1 2 ISSN 2229-547X विदेह मैथिली शिशु उत्सव (विदेह-सदेह ९, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक ५१-१००) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ शिशु, बाल आ किशोर साहित्यक एकटा समानान्तर संकलन) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मण्डल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक: नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद: पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग: विनीत उत्पल। श्रुति प्रकाशन ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रतिएवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नै कएल जा सकैत अछि। ISBN : 978-93-80538-67-9 ISSN: 2229-547X मूल्य : भा. रू. २००/- संस्करण : २०१२ © श्रुति प्रकाशन श्रुति प्रकाशन रजिस्टर्ड आॅफिस : ८/२१, भूतल, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- ११०००८. दूरभाष- (०११) २५८८९६५६-५८ फैक्स- (०११) २५८८९६५७ Website : http://www.shruti-publication.com e-mail : shruti.publication@shruti-publication.com Printed at : Ajay Arts, Delhi-110002 ज्योति सुनीत चौधरीक नानीक खिस्साक छह टा चित्र ज्योति सुनीत चौधरी द्वारा स्वयं बनाओल गेल। शशिधर कुमरक आलेखक चित्र- डायग्राम विकीपीडियासँ साभार। पोथीक शेष चित्र आ रंग प्रीति, आस्था आ ओम द्वारा। Typeset by : Umesh Mandal. Distributor : Pallavi Distributors, Ward no-6, Nirmali (Supaul). मो.- ९५७२४५०४०५, ९९३१६५४७४२ Videha Maithili Shishu Utsav : Anthology of Maithili Children Literature (Prose & Verse) . अनुक्रम गजेन्द्र ठाकुर- शिशु, बाल आ किशोर साहित्य आ ओकर समीक्षाशास्त्र ज्योति सुनीत चौधरी- ध्वनि-प्रतिध्वनि/ अदृश्य बन्धन/ नानीक खिस्सा (भलुनिया मौसी, सिन्नुरक पुल, एक राजाक सात मेहरी, पन्साया कुम्मरि, सुहान बोन) ब्युटी कुमारी- राहुलजी एक नजरिमे/ कैदी भावना नवीन- हमर प्रिये नेना भुटका शबनम श्री- कंप्यूटर क खेल डाॅ. रमण झा- गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा/ मैथिली चित्रकथा विनीत उत्पल- कतए गेल फिल्मक बाल कलाकार डाॅ० अभयधारी सिंह- अभिनव वर्ष अनमोल झा- एकटा बाल विहनि कथा- भण्डाफोर शिवकुमार झा ‘टिल्लू’- तरेगन देखाइए/ दहीक ठोप/ खोंइछक लेल साड़ी (दुर्गानन्द मण्डल जीक टिप्पणी सहित)/ नारियर- गाछ/ मिथिलाक लोकदेवता/ तरेगन श्रीमति शेफालिका वर्मा- आनक बड़ाइ/ साबरमती आश्रम/ मूर्ख राजा आ ओकर बेटा / देश-प्रेम/ गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा/ बाल दिवस अर्चना कुमर- विद्वान (दादीसँ सुनल कथाक पुनर्लेखन) मुन्नाजी- पथ दर्शन काश्यप कमल- बाबूक सुनाएल खिस्सा (सहस्रमुखक दीप/ गप्पक अर्थ/ जहियासँ काल धेलक/ नीक करी तँ पैघ के? बेजाए करी तँ पैघ के?/ पढ़बे टा नै करी ओकरा गुनबो करी/ अकिलक मोल) गंगेश गुंजन- लाट साहेबक किरानी दुर्गानन्द मण्डल- पारस/ राखी/ स्वतंत्रता दिवस नवीन ठाकुर- चंदा मामा आ चंद्रमा बिपिन कुमार झा- ऐ चराचर जगतमे मनुक्ख के?/ सुखकेँ मृगमरीचिका बुझू।(श्री देवब्रत बसुक संस्कृत कथाक मैथिली अनुवाद बिपिन कुमार झा द्वारा) अनिल मल्लिक- दादीक गीत वृषेश चन्द्र लाल- गोलबा/ एकदन्त हाथी आ नौलखा हार जगदानन्द झा “मनु”'- चोनहा (बाल उपन्यास) जगदीश प्रसाद मण्डल- बुढ़िया दादी/ मान गजेन्द्र ठाकुर- तरहरिमे परीलोक दमन कुमार झा- हीरा-मोती डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- दक्षिणी ध्रुव पर मनुक्खक पएरक सए वर्ष अर्थात् खिस्सा अण्टार्कटिका केर/ उड़ि ने सकी पर चिड़ै छी हम/ अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस/ चन्ना मामा (बालगीत) पंकज कुमार झा- माए गइ माए गजेन्द्र ठाकुर- बड़द करैए दाउन ने यौ ज्योति सुनीत चौधरी- बचपन/ सैण्टाक अस्तित्व/ दलमा जगदीश प्रसाद मण्डल - दू टा गीत (सुनू बौआ यौ सुनू नूनू यौ /पुत्र-पिता सम्वाद) डॉ. नरेश कुमार ‘विकल’- दूटा गीत (बाल गीत/ सुनू बौआ मोर) संस्कृति वर्मा- कतए जाइ/ अहाँ आबु/ हमर दादी माँ/ काश हमरा पंख रहितैक तँ अनमोल झा- अपन गाम/ मामा गाम राजेश मोहन झा “गुंजन”- साओन कुमार/ चुट्टी शिव कुमार झा टिल्लू- पेटू गोलू रमाकान्त राय रमा- उल्लूक शिकारी मिथिलेश कुमार झा- बाबाक रोपल गाछ सिनुरिया महाकान्त ठाकुर- सिनेहक सरगम/ खगता भगतसिंहक/ अपन भूमि/ भरि पोख/ ज्ञान दीप डॉ जया वर्मा- बेटी चन्द्रशेखर कामति- भात छै नाम-नाम/ गीत डॉ॰ शशिधर कुमर- हम फूल बनब, हम काँट बनब सद्रे आलम गौहर- नेना भुटकाक लेल एकटा सुंदर कविता जगदीश चंद्र ठाकुर ‘अनिल’- तीनटा बाल गीत प्रेमचन्द्र मिश्र- दूटा बालगीत बृषेश चन्द्र लाल- दसटा बालगीत शान्तिलक्ष्मी चौधरी- बाल गजल १-४/ कुम्हर/ बरखा रानी इरा मल्लिक- छम-छम बरसा/ माँ नवीन कुमार "आशा"- हिंगलू भाइ यौ टिंगलू भाइ मुन्नी कामत- जड़ैत ज्योत राजदेव मंडल- मुनियाँक चिन्ता/ कथीक गाछ चन्दन कुमार झा- हमहूँ पढ़बै आब/ बुन्नी शंभू नाथ झा- न्यूटनक सिद्धांत/ पाकल आम चंदन कुमार झा- दू टा मैथिली अगड़म-बगड़म मनोज कुमार मण्डल- खेल प्रभात राय भट्ट- चुनमुन चुनमुन करैत चिड़िया दुर्गानन्द मण्डल- हम हिन्दुस्तानी छी आशुतोष मिश्र- बाल गजल अमित मिश्र- बाल रुबाइ/ बाल गजल देवांशु वत्स- प्रगतिक रहस्य तुनिशा प्रियम/ गुंजन कर्ण/ ज्योति सुनीत चौधरी/ गणेश ठाकुर/ अनुपमा प्रियदर्शिनी/ श्वेता झा चौधरी/ श्वेता झा (सिंगापुर)/ प्रवीण कुमार ठाकुर/ कैलाश कुमार कामत/ मोना पाण्डेय/ इरा मल्लिक - चित्रकला
गजेन्द्र ठाकुर शिशु, बाल आ किशोर साहित्य आ ओकर समीक्षाशास्त्र बाल साहित्यमे मोटा मोटी एक बर्खसँ कम उमेरक बच्चासँ लऽ कऽ अट्ठारह बर्खक किशोर धरिक उपयोगक साहित्य सम्मिलित अछि। मानसिक रूपसँ आस्ते-आस्ते सीखएबला बच्चा लेल ई वर्गीकरण कने दोसर तरहेँ हएत, जेना जे सामान्य छह बर्खक बच्चा लेल बाल साहित्य मानल जाइए से हुनका लोकनि लेल दस बर्खक आयुमे प्रयुक्त भऽ सकैए। सरस्वती नदी, जल-प्रलय, मनु आ महामत्स्यक कथा, गिल्गमेश कथा काव्य, प्राणवंतक देश गिल्गमेशक खोज, सृष्टिकथा आ देवतंत्रक विकास ई सभ ऋगवेद आ अवेस्ता आदिक सन्दर्भमे प्रारम्भिक बाल साहित्य मानल जा सकैए। अरा-युक्त रथक वर्णन वेदमे भेटैत अछि। नहिये तँ ई पश्चिम एशियामे छल आ नहिये यूरोपमे। भारतीय देवनाम, शिल्प, कथा, अश्वविद्या, संगीत, भाषिक तत्व आ चिंतनक संग ई उद्घाटित होमए लागल पश्चिम एशिया, मिश्र आ यूनानमे। दोसर सहस्राब्दी ई.पूर्व अरायुक्त्त रथ, भारतीय देवनाम, भारतक धार, ऋगवैदिक तत्वचिंतन, अश्वविद्या, शिल्प-तकनीकी आ पुरातन् कथा भारतसँ पच्छिम एशिया, क्रीट-यूनान दिशि जाए लागल। कालक्रमसँ मिश्र, सुमेर-बेबीलोन आदि सभ्यता आ मित्तनी आ हित्ती सभ्यतासँ बहुत पहिनहिये ऋगवेदक अधिकांश मंडलक रचना भऽ गेल छल। वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदसँ पहिने सेहो भाषा अस्तित्वमे रहल हएत। कतेक मौखिक साहित्य जेना गाथा, नाराशंसी, दैवत कथा आ आख्यान सभ ओइ भाषामे रचल गेल हएत। एहने गाथा सभक गायकक लेल “गाथिन”, “गातुविद्” आ “गाथपति” ऋगवेदमे प्रयुक्त भेल। प्रख्यात कथा इतिहास पुराणसँ लेल जाइत अछि आ उत्पाद्य कल्पित होइत अछि। वैदिक आख्यान, जातक कथा, ऐशप फेबल्स, पंचतंत्र आ हितोपदेश आ संग-संग चलैत रहल लोकगाथा सभ। सभ ठाम अभिजात्य वर्गक कथाक संग लोकगाथा रहिते अछि। सलहेसक कथाक विवरण लिअ, क्षेत्रीय परिधि पार करिते सलहेस राजासँ चोर बनि जाइत छथि आ चोरसँ राजा। तहिना चूहड़मल क्षेत्रीय परिधि पार करिते जतए सलहेस राजा बनैत छथि ओतए चोर बनि जाइत छथि, आ जतए सलहेस चोर कहल जाइत छथि ओतुक्का राजा/ शक्तिशालीक रूपेँ जानल जाइत छथि। कथा-गाथा सँ बढ़ि आगू जाइ तँ आधुनिक कथा-गल्पक इतिहास उन्नैसम शताब्दीक अन्तमे भेल। एकरा लघुकथा, कथा आ गल्पक रूप मानल गेल। रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ शुरु भेल ई यात्रा भारतक एक कोनसँ दोसर कोन धरि सुधारवाद रूपी आन्दोलनक परिणामस्वरूप आगाँ बढ़ल। जे हम वैदिक आख्यानक गप करी तँ ओ राष्ट्रक संग प्रेमकेँ सोझाँ अनैत अछि। आ समाजक संग मिलि कए रहनाइ सिखबैत अछि। जातक कथा लोक-भाषाक प्रसारक संग बौद्ध-धर्म प्रसारक इच्छा सेहो रखैत अछि, ऐमे जे चिड़ै आ मालजालक माध्यमसँ कथा कहल गेल अछि से पंचतंत्र आ हितोपदेशसँ बहुत पहिने बालसाहित्यक अवधारणा प्रस्तुत करैत अछि। जेना विष्णु शर्मा पंचतंत्रक कथा कहैत-कहैत स्त्री आ शूद्रक पाछाँ अकारण क्रूर भऽ जाइ छथि सएह हाल राम चरित मानसक अछि। ऐसप ग्रीसक दास रहथि आ अपन मालिकक बच्चाकेँ कथा सुनबैत रहथि जे ऐसप्स फेबल्स रूपमे जगतख्यात भेल, अंगूर नै भेटलापर लोमड़ी कहैए जे ई अंगूर बड्ड अम्मत हेतै, ई सभ खिस्सा अमर भऽ चुकल अछि। मुस्लिम जगतक कथा जेना रूमीक “मसनवी” फारसी साहित्यक विशिष्ट ग्रन्थ अछि जे ज्ञानक महत्व आ राज्यक उन्नतिक शिक्षा दैत अछि। कथा पढ़ि सभ प्रबुद्ध नै हेताह तँ स्वस्थ मनोरंजन तँ प्राप्त कऽ सकताह। आ जे एकोटा व्यक्ति कथा पढ़ि ओइ दिशामे सोचत तँ कथाक सार्थकता सिद्ध हएत। आ जकरा लेल रचित अछि ई कथा जँ ओ नै पढ़ताह तँ ओकर ओइ परिस्थितिमे हस्तक्षेप करबामे सक्षम व्यक्ति तँ पढ़ताह। आ जे समाज बदलत तँ सामाजिक मूल्य सनातन रहत? प्रगतिशील कथामे अनुभवक पुनर्निर्माण करब, परिवर्तनशील समाजक लेल, जइसँ प्राकृतिक आ सामाजिक यथार्थक बीच समायोजन हुअए। आकि ऐ परिवर्तनशील समएकेँ स्थायित्व देबा लेल परम्पराक स्थायी आ मूल तत्वपर आधारित कथाक आवश्यकता अछि? व्यक्ति-हित आ समाज-हितमे द्वैध अछि आ दुनू परस्पर विरोधी अछि। ऐमे संयोजन आवश्यक, विश्व दृष्टि आवश्यक। कथा मात्र विचारक उत्पत्ति नै अछि जे रोशनाइसँ कागचपर जेना-तेना उतारि देलिऐ। ई सामाजिक-ऐतिहासिक दशासँ निर्दिशित होइत अछि। तँ कथा अनुभवकेँ पुनर्रचित कऽ गढ़ल जएत आ व्यक्तिगत चेतना तखने सामाजिक आ सामूहिक चेतना बनि आओत। शोषककेँ अपन प्रवृत्तिपर अंकुश लगबए पड़तन्हि तँ शोषितकेँ एकर विरोध मुखर रूपमे करए पड़तन्हि। कथा क्रमबद्ध हुअए आ सुग्राह्य हुअए तखने ई उद्देश्य प्राप्त करत, बुद्धिपरक नै व्यवहारपरक बनत। वैदिक साहित्यक आख्यानक उदारता संवादकेँ जन्म दैत छल जे पौराणिक साहित्यक रुढ़िवादिता खतम कऽ देलक। ई सूर्य अरब-खरब आन सूर्यमेसँ एकटा मध्यम कोटिक तरेगण- मेडिओकर स्टार- अछि। ओइ मेडिओकर स्टारक एकटा ग्रह पृथ्वी आ ओकर एकटा नगर-गाममे रहनिहार हम सभ अपन माथपर हाथ राखि चिन्तित छी जे हमर समस्यासँ पैघ ककर समस्या? हमर कथाक समक्ष ई वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आएल अछि। संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास होएबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास। आत्मप्रशंसा आ परस्पर प्रशंसाक परम्परा जइमे दोसराक निन्दा सेहो सम्मिलित अछि, उत्कृष्ट बाल साहित्यक निर्माणमे बाधक अछि। सरकारपर आलम्बन, प्राथमिकताक अज्ञान- जकर कारणसँ महान बनबा/ बनेबा लेल लेखक-समीक्षक जान अरोपने छथि, आ ओइ स्थितिमे जखन भाषा मरि रहल अछि। कार्ययोजनाक स्पष्ट अभाव अछि आ जेना-तेना किछु मैथिली लेल कऽ देबा लेल सभ व्यग्र छथि, कऽ रहल छथि। स्वयं मैथिली नै बाजि बाल-बच्चाकेँ मैथिलीसँ दूर रखबाक अभियान चलल अछि आ ऐमे मीडिया, कार्टून चैनल आ शिक्षा-प्रणालीक संग एक्के खाढ़ीमे भेल अत्यधिक प्रवास अपन योगदान देलक अछि। मैथिलीक कार्यकर्ता लोकनिक कएक ध्रुवमे बँटल रहबाक कारण समर्थनपरक लॉबिइंग कर्ताक अभाव अछि। क बदला अपन/ अप्पन लोकक की लाभ, ऐ लेल लोक बेशी चिन्तित छथि। मैथिली छात्रक संख्याक अभावक कारण उत्पाद उत्तम रहला उत्तर सेहो विक्रय कौशलक अभाव बढ़ि जाइए। मैथिलीमे उत्तम उत्पादक अभाव तँ अछिए, विक्रयकौशलक सेहो अभाव अछि। मैथिलीक सन्दर्भमे बाल साहित्य आ ओकर समीक्षाशास्त्र बाल साहित्य लेखकसँ अनुरोध जे ङ आ ञ क प्रयोग करथि जइसँ बच्चाकेँ सुविधा हएत। नै बाल साहित्यमे लिखल जा सकैए। भाङ लिखल जएबाक चाही, भांग नै। फेर छनि, कहलनि केँ बच्चा क्रमसँ छनी, कहलनी पढ़ैए, वर्कशापमे एहन देखल गेल; से छन्हि, कहलन्हि आदिक प्रयोग करू। मैथिली बाल साहित्यक लेखनमे संयुक्ताक्षर, आ ङ क प्रयोग भाषाक विशिष्टता काएम रखबामे सहायक हएत। तहिना सरल शब्द मुदा खाँटी मैथिली शब्द जेना अकादारुण आदिक प्रयोग करू। बाल साहित्यमे गद्य आ पद्य दुनू महत्वपूर्ण अछि जँ कही तँ पद्य कने बेसिये। गद्यमे कथामे विषयक समावेश जेना विज्ञान, समाज विज्ञान आदि देलासँ मनोरंजन आ शिक्षाक मध्य तालमेल भऽ सकत। मैथिलीमे बालकथा कएक राति धरि चलैत अछि तँ पैघ लोकक कथा मिनटमे सेहो खतम भऽ जाइत अछि। मैथिलीमे चित्र-शृंखला, चित्रकथा, विज्ञान, समाज विज्ञान, आध्यात्म, भौतिक, रसायन, जीव, स्वास्थ्य आदिक पोथीक अभाव अछि। संध्या विद्यालय आ चित्रकला-संगीतक माध्यमसँ शिक्षा नै देल जा रहल अछि। दूरस्थ शिक्षाक माध्यमसँ/ अन्तर्जालक माध्यमसँ मैथिलीक पढ़ाइक अत्यधिक आवश्यकता अछि। सङे मैथिली लेल सभक हृदएमे अग्नि छन्हि, से ओ परस्पर एक दोसराक विरोधी किए ने होथु। लोकक बीचमे ऐ भाषाक आरोह, अवरोह आ भाषिक वैशिष्ट्यकेँ लऽ कऽ आदर अछि आ ऐ मे मैथिली नै बजनिहार भाषाविद् सम्मिलित छथि। आध्यात्मिक आ सांस्कृतिक महत्वक कारण सेहो मैथिली महत्वपूर्ण अछि। ऐ भाषामे एकटा आन्तरिक शक्ति छै। बहुत रास संस्था, जइमे किछु जातिवादी आ सांप्रदायिक संस्था सेहो सम्मिलित अछि, एकर विकास लेल तत्पर अछि। ऐ भाषाक जननिहार भारत आ नेपाल दू देशमे तँ रहिते छथि आब आन-आन देश-प्रदेशमे सेहो पसरल छथि। शंकराचार्यक विषयमे कहल गेल जे ओ अपन कमंडलमे धार भरि लेलन्हि। भेल ई जे बाढ़िमे बीचेमे पहाड़ रहलाक कारण एक दिस बाढ़ि अबैत छल आ एक दिस दाही। बीचक गुफाकेँ शंकर अपन शिष्यक सहयोगसँ तोड़ि जखन कमण्डल लेने बहरओलाह तँ लोक देखलक जे दोसर कात पानि आबि रहल अछि। सभ शंकराचार्यक स्तुति कएलन्हि जे अहाँ अपन कमंडलमे धार आनि हमरा सभकेँ दाही सँ आ दोसर कातक लोककेँ बाढ़िसँ मुक्त्त कराओल। अहाँ कमण्डलमे पानि आ धार अनलौं! बादमे अवसरवादी लोकनि एकरा चमत्कारसँ जोड़ि देलक। आशा अछि जे मैथिली बाल साहित्य लेखक सेहो अपन लेखमे उगनाक कथाक तर्क आ श्रद्धासँ विवेचना करता। गोनू झाक गाम भरौड़ाक राजकुमार "बहुरा गोढ़िन नटुआ दयाल" लोककथाक मल्लाह कथानायक राजकुमार दुलरा दयाल, भरौड़ामे एखनो हिनकर गहबर छन्हि। मैथिली बाल साहित्य लेखक गोनूसँ आगू ईहो देखथु। ट्रेजेडीमे कथानक संग चरित्र-चित्रण, पद-रचना, विचार तत्व, दृश्य विधान आ गीत रहैत अछि। बाल साहित्यमे ट्रेजेडी नै हुअए, ओइ विचारकेँ हमर समर्थन नै अछि, समाजक निम्न वर्ग वा अस्पृश्य वर्गक लोकदेवता सेहो कोना अस्पृश्य भऽ गेला से बच्चाकेँ बुझबैए पड़त। मुदा बुझबैक ढङ एहेन हेबाक चाही जे बच्चा अपन धरोहरकेँ चीन्हि सकए, ओकर आदर कऽ सकए। मिथिलाक लोककथामे जाति-पाइत नै होइ छै, साम्प्रदायिकता नै होइ छै। गोनू झाक समएमे मुस्लिम मिथिलामे आएले नै रहथि तखन मुस्लिम तहसीलदारक अत्याचारक कथा गोनू झाक खिस्सामे किए घोसियाएल जा रहल अछि। कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जइमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कए ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नै कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ ऐ वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जँ ओकरो सँ ई ठीक नै होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लए ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट ! बाल साहित्य सेहो एहने तंत्रांश अछि जे बाल मनपर अंकित भऽ जाइत अछि, मुदा एतऽ फॉर्मेट करबाक विकल्प नै छै। तेँ बाल साहित्यक निर्माणमे सतर्की आवश्यक अछि, सावधानी आवश्यक अछि। उमेरक हिसाबसँ बाल साहित्यक वर्गीकरण आ ओकर समीक्षा हेबाक चाही। शिशु (०-५ बर्ख), बाल (५-१२ बर्ख) आ किशोर (१२-१८ बर्ख) उमेर मध्य बाल साहित्यक वर्गीकरण कऽ एकर समीक्षा समीचीन हएत। चित्रकथा पाँच बर्खसँ छोट बच्चा लेल रचल साहित्य होइत अछि, ई स्कूल जाइसँ पहिने अभिभावक द्वारा पढ़ाओल जाइत अछि। अभिभावक बच्चाकेँ कथा पढ़ि कऽ सुनाबै छथि आ बच्चा चित्रक माध्यमसँ ओकर अनुभव करैए। बच्चाक तीव्र मानसिक विकास एकर परिणामस्वरूप होइत अछि। जखन बच्चा स्कूल जाए लगैए आ वर्णमाला सीखि लैए तखन ओ ई पोथी सभ अपने पढ़ऽ लगैए आ एकर संग आन आन पाठ्यपुस्तक आ चित्रित पोथी सभ पढ़ऽ लगैए। सात बर्खक बाद ओ छोट-छोट अध्यायबला पोथी आ नौ-दस बर्खसँ पैघ-पैघ अध्याय बला पोथी पढ़ऽ लगैए। बारह बर्खक बाद बाल उपन्यास आदिक अध्ययन बच्चा सभ शुरू कऽ दैए। बाल साहित्यमे पारम्परिक लोककथा, इतिहास-महाकाव्यक कथा आदि सुनाओल जाइत अछि। साहसिक आ प्रेरणादायक जीवनी आ नीति-प्रेरक कथा सेहो बाल साहित्यक अन्तर्गत अबैए। परीकथा, जादू, गीत आदिक माध्यमसँ सार्थक बाल साहित्यक निर्माण होइए। तेँ बाल साहित्यक समीक्षामे बाल साहित्यक प्रकारपर सेहो ध्यान देबए पड़त। की बाल साहित्य अन्ध्विश्वासकेँ बढ़ावा तँ नै दऽ रहल अछि? की बाल साहित्य अपन धरोहरकेँ चिन्हबामे बच्चाकेँ सहयोग दऽ रहल अछि? की बच्चामे मानव मूल्यक ज्ञान ऐ साहित्यकेँ पढ़बासँ एतै? की जातिवादी आ वैचारिक कट्टरताक विरुद्ध बच्चाकेँ प्रशिक्षित करबाक उद्देश्यमे बाल साहित्य सफल भऽ रहल अछि? वैचारिक तराजू पसङाह तँ नै भऽ रहल अछि, बच्चाक स्वस्थ मनोरंजनमे कोनो कट्टरता तँ सायास-अनायास नै घुसि गेल अछि? सरल शब्दावली, सरल भाषा आ सरल विचार बाल साहित्यक उत्कृष्टताक लेल कसौटी बनत। मैथिलीक किछु सर्वश्रेष्ठ बाल साहित्य रचना: ज्योति सुनीत चौधरीक नानीसँ सुनल खिस्सा (भलुनिया मौसी, सिन्नुरक पुल, एक राजाक सात मेहरी, पन्साया कुम्मरि, सुहान बोन), काश्यप कमलक बाबूक सुनाएल खिस्सा (सहस्रमुखक दीप/ गप्पक अर्थ/ जहियासँ काल धेलक/ नीक करी तँ पैघ के? बेजाए करी तँ पैघ के?/ पढ़बे टा नै करी ओकरा गुनबो करी/ अकिलक मोल), अनिल मल्लिकक दादीक गीत आ अर्चना कुमरक दादीसँ सुनल कथा (विद्वान) मैथिली लोककथा-गीतक रिक्त स्थानक पूर्ति करैत अछि। शिव कुमार झा “टिल्लू” जीक तरेगन देखाइए, दहीक ठोप आ खोंइछक लेल साड़ी बाल मनोविज्ञानकेँ गहिया कऽ पकड़ैत अछि। दुर्गानन्द मण्डल जीक लघुकथा पारस एकटा सत्य चरित्रपर आधारित अछि, आ अदम्य इच्छासँ लोक की-की कऽ सकैए, से देखबैत अछि। वृषेश चन्द्र लाल जीक लघुकथा गोलबा आ जगदानन्द झा “मनु” जीक बाल उपन्यास चोनहा मैथिली बाल साहित्यक अमूल्य धरोहर अछि, गोलबा आ चोनहा मे मनोविज्ञान जबर्दस्त रूपमे सोझाँ आएल अछि। वृषेश चन्द्र लाल बच्चा सभक लेल सुन्दर-सुन्दर कविता सेहो गाबै छथि। पंकज कुमार झाक माए गइ माए आ चन्दन कुमार झा क दूटा अगड़म-बगड़म जइ सरलतासँ गाओल गेल अछि से अद्भुत अछि, दुनू गोटे इन्जीनियर छथि आ गामक संस्कृतिसँ पूर्णतः परिचित छथि। संस्कृति वर्मा ४था मे पढ़ै छथि आ बस्ताक बोझ आ अभिभावकक आ सूचना प्रौद्योगिकीसँ परेशान छथि आ अपन मनोभाव व्यक्त करै छथि। मनोज कुमार मण्डल, शिव कुमार झा टिल्लू, राजेश मोहन झा गुंजन, नरेश कुमार विकल, रमाकान्त राय रमा आ महाकान्त ठाकुरक बाल कवितामे प्रवाह अछि। मुदा जँ बाल मनक हिसाब सँ देखी तँ चन्द्रशेखर कामति प्रवाह आ भावमे सभकेँ पाछाँ छोड़ि दै छथि। मुन्नी कामतक पात्रा कहै छथि नै खेबै तरकारी, रोटी/ हमरा नूने रोटी खाए दे/ मुदा माय गे,/ हमरा तूँ पढ़ै लेल जाए दे। ई पढ़बाक ललक चन्दन कुमार झाक हमहूँ पढ़बै आब मे सेहो देखबामे अबैत अछि। शम्भू नाथ झा मैथिलीमे न्यूटनक सिद्धान्त पढ़बै छथि। प्रभात राय भट्टक चुनमुन चुनमुन करैत चिड़िया सुन्दरतासँ भाव आ शब्दक कएल मिलन अछि। संगमे देवांशु वत्सक प्रगतिक रहस्य आ तुनिशा प्रियम/ गुंजन कर्ण/ ज्योति सुनीत चौधरी/ गणेश ठाकुर/ अनुपमा प्रियदर्शिनी/ श्वेता झा चौधरी/ श्वेता झा (सिंगापुर) क चित्रकला अछि। श्वेता झा चौधरीक मिथिला चित्रकलाक कोनो जोड़ नै अछि। ई शिशु उत्सव मैथिली बाल साहित्यकेँ फरिछेलक अछि आ बच्चा सभ द्वारा एकटा पिकनिकक रूपमेँ एकर प्रयोग आबैबला कएक वर्षतक होइत रहत, से आशा अछि। ज्योति सुनीत चौधरी ध्वनि-प्रतिध्वनि ध्वनि आ प्रतिध्वनि नाओंक दूटा जुड़बा बहिन छली जे कि पहाड़ी इलाकामे रहै छली। ध्वनि स्वभावसँ बड्ड शान्त आ निर्मल छलथि जखन कि प्रतिध्वनि हुनकर विपरीत बहुत चञ्चल आ उपद्रवी छलथि। ध्वनि हमेशा घरमे अपन माएकेँ काजमे मददि करै छलथि। प्रतिध्वनि पहाड़ीमे एम्हर-उम्हर भागैत रहैत छलथि। एकदिन प्रतिध्वनि बाहर घुमै छली तँ हुनका एकटा राजकुमार देखेलनि। आे राजकुमार हुनका बड्ड नीक लगलनि। प्रतिध्वनि ओइ राजकुमारसँ खूब दाेस्ती केली आ आेकरा घुमाबए फिराबए लगली, कारण आे राजकुमार ओइठाम ककराे अतिथि बनि कऽ आएल छला। राजकुमार हुनकासँ बड्ड प्रसन्न छला। दिन बीतल आ प्रतिध्वनि ओइ राजकुमारसँ बिआहक माेन बनाबए लगली मुदा एकदिन जखन आे घर गेली तँ देखली जे आे राजकुमार हुनकर बहिनकेँ बिआहक प्रयाेजनसँ देखए लेल आएल छलनि। राजकुमार हुनकर बहिन ध्वनिकेँ पसन्द कए बिआह कऽ लेलाह। प्रतिध्वनिकेँ बहुत पैघ आघात पहुँचल छलनि। हुनका बहुत क्षाेभ भेलनि जे लाेक हुनकर दुःख नै बुझलकनि। आे पहाड़ीसँ कूदि कऽ अपन प्राण तिआगि देली। मुदा हुनकर आत्माकेँ मुक्ति नै भेटलनि। हुनकर आत्मा पहाड़क खाधिमे अखनाे भटकैत रहै छन्हि। अखनाे जँ कियाे पहाड़क खाधिमे किछु जाेरसँ बाजैत अछि तँ प्रतिध्वनि ओइ आवाजकेँ बेर-बेर बाजै छथि। अदृश्य बन्धन स्वतंत्र विचारक स्वामिनी माया अपन पेशाक प्रति अत्यधिक समर्पित एक बाल्य मनोविज्ञानक विशेषज्ञा छली। ऐ विषयमे हुनका बच्चेसँ लगाव छलनि आ हुनकर अपन परिवार सेहो बड्ड आधुनिक विचारक छलनि। माता-पिताक दिससँ कहियो कुनो जोर नै छलनि, ने व्यवसायक चयन बेरमे आ ने बिआहक निर्णयमे। ओना मायाक एक बड्ड नीक पुरुष मित्र छलखिन जे ने मात्र हुनकर, वरन हुनकर परिवारक सेहो बहुत स्नेही छलथि। मुदा ई मायाक अपन व्यवसायक प्रति अनुराग आ अपन निजी महत्वाकांक्षाक उन्माद छलनि जे ओ अपन एहेन पुरान आ घनिष्ठ मित्र द्वारा आएल बिआहक प्रस्तावकेँ अस्वीकार कऽ एकटा क्रेश -छोट बच्चा सभकेँ दिनमे देखभाल करैबला संस्था- मे नोकरी पकड़ली। विषय विशेषमे पारंगत मायाकेँ कार्यमे अपन निपुणता प्रमाणित करए मे कनियो देरी नै लगलनि। ओ अपन क्रेशक सभ बच्चाक व्यक्तिगत व्यवहारपर विशेष धियान राखै छलथि आ आवश्यक परामर्श अभिभावक सभकेँ दै छलथि। बच्चा सभक अभिभावक लग कोनो समस्या नै छल जकर उपाय हिनका लग नै छलनि। ऐ तरहेँ बहुत शीघ्र हुनका अपन कार्यक्षेत्रमे प्रसिद्धि आ प्रशंसा भेट गेलनि। आस्ते-आस्ते अपन कार्यमे अभ्यस्त भेलापर मायाकेँ अपन निजी जीवनक विषयमे सोचैक समए सेहो भेटए लगलनि। एक मनोवैज्ञानिकक रूपमे तँ ओ अपन अस्तित्व बना लेने रहथि मुदा जखन कखनो ओ बच्चा सभसँ आन्तरिक प्रेम स्थापित करए कऽ प्रयास करै छली, हुनका आन हुअ कऽ आभास आबि जाइत छलनि। दिन भरि बच्चाक भोजनक पौष्टिकता, रहन-सहनक शुद्धता आ खेलमे मस्तिष्कक विकासक समावेशक धियान राखैमे माया कतेक श्रम करैत छथि मुदा जखन बच्चा सभकेँ ओकर अभिभावक लेबऽ आबै छल तखन बच्चा सभमे एकटा अद्भुत खुशी बुझाइत छल। अभिभावकोक कहब छल जे अपन बच्चाकेँ पाबि सभटा थकान दूर भऽ जाइत अछि। बच्चा सभक मुँहपरक ओ खुशी जे ओकरा सभमे अपन माता-पिताकेँ देखलापर आबैत छल से खुशी देबाक सेहन्ता मायामे जागि गेल रहनि। बहुत सोच विचारक बाद ओ निर्णय केली जे अपन माता-पितासँ अपन मित्रक जानकारी ली। ज्ञात भेलनि जे ओकर कुनो खोज खबरि नै अछि। मायाकेँ विचार एलनि जे एक बच्चाकेँ गोद ली। मुदा सभ कहलकनि जे एनामे बच्चाकेँ पिताक सुख नै भेटतनि। तखन माया अपन माता-पितासँ अपन बिआह लेल एहेन वरक चएन करए कहलखिन जे एक बच्चाकेँ गोद लेबएसँ मना नै करनि; अन्यथा ओ ओहिना बच्चाकेँ गोद लेती कारण दुनियाँमे कतेको बच्चा बिना माता-पिताक सेहो रहैत अछि। माता-पिता अपन कार्यमे लागि गेला। किछु दिन बाद ‘वेलेन्टाइन्स’ दिवसपर मायाक अभिभावक हुनका अपना लग बजेलखिन। माया अपन कार्यसँ कम्मे दिनक छुट्टी लऽ अपन घर गेली। ओतए हुनकर अभिभावक घरपर पार्टी रखने रहथिन जइमे हुनका एक टा बढ़िया आश्चर्यजनक उपहार भेटलनि। मायाक पुरान मित्र ओइ पार्टीमे आएल छलनि जे अखनो मायासँ बिआह लेल तैयार छलनि। अतबे नै, ओ मायाक जे विचार रहनि, अनाथ बच्चाकेँ गोद लऽ अपन बनाबक, तहूसँ सहमत छलनि। सभ बेर माया अपन माता-पिताकेँ वेलेन्टाइन्स डे पर किछु उपहार दैत छलखिन मुदा ऐबेर हुनका अपन माता-पितासँ अमूल्य उपहार भेटल रहनि। अपन कार्य हेतु समर्पित माया कखन गृहस्थीक अदृश्य बन्धनमे बँधि गेली से हुनको नै बुझेलनि। नानीक खिस्सा हम जखन चारि पाँच वर्षक रही तखनसँ मोन अछि जे ई खिस्सा नानी सुनाबै छलथि। व्याहक बाद बहुत दिन हुनकासँ भेँट नै भेल। बादमे जखन भेटली तँ हम फेर कहलियनि खिस्सा सुनाबए, तँ हुनका खूब हॅंसी लगलनि। कहलनि जे आब तँ बाउ हइ तूँ अपन बच्चाकेँ सुनेबहीं। हम बिसरि गेल रही मुदा़ नब्बेसँ बेसी वर्षक अवस्था भेलाक बादो हुनका सभटा खिस्सा मोने छलनि। हम बस कोशिश कऽ रहल छी हुनके जकाँ कहैक। १.भलुनिया मौसी सुखनी आ दुखनी नाओंक दू बहिन छली। नाओंक अनुरूपे सुखनीक बिआह खूब सम्पन्न घरमे भेलनि आ दुखनीक गरीब घरमे। सुखनीक स्वभाव घमण्डी आ टेढ़ छलनि आ दुखनीक बड्ड शालीन आ मृदुल। सुखनीकेँ अपन बहिनक प्रति कखनो दया नै आबै छलनि। बहिनक बच्चा सभ जखन कखनो किछु मांगै लेल आबैत छलनि तँ ओ दुत्कारि कऽ भगा दइ छलखिन। एक दिन दुखनी फर-फूल ताकै लेल बोन दिस चलि गेली। जाइत-जाइत एकटा घर देखेलनि। खिड़कीसँ भीतर तकली तँ एक टा दुर्गन्ध गन्हाइत भलुनियाकेँ सूतल देखलनि। ओतएसँ पड़ाइते छली आकि ओ भलुनिया देखि लेलकनि आ अपन कर्कश बोलीमे पुछलकनि “के छैं गै”। आब सुखनी डेरा तँ खूब गेल रहथि मुदा कोनो रस्ता नै छलनि। तुरन्त हॅंसए लगली आ बड्ड आपकतासँ जबाब देलनि- “नै चिन्हलैं गइ मौसी़, हम दुखनी। बड्ड मोन लागल छल तोरा देखै लेल।” भलुनिया फेर कहलकनि “हम तँ ठीके नै चिन्हलियौ। एतँ की करै छलैं?” “हम देखै छलौं तोहर घर, कतेक नीक कोठा छौ। मोन होइत अछि तोहर खूब सेवा करियौ। अतेक दिन बाद भेटलैं। कहै ने, की काज कऽ दियौ।" दुखनी जबाब देलखिन। अतेक नीक बोलीसँ भलुनिया खुश भऽ गेल। दुखनीकेँ अपन घर घुसेलक। अन्दर खूब बड़का घर छल। एक कोठली सोना़-चाँदी़-हीरा़-असर्फीसँ भरल छल तँ एक कोठली कपड़ा लत्ताक ढेर छल। भनसा घर तरह-तरहक पकवाऩ, फल आदिसँ भरल छल। दुखनी पूरा घर नीप कऽ साफ कऽ देलखिन। तकर बाद भलुनियाक सेवा करए लगली। तेलसँ मालिस कऽ खूब जाँति देलखिन। भलुनिया बड्ड प्रसन्न भेल आ दुखनीकेँ खूब समान पाती संगे विदा केलक। पूरा ठेला गाड़ी सोना-असर्फी़ कपड़ा-लत्ता आ पूरी-पकवानसँ भरि कऽ दुखनी घर पहुँचली। बच्चा सभकेँ पहिल बेर भरि पेट भोजन करेलथि। फेर अपन बेटीकेँ कहलखिन जे मौसीसँ तराजू लेने आ। सिखा देलखिन जे भलुनिया दऽ किछु नै कहियनि। दुखनीक बेटी जखन सुखनी लग तराजू मांगए गेल तँ सुखनीकेँ आशंका भेलनि। ओ तराजूक पलड़ाक नीचाँ गोंद लगा देलखिन। दुखनी पूरा सोना-असर्फी सभ तौल कऽ तराजू लौटबा देलखिन। एकटा असर्फी आ किछु सोना तराजूमे सटि कऽ सुखनी लग पहुँचि गेलनि। आब तँ सुखनी दौगल गेली बहिन लग। बड्ड निहौरा करै लगलखिन तँ दुखनी सभटा बता देलखिन। लोभी सुखनी सेहो गेली बोनमे भलुनिया लग। फेर ओहिना भलुनिया देखि लेलकनि आ पुछलकनि तँ ई कहलखिन जे हम दुखनी छी। भलुनिया तुरत अन्दर बजा लेलकनि। सुखनी भीतर गेली आ सभसँ पहिने ठेलामे घर लऽ जाइ लेल समान पाती बान्हि लेलनि। फेर भलुनिया लग एली तँ ओकर महकैत शरीर नै बर्दाश्त भेलनि से बाजऽ लगली -“गए मौसी, गए मौसी़। तोहर देह केहेन महकै छौ गए। घर केहेन घिना कऽ रखने छैं गए, एनामे केना रहल होइ छौ।” एतेक सुनक छलै आकि भलुनियाकेँ तामस उठलै। ओ उठल आ सुखनीक कण्ठ मचोड़ि कऽ माइर कऽ खा गेल। २.सिन्नुरक पुल एकटा ब्राह्मण छलथि जे भीख मांगि कऽ अपन दिन काटैत छलथि। एक घर भीख मांगैत छलथि तैयो एक सेर चाउर होइत छलनि आ चालीस घर मांगैत छलथि तैयो एके सेर होइत छलनि। हुनकर संगे एक टा कुक्कुर आ एक टा बिलाड़ि सेहो रहैत छलनि। कुक्कुरमे आसपासक खतरा देखैक शक्ति छलै आ बिलाड़िमे भविष्य देखबाक दिव्यदृष्टि छलै। एक दिन ब्राह्मण भीख लऽ कऽ लौटि रहल छलथि तँ बिलाड़ि कहलकनि जे मालिक अहाँकेँ काल्हि बड धन सम्पत्ति भेटत़, ताबे कुक्कुड़ भौंकऽ लागल। मुड़ि कऽ देखलनि तँ एकटा नाग साँप कादोबला खत्तामे खसि पड़ल छलै। ब्राह्मण ओइ नागकेँ एकटा डारिक सहारे बाहर निकालि देलखिन। ओ नाग साधारण सर्प नै छल। ओ ब्राह्मणकेँ एकटा मणिबला अंगूठी देलकनि आ कहलकनि जे अहाँ भोरेमे नहाकऽ ठाँउ कऽ पूब मुँहेँ बैस कऽ ऐ अंगूठीक पूजा करब तकर बाद जे मांगब से भेटत। ब्राह्मणकेँ विश्वास तँ नै भेलनि तैयो ओ लऽ कऽ विदा भेला। भोरे जखन ब्राह्मणक नींद खुजलनि तँ मोन भेलनि जे अंगूठीकेँ जाँचल जाए। सभटा बताएल तरीकासँ पूजा कऽ ओ अपना लेल एकटा सुन्दर महल आ खूब धन सम्पत्ति मंगलनि। सभटा पूरा भऽ गेलनि। तकर बादसँ ब्राह्मणक दिन बदलि गेलनि। जखन जे जरूरत से मांगि लैत छलथि। एक दिन किछु लोक ढिंढोरा पीट आएल जे जमीन्दार साहब कहलखिन हेँ जे हुनका अपन सुन्दरी बेटी लेल एकटा वर चाहियनि। जे जमींदारक घरसँ शुरू कए अपन घर तक सिन्नूर पुल बनाओत तकरासँ ओ अपन बेटीक बिआह करेथिन। गछलाक बाद नै बनेलासँ सजा भेटत। ई ब्राह्मण गछि लेलखिन। विदा भेला सेवक सभ संगे। कुक्कुर कहलकनि- अंगूठी हम अपन मुँहमे लऽ कऽ जाएब। ब्राह्मण मानि गेला। बिलाड़िकेँ किछु अनर्थ होइक आशंका भेलै से ओहो संगे लागि गेल। रस्तामे एकटा पोखरिक कात सभ विश्राम लेल रूकला। कुक्कुरकेँ पोखरिमे अपन प्रतिबिम्ब देखेलै। ओ ओकरा अपन संगी बूझि उत्तेजित भऽ कऽ भौंकऽ लागल। एनामे अंगूठी पोखरिमे खसि पड़लै। आब ब्राह्मण बहुत दुखी भऽ गेला। सेवककेँ कहलखिन जे आब हमरासँ नै हएत पुल बनाओल। सेवक सभ हुनका कैद कऽ लेलकनि आ जमींदार लग विदा भेल। बिलाड़ि ओतै रूकि गेल। कुक्कुर कारण पुछलकै तँ कहलक जे काल्हि एतए माछ मारल जाएत। अंगूठी एकटा माछ गीर गेल अछि। जखन मल्लाह सभ माछक भोंटि फेकत तँ हम आेइमे सँ अंगूठी निकालि लेब। कुक्कुर सेहो रूकि गेल। भोरे सभटा ओहिना भेलै जेना बिलाड़ि कहने रहए। बिलाड़िकेँ इम्हर उम्हर घूमैत देखि मल्लाह सभटा माँछक भोंटि ओकरा दिस फेक देलकै। कुक्कुर बिलाड़ि दुनू सभटा भोंटि चिबाबए लागल। आखिर एकटामे अंगूठी भेटलै। दुनू अंगूठी लऽ कऽ जमीन्दारक कोठा दिस विदा भेल। ओतए ब्राह्मण कारावासमे बन्द छलथि। बिलाड़ि घुसिया कऽ गेल आ अंगूठी देलकनि। ब्राह्मणक जानमे जान एलनि। तुरन्त सेवक सबहक द्वारा जमींदारकेँ खबरि देलखिन। जमींदार सेवक सभकेँ बढ़ियासँ ठाँउ करै लेल कहलखिन। भोरे ब्राह्मण नहाकऽ पूब दिस बैस कऽ अंगूठीक पूजा केलनि आ फेर सिन्नुरक पुलक मांग केलखिन। पुल तुरत बनि गेल। जमींदार प्रसन्न भेला आ अपन बेटीसँ ओइ ब्राह्मणक बिआह करा देलखिन। फेर ब्राह्मण अपन पत्नी आ कुक्कुर-बिलाड़ि लऽ कऽ सिन्नुरक पुले बाटे अपन महल आबि गेला आ खुशी-खुशी रहए लगला। ३.एक राजाक सात मेहरी एकटा राजा रहथि जिनकर सात टा रानी रहनि। राजाक छोटकी रानी अपन सरल स्वभाव द्वारे सभसँ बेसी प्रिय रहनि जइ कारणे बाँकी छौओ रानीकेँ ओकरासँ बड्ड डाह होइ छलै। राजाकेँ एकोटा संतान नै छलनि तँए संतान प्राप्ति लेल ओ यज्ञ केलनि। साधु कहलकनि जे अहाँ आमक गाछ़मे बाम हाथे झट्ठा फेकू आर दहिना हाथे आम लोकू़, तखन ओइ आमकेँ सातो रानीकेँ कहियनु खाइ लेल। एना केलासँ अहाँकेँ शीघ्र पुत्र प्राप्ति हएत। राजा सएह केला आ लोकल आमकेँ बड़की रानीकेँ देलखिन आ कहलखिन जे सभ बाँटि कऽ खा लिअ। बड़की रानी आमकेँ छोटकी रानीकेँ नै देलखिन आ सभटा आम छहो रानी मिलि कऽ खा गेली आ आँठी खोंइचा छाउरक ढेरपर फेक एली। जखन छोटकी रानीकेँ पता लगलनि तँ ओ छाउरक ढेरपर सँ आँठी खोंइचा आनि कऽ ओकरा धो कऽ चाटि गेली। समए बीतल, छहो रानीकेँ किछु नै भेलनि आ छोटकी रानी गर्भवती भऽ गेली। राजाकेँ ज्ञात भेलनि तँ ओ तुरन्त सभ सेविका सभकेँ छोटकी रानीक बेसी धियान राखैक निर्देश दऽ देलखिन। ऐ सँ आन रानी सभ आरो तमसा गेली। जखन छोटकी रानीकेँ प्रसव भेलनि तँ बड़की रानी हुनकर नवजात बेटाकेँ छाउरक ढेरपर फेकवा देलखिन आ कान-खापैड़ देखा कऽ कहलखिन जे छोटकी रानीकेँ यएह संतान भेलनि। छोटकी रानी खूब कानए लगली। राजा सेहो बड्ड निराश भेला। उम्हर एकटा सियारिन, जे राहड़िक खेतमे रहै छल़, रोज राजमहलक पछुआड़मे छाउरक ढेरमे खाना ताकऽ आबै छल। ओ जखन ओइ बच्चाकेँ देखलक तँ सभ बात बूझि गेल। ओ सियारिन ओइ बच्चाकेँ अपन खोहिमे लऽ गेल आर अपन दूध पिया कऽ पालय लागल। राजमहलसँ चोरा चोरा ओकर पूरा पहिरन ओढ़न राजकुमार जकाँ राखने छल। एकटा सेविकाकेँ ई बात ज्ञात भऽ गेल। ओ बड़की रानीकेँ ई सभटा गप्प पाइक लोभमे कहि देलक। बड़की रानीकेँ भेलनि जे सियारकेँ मरबा देब तँ बच्चा फेर अनाथ भऽ जाएत आ कुनो जानवर ओकरा खा जेतै। ओ तुरन्त बेमार हुअए कऽ भग्गल कऽ लेलनि। राजा पुछलखिन जे की भेल तँ कहलखिन जे हम बड्ड बेमार छी। हमरा राहरिक खेतबला सियारक कलेजी तरि कऽ खाए पड़त नै तँ हम मरि जाएब। राजा तुरन्त अपन सैनिककेँ कहलखिन जे ओइ सियारकेँ माइर कऽ आनू। सैनिक सभ सियारकेँ माइर कऽ बड़की रानी लग हाजिर केलकनि, रानी फेर प्रसन्न आ स्वस्थ भऽ गेली। ओइ बच्चाक औरदा अखन बाँकी छलै। एकटा चिल्होड़ि जे नदीक कातक गाछपर घर बना कऽ रहैत छल़ से ओइ बच्चाकेँ रहड़िक खेतसँ उठा अपन घोंसलामे आनि कऽ पोषण करऽ लगलै। ओकर पहिरन देखि कऽ ओ चीन्हि गेलै जे ई राजकुमार अछि। ओइ घाटपर राजमहलक कपड़ा सभ धुआइत छल। चिल्होड़ि सेहो उम्हरसँ कपड़ाकेँ चोरा कऽ बच्चाकेँ पहिराबए लागल। ओ जगह-जगहसँ खाना लुझि कऽ बच्चाकेँ आनि कऽ दै छलै। आब बच्चा कनी ठेकनगर भऽ गेल छल, तँ चिल्होड़ि ओइ बच्चाकेँ एकटा फकड़ा सिखेलकै आ कहलकै जे ई गाबि-गाबि कऽ तूँ लोक सभसँ भीख मांग। बच्चा से करए लागल। जखन ई गीत राजमंत्रीक कानमे गेलनि तँ ओ राजाकेँ कहलकनि जे राजा ई गीत तँ अहींक खिस्सा लागैत अछि। अहाँक छोटकी रानीकेँ बच्चा भेल रहनि। सभ कहलक कान-खापड़ भेलनि से लागैत अछि झूठ अछि। राजा बच्चाकेँ राजमहल बजेलनि। कहलखिन जे अपन गीत गाबै। बच्चा गौलक- “एक राजा कऽ सात मेहरी, छोटकी मेहरी मोर महतरिया, रहड़िक खेतमे फेक देली, चिल्होरि पाओल, हम समचरिया़, भिक्षा दे मैया।” राजाक माथा ठनकलनि। ओ सेविका सभकेँ डरा कऽ सभ बात ज्ञात केलनि। रहड़िक खेत तकक खिस्सा सेविका कहलकनि आ बाँकी ओइ चिल्होड़क सिखाएल गीतसँ बुझा गेलनि। बिना देर केने राजा छौहो रानीकेँ मृत्युदण्ड देलखिन आ चिल्होड़िकेँ इनाम देलखिन। अपने छोटकी रानी आर राजकुमार संगे महलमे खुशी खुशी रहए लगला। ४.पन्साया कुम्मरि एक दिन एकटा राजा शिकारपर गेला। जाइत-जाइत ओ एक जगह पहुँचला जतए एकटा विशाल सुन्दर पानक पात छल। राजा जइने ओ पात तोडै़ लगला आकि ओ पात एकटा सुन्दर राजकुमारीमे बदलि गेल। राजा मोहित भऽ गेला। ओइ राजकुमारीक नाओं पन्साया कुम्मरि छल। राजा पन्साया कुम्मरिसँ बिआह कऽ हुनका अपन महलमे आनि लेलनि आ खुशीसँ रहए लगला। किछु दिनक बाद राजा फेर शिकारपर गेला। फेर जाइत-जाइत ओ थाकि गेला तँ एकटा महल देखेलनि। राजा ओइ महलमे प्रवेश केलनि तँ ओकर वैभव देखि चकित भऽ गेला। अन्दर जाइते नौकर चाकर हुनकर सत्कारमे लागि गेल। राजा बहुत प्रसन्न भेला। तखन एकटा राजकुमारी एलखिन आ कहलखिन जे जॅं अहाँकेँ हमर सत्कार नीक लागल तँ हमरासँ बिआह करू। राजा फँसि गेला। ओइ राजकुमारीक नाओं छल पहुनाइ। राजा पहुनाइसँ बिआह कऽ ओइ महलमे रहय लगला। समए बीतल। राजाक घर नै घुरलासँ पन्साया कुम्मरि चिन्तित रहए लगली। ओ सैनिक पठेली चारू दिस, राजाक खोजमे। सैनिक सभ खबरि आनि कऽ देलकनि। पन्साया कुम्मरि एकटा पत्र राजाक नामे पठेलखिन जइमे राजासँ घर लौटक आग्रह केने रहथि। पत्र महल तँ पहुँचल मुदा राजासँ पहिने पहुनाइक हाथ लागल। पहुनाइ जबाब पठौलखिऩ- “जरथु मरथु पन्साया कुम्मऱि दय बसहु पहुनाइ। जइ देस रहत पन्साया कुम्मरि तइ देस पिया घुरि नै जाय।। ” जबाब पढ़ि पन्साया कुम्मरि तमसा गेली। अपन सेवककेँ कहलखिन- हमरा एक पेटी मूस आ एक पेटी झिंगुर दिअ। जुल्हासँ काँच रंगमे रंगल खूब चटकदार साड़ी मंगेली। चटकदार साड़ी पहिन पेटी लऽ विदा भेली पहुनाइक महल दिस। पहुनाइक महल लग रूकि कऽ नाचए लगली। पहुनाइक नजरि हुनकर साड़ीपर गेलनि। राजासँ जिद्द करए लगली जे हमरा वएह साड़ी चाही। राजा बड्ड बुझेलखिन जे हम अहूसँ नीक आनि देब मुदा ओ जिद्दपर अड़ि गेली। हारि कऽ पन्साया कुम्मरिकेँ बजाओल गेल। पन्साया कुम्मरि राजासँ कहलखिऩ- हम एकेटा शर्तपर अपन साड़ी देब। काल्हि भोरमे अहाँ हम्मर साड़ी जेहेन अखन ऐ तहिना लौटाएब। नै तँ अहाँकेँ हमरा संगे चलए पड़त।” राजा शर्त मानि गेलखिन। रातिमे जखन पहुनाइ ओ साड़ी पहिन कऽ सुतली तँ पन्साया कुम्मरि हुनकर कोठलीक खिड़की बाटे भरि पेटी मूस आ भरि पेटी झिंगुर अन्दर दऽ देलखिन। राति भरिमे मूस साड़ीकेँ जतए ततए काटि देलकनि आ झिंगुर सभटा रंग चाटि गेलनि। भोरे पहुनाइ जखन उठली तँ साड़ीक दुर्दशा देखि कानए लगली। मुदा राजा एकटा नै सुनलखिन। अपन वचनबद्धताक कारण पन्साया कुम्मरि संगे ओ विदा भऽ गेला। ५ सुहान बोन एकटा राजाकेँ सात टा रानी रहनि। सभ मिलि-जुलि कऽ नीकसँ रहैत रहथि। किछु दिनका बाद छोटकी रानी गर्भवती भेलखिन। राजा खूब प्रसन्न भेला। एक दिन ओ शिकारपर गेला। जाइत-जाइत ओ सुहान बोन पहुँच गेला जतए एकटा राक्षसीक राज रहए। राक्षसीक एकटा बेटी रहै जकर नाओं सुहान रहए। राक्षसी जखन राजाकेँ देखलक तँ अपन बेटीकेँ खूब सुन्दर रूप दऽ कऽ राजाक रस्तामे बैसा देलक। राजा ओकर रूपपर मोहित भऽ ओकरासँ बिआह कऽ लेला। आब सुहान सेहो सातो रानी संगे महलमे रहए लागल। अपन राक्षसी प्रवृतिक अनुसार ओ सभकेँ खूब तंग करए लागल। राजाकेँ जखन अकर आभास भेलनि ओ सुहानपर सँ धियान हटाबए लगला। सुहानकेँ से बर्दाश्त नै भेलै आ ओ सातो रानीक आँखि निकालि कऽ जंगल दिस बैला देलक। सातो रानीक चौदह टा आँखिकेँ ओ अपन माएकेँ दऽ देलक। ओकर माए आेइकेँ सीकपर टांगि कऽ राखि लेलक। जखन राजा पुछलखिन सुहानकेँ जे बाँकी रानी सभ कतए छथि तँ सुहान कहलकनि जे ओ सभ महल छोड़ि कऽ भागि गेली। राजाकेँ बड्ड क्षोभ भेलनि। एम्हर सातो रानी फल-फूल खा कऽ गाछक नीचाँ जीवन काटै लगली। एहनेमे छोटकी रानीकेँ बेटा भेलनि। दिन बितैत गेल आ ओ बेटा पैघ भेल। एक दिन ओ जंगलसँ जाड़नि जमा कऽ शहरमे बेचलक आ जे पाइ भेलै तइसँ सभ लेल भोजन कपड़ा आदि किनने आएल। अतेक दिनका बाद अन्न खा कऽ सभ माए ओइ बच्चाकेँ खूब आशीर्वाद देलखिन। धीरे-धीरे ओ बच्चा एकटा झोपड़ी सेहो बना लेलक। अहिना एक दिन ओ बच्चा जाड़ैन ताकैत रहए तँ ओकरा फूलक ढेर देखेलइ। लग गेल तँ ओ एकटा पूजाक स्थल रहए। ओ तुरन्त सभ निर्मालकेँ बहा कऽ जगहकेँ नीप पोइछ कऽ ठीक कऽ लेलक आ नुका कऽ ताकऽ लागल जे एतऽ के पूजा करैत अछि? कनिक कालक बाद एकटा साधुबाबा एला। जगह साफ देखि कऽ बड खुश भेला। ओ आवाज देला जे जे कियो ई केलौंहेँ से सामने आउ। बच्चा सामने गेल तँ साधु बाबा कहलखिन जे अहाँ वरदान मांगू तँ बच्चा कहलकनि जे हमर माए सभकेँ सभटा पहिनेबला सुख, आँखिक रौशनी़, राजमहल आदि भेट जाए। साधु कहलखिन जे सभटा भेटत मुदा अहाँकेँ अपने प्रयास करए पड़त। साधु अपन दिव्य दृष्टिसँ देखि कऽ सुहानक माइक घरक रस्ता पता केलनि। फेर एकटा उड़ैबला घोड़ा बनेला। तखन कहलखिऩ “अहाँ सुहान बोनमे सुहानक नैहर जाउ। घोड़ाकेँ बाड़ीमे नुका कऽ ठाढ़ कऽ लेब आ अपने कौआ बनि कऽ चारपर बैस कऽ ई फकरा गाएब ‘बुढ़िया मैया नात़ि सुहान, मैया पूत़ लवा खाँऊ खाँऊ खाँऊ।’ ई सुनि कऽ ओ राक्षसनी बुझत जे अहाँ ओकर नाति आ सुहानक बेटा छी। अहाँकेँ असौरापर बैसा कऽ कहत जे माछी माइर-माइर कऽ फाँकू। हम रोपणी आ कटनी केने आबै छी। ओ बारहो मास धान रोपै छै आ बारहो मास काटै छै। जखने ओ खेत दिस जाएत अहाँ मनुखक रूप धऽ सीकपर सँ आँखिक कोहा उठा कऽ घोड़ापर चढ़ि भागि जाएब।” ओ बच्चा सभटा तहिना केलक जेना साधु बाबा सिखेने रहथिन। मुदा जखन ओ भागै छल तँ सुहानक माए पाछाँ-पाछाँ भागए लगलै आ कहए लगलै़ “रे मुड़ि़ घुरि ताक, रे मुड़ि़ घुरि ताक।” ओ बच्चा जइने पाछाँ तकलक की बच्चा आ घोड़ा जरि कऽ भष्म भऽ गेल। सुहानक माए फेरसँ सभटा आँखि सीकपर टांगि लेलक। साधु बाबा कहनाइ बिसरि गेल रहथिन जे पाछाँ घुरि कऽ नै ताकब। समए बीतल। आन्हर माए सभकेँ भेलनि जे बच्चाकेँ कुनो जानवर खा गेल। साधु बाबाकेँ सेहो कनी दिन बाद धियान एलनि जे ओइ बच्चाक हाल बुझिऐ। जइने दिव्य दृष्टि दौगेला तँए अपन गलतीक ज्ञान भेलनि। तुरन्त अमृत छीट कऽ बच्चा आ घोड़ाकेँ जियेला। एकटा काज आर केला जे सुहानक माएकेँ ऐ घटनाक स्मृति ओ हरि लेलखिन। फेरसँ बच्चा ओहिना सुहानक माए लग गेल, सभटा ओहिना भेलै मुदा ऐबेर बच्चा पाछाँ घुरि कऽ नै ताकलक। ऐबेर ओ सुरक्षित आँखि लऽ कऽ आबि गेल छल। आब सभटा आँखि ओ माए सभकेँ लगा देलक। सातो रानीकेँ सूझए लगलनि। सभ बड्ड प्रसन्न भेली। सभ साधु बाबाकेँ खूब धन्यवाद देलखिन आ बेटाकेँ खूब आशीष। साधु सहित सभ कियो मिलि कऽ राजमहल गेला। राजाकेँ सभ बात कहलखिन। राजा सुहान आ ओकर माएकेँ मृत्युदण्ड देलखिन आ बाँकी सभसँ माफी मंगला। फेर सभ कियो संगे खुशीसँ रहए लगला। ब्युटी कुमारी, सहायक शिक्षिका, संस्कृत मधुराम इंटर स्तरीय विद्यालय, ग्वालपाड़ा, मधेपुरा (बिहार)। स्नातक धरि पटना आ मधेपुरामे शिक्षा लऽ कऽ लेखिका बी.एड. जम्मू विश्वविद्यालयसँ आ एम.ए. मिराण्डा हाउससँ केलन्हि। संगहि कम्प्यूरमे डी.सी.ए. केने छथि। पी.एच.डी. डिग्री लेल थीसिस सेहो “इशावश्योपनिषदक भौतिकवादी व्याख्या: जन्मना जातीय समाजक परिपेक्ष्यमे” विषयपर जमा केने छथि। राहुलजी एक नजरिमे दुनियाँमे प्रतिभाक धनिक लोकक कमी नै अछि, तखन सर्वतोमुखी प्रतिभाक धनिक व्यक्ति तँ ओंगुरीपर गिनल जा सकैत अछि। राहुल सांकृत्यायन गिनल-चुनल ओहेन प्रतिभाक धनिक लोकमे छथिन जिनकर जोड़ नै अछि। हिनकर तुलना करै लऽ रुपकक कल्पना करनाइ दुस्साध्य लागैत अछि। राहुलजी जीवनक सभ अंगक, सामाजिक विज्ञानक सभ शाखाकेँ समृद्ध आ विकसित कऽ लिखने छथि। बौद्ध धर्मावलम्बीक तँ दावा अछि कि २०म सदीमे भगवान बुद्धक विचारक सभसँ बेसी प्रचार- प्रसार करैबला लोकमे राहुलजी अग्रगण्य छथि। औपनिषदिक परम्परासँ आधुनिक स्वरुपक कल्पना करैबला, ज्ञानक खोजमे तलवारक धारपर चलैबला मनीषी राहुल सांकृत्यायन छथि। दर्शन, साहित्य, राजनीति आ इतिहासक पण्डितो स्वीकार करै छथि कि राहुलजी श्रेष्ठ पण्डित छलाह। राहुलजी अो महापण्डित रहथि जे अतीतक प्रामाणिक आ प्रासांगिक अनुभवसँ लाभ लऽ नव ज्ञानक मार्ग प्रशस्त कएलथि। राहुलजी कर्मठ कर्मयोगी जकाँ अपन अनमोल समैक उपयोग कए वास्तविक स्वरुपकेँ देखलखिन आ बुझलखिन। ओकर संगे-संग अपन देशक लोकोकेँ बुझबैक प्रयास केलखिन। हुनका लेल चुपचाप बैसनाइ असंभव रहए। ओ अपन एक-एक क्षणक उपयोग सार्थक कार्यमे करैत रहथि। चरैवेति-चरैवेतिक सिद्धान्तक अक्षरशः पालन करैत रहथि। विश्लेषण आ संश्लेषण कलामे महारत हासिल रहै हुनकामे। ग्राह्य आ अग्राह्य वस्तुकेँ परिखैत रहथि राहुलजी। राहुलजीक व्यक्तिव्यक निर्माण कोना भेल एकर अध्ययन जतेक मजेदार अछि ओतबे प्रेरणादायक। आजमगढ़ जिलाक मझोला किसान परिवारमे हिनकर जन्म भेल रहए। नाओं छलनि केदारनाथ पाण्डे। पाँच सालक उमेरमे हिनकर शिक्षा आरम्भ भेल मुदा परिवारक वातावरण एहन नै रहै कि पढ़ाइ-लिखाइ ठीक-ठाक चलि सकै। इएह बीचमे हिनकर बियाह भऽ गेल। परिवारक वातावरणसँ केदारनाथक मन उचैट गेल, तखन घरसँ भागैक सिलसिला शुरु भऽ गेल- कलकता, बनारस, मद्रास, अयोध्या, लाहौरक चक्कर लगाबए लगलाह। अही चक्करमे ओ एक मठक महन्तक शिष्यत्व ग्रहण कएलथिन जेकर बाद हुनकर नाओं रामोदार साधु भऽ गेल। बादमे मठक महन्ती मिलैत रहनि मुदा अपना आपकेँ बान्हि कऽ नै राखि सकलाह। तखनक मनोदशाक वर्णन ओ आगू आबि कऽ कएने छथि- भावी महन्त बनबै लऽ महन्त लक्ष्मणदास हमरा बनारससँ आनलथि। यदि हम मठमे ठहरि कऽ नै रहि सकलौं आ महन्त नै बनि सकलौं तँ ऐमे हमर अपन घुमक्कड़ी आ ज्ञानक तीव्र जिज्ञासाक भाव रहए। भागैक दौरमे कतौ किछु समए रुकि कऽ संस्कृत, अंग्रेजी, हिन्दी, अरबी सबहक अध्ययन केलनि। लाहौरमे अध्ययन करैत आर्यसमाजक अनुयायी भऽ गेलाह। बौद्ध साहित्यक संग बड़ लगाव भऽ गेल रहनि। घुमक्कड़ प्रवृति तँ रहबे करनि, आब बौद्धधर्मक प्रति झुकाव होएबाक कारणेँ लुम्बिनी, सारनाथ, राजगृह, नालन्दा आदि बौद्ध तीर्थस्थानक यात्रा कएलनि। अही बीच गाँधीक आँधीमे अर्थात् स्वाधीनता आन्दोलनोमे कूदि गेलथि। छह मासक जेलमे सजा भऽ गेलनि। संन्यासी रामोदार उर्फ केदारनाथ उर्फ राहुलजीकेँ आजादी खातिर लड़ैत देखि लोक हुनकर चरण धूलि पाबैले दौड़ैत रहथि। ओ राजनीतिमे तियाग आ समर्पण भावक विशेष महत्व दैत रहथि। हुनकर कहब रहनि- राजनीतिमे खूनक वएह स्थान अछि जे पूजा पाठमे चन्दनक। राजनीतिमे रहैत हुनकर विद्यानुराग कम नै भेल। जेल यात्रा आ ज्ञान यात्रा दुनूक क्रम नै टूटल। ज्ञानक खोजमे कते बेर श्रीलंका, तिब्बत, इंगलैण्ड, रुस, ईरान, मंगोलिया, चीन आदि देशक यात्रा कएलनि। तिब्बत जा कऽ एहेन-एहेन दुर्लभ ग्रन्थक खोज कएलखिन जे भारतक इतिहासक अभिन्न अंग भऽ गेल। ज्ञानक साधना जारी रहल। किछु दिन बौद्धक चीवर धारण कऽ ओकरोसँ मुँह मोड़ि लेलनि। १९३७ ई. मे सोवियत संघ गेलथि, ओतै एक रुसी महिला संग बियाह केलनि, जिनकासँ पुत्र ईगोरक जन्म भेल। अखन धरि राहुल सांकृत्यायन प्रसिद्ध भारतीय विद्वानक रुपमे सभठाम प्रतिष्ठित भऽ गेल रहथि। हुनकर ग्रन्थ आ लेख केर धूम मचल रहए। आम लोकक मुक्ति लऽ राजनीतिक हथियारकेँ ओ सही तरीकासँ उपयोगमे लबैपर जोर दैत रहथि। अपन अनुभवक आधारपर क्रान्तिकारी दृष्टिकोणक समर्थक भऽ गेल रहथि राहुलजी। १९३८-३९ क जमाना रहए। देशपर अंग्रेजक शासन रहए। किछुए राज्यमे कांग्रेसक शासन रहए। राहुलजीक इच्छा रहनि कि किसानकेँ जमीन्दारक आ भू- स्वामिक अन्यायसँ छुटकारा मिलबाक चाही। भला ईहो कोनो नीक बात भेल कि किसान जमीन जोतै, बुनै, फसल उपजाबै आ मिलै भूस्वामीकेँ? राहुलजी एहेन अन्यायक घोर विरोधी छलाह। गरीब किसानक पक्षमे बिहारक अमवारी गाममे राहुलजी सत्याग्रहीक दलक संग उतरि गेलाह सत्याग्रह करबाक लेल। हुनका सभकेँ कुचलैक लेल जमीन्दारक हाथी, गुण्डा, पुलिस, सिपाही सभ रहए। राहुलजी हाथमे हसिया लऽ फसल काटए लगलाह। हुनकर ई रूप देखि जमीन्दारक इशारापर एगो महावत राहुलजीक माथपर जोरदार लाठीक प्रहार कएलक, हुनकर माथ फािट गेल। खूनक धारा बहि गेल। तैयो राहुलजीकेँ अन्य सत्याग्रही संग गिरफ्तार कऽ लेल गेल। तखन बिहारमे कांग्रेसक शासन रहए। राहुलजीकेँ हथकड़ी पहिरा पुलिस जेल लऽ गेल। लोकमे ऐ धटनासँ क्षोभ आ रोष रहए। मुदा राहुलजीक मनमे प्रतिशोधक भावना नै रहनि। सिद्धान्तपर चलैबला निर्भीक योद्धा जेना शोषणमुक्त समाजक स्थापना खातिर संघर्षरत रहथि राहुलजी। मुदा अमवारीमे जे हुनका माथपर चोट लागल रहनि ओ बड़ गहीर रहै जेकर परिणाम भेल कि १९६१ मे माथक पक्षाघातसँ ओ पीड़ित भऽ गेलाह। ईएह हुनकर मौतक कारणो बनल। दोसर विश्वयुद्धक जमानामे राहुलजी अमवारी सत्याग्रहबला केसमे जेलक सजा काटि रहल रहथि। आेइ समैमे महात्मा गाँधी, नेहरु, आ रवीन्द्रनाथ ठाकुर सनक लोक हिटलरक नाजीवाद आ जापानक सैन्यवादक खिलाफ लोककेँ जागरुक करैमे लागल रहथि। राहुलजी सेहो एकरा खातिर लोकभाषामे नाटक लिखलनि जेकर मंचन करि आम लोककेँ फासीवाद विरोधी आन्दोलनमे भाग लेबाक खातिर प्रेरित केलनि। १९४५ मे राहुलजी लेनिनग्राद विश्वविद्यालयक प्राच्यविभागमे प्राध्यापकक पदकेँ सम्हारबाक लेल सोवियत संघ गेलथि। ओतए अपन अर्धांगनी आ पुत्रसँ मिलि कऽ ओ बड़ प्रसन्न भेलाह। अखन दोसर विश्वयुद्ध खतमे भेल रहए। स्तालिनग्रादमे सहस्त्र टूटल-फूटल मोटर आ हवाई जहाजक ढेर लागल रहए। आधासँ अधिक मकान धराशायी भऽ गेल रहए। मुदा लोकक जोश देखैत बनैत रहए। सभ एकजुट भऽ निर्माण कार्यमे लागल रहथि। आमजनक भागीदारी देखि सोवियत जन, सोवियतक भूमि दुनुक प्रति हुनकर अनुराग आ सम्मान दुगुना भऽ गेल। एकर चर्चा करैत ओ लिखै छथि- इतिहास मानैत अछि आ मानैत रहतै कि मानवताक प्रगतिमे सभसँ बड़का बाधक शक्ति हिटलरक फासिज्मक रूपमे उपजल रहै, जेकर नाश करैक श्रेय सोवियत रूसकेँ जाइत अछि। ऐबेर राहुलजी पचीस मास तक सोवियत संघमे रहला। ओतए अध्यापनक संगे मध्य एशियाक इतिहासक ढेर रास सामग्री आ दुर्लभ ग्रन्थ ओ जमा केलनि। अनेक भाषा सिखलनि आ अनेक किताबक हिन्दी अनुवादो केलनि। सोवियत संघसँ विदा होइ काल पुत्र आ अर्द्धांगिनी दुनूमे सँ कियो हुनका छोड़ै लेल तैयार नै रहथिन। ओ दुनू फूटि-फूटि कऽ कानैत रहथिन मुदा जीवन कर्तव्य कोनो माया-मोहकेँ मानैले तैयार नै रहैत अछि। द्रवित हृदैकेँ कठोर कऽ राहुलजी विदा भेलाह। ऐ यात्राक बाद राहुलजी हिन्दीक प्रचार-प्रसार, ग्रन्थक सम्पादन, लेखनमे अपन जीवन समर्पित कऽ देलखिन। राहुलजी सामाजिक कुरीति, वर्ण -व्यवस्था, जातीय उन्माद, साम्प्रदायिक वैमन्स्यक सभदिन विरोध केलखिन। हुनकर समझ रहनि कि आर्थिक विषमता सभ कुरीतिक जड़ि थिक। भाषाेक सम्बन्धमे हुनकर विचार साफ रहनि कि अंग्रेजीकेँ भारतक लोकपर नै थोपबाक चाही। एकर विकल्प खोजैमे जतेक अबेर भऽ रहल अछि, राष्ट्रीय एकता ओतेक खतरामे पड़ि रहल अछि। कैदी जीवनक सुखक आ दुखक छाया तँ मनुषक मुँहपर सदिखन हेलैत रहैत अछि तखन ओकर अन्वेषण करबाक क्षमता किछुए प्रतिभाशाली लोकमे होइत अछि। ओ एक चित्रकार छलाह। भावना आ वास्तविकताक सामंजस्य हुनक चित्रक वैशिष्ट्य अछि। एक बेर हिनका मनमे ईसामसीहक चित्र बनेबाक बात उठल। सोचैत-सोचैत ओ ऐ निष्कर्षपर एलाह जे चित्रमे ईसामसीहक चित्रण एकटा अबोध बालकक रुपमे रहबाक चाही, जिनका शैतान हण्टर सँ मारैत रहै। मुदा चित्र बनिये नै रहल छल। हुनक मस्तिष्कमे जे ईसामसीहक रुप बनैत छल ओकर तँ मानव रुपमे दर्शने दुर्लभ छल। बहुत दिन धरि खोज-पुछारि भेल मुदा मनक मुताबिक ओहेन तेजस्वी मुखड़ा नै भेटाएल। एक दिन भ्रमण करैत अनाथालयक आठ वर्षक बालकपर हुनकर दृष्टि पड़ल। बालकक मुरुत भोला-सुन्दर-निष्छल-निर्मल आ निष्पापयुक्त छल, जेहेन ईसामसीहक चित्र खातिर हुनका मनमे चेहरा बसैत रहै। ओ ओइ बालककेँ कोरामे उठाए शिक्षकसँ अनुमति लए अपन चित्रघर आनलथि। चित्रकार अपूर्व उत्साहसँ कनिये कालमे ईसामसीहक चित्र पूरा कए बालककेँ पुनः अनाथालयमे दऽ एलखिन्ह। ईसा मसीहक चित्र बनेबाक बाद आब शैतानक चित्र बनबैक लेल फेरसँ हुनकर मन शून्य भऽ गेल, किएक तँ शैतानक चित्रो खातिर हुनक मनपर एक छायांकन भेल रहैत, जे क्रूर आ शक्तिशालीयो होएबाक चाही। दिन के कहै महिनापर महिना बीतै लागल। शराबक घर, वैश्याक मोहल्ला, मवालीक अड्डा सगरे खाक छानि एलथि मुदा शैतानक छाप कतौ नै भेटल। चौदह बरखसँ फोटो आधेपर पड़ल रहै। एक दिन जेलक आगासँ चित्रकार जी जाइत रहथि आकि एगो कैदीपर हुनक नजर पड़ल जे जेलसँ छूटि कऽ निकलैत रहै। साँवला रंग, बढ़ल केश-दाढ़ी, विचित्र हँसी। चित्रकारकेँ हुनका देखि अपार प्रसन्नता भेल। हुनकर आकृति एहन रहै जे चित्रकारक चित्र पूरा भऽ जैतिऐ। आखिर मनक अनुरुप शैतानक मूर्ति हुनका भेट गेल रहनि। कैदीकेँ मनाए चित्र बनबै खातिर रोकि लेलेन्हि चित्रकार जी। चौदह साल बाद हुनक चित्र पूरा भऽ गेल। चित्र पूरा होएबाक बाद कैदी कहलखिन्ह- कनी हमहूँ देखिऐ अहाँक चित्रकेँ। चित्र देखि कऽ हुनका पसीना आबै लागलन्हि, हकलाबै लागलाह। कैदी कहलखिन- अहाँ चौदह साल पहिने हमरे अनाथालयसँ उठा कऽ अनने रही ईसामसीहक फोटो बनेबाक लेल। अहाँ हमरा नै चिन्हलिऐ, लगैत अछि। भावना नवीन हमर प्रिये नेना भुटका जय मैथिली। आइ बाल दिवसक शुभ अवसरपर अहाँ सभकेँ बधाइ। हम आइ किछु कहबा लेल चाहैत छी। हमर सबहक मातृभाषा मैथिली छी आ राष्ट्र भाषा हिंदी छी, ई हम सभ जनैत छी। माय आ मातृभाषासँ बढ़ि संसारमे किछु नै। तखन अहाँ सभ मैथिली किए नै बजैत छी; CHARITY BEGINS AT HOME अहाँ नै सोचैत छी जे हम किए ने मैथिली बजैत छी? की हमरा लाज लागैत अछि, की हमर व्यक्तित्वकेँ ई छोट कऽ दैत अछि? अहाँ सोचू जे अंग्रेजी, फ्रेंच, रसियन आदि भाषा जानबा लेल हम कतेक पाइ खर्च करै छी, किन्तु जे हमर माताक भाषा थिक ओकरे हम उपेक्षा कऽ दै छी, जे हम दूधक संग घोंटैत छी। अपन भाषा बजबामे जे मजा छै ओ कोनो आन बस्तुमे नै। अहाँ दस टा अंग्रेज बच्चाक सामने आपसमे मैथिलीमे बाजब तँ ओकरा सभकेँ अवचंक लागि जेतै। अरे, ई कोन भाषा थिक, हिंदी तँ बूझैत छलौं मुदा ई कोन भाषा थिक? अहाँ ओकरा सभकेँ विस्मित देखि आर खुश भऽ बाजै लगब। अहाँ जनैत छी, अपने देशमे बंगाल अछि, आेइठामक बच्चासँ लऽ वृद्ध जन तक बड़का बड़का विदेशीसँ बंगलेमे बात करत। अपन भाषा बजबामे ओकरा शान लागैत छैक। कत्तौ हीनताक भाव नै अबैत छैक। अहाँक माता पिता यदि हिंदीमे गप करैत छथि, तँ अहाँ हुनका बुझाबू। अपन मातृभाषामे गप करैत, अपन भाषा सभ जग मिठ्ठा। पहिने अपन देशमे उर्दूक प्रचलन छल। हिन्दीक स्थानपर उर्दू पढ़ओल जाइत छल। उर्दूमे पानिकेँ “आब” कहल जाइत अछि। अंग्रेजी जकाँ आेइ समए उर्दु लोकक माथपर चढ़ल छल। ८-९ बरिसक एकटा स्कूली नेनाकेँ बोखार लागि गेलै। घरमे वृद्ध माय बाप। बोखारक तीव्रतामे ओ अड़-बड़ बकि रहल छल। माय बाप कान दऽ सुनलक, की बाजि रहल अछि बच्चा। ओ खाली आब-आब सुनथि। सोचैत रहल आब की, आब की हेतै? किएक आब आब कऽ रहल अछि? बच्चा बेहोश भऽ गेल। दुनू गोटे छाती पिटैत डाक्टरकेँ बजेलक। तावत बच्चाक मृत्यु भऽ गेल। -डाक्टर साहेब ओ बोखारमे खाली आब आब बजैत छल। डाक्टर चकित भऽ गेल, ओ तँ पानि मंगैत छल। फेर तँ माँ पिता दुनू छाती पीटि-पीटि कानए लागल। आब आब कय रहलौं पुत्ता, खटिया तर छल पानि; एहेन फारसी पढ़लौं पुत्ता, अपने सिर बिसानि। तैं कहै छी, सबहक माता पिता बेसीतर मैथिली जनैत छथि, मुदा विदेशी भाषा कम्मे सम्मे.. एहेन कोनो काज नै करी जे अपने माथ बिसा जाए। हम बेसी किछु नै बाजब, अहाँ सभ अपने बुझनुक छी, किएक तँ हम जनैत छी आइ काल्हिक बच्चा कंप्यूटर, रोकेटकेँ मात करैत अछि। तैं तँ वोर्ड्सवोर्थ कहने छथि- child is the father of the man. आइ बाल दिवस केर ऐ शुभ अवसरपर अहाँ सभ सप्पत खाउ जे हम अपन मातृभाषाक माथ कहियो नै झुकऽ देब। अपन संगी सभसँ, परिवारसँ अवश्य मैथिली बजबाक आ पढ़बाक अनुरोध करब। शबनम श्री कंप्यूटरक खेल हम सभ अपन कोनो पाठ यादि करैत छी तँ अपन पोथीसँ आकि कोपीसँ। गणित, विज्ञान, अंग्रेजी आदि सभ विषयकेँ बुझबा लेल शिक्षकसँ बुझए पड़ैत अछि। किन्तु समए बदलि गेल, विज्ञानक चमत्कारसँ आब कंप्यूटर सभ काज करैत अछि। बहुत शैक्षणिक प्रोग्राम कंप्यूटरमे अछि जे ओइमे रन करैत अछि, जकरा हम देखि सकैत छी, पढ़ि सकैत छी आ सुनियो सकैत छी। जेना अंग्रेजी विषय केर हम कतेक शब्दावली यादि कऽ सकैत छी, सौंसे व्याकरण पढ़ि सकैत छी। नव नव कथा पढ़ि सकैत छी। गणितमे गुणा भाग आदि प्रत्येक हिसाब नीक जकाँ खेल खेलमे सीख जाइत छी। विज्ञानमे भौतिकी, रसायन, जीव विज्ञान सबहक interesting problem सभ हल कऽ सकैत छी। कतेक तरहक सी. डी. rom भेटैत अछि जइमे सभ विषय केर program रहैत छै। सी. डी. रोम एकटा चमकैत प्लास्टिक केर डिस्क होइत छै जइमे विभिन्न प्रकारक पाठ आ सूचना नुकाएल रहैत अछि। एहेन बहुत प्रकारक सी.डी. सँ बाजार पाटल अछि यदि अहाँ चाही तँ स्कूलक उपरांत अपन कंप्यूटरपर बैस हँसैत खेलैत कतेक टास्क सीख लेब। साँच तँ ई अछि जे ऐमे मजो आबि जाइत छैक, जेना प्रेमशंकर पंचतंत्र केर कथा जानए लेल चाहैत छल, ओ खट्ट दऽ कंप्यूटरमे पंचतंत्र केर सी. डी. लगा देलक। तखन बहुत उत्साहसँ ओ एक-एक कथाक मजा लेबए लागल, ओना अहाँ जनैत छी, पंचतन्त्रक खिस्सा मानवक जीवन निर्माणमे बड़का सहायक होइत अछि। अहाँ जरुर एकरा देखब। नै पढ़ने-देखने ओहिनो कोनो चीजक ज्ञान लेल कंप्यूटरक स्क्रीनपर फोटो, गीत-संगीत, कथानक, animation क संग सूचना आबए लगैत अछि। अहाँकेँ खूब मोन लागत, अहाँ पएर झुलाबैत, गुनगुनाबैत सिखैत रहब। गणित एहेन नीरस विषयकेँ हँसैत-हँसैत सीख लेब। दू दोस्त एक साथ मिलि गणितक सी. डी. divide एंड conquer मे सीख लेब। दुनू दोस्त मिलि खेलैत अछि, कम्यूटर ओकरा सही कऽ दैत अछि। सही गलत भऽ जाइत छै तँ कंप्यूटर फेरो सिखबए लगैत छै। आ सभसँ पैघ बात छै जे कंप्यूटर कोनो शिक्षक जकाँ मारैत नै अछि। ऐ बहाने try अगेन क समाद कम्पूटर दैत रहैत अछि, बच्चा सभमे सिखबाक हिस्सक लगबैत अछि। जाधरि अहाँ right नै हएब ताधरि अहाँ हारि नै मानू। जीवनमे ऐसँ एकटा बड़का संकल्प लेबाक हिस्सक बनि जाइ छै। चाचा नेहरुकेँ विज्ञानसँ बहुत प्रेम छलनि। विज्ञानमे निहित शक्तिसँ देशक विकासक संभावना हुनका देखा पड़ैत छलनि आ तँए आइ हम सभ कंप्यूटर, रोकेट आदिक जमानामे जीब रहल छी। डाॅ. रमण झा गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा/ मैथिली चित्रकथा श्रीमति प्रीति ठाकुरक दू गोट सचित्र कथा संग्रह -मैथिली चित्रकथा एवं गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा देखलौं आ पढ़लौं (ई पोथी पी.डी.एफ. डाउनलोड लेल लिंक http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi पर सेहो उपलब्ध अछि।) । चित्रक माध्यमे कथाक प्रस्तुति एकटा अभिनव प्रयोग थिक जे लोककेँ, विशेषतः बच्चा सभकेँ अपना दिस आकृष्ट करत। खिस्सा पिहानी कहबाक आ सुनबाक परंपरा मिथिलामे अदौसँ चल आबि रहल अछि। बूढ़ पुरान स्त्रीगण लोकनि छोट-छोट बच्चा सभकेँ सुतएबाक काल नाना प्रकारक खिस्सा सभ सुनबैत छथि जे मनोरंजनक संग संग उपदेशप्रद एवं शिक्षाप्रद सेहो रहैत अछि। आेइ खिस्सा सभमे प्रसिद्ध अछि -दैत्य सभक खिस्सा, राज कुमार सबहक खिस्सा, रामायण महाभारतक खिस्सा, गोनू झाक खिस्सा प्रभृति। उच्च विद्यालय एवं महाविद्यालयमे प्रवेश कएलाक बाद छात्र-छात्रा लोकनि स्वयं कथा पढ़ैत छथि, बुझैत छथि, ओकर रसास्वादन करैत छथि आ समैपर लोककेँ सेहो सुनबैत छथि। मैथिलीक संग विडम्बना ई अछि जे महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तरपर लोक विषयक रूपमे मैथिली रखितो अछि, पढ़ितो अछि किन्तु विद्यालय स्तरपर सरकारी घोषनाक बादो लोक ने मैथिली विषयक रूपमे रखैत अछि आने मैथिली माध्यमे कोनो आने विषय पढ़ैत अछि। एतेक धरि जे मिथिलांचलक विद्यालय सभमे गुरुओजी लोकनि मैथिलीमे पढ़यबामे हीनताक बोध करैत छथि। नव युवक लोकनि बियाह होइतहि पत्नीक संग हिन्दी झारए लगैत छथि। कनेक पढ़ल लिखल आ पदवीबला लोक सभकेँ देखबनि जे अपनामे जँ मैथिलीयोमे गप्प करताह तँ बच्चा सभसँ निश्चय रूपसँ हिन्दीमे। हुनका सभकेँ ई नै बुझाइत छन्हि जे मैथिली भाषा कठिन छै। एकर समुचित ज्ञान जँ बच्चामे नै हेतै तँ बादमे होएब कठिन छै। कवीश्वर चन्दा झा अमैथिलीभाषी (अन्यदेशीय)क हेतु मैथिली भाषा ओहने कठिन कहलनि अछि जेहन एकटा इचना माछक बच्चाक हेतु समुद्रक सभटा जलकेँ पीयब छै- भाषा यदन्यदेशीयोः मिथिलायाः भवेत्तदा। प्ीतमिंचाकपोतेन समस्तं वारिधेर्जलम्।। जतए धरि हिन्दीक प्रश्न अछि तँ ओ तँ राजभाषा थिक। अनिवार्य विषय थिक। ओकर ज्ञान तँ स्वतः प्रत्येक व्यक्तिकेँ होएतैक आ रहिते छैक। एहन स्थितिमे श्रीमति प्रीति ठाकुरक उपर्युक्त विवेच्य पोथी देखि हमर मन गदगद भए गेल। गोनू आ आन मैथिली चित्रकथामे कुल १६ गोट कथा अछि जइमे गोनू झासँ सम्बद्ध नओ गोट कथा, महाकवि कालिदाससँ सम्बद्ध एक गोट आ शेष छओटामे राजा सलहेस, नैका बनिजारा इत्यादि प्रमुख चर्चित कथा सभ काल्पनिक चित्रक माध्यमे चित्रित कएल गेल अछि। ऐ सभ कथामे किछु बात तँ शब्दक माध्यमे अभिव्यक्त कएल गेल अछि आ किछु गप्प चित्र स्वयं कहैत अछि। ऐ कथा सबहक प्रसंग जे लोकक मनमे एकटा भावचित्र छल होएतैक से एतए बूझि पड़ैत अछि जेना साकार भए उठल हो। विदुषी कथा लेखिकाक दोसर संग्रह थिक मैथिली चित्रकथा जइमे कुल १० गोट प्रमुख कथा सभ वर्णित अछि। ऐ कथा सबहक बीच बीचमे काल्पनिक चित्र सबहक समायोजन कथाक यथार्थताकेँ प्रमाणित करैत अछि। ऐ संग्रहमे संग्रहित महत्वपूर्ण कथा सभ थिक -राजा सलहेस, बोधि कायस्थ, दीना भदरी, नैका बनिजारा, विद्यापतिक आयु अवसान प्रभृति। हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे उपर्युक्त दुनू कथा संग्रह बच्चा सभकेँ तँ आकृष्ट करबे करत अपितु समाजक सभ वर्गक लोककेँ एक बेर एकरा उलटयबाक लिप्सा होएबे करतैक। ऐ दिशामे श्रीमति ठाकुरक स्तुत्य प्रयास अछि, साहसिक डेग अछि आ अभिनव प्रयोग अछि। हमर शुभकामना अछि जे कथा लेखिका एहने सरस, सहज आ सजल रचना सभसँ मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ सुरभित करैत रहथि। विनीत उत्पल कतए गेल फिल्मक बाल कलाकार कहियो समए रहै जे बाल कलाकार अओर बाल गीत हिन्दी सिनेमा देखैबला लोकक मनमे उतरि जाइत छल। मुदा आजुक समैमे नै तँ एहन बाल कलाकार अछि आ नै ओहन डायरेक्टर अछि जे बच्चाकेँ लऽ कऽ फिल्म बनौलथि जे दिल कऽ छू लिअए। १९५४ मे एकटा फिल्म रिलीज भेल छल जागृति। कहल जाइत अछि जे ई फिल्म पहिल फिल्म छल जइमे बच्चाकेँ लऽ कऽ नीक गीत छल। गीत कवि प्रदीप लिखलनि। आओ बच्चो, तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिन्दुस्तान की एखनो लोक सभ गाबैत अछि। ऐ फिल्मक एकटा गीत आर अछि जे मोहम्मद रफीक गाएल छल हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के..। समए बदलैत गेल, कएकटा गीत लिखल गेल। ‘‘बूट पालिस"मे नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुटठी में क्या है, “श्री ४२०” मे इचक दाना बिचक दाना, “धूल का फूल” मे तूँ हिन्दु बनेगा न मुसलमान बनेगा, "गंगा जमुना"मे इंसाफ की डगर पे बच्चो दिखाओ चल के, "सन ऑफ इंडिया"मे नन्हा मुन्ना राही हूँ, "ब्रह्मचारी"मे चक्के पे चक्का, "दो कलियां" मे बच्चे मन के सच्चे; सभटा गीत बच्चा सभकेँ खूब नीक लागल। अओर तँ अओर, फिल्म आराधनाक गीत चंदा है तँू मेरा सूरज है तूँ आइ धरि लोक अप्पन सोना बेटाकेँ सुताबैक कालमे गाबैत अछि, जखन खेलाबए लागत तखन आशीर्वाद फिल्मक गीत रेलगाड़ी, रेलगाड़ी... गाबैत छल जकरा अशोक कुमार गएने छल। जखन घरमे मामा आबै छथिन या रातिमे आंगनमे सुतल लोरी जना लोग सुनाबैत अछि चंदा मामा दूर के.. गीत सुनहिमे खूब नीक लागैत अछि। ओहिनो फिल्म अपना देशक गीत रोना कभी नहीं रोना, कालीचरणक गीत एक बटा दो, मिस्टर नटवरलालक गीत आओ बच्चों मैं तुम्हें कहानी सुनाता हूँ, अंधा-कानूनक गीत रोते-रोते हँसना सीखो खूब सुनल अओर गाओल जाइत अछि। मासूम फिल्मक गीत छोटा बच्चा जानकर.. कोनो कालमे सबहक मुँहमे रहैत छल। हिन्दी फिल्मी दुनियाँमे एहनो काल छल जहिया बेबी तबस्सुम, बेबी गायत्री, मास्टर रतन, हनी इरानी, पल्लवी जोशी, नीतू सिंह, मास्टर मयूरकेँ देखए लेल लोक सिनेमा हॉल जाइत छल। मुदा ऐ गपसँ इनकार नै कएल जा सकैत अछि जे आब फिल्ममे अलग तरहक स्वादक लेल बाल कलाकारक अभिनय देखल जाइत अछि। कहियो दूटा प्रेमीकेँ मिलबए लेल बाल कलाकारकेँ फिल्ममे लेल जाइत छल जे आबक फिल्ममे नै अछि। किएकि मोबाइल, इंटरनेटक दुनियाँ आबि गेलासँ ने कबूतर, तोता अछि आ ने कोनो बच्चा, जकरासँ प्रेमपत्र भेजबामे मजा आबैत छल। एकटा फिल्म आएल छल "ब्लैक"। ओ संजय लीला भंसाली बनौने छल। आयशा कपूर ओइमे अभिनय केने छल जइसँ खूब फिल्म देखल गेल आ सर्वश्रेष्ठ फिल्म बनि गेल छल। अमोल गुप्तेक तारीफ कएल जा सकैत अछि, किएकि आमिर खानक संग डिसलेक्सियासँ पीड़ित बच्चापर "तारे जमीं पर" बनौलनि। खूब नीक अभिनय करैक लेल दर्शील सफारीकेँ घर-घरमे लोक चिन्हए लागल। ऐमे अमिताभ बच्चन कोना ककरोसँ पाछाँ रहितथि, भूतनाथमे अभिनय कऽ लोकक दिल जीत लेलखिन आ अमन सिद्दकी एकरामे बंकूक भूमिका केलनि। डाॅ० अभयधारी सिंह, सम्पादक- जाह्नवी संस्कृत ई जर्नल, पता- इतिहास विभाग, निर्मल्ली कालेज, निर्मल्ली, बिहार अभिनव वर्ष अभिनव वर्ष केर स्वागत करबाक हेतु जोर-शोरसँ तैयारी चलि रहल अछि। कोइ अपन छुट्टी लऽ अपन परिवारक संग मनपसन्द पर्यटन स्थलक लेल रुख कऽ रहल अछि तँ कोइ मित्रमण्डलीक संग कार्यक्रम कऽ रहल अछि तँ ओतहि कोइ घरेमे भोजन आ मनोरंजन केर साधन जुटा रहल अछि। एतए एकटा जिज्ञासा होइत अछि जे ऐ नूतन वर्ष केर इतिहास की अछि? १ जनवरीएकेँ ई किएक मनाओल जाइत अछि? की ई भारतीय वैशिष्ट्यकेँ परिलक्षित करैत अछि? एहने बहुतो जिज्ञासा केर प्रशमन हेतु ई लेख प्रस्तुत अछि। भारतवर्षमे ईस्वी संवत केर प्रचलन अंग्रेज शासक द्वारा वर्ष १७५२मे शुरू कएल गेल। एकर संबंध ईसा मसीहसँ अछि जे रोम केर सम्राट जूलियस सीजर द्वारा ईसाक जन्म केर तीन वर्ष बादक कालावधिसँ जोड़ि प्रचलनमे आनल गेल। भारतवर्षमे स्वतन्त्रता केर उपरान्त १९५२मे वैज्ञानिक आ औद्योगिक परिषद् द्वारा पंचांग सुधार समितिक गठन भेल जे अपन रिपोर्ट १९५५ मे दैत विक्रमी संवतकेँ स्वीकार करबाक सिफारिश कएलक। मुदा तत्कालीन प्रधानमन्त्री नेहरू केर आग्रहपर ग्रेगेरियन कलेण्डरे सरकारी कार्य निमित्त स्वीकृत भऽ सकल। ई २२ मार्च १९५७ सँ राष्ट्रीय कैलेण्डर केर रूप लेलक। की एकर राष्ट्रीय कैलेण्डर केर रूप लेब समुचित अछि? प्राचीनता- एकर उत्तर देबासँ पूर्व अन्य कैलेण्डर केर प्राचीनता देखि ली- ग्रेगेरियन- लगभग २००० वर्ष पुरान यूनानक काल गणना- लगभग ३५७९ वर्ष पुरान रोमक काल गणना- लगभग २७५६ वर्ष पुरान यहूदीक काल गणना- लगभग ५७६७ वर्ष पुरान मिस्रक काल गणना- लगभग २८६७० वर्ष पुरान पारसी काल गणना- लगभग १९८८७४ वर्ष पुरान चीनक काल गणना- लगभग ९६००२३०४ वर्ष पुरान भारतक काल गणना- लगभग १ अरब ९७ करोड ४९ लाख १०९ वर्ष पुरान (पृथ्वी केर आयु) जेकर नामकरण चक्रवर्ती राजा विक्रम केर नाओंपर धर्मकेर दृष्टिसँ- ईस्वी संवत- ईसाइ हिजरी संवत- मुसलमान विक्रमी संवत- कोनो धर्मविशेष सँ नै अपितु प्रकृति एवं खगोल सिद्धान्त सँ सम्बद्ध। उक्त परिप्रेक्ष्यमे ई कहल जा सकैत अछि जे ईस्वी संवत भारतवर्ष हेतु उपयुक्त कैलेण्डर नै। एकरे पृष्ठभूमिमे ई तर्क देल जा सकैत अछि- सांविधानिक दृष्टियेँ भारत पंथनिरपेक्ष राष्ट्र अछि एतए कोनो धर्म विशेषसँ सम्बद्ध कैलेण्डर केर स्थानपर पंथनिरपेक्ष कैलेण्डर होएब विधि सम्मत। प्राचीनता केर दृष्टिसँ सेहो भारतीय गणना उपयुक्त अनेक भारतीय परम्परासँ जुड़ल तथ्य भारतीय काल गणनासँ जुड़ल अछि। प्राकृतिक दृष्टिसँ भारतीय गणना उपयुक्त अछि किएक तँ ऐमे वर्षक प्रारंभ चैत्र (वसन्त) होइत अछि। बहुत रास तथ्य ऐसँ जुड़ल अछि जे राष्ट्रक प्रति गौरव केर अनुभूति करबैत अछि। अस्तु नूतनवर्षक रूपमे भारतीय सांस्कृतिक विरासत विक्रम संवतक अनुगम सर्वथा उपयुक्त। मुदा सरलताक दृष्टिसँ ईसवी सम्वत सर्वथा उपयुक्त अछि। अनमोल झा एकटा बाल विहनि कथा भण्डाफोर ओ कहबी नै छै जे बूढ़ भेने लोक दूरि जाइत अछि, सएह बात। ओना गाम बाबा संगे से बात नै छलनि। बूढ़ तँ छलाहे बेचारा मुदा लोककेँ लगै जे थोड़े ई नाटको करै छथि। जखन कियो आबनि दलानपर आ कहनि गोर लगै छी बाबा, चिन्हलौं हमरा? तँ कहि उठथिन- परिचय देब तखन ने चिन्हब। माने ओ जेना कम देखैत रहथि आ आगन्तुक अपन परिचय दैत छल तखन ओ चिन्हैत छलखिन। एहिना एक दिन ईंटाक भट्ठाक मालिक पाइक तगेदामे हिनका ओतए आएल आ कहलकनि- बबा प्रणाम। चिन्हलौं हमरा। तँ कहलखिन- नै तँ। -हम सियाराम, ईंटा भट्ठाबला। एतबे कहिते गाम बाबा बमकि उठलाह- ऐँ हौ, हमरा सभटा दू नम्बरक ईंटा दऽ देलह। तोरा ठकै लेल हमहीं भेटलियह की? आ मार-मार कऽ उठलाह बाबा ओकरा। सियाराम कहलनि- बाबा हम सात फीटक जवान छी से अहाँ सामनेमे ठाढ़ छलौं, बिना परिचयक अहाँ चिन्हबे नै केलौं आ सात इंचक ईंटा छैहो नै से अहाँ एक नम्बर आ दू नम्बर चिन्ह गेलिऐ...!! शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू” बाल लघुकथा तरेगन देखाइए सन सतासीक बाढ़िमे सम्पूर्ण मिथिलांचल छिन्न-भिन्न भऽ गेल। स्वाभाविक छल हमरो गाम कोना बचैत? जिरात सभमे खाधि फूटि गेल छल। पानिक माेंका सभ किसानकेँ बुड़िबक बना देलक। भदैयाक कोन गप्प जे रब्बी सेहो कोसी, बागमती आ करेजक लीलासँ नै पनकि सकल। “रौ काल्हि सम्मत छै, किछु नार-पुआर तँ नै उपजलौ, आक धतूरोक संठीक जोगार तँ करबेँ।” बाबूजीक ऐ जिज्ञासापर हमरा सबहक नेना टोलीक नेता रंजीतमे जोश आबि गेल। ओ पंकज, लाला, प्रदीप, हेमन्त, बबलू आ हमरा संग कऽ चलि देलक, होलिकाकेँ जड़एबाक लेल व्यवस्थामे.....। कतौ किछु नै भेटल। शस्य श्यामला करियनक वसुन्धरा मरूस्थलि भऽ गेल छथि। की करू, किछु नै फुराइत अछि? सोचैत बढ़ैत छलौं आकि ललबा बाजल- “रौ टिल्लू एकटा उपाए छौ।” रामलोचनक भिराठमे पािन नै लागल छलै, ओ साग तरकारी लगेने छथि। हम ओकर तितम्भासँ खिन्न भऽ गेलौं- “एक दूटा भाटा तोड़ि ओइमे होलिका सन माउगि कऽ कोना जड़ेबेँ?” -नै-नै, रामलोचन जीक खोपड़ी उखाड़ि कऽ लऽ जाएब। चल ने, एखन ओरिआन कऽ लैत छी, रातिमे खोपड़ी....। सभ छौंड़ा खोपड़ी लग गेलौं। ओइठाम केओ नै छल। सभटा खुट्टाक जड़िकेँ कोरि बगलमे गाड़ल चापाकलसँ पानि लऽ कऽ जड़िकेँ फुलाओल गेल। सुक्खल माटिसँ फेर ओइ खुट्टाक जड़िकेँ ललबा झाँपि देलक। ओ हमरा दलक न्यूटन छल। एतेक ध्यान जौं पढ़बामे लगबितए तँ आइ किछु आर रहितए। हम पुछलौं- “एना किए कएलेँ?” ओ ठामहिं बाजल- “एखन सूर्यास्तो नै भेलै, खोपड़ी लऽ कऽ चलबेँ तँ केओ देखि लेतौ, फेर आगाँ की हएत से तँ बुझले छौ। परूकॉं साल हाकिमक गहूमक बोझ सम्मतमे जड़एबाक लेल चोरि करैत पकड़ा गेल छलौं। ओ दादाकेँ परचारि देलनि। ततेक मारि खएलौं जे जौं एखनो पुरबा बसात बहैत अछि तँ पीठमे दर्द हाेमए लगैए।” ठीक राति नौ बजे हम सभ फेर लक्ष्य भेदनक लेल खोपड़ी लग आबि गेलौं। खोपड़ीक भीतर एकटा खाटपर रामलोचन बाबा अधसर साँप जकाँ दीर्घश्वास लैत छलाह। बगलमे हुनक पाँच बरखक पोता सूतल छल। रातिमे ओ साग तरकारीक ओगरबाही करैत छल। ई गप्प ललबाकेँ बूझल छल। तेँ खोपड़ीक खुट्टा लगक माटिकेँ पानिसँ गिल्ल कऽ देने छल। ई गप्प हम आब बुझलौं। जय लंकेशक मंद ध्वनिसँ हम सभ खोपड़ी उखाड़ि चलि देलौं। पोखरिक दछिनबरिया मोहारपर सम्मतक स्थान छल। ओतऽ पहुँचैत देरी दूरसँ गाड़ीक ध्वनि सुनलौं। जिरात पोखरिक उत्तर कातमे छल। हम सभ बूझि गेलौं। सम्मतक मुहूर्त तँ चारि बजे भोरमे अछि। आब की करबेँ? आगि तँ वएह लगाओत जकर बाप मरल हुअए। हम सभसँ पितृयुक्त छी। हमर ऐ टिप्पणीपर ललबा बगलक कंसारसँ आगि खोड़ि कऽ आनि सम्मतपर धऽ देलक। खोपड़ी कुरू-कुरू स्वाहा। रातिमे पंचैती लागल। सरपंच श्री रामप्रकाश जी लोचन बाबासँ पुछलनि- “अहाँ कोना बुझलौं जे खोपड़ीक चोरि भेल?” “हमर पोता डोला कऽ उठौलक। बाबा हौ बाबा, तोरी बाहिं, तरेगन देखाइए। हम अकचका कऽ उठलौं, खोपड़ीक चारमे तरेगन....। कोना उगल? उठि कऽ देखलौं, चारक कोन कथा, खुट्टा सेहो गोल अछि।” सभ पंच ठोहि पारि कऽ हँसलाह। हम सभ माफी मांगि लेलौं। काज तँ समाजक लेल कएने छलौं तेँ रामलोचन बाबा माफ कऽ देलनि। बाबाक पोता आब जवान भऽ गेल छथि। एखनो जौं केओ ओकरा ‘तरेगन देखाइए’ कहैत अछि तँ ओ मंद-मंद मुस्की मारि फेर अपन स्वर्गीय बाबाक स्मरणमे शांत भऽ जाइत अछि.....। पितृयुक्त ललबा सम्मतमे आगि लगौलक, अठासीक कोन कथा ओकर पिता एखन धरि स्वस्थ छथि। भगवान हुनका एहिना लहलहाइत राखथु। दहीक ठोप रातिमे शिवनगरमे रामखेलावनक पिआ-देशान्तर (बिदेसिया नाच) देखैले चलि गेल छलौं। बाबाक हुरपेटलाक बाद भोरे देरीसँ नीन फूजल। भोरूका स्कूल छल। झटपट स्नान कऽ बसिका रोटी आ पलाँकी साग हूरि बस्ता समेटलौं। हमर लङोटिया संगी सभ जेना रवि, धनश्याम पहिने विद्यालयक लेल विदा भऽ गेल छल। एकसर झटकल चलि देलौं। बाटमे उद वाकल चांडाल चौखरी भेटल। सभ सहपाठिए छल, मुदा विद्यासँ ओकरा सबहक कोनो संबंध नै। सभ दिन गुरूजी सँ धुनाइत छल, मुदा कोनो प्रभाव नै। नै चाहितो संग लागि गेलौं। ककर रोहिनियाँ आम तोड़त, कतए की उजाड़त पता नै। गामसँ कोस भरि दूरमे बैद्यनाथपुर उच्च विद्यालयमे पढ़ैत छलौं। आइ लगै छै किछु नै फबतै, हलधर अपने आमक जड़िकेँ पजिऔने छै। जितबाक ऐ हिलकोरकेँ सुनि करेज काँपए लागल। एतबामे उच्छृंखल संघक नेता आशुतोष चिचिआएल- “रौ हिरबा, दौड़ आगाँ, भरिया जा रहल छै....। भार छीनि कऽ दही चाखब।” सभ दौड़ल नहुँ-नहुँ भरिया लग आबि गेल छलौं। भरिया प्रलयक संकेत बूझि ठाढ़ भऽ गेल। “हौ ककरा ओइ ठाम भार लऽ कऽ जाइ छहक?” आशुतोष बाजल। “तोरा ओइसँ की मतलब, बेसी टभ-टभ करबेँ तँ उठा कऽ पटकि देबौ?”, भरिया बिगड़ि कऽ बाजल। सरिपौं ओ नेना सबहक उद्देश्य बूझि गेल छल। हम आशुतोषसँ विनती कएलौं, छोड़ि दहीं गऽ, कोनो अहिवाती बहिनक भार छै। आशुतोष हमरा दिश आँखि गुरड़ैत बाजल- “रौ हरिश्चन्द्रक नाति, तोँ भाग ऐठामसँ, हम सभ दही अवश्य खाएब।” हमर निवेदनपर दलमे फूटि पड़ि गेल। हमरा संग-संग किछु छौंड़ा आगाँ बढ़ए लागल। जितबा बड़ पारखी छल, ओ ई गप्प बूझि गेल, उद्धोषणा कएलक- जे छौंड़ा ऐ दहीसँ अपन माथमे चानन ठोप नै करत ओकर बाप तीन दिनक भीतर मरि जाएत। ई कहैत पहिने ओ दहीमे भूर कऽ अपन माथमे ठोप कएलक। हमर विरोध असफल भऽ गेल। अपन डेग पाछाँ करैत पितृमोहक दुआरे हमहूँ राजतिलक लगएलौं। देखिते-देखैत दहीक पातिलमे अकाशक तरेगन जकाँ सहस्त्र छिद्र भऽ गेल। भरिया भारकेँ छोड़ि ठामहिं गायघाट गाम दिशि गाड़ि पढ़ैत भागल। सभ छौंड़ा ओइ दहीसँ पारन कएलक। हम मूकदर्शक छलौं। विद्यालय पहुँचैत देरी महेन्द्र बाबू मास्टर साहेबक सटक्कासँ रक्त रंजित भऽ गेलौं। ओ सभ खा कऽ धुनाएल आ हम बिनु अपराध कएने। सोचऽ लगलौं हमर कोन दोख, हम तँ पितृमोहमे फँसि गेलौं। खोंइछक लेल साड़ी आसिनक नवरात्रक महाष्टमीक दिन। दशोदिस जगत जननीक गुणगान। भगवती स्थानमे यस्या प्रभाव मतुलं...क जयघोषसँ मातृभक्तिक परम अनुभूति भऽ रहल अछि। बाहर आनंदक हुलिमालि। मुदा ! आंगन अबैत देरी देखलौं जे हमर माँ ओलतीमे शांत चित्त बैसलि छलीह। की भेल माँ, किए एकातमे बैसलि छी? महाष्टमीक खोंइछ भरए लेल कखन जाएब? निशा पूजाक बाद खोंइछ भरब ने। माँ गुम्म, मुदा हम बडबड़ा रहल छलौं। -हम तँ आठ बजे चलि जाएब। आइ विद्यापति नाटक अछि। हम बाल विद्यापतिक रोल नेने छी। कनेक हमर अभिनय देखि लेब तँ हमरा नीक लागत। माँ अकच्छ भऽ कऽ बजलीह- हम आइ खोंइछ नै भरब। चैती दुर्गामे देखल जाएत। हम पुछलियनि- किए एना बजैत छी? -चैती दुर्गामे खोइंछ भरबाक लेल अख्खड़ साड़ी नै अछि आ ओहुना दूर रानीपरती जाए पड़त, माँ तमसा कऽ आगाँ बजली, -अहाँकेँ सभटा गप्प बुझब आवश्यक नै। नेना छी, नेना बनि कऽ रहू। बुटिया माएसँ जा कऽ पुछलौं तँ बुझना गेल जे माँक संगमे नव वस्त्र नै अछि। भगवतीक खोंइछ अख्खर साड़ीमे भरल जाइत अछि। हम असमंजसमे पड़ि गेलौं। की करब, किछु नै फुरि रहल? एकाएक मोन पड़ल जे गामक पाँजड़िमे वाधोपुर बजार अछि। दू – एक बेर बाबू जीक संग ओइठाम देबू महाजनक कपड़ा दोकानमे गेल छलौं। ओ हमरा चिन्हैत छथि। किनसाइत उधार दऽ देताह तँ माँक खोंइछ भरब सम्भव भऽ जाएत। चुपचाप विदा भऽ गेलौं। दोकानमे पैसैत देरी देखलौं जे महाजन गद्दीपर बैसल छलाह। हमरा दिसि तकैत पुछलनि- एकसरे अएलौं। बाबूजी ऐबेर कपड़ा नै लेलनि। हम लग जा कऽ अपन व्यथासँ अवगत करेलौं। महाजन आश्चर्यमे पड़ि गेलाह। अपन पुत्र दिनेश जीसँ कहलनि- बौआ, आइ तँ उधार देबाक नै अछि, मुदा ऐ बालकक मातृ प्रेम.....। ओना ई कियो आन नै, कवि जीक पुत्र छथि। निराश करब उचित नै। एकटा नीक सूती साड़ी पैक कऽ कए अपन मुंशी जनार्दन जीक हाथमे दैत बजला- जनार्दन हिनका करियन धरि छोड़ि आबू। साँझ पड़ि गेल, अन्हारमे एकसरि हिनका मुरदैयामे डर लगतनि। जनार्दन बाबू हमरा साइकिलपर बैसा कऽ हमर दलानपर उताड़ैत बजला- जाउ, साड़ी माँकेँ दऽ दियौन, हम कनेक ढल्लू मिसिरसँ भेँट कऽ लैत छी, तखन वाधोपुर चलि जाएब। हम अतिशय प्रसन्न दौगल आंगन गेलौं। माँ चिनुआर लग बैसलि पूजाक दीपमे तेल भरैत छलीह। माँ!! अहाँ लेल साड़ी अनलौं माँ। साड़ीक पन्नी माँक हाथमे थमा देलिअनि। माँ पन्नीसँ साड़ी निकालैत बजलीह- कैंचा कतए सँ अनलेँ? ककर जेबी कटलेँ? हमरा बड़ विश्वास छल ऐ छौड़ापर। धत..... बापक नाओं माटिमे मिला देलक।, माँ काँपए लगलीह। थापर, मुक्का, लातिक ताबरतोड़ बरखा होमए लागल। हाथक चूड़ी झन्न-झन्न टूटि कऽ माटिपर खसए लागल। किछु काँचक कण माँक हाथमे गड़ि गेल। टप-टप शोणितक अपादान। अखन धरि मात्र माँ क रूप देखने छलौं। पहिल खेप बेगूसरायक बेटीक रूप देखलौं। सुनैत छलौं, आइ पल्ला पड़ि गेल। बुढ़िया माए झटकल आबि माँक हाथ पकड़ैत बाजलि, नेनाक प्राण लऽ लेब की? कनिया एतेक तामस नीक नै। कोन गलती कएलक? -की कहबनि, माँ, ई चोर भऽ गेल। नै जानि केकरा घरमे सान्हि काटि कए हमरा लेल साड़ी अनलक? भगवान एहेन कुपुत्रसँ निपुत्र नीक। हम गुम्म। की बाजब? सोचैत की छलौं आ की भऽ गेल। बहुत उधेड़बुन्नक बाद मुँह खोललौं- माँ हम चोरि नै कएलौं। सभटा कथा सुना देलियनि। माँकेँ विश्वास नै भेलनि, बाबाक सेवक सोहनकेँ ढल्लू कक्काक दलानपर पठौलनि। संजोगसँ जनार्दन बैसले छलाह। सोहन आबि कहलथिन्ह- बहुआसिन, टिल्लू मिथ्या नै बाजलनि। -हा! हम ई की कएलौं? भरल पावनिमे चिलकापर अत्याचार। आइ तँ माँ गौरीक दिन थिक, मुदा हमरासँ कतेक पैघ गलती भऽ गेल। अपन दुनू हाथक मुट्ठीसँ देवालमे मारए लगलीह। अश्रु उच्छवाससँ हमर कंठ भरि गेल। माँक चरण पकड़ैत बजलौं- नै नै। जुनि अपराध बोधक अनुभव करू। अहाँक शंका स्वाभाविक छल। मातृ धर्मक वास्तविक रूप इएह थिक। अपन संतानपर अंध विश्वास नै करबाक चाही। मुदा! हमरा जे बुझना गेल सएह कएलौं। झट दऽ माँ बैस कऽ हमरा कोरमे लऽ कऽ सिनेह सागरक अविरल धार बनि गेली- भगवती, शिव सन पूत सभकेँ देथु। जेहन नाओं तेहेन काज। अपन आँचरसँ हमर आँखि पोछैत बाजलि- बौआ एकटा खुशीक गप्प कहैत छी जे जखन अहाँ वाधोपुर गेल छलौं तखने अहाँक बाबूजी आबि गेलाह। सबहक लेल वस्त्र अनने छथि। अहुँ लेल खूब सुन्दर अंगा आएल अछि। हमरा लेल तँ लाल रंगक सिफनक सोहनगर साड़ी.....। मुदा हम खोंइछ भरब तँ अहींक आनल साड़ीसँ। पूत प्रेमक ऐ पराकाष्ठाकेँ नै बिसरए चाहैत छी। ओ तँ सभ पावनिमे अनैत छथि। हम माँक हाथ पकड़ि जोरसँ कानए लगलौं। माताक कतेक रूप होइत अछि। धर्म, सिनेह, मोह, अनुशासन, दुत्कार.....। संततिक नव निर्माणक लेल आवश्यक। गर्वित छी, आर्यावर्त्तक नारीक संतान भऽ कऽ। (टिप्पणी: शिव कुमार झा टिल्लू जीक लिखल खोंइछक लेल साड़ी कथापर दुर्गानन्द मंडल जीक दू शब्द) कथा पढ़ल िचन्तन कएल, बुझना गेल कथा यथार्थपरक अछि जेना कथाकार अपनहि ऐ स्थितिसँ गुजरल होथि। जौं अनुभव हमर सत्य तँ सार्थकता शत्-प्रतिशत। एक कात कथाकार विद्यापतिक भूमिकामे छथि, मनमे सिनेह छन्हि जे माए कने ओ भूमिका देखि लेती तँ हमरा नीक लागत। एम्हर माए ओलतीमे गुम-सुम बैसल छलीह, कारण महाअष्टमीक राति एक टूक अखड़ साड़ी नै रहलाक कारणे ओ भगवतीक खोंइछ काेना भरती? ई जािन बालक मातृत्व प्रेमवश बाबूजीक साखपर कपड़ाबला महाजनक दोकानसँ एकटूक साड़ीक पन्नी माएक हाथमे थमा दैत छथिन। माएक टूटैत बिसवास माएक रूपमे नै अपितु बेगुसरायक बेटी रूपमे स्पष्ट होइत अछि। हाथक चूड़ी टुटब, काँचक किछु कण माएक हाथमे गड़ब आ टप-टप शोणितक अपादान- कविजीक साखपर दाग सदृश बुझना गेल। मुदा सत्य जानि अपन अपराध बोधक अनुभव कऽ माए बैस बालककेँ कोरामे लऽ कऽ सिनेह सागरक अविरल धारा प्रवाहित केलनि। सारत्व स्वरूप स्वामीक अर्थात कथाकारक बाबूजीक आनल लाल रंगक सिफनक सोहनगर साड़ी नै पहिर बालकक आनल सुती साड़ीसँ भगवतीक ख्ाोंइछ भरब, प्रभु प्रेमक एकटा अलग पराकाष्ठाक परिचएकेँ पाठक बन्धु नै बिसरि सकताह। कथाक सार्थकतापर इजोत छोड़ैत अछि जे निश्तुकी एकटा माँजल कथाकारक कथा बुझना जाइछ। मुदा जँ माँक जगह कोनो आन उपयुक्त, समुचित शब्दसँ सजबितथि तँ कथामे मैथिली समृद्धता आरो स्पष्ट होइत। शेष सभ चिकनहि चिक्कन। नारियर- गाछ बाबूजी सरायरंजन प्रखण्डमे कार्यरत छलाह। गामसँ दूर रहबाक कारण शनि दिनकेँ अबैत छलाह, फेर सोमन भिनुसरबेमे गामसँ विदा...। बुझू जे आन पाँच दिन हमरा सबहक लेल पिकनिक जकाँ छल। हम आ हमर पिसिऔत शंभू एकतुरिया छलौं। भोरसँ साँझ धरि धमगिज्जड़ि, ककरोसँ डर नै। बाबा बूढ़, खाट धएने छलथि। हुनक जुआनीक खिस्सा सुनि देह सिहरि जाइत छल। बड़ अनुशासित शिक्षक छलाह मुदा आब हमरा सबहक मास्टरीक आगाँ चुप्प भऽ जाइत छथि। रवि दिन भाेरे बाबा, बाबूजीकेँ उपराग देलनि- “टिल्लूकेँ कतेक दिनसँ कहैत छी, प्रयाग बाबूक ओइठासँ नारियरक गाछ आनैले मुदा हमर के सुनए।” हमरा दिस बाबूजीक आँखि पड़ल डऽरसँ औना गेलौं। विनय भायकेँ संग कऽ प्रयाग बाबूक टोल बंडिहा चलि देलौं। प्रयाग बाबू समाजक लेल कोनो अपरिचित नाओं नै। सभक लेल बाबू छोड़ि कोनो दोसर नाओं हुनका लैत नै सुनने छलौं। करियन गामक पूर्व मुखिया आ प्रसिद्ध वैध प्रयाग बाबू ककरोसँ इलाज करबाक क्रममे फीस नै लैत छलाह। एकर परिणाम कनेक-कनेक मोन अछि जे सन १९७७ई.मे रोसड़ा विधान सभाक निर्दलीय विधायकक रूपमे निर्वाचित भेल छलाह। फेर दोसर बेर चुनाव नै लड़लनि, पहिले चुनावक खर्चमे किछु जमीन बिका गेल छलनि। समाजमे एतेक सम्मान ‘न भूतो न भविष्यति’। दलानक प्रांगणमे पहुँचैत देरी खूब सम्मान पूर्वक आवाहन कएल गेल- “बौआ हम तँ मास्टर साहेबकेँ पंद्रह दिन पहिने नारियरक गाछ लेल कहने छलौं आ अहाँ सभ अखन आबि रहल छी।” प्रयाग बाबूक ऐ प्रश्नपर हम दुनू भाँइ मौन सहमति देलौं। फेर ओ खुरपीसँ नारियरक थल्ला कोरि एकटा गाछ हमरा हाथमे थमहा देलनि। हुनक बालक वसन्त बाबू दलानपर बैसल छलाह। बैद्यजी हुनका बजा कऽ कुट्टी काटएबला कत्ता मंगौलनि। क्यारीमे १५-१६गोट अओर नारियरक गाछ रोपल छल। सभटा गाछकेँ एक निशामे विधायक जी उखारि कऽ लकड़ीक गाड़ल कुट्टी कटबाक लेल सङग लग लऽ जा कऽ अष्टमीक बलिप्रदान जकाँ नािरयर गाछक बलि चढ़बए लगला। हम अजगुतमे पड़ि गेलौं। कोन अपराधक दंड ऐ गाछ सभकेँ भेट रहल अछि। अपन हाथमे लेल छोट नारियर गाछकेँ ठामहिं माटिपर राखि अपन टोल दिस दौग गेलौं। विनय भाय सेहो पाछाँ....। दलानपर अाबि बाबाकेँ सभ कथा सुनबए लगलौं नै की बाबूजी कानपर जोरसँ एक थप्पर जड़ि देलनि। हमरा पकड़ि कऽ प्रयाग बाबूक दलानपर बाबूजी अनलनि। डॉक्टर साहेबसँ बाबूजी हमर अपराधक जिज्ञासा कएलनि तँ प्रयाग बाबू कहलथिन- “नै-नै, ऐ नेनाक कोनो अपराध नै। अखन धरि हम पचास गोट नारियरक गाछ बाँटि देने छी। समाजक लोकक लागल अछि। केकरा देब केकरा नै....। ऐसँ बढ़िया नै रहतै बाँस आ नै बजतै बँसरी, तँए सभटा गाछकेँ काटि देलौं। बड़ सखसँ बिचड़ा खसौने छलौं हमरो दलानपर शोभा बढ़त आ किछु समाजक लोकेँ सेहो देब, मुदा....। अहाँक नेनाक गाछ देवालक कातमे राखल अछि अपने लऽ जा सकैत छी।” बाबूजी गाछ लऽ कऽ चलि देलनि की सोचैत विदा भेलथि ई हम कहियो नै पुछि सकलौं। मिथिलाक लोक देवता कोनो साहित्यक समृद्धिक आधार महाकाव्य, प्रबन्ध काव्य, उपन्यास वा कथाक उत्तर आधुनिक विवेचनकेँ मानल जाइत अछि। ऐ दिशामे मैथिली एखन बड़ पाछू अछि किएक तँ समग्र साहित्य विधाक परम्परागत रूपसँ ई भाषा बाझल मानल जा सकैछ। साहित्यक विकास तखने संभव जखन भाषाक दीर्घकालीन संभावना परिलक्षित हएत। पुरना खाढ़ी झखड़ि रहल छथि आ नवका पीढ़ीमे शिक्षाक माध्यम अंग्रेजी तखन मैथिलीक अस्तित्वपर अपने आप प्रश्न चिन्ह लागब दर्शनीय। गाम-घरक नेना-भुटकाकेँ जौं छोड़ि देल जाए तँ मैथिल परिवारक शैशवक मातृभाषा निश्चित रूपेँ बदलि रहल अछि। प्रारंभिक शिक्षाक माध्य अंग्रेजी आ हिन्दी थिक। ऐ दशामे साहित्यसँ बेशी आवश्यक अछि भाषाकेँ बचाएब। मैथिली तखने अपन अस्तित्वकेँ दृढ़ रूपेँ राखि सकतीह जखन नवका पीढ़ीमे मातृ आ वात्सल्य सिनेहक वेदना हुअए। एे लेल आवश्यक अछि बाल मनोविज्ञानकेँ स्पर्श करएबला बाल साहित्यक प्रोत्साहन। ऐ दिशामे कहबाक लेल तँ बहुत रास कार्य भेल अछि परंच वास्तविक बाल साहित्यमे आधुनिक पीढ़ीक रचनाकारक समूहमे अग्रगन्या छथि श्रीमति प्रीति ठाकुर। हिनक तेसर पोथी ‘मिथिलाक लोक देवता’ श्रुति प्रकाशनक सौजन्यसँ २०१० ईं.मे बहार भेल। टी.एस. इलियटक Tradition and the individual talent (सन १९४७) क अनुसार कोनो कवि, कथाकार वा कलाकार स्वयंमे पूर्ण अर्थ नै स्पष्ट करैत छथि। हुनक कलाक तुलना मृत कवि वा कलाकारक रचनासँ कएलाक बादे हुनक मूल्यांकन कएल जा सकैछ। जौं ऐ मतकेँ प्रासंगिक मानल जाए तैयो प्रीतिजी अतुलनीय छथि किएक तँ हिनकासँ पूर्व ऐ प्रकारक चित्रात्मक आ लयात्मक शैलीमे बाल गद्य पहिने मैथिलीमे लिखल नै गेल। ई अक्षरश: सत्यो थिक किएक तँ आदि पुरुषक माथपर पाग रखबाक साहस कियो नै कऽ सकल। संगहि ऐ तथ्यकेँ जानब सेहो आवश्यक जे अन्य भाषा समूहसँ तुलनाक बाद प्रीतिजी कतए छथि? ‘सामा चकेबा’ परम्परागत जनश्रुति आ पौराणिक कथाक आधारपर मिथिलाक गाम-गाममे प्रचलित कार्तिक पूर्णमासीक पावनि िथक। ऐ कथाकेँ ऐ पोथीमे सम्मिलित कऽ प्रीतिजी कोनो नव रचनात्मक कार्य नै कएलनि परंच अनचोकेमे नवका पीढ़ीकेँ अपन संस्कृतिसँ अवश्य अवगत करा देलखिन। अनचाेेके शब्दक प्रयोग ऐ दुआरे कएलौं किएक तँ बहुत रास गामसँ ई पावनि लुप्त भऽ रहल अछि, शहरमे तँ एकर अस्तित्वक कल्पना करब सेहो असंभव। आन ठाम जकाँ मिथिलामे सेहो पलायनवाद हाबी भऽ गेल छैक। कोनो आवश्यक नै जे पलायनक बाद लोक अपन संस्कृितकेँ दड़भंगिया प्रभावमे झाँपि कऽ राखि सकथि। तँए एहेन पावनिक चर्च आधुनिक पीढ़ी लग आवश्यक। जखन चर्च हएत तँ भऽ सकैछ जे प्रवासी नेनामे ऐ प्रकारक संस्कृतिसँ जुड़ल रहबाक प्रेरणा जागए। मधुश्रावणी वा कोजगराक सदृश सामा चकेबा कोनो जाति विशेषक पावनि नै थिक वरन् ई सम्पूर्ण मिथिलाक प्रतिनिधित्व कएने अछि। साहित्यानुरागी लोकनि ऐ पोथीकेँ रचनात्मक कथा (creative story) नै मानताह ई ध्रुव सत्य, किएक तँ एकर कथा सभ नूतन कल्पना नै भऽ कऽ परम्परागत शैली आ कथाक प्रतिरूप थिक। ऐ दुआरे रचनाकारक आलोचना सेहो संभव अछि। मुदा ई धियान राखब सेहो आवश्यक जे अबोध नेनाकेँ क्लिष्ट साहित्यसँ कोनो सिनेह नै होइछ। आे तँ महाकाव्यक पाँतिसँ बेसी ‘आनी-मूनी हम नै जानी’ सदृश अर्थहीन पाँतिसँ सिनेह रखैत अछि। तेँ चालनि बाढ़नि डेढ़ बितना, जेहन करनी, चारि बटोही, बगियाक गाछ आदि जनश्रुतिसँ संबंधित कथानककेँ बाल मनोविज्ञानसँ संबंधित माननाइ उचित हएत। लेखिका पहिनहि ईमानदारीसँ ई स्वीकार कएने छथि जे बाल कालमे बूढ़-पुरानक मुखसँ जे सुनने छलीह तकरा अपन शब्दमे कथाक रूप दऽ देलखिन। ऐ पोथीक सबल पक्ष अछि कथाक चित्रात्मक विवेचन। मोती साएर, लालबन बाबा, गरीबन बाबा, बिहुला, सीता आ सुग्गा, अयाची मिश्र, पक्षधर मिश्र आ उगना सन कथा चित्रकेँ तैयार करबामे कतेक मेहनति आ समए लागल हेतनि ओ तँ लेखिके कहि सकैत छथि। परंच ई चित्र अपन विविध मूक शैलीमे नेना-भुटकाक संग अवश्य वार्तालाप करत। आलोचनात्मक पक्षसँ जौं देखल जाए तँ एकरा आन भाषा साहित्यक चित्रकथासँ बेसी नै मानल जाएत, मुदा एहेन दीर्घसूत्री आलोचके कऽ सकै छथि। किएक तँ ई कोनो कम्प्यूटरक खेल नै अपन मस्तिष्कमे उपजल बालउद्वोधनक चित्रात्मक शैली थिक जे समालोचनाक भयसँ मुक्त रहैत लेखिका मात्र नेनाक लेल कएने छथि। रंग समंजन सेहो नीक लागल। अंतिम किछु चित्र श्वेत-श्याम रूपेँ देल गेल जइमे नेना स्वयं रंगरोगन कऽ सकैत छथि। ऐ पोथीक कथानक परम्परागत अछि मुदा शैली आ चित्रांकन नव तँए अपन उद्देश्यमे रचनाकार सफल छथि। दुर्बल पक्ष जे चित्रक संग जे किछु कथा देल गेल अछि ओकरा आर विस्तृत कएल जा सकैत छल। जेना मोती साएरसँ लऽ कऽ मीरा साहेब धरिक चित्रकथामे कथानक एकाएक बदलि जाइत अछि। जे सारंश जकाँ लागल, मुदा आशा करैत छी जे नेना सभकेँ नीक लागि रहल होएतनि। (ई पोथी पी.डी.एफ. डाउनलोड लेल लिंक http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi पर सेहो उपलब्ध अछि।) तरेगन वर्त्तमान युगक मानव-जीवन “अर्थनीति”क उक्खड़िमे तेना कऽ कुटा रहल अछि जे गाँधी आ लेनिनक सिद्धान्त मटियामेट भऽ गेल। नीित आ धर्मक गप्प केनिहार लोक अतिवादी आ कर्महीन मानल जाइत छथि। एे भागमभाग भरल जीवनमे “साहित्य” सन शब्द हास्यास्पद जकाँ बुझा रहल अछि। स्वाभाविके छैक, बिनु दाम सभ सुन्न! एे परिस्थितिमे साहित्यिक अवधारणा सेहो बदलि रहल अछि। आब महाकाव्य पढ़निहार लोक बड़ अल्प छथि किएक तँ सबहक जीवनमे समयाभाव छैक। हमहूँ एे गप्पकेँ मध्यकालिक रातिमे लिख रहल छी, किएक तँ दिनमे लिखब तँ खाएब की? एे सभ कारणसँ विहनि कथा आ लघुकविताक अनिवार्यता प्रतीत भऽ रहल अछि। साहित्य समागममे लघुकथाक स्थान बड़ महत्वपूर्ण मानल जाइछ। मैथिलीमे एखन धरि परंपरा जकाँ रहल जे छोट कथा चाहे ओ बिम्बित हुअए वा नै विहनि कथा थिक। किछु साहित्यकार मात्र एे दिशामे संकलन कऽ सकलाह। जइमे मनमोहन झा अग्रगन्य छथि। तारानंद वियोगी जीक विहनि कथा संग्रह “शिलालेख” आ अमरनाथ रचित “क्षणिका” उत्तम श्रेणीक मैथिली विहनि कथा संग्रह अछि। मुदा जौं साहित्यक सकल अवधारणा वा विधाक बिम्बित छायाक चर्च कएल जाए तँ श्री जगदीश प्रसाद मण्डल लिखित विहनि कथा संग्रह “तरेगन” मैथिली साहित्यक प्रथम सम्पूर्ण विहनि कथा मानल जाएत। एे पोथीमे एक सएसँ बेशी विहनि कथा देल अछि। छोट-छोट ताराकेँ मैथिलीमे “तरेगन” कहल जाइत अछि। रातिमे चित भऽ कऽ वसुन्धरापर लेटि स्वतंत्र गगनकेँ दिव्यदर्शन कएलापर तरेगनक समूह सबहक मध्य स्थापित संबंधकेँ देखल जा सकैत छैक। लगैत अछि जे एक तरेगन दोसर तारासँ सटल छैक मुदा विज्ञानक अनुसंधानसँ ई स्पष्ट भऽ सकल जे अकाशक तरेगनक समूहक बीचक दूरी पृथ्वी आ अाकाशक बीचक दूरीसँ बेसी छै। ओहिना एे कथा संग्रहमे लिखित सभटा कथा एक दोसरसँ सटल रहितो एक-दोसरसँ बहुत दूर अछि। न्याय, कर्म, मीमांसा, नीति आ बाल मनोविज्ञान सन बिम्बकेँ अनचोकेमे जगदीशजी एक संग बान्हि देलनि। मैथिलीमे नैतिक शिक्षाक अभावकेँ तरेगन बहुत हद धरि पूर्ण करबाक प्रयास कएलक। मूल रूपसँ ई संग्रह नेना सबहक लेल लिखल गेल अछि मुदा पैघो लोक जौं एे सिद्धान्तक अनुपालन करथि तँ समाजक विगलित मनोवृत्तिक रूपमे परिवर्त्तन अवश्यंभावित अछि। कोनो पोथीक समीक्षात्मक विवरणमे सम्पूर्ण रचनाक चित्रण करब अनिवार्य नै मुदा रचनाक समाजमे प्रभावक दर्शन कराएब वांछित होइत छैक। सम्पूर्ण पोथीक अवलोकन कएलापर एकरा मात्र नेना-भुटकाक कथा संग्रह नै मानल जा सकैछ। कथा -उत्थान पतन- मे नीति शिक्षा नेना भुटकाक संग-संग गृहस्थ धर्मी लोकक लेल प्रेरणादायी लागल। संयम जीवन जीबाक कलासँ धर्म, अर्थ, काम आ मोक्षक अवलंबन सहज होइत अछि। -प्रतिभा- मे डॉ. राममनोहर लोहियाक माध्यमसँ जगदीश जी ज्ञान आ समैक मध्य तारतम्य स्थापित करबाक प्रयास कएलनि। एे कथाकेँ मौलिक रचना (Creative writing) नै मानल जा सकैत अछि, किएत तँ कोनो महापुरूषक जीवन शैलीक चर्च कोनो पोथी पढ़ि कऽ कएल गेल अछि। मुदा नीक लागल जे जगदीश बाबू साम्यवादी प्रवृत्तिक मनुक्ख छथि आ लोहिया समाजवादी छलाह। ओना तँ समाजवादेसँ साम्यवादी धाराक परिकल्पना कएल जा सकैछ, परंच सैद्धान्तिक रूपसँ भारत वर्षमे दुहू राजनैतिक धारामे विलग नीति अछि। अपन अध्ययनशीलतासँ सम्पूर्ण मानव जातिकेँ एकसूत्रमे बान्हबाक जगदीश जी प्रयास कऽ रहल छथि। मर्म कथाक बिम्ब पढ़लासँ स्वामी विवेकानंदक सरल राजयोगक सिद्धान्तक दर्शन होइत अछि। हेलैक कलासँ सांसारिक जीवन जीवाक तुलना, वैभवक कुप्रावक छोट मुदा विशेषार्थ प्रस्तुति नीति अनुपालनमे सफल प्रयास कहल जाए। अज्ञ नीक नै तँ खराब सेहो नै, सर्वज्ञ किओ नै भऽ सकैत अछि बहुज्ञ समाजक पथ प्रदर्शक परंच अल्पज्ञ जकरा देसिल बयनामे “अधखड़ुआ” कहल जाइत अछि ओ समाजक विकासमे बाधक होइत छथि। अंग्रेजी साहित्यक प्रखर हास्य रचनाकार सर एलेक्जेंडर पोप सेहो कहने छथि- little knowledge is a dangerous thing. अर्थात अर्द्धज्ञान बड़ खतरनाक वस्तु होइत छैक। पहिने तप तखन ढलिहेँ- शीर्षक कथामे कुम्हारक आचार्य रूपक आ माटिकेँ शिष्य मानि नैतिक विश्लेषण नीक लागल। नीति-धर्म आ शैक्षणिक दर्शनसँ भरल दोहासँ एे कथाक तुलना अपेक्षित भऽ सकैछ- गुरूवार कुम्हार शिश कुम्ह है, गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट अंतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट। एे प्रसंगमे ज्ञानपीठ पुरस्कारसँ पुरस्कृत हिन्दी साहित्यक प्रांजल कवि श्री नरेश मेहताक कविता -मृत्तिका-क चर्च करब अनुकूल लागल। नरेश जीक रचनाक अनुसार माटि कहैत छथि- हम तँ मात्र माटि छी, जखन अहाँ अपन चरणसँ पददलित करैत छी आ हऽरक फाढ़सँ चीड़ दैत छी तखन हमरामे मातृत्वक बोध होइत अछि आ मातृत्वक प्रेरणा आ संसर्गसँ शस्य श्यामला धन धान्य अन्न हरियरीक रूपेँ संसारकेँ जीवन प्रदान करैत अछि। कर्मपथपर क्रियाशील मनुक्खक लेल कालक आ प्रहरक कोनो बान्ह नै होइत छैक। -जखने जागी तखने परात- शीर्षक लघुकथामे डॉ. क्रोनिनक जीवन दर्शनक माध्यमसँ रचनाकार नेना-भुटकामे काकचेष्टा आ श्वान निद्राक झाँपल दर्शन करएबाक लेल आतुर छथि। जे व्यक्ति सत्य कर्मी होइत छथि ओ सदिखन सत्यकेँ जितएबाक लेल प्रयास करैत छथि। महाभारतक कथाक गर्भसँ एहेन कालजयी बिम्बकेँ निकालि कऽ -उग्रधारा- कथाक रूप देबाक कलासँ जगदीश जीकेँ हंस मानल जा सकैत अछि। जेना हंस नीर दुग्ध मिश्रणमे सँ क्षीरकेँ सोंटि लैत अछि आ नीर पात्रेमे रहि जाइछ ठीक ओहिना महाभारतक सम्पूर्ण कथा बिम्बकेँ नीर, अमिय आ मधु मानल नै जा सकैत अछि। अर्जुनकेँ विजयी बनएबाक लेल श्रीकृष्ण अपन पाँजरपर हनुमानक अगम देह भारकेँ रोकि “भारत”केँ विजयी बनौलनि। ई कथा छात्रक संग-संग शिक्षकक लेल अनुकरणीय अछि। व्यवहारिक, समर्पण, देवता, पाप आ पुण्य शीर्षक कथामे उदयनाचार्यक न्याय कुसुमांजलिक क्षणिक स्पर्शक अनुभव बुझना गेल। अढ़ाइ आखरक शब्द प्रेमक रूप वास्तविक जीवनमे अर्थनीतिक आहिमे अप्रासंगिक भऽ गेल हुअए मुदा रचनामे एखन धरि जीवित अछि। हिन्दी साहित्यमे प्रेमचन्द्र रचित कथा ईदगाह, नागार्जुन रचित कविता गुलाबी चूड़ियाँ आ माखनलाल चतुर्वेदी रचित कविता प्रेमकेँ पढ़ि कऽ तिरपित होइत तँ छलौं परंच हरिवंश राय बच्चन जीक आ रही रवि की सवारी अंतिम पद्य मोन पड़िते क्षणहिंमे अकुला जाइत छलौं जे हिन्दी विजयी भऽ रहल छथि सूर्यक समान मुदा मैथिली उषाकालक चन्द्रमा सन झँपा रहलीह। जगदीश जीक प्रेम पढ़ि गुमानक अनुभव भऽ रहल अछि जे हमरा सभक भाषामे एे बिम्बपर जे कथा लिखल गेल अछि ओ कतऽ कतऽ आन भाषामे भेटत, हेरबाक चाही? ओना ई कथा मौलिक रचना नै भऽ कऽ अंग्रजीक प्रख्यात लेखक ओ. हेनरीक एकटा कथापर आधारित अछि। श्रमक सम्मान तखन भऽ सकैत अछि जखन श्रमजीवी सम्मानित कएल जाथि। वंश, तियाग, सद्विचार, साहस, बरदास्त, भूल, धैर्य, मनुष्यक मूल्य, मेहनतक दरद सन भाववाचक संज्ञाक दर्शन मात्र दार्शनिके कऽ सकैत छथि मुदा एे पोथीमे पाठक सेहो ई देख सकैत छथि। एकाग्रता छात्र जीवनक धरोहरि होइत अछि। भाषण तँ सभ केओ दऽ सकैत छथि मुदा पाँच पाँति लिखबाक कला कतेक लोकमे छन्हि। हमरा विश्वास अछि जे एकाग्रचित बिम्बकेँ रचनाकार पढ़थु, मतिभ्रम दूर भऽ जेतनि। अनुभव, सौन्दर्य, धर्म, आत्मबल सन मौन विषएकेँ कथाक रूपमे बिम्बित करब असंभव तँ नै मुदा अाश्चर्यजनक। समाजमे क्रांतिक दीप प्रज्वलित करबाक लेल नेना-भुटकामे क्रांतिदीप जराएब आवश्यक अछि। एे लेल समाजक कुप्रथाक गर्भावलोकन करएबाक प्रयास प्रासंगिक मुदा कतेक रचनाकार मैथिली साहित्यमे ई काज कएलनि। विधवा विवाह, देश सेवाक व्रत, नारीक सम्मान, सादा जीवन, पत्नीक अधिकार, जाति नै पानि शीर्षक कथा सभकेँ बाल मनोविज्ञानक मौलिक कथा मानल जाए। निष्कर्षत: जीवनकेँ जीवन्त बनएबाक लेल जतेक प्रकारक तारत्म्य होएबाक चाही जगदीश जी ओइ सभ बिम्बकेँ बिम्बित कएलनि। एे पोथीमे दर्शनक सभ विधाक सरल भाषामे चित्रण केलनि। खटकल तँ मात्र एक अर्थमे जे बाल मनोविज्ञानक विकास करबाक लेल जे सरस विश्लेषण होएबाक चाही ओ एे पोथीमे नै देल गेल। गरीबक दीनतामे हास्यक समागम सेहो होइत अछि। बाल साहित्यमे दर्शनक विश्लेषणमे कतौ-कतौ रीति आ प्रीतिकेँ हास्य रससँ बोरबाक चाही। पंडित हरिमोहन झा तँ विहनि कथा नै लिखलनि मुदा हुनक जे गद्य साहित्य उपलब्ध अछि ओइ सभमे दर्शनक बिम्बपर हास्य आ श्रंृगारक माखन चढ़ल भेटैत अछि। जगदीश जीक रचना तँ अनुशासित होइत छन्हि मुदा तरेगन मे बाल मनोविज्ञानक सरल प्रस्तुति करितो कनेक चूकि गेल छथि। एक अर्थमे ई पोथी मैथिली साहित्यक लेल पथ प्रदर्शक पोथी अछि, तँए जगदीश बाबू प्रशंसाक पात्र छथि। सम्पूर्ण पोथीक अर्न्तदर्शनक लेल योग्य आचार्यक, जिनकामे अनुशासनक संग-संग संतुलित अनुशीलन हुअए, अनिवार्यता प्रतीत होइत अछि। निष्कर्ष रूपेँ मैथिली भाषा-साहित्यमे तरेगन केँ बेछप्प नैतिक शिक्षाप्रद रचना मानल जाए। बालकथाक वास्तविक रूप अछि जे रचनाकारकेँ प्रश्नसँ बेसी समाधानपर धियान देबाक चाही। एे पोथीमे सभसँ नीक लागल जे रचनाकार प्रश्न ठाढ़े नै कएलनि। पोथीक नाओं- तरेगन विधा- बाल प्रेरक कथा संग्रह रचनाकार- जगदीश प्रसाद मण्डल प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन, दिल्ली पाेथी प्रप्ति स्थान- पल्लवी डिस्ट्रीब्यूटर्स, िनर्मली (सुपौल) प्रकाशन वर्ष- २०१० दाम- १००टाका मात्र (ई पोथी पी.डी.एफ. डाउनलोड लेल लिंक http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi पर सेहो उपलब्ध अछि।) डॉ. शेफालिका वर्मा आनक बड़ाइ भटकैत भुटकैत एकटा बड पुरान शिष्य अपन गुरु लग पहुँचल। गुरु अपन शिष्यकेँ देखि आह्लादित भऽ उठलाह... -की हाल छै शिष्य सुन्दरम? जीवन केना बीति रहल अछि अहाँक? -हम तँ बड अभागल छी महराज... कलपैत शिष्य बाजल। -की भेल? अहाँ तँ ज्ञानक पोटरी लऽ कऽ ऐठामसँ गेल छी। -हम जइ वस्तुक कामना करै छी वएह हमरासँ दूर भऽ जाइत अछि, नै तँ हम अर्थोपार्जन केलौं आ नै तँ जीवनक कोनो सुख भोगलौं..... स्नेह भरल स्वरे गुरु बजलाह- अहाँ पहिने देबा लेल सिखू, तखन लेबाक लेल सोचब.. -हम की देब भगवन! हमरा अछिए की? नै तँ धन दौलत, नै तँ घर-गाड़ी, नै कपड़ा लत्ता। देब तँ की देब?, निराश स्वर छल। -अहाँ लग बहुत किछु अछि। अहाँ चाही तँ लोककेँ बहुत किछु दऽ सकैत छी। चौंकि उठल शिष्य- की अछि जे दऽ सकै छी हम? -अहाँकेँ भगवान सुन्दर बोली देने छथि, अहाँ चाही तँ ओकर उपयोगसँ लोकक तारीफ कऽ सकै छी, दोसर केर बड़ाइ कऽ ओकर हृदैमे ख़ुशी भरि सकै छी, मुदा अहाँ तँ एतेक दरिद्र छी जे जइमे एको पाइ नै खर्च होइत अछि, ओहो नै कऽ सकै छी। आदमीकेँ कंजूस नै हेबाक चाही, भगवान जे देने छथि ओकरा जतेक बाँटब ओतेक बढ़त.. ककरो बड़ाइ करब तँ अहाँकेँ अपने सम्पन्नताक भान हएत, मोनमे उदारताक भाव रहत। अहाँ लग वाणीक धन अछि, हृदएकेँ विशाल बनाउ। एक बात जानि लिअ, ककरो बड़ाइ केनेसँ ओ पैघ नै होइत छै, वरन बड़ाइ करए बला, लोकक दृष्टिमे पैघ भऽ जाइत अछि। अहाँ खाली पएबा लेल जनैत छी तँए दुखी रहैत छी। जे दैत छथि ओ देवता छथि आ देवता कहियो अभावग्रस्त नै रहैत छथि। शिष्य गुरुक पएरपर खसि पड़ल। साबरमती आश्रम साबरमती आश्रमक प्रांगनमे विस्मय विमुग्ध मृगी सन हम ठाढ़ छलौं। ओइठामक कण-कणमे एकटा संतक साँस प्राणवंत छल। ई आश्रम कतेक दिन धरि बापूक कर्मस्थली बनल रहल, सघन आबादी आ चिनगी सबहक उद्योगी धुइयाँसँ प्रदूषित औद्योगिक नगर अहमदाबादकेँ दुइ भागमे विभक्त करएवाली साबरमती नदीक तटपर ई आश्रम अवस्थित अछि। साबरमती नदी आश्रम सँ लटपटाएल करघनी जकाँ लागैत अछि, जखन गाँधी जी डरबन (दक्षिण अफ्रीका) मे टोलस्टाय आश्रम लेल प्रयत्नरत छलाह तखने हुनक मोन मानसमे भारतमे एहेन आश्रमक स्थापनाक चित्र आकार लऽ नेने छल। भारत घुरलाक उपरांत समाज सेवी जीवनलाल देसाई हुनक ऐ सपनाकेँ साकार करबा लेल आत्मिक सहयोग देलनि। अहमदाबाद लग कोचरबमे बनल अपन मकान हुनका सुपुर्द कऽ देलनि। एवं प्रकारे २५ मइ १९१५मे सत्याग्रह आश्रम बनल, किन्तु एकर दुइ बरिस उपरांत जुलाइ १९१७ मे सत्याग्रह आश्रम साबरमतीक तटपर स्थानांतरित भऽ गेल। ई आश्रम ऐतिहासिक दांडी-यात्राक साक्षात् गवाह अछि जे २०० बरिससँ बेसीक अंग्रेजी शासनकेँ झकझोरि देलक। “ह्रदय कुञ्ज” ऐ आश्रमक प्रेरणास्थल अछि। ऐठाम गाँधी जी दलित वर्गकेँ पहिलुक बेर हरिजन कहि आत्मिक संबोधन देलनि। बापू आ बा एे कुंजमे लगभग १२ बरिस धरि संग रहलाह। बापूक कोठरीमे हुनक अपन चरखा, छोट सन मे, तीन बानर आ एकटा छोट घड़ी सभ स्मृतिक संग अवस्थित छल। लागले बा क कोठरीमे कलम, ताम्रपत्र, खडाऊँ, चश्मा, मथनी आदि राखल छल। बापू अपना हाथसँ खादीक वस्त्र बनाए आश्रममे रहैबला हरिजनकेँ दैत छलाह। आश्रममे बनल वीथिका संग्रहालय, पुस्तकालयसँ गाँधीजीक आत्मा, हुनक वैचारिक व्यक्तित्वकेँ उजागर करैत छल। ठाम-ठामपर बापूक जीवनयात्रा, कार्य शैली आ अन्य घटना सबहक सजीव फोटो आ फोटो-कृति सभ राखल छल। विश्वक कोना-कोनासँ आएल बापूक नाओं केर पत्र कत्तौ-कत्तौ देवारपर टांगल छल। गाँधी जीक संग आरंभसँ अंत धरि रहएबला हुनक पितियौत भाइ “मगन भाई”क आवास सेहो बगलमे छल। गांधीक विचारसँ अनुप्राणित बिनोबा भावेक कुटिया सेहो जगजगार छल। साँझक सुरम्य बेलामे प्राकृतिक सुषमाक मध्य सोंग्स एंड ड्रामा डिवीजन दिसिसँ गाँधीक समस्त जीवन देखौल गेल। हम सभ अभिभूत भऽ गेलौं.. साबरमती के संत तँू ने कर दिया कमाल... स्वतंत्रता संग्रामक कार्यस्थली साबरमती आश्रम ऐ लेल महत्वपूर्ण आ प्रेरणास्पद अछि जे अहिंसाक पुजारी बापू अपन वैचारिक क्रांतिक उद्घोष ऐठामसँ केने छलाह। “वैष्णव जन तो तेने कहिये..” बापूक प्रिय भजन सँ अनुगुंजित आश्रमक वातावरण मोन प्राणकेँ उद्वेलित कऽ देने छल। मूर्ख राजा आ ओकर बेटा एकटा राजा छल। ओकरा चारि टा बेटा छल। चारू राजकुमार बच्चेसँ महलमे पालल पोसल गेल छल। जखन चारू पैघ भऽ गेल तँ हुनका मोनमे चहारदीवारीक बाहर देखबाक हिलस उठलै। चारू भाई आपसमे सलाह मोस्विरा कए राजा लग पहुँचल- पिता जी, हम चारू भाइ राजमहलक बाहरक दुनियाँ देखऽ चाहैत छी। जौं अपनेक आज्ञा हुअए तँ हम सभ बाहर जा कऽ घूमि आबी। राजा बजलाह- हँ हँ, किए नै। हम सभ व्यवस्था कऽ दैत छी। सैनिक सभ अहाँक संग जाएत, घूमि लिअ, जतए मोन होइत अछि| -नै पिताश्री। हम सभ आम लोग जकाँ जेबा लेल चाहैत छी। अपन पहिचान ककरो नै बताएब। राजा मानि गेलाह। ठीक छैक, जे अहाँ सभकेँ नीक लागए। चारू राजकुमार अपन भेष बदलि, साधारण लोक जकाँ महलसँ बाहर निकललाह.. बाहर पएर राखितहि जेना हुनक मन मस्त भऽ गेल। कनिक काल ठाढ़ भऽ खुलल वातावरणमे साँस लेलनि, एक दोसराक मुँह देखि खुश भऽ गेलथि जेना मुक्तिक स्वाद पहिलुक बेर भेटल हुअए। नहु-नहु पएर राखैत आगू बढ़ैत गेलाह। एकटा चाहक दोकान देखि बैसि रहलाह आेइठामक बेंचपर। गरम गरम सिंघाड़ा, जिलेबी देखि जीहमे पानि आबि गेलै। ई की थीक? छोड़ू ने, जे हुअए, खेबाक बाद सोचब जे की छल। भरि भरि प्लेट सिंघाड़ा-जिलेबी चारू भाइ दबेलक। हुनक अंतरात्मा तृप्त भऽ गेल। ओह, नोकर चाकर जे दैत छल सोना चानीक थारीमे पकवान सभ, ओइमे ई स्वाद कतऽ? चारू भाइ घुमैत रहलाह, तरह तरहक लोक, तरह तरहक रहन सहन देखैत चकित होइत रहलाह। एक बेर घुमैत घुमैत एकटा गाममे पहुँचलाह। चारू दिस माइटक घर, छोट छोट। भूखल पिआसल नंग धड़ंग नेना सभ। ओ सभ सोचए लगलाह, ई कोन दुनियाँ थीक, सभटा झबरल माथ, आँखिमे काँची-पीची, बिमारियाह लोक सभ, पेट पीठ दुनू सटल, जेना कतेक दिनसँ अन्नक दाना नै देखने हुअए कियो| ओ सभ विचित्र दृष्टिसँ देखैत छल, दीनतासँ भरल आँखि देखि चारू भाँइक दिल पसीज गेलै। अपन बटुआसँ किछु सिक्का निकालि ओकरा सभमे बाँटि देलक। चारू ख़ुशी ख़ुशी विदा भऽ गेलाह। किन्तु विधना ककर भाग्यमे की लिख देने छै से कियो नै जनै छै। कनिए दूर आगू बढ़लाह तँ एतेक जोरसँ अन्धर तूफान, बर्खा होबऽ लागल जे सुनसानमे डरि गेलाह। पानिमे भिजैत-तितैत डेगे-डेगे एक दोसर केर हाथ पकड़ने आगू बढ़ैत रहलाह। कनिक दूरपर एकटा माटिक भीतबला कोनो घर देखा पड़लै। चारू ओइ भीतक आड़मे ठाढ़ भऽ गेलाह, मुदा ओ माइटक भीत अरड़ा कऽ खसि पड़ल। दुर्भाग्यसँ एकटा राजकुमार भीत तर पिचा कऽ मरि गेल। आब तँ तीनू भाइ डरसँ थरथरा गेल। जेम्हरे बाट भेटलै ओम्हरे पड़ाए लगलाह। गहन जंगलमे भोतिआए गेलाह आकि ओइ अन्हारमे किम्हर दनसँ एकटा भैंसा आबि गेल, ई सभ कहियो भैंसा नै देखने छलाह, एक तँ एकटा भाइक मृत्यु, तइपर संकटे संकट। ओ भैंसा आबि अपन सिंघसँ एकटा भाइक पेट फाड़ि देलक। ओ तत्क्षण मृत्युकेँ प्राप्त भऽ गेलाह। आब तँ दुनू भाँइ ले लंक भागला। भैंसा एकरा सभ दिसि दौगल। ई दुनू भाँइ जान प्राण नेने भागल, पाछू-पाछू भैंसा। सामने एकटा नदी तीव्र गतिसँ बहि रहल छल। दुनू भाँइ जान बचेबा लेल ओइमे कूदि गेल। मुदा नदीक वेगमे एकटा भाइ कतऽ सँ कतऽ बहि गेल। एकटा राजकुमार असगर बचि गेलाह। दुइ मास बीति गेल छल, पितासँ तीन मासक करार लऽ कऽ आएल छलाह। किन्तु दुइये मासमे एतेक प्रहार विधाताक भऽ गेल, के जनैत छल। बचल असगर राजकुमार दुनियाँक जंगलमे भोतिआए गेल, कोहुना भटकैत, हकासल, पिआसल अपन राजभवन पहुँचल। राजा ओकर ई हाल देखि चौंकि गेल। -कहू बेटा, दुनियाँक केहेन रीति। शोकाकुल बेटा बाजल- एक पिचाएल भीत राजा- बाँचल छल ने पैसा। बेटा- एककेँ मारलक भैंसा। राजा- आहा, आहा, आह। बेटा- एकटा नदीमे बह। राजा- धुर्र। बेटा- (मुड़ी नुघरोने) एक आएल घुरि। देश-प्रेम ई कथा ओइ कालक थीक, जखन रूस आ जापानमे युद्ध चलि रहल छलै। एकटा किलापर रुसी सैनिकक अधिकार छल, किलाक चारू कात बेस गहींर खाधि छल आ ओइमे पानि भरल। खाधिक उपरका पुल रुसी सभ तोड़ि देने छल। किलामे रुसी सैनिकक संख्या बड कम छल। खाधिकेँ पार केने बिना जापानी सैनिक किलापर अधिकार नै कऽ सकैत छल आ ओकरा लग पुल बनेबाक कोनो साधन नै छलै। ओकरा सभकेँ भए होइत छल जे अगिला दिन रुसी सेना आेइठाम आबि जाएत। सेनापति घबड़ाय गेल। कनिक काल सोचबाक उपरान्त ओ सैनिक सभसँ बाजल- ऐ खाधिकेँ मानव शरीरसँ पाटबाक अतिरिक्त आर कोनो उपाय नै अछि। जापानक प्रसन्नता लेल जे अपन जीवन उत्सर्ग करबा लेल चाहैत छी ओ दुइ डेग आगू आबि जाउ। समस्त सेना आगू बढ़ि गेल। एको सैनिक एहेन नै छल जे प्राण देबासँ पाछू हटल होथि। सेनापति संख्या गिनती करबाबए लेल बाजल। तकर बाद ओ आज्ञा देलक जे प्रति पाँचम सैनिक अपन वस्त्र उतारि, हथियार फेकि खाधिमे कूदी जाथि। अपन देश-प्रेममे बताह भेल जापानी सैनिक सभ एकक ऊपर एक कूदऽ लागल। पानिसँ भरल सउँसे खाधि सैनिक सबहक शरीरसँ पाटि पुल बनि गेल। किलापर जापानक आधिपत्य भऽ गेल। सभ नेनाकेँ ऐ कथासँ देशप्रेमक शिक्षा लेबक चाही। अपन राष्ट्रक रक्षा लेल अपन प्राणक चिंता नै करबाक चाही। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। माता आ मातृभूमिसँ बढ़ि किछु नै। प्रीति ठाकुरक गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा प्रत्येक भाषामे किछु एहेन रचनाकार होइत छथि, महिला आकि पुरुष-वर्ग, अपन विलक्षण प्रतिभाक कारण सभसँ फराक बुझा पडै़त छथि। ई दोसर बात थिक जे आलोचक वर्ग महिला लेखनकेँ इतिहासक पन्नाक एकटा कोनमे दऽ दैत छथि। किछु भाग्यशाली लेखिकाकेँ किछु स्थानो भेट जाइत छैक, मुदा समग्रतामे नै। लेखनमे महिला पुरुष नै होइत छैक, जइ विषएपर लेखक लिखैत छथि आेइपर लेखिका सेहो लिखैत छथि, कखनो बेसी नीक। बस आब एकेटा प्रतीक्षा अछि जे कोनो सशक्त महिला आलोचककेँ देखी, जे महिला नै भऽ मात्र आलोचक रहथि, पूर्वाग्रहसँ रहित नीक आलोचनाकेँ जन्म दैत। मैथिली साहित्यक इतिहासमे चारि चान लगाबथि, हम जनैत छी एहेन विद्वान लेखिकाक कमी नै अछि। आइ प्रीति ठाकुरक चित्रकथा गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा पोथी देखि चमत्कृत भऽ गेलौं। पहिने तँ हम एकरा मैथिलीक नेना भुटका लेल कोमिक्स बुझलौं मुदा पढ़ए लगलौं तँ एकरामे डूबि गेलौं। गागरमे सागर...। अद्भुत.. मैथिली लोकगाथाक विपुल संसारकेँ शिवक जटाजूट जकाँ कोना समेटि लेने छथि, ई पढ़ला उपरान्ते बुझा पड़त। कतेक कथाक खाली नाओं सुनने छलौं, ओ सभ ऐ पोथीमे साकार छल। जहिना आजुक समाज अकबर बीरबलकेँ बिसरि रहल अछि, ओहिना गोनू झाकेँ। प्रस्तुत पोथीक माध्यमसँ पाठक अपन समाजक सभ वर्गक आदर्शकेँ चीन्हि सकैत छथि। प्रीति जीकेँ अशेष शुभकामना एतेक सुन्दर पोथी लेल, प्रीतिजी आ गजेन्द्रजी सँ हम एकटा आग्रह करबनि जे कोसी नदी लेल बड़ खिस्सा कथा समाजमे पसरल छैक, ओकरो चित्रकलामे समेटि लैथि। कोसी नदीक रहस्यमय चरित्र, सिंघेश्वर बाबासँ बियाह आदि, आदि खिस्सा सभ.....जहिना समाजक प्रत्येक क्षेत्रमे नारी आइ निरंतर आगू बढ़ि रहल छथि, ओहिना मैथिली मिथिलाक विकासमे आजुक नारी अपन अपन स्तरसँ अमूल्य योगदान दऽ रहल छथि। अशेष साधुवाद, प्रीतिजी, असंख्य शुभाशंसा...। बाल दिवस प्रत्येक साल हम सभ १४ नवम्बरकेँ बाल दिवसक नामसँ मनबैत छी। ऐमे कोनो संदेह नै जे अहाँ सभ जनैत छी जे चाचा नेहरुक जन्म दिवसकेँ ई नाओं देल गेल। पंडित जवाहर लाल नेहरु हमर स्वतंत्र राष्ट्र केर प्रथम प्रधान मंत्री छलाह, नेना सभसँ एतेक प्रेम छलनि जे बच्चा सभ हुनका चाचा नेहरु कहऽ लगलाह। ओ कहैत छलाह "नेनागण, हमरा अहाँ सभसँ गप करबामे, अहाँ सभ संग खेलबामे नीक लागैत अछि। कनी काल लेल हम बिसरि जाइत छी जे हम वृद्ध भऽ गेल छी, हमर बाल्यकाल हमरासँ हजारो, लाखो कोस दूर चलि गेल अछि। बुढ़ पुरानकेँ देखैत छी जे नवतुरियाकेँ सीख देबामे हुनकापर अपन सलाह लादबाक अभ्यस्त भऽ जाइत छथि। हमहूँ जखन नेना छलौं तँए ई सभ उपदेश कनिको नीक नै लागैत छल। मुदा आब सोचैत छी तँ हुनक कहल कतेक गप जे तखन अनसोहाँत लागैत छल, आइ अनजानहि हमर संस्कार बनि गेल.." बाल्यकालेसँ नेहरु जीकेँ विज्ञानमे बड़ रूचि छलनि। जखन ओ स्कूलमे पढ़ैत छलाह तखनेसँ हुनका विज्ञानक प्रति बहुत अभिरुचि छलनि। एक बेर ओ टेलिस्कोपक विषयमे कत्तौ पढ़ने छलाह। हुनक मोनमे जिज्ञासा उठलनि, आखिर कोना बनैत अछि ई ? ओ अपन घरेमे दूरबीन बनेबाक प्रयत्न करऽ लागलथि, मुदा बिना केकरो मदतिक। अथाह बूझि पड़ैत छलनि। बड सोच विचार कएलाक उपरांत नेहरु अपन शिक्षक मिस्टर ब्रुक्ससँ सलाह केलनि। -अहाँकेँ दूरबीनक कोन आवश्यकता पड़ि गेल?, अचंभित भऽ ब्रुक्स पुछलनि- अहाँ तँ स्कूलोमे एकर उपयोग कऽ सकैत छी। -सर, हम अपना लेल स्वयं अपन टेलिस्कोप बनाबऽ चाहैत छी। हम अपन घरसँ समस्त ब्रह्माण्ड देखए चाहैत छी। जवाहरक मोनमे बहुत उत्साह छल। ब्रुक्स नेहरुक रूचि विज्ञानमे देखि बहुत हर्षित भऽ गेलाह। ओ सभ समानक जुगाड़ करए लागलथि। सभ समान जखन जमा भऽ गेल तँ नेहरु ख़ुशीसँ हुमचइ छलाह। -सर, आब तँ सभटा जोगाड़ भऽ गेल। आब काज शुरू करी? -हँ, हँ। किए नै?, आ तकर बाद गुरु शिष्यक सहयोगसँ दूरबीन तैयार भऽ गेल। जइ शिष्यक जइ दिस रूचि रहैत छैक गुरु निश्चय रुपेँ ओकरा आगू बढ़बै छथि। जवान बालक अपन बनाओल दूरबीनसँ सौंसे ब्रह्माण्डकेँ अपना लग देखि ख़ुशीसँ भरि उठल। विज्ञानक प्रति हुनक रूचि दिनों-दिन बढ़ैत गेल। जखन ओ भारतक प्रधान मंत्री बनलाह तँ कहलथि- खाली वैज्ञानिक तरीकासँ हम सभ भारत केर विकास कऽ सकैत छी। ओ सभ दिन विज्ञान आ टेक्नोलोजीकेँ प्रोत्साहित करैत रहलाह। विज्ञानक प्रति हुनक स्पष्ट विचार देशवासीक सम्मुख खुजि गेल। ऐ विषयक पढ़ाइ देशक कोन-कोनकेँ उत्साहित कऽ देलक। हुनक कहब छल, -विज्ञान हमरा सभकेँ अन्धविश्वाससँ दूर लऽ जाइत अछि। प्रत्येक कार्यक प्रयोजन देखबैत अछि। बिना कारण कोनो काज नै होइत छै। मुदा ओ चाहैत छलाह जे विज्ञान ध्वंसक कारण नै बनए वरन नव निर्माणक नवल सूरज बनए। तैं कोनो तरहक तोड़-फोड़ कए अपन देशक छविकेँ हम सभ धुमिल नै करी। कोनो राष्ट्र मात्र नदी-नाला, वन पर्वत, अरण्यसँ सुन्दर नै बनैत छैक मुदा देशकेँ सुन्दर बनेबा लेल एहेन नागरिक केर आवश्यकता होइत अछि जे परस्पर सिनेह, समता आ सौहार्द्रमे पलल हुअए। अर्चना कुमर विद्वान (दादीसँ सुनल कथाक पुनर्लेखन) एक विद्वान पंडित रहथिन। मुदा ओ बड्ड गरीब रहथिन। तइ कारण हुनका हुनकर पत्नी सदिखन कहथिन- कतौ जाउ कमाइले। किछु करू। बच्चा सभ भूखे मरैए। कृपा कऽ कऽ किछु तँ करू जे दू वक्तक भोजन नसीब हुअए। तँ ओ पत्नीकेँ कहथिन जे हम एतेक पैघ विद्वान छी जे विद्वता लेल पैसा कियो दैये नै सकत। तैयो अहाँ कहै छी तँ हम जाइ छी। आर ओ एक पाँती लिख लेलखिन आ बजार जाए ओइ पाँतिक चारि लाख दाम लगा देलखिन। ओइ पाँतिक चारि लाख टका दाम देखि सभ अचम्भित भऽ जाइत रहथिन आ कियो नै किनथिन। एकटा व्यापारी रहथिन। ओ सोचलखिन जे किछु तँ बात अछि ऐ पाँतीमे जे एकर चारि लाख टाका दाम छै, से नै, ई हम लऽ लै छी। आ ओ चारि लाख टाका दऽ कऽ ओ पाँती कीनि लेलखिन, आ अपन तलवारपर खोदबा लेलखिन। ओ शब्द रहए। आसनम प्रभु चालन। फेर ओ अपना व्यापार करैले निकललखिन। हुनका लग ढेरिक पैसा-कौड़ी सभ रहनि। एक जगह राति हुअए लागल तँ सोचलखिन, अपना दोस्त आेइठाम रहि जाएब। दोस्त लग गेलखिन तँ बात-बातमे दोस्तकेँ पता लागि गेल जे हिनका जिम्मा ढेरिक पैसा छन्हि। भोर भेल, हिनकर दोस्त अपना पत्नीकेँ बतेलखिन जे दोस्त लग ढेरिक पैसा छै। फेर दुनू मिलि कऽ हुनका मारैक सोचलखिन आर अंगनामे बड़का तरहरा खुनि लेलखिन, आर बिना घोरल खाट ऐपर बिछा, नीकसँ ओछैन कऽ देलखिन, आ अपना दोस्तकेँ बजेलखिन जे चलू खाइले। आइ अंगनेमे भोजन लागल अइ। ई गेलखिन खाइले अंगना, जहिना खटियापर बैसए लागलखिन तहिना हुनकर नजरि तलवारपर पड़लनि। ओइमे लिखल रहै- आसनम प्रभु चालन। माने कतौ बैसी तँ बिछौन कनी झाड़ि ली। ओ बिछौनकेँ जहिना झाड़लखिन तहिना अंदर देखि दंग रहि गेलखिन आ सोचलखिन हमर मौक्षक पूरा इन्तजाम भेल रहए। जे आइ ई शब्द नै पढ़ने रहितौं तँ आइ हम ऊपर पहुँचि गेल रहितौं। से नै तँ पंडितकेँ एक लाख आर हम देब। आर ओत्तऽ सँ ई कहि कऽ भागि गेलखिन जे हम पैखानासँ आबै छी। मुन्नाजी पथ दर्शन अहाँकेँ एतेक मना केलौं, परञ्च नहिये मानब अहाँ, तँ जाउ। मुदा रौद बड़ करगर छै, बचिये कऽ रहब। भइया आइ विभिन्न प्रकारक सांस्कृतिक कार्यक्रम छै स्कूलमे। हँ, उद्घाटन सत्र तँ बेजोड़ हेतै, की कहू एगदम धमगिजर, अहूँ एबै ने भइया? हम मौन रहि गेल रही। मुदा लाउडिस्पीकरक अवाज, अोइपर विभिन्न वाद्ययंत्रक पेँ...पोँ... आ शिक्षा मंत्रीक भाषण, हमर सबुरक बान्ह तोड़ि देलक। विदा भेलौं स्कुल दिस...। विद्यालयक प्राङ्गणमे पएर रखिते हमर शरीर थरथरा उठल। कानमे पड़ल नेना सबहक समवेत स्वरसँ...आवारा हूँ...आवारा हूँ। चोट्टहि घुरि एलौं घर। मोनमे उकस पाकस होमए लागल- “की ईएह थिकैक आइ-काल्हिक स्कूली सांस्कृतिक कार्यक्रम। आ गुरुजी दैत छथिन्ह एहने शिक्षा?” वाह रे भविष्य। दोसर दिन गुरुजीकेँ शिकाइत केलापर उतारा भेटल- जे बच्चा जेहेन धरनदार रहै छै तेहने तैयारियो रहै छै। आ अहाँ सभ की करै छिऐ? “हम सभ तँ मात्र रस्ता देखबैत छिऐ आगाँ बढ़बाक लेल”। पवनकान्त झा (काश्यप कमल) बाबूक सुनाएल खिस्सा सहस्रमुखक दीप एक टा राजा छलाह। ओ अपन प्रजाक बड नीक जेकाँ ध्यान रखैत छलाह। राजा साहेब रोज राति कऽ भेष बदलि कऽ अपन राज्यमे घुमैत छलाह। एक राति राजा घुमैत छलाह तँ देखलखिन जे एकटा गरीब आदमी घूर तपैत रहै, तखने ओकर पत्नी आबि कऽ कहलकै.. चलू भोजन कऽ लिअ। पति पुछलकै- पैंचा लगेलौं? पत्नी कहलखिन- हँ। पति पुछलकै-–पैंचा सधेलौं? पत्नी कहलखिन- हँ। पति कहलकै-–तँ चलू, सहस्रमुखक दीप जराउ गऽ, हम अबैत छी। पत्नी चलि गेलीह। राजा नुका कऽ सभटा गप्प सुनैत रहथि। राजा सोचलन्हि जे ई गरीब आदमी पैंचा लगबैतो अछि, पैंचा सधैबतो अछि आ सहस्रमुखक दीप बारि कऽ खाइत अछि। हम राजा छी से एक-दू नै तँ पाँच मुखक दीप जरबैत छी आ ई सहस्रमुखक दीप जरबैत अछि आ ई सभ दिन पैंचा लगबैत-सधबैत अछि। एकरा एतेक धन कतएसँ अबैत छैक? अवश्य ई कतौ चोरि करैत हएत। एकरा सजा भेटबाक चाही। भोरे राजा दरबारमे ओइ आदमीकेँ बजेलन्हि। दरबारमे राजा ओकरा पुछलखिन्ह- तोँ कोन काज करैत छेँ? ओ कहलकन्हि- महाराज, हम मजदूरी करैत छी। राजा बजलाह- तोँ झूठ बजैत छेँ। ओ कहलकन्हि- नै महाराज, हम झूठ नै बजैत छी। राजा तमसा कऽ पुछलखिन्ह- तहन तोरा रोज कतऽ सँ पैंचा लगबैत आ सधबैत छेँ? सहस्रमुखक दीप बारि कऽ भोजन कतए सँ करैत छेँ? ओ मजदूर विनती कऽ कऽ पुछलकन्हि तँ राजा रातुक सभ वृत्तान्त कहलथिन्ह। ओ मजदूर हँसए लागल आ बाजल- महाराज, हम सभ मजदूरी कऽ कऽ गुजर करैत छी तैयो अपन संस्कारसँ हटि नै सकलौं। राति जे हम अपन पत्नीसँ कहलिऐ से पैंचा लगेबाक अर्थ भेलै जे – हमर दू टा छोट धिया-पूता अछि तकरा भोजन करेनाइ आ पैंचा सधेबाक माने भेलै जे बूढ़ माए-बापकेँ भोजन करेनाइ। हमर घरवाली जखन कहलक हँ, तकर बाद हम कहलिऐ सहस्रमुखक दीप जरबै लेल। सरकार, हमरा सभकेँ लालटेम-डिबिया कतएसँ एतै? हम सभ तँ एक मुट्ठी पुआर जरा कऽ ओकरे इजोतमे खा लैत छी। हमरा सभ लेल वएह सहस्रमुखक दीप भेलै। सभ दरबारी ओकर जय-जयकार केलक आ राजा ओकरा बहुते रास इनाम देलखिन्ह। गप्पक अर्थ एक बेर एकटा राज दरबारमे नाच होइत रहै, ताइ दिन नाच भरि रातुक होइ, ब्रह्ममुहुर्त सँ कनी पहिने नटुआकेँ औंघी लागि गेलै, ई देखि नाचमे जे मूलगैन रहै से इशारामे कहलकै- गये रे बहुतरे काले संजनम मन रंजनम… आ नटुआ गाबए लागल। ई सुनि राजकुमार अपन गलाक हार नटुआकेँ इनाममे दऽ देलकै। राजकुमारी अपन गिरमोहार (गिरमलहार) नटुआकेँ इनाममे दऽ देलकै। सभकेँ आश्चर्य भेलै। जहन पुछल गेलै तँ राजकुमार कहलकै- हमर बाबू (राजा) ८० बरखक बूढ़ भऽ गेलाह तैयो एखन तक हमरा राजा नै बनेलन्हि, आइ हम सोचने रही जे रातिमे तलवारसँ काटि दितियन्हि। किन्तु अइ नटुआक शब्दक अर्थ हमरा लागि गेल, संयम राखै लेल मूलगैन कहलक। तकर बाद राजकुमारीसँ पुछल गेल तँ ओ कहलथि- हमरा मंत्रीक बेटासँ प्रेम अछि परंतु हमर बाबू (राजा) हमर विवाहक विरुद्ध छथि आ आइ हम दुनू गोटा भागि जैतौं मुदा ई नटुआ हमरा कहलक से हमरा अर्थ लागि गेल, संयम राखै लेल मूलगैन कहलक। तेँ किछु लोक केँ गप्पक अर्थ आ लक्ष्मीनाथ गोसाँइक पाँतिक जँ अर्थ बुझाए, से ने मनुख.. जहियासँ काल धेलक एक टा जोतखी जी रहथि। प्रकाण्ड विद्वान। विद्वतामे समस्त राज्यमे हुनकर धाख छलन्हि। भादव मास, सन्ध्या काल। जोतखी जी लोटा लऽ कऽ पैखाना दिस विदा भेलाह। बुनछेक भेल रहै परंच मेघ लागल रहै। गामक बाहर रस्ता कातमे मिरचैया गाछक झाँखुर लग धोती खोलि बैसि गेलाह। जहाँ बैसला कि बोनमे नुकाएल साँप पाछूमे काटि लेलकन्हि। जोतखी जी धरफराएल गामक कन्हा भगता लग गेलाह। ताइ दिन तँ गामक भगता सभ बेसी मुर्खे होइत छल। भगता झाड़ए लगलन्हि आ कहन्हि- केहेन बेकूफ छी, कुठाममे साँप काटि लेलक। जोतखी जी चुप रहला। भगता फेर हँसैत कहलकन्हि- धुर जोतखी जी, केहेन बेवकूफ छी। जोतखी जी फेर चुप। तेसर बेर भगता फेर कहलकन्हि- “ ”। अइ बेर जोतखी जीकेँ नै रहल गेलन्हि, कहलखिन्ह- हमरा सन विद्वान अइ राजमे नै छौ। परंच जहनसँ ई काल धऽ लेलकए तहनसँ ठीके हम बेवकूफ भऽ गेलौं। कहैत जोतखी जी विदा भऽ गेलाह। नीक करी तँ पैघ के? बेजाए करी तँ पैघ के? एक टा पण्डितजी रहथि, ओइ रज्यक राज कुमारकेँ शिक्षा देनाइ सेहो हुनके काज रहन्हि। पण्डितजी अपन बेटाकेँ सिखबथिन्ह जे नीक करी तँ पैघ के? बेजाए करी तँ पैघ के? छोट बुद्धिबलासँ संगत नै करी आ जनानीकेँ सभ गप्प नै कहिऐ। जहन पण्डितजी बूढ़ भऽ कऽ मरि गेलाह तँ हुनकर बेटा राज पण्डित भेलाह। ओइ राजाकेँ बुढ़ारीमे एकटा बेटा भेलन्हि। राजकुमार जहन ५-६ बरखक भेलाह तँ पण्डितजीसँ शिक्षा ग्रहण करए लगलाह। एक दिन पण्डितजीकेँ बुझेलन्हि जे बाबू सभ दिन कहैत छलाह नीक करी तँ पैघ के? बेजाए करी तँ पैघ के? छोट बुद्धिबलासँ संगत नै करी आ जनानीकेँ सभ गप्प नै कहिऐ। से एकरा भजेबाक चाही .... एक दिन ओ एकटा बड़का टा सन्दूक लेलन्हि, ओइमे खेबा-पिबाक व्यवस्था कऽ देलखिन्ह आ राजा बेटाकेँ कहलखिन्ह जे अहाँ अइ सन्दूकमे बन्द भऽ जाउ आ कतबो कियो सोर पाड़ए तँ नै बाजब। जाबे हम नै कही तावत नै निकलब। पण्डितजी बाहर एलाह आ एकटा चक्कू लेलन्हि आ चक्कूक संग अपन हाथमे लाल रंग लगा लेलन्हि आ हड़बड़ाइत पंडिताइनकेँ कहलथिन्ह जे हमरा बुते जुलूम भऽ गेलै, चक्कूसँ करची कलम बनबैत काल उछट्टि कऽ राजकुमारक नरेटी कटा गैलै। ई सुनि पंडिताइन छाती पीटऽ लगली। हरेलन्हि ने फुरेलन्हि पंडिताइन अपन पड़ोसिया चौकीदारक कनियाँ, जिनकासँ पंडिताइनकेँ बड़ अपेछितारे छलन्हि, दौड़ कऽ कहऽ गेलखिन्ह। चौकीदारनी दौड़ कऽ खेतमे हर जोतैत चौकीदारकेँ कहलकै। चौकीदार ने यएह सोचलक ने वएह, सोझे आबि पंडितजीक डांड़मे रस्सा लगेलक आ राजदरबारमे लऽ गेल। चौकीदारकेँ भेलै जे अइ माथे प्रोमोशन भऽ जाएत। राजदरबारमे सभ आश्चर्यचकित भऽ गेल? राजा कहलखिन्ह जे गुरुकेँ रस्सामे बान्हि अनर्थ केलैं। तुरत हिनकर रस्सा खोल। चौकीदार- महाराज, ई बड़का पैघ गलती केलन्हि। राजा- कतबो पैघ गलतीक लेल गुरुकेँ रस्सासँ बान्हल नै जा सकैत छै। जल्दी हिनका खोल। चौकीदार खोलि देलकन्हि, तहन राजा कहलखिन्ह- आब कह जे ई की केलन्हि? चौकीदार बाजल जे ई राजकुमारक हत्या कऽ देलन्हि। सभ सन्न। सभ दरबारीमे खुसुर-फुसुर होमए लागल। कियो कहै जे हिनका शूलीपर चढ़ा दे तँ कियो कहै जे भकसी झोंका दियन्हु। राजा बड़ी काल सोचलन्हि आ अंतमे फैसला लेलन्हि आ पण्डितजी केँ कहलखिन्ह- हमरा जीवनमे अइसँ पैघ अनर्थ नै हएत। अहाँ बड़ पैघ अपराध केलौं परंतु अहाँ गुरु छी। तथापि अहाँकेँ सजा भेटत। हम अहाँकेँ सजा दैत छी जे अहाँ सपरिवार चौबीस घंटाक भीतर हमर राज्यसँ निकलि जाउ। सभा समाप्त भऽ गेल। सभ दरबारीमे खुसुर-फुसुर शुरु भऽ गेल। समुच्चा राज्यमे हाहाकार मचि गेल। पण्डित जी गामपर एलाह आ बक्सामे सँ राजकुमारकेँ निकालि आंगुर पकड़ि राजदरबार दिस बिदा भेलाह। सभ आश्चर्यचकित भऽ गेल। पण्डित जी राजदरबार पहुँचलाह। सभ अचम्भित। राजा पुछलखिन्ह- की बात छिऐ पण्डित जी? पण्डित जी बजलाह- सरकार, हमरा जनमहिसँ बाबू कहैत छलाह जे नीक करी तँ पैघ के? बेजाए करी तँ पैघ के? छोट बुद्धिबलासँ संगत नै करी आ जनानीकेँ सभ गप्प नै कहिऐ। से गप्पकेँ हम भजेलौं अछि। राजा बजला- तँ की प्राप्ति भेल? अइ राज्यमे सभसँ पैघ अहाँ आ अहाँक अइसँ पैघ अनर्थ किछु नै भऽ सकैत अछि तथापि अहाँ हमरा मर्यादानुकूल दण्ड देलौं। तेँ ई तँ ठीके जे नीक करी तँ पैघ के आ बेजाए करी तँ पैघ के? दोसर अइ चौकीदारनीसँ पण्डिताइनकेँ बड़ अपेक्षितारे छलन्हि आ चौकीदार सेहो हमरा बड नमस्कार पात करैत छल। समय पड़लापर ओ ई बात नै बुझऽ लागल, सोझे पकड़ि लेलक, बुझलक जे अही माथे प्रोमोशन भऽ जाएत। तेँ ठीके बाबू कहैत छलाह जे छोट बुद्धिबलासँ संगत नै करी। तेसर- हमर पण्डिताइन किछु सोचऽ नै लगली आ सोझे चौकीदारनीकेँ कहए गेलखिन्ह। तेँ ईहो ठीक जे जनानीकेँ सभ गप्प नै कहिऐ। बाबूक सभ गप्प मील गेल। लिअ अपन बेटा आ हम चललौं। (बौआ-बुच्ची, ई पुरान खिस्सा छै जखन शिक्षा खास कऽ स्त्री-शिक्षाक अभाव रहै। आब परिस्थिति सभ ठाम, सभ वर्गमे बदलल छै।–-सम्पादक।) पढ़बे टा नै करी ओकरा गुनबो करी एक टा आदमी छलाह। हुनका आध्यात्मिक किताब पढ़ैमे बड़ मोन लगैत रहन्हि। आस्ते-आस्ते ओ बाबाजी भऽ गेलाह। हुनका नान्हिये टा मे किताबमे पढ़ल रहन्हि जे कण-कणमे भगवान बसैत छथि आ सएह सत मानि कऽ ओ जीवन कटैत रहलाह। एक बेर एक टा गाममे बड़ मरखाह साँढ़ आबि गेलै। भरि गाममे तेहेन ने उछन्नर देने छल जे गामक लोक ओइ साँढ़क डरे ओ रास्ता छोड़ि देने छल। एक दिन ई महात्मा जी ओइ गाम गेलाह। भरि दिन घुमलाक बाद साँझमे जखन घुमल जाइत रहथि तँ वएह रस्ता धरऽ लगलाह। ओहू ठाम नेना भुटका सभ खेलाइत रहै। बाबाजीकेँ ओइ रस्ते जाइत देखि नेना भुटका सभ मना केलकन्हि। बाबाजी कहखिन्ह जे रे बच्चा तूँ सभ की जाने गेलेँ, कण-कणमे भगवान बास करैए, हमरामे, तोरामे, ओइ साँढ़मे, सभमे... आ जखन साँढ़मे भगवान अइ तँ भगवान हमरा कोना मारत? हम तँ ओकर भक्त छी। नेना भुटका सभ कहलकन्हि- तहन जा तोरा भगवान बचेथुन्ह। बाबाजी आगू बढ़लाह। साँढ़ दूरेसँ देखि नांगरि उठा दौड़ल आ बाबाजीकेँ सिंघपर उठा आरिक कात मे रगड़ऽ लागल। बाबाजी बाप-बाप करए लगलाह। जावत लोक सभ लाठी-भाला आदि लऽ कऽ दौगल तावत बाबाजी बेदम भऽ गेलाह। हुनकर मृत्यु भऽ गेल छलन्हि। मुइलाक बाद जहन भगवानसँ भेँट भेलन्हि ओ बाबाजी भगवानसँ पुछलखिन्ह तँ भगवान जबाब देलखिन्ह- बाउ, किताबमे पढ़बे टा नै करू ओकरा गुनबो करियौ। जँ सभमे हम (भगवान) रहैत छी तँ ओ नेना भुटका सभ जे अहाँकेँ मना केलक ओकरोमे तँ हम (भगवान) छलिऐ। तेँ खाली पढ़बे टा नै करियौ, ओकरा गुनबो करियौ। अकिलक मोल एकटा राज्यमे वृद्ध राजा छलाह। हुनकर मंत्रीमण्डलमे सभसँ बेसी दरमाहा एक टा बुरहा मंत्रीजीकेँ छलन्हि। दरबारक किछु अपेक्षाकृत युवा मंत्रीगणकेँ एकटा बात अखरैत छलन्हि जे सभटा काज हम सभ करैत छी तैयो हमरा सभक कम दरमाहा आ ई बुरहा मंत्री कोनो काज नै करैत छथि, खाली राजा साहेब लग गप्प दैत रहैत छथिन्ह, तैयो ओ सभसँ बेसी दरमाहा पबैत छथि संगहि राजा साहैब हुनकर गप्प बेसी मानबो करैत छथिन्ह। अइ बातपर सभ दरबारी सभमे घोल-फचक्का होमए लागल। एक दिन सभ मिलि कऽ भरल राजदरबारमे अइ प्रश्नकेँ उठौलक। राजा साहेब बड़ गम्भीर भऽ कहलथिन्ह जे काल्हिए हम एकर प्रमाण देब। दरबार खतम भऽ गेल। भोर भेने दरबार लागल। राजा प्रतिवादी युवा मंत्रीकेँ आ बुरहा मंत्रीकेँ अलग अलग कमरामे बैसा देलथिन्ह। सभसँ पहिने प्रतिवादी युवा मंत्रीकेँ बजेलाह आ कहलखिन जे जाउ आ राजमहलक पछुआरमे नारक टाल छै ओइमे एकटा पिलिनियाकेँ बच्चा भेल छै, कने देखने अबियौ। युवा मंत्री गेलाह आ कने कालमे घुमि कऽ आपस एलाह। राजा पुछलखिन्ह- देखलिऐ? युवा मंत्री- जी महाराज, ठीके कुक्कूरकेँ बच्चा भेल छै महाराज। राजा- कएक टा छै? युवा मंत्री- जा, से तँ गनबे नै केलिऐ। युवा मंत्री फेर दौड़ कऽ गेलाह आ आबि कऽ कहलखिन- महराज, तीन टा चितकबरा, दू टा गोला आ एक टा उज्जर छै। राजा- ओइमे कएक टा पिलिनिया आ कएक टा पिल्ला छै? युवा मंत्री- जा से फरिछा कऽ देखबे नै केलिऐ। युवा मंत्री फेर दौड़ कऽ गेलाह आ आबि कऽ कहलखिन- महाराज, पाँच टा पिलिनियाँ आ एक टा पिल्ला छै। राजा- बिख लगैबला कएक टा छै आ बिना बिखबला कएक टा छै? युवा मंत्री फेर दौड़ कऽ गेलाह आ आबि कऽ कहलखिन- महाराज, तीन टाकेँ बिख लगतै आ तीन टाकेँ बिख नै लगतै। राजा- कएक टा पिल्लाकेँ बिख लगतै आ कएक टा पिलिनियाकेँ बिख लगतै? युवा मंत्री फेर दौड़ कऽ जेबाक लेल बढ़ए लगला तँ राजा रोकि देलखिन आ कहलखिन- बैस जाउ। युवा मंत्री बैस गेलाह। तकर बाद राजा बुरहा मंत्रीकेँ दरबारमे बजेलन्हि आ कहलखिन जे मंत्रीजी राजमहलक पछुआरमे जे नारक टाल छै ओइमे एकटा पिलिनियाँकेँ बच्चा भेल छै, कने देखने अबियौ। बुरहा मंत्री गेलाह आ कने कालमे घुमि कऽ आपस एलाह। राजा पुछलखिन्ह- मंत्री जी देखलिऐ? बुरहा मंत्री- जी महाराज, देखलिऐ। गोला पिलिनियाकेँ करीब पाँच-छ: दिन पहिने बच्चा भेल हेतै। तीन टा चितकबरा, दू टा गोला आ एक टा उज्जर रंगक छै। पाँच टा पिलिनियाँ आ एक टा पिल्ला छै। तीन टाकेँ बिख लगतै जइमे दू टा पिल्ला आ एक टा पिलिनियाँ आ बाँकी तीन टाकेँ बिख नै लगतै। लगैत अछि जे... राजा बीचमे रोकि देलखिन आ दरबारी सभसँ पुछलखिन जे अहाँ आब बुझलिऐ जे बुरहा मंत्रीजी केँ सभसँ बेसी दरमाहा किए छै? आबो ककरो कोनो कोनो प्रश्न? सभ दरबारी महाराजक जयकार कऽ उठल आ युवा मंत्रीक मुँह लटकि गेलन्हि। गंगेश गुंजन लाट साहेबक किरानी एकटा राजधानी रहए। राजधनीक राजमार्ग एकटा विशाल पुलसँ बाँटल छलै दू दिस। बेश उफंच, भव्य। साधरणतः पुलपर प्रजाकेँ सेहो चलबाक अनुमति रहै। खालीश जखन राजधानी वा बड़का राजधनीसँ सम्राट अबथिन आ हुनकर गाड़ी राज्यक सुख समृद्धि देखि टहलऽ बूलऽ अबै, तँ ओइ बड़का पुलक मरम्मति कएल जाइ, बाढ़निसँ बहारल जाइ आ मुरेठा-बंदूकबला सिपाही सभ लोककेँ बैला दै। सौंसे पुल खाली करबा देल जाइ। पुलपर काते-काते भीख मांगनिहार सभ बैसैत रहए। एकटा टंगटुट्टी बुढ़िया आगाँमे कारी खोइंझा चैथड़ा पसारने, एकटा कोढ़ि फुटल गत्र-गत्रसँ पीज बहैत वर्ष पैंतीसक पुरुष, एकटा अन्हरी मौगी बामा हाथमे अलमुनियाँक पिचकल छिपली लेने दहिना हाथे ढील कुरियबैत आ कएटा आर भिखारि। कियो गलल आंगुर सभपर मैल कुचैल चेथड़ा बन्हने माछी भिनकैत तँ कियो ठुठ्ठ पएर पसारने। एकटा नक्कट्टा बुढ़वा जे कए वर्षसँ पुलपर भीख मांगए बैसैत छल आ जकर मुँह-नाक मिलि कऽ बरौबरि छलै वीभत्स खाधि जकाँ, से भरिसक मरि गेल। ओइ जगहपर दूटा आन्हर भाए-बहिन हाथ पसारि कऽ भीख मांगए बैसए लागल रहए। मेही सुरमे राम नाओं जपैत दाता धर्मी लोकनिक गुन गबैत। परोपट्टाक लोक सभ बड़ दानी रहए। ऋण-पैंच लऽ कऽ दान देनिहार। रोज दिन घामे पसिने अपसियाँत, दरबार पहुँचबाक लेल एक दोसराकेँ धकियबैत। हकमैत। तैयो मुदा बगलीसँ कैंचा निकालि टुन टुन भीख दैत। मनहि मन खौंझाइतो मुदा यथा साध्य देनहुँ जाइत। एकटा राजाक किरानी सभ दिन अपन डिपटी बजाए, ओही बाटे लाट साहेबक कार्यालय जाए। बड़का पुल चढ़ैत काल भिखमंगा सभपर पहिने दयार्द्र, फेर तमसाइत ककरो एकटा पाइ खसबैत चलि जाए। एक दिन ओ लाटक किरानी दुनू नेन्ना अन्हरा भाए-बहिनकेँ देखि कऽ बड़ क्लेशित भेल। ओ सोचलक, सएह देखू सृष्टि। ऐ दुनू नेनाकेँ रौद-बसात, जाड़-गरम सभमे दूटा पाइ लेल एहिना बैसए पड़तै भरि जनम। ओइ दिन ओकरा पुलपर चढ़ले ने पार लगै। दोसर दिन फेर ओ किरानी जाइत रहए। मालिक दू गो पइसा...। ओ ठमकि गेल। ओइ कोढ़ि फुटल लोककेँ देखलक। पहिने तँ खूब घृणा भेलै, ओकरासँ भिखारि फेर याचना केलकै। माथपर प्रचण्ड रौद। कतौ सीकी ने डोलैत। अएनिहार गेनहार सभ घामे नहाएल आ भिखमंगा सभ तँ आर। पजरैत रौदमे बैस कऽ भीख मंगैत देखि, लाटक किरानीकेँ बड़ क्रोध उठलै। -तोरा ऐ रौदमे भीख मांगए के कहै छौ बैस कऽ...? -की करबै? ई पेट...?, ओ पेट दिस देखबैत दाँत बाबि देलकै। किरानीकेँ आर तामस उठि गेलै। -तखन मर ...। ओ ओकरा पाइ नै देलकै। आगाँ बढ़ि गेल। भिखारि दोसर दिन फेर टोकलकै- मालिक आइ एक्को गो पाइ नै देलक कोनो दाता धर्मी... किरानी ओकरा गुम्हरि कऽ देखलकै। तँ मारलैं किए ने पकड़ि कऽ दाता धर्मी सभकेँ जे ऐ लूह रौदमे दाँत बाबि कऽ किकियाइत बैसल छेँ?, ओ क्रोधे माहुर होइत कहलकै। -हम कोढ़िया लोक... बाबू भैयाकेँ मारबै... केना कऽ मालिक?, ओ दाँत चियाड़ि देलकै। तखन लाटक किरानी गुन-धुनमे पड़ि गेल। -एकटा कर। मारि नै सकै छहक तँ बाबू भैया सभकेँ ऐ पिजुआह हाथे छू तँ सकै छऽ? हाथ धऽ कऽ कहि तँ सकै छहक?, ओ किछु सोचैत कहलकै आ चलि गेल। दोसरा दिन ओइ भिखारिकेँ फेर बैसल देखि लाटक किरानीकेँ तामसे देह जरि गेलै। मरियो ने जा होइ छऽ जे उसनाइत, कुकुर जकाँ दूर दुराएब सुनैत तरहत्थी औरैत रहै छऽ?, ओ ग्लानिसँ मूड़ी गोँति लेलक। तेसर दिन ओ फेर पुछलकै भिखारि के- की सोचलऽ?, आ चलि गेल। चारिम दिन ओइ पुलपर वातावरणे दोसर रहै। बहुत रास उजरा धोती कुरताबला लोक सभ पएर झटकारि कऽ पड़ाएल जा रहल छल आ कोढ़िया भिखारि सभ हुनका सभकेँ पाछाँ-पाछाँ खेहाड़ि रहल छलनि। जे गोटय घेरा गेल रहथि से सभ जेबीसँ पाइ निकालि रहल छलाह। पड़ाहि जकाँ लागल छल। कोढ़िया, आन्हर, नांगर, सभ भिखमंगा लोककेँ घेरि कऽ ठाढ़ भऽ जाए। लोककेँ पुलपर दऽ कऽ गेने बिना उपाय नै छलै। ओतए छोट छिन हड़-बिरड़ो मचल छलै। राजधानीक ओइ बड़का विशाल पुलपर एकटा भयसँ आतंकित वातावरण चतरल जा रहल छलै। ओ लाटक किरानी, किछु फराकेसँ डराएल-डराएल पुछलकै- की हौ? कोढ़ि लोक सोझ भऽ कऽ ठाढ़ रहै। ओकर हकमैतहुँ मुखाकृतिपर खुशी पसरल छलै आ ओइ किरानीक प्रतिये कृतज्ञताक पवित्र आभास। -कम सँ कम एतवा तँ हमरा सभ कइये सकै छी। अपना सड़लाह गन्हाइत हाथे बाबू बबुआन सभकेँ दौड़ि-दौड़ि कऽ छुबियो तँ सकै छी... । आ ओ किरानी, ओही दिन ओइ राजधनीसँ विदा भऽ गेल। दुर्गानन्द मंडल पारस “शान्ति यै शान्ति कतए नुकाएल छी यै फूलकुम्मरि?” शान्ति- “एलौं याए एलौं।” आंगनसँ शान्ति हाक दैत लग आबि सोझाँमे ठाढ़ि होइत पुन: बाजि उठै छथि- “कथीले एतै जोर-जोरसँ हाक दै छलौं? कोनो खास बात छै की?” हम-“एह, अहाँकेँ तँ सदिखन मजाके सुझाइत अछि। खास बात की रहत। अहाँ छी तँ सभ खासे बात बूझु। ओना आइ विद्यालयक छुट्टी समाप्त भऽ गेल तँए झब दऽ खाइले किछु बनाउ। जे हम समैसँ विद्यालय चल जाएब।” शान्ति बजलीह- “ओ..., आब ने बुझलौं। अहाँ तँ सभ दिन गोलहे गीतकेँ गबै छी। ओना हे, आइ बड्ड सखसँ अपनहि बाड़ीसँ सुआ आ लौफक साग काटि अनलौंहेँ। तँए आइ साग-भात आ अल्लुक सानाक संग भाटा-अदौरीक तीमन बनवितौं से निआरने रही। मुदा तइमे तँ देरी हएत। ताबत अहाँ स्नान-पूजा करू आ हम जलखैक ओरिओन कऽ दै छी।” “बेस, बड्ड बढ़ियाँ। कने अंग-पोछा आ धोती-कुरता बहार कऽ दिअ।” हम धोलूकेँ हाक दै छी- “धोलू, हौ धोलू। कतए छह हौ?” “एलौं, याए ऐलौं बाबूजी, कने नदी फीरि रहल छी।” “बेस, बड्ड बढ़ियाँ। आ बौआ, है सुनै छह? आइ हमरा विद्यालय जेबाक अछि। से जात हम स्नान करै छी तात् तौं साइिकलकेँ बढ़ियाँ जकाँ झारि-पोछि दाए।” ई कहैत हम स्नान करबाक लेल डोल-लोटा लऽ कलपर चलि जाइ छी। स्नानोपरान्त पूजा-पाठ कऽ धोती पहीिर तैयार होइते छी तात् शान्तिक आग्रह- “सुनै छी, अहाँले जलखै निकालि देने छी, कऽ लिअ।” ई कहैत आगाँमे सिकीक चंगेरी, जे रंग-विरंगक रंगसँ रंगल मुजसँ बनौल गेल रहए, तइमे मुरही-चूड़ा, दूटा चुड़लाइ आ गोर पाँचेक तीलक लाइ संगमे काँच मेरचाइ आ नोन परसल छल, आगाँ बढ़ौलनि। एक क्षणक लेल हम मिथिला, मैथिल आ मैथिलक संस्कार आ स्भयतासँ बहुत बेसी आनन्दित भेलौं। मन गद्-गद् भऽ गेल। तात् शान्तिक मधुर आवाज- “कतए हेरा गेलौं? अखन यएह खा, विद्यालयसँ भऽ आउ, जखन आएब तँ गरमा-गरम साग, भात, अल्लुक साना अा भाँटा-अदौरीक तीमन भरि मन खाएब। ओना जाड़ मास छै जौं किछु आरो मनमे हुअए तँ कोनो हर्ज नै।” कहैत, हँसैत सोझासँ अढ़ भऽ गेलीह। आ हम जलखै करैत ऐ मादक अदाक मादे सोचए लगलौं। हमरो मनमे गुदगुदी लागए लागल। जलखै करैत एक बेर पुन: हाक देलिऐनि- “शान्ति, यै शान्ति....।” नै जानि जे हुनको मनमे कोनो बात उमरि रहल छलनि। ओ गुनगुनाइत ई गीत- “एगो चुम्मा दऽ दिअ राजा जी, बनि जाइ जतरा....।” आबि वाणभट्टक नायिका जकाँ लगमे सटि कऽ ठाढ़ि होइत प्रेमानुरूप एकटा चुम्मा लै छथि आ मुस्की दैत घरसँ बहार भऽ जाइ छथि। हम लजा जाइ छी। करीब चालीस मिनटक उपरान्त विद्यालय पहुँचै छी। हाथ-पएर धोलाक बाद हाजरी बनबै छी। प्रार्थनाक घंटी बजैत अछि आ धिया-पुताक संग हमहूँ एक पाँतिमे ठाढ़ भऽ जाइ छी। उपरान्त एकर नवम्-बी मे हमर वर्ग रहैत अछि। हाजरी बही लऽ वर्गमे प्रवेश करै छी। वर्ग नवम बी जे एकछाहा लड़कीएक वर्ग अछि, स्वागतार्थ सभ बच्चिया उठि कऽ ठाढ़ि भऽ जाइत अछि। बैसबाक आदेश पाबि यथास्थान सभ बैस जाइत अछि। सबहक हाजरी लेब सम्पन्न होइत अछि। तखन किछु बच्चिया सभ बाजि उठैत अछि- “मा-साएब, आइ ललका पाग पढ़बियौ, कियो कहैत अछि, जी नै सर आइ ग्रेजुएट पुतोहु पढ़बियौ। मुदा किछु खास बच्चिया यथा- राखी, गीतांजली, खुसबू, बबिता, रिंकी आ पिंकी कहि उठैत अछि- “जी नै सर, आइ अहाँ अपने िलखल कोनो कथा कहियौ। आ हम ओइ आग्रहकेँ नै टारि पबैत छी। शुरू कऽ दैत छी अपन लिखल ई कथा- .....पारस।” माँ मिथिलाक गोद आ कमला महरानीक कछैरमे बसल एकटा गाम दीप-गोधनपुर। जइमे छल एकटा चाहबला, ओकर नाओं छल पारस, पिता श्री सत्य नारायण जी। नाओंक अनुरूप दुनू बापुत विपरीत छल। पिता श्री सत्य नारायण जरूर मुदा सभ चीजले खगले रहै छलाह। एकटा प्राइवेट स्कूलमे अध्यापण कार्य करथि आ कोनो तरहेँ बाल-बच्चाकेँ पोसथि-पालथि। हुनकर बालकक नाओं पारस। नाओंक अनुरूप एकदम िवपरीत, मझौले कदक जवान देहो-हाथ सुखले-टटाएल, कारी-झामर हाथ-पएर एकदम सुखल-साखल मुदा पेट जरूर कदीमा सन अलगल। देहो-वगेह ओहने, सदिखन जेना मुँससँ लेर चुबिते छलै। फाटले-चिटले कोनो जूता-चप्पल पहिर ओही प्राइवेट स्कूलमे पढ़ैत छल। मुदा अकिलगल कम नै। सत्य नारायणजीक घर जरूर बान्हे कातक सौ फिट्टा अर्थात् सरकारी जमीनमे छल मुदा संस्कार कोनो सुसभ्य समाजक प्रतीक छल। सत्य नारायण बाबूकेँ हरलन्हि ने फुरलन्हि खोलबा देलखिन पारसकेँ एकटा एकचारी देल चाहक दोकान। अर्थाभावक कारणे पारस उधार-पैंच लऽ कीनि अनलक चाहक दोकानक लेल बरतन-वासन यथा केटली, ससपेन, चाहछन्नी, स्टोव, दूध राखक लेल दूटा टोकना आ दूआ माटिक मटकुरी छाल्ही राखक लेल। चाहक दोकान जे नित्य समैसँ खुलैत आ बन्द होइत छल। क्रमश: महिसिक अगब दूधक चाह, एक्को ठोप पानिक छूति नै, बरतन-वासन खूब पवित्र आ संस्कारी होएबाक कारणे ग्राहककेँ सेहो उचित सम्मान भेटनि। चाहक दोकान खूब चलनि। क्रमश: पाँच सेर दूधक बदला आध-आध दूध खपत होमए लागल। आमदनी नीक होमए लगलै। किछु पुंजी जमा केलाक बाद ओ एकचारी छोड़ि लऽ लेलक पक्काबला एकटा घर दोकान खोलए लेल। बना लेलक एकटा काउन्टर आ बढ़ा लेलक दोकानक मेल। साझु पहरकेँ बनाबए लागल सिंगहारा आ गरमा-गरम जिलेबी, बात एक कानसँ दू कान होइत गेलै। एकर दोकानक नाओं भऽ गेलै, दोकान खूब चलए लागल। समए पाबि २६ जनवरी आ १५ अगस्तमे प्रसादक लेल विशेष आदर पाबि बनाबए लागल मनक मन बुनियाँ आ भुजिया। अगल-बगलमे प्राइवेट कोचिंग चलौनिहार संचालक आ िनदेशक महोदयक योगदान ऐ देाकनकेँ चलाबएमे अहम भूमिका रखलक। दिन दुना आ राति चौगुना उन्नति होमए लगलै। मनक-मन दूध खपत होएबाक कारणे घी सेहो बनबाए आ नीक दाममे बेचए। देखैत-देखैत चाहक देाकानक अामदनीसँ कीनि लेलक ओ तीन बीघा जमीन। मुदा एकर उपरान्तो ओ चाहो बेचए आ पढ़बो करए। समए पाबि प्राइवेट स्कूलसँ सातमा पास कऽ ओ एकटा संस्कृत विद्यालयमे नाओं लिखा लेलक, आ मध्यमाक फारम भरि फस्ट डिविजनसँ पास केलक। आब तँ ओ किछु बेसिए खुश रहैत छल। मध्यमा पास केलाक बाद ओ अपन नाओं जनता काओलेज झंझारपुरमे लिखा लेलक। तखनो ओ बेचारा चाहो बेचए आ पढ़बो करए। आइ.ए. पास केलाक बादो ओकरामे कोनो परिवर्तन नै। काओलेजसँ ऐलाक बाद चाहक दोकानपर ओ जमि जाए। यद्यपि चाह बेचब एकटा तेहन काज मानल जएतै, ई विवादक विषए अछि। ओकरा एक्को पाइ लाज-संकोच नै। किएक तँ कर्म कोनो खराप नै होइ छै। कमा कऽ खाइ ऐमे कोन लाज, कोनो कि ककरोसँ भीख मंगबै जे लाज होएत। तँए चाह बेचब अधलाह काज नै से मानि ओ खूब जतनसँ अपन कर्त्तव्यक निर्वहन करए। बुझिनिहार मैथिलमे एकर चर्च होमए लागल, जे देखू पारस चाहो बेचैए आ पढ़बो करैए। देखिते-देखति ओ मैथिली औनर्ससँ बी.ए. पास केलक। परोपट्टामे नाओं भऽ गेलै जे एकटा चाहबला चाह बेचैत बी.ए. पास केलकहेँ। तखनो ओ चाह बेचब नै छोड़लक। बात पसरैत गेल। एक बेर एकटा कथा गोष्ठीक मादे सुपौल जेबाक छल। चारि गोट मात्र कथाकार विदा भेलथि दिन अछैते मुदा कोशी महरानीक अभिशापे नावसँ यात्रा करए पड़ल आ घंटा भरिक बाट मात्र चारि घंटामे तए भेल। सुपौलसँ पहिनहि झल अन्हार भऽ गेल, जड़ा सेहो गेल रही। तँए चारू कथाकार चाह पिबाक लाथे बैसलौं एकटा चाहक दोकानपर। दोकानदारसँ- “हौ, चारि कप चाह िदहह।” ओ बाजल- “जी, श्रीमान् दइ छी।” कहैत ओ चाहक जोगार लगबए लागल। तात् ओतए गप्प कियो तेसरे आदमी चलौलनि। जे गोधनपुर गाममे एकटा चाहबला अछि पारस बी.ए. पास। बी.ए. पास केलाक बादो ओ चाह बेचब अधला नै बुझैत अछि। चाहो ततबेक सुन्दर आ व्यवहारो ओकर ततबेक सुन्दर छै। वाह। हर्ष भेल जे समाजकेँ ऐ बातक नजरि जरूर छन्हि जे एकटा पढ़ल-लिखल लोक चाह बेचैत अछि। ओकर नजरिमे कोनो काज करबामे हर्ज नै। एम्हर देखू जे वर्तमान सरकारमे नगर-पंचायत, जिला परिषद, टेन प्लस टू विद्यालयमे नियोजनक भेकेन्सी भेल। तात पारस मैथिलीसँ एम.ए. सेहो कऽ लेलक। भैकेन्सीक अनुसार विभिन्न जिलामे आवेदन केलक। समए तँ जरूर लागल। मधुबनी जिलाक मेधा सूची प्रकाशित भेल, उपरहिमे ओकर नाओं छलै। नियोजनक निमित्त सभ आवश्यक कागजात, मूल प्रमाण पत्र एवं शपथ पत्र देलाक बाद ओकर चयन इच्छानुकूल परियोजना विद्यालय मनसापुरमे मैथिलीक लेल भेल। समाजक सभ वर्गकेँ ऐ बातसँ हर्ष भेल जे सत्यनारायण जीक बालक पारस आइ टेन प्लस टू विद्यालयमे मैथिली पदपर नियोजित भेलाह। साँझखन सभ ओही चाहक दोकानपर उपस्थित भऽ पारस आ हुनक पिता सत्य नारायणजीकेँ सभ शुभकामना आ बधाइ दैत कहलकनि- “सत्य नारायण, आब ओना काज नै चलत, आब भोज-भातक आयोजन कएल जाउ। भोज लागत।” सत्य नारायण आरो अह्लादित होइत बजलाह- “सभ ऐ समाजक आशीर्वाद थिक। अहीं सबहक अशीर्वाद थिक जे आइ पारस चाह बेचैत-बेचैत एकटा टेन-प्लस टू विद्यालयक शिक्षक भेल। हम ऐ समाजक ऋृणी थिकहुँ। आइ जे समाज नै तँ हमर कोनो अस्तित्व नै। आइ हमहूँ गौरवान्वित भऽ रहल छी जे हमर बेटा, हमरे बेटा नै ऐ समाजोक बेटा, जे ऐ समाजमे सिर उठा कऽ जिबाक एकटा अलग स्वाभिमान देलक। एकटा आदर्श देलक। तँए हम भोज देबेटा करब। भोज जरूर करब।” समए सुअवसर पाबि सत्यनारायण बाबू केलनि बड़का भोजक आयोजन। लगुआ-भगुआ हित अपेक्षित मित्र-बन्धु आदि ऐ भोजमे नै छुटथि आ हुनकर उचित सम्मान हुअए ऐ बातक सदिखन खियाल रखलनि। दुनू तरहक आयोजन छल, शाकाहारी आ मांसाहारी। निमंत्रित व्यक्ति सभ समैसँ उपस्थित भऽ आ स्वरूचि भोजन केलनि। शाकाहारीक लेल आयोजन छल। पुरान तीन-सलिया बासमती चाउरक भात, राहरीक दालि आमिल देल, पालक पूड़ी, पालक पनीर, आमक चटनी, सलाद, तरल मिरचाइ, मटर-आलू-परोर देल डलना, बड़ी अदौड़ी, सकरौड़ी तइपर डब्बूक डब्बूक घी। महीसीक अगव दूधक तौलाक-तौला दही, तरहत्थी सन मोट छाल्ही। बुझु तँ खेनिहार तर आ भोजेतक व्यवस्था उपर। दहीक तँ कथा नै पुछू, खेनिहार कम आ तौले बेशी। सभ कियो गद्-गद् भऽ गेलाह। एम्हर मांसाहरी लोकनिक लेल अरबा चाउरक भात आ आध-आध मनक जुआएल खस्सीक लद-वद करैत मांस। किसिम-किसिमक मसल्ला देल गम-गम करैत एकहक टा पीस बुझू जे सए-डेढ़ सए ग्रामक। एह अजोध खस्सी, माउस। बनलो ततबेक सनगर। सभ भरि मन खएलाह। आ उपरसँ सेरक सेर दही फी आदमीपर। तर-बत्तर छलाह, भोज तँ जस-जस भऽ भेल। सभ कियो भोजनो करथि आ पारसक चर्चो करथि। जे पारस तँ पारसे अछि। वस्तुत: पारस आब ओ पारस नै रहल जे चाह मात्र बेचै छल। चाहे बेचेत ओ पारस तँ आब समाजक लेल ओ पारस भऽ गेल। जेकर गुणसँ कतेको नेना-भुटका आब चाहेटा नै बेच समाजक बीच शिक्षाक ज्योति जगाओता। जइसँ अपना समाजमे पारस, पारस मणि गुणसँ प्रभावित होएत आ पारसक गुणसँ अपना समाजक कतेको बच्चा पारस बनताह। अन्तत: बाउ लोकनि अहीं सभ कहू जे अहाँ सभ घर अंगनाक काज करैत पढ़ि लिख की बनए चाहैत छी?” एक स्वरमे उत्तर भेटैत अछि मास्सैव हमहूँ पारस बनबै पारस। कहैत सभ बच्चियाक संग राखी, गीतांजली, खुशबू, बबिता, रिंकू, पिकूक नोरसँ भरल आँखिमे एकटा विशेष आत्म बिसवास हमरा बुझना जाइत अछि। जेना ओ प्रखर ज्योति बहराएल हुअए अनमोल मोती पारससँ। राखी ओना तँ अपन देश सभ दिनेसँ पावनिये तिहारक देश रहल अछि जतए सभ दिन कोनो ने कोनो पावनि-तिहार मनाओल जाइत अछि। आइ होली, तँ काल्हि दीवाली, परसू दुर्गापुजा, तँ तरसू कालीपूजा। आइ अनन्त चतुर्दशी तँ काल्हि नरक-निवारण चतुर्दशी। आइ भ्रातृ द्वितीया तँ काल्हि जितिया, आइ शनियाही घड़ी, तँ काल्हि बुधवारि घड़ी। कहियो सिर पंचमी, कहियो वसन्त पंचमी। तात्पर्य, सालो भरि सभ दिन पावनिए-पावनि। जइमे सभ पावनिकेँ एकटा अलग महत्व होइत अछि। कोनो पावनि रंग-अबीरसँ जुड़ल होइत अछि तँ कोनो अटूट भक्तिसँ। कोनो पावनि साँए-बेटासँ जुड़ल अछि तँ कोनो भाए-भतीजासँ, ओइ पावनिमे अपना देशमे रक्षा बन्धनक एकटा खास लौकिक तथा अलौकिक दुनू तरहक महत्व होइत अछि। तँ भारतक पावन पावनिमे रक्षा बन्धन अति पावन मानल गेल अछि। जइ पावनिमे कलाइपर धागा बान्हब भृकुटिक बीचमे टीका लगाएब आ मुँह मीठ कराएब देखल जाइत अछि। औझके दिन बहीन अपन भायक गट्टापर राखीक धागा बान्हि अपन रक्षाक दान लैत अछि। एकटा समए छलै जे युद्धक समएमे एकटा बहीन मुसलमान भाइक गट्टापर राखी बान्हि अपनाकेँ सुरक्षित बुझैत छल। किएक तँ एक भाय अपन बहीनक सतीत्वक, ओकर मान-मर्यादाक रक्षा जरूर करत। परञ्च मनुक्ख तँ पूर्ण समर्थ छथि नै। नै जानि जे एकर बादो कतेको माए-बहीनक लाज लुटल गेल हएत आ लुटल जाइए। वास्तवमे ऐ अपवित्र वृत्ति, दृष्टि आ कृतिकेँ पवित्र बनाबए पड़त। आर मन, वचन, कर्मसँ पवित्र रहि सभसँ अपन बहीनक समान बर्ताव करए पड़त। रक्षा बन्धनक रहस्यकेँ जानए पड़त, मानए पड़त। आजुक तारीखमे ऐ बातक खगता अछि जे बहीनो आइक तारीखमे अपन भायसँ कोन प्रकारक रक्षा चाहैत छथि? तनक रक्षा, धर्मक रक्षा, सतीत्वक रक्षा आदि महत्वपूर्ण तत्व अछि। आइ एकपेरिया धेने, चुप-चाप चलैत एसगरूआ बहीनकेँ ऐ बातक सदिखन आशंका बनल रहैत छैक जे क्यो आसुरी प्रवृत्तिबला लोक रावण बनि ओकर लोक-लाजकेँ समाप्त ने कऽ दै। ऐ लेल सभ बहीनक तरफसँ हम राखीक शुभ अवसरपर सभ भाइसँ दान स्वरूप ई लेबए चाहैत छी जे ओ अपन आसुरी प्रवृत्ति, क्रोध, लोभ, मोह आदि दान कऽ दैथि जइसँ हमर बहीनकेँ ई बुझना जाएत जे हमर पवित्रता, हमर सतीत्व, हमर मान-मर्यादा सदिखन सुरक्षित अछि। आ हमरा एक-आधटा नै अपितु संसारक सभ पुरूष भाय बनि हमर रक्षकक रूपमे सभ ठाम ठाढ़ छथि। ओना परम-पिता परमात्मा सभ आत्माक पिता छथि। सबहक रक्षक पालक वएह छथि। हुनका समक्ष स्त्री-पुरूषक देहक कोनो भेद नै छै। ऐ हेतु हम समस्त मैथिल आ मैथिली प्रेमीसँ हमर रक्षा-सिनेह रूपी बन्धन स्वीकार करू। परमात्मा अहाँक जीवनमे, शांति, शुभ-भावना, सिनेह, सहानुभूति, मधुरता पवित्रता आदि गुणसँ भरने रहथि। ई हमर शुभ भावना अछि। आउ ऐ अमूल्य पावनिमे आत्मीक राखी अपन-अपन गट्टापर बान्हि, आत्म चेतनाक टीका लगा आ मीठ-मीठ बोलक मधुरसँ अपन मन आ आत्माकेँ मीठ राखी। स्वतंत्रता दिवस आइ भारतीय स्वतंत्राक ६५म वर्षगाँठ मना रहल छथि। अनेरे प्रसन्न! सरकारी किंवा गैर सरकारी कार्यालय आजुक दिन स्वतंत्रता दिवसक रूपमे मना रहल अछि। विद्यालय सभमे सरकारी चिट्ठी पठा देल गेल जे फी विद्यालयक एक गोट मासाएब अमुख महादलित टोलमे झंडा फहराबथि, अन्यथा दण्डक भागी हेता। कहक लेल सभ किछु अनसोहाते बुझना जाइत अछि। कि खादीक नम्हर कुर्ता, ठेहुनसँ निच्चा धरि, माथपर गाँधी टोपी, डाँरमे खादीक धोती पहिर राष्ट्रध्वजक समक्ष सभटा झुट्ठे भाषण देल जा रहल अछि। सुनैत-सुनैत देहमे आगि लागि जाइत अछि। मोन कोना ने कोनादन करए लगैत अछि। झुट्ठा लोक सबहक झुट्ठ भाषण सुनैत-सुनैत पचास बर्खक भऽ गेलौं मुदा झुट्ठे बाजि अपने सन आनो जनकेँ परतारब कते अधलाह बात भेल! जँ हार-मौसक देह अछि तँ कनियो लाज हेबाक चाही, की बाजि रहल छी, की कऽ रहल छी? की सभ दिन झुट्ठे बाजि भारतक स्वतंत्रताकेँ अक्षुन्न राखि सकै छी? ई हमरा लोकनिक बीच एकटा यक्ष प्रश्नक सदृश्य राखल अछि। चारू कात देश भक्ति गीत बाजि रहल अछि। गीत सुनैत-सुनैत खुन खौलए लगैत अछि, ऐ सफेद पोस झुट्ठा सभकेँ देख कऽ जे समस्त भारतीय भाय-बहिन, माइ लोकनिकेँ सालो-सालसँ ठकैत आएल अछि। राष्ट्रध्वजक सामने बाजब किछु आ करब किछु हिनका सभक जन्म सिद्ध अधिकार भऽ गेल अछि। धिक्कार अछि एहेन भारतीय आेइ सन्तान सभकेँ जे भारत माताक संग झुठक बेपार करैत अछि। सवाल ई उठैत अछि, देशमे जखन चारूकात भ्रष्टाचार, बेबिचार, हत्या, बालात्कार, अपहरणक बेपार भऽ रहल अछि, तखन भारतीय कोन रूपेँ स्वतंत्र छथि? देशक शीर्षस्थ नेता लोकनिक करतुत प्रात होइते अखबारमे पढ़बामे अबैत अछि। भारतीय संविधानक ऊँचसँ ऊँच पदपर आसीन मंत्रीगण, क्यो बेदाग नै छथि। सबहक चद्दैरमे दाग लागल छन्हि। एकटा जहलसँ बहराइ छथि, तँ दोसर जेबाक लेल ततबए आतुर! कथी खातिर? देशक रक्षा खातिर? कखनो नै। अपितु ई आरो स्पष्ट भऽ जाइत अछि, जे अहाँ कतेक पैघ भीतरघाती छी। आइ खगता अछि ऐ बातक जे अपना-अपना भीतर झाँकि कऽ देखू जे अहाँ गाँधी, नेहरू, लोहिया, जे.पी.क भारतक की दुदर्शा केलिऐ? की अही कुकर्मक िनर्वहनक लेल अहाँकेँ भारतीय राजनीतिक क्षितिजपर बैसाओल गेल? आइ जँ कियो सही आबाज उठबै छथि तँ ओकर ओधि उखारि अहाँ अपनाकेँ सुरक्षित राखए चाहै छी। मुदा आब ओ दिन दूर नै जे अहाँ कखनो नाङट भऽ सकै छी आ अरबो-अरब भारतीय अहाँकेँ नाङटे-उघारे टी.भी.क पर्दापर देखत। तँए समए पूर्व चेतू हे मानव, चेतू। अन्यथा ने िसर्फ भारतीय बल्कि अरबो-अरब जनसंख्या अहाँकेँ- धुर छी! धुर छी!- करत। कतेक दुखक बात अछि जे अहाँ सन सपूत भारत माताक खोंइछ खाली कऽ सभटा धन नुकाए कऽ आनठाम रखने छी। मुदा से ककराले? अपनेकेँ बूझक चाही जे ओ धन किसान-मदूरक खुन-पसेनाक कमाइ छी। ओ धन अहाँकेँ पचि नै सकैए। ओइ धनसँ ने तँ अहाँ अपन श्राद्ध कऽ सकब आ ने बेटा-बेटीक बियाह। तखन ओ धन भोगत के? ऐठाम आप्त चिंतनक खगता अछि। सोचू, कने विचारू, कोन तरहक कुकर्म आ केकरा लेल से करै छी। जागू, जागू। हे भारतक सपूत अखनो जागू। भारतक अखण्डता आ एकता लेल जागू। भारत सबहक माता थिकीह। माताकेँ सद्विचारसँ सजाउ। आउ, अपन तियाग, निष्ठा, लोभ, मोह, अहंकारकेँ तियागि भारतकेँ माता बुझि अपन खून-पसीना स्वच्छ बुद्धि विवेकसँ माताकेँ बचाउ। बचाउ अपन मानवताकेँ, नैतिकताकेँ, आदि सनातन धर्मकेँ आ राजनीतिकेँ। देशमे जरूर प्रजातंत्रक शासन अछि। किन्तु सबहक आत्मामे रावणक शासन। तँए आइ पन्द्रह अगस्तक अवसरपर आबि ओइ रावणकेँ खतम कऽ देबाक सप्पत खाउ। सप्पत खाउ जे अपन भारतकेँ रामराज्य बना अपने राम कहाउ। नवीन ठाकुर चंदा मामा आ चंद्रमा चंदा मामा .. ई कोनो नव मुहाबरा नै अछि, मुदा एकर अर्थो किछु आब जिनगीमे बाँचल नै रहल। नेना सभकेँ बहकाबऽ आ फुसलाबऽ केँ छोड़ि कऽ ! किएक ठकैत छिऐ बचबा केँ, हमरो ठकने रही बच्चामे सभ मिल कऽ, नै-नै, ई बच्चा सभकेँ चुप करबाक रामबाण इलाज छै। के कहलक अहाँकेँ आ की अनुभव अछि। अंजाद नै अछि ठीक ठीक। शायद दुनु भऽ सकैत अछि ! मुदा चंदा मामा कहिया चंद्रमा भऽ गेल बुझल नै अछि? शायद नमहर भऽ गेलौं हम। नै तँ ई वैज्ञानिक दृष्टिकोणक दोष छै! जहिया सँ बुझलिऐ जे चंदा मामा एगो ग्रह छै तहिया सँ रिश्ता टूटि गेल मामा भगिनाक! चौरचनक दिन जे हृदए कोणमे कनी श्रद्धा बाँचल रहैत अछि ओ उमरि अबैए ! वैज्ञानिकदृष्टिकोणक तर्कसँ बहुत व्यक्तिक आस्था सेहो डगमगाइत देखलिऐए जिनगीमे! भौतिक ज्ञानसँ मोनमे जोर-घटा चलऽ लागैत छै। किछु शेष बचलापर दौग गेलौं मंदिर दिस नै तँ भरि जिनगी टाइम रहितो सबहक पास टाइमक अभाव होइ छै! आइयो वएह चाँद छै मुदा ओइमे कोनो बुढ़िया चरखा चलबैत नजरि नै आबि रहल अछि! बौआकेँ खेलबैत रही। एना ता अनचिन्हारक कोरामे नै जाएत जल्दी, जावत तक चंदामामाक रेफेरेंस नै देबै! चांदनीक शीतल आ शांतिक परिवेशमे बैसल रही छत पर, वास्तविकतासँ दूर। कने दू-चारि डेग आगाँ बढ़ेने रही। तखने लागल जे पाछाँसँ कियो टीक पकड़ि कऽ झीक देलक! -सुनैत छिऐ। नीचाँ आउ।, कनियाँ सोर पारलक। लागल जे कियो चंद्रलोकसँ मृत्युलोकमे बजा रहल अछि। मोनक तराजूपर बटखरा राखि देलक कियो। डगमगा गेल कनी काल लेल एकबैग मोन ! असलियत जनलाक बाद कतेक चीजसँ लोकक नाता टूटि जाइ छै। किछु सजीवसँ, किछु निर्जीवसँ। कतेक ज्ञानवस, कतेक अज्ञानतावस। समयपर जरूरत पड़लापर कमी खलै छै! ओ ज्ञान कोन काजक जेकरा जनितो आदमी जिनगी भरि अज्ञानी बनल रहैए , मोनमे अंतर्द्वन्द्व रहैत छै भरि जीवन, सही गलतक फैसला लेबऽ मे असमर्थ रहैत अछि ! सभ कहैत छै जे बच्चाकेँ भगवान देखाइ दैत छै, किए? हम बच्चा नै बनि सकैत छी , मुदा बचपना तँ राखि सकैत छी। कखनो काल कऽ अज्ञानी बनबोमे बहुत बड़का फाएदा होइ छै। खाली सामंजस्य स्थापित करक कला एबाक चाही। भऽ सकैत अछि जे समाजक दृष्टि बदलि जाएत अहाँ प्रति। शायद नीक बुझत की ख़राब ई कहि नै सकैत छी, ई तँ दृष्टि आ व्यवहारक बात छिऐ! मुदा समयक संग फाएदा हएत, ई निश्चित अछि! समयक अनुसार चलबामे नफ्फा छै, चंदा मामा रहथि आकि चंद्रमा, की फरक पड़ैत छै! छिऐ तँ एकैगो! बिपिन कुमार झा ऐ चराचर जगत मे मनुक्ख के? ऐ चराचर जगतमे मनुक्ख सभसँ अधिक बुद्धिबला प्राणी अछि ई सर्वविदित अछि। मुदा जङ्गलक राजाकेँ ई प्रश्न सदिखन मनमे अबैत रहैत छलै जे एना किए अछि। जङ्गलक राजा एक दिन सभा बजौलक। सभ सँ ई प्रश्न राखल गेल जे ऐ चराचर जगतमे मनुक्ख के अछि? आ ओ हमरा सभसँ कोना अधिक महत्वपूर्ण अछि? सभामे एकटा वृद्ध छलाह, ओ उठि कऽ कहलथि- हे वनराज! किए नै अपना सभ सोझे ई गप्प विधाता ब्रह्मा सँ करी? वनराज प्रत्युत्तर देलथि- एव मस्तु। तिथि निर्धारित भेल। सभ अपन विमानसँ सीधे ब्रह्मा लग पहुँचला। ब्रह्माकेँ प्रणाम कए पुछलथि। हे संसारकेँ बनेनिहार ब्रह्माजी, एकटा जिज्ञासासँ हम सभ एतए आएल छी। ब्रह्माकेँ किछु फुरि नै रहल छलन्हि किएक तँ एतबाक दिन तँ मात्र इन्द्रे किछु पुछैक लेल अबैत छलखिन्ह मुदा आब तँ पशु सभ सेहो। कोनो बात नै। ओ कहलथि- देरी कोन बातक। अपन गप्प कहू। वनराज कहलथि- हे विधाता! मनुक्ख हमरा सभसँ श्रेष्ठ कोना? ब्रह्मा कहलथि- सुनू, मनुक्ख लग ज्ञान छै अस्तु ओ अहाँ सभसँ श्रेष्ठ अछि। वनराज आपत्ति उठेलथि- ज्ञान तँ हमरो सभ लग अछि। यदि नै रहितए तँ बच्छाकेँ एक हजार गायक बीचमे छोड़ि देलापर ओ केकरहु थनसँ दूध पी लैतए। कहियो एहेन भेल? ब्रह्मा कहलथि- नै, वत्सो गच्छति मातरम्। वनराज कहलथि- तखन अहाँ कोन आधार पर मनुक्खकेँ एना टीकासन पर बैसा देलिऐ? ब्रह्मा कहलथि- देखू, मनुक्ख लग धर्म एहेन चीज छै जे अहाँ सभ लग नै अछि। धर्मो हि तेषामधिको विशेषो। वनराज हारि मानए बला नै, बजलाह- ई तँ अपने अनुचित कहल। प्रत्येक पशुक अपन धर्म छै। जे मांसाहारी अछि ओ नित्य मांसाहारी अछि जेना हम। हम कहियो घास नै खा सकैत छी। जे शाकाहारी अछि से कहियो मांस नै खा सकैत अछि। जेना बड़द लोकनि। ब्रह्मा तँ विचित्र संकटमे आबि गेला। मनुक्खकेँ श्रेष्ठ कोना कही। नै कहबै तँ ओ सभ आबि कऽ हल्ला करत। कहलथि- कनी काल रुकू। हम पोथी पतरा उलटा कऽ कहैत छी। कनिक काल बाद ब्रह्मा कहलथि- सुनु यौ, मनुक्खमे एकटा विशिष्ट गुण छै। ओ छै परिवर्तनशीलता। मनुक्ख कखनहु एक स्वभावबला नै रहि सकैत अछि। ओ स्वयंकेँ हर स्थितिमे समायोजित कए सकैत अछि। शाकाहारी मांसाहार कए सकैत अछि, मांसाहारी शाकाहार कए सकैत अछि। संस्कृत पढ़निहार अंग्रेजी पढ़ि सकै अछि। अंग्रेजी पढ़निहार संस्कृत। राजस्थानमे रहनिहार जम्मूमे रहि सकैत अछि आ गुजरातमे रहनिहार अटलाण्टामे। मनुष्य समायोजन कए सकैत अछि। की अहाँ घास खा सकैत छी। ऊँट बिहार केर बाढ़िकेँ बर्दास्त कए सकत? वनराज निरुत्तरित भऽ गेलाह मुदा उत्साहसँ बजलाह- बाह बाह। मुदा एकटा गप्प कहू? जे व्यक्ति परिवर्तन नै कए पबैत अछि वा जे एके रंग हमेशा रहैत अछि। जेकरामे विविधता नै अछि ओ? ब्रह्मा कहलथि- हँ, अहाँ सभक बात सुनि लगैत अछि जे विधिक विधानमे संशोधनक आवश्यकता अछि। जे विविधतासँ रहित छथि ओ आइसँ मनुक्ख नै कहल जेताह। वनराज बजलाह- तखन ओ की कहौताह? ब्रह्मा कहलथि- ओ विचित्र पशु कहौताह। सभ पशु हर्षित भऽ मृत्युलोक अएलथि। सुखकेँ मृगमरीचिका बुझू (श्री देवब्रत बसुक संस्कृत कथाक बिपिन कुमार झा द्वारा मैथिली अनुवाद) बालबोधिनी, अनूदित कथा, मूल संस्कृत लेखक श्री देवब्रत बसु कोनो राजा अपन वृद्धावस्थामे अपन बेटाकेँ राज्यक भार दऽ स्वयं जंगल दिस तपस्या करबाक हेतु प्रस्थान कएलथि। बाटहिमे कोनो तेजस्वी पुरुषसँ भेँट भेलन्हि। राजा हुनका नम्रता पूर्वक नमस्कार केलथि। ओ तेजस्वी पुरुष पुछलथि- हे राजा! आइ नै तँ अहाँक संग कोनो सैनिक अछि, नै तँ कोनो राजचिह्न! ने रक्षक, नहिये घोड़ा। एना असगरे कतए जाइत छी? राजा बजलाह- महोदय! संसार मोहकेँ छोड़िकेँ जंगल जाइत छी। तेजस्वी कहलथि- की अहाँ केर निश्चय दृढ़ अछि? क्रोधसँ, अपमानित भऽ कऽ, उपेक्षित भऽ कऽ, पराजयमे अधिक हानि प्राप्त कऽ कऽ कदाचित् संसार त्याग करबाक मन करैत छै। किन्तु बितैत समयक संग स्वयंकेँ संसारमे सामंजस्य बनेबाक लोक प्रयास करैत अछि। अहाँ तँ ओइ प्रकारक नै छी जे हारि मानि ली? -हे महात्मा! हम उत्तम राजवंशमे उत्पन्न भेलौं। हमर बहुतो रानी सन्तान छथि। हम बहुतो इनार आ पोखरि खुनाओल। पूजा-व्रत आदि बहुत कएल। बहुतो देश जितलौं। विद्यालय आ चिकित्सालय सेहो प्रतिष्ठापित कराएल। किन्तु कत्तौ हमरा सुख नै भेटल। एकर की कारण? कनिक काल रुकि कऽ ओ तेजस्वी नजदीकेमे विद्यमान नीमक गाछ देखा कऽ बजलाह- हे राजा! ई नीमक गाछ तीते टा होइत अछि। प्रार्थनासँ, दानसँ, पूजासँ की एकर मधुर फल प्राप्त कएल जा सकैत अछि? संसारो अही नीमक गाछ जकाँ अछि। ओ मृगमरीचिका अपना सभकेँ एम्हरसँ ओम्हर घुमबैत अछि। मृत्यु नजदीक एलाओ पर सुख नै भेटैत अछि। सत्कर्म आ अनुष्ठानसँ, भगवानक ध्यानसँ, शरणागतिसँ सुखक आशा रखबाक चाही नै कि अन्य प्रकारसँ। दोसरे क्षण ओ तेजस्वी नै देखाइ देलथि। भगवाने वस्तुतः हुनका तत्व बुझेबाक हेतु ऐ रूपमे आएल छलाह, ई सोचि राजा डेग आगू बढ़बैत भगवानक स्मरण करैत बढ़ि गेलाह। अनिल मल्लिक दादीक गीत नेन्हपनक हरेक भोर होइत छल दादीक मधुर स्वरमे गाओल ऐ गीतसँ, तहिया दिवाल घड़ी नै छल, ने कोनो अलार्म। दादीक गीत सुनि पड़ोसी बसीर अहमद बुझैत छलाह जे भोर भेल आ ओ अपन मवेशी भोरका पहर चराबक बास्ते खोलैत छलाह ! माँ, चाची, बाबुजी, कक्काजी बुझि जाइत छलथि जे भोर भऽ गेल आ उठि जाइत छलाह! जुग बितल। दादी अपने संगे लऽ गेली ई गीत। एकर मधुर लय आ भाव सेहो ! रहि गेल दादी द्वारा लिपिबद्ध ऐ लोक गीतक मात्र आखर-आखर, शब्द-शब्द, अर्थ-मर्म! रहि गेल एकटा अन्तहीन प्रतीक्षा। की दादी फेर औती? कोनो ने कोनो रुपमे.... मिथिलाक घर घरमे….. फेर पहिले जेहन भोर हएत, ई गीतक बोल संगे आँखि खुलत सभक, आ जिबन्त हएत संस्कृति फेर एक बेर! सादर ई गीत: उठू हे फूलकुमैर रानी, झारु दिअ अंगना उठता जे कृष्ण बलदाउ, बासी छीक अंगना उठू हे फूलकुमैर रानी ,झारु दिअ अंगना
कथी केर झारु झुरु, कथी केर बन्हना कोना हम झारु देब, ससुरजी तँ अंगना कोना हम झारु देब, भैंसुरजी तँ अंगना
सोना केर झारु झुरु, रुपा केर बन्हना लिहुरी लिहुरी झारु दियौ, नन्दजी केर अंगना उठता जे कृष्ण बलदाउ, खेलैथ दुनु अंगना
उठू हे फूलकुमैर रानी, झारु दिअ अंगना!! बृषेश चन्द्र लाल गोलबा जहिया ओ जनमल बड़कीमाइ धरतीपर खसहु नै देलकै। कि कहाँदोन माटि लागि जइतैक, कहैत छैक जे पशु जाति गन्धेसँ चिन्हैत छै आ प्रायः तँए गोलबा सभसँ पहिने बड़कीमाइक गन्ध थाह पओलकै आ लगले तखनहि सोनी, मोनी आ बब्बूक। अपन माइ चितकबरीक गन्ध तँ ओ पेटहिसँ पओने रहए। ओकरा कहियो नै बुझएलै जे ओ पशु अछि। ओ अपनाकेँ सोनी, मोनी आ बब्बूये जकाँ बड़कीमाइक सन्तान बुझैत रहल। बड़कीमाइ कहैत रहैत छलै जे गोलबा जनमल तँ ओकरा जखने पोछि-पाछि कए ठाढ कएल गेलै चभकि–चभकि कए चितकबरीक थनसँ दूध पिबए लगलैक आ जखने पेट भरि गेलै तँ दौडि कए ओकरि दुनू पएरक बीचमे साड़ीक कोंचामे गरदनि नुका लेलकै। आ तहियासँ ई क्रम चलिते रहलै। कुदि–फानि कऽ आएल आ बड़कीमाइक साड़ीक कोंचामे गरदनि पैसाकए उपर–नीचाँ करए लागल। बड़कीमाइ ओकरा कोरामे उठाकए ताबरतोड़ चुम्मा लेबए लगै आ गोलबा बड़कीमाइक स्नेहसँ मुग्ध भऽ जाइक। संसारमे ऐ सँ बेशी सुख ओकरा आर कतौ कखनो नै बुझएलै। ओकरा बड़कीमाइ सभ दिन ममताक समुद्र लगैत रहलै। कहाँदोन सन्तानसँ प्रेम करएबलाक प्रति सन्तानक माए मुग्ध भऽ जाइ छै। ओकर माइ चितकबरी बड़कीमाइक सभ दिन आदर करैत रहलै। जखने बड़कीमाइ कहै— “चितकबरी आह ..आह।” कि ओकर माइ चितकबरी चाहे कतबो दूर किए ने रहौक, कानमे आवाज झरिते चट बड़कीमाइ लग दौड़ि जाइक। आ बड़कीमाइ जेना–जेना इशारा करै कि चितकबरी चुप्पे मुड़ी गोंतने आदेशक पालन करैत जाइक। करौक केना नै? भोरे–भोरे चितकबरी लेल घास, कोराइ आ कहियो काल दालिक कुन्नीक ओरिआओन तँ वएह करैक ने। रौद उगैक तँ बड़का रस्सीमे खुट्टीमे बान्हि ओकरा चरए लेल छोडि दै आ फेर दुपहरियामे चौरीमे लऽ जाइक। आरिक दुबि खाएमे कतेक आनन्द अबै छै से जे खाए सएह ने जानए। तहिना करै गोलबा । ओहो कहियो बड़कीमाइक आदेशक अवज्ञा नै कएलक। हँ, चितकबरी स्थिरसँ अबै तँ ओ दौड़ैत–कुदैत–फानैत कहियो काल जखन बड़कीमाइ कोनो काज –धन्धामे लागल रहै छलि अथवा ककरोसँ बतिआइत रहैत छलि तँ गोलबाकेँ दुलारसँ धकेल दैत छलै। मुदा गोलबा ताधरि जान नै छोड़ैत छलै जाधरि बड़कीमाइ ओकरा उठाकए चुमि नै लै छलै। चितकबरी बड़कीमाइ आ गोलबाक सिनेह देखि मुग्ध रहैत छलि। ओ सभ दिन गोलबाकेँ सिखबैत रहलि जे जननाहरिसँ पोसनाहरि बड़की होइ छै। आ ओ तैँ सभ दिन बड़कीमाइकेँ अपन माइ चितकबरीसँ उपरे देखलकै। सोनी आ मोनी तँ गोलबा लेल अपन जाने न्योछारि देने छलि। नामो तँ ओकरे सबहक देल रहै ने। गोलबा जनमलै तँ गोल, गुटमुटाएल आ लेपटाएल रहै कहाँदोन आ तँए ओकरा सोनी–मोनी ‘गोलबा’ कहि देलकै। ओकर नामाकरण अहिना भेल रहै। पहिल बेरसँ लऽ कऽ बहुत दिनधरि साँझु पहर, रातिमे आ सुति–उठिकए ओ सभ ओकरा ओकर माइ चितकबरी लग लऽ जाइक आ मुँह पकड़ि कए थन छुअबै। गोलबा मस्त दूध पिबए लागए। दिनोमे ओकरा मोनसँ कुद–फान कहाँ करए दै ओ सभ। भरि दिन कोरामे लदने छी, लदने छी। तहिया गोलबाकेँ नीक नै लगै। मोन होइक जे छोड़ितए तँ कुद–फान करितए। मुदा बादमे जखन ओ नम्हर भऽ गेल तँ रहि–रहि कए मोन होइक जे कने सोनी–मोनी ओकरा कोरमे उठैबितै। सोनी–मोनी ओकरा लेल सुतए लेल ओछाओन आ पहिरए लेल मिरजइक व्यवस्था कएने रहै। ओ मुति दै तँ ओ सभ बड्ड पिताइक। रातिमे उठा–उठा कए पेसाप कराबए लऽ जाइक। गोलबाकेँ तामस होइक। ओ की जानए गेलैक जे ओकरा मुतक छै, पेसाप लागल रहै तँ ने। जखन पेसाप लगै ओ उठिकए गड़गड़ा दै। ... सोनी–मोनी ओकरा अपने कोठरीमे सुतबै। बड़कीमाइ कए दिन कहलकै जे ओकरा चितकबरी लग पथियासँ झाँपि दौक। मुदा सोनी कहै जे कहुँ हुराड़ लऽ जएतै तखन? आ ओ सभ एक बरख धरि गोलबाकेँ अपने कोठरीमे सुतबिते रहि गेलै। ओ नम्हर भेलै तँ चट्टीमे गहुमक भुस्सा भरि कए ओ सभ ओछाओन बना देने रहै। आमक पात, दुबि, रामझिमनी आदि गोलबाक प्रिय भोजन रहै। सोनी–मोनी चाउर भुजि आेइमे करु तेल सानि कऽ खुअबै छलै। गोलबा मस्तसँ खाए। कहै जे ऐ सँ देह मोटाइ छै। गोलबाकेँ लोक मोट आ कसगर कहै तँ बड्ड आनन्द अबै। आ तँए ओ चपर–चपर कऽ खाइक। गेरुका मेला लगलै तँ सोनी–मोनी मेलासँ फुदना अनने रहै आ लाल, हरियर, कारी फुदना ओकरा गरमे बान्हि देने रहै। कहै जे लालसँ शक्ति बढतै, हरियरसँ तन्दुरुस्ती आ कारी रहलापर ककरो नजरि नै लगतै। जेना–जेना ओ बढ़ैत गेल बब्बू ओकर दोस बनैत गेलै। शुरु–शुरुमे ओ अपन दीदी सबहक संगे आगाँ–पाछाँ करैक। मुदा बादमे बब्बू ओकरापर बेशी धियान देबए लगलै। जखन–तखन ओकर देह सेहारै। कतौ, कनेको, कोनो दाग नै लगबाक चाही। कनेको किछु लागि जाइक तँ ओ तुरत साफ करै, देह मलै आ पोछ–पाछ करैक। .... एकदिन पेठियासँ चारिगोट घुंघरुबला पट्टा किनि बब्बू ओकर गरमे सोनी–मोनीक फुदना संगहिं बान्हि देने रहै। गोलबाकेँ अपन गर कनेक भारी जकाँ लगलै आ कुद–फानमे सेहो असहज भऽ गेलै। घुंघरुक आवाज कानमे झर दै। कर्कश लगै। गोलबा मुड़ी हिलाकए पट्टा निकालक प्रयत्न कएलक मुदा ओ निकलएबला थोड़े रहै। उन्टे कान फाड़ए लगलै। आब तँ दौगएमे पछिलका पएरपर ठाढ़ भऽ कऽ गरदनि आ आँखि टेढ़ कए धाही मारएमे सेहो असोकर्य होमए लगलै। मुदा करो की ? अपने निकालि सकैत नै अछि। भगवान बोली तँ देने छथिन्ह मुदा सहज भाषा नै जे ओ बब्बूकेँ सम्झाबए सकओ। अन्ततः मन मसोसहि पड़लै। गोलबाक सिंघ जनमए लगलै तँ माथपर कुरिऐनी धऽ लेलकै। ओ दाबा, खम्हा, आड़ि जहाँ पाबए माथ रगड़ए आ धाही मारए। बब्बू आब ओकर माथकेँ पकड़ि कए ठेलए लगलै। ओकरा नीक लगै। ओ छड़पि कए पछिला टांगपर ठाढ भऽ बब्बूक हाथपर धाही मारए लागल। बब्बू आ गोलबाक नित्य कर्ममे इहो एकगोट अभ्यास जुड़ि गेलै आ तकर बाद तँ ओ लड़ाका बनि गेल। दुपहरियामे बब्बू ओकरा गाछीमे टहलाबए लऽ जाइ आ ओतए ओकरा कएटासँ भिड़ए पड़ै। बेशीकेँ ओ लगले भगा दै मुदा एक दिन ओ हारही लागल छल। ओ तँ बब्बू जे चलाकीसँ ओकरा जिता देलकै। ततेक जोड़सँ ने जोश बढ़ओलकै जे विपक्षी डरे भागि पड़ा गेलै। मुदा तीन दिन धरि ओकर सिंघ लग माथ दुखाइते रहलै।
नै जानि किएक एकाएक घरमे भीड़–भाड़ बढ़ि गेल रहै। बड़कीमाइ एकदिन बुढ़िया दाइकेँे बजौने रहै आ तकर लगले दोसर दिन सभ दर–देआद सबहक जमघट भेल रहै। गोलबाकेँ घरक गतिविधि किछु विशेष तँ बुझएलैक मुदा ओ किछु बूझि नै सकल। ओ देखि सकैत अछि। प्राकृतिक रुपसँ ओकरा अपना लेल आवश्यक विषयमे भगवान बुझक जतबे सामर्थ्य देने छथिन्ह ओ ततबे ने बुझत। ओ अपन दिनचर्या कऽ सकैत अछि, अपन प्रतिक स्नेह आ बजारल चोटकेँ छू सकैत अछि मुदा दोसरक छुपल भाव वा मनुखक भाषायी अभिव्यक्ति ओकर प्रकृति प्रदत्त सामर्थ्यसँ फाजिलक विषय छै। तैँ घरमे की चलि रहल रहै ओ बूझि नै सकल। हँ गोलबाप्रति स्नेह किछु बेशीये बढ़ि गेल रहै। ओना गोलबाकेँ कियो ऐंठ–काँठ खाए नै देलकै। शुरुएसँ कोनो घाओ–घौस नै होउक, कतौ कटाउक नै तकर ख्याल सभ कियो रखैत अएलैक अछि। मुदा अखन ओकर खान–पानपर पहिनेसँ किछु आर विशेष धियान राखल जा रहल छलै। ... एक दिन पुरहित अएलखिन । बड़ी काल धरि पतरा उनटबैत रहलखिन। जाए काल बड़की माइ बहुते रास चाउर दालि, अल्लू आ नूनक संगहि किछु टका सेहो देने रहै। आ तकर बाद घरक नीप–पोत, हाट–बजारक गतिविधि बढ़ि गेल रहै। दसे दिनक बाद घरमे ढ़ोल–पिपही बाजए लगलै। साँझखन कऽ गोसाँउनि–घरमे कनियाँ–मनियाँ आ बुढ़िया दाइ सबहक जमघट तथा गीतनाद होमए लगलै। बब्बूकेँे आगाँ राखि नै जानि कतेक विध-वाध कएल गेलै। ढोल–पिपही आ गीतनादसँ ओकर कान भारी भऽ गेल छलै। मुदा तैयो सभ किछु रमनगर लगै। बब्बू हर्षित रहैक तैँ। ओइ दिन भोरेसँ भीड़–भाड़ रहै। गोसाउनि–घरमे पूजा–पाठ भेलै। ओही क्रममे गोलबाकेँ दू गोट छौंड़ा पकड़ि कए पोखरि लऽ गेलै आ नहा देलकै। बड्ड जाड़ भेलै गोलबाकेँ। माघ महीनाक जाड़ आ ठरल पोखरिक पानि। छौंडा सभ सोझे पोखरिमे बुड़का देने रहै। बेचारा गोलबा मेमिआए लागल, पैखाना–पेसाप सभ भऽ गेलै। डरे प्राण निकलए लगलै। विवश गोलबाक गर लागि गेलै। ओ बब्बूक स्मरण कएलक। अखन बब्बू रहितै तँ एना होइतै? .... छौंड़ा सभ ओकरा कोरमे उठओने गोसाउनि–घरमे लऽ गेलै आ बब्बू लग ठाढ़ कऽ देलकै। तखन जा कऽ ओकर प्राण पलटलै। बुझएलै जे ओकरो ऐ समारोहमे सहभागी बनाओल जा रहल छै। ओ चारु भर देखए लागल। जाड़े देह थरथराइ मुदा तैयो ओ अपनाकेँ स्थिर करक पूरा प्रयत्नमे लागि गेल। ओ अपनाकेँ स्थिर करएमे लागले रहए कि पण्डितजी जोड़–जोड़सँ मन्त्र पढलखिन आ बब्बू ओकर माथपर अक्षत, फूल आ पानि ढ़ारि देलकै। माथ सर्द भऽ गेलै आ केशमे अक्षत फूल घुसिआ गेलाक कारणे ओकरा कुरिअइनी लागि गेलै। ओ जोड़सँ अपन माथ झटकए लागल। पण्डितजी जय भगवती, जय माते चिचिआए लगलखिन। बब्बू पाछाँ हटि गेलै। एक गोटे पाछाँसँ ओकर दुनू पएर पकड़ि लेलकै। दोसर ओकर गर्दनिपर हाथ फेरए लगलै। .... आ .... छपाक…।
आहिरो, ई की भेलै? ओ तँ अपन घरसँ अलग भऽ गेल अछि। आब ने ओ घरसँ अलगे फेकाएल माथमे अछि ने घरेमे। ओ अपन अलग भेल मुड़ीक मुआयना करैत अछि। असह्य पीड़ाक प्रतिबिम्ब छै उनटल आँखि आ दाँत तर दने निकलल जीह। दाँतक दबाब एतेक जे आधा जीभ कटाइये गेल छै। घरोक हालत ठीक नै छै। छिड़िआएल चारु टांग आ तानल धर एकदम कड़ा भऽ गेल छै। ओ अपनाकेँ एकदम हल्लुक पाबि रहल अछि। अनन्त अन्तरिक्षक यात्राक हड़बड़ी भऽ गेल छै। ऐ अनन्त यात्राक कतौ कोनो पड़ावपर ओकरा दोसर शरीर धारण करक छै। नै जानि ओ पड़ाव कतए हएतै? तखने ओ पुनः दुःःख–सुख आ भावनाक संवेगकेँ भोगि सकत। स्वाद आ श्रृंगारक रस पीबि सकत। अथवा अन्य कोनो अनुभूति लऽ सकत। .... गोलबा पुनः एक बेर स्थितिक जायजा लैत अछि। सोनी–मोनी पानि गरमा रहल छै। छौंड़ा सभ ओकर धर छोलए लेल केराक पात आ औजार सभ ठीक कऽ रहल अछि। भन्सीआ सभ बडका कराह आ भट्ठीक प्रबन्ध मिला रहल अछि। बड़कीमाइ कनियाँ–मनियाँ सभकेँ मर–मसल्ला, तेल, पिआउज आदिक बन्दोबस्तमे लगओने छै। पीअर धोती, कुर्ता आ गमछामे मुण्डित माथ नेने बब्बू अपन दोस सबहक संग हँसि–हँसि कऽ बतिआ रहल अछि। दरबज्जापर दर-देआद सभ मस्त खैनी चुनबैत गप्प–सप्पमे लागल छै। चितकबरी नोराएल आँखिसँ अपन पहिल बेटाक धर दिस टुकुर–टुकुर ताकि रहलि अछि। .... ओ कोनो झोंका जकाँ अन्तरिक्ष दिस उधिया जाइत अछि। एकदम निस्पृह भावेँ ई सभ स्वाभाविक छै। ओहो स्वाभाविक रुपेँ प्रकृतिक स्वाभाविक प्रक्रियामे आगाँ बढ़ि जाइत अछि। आब ओ गोलबा कहाँ अछि? एकदन्त हाथी आ नौलखा हार कछमछी छुटिते नै छै। जखनसँ मकवानपुरक सेनगढ़ी दरबार देखि कए फिरलि अछि ओकर मस्तिष्कपर इन्द्रकुमारी छाएल छै। १४ बर्षक इन्द्रकुमारी, बाल राजकुमारी। लगै छै जेना ओ सभ किछु प्रत्यक्ष देखि रहलि हुअए। सोन-चानीक महीन कढ़ाइसँ युक्त चमकैत निच्चाँ तक सोहराइत घघरा, नितम्ब तक लटकल कारी केशमे कलात्मक गुहल चोटीसँ सज्जित माथपर हीरा जड़ित मुकुट, डरकशसँ नापल गोल गिरहसनक डाँड़, बाँहिपर चमकैत बाजुबन्द, हीरा। मोती आ रंगबिरंगी रत्न जड़ित हारसँ सुशोभित कनेक्के उठल वक्ष, कानमे झुमैत झुमका आ कर्णफूल आदि आदि। राजकुमारीक जाज्वल्य सौन्दर्यक काल्पनिक प्रतिमूर्त्ति ओकर मानसपटलपर निरन्तर बिम्बित भऽ रहल छै। ओइ राजकुमारीक दैवी सौन्दर्यक चर्च कोना गोरखा पहुँचल हेतै? सभ किछुमे राजकीय सत्ता तथा शस्त्र शक्तिक बढ़ोत्तरीक योग। ह्रास देखि निर्णय लेबएबला धूर्त्त गोरखा युवराज पृथ्वीनारायण शाह आ ओकर सशस्त्र मण्डली ऐ मादेँ कोना अपन प्रतिक्रिया देखओने हेतै? कोना पहिने राजाक खोपी सभा फेर तकर बाद भारदारी सभा (राजा, रानी, युवराजक व्यक्तिगत कोठरीकेँ पहिने नेपाली दरबारी भाषामे खोपी कहल जाइक। दरबारक सल्लाहकार सभकेँ भारदार कहल जाइक।) मेे मकवानपुरक राजा हेमकर्ण सेनक सुता राजकुमारी इन्द्रकुमारीसँ पृथ्वीनारायणक विवाहक प्रस्तावक योजना बनल हेतै?.. आदि इत्यादि प्रकरण सभक दृश्य सभ ओकरा आगाँ जेना सजीव भऽ एक-एक कऽ आबए लागल छै। ओ फेर करोट बदलैत अछि। ओइ कोठरीमे लगले माय संगहि दोसर चौकीपर सुतलि आ कनेक्के काल पहिने तक फुसुर-फुसुर बतिआइत बड़की भौजी ओकर कछमछी पकड़ि लैत छथिन्ह। “मणिदाइ, निन्न नै होइए? किछु होइए की?” “नै, किछु नै”। भाउजक प्रश्नसँ ओ अकचका जाइत अछि। “तँ ओना किए अहुरिया कटैत छी?”। बड़की भौजी जेना कछमछी ठेकानि नेने रहथिन्ह। “नै, किछु नै होइए। खाली वएह मकवानपुर गढ़ीक दृश्य आगाँ चलि अबैत अछि। हेमकर्ण, इन्द्रकुमारी आ दिगबन्धन सेनक खिस्सा मोन पड़ि जाइत अछि”। ओ अपना प्रति भाउजक चिन्ताकेँ हटाबक कोशिश करैत अछि। मुदा बड़की भौजी अपन स्वाभाविक व्युत्पन्नता छोड़एवाली नै छथिन्ह। चट दागि दैत छथिन्ह- “आ की केओ ओतए मोनमे उतरि गेल अछि? माय, देखथुन्ह, मणिदाइक मोनमे केओ चढ़ि गेल छन्हि। बेटा सभकेँ शीघ्र वर खोजए कहथुन्ह। देखै छथिन्ह, कोना करोट पर करोट फेरै छथिन्ह उ।” माय बुझाइए औंघा गेलि छथिन्ह। ननदि-भाउजक गप्पमे ओ कोनो उत्तर नै देलखिन्ह। मणिकेँ भौजीक एखुनका परिहास नीक नै लगलै। चुप्पे आँखि मुनि लेलक। सोचए लागलि, “खाली बिआहेटा कोनो जीवन छै? बिआह तँ मुदा प्रारम्भ अछि। बिआहक बादक सहयात्रा ने थिक जीवन। की नारी सभ दिन अनचिन्हारे सहयात्रीक प्रतीक्षा करैत रहत? आ कतेको इन्द्रकुमारी अहिना जीवनक यात्राक पहिलुके पड़ाओपर अपन सहयात्रीक प्रतिक्षा करैत त्रासदीक खाढ़िमे ढकेल देल जाएत। आ ओकर सहयात्री सभ ओकरा अनभुआर जंगलमे एसगर ठाढ़ कए भगैत रहत। संग नै देबक लेल अनर्गल आ अनसोहाँत असम्भव शर्त सभ आगाँ बढबैत रहत? बेटी सभ अहिना चीज-वस्तु जकाँ निर्जीव नारी बनि तिल-तिल कऽ जड़ैत रहत?” आक्रोश जेना मणिकेँ भीतरसँ अओर छटपटा दैछ। ओ एकबेर फेरो करोट फेरैत अछि। बड़की भौजी प्रायः सुति रहलि छथिन्ह। राति बेशी चढ़ि गेल छैक। ओहो अपनाकेँ शून्य करक यत्न करैत अछि। निन्न हेतु मनसँ बल करैत आँखि मुनि लैत अछि। राजकुमारी इन्द्रकुमारीक कक्ष। पलंगपर बैसलि राजकुमारी। उदास मुदा आँखि आक्रोशित। लालट्रेस। ओ मुँह लड़कओने, ४-५ सखी सभ चारुकात घेरने। ककरो पदचापक ध्वनि अबैछ। सभ साकांक्ष भऽ जाइछ। राजकुमार दिगबन्धन सेन प्रवेश करैत अछि। फिकिरसँ गलल मोनपर उदासी स्पष्ट छै। सखी सभ स्थिरसँ बहरा जाइछ। दिगबन्धन- बहिन उदास नै होउ। निर्णय भऽ गेलै। हमरा सभ अपन बहिनक हेतु सभ किछु न्योछावर कऽ देब। बहिनक भविष्य आ ऐ क्षेत्रक मर्यादाक आगाँ एकदन्त हाथी आ नौलखा हार मूल्यहीन आ तुच्छ अछि। इन्द्रकुमारी दौड़ि कए अपन भायक छातीमे माथ सटाए कनैत- नै भाइ नै। आब सेन राज्य अओर मानमर्दित नै हएत। बहुत भऽ गेलै। एकदन्त हाथी आ नौलखा हार हमरा अहाँक नै ऐ राज्यक सम्पत्ति छैक। जनताक सम्पत्ति एकगोट राजाक बेटीकेँ दहेजमे नै देल जा सकैत अछि। ओ सभक धरोहर छै। एकदन्त हाथी केओ कमाएल नै अछि, ऐ क्षेत्र विशेषक हेतु प्रकृतिक विशेष आ अनुपम उपहार थिकै। एहन गलती जुनि करब। दिगबन्धन- अपन बहिनक वरकेँ संतुष्ट नै कऽ सकब ई ऐ महाभारतक आगोसक सम्पूर्ण मध्यक्षेत्रक मर्यादाक विपरीत हएत। इतिहासमे हमरा सभकेँ कोसल जाएत बहिन। जे सेन राजा अपन बेटीक द्विरागमन दहेजक अभावमे नै कऽ सकल। जीवनधरि बेटी विवाहोपरान्त नैहरेमे रहि गेल। नै बहिन नै, आब समय नै छैक तैयारीमे लागल जाए। इन्द्रकुमारी- आ ई नै जे सेन राजा अपन अबुझ जमायक अनर्गल मांगक आगाँ झुकि गेल जे सम्पूर्ण राज्यक सम्पत्ति सेनवंश एकगोट बुनल षड़यन्त्रक कारणेँ गोरखाक राजाकेँ विवश भऽ चढ़ा देलकै। हम नै जाएब। हमहूँ अपन सम्पूर्ण जीवन न्योछावर कऽ देब, दुनियाँकेँ देखा देबै जे ऐ क्षेत्रक नारी चीज नै सृष्टिक बीज अछि। मानक माथ आ त्यागक शीर्ष अछि। दिगबन्धन- आह बहिन। एहन जिद्द जुनि करु। भऽ सकैछ ऐसँ ऐ राज्यक सुरक्षापर सेहो असर पड़ए। इन्द्रकुमारी- तँ करु युद्ध, राज्यक अस्मिताक लेल युद्ध करब, आवश्यक पड़लापर शहीद हएब अहाँक धर्म थिक। राज्यक सुरक्षापर कोनो असर पड़ैत अछि तँ उठाउ तरुवारि। हम नारी छी। नारीक अस्मिता हेतु, अपन पवित्रता हेतु अपनाकेँ न्योछावर करब हमर धर्म थिक। नारी सभ किछुसँ दबि जाएत मुदा ओकर पवित्रता, ओकर स्वाभिमान आ नारीत्व ओकर प्राणोसँ बढ़ि कऽ थिकै। हमरा उपहारक वस्तु नै बनाउ भाइ। दिगबन्धन कक्षक चारुकात आहत बाघ जकाँ घुमए लगैत अछि। धम्म दऽ बहिनक पलंगपर बैस जाइत अछि आ ओकर माथ झुकि जाइत छैक। इन्द्रकुमारी- अहाँ तँ अड़ल रहिऐ भाइ, कोना झुकि गेलिऐ? कर्त्तव्यपर बहिनक ममताक छाउर पड़ि गेल अछि। सेन राज्यक राजकुमारकेँ राज्यक गौरव रक्षा करब पहिल काज छैक, बहिनक ममता नै। हम तहिये कहने रही। गोरखाक रीति रिवाज, राज्य प्राप्तिक हेतु किछु करक चलन, ठगी संस्कारक बारेमे सोचि लिअ। लिगलिगक चौरीमे चोरी कऽ बनल राजाक प्रस्तावमे जरुर किछु षडयन्त्र हएत। मुदा हम तँ चौदहे बर्षमे अहाँ सभक बोझ बनि गेल रही। शायद कोनो त्रुटि भेल रहए तैँ एहन खानदानमे हमरा फेकक निर्णय कएल गेल। दिगबन्धन- नै बहिन। ओइ अनजानमे भेल गलतीक कारणेँ हृदएमे अओरो प्रहार नै करु। अपन गलतीक आगिसँ ई अपने दग्ध आ तप्त अछि। अहाँ हमरा सभक गौरव छी। हम सभ तँ उत्तरक सभसँ शक्तिशाली राज्यक रानीक रुपमे अहाँकेँ देखए चाहलौं। इन्द्रकुमारी- शक्तिये प्राप्त कएलाक कारणेँ केओ नीक नै भऽ जाइछ भाइ। गुम्बजपर बैसल कौआ सभसँ नम्हर नै भऽ जाइत अछि। दिगबन्धन- इन्द्रकुमारी, हमर सोनसन बहिन। (स्वरमे किंकर्त्तव्यविमूढ़ता स्पष्ट अछि।) इन्द्रकुमारी- एकदन्त हाथी आ नौलखा हार दैयो देलापर अहाँक बहिन खुश रहत, निर्बाध सासुर भोगत तकर कोनो निश्चित ठेकान छै? काल्हि कतौ अओर किछु नै मांगि लिअए? सभसँ पहिने ओ सभ विवाह होइते चतुर्थीयोसँ पहिने बरिआतीये संग बिदागरीक मांग कएने रहए। हमरा सभक रीति रिवाजपर अपन चलन लादक कोशिश कएने रहए। एकरा संस्कृति आ परम्परापरक आक्रमण बुझू। आब दहेज मंगैत अछि, अड़ाकए। काल्हि फेरो कोनो नया बहन्ना खोजि लेत। भाइ, हमरा तँ बुझाइत अछि ओ ऐ औपचारिक वैवाहिक सम्बन्धक लाभ उठाए राज्यपर चढ़ाइ कऽ देत। एखन झुकक नै तनक समय थिकै, भावनामे नै कर्त्तव्यमे बहक बेर छैक ई। बहिनसँ पहिने मातृभूमिक रक्षाक चिन्ता करु। दिगबन्धन उठि जाइत अछि। ओकर गाल लाल भऽ गेल छैक। बान्हल मुठि ऊपर उठि जाइ छै। दिगबन्धन- एकदम ठीक कहलौं बहिन। अहाँक साहससँ हम गौरवान्वित आ प्रेरित छी। बाबूसँ एखने निवेदन करैत छिअन्हि। ( तीव्र डेगेँ बहरा जाइत अछि।) इन्द्रकुमारीक आँखि क्रोध आ आक्रोशसँ लाल भऽ गेल छै। बुझाइत छै जेना बाहर निकलए लेल आरत होइक। ओ अपन कसल मुठिसँ घघरा उठा कए दाँत कटकटबैत झारि दैत अछि। मणि धड़फड़ा कए उठल। मुठि ओकरो कसल रहै। बड़की भौजी तखने प्रवेश करैत रहथिन्ह। अपना हिसाबेँ अर्थ लगाइये लेलखिन्ह, “मणिदाइ, सपनाइत छलौं? सुतलमे कसैत देह देखिते हमरा बुझा गेल छल। देह दुखाइत हएत”। फेर हँसैत कहलखिन्ह, “बादक इन्तजाम तँ भाय सभ करताह। छोटकी चाय बना नेने अछि। नेने अबैत छी।” मणि किछु नै बाजलि। बड़की भौजी बाहर निकलि गेल रहथिन्ह। ओ पलंगसँ चुपचाप उतरि ब्रशमे पेस्ट लगाबए लागलि। जगदानन्द झा “मनु”' चोनहा ऋतु राज वसन्तक मास। नै जाड़, नै गर्मी, चारुकात बाड़ी-झाड़ी फूलसँ लदल। सेरसोँक पिअर-पिअर फूलसँ खिलाएल खेत, जेना कोनो चतुर कलाकार द्वारा बनाएल गेल अनुपम कलाकृतिक सुन्नर नमूना हुअए। गृहस्थक खेत-खड़िहान गहुमक बोझसँ भरल, मानू साक्षात् लक्ष्मी हँसि रहल छथि। आंगनमे रौद लगाबैक हेतु गहुमक बोझ खोलि-खोलि कs पसारल। भोरक मन-मोहक रौद तइ ऊपर छितरल। ओइपर घरक स्त्रीगन एवं धिया-पुता सभ विराजित, अमृतमय रौदक आनन्द लैत, प्रकृतिक अमृत लुटैत। ओइ पसरल गहुमक डाँटपर करीब दस वर्षक मासूम संजय अपन दुनु हाथे माँथ कसि कऽ पकड़ने, असहाय, माथक पीड़ासँ कराहैत छटपटाइत। ओइ असहाय दर्दपर सँ ओकर माय रहि-रहि कऽ कहैत- "जलखै कए ले नऽ, कतेक बेर भऽ गेलौ।" असहाय माथक दर्दक पीड़ा, कष्ट, ओइपर सँ मायक रहि-रहि कऽ जलखैक आग्रहक कानमे आबैत शब्द। संजयकेँ ई शब्द सुनि अओर बेसी माथ पीड़ासँ फटए लगै। मुदा मायकेँ धनसन। हुनका जेना संजयक असहाय पीड़ाक कोनो अनुमाने नै। ओकर कष्टपर किनको ध्यान नै, किएक तँ ई ओकर नित्यक कथा रहै। जेना-जेना सूर्यक तेज बढ़ल जाए तेना-तेना ओकर माथ अओर अधिक पीड़ासँ फाटल जाए, ओकर छटपटेनाइक गतिमे वृद्धि भेल जाइ। कखनो ओकर बाबीकेँ नै देखल जाए तँ एक चुरुक करु तेल माथमे होंसैत देथिन, ओइसँ ओकर माथक पीड़ामे तँ कोनो अंतर नै होइ मुदा दुनु आँखिक कोरसँ नोरक धार बहए लगै। शाइद दर्द एवं पीड़ाक अधिकतासँ अथवा बाबीक हाथक स्नेह स्पर्शसँ। दाँतसँ अपन ठोरकेँ कटैत जेना दर्दकेँ अंदर समेटक कोशिसमे असफल, सभक रहितो अनाथ, स्नेहक आ दुलारक अनाथ। जानलेबा दर्द, ई आइ-काल्हि ओकरा सभ साल होइ छै। जँ कहबै भरि दिन, भरि राइत, सेहो नै। भोरे रौदक तीव्रताक संग-संग ओकर माथक दर्द बढल जाइ छै, आ दुपहड़ियाक बारह-एक बजे बाद जेना-जेना रौदक तेज कमल जाइ छै तेना तेना ओकर दर्द कम भेल जाइ छै। बेर खसैत-खसैत एकदम ठीक, फेर अगिला दिन। ई ओकर नित्यक क्रम, मुदा घरमे कियो कान-बात दैबला नै। उलटे कियो कहैत- "हूँ पढ़ैक दुआरे बहाना करैए।" कियो कहैत- "काज करै दुआरे बहाना करैए।" एनाहियो अपन मिथिलाक कनियाँ-दाइ सभकेँ झगडा-निंदापर बेसी ध्यान रहैत छनि, अपन बाल-बच्चापर कम। पिताकेँ बाहर कमेनाइयेसँ फुरसैत नै, जे कतौ देखेथिन कि चेक करेथिन। फुरसैत ककरा लग रहै छै, ओहेन उइक्त रहबाक चाही, धिया-पुतासँ स्नेह रहबाक चाही, अपन बच्चाक प्रति अपन कर्तव्यकेँ समझबाक चाही। खाली मारने-पीटने, खिसियौने बुझु अपन कर्तव्यक इत्तीश्री भऽ गेल से नै। संजयकेँ ओइ कष्टकारी पीड़ा एवं दर्दकेँ सहैत दू वर्ष अओर व्यतीत भऽ गेल। दर्दक अधिकता आ भयंकरतामे दिनो-दिन वृद्धिये होइत रहलै। परन्च ओकर बाबीक एक चुरुक करु तेलक अलावा कोनो आन उपचार नै। संजयक पिता पापी पेट भरै लेल महानगर दिल्ली प्रवास कऽ लेला। किछु महिना बाद अपन छोट भाइ अर्थात संजयक पित्तीकेँ समाद देलखिन- "हमर स्त्री-धिया-पुताकेँ नेने आउ।" संजयक बाल मोन बहुत प्रसन्न भेलै। एक अपन बाबूजी लग जाएब, दोसर दिल्ली। ओहू सभसँ बेसी खुसी रेलपर बैसबाक। ओइसँ पहिले कहियो रेल देखनेहों नै। अपन दू वर्षीय छोट भाइकेँ कोरामे नेने आ समतुरिये माँझिल 'अनुज'केँ संग लेने भरि गाम खुशीसँ सभकेँ नोतैत- “'हम दिल्ली जाएब, हम दिल्ली जाएब।" ओ शुभ दिन आएल, संजय तीनू भाँइ, माय, पित्ती संगे दिल्ली आएल। नव लोक, नव जगह संजयकेँ बड़ नीक लगलै। सभ गोटे अपन-अपनमे व्यस्त भऽ गेल। संजयक पिता अपन नोकरीमे, माय घर-आंगनक काजमे। संजय दुनु भाँइकेँ स्कुलमे नाम लिखा गेलै। दिल्लीक गर्मीमे संजयक माथक पीरा अओर बेसिए वृहद् रूप लऽ लेलकै। जतए गाममे वर्षमे एक बेर कष्टदायक पीड़ा होइ छलै, ऐठाम वर्षमे दू बेर होबए लगलै, छ: छ: महिनापर। फरबरी-मार्च महिनामे जार खत्म भेलापर गर्मीक आगमनक संगे, आ अक्टूबर-नवम्बरमे गर्मी खत्म भेलाक बाद जाड़क आगमनक संगे। ऐठाम एलाक दोसरे वर्षमे एहन भऽ गेलै जे संजयकेँ घरसँ बाहर रौदमे निकलैत डर लगै। डर की, रौदमे जाइते देरी माथ दर्दसँ फाटऽ लगै। ओकर व्याकुलता-व्यग्रता देखि माय-बाबु पुछथिन- "कि होइ छौ? मोन ठीक छौ?" "बहुत जोर सँ माथ दुखाइये।", संजय एतबे कहि कऽ रहि जाए। माथ दर्दक कोनो सामान्य गोटी दएय देलासँ तत्काल दर्द ठीक भऽ जाए। संजयकेँ अपना बुझि पड़ै जेना दर्द रूपी आगिमे पानि पड़ि गेलै। मुदा दू-तीन दिन बाद ओहिना पहिलुका क्रम शुरू, जँइ-जँइ रौद बढ़ल जाइ तँइ-तँइ ओकर माथक दर्द बढ़ल जाइ। संजयकेँ अत्यधिक पीड़ा एवं कष्टसँ दुखी देख ओकर बाबूजी कहितथिन- "काल्हि चलि जइहेँ, काकासँ दबाइ लऽ लिहेँ।' ओकर काका एकटा डाक्टर लग कम्पोंडरी करै छलखिन। तैं किएक अपने लऽ कऽ कोनो डाक्टर लग जाइतथिन जे ई लगातार एतेक वर्षसँ किएक माथक दर्द होइत छै, की कमी छै, की दिक्कत छै, मुदा नै, कि माय कतौसँ देखा ऐबतथिन, मुदा नै। संजय अपन अनुजक हाथ पकड़ि चलि जाए काका लग। काका सेहो दुनु बच्चाकेँ देख बड खुश होथि, बिस्कुट टॉफी कीन कऽ दय देथिन, एक दू रुपया नगदो दय देथिन, बस बाल-मोन तइमे खुश। संजय अपने तँ काकासँ किछु कहियो नै सकैन, अनुजे काका सँ कहनि- "काका यौ, भाइजीक माथ बड दुखाइत रहै छन्हि।" "हँ। किए?"- माथ छुबैत काका कहथिन। माथ ऐ दुआरे छुबथिन कि बुखार-तुखार नै होय, मुदा बुखार नै रहै। "कहिया सँ?"- काका पुछथिन। "सभ दिन दुखाइत रहैए, बड तेज। भोरे जतेक रौद तेज भेल जाइ छै ओतेक बेसी दुखाइए।" ऐबेर संजय अपने बाजल, धिया-पुता ऐसँ बेसी कि कहतै? ओनाहूँ संजय बाजैमे बड़ कम। खास कऽ बाप-पित्तीसँ तँ अओर कम। लाजे बुझु या धाखे अथवा डरो कहि सकै छी। घर-अंगनाक वातावरणक असर धिया-पुताक मस्तिष्कपर पड़िये जाइ छै। "बस"!- काका अपने कोनो डिब्बासँ एक मुठ्ठी गोटी निकालि कऽ दऽ देथिन। दू-तिन दिन दवाइ खेलासँ दर्द बिलकुल ठीक। जतए आन-आन वर्ष दू-अढ़ाइ महिना दर्द रूपी राक्षसक सामना करए पड़ै, ओतए ऐ बेर दस-पन्द्रह दिनक तकलीफक बादे दवाइ खेने ठीक भऽ गेलै। समय एलै-गेलै। फेर अगिला साल ओहे खिस्सा। पहिलेसँ बेसी विकराल रुपे संजयक माथक दर्द शुरू, मुदा किनको कोनो ध्यान नै। फेर ओ अपन बाबूजीक कहला उपरांत काकासँ दवाइ लऽ अनलक। दू-चारि दिन खेला बाद दर्द ठीक। आब तँ ईहे निअम भऽ गेलै। समय आबै- जाए, संजयोकेँ अपार पीड़ा लऽ कऽ माथक दर्द आबै, गोटी खाए, ठीक भऽ जाए। दिल्ली एला सेहो तीन वर्ष भऽ गेलै मुदा ओकर माथ दर्दक कोनो स्थाइ इलाज नै। स्कूलमे संजय पढाइमे बड तेज। आब ओ वर्ग सात पास कऽ वर्ग आठमे प्रवेश केलक। पँचमासँ लगातार सभ साल अपन वर्गमे पहिल या दोसर स्थान आनए। ओकर अध्यापको सभ ओकर खूब प्रशंसा करथिन। मुदा ओ कहियो स्कूलक खेल-कूदमे भाग नै लिअए, किएक तँ स्कुलमे अक्सर सभ बैट-बॉल खेलाइ, मुदा ओकरा बैट-बॉलक खेलमे बॉल सुझबे नै करै। तैं ओ की खेलेतै? की बॉल पकड़तै? ओकर खेलाइक स्तर निम्न भऽ जाइ तैँ ओ खेलेबे नै करए। मुदा ई बात ओ नै बुझि पेलक या नै अनुभव कऽ सकल जे ओकरा बहुत कम देखाइ दै छै। सभ तँ केहन बढियाँ खेलाइ छै तँ ओहे किए नै खेल ? या ओकरा नै बॉल देखाइ दै छै तँ किए नै? अनुभवो कोना हेतै, ई बात माय-बाप या गारजनक अनुभव करै बला छै नै कि बच्चाकऽ, अगर बच्चाकेँ एतेक ज्ञान वा अनुभव भऽ गेलै तँ बच्चा, बच्चा किए कहेलक? ऐ वर्ष जहियासँ संजय वर्ग आठमे प्रवेश कएलक तहियासँ तँ ओकर आँखि दिनपर दिन अओर बेसिए कमजोर होबए लगलैए। स्कुलमे ओ सभसँ अगिला बेंचपर बैसैत छल मुदा आइ आबैमे किछु विलम्ब भऽ गेलै तैं दोसर पंक्तिक बेंचपर बैसऽ पड़लै, मुदा ओइ ठामसँ ओकरा ब्लैक बोर्डपर लिखलाहा देखेबे नै करै। ओ अपन अध्यापक द्वारा देल गेल किछो सवाल नै कऽ पेलक। आइ ओकरा अपना अनुभब भेलै जे ओकर आँखि कमजोर छै, कमजोर नै बड्ड कमजोर छै। ओ अनुभव केलक जे आन-आन बच्चा पाँचम-छअम पंक्तिक बैंचसँ बैसल सवाल कऽ रहल अछि मुदा ओकरा दोसरे पंक्तिसँ ब्लैक बोर्ड नै देखा रहल छै। आइ ओकरा ज्ञात भेलै जे ओकरा क्रिकेटक बॉल किए नै देखाइ दै छै। आइ ओ अनुभव केलक जे ओ बसपर किए नै चढ़ि सकैए। किए तँ ओकरा बसक नम्बरे नै सुझै छै। आइ ओकरा अनुभव भेलै जे ऐ साल वर्ग सातमे पिछुलका सालसँ कम नम्बर किए एलै? ईहे सभ सोचैत-सोचैत ओकर मस्तिष्कमे विचारक मंथन होइत रहै। कखन घंटी खतम भेलै, कखन मास्टर साब चलि गेलखिन, संजयकेँ किछो ज्ञात नै। ओकर ध्यान तँ तखन खुजलै जखन कि टिफिनक घंटी बजलै। सोचैत-सोचैत ओकर माथो बड्ड जोर-जोरसँ दुखाए लगलै। दर्दक अधिकतासँ ओकर दुनु आँखिसँ नोरक धार बहऽ लगलै। कोनो-ना ओ अपनाकेँ सम्हारैत मास्टर साबसँ छुट्टी लऽ कऽ घर चलि आएल। घर अबिते स्कुल बैग एक कात फेक चौकीपर मुँह नुका कऽ सुइत रहल, कखन ओ निन्द पड़ि गेल ओकरा कोनो ज्ञान नै। घरमें कियो नै। बारह बजे माय कतौसँ गप्प-सप्प कऽ कए एली तँ संजयकेँ सुतल देखलन्हि। निन्दसँ उठेलीह, तावत ओकर दर्द आ मोन दुनु स्थिर भऽ गेल रहै, खेलक-पिलक, दिन बित गेलै। साँझ खन पढै लेल बैसल तँ आइ ओ अनुभव केलक जे किताबपर ओ एतेक झुकि कऽ किए पढैए। जतए कि आन-आन बच्चा सभ पलथा मारि एकदम सोझ बैस कऽ पढ़ि रहल अछि। आब ओ पढत कि ओकर मस्तिष्क किछु दोसरे सोचैमे लागल छै। आइ ओकरा ज्ञात भऽ गेलै कि ओकर आँखि कमजोर छै। आब ओ करत तँ करत की? गुन-धुन, गुन-धुन करैत समय व्यतीत केलक। अगिला भिनसर संजय सभ दिन जेकाँ सुति कऽ उठल। रवि दिन रहै, स्कुल बन्दे, बच्चा सभ टेलीविजन देखैमे लागि गेल, संजय सेहो टेलीविजन देखए लागल। ओकरा बहुत लगसँ टी. वी. देखैक आदत छलै। ई ओकर मजबुरी रहै, किए तँ दूरसँ ओकरा टी. वी. नै देखाइ। मुदा बच्चाक ज्ञान, ओ अपने ऐ बातकेँ नै बुझै आ आगुएसँ टी.वी. देखए। माय-बाबु ऐ बातकेँ किए नै ध्यान देथिन से तँ आब ओहे सभ जानथि। टी.वी. देखै कालमे किछु छन बाद अनुज आबि संजयक आगू बैस रहलै। शाइद संजयकेँ नीकसँ सुझैत रहितै तँ अपने पाछू बैस रहितए। मुदा ओ विवश छल, ओकरा पाछू भेलासँ टी.वी. सुझबे नै करतै, तैं ओ अनुजसँ पाछू होइ लेल कहलकै। ओहो बच्चा, बच्चाक जिद्द। नै पाछू भेल दुनु बच्चामे झगड़ा भऽ गेलै, एतवामे माय संजयकेँ कान ऐंठ कऽ एक चटकन मारैत कहलखिन्ह- "ई चोनहा हरदम झगड़े करैत रहत, छोट भाइ छै, आगुए बैस रहलै तँ की भऽ गेलै। पाछुए भऽ जो।" आब तँ संजयक दुनु आँखिसँ नोरक गंगा-यमुना बहए लगलै। ओकर कान मायक कोनो शब्द नै सुनलकै, खाली ओकर कानमे बेर-बेर "चोनहा" शब्द गुंजय लगलै। आ ई चोनहा ओकर प्राचीन नाम छै, जखन-जखन ओकरा अपन मायक क्रोधक सामना करए पड़ै तखन-तखन ओकरा ऐ चोनहा शब्दसँ विभूषित कएल जाइ। आन दिन कोनो बात नै किए तँ ओ चोनहा शब्दसँ अनभिज्ञ छल मुदा आइ ओकरा चोनहा शब्दक ज्ञान भs गेल रहै, ओकरा कम सुझै छै तकर ज्ञान भऽ गेल रहै। तइ लऽ कऽ ई चोनहा शब्द ओकर हृदएमे शीसा जकाँ भोकए लगलै। मायो ओकरा चोनहा कोनो करणे कहथिन्ह किएक तँ आँखिक अधिक कमजोर भेला कारणे संजयकेँ कोनो वस्तु देखैक हेतु आँखिपर बेसी जोड़ देबए पड़ैक। तइ अवस्थामे ओकर आँखिक दुनु पपनी सिकुड़ि कऽ अधिक समीप भऽ जाए। ई बात ओकर माय देखथिन्ह आ तइ कारणेँ ओकरा चोनहा नामसँ अलंकृत कऽ देलखिन्ह। मुदा ओ एना अपन आँखिकेँ किए करैए, ऐ बातपर किए ध्यान देथिन? जखन मायेकेँ अपन बच्चाक प्रति ई जिम्मेवारी तँ आनक कि बात, जखन मालिए अपन लगाएल गाछकेँ उखाड़त तँ ओइ गाछक भविष्य कतए रहतै? ………….. संजयक मोन सैदखन ऐ सोचमे लागल रहै जे आब एकर कि उपाय हुअए। एक तँ माथक दर्द पहिनहिये छह-सात वर्ष सँ हरान केने, तइपर सँ ई आँखिक कमजोरी। किए तँ आब ओकरा अपन कमजोर आँखिक ज्ञान भऽ गेलै तइ कारण सैदखन ओकर मोन ओइ चिंतामे लागल रहै। आब ओ कि कऽ सकैए, गामसँ दिल्ली आएल तेरह-चौदह वर्षक बच्चा। नै किछु बुझल नै किछु ज्ञान, नै कोनो अस्पताल देखल, नै कोनो डाक्टरक पता। माय-बाबुसँ साफ-साफ ऐ बारेमे बात करए सेहो नै, ओकर मोनमे धाख वा डरक मिश्रित भाव एवं कनी कोनो कोनमे स्वाभिमानक भावना सेहो। ऐ गुण-धुन, गुण-धुनमे तीन महिना अओर बीत गेलै, कोनो उपचार नै। स्कुलमे त्रिमासिक परीक्षा भेलै। परीक्षा-परिणाम ओकर स्तरसँ निम्न रहलै, तैयो ओकर माय-बाबुक कोनो प्रतिक्रिया नै जे सभ वर्गमे पहिल-दोसर आबैबला बच्चाक ऐ परीक्षामे अनुरूप परिणाम किए नै एलै। उल्टा दू-चारि टा बात अओर सुनए पड़लै। एतेक कम नम्बर किए एलै तकर जड़ि ताकैबला कियो नै। आब तँ ओकर हालत ई भऽ गेलै जे ओ पढ़ए हेतु बैसऽमे कोताहि करए लगलै, किए तँ आँखि एतेक कमजोर भऽ गेलै जे ओकरा लेल किताब पढ़नाइ असम्भव भेल जाइ। त्रिमासिक परीक्षाक सेहो दु महिना भऽ गेलै। अकस्मात कतौसँ संजयकेँ रोटरी क्लब द्वारा संचालित आँखिक अस्पतालक विज्ञापनक पर्ची हाथ लगलै। तइमे सूचित कएल गेल रहै जे रोटरी क्लब, ब्लोक-३, त्रिलोकपुरीमे निःशुल्क आँखिक अस्पताल खोललक। संजयकेँ ई पढ़ि बड मोन खुश भेलै। ओकर अन्हार मोनमे इजोतक एकटा आशा भेटलै। सभसँ बेसी नीक बात जे ओ अस्पताल ओकर स्कुलक लगे आ निःशुल्क रहै। अगिले दिन संजय स्कुलक छुट्टी भेलाक बाद असगरे पुछैत-पुछैत आँखिक अस्पताल ब्लोक-३ त्रिलोक पुरी पहुँच गेल। ओइठाम ओकरा ज्ञात भेलै जे नव मारीच वास्ते पुर्जा भोरक आठसँ एगारह बजे तक बनैत छै। मुदा आइ तँ एक बाजि गेल रहै। काल्हि भोरे आबैक निश्चय मोने-मोन करैत घर चलि आएल। अगिला दिन भोरे संजय नहा-सुना कऽ स्कुल लेल बिदा भेल अवश्य मुदा स्कुल गेल नै, किताबक बस्ता ब्लोक-दु, त्रिलोकपुरीमे अपन काकाक घर राखि कऽ आँखिक अस्पताल ब्लोक-३ आबि गेल। किछु महिना पहिले तक संजयो सभ ब्लोक-२, त्रिलोकेपुरीमे रहै छल मुदा आब गणेश नगरमे आबि गेल जे किछु एक-डेढ़ किलोमीटर दूर छै। अस्पताल आबि, नव पुर्जाक लाइनमे लागि गेल, लाइनमे लागलाक बाद ओकरा ज्ञात भेलै जे पुर्जा बनेबाक वास्ते दू रुपैय्या देबऽ पड़ै छै जे ओकरा लग नै रहै। ओकर मोनमे किछु दुखो भेलै। स्वयंकेँ सम्हारैत दोसर दिन एबाक निश्चय कऽ ओ ओइठामसँ बिदा भऽ गेल। काका ओइठामसँ स्कूल बस्ता लैत घर आबि गेल। संजयकेँ स्कूल जाइकाल टिफिन बास्ते जे कहियो कऽ चारि-आठ आना पाइ घरसँ भेटै ओइ पाइ कऽ संजय खाए नै, बचा कए राखए लागल। एक सप्ताह बाद ओकरा लग दू रुपैय्या जमा भऽ गेलै। ठीक आठम दिन फेर ओ रोटरी क्लब द्वारा संचालित आँखिक अस्पताल गेल। पहिले जकाँ भोरे-भोरे किताब-कापी काकाक घर राखि कऽ पहुँचल। पाँतिमे लागि दू रुपैय्या देलाक बाद नव पुर्जा बनेलक। पुर्जा बनेलाक बाद डॉक्टरक कक्षमे पहुँचल। डॉक्टर-साब एकटा तेरह-चौदह वर्षक बच्चाकेँ असगर देखते पुछलखिन्ह- "संगे के अछि?" संजय चुप। डाक्टरसाब- "माय-बाबू किनको संगे नेने आउ।" आब संजयकेँ बड्ड मुस्किल भेलै मुदा ओ अपनापर काबू रखैत डॉक्टरसाबकेँ तत्काल उत्तर देलकन्हि- "बाबूजी ड्युटी गेल छथि आ माय गाममे छथि।" हलाँकि ओ ई बात झूठ बाजल जे माय गाममे छथि मुदा डॉक्टर साब ओकर उत्तरमे सत्य देखैत कहलखिन्ह- "अपन बच्चा लेल अहाँक बाबुजी एक दिनक छुट्टी नै कऽ सकै छथि।" "नै डॉक्टर साब, हुनक नव नोकरी छन्हि, छुट्टी करथिन्ह तँ नोकरी छुटि जेतैन।" इहो बात संजय झूठे बाजल, जखन कि ओकर बाबूजी महिनामे पंद्रह दिन छुट्टीएपर रहैत छलखिन्ह, परन्च डॉक्टर साबकेँ एक गोट मासूमक मुँहसँ ई बात सुनि विश्वास आ किछु सहानभूति सेहो भऽ गेलन्हि। "कोनो बात नै, आगू घुसैक कऽ बैसू।" ई कहैत डॉक्टर साब टोर्च वा अन्य-अन्य उपकरणसँ नीक जकाँ आँखिक जाँच कएलाक बाद बजलाह- “आँखि बड्ड कमजोर अछि, तीन दिन आबए पड़त, दू दिन आँखिमे दवाइ पड़त आ तेसर दिन चश्माक नम्बर भेटत।" ई कहैत डॉक्टर साब ओकर पुर्जापर किछु-किछु लिखैत, पुर्जा पेपरवेटक निचाँ दबा पुनः कहलखिन्ह- "जाउ बाहर बैस रहू, सिस्टर आँखिमे दवाइ देती, दवाइ लेलाक बाद करीब एक घंटा ऐठाम बैसब, सिस्टरकेँ कहला बाद घर जाएब, हँ! काल्हि परसू दू दिन अओर अवश्य आएब।" "ठीक छै।"- कहैत संजय उठि बाहर आबि बेंचपर बैस रहल। किछु छन बाद सिस्टर संजयक आँखिमे ड्रॉप दैत- "आँखि मुनि बैसल रहब।" ओकरा तँ आँखिमे दवाइ पड़िते आँखि एतेक दुखए लगलै जेकर हिसाब नै मुदा सहास केने चुपचाप आँखि मुनने बैसल रहल। लेकिन पंद्रह-बीस मिनटक बाद बुझेलै जे माथ एकदम शांत स्थिर भs गेल हुअए। किछु समय बाद सिस्टर आबि एक बेर फेरसँ संजयक आँखिक जाँच केलाक बाद ओकर दुनु आँखिमे दू-दू बूंद दवाइ दैत पहिले जकाँ आँखि मुनि कऽ बैसबाक निर्देश दैत चैल गेलि। ऐबेर पहिलेसँ किछु कम आँखि दुखेलै। करीब आधा घंटा बाद सिस्टर आबि संजयक आँखिक जाँच करैत कहलखिन्ह- "ठीक छै, आब जाउ काल्हि भोरे आठ बजे आएब।" "अच्छा !"- कहैत संजय उठि बिदा भऽ गेल, पुनः अपन काका ओइठामसँ बस्ता लेलक आ अपन घर आबि गेल। अगिला दिन संजय फेरसँ अस्पताल गेल, डाक्टर साब फेरसँ ओकर आँखिक जाँच कएलखिन्ह आ पहिले दिन जकाँ सिस्टरसँ आँखिमे दवाइ दिया कऽ आबि गेल। तेसर दिन अस्पतालमे डॉक्टर साब संजयक आँखिक भिन्न-भिन्न तरह लेंशसँ जाँच कएलाक बाद चश्माक नम्बर बना एकटा पुर्जापर लिख पुर्जा ओकर हाथमे दैत कहलखिन्ह- "ई अहाँक चश्माक नम्बर अछि, माइनस तीन, जे ऐ उमेरमे बहुत अधिक अछि आ अहाँक आँखिक खराबीक गति एखन बहुत अधिक अछि। तइ हेतु आइये जा कऽ चश्मा बनबा लेब आ सैदखन पहिरब। आ हँ, एक बात अओर जे छ महिना बाद आबि फेरसँ आँखिक जाँच करबा लेब, जइसँ ई ज्ञात चलत की आँखिक खराबीक गति कम भेलै, स्थिर भेलै वा बढ़ि रहल अछि।" "अच्छा जाइ छी।"- अपन दुनु हाथ जोड़ि संजय डॉक्टर साबसँ आज्ञा लेलक। "ठीक छै, जाउ।"- डॉक्टर साब बजला। संजय घर चलि आएल मुदा ओकर मोनमे एकटा नव द्वन्द्व मचए लगलै। चश्मा ! -"चश्मा कतए बनतै? कतए चश्माक दोकान छै? कमसँ कम डेढ़-दू सय रुपैयामे चश्मा बनत, ई डेढ-दू सय रुपैया कतएसँ आएत?" अओर आन-आन प्रश्न सभ ओकर मस्तिष्कमे एकक बाद एक समुद्रक हिलकोर जेकाँ आबै जाइ। "की करू? कोना करू? की बाबूजीकेँ कहि दिऐन, जइ चश्माक नम्बर अन्लौंहें से चश्मा बनबा दिअ, नै-नै, कोना कहबनि? की कहबनि? नै कहबनि तँ चश्मा कतएसँ आएत? चश्मा किनै लेल रुपैया कतएसँ आएत? की करु नै करू?" संजय किछु निश्चय नै कऽ सकल। ऐ सभ बिषयमे सोचैत-सोचैत ओकर आँखि लागि गेलै। ओ सुइत रहल। करीब तीन बजे बेरुपहर ओकर निन्द खुजलै। उठल, मुँह-हाथ धो भोजन केलक, परन्च ओकर मस्तिष्कमे चश्माक द्वन्द्व मचले रहै। ओ कतौ किच्छो करए मुदा ओकर दिमाग चश्मेक बारेमे सोचैत रहै। गुनधुन-गुनधुन करैत अंतमे ओ एकगोट योजनाक अंतर्गत निश्चय केलक जे साँझु पहर बाबूजी केँ कहि देतनि। आन कोनो दोसर उपाए ओकरा नै भेटलै। आ शाइद ई बहुत उचित उपाए रहै। साँझुपहर ओकर बाबूजी नोकरीसँ एलखिन्ह। गर्मीक महिना रहै, हाथ-पएर धोला बाद बाहर अंगनामे खाटपर बैसला। जलपान इत्यादि कएलाक बाद इम्हर-उम्हरक गप्प-सप्प होबए लगलै। संजय सेहो जेबीमे चश्माक नम्बर बला पुर्जा लेने हुनके लग जा बैस रहल। संजयक मोन आबो गुनधुन-गुनधुन करै, कहियौन्ह की नै। अंतमे ओ हँ कऽ निर्णय केलक आ अपन सम्पूर्ण हिम्मतकेँ जमा करैत, जेबीसँ पुर्जा निकालि कऽ बाबूजीकेँ दय देलकन्हि। "की छै?"- हलाँकि ओकर बाबूजी पढ़ल-लिखल छथिन्ह, पुर्जापर सभटा लिखल रहै, अस्पतालक नाम-पत्ता, मरीजक नाम उम्र, डॉक्टरक नाम, चश्माक नम्बर आ जारी करै कऽ तारीख, मुदा तैयो बाबूजी पुर्जाकेँ पढ़ैत पुछलखिन्ह। "चश्माक नम्बर।"- संजय अपन माथकेँ निचाँ झुकोने डराइत धीरेसँ बाजल। "ककर?"- बाबूजी पुर्जा पढ़ैत बातकेँ अन्ठाबैत पुछलखिन्ह। "हमर।"- संजय अपन सेफकेँ गरदनिसँ निचाँ घोटैत आगू बाजल- "आइ स्कूलमे डॉक्टर आएल रहैक ओ सभ बच्चाक आँखिक जाँच केलकै, हमरो जाँच केलक, हमर आँखि खराप अछि से कहलक। चश्मा पहिरऽ पड़तै।" हलाँकि संजय ई सभ बात झूठ बाजल मुदा ओ पिता छथि, पढ़ल-लिखल छथि, डॉक्टरक पुर्जा हुनक हाथमे छनि, ओ पढि सकै छलाह जे ई पुर्जा रोटरी क्लब द्वारा संचालित आँखिक अस्पताल त्रिलोकपुरी ब्लोक-३ क छै। मुदा कखन, जखन अपन बच्चा वा बच्चाक स्वास्थ्यक प्रति कोनो रूचि रहितनि। हुनका जेना संजयक बातपर विश्वास भऽ गेलन्हि। विश्वासो भेलन्हि तँ कमसँ कम ई तँ ज्ञात भेलन्हि जे हुनक बच्चाक आँखि खराप छनि। आबो कोनो नीक डॉक्टरसँ कतौ अपनेसँ देखा दिऐक वा डॉक्टर देखने छै तँ चश्मा बनबा दिऐ। कनी मोनमे किछो दोसर रंग हेबाक चाही। एकदमसँ बैसल-बैसाएल किनको ई ज्ञात होइन जे हुनक बच्चाक आँखि खराप छै, एकर प्रमाणिकताक एकटा विशेषज्ञ डॉक्टरक लिखल पुर्जा हुनक हाथमे छनि, ऐ तरहक पिताक मोनमे जरुर किछो भाव हेतैन्ह, आश्चर्यक, विस्मयक, दुखक, तत्पर्यताक मुदा नै, संजयक बाबुजीक ऊपर कोनो तरहक प्रभाव नै, धनसन। हँसैत संजयसँ कहै छथिन्ह -"डॉक्टर सभ एनाहीं कहैत छै, ऐ उम्रमे कतौ आँखि खराप होइ।" तै पर संजयक माय कहितो छथिन्ह -"हँ यौ, एकर आँखि चोनाह लगै छै।" बाबूजी- "अच्छा देखियौ, इम्हर आ।" एकर बाद अपन एकटा आंगुर देखबैत- "ई कएटा आंगुर छै।" संजय- "एकटा।" ऐबेर दूटा आंगुर देखा कऽ बाबूजी -"ई कएटा आँगुर छै।" "दूटा"- संजय धीरेसँ बाजल। "सभ ठीक छै, अच्छा कोनो बात नै। चश्मों बनबा देबौ।"- कहैत बाबूजी पुर्जा जेबीमे राखि लेला। तकर बाद इम्हर-उम्हरक गप्प-सप्प होइत बात खत्म। बात एलै-गेलै। समय बितैत रहलै। संजयक स्कूलक छमाही परीक्षा सेहो खत्म भऽ गेलै। ओकर आँखिक कमजोरीक गति लगातार बढ़ैत रहलै, चश्माक नम्बरो अनला महिनासँ उपर भऽ गेलै मुदा अखन तक ओकर चश्मा नै बनलै। संजयक छोटका मामा सेहो गणेश नगरमे संजयक घरसँ किछुए दूरपर रहै छलखिन्ह। हुनका किछु समानक खरीदारीक बास्ते सदर बजार जाइ कऽ रहनि। समान किछु बेसी लेबए कऽ रहनि, तइ हेतु ओ संजयकेँ सेहो अपन संगे टेल्हूमे संग कऽ लेलखिन्ह। मामा-भगिना दुनु गणेश नगरसँ लाल किलाबला बस पकड़ि लाल किलाक बस स्टेंडपर उतरि गेला। ओइ ठामसँ पएरे सदर बाजार हेतु चांदनी चौक खाड़ी-बाबली क रस्ते बिदा भऽ गेला। लाल किला दिससँ चांदनी चौक रोडपर किछुए दोकान पार कएलाक बाद दहिना हाथ कऽ एकटा सिनेमा घर पड़लै आ ओकर तेसरे दुकान चश्माक दोकान रहै। संजयक नजैर ओइ दोकानपर पड़ि गेलै। ओ ओइ दोकानकेँ देख लेलकै, देख की लेलकै ओकर नक्शा अपन मानस-पटलपर उताड़ि लेलक। चलैत-चलैत संजयक मस्तिष्कमे एकटा नव विचारक मंथन होबए लगलै- "चश्माक दोकान तँ देख लेलौंह, ऐठाम हम असगरो आबि सकै छी, आबि कऽ चश्मा बनबा सकै छी। रहि गेलै पाइयक बात, हम अपने पाइ जमा करब, तीन महिनामे हेतै, चारि महिनामे हेतै, कहुना कऽ दू सय रुपैया जमा करब। तकरा बाद ऐठाम आबि कऽ चश्मा बनबा लेब। जखन बाबूजी नै बनबा देला तँ अपनों तँ बनाबी। कियो कान-बात नै दै छथि, काल्हि आन्हर भऽ जाएब तँ… नै-नै.. हम जमा करब, दू सय रुपैया जमा करब, अवश्य जमा करब।" चलैत-चलैत अपने भीतर हराएल संजय कखन मामा संगे-संगे सदर बजार पहुँच गेल ओ किछु नै बुझलक, आ नै ओकरा कोनो रस्ता यादि रहलै, यादि रहलै तँ मात्र अपन घरसँ चश्मा दुकान तकक रस्ता। आब की छलै, आब तँ संजयकेँ एक गोट नव राह भेट गेलै। जतए कतौ कोनो बाबति दस -बीस पाइ, चारि-आठ आना, एक-दू रुपैया, जे जतऽ हाथ आबै, एकटा डिब्बामे जमा केने गेल। सभसँ नुका कऽ छुपा कऽ, माय-बाबू सभसँ। भेटै कते? दोसरा तेसरा दिनपर घरेसँ स्कूलक टिफिन बास्ते चारि-आठ आना पाइ। किएक तँ ओकर भोरका स्कूल रहै आ माय ओतेक भोरे किछु बना कऽ टिफिन बास्ते देथिन से नै पार लगनि। तइ हेतु दोसरा-तेसरा दिनपर नगदे चारि-आठ आना वा एक-दू रुपैया जे जहिया भेलै ओकरा भेट जाए। मुदा संजय ओइ पाइकेँ खाइमे खर्च नै करए। ओ मासूम बच्चा अपन भविष्य हेतु, अपन वर्तमानक मोनकेँ मारि सएह कऽ रहि जाए। कखनो कऽ कोनो पित्तियो आ मामा लोकनि सेहो किछु पाइ-कौरी धिया-पुताकेँ कोनो विशेष अवसरपर दऽ देथिन्ह मुदा संजय ओइ पाइकेँ खर्च नै कऽ चश्मा हेतु राखि लए। पाबनि-तिहार जेना दशहरा, रामलीला देखै लेल, मेला घुमै लेल, दिवालीक फटक्का किनै लेल, आन-आन पाबनि-तिहारक अवसरपर संजयकेँ जे पाइ घरसँ भेटै, सभटा अपन मोनकेँ मारि चश्माक लेल राखि लए। ……………… सभ मिला कऽ डेढ़ सय रुपैया जमा करैमे संजयकेँ पाँच महिना लागि गेलै। नम्बर लेलाक एक डेढ़ महिना बादसँ ओकर मोनमे पाइ जमा करैक बात एलै। कुल मिला कऽ चश्माक नम्बर अनला छ महिना भऽ गेलै मुदा संजय लग एखन तक मात्र डेढ़ सय रुपैया जमा भेलै। ओकर लक्ष्य तँ दू सय रुपैयाक रहै, मुदा आगूक पचास रुपैयाक वास्ते पता नै कतेक समय आरो लगतै। ताँइ ओ निश्चय केलक जे एतबेसँ दोकान जाए, कम भेलै तँ आगू देखल जेतै। अगिला दिन संजय स्कूलक टिफिनेमे स्कूलसँ लालकिलाक बस पकड़ि कऽ चाँदनी चौक चश्मा दुकानक हेतु बिदा भेल। पाँच महिना पहिले आएल छल, तइ कारण किछु दिक्कत सेहो भेलै, मुदा पहुँच गेल। जखन दोकानदारकेँ चश्माक नम्बरबला पुर्जा देलकै तँ दोकानदार देखिते बाजल- "ई तँ बड्ड पुरान नम्बर अछि, डॉक्टरसँ नबका पुर्जा बनबा कऽ लऽ आबू, किएक तँ नम्बर बढ़ैत रहै छै आ छह महिना तँ बहुत बेसी समय भेलै।" दोबारा पुर्जा बनाबैक निश्चय करैत संजय दुखी मोने ओइठामसँ चलि आएल। आइ प्रथमे कतौ बाहर असगरे निकलल रहए, असुविधो भेलै। सभसँ बेसी ओकरा बसक नम्बरे नै सुझाइ, तैं रहि-रहि कऽ सभसँ पुछऽ पड़ै, कोनोना घर तक सकुशल आएल। पुनः भोरे-भोर संजय पाहिले जकाँ रोटरी क्लब संचालित आँखिक अस्पताल त्रिलोकपुरी ब्लोक-३ पहुँचल। तीन दिनक हरानीक बाद चश्माक नव नम्बर भेटलै मुदा जे छह महिना पहिले माइनस तीन रहै से आब ठामे दुगुन्ना माइनस छह भऽ गेलै। छह महिनामे एतेक नम्बर बढ़नाइ। अही बातक अंदाजा लगाएल जा सकै छै जे ओकर आँखि कतेक बेसी खराप रहै वा कतेक बेसी गतिसँ खराप भऽ रहल छै। डॉक्टर तँ संजयकेँ ऐ बातसँ पहिले अबगत करा देने रहथि आ चश्मा तुरंत बनाबैक हिदायत से देने रहथि। मुदा विधिकेँ जे मन्जुर। अगर आबो अपने नै सचेत हएत तँ आगूक छह महिनामे आन्हरे भऽ जाएत। संजयकेँ आब बढ़ल नम्बरकेँ जानि बड़ चिंता होबए लगलै। अगिला दिन ओ स्कूलो किए जाएत, किताबक झोरा लेने सोझे चाँदनी चौक चश्माक दुकानपर पहुँचल। चश्माक नव नम्बरक पुर्जा दुकानदारकेँ देलक। ओकर आँखिक एतेक नम्बर देखि दोकानदार आश्चर्यसँ- "हाँ, एतेक बेसी नम्बर, अहींक छी की?" "हाँ"- संजय धीरेसँ बाजल। दोकानदार- "किए ऐसँ पहिले नै देखने रही की? ई तँ साफ-साफ लापरबाहीक लक्षण थिक। माँ बाबुजी नै छथि की? ओहो भगवान एहेन ककरो…।" "नै-नै एहन कोनो बात नै।"- दोकानदारक बात बिच्चेमे रोकैत संजय बाजल। दोकानदार सेहो अपन बातकेँ विराम दैत अलग-अलग डिजाइनक फ्रेम निकालि-निकालि कऽ देखाबए लागल आ संगे-संगे ओकर दाम सेहो बताबए लागल। फ्रेम सभपर एक नजरि दैत संजय बाजल- "हम विद्यार्थी छी आ हमरा लग कुल डेढ़ सय रुपैया अछि, अही दाममे कोनो मजबूत आ टिकाउ फ्रेम देखाबू।" "ठीक छै।"- कहैत दोकानदार सेफक एक कोनासँ एकटा साधारण परञ्च मजगूत फ्रेम निकालि कऽ दैत बाजल- "ई लिअ, अहाँ एहेन बच्चा लेल ई बहुत उचित छै। मजगूत टिकाउ आ दामो मात्र पचहत्तरिये रुपैया, पचास रुपैयाक शीसा अर्थात कुल सवा सय रुपैया लागत।" "ठीक छै एकरे बना दिअ।"- संजय खुशीसँ बाजल, किएक तँ ओकरा अंदेसा छलै जे रुपैया कम हएत आ कतऽ जे पचीस रुपैया बचिये गेलै। दोकानदार- "ठीक छै तँ पाइ जमा कऽ दिअ, काल्हि आबि कऽ चश्मा लय जाएब।" संजय दोकानदारकेँ एक सय पचीस रुपैया देलाक बाद बिल लय ओइठामसँ बिदा भऽ गेल। बिलपर देखलक दोकानक नाम “लक्ष्मी आप्टिकल” लिखल रहै। साइन-बोर्डपर लिखल नाम तँ ओकरा सुझले नै रहै। बस पकड़ि घर आएल। आइ ओकर मोन किछु शांत रहै। घरपर ई बात सभ केकरो लग नै बाजल। ओकर मोनमे तँ हलचल मचल रहै, कखन भोर होइ आ जल्दी-जल्दी चश्मा आनए। भोरे संजय उठि सभ दिन जेकाँ नहा-सुना कऽ स्कूल गेल। स्कूलक छुट्टी भेलाक बाद सोझे स्कूलेसँ लालकिलाक बस पकड़ि कऽ चश्मा लेल चाँदनी चौक बिदा भऽ गेल। चश्मा दोकान पहुँचल, ओकर चश्मा बनि चुकल छलै। चश्मा देखलाक बाद दोकानदारक कहला उत्तर लगाओ कऽ देखलक। ई की? चश्मा लगेलासँ ओकरा एक नव दुनियाँक दर्शन भेलै। सभ किछु नव-नव। ओ सामने रोडक ओइ पारक दोकान सभ, दोकानक भीतर राखल समान सभ, दोकान सबहक साइन-बोर्डपर लिखल अक्षर सभ एकदम साफ-साफ बिलकुल स्पष्ट देखा रहल छलै। एके मिनटमे आइ ओकरा ज्ञात भेलै जे ई महानगर कतेक सुन्नर छै जे की आइसँ पहिले कहियो नै देखने छलै। लगले ओ अपन आँखिसँ चश्मा निकालि कऽ खोलमे रखैत जेबीमे राखि लेलक। किएक तँ बिना चश्माक आ चश्मा पहिरलाक बादक दुनियाँक सन्तुलन करैमे किछु तँ समय लगतै। चश्मा पहिरला बाद सभटा नव-नव लगै, जे- जे बस्तु सब देखाइ से-से सभ कहियो ओ अनुभवो नै केने। अही दूरीकेँ भरैमे तँ किछु समय, एक दू दिन तँ लगबे करतै। दोसर दोकान तक ओ बिना चश्माक आएल छल, आब पहीर कऽ नव दुनियाँ संगे जाएमे असुविधा छलै। दोकानसँ बाहर निकलि बिना चश्मेक बस स्टेंड तक आएल। आब कोन बस पर चढ़ए कि ओकरा चश्माक यादि एलै। चश्मा निकालि कऽ लगेलक, की ओकर आश्चर्यक सीमा नै रहलै, जतऽ बिना चश्माक सामने ठाढ़ बसक नम्बरो नै सुझै छलै ततए चश्मा पहीर कऽ समूचा रोडपर जतेक बस गाड़ी रहै, सबहक नम्बर पढ़ि सकै छल। ओकर मोन ऐ नव वस्तु सभ देख कऽ आनन्दविभोर भऽ गेलै। पाछाँ घुमि कऽ देखलक तँ सामने छाती तनने ठाढ़ विशालकाय लाल पाथरसँ निर्मित सुन्नर लालकिला देखलक। लालकिलाक सुन्नरता एवं मनमोहकता देखि कऽ ओ मन्त्रमुग्ध रहि गेल। किए तँ पहिले बिना चश्माक तँ खाली लाल-लाल धुंद जकाँ किछु छै, सएहटा देखाइ दै। असली लालकिला तँ आइ चश्मा पहिरलाक बाद देखलक। तावत सामने दूरसँ ओ देखलक, ओकर बस आबि रहल छै। मुदा चश्मा पहिरबाक आदत नै रहबाक कारण चलैमे असुविधा होइ। तैँ फेरसँ चश्मा खोलि जेबीमे रखलक आ बसपर बैसल। बसपर बैसलाक बाद फेरसँ चश्मा निकालि एकबेर लगाबए एकबेर निकालए। अन्तमे चश्मा निकालि खोलमे दय बस्तामे राखि लेलक, तावतमे बस सेहो चलए लगलै। बस चलि रहल छलै आ संजय कऽ मोनमे सोचक भँवर उठए लगलै- "अही सवा सय रुपैयाक चश्माक अभावे हमरा एतेक कष्टक सामना करए पड़ल। नै खेला सकै छलौंह, नै बसपर चढ़ि सकै छलौंह, नै ब्लैक बोर्डपर लिखल हिसाब देख सकैत छलौंह, नै नीक जकाँ किताब पढ़ि सकै छलौंह, नै टी. वी. देख सकै छलौंह। पढ़ाइयोमे दिन-दिन पिछरल जा रहल छलौंह। मुदा माँ बाबूजी ऐ बातपर कोनो ध्यान नै देलनि। एक बेर तँ चश्माक नम्बरो आनि कऽ देलियन्हि मुदा धन-सन, कोनो कान-बात नै। कोना-कोना कुन-कुन हिसाबे अपने एक -एकटा पाइ जोड़ि कऽ पाँच महिनामे ई रुपैया जमा केलहुँ।" विचारक मंथनमे डुबल कोना समय बीत गेलै, कोना बस अपन गंतव्य स्थानतक आबि गेलै, संजयकेँ किछु ज्ञात नै। ओ तँ अपन ध्यानमे डुबल रहए, जखन सभ बससँ उतरि गेलै तखन ओकर ध्यान खुजलै आ ओ बससँ उतरल। बससँ उतरलाक बाद पएरे चलैत ओकर मोन एक बेर फेरसँ नव समस्यामे ओझराए लगलै- "चश्मा तँ लऽ अनलौं, आब घरमे की कहबै? कतए सँ चश्मा अनलौं? रुपैया कतएसँ अनलौं? के बना देलक?" आन-आन सवाल-जवाब सभ ओकरा मोनमे अबै जाइ। रस्ता खत्म, घर आबि गेलै। खेलक-पिलक मुदा ओकर मोन तँ अही प्रश्नक उत्तर खोजैमे लागल रहै की- "घरमे चश्मा की कहि कऽ देखेबै?" समय बितलै, साँझ पड़लै। संजय सेहो नव मोर्चा सम्हारैक किछु उपाय सोचलक। संजयक बाबुजी सेहो ड्यूटीसँ एलाह। नितकर्मसँ निवृत भेलाक बाद माँझ आँगनमे खाटपर बैसलाह। संजयक माय आ छोट दुनु भाइ हुनके चारुकात बैसल। संजय सेहो अपन जेबीमे चश्मा रखने ओइठाम बैसल मुदा बाहर निकालि कऽ देखेतै से हिम्मतक अभाव। आन-आन गप सभ होइत रहैक, तइ बिचमे संजय बहुत आत्ममंथन आ आत्मदृढ़ताक बाद अपन सम्पूर्ण सहासकेँ जुटाबैत जेबीसँ चश्मा निकालि बाबूजीकेँ देलकन्हि। बाबूजी चश्माकेँ हाथमे लैत- "की छै?" "चश्मा।" संजय अस्थिरेसँ माथ झुकौने बाजल। आगू अपन सेफकेँ गरदनिसँ निचाँ घोंटैत बाजल- "आइ फेरसँ स्कूलमे डॉक्टर आएल रहै। हमर चश्मा नै बनल तइ कारण बहुत बाजल, कहलक पहिलेसँ दुगुना बेसी आँखि खराब भऽ गेल-ए। अंतमे वएह डॉक्टर अपने लगसँ चश्मा देलक।" ई बात ओ एतेक फटाफट बाजल जेना कियो गोटा ड्रामामे रटल-रटाएल शब्द फटाफट बाजि जाइए। हलाँकि ओ उपरोक्त सभ बात फुसिए बाजल, किए तँ बच्चाक मोन अपने ओतेक कष्ट सहि चश्मा बनबेलक मुदा ओकरा सामने आनै लेल किछु नै किछु तँ कहैए पड़तै। झूठो बाजि कऽ अपन आँखिक रक्षा केलक। जे काज ओकर माय-बाबूकेँ करबाक चाहियैन्ह से काज ओ मासूम बच्चा अपने केलक। मुदा ई कोनो एतेक भारी झूठ नै भेलै जे पकड़ल नै जाए। चश्माक खोलपर साफ-साफ दोकानक नाम पत्ता लिखल रहै, लक्ष्मी ओप्टिकल, दोकान नम्बर फलाँ-फलाँ, चाँदनी चौक दिल्ली छह। आ ई कियो एक गोट सामान्य बुद्धिक व्यक्ति जनै छै जे एक निजी दुकान मँगनीमे चश्माक वितरण किए करतै? कोनो सरकारी या धर्मार्थ संस्थाक नाम होएतैक तँ कनी बिस्बासो कएल जा सकै छलै। मुदा ऐठाम एहन कोनो बात नै। दोसर चश्मा बनेनाइ कोनो चुटकीक काज तँ नै छैक? नम्बरक सीसाकेँ काटि-छाँटि कऽ,घसि कऽ फ्रेमक मुताबिक बनेनाइ, जे एक गोट वर्क-शॉपमे भऽ सकैत छै, नै कि कोनो डॉक्टरक जेबीमे। परञ्च बाबूजीकेँ संजयक बातपर विश्वास भऽ गेलनि, सैदखन पहिरै कऽ निर्देश दैत। बस! आगू कोनो बात-चित नै। कनीकाल लेल मानि लेल जाए, छह महिना पहिले जखन संजय हुनका हाथमे चश्माक नम्बर देने रहनि तखन ओ कोनो कारणे चश्मा नै बना पएलनि, मुदा आबो तँ सामने देख रहल छथिन जे कतेक मोटका सीसाक चश्मा ओकर आँखिक ऊपर छै। आबो तँ अपन पहिलुक गलती सुधारि सकै छलथि। कतौ कनी नीक डॉक्टरसँ ओकर आँखिक इलाज करा सकै छलथि। दिल्लीमे तँ एकसँ एक पैघ-पैघ अस्पतालक लाइन लागल छै। कतऽ धिया-पुताक आँखिमे एकटा कीड़ा पड़ि जाइत छै तँ ओकर माय-बापक आत्मा तर्पय लगै छै, आ कतए एक गोट माय-बापक बच्चाक आँखिक ऊपर माइनस छहक चश्मा लागि गेलै आ धन-सन। आब संजय सैदखन आँखिसँ चश्मा लगोने रहए, स्कूल, हाट-बाजार, रस्ता-घाट कतौ बिना चश्माक नै जाए। पहिले दु-चारि दिन किछु असुविधो भेलै मुदा बादमे अभ्यास भऽ गेला पश्चात सभ ठीक। चौबीस घंटामे जेतबे काल रातिमे सुतल ततबे काल ओकर आँखिसँ चश्मा निकलै, कहियो कऽ तँ चश्मे पहिरने सुतियो रहए। संजयकेँ चश्मा लेला पुरे दू वर्ष भऽ गेलै आ आइये ओकर दसम वर्गक परीक्षा परिणाम घोषित भेलैक ओ नीक अंकसँ पास केलक। परीक्षा परिणाम जनला बाद ओकर मोन रिजल्टक चिंतासँ किछु हल्लुक भेलैक, किछु शांतिसँ बैसल रहए की ओकर मोन रूपी घोड़ा जीवनक सात-आठ वर्ष पाछू चलि गेलै। कोना-कोना ओकरा कष्टकारी माथ दर्द होइ, कोना गामपर माथ दर्दसँ अंगनामे ओंघड़िया मारए आ कियो ओकरा देखनाहर नै। दिल्ली आएल मुदा दिल्लीयोमे ई जानलेबा असहाय माथ दर्द कोनो कम नै, दिनसँ दिन बेसिए परेशान केलकै। कि एकाएक ओकर मानसपटलपर कतौसँ अबाज एलै- "ई की? बहुतो दिनसँ तँ माथ दुखेबे नै कएल-ए। कहिया सँ? दू वर्षसँ, हाँ -हाँ दुए वर्षसँ, जहियासँ चश्मा लेलौंहँ तहिये सँ। हाँ-हाँ जखनसँ चश्मा पहिरब शुरु कएलौंहँ तखने सँ ई असहाय जानलेबा माथ दर्द ठीक अछि। ई दू वर्षमे एको बेर माथ दर्द नै भेल। तँ जे एतेक असहाय माथ दर्द सात-आठ वर्ष वा ओहुसँ पहिलेसँ होइ छल से आँखिक कमजोरीक कारणे? हाँ ! शाइद -- शाइद कि पक्का? पक्का, हाँ! आँखिक कमजोरीक कारणे ओतेक माथ दर्द होइत छल।" जान लेबा माथ दर्द, ओकर सुमरण मात्रसँ संजयक समुच्चा देहमे कपकपी भऽ गेलै। जेना-जेना आँखिक कमजोरी बढ़ल जाए तेना-तेना ओकर माथक दर्द विकराल रूप धारण केने गेल रहै। मुदा कियो कोनो डॉक्टरसँ देखाबए बला नै। ई बात सभ सुमैरते ओकर दुनु आँखिसँ नोरक धारा बहए लगलै। मुदा तैयो ओकर सोचक विराम नै होइ छै, ओकर विचार रूपी घोड़ा लगातार अपन पथपर सरपट दौड़ रहल छै- "आह! अगर सात-आठ वर्ष पहिले, कमसँ कम दिल्लीयो एला बाद कोनो नीक डॉक्टरसँ हमर माथ दर्दक इलाज भेल रहितए तँ किएक ओ ओतेक कष्ट आ पीड़ा सहय पड़ितए, आ किएक आइ एतेक मोट सीसाक चश्मा आँखिपर पहिरए पड़ितए, जकर बिना कि एक तरहे आन्हरे छी। ई ककर दोष? हमर? हमर समाजक? हमर माय-बापक? कि हमर कपारक? यदि एतबोपर हम अपने नै सचेत भेल रहितौं तँ आइ दसवीं पास करबाक जगह एक भयंकर अन्हारक दुनियाँमे विलीन भऽ गेल रहितौं।" संजयक विचारक घोड़ा विराम लेलकै कि नै? मुदा समाजक सामने एकटा यक्ष प्रश्न छोड़ि गेलै- माय-बापक कर्तव्य अपन संतानक प्रति की हेबाक चाही? भोजन, कपड़ा-लत्ता आकि आगुओ किछु? आगू की-की ??? जगदीश प्रसाद मण्डल बुढ़िया दादी नै जानि दादीकेँ एहेन तामस किअए भऽ गेलनि। एक तँ ओहुना बैशाख-जेठक सुखाएल जारनि चरचराइत रहैए, खढ़क छौड़ैत छार पटपटाइत रहैए, तइ हिसाबे दादीयोक खटखटाएब अनुकूले भेल। दादी माने तीन पीढ़ी ऊपर नै कि गामक बनौआ दादी। नवो-नौताड़ि बनौआ दादी होइते छथि, उचितो छै। गुड़-चाउर जे जते खेने हेतीह। आठ-दस बर्खक पोता अपन कुत्ताकेँ अनठियासँ लड़ा देलक जइसँ कोनचरक सजमनिक गाछ टूटि गेलनि, तेकरे तामस दादीकेँ पोतापर रहनि। जखन टुटलनि तखन बाधमे रहथि तँए नै देखलखिन। तखन ततबे, कुत्तेक झगड़ा भरि। बारह बजे बाधसँ अबिते, जहिना हजारो चेहराक बीच प्रेमी-प्रेमिकापर जा अँटकैत, तहिना दादीक नजरि सजमनिक गाछपर पहुँचि गेलनि। लटुआएल-पटुआएल पड़ल देखलखिन। नरसिंह तेज भेलनि, मुदा परिवारक सभ गबदी मारि देलक। तँए अधडरेड़ेपर तामस अँटकि गेलनि। जँ अकासक पानिकेँ धरती नै रोकए तँ पताल जाइमे देरी लगतै? दोसरि साँझ जखन बाधसँ घूमि कऽ दादी एलीह तँ नीक जकाँ भाँज लगि गेलनि जे पोताक किरदानीसँ गाछ नोकसान भेल। तामस लहड़ए लगलनि। छौड़ाकेँ सोर पाड़लखिन- “अगतिया छेँ रौ, रौ अगतिया?” नाओं बदलल बूझि गोविन्दोकेँ अवसर भेटलै। अन्हारे गरे चौकी-दोगमे नुका रहल। अपने फुड़ने दादी भट-भटाए लगली- “भरि दिन छौड़ा एम्हर-सँ-ओम्हर ढहनाइत रहैए आ कुत्ता-बिलाइ तकने घुड़ैए।” मुदा लगले मन ठमकि गेलनि। भरिसक अंगनामे नै अछि, खाइ-बेर भेल जाइ छै, कतए छिछिआइ ले गेल अखन धरि अंगनामे नै अछि। पुतोहुकेँ पुछलखनि- “कनियाँ, बौआ कहाँ अछि।” बेटाकेँ अपन जान सुरक्षित बूझि पुतोहु बजली- “बड़ी कालसँ नै देखलिऐ।” पोताकेँ तकैले बुढ़िया दादी विदा भेली। सुतै बेर जखन गोविन्दा अलिसाएल आबि दादीकेँ कहलक- “दादी बिछान बिछा दे।” गोविन्दक बात सुनि दादी पिघलि गेली। ओछाइन ओछा कऽ सुता देलखिन। सेन्धपर पकड़ल चोर जकाँ, क्रोध फेर कड़ुआ गेलनि। मुदा निनियाँ देवीक कोरामे देखि क्रोध घोंटए लगली। अखन छोड़ि दइ छिऐ, भोरहरबामे पेशाब करैले उठेबे ने करत। बुझतै केहेन होइ छै सजमनिक गाछ तोड़नाइ। जाबे सभ करम नै कराएब ताबे चालि नै छुटतै। भाेरहरबामे जखन गोविन्द दादीकेँ उठबैत बाजल- “दादी-दादी।” दादी गबदी मारैक विचार केलनि। मुदा तीन बेरक बाद तँ गरिऐबे करत, तइसँ नीक जे तेसर हाकमे अपने बाजि देबइ। की हेतै, एकटा सजमनियेँक गाछ ने टुटल। फेर रोपि लेब। मान तराजूक दुनू पलड़ा बीच डंडी लगल रहैत, जइ सहारासँ वस्तु-जातक वजन मानल जाइत तहिना जिनगीक तराजू सेहो होइत अछि। कमल फूलक डंटीक सहारासँ जहिना फूलक सभ अंग समान रूपे खिल-खिल खिलैत तहिना जिनगियोक होइत मुदा से कहाँ होइए? जिनगीक तरजूक पलड़ा दू रंग होइए, एक इमान दोसर बैमान। पलड़ाक घटी-बढ़ी भेने तरजू पसङाह भऽ जाइए, जइसँ घटैत-बढ़ैत जिनगी जीवनक दू धारामे प्रवाहित होइत चलए लगैए। एक महिना अखाढ़ रहितो दू नक्षत्रमे विभाजित होइत, आद्रा नक्षत्र अपन पूर्ण जिनगी बितबैत अछि, भलहिं अखाढ़क पहिल भाग हुअए वा मध्य वा अंत। पनरह दिन अन्हार बीत कऽ आठ इजोरिया मास टपि गेल। हाजरी भुकबए लेल मौसम जोगार लगा नेने अछि मुदा आद्राक उपस्थिति दर्ज नै भेल अछि। ओना कहैले सालक पाँच बरखा भऽ चुकल अछि मुदा तैयो आद्राक जगह उम्मस अपन पूर्ण जुआनीमे जगमगा रहल अछि। गोनू झाक हरबाहिक जलखैक खीर जकाँ हाल धरतीकेँ छुछुओनहि अछि। दिन उगिते जेना दीनानाथक दर्शन होइत तहिना किसानक बीच नव दर्शन आएल। ओ थिक श्री-विधिसँ खेती करब। मास दिन पूर्व धानक बीआ, जैविक खाद, कीटनाशक दबाइ इत्यादिक बँटबारा पछिला हिसाबे इमानदारीसँ भेल। इमानदारी ऐ लेल जे जहिना बैंकक कर्जकेँ लोक चौक परक भुज्जा खा सठा दैत, तहिना अखन धरिक बीआ-बालिक हिसाब रहल। वैचारिक रूपमे बीआ पाड़ि खेती करैक समए सेहो पौलक। संयोगो नीक रहल जे एकटा बरखा सेहो भेल। बरखा हाथ लगने किछु गोटे बीआ खसौलनि। देखबामे बरखा भेल मुदा बीआ पाड़ैक नै भेल जइसँ बीआ अधा-छिधा जनमल। किछु गोटे कल आ घैलसँ पटा-डुमा, हाल बना बीआ खसौसनि। जनमबैमे ओ जितलाह मुदा किछु गोटे अखनो बीआ घरेमे आद्राक आशापर रखने छथि। ओना अद्रोसँ रोहिणीक बीआकेँ निराग मानल गेल अछि। मुदा रोहिणीक पछातिक हिसाबकेँ अनदेखी केने बीरारेमे बीआ जड़बो करैत। खेतीक एक उपाय तँ हाथ आएल मुदा मूल उपाय पानि नै आएल। एक पाशापर भगवान बैसल दोसर २००८ ई.क कोसीक विभीषिका नहर खा गेल, तइ लागल १९८७क बाढ़ि आ अठासीक भुमकम बीस बर्ख पहिनहि बोरिंग खा गेल छल। जूड़-शीतल पावनिक चलती कमने पोखरिक उड़ाही रूकि गेल जइसँ ओ अपने तेहेन रोगा गेल अछि जे जान लेल रविक संग एकादशियो करैए। मनुष्यक जन्म संस्कार ओतए पनपब शुरू होइत जतए ओकर जन्म होइत अछि। ई दीगर बात जे कतौ पेटक बच्चाक सेवा पोनगैक पहिनेसँ हुअए लगैत आ कतौ रस्ते–पेड़े जन्मो लैत आ पाललो-पोसलो जाइत। आद्राक कर्त्तव्यक लापरवाहीसँ जन-जनक बीच तबाही तँ अछिये श्रमक घटबी सेहो बेसिआइये गेल अछि। मुदा किछुओ किअए ने हुअए आखिर वसन्तक उनाड़ियो मास तँ छी। किअए ने बाग-बगीचामे बगवार वसन्तक संग चैतावर आ बारहमासा गाओत। आमक संग-संग जमुनिया धार सेहो बहैत अछि। टोलक पाँच गोटेक गाछी एकठाम। साधारण परिवार तँए छोट-छोट गाछी। मुदा कलमी-सरही सभ आम लुबधल। करीब पच्चीस तीस गाछ सभ मिला कऽ पाँचो परिवारक जीवन-शैली एक रंग तँए विचारोमे एकरूपता छन्हि। एते जरूर छन्हि जे बिनु कहने कियो कोनो गाछपर ने ढेला फेकैत आ ने हाथसँ तोड़ैत। मुदा खसल आमक कोनो रोक नै। जइसँ चेतन तँ अपन-आनक ठेकान जरूर बुझैत, मुदा बाल-बोध नै। पाँचो परिवारक धिया-पुता एकेठाम खेलबो करैत आ आम खसलापर दौड़बो करैत। ओना अबोध बच्चा रहने, अवाजकेँ ठीकसँ नै अकानि कियो केम्हरो, कियो केम्हरो दौग जाइत मुदा केकरो भेटलापर एते खुशी सभकेँ जरूर होइ जे हराएल भेटल। रातिक दू बजैत। उमस भरल दिनक संग अधा रातियो बीत गेल। एक बजेक बाद पुरबाक लहकी उठल। दिन भरिक गुमराएल मन नीन दिस दौगल। दुनू बेटाक संग गुलजारी आमक गाछी विदा भेल। अष्टमीक चान लुप्त भऽ गेल छल जइसँ अन्हारक साम्राज्य पसरि गेल। आठ गोटेक परिवार गुलजारीक। तीनू बापूत मिला आठटा पाकल आम भेटलै। आंगन आबि डिबियाक इजोतमे आठो आम गनि छोटका बेटा राधेश्याम माएकेँ रखैले आम दैए, जे खाइ बेरमे सभ खाएब आ बाजल- “जते गोरे घरमे छी एक-एकक हिसाबसँ आमो अछि।” राधेश्यामक बात सुनि जेठका भाय गौरीशंकर बाजल- “जहिना छोट-पैघ आम अछि तहिना तँ घरमे लोको छोट-पैघ अछि किने। तँए....।” गजेन्द्र ठाकुर बाल उपन्यास तरहरिमे परीलोक आंगुरक संकेतसँ अक्षर आ भावक निर्देश करै छलि बा, अक्षरमुष्टिका। बा कहै छली- आंगुरसँ पकड़ि पिनसिन सँ अक्षर आ चित्र बनाउ, नीकसँ। अहूँ नीक आखर, नीक भाव बना सकब। बा- सुति जाउ, भोरे स्कूल जएबाक अछि। आइ हम थाकल सेहो छी। ओम- बा पहिने खिस्सा सुनाउ? बहन्ना नै चलत। (ओम आँ-आँ… कऽ कए कानऽ–रुसऽ लगैए।) बा- ठीक छै, ठीक छै। कोन खिस्सा? राजाबला, परीबला आकि.. ओम- परीबला। बा- ठीक छै, ठीक छै।(सोचैत) तरहरिमे परीलोक, गाछक धोधरि, कारी कौआ, उज्जर दपदप परीलोक….। ओम- ठीक छै तखन खिस्सा शुरू… बा: चन्ना गाछीक झमटगर बोन चन्ना गाछीक झमटगर बोनमे आम बिछैत-बिछैत आस्था आगाँ बढ़ि गेलि। तखने एकटा कार कौआ काँउ-काँउ करैत एलै। बोनमे एकटा झमटगर गाछक नीचाँ आस्था ठाढ़ भऽ गेलि। ओइ गाछमे एकटा धोधरि रहै। ओइ कार कौआक काँउ-काँउ सुनिते देरी ढेर रास कार कौआ आबि गेलै। आस्था जल्दीसँ धोधरिमे पैसि गेल। धोधरिमे जाइते देरी ओकरा किछु अनसोहाँत सन लगलै। ओकरा लगलै जे ओ अकासमे ठाढ़ अछि। धोधरिमे ओ ऊपर देखलक, नीचाँ देखलक। ओकरा लगलै जे ओ धोधरिमे स्थिर ठाढ़ अछि, फेर ओकरा लगलै जे ओ कहीं नीचाँ तँ नै जा रहल अछि! ओकरा लगलै जे ओकरा देहमे कोनो भार नै छै। ओ दूभियोसँ बेशी हल्लुक भऽ गेल छलि। दू घण्टाक बाद…. उज्जर दपदप परीलोक सन एकटा जगहपर ओ आबि कऽ खसलि। मुदा ओतए कोनो गद्दा राखल रहै, से ओकरा कनेको चोट नै लगलै। की परी लोकक निकास रहै ओ धोधरि? तखन तँ कतेक आर लोक, माल जाल, चिड़ै ओतऽ सँ खसैत हेतै, बिला जाइत हेतै।– आस्था सोचैत रहलि। आ तेँ लोक चन्ना गाछीकेँ भुतहा गाछी कहै छै! आस्था आँखि घुमेलक। जगह तँ नीके लागै छलै। ऊपर तकलक तँ धोधरि नै देखा पड़लै, अकास रहै चारू कात। नील अकास नै उज्जर अकास। तखने एकटा चिड़ै ओतऽ आएल। -हम छी टुराकोस चिड़ै। हम अफ्रीकासँ आएल छी। -हम छी आस्था। हम एशियासँ आएल छी। अहाँ चिड़ै भऽ कऽ मनुक्खक बोली कोना बाजै छी? -ई छी परीलोक। एतऽ एलाक बाद सभ एकबैग मनुक्ख जकाँ सोचऽ लगैए, बाजऽ लगैए। (ई कहैत टुराकोस आस्थाक कन्हापर बैसि गेल।) -माने जखन अहाँ अफ्रीकामे छलौं तखन अहाँ मनुक्खक बोलीमे नै बाजै छलौं। -नै। हरियर रंगक पाँखिबला टुराकोसक उड़ैबला पाँखिक रंग लाल रंगक रहै। तखने बर्खा जोरसँ हेबऽ लगलै। टुराकोसक देहसँ जे पानि खसलै से लाल रंगक रहै, आस्थाक हाथपर लाल रंग लागि गेलै। -अहाँ होली खेलाएल छी की? -नै किए? -ई लाल रंग अहाँक पाँखिसँ झड़लए। -हमर हरियर रंग पकिया अछि मुदा लाल रंग पानिमे झड़ऽ लागैए। -से? हमरा तँ लागल जे ई लाल रंग अहाँकेँ कियो लगा देनेए। -नै, ई लाल रंग हमर पाँखिक रंग छी। -एतऽ हम अपन गामक चन्ना गाछीक एकटा गाछक धोधरिसँ खसल छी। एतएसँ बाहर निकलैक कोनो रस्ता छै की? -सएह रस्ता तँ हमहूँ ताकि रहल छी। दुनू गोटे परीलोकमे आगाँ बढ़ल। प्रकाश चारू दिस पसरल रहै। -धोधरिमे प्रकाश कोना आएल? -धोधरिमे जे प्रकाश अछि से आँखिमे कुटकुटा कऽ लगितो नै अछि आ कोनो सूर्य सेहो एतए नै अछि। -तखन प्रकाश अबैए कतऽ सँ? तितली (दू पाँखिबला रंग बिरंगक, नांगरि रहित) आ टिकुली (चारि पाँखिबला, नांगरि युक्त) सेहो ओतऽ आबि गेल। चारू गोटे आगाँ गेलथि। जखन आस्था रस्तापर चलि रहल छलि तँ ओकरा लागलै जे एतऽ तँ घर्षण छैहे नै। चिक्कन साफ सड़क। नै किछु तँ सए किलोमीटर प्रति घण्टाक गतिसँ सभ चलि रहल छल। दौगत तँ कतेक तेजीसँ दौगत? -टुराकोस, ई प्रकाश जँ सूर्य प्रकाश नै अछि तखन कोन प्रकाश अछि? कार्बन डाइऑक्साइड गाछक पातक पातर छिद्र-स्टोमेटासँ प्रवेश करैए, पानि आ खनिज गाछक जड़िसँ प्रवेश करैए, सूर्य किरिण गाछक पातसँ प्रवेश करैए। परिणाम ऑक्सीजन प्रक्रियाक अवशेष रूपमे पातसँ बहराइए आ गाछक चिन्नी फलसँ बहार होइए। सूर्यकिरण प्रोटीन द्वारा सोखि लेल जाइत अछि, गाछ-बृच्छमे क्लोरोप्लास्ट द्वारा आ बैक्टीरियामे प्लाज्मा मेम्ब्रेन द्वारा। जँ सूर्य प्रकाश नै अछि तखन एतुक्का ऊर्जा कतएसँ अबैए? -अहाँ पढ़ैमे खूब तेज छी। एतए एहने लोक सभक आवश्यकता छै। सभ प्रश्नक उत्तर अहाँकेँ भेट जाएत। -ऐ लोकमे की सभ छै टुराकोस? -ऐ लोकमे खेत छै, मुदा ओतऽ धान गहूम नै उपजै छै, ओतऽ ऊर्जाक खेती होइ छै। बिना सूर्य प्रकाशक ऊर्जाक खेती। एतऽ रेगिस्तान सेहो छै। एतऽ एकटा बड़का टा रेगिस्तान छै, ऐ परीलोकक उत्तरबरिया महारक ओइपार ई रेगिस्तान छै। - उत्तरबरिया महार? -हँ। ऐ लोकक उत्तरमे उत्तरबरिया महार छै। तकर ओइपार रेगिस्तान छै। सुनै छिऐ, ओतऽ पहिने खेत छलै। मुदा जहियासँ एतुक्का रानी ओइ इलाकामे कूड़ा-कचरा फेकबाक आदेश देलनि, ओइ दिनसँ ई इलाका सुन्ना हेबऽ लागल आ आब तँ ई रेगिस्तान भऽ गेल अछि। -आ ई महार कहिया बनल? -जखन रानी ई आदेश देलन्हि तहिये ई महार बनाओल गेल। ऐसँ कूड़ा-कचरा फेकबाक स्थान फरिछाबैमे सुविधा भेल। तखने एकटा भयंकर साँप सोझाँ आबि गेल। आस्था डरा गेलि। -नै डराउ। ई ओना तँ सभसँ बेशी बिखबला मम्बा साँप अछि मुदा ई हमर अपन अफ्रीकाक अछि। ऐ परीलोकमे जेना सभ मनुक्खक बोली बाजऽ लगैए, तहिना एतऽ सभक बिख सेहो खतम भऽ जाइए। मम्बा सिसकारी दैत भारी अबाजमे बाजल- परीलोकमे अहाँक स्वागत अछि। तखने एकटा हँसैबला नढ़िया आबि गेल। -ई के छी? -ई छी कूकाबुरा। आस्ट्रेलियासँ ई एतऽ आएल अछि। ई हरदम हँसिते रहैए। कूकाबुरा खिखिया कऽ हँसऽ लागल- खी-खी-खी। -आस्ट्रेलिया, अफ्रीका आ एशियासँ ऐ परीलोकमे? हम तँ धोधरिसँ एलौं आ अहाँ सभ। -हमहूँ सभ धोधरिसँ एलौं। (ऐ बेर तितली, टिकुली, कूकाबुरा, मम्बा आ टुराकोस एकट्ठे बाजल।) कूकाबुरा हँसैत बाजल- एतऽ परीलोकमे आर्कटिक, अण्टार्कटिक, एशिया, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका आ अफ्रीकासँ धोधरि बनाओल गेल छै। कूकाबुरा फेरसँ हँसऽ लागल। आस्था पुछलक- आ बाहर निकलबाक कोनो उपाए? मम्बा बाजल- सुनिते छिऐ जे बाहर निकलै लेल औंठा आ आँखिक पहचानक आधारपर कोनो बाहरी निकास छै, जइसँ एशिया, यूरोप, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, आर्कटिक आ अण्टार्कटिक ऐ सभ ठाम बहार भेल जा सकैए। आस्था अकचकाइत पुछलक- आँखि आ औँठाक पहचान? माने फिंगरप्रिन्ट आ कोर्निया आइडेन्टिफिकेशन (पहचान)? से किए? मम्बा बाजल- हँ, फिंगरप्रिन्ट आ कोर्निया आइडेन्टिफिकेशन। कारण से नै भेलासँ एशियाक लोक अण्टार्कटिका पहुँचि जाएत आ से भेने तँ गड़बड़ हएत। -की गड़बड़ हएत? -बड्ड गड़बड़ हएत। जेना आर्कटिक केँ लिअ। ओतऽ उत्तर ध्रुवपर कहियो राति नै होइ छै। एकटा एस्कीमो भेटत, से कहत अहाँकेँ। तहिना अण्टार्कटिकमे दक्षिण ध्रुवपर कहियो दिन नै होइ छै। एकटा पेंग्यूइन भेटत, से कहत अहाँकेँ। तखने एस्कीमो आ पेंग्यूइन दू कातसँ एलै। नमस्कार पाती भेलै। -एतुक्का लोक की करैए? टुराकोस बाजल- एतुक्का लोक सदिखन कोनो ने कोनो प्रयोगमे लागल रहैए। बिना सूर्य प्रकाशक ऊर्जा कोना निकाली? बिन प्रकाशक जीवन कोना जीबी? -बिन सूर्यक प्रकाश! ठीके, एतऽ तँ सभ दिस प्रकाशे छै। मुदा तखन अन्हारपर कोना प्रयोग होइ छै? -उत्तरबरिया महारक उत्तरमे जे रेगिस्तान अछि ओतए रानीक आदेशक बाद अन्हारे अन्हार छै। आब सड़कपर चहल-पहल शुरू भऽ गेल छल। परी लोकमे कनियाँ-पुतरा सन परी सभ चारू कात घूमि रहल छली। घर-दुआर सभ सेहो रंग-बिरंगक छल। अकासक सात रंगबला पनिसोखा सोझाँ देखा पड़ि रहल छल। एक लाइनमे भटरङ, असमानी, नील रङ, हरिअर, पीअर, संतोला रंग आ लाल टुहटुह रंगक सातटा कियारी देखा पड़ल। -ई की छी टुराकोस? -ई परीलोकक मुख्यालय आ आवास छी। -अच्छा, की सभ छै ऐमे? -भटरङ बला कियारीमे वैज्ञानिक सभ रहै छथि। असमानी बला कियारीमे जे असमानी रङक मकानक पाँती छै ओइमे परीलोकक सैन्य विभाग छै। नील रङक जे मकानक कियारी बुझा रहल अछि ओइमे बच्चा सभक स्कूल छै, बुझू पहिला वर्गसँ विश्वविद्यालय धरि। हरियरका पाँतीमे वनस्पतिपर शोधक प्रयोगशाला सभ छै। पीअर रङक पाँतीमे मालजाल, मनुक्ख, परी आदिपर शोधक प्रयोगशाला आ अस्पताल छै। संतोला रङक पाँतीमे मानसिक आ शारीरिक रूपसँ कमजोर मनुक्ख, परी, चिड़ै, जानवर आ वनस्पति सभपर शोध लेल प्रयोगशाला छै। ई पाँती सभसँ पैघ छै आ एतऽ… बीचेमे आस्था टुराकोसकेँ टोकलक- मानसिक आ शारीरिक रूपसँ कमजोर वर्गमे वनस्पति सेहो अछि? से कोना? शारीरिक तँ बुझलौं मुदा मानसिक? टुराकोस बाजल- एतऽ प्रगति बड्ड तेजीसँ भेलै, से वनस्पति सेहो मनुक्ख आ आन प्राणी जकाँ बाजऽ भुकऽ आ सोचऽ लागल। ओ खाली चलि नै पबैए, सएहटा कमी छै, मुदा तकरो प्रयास भऽ रहल छै। सुनै छिऐ जे प्रयोगशालामे एकाधटा गाछ चलऽ लागल छलै आ ओइमेसँ एकाधटा पड़ा गेलै, अन्हार लोक दिस, महारक ओइपार पड़ा गेलै। -आ ई लाल टुहटुह रंगक पाँती की छिऐ? मम्बा बाजल- ई छिऐ परीलोकक बसिन्दाक निवास स्थान। ई सातो पाँती साँप सन टेढ़-टूढ़ भऽ सौंसे परीलोकमे पसरल अछि। सभ कियो आगाँ बढ़ैत रहल। आस्थाकेँ लगलै जे ऐ परीलोकमे सभ किछु साफ-सुथरा छै। सड़क, चौबटिया, गाछ-बृच्छ, मालजाल, आब ई सभ चारूकात देखा पड़ि रहल छलै। आस्थासँ सभ नमस्कार पाती कऽ रहल अछि, सभ मनुक्खक बोली बाजैए-बुझैए। ऐ लोकमे सभ किछु संतुलित बुझा पड़ि रहल छै। गाछक पात सभ गोल-गोल, डाढ़ि-पात सभ सेहो लगै छै जे कियो कतरने छै, अनुपातमे। सभ किछु अनुपातमे लागि रहल छै, नै कनियो पैघ आ नै कनियो छोट। मुदा आस्था तखने किछु अकानलक- हवा तँ लगैए जे एतऽ बहिते नै छै। पात सभ एक्कोरत्ती हिलियो नै रहल छै। -एम्हुरका गाछक पात नै हिलत। हरिअरका पाँतीबला मकानक दुनू कातमे जे गाछ सभ छै ओतऽ हवाक व्यवस्था विशेष परखनलीसँ कएल गेल छै। ओतऽ पात हिलैत भेट जाएत। शेष परीलोकमे ई पात सभ हिलैत नै भेटत। तखने सड़कक बीचमे एकटा बड़का दरबज्जा प्रकट भेलै, ओतऽ सातो रङक सातटा फाटक रहै। टुराकोस बाजल- सभ अबै जाउ लाल टुहटुह फाटक लग। आस्थाकेँ भेँट करै लेल रानीक महल जाए पड़तै आ ओतऽ जेबाक यएह रस्ता छै। लाल रंगक दरबज्जापर लाल रंगक पंखक फ्राक पहिरने सभ बैसल छै। -एतऽ जइ रङक दरबज्जा छै, तइ रङक कपड़ा, फर्नीचर आदि सेहो रहैत छै।, टुराकोस बाजल। -आउ आस्था, रानी अहाँक प्रतीक्षामे छथि।, दरबज्जापर स्वागतमे बैसल महिला बजली। -अहाँकेँ हमर नाम कोना बुझल अछि आ रानी हमर इन्तजारीमे कोना छथि? आ हम तँ धोधरिमे खसल रही आ ऐ परीलोकमे अनचोक्के आबि गेलौं। अहाँक नाम की छी? -अहाँकेँ कोना बुझल भेल जे ई परीलोक छी? -एतऽ चारू कात सभ चीज अनुपातमे छै। अहाँक आ एतुक्का आन लोकक पहिराबा सभ किछु ओहने छै जे हम सभ अपन किताबमे पढ़ै छलौं। -तहिना ऐ परीलोकक कोनो धोधरिसँ जखने कियो खसैए, तखने ओकर रेकॉर्ड शुरू भऽ जाइ छै। एतऽ सभ गतिविधि भटरङ प्रयोगशालाक माध्यमसँ रानीक मुख्यालयमे अबै छै। धोधरिसँ खसल प्राणीक सूचना विशेष रूपसँ रानी तत्काले मंगबै छथि। हमर नाम वनसप्तो ९९९९५७४५ छी। -वनसप्तो तँ पाँखिबला गाएकेँ कहल जाइ छै जे खिस्सामे अकासमे उड़ैए। बोनमे जे बच्चा रस्ता बिसरि जाइए ओकरा वनसप्तो घर घुरबै छथि। -ऐ लोकमे वनसप्तो सत्तेमे छथि। हम जखन जंगल जाइ छी तँ पाँखिबला गाए बनि जाइ छी। जे सभ अहाँ सभ खिस्सामे पढ़ै छी से सभ एतऽ सत्य छै। -अहाँक नाममे ९९९९५७४५ किए लागल अछि? -एतऽ अही तरहेँ नामकरण होइ छै। हमर बाद जे जन्म लेलक ओकर नाम वनसप्तो ९९९९५७४६ भऽ गेलै। रानीक लाल टुहटुह पाँतीमे जाइ लेल सभ कियो आगाँ बढ़ै गेला। लाल टुह-टुह पाँतीमे जाइते एकटा स्वागत कक्ष आबि गेल जे नहिये जमीनपर रहए आ नहिये अकासमे! कारण अकासमे रहितै तँ आस्था खसिये पड़ितए! मुदा से नै भेलै। ओतऽ सभकेँ एकात कऽ एकटा लाल रंगक परी आस्थाकेँ एकटा स्वागत कोठलीमे लऽ गेल। बिन अन्हारे ओइमे साँझ जकाँ लगलै आस्थाकेँ। ओकरा लगलै जे ओकरा निन्न आबि रहल छै, ओ ओंघाए लागलि। ओकरा लगलै जे जखने ओकरा ओंघी लागऽ लगलै तखने हवा संगे किछु नाक बाटे ओकरा मुँहमे जा रहल छै। हवा संगे!! ओकरा बुझेलै जे ओ जखनसँ परी लोकमे अछि तखनसँ साँस लेनहिये नै अछि, तँ की नाकक उपयोग एतऽ हवा सन कोनो चीजक माध्यमसँ खेनाइ खुआबै लेल होइ छै? तखने आस्थाकेँ निनिया लागि गेलै। सुतलासँ उठलापर आस्था चकित भऽ गेल छलि। ओकरा लगलै जे ओ जे किछु सपनामे केने छलि से जगलापर सोझाँ छलै। -ऐ परीलोकमे सुतलमे सपनामे कएल काज सेहो सत्य भऽ जाइ छै? आस्था सपनामे देखने छलि जे ओ धोधरिसँ बहरा गेल अछि आ ढेर रास समान घरसँ आनि हेलीकॉप्टरपर चढ़ि फेरसँ धोधरिमे ढुकि गेल अछि। दवाइ, खिलौना, एक्सरे-मशीन, चक्कू, फल, बर्तन, तराजू, पहिया, पेचकस, एना, फटक्का, डिब्बामे पैक कएल खाइ लेल केक, बिस्कुट आ हेलीकॉप्टर। हँ, हेलीकॉप्टरपर राखि कऽ ई सभ समान ओ अनने छलि। अपन ऐ स्वागत कक्षमे सपनामे ओ बर्तन, फल, डिब्बामे पैक कएल खाइ लेल केक आ बिस्कुट रखने छलि, से सभ जगलापर ओ सोझाँमे देखलक! ओ सपनामे सभ समान हेलीकॉप्टरेमे छोड़ि कऽ एतऽ आबि गेल छलि, मुदा बर्तन, फल, डिब्बामे पैक कएल खाइ लेल केक आ बिस्कुट कनी-कनी आनि लेने छलि। टुराकोस, मम्बा, एस्कीमो, तितली, टिकुली, कूकाबुरा आ पेंग्यूइन स्वागत कक्षमे आबि जाइ गेल। टुराकोस आस्थाकेँ आश्चर्यसँ आँखि खोलने देखलक। टुराकोस बाजल- हमरा सभकेँ रानीक आदेश भेटल अछि। ऐ लोकमे सपनामे कएल काज सत्य भऽ जाइ छै आस्था। तेँ एतुक्का रानी दुनियाँक सभ महादेशक सभ तरहक प्राणीकेँ एतऽ मंगबै छथि। ओतुक्का लोक अपन-अपन सपनामे बहुत रास बौस्त-जात एतऽ लऽ अनैए। किछु समस्या छै एतऽ, ओ एकाधटा गाछ जे चलऽ लागल छै… से किछु आफद अनतै एतऽ। किछु विचित्र-विचित्र गप सुनै छिऐ। मम्बा अपन भारी सिसकारी दैत अबाजमे बाजल- आर की की अनने छी आस्था, आ कतऽ कतऽ रखने छी? आस्था मोन पाड़ैत बाजल- हँ, ऊँ…। हम हेलीकॉप्टर अनने रही आ ओकरा ओइपार लऽ गेल रही। टुराकोस बाजल- ओइपार, माने महारक ओइपार? आस्था- हँ। टुराकोस, मम्बा, एस्कीमो, तितली, टिकुली, कूकाबुरा आ पेंग्यूइन एक दोसराक दिस ताकऽ लागल। कूकाबुरा, जे कनी काल पहिने धरि खी-खी हँसै छल, पहिल बेर चिन्तित आ गम्भीर देखा पड़ल। कूकाबुरा बाजल- जल्दी चलू आस्था, महारक ओइपार जल्दीसँ चलू। किछु आफद आबैबला अछि। ओ एकाधटा गाछ जे चलब सीखि लेने अछि, से ऐ हेलीकॉप्टर संगे किछु अनहोनी नै कऽ दिअए। सभ गोटे दौगू। कूकाबुरा हँसिते रहैए। मुदा जखन ओ चिन्तित आ गम्भीर होइए तखन बुझू जे किछु आफद आबऽ बला छै। टुराकोस, मम्बा, एस्कीमो, तितली, टिकुली, कूकाबुरा आ पेंग्यूइन आगू दिस दौगल आ आस्था ओकर पाछाँ गेलि। स्वागत कक्षसँ बाहर अबिते एकटा बाइपास सन सड़कपर सभ गोटे दौगि रहल छल। आस्थाकेँ लगलै जे ओकर सभक गति हजार किलोमीटर प्रति घण्टा तँ हेबे करतै। जखन चलब सए किलोमीटर प्रति घण्टा रहै तँ दौगब तँ हजार किलोमीटर प्रति घण्टा ठीके छै। एक घण्टा धरि सभ गोटे दौगैत रहला, तखने कूकाबुरा अकासमे ऊपर माथे कूदल। कूकाबुराक अकासमे कूदब माने गति कम करबाक संकेत। सभ अपन-अपन दौगनाइक गति घटबऽ लगला। सोझाँमे महार देखाइ पड़लै। सभ गोटे दौगबाक बदला झटकारि कऽ चलऽ लगला आ आस्ते आस्ते सभ गोटे सए किलोमीटर प्रति घण्टाक सामान्य गतिसँ चलऽ लगला। महारक ओइपार कनिये कालमे महार आबि गेल। ऊँच महार। आस्था पुछलक- ओइपार जाएब कोना? टुराकोस, मम्बा, एस्कीमो, तितली, टिकुली, कूकाबुरा आ पेंग्यूइन एक्के संगे हँसऽ लागल। एस्कीमो बाजल- टुराकोस भटरङ बला कियारीक वैज्ञानिक सभ लग रहैए, मम्बा असमानी बला कियारीमे सैन्य विभाग संग रहैए, हम नील रङक मकानक कियारीमे बच्चा आ विद्यार्थी सभक संग रहै छी, तितली हरियरका पाँतीमे वनस्पति शोध प्रयोगशालामे रहैए, टिकुली पीअर रङक पाँतीमे मालजाल, मनुक्ख, परी आदिपर शोधक प्रयोगशाला-सह-अस्पतालमे रहैए, कूकाबुरा संतोला रङक पाँतीमे मानसिक आ शारीरिक रूपसँ कमजोर मनुक्ख, परी, चिड़ै, जानवर आ वनस्पति सभपर शोध लेल प्रयोगशालामे रहैए। पेंग्यूइन परीलोकक बसिन्दाक लाल पाँतीमे रहैए। ओइपार गेनाइ हमरा सभकेँ सिखाओल गेल अछि। तितली बाजल- ऐ महारक ओइपार वनस्पति खतमे जकाँ छै। हम ओतऽ किछु प्रयोग करब आ ओइ एकाधटा भागल वनस्पतिक गतिविधिकेँ नियन्त्रित करबाक प्रयास करब। टुराकोस बाजल- हमहूँ महारक ओइपारमे हेलीकॉप्टर आ आन यन्त्रक तकनीककेँ ओइ अति विलक्षण आ तीव्र बुद्धिबला मुदा अस्थिर बुद्धिबला भागल-चलैबला वनस्पतिक हाथमे नै जाए देब। टिकुली बाजल- मालजाल, मनुक्ख आ परीमे सेहो ओइ भागैबला-चलैबला वनस्पतिक लक्षण नै आबि जाए, से हम देखब। पेंग्यूइन- हमरा रानी परीलोकक बसिन्दाक लाल पाँतीमे कोनो तरहक संक्रमण वा आक्रमण रोकबा लेल पठेने छथि। रानीसँ ककरो आइ धरि भेँट नै भेल छै, मुदा संदेश आएल छल। कूकाबुरा खी-खी हँसैत बाजल- ई भागल वनस्पति महारक ओइपार हेलीकॉप्टरसँ कोनो तेहेन तकनीक नै निकालि लिअए जे ओइसँ ककरो नोकसान भऽ जाए आ ई परीलोक संकटमे पड़ि जाए। मानसिक आ शारीरिक रूपसँ कमजोर मनुक्ख, परी, चिड़ै, जानवर आ वनस्पतिक प्रयोग ओ सभ ऐ लेल कऽ सकैए, कारण हिनका सभकेँ ठकि-फुसिया कऽ ओ सभ अपन काज सुतारऽ चाहत। कूकाबुराकेँ हँसैत देखि दोसर सभ गोटेकेँ भरोस भेलै। ओ जखन गम्भीर होइए तँ सभ घबड़ा जाइए। कूकाबुरा आस्थासँ पुछलक- आस्था, अहाँकेँ मोन अछि जे महारक ओइपार कतऽ अहाँ हेलीकॉप्टर रखने रही? आस्था- हम? कूकाबुरा खी-खी हँसैत बाजल- हँ हँ, सपनामे। किछु मोन अछि? आस्था- ओतऽ अन्हार तँ रहै, मुदा जखने हम हेलीकॉप्टर उतारैत रही तखने ठनका ठनकलै आ जोरसँ बिजलौका लौकलै, रेत सभ बुझेलै जे पघिल कऽ बहऽ लगलै। ओतऽ पघिलल बालुसँ शीसाक बड़का प्लेटफॉर्म बनि गेलै आ ओइपर हेलीकॉप्टर उतरि गेल। शीसामे हम अपन आ हेलीकॉप्टरक मुँह सेहो देखने रही। मुदा ओ तँ सपना रहै। टुराकोस बाजल- एतऽ सपना सत्य भऽ जाइ छै। मुदा ऐ लोकमे ठनका, बिजलौका? कूकाबुरा गम्भीर भऽ गेल- नै जानि ओ भागल-चलैबला वनस्पति की करत? आस्था पुछलक- मुदा जँ ओ सभ एकाधे टा अछि तखन कोन चिन्ता। टुराकोस बाजल- एकाधे टा सँ डारि खसा कऽ कतेक रास चलैबला-वनस्पति बनि जाएत। मुदा महारक ओइपार रेत छै, तेँ सम्भव अछि जे ओतेक जल्दी तँ एकसँ एक्कैस तँ ओ सभ नहिये बनि सकत। टुराकोस आगाँ बढ़ल आ एकटा गुप्त तरहरिक द्वार लग आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। एकटा पैघ शिलाकेँ ओ कंगुरिया आंगुरसँ उठेलक। आस्था आश्चर्यमे पड़ि गेलि- तरहरिमे तरहरि! तरहरिमे ठीके सातटा तरहरि छलै। टुराकोस भटरङ, मम्बा असमानी, एस्कीमो नील, तितली हरियर, टिकुली पीअर आ कूकाबुरा संतोला रंगक तरहरिक दरबज्जामे चलि गेल। पेंग्यूइन आस्थाकेँ इशारा केलक आ लाल रंगक तरहरिमे चलि गेल। पेंग्यूइन आस्थाकेँ कहलक- जेना रतिचर रातिमे घुमैत अछि आ दिनमे चोन्हरा जाइए, तहिना महारक ओइपार जाइ लेल हमरा सभकेँ विशेष उपकरण आ सुरक्षा उपकरण चाही। तखने हम अन्हारमे देखि सकब आ ओइ चलैबला-वनस्पतिक दिमागमे पैसि कऽ देखि सकब जे ओ हेलीकॉप्टर आ ओकर भीतरक समानसँ की-की करऽ चाहि रहल अछि। आस्था आ पेंग्यूइन विशेष ड्रेस आ सुरक्षा उपकरण पहीरि कऽ तरहरिक गुप्त मार्गसँ बहराइ गेला तखने टुराकोस भटरङ, मम्बा असमानी, एस्कीमो नील, तितली हरियर, टिकुली पीअर आ कूकाबुरा संतोला रंगक तरहरिक गुप्त दरबज्जासँ निकलै जाइ गेला। सोझाँमे महारक ओइपारक अन्हारमे सभ किछु खाली-खाली छल। टुराकोस आस्थासँ पुछलक- आस्था, हेलीकॉप्टरक तकनीकी जानकारी कने विस्तारसँ दिअ। आस्था सभकेँ सम्बोधित करैत बाजल- ऐमे चढ़ै-उतरैबला सीढ़ी होइ छै से तँ अहाँ सभकेँ बुझले हएत। हेलीकॉप्टर उतरै काल एकटा ढाँचापर उतरैए, जे हेलीकॉप्टरेमे लागल रहै छै। ओ बड्ड मजगूत होइ छै। धबसँ हेलीकॉप्टर नीचाँमे खसैए मुदा तैयो ओकरा कोनो नोकसानी नै पहुँचै छै। ई हवाइ जहाजसँ किछु मामिलामे बेशी कारगर होइए, अपन विशेष इन्जिन आ पंखाक मदतिसँ ई सोझे ऊपर माथे उड़ैए आ सोझे नीचाँ माथे नीचाँ उतरैए। हवाइ जहाज जकाँ एकरा उड़ै लेल दूर धरि दौगऽ नै पड़ै छै। हेलीकॉप्टर एकटा विशेष ईंधनसँ चलै छै। कूकाबुरा गम्भीर भऽ जाइए आ संगे सभ कियो गम्भीर भऽ जाइए। आस्था उत्तर पूर्वी दिशा दिस आंगुर देखबैत कहैत अछि- सपनामे लागल रहए जे रेगिस्तानमे बिजलौका ओइ दिशामे खसल रहए। कूकाबुरा सभकेँ कहैए- ककरो अन्हारमे देखबामे कोनो दिक्कत तँ नै भऽ रहल अछि? सभ एकट्ठे बाजल- नै, ककरो कोनो दिक्कत नै भऽ रहल अछि। कूकाबुरा बाजल- तखन चलू ओइ दिस। जतऽ बिजलौका रेतकेँ पघिला कऽ शीसा बना देने छै, ओइ स्थानकेँ ताकू। कारण जखन हम सभ एक हजार किलोमीटर प्रतिघण्टाक गतिसँ दौगि सकै छी तखन ई हेलीकॉप्टर तँ एतए एक लाख किलोमीटर प्रति घण्टाक गतिसँ उड़त। ओ चलैबला-वनस्पति हेलीकॉप्टरक सभटा तकनीकक अलगसँ उपयोग कऽ सकैए, ओ ओकर ईंधन, ईंजन, पंखाक प्रतिरूप बना सकैए। एक्सरे आदि उपकरणक प्रतिरूप बना सकैए। चलू… आ “चलू..” क शब्द सुनिते सभ दौग लगलाह। कएक घण्टा बीति गेल मुदा सगरो रेते रेत देखाइ पड़ि रहल छल। चमकैत शीसाक प्लेटफॉर्म सात घण्टाक बाद सभकेँ ओइ अन्हारमे एकटा शीसाक प्लेटफॉर्म देखा पड़लै। ओतै एकटा हेलीकॉप्टर ठाढ़ रहै। सभ गोटे दौगबाक बदला झटकारि कऽ चलऽ लगला आ आस्ते आस्ते सभ गोटे सए किलोमीटर प्रति घण्टाक सामान्य गतिसँ चलऽ लगला आ हेलीकॉप्टर लग आबि ठाढ़ भऽ जाइ गेला। टुराकोस, तितली आ टिकुली हेलीकॉप्टरक पाछाँ चलि गेल आ कोनो रस्ते भीतर पैसबाक ब्योँतमे लागि जाइ गेल। आस्था बाजल- ऐमे सँ हेलीकॉप्टर नीचाँ उतरै काल जइ ढाँचापर उतरैए, से गाएब अछि। सीढ़ी गाएब अछि। गेट खोलल गेल अछि आ कियो ने कियो ऐ सभ समानक गहिंकी नजरिसँ निरीक्षण केलक अछि। तखने तितली आ टिकुली भनभनाइत आएल आ संगे बाजल- एकटा ऊर्मि आबि रहल अछि बालुक ऊपरसँ। टुराकोस जे बड़ी कालसँ चुप छल बाजल- कोन दिशासँ। तितली आ टिकुली संगे बाजल- उत्तर पश्चिम दिशासँ। सभ गोटे उत्तर-पश्चिम दिशा दिस भगला। तखने तितली आ टिकुली सभ गोटेकेँ इशारासँ ठाढ़ होइले कहलकै। सभ अपन गति कम केलक आ फेर ठाढ़ भऽ जाइ गेल। तितली आ टिकुली किछु अकानलक। सभ कियो मरुस्थलक अवाज सुनलक। ई अवाज कखनो डरौन भऽ जाइ छलै तँ कखनो संगीतक सुर बनि जाइ छलै। अही दुनू स्वर आ लयक बीच एकटा तेसर ध्वनि अकानबाक प्रयास तितली आ टिकुली कऽ रहल छल। तितली बाजल- ह्वेलक पीठ बला बालुक ढिमकापर सँ किछु विभिन्न तरहक अबाज आबि रहल अछि। चलैबला वनस्पति ओतै अपन काज कऽ रहल हएत। आस्था बाजलि- ह्वेलक पीठबला बालुक ढिमका केम्हर अछि? टिकुली बाजल- एतऽ सँ उत्तर-पूर्व दिशामे। ओतऽ सँ उत्तर-पूर्व दिशामे सभ कियो दौड़ जाइ गेलाह। लगभग सात-आठ घण्टाक बाद दूरेसँ ह्वेलक पीठ सन बालुक ढिमका देखा पड़ल। टुराकोस बाजल- आब सम्हरि कऽ चलबाक अछि। एतऽ छोट-छोट ढिमकाक उड़लाक बाद ताल बनि जाइ छै। ओइमे कखनो काल पएर धँसि जाएत। आस्था पुछलक- दलदल जकाँ। कूकाबुरा खी-खी कऽ कए हँसैत बाजल- नै, तेहेन नै। एतऽ अहाँ ठेहुन भरि धँसब आ प्रयास केलासँ आसानीसँ पएर बाहर निकलि जाएत। खाली घबड़ेबाक नै अछि, से ध्यान राखब। सभ फेर चलऽ लगला। ह्वेलक पीठबला बालुक ढिमकापर गाछ-बृच्छ सभ चारू कात पसरल छलै। ई देखि सभ आश्चर्यचकित रहि गेला। टुराकोस बाजल- चलैबला वनस्पतिक ई किरदानी अछि। किछु दिनमे ई गाछ-बृच्छ सभ सेहो चलऽ लागत। तखने लग पासक वनस्पति सभ आस्थाकेँ हाय-हेलो करऽ लगलै। आस्थाकेँ कने अपरतीब लगलै। ई सभ गाछ-बृच्छ तँ बड्ड नीकसँ बाजैए। महारक ओइपारक गाछ बृच्छक पात हिलितो नै अछि, मुदा ऐ दिस तँ गाछक पात सभ हिलि रहल अछि। आस्था एकटा गाछसँ पुछलक- चलैबला एकाधटा वनस्पति जे महारक ओइपार सँ आएल छथि, से कतऽ छथि? एकटा बच्चा गाछ बाजल- ह्वेलक पीठक पुच्छी लग हुनकर महल छन्हि, सतरंगी महल, जतऽ पनिसोखा अकाससँ नीचाँ खसै छै। ओ हमर सभक राजा छथि। -ओतऽ गेनाइ ठीक हएत?, आस्थासँ सातो गोटे पुछलखिन्ह। आस्था उत्तर देलक- किए नै? जँ मित्रतासँ गप भऽ जाए तँ झगड़ाक कोन खगता? आस्थाक संगे सभ गोटे ह्वेलक पीठक ऊपरसँ होइत आगाँ बढ़ि जाइ गेलाह। आधा घण्टाक बाद एकटा सतरंगी गेटक सोझाँमे ओ सभ आबि गेलाह जतऽ ह्वेल रूपी बालुक ढिमकाक पुच्छी नीचाँ जा कऽ खतम भऽ गेल छलै। चलैबला वनस्पतिक समानान्तर परीलोक जखने आस्था अपन सातो संगीक संग ओइ चलैबला वनस्पतिक समानान्तर परीलोकक दरबज्जा लग पहुँचल कूकाबुरा खी-खी कऽ कए हँसए लागल। सभ ओकरा हँसैत देखि प्रसन्न भऽ जाइ गेल। एकटा अलौकिक प्रसन्नता सभक मुँहपर आबि गेलै। सभ अपन-अपन रंगक दरबज्जापर आबि गेल। पेंग्यूइन संगे आस्था ललका दरबज्जापर आबि गेल। ओकर सभक स्वागत कएल गेलै, एकटा चलैबला गाछक बच्चा स्वागत लेल बैसल छल। आस्थाकेँ लगलै जे एतऽ लोक हृदएसँ सोचि रहल अछि, मशीन नै हृदए काज कऽ रहल अछि। पेंग्यूइन संगे आस्था आगू बढ़ल। दूटा चलैबला गाछक बच्चा हुनका दुनू गोटेकेँ दूटा स्वागत कक्षमे लऽ गेल। आस्थाकेँ ओतऽ अपन खाइ पीबैबला समान, जे ओ सपनामे अनने छलि, देखा पड़लै। ओकरा लगलै जे ओ साँस लऽ पाबि रहल अछि। ओकरा लगलै जे ओकरा खूब जोरसँ भूख लागल छै। ओ ओतऽ राखल बिस्कुट आ आन खेनाइ खाए लागल। फेर कने कालक बाद ओ खिड़कीसँ बाहर देखलक। ओतऽ एकटा बिजलौकासँ पघिलल शीसाक बड़का मैदानमे ओहने छोट-छोट हेलीकॉप्टर ओकरा देखा पड़लै, जेहन हेलीकॉप्टर आस्था सपनामे अनने छली। चलैबला वनस्पति पायलट सभ ओकरा उड़ा रहल छल आ नीचाँ आनि रहल छल। तखने ओ छोट वनस्पतिक चलैबला बच्चा सूचना दैत बाजल- दुनू राजा एतऽ अहाँसँ भेँट करै लेल आबि रहल छथि। दुनू राजा किछु कालक बाद एला। दुनू वनस्पति रहथि, सोचैबला-चलैबला। आस्था हुनका सभसँ पुछलक- की अहाँ परीलोकक रानीकेँ खतम करैबला छी? परीलोककेँ नष्ट करैबला छी? दुनू राजा बजला- कोनो परीलोक नै छै आ नहिये कोनो रानी ओतऽ छै। की अहाँकेँ रानीसँ भेँट कराओल गेल छल? आस्था बाजलि- नै, से तँ भेँट नै कराओल गेल छल। दुनू राजा बजला- ओतए किछु विक्षिप्त वैज्ञानिक सभक राज भऽ गेल छै। हमरा पता चलल, तेँ हम महारक ऐपार आबि गेलौं। ऐ कात ओ सभ माहुर सभ सन पदार्थक अवशेष फेकै छथि आ ई क्षेत्र एकटा रेगिस्तान बनि गेल अछि। मुदा हमर सभक ठाढ़िसँ आब जीवन पसरि रहल अछि। आब अहूँ सभक देहसँ सातो दरबज्जामे आठ तरहक जीव पसरत। अहाँ लड़ाइ नै वार्ता चुनै लेल अपन संगी सभकेँ प्रोत्साहित केलौं, से हम दूर-संचालित एक्सरे-कैमरासँ देखि रहल छलौं। ई तँ समानान्तर सुधार गृह मात्र अछि। कनी कालमे दुनू राजा चलि गेला। आस्था सोचए लागल- ई सभ तँ नीक लोक छल। आस्था ओइ छोट वनस्पतिक चलैबला बच्चाकेँ पेंग्यूइनकेँ बजा कऽ आनै लेल कहलक, फेर किछु सोचि कऽ मना कऽ देलक। आस्थाकेँ निन्न आबए लगलै। ओ सोचए लागल जे कोना सभ ऐ तरहरिक छद्म परीलोक आ ओकर समानान्तर सुधार गृहसँ बाहर जाए। आस्था चाहलक जे ओकरा निन्न आबै आ सपना आबै। सभ महादेशक धोधरि बन्न भऽ जाए आ विक्षिप्त वैज्ञानिकक कथित परीलोक खतम भऽ जाए। आ तखन समानान्तर सुधार गृह अपने खतम भऽ जाएत। आस्था सपनाए लागल। समानान्तर सुधार गृहक दुनू राजा सपना पठेने रहै। आ आस्था चन्ना गाछी फेरसँ पहुँचि गेलि। सपना सत्य होइ छै, आ से भेलै। धोधरि बन्न भऽ गेलै। आब कोनो माल-जाल, चिड़ै निपत्ता नै होइ छै। ….. बा: ओम। मुदा ओम तँ सुति गेल छल। कतऽ धरि खिस्सा सुनलक से काल्हि रातिमे पुछबै- ई सोचैत बा सेहो सुति रहली। दमन कुमार झा हीरा-मोती अमन आ चमन दुनू मित्र छल, पहलमान छल। दुनू खूब शक्तिशाली छल मुदा ओ अपन बलक प्रयोग नीक काज करबामे नै अपितु चोरी-डकैती करबामे करैत छल। एक दिन दुनू चोरि करबाक निमित्ते घरसँ बहराएल। अन्हरिया राति छल, हवा जोर जोरसँ बहि रहल छल। झिंगुरक झंकार वातावरणकेँ डराओन बनेने छल। ई दुनू दबले पएरे जा रहल छल। जखन किछु दूर गेल तँ गप करबाक आवाज सुनाइ देलकै। एकरा दुनूकेँ कान ठाढ़ भेलै। ई दुनू ओम्हरे बिदा भेल। किछु दूर गेल तँ आवाज आर स्पष्ट भेलै। दुनू यात्री अपनामे गप कऽ रहल छल, डर नै हुअए तेँ जोर-जोरसँ बाजि रहल छल। पहिल बाजल- रे भाइ, हमरा लग एहन मूल्यवान हीरा अछि जे मरै काल तक रखने रहब। ऐपर दोसर बाजल- रे भाइ, हमरा लग एहन मोती अछि जे राजा-महाराजा लग नै छनि। ओ मोती हरदम हम अपने लग जोगा कऽ रखने रहैत छी। दुनूक गप सुनि चोर सभ खूब प्रसन्न भेल। गामक सुनसान जगह पर अबिते दुनूकेँ पाछूसँ चक्कू सटा देलकै। अमन जोरसँ बाजल- सावधान? दुनू यात्री अवाक। पुनः गरजि कऽ बाजल- तोरा सभ लग जतेक हीरा-मोती छौ निकाल, नै तँ एतै खतम कऽ देबौ। ओहीमे सँ एकटा बाजल- हमरा सभ लग किछु नै अछि। तइ पर दोसर चोर चमन गरजि उठल- चुप। एखन हीरा-मोतीक गप करै छलेँ, निकाल जल्दी नै तँ जान मारि देबौ। दुनू कलपैत बाजल- हम सभ ओहिना गप करै छलौं, डर नै हुअए तेँ जोरसँ बजैत छलौं। हमरा सभकेँ नै मारू, हमरा सभ लग किछु नै अछि। -चुप्प।, चोर जोरसँ बाजल। ओमहर दऽ कऽ घोड़सवार जा रहल छल। ओकरा संदेह भेलै। ओ घोड़ापर सँ उतरि हाथमे लाठी लऽ ओम्हरे बिदा भेल। जाबे-जाबे चोर किछु करए ता घोड़सवार दुनू केँ एहन लाठी मारलक जे दुनू अचेत भऽ गेल आ ओकर हाथसँ चक्कू खसि पड़लै। आब तीनू मिलि कऽ दुनू चोरकेँ पकड़ि लेलक। घोड़सवार दुनूकेँ बान्हि कऽ घोड़ा संग दोड़बैत लऽ जाए चाहैत छल मुदा ई दुनू घोड़सवारकेँ धन्यबाद दैत बाजल- एकरा दुनूकेँ छोड़ि दियौ। हम माफ केलिऐ। एकरा हीरा-मोती चाहिऐ ने। दऽ देबै। घोड़सवार चौंकल- अहाँ ई की करैत छी? अतेक अमूल्य चीज ओकरा दैत छिऐ? -हँ, मुदा एक शर्तपर।, ओ दुनू बाजल। -ओकरा ई दुनू चीज हरदम संग मे रखऽ पड़तै। दुनू चोर मुड़ी झुलेलक। पहिल बाजल- हमरा लग सत्य रूपी हीरा अछि। तँ दोसर बाजल- हमरा लग प्रेम रूपी मोती अछि। जँ हमरा लोकनि एकरा दुनू चीज दऽ देबै तँ दुनियाँक सभ काज कऽ सकैत अछि। सुखी आ खुशी सँ रहि सकैत अछि। अपन शक्तिक उपयोग नीक काज लेल कऽ सकैत अछि। सत-पथपर चलि विजय भऽ सकैत अछि। दुनू चोर ई बात सुनि दुनुक पएरपर खसि पड़ल। किछु दिन बाद अमन आ चमन अपन मेहनतक बल पर सत्य-अहिंसाक मार्ग पर चलि कऽ सुख चैनसँ जीवन बितबैत, गामक प्रतिष्ठित लोकमे गनल जाए लगलाह। डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” दक्षिणी ध्रुव पर मनुक्खक पएरक सए वर्ष अर्थात् खिस्सा अण्टार्कटिका केर आइ धिया – पुता सभ सोचैत होएताह कि विदेहजी फेर अहू बेर कोनो उपदेशबला कविता वा गीत लऽ कऽ अओताह आ अनेरो हमर सभक दिमाग खएताह। तँ से नै ऐबेर कोनो उपदेश नै। ऐ बेर हम अहाँ सभकेँ एकटा दूर देशक यात्रा पर लऽ चलैत छी, देश नै महादेश थिक ओ। चारू कात पानिसँ (समुद्रसँ) घेड़ाएल अछि, तेँ महाद्वीप थिक ओ। अहूँ सभ सोचैत हएब कि ऐ ठिठुरल जाड़मे के घर छोड़ि कऽ घूमए लेल निकलत। पर जतऽ जएबाक विचार अछि ओइ ठाम तत्तेक ने जाड़ पड़ैत अछि कि अपना अइ ठामक माघ मास आ तिला संक्रान्तिक जाड़ सेहो गर्मी सन बुझि पड़त। अहाँ सभक मोनमे होइत हएत जे कहीं हम कनाडा या स्विटजरलैण्ड केर बात तँ नै कऽ रहल छी। नै, कथमपि नै। स्विटजरलैण्ड वा कनाडा तँ देश थिक आ हम महादेशक बात कऽ रहल छी। ओ महादेश जत्तऽ प्राकृतिक रूपसँ मनुक्ख नै रहैत अछि। सही सोचि रहल छी अहाँ सभ, ओकर नाम थिक “अण्टार्कटिका”। अप्पन धरतीक दक्षिणी ध्रुवक चारू कात बसल महादेश अण्टार्कटिका। अण्टार्कटिका ग्रीक शब्दक रोमन संस्करण थिक, जकर अर्थ होइत अछि “आर्कटिक केर विपरीत” (Anti - Arctic) अर्थात् “उत्तर केर उनटा”, माने कि “दक्षिण”। चित्र सं॰-१ धरतीक ग्लोब पर अण्टार्कटिकाक स्थिति अहाँ सभकेँ ई तँ बुझले हएत कि धरती गोल अछि आ एकर दुनु ध्रुव समतोला सन थोड़ेक धँसल आ सपाट अछि। उत्तरी ध्रुवकेँ ९०° उत्तरी अक्षांश रेखा आ दक्षिणी ध्रुवकेँ ९०° दक्षिणी अक्षांश रेखा कहल जाइत अछि। रेखा नाम रहितो ई दुनु रेखा नै भऽ कऽ एकटा बिन्दुक सदृश थिक। एकर दुनुक आसपासक क्षेत्रकेँ क्रमशः “आर्कटिक क्षेत्र” आ “अण्टार्कटिक क्षेत्र” कहल जाइत अछि। संसारमे सातटा महादेश थिक जइमे सँ एक थिक “अण्टार्कटिका”। ओइ ठाम चारू कात केवल बर्फे-बर्फ अछि, सौंसे धरती बर्फक तरमे नुकाएल रहैत अछि। ओ दुनियाक सभसँ बेशी निर्जन, ठण्ढा, हवा-बिहाड़ि युक्त आ शुष्क क्षेत्र अछि। सामान्य भाषामे शुष्क माने सुखाएल। अहाँ सभक मोनमे प्रश्न उठल हएत कि एक तरफ तँ हम कहि रहल छी जे चारू कात केवल बर्फे-बर्फ अछि आ दोसर तरफ कहैत छी, दुनियाँक सभसँ सुखाएल क्षेत्र, से कोना? ओइ ठामक न्यूनतम् तापमान ८९.२°C (-१२८.६°F) नापल गेल अछि (रूसी अण्टार्कटिक केन्द्र “वोस्तोक” द्वारा)। तेँ पानि जमि कऽ ठोस आ कठोर (पाथरो सँ बेशी कठोर) बर्फ भऽ जाइत अछि। हवासँ पानिक अंश वा आर्द्रता (moisture/ humidity) पूर्ण रूपेँ निपत्ता भऽ जाइत अछि, परिणामस्वरूप हवा अत्यन्त शुष्क भऽ जाइत अछि। संगहि ओइ ठाम सतहपर कोनो ऊँच पहाड़, गाछ-वृक्ष वा आन अवरोध नै हेबाक कारणेँ ई हवा बिना रोक-टोकक बहैत रहैत अछि आ बिहाड़िक रूप लऽ लैत अछि। ऐठाम हवा केर अधिकतम् गति ३२० कि॰मि॰ प्रति घण्टा नापल गेल अछि। दक्षिणी ध्रुव केर नजदीक बर्फक अधिकतम् मोटाइ ४.७७६ कि॰मि॰ पाओल गेल अछि, जइसँ ओइ ठामक ठण्ढीक अन्दाज आसानीसँ लगाओल जा सकैत अछि। विश्वक स्वच्छ पानि (fresh water) क लगभग ७०% अण्टार्कटिकाक हिम-आवरणक रूपमे जमल अछि, जखनकि विश्वक सम्पूर्ण बर्फक ९०% भाग एकसरि अण्टार्कटिकामे अछि। अण्टार्कटिका केर क्षेत्रफल लगभग १ करोड़ ४० लाख वर्ग कि॰मि॰ (१४.०० million km2) थिक आ ओ एशिया, अफ्रिका, उ॰अमेरिका आ द॰अमेरिकाक बाद विश्वक पाँचम सभसँ पैघ महादेश अछि। ई चारू कातसँ दक्षिणी हिम महासागर (अण्टार्कटिक महासागर) सँ घेड़ाएल अछि। ऐ महासागरक ऊपरुका भाग ठण्ढीमे जमि जाइत अछि, जइसँ ऐ समयमे महाद्वीपक आकार प्रायः दूना बुझि पड़ैछ। ऐठाम लगभग ६ महीनाक दिन आ ६ महीनाक राति होइत अछि तेँ अपना घड़ीक अनुसार ६ मास धरि रातियोमे आकाशमे सूर्य देखाइ पड़ैत अछि, थिक ने आश्चर्यक गप्प! मुदा गर्मीक दिनमे सेहो अधिकतम् तापमान मात्र -२६°C (-१५°F) नापल गेल अछि। अपना सभ दिशि माघ मासक शीतलहरीमे सेहो औसत तापमान ४°C सँ १०°C केर बीचेमे रहैत अछि। आब अहीं कहू- छै ने बहुत ठण्ढा जगह? पड़ाए गेल ने अहाँ सभक जाड़? चित्र सं॰ -२- ठीक दक्षिणी ध्रुवक ऊपरसँ देखला पर अण्टार्कटिकाक स्वरूपक रेखाचित्र अण्टार्कटिकाक धरती पर मनुक्खक पहुँचब एक समयमे ओहिना छल जेना कि बादमे चानपर पहुँचब। ओहिना कठिन आ ओतबहि महत्वपूर्ण। लोक सभ अप्पन-अप्पन प्राणक बाजी लगा कऽ ओतए पहुँचबाक प्रयासमे लागल छलाह। किछु लोक अप्पन-अप्पन उद्देश्य वा लक्ष्य प्राप्त करबामे सफल भेलाह आ आपिस सेहो आबि सकलाह, जखन कि किछु लोक अप्पन प्राण गमाए बैसलाह। ओइ समएमे पालबला पनिया जहाज अण्टार्कटिका तक पहुँचबाक एक मात्र साधन छल। रस्ता मे “समुद्री बिहाड़ि” (Cyclone) मे घेड़एबाक वा “प्लवित / दहाइत हिमखण्ड” (Iceberg) तथा “प्रवाहित समुद्री हिमखण्ड” (Pancake ice, Polynya etc.) सँ टकड़एबाक वा “हिमनद” (Glacier) तथा “हिमीभूत समुद्री सतह” (Pack ice, Fast ice etc.) मे फँसि जएबाक सम्भावना रहैत अछि। प्लवित/ दहाइत हिमखण्ड कतेक विनाशक भऽ सकैत अछि तकर सभसँ नीक उदाहरण “टाइटेनिक” नामक पनिया जहाजक विश्व प्रसिद्ध दुर्घटनासँ लगाओल जा सकैत अछि। ई जहाज साउथेम्पटन (ब्रिटेन) सँ न्युयॉर्क (अमेरिका) जएबा काल, १० अप्रील १९१२ केँ एकटा एहने “प्लवित/ दहाइत हिमखण्ड” (Iceberg) सँ टकड़एबाक कारणेँ दुर्घटनाग्रस्त भेल छल। जएबा व अएबा दुनु कालक लेल खएबा-पिउबाक चीज बस्तु पहिनेसँ संगमे ओरिआ कए राखए पड़ैत छैक। ज्यों-ज्यों वातावरणक तापमान कम होइत जाइत छै आ हवाक शुष्कता एवम् गति बढ़ैत छै, त्योँ-त्योँ शरीर सुन्न होमए लगैत छै, शरीरक कोशिका (Cells) सभ मरए लागैत छै, जकरा चिकित्सकिय भाषा मे “हिमदाह/ हिमदग्ध” (Frost bite) कहल जाइत अछि। ऐ “हिमदाह” सँ किछुए कालमे मनुक्खक प्राण तक जा सकैत अछि। तेँ ऐ जानमारुक ठण्ढीसँ बचबाक पूरा ओरिआओन संग मे लऽ कऽ चलए पड़ैत छै। अण्टार्कटिकाक बीचो-बीच मध्य अण्टार्कटिक पर्वतश्रेणी (Trans Antarctic Maountains) थिक जे बर्फ सँ आच्छादित रहैत अछि। ई पर्वत श्रेणी अण्टार्कटिका केँ दू भागमे बाँटैत अछि, पैघ “मुख्य भाग” (Main land) आ दोसर छोट “प्रायद्विपीय भाग” (Antarctic peninsula)। एकर अतिरिक्त ओइ ठाम किछु सुप्त ज्वालामुखी पहाड़ सेहो थिक जे कखनो कखनो सक्रिय भऽ उठैत अछि। ओइ ठाम लगभग ७० टा स्वच्छ/ मीठ पानिक झील (Fresh water lakes) सेहो अछि। ओइ ठाम मनुक्ख तँ नै अछि, मुदा प्राणीविहीन जगह नै थिक ओ। चिड़ैमे पेंग्वीन (Penguin) (जे उड़ि नै सकैत अछि पर पानिमे नीक जेकाँ डुबकी लगा कऽ हेलि सकैत अछि आ बर्फ पर अपन दू पएर सँ मनुक्ख जेकाँ चलि सकैत अछि), स्क्युआ (Skua) आ एल्बेट्रॉस (Albatross) (एकर दुनु पंखक पसार संसारमे आन सभ चिड़ैसँ बेशी होइत अछि) आदि ओइ ठामक मूल निवासी थिक। समुद्रमे सील (Seal), वालरस (Walrus) , क्रील (Krill), मिंक ह्वेल (Mink Whale) आदि पाओल जाइत अछि। चित्र सं॰ -३- अण्टार्कटिकाक जैव धरोहरि कैप्टन जेम्स कुक (Captain James Cook) पहिल मनुक्ख छलाह जे “अण्टार्कटिक वृत्त” केँ १७ जनवरी १७७३ ई॰ केँ पार कएलन्हि। एकर बाद ओ साले भरिमे दू बेर आरो प्रयास कएलन्हि मुदा वातावरणीय विषमताक कारण अण्टार्कटिका धरि नै पहुँचि सकलाह। २७ जनवरी १८२० ई॰ केँ रूसी अण्वेषक बेल्लिंगहुसेन (Fabian Gottlieb von Bellingshausen) अण्टार्कटिकाक हिमाच्छादित धरतीकेँ पहिल बेर दूरेसँ देखि सकलाह मुदा हुनको ओइ ठाम पएर रखबाक सौभाग्य नै भेटलन्हि। तकरा बाद बहुतो लोक प्रयास कएलन्हि मुदा ओइ ठाम पएर रखबामे असफल रहलाह। उपलब्ध साक्ष्यक अनुसार अण्टार्कटिकाक हिमाच्छादित धरती पर पहिल बेर पएर रखनिहार व्यक्ति छलाह जॉन डेविस (John Davis)। यद्यपि ऐ सँ पहिने किछु आरो लोक सभ ऐ तरहक दावा कएने छलाह मुदा ओइ सन्दर्भमे पुष्टि कएनिहार कोनो साक्ष्य उपलब्ध नै अछि। जॉन डेविस सील नामक समुद्री प्राणिक शिकारक उद्देश्य सँ ७ फरवरी १८२१ ई॰ केँ पच्छिमी अण्टार्कटिकामे उतरलाह। परञ्च ओ ओइ ठाम किछुए काल ठहरि कऽ आपिस आबि गेलाह, किएक तँ ओ शिकारी छलाह, वैज्ञानिक नै। किछु लोक एकरो विवादिते मानैत छथि। चित्र सं॰ -४- दक्षिणी ध्रुव पर पहिल बेर पएर रखनिहार मनुक्ख, नॉर्वे निवासी “रॉएल्ड अमुण्डसेन” अण्टार्कटिका आ ओकर बाद दक्षिणी ध्रुव धरि पहुँचबाक प्रतियोगिता निरन्तर चलैत रहल । ऐबेर बाजी मारलन्हि नॉर्वे वासी रॉएल्ड अमुण्डसेन (Roald Amundsen)। ओ १४ दिसम्बर १९११ ई॰ केँ भौगोलिक दक्षिणी ध्रुव (Geographical south pole i.e. ९०°S latitude) पर पहुँचबामे सफल रहलाह। ओ अपन दलक सदस्य सभक संग ओइठाम नॉर्वेक झण्डा फहरओलन्हि आ अपन पहुँचबाक साक्ष्य ओतए सुरक्षित राखि आपिस चलि अएलाह। पहुँचबासँ पहिने ओ अपन यात्राक जानकारी दुनियाँसँ नुका कऽ रखलन्हि, तेँ हुनक प्रतियोगी सभकेँ ऐ बातक मिसियो खबड़ि नै रहन्हि। अमुण्डसेनक जन्म १६ जुलाई १८७२ ई॰ मे नॉर्वे (यूरोप महादेशक एकटा देश) केर शहर ओस्लो (Oslo) केर नजदीक क्रिस्चिनिया (Christinia) मे भेल छलन्हि। ऐ अभियानमे हुनक जहाजक नाँव छल फ्रॅम(Fram)। हुनक नजदीकी प्रतियोगी इंग्लैण्डक कैप्टन राबर्ट फॉल्कन स्कॉट (Captain Robert Falcon Scott) अमुण्डसेनक ३३ दिनक बाद १७ जनवरी १९१२ ई॰ केँ भौगोलिक दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचि सकलाह आ पहुँचलाक बाद पहिने सँ नॉर्वेक झण्डा देखि हुनका बहुत दुख आ तामस सेहो भेलन्हि। आपिस लौटैत काल दुर्घटनामे स्कॉट अप्पन पूरा दलक संग मारल गेलाह। १४ दिसम्बर २०११ ई॰ केँ अमुण्डसेनक दक्षिणी ध्रुवपर विजयक १०० वर्ष पूरा भेल। २०११ ई॰ केँ नार्वे “अमुण्डसेन वर्ष” आ यूनेस्को (UNESCO) “दक्षिण ध्रुव पर पहिल मनुक्खक शताब्दी वर्ष” क रूपमे मनओलक अछि। चित्र सं॰ -५- अण्टार्कटिकाक भूगोल आ ओइठाम भारतीय अनुसंधान केन्द्र दर्शक मानचित्र डॉ॰ सय्यद जहूर कासिम (Dr Sayed Zahoor Qasim) क नेतृत्व मे ९ जनवरी १९८२ ई॰ केँ २१ सदस्यीय पहिल भारतीय अण्टार्कटिक अभियान दल अण्टार्कटिकाक हिमाच्छादित धरतीपर पएर रखलक आ भारतक लेल इतिहास लिखलक। ई दल १९८१ मे गोआ सँ अपन गन्तव्यक लेल चलल छल। डॉ॰ हर्ष गुप्ता (Dr. Harsha Gupta) क नेतृत्वमे तेसर भारतीय अण्टार्कटिक अभियान दल द्वारा १९८३-८४ ई॰ मे एकटा स्थायी संशोधन केन्द्रक स्थापना कएल गेल, जकर नाँव राखल गेल “दक्षिण गंगोत्री”। ऐ मे एकटा भू-चुम्बकीय प्रयोगशाला (Geomagnetic laboratory) बनाओल गेल। ई एकटा “हिम छज्जी” (Ice shelf) पर स्थापित छल, जे बादमे बर्फमे धँसि गेल आ नव अनुसन्धान केन्द्र स्थापित करबाक आवश्यकता पड़ल। भारत अण्टार्कटिकामे अपन दोसर स्थायी संशोधन केन्द्रक स्थापना १९८९ ई॰ मे कएलक आ १९९० ई॰ सँ “दक्षिण गंगोत्री” केँ पूर्णतया बन्न कऽ देल गेल। नव अनुसन्धान केन्द्रक नाम राखल गेल “मैत्री” जे कि बर्फ रहित स्थान पर अवस्थित अछि। अण्टार्कटिकाक ९८ प्रतिशत भाग हिमाच्छादित अछि जखन कि मात्र २ प्रतिशत भाग बर्फ रहित अछि। मैत्रीक स्थान द॰गंगोत्री सँ लगभग ९० कि॰ मि॰ दूर अछि। भारतक तेसर स्थायी संशोधन केन्द्र निर्माणाधीन थिक, जकर नाम हएत “भारती”। भारतीक स्थापना मैत्रीसँ लगभग ३००० कि॰ मि॰ दूर अण्टार्कटिकाक आन भागमे भऽ रहल अछि जइ सँ ऐ विस्तृत महादेशक विस्तृत अध्ययन कएल जा सकए। ई केन्द्र मार्च-अप्रील २०१२ ई॰ धरि प्रारम्भ भऽ जाएत। २५ मई १९९८ ई॰ केँ राष्ट्रिय अण्टार्कटिक एवं समुद्री अनुसन्धान केन्द्र (National Centre for Antarctic and Ocean Research; NCAOR) क स्थापना गोआमे भेल। १४ अक्टूबर २०१० धरि भारत ३० गोट वैज्ञानिक अनुसन्धान दल अण्टार्कटिका पठा चुकल अछि। चित्र सं॰ -६- अण्टार्कटिकामे भारतक पहिल (दक्षिण गंगोत्री) आ दोसर (मैत्री) अनुसंधान केन्द्र आ तेसर (भारती) अनुसन्धान केन्द्रक प्रस्तावित प्रारूप (मॉडेल) अण्टार्कटिका दुनियाँक सभसँ पैघ प्राकृतिक प्रयोगशाला (Largest Natural Laboratory) अछि। ओइ ठाम भू-चुम्बकत्व, भूगर्भ विज्ञान, पृथ्वी आ सौरमण्डलक उत्पत्ति आ विकास, समुद्री जीव-जन्तु, वायुमण्डल (विशेषतः ओजोन स्तर) पर प्रदूषणक प्रभाव, चिकित्सा, मनोविज्ञान आदिक अध्ययन आ ओइसँ सम्बद्ध अनुसन्धान काज आदि कएल जाइत अछि। तँ केहेन लागल नव वर्षक अवसर पर नव ठामक यात्रा? फेर कहियो जखन समय भेटत तँ आन ठाम घुमबा-फिरबा लेल चलब। आइ बस एतबे। आब अप्पन-अप्पन घर आपिस चलल जाए। उड़ि ने सकी पर चिड़ै छी हम किछु दिन पहिने गाम गेल रही। साँझ खन धिया पुता सभ घेर लेलक। सबहक एक्कहिटा जिद्द जे खिस्सा सुनाउ। हम कहल- हमरा खिस्सा-तिस्सा नै आबैत अछि। जो, दादीसँ सुन गऽ। प्रिया- नै यौ, अहाँ झूठ बजैत छी। हम अहाँक खिस्सा सभ पढ़ने रही विदेहमे। ई सुनितहि बाकी धिया-पुता सेहो जोरसँ चिचिआए उठल। हमहूँ पढ़ने रही। बड्ड नीक लागल छल। हम- ओ तँ इण्टरनेट पर आबै छै, तोँ सभ कोना पढ़लह। नन्दू बाजल- हमरा सभक इस्कूलमे कम्प्यूटर देलकैए। मास्टर साहेब देखओलन्हि अहाँक लिखल खिस्सा आ पढ़ि कऽ सेहो सुनओलन्हि। विकास- हँ यौ, हम एक जनवरीकेँ पटनामे मामा लग रही। हुनका लगमे लैपटॉप छन्हि, ओत्तहि अहाँक लिखल खिस्सा पढ़लौं, बहुत नीक लागल। सोनी- हँ, चित्र सभ सेहो बहुते नीक रहए। एतबे मे बब्बन सेहो तपाकसँ बाजि उठल- हँ, हमरा ओहने खिस्सा सुनइ कऽ अइ। हमरा आरकेँ परीक खिस्सा नै सुनैक अइ। हम- तँ अहीं सभ बताउ, आइ की कएल जाए ? कतऽ चलल जाए? कोन खिस्सा सुनाओल जाए? बब्बन- जे अहाँ सुनेबै से सुनबै। प्रिया- हँ, अहाँ अपने मोनसँ किछु सुनाउ ने। जएह अहाँकेँ नीक लागए, सएह सुनाउ। हम- तँ चलू, आइ किछु एहेन चिड़ै सभक बारेमे सुनबैत छी जे चिड़ै रहितो चिड़ै नै आ चिड़ै सन नहियो लगैत चिड़ै थिक। नन्दू- माने? सोनी- बुझौअलि नै बुझाउ, साफ-साफ कहू ने! प्रिया- हँ, खिस्सा सुनबाक अछि बुझौअलि नै। हम- अरे, धैर्य राखू! कहै छी सभटा। आइ हम सभ ओइ चिड़ै सभक खिस्सा सुनए जा रहल छी जे उड़ि नै सकैत अछि, तेँ पहिल नजरिमे ओ सभ चिड़ै नै बुझि पड़ैत अछि। सोनी- मतलब की? चिड़ै रहितो ओ चिड़ै नै। हम- एकदम सही। मुदा ओकर सभक पुरखा लोकनि उड़ैत छलाह। वातावरणक प्रभाव आ आवश्यकताक अनुसार धीरे-धीरे ओ सभ उड़नाइ छोड़ि देलन्हि आ तेँ आब ओ सभ नै उड़ि सकैत छथि। नन्दू- मतलब जे चिड़ै सन नहियो लगैत चिड़ै छथि। हम- शुतुर्मुर्गक नाँव सुनने छह की? सभ धिया-पुता एक्कहि संग बाजि उठल- हँ। अफ्रीकामे होइ छै। बब्बन- हँ, सहाराक मरूस्थलमे होइए। हम- बेस। मुदा सहारा मरूभूमिक अतिरिक्त अफ्रीका महादेशक आनो भाग, जेनाकि सवाना घासभूमि आ दक्षिण अफ्रीकाक कालाहारी मरूभूमि आदि स्थान सभमे ओ भैटैत अछि। शुतुर्मुर्गकेँ अंग्रेजीमे ऑस्ट्रिच (Ostrich) कहल जाइ छै। धरतीपर एखन पाओल जाएबला चिड़ै सभमे ई सभसँ पैघ आ भाड़ी होइत अछि। एक पूर्ण वयस्क पुरुख शुतुर्मुर्गक लम्बाइ प्रायः १.७ सँ २ मीटर (५ फीट ७ इंचसँ ६ फीट ७ इंच) धरि, जखनकि पूर्ण वयस्क स्त्री शुतुर्मुर्गक लम्बाई १.८ सँ २.७५ मीटर (६ सँ ९ फिट) धरि भऽ सकैत अछि। साधारणतः एकर ओजन ६० कि॰ ग्रा॰ सँ १३० कि॰ ग्रा॰ धरि होइत अछि मुदा कखनो-कखनो १५७ कि॰ ग्रा॰ धरि सेहो देखल गेल अछि। एकर टांग आ गर्दनि नाम-नाम, धऽर भाग पैघ आ भारी मुदा मूड़ी बहुत छोट होइत अछि। जमीनसँ मूड़ी धरिक एकर उँचाइ करीब २ मीटर (६.६ फीट) तक होइत अछि। मूड़ीक आकार छोट रहितो आँखि बहुत पैघ-पैघ होइत अछि। एकर आँखिक आकार समस्त रीढ़युक्त प्राणी (Vertebrates; जइ प्राणी सभमे रीढ़क हड्डी या ओकर समान कोनो संरचना होइत अछि) सभमे सभसँ पैघ होइत अछि एकर आँखिक व्यास (diameter) लगभग ५० मिली मीटर अर्थात् २ इंच धरि होइत अछि। बहुत तीक्ष्ण देखबाक आ सुँघबाक शक्तिक कारण ओ दूरे सँ अपन दुश्मन प्राणी सभक आहटि बूझि सकैत अछि आ सचेत भऽ सकैत अछि। खएर, जीव विज्ञान वा प्राणीशास्त्रक (Life Science/ Biology/ Zoology) भाषामे एकर नाँव स्ट्रुथिओ कैमेल्स (Struthio camelus) थिक। नन्दू- कैमेल माने ऊँट। हम- हँ, कैमेल माने ऊँट। ऊँट सन शुतुर्मुर्गक पीठपर सेहो कुब्बर होइत अछि आ रहितो अछि ऊँट जेना मरूस्थलमे- तेँ कैमेल्स। एकर पएरक हड्डी आ मांसपेशी बहुत मजबूत होइत अछि आ तेँ विपत्तिक समयमे ओ ७० कि॰ मि॰ प्रति घण्टाक गतिसँ प्रायः आधा घण्टा धरि दौड़ि सकैत अछि। ओ सभ झुण्डमे रहैत अछि जकर नेतृत्व कोनो ने कोनो पुरुख शुतुर्मुर्ग करैत अछि। एक झुण्डक सभ स्त्री सदस्य लोकनि माटिक तऽर मे बनल एक्कहि घोसलामे अण्डा दैत छथि। आ ई अण्डा सभ देखैमे भलहिं हमरा सभकेँ एकरंगाह लागए मुदा सभ स्त्री शुतुर्मुर्ग अपन अपन अण्डाकेँ चीन्हि सकैत छथि- छै ने आश्चर्यक गप्प! आ एतबे नै, स्त्री शुतुर्मुर्गक एक अण्डाक व्यास (diameter) ३० सँ ६० सेण्टीमीटर (१२ सँ २४ इंच) धरि भऽ सकैत अछि। बब्बन- अरे! ई तँ फुटबॉलसँ सेहो पैघ होइए। हम –हँ। शुतुर्मुर्गक अण्डा संसारमे सभसँ पैघ होइत अछि। शुतुर्मुर्ग ओना तँ शाकाहारी होइत अछि मुदा भोजनक अभावमे छोट-मोट कीड़ा-मकोड़ा खा कऽ सेहो गुजर करैत अछि। माँसु, चमड़ा आ पंखक लेल पिछला २०० वर्षमे एकर अत्यधिक शिकार होएबाक कारणेँ आइ ई विलुप्त होएबाक स्थितिमे आबि गेल अछि आ सम्प्रति संरक्षित वन्य प्राणी अछि। प्रिया: ई तँ बहुत दुखक गप्प थिक। हम –हँ, से तँ छै। शुतुर्मुर्गक बाद उँचाईमे दुनियाँक सभसँ पैघ चिड़ै अछि एमू (Emu)। एकर अधिकतम ऊँचाइ १.५ सँ १.९ मीटर (५ फीटसँ ६ फीट ३ इंच धरि) होइत अछि। विकास: ओ ऑस्ट्रेलियाक मूल निवासी अछि आ ओत्तै पाओल जाइत अछि। ओकर जैव-वैज्ञानिक नाँव थिक ड्रोमैअस नॉवीहॉल्लैण्डी (Dromaius novaehollandiae)। एमू प्रायः समस्त ऑस्ट्रेलियामे विचरण करैछ। आ तइ कारणेँ ओ ऑस्ट्रेलियाक राष्ट्रिय चिड़ै थिक। विकास बिच्चहि मे बाजि उठल । हम: अरे वाह, अहाँ केँ तँ बूझल अछि। विकास: हँ, G.K. के किताबमे पढ़ने छलिऐ। हम- एमू ओना तँ शाकाहरी होइत अछि मुदा विपत्तिक समएमे सर्वाहारी (Omnivorous) भऽ जाइत अछि आ अपन भूख मेटाबए लेल चमगादर आ छोट-छोट कीड़ा मकोड़ाकेँ सेहो खा जाइत अछि। एकर पएर बहुत मजबूत आ तीनू औंठाक नह तीक्ष्ण नोकबला भाला सन चांगुर (पञ्जा) मे परिवर्तित भऽ गेल अछि। ई चांगुर एतेक मजबूत होइत अछि कि लोहाक ताड़क सामान्य छहड़देवालीकेँ तोड़ि सकैत अछि आ शिकारी शत्रु सभसँ अपन रक्षा करबाक हेतु प्रयुक्त होइछ। सोनी- ई तँ शुतुर्मुर्गे जेकाँ अछि। हम- हँ, किछु-किछु मुदा ओइसँ अलग विशेषता सेहो रखैत अछि। जेनाकि जरूरत पड़लापर ओ पानिमे हेल सकैत अछि। एमू रातिमे लगातार नै सूति सकैत अछि। ओ ओना तँ करीब ७ घण्टा सुतैत अछि मुदा हरेक ९०-१२० मिनट पर किछु खएबाक लेल वा मल विसर्जनक लेल उठैत अछि। ऐ प्रकारेँ एक रातिमे ओ निन्नसँ चारि सँ छौ बेर उठैत अछि। शुतुर्मुर्ग बेशी समए झुण्डमे रहैत अछि आ यथासम्भव मनुक्खसँ दूर रहए चाहैत अछि, जखनकि एमू बेशी समए एकसर रहैत अछि मुदा ओकरा मनुक्खक उपस्थितिसँ परहेज नै छै। उनटे ओ उत्सुकतावश मनुक्खक घरक नजदीक सेहो अबैत अछि आ मनुक्ख तथा आन जीवक चेष्टा वा नकल सेहो करैत अछि। प्रिया: तखन तँ ओहो ऐ मामिलामे नकलची बानर आ सुग्गा सन भेल। हम: एकदम्मे की। स्त्री एमू बहुत बेर दोसर एमूक घोसलामे अपन अण्डा दैत अछि। ऐ तरहक घटनाकेँ जीवविज्ञानमे पोषक परजीविता (Brood parasitism) कहल जाइत अछि। पवन: यौ, एहने काज कोइली सेहो करैत अछि। ओ कौआक घोसलामे चुपचाप अण्डा दैत अछि आ अपने भागि जाइत अछि। कौआ कोइलियोक अण्डाककेँ अप्पन अण्डा बुझि देखरेख करैत रहैत अछि। हम: ठीक बुझल अछि पवन। बस थोड़ेक अन्तर छै, कौआ आ कोइली दुनू अलग-अलग तरहक चिड़ै अछि मुदा ऐठाम एक एमू दोसर एमूक घोसलामे अण्डा दैत अछि। एमूक सम्पूर्ण आयु १० सँ २० वर्षक होइ छै। १७८८ ई॰ मे जखन यूरोपवासी पहिल बेर ऑस्ट्रेलियामे बसए गेलाह तँ ओ खएबाक लेल एमूक माँसु आ डिबिया जड़एबाक लेल एमूक चर्बीक प्रयोग करैत छलाह। एखनो बहुत जगह मुर्गी आ बत्तख जेकाँ माँसु, चमड़ा आ चर्बीक लेल एकरा पोसल जाइत अछि। विकास: – ई तऽ पटनाक चिड़ियाखानामे सेहो छै। ओतऽ एहने सन एकटा आरो चिड़ै छै जकर माथपर कलगी रहैत छै, गर्दनि नीला रंगक रहैत छै आ गर्दनिक आगाँ भागमे लाल रंगक भालरि लटकैत रहैत छै। प्रिया: से कोन? विकास: ओकर नाम छै क् .. क् ..केशो.. अरे याद नै आबि रहल अछि ठीकसँ। मुदा ओहो ऑस्ट्रेलियाक मूल निवासी अछि। हम: विकास सही कहि रहल अछि। चलू नाँव हम बता दै छी। ओकर नाँव अछि कैसोवरी (Cassowary)। ई उत्तरपुर्वी ऑस्ट्रेलिया, न्यु गिनी (New Guinea) आ आस पड़ोसक द्वीप सभक आर्द्र वर्षावन (Humid Rainforest) क मूल निवासी अछि। सम्प्रति एकर तीन टा जाति जिबैत अछि, दक्षिणी कैसोवरी/ कैजुएरिअस् कैजुएरिअस् (Casuarius casuarius), उत्तरी कैसोवरी/ कैजुएरिअस् अनअपेण्डिकुलेटस् (Casuarius unappendiculatus) आ वामन या छोटका कैसोवरी/ कैजुएरिअस् बेन्नेट्टाई (Casuarius bennetti)। ऐमे सँ दक्षिणी कैसोवरी विश्वक सभसँ भारी चिड़ै (शुतुर्मुर्गक बाद) आ ऊँचाईमे तेसर सभसँ पैघ चिड़ै (शुतुर्मुर्ग आ एमूक बाद) अछि। एकर कलगीकेँ कैस्क्यू (Casque) कहल जाइत छै, जेकि सम्भवतः अवाज ग्रहण (sound reception & acoustic communication) करबाक काज करैत अछि। ओना तँ ई सर्वभक्षी (Omnivorous) अछि मुदा विशेष रूपसँ फलभक्षी (Frugivorous) अछि। जखन गाछसँ फल पाकि कऽ खसए लागैत अछि तँ हरेक कैसोवरी एक-एक टा गाछ चुनि कऽ ओकरा नीचाँमे बैसि जाइत अछि आ खसल फल सभ खा कऽ गुजर करैत अछि। सेब आ केरा सन पैघ फल सभकेँ सेहो बीआ सहिते सौंसे भकोसि जाइत अछि। फल खसब समाप्त भेलापर ओतएसँ आन गाछक नीचाँ या अनतऽ चलि जाइत अछि। नवजात कैसोवरी मैलछौंह रंगक आ भूरा रंगक धारीयुक्त (brown-striped) होइत अछि। एकर आयु प्रायः ४० सँ ५० वर्षक मानल जाइत अछि। एकर माँसु सिझबामे आ पचबामे बहुत कठिन होइछ, तेँ प्रायः उपयोग नै कएल जाइत अछि। बब्बन:–यौ, ईहो पानिमे हेलि सकैए की? हम: बेस पूछल बब्बनजी अपने। ई पानिमे हेलएमे माहिर अछि। हेलि कऽ पैघ-पैघ नदीकेँ पार कऽ सकैत अछि आ समुद्रोमे आरामसँ हेलि सकैत अछि। एतबे नै, घनगर जंगल झाड़मे सेहो करीब ५० कि॰मी॰ प्रति घण्टाक गतिसँ दौड़ि सकैत अछि आ १.५ मीटर (करीब ५ फीट) धरि कूदि सकैत अछि वा छड़पि (jump) सकैत अछि। बब्बन :–बेज्जोर। सोनी : एकर बाद आब कक्कर बारी छै? पवन :–तोहर। ई सुनिते सभ धियापुता भभा कऽ हँसि पड़ल। हम: सुनह, आब राति बहुत भऽ गेल छै तेँ अजुका खिस्सा आइ बीचेमे रोकैत छी। काल्हि खन साँझमे आगाँ कहबह। सोनी: नै, आइए पूरा करए पड़त। हम : हमरा कोनो दिक्कत नै मुदा अहाँ सभक माए-बाबू अहाँ सभकेँ डँटताह। ओना सूतब सेहो जरूरी थिक शरीरक लेल। जँ भरि राति खिस्से सुनैत रहब तँ सूतब कखन? आ से नै तँ काल्हि भोरे फेर इस्कूल कोना जाएब? प्रिया: ठीके कहै छी अहाँ। हम सभ जाइ छी। सोनी : मुदा हम सभ अहाँकेँ छोड़ब नै, काल्हि पूरा करइए टा पड़त खिस्सा। हम: जरूर। (अगिला साँझ, हाट बजार कऽ कऽ आङ्गन अबैत रही। दूरे सँ कोनटे लगसँ बुझा गेल जे धियापुता सभ बाट ताकि रहल अछि। आइ संख्या सेहो किछु बेशी बुझि पड़ल, जेकि यथार्थे छल। लग अबिते सभ धियापुता सामने राखल काठक कुर्सीपर हमरा झीक-तीर कऽ बैसा देलक आ अपने सभ सामने राखल चौकीपर बैसि रहल।) सोनी: तँ चलू, आब शुरू भऽ जाउ आ आगाँक खिस्सा सुनाउ। कञ्चन: हम्मे काल्हि नै रहिऐ, हम्मे शुरूसँ सुनब। किछु धिया पुता सभ बाजल- नै! नै! हम सभ आगाँक खिस्सा सुनब। कञ्चन आइ भोरे भागलपुरसँ आएल छलि, ऐठाम ओकर मामा गाम। तँ फेर भगिनमानक बल, कोना ओकर बात टारि सकैत छलिऐ। बाकी धियापुताकेँ सेहो मोन नै तोड़ल जा सकैत छल तेँ ओकरा सभकेँ समझबैत पहिलुका खिस्सा एक बेर फेरसँ संक्षेपमे कहल। तँ हम सभ कैसोवरी लग आबि कऽ रूकल रही? - हँ आ एकर बाद “सोन चिड़ै” क रहए। बब्बन सोनी दिस इशारा करैत बाजल। सभ धियापुता फेर जोरसँ भभा कऽ हँसि पड़ल। सोनी ओइ ठामसँ उठि, हमर कुर्सीक कातमे आबि ठाढ़ि भऽ गेलि। थोड़ेक तामसमे बाजलि- यौ देखै छिऐ, ई सभ कोना हमरा खौंझबैत रहइए। हम कातमे राखल एकटा मचिया अपन कुर्सीक बगलमे रखैत बजलौं, -ठीक छै, तोँ ऐठाम बैस। ऐमे खौंझाइक कोन गप्प, तोँ तँ छेँहे “सोन चिड़ै”। लोक तँ दुलारसँ कहै छौ ने। ओकर तामस कम होइत निपत्ता भऽ गेलै जेनाकि सहजहि धियापुता सभमे होइ छै। ओ हमरे लग ओइ मचियापर बैस रहलि। -हँ तँ ऑस्ट्रेलियाक बगलमे कोन देश छै?- हम बाकी धियापुता दिस मुँह करैत बजलौं। -न्यूजीलैण्ड। सभ धियापुताकेँ शान्त देखि कञ्चन कने गम्भीर मुदा आत्मविश्वास भरल स्वरमे बाजलि। हम- आ ओइ ठामक राष्ट्रिय चिड़ै कोन? सभ धियापुता फेर अवाक भऽ हमर मुँह ताकए लागल। -तोँ सभ क्रिकेट खेलै जाइ छह, देखै जाइ छह, कने जोड़ दहक दिमागपर।, हम बजलौं। हम पुनः बजलौं- अच्छा छोड़ह, ई कहह जे न्यूजीलैण्डक लोक सभकेँ की कहल जाइ छै? बब्बन- (चहकैत बाजल) अरे हाँ, किवी। हम: एकदम सही, “कीवी” ओइ ठामक राष्ट्रिय चिड़ै अछि आ ओहो उड़ि नै सकैत अछि। एकर वंश (Genus) थिक अटेरिक्स (Apteryx)। एकर पाँच टा जाति (Species) पाओल जाइत अछि, जइमे सँ अछि अटेरिक्स ऑस्ट्रेलिस (Apteryx australis)। ई लजकोटरि आ मुख्यतः रातिमे विचरण कएनिहार चिड़ै अछि। तेरहम सती मे न्यूजीलैण्डमे मनुक्खक आगमनसँ पहिने ओइ ठाम कीवीक कोनो शत्रु नै छल। परञ्च मनुक्ख अपना संगहि कुकुर, बिलाइ आ ओकरे सन आन जानवर जेनाकि स्टोट (Stoat), फेर्रेट (Ferret, बिज्जीक एक प्रकार) आदि सेहो नेने आएल। स्टोट आ फेर्रेट कीवीक अण्डाक परम शत्रु आ कुकुर बिलाइ वयस्क कीवीक। ऐ प्रकारेँ कीवीक संख्या बहुत कम होइत गेल आ ई चिड़ै विलुप्त होएबाक श्रेणीमे आबि गेल। एकरा बचएबाक लेल २०० ई॰ मे न्यूजीलैण्डमे पाँचटा कीवी अभयारण्य (sanctuary) बनाओल गेल अछि। प्रिया: से सभ तँ ठीक मुदा एकरा बारेमे कोनो विशेष बात बताउ। हम: बहुत किछु विशेषता छै। एकर सूँघबाक शक्ति बहुत तेज होइत अछि। सोनी: तखन तँ ईहो कुकुरे भेल किने? हम: हँ, ऐ मामिलामे कुकुरे सन तेज। एकर नमगर चोंचक अगिला भागमे नासाछिद्र (Nostrils) होइत अछि जखनकि आन चिड़ै सभ केर चोंच केर पछिला भागमे। ई सर्वाहारी अछि, फल-फूल, कीड़ा-मकोड़ा, बेङ्ग-दादुर आदि खा जाइत अछि। कीवी बिना देखने जमीनक नीचाँमे बिलमे बैसल कीड़ा-मकोड़ाकेँ सही-सही अन्दाजि सकैत अछि। यद्यपि शुतुर्मुर्गक अण्डाक वास्तविक आकार दुनियाँमे सभसँ पैघ अछि मुदा वयस्क चिड़ैक आकारक अनुपातमे अण्डाक आकार देखलासँ कीवीक अण्डाक सानुपातिक अकार (Relative/ comparative size) सभसँ पैघ होइछ । कीवीक एक अण्डाक ओजन वयस्क स्त्री कीवीक ओजनक चौथाइ ओजन धरि भऽ सकैत अछि। ई किछु गिनल-चुनल चिड़ैमे सँ अछि जे एक बेर जोड़ी बनलाक बाद जिनगी भरि संग रहैछ। विकास: हूँ। से नै बूझल छल। हम: आब हम सभ नव दुनियाँ दिस चली। बब्बन: नव दुनियाँ? हम नै बुझली। प्रिया: अमेरिकाकेँ नव दुनियाँ कहल जाइ छै, छै ने?, ओ हमरा दिस तकैत बाजलि। हम: हँ, नव दुनियाँ (New World), प्रायः अमेरिकेकेँ आ खास कऽ दक्षिणी अमेरिका (उच्चारण दच्छनी अमेरिका) केँ कहल जाइ छै। ओना किछु लोक ऑस्ट्रेलिया आ लग पासक द्वीप समूह सभकेँ सेहो नव दुनियाँ कहैत छथिन्ह। कञ्चन: यानिकि हम्मे सभ एक नव दुनियाँ सँ दोसर नव दुनियाँ जयवो। हम: हँ। तँ चली। सभ केओ तैय्यार छी। सभ धियापुता एक स्वरेँ बाजल, -हँ, तैय्यार छी। हम- द॰ अमेरिकाक मूल निवासी अछि “रिया”। ई करीब-करीब पूरा दक्षिणी अमेरिका, जेनाकि ब्राजील, पेरू, अर्जेण्टीना, चिली आदि देशमे पाओल जाइत अछि। पवन- रिया तँ हमर मौसीक नाम अइ। हम- मुदा ऐठाम “रिया” मनुक्खक नै, चिड़ैक नाँव थिक। एकर दूटा जाति पाओल जाइछ, पहिल बड़की रिया या रिया अमेरिकाना (Rhea americana) आ दोसर छोटकी रिया या रिया पिन्नाटा (Rhea pennata)। ई सभ सर्वाहारी (Omnivirous) होइत अछि मुदा अधिकांशतः चाकर पत्ताबला गाछ-बिरिछक पात खाइत अछि, मुदा जरूरत पड़लापर फल, बीआ आ छोट-मोट गाछक जड़ि सेहो चिबा जाइत अछि। भूख लगलापर छोट-मोट कीड़ा-मकोड़ा आ गिरगिट धरि खा सकैत अछि। नै उड़ि सकैबला चिड़ै सभमे रियाक पंखक आकार सभसँ पैघ होइत अछि आ जखन ओ चलैत वा दौड़ैत अछि तँ पंखकेँ थोड़े-थोड़े पसारि लैत अछि। ई चिड़ै बहुत चलाक होइत अछि। सोनी- से कोना? हम- पहिने कहल आन चिड़ै सभ सन ईहो जमीनेपर अपन अण्डा दैत अछि, घोसला आसपासमे पाओल जाएबला घासपातसँ बनबैए। एक घोसलामे १० सँ ६० धरि अण्डा भऽ सकैत अछि। पवन- ऐमे कथीक चलाकी? हम- ई एकर चलाकी नै। अण्डा खएनिहार जीव-जन्तुक ध्यान बहटारए लेल ई चिड़ै अपन मुख्य घोसलाक चारू कात दू-चारि टा अण्डा छोड़ि दैत अछि। ऐ प्रकारेँ अपन किछु अण्डाक बलि दऽ कऽ शेष अण्डाकेँ बुद्धिमानीसँ सुरक्षित बचा लैए। बब्बन: हँ, तँ बुझली, ईएह छी एकर चलाकी। हम: दक्षिणी अमेरिकामे एक गोट आरो चिड़ै भेटैए जे उड़ि नै सकैए। केओ बता सकैत छह ओकर नाँव? सभ धियापुता एक दोसराक मुँह ताकए लागल। मुदा केओ किछु नै बाजल। हम: “पेंगुइन” क नाम सुनने छह की? सभ धियापुताक जेना भक टुटि गेल हुअए। एक्कहि संगे जोरसँ बाजल, -यौ! ओ तँ अण्टार्कटिकामे होइत छै। सोनी: अहीं तऽ अपन पछिला खिस्सा “खिस्सा अण्टार्कटिका केर” -मे कहने छलिऐ। अहूँकेँ निन्न लागल सन बुझाइत अछि। हम: निन्न नै लागल अछि। हम ई थोड़े ने कहने रही कि पेंगुइन (पेंग्वीन) खाली अण्टार्कटिके मे होइत अछि। पेंगुइनक करीब १७ सँ २० जाति पाओल जाइत अछि आ ओ अण्टार्कटिकाक अतिरिक्त दक्षिणी अमेरिका (अर्जेण्टीना, चीली), ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, दक्षिण अफ्रीका, गैलेपैगोस द्वीपसमूह आदि स्थानपर पाओल जाइत अछि। ई सभटा स्थान पृथ्वीक दक्षिणी गोलार्ध (Southern hemisphere) मे अबैछ। जे अकारमे पैघ आ भारी पेंगुइन अछि ओ ठण्ढा जगहपर आ जे छोट आ हल्लुक पेंगुइन अछि से अपेक्षाकृत गर्म जगहपर पाओल जाइछ। सम्राट पेंगुइन या एम्पेरर पेंगुइन (Emperor penguin) सभसँ पैघ आ भारी होइछ जेकि अण्टार्कटिकामे रहैछ। एकर ऊँचाइ १.१ मीटर (लगभग साढ़े तीन फीट) आ ओजन लगभग ३५ कि॰ग्रा॰ धरि होइत अछि। सम्राट पेंगुइनक जैव वैज्ञानिक नाँव अछि ऑप्टेनोडाइटिस फोर्सटेराइ (Aptenodytes forsteri)। अच्छा तोरा सभकेँ एकरा बारेमे की की बूझल छह? बब्बन: ई हमरे आर मनुक्ख जेकाँ दू पएर सँ चलि सकैए। हम: एकर मतलब कि अहाँ सभ ऐ चिड़ैसँ अपरिचित नै छी। पेंगुइन मनुक्खे जेकाँ दू पएरसँ धर उठा कऽ नाकक सीधमे चलि सकैत अछि। ऐ चलबाक समए ओकर छोट- क्षीण नांगरि (Tail) सन पछिला भाग ओकरा अपन शरीरकेँ सन्तुलित रखबामे मदति करैए। कञ्चन: हम्मे डिस्कवरी चैनलपर देखने रहिऐ जे ओकर पेट उज्जर आ पीठ कारी होइ छै। हम: एकदम सही, ओकर पेटक रंग बर्फ सन उज्जर होइत अछि। ऐ कारणेँ समुद्रक अन्दरसँ ताकि रहल शिकारी समुद्री जीव जेनाकि सील, वालरस आदि समुद्रक कातमे बर्फपर ठाढ़ पेंगुइन आ बर्फमे भेद नै कऽ पबैछ। ऐ प्रकारेँ पेटक उज्जर रंग ओकरा लेल सुरक्षा कवच सन काज करैत छै। तहिना पीठ परक कारी रंग सेहो – आकाशमे उड़ि रहल पैघ शिकारी चिड़ै सभ पाथर सन बुझि धोखा खा जाइत अछि। जीवविज्ञानमे ऐ प्रकारक प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्थाकेँ छद्मावरण (Camouflage) कहल जाइछ। एकर आन उदाहरण अछि गिरगिटक रंग बदलब। सोनी: ओ पानिमे हेलि सेहो सकैत अछि। हम: बेस कहल। ओ समुद्रक पानिमे डुम्मी काटि कऽ हेलि (Diving) सकैत अछि। ओकर देहमे बहुत चर्बी रहैत छै। अहाँ सभकेँ बुझले हएत कि चर्बी पानिसँ हल्लुक होइत अछि आ तेँ ओ पानिमे हेलबामे मदति करैए। ई चर्बी पेंगुइनकेँ ठण्ढीसँ सेहो सुरक्षित रखैए। ओकर दुनू पंख पानिमे हेलबाक लेल अनुकूलित भऽ गेल अछि आ हेलबाक समए नाओ केर पतवाड़ि सदृश काज करैए। ओ ६ सँ १२ कि॰मि॰ प्रति घण्टाक गतिसँ पानिमे डुम्मी मारि कऽ हेल सकैए। सम्राट पेंगुइन समुद्रक भीतर ३६५ मीटर अर्थात् १८७० फीट गहींर तक जा सकैत अछि। ओ समुद्री माँछ आ जीव-जन्तुक शिकार कऽ कऽ अपन पेट भरैए आ कखनो-कखनो ईएह फेरीमे स्वयं आन समुद्री प्राणीक (यथा सील आ वालरसक) शिकार सेहो बनि जाइए। ओ समुद्रक पानि सेहो पीबि कऽ पचा सकैत अछि आ समुद्रक पानिक संग पिअल गेल अतिरिक्त नोनकेँ मगरमच्छे जकाँ नोरक संग बहा दैए। पानिमे पेंगुइनक हेलबाक प्रक्रिया देखबामे बहुत किछु हवामे कोनो चिड़ैक उड़बाक प्रक्रियासँ मेल खाइए। प्रिया: सहीमे, ई तँ चिड़ै सन लगिते नै अछि। हम: हँ। कखनो-कखनो ई बर्फपर छहलैत-छहलैत (Sliding) एक जगहसँ दोसर जगह पहुँचि जाइए तँ कखनो-कखनो छोट धियापुता जकाँ दुनु पएर उठा कऽ कूदि-कूदि कऽ सेहो चलैए। पवन: आश्चर्य! हम: हँ, आश्चर्ये थिक। ओना तँ नै उड़ि सकनिहार करीब ४० प्रकारक चिड़ै अछि मुदा ई चिड़ै सभ लोककेँ बेशी आकर्षित करैत अछि तेँ अहूँ सभकेँ सुना देलौं। ई खिस्सा आब एतै खतम करै छी। विकास: तइयो किछु आर ऐ तरहक चिड़ै सबहक नाँव तँ बताउ। हम: नाँव तँ अहूँ सभकेँ बुझले अछि- मुर्गा, बत्तख आ मोर। प्रिया: मुदा ओ सभ तँ उड़ै छै। हम: नै, खा गेलौं ने धोखा। ओ सभ वास्तवमे उड़ैत नै अछि, कोनो ऊँच स्थानसँ कुदैत अछि, अपन पंखकेँ फड़फड़बैत अछि आ हवापर गुड्डी (पतंग) जकाँ उधियाइत वा उड़ियाइत (Glide) रहैत अछि। पवन: सही कहलौं अहाँ। हम: चलैत-चलैत एकटा नाँव आर बता दै छी- “डोडो”। ई चिड़ै मॉरिशसक मूल निवासी छल, उड़ि नै सकै छल। अत्यधिक शिकार होएबाक कारणेँ ओ करीब चारि साढ़े चारि सए वर्ष पहिने विलुप्त (Extinct) भऽ गेल। पवन: ओह। ई तँ बहुत खराब भेल। हम: हँ से तँ अछि। मुदा जे एक बेर विलुप्त भऽ गेल से फेरसँ दोबारा नै आबि सकैए। किछु क्षणक लेल सभ शान्त भऽ गेल।शान्तिकेँ तोड़ैत हम बजलौं- ठीक अछि, तँ आब चलबाक चाही। -हँ।, सभ धियापुता बेमोन सँ बाजल। सोनी: फेर अगिला बेर कोन खिस्सा सुनाएब? हम: से अगिले बेर कहब। ताधरि शुभ रात्रि। अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस (२१ फरबरीक अवसरपर विशेष) रेडियो बाजि रहल छल, गप्प-सड़क्का चलि रहल छल। धियापुताक मोन सेहो पढ़बापर कम्मे आ घूर लग बाजि रहल रेडियो आ चलि रहल गपशप दिस बेशी छल। एक तँ शीतलहरी, दोसर रतुका भोजनक समए लगिचाएल आ तेसर सामने बजैत रेडियो आ गप्प सड़क्का तखन तँ स्वभाविजे जे पढ़बामे मोन कोना लगओ? मोन मसोसि कऽ बैसल किताब दिस ताकि रहल छल आ प्रतीक्षामे छल जे कोनहुना समए बीतए आ खएबाक लेल जएबाक अनुमति भेटओ। एतबेमे हम आङ्गनसँ दलानपर अएलौं। हमरा देखितहि धियापुता सभक मोन खुश। खुश होएबाक कारण ई जे आब ओकरो सभकेँ गप्प मारबाक संवैधानिक अधिकार भेटैत बुझि पड़लै। जे लोकनि घूर लग बैसल रहथि से बहुत पैघ, बहुत बुजुर्ग तेँ पढ़ब छाड़ि हुनका सभसँ बतिएबाक मतलब छल डाँट सुनब। हुनका सभक आशय जे जाधरि अङ्गना जएबाक बिझो नै भऽ जाए ताधरि किताब लऽ कऽ बैसल रहह। हमरा अबैत देखि कऽ सोनी हमरा कुर्सी दैत बाजलि- यौ बैसू। -की पढ़ैत छी अहाँ सभ?, वस्तुस्थिति तँ हमरा बुझाइए गेल छल तथापि हम पूछल। -यौ की पढ़ब? रेडियो सुनि रहल छी से तँ अहूँकेँ बुझाइए गेल हएत।, प्रिया धीरे सँ बाजलि। पढ़बा छाड़ि कऽ बतिआएब हमरो पसिन्न नै मुदा बेमोनसँ किताब लऽ कऽ बैसबासँ की लाभ? ईएह सोचैत हम पूछल- ई बात तँ नीक नै? -यौ एकटा चीज पुछबाक अछि।, सोनीक शब्द हमर मोनक विचार प्रवाहकेँ तोड़लक। -की? पूछू।, हम बजलौं। -ई “मातृभाषा दिवस” की होइत छै? -अहाँकेँ के कहलक? -नै, रेडियोपर किछु बजैत छलै। -२१ फरवरी केँ हर साल “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस” (International Mother Language Day) क रूपमे मनाओल जाइत अछि। -से किए? पवन बाजल। -अहाँ सभकेँ तँ बुझले हएत कि जखन १५ अगस्त १९४७ ई॰ केँ भारत स्वतन्त्र भेल तँ भारतक विभाजन भेल आ पाकिस्तान नामक देश बनल। -हँ। से तँ सभकेँ बुझल छै।, सोनी बाजलि। -ओइ समएक पाकिस्तानक दू टा भाग छल पच्छिमी पाकिस्तान यानि कि आजुक “पाकिस्तान” आ “पुरबी पाकिस्तान” अर्थात् आजुक “बाङ्गलादेश”। -२१ मार्च १९४८ ई॰ केँ पाकिस्तानक तत्कालीन गवर्नर जनरल स्व॰ मोहम्मद अली जिन्ना जी आदेश देलन्हि कि सम्पूर्ण पाकिस्तानक राजकाजक एकमात्र भाषा हएत “उर्दू”। -जेना कि अपना देश मे “हिन्दी”।, पवन बाजल । -नै पवन, अहाँक ई जानकारी गलत अछि। भारत ऐ परिप्रेक्ष्यमे थोड़ेक उदार नीति अपनओलक। भारतक आठम अनुसुचीमे मान्यता प्राप्त हरेक भाषा राष्ट्रभाषा थिक आ नैतिक व संवैधानिक रूपेण समान अधिकार रखैए। जाधरि “हिन्दी” क लेल सम्पूर्ण भारतवर्षमे समान रूपसँ सहमति नै होइए ताधरि पूरा भारतमे “हिन्दी” आ “अंग्रेजी” राजकाजक भाषा रहत। संगहि-संग आठम अनुसूचीमे शामिल आन भाषा सभ सेहो अपन-अपन क्षेत्र वा राज्य विशेषमे राजकाजक भाषा रहत। जेनाकि बंगालमे बंगाली, महाराष्ट्रमे मराठी। -तँ स्व॰ जिन्ना जीक आदेशसँ तत्कालीन पच्छिमी पाकिस्तानक लोक सभकेँ खुशी भेलन्हि किएक तँ हुनका लोकनिकेँ उर्दू नीक जेकाँ अबैत छल। मुदा तत्कालीन पुरबी पाकिस्तानक लोक क्षुब्ध भऽ उठलाह कारण हुनका लोकनिकेँ “बाङ्गला” क अतिरिक्त आन भाषा वा उर्दू नै अबैत छलन्हि। -तँ फेर की भेलै?, उत्सुकता भरल स्वरेँ प्रिया पुछलक। -फेर पुरबी पाकिस्तानमे ऐ प्रस्तावक भयंकर विरोध भेल। पुरबी पाकिस्तानक राजधानी ढाकामे छात्र लोकनि शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कएलन्हि आ बन्न आयोजित कएलन्हि। मुदा तत्कालीन पाकिस्तान सरकार ऐ विरोधक यथासम्भव दमन कएलक। २१ फरबरी १९५२ ई॰ क दिन शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कए रहल छात्र लोकनिपर गोली चलाओल गेल। बहुत लोकनि घायल भेलाह आ बहुतो प्राण गमओलाह। प्राण गमओनिहार आन्दोलनकारी छात्र लोकनिमे प्रमुख छलाह स्व॰ अब्दुर्सलीम, स्व॰ रफीक उद्दीन अहमद, स्व॰ अब्दुल बर्कत आ स्व॰ अब्दुल जब्बार। -ई तँ जलियाँबाला बाग जकाँ काज भेल।, पवन बाजल। -हँ। बाङ्गला देशक स्वतन्त्रताक बाद २१ फरबरी १९५२ ई॰ क दिन दिवंगत भेल सभ गोटेक स्मरण चिन्हक रूपमे “ढाका विश्वविद्यालय” क प्राङ्गनमे एक गोट स्मारकक निर्माण कराओल गेल, जकर नाँव थिक “शहीद मिनार”। चित्र १: ढाका विश्वविद्यालय परिसर स्थित “शहीद मिनार”सौजन्य: विकिपीडिया, पब्लिक डोमेन) -तँ तहियेसँ “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस” मनाओल जाए लागल।, प्रिया बाजलि। -नै। एतेक आसान नै छल। बहुते संघर्ष चलल। २६ मार्च १९७१ ई॰ केँ पुरबी पाकिस्तान अपना आपकेँ स्वतन्त्र घोषित कएलक मुदा पाकिस्तान सरकारकेँ से मान्य नै। अन्ततः १६ दिसम्बर १९७१ ई॰ क दिन युद्धमे पुरबी पाकिस्तान द्वारा पच्छिमी पाकिस्तान पराभूत भेल। पुरबी पाकिस्तान स्वतन्त्र देश बनल जकर नाँव राखल गेल “बाङ्गला देश”। यद्यपि फरबरी १९७४ ई॰मे पकिस्तान बाङ्गलादेशकेँ स्वतन्त्र देश मानलक तथापि २६ मार्च १९७१ ई॰ क दिनकेँ “बाङ्गलादेश” मे स्वाधीनता दिवसक रूपमे मनाओल जाइत अछि। -हँ, १९७१ ई॰ क युद्धक चर्च हमर इतिहासक किताबमे अछि।, विकास बाजल। -बहुत बादमे १७ नवम्बर १९९९ ई॰ क यूनेस्को (UNESCO; United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization) द्वारा २१ फरबरीकेँ औपचारिक रूपेँ “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस” क रूपमे घोषित कएल गेल। आ तइ दिनसँ हरेक वर्ष २१ फरबरीक दिन “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस” क रूपमे मनाओल जाइत अछि। ऐ दिवसकेँ मनएबाक मुख्य उद्देश्य भाषायी आ सांस्कृतिक वैविध्यक संरक्षण करब आ बहुभाषिता (multilingualism) केँ बढ़ाएब थिक। चित्र २: ऑस्फील्ड पार्क, सिडनी, ऑस्ट्रेलिया स्थित “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस स्मारक” (सौजन्य विकिपीडिया, पब्लिक डोमेन) -चलू, आइ बहुत नीक चीज बताओल अहाँ।, प्रिया बाजलि। -हँ, ओना तँ हम सभ खाली किताब खोलि बैसल रही आ घूर तरक गप्प पिबैत रही। अहाँकेँ अएला सँ किछु नव सीखल।, सोनी बाजलि। -तँ आब रतुका भोजनक लेल चली?, हम पूछल। -हँ हँ।, सभ धियापुता बाजल। आ हम सभ रतुका भोजनक लेल आङ्गन दिस विदा भेलौं। चन्ना मामा (बालगीत) दियाबातीक समय थिक। किछु छोटछीन धियापुताक मित्र मण्डली जमा अछि। ओ सभ एतबो छोट नै कि किछु नै बुझल होइ। ओकरा सभकेँ ई तँ बुझल छै कि रॉकेट नामक कोनो चीज होइत छै जे चानपर जा सकैत अछि आ मनुक्खोकेँ लऽ जा सकैत अछि। ओकरा सभकेँ ईहो बुझल छै कि फटक्कामे रॉकेट नामक एकटा फटक्का होइत छै जे अकासमे उड़ैत छै। मुदा ओ सभ एतबो पैघ नै कि सभटा बात बुझले होइ। ओकरा सभकेँ ई नै बूझल जे फटक्काबला रॉकेट नै तँ अपने चानपर जा सकैत अछि आ नहिये ककरो चान धरि लऽ जा सकैत अछि। अपन घरक पैघ सदस्य द्वारा आनल फटक्काबला रॉकेटकेँ देखि कऽ ई अबोध धियापुता सभ की की कल्पनाक उड़ान भरैत अछि से ऐ बाल – गीतमे वर्णित अछि। देखल जाए:- चल रॉकेट! उड़ान भर। लऽ चल हमरा चान पर। चन्ना मामा शोर करै छथि, बैसल आसमान पर।। मामा भेटथिन्ह, मामी भेटथिन्ह। नाना भेटथिन्ह, नानी भेटथिन्ह। नाना सँ खूब खिस्सा सुनबै, सूतए काल दलान पर।। मामा संगे सौंसे घुमबै। दुर्गापूजा मेला देखबै। नटुआ नाच, सिनेमा, नाटक, देखबै दुर्गाथान तर।। कचड़ी खएबै, मुरही खएबै। रसगुल्ला बलुसाही खएबै। चूड़ा दऽही गरम जिलेबी, नथुनी साव दोकान पर।। ओहि ठाँ माएक दूध भात नै। ओहि ठाँ बाबू, बहिन, भाए नै। ओहि ठाँ हम ने रहबै हरदम, घुरि फेर अएबै गाम पर।। पंकज कुमार झा माए गइ माए माए गइ माए घरक ऊपर चारक तर बगरा बनेलकौ एकटा घर। माए गइ माए घरक पाछू बाड़ीक बिच सुगा अनलकौ एकटा फर। माए गइ माए गामक भीतर टोलाक बीच नटुआ नचलौ एकटा नाच। माए गइ माए गामक बाहर पोखरिक बीच पुरैनिक पातपर झिलमिल जल। माए गइ माए आँगन कात ढेकी लग बिहरिमे छौ गहुमन साँप। माए गइ माए बस्तुनिया लए हम कहलियौ सभ हाल-चाल जल्दीसँ दऽ दहीं बस्तुनिया हमर हम चललियौ खेलए लेल नै देबहीं बस्तुनिया हमर माए गइ माए चिकरैत रहबौ। माए गइ माए चिकरैत रहबौ। गजेन्द्र ठाकुर बड़द करैए दाउन ने यौ हाथी अगत्त, पिछू, थाइत, माइल बिरि हिर्र-हिर्र सुग्गर चलू संग घर घुरि ती-ती परबा उड़ि गेल ऊपर लिह लिह बकरी घास तूँ खो बड़द करैए दाउन ने यौ अतू कुकुड़ कुत-कुत डॉगी कैटी पिसू-पिसू आएत की? चेहै-चेहै सुनि पारा दौगल, भागी छोड़ि बाट हम ताकी अर्र बकरी घास तूँ खो बड़द करैए दाउन ने यौ ढेहै-ढेहै कऽ नै खौंझाबू साँढ़ आओत खरिहानमे यौ आव ठामे रे हे, हौरे हौ बड़द करैए दाउन ने यौ ज्योति सुनीत चौधरी बचपन उठिते देरी परातमे दिवसक पहिले पुकारमे दूबिपर छितराएल ओसक मोतीकेँ धांगि धांगि माटिमे मिलाबै छल
दिनक रौद तपलाक बादमे कुसियारकेँ पकड़ने हाथमे जड़ैत अकासमे मिझाइत सुर्यकेँ साँझक साँझ निहारै छल
कनिया पुतराक खेलमे संगी सबहक मेलमे पूरा विन्याससँ बियाह रचाबैत नम्हरो दिनकेँ पछाड़ैत छल
छतपर ठाढ़ भेल कातमे रातिक गहन अन्हारमे बड़का पसरल बाधक सन्नाटापर दूर दूर नजर दौड़ाबै छल
जाड़मे आकि आममे बीतल अछि जे गाममे घुरि कऽ फेर नै आएत कहियो बचपनक ओ बीतल पल सैण्टाक अस्तित्व सैण्टाक अस्तित्व आ मिथ्या खिस्सा सभकेँ सत मानि कऽ पैघ भेल बच्चा जखन सत्तक तथ्य सामने आएल नव-जन्मल युवाक मोन भेल घाएल बादमे हतास करैत छल सभ लोककेँ मोन भेल जे खतम करू ऐ लोभकेँ ने कुनो बौआ सैण्टाक आस लगेता ने पैघ भऽ ऐ नाटकीयतापर पछतेता फेर भेल जे केना चन्दाकेँ मामा कही देखि-देखि बच्चामे खाना खाइत रही फेर बादमे पढ़लौं जे ई मात्र उपग्रह थिक गोल परिक्रमा करैत रहैत अछि पृथ्वीक जहिया बौआ अपने ठेकनगर हेता खेलौना बाँटि-बाँटि स्वयं सैण्टा भऽ जेता अपना सभ जकाँ नै जे पहिने बच्चामे सुनलौं सभ खिस्सा भगवानक नामे जेना-जेना बढ़लौं बुद्धिमत्ता दिस केलौं ईश्वरपर शक भेलौं नास्तिक। दलमा दलमाक जड़िपर ठाढ़ बससँ निकलल सैलानी सभ तैयार भऽ हाथमे रस्सी, पहिन आँखिमे चश्मा, जूता, टोपी संग करए करिश्मा ध्येय छल पहुँचब चोटीपर रस्ता भरल घनघोर जंगल विदा भेल रस्तापर करैत निशान कनिये देरमे भेल भारी थकान ऊपर आकि गाछ आकि अकास नीचाँ दूर दूर तक समतलक नै आस बीच ढलानपर पहुँचल छल टोली सुनि रहल छल हिरणक बोली रूकि कऽ जखन पकड़लक गाछ सिहराबएबला चीज आएल हाथ किछु टाएर सन पातर ट्यूब ई तँ छल एक साँपक केंचुआ कहुना कऽ रहल छल डरपर काबू कि देखाएल हाथी भेल बेकाबू सुनि-सुनि ओकर जोरदार चिंघार सभ होशियारी भेल छल बेकार नुकाइत पड़ाइत कहुना बचल हाथी सभ अपन रस्ता बढ़ल आब फेर बेधड़क छल चढ़ब कि भेल शुरू बानरक उपद्रव कहुना पूरा भेल चढ़ाइ दैत एक दोसरकेँ बधाइ ऊपरसँ चारूकातक अद्भुत दृश्य सभ भय भऽ गेल छल एकदम अदृश्य। जगदीश प्रसाद मण्डल सुनू बौआ यौ सुनू नूनू यौ सुनू बौआ यौ सुनू नूनू यौ चेहरा देख मन झहरैए तरे-तरे देह सिहरैए तड़पि-तड़पि ओ कुहरि-कुहरि बेथित भऽ बेथा सुनबैए बिरड़ोमे उड़ि-उड़ि अहाँ दोगे सान्हिये पड़ा रहल छी मातृभूमिक रस पीब बिना पुरूखाक पुरूषत्व हरा रहल छी। मनुष्यक जिनगी आँकि-आँकि अपनाकेँ अँकए पड़त। नै तँ गंगा-जमुना जकाँ बोहिआएत जिनगी चलत। ककरो मेटेने कि कहियो गंगा आकि कोसी मरतै धारक पेट सदए धारा संग-संग चलिते रहत। मनुख-मनुखमे भेद कतए देखए पड़त ओइ दुर्गकेँ ढाहि ढुहि ओइ आड़ि धुर नव जिनगीक नव दुनियाँ बना कऽ। पुत्र-पिता सम्वाद पुत्र- बाबू यौ, पनिया दूध किअए बेचै छी एकरे ने पाप कहै छै? जानि-बूझि जे करए ढिठाइ तेकरे जमदुत पकड़ै छै? पिता- कहलह बौआ मधुर बात, सिहरि-सिहरि हृदए सिहरि गेल। अजीब खेल धर्म-पापक हँसि-हँसि जिनगी टूटैत गेल। पुत्र- की अजीब खेल धर्म-पापक गुरूवर-गिरिवर बनि कहू। कर्म, अकर्म, विकर्म, सुकर्म, बिलगा-बिलगा बुझा कहू। पिता- बाल-बोध रहितो अहाँ जिनगीक रहस्य-रस तकलह। जिज्ञासाक उठैत ज्वार समए पाबि-पाबि पेबह। डॉ. नरेश कुमार ‘विकल’ बाल गीत अहींसँ गंगा-जमुना बहथिन अहींसँ कमला धारा। अहीं सुरूज ओ चान जरावी अहींटा एक सहारा आइ हिमालय देखि रहल अछि फेर अहींकेँ बौआ! बाँझ रहथु धरती बरू पर उपज ने पाबए झौआ कतेक दु:शासन खींचि रहल अछि आइ द्रोपदीक चीर! कनिको जीमे प्राण रहए तँ रहब ने कनिको थीर! बना कलम तरूआरि अहाँ छोड़ू वीणा केर तार! रहू सदति तैयार अहाँ यौ गरमी हो वा जाड़!! सुनू बौआ मोर कानमे बाजू बौआ जाएब केकरा कोर आब ने भेटत बौआ तिरहुतमे तिलकोर कतए गेलै करमी आ पटुआक झोर साग आ पाग ने कोकटीक तौनी डालाक भार आ ने सीकीक मौनी महफाक ओहार उड़ल देखू कनियाँ गोर स्नो-पाेडरसँ करियो भेलै गोर पण्डौलमे पाव रोटी भेटत चहुँओर सौराठक सैण्डविच कएने अछि जोर कपिलेश्वरमे कटलेट भेटत टटुआरमे टोस्ट बूझि ने पड़त बौआकेँ गेस्ट आ होस्ट लोहनाक लिपिस्टिकसँ रंगल छैक ठोर हाइ हिलक चप्पलमे नाचै चारू पोर नेहरामे झकझक नायलान कएने अछि जोर जार्जेट जनकपुरमे कतए अछि पटोर? माए गेली मम्मी अएली टप-टप खसै नोर डैडी ओ डार्लिंगकेँ भेटत ओर ने छोर। संस्कृति वर्मा, क्लास ४था, क्विन मेरी स्कूल, मॉडल टाउन, दिल्ली। कतए जाइ... हम करी तँ की किछु ने फुरैत अछि. हमहूँ बेदरा छी मोन नै पड़ैत अछि! एकटा फ्लैटमे बन्द रहैत छी ओइ कोठरीसँ ओइ कोठरी धरि घुमैत रहैत छी। टीवी खोलैत छी, केहेन केहेन दृश्य आबि जाइत अछि हमरो लाज लागि जाइ अछि। कंप्यूटरपर जाइ छी, नेटपर किछु कहाँ आबि जाइ छैक लागले डैड सेहो पहुँचि जाइ छथि ई की देखि रहल छेँ डैड, हम की करी, कत्तऽ खेली आ आ डैड न्यूज खोलि बैस जाइत छथि। न्यूजपर किछु सीन आबि जाइत छैक आँखि गुरारि हमरा कोठरीसँ बाहर निकालि दैत छथि, जाउ होम वर्क करू ............ एकटा डिब्बामे बन्न भऽ बससँ स्कूल जाइत छी अबैत छी .... नीचा नै जाउ, जमाना खराप छैक छतपर नै जाउ नेनाकेँ उठा कऽ लऽ जाइत छैक आब अहीं कहू हम बच्चा सभ कतए जाउ अवलम्ब पाउ..........??? अहाँ आबु नेहरु चाचा, अहाँ कतए चलि गेलौं देखि लिअ अहाँ नेना सभकेँ की कऽ गेलौं.. हमर पीठपर भारी बस्ता ओइमे किताब कोपीक ठेलम ठेल देखू हमर उमिर मात्र आठ बरिस हमर पीठ आ कान्हक हाल देखू चाचा, कियो नै देखएबला हमरा सभकेँ कियो नै बुझएबला हमरा सभकेँ दुर्दिन आबि गेल हमर सबहक अपन राजक हाल देखू कतेक पढ़ब कतेक लिखब सभ विषय एखने पढ़ि लेब तँ इंजीनियर डाक्टर एखने बनाबू.. कखनो खेलक नै हिसाब देखू अहाँ गुल्ली-डंडा, कबड्डीक गप कहलौं हम क्रिकेट ले बेहाल, देखू एक बेर अहाँ फेरो आबू, अपन नौनिहालकेँ अहाँ बचाबू हम नीक नागरिक बनब देशक नाम ऊँच करब ऐ बोझसँ मुक्ति अहाँ दियाबू... चाचा नेहरु अहाँ आबू .............. हमर दादी माँ हमर दादी माँक गाम जकर नाम छी बड़गाम कतेक नीक कतेक सुंदर नीक नीक लोग नीक नीक घर सब केओ प्रेमसँ भरल एतेक सुन्दर गाम ककर दीप दीप सँ जगमगाइत जाइ ठाम हमर दादी माँ ओ भऽ गेल हमर धाम जकर नाम छी बड़गाम... काश हमरा पंख रहितैक तँ काश हमरा पंख रहितैक तँ हम अकास मे उड़ैत रहितौं काश, हमरा चारि हाथ होइतैक सभ काज जल्दी-जल्दी करितौं काश, हम यदि जनितौं सभक दुःख खत्म कऽ दैतौं किन्तु, हमरा किछु नै चाही हमरा तँ चाही हम्मर दादी माँ जिनक बिन सभटा सून अछि जे हमर जीवन-संगीतक धुन अछि .... अनमोल झा अपन गाम बौआ जेतै अपन गाम ओतएसँ अनतै बहुते आम एकटा आम दीदीकेँ देतै एकटा आम अपने खेतै एकटा आम काँचे बौआक मामी नाचै। बौआक पापा छै बड़ कसाइ मारलकहेँ बौआक गाल फोड़ि आइ अबै छै बाबूजी देतै घरसँ बैलाइ बाबूक राखि लेब कैडवरी खुआइ। बौआक माइ सेहो कसाइ मारलक हेँ बौआक पीठ फोड़ि आइ बजबै छी रिक्शा, देब नैहरा बैलाइ बाबूकेँ पोसि लेब दूध-भत्ता खोआइ। मास्टरबो टटीबा सभ छै बड़ कसाइ फोड़ि देलक बौआक गत्र-गत्र आइ फिरथु जनपीटा देबनि रस्ता भुलाइ पढ़ौनी ने लिखौनी शिक्षा मित्रक कमाइ। बुच्चीक पपा छै बड़ कसाइ मारलक बुच्चीकेँ लोल फोड़ि आइ अबै छै बबा, करत पापाक धोलाइ पढ़ि-लिखि बुच्ची भऽ जेतै बुधियारि। बुच्चीक माइ छै बड़ कसाइ मारलक हेँ बुच्चीकेँ झोंट तीर आइ अबै छै फल्लमाँ, देतै नैहरा बैलाइ बुच्ची रानीकेँ राखि लेब छाती लगाइ। मामा गाम बौआ जेतै मामा गाम ओतएसँ अनतै पाकल लताम एकटा लताम काँचे बौआक नानी नाचै। बौआक मामा गाममे श्यामजी भाइ जेतै बिदेसर अनतै लाइ खेतै सभ मिलि लाइ-मिठाइ बाँटि-खुटि खाइ राजा घर जाइ असगर खाइ डोमा घर जाइ। बुच्चीक मामा गाममे बंटी दाइ जेतै मेला, लेतै पाइ किनतै गुड़िया, नचतै आइ खेतै जिलेबी, अनतै लाइ मैयाँ तै ले बीतल जाइ। मामा गाममे पूजा दाइ दू बहिन आ असगर भाइ सभ मिलि खेलय-पढ़ितो जाइ एलै परीक्षा गद्-गद् भाइ पढ़ै-लिखैमे सबहक भलाइ। बौआक मामा गाममे ओम भाइजी आ आस्था दाइ रहै जाइ छै दिल्लीमे, एतै आइ मामा-मामीक गाड़ीपर घुरतै आइ, खेतै मिठाइ। पटना वाली मामी बड़ होसिआरि बौआ मामाकेँ बना देतनि फेहम गे दाइ सोनू दीदी गाम जखन एतै गै माइ बौआ सभ मामा गाम जेतै गै दाइ खेलेतै खूब, खेतै मिठाइ। बौआक बड़का मामा-मामी केहन कसाइ अपने खाइ छै रस मलाइ खाइते रहै छै कखनो ने अघाइ नाना-नानीकेँ दै छै नून-मरचाइ नाना-नानी चाहै छै तैयो भलाइ। सभ एक दिन बुढ़ हेमे गे दाइ बुढ़बा-बुढ़ियाक कष्ट हुअए ने भाइ सभ दिन एक समए रहय ने दाइ समैसँ जे पढ़त से बड़ होसिआरि नै पढ़ने केना हएब बुधिआरि? राजेश मोहन झा “गुंजन” साओन कुमार उछलि-कूद करै छेँ बौआ ऐ ऋतुक तोरा भान केना छौ टरटराइत छेँ कादो सानल जलमे स्वर सरगमक ज्ञान केना छौ झर-झर झहरौ ऋतु िनरझरनी सभा बजौलेँ डोबहा कातमे छोट-छोट जलकुमही पातक टिकुली सटने छेँ मुँह आ गातमे भेटथुन ऐठाँ प्रियतमा तोहर ऐ सबहक अनुमान केना छौ... आबेँ बैसेँ कनेक सुस्तावेँ... हेतै जे से देखल जाएत मेघदूतक शान बढ़ल छै नै पोखरिक पानि सुखाएत औता भुजंग लप्प दऽ धरता ऐ सभसँ अनजान केना छेँ जनैत छी किछु जन तोरा कूप मंडूक कहि उपहास करै छथि नै जनैत छथि तोहर महिमा मुदा गलती अनायास करै छथि चनहा सोती इनार वा सरिता सभठाँ जीवन आसान केना छी.... एकटा अपराध तुहूँ करै छेँ जखन-तखन तों बाढ़ि अनै छेँ जानै छी मानै छी मुदा की करू नेना वियोगमे खूब कनै छेँ दलबल आबे गीत सुनाबे मात्रा तालक वरदान केना छौ....। चुट्टी दाइ गे दाइ तोँ बड़ हरजाइ भागेँ ओइ दिश देखेँ जत्ताहि ढेपा गुड़क गुड़कल जाए तोहर चालिपर नेना सभ जानथि माय रखलथिन कतए मिठाइ काया छोट काज छौ मोट बास बनौलेँ केवाड़क ओट जौं काटें बपलहरि छोड़ाबेँ जहिना मुँहमे पड़ल मिरचाइ गणेशक लड्डू महादेवक भंग सिनेह तोरा छौ सबहक संग ितल संक्रांति तोरे लेल बनलौ नाचि-नाचि कऽ खा लै छेँ लाइ पाँतिसँ जाइ छैं पाँतिमे आबेँ निअम गणनाक खूब बुझाबेँ होइछ हल्ला उद्यम पटका जौं कोनो नेना एकरा देथि बिसराइ। शिव कुमार झा पेटू गोलू पाँचम कक्षामे व्याकरणक पाठ प्रश्नक डरेँ सभ नेना भेलै काठ देवीजी पुछलन्हि गोलूसँ ककरा कहै छै काल? कह रौ बेताल गोलू बाजल दुश्मन माने काल सुनिते देवीजी भेली बेहाल लागल थापर गोलीक कान सुन्न आँखिसँ झहरए लागल नोरक बुन्न ऊपरसँ केहन भोल मुदा पेट देखू कदीमा सन गोल नै दैत अछि पढ़ऽपर ध्यान तेँ नै भेलै विद्या-ज्ञान सुनऽ काल भऽ जाइछ बहीर पेट एकर भुतही पोखरिसँ गहींर चाहियनि हिनका सेर भरि खीर दस सोहारी, भरि बाटी पनीर झोड़ा उठौलक दौड़ल बथान नै देलक देवीजीक गप्पक ध्यान भरि थारी हूरि अचार दाँतमे साटि फूलल पेट दौड़ल लेलक गंजी फाड़ि रमाकान्त राय रमा उल्लूक शिकारी नन्हेँ भाय खेलए चललनि हाथ लेने बन्दूक लगलनि दनदन ‘फायर’ करऽ ओ पक्षी देखि उलूक नव लोक, नव चालि-चलन नवे-नव बन्दूक जानथि नै ओ गोली दागब गेलनि लक्ष्यसँ चूकि उड़ि गेल पक्षी, नन्हेँ भाय तँ मुँह लटकौने अएलाह लल्लूक पक्षीक शिकारी जे उल्लूए बनि घुरि अएलाह। मिथिलेश कुमार झा बाबाक रोपल गाछ सिनुरिया पातसँ बेसी लुधकए आम। देखैत हियसगर खूब सुअदगर रसगर गुदगर मिठगर आम। आमिल, अमोट, अँचार-कसौंझी हुअए साल भरिक ओरियान। बहुते दूरमे चतरल-पसरल रखने पुरना गाछीक मान। परसथि बाबी टोला-पड़ोसा भार चङेरा आनहु गाम। जन-बोनिहार उमठि जाइत अछि खा-खा हमर सिनुरिया आम। बाट-बटोही अघा जाइत अछि कोनो साल जाइ ने बाम। सौंसे गाछीक राजा अछि ई बाबाबला सिनुरिया आम। महाकान्त ठाकुर सिनेहक सरगम प्रेमक भाषा प्रेमक आशा सभ करैए प्रेम करब नै सोझ बोझ बनि लोक रहैए, चाहि रहल सभ पड़ले भेटौ लुब्धल-लुब्धल हमरे भेटौ हमरे भेटौ सभ तकैए। नीक मनुख सुख सभ लय ताकय सदिखन आगू अपन आन संग सिनेहक सरगम खूब बंटैए। अपनासँ पैघक आदरमे सदिखन तत्पर, छोटको भाए बहीनक सदिखन धियान रखैए। खगता भगतसिंहक पढ़ि-पढ़ि बनिहें एहन सिपाही सभतरि लोक करौ वाहवाही एहन संतानक अलगे धाही खगता छैक भगतसिंह चाही। आजादी नै लोक देखलकै अधिकारक नै स्वाद चिखलकै पसरल देशमे भ्रष्टाचारी खगता छैक भगतसिंह चाही। पहिने छलै विदेशीक शासन आबक शासक झाड़ै भाषण साँढ़े जकाँ लगाबै ढाही खगता छैक भगत सिंह चाही। अपन भूमि आम गाममे गाछी छल, दूध दुहैक छै बाछी चल शहरक जिनगी भागम-भाग, गाम अपन लऽ लाठी चल थाल पानि संग लीची जामुन, पान-मखान लऽ माटी चल जन्म भूमि स्वर्गोसँ सुन्दर, कहलनि बाबा खाँटी चल। भरि पोख कोइली मिठ-मिठ गीत गबैए कौआक देखसी कहाँ करइए। बौआक ठोर बँटैए सभटा, हँसि-हँसि सभसँ मेल करैए। खन रूसए खन बात बनाबए, झूला-झूलक भाँज पुरैए सोचैछ चाँद तरेगन पकड़ब बाजैछ माँ गै भूख लगैए। भेद-भाव नै अन्तर जानए, सिनेह दुलारक भाव बँटैए। कोरा कन्हा चढ़ि-चढ़ि घूमए काका-बाबाक पीठ चढ़ैए। सिनेहक भाषा सबहक आदर, लेब-देब भरपूर करैए। ज्ञान दीप विद्यालयमे ज्ञान भेटै छै बौआ-बुच्ची पढ़ि-पढ़ि आउ, की की सिखलौं, की की पढ़लौं, माँ बाबूकेँ रोज सुनाउ। आँखिसँ देखल चीजसँ आगू ज्ञानसँ देखब ब्योंत धराउ, मोनमे गुड़कए बहुतो लड्डू बुधि-विवेक संग खाउ खेलाउ। जे चमकैछ सभ सोना नै अछि, ठोकि बजा कऽ निकहा लाउ, हीरा-मोती सभ नै चिन्हैछ, विद्याधन लऽ आगू आउ। दुःखक मोटरी माथ दुखाबए, सुख चाही शिक्षित संग पाउ, जत्तहि छैक अविद्या पसरल, ज्ञानक दीपक बार कऽ आउ। डॉ जया वर्मा बेटी नेहरु कोनो व्यक्ति नै एकटा भाव छथि स्वतंत्रता समानता शक्तिक संभार छथि चाचा नेहरुक कोट लागल गुलाब नेनाक प्रतीक अछि ऊपरसँ कोमल सुगंधि पसारैत मुदा भीतरसँ जे निर्भय आ निडर अछि नेहरुक नेना इंदिरा प्रियदर्शिनी सन देशक शान अछि बेटी बेटीकेँ दुलार करू दुतकारू नै बेटी अर्चना अछि पूजा करू जाड़क रौद सन बेटी गरमीक छाहरि सन बेटी जीवनक गीत संगीत बसैत अछि ओइमे नै तँ रसहीन अछि जिनगी फूलमे मुस्काइत सावनक बरसात सन बेटी झरना सन चंचल आ गतिशील थाकल मोनक चैन अछि बेटी बाड़ीक लहलहाइत हरियरी अछि बेटी मौन सागरक लहरिमे बजैत संगीत सन बेटी ईश्वर ओकर रक्षा करू केकरो नजर नै लागैक माएक प्यार दुलार अछि बेटी जगकेँ आलोकित करबा लेल दीयाक लौ सन चमकैत बेटी अकासमे सूरज सन दीप्त बेटी बेटी शक्ति दुर्गा सन क्षमा सीताक श्रद्धा राधा सन लक्ष्मीबाइक शौर्यसँ भरल बेटी बेटी बेड़ी नै स्वच्छंद बयार अछि नै बान्हु कोनो सीमामे अनंत आकासक सीमा स्वयं बनाओत बेटी छठि पोखरिक गीत पाँच पुत्तर अन्न-धन लक्ष्मी धियबा मंगबौ जरूर नेहरुक बाल दिवसक सन्देश बेटा बेटी सभ बराबर सभ एक्के ईश्वरक संतान फेर किएक करैत अछि फर्क नादान इंसान चन्द्रशेखर कामति भात छै नाम-नाम भात छै नाम-नाम, दालि छै गोल तइपर चड़हल आलुक झोड़ कने दही दिअ कने बड़ी दिअ-२ छोटकी कनियाँ आबै छथि, ओ भानस खूब बनाबै छथि, हुनका हाथक बनल तरूआ, तरकारी सभकेँ भावै छै, छैक नोन-तेल सभ ठीक-ठीक, लागै छन्हि सभकेँ बड़ नीक, कने दही दिअ कने बड़ी दिअ-२ भात छै नाम-नाम दालि...... छोटकी केर छोटका कनटिरबा सभ काँय-काँय किकियाबै छै तैयो बेचारी मोन मारि-मारि अप्पन संसार चलाबै छै, केतबो कियो लाख सताबै छै दुब्बर दुलहा, दुलहिन मोट तइपर सँ दे लाठिक चोट कने दही दिअ कने बड़ी दिअ-२ भात छै नाम-नाम, दालि छै गोल तइपर चड़हल आलुक झोड़ कने दही दिअ कने बड़ी दिअ-२ गीत चऽल-चऽल-चऽल बौआ नानी गाम टीशनपर कीन देबौ थुर्री लताम बाटो ताकैत हेतौ मामा बेकल भऽ मौसी फोड़ैत हेतौ चिनियाँ बदाम चऽल-चऽल- चऽल बौआ नानी गाम टीशनपर कीन देबौ थुर्री लताम मामी जौं देखतौ तँ मुँह बिजकेतौ कानबेँ तँ हारि-मारि कऽ मामो उठेतौ मौसी छुलाहि छनि कहर बड़पेतौ मामी तँ कऽ देतौ जीअब हराम चऽल-चऽल- चऽल बौआ नानी गाम तहियेसँ मामाक सुधि-बुधि हेरेलौ जहियासँ मामी हुनक घर एलौ नानी आ नानाकेँ हाथ-मुँह बन्हेलौ बेटाक बियाह कऽ गिरला धड़ाम चऽल-चऽल- चऽल बौआ नानी गाम रहतनि ने सभ दिन हुनको जुआनी एक दिन बदलि जेतै सभटा कहानी टिकलय सदरि नै केकरो अरामी उड़लय सुगनमा जय सियाराम चऽल-चऽल- चऽल बौआ नानी गाम। डॉ॰ शशिधर कुमर हम फूल बनब, हम काँट बनब हम फूल बनब, हम काँट बनब । कोमलतम्, टाँट सँ टाँट बनब ।। नै ककरो हम, अधिकार हरब । नै ककरो हम पथविघ्न बनब। पर अपन प्रगति - पथ - रोड़ा लेऽ हम लोहक दण्ड समाठ बनब ।। पानिक संग बनि कऽ माछ रहब । शत्रु ले विषधर साँप बनब । सज्जन ले शिव अभिराम सही, दुर्जन ले हर विकराल बनब ।। मिथिला केर पारावार हमर । मिथिला भाषा अधिकार हमर । अछि तुच्छ एतए, संसार सगर । मिथिला भाषा सभसँ मिठगर । आँखि उठाओत जे एकरा दिशि, तकरा लेऽ चूल्हिक आँच बनब । सद्रे आलम गौहर नेना भुटकाक लेल एकटा सुंदर कविता झट स्कूल जो हाथ मे लऽ ले पोथी स्लेट आ भट्ठा, बौआ घी लेबे की मट्ठा। पढ़बेँ लिखबैँ साहेब बनबेँ बढ़िया बढ़िया सूट बूट अनबेँ नहि तँ सभ दिन पहिरऽ पड़तौ मोट झोट आ लठ्ठा बौआ घी लेबे की मट्ठा सरस्वती सँ लक्ष्मी भेटतौ घर भरि मे संपन्नता औतौ दड़िभंगा मे कीन देबौ तोरो जमीन दू कठ्ठा बौआ घी लेबे की मट्ठा देखही जे ने पढ़लक लिखलक अ आ इ ई सेहो ने सिखलक ओकरा आइ धरि जाए पड़ै छै, कान्ह पर हर लऽ हठ्ठा बौआ घी लेबे की मट्ठा ललुआ चुनुआ रबिया गुड़िया स्कूल जाइ छौ संगी तुरिया पढ़ कऽ अबिहैँ त संगी संग, करिहैँ हँसी ठठ्ठा बौआ घी लेबे की मट्ठा जगदीश चंद्र ठाकुर ‘अनिल’ बाल गीत १ हमरहि खातिर सुरुज उगइ छथि हमरहि खातिर चान हमरहि खातिर कोटि तरेगन हमरहि ले आसमान। हमरहि खातिर साँझ पड़इए राति सँ होइए प्रात हमरहि खातिर रौद अबैए हमरहि लेल बसात हमरहि खातिर गाछ फड़इए जामुन, आम, लताम। पानि तपैए, भाफ बनैए भाफ उड़इए, मेघ बनैए सेहो हमरे ले ऊपरसँ धरती पर रिमझिम बरसैए हमरहि खातिर धरती मैया देथि गहूम आ धान। हमरहि खातिर फूल फुलाइछ उज्जर- पीयर- लाल कतहु असीमित सागर अछि तँ पर्वत कतहु विशाल सभटा हमरहि लेल बनाकऽ नुका गेला भगवान। २ बुच्ची बढ़ती, लिखती-पढ़ती हमरा चिन्ता कथी के। तिलक-दहेजक दानव केर उत्पात मचल अछि मिथिलामे, तै लए बुच्ची खडग उठौती हमरा चिन्ता कथी के। ज्ञान आर विज्ञानक संपति अर्जित करती जीवनमे, नव सुरुज आ चान बनौती हमरा चिन्ता कथी के। लोकक मोल बुझै छै एखनहुँ लोक बहुत छै दुनियामे, संगी अप्पन अपनहि चुनती हमरा चिन्ता कथी के। अपनहि श्रम सँ बाट बनौती एहि बबूर केर जंगलमे, दुख सँ लड़ती आगाँ बढ़ती हमरा चिन्ता कथी के। ३ मम्मी, तोँ चिंता जुनि कर, तोँ तँ हमरा पढ़ा-लिखा दे कर नहि कनियोँ कथूक डर। तिलक-दहेजक बल पर किन्नहु हम कतहु नहि करब बियाह, अज्ञानी, ढोंगी, पाखंडीक संग नहि जीवन करब तबाह अपन पएर पर ठाढ़ होएब हम होएब अपनहि पर निर्भर, मम्मी, तोँ चिंता जुनि कर। संपति अर्जित करब सतत हम ज्ञान आर विज्ञान केर नाम बढ़ाएब हम दुनियामे सगरो हिन्दुस्तान केर हमर स्वप्नमे ‘किरण’, ‘कल्पना’ सतत कानमे हुनकहि स्वर, मम्मी, ताँे चिंता जुनि कर। हम्मर गहना होएत मम्मी हमर आत्म-विश्वास टा विजय अंध-विश्वासक ऊपर सत्यक दिव्य प्रकाश टा जीयब स्वामिभमान केर संगहि एतबहि अछि अभिलाष हमर, मम्मी, तोँ चिंता जुनि कर । प्रेमचन्द्र मिश्र अपन बेटा अभिनव मिश्रकेँ बल दै लेल कविता नुका नुका कऽ कानय बाला, व्यर्थ समय बिताबय बाला!! किछु सपनाकेँ मरि गेलासँ, जीवन नहि मरैत छै!! सपना की अछि, अहींक ओछाइनपर, सूतलमे आँखिक पानि। आओर टूटल तँ की भऽ गेल, जेना जागए काँचे नीन्न जवानी॥ भीजल उमर बनाबय बाला, डुबकी बिना नहाबए बाला॥ कनी पानिकेँ बहि गेलासँ सावन नहि मरैत छै। माला टूटि गेल तँ की भेल अपने हल भऽ जाएत समस्या। नोर जा लिलाम हुअए तँ बुझू पूरा भेल तपस्या। रूसल दिन मनाबय बाला, फाटल अंगा सियाबय बाला। एक आध दीपकेँ मिझा गेलासँ अंगना नै मरैत छै। हराइत नहि छै किछु एतए, बस सिर्फ जिल्द बदलैत अछि पोथी जेना रातिकेँ उतरिकेँ चान्दनी, भोरे पहिरैत अछि रौदक धोती कपड़ा बदलि कऽ आबए बाला, चालि बदलि कऽ जाइ बाला कनी खेलौनाक हेरा गेलासँ नेनपन नहि मरैत अछि लुटि लेलक जे मलिया उपवनकेँ, लुटलक नै ओ गन्ध फूलकेँ बिहाइरो तक नै छोड़लक पर, खिड़की बन्द ने भेल धूलकेँ नफरत आलिंगन करैबाला, सभपर गर्दा उड़बैबाला किछु मुखड़ाक नाराजगीसँ अएना नै मरैत अछि लाखो बेर घैला फूटल, चीछो तक नै आएल पनघटपर लाखो बेर नाह सभ डूबल, चहल-पहल ओहिना अछि पनघटपर अपन उमर बढ़ाबय बाला, लौ कऽ उमर घटाबय बाला लाख करए पतझर कोशिस पर फुलवाड़ी नै मरैत छै २ अपन बेटा अभिनव मिश्रकेँ बल दै लेल कविता (हिन्दी गीत कोशिस करने वाले की हार नहीं होती-क तर्जपर) डरा गेलासँ नाविक कहियो समुद्र पार नै होइ छै कोशिस करैबलाक कहियो हारि नै होइ छै छोटकी चुट्टी जखन मुँहमे रोटी लऽ कऽ चलैत छै नै जानि असंखो बेर नीचाँ खसैत छै मोनक बिसबास जेहनमे रंग भरैत छै खसि कऽ ऊपर गेनाइ ओकरा कखनो नै अखड़ैत छै अन्तमे ओकर मेहनति बेकार नै होइत छै कोशिस करैबलाक कहियो हारि नै होइत छै जंगलरूपी संसारमे पहाड़ बनू माए-बापक लेल हुनक माथक सरताज बनू किछु केने बिना झुट्ठो जय-जयकार नै होइ छै कोशिश करैबलाक कहियो हारि नै होइ छै विफलता एकटा चुनौती छै तकरा स्वीकार करू की कमी अछि तकरा देखू, चिन्हू, सोचू आ ओकर सुधार करू जाधरि जीत नै होइ ताधरि चैनक निन्नकेँ तियागू अहाँ संघर्षक रणभूमिसँ नै भागू अहाँ पैघ भलाइमे छोट नोकसान कखनो अपराध नै होइ छै कोशिश करैबलाक कहियो हारि नै होइ छै बृषेश चन्द्र लाल बाल-कविता १ चीनीकटोरा कड़कड़ बोले। धियापुताके मनमा डोले।। टनटन घण्टी जखने बाजे। बौआ दाइकेँ दौड़ि बजावे।। चलिऔ दैया दिऔक धान। चीनीकटोरा कहिऔ तान।। २ डमडम डमरु हवा मिठाइ। मुहँमे धरिते सोझे बिलाइ।। एक चौअन्नी मिठगर जादू। मन होए सभ किनिकऽ भागू।। नेना-भुटका घेरए दाइ। डम-डम दैया हवा मिठाइ।। ३ गे दैया हमरो दही किताब जोड़ घटाओ हमहूँ करबै सिखबै सभ हिसाब। भैया सभ इसकुल जाइत अछि हम कटैत छी घास इसकुल देखि मोन जागि उठैत अछि हमरो लगैछ पिआस। हमहूँ पढ़बै बड़का बनबै देरी नहि कर आब गे दैया हमरो दही किताब। बेटा–बेटी तोरहिं जनमल किए करै छह भेद दुनू समाजक मूल अंग अछि एकटा लेल कि खेद? युग–युगसँ सताओल दैया आब आरो ने दाब गे दैया हमरो दही किताब । बेटा पोसत बेटी ने पोसत ई छैक भरमक जाल अहीसँ आरो पिछड़ल जाइत अछि बनि समाज कंकाल सभ मिलि रहबै मिलि जुलि करबै मिलि कए गीत ई गाएब गे दैया हमरो दही किताब। ४ ढुम ढुम बौआ ढुम ढुम ढुम कौआ बजलौक सुन सुन सुन सुन सुन सुन २ चेतिकय रहिहे सुन सुन सुन पाछासँ अओतौक सुर मिलओतौक आओर बजतौक काँ काँ मौका मिलिते मारि झपट्टा तोरा कहतौक जाँ जाँ ढुम ढुम बौआ ढुम ढुम ढुम कौआ बजलौक सुन सुन सुन सुन सुन सुन २ चेतिकय रहिहे सुन सुन सुन अपना बेरमे शीश झुकओतौक करतौक तोरा सलाम तोरा बेरमे मुँह घुमओतौक फेक उठतौक खराम ढुम ढुम बौआ ढुम ढुम ढुम कौआ बजलौक सुन सुन सुन सुन सुन सुन २ चेतिकय रहिहे सुन सुन सुन उड़ि–उड़ि अयतौक आँखि घुमयतौक ससरिकय अयतौक आगाँ मारि लोल भागि पड़यतौक इहन होइ छै कागा ढुम ढुम बौआ ढुम ढुम ढुम कौआ बजलौक सुन सुन सुन सुन सुन सुन २ चेतिकय रहिहे सुन सुन सुन ५ रे बौआ मुसरी बड्ड पेड़इए! नवका अङ्गासँ डाह करैए, कुत्–कुत् कऽ कुतड़इए! मुनल कोठीपर चिहुँक उठैए, फोड़ि अन्न छिटइए!! रे बौआ मुसरी बड्ड पेड़इए! बिजली एकरा किछु ने करैए, तार कुतरि छोड़ि दइए! धोखा-धाखीमे वएह हमरा झटका दऽ झटकइए!! रे बौआ मुसरी बड्ड पेड़इए! बिनु नेओतल ई मुसरी जन सभ पड़ल–पड़ल ढ़ेकड़इए! अन्न–पानि निहटिते बौआ, ससरि चुप्पे टघरइए!! रे बौआ मुसरी बड्ड पेड़इए! ६ गुड्डी उड़य आकाशमे लटाइ अपन पासमे.... १ दहिना काटू वामा काटू कखनो छोड़ू निच्चाँ डोरी आहाँ तनबै जखने चढ़ि जाएत ओ उच्चा गुड्डी उड़ए आकाशमे लटाइ अपन पासमे ... २ नाचि नाचि आओत संग बझाओत तखन करत लड़ाइ काटि संगीकेँ ऊपर उड़त अपन करत बड़ाइ गुड्डी उड़ए आकाशमे लटाइ अपन पासमे .... ३ जावत उड़त नचिते उड़त राखत उपरे सूर डोरी मुदा कटिते बौआ सभ भऽ जाइछ चूर गुड्डी उड़ए आकाशमे लटाइ अपन पासमे .... ७ सुनू सुनू बुढ़िया दाइ कतए रखलहुँ लाउ चुड़लाइ। राजा बेटा खिस्सा सुन भेल अबेर आब आँखि तोँ मुन एक छल राजा एक सिपाही एक रुप तँ दोसर छाँही मारि हरिन मिलि रथपर धएलक नगर भरि फेर शोर मचओलक भीड़भाड़मे देखलक नाइ मुन आँखि आब छोड़ चुड़लाइ सुनू सुनू बुढ़िया दाइ कतए रखलहुँ लाउ चुड़लाइ। ८ राजा सभ दिन हरिने मारत दिन दुखीपर रोब ऊ झाड़त नै पकड़त ओ डाकू चोर राजाक नामसँ होइ छी बोर देखलथि बाबा देखलथि बाउ आबो तँ कने मोन घुमाउ मानत नै आब कोनो भाई बझि गेल छैक धरम लड़ाइ सुनू सुनू बुढ़िया दाइ कतए रखलहुँ लाउ चुड़लाइ। ९ नै छइ पटना नै छइ दिल्ली। सभसँ नीक गामेके झिल्ली।। नूनगर झिल्ली मीठ बतासा। अगहन मास धियाके आशा।। फटकि सूपमे धान उठाउ। भरिमन मुरही कचरी खाउ।। १० आ आ रे खजन चिड़ैया, बौआकेँ झुला पोखरिके भीड़पर हिड़ला लगा चाउर देबौ–खुद्दी देबौ, देबौ दालिक कुन्नी चींची-चींची गाबि-गाबि सुता दही मुन्नी मीठ–मीठ सपनासँ बौआकेँ भुला धीरे–धीरे सा रे ग म मुरली बजा आ आ रे खजन चिड़ैया, बौआकेँ झुला पोखरिके भीड़पर हिड़ला लगा
फर्–फर् तोहर पाँखि करए चंचल तोहर मन खुशी–खजाना घर–घर बाँटए हरदम क्षणे–क्षण नाचि-नाचि हमर बौआ फुसला गमगम फूलेसँ सेजिया सजा आ आ रे खजन चिड़ैया, बौआकेँ झुला पोखरिके भीड़पर हिड़ला लगा। शान्तिलक्ष्मी चौधरी बाल गजल १ शिशु सिया उपमा उपमान छिऐ हमर आयुष्मति बेटी मैत्रेयी गार्गीक कोमल प्राण छिऐ हमर आयुष्मति बेटी टिमकैत कमलनयन धव-धव माखन सन कपोल पुर्णमासीक चमकैत चान छिऐ हमर आयुष्मति बेटी बिहुसैत ठोर मे अमृतधारा बिलखैत ठोर सोमरस शिशु स्वरुपक श्रीभगवान छिऐ हमर आयुष्मति बेटी नौनिहाल किहकारी सरस मिश्री घोरल मनोहर पोथी दा-दा-ना-ना-माँ सारेगामा गान छिऐ हमर आयुष्मति बेटी सकल पलिवारक अलख तारा जन्मपत्रीक सरस्वती अपन मैया-पिता श्रीक जान छिऐ हमर आयुष्मति बेटी ज्ञानपीठक बेटी छिऐ सुभविष्णु मिथिलाक दीप्त नक्षत्र मातृ पितृ कुलक अरमान छिऐ हमर आयुष्मति बेटी "शांतिलक्ष्मी" विदेहक घर-घर देखए ईएह शिशुलक्ष्मी बेटी जातिक भविष्णु गुमान छिऐ हमर आयुष्मति बेटी ..................वर्ण २२................ २ कोबी, टमाटर, भट्टा, यै लइ आर जाइ जइबै मिरचाइ यै लहसुन हरदि उहो छै यै सुनइ आर जाइ छियै माइ यै यै गिरहतनी लइ जइबै तँ बाजू सुभिते मे दै देब आइ चिजो भेटत एकलम्बर एक्को चिज नै भेटत अधलाइ यै कोबी टमाटर धानक तीन खुटे भट्टा मिरचाइ फाँटि कय अल्लु चलू बरोबरि मुदा हरदीक लागत नकद पाइ यै हे गिरहतनी फाऽ लत तैँ लइये लेबय की करी दाम कम आढ़त जइबै पता चलत कोना आगि फेकय महगाइ यै हे माय कटहर नै किनलिऐ ओतहे चालीस के रहै किल्लो अहाँ सीन सेहो एक-दुइ किनै पुज्जी कोना दितिहै फँसाइ यै "शांतिलक्ष्मी" सोचए काल्हि चाहा-चिड़ै जकाँ भल्हों होइ अलोपित कुजरनीक बोली आइ गामक छिऐ बड़ अनुप मिठाइ यै .......वर्ण २३......... ३ सोचै छी हम एकबेर बनि जैतिहौं जँ फेर सँ नेना भुटका बच्चा टहैल आबितिहौं बाड़ि-झाड़ि खादि-खन्नर पोखरि डाबर चभच्चा खेलैबतिहौं नरकैटक बन्दुक बजैबितौं केरा पातक पिपही घसि-घसि बनैबतिहौ सीटी-बाजा उखारि ओंकरल आमक बिच्चा उछैलितौं फानितौं घुमितिहौं घुमरि खेलैबितिहौं करिया झुम्मरि करितौं हो-हो बनितौं मरूआक ढेरी उड़ैबितौं थालक फुरकुच्चा चढ़ितिहौं जँ आम लताम जामुनक गाछ झुलितिहौं डारिक झुल्ला कुतैरतिहौं टिकुला आ फुल्ली-बाति फर मारितिहौं कच्चा पर कच्चा घिचितिहौं झोटा-चोटी घोलैटितौं भुइयाँ कनितिहौ हकपुत्तर साँझ-बाति जँ घुरि अबितिहौं अंगना मारिते माय बौसतिहै चच्चा मनक सेहन्ता मुदा घुमरि-घुमरि रहि जाइए मोनेक भीतर सभटा भऽ गेल आब ई दुःसपना जेँ चढ़ल ई यौवन अधखिच्चा "शांतिलक्ष्मी" शहर-गाम मे देखए बस एक्के रंगक रंगल छिछ्छा छेटगर होइते पाछु पड़ि जाइ छै टोलक बूरल लफुआ लुच्चा ......वर्ण २५........ ४ पेट मे भल खड़ नै हिनका मुदा सिंघ मे तेल छै माय कहै बौआ हमर नुनुआगर बुरलेल छै जीटजाट फीटफाट मारय सीटल बिछान सन मारल कंघी लटुरिया जुल्फमे गमकै फुलेल छै जेहने चढ़ल पंथ बौआ तेहने होइन्ह संगति तीन खेप मैटरिक फेल दोस फेलो मे फलेल छै लभ लिखल फोनटेन लभे उकारल कुंजी-झावा लभ घसल तरहैत तँ कामदेवक गुलेल छै तीर तरकस सँ लैस बोआ चलला शिकार पर कान्ह पर हाथ देनय संगबै भजारी टंडेल छै अंगना घरक नुनुआ छथि सड़क पर उचक्का भरल चालि ढालि मे अवरपनीक अटखेल छै "शांतिलक्ष्मी" देखए छत पर षोडसीक काकचेष्ट बाट ठाढ़ बौआक आँखि मे बकोध्यानक झमेल छै .........वर्ण १९........ कुम्हर एकटा छौरी केँ भरि देह चून, जल्दी सँ कहू ओ फर कून? कुम्हरक फर छी हमर नाम, गठुल्लाक छप्पर हमर ठाम। हरियर पात पीयर फुल, तरकारीक लत्ती हमर कुल। बातबोली केँ बड़ सुकुमारि, अंगुरी देखेने बातिये सड़ि! शहर-बजार मे काँचो खाए, गामघरमे छोड़ए जुआए। कलाय दालिमे बनी कुम्हरौरी, किछुठाम कहे सिसकोढ़-बड़ी। मिठगर हम मुरब्बा मिठाइ, दर-दोकानमे राखे सजाए। गभा सकरैति मे फुलक उद्योग, गाय गोबर पर साटैएक योग। भरदुतियाक परतर नै दुज, नौत लिए हमरे पाँच फुल। बरखा रानी ओलतीक पानि तँ छर-छर झहरैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!! बैसलखीन पलथी बदलि दादी चुक्कुमाली! आँचर सम्हारि ओढ़लन्हि भरि देह साड़ी!! देह सिहरैत जनु हुनका जरौन लगैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!! गोलिऐल दियादिनी चारू ओसारकेँ धेनै! अलसाएल मोन एहेन कियो उठै कहै नहि!! हाफी पर हाफी, मोनक बात बतबैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!! बड़का कक्का ओतए ओढ़ना ले औनाइत! कहियो दिनेशकेँ कनी तौनी दऽ जाइत!! दुआरे सँ रहि-रहि बहिया केँ चिकड़ैत छथि! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!! भाय हमर करैत छथि कखने सँ कछमछ! मुत्तवास केने हिनका कखने सँ अक्कछ!! बुन्नी तँ कनियो छैको नहि करैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!! चुल्हा लग भौजीक काज छन्हि पसरल! घोघरी लऽ लालबहिन अइघर ओइघर!! तरल-तरल माछ रोटी जलखै बनैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!! घर भरि छिटल डाबा, दोल, कठौत, कप! खपड़ा केर घर सगर चुबैत छैक टपटप!! छोटका कक्का कार कौआपर कुढ़ैत छथि! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!! ओलतीक सिरहीपर चाली करैत सहसह! चुटकी सँ नून छिटै नेनतूर उखमज सभ!! कोनटामे जोंक देखू कोना नमरैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!! धीया-पुता केँ जेना उनमत्ति छै चढ़ल! खोपरिक नाह लेल कागज फाड़ै चर-चर!! लिखनाक पन्ना लेल किओ ठुनकैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!! भादव केर बरखा तइपर वर कोबर घर! रतिकेँ लग पाबि कामदेव छथि रसगर!! पुरबा बयार बहै मदन मोन रमकैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!! ओलतीक पानि तँ छर-छर झहरैत छै! बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!! इरा मल्लिक छम छम बरसा छम छम बरसा, छम छम पानि, चम चम बिजली, चमकै आइ, चम चम बिजली चमकै छै, जियरामे आगि लगाबै छै। कारी कारी घटा घिर आओल, मनक मोर शोर मचाओल, बिजली चमकै जियरा हहरै, कारि अन्हरिया राति भयाओन, पिया केँ सन्देश सुना दिअ आइ, चम चम बिजली चमकै छै। संग सहेली घर चलि गेलि, सून भवनमे छी हम अकेली, सनननन बड़ी जोर पवन अछि, घन घमंड देखाबै आइ, चम चम बिजली चमकै छै। मनक मोर सुनु इक बैन, पाओत मोन कोना कहु चैन, किछु तँ जतन करु अहाँ इहो रैन, छोड़ू मचेनाइ शोर किलोल, पहुँक सन्देश सुना दिअ मोर, चम चम बिजली चमकै छै। माँ! माँ हमरो कीनि दिअ खिलौना! खेलब मोन भरि, नै उत्पात मचाएब, नै पसारब आब, हम कोनो घेउना, माँ हमरो कीनि दिअ खिलौना। ना ना नै करू, जिद अहाँ छोड़ू, आनि दिअ कनी सुन्दर सुन्दर, भालू, बन्दर, खग, मृग छौना, माँ हमरो कीनि दिअ खिलौना। जाउ बजार अहाँ जल्दीसँ, करु नै देर, हमरो संग लऽ लिअ, रिमोटबला ओ मोटर गाड़ी, हवाइ जहाज किनू, होइ महग या भारी, बैटरीबला मोटर-बोट हो, हाथी, घोड़ा या गुड़िया छोट हो, ढोल, मजीरा, ड्रम, कैसियो, जे पसंद हुअए अहाँकेँ मैया, कीनि दिअ नै ताकू रुपैया, माँ हमरो कीनि दिअ खिलौना। लेकिन माँ! नै चाही हमरा, बंदूक, रायफल, तीर, कमान, खेल खेलमे हम नै सीखी, हिंसा सनक पाप, हम छी भारत माँक सपूत, हमरा भरऽके अछि, बड्ड ऊँच उड़ान, जन जनक रच्छा कऽ सकी, देशक कए सकी कल्याण, देशमे आनी खुशहाली, बालपनक, खेल खेलमे पूर्वाभ्यास एकर कऽ ली, माँ! हमरो कीनि दिअ खिलौना। नवीन कुमार "आशा" हिंगलू भाइ यौ टिंगलू भाइ हिंगलू भाइ यौ टिंगलू भाइ जुनि अहाँ तोड़ू तुराइ जँ अहाँ तोड़ब तुराइ रातिमे खाएब खूब पिटाइ जुनि रहू अहाँ खाटपर नै तँ काल्हि रहब टाट पर आब सुनू यौ भाइ सुनू यौ भाइ जे अछि टाटक बत्ती नै बनबै जाउ देहक पहचान आइ दुपहरिया रहि रहरिया ओतए आबै अहाँक अबाज पहुँचलौं जखन हम अहाँक डेरा तखन आएल माथमे फेरा फेर बुझल हम घरक रीत अहाँ करी सभटा काज भौजी खाली करथि साज तँए कही यौ टिंगलू भैया जल्दी-जल्दी खेनाइ पकाउ जँ अहाँ पकाएब नीक खेनाइ रातिमे भौजी दैथि रसमलाइ आ जँ अगर तानब तुराइ फेर खाएब खूब पिटाइ मुन्नी कामत जड़ैत ज्योत माय गे, कतेक दिन तक हम बच्चा रहबै बकरी संगे खेलैत रहबै हमरो दुनियाकेँ जानैक एगो मौका दऽ दे माय हमरा बस्ता दिया दे। छै छोट हमरासँ मालिकक बेटा अंगरेजियेमे फटर-फटर करै छै हम नै बुझै छी देवनागरीयोक एगो अक्षर माय गे, हमरो स्कूल जाए दे। मालिकसँ जा कऽ तूँ कहि दही नै चरेबइ आब हम भैंस हुनकर नै खेबै तरकारी, रोटी हमरा नूने रोटी खाए दे मुदा माय गे, हमरा तूँ पढ़ै लेल जाए दे। पढ़ि लिख हम अफसर बनबै तोरा लऽ लब साड़ी अनबै बाबूक बुरहक सहारा बनि हम दुनियामे नाम करबै माय गे, आब हमरा अपन भविष्य बनाबऽ दे हमरा जिनगी सवारऽ दे। राजदेव मंडल मुनियाँक चिन्ता “बच्चा जनमि गेल बेटा भेल” सुनतहि घर खुशीसँ भरि गेल सौंसे टोल खबरि पसरि गेल बढ़ए लगल उछाह कहलक लोक वाह-वाह मुनियाँ अछि लछमिनियाँ तब ने एकरापर सँ जनमल छौंड़ा हे गै तू किएक धेने छेँ दादीक कोरा मुनियाँ टक-टक ताकि रहल अछि आ मने-मन आँकि रहल अछि दादी बजल- ‘की लेबेँ बाज करए दे हमरा काज खसौने घाड़ कनैत छह जार-बेजार यएह करतह रक्षिया जिनगीक उठौतह भार धेने छह हमर गात ई तँ छै खुशीक बात जनमल तोरा भाए’ कतेक खुशी छह तोहर माए दादी, सभटा जानै छी हम ओइ लए नै कानै छी चिन्ता अछि हमरा आब के कोराकेँ लेत दूधो माए पीबऽ नै देत आँइ, सभ हँसल आ मुनियाँ फँसल। कथीक गाछ चारिटा छाैंड़ा छल गाछ तर फनैत जिद लगौने डरिकेँ गनैत पहुँचल पाँचम- हे रौ की गनै छेँ ई कथीक गाछ िछएे से जनै छेँ? सभ भेल अवाक अपन जमौलक धाक सुनने रही ई गाछ िछऐ अनचिन्हार जेकरा चिन्हलौं से चिन्हार नै चिन्हलौं तँ भेल अनचिन्हार कहैत माथ उठौलक तानि एकटा छौंड़ा बजल फानि ‘तहूँ तँ नै रहल छेँ जानि अपनौं ठकाइत छेँ आ दोसरोकेँ ठकै छिही टेढ़ी देखा संतोख करै छी झूठक कऽ रहल छी परचार दुर-छी दुर-छी करतौ संसार अनजानकेँ करैक चाही जनैक प्रयास नै छोड़ैक चाही आस पहिले बढ़ाले अपन गियान तब बाजबेँ तँ बढ़तौ मान। चन्दन कुमार झा हमहूँ पढ़बै आब बाबू यौ, कीनि दिअ ने हमरो किताब बाबू यौ, हमहूँ पढ़बै क, ख, ग, घ आब। नित्यदिन हम इस्कुल जेबै, पढि-लिखि कऽ आफिसर बनबै, करबै हमहूँ बी.ए., एम.ए. पास, बाबू यौ, गामो पर करबै सभटा काज, बाबू यौ, कीनि दिअ ने हमरो किताब बाबू यौ, हमहूँ पढ़बै क, ख, ग, घ आब। बेटा-बेटी मे नहि रहतै अंतर हमहूँ बनबै डाक्टर, इंजीनियर, नहि करबै आब ककरो आस, बाबू यौ, नहि रहबै आब हम बेकार, बाबू यौ, कीनि दिअ ने हमरो किताब बाबू यौ, हमहूँ पढ़बै क, ख, ग, घ आब। अबला सँ सबला हम बनबै, देश समाजक सेवा करबै, नहि सहबै हम ककरो रोआब, बाबू यौ, चिन्हबै हमहूँ अप्पन अधिकार, बाबू यौ, कीनि दिअ ने हमरो किताब बाबू यौ, हमहूँ पढ़बै क, ख, ग, घ आब। दहेज-प्रथा केर भूतो भगतइ, नारी समाजक शोषण रुकतइ, तखनहि हेतइ देशक पूर्ण-विकास, बाबू यौ, जखने पढ़बै हमहूँ किताब, बाबू यौ, कीनि दिअ ने हमरो किताब बाबू यौ, हमहूँ पढ़बै क, ख, ग, घ आब। बुन्नी झमझम बरसै छै बुन्नी छै नाचि रहल गरचुन्नी सुनि कऽ बेंगक टिटकारी फँसलीह कबइ कुमारी।। बगुला टकध्यान लगौने बैसल छल आस लगौने बुझू भेलै जबारी ओकरा भरि पोख पेलकै टेंगरा।। कौआ केर भेटलैक चाली बुझू जेना नूडल्स पाताली घसि-घसि लोल पिजबै छै खने खत्ता पानि उपछै छै।। जखने चमकल बिजलौका साकांक्ष भेल घोंघही डोका केयो जोड़ऽ लागल कुटमैती केयो करय गेल पंचैती।। काँकोड़ बिल सँ बहराएल ओ लगैछ कने अगुताएल चांगुरसँ महल बनेलक रचि-रचि केहन सजेलक।। छै झूर-झमाने मुसरी सोचै जे कोना कऽ ससरी घर-दुआरि ओकर दहेलै बुझू अपटी खेतमे फँसलै।। केयो गाबि रहल चौमासा ककरो लेल खेल तमाशा हरखित छै खेत-पथार जंगल, पहाड़ सभ धार।। शंभू नाथ झा, रिटायर्ड प्रधानाचार्य उच्च विद्यालय वैद्यनाथपुर, समस्तीपुर, मो.०७३५२४००८७०) न्यूटनक सिद्धांत वस्तु सतत रहै चलायमान जखन बल करै ने कोनो काम ई भेल न्यूटनक कोन सिद्धांत ई भेल न्यूटनक प्रथम सिद्धांत गमता दर ज्यों बढ़ि कऽ भागए बल ओहि दरें प्रभाव जमाबए ई भेल न्यूटनक कोन सिद्धांत ई भेल न्यूटनक द्वितीय सिद्धांत क्रिया प्रतिक्रिया संग संग आबै अपन प्रभाव विपरीत जमाबै ई भेल न्यूटनक कोन सिद्धांत ई भेल न्यूटनक तृतीय सिद्धांत व्याख्या- प्रथम नियम सँ बल केँ जानू दोसर सँ अहाँ बलकेँ नापू क्रिया-प्रतिक्रिया करै पहचान तेसरे चलबै वायुयान ई भेल न्यूटनक पूर्ण व्याख्यान । पाकल आम पाकल आम, पाकल आम राजा रंक साधु आ दुखिया समरूपे खाए भरि पथिया कौआ कुकुरो खाय अघाय नहि किछु लागै कौड़ी दाम पाकल आम ,पाकल आम ठोहि पाड़ि कऽ चिन्नी कानै हा हमरा कुकुरो नहि मानै खाजा मुंगबा नोर चुआबै नहि लै केओ हमरो नाम पाकल आम, पाकल आम तीमनक लागल सेहो सचार भात दालि पर रहै अँचार चोभू एकरा आठो याम पाकल आम ,पाकल आम (रचना रवि भूषण पाठक जीक सौजन्यसँ प्राप्त भेल।) चंदन कुमार झा दू टा मैथिली अगड़म-बगड़म माछ-भात तीत भेल, दही-चिन्नी मिठ्ठ भेल, खाकऽऽ टर्रर छी। --------------- कारी मेघ, कादो थाल, झर झर बुन्नी, चुबैत चार। मनोज कुमार मण्डल खेल खेल खेल खेल खेल बौआ खेल चोरा-नुकी खेल अज्ञानक अन्हारमे नुकाएल चोरबा ज्ञानक किरणसँ पकड़ल गेल खेल खेल खेल खेल दाय खेल कनियाँ-पुतरा खेल बेइमानक नगरीसँ निकलल बहुरिया शैतानक महफापर बैठा देल गेल इमानक चौबटियापर पकड़ल गेल खेल खेल खेल बौआ-बुच्ची खेल गुड्डा-गुडि़या खेल स्वाभिमानक गुड्डाकेँ बियाह ठीक भेल माया नगरीमे सोर भऽ गेल ज्ञानक बाट मादे साँयक रथ तैयार भऽ गेल तियागक पाग पहिर बिआह करए गेल खेल खेल खेल सभ मिलि खेल जिनगीक खेल खेल दयाक मूर्ति गुड़िया भेल ममताक नगरी सजा देल गेल सदाचारी, इमानदारीक जोर भऽ गेल बइमानीक पर्दाफास भऽ गेल अहिंसाक अंगनामे ढोल बाजि गेल कर्मठ मानवताक उदय भऽ गेल गुड्डा-गुड़ियाक बियाह भऽ गेल खेल खेल खेल खेल बच्चा खेल मर्यादाक खेल। प्रभात राय भट्ट चुनमुन चुनमुन करैत चिड़िया चुनमुन चुनमुन करैत चिड़िया बैसल अपना खोतामे ऊपरसँ मूत्र प्रवाह केलक हमर जल भरल लोटामे तामससँ हम मातल आगि लगेलौं खोतामे फुरसँ चिड़ैया उड़ि गेल आगि लागल हमरा कोठामे चीं चीं करैत चिड़ैया खोता जड़ैत देख व्याकुल भेल लहलहाइत आगिमे चिड़ैयाक बच्चा जड़ि कऽ मरि गेल मानवरूपी दानव तोँ ई केलेँ किए एहन दुष्कर्म द्वेषरागक वशीभूत मनुख कतए गमैले दया धर्म हमरा खोतामे आगि लगेलेँ अपनो घर जरेलेँ तूँ बुझैत छेँ ई कोठा तोहर हम बुझैत छी ई खोता हमर ईर्ष्या दोष लोभ क्रोध मोह त्याग देख कने दूरदृष्टि मुदा नै किछु तोहर नै हमर ई थिक ईश्वरक सृष्टि खाली हाथ एलेँ जगमे खाली हाथ तोँ जएबेँ कनिक धरनी मालिककें दरवारमे तोँ ई पएबेँ दुर्गानन्द मण्डल हम हिन्दुस्तानी छी हम हिन्दुस्तानी छी नै ककरोसँ डरै छी देश-िवदेशक बात करै छी अपने देशपर मरै छी। कथा पूर्वजक नै पुछू ओ सभ छथि सभसँ महान खेती-बाड़ी जिनकर धंधा जिनकासँ निखरल हिन्दुस्तान।। हमर रक्षक हमर भक्षक हमरेसँ करै छथि आश कवि बनू वा कलाम बनू पूर्ण करू अभिलाष। बूढ़क सहारा बनि हम देशक रखबाला बनि हम नाओं हमर जेना दिवाकर जगमे एहन काम करी।। अमित मिश्र बाल रूबाइ भोरक नव लाल इजोत छेँ तूँ बुचिया देशक जीत लेल खेलाड़ी तूँ बौआ माँ बाबूक लाठी साँस तूँहीँ तँ छेँ उड़िया नै मातल हवामे तूँ बेटा बाल गजल बौआ हमर छै कमौआ कहिया कमाओत चौआ
फैशन बढ़ल बाल मनमे कपड़ा किनै चमचमौआ
चटनी अचारक अमल नै खाली दियौ दूध पौआ
जागल लगै फूल सन ओ सूतल कली बनल बौआ
हिम्मत ककर लेत कोरा छै वएस जे जल पटौआ
मुस्तफइलुन-फाइलातुन 2212-2122 बहरे-मुजास आशुतोष मिश्र बाल गजल फेकै झटहा बेर-बेर बौआ तोड़लक आमकेँ बाबाकेँ बुझबे नै करै तोड़ि देलकै खरामकेँ बौआ आम लऽ पड़ेलइ बाबा जपै बौआ नामकेँ फेकै झटहा बेर-बेर बौआ तोड़लक आमकेँ बाबा बैसल फुच फुच करै लबए छौड़ाकेँ तानिकेँ बाबाकेँ बुझबे नै करै तोड़ि देलकै खरामकेँ देवांशु वत्स प्रगतिक रहस्य तुनिशा प्रियम, माँक नाओं- स्व. निभा रानी, पिता- डॉ. रमेश कुमार राय, नाना- प्रो. शिवनाथ मंडार, विभागाध्यक्ष भूगोल, बलिराम भगत कॉलेज, समस्तीपुर। नानी- श्रीमति निरुपमा पटेल, प्रधानाध्यापिका, म.वि. गाँधीपार्क, समस्तीपुर। जन्मतिथि- २०-१०-१९९८ पैतृक गाम- मँझौलिया, प्रखण्ड- बोचहा, जिला मुजफ्फरपुर, मातृक- ग्राम-धोबियाही, पोस्ट- बहेड़ी, जिला-समस्तीपुर। छात्रा- कक्षा- सप्तम “अ”, डी.ए.वी. स्कूल, समस्तीपुर। आदर्श- नानाजी। आवास, आशियाना भवन, रोड नं. ०२, आदर्शनगर, समस्तीपुर। गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी। ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी, निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; मैथिली कविता संग्रह “अर्चिस्” आ दूटा मैथिली बाल साहित्यक पोथी “मध्यप्रदेश यात्रा” आ “देवीजी” प्रकाशित। गणेश ठाकुर, पिता श्री विनोद ठाकुर, पोखड़िभीरा (कक्षा आठक विद्यार्थी) अनुपमा प्रियदर्शिनी, पति डॉ. रतन कर्ण, गाम- उजान (बड़कागाम), पो. लोहना रोड, जिला दरभंगा। सम्प्रति लोजियाना (संयुक्त राज्य अमेरिकामे)। श्वेता झा चौधरी, गाम सरिसव-पाही, ललितकला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, गाम- श्रीमेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर (एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर : कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललितकला, संगीत आ भानस-भात। श्वेता झा (सिंगापुर) प्रवीण कुमार ठाकुर, जन्म तिथि -31 दिसम्बर 1977; जन्म स्थान -कन्हौली , सकरी , मधुबनी ; शिक्षा- सूर्य नारायण हाई स्कूल - नरपतिनगर , बी . एस . सी - मेमोरिअल कॉलेज - दरभंगा , डिप्लोमा इन फैशन डिजाईन (नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फैशन डिजाईन - नयी दिल्ली ) , चित्रकला आओर फैशन पूर्वानुमानमे विशेष योग्यता, निवास स्थान- दिल्ली , इंडिया; पिता- श्री सत्य नारायण ठाकुर , सकरी - कन्हौली ; माता- श्रीमती मालती ठाकुर , सकरी - कन्हौली । वर्तमानमे अपन एक्सपोर्ट बिज़नस एस्थेट ( Aesthete By Pravin - aesthetepravin@gmail.com ) क नामसँ शुरुआत , पूर्वमे प्रोडक्ट डेवेलोप्मेंट आओर मर्चंटक रूपमे कार्यरत। कैलाश कुमार कामत, पिताक नाओं- श्री गंगाराम कामत , माताक नाओं- श्रीमती सुनीता देवी, गाम- बेरमा, भाया- तमुरिया , थाना- मधेपुर, जिला- मधुबनी , (बिहार) मधुबनी जिलाक बेरमा गामक मध्य विद्यालयमे पढ़ैत कैलाश कामत, सातमाक छात्र छथि बड़ लगनसँ फोटो बनबै छथि। मोना पाण्डेय इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा। विदेह मैथिली शिशु उत्सव || 321 322 || विदेह मैथिली शिशु उत्सव
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(प्रधान मध्यान्ह रेषा / रेखा) Ae fear देशान्तर रेषा / रेखा. अफ़्रिका महादेश rs ५ y Heat महासागर [Ee (Atlantic Ocean) हिन्द महासागर yor (Indian Ocean) i हा दक्षिण अमेरिका महांदेंश अण्टार्कटिका महादेशक i | अण्टार्कटिका महादेशक मुख्य भाग iy < | भाग बा [ae = देशान्तर रेषा / रेखा... दक्षिणी ध्रुव देशान्तर tor / रेखा (90 डिग्री q. अक्षांश रेखा. ऑस्ट्रेलिया महादेश / महाद्वीप cap प्रशान्त महासागर महासागर / (Pacific Ocean) t (Indian Ocean * svenicn ga (66.5 डिग्रीं द- अक्षांश रेषा / डी ——e देशान्तर रेषा / रेखा
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विंदेह Alert शिंश उत्सव ७3 विदेह-सदेह ६, विदेह www.videha.co.in Tex (अंक ४१-१००) &, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ शिशु, बाल आ किशोर साहित्यक एकटा समानान्तर संकलन है ह जल J (OZ ‘ : on कि | <p छ AY & as gi pA दि, | i -N yy ay अल मे कि KI o>. Ge 48 Y a OTE | MS FS) an ea अब Veo Oi Ae gre हि न हु भर SO las i 4 BL (ge = , a Sy lina ge है जाए 2) eee * », oe Oe ia = SS ig IN rie ps OU हिल | हि 00% E ce | Ai ie थक... 2 ee ~ Sn Vy ea a न i \ ve) Laas = — Pei al am विंदेह-प्रथम मैथिली पाधिक ई-पत्रिका >>. = ही ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मण्डल। सहायक wes: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। | भाषा-सम्पादनः AA कुमार झा AT पड्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा feet सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक-नाटक-रंगमंच-चलचित्र: बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समादः पूनम मंडल आ प्रियंका झा. é सम्पादक-अनुवाद विभाग: विनीत उत्पल। है
विदेह मैथिली शिशु उत्सव || 249 a aay वत्स प्रगतिक रहस्य मय. प्रति कह | ् A LISS e कि न = = _ — allo-devasbesuagenaiam series seat 2 जुका अपन वेब हिसाब के त eat, Ht oS दर को कब core oe, कलाम i ye लग aft मी at sent Set om get — meters pS Fa jon aor Sd Sal. a co peel | . cement An छा रत रु चख वा EE CS | Ae ee [wns 7} Yt भानंत तेजी St प्रगति el लिए anotes are ठमरा ae A ~ न ) See. “a fe \ ‘ के ty sn oa = - . . ata » a _— ais) ee ea =
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विदेह मैथिली शिशु उत्सव || 277 « सोना पाण्डेय
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