहल अछि। ऐ पुरस्कारक ग्राउण्ड लिस्ट बनेबा लेल एकटा तथाकथित साहित्यकारकेँ चुनल गेल जे प्राप्त सूचनाक अनुसार जातिक आ संकीर्णताक आधारपर पोथीक नाम देलन्हि जाइमे नहिये नचिकेताक पोथी रहए, नहिये सुभाष चन्द्र यादवक आ नहिये जगदीश प्रसाद मण्डलक। रेफरी जखन ७ टा पोथीक नाम पठेलन्हि तखन ओइमे चन्द्रनाथ मिश्र "अमर"क अतीत मंथन सेहो रहए जखन कि ओ पोथी निर्धारित अवधि २००७-२००९ मे छपले नै अछि, तँ की बिनु देखने पोथी अनुशंसित कएल गेल? ऐ तरहक ग्राउण्ड लिस्ट बनेनिहार आ बिनु पढ़ने पोथी अनुशंसित केनिहारकेँ साहित्य अकादेमी चिन्हित करए, आ नाम सार्वजनिक कऽ स्थायी रूपसँ प्रतिबन्धित करए, से आग्रह; तखने मैथिलीक प्रतिष्ठा बाँचल रहि सकत। श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक "गामक जिनगी" मैथिली साहित्यक इतिहासक सर्वश्रेष्ठ लघु कथा संग्रह अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ बधाइ। मनोज कुमार मण्‍डल “‍बाप भेल पि‍त्ती” ओ “‍अधि‍कार” नाटक'क सफल मंचन चनौरागंज, मधुबनी। वसंतक बेलामे सरस्‍वती पूजाक शुभ अवसरपर जे.एम.एस. कोचि‍ंग सेंटर केर संस्‍थापक सह शि‍क्षक श्री बेचन ठाकुर जीक रचि‍त दू गोट नाटकक मंचन कोचि‍ंगक बालक-बालि‍का द्वारा कएल गेल। पहि‍ल नाटक “बाप भेल पि‍त्ती‍” सतौत माएक नकारात्‍मक चरि‍त्रपर आधारि‍त छल। ऐ सम्‍पूर्ण नाटकक सफल प्रस्‍तुति‍ कोचि‍ंगक बालि‍का द्वारा कएल गेल। स्‍त्री, पुरूष दुनूक भूमि‍का बालि‍का सभ केलनि‍। नाटकक सफल मंचनक श्रेय श्री बेचन ठाकुरकेँ देबामे कनि‍यो असोकर्ज नै कारण नाटक लि‍खबासँ लऽ कऽ ि‍नर्देशन धरि‍ ठाकुरजी स्‍वयं केलाह। ऐ नाटकक प्रस्‍तुति‍सँ बुझि‍ पड़ल जे ठाकुरजी समाजसँ कतेक सरोकार रखै छथि‍ आ समाजक कतेक सूक्ष्‍म अध्‍ययन करै छथि‍। गाम-घरक परि‍वेश रहि‍तो दर्शक धन्‍यवादक पात्र छथि‍ जे नाटक देखबामे भाव-वि‍भोर भऽ गेल छलाह। दोसर लघु नाटक छल “अधि‍कार‍”, ई नाटक सूचनाक अधि‍कारसँ सम्‍बन्‍धि‍त “बेस्‍ट सि‍टि‍जन अवार्ड‍”सँ पुरस्‍कृत मो. मजनूम नवादपर आधारि‍त छल। ऐ नाटकक प्रस्‍तुति‍ संस्‍थानक बालक द्वारा कएल गेल। सभसँ महत्‍वपूर्ण बात ई अछि‍ जे दर्शकक पहि‍ल पति‍यानीमे बैस मो. मजनूम नवाद सेहो आदि‍सँ अंत धरि‍ नाटकक आनंद लेलाह। संगे चनौरागंगक अगल-बगल जेना बेरमा, मछधी, सि‍मरा, कनकपुरा, चनौरा, जगदर, रबारी, वि‍शौलक लोक सभ दर्शक रूपमे उपस्‍थि‍ति‍ रहथि‍‍। हजारोक संख्‍या कहबामे कम बुझना जाइ छल। कि‍छु लोक एहनो भेलाह जे अपन भाव मंचपर उपस्‍थि‍त भऽ कऽ अभि‍व्‍यक्‍त केलथि‍, जइ‍मे श्री कामेश्वर कामति‍, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री गोवि‍न्‍द झा, श्री चेत नारायण साहु, श्री रमेश प्रधान, श्री वि‍पि‍न साहु, श्री महावीर साहु, श्री बहादुर ठाकुर, श्री मनोज कुमार मण्‍डल इत्‍यादि‍ प्रसन्न भऽ नाटककार सह आयोजन कर्ता माने मंचक श्री बेचन ठाकुरजीकेँ धन्‍यवाद ज्ञापनक संग-संग कलाकार-वि‍द्यार्थी-सभकेँ प्रोत्‍साहन केलनि‍। उपस्‍थि‍त श्रोता सभ नाटकक वि‍षय-वस्‍तुसँ काफी प्रभावि‍त भेलाह, जेकर कारण नाटकक भाषा सेहो स्‍पष्‍ट रूपमे देखार भेल। ऐ नाटकक मंचनसँ आ श्रोता-दर्शकक उपस्‍थि‍ति‍ आ लगावसँ ई स्‍पष्‍ट देखार भेल जे जौं अहि‍ना मैथि‍ली नाटकक संचालन मि‍थि‍लाक गामपर हुअए तँ मैथि‍लीक वि‍कास माने मि‍थि‍लाक वि‍कासक प्रेमी-साहि‍त्‍यकार- अपन वि‍चारकेँ परोसबामे तेजी आनि‍ सकै छथि‍। प्रसाद पौनि‍हारक कमी नै अछि‍। हमहूँ अपना तरफसँ आदरणीय श्री बेचन जीकेँ धन्‍यवाद दै छि‍यनि‍ आ आशा करै छी जे आगूओ ओ अहि‍ना अपन नाटकक माध्‍यमसँ समाजकेँ ओझल वि‍षय-वस्‍तुसँ सुगम भाषामे समै-समैपर अवगत करबैत रहताह। जय मि‍थि‍ला! जय मैथि‍ली!! झिझिया प्रस्तुति (रिपोर्ट बृषेश चन्द्र लाल) झिझियाक प्रस्तुति धनुषाक बिन्ही गामक मुसहर जातिक महिला लोकनि कएलनि, तकर आयोजन मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक महिला फ्रन्ट द्वारा कएल गेल। संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चाक विशाल आमसभामे प्रारम्भमे एकरा प्रस्तुत कएल गेल छल। मैथिल संस्कृति प्रति राजनैतिक शक्तिक प्रतिबद्धताक ई एक उदाहरण अछि। विदेह मैथिली नाट्य उत्सव || 227 228 || विदेह मैथिली नाट्य उत्सव

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हमरा BAD एक आवाज, संघीय शासन मिथिला राज Woe | i मिधिला राज्य स्थापनाक लेल मिथिला राज्य संघर्ष समितिद्वारा आयोजित शान्तिपूर्ण कार्यक्रममे मिधिला BH fa विरोधी तत्वद्वारा कराओल गेल बम विस्फोटमे मिथिलाक पाँच सपत जें शहादत प्राप्त केलनि acm बलिदान प्रति fe द 4 Bi bj ऐक्यबद्धता प्रकट करवाक लेल बैशाख 30 गते २०६४ मे आयोजित श्रद्धाउजली सभामे उपस्थित भ' मिथिला | Hy 'राज्यक स्थापना प्रति ऐक्यवद्धता प्रकट करबाक लेल हार्दिक अनुरोध अधि । 4 | | स्थान जानकी मन्दिरक प्राजुण मिथिला राज्य संघर्ष समिति | ! | समय :- १ बजे दिन जनकपुरबाम |

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विंदेह भरथिली ज्ञाटथ उत्सत विदेह-सदेह ८, विदेह www.videha.co.in Tex (अंक ९१-१००) सँ, y (| x C4 Ms %) @) He ( Sa 7 से ही ai 3 Fi W y @ / Zax kL | तर कि os NY = सा oa peel # २९७३ . <= me Las ee या विंदेह-प्रथम मैथिली पाल्िंक ई-पत्रिका =————— Fa ISSN 2229-547X VIDEHA a सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादकः उमेश मण्डल। सहायक Tas: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: A कुमार झा आ पउ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा fart सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक-नाटक-रंगमंच-चलचित्र: बेचन ठाकुर। Jem | Playas सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद: पूनम मंडल आ प्रियंका झा। Fas : सम्पादक-अनुवाद विभाग: विनीत उत्पल। Ss

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b fa न au कवर आ बैक चित्र श्वेता झा चौधरी श्रुति प्रकाशन a कार्यालय: 6/29, J] राजेन्द्र नगर, दिल्‍्ली-११०००८ FEAT: (099) २४८८६६४६-४७ BHA: (०११) २४८५८६६४८ website: http://www.shruti-publication.com E-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (7 ‘*’**°??*°°* a 200/- US $25