SADEHA — 10

Publication: SADEHA · Issue: 10
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2 3 ISSN 2229-547X विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना (विदेह-सदेह १०, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक ५१-१००) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचनाक एकटा समानान्तर संकलन) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मण्डल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक: नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद: पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग: विनीत उत्पल। श्रुति‍ प्रकाशन ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। ISBN : 978-93-80538- 79 -2 ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. २००/- संस्‍करण : २०१२ © श्रुति‍ प्रकाशन श्रुति‍प्रकाशन रजि‍स्‍टर्ड आॅफि‍स : ८/२१, भूतल, न्‍यू राजेन्‍द्र नगर, नई दि‍ल्‍ली- ११०००८. दूरभाष- (०११) २५८८९६५६-५८ फैक्‍स- (०११) २५८८९६५७ Website : http://www.shruti-publication.com e-mail : shruti.publication@shruti-publication.com Printed at : Ajay Arts, Delhi-110002 Typeset by : Umesh Mandal. Distributor : Pallavi Distributors, Ward no-6, Nirmali (Supaul). मो.- ९५७२४५०४०५, ९९३१६५४७४२ Videha Maithili Pranandh-Nibandh-Samalochna : A Collection of Maithili Research Papers- Essays-Criticism. अनुक्रम गजेन्द्र ठाकुर- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना, समीक्षाशास्त्र आ समालोचनाक समालोचना राज यात्राीक कवितामे गाम डॉ. राजीव कुमार वर्मा कारी  घटा बरसैत मेघ अशोक बनैत-बिगड़ैत चन्द्रेश यर्थाथक अनुभुतिमे ऐतिहासिक दिनः झिझिया नृत्य महोत्सव दुर्गानन्‍द मण्‍डल मौलाइल गाछक फूल अच्‍छेलाल शास्‍त्री रणभूमि‍ आ कवि‍ता परमेश्वर कापड़ि मानकताक बात विखपाद अछि ! अतुलेश्वर पंडित गोविन्द झा, मैथिली आ अध्ययन उमेश मण्डल नि‍र्मलीसँ जनकपुर धाम/ बेरमा सगर राति‍मे श्रोता कथा-सागरमे डुबकी लगेलनि‍/ सुपौलक कथा गोष्‍ठी : ४ दि‍सम्‍बर २०१०/ ७५म कथा गोष्‍ठीमे ३९ टा कथा पाठ/ मैथि‍ली भाषाक दशा ओ दि‍शापर परिचर्चा/ महाकवि‍ पण्डित‍ लालदास जयन्ती समारोह संजीव कुमार ‘शमा’ महाकवि‍ पं. लालदास जयन्‍ती समारोह मुन्नाजी मैथिली गजलपर परिचर्चा/ रिपोर्ताज/ अझुको क्षणकेँ अंगीकार करैछ “क्षणिका” डॉ. अरुण कुमार सिंह मैथिलेत्तर भाषी प्रदेशमे मैथिली सीखबा-सीखैबामे कंप्यूटर आओर भाषा विज्ञानक भूमिका डॉ॰ शशिधर कुमर गामक जिनगी जितेन्द्र झा के राखत रुमालक इज्जति?/ उपटैत गाम बसाओत बाबा/ नेपालक राजनीतिक अवस्थासँ उपजल ग्लानि/ सुजितक अनुभव रिपोर्टर डायरीमे अनिल मल्लिक हम, देह आ विदेह....! जगदीश प्रसाद मण्‍डल अवतारवाद/ मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे ग्रामीण चि‍त्रण/ कामरूप आ मिथिला रवि भूषण पाठक आचार्य भामहक चिंतन शेफालिका वर्मा आधुनिक मैथिली साहित्यक प्रभाव क्षेत्रमे नारी तत्व- संगमे "मैथिली आ तमिल कवियित्री सम्मेलन" मीना झा लंदनमे मैथिल समाज खुशबू झा हमरा नजरिमे सुजीतक रिपोर्टर डायरी अमरकान्त अमर संघीयतामे मैथिली भाषा पूनम मण्डल महासुन्दरी देवीकेँ मिथिला चित्रकला लेल २०११ क पद्म श्री/ स्थानीय कवि‍ परि‍षद (सलहेसबाबा परि‍सर-औरहा) वार्षिकोत्सव- २०१२ राजेन्‍द्र कुमार प्रधान २१म शताब्दीक पहिल दशकक मैथिली उपन्यासमे राजनीतिक चेतना विनीत उत्पल की अछि दिल्लीक जी.बी. रोडक कोठाक सत सुजीत कुमार झा अनौपचारिक शिक्षामे मैथिली, पढ़ाइक हिसाबसँ प्रभावकारी भऽ रहल/  संस्‍मरण-चुनचुन मिश्र अरविन्द ठाकुर लोकदेव भीम केवट शम्भु कुमार सिंह यू.पी.एस.सी. (मैथिली) लेल प्रो. वीणा ठाकुर जि‍नगीक जीत उपन्‍यास/ गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा कपि‍लेश्वर राउत मि‍थि‍लाक वि‍कास बाधा रमाकान्‍त राय ‘रमा’(आचार्य दि‍व्‍यचक्षु)  गामक जिनगी/ आरसी बाबूक व्‍यक्‍ति‍त्‍व एवं कृति‍त्‍वपर द्वि‍दि‍वसीय राष्‍ट्रीय सेमि‍नार/ मैथि‍ल पत्र-पत्रि‍का: समस्‍या ओ समाधान/ प्रगति‍शील एवं सनातन वि‍चारधाराक समन्‍वयात्‍मक उपन्‍यास- ‘मौलाइल गाछक फूल’ डॉ. योगानन्‍द झा गामक जि‍नगी‍/ उषा कि‍रण खानक ‘जाइ सँ पहि‍ने’/ आदर्शक उपस्‍थापन- मौलाइल गाछक फूल मानेश्वर मनुज मैथिल दृष्टिक प्रसंग मुम्बइसँ एक चिट्ठी/ बुच्ची दाइक निलामी कोना से देखू/ मानसरोवरक भूमिकाक प्रासंगिकता ज्योति झा चौधरी इर्लिंग आर्ट ग्रुपक ९५ वाॅ वार्षिक कला प्रदर्शनी/ यूके मे भेल २०११ क वार्षिक मिथिला सांस्कृतिक कार्यक्रम शिव कुमार झा मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे दलि‍त पात्रक चि‍त्रण/ कुरूक्षेत्रम् अन्‍तर्मनक/ अर्चिस/ मैथि‍ली चि‍त्रकथा/ अम्बरा सुशान्त झा मैथिली, मैथिल संस्कृति आ मिथिला राज्य डॉ. बचेश्वर झा मौलाइल गाछक फूल राजेश्वर नेपाली कवि पं. प्रतापनारायण झाकें छअम पुण्यतिथिपर हार्दिक श्रद्धाञ्जलि बसंत झा उगना जीवकान्‍त जगदीश प्रसाद मंडलक ‘जिनगीक जीत’ उपन्‍यासपर/ जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्‍यास “मौलाइल गाछक फूल” धीरेन्‍द्र कुमार प्री‍ति‍ ठाकुरक गोनू झा आन मैथि‍ली ि‍चत्रकथा आ मैथि‍ली चित्रकथा/ जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्‍यास- “‍मौलाइल गाछक फूल”/ जगदीश प्रसाद मंडलक लघुकथा संग्रह- ‘गामक जि‍नगी’ राजदेव मंडल कुरूक्षेत्रम् अन्‍तर्मनक लेल पत्र कृपानन्द झा मैथिलक जन नायक चुनचुन मिश्र रमेश प्रो. मायानन्द मिश्रक रमनगर कथामे लागल “मुदा”/ बहस- पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि मैथिली साहित्यक कारी अध्याय थिक नवेन्दु कुमार झा १.रेल लाइनसँ जुड़त भारत आ नेपाल २. भारतीय सामाजिक बेवस्‍थामे आइयो जीवन्त अछि जाति बेवस्‍था- प्रो. शर्मा  ३.प्रदेशमे लागत चौदहटा नव उद्योग समूह, असोचैम कएलक ऐ‍ दिस पहल- मिथिलांचलमे सेहो लागत नव उद्योग डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र मिथिला चित्रकला (पेटिंग): भूत, वर्त्तमान आ भविष्य/ यायावरी-(हॉफलोंग; भावमय, भोगमय, योगमय बृन्‍दावन; लोअर दिवांग घाटी: इदु-मिसमी जनजातिक अनुपम संसार; मलि‍क भाय केर फुटपाथी चिंतन; उत्तराखण्‍डक नन्‍दा-राजजात/ संगाईप्राऊ : नागा पूर्वजक स्‍मरणक धरोहर) / गामक जि‍नगी/ जीवन संघर्ष मंत्रेश्वर झा चरि‍त्र चि‍त्रणक बाजीगर-जगदीश प्रसाद मंडल आशीष अनचि‍न्‍हार समालोचना- गजलक साक्ष्‍य डॉ. मेघन प्रसाद मैथिलीमे अनुवाद-कलाक शास्त्रीयकरणक इतिहास सुमित आनन्द संवाद- कार्यशालाक आयोजन धनाकर ठाकुर जगदीश प्रसाद मंडलक “गामक जि‍नगी‍” बिपिन झा यान्त्रिक अनुवाद आ Polysemy वीरेन्‍द्र कुमार यादव महावि‍ष्‍णु यज्ञ-मेलाक दृश्‍य रामभरोस कापड़ि "भ्रमर" अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन ः २०६७

गजेन्द्र ठाकुर प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना, समीक्षाशास्त्र आ समालोचनाक समालोचना मैथिली लेल समीक्षाशास्त्रक सिद्धांत- कला आ साहित्य लेल कोनो सैद्धांतिक प्रयोजन हेबाक चाही? साहित्यक विभिन्न विधा जेना पद्य, प्रबन्ध, निबन्ध, समालोचना, कथा-गल्प, उपन्यास, पत्रात्मक साहित्य, यात्रा-संस्मरण, रिपोर्ताज, नाटक आ एकांकी मनोरंजनक लेल सुनल-सुनाओल-पढ़ल जाइत अछि वा मंचित कएल जाइत अछि। ई उद्देश्यपूर्ण भऽ सकैत अछि वा ऐमे निरुद्देश्यता-एबसर्डिटी सेहो रहि सकै छै- कारण जिनगीक उत्थल-धक्कामे निरुद्देश्यपूर्ण साहित्य सेहो मनोरंजन प्रदान करैत अछि। प्राचीन कालमे कला, साहित्य आ संगीत एक खाढ़ीसँ दोसर खाढ़ी मध्य हस्तांतरित होइत छल। पदपाठ, क्रमपाठ, जटा पाठ, शिखापाठ, घनपाठ आदि स्मृतिक वैज्ञानिक पद्धति छल। घर, वेदी आ आन कलाकृतिक बनेबाक विधिक यजुर्वेदमे वर्णन छल जे भाष्य सभमे आर विस्तृत भेल आ पुरातत्वक प्राचीनतम आधार सिद्ध भेल। संगीतक पद्धति सामवेदकेँ विशिष्ट बनेलक। ऐ तरहेँ साहित्य, कला आ संगीतकेँ बान्हबाक प्रयत्न भेल, जइसँ ई विधा दोसरो गोटे द्वारा ओही तरहेँ अनुकृत भऽ सकए। आ ऐ क्रममे कला, साहित्य आ संगीतक समीक्षा वा ओकर गुणक विश्लेषण प्रारम्भ भेल। कला, साहित्य आ संगीतक समाज लेल कोन प्रयोजन, एकर नैतिक मानदण्ड की हुअए, ऐ दिस सेहो प्राच्य आ पाश्चात्य विचारक अपन विचार राखलन्हि। प्लेटो कहै छथि जे कोनो कला नीक नै भऽ सकैए किएक तँ ई सभटा असत्य आ अवास्तविक अछि। मुदा कला, संगीत आ साहित्य कखनो काल स्वान्तः सुखाय सेहो होइत अछि, एकरा पढ़ला, सुनला, देखला आ अनुभव केलासँ प्रसन्नता होइत छै, मानसिक शान्ति भेटै छै, तँ कखनो काल ई उद्वेलित सेहो करैत छै। एरिस्टोटल मुदा कहै छथि जे कलाकार ज्ञानसँ युक्त होइ छथि आ विश्वकेँ बुझबामे सहयोग करै छथि। जगतक सौन्दर्यीकृत प्रस्तुति अछि कला। फ्रायड सभ मनुक्खकेँ रहस्यमयी मानैत छथि। ओ साहित्यिक कृतिकेँ साहित्यकारक विश्लेषण लेल चुनैत छथि तँ नव फ्रायडवादी जैविकक बदला सांस्कृतिक तत्वक प्रधानतापर जोर दैत देखबामे अबैत छथि। नव-समीक्षावाद कृतिक विस्तृत विवरणपर आधारित अछि। उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कऽ विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स, जे दुनियाँ भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्द्वात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनेलन्हि। आइ-काल्हिक “डिसकसन” वा द्वन्द्व, जइमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (विशेष कऽ षडदर्शनक)- माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य- खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहिसँ विद्यमान छल। से इतिहासक अन्तक घोषणा केनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कएने छलाह- किछु दिन पहिने ऐसँ पलटि गेलाह। कम्यूनिज्मक समाप्तिक बाद लागल जे इतिहास, जे दूटा विचारधाराक संघर्ष अछि, एकटा विचारधाराक खतम भेलाक बाद समाप्त भऽ गेल। फ्रांसिस फुकियामा घोषित कएलन्हि जे विचारधाराक आपसी झगड़ासँ सृजित इतिहासक ई समाप्ति अछि आ आब मानवक हितक विचारधारा मात्र आगाँ बढ़त। मुदा किछु दिन पहिनहि ओ  कहलन्हि जे समाजक भीतर आ राष्ट्रीयताक मध्य एखनो बहुत रास भिन्न विचारधारा बाँचल अछि। जर्मनीक देवाल खसलापर हुनक मान्यता रहन्हि जे द्वन्द्व आधारित इतिहासमे कम्यूनिज्म खतम भेलाक बाद इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि कारण दुनियाँ यूनीपोलर भऽ गेल अछि मुदा आब ओ मानै छथि जे वंचितक अस्तित्व सभ ठाम छै आ ओकर सभ्यता आ इतिहास द्वन्द्व उत्पन्न करै छै, आ तेँ इतिहास जारी रहत। उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण, ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भऽ अपन अस्तित्व बचेने अछि। साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्द्वात्मक प्रणाली जेकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत। उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टिकोण अछि विज्ञानक ज्ञानक सम्पूर्णतापर टीका, सत्य-असत्य, अपन-अपन दृष्टिकोणसँ तकर वर्णन, आत्म-केन्द्रित हास्यपूर्ण आ नीक-खराबक भावनाक रहि-रहि खतम हएब, सत्य कखन असत्य भऽ जाएत तकर कोनो ठेकान नै, सतही चिन्तन, आशावादिता तँ नहिए अछि मुदा निराशावादिता सेहो नै, जे अछि तँ से अछि बतहपनी, कोनो चीज एक तरहेँ नै कएक तरहेँ सोचल जा सकैत अछि। दृष्टिकोण, कारण, नियन्त्रण आ योजनाक उत्तर परिणामपर विश्वास नै, वरन संयोगक उत्तर परिणामपर बेशी विश्वास, गणतांत्रिक आ नारीवादी दृष्टिकोण आ लाल झंडा आदिक विचारधाराक संगे प्रतीकक रूपमे हास-परिहास। भूमंडलीकरणक कारणसँ मुख्यधारसँ अलग भेल कतेक समुदायक आ नारीक प्रश्नकेँ उत्तर-आधुनिकता सोझाँ अनलक। विचारधारा आ सार्वभौमिक लक्ष्यक विरोध कएलक मुदा कोनो उत्तर नै दऽ सकल। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स देरीदा भाषाकेँ विखण्डित कऽ ई सिद्ध कएलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नै लगा सकैत छी। प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नै, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि। विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। ऐसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल। प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्ये मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओइसँ पृथक ओ किछु नै अछि; सार्त्र कहै छथि जे मनुख स्वतंत्र हेबा लेल अभिशप्त अछि। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देलन्हि। मूल तत्व जतेक गहींर हएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग। क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित कएने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकता सँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप अन्दाजसँ निश्चित करए पड़ैत अछि। तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक “अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम” सोझे-सोझी भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कऽ रहल अछि कारण ऐसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आएल अछि। जे शुरू भेल अछि से खतम हएत भलहि ओकर आयु बेशी हुअए। जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकताकेँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जँ सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नै पहुँचि सकब। साहित्यक समक्ष ई सभ वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आएल अछि। होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करए पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत। पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नै वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नै होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा कोनो विशिष्ट अर्थ नै होइत अछि। आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल। नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आएल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावादी आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आएल। ई सभ आधुनिक विचार प्रक्रिया प्रणाली, ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल। पाठमे नुकाएल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लैंगुएज गेम आ ऐ सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आएल पोस्टमॉडर्निज्म। कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जइमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कए ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नै कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि, तँ ऐ वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरो सँ ठीक नै होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लऽ ओकरा फॉर्मेट कऽ देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट! पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठनकेँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माणक नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नै मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ विखंडित भऽ सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था। इन्फॉरमेशन सोसाइटी किंवा सूचना-आधारित-समाज एकटा ओहेन समाज अछि जइमे सूचनाक निर्माण, वितरण, प्रसार, उपयोग, एकीकरण आ संशोधन एकटा महत्त्वपूर्ण आर्थिक, राजनीतिक आ सांस्कृतिक क्रिया होइत अछि। आ ऐ समाजक भाग हेबामे समर्थ लोक अंकीय वा डिजिटल नागरिक कहल जाइ छथि। ऐ उत्तर औद्योगिक समाजमे सूचना-प्रौद्योगिकी उत्पादन, अर्थव्यवस्था आ समाजकेँ निर्धारित करैत अछि। उत्तर-आधुनिक समाज, उत्तर औद्योगिक समाज आदि संकल्पना सँ ई निकट अछि। अर्थशास्त्री फ्रिट्ज मैचलप एकर संकल्पना देने छलाह। हुनकर ज्ञान-उद्योगक धारणा शिक्षा, शोध आ विकास, मीडिआ, सूचना प्रौद्योगिकी आ सूचना सेवाक पाँचटा अंगपर आधारित छल। प्रौद्योगिकी आ सूचनाक समाजपर भेल प्रभाव एतए दर्शित होइत अछि। अंकीय वा डिजिटल विभाजन एकटा ज्ञानक विभाजन, सामाजिक विभाजन आ आर्थिक विभाजन देखबैत अछि आ बिना भेदभावक एकटा सूचना समाजक निर्माणक आवश्यकता देखाबैत अछि, जइसँ सूचना प्रौद्योगिकीपर विकासशील देशक सार्वभौम अधिकार रहए। मानवाधिकार आ सूचना प्रौद्योगिकीक मध्य व्यक्तिक एकान्तक अधिकार सेहो सम्मिलित अछि। विद्वान, मानवाधिकार कार्यकर्ता आ आन सभ व्यक्तिक अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता, सूचनाक अधिकार, एकान्त, भेदभाव, स्त्री-समानता, प्रज्ञात्मक संपत्ति, राजनीतिक भागीदारी आ संगठनक मेलक संदर्भमे ऐ गपपर चरचा शुरू भेल अछि जे सूचना आ जनसंचार प्रौद्योगिकी आधारित सूचना समाजमे मानवाधिकारकेँ बल भेटत आकि ओकर हानि हएत। ऑनलाइन पत्राचारक गोपनीयताक अधिकार, अन्तर्जालक सामग्रीक सांस्कृतिक आ भाषायी विविधता आ मीडिया शिक्षा, सूचना समाजक तकनीकी अओजार ओकर अधिकार आ स्वतंत्रतासँ लाभान्वित होइत अछि आ समाजक समग्र विकास, अधिकार आ स्वतंत्रताक सार्वभौमता, अधिकारक आपसी मतभिन्नता, स्वतंत्रता आ मूल्य निरूपणमे सहभागी होइत अछि। ऐसँ सूचना, ज्ञान आ संस्कृतिमे ई सरल पइठक वातावरण बनैत अछि आ ई उपयोगकर्ताकेँ वैश्विक सूचना समाजक अभिनेताक रूपमे परिणत करैत अछि। कारण ई उपयोगकर्ताकेँ पहिनेसँ बेशी अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता आ नव सामग्री आ नव सामाजिक अन्तर्जाल-तंत्र निर्माण करबाक सामर्थ्य दैत अछि। ऐसँ एकटा नव विधि, आर्थिक आ सामाजिक मॉडेलक आवश्यकता सेहो अनूभूत कएल जा रहल अछि जइमे साझी कर्तव्य, ज्ञान आ मेल आधार बनत। बच्चाक हित एकटा आर चिन्ता अछि जे पैघक हितसँ सर्वदा ऊपर रखबाक चाही। आधुनिक समाजक आर्थिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक धनक एकत्र करबाक प्रवृत्ति सूचना समाजमे बढ़ल अछि आ प्रौद्योगिकी एकटा आधारभूत बेरोजगारी अनलक अछि। गरीबी, मजदूरक अधिकार आ कल्याणकारी राज्यक संकल्पना लाभ-हानिक आगाँ कतौ पाछाँ छूटल जा रहल अछि। आब मात्र किछुए अभिनेता चाही। प्रकाशक लोकनि सेहो मात्र किछु बेशी बिकएबला पोथीक लेखकक प्रचार करै छथि। यएह स्थिति रंगमंच, पेंटिंग, सिनेमा आ आन-आन क्षेत्रमे सेहो दृष्टिगोचर भऽ रहल अछि। मुदा सूचना सर्वदा लाभकारी नै होइत अछि। ई मात्र कला, ग्रंथ धरि सीमित नै अछि वरन सट्टा बाजार आ प्रायोजित सर्वेक्षण रपट सेहो ऐमे सम्मिलित अछि। समए आ स्थानक बीचक दूरीकेँ ई कम करैत अछि आ दुनूक बीचमे एकटा सन्तुलन बनबैत अछि। मानवक गरिमा मानवक जन्म आधारित सामाजिक स्थानसँ हटि कऽ मानवक गरिमाक सर्वभौमिकताक अधिकारपर बल दैत अछि। मुक्ति आ स्त्री-मुक्ति आन्दोलन ऐ दिशाक प्रयास अछि। दुनू विश्वयुद्ध आ फासिज्मक चुनौतीक बाद १० दिसम्बर १९४८ केँ संयुक्त राष्ट्र संघक महासभा द्वारा मानवाधिकारक सार्वभौम घोषणाक उद्घोषणा कएल गेल आ एकरा अंगीकार कएल गेल। ई घोषणा राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आ धार्मिक भेदभाव रहित एकटा सामान्य मानदण्ड प्रस्तुत करैत अछि जे सभ जन-समाज आ सभ राष्ट्र लेल अछि। सूचनाक स्वतंत्र उपयोग सीमित अछि, लोकक एकान्त खतम भऽ रहल अछि। बिल गेट्ससँ जखन हुनकर भारत यात्राक क्रममे पूछल गेल छलन्हि जे माइक्रोसॉफ्टक एक्स-बॉक्स भारतमे पाइरेसीक डरसँ देरीसँ उतारल गेल तँ ओ कहने रहथि जे माइक्रोसॉफ्ट कहियो कोनो उत्पाद पाइरेसीक डरसँ देरीसँ नै आनलक। स्पैम आ पाइरेसीक डर खतम हेबाक चाही। सूचना समाज वएह समाज छी जकर बीचमे हम सभ आइ-काल्हि रहि रहल छी। लोकतंत्र आ मानवाधिकारक सम्मान सूचना-समाज आ उत्तर सूचना-समाजमे होइत रहत। अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता, एकान्तक अधिकार, सूचना साझी करबाक अधिकार आ सूचना धरि पहुँचक अधिकार, जे सूचनाक संचारसँ सम्बन्धित अछि, ई सभ राज्य द्वारा आ सूचना-समाजक बाजारवादी झुकावक कारण खतराक अनुभूतिसँ त्रस्त अछि। अन्तर्जाल लोकक मीडिआ अछि आ एकटा एहन प्रणाली अछि जे लोकक बीच सम्वाद स्थापित करैत अछि। ऐसँ संचार-माध्यमक मठाधीश लोकनिक गढ़ टुटैत अछि। अन्तर्जालमे सामान्य रूपसँ कोनो सम्पादक नै होइत छथि। एतए लोक विषयक आ सामग्रीक निर्माण कऽ स्वयं ओकर संचार करै छथि। ऐसँ कतेक रास सामाजिक सम्वादक प्रारम्भ होइत अछि मुदा कतेक रास समाज-विरोधी सामग्री सेहो अबैत अछि। तँ की ओइपर प्रतिबन्ध हेबाक चाही। मुदा जँ सॉफ्टवेयरक माध्यमसँ मशीनकेँ सामग्रीपर प्रतिबन्ध लगेबाक अधिकार देब तखन ई अभिव्यक्तिक स्वतंत्रतापर पैघ आघात हएत। भारतमे बौद्धिक सम्पदाक अधिकार लेखकक मृत्युक ६० बरख बादो प्रकाशन आ वितरणक अधिकार ओकर उत्तराधिकारीकेँ दैत अछि। अन्तर्जालमे सेहो पाइरेसीकेँ प्रतिबन्धित करए पड़त आ लेखकक मृत्युक ६० बरख बाद धरि लेखकक अधिकार ओकर सामग्रीपर सैद्धांतिके नै प्रायोगिक रूपसँ रहए, से व्यवस्था करए पड़त। मुदा पेटेन्टक बेशी प्रयोग विकाशसील देशक सूचना अभिगमनमे बाधक हएत आ प्रौद्योगिकीक विकासमे सेहो बाधा पहुँचाओत। कॉपीराइटसँ सांस्कृतिक विकास मुदा हएत, जेना संगीत, फिल्म, चित्र-शृंखला(कॉमिक्स) आ चित्रकथाक विकास। डिजिटल वातावरणमे प्रतिकृतिक बिना अहाँ अन्तर्जालपर सेहो सामग्री नै देखि सकब, से ऑफ-लाइन कॉपीराइट आ ऑनलाइन कॉपीराइट दुनूमे थोड़बेक अन्तर अछि। ऑनलाइन कॉपीराइट प्रतिकृतिकेँ सेहो प्रतिबन्धित करैत अछि आ प्रतिकृति कएल सामग्रीकेँ दोसर वस्तुमे जोड़ब वा संशोधित करब सेहो बड्ड सरल अछि। से नाम आ चित्र बिना ओकर निर्माताक अनुमतिक नै प्रयोग हुअए, दोसराक व्यक्तिगत वार्तालाप-चैटिंग-मे हस्तक्षेप नै हुअए आ दोसराक विरुद्ध कोनो एहन बयानबाजी नै हुअए जइसँ कोनो व्यक्तिक विरुद्ध गलत धारणा बनए। तहिना नौकरी-प्रदाता द्वारा कोनो प्रकारक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अपन कर्मचारीक नियन्त्रण लेल लगबैत अछि तँ से अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संघक दिशा-निर्देशक अनुरूप हेबाक चाही। ई-पत्रमे अनपेक्षित सन्देश आ चिकित्सकीय रिपोर्टक अनपेक्षित संग्रह आ उपयोग सेहो मानवाधिकारक हनन अछि। अन्तर्जालक उपयोग मुदा सीमित अछि कारण बहुत रास सामग्री आ तंत्रांश मंगनीमे उपलब्ध नै अछि आ महग अछि, डिजिटल विभाजन शिक्षाक स्तरकेँ आर बेशी देखार करैत अछि। शारीरिक श्रमक बदलामे मानसिक श्रमक एतए बेशी उपयोग होइत अछि, से ई आशा रहए जे स्त्री-असमानता सूचना-समाजमे घटत मुदा सर्वेक्षण देखबैत अछि जे महिलाक पइठ सूचना प्रौद्योगिकीमे कम छन्हि। इलेक्ट्रॉनिक लाइब्रेरी आ ब्रेल-इनेबल कएल/ ध्वनि-इनेबल कएल कम्प्यूटर स्क्रीन/ इलेक्ट्रॉनिक लाइब्रेरी विकलांग आ अन्ध विकलांग लेल घर पर रहि ई-वाणिज्य करबामे सहायता देत। मुदा ऐ क्षेत्रमे कएल शोध आ ओकर परिणाम महग रहबाक कारणसँ ओतेक लाभ नै दऽ सकल अछि। बाल, वृद्ध, विकलांग, स्त्री, कामगार, प्रवासी-कामगार आ दोसर सामाजिक रूपसँ अब्बल वर्ग सूचना समाजमे सेहो अपनाकेँ अब्बल अनुभव करैत छथि, मुदा जँ-जँ हिनका लोकनिक पइठ सूचना प्रौद्योगिकीमे बढ़त तँ तँ सूचना-समाजमे असमानता घटत। नीक साहित्य/ कला त्वरित उपस्थापनक आधारपर नै बनत वरन ओइमे तीक्ष्णतासँ उपस्थापित मानव-मूल्य, सामाजिक समरसताक तत्व आ समानता-न्याय आधारित सामाजिक मान्यताक सिद्धान्त आधार बनत। समाज ओइ आधारपर कोना आगू बढ़ए से संदेश तीक्ष्णतासँ आबैए वा नै से देखए पड़त। पाठकक मनसि बन्धनसँ मुक्त होइत अछि वा नै, ओइमे दोसराक नेतृत्व करबाक क्षमता आ आत्मबल अबै छै वा नै, ओकर चारित्रिक निर्माणक आ श्रमक प्रति सम्मानक प्रति सन्देह दूर होइ छै वा नै- ई सभटा तथ्य लघुकथाक मानदंड बनत। कात-करोटमे रहनिहार तेहन काज कऽ जाथि जे सुविधासम्पन्न बुते नै सम्भव अछि, आ से कात-करोटमे रहनिहारक आत्मबल बढ़लेसँ सम्भव हएत। हीन भावनासँ ग्रस्त साहित्य कल्याणकारी कोना भऽ सकत? बदलैत सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक-धार्मिक समीकरणक परिप्रेक्ष्यमे एकभग्गू प्रस्तुतिक रेखांकन, कथाकार-कविक व्यक्तिगत जिनगीक अदृढ़ता, चाहे ओ वादक प्रति हुअए वा जाति-धर्मक प्रति, साहित्यमे देखार भइए जाइ छै। शोषक द्वारा शोषितपर कएल उपकार वा अपराधबोधक अन्तर्गत लिखल जाएबला कथामे जे पैघत्वक (जे हीन भावनाक एकटा रूप अछि) भावना होइ छै, तकरा चिन्हित कएल जाए। मेडियोक्रिटीकेँ चिन्हित करू। तकिया कलाम आ चालू ब्रेकिंग न्यूज आधुनिकताक नामपर, युगक प्रमेयकेँ माटि देबाक विचार ऐमे नै भेटत। आधुनिकीकरण, लोकतंत्रीकरण, राष्ट्र-राज्य संकल्पक कार्यान्वयन, प्रशासनिक-वैधानिक विकास, जन सहभागितामे वृद्धि, स्थायित्व आ क्रमबद्ध परिवर्तनक क्षमता,  सत्ताक गतिशीलता,  उद्योगीकरण;  स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद नवीन राज्यक राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्या-परिवर्तन आ एकीकरणक प्रक्रिया कखनो काल परस्पर विरोधी होइत अछि। सामुदायिकताक विकास, मनोवैज्ञानिक आ शैक्षिक प्रक्रियापर ध्यान देब सेहो आवश्यक। आदिवासी जेना सतार, गिदरमारा (बंजारा) आदि विविधता, प्रकृतिसँ लग, प्रकृति-पूजा, सरलता, निश्छलता, कृतज्ञता आ विकासक स्तरकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि। व्यक्तिक प्रतिष्ठा स्थान-जाति आधारित होइत अछि। किछु प्रतिष्ठा आ विशेषाधिकार प्राप्त जाति अछि तँ किछुसँ तिरस्कार कएल जाइ छै आ हुनकर जीवन कठिन अछि। ऋगवेदमे महिला अपाला, घोषा, श्रद्धा, शची, सार्पराज्ञी, यमी, वैवस्वती, देव जामय, इन्द्राणी, शश्वती, रोमशा, गोधा, उर्वशी, सूर्या, अदिति, नदी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, वाक् जुहू, सरमा आ यमी ऐ २१ टा ऋषिकाक वर्णन अछि। महिला आ बाल-विकासमे महिलाकेँ अधिकार दिआबए लेल शिक्षा-प्रणालीकेँ सक्रिय करबापर आ पाठ्यक्रममे महिला अध्ययनपर जोर देबापर ध्यान देमए पड़त। महिलाक व्यावसायिक आ तकनीकी शिक्षामे प्रतिशत बढ़ाओल जाए। स्त्री-स्वातंत्र्यवाद, महिला आन्दोलन ऐ दिशामे प्रभाव उत्पन्न केलक अछि। धर्मनिरपेक्ष- राजनैतिक संस्था संपूर्ण समुदायक आर्थिक आ सामाजिक हितपर आधारित, धर्म-नस्ल-पंथ भेद रहित सामाजिक मूल्यकेँ बढ़ाबैमे सहायक हएत। विकास आर्थिकसँ पहिने जे शैक्षिक हुअए तँ जनसामान्य ओइ विकासमे साझी भऽ सकैए। ऐसँ सर्जन क्षमता बढ़ैत अछि आ लोकमे उत्तरदायित्वक बोध होइत अछि। विज्ञान आ प्रौद्योगिकीक कारण विकसित आ अविकसित (विकासशील) राष्ट्रक बीचक अंतरक कारण मानवीय समस्या, बीमारी, अज्ञानता, असुरक्षाक समाधान- आकांक्षा-आशा आ सुविधाक असीमित विस्तार आ आधारक बीच सामंजस्यमे वृद्धि भेल अछि। विधि-व्यवस्थाक निर्धन आ पिछड़ल वर्गकेँ न्याय दिअएबामे प्रयोग हेबाक चाही। नागरिक स्वतंत्रता, मानवक लोकतांत्रिक अधिकार, मानवक स्वतंत्र चिन्तन, क्षमतापूर्ण समाजक सृष्टि, प्रतिबन्ध आ दबाबसँ मुक्ति, ऐ सभ मूल्यक संग प्रेसक -शासक आ शासितक ई कड़ी- सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक जीवनमे महत्वपूर्ण भूमिका अछि। मुदा आब प्रभावशाली विज्ञापन एजेंसी जनमतकेँ प्रभावित कएनिहार सेहो सिद्ध भऽ रहल अछि। नव संस्थाक निर्माण वा वर्तमानमे सुधार, सामन्तवादी, जनजातीय, जातीय आ पंथगत निष्ठाक विरुद्ध, लोकतंत्र, उदारवाद, गणतंत्रवाद, संविधानवाद, समाजवाद, समतावाद, सांवैधानिक अधिकारक अस्तित्व, समएबद्ध जनप्रिय चुनाव, जन-संप्रभुता, संघीय शक्ति विभाजन, जनमतक महत्व, लोक-प्रशासनिक प्रक्रिया-अभिक्रम, दलीय हित-समूहीकरण, सर्वोच्च व्यवस्थापिका, उत्तरदायी कार्यपालिका आ स्वतंत्र न्यायपालिका अपन भूमिकाक निर्वहण कऽ रहल अछि। जल-थल-वायुक भौतिक रासायनिक जैविक गुणमे हानिकारक परिवर्तन कऽ प्रदूषण, प्रकृति असंतुलन उत्पन्न भऽ रहल अछि। मिकेल फोकौल्ट कहै छथि जे ज्ञान आ सत्य बनाओल जाइत अछि। डेलीयूज आ गुटारी कहै छथि जे हम सभ इच्छा ऐ द्वारे करै छी कारण हम सभ इच्छा मशीन छी। मिकाहिल बखतिन भाषाकेँ सामाजिक क्रियाक रूपमे लै छथि आ हुनकर कार्य उपन्यासपर अछि। रूसक रूपवादी साहित्यकेँ मात्र भाषाक विशिष्ट प्रयोग मानै छथि। जीन फ्रान्कोइस लियोटार्डक अनुसार सत्यक आ इतिहासक सत्यता मात्र आभासी अछि। बौड्रीलार्ड कहै छथि जे विज्ञापन आ दूरदर्शन सत्य आ आभासीक बीच भेद मेटा देने अछि। दुनू उत्तर आधुनिकताक मुख्य विचारक छथि। लाकानक विशेषता छन्हि जे ओ फ्रायडक पद्धतिक भाषिकी अनुप्रयोग केलन्हि अछि। ओ कहै छथि जे अचेतनताक संरचना भाषा सन छै। जखन बच्चा भाषा सीखैए तखन ओकरा एकटा चेन्ह लेल एकटा शब्द सिखाओल जाइत छै। इच्छा, त्रुटि आ आन ई तीनटा तथ्य लाकान नीक जकाँ राखै छथि। इच्छा, आवश्यकता आ माँगनाइ, दुनू अछि मुदा एकरा ऐ दू रूपमे विखंडित नै कएल जा सकैत अछि। आनक वर्णनमे त्रुटि आ रिक्तता अबैत अछि। विषय अर्थक क्षणिक प्रभाव अछि आ ई आन सन हएत जखन ई आभासी हएत आ त्रुटिक कारण बनत, जइसँ इच्छाक उदय हएत। उत्तर उपनिवेशवादक तीन विचारक छथि- होमी भाभा (फोकौल्ट आ लाकानसँ लग), गायत्री स्पीवाक (फोकौल्ट आ डेरीडासँ लग) आ एडवर्ड सईद (फोकौल्टसँ लग) जे उपनिवेशवादीक पूर्वक धूर्तताक, शिथिलता आदिक धारणाक लेल कएल गेल कार्य आ सिद्धांतीकरणक व्याख्या करै छथि। रेमण्ड विलियम्सक संस्कृतिक अध्ययन साहित्यक आर्थिक स्थितिसँ सम्बन्ध देखबैत अछि। नव इतिहासवाद इतिहासक शब्दशास्त्र आ शब्दशास्त्रक ऐतिहासिकताक तुलना करैत अछि। इलाइन शोआल्टर महिला लेखनक मानसिक, जैविक आ भाषायी विशेषताकेँ चिन्हित करै छथि। सिमोन डी. बेवोइर नारीक नारीक प्रति प्रतिबद्धतामे वर्ग आ जातिकेँ (जकर बादक नारीवादी सिद्धांत विरोध केलक) बाधक मानै छथि। वर्जीनिया वुल्फ नारी लेखक लेल आर्थिक स्वतंत्रता आ निजताकेँ आवश्यक मानै छथि, हिनकर विचारकेँ क्रान्तिकारी नै मानल गेल। मेरी वोल्स्टोनक्राफ्ट नारी शिक्षामे क्रान्ति आ औचित्यक शिक्षाकेँ सम्मिलित करबापर जोर देलनि। नव समीक्षा- इलिएट कवितामे भावनाक प्रधानताक विरोध कएलन्हि आ एकरा गएर वैयक्तिक बनेबाक आग्रह केलनि। समीक्षकक काज लोकक रुचिमे सुधार करब सेहो अछि। विमसैट आ वर्डस्ले कहलनि जे कविक उद्देश्य वा ऐतिहासिक अध्ययनपर समीक्षा आधारित नै रहत। ई पाठकपर पड़ल भावनात्मक प्रभावपर सेहो आधारित नै रहत, कारण से सापेक्ष अछि, ओ आधारित रहत वास्तविक शब्दशास्त्रपर। फिलिप सिडनीसँ अंग्रेजी समीक्षाक प्रारम्भ देखि सकै छी, ओ कविताकेँ सौन्दर्य, अर्थ आ मानवीय हितमे देखलन्हि। जॉन ड्राइडन प्राचीन साहित्यमे नैतिक प्रवचनपर आ एकर लाभहानिपर विचार केलनि। सैमुअल जॉनसन सेक्सपिअरक नाटकमे हास्य आ दुखद तत्वपर लिखलन्हि। रूसोक रोमांशवाद मनुक्खक नीक हेबापर शंका नै करैए (क्लासिकल समीक्षक शंका करै छथि मुदा नव-क्लैसिकल कहै छथि जे मानव स्वभावसँ दूषित अछि मुदा संस्था ओकरा नीक बना सकैए) मुदा संगे ई कहैए जे संस्था सभ दूषित अछि आ मात्र दूषित लोकक मदति करैए। रोमांशवाद कविताक व्यक्तिगत अनुभव हेबाक गप कहैए। आधुनिक स्थितिवाद (साहित्यक अवस्थितिपर कोनो प्रश्न चिन्ह नै) पर संरचनावाद प्रहार केलक आ तकरा बाद लेखक स्वयं लिखल टेकस्टक विश्लेषण करबाक अधिकार गमेलक। उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्य ओइसँ आगाँक वस्तु अछि जे संरचनावाद बुझै अछि। उत्तर-संरचनावादक एकटा प्रकार अछि उत्तर आधुनिकता। उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्यमे संरचना, संस्कृति आ सिद्धान्त मध्य कार्य करैत अछि जत्तऽ किछु भाव आ सोच वंचित अछि जे निरन्तरताक विरोध करैए। विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकता उत्तर संरचनावादक बाद आएल। उत्तर उपनिवेशवाद उपनिवेशक नव रूपकेँ नै मानैए आ अव्यवस्थाक सिद्धांत जेना असफल उद्देश्यकेँ उचित परिणाम नै भेटबाक कारण मानैए। संरचनावाद दमित करैबला पाश्चात्य व्यवस्था आ समाजपर चोट करैए आ ऐ सँ मार्क्सवादकेँ बल भेटलै (अलथूजर)। आधुनिकतावादी-स्थितिवादी, नव समीक्षा, संरचनावाद आ उत्तर संरचनावादक बाद विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकतावाद आएल जकरा विलम्बित पूँजीवाद कहल गेल (फ्रेडरिक जेनसन)। अठारहम शताब्दीमे आधुनिक माने छल जड़विहीन मुदा बीसम शताब्दीक प्रारम्भमे एकर अर्थ प्रगतिवादी भऽ गेल। १९७० ई. क बाद आधुनिक शब्द एकटा सिद्धांतक रूप लऽ लेलक से उत्तर-आधुनिक शब्द पारिभाषिक भेल जकर नजरिमे लौकिक महत्वपूर्ण नै रहल। आधुनिक काल धरिक सभ जीवन आ इतिहास अमहत्वपूर्ण भेल आ खतम भेल। ई सिद्धांत भेल इतिहासोत्तर, विकासोत्तर आ कारणोत्तर। सत्य आ आपसी जुड़ावक महत्व खतम भऽ गेल। जादुइ वास्तविकतावादमे वास्तविक स्थितिमे जादुइ वस्तुजात घोसिआओल जाइत अछि। स्पेनिश उपन्यासकार गैब्रिअल गार्सिया मार्क्विसक “वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सोलीच्यूड” आ सलमान रुस्डीक “मिडनाइट्स चिल्ड्रेन” ऐ तरहक उपन्यास अछि। रचनाकार ऐ तरहक प्रयोग कऽ वास्तविकताकेँ नीक जकाँ बुझबाक प्रयास करै छथि। जोसेफ कोनरेड उपन्यासकेँ इतिहास कहै छथि। जोसेफ कोनरेड पोलिश भाषी रहथि मुदा अंग्रेजीक प्रसिद्ध उपन्यासकार छथि, मुदा धाराप्रवाह अंग्रेजी नै बजैत रहथि। रोलेंड बार्थेज कहै छथि जे उपन्यास इतिहास सेहो छी आ उपन्यास इतिहासक विरोध सेहो करैए। रोलेंड बार्थेज फ्रांसक साहित्यिक सिद्धांकार रहथि आ हिनकर लेखनीक प्रभाव संरचनावादी, मार्क्सवादी आ उत्तर संरचनावादी साहित्यिक सिद्धांतपर पड़ल। उत्तर आधुनिक पाश्चात्य बुर्जुआ दृश्य-श्रव्य मीडियाक प्रयोक कऽ असमता, अन्याय आ वंचितक अवधारणाकेँ मात्र शब्द कहै छथि जे समता, प्राप्ति आ न्यायक लगक शब्द अछि। गरीबी जे पाश्चात्यमे समस्या नै अछि से आइ भारतमे पैघ समस्या अछि। उत्तर आधुनिकता नारीवादक आ मार्क्सवादक विरोधमे अछि आ एकर नारीवाद आ मार्क्सवाद  विरोध केलक अछि। ऐतिहासिक विश्लेषणक पक्षमे मार्क्सवाद अछि आ ओइसँ ओ अपन सिद्धांत फेरसँ सशक्त केलक अछि, संरचनावाद-उत्तर-संरचनावाद आ उत्तर आधुनिकतावादक परिप्रेक्ष्यमे। मार्क्सवाद लौकिक पक्षपर जोर दैत अछि मुदा तेँ ई उपयोगितावाद आ चार्वक दर्शनक लग नै अछि, कारण उपयोगितावाद आ चार्वकवाद मात्र शारीरिक आवश्यकताकेँ ध्यानमे रखैत अछि। नारीवादी दृष्टिकोण सेहो उत्तर आधुनिकतावादक यथास्थितिवादक विरोध केलक अछि कारण यावत से खतम नै हएत ताधरि नारीक स्थितिमे सुधार नै आओत। देवता माने प्रतिपाद्य विषय नै कि गॉड (जेना ग्रिफिथ कहने छथि।) मन्त्रार्थमे महर्षि पतञ्जलिक वैज्ञानिक मन्तव्य “यच्छब्द आह तदस्माकं प्रमाणम्” माने जे शब्द आकि मंत्रक पद कहैत अछि सएह हमरा लेल प्रमाण अछि- एकर अर्थ बादमे वेदे प्रमाण अछि- गलत रूपेँ भेल। प्लेटो कहै छथि जे कोनो कला नीक नै भऽ सकैए किएक तँ ई सभटा असत्य आ अवास्तविक अछि। प्लेटोक ई विचार स्पार्टासँ एथेंसक सैन्य संगठनक न्यूनताकेँ देखैत देल विचारक रूपमे सेहो देखल जएबाक चाही,  काव्य/ नाटकक ऐ रूपेँ विरोध केलन्हि जे सम्वादकेँ रटि कऽ बाजैसँ लोक एकटा कृत्रिम जीवन दिस आकर्षित हएत। अरिस्टोटल कविताकेँ मात्र अनुकृति नै मानै छथि, ओ ऐ मे दर्शन आ सार्वभौम सत्य सेहो देखै छथि। ओ नाटकक दुखान्तकेँ आ अनुकृतिकेँ निसास छोड़ैबला कहै छथि जे आनन्द, दया आ भयक बाद अबैत अछि। सम्वाद दू तरेहेँ भऽ सकैए, अभिभाषण आ गप द्वारा। गपमे दार्शनिक तत्व कम रहत। प्राचीन ग्रीसमे कविता भगवानक सनेस बूझल जाइत छल। एरिस्टोफिनीस नीक आ अधला ऐ दू तरहक कविता देखै छथि, तँ थियोफ्रेस्टस कठोर, उत्कृष्ट आ भव्य ऐ तीन तरहेँ कविताकेँ देखै छथि। कविता आ संगीत अभिन्न अछि। मुदा यूरोपक सिम्फोनी जइमे ढेर रास वादन एके संगे विभिन्न लयमे होइत अछि, सिद्धांतमे अन्तर अनलक। यएह सभ किछु नाटकक स्टेज लेल सेहो लागू भेल। डेरीडाक विखण्डन पद्धति ऊँच स्थान प्राप्त रचना/ लेखक केँ नीचाँ लऽ अनैत अछि आ निचुलकाकेँ ऊपर। रोलेण्ड बार्थेस लिखै छथि जे जखन कृति रचनाकारसँ पृथक भऽ जाइए आ ओकर विश्लेषण स्वतंत्र रूपेँ होमए लगै छै तखन कृति महत्वपूर्ण भऽ जाइए जकरा ओ रचनाकारक मृत होएब कहै छथि। उत्तर-संरचनावाद संरचनावादक सम्पूर्ण आ सुगठित हेबाक अवधारणाकेँ माटि देलक। सौसरक भाषा सिद्धान्त- बाजब/ लिखब, वास्तविक समएक साहित्य वा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यक शब्दशास्त्र, महत्वपूर्ण कोनो कृति वा मनुक्ख अछि/ महत्ता एकटा भाव अछि, वास्तविक समएमे भाषा वा एकर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य; मुदा एकरा सेहो डेरीडाक विखण्डन सिद्धान्त उल्टा-पल्टा करए लागल। लिंग एकटा जैव वैज्ञानिक तथ्य अछि मुदा महिला/ पुरुषक सिद्धान्त सामाजिकताक प्रतिफल अछि। महिला सापेक्ष साहित्य कला पुरुष द्वारा निर्मित अछि आ पुरुखक नजरिसँ महिलाकेँ देखैत अछि। साहित्यक नारीवादी सिद्धान्त ऐ समस्याक तहमे जाइए। मिथिलाक सन्दर्भमे महिलाक स्थिति ओतेक खराप नै छै मुदा मैथिली साहित्यक एकभगाह प्रवृत्तिक कारण उच्च वर्गक नारीक खराप स्थिति साहित्यमे आएल। आधुनिकीकरण तथाकथित सामाजिक रूपसँ निचुलका जाति सभमे सेहो नारीक स्थितिमे अवनति अनलक अछि। दोसर एकटा आर गप अछि जे जाति आ धर्म नारीक अधिकारकेँ कएक हीसमे बाँटि देने अछि। नारीवादी दृष्टिकोण सेहो कहैए जे सभटा सिद्धांत पुरुष द्वारा बनाओल गेल, से ओ पूर्ण व्याख्या नै कऽ सकैए। सरल मानवतावाद सिद्धांतक विरुद्ध आएल। सरल मानवतावाद कहैए जे साहित्यक सिद्धान्तक बदलामे रचनाक की मानवीय दृष्टिकोण छै, ओइमे सार्थकता छै आकि नै से सामान्य बुद्धिसँ कएल जा सकैए। अपन बुद्धिक प्रयोग कऽ रचनाक गुणवत्ता अहाँ देखि सकै छी, कोनो साहित्यिक सिद्धान्तक आवश्यकता समीक्षा लेल नै छै। मुदा सरल मानवतावाद सेहो एकटा सिद्धांत बनि गेल। सार्थक साहित्यक निर्माण एकर अन्तर्गत भेल। पोथी समीक्षामे अत्यधिक आलोचनासँ बचबाक चाही। समीक्षककेँ अपन विद्वत्ता प्रदर्शन करबासँ बचबाक चाही। अत्यधिक आलोचनाक क्रममे लोक अपन विद्वता देखबऽ लगै छथि। आलोचनाक क्रममे संयम रखबाक चाही, खराप शब्दावलीक प्रयोग समीक्षकक खराप लालन-पालन देखबैत अछि। पोथीक बिना पढ़ने समीक्षा अनैतिक अछि। उदाहरणस्वरूप कर्मधारयमे धूमकेतुक विषयमे तारानन्द वियोगी लिखै छथि- मिथिलाक संस्कृतिमे युग-युगसँ प्रतिष्ठापित साम्प्रदायिक सौहार्दकेँ रेखांकित करैत हिनक कथा “नमाजे शुकराना” बहुत महत्वपूर्ण थिक। (कर्मधारय, पृ. १२७) (!) कथाक शीर्ष देखि कऽ ऐ तरहक समीक्षा भेल अछि कारण ऐ कथामे हाजी सैहेबक नमाजक समएमे पिंजराक सुग्गा “सीता...राम...।” बजैए आ सुग्गाक पिंजराकेँ हाजी सैहेब ताधरि महजिदक देबालपर पटकै छथि जाधरि सूगा मरि नै जाइए। सईदा कानऽ लगैए आ कथा खतम भऽ जाइए। आ ई कथा समीक्षकक मतमे साम्प्रदायिक सौहार्दकेँ रेखांकित करैए! काव्यक भारतीय विचार: मोक्षक लेल कलाक अवधारणा, जेना नटराजक मुद्रा देखू। सृजन आ नाश दुनूक लय देखा पड़त। स्थायी भावक गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनब- आ ऐ सन कतेक रसक सीता आ राम अनुभव केलन्हि (देखू वाल्मीकि रामायण)। कृष्ण भारतीय कर्मवादक शिक्षक छथि तँ संगमे रसिक सेहो। कलाक स्वाद लेल रस सिद्धांतक आवश्यकता भेल आ भरत नाट्यशास्त्र लिखलन्हि। अभिनवगुप्त आनन्दवर्धनक ध्यन्यालोकपर भाष्य लिखलन्हि। भामह ६अम शताब्दी, दण्डी सातम शताब्दी आ रुद्रट ९अम शताब्दीमे एकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। रस सिद्धान्त: भरत:- नाटकक प्रभावसँ रस उत्पत्ति होइत अछि। नाटक कथी लेल? नाटक रसक अभिनय लेल आ संगे रसक उत्पत्ति लेल सेहो। रस कोना बहराइए? रस बहराइए कारण (विभाव), परिणाम (अनुभाव) आ संग लागल आन वस्तु (व्यभिचारी)सँ। स्थायीभाव गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनैए, जकर स्वाद हम लऽ सकै छी। भट्ट लोलट:- स्थायीभाव कारण-परिणाम द्वारा गाढ़ भऽ रस बनैत अछि। अभिनेता-अभिनेत्री अनुसन्धान द्वारा आ कल्पना द्वारा रसक अनुभव करैत छथि। लोलट कविकेँ आ संगमे श्रोता-दर्शककेँ महत्व नै दै छथि। शौनक:- शौनक रसानुभूति लेल दर्शकक प्रदर्शनमे पैसि कऽ रस लेब आवश्यक बुझै छथि, घोड़ाक चित्रकेँ घोड़ा सन बूझि रस लेबा सन। भट्टनायक कहै छथि जे रसक प्रभाव दर्शकपर होइत अछि। कविक भाषाकेँ ओ भिन्न मानैत छथि। रससँ श्रोता-दर्शकक आत्मा परमात्मासँ मेल करैए। रसक आनन्द अछि स्वरूपानन्द। आ ऐसँ होइत अछि आत्म-साक्षात्कार। रस सिद्धान्त श्रोता-दर्शक-पाठक पर आधारित अछि। ई श्रोता-दर्शक-पाठकपर जोर दैत अछि। ध्वनि सिद्धान्त: आनन्दवर्धन ध्वन्यालोकमे साहित्यक उद्देश्य अर्थकेँ परोक्ष रूपेँ बुझाएब वा अर्थ उत्पन्न करब कहैत छथि। ई सिद्धान्त दैत अछि परोक्ष अर्थक संरचना आ कार्य, रस माने सौन्दर्यक अनुभव आ अलंकारक सिद्धान्त। आनन्दवर्धन काव्यक आत्मा ध्वनिकेँ मानैत छथि। ध्वनि द्वारा अर्थ तँ परोक्ष रूपेँ अबैत अछि मुदा ओ अबैत अछि सुसंगठित रूपमे। आ ऐसँ अर्थ आ प्रतीक दूटा सिद्धान्त बहार होइत अछि। ऐसँ रसक प्रभाव उत्पन्न होइत अछि। ऐसँ रस उत्पन्न होइत अछि। न्याय आ मीमांसा ऐ सिद्धान्तक विरोध केलक, ई दुनू दर्शन कहैत अछि जे ध्वनिक अस्तित्व कतौ नै अछि, ई परिणाम अछि अनुमानक आ से पहिनहियेसँ लक्षणक अन्तर्गत अछि। आ से सभ शब्द द्वारा वर्णित होएब सम्भव नै अछि। स्फोट सिद्धांत: भर्तृहरीक वाक्यपदीय कहैत अछि जे शब्द आकि वाक्यक अर्थ स्फोट द्वारा संवाहित अछि। वर्ण स्फोटसँ वर्ण, पद स्फोटसँ शब्द आ वाक्य स्फोटसँ वाक्यक निर्माण होइत अछि। कोनो ज्ञान बिनु शब्दक सम्बन्धक सम्भव नै अछि। ई भारतीय दर्शनक ज्ञान सिद्धान्तक एकटा भाग बनि गेल। अर्थक संप्रेषण अक्षर, शब्द आ वाक्यक उत्पत्ति बिन सम्भव अछि। स्फोट अछि शब्दब्रह्म आ से अछि सृजनक मूल कारण। अक्षर, शब्द आ वाक्य संग-संग नै रहैए। बाजल शब्दक फराक अक्षर अपनामे शब्दक अर्थ नै अछि, शब्द पूर्ण हेबा धरि एकर उत्पत्ति आ विनाश होइत रहै छै। स्फोटमे अर्थक संप्रेषण होइत अछि मुदा तखनो स्फोटमे प्राप्ति समए वा संचारक कालमे अक्षर, शब्द वा वाक्यक अस्तित्व नै भेल रहै छै। शब्दक पूर्णता धरि एक अक्षर आर नीक जकाँ क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए आ वाक्य पूर्ण हेबा धरि शब्द क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए। सांख्य, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा आ वेदान्त ई सभ दर्शन स्फोटकेँ नै मानैत अछि। ऐ सभ दर्शनक मानब अछि जे अक्षर आ ओकर ध्वनि अर्थकेँ नीक जेकाँ पूर्ण करैत अछि। फ्रांसक जैक्स डेरीडाक विखण्डन आ पसरबाक सिद्धान्त स्फोट सिद्धान्तक लग अछि। अलंकार सिद्धान्त: भामह अलंकारकेँ समासोक्ति कहै छथि जे आनन्दक कारण बनैए। दण्डी आ उद्भट सेहो अलंकारक सिद्धान्तकेँ आगाँ बढ़बै छथि। अलंकारक मूल रूपसँ दू प्रकार अछि, शब्द आ अर्थ आधारित आ आगाँ सादृश्य-विरोध, तर्कन्याय, लोकन्याय, काव्यन्याय आ गूढ़ार्थ प्रतीति आधारपर। मम्मट ६१ प्रकारक अलंकारकेँ ७ भागमे बाँटै छथि, उपमा माने उदाहरण, रूपक माने कहबी, अप्रस्तुत माने अप्रत्यक्ष प्रशंसा, दीपक माने विभाजित अलंकरण, व्यतिरेक माने असमानता प्रदर्शन, विरोध आ समुच्चय माने संगबे। औचित्य सिद्धान्त: क्षेमेन्द्र औचित्य-विचार-चर्चामे औचित्यकेँ साहित्यक मुख्य तत्व मानलन्हि। आ औचित्य कतऽ हेबाक चाही? ई हेबाक चाही पद, वाक्य, प्रबन्धक अर्थ, गुण, अलंकार, रस, कारक, क्रिया, लिंग, वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात माने फाजिल, काल, देश, कुल, व्रत, तत्व, सत्व माने आन्तरिक गुण, अभिप्राय, स्वभाव, सार-संग्रह, प्रतिभा, अवस्था, विचार, नाम आ आशीर्वादमे। कंपायमान अछि ई ब्रह्माण्ड आ ई अछि कंपन मात्र। कविता वाचनक बाद पसरैत अछि शान्ति, शान्ति सर्वत्र आ शान्ति पसरैत अछि मगजमे। अनुवाद समालोचना: सर्जनात्मक साहित्यमे नाटक सभसँ कठिन अछि, फेर कविता अछि आ तखन कथा, जँ अनुवादकक दृष्टिकोणसँ देखी तखन। नाटकमे नाटकक पृष्ठभूमि आ परोक्ष निहितार्थकेँ चिन्हित करए पड़त संगहि पात्र सभक मनोविज्ञान बूझए पड़त। कवितामे कविताक विधासँ ओकर गढ़निसँ अनुवादकक परिचित भेनाइ आवश्यक, जेना हाइकूक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद करै बेरमे मैथिलीक वार्णिक ५/७/५ क मेल जँ अंग्रेजीक अल्फाबेटसँ करेबै तँ अहाँक अनूदित हाइकू हास्यास्पद भऽ जाएत कारण अंग्रेजीमे ५/७/५ सिलेबलक हाइकू होइ छै आ मैथिलीमे जेना वर्ण आ सिलेबलक समानता होइ छै से अंग्रेजीमे नै होइ छै। ऐ सन्दर्भमे ज्योति सुनीत चौधरीक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद एकटा प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। कविताक लय, बिम्बपर विचार करए पड़त संगहि कविता खण्डक कविताक मुख्य शरीरसँ मिलान करए पड़त। कथामे कथाकारक आ कथाक पात्रक संग कथाक क्रम, बैकफ्लैशक समय-कालक ज्ञान आ वातावरणक ज्ञान आवश्यक भऽ जाइत अछि। रामलोचन शरणक मैथिली रामचरित मानस अवधीसँ मैथिलीमे अनुवाद अछि मुदा दोहा, चौपाइ, सोरठा सभ शास्त्रीय रूपेँ अनूदित भेल अछि। सिद्धान्तक आवश्यकता की छै? श्री राज यात्रीक कवितामे गाम स्थानीयतासँ सार्वभौमिकता तकक निरंतर कविता-यात्रा केनिहार, लेखन आ देखनमे अति साधरण लगनिहार अति विशिष्ट, असाधारण कविक नामए यात्री। श्रेष्ठतम रचनाकारे नै श्रेष्ठ नव-मानवतावादी युगक उन्नायक, उद्गाता आ शलाका पुरूष। यात्रीक कविता गम्हारिक शील भेल करैए जे देखबामे तँ सभसँ अनुपयोगी लकड़ी पिट्ठाक समतूल लगैए मगर उपयोगितामे एके ठाम विविध काठक गुण आ वैशिष्ट्य उपलब्ध करा दैए, कोनो अतिरिक्त मानस संवेदनक बिना। हुनकर कविता सभक लेल भेल करैए। जत्ते आ जतबे जकर ग्राह्यता आकि अभिरूचि। जै तीमनमे अपने स्वाद गुण छै, ओइमे बेसी मर-मसल्लाक कोन खाँहिंस। जे वास्तविक रूपमे बिना अतिरंजनक ‘सत्यम्’ छै ओ अनारोपित ‘सुन्दरम’ हेबे करतै। ज्ञान आ अनुभवक काशीमे लोक अस्सी बरिस सोझे बिताइयो लेत तैयो कि दूनूमे सँ किछु बिना प्रयासक थोड़बे भेट सकतै। तैं बहुतो भौतिक प्राप्तिक भट्ठीमे भाङेटा झोंकैत रहि जाइए। बर्तज बाबा यात्रीयेक ‘चानन बुझि देहमे किदन लेपैत रहि जाइए’ आकि कथीदन पर फूल-घी चढ़ा-औंसि पुण्य लाभक दुराशा आ भ्रमक परसादी लेने घुमि-फिरि अबैए। यात्राी बाबा अपन कथ्यकेँ कोनो सँाचमे गढ़ि कऽ पाठकक आगू नै राखि सोझ-सोझ बिना कोनो रंग-टीपक उपस्थित कऽ दै छथि, तैं पाठक हुनकर कविताक कथ्यसँ सोझे जुटि जाइ छथि। आलंकारिकता आकि कल्पनाशीलतामे बोरिया पाठक बाम-बूच नै जा सकैए। यात्री अपन कवितासँ सम्पूर्ण रूपसँ मिथिलांचलक किसान आ गमैया मजदूर आ मुख्यतः ओही नजैरसँ पूरा भारतीय समाजकेँ ओकर प्रबलता आ दुर्बलता संग देखैत उजागर करै छथि। तैं हुनक कवितामे वर्णित सामग्री सोझे समाजसँ ओतऽ गेल रहैए आ हमरे बात कहैए। अपन परिवेश आ अपन संवेदना द्वारा यथार्थकेँ टोहियेबाक एगो चेष्टा यात्राीक कवितामे सभतैर भेटैए। जिनगीक यथार्थसँ सरोकार रखनिहार एगो खँाटी रचनाकार मात्र ऐन्द्रिक सुन्नरतेकेँ नै चित्रित करैए अपितु ओ जिनगीक कुरूपताकेँ सेहो अँाकैए। ओजह ई छै जे जिनगीमे सभ किछु सुढ़ब-सुन्नरे नै छै। ओइ जघ सुन्नरताक पीठ-पाछू कुढ़ब, चँाछल आ धोखाधरियोक अस्तित्व छै। यदि एक दिस गामक अपार आ असीमित सुन्नरता छै तँ दोसर दिस गाममे बसनिहार लोक टोला-परोसक उधेसल-पुधेसल, उजरल-अपटल जिनगीक दर्दनाक कुरूपता सेहो। एतेक थाकल-हारल आ थकुचल जिनगी कि सुखक सभ बात गामक रहरहँा लोकक लेल रूप-कथे बुझाइत रहै छै। फेर मुट्ठी-दू मुट्ठी भात आकि किछु टुक्का-साबुत सोहारी आ दालि कि तीमनक झोर जुमि गेलापर ओ दिल्लीक दरबार आकि रंगमहलक सुध किए लेत? यएह तँ अछि ऐ जिनगीक असीमित विरोधभास। यात्री अपन कविताकेँ ग्रामीण परिवेश आ अपन संवेदना द्वारा यथार्थकेँ देखैक प्रयास निरंतर करै छथि। सभसँ खास बात तँ यात्राीक कविता मे ई ऐ जे ओ कविकर्म केँ प्रतिष्ठामूलक नै, अपन विशिष्ट संवेदनशीलताक दायित्व पूर्वक व्यवहार करब मानैत रहल छथि। यात्री जेहन काव्य युगक निर्माण केलनि, ओकर तरूमे नै जा बेसी रचनाकार ओकर आकृतिकेँ स्वीकार आकि खारिज करैत रहलाह। ऐ फाँटक रचनाकार लग गामक अति जरूरी मुदा उपेक्षित थीतिक खबैर तँ रहै छनि बलू गोबरकेँ गणेश आकि पाथरकेँ भगवान बनेबाक मुद्रा आ चेष्टामे। यात्रीक कवितामे पाथर बनि गेल लोकक सुधि आ संधान भेटैए। गाम घुरू (भुसपुतरा) आकि ठठरीक ‘फोटो’ जेकँा हुनकर कविता मे नै अबैए। जेतऽ यथार्थ युग-सत्य बनि जेबाक ओजह सँ विज्ञापनी मंडीमे थोक रूपसँ उतरैए जरूर, बलू ओइमे नै तँ गामक आम जनक थीते उजागर भऽ पबैए, आने खास लोकक चरित्रो उघारल-उधेसल जा सकैए। जहिना वर्तमान समएमे वैश्विकता सुनबामे तँ वसुधैव कुटुम्बकम् अथवा मार्क्सक दुनिया भरिक मजदूरक एकताक आह्वान सन उदात्त बूझि पडै़ए बलू क्रिया आ असैरमे एकर विपरीत एक छत्रा साम्राज्यवादिक सूत्र, सौन्दर्यवादी सुकुमार कविक गामसँ फराक यात्रीक गाम तखने अइ जे मूल रूपसँ किसान आ खेत-मजदूरक पक्षधरता हिनकर कविताक गामक प्रतिबद्धता अइ, कोनो ‘फैशन’ नै। आ अही ओजहसँ अपन जिनगीक सभसँ कम, जटिल आ आरंभिके काल खंड अपन जनमथान तरौनीमे बितबितो हुनक कवि ओकर गुरूत्वाकर्षणसँ मुक्त नै भऽ पबैए। देश-विदेश सभतरि सर्वाधिक रहनिहार ई यात्री कवि कोनो शहरी उद्यान; पार्कमे ब्योंतल आ करतब, ड्रिल कराओल मौसमी फूल आकि पत्ताबहार, क्रोटनक चाक-चिकपर आकृष्ट नै होइ छथि बलू ओत्तौ गामक चर-चाँचरमे अगराइत भेंट-कुमुदिन, माछ-मखान, लीची आ आम सभ कथूक नैसर्गिक सुन्दरताकेँ नै बिसरि पबै छथि- कत्ते दीब लगैए हमरा अपन ओ तरौनी गाम। मोन पड़ैए लीची आ आम। मोन पडै़ए कुमुदिनी आ ताल मखान। गामसँ दूर रहबाक कचोट स्पष्ट रूप सँ व्यक्त करैत अपन विवशताकेँ फरिछा कऽ रखै छथि यात्री अपन कवितामे। खाहें तन सँ कतौ रहथु बलू मोन मैथिल जातीय भारतीयता सँ हेंठ नै भऽ पबैए। होइ कोनहुँ ठाम। किछु भै जाइ। रही बहुतो दूर वा लगीच। बंधुगण बरू दुरदुराबथु किंतु। जननि राखब भाव अँह जननीक। एकरा आर फरिछाबैत एक ठाम ओ कहै छथि- किंतु की हम बिसैर पाएब। तरौनी सन गाम? गड़हरा सन आम? दीदिक इनारक पानि। अपन पोखरिक ओ ठुट्ठ पातर जाठिं।... धनरूर बाध कोसक कोस। हुनकर अनुराग सिन्दूर तिलकित भाल पर केन्द्रिते रहैए। आकृष्ट करैए कवि केँ नेनाक थोंथ हँसी, जेकरामे महज सुन्नरते नै, संजीवनी शक्तिक संचारक छेमता ओ पबै छथि। अहल भोरे जाड़ मासमे गाममे ओरियाओल छूराकेँ तपैत, जिनगीक सुख-दुःख मादे निष्कपट बतियैत, घूराक सोन्हगर गमैया गंधक पता ओहन आत्मीय भाव सँ कोनो यात्रीये सन माटि-पानिक कविकेँ भऽ सकै छै। आंचलिक बोलीक मिज्झरक, मिक्सचर अर्थात् संकीर्णतासँ हेंठ अनगढ़ बोली कोनो कवि यात्रीयेक कान जुरा सकै छै। जूता-मोजाक टीप-टापपर नै, ठेला आ बेमाय फाटल गोरपर कोनो कवि यात्रीयेक नजैर जा सकै छै। दू-गो बिम्ब जे खँाटी गमैया अइ, आम लोकक आशा-आकंाक्षाक प्रतीक अइ- दूधिया शीश आकि बालि ओ श्रमक फलाफल सोनिम पाकल शीश अधिक ठाम श्रमक गायक ऐ कविक कविता मे अबैत रहैए। वर्तमान व्यवस्थापक प्रतीक ध्ूरू (भुस्सा भरल झामलाल बिजुका) क माध्यम सँ तँ कवि पूरा व्यवस्थापक चरित्र ओ थीतकेँ बेपर्द करै छथि। चेतना हीन जनतंत्रक मालिक जनता साकांक्ष नै भऽ गफलैतमे पड़ल रहैए आ ओकर ओगरबारू प्रतिनिधि अपनेमे टर्र भाँजटा पूरैत रहैए। उपरका जँ सरङमे बिचरैत रहैए तँ निचलका दिन-दिन पताले धँसल जा रहलए। दूनू फँाट अपचक शिकार। बेसी कदन्न सँ तँ कम अधिक पौष्टिकता सँ। प्रतिनिधिक मगज आ करेजमे भुस्सा भरल बुझा पडै़ए जै पर खद्धर, स्वदेशीक आङरक्षक खाल चढ़ल अइ। अकालक ओजहसँ स्वतंत्र गामक अस्सी प्रतिशत लोकक त्रासदीक केहन सजीव चित्र यात्रीक कवितामे संभव भेल अइ- बिना पजारक मन्हुवाएल चूल्हि, कामहि जँात-चकरी, अन्नदाताक संग समान जिनगी बसर तै त- बरतैत आश्रिता कनही पिलिया, लाभर-जीभर अहरा प्राप्त केनिहार गिरगिट, मूसआ कौवा सभक उदासी, हतासी आ फेर आंशिक जरूरैत पूर्ति सँ टुकटुकाएल ओकर सभक चेष्टा आ चुहुलकेँ भला कोन ‘फेन्सी’ कवि एते कममे एते विराटताक संग प्रस्तुत करबाक सामरथ राखि सकैए। भाखाकेँ हम अभिव्यक्तिक माध्यम टा मानैत रहल छी तैं यात्री आ नागार्जुनमे अंतर करबामे असोकर्जक अनुभव करैत छी। मूल वस्तु तँ छिऐ कथ्य। गोल कऽ दियौ तँ लालमोहन, नाम तँ गुलाबजामुन। हलवाइ तँ एकेगो- यात्री कहियौ कि नागार्जुन। गरीब-गुरबा, किसान आ मजूरक आत्मीय समाङ। कतौ पं वैद्यनाथ मिश्र नै कलगणारक रूपमे। मनुख तँ वास्तविक रूपमे अगबे मनुखेटा रहै छै। दोखी तँ भेल करै छै कोनो व्यवस्था माने संचालन तंत्र। जँातक  काज छिऐ पिसनाइ। अखियासबाक तँ एतबे छै कि ओइमे ढारल की जा रहल छै- कोदो-मरूवा आकि चाउर-गहूम। सद्यः व्यवस्थाकेँ खेलौड़िया मुद्रामे लुल्हुवा देखेबामे बाबा यात्री-नार्गाजुन हिन्दीक माध्यमसँ भाव व्यक्त्त केनिहार किसान कवि त्रिलोचन आ केदारनाथ अग्रवालो सँ सहज आ पटु देखनामे अबै छथि। जनसंकुल टीसनो पर कवि गामेक अँाखिक प्रयोग करैत देखल जाइ छथि। ओइ लोक वरक अपार भीड़ोमे लोक-मन अर्थात निम्नवर्गीय ग्रामीणे परिवेशक दुरगमनियँा कनियँा-बरे पर कविक अँाखि जाइए। पारंपरिक रङल-टीपल बाकसपर ओङठलि घोघ-मरद काढ़ने नवकनियँा आ ओकर रछिया लेल बहाल लोकनियाँ चानीक टकहीक हर पहिरने, माङुर माछ सन काठी आ सिमरताइवाली आँखिसँ गामेक अनगढ़ सुन्नरताक पारखी कोनो कविक अँाखिटा देखि सकैए। तेज सबारीक बिरड़ो आ घटाटोपक अछैतो भदबारिक भीजल घोंघा सन (सूक्ष्म गमै उपमा) मंद ससरैत ट्रामे पर कविक अँाखि जाइ छनि। गामक हरेक मोर्चा पर यात्रीक कवि साकंक्ष ठाढ़ भेटैए। माटिक सभ स्पंदन हुनकर कवितामे निनादित होइए। तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सभ प्रकारक विद्रूपताक खबैर यात्री लैत चलैत छथि, संगे गामक सम्पूर्ण जिनगीकेँ रूपायित सेहो करै छथि। गामक लोकक सभ आशा-आकांक्षा, दुःख दरेग, हँसी-खुशी, सौन्दर्य-कुरूपता, जय-पराजय, उत्थान-पतन, कमजोरी-मजगूती, समटा समभाव सँ हुनकर कविता-यात्रामे सरीक रहैए। कविकर्म हुनकर धर्म छनि, जिनगीक मर्म छनि। कतौ लौल, सौख आकि प्रदर्शनकामिता नै। यएह ओजह अइ जे प्रगतिशीलताक प्रर्दशनमे ओ अपन मैथिल समाजक स्थानीयताक सभसँ ज्वलंत आ अपरिहार्य समस्या वैवाहिक दुर्गुण सभसँ सेहो मुँह नै मोडै़ छथि। यत्-यत् पिण्डे, तत् ब्रह्माण्डे, स्थानीयता सँ सार्वभौमिकता हुनक आदर्श बुझा पडै़ए। सरजमीन सँ कटि अकासक गप्प कखनौं नै। तैं मिथिलांचलमे व्याप्त बेमेल बियाह, बहु बियाह आदि दुर्गुणक चित्रण भेल अइ। तत्कालीन मैथिल समाजक खाहें बेमेल बियाहक स्पष्ट चित्रण हुअए आकि चरित्रक उद्घाटनक संग तहियाक पेशेवर घटकक सजीव आकलन जेना यात्रीक कवि कऽ सकल अइ, निस्संदेह मिथिला केन्द्रित आन कोनो कवि सँ संभव नै भऽ सकल। संस्कृतिक एहन सम्यक आ निठुर व्याख्याक संयम अंतऽ कतौ भेटब दुर्लभ। गामक-घर, माटि-पानि सँ केहन संव्यक्त्त छला ओ एकर परिचय तँ सुगमताक संग जेतऽ–तेतऽ भेटते अइ, तैयो बानगी सरूप किछु पतियानी उदघृत करबाक इच्छाकेँ नै रोकि सकबाक विवशताक संग एतऽ राखऽ चाहै छी जे बाल-विधवाक दुःख दैन्यकेँ सूक्ष्मताक संग उजागर करैए ‘‘भुस्साक आगि जेकँा नहूँ-नहूँ। जरै छी मने-मने हमहूँ। फटै छी कुसियारक पोर जेकँा। चैतक पछबा मे ठोर जेकँा। काते रहै छी जनु घैल छुतहर.....।’’ यात्री अपनाकेँ कतौ विशिष्ट नै, अपन कवित्वकेँ सामान्ये मानैत रहल छथि।  जहनि कि सभ मतक माननिहार सारस्वत चेतनाक सर्वोपरि सिद्धि मानैत रहल छथि, तेनाहितियोमे यात्री अवसरक अनुकूलतेकेँ आने सफलता जेकँा सर्वोपरि मानै छथि। परम मेधावी कते बालक जेतऽ। मूर्ख रहि गायटा चरबैत छथि। .......कालिदास कते। विद्यापति कते। छथि हेरायल महिंसबारक हेंड़मे। यात्रीक शिल्पी गामक ‘कमर्शियल’ सौन्दर्यकेँ प्रस्तुत करब मात्र अपन अभिष्ट किन्नौं ने रखने अइ। ओ यथार्थक एहन समतल भूमि तैयार करैत चलै छथि कि ओ अनायास ‘सुन्दरम्’ भऽ कवितामे प्रकट भऽ जाइए, वनफूलक महमही जेकँा। जौं एक दिस हुनका फसिलक मंजरीक दुर्लभ महमही अभिभूत करै छनि तँ दोसर दिस जेठक तिक्ख आतपकेँ सहैत कृषि कर्ममे साधनारत बीया बाउग केनिहार हाथ ओ मुँहक दूरीक सुरता सेहो सतबैत रहल छनि। ग्रामीण क्षेत्र दऽ बुलैत हैत तीरभुक्त्तिक माला हुनका नै सिहाबै छनि। थलहा कृषि –कर्मसँ लऽ जल-कृषक मलाहक जिनगी तकक शैली ओ संास्कृतिक चेतनाक सूक्ष्म ज्ञान बाबाक ओतऽ जतबा अइ, आनठाम एहन आ एते दुर्लभ अइ। एकर संगे नदी सभक प्रलयंकारी ताण्डव आ ओइसँ उपजल ओबा-टुनकी, मरकी-फौतीसँ सेहो छगाइत छथि बाबा यात्री। एकर विभीषिकासँ कोन फाँटपर कोन असैर पडै़ छै नीमन जगती बूझल छनि कवि यात्राीकेँ। एकेगो थीत केना ककरो गोटी लाल करैए, ककरो उफँाटि तँ ककरो पबन्नी लगबैए आ ककरो खेले उसरि दैए। सहज सपर्द भाखामे विराट शब्द अभिव्यंजना जे यात्रीक ओतऽ भेटैए ओ कोनो खँाटी ग्रामीणे संस्कारक कवि ओतऽ संभव छै। नव निर्मित मुलकी व्यवस्थाक प्रति मोह-भंगक मादे स्पष्ट आ संधानल कसगर चोट करितो फूलगेनासँ प्रहारक मुद्रा ऐ महान कविक अपन विशेषता रहल अइ। यात्री अपन लोकदृष्टिकेँ गमैया संस्कारक ओजहसँ घोघटामे बादरिक चान सन भँापि, अपवाद थीतिकेँ छोड़ि प्रस्तुत करैत रहल छथि जे निश्चित रूपसँ ग्राम्य संस्कारेक असरि अइ। स्वदेशी त्रुुटिपूर्ण आ जंगलशाही वर्त्तमान व्यवस्थापक प्रति मोहभंगकेँ यात्री सोझ-सहज हाड़ तक छूबऽ बला शुरमे व्यक्त्त करबाक सामरथ रखै छथि तै पर थोड़ेक दीठि देल जाए -चानन बुझि हम किदन लेपल देह मे। वाह रे! महान कविक शब्द अभिव्यंजना। आम लोककेँ उमेद रहै चाननक शीतलताक, बलू भेटलै वएह निर्घिन अवशिष्ट-नव व्यवस्थाक चरित्रकेँ केहन मर्यादित गमइ संस्कारक संग उधेसबामे सफल होइ छथि- पूँछ उठाकर नाच रहे हैं ‘पार्लिया-मेन्ट्री मोर’। बिखिन-बिखिन बिम्बक प्रयोगक अनिवार्यताक अछैतो भारतीय ग्राम्य संस्कारक केहन निर्वहन। अखारापर दम प्रदर्शनसँ बेसी दम पचेबाक प्रक्रिया बेसी कुशलताक मानल जाइ छै। ई बात भिन्न जे ऐ ग्राम्य सहज चेतनाकेँ गरियेबाक उदेससँ गमार आकि भदेसी विशेषणसँ अभिहीत किए ने कएल जाउक। यात्री नव मानवताकेँ आकृतिक आधारपर छोट-पैघ आङुरक छपाटि हाथकेँ सुरुब बनेबाक दलील देनिहार मिथ्याकार सभक फाँटक नै भऽ सकै छथि, ओजह जे हाथ ‘स्वस्ति-स्वाहा’ सभ कथूमे सक्षम आ मूल भेल करैए जहनि कि सुरूब अनुकृति मात्र। ओ कोनो प्रणालीक संचालनक सामरथ नै राखि चमचा चालन मात्र कऽ सकैए। साम्यक अर्थ युगकवि यात्री सभंजन जेकि भारतीय दर्शनोक मूलाधार अइ, सएहटा लगबैत रहल छथि। कोनो वायवीय अर्थक आधारपर सत्यकेँ खारिज करबाक कुप्रयास ओहन महामना कवि भला किए करत? एतावता जनवादी चेतना आ ग्रामीण सौंदर्य-बोध महान कवि यात्राीक जिनगीक सहज उच्छवास आ ऊर्जा, करेजक ध्ुकध्ुकी आ धमनीक प्रवाहित रक्त्त रहल अइ। डॉ. राजीव कुमार वर्मा कारी  घटा बरसैत मेघ तीस बरीख भऽ गेल दिल्लीमेI गामक जिनगी मोन पड़ैत अछिI शेफालिका जीक पोथी भावांजलिक किछु पन्ना पलटलौं- हमर अपन गाम सजीव भऽ गेल- आम, लताम, सीसो, सपाटू, नारियल वृक्षक फुनगीसँ/ धरतीकें अशीशैत चान सुरुजक किरणI/ हेमंत-बसंतक सुन्नर प्रसून प्रसन्नI/ कोसी कछेरक प्रार्थना सदृश मंद मंद सुगन्धित,/ शीतल बयार/ हवासँ अठखेली करैत खेतमे गहुमक बालि/ अनगिन हीरक जोत पसारैत मोइनक जलधारI/ नाहपर बैसल हम अहाँ/ पारिजात सुमन सन शुभ्र तारकक/ ज्योत्सना परिधान/ स्वर्गक मन्दाकिनी तीरसँ बरसावैत जीवन-दान/ ब्रह्मक थानसँ अबैत कीर्तन-गान/ प्राचीन ऋषि मुनिक आश्रम सन पावन/ शुभ्र स्निग्ध हमर ई डुमरा गाम/ बाबूजीक विश्वास  माँक ममतसँ भरल ई सुन्दर शुचि-धामI हमरा मोन पड़ल गामक घनघोर मेघI हथिया आ कान्हा नक्षत्रI चमकैत बिजुरिI मयूरक नाचI  ऋतुक रानी वर्षाI मोन पड़ल ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्णन- मेघक गज्ज, आकाशक मेचकता, विदुल्लताक तरंग, कदम्बक सौरभ, विषधरक संसार, ददुरक कोलाहल, धाराक संताप, आदित्यक तुच्छताI हम सभ ग्रीष्म ऋतुक ज्वालासँ जखन मृतप्राय भऽ जाइत छी तखन वर्षाक बूंद संजीवनीक काज करैत अछिI मोन पाडू भुवनेश्वर सिंह भुवनक शब्द- आएल आषाढ़, आएल आषाढ़I भए गेल तिरोहित ग्रीष्म गाढ़I झर-झर-झर-झर झहरय फुहारI खुजि गेल प्रकृति- मंदिर- दुआरI विश्वनाथ विषपायीजीक पंक्ति सेहो याद अबैत अछि- पट पहिरि हरित नव प्रकृति नटी पुनि गरा बान्हि कए बक्क माल I झिंगुर नूपुर पिक गीत गाबि फेकै अछि बिजुरिक नयन-जाल II विद्यापतिक नायिका कारी नुआ पहिरि मुँह झाँपि, पएरक कड़ाकें ऊपर ससारि, नूपुरक मुँह बंद कए पिच्छरमे अभिसारक निमित्त स्थलपर जाइत छथि जखन वर्षा भए रहल अछि, मेघ गरैज रहल अछि, साँप सह-सह कए रहल अछिI दिल्लीमे वर्षाक इन्तजारमे आँखिमे दरद आ दिलमे बेचैनीI हथिया आ कान्हाक कोनो चर्चा नैI झिन्गुरक गीत दुर्लभ आ मानव स्वयं विषधरI रत्ती भरि बूंद आ बाटपर गाड़ीक लम्बा जामI पाइने पाइन, गड्ढे गड्ढाI नालीक यमुना रोडपरI नै चाही हमरा दिल्लीमे हथिया आ कान्हाI दू  बुन्नसँ काम चला लेबI गाम जाएब तँ हथिया-कान्हा देख लेबI खूब देखब कारी घटा आ बरसैत मेघI लेखनीकेँ विराम दऽ रहल छी शेफालिका जीक भावांजलिक गोटेक शब्दसँ- हमर हृदय मरुस्थल बनि जाइत अछि अहाँ मेघ बनि बरैस जाइत छी हम कृतज्ञ भ जाइत छी II अशोक बनैत कम बिगड़ैत बेसी (सुभाष चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह) बनैत बिगड़ैत सुभाष चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह थिक। पहिल कथा संग्रह ‘घरदेखिया’ करीब छब्बीस वर्ष पूर्व आएल रहए। एतेक अंतरालपर आएल संग्रह स्वाभाविक रूपेँ लोकक धि‍यान आकृष्ट करैत अछि। से अहू दुआरे जे सुभाष चन्द्र यादव मैथिलीक जानल-मानल कथाकार छथि। मैथिली कथा साहित्यमे सुभाषक अपन विशिष्ट योगदान अछि। आलोचक कुलानन्द मिश्रक कहब छन्‍हि जे मैथिली कथाक क्षेत्रमे एकटा निश्चित सीमाक अतिक्रमण सुभाष चन्द्र यादवक बादे आरम्भ भेल। जे अखनुक नव्यतम कथाकार लोकनिक प्रियतम आस्था आ पवित्रतम विश्वास बनि गेल अछि। अपन कथा-संग्रह ‘घरदेखिया’क शीर्षक कथा घरदेखिया सुभाषकेँ मैथिली कथामे स्थापित कऽ देने छल। ई कथा मिथिला मिहिरक १५ सितम्बर १९७४क अंकमे पहिल बेर छपल रहए। ई कथा १९७७मे मैथिली अकादमीक कथा संग्रहमे अपन स्थान बनौलक। कथाक संग देल सम्पादकीय टिप्पणीमे कहल गेल जे ‘बीसम शताब्दीक ऐ‍ उन्नत युगमे समाजक एकटा वर्गक यथार्थ सँ ई कथा जे अंतरंग साक्षात्कार करबैत अछि, से एके संग मोनमे अनिवर्चनीय आह्लाद आ भीतर धरि पैस जाइबला अवसादसँ भरि दैत अछि। कथामे भाषा केना फोटोग्राफी करैत चलैत छैक, तकर बड़ सुन्दर उदाहरण ई कथा अछि’। वस्तुतः ‘घरदेखिया’ सुभाषक अनेको प्रसिद्ध कथामे सँ एक थिक। ओ कथा अभावग्रस्त लोकक घरक परिस्थितिकेँ बहुत सुन्यस्त रूपेँ देखब संवेदित करैत अछि। उपेनक संग पाठक सेहो ‘काका’क आर्थिक अभावकेँ देखि‍ चिंतित भऽ उठैत अछि। आब बेटीक बियाह लेल टाकाक जोगाड़ केना हेतै? पाठक सोचबा लेल विवश होइत अछि। निश्चित रूपसँ सुभाष मैथिली कथाकेँ अपना तरहक किछु उत्तम कथा सभ देलनि अछि। घरदेखियाक संग काठक बनल लोक, फँसरी आ झालि बहुतो पाठक आलोचक द्वारा प्रशंसित भेल अछि। ई कथा सभ सुभाषेक नै मैथिलीक नीक कथाक रूपमे मानल जाइत अछि। सुभाषक नीक कथा आरो अछि। हम एतए किछु आर कथाक नाओं लऽ सकैत छी। एकटा दुखांत कथा, उतर मेघ, जासूस कुकुर आ चोर, हीर्थ, परिचए, बेर-बेर, लिफ्ट आ फुकना। ई सभ कथा अपन शिल्प ओ कथ्यक संतुलनसँ अभीष्ट प्रभाव छोड़बामे सफल भेल अछि। कम-सँ-कम शब्दमे कोनो व्यक्ति, घटना अथवा भावक सजीव ओ भावपूर्ण अंकन ऐ‍ कथा सभमे भेल अछि। एकटा कलाकारक रूपमे सुभाष वर्णनसँ बेसी चित्रणमे अपन निपुणता देखबैत रहला अछि। से बिना कोनो ताम-झाम, रंग-रोगनकेँ। तँए सुभाषक कथा सभ कखनो कऽ एकटा रेखा-चित्र, शब्द चित्र सन लगैत अछि। साहित्यमे जेकरा रेखाचित्र कहल जाइत अछि, आेइमे कम-सँ-कम शब्दमे कलात्मक ढंगसँ कोनो वस्तु, व्यक्ति अथवा दृश्यक अंकन कएल जाइत अछि। ऐ‍मे साधन शब्द होइत अछि‍, रेखा नै । तँए एकरा शब्दचित्र सेहो कहल जा सकैत अछि। एकर अंग्रेजी नाओं स्केच, फोटो नै थिक। रेखाचित्रमे कथाक गहींरताक अभाव रहैत अछि, परंतु रेखाचित्रमे नै। ऐ सभ बातक होइतो कथा आ रेखा चित्रमे बहुधा भेद करब मुश्किल होइ छै। सुभाष चन्द्र यादवक ‘घरदेखिया’ संग्रहमे पैंतीसटा कथा रहए। बनैत-बिगड़ैतमे एक्कैसटा कथा अछि। ऐ‍ एक्कैसटा कथामे एकटा कथा अछि ओ लड़की। ई कथा ‘असंगति’ नाओंसँ ‘घरदेखिया’ संग्रहमे सेहो अछि। दुनू कथामे घटना एक्के थिक। मुदा उपस्थापन आ निस्पत्तिमे अंतर अछि। ऐ‍ प्रकारे एक्के घटनासँ निर्मित्त कथाक दूटा पाठ, दू शीर्षकसँ हमरा सभकेँ भेटैत अछि। घटना महानगरक होस्टल लगक थिक। मोटरमे बैस कऽ एकटा लड़का आ लड़की चाह पीलक। चाह पीब कऽ दुनू कप लड़की हाथमे रखने रहए। नवीन, जे ओकरासँ अपरिचित रहए, तकरा जाइत देखलक तँ पुछलकै जे की अहाँ आेइ दिसि‍ (चाहक दोकान दिसि‍) जा रहल छी? सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़कीक चेहरा सँ उतरि कऽ ओकर हाथक कपपर चलि गेलै आ ओ अपमानसँ तिलमिला गेल। ओकरा भीतर क्रोध आ घृणाक धधरा उठलै, की आेइ दुनूक अइंठ कप लऽ जाएत? लड़कीक नेत बूझिते ओ जबाब देलकै, नै। असंगतिमे नवीन अंत धरि तिलमिलाइत रहैए आ सोचैए जे ओ किए नै‍ कहि सकलै, ‘हाउ डिड यू डेयर?’ कथा ऐठाम खतम होइत अछि। मुदा ओ लड़की मे एकर बादो कथाकेँ विस्तार देल गेल छै। नवीनक मानसिक अंतर्द्वन्द्व छै। ओ सोचैत अछि जे दुनूमे कि‍यो दोषी रहल हेतै आ दुनू दोषी हेतै आ दुनूमे कि‍यो नै‍। कारण आरो भऽ सकैत छल। अंततः एतबे सत्य रहि गेलै जे लड़की उदास भऽ गेल छलै आ नवीन दुखी। ई सभ बात ओ सोचने चल जा रहल छल। दुनू कथामे घटना कनियेँटा अछि। आर जे किछु अछि‍ से मानसिके स्तरपर अछि। पहिलमे अपमानक बोध अंत धरि बनल छै। ऐ‍ बातक पछताबा छै जे लड़की (असंगतिमे लड़कीक नाओं कूकी थिक) केँ झाड़ि कऽ बदला किए नै लेलक? ओकरा औकात किए नै देखा सकलै! तोहर ई मजाल जे हमरा अइंठ कप उठा कऽ लऽ जाइ लेल कहबेँ? मुदा ओ लड़कीमे ई अपमान बोध अंततः समझौतामे बदलि जाइत अछि। थोसथाम भऽ जाइ छै। लड़कियो उदास जे अनेरे कहलकै आ नवीनो दुःखी जे अइंठ कप लऽ जइतए तँ की भऽ जइतै। मुदा ई सभटा मन कथे। मनेक भीतरमे चलैत। पजरैत आ मिझाइत। कथाक ऐ‍ दुनू पाठक विस्तारसँ तुलनात्मक अध्ययन बहुत रोचक भऽ सकैत अछि। बनैत बिगड़ैतमे संग्रहीत कथा सभसँ पूर्व कथाकार ‘अपन गप्प’मे कहैत छथि जे ‘हमर रचना और किछु नै, देश-कालक प्रति हमर प्रतिक्रिया थिक। हम अपन समैक सार तत्वकेँ प्रतिबिम्बित करए चाहैत छी। जीवन लेल जे किछु नीक आ श्रेयस्कर अछि, हमर रचना तकरे हासिल करए चाहैत अछि। हम एहन मनुक्ख गढ़ए चाहैत छी जे सभसँ प्रेम करए। आ प्रेम वएह कऽ सकैत अछि जे सत्यक सर्वाधिक निकट हएत’। कथाकारक इच्छा आ कथा सभकेँ जँ देखी तँ लागत जे कथाकार अपन अभीष्टकेँ बहुत अंश धरि प्राप्त कऽ लेने छथि। जतए कतौ अभीष्टक प्राप्ति नै भऽ सकलनि अछि तँ से अभीष्टक अस्पष्टता आ तइ कारणे उत्पन्न शिल्पक कमजोरी थिक। प्रथम पुरुष कथावाचकबला अर्थात् कथा कहनिहार ओ कथा जननिहार जतए एक छथि से एगारहटा कथा अछि। ई सभ कथाकेँ आत्मानुभूतिक निकट मानल कथा अछि। एहन कथा सभ अछि, अपन-अपन दुःख, आतंक, एकटा अंत, एकटा प्रेम कथा, कनियाँ पुतरा, कारबार, कुश्ती, तृष्णा, दृष्टि, बात, रम्भा, हमर गाम। ऐ‍ एगारहो कथामे सँ दसटा कथामे हम सोझे-सोझ पात्रक रूपमे कथामे सम्मिलित छथि। मुदा एकटा कथा ‘तृष्णा’मे ओ दोसर पात्र अखिलनक खिस्सा कहैत छथि। ऐ‍ कथा सबहक माध्यमे देश-कालक प्रति जे प्रतिक्रिया व्यक्त करैत छथि से यथार्थ लगैत अछि। से वर्त्तमान सामाजिक-आर्थिक स्थितिमे राग-भावक होइत अभावकेँ देखबैत अछि। सामाजिक-पारिवारिक सम्बन्ध-अनुबन्ध बदलि रहल अछि। अनकर दुख तकलीफक प्रति एक मारूक उदासीनता पसरि रहल छै। कारोबारी सम्बन्ध, अश्लीलता हदकेँ छूबि रहल अछि। शासन-बेवस्‍था असंवेदनशील आ भ्रष्ट भऽ गेल छै। लोक कमजोर आ असहायकेँ दबबए चाहैत अछि। गाम-घरमे जमीन-जाल, सम्पत्तिक छीना-झपटी बढ़ल छै। कथाकार चाहैत छथि जे प्रेम कएनिहारक बीच सम्वादहीनता नै उपजए। सम्वादहीनतासँ ओ बैचेन होइत छथि (एकटा प्रेम कथा) ओ मानैत छथि जे पति-पत्नीक बीचोमे सभ किछु साझी नै होइ छै (अपन-अपन दुख), शासन-बेवस्‍थाक अंग भेलापर मित्र-परिचितोक बात-बेवहार बदलि जाइ छै। ई बात-बेवहार आतंकित कऽ सकैत अछि (आतंक)। श्रद्धा आ सि‍नेह देखाबए लेल कर्मकाण्ड जरूरी नै छै (एकटा अंत), निश्छल आ निर्विकार यौवनकेँ छली आ विकारग्रस्त मानसिकतासँ बचाएब कठिन भेल जा रहल छै (कनियाँ पुतरा)। ऐ‍ कारोबारी युगमे असहाय आ निर्बलकेँ आर्थिक-शारीरिक शोषणसँ बाँचब मुश्किल भऽ गेलैक अछि। मानवीयताक ह्रास भऽ रहल छै (कारोबार), जीवनक आपाधापी लोककेँ जहिना-तहिना रहबापर विवश करै छै (कुश्ती), कोनो सुन्दर दृष्टि-भंगिमावाली स्त्रीक प्रति सहज खिंचाओ आ लगाओ सम्भव छै। लोकमे ई इच्छा जनमि सकै छै जे ओकर संग हरदम बनल रहए। संग नहियो भेटतै तँ स्मृति आत्माकेँ आलोकित करैत रहतै (तृष्णा), मनुक्खकेँ जीबाक लेल सार्थक ओ व्यावहारिक दृष्टि आवश्यक छै (दृष्टि), जीवनमे बहुतो घटना घटैत रहै छै। जीवन कथा चलैत रहै छै। दुख-सुख भोगैत रहैत अछि लोक। परन्तु बात कखनो-कखनो बनि पबैत छै (बात), रम्भा सन रूपवती स्त्री ककरो कोनो अवस्थामे विचलित कऽ सकैत अछि। ऐ‍ विचलनमे मोनकेँ नुका कऽ राखब सम्भव नै छै। मोन पारदर्शी भऽ जाइ छै। मोनक सुन्दरता आ कुरुपता देखार भऽ सकै छै (रम्भा), अनुपस्थित जमीन्दारक लेल गाम आब स्मृतिमे जा रहल छै। गामक जीवन विकट भऽ गेल छै। वस्तुतः गाम आब अपन नै रहि गेलैक अछि (अपन गाम)। ऐ‍ सभ कथामे जे भाव-विचार व्यक्त भेल अछि से बहुलांशमे कथामे अनुस्यूत भऽ कऽ आएल अछि। मुदा जतए-ततए कथामे फूटसँ टिप्पणी, चिन्तन, दर्शन वा मन्तव्यक सोङर सेहो दिअ पड़लनि अछि कथाकारकेँ। कथा-संग्रहमे संगृहीत किछु कथा सभमे ई सोंगर कखनोकेँ कने खीचल-तीरल सेहो लागि सकैत अछि। लागि सकैत अछि जे कथावाचक जेना किछु आगू बढ़ि गेल अछि आ कथा कतौ पाछूए छूटि गेल अछि। हमरा जनैत एकर कारण कथाक रूप-विधान थिक, ले आउट थिक। कथात्मकताक अभाव थिक। जँए कि सुभाष अपन कथा लेल वातावरण आ पृष्ठभूमिक निर्माण नहिएँ जकाँ करैत छथि तँए हुनका अभीष्ट प्राप्ति लेल कखनाैं कऽ फूटसँ उपक्रम करए पड़ैत छन्‍हि। किछु कथामे कोसीक बाढ़ि आ कोसी कातक गामक चित्रण बहुत प्रामाणिक रूपसँ भेल अछि। किछु कथामे असगर हेबाक कष्ट-भोग दारुण भऽ गेल अछि। ऐ‍ कथा सबहक चित्रण भयाओन अछि। जइ कथामे कोसी आ कोसी कातक गाम अछि से कथा केनरी आइलैंडक लारेल, परलय आ हमर गाम थिक। कोसीक बाढ़िसँ तबाही, कोसी कातक गामक रस्ता-पेंड़ाक दुरुहता कहैत अछि जे ई एकटा दोसरे संसार थिक। विकाससँ दूर, सामाजिक-पारिवारिक सम्बन्धक बदलैत आयाम आ आेइ भीतरसँ राग-विरागक झिलमिलाइत मनोभाव, बनैत-बिगड़ैत जातीय-वर्गीय सम्बन्ध कथा सभकेँ स्मरणीय बनबैत अछि। “परलय” आ “हमर गाम” शीर्षक तँ कथाक अनुकूल लगैत अछि, ओकर संगति छै मुदा केनरी आइलैंडक लारेलक कोनो संगति कथामे नै भेट पबैत अछि। कैनरी आइलैंड स्पेनक आइलैंड थिक, जे मेडीटरेनियन समुद्रमे अछि। ऐ‍ आइलैंडपर लारेल नामक गाछ खूब होइ छै। ऐ‍ झमटगर गाछक छोट-छोट पातक उपयोग मुकुट, टोपी बना कऽ लोककेँ सम्मानित करबामे होइत रहल अछि। इंग्लैण्डमे राजाक मुकुटमे लारेल लगाओल गेल रहै। मुदा कथामे ई लारेल के थिक, से स्पष्ट नै होइत अछि। कथाक संग शीर्षकक संगतिक समस्या किछु आनो कथाक संग अछि। “असुरक्षित” आ “एकाकी” बाहर आ भीतरसँ असगर भेल लोकक व्यक्ति-चित्र थिक। ई दुनू कथा बहिरंग आ अंतरंगक बीच होइत आवाजाहीक कथा थिक। कखनो बहिरंग हावी भऽ जाइ छै तँ कखनो अंतरंग। ई स्थिति व्यक्तिवादी मानसिकताक देन कहल जा सकैत अछि। एहन लोकमे असुरक्षा-बोध बढ़ि जाइ छै। ओ अपन वर्तमान वातावरणक संग ताल-मेल नै बैसा पबैत अछि। दाना, नदी आ कबाछु एहन कथा थिक जेकरामे कोनो पैघ बात कहबाक तागति छै मुदा अन्ततः से बात उभरि नै सकल अछि। एक ओझराएल अनुभूति आ संकोच, कहि सकैत छी जे ऐ‍ कथा सभकेँ पुष्पित हेबामे बाधक भेलैक अछि। तथापि “नदी” प्रवहमान धारक रूपमे तँ नै मुदा रुकैत-चलैत वात्सल्यक अनुभूति जगबैत छै। “दाना” ऐ‍ कारोबारी समैमे मनुक्खकेँ हरेक दाना लेल चिड़ै-चुनमुनी सन बनैत देखबैत अछि। “कबाछु”क अनुभूति जुगुप्सा जगबै छै जखनि कि ऐ‍ कथामे गहींर सत्यक बीज अछि। सत्य ई थिक जे जखन व्यक्तिक वर्ग बदलि जाइ छै तँ ओकरा अपन पूर्ववर्ती बेवहार, चालि-चलन, श्रम वा आराम सबहक प्रति एक हीनता-बोध, लाज-संकोच उपजि जाइत छै। कथा-संग्रहक नाआें बनैत बिगड़ैत, ऐ‍ नाओंसँ प्रकाशित कथाक आधारपर राखल गेल अछि। ऐ‍ कथामे माए-बाप लगसँ परदेश चल गेल सन्तानक कुशलता लेल व्याकुल अनिष्टक आशंकासँ डेराएल, संतानसँ भेटल अवहेलनाक संताप भोगैत पति-पत्नीक खिस्सा कहल गेल अछि। पत्नीकेँ ऐ‍ मानसिकतामे कौआक टाहि आ कुकुरक कानब अशुभ लगै छै। ओ परेशान होइत अछि। पति विभिन्न तर्कसँ पत्नीक धि‍यान ऐ‍ अशुभ कल्पनासँ हटाबए चाहैत अछि। मुदा पत्नी खिसिया जाइत छै। कटाह बात कहि दैत छै। आेइ कटाह बातसँ पति आर पीड़ित होइत अछि। ऐ‍ क्रममे ओ विभिन्न बात सोचैत अछि। कौआक कुचरबाक मादे अशुभ कल्पनाकेँ कौआक विलायल जेबासँ जोड़ि दैत अछि। कौआ संग अपनो (दादाक) विला जेबाक कल्पना करैत अछि। ऐ‍ प्रकारेँ जेना सन्तानक विछोहसँ उपजल क्षोभ आ दुखमे अपनाकेँ कौआ सन कुरुप मानि, अशुभ मानि, विला जेबाक, मरि जएबाक, स्मृतिमे चल जेबाक उपालम्भ देल गेल अछि। सुभाष चन्द्र यादवक ऐ‍ कथा-संग्रहक अनेक कथामे गामक, दादाक, सि‍नेह-भावक स्मृतिमे चल जेबाक बात कहल गेल अछि। जेना ई सभ आब स्मृतिएटा मे जीवित रहत। वस्तुतः वर्तमान समैपर ई सभ कथाकारक प्रतिक्रिया थिक। ई प्रतिक्रिया समैकेँ बनैत कम आ बिगड़ैत बेसी देखि‍ कऽ, पाबि कऽ व्यक्त भेल अछि। जेना ई समए बनि कम रहल अछि, बिगड़ि बेसी रहल अछि। वर्तमान समैपर कथाकारक ई प्रतिक्रिया यथार्थ भलेहि‍ं हुअए, मुदा ई यथार्थ उदास आ निष्क्रिय करैत अछि। ऐ‍सँ ने हृदैमे प्रेरणा होइत अछि आ ने आत्मबल भेटैत अछि। तैं सुभाषजी सँ ई आशा करब अनर्गल नै हएत जे ओ अगिला समैमे समकालीन यथार्थक एहन पक्ष सेहो प्रस्तुत करता जे प्रेरित आ सक्रिय करत। जइसँ आत्मबल भेटत। एहन कथा वस्तुतः कम बिगड़ैत आ बेसी बनैत कथा हएत। चन्द्रेश यर्थाथक अनुभुतिमे ऐतिहासिक दिनः झिझिया नृत्य महोत्सव

२०६८ साल आसीन १४ गते , नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान आ जनचेतना अभियान नेपालक संयुक्त अभियानमे झिझिया महोत्सव मनाओल गेल । ऐ कार्यक्रमक सभापति रहथि श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, उद्घाटक श्री विमलेन्द्र निधि, नेपाली कांग्रेसक केन्द्रिय सदस्य एवं सभासद आ मंच संचालक श्री अशोक दत्त। उद्घाटन भाषण करैत प्रमुख अतिथि श्री विमलेन्द्र निधि कहलनि जे डाइन जोगिन प्रथापर आधारित झिझिया मुख्यतः महिला लोकनिक थिक। मैथिली भाषा ओ साहित्यमे संस्कृतिक संरक्षण आवश्यक अछि। ऐसँ सामाजिक समरसता बढ़ैत अछि। आइ जे झिझिया नृत्य संस्कृति विलुप्तक कगारपर अछि तकरा बचएबाक ओ अस्मिताकेँ जगएबाक ई सार्थक प्रयास थिक। ओ ऐ कार्यक्रमक उद्घाटन दीप प्रज्वलित कऽ कएलनि । विषय प्रवर्तनक क्रममे स्वागत भाषण करैत श्रीराम भरोस कापड़ि भ्रमर, नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक परिषद सदस्य, प्राज्ञ कहलनि जे झिझिया नृत्य आइसँ बारह–तेरह सए वर्ष पहिने शुरु भेल हएत। डाइन जोगिनसँ बच्चा बुतरुकेँ बचएबाक हेतु मिथिलाक महिला लोकनि द्वारा ई नृत्य होइत छल। जेँकि ई हमरा लोकनिक सभ्यता संस्कृतिक अंग थिक तेँ आइ एकरा बचएबाक बेगरता अछि। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित ई कार्यक्रम वस्तुतः अपन संस्कृतिकेँ बचएबाक ओरियाओन थिक। आइ सात गोट टीम झिझिया नृत्य प्रस्तुत करत आ ऐ सभ संस्थाकेँ कोनो ने कोनो रुपमे प्रोत्साहित करबाक एवं सम्मानार्थ पुरस्कृत करबाक अछि। विभिन्न स्थानक पुरस्कार राशि भिन्न भिन्न अछि। अंक पत्रक आधारपर क्रमशः प्रथम, द्वितीय ओ तृतीय श्रेणीक विजेता टीम घोषित कएल जाएत। निर्णायक मण्डलमे तीन गोट व्यक्तित्वक चयन कएल अछि, सर्वश्री डा. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन, डा. रेवती रमण लाल आ अयोध्यानाथ चौधरी । अंक पत्रमे पचास अंक विभिन्न क्षेत्र–वेशभुषा, मौलिक नृत्य, मौलिक गीत, घैलक बनावटि आ समग्र। जनकपुरमे ऐ तरहक आयोजन पहिल थिक। ओ नेपाल प्रज्ञा प्रष्ठिान द्वारा कएल गेल काजक सविस्तार उल्लेख कएलनि। डा. राजेन्द्र प्रसाद विमल जनाओल जे तन्त्र-मन्त्रक परम्परा वैदिक कालसँ अछि। ई झिझिया नृत्य वैदिक ऋचासँ लेल गेल अछि। ई एकटा आनुष्ठानिक यज्ञ बुझी तँ थिक। एक तरहे लोक जागरणक प्रभाव थिक। डाइनक विभिन्न मुद्रा आ क्रिया–कलाप होइत अछि। मुइल बच्चाकेँ जिया कऽ नंगटे नाचब, नगर कोतबालकेँ देखब अर्थात तन्त्र-मन्त्रक प्रभाव कोनो ने कोनो रुपमे पड़िते अछि। ऐसँ लोक मुक्ति चाहैत अछि। समष्टि चेतनाक अन्तर्गत व्यक्ति चेतना समाहित भऽ जाइत अछि। शिव स्वयं अनादिक देवता छथि। परम्पराक निरंतरता तंत्र थिक। पितृपक्षमे पितरक बौआइत आत्मा सभ अबैत रहैत छथि, तइ क्षुधित आत्माक तृप्ति ऐ झिझिया नृत्यमे होइत अछि। वैदिक परम्पराक निरंतरता घट नृत्यमे होइत अछि। इन्द्रियक ओ भाग जे पकड़मे नै अबैक, से चेतना आ चेतनाक ओ भाग जे पकड़मे नै अबैक से देव आ ऐ दुनुक मध्य थिक तन्त्र। चेतनाक उर्ध्वीकरणक लेल समाजक आवश्यकता छै। झिझिया नृत्य बुझी तँ वैदिक, तान्त्रिक आ लौकिक परम्पराक समन्वित रुप थिक। ऐमे समयक अनुकुल परिष्कार आ भविष्यकेँ देखैत वर्तमान स्तरपर विकासक रुप देबाक थिक। प्रो. परमेश्वर कापडिक कथन छल जे झिझिया मात्र नृत्येटामे नै अछि आ ने गीतमे, ई जीवनसँ जुड़ल बात थिक। तेँ मनुक्खक जीवन केन्द्रित ई नृत्य अक्षुण्ण रहबाक चाही।  मंच संचालक अशोक दत्त जनाओल जे ई नृत्य महिला सशक्तिकरणक द्योतक थिक। विशिष्ट अतिथि डा. प्रफुल्ल कुमार सिंह अपन आलेख प्रस्तुत करैत झिझिया नृत्यक परम्परा, विकास ओ सम्भावनापर अपन विचार प्रस्तुत करैत अतीतक कथा उदाहरणक रुपमे प्रकट कएलनि। ओ जनौलनि जे ऐमे दू तरहक भावना प्रकट होइत अछि, पहिल जे डाइनिक डाइनिपनक विरोधस्वरुप गारि पढ़ब आ दोसर डाइनपनसँ मुक्तिक बाट। सहस्र छेदबला घैलकेँ लऽ कऽ नृत्य करब जइमे दीप बड़ैत हुअए। ओ इहो स्पष्ट कएलनि जे बखरीक बकरियो डाइन होइत अछि। बाल रुच कथा (चित्रसेन महाराजक भागिन) माध्यमे ओ अपन बातकेँ सिद्ध करैत ऐ अनुष्ठानिक यज्ञकेँ सामाजिक समरसताक आधारपर सिद्ध कएलनि। ओ व्यक्त कएलनि जे आलेखमे बहुत किछु झिझियाक विषयक विचारक उल्लेख अछि जे पठित भेलापर बहुत किछु शंकाक समाधान हएत। डा.रेवती रमण लाल जनाओल जे झिझिया नृत्य लोक पारम्परिक थिक। ऐमे महिला वर्गक सक्रियता होइत अछि। ई महिला जागरणक प्रतीक थिक आ संस्कृतिक आस्था पर्व।  तदुपरान्त झिझिया नृत्य हेतु सात गोट टीमक प्रदर्शन भेल जइमे छल १. माँ जानकी झिझिया टीम २. भैरव झिझिया टीम ३. जन चेतना अभियान झिझिया टीम ४.मिथिला मीडिया हाउस झिझिया टीम ५. नारी विकास केन्द्र झिझिया टीम ६.माँ जानकी झिझिया टीम जानकी नगर ७. ज्वालामुखी झिझिया टीम सिनुरजोड़ा। निर्णायक मंडल द्वारा निर्णीत परिणामकेँ घोषित कएलनि श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, सभापति जे प्रथम स्थान जन चेतना अभियान झिझिया टीम, द्वितीय भैरव झिझिया टीम आ तृतीय मिथिला मिडिया हाउस आ क्रमशः प्राप्त अंक छल १०१, ९९ एवं ९४ आ चारिटा टीमकेँ सान्त्वना पुरस्कारसँ पुरस्कृत कएल गेल। प्रथम पुरस्कार ३००० टाका, द्वितीय २००० टाका एवं तृतीय १००० टाका आ सान्त्वना पुरस्कार ५०० टाकाक छल। तदुपरान्त श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर लिखित भैया अएलै अपन सोराज नाटक जनचेतना अभियान मुजेलिया द्वारा मंचित भेल। ऐमे भाग लेलनि सर्वश्री राम विहारी राय–दीना, नरेश मण्डल– भद्री, सुनिल कुमार यादव–जोरावर सिंह, हरबाह–मिथुन यादव, रेविया–सुनिल राउत, लठैत–भोला मण्डल आ जयकरन, बुढी–पुष्पा यादव, कहार–सुरज मण्डल, महेश धनकार, पार्श्व गायक–रामदेव सदा, बेचन सदा, भोला मण्डल, प्रकाश–नरेश मण्डल, ध्वनि विस्तार– संजय झा, रुप–सज्जा–भोला मण्डल, निर्देशक सुनिल कुमार यादव।  ऐ कार्यक्रमपर टिप्पणी करैत राजेश्वर नेपाली कहलनि जे कार्यक्रमक जतेक प्रशंसा कएल जाएत थोड़ हएत। ई बहुत पैघ काज भेल अछि। संस्कृतिकेँ बचएबाक प्रयास भेल अछि। नाटकक सफल मंचन भेल अछि जे हृदएकेँ छुलक अछि। सामाजिक जागरण हएत से विश्वास झलकैत अछि।  समग्रतामे टिप्पणी करैत चन्द्रेश स्पष्ट कएल जे धर्म–अधर्म ओ अन्ध विश्वाससँ जुड़ल तन्त्र-मन्त्र पर आधारित ई झिझिया नृत्य महिला चेतनाक प्रतीक थिक। ऐमे शारीरिक ओ मानसिक स्तरपर विकास होइत अछि। ई गतिशील मुद्रामे होइत अछि। देहक नसमे शोणितक प्रवाह आ एकाग्रतामे ध्यान केन्द्रित कऽ ई नृत्य अवस्से मानसिक चेतनाकेँ जगबैत अछि आ स्नायु तन्त्रकेँ झंकृत कऽ स्वस्थ्य मानसिकताक विकास करैत अछि।  ओ नाटक पर विचार केन्द्रित करैत जनाओल जे सामन्ती शोषणक विरोध स्वरुप ई नाटक सामाजिक–राजनैतिक चेतनाक संग लोक चेतनाकेँ जगबैत अछि। वस्तुतः ई नाटक ओ लुत्ती थिक जकर पसाहीमे धु-धु जड़ैत सामन्ती मनोवृतिक नाश हएत आ नव उमंगमे लोक जीवनक नव संस्कार हएत। खास कऽ अभिनयकर्ता लोकनि अपन-अपन स्वभाविक ओ यथार्थ अभिनयमे रंगमंचक सार्थकता सिद्ध कएल अछि से ऐ नाटकक सफलता ओ सबलता थिक। हमरा विशेष कऽ मिथुन यादव, हरबाहक अभिनय ततेक नीक लागल अछि जे आनो आन कलाकारगणकेँ ऐसँ सिखबाक थिक जे अभिनयक सजीवता मर्म स्थल धरि उतरि सकए। ओना कोनो पात्रक अभिनय ककरोसँ कम नै, सभ उपरा–उपरी। मुदा बुढ़ी–पुष्पा यादवक अभिनयमे आरो निखार होएबाक थिक।  श्री अयोध्यानाथ चौधरी कहलनि जे स्वाभाविकतामे पनुगैत ई नाटक वस्तुतः समाजमे लोकजागरण आनत। डा.रेवती रमण लाल ऐ नाटकक भरपुर प्रशंसा कएलनि। ओ एहन-एहन नाटक खेलएबापर जोड़ देलनि। डा. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन कहलनि जे भैया अएलै अपन सोराज नाटकक कथानक ओ उद्देश्य पूर्णतः जीवन्त अछि। अभिनयकर्ताक अभिनयमे बुझाएल जे सभ केओ स्वयं भोक्ता छथि। ऐमे सामन्तवादक प्रखर विरोध भेल अछि।  डा. राजेन्द्र प्रसाद विमलक कथन जे ई नाटक दलित चेतनाक प्रतीक थिक। अन्तर्राष्ट्रिय जगतमे एहन नाटकक मांग अछि तेँ एकरा अंग्रेजीमे अनूदित होएबाक चाही। संगहि ओ ऐ नाटककेँ काठमाण्डुक गुरुकुलमे प्रदर्शनपर जोर देलनि। नाटकमे किछु एहन दृश्यक संयोजन अछि जे जीवन्तताक प्रतीक थिक आ हम ई नाटक देखि भाव विभोर भऽ गेलौं। अन्तमे सभापति भ्रमर जनाओल जे ऐ कार्यक्रमकेँ सम्पादित कऽ आ दर्शकक उत्साह देखि हम गौरवान्वित बोध करैत छी आ नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानसँ आरो काज करबाक लेल संकल्पित छी।  निष्कर्ष – १. कार्यक्रम पूर्ण रुपेण सफल रहल ।  २.सयोसँ बेसी महिलाक उपस्थिति दर्शक वृन्दमे महिला जागरणक प्रतीक बनि उभरि कऽ आएल। ३. झिझिया नृत्यक संयोजन पहिल बेर जनकपुर की नेपाल परिसरमे भेल खास कऽ नृत्य प्रतियोगिताक रुपमे सम्पादित।  ४. ई ऐतिहासिक महत्वक दिन कहल जाएत जे अपन अस्मिता ओ संस्कृतिक उत्थानक लेल भेल।  ५. सात गोट झिझिया टीमक उपस्थिति बोध, महिला वर्गक पहिल खेप मंचपर आएब आ अपन नृत्य प्रस्तुत करब अबस्से महिला वर्गक प्रतिनिधित्वक सूूचक बनल। खास कऽ निम्नेतर महिला वर्गक प्रतिनिधित्व हएब समाजमे नारी जागरणक प्रतीक थिक।  ६. उद्योग वाणिज्य संघक हॉल खचाखच भरल रहल। झिझिया नृत्य आ नाटक होएबा धरि दर्शकगण नै हिलल–डोलल ।  ७. भैया अएलै अपन सोराजक प्रस्तुति कएक ठाम भेल अछि। मुदा ऐ ठामक प्रस्तुतिमे सजीवता ओ जीवन्तता प्रदर्शित भेल।  ८. सभ बएसक लोककेँ ई कार्यक्रम प्रभावित कएलक।  ९. ऐमे निम्नेतर वर्गक प्रतिनिधित्व तँ भेबे कएल आ विशेष कऽ ओइ वर्गक लोककेँ अपन समारोह जे बुझाएल से सभक मोनकेँ जीति लेलक। खास कऽ बुढ़ पुरानक संगहि बूढ़ि महिला सभ सेहो खुशीमे उठि बैसल।  १०. नाटकमे किछु विसंगति अबस्से खटकल खास कऽ संगीत पक्षक क्रमबद्धतामे, मुदा अभिनय पक्ष ओ गीतक माधुर्यमे सभटा बिला गेल।  ११. अभिनयकर्ताकेँ आरो अभिनयक ऊँचाइपर कलात्मकतामे लऽ जाएब आवश्यक। मुदा प्रस्तुतिक सफलता निस्सन्देह सफलता थिक।  १२. कार्यक्रम सुस्थिर, सुनियोजित आ व्यावहारिक रहल।  १३. ई सत्य थिक जे ऐ नाटकक गमैया परिवेशमे जे अभिनयकर्ता द्वारा सजीवता प्रस्तुत कएल गेल अछि से प्रशंसनीय थिक।  १४. झिझिया नृत्यमे महिला वर्ग प्रदर्शित कऽ अपन उद्गार व्यक्त कएलनि से देखिते बनैत छल। कारण नृत्यकर्मी वर्गक मनुहार स्पष्ट झलकि उठल। खास कऽ पुरस्कृत हेबाक काल महिला वर्गक उत्साह देखबा योग्य छल।  १५. जे महिला वर्ग भाग नै लेलनि से अगिला महोत्सवमे भाग लेबाक हेतु उत्साहित भाव प्रकट कएलनि। १६. समग्रतामे लोक कल्याणपरक कार्यक्रम उर्ध्वमुखी भेल आ अपन विशिष्टतामे अमिट तिथि साबित केलक। दुर्गानन्‍द मण्‍डल पोथी  समीक्षा- मौलाइल गाछक फूल जेना लगातार पाँच-सात सालक प्रचंड रौदी भेलाक बाद जौं रोहनि‍ नक्षत्रमे एकटा कसगर अछार हुअए तँ गि‍रहत सबहक मोन फुलकोका जकाँ खि‍ल उठैत छै। सभ कि‍यो खेत-पथार जोति‍, तामि‍-कोड़ि, खढ़-पतार सभ बाले-बच्‍चा मि‍ल ओलि‍-पालि‍ कऽ देबे सेबे बि‍हनि‍ खसबैत छै। गोर दसे दि‍नक पछाति‍ हरि‍अर कंच बि‍हैनक टेम बि‍रारमे नि‍कलए लगैत अछि‍। गि‍रहत सभ पोखरि‍-झाखरि‍ दि‍स दि‍सा-मैदान करैत बाँसक उभ्‍भीबला दतमनि‍ करैत लोटा नेनहि‍ बि‍रार दि‍स चल जाइत छथि‍। बि‍रारमे उपजल हरि‍अर कंच बि‍हैन देख आत्‍मा जुड़बैत छथि‍। देखते-देखते बि‍हैन पैघ भऽ जाइत अछि‍। गि‍रहत सभ ऐ आशामे, पाँच-सात सालसँ बर्खो नै भेल जौं ऐबेर समए संग देत तँ बाले-बच्‍चा मि‍ल खूब जतनसँ खेती करब आ ऐ रौदीसँ छुटकारा भेट जाएत। दि‍न दसे-पनरेहक बाद अारदारा चढ़ि‍ते खूब कसगर बर्खा भेल। आ गि‍रहत सभक आत्‍मा गुलाबक फूल जकाँ खि‍ल उठल। कि‍नको खुशीक कोनो सी‍मा नै। सभ बाले-बच्‍चे लाठी-बहि‍ंगा (पटै), हर-कोदारि‍, चौकी आदि‍ लऽ खेती करए लेल खेत दि‍स चललाह। आ कृपा महादेवक जे ऐ साल समए नीक रहल, संग देलक आ मनसम्‍फे उपजा भेल। सभ आनंदि‍त छथि‍। एकटा नव उत्‍साह आ आनंदक संग दोहाइ दै छथि‍न परमपि‍ता परमात्‍माकेँ। ठीक तहि‍ना उपन्‍यासकार जगदीश प्रसाद मंडल जीक द्वारा लि‍खल उपन्‍यास “मौलाइल गाछक फूल”सँ प्राप्‍त भेल खुशी आत्‍माकेँ तृप्‍त कऽ देलक। प्रो. हरि‍मोहन झा जीक बाद बुझू जे मैथि‍ली साहि‍त्‍याकासमे बड़का रौदी नै अपि‍तु अकाल पड़ि‍ गेल छल। पाठक-बन्‍धु हक्कोपरास छलाह, उपन्‍यास नामक वस्‍तु पाठककेँ हेरने नै भेटैत छलनि‍। आत्‍मा तँ उपन्‍यास पढ़ए लेल सदि‍खन व्‍याकुल रहैत छल। जइ कमीकेँ मण्‍डलजी दूर कऽ देलनि‍। लगातार एक-सँ-एक चि‍क्कन-चुनमुन उपन्‍यास लि‍ख ने मात्र भारते उपि‍तु आनो-आन देशमे रहएबला मैथि‍ली भाषीक नजरि‍मे ख्‍याति‍ पौलन्‍हि‍। अपन देशक कथे कोन नेपालक जनकपुरसँ लऽ तराइ क्षेत्रमे सेहो हि‍नक लि‍खल उपन्‍यास, कथा संग्रह, कवि‍ता संग्रह, नाटक, एकांकी इत्‍यादि‍ साहि‍त्यक सभ वि‍धा केर पोथी सहजताक संग उपलब्‍ध अइ। पोथी उपलब्‍धता सेहो मैथि‍ली साहि‍त्‍य लेल एक नवीन बात थि‍क। ओना ऐ लेल हम श्रुति‍ प्रकाशनकेँ अलगसँ धन्‍यवाद दैत छि‍यन्‍हि‍। प्रस्‍तुत उपन्‍यासमे अपने अपना अनुसारे कतौ कोनो तरहक कमी नै रखने छी। अपि‍तु सागरमे गागर भरि‍ समाजक सभ वर्ग, सभ जाति‍, स्‍त्री-पुरूष, ऊँच-नीच, छोट-पैघ, नीक-बेजाए, धनीक-गरीब, नेना-भुटका, जवान-जुआनक लेल एकटा अलग संदेस छोड़एमे कतौ कमी नै रखलनि‍, जे पाठककेँ एक साँसमे उपन्‍यास पढ़ि‍ जेबाक लेल बाघ्‍य कऽ दैत अछि‍। हमरा अनुसारे ई एकटा बड्ड पैघ उपन्‍यासकारक सार्थकता सि‍द्ध भऽ रहल अछि‍। यर्थाथवादी रूपमे गाममे रहितो उपन्‍यास पढ़ए काल एहन लगैत अछि‍ जे हम गाम नै अपि‍तु मद्रासमे छी। मुदा मद्रासक चािल-वाणि‍, रहब-सुतब, लोक सबहक बाजब-भुकब, पैघ-पैघ कोठा-सोफा, अति ‍आधुनि‍क पैखाना घर आदि‍ रहलाक बादो अपने अपना गामक माटि‍क यादि‍ नै बि‍सरि‍ सकलौं। जे रामाकान्‍त बाबू अपन गामक सोन्‍हगर माि‍टक सुगंधक सि‍नेहकेँ स्‍पष्‍ट करैत कहैत छथि‍- “हौ जुगे, बि‍ना माटि‍ये हाथ कोना मटि‍याएब?” उपन्‍यासक पात्रक नामक अनुसार गुणक वि‍लक्षण समाबेस करब अपने कतौ नै बि‍सरलौं। नामक अनुसारे कामकेँ अपने स्‍पष्‍ट देखौने छी। समाजक जे जेहन लोक जेहन पदपर पदस्‍थापि‍त छथि‍ ओइ कार्यक लेल समर्पण उपन्‍यासक विशेषता बतबैत अछि‍। ठाम-ठाम अध्‍यात्‍म, दर्शन, अपना संस्‍कृति‍ आदि‍केँ दर्शा देब सभ पाठकक लेल मोन राखक योग्‍य बुझना गेल। यथा- “ई भूमि‍ जनकक राज मि‍थि‍ला थि‍क। तेँ मि‍थि‍लावासीकेँ जनकक रास्‍ता पकड़ि‍ हमरा लोकनि‍केँ चलक चाही, जाहि‍सँ प्रति‍ष्‍ठा सभ दि‍न बरकरार रहत।” ऐ उपन्‍यासक प्राय: सभ पात्रक चरि‍त्र अति‍ पवि‍त्र, सामजि‍क समरसतासँ भरल बुझना जाइत अछि‍। हुनका लोकनि‍क सहज सज्‍जनता प्रकृत प्रदत्त बुझाइत अछि‍। समाज सुधारक जौं कोनो कथा हुअए तँ प्राय: सभ एक-दोसराक प्रति‍ ओतबे जि‍म्‍मेवार स्‍वभावत: बुझना गेल जे एकटा सुसभ्‍य समाजक सामाजि‍क चि‍ंतनक प्रति‍ कर्त्तव्‍यनि‍ष्‍ठ बुझना जाइए‍। उपन्‍यासक केन्‍द्रीय पात्र रामाकान्‍त बाबू छथि‍। एकटा नीक जमीनदार होइतो हुनकामे सामाजि‍क कर्त्तव्‍यपरायणता, ईमानदारी, समाजक सभ जाति‍क प्रति‍ सि‍नेह, उदारचि‍त्त वि‍चारधारा, वास्‍तवि‍क मानवतावादक चि‍त्र, मानवक प्रति‍ कर्त्तव्‍य, ओकर दुख-सुख, मरनी-हरनीमे संग पुरनाइ आदि चारि‍त्रि‍क वि‍शि‍ष्‍टता स्‍पष्‍ट देखल जाइत अछि‍। उपन्‍यासक आरम्‍भहि‍मे जखन कि‍ गाममे अकाल पड़ि‍ जाइ छै लोक सभ अन्न बेतरे मरए लगैत अछि‍। जन केँ काज कतौ नै भेटैत छै, खेती-खोलाक कतौ थाह-पथाह नै, लोकक घरमे दि‍नक-दि‍न चुल्हि‍ नै पजरै छै। इनारोक पानि‍ ससरि‍ ततेक नि‍चाँ चल गेलै जे उगहनि‍यो सभ छोट भऽ गेलै। आ एम्‍हर बौएलालक प्राण भुखसँ छुटै-छुटैपर छल। तेहने दुरूह समैमे रामाकान्‍त बाबू द्वारा बड़की पोखरि‍ उराहब, समाजक प्रति‍ सहानुभूति,‍ हुनक हृदैक महानता देखल जाइत अछि‍। ऐ तरहेँ एक तँ लोककेँ वि‍भि‍न्न प्रकारक अकर्मण्यतासँ बचा कऽ दोसर दि‍स अन्नाभावसँ ग्रस्‍त लोककेँ मरबासँ सेहो बचबैत छथि‍। रमाकान्‍त बाबूक अवधारणा ‘सर्वे भवन्‍तु सुखि‍न: सर्वे सन्‍तु नि‍रामया:, सर्वे भद्राणि‍ पश्‍यन्‍तु मा कश्‍चि‍द् दु:खभाग भवेत्’ केँ स्पष्‍ट कऽ दैत अछि।‍ तँए रामाकान्‍त बाबू सामाजि‍क समरसता लेल ि‍तयागक मि‍शाल स्‍वरूप अपन दू सए बीघा जमीन गामक भूमि‍हीन परि‍वारक बीच वि‍तरण करबा दैत छथि‍न। ठीक ओहि‍ना जहि‍ना चीनी राजा चेन्‍पौ कएने रहथि‍। जइसँ गामक सभ व्‍यक्‍ति‍ सुखी भऽ जाइ छथि, आ गाँधीवादी वि‍चारधारकेँ आरो मजगूती भेट जाइत अछि‍। अर्थात् व्‍यक्‍ति‍गत खुशी वा सुख-शांति‍सँ एकटा समाज सुखी नै भऽ सकैत अछि‍। बल्‍कि‍ सामाजि‍क सुख-शांति‍क लेल व्‍यक्‍ति‍गत सुख-शांति‍क ति‍याग करब मनुष्‍यक अहम कर्त्तव्‍य थि‍क। स्‍पष्‍ट अछि‍। मनुष्‍य एक समाजि‍क प्राणी थि‍क, जे सोनेलाककेँ वि‍पति‍ पड़लापर फुदि‍या द्वारा कहल गपसँ स्‍पष्‍ट होइत अछि‍। जे “भाय, तोरा जे हमर खूनक काज हेतह, हम सेहो देबह।” स्‍पष्‍ट अछि‍ जे समाजमे एहि‍ना सबहक काज सभकेँ होइ छै। उपन्‍यासक मध्‍यमे मण्‍डलजी गाम-घरमे पसरल धर्मभि‍रूताक चि‍त्रण करब सेहो नै बि‍सरलाह। जे सोनेलालक आंगनवालीकेँ बि‍मारीसँ ठीक भेलापर आयोजि‍त भंडारामे दू साधू दलक द्वारा जे एकटा वैष्‍णव आ कबीरपंथसँ सोनेलाल कोना लुटल जाइत अछि, उपन्‍यासकार एहन समस्‍याक प्रति‍ समाजकेँ सचेत करै छथि‍। आजुक मशीनक युग हमरा समाजकेँ कोन तरहेँ जोंक जकाँ पकड़ने अछि‍ जे तरे-तर शोणि‍त पीब रहल अछि‍ मुदा पता तक नै चलै छै, ई स्‍पष्‍ट करबामे शत-प्रति‍शत सफल छथि‍। कोन तरहेँ खून अपना खूनकेँ चि‍न्‍हबामे असमर्थ अछि‍ एकदम स्‍पष्‍ट अछि‍, जे महि‍न्‍द्रक पुत्र रमेश होस्‍टलसँ आबि‍ अपन पि‍ताकेँ गोड़ लागि‍ ठकुआ कऽ आगाँमे ठाढ़ भऽ जाइत अछि‍, बाबा-दादीकेँ नै चि‍न्‍हैत अछि‍। बादमे पि‍ताक कहलापर रमेश तीनू गोटेकेँ गोड़ लगलकनि‍। ऐ तरहेँ संयुक्‍त परि‍वारक महत्‍व जे मि‍थि‍लाक धरोहरि‍ छल, ओकरा एकल परि‍वार बुझु जे झकझौरि‍ कऽ राखि‍ देलक। जे मानवीय सि‍नेहक नष्‍ट होइत स्‍वरूप थि‍क। एे प्रकारेँ उपन्‍यास “मौलाइल गाछक फूल”मे सामाजि‍क जि‍नगीक वि‍भि‍न्न प्रकारक समस्‍या आ ओकर समुचि‍त समाधान तकबाक पूर्ण प्रयत्‍न केलनि‍ अछि‍। “मनुष्‍यसँ परि‍वार बनैत अछि‍ आ परि‍वारसँ समाज। जँ परि‍वार ठाढ़ भऽ जाए तँ समाज स्‍वत: आगू बढ़ए लागत।” मण्‍डलजीक सामाजि‍क भावना आदर्शवादी भावनाक रूपमे परि‍लक्षि‍त होइत अछि‍। जकरा धि‍यानमे रखैत मद्रासमे डाक्‍टरी करैत डॉ. महेन्‍द्रकेँ गाममे एकटा स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्रक स्‍थापनाक वि‍चार गामवासीक सेवा लेल देखाओल गेल अछि‍। उपन्‍यासमे जाति‍-पाति‍, धर्म-सम्‍प्रदायमे खंि‍डत भेल गाम-समाजमे छूआ-छूत, ऊँच-नीचक खाधि‍केँ रामाकान्‍त बाबू द्वारा भजुआ डोमक ऐठाम जा कऽ भोजन करब, समाजक बीच समरसता स्‍थापना आ छूआ-छूतक अंत कऽ एकटा आदर्शवादी पूर्ण समाधान देखौलनि‍ अछि‍। जेकरा अशि‍क्षासँ उत्पन्न लाइलाज बि‍मारीकेँ वि‍चार मात्रमे परि‍वर्त्तन कऽ एकसूत्रमे बन्‍हबाक प्रयास, वरदान साबि‍त भेल अछि‍। उपन्‍यासक समस्‍त नारी पात्र यथा- रधि‍या, श्‍यामा, सुगि‍या, सोनेलालक बहि‍न आदि‍मे पति‍परायणता सुख-दुखमे संग साथ देब, भारतीय नारीक मर्यादा स्‍पष्‍ट चि‍त्र उपस्‍थि‍त करबामे पूर्णत: सफल भेल छथि‍। सुमि‍त्राक पढ़ि‍-लि‍ख नीक नर्स बनब आ सुजाताकेँ पढ़ि‍-लि‍ख नीक डाक्‍टर बनब, नारीक अबला नै अपि‍तु सबला रूप देखबामे अबैत अछि‍। एतबे नै, उपन्‍यासक मादे मण्‍डलजी स्‍पष्‍ट दर्शा देलनि‍ अछि‍ जे गरीबो-गुरबामे ओ क्षमता छै जेकरा जँ कनि‍को सहयोग भेट जाए तँ ओ बहुत आगाँ बढ़ि‍ सकैत अछि‍। नारीक एकटा अलग स्‍वरूप काली-दुर्गा आदि‍ शक्‍ति‍क रूप सि‍ति‍या केर चरि‍त्र देखेबामे सफल रहलाह अछि‍। जखन आवारा छौड़ा ललबा ओकर इज्‍जति‍ लुटए चाहै छै तखन सि‍ति‍या ललबाकेँ लाते-मुक्के थुरि‍-थारि‍ कऽ राखि‍ दैत छै। बात ओतइ नै खतम होइछ अपि‍तु जखन ललबाक गौआँ सभ हसेरी बान्‍हि‍ सि‍ति‍या गामपर हमला करैत अछि‍ तखन सि‍ति‍या झाँसीक रानी बनि‍ सभकेँ परास्‍त कऽ दैत छै। ऐ तरहेँ मौलाइल गाछक फूल उपन्‍यासमे सहजता, समरसता, यथार्थवाद, आदर्शवाद, धर्मभि‍रूता, एकल एवं संयुक्‍त परि‍वारक रूप-रेखा खींचि एकटा मनोवैज्ञानि‍क वि‍श्लेषण रूपमे उपन्‍यासकार हमरा लोकनि‍क मध्‍य उपस्‍थि‍त छथि‍। हुनक ऐ ि‍वधासँ उपन्‍यास जगतमे एक्केठाम सभ तरहक सुख, आनंदक अनुभव होइत अछि‍। आजुक समाज जे सभ तरहेँ मौलाएल अछि, अपना उपन्‍यासक मादे उपन्‍यासकार मात्र एक आदमी रामाकान्‍त बाबूक हृदए परि‍वर्त्तन कऽ समाजमे एकटा नवका फूल खि‍लेबामे शत-प्रति‍शत सफल भेला अछि‍। रामाकान्‍त बाबू द्वारा अपन दू सए बीघा जमीन- सबहक माथपर एकहक बीघा खेत अर्थात् जेकरा सात गो बेटा ओकरा सात बीघा दऽ सभकेँ एकटा नव जि‍नगी प्रदान करैत छथि‍। एक नव जि‍नगी जे पूर्णत: मौलाएल छल ओइमे फूल खिला दैत छथि‍। हमरा आशा नै अपि‍तु वि‍श्वास अछि‍ जे श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलजी सन उपन्‍यासकार होथि‍ आ रामाकान्‍त बाबू सन नायक तँ अपन समाज रूपी मौलाएल गाछ मौलाएल नै अपि‍तु डगडगीसँ भरल गाछ बनि‍ फूलसँ लदि‍ सकैत अछि‍। अच्‍छेलाल शास्‍त्री रणभूमि‍ आ कवि‍ता नामक शीर्षक कवि‍तापर दू शब्‍द “रणभूमि”‍ कवि‍ता पढ़ि‍ कवि‍क भावसँ हृदए वि‍भोर भऽ उठल। काव्‍यक गहराइमे गोँता लगेलासँ देखबामे बहुत कि‍छु आएल। श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक काव्‍य भू-मंडलकेँ प्रभावि‍त करैत अछि‍, संसारक रणभूमि‍मे मनुष्‍यक जि‍नगीकेँ राखि‍ भौति‍क, अध्‍यात्‍मि‍क अर्थ ज्ञानसँ कर्म वा धर्मपर ध्‍यानाकर्षण करबैत अछि‍। वि‍वेकसँ संसार समरमे सामर्थवान योद्धा बनबाक प्रेरणा देल अछि‍। मातृभूमि‍क समस्‍याकेँ समूल नि‍दानक लेल कर्मवाण चला असत्‍यपर सत्यक वि‍जयक महाभारतक उदाहरण दि‍एलन्‍हि‍ अछि‍। मनुष्‍यक लेल सकल वसुधाकेँ सुख भोग क्रान्ति‍ लेल सतत् सचेष्‍ट भऽ जग रणमे, कर्मवीर बनबाक प्रेरणा देलन्‍हि‍ अछि‍। तन-मन वतन केर पवि‍त्रतापर जोड़ दैत वि‍ष अमृत पहि‍चानि‍ वि‍वेकसँ समए धरातलपर उतरल समस्‍याक प्रति सचेष्‍ट करौलनि‍ अछि‍। “कवि‍ता” शीर्षक कवि‍तापर- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल जी सम्‍पूर्ण कवि‍वृन्‍दकेँ अपन मनोभावनासँ चि‍ताकर्षण करौलन्‍हि‍ अछि‍। काव्‍यक सृजनात्‍मक वि‍धाक दि‍शा ि‍नर्देश कएलनि‍ अछि‍। मन स्‍थि‍ति‍ भावनाक प्रवाहमे ि‍त्रवेणी संगममे पाठक संग रचनाकारकेँ गोँता लगौलन्‍हि‍ अछि‍। छंद अलंकार वाणी आनन्‍द युक्‍त कवि‍तापर जोर देलन्‍हि‍ अछि‍। प्रा.परमेश्वर कापड़ि मानकताक बात विखपाद अछि ! मानकताक बात विखपाद अछि। हम नेपालक छी तएँ नेपालक बात करब आ कहब जे नेपाल नव निर्माण आ संघीय संरचना विकासक क्रममे अछि। ऐ ठामक लोक अपन संघीय राजभाषा, संस्कृति, जातीयता, क्षेत्रीयता, सांस्कृतिकता आ ऐतिहासिक-पौराणिकताक बाहुल्य एवं प्रभुत्वक प्रभाव चाहैत अछि। सोच छै जे ऐसँ हमर अस्मिताक पहचान बनत आ स्वायत्तताक बोध हएत, ई बा ऐ लोक लेखे प्रजातन्त्र आ गणतन्त्रोसँ पहिनेक चाहना अछि। हमरा सभकेँ भाषा संस्कृतिक बाहुल्यता संघीय राज, सांस्कृतिक पहचान आ राजनीतिक पहुँच दिअएतै आ दिअबितो छै! हमरा सभकेँ भाषिक सांस्कृतिक चेतना अस्मीता आ स्वायत्तता बोधसँ आबद्ध रहने ऐपर राजनीतियो खूब भऽ रहल छै आ आरो हेतै। एहनमे ई मानकताक बात पद-बराइ विद्वताक बात अछि आ ऐसँ ऐ सालक नेपालक जनगणनामे मैथिलीकेँ बड घाटा भेल छै। घेँट धऽ कऽ घेँट काटऽ बला सभकेँ कहब छै जे हम सभ अछि, छथि, छथिनबला नै छी। हए, हब, है-हुइ बजै छी, तैँ बजिका बजै छी। बजिका कहि भाषिक लाभ लभगरसँ हेतै आ एकर राजनैतिक सन्दर्भ अलगे छै। पूर्वी तराइमे थारु भाषा अपन अलगे पहचान आ संस्कार बना लेने अछि। सेहे नइ, हमरा सभकेँ सर्लाही, बाड़ा पर्सा जिला सभ के लोक जैंकि छथि, अछि, नइ बजैत अछि तैं अपनाकेँ मैथिली भाषी नै कहि पाबि रहल अछि। जे कोइ मानकताक हुड़फेर फेरऽ चाहैत छथि से ई बात किए ने बुझैत छथिन जे मैथिली भाषा असलमे लोकभाषा अछि, मैथिली संस्कृति लोक-संस्कृति अछि। ईएह हाल लोककला, लोकसंगीत, लोकसाहित्य, लोकगीत, लोकगाथा, लोक-चित्रकलाक अछि। जे सुधार विकास आ निखार आएल अछि ओ बहुत एम्हर आबि कऽ सेहो हफनियाबऽ दफनियाबऽ आ भाषा–संस्ककृतिपर राज करऽ वास्ते। मिथिलेमे रहिकऽ ब्राह्मण–कायस्थेतर लोक अपनाकेँ मैथिल आ अपना भाषाकेँ मैथिली भाषा नै कहि सकल अछि। आनक भाषाके सम्पर्कमे अएलासँ आनो लोक ओ भाषा सिखि जाइए। हमरा जनिते एकहि गाम समाजमे रहियोकऽ तथाकथित सोलकन आ छोटवर्णा अछि, छथि, छथिन नै बजलखिन्ह आ जतऽ कतौ बजलो होतै तँ से बहिया-खबास, नोकरनी-बहिकिरनी सभ। मनोविज्ञान देखल जाए जे विरुद्धमे जा कऽ लोक बहिष्कार केना करै छै। बाभन पहचानक अछि, छथि, छलह आ जनौकेँ ब्राह्मणेतर वर्ग भूलियो कऽ लवजपर नइ लएलखिन्ह! परिणाम भेलै जे अपने मिथिलामे मैथिलीक प्रचारमे कहऽ जाए पड़लै जे अहूँ मैथिल छी आ अहाँक भाषा मैथिली भाषा अछि, अहाँक संस्कृति मैथिली संस्कृति अछि। आइ किछु लोक कत्तऽ कहाँ के धोती–कुर्ता आ बभनौटी पागकेँ मैथिली संस्कृतिक पहचान सङे जोड़ैके घृष्टता कए रहलाह अछि। हमरा जनिते सए बरख तँ बहुत भऽ गेल, भल पचास वर्ष पहिने धरि अपना सभके पुरुख मानुष विद्यापति सनके चौन्ही पेन्हैत छलाह। चौवन्ही पेन्हनिहारकेँ एखन तेसर पुस्ता ठीकसँ अएबो नै कएलैए आ समाजमे बाभन छोड़ि आन केओ पाग पहिरते नै छै। जे जाति विशेषसँ आवद्ध अछि से पाग जँ मैथिली संस्कृतिक प्रतीक बनत तँ नै लगैए जे ई बात फेरु हमरे बाभनके थीक से भऽ जएतै? कोनो भाषा समाज आ संस्कृतिसँ जुड़ले रहैत अछि। हम सभ ब्राह्मणेतर छी तैँ हमरा सभकेँ बाउ माइ रहे, माताजी पिताजी नै रहथि! बाउए सभ दिन हर जोतलकै, कोदारि पाड़लकै, करीन पटएलकै, घर बन्हलकै खेती गिरहस्तीके सभ काज कएलकै। जैं पिताजी बाभनकेँ छलनि तैं ओ अएलाह, गेलाह, पुरहिती पण्डितारे कएलन्हि, लोटा सेहो चलौलन्हि। हमरा सभकेँ घरमे तिमना बनल, हुनका सभकेँ घरमे भोजन आ तरकारी बनलनि। ई लोक नुआ धोती, आ–जमा पेन्हलक ओ लोकनि संस्कृतक वस्त्र पहिरलथि। संस्कृतेमे काल्हि घरि पतर–पाँति भेजऽबलाकेँ मैथिली दाँवे–घावे ने अप्पन रहनि? हमरा सभमे बाउ हर जोतै है। भात खाइ है, माइ घास छिलै है, उसुन बनिहारी खबासी करै है, से जे कहै छै तँ ओकर सम्प्रेषणमे, कोनो मानकताक गैंची–मोड़ आ दर्थी-अनादर्थीकेँ मान-अपमान लगिते नै छै तँ आन लोक टिप धऽ कऽ ऐमे भाषिक विष किए पादत? फेरु नेपालक सन्दर्भमे कहब जे एखुनका समय सन्दर्भमे मानकताक नइ सभकेँ समेटबाक आवश्यकता छै, सेहो पोल्हा-पनियाँ कऽ! जनगणनामे ऐ विषय लऽ कऽ हमरा सभकेँ बहुते पापड़ बेलऽ पड़ल अछि आ धन्यवाद एतिुका राजनैतिक दल आ कार्यकर्ता सभकेँ जे ओहो लोकनि जे जेहन मार्तभाषा बजैत होथि अपन मार्तभाषा लखा मैथिलीक हक मै बड़ पैघ योगदान देलन्हि अछि। मानकता वर्ग भेद, जाति भेद, भाषाक राजनीति आ संस्कृतिके हिसाबे विखण्डनक काज करैत अछि। ऐसँ मैथिलीक विशाल बरगदके सोझे पाङि दकड़ि ठुठ एकपोड़िया बनाएब तँ अछिए, लोकगीत, लोककथा, लोकगाथा आ लोकभाषा–संस्कृतिपर सोझे लात मारि कात करब अछि। अतुलेश्वर पंडित गोविन्द झा, मैथिली आ अध्ययन आम पाठककें गोविन्द झाक नाटक, कथा आ हुनक लिखल विद्यापतिक आत्मकथा आकर्षित करैत अछि। मैथिली भाषाक अध्ययन कएनिहारकेँ हुनक साहित्य तँ आकर्षित करितहिं अछि, सभसँ बेशी आकर्षित करैत अछि हुनक भाषा पर कएल कार्य। हुनक साहित्यिक रचना आ भाषा वैज्ञानिक कार्य दुनू एक्के गति सँ चलैत अछि, निरंतर गतिशील आ चिंतनशील।  हेमनिमे हुनक एक गोट पोथी आएल अछि, मैथिली व्याकरण (अंग्रेजी सँ मैथिलीमे अनुवाद), जकर मूल रचयिता छथि अंग्रेज लोकनिक ग्रियर्सन साहेब, मैथिलक गिलेसन साहेब आ गोविन्द झाजीक अनुसार मैथिलीक पाणिनी। पं.जीक मैथिली भाषाक प्रति ई काज हुनक जिजीविषाकेँ देखबैत अछि, कारण जे काज युवा वर्ग आ मैथिली अध्यापककेँ करबाक चाहिएनि ओ काज पंडित जी अपन नब्बे बरिसमे कतेक मनोयोगसँ कएलनि अछि, तकर अनुभव सभ सहृदयी कए सकैत छथि। हुनक ऐ कार्यक हेतु हमरा लग कोनो शब्द नै अछि, जइसँ हुनक अभिवादन-अभ्यर्थना कएल जा सकए। कारण मैथिली भाषाक  भाषा वैज्ञानिक कार्य बहुत सीमित भेल अछि, जे भेल अछि ओ आंगुर पर गानल जा सकैछ, जखनि कि ओकर अध्ययन आ विवेचना स्वतंत्र भारत सँ पूर्व भऽ चुकल छल। एतए प्रश्न उठैत अछि जे आखिर ऐ अन्तरक कोन कारण? एतेक दिन भेलाक बादो आइयो बहुतो तकला पर उचित मैथिली व्याकरण भेटब मोश्किल अछि, जइसँ सभ अध्यवसायीक शंकाक समाधान भऽ सकनि। आइ हमरा सभकेँ छोटसँ छोटो व्याकरणीय समस्या लेल बहुत बेशी कसरत करए पड़ैत अछि। मैथिली भाषा वैज्ञानिक अध्ययनक शिथिलताक एकटा नमूना हम सद्य: देखल अछि। जखनि कतहु मैथिली भाषाक चर्चा होइछ तँ ओ कखनो एकरा बिहारी भाषा कहि तँ कखनो हिन्दीक बोली कहि सोचल जाए रहल अछि। सोचबाक विषय अछि जे ऐ भाषाक एहन गति किए? हमरा लोकनि मात्र शुद्ध आ अशुद्धक झगड़ामे लागल रहलौं। ई कखनो नै सोचलौं जे भाषाक वैश्विक विकास लेल साहित्यक रचनाक संग-संग ओकर भाषा वैज्ञानिक अध्ययन सेहो हेबाक चाही, ओना किछु कार्य भेल, मुदा  ओकर निरन्तरता नै रहल जकर कारण भेल मैथिली भाषा हिन्दीक माँझमे दबाइत गेल। ओना ई अनुभव हमरा हेमनिमे आर बेशी भेल  जखनि सम्पूर्ण भारतीय भाषा, जे संविधानक अष्टम अनुसूची मे  सम्मिलित अछि, ओकर एकटा कार्यशाला छलै आ कार्यशाला अपन-अपन क्षेत्रमे हेबाक चाही ऐ प्रकारक निर्देश छलै। मुदा मैथिलीक कार्यशाला  मिथिला कि बिहार तकमे नै भेल, एकर एक मात्र कारण देखाओल गेल जे मैथिलीमे भाषाविज्ञ नै छथि। किन्तु कारण किछु आन छलै आ ओ कारण छलै मैथिलीकेँ हिन्दीक बोलीक रूपमे स्थापित करबाक एकटा षडयंत्र। ऐ षडयंत्रमे जतेक दोषी ओ लोकनि नै छलाह ओइसँ बेशी हम मैथिल छी, कारण मैथिलीक नाम पर जे विज्ञ बजाओल जाइत छथि ओ बेर-बेर एतबहि कहताह, जेना हिन्दीमे होइ छै ओहिना मैथिलीमे सेहो हएत। आ मैथिली अपन स्वतंत्र अस्तित्वक लड़ाइ लड़बासँ पहिने हारि जाइत अछि। ई भऽ रहल अछि अक्षरकट्टु मैथिली विज्ञ लोकनिक कारणेँ। नाम लेब ऐ कारणेँ उचित नै जे ओ सभ बिन वजहकेँ प्रसिद्धि पाबि लेताह। हम ऐठाम ई प्रसंग ऐ कारणे देलहुँ अछि जे पंडितजीकेँ ई आभास छनि जे भाषाक लेल साहित्य जतेक आवश्यक छै, ओहिना ओकर भाषा वैज्ञानिक अध्ययन सेहो, जकर कारण छल ओ सुविधाक अभावोमे मैथिली भाषाक वैज्ञानिक अध्ययन करैत रहलाह अछि। मुदा ई एकटा प्रश्न उठैत अछि जे विश्‍वविद्यालयमे चाकरी कएनिहार आ मैथिली भाषाक विज्ञ कहौनिहार ऐ अध्यापक लोकनिकेँ किए नै ऐ बिन्दु दिस ध्यान जाइत छनि, ओ सभ मात्र सुविधा पएबाक जोगाड़मे किए लागल रहलाह आ आइयो छथि। एतेक वर्ष मैथिलीक अध्ययनक आरम्भ भेलाक बादो ऐ महानुभाव लोकनिकेँ ई आवश्यकता किए नै देखा पड़ि रहल छनि। एकर कारण अछि हुनका लग एतेक अथाह पानिकेँ उपछबाक समए नै छनि, हुनका लग समए मात्र छनि अपन गोटीकेँ ब्योंत धरएबाक। पुस्तकक प्रकाशन करताह मात्र ऐ लेल जे प्रोन्नतिक लाभ भेटतन्हि भलहि ओ पुस्तक कोनो उपयोगी सिद्ध हुअए वा नै। मुदा पंडित गोविन्द झाकेँ नै तँ ओइसँ प्रोन्नतिक लाभ होइत छनि आ ने कोनो आने लाभ। हँ, लाभ होइत छनि- यश लाभ, जे हुनक ऐ काजक माध्यमेँ मैथिलीकेँ एकटा स्वतंत्र अस्तित्वक संग-संग मैथिली भाषाक विशेषता देखि आनो प्रबुद्ध वर्ग आकर्षित हेताह। यदि मैथिली भाषाकेँ पूर्ण देखए चाहैत छी तँ ओकरा लेल सर्वप्रथम हमरा लोकनिकें मैथिलीक अध्ययनक विस्तृतताकें बढ़बए पड़त नै तँ हमरा लोकनि अपन भाषाक विशेषताकेँ प्रतिष्ठित नै कऽ सकब। एकरे परिणाम हएत जे हमर भाषाक विशेषता नुकाएले रहि जाएत आ दोसर जे केओ हमर भाषाक विषयमे कहत ओएह संसार मानत आ हम सभ ओहिना मुँह तकैत रहि जाएब। उमेश मण्डल नि‍र्मलीसँ जनकपुर धाम प्राय: बच्‍चेसँ जनकपुर धाम जेबाक जि‍ज्ञासा छल जे आयोजि‍त कथा गोष्‍ठी ‘‘सगर राति‍ दीप जरय’’ क ६९ म खेपमे शामिल भऽ ३ अप्रैल २०१० केँ पूरा भेल। जइ‍सँ दोहरी खुशी भेटल। चारि‍ए बजे भोरमे नि‍र्मली टीशनपर पहुँचलौं। करीब पॉंच बजे गाड़ी खुजल आ समएसँ सकड़ी टीशनपर उतरलौं। सकरीसँ जयनगरक मेल नै‍ रहने मेक्‍सी पकड़ि‍ मधुबनी गेलौं। मधुबनीसँ पुन: मेक्‍सी पकड़ि‍ कलवाही, नगर कोठी होइत जयनगर गेलौं। तखन अढ़ाइ बजैत रहै। जयनगरसँ जनकपुर लेल नेपाली ट्रेन तीन बजेमे खुलत से जानकरी भेल। तइ ‍बीच हम सभ भोजन केलौं आ समएसँ आबि ट्रेनमे बैसि रहलौं। मैक्‍सीमे जखन भीड़ आ गुमारसँ परेशान रही तँ मनमे हुअए जे कोनो तरहेँ जयनगर तक पहुँचक अछि‍। ओइठॉंसँ तँ ट्रेनक यात्रा रहत। मुदा ट्रेनक नमती आ भीड़ देखि‍ हुअए जे बसे जेकॉं हाल हएत। सएह भेल। मुदा तइयो मनमे खुशी रहए ि‍कएक तँ दस-बारह गोटाक संगवे रहए जइ‍सँ यात्रामे कोनो कठि‍नाइ नै‍ बुझना गेल, भरि‍ रस्‍ता गप-सप्‍प चलैत रहल। नव कथाकारक संग-संग श्री जगदीश प्रसाद मंडल आ श्री राजदेव मंडल सेहो संगमे रहथि‍, जे हमरा सबहक लेल सौभाग्‍य छल। गोसॉंइ लुक-झुक करि‍ते छल तावत् गाड़ी जनकपुर धाम पहुँचि गेल। ट्रेनसँ उतरि‍ हम सभ रामानन्‍द युवा क्‍लब जेबाक लेल आगॉं बढ़लौं। ि‍मथि‍ला महोत्‍सवसँ जनकपुर भरि‍ बाजारमे रमणीय वातावरण छल। जइ‍सँ चाह-जलपान केनाइ आकि रि‍क्‍सासँ गेनाइ सभ कियो ि‍बसरि‍ गेलाह। पएरे सभ बिदा भेलौं। देखैत-सुनैत समएसँ रामानन्‍द युवा क्‍लबमे प्रवेश केलौं। दोसर मंजि‍लपर पएर दइते रही आकि श्री राजाराम सि‍ंह राठौरजी भेंट भऽ गेला। हमरा सभकेँ देखते हाथ पकड़ि‍ बड़ी अहलादसँ यथोचि‍त स्‍थानपर लऽ गेलथि‍। उपस्‍थि‍त साहि‍त्‍यकार लोकनि‍केँ देखि‍ हर्ष भेल। रामानन्‍द युवा कल्‍व जनकपुर धाममे ३ अप्रैल २०१० ६९ म सगर राि‍त दीप जरय कथा गोष्‍ठीक उद्घाटन डॉ रामावतार यादव द्वारा कएल गेल। संयोजक श्री राजाराम सि‍ंह राठौर आ रामानन्‍द युवा कल्‍व रहथि‍। दीप जरा गोष्‍ठि‍क शुभारम्भ भेल। संयोजक महोदय श्री राजाराम सि‍ंह राठौर सभ व्‍यवस्‍था बड़ नीक जेकॉं कएने रहथि‍। कथा जानकीक नामसँ एकटा बैनर टांगल रहै। आदरणीय रमानन्‍द झा “रमण”जी पहि‍नहि‍सँ उपस्‍थि‍त रहथि‍। गोष्‍ठीक संचालन आदरणीय फूलचन्‍द्र ि‍मश्रजीकेँ देल गेलनि‍। गोष्ठी‍क शुरूहेमे दर्जन भरि‍ पोथीक लोकार्पण कएल गेल, जइमे मौलाइल गाछक फूल (उपन्‍यास) आ ि‍मथि‍लाक बेटी (नाटक)- जगदीश प्रसाद मंडल, भाग रौ आ बलचन्‍द्रा (नाटक)- ि‍वभा रानी, हम पुछैत छी (कवि‍ता संग्रह)- वि‍नीत उत्‍पल, नताशा (कॉंि‍मक्‍स)- देवांशु वत्‍स, अर्चिस (कवि‍ता संग्रह)- ज्‍योति‍ सुनीत चौधरी। नेपथ्‍य (नाटक संग्रह) आ नैमि‍कानन (कथा संग्रह)- सम्‍पादक- रेबती रमण लाल, ि‍मथि‍ला सृजन (पत्रि‍का) सम्‍पादक ऋृषि‍ बशि‍ष्‍ठ। वि‍देह- कथा २००९-१०, प्रबन्‍ध समालोचना २००९-१० आ वि‍देह पद्य २००९-१० सम्‍पादक गजेन्‍द ठाकुर जीक रहनि‍। ऐ‍ तरहेँ बारह गोट पोथी‍क लोर्कापणक सिलसिला करीब घंटा भरिक‍ रहल। फोटोग्राफर सभ फोटो खि‍चलनि‍। तइ‍बीच चाह-जलपान सेहो चलल। रजि‍स्टरपर सभ कथाकार अपन-अपन उपस्‍थि‍ति‍ आ कथाक नाम दर्ज केलनि‍। पहि‍ल कथा श्री सुरेन्‍द्र नाथ, दोसर श्रीमती ि‍वजेता चौधरीक आ तेसर ि‍वभूति‍ आनन्‍दक रहल। विभूति आनन्दक कथापर रौशन जनकपुरी नीक समीक्षा केलनि आ कथाकारक दृष्टि आ शिल्पपर प्रश्न उठेलनि, जकर बाद हीरेन्द्र कुमार झा विशेष रूपेँ अजित आजादकेँ ऐपर बाजैले कहलखिन्ह जखनकि नामित समीक्षकमे ओ नै रहथि। अजित आजाद रौशन जनकपुरीक समीक्षासँ खुश नै रहथि आ सात-सात हाथ फांगए लगला, जइसँ स्थिति असहज भऽ गेल। खएर.. फेर ि‍जज्ञासु जी, जगदीश प्रसाद मंडल, रौशन जनकपुरी, अरवि‍न्‍द ठाकुर, ऋषि‍ बशि‍ष्‍ठ, उमेश मंडल, रघुनाथ मुखि‍या, महाकान्‍त ठाकुर, चौधरी जयंत तुलसी, बेचन ठाकुर, कपि‍लेश्‍वर राउत, मनोज कुमार मंडल, खड़ा नन्‍द यादव, राजदेव मंडल, दुर्गानन्‍द मंडल इत्‍यादि‍ तीस गोट कथाकार कथा पाठ केलनि‍। तीन-तीन कथाक पाली होइत छल। एक पालीक पठित कथापर समी‍क्षा होइत रहए। प्रखर समी‍क्षक डॉ. रामावतार यादव, डॉ राजेन्‍द्र ि‍बमल, रौशन जनकपुरी, डॉ रमानन्‍द झा रमण, श्री ही‍रेन्‍द्र कुमार झा, श्री योगानन्‍द झा, श्री अजित आजाद आदि‍ अपन दृष्‍टि‍कोण दैत समीक्षा रखलखि‍न। ई सिलसिला राति‍ भरि‍ चलैत रहल। लागि‍ रहल छल जे ई नव कथाकारक लेल ट्रेनि‍ंग काॅलेज सदृश्‍य अछि‍। भि‍नसर छह बजे गोष्ठी‍क समापन भेल। अगि‍ला कथा गोष्‍ठी ७०म सगर राति‍ दीप जरयक प्रस्‍ताव श्री योगानन्‍द झाजी रखलनि‍। आदरणीय रमानन्‍द झा रमण जीक संग-संग सभ साहि‍त्‍यकार लोकनि‍ सहर्ष एकरा स्‍वीकार केलनि‍। रजि‍स्टर आ दीप श्री राजाराम सि‍ंह राठौर जी अगि‍ला कथा उत्‍पल हेतु श्री योगानन्‍द झा जीकेँ देलनि‍। एकबेर सभ खुशी-खुशी थोपड़ी बजेलनि‍। अगि‍ला कथा गोष्‍ठीक स्‍थान- कबि‍लपुर, लहेरि‍यासरय (दरभंगा), ति‍थि‍- १२ जून २०१०, संयोजक- श्री योगानन्‍द झा, कबि‍लपुर (दरभंगा)। बेरमा सगर राति‍मे श्रोता कथा-सागरमे डुबकी लगेलनि‍ मधुबनी जि‍लाक लखनौर प्रखण्‍डक बेरमा गामक मध्‍य वि‍द्यालय परि‍सरमे २ अक्‍टूबर २०१०केँ ‘सगर राति‍ दीप जरय’क ७१म आयोजन श्री जगदीश प्रसाद मंडलक संयोजकत्‍वमे सुसम्‍पन्न भेल। दीप प्रज्‍वलन सह उद्घाटन श्री उग्र नारायण मि‍श्र ‘कनक’ संध्‍या ६:३० बजे केलनि‍। तत्पश्‍चात डॉ. रमानन्‍द झा रमण बेरमाक स्‍व. वि‍जयनाथ ठाकुर (चेतना समि‍ति‍सँ जुड़ल रहथि) चर्चा करैत गामक (बेरमाक) साहि‍त्‍यक इति‍हासक चर्च केलनि‍। गोष्‍ठी‍क शुभारम्‍भ स्‍वागत गीतसँ, सपत्नी श्री संजीव कुमार ‘समा’, श्री अजय कुमार कर्ण, श्री बेचन ठाकुर, आ श्री जागेश्वर प्रसाद राउत जीक द्वारा भेल। तत्‍पश्‍चात ‘मंगलाचरण’क उच्‍चारण श्री शि‍वकुमार मि‍श्रजी केलनि‍। गोष्‍ठी‍क अध्‍यक्षता डॉ. तारानन्‍द वि‍योगी आ संचालन डॉ. अशोक कुमार मेहताजी केलनि‍। कार्यक्रमकेँ आगाँ बढ़ाओल गेल पोथीक लोकार्पणसँ जेकर सूची ऐ‍ तरहेँ अछि‍- १ प्रलय रहस्‍य (कवि‍ता संग्रह) लेखक- तारानन्‍द वि‍योगी, लोकार्पणकर्ता- डॉ. रमानन्‍द झा रमण, २ जीवन-मरण (उपन्‍यास) ले. जगदीश प्रसाद मंडल, लो.- श्री कुमार रामेश्‍वर लालदास आ श्री रमाकान्‍त राय ‘रमा’, ३ तरेगन (बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह) ले. जगदीश प्रसाद मंडल, लो.- डॉ. रमानन्‍द झा ‘रमण’ आ डॉ. फूलचन्‍द्र मि‍श्र ‘रमण’, ४ जीवन-संघर्ष (उपन्‍यास) ले. जगदीश प्रसाद मंडल, लो.- श्री अशोक (पटना) आ श्री उग्रनारायण मि‍श्र ‘कनक’, ५ सी.डी. ति‍रहुत्ता (वि‍देह ई-पत्रि‍का, ६०म अंक धरि‍) संपादक गजेन्‍द्र ठाकुर, लो.- डॉ. योगानन्‍द झा, श्री उग्रनारायण मि‍श्र ‘कनक’ आ श्री नारायणजी, ६ सी.डी. देवनागरी (वि‍देह ई-पत्रि‍का, ६०म अंक धरि‍) सं. गजेन्‍द्र ठाकुर, लो.- श्री अरविन्द ठाकुर, डॉ. तारानन्‍द वि‍योगी, डॉ. मंजर सुलेमान आ श्री अजीत आजाद, ७ नि‍बंध-तरंग (नि‍बंध-संग्रह) ले. श्रीपति‍ सि‍ंह, लो.- डॉ. रमानन्‍द झा ‘रमण’, ८ अलका (कथा संग्रह) ले. कमलकान्‍त झा, लो.- डॉ. धनाकर ठाकुर आ डॉ. खुशीलाल झा। छह गोट पोथी आ दू गोट सी.डी.क लोकार्पणक पश्चात कथा पाठ आ तेकर समीक्षा/ समालोचना प्रारम्‍भ भेल। चारि‍-पाँच कथा/ वि‍हनि‍ कथाक पाठ आ तेकर समीक्षा चारि‍-पाँच समीक्षकक एक पालीमे होइत रहल। ऐ‍ तरहेँ भरि‍ राति‍मे सात पालीक सुन्‍दर प्रदर्शन भेल। नव पुरान कथाकारक अलावे बाल-कथाकार सेहो अपन नूतन कथाक पाठ केलनि‍। कथा आ कथाक समीक्षा संपूर्ण श्रोताकेँ आकर्षित केलकनि‍। तइ‍पर श्रोताक टि‍प्‍पणी सेहो आएल। नव-कथाकारकेँ श्री अशोक, डॉ. फूलचन्‍द्र मि‍श्र रमण आ डा. रमानन्‍द झा रमणक संग-संग आरो समीक्षक प्रोत्साहित केलनि‍ आ दि‍शा नि‍र्दे‍श सेहो देलनि‍। अध्‍यक्षीय भाषणमे डा. तारानन्‍द वि‍योगी बेरमाक नव-कथाकारक संग-संग नव दृष्‍टि‍कोणक कथाकारक कथापर सकारात्‍मक वि‍चार रखलनि‍‍। श्रोताक मनोयोग श्रवणसँ प्रभावि‍त भऽ कथाकार लोकनि‍क उत्‍साह भरि‍ राति‍ बनल रहल। उपरोक्‍त वर्णित कथाकार आ समीक्षकक अलावे श्री कमलेश झा, श्री उमेश नारायण कर्ण, श्री शंकर झा, श्री बुचरू पासवान, श्री महेन्‍द्र नारायण राम, श्री वि‍नय वि‍श्वबन्‍धु, श्री रघुनाथ मुखि‍या, श्री आशीष चमन, श्री पंकज सत्‍यम्, श्री ऋषि‍ वशि‍ष्‍ठ, श्री राजदेव मंडल, श्री ि‍वनय मोहन ‘जगदीश’ इत्‍यादि‍क गरि‍मामय उपस्‍थि‍त छल। दर्जनोसँ ऊपर श्रोताक टि‍प्‍पणीमे- श्री रमण कि‍शोर झा, श्री शशि‍कान्‍त झा, श्री वी‍रेन्‍द्र यादव, श्री लाल कुमार राय, श्री घुरन राम, मो. श्री इब्राहि‍म, श्री दीपक कुमार झा, श्री राम वि‍लास साहु आ श्री राम प्रवेश मंडलक टिप्पणी महत्‍वपूर्ण रहल। श्रोताक अनेको वि‍षए-वस्‍तुपर टि‍प्‍पणीक संग-संग एकटा महत्‍वपूर्ण टि‍प्‍पणी श्री कपि‍लेश्वर राउत जीक द्वारा- ‘दर्जनक-दर्जन कथा पाठ भेल नीक लागल मुदा हम सभ कि‍सान छी कि‍सानी जि‍नगीक (खेती-बाड़ी) बात-चीत/ वि‍षए-वस्‍तुक चर्च कथामे नै‍ भऽ पाबि‍‍ रहल अछि‍।’ ऐ‍ टि‍प्‍पणीपर श्री अशोक अपन वि‍चार व्‍यक्‍त करैत कहलनि‍- ‘खेती-बाड़ी, कि‍सानी जि‍नगी आ गाम-घरक चर्चा वास्‍तवमे नहि‍ये जकाँ भेल अछि‍, ने सि‍र्फ मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे वरण् हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यमे सेहो एकर अभाव माने जतेक अबैक चाही ओते नै‍ आएल अछि‍।’ भि‍नसर छह बजे ऐ‍ ७१म गोष्‍ठीकेँ अन्‍त करैत श्री अरवि‍न्‍द ठाकुर (सुपौल) अग्रि‍म कथा गोष्‍ठी ७२म आयोजन हेतु दीप आ उपस्‍थि‍ति‍ पुस्‍ति‍का लेलनि‍। संयोजक श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल समापनक दू-शब्‍दमे कहलनि जे अगि‍ला गोष्‍ठी जतए-कतौ हुअए हमरा सभकेँ धि‍यान रहए जे डेग आगू मुँहेँ ससरए पाछू नै। आयोजनक अवसरपर श्रीमती प्रीति‍ ठाकुर रचि‍त पोथी ‘गोनूझा आ मैथि‍ली चि‍त्रकथा’क वि‍तरण कएल गेल। श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल रचि‍त पोथी- ‘गामक जि‍नगी’ लघु कथा संग्रहक वि‍तरण सेहो कएल गेल। संयोजकक मतानुसार ऐ गोष्‍ठीक आयोजनमे श्री कपि‍लेश्वर राउत, श्री उग्रनारायण ठाकुर, श्री अरूण झा, श्री वि‍न्ध्यनाथ ठाकुर, श्री शशि‍कान्‍त झा, श्री लक्ष्‍मी दास, श्री दयानन्‍द चौधरी, श्री बेचन ठाकुर, श्री ब्रह्मानन्‍द प्रसाद, श्री मनोज कुमार मण्‍डल आदि‍क वि‍शेष सहयोग रहए। सुपौलक कथा गोष्‍ठी : ४ दि‍सम्‍बर २०१० व्‍यापार संघ भवन सुपौलमे दि‍नांक ४.१२.२०१०केँ सगर राति‍ दीप जरयक ७२म कथा गोष्‍ठी श्री अरवि‍न्‍द कुमार ठाकुरक संयोजकत्‍वमे बि‍पल्‍व फाउण्‍डेशन आ प्रगति‍शील लेखक संघ द्वारा आयोजि‍त कएल गेल। साँझ ६ बजे प्रो. सचि‍न्‍द्र महतोजी दीप प्रज्‍वलन कऽ गोष्‍ठीक उद्घाटन केलनि‍। मंच संचालन श्री अजित आजाद जी केलनि‍ आ गोष्‍ठीक अध्‍यक्षता श्री रमानन्‍द झा रमणजी केलनि‍। ऐ‍‍ अवसरपर जीवकान्‍त जीक पोथी ‘एकहि‍ पच्‍छ इजोर'क लोकार्पण अजित आजादक माध्‍यमसँ अरवि‍न्‍द ठाकुर जी द्वारा भेल। कुल २१ गोट नव-पुरान कथाकार अपन-अपन नूतन कथा वा वि‍हनि ‍कथाक पाठ केलनि‍। जे ऐ‍‍ तरहेँ अछि‍- रंजीत कुमार खाँ राही- (फाेंक), रजनीश कुमार ति‍वारी- (गप्‍पी), अरवि‍न्‍द कुमार ठाकुर- (युटोपि‍या), अजित आजाद- (रोग), पंकज सत्‍यम्- (घुमैत पि‍बैत), महाकान्‍त ठाकुर- (शि‍क्षाक प्रयोजन), चौधरी जयंत तुलसी- (धीपल फाढ़), आशीष चमन- (नि‍ष्‍कर्ष), राजाराम सि‍ंह राठौर- (राखीक रंग फीका), वि‍जय महापात्र- (मोन कि‍एक पाड़लेँ), जगदीश प्रसाद मंडल- (दोहरी मारि‍), दुर्गानन्‍द मंडल- (लबकी कनि‍याँ), कपि‍लेश्वर राउत- (कि‍सानक पुजी), मनोज कुमार मंडल- (बेमेल बि‍आह), रामबि‍लास साहु- (गामक गाछी), बेचन ठाकुर- (अनैति‍क बि‍आह), संजय कुमार मंडल- (सि‍नेह), अकलेश मंडल- (टि‍टनेस), मुकेश मंडल- (लोभक फल), लक्ष्‍मी दास- (बूड़ि‍बकक बूड़ि‍बक) आ उमेश मंडल- (युगक खेल आ आधा भगवान)‍। प्रो. सचि‍न्‍द्र महतो, शैलेन्‍द्र शैली, महेन्‍द्र, अरविन्द ठाकुर पठि‍त कथापर समीक्षा केलनि‍। ओना तुलसी जयंत चौधरी, राजाराम सि‍ंह राठौर, जगदीश प्रसाद मंडल, महाकान्‍त ठाकुर, दुर्गानन्‍द मंडल, आशीष चमन, वि‍जय महापात्र इत्‍यादि सेहो‍ कि‍छु कथापर टि‍प्‍पणी केलनि‍। श्री अजित कुमार आजाद मंच संचालनक संग-संग पठि‍त कथा सभपर आ कएल समीक्षापर अपन कि‍छु वि‍चार-टि‍प्‍पणी करैत रहला, तहि‍ना संयोजक श्री अरवि‍न्‍द ठाकुरजी सेहो वि‍शेष बात रखलनि‍ जेकर कछु वि‍चारणीय अंश नि‍म्‍नांकि‍त अछि‍- भोजनक बादक समए छल। उमेश मंडल, कपि‍लेश्वर राउत, अकलेश मंडल, दुर्गानन्द मंडल, लक्ष्‍मी दास, रामवि‍लास साहु, मनोज कुमार मंडल, बेचन ठाकुरक कथा पाठ भऽ गेल छल। प्राय: एकसँ दू पालीमे। समीक्षक लोकनि‍ हि‍नकर सबहक कथापर बाजि‍ चुकल छलाह। जइ‍‍मे उमेश मंडलक ‘अाधा भगवान’ कथापर श्री शैलेन्‍द्र शैल, अरवि‍न्‍द ठाकुर, राजाराम सि‍ंह राठौर आ तुलसी जयंत चौधरी कर्मवादी कथाक रूपमे समीक्षा केलनि‍। जेकरा पुन: एकबेर दोहरबैत संचालक श्री अजित आजाद जी बजै छथि‍- “उमेश मंडलक कथा ‘आधा भगवान’ लोककेँ भाग्‍यवादीसँ कर्मवादी दि‍सि‍‍ लऽ जाइत अछि‍। वास्‍तवमे ई कथा कि‍सानी जि‍नगीक लेल नीक प्रयास मानल जाएत।”‍ अकलेश मंडलक कथा ‘टि‍टनेस’ आ दुर्गानन्‍द मंडलक कथा ‘लबकी कनि‍याँ'पर श्री अरवि‍न्‍द ठाकुर बजै छथि‍- “लबकी कनि‍याँ कथा मंडलजी बला, सुनलौं। ठीके शैलेन्‍द्र शैलजी कहलथि‍हेँ जे ई कथा वि‍षए-वस्‍तु‍क खि‍यालसँ ओहि‍ना लगैत अछि‍ जेना राजश्री प्रोजेक्‍टक सि‍नेमा चलि‍ रहल हुअए। अकलेश मंडलक कथा टि‍टनेसपर हम एतबए कहब जे ई कोनाे हेल्थ मेग्जी‍नमे छपैत तँ उत्तम। हमरा लगैए जे आइ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक चौराहापर कि‍छु ओहन आदमीक उपस्‍थि‍ति‍ भऽ रहल अछि‍ जे देखबा, सुनबा आ वि‍चार करबा योग्य अछि‍। आइ बेरमा कथा गोष्‍ठीकेँ लेल जाए। जेकर संयोजक जगदीश प्रसाद मंडल, मंच संचालक अशोक कुमार मेहता आ अध्‍यक्ष तारानन्‍द वि‍योगी रहथि‍। तँ हम कहलौं जे ई जे पौतीमे बन्‍द मैथि‍लीक दुर्दशा छल ओ आब फूटि‍ बहराएलहेँ। एकरा अहाँ की‍ कहि‍ सकै छि‍ऐ? आइ साहि‍त्‍यि‍क मंचपर टाल ठाेकि‍ कऽ ओ सभ चुनौती बुझू दऽ रहला छथि‍ जे कहि‍यो खबास होइत छलाह। एकरा अन्‍यथा नै‍‍ लेल जाए। जे सत्‍य छै ओ सोझाँ राखलौं अछि‍। जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा-उपन्‍यास जखन हमरा सभ पढ़ै छी तँ जेना लगैए जे एकटा नव दुनि‍याँमे प्रवेश पौलौं अछि‍। एकदमसँ ओहेन दुनि‍याँ जै दुनि‍याँक कल्‍पनो ने बुझू भेल छल। जहि‍ना वि‍षए-वस्‍तु, तहि‍ना शब्‍द-संयोजन, तहि‍ना दृष्‍टि‍कोण....। तँ आब अहाँ सभ ई बुझि‍यौ जे जगदीश मंडलजी एकटा एहेन रेखा खींचि‍ देलनि‍, जेकरा धि‍यानमे राखि‍ कऽ अहाँ कथा लि‍खी तँ उत्तम। आइ जइ वर्गसँ अहाँ सभ आबि‍ रहल छी ओइ वर्गमे माने कि‍सानी जि‍नगीक अनेकानेक वि‍षए-वस्‍तुक चर्च मंडलजी केलनि‍ अछि‍। ओकरा धि‍यानमे राखि‍ अहाँ सभ आगाँ लि‍खी।” अरवि‍न्‍द ठाकुरजीक वक्तव्यक बाद मैक लैत अजीत आजादजी बजै छथि‍- “अरवि‍न्‍द‍ बाबू ठि‍के कहै छथि‍। हि‍नका बातकेँ हम समर्थन करैत छि‍अनि‍। अहूँ सभ कथा गोष्‍ठीमे अबै छी, पहि‍ने तँ जगदीश मंडल एलथि‍ बादमे अहाँ सभकेँ सेहो अनलाह आ अबै छी। जगदीश मंडल आ उमेश मंडलजीकेँ आब हम सभ दूरेसँ चि‍न्‍है छि‍यनि‍। लेकि‍न अहाँ सभ ऐ बातकेँ बूझि‍यौ जे कथा केना लि‍खा रहलैहेँ। अबै छी.., कथा पढ़ै छी.. आ जाइ छी। बड़ नीक मुदा ई बुझि‍यौ जे जइ वर्गक अहाँ सभ लोक छी मतलब कि‍सान वर्ग, जे आधार भेलै, कृषि‍ आधार छि‍ऐ कि‍ नै छि‍ऐ? तँ ओइमे जे बात सभ छै, जटिलता सभ छै ओकरा अहाँ सभ नै लि‍खबै तँ के लि‍खताह...? तँ ई कहलौं जे एम्‍हर-ओम्‍हर नै लि‍ख ओ बात सभ लि‍खल जाए। जइमे एकटा बड़का रेखा, कहबे केलथि‍हेँ अरवि‍न्‍दबाबू जे जगदीश मंडल द्वारा खींचि‍ देल गेलहेँ। जँ एकरा नै धि‍यान राखब तँ गोष्‍ठीमे एनाइ-गेनाइ बुझू नीक नै‍‍। ओना ऐ गोष्‍ठी‍सँ बाहरो नि‍कालल जाइ छै।” ई गप्‍प अध्‍यक्ष महोदय दि‍सि‍‍ तकैत आ मुड़ी डोलबैत अजितजी बजलाह। फेर अगाँ बजै छथि‍- “आब एकटा खि‍स्‍सा सुनबै छी- यंत्रनाथ मि‍श्रकेँ गोष्‍ठीसँ नि‍कालल गेलनि‍, की यौ.....? आश्चर्य लागत जे गेट आउट कहि‍ देल गेलनि‍ माने गेटसँ बाहर कऽ देल गेलनि‍।‍” वातावरणमे खटमिट्ठी बुझू पसरि‍ गेल। एत्ते बात बजबाक प्रयोजनपर सभकेँ सभ तरहक चि‍न्‍तन-मनन हुअए लागल। दू-चारि‍ मि‍नटक लेल वातावरण शान्‍ति‍...। एकदम्‍म शान्‍ति‍, सन्नाटा। कि‍छु लोक एक-दोसराक मुँह दि‍सि‍‍ तकैत आ कि‍छु लोक गोष्‍ठीक गार्जियन (अध्‍यक्ष) श्री रमानन्‍द झा ‘रमण’जी दि‍सि‍‍ गोरसपट टकधि‍यान लगेने। मुदा जे कि‍छु....। आगाँ उमेश मंडल (माने हम), हमर नामक चर्च संचालक महोदय पहि‍नहि‍ उद्वोधि‍त कऽ चुकल छलाह, जे ऐ‍‍ पालीक पठि‍त कथापर हमहूँ कि‍छु टि‍प्‍पणी करबै, हम प्राय: छुब्‍ध रही जे ई कोन समीक्षा भेल। ऐ‍‍ तरहक समीक्षासँ नवाङकुरपर आखिर की‍ प्रभाव पड़तनि‍। खाइर जे से, हम आगू जा मैक हाथमे लैत बजलौं- “जहि‍ना पठित पालीपर समीक्षाक ‍बहाने अन्‍यान्न वि‍षए-वस्तुपर गप्‍प-सप्‍प राखल गेल अछि‍, कहल गेल अछि, तहि‍ना हमहूँ कि‍छु बात राखि‍ रहल छी। सभसँ पहि‍ने हम ओइ कथाकार सभकेँ कहि‍ देबए चाहैत छि‍यनि‍ जे पहि‍ल या दोसर कथा लऽ कऽ उपस्‍थि‍त भेलाह आ कथा पाठ केलाहेँ। सबहक कथामे यथार्थ अछि, सुन्नर अछि‍, कथ्‍य, शि‍ल्‍प, भाषा, शैली सभ कि‍छु उत्तम। एक्को पैसा उदास हेबाक प्रयोजन नै‍‍। दोसर गप्‍प- अपने सभ (समीक्षक) ऐ‍‍ बातकेँ बुझल जाउ जे जहि‍ना भोजक पाँति‍मे बैसल पंचक आगाँ पहि‍ल खेपमे परसल व्‍यंजनपर कोनो तरहक टि‍का-ति‍रस्‍कार माने ना-नुकूड़क बेवहार नै‍‍ कएल जाइत, आ दोसर-तेसर बेर माने परसन लेबा काल ई जरूर धि‍यान राखल जाइत जे की नीक आ की बेजाए....। तेसर बात- अपने सबहक द्वारा नव लोककेँ कहल गेलनि‍हेँ जे एना नै ओना आकि‍ ओना नै एना लि‍खू। कृषि‍ वि‍कासक बात लि‍खू आ से ई के लि‍खता अहीं सभ ने लि‍खबै। ठीक बात, मुदा इंजी‍नि‍यर डाॅक्‍टरक पढ़ाइ करैबलाक भरमार लागल अछि‍ आनो-आन क्षेत्रमे, जि‍नका पढ़ाइ-लि‍खाइक सुवि‍धा पर्याप्‍त छन्‍हि‍, नम्‍बर लगौने छथि‍। लेकि‍न कृषि-‍कार्यक पढ़ाइ हेतू कि‍ए ओ सभ विमुख भेल छथि‍। ई गप्‍प आ समस्‍याकेँ के लि‍खताह? ऐपर कथा कि‍ए नै लि‍खल जाइत अछि‍। ऐपर वि‍षएपर अहूँ सभ वि‍चार करू।” अपन बातपर वि‍राम लगा हम मैक संचालक महोदयक हाथमे दैत यथास्‍थान जा बैस रहलौं। गोष्‍ठी‍मे बैसल सभ कथाकार आ समीक्षकक मनमे जेना समीक्षाक नव-नव बि‍म्‍ब नाँचए लगलनि‍। अध्‍यक्ष महोदय सेहो उठि कऽ बैस रहला। अध्‍यक्ष महोदय दि‍सि‍‍ देखैत संचालक अजित अजाद एक बेर पुन: अपन बात स्‍पष्‍ट करैत बजलाह- “देखियौ, हमर कहब छल जे अहाँ सभ एत्ते दूरसँ एलौं, जेबा-एबामे बड़ कठि‍नाइ होइ छै। हमर कहबाक भाव रहए जे जहि‍ना जगदीश बाबू लि‍खै छथि‍, ओ जे रेखा खिचलनि‍हेँ, ओकरा धि‍यानमे राखि‍.....। अहाँसँ साहि‍त्‍यमे की‍ लाभ भेलै। मतलब की देलि‍ऐ? से जौं नै तखन तँ.....।‍” ऐ बातपर हम पुन: बाजलौं- “‍अजीत बाबू, अपने साहि‍त्‍यि‍क लाभक बात ऐ‍‍ नव लोकमे तकै छी। मुदा एक बेर अपना दि‍सि‍‍ देखल जाए जे स्‍वयं थोड़े खन पहि‍ने बजलाैंहेँ‍ जे सत्तरह सालसँ लगातार अहाँ सभ कथा गोष्‍ठी‍मे भाग लेलौं अछि‍। आइसँ नै सत्तरह सालसँ। मुदा कएकटा कथा संग्रह देलि‍ऐहेँ?” अजित आजाद- “अहीं जकाँ हमरा प्रकाशन नै ने भेट गेल जे......।‍ अक्‍खैन कि‍यो भार लेथि‍, हम परसू तक तीनटा कथा संग्रह थम्‍हा दैत छि‍यनि‍। लेकि‍न ओहोसँ पैघ बात जे कै स्‍तरक कथा सभ हमर वि‍भि‍न्न पत्र-पत्रि‍कामे छपि‍ चुकल अछि‍ आ कहि‍यासँ तेकरो तँ देखबै।” अगल-बगलसँ पाँच-छह गोटा एक्केबेर- ‘हँ, से तँ ठीके बात।’ ‘हँ से तँ ठीके बात।’ बजैत अागाँ‍क कथा पाठ लेल अग्रसरक वि‍चार प्रकट केलाह। माहौलमे परि‍वर्त्तन भेल। लगभग चारि‍टा कथापाठ फेर भेल आ तेकर संक्षि‍प्‍त समीक्षा सेहो कएल गेल। ताबत भि‍नसर ६ बाजि‍ गेल। श्री रमानन्‍द झा ‘रमण’ अपन अध्यक्षीय उद्वोधनमे उपरोक्‍त झजमझ (मतांतर)पर एक्को शब्‍द नै बजलाह। अगि‍ला कथा गोष्‍ठी‍क आयोजन श्री वि‍जय महापात्र जीक संयोजकत्‍वमे हुनके मातृभूमि‍ महिषीमे कएल जाएत, तइ‍ लेल सुपौलक संयोजक श्री अरवि‍न्‍द ठाकुरजीक द्वारा दीप आ उपस्‍थि‍ति‍ पुस्‍ति‍का भावी संयोजककेँ समर्पित करैत गोष्‍ठी‍क समापन कएल गेल। ७५म कथा गोष्‍ठीमे ३९ टा कथापाठ १० दि‍सम्‍बर २०११ केँ ‘सगर राति‍ दीप जरय’क ७५म कथा गोष्‍ठीक आयोजन बि‍हार को-ऑपरेटि‍व फेडरेशन हॉल, बुद्धमार्ग पटनामे कएल गेल। साँझ ०५:३० बजेसँ भि‍नसर ८ बजे धरि‍ गोष्‍ठी जमल रहल। संयोजक द्वय अशोक आ कमल मोहन ‘चुन्नू’ जीक ऐ आयोजनमे ३९ गोट कथा/ लघुकथा/ विहनि कथाक पाठ भेल आ तइपर दूटप्‍पी  समीक्षा सेहो कएल गेल। ऐ अवसरपर वि‍भि‍न्न वि‍धाक दर्जन भरि‍ पोथी लोकार्पणक संग १६ म वि‍देह मैथि‍ली पोथी प्रदर्शनी आ वि‍देहक सहायक संपादक मुन्नाजी द्वारा मैथिलीक पहिल विहनि कथा पोस्टर प्रदर्शनी सेहो रहए। श्रीमती प्रीति‍ ठाकुरक पोथी “मि‍थि‍लाक लोक देवता” आ वि‍देह समानान्‍तर साहि‍त्‍य अकादेमी मूल पुरस्‍कारसँ पुरस्‍कृत पोथी “गामक जि‍नगी” (जगदीश प्रसाद मण्‍डलक लघुकथा संग्रह), ऐ दुनू पोथीक एकहक सए प्रतिक वि‍तरण श्रुति‍ प्रकाशन केलक। मैथि‍ली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्‍त क्रान्‍तिक‍ ऐ ७५म गोष्‍ठीक दीप प्रज्‍वलि‍त कऽ वि‍धि‍वत् उद्घाटन केलनि‍ श्री राजमोहन झा। स्‍वागत केलनि‍ श्री अशोक, अध्‍यक्षता केलनि‍ श्री उग्रनारायण मि‍श्र ‘कनक’, संचालन डॉ. तारानन्‍द वि‍योगी। मुख्‍य अति‍थि‍ श्री श्‍यामानन्‍द चौधरीक उपस्‍थि‍ति‍मे कार्यक्रमकेँ आगाँ बढ़ाओल गेल पोथी लोकार्पण सत्रसँ जइमे १२ गोट पोथीक लोकार्पण क्रमश: ऐ तरहेँ भेल- १. नि‍बंध सुधा (नि‍बंध संग्रह, सुधा कुमारी) लोकार्पण श्री मोहन भारद्वाज, २. जखन तखन पत्रि‍का (प्रेम वि‍शेषांक, संपादक वि‍भूति‍ आनंद, अशोक मेहता) लोकार्पण डॉ. वासुकीनाथ झा, ३. कोसी कातक गंगा (संस्‍मरण, साकेतानन्‍द) लो. श्रीमती उषा कि‍रण खाँ, ४.ऐ अकाबोनमे (कवि‍ता संग्रह, राज) लोकार्पण- डॉ. रामानन्‍द झा ‘रमण’, ५. जुबैदा (कथा संग्रह, उग्रनारायण मि‍श्र ‘कनक’) लोकार्पण केलनि‍ श्री राजमोहन झा, ६.समय साक्षी थि‍क (विहनि कथा संग्रह, अनमोल झा)- लो. डॉ. देवशंकर नवीन आ श्री उग्रनारायण मि‍श्र ‘कनक’, ७.गंग नहौन (कवि‍ता संग्रह, नि‍शाकर) लो. डॉ. तारानंद वि‍योगी, ८. बेटीक अपमान आ छीनरदेवी (नाटक, बेचन ठाकुर)- लो. श्री राजमोहन झा, ९. अनचि‍न्‍हार आखर (गजल संग्रह, आशीष अनचि‍न्‍हार)- लोकार्पण- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री श्याम दरिहरे, श्री अनमोल झा, १०. जेना जनलि‍यनि‍ (संस्‍मरण, महेन्‍द्र नारायण राम ‘नीलकमल’)- लोकार्पण श्री मन्‍त्रेश्वर झा, ११. सीतावतरण (खण्‍डकाव्‍य, संपा. योगानंद झा) लोकार्पण श्री मोहन भारद्वाज, १२. गाममे (नेपाली भाषाक कवि‍ता संग्रह ‘गाओंमे हरू’ मूल कवि‍यत्री रेमीका थापा केर मैथि‍ली अनुवाद, प्रदीप बि‍हारी) लोकार्पण श्री अशोक। लोकार्पण सत्रक पछाति‍ कथा सत्रक शुभारम्‍भ भेल जइमे नवोदि‍त कथाकारक संग स्‍थापि‍त कथाकार लोकनि‍ अपन-अपन नूतन कथा/लघुकथा/ विहनि कथाक पाठ केलनि‍ जेकर सूची क्रमश: ऐ तरहेँ अछि‍- प्रदीप बि‍हारी- कोदारि‍, तारानंद वि‍योगी- वैदि‍क हि‍ंसा, मन्‍त्रेश्वर झा दूटा विहनि कथा- जगरनाथ, उजारि‍, पन्ना झा- प्रबोधन, मधुकर भारद्वाज- रीमोट, शशि‍कान्‍त झा- चोरबा वंश, लछमी दास- भरमे-सरम, बेचन ठाकुर दूटा विहनि कथा- भुखाएल आ अबाम, उमेश मण्‍डल दूटा विहनि कथा- चाेर-सि‍पाही आ काल्हि‍ दि‍न, अनमोल झा- समाङ आ अन्‍हार, रघुनाथ मुखि‍या- प्रलोभन आ नि‍चेन समयमे, दुर्गानन्‍द मण्‍डल- पोस्‍टमार्टम आ प्रदूषण, अजय कुमार मि‍श्र- उठह हौ बनि‍याँ हाट-बजार, मेनका बि‍हारी- घरारी, अरूणा चौधरी- अभि‍न्न, नि‍क्की प्रि‍यदर्शनी- पलायन, धीरेन्‍द्र कुमार- मररि‍या चेतल, कमलकान्‍त झा- मुँहतक्की, जगदीश प्रसाद मण्‍डल- परि‍वारक प्रति‍ष्‍ठा, हीरेन्‍द्र- हास्यपर व्‍यंग फ्री, अर्द्धनारीश्वर- घोड़ा घास, दि‍लीप झा- एकटा लघुकथा, रामवि‍लास साहु- स्‍वर्गक सुख, शि‍वकुमार मि‍श्र- प्‍लेटफार्म, नन्‍दवि‍लास राय- जाति‍, पंकज सत्‍यम्- महानता, दि‍लीप कुमार- पुरस्‍कार, उमेश नारायण कर्ण- अन्‍धवि‍श्वास, सुरेश पासवान- बगुलाक सरदार, जगदीश कुमार भारती- धुरफन्‍दीलाल, रामनारायणजी- सि‍नुरि‍या, ऋषि‍ वशि‍ष्‍ठ- देश प्रेम, पंकज कुमार प्रि‍यांसु- एकटा लघुकथा, मुन्नाजी- वि‍कल्‍प, धनाकर ठाकुर- ओ, श्‍याम दरि‍हरे- जौहर, वि‍भूति‍ आनन्‍द- वन-वे ट्रेफि‍क, देवशंकर नवीन- मोटर साइकि‍ल, भवनाथ झा- मंडनक मनोभाव (६५०-६७० ऐति‍हासि‍क घटना)। अधि‍क कथाकारक जमघट भेने पठित कथा सभपर समीक्षामे थोड़ेक कंजूशी कएल गेल जे स्‍वभावि‍क छल। मुदा तैयो कि‍छु कथापर कि‍छु वि‍शेष टि‍प्‍पणी अाएल जेना तारानंद वि‍योगीक पठि‍त कथा- वैदि‍क हि‍ंसापर जगदीश प्रसाद मण्‍डल कहलनि‍- यथार्थवादी कथा पूर्णतामे कंजूसी, सम्‍प्रदाय, धर्म आ अध्‍यात्‍म, तीनू तीन, कथा एक अंगक, मात्र समस्‍याक। समस्‍याक कारण आ नि‍दान सेहो हुअए। तहि‍ना कोदारि‍ कथापर दुगानंद मण्‍डल कहलनि‍- शीर्षकक सार्थकताक अभाव, खुरपीयोक दर्शन नै भेल। अही तरहेँ भवनाथ झाक पठित- मण्‍डनक मनोभाव कथापर धनाकार ठाकुर कहलनि‍- ऐ कथाक मादे वेदक नि‍ंदा कऽ मण्‍डन मि‍श्रकेँ गएर ब्राह्मण वि‍रोधी बताओल गेलहेँ जे गलत अछि‍, जेकर कोनो प्रमाण नै। तइ लेल‍ हम एकरा बहिष्‍कार करैत छी। ‍कहैत डॉ. धनाकर ठाकुर गोष्‍ठीसँ बाहर नि‍कलि‍ गेलाह! चलि‍ गेलाह!! अंतमे, अगि‍ला गोष्‍ठीक आयोजन हेतु प्रस्‍ताव लेल घोषणा कएल गेल। पूर्व प्रस्‍तावमे हजारि‍येबाग (कथा गोष्ठी) सँ दूटा प्रस्ताव छल जे क्रमश: अर्द्धनारीश्वर आ प्रदीप बि‍हारीक छलनि‍। एकटा नव प्रस्‍ताव डॉ. देवशंकार नवीन जीक आएल। ऐ तीनू प्रस्‍तावमे अर्द्धनारीश्वरक पुनः प्रस्‍ताव रहनि‍ जे गोष्ठी बोकारोमे हुअए, ओ ७४म कथा गोष्‍ठी (हजारीबाग) सँ प्रस्‍तावक छलाह। मुदा प्रदीप बि‍हारी प्रस्‍तावक तँ अहुठाम बनलाह जे अगि‍ला गोष्‍ठी बेगुसरायमे हुअए मुदा जहि‍ना हजारीबागक गोष्‍ठी पटना भेने चुप भऽ समर्थके बनि‍ गेल छलाह तहि‍ना अहुठाम ७६म गोष्‍ठी बेगुसरायमे हुअए तकर प्रस्‍तावक बनलाह मुदा देवशंकर नवीनक प्रस्‍ताव दि‍ल्‍ली लेल एने चूप भऽ समर्थक बनि‍ गेलाह। अर्द्धनारीश्वरक बातपर कोनो वि‍चार नै कएल गेल। अर्द्धनारीश्वर एक बेर बजैत सुनल गेलाह- ‘अर्जी ककरो मर्जी ककरो’। ‘मैथि‍ली भाषाक दशा ओ दि‍शापर परिचर्चा मि‍थि‍लांचल वि‍कास परि‍षद, लहेरि‍यासराय आ मि‍थि‍ला संघर्ष समि‍ति‍ दरभंगाक संयुक्‍त तत्‍वावधानमे दि‍नांक ८ नवम्‍बर २०११ तदनुसार मंगल दि‍न बेरू पहर दू बजेसँ परि‍चर्चाक आयोजन कएल गेल छल। परि‍चर्चाक वि‍षए रहए- ‘मैथि‍ली भाषाक दशा ओ दि‍शा’। सीतायन, दरभंगामे आयोजि‍त परि‍चर्चामे वक्‍ता लोकनि‍ महत्‍वपूर्ण वि‍चार रखलनि‍। मुख्‍य वक्‍ता डॉ. भीमनाथ झा कहलनि‍, कवि‍ कोकि‍ल वि‍द्यापति‍ अपन मातृभाषाक वि‍षएमे काव्याभि‍व्‍यक्‍ति‍क क्रममे कहने छथि‍- बालचंद वि‍ज्‍जावइ भाषा दुइ न लग्‍गइ दुज्‍जन हासा..। (मुदा ई पदावलीबला ज्योतिरीश्वर पूर्व बिनु पागबला विद्यापतिक नै वरन संस्कृत आ अवहट्ठक पागबला विद्यापतिक कथन छियन्हि- सम्पादक) इत्‍यादि‍ कहैत वि‍द्यापति‍क भाषानुरागक वि‍स्‍तृत व्‍याख्‍या  केलनि‍। परि‍चर्चाक अध्‍यक्ष श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल कहलनि‍- “मि‍थि‍ला आ मैथि‍ली भाषाकेँ हम सभ कुचलल आ कमजोर कि‍अए बुझै छी। यूरोपक दर्जनो प्रमुख देश आ ओकर भाषा एहेन अछि‍ जे दुनि‍याँक बीच अपन पहि‍चान बनौने अछि, जहन की‍ ओकर जनसंख्‍या आ क्षेत्रफल हमरा सभसँ माने मि‍थि‍लांचलसँ बहुत कम अछि‍? अपना ऐठाम तँ क्षेत्रे आ जनसंख्‍येक पाछू तेहन वैचारि‍क ओझरी लागल अछि‍ जे सभ रस्‍ते-पेरे बौआइ छी। जमीनी भाषा मैथि‍ली छी, जते दूरमे मैथि‍ली बाजल जाइए ओ मि‍थि‍ला भेल। जहि‍ना आनो-आनो क्षेत्रमे मातृभाषाक अति‍रि‍क्‍तो भाषा बजलो जाइए आ पढ़ौलो-लि‍खौल जाइए, तहि‍ना अहूठाम अछि‍। तहूमे हि‍न्‍दी तँ राष्‍ट्रभाषे छी। जहाँ धरि‍ साहि‍त्‍यि‍क मानक भाषाक प्रश्न अछि‍ ओ तँ कतौ ने अछि‍। दुनि‍याँक बीचमे अंग्रेजी साहि‍त्‍य सभसँ समृद्ध बुझल जाइत अछि‍, जखन कि‍ दू देशक कोन बात जे एको देशक भाषा साहि‍त्‍यमे एकरूपता नै‍ अछि‍। मि‍थि‍लाराज हेतु जे दशा-दि‍शा अछि‍ तै संबंधमे एकटा कथा कहै छी- द्वापर युगक संध्‍याबेला। अर्जुनक मनमे त्रेता युगक समुद्रमे पुल बनबैक वि‍चार उठलनि‍। लंका जेबाकाल समुद्रमे एक-एक पाथर जोड़ि‍ पुल कि‍अए बनौल गेल? ओ तँ एक तीरोमे बनि‍ सकैत छल? पम्‍पापुरमे हनुमान तपस्‍या कऽ रहल छथि‍, हुनके मुँहेँ सुनब बेसी नीक हएत। पम्‍पापुर पहुँचि अर्जुन प्रश्न केलखि‍न। मुस्‍कुराइत हनुमानजी उत्तर देलखि‍न जे पुल बनि‍ सकैए, मुदा जते मजगूत एक-एक पाथर जोड़लासँ बनत ओते तीरसँ नै बनि‍ सकैए। जइठाम बाहरसँ आन-आन भाषाक तेजीसँ आयात भऽ रहल अछि‍, गाम-गाममे अंग्रेजी माध्‍यमक स्‍कूल चलि‍ रहल अछि‍, अपन शि‍क्षा पद्धति‍केँ ि‍नर्मूल उखाड़ैक योजना बनि‍ रहल अछि‍, तइठाम मि‍थि‍लाराज आ मि‍थि‍ला दर्शनक सपना कते सार्थक अछि‍?” इत्‍यादि,‍ अपन वि‍चार व्‍यक्‍त केलनि‍। मि‍. वि‍. प. क अध्‍यक्ष डॉ. वि‍द्यानाथ झा, श्री बुद्धिनाथ झा, श्री फूलेन्‍द्र झा, श्री कि‍शोरी कांत मि‍श्र, डॉ. श्रवण कुमार चौधरी, श्री प्रभाष सहनी, श्री शि‍लानाथ मि‍श्र आदि‍ वक्‍ता, मैथि‍ली भाषाक उत्तरोत्तर वि‍कास यात्रापर प्रकाश देलनि‍। परि‍चर्चाक संचालन मि‍थि‍ला संघर्ष समि‍ति‍क अध्‍यक्ष श्री कमलेश झा केलनि‍। महाकवि‍ पण्डित‍ लालदास जयन्ती समारोह मधुबनी जि‍लाक खरौआ गाममे +२ उच्च वि‍द्यालय परि‍सरमे ०२ नवम्बर २०११ केँ महाकवि‍ पण्डित‍ लालदास, जे रमेश्वर रचि‍त मि‍थि‍ला रामायणक परिणेता छलाह, हुनक १५५म जयन्ती समारोह सुसम्पन्न भेल। ऐ अवसरपर जयन्ती समारोह, काव्यपाठ, महाकवि‍ परि‍चर्चा आ संस्कृति‍क कार्यक्रम वर्णित क्रमश: चारि‍ सत्रमे ‍सामापन कएल गेल। दि‍नमे ३ बजेसँ अधरति‍या धरि‍ ग्रामीण लोकनि‍ आ खरौआसँ बाहरोक लोक भाग लेलनि‍। आयोजन कमि‍टि‍क उद्घोषक समीर कुमार ‘समा’केँ समारोह सत्रक संचालन करबाक हेतु आ एच.वी. लालकेँ अध्यक्षता हेतु, हरि‍ नारायण झाकेँ मुख्यि अति‍थि‍ रूपमे आ जनक कि‍शोर लाल दास, लक्ष्मण झा, रंगनाथ चौधरी, कुमार रामेश्वरम्, रमानन्द झा ‘रमण’, जगदीश प्रसाद मण्डल, रधुवीर मोची आदि‍क नाओं वि‍शि‍ष्ट अति‍थि‍ रूपमे मंचपर वि‍राजमान हेबाक लेल घोषणा आयोजक कमि‍टि‍ केलनि। सभ कि‍यो मंचासीन भेलाह। ‍उप वि‍कास आयुक्त ओम प्रकाश राय दीप प्रज्जवलि‍त कऽ समारोह सभाक उद्घाटन केलनि‍। “महाकवि‍ पण्डित लालदास अपन कर्मसँ पण्डित छलाह। ब्राह्मण जाति‍मे नै रहलाक बादो हुनका राजदरबारमे पण्डितक उपाधि‍ भेटब ऐ बातक सूचक थि‍क।” ई बात समारोह सभाक अधयक्ष कहलनि‍। ओम प्रकाश राय खरौआ गामक संग मधुबनीये मात्र नै अपि‍तु सम्पूर्ण मि‍थि‍लामे एक-सँ-एक वि‍द्वान हेबाक बात कहलनि‍। ओ इहो कहलनि‍ जे मि‍थि‍लावासी लेल ई गौरवक बात थि‍क, जैठाम मनुष्य नै अपि‍तु मनुष्यक कर्म महान होइए। अपन टि‍प्पणीकेँ पुष्टि करैत ओ कहलनि‍- “महाकवि‍ पण्डित लालदासकेँ पण्डितक उपाधि‍ केना भेटलनि‍। जेकर उल्लेख अखने अध्यक्ष महोदय सुनौलनि‍ अछि‍।” अही परि‍पेक्ष्यमे आगाँ कहलनि‍- सभ मनुष्य जन्मसँ शुद्र होइए आ कर्मसँ ब्राह्मण। ऐमे जाति‍क कोनो महत्व‍ नै। ब्रह्म की थि‍क अहु संदर्भमे ओ अपन सुन्दर वि‍चार रखलनि‍। अंतमे अपन एक गोट ‘शेर’ सुनेलखि‍न‍‍। दर्शक-दीर्घापर नीक प्रभाव देखल गेल। थपड़ीक गड़गराहटि ऐ बातक सूचक बुझाएल। उपवि‍कास आयुक्त ओम प्रकाश राय जीक वाचन हि‍न्दी भाषामे छल, उपरोक्त संदर्भित बात हि‍न्दीसँ मैथि‍लीमे कएल भावानुवाद छी। राय जीक नम्ह‍र आ सुन्दर टि‍प्पणीसँ श्रोता जगतमे शान्तिक सुन्दर दर्शन सेहो भेल। एकर बाद एक आध गोट वि‍शिष्ट अति‍थि‍क टि‍प्पणीक पछाति‍ दोसर सत्रक माने काव्यगोष्ठी केर घोषणा करैत कहल गेल जे उचयचन्द्र झा ‘वि‍नोद’ गोष्ठीक अध्यक्षता करताह आ फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’ संचालन। संग-संग परि‍सरमे उपस्थित कवि‍ लोकनि‍केँ मंचपर शीघ्र आबए लेल आग्रह कएल गेलनि‍। ऐ शीघ्र आग्रहक आग्रह ओम प्रकाश राय जीक सेहो रहनि‍। अशोक कुमार मेहता, नन्द‍ वि‍लास राय, उमेश पासवान, वि‍द्याधर मि‍श्र, बुचरू पासवान, मो. गुल हसन, रामवि‍लास साहु, हरि‍श्चन्द्र हरि‍त, जगदीश प्रसाद मण्डल, चन्द्रेश, जनक कि‍शोर लालदास, राम सेवक ठाकुर, रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’, शशि‍कान्त झा, मनोज कुमार मण्डल, शि‍वकुमार मि‍श्र, लक्ष्मी दास, कपि‍लेश्वर राउत, अखि‍लेश कुमार मण्डल, उमेश मण्डल, कल्पकवि उमेश नारायण कर्ण आदि‍क संग गोष्ठीक अध्यक्ष आ संचालक मंचपर उपस्थित भऽ गेलाह। काव्यगोष्ठीक श्रीगणेश अशोक कुमार मेहताक कवि‍ता- ‘कने अपनो कहु आ कने हमरो सुनू’सँ भेल पश्चात् वि‍द्याधर मि‍श्र- ‘गेले घर छी’, बुचरू पासवान- ‘मि‍थि‍ला राज मंगै छी यौ’, हरि‍श्चन्द हरि‍त- गाम हेरा गेल, जगदीश प्रसाद मण्डल- ‘साँझ’, तेकर बाद रामदेव प्रसाद मण्डल, मो. गुल हसन, शशि‍कान्त झा, शि‍वकुमार मि‍श्र, रामसेवक ठाकुर, जनक कि‍शोर लालदास, चन्द्रेश, रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ आ एक-आध-टा अओर कवि‍ जीक कवि‍ता पाठ भेल। आयोजक दि‍ससँ अगि‍ला सत्रक कार्यक्रम माने परि‍चर्चा लेल आब ऐ गोष्ठीकेँ समापनक घोषणा जल्दिये हुअए, से आग्रह भेल‍। से आग्रह संचालक आ अध्यक्षसँ कएल गेल। अध्यक्ष उदयचन्द्र झा ‘वि‍नोद’ इशारामे संचालककेँ सहमति‍ देलखि‍न, संचालक फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’ अशोक कुमार मेहताक हाथमे मैक दैत कहलखि‍न जे ओ हुनकर नाओंक घोषणा कऽ देथि‍न। अशोक कुमार मेहता मैक हाथमे लैत कहलखि‍न- “आब अहाँ सबहक बीच ऐ गोष्ठीक संचालक डॉ. फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’ अपन एकगोट लयात्मक गीत सुनौताह।” बहुत सुन्दर ढंगे लय आ रागसँ पूर्ण गीतक गायन आराम-आरामसँ बहुत नीक सूरमे ओ केलनि‍‍। गीत सम्पन्न भेलाक बाद संचालक रूपमे आबि‍ लगले-सूरे घोषणा केलखि‍न‍- “आब अध्यक्ष महोदय डॉ. उदयचन्द्र झा ‘वि‍नोद’ जि‍नका अपने सभ नीकसँ जनैत हएब....।” इत्यादि‍ कहैत आ वि‍स्तृत परि‍चए दैत, हुनका आग्रह कएल गेलनि‍। उपस्थित भऽ अध्य‍क्ष महोदय अपन कवि‍ताक पाठ सुन्दर ढंगे केलनि‍, सहजता आ स्थि‍रतासँ पूर्ण पाठ, बहुत नीक शैलीमे केलनि‍। ई कवि‍ता गोष्ठीक अंति‍म कवि‍ता छल। कवि‍ताक समापन होइतहि‍ अध्यक्ष रूपमे आबि लगले-सूरमे ओ बजलाह- “आब काव्यगोष्ठीक समापनक घोषणा कएल जाइत अछि‍।” मंचपर उपस्थित- उमेश पासवान, रामवि‍लास साहु, नन्द वि‍लास राय, बेचन ठाकुर, कपि‍लेश्वर राउत, मनोज कुमार मंडल, लक्ष्मीदास, अखि‍लेश कुमार मंडल आदि‍ कवि‍ सुगबुगाए लगलाह। मैकपर आयोजकक उद्घोषक घोषणा करैत कहलनि‍- “मंचपर उपस्थित कवि‍मे जि‍नकर कवि‍ताक पाठ भऽ सकल ओ कृपया मंचासीन रहथि‍, हुनका सभकेँ सम्मानि‍त कएल जाएत। बाँकी कविकेँ‍ मंच खाली करबाक आग्रह करै छि‍यनि‍।” सएह भेल। कमि‍टी‍ दि‍ससँ कवि‍ लोकनि‍केँ (जि‍नकर-जि‍नकर कवि‍ता पाठ भऽ सकलनि) एकहक गोट चादरि‍सँ सम्मानि‍त कएल गेल। तेकर बाद तेसर सत्रक प्रारम्भ भेल जइमे महाकवि‍ लालदास परि‍चर्चा भेल। कमलेश झा, फूलचन्द्र मि‍श्र ‘रमण’, रमानन्द झा ‘रमण’, कुमार रमेश्वरम् आदि‍ वि‍द्वान भाग लेलनि‍। ऐ अवसरपर महाकवि‍ लालदास कृत ‘महेश्वर वि‍नोद’ पोथीक लोकार्पण समारोह सभामे मंचासीन सभ गोटे द्वारा कएल गेल आ ‘वि‍देह’ द्वारा आयोजि‍त १५म मैथि‍ली पोथीक भव्य प्रदर्शनी सेहो भेल। अंत सांस्कृति‍क कार्यक्रमक पछाति‍ भेल। संजीव कुमार ‘शमा’ महाकवि‍ पं. लालदास जयन्‍ती समारोह महाकवि‍ पं. लालदास जयन्‍ती समारोह आयोजन समि‍ति‍, खड़ौआ द्वारा पं. लालदासक १५५ म जयन्‍ती समारोह स्‍थानीय लालदास उच्‍चतर माध्‍यमि‍क वि‍द्यालय प्राङणमे समारोहपूर्वक ०२.११.२०११ केँ मनाओल गेल। समारोहक वि‍शि‍ष्‍ठ अति‍थि‍ जि‍ला उपवि‍कास आयुक्‍त श्री ओमप्रकाश राय, मुख्‍य अति‍थि‍ अवकाश प्राप्‍त शि‍क्षक श्री हरि‍नारायण झा, आयोजन समि‍ति‍ सह कार्यक्रमक अध्‍यक्ष क्षारखण्‍ड वि‍द्युत बोर्डक पूर्व चेअरमैन डॉ. हरि‍वंश लाल संयुक्‍त रूपसँ महाकवि‍क प्रति‍मापर पुष्‍प  अर्पण आ दीप प्रज्‍वलन कऽ समारोहक उद्घाटन केलनि‍। कार्यक्रमक शुभारंभ वंदनाक स्‍वागत गीतसँ भेल तत्‍पश्चात भी.डी.एस.एच संगीत महावि‍द्यालय झंझापुरक छात्र देवेन्द्र महतो पं. लालदास रचि‍त मङल गीत- ‘जय जय गि‍रि‍जा तनय गणेश’ गौलनि, जकर धुन श्रीमती अंजना शमा देने रहथि‍। वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍ श्री राय अपन उद्घाटन भाषणमे उद्गार व्‍यक्‍त  करैत बजलाह जे मि‍थि‍लाक माटि‍ स्‍वनामधन्‍य अछि‍। ऐठाम अदौसँ वि‍द्वानक परंपरा रहल अछि‍। अपन अध्‍यक्षीय भाषणमे डॉ. एच.वी. लाल कहलनि‍ जे महाकवि‍ जन्‍मसँ नै अपि‍तु कर्मसँ पांडि‍त्‍यकेँ चरि‍तार्थ केलनि‍। ओ कहलनि‍ जे हम सभ हुनक व्‍यक्‍तित्‍व आ कृति‍त्‍वसँ कृतार्थ छी। समारोहक मुख्‍य अति‍थि‍ श्री झा जयंती समारोह मनेबा लेल आयोजन समि‍ति‍केँ साधुवाद दैत कहलनि‍ जे पंडि‍तजीक जयन्‍ती मनौलासँ नव पीढ़ीकेँ हुनकर जीवन आदर्शसँ नव दि‍शा भेटतनि‍। ऐ अवसरपर पंडि‍त लालदास कृत मैथि‍ली पद्ममय पोथी ‘महेश्वर वि‍नोद’क वि‍मोचन वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍, मुख्‍य  अति‍थि‍ आ मंचासीन सम्‍मानि‍त अति‍थि‍ लोकनि‍ द्वारा भेल। सभ अति‍थि‍ लोकनि‍केँ फूलक मालासँ सम्‍मानि‍त कएल गेलनि‍। ऐ अवसरपर ‘वि‍देह साहि‍त्‍य आन्‍दोलन’क वैनर तले मैथि‍ली पोथी प्रदर्शनी सेहो छल। वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍क वि‍शेष आग्रहपर कवि‍ संगोष्‍ठीक आयोजन प्रथमे सत्रमे कएल गेल। जकर अध्‍यक्षता डॉ. उदय चन्‍द्र झा ‘वि‍नोद’ आ संचालन डाॅ. फूलचन्‍द्र झा ‘प्रवीण’क छल। संगोष्‍ठीमे जतए डॉ. अशोक कुमार मेहता, कल्‍प कवि‍ डॉ. उमेश नारायण कर्ण, डॉ. बुचरू पासवान, मो. गुल हसन, श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’, श्री चन्द्रेश, श्री शशि‍कान्‍त  झा, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, डॉ. जनक कि‍शोर लालदास, श्री. शि‍व कुमार मि‍श्र, श्री रामसेवक ठाकुर अपन-अपन काव्‍यपाठसँ श्रोताकेँ मुग्‍ध कलनि‍, ओहीठाम श्री शंभू कुमार दि‍न, श्री उमेश मण्‍डल, श्री नन्‍द वि‍लास राय, श्री लक्ष्‍मी  दास, श्री बेचन ठाकुर, श्री संजीव कुमार शमा, श्री उमेश पासवान, श्री रामवि‍लास साहु , श्री अकलेश कुमार मण्‍डल, श्री मनोज कुमार मण्‍डल, श्री कपि‍लेश्वर राउत आदि‍ कवि‍ अपन काव्‍यपाठसँ वंचि‍त भेलाह। कवि‍ संगोष्‍ठीक अध्‍यक्ष ऐ वास्‍ते  कोनो खेद नै व्‍यक्‍त कऽ सकलाह। आयोजन समि‍ति खड़ौआक तरफसँ ओइ सभ कवि‍केँ जि‍नकर-जि‍नकर कवि‍ताक पाठ भऽ सकल, शालसँ सम्‍मानि‍त कएल गेल‍। महाकवि‍क व्‍यक्‍ति‍त्‍व आ कृति‍त्‍व वि‍षयपर परि‍चर्चामे मैथि‍लीक समालोचक डॉ. फूलचंद्र मि‍श्र ‘रमण’ महाकवि‍क रचना ‘रमेश्वर रचि‍त मि‍थि‍ला रामायण’क पुष्‍कर काण्‍डपर गंभीरतापूर्वक प्रकाश दैत कहलनि‍ जे महाकवि‍केँ दर्शनक साक्षात्कार छल। मि‍थि‍लामे चंदा झाक रामायण पूर्वहि‍ प्रकाशि‍त भेल छल तँए ई पूर्वहि‍सँ लोकप्रि‍य भेल। डॉ. रमानंद झा ‘रमण’, डी. ई. पी. नि‍देशक श्री रंगनाथ चौधरी दि‍वाकर, श्री कमलेश झा, श्री कुमार रामेश्वरम, श्री भरत नारायण कर्ण आ मैथि‍ला अकादमीक पूर्व नि‍देशक डॉ. रघुवीर मोची सन मैथि‍लीक उदभट वि‍द्वान लोकनि‍ अपन शोधपूर्ण सारगर्भित व्‍याख्‍यान देलनि‍। साझूँ परक कार्यक्रममे कस्‍तूरबा गांधी बालि‍का वि‍द्यालय सकरीक छात्रा लोकनि‍ द्वारा जट जटीन, झि‍झि‍या आ डोमकच नृत्‍यक भावपूर्ण प्रस्‍तुति भेल। संदीप कुमार पंकज, चंदन, श्यामा, प्रीति‍, अंशु अपन गायनसँ श्रोतावर्गकेँ झूमएपर मजबूर कऽ देलनि‍। ओतहि‍ हास्‍य सम्राट श्री रामसेवक ठाकुर अपन गप-सप्‍पसँ श्रोतावृंदकेँ लोट-पोट केलनि‍। संपूर्ण कार्यक्रममे बैंजोपर राजकुमार महथा, नालपर महेन्‍द्र ठाकुर मन्‍नू, पैडपर चीकू, तबलापर शीतल अपन कुशल संगति‍ प्रदान केलनि‍। जयंती समारोहक उद्घोषक एस.के.कर्ण शमा कार्यक्रमक सफल संचालन साहि‍त्‍यि‍क अंदाजमे कऽ श्रोतावर्गपर अपन खास प्रभाव छोड़लनि‍। आयोजन समारोहकेँ सफल बनेबामे सुनील कुमार दास, डाॅ. अरवि‍न्‍द लाल, श्री योगानंद लाल दास, श्री अजय कुमार दास, श्री राजेन्‍द्र कुमार दासक संग संपूर्ण ग्रामवासीक भूमि‍का सराहणीय छल। सचि‍व भागी‍रथ लालदासक धन्‍यवाद ज्ञापनक संग समारोह शेष भेल। मुन्नाजी मैथिली गजलपर परिचर्चा मैथिली गजल: उत्पत्ति आ विकास (स्वरूप आ सम्भावना) मैथिली गजलकेँ लोकप्रिय होइत देखि बेगरता बुझाएल एकरा पूर्ण रूपेँ फरिछेबाक। तेँ विदेह www.videha.co.in ISSN 2229-547X द्वारा “मैथिली गजल: उत्पत्ति आ विकास (स्वरूप आ सम्भावना)” विषयपर परिचर्चाक आयोजनक भार हमरा देल गेल। ऐ विषयपर लेखक लोकनिक विचार संक्षिप्तमे नीचाँ देल जा रहल अछि।- मुन्नाजी १ सियाराम झा “सरस” मुन्नाजी, मैथिली गजलपर परिचर्चाक आयोजन नीक लागल। बन्धुवर, मैथिली गजल सम्बन्धी हमर मान्यता एना अछि:- १)उत्पत्ति: पण्डित जीवन झाक नाटक “सुन्दर संयोग” (१९०५-०६) मे सर्वप्रथम मैथिली गजलक आगमन पबैत छी। तइसँ पूर्वक कोनो सूचना नै देखा पड़ैछ। तँए उत्पत्ति हम एतैसँ मानैत छी। २) विकास: विगत १०६ बर्खक इतिहासमे गुणात्मक नै जँ संख्यात्मके चर्चा करी तँ अमरजी, माया बाबू (गीतल कहि कऽ), केदार नाथ लाभ, सोमदेव, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, स्व. मार्कण्डेय प्रवासी, स्व. इन्दुजी, राजेन्द्र बिमल, गंगेश गुंजन, बुद्धिनाथ मिश्र, सियाराम सरस, स्व. कलानन्द भट्ट, डॉ. देवशंकर नवीन, डॉ. तारानन्द वियोगी, रमेश, भ्रमर, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, जगदीश चन्द्र ठाकुर “अनिल”, अरविन्द ठाकुर, अशोक दत्त, रोशन जनकपुरी, अजित आजाद, कु. मनीष अरविन्द, डॉ. कृष्णमोहन झा “मोहन”(राँची), आशीष अनचिन्हार समेत दर्जनो रचनाकार एकरा पुष्ट-बलिष्ट केलन्हि अछि। कथन आ भंगिमामे सेहो विविधता आएल अछि। दर्जनसँ बेशी संकलन नोटिस लेबा योग्य उपलब्ध अछि। विकास अखनो भऽ रहल अछि। ३) स्वरूप आ संरचनामे यथास्थान अछि। बहरक विकास गजलकारक अपन क्षमतापर निर्भर होइछ, किछु अध्ययन-मननपर सेहो। मैथिलीमे शेर तँ कहैत छी, मुदा मिसरा वा मतला-मकता आदिक प्रयोग नै कएल जाइछ। लोक बात-बातमे शेर नै कहैछ। ४) सम्भावना- नव-नव लोक सभ जुड़ि रहल छथि, संकलनो आबि रहल अछि, परिचर्चो शुरू भेल अछि, से चलैत रहए। आशीष अनचिन्हार जे योजना आरम्भ केलनि अछि, सेहो महत्वपूर्ण बिन्दु थिक। खरा-खरी कहबाक नाम छी गजल..गाम-घरमे दिवा रातिमे; हवा जकाँ बहबाक नाम छी गजल।-सरस। २ गंगेश गुंजन धन्यवाद जे ऐ मैथिली-गजल परिचर्चामे अहाँ हमरो शामिल कएलौंहेँ। ओना तँ अहाँ लोकनिक मैथिली गजलक परिभाषा-मान्यताक आन्दोलनमे स्वयंकेँ हम मैथिलीक गजल रचनाकारक श्रेणीसँ बाहर मानि लेने रही। किछु अर्थमे एखनो सएह अनुभव होइत अछि। तथापि - १.मैथिली गजलक प्रारम्भ अपने पं जीवन झासँ मानी बा विद्यमान रवीन्द्रनाथ ठाकुुुर सँ (अप्रिय-अनसोहाँत लगनु भने किनको, तथापि) ओइ ‘खास’ प्रवर्तन-गजलक मूल पाठ सेहो पाठकक सोझाँ देब उचित। नव भावबोधकेँ, नवतुरिया कवि-पीढ़ीकेँ से देखलाक बादे तकर मीमांसाक आधार भेटतै। हमर लाचारी अछि जे साहित्येतिहासक ने हम ओतेक आग्रहीए रहलौं आ तेँ ने अन्वेषके। मुदा तकर ‘उत्स’ आभास, निजी हमरा अहीमे सँ कतौ बुझाइछ। यद्यपि कोनो प्रयोग, विशेषतः साहित्य बा कला-विधामे, मात्र एतबे बात लेल ओइ रचनाकार बा ओइ विधाक ‘प्रारम्भ’ नै मानि लेल जएबाक चाही जे ‘ओ’ पहिल बेर ‘लीखल’ गेल। से पहिल बेर लीखल गेल विधा-रचना, अपन साहित्यिक प्रवृत्तिक स्वरूपमे निरन्तरतासँ कहाँ धरि सृजन-सक्रिय रहल? आगाँ रहबो कएल कि नै? असल मूल्य मानक सएह थिक। कोनो साहित्यक आयु ओकर जीवन्त आ प्रवहमान प्रयोगक काल मात्रहिमे देखल-बूझल जाइछ। हिन्दीमे छायावादी महाप्राण निराला तथा प्रसाद, संयोगसँ  एतऽ हमर ऐ दुनू सिद्धान्तक युगीन आ मूर्त्त उदाहरण छथि। ई दुनू ‘छायावाद’क स्तम्भ छथि आ ‘गजल’ सेहो लिखलनि। मुदा ‘गजल’ मे तँ आइ दुनूक आयु इतिहास मात्र अछि। तेँ मैथिली गजलपर विचारैत काल से महत्वपूर्ण बिन्दु। रचनाकारो काल लेखनक अपन मौलिक रुचि-प्रवृत्ति तथा अभ्याससँ फराक जा, तात्क्षणिक आवेशेँ ‘अन्यो विधा’मे टहलि-बूलि अबैए। परन्तु से आवेश निरन्तरतामे ओकर सर्जनाक स्वाभाविक प्रवृत्ति नै बनि पबै छै, यावत ओइ नव विधामे सृजन करबामे ओकर मोन रमि नै जाइक। हिन्दीक दुष्यन्त कुमार कविताक प्रारम्भ ‘गजल’ सँ नै कएने रहथि जे कि आगाँ आबि कऽ अपन उत्तर पीढ़ीक प्रेरणा भेलाह। से दुष्यन्ते जी भेलाह, जखन कि शमसेर बहादुर जी सन प्रशस्त पैघ कवि ‘गजल’ लीखि रहल छलाह। आनो कए टा नाम अछि, जे हिन्दीमे महत्वपूर्ण। मुदा गजल विधा-लेखनमे ऐ सघन निरन्तरताक श्रेय हम तँ दुष्यन्ते जीकेँ मानैत छी। अपने विचारियौ जे मधुप जी चाहितथि तँ गजल सेहो उत्कृष्ट नै लीखि सकैत छलाह? नै लिखलनि। किए? बा यात्री जी ? कविक  अनुभव-आनुभूतिक विकलता ओकरासँ प्राथमिकता तय करबैत छै- जे ओ की आ कोना कहए-लिखए। सएह प्राथमिकता रचना प्रक्रियामे रचनाकारकें अपन स्वभावक फ्रेममे उद्वेलित करै छै आ कवि से शैलीक बाट धरबा लेल सृजन विवश भऽ होइत अछि। सभ कविक तेँ अपन-अपन रुचिक खास विधा सेहो भऽ जाइ छै। सएह ओकर अभिव्यक्तिक सहज स्वाभाविक तागति बनि जाइ छै। कालांतरमे समाज मध्य ताही रूपमे ओकर परिचिति बनि जाइ छै। सएह मोटा-मोटी सुमन-मधुप-मणिपद्म-अमर तथा यात्रीक रूपमे चीन्हल जाइ योग्य होइछ। एखन मैथिली-गजलक प्रवाह ‘बाढ़ि’ बला अछि, यद्यपि स्नेह आ स्वागत करबा योग्य। किएक तँ मुख्यतः प्रवृत्तिक ई सृजन-प्रवाह एकछोहा ‘युवापीढ़ी’क थिक आ यदि मैथिली गजलक कोनो भविष्य छै तँ एही पीढ़ीक  सृजन-सम्पदामे। एक बएग जे ई सघन आ कए तरहें संगठित सेहो, ऐ विधाक प्रति उत्कट आग्रह आ ताही कारणें सक्रिय निरन्तरता आएल छै, से अगिला दशक धरि उल्लेख करबा योग्य स्वरूप लऽ लेत, ऐ बातमे हमरा कोनो संदेह नै। अवश्ये ऐ परिवेश-निर्माण मे ब्लॅाग/ फेसबुक/ अर्थात इन्टरनेट महाशक्तिक अपूर्व योगदान अछि, जे हमरा युगक नव रचनाकारकेँ नै छलै। अभिव्यक्ति सम्प्रेषण-माध्यम अत्यन्त सीमित छलै। तेँ मैथिली-गजलक वास्तविक ‘प्रस्थान’ हम एकदम टटका पीढ़ीमे पबैत छी। नव गछुली अछि एखन। बताह भऽ कऽ मजरल अछि। एकर कतेक मज्जर टिकुला भऽ पाओत आ कतेक ‘गोपी’ धरि परिणत हएत से देखबा योग्य हएत। आशा-अभिलाषा तँ ‘नव गछुलीए’ सँ। निश्छल तथा उदार बुद्धिये एकर अभिसिंचन-संरक्षण हेबाक चाही। से दायित्व पूर्व खाढ़ीक बचलाहा जीवित रचनाकारक। यदि नवतुरियाकेँ से स्वीकार होइक, जे कि अधिकांश नव रचना आ रचनाकारक ‘तेवर’मे परिलक्षित नै बुझाइछ। जइ गजलक ई गहन विमर्श कऽ रहल छी, तकर ‘जन्मभूमिक भाषा’ मे आइयो ‘इस्लाह’क परम्परा काएम छै। मान्य, श्रेय-प्रेय। ओना यथावत ताइ दिनबला गुरु-शिष्य परम्पराकेँ हमहूँ नै मानैत छी। आजुक युग आ वातावरणमे आब उचितो नै हएत से। मुदा कोनो विद्याक सरिता धार, जेँ कि एखनो प्रवाहित भइए रहल छै, तेँ किछु दूर धरि, पुरना ‘घटबारोक’ जरूरति बाँचले छै। तै अर्थमे कहलौं। सम्प्रति गजल-रूपमे लिखल गेल समस्त मैथिली-गजलकेँ चालल जाए तँ साबुत गजल दू गाहीसँ बेसी भरिसक्के निकलत। चनकल, टूटल-भांगल रचनाक गनती नै हुअए। से तँ कहबे कएलौं ‘बाढ़ि’ आएल अछि। अप्रिय परन्तु हमर जानकारीक यथार्थ यएह कहैए जे मैथिलीमे गजलक नामे लिखल जाइत रचनाक अधिकांश ‘खखरी’ अछि। उत्सुकतामे हम फेसबुकपर विशेष कऽ नव हस्ताक्षर सभकेँ पढ़बे करैत छी। मुदा फालतू,..सँ आगाँ बुझाए लगैत अछि। एक-दू टा रचना पढ़ैत काल तँ जीह ओकियाय लागल। हमर बात उत्कट लगैत हुअए भने मुदा एकटा पाठकक रूपमे हमरा एहनो अनुभव भेलए। दोसर जे, आजुक पीढ़ीक रचनाकार हमरा बेसी काल ‘बहर-मैनिया’ सँ ग्रस्त बुझाइछ, से माफी देब। दोसर रूपे कही तँ ‘बहर’क ‘ऑबसेसन’ सीमा तक आग्रही बुझाइत छथि। बहर अंततः साँच मात्र थिक। फ्रेम । ‘रूह’ नै। हम जखन रेडियोमे रही तँ हमरे कोठलीमे नारी जगत आ नाटक विभाग सेहो रहै। नारी जगतमे एक टा परम सुन्दरि स्त्री आबथिन। नख शिख सुन्दरि। कत्तौसँ कोनो कमी नै। तथापि कोनो आकर्षण नै। ई हमर सोचब छल। कए टा हमरासँ भेंट कएनिहारो देखथिन। ओइ सुन्दरी दऽ चर्चा करथि मुदा यएह प्रश्न सेहो जे आखिर की छै जे ई एहन सुन्दरी होइतो प्रशंसा योग्य नै। एकदिन अंततः हमर दू टा महिला संगी, जे रेडियोक रहथि, हमरा लोकनि संगे चाह पीबी, अएली संग करऽ। ओ सुन्दरी कोनो रिकार्डिंमे आएलि रहथि। फेर देखलखिन तँ ओइ दिन चाह दोकान दिस जाइते काल अचानक पुछलनि- ‘ई के सुन्दरी छथि जे दिलमे नै उतरि पबै छथि। विचित्र असुन्दर सुन्दरता छन्हि गंुजन जी।’ हम किछु जवाब नै दऽ यएह सोचैत रहलौं जे ओइ सुन्दरीक विषयमे हमर अपनो यएह जिज्ञासा रहए। अर्थात हमरा लोकनिक बुद्धियें शरीर तँ सर्वगुण सुन्दर, मुदा ‘सौन्दर्य’ सँ आत्मा गाएब रहनि सुन्दरीक। यदि अहाँक सूचीमे बाँचल छी तँ हम एखनो यएह मानैत छी आ वएह कहब- छुच्छे ‘इल्म’ सँ कविता जेकाँ किछु लिखि देल गेल, ’गजल’ नै भऽ जाइ छै। लीखू किछु  आसान गजल सबहक मोनक जान गजल एक एक हृदयक छाँह लगय गाबय  सबहक प्राण  गजल सब  कानय   अपने  अपनी बनय  सभक मुस्कान गजल लोकक  दुःखक बनय पुकार बौआय  नै  सुनसान गजल झलझल जल मोनक सपना से  अछि  गंगास्नान गजल जइ  क्षण पीड़ा मे  कानल धो दय सकल जहान गजल आकांक्षा  हो  जन-जन के से  गीतक अभिमान  गजल ३ प्रेमचन्द्र पंकज मैथिली गजल : एक नजरिमे गजल एकटा एहन सशक्त विधाक नाम थिक, जकरा माध्यमसँ अनेक सामाजिक प्रक्रियाक जटिलताकें थोड़ शब्दमे सहजतासँ अभिव्यक्ति प्रदान कएल जाइत अछि। सहजता एवं भाव-चमत्कार एकर मुख्य लक्षण थिक। अपन सहजता एवं भाव-चमत्कारक कारण एकरामे एकटा अद्भुत आकर्षण छै। अही आकर्षणक कारणें फारसीसँ उर्दू एकरा हपसि कऽ अपन कोरामे लेलक। हिन्दी सेहो ओकर नजरि अपना दिस घिचबाक प्रयास कएलक। सफलता सेहो भेटलै। मुदा उर्दूक कोरामे जेहन छलै, तेहने प्राप्त भेलै। कहबाक तात्पर्य जे उर्दूमे गजल एक खासे मानसिकताबला लोकक बीच अपन आकर्षणक भाभट पसारने छल आ हिन्दीमे सेहो ओहने स्थिति रहलै- बहुत दिन धरि। ओना सम्प्रति ओतौ (हिन्दीमे सेहो) इतिहास-दृष्टि आ सामाजिक द्वन्द्वबोधक ज्ञानसँ परिपूर्ण गजलकार लोकनि सार्वभौमिक अनुभूतिकें अभिव्यक्ति देबाक माध्यम नीक जकाँ बनौने छथि। गजलक ऐ सहजता एवं भाव-चमत्कारक आकर्षणक कारणें आइ प्राय: सभ भारतीय भाषामे एकरा दुलरुआ बना कऽ राखल गेल छै। ई दुलरुआ सुकुमार छै, मुदा कमजोर नै। कखनो किछु कऽ सकैए। केहनो विस्फोट। मैथिलीमे सेहो गजल आएल- ओहिना- सुकुमार, मुदा कमजोर नै। कखनो किछु कऽ सकैबला। कोनो विस्फोट। तें सुरेन्द्र नाथ कहै छथि- गजल हमर हथियार थिक। तारानन्द वियोगी एकरा अपन युद्धक साक्ष्य मानैत आगि जनमा रहल छथि- दर्द जँ हदसँ टपल जाए तँ आगि जनमै अछि बर्फ अंगार बनल जाए तँ आगि जनमै अछि प्रेमचन्द्र पंकज गजलक प्रसंग कहै छथि- ढोढ़िया नञि असली नाग छी गजल मस्तीमे गरजैत बाघ छी गजल प्रेमिकाक आँचर नहि, प्रीतमक बोल नहि चेतनामे बरकल मिजाज छी गजल गजलकें पारिभाषिक रूपसँ बुझबाक लेल एकर स्रोत-भाषा अरबी-फारसीक परम्पराक सूत्रकें पकड़ब आवश्यक भऽ जाइत अछि। ओतए एकर परिभाषा देल गेल छै- सुखन अज जनान (अथवा अज माशूक) गुफ्तन तथा बाजनान गुफ्तन करदैन। एकर अर्थ थिक स्त्रीगणक विषयमे वार्तालाप किंवा प्रेमी-प्रेमिकाक संवाद। आइ ई परिभाषा विस्तार पाबि सभ प्रकारक संवाद-प्रेषण-स्थापन करबामे सक्षम अछि- जँ ऐ परिभाषाकें संकुचित रूपसँ नै देखल जाए। प्रेम सार्वभौमिक अछि, सार्वस्थानिक अछि, सार्वकालिक अछि। जँ प्रेमक अर्थ विस्तृत अछि, प्रेम स्वयं एतेक विस्तारमे पसरल अछि तँ ने प्रेमी-प्रेमिका संकुचित भए सकैत अछि आ ने प्रेमी-प्रमिकाक वार्तालाप विषय विशेष पर सीमित रहि सकैत अछि। तें आइओ सभ भाषाक गजलमे उक्त परिभाषाकें घटित देखल जा सकैत अछि। गजलक अपन भिन्न व्याकरण छै आ ई व्याकरण देखबामे जतबा सरल छै, वस्तुत: ओइसँ कइएक गुना जटिल छै। ओना ऊपरसँ लगैत अछि जे ई मतला, शेर आ मक्ताक चौकठिमे ठोकल एकटा काव्य-विधा थिक। मुदा एकर बहरक निर्बाह करबामे मगज दुहा जाइ छै। ध्यान देबाक बात थिक जे गजल लिखल नै जाइ छै, कहल जाइ छै। स्पष्ट अछि, जे एकर बहर (छन्द) क संरचनामे वज्न (मात्रा)क गणना शब्दक उच्चारणक अनुसार कएल जाइत अछि, जइमे अनेक गजलकार (तथाकथित) हरदा बाजि जाइ छथि। गजल किछु शेरक माला थिक। पारम्परिक रूपसँ गजलक प्रत्येक शेरक विषय भिन्न-भिन्न होइ छै, परन्तु एक गजलक प्रत्येक शेरमे रदीफ आ काफिया एके रहै छै। गजलक पहिल शेर मतला कहबैत अछि, जकर दुनू पाँती (मिसरा) सानुप्रासिक होइत अछि, अर्थात् रदीफ आ काफियासँ सामन रूपें युक्त रहैत अछि। एकर अन्तिम शेर मक्ता कहबैत अछि तखन, जखन ओइमे रचनाकारक नाम अथवा उपनामक प्रयोग होइत अछि, अन्यथा सामान्य शेर भऽ कऽ रहि जाइत अछि। बीचबला शेरक उपरका पाँतीक रदीफसँ मेल रहब आवश्यक नै। किन्तु निचला पाँतीकें रदीफसँ मेल अर्थात् सानुप्रासिक हएब अनिवार्य छै। शेरक लेल आवश्यक छै जे ओ कोनो छन्द विशेषमे रहए, जे निश्चित कएल गेल छै। ई छन्द विशेष बहर कहबैत अछि। अस्तु, मैथिली गजलक इतिहास पर एक नजरि फेकबाक प्रयास कएल जाए तँ मैथिलीक पहिल गजल बीसम शताब्दीक प्रारम्भमे लिखल गेल आ मैथिलीक पहिल गजलकार भेलाह पं. जीवन झा। जीवन झाक गजलमे एकर मुख्य गुण- सहजता एवं भाव-चमत्कार स्पष्ट देखबामे अबैत अछि, जे ऐ बातकें द्योतित करैत अछि जे ओ गजलकें कतेक लगीचसँ बुझबाक चेष्टा कएने छलाह, बुझने छलाह। हुनक एक गजलक मतला देखल जाए- पड़ैए बूझि किछु ने ध्यानमे हम भेल पागल छी चलै छी ठाढ़ छी बैसल छी सूतल छी कि जागल छी जीवन झा द्वारा रोपल गजलक ऐ पिपहीकें समय-समय पर भुवनेश्वर सिंह भुवन, यात्री, आरसी प्रसाद सिंह, डॉ. व्रजशोर वर्मा मणिपद्म आदि खाद-पानि दैत रहलाह आ ई वर्तमान रहल। बादमे केदारनाथ लाभ, सुधांशु शेखर चौधरी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, विभूति आनन्द, कलानन्द भट्ट, सियाराम झा सरस, मार्कण्डेय प्रवासी, बुद्धिनाथ मिश्र, राजेन्द्र बिमल, तारानन्द वियोगी, नरेन्द्र, देवशंकर नवीन आदिक सेवासँ ई एकटा झमटगर गाछक रूप धारण कऽ लेने अछि। मैथिलीक गजलकारक जँ सूची बनाओल जाए तँ आस्वस्त करत। किन्तु मैथिलीमे गजल-संग्रहक सर्वथा अभाव अछि- जकरा अंगुरी पर गानल जा सकैत अछि। मैथिली गजलक पहिल संग्रह थिक विभूति आनन्दक उठा रहल घोघ तिमिर। एकर प्रकाशन जून ८१ मे भेल। फेर कलानन्द भट्टक कान्ह पर लहास हमर, सियाराम झा सरस क शोणिताएल पैरक निशान, तारानन्द वियोगीक अपन युद्धक साक्ष्य, रमेशक नागफेनी आएल। सियाराम झा सरस क सम्पादनमे बारह गोटेक कुल चौरासीटा गजलक संकलन लोकवेद आ लालकिला प्रकाशित भेल। थोड़े आगि थोड़े पानि सरसजीक एहन गजल संग्रह थिक जे ऐ विधाकें अओर मजगूती प्रदान करैत अछि। सुरेन्द्र नाथक गजल हमर हथियार थिक निश्चित रूपसँ स्वागत योग्य अछि। गजल-संग्रहक एहन अभाव थोड़ेक निरास अवश्य करैत अछि, मुदा सम्प्रति मैथिलीमे धुड़झाड़ गजलक रचना भए रहल अछि, अनेक बाधाक अछैतो। मैथिली गजल बहुत दिन धरि गजल बनाम गीतलक ओझराहटिमे पड़ल रहल। किन्तु कोनो भ्रममे नै पड़ल। सभ तर्कक जवाब दैत रहल। आगाँ बढ़ैत रहल। आइ मैथिली गजलक स्थिति ई अछि जे अनेक नव-पुरान रचनाकार अपन अभिव्यक्तिक माध्यम एकरा बनओने छथि, अपन स्वर गजलकें दऽ रहल छथि। डॉ. गंगेश गुंजन, डॉ. अरविन्द अक्कू, अरविन्द ठाकुर, डॉ. नरेश कुमार विकल, अजित आजाद, फूलचन्द्र झा प्रवीण आदि अपन अभिव्यक्तिक माध्यम गजलकें बनाए एकरा एकटा सशक्त विधाक सरूपमे प्रतिष्ठित कऽ रहल छथि। प्रसन्नताक विषय ईहो अछि जे आशीष अनचिन्हार अनचिन्हार आखर नामसँ गजलक लेल एकटा फराकसँ वेबसाइट तैयार कएने छथि जकरा माध्यमसँ अनेक नव-पुरान गजलकार लोकनिक गजल-रचना लगातार सोझाँ आबि रहल अछि। कतिपय व्यक्ति एकटा राग अलापि रहल छथि जे मैथिलीमे गजलक सुदीर्घ परम्परा रहितो एकरा मान्यता नै भेटि रहल छै। एहन बात प्राय: ऐ कारणे उठैत अछि जे मैथिली गजलकें कोनो मान्य समीक्षक-समालोचक एखन धरि अछूत मानि कऽ एम्हर ताकब सेहो अपन मर्यादाक प्रतिकूल बुझैत छथि। ऐ सम्बन्धमे हमर व्यक्तिगत विचार ई अछि, जे एकरा ओहने समालोचक-समीक्षक अछूत बुझैत छथि जनिकामे गजलक सूक्ष्मताकें बुझबाक अवगतिक सर्वथा अभाव छनि। गजलक संरचना, मिजाज आदिकें बुझबाक लेल हुनका लोकनिकें स्वयं प्रयास करऽ पड़तनि, कोनो गजलकार बैसि कऽ भट्ठा नै धरओतनि। हँ, एतबा निश्चय, जे गजल धुड़झाड़ लिखल जा रहल अछि आ पसरि रहल अछि आ अपन सामर्थ्यक बलपर समीक्षक-समालोचक लोकनिकें अपना दिस आकर्षित कइए कऽ छोड़त। हमरा सभकें मन पाड़बाक चाही जे एकटा एहनो समए छलै जहिआ नव-कविताक प्रति समीक्षक-समालोचक लोकनिक रबैया एहने छलनि। मुदा आइ? आइ की स्थिति छै? सएह होएतै गजलोक संग। निश्चय होएतै। वस्तुत: मैथिली गजल आइ ओइ ठाम ठाढ़ अछि जतएसँ ओकरा एकसूत्रताधारी विचार, दर्शन, समाज-संहिताक अतिरिक्त राजनैतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आ राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रिय संवेदनाकें अभिव्यक्त करबाक स्रोत सहजहिं भेटि जाइ छै। सम्भावनासँ परिपूर्ण ऐ विधाक क्रमिक विकासक लेल आवश्यक अछि प्रतिबद्धतापूर्वक गजलक निरन्तर रचना हएब। से भए रहल अछि- ऐ रूपमे भए रहल अछि जे एकर भविष्य लेल आश्वस्त करैत अछि, निश्चित रूपसँ। ४ राजेन्द्र बिमल मुन्नाजी: मैथिली साहित्य मध्य वर्तमान समयमे गजलक की दशा अछि, एकर भविष्यक की दिशा देखाइछ? राजेन्द्र बिमल: गजल अत्यन्त लोकप्रिय विधा थिक। मैथिलीमे सेहो खूब लीखल जा रहल अछि आ पढ़लो जा रहल अछि। बहुत गजलकार एकर व्याकरणसँ कम परिचित छथि। मुदा भविष्य उज्जवल छै। मैथिली गजलमे अपन निजात्मकताक विकास शुभ संकेत थिक। मुन्नाजी: मैथिलीक प्रकाशित गजलक संगोर (कतेको गजल संग्रह) आ मायानन्द मिश्रक गजलकेँ गीतल कहि प्रकाश्यक मादेँ गजेन्द्र ठाकुर एकरा अस्तित्वहीन कहि अपन सम्पादकीय आलेख माध्यमे अवधारणा स्पष्ट केलनि।अहाँक ऐपर अपन स्वतंत्र विचार की अछि? राजेन्द्र बिमल: संगोर सभ नै देखल अछि। आदरणीय माया बाबूक गीतल (गीत-गजल) एक गोट प्रयोग थिक। हम कोनो सृजनकेँ निरर्थक नै बुझैत छी आ लेखन स्वतंत्रतामे विश्वास रखैत छी। ५ मंजर सुलेमान जखन ऐ मिथिलामे अमीर खुशरो (१२२५-१३२५) सन विद्वान एलाह तँ ओहो ऐ भाषाक मधुरतासँ मुग्ध भऽ फारसी, मैथिली आ उर्दूक समिश्रणसँ कहलनि- हिन्दु बच्चा है कि अजब हुस्न रै छै। बर बक्ते सुखन गुफ्तम मुख फूल झरै छै॥ गुफ्तम ज लबे लालें तऽ यक बोसा बगीरम। गुफ्ता के अरे राम तुर्क का ई करै छै। (मंजर सुलेमान - त्याग-बलिदानक पवित्र पर्व मुहर्रम (मिथिला दर्शन नवम्बर-दिसम्बर २०१०) ६ शेफालिका वर्मा आदरणीय  मुन्नाजी, अपनेक विषय गजल पर परिचर्चा बड नीक लागल मुदा मैथिलीक प्रोफेसर  हम नै छी, तैं एकर जानकारी देनाइ हमरा लेल सुरुजकेँ दीपक देखेनाइ अछि। हँ हम एतबे जनैत छी  जे पहिने छिटपुट गजल लिखल जाइत छल, हमहूँ पढ़ैत रही, कखनो हमरो नीक लागल छल। मुदा आशीष अनचिन्हारक कारण विदेहक पन्नापर गजलक जेना बाढ़ि आबि गेल अछि। गजल हमर सभसँ प्रिये विधा हमरा लेल अछि, प्यार, रोमांससँ भरल भावातीत भऽ हृदएक उन्मेषमे जिबैत उर्दू गजल, शेरो शायरी सभ। हम तँ गजल माने प्यार मुहब्बते टा बूझैत छलौं जे शुद्ध प्रेम भावपर आधारित छल। एखनो हमर  पुरना डायरीमे गजल सभक अंश  लिखल अछि, कोमलकान्त पदावलीसँ परिपूर्ण मुदा मैथिलीमे  एकर नाना अर्थे प्रयोग  होइत देखलौं, कखनो नीक लगैत छल तँ कखनो कचोटी। मुदा जमाना कतऽ सँ कतऽ चलि गेल। सभ ठाम विकास भऽ रहल छै तँ मैथिली गजल केर सेहो नव परिभाषा उल्लेखनीय  रहत। साँच पुछू तँ प्रायः सभ टा गजल हम अवश्य पढ़ैत छी, ऐलेल आशीष जीकेँ अशेष बधाइ। मैथिली साहित्यमे गजल विधा नूतन मुस्की लऽ सबहक ह्रदएकेँ आलोक लोकसँ भरि देत, संगहि विदेह परिवारकेँ जे नाना रुपे माँ मैथिलीक श्री वृद्धि कऽ रहल छथि। ७ मिहिर झा गजल मूलतः अरबी भाषा केर काव्य विधा छै। गजल शब्दक अरबीमे माने छै स्त्रीसँ वा स्त्रीक बारेमे बात केनाइ। गजल जेखन अरबीसँ फारसीमे आएल तँ एकर शिल्प विधाक तँ पालन भेल लेकिन एकर विषय वस्तु भौतिक वा दैेहिक रखैत एकर मर्ममे अध्यात्मिक प्रेमक अनुभूति आनि देलक।  ऐ मर्मकेँ रखैत फारसी सूफी कवि सभ गजलक प्रसारमे महत्वपूर्ण योगदान केलन्हि। सूफी साधनामे विरहक बेशी महत्व छै, तइ कारणे, फारसी गजलमे विरह प्रेम केर बेशी उल्लेख अछि। गजल जखन फारसी सँ उर्दू मे प्रवेश केलक तँ एकर शिल्प विधा तँ ओहिना रहलै लेकिन कथ्य एकदम भारतीय भऽ गेल। मध्य कालमे उर्दू फारसीसँ बहुत प्रभावित छलै आ एकर व्याकरण ओ शब्द जटिल फारसी होइ छलै। भारतकेँ स्वतंत्र भेलाक बाद उर्दू धीरे धीरे फारसीक प्रभावसँ निकलल आ गजलमे बोल चालक शब्द प्रयोगमे आबए लागल। संगहि एकर मर्म अपन परंपरागत मर्म "स्त्रीसँ वा स्त्री संबंधित"केँ कात छोड़ैत नव-नव आयाम अपनामे सम्मिलित केलक। ध्यान देबाक गप ई अछि जे गजल केर शिल्प विधामे कोनो बदलाओ नै आएल, केवल एकर मर्ममे परिवर्तन आएल। जे गजल अरबीमे मात्र प्रेम तक सीमित छल से आब अपनामे सभटा विषय वस्तु समेट लेलक। हिन्दीक बाद गजल मराठी, अँग्रेजी होइत आब मैथिलीमे प्रवेश केलक आ धीरे धीरे मैथिली साहित्यमे  अपन स्थान बना लेलक। मैथिलीमे सेहो गजलक शिल्प विधामे परिवर्तन नै भेलै, हँ एकर मर्म आ शब्दकोष पूर्ण मैथिल भऽ गेल। भाव भक्ति, प्रेम, वीर, विरहक होइक वा सामाजिक, राजनीतिक वा व्यक्तिक कटाक्ष पर, सभ विधामे मैथिलीमे गजल देखबामे आबि रहल अछि। संगहि मिथिलाक संस्कार ओ परिवेशक छाप लैत मैथिली गजल आब पूर्णतः मैथिल भऽ चुकल अछि। गजलक मैथिली शिल्प विधाक लेखन विस्तारमे "अन्चिन्हार आखर" मे आलेखित अछि। बहुत रास मैथिली गजलकारक मैथिली गजलकारीमे प्रवेश ऐ बातक द्योतक अछि जे ई मैथिलीक पोर-पोरमे समा चुकल अछि आ कोनो एक विशेष स्तरक लोकक बदलामे ई जनकाव्य बनि चुकल अछि। "मैथिली गजलक उत्पत्ति आ विकास (स्वरूप एवं संभावना सहित)" विषय पर अपन भावना हम गजलक रूपमे देबाक प्रयास कऽ रहल छी- बैसलहुँ आइ करै ले मैथिली गजलक बखान हम       डूबि गेलहुँ उदगार मे केलहुँ नहि किछु ध्यान हम      

गजल होइत छैक प्रेम महिमा एकर महान छैक       दू पाँति मे समेटा देलहँु ई प्रेम गाथा क बखान हम    

बहर रफीद और काफिया शेरक होइ छैक प्राण यौ       मतला मकता जोड़ि एहि मे  बढेलंौ शेरक शान हम      

फारसी उर्दू अंग्रेजी सँ होइत ई आयल मिथिला धाम       तघज्जुल अपन बनाबी लऽ माछ मखान ओ पान हम    

शास्त्रीय कहू वा आधुनिक वा पकड़ूु अ-गजलक कान         समय संग बदलबै आब एहि गजलक प्राण हम          

प्रेम विरह सूफी आ भक्तिमे कऽ चुकल ई नाम अमिट       जन जीवन सँ जोड़बै लऽ आधुनिकताक नाम हम      

मुरद्दफ होइक वा गैर मुरद्दफ पबै छैे एके शान               "शौकीन" क ई कथा अमोल राखब सदिखन ध्यान हम ८ ओमप्रकाश झा मैथिली गजल पर परिचर्चा मैथिली गजलक उद्भव आ विकास विषय पर कोनो विचार प्रकट करबाक बहुत योग्य तँ हम अपनाकेँ नै मानै छी, मुदा ई विषय देखि किछु कहैसँ अपनाकेँ रोकि नै पाबि रहल छी। मैथिली गजलक इतिहास ओना तँ बड्ड पुरान नै अछि। मुदा गीत आ कविता लेखनक कार्य बहुत दिनसँ मैथिलीमे चलि रहल अछि। गीत आ कवितामे मैथिलीक बड्ड धनिक इतिहास छै। भारतवर्षक आर्य भाषा सभमे यदि देखल जाए तँ ई अपने बुझा जाइ छै जे उत्पत्तिक बादेसँ मैथिलीमे नीक गीत आ कविता लिखेनाइ शुरू भऽ गेल छल। गजल लिखबाक कोनो परम्परा मैथिलीमे नै छल। २० म शताब्दीमे गजल लिखबाक शुरूआत भेल आ २०म शताब्दीक उतरार्द्धमे ऐमे तेजी आएल। हम अपने किछु दिन पूर्व धरि गजलसँ अनजान छलौं। आशीष अनचिन्हार जी आ गजेन्द्र जीक सम्पर्कमे आबि मैथिली गजलक विषयमे किछु ज्ञान प्राप्त भेल। अनचिन्हार आखर ब्लाग पूर्ण रूपसँ गजलक लेल समर्पित अछि आ गजलक शास्त्रीयताकेँ नीक जकाँ ऐ ब्लागपर बुझाओल गेल अछि। यएह ब्लाग पढ़ि कऽ हम थोड़ बहुत सरल वार्णिक बहरक गजल लिखबाक प्रयास करैत रहै छी। एखन मैथिलीमे गजल बहुत तँ नै लिखल गेल अछि, मुदा गजलक अकालो नै बुझाइत अछि। एकटा नीक गप जे हमरा नोटिसमे आएल जे आब मैथिली पत्र-पत्रिकामे सेहो मैथिली गजल नियमित रूपेँ छपि रहल अछि। उत्कृष्टतापर हम किछु बाजबा योग्य नै छी। मुदा एतबा कहब जे जेना जेना नव नव गजलकार सभ एता आ गजल पढ़बाक रूचि बढ़ल जेतै, तेना तेना नव प्रयोगक संग नीक नीक रचना केर बाढ़ि आबि जेतै। हमरा बुझने मैथिली गजल एखन जवान भऽ रहल अछि आ समएक संग एकर जवानी मैथिली गजलकेँ बहुत ऊँच स्थान पर लऽ जाएत। ९ धीरेन्द्र प्रेमर्षि मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना (पूर्वमे विदेहक अंक २१ मे प्रकाशित) रूप-रङ्ग एवं चालि-प्रकृति देखलापर गीत आ गजल दुनू सहोदरे बुझाइ छै। मुदा मैथिलीमे गीत अति प्राचीन काव्यशैलीक रूपमे चलैत आएल अछि, जखन कि गजल अपेक्षाकृत अत्यन्त नवीन रूपमे। एखन दुनूकेँ एकठाम देखलापर एना लगै छै जेना गीत-गजल कोनो कुम्भक मेलामे एक-दोसरासँ बिछुड़ि गेल छल। मेलामे भोतिआइत-भासैत गजल अरब दिस पहुँचि गेल। गजल ओम्हरे पलल-बढ़ल आ जखन बेस जुआन भऽ गेल तँ अपन बिछुड़ल सहोदरकेँ तकैत गीतक गाम मिथिला धरि सेहो पहुँचि गेल। जखन दुनूक भेट भेलै तँ किछु समए दुनूमे अपरिचयक अवस्था बनल रहलै। मिथिलाक माटिमे पोसाएल गीत एकरा अपन जगह कब्जा करऽ आएल प्रतिद्वन्दीक रूपमे सेहो देखलक। मुदा जखन दुनू एक-दोसराकेँ लगसँ हिया कऽ देखलक तखन बुझबामे अएलै- आहि रे बा, हमरा सभमे एना बैर किएक, हम दुनू तँ सहोदरे छी! तकरा बाद मिथिलाक धरतीपर डेगसँ डेग मिला दुनू पूर्ण भ्रातृत्व भावेँ निरन्तर आगाँ बढ़ैत रहल अछि। गीत आ गजलक स्वरूप देखलापर दुनूक स्वभावमे अपन पोसुआ जगहक स्थानीयताक असरि पूरापूर देखबामे अबैत अछि। गीत एना लगै छै जेना रङ्ग-बिरङ्गी फूलकेँ सैँति कऽ सजाओल सेजौट हुअए। मिथिलाक गीतमे काँटोसन बात जँ कहल जाइछ तँ फूलेसन मोलायम भावमे। एकरा हम अहू तरहेँ कहि सकैत छी जे गीत फूलक लतमारापर चलबैत लोककेँ भावक ऊँचाइ धरि पहुँचबैत अछि। ऐमे मिथिलाक लोकव्यवहार एवं मानवीय भाव प्रमुख भूमिका निर्वाह करैत आएल अछि। जइ भाषाक गारियोमे रिदम आ मधुरता होइ छै, ओइ भूमिपर पोसाएल गीतक स्वरूप कटाह-धराह भइए नै सकैत अछि। कही जे गीतमे तँ लाली गुराँसक फूल जकाँ ओ ताकत विद्यमान छै जे माछ खाइत काल जँ गऽरमे काँट अटकि गेल तँ तकरो गलाकेँ समाप्त कऽ दै छै। गजलक बगय-बानि देखबामे भलहि गीते जकाँ सुरेबगर लगै, ऐमे गीतसन नरमाहटि नै होइ छै। उसराह मरुभूमिमे पोसाएल भेलाक कारणे गजलक स्वभाव किछु उस्सठ होइ छै। यद्यपि गजलकेँ प्रेमक अभिव्यक्तिक सशक्त माध्यम मानल जाइ छै। गजल कही तँ हिँदेरी लोकक मन-मस्तिष्कमे प्रेममय माहौल नाचि उठैत छै, ऐ बातसँ हम कतहु असहमत नै छी। मुदा गजलमे प्रेमक बात सेहो बेस धरगर अन्दाजमे कहल जाइ छै। कहबाक तात्पर्य जे गजल तरुआरि जकाँ सीधे बेध दै छै लक्ष्यकेँ। लाइ-लपटमे बेसी नै रहै छै गजल। मिथिलाक सन्दर्भमे गीत आ गजलक एक्कहि तरहेँ जँ अन्तर देखबऽ चाही तँ ई कहल जा सकैत अछि जे गजल फूलक प्रक्षेपण पर्यन्त तरुआरि जकाँ करैत अछि, जखन कि गीत तरुआरि सेहो फूल जकाँ भँजैत अछि। मैथिलीमे संख्यात्मक रूपेँ गजल आनहि विधा जकाँ भलहि कम लिखल जाइत रहल हुअए, मुदा गुणवत्ताक दृष्टिएँ ई हिन्दी वा नेपाली गजलसँ कतहु कनेको झूस नै देखबामे अबैत अछि। एकर कारण इहो भऽ सकै छै जे हिन्दी, नेपाली आ मैथिली तीनू भाषामे गजलक प्रवेश एक्कहि मुहूर्त्तमे भेल छै। गजलक श्रीगणेश करौनिहार हिन्दीक भारतेन्दु, नेपालीक मोतीराम भट्ट आ मैथिलीक पं. जीवन झा एक्कहि कालखण्डक स्रष्टा सभ छथि। मैथिलीयोमे गजल आब एतबा लिखल जा चुकल अछि जे एकर संरचनाक मादे किछु कहनाइ दिनहिमे डिबिया बारब जकाँ लगैत अछि। एहनोमे यदाकदा गजलक नामपर किछु एहनो पाँति सभ पत्र-पत्रिकामे अभरि जाइत अछि, जकरा देखलापर मोन किछु झुझुआन भइए जाइ छै। कतेको गोटेक रचना देखलापर एहनो बुझाइत अछि, जेना ओ लोकनि दू-दू पाँतिबला तुकबन्दीक एकटा समूहकेँ गजल बुझै छथि। हमरा जनैत ओ लोकनि गजलकेँ दूरेसँ देखि कऽ ओइमे अपन पाण्डित्य छाँटब शुरू कऽ दै छथि। जँ मैथिली साहित्यक गुणधर्मकेँ आत्मसात कऽ चलैत कोनो व्यक्ति एक बेर दू-चारिटा गजल ढङ्गसँ देखि लिअए, तँ हमरा जनैत ओकरामे गजलक संरचना प्रति कोनो तरहक द्विविधा नै रहि जएतै। तेँ सामान्यतः गजलक सम्बन्धमे नव जिज्ञासुक लेल जँ किछु कहल जाए तँ बिना कोनो पारिभाषिक शब्दक प्रयोग कएने हम ऐ तरहेँ अपन विचार राखऽ चाहैत छी- गजलक पहिल दू पाँतिक अन्त्यानुप्रास मिलल रहै छै। अन्तिम एक, दू वा अधिक शब्द सभ पाँतिमे सझिया रहलोपर साझी शब्दसँ पहिनुक शब्दमे अनुप्रास वा कही तुकबन्दी मिलल रहबाक चाही। अन्य दू-दू पाँतिमे पहिल पाँति अनुप्रासक दृष्टिएँ स्वच्छन्द रहैत अछि। मुदा दोसर पाँति वा कही जे पछिला पाँति स्थायीबला अनुप्रासकेँ पछुअबैत चलै छै। ई तँ भेल गजलक मँुह-कानक संरचना सम्बन्धी बात। मुदा खाली मुँहे-कानपर ध्यान देल जाए आ ओकर कथ्य जँ गोड़िआइत वा बौआइत रहि जाए तँ देखबामे गजल लगितो यथार्थमे ओ गीजल भऽ जाइत अछि। तेँ प्रस्तुतिकरणमे किछु रहस्य, किछु रोमाञ्चक सङ्ग समधानल चोट जकाँ गजलक शब्द सभ ताल-मात्राक प्रवाहमय साँचमे खचाखच बैसैत चलि जएबाक चाही। गजलक पाँतिकेँ अर्थवत्ताक हिसाबेँ जँ देखल जाए तँ कहि सकैत छी जे हऽरक सिराउर जकाँ ई चलैत चलि जाइ छै। हऽरक पहिल सिराउर जइ तरहेँ धरतीक छाती चीरि कऽ ओइमे कोनो चीज जनमाओल जा सकबाक आधार प्रदान करै छै, तहिना गजलक पहिल पाँति कल्पना वा विषय वस्तुक उठान करैत अछि, दोसर पाँति हऽरक दोसर सिराउरक कार्यशैलीक अनुकरण करैत पहिलमे खसाओल बीजकेँ आवश्यक मात्रमे तोपन दऽ कऽ पुनः आगू बढ़बाक मार्ग प्रशस्त करैत अछि। गजलक प्रत्येक दू-पाँति अपनोमे स्वतन्त्र रहैत अछि आ एक-दोसराक सङ्ग तादात्म्य स्थापित करैत समग्रमे सेहो एकटा विशिष्ट अर्थ दैत अछि। एकरा दोसर तरहेँ एहुना कहल जा सकैत अछि जे गजलक पहिल पाँति कनसारसँ निकालल लालोलाल लोह रहैत अछि, दोसर पाँति ओकरा निर्दिष्ट आकार दिस बढ़एबाक लेल पड़ऽबला घनक समधानल चोट भेल करैत अछि। गीतक सृजनमे सिद्धहस्त मैथिल सभ थोड़े बगय-बानि बुझितहिँ आसानीसँ गजलक सृजन करऽ लगै छथि। सम्भवतः तेँ आरसी प्रसाद सिंह, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, डॉ महेन्द्र, मार्कण्डेय प्रवासी, डॉ. गङ्गेश गुञ्जन, डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र आदि मूलतः गीत क्षेत्रक व्यक्तित्व रहितो गजलमे सेहो कलम चलौलनि। ओहन सिद्धहस्त व्यक्ति सभक लेल हमर ई गजल लिखबाक तौर-तरीकाक मादे किछु कहब हास्यास्पद भऽ सकैत अछि, मुदा नवसिखुआ सभकेँ भरिसक ई किछु सहज बुझाइक। मैथिलीमे कलम चलौनिहार सभ मध्य प्रायः सभ एक-आध हाथ गजलोमे अजमबैत पाओल गेलाह अछि। जनकवि वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” सेहो “भगवान हमर ई मिथिला” शीर्षक कविता पूर्णतः गजलक संरचनामे लिखने छथि। मुदा सियाराम झा “सरस”, स्व. कलानन्द भट्ट, डॉ.राजेन्द्र विमल सन किछु साहित्यकार खाँटी गजलकारक रूपमे चिन्हल जाइ छथि। ओना सोमदेव, डॉ.केदारनाथ लाभ, डॉ.तारानन्द वियोगी, डॉ.रामचैतन्य धीरज, बाबा वैद्यनाथ, डॉ. विभूति आनन्द, डा.धीरेन्द्र धीर, फजलुर्रहमान हाशमी, रमेश, बैकुण्ठ विदेह, डा.रामदेव झा, रोशन जनकपुरी, पं. नित्यानन्द मिश्र, देवशङ्कर नवीन, श्यामसुन्दर शशि, जनार्दन ललन, जियाउर्ररहमान जाफरी, अजित कुमार आजाद, अशोक दत्त आदि समेत कतेको स्रष्टाक गजल मैथिली गजल-संसारकेँ विस्तृति दैत आएल अछि। गजलमे महिला हस्ताक्षर बहुत कम देखल जाइत अछि। मैथिली विकास मञ्च द्वारा बहराइत पल्लवक पूर्णाङ्क १५, २०५१ चैतक अङ्क गजल अङ्कक रूपमे बहराएल अछि। सम्भवतः ३४ गोट अलग-अलग गजलकारक एकठाम भेल समायोजनक ई पहिल वानगी हएत। ऐ अङ्कमे डा. शेफालिका वर्मा एक मात्र महिला हस्ताक्षरक रूपमे गजलक सङ्ग प्रस्तुत भेलीह अछि। अही अङ्कक आधारपर नेपालीमे मैथिली गजल सम्बन्धी दू गोट समालोचनात्मक आलेख सेहो लिखाएल अछि। पहिल मनु ब्राजाकी द्वारा कान्तिपुर २०५२ जेठ २७ गतेक अङ्कमे आ दोसर डा. रामदयाल राकेश द्वारा गोरखापत्र २०५२ फागुन २६ गतेक अङ्कमे। छिटफुट आनो गजल सङ्कलन बहराएल हएत, मुदा तकर जानकारी ऐ लेखककेँ नै छै। हँ, सियाराम झा “सरस”क सम्पादनमे बहराएल “लोकवेद आ लालकिला” मैथिली गजलक गन्तव्य आ स्वरूप दऽ बहुत किछु फरिछा कऽ कहैत पाओल गेल अछि। ऐमे सरस सहित तारानन्द वियोगी आ देवशङ्कर नवीन द्वारा प्रस्तुत गजल सम्बन्धी आलेख सेहो मैथिली गजलक तत्कालीन अवस्था धरिक साङ्गोपाङ्ग चित्र प्रस्तुत करबामे सफल भेल अछि। समग्रमे मैथिली गजलक विषयमे ई कहि सकैत छी जे मैथिली गीतक खेतसँ प्राप्त हलगर माटिमे गुणवत्ताक दृष्टिएँ मैथिली गजल निरन्तर बढ़ि रहल अछि, बढ़िए रहल अछि। १० आशीष अनचिन्हार मैथिली गजलक वर्तनमान अनचिन्हार आखरक जन्मसँ पहिने (इंटरनेट पर) किछु गजलकार, समालोचक सभपर आरोप लगबैत छथि जे ओ गजलकेँ बुझि नै सकलाह। मुदा हमरा बुझने आलोचक सही छथि आ गजलकार गलत। कारण मैथिलीक किछु तथाकथित गजलकार सभ अपने गजलकेँ नै बूझि सकलाह। जकर परिणति अबूझ शेर सबहक रूपमे भेल। आ स्वाभाविक छै जे एहन-एहन गजलकेँ आलोचक नकारबे करतथि। वर्तमान गजल-- अ.आ. (अनचिन्हार आखर) क बाद गजल अबूझ नै रहल। से हम किछु शेरक उदाहरणसँ देब। १) चाहे अन्ना होथि आकि राजनीतिक पार्टी, दूनूक स्थितिकेँ परखैत मिहिर झा कहै छथि- छोड़ि दिऔ हाथ देखिऔ केम्हर जाइ छै जेतै तँ ओ उम्हरे सब जेम्हर खाइ छै २) तँ जगदानंद झा "मनु" विस्थापित लोकक वेदना देखार करैत कहै छथि- सोन सनक घर-आँगन स्वर्ग सन हमर परिवार छोड़ि एलहुँ देस अपन दू-चारि टकाक बेपार पर ३)  गप्प जँ आधुनिक शिक्षापर होइ आ ताहूमे कपिल सिब्बलकेँ धेआन रखैत तँ ताहूमे गजल पाछाँ नै रहल। अभय दीपराज जी कहैत छथि- परीक्षाक जखन हम नाम सुनैत छी तँ कँपैत छी, लगैत अछि सबटा बिसरल रहैत छी जे की पढ़ल अछि ४)  संसार बदलि गेल मुदा नै बदलल तँ मिथिला, एकरे लक्ष्य करैत दीप नारायण "विद्यार्थी" कहै छथि- जाति-पातिक भेद नहि बदलल समाजक आधार नहि बदलल कोसीक धार बदलि गेल मित! जीवन धार नहि बदलल ५) अही मिथिलाक सभसँ लज्जाजनक पहलू दहेज पर सुनील कुमार झा एना टिप्पणी करै छथि- बेटीक बियाहमे बिकल अंगा-नुआ लड़काक सूट तेँ कहले नै जाइ-ए ६) अही समाजक एकटा आर पहलू पर उमेश मंडल कहै छथि- कि‍यो ककरो नहि‍ देखैए ऐ समाजमे मोने मन झगड़ाइए चलू घुरि‍ चली ७) आधुनिक मीडिआपर क्रूरतम प्रहार करैत मैथिलीक दोसर मुदा सक्षम महिला गजलकार श्रीमती शांतिलक्ष्मी चौधरी कहै छथि- पापक पराकाष्ठामे जन्मै श्रीकृष्ण मीडिआ छथि जागल कंसक भेषमे आ एतबे पर नै रुकैत छथि। आ फेरो कहै छथि- सोसल साइट पर करैत छै सेंसर के दाबी रे भाय अभिव्यक्तिक स्वच्छंद साँढ़ मुँह बन्हबै की जाबी रे भाय ८) मुदा एहन परिस्थिति बेसी दिन बरदास्त नै कएल जा सकैए आ तँए ओम प्रकाश जी कहै छथि- मान-अपमान दुनू भेटै छै, ई मायाक थीक लीला, अन्याय केँ सदिखन दी मोचाड़ि, यैह थीक जिनगी ९) प्रेम आ प्रेम जनित वेदना गजलक प्रमुख अंग थिक। बिना एकरा गजल झुझुआन लागत। वर्तमान गजलमे इहो भेटत। रवि मिश्रा "भारद्वाज" कहै छथि- मोन हमर बहुत चंचल ताहि पर ई यौवन एना जे नैना चलेबै तँ हमर ईमान झुकि जेतै आ इएह प्रेम जँ परिपक्व भऽ जाए तखन १०) त्रिपुरारी कुमार शर्मा जीक शेर जन्मैए- आँखि मिला कऽ हमरा सँ राह पकड़ लेलि अहाँ कोना कटै अछि दिन आब रचना गवाह अछि हमर मिहिर झा जीकेँ बूझल छन्हि जे ई वेदना किएक छै तँए ओ कहैत छथि- हमरा अहाँ तोड़लहुँ सपना बुझि कऽ हमरा अहाँ छोडलहुँ अपना बुझि कऽ मुदा एतबो भेलाक बादो मैथिली ओ भाषा थिक जइमे विद्यापति सन कवि भेलाह। विद्यापति आशावादक सभसँ बड़का कवि छथि। आ हमर ओम प्रकाश जी अही आशाकेँ पकड़ि कहै छथि- झाँपै लेल भसियैल जिनगीक टूटल धरातल सपनाक नबका टाट भरि दिन बुनैत रहै छी कुल मिला मैथिली गजल एखन विकासक दोसर चरणमे चलि रहल अछि जकर बानगी उपरक उदाहरण सभमे देखल जा सकैए। मैथिली गजलक भविष्य पर हमर कोनो टिप्पणी नै रहत कारण हम कोनो ज्योतिषी नै छी। आ अतीतो पर नै कहब कारण ई सभकेँ बूझल छै। ओना मंजर सुलेमानक आलेखक बाद मैथिली गजल निश्चित रूपे पाछाँ गेल (जीवन झासँ पाछाँ) जे स्वागत योग्य अछि। ११ गजेन्द्र ठाकुर गजल, रुबाइ, कता, हाइकू, शेनर्यू, टनका, हैबून, कुण्डलिया, दोहा, रोला ई सभ एकटा स्थापित विधा अछि। स्थापित विधा माने जकर लिखबाक विधि जइ भाषा सभक ई मूल खोज अछि, ओइ भाषामे स्थापित भऽ गेल अछि। जँ हाइकू लिखबा काल कोनो निअम पालन नै करी तँ ओकर नाम क्षणिका पड़ि गेलासँ ओ हाइकू दोषविहीन नै भऽ जाएत। जँ कोनो भाषासँ हम गजल/ रुबाइ/ कता मैथिलीमे प्रयोग लेल सोचै छी तँ ऐ कारणसँ जे ओ ओइ भाषाक चमत्कारिक चीज अछि, मैथिलीक छौंक लगलासँ कोनो आर चमत्कारक हम आशा राखै छी। सएह हाइकू, शेनर्यू, टनका आ हैबून लेल सेहो लागू अछि। आब एतऽ ई देखबाक अछि जे कोनो विधाक आयात सतर्कतासँ हुअए, ओइ विधाक सैद्धान्तिक पक्ष सुदृढ़ छै। से जेना तेना आयात कऽ हाथपर हाथ धरि सए बर्ख आर इन्तजार करी ई सोचि जे तकर बाद एकर मैथिली छौंकबला अलग सिद्धान्त बनत, तँ तइ लेल स्थापित विधाक आयातक कोन बेगरता? एतेक समएमे तँ एकटा आर नव विधा बनि जाएत! हँ, मात्र लिप्यांतरण कऽ देलासँ उर्दूक सभ गजल निअम हिन्दीक भऽ जाइत अछि, मुदा ओतहु वर्तनीक भिन्नता मारते रास काफियाक उपनिअमक निर्माणक बाध्यता उत्पन्न करैत अछि। मैथिली तँ साफे अलग भाषा अछि तेँ एकर काफियाक निअम सोझे आयातित नै भऽ सकैए। बहरमे वर्ण/ मात्राक गणना पद्धति सेहो हिन्दी-उर्दूमे मात्र कोनो खास शब्दक वर्तनीक भिन्नताक कारण कखनो काल उपनिअम बनेबाक खगता अनुभूत करबैए, मुदा से मैथिलीमे सोझे आयातित नै भऽ सकैए कारण ई साफे अलग भाषा थिक। तँ की काफिया आ बहरक वर्ण/ मात्रा गणना पद्धति मैथिलीमे साफे छोड़ि देल जाए? आकि ओइमे ततेक ढील दऽ देल जाए जे ओकर कोनो मतलबे नै रहए? आ तखन जे बहरमे लिखथि वा काफियाक शुद्ध प्रयोग करथि से भेलथि कट्टर आकि जे एकर विरोध करथि से भेला कट्टर? आ जँ बिन काफिया आ बहरक गजलकेँ गजल नै कहल जाए तँ ओ रचना महत्वहीन भऽ गेल? ओ गजल नै भेल, वा जीवन युगक मैथिली गजल भेल, मुदा गीत/ कविता तँ भेबे कएल। कोनो गजल मात्र काफिया आ बहरक शुद्धता मात्र रहने उत्कृष्ट तँ नहिए हएत, मुदा उत्कृष्ट हेबाक सम्भावनाक प्रतिशतता कएक गुणा बढ़त। तहिना कोनो गजल सन रचना जँ अशुद्ध काफियामे आ बे-बहर अछि तँ सएह मात्र ओकर उत्कृष्टताक प्रमाण भऽ जाएत? एकर विपरीत हम ई कहए चाहब जे ओहनो रचना उत्कृष्ट भऽ सकैए, मुदा तकर सम्भावनाक प्रतिशतता भयंकर रूपेँ घटि जाएत। गजल, रुबाइ, कता, हाइकू, शेनर्यू, टनका, हैबून, कुण्डलिया, दोहा आ रोला निअमबद्ध रचना अछि। एकरा अकविता, गद्य-कविता आ गीतक स्वरूप देलासँ अहाँ भाषाक कोन उपकार कऽ सकब? कारण अकविता, गद्य-कविता आ गीत तँ स्वयं स्थापित विधाक स्वरूप लऽ लेने अछि। छोट कविता क्षणिका भऽ सकत, हाइकू नै। कुण्डलिया, दोहा आ रोलाक निअम मैथिलीमे बनेबामे कोनो असोकर्ज नै भेल कारण ई सोझे आयातित भऽ गेल मुदा गजल, रुबाइ, कता, हाइकू, शेनर्यू, टनका, हैबूनमे वर्ण/ मात्रा गणना पद्धति जापानी आ उर्दू-फारसीसँ अहाँ लइए नै सकै छी। जापानक लेखन पद्धति अल्फाबेट (वर्ण) आधारित अछिये नै, तखन अहाँ ओकर गणना पद्धति कोना आयात कऽ सकब। ओकर तरीका छै, पाश्चात्य तरीका आ सिलेबल आधारित लेखन पद्धति सेहो जापानी भाषामे होइ छै, से तकर प्रयोग कऽ ओइ चित्रात्मक लेखनक सिलेबल आधारित शैलीक मिलान संस्कृतक वार्णिक छन्द गणना पद्धतिसँ कएल गेल आ ओकरा हाइकू, शेनर्यू आ टनका लेल प्रयोग कएल गेल। तहिना गजल, कता आ रुबाइमे वैज्ञानिक आधारपर मैथिली भाषाक सापेक्ष निअम बनाओल गेल जइसँ गजल, कता आ रुबाइ मैथिलीमे दोसर भाषासँ एलाक उपरान्तो अपन मूल विशेषता बना कऽ राखि सकल। आ तकर बाद जे मैथिली गजल आ गजलकारक संख्यामे परिणामात्क आ गुणात्मक वृद्धि भेल अछि, से दुनियाँक सोझाँ अछि। मुन्नाजी- रिपोर्ताज ४ दिसम्बर २०१० (शनि दिन) मिथिला सेवा संघ, जैतपुर (बदरपुर, नई दिल्ली) द्वारा भव्य रूपेँ विद्यापति पर्व समारोहक सफल आयोजन कएल गेल। उक्त आयोजनक अध्यक्षता केलनि मैथिली/ हिन्दीक वरिष्ठ साहित्यकार श्री गंगेश गुंजन आ विशिष्ट अतिथि रहथि युवा पत्रकार ओ बहुविध रचनाकार श्री गजेन्द्र ठाकुर। अध्यक्षीय भाषणक नमहर कड़ीमे श्री गंगेश गुंजन आग्रह जतौलनि जे ऐ आयोजनमे कविगोष्ठीक आयोजन आ महिलाक अनुपस्थितिकेँ भरल जाए। आतिथ्य भाषणमे श्री गजेन्द्र ठाकुर एक मात्र पाँतीमे गएर बाभनक उपस्थितिकेँ सेहो निश्चित करबाक विचार देलनि। विजय मिश्र आ गंगेश गुंजन द्वारा दीप प्रज्वलनक पछाति मैथिलीक चर्चित-परिचित कलाकार द्वारा धमगिज्जर गीतनाद प्रस्तुत कएल गेल जे भोर धरि दर्शककेँ नै उठबाक लेल बन्हने रहल। श्रोता/ दर्शकक उपस्थिति सेहो अपेक्षासँ बेसी छल, जे प्रशंसनीय अछि। मुन्नाजी- अझुको क्षणकेँ अंगीकार करैछ “क्षणिका” विहनि कथाक नींवक पहिल ठोस खाम्ह बनि सोझाँ आएल “क्षणिका” पैंतीस बर्ख बाद पुनर्प्रकाशित अपनामे समेटने तीस गोट विहनि कथाक संगोर अछि। ऐमे प्रकाशित अधिकांश कथा अपना गात आ विहनि कथाक शिल्पेँ आइयो प्रासंगिक अओर विवरणीय अछि। ऐमे प्रकाशित कथाक नींव आइसँ चारि दशक पहिने श्री अमरनाथजी द्वारा तहिया राखल गेल जहिया मैथिलीमे विहनि कथाक स्थिति द्वितीयाक चान जकाँ छल। आन गद्य विधाक एक प्रकारेँ फरिछा गेल आजुक विहनि कथाक तहिया शैशवावस्था छल। शैशवो केहेन तँ जेना कहियो अप्पन समाजमे बेटीकेँ सोइरीयेमे नोन चटा अस्तित्वेकेँ मेटा देबाक सोच व्याप्त छलै। आइसँ चारि दशक पहिनेसँ आजुक सामाजिक परिवेशक तुलनात्मक स्थिति देखी तँ तहिया अमावश आ आइ पूर्णिमा सन देखाएत। तहियाक समग्र स्थितिक ठाम-ठीम चित्रण ऐ संगोरक कथा सभमे स्पष्ट देखाइछ। मुदा किछु सोच किछु कुरीतिक तहियाक चित्रण आइयो प्रासंगिक लगैछ जेनाकि “पपीहा” शीर्षक कथामे बुढ़ा-बुढ़ीक दुर्दशाकेँ बेटा-पुतौहक सेवासँ निराश भऽ स्वयं जीबाक लेल बाट तकैत ऐ बुजुर्ग दम्पत्तिक मानसिक चेतनाक शिकार अझुको बुजुर्गक दुर्दशाकेँ आलोकित करैए। ओना समाजक सभ व्यक्ति एके रंग अवचेतन नै होइछ जे तहियो छल आ आइयो अछि। आइयो ऐमे प्रकाशित कथा- “लालटेम”मे चित्रण, जुआ जकाँ हारल जुआनीसँ वृद्ध भेल पिता जखन अपन आश्रय तकै छथि तँ अपने विमोहित घरकेँ घुरि अबै छथि। ई चेतना अझुको किछु धिया-पुतामे धारल-उसारल-राखल भेटत, पूर्णतः मूइल नै। धनिक गरीबक फाँट तँ सभ दिन रहलैए आ ई अमर अछि। चाहे वैज्ञानिक तकनीकी दृष्टिये संसार कतबो बदलि जाए। ऐ संगोरक श्रेष्ठ कथामे सँ एक “माटि पानि”, साहेब सभ गरीबकेँ हेट कऽ रखैत छथि। हुनक ऐय्यासी, सामाजिक परिवर्तन  हुनक संवेदनाकेँ सेहो सुखबैत जा रहल अछि। मुदा एकटा गरीबे एहेन अछि जे सभ संकटक घड़ीमे साहेबकेँ जिनगीक पटरीपर लऽ आनि आगू बढ़बाक रस्ता देखबैछ। उपरोक्त कथा सभकेँ पढ़लोपरान्त अहाँकेँ ई भान अवश्य हएत जे विहनि कथा, जे आइसँ चारि दशक पूर्व मैथिलीयोमे आने भाषाक वि‍हनि ‍कथाक समकक्ष अपन खुट्टा गरबामे समर्थ भेल छल। ऐ “क्षणिका” नामक विहनि कथा संगोरकेँ प्रकाशित करबाक दुस्साहस अमरनाथजी देखौलनि जे आजुक विहनि कथाक बाटक हेतु मीलक पाथर साबित भऽ रहल अछि। चारि दशक पहिने अमरनाथजीक संगोर अवश्य सोझाँ आएल। मुदा ऐ विहनि कथाक ओ एसगर लेखक नै छलाह। ओही समैमे एहने निश्‍शन “विहनि कथा” मिथिला मिहिरक माध्यमे नियमित सोझाँ अबैत रहल, ओइ रचनाकारक नाओं छल एम. मणिकान्त। मुदा ई दुनू गोटे विहनि कथाक फलकपर नै जानि कतए हेरा गेला। “विदेह” पाक्षिक ई-पत्रिकाक ६७म अंक “जे विहनि कथा विशेषांक” छल तइमे विषय-वस्तुजन्य व्यक्ति आ रचना जुटेबाक क्रममे भाइ अनमोल झाक माध्यमे संपर्के जुड़लौं ऐ रचनाकारसँ, जे आइयो ओही उद्गारक संग अपन चारि गोट टटका रचना पठा ऐ संग्रहसँ एक डेग अओर आगाँ बढ़ि विहनि कथाकेँ मजगुत करबामे सार्थक सहयोग केलनि। एम. मणिकान्त अखनो हेराएले छथि...। ई रचनाकार युवाकालमे जइ जोशे किछु निश्शन रचना सभ देलनि, चारि दशक बादो आजुक रचनाकार सभ ओतै केन्द्रित भऽ रचना करैत देखाइत छथि, जेना देखू “शान्ति” शीर्षक कथाकेँ। लोक जीवन जीबाक लेल जीवनमे शान्ति पेबाक लेल भागा-दौड़ीमे लागल सम्पूर्ण जिनगीकेँ अशान्त बना लेने अछि। आ जीवन भरि कतौ शान्ति नै भेट‍ पबै छै, जँ शान्तिक दर्शन होइ छै तँ जिनगी शान्त भेलाक पछातिये, जे आइयो सगरो यएह स्थिति व्याप्त अछि। उपरोक्त ठोस रचनाक पछाति ऐ संग्रहकेँ अओर मजगुत आधार दइए सुमनजी द्वारा लिखल गेल आमुखमे सोदाहरण प्रस्तुत कएल गेल खलील जिब्रानकेँ। सत्य, वि‍हनि ‍कथाकेँ खलील द्वारा एक-एक बिन्दुपर देखार करैत जिनगीक सत्यकेँ सोझाँ अनलासँ साहित्य, सामाजिक आ राजनीतिक परिवेशमे खलबली मचि गेल रहए। जकर कोलाहल वा प्रासंगिकता आइयो बाँचल अछि आ सदा अमर रहत। मैथिली विहनि कथाक ऐ पहिल संग्रहक दोसर प्रस्तुति आइयो समीचीन भऽ ऐ साहित्यिक विधाकेँ एक प्रकारसँ आगाँ बढ़ेबा लेल उत्प्रेरकक काज करत। डॉ.अरुण कुमार सिंह मैथिलेत्तर भाषी प्रदेशमे मैथिली सीखबा-सीखैबामे कंप्यूटर अओर भाषा विज्ञानक भूमिका भूमिका भारत एकटा बहुभाषी देश अछि। एतए भारोपीय, द्रविड़, आस्ट्रो-एशियाटिक अओर चीनी-तिब्बती चारि भाषा परिवारक लगभग १६५० क ऊपर भाषा बाजल जाइत अछि। एक मतक अनुसार लगभग १४५५ भाषा एहन अछि जकरा १० हजारसँ कमे लोक बजैत अछि। ‘सेंसस डाटा २००१’क अनुसार-मैथिली बाजऽ बलाक संख्या १२,१७९,१२२ बताओल गेल अछि। आइ संविधानक मान्यता प्राप्त २२ भाषा (मैथिली, हिंदी, संस्कृत, मलयालम, तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मराठी, बंगला, पंजाबी, गुजराती, कश्मीरी, उर्दू, उड़िया, असमिया, बोडो, संथाली, सिंधी, डोगरी, कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली) अछि। तथा १०० सँ बेसिए एहन भाषा अछि जे आठम अनुसूचीमे नै अछि। भारतक एहन बहुसंख्यक भाषाई परिदृश्यपर बाजऽबलाक संख्या अओर भौगोलिक दृष्टिसँ जखन विचार कएल जाइछ तँ पता चलैछ जे मैथिलीक महत्वकेँ नजरअंदाज नै कएल जा सकैछ; किएक तँ ई देशक एकटा पैघ भू-भागक भाषा थिक। ई बिहारक प्रमुख भाषा अछि, तथा कतोक प्रदेशमे गौण भाषाक रूपमे सेहो व्यवहृत अछि। विश्व-ग्रामक संकल्पना तँ तकनीकी (Technology)केँ चरण पर पहुँचा देलक अछि। आधुनिक तकनीकीक विकासमे कम्प्यूटरक आविष्कार एकटा युगांतकारी घटना अछि। कम्प्यूटर आइ जीवनक लगभग सभ क्षेत्रमे अपन जगह बनाए लेल अछि। चूँकि भाषा जीवनक अभिन्न अंग अछि तेँ ओ कम्प्यूटरसँ कोना असम्पृक्त रहि सकैछ। आइ भाषिक अध्ययन अओर विश्लेषणक लेल कम्प्यूटरक उपयोग अनिवार्य भऽ गेल अछि। अतः मैथिली भाषाक समृद्धि एवं प्रचार-प्रसारक लेल कम्प्यूटरीकरण नितांत आवश्यक भऽ गेल अछि। प्रस्तुत आलेखमे द्वितीय भाषाक रुपमे मैथिली सिखैबामे कंप्यूटर अओर भाषा विज्ञानक भूमिकापर विचार करबाक प्रयास कएल गेल अछि। भाषा शिक्षण एवं भाषा विज्ञान मानव-उच्चारण अवयव द्वारा उच्चरित यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकक ओइ व्यवस्थाकेँ, जकर माध्यमसँ मानव समुदाय-विशेषक लोक परस्पर विचार-विनिमय करैत अछि, ओकरा बाजब, पढ़ब, लिखब एवं सुनब तथा समझबाक शिक्षाकेँ भाषा-शिक्षण कहल जाइत अछि। ई साँच अछि जे मैथिलेत्तरभाषी लोकक अपन मातृभाषा होइछ एवं ओकरा संगहि ओकर पहिल भाषा सेहो होइछ ऐ लेल मैथिलीकेँ द्वितीय भाषाक रूपमे सिखबामे की-की कठिनाइ अबैछ एवं ओइ कठिनाइकेँ भाषा-विज्ञान अओर कंम्प्यूटर कतऽ धरि समाधान कऽ सकैछ ऐपर विचार करब समीचीन हएत। प्राचीने कालसँ जीविकोपार्जन एवं ज्ञानार्जन आदिक लेल अधिकांश लोककेँ मातृभाषाक संगे-संग दोसर भाषा सीखबाक आवश्यकता पड़ैत आबि रहल अछि। ऐ दोसर भाषाकेँ द्वितीय भाषा कहल जाइछ। ऐ द्वितीय भाषाकेँ सिखबाक लेल लोककेँ भाषार्जनक जटिल प्रक्रियासँ बेस सतर्कतापूर्वक गुजरऽ पड़ैछ। भाषा विज्ञान तथा शिक्षा शास्त्रक दृष्टिसँ पहिल भाषासँ हँटि कऽ सीखल जाएबला सभ देशी बा विदेशी भाषा द्वितीय भाषाक श्रेणीमे अबैछ। आधुनिक युगमे द्वितीय भाषा-शिक्षणकेँ गंभीरतापूर्वक लेल जा रहल अछि अओर ऐ बातक पुरजोर प्रयास कएल जा रहल अछि जे विद्यार्थी कमसँ कम समएमे भाषाकेँ ठीक ढंगसँ सीखए अओर सुगमतापूर्वक प्रयोग करबामे सक्षम भऽ सकए। ऐ संबंधमे चारि प्रारंभिक भाषा कौशल (Language Skills) सुनब, बाजब, पढ़ब अओर लिखबकेँ ध्यानमे राखि भाषा-शिक्षणकेँ अंजाम देल जा रहल अछि। ऐमे पहिल दुइ भाषाक उच्चरित रूपसँ सम्बद्ध अछि जखनकि अन्तिम दुइ भाषाक लिखित रूपसँ। उच्चरित भाषासँ संबंधित कौशलमे भाषाक बोलीगत रूपसँ सम्बन्धित दुइ प्रमुख कौशल- सुनबाक तथा बोलबाक अन्तर्गत निम्नलिखित भाषिक पक्ष लेल जाइत अछि— १.ध्वनीमे भेद करबाक योग्यता, २.उच्चारणमे अनुकरणक सामर्थ्य, ३.उपकाव्य संरचना, ४.वाक्य संरचनाक निअमक ज्ञान, ५. मुक्त भाषण, ६.पदबन्ध, ७.शब्दावली, ८.श्रवण बोधन, ९.मुक्त बोधन, १०. गप-सप। वस्तुतः पहिल दुइ सुनबासँ संबंधित अछि अओर शेष बाजबासँ। लिखित भाषासँ सम्बन्धित प्रमुख कौशल- पढ़बाक अओर लिखबाक अन्तर्गत निम्नलिखित भाषिक पक्ष अबैत अछि— १. लिपि चिह्नक पहिचान, २. लिपि चिह्नक लेखन, ३. संकेतक सहायतासँ लेखन, ४. सन्दर्भ व्याकरण, ५. मुक्त लेखन, ६. मुक्त पठन ७.सन्दर्भक पहिचान ८.पत्राचार, ९.वर्ण बोधन, १०.कोश देखबाक अभ्यास। भाषा-शिक्षणमे बहुत रास पद्धति (Methods) प्राचीन कालेसँ उपयोगमे लाबल जा रहल अछि। ऐमे प्रमुख निम्नवत अछि: व्याकरण-अनुवाद पद्धति (Grammar translation Method) ई पद्धति बहुत बेसी प्रचलित रहल अछि किएक तँ एकरे माध्यमे शिक्षक अनुवादसँ भाषाक शिक्षण प्रदान करैत छलाह। विद्यार्थीकेँ अनुवादक माध्यमसँ द्वितीय भाषाक ओ सभ आवश्यक जानकारी देल जाइत छल जे भाषा सिखबाक लेल महत्त्वपूर्ण अछि। परंच व्याकरण-अनुवाद पद्धतिक त्रुट ई छल जे छात्र नै तँ भाषाक जीवंत तत्वसँ परिचित भऽ पबैत छल अओर नै तँ व्यावहारिक ज्ञानें प्राप्त करबामे समर्थ सिद्ध होइत छल। हुनक ज्ञान, भाषाक केवल सैद्धान्तिक पक्षे धरि सीमित रहैत छल, जइ कारणेँ विद्यार्थी लक्ष्य भाषा (Target Language) केँ बाजबाक क्षमता कतोक वर्षक प्रयासक बादो नै प्राप्त कऽ पाबैत छल। एकर मूल कारण ई अछि जे शिक्षक प्रारम्भेसँ विद्यार्थीकेँ मात्र द्वितीय भाषामे अनुवाद करबाक अओर व्याकरणकेँ रटबाक शिक्षा दैत रहैत छलाह। कखनो विद्यार्थीकेँ लक्ष्य भाषाकेँ बाजबाक अवसर कक्षा वा कक्षासँ बाहर नै भेटि पबैत छल। जे आधुनिक दौरमे कोनो भाषाकेँ सिखबाक लेल अति आवश्यक अछि। व्याकरण-अनुवाद पद्धति आइयो देशक विभिन्न पाठशाला, मदरसा, महाविद्यालय, विश्वविद्यालयमे प्रचलित अछि। जकर माध्यमसँ विद्यार्थीकेँ लक्ष्यभाषा (Target Language)क तँ ज्ञान प्राप्त भऽ जाइत अछि, परंच ओकरामे लक्ष्यभाषाकेँ सूक्ष्मतासँ बाजबाक वा व्यवहारमे लाबक क्षमता विकसित नै भऽ पबैछ। विद्यार्थी अपन समए मात्र भाषाक अनुवादेमे खपा दैत अछि। आइ हम सभ भली भाँति जनैत छी जे व्याकरणक निअमक ज्ञान अओर अनुवादक योग्यताकेँ कोनो प्रकारेँ हम ओइ भाषामे बाजबाक, पढ़बाक अओर लिखबाक सक्षमताकेँ उचित मानक स्तरपर नै राखि सकैत छी। प्रत्यक्ष पद्धति (Direct Methods): ई पद्धति वर्त्तमान समएमे प्रभावशाली मानल जा रहल अछि। ऐ पद्धतिक मूलभूत सिद्धान्त ई अछि जे मातृभाषे सदृश दोसरो भाषा सीखल वा सिखाओल जाए। यद्यपि ऐ मे मातृभाषाक उपयोग नै होइछ। परंच लक्ष्य भाषाकेँ सुनब, बोलब, लिखब, पढ़ब सिखाओल जाइत अछि। ऐ पद्धतिक माध्यमे शिक्षण देलासँ विद्यार्थीमे भाषाकेँ बाजबाक क्षमताक विकास अत्यन्त तीव्रगतिसँ होइत अछि। ईएह कारण अछि जे आइ अंग्रेजी माध्यम विद्यालयमे प्रत्यक्ष पद्धतिकेँ पूर्णरूपसँ अपनाओल जा चुकल अछि, अओर एकर पूरा फाएदा विद्यार्थी सभकेँ मिलि रहल अछि। ओ ऐ पद्धतिसँ द्वितीय भाषा (Secondary Language) केँ सरलतासँ सीखि जाइत अछि अओर हुनक उच्चारण सेहो बड्ड बेसी संतोषजनक रहैत अछि। परंच एकरा संग दोसर विकसित पद्धतिक सेहो सहारा लेल जाए तँ शिक्षण अओर अधिगम (Learning) दुनू काज सरल भऽ जाइत अछि। प्रत्यक्ष पद्धकिक अतिरिक्त जे दोसर पद्धति अछि ओइमे स्वाभाविक पद्धति, मनोवैज्ञानिक पद्धति, अनुकरणात्मक पद्धति, वार्तालाप पद्धति, भाषा प्रयोगशाला पद्धति, ऑडियो लिंग्वल मेथड, चलचित्र पद्धति अओर कम्प्यूटर-पद्धति आदि प्रचलित अछि। ऐमे ऑडियो लिंग्वल मेथड (Audio Lingual Method) एवं भाषा प्रयोगशाला पद्धति (Language Laboratory Method) बहुत बेसी प्रचलित अछि। परंच ऐ पद्धतिक किछु सीमा अछि; ऐ कारणेँ विद्यालय तथा शैक्षणिक संस्थामे ई पद्धति बहुत कमे देखबामे अबैत अछि। एकर मूल कारण ई अछि जे भाषा प्रयोगशाला पद्धति बहुत बेसी खर्चाबला अछि। एकरा कोनो साधारण संस्था वहन नै कऽ सकैछ। जइ संस्थामे ऐ पद्धतिक प्रचलन अछि, ओइ संस्थामे भाषा सीखि रहल विद्यार्थीक क्षमता एवं दक्षता व्याकरण-अनुवाद पद्धति अओर प्रत्यक्ष पद्धतिसँ द्वितीय भाषा सीखि रहल विद्यार्थीक तुलनामे बेसी बढ़ियाँ अछि। भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरक सात क्षेत्रीय भाषा-केन्द्र मैसूर, भुवनेश्वर, गुवाहाटी, लखनऊ, पटियाला, पुणे, अओर सोलेनमे मैथिली, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बंगाली, डोगरी, कश्मीरी, पंजाबी, उड़िया, संथाली, उर्दू, गुजराती, कोंकणी, मराठी, सिंधी, असमिया, बोडो, मणिपुरी अओर नेपाली भाषा द्वितीय भाषाक रूपमे पढ़ाओल जाइत अछि। ओइमे ‘प्रत्यक्ष पद्धति’ अओर ‘ऑडियो लिंग्वल मेथड’क माध्यमे केँ अपनाओल जा रहल अछि अओर विद्यार्थीक बाजबाक क्षमताक विकासक लेल सम्बन्धित भाषिक क्षेत्रमे पन्द्रह दिनक टूर सेहो कराओल जाइत अछि। जकर नीक परिणाम देखबाक लेल भेटैछ। जइसँ प्रशिक्षुक भाषिक क्षमता दस महीनामे एतबा विकसित भऽ जाइछ जे ओ लक्ष्य भाषाक पठन-पाठनमे पूर्ण रूपसँ समर्थ भऽ जाइछ। आइ काल्हि ‘ऑन लाइन शिक्षण’ (Internet Learning) सेहो ऐ दिशामे एक नव प्रयास अछि। उपरोक्त पद्धतिक सन्दर्भमे ईहो बात उल्लेखनीय अछि जे जतऽ ऐ पद्धतिसँ भाषा-शिक्षणमे लाभ अछि, ओतहि ऐ पद्धतिक किछु सीमा सेहो अछि। आधुनिक युगमे ध्वनि विज्ञानक बड़ पैघ महत्ता अछि। ध्वनि विज्ञानक द्वारा विद्यार्थीमे लक्ष्य भाषा (target language) केँ शालीनता अओर शुद्धतासँ बाजबाक क्षमता विकसित होइत अछि। ध्वनि विज्ञानक महत्व इहो लेल बढ़ि जाइछ जे जखन विद्यार्थी कोनो दोसर भाषाकेँ सिखैत अछि तँ ओ भाषा ओकर मातृभाषासँ कतोक तरहेँ भिन्न होइत अछि। अर्थात् जखन ओ द्वितीय भाषा ऐखैत अछि तँ सिखबाक क्रममे विद्यार्थीकेँ द्वितीय भाषाक कतोक नव ध्वनिक सामना करऽ पड़ैछ। जकर उच्चारणमे विद्यार्थीकेँ बहुत बेसी समस्या होइछ। विद्यार्थी द्वितीय भाषाक शब्दकेँ सुचारू रूपसँ उच्चारण नै कऽ पबैछ। भाषा शिक्षणमे उच्चारणक महत्वकेँ कोनो प्रकारेँ नकारल नै जा सकैछ; उच्चारणक महत्व रीढ़क हड्डीक समान होइत अछि। एकर सही ढंगसँ प्रयोग कएलासँ नै केवल भाषा अपन प्राकृतिक दशा एवं सुगमताक संग प्रभावित करैछ, अपितु शब्दक उचित अर्थ एवं भाव सेहो प्रकट होइछ। ‘भाषा विज्ञान’ द्वितीय भाषा-शिक्षण अओर प्रशिक्षणमे उत्पन्न हुअ बला समस्याक निराकरणमे महत्वपूर्ण भूमिका निबाहल अछि। जँ शिक्षक भाषाविज्ञानसँ सभ तरहेँ परिचित अछि तँ ओ उच्चारण सदृश समस्याक समाधान सहजतापूर्वक कऽ सकैत अछि। भाषाक एहने सभ समस्याकेँ देखैत व्यतिरेकी भाषा विज्ञान (Contrastive Linguistics) अस्तित्वमे आएल जकरा द्वारा शिक्षक विद्यार्थीक मातृभाषाक संरचना (Structure)क द्वितीय भाषाक संरचनासँ तुलनात्मक अध्ययन (Comparative study) केलल अछि अओर तत्पश्चात् ऐ बातक पता लगेबाक प्रयास कएल जे लक्ष्य भाषाक कोन एहन ध्वनि अछि जे विद्यार्थीक मातृभाषामे नै अछि। ओहन ध्वनि जे दुनू भाषामे पाओल जाइत अछि, ओ छात्रकेँ कोनो प्रकारक समस्या उत्पन्न नै करत। परंच ओ ध्वनि जे द्वितीय भाषामे तँ अछि मुदा मातृभाषामे नै अछि एहन ध्वनि समस्यात्मक ध्वनि (Problematic Sounds) कहाओत अओर भाषा सिखबामे समस्या उत्पन्न करत। शिक्षककेँ ऐ ध्वनिक उच्चारणमे पूर्णतः साबधानी बरतऽ पड़त आओर ऐ ध्वनिक उच्चारण प्रारंभिक मध्य अओर अन्तिम अवस्थामे छात्रसँ कराबऽ पड़त। ऐ तरहेँ बेर-बेर उच्चारण करौलासँ छात्रक उच्चारण ठीक हएत। अभ्यासक मात्रा मातृभाषा तथा द्वितीय भाषा-शिक्षणक उद्देश्य, शिक्षार्थीक अवस्था, अध्ययन-अध्यापनक लेल उपलब्ध समए आदि पर निर्भर करैछ। सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक दृष्टिसँ मातृभाषा तथा द्वितीय भाषाक शिक्षण-प्रक्रिया तथा तकनीकमे किछु अन्तर हएब स्वाभाविक अछि। भाषा कौशलक अभ्यास-मात्रा तथा ओकर प्रायोगिक पक्षमे जे अंतर देखार दैत अछि, तकर मातृभाषा तथा द्वितीय भाषाक शिक्षण-प्रक्रियासँ पर्याप्त संबंध अछि। भाषा शिक्षकेँ ऐ भिन्नताकेँ दृष्टिमे राखि भाषा अध्यापन करबाक चाही, जे भाषा शिक्षार्थीक लेल सरल ओ बोधगम्य भऽ सकए। भाषा शिक्षणमे कॉर्पस (Corpus in Language Teaching) भाषाविज्ञानमे कॉर्पस (कॉर्पोराक बहुवचन) पाठ सभक एकगोट पैघ अओर संरचनात्मक संग्रह अछि जइमे कोनो भाषाक शब्द तथा वाक्यकेँ संग्रहित कऽ ग्राह्य एवं पढ़बा योग्य रूपमे राखल जाइत अछि। कॉर्पस एके भाषा (एक भाषी कॉर्पस) वा एकसँ बेसी भाषा (बहुभाषी कॉर्पस) मे पाठकेँ संग्रहित करैत अछि। बहुभाषी कॉर्पसकेँ प्रारूपित कऽ केँ तुलनात्मक दृष्टिसँ संरेखित समानांतर कॉर्पस सेहो कहल जाइत अछि। कॉर्पस दुइ प्रकारक होइछ। लिखित कॉर्पस (Written Corpus) ऐमे भाषाक लिखित रूप जेना, साहित्य, समाचारपत्र, कहानी, नाटक, उपन्यास, आलोचना आदिमे प्रयोग हुअ बला भाषाकेँ रखैत छी। वाचिक कॉर्पस (Speech Corpus) ऐमे सामान्य लोकक बीच सामान्य बोलचालक भाषाकेँ रिकार्ड कऽ संग्रहित कएल जाइछ। कॉर्पसक प्रयोग प्रमुख रूपसँ कोशकारिता, मशीनी अनुवाद, वर्तनी संशोधक, भाषा शिक्षण, भाषिक अनुसंधान इत्यादि काजक लेल कएल जाइत अछि। कॉर्पसमे लिखित तथा वाचिक डेटा द्वारा उपकरण बनाओल जाइत अछि जे बेसी सार्थक तथा उपयोगी होइत अछि। ऐमे एकत्रित कएल गेल डेटामे सामान्य लोकक गप्प-सप्प तथा फराक-फराक समए पर एक लोक द्वारा प्रयोगमे लाबल जाएबला भाषा एवं शब्दाबलीमे बदलाव आदिक जानकारी होइत अछि। मैथिली शिक्षणमे समानान्तर कॉर्पस, तुलनात्मक कॉर्पस, डोमेन स्पेशिफिक कॉर्पसक योगदान बेस महत्वपूर्ण हएत। सूचना प्रत्यानयन (Information Retrieval) आजुक समए भूमण्डलीकरणक प्रभावसँ मानवक परिवर्त्तित जीवन-शैलीमे कमसँ कम समएमे बेसीसँ बेसी सूचनाक आवश्यकता भऽ सकैछ। एहने संकल्पनापर आधारित प्रक्रियाकेँ सूचना-प्रत्यानयन कहैत छी। ऐमे कोनो पैघ पाठ वा दस्तावेजसँ निश्चित सूचनाकेँ प्राप्त कएल जा सकैत अछि। बल्कि एकर सम्पूर्ण प्रक्रिया संगणकपर आधारित होइत अछि अतः समएक कम लागब स्वाभाविके अछि; जेहन कि ऐमे होइतो अछि। ऐमे वेबमे मैथिलीक लेल ‘सर्च इंजन’क निर्माण तथा कोशमे खोजबाक काज सरल भऽ सकैछ। खोज इंजनमे गूगल (Google), याहू (Yahoo), अल्ताविस्ता (Altavista), गुरूजी (Guruji.com), वेबखोज (Webkhoj), रफ्तार (Raftar) आदि उपलब्ध अछि। जइमे निरंतर नव-नव वर्जन लांच भऽ रहल अछि। गूगल हालिहमे ‘क्रोम’ नामक नव वर्जन लांच कएलक अछि। भाषा सिखबामे ऐसँ बहुत बेसी सहयोग लेल जा सकैत अछि। की वर्ड इन कान्टेक्स्ट एण्ड की वर्ड इन अदर कान्टेक्स्ट प्रत्यानयन (KWIC and KWOC Retriever) ऐ टूलक सहायतासँ भाषा शिक्षणमे सेहो सहायता लेल जा सकैत अछि। कोनो शब्द कोन-कोन संदर्भमे प्रयुक्त भऽ सकैत अछि, एकर जानकारी कमसँ कम समयमे प्राप्त कएल जा सकैत अछि। ई टूल कॉर्पसपर आधारित होइत अछि। जेना-कॉर्पससँ ऐ टूलक सहायतासँ ई ज्ञात कऽ सकैत छी जे —बहब क्रिया कोन-कोन संदर्भमे आबि सकैत अछि। उदाहरण खून बहब, पानी बहब, घाम बहब इत्यादि। वर्तनी संशोधक (Spell checker) ई संगणकक माध्यमसँ मैथिली भाषाक मानक रूपकेँ संरक्षित एवं निर्धारित कऽ सकैत अछि, संगहि वर्तनी सम्बन्धी त्रुटिकेँ चिह्नित कऽ सकैत अछि। ई संगणक आधारित भाषा-शिक्षणमे सेहो महत्वपूर्ण योगदगान दऽ सकैत अछि। एकर सहायतासँ मैथिली भाषाक वर्तनीक शुद्धताकेँ सुधारल जा सकैत अछि। संगहि शुद्ध लेखनमे सहायक भऽ सकैत अछि। रूपिमिक विश्लेषक (Morphological Analyzer) मैथिलीक मूल धातु रूप (Root Form)क डाटाबेस बना कऽ ऐमे प्रयोगक समए जुड़ल अतिरिक्त संरचकक रूपमे प्रतिपादककेँ छाँटि कऽ एकर भाषा-सापेक्ष विश्लेषण क्रमशः करैत अछि। एकर बाद उपसर्ग एवं प्रत्ययक संग्रहित सूचनाक आधार पर अपन विश्लेषणकेँ आगू बढ़बैत अछि। लिप्यंतरण (Transliteration) एक लिपिसँ दोसर लिपिमे अंतरणक प्रक्रिया लिप्यंतरण कहबैछ। लिप्यंतरणक द्वारा सेहो कोनो भाषाकेँ सिखबामे बहुत बेसी सहायता मिलैत अछि। कर्नाटकमे संस्कृतक बहुत रास टेक्स्ट कन्नड़ लिपिमे लिप्यंतरित अछि। जेना रामायण, महाभारत, पंचतंत्र, दुर्गासप्तशती आदि। एतऽ धरि जे स्नातकोत्तर संस्कृतक उपाधि सेहो लोक कन्नड़ लिपिमे लिखि कऽ प्राप्त कऽ रहल अछि। Mozilla FireFox’s Girgit add-onक द्वारा सेहो भारतीय भाषासँ सीधे दोसर भारतीय भाषामे लिप्यंतरण कऽ सकैत छी। LDC-IL, CIIL सेहो लिप्यंतरण टूलक विकास कएलक अछि। ऑनलाईन मैथिली शब्दकोश (Online Maithili Dictionary) भाषा सीखैले ऑनलाइन मैथिली शब्दकोशक भूमिका सेहो महत्वपूर्ण अछि। जकर अवलोकन https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ लिंक पर कएल जा सकैत अछि। किछु प्रमुख ऑनलाइन शब्दकोश निम्न वितान स्थली पर उपलब्ध अछि http://www.shabdkosh.com www.tdil.gov.in http://tdil.mithov.in/download/bharatiyabhasha.htm आवृत्ति शब्दकोश (Frequency Dictionary) भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरमे एकगोट महत्त्वाकांक्षी परियोजना ‘भारतीय भाषाक भाषावैज्ञानिक सांख्यिकी संकाय’ (LDC-IL)क अंतर्गत मैथिली कॉर्पसपर आधारित दस हजार शब्दक आवृत्ति शब्दकोश लगभग पूर्णताकेँ प्राप्त कऽ रहल अछि। ऐमे समाविष्ट शब्द एहन अछि जे सभसँ बेसी प्रयोगमे अबैछ। ई पूर्णरूपसँ कॉर्पसपर आधारित अछि। LDC-IL अखन धरि कन्नड़, बंगाली एवं हिन्दी मे आवृत्ति शब्दकोशक निर्माण कऽ चुकल अछि एवं अष्टम् अनुसूचीक भारतीय भाषामे काज चलि रहल अछि। उच्चारण शब्दकोश (Pronunciation Dictionary) (LDC-IL)क अन्तर्गत मैथिली कॉर्पसपर आधारित उच्चारण शब्दकोश बनएबाक दिशामे सार्थक प्रयास भऽ रहल अछि। ऐमे प्रयुक्त शब्द जे सभसँ बेसी प्रयोगमे अबैत अछि तकरा स्थान भेटि रहल अछि। एकर उच्चारण अहाँ सुगमतासँ सुनि सकैत छी अओर सीखऽबलाकेँ सेहो अभ्यास कराओल जा सकैत अछि। LDC-IL अखन धरि कन्नड़, बंगाली, एवं हिन्दीमे उच्चारण शब्दकोशक निर्माणक लेल अछि एवं अष्टम अनुसूचीक भारतीय भाषामे काज चलि रहल अछि। उपसंहार भूमण्डलीकरणक ऐ दौरमे भारत एक पैघ बाजारक रूपमे उभरि रहल अछि एवं मैथिली बाजऽ बलाक संख्या भारत एवं भारतसँ बाहर देखि एहन संभावना लागि रहल अछि जे मैथिलीकेँ कमोवेश सम्पर्क भाषाक रूपमे प्रयुक्त कएल जा सकैछ। मनहि एकर एक निर्धारित सीमा किए नै हुअए। मैथिली राष्ट्रक सांस्कृतिक चेतनासँ जुड़ल अछि। मैथिलीमे संस्कृत शब्दावलीक समावेशक कारणेँ मैथिलेत्तर भाषी लोक सेहो थोड़ प्रयासक बाद एकरा बुझि जाइत अछि। एकर कारण अछि जे दोसर भारतीय भाषामे संस्कृतक शब्दक पहिनेसँ समावेश अछि, चलन अछि। ऐ कारणेँ शब्दावली परिचयक स्तरपर साम्यक स्थिति  बनि जाइत अछि अओर दुइ व्यक्तिक बीच संवाद स्थापित करबैमे मैथिली सेहो सक्षम भऽ सकैछ। सहायक ग्रंथ सूची 1. श्रीवास्तव, रविन्द्रनाथ, ‘भाषा शिक्षण’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992 2. श्रीवास्तव, रविन्द्रनाथ, तिवारी भोलानाथ, गोस्वामी कृष्णकुमार, ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान’, आलेख प्रकाशन, दिल्ली 1980 3. भाटिया कैलाशचन्द्र, ‘आधुनिक भाषा-शिक्षण’, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 2001 4. Subbia, Pon, ‘Tests of Language Proficiency’, Central Institute of Indian Languages, Mysore, 2005 5. अनुवाद पत्रिका (कंप्यूटर-अनुवाद विशेषांक-2), भारतीय अनुवाद परिषद, नई दिल्ली, Apr-Jun 2007 6.  गवेषणा (सूचना प्रौद्योगिकी विशेषांक), केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा, Oct-Dec 2007 7. जैन, वृषभ प्रसाद, ‘अनुवाद और मशीनी अनुवाद’, सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 1995 8.   मल्होत्रा, विजय कुमार, ‘कम्प्यूटर के भाषिक प्रयोग’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2002 Website www.ldcil.org www.tdil.mit.gov.in www.cdac.in www.indic-computing.sourceforge.net www.ciil.org http://censusindia.gov.in/census-dat-2001/census-data-online/language/statetment1.htm डॉ॰ शशिधर कुमर पोथी समीक्षा : गामक जिनगी हम कोनो व्यावसायिक आलोचक, समालोचक वा समीक्षक नै छी मुदा मैथिली पढ़ब-लिखब नेनपने सँ नीक लगैत छल तेँ आइ एक गोट पोथीक समीक्षा लीखि रहल छी। पोथी थिक श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी रचित कथा संग्रह “गामक जिनगी”- ओना कोनो पोथीक ई हमर पहिल समीक्षा छी। ऐ पोथीक समीक्षा पहिनो किछु जगह ब्लॉग वा पत्रिका आदि मे प्रकाशित भऽ चुकल अछि जे पढ़ि हम स्वयं पुर्ण रूपेण संतुष्ट नै भऽ सकलौं आ पोथीक पुनः समीक्षा करबाक इच्छा भेल । बहुधा देखल जाइत अछि कि कथा संग्रहक नाँव कोनो एक गोट महत्वपूर्ण कथा वा घटना वा अंश पर राखि देल जाइत अछि, मुदा ऐबेर से नै। ऐ संग्रह मे ‍१९ गोट कथाक समावेश भेल अछि आ संग्रहक हरेक कथा स्वतंत्र रूपेँ व समग्र रूपेँ संग्रहक नाँवकेँ प्रतिबिम्बित करैछ। हर कथामे गामक जिनगीक एक अलगे स्वरुप देखबामे अबैछ। आमुख मे श्री सुभाष चन्द्र यादव जी बहुत सटीक लिखने छथि- "ऐ संग्रहक कथा सभमे औपन्यासिक विस्तार अछि। वर्त्तमान समएमे प्रचलित आ मान्य कथा सँ ई कथा सभ भिन्न अछि। हर कथा घटना बहुलता आ ऋजुसँ युक्त अछि।" मुदा एहि औपन्यासिक विस्तार आ ऋजुसँ युक्त हेबाक बादो हरेक कथा रुचिकर, लयबद्ध आ सुसम्बद्ध अछि। आधुनिक टी॰भी॰ धारावाहिकक सदृश भँसियाइत नै अछि, दिशाहीन सन नै बूझि पड़ैत अछि। कथा केर प्रवाह दिग्भ्रमित नै होइत अछि। कथाक हर घटना अप्पन ऋजु वा वक्रताक बावजूदो कथाक मुख्य भावनाक वा विषयवस्तुक अनुपूरक व सम्वाहक अछि। जेना कि “डाक्टर हेमन्त” नामक कथामे गामक जमीनक दियादी बँटवारा, सरकारी नोकरीक झंझटि आ क्लिनिकक झंझटि आ बाढ़िक संघर्ष चित्रित अछि मुदा तइयो कथामे कोनो विरोधाभास नै अबैछ, कथा एक लयमे शान्त अखण्ड प्रवाह जेना आगू बढ़ैत रहैत अछि। रौदी दाही मिथिलाक सभ दिनसँ प्रमुख समस्या, तेँ गामक जिनगीमे ओ समाविष्ट नै हुअए से कोना। कथा संग्रहक आरम्भ “भैँटक लावा” आ “बिसाँढ़” नामक कथा सभसँ होइत अछि जइमे क्रमशः दाही (बाढ़ि) आ रौदी (अकाल) केर बहुते सटीक व सजीव वर्णन भेटैछ। ओना मिथिलाक अभिन्न अंग हेबाक कारणेँ ऐ विभीषिका सभक विभिन्न रूपक दर्शन आनो कथा सभमे भेटैछ–मुदा हर बेर नव स्वरूपमे, पुनरुक्ति कतौ नै। १९६७ ई॰ केर अकालमे भारतक तत्कालीन प्रधानमंत्रीकेँ देखाओल गेल छल जे कोना मिथिलाक मुसहर लोकनि बिसाँढ़ खा कऽ अपन जीवनक रक्षा कएलन्हि, तकरे अधार बना कऽ “बिसाँढ़” नामक कथा लिखल गेल अछि। यद्यपि ऐ प्रकारक कथा मैथिली साहित्यमे बहुत पहिनहिये अएबाक चाही छल मुदा नै आबि सकल, एखन आएल अछि, मैथिली साहित्यक धरोहड़ि कथा बनत। जिनगी वास्तवमे एकटा संघर्ष थिक, मुदा जे हिम्मत नै हारैत अछि, परिस्थितिक सामना करैत अछि आ आगाँ बढ़ैत अछि सएह जीतैत अछि। ई ऐ संग्रहक पुर्वार्धक हरेक कथाक मूल मंत्र अछि तथापि पढ़बामे उपदेशात्मक कथा सुनि बोझिल कथमपि नै बूझि पड़त। हर कथा मैथिल समाजक विभिन्न सामाजिक, आर्थिक वा व्यावसायिक वर्गक जीवन संघर्षकेँ सजीव रूपेँ चित्रित करैछ, चाहे ओ बोनिहारिन “मरनी” हुअए, ठेलाबला, चूनवाली, दू पाइ कमयबाक इच्छा सँ दिल्ली जाएबला “फेकुआ”, पीरारक फऽड़ बेचि गुजर कएनिहार “पिचकुन आ धनिया” वा जीविकाक लेल संघर्षरत “शोभाकान्त व उमाकान्त” हुअए। चाहे ओ जीवनक उत्तरार्धमे गाम आएल “श्रीकान्त आ मुकुन्द” होथि, नव युगक जीवनक अभिलाषी “कुसुमलाल”, माए बापकेँ एकसरि छोड़ि अमेरिका बसनिहार “रघुनाथ” अथवा अप्पन निजी जिनगी आ ऑफिसक बीच ओझड़ाएल “डॉक्टर हेमन्त”। किनको मोन मे भऽ सकैत छन्हि जे जिनगी तँ ओहिना संघर्ष थिक- ओइमे ई संघर्षक खिस्सा पिहानी के पढ़त? पर से नै, लेखककेँ मनोविज्ञानपर एतेक जबर्दस्त पकड़ि छन्हि जे ओ जिनगीक संघर्षक ऐ कथा सभकेँ सेहो अत्यन्त सहज ओ रुचिकर ढंगसँ प्रस्तुत करबामे सक्षम भेलाह अछि। कोनो कथा कत्तहु निन्नक गोली सनि नै बुझना जाएत। पात्र सभक नाँव-गाँव भले जे हुअए मुदा कथा पढ़बाक काल हर वर्गक पाठक लोकनिकेँ कथा अपनहि वा अपनहि कोनो सर-सम्बन्धीक बुझि पड़तन्हि। बहुतेक कथा जिनगीक संघर्ष वा दुखसँ प्रारम्भ होइत अछि मुदा सुखान्त अछि। ई पाठककेँ एक मनःस्फुर्ति दैछ। किछु कथा किछु वर्ग व ओइवर्ग सँ जुड़ल व्यवसायक सैकड़ो वर्षक उतार चढ़ाव व संघर्षकेँ चित्रित करैछ, जेना कि कुम्हार (हारि जीत), चूनवाली आदि। वास्तवमे ठेलावला, रिक्सावला, चूनवाली, बोनिहारिन, कुम्हार आदि सभ तँ अपने मैथिल समाजक अंग छथि मुदा मैथिली साहित्य शायदे कखनो अपन ऐ अभिन्न अंग सभक सुधि लेलक आ तेँ ऐ वर्गक लोक सभ अपनाकेँ मिथिला-मैथिलीसँ पृथक बुझैत रहलाह। ई कथा संग्रह हुनका लोकनिक मनमे विश्वास आ ढाढ़स दैछ कि ओहो सभ ऐ मैथिल समाजक अविभाज्य अंग छथि। यद्यपि पूर्वमे किछु साहित्यकार लोकनि ऐ आर्थिक वा सामाजिक रूपसँ पिछड़ल, संघर्षरत समुदायपर लिखबाक प्रयास कएलन्हि अछि मुदा या तँ ओ कृत्रिम बुझाइत अछि अथवा यथार्थपरक रहितो पाठकक लेल ओ बोझिल सन बुझना जाइछ। ऐ विषय सभपर यथार्थपरक नीक व रुचिकर कथा सभक मैथिली साहित्यमे बहुधा अभाव रहल अछि। हमरा विचारेँ ऐ कथा-संग्रहमे ई दोष नै। कथा संग्रह केर हरेक कथा विभिन्न समाजिक वा आर्थिक वर्गक जीवन संघर्षकेँ चित्रित तँ करैछ मुदा संगहि संग पढ़बामे रुचिकर सेहो लगैछ। एकर अतिरिक्त किछु कथा जेना कि “अनेरुआ बेटा” आ “कामिनी”- अन्त मे एक गोट प्रश्न छोड़ि समाप्त होइत अछि। कथा लेखनक ई शैली मैथिलीक प्रसिद्ध कथाकार स्व॰ राजकमल चौधरीजीक कथा लेखनक शैलीसँ साम्य रखैत अछि, जखनकि आन कथा किछु हद तक स्व॰ हरिमोहन झा जीक कथाशैलीसँ साम्य प्रदर्शित करैछ। मुदा शैलीमे ऐ प्रकारक साम्य कथमपि कोनो कथाक मौलिकताकेँ प्रभावित नै करैछ। किछु लोकनिक कहब छन्हि जे लेखकक कथा संघर्षपरक छन्हि, सौन्दर्यपरक नै। मुदा हमरा जनैत लेखक जिनगीक संघर्षक संग-संग जिनगीक सौन्दर्यक सफल ओ सकारात्मक चित्रण कएलन्हि अछि। लेखकक सौन्दर्यबोध मात्र दैहिक नै भऽ कऽ बहुत व्यापक अछि आ कायिक सौन्दर्यक अतिरिक्त जगह-जगहपर मानसिक ओ प्राकृतिक सौन्दर्यक अजगुत चित्रण भेटैछ। लेखक जहिना मैथिल समाजक विभिन्न सामाजिक, आर्थिक वा व्यावसायिक रूपेण दलित (पिछड़ल) वर्गक जीवन संघर्षकेँ अपन लेखनीमे उताड़बामे सफल रहलाह अछि तहिना स्त्रिगणक मनोवैज्ञानिक चित्रण करबामे सेहो। हरेक बएसक व वर्गक स्त्रीक मनोदशाक सजीव चित्रण ऐ कथा संग्रहमे यत्र-तत्र भड़ल पड़ल अछि। चाहे ओ भैँटक लावामे “जिबछी” हुअए, बिसाँढ़ मे “सुगिया”, पीरारक फऽड़ बेचनिहारि “धनिया”, फेकुआक माए “रामसुनरि” होथि, पजेबा फोड़निहारि वृद्धा “मरनी” होथि वा मरनीक संग लबलब कएनिहारि स्वच्छन्द बाला “सुगिया”। चाहे पति सँ दू घड़ी बात करबाक लेल तरसैत “रागिनी” हुअए, चून बेचनिहारि “मखनी”, ओकर पुतोहु “फुलिया” वा ओकर पोती “कबुतरी”, मसोमात “लुखिया” होथि, आधुनिक नऽव परिवेशक बाला “सुनएना” अथवा कोशी कछेड़क निश्छल बाला “सुलोचना”। एकर अतिरिक्त लेखक किछु आनो सामाजिक समस्या सभ दिस इशारा कएलन्हि अछि यथा स्त्री भ्रुण हत्या (ठेलाबला), शराबक समस्या व नव जीवन शैलीक लापरवाह अनुकरण (भैयारी), नव जीवन शैलीक महत्वाकांक्षा आ टूटैत सम्बन्ध (बहीन, पछताबा व कामिनी), प्रतिभा पलायन (पछताबा), साम्प्रदायिक हिंसा (बहीन) आ रुपैय्याक जोड़ेँ बेमेल बियाह (कामिनी) आदि। पोथीक भाषा शैली सर्वसामान्यक विशुद्ध मानक मैथिली थिक। ओना कतौ-कतौ क्रिया आदिक प्रयोगमे मानक मैथिलीसँ थोड़ेक फड़ाक बुझि पड़ैत अछि (यथा “लागल” केर स्थान पर “लगल”)  परञ्च ओ कथाक पात्र आ परिवेशक अनुरूपे अछि तेँ ओ मानक मैथिलीसँ पृथक नै अछि। भाषा विन्यास बहुते सहज व स्वभाविक अछि तेँ बुझबामे दुरूह नै। “किछु” केर जगह हमेशा “कुछ” वा “कछु” केर प्रयोग भेल अछि जे बहुशः कथानकक अनुरूप सही अछि मुदा कतौ-कतौ मानक मैथिलीमे भऽ रहल सम्वादमे अचानक “कुछ” या “अइठीन” केर प्रवेश अखरैत अछि। एक्के शब्द, पात्र व परिवेशक अनुसारेँ साहित्यमे एक स्थानपर मानक भऽ सकैछ तँ दोसर स्थान पर नै यथा “कुछ” या “अइठीन” जँ कथा मे कोनो गामक सर्वसामान्य लोकक वार्त्तालाप थिक तँ ओइ ठाम मातृभाषा हेबाक कारणेँ ओ मानक मानल जाएत, मुदा वएह शब्द जँ कथामे कोनो मैथिलीक विद्वान बजैत अछि वा आन लोक- जकर मातृभाषा मैथिली नै थिक- से बजैत अछि तँ ओइ ठाम ओ मानकसँ विचलित बूझल जाएत।  पोथीमे शब्दक वैविध्य आ खाँटी मैथिलीक विलोपित होइत शब्द सभक प्रयोग स्व॰ हरिमोहन झा जीक रचना सभक याद करा दैत अछि। खाँटी मैथिलीक विलोपित होइत शब्द सभक ई कथा सभ एक अनमोल संग्रह थिक। इतिहासक किछु एहनो बातक इशारा ऐ कथा सभमे भेटैछ जे शाइद एखनुका पीढ़ीक धिया पुताकेँ नै बूझल होन्हि यथा चून पहिने डोका सँ बनैत छल (चूनवाली), कोना छतौनी सन सन मैथिल क्षेत्रमे अपनहि गलतीसँ आन भाषा-भाषीक आधिपत्य भेल (बोनिहारिन मरनी) आदि। अन्त मे हम श्री गजेन्द्र जीक पाँती (पोथीक पश्च मुखपृष्ठ पर देल) केँ दोहड़ाबए चाहब जे श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी केर कथा सभ मैथिली कथा धाराक यात्राकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लैत अछि। ऐ संग्रहक सभटा कथा उत्कृष्ट अछि, मैथिली साहित्यक रिक्त स्थानक पूर्ति करैत अछि आ मैथिली साहित्यक पुनर्जागरणक प्रमाण उपलब्ध करबैत अछि। ओना तँ कोनो पोथीकेँ पाठ्यक्रममे शामिल करबाक की प्रक्रिया छै से हमरा नै बूझल अइ मुदा अपन विषयवस्तु, मौलिकता आ भाषाविन्यासक आधारपर ऐ कथा सभकेँ पाठ्यक्रममे सम्मिलित करबाक चाही। केवल एक-आध कथाकेँ नै अपितु सम्पुर्ण कथा संग्रह स्नातक वा उच्चतर मैथिलीक पाठ्यक्रममे शामिल करबा जोग अछि। बहुत सम्भव अछि जे हमर ई बात आइ अतिशयोक्ति लागए मुदा भविष्यमे ई जरूर मैथिली पाठ्यक्रममे अपन स्थान बनाओत। पोथीक नाँव- गामक जिनगी लेखक- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन, 8/‍12, न्यू राजेन्द्र नगर, दिल्ली - ‍110008 दाम (अजिल्द / साधारण संस्करण‍)- भारतीय रु॰ 200/ मात्र, वा US $ 60 जितेन्द्र झा के राखत रुमालक इज्जति? एकटा मैल, पुरान रुमाल आ गीताक किताब चिरकाल धरि सुरक्षित राखए चाहैत छथि अरविन्द ठाकुर। किएक तँ बलिदानक चिन्हासी आ मित्रताक यादि‍ सहेजने अछि ई रुमाल। जर्जर रुमाल यादि‍ दिअबैत छन्हि हिनका जेल जीवन आ दुर्गानन्द संगे बिताओल समए। शहीद दुर्गानन्द झाकेँ फाँसी देलाक बाद काठमाण्डूक केन्द्रीय कारागारमे हिनका रुमाल आ गीताक पोथी सोंपल गेलनि। गीताक किताब तँ नै‍ मुदा रुमाल अखन धरि सहजने छथि अरविन्द। आेइ गीता किताबक प्रतीकक रुपमे ई एकटा ओहने गीता रखने छथि। प्रजातन्त्रक योद्धा ठाकुर ई रुमालक संरक्षण के करत से खोजि रहल छथि। ऐ‍ वास्ते ओ बहुतो नेताकेँ आग्रह कऽ चुकल छथि, मुदा कि‍यो हिनक आग्रहक औचित्य नै‍ बूझि सकल। नेपालक संग्रहालय सभ संस्कृति मन्त्रालय अन्तर्गत पड़ैत अछि। संस्कृति मन्त्री नेपाली कांग्रेसक मिनेन्द्र रिजाल छथि। ठाकुर कहैत छथि जे मिनेन्द्र रिजाल सहित कतेकोसँ अनुरोध कऽ चुकल छी एकर संरक्षणक लेल, मुदा कि‍यो नै‍ सुनलक। जतए दुर्गानन्द झाक नामे उपेक्षित अछि, ओतए हुनक रुमालकेँ के पुछए? ठाकुरक मांग छन्हि जे रुमालकेँ राष्ट्रिय संग्रहालयमे राखल जएबाक चाही। दुर्गानन्दकेँ एकटा शहीदक रुपमे नेपाल सरकार सम्मान नै‍ कऽ सकल अछि, एहनमे गीता आ रुमालक खोजी आ संरक्षणकेँ करत? वि.स. २०२० माघ १५ गते दुर्गानन्द झाकेँ फाँसी देल गेल रहनि। ओइ कऽ तीन दिन बाद जेलर ठाकुरकेँ दुनू वस्तु देने रहथि। आब ४ दशक हुअए लागल अछि आेइ दिनकेँ, जहिया तत्कालीन राजापर बम फेकबाक आरोपमे दुर्गानन्द झाकेँ फाँसी चढ़ाओल गेल रहनि। २०१८ सालमे जनकपुरक जानकी मन्दिरमे तत्कालीन राजा महेन्द्रपर बम प्रहार भेल छल। जइ‍मे महेन्द्र सकुशल बाँचि गेल छल। दुर्गानन्द आ अरविन्द बम प्रहारक आरोपमे जेल सजाए काटैत रहथि। नाबालिग भेलाक कारणे अरविन्दकेँ फाँसी नै‍ देल गेलनि। जेल जीवनक चरम यातनाकेँ याद करैत अरविन्दक आँखि नोरा जाइत छन्हि । अरविन्दक अनुसार दुर्गानन्द झाकेँ तड़पा तड़पा कऽ मारने रहए तत्कालीन क्रुर शाही शासक। ठाकुर अनुसार एकबेर रस्सीपर लटकाओल गेल फेर कनी काल साँस फेरए लेल छोड़ल गेल। तहन फँसरीपर लटका कऽ यातना देल गेल। आ अन्तमे गोली दागल गेल दुर्गानन्द झापर। एतेक केलाक बादो क्रुुरता जारीए रहलै। दुर्गानन्दक शव धरि हुनक परिवार जनकेँ नै‍ देल गेल छलै। राज्य शहीदक जीवनीकेँ सेहो उन्टा-पुन्टा कऽ राखि देने अछि। कक्षा १०क पाठय-पुस्तकमे दुर्गानन्द-जीवनी अछि जइ‍मे हुनक बलिदानी तिथिए गलत लिखल छै। दुर्गानन्द झाक बलिदानकेँ सम्मान करबाक राज्यक दायित्व छै। मुदा साम्प्रदायिक मानसिकतासँ जकड़ल नेता, मन्त्री सभ एकर अनदेखी करैत रहल। लगैछ जे दुर्गानन्द झाकेँ शहीदक रुपमे चिन्हाबहोमे राज्यकेँ लज्जाबोध छै। हुनक प्रति विभेदसँ दुखी छथि अरविन्द। नेपालमे प्रजातन्त्र एलाक बाद वएह सभ कुर्सी पओलक जे दुर्गानन्द संगे आन्दोलनमे छल। मुदा ओ सभ कहियो दुर्गानन्द आ हुनक माए आ पत्नीकेँ यादि‍ नै‍ कएलक। घरक एक्कहिटा सहारा दुर्गानन्दक फाँसीक बाद घर सभ दिनक लेल अन्हार भऽ गेलै। प्रजातन्त्र एलाक बाद सत्तामे सभसँ बेसी समए रहल नेपाली कांग्रेस दुर्गानन्द झाकेँ अपन कार्यकर्ता कहैत गर्व करैत अछि मुदा ओकर बेवहारमे मात्र घृणेटा देखाइ दै छै। शहीद झाक माए सुकुमारी देवी आ पत्नी काशी देवीकेँ गुजर-बसर करब मुश्किल छलै। तहिया कोनो कांग्रेसी नेताकेँ यादि‍ नै‍ एलै दुर्गानन्दक शोणित। काशी देवी सिक्की-मौनी बुनि कऽ संघर्षक पथपर आगू बढ़ैत रहली। वएह काशी देवी आइ संविधान सभाक सदस्य छथि। तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी हुनका समानुपातिक सभा सदस्‍य बनौने छन्हि। शहीदक नाओंपर नेता लम्बा चौड़ा भाषण दैत अछि। तालीक गड़गड़ाहटि सेहो सुनाइत छै। मुदा दुर्गानन्द सन शहीदकेँ पुछनिहार कियो नै‍। शहीद परिवारक घरमे चुल्हि जरलै आकि‍ नै‍ से के देखत? नेपालमे बलिदानी देनिहार सभक ईएह गति छै। शहीद परिवारक व्यथा कतबो बखानी, कम्मे हएत। वंशवाद व परिवारवादसँ रंगल कांग्रेसक दुर्गानन्दक उपेक्षासँ खिन्न छथि अरविन्द। ओ कहै छथि- हम सभ ईएह दिन देखबा लेल बलिदान नै‍ कएने रहौं। नेपालमे शहीदक नाओंसँ कतेको प्रतिष्ठान, अस्पताल, ट्रष्ट संचालित अछि। मुदा दुर्गानन्दक नाओंसँ किछु नै। हुनक नामक पाछाँ कोइराला या एहने किछु शब्‍द लागल रहैत तँ बहुत किछु सम्भव छलै। दुर्गानन्दकेँ उचित सम्मान करबासँ वि.पी. कोइराला, गिरिजा प्रसाद कोइराला सभकेँ के रोकलकै, से बुझए चाहैत अछि जनता। जकर शोणितपर प्रजातन्त्रक जग निर्माण भेलै तकरेसँ सौतिनियाँ बेवहार किए? कांग्रेस पार्टीए जहन कोनो मतलब नै‍ रखलक शहीदसँ तहन दलीय राजनीतिमे आन पार्टी आ सरकारकेँ देखबाक बाते कोन? उपटैत गाम बसाओत बाबा सुखी सम्‍पन्‍न जीवन बितएबाक ललसा लऽ कऽ लोक अपन गाम छोड़ि‍ परा रहल अछि शहर दिसि‍। वैश्वीकरणक अन्‍हर बिहाड़ि‍मे ओ अपन जन्‍म स्‍थानक महत्‍व नै‍ बुझए चाहैत अछि या कही बुझियो कऽ आँखि मुनि लैत अछि। गामक परती ओकरा विरान लागए लगै छै, ओतुक्का फुलबारीमे ओ काँट मात्र देखैत अछि। गमैया जीवनसँ जनमल एहने वितृष्‍णा देखएबाक प्रयास कएल गेल अछि मैथिली टेली श्रृंखला बाबामे। बाबाक लेखक निर्देशक रमेश रञ्‍जन कहैत छथि- मिथिलाक गाम उपटि रहल अछि। बाबा नेपाल टेलिभिजनसँ शनिदिन भोरमे ९ः३० बजे आ रविदिन १ः३० बजे प्रसारण भऽ रहल अछि। ग्रामीण जि‍नगीक नीक बेजाए पक्ष आ बाबा श्रृंखलासँ सम्‍बन्‍धित रमेश रञ्‍जनसँ कएल गेल बातचीतक संक्षेप। बाबाक कथानक की छै ? मिथिलाक वर्तमान अबस्‍था एकर मूल विषय वस्‍तु छै। मिथिलाक ग्राम्‍यजीवनमे दूटा पीढ़ीक बीचमे दूरी देखल गेल अछि। दू रंगक सोच छै। पीढ़ीगत अन्‍तर छै। एकटा पीढी छै जकरा गाम बड नीक लगैत छै, ओतुक्का जनजीवन प्रिय लगैत छै, संस्‍कार संस्‍कृति नीक लगैत छै। गाममे ओ सहज अनुभव करैत छै। एकटा पीढ़ी एहन बनि रहल छै जकरामे गामक प्रति विकर्षण छै। ओत्तऽके जीवन जटिल लगैत छै, श्रम करबाक तरीका बहुत बेजाए लगै छै। ओइ ठामक स्‍थायी सम्‍पत्ति बेकार लगै छै। एकटा नान्‍हिटा गामक विकट जीवनकेँ ओझरा कऽ राखैक औचित्‍य नै बुझैत छथि‍। ईएह द्वन्‍द्व नाटकमे केन्द्रीय अन्‍तर्वस्‍तु छै। मिथिलाक ग्राम्‍यजीवन आ बाबाक विषए वस्‍तुमे कतेक समानता छै? मैथिली भाषा एकटा माध्‍यम मात्र छै। बाबा सीरियलक स्‍थान चयन, ग्राम्‍य सौन्‍दर्यता, आम आदमीक संघर्ष आदि पीड़ाक बात छै ओतए। आम आदमीक हास्‍य विनोद, ओ कखन खुशी होइ छै, कखन दुःखी होइ छै। सामाजिक संरचनासँ निःशृत जे बात छै से कथानकमे बुझाइत छै। पात्रक बाजब, चलब, भेष-भूषा, आभूषण सभमे मिथिलाक झलक भेटै छै। तँए ई पूर्णरुपेँ मैथिली सीरियल छै। नेपालक लाखो मजदुर विदेशमे श्रम बेचबा लेल बाध्‍य अछि, देशमे अवसर नै‍ छै। की ओहने पड़ाइनकेँ देखएबाक प्रयास भेल अछि? एकर कथाक ओ अंश मात्र छै। ओ आवश्‍यक छै या नै‍ से बहसक विषए हेतै। लेकिन एकटा बात नि‍श्चि‍त छै जे कोनो देशक श्रमिक बाहर जा कऽ श्रम करए से नीक नै‍ मानल जा सकैत छै। मिथिलाक धरती उर्वर छै आ ओत्तए केर सपूत सभ ऊँट, भेड़ा चरबै छै। ओ मिथिला मात्रे नै‍ नेपालोक लेल नीक नै‍ भऽ सकै छै। मुदा मुख्‍य बात ई जे सम्‍पूर्ण रुपमे ग्रामीण जीवनक वैशिष्‍टय अप्रिय लागए लागल छै ऐ‍ पीढ़ीकेँ, आ फरक ढंगक स्‍वप्निल संसार दिसि‍ आकर्षित भऽ रहल अछि ओ। गाममे जीविका चलाएब कठिन नै‍ छै। दूटा गाए पोसि कऽ, पाँचटा बकरी पोसि कऽ, हर चला कऽ, अनकर आरिपर घास काटि कऽ आ खेत बटैया कए कऽ ओ जीविका चला सकैत अछि। सामान्‍य आदमीक लेल बहुत रास साधन छै गाममे। मुदा शहरमे सामर्थ्‍यवानक लेल मात्र साधन छै। आेइ आकर्षणमे भोतिया कऽ सभ किछु बिसरि गेल अछि। गाम किए ने नीक लगै छै, तकर विश्‍लेषण नै‍ करै छै, बस भागए केर कोशिस करै छै। ओ श्रमक लेल मात्रे भागि रहल छै एहन बात नै‍। ओत्तए उत्‍पादनक सम्‍भावना केहन छै? ओत्तए केर सम्‍भावना ओ नै‍ देखैत छै। ग्राम्‍य जीवनमे शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, रोजगारी आदिक अवसर नै‍ छै, एहनमे पड़ाइनकेँ स्‍वभाविक मानल जा सकैत अछि या नै‍? समस्‍या बहुत रास छै, मुदा समाधान की जे गाम छोड़ि कऽ भागि जाइ। कत्तए जाएब, गामसँ जनकपुर, जनकपुरसँ काठमाण्‍डू आ ओत्तएसँ न्‍यूयोर्क आ वाशिंगटन, तइक बाद? विकल्‍पक अन्‍त कत्तए छै। गाम उपटि रहल छै। मिथिलामे शहर छइहे नै‍, एकर आधारे गाम छै। ऐ‍के मतलब मिथिला उपटि रहल छै। हम तइ रुपमे ओकरा देखबाक प्रयास कएने छी। एखनुक मैथिली सीरियल जनशक्ति आ तकनीकी दुनू दृष्‍टिएँ कमजोर देखल गेल अछि। बाबा सिरियल ओकरे निरन्‍तरता तँ नै‍? बाबा सीरियल नेपाल टेलिभिजनक लेल बनाओल गेल अछि। ऐ‍मे नेपाल टेलिभिजनक प्राविधिक सहयोग लेल गेल अछि। मैथिली क्षेत्रक चर्चित कलाकार सभ ऐ‍ सीरियलमे सहभागी छथि। मिथिला नाट्य कला परिषद्क कलाकार रंगकर्ममे बेस चर्चित अछि। तँए ऐ‍ सिरियलमे ओतुका कलाकारक समावेश कएल गेल अछि। सुनील मिश्र, राम नारायण ठाकुर, मदन ठाकुर, घनश्‍याम मिश्र, रविन्‍द्र झा, रञ्‍जु झा, परमेश झा, राम कैलास ठाकुर सहितक कलाकार ऐ‍मे अभिनय कएने छथि। कथा, पटकथा, संवाद आ निर्देशन हम स्‍वयं कएने छी। नेपालक राजनीतिक अवस्थासँ उपजल –ग्लानि नेपालक राजनीतिक अबस्थासँ उपजल ग्लानि- मैथिली भाषामे उपन्यास विधामे न्यून रचना भऽ रहल, कहैत साहित्यकार सभ चिन्ता व्यक्त कएलनि अछि। नेपालसँ मैथिलीमे अखन धरि मात्र चारिटा उपन्यास प्रकाशित भेल कहैत साहित्यकार लोकनि औपन्यासिक कृति लेखन आ प्रकाशन नै हएब दुखद रहल, मन्तव्य व्यक्त कएलनि अछि। राजेश्वर ठाकुर रचित ग्लानि मैथिली राजनीतिक लघु उपन्यासकेँ साओन २७ गते राजधानीक भृकुटी-मण्डपमे आयोजित कार्यक्रममे विमोचन कएल गेल। प्राज्ञ रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’ ठाकुरक प्रथम कृति ग्लानिक विमोचन कएलनि। भ्रमर नेपालीय मैथिली साहित्यकार उपन्यास रचना करबा दिसि‍ रुचि नै देखौने छथि, कहलनि। नेपालमे कुल १ सए पचासटा मैथिली पुस्तक प्रकाशित अछि जइमे उपन्यासक संख्या मात्र चारि रहल, हुनक कहब छलनि। उपलब्ध चारिटा उपन्यास सेहो आह्लादकारी नै रहल, टिप्पणी भ्रमरक छलनि। राजेश्वर ठाकुरक ग्लानिक सम्बन्धमे ओ कहलनि जे उपन्यासक प्रमुख पात्र रमेश अछि जे मधेश आ मधेशीक हक अधिकारक लेल लड़ए चाहैत अछि। गजेन्द्र बाबुक मधेश आन्दोलनमे रमेश नौकरी छोड़ि‍ कऽ कूदि जाइत अछि, मुक्ति कामनाक संग। पहाड़ि‍या शासन प्रवृतिक विरोधीक रुपमे आगू बढ़ैत रहैत अछि रमेश। मुदा सत्ता लिप्सामे डुबि जाइत अछि राजनीतिक व्यक्तित्व सभ। एहन अवस्थामे रमेशक ग्लानि उत्पन्न होइ छै आ लघु उपन्यासक जन्म होइत अछि। ओही अवसरमे मन्तव्य दैत डाॅ. रामदयाल राकेश राजेश्वर ठाकुरक ग्लानि कृतिसँ मैथिलीक उपन्यास साहित्यमे एकटा नव अध्याय जुड़ल, कहलनि। कार्यक्रममे सहभागी सभ नेपालीय मैथिलीमे उपन्यास विधामे कलम चलएबा दिसि‍ साहित्यकार सभकेँ लगबाक आग्रह कएने रहथि। कार्यक्रममे डा. गंगा प्रसाद अकेला, गोपाल अश्क, संचार कर्मी चन्द्रकिशोर झा सहितक व्यक्ति सहभागी रहथि। सुजितक अनुभव रिपोर्टर डायरीमे प्रस्तुतिः जितेन्द्र झा जनकपुरधाममे हाल पत्रकारिता सक्रिय सुजीत कुमार झाक अनुभव आ विचारसभ समेटल रिपोर्टर डायरी नामक संस्मरण प्रकाशित भेल अछि । मैथिली भाषामे प्रकाशित ऐ कृतिक प्रकाशक आफन्त नेपाल नामक गैर सरकारी संस्था अछि। ओ जनकपुरमे काज करबाक क्रममे रिपोर्टिंग, घुमफिर आदिक क्रममे कएल अनुभवकेँ डायरीमे समेटने छथि। संस्मरणमे जनकपुरक आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक मुद्दा सभकेँ समेटबाक प्रयास कएल गेल अछि। लेखक मिथिला डट कम मैथिली समाचार पत्रक सम्पादक छथि। डायरीमे संग्रहित संस्मरण मिथिला डट कममे विभिन्न समएमे प्रकाशित भऽ चुकल अछि। प्रस्तुत अछि डायरीक किछु महत्वपूर्ण अंश। मैथिलीक विकास ट्रस्ट ः नाम उच्च काम तुच्छ मिथिला नाट्य कला परिषदक २०६८ साउन महिनामे भेल साधारण सभामे मैथिली विकास ट्रस्ट कोषपर हम कसि कऽ बजलौं। हमरा ऐपर जोड़ देबाक आशय छल, ऐ विषयपर बहस होइक। अहु दुआरे जे ओइ समारोहमे ट्रस्ट कोषक सदस्य सचिव आ दू गोट सदस्य उपस्थित छलथि। मुदा ओ सभ किछु नै बजलथि। किए नै बजलथि? हमरा नै बुझल अछि। ट्रस्ट कोष नै चललासँ ककरा फाएदा भऽ रहल अछि? या तँ एकरा पूर्णतः बन्द कऽ देल जाए, नै तँ काज शुरु कएल जाए। ऐ दूनुपर बहस आवश्यक अछि। बन्द करब कोनो दृष्टिसँ बढ़िया नै हएत। एक तँ मैथिलीक नामपर कतौसँ पैसा अबैत नै अछि, जँ एबो कएल तँ काज नै भेल आ पैसा फिर्ता चलि जाइए। ऐसँ दुर्भाग्य अओर की भऽ सकैत अछि! मैथिली विकास ट्रस्ट कोषक संयोजक छथि मैथिलीक वरिष्ठ साहित्यकार डा.राजेन्द्र बिमल, सदस्य सचिवमे नेपाल संगीत तथा नाट्य प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ रमेश रंजन, सदस्यमे पूर्वाञ्चल विश्वविद्यालयक उपकुलपति डा. रामावतार यादव, मिथिला नाट्य कला परिषदक अध्यक्ष सुनील मल्लिक, नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ राम भरोस कापड़ि भ्रमर, जिल्ला विकास समिति धनुषाक पूर्व सभापति राम चरित्र साह, एकीकृत नेकपा माओवादीक नेता रोशन जनकपुरी, मिथिला राज्य संघर्ष समितिक संयोजक परमेश्वर कापड़ि आ रामानन्द युवा क्लवक पूर्व अध्यक्ष जीवनाथ चौधरी। ई सभ असफलताक मुँह कहियो देखबे नै कएने छथि। हिनका सभक निष्ठापर प्रश्ने नै उठाओल जा सकैत अछि। मुदा कोषक काज देखलापर मस्तिष्कमे बनल सभ प्रभाव समाप्त भऽ जाइत अछि। जिल्ला विकास समितिक कोषक ई हाल अछि तँ सरकारक कोषक की हाल हएत? मैथिलीक विकास किए नै भऽ रहल अछि। एकर छोट उदाहरण अहुसँ लेल जा सकैत अछि। किओे कहता पैसा नै अछि तँए काज नै होइत अछि। मुदा ऐठाम तँ पैसो अछि तैयो काज नै भऽ रहल अछि। के सुनत बेचनक राग? बेचन पासवान मिथिलाक चर्चित गायक। धनुषा होइ, महोत्तरी होइ वा काठमाण्डूए, सभ ठामक लोक हिनका चिन्हैत छन्हि। कनिको-मनिकोमे बेचन गीत गाबि देतौक, सोचि लोक हिनका बजा लैत अछि। काठमाण्डूक बड़का लोक सभकेँ गीत सुनएकेँ मन भेल तँ बेचनकेँ बजा लैत अछि। मुदा बेचन आइ कोन अवस्थामे जी रहल छथि, ककरो नै बुझल हएत। ओ पैसाक लेल घर–घर भटकि रहल छथि। फुटल तबलाकेँ छड़ाबए हेतु देला महिनो भऽ गेल छन्हि। मुदा पैसा नै छन्हि जे चमरा लगसँ तबला अनता। खाइयोपर आफत छन्हि। बिना साजक के गीत सुनत! बेचन आ गायक उदित नारायण झा मित्र रहथि। आर्थिक स्थिति तहिया दूनुकेँ समाने छल। काठमाण्डूमे कतेको ठाम दुनु संगे गीत गएने छथि। काठमाण्डूमे संर्घष करैत काल बेचन नेता सभक चम्चागिरीकेँ प्राथमिकता देलन्हि आ उदित नारायण करियरकेँ। आइ उदित नारायण संगे रहितथि तँ बेचनोक एहन स्थिति नै रहैत? घर–घरमे दारु भठ्ठी ! धनुषा जिल्लामे अवैध दारुक भठ्ठी सञ्चालित अछि ई बात हमरा मात्र नै बहुतो गोटेकेँ बुझल अछि। गोरख यादवक सोहनी सिंगरजोरामे रहल भठ्ठी तोड़ए गेल पुलिस टोली संग रिपोर्टिङ्गक लेल हमहूँ गेल छलौं। ओइ ठाम पुलिस दारु सभ नष्ट कऽ भठ्ठीमे आगि सेहो लगौने छल। मुदा ऐबेर धनुषाक धनौजी गबिसक धनौजी आ भररिया तहिना औरही कप्टौलमे दारु देखलौं तँ चकित रहि गेल छलौं। विश्वास नै भऽ रहल अछि जे धनुषामे अवैध दारुक कारोबार ऐ रुपसँ बढ़ि गेल अछि। हमरा ऐ तीनू गाममे जाएसँ पूर्व लगैत छल, गोरख यादव, सवैलाक जयसवाल, इनरवाक राजा गोइत, फुलगामाक किछु व्यक्ति मात्र ई कारोबार करैत छथि। मुदा सत्य ऐसँ फरक अछि। कतेको घरमे पुलिस दारु नष्ट कएलक। ओ घर सभ बाहरसँ बहुत सम्भ्रान्त जकाँ लगैत छल मुदा भीतर गेलाक बाद किछु अओर छल। धनुषाक तत्कालीन प्रहरी उपरीक्षक दिनेश आमात्य टोलीक नेतृत्व कएलाक कारण दारु नष्ट करब औपचारिकता नै रहि गेल छल। एकटा घरमे पुलिस दारु नष्ट करए लेल पहुँचल तँ गृहणी बरियातीकेँ पिआबए कऽ लेल दारु किन कऽ अनने, जानकारी देलन्हि। मुदा भीतर गेलाक बाद तेँ माहौले किछु अओर छल। ओइ घरमे मात्र पाँच सए लीटरसँ बेसी तैयारी दारु आ ओतबे संख्यामे कच्चा दारु भेटल छल। पत्रकारक चुनाव: सुन्धारामे सुरापान नेपाल पत्रकार महासंघक राष्ट्रिय अधिवेशन २०६८ बैशाख २०२१ गते सम्पन्न भेल। केन्द्रीय पार्षदक रुपमे हमहूँ सहभागी भेल छलौं। पार्षदक रुपमे हमर ई पहिल सहभागिता छल से नै मुदा जे आनन्द ऐबेर लागल से कहियो नै लागल छल। सुन्धारामे ठहरबाक व्यबस्था कएल गेल छल। सभ पत्रकारकेँ ओइ एरियामे रखलाक कारण विशेषे चहल–पहल हएब स्वभाविक छल। चुनावमे भोट पएबाक लेल किछु गोटे मुँहसँ पोलहा रहल छलथि तँ किछु उम्मेदवार दारुक बोतल लऽ कऽ आएल छलथि। काश हमहूँ दारु पिबैत रहितौं तँ कतेक पिबतौं। दिनमे टैक्सीपर काठमाण्डू घुमाबएबला सभ सेहो भेटल। दोहरी डिस्को फाइव स्टारक भोजनक किछु गोटे मित्र सभ लाभ उठौलन्हि। ओहो सभ अपन–अपन खेत बेच कऽ ओना कऽ रहल छलथि से नै। हुनको सभकेँ किओ अओर फण्डीङ्ग कएने छल। व्यापारी, तस्कर, गलत कमाएबला नेता सभ दाता रहथि। काठमाण्डूमे लगैत छल, एहिना भोट होइत रहितै आ हम सभ ऐश करैत रहितौं। अपना आपकेँ समीक्षा करैत छी तँ काठमाण्डूमे बिताएल आनन्द प्रश्न कऽ रहल अछि, की पत्रकारक ईहे काज अछि? किए एतेक महग भऽ रहल अछि पत्रकारक चुनाव? सभ्य समाजक कल्पना करएबला कलमजीवी सभ स्वयं विकृति बढ़ाबएमे तँ नै लागल अछि। एक दू दिनक ऐश अराम लेल पत्रकारक संस्था बदनाम तँ नै भऽ रहल अछि? बैकुण्ठ जी, महन्थक गरिमा बुझियौ रत्न सागर स्थानक छोटे महन्थ बैकुण्ठ दास २०६८ अखारमे जिल्ला अदालत धनुषाक एक न्यायाधीशक निर्णयसँ भलेही साधारण तारेखमे रिहा भऽ गेल होइथ मुदा समाज एखनो हुनका बहुतो केशमे अपराधी मानैत अछि। जइ व्यक्तिकेँ देखि कऽ मोनमे श्रद्धा जगबाक चाही ओइ व्यक्तिकेँ देखि कऽ लोककेँ डर लगैत अछि। हमरा जहिया बैकुण्ठ जी सँ परिचए भेल छल तँ ओ कहलथि, ‘पाकिस्तानसँ डाक्टरी पढ़ने छी।’ डाक्टर भऽ कऽ बाबाजी बला काज कनी काल लेल उटपटांग अवश्य लागल छल। हुनका जनकपुरक सर्वशक्तिमान होबए कऽ लालसा छन्हि। मन्दिरमे पैसाक कनेको अभाव नै अछि। मुदा खेतपर खेत किए बिका रहल अछि? ओ अपन मन्दिरक जमीन बेचैत-बेचैत जमीनक दलाल भऽ गेल छथि। कतेको मन्दिर जमीनक कारण बरबाद भेल अछि। फेर ओहन बरबाद करएमे किछु महन्थमे हुनको हाथ अबैत अछि। पहिने हुनकासँ भेट होइत छल तँ ओ मन्दिरकेँ एना सुधार करब ओना सुधार करब, कहैत छलाह मुदा बादमे बाबाजी सभपर टिप्पणी करए लगला। ओ पुलिससँ केकरो पकड़ाबए आ ककरो छोड़एबामे लागल रहल छथि। ओ न्यायालयकेँ प्रभावित कऽ सकैत छथि। पत्रकारकेँ अपन पक्षमे लिखाबए मात्रे नै, मीडिया हाउस सेहो खोलि सकैत छथि। हुनकर निवासमे दिन भरि चटुकार सभक भीड़ लागल रहैत अछि। ओ सभ चाहैत अछि, बैकुण्ठ जी अओर जमीन बेचौथ, अओर दलाली करौथ, चटुकारितो करब आ ऐशो हएत। जनकपुरक बहुतो मन्दिर एखन घर वा दोकानमे परिणत भऽ गेल। ईहो भऽ जाएत। चटुकार सभकेँ कोनो लेनादेना नै अछि। सम्भवतः बैकुण्ठ जी विवाहो नै कएने छथि जे धियापुताकेँ बहुतो रुपैया छोड़ि कऽ जाइ एकर लोभ हेतन्हि। फलाकेँ पीट, फलाकेँ मार बला बात छोड़ि इम्हर ध्यान मात्र देलासँ देखथुन कतेक प्रसन्नता होइत छन्हि। जनकपुरिया आम कत्तऽ गेल? जनकपुरमे उपलब्ध आम सभ जनकपुरक नै रहैत अछि। ऐठाम भारतसँ आएल आम प्रायः बिक्री होइत अछि। नेपालक कतौ-कतौ बिक्रियो भेल तँ ओ उदयपुरक। जनकपुरक आम बजार तक पहुँचिये नै रहल अछि। एक समए छल जनकपुरक आम नेपालक सभ ठाम बिक्रीक लेल जाइ छल। कतेक व्यापारी तँ भारत धरि सेहो सप्लाइ करैत छल। २० वर्ष पूर्व ऐठाम ततेक आम होइत छल जे व्यापारी सभ मालोमाल भऽ जाइत छल। ओइ उमेरक सभ लोक देखने अछि। कहल जाइ छै, मनुष्य की कुकुर नढ़िया सेहो आमक महिनामे मोटा जाइत छल। परिक्रमा सड़क हुअए वा जनकपुर–जलेश्वर, जनकपुर–ढल्केबर, सभ सड़कक बगलमे आमक गाछ रहै छल। तिरहुतिया गाछी, पहाड़ी गाछीमे ततेक आम फड़ैत छल जे लोक तोड़ि नै सकैत छल। राम मन्दिरक आगाँमे रहल राम पार्कमे सेहो आमक गाछ छल। जानकी मन्दिरक पाछुमे राम बाग छल। ओत्तौ विभिन्न जातिक फूलक अतिरिक्त आमक गाछ छल। जनकपुरक सभ मन्दिरक अलग–अलग आमक बगान छल। आम खाएकें लेल बहुतो लोक आमक महिनामे जनकपुर अबैत छल। मुदा आब नै आमक बगान रहि गेल आ नहिये आम। जनकपुरसँ बाहर जाएबला बस सभमे आम महिनामे आम भरल रहैत अछि मुदा ओ आम भारतसँ आएल रहैत अछि। काठमाण्डूमे जहिना बाहरक माछ राखि जनकपुरक माछ कहि ठकैती होइत अछि, तहिना आमोमे। जुड़शीतलक जोगाड़ ऐसँ पहिने कहियो जुड़ शीतलमे थालमाटि नै खेलने छलौं। पहिने थालक ठोप मात्र लगबैत छलौं। राम युवा कमिटी २ बर्षसँ थालमाटि खेलक कार्यक्रम रखैत आबि रहल अछि। ओना कही हमरे प्रयाससँ ई थालमाटि राखल गेल अछि। हम पहिने थालमाटिक रिपोर्टिङ्ग करबाक लेल धनुषाक गंगुली जाइ छलौं। कलाकार गुड्डु गंगुलीक नेतृत्वमे ओतए थालमाटिक विशेष उत्सव होइत छल। ऐ कार्यक्रमक सम्बन्धमे रामयुवा कमिटीक अध्यक्ष सोहन ठाकुरकेँ आग्रह कएलियन्हि जे राम युवा कमिटी सेहो एकर आयोजना किए नै करैत अछि? ऐपर ओ सहमत भऽ गेलथि आ दू वर्षसँ ई पाबनि भऽ रहल अछि। कहियो ऐ पावनिक पूरे मिथिलाञ्चलमे एक हप्ता पहिनेसँ धुम रहैत छल मुदा सरकारी उदासीनता मात्र नै, एकरा समाप्त करबाक एकटा बड़का प्रयास भेल। किछु वर्ष पूर्व धरि ऐ दिन सँ नेपाालक एस.एल.सी. परीक्षा शुरु होइत छल। जे ऐ पावनिकेँ बहुत हद धरि असर कएलक वा कही बसिया बड़ी-भात खाएमे सीमित कएलक। एकरा बचाबए पड़त। ऐ पावनिमे रंग भरए पड़त। एक बेर फेरसँ मिथिलाकेँ शीतल शीतल करए पड़त। पैसा दिअ भोट लिअ धनुषा निर्वाचन क्षेत्र नम्बर ५ क उपनिर्वाचनक प्रचार–प्रसार कोना चलि रहल अछि, ई बुझबाक लेल २०६५ चैत १६ गते सखुवा महेन्द्रनगर पहुँचल छलौं कि तीन–चारि गोटे हमरा लग आबि कहैत अछि, ‘भाइजी, कोन पार्टीक प्रचारमे आएल छिऐ? हम सभ तँ निर्णय कएने छी, जे बेसी पैसा देत ओकरे भोट देबै।’ ‘पैसा?’ ‘हँ। ऐबेर हम सभ खोलि कऽ पैसा मंगैत छिऐ।’ ‘इन्ट्रेस्टिङ्ग !’ ओ सभ हमरा कोनो उम्मेदवार छी बुझि रहल छल। हम हुनका सभसँ चाहलौं जे पैसाक की खेल भऽ रहल छै, से बुझबामे चलि आबए। तँए बातकेँ बढ़बैत हुनका सभ संगे रहल एक महिलासँ पुछलियन्हि, ‘की अहूँकेँ पैसा चाही?’ ओ कनी क्रोधित होइत बजली, ‘किए नै, अहाँ सभ जखन हमर भोट लऽ कऽ ढौआ-ढाकी कमा सकै छी तँ किए नै हम सभ पैसा माँगू?’ ‘कतेक गोटे देलक अछि?’ हमर जिज्ञासापर ओ कहली, ‘प्रचार शुरु होबएसँ पहिने बहुत किछु सुनने छलौं “जे फलाँ महासेठ, फलाँ यादव, फलाँ डाक्टर ठाढ़ भेल छै। बहुते पैसा भेटत मुदा एकटा स्वतन्त्र उम्मेदवार पचास रुपैया देलक, तकर बाद किओ नै देलक अछि।’ ओइ महिला संगे रहल एकटा वृद्धा सेहो हमरा दिस ललचाएल मुद्रामे ताकि रहल छली। हमरा लागल जे हुनक मुखाकृति कहि रहल अछि जे हम हुनका बिड़ी पिअ लेल सेहो जँ पैसा नै देबै तँ ओ हमर कपड़ा फारि देती। तथापि हम हुनका दिस तकैत पुछलौं, ‘दाइ अहाकेँ किओ पैसा देलक अछि की नै?’ ‘एक दु गोटे कहलक अछि। मुदा की कहू, अगो बेर ठकि लेलक, अहूँ तँ कम्तीमे एकरा सभकेँ नै ठकियौ?’ अनिल मल्लिक हम, देह आ विदेह....! मोन बड़ा उद्विग्न छल, भोरे चाइरे बजे आँखि खुलि गेल! बौआक माय कहलथि “जाड़ मास, ठार पकड़ि लेत, गब्दिया कऽ सुति ने रहू!” मुदा आँखिमे निंद रहए, तँ ने सुती? निंद तँ पड़ाएल छल, चिन्ताक जेना बाढ़िमे भसिऐ लगलौं हम! काइल्हे बौआक बिआह लगभग निश्चित केलौं ! भजियबैत भजियबैत, गप्प मिलबैत मिलबैत… सौ टा फुइस साँच बजैत…  दू सालमे चारि ठमन कन्या देखलाक बाद… आब जा कऽ एतऽ हमर दालि गलल! कन्या सेहो सुशील, मोन गदगद, कि हमर सभ मनोरथ ऐ कुटमैतीसँ पूरा भऽ रहल अछि, सभसँ पैघ बात तँ ई, कि कन्याक पिता झटसँ राजी भऽ गेलथि कि लेनदेनक बात केकरो पता नै चलतै, कतौ नै खोलता, सभ ठमन बजता… कि आदर्श विवाह भेल! हमर गिनती समाजक अगुआमे होइत अछि, हमहीं सभ तँ छी, जे एहन कुरीतीक विरोध करै छीI जौं हमरा बारेमे लोककेँ पता चलि जाइ, की हम पाइ लऽ कऽ कुटमैती केलौं, तँ ई समाजमे हमर प्रतिष्ठाक चेथरा उड़ा देतI हम मोने-मोन धन्यवाद दैत एलौं मझिला साढ़ूकेँ, जे सभ बात भीतरे भीतर मिलेलथिI हुनके गतातीक कथा अछि ई, तै दुआरे निफिक्कीर छी! बड़ खुशी मोनसँ कन्यागत ओतऽ सँ लौटैत बेर भुतही हटियापर सँ ताजा बलसाही  किनने एलौंI घर अबिते बौआक मायकेँ सभ बात बतेलौंI सुनि कऽ बहुत प्रसन्न मोनसँ बाजि उठलथि, कि चलू “साँपो मरल आ लाठीओ नै टुटल”! खा पी कऽ जल्दिए सुति रहलौं दुनु प्राणी! हौ बा! ई की भेल? आब एकर निदान तँ श्रीधर बाबु मात्र बतेता तँ हुनके लंग जाइ छीI मोने-मोन निश्चय कऽ चललौं, हुनकेसँ भेंट करऽ! कहुना-कहुना कऽ पाँच बजल, कुहेश बड़ जोर, दशो हाथ दूर तक देखनाइ मुश्किल, पहुँचलौं श्रीधर बाबूक घर, तीन चारि गोटेक साथे घुर तपैत भेटला, दतमैन करैत! अकचका कऽ पुछलथि, की यौ? की बात? एतेक सबेरे? हम कहलियन्हि जे बड़का आफतमे छी, की कहू? कनेक असगरेमे विचार करैक छल अहाँसँ! सुनि कऽ श्रीधर बाबु हमरा दलान परक कोठरीमे बैसबाक लेल कहलथि आ कुर्रा आचमन केलाक बाद दू गिलास चाह लऽ कऽ एलथि कोठरीमे, बैसते  कहलथि “हँ ! तँ, आब कहऽ कोन आफतक बात करै छलह तों?”! बिना चोरा नुका कऽ सभटा बात कथा कुटमैतीक बारेमे कहलियन्हि हम श्रीधर बाबूकेँ! हमर गप्प निर्विकार भावसँ सुनैत रहला! हम कने दम धेलौं, आ फेर कहऽ लगलौं, श्रीधर बाबू! जेना अहाँ कहैत छी जे सपना कहियो भविष्यमे घटैबला घटनाक सूचक सेहो होइ छै आ हमहूँ ई बात मानै छी, आइ राति बड खुशी-खुशी सुतलौं मुदा राति हम सपना बड बिचित्रक देखलौं! देखलौं की… हम दू गोटे छी, एकदम हमरे जकाँ… हु बहू… देखबामे एको मिसिया फरक नै, जेना डबल रोल होइ? डिट्टो ओहिना, एकटा उपर आ एकटा निच्चा! उप्पर बला अपनाकेँ आत्मा कहैत छल, आ निच्चा बलाकेँ देह! आत्मा बड खिसिया कऽ धमकबैत छल देहकेँ “हम नै सहबौ आब तोहर बदमाशी, बाल्यकालक… जबानीक मनमानी क्षमा करैत गेलियौI अंग-अंगकेँ, सभ इन्द्रियकेँ डेमोक्रेसी देलियौ, बदलामे की भेटल हमरा? निराशा, अपमान, आत्मग्लानि… आइ तँ अति केलैं तों, हाथ पकड़लक देहक आ जेना घिसियबैत चलल कहिते, कि आ तोरा देखबै छियौ तों की की केलैं अखैन धरि, आ दण्ड किए नै दियौ तोरा? मायक गर्भसँ लऽ कऽ अखैन तकक यात्रा हमर देहकेँ क्षण भरिमे करा  देलक, जेना सिनेमा होइ तहिना, जेना ऐनामे स्पष्ट देखाइ छै तहिना एकदम किलियर साफ साफ! अपन कुकृत्य देख देह हाँफि गेल तँ आत्मा ओकर हाथ छोड़लक, देह धप्पसँ खसल जमीनपर, डरा कऽ देखऽ लागल आत्मा दिस, जेना चोर देखै छै दरोगा दिस तहिना, चुपचापI कनिक्को शांत नै भेल अखैन धरि आत्मा, बाजैत रहल,  बेटाक बिवाह करै छेँ, नीक बात, मुदा ऐ प्रयासमे तों की की प्रपंच रचलेँ से यादि छौ? सभसँ पहिले तोँ नीक बेपारी जकाँ ग्राहककेँ अपन जालमे फसेलेँI ग्राहक कन्यागत, प्रोडक्ट तोहर लालच, बेचारा नवयुवक तोहर अपन बेटा, जे ई कुरीति, भ्रष्टाचारक विरुद्ध लम्बा युद्ध लड़ैक क्षमता रखै छल, तीन चारि बेर कम्पीटिशन की लूज केलक तों ओकरा हिम्मत देबाक बदला, हौसला देबाक बदला लगले ओकर ब्रेनवास करा ऐ शर्टकट रस्तापर चलैक लेल राजी कऽ लेलहीं! मार्केटिङ टुल बनबाक लेल तैयार कऽ लेलहीं, नीक पैकेज, बोनस, इन्सेन्टिभक मकड़जालमे फाँसि लेलहीं, जखैन ओ तैयार भऽ गेलौ तँ निकलि पड़लै ओकरा लऽ कऽ मार्केटिङमे! आब आ, तोरा देखबै छियौ तोहर जघन्य अपराध! हमरा आगाँ आबि गेल दृश्य जइमे हम बौआ लेल पहिल कन्या देखऽ गेल रही! ओ बाजैत रहल, ऐ कन्याकेँ तों पिड़श्याम छेँ, दोसरकेँ लम्बाइमे, तेसरकेँ शाकाहारी कहि कऽ छँटलिहीं लेकिन बात दोसरे छलै, तोहर अदॄश्य अभीष्ट जौं पूरा होइतौ तँ तों कोनो नै छँटितहीं, जखैन दालि नै गलैबला भेलौ तँ तों बहाना बनेलहीं ई सभ! यथा सामर्थ कन्यागत तैयार छलखुन तोरा दै कऽ लेल मुदा तों कन्सिडर आ कम्प्रोमाइज करै कऽ लेल तैयार नै भेलें आ छ छ महिना प्रतीक्षा करेलाक बाद, दौड़ैलाक बाद जबाब पठेलहीं कि एतऽ नै हएत, आन ठमन देखूI हरेक जगह तों कन्या परीक्षण करैक बेर चला कऽ, बजा कऽ, लिखा कऽ कन्या देखलेँ जेना पुतौह नै मार्केटसँ एल.सी.डी. टेलिभीजन पसन्द कऽ रहल छें, कनेक्को अनुमान छौ? कोन मनोदशासँ ऐ सभ निरपराधकेँ गुजरए पड़ल हेतै? गरजि उठल आत्मा देहपर, कतेक मेहनतसँ ऐ बचिया सभमे विकसित भेल हेतै आत्मविश्वास आ स्वाभिमान, जकर नेओं हिला देलकै तोहर मिथ्या लांछन? निरपराध बचियाकेँ हीन भावनाक शिकार बनबैक, अपराध-बोधक शिकार बनबैक दुष्प्रयास केलें तों, ई अक्षम्य अपराध छौ, एकर दण्ड भेटतौ तोरा! हम आत्मा छी मुदा आत्माक दुख बुझै छी। परम-आत्माक कंठहार बनैक अछि हमरा! तोहर कुकृत्य हमरा नर्कक द्वार लऽ जाएत! आब मनमौजी नै चलतौ, कड़ा अनुशासन रहतौ आब! तों तँ देह छेँ, एक दिन सुन्दर काया क्षीण भऽ जेतौ। पे बैक पीरियडक बाद तों बेपारी जेना बैंकक पूँजी आपस करै छिही तहिना हमरो आपस करए पड़तौ! तोहर नियति छौ… कि तँ तों जड़बे कि तँ तों गड़बे, राख बनबें या माइट! तोहर खिस्सा तँ खतम भऽ जेतौ, लेकिन हमरा तँ जबाब देबऽ पड़त हमर सृजनहारकेँ, देखाबऽ पड़त तोहर बैलेन्सशीट! हुनको अपन युनिटक परफोरमेन्सक रिपोर्टिङ करए पड़ैत छन्हि, हायर मैनेजमेन्टक! तोहर बैलेन्सशीटक सम्पैत पक्ष छौ सत्कर्म, पुण्य आ दायित्व पक्ष छौ दुष्कर्म, पाप! तोहर अखन धरिक कारगुजारीसँ निश्चित छौ की तोहर दायित्व पक्ष भारी रहतौ ! हम की औचित्य बतेबै? हमरा तँ नियुक्त कएल गेल तोहर बैलेन्स शीटक सम्पैत पक्षकेँ भारी करैक लेल, तोरापर विश्वास केलियौ, स्वतंत्रता देलियौ डेमोक्रेटिक एक्सरसाइज करेलियौ, तकर परिणाम तों धोखा देबऽपर, घाटा देबऽपर लागल छें!  कुकर्म तों करबे आ कुकर्मक बिशेषन हमरा? सजाए हमरा? दुरात्मा, पापात्मा, निचात्मा… हम किए? तोहर कएल अपराधक सजाए हम नै भोगबौ! बेर बेर पृथ्बीपर आउ,  एतेक झमेलामे हम आब नै पड़बौ ! आत्माक क्रोध देखि कऽ डरसँ देह काँपि गेल! दुनु हाथसँ माथ पकड़ने चुक्कीमाली बैसल रहल देह! निःशब्द, निस्तब्ध, निसहाय! जेना करेज फाटि जेतै तहिना दर्द उठलै छातीमे, आँखिक आगाँ एकदम घुप्प अन्हार... जेना अचानक बिजली चलि जाइ तँ केहन अन्हार होइ छै? तहिना! मोनमे सोच एतबे जे आब कोन दण्ड भेटत? कनेक देर चुप रहलाक बाद फेर हुंकार भरलक आत्मा, तोहर सजाए ई छौ कि हम आइ, अखने तोरासँ निकलि जाइ, हमरा की? हमरा एतबे ने कि फेर आबऽ पड़त धरतीपर?  हमरा तँ फेर कोनो देह भेटत रहैक लेल, तों आब अप्पन सोच… कहिते घुमल आत्मा, देह धड़फड़ा कऽ उठल आ आत्माक पएर पकड़ि लेलक! देह घिघिऐ लागल, हमरा नै छोड़ू, सुबकऽ लागल, हाथ जोड़ि कऽ कहऽ लागल, जे अपराध केलौं हम तकर आब प्रायश्चित हम करब, हमरा रस्ता देखाउ! जे रस्ता अहाँ देखेबै तहीपर हम चलब, अहाँ हमरा एकटा औसर मात्र दिअ, कहि कऽ देह बिलखऽ लागल! देहक कननाइ देखि कऽ आ पश्चाताप करैत देखि कऽ देहकेँ धेने जे ओकर खास संगी साथी छलै लोभ, काम, ईर्ष्या, द्वेष, मोह पाँचोक पाँचो अपन अभीष्ट आब पूरा नै हएत बुझि कऽ छिटकि गेल ओकरा लगसँ, डगर नापि लेलक, फेर कहीं आत्माक कोपभाजन नै बनि जाइ, ई सोचि कऽ सभक सभ लंक लागि कऽ भागल! देह केँ असगर छोड़ि कऽ! देहकेँ डर, दिनता आ पश्चाताप करैत देखि कऽ आत्माकेँ दया आबि गेलै! किछु देर चुप रहलाक बाद आत्मा बाजल, किछु कोमल श्वरमे, अखन जे हम तोरा छोड़ि दियौ तँ कतेक दिन धरि सन्जोगि कऽ रखतौ तोरा तोहर परिवार? हम जे अखन निकलि जेबौ तोरामे सँ तँ ऐ सुखक तों भोग कऽ सकबेँ? देह मूड़ी हिलेलक नै कऽ इशारामे! आत्मा आब समझाबऽ लागल… देख अखनो किछु नै बिगड़ल छौ, हमर बात मनबे तँ पूर्ण काल तक तोरे संग रहबौ ! डेमोक्रेसीक बड बेजाए फाएदा उठओले तों, आब एकटा निश्चित परिधिमे रहैक छौ तोरा! डेमोक्रेसी नै छिनबौ, मुदा तोहर क्रियाकलापपर कड़ा निगरानी रखबौ, आत्म लोकपाल बनि कऽ! तोहर दैहिक आवश्यकता, अधिकारक सम्मान करबौ, अपमान तोरा सँ ककरो होए आब, से नै होबए देबौ! धर्म नै करबे नै कर, मुदा अधर्म तोरासँ, आब नै होबए देबौ! ककरो सुख नै दऽ सकबे, कोनो बात नै, मुदा ककरो तोरा सँ दुख पहुँचए, से नै होबए देबौ ! नै आनए सकबे ककरो चेहरापर मुश्कान, कोनो बात नै, मुदा तोहर कारण ककरो आँखिसँ नोर खसए, से नै होबए देबौ! तोरा मे "विदेह" बनैक सामर्थ नै छौ, हम जनै छी, जौं हमर कहबपर चलबे तों, तँ नीक "देह" तोरा जरुर बनेबौ हम! पक्का... गारण्टी छौ हमर, कह छौ मन्जूर? देह बुझि गेल छल अखैन धरि कि आब एकर बात मनबाक अलावा कोनो विकल्प नै अछि तँ कहलक, हँ हम सभ बात मानब ! मोनेमोन मुश्कायल आत्मा, सोचि कए कि चलू, ई तँ आएल आब लाइनपर, आब अपन आत्मा बिरादरीक मीटिङ्ग बैसेनाइ बड जरुरी बुझा पड़ल आत्माकेँ, कतौ आरो कोनो देह तँ एहन बदमाशी ने कऽ रहल हुअए, आब इग्नोर केनाइ उचित नै! अधिकसँ अधिक आत्माकेँ सचेत केनाइ आवश्यक महसूस केलक आत्मा, फेर कहलक, तों अप्पन बोझा केना हल्लुक करबे, की स्ट्राटजी बनेबहीं जे तोहर नफा नोकसान खाता केना नफा देखेतौ, से योजना तोरा अपने बनाबए के छौ! हमर कोनो हस्तक्षेप नै रहतौ, यदि तोरा सलाहक जरुरी पड़तौ, तँ आँखि बन्द करिहेँ, हमरा यादि करिहेँ, हम तुरन्त आबि जेबौ!  हम चलै छियौ, कहि कए अन्तरध्यान भेल आत्मा! आब उठल देह लम्बा साँस लए कऽ तँ अचानक अनुभव भेलै जे ओ बहुत हल्लुक भऽ गेल छल, हवामे जेना उड़ियाइत हुअए तहिना, देखलक अपनाकेँ तँ आश्चर्य भेलै अपनाकेँ देखि कऽ! एक दम नया, साफ, चिक्कन चुनमुन, पहिले तँ जेना हटिया परक चाह बलाकेँ वएह ठमन चाह बनबैबला गंदा ससपेन जेहन देह छलै अखन तँ जेना प्रिल सँ साफ कऽ देने होइ ससपेनकेँ, तहिना चमकैत छल देह ओकर! खुशीसँ हवामे नाचए लागल देह जेना मुन वाक करैत हुअए तहिना, की ठोकर लगलै आ आँखि खुलि गेल हमर! श्रीधर बाबु! ई सपना हमरा परेशान कऽ देने अछि!  ऐ सपनाक अर्थ की भऽ सकैत अछि? कि जेना अनगिनैत सपना हम जीबनमे देखैत छी, जकर कोनो अर्थ नै होइ छै, तहिना ईहो एकटा छै? कहीं ई कोनो संकटक पूर्वानुमान तँ नै? प्रश्नक जेना हम झरी लगा देलिऐ श्रीधर बाबूक आगाँ! सभटा बात सुनलाक बाद कनेक मुश्केलथि श्रीधर बाबू आ कहए लगला, सुन भाय, ई तोहर भाग्य छौ जे तोहर आत्मा तोरा अतीतसँ वर्तमान तकक मात्र यात्रा देखेलखुन्ह अइमे तों यतेक त्रस्त भऽ गेलैं, जौं भबिष्यक यात्रामे कहियो लगेलखुन्ह तँ तोहर की हाल हेतौ? हम कहलिऐ, नै बुझलौं हम, तँ बजला श्रीधर बाबू, देख, तोहर होबएबला समधि अखैन तँ कहलखुन्ह जे ओ कतौ नै बजता मुदा ओ बजता जरुर! तोहर पुतहुकेँ पता चलतौ, किछु साल बाद बेटो तोरे दोषी कहतौ, अखैन पैरुख छौ कोनो बात नै, मुदा धिरे-धिरे अबस्था ढलैत जेतौ, तोरा लोकक जरुरी, सम्मानक जरुरी, प्रेमक जरुरी पड़तौ, तखैन तों पएबे कि सभ सुख जेकर तोरा आवश्यकता हेतौ तों मुठ्ठीमे बन्द करए चाहबेँ, लेकिन सुखल बालु जकाँ तोरे आँखिक आगाँ तोहर हाथसँ निकलि जेतौ सभ सुख! तों किछु नै कऽ सकबे, कऽ सकबे तँ मात्र अफशोस!  कोइ नै रहतौ तोरा संग! ने पुत्र, ने पुतहु, ने पत्नी ने पौत्र कोइ नै! ने ककरो प्रेम ने ककरो बिश्वास! असगर रहि जेबैं तों भोगैक लेल अपन कृत्यक परिणाम! तखैन तों बेर बेर भगबानसँ पुछबे कि तोरे संग किए एना? तखैन तोरा यादि अएतौ तोहर सभ कृत्य, लेकिन करबेँ की? समए तँ निकलि गेल रहतौ! भोकासी पाड़ि कऽ कनबे तों, मुदा तोहर नोर पोछैबला कोइ नै रहतौ! हम सुनैत रहलौं श्रीधर बाबूक सभ बात ध्यानसँ, आँखिक आगाँ जेना चलदृश्य हुअए तहिना बुझाइत छल तखैन हमरा! कहैत रहला श्रीधर बाबू, एकटा बात बुझल छौ, ई दोसर जन्म की होइ छै? दोसर जन्म होइ छै बुढ़ापा! कहै छै ने बच्चा बूढ़ एक समान, तँ बच्चाक जन्म भेलै एक जनम आ बुढ़ापा भेलै दोसर जनम! कहै छै ने पुण्यसँ अगिला जनम सुधरै छै? तँ ई अगिला जनम मृत्युक बाद नै अबै छै! ई छै बुढ़ापा, जकरा नीक कर्म कए कऽ सुधारै छै लोक! आब तों निश्चय कर कि तोरा की करए के छौ! बएस अखनो बहुत बाँकी छौ, तों तँ एकटा सफल बेपारी छेँ, तोरा तँ पता छौ कि एकटा खाता जतेक रकमसँ डेबिट होइ छै ओतबेसँ दोसर खाता क्रेडिट सेहो होइ छै! तँ जीबन बेपारक सेहो डेबिट क्रेडिट एतए होइ छै! आब कोन पथ चलबें, कि आत्मा सँ कएल वचन पूरा कऽ सकबें, तोरा निर्णय करैक छौ! भाय! हम तँ एतबा कहबौ, जे फर्मुला तों बेपारमे लगा कऽ सफल भेलें, तहिना नीक फर्मुला निकाल आ जुटि जो जोर-सोरसँ जीबन बेपारमे, नफा कमाइक लेल! एतबा कहि कऽ श्रीधर बाबू हमर पीठ थपथपेलथि तँ जेना भक्कसँ हमर आँखि खुलि गेल, जेना कोनो पर्दा छल अखैन तक, से अचानक हटि गेल! चारु दिस जेना प्रकाश, उत्साह, रंग… व्यक्त नै कएल जा सकएबला खुशी…! जेना हमरा नया दिशा भेट गेल, हम गोर लगलौं श्रीधर बाबुकेँ आ चलि पड़लौं बाँकी रहल जीबन सुधारैक लेल… नव पथपर, पूरा आत्मबिश्वासक साथ… धिरे धिरे! दूर असमानमे बादलमे दूटा आँखिक आकृति उभरल…, मानू कि आत्मा हमरापर नजैर राखि रहल हुअए! हम हँसि पड़लौं आ निर्भीक मलङ्ग जकाँ बढैत रहलौं, बढ़ि रहल छी आ बढ़ैत रहब... हिम्मत दैत रहत "टैगोर" रचित गीत... जोदि तोर डाक सुने कोइ ना आसे तोबे एकला चोलो रे.....!! जगदीश प्रसाद मण्‍डल अवतारवाद जीव आ ईश्वर- जे कि‍यो शरीर धारण करैत आ छोड़ैत, जन्‍म लैत आ मरैत, ओ संसारी जीव होइत अछि‍। मुदा जे सर्वत्र व्‍याप्‍त, सर्वशक्‍ति‍मान, सर्वरक्षक गुणसँ मंडि‍त होइत ओ ईश्वर होइत। शास्‍त्रमे जे लक्षण ईश्वरक देल गेल अछि‍ आेइ‍ अनुसार ओ सबहक प्रति‍पालक सेहो होइत छथि‍। हुनक स्‍वभाव क्रुर भइये ने सकैत छन्‍हि‍। ि‍कए तँ ओ महादयालु होइ छथि‍। संगहि‍ ओ सर्वत्र व्याप्‍त छथि‍ तँए कतौ अबै-जाइक जरूरते केना हेतनि‍। प्रश्न उठैत अछि‍ जे ओ माछ आ काछुक रूप ि‍कअए धारण केलनि‍? ऐ‍ रूपमे एबाक की प्रयोजन भेलनि‍। मत्‍स्‍यावतार लऽ कऽ ि‍कअए शंखासुरक हत्‍या केलनि‍? जे स्‍वयं सर्वपालक सर्वव्‍यापी आ महादयालु छथि‍। हुनका ि‍कअए ककरोसँ द्वेष भेलनि‍? ि‍कअए ओ सुअर बनि‍ ि‍हरण्‍याक्षसँ पृथ्‍वी छीन अपना मुँहमे रखि‍ लेलनि‍। की पृथ्‍वी धीया-पूता खेलैक गेन्‍द सदृश अछि‍ जे ओ मुँहमे रखि‍ इतर पृथ्‍वीपर ठाढ़ भऽ हुनकासँ लड़ैत रहलाह आ अंतमे हत्‍या कऽ देलखि‍न। एतबे नै‍, नरसि‍ंह अवतार लऽ लोहाक खंभा फाड़ि‍ हि‍रण्‍यकश्‍यपुकेँ पेट फाड़ि‍ हत्‍या केलनि‍। की ईश्वर सभसँ पैघ हत्‍यारा छथि‍? वामन रूप धारण कऽ राजा बलि‍सँ तीन‍ डेग जमीन मांगि‍ सौंसे राज्‍य हड़ैप लेलनि‍, की दुनि‍याँमे सभसँ पैघ धोखाबाज वएह छलाह? एहन धोखाबाजक आराधना कएलासँ  केहन फल भेटत अपनो वि‍चारि‍ सकै छी। भीख मांगब मायावी, असमर्थ जीबक (मनुष्‍यक) काज छी नै‍ की कर्मठ, ऐश्वर्यवान पुरुषक। ऐ‍ रूपे देखलापर बूझि‍‍ पड़ैत जे मनक माया, कल्‍पना अओर अज्ञानता सभकेँ भरमा देने अछि‍। ततबे नै‍, परशुराम बनि‍ हैहय-वंशीय क्षत्रियकेँ एक्कैस बेर‍‍ सामूहि‍क हत्‍या केलनि‍। जहन एकबेर‍ वंश नाश कऽ देलखि‍न तहन दोहरा कऽ कतएसँ फेर क्षत्रि‍ए आबि‍ गेलाह जे दोहरबैत, तेहरबैत एक्‍कैस बेर‍‍ पहुँचि‍ गेलाह। अनन्‍त वि‍श्व- ब्रह्माण्‍डक रचैता ईश्वर दशरथक बेटा राम बनि‍ सीतासँ बियाहो कऽ लेलनि‍ आ हरण भेलापर गाछो-वृक्षसँ कानि‍-कानि‍ पता पुछलथि‍न। बि‍ना ओर-छोड़क समुद्रमे पाथरक पुलो बनबा देलखि‍न। इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍, अनेको प्रश्न वि‍चारणीय अछि‍। हम सभ एक्‍कैसम शताब्‍दीक समर्थ चेतना छी नै‍‍ कि‍ सोलहम शताब्‍दीक बाल चेतना। जड़-चेतनात्‍मक वि‍श्वसन्‍ताक वास्‍तवि‍क बोध नै‍‍ रहने पहि‍ने ि‍कछु गोटे जगतकर्त्ता ईश्वरक जाल ठाढ़ केलनि‍ आ पछाति‍ अपन स्‍वार्थ सि‍द्ध करए लेल नाना अवतारक कल्‍पना केलनि‍। छल करब, जोर-जबरदस्‍ती करब, यती-सतीक चरि‍त्र भ्रष्‍ट करब, की ईश्वरक काज थि‍क। ई सभ जाल-फरेबी मनुक्‍खक छी। एतबे नै‍‍ ईश्वरक नाओंपर मनुष्‍यक खून सेहो बहाओल गेल अछि‍। सेहो खून सि‍र्फ मानवेत्तर जीवेक नै‍‍ बल्‍कि‍ मूक, मासूम मनुष्‍यक सेहो। धनबल, शरीरबल, वि‍द्याबलादि‍सँ सेहो सदैव गरीब आदमी अत्‍याचारीक शि‍कार बनैत रहल अछि‍। जे अखनो आँखि‍क सोझमे दि‍न राति‍ भऽ रहल अछि‍। श्रीमद्भागवतक स्‍कन्‍ध-१, अध्‍याय-३, श्‍लोक-५ सँ लऽ कऽ २५म श्‍लोक धरि‍ अवतारवादक व्‍याख्‍या अछि‍। जइमे नि‍म्न प्रकारक चर्चा अछि‍- (१) सनक- सन्नदन, सनातन, सनत्‍कुमार-ब्रह्मचर्य पालनक लेल, (२) सुअर- पृथ्‍वीकेँ रसातलसँ आनबाक लेल, (३) नारद- उपदेशकक लेल, (४) नर-नारायण- तपक लेल, (५) कपि‍ल- सांख्‍य शास्‍त्रक उपदेश देबा लेल, (६) दत्तात्रेय- उपदेश देबा लेल, (७) यज्ञ- रूचि‍प्रजापति‍क पत्नी आकूति‍सँ उत्‍पन्न भेल स्‍वायम्‍भुक मन्‍वन्‍तरक रक्षाक लेल, (८) ऋृषभदेव- परमहंसक आदर्श देखेबा लेल, (९) पृथु- पृथ्‍वीसँ औषधि‍ दोहनक लेल, (१०) मत्‍स्‍य- डूमल पृथ्‍वीकेँ नि‍कालबाक लेल जे शंखासुर वेदकेँ चोरा नेने रहए। जेकरा मारि‍ कऽ मत्‍स्‍य वेदक उद्धार केलक, (११) कच्‍छप- समुद्र मथैमे सहयोगक लेल, (१२) धन्‍वन्‍तरि‍- समुद्रसँ अमृतक घैल लऽ प्रकट भेला, (१३) मोहि‍नी- देवता-दानवक झगड़ा फड़ि‍छबैक लेल, (१४) नृसि‍ंह- हि‍रण्‍यकश्‍यपुकेँ मारए लेल, (१५) वामन- बलि‍केँ ठकैक लेल, (१६) परशुराम-क्षत्रि‍यक सामूिहक हत्‍याक लेल, (१७) व्‍यास- वेदक ि‍वभाजन करए लेल, (१८) श्रीराम- रावणकेँ मारए लेल, (१९-२०) बलराम-कृष्‍ण- पृथ्‍वीक भार उताड़ै लेल, (२१) कल्‍कि‍- पृथ्‍वीक भार उताड़ए लेल। ऊपर वर्णित बाइस अवतार संग-संग आन-आन शास्‍त्रमे हंस आ हयग्रीवक चर्चा सेहो अछि‍। सनकादि‍केँ उत्तर देबा लेल हंस आ मधुकैटभक हत्‍याक लेल हयग्रीवक चर्च अछि‍। सभसँ पहि‍ने अवतारवादक भावना ‘शतपथ ब्राह्मण’मे भेटैत अछि‍। जेना ि‍क एच.याकोवी- ‘इनकारनेशन, इन्‍साइक्‍लोपीडि‍या ऑफ रि‍लीजन एण्‍ड इथि‍क्‍स’ भाग ७१मे लि‍खने छथि‍। संग-संग एम. माेनि‍एर वि‍लि‍यम्‍स- द. वि‍जडम पृष्‍ट ३८१मे सेहो लि‍खने छथि‍। एच.राय चौधरी- अर्लि हि‍स्‍ट्री ऑफ बैष्‍णव सेक्‍टमे पृष्‍ट ९६मे सेहो लि‍खने छथि‍। शुरूमे वि‍ष्‍णुक अपेक्षा प्रजापति‍क ि‍वशेष महत्‍व छलनि‍। शतपथ ब्राह्मणक अनुसार प्रजापति‍ए मत्‍स्‍य (१/८/१/१) कूर्म (कौछु) (७/५/१/५) अओर वराहक (१४/१/२/११) अवतार लेलनि‍। प्रजापति‍क बराह रूपक कथाक चर्च ‘तैत्तीरीय संहि‍ता’ (७/१/५/१) तैत्तरीय ब्राह्मण (१/१/३/६) तैत्तरीय आरण्‍यक (१०/१/८) अओर काठक संहि‍ता (८/१)मे प्रारंभि‍क रूपमे वि‍द्यमान अछि‍। जेकर चर्च डॉ. कामि‍ल बुल्‍के ‘रामकथा’ अनुच्‍छेद १४०मे केने छथि‍। ऐ‍ रूपे देखैत छी जे मत्‍स्‍य, कूर्म वराहक अवतार शुरूमे प्रजापति‍सँ छलनि‍। ि‍कन्‍तु पछाति‍ आबि‍ िवष्‍णुक महत्‍व बढ़लापर तीनूक संबंध ि‍वष्‍णुसँ भऽ गेलनि‍। महाभारतक नारायणी उपाख्‍यान (१२/३२६/७२) आ (१२/३३७) आ हरि‍वंश पुराण (४/४१)मे बराह आ वि‍ष्‍णुक संबंध मानि‍ लेल गेल। आगू आबि‍ तीनूक नाओंसँ एक एकटा महापुराण सेहो लि‍खल गेल। जइ‍मे तीनूक संबंध वि‍ष्‍णुसँ कए देल गेल अछि‍। वामनावतार आ नृसि‍ंह अवतार शुरूहेसँ ि‍वष्‍णुसँ संबंधि‍त अछि‍। वामनावतारक चर्चा तैत्तीरीय संहि‍ता (२/२/३/१) शतपथ ब्राह्मण (१/२/५/५) तैत्तीरीय ब्राह्मण (१/७/१७) अओर ऐतरेय ब्राह्मण (६/३/७) मे भेल अछि‍। नारायणी उपाख्‍यान (१२/३२६/७३) अओर हरि‍वंशपुराण (१/४१) मे सेहो उल्‍लेख अछि‍। ि‍वष्‍णु पुराणमे (१/१६) नृसिंहक कथाक वर्णन सेहो अछि‍। शुरूमे परशुरामक अवतार वि‍षयक कथाक चर्च नै‍‍ भेटल अछि‍। मुदा नारायणी उपाख्‍यान (१२/३२६/७७) हरि‍वंश पुराण (१/४१/११२/१२०) आ वि‍ष्‍णु पुराण (१/९/१४३) मे वि‍ष्‍णुक अवतार मानल गेल अछि‍। ऐ‍ रूपे प्राचीन साहि‍त्‍यमे अवतारवादक चर्चा होइतो वि‍शेष पूजाक चलनि‍ नै‍‍ भेल आ ने वि‍ष्‍णुक प्रधानते भेल रहए। कृष्‍णावतारक संग अवतारवादक ि‍वकासमे महत्‍वपूर्ण परि‍वर्तन प्रारंभ भेल। आेइ‍ समैसँ अवतारवाद भक्‍ति‍भावसँ जुड़ि‍ फुलैत-फड़ैत आजुक रूप धेने अछि‍। वासुदेव कृष्‍ण भागवतक इष्‍टदेव छलाह। शुरूमे ि‍वष्‍णुक संग हुनक संबंध नै‍‍ छलनि‍। हेमचन्‍द राय चौधरीक अनुसार तेसर शताब्‍दी ई.पू. वासुदेव कृष्‍ण आ वि‍ष्‍णुक अभि‍न्नताक भावना उत्‍पन्न भेल। अवतारवादक प्रक्रि‍यामे बौद्धधर्म जुड़ि‍ गेल। बौद्धधर्म आ भागवत सम्‍प्रदायक भक्‍ति‍मार्ग समान रूपसँ ब्राह्मण साहि‍त्‍यक कर्मकांड आ यज्ञ प्रधान धर्मक प्रति‍क्रि‍याक रूपमे उत्‍पन्न भेल आ वि‍कास केलक। जइ‍ कारणे धर्मक क्षेत्रमे ब्राह्मणक एकाधि‍कार ढील भेल। बौद्ध धर्मक अधि‍काधि‍क प्रचार-प्रसार देखि‍ भागवत समर्थक अपना दि‍सि‍‍ आकर्षित करए लेल भागवतक इष्‍टदेव वासुदेव कृष्‍णकेँ ि‍वष्‍णु-नारायणक अवतार मानि‍ लेलनि‍। ‘तैत्तीरीय आरण्‍यक’ (१०/१/६)मे वासुदेव आ ि‍वष्‍णुक अभि‍न्नताक चर्च सभसँ पहि‍ने भेल अछि‍। ऐ‍सँ अवतारवादककेँ भरपुर बल भेटल। संग-संग ि‍वष्‍णुक महत्‍व सेहो बढ़ए लगल। जइसँ अवतारवादक पूर्ण भावना रसे-रसे ि‍वष्‍णु-नारायणमे केन्द्रि‍त हुअए लगल। आ वैदि‍क साहि‍त्‍यक आन-आन अवतारक क्रि‍या-कलाप वि‍ष्‍णुमे आरोपि‍त भऽ गेल। एक दिसि‍ अवतारवाद बढ़ि‍ रहल छल तँ दोसर दिसि‍ रामक आदर्श चरि‍त्र जनमानसक बीच प्रबल भऽ रहल छल। रामायणक संग-संग रामक महत्‍व सेहो तेजीसँ बढ़ि‍ रहल छल। रामक वीरताक वर्णनमे अलौकि‍कताक मात्रा सेहो बढ़ए लगल। एक दिसि‍ रावण पाप आ दुष्‍टताक प्रतीक बनि‍ जनमानसक बीच आएल तँ दोसर दिसि‍ पुण्‍य आ सदाचारक प्रतीक राम बनलाह। जेकर फल भेल जे कृष्‍णे जकाँ रामो ि‍वष्‍णुक अवतारक श्रेणीमे आबि गेलाह। भरि‍सक पहि‍ल शताब्‍दी ई. पूर्वेसँ राम ि‍वष्‍णुक अवतार मानल जाए लगलाह। महाभारतक संग-संग वायु, ब्रह्माण्‍ड, वि‍ष्‍णु, मत्‍स्‍य, हरि‍वंश इत्‍यादि‍ पुराणमे अवतारक तालि‍कामे राम सेहो छथि‍। अवतारवादक पहि‍ल कल्‍पना ‘शतपथ ब्राह्मण’मे अछि‍। जे ईसासँ एक हजार वर्ष पूर्वक रचना मानल जाइत अछि‍। शतपथ ब्राह्मणमे कहल गेल अछि‍ जे प्रजापति‍ये माछ, कछुआ आ सूअरक अवतार धारण केलनि‍। जे शुद्ध कल्‍पनाश्रि‍त बूझि‍‍ पड़ैत अछि‍। वामन अवतारक कल्‍पना ‘तैत्तीरीय संहिता’ मे अछि‍। हजार वर्ष पूर्व एकरो रचना मानल जाइत अछि‍। ओना वामन अवतारक कल्‍पना ऋृग्‍वेदक प्रथम मंडलक बाइसम सूक्‍तक अंति‍म (१६/२१) छह मंत्रसँ सेहो उद्भुत मानल जाइत अछि‍। इदं वि‍ष्‍णुवि‍चि‍क्रमे त्रेधा ि‍नदधे पदम। समूलमस्‍य पांसुरे। त्रीणि‍ पदा वि‍चक्रमे वि‍ष्‍णुर्गोपा अदाभ्‍य: अतो धर्माणि‍ धारयन्। (ऋृग्‍वेद- १/१२/१७-१८) टीका रामगोवि‍न्‍द ि‍त्रवेदी। वि‍ष्‍णु सूर्यक प्रतीक छथि‍। हुनक ि‍करण पएर ि‍छयनि‍। पृथ्‍वी, अंतरि‍क्ष आ द्युलोकमे कि‍रण माने रोशनी पड़ब तीन पएर पड़ब छि‍यनि‍। जे प्राय: सभ वैदि‍क जनै छथि‍। मुदा पाछू आबि‍ ऐ‍ सूत्रकेँ कथा गढ़ि‍ ि‍वष्‍णु वामनक कथा बनि‍ गेल अछि‍। कथा अछि‍ ि‍वष्‍णु वामन बनि‍ राजा बलि‍केँ ठकि‍ कऽ तीन डेग भूमि‍ मांगि‍ सौंसे राज्‍ये नापि‍ लेलनि‍। प्रश्न उठैत जे एहेन-एहेन ठककेँ जनमानस केना ईश्वर मानि‍ लेलक‍? पुराणक अनुसार ि‍वष्‍णुु इन्‍द्रक छोट भाए कहल गेल छथि‍। जे अपन जेठ भाय इन्‍द्रक गद्दी स्‍थापि‍त करए लेल बलि‍केँ धोखा देलनि‍। मत्‍स्‍य, कच्‍छप, वराह, नृसि‍ंह, वामन, परशुराम इत्‍यादि‍ जे कि‍यो अवतारक श्रेणीमे एलाह, ि‍कयो पूजनीय नै‍‍ भऽ सकलाह। अवतारक अंति‍म छोरपर उदि‍त रामे आ कृष्‍णेटा पूजनीय भेलाह। वस्‍तुत: श्रमणक (बौद्ध-जैन) उत्तारवादक प्रति‍क्रि‍यामे अवतारवादक कल्‍पना भेल। महावीर आ बुद्धदेव महापुरुष छलाह। (उत्तारक अर्थ-सामान्‍य जीवकेँ दोसरसँ ऊपर उठब होइत अछि‍ जखन कि‍ अवतारक अर्थ महान सत्ताकेँ ऊपरसँ नि‍च्‍चाँ उतरब होइत अछि‍)। अवतारवादक परम्‍पराक अनुसार परमात्‍मा उतरि‍‍ कऽ साधारण मनुष्‍य बनि‍ गेलाह। पहि‍ने कृष्‍णकेँ अवतार मानल गेलनि‍। जि‍न‍कर पूर्ण वि‍कास गीताक कृष्‍णवतारमे भेलनि‍। ताधरि‍ राम अवतारक श्रेणीमे नै‍‍ आएल छलाह। केवल धनुर्धारी वीर मानल जाइत छलाह। गीताकार कृष्‍णक मुँहसँ रामक संबंधमे कहबौलनि‍- ‘राम: शस्‍त्रभृतामहम।’ ईसाक सौ वर्ष पूर्व धरि‍ चारू भाँइ रामकेँ वि‍‍ष्‍णुक अंशावतारे मानल जाइत छल‍ि‍न। रामक पूर्ण परब्रह्म ईसाक बाद अध्‍यात्‍म रामायणसँ शुरू भेल। ऐ‍ रूपे अवतारवादक गुन्‍जाइस माने अँटावेश वेदमे नै‍‍ पछाति‍ भेल। प्रश्न उठैत जे अवतारवाद की थि‍क? वि‍श्व अनंत देश आ काल-व्‍यापी अछि‍। वि‍श्वक मुख्‍य दू घटक-जड़ आ चेतन अछि‍। ओइमे अपन-अपन गुण-धर्म नि‍हि‍त अछि‍। जइ‍सँ जगतक बेवस्‍था अनादि‍कालसँ अबाध गति‍ए चलि‍ रहल अछि‍। ऐ‍सँ हटि‍ दोसर ईश्वरक कल्‍पना तथ्‍यसँ अलग हएब अछि‍। कहल गेल अछि‍ जे शंखासुर नामक राक्षस छलाह। ओ ब्रह्मा अोइ‍ठाम पहुँचि‍ वेद चोरा कऽ समुुद्रमे नुका कऽ रखि‍ लेलक। जेकरा पुन: प्राप्‍त करए लेल वि‍ष्‍णु मत्‍स्‍यावतार धारण कए समुद्रमे शंखासुरकेँ मारि‍ वेद लऽ अनलनि‍। प्रश्न उठैछ- कि‍ ईश्वरक काज हत्‍या करब थि‍क? जे सर्वज्ञ, दयालु छथि‍ हुनकर एहने कि‍रदानी हेतनि‍। ओ तँ अपना सत्‍प्रेरणासँ ककरो बदलैत छथि‍। एहि‍ना हि‍रण्‍याक्षक संबंधमे सेहो अछि‍। हि‍रण्‍याक्ष पृथ्‍वीकेँ चोरा कऽ टट्टीमे नुका रखलक। जेकरा वि‍ष्‍णु सुअरक अवतार लऽ थुथुनसँ पृथ्‍वीकेँ टट्टीसँ नि‍कालि‍, ि‍हरण्‍याक्षकेँ माि‍र ऊपर अनलनि‍। जइसँ पृथ्‍वीक उद्धार भेल। प्रश्न उठैछ- जखन पृथवीएक चोरि भऽ गेल तँ ओकरा राखल कतए गेल। अपन गुरुत्‍वाशक्‍ति‍सँ पृथवी स्‍वयं धारि‍त अछि‍। एहने कथा हि‍रण्‍यकश्‍यपु आ प्रह्लादक सेहो अछि‍। प्रह्लाद वि‍ष्‍णुक भक्‍त रहथि‍ जे हि‍रण्‍यकश्‍यपुकेँ पसि‍न नै‍‍ रहनि‍। जइसँ बान्‍हि‍ देलखि‍न। प्रह्लादक दुख देखि‍ ईश्वर (वि‍ष्‍णु) नर आ नारायणक ि‍मश्रि‍त रूप बना खूँटा फाड़ि‍ कऽ नि‍कलि‍ हि‍रण्‍यकश्‍यपुकेँ मारलनि‍। प्रश्न उठैछ- एक प्रह्लादक लेल ईश्वर खूँटा फाड़ि‍ नि‍कललाह मुदा, चंगेज खाँ, नादि‍रशाह, ि‍मलाबटखोर, जमाखोर, घूसखोर शोषकक लेल नि‍न्न नै‍‍ टुटैत छन्‍हि‍? वामन रूप बनि‍ बलि‍सँ भीख मंगलनि‍। भीख मांगब, छल करब मायावी मनुक्‍खक काज छी ने कि‍ ईश्वरक। जखन परशुराम हैहय क्षत्रि‍ए वंशक सामूहि‍क हत्‍या केलनि‍ तँ फेर दोहरा-तेहरा, एते तक ि‍क एक्‍कैस बेर‍‍ कऽ केकर हत्‍या केलनि‍। जँ एहेन-एहेन हत्‍यारा ईश्वर होथि‍ तँ अपराधी ककरा कहबै? अनंत वि‍श्वव्‍यापी जगत स्रष्‍टा ईश्वर (राम) दशरथक बेटा बनि‍ सीतासँ बि‍आह करए औताह। ततबे नै‍‍ हरण भेलापर कानि‍-कानि‍ गाछ-वृक्ष सभकेँ पता पुछथि‍न। गाए-चरबए लेल कृष्‍ण वृन्‍दावन आबि‍ नारी संग रास करए औताह। की यएह लक्षण ईश्वरक वेद कहैत अछि‍? वि‍श्वमे मुख्‍य दू तत्‍व-जड़ आ चेतन अछि‍। जेकरा पुराकालसँ सांख्‍य दर्शन प्रकृति‍ आ पुरुष कहैत आएल अछि‍। जड़ प्रकृति‍मे अनेक तत्‍व अछि‍। जे सभ अनादि‍-अनंत अछि‍। ओइमे अपन-अपन स्‍वभाव सि‍द्ध गुण-धर्मक क्रि‍या, ओकर सम्‍पत्ति‍ छि‍ऐ। जइ‍सँ सृष्‍टि‍ नि‍रंतर वि‍द्यमान रहैत अछि‍। जँ से नै‍‍ तँ पुरबा आकि‍ पछबा हवा जे बहैत अछि‍, ओकरा ि‍कयो पूब आकि‍ पछि‍म जा कऽ ठेलैत अछि‍ आकि‍ अपन दबाबक नि‍अमक अनुसार हवा स्‍वयं चलैत अछि‍। तहि‍ना बरखो होइत अछि‍। पानि‍ बरि‍सैक जे प्राकृति‍क नि‍अम छै, अनुकूल भेलापर बरखा होइत अछि‍। प्रकृति‍ जड़ छी। ओ ई नै बुझैए जे रौदी, कम बरखा आकि‍ बेसी बरखा ककरो नोकसान करत आकि‍ लाभ पहुँचाओत। एक दिसि‍ १९८७ ईं.क पानि‍ (बरखा) मि‍थि‍लांचलकेँ दहा देलक तँ दोसर दिसि‍ राजस्‍थान, गुजरात, उड़ीसा इत्‍यादि‍ राज्‍यमे रौदी भऽ गेल। की एहने काज सर्वज्ञ, दयालु आ सर्वशक्‍ति‍मान ईश्वरक छि‍यनि‍? झरनासँ पानि‍ नि‍कलब, धार बहब कि‍ ईश्वरेक प्रेरणासँ होइत अछि‍। चान, सुरूज, तरेगण हुनके माने ईश्वरेक कृपासँ चमकैत अछि‍। फूल वएह फुलबैत छथि‍। अजीब-अजीब अंधवि‍श्‍वासू कल्‍पना ठाढ़ कऽ अज्ञानी मनुष्‍यकेँ अदौसँ चालबाज सभ लुटैत आएल अछि‍! जे मनुष्‍य ज्ञान अर्जन कऽ पवित्र आचरण बना स्‍वरूप स्‍थि‍ति‍ प्राप्‍त कऽ लैत वएह ऐ‍ जीवनकेँ सार्थक बना मुक्‍ति‍क अधि‍कारी बनैत छथि‍। जनि‍का लेल अलगसँ कोनो कल्‍पि‍त ईश्वरक प्रयोजन नै‍‍ छन्‍हि‍। बीजकमे कबीर कहै छथि‍- “ज्ञान हीन कर्ताकेँ भरमें, माये जग भरमाया।” छल करब, बलपूर्वक ककरो धन-इज्‍जत लुटब, ई सभ संसारी मनुष्‍यक काज छी नै कि‍ ईश्वरक। यती, सती-पति‍व्रता एवं सत्‍य बजनि‍हार आ सत्‍य बाटपर चलनि‍हारकेँ पथ-भ्रष्‍ट करब, पति‍त बनाएब, की‍ ई सभ वि‍वेकवान मनुष्‍यक काज छी? अवतारक संबंधमे कबीर कहने छथि‍- ‘दश अवतार ईश्वरी माया, कर्ता कै जि‍न पूजा। कहहि‍ं कबीर सुनो हो सन्‍तो, उपजै खपै सो दूजा।’ अर्थात् दस या चौबीस अवतारक कल्‍पना ईश्वरीए माया छी। आेइ‍ कल्‍पि‍त अवतारक पूजा करब, सत्‍यज्ञानसँ रहि‍त मनुष्‍यक काज छी। जहि‍ना अवतार तहि‍ना अवतारी माने ईश्वर, दुनू लोकक मनक कल्‍पना छी। ि‍कएक तँ जन्‍म आ मृत्‍य जगतक कर्ताकेँ केना भऽ सकैत अछि‍। चौबीस अवतारमे श्रीराम, कृष्‍ण, महात्‍मा बुद्ध इत्‍यादि‍ ऐति‍हासि‍क महापुरुष छथि‍। बाकी सभ काल्‍पनि‍क थि‍क। ओना अवतार तँ उतरब आ जन्‍म लेबकेँ कहल जाइत अछि‍, जे प्राय: कर्मी जीवकेँ होइत अछि‍। अवतारवाद मनुष्‍यमे हीनभावनाक जन्‍म दैत अछि‍। जँ से नै‍‍ तँ देश आ धर्मपर संकट एलापर अवतारी ि‍कए ने नि‍वारण करैत अछि‍। जखन वि‍धर्मी सोमनाथक मंदि‍र लूटि‍ लेलक तखन पुजेगरी सभ ि‍कए मुँह तकैत रहि‍ गेल। ि‍कए ने ईश्वरकेँ पुकारि‍ बचौलक। ताधरि‍ मनुष्‍य उन्‍नति‍ नै‍‍ कऽ सकैत अछि‍ जाधरि‍ ओ ई नै‍‍ बुझत जे धरतीपर मनुष्‍य सभसँ बलशाली अछि‍। ईश्वर, देवी-देवता, अवतारक कल्‍पना मनुष्‍यक आेइ‍ अंधकार मस्‍ति‍ष्‍कमे जन्‍म लैत अछि‍ जइमे ओ अपन दुर्बलताकेँ संयोगि‍ अवकाशक साँस लैत अछि‍। वस्‍तुत: आत्‍मा जखन महात्‍माक रूपमे वि‍कसि‍त होइत तखन परमात्‍मा स्‍वयं बनि‍ जाइत अछि‍। काम-क्रोध, राग-द्वेष इत्‍यादि‍ दुर्गुणपर जखन मनुष्‍य वि‍जय पाबि‍ जाइत अछि‍ तखन अपने-आपमे ईश्वर, परमात्‍मा, दैव आ ब्रह्मक रूप देखए लगैत अछि‍। श्रीमद्भागवत- दरि‍द्रो यस्‍त्‍वसन्‍तुष्‍ट: कृपणो योऽ जि‍तेन्‍द्रि‍य:। गुणेष्‍वसक्‍तधीरीशो गुणसंगे वि‍पर्यय: /११/१९/४४ जेकरा चि‍त्तमे असन्‍तोष अछि‍ वएह दरि‍द्र छी। जे ि‍जतेन्‍द्रि‍य नै‍‍ अछि‍ वएह कृपण छी। समर्थ, स्‍वतंत्र आर ईश्वर वएह छथि‍ जि‍नकर चि‍त्त-वृत्ति‍ ि‍वषए-भोगमे आसक्‍त नै‍‍ छन्‍हि‍। अहीक वि‍परीत जे वि‍षयमे आसक्‍त अछि‍ वएह सोलहन्‍नी पापी छी। मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे ग्रामीण चि‍त्रण साहि‍त्‍यक आधार मनुष्‍यक जि‍नगी होइछ। मनुष्‍येक जि‍नगीक ‍नींवपर भाषा साहि‍त्‍य ठाढ़ आ सुदृढ़ बनैत अछि‍। जे मनुष्‍यकेँ जीबैक कला सि‍खबैत अछि‍। गद्य-साहि‍त्‍यक वि‍धामे उपन्‍यासो छी। जइ‍ नींवपर साहि‍त्‍यक भवन ठाढ़ रहैत अछि‍ ओ माटि‍क नि‍च्‍चाँ दाबल रहैत अछि‍। जीवन परमात्‍माक सृष्‍टि‍ छी तँए अनन्‍त-अगम्‍य अछि‍। जहन कि‍ साहि‍त्‍य मनुष्‍यक सृष्‍टि‍ होइत तँए सुबोध-सुगम आ मर्यादि‍त होइत अछि‍। ऐ ‍जगतमे मनुष्‍य जे कि‍छु सत्‍य आ सुन्‍दर पौलक आ पाबि‍यो रहल अछि‍ वहए साहि‍त्‍य छी। ओना साहि‍त्‍य समाजक दर्पण कहल जाइत अछि‍ मुदा मनुष्‍यक अएना आ प्राकृति‍क अएनामे अन्‍तर अछि‍। प्राकृति‍क अएना वस्‍तुक बाहरी रूप देखबैत जहन कि‍ मनुष्‍यक अएनाकेँ दोहरी रूप होइत अछि‍। जइ‍सँ बाहरी आ भीतरी दुनू रूप देखैत अछि‍। ऐठामक (मि‍थि‍लाक) चि‍न्‍तनधारामे, प्रचलि‍त दार्शनि‍क चि‍न्‍तनधारासँ भि‍न्न कि‍छु एहेन वि‍शेषता सन्नि‍हि‍त अछि‍ जे अपन अलग पहचान बनौने अछि‍। जइ‍ आधारपर साहि‍त्‍यक दीप (ज्‍योति‍) कहब अधि‍क उपयुक्‍त हएत। उच्‍च कोटि‍क साहि‍त्‍यि‍क सृजन लेल यथार्थ आ आदर्शक समावेश आवश्‍यक अछि‍। जकरा आदर्शोन्‍मुख-यथार्थवाद कहल जा सकैछ। अगर यथार्थवाद आँखि‍ खोलैत अछि‍ तँ आदर्शवाद उठा कऽ मनोरम स्‍थानपर पहुँचबैत अछि‍। चरि‍त्रकेँ उत्‍कृष्‍ट आ आदर्श बनेबा लेल जरूरी नै‍‍ जे ओ नि‍र्दोषे हुअए। ऐ‍ जटि‍ल संसारमे, जइ‍मे छोट-सँ-छोट आ पैघ-सँ-पैघ समस्‍या लधलो अछि‍ आ दि‍न-प्रति-दि‍न जन्‍मो लैत अछि‍, तइ‍ठाम नि‍र्दोष चि‍त्रणक नि‍र्माण कठि‍न अछि‍। महानसँ महान पुरुषमे कि‍छु-ने-कि‍छु कमजोरी रहि‍ते‍ छन्‍हि‍, जेकरा नि‍खारब आगूक लेल महत्‍वपूर्ण अछि‍, तँए अनुचि‍त नै‍‍। वएह कमजोरीक सुधार मनुष्‍य बनबैत अछि जे उपन्‍यासक मुख्‍य बन्‍दु छी। साहि‍त्‍यक मुख्‍य अंग आदर्श छी जइ‍सँ रचना कलाक पूर्ति होइत अछि‍। आदि‍कालेसँ आदि‍वासी‍क रूपमे पनपैत मि‍थि‍लाक समाज आइक वि‍कसि‍त समाजक सीढ़ी धरि‍ पहुँचल अछि‍। जंगली जीवनसँ लऽ कऽ सुसभ्‍य जि‍नगी धरि‍क इति‍हास मि‍थि‍लाक भूमि‍मे चंदनक गाछ सदृश दुनि‍याँक वातावरणमे अपन महमही बि‍लहैत रहल आ अखनो बि‍लहैक सामर्थ रखैत अछि‍। जे हमरा सबहक धरोहर छी तँए बचा कऽ राखब सभसँ पैघ दायि‍त्‍व बनैत अछि‍। जि‍नगीक आवश्‍यकता आ उत्‍पादन करैक जते शक्‍ति‍ छलनि‍ आेइ‍ अनुकूल जि‍नगी बना सामंजस्‍यसँ सभ मिल‍-जुलि‍ अखन धरि‍ रहला अछि‍। आगू बढ़ाएब आइक आवश्‍यकता छी। जइ‍ समाजमे अखनो बरहबरना (बारह-वर्ण) भोज, बरहबरना बरियाती (बि‍आहमे) बरहबरना कठि‍आरीक (जि‍नगीक अंति‍म क्रि‍या) चलैन अछि‍, की‍ आेइ‍ समाजकेँ तोड़ि‍ सासु-पुतोहू, पि‍ता-पुत्रक संबंधकेँ माटि‍क बरतन जकाँ फोड़ि‍-फाड़ि‍ ि‍दऐ। जइ‍ समाजक बीच सभ संग मिलि‍ पावनि‍-ति‍हार, धार्मिक स्‍थानक नि‍र्माण केलनि‍, की ओकरा नस्‍त-नाबूद कऽ दिऐ? ओना मि‍थि‍लाक दुर्भाग्‍य कही आकि‍ देशक दुर्भाग्‍य, साठि‍ बर्ख पूर्वसँ लऽ कऽ हजारो बर्ख पूर्व धरि‍ परतंत्र रहल। परतंत्रताक जि‍नगी केहन होइ छै, कहब जरूरी नै‍‍। ओना जइ‍ रूपक वि‍देशी प्रभाव आन-आन क्षेत्रमे पड़ल आेइ‍सँ भि‍न्न मि‍थि‍लांचल प्रभावि‍त भेल। अदौसँ अबैत वैदि‍क ढाँचामे सजल समाज अखनो धरि‍, एते दि‍नक गुलामीक उपरान्‍तो सजल अछि‍। मुदा भूमण्‍डलीकरणक प्रभाव जते तेजीसँ प्रभावि‍त कऽ रहल अछि‍ आेइ‍सँ बचैक लेल गंभीर सोचक जरूरत अछि‍। जँ से नै‍‍ हएत तँ मि‍थि‍लाक बदसूरत दृश्‍य सामने नाचए लगत। मि‍थि‍लाक संबंध जते पूर्वी प्रान्‍त बंगाल (पछि‍म बंगाल सहि‍त बंगलादेश) आसाम (मेघालय सहि‍त आसाम) आ नेपालक तराइ इलाकासँ रहल ओते पछि‍मी आ दछि‍नी प्रान्‍तसँ नै‍‍ रहल। घनगर अबादी होइबला इलाका रहने मि‍थि‍लाक बोनि‍हार (श्रमि‍क) बोि‍न करए नेपाल, आसाम आ बंगाल जाइत रहल अछि‍। पटुआ काटब, धोअब आ धान रोपब-काटब मुख्‍य काज रहल। जइ‍सँ संग-संग रहैक, खाइ-पीबैक, नचै-गबैक अवसर भेटल। कला-संस्‍कृति‍मे मि‍श्रण भेल। जइ‍सँ एक-दोसराक जि‍नगी मि‍लैत-जुलैत रहल अछि‍। आजुक संस्‍थागत शि‍क्षण बेवस्‍थाक सदृश तँ संस्‍था कम छल मुदा पूर्वहि‍सँ गुरुकूल शि‍क्षण बेवस्‍थाक चलैन आबि‍ रहल छल। वि‍देशी शासकक संग भाषा-साहि‍त्‍य सेहो आएल। सामाजि‍क बेवस्‍थाक मजबूतीक चलैत ओ ओते तेजीसँ आगू नै‍‍ बढ़ि‍ सकल जते तेजीसँ बढ़क चाहि‍ऐक। ओना राज-काजमे अपन स्‍थान बना लेलक। जनसंख्‍याक (मि‍थि‍लाक) अनुपातमे पढ़ै-लि‍खैक बेवस्‍था नगण्‍य छल। कारण छल अखुनका जकाँ ने पढ़ै-लि‍खैक एते साधन छल आ ने पढ़ैक आवश्‍यकता बुझैत छल, जीबैक लूरि‍ सीख ‍ लेब प्रमुख छल, जे परि‍वार (माए-बाप) सँ भेट जाइ छलै। कि‍छु एहनो काज (लूरि‍) छलै जे समाजोसँ भेटै छलै, जइ‍सँ स्‍पष्‍ट रूपे दू भागमे वि‍भाजि‍त छल। पढ़ल-लि‍खल लोकक समाज आ बि‍नु पढ़ल-लि‍खल उत्‍पादक समाज। मुदा समाज हुनके (पढ़ल-लि‍खल) सबहक देखाओल रास्‍तासँ चलैत रहल। पढ़ल-लि‍खल लोकक बीच संस्‍कृत आ बि‍नु पढ़ल-लि‍खल लोकक बीच अपन बोली (जे बादमे भाषा बनल) चलैत छल। नव-नव शब्‍दक जन्‍म सेहो होइत छल। वैदि‍क संस्‍कृत सेहो जनभाषाक नगीचे छल मुदा धीरे-धीरे परि‍नि‍ष्‍ठि‍त बनैत-बनैत दूर हटैत गेल। जइ‍सँ वि‍शाल जन-समूह संस्‍कृतसँ दूर भऽ गेल। जेकर प्रभाव जन-मानसक जीवनक अानो-आनो अंगपर पड़ल, कला-संस्‍कृतिपर सेहो पड़ल। जइ‍सँ लोक संस्‍कृति सेहो पनपल। संस्‍कृत समाजोन्‍मुखी नै‍‍ भऽ परि‍वारोन्‍मुखी हुअए लगल। समाजक बीच पालि-प्राकृत भाषाक जन्‍म भेल। समाज-सुधारक आ धार्मिक सम्‍प्रदायि‍क जनमानसक बीच पालि‍ भाषाक प्रयोग केलनि‍। ऐ रूपे संस्‍कृतसँ पाि‍ल, अपभ्रंश होइत आगू मुँहे ससरल। अपभ्रंशसँ मागधी आ मागधीसँ बि‍हारी, उड़ि‍या, बंग्‍ला आ असमि‍या भाषाक वि‍कास भेल। बि‍हारी भाषाक अन्‍तर्गत भोजपुरी, मगही आ मैथि‍लीक वि‍कास भेल। बि‍हारक मैिथली भाषा क्षेत्रसँ पछि‍म उत्तर-प्रदेशक पुबरि‍या भाग धरि‍ भोजपुरी भाषा बढ़ल। दछि‍न बि‍हार (गंगासँ दछि‍न) मगही आ गंगासँ उत्तर नेपालक तराइ धरि‍ मैथि‍लीक वि‍कास भेल। ओना भाषाक संबंधमे कहल गेल अछि‍ जे- “चारि‍ कोसपर पानी बदले आठ कोसपर वाणी।‍” बि‍हारक तीनू भाषा क्षेत्रक अन्‍तर्गत क्षेत्रीय बोली सेहो पनपैत रहल अछि‍। गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदानक बीच बसल ि‍बहार, बंगाल आ आसामक बीच माटि‍-पानि‍ आ जलवायुक (कि‍छु वि‍षमता छोड़ि‍) समता सेहो अछि‍। समतल भूमि‍ आ एकरंगाह जलवायु रहने खेती-पथारी, उपजा-बाड़ीमे सेहो समता अछि‍। धान सन प्रमुख अन्न तीनू राज्‍यक मुख्‍य उपज छी। एक रंगाह उपजा-बाड़ी आ खेतीक लूरि‍सँ खेति‍हरक एकरंगाह जि‍नगी बनल। खान-पान, आचार-वि‍चार, चालि‍-ढालि‍, कला-संस्‍कृतिमे एकरूपता आएल। मुदा प्राकृति‍क प्रकोप आ व्‍यापारि‍क अनुकूल भेने बंगाल आ मि‍थि‍लाक दूरी बढ़ौलक। जइ‍ठाम मि‍थि‍ला क्षेत्र पोखरि‍क पानि‍ जकाँ स्थि‍र (कहि‍यो काल पैघ भूमकम आ अन्‍हर-तुफान होइत) बनल रहल तइ‍ठाम बंगाल प्राकृति‍क प्रकोपसँ अधि‍क प्रभावि‍त होइत रहल अछि‍। व्‍यापारि‍क अनुकूलता (समुद्री मार्गसँ) सँ विदेशीक प्रभाव सेहो बढ़ल। कोनो भाषा-साहि‍त्‍य आेइ‍ठामक जि‍नगीसँ प्रभावि‍त होइत। ऐ‍ दृष्‍टि‍सँ जेहन उर्वर भूमि‍ बंगला साहि‍त्‍यकेँ भेटल ओ मैथि‍लीकेँ नै‍‍ भेटल। वि‍देशी कला-संस्‍कृतिक प्रभाव जते बंगालपर पड़ल ओते बि‍हारपर नै‍‍ पड़ल। ओना मि‍थि‍लांचल प्राकृति‍क प्रकोप आ वि‍देशी शासनसँ ओते प्रभावि‍त नै‍‍ भेल जते बंगाल भेल। मुदा अनुकूल जलवायु रहने मि‍थि‍लांचलमे मनुष्‍यक बाढ़ि‍ सभ दि‍नसँ रहल। जइ‍सँ जनसंख्‍याक भार सभ दि‍न रहल। सामंतीक कुबेवस्‍था आ जनसंख्‍याक भारसँ मि‍थि‍लांचल गरीबीक जालमे सभ दि‍न फँसल रहल। जइ‍मे कला साहि‍त्‍य, संस्‍कृति‍ सभ कि‍छु प्रभावि‍त होइत रहल। समाजक स्‍थि‍ति‍केँ आरो भयावह बनबैमे जातीय आ साम्‍प्रदायि‍क योगदान भरपूर रहल। टुकड़ी-टुकड़ीमे समाज वि‍भाजि‍त भऽ गेल। जेकर प्रभाव कला-संस्‍कृतपर सेहो नीक-नहाँति‍ पड़ल अछि‍। अर्द्ध-मागधीसँ नि‍कलल मैथि‍ली तेरहम-चौदहम शताब्‍दीमे ज्‍योति‍रीश्वरसँ पूर्व‍ वि‍द्यापति‍क रचनासँ प्रारंभ भेल। लोकक कंठ-कंठमे वि‍द्यापति‍ समाए अखनो गाबि‍ रहला अछि‍। एकटा ज्योतिरीश्वरक परवर्ती वि‍द्यापति‍ संस्‍कृत भाषाक राजपंडि‍त छलाह मुदा ज्योतिरीश्वरक पूर्ववर्ती विद्यापति समाजक जनभाषामे लिखलनि। जइ‍‍सँ संस्‍कृत-मैथि‍लीक संग अवहट्ठ (जनभाषा)मे ‘कीर्तिलता आ कीर्तिपताका’ मे परवर्ती विद्यापति सेहो कहलनि‍- “सक्कय वाणी बहुअन भावय‍..” उन्नैसम शताब्‍दीसँ पूर्व धरि‍ साहि‍त्‍य सृजन कवि‍तेमे होइत आबि रहल छल। आने-आने भाषा जकाँ मैथि‍ली गद्यक वि‍कास सेहो पछाति‍ भेल। साहि‍त्‍य सृजन मूलत: गद्य आ पद्यमे होइत। गद्यक चरम उपन्‍यास छी तहि‍ना पद्यक महाकाव्‍य। साहि‍त्‍यक आने वि‍धा जकाँ उपन्‍यासो छी। सामाजि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍क दृष्‍टि‍सँ मैथि‍ली उपन्‍यासकेँ १९६०ई.सँ पूर्व आ साठि‍क पछाति‍केँ दू भागमे वि‍भाजि‍त कए आगू बढ़ैत छी। साठि‍क वि‍भाजन रेखाक पाछू देशक आजादी, ढहैत राजा-रजवाड़ आ भूमि‍-आन्‍दोलन प्रमुख कारण रहल अछि‍। साठि‍ ईस्‍वीसँ पूर्व मैथि‍लीमे नि‍म्नलि‍खि‍त उपन्‍यासक सृजन भऽ चुकल छल। ‘ि‍नर्दयी सासु’ (१९१४), शशि‍कला (१९१५), पूर्ण वि‍वाह (१९२६) दुरागमन रहस्‍य (१९४६), कलयुगी सन्‍यासी (१९२१) रामेश्वर (१९१५), सुमति‍ (१९१८), मनुष्‍यक मोल (१९२४) चन्‍द्रग्रहन (१९३३) कन्‍यादान (१९३३), सोन्‍दर्योपासनक पुरस्‍कार (१९३८), सुशीला (१९४३) असहाया जाया (१९४५), जैबार (१९४६) पारो (१९४६) नवतुरि‍या (१९५६), कुमार (१९४६), भलमानुस (१९४७), कला (१९४६), वि‍कास (१९४६), चन्‍द्रकला (१९५०), प्रति‍मा (१९५०), मधुश्रावनी (१९५६) वीरकन्‍या (१९५०), वि‍दागरी (१९५०), अनलपथ (१९५४), वि‍द्यापति‍ (१९६०), कृष्‍णहत्‍या (१९५७), रत्‍नहार (१९५७), आन्‍दोलन (१९५८), दुर्वाक्षत (१९५८), आदि‍कथा (१९५८), चानोदय (१९५९), बि‍हाड़ि‍ पात-पाथर (१९६०), दुरागमन (१९४५), चामुन्‍डा (१९३३), मालती-माधव (१९३५)। आजुक उपन्‍यास कलाक दृष्‍टि‍सँ भलेहि‍ं ऊपर लि‍खि‍त सभ उपन्‍यासकेँ सफले नै‍‍ कहब मुदा ऐ‍‍ बातसँ इनकारो करब जे आेइ‍ उपन्‍यासकार सबहक संगे जेहन सामाजि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍ छलनि‍ आेइ‍ अनुकूल नै‍‍ अछि‍। हमरा सभकेँ ऐ‍‍ बातक सदति‍ धि‍यान राखए पड़त जे मैथि‍ली भाषा मि‍थि‍ला भूमि‍सँ जन्‍म नेने अछि‍ आ अखनो जीवि‍त अछि‍। पुरान भाषा मैथि‍ली रहि‍तो आइ धरि‍ राजभाषाक रूपमे राज-दरबार नै‍‍ पहुँचल, जे अवसर आइ भेटल, ओ प्रमाणि‍त करैत अछि‍ जे हम जीवि‍त भाषा छी। दुनि‍याँक अनेको एहेन राजभाषा अछि‍ जे मि‍थि‍ला क्षेत्र आ मैथि‍ली भाषासँ छोट अछि‍। बीसम शताब्‍दीक पूर्वाद्धसँ आरंभ भेल उपन्‍यास साहि‍त्‍य कखनो कुदैत तँ कखनो ठमकि‍-ठमकि‍ चलि‍ अखनो चलि‍ रहल अछि‍। जे माटि‍-पानि‍ बंगला, असामी आ उड़ि‍या भाषा-साहि‍त्‍यकेँ भेट‍लै से मैथि‍लीकेँ नै‍‍ भेट सकलै तँए जँ आेइ‍ सभ साहि‍त्‍यसँ पछुआएल तँ ऐ‍‍मे आश्चर्य की? ओना साठि‍क दशकमे मि‍थि‍लो समाजमे मोड़ आएल मुदा साहि‍त्‍य ठमकले रहि‍ गेल। उपन्‍यास साहि‍त्‍यक वि‍षए-वस्‍तुमे बढ़ाेत्तरी अवश्‍य भेल मुदा जइ‍‍ रूपे हेबाक चाही से नै‍‍ भेल। जि‍नगीक मुख्‍य समस्‍या साहि‍त्‍यक गौण रूपमे आ गौण समस्‍या मुख्‍य रूपमे बनल रहल। मुदा सौभाग्‍यक बात छी जे नव-नव उपन्‍यासकार मि‍थि‍लाक सर्वांगीण रूपकेँ दृष्‍टि‍मे राखि‍ लि‍खि रहलाह अछि‍। ओना मि‍थि‍लाक जे वास्‍तवि‍क रूप अछि‍ ओ अत्‍यन्‍त दयनीय अछि‍। जइ‍‍ बीच रहि‍ साहि‍त्‍य सृजन अत्‍यन्‍त कष्‍टकर अछि‍। मुदा मि‍थि‍ला तँ वएह धरती छी जइ‍‍ठाम एक-सँ-एक ऋृषि‍-मुनि‍ साधना कए अपन दृष्‍टि‍ देलनि‍ जे दुनि‍याँक सभसँ ऊपर अछि‍। ग्रामीण चि‍त्रण- ग्रामीण शब्‍दक दू अर्थ दू जगहपर होइत अछि‍। समग्र दृष्‍टि‍सँ ग्रामीण शब्‍दक अर्थ क्षेत्र-वि‍शेषक सभ कि‍छुसँ होइछ आ ग्रामीण परि‍धि‍मे (गामक सीमाक भीतर) ग्रामीण शब्‍द सि‍र्फ ग्राममे रहनि‍हार मनुष्‍यसँ होइछ। प्रश्न उठैत ग्राम संग ग्रामीण आकि‍ अगबे ग्रामीण? ग्राम संग ग्रामीणक संबंध ओतबे नै‍‍ होइत जे हम अमुख ग्राम रहै छी। ग्राम आेइ‍ रूपे ससरैत आगू बढ़ए जइ‍‍ रूपे दुनि‍याँ ससरि‍ रहल अछि‍। जँ से नै‍‍ हएत तँ लोक भागि‍-पड़ा आेइ‍ठाम पहुँचत जइ‍‍ठाम सुगमतासँ सुभ्‍यस्‍त जि‍नगी भेटतै। ग्रामक उत्‍पादि‍त पूँजी माटि‍-पानि‍, गाछ-वि‍रीछ, नदी-नाला इत्‍यादि‍ मनुष्‍यक संग पूरैबला आर्थिक आधार छी। कोनो जुग अबौ आ जाओ, मनुष्‍यक जे मूल-समस्‍या अछि‍ ओ अनवरत रहबे करत। भलेहि‍ं उन्नति‍ भेलापर सुगमता आओत, नै‍‍ भेलापर जटि‍लता आओत। आजुक समैक मांग अछि‍ जे हमरा सबहक आर्थिक आधार ओहन बनए जे एक्कैसम शताब्‍दीक मनुष्‍य कहबैक अधि‍कारी बनी। अंतमे, जहि‍ना पैघ गहवरमे सैकड़ो जगह पूजा ढारि‍ गोसाँइ खेलल जाइत तहि‍ना आइक समाजक मांग साहि‍त्‍यक अछि‍। कामरूप आ मिथिला मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति द्वारा गुवाहाटीमे आयोजित भेल "विद्यापति स्मृति पर्व समारोह" स्थान: प्राग्ज्योतिष आइ.टी.ए. सेन्टर, माछखोवा, गुवाहाटी;  २३ दिसम्बर २०११ केँ ५ बजे अपराह्ण। ऐ अवसरपर विशेष अतिथि रहथि डॉ. श्रीमती प्रेमलता मिश्र "प्रेम" आ सम्माननीय अतिथि रहथि श्री जगदीश प्रसाद मण्डल। श्री जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ सम्माननीय अतिथि बनेबाक विरोध जातिवादी तत्व सभ द्वारा भेल आ आयोजकक ओ लोकनि फज्झति सेहो केलनि, मुदा आयोजक धन्यवादक पात्र छथि जे ओ अड़ल रहला। किछु काल लेल कार्यक्रम रुकि गेल, जातिवादी स्वरक वीडियो रेकॉर्डिंग http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video पर उपलब्ध अछि जइमे डॉ. अमलेन्दु शेखर पाठक कहि रहल छथि- सपनोमे नै सोचने हेतै… आ डॉ. बैद्यनाथ चौधरी बैजू आदि ओइ गपपर हँसि रहल छथि। मैथिलीक विद्यापतिक पर्वक इतिहासमे किछु लोक द्वारा कएल ई कृत्य कारी अक्षरमे लिखा गेल। मुदा आयोजकक दृढ़ताक कारण कार्यक्रम आगाँ बढ़ल। जगदीश प्रसाद मण्डलजीक उद्बोधन भाषण भेल जे नीचाँ देल जा रहल अछि। सभसँ पहि‍ने ऐ पर्व समारोहक सहयोगी आ मि‍थि‍ला सांस्‍कृति‍क समन्‍वय समि‍ति‍केँ धन्‍यवाद दैत छि‍यनि‍ जे मि‍थि‍ला आ कामरूपक बीच युग-युगसँ प्रवाहि‍त होइत जीवन धाराकेँ जीवि‍त रखने छथि‍। संगहि‍ आगूओ एहि‍ना लहड़ाइत धाराकेँ जीवि‍त रखताह, से आशा करैत छी। कामरूप आ मि‍थि‍लाक बीच संबंध कहि‍यासँ शुरू भेल, एकर नि‍श्चि‍त ति‍थि‍ तँ नै बुझल अछि‍, मुदा सहस्रो सालसँ जीवन धारा बनि‍ प्रवाहि‍त होइत आबि‍ रहल अछि‍, ई कहैमे कनि‍यो मनमे संकोच नै अछि‍। जे कामरूप कहि‍यो प्राग्‍ज्‍योति‍ष कहल जाइत छल भरि‍सक तहि‍येसँ। ओना इति‍हासक वि‍द्यार्थी नै रहने इति‍हास पढ़लो नै अछि‍। भऽ सकैत अछि‍ जे जहि‍ना मि‍थि‍लाक संपूर्ण इति‍हास लि‍खि‍नि‍हारक अभाव रहल अछि‍ तहि‍ना भाषोक हुअए। मुदा दुनूक बीच प्रगाढ़ संबंध बनल चलि‍ आबि‍ रहल अछि‍, ऐमे कतौ दू-राइ नै अछि‍। जखन बच्‍चे रही तहि‍यो बूढ़-बुढ़ानुसक मुँहे सुनैत रही जे फल्‍लाँ कामरूपक सि‍ख छथि‍। ततबे नै मि‍थि‍लावासीक लेल कामरूप कामाख्‍या, अदौसँ तीर्थ-स्‍थल बनल चलि‍ आबि‍ रहल अछि‍, आगूओ चलैत रहत। जहि‍ना बंगालक गंगासागर, दक्षि‍णेश्वर, उड़ीसाक कोणार्क आ जगरनाथ, मद्रासक श्वेतबान रामेश्वर, कन्‍याकुमारी, गुजरातक द्वारि‍का, राजस्‍थानक पुष्‍कर, पंजाबक स्‍वर्ण मंदि‍र, कश्मीरक वैष्णोदेवी-अमरनाथ, उत्तरांचलक बद्रीनाथ, हरि‍द्वार, उत्तर प्रदेशक काशी, वि‍न्‍घ्‍याचल, मथुरा-वृन्‍दावन इत्यादि‍ रहल अछि‍, तहि‍ना। जइ समए गाड़ी-सवारीक अभाव छल तहू समए छल। शंकरदेवक पारिजातहरण आ रामविजय , दैत्यारि ठाकुरक श्यामन्तहरण यात्रा आ  लक्ष्मीदेवक कुमारहरण नाट (शतस्कन्ध रावण वध), ई सभ अंकियानाट मैथिलीक आरम्भिक नाटक अछि आ असमक ऐ ऋणसँ हम सभ कहियो उऋण नै भऽ सकै छी। गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदानक बीच बसल मि‍थि‍लो आ कामरूपोक रहने उपजा-बाड़ीसँ लऽ कऽ जि‍नगीक आनो-आनो संबंध सहज अछि‍। जहि‍ना कामरूप तलहटी मैदानसँ लऽ कऽ पहाड़-पठार, वनक संग प्रवाहि‍त होइत जलधारासँ सम्‍पन्न अछि‍ तहि‍ना बि‍‍हारो अछि‍। बंगालक खाड़ीसँ उठैत माैनसुनसँ जहि‍ना कामरूपक भूमि‍ सि‍ंचि‍त होइत तहि‍ना मि‍थि‍लांचलोक। ओना मुँहपर पड़ने कामरूपमे अधि‍क आ जेना-जेना पछि‍म मुँहेँ ससरैत तेना-तेना कम होइत जाइत, मुदा दुनूक बीच नजदीकी रहने बहुत बेसी अंतर नै पड़ैत। गंगा-ब्रह्मपुत्रक एक तलहटी रहने माटि‍यो आ माइटि‍क सुगंधोकेँ एकरंगाह बनौने अछि‍। उत्तरी पहाड़सँ नि‍कलैत (नदी धारा) जल धारो एक-रंगाहे रहल अछि‍। जइठाम जेहन माटि‍-पानि‍ तइठाम तेहन उपजा-बाड़ी। जइठाम जेहन उपजा-बाड़ी तइठाम तेहने खानो-पान आ आचारो-वि‍चार। जइठाम जेहन खान-पान, आचार-वि‍चार तइठाम तहि‍ना कला-सांस्‍कृति‍क संबंध। जे दुनूक बीच अदौसँ रहल अछि‍। ओना खेती-बाड़ीमे एक-रूपतो अछि‍ आ भि‍न्नतो। अधि‍क मध्‍यम बर्षा भेने, पनि‍सहू फसि‍लो आ फलो-फलहरीमे अन्‍तर होइत, से अछि‍यो। जइ कामरूपमे नारि‍यल, सुपारी, चाहक बहुतायत अछि‍ ओ मि‍थि‍लांचलमे कम अछि‍। ओना मि‍थि‍लांचलमे ि‍सर्फ आम हजारो कि‍स्‍मक अछि‍। मुदा पटुआ आ धान जहि‍ना कामरूपक मुख्‍य फसि‍ल अछि‍ तहि‍ना मि‍थि‍लोक। मुदा जहि‍ना नीलक नव अवि‍ष्‍कार भेने नीलक खेती मारल गेल तहि‍ना पोलीथि‍नक आगमनसँ पटुआक खेती प्रभावि‍त भेल अछि‍। मि‍थि‍लाक उर्वर भूमि। जहि‍ना माटि‍-पानि‍ तहि‍ना स्‍वच्‍छ हवो। जइसँ सभ कथूक वृद्धि‍। चाहे ओ खेती हुअए आकि‍ जीवन पद्धति‍ हुअए आकि‍ कला-संस्‍कृति‍। मि‍थि‍लांचलक चि‍न्‍तन धारामे ि‍सर्फ उच्‍चकोटि‍क मनुष्‍ये नै उच्‍च कोटि‍क समाज आ सामाजि‍क पद्धति‍क सेहो दि‍शा-दर्शन रहल अछि‍। जन-गणक नगर जनकपुर आ जनकपुरक राजा जनक। जनि‍क कन्‍या जगत जननी जानकी। एक-सँ-एक चि‍न्‍तक, तत्ववेत्ता, दार्शनि‍क मि‍थि‍ला भूमि‍ पैदा केने अछि‍‍। जेकर बानगी इति‍हास-पुराण जीवि‍त अछि‍। जहि‍ना सौंसे देश गुलामीक शि‍कंजामे हजारो बर्खसँ रहल तहि‍ना देशक उत्तर-मध्‍य बसल मि‍थि‍लो अछि‍। ओना मि‍थि‍ला दू देशमे बटल अछि‍। साठि‍-पैंसठि‍ बर्ख पहि‍ने भारत स्‍वतंत्रताक साँस लेलक जहन कि‍ नेपालक मि‍थि‍ला हालमे साँस लेलक। जहि‍ना अभावी परि‍वारमे अभावक चलैत जीवनक सभ कि‍छु प्रभावि‍त होइत, तहि‍ना भेल। जीवन-पद्धति‍मे खोंट अबैत-अबैत खोंटाह होइत गेल अछि‍। जेकर असरि‍ अधलाह पड़ैत गेल। मुदा तैयो मि‍थि‍लाक वएह भूमि‍ छी जे अदौसँ रहल। मि‍थि‍लांचलक उर्वर भूमि‍ रहने मनुष्‍योक बाढ़ि‍ सभ दि‍नसँ रहल, अखनो अछि,‍ आगूओ रहत। कतबो मि‍थि‍लावासी पड़ाइन केलनि‍, दुनि‍याँक कोन-कोनमे बसलाह अछि‍, तैयो मि‍थि‍लाक जनसंख्‍या पर्याप्‍त अछि‍ये। जइसँ गरीबी रहल अछि‍। एक दृष्‍टि‍ये देखलासँ जहि‍ना पर्याप्‍त जनसंख्‍या अछि‍ तहि‍ना प्रचुर सम्‍पत्ति‍यो अछि‍। मुदा दुनूक संयोगमे भि‍न्नता अछि‍। जइसँ दुनूक बीच भारी खाधि‍ बनि‍ गेल अछि‍। जि‍नकर गाम ति‍नकर सम्‍पत्ति‍ नै आ जि‍नकर सम्‍पत्ति‍ ति‍नकर गाम नै। जइसँ मुट्ठी भरि‍ पूर्ण सम्‍पत्ति‍ हथि‍यौने छथि‍। जेकर ज्‍वलंत उदाहरण पड़ाइन अछि‍। गरीबीक चलैत मि‍थि‍लावासी आइये नै पूर्वहि‍सँ नेपाल, बंगाल, अासाम धरि‍ रोजी-रोटीक लेल जाइत रहल छथि‍। पटुआ काटब, धान रोपब, धान काटब हुनका सबहक मुख्‍य कार्य छलनि‍। सालक छह मास ओ सभ कमाइ छलाह। मुदा ओइसँ पैघ-पैघ उपलब्‍धि‍ सेहो भेटल। अपना संग अपन भाषो, कलो-संस्‍कृत लेने अबैत छलाह आ लैयो जाइत छलाह, जइसँ दुनूक बीचक संबंधमे प्रगाढ़ता अबैत रहल। एकठाम रहने दुनूक बीच सभ तरहक संबंध बनैत रहल आ अखनो प्रवाहमान धारा सदृश्‍य बहि‍ रहल अछि‍। तँए ऐ पावन अवसरपर समन्‍वय समि‍ति‍ संग वि‍द्योपति‍केँ कोटि‍श: नमस्‍कार! पूर्वांचल आ मि‍थि‍ला, दुनूक बीच व्‍यापारि‍क संबंध सेहो अदौसँ रहल अछि‍। गाए-महि‍ंसिक व्‍यापार चलैत रहल अछि‍। संग-संग कलाकारक संग कलाक आदान-प्रदान सेहो चलैत रहल अछि‍। अखनो मि‍थि‍लाक श्रमि‍कक बीच जते पूर्वांचलक भाषा पसरल अछि‍ ओते मध्‍य आ उच्‍च परि‍वारक बीच नै अछि‍। वि‍द्यापति‍ पर्व समारोहक ऐ पावन असवरपर वि‍द्यापति‍केँ ि‍सर्फ मि‍थि‍ले-मैथि‍ल कहब हुनका संग अन्‍याय करब हएत। हुनका आत्‍माकेँ ठेस पहुँचतनि‍। ओ युग-पुरूष छलाह। भाषा-साहि‍त्‍यक अपन धारा अछि‍। जइ धाराक मध्‍य ओ अखनो ठाढ़ छथि‍। वैदि‍क भाषा जखन जन-गणक बीच अपन साहि‍त्‍यि‍क धारा पकड़लक, तहि‍येसँ समाजमे एक नव समाज उठि‍ कऽ ठाढ़ भेल। ओ बढ़ैत-बढ़ैत कालि‍दास धरि‍ अबैत-अबैत सोझा-सोझी ठाढ़ भऽ गेल। मुदा जि‍नगीक लेल भाषा-अनि‍वार्य, तँए जन-गणक बीच पालि‍ भाषा उगल। तहि‍ना आगू बढ़ैत- प्राकृत, अपभ्रंश होइत अवहट्ठमे पहुँच गेल। अवहट्ठक सीमानपर वि‍द्यापति‍ अपन कीर्तिलता लऽ कऽ ठाढ़ छथि‍। जइमे जन-गणक आत्‍मा झलकि‍ रहल छन्‍हि‍। ओना ओ संस्‍कृतक प्रगाढ़ पंडि‍त छलाह, जे हुनक रचनामे झलकि‍ रहल अछि‍, ओ उगना सन संगीक संग रहैत छलाह। जे उगना गंगाजल पहुँचबैत छलनि‍। एक भांग पीसैमे मस्‍त तँ दोसर पीब-पीब मस्‍त! एहन ठाम हटलासँ, वि‍द्यापति‍ पत्नि‍योसँ झगड़ा कऽ उगना लेल नि‍ष्‍काम प्रेम धारा नै बहाबथि‍, से केहन हएत। अंतमे, जहि‍ना अदौसँ एक-दोसरक सटल रहलौं तहि‍ना आगूओ सटि‍ चलैत रही, यएह शुभ-कामना। एहेन-एहेन पर्व आरो नम्‍हर भऽ भऽ मनाओल जाइत रहए, यएह शुभेच्‍छा! जय-मैथि‍ली! जय मि‍थि‍ला!!, जय कामरूप! जय भारत!! जय मानव!!! रवि भूषण पाठक आचार्य भामहक चिंतन भामह अलंकारवादी रहथि आ संस्‍कृत आलोचनाक ऐ विवादसँ परिचित छलाह जे काव्‍य-सौंदर्यक मूलाधार शब्‍दालंकारमे होइछ वा अर्थालंकारमे। पहिल मानैत छलाह जे काव्‍यमे चमत्‍कारक सृष्टि शब्‍द सौंदर्येसँ संभव अछि। दोसर समुदाय मानैत छल जे उपमा, रूपक आदि अर्थालंकारेसँ काव्‍य शोभा होइछ। भामह अपना हिसाबें दुनूमे समन्‍वय करबाक प्रयास केलखिन्‍ह। शब्‍दार्थौ सहितौ काव्‍यम् क द्वारा भामह शब्‍द आ अर्थ दुनूक महत्‍वपर बल दैत छथिन्‍ह, अर्थात शब्‍द आ अर्थक सहभावमे काव्‍यक सृष्टि होइ छै। य‍द्यपि भामहक चिंतनसँ ई विवाद आर गहिराएल कि काव्‍य कतऽ होइत छैक १.शब्‍द मे २.अर्थ मे ३. या सहभाव मे। ई विवाद एते प्रबल रहल कि शाहजहाँ कालीन विद्वान जगन्‍नाथ कहलखिन्‍ह- रमणीय अर्थक प्रतिपादक शब्‍दे काव्‍य थिक। आ वर्तमान मैथिली कविताकेँ देखल जाए तखन लगैत अछि जे फेरसँ शब्‍द अपन जाल फैला रहल अछि। ओना आधुनिक मैथिलीमे फतवाक कमी नै छै आ जइ कविताकेँ प्राचीनसँ प्राचीन आचार्य तक नवोन्‍मेषक कारणें स्‍वीकार कऽ सकैत छलखिन ओ कविता मैथिलीमे एक झटकामे श्रीविहीन साबित कऽ देल जाइत अछि आ तहिना श्रीविहीन कविताकेँ गौरवान्वित करबाक सेहो ऐ ठाम सुदीर्घ परंपरा अछि। शेफालिका वर्मा- -"आधुनिक मैथिली साहित्यक प्रभाव क्षेत्रमे नारी तत्व" संगमे "मैथिली आ तमिल कवियित्री सम्मेलन" "आधुनिक मैथिली साहित्यक प्रभाव क्षेत्रमे नारी तत्व" संगमे "मैथिली आ तमिल कवियित्री सम्मेलन" भारतक साहित्य अकादेमीक तत्वावधानमे १७-१८ दिसम्बर २०११ केँ पुडुचेरीमे सम्पन्न भेल। साहित्य अकादेमीक ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी श्री जे. पुन्नोदुर्रै स्वागत भाषण देलनि। आरम्भिक भाषण श्री विद्यानाथ झा "विदित" (संयोजक मैथिली परामर्शदात्री समिति, साहित्य अकादेमी)क आ श्री एरा मोहन (साहित्य अकादेमीक जेनेरल काउन्सिलक सदस्य)क रहल। अध्यक्षीय भाषण श्रीमती शेफालिका वर्मा देलनि। उद्घाटन भाषण श्री मनोज दास (ओड़िया आ अंग्रेजी लेखक) देलनि, ओ अरविन्द आश्रम, पुडुचेरीमे रहै छथि। मैथिली लेखिका श्रीमती रेवती मिश्र मुख्य भाषण देलनि। सिरपी बालसुब्रह्मण्यम (संयोजक तमिल परामर्शदात्री समिति, साहित्य अकादेमी) सम्माननीय अतिथि रहथि। १८ दिसम्बर २०११केँ ऑरोविल, पुडुचेरीमे ४ बजे अपराह्णसँ "मैथिली आ तमिल कवियित्री सम्मेलन" भेल। मैथिलीक मुख्य प्रतिभागी महिला लोकनि रहथि, डा. कमला चौधरी, कुमकुम झा, वीणा कर्ण, रश्मि तनु, आरती कुमारी, शेफालिका वर्मा, रमा झा, आशा मिश्र, स्वाति शाकम्भरी, नीलिमा मिश्र, रेवती मिश्र, अरुणा चौधरी, सुशीला झा, वीणा ठाकुर, उषा वत्स, ममता चौधरी, प्रमिला झा, लालपरी देवी, चंदना दत्त आ नीलम कुमारी। साहित्य अकादेमी, दिल्ली दिससँ “आधुनिक साहित्यक प्रभावक्षेत्र मे नारी तत्व” पर एकटा मुख्यतः महिला लोकनिक सेमिनार पांडिचेरी मे १७-१८ दिसम्बर केँ संपन्न भेल। ऐ सेमीनारक विशेषता छल जे कमसँ कम आयु एवं नवीन लेखिका सभकेँ मंचपर आनबाक प्रयास कएल गेल छल। ऐमे तमिलक विद्वान सभ सेहो भरल रहथि। ई सेमिनार पांडिचेरीक सभसँ पैघ होटल अनंदा इन मे छल आ रहबाक व्यवस्था सेहो ओहीमे छल। आरम्भ १७ दिसम्बरकेँ करीब १० बजे दिनमे साहित्य अकादमीक ओ.एस.डी. पोंनुदुरैक अभिभाषणसँ भेल। एकर बाद मि. राजा तमिलमे सभक परिचय करौलनि अंग्रेजी अनुवादक साथ। श्री बैद्यनाथ झा विदित अंग्रेजी आ मैथिलीमे सेमिनारकेँ संबोधित केलनि, संगे एरा मोहन, मेम्बर, जेनरल कौंसिल, साहित्य अकादेमी, पोंडिचेरी सेहो सम्बोधित केलनि। एकर उपरांत डॉ. शेफालिका वर्मा अध्यक्षीय अभिभाषण पहिने अंग्रेजी पुनः मैथिलीमे देलनि जे "आइ उत्तर केर गंगा जमुनाक साहित्य भाव दक्षिण केर साहित्य सागरसँ मिलन पर्व मना रहल अछि।” मि. मनोज दास, साहित्य अकादेमी फेलो केर विद्वता पूर्ण भाषण तमिल आ अंग्रेजीमे भेल। श्रीमती रेवती मिश्र सेमीनारक विषयपर अपन बीज भाषण आ विद्वतापूर्ण विशद आलेख पढ़लनि। गेस्ट ऑफ ओनर मि. सिर्पी बलासुब्रह्मण्यम, कन्वेनर, तमिल एडवाइजरी बोर्ड, साहित्य अकादेमी अपन भाषण देलनि। धन्यवाद ज्ञापनक उपरांत पहिल सेशन भेल जइमे अध्यक्षता कमला चौधरी केलनि, मंजर आलम, अरुणा चौधरी, कुमकुम झा, सुशीला झाक आलेख छल। दोसर सेशनक अध्यक्षता वीणा ठाकुर केलनि, ओइमे धीरेन्द्र नाथ मिश्र, रविन्द्र कु. चौधरी, आशा मिश्र, उषा वत्स केर आलेख छल। तेसर सेशनमे अध्यक्षता प्रमिला झा केलनि। ऐमे ताराकांत झा, ममता चौधरी आदिक आलेख छल। १८ दिसम्बर २०११ केँ चारि सेशन भेल, लालपरी देवीक अध्यक्षतामे अमरनाथ झा, पंचानन मिश्र, रमा झा, चंदना दत्तक आलेख छल। पाँचम सेशनक अध्यक्षता वीणा कर्ण, आलेख पाठ नीलम कुमारी, रश्मि तनु, आरती कुमारी आ सभसँ कम आयुक स्वाति शाकम्भरी केलनि। अंतिम सेशनक अध्यक्षता पन्ना झा केलनि, गेस्ट ऑफ ओनर रहथि पी. राजा (साहित्य अकादेमीक जेनेरल काउन्सिलक सदस्य), भाषण उषाकिरण खानक बाद मात्री मंदिर अरुवेलीमे तमिल मैथिली कवि सम्मलेन भेल। सभ गोटे पहिने अंग्रेजीमे तखन मैथिलीमे बजलीह। कतेक लेखिका खाली अंग्रेजीमे पाठ केलनि। महिला लेखिकाक बाहुल्य, उत्साह देखि लागल 0ldest to latest क अन्वेषण छल। मात्री मंदिरमे कवि सम्मलेनक उपरान्त सभ गोटेकेँ एकटा उज्जर झोरामे एक-एक टा चद्दर, एकटा सुंदर दीया, फूल पत्ती, छोट छोट कलात्मक चीज सभ देल गेल। तमिलक सुप्रसिद्ध कवियित्री मीनाक्षी सुन्दरम अपन मोहक मुस्कानसँ सभकेँ मोहि लेलनि। कोनो आलेख सतही नै छल, सभटा विद्वता पूर्ण, पढ़बाक उत्साह वाणीमे झलकैत छल लेखिका गण केर। नारी शक्तिसँ मिथिला ओत प्रोत अछि कोनो शक नै। मीना झा लंदनमे मैथिल समाज समाचार:९.४.२०११, आइ लंदनक स्लौवक ४०० वर्ष पुरान ऐतिहासिक किला बेलिस हाउस (Baylis House, Slough)  लंदनमे मैथिल समाज ऑफ यु.के. केर तेसर वार्षिक समारोह भेल। ऐ समारोहमे भारतसँ मुख्य अतिथि मैथिलीक सुप्रतिष्ठित लेखिका एवं मैथिलीक महादेवी वर्मा डॉ. शेफालिका वर्मा आएल छलीह। समारोहक आरम्भ बालिका पारुलक गायत्री मंत्रपर भारत नाट्यम नृत्यसँ भेल। डॉ. विभाष मिश्र  संबोधनमे मैथिल समाज केर परिचय देलनि, डॉ अरुण कुमार झा (बर्नली) अध्यक्ष मैथिल समाज, उद्घाटन भाषण केलनि -हम सभ मैथिल समाजक स्थापना संयुक्त राज्यमे बसल मैथिल सभ कोना अपन संस्कृतिक रक्षा कऽ सकी। खास कऽ हमर ब्रिटिश युवा वर्ग अपन देस कोसकेँ नै बिसरथि, हम की छी से जानथि। अपन परंपरा, अपन संस्कृतिक ज्ञान हुनका रहए, अपने सभ देखैत छी जे कतेक ब्रिटिश युवा ऐमे आइ भाग लऽ रहल छथि।' डॉ. कल्पना झा समारोहक विषयमे  विस्तारसँ सभ बात कहलनि। श्रीमति ज्योति झा चौधरी  मिथिलाक टूरपर अपन प्रोजेक्ट देखौलनि, जइमे मिथिलाक संस्कार संस्कृतिक झलक छल। डॉ. रीता झा अपन प्रोजेक्ट स्त्रीक स्वास्थ्य एवं स्थिति- भारतमे कोना दयनीय अवस्थामे छै, से अपन प्रोजेक्टसँ जाहिर केलनि। लोककेँ आह्वान केलनि जे ऐ स्थितिकेँ रोकबाक उपाय कएल जाए। डॉ अरुण कुमार झा (लन्दन) अपन प्रोजेक्टमे कन्या महाविद्यालय, जनकपुरकेँ देखौलनि, जइमे स्कूल कोना चलि रहल अछि, कोना ओइ स्कूलकेँ कंप्यूटर आदिक सुविधा उपलब्ध करौलनि। सभसँ  आग्रह  केलनि जे हम सभ जे अपन लैपटॉप कनिको खराब होइत अछि तकरा फेकि दै छी, से नै कऽ एकठाम जमा करी। ओकरा अपन देस कोसमे भेजबाक प्रबंध करी। ठसाठस भरल हॉलमे सभ मन्त्रमुग्ध सन सुनि रहल छलाह। डॉ. अरुण झाक पत्नी श्रीमति मीना झा जे स्वयं मैथिलीमे लिखै छथि पूर्ण सहयोग दऽ रहल छलीह। समारोहमे डॉ. रामभद्र  झा, डॉ. कौशलेन्द्र कर्ण, डॉ. मिथिलेश झा आदि सबहक सहयोग छल। तकर  बाद डॉ.नूतन  मिश्र क आग्रहपर  डॉ. कलाधर  झा  मुख्य अतिथि डॉ. शेफालिका वर्माक परिचय करौलनि- कोना हिनकर विषयमे केरला सरकार की सभ लिखने छै, कोना हिनक कविता सभ यु.के. क पाठ्य क्रममे छै'। ऐसँ पहिने  बालिका पारुल आ वत्सला राधा कृष्णपर बड सुन्दर नृत्य नाटिका प्रस्तुत केलनि। समारोहक दोसर सत्र खुलल आकाशक नीचाँ  बासंती  उपवनमे मुख्य अतिथि डॉ. शेफालिका वर्माक भाषणसँ ई शुरू भेल। ओ अपन भाषणमे मिथिलांचलक अतीत केर परिचय दैत बजलीह- विदेशक ऐ भावभूमिपर अपन मिथिला देशकेँ देखि रहल छी। मैथिल समाजक ई ओ समारोह अछि जइ ठाम ह्रदए-ह्रदएसँ जुड़ैत अछि, बुद्धि-बुद्धिसँ, चिंतन-चिंतनसँ। सभसँ पहिने हम अपन हार्दिक आभार प्रकट करैत छी जे अपने सभ ई सम्मान हमरा देलौं। हम कत्तौ मिथिला मैथिली शब्द देखैत छी तँ हमर मोन प्राण अद्भुद रूपसँ झंकृत होमऽ लगैत अछि। अपने सभ विदेशमे रहि अपन समाजकेँ नै बिसरल छी, ऐलेल अपने सभकेँ बेर-बेर नमन। सौँसे पृथ्वी पर यदि  हम घूमि आबी तँ सभ ठाम कत्तो ने कत्तो एक टा छोट मोट मिथिला अवश्य भेटि जाएत। मिथिलाक संस्कृति, मिथिलाक संस्कार हमरा बुझने विश्वमे शाइते कत्तौ होइ। वास्तवमे मिथिला आधा बिहारमे छपल अछि, लागले पड़ोसी देश नेपाल तँ मैथिलीसँ महामंडित अछि। पहिने दरभंगा, समस्तीपुर,  मुजफ्फरपुर, भागलपुरसँ लऽ कऽ सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, कटिहार, पूर्णियाँ सभ मिथिले थिक। कहल जाइ छै जे चारि कोसपर पानि बदले, पाँच कोसपर वाणी, यानि सभ ठाम मैथिलीक उच्चारण  अपन-अपन क्षेत्रक अनुसार होइत अछि, जेना विश्वभाषा अंग्रेजीकेँ मानल गेल छै, जइमे कतेको स्थानक अंग्रेजी उच्चारण समाहित अछि, हँ ई आन गप थिक जे मुजफ्फरपुर बज्जिका बनि गेल, तँ भागलपुर अंगिकाकेँ जन्म दऽ देलक। किन्तु सबहक ह्रदएमे मैथिलीक संस्कार ओहिना अविरल रूपसँ प्रवाहित होइत रहैत अछि। पुनः ओ विद्यापतिक गीतसँ मैथिलीक काव्यधाराक उत्पत्ति कहैत लोकप्रिय साहित्य बनेबामे पं. हरिमोहन झाक साहित्य रचनाकेँ बड़का योगदान कहलनि। आजुक वैचारिक क्रांति, वैज्ञानिक क्रांतिक उल्लेख करैत ओ कहलनि जे संचार क्रांतिक ऐ युगमे सौँसे विश्व एकटा गाम बनि गेल। हम सभ देशक नै वरन विश्वक नागरिक बनि गेल छी। आइ दुनियाँक एक कोनसँ दोसर कोन धरि सोझे संवाद कऽ लैत छी। ऐसँ मैथिली साहित्यकेँ बहुत फाएदा भेलै। नेटपर मैथिली पत्रिका सभ आबए लागल, मिथिलाक खबर आबए लागल, जइमे मिथिला मंथन, मैथिल आर मिथिला, अनचिन्हार आखर, विदेह.कॉम आदि बहुतो पत्रिका नेटपर अबैत अछि मुदा असगरे विदेह पत्रिका जे प्रसिद्ध साहित्यकार गजेन्द्र ठाकुरक सम्पादनमे शिव कुमार झा, उमेश मंडल आदिक संयोजनमे  बंगला, उड़िया, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, गुरुमुखी आदि लिपिमे छपैत अछि। एकटा सर्वेक्षणक अनुसार २००४ सँ आइ धरि  विदेह १०७ देशक १०७२६, ठामसँ ५७,००० लोक २००९४९९०   बेर ऐ पत्रिकाकेँ देखलनि। सभसँ पैघ गप छै जे नव लेखकक प्रतिभाकेँ उजागर कएल गेल आ सभ जातिक  प्रतिभाकेँ उजागर कएल गेल। दिल्लीसँ मिथिलांगन, अंतिका, कोलकातासँ कर्णामृत, मिथिला दर्शन,   बम्बइसँ मिथिला दर्पण, आसामसँ पूर्वोत्तर मैथिल, पटनासँ समय साल, घर बाहर, झारखंडसँ पक्षधर आदि कतेको पत्रिका बहराए रहल अछि मुदा सभ ठाम नेट जुड़ल अछि। हम हुनका सभकेँ कहलौं जे मैथिली पुस्तक एकसँ एक प्रकाशित भऽ रहल अछि मुदा बाजारमे नै छै। अहाँ सभ पुस्तक ऐ ठाम मंगाउ आ हिन्दीक पोथी पुस्तकालयमे ऐठाम अछि, मैथिलीक पोथी किए नै? मिथिला मैथिली बहुत तरहक समस्यासँ ग्रस्त अछि, ओकर समाधानक लेल सेहो सोचू। दिल्ली सरकारक मैथिली भोजपुरी अकादेमीसँ बहुत काज मैथिली लेल भऽ रहल छै। यानि मैथिलीक चहुमुखी विकास भऽ रहल अछि, तैयो मिथिलांचल बाढ़ी, रौदी, दाही, बेरोजगारी आदि समस्यासँ ग्रस्त अछि। सभसँ पैघ बात ओ कहलनि  जे नबका पीढ़ी अपन भाषा बिसरल जा रहल छथि। देश विदेश सभ ठाम, ई एकटा गंभीर प्रश्न सभक सोझामे छै। एहेन नै होइ जे एकदिन अपन मूल गामो बिसरि जाए।  हवाक वेगमे पानिमे हेलैत जड़विहीन भाखन जकाँ हेलैत रहि जाए। मिथिलाक नारी लेल सेहो ओ कहलनि कोना अपन अस्तित्व लेल छटपटा रहल छथि, स्त्रीकेँ सुरक्षित नै स्वरक्षित हेबाक चाही, निर्णय लेबाक क्षमता हेबाक चाही। भाषणक अंत अपन कवितासँ केलनि- हमर घर कतऽ हेरा गेल। कतेको श्रोताक आँखि नोरा  गेल। एकर सभसँ मनोरंजक कार्यक्रम विदेशमे रहल मैथिल बच्चा मैथिली कोना बाजत जकर बहुत नीक आ सटीक संचालन डॉ. अरुण झा (लन्दन) केलनि। एकर आकर्षक पक्ष छल एक दिस पुरान पीढ़ी दोसर दिस नव पीढ़ी। दुनूक समस्या आ समाधानक  चेष्टा- डॉ. विभाष मिश्र, डॉ. नूतन मिश्र आ श्रीमती ज्योति झा चौधरी तीनू हरिमोहन झाक खट्टर ककाक तरंग पर एकटा छोट सनक स्वर-रूपक प्रस्तुत केलनि। समूचा हॉल ठहक्कासँ गूँजि उठल। ऐ समारोहक विशेष आकर्षण रहल मैथिली पुस्तक आ  मिथिला पेंटिंगक बिक्री। गीत संगीतमे श्रीमति अनीता चौधरी आ श्रीमती माला मिश्र, डॉ. वीणा झा आ  डॉ. विभाष मिश्रक गानपर समस्त हाल झूमि उठल, पुनः अंग्रेजी कविता डॉ. सीमा झा, मैथिली कविता श्रीमती ज्योति झा चौधरी आ डॉ. शेफालिका वर्माक कविता माय विलेज क पाठ हुनके नतिनी सुश्री  अंकिता कर्ण केलनि। डॉ वंदना कर्ण  मुख्य अतिथि डॉ शेफालिका वर्माक हाथे पुरस्कार वितरण कएल गेल । सबहक समाप्ति डॉ. मिथिलेश झाक धन्यवाद ज्ञापनसँ  भेल। ऐ समारोहक समापनक उपरांत लागले  कार्यकारिणी समितिक मीटिंग भेल, जइमे समय पूर्ण हेबाक कारण नव कार्यकारिणीक गठन भेल। पुरान कार्यकारिणी: अध्यक्ष डॉ. अरुण झा (बर्नली), सचिव एवं कोषाध्यक्ष -डॉ. मिथिलेश झा, कार्यकारिणीक सदस्य.- डॉ. रामभद्र झा,  डॉ. वंदना कर्ण, डॉ. पूनम झा, डॉ. कल्पना झा, डॉ. राजीव रंजन दास, वेब साइट रचयिता श्री अखिलेश कुमार। नव समिति: अध्यक्ष- डॉ. अरुण झा (लन्दन), सचिव  डॉ वन्दना कर्ण, कोषाध्यक्ष-डॉ. मिथिलेश झा, कार्यकारिणीक सदस्य- डॉ. विभाष मिश्र, डॉ. राहुल ठाकुर, डॉ. आलोक झा, श्री राजेन्द्र चौधरी, श्री राज झा, श्रीमती  ज्योति झा चौधरी। २०१२ मे ३१ मार्चक तारीख अखन राखल गेल अछि एनुअल जेनेरल मीटिंगक लेल। बेसी जानबा लेल वेबसाइट www.maithili.co.uk  देखू। खुशबू झा हमरा नजरिमे सुजीतक रिपोर्टर डायरी संस्मरणक किताब हम कएटा पढ़ने छलौं मुदा रिपोर्टर डायरी पढ़ैक हमर ई पहिल अनुभव रहल। रिपोर्टर डायरीमे की सभ हेतै एकर उत्सुक्ता छल। एकरे कारण जखन हमरा रिपोर्टर डायरी भेटल हम दू बैसानमे पढ़ि लेलौं। पत्रकार सुजीत कुमार झाक पहिल कृति चिड़ै हम पढ़ने छलौं संगहि हुनक एभि न्यूज टिभी, रेडियो मिथिला आ मिथिला डट कमक रिपोर्टिङ्ग सँ सेहो परिचित छी । मुदा जे चीज रिपोर्टर डायरीमे भेटल ऐ सँ पहिने हमरा हुनकामे देखबामे नै आएल छल। ४७ टा डायरी अर्थात लेखमे कोन बढ़ियाँ वा कमजोर छुटिऐब कठिन अछि। सभ एक पर एक। फेर ऐमे सभ चीज भेटैत अछि। संस्मरण, रिपोर्ताज आ अहू सँ बेसी सभ स्टोरीकेँ हम कथे कहै छिऐ। ला जबाब पिक्चराइज अछि। रिपोर्टर डायरी पढ़लाक बाद लोक जनकपुर बुझि सकैत अछि। फेर पत्रकारक नजरिमे केहन जनकपुर अछि एकर स्पष्ट झलक ऐमे भेटैत अछि। फेर बहुत रास समस्या सभ सेहो उठल अछि। जेना रस नै गुल्लाक रेकर्डमे बरियाती आ बेटी बलाक अवस्थाक बहुत बढ़ियाँ जकाँ चित्रण भेल अछि। तहिना साज विहीन स्वर सम्राट बेचनमे बेचनक अवस्था आ बेचनक मित्र उदित नारायण झा बिचक विकास क्रम बढ़ियाँसँ कम शब्दमे कहल गेल अछि। बिबाह कार्डमे मैथिली भाषा आ ओ तँ मैथिली बिटक समाचारदाता छला, ओहो लाजबाब अछि। जनकपुरक बिबाह कार्ड सभमे कोना मैथिली लिखाइ कऽ क्रम शुरु भेल, तहिना रहिकाक चुनचुन मिश्रक मैथिलीक प्रति समर्पण, सेहो गजबसँ लिखाएल अछि। चुनावक नामपर पैसाक बहस नामसँ चुनावमे भ्रष्टाचार कोन रुपसँ बढ़ल अछि, अइसँ बढ़ियाँ चित्रण नै भऽ सकैत अछि। एकटा पत्रकार कोन अवस्थासँ अपन पत्रकारिताक क्रममे गुजरैत अछि, तेकर ऐठाम गजब बानगी भेटैत अछि। घड़ीक सुइकेँ केउ पकड़ि लेने छल, तइमे महिला पत्रकार उमा सिहंक हत्या दिनक लेख अछि। ऐमे लेखककेँ रेडियोमे कार्यक्रम चलाबए जाइत काल एकटा टेलिफोन अबैत अछि। पत्रकार उमा सिहंकेँ आक्रमण भेलै, एहनमे ओ उमा सिहंकेँ सहयोग करए जाथि वा कार्यक्रम चलाबए, ओइ समएक द्वन्द्व बेजोर आएल अछि। तहिना महासंघक चुनाव आ सुन्धराक आनन्दमे, नेपालमे पत्रकारितामे पैसाक खेल कतेक बढ़ि गेल अछि तेकर सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत कएल गेल अछि। नेपालक पत्रकारितामे कतेक रास विकृति आएल अछि तेकरा रखैत एकटा निकास देबाक सेहो प्रयास कएल गेल अछि। सरल भाषामे लिखल सुजीतक रिपोर्टर डायरी पढ़एमे आम पाठककेँ बहुत आसान हएत। फेर किताबक प्रिन्टिङ्ग तँ एहन अछि जे लगैत अछि एक बेर देखिते रही। किताबक प्रकाशक आफन्त नेपाल अइ लेल धन्यबादक पात्र छथि। सुजीत जी किताबमे लिखने छथि, पहिल पुस्तक जकाँ अर्थात चिड़ै कथा संग्रह जकाँ एकरा सिनेह भेटतै, आशा रखने छथि। पढ़लाक बाद हम ई कहि सकैत छी, स्नेहक आवश्यकता नै छै। नीक चीज छै, लोक पसिन कऽ रहल अछि। हमरा तँ बहुत बेजोड़ लागल। मैथिली संसारमे एहन रचना सभक आवश्यकता अछि। खाली कथे कबिता नै, सभ तरहक चीज आबक चाही। नयाँ चीज पाठककेँ नयाँ आनन्द दैत अछि। अमरकान्त अमर संघीयतामे मैथिली भाषा नेपालक नयाँ संविधानमे जोड़ तोड़ सँ संघीयताक बात उठि रहल अछि । देशमे संघीय संरचना भेलाक बाद मात्र सभक अधिकार सुनिश्चित हेबापर मिथिला आ मैथिली भाषा-भाषी सभ आश्वस्त अछि। तँए संघीयताक विकल्प आब नै रहल, एतुका जनता सेहो अवाज उठा रहल अछि। तखन संघीय संरचनामे राज्यकेँ कोना कऽ प्रदेशमे छुटिआओल जाए, अखनो धरि विभिन्न दल सभ बीच मतान्तर देखल गेल अछि। किओ १४ टा राज्य हेबाक मुद्दा उठबैत छथि तँ किओ ५ टा, किओ ३ टा आति इत्यादि। मुदा अखन विचारमे मात्र सीमित रहि गेल अछि राज्य पुनर्संरचना। चाहे जे से देर सही, दुरुस्त राज्य पुनर्संरचना आ नयाँ संविधानक कल्पना नेपाली जनता कऽ रहल अछि। राष्ट्र भाषा नेपाली बाहेक नेपालमे दोसर राष्ट्रीय भाषाक रुपमे मैथिली भाषा अपन सर्वोच्चता काएम कएने अछि। ऐमे ककरो दू मत सेहो नै अछि। संघीयतामे गेलासँ मैथिली भाषाक विकास तीव्रगतिसँ हएत। राज्य पुनर्संरचनामे जइ रुपसँ मिथिला प्रदेशक बात उठि रहल अछि, निश्चित मैथिली भाषाक विकास किओ नै रोकि सकत। तखन मैथिली भाषापर सभ दिनसँ कुठाराघात होइत आएल अछि। ऐसँ बचबाक लेल मैथिली भाषा-भाषी सभकेँ सदिखन सचेत रहए पड़त। परापूर्व कालेसँ मैथिली भाषा समृद्ध रहलाक बादो आन भाषा एना कऽ लादल गेल जे मैथिली भााषाकेँ ऊपर उठएमे बहुत रास समस्याक सामना करए पड़ल। ओना मिथिला क्षेत्रक मिथिलानी सभ अपन भाषा आ संस्कृतिकेँ अखनो धरि बचाबएमे सफल छथि। तखन संघीयतामे मैथिली भाषाक स्थान कोन रुपसँ बढ़ि सकत आ एकर प्रभाव केहन हएत तइ सम्बन्धमे सामाजिक समावेशीकरण अनुसन्धान कोषक सहयोगमे भाषा विज्ञान सम्बन्धमे अनुसंधान कएनिहार भाषा विद् डा. प्रा योगेन्द्र प्रसाद यादवक कहब छन्हि जे भाषाक आधारपर प्रदेशक निर्माण कएल गेल तँ मैथिली भाषा वर्तमान अवस्थासँ बहुत सुदृढ़ आ व्यवसायीकरण दिस उन्मुख हएत। भाषाक आधारपर राज्य पुनरसंरचना कएल गेल तँ हरेक निकायमे सभ गोटे सहज हएत, कहैत ओ कहलन्हि जे प्रदेशमे सामंजस्यता, मिल-मिला कऽ संगहि भाषाक संगे अन्य निकाय सभमे सेहो विकासक द्रुत गति लेत। भाषाक आधारपर वा समग्र मधेश एक प्रदेशक आधारपर प्रदेश निर्माण भेल तँ मैथिली भाषा तुलनात्मक रुपमे सभसँ अग्रणी स्थानमे रहत, भाषाविद् यादवक दावी छन्हि। सम्रग मधेश प्रदेशक निर्माण भेल तँ हिन्दी भाषाक वर्चश्व मिथिला क्षेत्रमे काएम हएत, कएल गेल प्रश्नक जवाबमे डा. प्रा. योगेन्द्र प्रसाद यादव कहलन्हि, सम्रग मधेश प्रदेशक निर्माण भेल तँ हिन्दी मात्र सम्पर्कक भाष रहि सकत। हिन्दीसँ मैथिली भाषाकेँ ‘इगनोर’ नै कएल जाएत, कहैत ओ कहैत छथि, ‘संघीय संरचनामे मैथिली भाषाक बाहेक अन्य स्थानीय भाषा सेहो विकास करत।’ वर्तमान समएमे देखल गेल अछि जे प्राथमिक विद्यालय सभमे मातृभाषामे अध्ययन अध्यापन नै भऽ रहलाक कारण विद्यार्थी सभमे मनोवैज्ञानिक त्रास उत्पन्न भेल, हुनक कहब छलन्हि। मनोवैज्ञानिक त्रासक कारण बच्चा सभ विद्यालय जाएसँ हिचकिचा रहल अछि, अनुसंधानक क्रममे देखल गेल, ओ जानकारी देलन्हि अछि। तहिना अपन भाषामे पढ़ाइ नै भऽ रहलासँ शिक्षामे गुणात्मक वृद्धि नै भऽ रहल आ विद्यार्थी सभ सेहो नीकसँ नै बुझि रहल, हुनक धारना छल। मातृभाषामे शिक्षा ग्रहण कराओल गेल तँ बच्चा सभक मानसिक विकासक वृद्धि हेबाक संगे भाषिक विकास सेहो होइत अछि, कहैत भाषाविद् योगेन्द्र प्रसाद यादव कहलन्हि, मातृभाषाकेँ बीचमे रोकि अन्य भाषामे बुझेलासँ मानसिक असर सेहो पहुँचैत अछि। अन्य देश सभमे कएल गेल अनुसंधानमे देखल गेल जे मातृभाषामे शिक्षा-दीक्षा देलापर बच्चा सभक दिमाग अन्य भाषाक तुलनामे बेसी तेज होइत अछि, तएँ मातृभाषाक प्रयोग करएपर ओ जोड़ देलन्हि। मिथिला क्षेत्रमे मैथिली भाषाक लोप होइत देखल जा रहल प्रति ओ कहै छथि, जइ भाषाकेँ लोकसेवामे समोवश नै कएल गेल, सरकारी काम काजक भाषामे प्रयोग नै भेल आ अन्य अवसर सभ प्राप्त नै भेल तँ ओइ भाषाक लोप हेबाक सम्भावना रहैत अछि। भारत, स्वीटजरलेण्ड आ केन्या सहितक देश सभमे संघीय संरचना भाषाक आधारपर कएल गेल, कहैत ओ कहलन्हि, भाषाक आधारपर कएल गेल राज्य पुनर्संरचना स्थायित्व प्रदेशक निर्माण हेबाक ओ दावी कएलन्हि अछि। तहिना संघीयतामे देश गेलापर मैथिली भाषाक विकास कोन रुपसँ आगाँ बढ़त तइ सम्बन्धमे मिथिला राज्य संघर्ष समितिक संयोजक प्राध्यापक परमेश्वर कापड़िक कहब छन्हि जे संघीयतामे मैथिली भाषा-संस्कृतिक असल पहिचान आ स्वायत्तताक बोध हेबे करत, तँए तकर दोसर विकल्प खोजब भूत खेलाएब अछि। मैथिली भाषा अभिव्यक्तिक माध्यम मात्र नै भऽ मैथिली भाषामे लौकिकता, सांस्कृतिकता, कला, साहित्य सभकेँ स्पष्ट आ अनिवार्य छाही देखल जाइछ, प्राध्यापक कापड़िक कहब छन्हि। ओ कहै छथि, मैथिला भाषामे सांस्कृतिक निजत्व छै, जकर संप्रेषन आन भाषामे नहिए भऽ सकैत अछि। जकर उदाहरण मैथिली भाषाक होरी, छठि, सामा, जट-जटिन, लगनी, सोहर, समदाउन, लोकगाथा, लोक गीत रहल, ओ उल्लेख कएलन्हि। ओ कहलन्हि, ऐ सभकेँ मैथिली बाहेक आन भाषामे अनुवाद नै भऽ सकैत अछि। प्रजातन्त्र गणतन्त्रसँ बेसी एखन देशमे संघीयता चाही, कहैत ओ कहलन्हि, संघीयतासँ अस्मिताकेँ पहिचान आ स्वात्तताक बोध होइत अछि। संघीयतामे भाषिकता, जातीयता, क्षेत्रीयता, ऐतिहासिकता आ पौराणिकता प्राकृत रुपसँ देखाइ दैत अछि। भाषाक मामिलामे मैथिलीकेँ सर्वसत्तावादिता नै, एतुका सभ भाषा आ संस्कृतिकक संगे एकर समायोजित स्वायत्तताक पक्षधर रहल अछि। मैथिली भाषा-भाषी नेपालमे एखन मोरङ्गसँ लऽ कऽ रौतहट धरि रहल अछि। ओना मैथिली भाषाक बात करी तँ धनुषा, महोत्तरी, सिरहा, सप्तरी, मोरङ्ग, सुनसरी, रौतहट, सलार्ही सहितक जिल्लामे बेसी प्रभाव देखल गेल अछि। तहिना मिथिला क्षेत्रक बात करी तँ पूर्वमे मोरंग सँ लऽ पश्चिममे बाराक सिम्ररौनगढ़ धरि मानल जाइत अछि। मैथिली भाषा किछु वर्ष इम्हरसँ गति लेबएमे पाछाँ पड़ल देख गेल, मुदा पहिचानक बात उठि रहल समएमे आ संचार क्षेत्रक विकास भेलाक बाद मैथिली भाषाक विकास पुनः गति लेलक अछि। मैथिली भाषापर अन्य भाषा सभ लादल नै गेल तँ स्वतः मैथिली आ मिथिलाक विकास हएत। समए-समएमे मैथिली भाषाकेँ कमजोर करए लेल मैथिलीएकेँ मगही कहि कऽ प्रचार कएल जाइत अछि। ओना भाषाविद योगेन्द्र प्रसाद यादव एकरा मगही संकीर्णताक उपजक संज्ञा देने छथि तँ प्राध्यापक परमेश्वर कापड़ि मगही भाषा राजनीतिक विषपाद रहल बतौने छथि। चाहे जे से मगही कए नै प्रचार कएल जाएत, ओ मैथिलीए भाषा रहल सभ स्वीकार करैत छथि। तहिना भोजपुरी भाषा मैथिलीपर सेहो भारी भेल जा रहल अछि। मैथिलीक अंगिकाक रुपमे रहल कहल जाएबला भोजपुरी भाषामे अश्लीलताक प्रभावसँ मैथिलीपर भारी पड़ि रहलाक बादो मैथिलीक अस्तित्व अखनो बाचएमे सफल भेल अछि। मैथिली भाषाकेँ शासन-प्रशासन, लोकसेवा आ अदालतक संगे संचारी भाषाक रुपमे प्रयोग भेलाक बाद मैथिली भाषाक प्रभाव क्षेत्र बहुत व्यापक हेबाक सम्भावना अछि। आ एना भेलापर मैथिली भाषाकेँ विकास करए नै पड़त, स्वतः भऽ जाएत। मैथिली भाषाकेँ राज्य स्तरसँ दू भावनामे नै राखल जाए तँ एकर प्रभाव काठमाण्डू सहित अन्य भाषा-भाषाीमे सेहो लोकप्रिय अछि। मैथिली भाषाकेँ अपन लिपि हेबाक संगे एकर अपन निजत्व अछि। पूनम मण्डल महासुन्दरी देवीकेँ मिथिला चित्रकला लेल २०११ क पद्म श्री महासुन्दरी देवी (८९ बर्ख)केँ मिथिला चित्रकला लेल २०११क पद्म श्री देल जाएत। हिनका पहिने तुलसी सम्मान आ शिल्पगुरु सम्मान भेटल छन्हि। भारतक राष्ट्रपति १२८ पद्म पुरस्कार देलनि, जइमे १३टा पद्म विभूषण, ३१टा पद्म भूषण आ ८४टा पद्म श्री पुरस्कार अछि। ऐ १२८मे ३१टा महिला छथि, एकटा डुओ (गणना लेल एक) आ १२ टा विदेशी/ एन.आर.आइ./ पी.आइ.ओ/ मृत्योपरांत वर्गसँ छथि। पद्म पुरस्कार कला, सामाजिक कार्य, सार्वजनिक सेवा, विज्ञान आ आभियांत्रिकी, व्यापार आ उद्योग, चिकित्सा, साहित्य आ शिक्षा, खेलकूद आ लोकसेवा लेल देल जाइत अछि। पद्म विभूषण उत्कृष्ट आ नीक, पद्म भूषण उच्च कोटिक नीक आ पद्म श्री नीक सेवा लेल देल जाइत अछि। गणतंत्र दिवसक अवसरपर एकर घोषणा होइत अछि आ राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति भवनमे मार्च-अप्रैलमे देल जाइत अछि। स्थानीय कवि‍ परि‍षद (सलहेस बाबा परि‍सर, औरहा) वार्षिकोत्सव २०१२ दि‍नांक २७ जनवरी २०१२ (शुक्र दि‍न) स्थानीय कवि‍ परि‍षदक चारि‍म वार्षिकोत्सव २०१२क अवसरपर सम्मान समारोह आ कवि‍ सम्मेलन श्री उमेश पासवानक संयोजकत्वमे सुसम्पन्न भेल। स्थान- सलहेस बाबा परि‍सर औरहा, प्रखण्ड- लौकही, जि‍ला- मधुबनी, समए- ११:०० बजे (पूर्वाहन) सँ संध्या ५ बजे धरि‍ कार्यक्रम चलैत रहल। कार्यक्रमकेँ दीप प्रज्वलि‍त कऽ वि‍धि‍वत् उद्घाटन केलनि‍ वनगामा (उत्तरी) पंचायतक मुखि‍या श्री दयानंद साह आ सरपंच श्री नूनू साहजी। मैथि‍ली साहि‍त्यक श्रेष्ठ कथाकार, नाटकरकार, उपन्यासकार आ कवि‍ श्री जगदीश प्रसाद मंडल, एकैसम शताब्दीकक पहि‍ल दशकक सर्वश्रेष्ठ कविता संग्रह अम्बराक लेखक‍ श्री राजदेव मंडल आ कवि‍ श्री अच्छे लाल शास्त्री जीकेँ नव वस्त्रक संग प्रो. राधाकृष्ण चौधरी लि‍खि‍त ‘मि‍थि‍लाक इति‍हास’ आ मैथि‍ली साहि‍त्यक सर्वश्रेष्ठ बाल-साहि‍त्य ‘मि‍थि‍लाक लोकदेवता’(श्रीमति प्रीति‍ ठाकुर) पोथीसँ सम्मानि‍त कएल गेलनि‍। सम्मान समारोहक अध्ययक्षता केलनि‍ श्री मि‍थि‍लेश सि‍ंह (शि‍क्षक, मध्य वि‍द्यालय- महदेवा, मधुबनी) आ मंच संचालन श्री दुर्गानंद मण्डल आ संजीव कुमार शमा। कार्यक्रमकेँ आगाँ बढ़ाओल गेल श्री राधाकान्त मण्डलक स्वलि‍खि‍त स्वागत गीत- हे मि‍थि‍लावासी कवि‍वर, स्वागत हमर स्वीकार करू....सँ। ‘आशासँ फूलक माला लेने हम ठाढ़......’ सुन्दर गीतसँ प्रो. उपेन्द्र नारायण अनुपमजी सेहो स्वागत केलनि। तकर बाद स्वागत भाषण प्रस्तुत केलनि‍ प्रो. कपि‍लेश्वर साहु जी आ स्वागत कवि‍ताक अति‍वि‍शि‍ष्ठ पाठ केलनि‍- श्री रामवि‍लास साहुजी। पहि‍ल सत्रक समापनक बाद दोसर सत्र प्रारम्भ भेल जइमे लगभग २ दर्जनसँ बेसी कवि‍ लोकनि‍ अपन-अपन नूतन कवि‍ताक पाठ केलनि‍ जे ऐ तरहेँ भेल- अवकाश प्राप्त शि‍क्षक- श्री दुखन प्रसाद यादव- गरीबी, गणतंत्र, हमर भारत छै; श्री नंदवि‍लास राय- मानवता, शि‍क्षि‍त बेरोजगार; लक्ष्मी दास- लौटि‍या; अखि‍लेश कुमार मण्डल- जि‍नगी; रामवि‍लास साहु- प्रेमक भूखल, माघक जाड़, हमर गाम घर; उमेश मण्डल- आगाँ अबै जाउ, आत्म‍ वि‍श्वास, अढ़ाइ हाथ; प्रो. उपेन्द्र नारायण साह- छी कनी; प्रो. कपि‍लेश्वर साह- गामक घटक; श्री वि‍रेन्द्र कुमार यादव- मारल बुइध; श्री हेमनारायण साह- व्यवथा; श्री कुसुम लाल मंडल- ठाढ़ी; श्री राजदेव मंडल- कामना; श्री अच्छेलाल शास्त्री- हवा बहैत अछि‍ सन-सन-सन; श्री जगदीश प्रसाद मण्डल- कि‍छु सि‍खू कि‍छु करू; उमेश पासवान- रगड़ा; संजीव कुमार शमा- भेल छने अन्हार, गप मजगर कह; प्रो. रमेश कुमार मंडल- आत्म-हत्या, अहि‍ना। श्री आशीष कुमार सि‍ंह, श्री अमरनाथ यादव, संजय कुमार सि‍ंह, सोनेलाल यादव, रामप्रवेश मंडल, राधाकान्त मंडल आदि सेहो मैथिली कविताक पढ़लन्हि‍। ऐ अवसरपर लौकही थानाध्यकक्ष श्री राज कि‍शोर बैठा, श्री गुप्ता प्रसाद सि‍ंह, एस. आइ. लौकही, मधुबनी, छि‍न्नमस्तिका एफ.एम. राजवि‍राज, नेपालसँ आएल प्रमोद प्रि‍यदर्शी, भूतपूर्व सरपंच श्री रामनारायण यादव, शि‍क्षक श्री सत्य नारायण मण्डल, डंगराहा पंचायतक भूतपूर्व मुखि‍या श्री रामप्रीत मंडल जीक संग-संग लगभग पाँच सएसँ ऊपर लोक समारोहमे भाग लेलनि‍। “वि‍देह मैथि‍ली पोथी प्रदर्शनी”सँ ग्रामीण सभमे काफी हर्ष देखबामे आएल। राजेन्‍द्र कुमार प्रधान २१म शताब्दीक पहिल दशकक मैथिली उपन्यासमे राजनीतिक चेतना कोनाे सामाजि‍क उपन्यासमे प्रस्तुत वि‍षय-वस्तुक हएब प्राय: स्वभावि‍क अछि‍। उपन्यास एक एहन वि‍धा थि‍क जइमे सम्पूर्ण जि‍नगीक वर्णन रहै छै। जि‍नगीक एकटा अहम अंग राजनीति‍ होइछ। जइ‍सँ उपन्यानसमे मोड़ आनल जाइत अछि‍ आ ई दि‍शाकेँ बदलि‍ दै छै। व्यक्ति भलहि‍ं व्यक्तिगत स्थि‍ति‍केँ द्योतक हुअए मुदा जि‍नगी एकटा एहन वि‍शाल परि‍क्षेत्रक नाओं थि‍क जे समाजक बीच पसरि‍ जाइत अछि‍। मनुख जखने समाजसँ जुड़त तँ ओइमे राजनीतिक‍ स्वत: एक अंग बनि‍ जाएब स्वभावि‍क अछि‍। पहि‍ल दशकमे प्रकाशि‍त उपन्यास तँ बहुतो हएत मुदा हम जेतबा पढ़ि‍ वा देखि‍ सकल छी मात्र तेकरे वर्णन एे आलेखमे कऽ रहलौं अछि‍। जगदीश प्रसाद मण्डलजीक उपन्यासकेँ मैथिली साहित्यमे सार्थक राजनैतिक चेतना जगेबाक प्रारम्भक रूपमे देखि सकै छी, मौलाइल गाछक फूल उपन्यासमे राजनीति‍क चेतना ओत-प्रोत अछि, जइ‍मे ग्रामीण जीवनमे पसरल समस्याक यथार्थ चि‍त्रण केलनि‍ अछि‍। प्रस्तुत उपन्यासमे सुबुध नामक एकटा पात्र जे शि‍क्षक छथि‍ ओ अध्यापन कार्यमे लागल रहैत छलाह। गाम-समाजक चि‍न्ता‍सँ मुक्त छलाह। जखन रमाकान्त बाबू मद्राससँ घुरि‍ अपन गाम एलाह आ हुनकामे ई चेतना भेलनि‍ जे अनेरे जमीन हम कि‍अए रखने छी तखन अपन २ सए बीघा जमीन समुच्चा ग्रामीणमे बाँटि‍ समाजकेँ परि‍वार रूपमे देखए केर नजरि‍क पता शिक्षक सुबुधकेँ लगलनि,‍ तखन हुनकामे सेहो चेतना एलनि‍ आ अपन नौकरीसँ ति‍याग पत्र दऽ पुन: आपस आबि‍ जाइ छथि‍। गाम-समाजक बीच एबाक लक्षण एकटा राजनीति‍क चेतनाक अपूर्व कृति‍मान उपस्थि करैत अछि‍। तहि‍ना जिनगीक जीत उपन्यामे समाजक दशा-दि‍शाक यर्थाथ चि‍त्रण करैत अर्थनीति‍ केर मूल रहस्यकेँ उद्घाटि‍त करबाक जे प्रयास मंडलजी केलनि‍ अछि‍ ओ एक अद्भुत राजनीति‍क प्रमाण उपलब्धे करबैत अछि‍। जगदीश प्रसाद मंडलक अगि‍ला उपन्यास उत्थान-पतन- ऐ‍ उपन्यासक माध्यमे सामंती सोचबला समाज आ समाजि‍क सोचक समाज बीच आधुनि‍क वैज्ञानि‍क समन्वयवादी सोचक यथार्थ चि‍त्रण तेहन मार्मिक आ ईमानदारीसँ मंडलजी केलनि‍ अछि‍ जे एक तेहन राजनीति‍क चेतनाक संवाहक बनैए जे प्रत्येक मनुखक उत्थान आ पतनक मार्ग दर्शन रूपमे सि‍द्ध करैत अछि‍। ‘जीबन-मरन’ उपन्यासक लेखक जगदीश प्रसाद मंडल जी छथि‍- ऐ‍ उपन्यासक मूल पात्र छथि‍ रघुनंदन। रघुनंदनक मृत्यु जइ दि‍न भेलनि‍ ओइ दि‍नसँ उपन्यासक प्रारम्भ होइत अछि‍। मि‍थि‍लाक समस्यामे बाढ़ि‍, रौदी आदि‍ प्राकृतिक समस्याक अलाबे आर बहुत रास समस्या छै जे मानव द्वारा अक्तिा‍यार कऽ समाजकेँ जकरने छै। प्रस्तुत वि‍षय केर चि‍त्रण तइ‍ रूपे मंडलजी अपन जीबन-मरन उपन्यासमे केलनि‍ अछि‍ जे एक खास राजनीति‍क चेतनाक जन्‍म दैत अछि‍। हि‍नक अगि‍ला उपन्यास अछि‍ ‘जीवन-संघर्ष’-अध्यात्मक मूल उद्देश्य थि‍क मानव-मानवक बीच अगाध प्रेमक जन्म देनाइ, जइसँ सभ कि‍यो सहमत छी। प्रस्तुत उपन्यास जीवन-संघर्ष केर माध्यमसँ मंडलजी सम्प्रदाय आ धर्म कोना व्यक्ति‍सँ समाज धरि‍केँ तोड़ैए आ कोना लोक अपनाकेँ महामानवक बाटपर चलि‍ सकैए, तइ‍ परिप्रेक्ष्यमे चि‍त्रण भेल अछि।‍ ओ एक अद्भुत राजनीति‍क चेतनाक द्योतक अछि‍। नि‍ष्कर्षत: ऐ सभ उपन्यासमे जीवन आ राजनैतिक चेतना समाहित अछि। लोकक कार्यक प्रति मण्डल जीक विश्वास जिनगीक प्रति विश्वास बिनु राजनैतिक चेतनाक सम्भव नै। श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक उपन्यास- सहस्रबाढ़नि ढेर रास राजनैतिक आ ब्यूरियोक्रेटिक उथल-पुथलक गबाह अछि, तँ हुनकर सहस्रशीर्षा दलित गबैय्या मोहनक भारतक स्वतंत्रता सँ सूचनाक अधिकार धरि गीतक माध्यमसँ राजनैतिक चेतना पसारबाक अद्भुत सफल प्रयास अछि, तँ एकर बीचमे सन्हिआएल गामक आ बाढ़िक राजनीति गामसँ दिल्ली धरि पसरल अछि। राजदेव मण्डल जीक ‘हमर टोल’धारावाहिक रूपेँ विदेहमे ई-प्रकाशित भेल आ ई मैथिलीक सभसँ बेसी पठित उपन्यासक रूपमे उभरि रहल अछि। ओना तँ ई उपन्यास अखन प्रेसमे अछि मुदा घृणा आ प्रेम दुनूसँ सराबोर राजनैतिक घटनाक्रमक लेखक द्वारा जे प्रस्तुतीकरण भऽ रहल अछि, से अतुलनीय अछि। केदारनाथ चौधरीजीक चमेलीरानी आ एकर सेक्वेल माहुर वर्तमान राजनैतिक स्थितिक सुन्दर प्रस्तुतिकरण अछि आ अपराधीक राजनीतिमे प्रवेशक सुन्दर विवरण अछि, जतए पाठक चमेलीरानीसँ प्रेम करए लगैए आ ओकर अपराधकेँ स्वीकृति करबा लेल विवश भऽ जाइए। आशा मिश्रक उचाट आ अशोक कुमार ठाकुरक निशांत आ वसुधाक संसार सेहो ठाम-ठीम एकर विवरण करैत अछि। श्याम चन्द्रक "रूपा दीदी" लेखकक कलाक प्रति उदासीनतासँ ओतेक निस्सन प्रभाव उत्पन्न नै करैए मुदा विषय-वस्तुक दृष्टिए ई राजनैतिक चेतनाकेँ आधार लऽ लिखल गेल अछि। साकेतानन्दक सर्वस्वान्त बाढ़ि आ राहतक राजनीतिक डोक्यूमेन्ट्री फिक्शन अछि। अनिलचन्द्र ठाकुरक “आब मानि जाउ”उपन्यासमे एक एहन युवतीक संघर्ष-गाथा अंकित अछि जे अपन लगनसँ जीवन बदलैत अछि। असंख्य गामक ई कथा कुलीनताक अधःपतनक कथा, संस्कार विहीनताक उद्घाटन आ भविष्यक पीढ़ीकेँ बचएबाक चेतौनी छी। वीणा ठाकुरक ‘भारती’उपन्यासमे सेहो राजनीति‍क चेतना झलकैत अछि‍। विनीत उत्पल की अछि दिल्लीक जी.बी. रोडक कोठाक सत हिन्दू मिथ कथामे वर्णित नर्क अओर ओतुक्का ‘यातना’ साकार रूपमे देखबाक इच्छा हुअए तँ दिल्लीक जी.बी. रोडक अगल-बगलक २५ टा बिल्डिंगमे रहैबला पाँच हजार सेक्स वर्करकेँ देखि‍ आउ। ऐ‍ नर्कसँ निजात दियाबैक सरकारी प्रयासक काजकेँ लऽ कऽ जहिना एकटा सेक्स वर्कर परवीनसँ पुछैत छी, ओ तमैक कऽ कहैत अछि, ‘एतए एतेक किछु भोगलौं अछि जे ओ नै जानैत अछि। कतए कऽ सरकार अओर कोन सरकार?’ सरकार अछि तँ हम एतबी टा मांगैत छी जे ओ हमरा जीबैले दिअए। धंधाक ‘नर्क’ केँ ओ बुझाबैत अछि, ‘देह बेचि‍ कऽ जए टा पैसा मिलैत अछि ओकर छह टा हिस्सा होइत अछि, कोठा मालकिन, दलाल, पुलिस, राशन कार्ड मालिक, सूदखोर अओर गुंडा।’ देह मंडीक गणित ई अछि जे सौ टकामे हिनकर हिस्सा मात्र पंद्रह टाका अबैत अछि। ऐ‍ पाइमे हुनका परिवार चलबए पड़ैत अछि, ग्राहक लेल सजए-सँवरए पड़ैत अछि आ ग्राहकक संसर्गसँ सौगातमे भेटल बीमारीक इलाज सेहो करबए पड़ैत अछि। बाकी ८५ टाका दलाल, कोठाक मालकिन अओर पुलिस सबहक हफ्तामे बँटि जाइत अछि। ई केकरो मजबूरीपर बेइमानीसँ फलैत-फूलैत धंधा अछि। सरकारक नजरिमे ई धंधा दिल्लीमे केवल जी.बी. रोडपर भऽ रहल अछि, मुदा हयात होटलक इलाका हुअए वा लक्ष्मीनगर, पटेलनगर वा खानपुर, सभ जिस्मफरोशीक अड्डा बनल अछि। जी.बी. रोडपर दोकानक बीचसँ गुजरैबला अन्हार सीढ़ीक दरबज्‍जापर लाल रंगसँ लिखल अछि, ‘दलाल-जेबकतरासँ सावधान’। मुदा जिस्मक भूखक आगू ई चेतावनी बेइमानी लागैत अछि। ऐ कोठापर हमर भेँट होइत अछि, विमला, नसरीन, बबीता, सीता, परवीन, फरहाना आदिसँ जे दिनराति घुटैत रहैत अछि आ लड़ैत अछि अप्पन जिनगीसँ। देह व्यापार गैर कानूनी हेबाक कारण ई सभ दिनक उजालामे सामान कीनैले नै जाइत अछि। राशनबला मिट्टीक तेलमे मिलावट कऽ कऽ दैत अछि आ नापतौलमे बेइमानी करैत अछि। तइसँ ई सभ कमला मार्केट जाइत अछि बाजार करै लेल, जइसँ ओतए कियो हिनका चीन्हि नै लिअए। स्वीपर हिनकासँ घूस मांगैत अछि आ नै देलापर सीढ़ीपर कूड़ा-कचरा फेक दैत अछि। एतए पाँच हजार सेक्स वर्करमे सँ १२ सए वोटरक आइ-कार्ड तँ बनि गेल अछि, आब ओ वोटर अछि। एकर बादो लाइमलाइटमे आबैसँ डरैत अछि जे समाज हुनका सभकेँ बारि नै दिअए। एहन सेक्सवर्कर जे मजबूरीवश अपना लेल फैसला कऽ कऽ ऐ‍ धंधामे उतरल अछि अओर हुनकर घरबला ऐ‍ धंधासँ अनजान अछि, ओ सेहो अप्पन तस्वीर उजागर हेबासँ डरैत अछि। दूर-दूरसँ आएल लड़की पावनि-त्योहार, शादी-ब्याहक मौकापर घर तँ जाइत अछि मुदा अप्पन धंधाकेँ लऽ कऽ केकरोसँ गप नै करैत अछि, फोटो खिचाबैसँ ऐ‍ लेल मना करैत अछि। ई सेक्सवर्कर धंधाक पाइ-पाइ हिसाब बताबैत अछि जे कॉलगर्लक धंधा पनपैसँ हुनकर धंधाक रौनक कम भऽ गेल अछि। ओ पाँच हजार टाका महीना कमाबैत अछि जइमे १५०० टाका बच्चापर खर्च भऽ जाइ छै। एक हजार टाका कपड़ा आ मेकअपमे खत्म भऽ जाइत छै। संगे एक हजार टाका रेंट दिअए पड़ै छै। खा-पीब कऽ जे पैसा बचै छै ओकरा घर पठा दैत अछि। एकरामे सभकेँ अप्पन बच्चाक परवरिशक खास ख्याल छै। कियो-कियो अप्पन बच्चाकेँ एम.सी.डी. स्कूलमे नै भेज कऽ मंटो रोड लग प्राइवेट स्कूलमे भेजैत अछि आ मास्टरसँ कहैत अछि जे हुनकर धंधाक गप बच्चा लग नै करू। कतेक सेक्सवर्कर एहनो अछि जे अप्पन धंधाक भेद बच्चाक लग खुजि नै जाए, एकर डरसँ अपनासँ दूर बोर्डिंगमे राखि कऽ बच्चाकेँ पढ़ा-लिखा रहल अछि। देहक बाजार सर्वधर्म समभावपर चलैत अछि। जी.बी. रोडपर हनुमान मंदिर अओर मस्जिद एक्के इलाकामे अछि। एक कमरामे मक्का-मदीनाक फोटो अछि तइ बगलमे हिन्दू देवी-देवताक कएकटा फोटो टांगल अछि। बालकनीमे लागल तुलसी अओर मनीप्लांटक गाछ ऐ‍ गपक गवाह छल जे देह व्यापारक नै कोनो धर्म होइत अछि अओर नै कोनो जाति होइत अछि। एतए सबहक बस एक्केटा जद्दोजहद अछि, जिनगी गुजारैक। सुजीत कुमार झा अनौपचारिक शिक्षामे मैथिली, पढाइक हिसाबसँ प्रभावकारी भऽ रहल धनुषा जिल्लाक ३० टा केन्द्रमे अनौपचारिक शिक्षाक पढ़ाइ मैथिली भाषामे शुरु कएल गेल अछि। यूनेस्कोक सहयोगमे आसमान नेपाल द्वारा भऽ रहल ओइ पढ़ाइक लेल मैथिली भाषामे ‘हमर जतरा’ नामक पोथी सेहो निकालल गेल अछि। १५ वर्षसँ ४५ वर्ष धरिक महिलाकेँ शिक्षित करबाक उद्देश्यसँ शुरु कएल गेल आधारभूत साक्षरता कार्यक्रममे गजब रिस्पोन्स भेट रहल आयोजक पक्षक दाबी रहल अछि। आसमान नेपालक सुरैत ठाकुर कहैत छथि- ‘पहिने हम सभ नेपाली किताब लऽ कऽ आधारभूत साक्षरता कार्यक्रम शुरु करैत छलौं मुुदा मैथिली भाषाक किताब लऽ कऽ अखन प्रशिक्षणे पढ़ाइ शुरु भेल अछि, विद्यार्थी सभ नेपालीसँ मैथिलीक किताब बढ़ि‍याँ जकाँ बूझि रहल बतबैत अछि। ‘हमर जतरा’ पोथीक लेखक मैथिली भाषाक वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. राजेन्द्र विमल, डाॅ. आशा सिन्हा आ सुरैत ठाकुर रहल छथि। नारी विकास केन्द्र जनकपुरक साक्षरता कक्षाक सुमित्रा महासेठ कहै छथि ‘पढाइक हम पहिने ‘प’ नै जनैत छलौं मुदा आब तँ कऽ टऽ पढ़ए लागलि‍ छी। एकर एकटा कारण अपन भाषामे पढ़ाइ रहल, ओ कहैत छथि। आधारभूत साक्षरता कक्षा जनकपुर नगरमे १७, लक्ष्मीपुर बगेवामे ९ आ घोड़घासमे ४ टा केन्द्र परीक्षणक रुपमे शुरु कएल गेल अछि। प्रत्येक केन्द्रपर दैनिक २ घण्टा महिला सभकेँ पढ़ाओल जाइत अछि। आसमान नेपालक केन्द्रीय निर्देशक नवल किशोर यादव कहै छथि- ‘आब क्रमशः अन्य केन्द्रपर सेहो मैथिली भाषक किताब लागू कएल जाएत।’ जिल्ला शिक्षा कार्यालय धनुषा ऐ अनौपचारिक शिक्षाक स्वयं निगरानी कऽ रहल अछि। विभिन्न केन्द्रक निरीक्षणक बाद धनुषाक शिक्षा अधिकारी सदानन्द झा कहलनि ‘पढ़ाइ बढ़ि‍या भऽ रहल, ओहूमे मातृभाषामे सन्तोषक पर्याप्त जगह अछि।’ धनुषामे मात्र अढ़ाइ सए विद्यालय एहन अछि जे अनौपचारिक शिक्षा पढ़बैत अछि। नेपालक मिथिलाञ्चल क्षेत्रक बात करी तँ एक हजारसँ बेसी ठाम अनौपचारिक शिक्षाक पढ़ाइ होइत अछि। अधिकांशमे नेपाली किताब लऽ कऽ पढ़ाबैक परम्परा अछि। आेइ सभमे सेहो मैथिली भाषाक किताब आबि गेलाक बाद आब आेइ भाषामे पढ़ाओल जाए, तइपर बहस शुरु भऽ गेल अछि। संस्‍मरण-चुनचुन मिश्र हमर तँ ओ मैथिली बिटक समाचारदाता छलाह, फेसबुकमे किछु दिन पूर्व एकटा समाचार पढ़लौं, ओइमे लिखल छल- चुनचुन मिश्र नै‍ रहला। ई खबर पढ़िते शरीरमे करेन्‍ट जकाँ लागल। कनीकाल लेल तँ बुझाएल, हमरो शरीरसँ प्राण निकलि गेल। चुनचुन बाबूसँ बड घनिष्‍टता छल से नै‍, मुदा मैथिलीक बहुत बड़का आन्‍दोलनी भेलाक कारण हमरा हुनका प्रति बहुत श्रद्धा छल। हम हुनकर नाओं कोनो समाचारमे देखैत छलौं की पुरान समाचार किया नै‍ हुअए, अपन रेडियोमे बजा दै छलौं। कए दिन तँ रेडियो मिथिलामे अपन नाम समाचारमे सुनलाक बाद ओ रहिकासँ टेलिफोन कऽ कऽ धन्‍यबाद दै छलाह। बिहारक मात्र नै‍ भारतक कतेको स्‍थानपर मैथिलीसँ जुड़ल कोनो कार्यक्रम होइत छल तँ ओ अपने समाचार टिपा दै छलाह। एक बेर तँ एहन भेल रहै जे नेपालक राजविराजमे विद्यापति पर्व समारोह भेल छल, हमर रेडियो सँ ओकर समाचार कोनो कारणवश नै‍ बाजल। ओ हमर मोबाइलमे टेलिफोन कऽ उपराग देलनि, जखनकि चुनचुन बाबु ओइ कार्यक्रममे गेलो नै‍ छलाह। हमर रेडियोक लेल ओ अपन पैसा लगा कऽ काज करैत रहथि। मधुबनी, वासोपट्टी, जयनगर, बेनीपट्टी सहितक स्‍थानपर हमर सबहक समाचारदाता भेलाक बादो मैथिली बिटक समाचार प्रायः ओहे करैत छलथि। हमर सबहक समाचारदाताकेँ बुझल छल जे मैथिलीक समाचार चुनचुन बाबु कइए दैत छथि तँए ओ सभ सेहो चुनचुने बाबु लेल मैथिली समाचार छोड़ि दैत छलथि। हुनका सभकेँ बढ़िया जकाँ बुझल छलनि, मैथिली बिटक समाचारदाता तँ चुनचुन बाबु छथि। हुनका समाचार पठाबएमे बहुत खर्च होइत छन्‍हि, हमरा लगैत छल, कए दिन कहि दैत छलियन्‍हि, कथिलाए एतेक सहयोग करै छी। चुनचुन बाबु हमरा बेर बेर कहथि, हम तोरा थोड़हे सहयोग करैत छिअह, मिथिला मैथिलीकेँ लेल काज करै छी। अइमे जतेक सन्‍तुष्‍टि भेटैत अछि, ओतेक दोसरमे नै। मिथिला मैथिलीक लेल निस्‍वार्थ भावसँ काज करएबला चुनचुन बाबु बाहेक हम अपन जीवनमे दोसर किनको नै‍ देखने छी। चुनचुन बाबुसँ हमरा जीवनमे दू बेर मात्र प्रत्‍यक्ष भेट भेल अछि। मुदा पहिल भेटमे जे हुनका प्रति जे छाप बनल, से अखनो काएमे अछि। नेपालक राष्‍ट्रिय अखबार स्‍पेशटाइम दैनिकमे हम काज करैत छलौं, ओ पत्रिका सौराठ सभापर विशेष रिपोर्टिङ्गक लेल सौराठ जाएकेँ लेल हमरा अढ़ौने छल। ९ वर्ष पहिने ओतए पहुँचलौं तँ सभसँ पहिल भेट चुनचुन बाबुसँ भेल छल। चुनचुन बाबु संगे सौराठ सभापर बेस चर्चा-परिचर्चा कएलौं, फेर हुनकेँ संगे सौराठ गाम घुमलौं। पञ्जीकार जी सहित बिभिन्‍न विद्वान सभ संग बात कएलौं। आेइ दिन पानि पड़ल रहै, कनी कनी थालो भऽ गेल रहै। एकर बाबजूद ओ हमरा संगे घण्‍टो घुमलाह। हुनकर व्‍यवहार हमरा भीतर तक प्रभावित कएलक। कनिके कालक भेट हमरा सभकेँ बहुत निकटता आनि देलक। चुनचुन बाबुक मूल परिचए हमरा मैथिलीक अष्‍टम अनुसूचीक लेल भारतमे भेल आन्‍दोनक समाचारसँ भेल। चुनचुन बाबु संगे दोसर भेट जनकपुरमे एफ. एम. रेडियो खुजलाक बाद भेल छल। हम रेडियो मिथिलाक समाचार प्रमूख भेलौं तँ ओ ओना बधाइ देबए जनकपुर आएल रहथि, मुदा ओ जे कहलथि तइसँ लागल बधाइ कम मिथिला आ मैथिलीक लेल हमर की दायित्‍व अछि तेकरा मन्‍त्र देबए बेसी। ओ जाइत जाइत कहलथि, मिथिला आ मैथिलीक लेल प्रतिष्‍ठा नै‍ देखए लगी। अपना बुते जे लागए से करी। हम रेडियो मिथिलामे हुनकर किछु महत्‍वपूर्ण इन्‍टरभ्‍यू सेहो लेलौं। आइ हमरा सभ लग चुनचुन बाबु नै‍ छथि। कतेको गोटे बातचीतक क्रममे कहलनि, चुनचुन बाबु गेलासँ अभिभावक विहीन भऽ गेलौं, मुदा हमरा तँ ओ दोसरे विहीन बना कऽ चलि गेल छथि। हमरा तँ चिन्‍ता लागल अछि रेडियो मिथिला आ मिथिला डटकमक मिथिला बिटक समाचारदाता के बनत। एतेक निस्‍वार्थ भाब दोसरमे कतए सँ भऽ सकैत अछि। सहीमे चुनचुन बाबु महान छलाह। अरविन्द ठाकुर लोकदेव भीम केवट आठम सदीक मध्य धरि गुप्त-वंशक शासन नरभराइत-नरभराइत चलल। हर्षवर्धनक बाद सम्पूर्ण शासन-क्षेत्रमे अराजकता आ अबेवस्‍था पसरि गेल। मत्स्य-न्यायसँ त्रस्त प्रजा अपन रक्षाक लेल सर्वसम्मतिसँ शस्त्र, शास्त्र आ कृषिमे निष्णात अयाचक-ब्राह्मण गोपालकेँ अपन राजा चुनलक। हुनकेसँ पाल वंशक प्रारम्भ भेल। गोपाल बिहार आ बंगालकेँ एकसूत्रमे बान्हि जनसहयोगसँ शासनकेँ सुव्यवस्थित केलनि। गोपाल परम लोकप्रिय राजा भेलाह आ हुनकासँ प्रारम्भ पाल शासन कालमे शिक्षा-संस्कृतिक चतुर्दिक विकास भेल। एगारहम शताब्दी आएल। तखन पालवंशी राजा विग्रहपाल तृतीयक शासन छल। ओहो अपन पूर्वज सभ जकाँ प्रजापालक आ न्यायपरायण छलाह। मुदा हुनक ज्येष्ठ पुत्र महिपाल-द्वितीय सत्तालोलुप छल। पिताक मृत्युक उपरान्त ओ अपन दुनू छोट भाए शूरपाल आ रामपालकेँ बन्दी बनाए कारागारमे ढाठि देलक आ शासनक मनमाना संचालन करए लागल। गुप्तकालमे पूर्वी मिथिला आ पश्चिमी बंगालकेँ मिला कऽ एकटा राज्य बनाओल गेल छल- पौन्ड्रवर्धन। ऐ‍ क्षेत्रान्तर्गत छल भेरियारीगढ़। ई अजुका अररिया जिला मुख्यालयसँ प्रायः १६ किलोमीटर दूर नेपाल सीमापर अवस्थित अछि। ऐ‍ भेरियारीगढ़मे दिब्बो नामक पाल शासकक एकटा प्रभावशाली सामन्त अपन भातिज भीम केवटक संग रहै छलाह। ओ अपन प्रजाक कल्याण लेल तँ तत्पर रहिते छलाह, हुनका अनेक सिद्धि सेहो प्राप्त छलनि। ओ भेरियारीगढ़सँ शासन आ पनार नदीक मनोरम तीरपर भागनगर गाम स्थित एक गुफामे योग साधना करै छलाह। मोरंगक राजा भीमदेवक संग हुनक प्रगाढ़ मैत्री छल। महिपाल द्वारा अपन भाए सबहक संग कएल कुकृत्य आ अराजक शासन पद्धतिसँ सामन्त दिब्बो क्षुब्ध भए गेलाह। ओ अपन राजाक निन्दनीय कृत्यक विरोध करए लगलाह। ओ केवट सबहक २२ (बाइस) उपजातिकेँ संगठित केलनि आ तकर नेतृत्व लेल अपन भातिज भीम केवटकेँ नियुक्त केलनि। संघर्षक योजना बनए लागल। क्षेत्रक अन्य अनेक छोट-बड़ सामन्त सभ भीम केवटक झंडाक नीचाँ एकजुट होबए लागल। महिपालकेँ एकर भनक लागल तँ ओ एक भाए शूरपालकेँ मुक्त कए शासनमे हिस्सेदार बना लेलक। मुदा ऐ‍सँ स्थिति नै सम्हरलै। जनाक्रोश चरमपर आबि गेल छलै। भीम केवटक नेतृत्वबला जन-सेना आक्रामक भए गेल। राजा महिपाल शक्तिशाली सेनाक संग-संग ग्राम्य रक्षादल वाहिनीसँ सम्पन्न छल मुदा प्रजाक विश्वास ओकरा संग नै छलै। भयंकर युद्ध भेलै जइमे महिपाल हारि गेल आ क्रुद्ध प्रजा ओकर वध कए देलकै। शूरपाल आ रामपाल मुक्त कए देल गेलाह आ दुनू भाए बंगाल दिसि‍ चलि गेलाह। विजयोपरान्त दिब्बोकेँ राजा बनाएल गेल। हुनका कोनो पुत्र नै छलनि तँए हुनक मृत्युक उपरान्त भीम केवट राजा भेलाह। एक बेर मोरंग राजा भीमदेवक बहिन तिरफूल सुन्नरि एक सए नाहमे सनेस आ दहेजक  संग अपन सासुर जाइ छलीह। सिरीपुर चौरमे किराँत डकैत सभ सइयो नाह लूटि लेलक आ तिरफूल सुन्नरिक हरण कए पतालक ऐठाम राखि देलक। हाहाकार मचि गेलै। राजा भीमदेव अपन मित्र भीम केवटसँ गोहार कए मदति मांगलनि। भीम केवट भागनगर गुफामे भगवतीक धि‍यान लगौलनि। भगवती परगट भए हुनका तिरफूल सुन्नरिक पता देलथिन। भीम केवट अपन बलशाली हाथमे अढ़ाइ मोनक खण्डा लेने बनहौटा घोड़ापर सवार भए किराँत सबहक उन्मूलन लेल अग्रसर भेलाह। किराँत सबहक सभटा मंतरकेँ अपन साधनाक बलपर काटैत भीम केवट पताल-लोक धरि पहुँचि गेलाह। अपन खंडासँ किरात डकैत सबहक वध कए ओ तिरफूल सुन्नरिकेँ मुक्त करौलनि। तइ काल धरि बौद्ध धर्म कलुषित हुअए लागल छल। वज्रयानी सभ विकृत गुह्य साधनामे लागि गेल छल। भीम केवट अपन शासन क्षेत्रमे ऐ‍ दुराचारकेँ प्रतिबन्धित केलनि। वज्रयानी बौद्ध मठ सभकेँ उजाड़ि ओकरा शिव मन्दिरक रूप देल गेल। अत्यन्त लोकोपकारी काज सभ करैत भीम केवट अपन शासनकालमे जननायक बनल रहलाह। आइयो भीम केवट लोकदेव रूपमे स्मरण कएल जाइत छथि आ हुनक वीर गाथा लोकगीत बनि लोक कंठमे बसल अछि। शम्भु कुमार सिंह यू.पी.एस.सी. (मैथिली) प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन :: मिथिलाक परम्परागत सीमा बृहदविष्णुपुराण (५म शताब्दी)क मिथिला महात्म्य खंडमे वर्णित अछि जकर अनुवाद कवीश्वर चन्दा झा ऐ‍ प्रकारेँ कएने छथि: “गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिसि‍ पूर्व कौशिकी धारा पश्चिम बहथि गण्डकी उत्तर हिमवत बल विस्तारा कमला त्रियुगा अमृता धेमुड़ा बागमती कृतसारा मध्य बहथि लक्ष्मणा प्रभृति से मिथिला विद्यासारा।” :: बृहदविष्णुपुराणमे मिथिलाक बारह गोट नामक उल्लेख भेटैत अछि: मिथिला तीरभुक्तिश्च वैदेही नैमिकाननम। ज्ञानशीलं कृपापीठं स्वर्णलांगलपद्धतिः।। जानकी जन्मभूमिश्च निरपेक्षा विकल्मषा। रामानन्दकरी विश्वभाविनी नित्यमंगला।। :: मिथिलाक आदि शासक विदेहक नाओंपर मिथिलाक नाओं ‘विदेह’ पड़ल। ::‘तिरहुत’ नामक उल्लेख सर्वप्रथम पुरुषोत्तमदेवक ‘त्रिकाण्डकोश’ (१२म शताब्दी) मे भेल अछि। :: विदेह राज्यकुलक मिथिलापर शासनक समए ३००० ई.पू.सँ ६०० ई.पू. धरि अनुमानित अछि। :: मिथिलामे पञ्जी बेवस्‍थाक सम्पादन कर्णाटवंशीय नरपति हरिसिंहदेवक द्वारा प्रारंभ भेल। ::सप्तरत्नाकरक रचयिता छलाह चण्डेश्वर ठाकुर। ::मिथिलाक प्रथम कर्णाटवंशीय शासक छलाह ‘नान्यदेव’ (१०९७ ई.)। :: खण्डबला राजकुलक स्थापना म.म. महेश ठाकुर द्वारा १५५७मे भेल। ::मिथिलापर ओइनवार राज्यवंशक शासन चौदहम शताब्दीक मध्यमे आरंभ भेल। ::मिथिलामे भस्मसँ अंकित त्रिपुण्ड शिवभक्तिक, लम्बाकार श्रीखंडक टीका विष्णुभक्ति एवं सिन्दूरक ठोप शाक्त भावनाक प्रतीक मानल जाइत अछि। ::मिथिलाक्षरक विकास तान्त्रिक यन्त्रसँ मान्य अछि। ई मानल जाइत अछि जे तिरहुताक्षरक आरंभ जइ मंगल चिह्न ‘आँजी’ सँ होइत अछि से तान्त्रिक कुण्डलनीक बोधक थिक। ::मिथिलामे  बि‍आहक अवसरपर गाओल जाइबला ‘जोग’ तन्त्रसँ सम्बद्ध मानल गेल अछि। ::मिथिलाक धार्मिक जीवनक मुख्यधारा शिव ओ शक्तिमूलक थिक। ::मैथिलीय रागरागिनीक प्राचीनतम उल्लेख सिद्ध लोकनिक ‘चर्यापद’मे उपलब्ध होइत अछि। ::कर्णाटनरपति म. नान्यदेव (१०९७ ई.पू.) मिथिलामे अपन राज्य स्थापित करबाक पश्चात् ‘सरस्वती हृदयालंकार’ नामक संगीतग्रंथ लिखल जइमे सर्वप्रथम ओ मैथिलीय रागरागिनीक उल्लेख क्रमबद्ध रीतिएँ कएल। ::मैथिलीय संगीतक सक्रिय गतिविधि ओ विकास-प्रसारक दृष्टिसँ म. हरिसिंहदेव (१२९६-१३२६)क राज्यकाल विशेष रूपेँ उल्लेखनीय अछि। ::‘तिरहुति’ श्रृंगाररसक मधुरगीत थिक, जइमे नायक-नायिकाक संयोग-वियोगक रागात्मक वर्णन होइत अछि। ::‘बटगवनी’मे सखी सबहक संग समागम-गृहमे पतिसँ अभिसारक हेतु जाइत नायिकाक वर्णन होइत अछि। ::‘गोआलरी’क विषए-वस्तु होइत अछि गोपी सबहक संग कृष्णक नोंक-झोंक एवं केलिकौतुक। ::‘रास’मे गोपी सबहक संग कृष्णक रासलीलाक वर्णन होइत अछि। ::रासक सर्वप्रथम रचयिता छथि ‘साहेबरामदास’। ::मिथिलाक लोकवाणी हेतु ‘मैथिली’ शब्दक प्रयोग सर्वप्रथम कोलब्रुक १८०१ ई.मे कएल, परन्तु ऐ‍ नामकेँ प्रसिद्ध करबाक श्रेय मैथिली भाषा साहित्यक आदि उन्नायक ग्रियर्सन महोदयकेँ छन्हि। ::कालानुसारेँ मूल भारोपीय भाषाक समए २५०० ई.पू. मानल जाइत अछि। ::प्राचीन भारतीय आर्यभाषाक इतिहास १२०० ई.पू. सँ मानल जाइत अछि। ::बौद्धधर्मक सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘ललितविस्तार’मे “वैदेहीलिपि”क उल्लेख अछि जकरा मैथिली लिपिक प्राचीनतम स्वरूप कहल जा सकैत अछि। ::कोनो युगमे शिष्ट ओ परिनिष्ठित साहित्यसँ भिन्न जे रचना होहत अछि से आेइ युगक लोक-साहित्य कहबैत अछि। ::दीर्घ आख्यानपर आधारित गेयात्मक कथा ‘लोकगाथा’ कहल जाइत अछि। ::मैथिलीक किछु प्रमुख लोकगाथा काव्य थिक— लोरिकाइन, सलहेस, अनंगकुसुमा, दुलरादयाल, नैका बनिजारा, दीनाभद्री, रईया रणपाल आदि। ::‘वर्णरत्नाकर’ निर्विवाद रूपसँ मैथिली साहित्यक प्रथम उपलब्ध गद्य ग्रंथ थिक। ::विद्यापतिक ‘पुरुषपरीक्षा’, पंचतंत्र, हितोपदेश आदि परंपराक संस्कृत नीतिकथा थिक। ::विद्यापतिक ‘कीर्तिलता’ अवहट्टक गद्यपद्यमय ग्रंथ थिक। ::‘गोरक्षविजय’ विद्यापतिक संस्कृत नाटक थिक, जइमे मैथिली पद सेहो प्रयुक्त भेल अछि। ::‘विशुद्ध विद्यापति पदावली’ विद्यापतिसँ कम-सँ-कम एक शताब्दीक पश्चातक संकलन थिक। ::१८७९ ई.मे दरभंगा राज हाई स्कूलक स्थापना भेल छल। ::१९६६ ई.मे मैथिली भारतक प्रमुख साहित्यिक भाषाक रूपमे साहित्य अकादेमी, दिल्ली द्वारा स्वीकृत भेल। ::मैथिली अकादमीक स्थापना १९७६ ई.मे भेल। ::नाटकमे आंगिक, वाचिक, आहार्य, तथा सात्विक चारू प्रकारक अभिनय आवश्यक होइ छै। ::‘अंकियानाट’क आदि रचयिता छलाह शंकरदेव (१४४९-१५६९)। ::मिथिलामे ‘कीर्तनिञानाच’क परिपाटीक आरंभ नवद्वीपक कीर्तनमंडलीक प्रभावसँ भेल १७म शताब्दीक आदिमे। (स्रोत: मैथिली साहित्यक इतिहास, डॉ. दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’) मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता (यू.पी.एस.सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी) मैथिली भारोपीय भाषा परिवारक, भारतीय आर्यभाषासँ उत्पन्न एक महत्वपूर्ण आर्यभाषा थिक। ऐ‍ भाषाक उद्भव ओ विकासक जेहन प्राचीन साहित्यिक मान्यता उपलब्ध अछि ओहन भारतक कोनो आधुनिक आर्य आ द्रविड़ भाषाक नै अछि। कोनो सशक्त भाषाक अन्तर्गत ओकर अनेक बोली अथवा उपभाषाक निर्माण कालक्रमसँ क्षेत्रानुसार अवश्य होइत रहैत अछि। तकर कारण अनेक अछि। प्रत्येक भाषा अपन चारूकातक भाषासँ प्रभावित होइत अछि। ऐ‍ क्रममे ईहो कहल जाइत अछि जे प्रत्येक कोसपर बोली बदलैत अछि आ प्रत्येक जाति वा समाजक भाषा भिन्न होइत अछि। डॉ. सुभद्र झा एवं ग्रियर्सन सन विद्वान लोकनि ई पहिनहि स्पष्ट कऽ देने छथि जे मैथिली एक स्वतंत्र आ सशक्त भाषा थिक। ऐ‍ भाषाक चारूकात चारि गोट भाषा अछि। एकर पूबमे बंगला भाषा, पश्चिममे भोजपुरी, उत्तरमे नेपाली आ दक्षिणमे मगही भाषा अछि। ईहो स्वतः सिद्ध अछि जे कोनो भाषा अपन निकटवर्ती भाषा सभसँ प्रभावित होइत रहैत अछि। उपर्युक्त कारणसँ मैथिली भाषामे अनेक बोली अथवा उपभाषाक जन्म भऽ गेल अछि। सर्वप्रथम मैथिली भाषाक विभिन्न उपभाषाक परिचए डॉ. ग्रियर्सन अपन “Linguistic Survey of India”क दोसर भागमे प्रस्तुत कएने छथि। हिनका अनुसारेँ मैथिलीक छः गोट उपभाषा अछि:- (१) मानक मैथिली (२) दक्षिणी मानक मैथिली (३) छिका-छिकी बोली (४) पूर्वी मैथिली (५) पश्चिमी मैथिली (७) जोलहा बोली। ग्रियर्सनक उपर्युक्त उपभाषा वा बोलीक वर्णनसँ पं. गोविन्द झा सहमत नै छथि। हिनक कहब छन्‍हि जे मैथिलीक विभिन्न बोलीकेँ क्षेत्रानुसार पाँच उपभाषामे बाँटल जा सकैछ: (१)  पूर्वी मैथिली (२) दक्षिणी मैथिली (३) पश्चिमी मैथिली (४) उत्तरी मैथिली (५) केन्द्रीय मैथिली वा उपभाषा। उपर्युक्त विवेचनासँ लगैत अछि जे गोविन्द झा सेहो ग्रियर्सनक मतानुसार मैथिलीक उपभाषाक वर्णन केने छथि। ओना ओ कतौ-कतौ विभिन्न उपभाषाक क्षेत्र आदिमे कनेक अन्तर कऽ देने छथि, अस्तु मैथिलीक वर्तमान रूपकेँ देखल जाए तँ ज्ञात होइत अछि जे ग्रियर्सनक समैमे जे मैथिलीक विभिन्न उपभाषाक क्षेत्र आ रूप छल ओइमे परिवर्तन भऽ गेल अछि। एकर अतिरिक्त नेपालक तराइमे जे मैथिली बाजल जाइत अछि ओकरो एकटा फराक रूप छै। एहना स्थितिमे मैथिलीक उपभाषाक वा बोलीक आठ गोट भेद कएल जा सकैत अछि: १.मानक मैथिली: एकर क्षेत्र केन्द्रीय ओ उत्तरीय पुरना दरभंगा जिला (मधुबनी, दरभंगा आ समस्तीपुर) थिक। ओना तँ डॉ. ग्रियर्सनक अनुसारेँ मानक मैथिली दरभंगा आ भागलपुर जिलाक उत्तरी क्षेत्रक आ पुर्णियाँ जिलाक पश्चिमी क्षेत्रक ब्राह्मण लोकनि बजै छथि। हिनका लोकनिक अपन साहित्य आ परंपरा छन्हि जे ऐ‍ भाषाक विकृत प्रवाहकेँ मन्द कएने अछि। वर्तमानमे ई स्पष्ट भऽ गेल अछि जे मानक मैथिली ब्राह्मणे टाक बोली नै छन्हि, किएक तँ मैथिली भाषाक पठन-पाठनक प्रवृति ब्राह्मणसँ आनो जातिक मध्य पूर्ण रूपसँ जागल अछि। ऐ‍ हेतु मानक मैथिली मिथिलाक सभ जातिक बोली कहल जा सकैत अछि। २. दक्षिणी मैथिली : डॉ. ग्रियर्सनक दक्षिणी मानक मैथिलीकेँ दक्षिणी मैथिलीमे राखल जा सकैत अछि। एकर क्षेत्र मुंगेर, मधेपुरा, सहरसा ओ समस्तीपुर धरि मानल जा सकैत अछि। मानक मैथिली आ दक्षिणी मैथिलीमे निम्न अन्तर अछि—(I) मानक मैथिलीमे जतए धातु स्वर ह्रस्व रहैत अछि ओतए दक्षिणी मैथिलीमे दीर्घ भऽ जाइत अछि। जेना-मानक मैथिलीमे, ‘जनै छी’ होइत अछि आ दक्षिणी मैथिलीमे, ‘जानै छी’। (II) सर्वनामक रूपमे मानक मैथिलीमे हमर, तोहर, अहाँ, अपने, आदि प्रयुक्त होइत अछि। दक्षिणी मैथिलीमे मोर, तोर, तोहे सर्वनामक प्रयोग होइत अछि। (III) क्रियापदमे सेहो भिन्नता देखल जाइत अछि, उदाहरण स्वरूप मानक मैथिली ‘अछि’ दक्षिणी मैथिलीमे ‘अछ’ भऽ जाइत अछि। ३.पूर्वी मैथिली : ग्रियर्सन एकरा गँवारी मैथिलीक संज्ञा देने छथि। एकर क्षेत्र पूर्णियाँ जिलाक केन्द्रीय आ पश्चिमी भाग, संथाल परगनाक पूर्वी भाग, साहेबगंज आ देवघर धरि अछि। ग्रियर्सन कहैत छथि जे ई भाषा अशिक्षित वर्ग द्वारा बाजल जाइत अछि। पूर्वी मैथिली, दक्षिणी मैथिली आ दक्षिणी मानक मैथिलीसँ साम्य रखैत अछि। ओना कनेक अन्तर सेहो देखना जाइत अछि— (I) दक्षिणी मैथिलीमे सम्बन्ध कारकमे ‘के’ प्रयोग होइत अछि, मुदा पूर्वी मैथिलीमे ‘केर’ चिह्नक प्रयोग होइत अछि। (II) दक्षिणी मैथिलीमे ‘छिक’ क्रियाक प्रयोग होइत अछि, मुदा पूर्वी मैथिलीमे ओकर बदलामे ‘छिकई’ क्रियाक प्रयोग होइत अछि। ४.छिका-छिकी बोली : ई गंगाक दक्षिणी मुंगेरक पुबारी भागमे, दक्षिणी भागलपुर ओ संथाल परगनाक उत्तरी ओ पश्चिमी भागमे बाजल जाइत अछि। ई दक्षिणी मानक मधेपुराक बोलीसँ अत्यधिक साम्य रखैत अछि। ऐ‍मे शब्दक अन्तमे ‘की’ वा ‘हो’ क उच्चारण कएल जाइत अछि, जेना— अपनो, खएबहो, कहबहो, सुनलहो आदि। ५.पश्चिमी मैथिली: एकर क्षेत्र मुजफ्फरपुर ओ चम्पारण जिलाक पुबरिया भाग थिक जइपर भोजपुरीक व्यापक प्रभाव अछि। ग्रियर्सनक अनुसारेँ ऐ‍ क्षेत्रक कतिपय लोक जे बजैत छथि तकरा भोजपुरी कहल जाए अथवा मैथिली ई कहब कने कठिन। ओना मुजफ्फरपुरसँ अलग भेल वैशाली जिलाक क्षेत्रक भाषाक नाओं ‘बज्जिका’ भाषा देल गेल अछि। ऐ‍ भाषाक नामकरण लिच्छवी वंशक इतिहासक आधारपर कएल गेल अछि। ६.उत्तरी बोली: एकर क्षेत्र नेपालक तराई आ वर्तमान सीतामढ़ी जिलाक उत्तरी भाग धरि मानल जा सकैत अछि। ऐ‍ भाषापर नेपाली भाषाक प्रभाव बुझना जाइत अछि। ७.जोलहा बोली : पुरना दरभंगा जिलाक मुसलमानक बोलीकेँ डॉ. ग्रियर्सन जोलहा बोली मानैत छथि। ओना हिनक कहब छन्‍हि जे मिथिलाक मुसलमान मैथिली नै बजैत छथि। मुजफ्फरपुर आ चम्पारण जिलाक मुसलमान जे बोली बजैत छथि आेइपर अवधी भाषाक प्रभाव अछि। एकर अतिरिक्त वर्तमान कालक मुसलमानक बोलीपर उर्दू आ हिन्दीक प्रभाव सेहो परिलक्षित होइत अछि। ८.केन्द्रीय मैथिली: मध्य मिथिलाक (दरभंगा, मधुबनी, पंचकोशी) सम्पूर्ण क्षेत्रक भाषा जकर निकट कोनो आन भाषा नै अछि, तकरा केन्द्रीय मैथिलीक नाओंसँ जानल जाइत अछि। केन्द्रीय मैथिली साहित्यक भाषाक अत्यन्त नजदीक कहल जा सकैत अछि। मानक मैथिली आ केन्द्रीय मैथिलीमे बहुत सामीप्य देखल जाइत अछि। वर्तमानमे मैथिलीक दूटा उपभाषाक नवीन नामकरण भेटैत अछि— अंगिका ओ बज्जिका। छिका-छिकी, अर्थात् पूर्वी बोलीकेँ अंगिका कहल जाइत अछि जकर केन्द्र स्थल थिक भागलपुर। प्रायः भागलपुर महाभारत कालीन अंग राज्यक राजधानी छल तँए ऐ‍ क्षेत्रक भाषाकेँ अंगिका कहल जाइत अछि। बज्जिकाक सम्बन्धमे विवेचना कएल जा चुकल अछि। एतावता ज्ञात होइत अछि जे मैथिली भाषाक क्षेत्रानुसार अनेक उपभाषा अछि। एखनौं धरि एकर पूर्णरूपेण सर्वेक्षण नै कएल गेल अछि नै तँ किछु आओर उपभाषाक सम्बन्धमे ज्ञात होइत, तँए ऐ‍ बिन्दुपर भाषावैज्ञानिक दृष्टिएँ सर्वेक्षण हएब अत्यंत आवश्यक अछि। मैथिली साहित्यक आदिकाल (यू.पी.एस.सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी) मानव समुदाय सर्वदासँ समस्या सबहक समाधान करबाक लेल साकांक्ष रहल अछि। कोनो भाषाक जन्म कहिया भेल ऐ‍ विषएमे किछु कहब कठिने नै अपितु असंभव सेहो अछि। यद्यपि किछु विद्वान भाषा सबहक जन्मपत्री बाहर करबामे व्यस्त रहलाह अछि किन्तु ओ लोकनि  बरोबरि ऐ‍ दिशामे असफल रहलाह अछि। लिखित उपलब्ध साधनपर एतबे कहल जा सकैछ जे अमुक समैमे अमुक भाषा-शब्द प्रचलित छल। ईएह हाल प्रत्येक भाषाक संग अछि। साहित्यक शरीर अछि भाषा। संवेगात्मक अनुभूति जकरा साहित्यशास्त्रमे रसक आख्यान कहल जाइत अछि, भाषाक माध्यमसँ अभिव्यक्त होइछ, ओ तँए कोनो साहित्य इतिहाससँ संलिष्ट रहैत अछि। विश्वभाषाक इतिहासमे केवल संस्कृतेटा एहन विषए अछि जे पाणिनि द्वारा ‘संस्कृत’  भए तेना ने प्रतिष्ठित भेल जे अद्यापि अपन स्वरूप सभ ठाम सभ विषएमे एकरूप स्थिर कएने अछि। भारतीय साहित्यक आरंभ प्रायः अंधकारमे विलीन अछि। मैथिली साहित्यक संग सेहो ईएह चरितार्थ होइत अछि। साहित्यक इतिहासकार मध्य बहुत दिन धरि ई विवादक विषए बनल रहल जे मैथिली साहित्यक उद्भव एवं विकासक प्रारंभ कहियासँ मानब? प्राचीन समैसँ मिथिला संस्कृतक केन्द्र रहल अछि। सम्पूर्ण भारत विशेषतः पूर्वांचलक छात्र लोकनि संस्कृत अध्ययनक हेतु मिथिला अबैत छलाह। विद्याक प्रचार-प्रसारक कारणेँ एतए विद्वान लोकनिक संख्या अधिक छल। ई विद्वान लोकनि दर्शन, न्याय, ज्योतिष, गणित, आदिकेँ महत्वपूर्ण मानैत छलाह। फलस्वरूप जनभाषाक उपेक्षा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूपमे होइते रहलै। मुदा एतबा होइतो ऐठामक लेखक तथा कविगण समए-समैपर जनभाषामे सेहो किछु रचना करैत छलाह। ऐ‍ कारणेँ प्राचीनकालीन मैथिली सामग्री अत्यंत सीमित रूपमे उपलब्ध होइत अछि। किन्तु जतबा सामग्री मैथिलीक प्रारंभिक कालक अध्ययनक हेतु उपलब्ध अछि तकरा चारि भागमे विभाजित कएल जा सकैत अछि:- १.शब्द, २.वाक्यखंड, ३.सूक्ति तथा ४.लोकगीत एवं लोकगाथा। अध्ययनक सुविधाक हेतु ऐ‍ सभ वर्गपर अलग-अलग प्रकाश देल जा सकैछ। (१)शब्द- भाषा विज्ञानक अनुसार कोनो भाषाक हेतु शब्दक  महत्व सर्वाधिक अछि। पहिने  शब्दक प्रयोग होइ छै, तखन स्वरूपक। ऐ‍ दृष्टिएँ प्रथम कोटिमे ओ सभ ग्रंथ अबैत अछि, जइमे मैथिली शब्दक प्रयोग कएल गेल अछि। यद्यपि ओ सभ ग्रन्थ संस्कृतमे लिखल अछि, किन्तु लेखक अपन भावकेँ पूर्ण रूपसँ व्यक्त करबाक हेतु तथा सरल एवं जनसाधारणक बुझबा योग्य बनएबाक हेतु अनेक स्थानपर पर्यायवाची मैथिलीक बेवहार कएलनि अछि। ऐ‍ वर्गमे सर्वप्रथम किछु निबंधकार लोकनि अबैत छथि जे अपना निबंधमे मैथिलीकेँ स्थान देलनि। ऐ‍ प्रकारक लेखक लोकनिमे नवम् (९वम) शताब्दीक लेखक वाचस्पति मिश्रक नाओं सर्वप्रथम लेल जाइत अछि। ई अपन प्रसिद्ध ग्रंथ शाङ्कर भाष्य टीका ‘भामति’मे निगड़ शब्दवाची मैथिली ‘हरि’क प्रयोग कएने छथि। ई शब्द देशी थिक आ हमरा लोकनिक ओतए आइ धरि प्रचलित अछि। ई शब्द मैथिलीक अप्पन अछि आ तेना ने पचि गेल अछि जे एकरा ऐ‍सँ फराक करब असंभव छै। यद्यपि एखनौं विद्वान मंडली मध्य ई विवाद अछि जे ई शब्द सन्ताली छै। शब्द जँए प्रचलित छलै तँए एकरा अपनाओल गेल, अतएव ऐ‍ शब्दकेँ मैथिलीक शुद्ध रूप कहब विशेष उपयोगी हएत। दोसर लेखक छथि १०म् ११हम् शताब्दीक सर्वानन्द। डॉ. सुभद्र झा अपन निबंध Maithili Words in Sarvanand’s  Amarkosh मे पूर्ण रूपेँ विचार करैत कहैत छथि जे “सर्वदानन्दक ‘अमरकोष’मे ४०० सँ ६०० बीचमे शुद्ध मैथिली शब्दक प्रयोग देखबामे अबैत अछि, जकरा मैथिलीक शुद्ध रूप कहल जा सकैछ।” मैथिलीकेँ असमी एवं बंगलासँ समता रहबाक कारणेँ ऐ‍पर विवाद कएल गेल जे ई शब्द प्राचीन बंगला एवं असमीक प्रारंभिक रूप थिक। किन्तु ई तँ स्वाभाविक थिक जे तखन भाषा अपन निर्माणक स्थितिमे रहल हएत, तँए आेइ समैक तद्युगीन भाषासँ कमे अंशमे अंतर रहतै तथा देशगत भिन्नता रहबाक कारणेँ पूर्ण रूपसँ एकर विकास हएब असंभव अछि। ‘अमरकोष’मे प्रयुक्त ई शब्दावली मैथिलीक निज सम्पत्ति थिक जकरा अस्वीकार नै कएल जा सकैछ। तृतीय सामग्री हमरा लोकनिकेँ पञ्जीमे उपलब्ध होइछ। डॉ. जयकान्त मिश्र एकरा सभसँ प्राचीन मानैत छथि : The Earliest of these are, of course, the oldest Vernacular names of places and persons found in the early Panji records. किन्तु एतए एकटा तथ्य विचारसंगत अछि जे पञ्जीक प्रारंभ १३१० ई. मानल गेल अछि, तँए ऐ‍मे पओल गेल शब्दकेँ वाचस्पति मिश्र एवं सर्वानन्दक पश्चातहिक मानब उचित हएत। पञ्जी सेहो संस्कृतहिमे अछि किन्तु किछु शब्द एहन भेटैत अछि  जे मैथिलीक थिक। शब्द सबहक ऐ‍ प्रकारेँ प्रयोग चौदहम एवं पन्द्रहम शताब्दीक अन्य विद्वान सभ यथा चण्डेश्वर ठाकुर, रूचिपति, जगद्धर, वाचस्पति द्वितीय तथा विद्यापति ठाकुर सेहो कएने छथि। डॉ. उमेश मिश्र अपन निबंध शीर्षक Chandeshwar and Maithili मे चण्डेश्वर ठाकुर द्वारा प्रयुक्त मैथिली शब्द सबहक चर्चा कएने छथि। तथा पुनः ओ Journal of Bihar Orissa Research Society १९२८क पृष्ठ संख्या २६६मे Maithili Words of the 15th Century शीर्षक निबंधमे रूचिपति एवं जगद्धर द्वारा प्रयुक्त शब्दक चर्चा करैत ओ लिखैत छथि- In this commentary  Ruchipati has now and then  used words of Maithili, His mother-tongue, in order to give the exact meaning of some of the words of Sanskrit and Prakrit. उदाहरणस्वरूप किछु शब्दकेँ देखल जा सकैछ:- संस्कृत मैथिली कर्तरिल कतरनी जलग्रह जलढ़री पलांदु पियाजु पोत डोंगी कर्मान्तिक कामत, कमती विहंगिक बँहगी सुवासिनी सुआसिन पर्यङ्क पलंग पुत्रिक पुतरी आलवाल थाल, कादो इत्यादि। डॉ. मिश्र आेइ निबंधमे जगद्धर द्वारा प्रयुक्त शब्द सबहक सेहो वर्णन कएलनि अछि। जगद्धरक ‘मालती-माधव’ तथा ‘वेणीसंहार’ दुनू टीकामे मैथिली शब्द पाओल जाइत अछि यथा: संस्कृत मैथिली दोड़दह दोहर चोर्णकम टोप्पर ग्रह गोह अलवालम थाल, कादो प्राजनम् पैना यूथिका जूही आदि। वाचस्पति मिश्र द्वितीय द्वारा लिखित ‘तत्वचिन्तामणि’क अंग्रेजी अनुवादक भूमिकामे सेहो डॉ. उमेश मिश्र सिद्ध कएने छथि जे वाचस्पति मिश्र द्वितीय सेहो अनेक मैथिली शब्दक प्रयोग कएने छथि। (२) वाक्यखंड शब्दक अतिरिक्त हमरा लोकनिकेँ मैथिली वाक्यखंड सबहक प्रयोग सेहो भेटैत अछि। जखन भारतवर्षमे अंग्रेजी राज्यक सुदृढ़ स्थापना भए गेल, तखन अंग्रेज लोकनि भारतक क्षेत्रीय भाषा सबहक आधुनिक अनुसंधान प्रणालीक अनुसारेँ अध्ययन प्रारंभ कएलनि। ऐ‍ क्रममे म.म. हरप्रसाद शास्त्रीकेँ प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ सबहक अनुसंधान करबाक भार भेटलनि। म.म. शास्त्री ऐ‍ क्रममे नेपाल गेलाह, ओतए हुनका १९१६ ई.मे तीन गोट ग्रंथ भेटलनि, जकरा ओ ‘बौद्धगान ओ दोहा’ नाओंसँ प्रकाशित करौलनि। उक्त तीनू ग्रंथ थिक (क) दोहाकोष (ख) चर्याचर्य विनिश्चय (ग) डाकार्णव। ऐ‍ ग्रंथ सबहक रचनाकाल आठम शताब्दीसँ एगारहम शताब्दी धरि मानल जाइत अछि। आेइ समैमे आधुनिक भाषा सभ विकासोन्मुख छल, किन्तु विकसित नै भेल छल, तँए हेतु भाषा-विज्ञानी लोकनि आेइ रचनामे भारतीय पूर्वांचलक प्रायः सभ भाषाक रूप पबैत छथि। सिद्ध लोकनिक विषएमे जखन विशेष अनुसंधान भेल तँ हुनका लोकनिक क्षेत्र गोरखपुरसँ भागलपुर धरि मानल गेल। जे सिद्ध लोकनि जइ क्षेत्रकेँ अपनौलनि से हुनका अपन रचनामे आेइ क्षेत्रक भाषाक प्रभाव देखबामे अबैत अछि। मैथिलीक प्रभाव सेहो सिद्ध लोकनिक रचनामे पाओल जाइत अछि। ऐ‍ मतक पुष्टि करबाक हेतु निम्न तर्कपर दृष्टि देल जा सकैछ: १.सिद्ध लोकनिक चर्चा ज्योतिरीश्वर अपन ‘वर्णरत्नाकर’मे कएने छथि जइसँ अनुमान कएल जाइत अछि जे ओ लोकनि अपन मतक प्रचारार्थ मिथिला अवश्य गेल हेताह। २.पदक शब्दावली सबहक वैज्ञानिक अध्ययन कएला सँ ई सिद्ध होइ छै जे ओ मैथिलीक अत्यंत सन्निकट अछि। ३.हुनका लोकनिक पदमे जइ प्रकारक स्थानक वर्णन कएल गेल अछि तकरा मिथिलाक भौगोलिक स्थितिसँ विशेष साम्य छै। ४.ओइमे विभक्ति, विशेषण तथा किछु क्रियापद एहन अछि जे मैथिलीमे प्रचुर मात्रामे प्रयोग कएल जाइत अछि। सिद्ध साहित्यक भाषा, विद्यापतिक कीर्तिलता, कीर्तिपताका, विशुद्ध विद्यापति पदावली तथा ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकरक भाषासँ साम्य  रखैत अछि। किछु सामान्य विशेषता ऐ‍ सभ पदमे पाओल जाइत अछि यथा : दन्त्य वर्णक प्रधानता, ‘एँ’ क प्रयोग, चन्द्रबिन्दुक एक्के समान प्रयोग, ‘हि’ ‘एँ’ तथा ‘ए’ क ध्वनिक एक्के समान प्रयोग, जे, एहु, तरक, अप्पन, आदि सर्वनामक प्रयोग इत्यादि विशेषता समान अछि। ५.आेइ पद सभमे किछु लोकोक्ति तथा किछु वाक्यखंड एहन प्रयोग कएल गेल अछि जे मिथिलामे एखनौं प्रचलित अछि, यथा : (I) पहिल बियान, (II) बलाद बिआएल गबिया बाँझे (बरद बिआएल गाए रहल बाँझे) (III)  बेङ्गसँ साँप बढ़िल जाए (IV) हाक पाड़ई (V) जे जे अएला ते ते गेला (VI) टूटि गेल कन्था इत्यादि। ६.किछु शब्दावली एहन अछि जे मैथिलीक प्राचीन रूप थिक। ओ शब्द सभ अखन विकसित भए दोसर रूप धारण कए लेलक अछि, यथा : चर्यापद मध्यकालीन मैथिली      आधुनिक मैथिली आजि                 आजि                आइ चापी                -                    चापिदेब तेन्तलि               -                      तेतरि बिआती              बाइति                बिअउती टेंगी                  -                      टेंगारी चगेरा                 -                      चङ्गेरा भणइ                 भनइ                 भनथि सिद्ध साहित्यक प्रधान कविगणमे किछु नाओं अछि सरहपा, कान्हपा, भुसुकपा, शबरपा, कुक्करीपा, लुईपा आदि। जतए धरि हिनक सबहक समैक प्रश्न अछि, हिनका लोकनिक समए संवत ८१७सँ मानल गेल अछि किएक तँ प्रथम कवि ‘सरहपा’क आविर्भाव काल ८१७ मानल गेल अछि। ऐ‍ तरहेँ हिनका लोकनिक समए ८सँ १२हम शताब्दी धरि निश्चित कएल गेल अछि। दोहाकोषक भाषाकेँ डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी शौरसेनी अपभ्रंश मानैत छथि। ‘चर्याचर्य विनिश्चय’पर सेहो शौरसेनीक प्रभावकेँ ई स्वीकार करैत छथि: The Charyas belong to the early or old N.I.A Stage. Being the first attempt, the speech is not sure of its own forms learns on its stronger, better established Sisters and Aunts. उपर्युक्त तर्क एवं प्रमाण सबहक आधारपर डॉ. सुभद्र झा अपन “Formation of Maithili Language” नामक ग्रंथमे चर्यापदक भाषाकेँ निर्विवाद रूपेँ मैथिलीक “छिकाछिकी” शाखाक अन्तर्गत मानैत छथि। किन्तु ई निर्विवाद नै अछि। एकरा प्राचीन बंगाली, प्राचीन असमियाँ तथा प्राचीन उड़िया सेहो कहल गेल अछि तथापि एतबा विवाद रहितौं अधिकांश विद्वान एकर भाषाकेँ प्राचीन मैथिली मानैत छथि। ऐ‍ मतक समर्थक छथि- राहुल सांकृत्यायन, डॉ. के.पी. जायसवाल, म.म. डॉ. उमेश मिश्र, नरेन्द्रनाथ दास, डॉ. सुभद्र झा, श्री शिवनन्दन ठाकुर आदि। अतएव निष्कर्ष रूपेँ कहल जा सकैछ जे चर्यापदक भाषा प्राचीन मैथिलीक अत्यंत सन्निकट अछि। कारण जे ऐ‍मे प्रयुक्त वाक्यखंड, जे मैथिलीक थिक, आदिक पूर्ण प्रयोग पाओल जाइत अछि। (३) सूक्ति एकर पश्चात् डाक वचनावलीक स्थान अबैत अछि। अतिप्राचीन कालसँ मिथिला कृषि प्रधान मानल जाइत रहल अछि। एतुका भूमिमे ने नदीक अभाव छैक आ ने भूमि उस्सर छै। फलस्वरूप खेतीपर पूर्ण जोर देल जाइत रहलै। मिथिलावासी लोकनि ज्योतिषमे सेहो विशेष आस्था रखैत छलाह, फलस्वरूप कृषि एवं ज्योतिष संबंधी निअम आदिक विषएमे लोककेँ शिक्षा देबाक हेतु विद्वान लोकनि तत्कालीन प्रचलित जनभाषामे सूक्ति सबहक निर्माण करैत छलाह, जइसँ अनपढ़ लोक सेहो पूर्णरूपसँ लाभान्वित होइत छलाह। ऐ‍ सूक्ति सबहक अन्तर्गत डाक, घाघ, आदिक वचन सभ अबैत अछि। डाक वचनावलीक भाषाकेँ किछु विद्वान चर्यापदो सँ प्राचीन मानैत छथि। कारण जे चर्यापदे जकाँ एकरो प्रचार उत्तर प्रदेश सहित समस्त पूर्वोत्तर भारतमे भेल। डाक वचनावलीक दू संस्करण मिथिलामे प्रकाशित भेल, कन्हैयालाल कृष्णदास द्वारा मैथिली साहित्य परिषद, दरभंगासँ। भाषाक दृष्टिसँ दोसर संस्करण बेसी प्रामाणिक कहल जा सकैछ। कारण जे ई एक प्राचीन हस्तलिखित पोथीपर आधारित अछि। एकर भाषा अपभ्रंशसँ विशेष साम्य रखैत अछि। प्राचीन तालपत्रमे जे डाकवचन भेटैत अछि से आेइ ‘अवहट्ट’ मे भेटैत अछि, जइमे महाकवि विद्यापतिक ‘कीर्तिलता’ विद्यमान अछि।  डाकक वचन अखनो मैथिल समाजमे प्रचलित अछि, किन्तु देश कालक व्यवधानसँ हुनक भाषामे अनेक परिवर्तन आबि गेल अछि जइसँ ओ आधुनिकताक छाप लऽ नेने अछि। प्राचीन स्वरूपक एकाध उदाहरण थिक : मुहूर्त विचार : तिथि परमाणहि साठि दण्डा, से लए करए बारह खण्डा। अद्दा, भद्दा, कार्तिक मूल, भनई डाक सबेटा निर्मूल। तथा, सनिसत्ते शुष्क लए दुई छठि वेहप्फए होइ विरूई, बुध तीअ दोअसि सूर, मंगल दशमी परिहर दूर, होए एगादशी सोमवारे, दग्धतिथि फुर गहिअ गोआरे।। किछु आर उदाहरण:- साओन पछबा बह दिन चारि चूल्हिक पाछाँ उपजय सारि साओन शुक्ला सप्तमी जौं गरजे अधरात तो जाहू पिया मालवा हम जाएब गुजरात। डाकक समएकेँ लऽ कए विद्वान सबहक मध्य अखन धरि मतैक्य नै अछि। हुनक निवास स्थानक विषय सेहो विवादग्रस्ते अछि। बंगाल, उत्तर प्रदेश, तथा मिथिला सभ हुनका अपन-अपन स्थानक मानैत अछि। मिथिलामे डाकक संबंधमे अनेक किवदंती प्रचलित अछि। ऐ‍सँ ई अनुमान कएल जाइत अछि जे ई अवश्ये मिथिलाक छलाह। मिथिलामे जे किवदंती प्रचलित अछि तइ अनुसारेँ ई बराहमिहिरक पुत्र छलाह तथा जातिक गोआर। कृषिसँ संबंधित डाकक प्रस्तुत वचन अद्यावधि प्रायः प्रत्येक लोकक कण्ठमे निवास कऽ रहल अछि: थोड़कए जोतिहऽ अधिक मटिअबिह ऊँच कए बान्हिहऽ आरि ताहू पर जँ नै उपजय तँ डाककेँ पढ़िहऽ गारि। अथवा साओन पछबा भादव पुरबा आसिन बहै ईशान कातिक कन्ता सिकियो ने डोलै, कतए कए रखबऽ धान? अथवा शुक्र दिन केर बादरी, रहे शनिचर छाय कहे डाक सुनु डाकिनी, बिनु बरसे नै जाय।। अथवा जौं पुरबैया पुरबा पाबै, सुखले नदिया धार बहाबै (४) लोकगीत एवं लोककथा आदिकालक उपलब्ध सामग्रीक रूपमे लोकगीत एवं लोकगाथाक सेहो अपन महत्वपूर्ण स्थान अछि। ऐ‍मे सँ किछु तँ पूर्ण साहित्यिक थिक। एकर एक विशेषता ई अछि जे ऐ‍ सबहक नायक कोनो अवतारी वा अंशी पुरुष नै छलाह। एहन रचना सभमे लोरिक, सलहेस बिहुला, गोपीचन्द मरसीयाक गीत सभ अबैत अछि। संसारक प्रत्येक स्थानमे वीरपूजाक भावना वर्तमान छलै, मिथिला सेहो ऐ‍ भावनासँ वंचित नै छल। उपलब्ध प्रमाणक आधारपर एतबा कहल जा सकैछ जे १३हम १४हम शताब्दीमे आेइ प्रकारक गानक प्रचार ऐठाम छल। कारण जे ज्योतिरीश्वर अपन ग्रंथ ‘वर्णरत्नाकर’मे लोरिक गीतक चर्चा कएने छथि। अतएव ई सिद्ध होइत अछि जे ई ऐ‍सँ पूर्वक तँ अवश्ये थिक। ई गीत सभ अखनो मिथिलामे खूब गाओल जाइत अछि। मात्र जिह्वापर रहबाक कारणेँ एकर भाषा आधुनिक रूप धारण करैत गेलैक अछि। ऐ‍ गीत सबहक भाषा अवश्ये प्राचीन मैथिली छल होएतै, किन्तु दुर्भाग्यवश आेइ प्रकारक गीत सबहक संग्रह एकठाम नै भेल अछि। ऐ‍ दिशामे सर्वप्रथम डॉ. जी.ए. ग्रिर्यसन १९म शताब्दीक अन्तमे किछु कार्य कएलनि, हिनक संग्रह प्राचीनतम संग्रह मानल जाइत अछि। एकर पश्चात् ‘लोरिक विजय’पर श्री मणिपद्मक एकगोट निबंध, दिसम्बर १९५३मे ‘वैदेही’मे प्रकाशित भेल छलनि, जइमे ओ प्रमाणित कएने छलाह जे लोरिकक गीत मैथिली साहित्यक अमूल्य निधि थिक। लोरिक गाथाक प्रस्तुत पाँतीमे केहन धरावाहिकता तथा भाषाक प्राचीनता अछि से द्रष्टव्य थिक : आँगी मे जे झाँगी सोभए रत्तन लागल हार झाँगी मे जे मानिक सोभए हीरा झमकार से हँसइ जखन दामिनी दमकए जकरा दिसि‍ उठाकए तक्कए दई करेजा सालि लोरिकक प्रवाह अपूर्व आ ध्वनि-योजना अत्यधिक ओजस्वी अछि। एकर गायक ई गबैत-गबैत जेना प्रभक्त भए उठैत अछि एवं झूमए लगैत अछि, तथा ताल ठोकि टाहि मारैत अछि। ऐ‍ बीचमे कनियो एकरा टोकि दिऔ अथवा स्थिर भावेँ गाबऽ कहिऔ तँ गायक झमान भए खसत। मंगलाचरणक ई पंक्ति केहन मोहक अछि : “कंठ दीह कोकिला माय आ मधु सन दीह भास” लोरिकक सदृश मरसीयाक गीतकेँ सेहो देखल जा सकैछ : वनमे रोए कोयल जंगलमे रोए फातमा घरमे रोए दुलहिन अभागलि रे हाय एक रोए अम्मा दोसर रोवे धन्ना रे हाय तेसर रोए दूध छारि बलवा रे हाय। अतएव ई दृढ़तापूर्वक कहल जा सकैछ जे १३हम १४हम शताब्दी धरि मैथिली भाषामे गीत तथा कथाक सृजन अवश्य होमए लागल छल। एकरा सबहक अतिरिक्त निम्न साक्ष्य सबहक सम्यक अध्ययन सेहो कएल जा सकैछ:- (अ) वर्णरत्नाकर:- एकर पश्चात् वर्णरत्नाकरक स्थान अबैत अछि। ऐठामसँ हमरा लोकनिकेँ मैथिली भाषाक क्रमबद्ध प्रगति दृष्टिगत होइत अछि। वर्णरत्नाकर मैथिलीक प्राचीनतम गद्य ग्रंथ थिक। १३हम १४हम शताब्दीमे मैथिली एक विकसित भाषा भए गेल। केवल शब्द, वाक्यखंड तथा किछु लोकगीतक नै अपितु वर्णरत्नाकर सदृश प्रौढ़ गद्य ग्रंथ, उपलब्ध सामग्रीमे मैथिलीक पूर्ण विकसित रूप ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकरक रूपमे भेटैत अछि। ई १४हम शताब्दीक आदिकाल (१३२४)क रचना थिक। वर्णरत्नाकरक विषयमे केवल एतबे धरि जोर दऽ कए कहल जा सकैछ जे ई प्राचीन उपलब्ध सामग्रीमे मैथिलीक प्रगतिक द्योतक थिक। ई अखन धरि अपन महत्वसँ मिथिला ओ मैथिलीकेँ गौरवान्वित कऽ रहल अछि। (ब) एकर अतिरिक्त प्राचीन मैथिलीक किछु सामग्री ‘प्राकृत पैंगलम’ तथा अन्य अपभ्रंश ग्रंथमे सेहो भेटैत अछि। प्राकृत पैंगलममे लोकभाषाक उदाहरण देल गेल छै। शिवनन्दन ठाकुरक मत छन्‍हि जे ऐमे प्रयुक्त किछु शब्द मैथिलीक थिक। (स) विद्यापतिक अवहट्ट रचना ‘कीर्तिलता’ तथा ‘कीर्तिपताका’मे प्राचीन मैथिलीक अनेक विशेषता पाओल जाइत अछि, यथा : क्रियाक स्त्रीलिंग रूप ए, एँ तथा हिं क प्रयोग पूर्वकालिक क्रियाक हेतु तथा ‘ए’ क प्रयोग आदि। ऐ‍ लेल ई ग्रंथ सेहो महत्वपूर्ण भऽ जाइत अछि। ऐ‍ सामग्री सबहक विषयमे डॉ. सुनीति कुमार चटर्जीक उक्ति युक्तिसंगत अछि- These specimens allow us to have a glimpses of the language in its formative period. उपर्युक्त सामग्री सबहक समीक्षा कएलासँ ई विषए स्पष्ट भए जाइत अछि जे अभिरूचि ऐठामक  लेखकमे ८म शताब्दीसँ प्रारंभ भए गेल छल। एतबा धरि सत्य जे आेइ कालक जे रचना उपलब्ध अछि तइमे विशेषतः दार्शनिक एवं व्यावहारिक पक्षक सबलता देखबामे अबैत अछि। आन प्रकारक रचना मौखिके रूपमे लोकक समक्ष उद्घाटित होइत रहल अछि तथा अनुमानसँ लोक एकर प्राचीन रूप जानबाक चेष्टा करैत अछि। मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण (यू.पी.एस.सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी) ज्ञान राशिक संचित कोष थिक साहित्य। शब्द आ अर्थक यथावत सद्भाव, जइमे मनुष्यक भावना आ बेधन चेष्टा समाविष्ट हुअए, सएह थिक साहित्य। जनताक चित्रवृतिक परम्पराक संग ओकर सामञ्जस्य देखाएबे साहित्यक इतिहास थिक। व्यापक, गहन आ अध्ययनक सुविधाक लेल साहित्यकेँ समैक विभिन्न परिधिमे बाँटब काल-विभाजन थिक। मुदा काल विभाजनक ई तात्पर्य कथमपि नै अछि जे एक कालक समाप्त भेलाक लगले पश्चात् दोसरहि दिन साहित्यक धारा दोसर दिशामे प्रवाहित होमए लगैत अछि। काल-विभाजन कोनो सुनिश्चित मापदण्ड अथवा कसौटी नै अछि। ऐ‍ लेल काल विशेषक नामकरण, कखनौं सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक आ धार्मिक परिस्थितिक परिपेक्ष्यमे होइछ तँ कखनौं रचना विशेषक प्रवृति प्रावल्यक आधारपर। साहित्य अनन्त अछि। कोनो साहित्यक वैज्ञानिक ओ विधिवत ज्ञान आेइ साहित्यक अध्ययनसँ संभव होइत अछि। साहित्यक सम्यक अध्ययनक लेल युग विभाजन वा काल-विभाजन आवश्यक अछि। कोनो निर्जन प्रदेशक शैवलनी सदृश एकर धारा अबाध गतिसँ प्रवाहित होइत रहल अछि। अतः ओकर सम्यक विचारक परिचए पेबाक हेतु काल-विभाजन प्रयोजनीय अछि, उपयोगी अछि। मैथिली साहित्यक काल-विभाजनपर जखन विचार करैत छी तँ ई एक गोट विचारणीय विषए बनि जाइत अछि। विभिन्न विद्वानक ऐ‍ संबंधमे मत अछि एवं प्रसिद्ध इतिहासकार लोकनि ऐ‍ प्रसंगे, विभाजन पृथक-पृथक कएल अछि। ओना तँ साहित्य प्रवाहमान धाराक सदृश्य अछि, जकर विभाजन दुःसाध्य नै प्रत्युत असंभव भऽ जाइत अछि; किन्तु अध्ययनक सुविधाकेँ दृष्टिमे राखि विभिन्न प्रवृतिक प्रधानता आर अप्रधानताक आधारपर विभाजन कऽ लेल जाइछ। ई विभाजन दू प्रकारेँ कएल जा सकैछ: (I) देशकृत (II) कालकृत साहित्य तँ सार्वभौमिक ओ सर्वकालिक अछि। यदि देशकृत विभाजन कएल जाए तँ साहित्य पृथक-पृथक स्थानपर भिन्न-भिन्न नाओंसँ संबोधित कएल जाएत। कालकृत विभाजन किछु विशेष प्रवृतिक आधारपर कएल जाइछ। परिवर्तन मनुष्यक संग अवांछनीय रूपसँ अछि। सामाजिक, धार्मिक ओ राजनीतिक परिवर्तन भेल करैछ। कोनो युगमे कोनो खास तरहक प्रवृतिक प्रधानता पाओल जाइत अछि। ‘प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति’। अतः प्रवृतिक अनुरूप आेइ कालक नामकरण कएल जाइछ; जइसँ ई कथमपि नै बुझबाक चाही जे आन-आन प्रवृतिक अवशेष भए जाइछ, अपितु ओ गौण रूपसँ सदिखन वर्तमान रहैछ। जइकालमे कोनो विशेष प्रवृतिक रचनाक प्रचुरता भेटैछ तँ ओ स्वतंत्र भऽ ओकर फराक नामकरण कएल जाइछ। ऐ‍ प्रकारेँ कालकृत विभाजनक एक गोट आर विशेषता पाओल जाइत अछि ओ थिक ग्रंथकेँ विशेष प्रसिद्धि भेलासँ कोनो कालक भीतर जइ प्रकारक अनेक प्रसिद्ध ग्रंथ चलि आबि रहल अछि, तँए आेइ प्रकारक रचनाकेँ आेइकालक अंतर्गत मानब उचित हएत। यद्यपि आनो-आन पुस्तक सभ आेइ कालक मध्य असाधारण कोटिक किए नै प्राप्त हुअए। अतः मैथिली साहित्यक युग विभाजन ऐ‍ रचना प्रवृतिक आधारपर तीन युगमे भेल अछि— पहिल अछि गीतिकाव्य युग, दोसर—नाटक युग, आ तेसरकेँ—गद्य युगक संज्ञा देब उचित हएत। दोसर शब्दमे पहिलकेँ ‘श्रृंगार युग’ दोसरकेँ  ‘भक्ति युग’ आ तेसरकेँ ‘आधुनिक युग’ कहल जा सकैछ। प्रारंभिक युगमे मिथिलामे गीतिकाव्यक विशेष प्रचार-प्रसार रहलाक कारणेँ प्रायः गीति-युगक संज्ञा देल गेल। ऐ‍ युगक प्रवर्तक छलाह अभिनव जयदेव महाकवि विद्यापति ठाकुर। हिनकासँ लऽ कए कवीश्वर चन्दा झा धरि एकर पूर्ण प्रचार-प्रसार रहल। कवीश्वरक मृत्युक पश्चात् ऐ‍ युगक अवसान भऽ गेल। मध्य युगमे आबि कए गीति काव्यक मधुर-मधुर गीत संयोगसँ नाटकक रचना दिसि‍ लोकक प्रवृति झुकल। अतः ऐ‍ युगकेँ ‘नाटक युग’क संज्ञा देब उचित प्रतीत होइत अछि। ऐ‍ युगमे हमरा लोकनिकेँ उमापति उपाध्याय कृत ‘पारिजातहरण’, म.म. रामदास झाक ‘आनंदविजयाभिधान’, काशीनाथकृत ‘विद्याविलाप’, कृष्णदेवकृत ‘महाभारत’ आ धनपतिकृत ‘माधवानल काम कण्डला’सँ साक्षात्कार होइत अछि। एवं प्रकारेँ नाट्य कलाक विशेष प्रदर्शन भेलासँ लोकक रूचि आेइसँ बदलैत गेल एवं वर्तमान युगमे लेखकक प्रवृति गद्य लिखबा दिसि‍ विशेष झुकल। ऐ‍ युगमे लेखक वृन्द गद्य साहित्यमे अपन मौलिक रचनामे उपन्यास, गल्प, कहानी, निबंध, लिखऽ दिसि‍ विशेष रूचि देखौलनि। आब प्रश्न उठैत अछि जे अखन धरि जतेक काल-विभाजन मैथिली साहित्य मध्य कएल गेल अछि ओकर तिथि निर्धारण करबामे विद्वान लोकनिमे मतैक्य किए नै अछि? मैथिली साहित्यक प्रथम काल-विभाजन करबाक प्रयास म.म. डॉ. उमेश मिश्र, मनबोध रचित कृष्णजन्मक अपन भूमिकामे कएलनि अछि। हिनका मतानुसारेँ : (I) आदिकाल ११०० सँ १३०० ई. धरि (II) मध्यकाल १३०० सँ १८०० ई. धरि (III) आधुनिक काल १८०० सँ अद्यतन। उपर्युक्त विभाजन एक तँ मैथिलीकेँ धि‍यानमे राखने अछि आ भाषाक विभिन्न रूपकेँ धि‍यानमे राखि कएल गेल काल-विभाजन साहित्यक इतिहासक काल-विभाजन नै कहाओत। साहित्यक इतिहासक काल-विभाजनमे भाषाक अतिरिक्त कृत्ति, कर्ता पद्धति ओ विषएपर धि‍यान देब आवश्यक अछि। म.म. डॉ. उमेश मिश्र, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्क वार्षिक अधिवेशन, मार्च १९५३मे अध्यक्ष पदसँ “मैथिली भाषा ओ साहित्य”पर भाषण दैत, राजनीति, सामाजिक ओ भाषाविज्ञानक दृष्टिएँ समस्त साहित्यकेँ निम्न भागमे प्रस्तुत कएने छथि: (I)आदिकाल १००० सँ १६०० ई. धरि (II)मध्यकाल १६०० सँ १८६० ई. धरि (III)आधुनिक काल १८६० सँ १९५० ई. धरि। ओ मिथिला भाषा तथा इतिहासकेँ ऐ‍ प्रकारक उपादेयतापर विचार करैत तीनू युगमे नामकरण करैत छथि। आदियुगकेँ गीतियुग, मध्ययुगकेँ नाटकयुग एवं आधुनिक युगकेँ गद्ययुगक संज्ञासँ संबोधित कएल अछि। काल विभाजनक प्रसंगमे अपन विचारक परिवर्तनक कोनो युक्तिसंगत कारण म.म. मिश्रजी नै देने छथि। परन्तु हिनक पूर्वक काल-विभाजन एवं नवीन काल विभाजनक बीच डॉ. जयकान्त मिश्रक प्रबंध प्रकाशित भऽ चुकल छल। डॉ. मिश्रक काल-विभाजन ऐतिहासिक पृष्ठभूमिमे सर्वमान्य अछि तँ आश्चर्य नै जे म.म. जी अपन मतमे संशोधन कएने होथि। हिनक ऐ‍ प्रकारक विभाजनमे कए प्रकारक दोष आबि गेल अछि जे सम्प्रति १९५० ई. मे आबि कऽ आधुनिक युगक समाप्ति मानैत छथि। मिथिला वा कोनो देशक जनताक चित्रवृत्त बहुल किछु राजनीतिक, सामाजिक साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थितिक होइत अछि, मुदा जखन १९५०पर दृष्टिपात करैत छी तँ सर्वथा असंगत बूझि पड़ैत अछि, ऐ‍ कालमे कोनो राजनीतिक वा सामाजिक परिवर्तन नै पाबि रहल छी जकर आधार मानि म.म. मिश्रजी अपन विभाजन मध्य आधुनिक कालक समाप्ति कएल अछि। जँ हिनक धारणा छन्‍हि जे काल-विभाजन राजनीति, सामाजिक एवं भाषा विज्ञानक दृष्टिएँ कएल जाए तँ राजनीतिक परिस्थितिकेँ धि‍यानमे राखि सम्प्रति १९४७ मानि सकैत छलाह। ऐ‍ प्रकारेँ विवेचना कएला उत्तर जखन हिनक विभाजनक साहित्यिक समीक्षा करैत छी, तँ हिनक परिभाषा अमान्य सिद्ध होइत अछि। (२) डॉ. जयकान्त मिश्र साहित्य अकादमीसँ प्रकाशित अपन शोध-प्रबंध The history of Maithili Literature, Volume-I मे राजनीतिक घटनाक साहित्य परंपरापर प्रभावक आधारपर काल विभाजनक प्रसंगे निम्न मत प्रस्तुत कएने छथि— (I) प्राक् मैथिली काल ८म शताब्दीसँ १२हम शताब्दी धरि (II) प्रारंभिक मैथिली साहित्य १३०० ई.सँ १६०० ई. (III) मध्यकालीन मैथिली साहित्य १६०० ई.सँ १८६० ई. (IV) आधुनिक मैथिली साहित्य १८६० ई. सँ अद्यतन। डॉ. मिश्रक उपर्युक्त कथन बहुतो अंशमे तर्कपूर्ण एवं वैज्ञानिक कहल जाएत। यद्यपि अपन काल विभाजनक आधार ओ राजनैतिक घटनाक साहित्य परम्परापर प्रभावेकेँ राखलनि अछि। हिनका अनुसारेँ भाषा-वैज्ञानिक आ व्याकरणक दृष्टिएँ ई विभाजन समीचीन अछि। मुदा ऐमे सेहो किछु त्रुटि रहि गेल अछि। प्रारंभिक कालक समए जे १३०० ई. स्थिर कएल गेल अछि तकर आरंभ मानबाक कोनो कारण नै देल गेल अछि। १३०० ई. मानलाक कारणेँ आेइसँ पूर्वक बहुत रास रचना ऐ‍ परिधिमे नै आबि सकल। मुदा विद्यापतिक पूर्वक साहित्यकेँ प्राक् विद्यापति साहित्यक संगे विस्तारसँ चर्चा कएने छथि। ऐ‍ साहित्यमे ‘वर्णरत्नाकर’ तँ हिनक युग आरंभिक रचना थिके, चर्यापदोक चर्चा ओ बड़ परिश्रमपूर्वक केने छथि। तखन हिनक उपर्युक्त मत स्वतः संदेहात्मक भऽ जाइत अछि। १३०० ई.मे मिश्रजी मुसलमानक आगमनक कारण प्रस्तुत करैत छथि। मिथिला सर्वदासँ कट्टर धर्मावलम्बी रहल तइसँ मिथिलापर मुसलमानक आगमनक कोनो प्रभाव नै पड़ए देल। एकर दोसर हेतु इहो भऽ सकैत अछि जे जयकान्त बाबूक धि‍यान ज्योतिरीश्वरक गद्य ग्रंथ ‘वर्णरत्नाकर’पर होन्हि‍ एवं एकर समए १३२४ ई. लगभग कहने छथि। १४०० ई.क अभ्यन्तर विद्यापतिक प्रभाव साहित्यपर मुख्य रहल। ऐ‍ समैमे अपभ्रंशक पतनक अनन्तर पूर्वीय भारतमे मैथिलीक प्रयोग भेटैत अछि। श्री जयकात मि‍श्र ऐ‍ काल-विभाजन अवसानक कारण प्रस्तुत करैत ओइनवार वंशक पतनक कारण प्रस्तुत करैत छथि। ऐ प्रकारेँ १६०० ई.सँ मध्यकालक प्रारंभ मानल गेल अछि तइ हेतु विशेष उल्लेख नै कएल गेल अछि। ऐ‍ युगमे मिथिलामे नाट्य साहित्यक पूर्ण प्रचार-प्रसार छल। जकरा ओ कीर्तनिञा नाटक कहल अछि। हिनका अनुसारेँ विद्यापति पदावलीक जे सशक्त धारा प्रवाहित भेलसे उमापतिसँ नाट्य रचनाक प्राचुर्य द्वारा एक महत्वपूर्ण ओ प्रौढ़ दिशान्तरकेँ प्राप्त कए नवयुग प्रवेश कएल परन्तु हिनक ई धारणा पूर्वाग्रहसँ अनुप्राणित अछि। वस्तुतः जकरा ओ मैथिलीक नाट्य परंपरा कहैत छथि ओ आेइसँ पूर्व विद्यापति एवं ज्योतिरीश्वरक ‘धूर्तसमागम’सँ प्रारंभ भेल। ऐ‍ समैक उल्लेख करैत मिश्रजी नेपालक जगत प्रकाशमल्ल, उमापति उपाध्याय एवं शंकरदेवक नाम लैत छथि, जे ओ मैथिली नाट्यकलाक प्रवर्तकक रूपमे अबैत छथि। ऐ‍ कालक अवसान सेहो खण्डबला कुलक अवसानसँ भेल। डॉ. जयकान्त मि‍श्र आधुनिक युगक आरंभ १८६० ई.सँ मानलनि अछि, जखन कि दरभंगा राज कोट ऑफ वार्डस (Courts of Wards) क संरक्षण मे चलि गेल आर दरभंगा शहरमे अंग्रेजी शिक्षाक प्रचार-प्रसार भेल। परन्तु जखन हम मिथिलाक सीमा मैथिलीक क्षेत्रकेँ दरभंगासँ बाहरो मानै छिऐ तँ खाली दरभंगेक स्थितिपर साहित्यक निर्धारण करब कतए धरि तर्कसंगत हएत? (३)ऐ‍ प्रकारेँ प्रो. श्रीकान्त मिश्र सेहो अपन इतिहासमे उपर्युक्त तथ्यक समर्थन कएल अछि। एवं क्रममे अनेक गतिरोधक मुख्य कारण प्रस्तुत करैत मिश्रजीक कथन अछि जे शिक्षा-पद्धतिमे बरोबरि मैथिलीक अवहेलना होइत रहल। समए पाबि साहित्यक आनो अंग सभ गद्य, पद्य आदिक विशेष प्रगति होइछ। (४) तेसर काल-विभाजन कुमार श्री गंगानंद सिंह द्वारा कएल गेल अछि। अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलनक चौदहम अधिवेशनमे ‘मैथिली साहित्यक प्रगति’ शीर्षक निबंधपर भाषण दैत अपन मतक पूर्ण विवेचना कएल अछि: (I)प्रारंभिक काल ८०० सँ १३०० ई. धरि (II)मध्यकाल १३०० सँ १८०० धरि (III)आधुनिक काल १८०० सँ १९म, २०म शताब्दी धरि प्रारंभिक कालमे ओ चर्यापदक आचार्य लोकनिक रचनाकेँ मानैत छथि, आ वाचस्पति मिश्रक ‘भामति टीका’ आ सर्वानन्दक ‘अमरकोष टीका’मे संस्कृतक पर्यायवाची अनेक मैथिली शब्दक उल्लेख कएल अछि। परन्तु चर्यापदक भाषा मैथिलीक पूर्व रूप भलहि‍ं भऽ सकैछ मुदा ओकरा मैथिली नै कहि सकैत छी। भाषाविज्ञानक अनुसारेँ ई बूझि पड़ैत अछि जे लिपिबद्ध नै भेलाक कारणेँ ओकर भाषामे बहुत परिवर्तन भेल तइसँ ओ बहुत किछु आधुनिक मैथिलीक रूप धारण कए लेने अछि। प्रारंभिक कालकेँ ८००ई. लऽ जएबाक कोनो तेहन युक्ति नै भेटैत अछि। ऐ प्रकारेँ सम्प्रति मध्यकालमे जयकान्त मि‍श्रक प्रारंभिक मैथिली साहित्य ओ मध्यकालीन मैथिली साहित्य दुनूकेँ सन्निहित कऽ देल गेल अछि। ज्योतिरीश्वरक ‘वर्णरत्नाकर’केँ मैथिलीक सभसँ प्राचीन उपलब्ध गद्य ग्रंथक रूपमे प्रस्तुत करैत छथि। ऐ‍ भाषामे प्रोत्साहन एवं विकास तत्कालीन नृपतिगणक सहयोगक फलस्वरूप भेल। ऐमे अनेक कवि एवं लेखक लोकनिक प्रादुर्भाव भेलासँ साहित्यक अभिवृद्धिमे सहायक सिद्ध भेल। वस्तुतः साहित्यक प्रारंभ ओ विकास ऐठाम केन्द्रित भऽ जाइत अछि। तइसँ १८०० ई. सँ वर्तमान काल मानवामे समुचित कारणक अभाव भेटैत अछि। ओ आधुनिक कालकेँ दू भागमे विभाजित करैत छथि। १९म शताब्दी धरि मैथिलीमे जतेक ग्रंथ सबहक चर्चा भेटैत अछि आेइपर भाषा एवं वाक्य विन्यासक दृष्टिएँ १८म शताब्दीक छाप बूझि पड़ैत अछि। परन्तु २०म शताब्दीमे आबि कऽ क्रमशः एकर प्रयास भेलै जे जतए जे छटा भेटलै ओकरा ग्रहण कए मैथिलीक कायाकल्प कएल जाए। ऐ‍ विभिन्नताक मुख्य कारण राजनीतिक थिकै। (५)ऐ‍ काल विभाजनसँ मिलैत-जुलैत विभाजन श्री भोलालालदास ‘मिथिला मिहिर’क मिथिलांकमे सेहो कएलनि अछि, जकर समानता ऐ‍ विभाजनसँ अछि। (६) मैथिली साहित्यक मूर्द्धन्य विद्वान आ प्रसिद्ध भाषाविद् डॉ. सुभद्र झा अपन शोध प्रबंध Formation of Maithili Language मे सेहो काल-विभाजन करबाक प्रयास कएल अछि। हिनक विभाजनमे सेहो कोनो मतसँ साम्य नै भेटैत अछि, अतएव एकरा स्वतंत्र विभाजन कहल जा सकैछ। हिनक विभाजन ऐ‍ प्रकारेँ अछि: (I)प्रारंभिक कालक मैथिली A.D १००० सँ A.D १३०० (II)मध्यकालीन मैथिली A.D १३०० सँ A.D १८०० (III)आधुनिक मैथिली A.D १८०० सँ अद्यतन। आलोचकक अनुसारेँ डॉ. झा मैथिली भाषा ओ साहित्यक विकास १००० ई.क पश्चाते मानैत छथि। संभव ई मानि जे ‘वर्णरत्नाकर’ मे प्रयुक्त भाषा ओकर रचनाकाल ३०० ई. पूर्व विकसित भेल छल। परन्तु की मिथिला-भाषा विकासक प्रक्रियाकेँ बुझबाक हेतु ‘चर्यापद’क भाषा सहायक सिद्ध नै भऽ सकैछ? ऐ‍ प्रकारेँ डॉ. झा १००० ई.क पूर्वक रचनापर धि‍यान नै रखलनि अछि। १८०० ई. धरि मध्यकाल मानबाक हुनक आधार की अछि, तकरा स्पष्ट सेहो नै केने छथि। डॉ. झा काल विभाजनक क्रममे साहित्य परंपरापर धि‍यान नै दए भाषाक विकासक दृष्टिएँ देखबाक प्रयास कएलनि। मैथिलीक प्रारंभिक काल विद्यापतिक ‘कीर्तिलता’ एवं ‘कीर्तिपताका’सँ मानैत छथि। ऐ‍ प्रकारेँ ओ अपन निबंधमे लिखने छथि— Hence as the display the genius of the language they are termed pro to Maithili or Maithili at the earliest stage of its development. वर्णरत्नाकरसँ कृष्णजन्म धरि मध्यकालीन मैथिलीकेँ उदारहण स्वरूप उपस्थित करैत छथि। ‘कृष्णजन्म’ जकर भाषावलोकन कएलासँ स्पष्ट प्रतीत होइत अछि जे मनबोधक शैली १८म शताब्दीक प्रतिनिधित्व करैत अछि। जखन कि प्रारंभिक मैथिली एवं मध्यकालीन मैथिली भाषामे सभ्यता आबि गेल तखन आधुनिक मैथिलीक रूप धारण कऽ लेलक। ऐ‍ प्रकारेँ एकर उद्भव एवं विकास १९म शताब्दीकेँ मानि सकैत छी। ई कहबामे कठिनता अछि जे कोन युगमे ऐ‍ साहित्यक कोन रूप छल एवं कोन स्थितिमे छल मुदा एतबा धरि अवश्य जे प्रत्येक युग अपन युगक छाप लैत अछि। मैथिली साहित्यक समालोचक स्व. प्रो. रमानाथ झा मैथिली साहित्यक काल विभाजनक प्रसंगमे अपन मंतव्य डॉ. दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ रचित ‘मैथिली साहित्यक इतिहास’क भूमिकामे उपस्थित करैत छथि जे- “काल विभाजनक समस्यापर कोनो आचार्यक मतसँ हमरा संतोष नै अछि।” हिनक विभाजन ऐ‍ प्रकारेँ अछि : (क)विद्यापति युग- कृष्ण काव्य युग अथवा प्राचीन युग (ख)चन्दा झा युग- कृष्ण काव्य युग अथवा नवीन युग। समालोचक लोकनिक मतेँ निश्चित रूपेँ उपर्युक्त काल-विभाजन रचना पद्धतिक आधारपर समीचीन होइतो सर्वांगपूर्ण नै कहल जाएत, कारण मैथिली साहित्यक बहुत रास रचना ऐ‍ काल विभाजने नै आबि सकत जेना ‘चर्यापद’, ‘वर्णरत्नाकर’ आदि। चन्दा झाक युगसँ पूर्वक समस्त मैथिली साहित्यकेँ प्राचीन युग मानब उचित नै बुझना जाइत अछि। (८) डॉ. दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ अपन पुस्तक ‘मैथिली साहित्यक इतिहास’मे काल विभाजनक प्रसंगमे निम्न मत प्रस्तुत कएने छथि : (१)आदिकाल, प्राक् ज्योतिरीश्वर काल अथवा अपभ्रंश युग— ई. पू. प्रथम शतकसँ १३०० ई. धरि (२)विद्यापति युग—१३०० सँ १८६० (क)विद्यापति युग—१७०० (ख) उत्तर विद्यापति युग—१७०० सँ १८६० (३)आधुनिक काल—१८६० सँ अद्यःपर्यन्त (क) वातावरण निर्माण—१८६० सँ १८८० (ख) चन्दा झा युग—१८८० सँ १९३० (ग) नव-नव विकासक युग—१९३० सँ अद्यःपर्यन्त। आलोचक लोकनिक अनुसारेँ हिनक मत बहुत अंश धरि समीचीन एवं तर्कपूर्ण बुझना जाइत अछि। (९)डॉ. शैलेन्द्र मोहन झा अपन अप्रकाशित शोध-प्रबंध ‘आधुनिक मैथिली साहित्यक विकास’ एवं मेघातिथिक छद्म नाओंसँ “मैथिली साहित्यक प्रमुख कविक मैथिली कविताक विकास” शीर्षकमे निम्न तर्क प्रस्तुत कएने छथि: (I)आदिकाल ११०० सँ १५५६ ई. धरि (II)मध्यकाल १५५६ सँ १८५७ धरि (III)आधुनिक काल १८५७ सँ अद्यःपर्यन्त। आलोचकक अनुसारेँ हिनक दृष्टि शुद्ध साहित्यैतिहासिक हेबाक चाही मुदा से नै अछि। हिनक विभाजनसँ ‘चर्यापद’ मैथिलीक विवेच्य वस्तु नै रहि जाइत अछि, आ ११०० ई. धरि तँ एहन कोनो कृत्ति नै अछि जकरा आधार मानि ११०० ई.सँ आरंभिक  काल मानल जाएत.....। डॉ. झा काल सीमाक विभाजनमे डॉ. जयकान्त मिश्रसँ प्रभावित बूझि पड़ैत अछि; यद्यपि समग्र रूपेँ ओहो साहित्यिक विकासक मर्मकेँ अनुभव करैत अवश्य प्रतीत होइत छथि। प्रो. शैलेन्द्र मोहन झा अपन अप्रकाशित शोध-प्रबंध ‘आधुनिक मैथिली साहित्यक विकास’मे उपरोक्त विभाजनक संशोधन करैत निम्न रूपेँ प्रस्तुत कएने छथि: (I)आदिकाल १३०० सँ १५५५ ई. धरि (II)मध्यकाल १५५५ सँ १८५७ धरि (III)आधुनिक काल १८५७ सँ अद्यःपर्यन्त। (१०) स्वर्गीय डॉ. राधाकृष्ण चौधरी अपन पुस्तक A Survey of Maithili Literature मे निम्न रूपेँ काल विभाजनक प्रसंगमे अपन मत व्यक्त कएने छथि: (I) Early Maithili Literature 900-1350 A.D (II) Middle Maithili Literature 1350-1830 A.D (III) Early Maithili Literature 1830- till dated। समालोचकक अनुसारेँ प्रो. चौधरी, अपन काल विभाजनक हेतु सेहो प्रस्तुत कएने छथि मुदा तकर विश्लेषण कएलासँ ओ सभ समीचीन नै बुझना जाइत अछि। १८३० ई.सँ आधुनिक युगक आरंभ मानबामे कोनो ठोस कारण नै भेटैत अछि। ने तँ तत्कालीन कोनो साहित्य उपलब्ध अछि आ ने मिथिलामे एहन कोनो राजनीतिक अथवा सामाजिक घटनाक सूत्र प्राप्त होइत अछि, जकर मिथिलाक सांस्कृतिक जीवनमे प्रभाव पड़ल हुअए। (११)डॉ. दिनेश कुमार झा ‘मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहास’ नामक अपन पुस्तकमे काल विभाजनक प्रसंगमे अपन निम्न मत प्रस्तुत कएने छथि: (I)आदिकाल/ आधारकाल ८०० सँ १३५० ई. धरि (II)मध्यकाल १३५० सँ १८५७ धरि (III)आधुनिक काल- (क) ब्रिटिश काल १८५७ सँ १९४७ धरि (ख) स्वतंत्रता काल १९४७ सँ अद्यःपर्यन्त। डॉ. झा आदिकालक आरंभ सिद्ध साहित्यसँ, मध्यकालक आरंभ विद्यापतिक रचनासँ आ आधुनिक कालक आरंभ अंग्रेज सबहक द्वारा राज्य स्थापना एवं नवीन शिक्षाक फलस्वरूप जीवनक नव परिस्थिति उत्पन्न भेला तथा साहित्यक ‘स्पिरिट’ बदलि गेलासँ एवं अंग्रेजी एवं अन्य यूरोपीय साहित्यक मैथिली साहित्यपर प्रचुर प्रभावसँ मानैत छथि। हिनक मत समालोचकक अनुसारेँ बहुत अंश धरि तर्कपूर्ण, वैज्ञानिक एवं समीचीन अछि। ई शुद्ध राजनैतिक दृष्टिसँ काल-विभाजन कएने छथि, मुदा आदिकालमे हुनक ओ दृष्टिकोण काज नै कएलकनि, तहिना आधुनिक कालकेँ ब्रिटिश काल आ स्वतंत्रताकालकेँ भागमे विभक्त करब, उचित नै बुझाइत अछि। १९४७मे भारत अवश्य स्वतंत्र भेल मुदा आेइसँ मैथिली साहित्यमे कोनो ऐतिहासिक दिशान्तर भेल हुअए, तकर कोनो प्रमाण नै अछि। (१२) डॉ. बालगोविन्द झा ‘व्यथित’ अपन पुस्तक ‘मैथिली साहित्यक इतिहास’मे मैथिली भाषा ओ मैथिली साहित्यक सुदीर्घ परंपरा देखि‍ इतिहासमे काल-विभाजन एकर समस्त उपलब्ध कृत्ति, कर्ता, पद्धति ओ विषएकेँ धि‍यानमे राखि निम्न रूपेँ कएल अछि: (I)प्राचीन काल ७०० सँ १३२५ ई. धरि (II)मध्यकाल १३२५ सँ १८६० धरि (III)आधुनिक काल १८६० सँ अद्यःपर्यन्त। (१३)डॉ. नित्यानंद झा ‘मैथिली साहित्यक काल विभाजन’ शीर्षक निबंधमे अपन मत ऐ‍ प्रकारेँ व्यक्त कएने छथि: (I)पूर्व विद्यापति काल ८०० ई.सँ १३५० ई. धरि (II)विद्यापति काल १३५० सँ १७०० ई.धरि (III)उत्तर विद्यापति काल १७०० सँ १९०० ई.धरि (IV)आधुनिक काल १९०० सँ अद्यःपर्यन्त। प्रो. सोमदेव ‘मैथिली भाषा ओ साहित्य’ शीर्षक निबंधमे ऐ‍ रूपेँ कहलनि जे मैथिली साहित्यक इतिहासक काल-विभाजन, जँ उपलब्ध सामग्री, प्रवृत्ति, एवं मोड़क दृष्टिएँ कएल जाए, तँ ऐ‍ प्रकारेँ हेबाक चाही: (I)प्राचीनकाल ८म शताब्दीसँ १८७० ई.धरि (II)मध्यकाल १८७० ई.सँ १९३६ ई. धरि (III)नव जागरणकाल— (क) स्वतंत्रतापूर्व १९३६ सँ १९४७ ई. धरि (ख)स्वतंत्रता उपरान्त १९४७ सँ १९८६ ई. धरि (ग)जनचेतना युग १९८६सँ प्रारंभ। प्रो. धीरेन्द्र ‘मैथिली प्रकाश’ नवम्बर १९८६मे काल विभाजनक प्रसंगे कहैत छथि: (I)आदिकाल ८०० सँ १३२४ ई. (II)ज्योतिरीश्वर युग १३२४ सँ १४१२ ई. (III)विद्यापति युग १४१२ सँ १५२७ ई. (IV)उत्तर विद्यापति युग १५२७ सँ १८६० (V)आधुनिक काल १८६० सँ अद्यःपर्यन्त। (क)पुनर्जागरण युग १८९० सँ १९२५ (ख)नवयुग १९५० सँ अद्यःपर्यन्त। समालोचक प्रो. झाक विद्यापति युग ओ उत्तर विद्यापति युगक मतसँ सहमत छथि, परन्तु ज्योतिरीश्वर नाओंसँ एक पृथक युगक कल्पनाकेँ उचित नै मानैत छथि। कारण ‘वर्णरत्नाकर’ सन अमूल्य ग्रंथकारक रचना करितो ओ कोनो विशेष परंपराक स्थापना नै कऽ सकलाह। १९५६ सँ नवयुग मानव सेहो अनुचित कहैत छथि, किएक तँ १९५० मे भारत अवश्य पूर्ण रूपेँ स्वतंत्र भेल मुदा आेइसँ मैथिली साहित्यमे कोनो विशेष उल्लेखनीय ऐतिहासिक दिशान्तर उपस्थित भेल हुअए तकर कोनो प्रमाण नै अछि। (१५)प्रो. प्रेमशंकर सिंह ‘वैदेही’क १९६३ ई., जनवरी-मार्च अंकमे ‘मैथिली साहित्यक काल विभाजन’ शीर्षक निबंधमे नवीन दृष्टिकोणसँ काल-विभाजन प्रस्तुत कएने छथि: (I)अपभ्रंश काल १००० ई. सँ पूर्व (II)प्रारंभिक युग ११०० ई. सँ १५५६ ई. (III)मध्य युग १५५६ ई. सँ १८५७ ई. (IV)आधुनिक युग १८५७ ई. सँ अद्यःपर्यन्त। अपभ्रंश युगकेँ मैथिलीक पूर्व पीठिका मानि सकैत छी। अपभ्रंश कालक अनेक रचनासँ हमरा लोकनिक साक्षात्कार होइत अछि। अतः भाषाक आधारपर ओकर नामकरण प्रारंभिक कालक पूर्वमे राखल गेल। तथापि एकर अपभ्रंश साहित्य सर्वदासँ समृद्धशाली रहल अछि। ऐ‍ युगक ‘प्राकृत पैंगलम’ सदृश अपूर्व ग्रंथ प्राप्त होइत अछि। ‘चर्यापद’ एवं सिद्ध लोकनिक सेहो अनेक रचना सभकेँ ऐ‍ कोटिमे राखल जा सकैत अछि। दिल्लीक बादशाह अकबर जखन सिंहासनपर बैसलाह तँ भारतक राजनैतिक स्थितिमे महान परिवर्तन भेल। ऐ‍ समैमे मिथिलाक शासनक भार पं. महेश ठाकुरकेँ भेटलनि, तथा दिल्ली केन्द्रसँ मिथिलाक साहित्यक सेहो महान परिवर्तन भेल। गीति युगक अवसान भेलाक फलस्वरूप मैथिल विद्वानक धि‍यान कीर्तनिञा नाटक लिखबा दिसि‍ विशेष भेल, परन्तु ऐ‍ नाटक सभमे जइ गीत सबहक समावेश भेल ओ पाण्डित्यपूर्ण ओ वर्गीय होमए लागल। म.म. उमापति सँ लए कए वर्तमान युगमे कवीश्वर हर्षनाथ धरि मैथिली नाटकक ईएह रूप देखल जाइत अछि। १८५४ ई.सँ मैथिली साहित्य मध्य नवीन युगक प्रादुर्भाव होइत अछि। १८५७क पश्चात् देशमे एक नव-जागरणक संचार भेल। सामाजिक एवं राजनीतिक दृष्टिकोणसँ ऐ‍ सालक नाओं इतिहासमे स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। एकर नेतृत्व नवीन शिक्षित बुद्धिजीवी वर्गक हाथमे रहल। ऐ‍ सालमे भारतमे राजक्रांति भेल जकर फलस्वरूप एकर प्रत्येक क्षेत्रमे परिवर्तन भेल। अतएव भाषा एवं साहित्यक क्षेत्रमे परिवर्तन अवांछनीय नै कहल जा सकैछ। अतएव नवीन दृष्टिकोणकेँ धि‍यानमे राखि मैथिली साहित्यक आधुनिक  कालक प्रारंभ १८५७ सँ मानबामे आपत्ति नै होमक चाही। मुदा प्रस्तुत विभाजनकेँ लऽ कए मैथिली साहित्य मध्य एकगोट आविष्कारक विषए बनि गेल अछि। म.म. जी एवं जयकान्त मि‍श्र आधुनिक कालक प्रारंभ १८६०सँ मानैत छथि, एवं कुमार श्री गंगानंद सिंह तथा भोला लालदासक मतानुसारेँ १८०० ई. मानल गेल अछि। डॉ. जयकान्त मि‍श्र अपन तर्क प्रस्तुत करैत कहैत छथि जे १८६०मे मिथिलाक शासक ‘कोर्ट ऑफ वर्डस’क अधीन चलि गेल तकर फलस्वरूप भाषा-साहित्य नवरूप धारण कए लेलक, ऐमे हिन्दीक साक्षात् प्रभाव देखना जाइत अछि, जे रवीन्द्रक कवितासँ प्रभावित भए श्री सुमनजी कविता लिखल। एकर अवलोकनसँ साक्षात् ज्ञात होइत अछि जे देशी एवं विदेशी दुनू दृष्टिएँ एकर प्रभाव मिथिलाक आध्यात्मिक जीवनपर पड़ल। मुदा १८५७सँ आधुनिक युगक प्रारंभ मानबाक सबल प्रमाण भेटैत अछि, अंतर्राष्ट्रिय दृष्टिकोणसँ सेहो पर्याप्त छै, ऐ‍ क्रांतिक प्रधान कारण छल जे ऐ‍सँ व्यक्तिक स्वतंत्रताक अभ्युदय हुअए। एक दिसि‍ तँ  ई लोकनि अपन प्राचीन संस्कृतिक सुरक्षा लेल उत्सुकता देखौलनि तँ दोसर दिसि‍ आेइ संस्कृतिक परंपराक सुरक्षा एवं विकासक हेतु सचेष्ट रहलाह। समग्र रूपेँ विचार कएला उत्तर निष्कर्ष रूपेँ कहल जा सकैछ जे मैथिली साहित्यक मध्य आधुनिक कालक बड़ पैघ महत्व छै, एतेक दिन धरि भाषा-साहित्य अन्हारमे टापर-टोइया दैत छल मुदा आधुनिक कालमे आबि कऽ ई नवीन रूप धारण कए लेलक। आधुनिक काव्यक प्रारंभमे चन्दा झाक नाओं लेल जाइत अछि। चन्दा झा मैथिलीमे नवयुगक प्रवर्त्तक छलाह। वर्तमानमे मैथिली कवितामे शैली एवं भावधाराक दृष्टिएँ महान परिवर्त्तन भेल। नवीन युगक पदार्पण भेलासँ कविता कामिनी अपन नैसर्गिक सुषमाक भारकेँ वहन करबामे असमर्थ भेलीह एवं ओकरा संग अग्रलेखक एवं पाठकक अभिरूचि एवं मनोरंजनक हेतु उपन्यास साहित्यपर विशेष जोर देल गेल। ऐ‍ सभ दृष्टिकेँ धि‍यानमे राखि १८५७सँ आधुनिक कालक प्रारंभ मानब उचित हएत। प्रो. वीणा ठाकुर जि‍नगीक जीत उपन्‍यास श्री जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्‍यास ‘जि‍नगीक जीत’ पढ़बाक अवसर भेटल। उपन्‍यास पढ़ि‍ बुझाएल जे ई उपन्‍यास तँ वास्‍तवमे मि‍थि‍लाक संस्‍कृति‍क गीत थि‍क, जीवनक गीत थि‍क, संस्‍कारक गीत थि‍क। जौं एक शब्‍दमे कहल जाए तँ यएह कहल जा सकैत अछि‍ जे ई ‘लोक’क गीत थि‍क। जखनहि‍ लोकक गीत थि‍क तँ स्‍वभावि‍क अछि‍ जे ऐ‍ उपन्‍यासक मध्‍य लोक साहि‍त्‍यक सुगन्‍ध चतुर्दिक पसरल हएत। उपन्‍यासक कथा मि‍थि‍लाक एकटा गाम कल्‍याणपुरक थि‍क, जतए जीवि‍काक मुख्‍य साधन थि‍क कृषि, जतए आधुनि‍क वैज्ञानि‍क युगक प्रकाश नै‍‍ पहुँचल अछि‍। जतए उच्‍चतम शि‍क्षाक लक्ष्‍य थि‍क बी.ए. पास करब अओर जतए एकैसम शताब्‍दी अखन धरि‍ नै‍‍ आएल अछि,‍ अओर नै‍‍ आएल अछि‍ शाइनि‍ंग इंडि‍याक प्रकाश। उपन्‍यासक प्रमुख पात्र छथि‍ नायक बचेलाल, नायि‍का रूमा, मुख्‍य पात्र छथि‍ बचेलालक माए सुमि‍त्रा, अछेलाल, अछेलालक पत्नी मखनी इत्‍यादि‍। कथा अछि‍ बचेलालक द्वन्‍द्व एवं द्वन्‍द्वसँ उपजल अवसादक एवं जीवन संघर्षक, सुमि‍त्राक मि‍थि‍लाक नारीक गरि‍माक अछेलालक कर्त्तव्‍य नि‍ष्‍ठताक, संगहि‍ मानवीय संघर्षक, द्वन्‍द्वक अओर भवि‍ष्‍यक आशा-आकांक्षाक। नायकक मानसि‍क द्वन्‍द्व जौं जीवनक सार्थकता लेल अछि‍ तँ नायकक माए सुमि‍ताक दृष्‍टि‍ स्‍पष्‍ट मानवीय गरि‍मासँ युक्‍त अछि‍। नायकसँ एक डेग आगाँ बढ़ि‍ द्वन्‍द्वसँ मुक्‍ति‍क बाट देखबैत प्रकाश पुंज मध्‍य अछि‍। नायकक पत्नी रूमाक चरि‍त्रपर प्रकाश नै‍‍ देल गेल अछि‍, तइ‍ कारणे रूमा उपन्‍यास मध्‍य गौण पात्र भऽ गेल छथि‍। कोनो समाजक जातीय मनीषा, सामुदायि‍क चेतना, जातीय बोध मानवीय मूल्‍य अओर जीवन दर्शनक वि‍वि‍ध पक्षमे अवगत हेबा लेल ओकर लोककेँ बुझब आवश्‍यक। उपन्‍यासकार ऐ‍ उपन्‍यास मध्‍य अत्‍यन्‍त ईमानदारी पूर्वक अपन समाज, मि‍थि‍लाक समाज, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा एवं समैक सत्‍य लि‍खने छथि‍। समाजक नि‍म्‍न वगर्क, कृषक वर्गक जीवनक चि‍त्रण अत्‍यन्‍त ईमानदारी पूर्वक कएने छथि‍। उपन्‍यासकार मि‍थि‍लाक वास्‍तवि‍क चि‍त्रण करबामे सफल भेल छथि‍, मि‍थि‍लाक तत्‍कालीन दशाक चि‍त्रण कएने छथि‍ तँ मात्र अओर मात्र अपन भाषा, देश एवं सामाि‍जक दायि‍त्‍व, समाजक प्रति‍ प्रेम-प्रति‍बद्धताक कारणेँ हि‍नकासँ ओ ई उपन्‍यास लि‍खबा लेने अछि‍। यद्यपि‍ कथाक प्रवाह अवरूद्ध अछि‍ तथापि‍ कथा अपन अंकमे देश-समाज, मानव, प्रकृति‍, संस्‍कृति‍, वि‍कृति‍ आदि‍केँ समेटि‍ अपन लक्ष्‍यपर पहुँचबामे सफल भऽ गेल अछि‍। हि‍नक उपन्‍यासमे हि‍नक व्‍यक्‍ति‍त्‍व पाठकक समक्ष स्‍पष्‍ट प्रतीत भेल अछि‍। जीवन दर्शन अओर आध्‍यात्‍मसँ लऽ कऽ मनुष्‍यक समस्‍त राग-वि‍राग ‘लोक’मे वि‍द्यमान अछि‍। मि‍थि‍लाक लोक संस्‍कृति‍ संवाहक उपन्‍यास ‘जि‍नगीक जीत’मे उपन्‍यासकार जीवनक आेइ‍ सत्‍यकेँ आत्‍मसात् करबाक प्रयास कएने छथि‍ जइ‍मे जीवनक समस्‍त ‘सार’ नुकाएल अछि‍। उपन्‍यासक मध्‍यमे उपन्‍यासकार मनुष्‍य जीवनक समस्‍त राग-वि‍राग, आशा-आकांक्षा, दीनता-हीनता, उत्‍कर्ष-अपकर्षक चि‍त्रि‍त करैत वस्‍तुत: जीवनक शाश्वत तथ्‍य- जीबाक इच्‍छाकेँ उजागर करबामे सफल भेल छथि‍। वस्‍तुत: ई उपन्‍यास भाषा अथवा बोलीमे जातीय स्‍मृति‍क आ साहि‍त्‍यि‍क रूप थि‍क जे हमर जातीय चेतना अथवा जातीय बोधकेँ सुरक्षि‍त राखने अछि‍। मि‍थि‍लाक सुच्‍चा चि‍त्र अंकि‍त करैत उपन्‍यासकार अपन जीवनानुभवसँ संचि‍त कएल ‘सार’ अओर ‘सत्‍य’केँ अभि‍व्‍यक्‍त कएने छथि‍। वस्‍तुत: ई उपन्‍यास मि‍थि‍लाक संस्‍कृति‍क प्रतीक थि‍क अओर एकर सार थि‍क शाश्वत। उपन्‍यास मध्‍य प्रकृति‍, परि‍वेश, आध्‍यात्‍म, समरसता अओर समन्‍वयक छवि‍ अओर छटा सर्वत्र दृष्‍टि‍गोचर होइत अछि‍। वर्तमान साहि‍त्‍यमे ई प्रवृति‍ प्रमुख अछि‍- एक समाजोन्‍मुख दोसर व्‍यक्‍ति‍ नि‍ष्‍ठा तथा आत्‍म केन्‍द्रि‍त। उपन्‍यासकारक प्रवृत्ति‍ समाजोन्‍मुख अछि‍। सम्‍पूर्ण उपन्‍यास मध्‍य मि‍थि‍लाक गामक लोकक रहन-सहन, अचार-वि‍चारक चि‍त्रण एतेक सजीव अछि‍ जे पाठककेँ आेइ‍ लोकमे लऽ जाइत अछि‍, जि‍नका गाम छुटि‍ गेल छन्‍हि‍। उपन्‍यास मध्‍य मि‍थि‍लाक समाजक चि‍त्र एतेक वास्‍तवि‍क रूपमे चि‍त्रि‍त्र भेल अछि‍ जे मि‍थि‍लाक माि‍ट-पानि‍क सुगन्‍धसँ पाठकक हृदए सहजहि‍ आह्लादि‍त भऽ जाइत अछि‍। वर्तमान समैमे गामक लोकक पड़ाइन शहर दि‍सि‍‍ भऽ गेल अछि‍, गाम पाछाँ छूटल जा रहल अछि‍। मुदा पाठक उपन्‍यास पढ़ि‍ पुन: गाम घुि‍र जाइत अछि‍, गामक स्‍मृति‍सँ पाठक बान्‍हल रहि‍ जाइत अछि‍। सामाजि‍क प्रश्नक प्रति सजग उपन्‍यासकार अपन ऐ‍ रचनामे सामाजि‍क जीवनक अर्न्‍तवि‍रोध, वि‍संगति‍ एवं परि‍वेशक चि‍त्रण करैत, सामाजि‍क प्रश्नक नि‍दान मूलत: व्‍यक्‍ति‍मे ताकबामे सफल भऽ गेल छथि‍। मि‍थि‍लाक ग्रामीण समाजक, नि‍म्‍नवर्गक एवं कृषक समुदायक मान्‍यता एवं परम्‍पराकेँ प्रस्‍तुत करैत उपन्‍यासकार उपन्‍यासकेँ अत्‍यन्‍त संवेद्य बना देने छथि‍ संगहि‍ एकटा नव संदेश-आशाक संदेश, भवि‍ष्‍य नि‍र्माणक संदेश देबाक सेहो प्रयास कएने छथि‍। ऐ‍ संदेशकेँ उपन्‍यासकार लोकक भाषामे व्‍यक्‍त करैत संकीर्ण एवं अव्‍यवहारि‍क पक्षकेँ मानवीय सरोकारसँ जोड़ैत कल्‍पनाशीलता एवं संवेदन शीलताकेँ केन्‍द्रमे राखि‍ अपन उद्देश्‍यकेँ चि‍त्रि‍त करबामे सफल भऽ गेल छथि‍। ‘बहुजन हि‍ताय बहुजन सुखाय’क ध्‍वनि‍ बुलंद करैत उपन्‍यासकार दया, ममता, आस्‍था, त्‍याग, परोपकार सदृश मानवीय गुणक पक्षधर प्रतीत होइत छथि‍। दोसर दि‍सि‍‍ ऐ‍ गुणकेँ प्राप्‍ति‍क दिसि‍ नि‍र्देश सेहो कएने छथि‍। आधुनि‍क बुद्धि‍जीवी मानवक कार्य, ज्ञान अओर इच्‍छाक बीच तालमेलक अभाव आधुनि‍क जीवनक वि‍डम्‍बना थि‍क। मुदा उपन्‍यासकार मि‍थि‍लाक सरल, नि‍श्‍छल एवं सहज लोकक चि‍त्रण करैत वस्‍तुत: मि‍थि‍ला शुद्ध, पवि‍त्र एवं सत्‍यक चि‍त्रण कएने छथि‍। उपन्‍यासक सभसँ पैघ वि‍शेषता थि‍क समाजक नि‍म्‍नवर्गक बोलचालक भाषा, लोक संवाद एवं लोकोक्‍ति‍क प्रयोगक संग समाजक वि‍षमता एवं वि‍संगति‍पर प्रहार करब। अपन जीवनानुभवकेँ अलग शैली एवं शि‍ल्‍पक माध्‍यमसँ नि‍रूपि‍त करबामे उपन्‍यासकार सफल भऽ गेल छथि‍। संगे‍ ईहो सत्‍य जे उपन्‍यासकारक अर्न्‍तमन अत्‍यन्‍त कोमल तन्‍तुसँ नि‍र्मित छन्‍हि‍, तँए हि‍नक उपन्‍यास मध्‍य ‘रि‍सेप्‍टीवि‍टीक’ स्‍तर बहुत गाढ़ भऽ गेल छन्‍हि‍। उपन्‍यासकार प्रमाणि‍त कऽ देने छथि‍ जे सहज लोक भाषाक माध्‍यमसँ नै‍‍ मात्र अपन अन्‍तर्परि‍ष्‍करण सम्‍भव अछि‍ अपि‍तु प्रकारान्‍तरसँ मानवीय दायि‍त्‍वक नि‍र्वहन सेहो। संबंधक अभावमे मनुष्‍य सुखा जाइत अछि‍। मनुष्‍य अपनामे बन्द हेबा लेल नै‍‍ बनल अछि‍। मनुष्‍यमे जतेक जे अछि‍, सभ ओकरा अन्‍यसँ माने दोसरसँ जोड़ैत अछि‍ आ प्रसन्‍नताकेँ बाँटैत अछि‍। सम्‍भत: यएह उपन्‍यासकारक इष्‍ट छन्‍हि‍। हम हि‍नक मंगलमय भवि‍ष्‍यक कामना करैत अंतमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक भंडारकेँ समृद्ध करबाक हेतु साधुवाद दैत छि‍यन्‍हि‍। पोथीक नाओं- जि‍नगीक जीत (उपन्‍यास) उपन्‍यासकार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन, राजेन्‍द्र नगर दि‍ल्‍ली। मूल्‍य- २५० टाका मात्र। प्रकाशन वर्ष- सन् २००९ पोथी पाप्‍ति‍क स्‍थान- पल्‍लवी डि‍स्‍ट्रीब्‍यूटर्स, वार्ड न.६, नि‍र्मली, सुपौल, मोबाइल न. ९५७२४५०४०५ गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा प्रीति ठाकुर रचित “गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा” पढ़बाक आ देखबाक सुयोग भेल। देखबाक ऐ लेल जे ई पोथी चित्रकथा थिक अर्थात चित्रक माध्यमे संकलित सोलह कथाक चित्रण लेखिका कएने छथि। सोलह कथामे नौ कथाक नायक छथि गोनू झा आ शेषमे रेशमा चूहड़मल, नैका-बनिजारा, भगता ज्योति पँजियार, महुआ घटवारिन, राजा सलहेस, छेछन महराज आ कालिदास। सभ पात्र मिथिलाक संस्कृतिक प्रतिनिधित्व करैत। वस्तुतः संस्कृति शब्द अत्यन्त व्यापक अछि, दोसर शब्दमे कहल जा सकैत अछि जे एहन बेवहार जे परम्परासँ प्राप्त होइत अछि, संस्कृति कहबैत अछि। एकरा सामाजिक प्रथाक पर्याय सेहो कहल जा सकैत अछि। प्रेम, त्याग, दया, करुणा, सहानुभूति आदि समस्त गुण संस्कृतिक अन्तर्गत समाहित होइत अछि। संगहि कलाक उद्देश्य जौं सौन्दर्यक अनुसंधान एवं रसानुभूति होइत अछि तँ कलाक संबंध लोक संस्कृतिसँ रहब आवश्यक भऽ जाइत अछि। गोनू झाक कथा मिथिलाक घर-घरमे जनकण्ठमे व्याप्त अछि, प्रायः प्रत्येक मिथिला निवासी अपन बुजुर्गसँ गोनू झाक कथा सुनने हएत आ पश्चात अपन बाल-बच्चा, संगी-साथीकेँ सुनौने हएत। तहिना नैका बनिजारा, सलहेस, छेछन महराज, भगता ज्योति पँजियार- अपन शौर्य, वीरता, पराक्रम आ उदात्त व्यक्तित्वक कारणेँ कहियो जौं लोकनायक छलाह तँ पाछाँ लोकदेवता रूपमे पूजित होमए लगलाह। तहिना कालिदास अपना विद्वता एवं पाण्डित्यसँ भारतीय संस्कृतिमे अपन महत्वपूर्ण स्थान निर्धारित कऽ लेने छथि। महुआ घटवारिनक आदर्श प्रेम कथा आदर्श रूपमे चित्रित होइत अमर भऽ गेल अछि। पोथीमे संकलित प्रत्येक पात्र एवं कथा मिथिलाक संस्कृतिक प्रतिनिधित्व कऽ रहल अछि। संस्कृति लोक जीवनसँ सम्बद्ध रहैत अछि। समाज आ संस्कृतिमे अभिन्न सम्बन्ध अछि किएक तँ संस्कृतिक निर्माण काल सापेक्ष होइत अछि, जेना समाजमे नीक कृत्यक अनुकरण होइत अछि। किछु अवधि पश्चात ओ समाजक प्रकृति भऽ जाइत अछि। कालान्तरमे यएह प्रकृति संस्कृतिक रूप धारण कऽ लैत अछि। एवं प्रकारे कृति, प्रकृति आ संस्कृतिक क्रम चलैत रहैत अछि। यएह कारण अछि जे संस्कृतिक निर्माण आ विनाशमे समए लगैत अछि जखनकि सभ्यतामे परिवर्तन-क्रम समैमे होइत अछि। पोथीमे संकलित प्रत्येक पात्र अपन-अपन समैक प्रतिनिधित्व करैत मिथिलाक संस्कृतिक प्रतीक छथि। कलाकार-लेखिका प्रीति ठाकुरजी रेखा आ रंगक माध्यमसँ चित्रकथाक रचना कएने छथि। प्रत्येक चित्र किछु संकेतकेँ प्रकट कऽ रहल अछि। अकारण वा अनायास किछु नै बनाओल जा सकैत अछि। प्रत्येक चित्र तथ्यात्मक अछि, प्रत्येक रेखा एकटा कथाक निर्माण कऽ रहल अछि। मिथिलाक जन-जीवनक अभिव्यक्ति ऐ चित्र कथाक माध्यमसँ भेल अछि। वस्तुतः लोक चित्र कला तत्कालीन लोक जीवनक चित्रण करैत अछि जेना लोकगीत, लोकनृत्य, लोकभाषा आदि माध्यमसँ तत्कालीन समाजक स्वरूपक ज्ञान होइत अछि। फूलक सुगंध सदृश संस्कृति अलक्ष्य होइत अछि मुदा वातावरणकेँ अपन सौरभसँ सतत सुवासित करैत रहैत अछि। ई आन्तरिक गुण थिक जकर मात्र अनुभव कएल जा सकैत अछि। एकर स्थान हृदैमे रहैत अछि, बाह्य आचरण ओकर मात्र प्रतिफल थिक। ऐ संस्कृतिक अभिव्यक्तिक माध्यम कला होइत अछि जेना नृत्यकला, संगीतकला, चित्रकला। चित्रकला मूक होइत अछि जकर भाषा रंग आ रेखा चित्र होइत अछि। कलाकार प्रीति ठाकुरजी मिथिलाक ऐ संस्कृतिकेँ नै मात्र रंग रेखाक माध्यमसँ चित्रित कएने छथि अपितु शब्दक माध्यमसँ चित्रित करैत अपन कलाकृतिक सौन्दर्य द्विगुणित कऽ लेने छथि। वस्तुतः हिनक ई प्रयास सर्वथा प्रशंसनीय छन्हि। कला मानव संस्कृतिक उपज थिक, कला आ मनुष्यक सम्बन्ध अविभाज्य अछि। मानव द्वारा कलाक प्रतिष्ठा भेल अछि आ कला द्वारा मानव आत्मगौरव आ आत्मचैतन्य प्राप्त कएने अछि। कलाक माध्यमे सँ मानव जीवनमे माधुर्य आ सौन्दर्यशीलताक जन्म भेल आ कर्म मधुर आ सुन्दर बनि गेल। वस्तुतः सौन्दर्यक मूलभूत प्रेरणा कलाक उद्घम स्थल थिक आ सौन्दर्याभिरुचिक प्रमाण। मनुष्यक अनुकरण प्रवृत्ति थिक। आदिये कालसँ प्राकृतिक दृश्य मानव मोनकेँ आनन्दित करैत रहल आ ऐ दृश्यक निर्माण करबाक इच्छा मोनमे जागृत भेल आ यएह इच्छा जन्मक प्रेरक भेल। प्रीति ठाकुर जीक आत्मगौरव एवं आत्मचैतन्य ऐ चित्र कथाक रचना लेल प्रेरक भेलनि, आत्मगौरव मिथिलाक संस्कृतिक प्रति एवं आत्मचैतन्य सौन्दर्यशीलताक कारणेँ आ जकर प्रतिफल भेल विभिन्न कालक मिथिलाक लोकनायकक चित्रकथाक माध्यमसँ निरूपण करबाक। प्रिन्ट मीडिया आ इलेक्ट्रानिक मीडियाक कारणेँ जखन सम्पूर्ण विश्वक ग्लोबलाइजेशन भऽ गेल अछि, मिथिलाक चित्रकलामे अन्य कलाक विधा सदृश सेहो पारम्परिक स्वरूपमे परिवर्तन भेल अछि। परिवर्तनेक दोसर नाओं तँ विकास थिक। लेखिका मिथिला चित्रकलाक पारम्परिक स्वरूपमे परिवर्तन तँ कएने छथि मुदा लोक चित्रकथाक माध्यमसँ एकर सार्थकता आ प्रासंगिकतामे सफल भेल छथि। किएक तँ मिथिलाक चित्रकला मूल्यग्राही अथवा कोमल हृदए कलाकारक मात्र हॉबी थिक अपितु परम्पराबद्ध समाजक एकटा अभिन्न जीवन-दर्शन थिक, संगहि मैथिल संस्कृतिक जीवनक एक अविच्छिन्न अंग सेहो। समाजक परिवर्तनक प्रभाव कला आ साहित्यपर पड़ब स्वाभाविक अछि संगहि कला आ साहित्य समाजक प्रतिबिम्ब सेहो थिक। वस्तुतः साहित्य युगक प्रवृत्ति एवं प्रयोजनक उपेक्षा नै कऽ सकैत अछि। कला जीवनसँ निरपेक्ष नै रहि सकैत अछि कारण एकर आधार मानव जीवन थिक। एकर पोषण जीवनसँ होइ छै, एकर प्रभाव मानव जीवनपर पड़ै छै, तँए कलाकार जीवनक प्रति अपन उत्तरदायित्वक उपेक्षा नै कऽ सकैत अछि। आ यएह कारण अछि जे कलाक स्वरूपमे परिवर्तन होइत रहैत अछि। ऐ वैश्विक प्रतियोगिताक युगमे मिथिलाक चित्रकला जइमे मात्र कोहबर, डाला, अष्टदल, अरिपन, मंडप, वेदी आदिक चित्र निर्माणक परिधिमे ओझराएल अछि, आवश्यक अछि जे मिथिला चित्रकलाक विषए-वस्तुमे विस्तार कएल जाए। लेखिकाक ई सर्वथा नूतन प्रयास छन्हि। प्रीति ठाकुरजी परम्परागत विषय वस्तुसँ आगाँ बढ़ि मिथिलाक लोक-कथाकेँ चित्रकथाक माध्यमे चित्रित करैत मैथिली साहित्य मध्य सर्वथा नूतन शैलीक रचना कएलनि अछि। निश्चित रूपसँ मैथिली साहित्यक भंडारमे श्रीवृद्धि तँ भेल अछिये, ई नव शैली, नव विषय वस्तु एक शब्दमे नव स्टाइल सर्वथा प्रशंसनीय अछि। समए परिवर्तनशील होइत अछि, ऐ बदलैत समैक संग जे अपनामे परिवर्तन नै आनैत अछि से विकासक धारासँ बाहर भऽ जाइत अछि। तँए समैक यथार्थक चित्रण कलाक माध्यमसँ होएब आवश्यक अछि, तखने कला अपन प्रासंगिकता सिद्ध कऽ सकैत अछि। वर्तमान बदलैत आधुनिक समाजक आवश्यकताक अनुरूप लेखिका ऐ पोथीक रचना कएलनि, ई प्रासंगिक तँ अछिये संगहि लोकोपयोगी सेहो अछि। संगहि एकटा तथ्य आर महत्वपूर्ण अछि। मैथिली लोक साहित्यक संरक्षिका मिथिलाक महिला लोकनि छथि, किएक तँ हिनकहि कण्ठमे लोकगीत आ लोकनृत्य आ हिनकहिं हाथे लोकचित्रकला जीवित अछि। त्याग आ तपस्यासँ युक्त हिनका लोकनिक सांस्कृतिक चेतनासँ लोककला जीवित अछि तथा हिनकहि लोकनिक कोमल तूलिकाक प्रसादात मिथिलाक चित्रकला जीवित, संरक्षित एवं विकसित भऽ रहल अछि। आ ई पोथी “गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा”क रचयिता सेहो महिला छथि। ई सर्वथा स्तुत्य थिक। कपि‍लेश्वर राउत मि‍थि‍लाक वि‍कास बाधा मुख्‍य रूपसँ मि‍थि‍लाक जे क्षेत्र अछि‍ से उत्तरमे नेपाल, दक्षि‍णमे गंगा, पूबमे बंगाल, पश्‍चि‍ममे उत्तर प्रदेश। जकर जीबक मुख्‍य आधार कृषि अछि‍। मुदा अपना ऐठाम जाति‍ बेवस्‍था, धर्म बेवस्‍था, लि‍ंग बेवस्‍था, तेना ने समाजकेँ जकड़ने अछि‍ जे ऐ‍ क्षेत्रक वि‍कासमे मूख्‍य रूपसँ बाधक अछि‍। एतेक परि‍वर्तन भेलाक बादो समाजमे रूठि‍वादि‍ता, सामंती सोच हर व्‍यक्‍ति‍केँ जकड़ने अछि‍। सराध, बि‍आह, उपनयनमे जरूरतसँ बेसी खर्च कऽ देब कि‍एक, तँ अपन रूआबकेँ प्रर्दशि‍त करबाक लेल। हर काजकेँ धर्म आधारि‍त मानब, ई सोलकन अछि‍, हम उच्‍च वर्ग छी, स्‍वर्ग, नरकक फेरा इत्‍यादि‍ समाजकेँ जकड़ने अछि‍। मनगढ़ंत राजा-रजवारक खि‍स्‍सा-पि‍हानी कहि‍ समाजकेँ बरगलेने रहब, ई सभ मि‍थि‍ला वि‍कास आ मि‍थि‍लावासीक लेल अभि‍शाप भऽ गेल अछि‍। जावत धरि‍ ऐ‍ सभसँ ऊपर उठि‍ सभकेँ अप्‍पन भाय-बन्‍धु बूझि‍ उन्नत वैज्ञानि‍क आधारि‍त कृषि, बाढ़ि‍ रौदीसँ नि‍जातक लेल बेवस्‍था, जाति‍ बेवस्‍थाक लोप, दान-दहेजक समाप्‍ति‍, सामन्ती‍ सोच आदि‍केँ नै बदलल जाएत, तावत धरि‍ मि‍थि‍लावासीक ि‍वकासक कल्‍पना केनाइये बेकार अछि‍। मि‍थि‍ला क्षेत्रक माटि‍ तँ एहेन अछि‍ जे सौंसे संसारमे एहन माटि‍ कतौ नै छै। अपना ऐठाम तँ जे फसल, जे तरकारी, जे फल उपजबए चाहब से उपजत। आइ जे मि‍थि‍लाक मजदूर पंजाव-हरि‍याणा पड़ाइन कए रहल अछि‍ से तुरन्‍त रूकि‍ जाएत। कि‍सानकेँ जे आइ मजदूर नै भेट ‍रहल छन्‍हि‍ आ दोसर दिसि‍ ऐठामसँ मजदूर दोसर राज्‍यमे नौकरी करैले जाइत अछि‍, से रूकि‍ जाएत। समाजमे समरसता आएत। सबहक दूख अपन दुख, सबहक सुखकेँ अपन सुख बुझए लागत तँ समाज स्‍वत: बदलि‍ जाएत। अखन जे गोर मौगी गौरबे आन्‍हर बनल छी, से स्‍वत: मेटा जाएत। जहि‍ना अपना ऐठाम राजा जनक कृषि‍केँ अपनाए कऽ राज चलौलनि‍ आ अष्टावक्रकेँ गुरु बनौलनि‍, तहि‍ना हमरो सभकेँ करए पड़त। हार-चामक फेरासँ ऊपर उठए पड़त। आ तखने सर्वे भवन्‍ति‍ सुखि‍ना सर्वे सन्‍तु नि‍रामया भऽ सकैत अछि‍। अपन मि‍थि‍ला कोनो राज्‍यसँ वि‍कसि‍त बनि‍ सकैत अछि‍। एकटा भाखरा-नांगल डेमसँ जँ पंजाब-हरि‍याणा भारतक सि‍रताज भऽ सकैत अछि‍ तँ हमर मि‍थि‍लाक लोक नौकरसँ कि‍सान नै भऽ सकैत अछि? कोशीमे ब्राहक्षेत्र आ कमलामे शीशा पानी आ वागमतीमे नूनथरमे डेम बना देलासँ मि‍थि‍ला तँ स्‍वर्ग बनि‍ए टा जाएत आ हम सभ आनो-आनो राज्‍यकेँ बि‍जली दऽ सकैत छी। जइ‍सँ आनो राज्‍य वि‍कसि‍त हएत। हर खेतकेँ पानि‍ आ हर हाथकेँ काज भेट जाएत। तँ जँ मुइलाक पछाति‍ जे स्‍वर्ग जाइत छी से जिबितेमे स्‍वर्गक सुख करए लागब। एकटा कल्‍पना सुनैत छि‍ऐ जे मि‍थि‍लाकेँ मण्‍डन मि‍श्रक सुग्‍गा आ पानि‍ भरनि‍यो संस्‍कृतेमे गप्‍प करैत छल, से आइ मि‍थि‍लामे ८० प्रति‍शत मूर्ख केना भऽ गेल। जखनि‍ कि‍ अओर आगाँ मुहेँ हेबाक चाही छल ने। हमरा समझमे एकटा मूल बात अबैत अछि‍ जे कि‍छु व्‍यक्‍ति‍ वि‍शेषमे अहंगक भावना। जहि‍ना संस्‍कृत भाषा कि‍छु व्‍यक्‍ति‍ वि‍शेष अपन खानगी बुझलनि‍, परि‍णाम कोठी कन्‍हेपर राखल रहि‍ गेल आ आम जनतामे प्रचार-प्रसार नै‍‍ भऽ सकल, तहि‍ना मि‍ि‍थलाक मैथि‍लीयो भाषाकेँ ई रूप नै देखए पड़ए। ई हमरा सभ लेल वि‍चारणीय मुद्दा अछि‍। रमाकान्‍त राय ‘रमा’ (आचार्य दि‍व्‍यचक्षु) गामक जि‍नगी भारतीय भाषा साहि‍त्‍यमे ग्राम्‍यांचलक उर्वर भूमिमे सभ कि‍छु उपजैत अछि‍- अन-धन-लक्ष्‍मी। जँ आम सन अमृत फल होइत अछि‍ तँ करैला सन तीत सेहो। जँ सभ रूपमे औषधि‍ सन धातृफल तँ सभ तरहेँ अनि‍ष्‍टकारक बरहर सेहो। कनकजीर आ तुलसी फूल स्‍वादि‍ष्‍ट चाउर हम सभ उपजाबैत छी, कऽन-साग-मरूआ आ अकटा-मि‍सि‍या सन कुअन्न सेहो समए-कुसमए लोकक क्षुधा शांति‍ कऽ गरि‍मा मण्‍डि‍त होइत अछि‍। दोसर दि‍सि‍ भादो मासमे झहरैत वर्षामे भीज कऽ थाल-कादोमे खि‍ल्‍ली-छाबा डुबा कऽ जँ धान रोपैत अछि‍ तँ चैत-बैसाखक बड़कैत रौदमे गहुम काटैत अछि‍, दाउन करैत अछि‍ तथा माध मासक हारमे धुसि‍आइबला जाड़ आ जन-मारूख शीतलहरीमे राति‍-राति‍ भरि‍ जागि‍ कऽ लोक रवि‍-राइक पटौनी करैत अछि‍। काजमे जँ कनि‍को उफाँटि‍ भेल कि‍ पलमे प्रलए भऽ जाइ छै। लोकक जीवन अपटी खेतमे चलि‍ जाइ छै मुदा जँ जीवि‍त रहि‍ लोक काज सम्‍पन्न कऽ लैत अछि‍ तँ की की ने देखैत अछि‍- ताड़क गाछ तरेगन आ दि‍नोमे तरेगन। गाम उर्वर भूमि‍ एक-सँ-एक वि‍द्वान, वैज्ञानि‍क, राजनेता आदि‍केँ अपना अंकमे पोसैत आबि‍ रहल अछि‍, तँ एक-सँ-एक कवि‍-कलाकार-साहि‍त्‍यकारकेँ सेहो। राष्‍ट्रकवि‍ मैथि‍लीशरण गुप्‍त, रामधारी सि‍ंह “दि‍नकर‍” आ अमर कथाकार मुंशी प्रेमचंद गामेक उर्वर भूमि‍क पुत्र छलाह जे अपन-अपन क्षेत्रक शि‍खर पुरुष भेलाह। मि‍थि‍ला मूलत: मैथि‍ली भाषा-भाषी ग्रामीण क्षेत्रक वि‍शाल भूभागमे पसरल अछि‍। तँए ऐठाम सेहो अधि‍कांश लेखक, कवि‍, कलाकार-साहि‍त्‍यकार प्राय: गामेक मूल नि‍वासी छथि‍। मुदा एकटा बात आन भाषासँ मैथि‍लीमे भि‍न्न ई अछि‍ जे जतए आन भाषाक रचनाकार-कलाकार अपन कृति‍मे गामकेँ वि‍शेष जगजि‍यार करबाक चेष्‍टा केलनि‍ अछि‍ तेना मैथि‍लीमे नै। ओना राजकमल, यात्री, मायानन्‍द, ललि‍त, धीरेन्‍द्र, धूमकेतू आदि‍क रचनामे गाम आएल अछि‍ अवश्‍य मुदा ओकर मात्रा बड्ड थोड़ अछि‍‍। जेना राजकमलक “ललका पाग‍” सन कथामे गामक नारीक नि‍श्‍छल प्रेमक प्रवाह अछि‍ तँ ललि‍तक “रमजानी‍”मे पि‍छड़ल अल्‍पसंख्‍यकक कथा नीक जकाँ बि‍कछा कऽ कहल गेल अछि‍। जहि‍ना मायानन्‍द मि‍श्रक “खौंता आ चि‍ड़ै‍” मे उच्‍च वर्ग आ पि‍छड़लक वर्ग संघर्षक कथा नीक जकाँ स्‍थान पओलक अछि‍ तहि‍ना यात्रीक “बलचनमा‍” मे सेहो ऐ माैलि‍कताक स्‍पष्‍ट रेखांकन भेल अछि‍। आनो-आन नव-पुरान कथाकार मि‍थि‍लाक गामक कथा लि‍खलनि‍ अछि‍ मुदा खेति‍हर-मजदूर, नि‍म्नवर्गक बोनि‍हार, एक साँझ खा कऽ दोसर साँझक जोगारमे बेकल लोकक कथाक अभावे रहल अछि‍। श्री जगदीश प्रसाद मंडलक कथा संग्रह “गामक जि‍नगी‍” ऐ‍‍ प्रकार अभावक पूर्ति करैत अछि। गामक सम्‍पूर्ण चि‍त्र देखेबामे सक्षम भेल अछि‍। ओतबए नै, ऐमे ने केवल नि‍म्न-मघ्‍य वि‍त्त आ पि‍छड़ल नि‍म्नवर्गक कथा अछि‍ प्रत्‍युत गामसँ बाहर रहि‍ अयोध धामन-गहुमन साँप सन वि‍षधरक कथा सेहो अछि‍ जे अपन जीवनक सांध्‍य बेलामे प्रदूषण मुक्‍त गामोकेँ अपन वि‍षक धधकैत ज्‍वालमे भस्‍मसात करए चाहैत छथि‍। “गामक जि‍नगी‍” कथा संग्रहमे कुल उन्नैसटा कथा अछि‍ जे समग्रतामे मूल रूपसँ गामक कथा अछि‍। ऐ सभ कथाक कोनो ने कोनो पात्र गामक अछि‍- व्‍याधि‍ रोग-शोक, ईर्ष्‍या-द्वेष, घृणा-सि‍नेहक शि‍कार कतौ ने कतौ अवश्‍य होइत अछि। कि‍छु कथामे तँ एना लगैत अछि‍ जे कथा नायक वा उपनायक जीवनसँ पूर्णत: नि‍राश भऽ अनि‍श्चयक भ्रमरजालमे ओझरा जाएत मुदा तखने आशाक सूर्यक कि‍रि‍ण हुनका जीवनमे एकटा नव उत्‍साह, उमंग भरि‍ दैत छन्‍हि‍ आ ओ पुन: वि‍श्वाससँ भरि‍ नव-जीवनक शुभारम्‍भ करबामे जुटि‍ जाइ छथि‍। कि‍छु कथामे एक क्षेत्रक लोककेँ दोसर क्षेत्रक भौगोलि‍क परि‍वर्तनजन्‍य कि‍छु अनेरूआ फसि‍लक वि‍षएमे व्‍यवहारि‍क ज्ञानक अभाव रहैत अछि‍ जइसँ दैवी प्रकोपक समए नीक जकाँ जीवन-यापन कएल जा सकैत अछि‍। कथाकार जगदीश प्रसाद मंडल जीवनक उतरार्द्धमे लि‍खब प्रारम्‍भ कएलनि‍ अछि‍। ओना कि‍छु पहि‍नौंसँ लि‍खबाक अभ्‍यास छल होएतनि‍ मुदा देखार रूपमे मात्र दू-अढ़ाइ वर्षक अवधि‍मे दर्जन भरि‍सँ अधि‍क पोथीक सृजन कऽ ई एकटा नव कीर्तिमान स्‍थापि‍त कएलनि‍ अछि‍। जइमे आधा दर्जनसँ अधि‍क पोथी प्रकाशि‍त भऽ गेल छन्‍हि‍। मनुष्‍यक जीवनमे नि‍त्‍य अनेक घटना-दुर्घटना-संघर्षक संग हर्ष-वि‍षादक अवसर अबैत अछि‍। ओइ महँक कि‍छु सार्थक क्षणकेँ समेटि‍ कऽ मानवोचि‍त मर्यादा, दायि‍त्‍वबोध, सुरक्षा, संरक्षा, सु-वि‍वेचन-रचनादि‍ द्वारा मनुष्‍यमे जि‍जीवि‍षा उत्‍पन्न कऽ पुनर्स्थापि‍त करब कथाकारक दायि‍त्‍व अछि‍। जगदीशबाबू ऐमे पूर्ण सि‍द्धस्‍त छथि‍। माँजल छथि‍। जँए कि‍ ई ग्रामीण अंचलमे एकटा राजनैति‍क कार्यकर्ताक रूपमे समाजकेँ खूब नीक जकाँ चि‍न्हने छथि‍, जन-जनक, गरीब-अमीरक सुख-दु:खमे सहभागी रहल छथि‍, तँए ओकर नोन-तेल-हरदि‍सँ लऽ कऽ जन्‍म-मरण धरि‍क साक्षी रहलाह अछि‍। ऐ अनुभव सभकेँ ओ नीक-जकाँ बि‍कछा-बि‍कछा कऽ अपन कथा सबहक तानी-भरनी बनौलनि‍ अछि‍। तँए हुनक रचना मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे एकदम बेछप बूझि‍ पड़ैत अछि‍। बेछप अछि‍! डॉ. मेघन प्रसाद अपन पुस्‍तक “मैथि‍ली कथा कोश” मे कथाक प्रसंग अपन वि‍चार ऐ प्रकारसँ व्‍यक्‍त कएलनि‍ अछि‍- “कथा, जीवनक एकटा खण्‍ड चि‍त्र अछि‍ जे सम्‍पूर्ण जीवनक व्‍याख्‍या नै कऽ ओकर मात्र एकटा घनीभूत क्षणक उद्घाटन करैत अछि‍।‍” वस्‍तुत: कथा अपन आकारगत सीमाक कारणेँ एक्केटा घटनाक प्रभावशाली चि‍त्रण कऽ सकैत अछि‍। ओइमे प्रासंगि‍क कथा अथवा वि‍वरणक बेसी स्‍थान नै होइत अछि‍। दोसर शब्‍दमे कथा गद्यक एकटा छोट अत्‍यन्‍त सुघटि‍त अओर अपनामे पूर्ण साहि‍त्‍य रूप अछि‍। (भूमि‍का पूष्‍ठ-२) जगदीश प्रसाद मंडलक कथा ऐ दृष्‍टि‍सँ कनि‍को पथ-च्‍युत नै भेल छन्‍हि‍। हँ, हि‍नक कथा सभमे कि‍छु वि‍स्‍तार अवश्‍य अधि‍क अछि‍ मुदा ओतेक वि‍स्‍तार नै जे मात्र कथाक एक्केटा रूप, वि‍हनि‍कथा रहि‍ जइतए, जखन कि‍ ओइमे घनीभूत क्षणक उद्घाटन करबा लेल कि‍छु वि‍स्‍तार प्रयोजन बांछनीय होइछ। एकटा बात आर, हि‍नक कोनो कथामे प्रासंगि‍क वि‍वरण सेहो लघुरूप धारण कऽ घुसि‍आएल अवश्‍य भेटत। मुदा ओइसँ ने तँ कथाक मौलि‍कता प्रभावि‍त बूझि‍ पड़त आ ने ओकर औपन्‍यासि‍क वि‍स्‍तार बुझाएत। भने कोनो-कोनो कथाकेँ लघुक स्‍थानपर दीर्घकथा कहबे श्रेयस्‍कर होएत। सुप्रसि‍द्ध कथाकार डॉ. सुभाषचन्‍द्र यादव हि‍नक कथाक वि‍शि‍ष्‍टता मादे कहैत छथि‍ जे हि‍नक कथामे औपन्‍याि‍सक वि‍स्‍तार अछि‍। वर्तमान समैमे प्रचलि‍त आ मान्‍य कथासँ हुनक कथा भि‍न्न अछि‍। हुनक कथा घटना बहुल आ ऋृजुसँ युक्‍त अछि‍। डॉ. मेघन प्रसादक वि‍चार जतए आम कथाक वि‍षएमे कहल गेल अछि‍ ओतहि‍ डॉ. यादवक वि‍चार मात्र श्री जगदीश प्रसाद मंडलपर केन्‍द्रि‍त अछि‍। मुदा शब्‍दक कनेक हेर-फेरसँ दुनू व्‍यक्‍ति‍क वि‍चार जइ वि‍न्‍दुपर मि‍लैत अछि‍ से अछि‍ डा. यादव द्वारा प्रत्‍युत शब्‍द- “ऋृजु‍” अछि‍। ओ हि‍नका जीवन संघर्षक कथाकारक रूपमे स्‍थापि‍त करैत जि‍जीवि‍षा, मानवीयता आ आदर्शकेँ सुदृढ़ आ पुनप्रति‍ष्‍ठि‍त करबाक उद्देश्‍यसँ अनुप्रमाणि‍त मानैत छथि‍। एक्के संग अनेक नीक भावक संयोजनकेँ ऋृचा जकाँ बहुभावाभि‍व्‍यक्‍ति‍क संभावनाकेँ ऋृजु संज्ञा रूपमे डॉ. यादवक सोचक व्‍याख्‍या कएल जा सकैत अछि‍। जेना कि‍ संग्रहक नाओंसँ स्‍पष्‍ट अछि‍- ऐ पुस्‍तकमे गामक जि‍नगीक कथा कहल गेल अछि। मुदा आइ-काल्हि‍ केहनो ठेठ गामक जीवनमे कतौ ने कतौ शहर आबिए जाइत अछि‍। तखन कथाकार ऐ हेतु सभठाम पूर्ण सचेष्‍ट छथि‍ जे गाम आ शहरक ऐ दुरभि‍संधि‍मे गामक मौलि‍कता भुति‍आ नै जाए, हेरा नै जाए। हि‍नक कथा सभमे जँ कतौ गाम आ शहर मि‍झराएलो अछि‍ तँ ओ ऐ दुनूक सुच्‍चा स्‍वरूपकेँ स्‍पष्‍ट रूपेँ रेखांकि‍त कएलनि‍ अछि‍ आ शहरक नग्रक जि‍नगीपर गामक जि‍नगी सभ ठाम प्रभावी देखाओलनि‍ अछि‍। “भैंटक लाबा, बि‍साँढ़ आ पि‍रारक फड़‍” ई तीनू कथा एक्के भूमि‍पर प्रति‍ष्‍ठि‍त अछि‍ भैंट, बि‍साँढ़ आ पि‍रारक उपयोगक वि‍षएमे जइठामक लोक नै जनैत छथि‍ हुनक पति‍ (जँ ओइठाम ओ वस्‍तु प्रयुक्‍त होइत हुअए) कि‍ंवा पत्नीसँ ऐ वि‍षएमे जानि‍-बूझि‍ कऽ बाढ़ि‍, सुखारक समैमे ओकर सदुपयोग कऽ ओइसँ त्राण पएबाक ई एकटा सशक्‍त साधन होइत अछि‍। मुदा समाने भाव-भूमि‍क होइतो तीनू कथाक ई वि‍शेषता अछि‍ जे बि‍साँढ़ जतए रौदीमे, सुखारमे गरीबक जीवन रक्षक होइत अछि‍, ओतहि‍ भैंटक लाबा बाढ़ि‍सँ बि‍लटल परि‍वारक रक्षक होइत अछि‍। मुदा पि‍रारक फड़ सामान्‍य समैओमे लोकक व्‍यंजनक बेगरता मेटबैत अछि‍। ऐ तीनू कथा गढ़बा काल लेखक ऐ हेतु पूर्ण साकांक्ष छथि।‍ ऐ स्‍थि‍ति‍-परि‍स्‍थि‍तमे गामक गि‍रहस्‍तक लेल कोन-कोनटा उपकरणक उपयोग अपेक्षि‍त अछि‍। ऐसँ आेइ‍ अव्‍यवहृत वा कम व्‍यवहृत सरंजाम-उपकरणक धि‍यान एकबेर आेइ‍ सभ लोककेँ आबि‍ जाइत छन्‍हि‍ जे ग्राम्‍य संस्‍कृति‍सँ बहुत दिनसँ सुदूर रहि‍ रहल छथि‍। “अनेरूआ बेटा‍” केँ नि‍:संतान दम्‍पति‍ अपन बना कऽ पोसैत अछि‍। पहि‍ने चाहक दोकान कऽ कए ओ क्रमश: पढ़ब-लि‍खब सि‍खैत अछि‍। ओकर जि‍ज्ञासु मन स्‍वाध्‍यायक बलपर साहि‍त्‍य सृजन दि‍सि‍ उन्‍मुख होइत अछि‍ आ क्रमश: ओहूमे सम्‍मान जनक स्‍थान प्राप्‍त करैत अछि‍। गामक वातावरणसँ सर्वथा असंपपृक्‍त, शहरी जीवनक अभ्‍यासी एकटा वकील साहेबक नवयुवती पुत्रीकेँ ओकर साहि‍त्‍य अपना दि‍सि‍ आकृष्‍ट करैत अछि‍। ओ ओकरासँ भेँट कऽ ओकरे संग अपन जीवन व्‍यतीत करबाक स्‍वप्न देखैत अछि‍। अपन स्‍वभाव-प्रभावसँ माए-बापकेँ मना कऽ ने केवल ओकरासँ बि‍आह करबामे सफल होइत अछि‍ प्रत्‍युत गृहस्‍थ जीवनक हेतु आवश्‍यक सभटा सरंजामो पि‍तोसँ करबा लैत अछि‍। ठेलाबला अा ि‍रक्‍साबला दुनू करेज तोड़ मेहनति‍बला लोक मुदा पहि‍ल जँ अपन कमाइसँ अपन दुनू बेटाकेँ नीक जकाँ मैट्रीक पास करबा कऽ “शि‍क्षा-भि‍न्न‍” बना कऽ उपराग जि‍नगी जीबैत अछि‍ तँ “रि‍क्‍साबला‍” जतए बैसारीमे रि‍क्‍शा चलबैत अछि‍ तँ शेष समए एकटा चि‍मनीक मालि‍कक संग पुरैत अछि‍। एकदि‍न मालि‍कक कनि‍याँक दि‍नचर्या ओकरे मुँहसँ सुनि‍ कऽ ओकर भौति‍क जीवनक लाचारीक लाचारी आ आँखि‍ महँक भूख देखि‍ कऽ अनठा कऽ अपन घर पड़ाइत अछि‍। “‍डाॅ. हेमंत” केँ बाढ़ि‍ग्रस्‍त क्षेत्रक डयूटीपर जएबाक जे जेतेक संशय, ग्रामीण वातावरण, सामन्‍यजस्‍यक समस्‍या आ ग्रामक अशि‍क्षि‍त लोकक संग रहबाक हीन ग्रन्‍थि‍ छलनि,‍ सभटा ग्रामीणक सदव्यवहार, सहयोग आ नि‍श्‍च्‍छल कार्यव्‍यापारसँ दूर भऽ जाइत छन्‍हि‍ आ गाममे बि‍ताओल क्षण हुनका जीवनक एकटा अनमोल स्‍मारक जकाँ मानस पटलपर अंकि‍त भऽ जाइत छन्‍हि‍। बाहर रहि‍ जीवन भरि‍ भ्रष्‍टाचारमे आकंठ डूमल रहि‍ दूटा पि‍ति‍औतक जीवनमे ऐ भौति‍कवादी युगक उपादानो सभसँ जखन स्‍वाभि‍मानपर चोट पहुँचैत छन्‍हि‍ तखन गामक जि‍नगीक मोह गछारैत छन्‍हि‍। मुदा गाममे पास करबासँ पहि‍नहि‍ घरारीक बटबाराक क्रममे गामक शांत जि‍नगीमे ओ दुनू भाँइ उत्कोच आ छल-छद्मक बलेँ जखन कि‍छु अनुचि‍त नै करा पबैत छथि‍ तखन प्रेम चन्‍द्रक “पंचपरमेश्वर‍” सँ कोनो कम महत्‍पूर्ण अछि‍ नि‍श्‍च्‍छल ग्रामीण मि‍थि‍लाक ई कथा भैयारी। बोनि‍हार-मरनीक बातपर जँ ओकरासँ काम करौनि‍हार मदमस्‍त ठीकेदारक आँखि‍ नोरा जाइत अछि‍ तँ आनक कथे की? ऐ वैज्ञानि‍क युगमे श्रमक जतेक अवमूल्‍यन भेल अछि‍, भऽ रहल अछि,‍ ओतेक कोनो आन वस्‍तुक नै। ऐमे ग्‍लाेबलाइजेशनक बड्ड पैघ हाथ छै। नै तँ एकटा कुम्‍हार जँ एक बेर कोशीक कटावसँ गाम छोड़ि‍ पड़ा कऽ दोसर गाममे बसैत अछि‍, तँ दोसर बेर अपन वस्‍तु जातक, श्रमसँ उत्‍पादि‍त वस्‍तुक ग्राहक अभावसँ गाम छोड़बाक नि‍श्चय करैत अछि‍। मुदा संयोगसँ तइ समए ओकर भुति‍आएल बेटा प्रचुर टाका-पैसाक संग आपस आबि‍ जाइ छै जे आब कुम्‍हारक नै, मूर्तिकार आ चि‍त्रकारक रूपमे अपनाकेँ स्‍थापि‍त कऽ लेने छल। तँए ओइ कुम्‍हारक हारि‍ जीत‍‍मे बदलि‍ जाइत छै। पुस्‍तकक भाषा ठेठ ग्रामीण अछि‍ जइमे स्‍थानीय लोकोक्‍ति‍, मुहावरा आ सभसँ बेशी अप्रचलि‍त ठेठ ग्रामीण शब्‍दक बाहुल्‍य पुस्‍तककेँ अत्‍यधि‍क महत्‍वपूर्ण तत्‍व कहल जा सकैत अछि‍। बहुत कथामे तँ जाति‍गत पेशामे उपयोगमे आबएबला सभटा सामग्रीक नाओं एवं उपयोगक उल्‍लेख अछि‍ जे ओइ शब्‍दकेँ वि‍स्‍मृति‍क खाधि‍मे जएबासँ बचएबाक सफल प्रयास कहल जा सकैछ। “डीहक बँटवारा‍” शीर्षक कथामे गुरु काका गामक प्रसंग जे वि‍चार रखलनि‍ अछि‍ से द्रष्‍टव्‍य अछि‍- “गाम तँ गामे छी। शुद्ध मि‍थि‍ला। भारत। जे स्‍वर्गोसँ नीक अछि‍। मुदा सभ गामक अपन-अपन चरि‍त्र आ प्रति‍ष्‍ठा छैक। जे चरि‍त्र आ प्रति‍ष्‍ठा गामक कर्मठ, ति‍यागी लोकनि‍ बनौने छथि‍। अपन कठि‍न मेहनति‍ आ कर्तव्‍यसँ सजौने छथि‍। ओकरा जीवि‍त राखब तँ अखुनके लोकक कान्‍हपर भार अछि‍ कि‍ ने?.....‍ ई तँ नहि‍ जे गदहा गेल स्‍वर्ग तँ छान-पगहा लगले गेलै।” नि‍ट्ठठ गाममे ईर्ष्‍या-द्वेष कम सि‍नेह भैयारी-यारी अधि‍क रहैत अछि‍। जतए अपन जन्‍मलि‍ बेटी अपने धि‍या-पुतामे व्‍यस्‍त रहि‍ माएक मृत्‍युशय्यापर सुनि‍ कऽ देखबा लेल, सेवा करबा लेल नै आबि‍ पाबैत अछि‍ ओतहि‍ वि‍जातीय-नैहरक दूरक आन आन धर्मक “बहीन‍” ने केवल देखबा लेल आबैत अछि‍ प्रत्‍युत बहीनकेँ जीवि‍त रहबा धरि‍ सेवा करबाक उद्दात भावनसँ अभि‍भूत “हि‍न्‍दु-मुस्‍लि‍म एकता‍” गाममे कतेक अधि‍क गहींर अछि‍- ई सि‍द्ध करबा लेल पर्याप्‍त अछि‍। आ यएह थि‍कै गामक जि‍नगीक कथाक मूल तत्‍व। कथाकार लेखक संपादक श्री गजेन्‍द्र ठाकुरक अनुसार जगदीश प्रसाद मंडलक कथा मैथि‍ली साहि‍त्‍यक पुनर्जागरणक प्रमाण उपलब्‍ध करबैत अछि‍ तथा हि‍नक कथा मैथि‍ली कथा धराकेँ एक भगाह होएबासँ बचा लैत अछि‍। उदाहरणमे ओ मात्र हि‍नक एक कथा बि‍साँढ़केँ उपस्‍थापि‍त करैत कहैत छथि‍ जे १९६७ईं.क अकालमे देखाओल गेल छल जे मुसहर लोक बि‍साँढ़ खा कऽ अकालसँ लड़ि‍ रहल छथि‍ मुदा ऐपर कथा लि‍खल गेल २००९ई.मे जगदीश प्रसाद मंडलजी द्वारा। हम “गामक जि‍नगी‍” कथा संग्रहक आधारपर ई कहए चाहब जे जहि‍ना हि‍न्‍दीमे ग्राम्‍यांचलक कथाकारमे प्रेमचन्‍द असगरे छलाह, तहि‍ना मैथि‍ली कथाक ऐ पुनर्जागरण कालमे, मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा असगरे अछि‍- तोहर सरि‍स एक तोहे माधव! चर्चित पाेथी- गामक जि‍नगी प्रकाशन वर्ष- २००९ लेखक- श्री जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन पृष्‍ठ- १७६ मूल्‍य- २०० टाका मात्र आरसी बाबूक व्‍यक्‍ति‍त्‍व एवं कृति‍त्‍वपर द्वि‍दि‍वसीय राष्‍ट्रीय सेमि‍नार दू दर्जन वि‍द्वानक सहभागि‍ता : आचार्य दि‍व्‍यचक्षु मुजफ्फरपुर। साहि‍त्‍य अकादेमी नई दि‍ल्‍ली आ स्‍नातकोत्तर मैथि‍ली वि‍भाग, बाबा साहब भीमराव अम्‍बेदकर बि‍हार वि‍श्ववि‍द्यालय मुजफ्फरपुरक संयुक्‍त तत्‍वधानमे महाकवि‍ आरसी प्रसाद सि‍ंहक जन्‍म शतवार्षिकीक अवसरपर एकटा द्वि‍दि‍वसीय सेमि‍नारक आयोजन गत १६-१७ दि‍सम्‍बर २०१०केँ वि‍श्ववि‍द्यालयी पुस्‍तकालयक सभागारमे कएल गेल, जइमे दू दि‍न धरि‍ दू दर्जनसँ अधि‍क वि‍द्वान अपन-अपन आलेखक पाठ केलनि‍। जइमे आरसीबाबूक महनीय सारस्‍वत व्‍यक्तित्‍वक वि‍भि‍न्न पक्षपर वि‍शद वि‍वेचन कएल गेल। १५ दि‍सम्‍बरकेँ आयोजि‍का सह मैथि‍ली वि‍भागाध्‍यक्ष डाॅ. कमला चौधरीक अध्‍यक्षतामे उद्घाटन सत्र १० बजे प्रारम्‍भ भेल। कार्यक्रमक आरम्‍भमे स्‍नातकोत्तर मैथि‍ली वि‍भागक छात्रागण गोसाओनि‍क गीत प्रस्‍तुत केलनि‍। वि‍श्ववि‍द्यालयक कुलपति‍ डॉ. राजदेव सि‍ंह आरसीबाबूक चि‍त्रपर माल्‍यार्पण एवं दीप प्रज्‍वलि‍त कऽ कार्यक्रमक उद्घाटन केलनि‍। स्‍वागत गीतक बाद साहि‍त्‍य अकादेमीमे उपसंपादक श्री देवेन्‍द्र कुमार देवेश, सभागत अति‍थि‍, प्रति‍भागी साहि‍त्‍यकार एवं समुपस्‍थि‍त श्रोतागणक स्‍वागत केलनि‍। अकादेमीमे मैथि‍ली भाषाक प्रति‍नि‍धि‍ डाॅ. वि‍द्यानाथ झा वि‍दि‍त, आरसी प्रसाद सि‍ंहक वि‍राट व्‍यक्‍ति‍त्‍व, हुनक साहि‍त्‍य साधनाक वि‍स्‍तृत फलकपर वि‍द्वत्‍वर्ग द्वारा गहन वि‍चार-वि‍मर्श करबाक आह्वान केलनि‍। डॉ. नरेश कुमार वि‍कल, अपन बीज भाषणमे हुनक साहि‍त्‍य साधनाक वि‍स्‍तृत चर्च करैत हुनक राष्‍ट्रवादी, उदात्त एवं स्‍वाभि‍मानी चरि‍त्रक वि‍स्‍तृत चर्च करैत मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे हुनक अवदानक सेहो चर्च केलनि‍। ऐ अवसरपर साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा प्रकाशित डाॅ. दि‍व्‍येन्दु पालित‍क डॉ. देवेन्‍द्र झा द्वारा अनुदि‍त बंगला उपन्‍यासक लोकार्पण डाॅ. वि‍द्यानाथ झा वि‍दि‍त द्वारा सम्‍पन्न भेल। डॉ. मदन मि‍श्र धन्‍यवाद ज्ञापन केलनि‍‍। मध्‍याह्न १२ बजे डॉ. देवेन्‍द्र झाक अध्‍यक्षतामे दोसर सत्र आरम्‍भ भेल जइमे डॉ. नरेन्‍द्र नारायण झा ि‍नराला, आरसी बाबूक रचनाक ऐति‍हासि‍क परि‍प्रेक्ष्‍यपर एवं डॉ. लावण्‍य कीर्ति सि‍ंह काव्‍या आरसीक रचनामे संगीत तत्वपर अपन-अपन आलेख पाठ केलनि‍। श्रोताक वि‍शेष आग्रहपर डॉ. नरेश कुमार वि‍कल अपन बहुप्रशंसि‍त कवि‍ता कहुना कऽ चलि‍ आउ अपन गाम क सस्‍वर पाठ केलनि‍। भोजनोपरान्‍त अपराह्न ३ बजे डॉ. पद्मनारायण झा वि‍रंचिक अध्‍यक्षतामे श्री राजन सि‍ंह, डॉ. रामनरेश सि‍ंह एवं श्री श्रीमन्‍त पाठक आरसी बाबूक काव्‍यक वि‍भि‍न्न आयामपर वि‍स्‍तृत प्रकाश देलनि‍। वि‍दि‍त जीक आग्रहपर श्रीमन्‍त पाठक अपन एकटा गीत सेहो प्रस्‍तुत केलनि‍। पहि‍ल एवं तेसर सत्रक संचालन डॉ. अमरनाथ झा एवं दोसर सत्रक डॉ. सुलेमान केलनि‍। दोसर दि‍न १६ दि‍सम्‍बरकेँ डॉ. नागेश्वर सि‍ंह शशीन्‍द्रक अध्‍यक्षतामे श्री रमाकान्‍त राय रमा, श्री दि‍वाकान्‍त पाठक एवं श्रीमती सुशीला झा आरसी बाबूक रचनाशीलता, जीवन दर्शन, व्‍यक्तित्‍व एवं आदर्शपर अपन-अपन सारगर्भित आलेखक वाचन केलनि‍। वि‍दि‍त जीक आग्रहपर श्री अमलेन्‍दु शेखर पाठक बेंगलोर'मे भेल सर्वभाषा लेखक संगोष्‍ठि‍क वि‍षएपर अपन अनुभव सुनौलनि‍ आ ओइ प्रस्‍तुत अपन रचनाक सेहो पाठ केलनि‍‍। अध्‍यक्ष डाॅ. शशीन्‍द्रजी आरसी प्रसाद सि‍ंहक जीवनक वि‍भि‍न्न पक्षपर चर्च करैत जनौलनि‍ जे हुनकामे अपन भावना व्‍यक्‍त करबाक एकटा अद्भुत कला छल। ओ मैथि‍लीए नै हि‍न्‍दी भाषामे सेहो अनेक आयाम वि‍कसि‍त केलनि‍। भोजनोपरान्‍त पुन: डॉ. कमला चौधरीक अध्‍यक्षतामे समापन सत्र आरम्‍भ भेल जइमे डॉ. प्रमोद कुमार सि‍ंह, डॉ. प्रफुल्‍ल कुमार सि‍ंह मौन आ डॉ. श्रीमती नीता झा अपन-अपन प्रति‍वेदन लऽ उपस्‍थि‍त भेलाह। प्रमोद बाबू आरसीक वि‍राट ि‍हन्‍दी साधना आ मातृभाषा मैथि‍लीक अा साधनाक तुलनात्‍मक वि‍श्‍लेषण करैत मैथि‍ली सेवा लग हि‍न्‍दी सेवाकेँ फूस जकाँ बतौलनि‍। हि‍न्‍दीक वि‍द्वान प्रवक्‍ता एवं साहि‍त्‍यकार होइतो ओ मैथि‍लीमे धराप्रवाह बाजैत हुनक बाल साहि‍त्‍य, कि‍शोर साहि‍त्‍य एवं प्रौढ़ साहि‍त्‍यक प्रसंग वि‍स्‍तृत चर्च केलनि‍। डॉ. नीता झा सम्‍पूर्ण कार्यक्रमक पर्यवेक्षण प्रति‍वेदन प्रस्‍तुत केलनि‍ जइमे सबहक सभ वक्‍ताक सम्‍भाषण मूल तत्‍वक बीज वि‍द्यमान छल। डॉ. प्रफुल्‍ल कुमार सि‍ंह मौन अपन समापन भाषणमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक वर्तमान दशा-दि‍शाक चर्च करैत ऐमे आरसी बाबूक महती योगदानक चर्च केलनि‍ जे यद्यपि‍ ओ हि‍न्‍दी आ मैथि‍ली दुनूमे लि‍खि‍लनि‍ मुदा हि‍न्‍दी हुनका ओ सम्‍मान नै देलकनि‍ जकर ओ अधि‍कारी छलाह। मैथि‍ली हुनक मातृभाषा छलनि‍ जे अपन पुत्रक सम्‍मान दऽ मान बढ़ौलक। डॉ. वि‍द्यानाथ झा वि‍दि‍त मैथि‍ली भाषाक लेल साहि‍त्‍य अकादेमी, भारतीय भाषा संस्‍थान आ भारत सरकारक योजनाक प्रसंग वि‍स्‍तृत जानकारी देलनि‍। आजुक तीनू सत्रक संचालन डॉ. अमरनाथ झा केलनि‍। श्री शैलेन्‍द्र चौधरी धन्‍यवाद ज्ञापन केलनि‍। मैथि‍ल पत्र-पत्रि‍का : समस्‍या ओ समाधान : “‍देशक स्‍वतंत्रताक ६२-६३ वर्षक बादो मैथि‍लीक माध्‍यमे प्राथमि‍क शि‍क्षाक बेवस्‍था नै रहबाक कारणे मैथि‍ली भाषा-भाषी अपन मातृभाषाक पत्र-पत्रि‍कासँ नै जुड़ि‍ पबैत छथि‍, मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍का आ पुस्‍तक नै पढ़ि‍ सकैत छथि‍। तँए यत्र-कुत्र मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍का देखि‍यो कऽ ने तँ ओ किनबा लेल उत्‍सुक होइत छथि‍ आने पढ़बा लेल। ई मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍का प्रकाशनक सभसँ प्रमुख समस्‍या अछि‍।” ई वि‍चार प्रो. शि‍वकान्‍त पाठक गत २ अगस्‍तकेँ दूरदर्शनक मुजफ्फरपुर केन्‍द्रसँ प्रसारि‍त मैथि‍ली दैनि‍क समाचार पत्र-पत्रि‍का: समस्‍या ओ समाधान वि‍षएपर आयोजि‍त कएटा परि‍चर्चामे व्‍यक्‍त कएलनि‍। कार्यक्रमक संचालन करैत साहि‍त्‍यकार श्री रमाकान्‍त राय रमा कहलनि‍ जे यावत् मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍काकेँ व्‍यवसायि‍क दृष्‍टि‍कोणसँ सम्‍पादन, बेवस्‍थापन, वि‍तरण आ संयोजनक फराक-फराक कऽ एेपर एक समान धि‍यान नै देल जाएत तावत् मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍का दीर्घायु नै भऽ सकैछ। वर्तमान समैमे प्रकाशि‍त पूर्वोत्तर मैथि‍ली, मि‍थि‍ला दर्शन, मि‍थि‍ला दर्पण आदि‍ पत्र-पत्रि‍काक चर्च करैत कहलनि‍ जे ऐ सभ पत्रि‍कामे रचना, वि‍ज्ञापन आ वि‍तरणक नीक समन्‍वय रहैत अछि‍ जे नीक संयोजन-बेवस्‍थापनक कारणे भऽ पबैत अछि‍ आ पत्रि‍का दीर्घजीवी अछि आ रहत से वि‍श्वास कएल जा सकैत अछि‍। मुजफ्फरपुर दूरदर्शन केन्‍द्रक सृजन कार्यक्रममे आयोजि‍त ऐ मैथि‍ली परिचर्चामे प्रो. शि‍वकान्‍त पाठक, डॉ. नरेश कुमार वि‍कल आ डा. नारायण प्रति‍भागी छलाह। कार्यक्रमक संचालन श्री रमाकान्‍त राय रमा कऽ रहल छलाह। डॉ. नरेश कुमार वि‍कल मैैथि‍ली पत्र-पत्रि‍काक त्रुटि‍पूर्ण वि‍तरण बेवस्‍था आ ओकर आर्थिक आधारकेँ सुदृढ़ करबापर जोर दैत कहलनि‍ जे यावत् मि‍थि‍लाक लक्ष्‍मीवान नीक पँूजी लगा कऽ सम्‍पूर्ण मि‍थि‍लांचलमे साइकिलपर घूमि‍-घूमि‍ कऽ अखबार बेचनि‍हार भेंडरकेँ साइकिलपर नै टहलौताह तावत् मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍काकेँ अल्‍पायुए हेबाक सम्‍भावना अछि‍। आधा घंटाक ऐ परि‍चर्चाक प्रस्‍तुति‍ सहायक छलाह सृजन कार्यक्रमक प्रभारी अधि‍कारी श्री मुकेश कुमार। परि‍चर्चामे अपन महत्‍वपूर्ण सहभागि‍ता देखबैत डा. नारायण झा ई स्‍पष्‍ट कएलनि‍ जे वि‍ज्ञापन आ वि‍तरण ऐ दुनूमे अन्‍योन्‍याश्रय सम्‍बन्‍ध अछि। जँ मैथि‍ली भाषा-भाषी अधि‍काधि‍क समाचार पत्र किनताह, पढ़ताह तँ लोक अपन सामग्रीक प्रचार-प्रसार हेतु वि‍ज्ञापन देबे करताह। आ जँ पत्र-पत्रि‍काकेँ वि‍ज्ञापन भेटतै तँ ओकर आधार अवश्‍य मजगूत हेतै, जे ओकर दीर्घायुक आधार हेतै। नारायण बाबू एकटा आर महत्‍वपूर्ण गप्‍प कहलनि‍ जे पाठकक रूचि‍क पाठ्य-सामग्री एवं रोचक-प्रेरक समाचारक संकलन ि‍नश्चय समाचार पत्र आ पत्रि‍काकेँ लोकप्रि‍य बनेबाक सामर्थ्‍य रखैत अछि। एे क्रममे डॉ. वि‍कल जोड़लनि‍- “समसामयि‍क परि‍वेशकेँ प्रश्रय देब एवं नव लोकक लेखन-सम्‍पादनसँ जोड़ब सेहो मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍काकेँ गति‍शील बनाओत। शि‍वकान्‍त बाबू पूर्वमे प्रकाशि‍त ‍अपन पत्रि‍का वागमतीक अनुभवक आधारपर कहलनि‍ जे हम जतेक दि‍न मासि‍क वागमती पत्रि‍का सम्‍पादि‍त प्रकाशि‍त कएलौं, हमरा आेइ‍सँ आर्थिक हाि‍न नै भेल। मुदा वि‍तरण बेवस्‍थाक त्रुटि‍ ओहो स्‍वीकार कएलनि‍। नारायण पत्रि‍का सबहक फराक-फराक वर्तनीकेँ मैथि‍ली भाषाक लेल घातक बतौलनि‍। वर्तनीक एकरूपतापर सम्‍पादक एवं भाषा विशेषज्ञकेँ धि‍यान देबाक आह्वान कएलनि‍। रमाकान्‍त राय रमा चारि‍ बेर तीन ठामसँ तीनटा मैथि‍ली दैनि‍क पत्राचार पत्रक प्रकाशन करैत जोड़लनि‍ जे स्‍वदेश, मि‍थि‍ला मि‍हि‍र आ मि‍थि‍ला समादमे एखन मात्र एकटा दैनि‍क मि‍थि‍ला समाद मात्र ऐ चारि‍ कोटि‍ लोक दैनि‍क अछि। जे मैथि‍ली भाषाक पाठकक दारि‍द्रय द्योतक अछि। परि‍चर्याक समापन करैत संचालक श्री रमाकान्‍त राय रमा सभ प्रति‍भागीकेँ हुनक महत्‍वपूर्ण एवं मौखि‍क वि‍चारक अभि‍व्‍यक्‍ति‍ लेल धन्‍यवाद दैत कहलनि‍ जे समग्रत: कहल जा सकैत अछि‍ जे मैथि‍ली माध्‍यमे प्राथमि‍क शि‍क्षा, सुदृढ़ आर्थिक आधार, समसामयि‍क प्रभावोत्‍पादक रचना, रोचक-प्रेरक समाचार, मानक मैथि‍ली भाषाक वर्तन, वि‍ज्ञापन जुटएबाक सार्थक प्रयास, सम्‍पादन, वि‍तरण एवं बेवस्‍थापनक फराक-फराक नीक बेवस्‍था इत्‍यादि‍ प्रमुख बि‍न्‍दुपर जँ धि‍यान देल जाए तँ मैथि‍ली दैनि‍क समाचार पत्र ओ पत्रि‍का सभ नि‍श्चि‍त रूपसँ दीर्घायु हएत आ पाठकगणक संतुष्टिक संग मि‍थि‍लाक जन-जन धरि‍ पहुँचत। प्रगति‍शील एवं सनातन वि‍चारधाराक समन्‍वयात्‍मक उपन्‍यास- ‘मौलाइल गाछक फूल’ ‘मौलाइल गाछक फूल’ श्री जगदीश प्रसाद मंडलक सद्य: प्रकाशि‍त उपन्‍यास थि‍कनि‍ जेकर वि‍मोचन ०३ अप्रैल २०१०केँ जनकपुरधाम (नेपाल)मे आयोजि‍त ‘सगर राति‍ दीप जरय’ कथा गोष्‍ठीक अवसरपर भेल। ऐ‍मे प्रगति‍शील जनवादी आ पौराणि‍क सनातनी वि‍चारधाराक समन्‍वयक नीक जकाँ वर्णन भेल अछि‍। जगदीश प्रसाद मंडलजी मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल नव नै‍‍ रहलाह। ७-८ वर्षक रचना धर्मिता आ मात्र दू-तीन बर्षक प्रकाशन प्रसारसँ ई मैथि‍ली जगतमे अपन एकटा नीक स्‍थान बना लेलनि‍। आे स्‍थान सेहो आन-आन लेखकसँ फराक आ बेछप अछि‍। ओना साहि‍त्‍यमे हि‍नक प्रवेश राजनीति‍ पटलसँ भेल अछि‍। “पैंतीस साल समाज सेवा कऽ हहरैत शरीर देखि‍ कि‍छु लि‍खै-पढ़ैक वि‍चार भेल।‍” (भूमि‍का।) ओ अपन पहि‍ल कथा ‘सगर राति‍ दीप जरय’ कथा गोष्‍ठीमे पढ़ि‍ प्रशंसा प्राप्‍त कएलनि‍। लि‍खबाक लति‍ बढ़लनि‍ आ ओ अनवरत लि‍खए लगलाह- कथा, वि‍हनि‍ कथा, दीर्घ कथा, उपन्‍यास, एकांकी, नाटक, कवि‍ता। जे लि‍खबाक रूचि‍ भेलनि‍- दि‍ल खोलि‍ कऽ लि‍ख रहल छथि‍। प्रकाशनक कोनो चि‍ंता नै‍‍। ओ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रकाशनक रूढ़ प्रक्रि‍या दिसि‍ कहि‍यो नै‍‍ सोचलनि‍ आ रचना धर्मितासँ वि‍मुख नै‍‍ भेलाह। हुनका अपन रचनापर पूर्ण आस्‍था आ वि‍श्वास छन्‍हि‍। मधुबनी कथा गोष्‍ठीमे पठि‍त हि‍नक कथा ‘बि‍साँढ़’ घर बाहरमे आ दोसर कथा ‘चूनवाली’ सन् २००९ क उतरार्द्धमे ‘मि‍थि‍ला दर्शन’ मे छपल। ऐ‍ दुनू रचनाक कथानक, लि‍खबाक शैली ओइमे व्‍यक्‍त वि‍चारधारासँ लोक वेश प्रभावि‍त भेल। लेखनमे नव रहि‍तौं अनुभूति‍क अभि‍व्‍यक्‍ति‍ कौशलसँ लबालब भरल हि‍नक रचना सभ मि‍थि‍लांचलक आम जीवनकेँ नीक जकाँ प्रतिबि‍म्‍बि‍त करैत अछि‍ जे पाठककेँ चुम्‍बक जकाँ अपना दिसि‍ आकृष्‍ट कऽ लैत अछि‍। वि‍देह प्रथम मैथि‍ली पाक्षि‍क ई-पत्रि‍काक संपादक श्री गजेन्‍द्र ठाकुर मानैत छथि‍ जे ‘जगदीश प्रसाद मंडल शि‍ल्‍पी छथि‍, कथ्‍यकेँ तेना समेटि‍ लैत छथि‍ जे पाठक वि‍स्‍मि‍त रहि‍ जाइत अछि‍। समाजक सभ वर्ग हि‍नक कथ्‍यमे भेटैत अछि‍ आ से आलंकारि‍क रूपमे नहि वरण् अनायास, जे मैथि‍ली साहि‍त्‍य लेल एकटा हि‍लकोर अएबाक समान अछि‍।’ यएह कारण अछि‍ जे हि‍नक सात-आठ टा पुस्‍तकक प्रकाशन दुइये कथा प्रकाशनक बाद दि‍ल्‍लीक प्रति‍ष्‍ठत प्रकाशक ‘श्रुति‍ प्रकाशन’ द्वारा वर्षाभ्‍यन्‍तरे भेल अछि‍। एहन मैथि‍ली लेखक वि‍रले छथि‍ जे मात्र अपन लेखन क्षमताक बलपर कोनो प्रकाशककेँ एतेक अत्‍यल्‍प अवधि‍मे आकृष्‍ट कऽ अपन प्रारम्‍भि‍क रचनोक प्रकाशनक मार्ग प्रशस्‍त कएने होथि‍! ‘मौलाइल गाछक फूल’क कथानक तँ सोझ अछि‍। रमाकान्‍त गामक एकटा पैघ भूस्‍वामी प्राय: दू सए बीघा भूमि‍क माि‍लक छथि‍। ओ कम पढ़ल-लि‍खल रहलाक बादो परोपकारक भावना, गाम-समाजक हि‍तक चि‍ंतासँ सदति‍ चि‍ंति‍त रहैत छलाह। घोर अकालमे अन्न बि‍नु हकन्न कनैत लोक लेल ने केवल स्‍वयं अपन पोखरि‍ उराहबाक काजसँ जन-गणक मन मोहि‍ लैत छथि‍ प्रत्‍युत अड़ोसि‍यो-पड़ोसि‍यो गाममे श्रीसम्‍पन सभकेँ एहन-काज करबा लेल उत्‍प्रेरि‍तो करैत छथि‍। अपन वि‍द्वान पि‍ता द्वारा सम्‍पति‍ आ हुनकेसँ प्राप्‍त ज्ञानक कारणे कालान्‍तरमे ओ अपन सभटा भूमि‍ समाजक सभ वर्गक दीन-हीन लोकमे बाँटि‍ कऽ स्‍वयं चैनक वंशी बजबैत छथि‍। हुनका अपन भरण पोषणक कनि‍यो चि‍ंता नै‍‍ छन्‍हि। कि‍एक तँ हुनक दू-दूटा पुत्र मद्रासमे डाक्‍टरी पढ़ि‍ आेइ‍ठाम सरकारी सेवामे छन्‍हि। ओ दुनू अपन मनोनकूल मेहनति‍सँ अर्जित कऽ नीक घर-द्वारि‍ बना ओतहि‍ रहैत छथि‍। ओ सभ यदा-कदा गाम आबि‍ माता-पि‍ता आ गामक लोकसँ भेँट-घाँट कऽ जाइत छथि‍। गाममे दूटा वस्‍तुक अभाव छै- पहि‍ल उच्‍च शि‍क्षा लेल वि‍द्यालय आ दाेसर दुखि‍त-पीड़ि‍तक लेल चि‍कि‍त्‍सालय। रमाकान्‍तक सहयोगे पहि‍ने एकटा पुरुष आ एकटा महि‍ला प्राथमि‍क चि‍कि‍त्‍साक ट्रेनि‍ंग मद्राससँ कऽ अबैत छथि‍। पछाति‍ जमीन्‍दारक डाक्‍टर पुत्र आ पुत्रवधू जखन गाम अबैत छथि‍ तँ पि‍ता आ समाजक समझौला-बुझौला तथा परोपकार एवं जनसेवाक भावनासँ प्रेरि‍त भऽ चारि‍म डाक्‍टरमे सँ एक एकटाकेँ क्रमश: गाममे रहि‍ लोकक सेवा करबा लेल तैयार भऽ जाइत छथि‍ आ गाममे चि‍कि‍त्‍सा आरम्‍भ कऽ दैत छथि‍। ऐ‍सँ मात्र आेइ‍ गामक लोककेँ नै‍‍ प्रत्‍युत लग-पासक आनो-आन गामक मौलाइल गाछ, रोग व्‍याधि‍ ग्रस्‍त लोक सभमे चि‍कि‍त्‍सा सुवि‍धा रूपी नव जीवनक फूल बि‍हँसि‍ उठैत अछि‍। उपन्‍यास आ लघु‍कथाक कथानकमे अन्‍तर होइछ। कथामे जीवनक किछु दि‍न, कि‍छु क्षणक उतार-चढ़ाव, स्‍थि‍ति‍-परि‍स्‍थि‍ति‍क वर्णन होइत अछि‍, मुदा उपन्‍यासमे जीवनक प्राय: सम्‍पूर्ण नै‍‍ तँ अधि‍कसँ अधि‍क घटना, दुर्घटनाक आरोह-अवरोहक महत्‍वपूर्ण बाटपर रोकैत, वि‍श्राम करैत, थाकैत, खसैत, पड़ैत, उठैत स्‍थि‍ति‍क नि‍रपेक्ष लेखन अछि‍। कथाकेँ जलखैक भूजा कि‍ंवा सातु मानल जाए तँ उपन्‍यासक वि‍न्‍यास पूर्णत: भोजन अछि‍। ई उपन्‍यास आदर्श जनवादी धरातलपर ठाढ़ अछि‍। ऐठाम जनवादमे जे अादर्शक समन्‍वय भेल अछि‍, से प्रशस्‍त सनातन परम्‍परामे सेहो विद्यमान अछि‍। जेना ऐ‍ उपन्‍यासमे कएल गेल एकटा महत्‍वपूर्ण कार्य अछि‍ परोपकार। महर्षि व्‍यास परोपकारकेँ पुण्‍यक एकमात्र कार्य मानैत छथि‍- “अष्‍ट्ादश पुराणेषु व्‍यासस्‍य वचनद्वयम्। परोपकार: पुण्‍याय पापाय पर पीड़नम्।।” दोसर शब्‍दमे हम कहि‍ सकैत छी जे उपन्‍यासकार मार्क्‍सवादसँ नीक जकाँ प्रभावि‍त छथि‍ मुदा अपन सनातन परम्‍परा, धर्म-कर्म आ आचार-वि‍चारक प्रति‍ सेहो वि‍शेष सहानुभूति‍ रखैत छथि‍। एकरा देश-काल आ परि‍वेश प्रभाव सेहो कहल जा सकैछ। उपन्‍यासक भाषा ठेंठ ग्रामीण भाषा अछि‍ जे मधुबनी जि‍लाक पूर्वांचलमे बाजल जाइत अछि‍। हमरा उपन्‍यासक ई आंचलि‍क भाषा प्रभावि‍त अवश्‍य करैत अछि‍ मुदा कतौ-कतौ आंचलि‍कता आकि‍ बोल-चालक भाषा मानक मैथि‍ली भाषाकेँ काटैत जकाँ लगैत अछि‍ कि‍एक तँ ऐ‍मे हमरा क्रि‍या पदक अपूर्ण प्रयोग जकाँ बुझाइत अछि‍। जेना- कि‍छु फुरबे ने करैत। (पृ.५), बखारि‍क धान आ मड़ुआक हि‍साब मि‍लबैत।, मुसनाक बोली साफ-साफ नि‍कलबे ने करैत। ऐठाम ऐ‍ तीनू वाक्‍यक क्रि‍या पद अपूर्ण लगैत अछि‍। हमरा जनैत मानक मैथि‍लीमे क्रमश: कि‍छु फुरबे करैक/करैत छलैक।, हि‍साब मि‍लबैत छलाह आ निकलबे ने करैक/करैत छलैक ऐ‍ प्रकारे हएत। एहन क्रि‍यापदक प्रयोग प्राय: सभ पृष्ठपर अछि‍ जइसँ हमरा बूझि‍ पड़ैछ जे ई आेइ‍ ग्राम्‍यांचलक वि‍शेष प्रयोग होइक जकरा अंगीकार करब, लेखककेँ समुि‍चत बुझएलनि‍। कारण कोसे-कोसे पानी‍ आ पाँच कोसपर वाणी तँ सुप्रसि‍द्धे अछि‍। मूल कथामे अनेक छोट-छोट उपकथा, सह कथा कथानककेँ अत्‍यधि‍क रोचक बनबैत अछि‍। तहि‍ना कतेको ठाम लेखक अपन वि‍चारक वीथी वि‍भि‍न्न पात्रक मुखसँ कहबौने छथि‍ जे नीक सूक्‍ति‍ कि सदुक्‍ति‍ बनि‍ कऽ पुस्‍तकसँ फराको रहि‍ लोककेँ प्रेरणा दैत रहत। जेना- (क) जनकक राज मि‍थि‍ला थि‍कैक तेँ मि‍थि‍लावासीकेँ जनकक कएल रस्‍ता पकड़ि‍ कऽ चलक चाही। (ख) मनुखमे जन्‍म लेलापर कि‍यो माए-बापक सेवा नहि‍ करै तँ ओ मनुखे की? (ग) मनुखकेँ कखनो नि‍रास नै‍‍ हेबाक चाि‍हएेक, जखने मनुखमे नि‍राशा अबैत छैक तखने मृत्‍यु लग चल अबै छैक। तेँ सदि‍खन आशावान भऽ जि‍नगी वि‍तेबाक चाहि‍एेक। कठि‍नसँ कठि‍न समए कि‍एक ने आबए मुदा वि‍वेकक सहारा लऽ आगू डेग बढ़ेबाक चाहि‍ऐक। इत्‍यादि‍। समग्रत: मौलाइल गाछक फूल मार्क्‍सवादी वि‍चारधारा आ भारतीय सनातन वि‍चारधाराक समन्‍वयवादी एकटा एहन मौलि‍क कृति‍ अछि‍ जकरा मैथि‍ली भाषाक पाठक पढ़बाक लेल सदति‍ उत्‍सुक रहताह- ई हमर दृढ़ वि‍श्वास अछि‍। चर्चित पोथी- मौलाइल गाछक फूल (उपन्‍यास) लेखक- श्री जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन, न्‍यू राजेन्‍द्र नगर दि‍ल्‍ली-११००८ दाम- २५० टाका मात्र। पृष्‍ठ संख्‍या- १२८ पोथी प्राप्‍ति‍क स्‍थान- पल्‍ल्‍वी डि‍स्‍ट्रीब्‍यूटर्स वार्ड नं.६, नि‍र्मली (सुपौल) डॉ. योगानन्‍द झा गामक जि‍नगी‍ आस्‍था, जि‍जीवि‍षा ओ संघर्षक प्रवाह श्री जगदीश प्रसाद मंडल कृत “गामक जि‍नगी‍” हि‍नक उन्नैस गोट कथाक संग्रह थि‍क। ऐ‍‍ कथा सभमे मि‍थि‍लाक ग्राम्‍य जीवनक मौलि‍क ओ अकृत्रि‍म छवि‍ अभि‍व्‍यक्त भेल अछि‍। आजुक संक्रमणशील युगमे मि‍थि‍लाक गाम कोन तरहेँ अपन परम्‍परि‍त जीवन पद्धति‍, आस्‍था ओ वि‍श्वासक संग प्रबल जि‍जीवि‍षाक बलेँ नि‍रन्‍तर संघर्ष पथपर आरूढ़ अछि से कुशलताक संग रूपायि‍त कएल गेल अछि‍। संग्रहक तीन गोट कथा क्रमश: ‘भैंटक लावा’, ‘बि‍साँढ़’ ओ ‘पीराड़क फड़’ मि‍थि‍लामे उपलब्‍ध प्राकृति‍क उपादानक उपयोगि‍तापर वि‍मर्श प्रस्‍तुत करैत अछि‍। बाढ़ि‍ आ सुखारसँ पीड़ि‍त मि‍थि‍लाक जनसमुदाय अपन जीवन रक्षाक हेतु कोन तरहेँ भैंट, बि‍साँढ़, पीरार आदि‍केँ अपन मेहनति‍क बलेँ खाद्य पदार्थक रूपमे ग्रहण करैत रहल अछि‍ तथा ऐठामक प्राकृति‍क संसाधनक उपयोग द्वारा केना मि‍थि‍लाक भूखमरी ओ बेरोजगारीकेँ दूर कएल जा सकैछ, एकर आर्थिक वि‍कास कएल जा सकैछ, तकर चि‍त्र ऐ‍‍ तीनू कथामे भेटैत अछि‍। श्रमपर वि‍श्वास, ईमानदार प्रयास, कर्मण्‍यता ओ चातुर्यक संबलसँ वि‍पन्नतापर वि‍जयक ई गाथा सभ मि‍थि‍लाक लोकजीवनमे व्‍याप्‍त उत्‍साह ओ संघर्षक मर्मस्‍पर्शी चि‍त्र प्रस्‍तुत करैत अछि‍। संग्रहक अन्‍यान्‍य कथा सभमे वि‍भि‍न्न प्रकारक समस्‍या सभपर वि‍मर्श प्रस्‍तुत भेल अछि‍ आ एक गोट आदर्श ग्राम्‍य समाजक परि‍कल्‍पना प्रस्‍तुत भेल अछि‍। दहेजक सामाजि‍क समस्‍याक उन्‍मूलनक दृष्‍टि‍ए ‘घरदेखि‍या’ कथा अत्‍यन्‍त हृदैस्‍पर्शी अछि‍। मि‍थि‍लाक उच्‍चवर्गीय समाजमे धन-लोलुपताक कारणे उत्‍पन्न ऐ‍‍ समस्‍याक कुफल नारी प्रताड़नाक अति‍रेकक रूपमे अत्‍यन्‍त गर्हित स्‍थि‍ति‍ प्राप्‍त कएने अछि‍ जकर कारणे कन्‍याक बि‍आह एकटा पैघ समस्‍या बनल रहल अछि‍ आ एकर कोनो ठोस समाधान अद्यावधि‍ समक्ष नै‍‍ आबि‍ सकल अछि‍। मण्‍डलजी ऐ‍‍ समस्‍याक समाधान लोकजीवनक वैचारि‍क परि‍वर्त्तनकेँ मानैत छथि‍ आ सर्वहारा वर्गक अति‍शय दीन पात्र लुखि‍यासँ कहबैत छथि‍- “नै। हम ककरो बेटीकेँ पाइ लऽ कऽ अपना घर नै आनब।‍” लुखि‍याक एे वाक्‍यमे दहेज समस्‍याक प्रति‍ समाधानक दि‍शा-बोध होइत अछि‍। आजुक युग तकनीकक युग थि‍कै। नि‍त्‍य नूतन तकनीकक वि‍कासक कारणेँ जे कि‍यो अपन तकनीकी ज्ञानमे अद्यतन बनल नै‍‍ रहि‍ सकत, ओ जीवन-संघर्षमे पाछाँ धकेलि‍ देल जाएत। ऐ‍‍ तथ्‍यसँ अवगत करएबाक उद्देश्‍य मण्‍डलजीक दुनू गोट कथा- ‘दूटा पाइ’ आ ‘हारि‍-जीत’मे अभि‍व्‍यक्‍त भेल अछि‍। ‘दूटा पाइ’क फेकुआ नूतन फैशनक अनुरूप सि‍आइक काज सि‍खबामे असमर्थ रहैत अछि‍ तँए ओकरा शहरो छोड़ए पड़ै छै आ जीवि‍कासँ हाथो धो लैत अछि‍। जखन कि‍ ‘हारि‍-जीत’ कथाक रामदत्त कुम्‍हारक व्‍यवसायमे होइत नि‍त्‍य परि‍वर्त्तनक अनुरूप अपन व्‍यवसायोमे परि‍वर्त्तन कऽ मूर्ति‍कार बनि‍ जीवि‍कोपार्जनमे समर्थ बनल रहि‍ पबैत अछि‍। ओकरा जीवि‍कापर ऐ‍‍ परि‍वर्त्तनक कोनो असरि‍ नै‍‍ पड़ि‍ पबै छै जे घरैया बासनमे माटि‍क बदला धातुक प्रयोग होमए लगै छै आ खपराक घरक स्‍थानपर एस्‍बेस्‍ट्स शीटक मकान लऽ लै छै। ऐ‍‍ तरहेँ ई दुनू कथा युग-परि‍वर्त्तनक संग चलबाक शि‍क्षा प्रदान करैत अछि‍। उपयोगि‍तापर आधारि‍त बेवहारपरक ऐ‍‍ युगमे लोक स्‍वार्थ मात्र दिसि‍ ततेक झूकि‍ गेल अछि‍ जे वृद्ध माता-पि‍ताक प्रति‍ कुभेला एकटा सामान्‍य बात भऽ गेल अछि। आइ मातृ देवो भव, पि‍तृ देवो भव लोक संस्‍कारसँ वि‍लुप्‍त भेल जा रहल छै। श्रवण कुमारक आदर्शसँ लोक बान्‍हल नै‍‍ रहि‍ सकल अछि‍। जइ‍‍ भारतमे कृतज्ञतावशात् लोक गाछ पर्यन्‍तक पूजक अछि‍, ततहि‍ पालि‍-पोसि‍, पढ़ा-लि‍खा कऽ समर्थ बनौनि‍हार माताे-पि‍तोक प्रति‍ कृतज्ञ रहबामे संकोच भऽ रहल छै। समाजमे आएल ऐ‍‍ परि‍वर्त्तनकेँ रेखांकि‍त कऽ मंडलजी दू गोट कथामे ऐ‍‍पर वि‍मर्श प्रस्‍तुत कएलनि‍ अछि‍ जकर नाओं अछि‍ क्रमश: भैयारी आ बहि‍न। भैयारीक कुसुमलाल अपन जेठ भाय दीनानाथक परि‍श्रमक बलपर उपार्जित पाइसँ जखन पढ़ि‍-लि‍ख कऽ नोकरी करए लगैत अछि‍ तँ गामक अपन हि‍स्‍साक सम्‍पत्ति‍ बेच‍ शहरी जीवन व्‍यतीत करए लगैत अछि‍। ओकरा अपन लकवाग्रस्‍त पि‍ता आ वृद्धा माताक कोनो धि‍यान नै‍‍ रहै छै। तँए जखन ओ दारूक सेवनक कारणेँ असमए कालकवलि‍त हेबापर वृत्त भऽ जाइत अछि‍ आ माएकेँ ई समाद भेटै छन्‍हि ‍जे ओ ओकर अन्‍ति‍म दर्शन कऽ लेथि‍ तँ माइक ऐ‍‍ उक्‍ति‍मे वृद्धा माता-पि‍ताक वैकल्‍य अभि‍शापक रूपमे प्रकट होइत अछि‍- “कुसुमा हमर बेटा थोड़े छी जे मुँह देखबै। उ तँ ओही दि‍न मरि‍ गेल जइ दि‍न हमरा दुनू परानीकेँ छोड़ि‍ चलि‍ गेल। आइ बीस बर्खसँ ऐ हाथ-पएरक बलेँ बीमार पति‍केँ जीवि‍त राखि‍ अपन चूड़ी आ सि‍नूरक मान रखने छी।‍” ‘बहीन’ कथामे सरोजनी नामक वृद्धाक कथा अछि‍ जनि‍क मृत्‍युक अवसरपर बजौलो उत्तर हुनक पुत्री रीता हुनक अन्‍ति‍म दर्शनक हेतु नै‍‍ अबैत छथि‍ आ व्‍यस्‍त हेबाक लाथ लगा दैत छथि‍ जखनकि‍ परजाति‍क मुसलमानि‍ बहि‍ना शबाना हुनका देखबाक हेतु अबै छथि‍न। राधेश्‍यामक ऐ‍‍ चि‍न्‍तनमे सम्‍बन्‍ध-बन्‍धक वास्‍तवि‍कताकेँ उद्घाटि‍त करैत कहल गेल अछि‍- “दुनि‍याँमे बहि‍नि‍क कमी नै‍‍ अछि‍। लोक अनेरे अप्‍पन आ वीरान बुझैत अछि‍। ई सभ मनक खेल थि‍क। हँसी-खुशीसँ जीवन बित‍बैमे जे संग रहए वएह अप्‍पन।‍” माता-पि‍ताक प्रति‍ धि‍यापुताक कुभेलाक संगहि‍ ऐ‍‍ कथामे मानवतावादक प्रति‍पादन मंडल जीक लक्ष्‍य बुझना जाइत अछि‍। उच्‍च शि‍क्षा प्राप्‍त वर्गमे सम्‍प्रति‍ वि‍देश गमनक लि‍लसा प्रबल देखल जाइत अछि‍। ऐ‍‍ प्रवृत्ति‍क कारणे ओ लोकनि‍ स्‍वदेश सेवासँ तँ वंचि‍त भइ‍ये जाइत अछि‍, अपनो जीवनक परि‍वेश संकुचि‍त बना लैत अछि‍। ‘पछतावा’ कथा शि‍क्षि‍त वर्गक अही अध:पतनक कथा थि‍क। एकर प्रमुख पात्र रघुनाथक ऐ‍‍ पश्‍चात्तापपूर्ण उक्‍ति‍मे एहन लोकक मानसि‍कताक अभि‍व्‍यक्‍ति‍ कएल गेल अछि‍- “हमरासँ सइओ गुना ओ नीक छथि‍ जे अपना माथपर पानि‍क घैल उठा मातृभूमि‍क फुलवारीक फूलक गाछ सींचि‍ रहल छथि‍‍। अपन माए-बाप, समाजक संग जि‍नगी बि‍ता रहल छथि‍। जि‍नगीक अन्‍ति‍म पड़ावमे पहुँचि‍ आइ बूझि‍ रहल छी जे ने हमरा अपन परि‍वार चि‍न्‍हैक बुधि‍‍ भेल आ ने गाम-समाजक।” अही तरहेँ ‘बोनि‍हारि‍न मरनी’मे सर्वहाराक प्रति‍ करूणा, ठेलाबलामे सर्वहाराक संघर्ष, ‘जीि‍वका’मे जनवि‍तरण प्रणालीमे व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार, ‘रि‍क्‍शाबला’मे सर्वहाराक उन्‍मुक्‍त जीवन आ सम्‍पत्ति‍शाली वर्गक नारीक कुंठा, ‘चूनवाली’मे सर्वहारावर्गक सि‍नेह-सम्‍बन्‍ध आदि‍केँ आधार बना कऽ कथा गढ़ल गेल अछि‍ जे अत्‍यन्‍त रोचक भेल अछि‍। ‘अनेरूआ बेटा’ लोकजगतमे शि‍क्षाक आवश्‍यकतापर बल दैत अछि‍ तँ ‘डाक्‍टर हेमन्‍त’ सुदूर देहातमे स्‍वास्‍थ्‍य सुवि‍धाक बेवस्‍थाकेँ रेखांकि‍त करैत अछि‍। ‘बाबी’ कथाक माध्‍यमे मंडलजी हि‍न्‍दू-मुस्‍लि‍म एकताकेँ छठि‍ पाबनि‍क आधारपर दृढ़ता प्रदान करबाक राष्‍ट्रीय दायि‍त्‍वक प्रति‍ सतर्कता दर्शौलनि‍ अछि‍। ‘डीहक बँटबारा’ भ्रष्‍टाचार पूर्वक धन अर्जन कएनि‍हार समाजक अधोगति‍क चि‍त्रांकन करैत अछि‍। मंडलजीक अधि‍कांश कथा वर्णनात्‍मक शैलीमे लि‍खल गेल अछि‍। ऐ‍‍ शैलीक कारणें हि‍नक कथा सभमे उपन्‍यासक आनन्‍द भेटैत अछि‍ मुदा एके कथामे अनेक उपकथा सबहक सम्‍मि‍श्रणक कारणें बहुधा लघु ‍कथाक क्षि‍प्रता ओ सघनता बाधि‍त देखि‍ पड़ैत अछि‍। हि‍नक वर्णनमे अवश्‍ये चारूताक दर्शन होइत अछि‍ आ पाठक समक्ष समग्र चि‍त्र रूपायि‍त भऽ जाइत अछि‍ यथा- “पछि‍ला चारि‍ सालक रौदी भेने गामक सुरखि‍ये बेदरंग भऽ गेल। जे गाम हरि‍यर-हरि‍यर गाछ-बि‍रीछ, अन्नसँ लहलहाइत खेत, पानि‍सँ भरल इनार-पोखरि‍, सैकड़ो रंगक चि‍ड़ै-चुनमुनी, हजारो रंगक कीट-पतंगसँ लऽ कऽ गाए, महींस आ बकरीसँ भरल रहैत छल ओ मरणासन्न भऽ गेल। सुन्न-मसान जकाँ। वीरान। सबहक मनमे एक्केटा वि‍चार अबैत जे आब ई गाम नै रहत। जँ रहबो करत तँ माटि‍येटा। कि‍एक तँ जइ‍‍ गाममे खाइक लेल अन्न नै‍‍ उपजत, पीबैक लेल पानि‍ नै‍‍ रहत, तइ‍ गामक लोक की हवा पीब‍ कऽ रहत।‍” इत्‍यादि‍। मंडलजीक हृदैमे ग्राम्‍य जीवनक प्रति‍ अगाध नि‍ष्‍ठा छन्‍हि आ मि‍थि‍ला ओ भारतक आदर्श ग्रामक परि‍कल्‍पना छन्‍हि‍। तँए ओ आेइ‍ सभटा परि‍स्‍थि‍ति‍ दिसि‍ नजरि‍ खि‍रबैत देखि‍ पड़ैत छथि‍ जे ग्राम्‍य जीवनक सौन्‍दर्यक हेतु बाधक बनल अछि‍। एकटा पात्रक माध्‍यमे ओ कहैत छथि‍- गाममे ने पानि‍ पीबैक ओरि‍यान छै, ने खाइक लेल सभकेँ संतुलि‍त भोजन भेटै छै, ने भरि‍ देह कपड़ा भेटै छै, ने रहैक लेल घर छै, आेइ‍ देशकेँ मरल नै कहबै तँ की कहबै। अखनो लोक सड़ल पानि‍ पीबैत अछि‍, कहुना कऽ कि‍छु खा दि‍न कटैत अछि‍, गाछक नि‍च्‍चाँमे आगि‍ तापि‍ समए बि‍तबैत अछि‍, हजारो रंगक रोग-व्‍याधि‍सँ घेरल अछि‍, आेइ‍ देशकेँ की कहबै? हजारो वर्षक मनुक्‍खक इति‍हासमे अखनो धरि‍ सरस्‍वतीक आगमन सभ मनुक्‍ख धरि‍ नै भेल अछि‍, आेइ‍ देशकेँ की कहबै? आदि‍। अवश्‍ये हुनक आदर्श गामक परि‍कल्‍पना सर्वथा सुवि‍धासम्‍पन्न, आर्थिक रूपेँ सबल आ सुशि‍क्षि‍त गामक छन्‍हि। जकर चर्चा बेर-बेर हुनक कथा सभमे अनायास आएल अछि‍। अपन कथा सभमे मंडलजी कतौ कृत्रि‍मताक प्रवेश नै‍‍ होमए देलनि‍ अछि‍। स्‍वभावत: हि‍नक भाषा, संवाद, वर्णन, वस्‍तु, चरि‍त्र आदि‍ समस्त उपादानमे सहजताक दर्शन होइत अछि‍। हि‍नक अधि‍कांश कथा ग्राम्‍य जीवनसँ सम्‍बद्ध अछि‍ तँए ई पात्रक नामावली सेहो ओही जीवनसँ लेने छथि‍ यथा- फुलि‍या, दुखनी, बेचन, सुगि‍या, धनि‍या, पि‍चकुन, पि‍हुआ, भुलि‍या, फेकुआ, लुखि‍या, सोमन, मरनी, रघुनी, बुचाइ, बचनू आदि‍। मुदा जखन ई नगर पात्रकेँ अपन कथामे प्रवेश दैत छथि‍ तँ वर्गीय नामोक प्रयोग करैत छथि‍ यथा- मुकुन्‍द, शि‍वनाथ, रूक्‍मि‍णी, शोभाकान्‍त, रागि‍नी, सुनयना आदि‍। पात्रक रेखाचि‍त्र पाठकक मानसमे उतारि‍ देबाक हि‍नक झमता मरनीक ऐ‍‍ स्वरूप वर्णनमे अत्‍यन्‍त उत्‍कृष्‍ट देखि‍ पड़ैछ- “कारी झामर एकहड्डा देह, ताड़-खजूरपर बनाओल चि‍ड़ैक खोंता जकाँ केश, आंगुर भरि‍-भरि‍क पीअर दाँत, फुटल घैलि‍क कनखा जकाँ नाक, गाइयक आँखि‍ जकाँ बड़का-बड़का आँखि‍, साइयो चेफड़ी लागल साड़ी, दुरगमनि‍या आंगि‍ फटलाक बाद कहि‍यो देहमे आंगीक नसीब नै‍‍ भेल, बि‍ना साया-डेढ़ि‍याक साड़ी पहि‍रने। यएह छी मरनी।‍” मात्र ई वर्णन मरनीक प्रति‍ करूणा उत्‍पन्न करबामे सक्षम सि‍द्ध होइत अछि‍। ग्राम्‍य जीवनक वर्णन करैत काल ओकर श्‍याम पक्षकेँ सेहो मंडलजी यथावत् राखि‍ कथाक सहजताकेँ अक्षुण्‍ण रखलनि‍ अछि‍। ग्राम्‍य जीवनमे ताड़ी-दारू, गाँजा-भांग, बीड़ी-सलाइ आदि‍क प्रयोगकेँ ई वि‍भि‍न्न कथामे सहजताक सृजनक हेतु प्रयुक्‍त कएलनि‍ अछि‍। आस्‍था आ वि‍श्वास ग्राम्‍य जीवनक अंग थि‍क। मंडल जीक कथा सभमे अनेक ठाम लोक जीवनक जीवन्‍त आस्‍थाक चि‍त्रण भेल अछि‍ यथा- “इन्‍द्र भगवानकेँ कोनो चीजक दुख भऽ गेल हेतनि‍। तेँ हुनका बौसब जरूरी अछि‍।” यएह सोचि‍ कि‍यो भूखल-दुखलकेँ अन्नदान तँ कि‍यो कीर्तन-अष्‍टयाम-नवाह, तँ कि‍यो यज्ञ-जप चंडी, वि‍ष्‍णु तँ कि‍यो महादेव पूजा लि‍ंग इत्‍यादि‍ अनेको रंगक बौसऽक ओरि‍यान शुरू केलक। जनि‍जाति‍ सभ कमला-कोशीकेँ छागर-पाठी कबुला सेहो करए लगलीह। इत्‍यादि‍। ग्राम्‍य जीवन लाख अभाव-अभि‍योगक अछैतो जइ उत्‍साह ओ उमंगकेँ अङेजने रहैत अछि‍, से एकर अपार जि‍जीवि‍षाक प्रतीक थि‍क। मण्‍डल जीक कथा सभमे पात्रक चरि‍त्रमे कुंठा ओ संत्रासपर जि‍जीवि‍षाक वि‍जय देखाओल गेल अछि‍ जइसँ हि‍नक कथा सभ नव आशाक संचार कऽ लोक जीवनक सोनहुल भवि‍ष्‍यक प्रति‍ आश्वस्‍त करैत अछि‍। द्रष्‍टव्‍य अछि‍ कि‍छु पाँती- -“अपन धन हएत, तइपर सँ मेहनत करब तँ कोन दरीदराहा दुख आबि‍ कऽ हम्‍मर सुख छीनि‍ लेत।‍” -“एक्केटा बाढ़ि‍मे एत्ते चि‍न्‍ता‍ करै छथि‍ काका, कनी नीक की कनी अधलाह, दि‍न तँ बि‍तबे करतनि‍।” -“‍जकरा खाइ-पीबैक ओरि‍यान बूझल छैक ओ कथीक चि‍न्‍ता करत। इत्‍यादि‍।” एतवता मण्‍डल जीक ‘गामक जि‍नगी’ कथा संग्रहमे ग्राम्‍य शब्‍दावलीक माध्‍यमे ग्राम्‍य जीवनक सौन्‍दर्य ओ समस्‍या तथा तकरा सबहक वि‍वेकपूर्ण नि‍दान दिसि‍ इंगि‍त करबाक प्रयास भेल अछि‍ जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक कथा वि‍धामे अन्‍यतम याेगदानक रूपमे चर्चित-अर्चित हेबाक सार्मथ्‍य रखैत अछि‍। पोथीक नाओं- गामक जि‍नगी वि‍धा- लघु कथा संग्रह रचनाकार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन राजेन्‍द्र नगर दि‍ल्‍ली मूल्‍य- २०० टाका मात्र प्रकाशन वर्ष- सन् २००९ पोथी पाप्‍ति‍क स्‍थान- पल्‍लवी डि‍स्‍ट्रीब्‍यूटर्स, वार्ड न.६, नि‍र्मली, सुपौल। उषा कि‍रण खानक ‘जाइ सँ पहि‍ने’ वनदेवी आ नारी अस्‍मि‍ताक गाथा कथा, उपन्‍यास, नाटक आदि‍ वि‍भि‍न्न वि‍धामे गरि‍मामय लेखनक हेतु प्रख्‍यात, आधुनि‍क मैथि‍ली महि‍ला लेखनमे अग्रि‍म पाङक्‍तेय आ डाॅ. श्रीमती उषा कि‍रण खानक ‘जाइ सँ पहि‍ने’ एक गोट गद्यात्‍मक खण्‍डकाव्‍य थि‍क। ऐमे सीताक व्‍यथा-कथाकेँ उपजीव्‍य बनाए नारी-अस्‍मि‍ताक अन्‍वेषण कएल गेल अछि‍। स्‍वभावत: पौराणि‍क पात्रक आश्रए लऽ अत्‍याधुनि‍क युगीन वृत्ति‍क प्रतीक्षाक साकांक्ष दृष्‍टि‍ ऐ काव्‍यक महत्‍वपूर्ण उपलब्‍धि‍ थि‍क। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम आ सती शि‍रोमणि‍ सीताक कथा भारतीय जीवन दर्शनक प्रतीक बनल रहल अछि‍‍। सीता अदौसँ मि‍थि‍लाक पहचान बनलि‍ रहलि‍ छथि‍। मुदा भूमि‍जा सीताक उत्तर चरि‍त सीता-वनवासक कथा मैथि‍ल मानसकेँ सदति‍ उद्वेलि‍त कएने रहलैक अछि‍। एतए धरि‍ जे सीताक बि‍आहक दि‍न बि‍आह पंचमीकेँ अखनो धरि‍ लोक सरि‍ भऽ कऽ अपन बेटीक बि‍आहक दि‍वसक रूपमे स्‍वीकार करबामे धखाइत रहल अछि‍। सीताक जन्‍म वि‍रोगहि‍ गेल लोक कंठमे हुनक प्रतीक्षा सहानुभूति‍क रूपमे वि‍द्यमान अछि‍। ऐठामक सन्‍त परम्‍परामे एकटा समुदाय तँ एतबो धरि‍ मानबाक लेल तत्‍पर नै जे सीता द्वि‍रागमनक बाद अपन सासुर अयोध्‍यो गेलीह आ तत:पर कखनो राम वनवासक कारणे तँ कखनो अपन वनवासक कारणे दु:ख भरल जीवन बि‍तबैत रहलीह। हि‍नका लोकनि‍क तँ ई मान्‍यता छन्‍हि जे वि‍वाहोपरान्‍त दुल्हा श्रीराम सभ दि‍नक हेतु मि‍थि‍लेक बनल रहि‍ गेलाह आ मि‍थि‍लाक सखी-लोकनि‍ हुनक दुलार-मलार करैत हुनका सासुरेमे छेकने रहि‍ गेलखि‍न। सीताक दु:खक जीवन-प्रसंगकेँ ओ लोकनि‍ ऐ माध्‍यमे बि‍सरबाक आयोजन कएलनि‍। मैथि‍लीक पं. सुरेन्‍द्र झा सुमन अपन ‘सीतावन्‍दना’ मे अत्‍यन्‍त कटु शब्‍दें सीता वनवासक प्रति‍ अपन आक्रोश प्रकट कएलनि‍- कि‍ए बनलि‍ वनवासि‍नी पति‍-पद-रेणु सुता हमर। ज्‍वालामुखी न थीक ई ज्‍वलि‍त प्रश्न धरणी उरक।। वस्‍तुत: पत्नीक रूपमे सीता पति‍-पद अनुगमनक भारतीय आदर्श प्रस्‍तुत कएलनि‍ तथापि‍ राजधर्म हुनका वनवासक दण्‍ड दऽ प्रताड़ि‍त कएने छल, जकरा हुनक माता पृथ्‍वी आइयो धरि‍ पचा नै सकलीह अछि‍ आ हुनक आक्राेश आइयो ज्‍वालामुखीक रूपमे प्रकट अछि‍। ई केवल कवि‍ कल्‍पने नै, मैथि‍ल मानसक आक्रोशो थि‍क। सीता मि‍थि‍लाक बेटी छलीह। परवर्ती कालमे ओ अयोध्‍याक पुतोहु बनलीह आ अपन कर्त्तव्‍य भावना ओ पाति‍व्रत्‍य द्वारा एहेन आदर्श उपस्‍थि‍त कएलनि‍ जे भारतीय लोक जीवनक आदर्शक रूपमे आइयो प्रथि‍त अछि‍। ओ नैहर आ सासुर दुनू कुलक मान रक्षाक हेतुक यज्ञमे ि‍नरन्‍तर आहुति‍ प्रदान करैत रहलीह। मुदा समाज हुनक चरि‍त्रपर आशंका करैत रहलनि‍। ऐ आशंकाक नि‍वारणार्थ हुनका सर्व सामान्‍यक बीच अग्नि‍ परीक्षा देबए पड़लनि‍। अग्‍नि‍ परीक्षाक बाद जखन ओ अयोध्‍या आपस अएलनि‍, तकर बादो पुनश्च हुनक चरि‍त्रपर आक्षेप कएल गेलनि‍ आ मर्यादा पुरुषोत्तम राम राजधर्मक अनुदेशे हुनका वनवासक दण्‍ड प्रदान कऽ देलखि‍न सेहो एहन स्‍थि‍ति‍मे जखन ओ दुजीवा छलीह। अग्‍नि‍ परीक्षाक साक्षी राम, अक्षय अनुरागसँ संबलि‍त पति‍ राम हुनका प्रतीक्षा कएल गेल आक्षेपक कोनो प्रति‍रोध नै कऽ सकलखि‍न। नारीक प्रति‍ ई उपेक्षाभाव संभवत: सीताकेँ सहन नै भऽ सकलनि‍ जकर परि‍णाम पाताल-प्रवेशक रूपमे आएल जे आइयो पुरुष समाजक नारीक प्रति‍ हीन मनोभावनाक द्योतक थि‍क आ द्योतक थि‍क नारीक आक्रोश, वि‍रोध आ वि‍द्रोहक, जकरा श्रीमति खान अपन ऐ गद्य खण्‍डकाव्‍यमे रूपायि‍त कएलनि‍ अछि‍। श्रीराम अयोध्‍याधि‍पति‍ छलाह। प्रजावत्‍सलता हुनक राजधर्म छलनि‍। ऐ राजधर्मक वशीभूत भऽ ओ धोबि‍ द्वारा लांछि‍त सीताकेँ, पूर्वहि‍ अग्‍नि‍ परीक्षि‍ता सीताकेँ वनवास देबाक दण्‍ड सुनौलनि‍। रामक ई मानसि‍कता मर्यादा पुरुषोत्तमत्‍वक प्रति‍ हुनक भावनाक अति‍रेकक प्रदर्शन छल। ओ प्रजासँ वाहवाही पएबाक फेरमे एकटा सती सावि‍त्रीक आहि‍पर धि‍यान नै दऽ सकल छलाह। भूमि‍जा, रामक ऐ अहंभावक परि‍तुष्‍टि‍क यज्ञाग्‍नि‍मे झोंकि‍ देल गेल छलीह। मुदा हुनको दि‍न फि‍रलनि‍। लव-कुश सन सन्‍तानक माता भेलाक बाद सीताक आत्‍मगौरव उद्दीप्त भेलनि‍। श्रीमति खान सीताक ओइ स्‍वरूपक चि‍त्रण करैत कहैत छथि‍- मंजरायि‍त गाछ गदरायल माछ बाधवाली गाय आ सन्‍तानवती माय के छथि‍? सभ सि‍या सुकुमारि‍ये तँ छथि‍। आ सन्‍तानवती वनदेवीक पुत्र द्वय राजा रामक अश्‍वेमेध यज्ञक घोड़ाकेँ रोकि‍ लैत छन्‍हि‍, हुनक सैन्‍य समूहकेँ पराजि‍त कऽ दैत छन्‍हि‍। सीता हस्तक्षेप कऽ कऽ यज्ञक ओइ घोड़ाकेँ ि‍वमुक्‍त करबैत छथि‍। महर्षि वाल्‍मीकि‍ द्वारा सीताक पाति‍व्रत्‍य अभ्‍यर्थनापर राम अपन कृत्‍यपर लज्‍जि‍त होइत छथि‍ आ सीताकेँ वाल्‍मीकि‍ आश्रमसँ अयोध्‍या लऽ चलबाक हेतु तैयार भऽ जाइत छथि‍। रामक उक्‍ति‍ श्रीमति खानक शब्‍दमे द्रष्‍टव्‍य अछि‍- बदलि‍ देब सभटा जे हेबाक छैक से होएत जे नि‍यत छैक से नहि‍ वि‍धि‍क वि‍धान हम तहस नहस कए देब। मुदा सीता अयोध्‍या आपस होएब स्‍वीकार नै करैत छथि‍ आ भूमि‍ पुत्रीमे भूमि‍मे बि‍ला जाइ छथि‍। हुनक भूमि‍मे जएबासँ पहि‍नेक उद्घोष ऐ खण्‍डकाव्‍यक परि‍णति‍ थि‍क आ नारी अस्‍मि‍ताक उत्‍कर्षक द्योतक सेहो- हम नहि‍ छी पाषाणी अहल्‍या वातभक्षा नि‍राहारा जि‍नकर कयल प्रभू उद्धार मि‍लाओल स्‍वामी गौतम सँ हम छी सशक्‍त, स्‍वयंपूर्ण सीता श्रीमति खान ऐ खण्‍डकाव्‍यमे सीता धरि‍ अनुगायनक माध्‍यमे सासुरवास बेटीक मनोभावकेँ अत्‍यन्‍त मनोरम ढंगे प्रस्‍तुत करैत भाव व्‍यक्‍त कएने छथि‍- बि‍आह होइत देरी नारीक स्‍तरीयतामे आकस्‍मि‍क परि‍वर्त्तन भऽ जाइ छै। ओकर अस्‍मि‍ताकेँ जेना बाकसमे बन्न कऽ देल जाइ छै, ओकर स्‍वातंत्र्यकेँ बेढ़ि‍ देल जाइ छै। हुनके‍ शब्‍दमे- बि‍सरलहुँ छल्‍हि‍गर दही, हरि‍यर चूड़ा सपना भेल भुन्नाक पेटी, रहूक मूड़ा छूटल एकछि‍न्ना नूआ नौगज्‍जीमे हेराएल तनुक धूआ घरे-घर, गलि‍ये गली, जतय मोन करय ततय चली एतय कनक मन्‍दि‍रक चतुष्‍कोण देहरि‍ के कहय साधंस कतय कि‍ कक्ष कौखन पार करी नारीकेँ पुरुषक समकक्ष कि‍ंवा पुरुषोसँ अधि‍क सबला स्‍वरूपमे प्रस्‍तुत करबाक भावाभि‍व्‍यक्‍ति‍क कोनो अवसर श्रीमती खान ऐ खण्‍डकाव्‍यमे छोड़लनि‍ नै अछि‍ जे नारी अस्‍मि‍ताक अन्‍वेषणक प्रति‍ हि‍नक साकांछ दृष्‍टि‍क द्योतक अछि‍। ऐमे एक गोट प्रसंग अछि‍ धनुष यज्ञक। धनुष वास्‍तवमे अनेकानेक बलशाली राजा लोकनि‍ द्वारा टसकाओलो नै भेल छलनि‍ तकरा राजा राम सहजे तोड़ि‍ देलनि‍। मुदा तइसँ हुनक अपौरूषेय बल-वि‍क्रम बूझि‍ पुरुष समाजकेँ गर्व करबाक कोनो कारण नै छल, कारण सीता अत्‍यन्‍त सहज रूपसँ ओकरा उठा कऽ प्रति‍दि‍न ठाँव कऽ लेल करैत छलीह। श्रीमती खान कहने छथि‍- केहन केहन मोँछबला अयलाह धोंछ भेल मुँह गेलाह एकहु रत्ती कहाँ टसकलनि‍ धनुषा..... कमल नाल सन कोमल कान्‍त कि‍शोर सहजहि‍ उठाओल जनु फूल सि‍ंगरहारक हो हल्‍लुक गे दाइ! ताहू सँ कोमल हमर सि‍या सुकुमारि‍ उठबथि‍ नि‍त दि‍न ठाँव करैक काल जेना सि‍मरक फाहा होइक ऐ प्रकारक दोसर प्रसंग अछि‍ सहस्रबाहु वधक जइमे अद्भुत रामायणक अनुरूप ई कथा आएल अछि‍ जे सहस्रबाहु राजा रामकेँ अपन बलसँ परास्‍त करबामे सक्षम छल, युद्धभूमि‍मे राजा राम अचेत भऽ गेल छलाह। तखन सीता कालीक रूप धऽ सहस्रबाहुकेँ पराजि‍त करबामे अपन सामर्थ्‍य देखौने छलीह। श्रीमती खान द्वारा अहू कथाक समावेशसँ हुनक काव्‍यमे अभि‍व्‍यक्‍त नारी-भावनाक परि‍चए भेटैत अछि। श्रीमती खानक ऐ खण्‍डकाव्‍यमे वाल्‍मीकीय रामायणमे उद्घृत ओहू अंशक सवि‍शेष उल्‍लेख अछि‍ जइमे राम द्वारा लंका वि‍जयक उपरान्‍त सीताकेँ परि‍त्‍याग कऽ देबाक कथा अनुस्‍यूत अछि‍ आ जकर मार्जन अग्‍नि‍ परीक्षासँ होइत अछि‍। ऐ सन्‍दर्भमे वाल्‍मीकि‍क कि‍छु श्‍लोकक भावराशि‍केँ श्रीमती खान यथावत् गृहीत कऽ लेलनि‍ अछि‍। सीत हम अहाँक लेल नहि‍ केलहुँ युद्ध रावण केँ करक परास्‍त देवसत्ता केँ स्‍थापि‍त करक पत्नी जनि‍कर हरण भेल ताहि‍ राजाक कलंक मेटब छल अभि‍ष्‍ट से भेल सि‍द्ध तेँ कएल युद्ध हे सीते, आइ अहाँकेँ कएलहुँ मुक्‍त पत्नी धर्मसँ रहू लंका मे कि‍ंवा जाउ भारतवर्ष भरत कि‍ंवा शत्रुध्‍न आ कि‍ लक्ष्‍मण जकरा संग रहबाक हो रहू- रामक ई प्रसंग अत्‍यन्‍त कारूणि‍क अछि‍। अहूठाम ि‍नर्दोष सीतापर रामक वचन वाणक प्रहार भेल अछि‍ जकरा नारी अस्‍मि‍तापर प्रहार कहल जा सकैछ। महात्‍मा तुलसीदासकेँ श्रीरामक ई कटूक्‍ति‍पूर्ण वचन ततेक अप्रि‍य बुझना गेलनि‍ जे ओ अपन रामकथामे वस्‍तुक आग्रहेँ ऐ घटनाक अल्‍पतम शब्‍दावलीमे उल्‍लेख कऽ कऽ आगू बढ़ि‍ गेलाह। मुदा ऐ प्रसंगमे वाल्‍मीकि‍क सीतामे जइ अपार ऊर्जाक दर्शन होइत अछि‍, तकर श्रीमती खानक खण्‍डकाव्‍यमे अभाव देखि‍ पड़ैत अछि‍, जकरा आश्चर्यजनक कहल जा सकैछ। वाल्‍मीकि‍क‍ सीता अग्‍नि‍ परीक्षासँ पूर्व प्रगल्भतापूर्वक अपनापर कएल गेल शंकाक प्रति‍वाद करै छथि‍ जे नारी अस्‍मि‍ताक प्रति‍ हुनक दृढ़ भावनाक प्रती‍क थिक, तथापि‍ श्रीमति खानक ऐ खण्‍डकाव्‍यक ई वि‍शि‍ष्‍टता थि‍क जे ऐमे मि‍थि‍लामे रामजानकी वि‍षयक रूढ़ि‍ सभकेँ सेहो महत्‍वपूर्ण स्‍थान देल गेल अछि‍। मि‍थि‍लामे प्रत्‍येक कन्‍याकेँ सीताक प्रतीक मानल जाइ छन्‍हि‍ आ मि‍थि‍लाक लोकगीतमे सीता प्रत्‍येक जनकक पुत्रीक रूपमे गृहीत छथि‍। मैथि‍ली लोकगीतमे सीताक वैवाहि‍क प्रसंगक बाहुल्य अछि‍ आ लोक सीताक व्‍यथा-कथाकेँ जेना बि‍सरि‍ गेल छथि‍। ऐ तथ्‍यकेँ श्रीमती खान ऐ शब्‍दें अभि‍व्‍यक्‍त कएने छथि‍- सीकी खोंटैत लि‍खि‍या करैत सुआसिन लोकनि‍ गओतीह गीत ढौरतीह कोबर बि‍सरि‍ जयतीह सायास सि‍या धि‍याक अनसोहाँत पीर। श्रीमती खान नारी ओ पुरुषक समकक्षताकेँ प्रेय रूपमे ऐ साहि‍त्‍यि‍क कृति‍मे प्रस्‍तुत कएलनि‍ अछि‍ जे ऐति‍हासि‍क-पौराणि‍क कथावस्‍तुकेँ अधुनातन युगजीवनक परि‍प्रेक्ष्‍यमे देखबाक अन्‍वेषक दृष्‍टि‍क कारणे हि‍नका साहि‍त्‍यकार वरेण्‍य श्रेणीमे साबि‍त करै छन्‍हि‍। द्रष्‍टव्‍य अछि‍ रामक प्रति सीताक ई उक्‍ति‍- हमरा लेल अहाँ प्राणहरि‍ छी राम ने छी साध्‍य, ने साधन अहाँ साक्षत वि‍जय थि‍कहुँ हम मुदा पराजय नहि‍ थि‍कहुँ नहि‍ होइत छैक प्रत्‍येक प्रति‍स्‍पर्द्धामे जय आ पराजय सहजता, सरलता ओ प्रसाद गुण सम्‍पन्नतासँ मण्‍डि‍त तत्‍सम् ओ तद्भव बहुल श्रीमति खानक ऐ खण्‍डकाव्‍यमे उपमा, उत्‍प्रेक्षादि‍ अलंकार सहजहि‍ं आकृष्‍ट करैत अछि‍ आ भवभूति‍क एको रस: करूण एवं प्रति‍ध्वनि‍त होइत देखि‍ पड़ैछ। ऐ पठनीय, मननीय ओ संग्रहणीय कृति‍क हेतु श्रीमती खान साधुवादक पात्र छथि‍। मैथि‍ली जगतक तँ सहजहि‍ं, रामकथाक प्रत्‍येक अध्‍येताकेँ, हि‍नक ई खण्‍डकाव्‍य आकर्षित करतनि‍, से अपेक्षा कएल जएबाक चाही। कि‍छु परि‍मार्जनक संग ई कृति‍ कालजयीक श्रेणीमे गण्‍य होएबाक योग्‍यता रखैछ। मैथि‍ली रामकथाक आयामकेँ संवर्धि‍त करैबला ऐ कृति‍केँ वि‍भि‍न्न दृष्‍टि‍ये समीक्षा-समालोचनाक वि‍मर्श परक आयाम भेटक चाही। आदर्शक उपस्‍थापन :: मौलाइल गाछक फूल श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल बहुआयामी रचनाकार छथि‍। कथा, उपन्‍यास, नाटक आदि‍ वि‍भि‍न्न वि‍धामे प्रभूत रचना द्वारा ई आधुनि‍क मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे बेछप स्‍थान बना चुकल छथि‍। ‘मौलाइल गाछक फूल’ हि‍नक औपन्‍यासि‍क कृति‍ थि‍कनि‍। आदर्शवादी वि‍चारधारासँ ओतप्रोत हि‍नक ऐ‍ उपन्‍यासमे मण्‍डलजीक उदात्त सामाजि‍क चि‍न्‍तनक प्रक्षेपण भेल अछि‍। ऐ‍ उपन्‍यासक अधि‍कांश चरि‍त्र उदार ओ सज्‍जन प्रकृति‍क छथि‍। हुनका लोकनि‍क हृदए पवि‍त्र छन्‍हि आ स्‍वार्थ ओ वासनासँ फराक रहि‍ समाज उत्‍थानक हेतु चि‍न्‍तन करैत देखि‍ पड़ैत छथि‍। स्‍वभावत: एहन चरि‍त्र सबहक अनुगुम्‍फनसँ ई उपन्‍यास एक गोट परि‍ष्‍कृत सामाजि‍क चि‍न्‍तनक मार्ग प्रशस्‍त करैत देखि‍ पड़ैत अछि‍। ऐ‍ उपन्‍यासक केन्‍द्रीय पात्र छथि‍ रमाकान्‍त। उपन्‍यासक अधि‍कांश घटना हि‍नके परि‍त: आघूर्णित होइत अछि‍। ई जमीन्‍दार छथि‍ आ सुभ्‍यस्‍त सेहो। उदार वि‍चार, इमानमे गंभीरता, मनुक्‍खक प्रति‍ सि‍नेह हि‍नक चारि‍त्रि‍क वि‍शि‍ष्‍टता छन्‍हि। हि‍नकामे ने सूदि‍खोर महाजनक चालि‍ छन्‍हि ने धन जमा कएनि‍हार लोकक अमानवीय बेवहारे छन्‍हि। नीक समाजमे जेना धनकेँ जि‍नगी नै‍‍ अपि‍तु जि‍नगीक साधन बुझल जाइत अछि‍, सएह रमाकान्‍तोक परि‍वारमे छन्‍हि। उपन्‍यासक आरम्‍भहि‍मे हि‍नक उदात्त चरि‍त्रक परि‍चए भेट जाइत अछि‍। गाममे अकाल पड़ि‍ जाइ छै। आ लोक सभ अन्न बेत्रेक मरब शुरू कऽ दैत अछि‍। मुदा रमाकान्‍त लग बखारीक बखारी अन्न पड़ल छन्‍हि। लोकक प्रति‍ सहानुभूति‍सँ द्रवि‍त भऽ रमाकान्‍त अपन बखारी फोलि‍ दैत छथि‍ आ काजक बदला अनाज कार्यक्रम शुरू कऽ अपन पोखरि‍केँ उरहबा लैत छथि‍। ऐ‍सँ एक दिसि‍ जँ लोककेँ अकर्मण्‍यतापूर्वक खराती अन्न लेबासँ परहेज करबैत छथि‍ तँ दोसर दिसि‍ अन्नाभावमे लोककेँ मरबासँ बचबैत छथि‍। रमाकान्‍तक ई अवधारणा छन्‍हि जे संसारक यावन्‍तो मनुक्‍ख अछि‍ सभकेँ जीबाक अधि‍कार छै। सभकेँ सभसँ सि‍नेह हेबाक चाहि‍ऐ। मुदा जइ‍ परि‍वेशमे हमरा लोकनि‍ जीब रहल छी, जइ‍ठाम व्‍यक्‍ति‍गत सम्‍पत्ति‍ आ जबाबदेहीक बीच मनुक्‍ख चलि‍ रहल अछि‍, आेइ‍ठाम सि‍नेह खंडि‍त हेबे करतै आ सि‍नेह खंडि‍त भेने पारस्‍परि‍क द्वेष ओ लड़ाइ-दंगाकेँ कोनो शक्‍ति‍ रोकि‍ नै‍‍ सकै छै। तँए नूतन समाजक नि‍र्माणक हेतु, सामाजि‍क समरसता हेतु त्‍याग भावनाक आवश्‍यकता छै आ छै पारस्‍परि‍क सहयोग भावनाक वि‍स्‍तारक आवश्‍यकता। तँए ओ अपन दू सए बीघा जमीन गामक भूमि‍हीन परि‍वार सबहक बीच वि‍तरणक नि‍र्णए लै छथि,‍ जइ‍सँ गामक सभ व्‍यक्‍ति‍ सुखी आ सम्‍पन्न भऽ सकथि‍। यद्यपि‍ रमाकान्तक ऐ‍ प्रकारक अति‍शय उदारता, जमीन्‍दारक प्रवृत्ति‍ ओ समसामयि‍क यथार्थक दृष्‍टि‍ये सर्वथा अवि‍श्वसनीय प्रतीत होइत अछि‍, तथापि‍ ई उदात्त लेखकी‍य कल्‍पना उपन्‍यासकारक ऐ‍ उद्देश्‍यकेँ प्रति‍पादि‍त करैत अछि‍ जे यावत् समाजमे एक दिसि‍ अति‍ वि‍पन्न आ दोसर दिसि‍ अति‍ सम्‍पन्न लोकक वास रहत, ताधरि‍ सामाजि‍क समरसताक बात स्‍वप्‍ने बनल रहत। रमाकान्‍तक उदारताक अति‍रंजि‍त वर्णन उपन्‍यासमे अनेक स्‍थलमे देखि‍ पड़ैत अछि‍ यथा ओ शशि‍शेखर नामक युवककेँ उच्‍च शि‍क्षाक हेतु सहायता प्रदान करैत छथि‍, गाममे स्‍कूल स्‍थापि‍त हेबा काल शि‍क्षकक भोजनादि‍क बेवस्‍थाक भार अपना ऊपर लऽ लै छथि‍, टमटमबलाक दुखि‍ताहि‍ घरवालीक इलाजक हेतु ओकरा पर्याप्‍त टाका दऽ सहायता करै छथि‍, आदि‍। ऐ‍ उपन्‍यासमे मण्‍डलजी मि‍थि‍लाक ग्राम्‍य जीवनमे पसरल धर्मभीरूताक समस्‍याक यथार्थवादी चि‍त्रण कएलनि‍ अछि‍। ऐ‍ समस्‍याक चि‍त्रण हेतु ओ सोनेलाल नामक पात्रक अवधारणा करैत छथि‍। सोनेलालक पत्नी दुखि‍त पड़ि‍ जाइत छथि‍न। ओ ओकरा अस्‍पतालमे देखएबाक हेतु अपन जमीन भरनापर दऽ दै छथि‍। उपचार भेलापर हुनक पत्नी स्‍वस्‍थ भऽ जाइ छथि‍न। मुदा तइ‍ क्रममे ओ साधु भण्‍डाराक कबुला कऽ लै छथि‍। ऐ‍ कबुलाकेँ पूर करबाक हेतु साधुक दूटा दल नि‍मंत्रि‍त कएल जाइत छथि‍। हि‍नका लोकनि‍क हेतु सोनेलाल पर्याप्‍त भोज्‍य पदार्थ जुटबैत छथि‍। मुदा साधुक दुनू दलमे एकटा वैष्‍णव सम्‍प्रदायक तथा दोसर कबीरपन्‍थी सम्‍प्रदायक रहैत अछि‍ आ दुनू दल अपन-अपन साम्‍प्रदायि‍क अभि‍मानसँ ग्रस्‍त रहैत अछि‍, जकर कारणे भण्‍डारामे अनेक वि‍संगति‍ उत्‍पन्न होइ छै। मुदा सर्वाधि‍क कष्‍टकर स्‍थि‍ति‍ तखन बनै छै, जखन वैष्‍णव सम्‍प्रदायक महन्‍थ भण्‍डाराक बाद स्‍थानक हेतु एक सए एक, अपना हेतु एक सए एक, भजनि‍या सबहक हेतु एकावन-एकावन आ भनसीयाक हेतु एकासी-एकासी टाका दक्षि‍णाक मांग कऽ बैसै छथि‍। पराभवमे पड़ि‍तो धर्मभीरू सोनेलालकेँ ओ रकम चुकता कऽ देबए पड़ै छन्‍हि। तत:पर दोसर दल सेहो हुनका ओतबे दक्षि‍णा देबाक हेतु दबाब दै छन्‍हि आ सेहो हुनका चुकता करए पड़ै छन्‍हि। ऐ‍ तरहेँ धर्मभीरू लोक पाखंडी साधु समाज द्वारा केना लूटल जाइ छथि‍, तकर वर्णन कए उपन्‍यासकार ऐ‍ समस्‍याक प्रति‍ लोकदृष्‍टि‍केँ सचेत करबाक उपदेश दै छथि‍। अवश्‍ये दोसर मंडली द्वारा दक्षि‍णाक रकम घुरा देलासँ सोनेलालकेँ थोड़ेक राहत भेटै छन्‍हि‍ आ आेइ‍ मंडलीक प्रति‍ लोक जगतमे सहानुभूति‍ जगै छै। मि‍थि‍लाक अनेक लोक बेवहार सेहो लोक जीवनक अभ्‍युन्नति‍मे बाधक रहल अछि‍, ताहू दिसि‍ मण्‍डलजी संकेत कएलनि‍ अछि‍। ऐ‍ हेतु ई शशि ‍शेखर नामक पात्रक अवतारणा कएलनि‍ अछि‍। शशि ‍शेखर कृषि‍ कओलेजमे प्रवेश पाबि‍ जाइत अछि‍। ओ ऐ‍ प्रवेशसँ अपन भावी सुखी जीवनक परि‍कल्‍पना कऽ अत्‍यन्‍त आनन्‍दि‍त होइत अछि‍। ओकर पि‍ता सेहो खेत बेचि‍यो कऽ ओकर पढ़ाइ पूरा करएबाक संकल्‍प लै छथि‍। मुदा कि‍छु दि‍नक बाद पि‍ता बीमार पड़ि‍ जाइ छथि‍न। शशि‍ शेखर खेत बेचि‍यो कऽ हुनक इलाज करबै छन्‍हि मुदा ओ काल-कवलि‍त भऽ जाइ छथि‍न। तत:पर अपन बूढ़ि‍ माताक सेवा करैत शशि ‍शेखर अपन आगूक पढ़ाइ केना जारी राखि‍ सकत, तइ‍ बि‍न्‍दुपर बिनु वि‍चार कएने खेते बेचि‍ कऽ पि‍ताक श्राद्धो कऽ लैत अछि‍। परि‍णामत: ओकरा कओलेज छोड़बाक बाध्‍यता होइ छै। ऐ‍ तरहेँ मण्‍डलजी लोक-जगतमे व्‍याप्‍त अन्‍धवि‍श्वास ओ लोक बेवहारसँ बचले-उत्तर समाजक कल्‍याणक दि‍शा-नि‍र्देश करबैत देखि‍ पड़ै छथि‍। अन्‍तत: रमाकान्‍तक सहायतासँ शशि‍ शेखरकेँ अपन पढ़ाइ पूर करबाक संबल भेट जाइ छै मुदा लोकबेवहारक समस्‍याक प्रति‍ जुगुप्‍साक भाव अवश्‍य उत्‍पन्न भऽ जाइ छै। अशि‍क्षा ग्राम्‍य जीवनक दैन्‍यक अन्‍यतम कारण अछि‍। अखनो मि‍थि‍लाक नि‍म्‍न वर्गीय समाजमे शि‍क्षाक सर्वथा अभाव छै, जकर कारणे सामाजि‍क उन्नत्ति‍ बाधित छै। मुदा अहू समस्‍याक समाधान सामाजि‍क जागरूकतासँ संभव छै। मसोमातक दान कएल जमीनपर वि‍द्यालयक स्‍थापना, हीरानन्‍द द्वारा बौएलाल ओ बौएलाल द्वारा सुमि‍त्राकेँ शि‍क्षि‍त कऽ ओकरा सबहक स्‍तरीय जीवनक चि‍त्रण ‘मौलाइल गाछक फूल’ उपन्‍यासक अही उद्धेश्‍यपरक दृष्‍टि‍कोणक परि‍चायक थि‍क। आजुक ग्राम्‍य समाजक ई वि‍डम्‍बना छै जे पढ़ल-लि‍खल धि‍यापुता पाइ कमएबाक अन्‍ध दौरमे शामि‍ल भऽ गेल अछि। तँए ओ सभ अपन गाम-समाजकेँ छोड़ि‍ हजारो मीलक दूरीपर नोकरी करए चलि‍ जाइ छै। परि‍णामत: बूढ़ माता-पि‍ताक परि‍चर्या केनि‍हार कि‍यो रहि‍ नै‍‍ पबै छै। पारि‍वारि‍क वि‍घटनक फलस्‍वरूप सामाजि‍क जगतमे पसरल ऐ‍ वि‍संगति‍क कथा रमाकान्‍त ओ हुनक डाक्‍टर पुत्र सबहक कथामे भेटैत अछि‍। मण्‍डलजी अहू वि‍डम्‍बनासँ समाजकेँ बचबाक संकेत ऐ‍ उपन्‍यासक माध्‍यमे केलनि‍ अछि‍। हुनक भावना सुबुधक ऐ‍ उक्‍ति‍मे साकार भेल अछि‍- ‘आइक जे एकांगी परि‍वार अछि‍ ओ कुम्‍हारक घराड़ी जकाँ बनि‍ गेल अछि‍। बाप-माए कत्तौ, बेटा-पुतोहु कत्तौ आ धि‍या-पुता कत्तौ रहए लागल अछि‍। मानवीय सि‍नेह नष्‍ट भऽ रहल अछि‍।’ यद्यपि‍ ई भावना कृषक युगीन हेबाक कारणे, साम्‍प्रति‍क यथार्थक दृष्‍टि‍सँ एकटा वैचारि‍क द्वन्‍द्वकेँ ठाढ़ करैत अछि‍। मण्‍डलजी रमाकान्‍तक दुनू डाक्‍टर पुत्रक मद्रासमे नोकरी करबाक लाथे कि‍छु ग्रामेतर समस्‍या सबहक चि‍त्रण सेहो कएलनि‍ अछि‍। ऐ‍मे सर्वाधि‍क प्रमुख अछि‍ धनलि‍प्‍सामे व्‍यस्‍त समाजक बेचैनी। महेन्‍द्रक ऐ‍ कथनसँ ई प्रति‍भाषि‍त होइत अछि‍ जे ग्रामेतर समाजमे अत्‍यधि‍क सुवि‍धा सम्‍पन्न लोकोक जीवन असामान्‍य भऽ गेल छै- ‘अपनो सोचै छी जे एते कमाइ छी, मुदा िदन राति‍ खटैत-खटैत चैन नै‍‍ भऽ पबैत अछि‍। कोन सुखक पाछू बेहाल छी से बूझि‍ये ने रहल छी। टी.भी. घरमे अछि‍, मुदा देखैक समये ने भेटैत अछि‍। खाइले बैसै छी तँ चि‍ड़ै जकाँ दू-चारि‍ कौर खाइत-खाइत मन उड़ि‍ जाइत अछि‍ जे फल्‍लांकेँ समए देने छि‍ऐक, नै‍‍ जाएब तँ आमदनी कमि‍ जाएत। तहि‍ना सुतइयोमे होइत अछि‍। मुदा एते फ्रीसानीक लाभ की भेटैत अछि‍? सि‍र्फ पाइ। की पाइये जि‍नगी छि‍ऐक?’ एतावता मौलाइल गाछक फूलमे लोकजीवनक वि‍वि‍ध समस्‍या ओ तकर समाधानक मार्ग तकबाक प्रयत्‍न भेल अछि‍। ‘अपन जि‍नगीकेँ जि‍नगी देखैत परि‍वार, समाजक जि‍नगी देखब जि‍नगी थि‍क।’ मण्‍डल जीक आदर्शवादी चि‍न्‍तनक रूपमे प्रति‍फलि‍त भेल अछि‍। प्राय: अही तथ्‍यकेँ धि‍यानमे रखैत महेन्‍द्र द्वारा गामे‍मे स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्र स्‍थापना कऽ वि‍चार अभि‍व्‍यक्‍त कराओल गेल अछि‍ जतए ओकर परि‍वारक एकटा डाक्‍टर नि‍त्‍य मरीजक सेवा, ग्रामवासीक सेवाक हेतु उपलब्‍ध रहतै। सामाजि‍क समन्‍वयक प्रति‍ पक्षधरता ऐ‍ उपन्‍यासमे भजुआक कथामे भेटैत अछि‍। जाति‍-पाति‍मे बँटल ग्राम्‍य समाजमे छूआछूत, ऊँच नीचक वि‍चार अदौसँ रहलैक अछि‍। गाँधीजीक स्‍वतंत्रता आन्‍दोलनक समए अछूतोद्धारक प्रति‍ हुनक चेष्‍टा ओ स्‍वातंत्र्योत्तर कालमे समाजक बदलैत रीति‍-नीति‍क कारणे यद्यपि‍ ग्रामो समाजमे अस्‍पृश्‍यताक प्रति‍ भाव बदललै‍ तथापि‍ सहभोजनक दृष्‍टि‍ये अखनो जाति‍-पाति‍क बीच दूरी बनले छै। रमाकान्‍त द्वारा डोम भजुआक आेइ‍ठाम जाए भोजन करबाक कथाक माध्‍यमे मण्‍डलजी समाजक ऐ‍ समस्‍याक आदर्शपूर्ण समाधान देखौलनि‍ अछि‍। अवश्‍ये ऐ‍मे ईहो संकेत देल गेल अछि‍ जे समरसताक बाधक तथाकथि‍त अस्‍पृश्‍य लोकनि‍क शुचि‍ताक प्रति‍ प्रतिबद्धताक अभाव रहलनि‍ अछि‍। जे अशि‍क्षाजन्‍य अछि‍ तथा शि‍क्षा द्वारा ओकरो बदलल जा सकै छै। मण्‍डल जीक ऐ‍ उपन्‍यासमे नारी वि‍षयक चि‍न्‍तनमे प्राचीन भारतीय नारी लोकनि‍क आदर्शेक उपस्‍थापन भेल अछि‍। हि‍नक अधि‍कांश नारी पात्र यथा रधि‍या, श्‍यामा, सुगि‍या, सोनेलालक बहि‍न आदि‍मे पति‍परायणा भारतीय नारीक चि‍त्रांकन भेल अछि‍। नारी-शि‍क्षाक प्रति‍बद्धता सेहो मण्‍डलजीक ऐ‍ उपन्‍यासमे सुमि‍त्राक माध्‍यमे अभि‍व्‍यक्‍त भेल अछि‍ जे पढ़ि‍-लि‍ख कऽ नीक परि‍चारि‍काक रूपमे गामक हेतु एकटा सम्‍पत्ति‍ बनि‍ जाइत अछि‍। सुजाता सेहो एहने नारी पात्र छथि‍ जे श्रमि‍क परि‍वारमे जन्‍म लेलाक बादो महेन्‍द्रक सहायता पाबि‍ डाक्‍टरनी बनि‍ जाइ छथि‍ आ महेन्‍द्रक भावहु सेहो भऽ जाइ छथि‍। मुदा शि‍क्षि‍ताक संगे‍ मंडलजी जइ‍ नारी-स्‍वरूपक परि‍कल्‍पना ऐ‍ उपन्‍यासमे रूपायि‍त कएलनि‍ अछि‍, से थि‍क नारीक सबला रूप। नारीक ऐ‍ स्‍वरूपक चि‍त्रांकन सि‍ति‍याक चरि‍त्रमे भेल अछि‍। ओ ने केवल अपन इज्‍जति‍पर हाथ उठौनि‍हार ललबाकेँ थूरि‍ कऽ राखि‍ दैत अछि‍ अपि‍तु जखन ललबाक गामक लोक ओकरा गामपर आक्रमण कऽ दै छै, तँ नारी लोकनि‍क सेनानायि‍का बनि‍ ओकरो सभकेँ परास्‍त कऽ दैत अछि‍। स्‍वातंत्र्योत्तर भारतमे भ्रष्‍टाचार एक गोट कोढ़क रूपमे देखि‍ पड़ैत अछि‍। मास्‍टरक बहालीमे हीरानन्‍दक आक्रोशक माध्‍यमे मण्‍डलजी सरकारी स्‍तरपर होइत भ्रष्‍टाचारक यथार्थकेँ अभि‍व्‍यक्‍ति‍ प्रदान कएलनि‍ अछि‍। मि‍थि‍लाक आर्थिक समृद्धि‍क हेतु ऐठाम जलकरक सदुपयोग करबाक चि‍न्‍तन सेहो ऐ‍ उपन्‍यासमे अभि‍व्‍यक्त भेल अछि‍। मौलाइल गाछक फूलक भाषा अत्‍यन्‍त सरल, सहज ओ गमैया मैथि‍ली थि‍क। मण्‍डलजी अपन कल्‍पि‍त संसारकेँ मूर्त्त, वि‍श्वसनीय ओ सजीव रूपमे प्रस्‍तुत करबाक हेतु लेखनक अनेक प्रवि‍धि‍केँ ऐ‍ उपन्‍यासमे समाहि‍त कएने देखि‍ पड़ैत छथि‍। अनेक ठाम हि‍नक नाटकीय भाषा प्रयोग अत्‍यन्‍त तीव्रता ओ सहजताक संग भेल अछि‍, यथा- ‘की कहैले ऐहल?’ ‘नत दैले एलौं।’ ‘कोन काज छि‍अह?’ ‘काज-ताज नै कोनो छी। ओहि‍ना अहाँ चारू गोरेकेँ खुअबैक वि‍चार भेल’ इत्‍यादि‍। अनेक ठाम ई संस्‍मरणात्‍मक भाषाक सुष्‍ठु प्रयोग कएने छथि‍ यथा- ‘ऐ‍ गाममे पहि‍ने हम्‍मर जाति‍ नै रहए। मुदा डोमक काज तँ सभ गामेमे जनमसँ मरन धरि‍ रहै छै। हमरा पुरखाक घर गोनबा रहए। पूभरसँ कोसी अबैत-अबैत हमरो गाम लग चलि‍ आएल। अखार चढ़ि‍ते कोसी फुलेलै। पहि‍लुके उझूममे तेहेन बाढ़ि‍ चलि‍ आएल जे बाधक कोन गप्‍प जे घरो सभमे पानि‍ ढूकि‍ गेल। तीन-दि‍न तक ने मालजाल घरसँ बहराएल आ ने लोके। पीह-पाह करैत सभ समए बि‍तौलक। मगर पहि‍लुका बाढ़ि‍ रहै, तेसरे दि‍न सटकि‍ गेल।’ इत्‍यादि‍। परि‍वेश ओ वातावरणक नि‍र्माणक हेतु मण्‍डलजी अभि‍धा शक्‍ति‍सँ संपुष्‍ट भाषाक प्रयोग द्वारा सटीक ओ वि‍श्वसनीय बि‍म्‍ब ठाढ़ करबामे समर्थ देखि‍ पड़ैत छथि‍ यथा- ‘दू साल रौदीक उपरान्‍त अखाढ़। गारमीसँ जेहने दि‍न ओहने राति‍। भरि‍-भरि‍ राति‍ बीअनि‍ हौंकि‍-हौंकि‍ लोक सभ बि‍तबैत। सुतली राति‍मे उठि‍-उठि‍ पानि‍ पीबए पड़ैत। भोर होइते घाम उग्र रूप पकड़ि‍ लैत। जहि‍ना कि‍यो ककरो मारैले लग पहुँचि‍ जाइत, तहि‍ना सुरूजो लग आबि‍ गेलाह। रस्‍ता-पेराक माटि‍ सि‍मेंट जकाँ सक्कत भऽ गेल अछि‍।’ इत्‍यादि‍। पात्रक परि‍चए दैत काल मण्‍डलजी ओकर रूपरेखा, वेश भूषा, आयु आदि‍क वर्णन अनेक ठाम आेइ‍ पात्रक ठोस व्‍यक्‍ति‍त्‍वकेँ अभि‍व्‍यक्त करबाक हेतु कएलनि‍ अछि‍। मुदा ऐ‍ प्रकारक वर्णनक प्रति‍ हुनक प्रति‍बद्धता नै‍‍ देखि‍ पड़ैछ। तथापि‍ जतए कतौ ओ पात्रक मनोभावक वर्णन कएने छथि‍, आेइ‍ठाम हुनक भाषा वि‍श्‍लेषणात्‍मक प्रकृति‍क देखि‍ पड़ैत अछि‍, जइ‍सँ पात्रक हृदैगत भावक प्रति‍ पाठककेँ सुनि‍श्चि‍त आकलनक अवसर भेट जाइत छन्‍हि‍, यथा- ‘ब्रह्मचारी जीक बात सुनि‍ रमाकान्‍तकेँ धनक प्रति‍ मोहभंग हुअए लगलनि‍। सोचए लगलाह जे हमरो दू सए बीघा जमीन अछि‍, ओते जमीनक कोन प्रयोजन अछि‍। जँ आेइ‍ जमीनकेँ नि‍र्भूमि‍क बीच बाँटि‍ दि‍ऐक तँ कते परि‍वार आ कत्ते लोक सुख-चैनसँ जि‍नगी जीबै लगत। जकरा लेल जमीन रखने छी ओ तँ अपने तते कमाइ छथि‍ जे ढेरि‍औने छथि‍। अदौसँ मि‍थि‍लाक ति‍यागी महापुरुषक राज रहल, कि‍एक ने हमहूँ आेइ‍ परम्‍पराकेँ अपना, परम्‍पराकेँ पुन:र्जीवि‍त कऽ दि‍ऐक।’ ऐ‍ तरहेँ ‘मौलाइल गाछक फूल’मे भाषाक कुशल ओ रचनात्‍मक प्रयोग भेल अछि‍ जइ‍सँ वर्णनमे सटीकता, सहजता, बि‍म्‍ब धर्मिता, स्‍पष्‍टता ओ मनोवैज्ञानि‍क वि‍श्‍लेषणक क्षमता प्रदर्शित होइत अछि‍। अपन गुणक कारणेँ मण्‍डलजीक कथासंसारमे वि‍श्वसनीयता देखि‍ पड़ैत अछि‍ आ ओ अपन प्रौढ़ वि‍चार ओ अनुभूति‍केँ पाठकीय मानसमे स्‍थानान्‍तरि‍त करबामे सफल भेल छथि‍। अन्‍तत: महेन्‍द्रक उक्‍ति‍- ‘समाज रूपी गाछ मौला गेल अछि‍, ओइमे तामि‍, कोड़ि‍, पटा नव जि‍नगी देबाक अछि‍ जइ‍सँ ओइमे फूल लागत आ अनवरत फुलाइत रहत’ मे उपन्‍यासक उद्धेश्‍य स्‍फुट भेल अछि‍। स्‍वभावत: मण्‍डलजी ऐ‍ कृति‍क माध्‍यमे ग्राम ओ ग्रामेतर जीवनक संगहि‍ व्‍यक्‍ति‍, परि‍वार, समाज ओ राष्‍ट्रक अभ्‍युन्‍नति‍क हेतु एकर प्रत्‍येक इकाइकेँ त्‍याग ओ समर्पणक भावनासँ ओत प्रोत रहबाक आदर्श, जीवन पद्धति‍ अपनएबाक संदेश देलनि‍ अछि‍। हि‍नक ई संदेश ‘सर्वे भवन्‍तु सुखि‍न: सर्वे सन्‍तु नि‍रामया:, सर्वे भद्राणि‍ पश्‍यन्‍तु मा कश्‍चि‍द् दु:खभाग भवेत्’ क भावनाक पुन: उपस्‍थापन थि‍क। मानेश्वर मनुज मैथिल दृष्टिक प्रसंग मुम्बइसँ एक चिट्ठी मुम्बइ ०६ जून २०११ आदरणीय भाइ, हमरा पत्रकेँ सम्पादक लोकनि मिथिले-मिहिर टाइमसँ चर्चाक विषय बनबैत रहलन्हि अछि। सोमदेव कहै छलथि जे पत्र-लेखकक रूपमे मिथिला-मिहिरमे अहाँ चर्चित छलौं। कतेको सम्पादक हमर आलेखकेँ पत्रक रूपमे छापि देने छथि आ कतेको एकरा सम्पादकीय बना देने छथि। मुक्तिबोध कविता छोड़ि की डायरी लिखऽ लागल छलथि। हम अप्पन दू-टूक बात बहुतो विद्वान् आ लेखककेँ पत्रसँ आकि फोनपर कहि चुकल छियनि। स्वार्थवश ओ लोकनि ओइपर ध्यान नै दैत छथिन। समीक्षक ओ आलोचककेँ लेखक आ कविक पहचान नै छनि, इतिहासकार लोकनि आलोचक आ समीक्षकक विषयमे किछु नै जनै छथि। सभतरि मैथिलीक नामपर निजी स्वार्थ-साधना भऽ रहल अछि। दोसर दिस भाषा-वैज्ञानिक लोकनि डंकाक चोटपर कहि रहल छथि जे किछुये भाषा छोड़ि सभ भाषा मरि जाएत। भाषा मरि जाएत तँ के रोकतै, मुदा साहित्य तँ आनो भाषामे रूपान्तरित भऽ जीबि सकैत अछि। मुदा सभ विधाक विकासक दिशामे कहाँ कतौ निःस्वार्थ प्रयास भऽ रहल अछि। पत्र सेहो साहित्यक एक विधा अछि जे मरल जा रहल अछि। अहींक मानेश्वर मनुज …. जीवकान्त सभ दिन क्षेत्रीयताक पृष्ठ पोषक रहल छथि। ओ अप्पन वार्तामे सभ दिन कहैत रहलथि जे जे शक्ति झंझारपुरक माटिमे छै ओ बेनीपट्टीक माटिमे कतऽ सँ अओतै आ राजनगरोमे कतऽसँ अओतै। दोसर दिस ओ हरदम गाम आ शहरक बात करैत रहै छथि। ओ गामक लेखक छथि। आ बहुतो गोटे शहरक लेखक छथि। हाइ स्कूलसँ बढ़ि कऽ कोनो स्कूल नै होइ छै, तकर ओ अध्यापक छलथि। पढ़बैत तँ विज्ञान छलथि मुदा ओ बी.ए.पास छथि। यानी कलाक ग्रेज्युएट छथि। ओ हाइ स्कूलक पाठ्यपुस्तक यथा अर्थशास्त्र, नागरिकशास्त्र, इतिहास, भूगोल, जीव विज्ञान आ गृह विज्ञानपर जरूर नजरि देने हेताह। ई सभ विषय एक संग बैस कऽ पढ़ि लेलाक बाद मोनक  बहुत रास अन्हार हटि जाइ छै। शहरीकरण आधुनिक सभ्यताक परिणति अछि। जाइ देशक जतेक अधिक लोक शहरमे आबि बसि गेल अछि ओ ओतेक सभ्य कहबैत अछि। विकसित देशमे बीज आ खाद हेलीकोप्टरसँ छीटल जाइत अछि। जोताइ आ कटाइ अत्याधुनिक मशीनसँ होइत अछि। समुन्नत गाँवकेँ शहर कहै छै आ शहर आ गाममे किछु अन्तर नै होइत अछि। शहरमे पाँच-पाँच एकड़ जमीनमे एकटा अस्पताल बनल रहैत अछि, दू-तीन एकड़क पार्क रहैत अछि, चौड़ा-चौड़ा सड़क रहैत अछि, नमहर-नमहर वाकिंग-स्पेस रहैत अछि, पैघ-पैघ लिफ्ट मल्टी-स्टोरी बिल्डिंगमे रहैत अछि। मुदा रहबाक लेल छोट-छोट रूम रहैत अछि। मुम्बइ महानगरमे दुपहरियाक समय जे जे होस्पीटलक अगल-बगलमे घुमि कऽ देखियौ- कतेक पिपरक गाछ आ कतेक बड़क गाछक निच्चामे कंगाल सभ बैसल छै। जइ जगहपर एक रूमक दाम बीस लाखसँ कम नै ओतऽ भिखमंगो गुजर-बसर कऽ रहल छै। कफ-परेड सन महग एरियामे बिल्डिंग -दोगा-दोगी- मजदूर वर्ग सेहो गुजर कऽ रहल छै। झोपड़पट्टी सभ सरकारी जमीनक अनाधिकार अधिग्रहण छै मुदा ओकरा केओ हटा नै पबै छै। मुम्बइ महानगरमे कमसँ कम एक लाख स्त्री-पुरुष बीच शहरमे बनल रेल लाइनपर खुलेआम मल्ल त्याग करैत रहैत अछि। भोर पाँच बजे जे लोकल ट्रेनसँ यात्रा करी तँ ई दृश्य देखल जा सकैत अछि। जे कोनो स्त्री-पुरुष नै देखने होथि ओ लाख-लाख स्त्री-पुरुषक अंग दर्शन कऽ सकैत छथि। दोसर दिस ओतुक्का जीवन-यापनमे एतेक भागम-दौड़ छै जे प्रति दिन रेल आ अन्य दुर्घटनामे करीब पचास आदमी मरि जाइत अछि आ ओकर कतौ ओतबो चर्च-बर्च नै होइ छै जतेक चर्च कतौ छागर वा मुर्गीकेँ कटलाक बाद होइ छै। शहरमे बिल्डर सभ जमीन्दार भऽ गेल अछि, पैघ व्यापारी सभ जमीनदार भऽ गेल अछि। पैघ नेता आ पदाधिकारी सभ घोटाला कऽ आकि घुसखोरी कऽ जमीन्दार भऽ गेल अछि। ओ सभ समृद्ध (एफलुएन्ट) अछि। ओ सभ शहरक भोग कऽ रहल अछि। बाँकी सभ तँ शहरोमे गामेक दैन्य जीवन जी रहल अछि। दृष्टिक संकीर्णता यात्रासँ समाप्त होइ छै। योगी लोकनिक दृष्टि विशाल होइत छनि कारण ओ सभ एक ठाम नै रहै छथि, घुमैत-फिरैत रहै छथि। कबीर पढ़ल-लिखल नै रहथि मुदा घुमैत-फिरैत रहथि। ओ अप्पन गुरु कतौ अगल-बगलमे नै तकलथि। ओ अप्पन गुरु आधुनिक महाराष्ट्रमे आबि तकलथि। रामकेँ कोन प्रयोजन छलनि जनकपुर अएबाक। कर्णकेँ भागलपुर (आधुनिक) केँ छोड़ि गुजरात जेबाक कोन प्रयोजन छलनि। कालिदास उच्चैठ की करऽ एलथि (लोक कथा आधार)। राजनेता लोकनि घुमैत-फिरैत लोक सभसँ बातचीत करैत लोकक दर्शन करैत अप्पन दृष्टि विकसित कऽ लै छथि। यात्रीक दृष्टिमे आकि राजकमलक दृष्टिमे जे विस्तार छलन्हि ओ हुनका लोकनिक घुमकड़ी स्वभावक कारणेँ। आइ गौरीनाथ गाम घरसँ दूर दिल्ली महानगरमे पत्रकारिता क्षेत्रमे अप्पन स्थान बना लेलन्हि अछि, एकर कारण की अछि? ओ मैथिलीक अलावे हिन्दीक अत्यधिक रचनाकारसँ सम्पर्क बना लेलन्हि अछि। बेनीपट्टीमे कहियो पाँच सौ आदमी एक दरखास्तपर दस्तखत कऽ कलक्टरक जनता दरबारमे नै देने हेतै मुदा पाँच सौ डीलर अप्पन पक्ष लऽ जनता विरोधी पेटीशन दऽ दै छै। दिल्लीमे जे नै रहैत छथि आकि विश्व पुस्तक मेलामे नै जाइ छथि ओ की जानि सकैत छथि जे कतेक प्रकाशक एक ठाम जुटि सकैत अछि। एहन व्यवस्था छै जे सभ क्षेत्रक कार्यकर्ता आकि नेता आकि साहित्यकार देशक आ विदेशक भ्रमण करथि। एक दोसरासँ हिलथि-मिलथि, मित्रता स्थापित करथि आ बात ओ विचारक आदान-प्रदान करथि। की कहियो मैथिलीक कोनो पत्रकारकेँ आकि लेखककेँ एहन अवसर भेटलन्हि अछि। फेर दृष्टिमे विकास कोना हेतन्हि। जीवकान्तजी कहैत छथि जे हमर संस्कृति बाहर नै जाइत अछि। हमर पुस्तक बाहर नै पढ़ल जा रहल अछि। अंग्रेजीक पत्र जे एक दिनक लेल छपै छै, एक-एक शब्दपर विचार कएल जाइ छै, दस-दस बेर प्रुफ देखल जाइ छै मुदा मैथिलीक पत्र-पत्रिका कि पुस्तको बिना प्रुफ देखने निकलि जाइत अछि। तँ की चाहैत छी जे ई अन्यत्र पढ़ल जाएत? सरकारक अंग विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका आ राष्ट्रपति अछि। सभक ऊपर राष्ट्रपति अछि जे मात्र एक व्यक्ति अछि। एक-एक व्यक्ति एक राष्ट्र अछि। ऐ आशयसँ साहित्यसँ समाज कहिया ने हटि गेल अछि। मुदा हमरा लोकनि स्कुलिये विद्यार्थी जकाँ तोता-रटन्त कऽ रहल छी- साहित्य समाजक दर्पण होइत अछि। एक यात्रीजी भेट गेला कि सभ हुनके नाङरि पकड़ि पार उतरऽ लागब। स्वयं अपना आपकेँ एक व्यक्तिक रूपमे स्थापित करक कोशिश नै करब। एक अस्त्र बनैत अछि दोसर अस्त्रकेँ निरस्त कऽ देबक हेतु। एक कविता लिखाइत अछि ओइसँ पूर्वक कविताकेँ खारिज कऽ देबक हेतु। एक लेखक जन्म लै छथि पूर्वक लेखककेँ खारिज कऽ देबक हेतु। एक संग्रह छपैत अछि पूर्वक संग्रहकेँ काटि देबक हेतु। ई स्पर्धा एक-दोसराक धारकेँ देखबाक हेतु व्याकुल करै छै। कतौ भोथ हाँसू पड़ल छै, लोक किए देखत। रवीन्द्रनाथकेँ चिन्ता छलनि जे आइसँ सौ साले बाद कोन कवि जनताकेँ मनोरंजन कराओत। मुदा प्रगतिवादी लेखक मनोरंजनसँ अपनाकेँ फराक रखै छथि। कतौ एतेक कल्पना भऽ जाइत अछि जे सत्यक कतौ कोनो स्थाने नै रहि जाइत अछि। कतौ एतेक सत्य/ यथार्थ आबि जाइत अछि कि ओ कथा सत्य-कथा माने अपराध कथा बनि जाइत अछि। आ परिणाम एहन बिन्दुपर नै चलि जाइक जे उत्तेजनाक संचार होइक। कठिनतम विषयकेँ कलाक माध्यमसँ कहल जाइ छै। राजमोहन झाक “प्रत्यावर्तन” कथामे पति-पत्नी होटलमे जा एक राति प्रेमी-प्रेमिकाक सुख भोगै छथि आ जखन घर अबै छथि तँ पत्नीसँ कहै छथि जे – ओइ होटलक रूम लेल जे बीस रुपैया खर्च भऽ गेल ओकर मेक-अप कोना करब? स्वतन्त्रता कथिक लेल होइ छै- व्यक्तिक सुखक लेल। अपना ओतए कहब छै- अहाँ तँ हमर सुख आ सौख दुनू मारि देलौं, दिअरकेँ कहै छै छिनरा आ जाउतकेँ खेलड़ा! कलकत्तामे दुर्गापूजाक समय युवक आ युवती स्वतन्त्र भऽ जाइत अछि। जतऽ घुमी, जतऽ फिरी। तहिना मुम्बइमे गणेश पूजामे दीआबातीमे पश्चिम भारतमे आ पश्चिम उत्तर भारतमे चान पृथ्वीपर आबि जाइत अछि। गुजराती समाज एक अति समृद्ध समाज अछि। नवरात्रामे डांडिया मुम्बइ, बड़ोदा, सूरत, अहमदाबाद आ आन सभ छोट आ पैघ जगहपर खेलल जाइत अछि। तकर बाद लाइन लागि जाइत अछि गर्भपात केन्द्र सभमे। बंगालमे कहल जाइ छै जे विवाहसँ पूर्व सात घर देखी आ ओइमे सँ एक चुनि ली। आर बहुत बात अछि जे बंगालक ओपेन फैक्टक रूपमे जानल जाइत अछि जकरा साहित्यकार प्रेमक रूपमे रूपान्तर केने छथि। शिवभक्तिक अर्थमे मिथिला तमिलनाडु आ केरलसँ मिलैत अछि। माछ आ भोजनक अर्थमे मिथिला, बंगाल, उड़ीसा आ केरलसँ मिलैत अछि। वेश-भूषा आ शरीरक आकृतिक अर्थमे मिथिला गुजरातसँ मिलैत अछि। धार्मिक रीति-रेवाज इत्यादिक अर्थमे मिथिला उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र आ गुजरातसँ मिलैत अछि। आर्थिक दृष्टिसँ ई क्षेत्र सम्पूर्ण देशमे सभसँ पछुआएल अछि। कहै छै जे जतऽ दर्शन हेतै ओतऽ मैनेजमेन्ट हेबे करतै। जतऽ वैज्ञानिक हेतै ओतऽ फैक्ट्री हेबे करतै। जतऽ दवाइक फर्मूला हेतै ओतऽ दवाइ बनबे करतै। आइ कोन कारणसँ भाइ भोगेन्द्र झाक बड़हा गाममे सैकड़ो इन्जीनियर, ओइ गाममे एक रस्ता नै। आइ कोन कारण अछि जे जइ स्कूलक अध्यापक जीवकान्तजी ओ स्कूल सभसँ खराप। आइ किए देशक सभ विश्वविद्यालयसँ पाछाँ मिथिला विश्वविद्यालय आ सभ अस्पतालसँ खराप दरभंगा अस्पताल। एहना स्थितिमे अपनामे सुधार नै आनि हमरा लोकनि मैथिल दृष्टि आ मैथिल दर्शनक बात करै छी। मिथिलाक पंडित शिक्षक, भनसीया, योगी आ दरबान करीब-करीब अंग्रेजक समयेसँ बंगाल, असाम, राजस्थान आ गुजरात तक पसरल छल। ई क्रम चलिते रहल। हालक वर्षमे राज्यसँ बाहर रोजगारक गति किछु बेसी जोर पकड़लक अछि। नेवीमे देखू, एयर फोर्समे देखू, आर्मीमे देखू, विभिन्न आइ.आइ.टी. मे देखू, बैंकिंग सेवामे देखू, रेल-सेवामे देखू, स्वास्थ्य-विभागमे देखू। एक-एक ठाम बिहारक लोकक प्रतिशत निनानवे प्रतिशत तक पहुँचि चुकल अछि। सभ राज्य चिन्तामे अछि जे कोन रस्तासँ दोसर ठामक लोककेँ ओतऽ रोजगार पएबासँ वंचित कएल जाए। जातीयताक बन्धन तँ लगाएले जा चुकल अछि, क्षेत्रीयता आ भाषाक बन्धन सेहो लगेबाक प्रयत्न कएल जा रहल अछि। कतेको ठाम उच्च शिक्षाधारीकेँ कोनो कार्यसँ वंचित राखल जा रहल अछि तँ कतौ अन्य क्षेत्रक लोककेँ वंचित राखल जा रहल अछि आ आब पुनः क्षेत्रीय भाषाक बात उठा दोसराकेँ रोकक प्रयास भऽ रहल अछि। बिहारक छात्रक प्रवेश-पत्र आ उत्तर-पुस्तिकापर असाम, तमिलनाडु, महाराष्ट्र सभतरि प्रहार भेल अछि। जयकान्त मिश्र सभ दिन इलाहाबादमे रहलथि आ बात मिथिलाक माटि आ पानिक करैत रहलथि। जीवकान्तजी सेहो माटि आ पानि भाषा आ भूगोलक बात करैत रहलथि अछि। अपनाकेँ बाकी इन्डियासँ बीस-बर्ख आगाँ कहऽबला बंगाली अधबैसीकेँ पूणाक एक सुसभ्य सुसंस्कृत वृद्ध अंग्रेजीमे डाँटि रहल छलैक- आ ओ युवक बकर-बकर मुँह ताकि रहल छल। तैओ भीड़मेसँ आबि एक “गवाठी” कइएक फाइट ओकरा मुँहपर मारलकै। चुप्प रहलासँ कि हारि मानि लेलासँ सेहो केओ छोड़ै नै छै। पटनाक बसमे मुम्बइ ट्रेन पकड़बाक लेल एक यात्री छल। बिपतिक मारले केओ परदेश जाइत अछि। वेश-भूषा वएह रहै। केओ पुछलकै, कतऽ जेबै। तँ कहलकै- बम्बइ। कोनो सुसभ्य आदमी कहलकै- कतऽ बममे। किछुए दिनक बाद मुम्बइमे बम विस्फोट भेलै। मिथिलाक दृष्टि आ व्यवस्था एतेक अकिंचन भऽ गेलैक अछि। किछु स्थानीय उच्च वर्गक भोथ दिमागक नोकरिहारा शिक्षक, बैंक कर्मचारी, राज्य सरकारक विभिन्न कार्यालयक कर्मचारी आ मध्यम वर्गीय किसान तक्षक नाग जकाँ अप्पन आसन जमौने छथि आ ओ आसन अछि सामन्तवादक आसन। सामन्ती सोचसँ मैथिली साहित्य तक भरल अछि। मिथिलाक संस्कृति जकरा कहैत छी ओ किछु अलग संस्कृति नै ओ हिन्दू जीवन पद्धति अछि जे सम्पूर्ण देशमे अछि। जे अमन चैनसँ सुतऽ चाहै छथि तिनका पेटोकेँ छुट्टी देबऽ पड़तनि। ई पद्धति आलस्यक पद्धति अछि, जकरा त्यागक प्रयोजन अछि। कोनो समएमे ऐ पद्धतिक प्रधानता छलै। पैघ-पैघ किसान छलै। लोक बाहरसँ रोजगार लेल एतऽ अबै छै आ “गुहनार”मे अप्पन झोपड़ी-पट्टी बना लै छल- छोट लोक कहबैत छल। मुम्बइमे तहिना दू अट्टालिकाक बीच आकि नालाक कात, गुहनारक, रेलक पटरीक काते-कात, पोस्ट ऑफिस आकि आन कोनो सरकारी कार्यालयक बगलमे, जकर भार केओ सरकारी कर्मचारी आकि अधिकारी लेबऽले तैयार नै, झोपड़ पट्टी बनि गेल अछि। पटनेमे गली सबहक दुनू कात झोपड़ी ठाढ़ भऽ गेल अछि। ऐ हालातमे मिथिलाक लोक अन्यत्र जीवि रहल अछि। बोली सुन्दर छै, आवाज बहराइ छै- हे, यौ, अ-अप्पन पेपर जे छल ओ फेक देलनि। आब कथीपर सूतब। पूणे जाइत एक दम्पत्ति जकरा देहपर कतौ लत्ता नै, आग्रह करै छै, मुम्बइ जाएबला यात्रीसँ- जरूर आएब यौ, नासिकमे सेहो देखक बहुत चीज सभ छै, जकरा अही क्षेत्रवादक कारण खेहारि-खेहारि कऽ भगाओल जाइत अछि। मुदा मास्टर साहेबकेँ दुःख छनि- आब भरिया-खबास नै भेटैत छनि। भनसीया नै भेटैत छनि। मुदा ठिकेदार भेट जाइत छनि। ड्राइवर भेट जाइत छनि। बुच्ची दाइक निलामी कोना से देखू विभा रानीक “एहिना एकटा बुच्ची दाइ” घर-बाहर पत्रिकाक अक्टूबर-दिसम्बर २००६ अंकमे छपल छल। फेर ओ “नवनीत” फरवरी २००७ मे हिन्दी कहानीक रूपमे “यूँ ही बुच्ची दाइ” नामसँ सेहो छपल छल। विभा रानीक कथा किछु आन बहुतो जकाँ ओइ सभ तत्वसँ श्रुहेसँ भरल रहैत छन्हि जे तत्व कोनो कथाकेँ कथा कहबऽसँ वंचित करै छै। मैथिलीक सम्पादक आ आलोचक लोकनि जतेक प्रोत्साहित हुनका केलखिन्ह ततेक कोनो आन लेखिकाकेँ नै। छात्र जीवनमे जखन हुनकर कथा देखैत छलौं तँ सोचैत रही जे हिनका आगाँ जखन बोध हेतन्हि तँ संग्रहमे एकरा सुधारि लेतीह मुदा ओ सभ पूर्ववत “खोहसँ निकसैत” मे आएल अछि। विभा रानी शुद्ध-अशुद्ध रूपमे अनपढ़क बीच प्रयोग होइत जे किछु सुनै छथि आकि सुनने छथि, सभकेँ मिथिला वा मैथिल वा मैथिलीक संग जोड़ि दै छथि- आ मिथिला नामक जतेक जे अर्जित क्रेडिट छै- अपना माथपर लऽ लेबऽ चाहै छथि। आइ नेता बनक हेतु जेना प्रचुर समए आ प्रचुर पैसा चाही तहिना लेखक बनक लेल सेहो प्रचुर समए आ पैसाक जरूरति पड़ै छै। एहन भाग्य दर्जन भरि मैथिलीक प्राध्यापकक संग हिनका आ नवीन चौधरीकेँ प्राप्त छन्हि। हिन्दी विभाग सन अमन चैनक जिनगी कोनो नोकरिहारा हेतु दुर्लभ अछि आ ताहूमे हिन्दी पदाधिकारी तँ सोनामे सुगन्धे। हरिमोहन बाबूक बुच्ची दाइकेँ उठा कऽ विभा रानी “एहिना एकटा बुच्ची दाइ”मे लऽ अनलन्हि अछि। मिथिलामे विधवा विवाह आ अन्य समस्या सिर्फ उच्च कुल आ उच्च वर्गमे अछि। बोनिहार लोक विआह आ तलाकक अर्थमे अमेरिका-इंगलैण्डोसँ आगाँ अछि। विभा रानी जहाँ-तहाँ विद्यापतिक प्रसिद्ध गीत सभक गलत रूपमे उल्लेख करैत छथि। शुद्ध एना अछि:- सर बिनु सरसिज सरसिज बिनु सर की सरसिज..............बिनु सूरे यौवन बिनु तन   तन बिनु यौवन की यौवन.......पिये दूरे “एहिना एकटा बुच्ची दाइ” कथाक अन्तिम तीन पाँति “दुःखहि जनम लेल, दुखहि गमाओल नयन न तिरपित भेल हे भोलानाथ कखन हरब दुःख मोर!” क कतेक गलत प्रयोग भेल अछि, जे देखल जा सकैत अछि। ध्यानाकर्षणार्थ:- दुःखहि जनम लेल, दुःखहि गमाओल सुख सपनहुँ नहि भेल, हे भोला दानी कखन हरब दुःख मोर! “नयन न तिरपित भेल” अनावश्यक शिव स्तुतिमे मिला देल गेल अछि। शुद्ध रूप एना अछि:- “कत मधुआमिनी रभसि गमाओल नहि बुझि कैसन केलि सैहो मधुबोल श्रवणहि सूनल श्रुतिपथ नहि भेल जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।” विभा रानी शुरुहेसँ शब्दक प्रति अल्हड़पन देखबैत अएलथि अछि मुदा तैयो हुनकर कथा सभ ऐ नोटक संग आन सभ लेखिकाकेँ अपमानित करैत छपल अछि:- आन लेखिका जकाँ विभा रानीक कथा महिला कोटाक अन्तर्गत नै छापल जा रहल अछि। “यूँ ही बुच्चीदाइ”क किछु शब्द देखू- माँ-बाउजी, कहानी-वहानी, लोग-वाग, पता नहीं पारा-पारी, घास-पुआल जैसी बढ़ती ही चली जाती, अगर ब्राह्मण की बहु रहती न आपकी माँ तो वे भी एक के बाद एक लेद-गेद जनमाती रहती, पुरुषों का होता है हमारे में, लड़कियों का नहीं। मिथिला की बेटियाँ, तिलकोर के बेल की तरह चतर गयी, अलच्छा, रंडापा, सिद्धा, आज मगर कानून बन जाने के बाद भी कहाँ कोई जयदाद देता है। ई सभ शब्द विभारानी ककरा लेल रचने छथि। हिनका मंडन मिश्रक पनिभरनी याद नै अबै छन्हि जे शंकराचार्यसँ संस्कृतमे बात कएने छलथि। कथाक बहन्ने, लोक कथाक बहन्ने वा संस्कार ओ उत्सवक बहन्ने कतेको ठाम विभा रानी बिहार कि मिथिला कि मधुबनीक प्रयोग गलत अर्थमे कएने छथि। कोनो कथा थूक फेकक लेल वा गूँ-मूतक बात करक लेल नै लिखल जाइ छै। कथा सभ्यताक पहिल डेग अछि। कथाकार रामधारी सिंह “दिवाकर” जीवन भरि दरभंगामे रहि कहानी लिखैत रहलथि मुदा ओ कतौ दरभंगा वा मिथिलाक नाम नै लेलन्हि। “जखन तखन” जनवरी-मार्च ०७ अंकमे पुनः विद्यापतिक पाँति गलत रूपमे दोहराएल गेल अछि। “बड़ रे जतन सँ सिया दाइकेँ पोसलहुँ सेहो रघुवंशी नेने जाय।” हेबाक चाही। पंडित लोकनि बड़ प्रयत्नसँ मैथिलीकेँ बचौने छथि। मैथिलीक बड़प्पन अष्टम अनुसूचीमे अएलासँ नै भेल अछि। मैथिली जहिया ज्ञानक भाषा बनत तहिया मैथिलीक बड़प्पन हएत। मैथिली अनपढ़क भाषा बनल रहत तँ कि ज्ञानक कोनो विषय मैथिलीक भरोसे बैसल रहत। जीवकान्त जी कहैत छलथि जे मैथिलीक लेखक कुंठित लोकक बीच रहै छथि तँ कुंठा नै तँ की लिखताह। जिनका कोनो विषयक ज्ञान नै ओ शिक्षक बनै छथि, जिनका कोनो अध्ययन नै ओ लेखक बनै छथि, कारण ओ सुविधा जीवी छथि। जँ केओ अयोग्य व्यक्ति सम्पादक बनैत छथि कि पुरस्कारक हेतु जूरी बनै छथि तँ ओ मैथिलीक टांग घीचि रहल छथि। किछु आलोचक लोकनि आब कथा आ कविता लिखऽ लगलथि अछि आ किछु कथाकार लोकनि आलोचना। हम जखन ककरो लाठी भँजैत देखै छिऐ कि नचैत देखै छिऐ कि गबैत देखै छिऐ वा सर्कस-सिनेमामे अपन “करतब” करैत देखै छिऐ तँ सोचैत छी जे ओ गुण मैथिलीक लेखक लोकनिमे किए नै छै। फुटबॉल, क्रिकेट कि सर्कसमे किछुओ गलती भऽ जाइ छै तँ सभकेँ देखाइ दै छै मुदा साहित्यपर गवार राज्य कऽ रहल छै से किए ने केओ देख रहल छै। एक गोटे कहै छथि जे देखैत तँ सभ छै मुदा ककरो कोन मतलब। जेना राजमोहन झा कहलनि- लोकक सम्पर्कमे नै अएबै तँ लोककेँ कोन मतलब जे अहाँ नीक लिखै छी कि बेजाए। एतद्धि। मानसरोवरक भूमिकाक प्रासंगिकता ओना तँ प्रेमचन्द सेहो अप्पन गुरु बंगलाक महान कथाकार शरतचन्द्रकेँ मानलनि मुदा बंगलाक विभिन्न पत्र-पत्रिका कथा-चेतनाक हिसाबे प्रेमचन्दकेँ सर्वोपरि मानै छथि। ऐ‍ बातमे कोनो संदेह नै‍ जे प्रेमचन्दक कथा साहित्य विश्व साहित्यमे अप्पन समुचित स्थान रखैत अछि। गाँधीजी रवीन्द्रनाथ टैगोरक समक्ष नतमस्तक भऽ जखन हुनका गुरु कहलकन्हि तखन रवीन्द्रनाथ टैगोर सेहो आह्लादपूर्वक हुनका बापू कहलकन्हि। प्रेमचन्द जे सम्मान बंगला साहित्यकेँ देलनि तइसँ कनिको कम सम्मान बंगलाक साहित्यकार प्रेमचन्दकेँ नै‍ दऽ रहल छथि। प्रेमचन्दक जे कथा सभ पाठ्यपुस्तकमे लागल अछि तइसँ हिन्दी आ मैथिली जगत पूर्णतः वाकिफ अछि, तकर अलावे समए-समैपर हिन्दीक पत्रिका सभ प्रेमचन्दक आनो कथा सभ प्रकाशित करैत रहैत अछि। एतेक सभ भेलाक बादो हिन्दी आ मैथिलीक आम पाठक की लेखको प्रेमचन्दसँ अनभिज्ञ भऽ रहल छथि, जइ कारणेँ मैथिली की हिन्दियो साहित्य एको डेग आगाँ नै‍ बढ़ि रहल अछि। मानसरोवरक प्राक्कथनमे प्रेमचन्द भारतीय कथा साहित्यक गुढ़केँ कतेक गदिया कऽ पकड़ने छथि- देखल जा सकैत अछि आ हमरा लोकनि लीकसँ कतेक हटि गेल छी तकरो अनुमान कएल जा सकैत अछि। हिन्दीक कतेको पत्र अप्पन सम्पादकीयमे कहैत छल जे मैथिली पहिने अप्पन साहित्यकेँ मजगूत कऽ लिअए तखन संवैधानिक मान्यताक बात करए, मुदा मैथिलीक साहित्यकार लोकनि अपना हठपर अड़ल रहलथि। रोजगारक नाओंपर दर-दर भटकैत मैथिलजन सभतरि अपमानित भऽ रहल छथि तकर किनको चिन्ता नै‍ मुदा अप्पन हठ काएम रखताह। साहित्य वा राजनीति एहन हल्लुक चीज नै जे सत्यसँ अलग पएर राखि आडम्बरक बलपर सफलता प्राप्त कऽ लिअए। सौ चोर मसियौत अइ तँ सौ साधु सहोदर, ई परम सत्य अइ। कथा साहित्य पाठकक सुन्दर भावनाक स्पर्श- मानसरोवरक प्राकक्थन-प्रेमचन्द- मैथिली रूपान्तर- मानेश्वर मनुज एक आलोचक लिखलनि अछि जे इतिहासमे सभ किछु यथार्थ होइतो ओ असत्य अछि आ कथा साहित्यमे सभ किछु काल्पनिक होइतो ओ सत्य अछि। ऐ कथनक आशय एकर सिवाए अओर की भऽ सकैत अछि जे इतिहास आदिसँ अन्त धरि हत्या, संग्राम आ धोखाक प्रदर्शन करैत अछि जे असुन्दर अछि तँए असत्य अछि, लोभक क्रूरसँ क्रूर अहंकारक नीचसँ नीच, ईर्ष्याक अधमसँ अधम घटना सभ अहाँकेँ ओतए भेटत आ अहाँ सोचए लागब जे मनुष्य एतेक अमानुषिक अछि, थोड़ स्वार्थक लेल भाए-भाएक हत्या करैपर लागल अछि। बेटा बापक हत्या कऽ दैत अछि आ राजा असंख्य प्रजाक हत्या कऽ दैत अछि। एकरा पढ़ि कऽ मोनमे ग्लानि होइत अछि आनन्द नै। आ जे आनन्द प्रदान नै कऽ सकैत अछि ओ सुन्दर नै भऽ सकैत अछि आ ओ सत्य सेहो नै भऽ सकैत अछि। जतए आनन्द अछि ओतै सत्य अछि। साहित्य काल्पनिक वस्तु अछि मुदा एकर प्रधान गुण अछि आनन्द प्रदान करब, आ ऐ‍ हेतु ओ सत्य अछि। मनुष्य जगतमे जे किछु सत्य आ सुन्दर पओलक अछि आ पाबि रहल अछि ओकरे साहित्य कहै छै आ गल्प सेहो साहित्यक एक भाग अछि। मनुष्य जाति लेल मनुष्ये सभसँ विकट पहेली अछि। ओ स्वयं अपना समझमे नै अबैत अछि। कोनो ने कोनो रूपमे ओ अपने आलोचना करैत रहैत अछि, अपने मनोरहस्य खोलल करैत अछि। मानव संस्कृतिक विकासे ऐ‍ लेल भेल अछि कि मनुष्य अपनाकेँ समझाबए, आध्यात्म आ दर्शन जकाँ साहित्यो ऐ‍ खोजमे लागल अछि, अन्तर एतनी अछि कि ओ ऐ उद्योगमे रसक मिश्रण कऽ ओकरा आनन्दप्रद बना दैत अछि, ऐ‍ लेल आध्यात्म आ दर्शन सिर्फ ज्ञानी लोकनिक लेल अछि, साहित्य मनुष्य मात्र लेल। जेना हम ऊपर कहि गेल छी, गल्प आ आख्यायिका साहित्यक एक प्रधान अंग अछि। आइसँ नै, आदिये कालसँ। हँ, आइ-काल्हुक आख्यायिका आ प्राचीन कालक आख्यायिकामे समैक गति आ रुचिक परिवर्तनसँ बहुत किछु अन्तर भेल अछि। प्राचीन आख्यायिका कुतुहल प्रधान होइत छल आ आध्यात्म विषयक। उपनिषद आ महाभारतमे आध्यात्मिक रहस्यकेँ समझाबक लेल आख्यायिका सबहक आश्रय लेल गेल अछि। “जातक” सेहो आख्यायिकाक सिवाय अओर की अछि? बाइबिलमे सेहो दृष्टान्त सभ आ आख्यायिका सबहक द्वारे धर्म तत्व समझाएल गेल अछि। सत्य ऐ रूपमे आबि कऽ साकार भऽ जाइत अछि आ तखने जनता ओकरा समझैत अछि आ ओकर बेवहार करैत अछि। वर्तमान आख्यायिका मनोवैज्ञानिक-विश्लेषण आ जीवनक यथार्थ स्वभाविक चित्रणकेँ अप्पन ध्येय समझैत अछि। ऐमे कल्पनाक मात्रा कम, अनुभूतिक मात्रा अधिक होइत अछि, बल्कि अनुभूतिये रचनाशील भावनासँ अनुरंजित भऽ कऽ कथा बनि जाइत अछि, मगर ई समझब भूल हएत कि कथा जीवनक यथार्थ चित्र अछि। जीवनक चित्र तँ मनुष्य स्वयं भऽ सकैत अछि, मगर कथाक पात्र सबहक सुख-दुःखसँ हम जतेक प्रभावित होइत छी ओतेक यथार्थ जीवनसँ नै होइत छी, जावत तक ओ निजत्वक परिधिमे ने आबि जाए। कथा सबहक पात्र सभमे हमरा एक्के-दू मिनटक परि‍चएमे निजत्व भऽ जाइत अछि आ हम ओकरा संग हँसए आ कानए लगैत छी, ओकर हर्ष आ विषाद हमर अप्पन हर्ष आ विषाद भऽ जाइत अछि, बल्कि कहानी पढ़ि कऽ ओ लोको कानैत आ हँसैत देखल जाइत अछि, जकरापर साधारणतः सुख-दुःखक कोनो असरि नै पड़ैत अछि, जकर आँखि श्मशानमे या कब्रिस्तानमे सेहो सजग नै होइत अछि, ओ लोक सेहो उपन्यासक मर्मस्पर्शी स्थल सभपर पहुँचि कऽ कानए लगैत अछि। शाइत एकर ईहो कारण होइक कि स्थूल प्राणी सूक्ष्म मनक ओतेक लग नै पहुँचि‍ सकैत अछि जतेक कि कथाक सूक्ष्म चरित्रक। कथाक चरित्र सभ आ मनक बीचमे जड़ताक ई पर्दा नै होइत अछि जे एक मनुष्यक हृदैकेँ दोसर मनुष्यक हृदैसँ दूर रखैत अछि। आ अगर हम यथार्थकेँ हू-ब-हू खीच कऽ राखि दी तँ ओइमे कला कहाँ अछि। कला केवल यथार्थक नकलक नाओं नै अछि। कला देखाइत तँ यथार्थ अछि मुदा यथार्थ होइत नै अछि। ओकर खूबी ई अछि कि ओ यथार्थ नै होइतो यथार्थ लगैत अछि। एकर मापदण्ड सेहो जीवनक मापदण्डसँ अलग अछि, जीवनमे बहुधा हमर अंत ओही समए भऽ जाइत अछि जखन ओ वांछनीय नै होइत अछि। जीवन ककरो दायी नै अछि। ओकर सुख-दुःख, हानि-लाभ, जीवन-मरणमे कोनो क्रम कोनो सम्बन्ध ज्ञात नै होइत अछि। कम-सँ-कम मनुष्यक लेल ई अज्ञेय अछि, लेकिन कला-साहित्य मनुष्यक रचल जगत अछि आ परिमिति हेबाक कारण सम्पूर्णतः हमरा सामने आबि जाइत अछि आ जहाँ ओ हमर मानवीय न्याय-बुधि‍ आ अनुभूतिक अतिक्रमण करैत पाओल जाइत अछि, हम ओकरा दण्ड देबाक लेल तैयार भऽ जाइ छी। कथामे अगर ककरो सुख प्राप्त होइ छै तँ एकर कारण बतबक हेतै। दुःखो भेटै छै तँ ओकर कारण बतबक हेतै। एतए कोनो चरित्र मरि नै सकै छै जावत तक मानव-न्याय-बुइधि‍ ओकर मौत नै मांगै। सृष्टाकेँ जनताक अदालतमे अप्पन हर एक कृतिक लेल जवाब देबए पड़तै। कलाक रहस्य भ्रान्ति अछि मुदा ओ भ्रान्ति जइपर यथार्थक आवरण पड़ल हुअए। हमरा सभकेँ ई स्वीकार कऽ लेबएमे संकोच नै हेबाक चाही कि उपन्यासो जकाँ आख्यायिकाक कलो हम पश्चिमसँ लेल अछि। कम-सँ-कम एकर आइ-काल्हुक विकसित रूप तँ पश्चिमेक अछि। अनेक कारण सभसँ जीवनक अन्य धारा सबहक तरहे साहित्योमे हमर प्रगति रुकि गेल आ हम प्राचीनसँ एको-रत्ती एम्हर-ओम्हर हटबो निषिद्ध बूझि‍ लेलौं। साहित्यक लेल प्राचीन लोक सभ जे मर्यादा बाँधि देने छलथि, ओकर उल्लंघन करब वर्जित छल। अतएव काव्य, नाटक, कथा कथूमे हम अप्पन कदम बढ़ा नै सकलौं। कोनो वस्तु बहुत सुन्दर भेलोपर अरुचिकर भऽ जाइत अछि, जावत तक ओइमे किछु नवीनता नै आनल जाए। एक्के तरहक नाटक, एक्के तरहक काव्य पढ़ैत-पढ़ैत आदमी ऊबि जाइत अछि आ ओ किछु नव चीज चाहैत अछि, चाहे ओ ओतेक सुन्दर आ उत्कृष्ट नै हुअए। हमरा ओतए तँ ई इच्छा उठबे ने कएल या हम सभ एतेक सकुचएलौं कि ओ जड़ीभूत भऽ गेल। पश्चिम प्रगति करैत रहल, ओकरा नवीनताक भूख छलै, मर्यादाक बेड़ी सभसँ चिढ़। जीवनक हर एक विभागमे ओकर ऐ‍ अस्थिरताक, असंतोषक बेड़ी सभसँ मुक्त भऽ जेबाक छाप लागल अछि। साहित्यमे सेहो ओ क्रान्ति मचा देलक। शेक्सपियरक नाटक अनुपम अछि मुदा आइ ओइ नाटक सबहक जनताक जीवनसँ कोनो सम्बन्ध नै। आजुक नाटकक उद्देश्य किछु अओर अछि, आदर्श किछु अओर अछि, विषय किछु अओर अछि, शैली किछु अओर अछि। कथा-साहित्यमे सेहो विकास भेल आ ओकर विषएमे चाहे ओतेक पैघ परिवर्तन नै भेलै मुदा शैली तँ बिल्कुले बदलि गेलै। अलिफलैला आेइ समैक आदर्श छलै, जइमे बहुरूपता छलै, वैचित्र्य छलै, कुतुहल छलै, रोमांस छलै, मुदा ओइमे जीवनक समस्या नै छलै, मनोविज्ञानक रहस्य नै छलै, अनुभूति सबहक एतेक प्रचुरता नै छलै, जीवन आ सत्य रूपमे ओतेक स्पष्टता नै छलै। ओकर रूपान्तर भेलै आ उपन्यासक उदय भेलै, जे कथा आ ड्रामाक बीचक वस्तु अछि। पुरान दृष्टान्त सभ रूपान्तरित भऽ गल्प बनि गेल। मुदा सए वर्ष पहिले यूरोप सेहो ऐ‍ कलासँ अनभिज्ञ छल। पैघ-पैघ, उच्च कोटिक दार्शनिक तथा ऐतिहासिक आ सामाजिक उपन्यास लिखल जाइत छल, लेकिन छोट-छोट कथा सबहक दिसि‍ ककरो धि‍यान नै जाइ छलै। हँ परी सबहक आ भूत सबहक कथा लिखल जाइत छल, किन्तु ऐ‍ एक शताब्दीक अन्दर या ओहूसँ कम बुझी छोट-कथा साहित्यक आन सभ अंगपर विजय प्राप्त कऽ लेलक अछि, आ ई गलत नै हएत कि जेना कोनो जमानामे कविते साहित्यिक अभिव्यक्तिक व्यापक रूप छल ओहिना आइ कथा अछि। आ ओकरा ई गौरव प्राप्त भेलैक अछि यूरोपक कतेको महान कलाकारक प्रतिभासँ, जइमे बालजाँक, मोपासाँ, चेखब, टॉलस्टाय, मैक्सिम गोर्की आदि मुख्य अछि। हिन्दीमे पचीस-तीस साल पूर्व तक गल्पक जन्म नै भेल छल। आइ तँ कोनो एहन पत्रिका नै जइमे दू-चारि “कथा” नै हुअए, एतए तक कि कतेको पत्रिकामे केवल “कथे” देल जाइत अछि। कथाक ऐ‍ प्राबल्यक मुख्य कारण आजुक जीवन संग्राम आ समयाभाव अछि, आब ओ जमाना नै रहल कि हम “बोस्ताने खयाल” लऽ कऽ बैस जाइ आ पूरा दिन ओकरे कुँजमे विचरैत रही। आब तँ हम संग्राममे एतेक तन्मय भऽ गेल छी कि हमरा मनोरंजनक लेल समए नै भेटैत अछि, अगर किछु मनोरंजन स्वास्थ्यक लेल अनिवार्य नै होइत आ हम विक्षिप्त भेले बिना अट्ठारह घंटा काज कऽ सकितौं तँ शाइत हम मनोरंजनक नाओं तक नै लितौं, मुदा प्रकृति हमरा विवश कऽ देलक अछि तँए हम चाहैत छी कि थोड़सँ थोड़ समैमे अधिकसँ अधिक मनोरंजन भऽ जाए, तँए सिनेमा घरक संख्या दिनो-दिन बढ़ैत जाइत अछि। जइ उपन्यासकेँ पढ़एमे महीना लगैत ओकर आनन्द हम दू घंटामे उठा लै छी। कथाक लेल पन्द्रह-बीसे मिनट काफी अछि। अतएव हम कथा एहन चाहै छी कि ओ थोड़सँ थोड़ शब्दमे कहल जाए, ओइमे एक वाक्य कि एक शब्दो अनावश्यक नै आबि पाबए, ओकर पहिले वाक्य मनकेँ आकर्षित कऽ लिअए आ अन्त तक ओकरा मुग्ध कएने रहए, ओकरामे किछु छटपटाहटि‍ होइक, किछु ताजगी होइक, किछु विकास होइक आ ओकर संग किछु तत्वो होइक। तत्वहीन कथासँ चाहे मनोरंजन भऽ जाए मानसिक तृप्ति नै होइ छै। ई सत्य अछि जे हम कथामे उपदेश नै चाहै छी, मुदा विचारकेँ उत्तेजित करक लेल, मनक सुन्दर भावकेँ जागृत करक लेल किछु ने किछु अवश्य चाहै छी। वएह कथा सफल होइत अछि जइमे ऐ दुनूमे सँ मनोरंजन आ मानसिक तृप्तिमे सँ एक अवश्य उपलब्ध अछि। सभसँ उत्तम कथा ओ होइत अछि जकर आधार कोनो मनोवैज्ञानिक सत्यपर होइक। साधु पिताक अप्पन कुव्यसनी पुत्रक दशासँ दुखी हएब मनोवैज्ञानिक सत्य अछि। ऐ‍ आवेगमे पिताक मनोवेगकेँ चित्रित करब आ तदनुकूल ओकर बेवहारकेँ प्रदर्शित करब कथाकेँ आकर्षक बना सकैत अछि। अधलाह लोक सेहो बिल्कुल अधलाह नै होइत अछि, ओकरोमे कतौ ने कतौ देवता अवश्य छिपल होइ छै, ई मनोवैज्ञानिक सत्य अछि। ओइ देवताकेँ खोलि कऽ देखाए देब सफल आख्यायिकाक काज अछि। विपत्तिपर विपत्ति पड़लासँ मनुष्य कतेक दिलेर भऽ जाइत अछि एते तक कि ओ पैघसँ पैघ संकटक सामना करक लेल टाल-ठोकि कऽ तैयार भऽ जाइत अछि। ओकर सभ दुर्वासना भागि जाइ छै। ओकरा हृदैक कोनो गुप्त स्थानमे छिपल जौहर निकलि अबै छै आ हमरा चकित कऽ दैत अछि, मनोवैज्ञानिक सत्य अछि। एक्के घटना वा दुर्घटना भिन्न-भिन्न प्रकृतक मनुष्यकेँ भिन्न-भिन्न रूपसँ प्रभावित करैत अछि। हम कथामे एकरा सफलताक संग देखा सकी तँ कथा अवश्य आकर्षक हएत। कोनो समस्याक समावेश कथाकेँ आकर्षक बनबाक सभसँ बड़का साधन अछि। जीवनमे एहन समस्या नित्ये उपस्थित होइत अछि आ ओइमे पैदा हुअएबला द्वन्द्व आख्यायिकाकेँ चमका दैत अछि। सत्यवादी पिताकेँ पता चलै छै कि ओकर पुत्र हत्या केलक अछि, ओ ओकरा न्यायक वेदीपर बलिदान कऽ दिअए वा अप्पन जीवन सिद्धान्तक हत्या कऽ दिअए? कतेक भीषण द्वन्द्व अछि! पश्चाताप एहन द्वन्द्वक अखण्ड श्रोत अछि। एक भाए दोसर भाएक सम्पत्ति छल-कपटसँ अपहरण कऽ लेलक अछि, ओकरा भिक्षा मांगैत देखि‍ कऽ की छली भाएकेँ कनिको पश्चाताप नै हेतै। अगर एना नै होइक तँ ओ मनुष्य नै अछि। उपन्यासे जकाँ कथा सेहो किछु घटना प्रधान होइत अछि, किछु चरित्र प्रधान। चरित्र प्रधान कथाक पद उच्च बुझल जाइत अछि, मुदा कथामे बहुत विस्तृत विश्लेषणक गुंजाइश नै होइत अछि। एतए हमर उद्देश्य सम्पूर्ण मनुष्यकेँ चित्रित करब नै, बल्कि ओकर चरित्रक एक अंग देखाएब अछि। ई परमावश्यक अछि कि हमर कथासँ जे परिणाम वा तत्व निकलए ओ सर्वमान्य हुअए आ ओइमे किछु बारीकी हुअए। ई एक साधारण निअम अछि कि हमरा ओही बातेक आनन्द अबैत अछि जइसँ हमर किछु सम्बन्ध होबए। जुआ खेलएबलाकेँ जे उन्माद आ उल्लास होइ छै ओ दर्शककेँ कदापि नै भऽ सकैत अछि। जखन हमर चरित्र एतेक सजीव आ आकर्षक अछि कि पाठक स्वयंकेँ ओकरा स्थानपर समझि लैत अछि‍ तखने ओकरा कथाक आनन्द प्राप्त होइ छै। अगर लेखक अपना पात्रक प्रति पाठकमे ई सहानुभूति नै उत्पन्न कऽ देलक तँ ओ अपना उद्देश्यमे असफल अछि। पाठकसँ ई कहक जरूरति नै अछि कि ऐ थोड़ दिनमे हिन्दी गल्पकला कतेक प्रौढ़ता प्राप्त कऽ लेलक अछि। पहिने हमरा सामने बंगला कथाक नमूना छल। आब हम संसारक सभ प्रमुख गल्प लेखकक रचना पढ़ैत छी, आेइपर विचार आ बहस करै छी, ओकर गुण-दोष निकालै छी आ आेइसँ प्रभावित भेने बिना नै रहि सकै छी। आब हिन्दीक गल्प लेखक सभमे विषए, दृष्टिकोण आ शैलीक अलग-अलग विकास हुअए लागल अछि। कथा जीवनक बहुत निकट आबि गेल अछि। ओकर जमीन आब ओतेक लम्बा-चौड़ा नै अछि। ओइमे कतेक रस, कतेक चरित्र आ कतेक घटनाक लेल स्थान नै रहल। आब ओ केवल एक प्रसंगक, आत्माक एक झलकक सजीव ह्ृदैस्पर्शी चित्रण अछि, ई एक तथ्यता, ओइमे प्रभाव, आकस्मिकता आ तीव्रता भरि दैए। आब ओइमे व्‍याख्‍याक अंश कम संवेदनाक अंश बेसी रहैत अछि। एकर शैलियो आब प्रभावमय भऽ गेल अछि। लेखककेँ जे किछु कहक अछि ओ कम-सँ-कम शब्दमे कहि देबए चाहैत अछि। ओ अप्पन चरित्रक मनोभावनाक व्याख्या करैत नै बैसैत अछि, केवल ओकरा दिसि‍ इशारा कऽ दैत अछि। कखनो-कखनो तँ संभाषणमे एक दू-शब्देसँ काज निकालि लैत अछि। एहन कतेको अवसर होइत अछि, जखन पात्रक मुँहसँ एक शब्द सुनि कऽ हम ओकर मनोभावक पूरा अनुमान कऽ लै छी। पूरा वाक्यक जरूरतिये नै रहैत अछि। आब हम कथाक मूल्य ओकर घटना विन्याससँ नै लगबैत छी। हम चाहैत छी पात्रक मनोगति स्वयं घटनाक सृष्टि कराबए। घटनाक स्वतन्त्र कोनो महत्वे नै रहल, ओकर महत्व केवल पात्रक मनोभावकेँ व्यक्त करबाक दृष्टिएसँ अछि- ओहिना जेना शालिग्राम स्वतन्त्र रूपसँ केवल पत्थरक एक गोल टुकड़ा छथि, लेकिन उपासकक श्रद्धासँ प्रतिष्ठित भऽ कऽ देवता बनि जाइ छथि। खुलासा ई कि गल्पक आधार आब घटना नै, मनोवैज्ञानिक अनुभूति अछि। आइ लेखक कोनो रोचक दृश्य देखि‍ कऽ कथा लिखए नै बैस जाइत अछि। ओकर उद्देश्य स्थूल सौन्दर्य नै। ओ तँ कोनो एहन प्रेरणा चाहैत अछि, जइमे सौन्दर्यक झलक होइक आ ओकरा द्वारा ओ पाठकक सुन्दर भावनाक स्पर्श कऽ सकए। ज्योति झा चौधरी इर्लिंग आर्ट ग्रुपक ९५म वार्षिक कला प्रदर्शनी इर्लिंग आर्ट ग्रुपक अन्तर्गत जे ९५म वार्षिक कला प्रदर्शनी लण्डनमे लागल छल, तइमे हमर तीनटा मधुबनी पेण्टिंग सेहाे प्रदर्शित छल। ई कला तँ अहुना विश्व भरिमे अपन पहि‍चान बना चुकल अछि। अहू प्रदर्शनीमे ऐ कलाकेँ उच्च स्थान भेटल छल। सभ बेर बढ़िया कलाकेँ द्वारपर जगह भेटैत छल से ऐबेर मधुबनी वा मिथिला चित्रकलाकेँ प्रवेश द्वार लग जगह भेटल छल। प्रदर्शनी हाॅलमे प्रवेश करैत देरी बामा कात सभसँ पहिने काेहबर आ अन्य दूटा चित्रकला नजरि आबैत छल। कैटेलाॅगमे सेहाे हमर नाओं दाेसर स्थानपर आ हमर पेण्टिंगक नाओं तेसर चारिम आ पाँचम स्थानपर छल। जे कलाकार पहिल स्थानपर रहथि‍ तिनकर दूटा आॅयल पेण्टिग प्रवेश द्वारपर दहिना कात विराजमान छलनि‍। पहिल दिनक प्राइवेट व्यूबला दिन कम-सँ-कम १०० लाेकक भीड़ लागल छल। ऐ सफल प्रदर्शनीमे मिथिला चित्रकलाकेँ जे सम्मानजनक स्थान भेटल छल से वास्तवमे प्राेत्‍साहक अछि। यूके मे भेल २०११ क वार्षिक मिथिला सांस्कृतिक कार्यक्रम बहुत गर्वक बात अछि जे अपन माटिसँ दूर रहितो यू. के. मे रहैबला मैथिल सभ, जइमे बेसीतर दम्पति कार्यरत छथि, अपन कला आ संस्कृतिक प्रति सम्मानक भाव जीवित रखने छथि। जइ भव्य रूपे तेसर बेरक मैथिल वार्षिक समारोह ९ अप्रैल २०११ केँ स्लाऊमे सम्पन्न भेल, हमरा सभकेँ अपन संस्कृतिक स्वर्णिम युगक प्रारम्भ नजदीके बुझबाक चाही। कार्यक्रमक प्रारम्भ कल्पनाजी, जे लॉयड्स बैंकमे कार्यरत छथि, क मधुर वाणीक स्वागत सम्भाषणसँ भेल। कल्पनाजी स्वयम् भागलपुरक छथि आ मैथिली उच्चारणमे पारंगत नै छथि मुदा अपन प्रयास आ अभ्याससँ ओ कठिन शब्दकेँ तेहेन सहजतासँ बजली जइ लऽ कऽ हुनका मिथिलाक ‘कैटरीना कैफ’ कहल जा सकैत छनि। तकर बाद डॉक्टर जी.डी. झा सभकेँ आशीर्वचनक संग एक भजन “जनक नन्दिनी मॉं” सुनेलखिन। पारूलक गायत्रीमन्त्रपर भरतनाट्यम् आ पारूल आ वत्सलाक ‘सुनु सुनु रसिया’ पर राधा-किसनक रूपमे नृत्य बड़ मनमोहक छल। फेर मिथिला संस्कृतिपर मिथिला पेण्टिंगक माध्यमसँ एक पावर प्वाइंट प्रेजेन्टेशन प्रस्तुत कएल गेल। फेर सभसँ गर्वक समए छल मुख्य अतिथि आदरणीया डॉक्टर शेफालिका वर्मा जीक परिचए। किछु डॉक्टर सभ अपन अपन अवैतनिक रूपसँ कएल गेल सामाजिक कार्य आ चिकित्सा सुविधाक अभाव, विकासक आवश्यकता आ सम्भावनापर बहुत ज्ञानपूर्ण पावरप्वाइंट प्रस्तुतिकरण केलनि। डॉ अरूण झा सेण्ट अलबन्स मानसिक रोग, सामान्य चिकित्सा तथा स्त्री शिक्षापर बजला। डॉ रीता झा सभकेँ मोन पाड़लखिन जे पानि-बिजली आ पौष्टिक आहारक उपलब्धता कतेक पैघ सौभाग्य अछि। हुनकर प्रस्तुतिकरणमे गर्भावस्थामे हुअएबला मृत्युक कारणपर सेहो जोर देल गेल छल। डॉ. रामभद्रजी शल्य चिकित्साक विकासपर सेहो बजला। अध्यक्ष डॉ अरूण झा, बर्नले, मैथिल साहित्यिक संस्था यू.के. क आर्थिक दशापर अपन वक्तव्य देला। नव सदस्य सबहक स्वपरिचयक बाद मुख्य अतिथि अपन भाषणक प्रारम्भ ‘हरसिंगार’ क पंक्तिसँ केली, जइमे हुनकर नाम ‘शेफालिका’ राखैक कारण व्यक्त छल। हुनकर भाषणमे विदेहक सभसँ प्रचलित आ लोकप्रिय मैथिली पत्रिकाक रूपमे चर्चा भेल। कहैक आवश्यकता नै जे अइ पत्रिकाक सम्पादक महोदयक सेहो प्रशंसा भेलनि। मुख्य अतिथिकेँ फूल आदि उपहार देलाक बाद “विदेशमे रहैबला नबका दोसर पीढ़ी अपन संस्कृति बिसरि रहल छथि” तइ विषयपर वाद-विवाद प्रतियोगिता भेल। भाषा मैथिली तक सीमित नै छल कारण किछु बुद्धिजीवी नब पीढ़ीक लोक मैथिली बाजैमे असमर्थ छलथि आ हुनकर सबहक विचार बहुत महत्वपूर्ण छल। बहुत नीक विचार विमर्श छल मुदा सबहक निष्कर्ष किछु हद तक निराशाजनक छल जे ठीके हम सभ अपन संस्कृति बिसरि रहल छी। मुदा अन्तमे एकटा खट्टरकक्काक प्रसंग ‘मिथिला संस्कृति’ पर हास्य नाट्य प्रस्तुत कएल गेल जकर संवाद बहुत तर्कसंगत आ विषयसँ सम्बद्ध छल। फेर नाच गान करैलेल बच्चा सभकेँ मिथिला पेण्टिंगसँ बनल प्रमाणपत्र देल गेल। वाद-विवाद जीतिनाहरकेँ मिथिला पेण्टिंग छपल टी कप देल गेल। श्रीमती माला मिश्रा, डॉ वीणा झा, डॉ विभाष मिश्र, श्रीमती अनीता चौधरी द्वारा प्रस्तुत गीत नादक कार्यक्रम सेहो बड्ड मनोरंजक छल। कविता पाठ सेहो भेल। अध्यक्ष दम्पत्ति, सचिव दम्पत्ति, कोषाध्यक्ष दम्पत्तिक संग विभाषजी सपरिवार बड्ड प्रयास केने छलथि अइ कार्यक्रमकेँ सफल करैमे, तइ कारणे विशेष धन्यवादक पात्र छथि। आशा करैत छी नव अध्यक्ष आ नव सदस्यगण अकरा आर ऊपर लऽ जेता ।कार्यक्रमक चित्र लेल www.maithili.co.uk वेब साइट देखू। शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे दलि‍त पात्रक चि‍त्रण उपन्‍यास कोनो गद्य साहि‍त्‍य रूपी व्‍यष्‍टि‍क आत्‍मा मानल जाइत अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे लगभग सए बर्ख पूर्व धरि‍ उपन्‍यास वि‍धाक रचना लगभग शून्‍य छल। ऐ‍‍ कारण आेइ‍ अवधि‍ धरि‍ मैथि‍लीकेँ पूर्ण साहि‍त्‍यि‍क भाषा नै‍‍ मानल जाइत छल। जनसीदनजी ऐ‍‍ भाषा साहि‍त्‍यक पहि‍ल मान्‍य उपन्‍यासकार छथि‍। हि‍नक पाँच गोट उपन्‍यासक पश्‍चात् अखन धरि‍ देसि‍ल बयनामे साहि‍त्‍यक समग्र वि‍धाक चि‍त्रण करैत बहुत रास उपन्‍यास पाठक धरि‍ पहुँचल अछि‍। परंच ऐ‍‍ साहि‍त्‍यक संग सभसँ पैघ बि‍डम्बना रहल जे पछाति‍क समाज जकरा सामाजि‍क शब्‍दमे दलि‍त कहल जाइत अछि‍, ओकर महि‍मा मंडनक गप्‍प तँ दूर प्राय: ऐ‍‍ साहि‍त्‍यमे अकस्‍मात् अवांछि‍त अभ्‍यागतक रूपमे क्षणप्रभा जकाँ कतौ-कतौ चर्चित अछि‍। दलि‍त वर्ग तँ सामाजि‍क, सांस्‍कृति‍क आ शैक्षणि‍क रूपेँ सम्‍पूर्ण आर्यावर्त्तमे पि‍छड़ल छथि‍, मुदा मि‍थि‍ला-मैथि‍लीमे हि‍नक स्‍थानक वि‍वेचन हि‍नका सबहक जाति‍ जकाँ अछोप अछि‍। एकर प्रमुख कारण मि‍थि‍लामे धर्मसुधार आन्‍दोलन, वि‍धवा बि‍आहक सकारात्‍मक दृष्‍टकोण आदि प्राय: मृतप्राय रहि‍ गेल। दार्शनि‍क उदयनाचार्य, भारती-मंडन, आयाचीक ऐ‍‍ भूमि‍पर सनातन संस्‍कृति‍क पुनरूद्वार तँ भेल मुदा ऐ‍‍ पुनरूद्धारपर आडंबर धर्मी बेवस्‍थाक अमरलत्ती मूल संस्‍कृति‍क बि‍म्‍बकेँ सुखा देलक। समाजक साम्‍यवादी सोच भगजोगनी बनि‍ सवर्ण-दलि‍तक मध्‍य भि‍न्न सामाजि‍क दशाक मध्‍य मात्र टि‍मटि‍माइत रहल। ऐ‍‍ कारण सम्‍यक दृष्‍टि‍कोण रहितो मैथि‍ली भाषाक स्‍थापि‍त रचनाकारक लेखनी व्‍यथि‍त आ शोषि‍त दलि‍तक मर्मस्‍पर्शी जीवन गाथाकेँ प्रकाशि‍त नै‍‍ कऽ सकल। कथा-कवि‍ता आ गल्‍पमे तँ दलि‍तक चि‍त्रण भेटैत अछि‍, मुदा उपन्‍यासमे अत्‍यल्‍प। अपन व्‍यथाक वि‍वेचन दलि‍त वर्गक साहि‍त्‍यकार सेहो नै‍‍ कऽ सकलाह, कि‍एक तँ हि‍नक संख्‍या अखन धरि‍ नगण्य छल‍। संभवत: दलि‍त रचनाकारक उपन्‍यास अपन बयनामे मैथि‍लीकेँ अखन धरि‍ नै‍‍ भेटलनि‍। सभसँ जनप्रि‍य उपन्‍यासकार हरि‍मोहन झाक साहि‍त्‍यमे दलि‍त वर्ग अनुपस्‍थि‍त जकाँ छथि। यात्रीक ‘बलचनमा’ ओना ऐ‍‍ वर्ग दिसि‍ संकेत करैत अछि‍ ओहि‍ना जेना ललि‍तक ‘पृथ्‍वीपुत्र’, धूमकेतुक ‘मोड़ पर’ आ रमानंद रेणुक ‘दूध-फूल’। यात्रीक ‘पारो’ आ नवतुरि‍या वि‍षयक चएनक कारण दलि‍त वर्ग दिसि‍ धि‍यान नै‍‍ दऽ सकल। धीरेश्वर झा ‘धीरेन्‍द्र’क ‘कादो ओ कोयला’ छोट लोकक कथा कहैत अछि‍ तँ हुनकर ‘ठुमकि‍ बहू कमला’ मे दलि‍त वर्गक संघर्षक कथा ठीठर आ रामकि‍सुनक माध्‍यमसँ कहल गेल अछि‍। मणि‍पद्ममक उपन्‍यासक ‘राजा सहलेस’ दलि‍त दुसाधक नायक सहलेसक कथा कहैत अछि‍ तँ ‘लोरि‍क वि‍जय’ उपन्‍यासक नायक तँ यादव छथि‍ मुदा हुनक मि‍त्र वर्गमे बंठा चमार, वारू पासवान, राजल धोबी, ई सभ दलि‍त वर्गक छथि‍। लोरि‍कक कि‍छु वि‍रोधी शासक सेहो दलि‍त वर्गक छथि‍- मोचलि‍, गजभीमलि‍, हरवा आदि‍। बंठाक संहार परि‍स्‍थि‍ति‍वश करैत छथि‍ आ तइ‍सँ लोरि‍क वि‍जयमे दलि‍त कथाक ढेर रास प्रसंग आएल अछि‍। नैका बनि‍जारामे सेहो नैकाक पत्नी फुलेश्वरीकेँ कि‍नबाक वर्णन अछि‍। हुनकर फुटपाथ भि‍खमंगा सबहक कथा कहैत अछि‍ तँ लि‍ली रे क ‘पटाक्षेप’ भूमि‍हीनक नक्‍सलवाड़ी आन्‍दोलनक कथा कहैत अछि‍। वि‍द्यानाथ झा ‘वि‍दि‍त’जी ऐ‍‍ वि‍षयपर अपन लेखनीकेँ चलेलनि। ओना तँ वि‍दि‍त जी अखन धरि‍ आठ-नौ गोट उपन्‍यासक रचना कएलनि‍ अछि‍, परंच हि‍नक तीन गोट उपन्‍यासमे दलि‍तक दशाक चि‍त्रण मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल अपूर्व नि‍धि‍ मानल जा सकैछ। हि‍नक वि‍प्‍लवी बेसराक कथामे आदि‍वासीक कथा धौना, टेकू सुफल, बांसुरी, मोहरीलाल, गौरी, मारसक संग सफलता पूर्वक कहल गेल अछि‍। ‘कौसि‍लि‍या’ उपन्‍यासमे तँ फुलि‍या चमैनक पात्रताक चि‍त्रण अनुपमेय अछि‍। वि‍दि‍त जीक तेसर उपन्‍यास ‘मानव कल्‍प’ मे मि‍थि‍ला, अंग आ झारखंडक आँचरमे बसल लगभग सम्‍पूर्ण दलि‍त समाजक वि‍वेचन कएल गेल। ओना तँ श्रीमती शेफालि‍का वर्माजी मानव धर्मी रचनाकार छथि‍। हि‍नक समग्र साहि‍त्‍यि‍क कृति‍मे ‘जाति‍’ शब्‍द भूमंडलीकृत अछि‍। ‘नाग फांस’ उपन्‍यासमे जाति‍वादी बेवस्‍थासँ शेफालि‍का जी बचबाक प्रयास कएलनि‍, परंच ऐ‍‍ उपन्‍यासक एकटा पात्र आकाशक पत्नी तरंगक प्रकृति‍सँ बुझना जाइत अछि‍, जे ओ दलि‍त छथि‍। कहबाक लेल तँ सभ साहि‍त्‍यकार अपनाकेँ साम्‍यवादी कहै छथि‍ मुदा साम्‍यवादी जीवन शैलीक जौं चर्च कएल जाए तँ संभवत: मैथि‍लीक सर्वकालीन साहि‍त्‍यमे ध्रुवताराक स्‍थान श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीकेँ भेटबाक चाही। हि‍नक सभ उपन्‍यास (मौलाइल गाछक फूल, जि‍नगीक जीत, जीवन-मरण, जीवन-संघर्ष, उत्‍थान-पतन)मे दलि‍तक चि‍त्रण अनायास भेट‍ जाइत अछि‍। लि‍खबाक शैली ओ बि‍म्‍बक चएन ततेक पारदर्शी जे सवर्ण-दलि‍तक मध्‍य कोनो खाधि‍ नै‍‍। सम्‍पूर्ण समाजमे सकारात्‍मक तारतम्‍य स्‍थापि‍त करबाक जगदीश जीक स्‍वप्‍न मात्र उपन्‍यासमे नै‍‍ रहत, ऐ‍‍सँ मि‍थि‍लाक समाजि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍मे भवि‍ष्‍यमे सर्वे भवन्‍तु सुखि‍न:. सि‍द्धान्‍तक स्‍थापना अवश्‍य हएत। हि‍नक अवि‍रल मर्मस्‍पर्शी आ प्रयोगधर्मी कृति‍ ‘मौलाइल गाछक फूल’ मे दलि‍त समाजक महादलि‍त मुसहर जाति‍क रोगही, बेंगबा, कबुतरीक मनोदशा आ नि‍त्‍यकर्मसँ समाजमे शांति‍क ज्‍योति‍ जगएबाक कल्‍पना अनमोल अछि‍। दड़ि‍भंगाक प्‍लेटफार्मपर सँ भंगी डोमक मानवीय भावनाक मरीचि‍का एकठाँ भक्क दऽ उगि‍ जाइत अछि‍। भजुआ, झोलि‍या आ कुसेसरी सभ सेहो डोम जाति‍क छथि‍, जि‍नकर सहायता सम्‍यक सोचबला ब्राह्मण रमाकान्‍तजी करै छथि‍। ऐ‍‍ कृति‍क सभसँ अजगुत पात्र छथि‍ रमाकान्‍तजी। हि‍नक छोट पुत्र कालक डांगसँ अधमरू, वनि‍ता सुजाता जे धोबि‍न छथि‍, ति‍नकासँ बि‍आह कऽ लै छथि‍। बि‍आहे टा नै‍‍, बि‍आहसँ शि‍क्षा ग्रहण करबाक लेल प्रेरणा आ अर्थ सेहो सुजाताकेँ भेटलनि,‍ जइ‍‍सँ ओ डाॅ. सुजाता बनि‍ गेली। गाममे रहनि‍हार आ अपन मातृभूमि‍क प्रति‍ असीम श्रद्धा रखनि‍हार रमाकान्‍त बाबूकेँ अपन पुत्र महेन्‍द्रक ऐ‍‍ नि‍र्णएसँ कोनो पीड़ा नै‍‍ भेलनि‍। हि‍नक सम्‍पूर्ण परि‍वार ऐ‍‍ नि‍र्णएकेँ सहृदए स्‍वीकार कऽ लेलकनि‍। जगदीश बाबूक दोसर उपन्‍यास ‘जीवन-मरण’मे हेलन-गुदरी डोम दम्‍पति‍क चर्च कएल गेल अछि‍। जीबछ, छीतन, रंगलाल चमार जाति‍सँ सम्‍बन्‍ध रखैत छथि‍। जि‍नगीक जीत उपन्‍यासमे पलहनि‍क नेपथ्‍यक पात्रता दर्शित अछि‍। गजेन्‍द्र ठाकुरक ‘सहस्‍त्रबाढ़नि‍’मे दम्‍माक जड़ी एकटा आदि‍वासी द्वारा आनब आ ि‍कछु बर्ख बाद ओ जड़ी जंगलमे नै भेटब वोन कम होएबा दिसि‍ संकेत करैत अछि‍ तँ हुनकर ‘सहस्‍त्रशीर्षा’ मि‍थि‍लाक लगभग सभ दलि‍त जाति‍क विस्तृत वि‍वेचना करैत अछि‍। -तीनटा घरक रहलोपर धोबि‍या टोली एकटा टोल बनि‍ गेल अछि‍। झंझारपुर धरि‍ मारवाड़ीक कपड़ा एतए साफ कएल जाइत अछि‍। महि‍सवार ब्रह्मण सभ जे बरि‍यातीमे बेलवटम झाड़ि‍ कऽ सीटि‍-सीटि‍ कऽ नि‍कलैत छथि‍ से कोनो अपन कपड़ा पही‍रि कऽ। वएह मंगनि‍या कपड़ा, महगौआ मारवाड़ी सबहक। मारवाड़ी सबहक ई कपड़ा रजकभाय दू दि‍न लेल भाड़ापर हि‍नका सभकेँ दै छथि‍न। कोरैल बुधन आ डोमी साफी, धोबि‍‍। डोमी साफी आब डोमी दास छथि‍, कारण कबीरपंथी छथि‍। फेर एकटा आर टोल, चमरटोली अछि‍। चमार- मुखदेब राम आ कपि‍लदेव राम। पहि‍ने गामसँ बाहर रहए, बसबि‍ट्टीक बाद। मुदा आब तँ सभ बाँॅस काटि‍ कऽ उपटाए देने अछि‍ आ लोकक बसोबास बढ़ैत-बढ़ैत ऐ‍‍ चमरटोली धरि‍ आबि‍ गेल अछि‍। घरहट आ ईंटा-पजेबा सभ अगल-बगलमे खसि‍ते रहैत अछि‍। ढोलहो देबासँ लऽ कऽ सि‍ंगा बजेबा धरि‍मे हि‍नकर सबहक सहयोग अपेक्षि‍त। गाए-माल मरलाक बाद जाधरि‍ ई सभ उठा कऽ नै‍‍ लऽ जाइत छथि‍ लोकक घरमे छुतका लागले रहैत अछि‍। भोला पासवान आ मुकेश पासवान, दुसाध। गेना हजारीक नि‍चुलका खाड़ीक संबंधी। वएह गेना हजारी जे कुशेश्वर स्‍थानमे एकटा कुशपर गाए द्वारा आबि‍ कऽ दूध दैत देखने रहथि‍ तँ आेइ‍ स्‍थानकेँ कोड़ए लगलाह, महादेव नीचाँ होइत गेलाह, सीतापुत्र कुश द्वारा स्‍थापि‍त ई महादेव गेना हजारीक ताकल। मुकेश पासवानक बेटी मालती बैंक अधि‍कारी छथि‍न आ जमाए मथुरानंद डी.पी.एस. स्‍कूलक प्राचार्य छथि‍, वसंतकुंज लग फार्म हाउसमे रहै जाइ छथि‍। भोला पासवान आ मुकेश पासवान गामेमे रहै जाइ छथि‍। १९६७ई.क अकालमे जखन सभटा पोखरि‍, गड़खै सुखा गेल मुदा डकही पोखरि‍ नै‍‍ सुखाएल प्रधानमंत्री आएल रहथि‍ तँ हुनका देखेने रहनि‍‍ सभ जे केना एतएसँ बि‍साँढ़ कोड़ि‍ कऽ मुसहर सभ खाइ छथि‍। चर्मकार मुखदेव रामक बेटा उमेश सेहो आेइ‍ मुक्‍ताकाश सैलूनक बगलमे अपन असला-खसला खसा लेने अछि‍, रहैए मुदा कि‍शनगढ़मे। चप्‍पल, जुताक मरोम्‍मति‍क अलावे तालाक डुप्‍लीकेट चाभी बनेबाक हुनर सेहो सीख‍ लेने अछि‍। कुंजी अछि‍ तँ ओकर डुप्‍लीकेट पंद्रह टाकामे। कुंजी हेरा गेल अछि‍ तँ तकर डुप्‍लीकेट सए टाकामे। आ जे घर लऽ जएबनि‍‍ तँ तकर फीस दू सए टाका अति‍रि‍क्‍त। मुसहर बि‍चकुन सदायक बेटा रघुवीर ड्राइवरी सीख ‍लेने अछि‍। वसंत कुंजक एकटा व्‍यवसायीक आेइ‍ठाम ड्राइवरी करैए आ रहैत अछि‍ कि‍शनगढ़मे। डोम टोलीक बौधा मल्‍लि‍कक बेटा श्रीमंत सेक्‍टरक मेन्‍टेन्‍सक ठेका लेने छथि‍। हुनका लग दू सए गोटे छन्‍हि‍ जे सभ क्‍वार्टरक कूड़ा सभ दि‍न भोरमे उठेबाक संग रोड आ पार्किंगक भोरे-भोर सफाइ करै छथि‍। ऐ‍‍मे सँ कि‍छु गोटे वि‍शेष कऽ नेपालक, भोरे-भोर लोकक शीसा महि‍नवारी दू सए टाकामे पोछै छथि‍ आ अखबारक हॉकर बनल छथि‍। रहै छथि‍ कि‍शनगढ़मे मुदा अपन मकानमे- मुसहर पि‍‍चकुन सदाय। दलि‍त संस्‍कृति‍क प्रति‍ उदासीनताक मुख्‍य कारण अछि‍ समाजमे पसरल छूति‍ बेवस्‍था। ओना तँ ऐ‍‍ प्रकारक अवस्‍था प्राय: सम्पूर्ण आर्यावर्त्तमे रहल अछि‍, परंच आन ठामक जनभाषासँ दोसर धर्मक लोकक हृदैगत स्‍पर्शक कारण दलि‍त संस्‍कारक चि‍त्रण आन भाषामे मैथि‍लीसँ बेसी भेटैत अछि‍। मि‍थि‍लामे तँ इस्‍लाम धर्मी छथि‍, परंच मातृभाषा मैथि‍ली रहलाक बादो हुनका सबहक मध्‍य साहि‍त्‍यक सृजनशीलता उदासीन रहल। एकरा मैथि‍लीक दुर्भाग्‍य मानल जा सकैत अछि‍ जे अखन धरि‍ ऐ‍‍ भाषामे दलि‍त वर्गसँ उपजल साहि‍त्‍यकार उपन्‍यास नै‍‍ लि‍ख सकलनि‍। प्राय: यएह स्‍थि‍ति‍ इस्‍लाम धर्मी साहि‍त्‍यकारक संग सेहो अछि‍। फजलुर रहमान हासमी, मंजर सुलेमान सन साहि‍त्‍यकार तँ मैथि‍लीकेँ आत्‍मसात कएलनि‍ परंच उपन्‍यासकार नै‍‍ बनि‍ सकलाहेँ। ई लि‍खबाक तात्‍पर्य जे इस्‍लाममे जाति‍वादी बेवस्‍था सनातन संस्‍कृति‍क अपेक्षा न्‍यून अछि‍। दलि‍त वर्गक संख्‍या मि‍थि‍लामे लगभग आठ आना अछि‍, संपूर्ण समाजक मातृभाषा मैथि‍ली, मुदा शि‍क्षा-चेतनाक अभावक कारण ऐ‍‍ वर्गमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रति‍ सृजनात्‍मक दृष्‍टि‍कोण नै‍‍ पनपि‍ सकल। आगाँक जाति‍मे सम्‍यक् ि‍वचारक अभाव रहल अछि‍, कि‍छु साहि‍त्‍यकार ऐ‍‍ परि‍धि‍सँ तँ बाहर छथि‍ परंच वर्गक बीचक खाधि‍ लक्ष्‍मण रेखा बनि‍ हुनको सभमे जनभाषा वाचकक प्रति‍ सि‍नेह नै‍‍ आबए देलक। संभवत: मैथि‍ली आर्यभाषा समूहक पहि‍ल जनभाषा थि‍क जकरापर जाति‍वादी कलंक लागल अछि‍। संस्‍कृतक संग यएह वि‍डम्‍बना रहल परंच ओ कहि‍ओ जनभाषा नै‍‍ रहल। जखन कि‍ मैथि‍ली वर्तमान कालमे सवर्णसँ बेसी दलि‍त-पछाति‍क मातृभाषा अछि‍। पड़ाइन तँ सभ जाति‍ समूहमे भऽ रहल अछि‍ परंच मजदूरी केनि‍हार दलि‍त प्रवासमे सेहो मैथि‍लीकेँ आत्‍मसात कएने छथि‍। एकर वि‍परीत मि‍थि‍लामे रहनि‍हार सवर्ण परि‍वारक आधुनि‍क पि‍रहीक नेना वर्गमे मातृभाषाक स्‍थान हि‍न्‍दी लऽ रहल अछि‍। ‘ज्‍योति‍क-कोखि‍ अन्‍हार’ जकाँ मातृभाषाक वास्‍तवि‍क संरक्षकक वि‍वेचन ऐ‍‍ साहि‍त्‍यक उन्नयनक नै‍‍ कऽ रहल छथि‍। उत्तर-बि‍हारक बेस रास स्‍थानमे पसरल मैथि‍ली तँ कखनो-कखनो मात्र मधुबनी दड़ि‍भंगाक मातृभाषा प्रमाणि‍त कएल जाइत अछि‍। रचनाकारक दृष्‍टि‍कोण रचनामे कि‍छु आर आ वास्‍तवि‍क जीवनमे कि‍छु आर रहल। साम्‍यवादी बेवस्‍थापर सि‍याहीक प्रयोग केनि‍हार उपन्‍यासकारमे वास्‍तवि‍कता जौं रूढ़ि‍वादी रहत तँ सम्‍यक् समाजक कल्‍पनो करब असंभव। व्‍यथा वएह बूझि‍ सकैत ‍अछि‍ जकरामे जीवन्‍त अवि‍रल हृदए हुअए वा स्‍वयं व्‍यथि‍त हुअए। नि‍ष्‍कर्षत: आशक संग-संग वि‍श्वास अछि‍ जे वर्तमान युगक साहि‍त्‍यकार समाजक कात लागल वर्गक प्रति‍ सि‍नेही बनि‍ मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ गरि‍मामयी बनाबथु। पूर्वाग्रहकेँ अनुगृहीत करबाक पश्चात एहेन कल्‍पना-वास्‍तवि‍क भऽ सकैत अछि‍। जौं अपमानि‍त, अछोपकेँ सम्‍मानि‍त कएल जाए तँ मि‍थि‍ला पुनि‍ आेइ‍ मि‍थि‍लामे परि‍णत भऽ सकैत अछि‍ जतए राजा जनक परि‍वार, समाज आ राज्‍य हि‍तमे धर्मक पालनक हेतु राजासँ हरबाह बनि‍ गेलथि‍। कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक कि‍छु लोकक ई प्रवृत्ति‍ होइत अछि‍ जे सदि‍खन अपन चल जीवनमे नव-नव प्रकारक प्रयोग करैत रहैत अछि‍। एे‍‍ नव प्रयोगक कारण जहानमे अपवर्गक वि‍हान देखएमे अबैत अछि‍। प्रयोग धर्मिता व्‍यक्‍ति‍क इच्‍छासँ नै‍‍ जन्‍म लऽ सकैछ, ई तँ नैसर्गिक प्रति‍भाक परि‍णाम थि‍क। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे प्रयोगधर्मी सरस्‍वती पुत्रक अभाव नै‍‍ परंच वर्तमान कालमे एकटा एहेन प्रयोगधर्मी मि‍थि‍ला पुत्रकेँ माँ मि‍थि‍ले अपन आँचरमे सक्रि‍य कएलनि‍, जे तत्‍कालि‍क मैथि‍लीक दशा वदलबाक प्रयास कऽ रहल छथि‍। क्रांति‍वादी आ सम्‍यक वि‍चारधाराक सम्‍पोषक ओ व्‍यक्‍ति‍ केओ अनचि‍न्‍हार नै‍‍- मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रथम अंतर्जाल पाक्षि‍क पत्रि‍का वि‍देहक सम्‍पादक श्री गजेन्‍द्र ठाकुर छथि‍। भऽ सकैत अछि‍ जे कि‍छु लोक मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ अन्‍तर्जालसँ जोड़बाक प्रयास कए रहल हएताह परंच एकटा मूर्त्त रूप दऽ लगातार ११४ अंक (अखन धरि)‍ पहुँचेबाक कार्य गजेन्‍द्रे जी कएलन्‍हि‍। साहि‍त्‍यक नव-नव वि‍धा आ समाजक वेमात्र वर्गकेँ मैथि‍लीक आलि‍ंगनमे आबद्ध कऽ साम्‍यवाद आ समाजवादकेँ वैदेहीक माटि‍पर आनि‍ हमरा सबहक माथपर लागल अनसोहांत कलंककेँ धो देलनि‍। मात्र ११४ अंकमे जे कार्य भेल अछि‍ ओ कतऽ-कतऽ पहि‍ने भेल छल, आत्‍म-अवलोकन करबाक पश्‍चात् जानल जा सकैत अछि‍। समाजक फूजल, बेछप्‍प आ उदासीन वर्गकेँ अपन बयनाक मानस पटलपर आच्‍छादि‍त करबाक लेल साहस सभ केओ नै‍‍ जुटा सकैत अछि‍। मात्र भाँज पुरएबाक लेल मानस पुत्र एहेन कार्य नै‍‍ कएलनि‍, ओइ‍‍ उपेक्षि‍त वर्गक रचनाकारक रचनामे वि‍षए-वस्‍तुक गति‍शीलता आ तादात्‍म्‍य बोध ककरोसँ कम नै‍‍ अछि‍। प्रयोगधर्मी गजेन्‍द्र जीक कर्मक दोसर आमुख थि‍क हि‍नक लेखनीक धारसँ नि‍कलल इन्‍द्रधनुषक सतरंगी गुलालसँ भरल भावक आत्‍म-उदवोधन- “‍कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक”। एे‍‍ पोथीकेँ की कहल जाए उपन्‍यास, गल्‍प, बाल साहि‍त्‍य, समालोचना, प्रबन्ध वा काव्‍य? साहि‍त्‍यक सभ वि‍धाक अमृत रसकेँ घोरि‍ वंगोपखाड़ी बना देलनि‍ जतए ई कहब असंभव अछि‍ जे गंगा, कोशी, यमुना वा हुगली ककर नीर कतए अछि‍? शीर्षक देख‍ अकचका गेल छलौं, ई महाभारत मचौता की! मुदा अपन हृदेसँ सोचल जाए, प्रत्‍येक मानवक हृदैक दूटा रूप होइत अछि,‍ मुदा अन्‍तर्मन सदि‍खन सत्‍य बजैत अछि‍ ओइ‍‍ठाँ मि‍थ्‍याक स्‍थान नै‍‍। कुरूक्षेत्र रणभूमि‍ अवश्‍य छल परंच ओइ‍‍ठाँ सत्‍यक वि‍जयक लेल युद्ध भेल। ओइ‍ठाँ धर्मसंस्‍थापनार्थ वि‍नाश लीला मचल छल। हमरा सभकेँ अपन अन्‍तर्आत्‍मामे कुरूक्षेत्रक दर्शन करएबाक लेल दि‍शा नि‍र्देशन कऽ रहल छथि‍ गजेन्‍द्र जी। मैथि‍ली साहि‍त्‍यक कोन असत्‍यकेँ त्‍याग करबाक चाही? कि‍अए सुमधुर बयनाक एहेन दशा भेल? नव पथक नि‍र्माण नवल दृष्‍टि‍कोणसँ हएत। हमरा बुझने एे‍‍ पोथीमे साहि‍त्‍य समागमक लेल दृष्‍टि‍कोणकेँ प्राथमि‍कता देल गेल अछि‍। एहेन वि‍लक्षण साहि‍त्‍यपर आलेख लि‍खब हमरा लेल आसान नै‍‍ अछि‍- मुदा दु:साहस कऽ रहल छी- भऽ रहल वर्ण-वर्ण नि‍:शेष शब्‍दसँ प्रकटल नहि‍‍ उद्देश्‍य मोनमे रहल मनक सभ बात अछि‍ंजलसँ सद्य: स्‍नात सात खण्‍डमे वि‍भक्‍त एे‍‍ पोथीकेँ सम्‍पूर्ण परि‍वारक लेल सनेश कहि‍ सकैत छी। प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना:- एे‍‍ खण्‍डक आदि‍ लोकगाथापर आधारि‍त कथा सीत-वसंतसँ कएल गेल अछि‍। उत्तर मध्‍यकालीन इति‍हासमे अल्‍हा-ऊदल, शीत वसंत सन कतेक कथा प्रचलि‍त छल, जकर मंचन पद्यक रूपमे वर्तमान कालमे बि‍हारक गाम-गाममे भऽ रहल अछि‍। एक राज परि‍वारक वि‍षए-वस्‍तुक चि‍त्रण करैत लेखक सतमाएक ि‍सनेहपर प्रश्‍न चि‍न्‍ह लगैबाक प्रयास कएलनि‍ अछि‍? कथाक आरंभसँ इति‍ धरि‍ मर्मस्‍पर्शक अनुभव होइत अछि‍। कथाक अंतमे वि‍माताकेँ ओइ‍‍ पुत्रक छाया भेटलनि‍ जकर पराभव ओ कऽ देने छलीह। श्री मायानन्‍द मि‍श्र मैथि‍ली साहि‍त्‍यक सभ वि‍धाक माँजल साहि‍त्‍यकार मानल जाइत छथि‍। हुनक इति‍हास बोधक चारू प्रमुख स्‍तंभ प्रथमं शैलपुत्री च, मंत्रपुत्र, पुरोहि‍त आ स्‍त्रीधनपर सम्‍यक आलेख प्रस्‍तुत कऽ गजेन्‍द्र जी पूर्वमे लि‍खल गेल प्रबंधक दृष्‍टकोणकेँ चुनौती दऽ रहल छथि‍। ऋृग्‍वैदि‍क कालीन इति‍हासपर आधारि‍त मंत्रपुत्र मायानन्‍द जीक प्रमुख कृति‍ मानल जाइत अछि‍। एे‍‍ पोथीक लेल माया जीकेँ साहि‍त्‍य अकादेमी पुरस्‍कार भेटल अछि‍। मंत्रपुत्र पाश्‍चात्‍य इति‍हाससँ प्रभावि‍त अछि‍। मंत्रपुत्रक संग-संग पुरोहि‍तमे सेहो पाश्‍चात्‍य संस्‍कृि‍तक झलकि‍ देखएमे अबैत अछि‍। अपन समालोचनाकेँ गजेन्‍द्र जी अक्षरश: प्रमाणि‍त कऽ देने छथि‍, मायाबाबूक इति‍हास बोधपर प्रश्न ठाढ़ कऽ देने छथि मुदा हुनकर रचना संसारपर कोनो तरह प्रश्‍न चि‍न्‍ह नै‍‍ ठाढ़ केलनि‍। समीक्षाक रूप एहने हेबाक चाही। समीक्षककेँ प्ूर्वाग्रह रहि‍त रहलासँ साहि‍त्‍यि‍क कृति‍क मर्यादा भंग नै‍‍ होइत अछि‍। केदारनाथ चौधरी जीक दू गोट उपन्‍यास ‘चमेली रानी’ आ ‘माहुर’ पर गजेन्‍द्र जीक समीक्षा पूर्णत: सत्‍य मानल जा सकैत अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे बहुत रास रचनाक बि‍क्री सम्‍पूर्ण मैथि‍ल समाजमे जतेक नै‍‍ भऽ सकल, ‘चमेली रानी’क ओतेक बि‍क्री मात्र जनकपुरमे भेल। एे‍‍सँ एे‍‍ साहि‍त्‍यक प्रति‍ पाठकक श्रद्धाकेँ देखल जा सकैत अछि‍। ‘माहुर’ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल क्रांति‍कारी उपन्‍यास थि‍क। अरवि‍न्‍द अडि‍गक कृति‍क चरि‍त्रसँ एे‍‍ उपन्‍यासक एक पात्रक तुलना लेखकक भाषायी समृद्धताकेँ प्रदर्शित करैत अछि। वि‍देह-सदेहक सौजन्‍यसँ श्रुति‍ प्रकाशन द्वारा नचि‍केता जीक एकटा नाटक ‘नो एण्‍ट्री मा प्रवि‍श’ प्रकाशि‍त भेल अछि‍। एे‍‍ नाटकक लेखनपर नचि‍केता जीकेँ कीर्ति नारायण मि‍श्र सम्‍मान देल गेल अछि‍। नाटकक चारू कल्‍लोलक तर्क पूर्ण वि‍श्‍लेषण कऽ गजेन्‍द्र जी समीक्षाक रूप बदलबाक प्रयास कएलनि‍ अछि‍। एे‍‍ नाटकमे तार्किकता आ आधुनि‍कताक वि‍षए-वस्‍तु नि‍ष्‍ठताकेँ ठाम-ठाम नकारल गेल अछि‍। रचना लि‍खबासँ पहि‍ने अध्‍यायमे गजेन्‍द्र जी मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे भाषा सम्‍पादनपर वि‍शेष धि‍यान देबाक आग्रह कएलनि‍। अपन साहि‍त्‍यमे भाषायी त्रुटि‍पर पूर्णरूपसँ धि‍यान नै‍‍ देल जा रहल अछि‍। कवि‍शेखर ज्‍योति‍रीश्‍वर, वि‍द्यापति‍ शब्‍दावली, रसमय कवि‍ चर्तुभूज शब्‍दावली आ बद्रीनाथ शब्‍दावली द्वारा मि‍थि‍ला-मैथि‍लीक सर्वकालीन शब्‍द वि‍न्‍यासक आ शब्‍द भंडारक वि‍स्‍तृत वर्णन कएल गेल अछि‍। एे‍‍सँ नि‍श्‍चय भाषा सम्‍पादनमे सहायता भेटल। कतेक रास एहेन शब्‍द अछि‍ जकर वि‍षएमे हम की साहि‍त्‍यक पैघ-पैघ वेत्ता पहि‍ने नै‍‍ जनैत हेताह। नि‍श्‍चि‍त रूपसँ ई अध्‍याय पाठकक संग-संग साहि‍त्‍यकार आ असैनि‍क सेवाक ओइ‍‍ प्रति‍योगीक लेल उपयोगी हएत जे मैथि‍लीकेँ मुख्‍य वि‍षएक रूपमे लऽ कऽ प्रति‍योगि‍तामे सम्‍मि‍लि‍त हेबाक लेल प्रयत्‍नशील छथि‍। समीक्षक हमरा सबहक मध्‍य एकटा नव पद्य वि‍धाक चर्च कऽ रहल छथि‍- हाइकू। एे‍‍ वि‍धापर मैथि‍लीमे पहिनो रचना होइत छल, कखनो एे‍‍ विधाकेँ क्षणि‍काक नाअोसँ जानल जाइत छल। जापानी साहि‍त्‍य द्वारा सृजि‍त एे‍‍ पद्य रूपक वास्‍तवि‍क चि‍त्रण मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे गजेन्‍द्र जी आ ज्‍योति‍ झा चौधरी कएलनि‍ अछि‍। मि‍थि‍लाक लेल प्रलय कहल जाए वा वि‍भीषि‍का- ‘बाढ़ि‍’ ई शब्‍द सुनि‍तहि‍ कोशी, कमला, बलान, गंडकी, बागमती आ करेहक आँतसँ ओझराएल लोक सभ काँपि‍ जाइ छथि‍। एे‍‍ समस्‍याक स्‍थि‍ति‍, सरकारी प्रयासक गति‍ आ दि‍शाक संग-संग बचबाक उपाएपर लेखकक दृष्‍टि‍कोण नीक बुझना जाइत अछि‍। कोनो ठाम आ कोनो आन धाममे जौं हमरा लोकनि‍क वि‍षएमे पता चलए कि मैथि‍ल छथि‍, लोकक दृष्‍टकोण स्‍पष्‍ट भऽ जाइत अछि‍- हम सभ मछगि‍द्धा छी। एकर कारण जे धारक कातमे रहनि‍हार जीवक जीवन जलचरे जकाँ होइत अछि‍। जलीय जीवक भक्षण अधि‍कांश व्‍यक्‍ति‍ करैत छथि‍। तँए ने हमरा सभकेँ माँछ आ मखानक प्रेमी बुझल जाइत अछि‍ आ वास्‍तवमे हम सभ माँछक प्रेमी छी। अधि‍कांश मैथि‍ल ब्राह्मण परि‍वारमे सोइरीसँ श्राद्ध धरि‍ माँछक भक्षण अनि‍वार्य अछि‍। अान जाति‍मे अनि‍वार्य तँ नै‍‍ अछि‍ मुदा ओहू वर्गक अधि‍कांश लोक माँछक प्रेमी छथि‍। लेखक एे‍‍ लोकक भक्षण धारकेँ धि‍यान धरैत कृषि‍ मत्‍स्‍य शब्‍दावली लि‍खलन्‍हि‍ अछि‍। एे‍‍मे सभ प्रकार माँछक आकार, रंग, रूपक वि‍श्‍लेषण कएल गेल अछि‍। कृषि‍कार्यक लेल जोड़ा बड़दक संग हर पालो इत्‍यादि‍क ज्‍वलन्‍त व्‍यवस्‍थापर लेखकक वि‍चार नीक मानल जा सकैत अछि‍। करैल, तारबूज आ खीराक वि‍वि‍ध प्रकारक नाओं सुनि‍ गामक जि‍नगी स्‍मरण आबि‍ जाइत अछि‍। एे‍‍ खण्‍डक सभसँ नीक वि‍षए जे हमरा अन्‍तर्मनकेँ हि‍लकोरि‍ देलक ओ अछि वि‍स्‍मृति‍ कवि‍ पंडि‍त राम जी चौधरीक रचना संसारपर प्रवाहमय आ वि‍स्‍तृत प्रस्‍तुति‍। हमरा सबहक भाखाक संग ि‍कछु वि‍षमता रहल जे एे‍‍मे कतेक रास एहेन रचनाकार भेल छथि‍ जे अपने संग अपन रचनाकेँ गेंठ बन्‍हने वि‍दा भऽ गेलाह। एकर कारण एे‍‍मे सँ कि‍छु रचनाकारक रचनाक संकलन नै‍‍ भऽ सकल वा भेबो कएल तँ पाठक धरि‍ नै‍‍ पहुँचल। एे‍‍ लेल ककरा दोष देल जाए रचनाकारकेँ आ हमरा सबहक भाषाक तत्‍कालीन रक्षक लोकनि‍केँ? एे‍‍ भीड़मे राम जी चौधरीक नाओं सेहो अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे रागपर लि‍खल रचनामे राम जी बाबूक रचना सेहो अछि‍। भक्‍ति‍मय राग वि‍नय वि‍हाग, महेशवाणी, ठुमरी, ति‍रहुता, ध्रुपद, चैती आ समदाओनक रूपमे हुनक लेखनीसँ नि‍कलैत गीत सभ अलभ्य अछि‍। शास्‍त्रीय शैलीक मैथि‍ली गायनमे वर्तमान पि‍रहीक लेल अत्‍यन्‍त उपयोगी रचना सभकेँ प्रकाशमे आनि‍ गजेन्‍द्र जी मि‍थि‍ला, मैथि‍ली आ मैथि‍लपर पैघ उपकार कएलनि‍ अछि‍। सत्‍यकेँ स्‍वीकार करबाक सामर्थ्‍य मात्र कि‍छुए लोकमे होइत अछि‍। गजेन्‍द्र जी ओइ‍‍ लोकक पातरि‍मे ठाढ़ एक व्‍यक्‍ति‍ छथि‍ परि‍णामत: मैथि‍ली साहि‍त्‍य भोजपुरीसँ आगाँ मानल जाइत अछि‍ मुदा गुणवत्ताक दृष्‍टि‍ए भोजपुरी रास परि‍मार्जि‍त अछि‍। भोजपुरी साहि‍त्‍यक काल पुरूष भि‍खारी ठाकुरक मर्म स्‍पर्शी बि‍देसि‍यासँ एे‍‍ भाषाकेँ अलग पहि‍चान भेटल। मैथि‍ली भाषामे वि‍देशि‍याक कमीक मुख्‍य कारण रहल-प्रवासक प्रति‍ उदासीनता। जौं लि‍खलो गेल तँ महाकाव्‍यक रूप दऽ देल गेल। बिदेसिया पद्य आ बिद्यापति‍क लि‍खल? हमरो वि‍श्‍वास नै‍‍ भेल छल। वि‍द्यापति‍केँ मुख्‍यत: शृंगारि‍क कवि‍ मानल जाइत अछि‍। ओना हुनक रचनाकेँ भक्‍ति‍ रससँ सेहो जोड़ल जाइत अछि‍। कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक पोथी पढ़लासँ नव सोच मोनमे आबि‍ गेल। जकरा भोजपुरी साहि‍त्‍यमे बिदेसि‍या कहल गेल वास्‍तवमे मैथि‍लीमे ओ अछि‍- पि‍आ देशान्‍तर। वि‍द्यापति‍क नेपाल पदावलीमे एे‍‍ प्रकार रचना सभ संकलि‍त अछि‍ मुदा कहि‍यो एे‍‍ रूपे ओकरा महि‍मा मंडि‍त नै‍‍ कएल गेल। कारण स्‍पष्‍ट अछि,‍ पिआ देशान्‍तरक नाट्य रूप मि‍थि‍लाक पि‍छड़ल जाति‍क मध्‍य प्रदर्शित कएल जाइत अछि‍। तँए अग्रसोची लोकनि‍ एकरासँ दूरे रहब उचि‍त बुझैत छथि‍। एे‍‍सँ मैथि‍लीक दशा-दि‍शाकेँ नव गति‍ कोना भेटि‍ सकैत अछि‍। मैथि‍ली लोकभाषा अछि‍, लोक संस्‍कृति‍केँ बढ़एबाक प्रयास करबाक चाही। गजेन्‍द्र जीक सोझ दृष्‍टि‍कोणकेँ बि‍म्‍बि‍त करबाक चाही। “एतहि‍ जानि‍अ सखि‍ प्रि‍यतम व्‍यथा‍” श्रैंगारि‍क-वि‍रह व्‍यथाक वर्णन मुदा अछि‍ तँ पि‍आ देशान्‍तर। सुभाष चन्‍द्र यादव जीक कथा संग्रह ‘बनैत-बि‍गड़ैत’ पर गजेन्‍द्र जीक समीक्षा अपूर्व अछि‍। प्रवेशि‍कामे हुनक कथा ‘काठक बनल लोक’ पढ़ने छलौं। काठक बनल लोकक नायक बदरि‍याक मर्म देख‍ पाथरो पि‍घलि‍ जा सकैत अछि‍। वास्‍तवमे सुभाष जी मैथि‍ली साहि‍त्‍यक फणीश्‍वर नाथ रेणु छथि‍। महि‍मा मंडनक कालमे मात्र भाँज पुरएबाक लेल हि‍नक कथा पाठ्यक्रममे दऽ देल जाइत अछि‍। आंचलि‍क रचनाकेँ कहि‍या धरि‍ उपहासक पथि‍यामे झाँपि‍ कऽ राखल जाएत? एक नै‍‍ एक दि‍न छीप उधि‍या जाएत आ सत्‍यक सामना करए पड़त। लोक धर्मी साहि‍त्‍यकार चाहे ओ धूमकेतु, कुमार पवन, कमला चौधरी, सुभाष चन्‍द्र यादव, जगदीश प्रसाद मंडल वा कोनो आन होथु- हुनका सबहक रचनाक उपेक्षा नै‍‍ होएबाक चाही। सुभाष जीक कथा कनि‍याँ-पुतरा, बनैत-बि‍गड़ैत आ दृष्‍टि‍क समीक्षा देख‍ समए-कालक दशाक अवि‍रल द्वन्‍द्व उपस्‍थि‍त भऽ जाइत अछि‍। ऋृणी छी जे गजेन्‍द्र बाबू एे‍‍ पोथीपर समीक्षा लि‍खलन्‍हि‍। इंटरनेटक लेल अन्‍तर्जाल प्रयोग, नीक लागल। वेबसाइट बनएबाक तकनीकसँ गजेन्‍द्र जीक उद्वोधन आ नि‍यमन नै‍‍ बुझि‍ सकलौं। तीन बेर‍ पढ़लौं मुदा जेठक तेज बि‍हारि‍ जकाँ माथपर सँ उड़ि‍ गेल। नव-नव नेना भुटका बुझि‍ जएताह। तकनीकी युगक नेनाक स्‍मरण शक्‍ति‍क आंगन पैघ होइत अछि‍ तँए हुनके सबहक लेल एे‍‍ अध्‍यायकेँ छोड़ि‍ देलौं। लोरि‍क गाथा समाजक उपेक्षि‍त वर्गक संस्‍कृति‍पर आधारि‍त अछि‍। सहरसा-सुपौलक वीर आदि‍ पुरूष लोकि‍कक परि‍चए-पातमे पौराणि‍क मैथि‍ल संस्‍कृति‍क दर्शन होइत अछि‍। मि‍थि‍लाक खोजमे जनकपुर, सुग्‍गा धनुषा सन नेपालक स्‍थलसँ लऽ कऽ मधुबनी जि‍लाक कतेको उत्तर मैथि‍ल गामसँ दक्षि‍णमे जयमंगलागढ़ (बेगूसराय)क चर्च कएल गेल अछि‍। पूबमे पूर्णिया कि‍शन गंजक कतेक स्‍थलसँ लऽ पश्‍चि‍ममे चामुण्‍डा (मुजफ्फरपुर)क माँ दुर्गाक मंदि‍रक चर्च कएल गेल अछि‍। मि‍थि‍लाक ि‍कछु स्‍थानक वर्णन एे‍‍ सूचीमे नै‍‍ भेटल जेना- सती स्‍थान (गाम-शासन प्रखंड-हसनपुर जि‍ला- समस्‍तीपुर) आ उदयनाचार्यक जन्‍म स्‍थली (गाम-करि‍यन जि‍ला- समस्‍तीपुर)। एे‍‍ लेल लेखककेँ दोष नै‍‍ देल जा सकैत अछि‍, कि‍एक तँ मि‍थि‍लाक खोज वि‍देहसँ लेल गेल अछि‍, जइ‍मे गजेन्‍द्र जी अवाहन कएने छथि‍, जे जि‍नका लग कोनो प्रसि‍द्ध स्‍थलक वि‍षएमे जानकारी हुअए जे एे‍‍मे सम्‍मि‍लि‍त नै‍‍ अछि‍ तँ ओकर छाया चि‍त्रक संग सूचना पठाओल जाए। कि‍छु स्‍थल आर छूटल भऽ सकैत अछि‍, प्रबुद्ध पाठक एे‍‍ वि‍षएपर कार्य कऽ सकैत छथि। सहस्‍त्रबाढ़नि‍ (उपन्‍यास):- सहस्‍त्रबाढ़नि‍ एकटा आकाशीय पि‍ण्‍ड होइत अछि‍, जकर दर्शन आर्यक धार्मिक दृष्‍टि‍कोणमे अछोप बुझना जाइत अछि‍ मुदा उपन्‍यासकार एक अछोप पि‍ण्‍डकेँ आत्‍मसात् करैत एकरा सावि‍त्री बना देलनि‍। सावि‍त्री अपन पाति‍ब्रत्‍य आ दृढ़ नि‍श्‍चयसँ सत्‍यवानक प्राण यमराजसँ छीनि‍ लेने छलीह। एे‍‍ उपन्‍यासक दृष्‍टि‍कोण तँ एहन नै‍‍ अछि‍ परंच उपन्‍यासक नायक आरूणि‍क मृत्‍युपर वि‍जयमे सहस्‍त्रबाढ़नि‍क उत्‍प्रेरणक उद्वोधन कएल गेल अछि। कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक मूल पृष्‍ठपर सहस्‍त्रबाढ़नि‍क चि‍त्र देल गेल अछि‍। एे‍‍सँ प्रमाणि‍त होइत अछि,‍ रचनाकारक दृष्‍टि‍मे सम्‍पूर्ण पोथीक सातो खण्‍डमे एे‍‍ उपन्‍यासक वि‍शेष महत्‍व अछि‍। सहस्‍त्रबाढ़नि‍मे उन्नैसम शताब्‍दीक उत्तरांशसँ वर्तमानकाल धरि‍क वर्णन कएल गेल अछि‍। एक परि‍वारक एक सए पंद्रह बरखक कथाक वर्णनकेँ कल्‍प कथा मानब नि‍श्‍चि‍त रूपसँ रचनाकारक भावनापर कुठाराघात मानल जाएत। सद्य: ई कथा रचनाकारक पाँजड़ि‍क कथा अछि‍। जौं एकरा गजेन्‍द्र बाबूक आत्‍मकथा मानल जाए तँ संभवत: अति‍शयोक्‍ति‍ नै‍‍ हएत। उपन्‍यासक आदि‍ पुरूष झि‍ंगुर बाबू एकटा कि‍सान छथि‍। जनि‍क घरमे भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेसक स्‍थापना बर्ख सन् १८८५ई. मे एकटा बालक जन्‍म लेलन्‍हि‍- कलि‍त। कलि‍तक नेनपनसँ एे‍‍ उपन्‍यासक श्री गणेश कएल गेल। कलि‍तकेँ ओइ‍‍ कालमे बंगाली शि‍क्षकसँ अंग्रेजीक शि‍क्षण व्‍यवस्‍था दरि‍भंगामे कएल गेल। एे‍‍सँ दू प्रकारक भावक बोध होइत अछि‍। पहि‍ल जे झि‍ंगुर बाबू समृद्ध लोक छलाह। ओइ‍‍ कालमे अवहट्ठक शि‍क्षा सेहो गनल गुथल परि‍वारमे देल जाइत छल, अंग्रेजीक कथा तँ अति‍ वि‍रल छल। देासर जे बंगाली लोक हमरा सभसँ शि‍क्षाक दृष्‍टि‍मे आगाँ छलाह। बंगाली जाति‍क अंग्रेजी शि‍क्षक, हम सभ कतेक पाछाँ छलौं जे हमरा सबहक संस्‍कृति‍क राजधानी दरि‍भंगामे कोनो मैथि‍ल अंग्रेजी शि‍क्षक झि‍ंगुर बाबूकेँ नै‍‍ भेटलन्‍हि‍। सौराठ आ ससौलाक सभा गाछीक चर्च तँ बेर‍-बेर‍ कएल जाइत अछि‍ मुदा एे‍‍ पोथीमे वि‍लुप्‍त सभा बलान कातक गाम परतापुरक सभा गाछीसँ कथाकेँ जोड़बाक दृष्‍टि‍कोण अलग मुदा नीक बुझना जाइत अछि‍। कलि‍तक वि‍वाहमे वर महफामे, बूढ़ वरि‍याती कटही गाड़ीमे आ जवान लोकक पैदल जाएब वर्तमान पीढ़ीक लेल अजगुत लागत मुदा अपन पुरातन संस्‍कृति‍सँ नेना-भुटकाकेँ आत्‍मसात कराएब आवश्‍यक अछि‍। कलि‍तक मृत्‍युक पश्‍चातक कथा हुनक छोट पुत्र नंदक परि‍धि‍मे धूमए लागल। नंदक पारदर्शी सोच, अपन कनि‍यासँ प्रत्‍यक्षत: गप्‍प करब, तृतीय पुरूषक रूपे संबोधन नै‍‍। मि‍थि‍लामे वर-कनि‍याँ, सासु-पुतोहु, सासु-जमाएक गप्‍पमे तृतीय पुरूषक संबोधन अनिवार्य होइत अछि‍। एे‍‍ प्रकारक व्‍यवस्‍थाक वि‍रूद्ध नंदजी अपन नवल सोचकेँ केन्‍द्रि‍त कएलन्‍हि‍। वर-कनि‍याँक संबंध स्‍वाभावि‍क रूपेँ तँ समझौता मात्र होइत अछि‍ परंच संसारक व्‍यवस्‍थामे सभसँ पवि‍त्र आ अपूर्व संबंध यएह होइत अछि‍। जीवन भरि‍ नि‍र्वहन कोनो एक जनक संग छुटलापर दोसरमे व्‍यथा.... अकथ्‍य व्‍यथा। तँए एे‍‍ संबंधमे प्रत्‍यक्ष संबोधन हेबाक चाही। हमर दृष्‍टि‍कोण ई नै‍‍ जे अपन संस्‍कृति‍ पराभव कऽ देबाक चाही मुदा संस्‍कृति‍ आ व्‍यवस्‍थाकेँ सेहो कालक गति‍मे परि‍वर्तनक अनि‍वार्यता प्रतीत होइ छै‍। आर्यावर्त्त न्‍याय, कर्म, मीमांसा सन प्रांजल दर्शनक अार्विभाव भूमि‍ मानल जाइत अछि‍। एे‍‍ खण्‍डमे एकटा नव दर्शनसँ मि‍थि‍लाक भूमि‍केँ वैशि‍ष्‍ट्ता प्रदान कएल गेल ओ अछि‍- इमान आ मर्मक बि‍म्‍बमे संबंधक मर्यादा। नंद बाबू इंजीनि‍यर छलाह। जौं अपन धर्मकेँ कि‍छु ढील कऽ दैतथि‍ तँ भौति‍कताक बाढ़ि‍सँ परि‍वार ओत-प्रोत भऽ सकैत छला। मुदा एना नै‍‍ कऽ सतत अपन कर्मकेँ साकार सत्‍यसँ बान्‍हि‍ लेलन्‍हि‍। स्‍वाभावि‍क अछि‍ अर्थयुगमे इमानक प्रासंगि‍कता बड़ ओछ भऽ जाइत अछि‍। असमए मृत्‍युक पश्‍चात् परि‍वारक दशाक वि‍वेचन मर्मस्‍पर्शी लागल। हुनक सत् कर्मक प्रभाव यएह भेल जे संतान सभ वि‍शेषत: आरूणि‍ भौति‍क रूपसँ संपन्न तँ नै‍‍ भऽ सकलाह मुदा पि‍ताक छत्र-छायाक आंगनमे मनुक्‍ख भऽ गेलाह। कर्मक गति‍सँ लोक राज भोगकेँ प्राप्‍त तँ कऽ सकैत अछि‍ मुदा मनुक्‍ख बनबाक लेल नैसर्गिक संस्‍कार बेसी महत्‍वपूर्ण होइत अछि‍। तँए कहलो गेल अछि‍- “बढ़ए पूत पि‍ताक धर्मे।‍” कतौ-कतौ नीच वि‍चारक मानवक संतान मनुसंतान भऽ जाइत अछि‍, एे‍‍मे दैहि‍क संस्‍कार आ प्रकृति‍क लीला होइत अछि‍। आरूणि‍क दृढ़ वि‍श्‍वासपर केन्‍द्रि‍त एे‍‍ उपन्‍यासक कथामे सतत प्रवाहक गंगधारा खहखह आ शीतल बुझना गेल। जँ कथाकेँ आत्‍मसात् कएल जाए तँ कोनो अर्थमे एकरा काल्‍पनि‍क नै‍‍ मानल जा सकैछ। आत्‍मकथा स्‍पष्‍टत: नै‍‍ मानि‍ सकैत छी, कि‍एक तँ उपन्‍यासकार कोनो रूपेँ एकर उद्वोधन नै‍‍ कएलनि‍ अछि‍। भऽ सकैत अछि‍ समाजक अगल-बगलक रेखाचि‍त्र हुअए मुदा हमरा मतेँ ई कल्‍पना नै‍‍, सत्‍य घटनापर आधारि‍त अछि‍। उपन्‍यासमे एकटा कमी सेहो देखलौं। अंग्रेजी आखरक ठाम-ठाम प्रयोग कएल गेल जेना- एनेश्‍थेशि‍या, ओपि‍नि‍यन, इम्‍प्रेशन आदि‍। एे‍‍ सभ शब्‍दक स्‍थानपर अपन शब्‍दक प्रयोग कएल जा सकैत छल मुदा नै‍‍ कएल गेल। हमरा बुझने हम दोसर भाखाक ओइ‍‍ शब्‍द सभकेँ मात्र आत्‍मसात करी जकर स्‍थानपर हमर अपन भाखामे शब्‍दक अभाव अछि‍। सहस्‍त्राब्‍दीक चौपड़पर:- कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनकक तेसर खण्‍ड कवि‍ता संग्रहक रूपमे अछि‍, जकर शीर्षक ‘सहस्‍त्राब्‍दीक चौपड़पर’ देल गेल। मात्र तैंतालीस गोट कवि‍ताक सम्‍मि‍लनमे श्रंृगार, वि‍रह, हैकू, वि‍चार मूलक कवि‍ताक संग-संग एकटा ध्‍वज गीत सेहो अछि‍। इन्‍द्रधनुषक आसमानी रंग जकाँ प्रथम कवि‍ता ‘शामि‍ल बाजाक दुन्दुभी वादक’ मे क्षणि‍क प्रकृति‍क आवरणमे स्‍वर-सरगमक भान होइत अछि‍ मुदा अन्‍तरक अवलोकनक पश्‍चात् दशा पूर्णत: वि‍लग। राजस्‍थानक वाद्य संस्‍कृति‍मे एकटा दर्शक वाद्य यंत्रक प्रासंगि‍कताक केन्‍द्रमे कवि‍क भाव अस्‍पष्‍ट लागल। सहज अछि‍ ‘जतऽ नै‍‍ पहुँचथि रवि‍, अेातऽ गेल‍ कवि‍’। कवि‍ स्‍वयं दुन्दुभी वादक छथि,‍ तँए स्‍पष्‍ट दर्शन कोना हएत। संभवत: समाजक पथ प्रदर्शकक मूक दृष्‍टकोणकेँ कवि‍ताक केन्‍द्र बि‍न्‍दु बनाओल गेल अछि‍। बहुआयामी व्यक्‍ति‍त्‍वक धनी व्‍यक्‍ति‍ सेहो जीवनक गति‍मे दबावक अनुभव करैत कतौ-कतौ अपन संवेदनाकेँ दबा कऽ दुन्‍दभी बनबाक नाटक करैत छथि‍। केओ-केओ दोसरकेँ संतुष्‍ट करबाक लेल अपन वि‍चारधारा बाह्य मनसँ बदलि लैत छथि‍। संतुष्‍टीकरण प्रवृत्ति‍ वा कोनो प्रकारक मजबूरी हुअए, हमरा सभकेँ परि‍स्‍थि‍ति‍सँ सामंजस करबाक बहाने अपन सम्‍यक वि‍चारकेँ माटि‍क तरमे नै‍‍ झँपबाक चाही। समाज जौं एकरा पूर्वाग्रह मानए तँ अपन पक्षक वि‍वेचन कएल जाए मुदा अनर्गल प्रलापकेँ मूक समर्थन नै‍‍ देबाक चाही। मोनक रंगक अदृश्‍य देबालमे परि‍स्‍थि‍ति‍जन्‍य वि‍षमताक वि‍षए-वस्‍तुक दर्शन आशातीत अछि‍। मन्‍दाकि‍नी.... आ पक्का जाइठ‍ शीर्षक कवि‍तामे प्रकृति‍ आ समाजक स्‍थि‍ति‍क मध्‍य वि‍गलि‍त मानवतापर मूक प्रहारमे कवि‍क नैसर्गिक मुदा अदृश्‍य सोच हमरा सन साधारण समीक्षक लेल अनुबूझ पहेली जकाँ अछि‍। अपन पुरातन इति‍हासक ओइ‍‍ दि‍वसकेँ लोक स्‍मरण नै‍‍ करए चाहैत छथि‍, जइसँ अतुल पीड़ाक अनुभव होइत अछि‍। त्रेता युगक घटना, कलि‍युग धरि‍ पाछाँ धेने अछि‍। शतानंद पुरोहि‍त सीता जीक बि‍याह अगहन शुक्‍ल पक्ष पंचमीकेँ करौलनि‍, परि‍णाम सोझाँ अछि। खरड़ख वाली काकीक बि‍आह ओइ‍‍ ति‍थि‍मे भेल। भऽ सकैत अछि‍ हुनक भाग्‍यमे सीताजी जकाँ गृहस्‍थ सुख नै‍‍ लि‍खल। मुदा कलंक तँ ‘विवाह पंचमी’ ति‍थि‍केँ देल गेल। एे‍‍ कवि‍तामे कवि‍क दृष्‍टकोण तँ वि‍धवा बि‍आहक समर्थन करबाक अछि‍ मुदा सवर्ण मैथि‍ल नै‍‍ स्‍वीकार कऽ रहल छथि‍। अपन पुरान सांगह लऽ कऽ हम सभ हवड़ाक पुल बनएबाक कल्‍पनामे कहि‍या धरि‍ ओझराएल रहब? एे‍‍ कवि‍ता संग्रहमे जे नव वि‍षए बुझना गेल ओ अछि‍ ‘बारह टा हैकू’। गि‍दरक नि‍रैठ, राकश थान, शाहीक मौस आ बि‍धक लेल शब्‍द-शब्‍द बजैत अछि‍। हैकूक सार्थक अर्थ लगाएब अत्‍यन्‍त कठि‍न होइत अछि‍ मुदा हमरा बुझने जौं एहेन हैकू लि‍खल जाए तँ नेनो सभ जे मैथि‍लीमे माए परि‍वार कुटुम्बक संग बजैत छथि‍, अवश्‍य बूझि‍ जएताह। मि‍थि‍लाक ध्‍वज गीतमे मातृभूमि‍सँ कर्मक सार्थक गति‍ मांगल गेल अछि‍। मातृ वंदनाकेँ कवि‍ता संग्रहमे देबाक हि‍नक दृष्‍टि‍कोण रचनाक्रममे उपयुक्‍त हुअए मुदा हमरा मतेँ एकरा कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक प्रथम पृष्‍ठपर वंदनाक रूपमे देल गेल रहि‍तै तँ बेसी सुन्नर होइतए। ‘बड़का सड़क छह लेन बला’मे मि‍थि‍लाक वि‍कासक स्‍थि‍ति‍क वर्णन कएल गेल अछि‍। सम्‍पूर्ण कवि‍ता संग्रहक अवलोकनक बाद कोनो पद्य अकच्‍छ करैबला नै‍‍ लागल। ‘पुत्र प्राप्‍ति‍’ शीर्षक कवि‍तामे लुधि‍यानामे हमरा सबहक समूहक एकटा पंडि‍तक ठकपचीसीक चर्च कएल गेल अछि‍। एहने ठकक कारण ‘बि‍हारी’ व्‍यक्‍ति‍केँ आठ ठाम लोक शंकाक दृष्‍टि‍सँ देखैत छथि‍। मुदा गजेन्‍द्रजी सँ हमर आग्रह जे एे‍‍ कवि‍ताक पंजाबी भाषामे अनुवादक अनुमति‍ नै‍‍ देल जाए नै‍‍ तँ कतेको भलमानुष बनल मैथि‍ल घुरि‍ कऽ गाम आबि‍ जएताह आ हमरा सबहक समाजमे कुचक्र आरो बढ़ि‍ जाएत। गल्‍प गुच्‍छ- २३ गोट लघुकथा- विहनि कथाक सम्‍मि‍लन कऽ गल्‍प गुच्‍छक नाओं देल गेल। चौंसठि‍ पृष्‍ठक एे‍‍ खण्‍डमे समै-सालक सभ रूपकेँ बि‍म्बि‍त करैत कथाकार साि‍हत्‍यक समग्र वि‍धापर लेखनक प्रयास कएलनि‍ अछि‍। सर समाज कथामे अर्थनीति‍क मौन प्रस्‍तुति‍ नीक लागल मुदा कलात्‍मक शैलीक अभाव बुझना गेल। घरक मरम्‍मति‍क बिम्बि‍त खि‍स्‍सामे कनेक रस-प्रवाह रहि‍तए तँ कथा आर नीक भऽ सकैत छल। हम नै‍‍ जाएब वि‍देशमे पलायनवादक वि‍रोध कएल गेल अछि‍ बि‍म्‍ब तँ नीक अछि‍ मुदा वि‍श्‍लेषणमे अलंकारक तादात्‍म्‍य नै‍‍ भेटल। एहेन मार्मिक वि‍षए-वस्‍तुक कथा तँ ओइ‍‍ प्रकारक होएबाक चाही जइसँ हि‍यमे हि‍लकोरि‍ उत्‍पन्न भऽ जाए। राग भैरवी छोट मुदा संस्‍कृति‍केँ छूबैत अछि‍। काल स्‍थान वि‍स्‍थापन आ वैशाखीपर जि‍नगीकेँ औसत मानल जा सकै छै। कोनो साहि‍त्‍यकेँ ताधरि‍ पूर्ण नै‍‍ मानल जा सकैछ जाधरि‍ समाजक अंति‍म व्‍यक्‍ति‍सँ संबंधत भाषा साहि‍त्‍यकेँ जोड़ल नै‍‍ गेल हुअए। सर्व शि‍क्षा अभि‍यान‍ कथाकेँ पढ़लाक बाद मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे दलि‍त, पि‍छड़ा आदि‍ वर्गक प्रति‍ सरकारी योजनाक ि‍नष्‍फल हेबाक कारण केर स्‍पष्‍टीकरण वास्‍तवि‍क लगैत अछि‍। पेटमे अन्नक फक्का नै‍‍ हुअए आ पोथी मुफ्तमे भेटए, एहेन शि‍क्षाक स्‍थि‍ति‍पर प्रश्‍न चि‍न्ह ठाढ़ करब स्‍वाभावि‍क अछि‍। साम्‍यवादी सोच राखएबला कथाकार कथाक बहाने स्‍पष्‍ट करए चाहैत छथि‍ जे गरीबक मध्‍य जाति‍क आधारपर वि‍भाजन हमरा सबहक समाजक कलुषित रूप थि‍क। छोट उद्देश्‍यपूर्ण कवि‍ताकेँ क्षणि‍का वा हाइकूक नाओं देल गेल मुदा विहनि कथाकेँ की कहल जाए? विहनि कथामे बि‍म्‍बक वि‍श्‍लेषण अति‍ क्‍लि‍ष्‍ट होइत अछि‍ मुदा “जाति‍वादी मराठी‍”मे मैथि‍ली भाषाक अस्‍ति‍त्‍वपर लागल जाति‍क कलंकक प्रस्‍तुति‍ सराहनीय अछि‍। थेथर मनुक्‍ख, बहुपत्नी वि‍वाह आ ि‍हजड़ा, स्‍त्री-बेटी, बि‍आह आ गोरलगाइ, प्रति‍भा, अनुकम्‍पाक नौकरीक सभक वि‍षए-वस्‍तु छोट-छीन परंच सारगर्भित लागल। जेना हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यक पत्र-पत्रि‍कामे चर्चित लेखक खुशवन्‍त सि‍ंह मात्र दू पाँति‍मे बहुत-रास गप्‍प लिखि जाइ छथि‍ ठीक ओहि‍ना एे‍‍ सभ लघुकथाकेँ पढ़ि‍ बुझना गेल। जाति‍-पाति‍ लघुकथा तँ पूर्णत: बेच्‍छप लागल। एकटा डोम जाति‍क आइ.पी.एस. परि‍वीक्षाधीन अधि‍कारीमे जाति‍क गरानि‍ कोनो आत्‍मीय मनुक्‍खकेँ मर्माहि‍त कऽ सकैत अछि‍। मृत्‍युदंड आ वाणवीरक सामाजि‍क बि‍म्‍बक संग-संग सामन्‍तवादी, मीडि‍यासँ संबंधि‍त कथा सभकेँ बेजोड़ तँ नै‍‍ मुदा मैिथली साहि‍त्‍यक लेल नूतन-धाराकेँ स्‍पर्श करैबला कथा जौं मानल जाए तँ कोनो दोख नै‍‍। आब प्रश्‍न उठैत अछि‍ जे गल्‍प-गुच्‍छकेँ कोन रूपक मानल जाए। हमरा सबहक भाषाक संग दुर्भाग्‍य रहल जे कथाक वि‍षए-वस्‍तुसँ बेसी भाषा वि‍ज्ञान, बि‍म्‍बक वि‍श्‍लेषन आ शब्‍द वि‍न्‍यासक कलाकारीपर वि‍शेष धि‍यान देल जाइत अछि‍। साहि‍त्‍यक अधि‍कांश अधि‍ष्‍ठाता एकटा गप्‍पपर नै‍‍ धि‍यान देबए चाहै छथि‍ जे रचनासँ समाजक परि‍दृश्‍यमे सम्‍यक जीवनक सनेश जाएत वा नै‍‍। जाति‍क संग-संग संतुष्‍टीकरण केर छद्मसँ ऊपर उठब अनि‍वार्य अछि‍ नै‍‍ तँ मैथि‍लीक अस्‍ति‍त्‍वपर प्रश्‍न चि‍न्‍ह ठाढ़ भऽ जाएत। भौगोलि‍कीकरणक परि‍धि‍मे मैथि‍ली सभसँ बेसी प्रभावि‍त भेल छथि‍। सौति‍न भाषाक संग-संग पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति‍क प्रभावसँ वैदेही टि‍म-टि‍मा गेली। एे‍‍ भाषामे नवल अर्चिस जड़एबाक लेल वर्ग संघर्षक स्‍थि‍ति‍सँ ऊपर उठि‍ कऽ कार्य करबाक चाही। पागक अभि‍प्राय जौं मैथि‍ल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्‍थक संग-संग बहुल झाँपल मुदा जनभाषाक संरक्षक वर्ग धरि‍ पहुँचबाक प्रयास कएल जाए तँ मैथि‍लीक दशामे फेर‍ चारि‍ नै‍‍ आठ गोट चान लागि‍ जाएत। एे‍‍ कथा सबहक कथाकार कथाक शैली ओ वि‍वेचन जे हुअए एकर निर्णए पाठकपर छोड़ि‍ देबाक चाही मुदा रचनाक उद्देश्‍य स्‍पष्‍ट अछि‍। गजेन्‍द्र जी नि‍श्‍चि‍त रूपेँ एे‍‍ कथा संग्रहक माध्‍यमसँ समाजमे अपन संस्‍कृति‍क रक्षा करैत नूतन सम्‍यक ज्‍येाति‍ जड़ाबए चाहै छथि‍, जतऽ डोम, चमार, ब्राह्मण, राजपूत, मुसलमान ओ कायस्‍थ नै‍‍, मात्र “मैथि‍ल‍” शब्‍दक व्‍योमक परि‍धि‍मे मि‍थि‍लाक चर्च कएल जाए। दुर्भाग्‍य अछि‍ जे मैथि‍ली पोथीक समीक्षा करबामे आलोचना-प्रत्‍यालोचनाकेँ मूल बि‍म्‍ब मानल जाइ छै जखन की आन भाषामे रचनाकारक मनोवृति‍ आ दृष्‍टि‍कोणपर धि‍यान देल जाइत अछि‍। संकर्षण: मात्र १६ पृष्‍ठक नाटक, सुनबामे कनेक अनसोहाँत जकाँ लगैत अछि‍ मुदा जौं तन्‍मय भऽ कऽ पढ़ल जाए तँ स्‍पष्‍ट भऽ जाएत जे हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यमे मात्र कि‍छु कथाक कथाकार श्री चन्‍द्रधर शर्मा गुलेरी जीकेँ कोना आ कि‍ए आत्‍मसात् कऽ लेल गेल? संकर्षण सन अभि‍नेता जइ‍ नाटकमे हुअए ओइ‍मे ि‍वशेष भावक उपस्‍थि‍ति‍ स्‍वाभावि‍क अछि‍। अभि‍नेताक कोनो गुण नै‍ मुदा गजेन्‍द्र जी एकरा प्रधान नायक बना देलनि‍। समाजक कुहरैत अवस्‍थाक यएह सत्‍य रूप थि‍क, एक ि‍दश महीसक चरवाह आ दोसर दि‍शि‍ कलक्‍टरक चाटुकार। मि‍थि‍लाक समाजि‍क बिम्बकेँ स्‍पर्श करैत छोट नाटक संकर्षणमे नुक्कड़ नाटकक रूप अछि‍। “हौ गोनर! पानि‍ कोना लागए देबैक एकरा। पएरक चमड़ा सड़त तँ फेर नवका आबि‍ जाएत। मुदा ई सड़ि‍ जाएत तखन कतएसँ आएत।‍” कहबाक तात्‍पर्य जे जइ‍ व्‍यक्‍ति‍केँ शरीरसँ बेसी कि‍छु कैंचाक जुत्ता वि‍शेष महत्‍वपूर्ण लगैत हुअए ओइ‍ व्‍यक्‍ति‍मे जीवनक तादात्‍म्‍यक कोन प्रयोजन? धर्मनीति‍सँ अर्थनीति‍ बेसी महत्‍वपूर्ण अछि‍। कालक बदलैत स्‍वरूपक ि‍चन्‍तन करबाक योग्‍य संभवत: ऐ‍ नाटकक यएह उद्देश्‍य थि‍क, पर्दा उठत आ आधा धंटामे नाटक समाप्‍त। जीवनक नाटक मंडलीकेँ केन्‍द्रि‍त करए बला संकर्षण चि‍न्‍तन करबाक योग्‍य लागल। सभटा नाटकमे कोनो ने कोनो रूपेँ हास्‍य आ श्रंृगारक सम्‍मि‍लन होइत अछि‍ मुदा ऐठाँ अभाव कि‍एक तँ समाजक मनोवृत्ति‍केँ छुबैत ऐ नाटककेँ पढ़ि‍ कोनो कवि‍क एकटा कवि‍ताक एक पाँॅति‍ मोन पड़ि‍ गेल- “ठोप-ठोप चारक चुआठकेँ आंॅगुरसँ उपछैत रहल छी‍” गजेन्‍द्र जीक प्रयास छोट परंच अनुकरणीय लागल। त्‍वञ्चाहञ्च आ असंजाति‍ मन- जेना की नाअोसँ स्‍पष्‍ट भऽ जाइत अछि‍ जे दुनू काव्‍य ऐति‍हासि‍क धटनाकेँ बिम्बि‍त कऽ लि‍खल गेल। धर्म आ कर्मक्षेत्रक परि‍धि‍मे आर्य संस्‍कृति‍क वि‍वेचन नीक लागल। एे‍‍ महाकाव्‍यक वि‍षएमे मात्र यएह कहल जा सकैत अछि‍ जे सुरेन्‍द्र झा सुमन, वैधनाथ मल्‍लि‍क वि‍धु आ मार्कण्‍डेय प्रवासी जीक काव्‍य लेखन परम्‍पराकेँ जीवंत रखवाक प्रयास कएल गेल। बालमंडली आ कि‍शोर जगत- हम सभ गौरवान्‍वि‍त छी जे मैथि‍ली भाषा समग्र आर्य परि‍वारक भाषा समूहमे सभसँ सरस भाषा मानल जाइत अछि‍। साहि‍त्‍य चि‍न्‍तन सेहो पाठकक गणनाकेँ देखैत ककरोसँ कम नै‍‍। मुदा एकटा पक्ष जे सभसँ कमजोर रहल ओ ि‍थक मैथि‍ली भाषा साहि‍त्‍यमे “बाल साहि‍त्‍यक दरि‍द्रता।‍” कहबाक लेल तँ बहुत रास लेखक वा कवि‍ अपनाकेँ बाल साहि‍त्‍यसँ जोड़वाक सतत् वाक पटुता देखबैत छथि‍ मुदा जौं पूर्ण रूपसँ बाल साहि‍त्‍यक रचनाक गणना कएल जाए तँ जीवकांत जी सन मात्र कि‍छु साहि‍त्‍यकार छथि‍ जि‍नक लेखनी एे‍‍ दि‍शामे क्रि‍याशील रहल। जखनकि बाल साहि‍त्‍य जौं परि‍मार्जित नै‍‍ हएत तँ ि‍नकट भवि‍ष्‍यमे मातृभाषाक स्‍वरूप वि‍गलि‍त भऽ सकैत अछि‍। एे‍‍ दि‍शामे गजेन्‍द्र जीक प्रयाससँ कृतज्ञ होएबाक चाही जे कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक सातो खण्‍डमे सभसँ नीक खण्‍ड बाल मंडली अछि। कि‍शोर जगतपर अपन लेखनीकेँ हाथसँ नै‍‍ हृदेसँ लि‍खलन्‍हि‍। एे‍‍ खण्‍डमे दू गोट बाल नाटक, तैइस गोट बाल कथा, वर्णमाला शि‍क्षा आ एक सएसँ ऊपर बाल कवि‍ता देल गेल अछि‍। सभ बि‍म्‍बकेँ केन्‍द्रि‍त करैत लि‍खल गेल रचना सभक भाषा अत्‍यन्‍त सरल अछि‍। नेना-भुटकाकेँ एहने रचना चाही। जौं तत्‍सममे बाल साहि‍त्‍य लि‍खल जाए तँ ओकर कोन प्रयोजन? कवि‍ता सभ तँ खूब नीक मानल जा सकैत अछि‍- आइ छुट्टी काल्हि‍ छुट्टी घूमब फि‍रब जाएब गाम......। बाल बोधक लेल अलंकारसँ बेसी मनक चंचलता उपयोगी होइ छै तँए एे‍‍ खण्‍डकेँ आलोचनात्‍मक स्‍वरूपसँ देखब उचि‍त नै‍‍। नि‍ष्‍कर्ष- सात खण्‍डमे वि‍भक्‍त एे‍‍ पोथीमे साहि‍त्‍यक समग्र रसक स्‍वादन करएबाक प्रयास कएल गेल। मुदा एकर सभसँ पैघ नकारात्‍मक स्‍वरूप जे एकरा की मानल जाए? भऽ सकैत अछि‍ सभ धाराकेँ छूबि‍ गजेन्‍द्र जी मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे एकटा नव रूपक धारा केन्‍द्रि‍त करए चाहैत होथि‍। एकटा पोथीमे प्रबन्‍ध, समालोचना, उपन्‍यास, गल्‍प, कवि‍ता संग्रह, महाकाव्‍यक संग-संग बाल साहि‍त्‍य, पोथीकेँ वि‍शाल बना देलक। भऽ सकैत अछि‍ समीक्षक लोकनि‍क संग-संग ि‍कछु पाठककेँ नीक नै‍‍ लागनि‍ मुदा हम एे‍‍ प्रकारक प्रयोगक स्‍वागत करब उचि‍त बुझैत छी। ओना पाठकक सुवि‍धाक लेल अलग-अलग सेहो प्रकाशि‍त कएल गेल अछि‍। सभसँ बेसी प्रकाशक धन्‍यवादक पात्र छथि‍ जे एतेक वि‍शाल पोथीक नीक रूपेँ आ सम्‍यक मूल्‍यमे प्रकाशन कएलन्‍हि‍। भाषा सम्‍पादन सेहो नीक लागल, शाब्‍दि‍क आ व्‍याकरणीय अशुद्धता अत्‍यन्‍त न्‍यून अछि‍। पाेथीक नाओं- कुरूक्षेत्रम् अन्‍तर्मनक लेखक- गजेन्‍द्र ठाकुर अर्चिस वर्तमान मैथि‍लीक कवि‍ताकेँ तरूण कवि‍ आ कवयि‍त्रीक पदार्पणसँ नव गति‍ भेट‍ रहल अछि‍। ऐ‍ नवतुरि‍या मुदा वि‍षए-वस्‍तुक दृष्‍टि‍कोणसँ सजल रचना सबहक रचनाकारक वर्गमे एकटा मैथि‍लीक प्रवासी कवयि‍त्री छथि‍- श्रीमति ज्‍योति‍ सुनीत चौधरी। “अर्चिस‍” ज्‍योति‍ जीक प्रथम संकलि‍त कवि‍ता संग्रह थि‍क। ऐ‍ पोथीमे ३७ गोट कवि‍ता संग्रहि‍त अछि‍। ज्‍योति‍जी कतेक दि‍नसँ रचना करैत छथि‍, ई तँ नै‍‍ बुझल अछि‍ मुदा वि‍देहक पदार्पणक कि‍छुए अंकसँ हि‍नक रचना प्रकाशि‍त हुअए लागल। अर्चिसक अर्थ तत्‍सममे अग्‍नि‍ आ तद्भवमे आगि, अनल आदि‍ मानल जाइत अछि‍ मुदा मैथि‍लीमे आगि‍, अंगोर आ लुत्ती सेहो कहल जा सकैछ। ऐ‍ पोथीक शीर्षक मात्र कवयि‍त्रीक भावनापर आधारि‍त अछि‍, कवि‍ताक भावसँ ऐ‍ शीर्षकक कोनो संबंध नै‍‍। पहि‍ल कवि‍ता “हाइकू‍” प्रकृति‍ वर्णन, श्रृंगार, वि‍चार मूल आ वि‍रहक मि‍श्रि‍त चि‍त्रांकन करैछ। हाइकू पहि‍ने मैथि‍लीमे क्षणि‍का नाओंसँ लि‍खल जाइत छल, मुदा ज्‍योति‍जी एकर वास्‍तवि‍क रूपक चि‍त्रण कएलनि‍ अछि‍। सम्‍पूर्ण कवि‍तामे अर्न्‍तद्वन्‍द्व आ प्रसन्नताक भीड़क मध्‍य व्‍यथा-टीशक अंतरंग हृदैक प्रवाहमयी प्रस्‍तुति‍..... मनोरम लागल। एकटा हेराएल सखीमे कवयि‍त्री कवि‍ताक नायि‍काकेँ अपन सखी माि‍न ओकरा सि‍नेहीसँ भेटल पीड़ाक उद्वोधन कऽ रहल छथि‍। नारी मोनमे अश्रु उच्‍छवासक संग-संग समर्पण सेहो रहैत अछि‍। ओना तँ आर्य ग्रन्‍थमे “त्रि‍या चरि‍त्र‍: पुरुषस्‍य भाग्‍यम् देवो न जानाति‍ कुतो मनुष्‍य:” लि‍खल गेल अछि‍, मुदा एकरा हम उचि‍त नै‍‍ मानैत छी। आर्यावर्तक नारीक मोन वि‍ह्वल आ भावुक होइत अछि‍ तँए भावनात्‍मक छलक शि‍कार शीघ्र भऽ जएबाक संभावना देखल जा सकैछ। पुरुष प्रधान समाजमे दोष नारीपर देल जाइत अछि‍ मुदा पुरुषक चरि‍त्रहीनताक नाओं की देल जाए? जीवन भरि‍ एक पुरुषक प्रति‍ समर्पणकेँ केन्‍द्र बि‍‍न्‍दु बना कऽ कवयि‍त्री दुखि‍त छथि‍, अपन सखीक नि‍श्‍छल समर्पणसँ। ई कवि‍ता सदेह ३ मे कल्‍पना शरणक रचनाक रूपमे प्रकाशि‍त भेल अछि‍। नै‍‍ जानि‍ बेर‍-बेर नाओं बदलि‍ कऽ लि‍खबाक परम्‍परा कहि‍या धरि‍ चलत। छद्म नाअोंक नि‍र्णय एकबेर‍मे कऽ लेबाक चाही, नै‍‍ तँ रचनाकारक वि‍लगि‍त मानसि‍कताक बोध होइत अछि‍। वर्तमान महि‍ला वर्गमे नौकरी करबाक इच्‍छा शक्‍ति‍ प्रबल भऽ रहल अछि‍। स्‍वभावि‍के अछि‍, जीवनक दोसर पहि‍या तँ नारी छथि‍। सृजन आ सृष्‍टि‍क रूपमे पहि‍ल पहि‍या सेहो कहि‍ सकैत छी। परंच युवा महि‍ला वर्गक प्रवृत्ति‍ चंचल होइत अछि‍। ऐ‍ अल्हड़पनमे अपन कर्मगति‍केँ सेहो चंचल बनएबाक प्रयास कऽ रहल छथि‍ कवयि‍त्री अपन कवि‍ता “एकरा नौकरी चाही‍” मे। कार्यालयक सभटा काज हि‍नके मोनक हेबाक चाही। काज कम मुदा कैंचा बेसी चाहै छथि‍। बॉसकेँ आन्‍हर आ बही‍र हेबाक कामनामे हास्‍यक दर्शन होइत अछि‍। भऽ सकैत अछि‍ हि‍नक एहेन दृष्‍टि‍कोण मात्र कवि‍तेटा मे हुअए। “पनि‍भरनी‍” कवि‍ता पढ़ि‍ हमर माथ सुन्न भऽ गेल, अकचका गेलौं। जइ‍ नारीक बालकाल जमशेदपुरमे बीतल हुअए, आब लंदनमे रहै छथि‍ हुनकासँ एहेन शब्‍दक आश केना कएल जा सकैत अछि‍? गामोमे आब घैल आ इनारक रूप मृतप्राय भऽ गेल अछि। एकटा गरीब अबला पनि‍भरनीक प्रति‍ आसक्‍ति‍सँ कवि‍ता ओत-प्रोत अछि‍। वि‍षयवस्‍तु आ दृष्‍टि‍कोण समंजन खूब नीक लागल। अपन जाति‍क प्रति‍ सि‍नेहक मर्मस्‍पर्शी चि‍त्रण भऽ सकैत अछि जे ऐ‍ प्रकारक व्‍यस्‍थाक वर्णन अपन परि‍वारक बूढ़-पुरानसँ ज्‍योति‍जी सुनने हेती। दीपमे ज्‍योति‍ पसारबाक शक्‍ति‍ होइत अछि‍ मुदा तरमे तँ अन्‍हार रहैछ। स्‍वाभावि‍क अछि‍ जे जहानमे आनंद देबामे सक्षम होइछ ओकर अपन जीवन व्‍यथि‍त भऽ जाइत अछि‍। ऐ‍ प्रकारक दर्शन भेल “शीतल बसात” कवि‍तामे। वृक्ष दोसरकेँ शीतलता दैत अछि‍ परंच ओकर पात भूखण्‍डपर खसि‍ते अस्‍ति‍त्‍व वि‍हीन भऽ जाइत अछि‍। पतझड़ि‍क बाद वसन्‍त, फेर पतझड़ संगहि‍ रौद क्षणहि‍मे छाह, ई तँ प्रकृति‍क लीला अछि‍। मि‍थि‍लाक भूखण्‍डमे आमक गाछी बूढ़ पुरानक संग-संग बाल बोधक लेल गरमीक पि‍कनि‍क केन्‍द्र होइत अछि‍। भोज कोनो छप्‍पन प्रकारक भोज्‍य पदार्थक नै‍‍, टि‍कुला आ झक्‍काक भोज। गरमी छुट्टीमे गामक प्रवासक ज्‍योति‍ जीक अनुभव नीक बुझना जाइत अछि‍। “एकटा भीजल बगरा‍” कवि‍ता पढ़ि‍ हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यक महान लेखि‍का महादेवी वर्मा जीक लि‍खल “गि‍ल्‍लू‍” कथा मोन पड़ि‍ गेल। आेइ‍ कथामे वर्माजी एकटा लुक्‍खीक पीड़ाक वर्णन करैत ओकरा आत्‍मसात कऽ लै छथि‍, तहि‍ना ज्‍योति‍जी एकटा चि‍ड़ैक प्रति‍ सि‍नेहक जे भाव देखा रहल छथि‍ ओ “सर्वे भवन्‍तु सुखिन:‍” सि‍द्धान्‍तक द्योतक बुझना गेल। “हम एकटा मध्‍य वर्गक बालक‍” बाल साहि‍त्‍यपर आधारि‍त कवि‍ता अछि‍। बाल मनोवि‍ज्ञानक संग एकरा बाल गृहवि‍ज्ञान सेहो मानल जा सकैत अछि‍, मुदा ऐ‍ कवि‍तामे प्रवाहक अभाव देखए मे आएल। शब्‍दकेँ तुकांत बनएबाक क्रममे मूल भावक प्रति‍ अनाकर्षण देखएमे आबि‍ रहल अछि‍। “टाइम मशीन‍” कवि‍तामे आर्य भूमि‍क दृष्‍टि‍कोण आ पाश्‍चात्‍य देशक बेवस्‍थासँ तुलना नीक लागल। वि‍लासि‍ताक प्रति‍ हमरा सबहक समर्पण परतंत्रताक रूपमे परि‍णत‍ भेल आ हम सभ सगरो क्षेत्रमे पंगु भऽ गेलौं। मि‍ठगर रौद, पहि‍ल फुहार आ बरसातक दृश्‍य कवि‍तामे प्रकृति‍ वर्णन सामान्‍य रूपसँ कएल गेल अछि‍। ऐ‍ प्रकारक कवि‍तासँ हमर साहि‍त्‍य ओत-प्रोत अछि‍। ऐ‍ प्रसंगमे कि‍छु नव नै‍‍ देखएमे अाएल। जीवन सोपानमे जीवनक क्रमि‍क गति‍क छंदसँ भरल प्रस्‍तुति‍ सेहंति‍त अछि‍। “प्रतीक्षासँ परि‍णाम धरि‍‍” जीवन-दर्शनपर आधारि‍त ज्‍योति‍ जीक सोहनगरक कवि‍ता अछि‍। हमरा बुझने ई कवि‍ता ऐ‍ पोथीक सभसँ वि‍लक्षण अध्‍याय थि‍क। श्रीमद्भगवतगीता आ शेष महाभारतक आधारपर कृष्‍ण चरि‍तक वर्णनसँ कवयि‍त्रीकेँ सि‍द्धहस्‍त मानल जा सकैछ। द्वापरसँ कलि‍मे प्रवेश नि‍श्चि‍त रूपेँ कवयि‍त्रीक वि‍स्‍तृत अध्‍ययन आ अनुशीलनक छाया देखा रहल अछि‍। “इन्‍टरनेट स्‍वयंवर‍” बि‍आहक नव रूपक चि‍त्रण कऽ रहल अछि‍। वैदि‍क कालमे आठ प्रकारक पाणि‍ग्रहण बेवस्‍था छल। वर्तमान समैमे इंटरनेट चैटि‍ंगसँ बि‍आह करबाक प्रणालीमे ठक बेवस्‍था अछि‍ तँए कवयि‍त्री जकरा बि‍नु देखने प्रेम करबाक नाटक कएलनि‍ ओ पुरुष नै‍‍ स्‍त्री अछि‍। क्षि‍ति‍जक साक्षात दर्शनमे प्रवाहक पयोधि‍ गति‍शील अछि‍ मुदा रचनामे तारतम्‍यक अभाव देखि‍ रहल छी। हि‍म आवरि‍त आ मेघाच्‍छादि‍त सन शब्‍द तँ नि‍योजि‍त अछि‍ मुदा जखन हमरा सबहक भाषामे शब्‍द वि‍न्‍यासक अभाव नै‍‍ तखन एहेन तद्भवक चएन करब नीक नै‍‍ लागि‍ रहल अछि‍। जौं ऐ‍ कवि‍तामे देसि‍ल बयनाक मूल शब्‍दक प्रयोग करि‍तथि‍ तँ कवि‍ताक रूप बेसी नीक भऽ जएबाक संभावना छल। महावतक हाथी, वि‍द्या धन, बर्फ ओढ़ने वातावरण आ गामक सूर्यास्‍त कवि‍ता तँ नीक अछि‍ मुदा एकर बि‍म्‍ब कोनो नव नै‍‍, सभटा वएह पुरना कवि‍क रचना सबहक रूप देखएमे आएल मुदा दृष्‍टि‍कोण हि‍नक अपन अछि‍, ककरो रचनाक नकल नै‍‍ कएने छथि‍। वि‍शाल समुद्रमे जलोधिक‍ छोट मुदा प्रासंगि‍क प्रस्‍तुि‍त नीक लागल। आधुनि‍क जीवन दर्शनमे कवि‍ताक बि‍म्‍ब तँ नीक लागल मुदा वि‍वेचन पक्ष दुर्बल बुझना गेल। मनुष्‍य आ ओकर भावनामे जीवनक वर्तमान रूपक अन्‍वेषण उद्धेश्‍यपूर्ण अछि‍। हम्‍मर गाम कवि‍तामे गामक जि‍नगीक जीत दर्शनीय अछि‍। वि‍कासमे मूल प्रकृति‍क रूपकेँ वैज्ञानि‍क दृष्‍टि‍सँ परि‍वर्तनक प्रयाससँ नि‍कलैत परि‍णामक वर्णन कएल गेल अछि‍। बालश्रम वर्तमान समाजमे घृणित रूप लऽ लेने अछि‍। साधनक अभावमे हम सभ नेनाक शैशव कालकेँ बि‍सरि‍ अबोधपर मानसि‍क आ शारीरि‍क अत्‍याचार करै छी। मि‍थि‍लामे बाढ़ि‍क परि‍णाम आ प्रलयक रूप मेघक उत्‍पात आ बरखा तूँ कहि‍या जेबैं कवि‍तामे देखि‍ रहल छी। “‍ईशक अराधना” शीर्षक कवि‍तामे कर्म शक्‍ति‍क आवाहन कएल गेल अछि‍। ऐ‍ कवि‍ताक बि‍म्‍ब नीक, प्रवाह कलकल आ भाषा सरल अछि‍। ऐ‍ प्रकारक शब्‍द वि‍न्‍यासक मैथि‍लीमे आवश्‍यकता अछि‍। “खरहाक भोज‍” शीर्षक कवि‍तामे आन जीवसँ मनुष्‍यक तुलना नीक लागल। बौद्धि‍क रूपसँ वि‍कसि‍त मानवकेँ कर्म आ धैर्यपर वि‍श्वास रखबाक चाही, आन जीवक जीवन-उद्धेश्‍य भोजन मात्र होइत अछि‍। कल्‍पना तखने साकार भऽ सकैत अछि‍ जखन शि‍क्षाक विकास हएत, ऐ‍ प्रकारक दृष्‍टि‍कोण लोककेँ समृद्धि‍ दऽ सकैत अछि‍। कोशीक प्रकोप कवि‍ताक बि‍म्‍ब वर्तमान कालक एकटा पैघ समस्‍याकेँ उद्घृत कऽ रहल अछि‍। “‍असल राज आ पतझड़क आगमन” कवि‍ताक वि‍षय वस्‍तु सामान्‍य मुदा नीक लागल। वृद्धक अभि‍लाषामे प्राकृति‍क संतुलनकेँ धि‍यानमे राखि‍ नव पि‍रहीक लेल सृजनशीलताक क्रममे वृक्षारोपणपर बल देल गेल अछि‍। “टेम्‍स धारमे नौका वि‍हार‍” कवयि‍त्रीक वास्‍तवि‍क जीवन रेखाक बि‍न्‍दु लंदनसँ अपन ठामक तुलनापर आधारि‍त अछि‍। टेम्‍सक धारमे नौका वि‍हार करएवालीकेँ अपन चनहा केना मोन पड़ि‍ गेलनि‍, नि‍श्चय आन ठामक नीक बेवस्‍था देखि‍ हमरा सभकेँ अपन पि‍छड़ल दशापर मर्म होइत अछि‍। कतौ-कतौ कि‍छु दुर्बल बि‍न्‍दु रहलाक बादो ऐ‍ संग्रहकेँ खूब नीक मानल जा सकैत अछि‍। कवयि‍त्री कखनो द्वापर युगमे चलि‍ जाइ छथि‍ तँ कखनो चैटि‍ंग बि‍आहक अनुसंधानक आधुनि‍क युगमे। समग्र कवि‍ता संग्रहमे कि‍छु स्‍थानकेँ छोड़ि‍ वि‍षयवस्‍तुक चयन नीक लागल। वर्तमान युगक नवतुरि‍या पि‍रहीसँ एतेक आश नै‍‍ छल। नि‍श्चय ज्‍योति‍जी धन्‍यवादक पात्र छथि‍। शेष...अशेष पोथीक नाओं- अर्चिस रचयि‍ता- श्रीमती ज्‍योति‍ सुनीत चौधरी दाम- १५० टाका प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन प्रकाशन वर्ष- २००९ मैथि‍ली चि‍त्रकथा आठ बर्ख पहि‍ने ‘मैथि‍ली’ भारतीय संवि‍धानक अष्‍टम अनुसूचीमे शामि‍ल कएल गेल। कति‍पय हर्षित भेलौं जे हमरो भाखाकेँ वैधानि‍क अस्‍ति‍त्‍व देल गेल। मोने-मोन आेइ‍ सभ गोटेक प्रति‍ कृतज्ञता आ मंगल कामना करैत छलौं जनि‍क प्रयाससँ ई काज भेल। मुदा! एकटा कचोट अर्न्‍तमनकेँ हि‍लकोरि‍ रहल छल जे आगाँ की हएत? अपन भाखाक भवि‍ष्‍य नीक नै‍‍ देखि‍ रहल छलौं। ऐ‍ व्‍यथाक सभसँ पैघ कारण छल हमरा सबहक भाषा साहि‍त्‍यमे कोनो क्रांति‍क आश नै‍‍ नजरि‍ आबि‍ रहल छल। वर्तमान पीढ़ी मातृभाषासँ दूर भऽ रहल छलाह। अगि‍ला पीढ़ीक गप्‍प की कहू? कतेक नेनाकेँ ओलती, चि‍नुआर, थान, छान-पग्‍घाक अर्थ बुझल अछि‍? जौं कोनो अभि‍भावकसँ पुछैत छी जे नेनासँ अपन बयनामे गप्‍प कि‍ए नै करैत छी तँ जवाब भेटैत अछि‍ जे स्‍कूल जाएत तँ हि‍न्‍दी आ अंग्रेजी नै‍‍ बूझत तेँ अखनेसँ सि‍खा रहल छी। नेनोमे चेतना नै‍‍ कि‍एक तँ बाल-साहि‍त्‍य मैथि‍लीमे लि‍खले नै‍‍ गेल। जौं कि‍छु अछि‍ तँ ओकर अर्थ कतेक नेना बुझैत छथि‍। महान लेखक वा कवि‍क श्रेष्‍ठ भाषामे लि‍खल रचना हम नै‍‍ बुझैत छी तँ हमर धीया-पूता केना बुझतथि‍? ऐ‍ मध्‍य मैथि‍लीमे वि‍देह-सदेहक पदार्पण भेल। नव रूप, नवल सोच आ सकारात्‍मक दृष्‍टि‍कोणक संग। मौलि‍क बि‍न्‍दुपर रचना हुअए लागल। उपेक्षि‍तकेँ नव आश भेटल। साहि‍त्‍य आन्‍दोलनक एकटा परि‍णामक चर्च हम पाठकसँ कऽ रहल छी -गोनू झा आ आन मैथि‍ली चि‍त्रकथा- श्रुति‍ प्रकाशन दि‍ल्‍ली द्वारा वि‍देहक सौजन्‍यसँ ई पोथी सन् २००८ ई. मे बहराएल। ऐ‍ पोथीक लेखि‍का छथि‍ श्रीमति प्रीति‍ ठाकुर। मैथि‍ली चि‍त्रकथा हि‍नक दोसर रचना थि‍क। वि‍षए पूर्णत: नव, बाल साहि‍त्‍यक चि‍त्रकथा। हम ऐ‍सँ पूर्व ऐ‍ वि‍षयक पोथी मैथि‍लीमे नै‍‍ देखने छलौं। एकरा रचना नै‍‍ कहल जा सकैछ, कि‍एक तँ ऐ‍मे कोनो साहि‍त्‍यक सृजन नै‍‍, लोक कथा आ जन-श्रुति‍ जे मि‍थि‍लामे पहि‍नेसँ सुनल जा रहल छल ओकरा चि‍त्रक संग चर्च कएल गेल अछि‍। ऐ‍ प्रकारक जन श्रुति‍ गाम-गाममे बूढ़-पुरानक मुँहसँ बाजल जाइत छल मुदा आब वि‍लीन भऽ रहल अछि‍। आेइ‍ वि‍लुप्‍त वि‍षयपर चि‍त्रकथा लि‍खि प्रीतिजी‍ बड्ड नीक काज कएलनि‍। ऐ‍ पोथीमे जे वि‍शेष आ नव सकारात्‍मक पक्ष देखलौं ओ अछि‍- वि‍षयक आ कथाक चयन। सम्‍पूर्ण मि‍थि‍ला ऐ‍मे समाएल अछि‍। सभ जाति‍ समाजक लोककथाक चि‍त्रण कएल गेल अछि‍। मोती दाइ कथामे रजक जाति‍क नि‍ष्‍ठाक चि‍त्रण तँ राजा सलहेसमे दूधवंशीक भावनाक व्‍याख्‍या। मि‍थि‍ला दरबारक बोधि‍-कायस्‍थक गंगा लाभ मनोरम लागल। बहुरा गोढ़ि‍‍न आ नटुआ दयाल बेगूसरायक लोक कथा थि‍क। पहि‍ने लोकक मानसि‍कता छल जे बेगूसरायक लोक मैथि‍ली भाषी नै‍‍ छथि‍। हमरो मर्म होइत छल कि‍एक तँ हमर मातृक बेगूसराइये जि‍लामे अछि‍। ऐ‍ कथाकेँ पढ़ि‍ ति‍रहुति‍या आ दछि‍नाहाक भेद हि‍यासँ मेटा गेल। हमरा सबहक समाजक एकटा उपेक्षि‍त जाति‍ छथि‍- मुसहर। मुसहरोमे दूटा आदर्श पुरुष भेल छलाह दीना आ भद्री। आेइ‍ दीना भद्रीक कथा बड्ड नीक लागल। पहि‍ने बूझैत छलौं जे तपस्‍वी बनबाक लेल बौद्धि‍कता आ भौति‍कता पैघ मापदंड थि‍क, मुदा आब ई भ्रम दूर भऽ गेल। ऐ‍ प्रकारे बहुत रास कथाक चि‍त्रण कएल गेल अछि‍। एक बेर आदरणीय जगदीश प्रसाद मंडल आ बेचन ठाकुरजीक रचना पढ़ि‍ हम लि‍खने छलौं जे वि‍देह मैि‍थली साहि‍त्‍य आन्‍दोलन’ मैथि‍ली पर लागल जाति‍वादी कलंककेँ धो देलक। जौं ई गप्‍प सत्‍य अछि‍ तँ ओइमे ऐ‍ पोथीक भूमि‍काकेँ नै‍‍ नजरि‍ अंदाज कऽ सकै छी। वर्तमान पीढ़ीक लेल प्रेरणादायी आ अगि‍ला पीढ़ीकेँ मैथि‍लीक प्रति‍ सि‍नेह जगबए लेल ई पोथी प्रासंगि‍क अछि‍। भाषा संपादन नीक लागल। ि‍चत्रक स्‍तर बड़ सुन्‍नर आ व्‍यापक अछि‍। श्रुि‍त प्रकाशन सेहो धन्‍यवादक पात्र छथि‍। नीक कागतक प्रयोग कएलनि‍ आ चि‍त्रक रंग संयोजन सेहो सेहंति‍त लागल। अंतमे हम प्रीति‍ जीकेँ धन्‍यवाद दैत छि‍यनि‍ जे हमरा सबहक बीच एकटा झाँपल वि‍षएपर लेखनीक प्रयोग कएलनि‍। आगाँ सेहो हम आशा करैत धन्‍यवाद ज्ञापन करैत छी। पोथि‍क नाओं- मैथि‍ली चि‍त्रकथा प्रकाशन वर्ष- २००९ लेखि‍का- प्रीति‍ ठाकुर प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन, राजेन्‍द्र नगर- दि‍ल्‍ली। दाम- १००टाका मात्र पोथी प्राप्‍ति‍ स्‍थान- पल्‍लवी डि‍स्‍ट्रीब्‍यूटर्स वार्ड न. ६ नि‍र्मली, सुपौल, मोबाइल न. ०९५७२४५०४०५ अम्‍बरा- (कवि‍ता संग्रह, राजदेव मण्‍डलक) बक हँसैत अछि‍ कुटि‍ल हँसी, कलपै छथि‍ लुब्‍ध मराल। जे कँपैत छल डरसँ थरथर, आब ने तकरो लाज। पड़ल छथि‍ बंधनमे मृगराज।। प्रस्‍तुत पद्यांश कवि‍ सरोज भुवनेश्वर सि‍ंहक कवि‍तासँ लेल गेल अछि‍। ऐ कवि‍तामे समाजक वि‍स्‍मयकारी अवस्‍थासँ कवि‍ क्षुब्‍ध छथि‍। ऐमे देखाएल युगक वि‍षमताक मार्मिक उद्वोधनसँ जौं अपन भाषा ओ साहि‍त्‍य दु:दशाक तुलना कएल जाए तँ कोनो अति‍शयोक्‍ति‍ नै। कि‍छु महान साहि‍त्‍यकार वि‍स्‍मृत रहि‍ कालक गालमे समा गेलाह। लोक कहै छथि‍ कवि‍ कहि‍यो नै मरैछ, ओ तँ अपन रचनामे जीवंत रहै छथि‍ मुदा जखन रचने मरि‍ गेल तँ कवि‍ कोना जीबथि‍। जे भेल से भ्‍ोल मुदा हमर दृष्‍टि‍कोण जे आबहु चि‍न्‍तन कएल जाए। अखनो कि‍छु एहेन रचनाकार उदीयमान छथि‍ वा उगबाक प्रयास कऽ रहल छथि‍ जनि‍क लेखनीकेँ प्रोत्‍साहि‍त नहि‍यों तँ कमसँ कम कि‍छु चर्च कएल जाए तँ ओइ‍ रचनाकारक संग-संग भाषा-साहि‍त्‍यकेँ अमरत्‍व अवश्‍य भेटत। एकटा परि‍पक्‍व मुदा साहि‍त्‍यक भाषामे नवतुि‍रया कवि‍ मैथि‍लीक पल्‍लवकेँ वसन्‍तक वातसँ हि‍लएबाक अपना भरि‍ प्रयास कऽ रहल छथि‍ श्री राजदेव मण्‍डल। हि‍नक पहि‍ल कवि‍ता संग्रह –अम्‍बरा- श्रुति‍ प्रकाशनक सौजन्‍यसँ पाठक लोकनि‍ लग परसल गेल अछि‍। राजदेवजी परि‍पक्‍व ऐ दुआरे कि‍एक तँ ओ नव रचनाकार नै छथि। कतेक बर्ख ठकाइते रहलाह। जखन आत्‍मीय लोक मैथि‍ली अकादमीक अध्‍यक्ष बनाओल गेलाह तँ राजदेव जीकेँ आश जगलनि‍, जे समाजक कात लागल वर्गक लोक अकादमीमे अएलनि‍, रचना प्रकाशि‍त हएत वा कि‍छु मदति‍ भेटत। अकादमीक अध्‍यक्षक संग-संग अकादमीक पत्रि‍काक संपादक मण्‍डलमे सेहो अपन लोक देख दोहरि‍ आश नेने येनकेन प्रकारेण संपर्क स्‍थापि‍त कएलनि‍। करीब तीसटासँ उपरे कवि‍ता देबो केलखि‍न, कि‍न्‍तु ओ सभ मृग मरीचि‍का मात्र देखबैत रहलखि‍न। परि‍णाम नि‍राशावादी रहल। वि‍देह पत्रि‍काक पदार्पणक पश्‍चात श्री उमेश मण्‍डल जीक माध्‍यमसँ संपादक श्री गजेन्‍द्र ठाकुर जी संग जुड़ि‍ रचना पठाबए लगलाह। श्रुति‍ प्रकाशनक अंति‍म मुहर लगि‍तहि‍ं अम्‍बरा सामान्‍य अर्थमे तँ छाह मुदा नवल-धवल इजोत नेने पाठक धरि‍ पहुँचि गेल अछि‍। राजदेव जीकेँ नवतुरि‍या ऐ दुआरे कहल जाए कि‍एक तँ पूर्वमे लि‍खल गेल कवि‍ता एखन धरि‍ पाठकक लोचनसँ दूर छल। ऐ संग्रहमे ७५ गोट कवि‍ता देल गेल अछि‍। आह सँ श्रीगणेश आ आँखि‍क प्रतीक्षासँ इति‍श्री। एकर तात्‍पर्य जे रसहीन जीवनसँ आकुल मनुक्‍ख कुपि‍त अछि‍ मुदा अंति‍म स्‍वप्‍न वा कल्‍प आशक संग मूर्त्त रूपमे क्षणहि‍ंमे परि‍वर्तित भऽ जाइछ। बाह्य रूपमे शीतलता अर्थात शांति‍ देखऽमे अबैत अछि‍, परंच भीतरमे धाह.....। कोन प्रकारक धाह? एकरा अश्रु उच्‍छ्वास, आकुलता, संत्राश वा प्राप्‍ति‍क आश नै पूर्ण होएबाक क्रममे उद्वि‍ग्‍नताक नाआंे देल जाए। जै व्‍यक्‍ति‍क जीवनक चौमुख आह वा क्षोभसँ घेरल हुअए ओ जौं आकाशकेँ छूबाक कल्‍पना करए तँ ओकरा वि‍क्षि‍प्‍त नै तँ कमसँ कम अति‍वि‍श्‍वासी अवश्‍य कहल जा सकै छै। कुरूक्षेत्रक युद्ध समाप्‍ति‍क पश्‍चात् गांधारीक मनोदशा जकाँ अकाश स्‍पर्शक कल्‍पनामे अकाश तँ शून्‍य दृष्‍टि‍गोचर होइछ मुदा पएरक नीचाँ असंख्‍य लहास आ बाँचल बन्‍धु-बांधब केर कंठ दोहन कवि‍क मोनकेँ अशांत कऽ देलकनि‍। भौति‍कवादी युगक हीराक चमकि‍मे अपन साहसक रजत नेने नव मार्गकेँ ताकि‍ रहल छथि‍- बि‍नु लेने आह कि‍ भेटि‍ सकत वाह-वाह परंच, नहि‍ छी लापरवाह खोजब नवका राह। 'खोजब' शब्‍दक स्‍थानपर ताकब वा हेरब लि‍खल रहि‍तए तँ आर नीक लगि‍तए। संग-संग छंद लेपनक क्रममे कतौ-कतौ अपन भावकेँ कवि‍ व्‍यक्‍त नै कऽ सकलाह। ज्ञानक झंडा कवि‍तामे ज्ञानक परि‍भाषा वि‍ज्ञानक अन्‍वेषणक रूपेँ कएल गेल। वि‍ज्ञानक वि‍कास-क्रममे अन्‍ध विश्वास शनै: शनै समाप्‍त भऽ रहल अछि‍- आब नहि‍ चलत अंध वि‍श्वासक हथकंडा फहरा रहल वि‍ज्ञानक झंडा....। प्रयोग धर्मितामे ई गप्‍प तँ सत्‍य मुदा वास्‍तवि‍कताक अवलोकन कएलापर स्‍थि‍ति‍ भि‍न्न होइ छै। ऐ युगमे सेहो पि‍तृ कर्म आ देवकर्ममे वि‍श्वास जागले अछि‍ जखन कि‍ वि‍ज्ञानक शब्‍दकोषमे स्‍वर्ग-नर्कक परि‍भाषा असंभव। लोक एखनो श्राद्ध करै छथि‍, जीवनकालमे भरि‍ पेट अन्न नै मुदा मुइलाक पश्चात सोहल अचार। मि‍ि‍थलामे जमीन बेच कऽ पि‍तृ श्राद्ध कएल जाइत अछि‍। साधन विही‍न मानव अपन जीवि‍त संतानक प्रति‍ अपन दायि‍त्‍वक पालन कोना करथि‍, समाजकेँ एकर कोनो परवाहि‍ नै, ओ तँ मात्र पि‍तृधर्म पालनक उपदेश दै छथि‍। तँए ज्ञानक झंडामे कवि‍केँ अनुकरणीय बि‍म्‍बक चि‍त्रण करबाक चाही छल जे नै कएलनि‍। राजदेवजी शि‍ल्‍पी नै छथि‍, कि‍एक तँ कोनो शि‍ल्‍पक कृत्रि‍म बि‍म्‍ब नै तैयार कएलनि‍, स्‍वाभावि‍क अछि‍ जै व्‍यक्‍ति‍केँ आरसी, यात्री, चन्‍द्रभानु, बहेड़ आ बूच जकाँ अपन गृहस्‍थ धर्मक पालन हेतु अभाव आ संत्रासक अनुभव नि‍त्‍य-प्रति‍ होइत हुअए ओइ व्‍यक्‍ति‍केँ कल्‍पनाशीलताक शि‍ल्‍प बि‍म्‍बि‍त करबाक लेल समए कखन भेटए? ओ तँ जौं अपन जीवन दशासँ समाजक तुलना करऽ लागए तँ सदि‍खन बि‍म्‍बे-बि‍म्‍ब। झाँपल अस्‍ति‍त्‍वक शीर्षक कवि‍ता हृदैकेँ स्‍पर्श करैत अछि‍- भीतरमे ओ लगा रहल अछि‍ फानी, सुनि‍ रहल छी वक्रवाणी प्राप्‍त करबाक लेल उत्‍कर्ष करऽ पड़त आब संघर्ष....।। वि‍रोध कोनो जीव ताधरि‍ कऽ सकैत अछि‍ जाधरि‍ ओकरामे संघर्ष करबाक सामर्थ्य जीवि‍त हुअए। पराजयक बेर-बेर ि‍हलकोर लगलासँ आत्‍म समर्पणक संभावना प्रबल भऽ जाइछ। कखनो कखनो आसक्‍ति‍क कारणेँ लोक सेहो आत्‍मसमर्पण कऽ दै छथि‍। जेना कुरूक्षेत्रमे भीष्‍म पि‍तामह अर्जुनकेँ चाहि‍तथि‍ तँ धाराशायी कऽ सकैत छलथि‍ मुदा ओ तँ अर्जुनक वि‍जय हृदैसँ चाहै छलाह। रहब अहींक सभक संग कवि‍ता आसक्‍ति‍, मृगतृष्‍णा वा मजबूरी कोन रूपक समझौता थि‍क एकर वि‍वेचन संभव नै, ई तँ कवि‍क जीवनक अनुभवक सार अछि‍, ओ स्‍पष्‍ट रूपेँ बाँटए चाहै छथि‍- नहि‍ करब आब नि‍यम भंग नहि‍ करब अहाँ सभकेँ तंग लि‍अ अपन राज, नहि‍ चाही हमरा ताज....।। एकटा अन्तर्मुखी सोझ वि‍चारक लोक जखन स्‍वयंसँ लड़ैत-लड़ैत थाकि‍ जाइत अछि‍ तखन एहने वेदना कृत्रि‍म हँसीक संग-संग नि‍कसैत अछि। फेरो अपन परि‍वारि‍क धर्म मोन पड़ि‍ते नदीक माछ बनि‍ जाइछ। जीव जखन प्राणकेँ छोड़ि‍‍ दैछ वा प्राण जीवकेँ छोड़ि‍ दैछ तखन लहासक रूप.....ओइ‍ प्रकारें कवि‍ नदीक माछकेँ जल दुनि‍यासँ बाहर नि‍कलबाक प्रयास करै छथि‍। परि‍णाम हुनके मुखसँ सुनल जाए- सुनने छल ओ अपनहि‍ कान कहने रहथि‍न बूढ़-पुरान कहि‍यो नहि‍ जाइहेँ ओहि‍ दुनि‍या ओहि‍ठाम भरल अछि‍ खुनि‍याँ। सभ कि‍छु रहि‍तौं अर्थाभाव एखन समाजक सभसँ पैघ अभि‍शाप बनि‍ गेल अछि‍ समाजक मध्‍य, जतऽ ईमानदारी आन्‍हर जकाँ गांधारी बनि‍ ठाढ़ छथि‍, तँए उद्वि‍ग्‍न भऽ जलदुनि‍यासँ बाहर जएबाक प्रयास कएलनि‍ परंच क्षणहि‍ंमे अपन मातृभूमि‍क सि‍नेहक कड़ीमे फँसि‍ फेर पानि‍मे कूदि‍ गेलाह- मुदा ओ अछि‍ अभागल जलबून्‍द कड़ी अछि‍ लागल वि‍फल भेल छल बलमे पुन: खसल ओहि‍ नदीक जलमे जखन लोक अपनाकेँ पूर्णत: एकसरि‍ मानि‍ लैत अछि‍ ओहि‍ कालक मनोदशाक अभि‍व्‍यक्‍ति‍ के करए? नहि‍ कि‍ओ दऽ रहल अछि‍ साथ, पहाड़ीपर पटकब आब माथ हूबा देबैक हम खूनसँ अपना घामक बूनसँ.....। ऐ प्रकारक परि‍स्‍थि‍ति‍जन्‍य पद्यक संग-संग सीमा परक झूला, कांध परक मुरदा, दीप, हि‍त-अहि‍त, प्रयास, ऑफि‍सक भूत, कठुआएल रूप, सुनगैत चि‍नगी, अहाँक अगवानीमे, लाल ज्‍योति‍, बीखक घैल, पत्रोतर, अन्‍हारक खेल, नाचक वि‍खाह आदि‍-आदि‍ वि‍चारमूलक मर्मस्‍पर्शी पद्य ऐ संग्रहमे संकलि‍त अछि‍। मुदा अंत धरि‍ नव जीवनक आशमे कवि‍क आँखि‍ मात्र प्रतीक्षा कऽ रहल छन्‍हि‍- मन्‍द-मन्‍द सि‍हकैत बसात केना रहब अहाँसँ भऽ कात एको बेर तँ बोलू आबो आँखि‍ खोलू नि‍कलए नेह वा धि‍क्कार हमरा दुनू अछि‍ स्‍वीकार...।। सम्‍पूर्ण संग्रहमे अश्रुरोदनक बि‍म्‍बि‍त चि‍त्रमे नूतन आयामक संग-संग जीवनक नवल आश धएने कवि‍ अम्‍बरासँ मुक्‍ति‍पर रहब चाहे चलैत, सूतल, ठार वा बैसल....। अम्‍बरा अर्थात् छायाकेँ लोक एकाकार तँ नै कऽ सकैत अछि‍ परंच भगाएब सेहो असंभव। तँए दुनू रूपेँ कवि‍ अपन जीवनक अम्‍बराकेँ स्‍वीकार कऽ लि‍अ चाहै छथि‍। रचनाक ि‍नर्बल पक्ष जे कतौ आकर्षण नै, कतौ शि‍ल्‍प नै, कतौ बि‍म्‍ब नै मुदा सभ छंद आयामक अभावक बादो राजदेवजी अनचोकेमे एहेन कवि‍ता संग्रह लि‍ख देलनि‍ जकर तुलना दोसर कवि‍सँ करब प्रासंगि‍क नै कि‍एक तँ मैथि‍ली भाषाक लेल एकटा नव प्रकारक प्रयोग ऐमे भेटल। सुशान्त झा मैथिली, मैथिल संस्कृति आ मिथिला राज्य समदियापर मिथिला आ बिहारसँ संबंधित लेख पढ़ि‍ कऽ ओतए चलैबला विकासपरक गतिविधिक अंदाज लागि पाबैए। इम्हर हमर एहेन मैथिल मित्रक संख्यामे बड़ तेजीसँ वृृृृृृद्धि भेल जे बिहार या मिथिलाक विकासक बारेमे जानए तँ चाहैत छथि लेकिन जखन समदियापर मैथिलीमे लेख पढ़ए कहबनि तँ दिक्कत भऽ जाइ छन्हि। हुनका मैथिली बाजए तँ अबै छन्हि लेकिन पढ़ए नै‍ आबै छन्हि। ओ हिंदी बड़ आरामसँ पढ़ि‍ लैत छथि लेकिन मैथिली पढ़एमे दिक्कतक ओजहसँ ओ मैथिली साईट पढ़िते नै‍ छथि। ई बड्ड पैघ समस्या अछि। देखल जाए तँ अमूमन जे कोनो भाषाक अपन लिपि जीवित छै, ओकरा पढ़ैबलाकेँ कोनो दिक्कत नै‍ होइ छै- कारण जे ओ बच्चेसँ आेइ भाषाक आेइ लिपिमे पढ़एक अभ्यस्त होइत अछि। जेना तमिल, तमिलमे लिखल जाइत अछि, तँ एकटा औसत अंग्रेजी तमिलभाषीयोकेँ ओकरा पढ़ैमे कोनो दिक्कत नै‍ होइ छै। लेकिन कल्पना करु की अगर तमिलकेँ देवनागरीमे लिखल जाए तँ की हएत? ओ आदमी तमिल तँ बाजि लेत- चूँकि ओ ओकरा अपन माए या परिवारक अन्य सदस्यक मुँहसँ सूनि कऽ सिखलक अछि- लेकिन ओकरा पढ़ैमे बड्ड दिक्कत हेतै। ओकरा देवनागरी लिपि सेहो सिखए पड़तै। हमर भाषा संगे यएह दिक्कत अछि। मैथिलीकेँ अपन लिपि तँ छै, लेकिन ओ देवनागरीमे लिखल जा रहल अछि- जइ लिपिमे हम सभ सिर्फ हिंदी पढ़ैक आदी‍ छी। अधिकांश मैथिली बजैबलाकेँ मैथिली तँ आबै छन्हि- किएक तँ ओ सुनि कऽ सिखने छथि लेकिन ओ पढ़ि नै सकै छथि, किएक तँ पढ़ैक आदत हुनका हिंदीक छन्हि। ई बात स्वीकार करएमे हमरा कोनो संकोच नै‍ जे हमर भाषा हिंदीक भाषाइ साम्राज्यवादक शिकार भेल अछि। ई संकट मैथिलियेटा संग नै‍, बल्कि हिंदी क्षेत्रक तमाम भाषा जेना अवधी, भोजपुरी, ब्रज, राजस्थानी, सबहक संगे छै। देखल जाए तँ भोजपुरी कनी नीक अवस्थामे अछि कारण जे एकरा बाजार सेहो सहायता कऽ रहल छै। लेकिन जेना-जेना शहरीकरण बढ़ि रहल अछि देशमे छोट-छोट भाषा आ बोलीक स्पेस खत्म भऽ रहल अछि। देशक एकात्मक स्वरुपक विकासक लेल हिंदी आ अंग्रेजी अनिवार्य बनल जा रहल अछि। हलाँकि दक्षिणक प्रांत आ उत्तरमे बंगाल या उड़ीसा ऐसँ बहुत हद तक मुक्त अछि- ओना संकट ओतौ कम नै‍। हमर भाषा मैथिली जनसंख्याक आकार, भौगोलिक स्थिति, प्राचीनता आ व्याकरणक दृष्टिकोणसँ कोनो भाषासँ कम नै‍ लेकिन तैयो हम सभ असहाय किए छी- ई एकटा विचारणीय प्रश्न अछि। हमर दोस्त सभ जिनकर जन्म पटना या दिल्लीमे भेलनि ओ हिंदीमे बात करैत छथि। हलाँकि ओ अपन माए-बाबूजीसँ मैथिली बाजि लै छथि लेकिन अन्य मैथिल भाषीसँ ओ हिंदीयेमे संवाद करै छथि। एकर पाछू कोन मानसिकता अछि, कोन कारक एकरा प्रभावित कऽ रहल अछि, तइपर विवेचना आवश्यक। दोसर बात हीन मानसिकताक सेहो। हम सभ अपन संस्कृतिकेँ जेना बिसरि गेलौं अछि। हमरा सभ ज्ञानक मतलब अंग्रेजीक जानकारी मानि लेने छी, आ संस्कारित होइक मतलब हिंदीक नीक ज्ञान माने खड़ी हिंदीकेँ दिल्ली या टी.वी.क टोनमे बाजैक ज्ञान मानि लेने छी। हमरा अपन प्राचीन परंपराक ज्ञानसँ या तँ वंचित कएल जा रहल अछि या हम सभ खुद अनभिज्ञ भेल जा रहल छी या कएकटा आर्थिक वजह हमरा सभसँ अमूल्य समए छीन रहल अछि जे हम सभ अपन भाषा या संस्कृतिक बारेमे सोची। हमर कएकटा मैथिल मित्रकेँ ई ज्ञान नै‍ छन्हि जे सर गंगानाथ झा या अमर नाथ झा के छलाह। हुनका उमेश मिश्रक बारेमे नै‍ बुझल छन्हि। हुनका सरिसव पाही या बनगाँव महिसीक भौगोलिक जानकारी तक नै‍ छन्हि। हुनका मंडन मिश्र या जनक या मिथिलाक प्राचीन विद्रोही विद्रोही परंपराक बारेमे बिल्कुले पता नै‍ छन्हि। लोरिक या सलहेस अखन तक यादवे या दुसाधक देवता किए छथि? आ मैथिलक मतलब मैथिल ब्राह्मणे किए होइ छै? की हम एकात्म मैथिलक रुपमे कोनो प्रश्नकेँ सोचैत छी? अहू सवालसँ टकरेनाइ आवश्यक। इंटरनेट ऐ दिशामे नीक काज कऽ रहल अछि। एम्हर कएकटा वेबसाइटपर मैथिली या मिथिलाक बारेमे नीक जानकारी आबि रहल अछि। लेकिन की एतबे काफी अछि? एकटा प्रश्न मिथिला राज्यक निर्माणसँ सेहो जुड़ल अछि। मिथिलाक इलाका अप्पन दरिद्रता, विशालता, भाषाइ विशिष्टताक ओजहसँ राज्यक दर्जा पाबैक पूरा हकदार अछि, लेकिन की सिर्फ मिथिला राज्य बनि गेलासँ हमर भाषाक पूरा विकास भऽ पाओत? हम एतए राज्य बनि गेलाक बाद आर्थिक विकासक उम्मीद तँ कऽ सकै छी लेकिन की भाषाइ आ सांस्कृतिक विकास भऽ पाओत? उत्तराखंड या छत्तीसगढ़ बनि गेलाक बादो ओतुक्का स्थानीय भाषाक की हाल अछि, ई एकटा शोधक विषय भऽ सकैत अछि। दोसर गप्प मैथिलीक एकरुपतासँ जुड़ल अछि। एतए मैथिल भाषी आ ओकर साहित्यकार खुद एकर जिम्मेवार छथि। दरभंगा-मधुबनीक मैथिलीकेँ मानक बना कऽ हम केना पूरा मिथिलाकेँ ठीका उठबैक दाबा कऽ सकै छी? अखनो दरभंगा-मधुबनीक भाषाइ अहं, सहरसा-पूर्णिया आ मधेपुराबलाकेँ ऐ आन्दोलनकेँ शंकाक दृष्टिसँ देखैपर मजबूर कऽ रहल अछि। हमर ई माननाइ अछि जे मैथिली कतौ कऽ हुअए, ओकर मूल रुपमे जाबे तक ओकरा स्वीकार नै‍ कएल जाएत, मिथिला आ मैथिली आन्दोलनकेँ बहुत फाएदा नै‍ हुअएबला। दोसर बात फेर लिपि केर संबंधमे अछि। की हम मिथिला राज्य बनि गेलाक बादो मैथिलीकेँ मिथिलाक्षरमे लि‍खि सकब? की हम देवनागरीसँ मुक्त भऽ सकब? की हम राष्ट्रकेँ मुख्यधारासँ टकराइक साहस कऽ सकब... आ दरभंगा-सहरसाक शहरी वर्गकेँ मैथिली बाजै आ लिखैक लेल मना या प्रेरित कऽ सकब- ई लाख टाकाक प्रश्न। देखल जाए तँ सांस्कृतिक रुपसँ हमर मिथिला, बंगालक बेसी नजदीक अछि, लेकिन हमर राजनीतिक जुड़ाव हिंदी पट्टीसँ स्थापित कऽ देल गेल अछि। इतिहासक ऐ आघातसँ मुक्ति केना भेटत, राज्य निर्माण एकटा कदम तँ भऽ सकैत अछि, लेकिन हिंदीक इन्फ्रास्ट्रक्चर हमर जनताकेँ मजबूर कऽ देने अछि जे हम अपन लेखन या पाठन हिंदीमे करए। हमरा ओकर लत लागि गेल अछि आ हमर भाषा सिर्फ बाजैक भाषा बनि कऽ रहि गेल अछि। तखन उपाए की अछि? मैथिलीक बारेमे किछु विज्ञ लोकसँ जखन चर्चा होइत अछि तँ कहै छथि जे ५० या ६०क दशकमे जते मैथिलीक आन्दोलन मजबूत छल ओते आब नै‍। सर गंगानाथ झा, या अमरनाथ झा या उमेश मिश्र या हरिमोहन बाबू घनघोर मैथिलवादी छलाह। ओ या तँ अंग्रेजीमे संवाद करै छलाह या फेर मैथिलीमे। ओ हिंदीक भाषाइ साम्राज्यवादकेँ चीन्ह गेल छलाह- ओ उर्जा अखन कहाँ देखि‍ रहल छी? हमर बहिन कैलिफोर्नियामे रहैत अछि। ओकरा ओतए कएकटा मैथिल टकराइत छथि‍न जे मैथिलीयेमे गप्प करैत छथि। लेकिन ई चेतना भारतमे कहाँ अछि? एतए ओ हिंदी किए बाजए लगै छथि? जे अपनापन ओ अमेरिकामे ताकए चाहै छथि ओ भारतमे किए नै‍ करै छथि, एकर कोनो जवाब हमरा नै‍ सुझाइत अछि। एम्हर किछु लोग बहुत एलीट भेलाक बाद फेरसँ अपन रुटसँ जुड़ैक कोशिश कऽ रहल छथि। शायद ओ हॉलीवुड स्टार सभसँ प्रेरणा लऽ रहल होथि। ओरकुट या फेसबुकपर मिथिलाक गामक तस्वीर फेरसँ जागि रहल अछि। एकटा महत्वपूर्ण भूमिका मिथिला पेंटिंगक सेहो अछि। लेकिन लेखन या पठनक स्तरपर अखनो लोक मैथिलीसँ कहाँ जुड़ि पेला अछि? जइ भाषा-भाषीक जनसंख्या २ करोड़सँ ऊपर हुअए ओतए कोनो नीक अखबार या पत्रिका कहाँ देखि‍ रहल छी। तखन तँ इंटरनेटकेँ धन्यवाद देबाक चाही जे ओ ऐ‍ दिशामे नीक काज कऽ रहल अछि- कारण जे ऐमे पूँजी कम लगै छै। एकटा उम्मीद ऑडियो-विजुअल माध्यमसँ अछि लेकिन हमर भाषा ओहू मोर्चापर भोजपुरी जकाँ प्रदर्शन नै‍ कऽ रहल अछि। हलाँकि भोजपुरीक विशाल आबादी आ अंतराष्ट्रीय बाजार ओकरा सहयोग कऽ रहल छै लेकिन ओहूसँ बेसी महत्वपूर्ण हमरा जनैत ई जे हमर भाषा बेसी क्लासिकल होइक ओजहसँ ऐ मोर्चापर पिछड़ि रहल अछि। मैथिली भाषा लेखनक परंपरासँ विकसित भेल अछि आ बेसी मर्यादित अछि, जखनकि भोजपुरीमे लेखनक परंपरासँ बेसी वाचनक परंपरा छै। ई क्लासिकल भेनाइ हमर भाषाकेँ पोपुलर कल्चरसँ काटि कऽ राखि देने अछि। मिथिलामे संभ्रान्त वर्गक मैथिली अलग आ आम जनक मैथिली अलग भऽ गेल छै। एकर अलाबा लेखनक परंपरा होइक कारण एकर लोकगीत आ नाट्यमे एक प्रकारक अश्लीलता या बेवाकपनक बड्ड कमी छै जे भोजपुरीमे प्रचुर रुपसँ छै। तइ कारणें हमर भाषामे हाहाकारी रुपसँ हिट लोकगीतक कैसेट या फिल्म नै‍ बनि पबैत अछि। परिणाम ई जे मैथिलियोक दर्शक भोजपुरिये गीत या फिल्मक आनंद बेसी लै छथि- जे बाजार द्वारा हुनकर बेडरुम तक पहुँचा देल गेल अछि। लोक ‘महुआ’ चैनल तँ देखै छथि लेकिन ‘सौभाग्य मिथिला’क बारेमे कतेक लोककेँ पता छन्हि? मैथिलीक बाजार नै‍ बनि पाएल अछि। ईहो प्रश्न विचारणीय। तखन हमर भाषाक उम्मीद कतए अछि? की सिर्फ ‘विल पावर’ आ गार्जियन सभक अतिशय जागरुकता मात्र हमर उम्मीद अछि जे ओ अप्पन बच्चा सभकेँ कम-सँ-कम मैथिली जरुर सिखाबथु या अओर किछु? लगैए हम बेसी निराश भऽ रहल छी। शाइद हमरा एतेक निराश नै‍ हुअक चाही। जे भाषा हजार सालसँ लेखन आ वाचिक परंपरासँ जीवित अछि ओ आगूओ जीवैत रहत। एकर त्राता ओ किछु हजार या लाख लोग नै‍ छथि जे दरभंगा-पटना या दिल्लीमे आबि कऽ कॉरपोरेट भऽ गेल छथि- बल्कि ई भाषा करोड़क करोड़ मैथिल भाषीक हृदैमे जीवित अछि जे अखनो कोसीक बाढ़ि आ जयनगर रेलबे लाइनक कातमे पसरल हजारो गाममे रहै छथि। हमर ई विवशता अछि जे हमर युवा आबादी, जवान होइते देरी दिल्ली-बम्‍बै भागि जाइत अछि। अबैबला समैमे जखन आर्थिक गतिविधि हमरा इलाकामे पसरत तँ लोकक पड़ाइन नै‍ हेतै, लोक अप्पन भाषामे संवाद करैत रहत। ऐ शुभेच्छाकेँ जिअबैक लेल हमरा आर्थिक लड़ाइ लड़ए पड़त। दिल्ली आ पटनाक सरकारसँ अप्पन हक मांगए पड़त, इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत करए पड़त। शाइद मिथिला राज्य आेइ दिशामे एकटा पैघ कदम साबित हुअए। कम-सँ-कम मिथिला राज्यक निर्माणक ऐ आधारपर जरुर समर्थन करक चाही। आ मैथिल बुद्धिजीवी सभकेँ ऐ आन्दोलनमे अहम भूमिकाक निर्वाह करैए पड़तन्हि। डॉ. बचेश्वर झा मौलाइल गाछक फूल ‘मौलाइल गाछक फूल’क लेखक श्री जगदीश प्रसाद मंडलकेँ हम साधुवाद दै छि‍यन्‍हि‍ जे हि‍न्‍दी आ राजनीति‍ शास्‍त्रमे एम.ए.क अर्हता प्राप्‍त होइतो अपन मातृभाषाक प्रति‍ अटुट सि‍नेह राखि‍ मैथि‍लीमे लेखन करबाक भागि‍रथी प्रयास कएल अछि‍। ओना तँ मैथि‍लीमे अनेकानेक साहि‍त्यकार लोकनि‍ चेष्‍टा कएल अछि‍। हुनका लोकनि‍क भाषामे फेंट-फाँट भेटल अछि‍, कि‍न्‍तु मौलाइल गाछक फूलमे सुच्‍चा लोकभाषाक प्रयोग भेटैत अछि‍। प्रांजल भाषा गमैया भाषाक आगाँ घुटना टेक दैत अछि‍, जन साधारण अल्‍पो शि‍क्षि‍तकेँ गुद-गुदीक संग वि‍षय अन्‍तस्‍थलीकेँ छुबि‍‍ लैत अछि‍। वैचारि‍क दृढ़ता एवं हार्दिक मृदुलताक अद्भुत समाहार जगदीश जीमे वि‍रल अस्‍ति‍त्‍वक परि‍चए दैछ। उपन्‍यासक प्रत्‍येक लेखपर माने उपकथापर दृष्टि‍ दै छी तँ स्‍पष्‍ट प्रतीत होइछ जे एकर लेखक जेना प्रत्‍यक्षदर्शी भऽ वि‍षयक नि‍रूपण कएल अछि‍। ओना तँ शि‍क्षाक सीढ़ीकेँ पार कऽ लेखक कलाक बलवती इच्‍छा राखि‍ मैथि‍लीक वाटि‍काकेँ पल्‍लवि‍त-पुष्‍पि‍त करक भरपूर प्रयास कएलनि‍‍ अछि‍। गाम ठामक वि‍लक्षण चि‍त्रण, हि‍नक लेखनीक वि‍शेषता, ऐ‍ पोथीमे देखल जाइछ। हि‍नका भाषानुरागीक संग मातृभाषाक सि‍नेही कही तँ सर्वथा उपयुक्‍त हएत। ऐ‍मे सामाजक आेइ‍ वर्गक समीक्षा कएल अछि‍ जकरापर आइ धरि‍ कि‍यो सोचबो ने कएने छल। माजल ठेंठ गमैआ बोलीकेँ मैथि‍लीमे समाहि‍त कएने छथि‍। हमरा तँ लगैत अछि‍ माए मैथि‍ली लेखकक माथपर चढ़ि‍ कऽ एहन चमत्‍कारी उपन्‍यास लि‍खक हेतु प्रेरि‍त कएल अछि‍। फणी‍श्वर नाथ रेणु आ यात्री जीक उपन्‍यासमे सामाजि‍क रहन-सहन, वैचारि‍क भि‍न्नता, अर्थाभावक कारणे स्‍वाभि‍मानक हनन जौं देखबामे अबैत अछि‍ तँ सम्‍प्रति‍ उपन्‍यासमे वर्णित घटना आ घटनासँ पात्रक प्रत्‍यक्ष दि‍ग्‍दर्शन अति‍ मार्मिक अन्‍तरमनकेँ सोचबा लेल उत्‍प्रेरि‍त करैछ। मधुबनी जि‍लाक बेरमा गाममे जन्‍म नेनि‍हार लेखक एतेक सुन्‍दर, सुबोध आ सुगम्‍य ढंगसँ वि‍षएकेँ नि‍रूपि‍त कऽ पाठकक जि‍ज्ञासाकेँ अन्‍त धरि‍ बढ़बैत गेल छथि‍ जे चि‍क्कन, चोटगर आ चएन लेल बाध्‍य करैत अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍याकाशक ई ज्‍योतिर्मान नक्षत्र सदृश उद्भूत भऽ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक भंडारमे समृद्धता अनबामे योगदान कएल अछि‍। ओना तँ औपन्‍यासि‍क वि‍चारानुसार ऐ‍ उपन्‍यासमे त्रुटि‍ अछि‍। एकरा उपन्‍यास कहल जाए वा सामजि‍क नि‍बंध तइ‍ परि‍प्रेक्ष्‍यमे वि‍द्वान पाठके नि‍र्णए कऽ सकै छथि‍। मुदा हमरा तँ लेखकक ऐ‍ उपन्‍यासमे कालानुसार घटना आ पात्रक चि‍त्रणमे ताल-मेलक अभाव भेटैत अछि‍ जेना- एक ओर अनुप बोनि‍हारक बेटा बौएलाल भूख-पि‍याससँ आकुल अछि‍, इनारक पानि‍ भरबामे डोरी डोलक प्रयोजन छै तँ दोसर दि‍सि‍‍ रमाकान्‍त आ हीरालालक आधुनि‍क कालमे शराब चुस्‍की लेबाक चर्चा होइत अछि।‍ तँए उपन्‍यासक वि‍षए-वस्‍तु समए बद्ध नै‍‍ रहलासँ औपन्‍यासि‍क दोष लक्षि‍त होइत अछि‍। स्‍वीकार करए पड़ैत अछि‍ जे हि‍नक ई उपन्‍यास वि‍षय-वस्‍तुकेँ तइ‍ रूपेँ समेटने अछि‍ जेना सि‍तुआमे समुद्र समाएल हुअए। लेखक जगदीश प्रसाद मंडल जीक प्रयास आ आयास दुनू सराहनीय छन्‍हि‍। हम माँ मैथि‍लीसँ प्रार्थना करै छी जे हिनकामे स्‍फूर्ना बनल रहनि‍‍ जइ‍सँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक सम्‍वर्द्धन होइत रहए। पोथी‍क नाओं- मौलाइल गाछक फूल उपन्‍यासकार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशन- श्रृति‍ प्रकाशन, दि‍ल्‍ली पोथी-प्राप्तिक स्थान- Pallavi Distributors मोबाइल- ९५७२४५०४०५ Ward no- 6, Nirmali (Supaul) मूल्‍य- २५० टाका राजेश्वर नेपाली कवि पं. प्रतापनारायण झाकेँ छअम पुण्यतिथिपर हार्दिक श्रद्धाञ्जलि पं. प्रताप नारायण झा एकटा उच्च कोटिक साहित्यकार रहथि। मूलतः अध्यापन पेशामे जीवनक महत्वपूर्ण समए व्यतीत कए चुकल ज्योतिषीजीक नाओंसँ सुपरिचित सीता स्वयम्बर तथा सुकन्या च्यवन दूटा खण्ड काव्यक रचना संगहि अनेक कविता लिखलनि । साहित्यिक प्रतिभावान कवि प्रताप नारायण झाक कवित्वक परिचए, हुनक कर्तव्य की अछि के जनै छी? शीर्षक कवितासँ भेटैत अछि। २०५० साल जेष्ठ २८ गते जनकपुरधाममे नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठानक उपकुलपति मदनमणि दीक्षितक प्रमुख आतिथ्यमे भेल वृहत कवि सम्मेलनमे पठित कविताक संग्रह ‘लावाक धान’मे आेइ कविता संदर्भमे डाॅ. रमानन्द झा रमण नेपालमे मैथिली कविताक धारमे टिप्पणी करै छथि- महेन्द्र विद्याभूषण पं. प्रताप नारायण झाक कवितामे विचारक गम्भीरता आ आदर्शक उच्चता स्पष्टतः भाषित होइत अछि। केहन ई संसार अछि की हम जनै छी? के जनै छी? मात्र स्वार्थे एक दोसरसँ जुटल अछि, सभ जनै छी। किन्तु जैखन स्वार्थमे धक्का लगै अछि खसि पड़ै छी तथापि‍ बचबाक आगाँ बंचना करिते रहै छी । टूटि पड़ै छी लड़ि‍ उठै छी, अपन-आन की नै बुझै छी तँए कहल हम केहन ई संसार अछि से के जनै छी? कविताक अंतमे कवि लिखै छथि ः सभ देखै छी सभ करै छी बेस ततबे सभ जनै छी फलक आशा ति‍यागि‍ कए संलग्न छी से जनै छी आर की चाही तकर चिन्ता कहाँ अछि से जनै छी/ मैथिली संसार अछि कर्तव्य की अछि के जनै छी/ तँए कहल हम केहन ई संसार अछि से के जनै छी? हुनक प्रथम खण्डकाव्य लागल यज्ञ आ सीता स्वयम्बर ऐतिहासिक खण्ड काव्य अछि। सात सर्गक ऐ खण्डकाव्यक भूमिकामे त्रिभुवन विश्वविद्यालय, केन्द्रीय मैथिली विभागक तत्कालीन अध्यक्ष डाॅ. धीरेश्वर झा धीरेन्द्र लिखने छथि- ज्योतिषाचार्य पं. प्रताप नारायण झा जीक सीता स्वयम्बर खण्ड काव्यक अध्ययनक सौभाग्य हमरा प्राप्त भेल। मातृभाषा मैथिलीमे रचित ई खण्ड काव्य हुनक प्रथम रचना रहितो अपन प्रौढ़ताक कारणे अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रतीत भेल। एकरा हम नेपाल खण्डक मैथिली साहित्याकाशक एक गोट दिव्य नक्षत्र मानै छी। पण्डितजीक वर्णन तन्मयता तथा अभिव्यक्तिक प्रवाह सर्वथा श्लाघनीय अछि। प्रथम सर्गमे ओ मिथिला वर्णनमे लिखै छथि हिम पहाड़सँ दक्षिण भागक अङ्ग कलिङ्ग बंगसँ पर गंगा हरिहर क्षेत्रसँ उत्तर सदानिरा (नारायणी)सँ पूर्व सगर तँ सिमान्तर्गत क्षेत्रक अछि मिथिला नाओं परल सुुन्दर शस्य श्यामला धरा जनकर छै उत्तर नगपति छै भूधर दोसर सर्गमे राजर्षि जनकक वर्णन करैत ओ लिखै छथि- मिथिक मनोहर मिथिलामे पृथ्वी पति श्री राजर्षि जनक देश सुधारल प्रजा खुशाहल सुखमय जीवन छल सभहक त्रेतामे भेल भयंकर अतिकाल आ ओकर समाधानक हेतु यज्ञ करबाक निर्णयपर ओ लिखै छथि- अन्न पानि बिनु बांचि सकत के ऋषि मुनि श्रुति सम्मत वाणी जँ जल्दी वर्षा नै‍ होएत बांचि सकत नै‍ कि‍यो प्राणी सभासदक सम्मतिसँ पारित भेल यज्ञ होबक चाही लाङ्गल यज्ञ करथु राजा, तैखन मेटल रौदिक धाही। तेसर सर्गमे सीता स्वयंबर पूर्वक वर्णन करैत ओ लिखै छथि ः जनक अति प्रभुदित रानीक मनमे नै‍ चैन । सीता केना खुशी भय रहती तइ लेल सदिखन बेचैन ।। ओ आगू शिव धनुषक आसपास नीपल गेल संदर्भमे लिखै छथिः– एक दिन माय सुनयना कहलनि पूजा घरक ठाँव कए लेब। शिव पिनाक धयल छै तकरो आस पासमे निपिओ देब।। राजा जनक जखन पूजा लेल एला देखलनि सक भारी। आई ठाँवकेँ कएलक ऐठाँ ऐ तरहेँ अभिनव कारी।। सुुनतहि आबि सुनयना बजली देखलनि काज चमत्कारी। जे धनु टस मस होय न कनिको केना उठा सकली भारी।। कारण तरमे निपल भूमि छै ऊपरसँ शिव धनु राखल। सीता केलनि ठाँव कहल हम हुनके ऐठाँ ठावक लेल।। चारिम सर्गमे धनुष यज्ञक तैयारी आ देश देशान्तरक राजकुमार सभ आएल। लिखै छथि ः– धनुष यज्ञक हेतु जिनका जाहि‍ काजक भार छल। काज झन पट पूर्ण करबा लय सदा तैयार छल।। आेहि‍ मे स्वागत सत्कारक क्रममे आगू लिखै छथि ः– चहुदिस सँ लोक सब आ राज रजवारक कुंमर। अपन अपना ढंग के रथ तुरग गज बाहन सुधर।। आबि रहला आबि गेल छथि वैसला स्वविवेकसँ। जनक सबठाम स्वागतारथ सेवको एक एकसँ।। कथुक किनको त्रुटि नै‍ हो वस्तु नै छल कहथि केओ। सब सतत् तैयार रहि घुमितो रहथु कि‍यो कतौ कि‍यो।। पाँचम सर्गमे धनुष भंगक प्रसंग लिखै छथिः– परशुराम आ लखन मे किछु काल अटपट भय रहल। तखन श्री रघुवंशमणि मुनि रुप देखैतई कहल।। वीर हीना हो न बसुधा सत्य शिव सुन्दर सबला। गुरुक आज्ञा पावि शिव धनु सहज भावे कर गहल। भूमिसँ ऊपर उठवितँह टूटि कय धनु खसि परल ।। ओ आगू स्वयम्बरक क्रम मे लिखै छथि ः– तेहि समय सीता माला लय सखि संग ऐली झट तहाँ। श्री धनुषधारी नृपति मणि श्री राम ठाढ़ छथि जहाँ।। फूल वर्षा भेल नभएँ मांगलिक बाजा बजल। दिग दिगन्तो धरि प्रवल जयकार ध्वनि गुन्जिते रहला।। छअम सर्ग मे राम सीताक बि‍आहक प्रसंग लिखै छथि ः– हर्षमय वातावरण तेहि काल सँ सबठाँ रहला जनक विश्वमित्र सँ शुभ लग्न हेतुक जा पुछला ।। गाधि सुत तेहि काल से राजा जनक सँ कहि देला। अवधपति के नौत पोताक लि‍खि‍ दिअनु वरियात ला।। मास अगहन पंचमी तिथि शुक्ल पक्षक नीक छै। अवधपति के चारु पुत कें परिणयन होयवाक छै। ओ सर्गक अंत मे तैयारीक संदर्भमे लिखै छथिः– अपन काजक सब रखने छलै अपने ऊपर। देल काजक भार कब कत्त पूर्ण होवय बिना डर ।। ऐ प्रकारे जनकपुर नगरक सजायल वेश छल । प्रजा राजा सब जुटल सुरनर नाओं किन्नर यक्ष सब। मैथिलीक परिणयन बूझि‍ प्राकृतिक सौन्दर्यो कहबा।। अंतिम सातम सर्गमे कन्या दलक संदर्भमे लिखै छथिः– गुरु बशिष्ठक कथन अनुकूले सकल पूर्वाङ्ग सब। सतानन्द पुरोहितक आसन पकड़ि विधि करथि सब।। कोनो वस्तुक कमी ककरो मैथिलीक दिसि‍सँ ने भेल । समए जखनुक छलै तैखन सिन्दुरक शुभदान भेला गगन सँ सुरवालिका सभ पुष्प वर्षा कय रहला मांगलिक सुरतान लय सँ गीत मंगल गा रहला।। ऐ तरहे सात सर्गक सीता स्वयम्बर खण्ड काव्य कविक मौलिक कृति छन्हि। २०५२ सालमे कवि द्वारा प्रकाशित ऐ‍ खण्ड काव्यक लगले २०५३ साल वैशाखमे हुनकर सुकन्या च्यवन, दोसर खण्ड काव्य प्रकाशित भेल। सात सर्गक ईहो खण्ड काव्य बहुत सुन्दर अछि। महोत्तरी जिलाक सकरी ग्राममे १९८० साल मार्ग शुक्ल दशमी १८ गते हुनक जन्म भेलनि आ ज्योतिष गणिताचार्य एवं फलित शास्त्री ज्योतिषी जी २००७ सालमे प्रजातन्त्रसँ पूर्वहि सप्तरीक एकटा संस्कृत विद्यालयक शिक्षकक रुपमे अध्यापन सेवा आरंभ कएलनि आ मटिहानीक श्रीराम मा. वि.क प्रधानाध्यापक पदसँ २०४३ सालमे सेवा निवृत भेल रहथि आ ओकर बाद २०६० साल पुस १५ गते निधन पर्यन्त जनकपुरधाममे विश्वकर्मा चौकसँ दक्षिणमे अपन छोट-छिन घरमे रहैत ज्योतिष कार्य तथा साहित्य साधनामे लागल रहलथि। अपन छत्तीस वर्षक अध्यापन सेवामे रहैत ओ २०२३ सालमे जनसेवा पदक २०२५ मे महेन्द्र विद्याभूषण, २०३६ क शिक्षा दिवसपर पुरस्कृत भेल रहथि आ २०३७मे दीर्घ सेवा पदक भेटलनि। २०३७ सँ २०४० धरि जिला शिक्षा समितिक सदस्य रहथि। पंडितजी मातृभाषा मैथिलीक संगहि हिन्दीमे दर्जनो भजन आ कविता लिखने छथि। हुनकर छअम पुण्य तिथिक अवसरपर हुनक स्वर्गीय आत्माकेँ चिरशान्ति हेतु हार्दिक श्रद्धाञ्जलि अर्पण करै छियन्हि। बसंत झा उगना महाकवि विद्यापतिक जन्म बिस्फी गाममे भेलनि‍। ओ मैथिलीक बहुत पैघ कवि‍ भेला जिनका कवि‍ कोकिलक उपाधि देल गेलनि‍। ओ महादेवक बहुत पैघ भक्त सेहो छला। कवि‍ विद्यापतिक रचना एतेक प्रभावी होइत छलनि‍ जे जखन ओ अपन रचनाकेँ गबैत छला तँ कैलाशपर बैसल भगवान महादेव प्रसन्न भऽ जाइ छला आ हरदम हुनक रचना सुनबाक इच्छा राखैत छला, ई इच्छा एतेक बढ़ि गेलनि जे ओ एक दिन माता पार्वतीकेँ कहलखिन- "हे देवी सुनु, हम मृत्युलोक जा रहल छी, कवि‍ विद्यापतिक रचना हमरा बहुत नीक लगैत अछि आ हमर मोन भऽ रहल अछि जे हम हुनका संगे रहि‍ कऽ हुनक रचना सुनी, तँ अहाँ अहीठाम कैलाशमे रहू आ हम जा रहल छी मृत्युलोक" आ रचना सुनबाक लेल धरतीपर आबि गेला, आ विद्यापतिक ओतए नौकर बनि‍ कऽ उगनाक नाओंसँ काज करए लागला। ओ विद्यापतिक चाकरीमे लागि‍ गेला। ओ हुनकर सभ काज करथिन, हुनका पूजाक लेल फूल आ बेलपत्र तोड़ि‍ कऽ आनथि‍, बड़दकेँ चराबथि।‍ सभ चाकरी करैत रातिमे सुतबा कालमे हुनकर पएर सेहो दबबथि‍ (धन्य ओ विद्यापति जिनक पएर देवक देव महादेव दबबथि‍)। ऐ प्रकारे जखन बहुत दि‍न बीत गेल, ओम्हर माता पार्वती बहुत चिंतित भऽ गेली। हुनका लगलनि‍ जे आब महादेव मृत्यु लोकसँ आपस नै एताह। ओ हुनका आपस अनबाक प्रयासमे लागि‍ गेली। ओ क्रोधकेँ आदेश देलखिन जे अहाँ जाउ आ विद्यापतिक पत्नीमे प्रवेश कऽ जाउ, जइसँ उगना द्वारा कोनो गलत काज भेलापर विद्यापतिक पत्नी हुनका मारि कऽ भगा देती, लेकिन माता पार्वतीक ई प्रयास सफल नै भेलनि।‍ तखन ओ दोसर प्रयास केलीह। विद्यापतिक जखन एकटा जंगलक रस्तासँ उगना संगे राजाक ओतए जा रहल छलाह, जलक कोनो आस नै छलै, ओइ बिचमे कवि‍ विद्यापति पियाससँ तड़पए लागला "रे उगना जल्दीसँ  पाइन ला रउ, नै तँ हम मरि जेबउ। बड़ जोरसँ प्यास लागि गेलौ।" कहैत जमीनपर ओङ्घराए लगला। आब उगना की करता ओ परेशान भऽ गेला। एम्हर उम्हर पानि‍क तलाशमे भटकए लगला। हुनका पानि‍ नै भेटलनि‍, तखन ओ एकटा गाछक पाछूमे नुका गेला आ अपन असली रूप धारण कऽ अपन जटासँ गंगाजल निकालि विद्यापतिकेँ जल देलखिन। विद्यापति जल पिबिते देरी चौंक गेला, उगनासँ पूछए लगला "रे उगना ई तँ गंगाजल छउ, बता एतऽ गंगाजल कतऽ सँ अनलेँ।" आब उगना की करता, ओ कतबो बहाना बनेला लेकिन हुनकर एको नै चलल। ओ की करता, हुनका विवश भऽ अपन रूप देखाबए पड़लनि‍। विद्यापति महादेवक असली रूपक दर्शन करिते देरी चकित रहि‍ गेला आ हुनक चरणपर खसि कऽ हुनकासँ क्षमा माँगए लगला, "प्रभु हमरा क्षमा करू। हम अहाँकेँ चिन्ह नै सकलौं। हमरासँ बहुत पैघ अपराध भऽ गेल।" तखन हुनका उठाबैत महादेव कहलखिन- "हम अहाँ संगे अखन आरो रहब, लेकिन हमर एकटा शर्त अछि जे अहाँ ई बात केकरोसँ नै कहबै। जखने अहाँ ई बात केकरो लग बाजब ओही क्षण हम अहाँ लगसँ चलि जाएब।" एक दिन उगनाकेँ बेलपत्र लबैमे कनेक देरी भऽ गेलनि तइपर विद्यापतिक पत्नी एतेक क्रोधित भऽ गेली कि ओ चुल्हामे जड़ैत एकटा लकड़ी निकालि‍ कऽ हुनका मारबाक लेल उठेलखि‍न, "सरधुआ, आइ तोरा नै छोड़बौ। तँू बड़ शैतान भऽ गेलऽहेँ। हमर बच्चा सभ भूखसँ बिलखि‍ रहल अछि आ तँू एतेक देरीसँ बेलपत्र लऽ कऽ एलँहेँ।" कहैत हुनका दिसि‍ बढ़लखिन, तखन विद्यापतिसँ देखल नै गेलनि, ओ बजला "हे हे ई की करै छी, ई तँ साक्षात महादेव छथि।" एतबे कहिते महादेव विलीन भऽ गेलखिन, फेर विद्यापति हुनका जंगले जंगले ताकए लगला आ "उगना रे मोर कतऽ गेला" गबैत रहला। लेकिन उगना फेर हुनका नै भेटलखिन, आ ओ अपन प्राण तियागि‍ देलखिन। ओ स्थान जइठाम देवक देव महादेव कवि-कोकिल विद्यापतिकेँ अपन असली रूपक दर्शन देने छलखिन ओइठाम "बाबा उगना"क मंदिर छनि। ओइमे शिवलिंग जे छै से अंकुरित छै, जेकर कहानी किछु एहन, छै जे एक बेर गामक एक बुजुर्ग ब्यक्तिकेँ महादेव सपना देलखिन जे "हम एकटा गाछक जड़ि‍मे छी" आ ओतै बहुत पैघ जंगल छलै। तखन गामक लोक सभ तैयार भऽ कऽ ओइठाम गेला आ पहुँचि‍ कऽ जखन खुदाइ केला तँ देखलखिन जे एकटा बहुत सुन्दर शिवलिंग छै। सभ गोटे बहुत खुश भेला आ विचार भेलै जे हिनका बस्तीपर लऽ चलू। ओइठाम मंदिर बना कऽ हिनक स्थापना करब। हुनका उठेबाक लेल जखने हाथ लगेलखिन आकि‍ ओ फेरसँ जमीनक भीतर चलि‍ गेला। तखन सभ गोटेकेँ बुझबामे एलनि‍ जे ई ऐठाम रहता आ ऐठामसँ नै जेता, तखन ओइठाम साफ सफाए कएल गेल आ तत्काल मंडप बनाएल गेल। बादमे मंदिरक निर्माण शुरु भेल जे १९३२मे जा कऽ तैयार भेल आ ऐ मंदिरक परिसरमे ओ स्थान सेहो अछि जइठाम महादेव अपना जटासँ गंगाजल निकालने छला आ आइ ओ इनारक रूपमे अछि जेकरा "चन्‍द्रकुप"क नाआंेसँ जानल जाइ छै आ अखनो ओकर जल शुद्ध गंगाजल छै, जे लैब टेस्टेड छै! ई स्थान मधुबनी जिलाक भवानीपुर गाममे स्थित अछि। "जय बाबा उग्रनाथ" हमर ई सौभाग्य अछि कि‍ हमर जन्म अही गाममे भेल अछि आ हमर बचपन ऐ स्थानपर बीतल अछि। (लोककथापर आधारित।) जीवकान्त जगदीश प्रसाद मंडलक ‘जिनगीक जीत’ उपन्‍यासपर उपन्‍यासकार जगदीश प्रसाद मंडल। हि‍नक दोसर उपन्‍यास देखल- ‘जि‍नगीक जीत’। हि‍नकर अन्‍य उपन्‍यास अछि‍- ‘मौलाइल गाछक फूल, जीवन-संघर्ष, जीवन-मरण, उत्‍थान-पतन‍। हि‍नकर नाओंपर कथा संग्रह आ नाटक सेहो अंकि‍त अछि‍। ऐ‍‍ उपन्‍यासमे कि‍छु नव अछि‍। मि‍थि‍लाक खेती-प्रधान गामक जीवन आएल अछि‍। मैथि‍लीमे ऐ‍‍ लेल आर नव सुखद अनुभूति‍ अछि‍ जे एकर लेखक खेति‍हर समुदायक बहुसंख्यक समाजसँ आएल छथि‍। गामक लोकक भाषा अनने छथि‍। सवर्ण जाति‍क लेखक जखन गामक अशि‍क्षि‍त आ दलि‍त लोकक भाषा साहि‍त्‍यमे टि‍पैत अछि‍, आ जे कदाचि‍त होइत आएल अछि‍, से बनौआ आ कृत्रि‍म जकाँ लगैत अछि‍। लेखक जे भाषा लि‍खलनि‍ अछि‍, से देशज मैथि‍ली थि‍क। मैथि‍लीमे उर्वरा शक्‍ति‍ असीम आ कल्‍पनातीत अछि‍, से जगदीश जीक भाषा देखि‍-पढ़ि‍ कए बुझल जा सकैत अछि‍। नव अछि‍ जे एकर सभ पात्र खेतीसँ जुड़ल अछि‍। ऐ‍‍मे कतौ बनि‍याँ-बेकाल, सूदखोर महाजन, शोषक सवर्ण भूस्‍वामी, पाकेटमार, डाकू, लम्‍पट आ खुनि‍याँ नै‍‍ आएल अछि‍। खेतीमे जते समस्‍या छै, जते गरीबी आ अभाव भऽ सकैत अछि‍, जते अकर्मण्‍यता आ आलस भऽ सकै छै, से सभ वि‍स्‍तारसँ आएल अछि‍। लेखकक दृष्‍टि‍कोण नव अछि‍। ओ कहैत अछि‍ जे गामक उन्नति‍ गामक लोकेक हाथमे छै। ओ कहैत अछि‍, गामसँ पड़ाइन आ वि‍स्‍थापनकेँ रोकबाक चाही। गामक धनि‍क आ गरीब मेल-पाँच कए कऽ खेतीमे पूँजी लगाबए, पूँजी जुटबए लेल गामेमे संभावना ताकए आ तकर दोहन करए। शि‍क्षा पएबा लेल एक दोसरक मदति‍ करए, बि‍लटलक मदति‍ कऽ ओकरा समर्थ आ सम्‍पन्न बनाबए। लेखक बैंकक कर्जा लऽ वि‍कास करबाक बात नै‍‍ करैत अछि‍। ओ ब्‍लॉक आफि‍सक प्रखण्‍ड वि‍कास पदाधि‍कारीक आ ओकर अमलाक चर्चा नै‍‍ करैत अछि‍। स्‍वयंसेवी आ स्‍वयं सहायता समूहक चर्चा नै‍‍ करैत अछि‍। देशक पंचवर्षीय योजना आ नहर योजनाक प्रादुर्भाव आ अभावक बात नै‍‍ करैत अछि‍। नव अछि‍ जे ओ मनुक्‍खक जि‍नगीकेँ अनमोल मानैत अछि‍। ओकरा बचएबा लेल ओ सार्थक सहयोगक कथा कहैत अछि‍। मनुक्‍खक गरि‍मामे ओकर वि‍श्वास छै। ऐ‍‍ गरि‍माकेँ स्‍थापि‍त कएल जा सकैत अछि‍, से बात ओ ऐ‍‍ कथानककेँ लि‍ख कऽ देखा देलक अछि‍। एकटा महात्‍माक उक्‍ति‍ कि‍यो उद्धृत कएने छथि‍- दू प्रकारक लोकक गरामे पाथर बान्‍हि‍ कए पानि‍मे डुबेबाक थि‍क, एक तँ आेइ‍ धनि‍ककेँ जे धन अछैत दान नै‍‍ करैत अछि‍, आ दोसर आेइ‍ गरीबकेँ जे हाथ-पएर अछैत परि‍श्रम नै‍‍ करैत अछि। “जि‍नगीक जीत‍”मे एहेन धनि‍क अछि‍ जे सामाजि‍क काज लेल दान करैत अछि‍। एकर उदाहरण थि‍क बचेलाल आ ओकर माए सुमि‍त्रा। गरीबक एक एहेन उदाहरण थि‍क अच्‍छेलाल। दोसर उदाहरण थि‍क देवन आ बुधनी। लेखक जगदीशजीक उपन्‍यास मनुक्‍खक आदर आ गरि‍माक बात करैए। सभ ठाम वि‍भि‍न्न पात्र सभ एक दोसराक सम्‍मान करैए। वि‍वेकानन्‍दक भाषण सभ मोन पड़ैए, ओ बात-बातमे पराधीन भारतक हि‍न्‍दू सभकेँ धि‍क्कार करैत छलाह। जे सक्षम छल तकर कर्तव्‍य छलै जे अन्नहीनकेँ अन्न दि‍अए, वि‍द्याहीनकेँ वि‍द्या दि‍अए। जे एहेन नै‍‍ करैत छल, से मनुक्‍ख नै‍‍ छल। वि‍देशमे ओ कहि‍ अबैत छलाह जे वेदमे अद्वैतवाद छै, सभ मनुक्‍खकेँ एक समान मानैत अछि‍ हि‍न्‍दू। देशमे आबि‍ आर्थिक-सामाजि‍क वि‍षमता देखि‍ दुखी भऽ कहैत छलाह जे दीन-हीन-अज्ञानीकेँ समानता देबा लेल ति‍याग आ श्रम करू। लेखक जगदीशजी स्‍वामी वि‍वेकानन्‍दक भाषा बजै छथि‍। पहि‍ल उपन्‍यास ‘मौलाइल गाछक फूल’मे रमाकान्‍तक चरि‍त्र-चि‍त्रण कएलनि‍ अछि‍। रमाकान्‍त मद्रासमे, बेटा सबहक मत बुझलाक बाद अपन जमीन-जाल भूमि‍हीन सभमे बँटबाक नि‍र्णए लैत छथि‍, तइ‍ठाम वेदान्‍तक अद्वैतवादक चर्चा लेखक कएने छथि‍। पोथीक अंति‍म आवरणपर लेखकक परि‍चएमे कहल गेल अछि‍- ‘मार्क्‍सवादक गहन अध्‍ययन। हि‍नकर कथामे गामक लोकक जि‍जीवि‍षाक वर्णन आ नव दृष्‍टि‍कोण दृष्‍टगोचर होइत अछि‍।’ ई रचनाकार पूरा उपन्‍यासमे मार्क्‍सवादी शब्‍दावली नै‍‍ अनैत छथि‍। अनेक ठाम मार्क्‍सवादक मूल धारणा सभकेँ स्‍थान देने छथि‍। बहुत चतुर चालाक छथि‍। कतौ कहताह, धर्म आ भाग्‍यकेँ मानब नि‍रर्थक थि‍क, कतौ कोनो समाजवादीक सम्‍वादमे कहबा दै छथि‍ जे उत्‍पादनक सभ स्रोतपर व्‍यक्‍ति‍क एकाधि‍कार नै‍‍ रहए देबाक थि‍क, आेइ‍पर मानव-समाजक अधि‍कार देब न्‍याय-संगत थि‍क। सामान्‍यत: उत्‍पादनक स्रोत तीनटा थि‍क- जमीन (खेती), कारखाना आ खान। समाज बदलबा लेल ओ अनेक ठाम कहै छथि‍- मनुक्‍खकेँ मनुक्‍खक आदर करबाक चाही। ऐ‍‍ लेल व्‍यक्‍ति‍केँ सभसँ पहि‍ने अपनाकेँ मनुक्‍ख बनएबाक चाही। उपन्‍यासमे आदर्श अछि‍, गरीबक गरीबी दूर करबा लेल संगठि‍त आ योजना बद्ध रूपेँ प्रयास हेबाक चाही। समाज बदलि‍ सकैत अछि‍। से ओ कि‍छु परि‍वारक उदाहरण लए कऽ देखा देलनि‍ अछि‍। आजुक गाममे एहेन प्रयास छि‍टफुट होइत रहैत अछि‍। मुदा गामक यथार्थ रूप भि‍न्न अछि‍। बैमानी-शैतानी अछि‍। गरीबक शोषण अछि‍। कमजोरक दमन अछि‍। धोखा, फरेब अछि‍। लगानी-भि‍रानी अछि‍। चक्रवृद्धि‍ ब्याजक ताण्‍डव नृत्‍य भऽ रहल अछि‍। कथानकक अन्‍तमे लेखक देवनक संग महंथान सभ दिसि‍ जाइत अछि‍। सुख आ समृद्धि‍क टापूपर ई मठ-मठाधीश अछि‍। महंथ सभ भोग-वि‍लासमे डूमल अछि‍। महंथानमे शान्तीसँ भेँट होइत अछि‍। ओ महंथानमे भाेग वि‍लास लेल अछि‍। ओकर नाटकीय ढंगसँ अपहरण भेल छै। बन्‍द कए राखल आ पोसल जाइ छै। ओ अभि‍शप्‍त अछि‍, काम-क्षुधा शान्‍ति‍ लेल एक तुच्‍छ साधन भेल अछि‍। धर्मक वि‍रूद्ध बजलाह बुद्ध। हुनको नाओंपर मठ-महंथ अछि‍। कबीर बजलाह। हुनको नाओंपर संगठि‍त गुरु साहेबक परम्‍परा अछि‍। मार्क्‍स वर्गहीन, शोषणहीन समाज बनाएब लक्ष्‍य रखलनि‍। हुनको नाओंपर अनेक मस्‍तान मस्‍त भेल अछि‍। प्रजातंत्रमे हर राजनीति‍क दल जनताक सुख-सुवि‍धा लेल राजगद्दी मंगैत अछि‍। नेता सबहक रूपमे महंथ सभ अपन भोग-रागक बेवस्‍था करैत अछि‍। कदाचि‍त उपन्‍यासमे वर्णित महंथान प्रत्‍येक वि‍चार-धाराक जन-वि‍रोधी भऽ जएबाक आ होइत जएबाक संकेत कऽ दैत अछि‍। मनुक्‍ख बहुत पाखण्‍डी आ अनुदार होइत अछि‍। अन्‍तमे देवन आ शान्‍ती मुक्‍ति लेल, मानव-जाति‍क मुक्‍ति‍ लेल संघर्षक बात करैत अछि‍, जीतक भावनासँ डेग उठबैत अछि‍। उपन्‍यासक अन्‍ति‍म पाँति‍ सभ ऐ‍‍ प्रकारक संकल्‍प अंकि‍त करैत अछि‍- “तँए जरूरी अछि‍ जे सभसँ पहि‍ने अपने उठि‍ कऽ मनुक्‍खक रास्‍तापर ठाढ़ होइ। जखन मनुक्‍खक रास्‍तापर ठाढ़ भऽ चलए लागब तखन जे गिरल मनुक्‍ख अछि‍ ओकरा उठबैक कोशि‍श करैक चाही। उठबैक दुनू उपाय अछि‍। ककरो बाँहि‍ पकड़ि‍ खि‍ंचैक अछि‍, ककरो पाछूसँ धक्का दऽ धकेलैक अछि‍।‍” यएह जि‍नगीक जीत थि‍क....। जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्‍यास “मौलाइल गाछक फूल” जगदीश प्रसाद मण्‍डलक पोथी ‍“मौलाइल गाछक फूल‍‍” पढ़ि‍ गेलौं। एकटा नव लेखक। एकटा नव भाव-भूमि‍। उपन्‍यास थि‍क। प्रमुख बात थि‍क गामक गरीबी, अशि‍क्षा आ खेतक वि‍षम वि‍तरण। आरंभसँ अन्‍त धरि‍ समाजवादक धारणा गनगनाइत अछि‍। तँए पात्र सभ गौण भ‍ऽ जाइत अछि‍। पात्र सभ गरीबी लए क‍ऽ उपस्‍थि‍त होइत अछि‍, अपन दीनता, अपन संघर्ष अपन वि‍जय अभि‍यानक दि‍शा देखबैत अस्‍त भ‍ऽ जाइत अछि‍। गाम बदलतैक जखन बोनि‍हारकेँ भू-स्‍वामी बना देल जएतै, शि‍क्षा लेल स्‍कूल फुजतै, दवाइ लेल डाक्‍टर आ दवाइ सुलभ हेतै। से सभ ऐ‍ “‍मौलाइल गाछ‍” (मि‍थि‍ला आ भारतक अवि‍कसि‍त आ कृषि‍-प्रधान गाम) मे भ‍ऽ जाइ छै। भूमि‍क वि‍तरण भ‍ऽ जाइ छै। स्‍कूल फुजै छै। दूटा कि‍शोर-कि‍शोरी मद्रास जा कऽ चि‍कि‍त्‍साक आरंभि‍क ज्ञान लऽ गाम आबि‍ जाइ छै। गाममे परिवर्तन होइ छै। गामक सवर्ण भू-स्‍वामी डोमक नोत मानि‍ सोत्‍साह भोजमे सम्‍मि‍लि‍त हाेइत अछि‍। बोनि‍हारक बेटा गामक पैघ जोतदार (आब भूत पूर्व) लेल जर्मनीमे बनल रेडि‍यो उपहार देबा लेल अनैत अछि‍। नव जागरण छै। नया समाजवाद छै। कतौ मारि‍-मोकदमा नै‍‍। कतौ भोट-भाँट नै‍‍। सभ वस्‍तु आरामसँ स्‍वत: होइत गेल अछि‍। एकठाम लाठी चललैक अछि‍। ि‍सति‍या आ ललबाबला प्रसंगमे। दू वर्गक लोक अछि‍। दुनूक वर्ग चरि‍त्र झलकै छै। पोथीमे उल्‍का जकाँ ई घटना अबैत अछि‍ आ मि‍झाइत अछि‍। वर्ग घृणा एकठाम छै। सुबुध मास्‍टर नोकरी छोड़बा लेल त्‍यागपत्र फेक‍ अबैत अछि‍। ओकर स्‍त्री घौना करैत अछि‍। घसवहि‍नी सभ आेकर दुख ओकर जीवन-शैलीक चर्चा कए अपन घृणा प्रकट करैत अछि‍। गाममे एहेन परि‍वर्तन हेबाक चाही, से बात उपन्‍यासकार कहै छथि‍। कथानकमे कोनो पार्टीक उपस्‍थि‍ति‍ नै‍‍ छै। मुदा पार्टीक एजेण्‍डा जकाँ सभ काज भऽ जाइ छै। गाममे एन.जी.ओ. नै‍‍ छै, मुदा एन.जी.ओ.क उपस्‍थि‍ति‍ अभड़ैत छै। मार्क्‍स, गाँधी, लोहि‍या, वि‍नोबा इत्‍यादि‍क आहट सुनाइ छै। एहेन परि‍वर्तन हएब तत्‍काल संभव नै‍‍ छै। शि‍क्षा प्रचारसँ आ समाजसेवी सबहक सेवा आ श्रमसँ एना भऽ जाए तँ आश्चर्यक बात नै‍‍। रमाकान्‍त जखन मद्राससँ घुरैत छथि‍, तखनसँ अन्‍त धरि‍ उपन्‍यास शि‍थि‍ल भऽ जाइत अछि‍। तकर बाद सभ घटनाक अन्‍दाज पाठककेँ भऽ जाइ छै। उपन्‍यासमे अन्‍त-अन्‍त धरि‍ मोड़ अएबाक चाही, घटना सभमे आकस्‍मि‍कता हेबाक चाही, से नै‍‍ छै। पोथीक भाषा खाँटी लो‍कक भाषा थि‍क, कि‍ताबी भाषा नै‍‍ थि‍क। सेहो एकरा वि‍शि‍ष्‍ट आ महत्‍वपूर्ण बनबै छै। साहि‍त्‍यमे एहेन घर-आंगनक पात्र नै‍‍ आएल छल, से सभ प्रवेश कएलक अछि‍। भारतमे गरीबी वि‍शाल अछि‍। एकर नि‍यति‍ बदलतै, मंद गति‍सँ बदलतै। एकर उनटा ऐ‍मे अछि‍। पोथी पढ़ि‍ गेलौं। से एकर सफलताक सूचक थि‍क। धीरेन्‍द्र कुमार प्री‍ति‍ ठाकुरक गोनू झा आन मैथि‍ली ि‍चत्रकथा आ मैथि‍ली चित्रकथा मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे पहि‍ल बेर श्रुति‍ प्रकाशन, नई दि‍ल्‍लीसँ प्रकाशि‍त ि‍चत्रकथा उमेश जीक माध्‍यमसँ भेटल। साहि‍त्‍य पूर्ण तखने होइत अछि‍ जखन साहि‍त्‍य सभ वि‍धामे लि‍खल जाए आ रचना प्रौढ़ हुअए। हमर दृष्‍टि‍मे चि‍त्रकथामे प्रीति‍ ठाकुरक रचना गोनू झा आन मैथि‍ली ि‍चत्रकथा आ मैथि‍ली चित्रकथा सफल रचना थि‍क। लेखि‍का धन्‍यवादक पात्र छथि‍, ऐ‍ कारणे जे मैथि‍ली दिस‍ हुनक दृष्‍टि‍ गेलनि‍। दोसर कारण ई जे मैथि‍लीक वि‍रासतमे जे कथा लोकमुखमे सुरक्षि‍त अछि‍ तकरा ओ लेखनी‍क रूप प्रदान कऽ मैथि‍लीक चि‍त्रकथा वि‍धा, जकर ओ प्रारम्भ केलनि अछि, तइ‍केँ समृद्ध करक प्रयास केलनि‍ अछि‍। ‘गोनू झा आ आन मैथि‍ली चि‍त्रकथा’ मे प्रकाशि‍त अछि‍ गोनू झा आ माँ दुर्गा, गोनू आ स्‍वर्ग, गोनू आ स्‍वर्ण चोर, गोनू झा आ बि‍लाड़ि‍, गोनू झाक दूटा बड़द, गोनू झाक महीस, गोनू झाक अशर्फी, गोनू झा आ कर अधि‍कारीक दाढ़ी, गोनू झाक माए, रेशमा चूहड़मल, नैका बनि‍जारा, भगता ज्‍योति‍ पजि‍यार, महुआ घटवारि‍न, राजा सलहेस, छेछन महराज, राजा सलहेस आ कालि‍दास। मैथि‍ली चि‍त्रकथामे मोती दाइ, राजा सजहेस, बोधि‍-कायस्‍थ, बहुरा गोढ़ि‍न नटुआ दयाल, अमता घरेन, दीना भदरी, जालि‍म सि‍ंह, नैका बनि‍जारा, रघुनी मरड़, वि‍द्यापति‍क आयु अवसान। सभटा कथा मि‍थि‍लाक धरतीसँ सम्‍बद्ध अछि‍ आ अखन धरि‍ लोक मुखमे सुरक्षि‍त अछि‍। समैक परि‍वर्तन संगे लोक रूचि‍ आ लोक संस्‍कारमे परि‍वर्त्तन सेहो होइत अछि‍। अपन देशक गप्‍प लिअ। आइ पोथीमे सुरक्षि‍त अछि‍ आयुर्वेद वि‍द्या, यूनानी वि‍द्या, होमयोपैथी आ कतेक रास ज्ञानसँ समर्पित वि‍द्या। जँ पोथीमे सुरक्षि‍त नै‍‍ रहत तखन अगि‍ला पीढ़ी ऐ‍ वि‍द्यासँ अनभि‍ज्ञ रहि‍ जाएत। तँए हमर मि‍थि‍लामे जे कथा पसरल अछि‍ ओकरा पोथी स्‍वरूपमे प्रदान कऽ प्रीति‍जी प्रशंसनीय काज केलनि‍ अछि‍। वीरबलक कथा भऽ सकै छल जे लोक बि‍सरि‍ जाइत मुदा पोथी स्‍वरूपमे रहलासँ आइ धरि‍ ओ लोक-मानसक रंजनक माध्‍यम बनल अछि‍। चि‍त्रकथाक अपन महत्‍व होइत अछि‍। बाह्य-संप्रेषणसँ जे प्रभाव वंचि‍त रहि‍ जाइत अछि‍ ओ संप्रेषि‍त होइत अछि‍ चि‍त्रसँ। नाटकमे अभि‍नयसँ जे संप्रेषि‍त नै‍‍ होइत अछि‍ ओ संप्रेषि‍त अछि‍ रंग, ध्‍वनि‍ आ प्रकाशसँ तहि‍ना चि‍त्रकथामे सेहो होइत अछि‍। बाल साहि‍त्‍य लेल ई काज प्रीति‍ जीक सराहनीय छन्‍हि‍। चारि‍ बर्खक नेना जेकरा अक्षर बोध नहि‍यो छै, सेहो कथाकेँ परेख सकैए, चि‍त्रक माध्‍यमसँ। बाल साहि‍त्‍यक जे अभाव अपना मैथि‍लीमे अछि‍ तइ‍पर बड़का-बड़का वि‍द्वानक अछैत थोड़ेकबो धि‍यान नै‍‍ देल गेल छल आ खास कऽ ऐ‍ तरहक। पोथी आकर्षक, रूचि‍कर आ बालमनकेँ प्रभावि‍त करैत अछि‍। ऐ‍ लेल हम एक बेर फेर श्रीमती प्रीति‍ ठाकुरकेँ धन्‍यवाद दैत छि‍यनि‍। संगे आशा करब जे आगाँ सेहो ऐ‍ तरहक काज करथि‍। जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्‍यास- “‍मौलाइल गाछक फूल” मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे यथेष्‍ट सामग्री लऽ प्रवेश केनि‍हार उपन्‍यासकार/ कथाकारमे यशस्‍वी एक लेखक छथि श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल‍। २००२मे प्रवेश केनि‍हार मंडलजीक सामग्री सभकेँ आश्चर्यचकि‍त कऽ दैत अछि‍। एहन लगैत अछि‍ जे जीवनक चि‍ंतन, समाजक चि‍ंतन आ आस-पासक होइत घटनाक्रमपर सृजन-दृष्‍टि‍ हि‍नकर पहि‍नेसँ कार्यरत रहनि‍ आ शब्‍दबद्ध करैत रहलाह आ अनुकूल समए भेटैत अंकुरि‍त भेलाह आ शीघ्रे एकटा गाछक पैघ स्‍वरूप धऽ लेलनि‍। प्रस्‍तुत कृति‍ ग्राम्‍य-परि‍वेशक सशक्‍त अभि‍व्‍यक्‍ति‍मे सफल अछि‍। ग्राम्‍य-जीवनक चि‍त्रणक कमी नै अछि‍ मुदा हि‍नकर चि‍त्रण आर सभसँ अलग अछि‍। गामक छोट-छी‍न मुद्दाकेँ पकड़ैमे यथास्‍थान प्रस्‍तुति‍करण करैमे, चि‍त्रणक सघनतामे मंडलजी सि‍द्धहस्‍त छथि‍। मंडलजी हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यसँ एम.ए. केने छथि‍। हि‍नका हि‍ंदी साहि‍त्‍यक कतेको उपन्‍यास-कथा पढ़बाक अवसर भेटल हेतनि‍। हि‍नक “मौलाइल गाछक फूल” उपन्‍यास पढ़लापर स्‍पष्‍ट प्रतीत होइत अछि‍ जे ओ प्रेमचन्‍दसँ बेसी प्रभावि‍त छथि‍। गाम-घरमे रहि‍ कऽ अनुखन समाजक कल्‍याणक भावना हि‍नकामे छन्‍हि। जइ कारणें रमाकांत उदारवादी पात्रक रूपमे प्रति‍ष्‍ठि‍त छथि‍। व्‍यक्‍ति‍गत रूपसँ परि‍पूर्ण छथि‍। कि‍यो एकटा परि‍वारक पात्र एहन नै‍‍ अछि‍ जे आदर्शवादी रमाकांतक बेवहारक वि‍रोध केने होथि‍। गाम-घरसँ पढ़ि‍-लि‍ख शहरमे नीक पदपर स्‍थापि‍त भऽ बेटा-कनि‍याँ गामक संस्‍कारसँ परि‍पूर्ण अछि‍। आजुक व्‍यस्‍तता, पाइक महत्ता आ छद्म-मुखौटाधारी एकोटा पात्र रमाकांतक परि‍वारमे नै भेटत। उपन्‍यासकारक वि‍चार-दृष्‍टि‍ समाजमे मूल्‍य स्‍थापि‍त करब अछि‍ तँए ओइ दृष्‍टि‍सँ उपन्‍यासकेँ देखक चाही। जे अछि,‍ जे होइत अछि‍, तइ‍ माध्‍यमसँ अबैत भवि‍ष्‍यकेँ सचेत नै‍‍ कऽ मानवीय-दृष्‍टि‍सँ आदर्श समाजक स्‍थापनापर हि‍नकर वि‍श्वास छन्‍हि‍। भाषा हि‍नकर वि‍कासशील अछि‍। वि‍शेष वर्गमे स्‍थापि‍त भाषासँ अलग बेवहारक शब्‍द आ भाषा हि‍नक उपन्‍यासमे छन्‍हि। तइ‍ कारणे पाठककेँ अपन समाजक बोध होइत छन्‍हि। मंडल जीक उपन्‍यास आ “सेवासदन”क आदर्श एक्के अछि‍। अपन जीवनकालमे मंडलजी मार्क्‍सवादसँ प्रभावि‍त छथि‍। एकर स्‍पष्‍ट दर्शन अपनेकेँ जमीन वि‍तरण प्रणालीमे अवस्‍से देखबामे आओत। कि‍छु लेखक जमीन छि‍नए लेल ठाढ़ समाजक चि‍त्रण केनि‍हार भेटताह मुदा मंडल जीक पात्र रमाकांत अपन मोने, प्रसन्‍न्‍ा मोने वि‍तरण करैत अछि‍। श्रृति‍ प्रकाशनसँ प्रकाशि‍त पोथी‍ सुन्‍दर आ छपाइक आकर्षक आवरणसँ युक्‍त अछि‍। पोथीक नाओं- मौलाइल गाछक फूल वि‍धा- उपन्‍यास उपन्‍यासकार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशन- श्रृति‍ प्रकाशन, दि‍ल्‍ली मूल्‍य- २५० टाका जगदीश प्रसाद मंडलक लघुकथा संग्रह- ‘गामक जि‍नगी’ ‘गामक जि‍नगी’ सम्‍पूर्ण रूपसँ गामक समस्‍यापर आधारि‍त आ ओकर समाधानक दि‍शापर रचि‍त जगदीश प्रसाद मंडल जीक लघुकथा संग्रह अछि‍। समस्‍त संग्रहमे उन्नैसटा लघुकथा अछि‍। वर्तमान कथा प्रवाहसँ भि‍न्न कथा-प्रवाह अछि‍। वर्तमानमे समस्‍याक प्रवाह अछि‍। कथाकार समस्‍याकेँ सोझाँ राखि‍ पाठक माने समाजकेँ बोध करबैत अछि‍। समाधान ताकक दायि‍त्‍व पाठकपर होइत अछि‍। यर्थाथक नाङट‍ चि‍त्रण, मानवीय कुरूपता, असंवेदनशीलता आ साहि‍त्‍यक नाओंपर अश्‍लीलता पसरल जाइत अछि,‍ ओतै‍ प्रस्‍तुत कथा संग्रह गाममे पसरल छोट-छोट वस्‍तुक उपयोगि‍तासँ समाजक समस्‍याक समाधान प्रस्‍तुत करैत अछि‍- भैंटक लावा, बि‍‍साँढ़, पीरारक फड़। हि‍नकर कथा मोनमे कचोट नै वरन् उन्‍मुक्त आ आशात्‍मक सनेस दैत अछि‍। आजुक कथा जकाँ दमघोटू वातावरण तैयार‍ नै करैत अछि‍ वरन् भोरूका स्‍वच्‍छ हवा प्रदान करैत अछि‍- बोनि‍हारि‍न मरनी, ठेलाबला, रि‍क्‍शाबला, घरदेखि‍या। वर्णनात्‍मक शैलीमे समस्‍त लघुकथा अछि‍। कथाकार समस्‍याकेँ पकड़ब, उठाएब आ समाधान दिसि‍ लऽ जएबामे सि‍द्धहस्‍त छथि‍। ई गुण आ फलक हि‍नकर व्‍यक्‍ति‍गत जीवनक श्रेष्‍ठताक कारणसँ अबै छन्‍हि‍। सर्वकल्‍याणक नजरि‍क कारणसँ अबै छन्‍हि‍। कथामे अवि‍छि‍न्न प्रवाह अछि‍ कतौ कथा संयोजन ठमकल नै भेटत। कथाक उद्गम होइत अछि‍, ओ बढ़ि‍ जाइत अछि‍। कथाक आवश्‍यक तत्‍वमे जे आवश्‍यक तत्‍व होइत अछि‍ से अवस्‍से भेटत। शीर्षक कतौ असम्‍बद्ध नै‍‍ भेटत। उल्‍लेखनीय कथा अछि‍- घरदेखि‍या। लुखि‍याक जि‍ज्ञासा आ भलमनसाहत प्रशंसनीय अछि।‍ कथाक प्रवाह अवि‍चल अछि‍ अओर संपूर्ण कथामे आगाँ की हेतै से सदि‍खन जानबाक प्रबलता बनल रहैत अछि‍। कथामे ऐ‍ तत्‍वक आवश्‍यकता मानल जाइत अछि‍। घरक एक-एकटा ओरि‍आओन, घरक हालति‍ आ लुखि‍याक प्रयास सहज अछि‍। कतौ नाटकीयता नै झलकैत अछि‍। मि‍थि‍लाक हँसी-मजाक कथाकेँ मि‍थि‍लाक माटि‍-पानि‍सँ सम्बद्ध कऽ दैत अछि‍। लुखि‍या समैधसँ पाइ लऽ कनि‍याँ आनक पक्षमे नै अछि‍ तँए ओ बजैत अछि‍- “ककरो बेटीकेँ पाइ लऽ कऽ अपन घर नै आनब‍।” नागेसर ऐ पक्षमे नै‍‍ छथि‍ मुदा भौजीक कहल काटब ओकरासँ संभव नै‍‍ अछि‍। कथाक समापन ऐ उक्‍ति‍सँ अछि‍। समापन नागेसरकेँ झकझोड़ि‍ दैत अछि‍। कथाकार ई स्‍पष्‍ट करैत अछि‍ जे नागेसर की करताह? मुदा लुखि‍याक कथन आजुक समाजक लेल सोचनीय उक्‍ति‍क रूपमे प्रश्नवाचक अछि‍। कथाक ई उत्‍कर्ष अछि‍ आ पाठककेँ आकर्षणमे बान्‍हि‍ लैत अछि‍। कथाकार ग्राम्‍य जि‍नगीक चि‍त्रणमे माहि‍र छथि‍‍ आ हुनका ग्राम्‍य-जीवनक अनुभवक बखाड़ी छन्‍हि‍। कुम्‍हारक सामग्रीक वि‍वेचन देखल जाए- ‘कूड़, हाथी, ढकना, कोशि‍या, दीप, पांडव, गणेश, लछमी, मटकूर, छांछी, डाबा, घैल, सामा-चकेबा, पुरहर, अहि‍वात, कोहा, फुच्‍ची, सीसी, सरबा, सीसी, भरहर, आहूत, धुपदानी, पात्ति‍ल, तौला, मलसी....।’ ओहि‍ना बाबी कथा मि‍थि‍लाक पर्व त्‍योहारक वि‍स्‍तृत आख्‍यान अछि‍। कखन कोन पर्व हएत ओकर वि‍धि‍-वि‍धान बाबीक माध्‍यमसँ व्‍यक्त होइत अछि‍। सभसँ आश्चर्यक गप्‍प जे सजीव चि‍त्रण कथाकार केने छथि‍। कथाक अंतमे ई नै बुझना जाइए जे हम छठि‍ पावनि‍क घाटपर उपस्‍थि‍‍त नै‍‍ छी। छठि‍क मर्यादा आ शुद्धतापर सभसँ बेसी धि‍यान देल जाइ छै तँए ओहू घटनाकेँ कथाकार पकड़ि‍ नेने छथि‍।- “बाबी देखथुन जे ई छौंड़ा तेहन अगि‍लह अछि‍ जे हाथीकेँ पटकि‍ देलकै। ई तँ गुण भेल जे एकेटा टांग टुटलै नै तँ टुकड़ी-टुकड़ी भऽ जाइत।‍” प्रस्‍तुत लघुकथा संग्रहमे सभ कथा अपन-अपन वि‍शेषता रखैत अछि‍ आ सभ कथाक समस्‍या भि‍न्न अछि‍। सबहक समाधान अछि‍। कथ्‍य भि‍न्न आ वस्‍तु वि‍शेष नव-नव। कथाक शीर्षक कथासँ संबंधि‍त आ भाषा जनभाषा अछि‍। अधि‍संख्‍य लोक जे भाषा बजैत अछि‍ टीसनपर, हाटपर, यात्रामे, गाममे आ घरमे, तइ भाषाक प्रयोग अछि‍। वि‍षय-वस्‍तु आ भाषाक बीचक संबंध ई स्‍पष्‍ट करैत अछि‍ जे कथाकार जमीनी हकीकतकेँ उपस्‍थि‍त केलनि‍हेँ। मैथि‍ली साहि‍त्‍य लेल ई एकटा सौभाग्‍यक बात थि‍क। कथामे सूक्ति‍‍ वाक्‍य, सैद्धांति‍क वाक्‍यक संरचनासँ प्रेमचंद अवश्य स्‍मरण होइत हथि‍ मुदा मुहावरा आ लोकोक्ति‍क अभाव सेहो भेटैत अछि‍। कथामे वर्णनात्‍मक शैली रहितो कतौ-कतौ कथाकार कथोपकथनक प्रयोग सेहो केने छथि‍। कथाक वि‍श्वसनीयता आ साधारणीकरण प्रक्रि‍यामे आवश्‍यक तत्व एकटा एकरो अहमि‍यत होइ छै‍ मुदा कथाकारकेँ हम सचेष्‍ट करए चाहब जे पात्रक भाषा पात्रक शैक्षि‍क स्‍तरसँ सम्‍बद्ध रहने, ओकर मानसि‍कता, परि‍वेशसँ मेल खाइत होमक चाही। कथाकारकेँ हम धन्‍यवाद देबनि‍ जे हि‍नकर कथा राति‍क बाद अकासमे चमकैत भोरूकबा अछि‍। राजदेव मंडल कुरूक्षेत्रम् अन्‍तर्मनक लेल पत्र प्रि‍य बन्‍धु, अहाँक दीर्धकाय ग्रंथ ‍“‍कुरूक्षेत्रम् अन्‍तर्मनक‍‍” पढ़बाक सुयोग प्राप्‍त भेल। कतेको साहि‍त्‍यि‍क कृति‍ (उपन्‍यास, कवि‍ता, कथा-गल्‍प संग्रह, नाटक, महाकाव्‍य, बाल नाटक, बाल कथा, बाल कवि‍ता, प्रबन्‍ध-नि‍बन्‍ध समालोचना) केँ एक्के‍ पुस्‍तकमे संग्रहि‍त कए अहाँ पाठकक लेल एकटा तेहेन पुष्‍पमाला बना देलि‍ऐ जइ‍मे लगैत अछि‍ जे वि‍भि‍न्‍न रंगक पुष्‍प एक्के जगह गाँथल हुअए। आ पाठक वृन्‍द साहि‍त्‍यक सभ स्‍वाद ऐ‍ दीर्घ पोथीसँ प्राप्‍त कए सकैत छथि‍‍। नि‍श्चय अपनेक ई प्रयास साहि‍त्‍यक लेल नवीन अछि‍ संगहि‍ कर्मठताक साक्ष्‍य। अहाँक पुस्‍तक पढ़लाक उपरान्‍त मनमे जे वि‍चारक उद्भव भेल तइ‍सँ अवगत करा देब एकटा दायि‍त्‍व सन बुझै छी। तँए कि‍छु अपन वि‍चार पठा रहल छी। बन्‍धु, प्रथमत: ई कहबामे हमरा कनि‍यो संकोच नै‍‍ होइत अछि‍ जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल जे अपने साहि‍त्‍य आन्‍दोलनक कार्य क‍ऽ रहल छी से साहि‍त्‍यक लेल तँ ऐति‍हासि‍क अछि‍ए, संगहि‍ मैथि‍ली प्रेमी, मि‍थि‍लावासी सेहो अहाँक ऐ‍ सुकार्यकेँ कहि‍यो नै‍‍ भूलत-बि‍सरत। बालकथा- अहाँ मि‍थि‍लांचलमे पसरल छोट-पैघ कथा सभकेँ नवीन रूपेँ संग्रहि‍त कएने छी। अहाँक ऐ‍ प्रयाससँ वि‍लुप्‍त होइत कथा सभ पुन: जीवन्‍त भ‍ऽ उठल अछि‍। बगि‍याक गाछ बचपनावस्‍थामे दादीक मुँहसँ सुनने रही। आइ पुन: पढ़बाक अवसर भेटल। राजा सलहेस, महुआ घटवारि‍न, नैका-बनि‍जारा, जट-जटि‍न इत्‍यादि‍ कथ्‍ाा सभ पढ़लासँ लगैत अछि‍ जे इति‍हास‍क बहुत गूढ़, तथ्‍यपूर्ण बात सभ सोझाँ अाएल अछि‍। क्षि‍प्रताक साथ अग्रसर होइतो सभ बातक संकेत धरि‍ आबि‍ गेल अछि‍ आ आेइ‍ प्राचीन समैक दशा आ दि‍शाक ज्ञान सहजहि‍ं परि‍लक्षि‍त भ‍ऽ रहल अछि‍। सामाजि‍क जि‍नगीक क्रि‍या-कलापक वर्णन करैत अहाँ जे चि‍त्र उपस्‍थि‍त कएने छी तइ‍मे आेइ‍ काल वि‍शेषक प्रेम-घृणा, संयोग-वि‍योग, उन्‍नति‍-अवनति‍, बैर-प्रीत, शांि‍त-अशांति‍, वीरता-कायरता, मुर्खता-वि‍द्वता सभटा भि‍न्न-भि‍न्न रूपेँ प्रगट भेल अछि‍। पढ़ैत काल लगैत अछि‍ जे हम दोसर संसारमे प्रवेश कएने छी। आेइ‍ समैकेँ जँ एखुनका समैसँ तुलना करैत छी तँ बूझि‍‍ पड़ैत अछि‍ जे वि‍कास कते तीव्र गति‍सँ भ‍ऽ रहल अछि‍। आ ऐ‍ पुरान भेल जि‍नगीक कथापर कलम चलौनाइ कोनो साधारण गप्‍प नै‍‍ अछि‍। वि‍षए-वस्‍तु सभपर जे अहाँ संतुलन बनौने छी से समए आ परि‍स्‍थि‍ति‍क अनुकूल अछि‍। संकर्षण-नाटक- अपाला आत्रेयी-दानवीर दधीची- अपाला आत्रेयी आ दानवीर दधीची- ऐ‍‍ दुनू बाल नाटकमे अहाँ कथाकेँ कि‍छु नव रूपे प्रकट कएने छी। से पात्रक अनुरूपे अछि‍। कथोपकथनमे प्रवाह अछि‍ आ छोट-छोट वाक्‍यक प्रयोग अछि‍ जे नाटकीयतामे प्रभाव उत्‍पन्न करैत अछि‍। जेना दानवीर दधीची‍क एकटा कथोपकथन : ‍“दधीची- इन्‍द्र। कुरूक्षेत्र लग एकटा जलाशय अछि‍ जकर नाओं अछि‍, शर्यणा। अहाँ ओतय जाउ। ओतय घोड़ाक मुड़ी राखल अछि‍.....। ओहि‍सँ नाना प्रकारक शस्‍त्र बनाउ।‍” बाल नाटक बालकक ज्ञान बृद्धि‍क लेल सेहो उपयोगी अछि‍। संकर्षण- नाटक एकटा नवीन चरि‍त्रसँ परि‍चि‍त करबैत अछि‍। जे गामक लोककेँ ठकनाइकेँ नीक बुझैत अछि‍। ऐ अवगुणकेँ प्रति‍भा बुझैत रहैत अछि‍।‍ अवगुणक प्रति‍फलपर कनेको वि‍चार नै‍‍ करैत अछि‍। वएह बेकती जखन दि‍ल्‍ली सन महानगर जाइत अछि‍ तँ रस्‍तामे स्‍वयं ठका जाइत अछि‍। लालकि‍लामे जूता कि‍नबा काल ओकरा पता चलि‍ जाइत अछि‍ जे ओ ठक वि‍द्यामे कतेक पाछू अछि‍, उदाहरण रूपेँ एकटा कथोपकथन : ‍“गोनर- अहाँकेँ ठकि‍ लेलक। अहाँक नाओं तँ बुझनुक लोकमे अबैत अछि‍। संकर्षण- मि‍त्र की कहू‍?......। ऐ‍ लालकि‍लाक चोर बजारक लोक सभ तँ कतेको महोमहापाध्‍यायक बुधि‍केँ गरदामे मि‍ला देतन्‍हि‍।‍” छोट-छीन कथोपकथन द्वारा व्‍यंग्‍य, हंसी आ गम्‍भीर बातकेँ सहज ढंगसँ कहि‍ देब अहाँक लेखनीक वि‍शेषता थि‍क। नाटकक आकार लघु अछि‍ जे नवीनताक सूचक अछि‍। तथा मि‍थि‍लामे पसरल बहुत रास बातकेँ समेटबाक प्रयास नि‍श्चय सराहनीय अछि‍। मंचि‍त करबाक लेल दि‍शा नि‍र्देश नीक ढंगे कएल गेल अछि‍। नाटक पठनीयता संगे नाटकीयतासँ परि‍पूर्ण अछि‍। आ संकर्षण आकर्षणसँ भरल अछि‍। गल्प गुच्‍छ- (विहनि आ लघुकथा संग्रह) कथा सभकेँ पढ़लौं, जे गल्प गुच्‍छमे संग्रहि‍त अछि‍। पढ़ै काल स्‍मरण भेल एनसाइक्‍लोपीडि‍या ब्रि‍टेनि‍काक कि‍छु शब्‍द- कथा स्‍वतंत्र वि‍धा अछि‍। ऐ‍मे संक्षि‍प्‍ताक संगहि‍ अत्‍यधि‍क संगठि‍त तथा पूर्ण कथा रूप हेबाक चाही। ओना जि‍नगी कथा अछि‍ आ कथा जि‍नगी अछि‍। आ जि‍नगी जे नि‍रन्‍तर नवीनताकेँ प्राप्‍त कऽ रहल अछि‍। गप्‍ल गुच्‍छ पढ़ैत काल जे कथा वा पाँति‍ बेसी प्रभावि‍त कएलक आेइ‍ सबहक वि‍षयमे कहब आवश्‍यक बुझाइत अछि‍। नीक-अधलाह कहबाक अधि‍कार तँ पाठककेँ होइते अछि‍। नव सामन्‍त- आब सामंतवादी युग नै‍‍ रहल। कि‍न्‍तु सामंती प्रवृति‍ अखनो जीअते अछि‍। हँ ओकरा रूपमे परि‍र्वन भऽ गेल अछि‍। आ ओ भि‍न्न-भि‍न्न रूपे समाजमे आइयो दृष्‍टि‍गोचर भऽ गेल अछि‍। ऐ‍ कथामे एकटा नव सामन्‍तक नवीन रूप लक्षि‍त भऽ रहल अछि‍। सर्वशि‍क्षा अभि‍यान- कथाक माध्‍यमसँ दलि‍त आ गरीबक धीया-पुताकेँ पढ़ेबाक लेल उदासीनताक भावना व्‍यक्‍त भेल अछि‍। सरकार द्वारा मुफ्तमे देल गेल पोथी अदहरमे बेचा जाइ छै, कथाक पाँति‍- “आ दुसधटोली, चमरटोली आ धोबि‍याटोलीसँ सभटा कि‍ताब सहटि‍ कऽ नि‍कलि‍ गेल।‍” थेथर मनुक्‍ख- ऐ‍ कथासँ स्‍पष्‍ट होइत अछि‍ जे मनुक्‍खक पूर्ण अद्य:पतन भऽ गेल अछि‍। एतेक जे मनुक्‍ख चि‍ड़इ-चुनमुनी, परबा-पौरकी धरि‍सँ नीचा उतरि‍ थेथर भऽ गेल अछि‍। स्‍त्री-बेटा- ऐ‍‍मे समाजमे स्‍त्रीगणक महत्‍वहीनता आ संगहि‍ करबट लैत सामाजि‍क स्‍थि‍ति‍-परि‍स्‍थि‍ति‍क चि‍त्रण भेल अछि‍। बि‍आह आ गोरलागइ- क्षण-क्षणमे मनुक्‍खक बदलैत रंग गि‍रगि‍ट जकाँ...... आ दहेजक लोभी बेकती संतोषी सन बेवहार देखा कऽ स्‍वयं लज्‍जि‍त होइ छथि‍। आइयो कोन कोन रूपेँ दहेज लोभी दुबकल अछि‍ समाजमे आ कोन-कोन प्रपंची चालि‍ चलि‍ रहल अछि‍। से ऐ‍ कथासँ बुझाइत अछि‍। नीक चि‍त्रण भेल अछि‍। प्रति‍भा- चलाकी आ प्रति‍भा दुनू अलग-अलग बात छै। प्राप्‍ति‍क लेल दुनूमे सँ कोन महत्‍वपूर्ण सएह देखेबाक यत्‍न भेल अछि‍। मि‍थि‍लाक उद्योग- कि‍छु कथाक कोनो गप्‍प पाठककेँ दीर्घकाल तक झंकृत कएने रहैत अछि‍। ऐ‍ कथामे गदहापर लादल जे संदेश भेट ‍रहल अछि से बहुत दि‍न धरि‍ पाठककेँ स्‍मरणमे रहत। रकटल छलौं कोहबर लय- स्‍त्री-पुरुषक बीच बनैत-बि‍गड़ैत सम्‍बन्‍ध आ छल-प्रपंच अपने-आपकेँ ठकइ आ ठकाइबला गप्‍पक मार्मिक वि‍श्लेषण ऐ‍ कथा द्वारा भेल। हम नै‍‍ जाएब वि‍देश- कोन बेकतीक हृदैमे कतेक कष्‍ट-पीड़ा आ हँसी-खुशी भरल अछि‍, ओकर पूर्णतया उत्‍खनन करनाइ सम्‍भवो नै‍‍ अछि‍ तथापि‍ कथाकार तँ प्रयास करबे करताह। ऐ‍ कथामे द्वि‍जेन्‍द्रक मोनक व्‍यथाक कथा पूर्णरूपेण उजागर भेल अछि‍। एकटा पाँति‍- “कोन सरोकार माएसँ पैघ छल यौ लाल। जे अहाँ कहैत छी जे हम ककरोसँ सरोकार नै‍‍ रखने छी।‍” राग वैदेही भैरवी- ऐ‍ कथामे एकटा कलाकारक जि‍नगीपर रोशनी देल गेल अछि‍। केना एकटा साधारण गामक गबैया सुख-दुख, सफलता आ वि‍फलतासँ लड़ैत उच्‍चताकेँ प्राप्‍त कएलक तकर वि‍शद् वर्णन भेटैत अछि‍। बाढ़ि‍ भूख आ प्रवास- हास्‍य-व्‍यंग्‍यसँ पूर्ण कथा अछि‍। लघु आकारक रहि‍तो ई कथा बहुत रास गप्‍पकेँ समेटने अछि‍। भूख आ भूखक कारणे उठैत मनक तरंग आ आेइ‍ कारणे बेकती कतएसँ कतए प्रवास करैले जाइत अछि‍। आ ओहू स्‍थानपर केना आशापर तुषारपात होइत अछि‍। ऐ‍ पाँति‍केँ पढ़लासँ स्‍वत: हास्‍य उपस्‍थि‍त भऽ जाइत अछि, “सरकार हम तँ ट्रेनसँ आएल छी मुदा अहाँ कोन सवारीसँ अएलहुँ जे हमरासँ पहि‍नहि‍सँ वि‍राजमान छी।‍”- वैदिक जी अल्हुआसँ हाथ जोड़ि‍ कहैत छथि‍। नूतन मी‍डि‍या- आधुनि‍क मी‍डि‍या कोन तरहेँ चलि‍ रहल अछि। से उजागर भेल अछि‍। जाति‍-पाति‍- ऐ‍ कथाकेँ पढ़लाक बाद पाँति‍ याद अबैत अछि‍- “देखनमे छोटन लागै जाति‍ पाति‍क दंश‍।” बहुपत्नी बि‍आह आ हि‍जड़ा- ऐ‍ कथामे एकसँ अधि‍क पत्नी कएलासँ जे समाजमे सड़ांध पैदा भऽ रहल अछि‍, कोन-कोन रूपेँ ओकर वि‍कार नि‍कलैत अछि,‍ तकर वर्णन भेल अछि‍। कि‍छु पाँति‍- “‍...भाति‍ज सभकेँ नै‍‍ मानैत छि‍ऐक तैं भगवान बच्‍चा नै‍‍ देलनि‍।” वाणवीर- ऐ‍ कथामे बाणवीरक मनोि‍वश्लेषण नीक जकाँ भेल अछि‍। समूहसँ कटल बाणवीर कतेक अथाह पीड़ामे संघर्ष करैत जि‍नगीक एक-एक पल कटैत रहैत अछि‍ से कथासँ स्‍पष्‍ट भऽ जाइत अछि‍। वाणवीरक ऐ‍ कथनमे कतेक मर्म छि‍पल अछि‍- “माए बाबू! हमरा बुझल अछि‍ जे हमर बि‍आह दान नै‍‍ होएत। मुदा अपन पेट तँ कोहुना हम गाममे भरि‍ए लैत छी। गुजर तँ कइए लैत छी। लोक सभ कहैत रहए जे तोहर माए-बाप तोरा बेचि‍ देलकौ। से ठीके अछि‍ की?‍”....कन्नारोहट उठि‍ गेल। अनुकप्‍पाक नोकरी- लोककेँ बाप मरलापर नोकरी भेटै छै। हुनका भाएक मरलापर भेटलनि‍‍। ऐ‍ कथाक सार अछि‍। मृत्‍युदंड- कथा द्वारा देखाओल गेल अछि‍ जे केना बालि‍का आर्याकेँ मृत्‍युदंड मिलि‍ जाइत अछि‍ जेकर कोनो दोष नै‍‍ छल। बेगुनाहकेँ दण्‍ड। सेहो मृत्‍युदंड। एहेन अछि‍ ऐ‍‍ठामक समाज। जेकरा सहजताक संग स्‍वीकारो कऽ लेल जाइत अछि‍। एखनुक समाजक दरपन जकाँ कथा लगैत अछि‍। ऐ‍ तरहेँ गल्‍प गुच्‍छक कथा सभक बाद बुझाइत अछि‍ जे वर्तमान समस्‍याक यर्थाथ रूप प्रकट भेल अछि‍। छोट-छोट दृश्‍य खंड काव्‍यात्‍मक रूपसँ सोझा आएल अछि‍। कथावस्‍तुमे मि‍थि‍लाक माटि‍-पानि‍क गंध अछि‍। कि‍छु कथा अत्‍यन्‍त लघु तथापि‍ उद्देश्‍य प्रकट भऽ गेल अछि‍ जे सम्‍पूर्ण देशक यथार्थताकेँ समेटने अछि‍। सहस्‍त्रबाढ़नि‍ (उपन्‍यास)- प्राचीन काले‍सँ सहस्‍त्रबाढ़नि‍क वि‍षयमे उत्‍सुकताक संगहि‍ अनुमान कएल जाइत रहल अछि‍। अनुमानि‍त व्‍याख्‍या आ समीक्षा होइत रहल अछि‍। वि‍ज्ञान द्वारा अलग ढंगसँ आ साहि‍त्‍य तथा अध्‍यात्‍म द्वारा अलग-अलग ढंगसँ। अहाँक उपन्‍यासक पात्र ऐ‍ सम्‍बन्‍धमे कहैत अछि‍- “खसैत लहास, कनैत हुनकर सबहक परि‍वार। सपनामे अबैत रहल ई सभ सहस्‍त्रबाढ़नि‍क रूप बनि‍ कए। हमरे सन कोनो श्रापि‍त आत्‍मा अछि‍ ओ सहस्‍त्रबाढ़नि‍ जे अपन संघर्ष अधखि‍ज्‍जू छोड़ि‍ मरि‍ गेल होएत आ आब ब्रहमाण्‍डमे घुरि‍या रहल अछि‍। आब देखू तीनू बच्‍चाक परीक्षा परि‍णाम, सभ दि‍न प्रथम करैत अबैत रहथि‍, आब की भऽ गेलनि‍। हम जे संघर्ष बीचमे छोड़लहुँ तकर छी ई परि‍णाम।‍” नन्‍द हबोढ़कार भऽ कानए लगलाह। ऐ‍ पाँति‍केँ जँ गम्‍भीरतासँ आत्‍मसात करए लगलौं तँ मात्र नामेटा नै‍‍ संगहि‍ उपन्‍यासक सारतत्‍व एवं उद्देश्‍यो प्रकट भऽ गेल। नन्‍दक चरि‍त्र आ हुनका द्वारा कएल गेल संघर्षक रूप तथा मनक मनोवि‍ज्ञान स्‍पष्‍ट भऽ जाइत अछि‍। उपन्‍यासक भाषा शैली नवीन ढंगक अछि‍। वर्णनात्‍मक शैलीमे आरम्‍भ भेल अछि‍। भाषामे चि‍त्रात्‍मकताक एकटा उदाहरण- “एकदि‍न कलि‍तकेँ देखलौं जे ठेहुनि‍याँ दैत आगू जा रहल छथि‍। आंगनसँ बाहर भेलापर जतए आँकर-पाथर देखलनि‍ ततए ठेहुन उठा कऽ मात्र हाथ आ पएरपर आगू बढ़ए लगलाह।‍” कि‍छु ऐ‍ तरहक शब्‍दक प्रयोगसँ भाषामे आकर्षण आबि‍ गेल अछि‍। जेना थाम्‍ह-थोम्‍ह, कानब-खीजब, काज-उद्यम, जान-पहचान, बूढ़-पुरान, घुमब-फि‍रब, टोका-टोकी, संगी-साथी, झगड़ा-झाँटी, तंत्र-मंत्र, पढ़ाइ-लि‍खाइ इत्‍यादि‍। उपन्‍यासक भाषा मैथि‍ली पाठकक अनुकूल अछि‍ जहि‍ना लोक बजैत छथि‍ तहि‍ना सहज ढंगसँ वर्णित अछि‍। झि‍ंगूर बाबू, नन्‍द आ नन्‍दक भैया, भाति‍ज, बेटा, नवीन, आरूणि‍ आ हुनक माए-बाबू, बहि‍न, कलि‍त आ हुनक पत्नी, शशांक, मणीन्द्र, भौजी, शोभा बाबू, बुचि‍या इत्‍यादि‍ पात्रक माध्‍यमसँ कथावस्‍तुक संगे‍ चरि‍त्रक वि‍कास भेल अछि‍। जइ‍मे मौलि‍कताक संगे‍ स्‍वाभावि‍कता अछि‍। नव दृष्‍टि‍कोणसँ सहजताक संग चरि‍त्र सबहक वि‍कास भेल अछि‍। जे उपन्‍यासक अनुकूल अछि‍। मि‍थि‍लाक नदी- कमला, कोसी, बलान अादि‍क वर्णन भेल अछि‍। संगहि‍ ऐठामक गाम घर- झंझारपुर, मेंहथ, गढ़ि‍या, कछबी आदिक‍ वर्णनसँ सहजहि‍ कथामे मि‍थि‍लाक माटि‍-पानि‍क गंध आबि‍ गेल अछि‍। कथोपकथनमे संक्षि‍प्‍ता आ सहजता अछि‍। उदाहरण स्‍वरूप कि‍छु अंश देखल जा सकैत अछि‍। आरूणि‍ दू-तीन कौर खा कऽ उठि‍ गेलाह। हुनकर संगी कारण पुछलखि‍न- “पता नहि‍‍‍। घबराहटि‍ भऽ रहल अछि‍।‍” “काल्हि‍ ट्रेनि‍ंगपर जएबाक अछि‍ ने। तइ‍ द्वारे।‍” “पता नहि‍।‍” ताबत भीतरसँ अवाज आएल। सभ कि‍यो दौगलाह। कथोपकथन जि‍नगी आ पात्रानुकूल अछि‍। “की बजलहुँ बेटा‍”- माए पुछलखि‍न। “नहि‍‍‍। ई कॉलोनी देखि‍ कऽ कि‍छु मोन पड़ि‍ गेल।‍” “नहि‍‍‍ देखू ई पपि‍याहा कॉलोनीकेँ।‍” उपन्‍यास मनोवि‍श्‍लेषणक संगहि‍ दर्शनसँ सेहो पुष्‍ट अछि‍। “पृथ्‍वी वि‍शाल अछि‍ आ काल नि‍स्‍सीम, अनंत। एहि‍ हेतु वि‍श्वास अछि‍ जे आइ नहि‍‍ तँ काल्हि‍ कि‍यो ने कि‍यो हमर प्रयासकेँ सार्थक बनाएत।‍” आशाक संचार करएबला ई वाक्‍य बारम्‍वार मनमे उठैत अछि‍। जि‍नगीक संचालि‍त करबाक लेल तँ आवश्‍यक अछि‍ जि‍नगीक रस। वएह रस थि‍क- आशा। जँ जि‍नगीमे आशा, अभीप्‍सा नै‍‍ होइ तँ जीवन नि‍रर्थक। “आरूणि‍केँ लगलन्‍हि‍‍ जे ओ झोंटाबला सहस्‍त्रबाढ़नि‍ झमारि‍ कए ऐ‍ वि‍श्वमे फेक दैत छन्‍हि‍ हुनका।‍” कथीले कि‍छु कि‍एक, से प्रश्न उठैत अछि‍ मनमे। यएह प्रश्न पाठककेँ बेर-बेर सोचैले मजबूर करैत अछि‍- बहुत रास गप्‍प। आ एक प्रश्नसँ जन्‍मैत अछि‍ बहुत प्रश्न जे पाठककेँ एकटा अलग संसारमे लऽ जाइत अछि‍। मनुष्‍यक प्रवृति‍क सम्‍बन्‍धमे ई पाँति‍ देखल जा सकैत अछि‍- “मनुष्‍यक प्रवृत्ति‍ये होइछ, समानता आ तुलना करबाक साम्‍य आ वैषम्‍यक समालोचना आ वि‍वेचनामे कतेक गोटे अपन जि‍नगी बि‍ता दैत छथि‍। आरूणि‍ आ नन्‍दक बीच सेहो अनायासहि‍ं साम्‍य देखल जा सकैत अछि‍।‍” ऊपरसँ मानव भि‍न्न-भि‍न्न प्रवृत्तिक होइत अछि‍। कि‍न्‍तु मूलमे गहराइसँ अन्‍वेषण कएल जाए तँ कि‍छु तल पर सभ मनुष्‍यक लगभग साम्‍य होइत अछि‍। अन्‍तमे वएह रस नि‍:सृत होइत रहैत अछि‍। कि‍न्‍तु ओतेक शान्‍त भाव आ ओतेक गम्‍भीरतासँ स्‍वयंकेँ देखनाइ सहज गप्‍प तँ नै‍‍ थि‍क। उपन्‍यासक आकार लघु रहि‍तो कथा वस्‍तुक पूर्ण वि‍कास भेल अछि‍। कथाक अनुकूल अछि,‍ भाषाक संतुलि‍त ढंगसँ प्रयोग भेल अछि‍। नव वस्‍तुक नवीन दृष्‍टि‍कोणसँ अभि‍व्‍यक्‍ति‍ भेल अछि‍। मौलि‍कतासँ पूर्ण अछि‍। वर्तमानमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रगति‍क लेल अहाँ सन बेकतीक आवश्‍यकता अछि‍। जे एकभगाह होइत मैथि‍लीकेँ संंतुलि‍त करता आ संगहि‍ स्‍वयं तँ अग्रसर हेबे करता दोसरोकेँ आगू बढ़बाक सुअवसर देताह। ऐ‍ दृष्‍टि‍कोणसँ अहाँक प्रयास अवर्ण्‍य अछि‍। एकटा पाँति‍ स्‍मरण भऽ गेल- अहीं सन मैि‍थली सेवकपर अछि‍ हमरा सबहक आस भरब भण्‍डार मैथि‍लीक अछि‍ पूर्ण वि‍श्वास। सहस्‍त्राब्‍दीक चौपड़पर- सहस्‍त्राब्‍दीक चौपड़पर बैसल अहाँ जि‍नगीक खेल देखि‍ रहल छी‍। गहन अन्‍वेषण करैत एक-एकटा चि‍त्रक रचना कऽ रहल छी आ ओइ उमंगमे डूमि‍‍ रहल छी। “असीम समुद्रक कातक दृश्‍य हृदय भेल उमंगसँ पूरि‍त....।‍” अहाँक अन्‍तरक कवि‍ रवि‍क चि‍त्र उपस्‍थि‍त करैत कहैत अछि‍- “सूर्य कि‍रण पसरि‍ छल गेल कतेक रहस्‍य बि‍लाएल ति‍मि‍रक धुँध भेल अछि‍ कातर मुदा ई की.......।‍” संग्रहमे कि‍छु हाइकू पढ़बाक सुअवसर भेटल। कि‍छु सुआद बदलबाक लेल....। मि‍थि‍लांचलक गमकसँ अहाँक कवि‍ता हमरा सबहक मोनकेँ गमका रहल अछि‍ : “‍मोन पाड़ैत छी धानक खेत झि‍ल्‍ली कचौड़ी लोढ़ैत काटल धानक झट्टा ओहि‍ बीछल शीसक पाइसँ कीनल लालछड़ी जेकरे नाओं लाल छड़ी आ सत घरि‍आ खेल....।” प्रवासमे रहैत स्‍मरण होइत गाम घर। ऐ पाँति‍मे वि‍योगक ओइ व्‍याथाक वर्णन भेटैत अछि‍। एकटा नवीन लयक संग- “‍पता नै‍‍ घुरि‍ कऽ जाएब आकि‍ एतहि‍ मरि‍-खपि‍ बि‍लाएब.....।” ऐ व्‍यंग्‍यमे स्‍पष्‍ट दृष्‍टि‍गोचर भऽ रहल अछि‍। “लाठी मारबामे कोनो देरी नहि‍‍‍ बाछी भेलापर शोको थोड़ नहि‍ परन्‍तु छी पूजनीया अहाँ....।‍” बाढ़िसँ उत्‍पन्न भेल समस्‍या आ ओकरा छोट-छीन पाँति‍मे समेटनाइ गागरमे सागर भरबाक प्रयास ऐ पाँति‍मे परि‍लक्षि‍त भऽ रहल अछि‍- “ठाम-ठाम कटल छल छहर ऊपरसँ बुन्नी पड़ि‍ रहल सभटा धान चाउर भीतक कोठी टूटि‍ खसल पानि‍क भेल ग्रास...।‍” नव-नव बि‍म्‍बसँ कवि‍ता सभ पूरि‍त अछि‍- “सहस्‍त्रबाढ़नि‍ जकाँ दानवाकार घटनाक्रमक जंजाल फूलि‍ गेल साँस हड़बड़ा कऽ उठलौं हम....।‍” हड़बड़ा कऽ नै बल्‍कि‍ अहाँ सचेत भऽ कऽ उठलौं। नव-नव चि‍त्र ध्‍वनि‍ लऽ कऽ नवीन दृष्‍टि‍क संगे। पता नै कतए धरि‍ जाएब। कतए गन्‍तव्‍य अछि‍ अहाँक। “वि‍श्वक मंथनमे होएत कि‍छु बहार आब.... पथक पथ ताकब..... प्रयाण दीर्घ भेल आब....।‍” प्रबन्‍ध-नि‍बन्‍ध समालोचना :- प्रारंम्‍भमे फल्‍ड वर्कपर आधारि‍त खि‍स्‍सा सीत-बसंत अछि‍। ई लोक कथा मार्मिक अछि‍ संगहि‍ शि‍क्षा आ उपदेशसँ भरल। सतमाएक चरि‍त्र केहेन होइत अछि‍ आ केहेन होएबाक चाही से स्‍पष्‍ट भेल अछि‍। समाज द्वारा बि‍सरल जा रहल ऐ कथाकेँ अहाँ पुन: जीवित कएने छी जइमे माए-बाप बेटा आ सतमाएक मर्मस्‍पर्शी वर्णन भेल अछि‍। वर्तमानमे सीत-बसंत नाच बि‍हारक गाम-गाममे लोक मानसकेँ आनन्‍दि‍त कऽ रहल अछि‍। दोसर अछि‍- मायानन्‍द मि‍श्रक प्रथमं शैल पुत्री च, मंत्रपुत्र, पुरोहि‍त आ स्‍त्रीधन। जे वेदकालीन इति‍हासपर आधारि‍त अछि‍। जेकर समीक्षा इति‍हास आ साहि‍त्‍य दुनू आधार लऽ अहाँ नीक जकाँ प्रस्‍तुत कएने छी। एकर बाद अछि‍ केदारनाथ चौधरी जीक दूटा उपन्‍यास- चमेली रानी आ माहुर, ई पाठक द्वारा आदृत उपन्‍यास अछि‍। एकर समीक्षा अहाँ नीक तरहेँ कएने छी। अहाँ कहने छी जे- नव समीक्षावाद कृति‍क वि‍स्‍तृत वि‍वरणपर आधारि‍त अछि‍। नो एंट्री : मा प्रवि‍श- नचि‍केता जीक नाटक अछि‍। जेकरा अहाँ कि‍छु नव तरहेँ समीक्षा करबाक प्रयत्न कएने छी। कवि‍शेखर ज्‍योति‍रीश्वर शब्‍दावली- वि‍द्यापति‍ शब्‍दली, कवि‍ चतुर्भुज शब्‍दावली आ बद्रीनाथ झा शब्‍दावली द्वारा मैथि‍ली शब्‍द भंडारकेँ वि‍शद वर्णन कएल गेल अछि‍। मैथि‍ली हाइकू आ क्षणि‍का पढ़बाक अवसर भेटल। श्रीमती ज्‍योति‍ झा चौधरीक इंग्‍लि‍श हाइकू अहाँक मैथि‍ली अनुवाद सहि‍त। मि‍थि‍लाक बाढ़ि‍- जे एतुक्का रहनि‍हारक लेल प्रलय बनि‍ आबैत अछि‍। ऐ समस्‍या आ सरकारी प्रयासक वर्णन नीक जकाँ भेल अछि‍। वि‍स्‍मृत कवि‍ पं. रामजी चौधरीक रचनाकेँ पाठकक सोझाँ रखबाक प्रयास। वास्‍तवमे ई अहाँक अवि‍स्‍मरणीय कार्य अछि‍। वि‍द्यापति‍क बि‍देशि‍या- पि‍आ देसाँतर- ऐमे कि‍छु नव तथ्‍य सभ सोझा आएल अछि‍। बनैत-बि‍गड़ैत सुभाष चन्‍द्र यादवक कथा संग्रहक समीक्षामे अहाँ द्वारा सार्थक प्रयास भेल अछि‍। ई कथन जे “‍ओ कथाक माध्‍यमसँ जीवनकेँ रूप दैत छथि‍। शि‍ल्‍प आ कथ्‍य दुनूसँ कथाकेँ अलंकृत कए कथाकेँ सार्थक बनबैत छथि‍।” ऐ कथा संग्रहक अहाँ वि‍शद रूपेँ समीक्षा कएने छी। अन्‍तर्जालपर मैथि‍ली- ऐमे नवीन एवं ज्ञानवर्द्धक तथ्‍य सभ पाठकक लेल परोसने छी। आजुक समैमे एकर ज्ञान आ अनुभव बड्ड आवश्‍यक भऽ गेल अछि‍। लोरि‍कक गाथामे समाज ओ संस्‍कृति‍- ऐ गाथामे ओइकालक समाज ओ संस्‍कृति‍ एवं राजनीति‍क पक्षकेँ अहाँ उजागर कएने छी। मि‍थि‍लाक खोज- अहाँ घुमैत रहलौं गाम-गाम। संगहि‍ पाठककेँ स्‍थान सभसँ परि‍चि‍त करबैत सराहनीय कार्य कएलौं। त्‍वन्‍चाहन्‍च आ असन्जाति‍ मन (महाकाव्‍य)-  महाकाव्‍यमे जीवनक अत्‍यन्‍त व्‍यापक चि‍त्रण उदात मानवीय अनुभूति‍क रूपमे प्रकट कएल जाइत अछि‍। अहाँ प्रारम्‍भमे लि‍खने छी- “ई भारत ग्रंथ जयक जाहि‍मे गान तखन कहि‍या सँ भेलाह एतुक्का लोक कर्महीन, संकीर्ण.....।‍” अहाँ अन्‍त ऐ पाँति‍सँ कएने छी- “असन्‍जाति मनक ई सम्‍बल देलौं अहाँ हे बुद्ध हे बुद्ध- हे बुद्ध।‍” ओना आब महाकाव्‍य कम लि‍खल जा रहल अछि‍। कि‍न्‍तु साहि‍त्‍यक सभ वि‍धा जीवित रहबाक चाही। ऐ परम्‍पराकेँ अहाँक द्वारा आगू बढ़ेबाक प्रयास भेल अछि‍। धर्म-उपदेशपर आधारि‍त पौराणि‍क कथाकेँ अहाँ कथावस्‍तुक रूपेँ कि‍छु नूतन तरहेँ सजेबाक प्रयास कएने छी। अभि‍व्‍यक्‍ति‍ लेल तत्‍सम शब्‍दावलीक प्रयोग भेल अछि‍। ओना पात्रानुकूल ओहन शब्‍द आनब आवश्‍यके छल। शीर्षक कहबामे काठि‍न्‍य सन अनुभव भेल। तथापि‍‍ रचना आदर करबाक योग्‍य अछि‍। बाल कवि‍ता- ऐमे उपदेशक संगहि‍ मनकेँ रंजि‍त करबाक क्षमता हेबाक चाही। जे उत्‍सुकता बनौने रहए। नव-नव मोहक दृश्‍य देखबैत अहाँ बच्‍चा सभकेँ नव संसारसँ परि‍चि‍त करबाक प्रयास कएने छी। जेना- “मेहनति‍ अहाँ करू फल हमरा दि‍अ.....।‍” दोसर पाँति‍- “मुइलपर भाबहु की भैंसुर/ केलहुँ अतत्तह/ समए बदलल नहि‍‍‍ बदलल ई गाम हमर।।‍” निश्चय एतेक रास बाल कवि‍ता रचि‍ अहाँ बाल साि‍हत्‍यक भण्‍डार भरबाक सराहनीय प्रयास कएने छी। अन्‍तमे यएह जे साहि‍त्‍यक सभ वि‍धाकेँ एक्केठाम संग्रहि‍त करबाक एकटा नव प्रयोग भेल अछि‍। व्‍याकरण आ भाषाक शुद्धता अछि‍। श्रुति‍ प्रकाशन धन्‍यवादक पात्र छथि‍ जे नीक जकाँ एतेक पैघ पोथीक प्रकाशन कएलनि‍। दीर्घकाय पोथीक मूल्‍य कम अछि‍, जइसँ पाठककेँ क्रय करबामे सुवि‍धा हेतै। पोथी‍क लेल यएह कहब जे- अहाँ भि‍न्न-भि‍न्न प्रकारक पुष्‍पसँ सुसज्‍जि‍त एहेन पुष्‍पवाटि‍का बनेलौं जइमे प्रवेश कऽ पाठक जेहने आकांक्षा करत तेहने रूप, गंध प्राप्‍त करत आ हमरे जकाँ आनन्‍दि‍त भऽ कहत- “धन्‍यवाद।‍” कृपानन्द झा मैथिलक जन नायक चुनचुन मिश्र (२५/१०/१९४२— १६/११/२०१०) चुनचुन मिश्र ओ मुखियाजी जीक २५/१०/१९४२ केँ भारतक आजादीक संघर्षक गर्भसँ जन्म भेलनि। हुनकर जन्मक वर्ष हुनकर सम्पूर्ण जिनगीमे झलकैत रहल। ओ आजन्म मिथिला ओ मैथिलीक लेल संघर्षरत रहलाह। अपन जीवनक अन्तिम क्षण धरि ओ मिथिला राज्यक लेल संघर्ष करैत रहलाह। १६-११-२०१० केँ २ बजे प्रात: काल मिथिला राज्यक सपना लेने चुनचुन बाबू ऐ‍ दुनियाँकेँ छोड़ि चलि गेलाह। चुनचुन बाबूक जन्म रहिका गाम, तहिया दरिभंगा जिला आ आब मधुबनी जिला, मे भेलनि। हुनकर प्रारम्भिक शिक्षा रहिका एवं वाटसन स्कूल, मधुबनीमे भेलनि। ओ १९६० ई. मे वाटसन स्कूल, मधुबनीसँ मैट्रिक पास केलनि। ओकरा बाद आर.के. कॉलेजसँ १९६६ मे स्नातक कएलनि। चुनचुन बाबूक बि‍आह १९६०ईं.मे श्रीमति प्रेमलता मिश्रक संग भेलनि। हुनका ४ पुत्र आ ३ पुत्री छथिन। सभ पुत्र आ पुत्रीक बि‍आह दान भऽ गेल छन्‍हि। भरि घर नैत, नातिन, पोता आ पोती सब छन्‍हि‍। निवर्तमान हुनक पत्नी रहिकामे परिवारक संग रहि रहल छथि। समाजिक ओ राजननीतिक जीवन: १९६६मे मिथिलाक महान सोसलिस्ट नेता बाबू सूर्य नारायण सिंहक सम्पर्कमे आबि ओ सोसलिस्ट पार्टीक समर्पित कार्यकर्ता भऽ गेल छलाह। १९७८ ईं. मे ओ रहिका पंचायतक मुखिया चुनल गेलाह। पुन: ओकरा बाद २००१ मे मुखियाक चुनाव भेल जइमे पुन: ओ मुखिया चुनल गेलाह। १९८० ईं. मे जखन मैथिलीकेँ दरकिनार करैत बिहारमे उर्दूकेँ बढ़ाबा देल गेल तँ चुनचुन बाबू मैथिली अन्दोलनमे कूदि गेलाह। १९९२ मे जहन श्री लालू प्रसाद मैथिली केँ बी.पी.एस.सी. सँ निकालि देलखिन तखन मैथिली सेवी सभ उग्र अन्दोलन कएलनि। आेइमे चुनचुन बाबू दिल्लीमे आमरण अनसनपर बैस गेलाह। २००० मे मधुबनीमे मैथिलीकेँ अष्टम सूचीमे शामिल करबाक लेल आमरण अनशनपर १२ दिन तक रहलाह। १९९४मे मिथिला राज्य संघर्ष समितिक उपाध्यक्ष मनोनीत भेलाह, जकर अध्यक्ष डाॅ. जयकान्त मिश्र छलाह। ऐ‍ संस्थाक संस्थापना सेहो डाॅ. जयकान्त मिश्रक नेतृत्वमे अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मैथिली परिषदक अन्तर्गत भेल छल। जयकान्त बाबूक निधनक बाद राज्य संघर्ष समितिक अध्यक्षक भार चुनचुन मिश्रकेँ फरबरी २०१० मे देल गेलनि। हुनकर नेतृत्वमे मधुबनी, दरिभंगा, मुजफ्फरपुर, समस्‍तीपुर, पटना आदि कतेको जगह मिथिला राज्यक निर्माणक लेल धरना प्रदर्शन भेल। एकर अलाबा ओ नेपालक मैथिलमे सेहो क्रियाशील रहलाह। चुनचुन बाबू जनकपुर, सिरहा, राजबिराज, आदिमे सेहो मैथिली अन्दोलनकारीक मार्गदर्शक छलाह। नेपालमे हुनकर लोकप्रियताक पता तखन चलल जखन हमरा ई. मेलपर नेपालक ४-५ टा मुख्य अखबारमे छपल श्रद्धान्‍जलि‍क कटिंग आएल। विचारधारा- चुनचुन बाबूक जीवन, संघर्ष करबाक तरीका ओ जुझारूपनमे सोसलिज्म झलकैत रहल। एकटा आधा बाँॅहिबला कुर्ता, दूटा कपड़ाबला गंजी, एकटा गमछा आ एकटा धोती, बस, सभटा एकटा झोरामे। कोनो लाम काफ नै‍। कोनो रिजर्वेशनक चिन्ता नै‍। जेबीमे पाइ अछि की नै‍ तकरो चिन्ता नै‍। कहब छलनि जहन समाजक काज करै छी तँ समाजे ने पूरा करतै सभटा! ककरो डर नै। मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, भागलपुर, देवघर, जनकपुर, सिरहा, सुरसरि, कानपुर, बम्बइ, दिल्ली, हैदराबाद आ कतए नै‍, चुनचुन बाबू सभ ठाम। आन्दोलन मैथिलीकेँ अष्टम सूचीक लेल हुअए, मिथिला राज्यक लेल हुअए या सौराठ सभाक उत्थानक लेल, चुनचुन बाबूकेँ अगुआ बिना अखन धरि कोनो कार्य सम्भव नै‍ भेल छल। दिल्लीमे हुनका देखितहि Intelligence ओ दिल्ली पुलिस सभ कहनि, “आबि गेला मिथिला राज्यबला”। २२-१२-२००९ केँ जंतर मंतरपर एकटा पुलिस कहलकनि “बाबा अहाँ चौराहासँ पाछू जा कऽ बैसू, एतऽ जाम लागि जाएत।” चुनचुन बाबू कहलथि‍न “कोनो हम पहुनाइ करए आएल छियौ, हम तँ धरनापर आएल छियौ, बैसबौ तँ ऐठाम, हिम्मत छौ तँ पकड़ि कऽ हमरा जहलमे दऽ दे। आेइ समए मात्र १५-२० आदमी जमा भेल छलाह। चुनचुनबाबूकेँ २७/११/२०१० केँ अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मैथिली परिषद मैथिलक जन नायकक उपाधिसँ सम्मानित केलक। रमेश प्रो. मायानन्द मिश्रक रमनगर कथामे लागल “मुदा”... माया बाबूक कथा-संसारक फलक व्यापक अछि। ओ कथाक “प्लॉट”क चयनमे माहिर आ आधुनिक छथि। ओ पैघ आ छोट सभ आकारक कथा लिखलनि अछि। कथा लेखनक क्रममे ओ पैघ कालखण्ड देखलनि आ भोगलनि अछि। ओ कएकटा प्रसिद्ध कथाक यशभागी बनलाह अछि। ओ कए पीढ़ीक जीवनकेँ देखलनि आ लिखलनि अछि। हुनकर लेखनमे लक्षित वर्ग थिक मध्यवर्ग आ निम्न-मध्यवर्ग आ कौखनकेँ राजनीतिक आ पूँजीपति-वर्ग सेहो। ओ नव पीढ़ीक “अंडा प्रेम”, आधुनिकताक प्रति अति-उत्साह आ पुरान पीढ़ी (पिता)क पुरातनपंथी-नक-घोंकची, दुनूपर व्यंग्य केलनि अछि आ अपना हिसाबे देखार करबाक कोशिश केलनि अछि। दुनू पीढ़ीक सोचमे विकृतिकेँ बीछि-बीछि कऽ देखार करितो, प्राचीन शिक्षक, पिताक प्रति सहानुभूति रखितो, नव पीढ़ीक दिक्कत बुझितो, आधुनिक आ प्रगतिशील सोचकेँ आत्मसात् नै कऽ सकलाह अछि। बेटाक नोकरीक लिलसामे मंत्रीक “अभिनन्दन” लिखएबला प्रोफेसरक दुर्दशाक खिस्सा मायानन्द मिश्रे टा लि‍ख सकैत छलाह। लक्ष्मीक आगू सरस्वतीक नत-मस्तक हएब आ राजनीतिक समक्ष योग्यता, कला-संस्कृतिक पराजयक बोध मायाबाबू करौलनि। मुदा प्रोफेसरक विवशताक आगूक चरण छल- प्रोफेसरक विद्रोह- भाव आ संघर्षशीलता, जे गुरु भइयो कऽ शिष्यक समक्ष प्रदर्शित नै कऽ पबैत छथि। पाठककेँ ई कथाकारोक वैचारिक सीमा बुझा सकैत अछि। अपन “भैरव” कथामे एकटा युवा कविकेँ एकटा एम.एल.ए.क “उपग्रह” (ओकर नारा सर्जकक रूपमे) चित्रित केलनि अछि मायाबाबू आ ओकरा विकृत यथार्थक स्थितिमे, ओही रूपमे छोड़ि, दुनूकेँ देखार करितो, यथास्थितिवाद लग ठमकि जाइ छथि। यएह “भैरव” “माध्यम” नामक कथामे “बीडिओक भैरव” (महादेवक भैरव) बनि कऽ अबैत अछि। “भैरव”मे युवा-कवि “माध्यम” बनि कऽ अबैत अछि आ “माध्यम”मे बीडिओ साहेबक चम्मच (भैरव) बनि कऽ अबैत अछि। दुनू कथा, खलनायकगण (मुख्य, गौण आ बिचौलिया) केँ देखार करितो “जनहितमे उपयोगी नै भऽ कऽ मात्र “साहित्य-हित”मे उपयोगी भऽ पबैत अछि, जे कला, मात्र कलाक लेल भऽ कऽ रहि जाइत अछि। कथाक उद्देश्य मात्र विकृतिक वा संस्कृतिक चित्रण टा नै होइत अछि। चित्रणकेँ समाधान-संकेतक चासनीसँ बोरबाक कला चाही। जइ कथाकेँ कथाकार जनमानसक संग जोड़ि पबैत अछि, से कथा चिरायु भऽ पबैत अछि। “नमकहराम” (जे कि “निमकहराम” हेबाक चाहैत छल)मे चौठियाकेँ “अगुरवान” बना कऽ सफलतापूर्वक परसल गेल अछि। मायाबाबूक शिल्प-शैली तँ कमालेक अछि। ओ व्यंग्यात्मक शीर्षक चुनैत छथि आ ताही भाषा-शैलीक उपयोग करैत छथि। व्यापारी वर्ग द्वारा आम जनताक प्रति कएल गेल निमकहरामीक चित्रण नीक जकाँ करैत सभ प्रकारक दुरभिसन्धिकेँ देखार करैत छथि। ई व्यापार तकनीक, व्यापार-समझौता, कालाबजारीक बीजमंत्र पाठक “भये प्रकट कृपाला”मे खुबे पढ़ैत अछि। बोगलाजीक मृत्यु-महत्ताक सजीव वर्णन करितो कथाकार बोगलाजीक शार्टकट रस्तासँ महा-उत्थानक जे अन्तर्कथा कहैत छथि- सएह कथाक प्राण थिक। व्यंग्यात्मक टोन पाठककेँ “बोर” हेबासँ बचबैत अछि। तहिना “दीन दयाला” राजनैतिक कुचक्र, मंत्री-मुख्यमंत्री, एम.एल.ए.-हाकिमक दुरभि संधि, भ्रष्टाचार-आवरण, योजना, ड्राइंग रूम मैनेजमेंट, पी.ए. टाइप लोकक पी.ए. गीरी आदि नव मुदा घृणित दुनियाँसँ मैथिली साहित्यकेँ परिचित करबितो, ओइ दुनियाँक प्रखर विरोध कथाकारसँ नै भऽ पबैत अछि। फेर “कौशल्या हितकारी” बनितो स्वास्थ्य-मंत्रीक “इस्तीफा” मात्र मूक-विरोध संकेतित कऽ पबैत अछि आ एकटा पड़ाइन-भावक प्रदर्शन कथान्तमे होइत अछि। कौशल्याक शील-हरण स्थायी-विद्रोहक सृष्टि नै कऽ पबैत अछि आ कएटा गर्भपाती क्रान्ति जकाँ शिथिल इतिहास दोहरा जाइत अछि। उपर्युक्त कथा सबहक प्रकाशन काल्हियो आ आइयो, संक्रान्तियेकाल थिक। भारतीय सामाजिक आ राजनैतिक-बेवस्‍था विकृतिक पराकाष्ठापर अछि आ समाज लहालोट भऽ रहल अछि। मुदा संगहि-संग विकृत-चेतना, सुसंस्कृत चेतना, विकृतिक प्रति जनमानसमे घृणा-भाव आ चेतन-लोकमे विद्रोह-भाव, सभ किछु एक्के संग अस्तित्वमे अछि आ विचारधाराक संघर्षक श्रृंखला सुस्पष्ट अछि। एहना स्थितिमे कला-चातुर्यसँ परिपूर्ण सक्षम कथाकारक दायित्व थिक जे यथास्थितिपर आनि कऽ कथा, पात्र वा पाठककेँ नै छोड़थि। हुनका नकारात्मक विकृतिक चित्रणमे अपन ऊर्जा नै खपा कऽ सकारात्मक बाट, नकारात्मक विकृतिक लहासक बीचसँ निकालबाक ईमानदार आ श्रमपूर्ण प्रयास करबाक छलनि। सकारात्मक चेतनाकेँ ऑक्सीजन देबाक काज साहित्यकारे टा करैत छथि। शेष संवर्गकेँ विधात्मक सीमा होइत छन्‍हि। मायाबाबूकेँ समस्त सामाजिक आ राजनैतिक विकृति बुझल छन्‍हि। हुनका पैघ दुनियाँसँ परिचए छन्‍हि। ओ अपनाकेँ मैथिली कथा-साहित्यक “त्रिपुण्डक” एकटा “पुण्ड” मानलनि अछि। मुदा ललित-राजकमलक विद्रोह-चेतना वा समकालीन सोचक टन-टन आवाज हिनका कथा साहित्यसँ लुप्तप्राय अछि। से आश्चर्यजनक आ सत्य सेहो अछि। अपन कथा सभमे प्लॉटक स्तरपर नव आ आधुनिक लगितो, कथ्य (थीम)क स्तरपर मायाबाबू कोनो तेहेन सन आगू नै जा पबैत छथि। मनोरम शिल्प, सुन्दर “ट्रीटमेन्ट” आ भाषाधिकार, कथा-कलाक मेंही-मेंही तत्वसँ सराबोर मायाबाबूक आकर्षक कथा-संसार, मिथिलाक नव पीढ़ीकेँ मात्र सुधारवादी-संशोधनवादी संदेश दऽ पबैत अछि आ कोनो नव रस्ता नै देखा पबैत अछि, जखनकि समकालीन वैचारिक मुख्यधारा मायाबाबूक पाठक आ नव-पीढ़ीकेँ पहिनहिसँ बुझल छै। मायाबाबूक कथामे तथाकथित “हरिजन नेता” वा एमेले, बड़जन-मुख्यमंत्रीक नाङरि बनि कऽ पाछू-पाछू चलैत अछि- “हा हुसैनक” मुद्रामे। ई बिहारक कांग्रेसी मंत्रीमण्डलमे होइते छल। डॉ. जगन्नाथ मिश्र अपना मंत्रीमण्डलमे कोनो-ने-कोनो बिलट पासवानकेँ रखिते छलाह। मायाबाबूक कथा-संसारमे नारी आ दलित-वर्गक मात्र दुर्दशेटा आएल अछि, से ओइ दिनक समए आ मायाबाबू दुनूक सीमा थिक। सेहो दुर्दशा-वर्णन गरिमायुक्त भऽ कऽ नै आएल अछि। मायाबाबूक कथा-कला प्रभासेजी जकाँ “धनीक” अछि। सेहो राजमोहन झाक “नागर-भाषा”मे नै, अपितु खाँटी “भाखा”मे। हिनकर कथा-लोक रमणीक आ रसगर चित्रणसँ भरल-पुरल अछि। वर्णन कखनो उस्सठ नै होइत अछि हिनकर। मिथिलाक पारिवारिक आ सामाजिक सम्बन्धक हिनका गहींर अवधारणा छन्‍हि- से कएटा कथा साबित करैत अछि। उपन्यासोमे से आएल अछि। हिनकर बहुआयामी व्यक्तित्व मिथिला-मैथिलीकेँ अत्यंत समृद्ध केलक अछि आ मैथिली-कथामे हिनकर अवदानकेँ कमजोर केलक अछि। हिनकर मंचीय व्यक्तित्व, गरिमाक प्रति तृष्णा, भोगक प्रति लालसा- हिनक कथाक प्रति परिश्रम, समर्पण आ अन्ततः कथाक धारकेँ भोथ केलक अछि। मैथिली आन्दोलनमे हिनकर संघर्षशीलता जेहेन रहल तेहेन संघर्षशीलता कथा लेखनमे द्रष्टव्य नै अछि, यद्यपि जइ कालखण्डमे ई कथा सभ लिखल गेल छल, तखन “नवीन” मानल गेल छल। मुदा आइ नवीन तत्व सबहक परीक्षण केलापर कथा सभ “रमणीक” बुझाइतो ततेक नव आ धरगर नै बुझाइत अछि। तहिना अभिव्यंजनाक काव्य-श्रृंखलाक कविता सभ खूबे “नवीन” मानल गेल छल। मुदा आधुनिकताक टन-टनाटन ध्वनि जे यात्री-राजकमलक काव्यमे आएल- से हिनक काव्यमे विलुप्तप्राय रहल। कथे जकाँ हिनकर उपन्यासोमे आधुनिकता आ पात्रक संघर्षशीलता कोनो तेहन जगजियार नै भऽ सकल। फेर हिनकर गीत, गीतल आ मंच-संचालनमे खूबे रस आ नवीनता अछि, मुदा सेहो मात्र शिल्प आ प्रयोगेक स्तरपर। वस्तुतः संघर्षशीलता आ जिजीविषा प्रायः सभ विधामे विलुप्तप्राय अछि। मायाबाबू अपना जीवनमे खूब सार्थक काज सभ केलनि अछि। हिनकर जीवनक उपलब्धिक प्रशंसनीय पथार लागल अछि। मुदा अपना समैक सीमाकेँ उपन्यास-कथा अथवा कवितोमे नै तोड़ि सकल छथि। ऐतिहासिक उपन्यासकेँ प्राचीने राष्ट्रवादी-गौरववादी दृष्टिकोणसँ लिखलनि अछि। कोनो आधुनिक संदर्भमे वैज्ञानिक मार्क्सवादी दृष्टिकोणसँ नहिए लि‍ख सकल छथि। मंत्रपुत्र, स्त्रीधन वा पुरोहितमे प्राचीन इतिहासक पुराने व्याख्या प्रस्तुत केलनिहेँ। प्राचीन भारत, प्राचीन समाज, पुरातन आ सनातन-बेवस्‍थाक प्रति हिनकर “नजरिया” पारम्परिक राष्ट्रवादी-गौरववादी-स्कूल जकाँ अछि, जइ स्कूलक यू.एन. घोषाल, के.पी. जायसवाल, आर.सी. मजूमदार, हेमचन्द्र रायचौधुरी, के.के.दत्त, राधाकृष्ण चौधरी, बाल गंगाधर तिलक आदि छलाह। ई लोकनि प्राचीन भारतक गौरव-बोधसँ ब्रिटिश साम्राज्यवादकेँ चकचोन्ही लगा कऽ निचैनसँ सूति रहैत छलाह आ इतिहासकेँ वैज्ञानिक पद्धतिसँ दूर कऽ मात्र “ब्रिटिश विरोधक औजार” मानैत छलाह। तकर बाद ऐतिहासिक यथार्थ सभ उपेक्षित भऽ जाइत छल। राजसत्ता आ प्राचीन-बेवस्‍थाक यशोगानक अलावे प्रजाक दुःख-दर्द इतिहास-लेखनक ऐ तंत्रमे नै छल। एहने पुनरुत्थानवादी जीर्ण-शीर्ण अवधारणा, जकरा रामचैतन्य धीरज वैज्ञानिक ब्राह्मणवाद कहै छथि, जकाँ, जँ उपन्यास-कथा लेखन हुअए तँ प्राचीन समाजकेँ नव सन्दर्भमे देखब असम्भव जकाँ भऽ जाइत अछि। इतिहासक घटना सबहक अध्ययन वा पात्र आ परिवेशक मनोरम चित्रण एक बात थिक आ वैज्ञानिक इतिहास दृष्टिसँ निष्कर्ष बहार कऽ समाजकेँ चेतना-सम्पृक्त करब दोसर बात थिक। इतिहास दृष्टिक विकास पाछू मुँहे नै होइत अछि आ ने हेबाक चाही। आगू मुँहे विकास ओ थिक जे रोमिला थापर, राम शरण शर्मा, डी.डी. कोशाम्बी, इरफान हबीब, डी.एन.झा, सतीश चन्द्र आदि इतिहासकारगण अपन-अपन कृति सभमे केलनि अछि। ओ लोकनि राजसत्ताक गौरव गाथाक उपेक्षा कऽ तत्कालीन समाजक अभग दशाकेँ देखार कऽ नव, जनवादी दृष्टिसँ ऐतिहासिक तथ्य सबहक परीक्षण आ तर्कसंगत व्याख्या केलनि आ प्राचीन इतिहासकेँ निस्सन वैज्ञानिकताक आधार देलनि। हिन्दी साहित्यमे इतिहास दृष्टि आधारित उपन्यास सभ बहुत प्रासंगिक बनल मुदा मैथिलीक ऐतिहासिक चेतना-सम्पृक्त उपन्यास पछुआएल विचारधारा आधारित भऽ गेल। ऐतिहासिक घटना सबहक नीक संयोजन, तथ्य, पात्र, संस्कृति-तत्व सभसँ परिपूर्ण रहितो, उपन्यास-तत्व आ कला-चातुर्यसँ धनीक रहितो, वैचारिक स्तरपर प्रगतिशील नै हेबाक कारणेँ “मंत्रपुत्र” अपन महत्वकेँ घटा लैत अछि, जखनकि एस.ए. डांगे “साधु समाजवाद”केँ तत्कालीन समाजक एक “यथार्थ” मानने छथि। ओना ई तथ्य मायाबाबूक पक्षमे जाइत अछि जे ऐतिहासिक उपन्यासक मामिलामे दरिद्र मैथिलीक भण्डारक श्रीवृद्धि ई उपन्यास करैत अछि। आब आगरिमो हमरा कोनो आशा नै अछि जे प्राचीन इतिहास आधारित अपन अन्य उपन्यासमे मायाबाबूक पात्र सभ प्राचीन बेवस्‍था विद्रोह धर्मक निर्वाह करत। आ ऐ बातक ग्लानि तँ अछिए जे “पुरोहित” आ “स्त्रीधन” मैथिलीक भण्डारसँ बाहरे रहल। वैदिक कालीन दासत्वपर मणिपद्मजीक “आदिम गुलाम” लेखकीय नजरिया आ माटिक प्रति प्रतिबद्धता प्रस्तुत केलक, से मंत्रपुत्रक “शास्त्रीय-एप्रोच” प्रस्तुत नै कऽ सकल। मायाबाबूक अपन कथा सभमे ऊपरी स्तरपर जे आधुनिक बुझाइत होथि, तेहेन वैचारिकताक स्तरपर प्रगतिकामी नै बुझाइत छथि। हुनकर वैचारिकता जहिना उपन्यासमे रहल तहिना कथोमे रहल, से स्वाभाविके छल। कोनो रचनाकार दू विधामे अलग-अलग विचारक हुअए, से ने तँ संभव अछि आ ने उचिते। व्यक्ति अपन जीवन, साहित्य आ सभ क्षेत्रमे प्रायः एक्के विचारधाराक रहए, सएह नीक आ सएह रहितो अछि। आ से नै रहलापर पकड़ाइयो जाइत अछि। मायाबाबू जे छथि से सभठाँ छथि- एक्के रंग। जीवनोमे रसगर, मंचोपर रसगर, उपन्यास-कथा-गीत-काव्य, सभठाँ “रसगर”। सभठाँ रमनगर वर्णन, सभ विधामे शिल्प-शैलीमे महारत प्राप्त। कला-चातुरी-युक्त सक्षम खेलाड़ी। सफलता प्राप्त करबाक बीज मंत्रक विशेषज्ञ। मुदा जीवनदर्शन आ वैचारिकतामे मयूरक पएर जकाँ सुखाएल। पुरान वैचारिकता, नृत्य-कौशल-प्रेमी दर्शककेँ मयूरक पएर देखाइ दैते झूड़-झमान बना दै छै। मायाबाबू यात्री-राजकमल-ललित-किसुनजीकेँ देखने-पढ़ने छलाह। किरणजीक परम्परा हुनका बुझल छलनि। तँए किछु बेसी अहू बिनुपर छल। हिनका “सोनाक नैया” रचए अबैत छलनि। “माटिक लोक”क सेहो हिनका परि‍चए छलनि। तँए माटिपर ठाढ़ लोकक जनवादी आ प्रगतिशील आँखिकेँ चीन्हि कऽ पात्र आ परिवेशक रचना करब अपेक्षित छल। कोनो साहित्यकारसँ आजुक लोक, समाज आ समए- ई आशा रखैत अछि। मुदा सर्वतोभावेन साहित्यिक सक्षमताक बावजूद “दरभंगिया इसकूलक” तेजगर छात्र बनबाक “दुर्घटना” हिनको संग भइये टा गेल। से मात्र वैचारिकताक कारणेँ। अन्यथा, “दड़िभंगा”क कएटा “गुरु-घंटाल”सँ कतओक आगू जएबाक प्रतिभा हिनकामे छल। मात्र अहीटा बातकेँ छोड़ि कऽ मायाबाबू अपना कालखण्डक एकटा अत्यंत सक्षम बहुआयामी साहित्यकार छथि आ अपन समैक मिथिला-मैथिल-मैथिलीकेँ अपन असंख्य योगदानसँ परिपूरित केलनि अछि आ कऽ रहल छथि। हुनकर ऊर्जा स्तुत्य अछि। मुदा ऊर्जाक “आउटपुट” कलाक चरमोत्कर्षपर होइतो, वैचारिक रूपेँ आलोच्य अछि। बहस- पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि मैथिली साहित्यक कारी अध्याय थिक- विदेह-सदेह-२ (२००९-१०)सँ पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि आ साइबर अपराधक पापक घैलक महा-विस्फोट भेल अछि। ई पैघ श्रेय पत्रिकाक सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुरकेँ जाइत छन्‍हि। हुनकर अपराध पकड़बाक चेतना केर जतेक प्रशंसा कएल जाए, कम हएत। “विदेह”क मैथिली प्रबन्ध-समालोचना- अंक, ऐ पोल-खोल लेल कएक युग धरि विलम्बित भऽ कऽ निबद्ध रहत, से “समैकेँ अकानैत” कहब कठिन अछि। साहित्योमे चौर्यकलाक उदाहरण पहिनौं अबैत रहल अछि गोटपगरा। मुदा एक बेरक चोरि पकड़ा गेलाक बाद प्रायः चोरिक आरोपी साहित्यकार मौन-व्रत धारण करैत रहलाह अछि आ मामिला ठंढ़ाइत रहल अछि। मुदा तइ परम्पराक विपरीत ऐबेरक चोर ‘सिन्हा चोर’ निकलल अछि आ विगत एक दशकसँ निरन्तर चोरि करैत जा रहल अछि- सेन्ह काटि कऽ। आ तेहेन महाचोरकेँ मैथिलीक साहित्यकार आ संस्था सभ तरहत्थीपर उठा-उठा कऽ पुरस्कृत केलक अछि आ समीक्षाक चासनीमे चोराएल कविता सभकेँ बोरि देल गेल अछि। विदेह-सदेह-२ प्रमाण-पुरस्सर अभियोगे टा नै‍ लगौलक, अपितु एहेन महत्वाकांक्षी असामाजिक तत्वक विरुद्ध साहित्यिक दण्ड आरोपित कऽ अपन “बोल्डनेस” सेहो प्रदर्शित केलक अछि। एक दशकमे तीन बेर पकड़ाएल चोर प्रायः “डेयर डेभिल” होइत अछि आ अपन अनुचित सीमाहीन महत्वाकांक्षाक पूर्ति लेल अपन वरीय संवर्गीय व्यक्तिकेँ सीढ़ीक रूपमे उपयोग करैत अछि आ स्वार्थ-सिद्धिक उपरान्त अपन पएरसँ ओही सीढ़ीकेँ निचाँ खसा दैत अछि। फेर ओकरा अपन ट्विटर-फेसबुक-नेट वा पत्रिकामे गारि दऽ निकृष्टतम स्तरपर उतरएमे कनियों देरी नै‍ होइ छै। ओ नाओं बदलि-बदलि कऽ गारि पढ़ैत अछि आ अपन प्रशंसामे जे.एन.यू.क छात्र-छात्राक पोस्टकार्ड लिखेबामे अपस्याँत भऽ जाइत अछि। ओ हिन्दीक कोनो बड़का साहित्यकारक बेटीक संग अपन नाओं जोड़ि बि‍आहक वा प्रेम-प्रसंगक खिस्सा रस लऽ लऽ कऽ प्रचारित करैत अछि। एहेन प्रवृत्ति कएटा अओर तिकड़मबाजमे देखल गेल अछि जे हिन्दीक पैघ-पैघ नामक माला जपि कऽ मठोमाठ हुअए चाहैत अछि। वस्तुतः ई चिन्ताजनक तथ्य थिक जे मैथिलीक नव-तूरकेँ हिन्दीक पैघ-पैघ नामक वैशाखीक एतेक जरुरति किए होइ छन्‍हि? “विदेहक” “इनक्वायरीक विवरण” पढ़ि कऽ रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइत अछि। पहल-८६ आ आरम्भ-२३ मे जे पोल खूजल छल, ऐ तथाकथित साहित्यकारक, तकरा बादे मैथिली साहित्यसँ बारि देल जेबाक चाहैत छल। मुदा विडम्बना देखू जे चेतना समिति सम्मानित कऽ देलक। “मैथिल ब्राह्मण समाज”, रहिका (मधुबनी) सन अँखिगर संस्थाकेँ चकचोन्ही लागि गेल, जखनकि संस्थामे विख्यात साहित्यकार उदयचन्द्र झा “विनोद” आ पढ़ाकू प्रोफेसरगण छथि। ई संशय विहीन अछि जे पुरस्कृत करेबामे विनोदजीक महत्वपूर्ण भूमिका रहल हएत। “विदेह” द्वारा रहस्योद्घाटन केलाक बावजूद एखन धरि चेतना समिति अथवा मैथिल ब्राह्मण समाज, रहिकाकेँ अपन पुरस्कार आपस करेबाक वा आने कोनोटा कार्रवाइ करबाक बेगरता नै‍ बुझा रहल छै आ सर्द गुम्मी लधने अछि। एहेन “जड़-संस्था” सभ मैथिली साहित्यक उपकार करैत अछि वा अपकार? ई केना मानल जाए जे पहल-८६ वा आरम्भ-२३ ऐ दुनू संस्थाक कोनो अधिकारी वा साहित्यकारकेँ पढ़ल नै‍ छलनि? ई आश्चर्यजनक सत्य थिक जे मैथिलीक कएटा पैघ साहित्यकार पंकज पराशरक कृत्रिम काव्य आ आयातित शब्दावलीमे फँसि गेलाह अछि। “विलम्बित कएक युगमे निबद्ध”क भूमिकामे अनेरो विदेशी साहित्यकारगणक तीस-चालिसटा नाओं ओहिना नै‍ गनाओल गेल अछि, अपन कविताकेँ विश्वस्तरीय प्रमाणित करबाक लेल अँखिगर चोरे एना कऽ सकैत अछि। सम्भावना बनैत अछि जे डगलस केलनर जकाँ ओहू सभ कविक रचनाक भावभूमिक वा शब्दावलीक चोरिक प्रमाण अही काव्य-पोथीमे भेट‍ जाए। अंततः मि. हाइडक कोन ठेकान? मैथिलीमे तँ लोक विश्व-साहित्य कम पढ़ैत अछि। तकर नाजायज फएदा कोनो ब्लैकमेलर किए नै‍ उठाओत? आखिर टेक्‍नो-पोलिटिक्स की थिक- टेकनिकल पोलिटिक्स थिक, सएह किने? एकरा बदौलत झाँसा दऽ कऽ पाकिस्तानोक यात्रा कएल जा सकैत अछि। “टेक्‍नो-पोलिटिक्सक” बदौलत किरण-यात्री पुरस्कार, वैदेही-माहेश्वरी सिंह “महेश” पुरस्कार, एतेक धरि जे विदितजीक अकादमीयोक पुरस्कार लेल जा सकैत अछि। प्रदीप बिहारीक सुपुत्रक भातिज-कक्का सम्बन्धक मर्यादाक अतिक्रमण कएल जा सकैत अछि। प्रो. अरुण कमलक “नये इलाके में” सेंधमारी कऽ कऽ “समय केँ अकानल” जा सकैत अछि। आर तँ आर, ऐ टेकनिकल पॉलिटिक्सक बदौलत जीवकान्तजी सन महारथी साहित्यकारसँ “विलम्बित कएक युग...” पोथीक समीक्षा लिखबा कऽ “मिथिला दर्शन” (५) सन पत्रिकामे छपबा कऽ स्थापित आ अमर भेल जा सकैत अछि। मैथिली साहित्यक सभसँ पैघ सफल औजार थिक “टेक्‍नो पोलिटिक्स”! ई मानल जा सकैत अछि जे मिथिला दर्शनक सम्पादककेँ आरम्भ-२३ आ पहल-८६ कोलकातामे नै‍ भेटल होन्हि। मुदा जीवकान्तजी नै‍ पढ़ने हेताह से मानबामे असौकर्य भऽ रहल अछि। जीवकान्तजी तँ प्रयाग शुक्लक “चन्द्रभागा में सूर्योदय” आ एही शीर्षकक नारायणजीक कविता (चन्द्रभागामे सूर्योदय) सेहो पढ़ने हेताह जे छपल अछि मैथिलीमे। तखन पंकज पराशरक समुद्रसँ असंख्य प्रश्न पूछएबला कविताक भावार्थ किए नै‍ लगलनि जे समीक्षामे कलम तोड़ि प्रशंसा करए पड़लनि वा करा गेलनि? एकरा “प्रायोजित समीक्षा” किए नै‍ मानल जाए? की प्रयाग शुक्ल वा नारायणजीक समुद्र विषयक कवितासँ बेसी मौलिकता पंकज पराशरक कवितामे भेटलनि जीवकान्त जीकेँ? ओइ सभ कविताक कनियोँ “छाया”क शंको नै‍ भेलनि समीक्षककेँ? “सभ्यताक सभटा मर्मान्तक पुकार”क नोटिस लेबएबला समीक्षककेँ साहित्यिक चोरि असभ्य आ मर्मान्तक पीड़ादायक नै‍ लगलनि? आब जीवकान्तजी सन समीक्षकक “पोजीशन फॉल्स” भऽ जेतनि से अन्दाज तँ मिथिला दर्शनक सम्पादककेँ नहियें रहनि, उदय चन्द्र झा “विनोद” केँ सेहो नै‍ रहनि। ई अभिज्ञान तँ पंकजे पराशर टाकेँ रहल हेतनि? बेचारे “पराशर” मुनिक आत्मा स्वर्गमे कनैत हेतनि आ पंकसँ जनमल जतेक कमल अछि सभ अविश्वसनीय यथार्थक सामना करैत हेताह। पराशर गोत्री भऽ कऽ तीन बेर चोरि केनाइ “पराशर” महाकाव्यक रचयिता स्व. किरणजीकेँ सेहो कनबैत हेतनि। आखिर जीवकान्तजी साहित्यिक चोरिक नोटिस किए ने लेलनि, जखनकि हुनका विचारेँ “मैथिलीक समीक्षक प्रायः मूर्खता पीब कऽ विषवमन करैत अछि” (विदेह-सदेह-२-२००९-१०)/ विनीत उत्पल-साक्षात्कार आ जीवकान्तजी स्वयं पंकज पराशरक चोरिबला कविता-पोथीक समीक्षक छथि, अपितु चौर्यकला प्रवीण कविक घोर प्रशंसक छथि। तखन ऐ समीक्षा-आलेखमे अन्तर्निहित असीम-प्रशंसा साकांक्ष-पाठककेँ “विष-वमन” केना ने लगौक? हुनका सन “पढ़ाकू” समीक्षक-पाठककेँ “फॉल्स पोजीशन”मे अननिहार “एक्सपर्ट आ हैबिचुएटेड” साहित्य-चोरसँ प्रशंसा आ पुरस्कार दुनू पाबि जाए तँ मैथिली-काव्यक ई उत्कर्ष थिक वा दुर्भाग्य? अंततः विदेह-सदेहेटा किए निन्दा केलक ऐ‍ घटनाक? आन कोनो पत्रिका किए नै‍ केलक? डॉ. रमानन्द झा “रमण” इन्टरनेटपर निन्दा करैत छथि तँ घर-बाहर पत्रिकामे किए नै‍ जकर ओ सम्पादक छथि? चेतना समिति, पटना सम्मानित करैत अछि एहने-एहने साहित्यकारकेँ तखन अपने पत्रिकामे केना निन्दा करत, जखनकि पुरस्कार आपसो नै‍ लैत अछि, जानकारी भेलाक वा साकांक्ष साहित्यकारक अनुरोध प्राप्त भेलाक बादो? नचिकेताजी नेटपर निन्दा करताह आ “विदेह”मे छपत तँ “मिथिला दर्शन”मे किए नै‍ निन्दा वा सूचना छपल? कारण स्पष्ट अछि- जीवकान्तक समीक्षा पंकज पराशरक काव्य-पोथीपर छपत, तखन ओही पोथीक चोरि कएल कविताक निन्दा केना छपत? चारु भाग साहित्यिक आदर्श, मर्यादा आ नैतिकताक धज्जी उड़ि रहल अछि- पितामह आ आचार्यगणक समक्ष आ (अनजाने मे सही) हुनको लोकनि द्वारा। मैथिल समाज, रहिका; चेतना समिति, पटना आ साहित्य अकादेमी, नई दिल्लीमे अन्ततः कोन अन्तर अछि वा रहल? एहेन नामी पुरस्कारक संचालन आ चयनकर्ता महारथी सभकेँ नव लोककेँ पढ़बाक बेगरता किए नै‍ बुझाइत छन्‍हि? बिना पढ़ने पुरस्कारक निर्णए वा समीक्षाक निर्णए कतेक उचित, जखन कि ई चोरि तेसर बेरक चोरि थिक आ से छपि-कऽ भण्डाफोड़ भेल अछि। एकरा वरेण्य आ वरीय साहित्यकारगण द्वारा काव्य-चोरि, आलेख-चोरिकेँ प्रश्रय देल जाएब किए नै‍ मानल जाए, जखन कि आरम्भ, मैथिल-जन, पहल आ विदेह-सदेह पहिनहि छापि चुकल छल? की साहित्यिक चोरिकेँ प्रश्रय देब, दलाल वर्गकेँ प्रश्रय देब नै‍ थिक? एहेन सम्भावनायुक्त नव कविकेँ प्रश्रय देब मैथिली साहित्य लेल घातक अछि वा कल्याणकारी, जकरा मौलिकतापर तीन बेर प्रश्न चेन्ह लागल होइक? की पोथीक आकर्षक गत्ता देखि‍ वा विदेशी कविगणक नामावली (भूमिकामे) पढ़ि कऽ समीक्षा लिखल जाइत अछि वा पुरस्कारक निर्णए लेल जाइत अछि? जँ से भेल हुअए तँ सभ किछु “ठिक्के छै भाय”? ऐ सभसँ तँ जीवकान्त जीक बात सत्य बुझाइत अछि जे समीक्षकगण दारू पीब कऽ वा पैसा पीब कऽ वा मूर्खता पीब कऽ समीक्षा लिखै छथि। डगलस केलनरक “टेक्‍नो-पोलिटिक्स” तँ छपि गेल “पहल”मे चोरा कऽ। आब जीवकान्तजी, ज्ञान रंजनजी अथवा हिन्दी जगतक आन साहित्यकार-सम्पादकसँ पूछथु जे नोम चोम्स्कीबला रचना कतए गेल, की भेल, कोन नामें छपल? पंकज पराशरक नामें आकि प्रदीप बिहारीजीक सुपुत्रक नामेँ (अनुवाद रूपमे)। ई रिसर्च अखन नै‍ भेल तँ भविष्यमे पुनः एकटा साहित्यिक चोरिक पोल खूजत? अंततः एकटा माँछकेँ कएटा पोखरिकेँ प्रदूषित करए देल जाए आ से कए बेर? उदयकान्त बनि कऽ गारि पढ़बाक आदति तँ पुरान छन्‍हि डॉ. महाचोरकेँ। ककरो “सरीसृप” कहि सकैत छथि (मैथिल-जन) आ कोनो परिवारमे घोंसिया कऽ विष-वमन कऽ सकैत छथि। ऑक्टोपसक सभ गुणसँ परिपूर्ण डॉ. पॉल बाबाकेँ चोरिक भविष्यवाणी करबाक बड़का गुण छन्‍हि तँए हिनका नामी फुटबॉल टीम द्वारा पोसल जाइत अछि, जइ‍सँ “विश्व-कप”क दौरान ऐ “अमोघ अस्त्रक” उपयोग अपना हिसाबेँ कएल जा सकए। सहरसा-कथागोष्ठीमे पठित हिनकर पहिल कथाक शीर्षक छल- हम पागल नै‍ छी। ई उद्घोषणा करबाक की बेगरता रहै- से आइ लोककेँ बुझा रहल छै। अविनाश आ पंकज पराशरक मामाजी तहिया हिनकर कथाकेँ “टिप्पणीक”क्रममे मैथिली-कथाक “टर्निंग प्वाइंट” मानने छलाह। आइ ओ “टर्निंग प्वाइंट” ठीके एक हिसाबे “टर्निंग प्वाइंट” प्रमाणित भेल, कारण कथाक आेइ शीर्षकमे सँ “नहि” हटि गेल अछि, हिनकर तेबारा चोरिसँ। हिनकर पहिल चोरि (अरुण कमलक कविता- नए इलाके में)क निन्दा प्रस्तावमे “मामाजी” आ डॉ. महेन्द्रकेँ छोड़ि, सहरसाक शेष सभ साहित्यकार हस्ताक्षर कऽ “आरम्भ”केँ पठौने छलाह। आइ ओ हस्ताक्षर नै‍ केनिहार सभ कन्छी काटि कऽ वाम-दहिन ताक-झाँक करबाक लेल बाध्य छथि। द्वैध-चरित्र आ दोहरा मानदण्डक परिणाम सएह होइत अछि। अविनाश तखन तँ देखार भऽ जाइत छथि जखन ओ विदेह-सदेह-२ मे लिखैत छथि जे “एकरा सार्वजनिक नै‍ करबै”। नुका कऽ सूचना देबाक कोन बेगरता? पंकज पराशरसँ सम्बन्ध खराब हेबाक डर वा कोनो “टेक्‍नो-पोलिटिक्स”(?) केर चिन्ता? विदेह-सदेह-२क पाठकक संदेश तँ कएटा साहित्यकारकेँ देखार कऽ दैत अछि। जतए राजीव कुमार वर्मा, श्रीधरम, सुनील मल्लिक, श्यामानन्द चौधरी, गंगेश गुंजन, पी.के.चौधरी, सुभाष चन्द्र यादव, शम्भु कुमार सिंह, विजयदेव झा, भालचन्द झा, अजित मिश्र, के.एन.झा, प्रो. नचिकेता, बुद्धिनाथ मिश्र, शिव कुमार झा, प्रकाश चन्द्र झा, कामिनी, मनोज पाठक आदि अपन मुखर भाषामे प्रखरतापूर्वक निन्दनीय घटनाक निन्दा केलनि अछि, ततहि अविनाश, डॉ. रमानन्द झा “रमण”, विभा रानीक झाँपल-तोपल शब्द आश्चर्य-भावक उद्रेक करैत अछि। मुदा संतोषक बात ई अछि जे पाठकक “प्रबल भाव-भंगिमा” साहित्यकारोक “मेंहायल आवाज”क कोनो चिन्ता नै‍ करैत अछि। विभा रानी तँ कमाले कऽ देलनि। ऐठाम मैथिली भाषा-साहित्यक एक सए समस्या गनेबाक उचित स्थान नै‍ छल। ई ओनाठ काल खोनाठ आ महादेवक बि‍आह कालक लगनी भऽ गेल। कोनो चोर बेर-बेर अपन कुकृत्यक परिचए दऽ रहल अछि आ हुनका समए नष्ट करब बुझा रहल छन्‍हि आ चोरकेँ देखार केलासँ दुःख भऽ रहल छन्‍हि? ओ अपन प्रतिक्रियामे कतेक आत्मश्लाघा आ हीनभावना व्यक्त केलनि अछि से अपने पत्र अपने ठंढा भऽ कऽ पढ़ि कऽ बूझि सकै छथि। हिन्दीयोमे एहिना भऽ रहल अछि, तँए मैथिलीमे माफ कऽ देल जाए? आब हिन्दीसँ पूछि-पूछि कऽ मैथिलीमे कोनो काज हएत? विभारानी ज्योत्सना चन्द्रमकेँ ज्योत्सना मिलन केना कहै छथि? हुनकर उपेक्षा केना मानल जाए? ओ सभ साहित्यिक कार्यक्रममे नोतल जाइ छथि, सम्मान आ पुरस्कार पबै छथि, पाठक द्वारा पठित आ चर्चित होइ छथि। समीक्षाक शिकाइत की उच्चवर्णीय (?) साहित्यकारकेँ मैथिलीमे नै‍ छन्‍हि? समीक्षाक दुःस्थिति सभ जातिक मैथिली साहित्यकार लेल एक्के रंग विषम अछि। ओइमे जातिगत विभेद एना भेलए जे ब्राह्मण-समीक्षक, आरक्षणक दृष्टिकोणेँ निम्न जाति(?)क साहित्यकारक किछु बेसीए समीक्षा (सेहो सकारात्मक रूपेँ) केलनि अछि। समीक्षा आ आलोचनाक विषम स्थितिक कारणें जँ नैराश्यक शिकार भऽ जाए लेखक, तँ लेखकीय प्रतिबद्धताक की अर्थ रहि जाएत? विभाजीकेँ बुझले नै‍ छन्‍हि जे हुनका लोकनिक बाद मैथिली महिला लेखनमे कामिनी, नूतन चन्द्र झा, वन्दना झा, माला झा आदि अपन तेवरक संग पदार्पण कऽ चुकल छथि। हुनका ने कामिनीक कविता संग्रह पढ़ल छन्‍हि आ ने “इजोड़ियाक अङैठी मोड़”। हुनका अपन गुरुदेवक बात मानि हिन्दीमे जाइसँ के कहिया रोकलकनि? ओ गेलो छथि हिन्दीमे। मातृभाषाक प्रेरणा अद्वितीय होइ छै। मैथिलीक जड़ संस्था अथवा समीक्षक सभपर प्रहार करबामे हमरा कोनो आपत्ति नै‍, मुदा अर्थालाभ तँ एतए नगण्य अछिए। सामाजिक सम्मान विभाजीकेँ अवश्य भेटलनि अछि। समाजमे “जड़” लोक छै तँ “चेतन” लोक सेहो छै। हुनकासँ मैथिली भाषा-साहित्य आ मिथिला-समाजकेँ पैघ आशा छै, हीनभाव वा आत्मश्लाघासँ ऊपर उठि काज करबाक बेगरता छै। सक्षम छथि ओ। हुनका श्रेय लेबाक होड़सँ बचबाक चाही। अन्यथा साहित्य अकादेमी प्रतिनिधि, दिवालियापन केर शिकार जूरीगण आ मैथिलीक सक्षम साहित्यकारमे की अन्तर रहि जाएत? विभारानीक विचलनक दिशा हमरा चिन्तित आ व्यथित करैत अछि। ओ दमगर लेखिका छथि, सशक्त रचना केलनि अछि, आइ ने काल्हि समीक्षकगण कलम उठेबापर बाध्य हेबे करताह। समीक्षकक कर्तव्यहीनतासँ कतौ लेखक निराश हुअए? पंकज पराशरक श्रृंखलाबद्ध साहित्यिक चोरिपर सार्थक प्रतिक्रिया देब कोनो साहित्यकार लेल अनुचित नै‍ अछि कतौसँ। साहित्यकार लेल साहित्यिक मूल्यक प्रति ओकर प्रतिबद्धता मुख्य कारक होइत अछि आ हेबाको चाही आ तकरा देखार करबाक “बोल्डनेसो” हेबाक चाही। “चाही”बला पक्ष साहित्यमे बेसीए होइत अछि। एहेन-एहेन गम्भीर विषएपर साहित्य आ समाजक “चुप्पी” एहेन घटनाकेँ प्रोत्साहित करैत अछि आ जबदाह जड़ताकेँ बढ़बैत अछि, भाषा-साहित्यकेँ बदनाम तँ करिते अछि। जाधरि पंकज पराशरक चोरि-काव्यक समीक्षा लिखल जाइत रहत, विभारानीक मूल-रचनाक समीक्षा के लिखत? ककरा जरूरी बुझेतै? विभारानी अपने तँ समीक्षा प्रायोजित नै‍ करओती? सक्षम लेखकक व्यवहारोक अपन स्तर होइ छै। तँए संगठित भऽ चोरिक भर्त्सना हेबाक चाही। नवेन्दु कुमार झा १.रेल लाइनसँ जुड़त भारत आ नेपाल २. भारतीय सामाजिक बेवस्‍थामे आइयो जीवन्त अछि जाति बेवस्‍था- प्रो. शर्मा  ३.प्रदेशमे लागत चौदहटा नव उद्योग समूह, असोचैम कएलक ऐ‍ दिस पहल- मिथिलांचलमे सेहो लागत नव उद्योग १ रेल लाइनसँ जुड़त भारत आ नेपाल पड़ोसी देश नेपालक संग दोस्तीकेँ आर मजगूत करबाक लेल भारतीय रेल नेपालमे रेल लाइन बनाओत। एक दोसराक संग सहयोग बढ़ेबाक उद्देश्यसँ बनएबला ई रेल लाइन भारतमे मधुबनीक जयनगरसँ नेपालक बरदीवासक मध्य बनाओल जाएत। ई नव रेल लाइन सत्तरि किलोमीटरक हएत, जकर स्वीकृति रेल मंत्रालय दऽ देलक अछि। ऐ‍ नव रेल लाइन बनबऽ मे गोटेक चारि सौ सत्तरि करोड़ टाका खर्च हेबाक अनुमान अछि। एकर काज प्रारम्भ करबाक लेल मंत्रालय दस करोड़ टाका दऽ देलक अछि आ वित्तीय वर्ष २०११-१२ मे एकर काज प्रारम्भ भऽ जाएत। ई रेल लाइन दू चरणमे पूरा हएत। पहिल चरणमे जयनगर आ जनकपुरक मध्य तीस किलोमीटर छोटी लाइनक आमान परिवर्तन हएत आ दोसर चरणमे जनकपुरसँ बरदीवास धरि नव रेल लाइन बनेबाक काज प्रारम्भ हएत। नव रेल लाइनक वास्ते जमीन अधिग्रहणक काज जल्दीए प्रारम्भ हएत। २ भारतीय सामाजिक बेवस्‍थामे आइयो जीवन्त अछि जाति व्यवस्था- प्रो. शर्मा दरभंगा स्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयमे महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह स्मारक व्याख्यानमाला सम्पन्न भेल। ऐ‍ व्याख्यानमालाक मुख्य वक्ता राजस्थानक प्रतिष्ठित नेशनल ओपन यूनिवर्सिटीक कुलपति आ जानल-मानल समाजशास्त्री प्रो. के.एल. शर्मा कहलनि जे भारतीय सामाजिक व्यवस्थामे जाति व्यवस्था नियंत्रण बल अछि। श्री शर्मा कहलनि जे सामाजिक व्यवस्थामे आइयो जाति व्यवस्था प्रत्यक्ष आ जीवन्त अछि आ एकटा व्यवस्थाक रूपमे बदलाब अनबाक प्रयास करैत अछि। ओ कहलनि जे देशक राजनीतिक व्यवस्था सेहो जाति व्यवस्थाकेँ जीवन्त रखबामे महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कएलक अछि। वर्ष १८९१ सँ १९३१ धरि सरकारी स्तरपर जाति व्यवस्थाक श्रेणीकरणक काज कएल गेल। स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद १९५१ जनगणनामे जातिकेँ छोड़ि देल गेल मुदा एक बेर फेर राजनीतिक उद्देश्य आकि विवशताक अन्तर्गत जाति गणना करेबापर सहमति बनल अछि। ओ कहलनि जे सामाजिक परिवर्तनक संग-संग अहूमे बदलाव आएल अछि मुदा एकर बावजूद आइयो एकर सातत्व काएम अछि। व्याख्यानमालाक अध्यक्षता भारतीय प्रशासनिक सेवाक सेवानिवृत्त अधिकारी एस.एन.सिन्हा कएलनि। ३ प्रदेशमे लागत चौदहटा नव उद्योग समूह, असोचैम कएलक ऐ‍ दिस पहल- मिथिलांचलमे सेहो लागत नव उद्योग बिहारमे मुख्यमंत्री नीतीश कुमारक नेतृत्वबला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधनक दोबारा आपसीक संगहि देशक उद्योग जगतक नजरि बिहारपर पड़ल अछि। देशक औद्योगिक संगठन “एसोचैम”प्रदेशमे अगिला तीन वर्षमे तीनटा “बिजनेस मार्ट”क माध्यमसँ चारि लाख टाकाक निवेशक योजना बनौलक अछि। एसोचैम बिहार चेम्बर ऑफ कामर्स (बी.सी.सी.) आ बिहार इन्डस्ट्रीज एसोसिएशनक सहयोगसँ ई बिजनेस मार्ट आयोजित करत। पहिल बिजनेस मार्ट अप्रील २०११ मे हएत जइ‍मे पचास हजार करोड़ टाकाक निवेशक लक्ष्य राखल गेल अछि, जखनकि २०१३ मे आयोजित होमएबला दोसर मार्टमे एक लाख पचीस हजार करोड़ टाका आ वर्ष २०१५ मे आयोजित होमएबला तेसर मार्टक माध्यमसँ आर निवेशक लक्ष्य राखल गेल अछि। ई संगठन चेम्बर ऑफ कामर्स आ इन्डस्ट्रीज एसोसिएशनक सहयोगसँ चौदह टा नव उद्योग समूह दरभंगा, मुजफ्फरपुर, मधुबनी, बरौनी, कटिहार, भागलपुर, मुंगेर, सुपौल, हाजीपुर, पटना, नवादा, गया आ भोजपुरमे स्थापित करत, जइ‍मे सभ उद्योग समूहमे अठारह सौसँ दू हजार नव औद्योगिक इकाइ रहत। ऐ‍सँ सरकारकेँ गोटेक बारह प्रतिशत राजस्व भेटत। गोटेक चरि सौ पचास करोड़ टाकाक निवेशबला सभ प्रस्तावित उद्योग समूह गोटेक छह लाख लोककेँ परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूपसँ रोजगार उपलब्ध कराओत। एसोचैम सरकारसँ प्रदेशमे “क्लस्टर्स डेवेलपमेन्ट अथोरिटी”क स्थापनाक मांग सेहो कएलक अछि। डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र मिथिला चित्रकला (पेटिंग): भूत, वर्त्तमान आ भविष्य परिचय: ५००० वर्ष पुरान भारतीय संस्कृति अपन आगामी पीढ़ीक परंपरा, आधुनिकता आ मूल्य प्रणालीक संयोजनसँ युक्‍त दिव्य मस्तिष्क देलक, जे समयक गति, बेर बेर भेल विदेशी हमला आ जनसंख्यामे पैघ वृद्धिक बावजूदो नीकसँ राखल गेल अछि। ई हुनका लोकनि कें विशिष्ट व्यक्‍तित्व देलक। २० म सदी अनेको क्षेत्रमे महत्वपूर्ण रहल आ ऐ संबंधमे कलाक उल्लेख सेहो कएल जा सकैछ। २०म सदीमे बनल गीत, नाचक रूप, साहित्यिक काज आ कलाक काजमे नव अभिव्यक्ति आएल आ ई बात साबित भऽ गेल जे ई सदी नै केवल मानवक इतिहासमे महान रहल वरन नव आविष्कार आ तेज नवीकरणक अवधि सेहो रहल। जहनकि कलाक सभ रूप पर्याप्त उपलब्धि प्रदर्शित कएलक, सिनेमा, पॉप म्यूजिक आ टेलीविजन वृत-चित्र एहेन नव कलाक रूप सेहो आविष्कृत आ लोकप्रिय भेल। मिथिला चित्रकला (पेंटिंग ) जे मधुबनी चित्रकला (पेंटिंग) क रूपमे सेहो जानल जाइत अछि मूल रूपसँ ऐ क्षेत्रक सभ जाति आ समुदायक महिला द्वारा बनाओल जाइत अछि। ऐ देशक महिला अति प्राचीन समएसँ विभिन्न रूपक रचनात्मकतामे स्वयंकेँ संलग्न रखलनि। हुनक रचनात्मकताक सभसँ नीक चीज प्रकृति, संस्कृति आ मानव मनोवृत्तिक बीच सम्बन्ध अछि। ओ ओही सामग्रीक उपयोग केलनि जे हुनका लगपासमे पर्याप्त मात्रामे उपलब्ध छल। लोक चित्रकला आ कलाक आन रूपक माध्यमसँ ओ अपन इच्छा, सपना, आकांक्षाकेँ व्यक्‍त केलनि आ अपन मनोरंजन सेहो केलनि। ई समानान्तर साक्षरता थिक, जेकरा द्वारा ओ लोकनि अपन सौंदर्य विषयक अभिव्यक्तिकेँ व्यक्त केलनि। हुनक रचनात्मक कला स्वयंमे लिखनाइक शैली मानल जा सकैत अछि, जेकरा द्वारा हुनक भावना, आकांक्षा, वैचारिक स्वतंत्रता आदिक अभिव्यक्ति होइत अछि। हुनक पृष्ठभूमि, प्रेरणा, आशा, सौंदर्य विषयक सजगता, संस्कृति ज्ञान आदि हुनक सभ संभव कलामे व्यक्‍त भेल। हुनक कलाक विषयमे लिखबा आ गप्प करबासँ पहिने हुनक आंतरिक संस्कृतिक स्तर आ सिखबाक तरीकाक विषयमे जानब आवश्‍यक अछि। ई आलेख महिलाकेँ केन्द्र बिन्दुमे राखि कऽ लिखल गेल अछि। ऐ देशक कोनो क्षेत्र महिला रचनात्मकतासँ फराक नै अछि। हम पंजाबमे फ़ुलकारी, गुजरातमे वारली, लखनऊमे चिकन कशीदाकारी, उत्तरमे बुनाइ, बंगालमे कंथा, राजस्थानमे लघु चित्रकला, बिहारक मिथिला क्षेत्रमे सुजनी आ केथरीक रूपमे मिथिला चित्रकला (पेंटिंग) क उदाहरण देखै छी। मिथिला पेंटिंग ऐ क्षेत्रक महिला लोकनिक जीवंत रचनात्मक काज अछि। ई मुख्यत: मिथिलाक ग्रामीण महिला द्वारा कागज, कपड़ा, बनल-बनाएल पोशाक आदिपर चित्रित कएल गेल प्रसिद्ध लोकचित्र अछि। मूलत: ई मुसलमान सहित सभ जाति आ समुदायक महिला द्वारा प्राकृतिक रंगसँ देबार आ सतहपर बनाओल गेल लोकचित्र थिक। बादमे किछु लोक ऐमे रूचि लेलनि आ महिला लोकनिकेँ अपना कलाकें देबार आ सतहक अलावा कैनवासपर उतारबाक प्रेरणा देलनि आ ऐ रूपमे ऐ कलाकें कला जगतमे आ बाजारमे पहचान भेटलै। ऐ लोक कलाक अपन इतिहास, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, महिलाक एकाधिकार आ विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान अछि। मिथिला कतए अछि? ऐ भूमिक सांस्कृतिक आ ऐतिहासिक महत्व की अछि? ई कला मिथिलामे विशेष रूपें किए अछि? ऐ कला रूपक विषयमे किछु लिखबासँ पहिने ऐ प्रश्‍न सभक उत्तर अपेक्षित अछि। भारतक पैघ शहर आ आधुनिक दुनियासँ दूर एक सुंदर क्षेत्र अछि जे कहियो मिथिलाक रूपमे जानल जाइत छल। ई पूर्वी भारतमे स्थापित पहिल राज्य छल। ई क्षेत्र उत्तरमे नेपाल, दक्षिणमे गंगा, पश्‍चिममे गंडक आ पूबमे बंगाल धरि पसरल मैदानी भाग अछि। वर्तमान बिहारक चंपारण, सहरसा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, सुपौल, समस्तीपुर, मुंगेर, बेगूसराय, भागलपुर आ पूर्णियाँ जिलाक भाग मिथिला अछि। ई पूर्णत: समतल अछि। एकर माटि दोमट अछि जे गंगा नदी द्वारा आनल गेल अछि। यदि मानसूनमे विलंब भेल या कम वर्षा भेल तँ फसलमे रूकावट अबैत अछि। लेकिन यदि पानिक देवताक कृपा भेल तँ पूरा मैदान हरियरे हरियर रहैत अछि। मधुबनी पेंटिंगक हृदय स्थली अछि। ऐ क्षेत्रक सघन हरियाली प्राचीन दर्शक लोकनिकें ततेक आकर्षित कएलक जे ओ ऐ क्षेत्रकेँ मधुबनी (मधुक जंगल) कहलनि। आब ई जिला पेंटिंगक लेल सभसँ बेसी जानल जाइत अछि। ऐ पौराणिक क्षेत्रमे राम (अयोध्याक राजकुमार आ विष्णुक अवतार) सीतासँ बियाह केलनि। सीताक जन्म हुनक पिता जनक द्वारा हर (हल) जोतबाक समए भेल। मिथिला ओ पवित्र भूमि अछि जतए बौद्ध धर्म आ जैन धर्मक संस्थापक आ संस्कृत शिक्षाक छह परंपरागत शाखाक विद्वान जेना कि याज्ञवल्क्य, वृद्ध वाचस्पति, अयाची मिश्र, शंकर मिश्र, गौतम, कपिल, सचल मिश्र, कुमारिल भट्ट आ मंडन मिश्रक जन्म भेलनि । १४ म सदीक वैष्णव कवि विद्यापतिक जन्म मिथिलामे भेल जे अपन पदावलीक माध्यमसँ ऐ क्षेत्रमे राधा आ कृष्णक बीचक संबंधक व्याख्या करैत प्रेम गीतक नव रूपकेँ अमर बना देलनि। ईएह कारण अछि जे लोक हुनका जयदेवक पुनर्जन्म रूपमे (अभिनव जयदेव) स्मरण रखलक। कर्णप्योर (बंगालक एकटा शास्त्रीय संस्कृत कवि) अपन प्रसिद्ध भक्‍तिमय महाकाव्य "पारिजात हरण"मे मिथिलाक लोकक विद्वताक चित्रण केलनि। कृष्ण अमरावतीसँ द्वारका जेबाक मार्गमे ऐ भूमिक ऊपरसँ उड़ैत काल सत्यभामासँ कहलनि, "कमलनयनी! देखू ई मिथिला थिक, जतए सीताक जन्म भेल। एतए विद्वान लोकनिक जीहपर सरस्वती सगर्व नचैत छथि (मिश्र, कैलाश कुमार २०००) "। मिथिला एकटा अद्‍भुत क्षेत्र अछि जतए कला आ विद्वता, लौकिक आ वैदिक व्यवहार दुनू पूर्ण सौहार्द्र सहित संग संग चलैत अछि । पृष्ठभूमि: भारतक विविधता जेकाँ एकर लोक कला ऐ देशक बहुविध संस्कृतिकेँ विभिन्न रंग द्वारा प्रदर्शित करैत अछि। ई कला (पेंटिंग) लोक कलाक समुद्रक रूपमे मानल जाइत अछि, जइमे प्राचीने समएसँ लोकप्रिय कला रचना भारतीय उपमहाद्वीपक हर भागसँ अबैत रहल। भारतक कला मध्य मिथिला पेंटिंगक अपन महत्वपूर्ण स्थान अछि। मिथिलामे महिला देबार, सतह, चलायमान वस्तु आ कैन्वसपर पेंटिंग करैत छथि, माटिसँ देवता, देवी, जानवर आ पौराणिक पात्रक प्रतिमा बनबैत छथि; सिक्‍की घाससँ टोकरी, छोट-छोट बर्तन आ खिलौना बनबैत छथि, केथरी आ सुजनी बनेबाक रूपमे कशीदाक काज करैत छथि, विभिन्न तरहक धार्मिक आ काजक चीज बनबैत छथि। ई कलाक काज महिला द्वारा दैनिक काजक रूपमे कएल जाइत अछि, जे हुनका पूर्ण रचनात्मक व्यक्ति, एकटा गायक, मूर्तिकार, चित्रकार, कशीदाकार आ सभ किछु बनबैत अछि। पीढ़ी दर पीढ़ी मिथिलाक महिला विभिन्न विशिष्ट पेंटिंग बनेलनि अछि। चर्चा: मिथिलामे सामान्यतया पेंटिंग महिला द्वारा तीन रूपमे कएल जाइत अछि: सतहपर पेंटिंग, देबारपर पेंटिंग आ चलायमान वस्तुपर पेंटिंग। प्रथम श्रेणीमे अरिपन अबैत अछि जे सतहपर अरबा चाउर (कच्चा चावल) क लईसँ बनाएल जाइत अछि। सतहक अलावा एकरा केरा आ मैना पात आ पीढ़ीपर सेहो बनाओल जाइत अछि। एकरा दहिना हाथक आंगुरक प्रयोगसँ बनाओल जाइत अछि। तुसारी पूजा (कुमारि लडकी द्वारा नीक पतिक कामनासँ शिव आ गौरीकेँ प्रसन्न करबाक लेल त्योहार) क अरिपन उज्जर, पीअर आ लाल रंगक चाउरक चूर्णसँ बनाओल जाइत अछि। विभिन्न अवसरक लेल विभिन्न तरहक अरिपन होइत अछि। अष्टदल, सर्वतोभद्र आ स्वास्तिक एकर मुख्य प्रकार अछि। देबार परहक पेंटिग अनेको रंगक होइत अछि। ऐ मे मुख्यत: तीनसँ चारि रंगक प्रयोग होइत अछि। ऐ मे नयना जोगिन, पुरैन, माँछक भार, दही, कटहर, आम, अनार आदिक गाछ आ चिड़ै जेना सुग्गाक चित्र बनाओल जाइछ। चलायमान वस्तुपर पेंटिंगमे शामिल अछि माटिक बरतन, हाथी, सामा-चकेबा, राजा सलहेस, बाँसक आकृति, चटाइ, पंखा आ सिक्‍कीसँ बनल वस्तु। ऐमे सँ कतेक पेंटिंग तांत्रिक महत्वक अछि। विवाह समारोहक दौरान किछु अवैदिक प्रथाक सेहो पालन सिर्फ महिला द्वारा कएल जाइत अछि जेना ठक-बक, नयना-जोगिन आदि, जे मिथिला तंत्रसँ संबंधित अछि। देवार परहक पेंटिंग आ सतह परहक पेंटिंग जे घरकेँ सुन्दर बनेबाक लेल आ धार्मिक उद्देश्‍यसँ कएल जाइत अछि, महाकाव्य युगसँ चलि रहल अछि। तुलसीदास अपन महान काव्य रामचरितमानसमे सीता आ रामक बियाहक अवसरपर कएल गेल मिथिला पेंटिंंगक वर्णन केलनि अछि। राम आ सीताक सुंदर जोड़ीसँ प्रभावित भऽ कऽ गौरी बियाहक समारोहमे भाग लेलनि आ कोहबरक चित्रण करए चाहलनि, जतए सुमंगलीककें ऐ आदर्श जोड़ीक लेल गीत आ संबंधित विध-व्यवहार करक छलनि। ऐ चित्रणमे परंपरागत चित्र, हिन्दू देवी- देवताक चित्र आ स्थानीय जीव-जन्तु आ वनस्पतिक चित्र बनाओल जाइत अछि। महिला कलाकार ऐ कलाक एकमात्र अभिरक्षक छथि, जे ई चित्रण करै छथि आ पीढ़ी दर पीढ़ी ई माय सँ बेटीकेँ हस्तांतरित भऽ जाइत अछि। ओ ऐ कलारूपकें प्राचीन समयसँ बचा कऽ रखने छथि। लड़की ब्रश आ रंगसँ नेनेसँ काज करब शुरू करैत छथि जेकर पराकाष्ठा कोहबरमे देखल जा सकैछ। बियाहसँ संबंधित सभ धार्मिक समारोह कोहबरमे होइत अछि। अहिवातक पातिलकेँ चारि दिन लगातार जरा कऽ राखल जाइत अछि। मिथिला पेंटिंग (मधुबनी पेंटिंग) क वर्तमान रूप देबार पेंटिंग, सतह पेंटिंग केर कागज आ कैंपसपर रूपांतरण थिक। ई प्रयोग बहुत पुरान नै अछि। २०म सदीक साठिक दशकमे भयंकर अकालक चुनौतीक सामना करक लेल महिलाक लेल काजक अवसर निमित्त किछु महिला लोकनि देबार आ सतह परहक अपन कलाकें कागज या कैनवसपर उतारब शुरू केलनि। प्रारंभमे एकरा देखऽबला कम लोक छल परन्तु बादमे ऐमे वृद्धि भेल। ऐ काजमे महिला लोकनिकें खूब सफलता भेटल आ व्यवसायक एकटा नव मार्ग खूजल। तइ समयसँ पेंटिंगमे विविधता आएल अछि। देबार पेंटिंगकेँ हाथसँ बनल कागजपर हस्तांतरित कएल गेल आ धीरे-धीरे ई आन स्थान यथा ग्रीटिंग कार्ड, ड्रेस, सनमाइका आदिपर सेहो उतरल। नीक चित्रांकन, चमकदार स्वदेशी रंग, सभ संभव स्वदेशी प्रयोग आदिसँ पूरा दुनियाक दर्शक आकर्षित भेलाह। प्रारंभमे किछु ब्राह्मण महिलाकें ऐ कला कर्मक अवसर देल गेल परन्तु १० वर्षक बाद किछु कायस्थ महिला एक नव रीतिक संग ऐ क्षेत्रमे एलीह। एखन धरि हरिजन महिला ऐ क्षेत्रमे नै आएल छलीह। सीता देवी मिथिला पेंटिंगक ब्राहमण स्टाइलकें आगाँ बढ़ेलीह। ऐ मे मुख्यत: कोहबर आ देवी देवताक चित्र छल। बौआ देवी आ हुनक बेटी सरिता सेहो ऐ क्षेत्रमे अपन पर्याप्त योगदान देलनि। कायस्थ महिला ऐ क्षेत्रमे सेहो आगाँ अएलीह आ सतरिक दशकमे हुनक पहचान बनल। ओ लोकनि गाम आ धार्मिक दृश्‍यकेँ पेंटिंगमे स्थान देलनि। गंगा देवी, पुष्पा कुमारी, कर्पूरी देवी, महासुन्दरी देवी आ गोदावरी दत्त प्रमुख कायस्थ महिला कलाकार छलीह। ऐ दुनू वर्गक महिला कलाकार लोकनिक प्रयाससँ मिथिला कलाकें मूर्त रूप भेटल। तेसर समूह हरिजन महिलाक १९८० क दशकमे आगाँ अएलीह। दुसाध आ चमार जातिक महिला लोकनि परंपरागत पेंटिंगक प्रयोग अपन धार्मिक काज आ घरवार सजेबाक लेल करैत छलीह। ओ लोकनि गोदना आ अन्य चमकदार रंगक प्रयोग अपन पेंटिंगमे करए लगलीह। बादमे ऐमे लाइन, तरंग, वृत आदि सेहो जुड़ि गेल। जमुना देवी आ ललिता देवी प्रसिद्ध हरिजन कलाकार भेलीह । ओ लोकनि पेंटिंगमे दैनिक जीवनक वस्तु जातक सेहो चित्रण करए लगलीह। आब तँ सभ जातिक लोक ऐ कलाक उपयोग जीविका अर्जन निमित्त करै छथि। सभ कलाकर लोकनि रंगक लेल मुख्यतया प्रकृतिपर निर्भर करैत छथि। ओ लोकनि माटि, छाल, फूल, जामुनसँ कतेको प्राकृतिक रंग निकालैत छथि। रंग मुख्यत: लाल, नीला, हरिअर, कारी, हल्का पीअर, गुलाबी आदि होइत अछि। प्रारंभमे घरमे बनाओल गेल रंगसँ काज चलैत रहल तथापि ऐ विद्यासँ प्राप्त रंगक मात्रा कम होइत छल आ तें महिला लोकनि बाजारमे उपलब्ध रंगक प्रयोग करब सेहो शुरू केलनि। कोहबरक चित्रांकन पौराणिक, लोकगाथा आ तांत्रिक प्रतीकपर आधारित अछि। कोहबरक चित्रण नव जोड़ाक आशीषक निमित्त कएल जाइछ। ऐ पेंटिंगमे सीताक बियाह या राधा कृष्णक चित्रांकन अछि। शक्‍ति भूमि हेबाक कारणें मिथिला पेंटिंगमे शिव, शक्‍ति, काली, दुर्गा, हनुमान, रावण आदिक चित्रण सेहो भेटैत अछि। उर्वरता आ संपन्नता प्रतीक यथा माछ, सुग्गा, हाथी, काछु, सूरज, चन्द्रमा, बाँस, कमल आदिक चित्रांकन प्रमुखतासँ होइत अछि। ऐ पेंटिंगमे देवताक स्थान बीचमे आ हुनक प्रतीक, वनस्पति आदिक स्थान पृष्ठभूमिमे रहैत अछि। वाणिज्यीकरणसँ ऐ कलाकें नोकसान पहुँचल अछि। महिला आ पुरूष ऐ कलाकेँ शहर आ नगरक बाजारसँ सीखि रहल छथि। प्रशिक्षण देनिहार स्वयं ऐ कलाक तत्व आ सौंदर्यसँ अनभिज्ञ छथि। किछु गोटा तँ रंगक संयोजीकरण, प्रकृति सँ एकर प्राप्ति, पृष्ठभूमिक निर्माण, लय, रंग, गीत, विधि, नृत्यसँ एकर संबंध आ पेंटिंगक ढंगसँ सेहो अपरिचित छथि। पेंटिंगक विषय बा डिजाइन आब अधिकांश मामिलामे खरीददार द्वारा निर्णीत होइत अछि। खरीददार केन्द्रित पहल ऐ महान कला रूपक रंग, डिजाइन, मूल, संवेदना आदि पर खतरा अछि। हम देखै छी जे तांत्रिक पेंटिंगक नामपर महिला मिथिलाक परंपरासँ बहुत अलग किछु बनाबै छथि। वाणिज्यिकरणसँ बहुतो पुरूष कलाकार सेहो ऐ मे रुचि लेब शुरू केलनि अछि। ओ ऐ मे महिलाक महत्वकें बुझने बिना पेंटिंग करै छथि। ओ मिथिला पेंटिंगक नामपर खरीदनाहरक जरूरतिक मोताबिक किच्छो पेंटिंग करक लेल तैयार रहै छथि। लेकिन जहन हम लोक आ परंपरागत पेंटिंगक रूपमे मिथिला पेंटिंगक गप करै छी, जे धार्मिक अवसरपर बनाओल जाइछ या भारतक कोनो धार्मिक पेंटिंगक गप करै छी तँ हम देखै छी जे ऐ मे कतेको कार्यकलाप जुड़ल अछि। ई संयोजन वस्तुत: कलाकें विशेष महत्व दैत अछि। अवधारणा आ अनुभवक आधारपर देखलासँ सभ स्थानीय, क्षेत्रीय, अखिल भारतीय आ भारतसँ बाहर कलाक अभिव्यक्ति आंतरिक मनसँ उभरैत देखाइत अछि आ ई जीवनक एकटा अभिन्न अंग अछि। पेंटिंग, गीत, नृत्य, कविता आ आन कार्यात्मक चीजकें पौराणिक कथा, धार्मिक रीति, त्योहार आ संस्कारसँ अलग कऽ कऽ नै देखल जा सकैत अछि। जहन एकटा पेंटर देबार या सतहकें पेंट करैत रहैत छथि तँ अन्य महिला लोकनि गीत गाबि कऽ हुनका मददि करैत छथिन। लोक कथासँ लेल गेल ज्ञान सेहो हुनका पेंटिंगक लेल विषय प्रदान करैत अछि। तांत्रिक पेंटिंग वस्तुत: मधुश्रावणीक कथापर आधारित अछि। आ एहिना पेंटिंग आ आन कलाक संबंध कतेको लोक कलासँ अछि। एकटा महिला जहन देबालपर चित्रांकन करैत छथि तँ ओ कतौसँ आर्थिक लाभक आशा नै करैत छथि। तथापि जहन ओ अपन पेंटिंगकेँ बेचबाक लेल बनबै छथि तँ हुनक पूरा ध्यान संस्कृतिसँ ग्राहक दिस चलि जाइत अछि। तहन ओ परंपराकेँ जीवित रखबाक लेल पेंटिंग नै करै छथि, वरन जीविकाक लेल पेंटिंग करै छथि। मिथिलासँ जीविकाक निमित्त सतत पलायन सेहो ऐ पेंटिंगकेँ बाहर अनलक अछि आ बाजारमे एकरा नव खरीददार भेटलैक अछि। किछु चित्रकार अर्थात कर्पूरी देवी, गंगा देवी आ जमुना देवी अपन खरिददारक जरूरतक अनुसार पहल केलनि अछि। गंगा देवी अपन पेंटिंगमे रामायण चित्रकेँ उतारि लेलनि अछि। गंगा देवी मधुबनीसँ अपन यात्रा शुरू केलनि। ओ इलाजक निमित्त दिल्ली एलीह। ओ अपन पेंटिंगमे रेलगाड़ी, डॉक्टर, अस्पताल, सीरिंज, मेडिकल वार्ड सभ किछुक चित्रांकन केलनि। हुनक पहल अनेको तरहसँ विशिष्ट छल। किछु लोक हुनक आलोचना केलनि जे ऐ सँ मिथिलाक लोक चित्रांकनक हानि हएत, तथापि बहुतो लोक हुनक समर्थन केलनि। जमुना देवी आ हुनक भाइ मितर राम चमकीला रंगक स्टाइलक विकास केलनि, जेकर बराबरी मिथिला कलामे नै अछि। ओ स्वयंभू कलाकार छथि आ जानवर जेनाकि गाय आदिक चित्रणसँ आनंदित होइ छथि। हुनक चित्रण परिपाटीसँ स्वतंत्र अछि। तथापि ओ रंगक प्राप्ति, कैनवासक पृष्ठभूमिक निर्माण, सजीव चित्रांकन आदिमे परंपराक पालनक प्रति दृढ़ छथि। ई चित्रकार लोकनि भूकंप, नदी आ आन कोनो वस्तुक चित्रांकन करै छथि, जे ग्राहक हुनकासँ चाहैत अछि। जितवारपुर आ राँटी गाममे मिथिला पेंटिंग वाणिज्यिक कार्यकलापक रूपमे उभरल अछि। जहन हम हालेमे जितवारपुर गेलौं तँ देखलौं जे जमुना देवी १५ सँ बेसी छात्रकेँ, जे हरिजनसँ लऽ कऽ ब्राह्मण परिवारसँ छल, पढ़बैत छलीह। पुछलापर ओ उत्तर देलनि, "हम एकरा सभकेँ माय जेना पढ़बैत छिऐ। ई सभ ऐठाम अपन घर जेकाँ अनुभव करैत अछि। हम एकरा सभसँ कोनो फीस नै लै छिऐ। अगर हम फीस लेबै तँ हमर कला गंदा भऽ जाएत। सभसँ उत्तम पुरस्कार हमरा लेल ई अछि जे जहन कोनो ब्राह्मण लड़की अपन प्रशिक्षण पूरा केलाक बाद हमर पएर छुबैत अछि तँ हम ओकरा हृदयसँ आशीष दै छिऐ आ एकटा प्रमाणपत्र सेहो दै छिऐ।" मिथिला पेंटिंग कलासँ ऊपर अछि। ऐ रचनात्मक क्षमतासँ महिलाक एक समूह अपन इच्छा, सपना, आकांक्षा, आशा आदिकें व्यक्त करै छथि। यदि अहाँ हुनकासँ पुछबनि जे की कऽ रहल छी तँ उत्तर भेटत "गहबर या कोहबर लीखि रहल छी"। हुनका लोकनिक लेल हुनक स्टाइल एक तरहक लिपि थिक, जेकरा माध्यमसँ ओ पुरुष समुदाय या दुनियाक बाँकी लोकसँ संवाद करै छथि। ओ कलात्मक लेखक छथि जे अपन भावनाकेँ पेंटिंगक माध्यमसँ लिखै छथि। वस्तुत: ओ सृजनकर्ता आ ईश्वरक समीप छथि। आर्थिक युगक कारणें यद्यपि किछु पुरुष-पात सेहो ऐ क्षेत्रमे उतरलाह अछि, परंतु मूलत: आइयो ई महिलाक रचना थिक। निष्कर्ष: यदि भरत नाट्यम, मणिपुरी, कुचीपुड़ी, ओडिसी आ सतरिया नृत्यकेँ मूल रूपमे रखैत दिनानुदिन लोकप्रिय कएल जा सकैत अछि, तँ ऐ महान लोक-चित्रकलाकेँ मूल रूपमे किए नै राखल जा सकैत अछि? कला वस्तुकेँ बेचनाइ खराब नै थिक, तथापि खरीददारक समक्ष कलाक संपूर्ण परंपरागत रचनात्मकता आ मूल्यक समर्पण ठीक नै थिक। मिथिला पेंटिंगकेँ मूल रूपमे बचा कऽ रखबाक लेल गंभीर चिन्तनक आवश्यकता अछि। अन्वेषणकर्ता, गएर सरकारी संगठन, पेशेवर लोक कलाकार आ संबंधित व्यक्तिकेँ ऐ कलाक मौलिकता बचेबाक लेल एकजुट भऽ जेबाक चाही। यायावरी हॉफलोंग हमर एक बंगाली मानवशास्त्री मित्र छथि। हुनकर नाम छन्हि डॉ. अभिक घोष। बहुत समर्पित लोक। अपन विषय मानव-विज्ञानक प्रति घोष साहेबकेँ अगाध प्रेम छन्हि। आइ-काल्हि पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़मे मानव-विज्ञान पढ़ा रहल छथि। झारखण्डक मुण्डा जनजातिपर पी.एच.डी. केने छथि। हालेमे घोष साहेब हमरा लग हमर पुत्र शशांककेँ देखबाक हेतु दिल्ली आएल छलाह। हुनकासँ हम अपन नॉर्थ कछार हिल्स केर यात्राक सम्बन्धमे चर्चा केलौं। ओ बहुत प्रसन्न भेलाह। कहलन्हि “कैलाशजी, हमर पत्नी उत्तर-पूर्व भारतक छथि। ओ हमेशा हॉफलोंग केर प्रशंसा करैत रहै छथि। हालेमे हम एक संगोष्ठीमे भाग लेबाक हेतु कलकत्ता गेल रही। ओतए सेहो हॉफलोंग केर प्रसंग चललै। कलकत्तामे बंगालक एक प्रसिद्ध पत्रकार अमिताभ चक्रवर्ती हमरा कहलन्हि जे नॉर्थ कछार हिल्स भारतक स्वीटजरलैण्ड थीक”। डॉ अभिक घोषक ऐ बातपर हम कहलियन्हि “अभिकजी, हमरा अइ बातक जानकारी दिअ, की अमिताभ चक्रवर्ती अरुणाचल प्रदेशक तवांग गेल छलाह”? “हँ हँ, अनेको बेर”। अभिक फटाकसँ बहुत आत्मविश्वासक संग हमर प्रश्नक उत्तर देलन्हि। फेर ओ ऐ बातकेँ स्पष्ट करए लगलाह, “देखू। दुनू स्थानक अपन-अपन महत्व छै। तैँ तुलना करब उचित नै। पुनःश्च हम तवांग गेल छी, परन्तु नॉर्थ कछार हिल्स जएबाक अवसरसँ एखन धरि वंचित छी। तैँ ऐ सम्बन्धमे कुनो टिप्पणी करब यथोचित नै”। हमरा दिस मुँह कए आँखिक भंगिमाकेँ हमरापर शत-प्रतिशत केन्द्रित करैत डॉ अभिक घोष हमर ध्यानकेँ अपन कथ्यपर आकर्षित करैत कहलाह, “कैलाशजी, अहाँ ऐ विषयपर सोचबाक लेल एवं निर्णय लेबाक लेल सही आदमी छी। कारण अहाँ दुनू स्थान-तवांग आ नॉर्थ कछार हिल्स- केर चप्पा-चप्पा घुमल छी”। हम डॉ अभिक घोषक बातपर अपन मूरी हिला देल। कनिक कालक बाद हम नॉर्थ कछार हिल्सक परिवेशमे एक बेर पुनः मानसिक रूपसँ पहुँचि गेलौं। जुआएल, पाकल, सुखाएल, कुम्हलाएल, अधपाकल, खिच्चा, कोमल, हरियर गाँठसँ भरल झुण्डक-झुण्ड बाँसक बीट हमरा मोनमे स्मरण आबए लागल। कल-कल करैत टेढ़-टाढ़ नदी, सुन्दर हरिअर पहाड़ी, नव बालक-बालिका, युवक, युवती एवं वृद्ध अपन परम्परागत बहुरंगी वस्त्रमे नचैत-गबैत विभोर भेल हमर मानस पटलपर रंगमंचक अद्वितीय नायक एवं नायिका जकाँ स्मरण होमए लागल; लागल जेना सरिपौं हम सेकेण्डोमे दिल्लीक शोरगुलसँ हजारो किलोमीटर दूर असम राज्य केर नॉर्थ-कछार हिल्समे पहुँचि गेलौं। की धरती, की पहाड़, की संस्कृति आ केहेन आत्मीय आ रमनगर लोक! जतेक प्रशंसा करी कम। अनुभूतिकेँ याद करैत आत्मिक प्रसन्नता होइत अछि। यायावरीकेँ आगाँ बढ़बैत पुनः नॉर्थ कछार हिल्स चली। बात बाँसक करैत रही। साधारणतया ५०-६० वर्षक अन्तरालमे बाँसमे एकाएक फूल आबए लगै छै। फूल केहेन तँ धानक सीस जकाँ। दाना सेहो धाने जकाँ। फूल पकलाक बाद नीचाँ खसए लगै छै। मूस सभ ओइ फूलकेँ धान बुझि झुण्डक-झुण्डमे आबि ओकरा कुतरनाइ प्रारम्भ कऽ दै छै। मूसक संख्या आवश्यकतासँ अधिक भऽ जाइ छै। फलस्वरूप जखन धानक खेतीक समय होइ छै, तखन जतेक धान लोक सभ बीयाक रूपमे बाउग करैत अछि, मूस सभ एक-एकटा धानक बीयाकेँ खाऽ जाइ छै। लाख प्रयासक बादो लोक धान उगेबामे असमर्थ भऽ जाइत अछि। परिणाम ई होइ छै जे घोर अन्नक आपदा समस्त क्षेत्रमे व्याप्त भऽ जाइ छै। ऐ आपदासँ अरुणाचल प्रदेश आ सिक्किमकेँ छोड़ि लगभग समस्त उत्तर-पूर्व भारतक भू-भाग कहियो ने कहियो तबाह होइते टा अछि। हलाँकि आइ काल्हि सरकारी मदति भेटै छै। कृषक सभ सेहो जागरुक भेल जा रहल छथि; समय रहिते मूस मारबाक एवं मूसकेँ भगेबाक पूर्ण इन्तजाम कएल जाइ छै। आब कल्पना कऽ सकै छी जे एहेन विभीषिकासँ हानि कम हेतै। बाँसक फुलेनाइक चर्चा करैत छी तँ अरुणाचल प्रदेशक चर्चा केनाइ अनिवार्य। जेना कि बता चुकल छी जे ऐ प्रदेशक लोक ऐ विभिषिकासँ नै प्रभावित होइ छथि। एकर कारण ई जे अरुणाचल प्रदेशक तमाम भू-भागक आदिवासी लोकनि मूस पकरबामे निपुण होइ छथि। एतबे नै, मूस हिनका लोकनिक बहुत रुचिगर भोजन छन्हि। जखन हम लोअर दिवांग घाटी आ लोहित जिलामे भ्रमण करैत रही तँ लोक सभकेँ (विशेषण रूपेण इदू मिसमी, दिगारु मिसमी, मिजो-मिसमी तथा खामती जनजाति) मूसक शिकार करैत आ ओकर मांस खाइत देखलौं। ऐ परम्पराक नीक परिणाम ई होइ छै जे बाँस फुलेलाक उपरान्तो मूसक जनसंख्यापर नियन्त्रण बनल रहै छै, आ एतए केर लोक बाँस फुलेला उपरान्त होमएबला विभीषिकासँ बचल रहैत छथि। हमरा लोकनि नॉर्थ कछार हिल्स केर तमाम जनजातिक स्त्रीगण सभकेँ जिलाक तमाम क्षेत्रसँ बजा समाजक विकास एवं सांस्कृतिक उन्नतिमे नारीक योगदानपर अलग-अलग जनजातिक महिलाकेँ अलग-अलग समूहमे राखि हुनका लोकनिकेँ अलग-अलग समूहमे राखि, हुनका लोकनिकेँ विचारसँ अपना-आपकेँ अवगत कराबए चाहैत रही। स्पष्ट कऽ दी जे ई एकमात्र कार्यक्रम नै छल। अनेक कार्यक्रममे ईहो एकटा महत्वपूर्ण कार्यक्रम छल। एकर परिणामसँ हम गदगद भेल रही। ई कार्यक्रम पाँच दिन चलल। पाँचो दिन महिला लोकनि हमरा लोकनि केर अनुमानसँ ज्यादेक संख्यामे उपस्थित छलीह। सभ दिन अपन परम्परागत वस्त्र, आभूषण एवं दैनिक जीवनक रूपरेखा प्रस्तुत करैत। भेल जे श्रृंगारक जंगलमे छी। एहेन जंगल जकर कल्पना मात्र कएल जा सकैत अछि। वास्तवमे एहेन उत्साहमय आ जीवन्त जीवनक-संस्कृतिक कल्पनो असंभव। परन्तु छल तँ सत्य आ अनुपम! हरेक महिला समूहमे हमरा लोकनिक तीन-चारि कार्यकर्ता साक्षात्कार करबाक हेतु तथा अधिकसँ अधिक जानकारी प्राप्त करबाक हेतु तत्पर छलाह। ऐ कार्यकर्ता लोकनि केर चुनाव हमरा लोकनि अपन सहयोगी-संस्था- श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्रक सहयोगसँ केने रही। तमाम कार्यकर्ता स्थानीय छलाह एवं हॉफलोंग, हिन्दी, अंग्रेजी आ असमिया भाषाकेँ धुरझार बाजैत आ लिखैत छलाह। कार्यकर्तामे आधासँ अधिक लड़की सभ छलीह। हम प्रतिदिन प्रातः सभ समूहकेँ मुख्य हॉलमे बैसा अपन कार्यशालाक उद्देश्यक जानकारी सहभागी लोकनिकेँ दैत छलियन्हि। अगर किनको कुनो तरहक संशय रहल तँ तकरो निराकरण करबाक प्रयास करै छलौं। अपन संस्कृति, संस्कार एवं संस्कारक नीक चीज एवं परम्पराक रक्षा आधुनिकताकेँ स्वीकारैत केना करी तइपर हम प्रभावपूर्ण ढंगसँ जोर दै छलौं। हमरा एना बुझना जाइ छल जेना सहभागी महिला लोकनि एवं स्थानीय पत्रकार सभ हमरासँ प्रभावित छलाह। स्थानीय अखबारमे एवं टेलीविजनपर नित्य समाचार अबैत छल। प्रति दिन साँझमे सांस्कृतिक कार्यक्रम होइ छलै, आ अन्ततः भोजन (रात्रिक भोजन) सँ पहिने कार्यकर्ता लोकनि हमरा दिन भरिक क्रिया-कलापक सम्बन्धमे संक्षिप्त जानकारी दै छलाह। ओइ जानकारीक आधारपर हम अगिला दिन की करी तकर निर्देश दै छलियन्हि। कार्यक्रम अपन पूर्ण गतिसँ चलि रहल छल। एक दिन साँझमे हम चाह पिबैत रही। ओतए दिमासा जनजातिक किछु महिला हमरा लग आबि निवेदन केलन्हि, “श्रीमान्! कनी हमरा लोकनिक कार्यशालामे चलब?” हम कहलियन्हि: “हँ, हँ। अवश्य जाएब”। आ चाहक प्याला हाथमे लेने विदा भऽ गेलौं। हमर ऐ व्यवहारसँ ओ सभ गदगद भऽ गेलीह। जखन हम पहुँचलौं तँ ओतए केर माहौल दोसरे जकाँ रहै। तीन स्थानीय पत्रकार अपन कैमरा संग आ एक टी.वी. पत्रकार गुवाहाटीसँ आएल छलाह। ई महिला लोकनि हमरा पत्रकारक समक्ष अपन परम्परामे हाथक बनाओल कलात्मक चद्दरिसँ स्वागत करक हेतु बजेने छलीह। हम ऐ बातकेँ सुनि कनी घबरेलौं। कारण ऐ तरहक परम्परामे हमरा नेतागिरी केर दुर्गन्ध बुझना जाइत अछि। परन्तु दिमासा महिला लोकनिक स्नेहकेँ अपमानित हम नै करए चाहैत रही। तँए चद्दरिकेँ स्वीकार कएल। एकर बाद देखैत छी जे तमाम जनजाति समूहसँ दू-तीन महिला चद्दरि, गमछा आदि लए हमर स्वागत हेतु आएल छथि। लोकक स्नेह देखि मोन भरि आएल। सभसँ भेँट स्वीकार कएल। फेर सोचए लगलौं: “जखन ई सभ एतेक नीक छथि तँ आतंकवादी गतिविधि, खून-खरापा किए? की समस्याक समाधान लोक सभसँ मिलि कऽ नै भऽ सकैत अछि”? ई बात सोचए लगलौं। लोकक प्रेममे आकंठ भऽ गेलौं। अतबेमे कार्बी जनजाति समूहक तीन महिला अएलीह। ओ सभ कहलन्हि: “श्रीमान्, कनी हमरा सबहक कार्यशालामे पाँच मिनट हेतु चलबै?” हम बिना किछु कहने अपन मूरीकेँ स्वीकारात्मक अवस्थामे हिलबैत कार्बी महिला सबहक कार्यशाला दिस प्रस्थान केलौं”। ओतए गेलापर दलक महिला लोकनि कहए लगलीह: “श्रीमान्, अहाँ लोकनि प्रथम बेर हमरा सभकेँ ई अवसर देलौं अछि जे हम सभ अपन समाज, अपन संस्कृति, अपन परम्परा दिस ताकी। परम्पराक ताकतिकेँ आँकी। एतए तँ ईसाईयत, आधुनिकता, शिक्षा एवं आतंकवादक कारणेँ लोक सभ परम्परा बिसरल जा रहल अछि। अपन जनजातिक ढंगसँ रहनाइ, व्यवहार केनाइ, खेनाइ-पिनाइ, गीत-नृत्य आदि तँ आजुक युगमे पिछड़ापनक निशानी छै। किछु जनजातिक लोक जे ईसाईयतकेँ अपन धर्म स्वीकार कऽ लेलन्हि अछि, तनिका लोकनिक विवाह आदिक तमाम रीति क्रिश्चियन रीतिक अनुरूप करए पड़ै छन्हि। गिरजाघरमे विवाह केनाइ, आधुनिक वस्त्र अर्थात् पेन्ट-शर्ट पहिर कऽ विवाह केनाइ। ओ लोकनि चाहैतो अपन जनजातिक सनातनीक परम्परासँ विवाह, जन्म-संस्कार एवं मृत्यु संस्कार नै कऽ सकै छथि। लेकिन अहाँक कार्यशालाक बाद हमरा लोकनि ऐ तथ्यपर गंभीरतासँ विचार कऽ रहल छी। धर्म कुनो भऽ सकैत अछि, परन्तु स्थानीय परम्पराक पालन अवश्य हेबाक चाही। स्थानीय परम्परा धरती, एतए केर वातावरण, पानि, पहाड़, परिस्थिति सँ अटूट रूपेँ जुड़ल छै। ई सभ बात हमरा लोकनि अहीँ सबहक कारणेँ ऐ कार्यशालाक माध्यमसँ बुझि सकलौं अछि”। हम मोने मोन प्रसन्न भेलौं आ अपन संस्थाक सदस्य सचिव डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्तीक दूरदर्शितापर आश्चर्य होमए लागल हमरा। जखन-कखनो ओ हमरा ऐ तरहेँ अनेक चीज संगे करए कहै छथि, तखन हमरा बुझाइत छल जे ई हमरा मनुक्ख नै सर्वशक्तिमान भगवान बनबए चाहै छथि, जे कहियो सम्भव नै थीक। एतेक चीज कहीं एक संगे संभव छै? परन्तु आइ पता चलि गेल जे अगर नीक भावनासँ सही ढंगसँ कार्य कएल जाए तँ सभ किछु संभव छै। ओहो मनुक्ख द्वारा। ऐ हेतु भगवान बनक कुनो प्रयोजन नै। हम ई बात सोचि रहल छलौं। एकाएक एक परम्परागत परिधानमे सजल कार्बी महिला हमरा लग अएलीह आ कहलन्हि: “मिश्रा साहेब, एक बात कही”? हम कहलियन्हि: “हँ, हँ। अवश्य कहू”? ओ महिला बजलीह: “अहाँ जखन संस्कृति इत्यादिक सम्बन्धमे हमरा लोकनिसँ बात करै छी तँ बड्ड नीक लगैत अछि। आब हम सभ विचार केलौं अछि जे सप्ताहमे कमसँ कम एक दिन अपन परम्परागत वस्त्र एवं गहनामे अवश्य रहब। लेकिन एक चीज हमरा सभकेँ पहिले दिनसँ परेशान कऽ रहल अछि। अहाँ मिथिलासँ छी। पढ़ल-लिखल छी। समस्त भारतक परम्पराकेँ जनैत छी। परम्पराक नीक चीजक पालन हुअए आ ओ चीज शाश्वत रहए तइ लेल प्रयासरत छी। परन्तु अहाँ कहियो अपन परम्पराक वस्त्रमे हमरा सभ लग नै अएलौं। हमरा सभकेँ ऐ चीजसँ आश्चर्य भऽ रहल अछि। हमरा लोकनि ऐ विषयपर काफी विचार-विमर्श कएल आ अन्ततः ऐ निष्कर्षपर पहुँचलौं जे अहाँसँ ऐ सम्बन्धमे बात करी। आशा अछि, अहाँ हमरा लोकनिक भावनाकेँ सही अर्थमे लेब। एकरा अन्यथा नै मानब”। हम बिना कोनो देर केने अपन गलतीकेँ स्वीकार कऽ लेलौं। हम ओइ कार्बी महिलाकेँ कहलियन्हि: “ई हमर घोर गलती थीक। शाइद दिल्ली शहरक जीवन चक्रमे फँसि हम अपन परम्परासँ दूर भऽ गेल छी। हमरा अहाँक विचार उत्तम लागल। अहाँ हमरा अपन मोनमे अपन मैथिली परम्परा आ संस्कारक प्रति घोर आस्था जाग्रत केलौं, तइ लेल हम अहाँक प्रति हृदएसँ आभार व्यक्त करै छी। अहाँक बातकेँ अन्यथा भला केना लऽ सकैत छी? हम अहाँकेँ वचन दै छी, जे हम आब जतए कतौ जाएब एक जोड़ धोती-कुर्ता अवश्य लऽ जाएब आ कमसँ कम एक दिन अपन मिथिलाक परम्परागत परिधानमे अवश्य रहब”। हमर ऐ बातसँ ओ कार्बी महिला बड्ड प्रसन्न भेलीह। एकर बाद हम कार्बी कार्यशालासँ दिमासा जनजातिक कार्यशाला दिस गेलौं। दिमासा जनजातिक महिला लोकनिक कार्यशालामे ऐ बातपर चर्चा चलैत रहै जे शहर (अर्थात् हॉफलोंग) केँ साफ एवं स्वच्छ रखबाक लेल महिला सभकेँ की करक चाही। हम पुछलियन्हि: “अहाँ सभ एकटा बातक उत्तर दिअ। की ऐ हॉफलौंग शहरमे गन्दगी नै फैलै, एतए मच्छड़ आदिक प्रकोप नै हुअए, ट्रैफिक निअमक पालन होइक, ई कर्तव्य ककर छै? सरकारक? प्रशासनक? पुरुषक? नेताक? आकि आनो ककरो? अहूँ लोकनिक अर्थात् एतए केर सजग महिला सभक सेहो”? हमर ऐ प्रश्नक उत्तर देबाक हेतु एक अधेर महिला अएलीह। ओ कहलन्हि: “श्रीमान् शहर तँ सबहक छै। की महिला आ की पुरुष! एकटा उदाहरण हम ऐ सम्बन्धमे देमए चाहै छी। किछु दिन पूर्व हॉफलोंग शहरमे मलेरियाक भयंकर प्रकोप भेलै। चारु कात गन्दगी पसरल रहै। सड़कपर सफाइ नै। ककरो ऐ बातक चिन्ता नै। नॉर्थ कछार ऑटोनोमस काउन्सिलक अधिकारीगण एवं नेता लोकनिसँ दिमासा महिला एसोसिएशन केर सदस्य सभ बात केलन्हि तँ ओ लोकनि आश्वसन देलाह परन्तु ओइ आश्वासनपर कोनो कार्यवाही नै केलन्हि। मलेरियाक कारणेँ स्त्रीगणक जीवन नर्क बनल छलै। बच्चा सभ ज्यादे परेशान। बच्चाक कारणेँ मायो परेशान। की करु की नै। अन्ततः हमरा लोकनि शहरक सफाइ करक बीड़ा स्वयं अपना हाथमे लेल। करीब पचास महिला एकत्रित भेलौं। पच्चास टा बाढ़नि, पच्चास पथिया, पाँच कोदारि कीनल आ सफाइ केर अभियानमे लागि गेलौं। सर्वप्रथम जिलाधिकारीक ऑफिसक बाहरक गन्दगीकेँ साफ करए लगलौं, फेर ऑटोनोमस काउन्सिलक दफ्तर, फेर शहरक रोड। सामान्य जनतासँ गीत गाबि-गाबि एवं अपन सफाइ अभियानसँ शहरकेँ साफ रखबामे मदति करबाक निवेदन करए लगलौं। एक दिन तँ लोक सभ हमरा सभपर ध्यान नै देलाह। परन्तु दोसर दिन पत्रकार सभ ऐ बातकेँ उजागर केलन्हि आ सरकार, प्रशासन एवं नेताक अकर्मण्यताक बारेमे लिखए लगलाह। आब लोक सभकेँ एहसास भेलन्हि जे गलती भेल। तेसर दिन एकाएक समस्त प्रशासन साकांक्ष भऽ गेल आ चप्पा-चप्पामे सफाइ होमए लगलै। हमहूँ सभ जनता लोकनिसँ साफ एवं स्वच्छ रहबाक निवेदन करैत रहलौं। शहर हमर अछि तँ एकर ध्यानो हमरे सभकेँ राखए पड़त”। दिमासा महिलाक ऐ जवाबसँ लागल जे नीक चीजक श्रीगणेश संसारक छोटसँ छोट कोनसँ भऽ सकैत अछि। समाजमे जागृति लेबाक लेल महिला वर्गक योगदान अतुलनीय भऽ सकैत अछि। दिमासा महिला हमरा कहलन्हि: “श्रीमान्, हमरा लोकनिक आनो अनेक तरहक समाजक समस्या छै जइपर एकजुट भए कार्य करए चाहै छी। पुरुषक शराब पीनाइ, एकसँ अधिक पत्नी रखनाइ आदि किछु एहन विषय छै जइपर हमरा लोकनि गम्भीरतासँ सोचि रहल छी”। हम जवाब देलियन्हि: “अहाँ लोकनिक प्रयास प्रशंसनीय अछि। अहाँक प्रयोग प्रभावकारी अछि। ऐ तरहक प्रयोग सूतल प्रशासन एवं अधिकारी सबहक निन्द खोलबाक नीक औषधि थीक। हमरासँ जतेक मदति संभव भऽ सकत से हम करब”। ओ महिला कहलीह: “दिमासा महिला उत्थान समिति नामक एक संस्थाक गठन हमरा लोकनि केलौं अछि। एकरा हमरा लोकनि दिल्लीसँ अखिल भारतीय संस्थाक रूपमे रजिस्ट्रेशन करबए चाहैत छी। ऐ पंजीकरणमे अहाँक सहायता चाही। अगर पंजीकरण भऽ गेल तँ हमरा लोकनि अनेक तरहक कार्य करब”। हम उत्तर देलियन्हि: “अहाँ लोकनि जखन चाही दिल्ली आबि जाउ। हम दू-तीन दिनक भीतर अहाँ संस्थाक पंजीकरण अखिल भारतीय संस्थाक रूपमे पंजाब रेगुलेशन एक्ट केर अन्तर्गत सोसाइटीक रूपमे करबा देब। ऐमे कोनो तरहक पैसा इत्यादि नै लागत”। दिमासाक बाद हम जेमि नागा महिला समूह द्वारा आयोजित कार्यशाला दिस बढ़लौं। जेमि नागाक सम्बन्धमे ई जानकारी देनाइ उचित जे ई नागा मात्र असम टा मे रहि गेल अछि। आन राज्यमे तीन नागा मिलि एक जिलियांगरोंग (zeliangrong) बनि जाइत अछि। तँए नागा बहुल प्रदेश नागालैण्ड आ मणीपुरमे एकर स्वतंत्र अस्तित्व नै रहि जाइ छै। सच पूछी तँ जेमि जनजातिक महिला सबहक आभूषण एवं वस्त्र सभसँ आकर्षक आ मनोहारी लागल। जेमि महिला लोकनि कहलीह जे हुनकर सबहक अपन महिलाक संस्था छन्हि। संस्थाक उद्देश्य जेमि नागा समुदायमे अपन संस्कृति आ परम्पराक रक्षा केनाइ छै। एक उद्देश्य ईहो जे ऐ समुदायक लोक ईसाईयतकेँ नै स्वीकार कए अपन मूल जनजातीय धार्मिक मान्यता आ आस्थासँ जुड़ल रहलथि। नागालैण्डमे लगभग ९५ प्रतिशत नागा समुदाय केर लोक ईसाई भऽ चुकल छथि, स्थिति कमो-बेश मणीपुरक नागा समुदायक सेहो यएह छन्हि। परन्तु सौभाग्यसँ नॉर्थ कछार हिल्स केर जेमि नागाक अधिकांश परिवार एखनो धरि अपन मूल मान्यता, धर्म, देवी-देवता, पूजा-पद्धति आदिसँ जुड़ल छथि। जिमि नागा महिला समूहमे एकटा २७ वर्षीय अविवाहित युवती भेटलीह। हुनकासँ पता चलल जे जिमि नागाक महिला सभ अपन संस्कृतिक रक्षाक प्रति बड्ड सचेत छथि। ओ २७ वर्षीय नागा नायिका हमरा ईहो बतेलीह जे ओ तीन वर्ष धरि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केर मुख्यालय नागपुरसँ प्रशिक्षण लए आएलि छथि। हम कहलियन्हि: “अहाँकेँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केर वातावरण केहन लागल? ओतए केर लोक सभ हिन्दू धर्मक प्रति अनेरे निष्ठा तँ नै जगेबाक प्रयास कएलन्हि? ऐ सभ कारणेँ अहाँकेँ अपन जनजातीय धार्मिक विश्वास आ रीति-रिवाजपर कोनो आघात तँ नै पड़ल”? हमर प्रश्नक उत्तर दैत नागा नायिका कहलन्हि: “की कहि रहल छी श्रीमान्! ओ लोकनि तँ हमरा सभकेँ हमेशा यएह कहलन्हि जे अपन मान्यता, धर्म, परम्परा आदिक त्याग नै करू। अगर परम्परामे कोनो अन्ध-विश्वास अथवा विनाशकारी तत्व अछि तँ ओकर निदान अवश्य करू। जेना हमरा लोकनि परम्परासँ जानवर आदिक बलि चढ़बैत छी। ओ सभ कहैत छथि कि अगर संभव भऽ सकए तँ कमसँ कम मिथुन, साँढ़ या भैंसाक बलि दिअ। जिमि नागा समुदायमे बिआहल स्त्रीगण सिन्नूर नै लगबैत छथि। फेर कोनो लड़कीकेँ देखि ई पता कोना लगाएल जा सकैत अछि कि ई लड़की कुमारि अछि आकि व्याहता? परम्परागत संस्कृतिक अगर पालन करी तँ ई बात सहजतासँ पता चलि जाइत अछि। परम्परा तँ ई छै जे कुमारि कन्या विवाहसँ पहिने कपारक आगाँ किछु केशकेँ आधा कटा ओकरा कपारपर लटकबइत अछि। संगे कनपटीपर केश विन्यास करैत अछि। ऐसँ सहजतासँ पता चलि जाइ छै कि फलाँ-ने-फलाँ लड़की कुमारि थीकि”। हम ओइ नागा नायिकासँ प्रश्न केलियन्हि: “अहाँ ई बताउ जे व्याहता महिला केर पहचान फेर कोना होइ छन्हि”? हमर प्रश्नक जवाब दैत ओ नागा नायिका कहए लगलीह: “विवाह होइते नागा महिला कपार परक केसकेँ कटेनाइ बन्द कऽ दै छथि आ केसकेँ कपारपर नै लटका माथक सीथ दिस ऊपर कए बान्है छथि। संगे विवाह होइते मातर नागा महिला कनपट्टी बला किछु लट दुनू कात कटा लै छथि। ऐसँ कियो सहजतासँ पता लगा सकैत अछि कि फलाँ ने फलाँ स्त्रीगण व्याहता थीकि”। नागा नायिका फेर हमरा कहए लगलीह जे प्रतिवर्ष समस्त बराक घाटी आ नॉर्थ कछार पहाड़ी केर जेमि नागा लोकनिक महिला सभ जनवरी-फरवरी मासमे कोनो दिन कोनो-ने-कोनो जिमि नागा गाँवमे जुटान करै छथि। मर्दक कोनो प्रयोजन नै। प्रत्येक जिमि नागा गामक महिला सभमे एक प्रधान, एक सहायक तथा एक ट्रेजरार होइ छथि। मर्दक कार्य केवल एतेक जे शामियाना लाबथि, स्टेज बनाबए इत्यादिमे महिला लोकनिकेँ मदत करथि। हजारक संख्यामे स्त्रीगण सभ अबै छथि। हुनका लोकनिकेँ रहबाक एवं खेबाक इन्तजाम गामक महिला सभ करै छथि। प्रत्येक घरमे तीन-चारि या सामर्थ्यक हिसाबे कम-ज्यादे महिला सभ रहि जाइ छथि, जाइ कालमे अतिथि गामक महिला सभकेँ अपना संगे आनल चाउर, किछु पाइ, हरियर तरकारी आदिक संग किछु पाइ दऽ दै छथिन्ह। ऐसँ ककरोपर कोनो अनेर भार नै पड़ै छै। प्रत्येक वर्ष नव पदाधिकारीक चुनाव होइ छै, एवं अगिला वर्षक जुटान कोन गाममे हएत तकर निर्णय सेहो लेल जाइ छै। ऐ महिला सभाक उद्देश्य मूल रूपेण परम्परागत जिमि नागा जनजातिक परम्पराकेँ महिला लोकनिक माध्यमसँ बचेबाक थीक। ई सभा एक सांस्कृतिक जनचेतना थीक। एकर सूत्रधार छलीह महान स्वतंत्रता सेनानी आ परम गम्भीर, चतुर्मुख प्रतिभासँ सम्पन्न जेलियांगरोंग नागा समुदायक रानी गैदीन्लयू (Gaidinliu)। गैदीन्ल्यूक जन्म आजुक मणिपुर प्रान्तमे २६ जनवरी १९१५ ई. मे भेल छलन्हि। हुनकर गाम तामेंगलोंग जिला अन्तर्गत तौसेम सब-डिवीजनमे छन्हि। गामक नाम लोंगकाओ छै। कहल जाइ छै कि प्रारम्भेसँ गैदीन्ल्यू जिनका कि स्थानीय लोक सभ रानी माँ कहै छन्हि, बहुत प्रतिभा सम्पन्न अओर साहसी छलीह। ब्रिटिश सरकारक सामाजिक आ राजनैतिक क्रिया-कलाप देखि तेरह वर्षक छोट अवस्थामे रानी माँ विचलित भऽ गेलीह आ एकरा विरुद्ध संघर्षक बिगुल बजेबाक प्लान करए लगलीह। किंवदन्ती तँ ई छै जे छोटे उमरिमे रानी माँमे दैविक शक्ति प्रवेश कऽ गेलन्हि। हुनकर ऐ आश्चर्यजनक शक्तिक भान सर्वप्रथम हुनक पिताकेँ भेलन्हि। रानी माँ केँ तेरहम अवस्थामे पहुँचैत ऐ बातक अनुभूति होमए लगलन्हि जे अंग्रेज सभ प्रशासनक मादे आ पुनः क्रिश्चियन मिशिनरी केर माध्यमसँ आजुक तीन उत्तरपूर्वी राज्य- असम, नागालैण्ड आ मणिपुर- केर नागा जनजातिक तमाम उपजाति सबहक संस्कृति, संस्कार आ परम्पराक नाश कऽ रहल अछि। ठीक ओही क्षण रानी माँ हैपु जदोनांग नामक नागा विद्रोहीसँ भेँट केलन्हि। जदोनांग रानी माँ केँ बतेलखिन्ह जे केना क्रिश्चियन मिशिनरीक लोक सभ स्थानीय संस्कृति आ संस्कारक सर्वनाश कऽ रहल अछि। जदोनांग महोदयक दर्शनसँ प्रभावित भय रानी माँ हुनकर परम अनुयायी भऽ गेलीह। फेर की छल, १९२७ ई. मे एकाएक लोक सभ आन्दोलन प्रारम्भ कऽ देलक। रानी माँ ओइ आन्दोलन केर प्रमुख सूत्रधारमे एक छलीह। लोक सभ एकाएक अंग्रेजक शुल्क आ बलपूर्वक बेगारीक प्रथाक विरोध करए लागल। सबतरि हड़ताल पड़ि गेलै। धीरे-धीरे चारि-पाँच वर्षमे आन्दोलन अपन पराकाष्ठापर चढ़ि गेल। दुर्भाग्यसँ ओइ समए हैपू जदोनांगकेँ अंग्रेज सभ छलसँ कैद कऽ लेलकन्हि आ कनिकबे दिनक बाद २९ अगस्त १९३१ ई. मे आजुक मणीपुर राज्यक राजधानी इम्फालमे फाँसीपर निर्दयतापूर्ण ढंगसँ चढ़ा देलकन्हि। ऐ घटनासँ रानी माँ बड्ड दुखी भेलीह, परन्तु अपन निश्चय पर चट्टान जकाँ ठाढ़ि छलीह। आब आन्दोलन केर समस्त कमान रानी माँक हाथमे आबि गेलन्हि। कतेक ठाम हुनकर गुरिल्लानुमा अनुयायी सभ अंग्रेज सभकेँ पश्त कएलक। अंग्रेज सिपाही सभ रानी माँक युद्ध कौशलसँ त्राहि-त्राहि करए लागल। अही नॉर्थ कछार धरतीक हंगरुम नामक गाममे अंग्रेज सिपाही आ रानी माँक समर्थकक बीच भयानक संघर्ष भेलै। बादमे घोर तामसमे आबि अंग्रेज सभ समस्त गामकेँ आगिमे झोँकि देलकै। जान-मालक बड्ड क्षति पहुँचलै। एतबे नै, अंग्रेज अधिकारी लोकनि एक गुप्त मीटिंग केलन्हि जइमे ई निर्णय लेल गेलै जे, जे कियो रानी माँक हुलिया बताओत तकरा प्रशासन दिससँ पाँच सए टका इनाम देल जेतै। परन्तु रानी माँक प्रति कछार हिल्स, मणिपुर तथा नागालैण्डक लोककेँ बड्ड श्रद्धा छलै। दुर्भाग्यसँ वर्तमान नागालैण्ड प्रान्तक पोइलवा गामसँ १७ अक्टूबर १९३२ ई. मे अंग्रेज सैनिक रानी माँकेँ बन्दी बना लेलकन्हि। ऐ सैन्य टुकड़ीक संचालन कैप्टन मैकडोनाल्ड करैत छलाह। रानी माँक दुनू हाथ बान्हि देल गेलन्हि। रौदमे बान्हल हाथ उठेने ठाढ़ छलीह। एक रस्ता चलैत बूढ़केँ नीक नै लगलन्हि। तमसा कऽ बाजि उठलाह: “सर्वनाश हुअए अहाँ लोकनिक। लाजे मरि नै होइत अछि। एक महिलाक दुनू हाथ बान्हि ऊपर उठेने छी। मर्द छी तँ हाथ खोलि दियौ”? तइपर अंग्रेज सिपाही बूढ़ापर चिचिआए लगलन्हि। बूढ़ो आव देखलाह ने ताव। उठेलन्हि एकटा पाथर आ प्रहार कऽ देलन्हि। संयोगसँ अंग्रेज सिपाही बचि गेल। तुरते बूढ़ाकेँ कैद कऽ लेलकन्हि। तीन मासक बाद बूढ़ाक उम्रकेँ ध्यानमे रखैत हुनका जेहलसँ रिहा कऽ देल गेलन्हि। रानी माँ इम्फाल, तूरा, कोहिमा आ शिलांगक जेहलमे अपन समए बिताबए लगलीह। १९३७ ई. मे पण्डित जवाहर लाल नेहरू रानी माँ सँ शिलांगक जेहेलमे भेंट केलथिन्ह आ हुनका प्रति अपन सम्वेदना व्यक्त केलाह। हुनका जेहलसँ बाहर निकालबाक प्रयास सेहो पण्डितजी करए लगलाह। नेहरू जी रानी माँकेँ पहाड़ीक बेटीक संज्ञा देलथिन्ह आ हुनकर नामक संग सर्वप्रथम रानी जोड़ि देलथिन्ह। नेहरू जी रानी माँक तुलना जॉन ऑफ आर्क आ रानी लक्ष्मीबाइ सँ केलथिन्ह। हलाँकि रानी माँकेँ छोड़ेबामे नेहरूजी असमर्थ रहलाह। अन्ततः भारतक आजादी भेटलाक उपरान्त १४ अक्टूबर १९४७ ई. मे लगभग १५ वर्ष विभिन्न जेलमे रहलाक बाद रानीमाँ आजाद भेलीह। हलाँकि किछु वर्षक बाद रानी माँ अपन जनजातीय धर्म एवं संस्कारपर क्रिश्चियन संस्था द्वारा आघात बर्दाश्त नै केलन्हि आ पुनः अण्डरग्राउण्ड भऽ संघर्ष करए लगलीह। १९६० ई मे सेहो हुनकर लगभग ३०० समर्थकक जान चलि गेलन्हि। बादमे रानी माँकेँ १९७२ ई. मे ताम्रपत्र, स्वतन्त्रता सेनानी अवार्ड, १९८१ मे पद्म भूषण आर १९८३ मे विवेकानन्द सेवा अवार्ड देल गेलन्हि। अन्ततः १७ फरबरी १९९३ केँ लगभग ७८ वर्षक अवस्थामे रानी माँ पंच तत्वमे विलीन भऽ गेलीह। एखनो धरि स्त्रीगण सभ (विशेष तौरपर नॉर्थ कछार हिल्स केर जिमि नागा जनजातिक स्त्रीगण) सभ रानी माँक सामाजिक आ राजनैतिक चेतनाक मन्त्रकेँ स्मरण करैत अपन संस्कृति आ सभ्यताक रक्षामे लागल छथि। नॉर्थ कछार हिल्समे अनेको तरहक प्रयोग हमरा लोकनि कएल। आन प्रयोग सभ पूर्णतः शैक्षणिक आ दार्शनिक छल। तँए पाठकसँ ओइ विषय सभपर चर्चा कए हम अनेरे बोर नै करए चाहै छियन्हि। नॉर्थ कछार हिल्स केर यात्राक यायावरीक एतए अन्त कऽ रहल छी। भावमय, भोगमय, योगमय बृन्‍दावन “‍बृन्‍दावन सन वन नहीं नन्‍दग्राम सन ग्राम बंशीवट सन बट नहीं रामनाम सन नाम”. जखन बच्‍चे रही तँ हमर धर्मार्थी नानी हमरा संस्‍कृतक कि‍छु श्‍लोक आदि‍क संगे उपरोक्‍त दोहा सुग्‍गा जकाँ रटा देने रहथि‍। सूरदास, विद्यापति, रसखान आदि‍ कवि‍ लोकनि‍केँ रचना पढ़लाक बाद बृन्‍दावनक बारेमे सदति‍काल कल्‍पना करैत रही। यमुनाक जल हरि‍यर कचोर आ स्‍वच्‍छ कल-कल करैत होइ छैक। ई कहब छलन्‍हि‍ हमर नानीक। अपनो मोनमे अबैत छल, तँए तँ गोपी सभ ऐ यमुनामे कखनो स्‍नान तँ कखनो पनघट लए घघरा चुनरी पहि‍रने, पएरमे पाजेब पहि‍र झुमैत-गबैत अबैत छल हेतीह। कतेक नैसर्गिक दृश्‍य होइत हेतै यमुनाक कछेरमे! कदम्‍बक गाछ, गामक ग्‍वाल-बाल सबहक मधुर स्‍वर, मुरलीक तान, गोपीक गान, साधु-संतक शंखनाद, हरे-कृष्‍ण राधे-राधेक नाओंसँ उच्‍चारि‍त आ मुग्‍धमय वातावरण, पण्‍डि‍त, पण्‍डा आ वि‍द्वान लोकनि‍क भगवद् चर्चा एवं राधा-कृष्‍णक प्रसंगपर वाद-वि‍वाद, मस्‍त वातावरण। कृष्‍णमय बृन्‍दावन। राधामय बरसाना। नन्‍दमय नन्‍दग्राम। कान्‍हाक मथुरा। भगवानक कंगुरि‍यापर उठल १८ कि‍लोमीटर केर परि‍धि‍मे पसरल गोवर्धन पहाड़। दूध-दही, मक्‍खन, रबड़ीसँ रेलम-पेल भेल समस्‍त चौरासी कोस। साफ-स्‍वच्‍छ वेगवान हरि‍यर कचोर जलसँ आप्‍लावि‍त आ कल-कल करैत यमुना। कातमे रंग-बि‍रंगक गाछ- कदम्‍ब, जामुन, आम, नीम, बैर इत्‍यादि‍। नाना तरहक हरि‍यरी। काते-काते मस्‍त भावसँ चरैत गाए-बाछा-बाछी। होइत छल एहने कि‍छु दृश्‍य हेतै समस्‍त ब्रजक्षेत्रक। माए ऊपरसँ हमरा हमेशा कहै छलीह: समस्‍त ब्रजक धरतीमे कि‍छु देवत्वक भाव छै। आकर्षक छै। आइयो ऐ धरतीक छटा कि‍छु अलगे छै। एक बेर जाएब तँ आबक मोने ने करत। हएत ओतै रहि‍ जाइ। सुग्‍गा सभ चौंचसँ चौंच मि‍लबैत, गाए-बछरा सभ आनन्‍दक उन्‍मादमे चरैत। खेत खरि‍हानमे मोर घुमैत, एहने छटा छै बृन्‍दावनक। माएक बातकेँ नै मनबाक प्रश्‍ने कहाँ छल। रसखान स्‍मरण अबै छलाह। रसखान तँ ओइ कौआ केर भागकेँ नीक बुझै छथि‍ जकर जन्‍म ब्रजभूमि‍मे भेल छै। भगवान जँ पाथरो बनाबथि‍ आ ब्रजभूमि‍मे पाथर बनि रही तँ जीवन कृत-कृत। ई मान्‍यता छलन्‍हि‍ रसखानक। दि‍ल्‍लीमे पढ़ैकाल किछु लोक सभ मथुरा बृन्‍दावनक चर्च करैत छलाह मुदा कहि‍ नै कि‍ए कहि‍यो ओतए जएबाक योजना नै बनल। बादमे जखन १९९७ ईं.मे हम इन्‍दि‍रा गान्‍धी राष्‍ट्रीय कला केन्‍द्रमे शोधकर्मीक रूपमे नौकरी प्रारम्‍भ केलौं तँ हमर वि‍भाग जनपद-सम्‍पदा केर वि‍भागाध्‍यक्ष प्रोफेसर बैधनाथ सरस्‍वती हमरा मुख्‍य रूपेँ दू कार्यपर केन्‍द्रि‍त करबाक निर्देश देलन्हि‍। पहि‍ल, UNESCO, UNDP केर ग्रामीण भारत परि‍योजनापर कार्य करब आ दोसर, वि‍भागक क्षेत्र सम्‍पदा कार्यक्रम केर अन्‍दर ब्रज प्रकल्‍प परि‍योजनाकेँ देखब। क्षेत्रसम्‍पदा केर अन्‍तर्गत ई वि‍भाग कुनो वि‍ख्‍यात सांस्‍कृतक क्षेत्र लए ओइ‍ क्षेत्रक सांस्‍कृति‍क निधिक सर्वांग अध्‍ययन करै छलै। सर्वांगसँ तात्‍पर्य ओइ सांस्‍कृति‍क क्षेत्रक सम्‍बन्‍धमे उपलब्‍ध रचना, ओतए केर लोकक मान्‍यता, ओतए केर इति‍हास, पुरातत्व, वास्‍तु निर्माण कला, मूर्तिकला, लोक गीत, संगीत, वाह्य, वाह्ययंत्र, कृषि‍-कार्य,  पद्धति केर दक्षता, वेश-भूषा, गहना, वस्‍त्र वि‍न्‍यास, श्रृंगार आर नै जानि की की, सबहक समग्रतामे अध्‍ययन, ओकर ज्ञानक प्रकाशन केनाइ, ओइपर चर्चा, परि‍चर्चा, सम्‍बाद, संगोष्‍ठी, कार्यशाला आदि‍क आयोजन। ओइ समएमे क्षेत्र परम्‍परा केर अन्‍तर्गत दू क्षेत्रपर कार्य चलैत रहै- दक्षि‍ण भारतमे बृहदेश्वर मन्‍दि‍र तथा उत्तर भारतमे ब्रज प्रकल्‍प। ब्रज प्रकल्‍पमे ओना तँ बहुत रास वि‍द्वान आ अन्‍य वि‍षयक वि‍शेषज्ञ सभ छलाह परन्‍तु हमरा जे सर्वाधि‍क प्रभावित केलाह से छलाह श्रीवत्‍स गोस्‍वामी। श्री वत्‍स गोस्‍वामी बृन्‍दावनसँ छथि‍। हि‍नकर पुरखा पश्‍चि‍म बंगालसँ आबि‍ बृन्‍दावनक खोज केलन्‍हि‍ आ ततए केर मुख्‍य पुजारी भेलाह। अखनो बृन्‍दावन केर बाके बि‍हारी मन्‍दि‍र केर मुख्‍य पुजारी हि‍नके पि‍तियौत छथि‍न्‍ह। ई लोकनि‍ अपन संस्‍था बनौने छथि‍- बृन्‍दावन शोध-संस्‍थान। ई संस्‍था बृन्‍दावन केर इति‍हास, प्रेम परम्‍परा इत्‍यादि‍पर शोध करैत अछि‍। हि‍नकर छोट भाए भागवत कथा करै छथि‍। श्रीवत्‍स गोस्‍वामी बि‍ना सीअल वस्‍त्र पहि‍रै छथि‍। केवल धोती आ शरीरपर चद्दरि‍। धोती आ चद्दरि‍ दुनू पीताम्‍बरी। महग आ शुद्ध ट्विस्‍टेड रेशमसँ बनल। बहुत छोट-छोट केस। बि‍ना मोछ दाढ़ीक चि‍क्कन मुँह आ गाल। नमहर-नमहर पनि‍गर डोका जकाँ आँखि‍, आभासँ चमकैत कपार, गोर वर्ण, करीब साठि‍क उमेर‍, पाथरक आकर्षक मूर्ति जकाँ तरासल सन मुँह, नाक, कान, आँखि‍। गो-खूर जकाँ टीकी, कपारपर कुमकुम चानन केर टीका, छह फूटक काया, छरहर शरीर, सुडोल पेट, धोधि‍ केर नामो-नि‍शान नै, सीटल-सोटल स्‍मार्ट। तइपर सँ संस्‍कृत, ब्रजबोली, हि‍न्‍दी, बंग्‍ला, अंग्रेजी, फ्रेन्‍च आ जर्मन, अतेक भाषा धारा प्रवाह बजैत-लि‍खैत। के नै मन्‍त्र-मुग्‍ध भऽ जेता अहेन व्‍यक्‍तत्‍वसँ? हमहूँ भेलौं तँ कून आश्‍चर्य। तँ भेलै ई जे एक दि‍न श्रीवत्‍स गोस्‍वामी एक अन्‍तर्राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठीमे बृन्‍दावन केर बाँके बि‍हारी मन्‍दि‍रमे छप्‍पन भोगपर अपन एक आलेख पढ़लनि‍। रसगर वि‍न्‍यास, सोहनगर सामग्री, मधु टपकैत भाषा आ तइपर पॉवर प्‍वाइन्‍ट प्रजेन्‍टेशन। हुनकर ऐ प्रजेन्‍टेशनकेँ सुनला आ देखलाक बाद सभागारमे उपस्‍थि‍त तमाम देशी-वि‍देशी वि‍द्वान लोकनि‍ मन्‍त्रमुग्‍ध भऽ गेलाह। हमहूँ भेलौं। हुनकर प्रजेन्‍टेशनसँ ऐ बातक जानकरी भेल जे प्रति‍ दि‍न बृन्‍दावन केर बाँके बि‍हारी जीक मन्‍दि‍रमे मन्‍दि‍रक मुख्‍य देवता (प्रस्‍तर प्रति‍मा) राधा-कृष्‍णकेँ कमसँ कम छप्‍पन-पच्‍चास अओर छ-छप्‍पन भोज्‍य सामग्रीसँ भोग लगैत छन्‍हि‍। लोक सभ एवं स्‍थानीय पण्‍डा लोकनि‍ अपन-अपन घरक चि‍नवारसँ अति‍ सुचि‍ताक संग बि‍ना पियाज, लहसुन एवं कुनो वर्जित आ अखाद्य वस्‍तुकेँ देने बिना बनल व्‍यंजन लबै छथि‍। नि‍अम तँ ई छै जे छप्‍पन व्‍यंजन हेबाक चाही मुदा सामान्‍यतऽ ई संख्‍या दू गुना बढ़ि‍ जाइ छै। श्रीवत्‍स गोस्‍वामी केर स्‍लाइड कतेक नीक रहै, तकर वर्णन शब्‍दसँ नै कएल जा सकैत अछि‍। व्‍यंजनक आकर्षण आ मनमोहक सौन्‍दर्य। बनेबासँ लऽ कऽ सजेबा धरि‍ केर बि‍हंगम दृश्‍य। सौन्‍दर्य, संयोजन आ समर्पण केर बेजोड़ उदाहरण। एकाएक बुझाएल जेना व्‍यंजन बनेबा आ सचार लगेबासँ पैघ कुनो कला नै भऽ सकैत अछि‍। गाम स्‍मरण आबए लागल। जखन कखनो हमर बहि‍नक ससुर हमरा ओतए अबैत छलाह तँ हमर माए नाना तरहक व्‍यंजन आ तरकारी, तरूआ, पापर, अचार, चटनी, सलाद, बर, बड़ी आ नै जाने की की बनबैत छलीह। घरमे पावनि‍-ति‍हारबला उत्‍साह भऽ जाइत छल। अलग-बगल केर महि‍ला सभ सेहो माएकेँ मदति‍ करबाक लेल आबि‍ जाइ छलथि‍न्‍ह। भोजन बनलाक बाद गाएक गोबरसँ ठाँओ नीपल जाइ छल। बड़का कांसाक थारी (बल्कि थार कहू) मे कमसँ कम एक सेर अरबा चाउरक गम-गम करैत छरहर भात सजाएल, थारी दि‍ससँ अर्धचन्‍द्राकारक स्‍वरूपमे पैघ आ छोट वि‍भि‍न्न  प्रकारक बाटी सजाएल। ओइ सभमे दालि‍, घृत, तरकारी, अचार, सन्ना, चटनी इत्‍यादि‍ राखल। एकटा मध्‍यम आकारक छि‍पलीमे तरूआ इत्‍यादि‍ सजाएल। पापर हमर माए जानि‍-बुझि‍ कऽ भातक ढेरपर राखैत छलीह। कलपर सँ टटका पानि‍ लाबक जि‍म्‍मेदारी हमर होइत छल। लोटाक संग एकटा फुलही गिलास सेहो होइ छलै। जखन माए केर ई सभ तैय्यारी पूर्ण भऽ जाइ छलन्‍हि‍ तँ हमरा कहैत छलीह- “जाउ दरब्‍ज्‍जापर दद्दा (हमर पि‍ताक बेमातर जे हमर पि‍तासँ करीब २० वर्षक पैघ छलाह। हम हुनका पि‍तामह तुल्‍य मानैत छलियनि‍। आ सि‍नेहसँ दादा कहै छलियनि‍।) केँ  कहि‍औन्‍ह जे भोजनक सचार लागि‍ गेल अछि‍। समधि‍केँ भोजन करा देथुन्‍ह।‍” हम माएक सम्‍वाद लऽ चट्ट दनी  दरबज्‍जापर चलि‍ जाइ छलौं आ दादाकेँ कातमे बजा माएक सम्‍वाद नहु-नहु बता दै छलियन्‍हि‍। दादा साकांक्ष होइत बहि‍नक ससुरकेँ बड़ा वि‍नम्रतापूर्वक कहैत छलथि‍न्‍ह- “समधि‍, भोजन तैयार अछि‍। हाथ-पएर धोल जाओ। चलू भोजनक हेतु।‍” आ पाहुन महोदय  बड़ा विनम्रतासँ दादाक आग्रहकेँ स्‍वीकार करैत ओछाइनपर सँ उठि‍, खराम पहीर, हाथ-पएर धो, दादाक संग भोजनक हेतु वि‍दा होइत छलाह। आगाँ-आगाँ हम आ पाछाँ-पाछाँ ओ सभ। बड्ड प्रेमसँ भोजन करैत छलाह। अन्‍तमे माए बड़का बट्टामे छालीसँ भरल गरम दूध आ सभसँ अन्‍तमे दही भेजबैत छलथि‍न्‍ह। पाहुन महोदय थारीक परोसल ब्‍यंजन एवं तमाम वस्‍तुक लगभग ७५ प्रति‍शत हि‍स्‍सा बड़ा मनोयोग पूर्वक ग्रहण कऽ लैत छलाह। एक-आध बेर भोजनक प्रशंसा सेहो मुक्‍त कंठसँ करैत छलाह। कि‍छु हँसी-मजाक आ कटाक्ष सेहो चलै छलै। दादा हुनका सामनेमे एक छोट पीढ़ीपर बैसल, बेंत पकड़ने हुनकर आव-भगतमे लागल रहैत छलाह। ओह!! कतए भटकि‍ गेलौं हम छप्‍पन भोगक चर्चामे!! श्री वत्‍स गोस्‍वामी हमरा मोनमे एक हि‍साबें ब्रज प्रकल्‍पक खूब नीकसँ जनबाक जि‍ज्ञासा उत्‍पन्न कऽ देलन्‍हि‍। बीच-बीचमे कि‍छु सांस्‍कृति‍क कार्यक्रममे ब्रजभूमि‍सँ कलाकार आ कथावाचक सभ अबै छलाह। गीतमे आ कथा वाचनक क्रममे ई लोकनि‍ ब्रजभाषाक कि‍छु खाँटी शब्‍दक प्रयोग करैत छलाह। ओ शब्‍द एहेन जे एकाएक प्रेमक नशामे मनुक्‍ख धुत्त भऽ जाए। फेर की छल, हम अपन संस्‍थाक ब्रज-प्रकल्‍प परि‍योजनामे लागि‍ गेलौं। मुदा एकाएक आरो परि‍योजना सभ आबि‍ गेलै आ हमरा ब्रज-प्रकल्‍प छोड़ए पड़ल। मोन हमेशा कचोट करैत रहल मुदा की कएल जा सकैत छल। २००७ ईं मे गामसँ हमर माता-पि‍ता दि‍ल्‍ली एलाह। माए मथुरा वृन्‍दावन जेबाक इच्‍छा व्‍यक्‍त केलनि‍। हम तुरंत तैय्यार भऽ गेलौं। मुदा समयाभाव छल। हमरा लग समएक कमी रहैत अछि‍, ऐ बातसँ पि‍ताजी नीक जकाँ अवगत छलाह। ओ कहलनि‍- “ठीक छै। हमरा लोकनि‍ दि‍ल्‍लीसँ तीन बजे प्रात: बृन्‍दावनक हेतु प्रस्‍थान करब। बाँके बि‍हारी, रंगनाथ इस्‍कॉन मन्‍दि‍र आ कि‍छु अन्‍य प्रसि‍द्ध मन्‍दि‍रक दर्शन करैत सीधे मथुरा चलि‍ पड़ब। मथुरामे द्वारकाधीशक  पूजा कए आ भगवान श्रीकृष्‍णक जन्‍मस्‍थली (गर्भ गृह) देखलाक बाद भोजन- तत्‍पश्चात गोबर्धनक परि‍क्रमा (कारेसँ) आ अन्‍तत: बरसाना जाए राधा-रानी या लाड़ली जीक दर्शन करैत देर-सबेर ओही दि‍न दि‍ल्‍ली वापस आबि‍ जाएब।” पि‍ताजीक ऐ योजनासँ हम प्रसन्न भेलौं।‍ भेल जे सभ कार्य एके दि‍न (रवि‍ दि‍न) मे भऽ जाएत। ईहो भेल जे पि‍ताजी ब्रज क्षेत्रसँ नीक जकाँ वाकि‍फ छथि‍। माए सेहो पि‍ताजी केर योजनाकेँ सहर्ष स्‍वीकारि‍ लेलनि‍। दोसर दि‍न प्रात: हमरा लोकनि‍ स्‍नान-ध्‍यान कए ठीक तीन बजे बृन्‍दावन यात्राक हेतु  दिल्लीसँ नि‍कलि‍ गेलौं। रस्‍ता साफ आ भीड़क नामो नि‍शान नै। गाड़ीक चालक साकांक्ष। बहुत वेगसँ मुदा सधल गाड़ी हँकैत। ठीक दू घंटामे बृन्‍दावन पहुँचि गेलौं। सभसँ पहि‍ने इस्‍कान मन्‍दि‍र, फेर रंगनाथ मन्‍दि‍र कि‍छु छोट-मोट आनो मन्‍दि‍र आ अन्‍तत: बाँके बि‍हारीक मन्‍दि‍र जा ओतए राधा-कृष्‍णक दर्शन केलौं। सभ कर्म शीघ्रतामे आ अन्‍हारेमे। ओतएसँ सीधे मथुराक हेतु प्रस्‍थान केलौं। होइत छल शीघ्र द्वारकाधीशक दर्शन भऽ जाएत तँ माए-बाबूजी अन्नजल ग्रहण करताह। द्वारकाधीशक दर्शन कए कृष्‍ण जन्‍मस्‍थलीक दर्शन केलौं। पुन: एक होटलमे भोजन कए बि‍ना समए गमौने हमरा लोकनि‍ गोबर्धन पर्बत दि‍स बि‍दा भेलौं। आब सुरूज पूरा उगि‍ गेल छलाह। जाड़ कम भऽ रहल छल। गोबर्धन कोनो दृष्‍टि‍कोणे पहाड़ नै लागि‍ रहल छल। मुदा माए कहलनि‍- “बाउ, भाव देखि‍यौ, स्‍वरूप नै। कलयुग केर मनुक्‍खक दुष्‍कर्म आ पापसँ गाेबर्धन नीचाँ भऽ गेल छै। अहाँ पढ़ल-लिखल छी। कनी सोचू: भगवान कृष्‍ण जै गोबर्धनकेँ अपना आंगुरपर उठेने हेताह से की सामान्‍य पहाड़ छल हेतै? कि‍न्नौ नै।‍” माएक बातकेँ हम बि‍ना कुनो तर्क केने सुनि‍ लेलौं। एक बात ई नीक लागल जे  गोबर्धन साफ-सुथड़ा छलै। बीच-बीचमे अगल-बगल केर गामक महि‍ला सभ गोबरक चि‍पड़ी आ गोइठा पथैत। कतौ-कतौ गाए-बाछी (आ बाछा) चड़ैत। चहुओर हरि‍यरी। रस्‍तामे झुण्‍डक-झुण्‍ड महि‍ला आ पुरूष लोकनि‍ बि‍ना जूता-चप्‍पल पहि‍रने गोबर्धनक परि‍क्रमा करैत। राधे-कृष्‍ण, राधे-कृष्‍णक रट लगबैत। मुरलीधर की जय, श्रीकृष्‍ण की जय, करैत। आ कि‍छु लोक सभ गीत गबैत प्रेमक उन्‍मादमे वि‍भोर भेल चलल जाइत। एक ठामक ई दृश्‍य देख माए भावुक भऽ गेलीह। कहलनि‍- “बाउ, १०-१५ मि‍नट लेल हमरा कारपर सँ उतारि‍ दिअ। कमसँ कम १००८ डेग पएरे तँ चलि‍ ली ऐ भूमि‍पर! ई माटि‍ जौं पएरमे लागि‍ जाएत तँ जीवन धन्‍य भऽ जाएत।” हम गाड़ी रोकि‍ माए केर संग लगभग दू कि‍लोमीटर पैदल चलैत रहलौं। माए बड़ प्रसन्न भेलीह। मुदा ई कचोट रहि‍ये गेलन्‍हि‍ जे पूरा गोबर्धनक परि‍क्रमा पएरे-पएरे करि‍तौं। बादमे हमरा लोकनि‍ कारपर बैस गेलौं। गोबर्धनसँ हमरा लोकनि‍ बरसानाक हेतु वि‍दा भेलौं। बरसाना पहुँच कऽ राधा-रानीक मन्‍दि‍र जेबाक छल। ओतए गेलाक बाद ज्ञात भेल जे मन्‍दि‍र तँ पहाड़ीपर छै, जै लेल लगभग चारि‍ सए सीढ़ीक पैदानपर चढ़ऽ पड़तै। धर्मसँ ओतप्रोत भेल माए बड़ा सहजतासँ सीढ़ी चढ़ए लगलीह। पि‍ताजी घुटनाक दर्दसँ ग्रसि‍त छलाह तथापि‍ नहु-नहु ओहो सीढ़ी चढ़ैत रहला‍। बीच-बीचमे सुसताइत आ फेर आगू बढ़थि‍। अन्‍तत: हमरा लोकनि‍ मन्‍दि‍रक प्रांगणमे प्रवेश केलौं। मुदा प्रवेश केलाक बाद पता चलल जे मन्‍दि‍रक पट बन्‍द छै। तइ काल दू बजैत रहै। लोक सभ कहलक जे मन्‍दि‍रक पट साढ़े चारि‍ बजे साँझमे खुजतै। थाकल तँ रहबे करी। एकठाम भुइयेमे ओछाइन ओछा, जाजिम बिछा हमरा लोकनि‍ बैसि गेलौं। कनी कालक बाद दू टा ८-१० बर्खक लड़का आ दू टा बालिका, सभ स्‍थानीय, हमरा सभ लग पहुँचल। कहए लगल- “बाबू जी, राधा-रानीक गीत सुनाउ?‍” कहि‍ नै किएक हम तुरत कहि‍ देलि‍ऐ- “ठीक छै सुनाउ।‍” आ ओ सभ गीत गाबए लागल: “राधा रानी की जय। महरानी की जय......।‍” सभ आखर सुन्‍दर, बोली मनमोहक। स्‍वर खाँटी लोकल आ सुअदगर। गीतक बाद गीत। ओ सभ गबैत रहल। ब्रजबोलीमे समस्‍त वातावरण राधामय। माए भाव-वि‍भोर भऽ हाथ जोड़ने राधा-रानी की जय, महरानी की जय, राधे-कृष्‍ण, राधे-कृष्‍ण बजैत रहलीह। गीत सुनैत रहलीह। तीर्थक इच्‍छाक पूर्ति भेलनि‍ तै सुखसँ आह्लादि‍त भऽ गर्म-गर्म नोर खसैत रहलन्‍हि‍। जेना-जेना माए केर आँखि‍सँ नोर खसन्‍हि‍ तेना-तेना हुनके‍ आँखि‍ आ मुँह सुन्नर भेल गेलन्‍हि‍। पि‍ताजी सेहो प्रसन्न छलाह। ठीक साढ़े चारि‍ बजे मन्‍दि‍रक पट खुजलै। लोक सभ जोरसँ राधा-रानी  की जय केर घोष केलक आ मन्‍दि‍रमे प्रवेश केलक। दर्शन केर बाद हमरा  लोकनि  किछु ‍काल आरो ओतए रहलौं। जखन अन्‍हार होमए लगलै तँ पहाड़ीपर सँ नीचाँ उतरए लगलौं। नीचाँ उतरि‍ चाह-नाश्‍ता कऽ एकबेर पुन: भगवान श्रीकृष्‍ण आ राधा रानी केर जयकार करैत दि‍ल्‍लीक हेतु प्रस्‍थान केलौं। दि‍न भरि‍क थाकल आ भोरे ऑफि‍स जेबाक बोझ तँए सूति‍ रहलौं। मुदा मोनमे ई भावना प्रबल भऽ गेल जे एकबेर चैनसँ ब्रजक्षेत्र घूमब। यमुनाकेँ देखक इच्‍छा आ बरसानेक सौन्‍दर्यक अवलोकन सदरि‍काल मोनमे औढ़ मारैत रहल। जनवरी २०११ मे हमर सासु बृन्‍दावन जेबाक इच्‍छा हमरासँ व्‍यक्‍त केलनि‍। ओ हमर स्‍वर्गीय स्‍वसुर पण्‍डि‍त कालीनाथ झा केर प्रथम पुण्‍यति‍थि‍सँ पूर्व एकबेर यमुनामे स्‍नान एवं अपन गौरक विसर्जन करए चाहैत छलीह। हम तुरत अपन संगी श्री वि‍रेन्‍द्र कुण्‍डुसँ बात कए जनवरी मासक अन्‍ति‍म रवि‍ दि‍न अप्‍पन सासुक संग वि‍रेन्‍द्रक कारसँ बृन्‍दावन जेबाक योजना बना लेलौं। बृन्‍दावन केर हमर एक विद्यार्थी वि‍भु शर्मा कहलक जे ओकर अनुज प्राञ्जल हमरा लोकनि‍ लेल तमाम स्‍थानीय सहायताक व्‍यवस्‍था करता। दि‍ल्‍लीसँ स्‍नान-धि‍यान कए हमरा लोकनि‍ ५ बजे भोरे वि‍दा भेलौं। सीधे वृन्‍दावन पहुँचलौं। ओतए इस्कॉन मन्‍दि‍र लग प्राञ्जल शार्मा हमरा लोकनि‍क पथ हेर रहल छल। प्राञ्जल संग प्रवीण शर्मा नामक एक स्‍थानीय गाइड छलै। प्राञ्जल हमरा कहलक जे ई अहाँकेँ सभ किछु देखौताह। हमर सासु केर इच्‍छा सर्वप्रथम यमुनामे स्‍नान आ गौर वि‍सर्जनक छलन्‍हि‍। प्रवीण कहलक जे बृन्‍दावनक केशी घाट सर्वोत्तम छै। केशी भगवान श्रीकृष्‍णक घोड़ाक नाम छलन्‍हि‍। ओ बड़ा प्रतापी तथा पुण्‍यात्‍मा घोड़ा छलै। प्रवीण स्‍थानीय होमक कारण बृन्‍दावन केर एक-एक गलीसँ परि‍चि‍त छल, रमणरेती दि‍ससँ लऽ कऽ जाए लागल। कहलक- “यएह छी रमणरेती।‍” देखैत छी चारू दि‍स गली, मकान, मन्‍दि‍र इत्‍यादि‍। एको ईंच धरती खाली नै। एको चम्‍मच रेतक माने बाउलक नामो नि‍शान नै। चहुँ दि‍स तंगी, आ गन्‍दगी। भेल यएह थीक रमणरेती? खएर! गली-कुच्‍ची होइत अंतत: हमरा लोकनि‍ केशी घाट पहुँचलौं। यमुनामे जल कुनो वि‍शेष नै। १५ टा नाह कछेरपर लागल। पाँच-सात तीर्थायात्री स्‍नान करैत। मोनमे भेल- चलू, चैनसँ स्‍नान करब। यमुनामे गाड़ीसँ उतरि‍ कछेरपर एलौं। कछेरपर अबि‍ते पानि‍सँ दुुर्गन्‍ध आबए लागल। कारी सियाह पानि‍। तीन ठामसँ पूरा शहरक गन्‍ध-भरल पानि‍ यमुनामे हरा-हरा कऽ खसैत। मोन घृणासँ भरि‍ गेल। नहेबाक इच्‍छा समाप्‍त भऽ गेल। यमुनाक तमाम कल्‍पना आ वर्णन बि‍सरि‍ गेलौं। एकाएक एना बुझना गेल जेना हम दुनि‍याँक सभसँ पैघ गन्‍दा नालामे आबि‍ गेल छी। कृष्‍ण-राधा-गोपी कदम्‍बक गाछ यमुना....। सभ कि‍छु खतम!! नावबला सभ कहलक- “श्रीमान्, नाहपर चढ़ा, हम यमुनाक ओइपार लए जाइत छी। ओतए नीक जल छै।‍” हमरा लोकनि‍ नाहपर चढ़ि गेलौं। जलसँ दुर्गन्‍ध अबैत छल। मोन घोर छल। ओइ कात जा बालुपर सभ समान रखलौं। एक आँजुर जल उठेलौं। कारी-भीस आ दुर्गन्‍धसँ भरल। सभ स्‍नान करैसँ साफ मना कऽ देलनि। मुदा हमर सासु जि‍द्द ठानि‍ देलन्‍हि‍। ओ यमुनाक ओइ जलमे ग्‍यारह डुब्‍बी मारलनि‍। सबहक हेतु आ अपनो लेल। हम कहलि‍यनि‍- “एक डुब्‍बी हमरो लेल मारि‍ लेथि‍।‍” हमरा लग चन्‍दन केर पेस्‍ट छल। हम हुनक माथ एवं हाथमे रगड़लौं आ फेर बृन्‍दावन केर मन्‍दि‍र दि‍स प्रस्‍थान केलाैं। सभसँ पहि‍ने रंगनायक मन्‍दि‍र, तकर बाद एक आर मन्‍दि‍र- जइमे कृष्‍ण जीक बालवस्‍थाक मूर्ति कि‍शोरी जीक संग छलन्‍हि‍, तइमे अएलौं। पण्‍डा सभ नाना तरीका -वि‍धवा, कल्‍याण, अनाथ आश्रम, गौसेवा-सँ लोक सभसँ पैसा ऐंठबामे माहि‍र। गली सभ गंदगीसँ भरल। समए बीतल जाइत छल। हम प्रवीणकेँ कहलि‍ऐ- “सीधे हमरा लोकनि‍केँ बाँके बि‍हारी जीक मन्‍दि‍र लऽ चलू।‍” कारण हुनकर दर्शन बि‍ना हमर सासु अन्न-जल ग्रहण नै कऽ सकै छलीह। प्रवीण संग हमरा लोकनि‍ बाँके-बि‍हारी मन्‍दि‍र केर प्रांगण दि‍स बढ़लौं। पूरा गलीमे बड्ड भीड़। मनुक्‍ख चुट्टीक धारी जकाँ ससरैत। हरे-कृष्‍ण, राधे-राधेक उच्‍चारणसँ वातावरण गनगनाइत। चारू दि‍स गली सभमे गंदगी। कतौ-वि‍धवा सभ भीख मंगैत तँ कतौ भगवा वस्‍त्रमे साधु! मोन खि‍न्न-खि‍न्न भेल। कतए आबि‍ गेलौं। प्रवीण स्‍थानीय हेबाक कारणे एकटा नुकौका गलीसँ हमरा लोकनि‍केँ मन्‍दि‍रक प्रांगणमे घुसेलन्‍हि‍। मनुक्‍खपर मनुक्‍ख चढ़ैत। हमरा लोकनि‍ कोहुना-कहुना बाँके-बि‍हारी जीकेँ एक झलक देख पेलौं। आब मोनमे आबए लगल जे कखन बाहर नि‍कली। जखन वापस अबैत रही तँ कातमे एक भव्‍य साधु जे करीब ६५ वर्षक छल, केँ कनैत आ भाव-वि‍भोर होइत देखलिऐ। हम कहलिऐ- “किए कानि रहल छी बाबा?‍” जबाब देलाह- “आज ठाकुर जीक ब्‍याला छी।‍” हम ब्‍यालाक अर्थ नै बुझलौं पुछलयनि‍- “ब्‍याला की होइए?‍” साधु- “जखन ककरो मन्नत पूर्ण होइ छै तँ ठाकुर जीक ब्‍याला करबाओल जाइ छै। ब्‍याला अर्थात् वि‍वाह। ऐमे तीन लाख रूपैयाक खर्च छै। फूलसँ पूरे मन्‍दि‍रकेँ सजाओल जाइ छै। बरातक आयोजन, पालकीमे बैसा कऽ ठाकुर जी एवं कि‍शोरी जीकेँ पूरे बृन्‍दावनमे घुमाओल जाइए। पालकी पुन: बरसाना लऽ गेल जाइए फेर ओतँसँ आपस बृन्‍दावन।” हमरा मुँहसँ नि‍कलल- “ठीक छै। नीक छै। ई तँ उत्‍सवक माहौल अछि। फेर कानि किए रहल छी?‍” साधु- “कानबाके तँ समए अछि। राधे-राधे ऐ लेल कऽ रहल छी जे‍ राधा हमर बहिन छी।‍ आब ठाकुर जी सँ ओकर ब्‍याहला भऽ रहल छै। एकर बाद ओ हमरासँ बि‍छुड़ जेती। हम नै कानब तँ के कानत?।” ई कहि‍ ओ भोकासी पारि‍ पुन: कानए लगल। ओकर कानब वास्‍तवि‍क। कुनो नाटकीयता नै। सहज आ नि‍श्‍छल। ओहि‍ना जेना एक सहोदर भाय अपन बहि‍नक दुरागमनक काल कनैत अछि‍। बहि‍नसँ बि‍छुड़बाक वएह टीस। वएह भावनात्‍मक लगाव। हमर मोन ओकरा प्रति‍ श्रद्धासँ भरि‍ गेल। बृन्‍दावनसँ सि‍नेह बढ़ए लागल। घृणा समाप्‍त होमए लागल। एकाएक नजरि‍ एक लगभग ४५ वर्षक युवकपर गेल। फुलपेन्‍ट-शर्ट पहि‍रने, माथामे चानन मुदा त्रि‍पुण्‍ड नै। धरगर-पतरगर। गरदनि‍मे तुलसीक माला लपेटने-बि‍ल्‍कुल गरदनि‍मे सटल आ लपटाएल। ओ बाँके-बि‍हारी जीक सामने ठाढ़ भऽ कि‍छु बड़बड़ाइत छल। हम अनायास ओकरा लग बढ़लौं। सुनैत छी ओ कि‍छु एना बाजि‍ रहल अछि‍- “बड़ो जीजा जी। की लीला करै छी। बड़-बड़ केँ नचाबै छी। हम मस्‍त भऽ गेलौं। धन्‍य भऽ गेल हमर बहिना। हमरा आर की चाही। जँ हमर बहिन आ जीजा प्रसन्न तँ हमहूँ प्रसन्न। लागल रहू।‍” हमरा बुझना गेल ई की बाजि‍ रहल अछि‍। हम टोकैत कहलि‍यनि‍- “ककरासँ गप कऽ रहल छी?‍” युवक- “बाँके-बि‍हारी जी सँ, अओर ककरासँ।‍” हम- “फि‍र जीजा जी ककरा कहि रहल रही?‍” युवक- “बि‍हारी जी केँ।‍” हम- “बि‍हारी जी केँ?‍” युवक- “जी। हम अपन गुरूजीक आदेशसँ बि‍हारी जीकेँ अपना जीजा बनेने छी। ऐ तरहेँ राधा जी हमर बहिन भेली। हम अहाँ सभ जकाँ हिनकासँ किछु मांगैले नै अबै छी। भाइ भला अपन जीजा आ बहिनसँ की मांगब। हम तँ देबै ने, हम तँ दैले अबै छी। हिनकर लीला देखैले अबै छी।‍” हम आश्‍चर्यित होइत‍ बजलौं- “अहाँक नाम की छी?‍” युवक- “हमर नाम चोलेश शर्मा छी, हम दि‍ल्‍लीसँ छी। प्रति‍ सप्‍ताह रवि‍केँ एतऽ अबै छी।‍” हम- “आब एतऽसँ कतऽ जाएब?‍” युवक- “आइ मथुरा नै जाएब। एतऽसँ सोझे बरसाना जाएब। अपन लाडली राधासँ मिलि दि‍ल्‍ली फिर्ता हएब।‍” हम- “की हम सभ सेहो अहाँक संग चली?‍” युवक-“किए नै। अहूँ चलू। हमर गाड़ीक संग-संग।‍” चोलेश शर्माक भावमे सेहो हमरा सहजता आ समर्पण बुझना गेल। हमरा लोकनि‍ मथुराक यात्रा कुनो आन बेर लेल छोड़ि‍ बरसाना दि‍स वि‍दा भेलौं। बृन्‍दावनकेँ कि‍छु नगद राशि‍ आ धन्‍यवाद दैत चोलेश शर्माक संग हमरा लोकनि‍ आगाँ बढ़लौं। हम अपन एक आदमीकेँ चोलेश शर्मा गाड़ीमे बैसेलौं। चोलेश राधा-कृष्णक कथा आर एक-एक स्‍थानक गुणगान करैत रहल। समस्‍त बृन्‍दावन एकाएक भव्‍य लागऽ लागल। अन्‍तत: दू बजे दि‍नमे बरसाना पहुँचलौं। पहाड़पर चढ़ि‍ राधा-रानीक मन्‍दि‍रमे प्रवेश केलाैं। करीब २५ मि‍नट चढ़ैमे लागल। पता चलल जे मन्‍दि‍रक पट बन्न छै। साढ़े चारि‍ बजे सांझमे खुजतै। चोलेशक संग मन्‍दि‍रक बाहरी हि‍स्‍साक आवरणक नि‍रक्षण करए लगलौं। बरसानेक मध्‍यमे ई पहाड़ी बरसानाक माथपर मनटीका जकाँ लागल। एे मन्‍दि‍रकेँ लाड़लीजीक मन्‍दि‍र कहल जाइ छै। मन्‍दि‍रक ि‍नर्माण राजस्‍थानक राजा वीर सि‍ंह १६७५ ईं.मे करौलन्‍हि‍। मन्‍दि‍रक स्‍थापत्य दक्षि‍ण आर उत्तर भारतक सोहनगर मि‍श्रण केर अनुपन उदाहरण बुझना गेल। मन्‍दि‍र ९० फीटक छै। शि‍खर उज्जर, नील ग्रेनाइट पाथर तथा सोनासँ बनल छै। मन्‍दि‍रक कलाकृति‍क ि‍नर्माण दक्षि‍ण भारतक १५ कलाकारक सहायतासँ कएल गेल छै। मन्‍दि‍रक प्रांगणक चारूकात राजस्‍थान शैलीक पेन्‍टि‍ंगसँ सजाएल। कतौ कृष्‍ण गोपीक चीर हरण करैत, कतौ मत्‍स्‍यावतारक चि‍त्रण, कतौ नटखट कन्‍हैयाकेँ यशोदाजी उखड़ि‍मे बन्‍हने, कतौ कलि‍या नागकेँ नथैत कृष्ण, कतौ कदम्‍बक गाछपर बैस बासुरी हेरैत कृष्‍ण, कतौ गोवर्धन पहाड़केँ आंगुरपर उठेने कृष्‍ण, कतौ यमुनासँ जल भरैत गोपी, कतौ ऐ मंदि‍रक रचनाक उल्‍लेख- चि‍त्रकलाक उत्तम प्रस्‍तुि‍त। चोलेश शर्मा एक स्‍थानीय साधु श्री भोलालाल दासक सहायतासँ एक-एक चीजक दर्शन हमरा लोकनि‍केँ करौलन्‍हि‍। मुख्‍य पट खुजबामे अखनो समए छल। हमरा लोकनि‍ मन्‍दि‍रक पाछाँमे बनल एक छोट कड़ी दि‍स बढ़लौं। एक साधु भेटलाह। चोलेश ओइ साधुसँ बात करए लगलाह। बीच-बीच झुण्‍डक-झुण्‍ड स्‍थानीय महि‍ला सभ घघरा-चुनरी पहि‍रने राधा-कृष्‍णक लोकगीत गबैत अबैत रहल। मोन प्रसन्न भेल। साढ़े चारि‍ बजे पट खुजि‍ गेलै। राधा-कृष्‍णक बड़ा नि‍श्‍चि‍न्‍ततासँ दर्शन भेल। आब हमरा लोकनि‍ दि‍ल्‍लीक हेतु प्रस्‍थान केलौं। जतए कतौ खाली स्‍थान रहै ततए राधे-राधे लीखल। हमहूँ राधे-राधेमे मग्‍न भऽ गेलौं। ईहो पता चलल जे बरसानाक पूर्व नाम ब्रम्‍हसरीन छै। दंतकथा ई छै जे एक बेर ब्रम्‍हाजी भगवान श्रीकृष्‍णसँ धरतीपर ि‍कछु दि‍न रहबाक नि‍वेदन केलथि‍न्‍ह। कृष्‍ण कहलथि‍न्‍ह ब्रम्‍हाजीसँ- “ठीक छै, अहाँ एकटा पहाड़ीमे अपनाकेँ परि‍वर्तित करू। ब्रम्‍ह तुरत पहाड़ी भऽ गेलाह। तैँ बरसाने केर चारि‍ पहाड़ी ब्रम्‍हाजीक चारि‍ मस्‍त‍क या सि‍र मानल जाइत अछि‍। तैँ ब्रम्‍हाक सि‍रसँ ब्रम्‍हसरीन भेल या ब्रम्‍हसरीन कालान्‍तरमे बरसाने भऽ गेल।‍” लोअर दिवांग घाटी: इदु-मिसमी जनजातिक अनुपम संसार क्षेत्रफलक दृष्टिकोणसँ अरुणाचल प्रदेश सम्पूर्ण उत्तर-पूर्व भारतमे सबसँ पैघ राज्य थीक। हलाँकि जनसंख्याक घनत्व एतए सबसँ कम छै। समस्त राज्य हरियर जंगल, पहाड़सँ भरल; रम्य आ आकर्षक। ऐ राज्यमे २६ मूल जनजाति अनेक उपजातिक संग रहि रहल अछि। अरुणाचलक अधिकांश क्षेत्रमे पहुँचनाइ आइयो बहुत कठिन कार्य छै। एक ठाम पहुँचबाक हेतु कतेको बेर नदी पार केनाइ, कतौ पक्का सड़कक नै भेनाइ, कतौ जमीन धसि जेबाक कारणेँ रस्ता अवरुद्ध भऽ गेनाइ इत्यादि सामान्य बात छै। ऐ कठिन परिस्थितिक कारण एतए केर जनजाति सभ एखनो धरि अपन मूल परम्परा, खान-पान, आभूषण, वस्त्र-विन्यास, रीति-रिवाजकेँ सहेजने छथि। अनेक दिस चीन एवं आन अन्तर्राष्ट्रीय सीमासँ सटल भारतक ई नैसर्गिक प्रदेश सौन्दर्यक दृष्टिसँ भारतवर्षक श्रृंगार थीक। एकर प्राकृतिक स्वरूपक जतेक प्रशंसा कएल जाए से कमे हएत। अरुणाचलक नाम लैते मात्र तवांग, ईटानगर (प्रदेशक राजधानी), बोमडिला, बन्दरदेवा, रोईंग, जीरो, तिराप, सुबंसरी, नामसाई आ अनेक रम्य स्थान हमरा मानस पटलमे घुमए लगैत अछि, आ घुमए लगैत अछि रंग-बिरंगक परम्परागत परिधानसँ सजल अरुणाचल प्रदेशक जनजाति- सेड्रोपेन, खामती, आदी, इदू-मिसमी, दिगारु-मिसमी, मिजो-मिसमी, आपातानी इत्यादिक झुण्डक-झुण्ड अपन सहजतामे हँसैत आ आबए बला प्रत्येक अतिथिकेँ अपन स्वभाविक आ स्वीकारात्मक मुस्कानसँ स्वागत करैत। बिना कहने सभ किछु कहैत। तँए यायावरीक ऐ अंकमे हम अपन लोअर दिवांग घाटी जिलाक यात्रा वृत्तान्तक चरचा कऽ रहल छी। प्रदेशक दिवांग घाटी दू भाग- अपर दिवांग घाटी आ लोअर दिवांग घाटीमे बाँटल छै। हम अपन यात्रा अपन संस्थाक एक सहयोगी डॉ. ऋचा नेगीक संग दिसम्बर २००७मे केने रही। लोअर दिवांग घाटी तँ ठीक रहै परन्तु अपर दिवांग घाटी जनपदमे अति बर्फ खसलाक कारणेँ बिल्कुल अवरुद्ध छलै। तँए हमरा लोकनि ई निर्णय लेलौं जे अपनाकेँ सिर्फ लोअर दिवांग घाटी जनपद तक सीमित राखब आ ओतए केर इदु-मिसमी जनजातिपर कार्य करब। कार्यक मतलब ई जे इदु-मिसमीक जीवन-चक्र, गृह-निर्माण, पावनि-तिहार, वस्त्र-विन्यास, श्रृंगार-प्रसाधन, गहना, विवाह, कृषि-कार्य, स्त्री-पुरुषक सम्बन्ध, परम्परागत क्रीड़ा आदिक विस्तारसँ प्रलेखन आ डाक्युमेन्टेशन केनाइ, इदु-मिसमीक भाषा-संस्कृतिसँ अपनाकेँ अवगत करेनाइ। डॉ. ऋचा नेगी एक प्रतिष्ठित आ वरिष्ठ मानवशास्त्री प्रोफेसर रघुनाथ सिंह नेगीक पुत्री छथि। ओना तँ हिनकर शिक्षा अंग्रेजीमे एम.ए. एवं अंग्रेजीयेमे लोक नाट्यपर छन्हि, परन्तु भ्रमणमे खूब मोन लगैत छन्हि। ई अलग बात छै जे ओ एको आखर लिखएसँ सदरिकाल बचबाक बहाना बनबएमे माहिर छथि। ऋचाजीकेँ समस्त अऋणाचल प्रदेशसँ अथाह प्रेम छन्हि। हमरासँ ज्यादे ओ अरुणाचल प्रदेशमे रहै छथि। जखन-कखनो हमरा लोकनि उत्तर-पूर्व भारतक यात्रा करै छी तँ गोवाहाटी जाइते मात्र ऋचाजी कोनो-ने-कोनो बहाना बनाए अरुणाचलक हेतु प्रस्थान कऽ जाइ छथि। पुनः दिल्ली वापस अएबाक नियत तिथिसँ एक-दू दिन पहिने गोवाहाटी आबि जाइ छथि। कद-काठी, उजरी गोराइ एहेन छन्हि जे सहजतासँ अरुणाचलमे खपि जाइ छथि। लम्बाइ पाँच फुटसँ ज्यादे नै हेतन्हि। ऐ सभ कारणेँ अरुणाचलमे लोक ऋचाजीकेँ स्थानीय बुझै छन्हि। ऐ बातपर ओ बड्ड प्रसन्न रहै छथि। बात लोअर दिबांग घाटी जनपद केर यात्राक सम्बन्धमे करैत रही। ई हमर प्रथम यात्रा छल, परन्तु ऋचाजी एक बेर पहिने आबि ऐ जनपद केर डिस्ट्रिक्ट रिसर्च ऑफिसर, भाषा अधिकारी, जिला कला अओर संस्कृति अधिकारी एवं किछु स्थानीय लोक सभसँ बातचीत कए कार्यक्रम केर रूपरेखा बना कऽ गेल छली। तँए परियोजनाक कार्यान्वयनमे हमरा लोकनिकेँ कोनो तरहक दिक्कत नै भेल। लोअर दिबांग घाटी जनपद केर मुख्यालय केर नाम रोईंग छै। रोईंग ओना तँ जनपद केर मुख्यालय थीक परन्तु जनसंख्या आदिक दृष्टिएँ एना लागत जेना कोनो प्रखण्ड-स्तर केर कस्बा हुअए। तइमे रोईंग पहुँचनाइ बहुत दुष्कर। हमरा लोकनि दिल्लीसँ हवाई जहाजसँ असम राज्य डिब्रूगढ़ अएलौं। डिब्रूगढ़सँ दू टाटा सूमो टेक्सी लेल। एक टेक्सीमे हम आ डॉ. ऋचा नेगी आ दोसर टेक्सीमे हमरा लोकनिक विडियो कैमराक सदस्य लोकनि अपन असला-खसला लए सवार भऽ गेलाह। डिब्रूगढ़ हवाई अड्डासँ हमरा लोकनि तिनसुकिया अएलौं। ओतए जरूरीक किछु समान जेना कि टॉर्च, रेनकोट, छत्ता, खएबाक हेतु नमकीन आदि कीनि रोईंग लेल प्रस्थान कएल। तिनसुकियासँ रोईंग कोनो बड्ड दूर नै छै। लगभग ७५-८० किलोमीटर हेतै, मुदा पहुँचनाइ दुष्कर। सर्वप्रथम हमरा लोकनि सदियाघाट नामक स्थान जे कि ब्रह्मपुत्र नदीक कछेरपर छै, पर पहुँचलौं। ओतएसँ एक प्राइवेट फेरीबलासँ बात कए अपन दुनू टेक्सीक संग ब्रह्मपुत्र पार करबाक हेतु मोटरबला नावमे सवार भेलौं। सवार होमाक प्रक्रिया मात्रमे लगभग सवा घण्टा लागि गेल। आब हमरा लोकनिक नाव ब्रह्मपुत्रक दोसर कछेरक यात्राक हेतु प्रस्थान कऽ चुकल। नावकेँ चलिते एना बुझाएल जेना कोनो समुद्रक बीच आबि गेलौं। चारू दिस जलमग्न। ऊपरसँ साँझ से भऽ गेल रहै। ब्रह्मपुत्रक शान्त स्वभाव आ नावक मोटरक पानि काटक प्रक्रियाक कारणेँ एक अलग किस्म केर बनैत पानिक स्वरूप, वर्षाक कारणेँ मटिआएल पानि, हमरा नीक लगैत छल। नाव बला सभ कहलक जे सदियाघाटसँ दोसर दियरा दिस जाएमे लगभग सवा घण्टा लागत। लगभग १० मिनट पानिमे चललाक बाद नावक मलाह अपन खोलीसँ एक छोट-छिन बोतल निकाललक। बोतल पौआ देशी दारुक रहै। आधा भरल। दू आदमी बिना पानि मिलेने आधा-आधा घटकि लेलक आ जय कमला मइया कहैत खाली बोतलकेँ ब्रह्मपुत्रमे फेंकि देलकै। पुनः ओ सभ आपसमे मैथिलीमे वार्तालाप प्रारम्भ केलक। हम पुछलिऐ: “अहाँ लोकनि कतए केर छी”? “हम सभ बिहारक छी”। ओ सभ उत्तर देलक। हम पुनः पुछलिऐ- बिहारक छी से तँ हम बुझि गेलौं, बिहारक कोन जिलामे अहाँ लोकनिक घर थीक? तइपर ओ जवाब देलक- “हमरा लोकनि पूर्णियाँ जिलासँ छी”। ऐपर हम कहलिऐ- “हम मधुबनीसँ छी”। एकर बाद हमरा लोकनि अपन वार्तालाप मैथिलीमे शुरु कऽ देलौं। मलाह हमर दिस इंगित भऽ कहलक- “सरकार अहाँ लोकनि कतएसँ आएल छी”। हम जवाब देलिऐ: “दिल्लीसँ। हमरा लोकनि भारत सरकारक अधीनस्थ कर्मचारी छी। लोअर दिबांग घाटी जिलामे ओतए केर लोकक विशेषतः इदु-मिसमी जनजातिक संस्कृतिकेँ बुझबाक हेतु एवं ओइ संस्कृतिपर कार्य करबाक हेतु आएल छी”। हमर जवाब सुनि मलहबा भैया पुछलक: “सरकार, अहाँ सभ कहियासँ कहिया धरि लोअर दिबांग घाटीमे रहब? लोअर दिबांग घाटीक मुख्यालय रोईंग छै। रोईंगमे कतए रहब”? हम कहलिऐ: “भाई, हम सभ दिन भरि तँ भिन्न-भिन्न गाम सभमे कार्य करब आ रातुक विश्राम रोईंग केर कोनो होटलमे करब। रोईंगक ई हमर प्रथम यात्रा थीक तँए होटल आदिक नाम हमरा बुझल नै अछि। हँ ओतए केर जिला शोध अधिकारी श्री श्रुतिकर हमर पूर्व परिचित लोक छथि। हमर जे महिला सखी छथि (डॉ. ऋचा नेगी) सेहो रोईंग एवं आस-पास केर इलाकासँ पूर्व परिचित छथि। श्री श्रुतिकर एवं डॉ. ऋचा नेगी दुनू गोटे मिलि सम्भवतः नीक जगहमे हमरा लोकनिक रात्रि-विश्रामक व्यवस्था करतीह, ई विश्वास अछि। जहाँ तक कार्य करबाक बात छै तँ हमरा लोकनि २४ फरबरीसँ १ फरबरी २००८ धरि सम्पूर्ण लोअर दिबांग घाटीमे कार्य करबाक योजना बना कऽ आएल छी। आगाँ भगवानक मर्जी”। हमरा लोकनि बात करिते रही, ओइ बीच एकाएक बरखाक एक-आध बुन्द खसए लगलै। हम डरि गेलौं। भेल कहीं बीच ब्रह्मपुत्र धारमे नै फँसि जाइ। डरैत पुछलिऐ : “कहीं जोरसँ बरखा तँ नै हेतै? आ भेलै तँ हमरा लोकनि केर की गति हएत”? हमर अकुलाएल प्रश्नसँ परेशान होइत मलहबा भाइ हँसैत एवं निर्भीक स्वरमे बाजल- “सरकार, अनेरे किए परेशान भऽ रहल छी? ई बरखा ओना तँ हएत नै आ किनसाइत भइयो गेल तँ चिन्ताक कोनो बात नै। हम सभ जलकर केर सन्तान छी। महाराज कोइलाबीरक पुजारी छी। कोसी माइ केर कोरामे बढ़ल छी। कहू मालिक! कोसीसँ खतरनाक भला कोनो धार दुनियाँमे भला भऽ सकैत अछि? कमलेसरी मैयाक कृपा हमरा सभपर छन्हि। लगभग १५ बरखसँ नाव चला रहल छी, आइ तक कोनो दुर्घटना नै घटित भेल। बिना कमलेसरी आ कोइलाबीरक सुमिरन केने घरसँ नै निकलै छी”। मलहबा भाइ केर ढ़ाढ़ससँ मोन कनी चैन भेल। वार्तालापक कड़ी टूटल नै। हम पुछलिऐ: “अहाँ सभ हमरा ई कहू जे पुरनियाँसँ सदियाघाट कोना अएलौं। मलहबा भैया कहलक: “सरकार, पेट अनलक। गाममे बड्ड गरीबी छल। एकटा बाभनसँ हमर बाबू तीन सए टाका हमर बहिनक बियाह लेल सूदिपर लेलकै। ऐ आशामे जे धान-पानि नीक जकाँ हएत तँ धान बेचि एवं मखानक खेतीक पाइसँ कर्जा सधा देबै। दुर्भाग्यसँ लगातार तीन बरख कोसीमे बाढ़ि अबैत रहलै आ बभनाक पाइ सधेनाइ तँ दूर हम सभ अपन पेट भरक लेल धान आ अन्न सेहो डेढ़ापर लए लेलिऐ। सभ टा चीज बढ़ैत गेलै। अन्ततः पाँच बरखक बाद डकूबा बभना सभटा जोरि-जारि चालिस हजार टका बना देलकै। गाममे पंचैती बैसलै। हमर बूढ़ बाबूकेँ बभनाक बेटा सभ बान्हि कऽ मारलकै। हमरा सबहक तीन बीघा जमीन बलजोरी लिखा लेलक”। “मालिक! मरैत लोक की नै करैए! एक दिन साँझ खन हमर बाबू हमरा दुनू भाइकेँ बजौलक आ कनैत कहलक- बौआ! हम तँ बीट-बीट धरतीकेँ बेचि देलियौ। आब तोँ सब धरतीहीन छैं। जो कलकत्ता-असम कतौ, कमा आ पाइ भेज जइसँ गुजर चलौ- एकर बाद बाबू हमरा दुनू भाइकेँ पकड़ि जोर-जोरसँ कानए लागल। “बाबूक बात तँ सत्य छलै। हम दुनू भाइ गामसँ कनियाँक गहना बन्हक राखि कलकत्ता आबि गेलौं। कलकत्तामे मोहियाबुर्ज नामक स्थानपर रिक्शा चलाबए लगलौं। शुरूमे तँ बड्ड थकान भेल परन्तु धीरे-धीरे मोन लागि गेल। बाबू आ बच्चा सबहक बड्ड ध्यान अबैत छल। एक दिन साँझमे टेलिग्राम आएल जे “बाबू मरि गेल”। देखियौ सरकार, हमर बाबूक दुर्भाग्य, मरऽ काल हम दुनू भाइ बाबू लग नहि रहिऐ। हमर पितियौत आगि देलकै। “बाबू श्राद्धमे गाम गेलौं तँ किछु लोक कुटमैतीक नोत पूरक हेतु अएलाह। ओ सभ कहलनि, असम चलू। हम सभ असम आबि गेलौं। तहियेसँ सदियाघाटमे छी। बाबू तँ हमर जमीनक शोकमे मरि गेल, मुदा हम सभ १५ बरखमे पाँच बीघासँ ऊपर जमीन लेलौं। माय एखनो जिबैत अछि। माय हमेशा कहैत अछि- रे रामओतार! तोहर बाउ तोरा स्वर्गसँ आशीर्वाद दै छौ। बभनाकेँ देख, कुष्ट फुटि गेल छै। बेटासभ लगो नै अबै छै। घरबाली मरि गेलै। अपने असगरे टाहिं-टाहिं करैत अछि- सरकार हमरा सभकेँ होइत अछि जे स्वर्ग-नरक सभ ऐ धरतीमे छै”। हम रामओतारकेँ कहलिऐ- “हमरा बड्ड प्रसन्नता भेल जे तोँ सभ एतए ईमानदारीसँ मेहनत कए सम्पत्ति अर्जन करैत छह। नीक चीजक परिणाम नीके होइ छै”। संयोग नीक छल। कनीक बुन्दी-बान्दी भऽ आकाश स्वच्छ भऽ गेलै। बरखा नै भेलै। मोन खरहर भऽ गेल। ओना जनवरी-फरवरी महिना प्रचण्ड जाड़, बरखा आ बर्फ खसबाक समय छै लोअर दिबांग घाटीमे। अपर दिबांग घाटीमे तँ ऐ मासमे आबाजाही साफे बन्द भऽ जाइ छै। समस्त इलाका बर्फ आ पानिसँ भरल। रस्ता सभपर बर्फक परत दर परत जमल रहै छै। स्थानीय लोक सभ दू तीन मास पहिने जरूरी समान जेनाकि नोन, तेल, मसल्ला, दवाइ, वस्त्र, इन्धन, अन्न आदिक भण्डारण कऽ कए राखि लैत अछि। खएर! थोड़ेक कालक बाद घाटक दोसर कछेरपर हमरा लोकनि पहुँचि गेलौं। आब राति भऽ गेल छल। पता चलल जे ओतएसँ रोईंग शहर लगभग ५५ किलोमीटर केर दूरीपर अवस्थित छै। ५५ किलोमीटरमे लगभग १५ किलोमीटर दियारा अर्थात् बालु आ कादोसँ भरल कच्चा रस्ता। पहिने गेल गाड़ीक लीकपर चलैत रही। खूब सावधानीक संग। ड्राइवरक गति आ दिमाग दुनू चीजक आश्चर्यजनक सामंजस्यक संग चलबाक जरूरत। से नै भेल तँ कतौ फँसि जाएब। हमरा लोकनिक गाड़ी टाटा-सूमो छल। गाड़ीक ड्राइवर धर्मा बड़ा तेज आ बातूनी। ऋचा नेगीकेँ हाँ मे हाँ मिला कऽ बेबकूफ बनेबामे माहिर। ओना ड्राइवरीमे ओतेक निपुण नै जतेक बात बनेबामे। हम सभ अन्हरिया रातिमे ओइ सुन-सान दियारामे जाइत रही। एकाएक गाड़ीक पछिला चक्का थालमे फँसि गेलै। हम सभ कियो बाहर निकललौं। किछु कारणवश ऋचाजी सँ बाताबाती भऽ गेल रहए तँए वार्तालाप नै चलैत छल। ऋचाजी अपन शेखी बखारए लगलीह। तुरत अपन भायक दोस्त जे कि गोरखा रेजीमेन्टमे छलन्हि तकरा फोन करए लगलीह। एम्हर हमरा लोकनि डण्टा आ खन्तीसँ पछिलका चक्का आ मडगार्ड लग जमल माटिकेँ हटाबए लगलौं। लगभग आधा घण्टा धरि ऋचाजीकेँ फोनो नै लगलन्हि। जखन लगलन्हि तँ गोरखा रेजीमेन्ट केर ऑफिसर सभ कहलकन्हि जे आबएमे ओकरा सभकेँ थोड़ेक देर लगतै कारण ओ सभ कोनो दोसर ठाम फँसल गाड़ीकेँ निकालबाक हेतु पहिनेसँ कतौ गेल अछि। खएर! हमरा लोकनि अपन प्रयासमे लागल रही। हमरा लोकनिक मणिपुरी कैमरामेन या विडियोग्राफर रोनेल हाओबाम आ जेम्स बड़ा उत्साही युवक छल। ओ सभ पूर्ण तन्मयताक संगे कादो निकालएमे लागल रहल। हुनका लोकनिक साहसकेँ देखैत हमहूँ सेतु बान्हक लुक्खी जकाँ कनी-कनी माँटि निकालैत रहलौं। हमरा सभ लग दुर्भाग्यसँ टॉर्च आदि सेहो नै छल। ओइ बीचमे धर्मा ड्राइवर बाजल जे ऐ रस्तामे चलबाक हेतु जरूरी छै जे गाड़ीमे एक कोदारि, एक खन्ती, एक टॉर्च आदि लऽ कऽ चली”। धर्मा पहिनो ऋचाजीक संग लोअर दिबांग घाटीमे आबि चुकल छल। हम आब ओकरापर कनी तमसेलौं- “तोँ पहिने किए नै खन्ती, कोदारि, टॉर्च आदि अनलैंह? जखन रस्ताक बारेमे बूझल छलौ तँ एना केयरलेस किए छेँ”? ऋचाजी धर्माकेँ बचेबाक मुद्रामे हमरा लग अएलीह। ऐसँ पहिने जे ओ किछु बजितथि, हम कहलियनि- “अहाँ लेल नीक हएत जे अहाँ एकौ शब्द नै निकालू। हम एखन घोर तामसमे छी! अहाँ सभ पहिने की एतए पिकनिक मनेबाक हेतु आएल छी”? ऋचाजी हमर तामससँ पूर्व परिचित छलीह। ओ चुपे रहबामे अपन कल्याण बुझलनि आ किछु बातक जवाब नै देलीह। ओना रोनल आ जेम्स केर जतेक प्रशंसा करी से कम। दुनू बिना एकौ मिनट केर आरामक कादो हटबैत रहलाह। हमहूँ तमसाइत, चिचियाइत रहलौं मुदा कादो हटेबाक कार्यकेँ रुकए नै देलिऐ। अन्ततः हमरा लोकनि अपन उद्देश्यमे सफलता प्राप्त कएल। गाड़ी कादोसँ बाहर भेल। आब रातिमे बौआइत डेराइत हमरा लोकनि अपन गन्तव्य दिस बढ़ए लगलौं। लगभग १५ किलोमीटर आगाँ बढ़लाक बाद गोरखा रेजीमेन्ट बला सभ एक जीप आ एक ट्रकक संग हमरा लोकनि लग आएल। धर्मा ड्राइवर ओकरा सभकेँ बता देलकै जे हमरा लोकनिक टाटा सूमो स्वतः हमरा लोकनिक प्रयाससँ ठीक भऽ गेल। मुदा ऋचाजी कतए मानएवाली। सेना जीपकेँ रोकबाक इशारा करैत स्वयं गाड़ीसँ बाहर अएलीह। हाथ मिलेलन्हि। मुद्रा एहेन बनेली जेना भारतक तीनू सेनाक सर्वोत्कृष्ट अधिकारी होथि। हम तामसे भेर रही। खएर, लगभग साढ़े दस बजे रातिमे हमरा लोकनि रोईंग आबि एक स्थानीय होटलमे अएलौं। आब पानि खूब जोरसँ होबए लगलै। होटलक मैनेजर एक बंगाली भद्रलोक छलाह। कनीक फुचफुचाएल। लगभग ६२ वर्षक श्यामवर्ण। मोटुका चश्मा धारण केने। हम सभ जखन होटल एलौं तँ पता चलल जे जिला शोध अधिकारी डॉ. पी.के. श्रुतिकर एवं जिला भाषाधिकारी श्री जेमि पुलू महोदय हमरा लोकनिक रहए केर व्यवस्था डॉ. ऋचा नेगीसँ दूरभाषसँ भेल बातचीतक आधारपर पूर्वहिँ ऐ होटलमे केने छलाह। डॉ. श्रुतिकर स्वयं कतौ व्यस्त छलाह तँए लोअर दिवांग घाटीक जिला कला एवं संस्कृति अधिकारी श्री गोगोई लींगि एवं जिला भाषाधिकारी श्री जेमिपुलूकेँ हमरा लोकनिक स्वागत एवं दिशा निर्देशन हेतु होटलमे पठा देने रहथिन। जार प्रचण्ड रहै। थर-थर कँपैत आ ऊपरसँ पानिमे भिजैत कोनो तरहेँ हमरा लोकनि होटलक प्रांगणमे प्रवेश केलौं। होटलक स्वागत कक्षमे प्रवेश करिते मात्र बिजली गुम भऽ गेलै। अन्हार गुप्प!!! होटल केर मैनेजर साहेब तुरत एकटा १३-१४ वर्षीय बच्चाकेँ बजौलाह। ओ बच्चा सेहो मोतीहारी जिलाक रहै। बच्चाकेँ डटैत मोमबत्ती अनबाक निर्देश देलथिन्ह। हम कहलियन्हि- “एतए जेनेरेटर केर व्यवस्था नै छै की”? तइपर गोगोई लींगि महोदय कहलाह- “एतए ई सभ सुविधा कोना भेटत? एतए केर सभसँ नीक होटल यएह छी। समए कोहुना बिताबए पड़त। ऐसँ नीक समस्त रोईंग शहरमे कोनो स्थान नै छै”। कनीक कालक बाद ओ बच्चा (होटल केर नौकर) तीन टा मोमबत्ती लऽ हमरा लोकनि लग एक आरो नौकरक संग आएल। पता चलल जे हमरा लोकनिक व्यवस्था होटल केर तेसर तल्लापर अछि। जखन तेसर तल्लापर पहुँचलौं तँ घोर पश्चाताप भेल। तमाम कमरा सभ दुर्गन्धसँ भरल। कोनो कमरामे लैट्रिन-बाथरूम संलग्न नै, मूस सभ एम्हर-ओम्हर दौड़ैत; ओछाओन सभ मैल, मसुआएल आ दुर्गन्धसँ भरल। भेल, हे भगवान। कतए आबि गेलौं। अन्ततः एक कमरा कनीक नीक लागल। हम अपन लैपटॉप बला बैग लऽ ओइ कमरा दिस आगाँ बढ़ि कहलिऐ- “हमर समान एतए राखू”। बीचहिमे जिला कला एवं संस्कृति अधिकारी श्री गोगोई लींगि महोदय झटाक दऽ बाजि उठलाह- “नै, नै। ऐ कमरामे अहाँ नै रहि सकैत छी। कोनो आन कमरा पसन्द कऽ लिअ। ई कमरा हमरा लोकनि डायरेक्टर महोदया लेल सुरक्षित रखने छी”। ई कहि गोगोई लींगि ऋचाजीक बैग लऽ ओइ कमरामे आबि गेलाह। फेर होटलक नौकरकेँ निर्देश देलथिन्ह: “ऐ कमराकेँ ठीकसँ साफ कऽ डॉ. ऋचा नेगी लेल तैयार करह”। हम तामसे भेर भऽ गेलौं। तामससँ काँपैत कहलिऐ: “कियो डायरेक्टर नै अछि एतए। जएह ऋचा नेगी छथि, सएह हमहूँ छी। दू तरहक कमराक निर्देश अहाँ लोकनिकेँ के देलक”? तावत ऋचाजी ओतए आबि गेल छलीह। ओ तुरत्ते अपन गलतीकेँ ठीक करऽ लगलीह। गोगोई लींगिसँ हमर परिचय करओलन्हि: “ई डॉ. कैलाश कुमार मिश्र छथि। हम सभ दुनू गोटे शोध अधिकारी छी। ई ज्यादे काल असम, मणिपुर, मेघालय, नागालैण्ड, त्रिपुरा आदिमे व्यस्त रहैत छथि। अरुणाचल मूलतः हमहीँ अबैत छी। हिनका यएह कमरा देल जाए”। हम ऋचाजीकेँ किछु नै कहलियन्हि। अपन समान ओही कमरामे राखि लेल। गोगोई लींगि महोदय एवं भाषाधिकारी जीमि पुलू महोदयसँ हाथ मिला अपन समान सभ ठीक करए लगलौं। ओ सभ ऋचाजी एवं हमर टीमक आन सदस्य सभ लेल कमराक व्यवस्थामे लागि गेलाह। आब बिजली सेहो आबि गेल छलै। हम मुँह हाथ धोबए चाहैत रही। मुदा पानि सर्द एतेक जेना बर्फ हुअए। की करू? घंटी बजा मैनेजर साहेबकेँ बजाओल आ निर्देश देलियन्हि जे तुरत गरम पानिक व्यवस्था करओल जाए। पन्द्रह मिनटक बाद एक लड़का एक बाल्टीन पानि लऽ प्रवेश केलक। आब हम कपड़ा बदलि मुँह हाथ धोलौं। हाथमे थाल इत्यादि लागल छल। तकरा नीक जकाँ साफ कएल। कनी कालक बाद रात्रिक भोजन केर व्यवस्था भेल, मोटका चाउरक भात, हरियर तरकारी, स्थानीय साग, मुर्गाक माँस, मसुरिक दालि, टमाटर, पियाज, मुरइ, हरियर मिरचाइ इत्यादि केर सलाद। रोटीक कल्पना केनाइ मूर्खता। तँए भोजन करए लगलौं। मुदा भोजनमे कोनो स्वाद नै। भूख हदसँ ज्यादा, मुदा स्वादहीन भोजन खाउ तँ कोना! तावतमे कैमरामेन रोनल आ जेम्स हमरा लग आबि गेलाह। कहलन्हि- “सर, ई भोजन अहाँ नै खा सकैत छी। स्थानीय मसाला आ बिना तेलक बनल छै। हमरा लोकनि बड्ड भुखाएल छी। एतए एक सप्ताह रहबाक सेहो अछि। अहाँ दू पैग रमक लऽ लिअ। जाड़ सेहो ठीक भऽ जाएत। एक आज्ञाकारी शिष्य जकाँ हम बिना कोनो तर्क केने रोनल आ जेम्सक बात मानि लेलौं। जेम्स एक स्टील बला ग्लासमे एकै बेर दू पैग रम ढारि पानिसँ भरि हमरा लग अनलन्हि। हम धीरे-धीरे पी लेलौं। आ नीक जकाँ भोजन कऽ डायरी लीखए लगलौं। कनीक कालक बाद ऋचाजी अएलीह। कहलन्हि: “हम अहाँसँ किछु बात करए चाहै छी”। हम कहलियन्हि: “हम एखन बात करबाक मूडमे नै छी। काफी थाकल छी। अपसेट सेहो छी। अहाँ हमरासँ भोरमे बात करू।” ऋचाजी फेर कहलन्हि- “हमरा बुझा रहल अछि जे गोगोई लींगिक बातसँ अहाँकेँ हमरा प्रति किछु गलतफहमी भऽ गेल अछि। हम ओकरा दूर करए चाहै छी। हमरा मात्र ५-१० मिनट समय दिअ। हम फेर चलि जाएब”। हम साफ मना कऽ देलियन्हि- “देखू ऋचाजी। हम एखन बहुत डिस्टर्ब आ थाकल छी। अहाँसँ हम कोनो तरहक वार्तालापक मूडमे नै छी। जतेक गलतफहमी अछि तकरा भोरमे ठीक करब। एखन हम असगर रहए चाहै छी। चिन्तन करए चाहै छी। आ पुनः सुतए चाहै छी। अहूँ थाकल छी, जाउ आ सुति रहू”। ऋचाजी बुझि गेलीह जे हम नाराज छियन्हि, वार्तालाप सेहो सम्भव नै। कनिक उदास भऽ नहुँ-नहुँ हमरा कमरासँ बाहर भऽ गेलीह। जाइत-जाइत शुभ-रात्रि कहलन्हि, मुदा हम कोनो उत्तर नै देलियन्हि। कनिक काल तक हम तमाम परियोजनापर सोचैत रहलौं। रोईंगक ऐ विकट होटलमे अपन पुत्र शशांकक याद बेर-बेर अबैत छल। सोचि रहल रही जे पूनम (हमर कनियाँ) बड्ड परेशान हेतीह। बात करए चाहैत रही। परन्तु नेटवर्क साफे इंगित नै भऽ रहल छल। काफी कचोट भेल। अन्ततः सुति रहलौं। मलि‍क भाय केर फुटपाथी चिंतन मलि‍क भाय हमरा बड्ड प्रि‍य छथि‍। पि‍ण्‍डश्‍याम वर्ण, लगभग ४८-५० केर आयु, मोट नाक मुदा नीक आ सुडौल काया। सदरिकाल गंभीर बनल। कपड़ा-जुत्ता पहि‍रबाक नीक शैली। खानदानी मुसलमान छथि‍। हि‍नकर पि‍ताजी अलीगढ़ मुस्‍लि‍म वि‍श्‍ववि‍द्यालयमे इति‍हासक प्रख्‍यात प्रोफेसर छलथि‍न्‍ह। आब अवकाश प्राप्‍त जीवन जिबैत छथि‍न्‍ह। मलि‍क भायक नाम  मुर्त्तजा मलिक ‍छन्‍हि‍। हि‍नकर परि‍वार शि‍क्षि‍त आ उदारवादी परि‍वार छन्‍हि‍। मलि‍क भाय डाक्‍यूमेन्‍टरी फि‍ल्‍म बनबै छथि‍। पहि‍ने बहुत दि‍न धरि‍ रंगमंचसँ जुड़ल छलाह। हबीब तनवीर केर संग नाटक केलन्‍हि‍। नौटंकीमे नीक अभि‍रूचि‍ छन्‍हि‍। वि‍शेष रूपसँ कानपुर, हाथरस आ मथुराक नौटंकी परम्‍पराक प्रति‍ हि‍नकर लगाव अद्भुत छन्‍हि‍। ओइ‍ शैलीकेँ पुनर्जीवि‍त करबाक लेल सदरिकाल तत्‍पर रहै छथि‍। मुसलमान समाजक बुद्धि‍जीवी‍, आइ.ए.एस., आइ.एफ.एस., आइ.पी.एस., रंगकर्मी, साहि‍त्‍यकार, महि‍ला इन्‍टरप्रेन्‍युअर इत्‍यादि‍क बीच ई अपन ठोस पकड़ बनौने छथि‍। मुसलमान राजनेता चाहे कुनो पार्टीक कि‍ए ने होथि‍, मलिक भायक सम्‍मान करै छथि‍न्‍ह। जखन अब्‍दुल कलाम राष्‍ट्रपति‍ छलाह तँ मलि‍क भाय सदरिकाल राष्‍ट्रपति‍ भवन केर चक्कर लगबैत रहैत छलाह। मुदा बि‍ना बजौने कहि‍यो नै‍ गेला‍। तखने जाइ छला‍ जखन बजाहट अबै छलन्‍हि‍। वर्तमान उपराष्‍ट्रपति‍ डॉ. अंसारी लग सेहो हि‍नकर बड्ड नीक पहुँच छन्‍हि‍। अंसारी महोदयकेँ बड्ड करीबी मानल जाइत छथि‍ मलि‍क भायक। एन.डी.ए. केर शासन कालमे मलि‍क भाय राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ, भारतीय जनतापार्टी एवं एन.डी.ए. केर घटक दलक नेता सभसँ बड्ड समी‍पक नाता रखै छलाह। मलि‍क भायसँ प्रथम परि‍चए हमरा एन.डी.ए. केर शासन कालमे नेशनल म्‍युजि‍यम संस्‍थान केर एक होनहार शोधार्थी श्री आनन्‍दवर्धन जे आइ-काल्हि‍ Delhi Institute of Heritage and Research Managemenet   मे सी‍नि‍यर लेक्‍चरॉर छथि‍, भारतीय जनता पार्टी केर मुख्‍यालयमे करौलन्‍हि‍। अइ‍ बातकेँ लगभग नौ वर्ष भऽ गेल। आनन्‍दवर्धन हमरा कहलन्‍हि‍- “‍भैया, ई छथि‍ मलि‍क भाय। बड्ड नीक लोक। Documentary film बनबै छथि‍। राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ आ संस्‍कार भारती सँ बड्ड नीक सम्‍बन्‍ध छन्‍हि‍। भारतीय परम्‍परासँ सि‍नेह छन्‍हि‍। भारतीय परम्‍परा केर संरक्षण आ सम्वर्धनमे सदरिकाल लागल रहै छथि‍। उदारवादी प्रवृत्ति‍क मुसलमान छथि‍। अयोध्‍यामे राम मन्‍दि‍र बनए, तकर पक्षधर छथि‍। पाकि‍स्‍तानक घोर वि‍रोधी छथि‍। हि‍न्दू-मुसलमान एकताक समर्थक छथि‍...।" इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍। आनन्‍दवर्धन केर अइ‍ परि‍चएपर मलि‍क भाय बि‍ना कि‍छु बजने आँखि‍मे धूपबला कीमती चश्‍मा लगौने बड़ा गम्‍भीर अहंकार-हीन भावनासँ हमरा लग आबि‍ गर्मजोशीसँ हमरासँ हाथ मि‍लौलन्‍हि‍। आनन्‍दवर्धनजी मलि‍क भायकेँ सेहो हमर बड़ वि‍स्‍तारपूर्वक परि‍चए देलथि‍न्‍ह। नै‍ तँ आनन्‍दवर्धनजी हमरा मलि‍क भायक पूर्ण नाम बतौलन्‍हि आ नहि‍ये हम जनबाक प्रयास केलौं। मुदा तकर बाद मलि‍क भायसँ दि‍न-प्रति‍दि‍न सम्‍बन्‍धक प्रगाढ़ता बढ़ैत गेल। मलि‍क भायसँ जतेक नजदी‍की अबैत गेलौं ततेक हि‍नका प्रति‍ हमर सि‍नेह आ सम्‍मान बढ़ैत गेल। एक दि‍न मोनमे आएल- आहि‍ रे बा! मलि‍क भाय केर नाम तँ हमरा पते नै‍ अछि‍। कहीं कहि‍यो कि‍यो पुछलक जे मलि‍क भाय अर्थात के, तँ की उत्तर देबै? मुदा प्रगाढ़ता अतेक बढ़ि‍ गेल छल जे हमरा मलि‍क भायसँ हुनकर नाम पुछबाक हि‍म्‍मत नै‍ भेल। जखन आनन्‍दजी भेँट भेलाह तँ पुछलियनि‍- “मलि‍क भाय केर नाम की छन्‍हि‍?‍” आनन्‍द जवाब देलन्‍हि‍- “हमरो ज्ञात नै‍ अछि‍। हमहूँ हि‍नका मलि‍क भाय केर नामसँ जनैत छियन्‍हि‍।‍” एक दि‍न मलि‍क भाय हमरा ईमेल भेजलन्‍हि‍। ओइ‍ ईमेल आइ.डी.मे ईमेल भेजएबलाक नाम मुर्त्तजा मलि‍क रहै। एक्के‍ क्षणमे ई ईमेल हमर समस्‍याक समाधान कऽ देलक। जखन राम जन्‍मभूमि‍ आ बाबरी मस्‍जि‍द केर विवादपर इलाहाबाद हाइकोर्ट (लखनऊ बेन्‍च) क निर्णय अएलै तँ झट दनि‍ मलि‍क भाय हमरा ई एस.एम.एस. केलन्‍हि‍- “Congrats, now we can build temple‍.” कनी कालक बाद मलि‍क भाय फोन सेहो केलन्‍हि‍। कहए लगलाह- “कैलाश भाय, भारतक मुसलमान आब शान्‍ति‍ चाहैत अछि‍। हमरा लोकनि‍ हि‍न्दू-समाजक संग मिलि कऽ रहए चाहै छी। आब अतए केर मुसलमान कुनो नेता आ मुल्‍लाक माया-जालमे नै‍ ओझराए चाहैत अछि‍। मुसलमान समाजक युवावर्ग आब वि‍कासमुखी भऽ गेल अछि‍। आब ऐ‍ तरहक बात लऽ कऽ हमरा लोकनि‍ खून खराबा नै‍ कऽ सकैत छी। बहुत भेल आब कुनो नेता किंवा कठमुल्‍लाक झपासामे देशक मुसलमान नै‍ आबएबला अछि‍। हमरा लोकनि‍ तँ बल्कि ई सोचि‍ रहल छी जे देशक मुसलमान सभकेँ वि‍भन्न भौगोलि‍क क्षेत्रसँ बजा अयोध्‍या लऽ जाइ आ हि‍न्‍दु लोकनि‍क संग मि‍ल कऽ एक भव्‍य आ पैघ राम-मन्‍दि‍र केर निर्माणक कार्य प्रारम्‍भ करी। अगर एहेन भऽ गेल तँ  समस्‍त वि‍श्‍वमे एकटा बात पहुँचत जे भारत सरि‍पहुँमे अनेकतामे एकता, आपसी सामंजस्‍य तथा वैवि‍ध्‍य संस्‍कृति‍क समागम स्‍थल अछि‍। एहेन प्रमाण अन्‍यत्र संभव नै‍।‍” मलि‍क भाय केर ऐ‍ तरहक वि‍चार सुनि‍ मोनमे एक बेर फेर हुनका प्रति‍ अपार सि‍नेह आ सम्मान जागि‍ गेल। मोन भेल जे मलि‍क भायकेँ हृदएसँ लगा ली। तैय्यार सेहो भेलौं। मुदा कहि‍ नै‍ कि‍ए एकै झटकामे अपनाकेँ रोकि लेलौं। भेल मलि‍क भाय सोचताह- “राम-मन्‍दि‍र लेल कैलाश भाय अतेक चि‍न्‍ति‍त छथि‍ मुदा मुसलमानक भावना केर चि‍न्‍ता कहाँ छनि‍। कैलाश भाय कते मतलबी लोक छथि‍!” करीब दू बरख पूर्व मलि‍क भाय पुनीता शर्मा नामक एक पि‍ण्‍डश्‍याम मुदा आकर्षक नाक-नक्‍शावाली बालाक संग हमरा लग अएलाह। पुनीता शर्माक सम्‍बन्‍धमे मलि‍क भायसँ हमरा ई ज्ञात भेल जे पुनीता शर्मा कत्‍थक नृत्‍यांगना छथि‍। ओ अपन संस्‍थाक माध्‍यमसँ सांस्‍कृति‍क कार्यक्रमक आयोजन करैत रहैत‍ छथि‍। पुनीता शर्मा बि‍हारसँ थिकीह। नृत्‍य संग-संग नृत्‍य-नाटि‍काक सेहो मंचन एक उभरैत कलाकारक रूपमे करैत छथि‍। पुनीता शर्माक संग एक आरो श्‍यामे वर्ण, छटगर मुदा आकर्षक आ मुँहक पानि‍मे पुनीता शर्मासँ कनी अठारह, एक नायि‍का हमरा लग आएल छलीह। ऐ‍ नायि‍का केर नाम छलन्‍हि‍ अनु चौधरी। बार्तालापक क्रममे पता चलल जे अनु चौधरी मुलत: मि‍थि‍लासँ छथि‍। हि‍नकर पि‍ता कुनो संस्‍कृत वि‍द्यालयमे गणि‍त केर शि‍क्षक छथि‍न्‍ह आ दि‍ल्‍ली महानगरीक पश्‍चि‍मी कछेरमे बसल नजफगढ़मे अपन घर-द्वार बना रहि‍ रहल छथि‍। अनुक जन्‍म, पालन-पोषण एवं शि‍क्षा इत्‍यादि‍ सेहो दि‍ल्‍लीए मे भेल छन्‍हि‍। अनु हि‍न्‍दीसँ एम.ए. केलाक बाद  दि‍ल्‍ली वि‍श्‍ववि‍द्यालयसँ पी.एच.डी. कऽ रहल‍ छलीह। आब पी.एच.डी. लगभग लगि‍चाए गेल छन्‍हि‍। मुदा अनु पुनीताक तुलनामे कनी गंभीर बुझना गेलीह। जखन अनुकेँ हमरा बारेमे ज्ञात भेलन्‍हि‍ जे हम मैथि‍ल छी तँ ओ हमरासँ हि‍ल-मि‍ल गेलीह आ खाँटी मैथि‍लीमे वार्तालाप करए लगलीह। “राग-वि‍राग‍” संस्‍थासँ अनु सेहो जुड़ल छलीह। पुनीता शर्मा आ अनु चौधरी दुनूकेँ बि‍हारक संस्‍कृति‍ आ संस्‍कारसँ घोर लगाव बुझना गेल हमरा। ई दुनू मि‍ल अपन संस्‍था- राग-बि‍रागक माध्‍यमसँ हम्‍मर तइ‍ समएक संस्‍था- इन्‍दि‍रा गान्‍धी राष्‍ट्रीय कला केन्‍द्र केर प्रांगणमे “बि‍हार उत्‍सव‍” मनबए चाहैत छलीह। ओइ‍ सांस्‍कृति‍क कार्यक्रममे प्रदर्शनी, लोक तथा शास्‍त्रीय नृत्‍य आ संगीतक मंचन, बि‍हारक सांस्‍कृति‍क वि‍रासत तथा बि‍हारमे वि‍कासक संभावनापर एक दू-दि‍नक संगोष्‍ठी इत्‍यादि‍ करबाक वि‍चार छलन्‍हि‍। यद्यपि‍ बि‍हारक प्रति‍ हुनका हृदएमे अगाध प्रेम छन्‍हि‍। जखन ई दुनू नायि‍का मलि‍क भायसँ बि‍हार उत्‍सव करबाक इच्‍छा व्‍यक्‍त केलखि‍न तँ मलि‍क भाय हुनका लोकनि‍क संग मि‍ल ऐ‍ सपनाकेँ साकार करबाक लेल लागि‍ गेलाह। मुदा स्‍पॉन्‍सर भेटबाक लेल एक परि‍योजना तथा एकटा आधार लेख जरूरी। ओही परि‍योजना तथा आधारक निर्माण, संगहि‍-संग इन्‍दि‍रा गान्‍धी राष्‍ट्रीय कला केन्‍द्र केर प्रांगणमे कार्यक्रम करबाक अनुमति‍ केर लेल मलि‍क भाय ऐ‍ दुनू नायि‍काकेँ लए हमरा लग आबि‍ गेलाह। हम मलि‍क भाय केर बि‍हारक प्रति‍ प्रेम एवं पुनीता तथा अनुक इच्‍छाकेँ सम्‍मान करैत परि‍योजना तैयार कऽ देलियन्‍हि‍। संगे‍ अपन तत्‍कालीन सदस्‍य सचि‍व डॉ. कल्‍याण कुमार चक्रवर्तीसँ नि‍वेदन कए पूरा कला केन्‍द्रक प्रांगण हि‍नका लोकनि‍केँ बि‍हार उत्‍सव केर आयोजन करबाक हेतु दि‍या देलियन्‍हि‍। आब मलि‍क भाय प्रसन्न भऽ पुनीता आ अनुक संग बि‍हार उत्‍सव केर तैय्यारीमे जमि‍ कऽ लागि‍ गेलाह। स्‍पॉन्‍शरशिप केर लेल सेहो जतए-ततए दौड़-धूप करए लगलाह। हमहूँ उत्‍साहि‍त रही। मुदा एकाएक कोसी अपन बि‍कराल रूपसँ सहरसा, पुरणि‍यामे सर्वनाश कऽ देलक। जान-मालक जबरदस्‍त हानि‍ भेलै। समस्‍त देश कोसीक वि‍भी‍षि‍कासँ काँपि‍ गेल। अइ‍ बि‍करालताकेँ देखैत हमरा लोकनि‍ ई  निर्णय सर्वसम्‍मति‍सँ लेलौं जे कार्यक्रमकेँ कि‍छु दि‍न लेल स्‍थगि‍त कऽ देल जाए। ऐ‍ घटनाक एक प्रभाव ई भेल जे हम मलि‍क भायक आरो समीप आबि‍ गेलौं। जतेक बेर भेटथि‍ मलि‍क भाय, ततेक नजदी‍क अबैत गेलौं हम हुनका संग। हाले‍मे एक दिन हम मलि‍क भायसँ नौटंकी परम्‍पराक सम्‍बन्‍धमे एक शोध परि‍योजनापर दि‍ल्‍लीक मंडी हाउसमे श्रीराम सेन्‍टर केर केफेटेरि‍यामे बैसल  गप्‍प-सप्‍प करैत रही। मलि‍क भाय नौटंकी परम्‍पराकेँ पुन: प्रति‍ष्‍ठापि‍त करबाक लेल बड्ड चिंतित बुझना गेलाह। जखन ओ नौटंकी केर बात करैत छथि‍ तँ हुनकर भाव-भंगि‍मासँ एना लागत जेना कलाकारक टीस बाहर भऽ रहल हुअए आ एक शोधार्थी केर उत्‍कंठा सेहो। बहुत तरहक आ नौटंकीक वि‍वि‍ध आयामपर मलि‍क भाय केर सोच देख मोन हरि‍यर भऽ जाइत अछि‍। वि‍चार-पर-वि‍चार होइत गेल। सोचक श्रंृखला बढ़ैत गेल। मलि‍क भाय कॉफी पीबाक एक तरहसँ एडि‍क्‍ट छथि‍। ओना हमरा कॉफीसँ कुनो सि‍नेह नै‍ अछि‍ मुदा एकरसता समाप्‍त करबाक लेल तथा वि‍चारधारामे नव-नव बुलबुला अनबाक लेल हमहूँ कॉफी-पर-काॅफी पीबैत रहलौं। मलि‍क भायक साथ दैत रहलियनि‍। बात खि‍चाइत रहल, सोच बढ़ैत रहल। परि‍योजना अपन स्‍वरूप पकड़ने गेल। लगभग परि‍योजनाक बाहरी आवरण बनि‍ गेल छल। एकाएक मलि‍क भाय कहलन्‍हि‍- “कैलाश भाय, हमरा लोकनि‍ तीन घंटासँ नौटंकीपर चर्चा कऽ रहल छी। बि‍ना कुनो अवरोधक। बि‍ना कुनो वि‍रामक। कनी काल आब‍ हमरा लोकनि‍केँ मोन फ्रेश करक चाही। चलू घूमि‍ कऽ १५-२० मि‍नटमे वापस आबि‍ पुन: नौटंकीबला कार्यकेँ समाप्‍त करब।” ई कहि‍ मलि‍क भाय उठि‍ गेलाह। हम्‍मर हाथ पकड़ि‍ केफेटेरि‍यासँ बाहर वि‍दा भेलाह। हमहूँ एक आज्ञाकारी शि‍ष्‍य जकाँ मलि‍क भाय संग बाहर घुमबाक हेतु वि‍दा भेलौं। मोनमे भेल- चलू कनी मोनमे नव संचार उत्‍पन्न कऽ ली। जखन बाहरमे घुमैत रही तँ एकाएक राजनीति‍, राजनीि‍तमे भ्रष्‍टाचार आदि‍ वि‍षएपर गप्‍प होमए लागल। गप्‍प ए.राजा आ २ जी. स्पेक्ट्रम केर भयंकर घोटालासँ प्रारंभ होइत नीतीश कुमार केर डेवलपमेन्‍ट प्‍लान आ जीत आ पुन: गुजरातक मुख्‍यमंत्री नरेन्‍द्र मोदीक वि‍चारधारा धरि‍ होइत रहल। हम उपनि‍षदक अज्ञानी चेला जकाँ अपन जि‍ज्ञासा एक-दू वाक्‍यमे रखैत गेलौं, आ मलि‍क भाय उपनि‍षद केर घोर तपस्‍वी आ मर्मज्ञ जकाँ हमर जि‍ज्ञासाक समाधान वि‍स्‍तारसँ करैत गेलाह। मलि‍क भाय जेना हम्‍मर उधेर-बुनकेँ बि‍ना पुछने बुझि‍ लेने होथि‍। ओ बजैत गेलाह बेवाक। कुनो मर्मज्ञ राजनैति‍क वि‍श्‍लेषक जकाँ। १५ मि‍नट समए कोना डेढ़ घंटामे बदलि‍ गेल से पते नै‍ चलल। भ्रष्‍टाचार आ घोटालापर मलि‍क भाय कहलन्‍हि‍- “कैलाश भाय, भ्रष्‍टाचार आ घोटाला नेता नै‍ बड़का बाबू अर्थात् आइ.ए.एस. ऑफि‍सर सबहक लॉबी करैत अछि‍। ओ सभ नेता आ मि‍नि‍स्‍टर सभकेँ अपना हाथक खेलौना बनेने रहैत अछि‍। कार्य ओ सभ अतेक दक्षताक संग करैत अछि‍ जे अपने तँ कहि‍यो नै‍ फँसत मुदा बदनाम नेता कि‍ंवा मंत्री भऽ जाएत। I.A.S. केर अर्थ होइ छै- I’m always safe. मंत्रीकेँ  बड़का बाबू एक तरहेँ वि‍वश कऽ दै छै जे ओ जइ कागतपर कहै तइ‍पर हस्‍ताक्षर लऽ लिअए।‍” मलि‍क भाय बजैत रहलाह आ हम जि‍ज्ञासासँ आँखि‍ फाड़ने आ कान खोलने हुनकर बातकेँ सुनैत गेलौं। मलि‍क भाय कहलन्‍हि‍- “जनै छी कैलाश भाय, ऐ‍ पौने दू लाख‍ हजार कड़ोरक घोटालामे चारि‍ओ अना हि‍स्‍सा ए. राजाकेँ नै‍ भेटल हेतै। दससँ बारह अना हि‍स्‍सा तँ बड़का बाबू सभ गट दनि‍ पचा लेने हेतै आ छौसँ चारि‍ अनामे अपना पार्टीक मुखि‍या, देशक सभसँ पैघ पार्टीक मुखि‍या आ अन्‍तत: अपन लगुआ-भगुआ सभमे बाँटए पड़ल हेतै। मुदा बड़का बाबू सभ कागजकेँ तेना ओझरेने हेतै जे तमाम प्रक्रि‍यासँ लऽ लऽ सी.बी.आइ. केर जाँच धरि‍ अगर कि‍यो फँसत तँ मंत्री। पत्रकार सेहो बड़का बाबूपर चुप रहत आ नेता आ मंत्रीकेँ दोषी बनेबामे अपन दि‍माग आ खोजी पत्रकारि‍ताक तमाम टिप्‍सकेँ लगौने रहत। मंत्रीक स्‍वरूप कि‍छुए दि‍नमे नायकसँ खलनायक बनि‍ आओत।” हम मलि‍क भायकेँ पुछलियनि‍- “अहाँक जनैत की कारण छै जे अइ‍ बेरक बि‍हार वि‍धानसभा केर चुनावमे कांग्रेस, लालू यादव आ रामवि‍लास पासवान, तीनूकेँ नीतीश कुमार खरड़ा लऽ कऽ खरड़ि‍ देलन्‍हि‍। एहेन कि‍ए भेलै?‍” मलि‍क भाय कहलन्‍हि‍- “‍देखू, लोक आब नेहरू-गान्‍धी परि‍वारक वंशानुगत राजनीति‍सँ तंग आबि‍ गेल अछि‍। लालू यादवक जाति‍क राजनीति‍ प्रारम्‍भमे छोटका जाति‍ सभकेँ नीक लगलै, कि‍एक तँ पहि‍ल बेर ओ सभ चुनावमे हि‍स्‍सा लेलक, अप्‍पन बातकेँ बि‍ना कुनो डर आ आतंककेँ बाजल। लोककेँ बुझेलै जे प्रजातंत्रो कुन चीज होइ छै। मुसलमानकेँ कांग्रेससँ मोह भंग होमए लगलै। १९९१ केर बाबरी मस्‍जि‍द ध्‍वस्‍त भेलाक बाद मुसलमान सभ बुझि‍ गेल जे कांग्रेस आ भारतीय जनता पार्टीमे कुनो विशेष अन्‍तर नै‍ अछि‍। बि‍हारमे मुसलमान सभकेँ सभसँ ज्‍यादे भय गुआरसँ रहलै। कखनो कुनो साम्‍प्रदायि‍क उन्‍माद होइक तँ मुसलमान सबह‍क जानमालक क्षति‍ सभसँ ज्‍यादे गुआरे सभ करै। तँए‍ मुसलमान विकल्पहीन भऽ गेल। मुसलमान सभ लाचार भऽ लालू यादव केर साथ भऽ गेल। मुदा बादमे मुसलमानो सभकेँ ई बुझएमे आबि‍ गेलै जे लालू यादव केवल बातक धनिक छथि‍ आ कर्मक छोट। जखनकि‍ ठीक एकर वि‍परीत नीतीश कुमारजी एक मात्र वि‍कासकेँ अपन आधार बनौलन्‍हि‍। बि‍ना कुनो कन्‍ट्रोवर्सीमे गेने वि‍कासक कार्य करैत रहलाह। महि‍ला सभकेँ नौकरी भेटलै, शि‍क्षामि‍त्र बनल, ग्राम पंचायतसँ जि‍ला पंचायत धरि‍ साझेदारी बढ़लै, बहुत महि‍ला सभ शि‍क्षि‍का बनलि‍, ए.एन.एम. बनलि‍, बालि‍का सभकेँ स्‍कूली वर्दी, मुफ्त साइकिल, वि‍द्यालयमे भोजन भेटलै। फेर की छल- की छोट आ की पैघ- सभ कि‍यो अपन लड़की सभकेँ इसकूल भेजनाइ प्रारंभ केलक। लालू जी समएक तमाम गुण्‍डा आ लफन्‍दर सभ जे कि‍ डाका डालैत छल, लोककेँ अपहरण करैत छल, छीना-छपटी करैत छल, आतंकक माहौल बना समस्‍त भारतमे बि‍हारकेँ बदनाम बनौने छल, तकरा सभकेँ पकड़ि‍-पकड़ि‍ नीति‍शजी जहलमे धऽ देलन्‍हि‍। मातहत पुलि‍स सभकेँ स्‍पष्‍ट ि‍नर्देश देलखि‍न्‍ह‍ जे ऐ‍ उपद्रवी तत्‍वकेँ एहेन इलाज करल जाए जे फेरो जीवनमे ई सभ एहेन कार्य करब तँ दूर सोचबो नै‍ करए। एकर प्रभाव बड्ड नीक रहलै। शनै: शनै: लेाक भय-मुक्‍त होमए लागल।” मलि‍क भाय बजैत रहलाह- “नीति‍शजी ईहो बुझलन्‍हि‍ जे बि‍हारक सड़क कंडम भऽ गेल अछि। तँए‍ सड़कक मरम्‍मत तथा नव सड़कक ि‍नर्माणक कार्यकेँ तीव्रताक संग-संग दक्षतासँ करबाक ि‍नर्देश देलथि‍न्‍ह। हुनका पता चललन्‍हि‍ जे ठेकेदार सभ कनी-मनी कार्य कऽ सभटा पाइ पंत्री, आॅफीसर आ अपने-अापमे बाँटि‍ लैत अछि‍। फेर की छल। नीतीशजी ईहो ि‍नर्देश देलथि‍न्‍ह, कि‍ जे कि‍यो ठेकेदार सड़कक जीर्णोद्धार  या ि‍नर्माणक ठीका लेत, सएह एक ि‍नश्‍चि‍त अवधि‍ माने पाँच या दस वर्ष धरि‍ ओइ‍ सड़कक रखरखाव सेहो करत। अगर कुनो तरहक कमी भेलै तँ ठेकेदारक जि‍म्मेदारी हेतै आ आेकरा ठीक कराबए पड़तै। ऐ‍ ि‍नर्देशक बड्ड उत्तम प्रभाव पड़लै। बि‍हारक जनता सड़क बनबासँ आ सड़कक उद्धार होमासँ गद-गद भऽ गेल। मुदा सामान्‍य जनताक बीच एखनो लालू जीक गुण्‍डा सबहक डर छलै, जकरासँ ओ मुक्‍ति‍ पाबए चाहैत छल। आ ई मुक्‍ति‍ चुनावमे लालू जीक पार्टीकेँ हरा कऽ देल जा सकैत छल।‍” “रामवि‍लास पासवान अपन इमेज एकटा अवसरवादी नेताक रूपमे बना लेने छथि‍ पहि‍ने एन.डी.ए. मे मंत्री रहला‍, फेर  एन.डी.ए. छोड़ि‍ सत्ताधारीमे आबि‍ झट दनि‍ मंत्रीक कुर्सीपर बैस रहलाह। हमेशा लालू यादवक घोेर वि‍रोध केलन्‍हि‍ मुदा अवसरवादि‍तासँ अतेक ग्रसि‍त भऽ गेलाह जे हुनके संगे राजनैति‍क गठबन्‍धन क‍ऽ लेलन्‍हि‍। बि‍हारक अति‍ पि‍छड़ा वर्ग, वि‍शेष रूपेँ हरि‍जन सभपर अपन अधि‍कार बुझए लगला‍। नीतीशजी सर्वप्रथम दलि‍तकेँ दू भाग- दलि‍त आ महादलि‍तमे बाँटि‍ रामवि‍लास पासवानक आधारकेँ शनै: शनै: अतेक तोड़ि‍ देलथि‍न्‍ह जे गिनी‍ज बुक ऑफ बर्ल्‍ड रि‍कॉर्डमे सभसँ ज्‍यादा मत लऽ जीतक रेकॉर्ड बनबएबला रामवि‍लास पासवान स्‍वयं एम.पी. केर चुनाव हाि‍र गेलाह। धन्‍यवाद दी लालू यादवकेँ जे हि‍नका राज्‍यसभामे आनि देलथि‍न्‍ह। अन्‍यथा आइ सड़कपर रहि‍तथि‍। इमहर कुर्मी, कोइरी, धानुक मल्‍लाह, मुसहर आदि‍ लालू यादवसँ अलग आबि‍ अपनाकेँ नीतीश लग सुरक्षि‍त बुझए लगलाह।” मलि‍क भाय हमरा दि‍स देखलन्‍हि‍। हमर जि‍ज्ञासा भावकेँ बि‍ना कहने बुझि‍ गेलाह आ अपन कथ्‍यकेँ आगाँ बढ़बैत बजलाह- “रहल बात मुसलमानक। तँ नीतीशजी ऐ ‍बिन्‍दुपर अपन कौटि‍ल्‍य नीति‍ केर सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्‍तुत केलन्‍हि‍। एक दि‍स तँ भारतीय जनता पार्टीकेँ अपन घटक दल बनौने रहलाह मुदा दोसर दि‍स कॉमन मि‍नि‍मम प्रोग्रामक घोषणा केलन्‍हि‍ जइ‍मे मंदि‍र बनेबाक इशू शामिल नै‍ रहै। संगे‍ गुजरातक मुख्‍यमंत्री मुख्‍यमंत्री नरेन्द्र  मोदीकेँ अपन कुनो कार्यक्रममे जानि‍-बुझि‍ कऽ नै‍ आबए देलथि‍न्‍ह। नीतीश कुमारक ऐ‍ ि‍नर्णएसँ भारतीय जनता पार्टीक नेता सभ बि‍फरि‍ गेलाह। मुदा नीतीशजी अपन ि‍नर्णएसँ टससँ मस नै‍ भेलाह। आर-तँ-आर ओ बी.जे.पी.केँ साफ कहि‍ देलथि‍न्‍ह जे नरेन्द्र मोदी बि‍हार-वि‍धान सभा २०१० केर आम चुनावमे पार्टीक प्रचारक हेतु बि‍हार नै‍ अबथि‍। ई ि‍नर्णए भारतीय जनता पार्टीक लेल बड्ड पैघ धक्का छलै। मुदा गठबंधन केर धर्मकेँ स्‍वीकारैत तथा नीतीश जीक बढ़ैत कदकेँ देखैत बी.जे.पी. केर श्रेष्‍ठ नेता सभ चुप्‍प रहि‍ ि‍नर्णए स्‍वीकारि‍ लेलन्‍हि‍। Beggar cannot be chooser.” हम अइ‍पर मलि‍क भायक वि‍चारक श्रंखला तोड़ैत कहलि‍यन्‍हि‍- “मलि‍क भाय, अगर मोदी अतेक खराब छथि‍ आ मी‍डि‍यासँ लए कऽ तमाम वि‍पक्षी दल हुनकर घोर वि‍रोध कऽ रहल अछि‍ तँ फेर बेर-बेर गुजरात सनहक पैघ राज्‍यमे ओ जितैत कि‍ए छथि‍?‍” मलि‍क भाय कहलन्‍हि‍- “देखू कैलाश भाय, मोदी हि‍न्दू वि‍चारधाराक बदौलत ि‍कंवा गोधरा आ आन ठामक नरसंहारक कारणे नै‍ जितैत छथि‍। मोदीक जीतमे हीरा जवाहरातक कारोबार करएबला व्‍यापारीक हाथ छै। पहि‍ने ऐ‍ कार्यमे चाहे कीमती पत्‍थरकेँ कटाइ-छटाइ हुअए, पॉलिसींग हुअए, घसाइ हुअए या खानसँ उपलब्‍धता या पुन: आयात-ि‍नर्यात, तमाम प्रक्रि‍यामे मुसलमान सभ डोमि‍नेट करैत छल। एकाएक वि‍श्‍व-बाजारमे जखन कीमती पत्‍थर तथा हीरा जवाहरात दि‍स इजराइल केर यहूदी व्‍यापारीक हष्‍टि‍ गेलै तँ शनै:-शनै: ओ सभ अइ‍ धंधामे एकाधि‍कार स्‍थापि‍त कऽ लेलक। फेर गुजरातक हि‍न्‍दु-व्‍यापारी सभकेँ सेहो अपना दि‍स आकर्षित कऽ मुसलमान सभसँ पृथक करक प्रयास करए लागल। स्‍थानी‍य आ अप्रत्‍याशि‍त लाभकेँ ध्‍यानमे रखैत गुजरातक हि‍न्दू व्‍यापारी सभ हीरा-जवाहरात तथा तमाम वेश कीमती पत्‍थरपर अपन आधि‍पत्‍य बनेबाक युक्‍ति‍पर वि‍चार करए लागल। आ ऐ‍ तरहक एकाधि‍पत्‍य बि‍ना राजनैति‍क सहयोग एवं हस्‍तक्षेपसँ संभव नै‍ अछि‍। अइ‍ तरहक सहयोग जखन मोदी प्रथम बेर मुख्‍यमंत्री भेलाह, तँ देनाइ प्रारम्‍भ कऽ देलथि‍न्‍ह। फेर की छल, हिन्दू व्यापारी सभ हुनका समर्थन करए लगलन्‍हि‍ आ हुनकर चुनावमे आर्थिक एवं अन्‍य तरहक मदति‍ करए लगलन्‍हि‍। अन्‍तर्राष्ट्रिय स्‍तरपर इजरायल तँ मदति‍ कैयो रहल छन्‍हि‍। संगे‍ गुजरातक आदि‍वासी तथा कट्टरपंथी हि‍न्दू वर्ग हि‍न्दू अस्‍मिताक नामपर हि‍नकर संग छन्‍हि‍।‍” मलि‍क भाय गंभीर रहलाह आ बजैत रहलाह- “गुजरातमे मुसलमान समुदाय केर साथ खून-खरापा उच्‍च वर्ग हि‍न्दू अथवा व्‍यापारी इत्‍यादि‍ नै केलक। ऐ‍ लेल ठेकेदार सभ आदि‍वासी लोकनि‍केँ पटौलक। ओकरा सबहक मोनमे मुसलमान समुदायक प्रति‍ घृणा आ वैमनस्‍य उत्‍पन्न केलक। अहाँकेँ की कहू कैलाश भाय, हाले‍मे हम गुजरातक कि‍छु आदि‍वासी बहुल क्षेत्रमे पत्रकारक टीम संगे यात्रा केने रही। जखन एक आदि‍वासी गाममे गेलौं आ पुछलि‍ऐ जे बगलबला गाँव जइ‍मे मुसलमान सभ रहैत अछि‍ तकर सबहक की हालत छै? हमर जि‍ज्ञासापर आदि‍वासी सभ तमतमाइत कहलक- श्रीमान्, अहाँ मुसलमान सबहक बात नै‍ करू। ओ सभ गद्दार अछि‍। ओ सभ कि‍छु अंट-संट गारि‍ सेहो बाजल आ अन्‍तमे कहलक- जनैत छी, हमरा लोकनि‍ गुजरातक दंगाक समएमे मुसलमान सभकेँ खूब मारलौं। सभटा बदला लऽ लेलिऐ। पूरा देशमे जे भारतीय जनता पार्टी २००४ केर चुनाव हारल तकर कारण कुतुबुद्दीन अन्‍सारीक बान्‍हल आ वि‍वशतामे हाथ जोड़ैत फोटो। ओ भीड़क उन्‍मादमे मातल लोक सभसँ हाथ जोड़ने अपन प्राणक भीख मांगैत छल। ई फोटो मात्र समस्‍त भारतमे भारतीय जनता पार्टीक प्रति‍ लोकक मोनमे घृणा उत्‍पन्न कऽ देलकै आ ऐ‍ बातकेँ बी.जे.पी.केर नेता नै‍ बुझि‍ सकलाह। परि‍णाम बहुत नीक जकाँ सरकार चलेबाक बादो भारतीय जनता पार्टी एवं घटक दल सत्तामे नै‍ आबि‍ सकल। आ सम्‍पूर्ण परि‍प्रेक्ष्‍यमे नरेन्‍द्र मोदीकेँ एकर सूत्रधार मानल गेलै। एका-एक पूरा देशक मुसलमान मोदी वि‍रोधी भऽ गेल। मुसलमान डरे हरकम्‍प काँपए लागल। अपने-आपकेँ घोर असुरक्षि‍त बुझए लागल। जानैत छी कैलाश भाय, हम तँ मुसलमान समाज आ ि‍वशेष रूपसँ बुद्धि‍जीवी सभ लग बैसै छी। मुसलमान समाजमे ई चर्चा भऽ रहल छै जे घोर राष्‍ट्रवादक नामपर भारतमे मुसलमान सभकेँ जान-मालक अपार छथि‍ हेतै। कि‍छु वर्ष अर्थात ३०-४० वर्षक बाद मुसलमान सभ अपन नाम हि‍न्दू नाममे परि‍वर्तित कऽ लेत। इजरायल अपन प्रभुत्‍व, भारतमे घोर राष्‍ट्रवादी संग मि‍ल, बनाओत आ मुसलमानकेँ परेश्‍‍ाान कऽ कऽ देखाओत। भारतक अगल-बगल केर छोट-छीन देश सभ भारतमे मि‍ल जाएत। मुदा मुसलमान सभ ईहो सोचैत अछि‍ जे चीन जइ‍ तरहसँ अपनाकेँ हर दृष्‍टकोणसँ मजबूत कऽ रहल अछि‍- एक दि‍न लगभग डेढ़-दू सए वर्षक बाद ई स्‍थि‍ति‍ हेतै जे चीन भारतकेँ छि‍न्न-भि‍न्न करएमे सफल भऽ जाएत। हलाँकि‍ चीनक लेल चि‍न्‍ताक वि‍षए छै तीव्र गति‍सँ ओतए केर जनताक ईसाई धर्ममे परि‍वर्तन।” एकरा बाद पुन: मलि‍क भाय बि‍हारक सन्‍दर्भमे बाजए लगलाह कहलन्‍हि‍- “बि‍हारक मुसलमान नीतीश जीक अइ‍ ि‍नर्णएसँ संतुष्‍ट छल जे चलू ओ नरेन्‍द्र मोदीकेँ बिहार  नै‍ आबए देलाह। उच्‍च वर्ग सभ पहि‍ल बेर एक भेल आ अपन मत नीतीश कुमारक पार्टी एवं भारतीय जनता पार्टीक उम्‍मीदवार सभकेँ आँखि‍ मूनि‍ कऽ देलक। अइ‍ तरहेँ नीतीशकेँ महादलि‍त आ दलि‍त, मुसलमान, महि‍ला, युवक, बेरोजगार आ वि‍कास पसि‍न्न करएबला जनताक आधार भेटलन्‍हि‍। लालू जीक पक्षमे यादव एवं अन्‍य हुनकर परम्‍परागत लोक सभ एखनो छल। मुदा सेन्ह लगलन्‍हि‍ मुसलमान, उच्‍चवर्ग एवं दलि‍त समुदायमे, जकरा कारणे ओ भयंकर हारि देखलन्‍हि‍। रामवि‍लास माँटि‍मे सेन्हि‍या गेलाह। काँग्रेस ध्‍वस्‍त भऽ गेल। राहुल गान्‍धी सोनिया गान्‍धी आ प्रधानमंत्री जीक दौरा बि‍हारक जनताकेँ नै‍ पसि‍न्न कऽ सकल। नीतीशजी वि‍जयी भेलाह। आब वि‍कास पुरूषक मोहर लागि‍ गेल छन्‍हि‍। आगाँ आरो आत्‍म वि‍श्‍वाससँ कार्य करताह। बि‍हार आब शीघ्रे‍ एक आदर्श राज्‍यक दर्जा प्राप्‍त करत।” एकर बाद घड़ी देखैत मलि‍क भाय हमरा कहलन्‍हि‍- “कैलाश भाय, हमरा लोकनि‍ १५ मि‍नटक लेल बाहर नि‍कलल रही आब डेढ़ घण्टा भऽ गेल। चलू, अपन नौटंकीक परि‍योजनापर चर्चा करी।‍” हम एक आज्ञाकारी शि‍ष्‍य जकाँ हुनका संग एक बेर पुन: श्रीराम सेन्‍टर केर केफेटेरि‍यामे नौटंकीपर वि‍मर्शमे व्‍यस्‍त भऽ गेलौं। आब सोचैत छी, मलि‍क भाय केर फुटपाथी गप्‍प कहीं यथार्थक वर्णन तँ नै अछि‍! सोचल ऐ‍ बातकेँ बि‍ना कुनो भेद-भावकेँ पाठक संग यायावरीक माध्‍यमसँ बाँटी। उत्तराखण्‍डक नन्‍दा-राजजात गाम बड्ड याद अबैत अछि दिल्लीमे हमरा मुदा गाम अतबो नजदीक तँ नै अछि जे चट दनी बिदा भऽ जाएब! तँए जखन कखनो दिल्लीसँ मोन औनाए लगैत अछि तँ हम ऋषिकेश चलि जाइत छी। एक दू दिन गंगाक तटमे आनंदसँ रहि फेर दिल्लीमे कर्म धुनऽ चलि अबैत छी। हिमालय केर विभिन्न भागमे जेबाक आ कार्य करबाक अवसर भेटल अछि- कखनो सिक्किममे जा कञ्चनजंघाक दर्शन, भुटिया आ लेपचा जनजातिक अध्ययन एवं सांस्कृतिक विश्लेषण तँ कखनो अरुणाचल प्रदेशक तवांगमे जा ओतऽ केर परम्पराक अवलोकन। अनुभव हमेशा उत्तम। हिमालय दर्शन केर क्रममे कतेको बेर हिमाचल प्रदेश, कश्मीर आ उत्तराखंड सेहो गेल छी। साल २००५मे हम उत्तराखंड गेल रही। ओतएसँ वापस एलाक बाद २००५ ई. मे हम नन्‍दा-राजजातपर एकटा लेख अपन मानवशास्‍त्रीय सर्वेक्षण केर आधारपर लिखने रही। ओ लेख इन्‍दि‍रा गान्‍धी राष्‍ट्रीय कला केन्‍द्र केर वेबसाइटपर प्रकाशि‍त भेलै। कि‍छु दि‍नक बाद हमरा उतराखण्‍डसँ बहुत लोक सभ लेख लिखबाक हेतु साधुवाद दिअए लगलाह। कतेको लोकनि‍ ओइ लेखक लि‍ंककेँ अपन ब्‍लॉगसँ जोड़लनि‍। हालेमे एक उतराखण्‍डक नवयुक अपन माटि‍ आ पहाड़सँ सि‍नेह देखबैत एकटा पद्यमय पत्र लि‍खलनि‍। पत्र कि‍छु एना लिखल छल- “‍आँखिक आगाँ वनश्रीक खुजैत पट अद्भुत, छोट-छोट खेत आ आड़ू सेबक बगीचा, देवदार वन, नभ धरि अपन छवि‍ जाल पसारने अछि। हमरा तँ हि‍मसँ आच्छादित अपन पहाड़ प्रिय अछि।‍” नन्‍दाराज-जातक अर्थ भेल नन्‍दादेवीक यात्रा। लोक इति‍हासमे ि‍स्‍थति‍क अध्‍ययन करी तँ पता लगैत अछि जे नन्‍दा गढ़वालक राजा लोकनि‍क संग-संग कुँमाऊ केर कत्‍युरी राजवंशक ईष्टदेवी छलीह। ईष्‍टदेवी हेबाक कारणें नन्‍दादेवीकेँ राजराजेश्‍वरीक रूपमे सेहो सम्‍बोधि‍त कएल जाइ छन्‍हि‍। नन्‍दाकेँ लोक ओना पार्वतीक बहि‍न सेहो मानै छथि‍। समस्‍त उत्तराखण्‍डमे समान रूपें पूजि‍त हेबाक कारणे नन्‍दादेवी समस्‍त प्रदेशमे धार्मिक एकता केर सूत्र सांस्‍कृति‍क रूपसँ मानल जाइ छथि‍। अर्थात हि‍नकासँ समस्‍त प्रदेश एक सूत्रमे जेना बन्‍हा जाइत हुअए! स्‍थानीय दंतकथा तँ ई कहैत अछि‍ जे नन्‍दादेवी दक्ष प्रजापति‍ केर सात कन्‍यामे सँ एक छलीह। एहेन मानल जाइत अछि‍ जे हि‍नकर वि‍आह भगवान महादेवसँ भेल रहनि‍। भगवान महादेवक संग ऊँच आ हि‍मसँ आच्‍छादि‍त पहाड़पर नन्‍दा देवी रहै छथि‍। पति‍सँ एहेन सि‍नेह जकर वर्णन असंभव! पति‍ जखन संग रहै छथि‍न तँ सुखक बदलामे घोरसँ धोर कष्‍टकेँ नन्‍दा दाइ सहि‍ लै छथि‍। कुनो-कुनो ठाम तँ नन्‍दादेवीकेँ पार्वतीक साक्षात् रूप मानल जाइ छन्‍हि‍। नन्‍दाकेँ बहुत नामसँ जानल जाइ छन्‍हि‍- शि‍वा, सुनन्‍दा, शुभानन्‍दा, नन्‍दि‍नी इत्‍यादि‍। उतराखण्‍डमे देवी-देवताक स्‍तुति‍ या स्‍मरणमे दि‍न-राति‍ जागि‍ कऽ गाबैबला गीत अथवा कीर्तनकेँ जागर कहल जाइ छै। तहि‍ना जेना अपना मि‍थि‍लामे अष्‍टयाम होइत अछि‍। नन्‍दा देवीक बारेमे अनेक जागरक अनुसार भाँति‍-भाँति‍क दन्‍तकथा भेटै छै। एहने एक कथामे नन्‍दा दाइकेँ नन्‍द महराजक बेटी मानल जाइ छन्‍हि‍। नन्‍द महराजक ई बेटी भगवान श्री कृष्‍णक जन्‍मसँ पहि‍ने कंसक हाथसँ छहलि‍ कऽ आकाशमे उड़ैत नागाधि‍राज हि‍मवंतक पत्नी मैनाक कोरामे पहुँच गेलीह। एक दोसर जागरमे नन्‍दा दाइकेँ चान्‍दपुर गढ़क राजा भानुप्रतापक पुत्री कहल जाइ छन्‍हि‍। एक जागरमे लोक सभसँ पता चलल जे नन्‍दा देवीक जन्‍म ऋषि‍ हि‍मवंत आ हुनकर पत्नी मैनाक घरपर भेल छलनि‍। मुदा तमाम तरहक अलग-अलग धारणा भेलाक बादो पर्वतीय अंचलमे रहनि‍हार लोकनि‍ नन्‍दादेवीकेँ लोक मानस केर एक दृढ़ आस्‍थाक प्रतीक मानैत छन्‍हि‍। संगे नन्‍दा राजजातकेँ परम्‍परा केर अभि‍न्न हि‍स्‍सा मानैत प्रत्‍येक बारह बर्षमे राजजातक भव्‍य आयोजन करै छथि‍। राजजात किंवा नन्‍दाजातक अर्थ भेल राज राजेश्‍वरी नन्‍दादेवीक यात्रा। गढ़वाल क्षेत्रमे देवी-देवताक जात अथवा यात्रा खूब धूमधामसँ मनाएल जाइ छै। अर्थात एतऽ ऐ क्षेत्रक लोकक दृष्‍टि‍मे जातक अर्थ भेल देवयात्रा। लोक वि‍श्‍वास ईहो छै जे नन्‍दा देवी भादवक अन्‍हरि‍या पक्षमे अपन नैहर अबैत छथि‍। कि‍छु दि‍नक बाद अष्‍टमी दि‍न हुनका नैहरसँ सासुर वि‍दा कएल जाइ छन्‍हि‍। राजजात या नन्‍दाजात नन्‍दा दाइकेँ अपन नैहरसँ एक बनल-ठनल, वस्‍त्र आ गहनासँ सुसज्‍जि‍त नव व्‍याहि‍ता कनि‍याँ जकाँ सासुर जेबाक यात्रा छन्‍हि‍। सासुरकेँ स्‍थानीय भाषामे सौरास कहल जाइ छै। ऐ अवसर पर नन्‍दादेवीकेँ सजा कऽ बना ठना कऽ महफामे बैसा तथा वस्‍त्र, आभूषण, खाद्यान्न, पैसा, मि‍ठाइ इत्‍यादि‍ सनेस दऽ गढ़वालक परम्‍पराक अनुसारे वि‍दा कएल जाइ छन्‍हि‍। ओना तँ हरेक साल नन्‍दाजात आयोजन करबाक प्रथा छै परन्‍तु बारह वर्षमे भव्‍य आ मनोरंजक राजजातक आयोजन कएल जाइ छै। आयोजन एहेन जकरा शब्‍दमे नै कहल जा सकैत अछि‍। केवल अनुभव कएल जा सकैत अछि‍। नन्‍दाजात प्रति‍ वर्ष इजोरि‍या पक्षक अष्टमीक दि‍न मनाएल जाइत अछि। तही दि‍न नन्‍दा दाइकेँ महफामे बैसा कऽ वि‍दा कएल जाइ छन्‍हि‍। नैनीताल, बैजानाथ आ अल्‍मोड़ामे वि‍शेष धूमधामसँ ऐ महापावनि‍केँ मनाएल जाइत अछि‍। नैनीतालमे प्रति‍वर्ष नन्‍दा-सुनन्‍दा मेलाक आयोजन कएल जाइ छै। ऐ अवसरपर नन्‍दा आ सुनन्‍दा दुनू बहि‍नकेँ, वि‍शि‍ष्‍ट रूपेँ केराक गाछसँ बनल मूर्तिकेँ, महफामे बैसा चारू तरफ घुमाएल जाइत छन्‍हि‍। केराक एहेन आकर्षक मूर्ति कुमाऊँकेँ अति‍रि‍क्‍त अन्‍यत्र नै बनाएल जाइ छै। आ सभसँ अन्‍तमे मूर्तिक वि‍सर्जन नैनी झीलमे कऽ देल जाइ छै। कुमाऊँ क्षेत्रक बात भऽ रहल अछि‍ तँ एक बात आरो स्‍पष्‍ट कऽ दी। कुमाऊँमे नन्‍दाक एक वि‍शेष बात ई छन्‍हि‍ जे गरूड़क कोट भ्रामरी मन्‍दि‍रमे नन्‍दादेवीक अवतार एक पुरूषक शरीरमे होइ छन्‍हि,‍ जखन कि‍ उतराखण्‍डक अन्‍य क्षेत्रमे देवीक अवतार स्‍त्रीक शरीरमे आ देवता लोकनि‍क अवतार पुरूषक शरीरमे होइ छन्‍हि‍। प्रसि‍द्ध इति‍हासकार एटकि‍ंसन महोदय हि‍मालयन गजेटि‍यरमे प्रत्‍येक बारह बर्षपर नन्‍दा राजजात मनेबाक वि‍स्‍तृत वर्णन करै छथि‍। ऐ यात्रामे करीब २५० कि‍लोमीटर दूरी- नौटीसँ होमकुण्‍ड धरि‍ पैदल करए पड़ै छै। ऐ यात्राक मध्‍य घनघोर जंगल, दुर्गम चोटी आ बर्फसँ झाँपल पहाड़केँ पार करए पड़ै छै। यात्राक कठि‍नता आ दुरूहताक कल्‍पना अहाँ ऐ बातसँ लगा लिअ जे बाण गामसँ आगाँ रि‍णकीधारसँ यात्री सभकेँ पएरे- बि‍ना जूत्ता-चप्‍पलकेँ- ज्‍यूगरालीदार देसी (करीब १८००० फीटक ऊँचाइ) पार करए पड़ै छै। यात्रा जखन रि‍णकीधारसँ आगाँ बढ़ैत छै तँ नाना तरहक प्रति‍बन्‍धक पालन केनाइ अनि‍वार्य भऽ जाइ छै जेना स्‍त्रीगण, बच्‍चा, अभक्ष्‍य ग्रहण करैबला जाति‍क लोक, चामक बनल वस्‍तु, गाजा बाजा इत्‍यादि‍ नि‍षि‍द्ध भऽ जाइ छै। सम्‍भवत: ई यात्रा संसारक सभसँ पैघ, दुर्गम आ कठि‍न धर्मयात्रा थीक। ऐ यात्राकेँ केवल समर्पित तथा नि‍ष्‍ठावान भक्‍त लोकनि ‍कऽ सकै छथि‍। हजारोक संख्‍यामे श्रद्धालु लोकनि‍, धर्म तथा परम्‍परामे वि‍श्‍वास करैबला आइयो केर घोर कलि‍युगमे, ऐ यात्राकेँ श्रद्धापूर्वक पूरा करै छथि‍। संगाईप्राऊ : नागा पूर्वजक स्‍मरणक धरोहर उत्तर-पूर्व भारतक तमाम प्रदेश हमरा नीक लगैत अछि‍। नीक लगैत अछि‍ ओतए केर पहाड़, पठार, जंगल, गाछ, वृक्ष, फल, फूल, खेत, खरि‍हान, सुरम्‍य झरना, जीव-जन्‍तु आ ओइ परि‍वेशमे बसल भाँति‍-भाँति‍क लोक, जे अपन बहुरंगी संस्‍कृति‍क संग जीब रहल अछि‍। तखन जखन हमर मणिपुर केर राजधानीसँ लगभग ७ कि‍लोमीटर केर दूरीपर समतल भूमि‍मे बसल कबुई नागा जनजाति‍ बहुल गाममे जएबाक निमंत्रण शोधक कारणे भेटल, तँ मोन गद-गद भऽ गेल। ई समए थीक सि‍तम्‍बर २०१० केर मध्‍य। हमरा लग हवाइ जहाजक टिकट, यात्रा करक पाँच दि‍न पहि‍ने आबि‍ गेल छल। ईहो निर्णय भऽ गेल छल जे शोध कार्यमे हमरा एकटा कबुई बाला -बीजू जे कि‍ ओही गामसँ थिकीह, से मदति‍ करतीह। बीजू समाजशास्‍त्रमे पूणे वि‍श्‍ववि‍द्यालयसँ एम.ए. केलाक बाद आइ-काल्हि‍ असम सेन्‍ट्रल वि‍श्‍ववि‍द्यालय सि‍लचरसँ पी.एच.डी. कऽ रहल‍ छथि‍। बीजूक आयु लगभग २६ वर्षक हेतन्हि‍। मोट मुदा मजगुतगर देहयष्‍टि‍। थुलथुन नै, आकर्षक। नाक कनी पीचल, आँखि‍ कनी धसल मुदा सोहनगर। गसल-गसल बाँहि, भरल गाल, उन्नत वक्ष आ मध्‍यम कद-करीब ५ फीट २ इंच, गौर वर्ण, गसल-गसल दुधि‍या दाँत  चमचम  करैत। हँसैत मुँह, लज्‍जा भावसँ भरल, अति‍थि‍ सेवा-सत्‍कारमे सदति‍ काल तैयार। अंग्रेजी बीजू मातृभाषा जकाँ बजैत छथि‍ तँए हमरा हुनका संगे सम्‍प्रेषणमे कुनो तरहक दि‍क्कत नै भेल। ओना हमर परि‍योजनाक सम्बन्ध महि‍ला वि‍कास, इन्‍फॉरमेशन टेक्‍नोलॉजी, आ संस्‍कृति‍सँ रहैत अछि‍ आ बीजू सोसल वर्कमे शोध कार्य करैत छलीह। मुदा हुनकर फोकस उत्तर-पूर्व भारत केर जनजातीय महि‍ला समुदायमे एड्स एवं अही तरहक बी‍मारी (अथवा महामारी) क प्रकोपपर छलन्‍हि‍। सोचल, नारी चेतना दि‍स तँ कार्य करि‍ते छथि‍, कि‍छु ट्रेनिंग आ उत्‍साह सम्‍बर्धन केर पश्‍चात हमरो संगे काज कऽ लेतीह. यएह सोचैत बीजूकेँ हम अपन परि‍योजनामे राखि‍ लेलियन्‍हि‍। जखन पहि‍ल बेर मणि‍पुरक राजधानी इम्‍फालसँ संगाइप्राऊ गाम दि‍स गामक चारि‍ युवक आ Read Global संस्‍थाक एगो सहयोगी नाहि‍द जुबेरक संग हमरा लोकनि‍ वि‍दा भेलौं तँ लागल जे युवक सभ उत्‍साही छथि‍ आ हि‍नका लोकनि‍क मदति‍ सँ हमरा एतऽ कार्य करैमे सुवि‍धा हएत। संगाइप्राऊ एक साफ आ सुन्‍दर गाम थीक जे कि‍ पश्‍चि‍मी इम्‍फाल जि‍लाक अन्‍तर्गत लमजाओतोंगबा ग्राम पंचायतमे अबैत अछि‍। अगर इम्‍फाल शहरसँ हवाइ अड्डा दि‍स प्रारंभ करब तँ शहरसँ लगभग ७ कि‍लोमीटर चललाक बाद दूटा राष्‍ट्रीय राजमार्ग संख्‍या ५३ आ १५० केर मध्‍य ई गाम बसल अछि‍। संगाईप्राऊ नाम मणि‍पुर राज्‍यक माइथोलाॅजीसँ लेल गेल छै। तइ मीथक अनुसारे संगाईप्राऊ संगाई जे कि‍ राज्‍यक जानवर छै, केर ई आवास स्‍थान मानल जाइ छै। ओइ गाममे अधि‍कांश लोक सभ कबुई नागा समुदायसँ छथि‍। कबुई नागाकेँ रोंगमेई नामसँ सेहो जानल जाइ छै। गाममे प्रवेश करि‍ते हमरा बीजू भेट भेलीह। हम बीजूकेँ कहलियनि‍ जे हम अतए केर कि‍छु बुढ़-पुरान, कि‍छु महि‍ला, कि‍छु युवक  आदि सँ भेँट करए चाहै छी आ हुनका लोकनि‍सँ ऐ गाम, एकर लोक इति‍हास, एतुक्का परम्‍परा, आर्थिक-सामाजि‍क परि‍वेश इत्‍यादि‍पर अपन जानकारी बढ़बए चाहै छी, जैसँ रि‍पोर्ट लिखबामे सुवि‍धा रहत। हमर बातकेँ सुनि‍ते बीजू हमरा गामक सभसँ बुढ़ आ जातीय प्रधान लग लऽ गेलीह। बुढ़ ८६ वर्षक छलाह। सातमा पास केलाक बाद सरकारी स्‍कूलमे मास्‍टर भऽ गेलाह। बेटा-बेटी सभकेँ नीक शि‍क्षा देलन्‍हि‍। हुनकासँ ज्ञात भेल जे हुनकर पूर्वज कि‍छु आरो लोक सबहक संगे पहाड़सँ उतरि‍ ऐ गाममे लगभग १७८० ई. मे बसलाह। यद्यपि‍ हुनका लग ऐ बातक ऐति‍हासि‍कताक कुनो लि‍खि‍त प्रमाण नै छलन्‍हि‍। हुनका हि‍साबे प्रारम्‍भमे मात्र ग्‍यारह परि‍वार ऐ गाममे बसल। ऐ ग्‍यारह परि‍वारक मुखि‍याक नाम आइयो गामक बूढ़-पुरान सबहक मँुहमे छै। ई ग्‍यारह व्‍यक्‍ति‍ छलाह- १. गोन्‍बी, २.थोम्‍बुई, ३.बोंकमलाक, ४.सचाऊ, ५.लंगखोंग्‍टबा, ६.गंगबी, ७.ममुईबा, ८.गंगथवांगम, ९.मईपाक, १०.तरांगबोन्नांग, ११.कपजीलुपूई (महि‍ला)। जँ दन्‍तकथाकेँ मानी तँ ई लोकनि‍ बड्ड उद्यमी छलाह। स्‍थानीय राजा हि‍नकर उद्यमि‍तासँ प्रसन्न भऽ हि‍नका लोकनि‍केँ अगल-बगल केर पनि‍गर खेत सभमे धान उपजेबाक लेल कहलखि‍न। ई सभ बड़ा साहसी आ दबंग सेहो छलाह। तइ दि‍नमे हि‍नका लोकनि‍केँ गुण्‍डा आ अपराधी तत्‍वकेँ पकड़बाक तथा सजा देबाक अधि‍कार सेहो दऽ देलखि‍न। ई ग्‍यारह पूर्वज संगाईप्राऊ बच्‍चा संगे बसि‍ अवश्‍य गेलाह मुदा अपन-अपन मूलग्रामसँ सम्‍बन्‍ध सेहो बनौने रहला‍। ओतए अर्थात पहाड़क घर इत्‍यादि‍केँ नै छोड़लाह। जाइत-अबैत रहलाह। जखन द्वि‍तीय वि‍श्‍वयुद्ध चलि‍ रहल छल, तइ क्षण नेताजी सुभाषचन्‍द्र बोस अपन आजाद हि‍ंद फौजक संग जापानक सहयोगसँ अही रस्‍ते  तइ समएक बर्मा (आ आजुक म्‍यंमार)सँ सम्‍पर्क रखने छलाह। मणि‍पुर म्‍यंमारक सीमासँ सटल अछि‍। फलत: अतए केर लोककेँ भयंकर बमबारीक समाना करए पड़लै। पहाड़ीपर रहैबला लोक लगातार बमबारीसँ परेशान भऽ कखनो झाड़-झंखाड़ दि‍स तँ कखनो मैदानी भाग दि‍स, दहशतसँ प्राणरक्षाक लेल भागए लागल। ओहूकाल पहाड़ीपर बसल गामसँ कि‍छु कबुई नागा लोकनि संगाईप्राऊ गाममे आबि‍ बसि‍ गेलाह। तँ बात करैत रही गामक सभसँ बुढ़ पुरूषक। ओ परम्‍परागत रूपसँ कबुई समाजक प्रधान छथि‍। ओ कहलनि‍ जे आब ऐ गामक लगभग ३५ प्रति‍शत नागा लोकनि‍ ईसाई भऽ गेलाह अछि‍। एकर बादो आपसमे कुनो वैमनस्‍य नै। लोक सभ परम्‍परागत पाबनि‍-ति‍हार, नाच-गान, सभ एक्के संग अखनो बड़ उत्‍साहसँ मनबैत छथि‍। अखनो ई लोकनि‍ अपन पूर्वजकेँ देवतासँ बेसि‍ए सम्‍मान दै छथि‍। अखनो अपने-आपकेँ कुनो धर्म आ संस्‍कृति‍सँ ऊपर उठि‍ नागा बुझएमे गर्वक अनुभूति‍ करै छथि‍। पि‍तृक प्रति‍ अतेक सि‍नेह कत्तौ नै देखल हम अपन आइ धरि‍क यायावरीक प्रवृत्ति‍मे। पि‍तृक प्रति‍ अतेक समर्पण जे कबुई नागामे देखलौं से एकाएक हमरा अपने-आपकेँ अपन पि‍तृक प्रति‍ सचेत कऽ देलक। पि‍तृक प्रति‍ अतेक इमानदारी जे गामक एक नागा चि‍त्रकार प्रथम ग्‍यारह पूर्वजक चि‍त्र बनाए गामक ि‍नर्माणक  एक भव्‍य पेन्‍टि‍ंग बनौलनि‍। पेन्‍टि‍ंग भव्‍य आ पैघ। आकर्षक आ रंग तथा तुलि‍काक समायोजन केर सर्वश्रेष्‍ठ उदाहरण। केनवासमे एक-एक रत्ती जगह भरक असाधारण प्रयास। बाह रे कलाकार! बाह रे कला!  बाह रे पितृक प्रति समर्पण!  हम पूरा आत्‍मवि‍श्‍वासक संग कहि‍ सकैत छी जे अतेक सि‍नेह हमर पि‍ताक अलावे आर कि‍यो आन पुरूष हमरा नै दऽ सकैत छल। परम्‍परागत कबुई नागा धर्मकेँ मानैबला प्रकृति‍क समी‍प छथि‍। ओ एकटा सर्वशक्‍ति‍मान भगवान अर्थात् तींगकाओ रगवांग केँ मानैत छथि‍, एकर अति‍रि‍क्‍त अनेक तरहक देवी-देवताक अराधना आ पूजा-उपचार सेहो करै छथि‍। परम्‍परागत कबुई नागाक बीच ई वि‍श्‍वास अखनो छन्‍हि‍ जे मनुक्‍ख तखने बी‍मार पड़ैत अछि‍ जखन ओकरा कुनो भूत-प्रेत परेशान करै छै आ ओकरापर सवार भऽ जाइ छै। कखनो काल डाइन-जोगि‍न सभ सेहो जादू-टोनासँ लोककेँ परेशान करै छै। भूत-प्रेत या शैतानी आत्‍मासँ मुक्‍त करबाक लेल बी‍मार व्‍यक्‍ति‍क सामने गामक ओझा हरि‍यर तरकारी, फल, फूल, मुर्गीक बच्‍चाक शोणि‍त, चाउर, देशी दारू आदि‍सँ अपन ईष्‍टदेव, पि‍तृ इत्‍यादि‍केँ अर्पित करैत अछि‍ आ निष्ठापूर्वक पूजा करैत अछि। वि‍श्‍वास ई कएल जाइत अछि‍ जे ऐ प्रक्रि‍या आ आराधनासँ लोकक कष्‍टक समाधान भऽ जएतै। संगाईप्राऊ गामक कबुई नागा मूलत: छः गोत्रक छथि‍। ई ६ गोत्र गामक बुजुर्ग लोकनि‍क कथनानुसार नि‍म्नलि‍खि‍त अछि‍- क. कामेई २७ घर; ख. पालमेई ०९ घर; ग.गोलमेई ११ घर; घ. गंगमेई ०८ घर; च.मारि‍ंगमेई ०८घर; छ.न्‍यूमेई ०१घर। ईसाईयक प्रभाव तेजीसँ बढ़ि‍ रहल छै। गाममे एकता मध्यम आकृति केर गि‍रि‍जाघर आ एकटा एक्‍टीभीटी केन्‍द्र ईसाई मि‍शनबला बना देने छै। गामक लोक सभ, मुख्‍यरूपेण महि‍ला लोकनि‍, बड़ा कलात्‍मक आ रचनात्‍मक प्रवृति‍क छथि‍। Read Global संस्‍थाक सहयोगसँ पच्‍चास प्रति‍शत साझेदारीकेँ स्‍वीकारैत ऐ गामक स्‍त्री-पुरूष गामक गैरमजरूआ भूमि‍पर सार्वजनि‍क प्रयोगक हेतु एगो पुस्‍तकालय, कम्‍प्‍यूटर प्रशि‍क्षण केन्‍द्र, महि‍ला वर्गक लेल आर्थिक उपार्जन हेतु व्‍यवसायि‍क प्रशि‍क्षण केन्‍द्र बना रहल छथि‍। ऐ प्रांगणक नाम तजाई राखल गेल छै। पुछलापर पता चलल जे स्‍थानीय भाषामे तजाई केर अर्थ होइ छै पहाड़ी जंगलमे एहेन पोखरि‍ जतए नुनगर पानि‍ उपलब्‍ध होइ छै। आ सभ तरहक जानवर ओइ पानि‍क स्‍वाद स्‍वतंत्र भावसँ अतए लैत अछि‍। तहि‍ना तजाई प्रांगण अगल-बगलक तमाम लोकक हेतु चाहे ओ स्‍त्री-पुरूष, बच्‍चा-बुढ़, नव-पुरान, जनजाि‍त-सामान्‍य जाति‍क कि‍ए नै हुअए, सबहक लेल छै। सभ कि‍यो अतऽ आबि‍ ऐठाम उपलब्‍ध सुवि‍धाक लाभ उठा सकैत अछि‍। आब बुझैमे कुनो भांगठ नै अछि‍ जे आपसी सौहार्द कोना कऽ कबुई नागामे व्‍याप्‍त अछि‍। ई रहस्‍य अखनो धरि‍ पता नै चलल जे बीजू कि‍एक बहुत रास अगरबत्ती जरेने छलीह। हलाँकि‍ कुनो वि‍शेष तरहक दुर्गन्‍धक अनुभूति‍ अवश्‍य भऽ रहल छल। जखन ओइ गामसँ सम्‍बन्धि‍त नाना तरहक जानकारी लऽ लेलौं तँ ओइ बुजुर्गकेँ कहलि‍यनि‍- “बीजू हमरा लेल जानकारी एकत्रि‍त कऽ रहल‍ छथि‍। अहाँ लोकनि‍ लग बेर-बेर एतीह आ वि‍भि‍न्न तरहक प्रश्‍न करतीह। नि‍वेदन जे ऐ गामक नागा समाजक प्रधान हेबाक नाते, सभसँ बुजुर्ग हेबाक नाते, अनुभवी हेबाक नाते अहाँ हि‍नका यथासंभव मदति‍ करबन्‍हि; गामक लोक सभसँ सेहो आग्रह करबनि‍ जे ई लोकनि‍ बीजूकेँ सहयोग करथि‍।‍” बुढ़ बजलाह- “कुनो बात नै। बीजू तँ गामक बेटी थिकीह। आर अहाँ लोकनि‍ तँ हमरे सभ लेल कार्य कऽ रहल छी। फेर सहयोग तँ करबे करबनि‍।” एकर बाद हुनका नमस्‍कार कए एक महि‍ला लग  विदा भेलौं। रास्‍तामे बीजू कहलनि‍- “श्रीमान्, ऐ घरक  बारी मे एकटा तीन दि‍न पूर्व मरल बड़दक मांस नि‍कालल जाइ छलै तथा खालकेँ अलग करैत छलीह घरक महि‍ला लोकनि‍। तकरे दुर्गन्‍ध आबि‍ रहल छल। दुर्गन्‍ध कनी‍ कम भऽ जाए तँए तीन-चारि‍ मुट्ठी अगरबत्ती जरा देने रही।‍” आब हमरा लोकनि‍ गामक एक ६४ वर्षीए नागा महि‍ला श्रीमति एथेनाक घर पहुँचलौं, बड्ड साफ-स्‍वच्‍छ आ कलात्‍मक घर। चारू कात फूल आ हरि‍यरीसँ भरल। घरक भीतरसँ एक युवक बाहर एलाह। हमरा लोकनि‍केँ बैसबाक लेल कहलनि‍। कनी कालक बाद श्रीमति एथेना कमरमे फनेक लपेटने तथा ब्‍लाउज पहि‍रने एलीह। सहज आ सुन्‍दर स्‍वरूप। नि‍श्‍छल मोन। शांत स्‍वरूप। बात होमए लागल। कहलनि‍- “हम्‍मर माता-पि‍ता कहि‍ नै कि‍ए ईसाई भऽ गेलाह। मुदा हमरा लोकनि‍ नागा परम्‍पराकेँ धेने रहलौं। पि‍ताजी हमरा सदति‍काल बेटे जकाँ सि‍नेह देलनि‍। अन्‍तत: १९६९ ई.मे गुवाहाटी वि‍श्‍ववि‍द्यालयसँ राजनीति‍ शास्‍त्रमे एम.ए. केलौं। हम पहि‍ल कबुइ नागाक महि‍ला छी जे एम.ए. केलौं, तकरबाद हमर वि‍वाह भऽ गेल। हमर पति‍ इन्जीनीयर छलाह। ओ हमरा कहलनि‍ जे अहाँ चाही तँ नौकरी कऽ सकै छी। फेर की छल। भारतीय डाक वि‍भागमे भेकेन्‍सी एलै। हम अपन आवेदन पत्र जमा केलौं आ हमरा नौकरी भेट गेल। आब अवकाश प्राप्‍त कए अपन गाममे रहि‍ रहल छी। बेटा अपन मकान गौहाटीमे बनौने अछि‍ आ बेटी ि‍दल्‍लीमे। दुनू कहैत अछि‍ गौहाटी कि‍ंवा दि‍ल्‍ली आबि‍ जाउ। अतए तमाम सुवि‍धा उपलब्‍ध छै। मुदा हम कतौ नै जाए चाहै छी। हमर पति‍ केन्‍सरसँ मरि‍ गेलाह। हम देखै छी जे गामक बच्‍चा सभ दि‍शाही‍न भऽ रहल अछि‍। युवक सभ बेरोजगार आ सड़कछाप छथि‍। महि‍ला लोकनि‍ शोषि‍त जीवन जीबाक लेल बाध्‍य छथि‍। लोकमे देशी दारू बनेबाक आ पीबाक जबरदस्‍त रोग भऽ गेल छै। बच्‍चा सभ लेल कुनो एहेन सार्वजनि‍क स्‍थल नै छै जतए ओ सभ खेल-कुदि‍ सकए, कला आ रचनात्‍मक प्रवृत्ति‍केँ आगाँ बढ़ा सकए, महि‍ला एवं युवा वर्ग सभ लेल कुनो आमदनीक जरि‍या नै छै। सोचैत छी गामेमे रहि‍ ऐ दि‍शामे कार्य करब। आब Read Global संग कार्य प्रारंभ भेल अछि‍। कि‍छु-ने-कि‍छु अवश्‍य भऽ जएतै।‍” एथेनासँ इहो पता चलल जे गामक अनेको युवक दारू पीब समएसँ पहि‍ने काल-कवलि‍त भऽ गेलाह। हुनका लोकनि‍क विधवा सभ बड़ा कष्‍टक जीवन जीवाक लेल बाध्‍य छथि‍। संगाईप्राऊ गामक अधि‍कांश महि‍ला लोकनि‍ स्‍थानीय दारू भातसँ बनबै छथि‍। शहरक लोक सभ घरे-घरे आबि‍ दारू पिबैत अछि‍। पच्‍चास टकामे एक मग दारू आ ओकरा संगे सुगरक मांस, कनि‍क सलाद सेहो भेटै छै। एक ग्राहक  सँ लगभग २०-२५ टकाक आमदनी भऽ जाइत छै। अगर एक घरमे एक दि‍नमे पाँचोटा ग्राहक आबि‍ गेलै तँ औसतन १२५ टकाक आमदनी। मुदा एकर वि‍परीत प्रभाव स्‍पष्‍ट छै। दारू पिऐबला सभ महि‍ला सभकेँ कुदृष्‍टि‍सँ देखैत अछि‍। आर्थिक वि‍वशता तथा पैसाक लोभें कि‍छु नागा महि‍ला देह व्‍यापारमे लागल‍ छथि‍। घरमे दारू सदरि‍काल उपलब्‍ध रहबाक कारणे पुरूष सभ बच्‍चेसँ दारूक सेवन प्रारम्‍भ कऽ लैत अछि‍। महि‍ला सभकेँ अगर अवसर भेटनि‍ तँ ई धंधा छोड़ि‍ अर्थोपार्जन केर कुनो आन ब्‍यौंत करतीह। ई बड़ा आश्चर्यक वि‍षए थि‍क। मणिपुर राज्‍य दू प्रकारक लोकमे बँटल अछि‍। समतल भू-भागमे रहएबला मैतेई आबादी जे मूलत: वैष्‍णव छथि‍, कृषि‍ कार्यमे दक्ष छथि‍, आ राज्‍यक जनसंख्‍याक पैघ प्रति‍शत छथि‍, आ दोसर दि‍स पहाड़ी क्षेत्रमे बसनि‍हार ३१ जनजातीय समुदाय। मैतई महि‍ला लोकनि‍ बड्ड उद्यमी छथि‍। मणि‍पुर केर प्रत्‍येक जि‍ला तथा ब्‍लॉक स्‍तरपर आमा मार्केट अर्थात मातृ-बाजार लगैत छै। ऐ तरहक अमां-मार्केटमे केवल स्‍त्रीगणें सभ  दोकान लऽ सकै छथि‍। आश्‍चर्यक बात ई जे समस्‍त मणि‍पुरमे अमां-मार्केटमे एकौटा दोकान आदि‍वासी महि‍ला लोकनि‍ नै लेलनि‍ अछि‍। आर-तँ-आर संगाईप्रऊ गाममे जे तरकारी बेचैवाली महि‍ला सभ छलीह सेहो सभ मैतेई महि‍ला छलीह। एकर एगो कारण ईहो बुझना गेल जे मैतेई पुरूष बड़ा उद्यमी होइत छथि‍। महि‍ला लोकनि‍ कपड़ा बुनि‍, खेत-पथारमे कार्य कऽ कि‍छु तरकारी इत्‍यादि‍ बेच, कि‍छु समानकेेँ बाजारमे बेच आ नरेगा कार्यक्रममे कि‍छु दि‍न कार्य  कऽ अपन-अपन घरक हेतु कि‍छु अति‍रि‍क्‍त आमदनीक ब्‍यौंत कऽ लै छथि‍। ऐ तरहेँ गृहस्‍थीमे स्‍त्री-पुरूषक सौहार्दपूर्ण सहभागि‍ता देखल जा सकैत अछि‍। हलाँकि‍ एथेना आ संगाइप्राऊ गामक अन्‍य उत्‍साही महि‍ला लोकनि‍ हमरा कहलनि‍ जे अगर महि‍ला लोकनि‍केँ तकनीकी‍ ज्ञानक शि‍क्षा, उद्यमि‍ताक प्रशि‍क्षण आ इन्‍टरीप्रेन्‍युअर केर ज्ञान वैज्ञानि‍क ढंगसँ देल जानि‍ तँ ई लोकनि‍ वस्‍त्रक बुनकरी, सुगर-आ अन्‍य मांसक आचार आदि‍ प्रोसेसि‍ंग आ पेकेजि‍ंग, नेबो, हरि‍यर मि‍रचाइ, बाँसक कोपर इत्‍यादि‍ अचार बना बजारमे बेच सकै छथि‍। आ एथेना ऐ दिशा मे प्रयासरत छथि‍। अगर सांस्‍कृति‍क पक्षकेँ देखल जाए तँ ऐ गामक कबुई नागा अपन संस्‍कार, लोक रीति‍-रि‍वाज, वस्‍त्र-वि‍न्‍यास, श्रृंगार, परम्‍परासँ अखनो जुड़ल छथि‍। बुजुर्गक सम्‍मान सर्वोपरि‍ अछि‍। युवक आइयो बि‍ना बुजुर्गक आज्ञा लेने कुनो वि‍शेष किंवा  महत्‍वपूर्ण निर्णय  नै लैत अछि‍। बहुरंगी वस्‍त्र आ आकर्षक युवती-युवककेँ नचैत-गबैत देखब तँ देखि‍ते रहि‍ जाएब। सौन्‍दर्य जेना हि‍नका लोकनि‍क बीच कैद भऽ गेल हुअए। बाह रे देह सौष्‍ठव। बाह रे सुन्‍दरता!  बाह रे श्रृंगार! बाह रे युवक आ युवतीक मध्‍य नैसर्गिक प्‍यार! कबुई नागाक प्रत्‍येक घरमे पूर्वजक फोटो टांगल देखलौं। फोटोमे नागा जनजाति‍क लोकक पहाड़, या प्रकृति‍सँ सम्‍बन्‍ध सेहो सम्‍मि‍लि‍त रहै। अपन घर आ दैनि‍क जीवनसँ सम्‍बन्‍धि‍त उपयोगक तमाम वस्‍तुकेँ कलाकृति‍सँ मण्‍डि‍त कए  जीबाक कला सिखबाक हुअए, स्‍वच्‍छ केना रही से जनबाक हुअए, पि‍तृ केँ सदति‍काल केना याद राखी से शि‍क्षा लेबाक हुअए, गरीबी जीवनमे रहि‍यो अपन माटि‍-आ संस्‍कारसँ सि‍नेह देखबाक हुअए, सदति‍काल चौअन्नी मुस्‍कान बला चेहरा बनेबाक हुअए तँ कुनो नागा समाजमे जा कऽ कि‍छु दि‍न रहू। पता लागि‍ जाएत। गामक जि‍नगी -जगदीश प्रसाद मण्‍डल समाजमे परि‍वर्तन किंवा परि‍स्‍थि‍ति‍क अनुसार कुनो अल्‍टरनेटि‍व उपाएक ब्‍यौंत करक हेतु हमेशा कुनो अवतार, पैगम्‍बर, महान पुरुष, वि‍द्वान, राजा राममोहन राय अथवा महात्‍मा गाँधीक जरूरति‍ नै। अनेको परि‍स्‍थि‍ति‍मे ऐ तरहक कार्य कि‍यो- गामक सामान्य एवं नि‍रक्षर महि‍ला, रि‍क्‍शा चलबैबला, बारह बर्खक बालि‍का, चाह बेचैबला युवक, गामक लोककेँ बेर वि‍पत्ति आ पावनि‍-ति‍हारमे कार्य आबएवाली वृद्ध महि‍ला, पोखरि‍मे माछक धंधा करैबला मल्‍लाह कऽ सकैत अछि‍। प्रकृति‍ आ संस्‍कृति‍मे सामंजस्‍य कए कऽ मनुष्‍य रहि‍ सकैत अछि‍। जापानमे बेर-बेर भूकम्‍प होइ छै। तकर मतलब तँ ई नै जे जापानक लोक जापाने छोड़ि‍ दि‍अए! जापानक लोक अपना देशसँ बड्ड सि‍नेह रखै छथि‍। ओइ भूमि‍क रचना आ भूकम्‍पकेँ देखैत घरक रचना एवं संस्‍कृति‍क वि‍कास करै छथि‍। जापान वि‍श्वमे एक चमकैत आ उदीयमान नक्षत्र अछि‍। तहि‍ना अपन १९ गोट कथाक माध्‍यमसँ जगदीश प्रसाद मण्‍डल कहए चाहै छथि‍ जे बाढ़ि‍, रौदी एवं अन्‍य प्राकृति‍क वि‍पदाक समाधान अगर मि‍थि‍लाक लोक चाहथि‍ आ लगनसँ कार्य करथि‍ तँ स्‍थानीय तौरपर कएल जा सकैत अछि‍। लोकक जत्‍थाक-जत्‍था पड़ाइनकेँ रोकल जा सकैत अछि‍। कथामे गामक परि‍वेश आ परि‍स्‍थि‍ति‍क सटीक वर्णन कएल गेल अछि‍। अपन छोट-छोट कथासँ लेखक पाठककेँ सोचबाक लेल वि‍वश कऽ दै छथि‍। ऐ कथा-संग्रहक नाओं थि‍क- ‘गामक जि‍नगी’ गामक जीवनक लगभग प्रत्‍येक परि‍स्‍थि‍ति‍क चर्चा अलग-अलग रूपेँ अलग-अलग कथाक माध्‍यमसँ कएल गेल अछि‍। पहि‍ल कथा थि‍क भैंटक लावा। ऐ कथाक तुलना कुनो भाषाक कुनो कालजयी लेखक केर कथासँ कएल जा सकैत अछि‍। भयंकर बाढ़ि आ बाढ़ि‍क विभीषि‍का संगहि‍-संग बाढ़ि‍क बाद जे लोककेँ समस्‍याक सामना करए पड़ै छै तकर बेजोड़ वर्णन। एहना स्‍थि‍ति‍मे सामान्‍यतया साहि‍त्‍यकार लोकनि‍ जखन कुनो जमी‍न्‍दारक चरि‍त्रक वर्णन करै छथि‍ तँ ओकरा क्रूर, नृशंस, हृदैहीन बना मात्र ओकर व्‍यक्‍ति‍त्‍वक गलत पक्षक वर्णन करै छथि‍। लेकिन मंडलजी तँ सामंजस्य स्थापित करबामे माहिर छथि। ऐ‍ कथामे महाजनो ओतबे परेशान अछि जतेक कुनो आन ग्रामीण। बल्कि महाजन ज्यादे परशान अछि- केना अपन इज्जत आ केना गामक लोक सबहक भारपन राखत? कथामे महाजन श्रीकान्‍त परेशान जे बाढ़ि‍सँ धानक फसलि‍ सुड्डाह, “एक्को धुर धान नै‍‍ बँचल अछि जे अगहनोक आशा होएत। जे सभ दि‍न कीनि‍-बेसाहि‍ कऽ खाइत अछि‍ ओकरा तँ कोनो नै मुदा हमरा लोक की कहत? चाह पीब‍ते-पीब‍ते श्रीकान्‍तकेँ चौन्‍ह आबए लगलनि‍। मन पड़लनि‍ जे बाबा कहने रहथि‍ जे दरबज्‍जापर जँ कि‍यो दू-सेर वा दू-टाका माँगए लेल आबए तँ ओकरा ओहि‍ना नै‍ घुमबि‍हक। आेइ‍सँ लक्ष्‍मी पड़ाइ छथि‍।‍” लेखक महाजनक वेदनाकेँ सेहो उजागर करैमे सफल छथि‍। सामान्‍यतया अन्‍य लेखक लोकनि‍ ऐ तरहक भावनाकेँ नै व्‍यक्‍त कऽ सकै छथि‍। श्रीकान्त बजै छथि‍- “जहि‍ना सभ कि‍छु बाढ़ि‍मे दहा गेल तहि‍ना जँ अपनो सभ तुर भसि‍ जैतौं, से नीक होइत। जाबे परान छुटैत, ततबे काल ने दुख होइत। आगू तँ दुख नै‍‍ काटय पड़ैत।‍” भैंटक लावा कथाक दोसर आ मुख्य आधार या वि‍शेषता एक नि‍रक्षर महि‍ला- मलाहि‍न द्वारा भैंटक खोज अनाजक रूपमे करब थि‍क। केना भैंटि‍क दानाकेँ जमा करब, कुटब, छाँटब आ लावा भुजबक प्रक्रि‍या जे जीबछी मलाहि‍न करैत अछि‍ से पाठककेँ एकोक्षण कथासँ भटकए नै दैत अछि‍। भैंटक दानाक लावा गामक लोकक जीबाक एक पैघ सामग्री बनि‍ जाइत अछि‍ आ ओकर श्रेय जीबछीकेँ जाइ छै। जीबछीक लावाकेँ चीखैत श्रीकान्‍त पत्नीसँ कहै छथि‍- “एत्ते सुन्नर वस्‍तुकेँ अखन धरि‍ जनितो नै‍‍ छलौं। धन्‍य अछि‍ जीबछीक ज्ञान आ लूरि‍ जे एहेन सुन्नर हराएल वस्‍तुकेँ ऊपर केलक। साक्षात देवी छी जीबछी। जाउ, सन्‍दुकमे सँ एक जोड़ साड़ी आ आंगी नि‍कालने आउ। जीबछीकेँ अपना अहि‍ठामसँ पहि‍रा कऽ वि‍दा करब। गरीब-दुखि‍याक देवी छी जीबछी।”‍ ऐसँ ई पता चलैत अछि‍ जे लेखक समाजक सभ वर्गक लोककेँ धि‍यानमे रखैत अपन रचनाकेँ आगाँ बढ़बैत छथि‍। जीबछीक ज्ञानक सम्मान होइत अछि आ जीबछी एकटा क्रांति लाबैत अछि‍। ओहन क्रांति जे समाजमे एकटा जीवन जीबाक आधार दैत अछि। नारी ज्ञान आ बि‍पत्ति‍क क्षणमे नारीक सुझाएल ओरि‍यान जइसँ रौदीकेँ, वि‍भि‍षि‍काकेँ सामाना कएल जा सकैत अछि‍ केर ज्ञान बि‍साँढ़ कथाक माध्‍यमसँ होइत अछि‍। कथाक पात्र डोमन केर पत्नी सुगि‍या द्वारा ई कहब जे, “जकरा खाइ-पीबैक ओरियान करैक लूरि‍ बुझल छैक ओ कथीक चि‍न्ता करत?‍” ऐ बातक प्रमाण अछि‍। लगातार तीन-चारि‍ वर्ष रौदी हेबाक कारणे गामक गाम लोक खाली कऽ परदेश भागि‍ गेल। मुदा सुगि‍याक सुझाएल ओरियानसँ ओकर पति‍ डोमनकेँ जखन ऐ बातक भान होइ छै जे पुरैनि‍क जड़ि‍मे बि‍साँढ़ फड़ै छै, अल्हुए जकाँ, तखन ओ अपन कार्यमे लागि‍ जाइत अछि‍। कोदारि‍ चलाबैमे जखन परेशानी होइ छै तँ डोमनकेँ सुगि‍या ई कहि‍ कार्य करबाक प्रति‍ जोश उत्पन्न करै छै- “हमर चूड़ी-साड़ी पहीर लि‍अ आ हमरा धोती ि‍दअ। तखन कोदारि‍ पाड़ि‍ कऽ देखा दै छी।‍” पुरुषक दंभ ओकरा गतिमान बना दै छै। फेर जोशमे आबि‍ डोमन कोदारि‍ भाँजए लगैत अछि‍। तकर परि‍णाम ई जे बि‍साँढ़क जड़ि‍ भेटलै। बि‍साँढ़क वर्णन जे लेखक करै छथि‍ तँ यात्रीक कटहरक वर्णनक स्‍मरण होमए लगैत अछि‍! बि‍साँढ़क वर्णन ने देखू- “उज्‍जर-उज्‍जर। नाम-नाम। लठि‍आहा बाँस जकाँ। गोल-गोल, मोट। हाथी दाँत जकाँ चि‍क्कन, बीत भरि‍सँ हाथ भरि‍क। पाभरि‍सँ आधसेर धरि‍क।‍” लागत एना जेना बि‍साँढ़क जड़ि‍सँ उत्तम खाद्य पदार्थ दुनियाँमे कुनो नै! बातो सएह अगर लोककेँ किछु खेबाक लेल नै‍ उपलब्ध हेतै तँ किछु तँ चाही जइसँ प्राण रक्षा भऽ सकए। ओहो खोज एहेन जे लोकक दोसर ठाम जेनाइए रोकि दि‍अए। ‍बि‍साँढ़ एक उत्तम उपाए अथवा व्योंत बनि जाइत अछि। पीरारक फड़ कथामे मण्‍डलजी एक पात्र धनि‍याक माध्‍यमसँ पीरारक फड़क वि‍शेषताक वर्णन करै छथि‍। केना धनि‍या अपन पति‍ पि‍चकुन केर सहायतासँ पीरारक फड़ तोड़ि‍-तोड़ि‍‍ हाटे-हाटे गामे-गामे बेचैत अछि‍ आ पि‍चकुन अनेरूआ माछ मारि‍ बेचबो करैत अछि‍ आ खाइतो अछि‍। धनि‍या अपन युक्ति‍सँ पीरारक फड़ आ अनेरूआ माछसँ अपन आर्थिक तंगीकेँ दूर करैत अछि‍ आ जीवनमे सभ कि‍छु जोड़बाक प्रयास करैत अछि। अगर मनुष्य लगनसँ कार्य करए तँ सभ किछु संभव छै। अनेरे गाम या मिथिलासँ पड़ा गेने समस्याक समाधान नै‍ भऽ सकैत अछि। अनेरूआ बेटा एक एहेन गरीब गृहस्‍तक कथा थि‍क जे लगभग पचासक बएसमे अएलाक बादो संतानहीन छल गंगाराम। हाटसँ आबएकाल जखन एकटा जनमौटी अनेरूआ बच्‍चाकेँ कोरामे लऽ कऽ गंगाराम घर अबैत अछि आ घरवालीकेँ कहै छै- “आइ भगवान खुश भऽ एकटा बेटा देलनि‍।‍” दुनू परानी प्रसन्न भऽ ओइ बेटाकेँ पोसए लागल। गंगाराम आ विशेष रूपसँ ओकर पत्नी ओही अनेरुआ शिशुक प्रति प्रेमक अपूर्व सोहनगर दृश्य उत्पन्न करैत अछि ई कथा। शरीरसँ खि‍न्न होमाक कारणे गंगाराम कि‍छु उपार्जन करबा जोकरक नै रहल। बेटा मंगल कि‍छु पढ़लाक बाद आर्थिक वि‍पन्नताक कारणे पढ़ाइ छोड़ि‍ चाहक दोकान खाेि‍ल लै छै। मंगल अपन पढ़ाइ चाहक दोकानोमे रहि‍ करैत अछि‍। मरै काल गंगाराम मंगलकेँ ओकर जन्‍मक कथा बता देने रहै। मंगल कि‍ताबक संग-संग समाजक बेबहारक अध्‍ययन सेहो करैत अछि‍। मंगलक कथा एकटा पत्रकार सुनै छथि‍ आ ओकरा छापि‍ दै छथि‍न। मंगलक एहने कथा पढ़ि‍ सुनयना नामक एक पढ़लि‍ नायि‍का मंगल लग अबै छथि‍ आ मंगलक प्रति‍भासँ प्रभावि‍त भऽ सुनयना अपन वकील पि‍तासँ दली‍ल दऽ मंगलसँ बि‍आह करए लेल पि‍ताकेँ तैयार कऽ लैत छथि‍। आ अंततः मंगल आ सुनयनाक बि‍आह भऽ जाइ छै। बिम्बक दृष्टिकोने ई कथा उत्तम संगहि‍ ऐ कथा केर मध्यमसँ लेखक समाजक दू वर्गकेँ जोड़बाक प्रयास केलनि अछि। परिवेशक वर्णन यथार्थ आ उत्तम बुझना जाएत। एहनो बात नै‍ जे ऐ‍ तरहक कथा पूर्व मे नै‍ लिखल गेल हुअए मुदा ई कथा एकटा नव परिवेशक जन्म दैत अछि, चीजकेँ लिखबाक एकटा सहज आ सुन्दर शैली प्रस्तुत करैत अछि। दूटा पाइ कथा ओइ तरहक नवयुवकपर कटाक्ष करैत अछि‍ जे दि‍ल्‍ली, मुम्‍बई जा कऽ ओतए केर चकाचौंधमे अपन जड़ि‍केँ बि‍सरि‍ जाइत अछि‍। मुदा माइयक ममत्‍व तँ अथाह समुद्र होइ छै। फेकुआ अपन कमाइकेँ वस्‍त्र आ फैशनमे बरबाद कऽ लैत अछि‍। बि‍सरि‍ जाइत अछि‍ जे ओकर वि‍धवा माए गाममे केना जिबैत हेतै। माए, बेटा परदेश गेल अछि‍ आ वापस आएत तँ कमा कऽ ढौआ लाओत, तकर ख्‍याली पोलाव बनबै छै। परन्‍तु जखन ओकरा बेटाकेँ यर्थाथक पता चलै छै तखनो ओ अर्थात माए अपन महानताक परि‍चए देबएमे बाज नै अबै छै। माए बेटाकेँ कहै छै- तों आपस गाम आबि‍ जो। हमरा तोहर कमाइक जरूरत नै‍‍ अछि‍। भाड़ा नै‍‍ छौ तँ ककरोसँ पैंच लऽ ले, अतए अएलापर दऽ देबै। बोनि‍हारि‍न मरनी कथा मार्मिक ढंगे लि‍खल गेल अछि‍। कथाक एक-एक पाँति‍ अर्थपूर्ण लागत बिना कुनो बनाबटक, यथार्थकेँ जोड़ैत, सत्यकेँ बाचैत। कथाक मुख्‍य पात्र पचास वर्षक मरनीक पति‍, बेटा आ पुतोहू तीनू बज्र खसलासँ गाछक तरमे खून बोकरि‍ कऽ मरि‍ जाइ छै। असहाय अबला लाचार भऽ पाँच वर्षक पोता आ आठ वर्षक पोती आशाक संग जीब रहल अछि‍। मरनीक देह आ जीवनक वि‍वरण देबामे लेखकक जवाब नै- “कारी झामर एक हड्डा देह, ताड़-खजुरपर बनाओल चि‍ड़ैक खोंता जकाँ केश, आंगुर भरि‍-भरि‍क पीअर दाँत, फुटल घैलक कनखा जकाँ नाक, गाइयक आँखि‍ जकाँ बड़का-बड़का आँखि‍, साइयो चेफड़ी लागल साड़ी, दुरंगमनि‍या आंगी फटलाक बाद कहि‍यो देहमे आंगीक नसीब नै‍‍ भेल। बि‍ना साया-डेढ़ि‍याक साड़ी पहि‍रने। यएह छी मरनी।‍” राष्‍ट्रीय राजमार्गक पक्की सड़कक ि‍नर्माणमे जखन मरनीकेँ गि‍ट्टी फोड़ैक कार्य भेटै छै तँ अपन थाकल आ जीर्ण शरीर लऽ सेहो अपन छोट-छोट बच्‍चा सभ लेल ओ ओइमे तल्‍लीन भऽ जाइत अछि‍। लेखक गि‍ट्टी फोड़ैत मरनीक बड़ा सजीब आ कारूणि‍क वर्णन करै छथि: “पचास बर्खक मरनी जे देखैमे झुनकुट बूढ़ि‍ बूझि‍ पड़ैत। सौंसे देहक हड्डी झक-झक करैत। खपटा जकाँ मुँह। खैनी खाइत-खाइत अगि‍ला चारू दाँत टुटल। गंगी-जमुनी केश हवामे फहराइत। तहूमे सड़कक गरदासँ सभ दि‍न नहाइत। मुदा तैयो मरनी अपन आँखि‍ बचेने रहैत। जखन पुरबा हवा बहै तँ पछि‍म मुँहे घुरि‍ कऽ गि‍ट्टी फोड़ए लगैत आ जखन पछबा बहए लगैत तँ पूब मुँहे घुरि‍ जाइत। बीच-बीचमे सुसताइयो लैत आ खैनि‍यो खा लैत। मुदा तैयो ओकर मुँह कखनो मलि‍न नै होइ। कि‍एक तँ हृदैमे अदम्‍य साहस आ मनमे असीम वि‍श्वास सदि‍खन बनल रहैत। तँए सदि‍खन हँसि‍ते रहए।‍” मुदा मरनीमे आत्‍मबल छै। जखन ठीकेदार मरनीसँ बात करै छै तँ अाेकर मन कानए लगै छै। ई लेखकक महानता कहल जा सकैत अछि‍। ठीकेदार की सोचैत अछि‍ से देखू- “एत्ते भारी काज केनि‍हारक देहपर कारी खट-खट कपड़ा छै, तहूमे सइयो चेफड़ी लागल छै, काज करै जोकर उमेर नै छै, तैपर एते भारी हथौरी पजेबापर पटकैत अछि‍।” ठी‍केदारक मन दहलि‍ गेलै।‍ फेर लेखक द्वारा ठीकेदारक मनोदशाक चि‍त्रण देखू: “जहि‍ना आकास आ पृथ्‍वीक बीच क्षि‍ति‍ज अछि‍, जहि‍‍ठाम जा चि‍ड़ै-चुनमुन्नी लसकि‍ जाइत अछि‍, तहि‍ना ठीकेदारक मन सुख-दुखक बीच लसकि‍ गेल। जेना सब कुछ मनक हरा गेलै। शून्न भऽ गेलै। ने आगूक बाट सूझै आ ने पाछूक। मरनीसँ आगू की पूछब से मनमे रहबे ने केलै। साहस बटोरि‍ पुछलक- भरि‍ दि‍नमे कते रूपैया कमाइ छी?‍” ठीकेदारक प्रश्न सुनि‍ मरनीक मोनमे झड़क उठलै। बाजलि‍- “कते कमाएब! जेहने बैमान सरकार अछि‍ तेहने ओकर मनसी छै। चारि‍ दि‍न एकटा पजेबाक ढेरी फोड़ै छी तँ तीन-बीस रूपैया दइए। आइसँ तीन तूरक पेट भरत? भरि‍ दि‍न ईंटा फोड़ैत-फोड़ैत देह-हाथ दुखाइत रहैए मुदा एकटा गोटि‍यो कीनब से पाइ नै बँचैए।‍” लेखक कथाक नि‍ष्‍कर्ष बड्ड संक्षेपमे करै छथि: ठीकेदारक आँखि‍मे नोर आबि‍ गेलै। मनुष्‍यता जागि‍ गेलै। मुदा ई मनुष्‍यता कते काल जि‍नगीमे अँटकतै? जि‍नगी तँ उनटल छै। जइ‍‍मे मनुष्‍यता नामक कोनो दरस नै‍‍ छैक। हारि‍-जीत कथा Internal innovation केर संदेश दैत अछि‍। एकटा कुम्‍हारक परि‍वार जकर गाम कोसीक बाढ़ि‍सँ कोसीमे धँसि‍ जाइ छै, अपन जरूरी समान लऽ अन्‍तहीन दि‍शा ि‍दस बढ़ैत अछि‍। रस्‍तामे लछमीपुरक एक बटोही भेट जाइ छै। लछमीपुरमे कुम्‍हार नै रहै छै। सोमन ओही गाममे बसि जाइत अछि,‍ धंधा चलि‍ पड़ै छै। लेखकक वि‍शेषता ई जे कुम्‍हारक चाकसँ सम्‍बन्‍धि‍त तमाम प्रक्रि‍याक बनाएल समाग्रीक सेहो पैघ फेहरिस्त प्रस्‍तुत करै छथि‍। लागत जेना कुनो कुम्‍हार अपन वि‍वरण प्रस्‍तुत कऽ रहल अछि‍। खएर कथा आगाँ बढ़ै छै, कुम्‍हारक एक छोट बेटा मेलामे हेरा जाइ छै। बादमे नै भेटै छै। स्‍टील आ आन तरहक बर्तन अएलाक कारणे परम्‍परागत बर्तन केर मांग खत्‍म भऽ जाइ छै। अहि‍ना स्‍थि‍ति‍मे दुनू प्राणी इहो गाम छोड़बाक प्रण करैत अछि‍। सभ ब्‍यौंत कऽ लैत अछि‍। ठीक ओही समैमे बि‍छुरल बेटा जवान भऽ आबि‍ जाइ छै। समैक अनुसारे ओ नव-नव चीज बनाएब सीख आएल छै। तँए पुन: कुम्‍हारक धंधा चलि‍ जाइ छै। लेखक कथाक अन्‍तमे शाइद ई कहबाक प्रयास केलनि‍ अछि‍ जे परम्‍पराकेँ नूतन परि‍प्रेक्ष्‍यमे अपने-आपकेँ मि‍लान कऽ कऽ चलक चाही। अगर समए अनुसरे परंपरामे परिवर्तन आनब तँ परंपरा कहिओ नै‍ मरत। कुनो बस्तुक उपाए जरुरी, भागने कहीं कल्याण संभव छै? ठेलाबला कथा एक सिद्धान्‍तक जन्‍म दैत अछि‍। भोला नौकरीक तलाशमे कलकत्ता जाइत अछि‍। ओतए ठेला चलबए लगैत अछि‍। दूटा बेटा गामपर छै तकरा कष्टो काटि‍ पढ़बैत अछि‍। मैट्रि‍क पास केलाक बाद दुनू भाँइकेँ अपन पि‍ताक परिस्थितिक आभास होइ छै। पैसाक तंगीक कारण आगाँ नै पढ़ि‍ पबै छै, परन्‍तु गामक स्‍कूलमे शि‍क्षा-मि‍त्रक नौकरी दुनू भाँइकेँ लागि‍ जाइ छै। जखन भोलाकेँ दुनू पुत्र हुनका पत्र लीख कऽ कहै छन्‍हि,‍ जे आब गाम आबि‍ जाउ तँ भोला गाम आबि‍ जाइ छथि‍। बेटाक पत्र पढ़लाक बाद भोलाक मनोदशाक चि‍त्रण बड्ड मार्मिक लगैत अछि: “समाजसँ नि‍कलि‍ छातीपर ठेला घीचि‍, दूटा शि‍क्षक समाजकेँ देलि‍ऐक, की आेइ‍ समाजक आरो ऋृण बाकी छैक?” जीवि‍का कथाक माध्‍यमसँ परम्‍परासँ जुड़ल मानक परि‍वेशसँ सि‍नेह, परि‍वारक दायि‍त्‍वक ि‍नर्वाह करक संदेश देल गेल अछि‍। लोक शहरीकरणक नकलमे अपन अस्ति‍त्‍व आ संस्‍कार केना समाप्‍त कऽ लैत अछि‍, तकर चि‍त्रण कएल गेल अछि‍। माता-पि‍ताक प्रति‍ दायि‍त्‍वक ि‍नर्वाह केने कोन लाभ भऽ सकैत अछि‍ तकर वर्णन। रि‍क्‍साबला कथा ई संदेश दैत अछि‍ जे सम्‍पति‍ अथवा पैसा आ भोग-वि‍लासक वस्‍तुसँ लोक प्रसन्न नै रहि‍ सकैत अछि‍। प्रसन्न रहबाक लेल आत्‍मसंतोष भेनाइ जरूरी। कथाक रचना प्रभावकारी आ उद्देश्‍यपूर्ण। पात्रकेँ कथा आदि‍सँ अंत धरि‍ अपनामे सराबोर केने रहैत अछि‍। चूनवाली मि‍थि‍लामे डोका, सि‍तुआ कि‍ंवा खूरचन आदि‍सँ चून बनेबाक प्रथा प्राचीन छल। ऐ कार्यक सम्‍पादन करैत छलीह मल्‍लाह वर्गक महि‍ला लोकनि‍, आब लगभग ई प्रथा समाप्‍त भऽ गेल। ओकरा बदला लोक आब एक्केठाम बजारसँ चून कीन कऽ लऽ अबैत अछि‍। सुखल चून। जकरा सहजतासँ गील कऽ वएह मल्‍लाह सभ बजारे-बजारे आ घरे-घरे बेचैत अछि‍। एे कथाकेँ पढ़लासँ समाप्‍तप्राय परम्‍परापर दृष्‍टि‍ देबाक एक प्रयास कएल गेल अछि‍। शि‍क्षा आ संस्‍कार अलग-अलग चीज थि‍क। गामसँ पढ़ि‍ इन्‍जि‍ीनीयर बनि‍ गलत-सलत पैसा कमा जतए गामक दू पि‍तऔत भाय अवकाश प्राप्‍त करबाक बाद गाममे रहि‍ फइलसँ मकान बनबए लेल सीमि‍त घरारीमे सँ धुरफन्‍दी कऽ १० धूर जमीन ज्‍यादे लेबाक ब्‍यौंतमे लागल छथि‍। डिहक बटबारा कथामे गामक लोक हुनका दुनूक ऐ गलत मंसाकेँ बूझि‍ जाइत अछि‍ आ दुनूसँ पैसा ठकि‍ लैत अछि‍। अन्‍तत: जमीन दुनूमे बराबर बँटैत अछि‍। ने ककरो कम आ ने ककरो बेसी। गामक लोकक दृष्‍टि‍मे पढ़ला-लि‍खलाक बादो दुनू इन्‍जि‍नीयर चरि‍त्रहीन आ गामक वातावरणकेँ प्रदूषि‍त केनि‍हार मानल जाइ छथि‍। लेखक ऐ परम्‍पराकेँ मर्मज्ञतासँ उजागर करै छथि‍। भैयारी कथा शहरी जीवनक चकाचौंधसँ लोककेँ सावधान करैत अछि‍। जे ऐ बातकेँ नै‍ बुझै छथि‍ आ अपन परम्परा आ संस्‍कारकेँ नै धि‍यानमे राखैत गामक जमीन-जत्‍था बेचि‍, गामक जड़ि‍केँ समाप्त कऽ शहरमे बसि जाइत अछि‍, तकर परि‍णाम नीक नै होइत अछि‍। ई कथा लेखक केर आत्‍मासँ नजदी‍क छन्‍हि‍। बहीन कथाक माध्‍यमसँ मण्‍डलजी कहए चाहै छथि‍ जे केवल माइयक कोरासँ जन्‍म लेने बहि‍न या भाए नै भऽ सकैत अछि‍। एक दि‍सि‍ जतए अपन बेटी अपना कार्यमे अतेक लीन अछि‍ जे मरनासन्न माएकेँ देखबाले समए नै नि‍कालि‍ पाबि‍ रहल अछि‍ अोतै‍ दोसरठाम माइयक एक मुसलमान सखी हल्‍ला-फसाद रहितो राति‍मे चोरा कऽ माएकेँ देखए अबैत अछि‍। ई कथा हि‍न्दू-मुसलमानक संग आपसी प्रेमक गंगा-जमुनी प्रवाह कहल जा सकैत अछि‍। मैथि‍लीमे ऐ तरहक कथाक रचना हेबाक चाही। मण्‍डलजीक रचनाक एक वि‍शेषता हमरा जनैत पात्रक नामकरण छन्‍हि‍। हरेक नामक प्रति‍ साकांक्ष रहै छथि‍ आ उद्देश्‍यपूर्ण ढंगसँ नाओं रखै छथि‍। एकर उत्तम उदाहरण थि‍क पीहुआ। पात्रक नाओं पीहुआ कि‍ए पड़लै तकर वि‍वरण सुनू: “छठि‍यार राति‍, दाइ-माइ पुहुपलाल नामकरण केलखि‍न। जखन ओ आठ-दस बर्खक भेल, तखन जाड़क मास बाधमे फानी लगबए लागल। गहींर खेत सभमे सि‍ल्‍लि‍यो आ पीहुओ आबि‍-आबि‍ धान चभैत। जकरा ओ फानी लगा-लगा फँसबैत। अपनो खाइत आ बेचबो करैत। कि‍छु दि‍नक बाद स्‍त्रीगण सभ पीहुआबला कहए लगलैक। फेर कि‍छु दि‍नक पछाति‍ भौजाइ सभ पीहुआ कहए लगलैक। तँए पुहुपलाल बदलि‍ पीहुआ भऽ गेल।‍” पछताबा एक एहेन कथा थि‍क जकरा माध्‍यमसँ ई कहक प्रयास कएल गेल अछि‍ जे आधुनि‍क आ तकनीकी‍ शि‍क्षा प्राप्‍त कऽ लोक बाहर भागि‍ जाइत अछि‍। बाहर जाए जीवन मशीन भऽ जाइ छै। रघुनाथ कि‍छु एहने कार्य केलनि‍। चलि‍ गेलाह अमेरि‍का। मुदा अन्‍तमे अपन गलतीक अनुभव भेलनि‍ आ अपनाकेँ बोनि‍हार-मजदूरसँ निरी‍ह मानए लेल तैय्यार भेलाह- “हमरासँ सइयो गुना ओ नीक छथि‍ जे अपना माथापर घैल उठा मातृभूमि‍क फुलवाड़ीक फूलक गाछ सींचि‍ रहल छथि‍। अपन माए-बाप समाजक संग जि‍नगी बि‍ता रहल छथि‍। आइ जे दुनि‍याँक रूप-रेखा बनि‍ गेल अछि‍ ओ कि‍छु गनल-गूथल लोकक बनि‍ गेल अछि‍। जि‍नगीक अन्‍ति‍म पड़ावमे पहुँचि‍ आइ बूझि‍ रहल छी जे ने हमरा अपन परि‍वार चि‍न्‍हैक बुधि‍‍ भेल आ ने गाम समाजकेँ।‍” डॉ. हेमन्‍त प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करैत छथि‍ ओइ तमाम डाक्‍टर समुदायक जे अपन वि‍धाक मर्यादा बि‍सरि‍ शहरी जीवन जिबैत अछि‍, पैसा कमाइत अछि‍, गाम-घर कि‍ंवा दुर्गम स्‍थानमे जेनाइ जहल जेनाइ कि‍ंवा कालापानीक सजा बुझैत अछि‍। जखन डाॅ.  हेमन्त कोसि‍कन्‍हामे बसल बाढ़ि‍सँ प्रभावि‍त गाम जाइ छथि‍ तँ एक बारह वर्षक कि‍शोरी सुलोचनाक अपन बेवहार आ गामक लोकक सि‍नेह पाबि‍ ओ कृत-कृत भऽ जाइ छथि‍। अभावक सि‍नेह कतेक रमनगर आ सुअदगर भऽ सकैत अछि‍। सुलोचनाक मुँहसँ गाम आ शहरी जीवनक तुलना मि‍रचाइ आ चीनीक कीड़ासँ कऽ लेखक कहानीमे नव बि‍म्‍बक रचना करैमे सफल होइ छथि‍। कथामे सुलोचना डॉ. हेमन्‍तकेँ कहै छन्‍हि‍- “हम तँ बच्‍चा छी डाॅक्‍टर सहाएब तेँ बहुत नै बुझै छी। मुदा तैयो एकटा बात कहै छी। जहि‍ना चीनी मीठ होइत अछि‍ आ मि‍रचाइ कड़ू। दुनूमे कीड़ा फड़ै छै आ ओइमे जीवन-यापन करैत अछि‍। मुदा चीनीक कीड़ीकेँ जँ मि‍रचाइमे दऽ देल जाइए तँ एको क्षण नै जीबि‍त रहत। उचि‍तो भेलै। मुदा की मि‍रचाइक कीड़ाकेँ चीनीमे देलाक बाद जीबि‍त रहत? एकदम नै‍‍ रहत। तहि‍ना गाम आ बाजारक जि‍नगी होइत।‍” बाबी कथाक माध्‍यमसँ लेखक एक एहेन सामाजि‍क महि‍लासँ परि‍चए करबै छथि‍ जे ओना तँ अपन नाओं लि‍खए नै जनै छथि‍ परन्‍तु बेवहार आ बुधि‍‍सँ समस्‍त गाममे पूज्या थिकी। गामक लोक कुनो कार्य हुनका पुछने बि‍ना नै करैत अछि‍। बाबी सबहक लेल छथि‍ आ सभ बाबी लेल तत्‍पर। कथाक प्रारम्‍भमे एकटा उपमा, खाँटी देसी आ औरि‍जनल लगैत अछि,‍ काति‍क मासक वर्णन करैत बाबी कहै छथि,‍ जे ई एहेन मास थि‍क जइमे लुंगि‍या मि‍रचाइक घौंदा जकाँ पावनि‍क घौंदा अछि‍। एहेन उपमा हमरा अन्‍यत्र नै भेटल अछि‍। अही कथामे “‍पथि‍यामे दूटा नारि‍यल, पान, छीमी केरा, दूटा टाभ नेबो, दूटा दारीम, दूटा ओल, दूटा अड़ुआ, दूटा टौकुना, दूटा सजमनि‍, एक मुट्ठी गाछ लागल हरदी, एक मुट्ठी आदी नेने रहमतक माए आंगन पहुँचि‍ बाबीक आगूमे रखि‍ बाजलि‍- बाबी अपनो डालीले आ हि‍नकोले नेने एलि‍एनि‍हेँ।” ई कथा हि‍न्दू-मुसलमानक बीच प्रेम आ सांस्‍कृति‍क एकताक कड़ी थि‍क। अपन बेटा रहमत जे कि‍ बच्‍चामे बीमार भऽ गेलै आ बाबी ओकरो लेल छठि‍ मइयासँ कबुला कऽ देलथि‍न, तँए ओकर माए बाबीक माध्‍यमसँ पाँच वर्ष धरि‍ नि‍ष्‍ठाक संग छठि‍ मनबैत अछि‍। ओहि‍ना उपास, सभ चीजक पालन, छठि‍क प्रति‍ आस्‍था। बाबी जखन खरनाक खीरक प्रसाद रहमतक माएकेँ दै छथि‍न तँ ओ खुशीसँ नाचि‍ उठैत अछि‍। छठि‍ मइयाकेँ गोर लगै छन्‍हि‍ आ बेटाकेँ ि‍नरोग जि‍नगी जीबैक आशा सेहो लगा लैत अछि‍। कामि‍नी कथामे कामि‍नीक पि‍ता भैया काका कामि‍नीक बि‍आहमे पाँच लाख टाका खर्च केलाक बादो ऐ बातकेँ स्‍वीकारै छथि‍ जे ओ कंंजुसाइ केलनि‍। कि‍एक तँ हुनका दस बीघा जमीन आ अन्‍य सम्‍पति‍। कामि‍नी तीन भाए-बहि‍न माने दू भाँइ आ एक बहिन। खेतक मात्र कीमत अस्‍सी लाख! तइ हि‍साबे कामि‍नीक हि‍स्‍सा २५ लाख टाकासँ बेसी होमाक चाही मुदा खर्च भेलनि‍ पाँच लाख। ओ इहो मानै छथि‍ जे हि‍नका लेल जेहने बेटा तेहने बेटी। तँए जखन कामि‍नीक पति‍ दोसर पत्नी आनि‍ लै छथि‍ आ कामि‍नीक प्रति‍ हुनकर सौति‍न आ पति‍ कि‍छु प्‍लान बनबए लगै छथि‍ तँ कामि‍नी अप्‍पन दूटा बच्‍चाकेँ लऽ सोझे गाम आबि‍ जाइ छथि‍। सभ कथा प्रभावोत्‍पादक आ शि‍क्षाप्रद लागत। मण्‍डलजी लोक वि‍धा अथवा फाॅकलाेर केर नीक ज्ञाता छथि‍। गाम-घरक परि‍वेशक ठेठ उदाहरण, उपमा, कहावत इत्‍यादि‍क समावेश देखब तँ मोन तिरपीत-तिरपीत भऽ जाएत। रौदीक वर्णन देखू: “जे मूस अगहनमे अंग्रेजी बाजा बजा-बजा सत-सतटा बि‍आह करैत छल ओ या तँ बि‍लमे मरि‍ गेल वा कतए पड़ा गेल तेकर ठेकान नहि‍।‍” “डोमनक मनमे आशा रहए जे जहि‍ना लुल्हि‍यो कनि‍याँ बेटा जनमा कऽ गि‍रथाइन बनि‍ जाइत, तहि‍ना तँ पानि‍ भेने परति‍यो खेत हएत कि‍ने।‍” पीरारक फड़क वर्णन करैत मण्‍डलजी लीखै छथि‍- सहतक कोथी जकाँ चोखगर काँट, डारि‍ रूपी पहरूदारकेँ सजौने। छड़गर-छड़गर डाि‍रमे चौरगर-चौरगर पात जेना इन्‍द्रकमल वा तगड़ फूलक होइत। तहि‍ना फूलो। आन उदाहरण जेना- “अनकर पहीरि‍ कऽ साज-बाज छीनि‍ लेलक तँ बड़ लाज।‍” “‍गांगी-जमुनी केश हवामे फहराइत।” “मेघनक दुआरे सतभैंयाँ झँपाएल। जेम्‍हर साफ मेघ रहए ओम्‍हुरका तरेगन हँसैत मुदा जेम्‍हर मेघौन रहए ओम्‍हुरका मलि‍न।‍” सुभाष चन्द्र यादव मण्‍डल जीक कथाक बारेमे लि‍खै छथि: “हुनक कथाक सन्‍दर्भमे जे सर्वाधि‍क उल्‍लेखनीय बात अछि‍ से ई जे हुनक सभ कथामे औपन्‍यासि‍क वि‍स्‍तार अछि‍।‍” परन्तु हमर तँ मानब ई अछि‍ जे हि‍नक कथा अपने-आपमे सम्‍पूर्ण अछि‍ आ अपन सम्‍वाद या नि‍चाेर सहजतासँ कहि‍ दैत अछि‍। हलाँकि‍ पोथीमे कतौ-कतौ छपबामे गलती सभ भेल अछि‍। जेना कि‍ डाक्‍टर हेमन्‍त कथामे हेमन्‍त केर स्‍थानपर हमन्‍त भऽ गेल अछि‍। मुदा पूरा पाेथी अपने-आपमे एकटा उत्तम आ संग्रह योग्‍य वस्‍तु थि‍क। मैथि‍ली पाठककेँ ऐ तरहक कथाकेँ पढ़बाक आदति‍ लगेबाक चाहि‍यनि। जीवन संघर्ष (उपन्‍यास समीक्षा) श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक उपन्‍यास ‘‍जीवन संघर्ष’ एक नीक रचना थि‍क। एहेन रचना अगर मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे लगातार हुअए आ ऐ तरहक रचनाक प्रचार-प्रसार नीकसँ कुनो जाति-पाति‍, वर्ग, सम्‍प्रदाय, स्‍थानीयता आदि‍क दुर्भावनासँ दूर भऽ कएल जाए तँ मैथि‍ली साहि‍त्‍य महि‍मा-मण्‍डि‍त भऽ एक गौरवशाली परम्‍पराक प्रारम्‍भ कऽ सकैत अछि‍। हम शि‍क्षा, व्‍यवसाय आ स्‍वभावसँ मंथर गति‍क पाठक छी। नीकसँ नीक पोथी चाहे ओ कोनो वि‍षएसँ सम्‍बन्‍धि‍त कि‍ए ने‍ हुअए, हम एक बैसारमे पच्‍चीस पन्नासँ अधि‍क नै‍ पढ़ि‍ सकै छी। एक दि‍न अनायास कमप्‍युटरपर बैसबासँ पूर्व इच्‍छा भेल जे जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक ऐ रचनाकेँ ऊपर-झापर देखि‍ ली। यएह सोचि‍ पढ़ए लगलौं। आ जखन पढ़ए लगलौं तँ एतेक मग्‍न भऽ गेलौं जे एक्के‍ बैसारमे १०९ पन्नाक ऐ‍‍ पोथीकेँ आदि‍सँ अन्‍त तक पढ़ि‍ गेलौं। बुझना गेल जेना कुनो समाजशास्‍त्र किंवा मानवशास्‍त्रक घोर अवलोकनार्थी अपन वि‍धाक ट्रेनिंग लए एक समाजमे रहि‍, सघन सहभागी अवलोकन करैत, आेइ‍ समाजक एथनोग्रॉफी लि‍ख रहल होथि‍। एतबे नै‍‍ ओ स्‍वयं समाजक सदस्‍य होमाक मादे अगर कुनो समस्‍याकेँ उजागर करै छथि‍ तँ ओकर समाधानक हेतु इन्‍टरवेन्‍सन सेहो करैमे नै‍‍ सकुचाइ छथि‍। आब जखन कि‍ ‘जीवन संघर्ष’ पोथीकेँ अद्योपान्‍त पढ़ि‍ चुकल छी तँ अनेक तरहक वि‍चार मोनमे हिलोड़ लऽ रहल अछि‍। होइत अछि‍ अगर कुनो कुशाग्र-बुइधि‍‍बला शोध-वि‍द्यार्थी भेटत तँ ओकरा उत्‍साहि‍त करबै जे जगदीश प्रसाद मण्‍डलक रचनाशैली, जीवन-क्रम आ व्‍यक्‍ति‍गत इति‍हास तीनूकेँ समेटैत मिथि‍लांचलक समाजक सन्‍दर्भमे एक समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन करए। हम ऐ बातकेँ नीक जकाँ बुझै छी जे हमर ऐ‍‍ तरहक टि‍प्‍पणीसँ कि‍छु आलोचक आ मैथि‍ली साहि‍त्‍य केर सुयोग्‍य वि‍द्वान लोकनि‍ बि‍फरि‍ जेताह आ हम्‍मरा इम्‍मेचीओर आ कि‍छु आनो तरहक उपमासँ बजेताह। मुदा हम ई बात बि‍ना कारणे नै‍‍ कहि‍ रहल छी। मण्‍डलजी ऐ उपन्‍यासक प्रारंभ बँसपुरा गामक परि‍प्रेक्ष्‍यसँ करै छथि‍। -बँसपुरा गामक एक नव बि‍आहल अट्ठारह-बीस बर्खक लड़की जे मात्र तीनि‍ये मास सासुरसँ बसल छलि,‍ गामसँ एक कोस दूर बसल सि‍सौनीमे दुर्गापूजाक मेला देखए गेल छलि‍। ओतए आेइ‍ लड़कीकेँ पूजा कमि‍टीक तीन गोटे फुसला कऽ भंडार घर लऽ गेल। मेला- गनगनाइत। नाच-तमाशाक लाउड-स्‍पीकर चरि‍ कोसीक नीन उड़ौने। तीनू गोटे आेइ‍ लड़कीक संग दुरबेवहार केलक। बेवस भऽ ओ लड़की सभ कि‍छु बरदास केलक। चारि‍ बजे भोर ओकरा सभ छोड़ि‍ देलक। मेला भरि‍ ओ कि‍छु नै‍‍ बाजलि‍। मुँह-कान झाँपि‍ मेलासँ नि‍कलि‍ सोझे गामक रस्‍ता धेलक। गामक सीमापर पहुँचतहि‍ छाती चहकि‍ गेलइ। छाती चहकि‍तहि‍ हबो-ढकार भऽ कानए लागलि‍। भि‍नसुरका कानब सुनि‍ एक्के-दुइये गामक लोक घर-आंगनसँ नि‍कलि‍ रास्‍तापर आबि‍-आबि‍ देखए लगल। टोल प्रवेश करि‍तहि‍ एका-एकी लोक पूछए लगलै। कानि‍-कानि‍ अपन बीतल घटना सुनबए लागलि‍। बि‍ना कि‍छु पुछनहि‍, माए बेटीकेँ कनैत देखि‍, छाती पीटि‍-पीटि‍ कनवो करए आ दुनू हाथे पँजि‍या कऽ पुछलक- “की भेलौ, हम माए छि‍यौ, हमरा ने कहमे ते केकरा कहवीही।‍” जेना-जेना माए बेटीक मुँहक बात सुनैत तेना-तेना देहमे आगि‍ सुनगए लगलै। सुनैत-सुनैत बमकि‍ कऽ पति‍केँ कहलक- “जहि‍ना हमर बेटीक इज्‍जत सि‍सौनीबला लुटलक तहि‍ना सि‍सौनीक दुर्गास्‍थानमे मनुक्‍खक बलि‍ पड़त।‍” फेर की छल! समस्‍त बँसपुराक लोकमे प्रति‍शोधक ज्‍वाला धधकए लागल। सि‍सौनी गाममे आक्रमण कए कचरमबद्ध करबाक प्‍लान बनए लागल। मुदा उपन्‍यासकारक सोझराएल मोन देखू। जखन समस्‍त गामक लोक कचरमबध करबाक योजनाकेँ लगभग ध्‍वनि‍मतसँ स्‍वीकृति‍ दऽ देने छल तइ‍काल गाममे एक-आध एहेन व्‍यक्‍ति‍क प्रवेश होइत अछि‍ जे दुनू गामक बीच सामंजस्‍य स्‍थापि‍त करै छथि‍। गामक सभसँ बुजुर्ग- मनधन बाबाक प्रवेश लोकक भीड़केँ एक दोसर दि‍शामे लऽ जाइ छै। परम्‍परागत मि‍थि‍ला समाजमे आइयोक समैमे बूढ़-पुरान आ अनुभवी लोकक बड्ड सम्‍मान छै। एकर प्रमाण ऐ सन्‍दर्भसँ भेटैत अछि‍ जे जखन मनधन बाबा लोककेँ दुनू गाममे झगड़ा नै‍‍ करबाक अपन वि‍चार दैत छथि‍न तइ‍खन बेटीक इज्‍जतक बदला लेबाक लेल बदलाक आगि‍मे जड़ैत आेइ‍ लड़कीक माए पवि‍त्री सेहो मानि‍ जाइत अछि‍। पवि‍त्री बोम फाड़ि‍ कानैत कहै छै- “बाबा, ई तँ गामक मेह छथि‍न तँए हि‍नकर बात मानि‍ लेलि‍यनि‍। नै तँ आइ सि‍सौनीमे आगि‍ लगौने बि‍ना छोड़ि‍ति‍ऐ। जखैनसँ बेटी आइलि‍ तखैनसँ एक्को बेर‍‍ मुँह उठा नै तकैए। कनैत-कनैत दुनू आँखि‍ डोका जकाँ भऽ गेलै। सदि‍खन एक्केटा रट लगौने अछि‍ जे जीवि‍ये कऽ की हएत? जखन इज्‍जत चलि‍ये गेल तखैन कोन मुँह समाजकेँ देखाएब।‍” कल्‍पना करू एक माए केर आवेश आ वेदनाकेँ! आ आेइ‍ समाज आ गामकेँ जकर ब्‍याहल जवान लड़कीक इज्‍जतक संग कुनो पड़ोसी गामक लफन्‍दर सभ मिलि‍ खेलबार केने होइक!! सभ लड़ऽ-मरऽक लेल अमादा!! मुदा एक अनुभवी बुजुर्गक प्रति‍ गामक लोकक आश्चर्यजनक सम्‍मान। जकरा कारण अपन खूनक घूँट पीब‍ सभ शान्‍त भऽ जाइत अछि‍। एक नव वातावरणक संचार होमए लगैत अछि‍। लेखक ऐ कार्यकेँ एक माँजल साहि‍त्‍यकार जकाँ उत्तम ढंगसँ करै छथि‍। उपन्‍यासक समस्‍त क्रि‍या-कलाप बँसपुरा गामक इर्द-गीर्द घुमैत समस्‍त मि‍थि‍ला समाजक समस्‍याक चि‍त्रण करए लगैत अछि‍- लोकक पड़ाइन केर समस्‍या, सरकारी मदति‍ आ कार्यक्रमकेँ ठीकसँ नै‍‍ पहुँचबाक समस्‍या, मल्‍लाह-पोखरि‍ (जलकर) आ सोसाइटीक समस्‍या, कि‍सान बोनि‍हारक समस्‍या, कोशीक कहरक समस्‍या, एक वि‍धवा जकर पति‍ कमे बएसमे मरि‍ जाइ छै, बेटी ब्‍याहलि‍ छै आ बेटा नौकरी करए लेल जइ प्रदेश गेलै, ओतएसँ तीन बरख धरि‍ गाम नै‍‍ एलै, तकर समस्‍या, मि‍थि‍लाक वि‍धवा सबहि‍क समस्‍या आ वि‍धवा सबहि‍क सामाजि‍क वैज्ञानि‍क जकाँ वि‍भि‍न्न श्रेणीमे वि‍भक्‍त कए आेइ‍ श्रेणी सबहक समस्‍या, कोशी नदीकेँ कटाब केना बँसपुरा गामक लोककेँ मातृभूमि‍ केर परि‍भाषासँ दूर करैत अछि,‍ तकर समस्‍या, एक कुमहार आ ओकर सपनाकेँ सही अर्थमे साकार करबाक समस्‍या, दू-गामक लोकक बीच उपद्रवी तत्‍व द्वारा समस्‍या उत्‍पन्न करब आ गामक समझदार लेल अथक प्रयास करबाक समस्‍या आदि‍-आदि‍। एना बुझाएत जे बँसपुरा गाम उपन्‍यासकार जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक प्रयास द्वारा एकटा मि‍नि‍एचर मि‍थि‍ला बनि‍ गेल अछि‍। पोथीक एक-एक पाँति पोथी‍क नामकरण ‘जीवन-संघर्ष’ केँ सटीक प्रमाणि‍त करैत आगाँ बढ़ैत अछि‍। पाठक उपन्‍यासक संग जीवनसँ संघर्ष करए लागैत अछि: हँसैत, बाजैत, जुझैत, कानैत आ फेर उपन्‍यासकारक प्रयाससँ नव उत्‍साह आ नव चेतना पाबि‍ जीवनकेँ पुन: सार्थक सि‍द्ध करबाक योजनामे संलग्‍न होमए लगैत अछि‍। मण्‍डलजी भेरचाल चलएबला उपन्‍यासकार आ साहि‍त्‍यकारसँ हटि‍ अपन स्‍वतन्‍त्र अस्‍ति‍त्‍व बनबैत एक दिसि‍ तँ समस्‍याक वर्णन करै छथि‍ आ दोसर दिसि‍ समस्‍यासँ घबराइ नै‍‍ छथि‍। कुनो वैमनस्‍यता किंवा बदलाक भावनासँ ग्रसि‍त नै‍‍ छथि‍। समस्‍याक नि‍दान जे कि‍ यथार्थवादी नि‍दान अछि, सेहो प्रस्‍तुत करै छथि‍। आ उपन्‍यास बि‍ना कुनो अवरोधकेँ आगाँ बढ़ल जाइत अछि‍। रमेसरा दि‍ल्‍लीसँ वापस आबि‍ आब गामेमे अनेक तरहक समानक दोकान खोलने अछि‍। समानमे लोहा आ लकड़ी दुनू वस्‍तु छै: “‍हँसुआ, खुरपी, टेंगारी, पगहरि‍या, कुड़हड़ि‍, खनती, चक्कू, सरौता, छोलनीक संग चकला, बेलना, कत्ता, रेही, दाइब, खराम.......।” दि‍ल्‍लीमे जे लोक जत्‍थाक जत्‍थामे मजदूरी करए अबैत अछि‍ तकरा बारेमे ओकर वि‍चार बड़ा सटीक छै: “‍ि‍दल्‍ली सेट सभकेँ फुलपेंट, चकचकौआ शर्ट, घड़ी, रेडि‍यो, उनटा बावरी देखि‍ हमरो मन खुरछाही कटए लगल। गामपर ककरो कहबो ने कहलि‍ऐ आ पड़ा कऽ चलि‍ गेलौं। अपने जाति‍क (बरही) ऐठाम नौकरी भऽ गेल। तीन हजार रूपया महि‍ना दरमाहा आ खाइले दि‍अए। मुदा तते खटबे जे ओते जँ अपने गाममे खटी तँ कतेक बेसी होइए। घुरि‍ कऽ चलि‍ एलौं। जहि‍या सुनलि‍ऐ जे अपनो गाममे काली-पूजाक मेला हएत तहि‍यासँ एते समान बनौने छी। कहुना-कहुना तँ चारि‍-पाँच हजारक समान अछि‍। कोनो की सड़ै-पचैबला छी जे सड़ि‍ जाएत। तोरा सभकेँ ने बूझि‍ पड़ै छौ जे दि‍ल्‍लीमे हुन्‍डी गारल अछि‍। हम एक्के मासमे बूझि‍ गेलि‍ऐ। जखन अपना चीज-बौस बनबैक लूरि‍ अछि‍ तखन अनकर तबेदारी कि‍अए करब। अपन मेहनतसँ मालि‍क बनि‍ कऽ कि‍अए ने रहब। तँू सभ ने अनके कोठा आ सम्‍पत्ति‍केँ अपन बुझै छीही। मुदा ई बुझै छीही जे धनि‍कहा सभ तोरे मेहनत लूटि‍ कऽ मौज करैए। अखैन जो, कनी दोकान लगबै छी।” माटि‍सँ जुड़ल उपन्‍यासकार मण्‍डलजी रमेसराक माध्‍यमसँ मि‍थि‍लासँ पड़ाइन करैत लोककेँ मि‍थि‍लेमे रहि‍ अल्‍टरनेटि‍व धन्‍धाक उक्ति‍ बता रहल छथि‍। उपन्‍यास आगाँ बढ़ैत अछि‍। डोमक धंधा आ ओकर क्रि‍या-कलापक सजीव वर्णन एहेन जे सोझे गाम चलि‍ जाएब। बि‍ना कोनो नोन-मि‍रचाइ लगौने, सहज आ स्‍वभावि‍क। मण्‍डलजी जनसामान्‍यक बात आ परि‍स्‍थि‍ति‍क वर्णन जनवाणीमे करै छथि‍। समस्‍त उपन्‍यासमे कुनो एहेन शब्‍द नै‍‍ भेटत जकर अर्थ एक साक्षर मात्रोकेँ बुझएमे दि‍क्कत हुअए। एक दिसि‍ यात्रीजी मि‍थि‍लाक परि‍स्‍थि‍ति‍सँ परेशान होइत जतए दि‍ल्‍ली अथवा आनठाम पड़ाइन करबाक वि‍चार दैत स्‍वयं दि‍ल्‍ली चलि‍ जाइ छथि: “आब जँ तँू अतए रहवैं/ कहतौ लोक बताह/ तँए हम्‍मर बात मान आ सोझे दि‍ल्‍ली जाह/” कहै छथि‍ ठीक एकर वि‍परीत मण्‍डलजी परि‍स्‍थि‍ति‍सँ सामना करबाक लेल अपन पात्रककेँ ब्‍यौंत बुझबै छथि‍। चाहे ओ मि‍ठाइ बनाबैबला हुअए, लोहार, कुम्‍हार, अथवा कि‍यो आर हुअए। मण्‍डलजी कथनी आ करनीमे सामंजस्‍य रखै छथि‍ आ स्‍वयं गामेपर रहै छथि‍। कहि‍यो चाकरीक खोजमे मि‍थि‍लासँ बाहर नै‍‍ गेलाह। उपन्‍यास आगाँ बढ़ैत अछि‍। भगता जहल कि‍ए गेल रहै तकर वर्णन शाइद समाजक अन्‍ध बेवस्‍थापर प्रहार थि‍क। केना ओ एकटा कलकत्तामे नोकरी करनि‍हारक घरवालीक संग मध्यरात्रिमे गलत कार्य करबाक कोशि‍श केलक आ भण्‍डा-फोरी भऽ गेलै, तकर नीक वर्णन पोथीमे भेटैत अछि‍। पोथीमे जखन जोगि‍नदर अपन ग्रह ठीक करबाक लेल वि‍वि‍ध रूपेँ दान पुण्‍य करबाक वि‍चार करैत अछि‍ तँ मंगलसँ बात करैत मसोमात सभकेँ मदति‍ करबाक हेतु तैयार भऽ जाइत अछि‍। अतए सेहो मण्‍डलजी सरकारी सुवि‍धा आ मसोमातपर मंगलक मुँहसँ समाजि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍पर प्रहार करैत लि‍खै छथि‍- “अपना अहि‍ठाम दू तरहक मसोमात अछि‍, एक तरहक सरकारी अछि‍ आ दोसर तरहक समाजक अछि‍। सरकारी मसोमात ओ छी जे सरकारक देल सभ सुवि‍धा पबैत अछि‍। आ समाजि‍क वि‍धवा ओ छी जेकरा ने सरकार जनै छै आ ने ओ सरकारकेँ जनैत अछि‍। कि‍छु गनल सरकारी मसोमात अछि‍ जे ओकर पोसुआ छी। जे कोनो सरकारी सुवि‍धा मसोमात सबहक लेल आओत ओ ओकरे भेटतैक। अजीब खेल सरकारो आ मसोमातोक अछि‍। आेहि‍ पोसुआ मसोमातकेँ इन्‍दि‍रो आवासक घरो छै आ बाढ़ि‍-बरखामे घरखस्‍सीक रूपैआ सेहो भेटतै आ बाढ़ि‍सँ क्षति‍ फसलक क्षति‍पूर्तिक रूपैआ सेहो ओकरे भेटतै। ततबे नहि‍, वृद्धावस्‍था पेंशन सेहो ओकरे भेटतै आ रोजगार चलबैक नाओंपर सबसीडी सेहो भेटतै। तँए सरकारी मसोमात छोड़ि‍ जे नि‍रीह समाजक मसोमात अछि‍, जँ ओकरा जीबैक उपाए भऽ जाए तँ उपाय केनि‍हारकेँ अइसँ बेसी दान-पुनक फल कतए भेटतै। धन्‍यवाद आेइ‍ माए-दादीकेँ दी जे सत्तर-अस्‍सी बर्ख बि‍तौलाक बादो जेठक दुपहरि‍या, भादवक झाँट आ माघक शीतलहरीमे, जी-जानसँ मेहनत करैत अछि‍। धन्‍यवाद आेहि‍ अस्‍सी बर्खक मैयाकेँ दी जे माथपर धान, गहुम, मकैक बोझ लऽ कऽ दुलकी चालि‍मे गीत गुनगुनाइत खेतसँ खरि‍हान अबैत छथि‍।..... तँए पहि‍ने जा कऽ आेहि‍ मैया सभकेँ गोड़ लागि‍ कहि‍हक बाबी, समाजरूपी परि‍वारक अहूँ छी आ हमहूँ छी, तँए कमाइबलाक ई दायि‍त्‍व बनि‍ जाइत अछि‍ जे परि‍वारमे वृद्ध आ बच्‍चाक सेवा इमानदारीसँ होय। हम अहाँकेँ मदति‍ सेवाक रूपमे दऽ रहल छी।‍” साहि‍त्‍यकेँ समाजक दर्पण कहल जाइत अछि‍। दर्पण तखन जखन साहि‍त्‍यकार पारखी होथि‍। समाजक संग चलथि‍। सामाजि‍क बेवस्‍थाकेँ समैक संग वि‍वेचना करथि‍। साहि‍त्‍य सृजनक धर्मकेँ बुझथि‍। मण्‍डलजी ऐ कार्यकेँ ईमानदारीपूर्वक केलनि‍ अछि‍। ऐ‍‍ उपन्‍यासक हि‍न्‍दी, अंग्रेजी इत्‍यादि‍ भाषामे अनुवादि‍त कए प्रचार-प्रसार होमाक चाही। ई रचना समाजक दर्पण अछि‍। एक नि‍श्चल आ आशावान वि‍चारधाराकेँ प्रतिपादित करैत अछि‍। जगदीश प्रसाद मण्‍डल अपन कृति‍मे native intelligence केर अभूतपूर्व प्रमाण दैत छथि‍। पुस्‍तक केर साज सज्‍जा, आवरण इत्‍यादि‍ नीक अछि‍। प्रकाशक सेहो धन्‍यवादक पात्र छथि‍। मंत्रेश्वर झा चरि‍त्र चि‍त्रणक बाजीगर- जगदीश प्रसाद मंडल पछि‍ला कि‍छु वर्षमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक इति‍हासमे जगदीश प्रसाद मंडल धूमकेतु जकाँ उगल आ चमकल छथि‍। संप्रति‍ हुनकर दू उपन्‍यास ‘जि‍नगीक जीत’ आ ‘मौलाइल गाछक फूल’ हमरा समक्ष अछि‍। दुनू उपन्‍यासकेँ मनोयोगसँ पढ़ि‍ चुकल छी। रोचक भाषा आ शैलीमे लि‍खल हि‍नकर दुनू उपन्‍यास ग्रामीण जीवनक चि‍न्‍तन आ ऊहापोहक सजीव चि‍त्रण करैत अछि‍। जइ ‍गाम घरक कथा सभ मंडलजी उठाए ओकरा परि‍णति‍ तक पहुँचओने छथि‍, तइ गाम घरक एतेक सूक्ष्‍म आ वि‍स्‍तृत वि‍वरण मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे ऐसँ पूर्व कमे भेल अछि‍। ‘जि‍नगीक जीत’ उपन्‍यासमे कतेको एहन चरि‍त्र उभरल अछि‍ जे कोनो पाठककेँ प्रभावि‍त केने बि‍ना नै रहत। उदाहरण स्‍वरूप बचेलाल आ सुमि‍त्राक चरि‍त्र देखल जाए, “शि‍वकुमारकेँ नोकरी होइते बचेलाल इस्‍कूलमे त्‍याग-पत्र दऽ देलक। बचेलालक त्‍यागपत्रसँ सौंसे गाम टि‍का-टि‍प्‍पणी चलए लगल। कि‍छु गोटेकेँ दुख ऐ‍‍‍ दुआरे होइत जे बेर-बेगरतामे पाइसँ मदति‍ भऽ जाइत। कि‍छु गोटेकेँ खुशि‍यो होइत कि‍एक तँ भने आमदनी बन्न भऽ गेलनि‍। मुदा सुमि‍त्राकेँ ने हरख आ ने वि‍स्‍मय। कि‍एक तँ ओ नीक नहाँति‍ बुझैत जे जत्ते मनुक्‍खक भीतर कमाइक शक्‍ति‍ होइत छै, ओते तँ नोकरीमे नहि‍ये होइत छैक।‍” एे उपन्‍यासमे महन्‍थी केना चलैत अछि‍, महन्‍थ कोन-कोन कारनामा करैत अछि‍ तकरो अद्भुत चि‍त्रण भेल अछि‍। “‍ऊपरका हन्नामे आठ गो कोठली छै। आठो कोठली असगरे रखने अछि‍।... पूजाक बाद सभ अपन-अपन ठरपर चल जाइए। तकर बाद लीला शुरू होइ छै। मुदा बेसी नै कहबह।” ऐ प्रकारे बेसी नै कहबह कहि‍ कऽ महन्‍थक चरि‍त्रक पूरा वर्णन स्‍पष्‍ट भऽ जाइत अछि‍। दू-तीन दशक पूर्व उच्‍चतम न्‍यायालय पटना उच्‍च न्‍यायालयक कोनो भ्रष्‍ट आदेशकेँ नि‍रस्‍त करैत बारंबार यएह टि‍प्‍पणी केने छल, “We say no more‍”। मौलाइल गाछक फूल उपन्‍यास सेहो ओहि‍ना उद्देश्‍यपूर्ण अछि‍ जेना जि‍नगीक जीत। मुदा ऐ उपन्‍यासमे आदर्शवाद कने बेसी प्रकट भेल अछि‍। रमाकान्‍तक जे चरि‍त्र प्रस्‍तुत भेल अछि‍ तकर उदाहरण भेटब ओतेक सुलभ नै‍। चाह पीब रमाकान्‍त कहलखि‍न, “देखू हम अप्‍पन सभ खेत समाजकेँ दऽ देलि‍ऐक। आब हमरा कोनो मतलब आेइ‍ खेतसँ नै‍‍ अछि‍।” दोसर दिसि‍ सुबुधक चरि‍त्र अछि‍ जे नोकरी छोड़ि‍ गामक छोट-पैघ सबहक धीयापूताकेँ पढ़ेबा लेल त्‍यागक आदर्श प्रस्‍तुत करैत अछि‍। एहेन चरि‍त्र सभ नि‍स्‍संदेह गामकेँ पुनर्जीवि‍त आ पुनर्गठि‍त करबामे प्रेरणाक काज करत। दुनू उपन्‍यास सभ दृष्‍टि‍येँ उत्‍कृष्‍ठ अछि‍ आ मैथि‍ली उपन्‍यास लेखनमे नव आयाम गढ़ैत अछि‍। मंडल जीक कथा संग्रह गामक जि‍नगी अओरो बेसी श्रेष्‍ठ रचना अछि‍। ऐ संग्रहमे कुल उनैस कथा संकलि‍त अछि‍। ऐ संग्रहक लगभग सभ कथा प्रकाशनसँ पूर्व मंडलजी हमरा पठौने रहथि‍। तहि‍या हम ि‍दल्‍लीमे रही। हुनकर आग्रह रहनि‍ जे हम कथाक पांडुलि‍पि‍केँ शुद्ध कऽ हुनका पठा दि‍अनि‍। हमरा आश्चर्य भेल छल जे हमरा केना ओ ऐ लेल उपयुक्‍त बुझलनि‍। मंडल जीक कथा सभ पढ़ि‍ हम ततेक प्रभावि‍त भेल रही जे हमरा पांडुलि‍पि‍मे कतौ कोनो चेन्‍ह लगाएब उपयुक्‍त नै लागल। हम दूरभाषपर जगदीश मंडलजी आ हुनक सुपुत्र उमेश मंडलकेँ कहलि‍यनि‍ जे जखन हम पटना आपस आएब तखन स्‍वयं हुनकासँ भेँट कए अपन सुझाव देबनि‍। कोनो रचनात्‍मक लेखनक आलोचना तँ भऽ सकैत अछि‍, ओकर गुण-दोषकेँ वि‍वेचन तँ भऽ सकैत अछि‍, ओकरा हठात् काटल-छाँटल नै जा सकैत अछि‍। से कएलो नै जेबाक चाही। संयोगसँ ऐ बीच गजेन्‍द्र ठाकुर जीकेँ मंडल जीक पांडूलि‍पि‍ प्राप्‍त भेलनि‍ आ ओ सफल जौहरी जकाँ मंडल जीक कथा, उपन्‍यास, नाटक आदि‍ कतोक वि‍धाक रचनाकेँ वि‍वि‍ध रूपमे प्रकाशमे अनलखि‍न। ऐ लेल ओ अशेष धन्‍यवादक पात्र छथि‍। गामक जि‍नगीक सभ कथा ग्राम्‍य जीवनकेँ कि‍छु अनछुअल प्रसंगक मार्मिक चि‍त्रण करैत अछि‍। भैंटक लावा, बि‍साँढ़, अनेरूआ बेटा, डीहक बटबारा, घरदेखि‍या, बाबी, जीवि‍का, ठेलाबला, बोनि‍हारि‍न मरनी, इत्‍यादि‍ ऐ संग्रहक उत्‍कृष्‍ठ कथा सभ अछि‍। अपन उपन्‍यासे जकाँ मंडल जीक कथा सभ जि‍जीवि‍षा आ व्‍यावहारि‍क आदर्शक उत्‍कंठासँ भरल अछि‍। मंडलजी जइ तरहेँ नि‍रंतरतामे वि‍वि‍ध वि‍धाक रचना कऽ रहल छथि‍ से भवि‍ष्‍यमे हुनकर वि‍शेष अवदान लेल वि‍श्वास जगबैत अछि‍। आशीष अनचि‍न्‍हार समालोचना- गजलक साक्ष्‍य हमरा आगूमे पसरल अछि “अपन युद्धक साक्ष्‍य‍” तारानंद ि‍वयोगीक गजल संग्रह। चालीस गोट गजलकेँ समेटने। लोककेँ छगुन्‍ता लागि‍ सकै छै जे मैथि‍लीमे गजलक आलोचना कहि‍आसँ शुरू भऽ गेलै। ऐ छगुन्‍ताक कारण मुख्‍यत: हम दू रूपेँ देखै छी, पहि‍ल तँ ई जे गजल कहि‍ओ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक मुख्‍यधारामे नै आएल, दोसर-मैथि‍ल-जन अखनो गजलक सामान्‍य नि‍अम आ ओकर बनोत्तरीसँ परि‍चि‍त नै छथि‍। सामान्‍ये कि‍ए, अपनाकेँ गजल बुझनि‍हारक सेहो हाल एहने छन्‍हि‍। बेसी दूर नै जाए पड़त। “‍घर-बाहर” जुलाइ-सि‍तम्‍बर २००८ई. मे प्रकाशि‍त अजि‍त आजादक “कलानंद भट्टक बहन्ने मैथि‍ली गजलपर चर्च‍” पढ़ि‍ लि‍अ, मामि‍ला बुझबामे आबि‍ जाएत। जँ विषयान्‍तर नै बुझाए तँ थोड़ेक कालले तारानंद वि‍योगीक पोथीसँ हटि‍ आजादजीक लेख क चर्च करी। ऐ लेख क पहि‍ले पाँति‍ थि‍क- मैथि‍लीमे गजल लि‍खबाक सुदीर्घ परम्‍परा रहल अछि.....। मुदा कतेक सुदीर्घ तकर कोनो ठेकाना आजादजी नै देने छथि‍न। फेर अही लेख क दोसर पैरामे अजि‍तजी दूमरजामे फँसल छथि‍। ओ मैथि‍ल द्वारा सामान्‍य गप-सप्‍पमे गजलक पाँति‍ नै जोड़बाकेँ प्रथम कारण मानैत छथि, जे मैथि‍लीमे शेर एकदम्‍मे नै लि‍खल गेल। आब पाठकगण कने घि‍यान देल जाए। लेख क पहि‍ल पाँति‍ तँ अपनेकेँ धि‍यान हेबेटा करत जे मैथि‍लीमे गजलक सुदीर्घ....।” सभसँ पहि‍ल गप्‍प जे गजल कि‍छु शेरक संग्रह होइ छै आ दोसर गप्‍प ई जे जँ आजादजीक मोताबि‍क शेर लि‍खले नै गेलै तँ फेर कोन प्रकारक सुदीर्घ परंपराकेँ मोन पाड़ि‍ रहल छथि‍ आजादजी। एेठाम गलती आजाद जीक नै मैथि‍लीक आेइ‍ गजलकार सबहक छन्‍हि‍ जे गजल तँ लि‍खै छथि‍ मुदा पाठककेँ ओकर परि‍चए, गठन, नि‍अम आदि‍ देबासँ परहेज करै छथि‍। ओना प्रसंगवश ई कहबामे कोनो संकोच नै जे गजल कखनो लि‍खल नै जाइ छै। मुदा मैथि‍लीक धुरंधर सभ गजल लि‍खै छथि‍। मूल रूपसँ अरबी-फारसी-उर्दूमे गजल कहल जाइ छै, लि‍खल नै। पाठकगण, गजलक ई नि‍अम भेल। आब फेरो अजि‍त जीक लेखकेँ आगू पढ़ू आ अपन कपार पीट अपनाकेँ खुने-खूनामे कऽ लि‍अ। अजि‍तजी अपन संपूर्ण लेखमे जइ शेर सभकेँ मक्‍ता कहलखि‍न अछि वस्‍तुत: ओ मक्‍ता छइहे नै। पाठकगण मोन राखू, मक्‍ता गजलक आेइ‍ अंति‍म शेरकेँ कहल जाइ छै जइमे गजलकार (एकरा बाद हम शाइर शब्‍द प्रयुक्त करब, अहूठाम मोन राखू शायर गलत उच्‍चारण थि‍क।) अपन नाओं वा उपनाओंक प्रयोग करै छथि‍। (अहूठाम मोन राखू हरेक गजलमे नाओं वा उपनाओंक समान प्रयोग हेबाक चाही ई नै जे एकटा गजलक मक्‍ता तारानंदसँ हुअए आ दोसर गजलक मक्‍ता वि‍योगीक नाओंसँ।) मुदा आश्चर्य रूपेण आजादजी जइ शेर सभकेँ मक्‍ता कहलखि‍न अछि ओइमे कोनो शाइरक नाओं-उपनाओं नै भेटत। ओना अजि‍तजी हि‍न्‍दीक सुप्रसि‍द्ध शाइर छथि‍ तकर प्रमाण ओ लेखक प्रारंभेमे दए देने छथि‍। हँ तँ ऐ लेख क संक्षि‍प्‍त अवलोकनक पछाति‍ फेरसँ वि‍योगी जीक गजल संग्रहपर चली। तँ शुरूआत करी स्‍पष्‍टीकरणसँ, हमर नै वि‍योगीजीक। सभसँ पहि‍ने ई जे अन्‍य मैथि‍ली शाइर जकाँ वि‍योगीओ जी मानै छथि‍ जे गजल लि‍खल जाइ छै। दोसर गप्‍प जे वि‍योगीजी द्वारा देल अपन भाषा संबंधी वि‍चारसँ लगैत अछि जे ‍भलहिं‍ ि‍वयोगीजी उर्दू सीख उर्दूक पोथी पढ़ैत हेताह मुदा गजल तँ कि‍न्नहुँ नै लि‍खैत हेताह, कारण, पाठकगण धि‍यान देल जाए, अरबी-फारसी-उर्दू तीनू भाषाक छंद शास्‍त्र एक-मतसँ कहैए जे दोसर भाषाकेँ तँ छोड़ू अपनो भाषाक कठि‍न शब्‍दक प्रयोग गजलमे नै हेबाक चाही। ठीक उपरोक्‍त भाषाक नि‍अम जकाँ मैथि‍लीओ मे नि‍अम छै। तँए महाकवि‍ वि‍द्यापति‍ अपन कोनो गीतमे कृष्‍ण, वि‍ष्‍णु आदि‍क प्रयोग नै केने छथि‍। मुदा वि‍योगीजी अपन पोथीक नाओं रखने छथि‍ “अपन युद्धक साक्ष्‍य‍”। जनसमान्‍य युद्ध तँ कहुना बूझि‍ जेतै मुदा साक्ष्‍य....। ऐठाम प्रसंगवश ई कहब बेजाए नै जे वि‍योगीजी अपनाकेँ अभि‍जात शब्‍दक प्रयोग नै केनिहार मानै छथि, आब हमरा लोकनि‍ ऐ पाेथीमे प्रस्‍तुत चालीसो गजलक चर्च करी, तँ तकर उन्टा भेटत। पहि‍ले भाषाकेँ देखी। ओना वि‍योगीजीक भाषा संबंधी गलती जानि‍ बूझि‍ कए लौल-वश ततेक ने कएल गेल छै जकरा अनठा कए आँगा बढ़ब संभव नै। एकर कि‍छु उदाहरण प्रस्‍तुत अछि- दोसर गजलक मतलाक दोसर पाँति‍मे दुखक बदला यातना। अही गजलक दोसर शेरक पहि‍ल पाँति‍मे नाराक बदला जुमला। तेसर गजलक दोसर शेरक दोसर पाँति‍ धधराक बदला ज्‍वलन। अही गजलक अंति‍म शेरमे प्रयुक्‍त तन्‍वंग, आब एकर अर्थ जनताकेँ बुझबि‍औ। फेर आगू गजलक दोसर शेरमे नजरि‍ केर बदला दृष्‍टि‍, दसम गजलक दोसर शेरमे उन्टाक जगह वि‍परीत। एगारहम गजलक मतलामे दुबि‍धाक जगह द्धैध। तेरहम गजलक तेसर शेरमे नेकदि‍ली आ बदीक प्रयोग। तइसम गजलक अंति‍म शेरमे भटरंगक बदला बदरंग। पचीसम गजलक तेसर शेरमे इजोरि‍आक बदला ज्‍योत्सना। चौंतीसम गजलक मतलामे दुख केर बदलामे पीड़ा-इत्‍यादि‍। ओना ऐ उदाहरणक अति‍रि‍क्‍त हरेक गजलमे हि‍न्‍दी, उर्दू, संस्‍कृत आदि‍ भाषाक तत्‍सम बहुल शब्‍दक ततेक ने प्रयोग भेल छै जे गजलक मूल स्‍वर, भाव-भंगि‍मा, रसकेँ भरि‍गर बना देने छै। तइपर वि‍योगीजी गर्वपूर्वक घोषणा केने छथि‍ जे ओ ओइ परि‍वारक नै छथि‍ जि‍नका संस्‍कारमे अभि‍जात शब्‍द भेटल हुअए। बि‍डंबना छोड़ि‍ एकरा कि‍छु नै कहल जा सकैए। जौं चालीसो गजलक भाषाकेँ धि‍यानसँ देखल जाए तँ हमरा हि‍साबे वि‍योगीजी ऐ गजल सबहक मैथि‍ली अनुवाद कए देथि‍न तँ बेसी नीक हेतै। भाषासँ उतरि‍ आब गजलक वि‍चारपर आएल जाए। बेसी दूर नै जाए पड़त, तेसर गजलक अंति‍म शेरसँ मामि‍ला बुझबामे आबि‍ जाएत। सोझे-सोझ ई शेर कहैए जे लोककेँ अपन जयघोष करबामे देरी नै करबाक चाही आ काज केहनो करी चान-सुरूजक पाँति‍मे अएबाक जोगाड़ बैसाबी। ओना हम एतए अवश्‍य कहब जे ई कोनो राजनीति‍क वि‍चार नै छै जकर स्‍पष्‍टीकरण दए वि‍योगीजी अपन पति‍आ छोड़ा लेताह। ई वि‍शुद्ध रूपे समाजि‍क वि‍चार छै आ ऐ वि‍चारसँ समाजपर की नकारात्‍मक प्रभाव पड़लै वा पड़तै तकर अध्‍ययन अवश्‍य कएल जेबाक चाही। मुदा एहन नकारात्‍मक वि‍चार ऐ संग्रहमे कम्‍मे अछि। संग्रहक कि‍छु सकारात्‍मक ि‍वचार प्रस्‍तुत अछि। दसम गजल केर अवलोकन कएल जाउ। नि‍श्चि‍त रूपसँ वि‍याेगीजी एकटा परि‍र्वतनीय वि‍चार रखलाह अछि ई कहि‍ जे- देस हमर जागत अच्रक एना चलि‍ ने सकत हारि‍ लि‍खब झण्‍डा के आदमीक जीत लि‍खब। पाठकगण आजुक समैमे झण्‍डाक वि‍परीत गेनाइ सहज गप्‍प नै। तहि‍ना चारि‍म गजलक तेसर शेरक पहि‍ल पाँति‍- राम राज्‍यक स्‍थापना लेल भरत-लक्ष्‍मण झगड़ि‍ रहला। कतेक सटीक व्‍यंग अछि से सभ गोटे बुझैत हेबै। ओतै आजुक भ्रमोत्‍पादक सरकारपर तइ दि‍नमे लि‍खल अड़तीसम गजलक मतलाक पहि‍ल पाँति‍ देखू- राजनीति‍ भटकल तँ डूमल मझधार जकाँ। वि‍चार संबंधी प्रस्‍तुत उदाहरणसँ स्‍पष्‍ट अछि जे सकारात्‍मक वि‍चार बेसी अछि। मुदा कहबी तँ सुननहि‍ हेबैक अपने जे, एक्केटा सड़ल माछ.....। अस्‍तु आब ऐ गजल संग्रहक व्‍याकरण पक्षकेँ देखल जाए। ऐठाम ई स्‍पष्‍ट करब आवश्‍यक जे मैथि‍ली गजल अखनो फरि‍च्‍छ भऽ कऽ नै आएल अछि जइसँ हम बहर (छंद) आदि‍पर वि‍चार करब। तँए ऐठाम हम मात्र रदीफ आ काफि‍याक प्रयोगपर वि‍चार करब। पाठकगण गजलमे रदीफ ओइ शब्‍द अथवा शब्‍द समूहकेँ कहल जाइ छै जे गजलक मतलाक (गजलक पहि‍ल शेरकेँ मतला कहल जाइ छै।) दुनू पाँति‍मे समान रूपसँ आबए आ तकरा बाद हरेक शेरक अंति‍म पाँति‍मे सेहो समान रूपे रहए। तहि‍ना काफि‍या ओइ वर्ण अथवा मात्राकेँ कहल जाएत जे रदीफसँ तुरंत पहि‍ने आबैत हुअए जेना एकटा उदाहरण देखू- दूटा शब्‍द लि‍अ, पहि‍ल भेल अनचि‍न्‍हार ओ दोसरमे अन्‍हार। आब मानि‍ लि‍अ जे ई दुनू शब्‍द कोनो गजलक मतलामे रदीफक तुरंत बादमे अछि। आब जँ गौरसँ देखबै तँ भेटत जे दुनू शब्‍दक तुकान्‍त “र‍” छै। तँ एकर मतलब जे “र‍” भेल काफि‍या (काफि‍या मतलब तुकान्‍त बूझू) तेनाहि‍ते मात्राक काफि‍या सेहो हेतै जेनाकि‍- राधा आ बाधा दुनू शब्‍द आ क मात्रासँ खत्‍म होइत अछि। तँए ऐमे आ क मात्रा काफि‍या अछि। “एहि‍‍” आ “रहि‍‍” दुनूमे इ‍ क मात्राक काफि‍या अछि। अन्‍य मात्राक हाल एहने सन बूझू। तँ फेर चली ऐ संग्रहक व्‍याकरण पक्षपर- एे संग्रहक कि‍छु गजलमे काफि‍याक गलत प्रयोग भेल छै- उदाहरण लेल सातम गजलकेँ देखू। मतलाक शेरमे काफि‍या अछि “न‍” (भगवान आ सन्‍तान)। मुदा वि‍योगीजी आगू दोसर शेरमे काफि‍या “म‍” (गुमनाम) केँ लेलखि‍न अछि जे सर्वथा अनुचि‍त। तेनाहि‍ते सताइसम गजलक उपरोक्त “म‍” काफि‍या बदलामे “न‍” काफि‍याक प्रयोग। कुल मि‍ला कऽ ई गजल संग्रह ओतेक प्रभावी नै अछि जतेक की शाइर कहै छथि‍। हँ एतेक स्‍वीकार करबामे हमरा कोनो संकोच नै जे ई गजल संग्रह ओइ समैमे आएल जइ समैमे गजलक मात्रा कम्‍मे छल। आ शाइर आ गजल संग्रह सेहो कम्‍मे जकाँ छल। डॉ. मेघन प्रसाद मैथिलीमे अनुवाद-कलाक शास्त्रीयकरणक इतिहास पहिनहिये कहि दी जे हम अनुवाद कलाक ने तँ मर्मज्ञ छी आ ने कहियो अनुवादक काज कएलौं अछि। तथापि राष्ट्रीय अनुवाद मिशन योजनाक तहत केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थानक अधि‍कारी लोकनि पूर्ण विश्वसनीयताक संग अनुवादक शास्त्रीय विषयपर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनारमे मंचसँ हमरा किछु कहबाक दायित्वपूर्ण भार देलनि, तकरा लेल हम संस्थाक अधि‍कारी लोकनि खास कऽ डॉ. अजित मिश्रजीक प्रति कोटिशः आभार प्रकट करै छी। अनुवादक काज करबाक उत्कट इच्छा तँ छल मुदा साहित्य अकादेमीक प्रतिनिधि‍ तथा सदस्य लोकनि तकरा आइ धरि‍ पूर्ण नै‍ होमए देलनि। पता नै‍ हमरा प्रति कोन प्रकारक दुराग्रह पोसने छथि। एकाध बेर साहित्य अकादेमीक प्रतिनिधि/ पदाधि‍कारीसँ पत्राचारो केलौं मुदा सेहो निरर्थके गेल। ई जरुर कहि दी जे मैथिलीसँ जुड़ल रहबाक कारणेँ मैथिलीमे अनुदित रचना बेस संख्यामे पढ़बाक अवसर प्राप्त भेल अछि तँए आेइ अनुभवक आधारपर मैथिलीमे अनुवाद-कलाक इतिहासपर किछु कहबाक हिम्मति जुटा सकलौं अछि। अनुवाद-कलाक अर्थ- अनुवाद-कलाक मादेँ मैथिलीक अनुभवी आ सफल अनुवादक पण्डित श्री गोविन्द झा जीक कहब बेसी उपयुक्त बूझि पड़ैत अछि- एहेन कोनो रहस्य एहेन कोनो सूत्र नै‍ वा एहेन कोनो मन्त्र नै‍ छैक जे कानमे ढारि देने कि‍यो सफल अनुवादक भऽ जाए। हमरा जनैत अनुवाद थिक कोदरबाहि जइ‍मे शिक्षण-प्रशिक्षण नै‍ केवल अभ्यास अपेक्षित होइत छैक। स्वतन्त्राताक सन्दर्भमे अनुवाद जे थिक से एक प्रकारक व्याख्या थिक। प्रायः १९१५ ई.मे भाषा वैज्ञानिक Saussure छलाह जे कॉलेज नोट (College Note) लिखलनि तकरा बादमे अनुवाद कहि कऽ प्रकाशित कराओल गेल। ओ अपन नोटक व्याख्या कऽ कऽ प्रकाशित करौलनि, जे हुनक मृत्योपरान्त अनुवाद कहि कऽ प्रकाशित भेलै। अनुदित रचना लोक सभ मनोरंजन लेल कम्मे, ज्ञान लेल बेशी पढ़ैए। तँए ओकर मूल बिन्दु आ तकनीकी अर्थबला शब्दक उपयोग करए काल पूर्ण सावधानीक आवश्यकता अछि। विषयवर्गानुसार अनुवाद तीन प्रकारक मानल गेल अछि – शास्त्रीय, व्यावहारिक आ साहित्यिक। अनुवाद शास्त्रीय कम, व्यावहारिक बेसी हेबाक चाही। शास्त्रीय आ व्यावहारिक अनुवादमे मुख्यतः अर्थ अर्थात् Surface Meaning आ भाव अर्थात् Intended  Meaning ईएह दुनू पकड़बाक प्रयोजन होइ छै। मुदा साहित्यिक अनुवादमे मूलक अभिव्यंजना सेहो सुरक्षित राखबाक अपरिहार्यता रहै छै। अभिव्यजनाकेँ पकड़ि पएबाक हेतु विद्वता नै‍, भावुकता चाही। ऐ‍ अभिव्यंजनामूलक विशिष्टताकेँ देखैत विभिन्न विद्वान् साहित्यिक अनुवादकेँ अनुवाद नै‍ कहि Transcreation, Recreation पुनःसर्जन,  प्रतिरूपण आदि नानाविद्य नाओं दै छथि। परोक्षानुवाद- भारतीय भाषा सभमे खास कऽ मैथिलीमे अनुवादक एक विकृत अर्थात् अवांछनीय परम्परा चलि पड़ल अछि। ई थिक परोक्षानुवाद। अर्थात् अनुवादसँ अनुवाद। ऐ‍ प्रकारक परोक्षानुवादमे बहुत-रास विकृति आबि जाइ छै। विकृति केना आ कतेक अबै छै, एकबेर तकर परीक्षण यूरोपक कोनो संस्था करौने छल। लेखक जेन आस्टिन केर प्रसिद्ध उपन्यास प्राइड एण्ड प्रीजूडिस केर एक अध्यायक अनुवाद चीनक मण्डेरिन भाषामे भेल छलै, तइसँ अरबीमे आ तइसँ फेर अंग्रेजीमे कएल गेलै। बादमे ज्ञात भेलै जे ऐ‍ अनुवाद-श्रंृखलामे मूल पाठक अधि‍कतर भाग आमसँ कटहर भऽ गेलै। ऐ‍ प्रकारक अनुवादक Channel Distortion निश्चय परोक्षानुवादक श्रेणीमे अबैत अछि। परोक्षानुवादक मादेँ एक बात अओर कहल जा सकैत अछि- जँ अनुवादक मूल भाषा चीनी वा अरबी सदृश विदेशी हुअए तखन तँ मैथिली अनुवादमे मूल भाषाक कोनो खास कुप्रभाव नै‍ पड़तै, किए तँ दुनू मैथिलीसँ बहुत दूरक भाषा छै। मुदा मूल भाषा हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद हएत तँ मूल भाषाक बेसी कुप्रभाव पड़तै आ ओ मैथिलीक स्वरुपकेँ किछु-ने-किछु अवश्ये बिगाड़ि देतै। हिन्दीक मूल ग्रन्थ वा अनुदित ग्रन्थसँ जतेक मैथिली अनुवाद हमरा लोकनि देखि‍ सकलौं अछि सभटा लगैत अछि जे मैथिलीक परिधानमे साक्षात् हिन्दीए ठाढ़ हुअए। संगोष्ठीमे विचारणीय अछि जे ऐ‍ प्रवृत्तिक विरोध केना आ कतेक दूर धरि‍ हुअए। सफल अनुवादकक प्रवीणता- सफल अनुवादककेँ तीन क्षेत्रमे प्रवीणता रहबाक चाही। मूल भाषामे प्रवीणता, लक्ष्य भाषामे प्रवीणता आ अनूद्य सामग्रीक विषय क्षेत्रमे प्रवीणता। जेना मूल सन्दर्भ गणितक हुअए तँ गणित-शास्‍त्रमे प्रवीणता वा कम-सँ-कम प्रवेश तँ अवश्ये चाही। मैथिलीमे वास्तविक स्थिति तँ ई अछि जे जेना आजुक मन्त्री सर्वज्ञ बुझल जाइ छथि तहिना आजुक मैथिली अनुवादक सेहो सौभाग्य वा दुर्भाग्य वश सर्वज्ञ मानि लेल जाइ छथि। आदर्श अनुवाद तँ ओ हेबाक चाही जे विषय-विज्ञ मूलभाषा-विज्ञ आ लक्ष्यभाषा-विज्ञ लोकनिक सहयोगसँ प्रस्तुत हएत। उपयुक्त पर्यायक चएन- अनुवादमे भलहिं‍ भावक उपदेश देल जाए, उपयुक्त पर्यायक चएनकेँ सभसँ पहिने आ सभसँ उच्च स्थान दिअए पड़त। उपयुक्त पर्यायकेँ चुनबाक हेतु अनुवादकर्त्ता पहिने अपन हृदैकेँ नै‍ द्विभाषिक शब्द-कोषकेँ ढूँढ़ए लगै छथि। अनुवादकर्त्ता पहिने अपन हृदैमे सँ उपयुक्त पर्याय ताकथु आ अपन आत्मविश्वास बढ़ाबथु आ तकरा बाद द्विभाषिक वा बहुभाषिक शब्द-कोषमे ढूँढ़थु तँ नीक अनुवाद प्रस्तुत भऽ सकैछ। मैथिलीमे नीक अनुवादक लेल बहुभाषिक व्याकरण रहब आवश्यक अछि, जकर अभाव मैथिलीमे सभसँ बेसी अखरैत अछि। अखन ऐ‍ दिशामे डॉ. राम नारायण सिंहजी एकटा नीक काज कऽ रहल छथि। डॉ. राम नारायण सिंहजी व्यावसायसँ संस्कृतक शिक्षक छथि मुदा मैथिलीसँ नीक जकाँ जुड़ल छथि। मैथिली-मलयालम-संस्कृत-अंग्रेजी क्रिया-कोश (Multi Lingual Verbal Dictionary) क निर्माणमे लागल छथि। प्रायः पूर्ण भऽ गेल छन्‍हि। आब छपबाक स्थितिमे अछि। ज्ञातव्य जे साहित्य अकादेमीसँ पुरस्कृत मलयालम भाषाक लेखक श्री तकष़ी शिवशंकर पिल्‍लैक एकटा उपन्यास चेम्मीन, साहित्य अकादेमीसँ पुरस्कृत आ विश्वक अनेक भाषामे अनूदित, उपन्यासक मैथिली अनुवाद मलाहिन साहित्य अकादेमीसँ शीघ्र प्रकाश्य छन्‍हि। हिन्दीक लेखिका डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्रक छटता कोहरा वि‍हनि‍ कथा-संग्रहक मलयालममे जाग्रता शीर्षकसँ अनुवाद प्रकाशित भऽ चुकल छन्‍हि। मलयालम भाषाक प्रसिद्ध लेखक श्री जी. शंकर पिल्‍लैक तीनटा मलयालम नाटक पूजा मुरि करुत्त दैवत्ते तेडि‍ सि‍नेहदूतन केर हिन्दी अनुवाद पूजा घर काले देव की खोज सि‍नेहदूत शीर्षकसँ नेशनल बुक ट्र्रस्ट ऑफ इन्डियासँ शीघ्र प्रकाश्य छन्‍हि। मैथिली भाषामे शब्दकोषक परम्परा:- अनुवादक लेल आवश्यक सामग्री यथा शब्दकोषक परम्परा मैथिलामे आरम्भ भेल बहुत बादमे जाऽ कऽ १९५१ई. मे। ऐ‍सँ पहिने बहुतो मैथिली शब्दक प्रयोग/ समावेश आन-आन भाषाक कोष तथा शब्दावली सभमे कएल गेल छल। मैथिलीमे अखन धरि‍ प्रकाशित ११ गोट कोष उपलब्ध अछि- १ मिथिला शब्द प्रकाश (३), २ मिथिलाभाषाकोष (४), ३ धातुपाठ (५), ४ बृहद मैथिली शब्दकोश (६), ५ पर्यायवाची शब्दकोश (७), ६ मैथिली शब्दकोश (८), ७ मैथिली शब्दकल्पद्रुम (९), ८ अंगिका हिन्दी शब्दकोश (१०), ९ कल्याणी-कोश: मैथिली अंग्रेजी शब्दकोश (११), १० चातुर्भाषिक शब्दकोश (१२), एवं ११ मैथिली अंग्रेजी शब्दकोश (१३)। मैथिलीमे प्रकाशित उपर्युक्त शब्दकोश सबहक तुलना जँ आन भारतीय भाषा सभसँ करी तँ निश्चये मन खिन्न भऽ जाएत। मैथिलीक नवीनतम कोश थिक श्री गजेन्द्र ठाकुरक अंग्रेजी-मैथिली-अंग्रेजी-शब्दकोश जे प्रकाशनक क्रममे अछि। एकर अतिरिक्त न्यू हिन्दुस्तानी इंग्लिश डिक्शनरी, ऐन इन्ट्रोडक्शन टु द मैथिली लैंगुएज ऑफ बिहार भाग-२, क्रैस्टोमैथी एण्ड भोकेब्युलरी, ट्रान्सलेशन ऑफ मनबोध सँ हरिवंश एण्ड इन्डेक्स टु मनबोध, बिहार पीजेन्ट लाइफ ए कम्पैरेटिभ डिक्शनरी ऑफ द बिहारी लैंगुएज भाग-१, बंगीय शब्दकोश ए कम्पैरेटिभ एण्ड ईटीमोलोजिकल डिक्शनरी ऑफ नेपाली लैंगुएज, अमरकोष, वर्णरत्नाकर, विद्यापति पदावली, कृषि कोश, बेसिक कलोक्विअल मैथिली आदि कृति सभकेँ शब्दसूची, शब्दानुक्रमणी वा पारिभाषिक पदावली कहल जा सकैत अछि, जकरासँ मैथिलीक कोश सभ बनल आ अनुवादक काज लेल गेल अछि। अनुवाद भाषाक नै‍ भावक हेबाक चाही। अनुवादककेँ भाषाक फेरमे नै‍ पड़ि पूर्णतः भावग्राही हेबाक चाही। भाव प्रसंगसँ पकड़ल जाइत अछि। प्रसंग शब्दक अर्थ बड़ व्यापक अछि। ऐ‍मे देश  काल पात्र प्रकरण घटनाक्रम विषय आदि परिवेशिक तत्‍व समाहित रहैछ। अनुवादमे प्रसंगसँ बेसी महत्‍व अछि संगतिक। अनुवादककेँ संगतिपर सतत धि‍यान रखबाक चाही। अनुवादकक श्रेणीकरण- अनुवादककेँ शब्दग्राही वाक्यग्राही आ भावग्राही आदि तीन श्रेणीमे विभक्त कएल जा सकैत अछि। जेना साइकिल सिखनिहार खसबाक डरे साइकिलकेँ कसि कऽ पकड़ने रहैत अछि। तहिना नवसिखुआ अनुवादक अशुद्ध भऽ जएबाक डरेँ मूल भाषाक शब्द आ वाक्य-विन्यासकेँ धएने रहैत छथि। हुनका डर होइ छन्‍हि जे मूल भाषासँ कनेको विचलित हएब तँ अनुवाद अशुद्ध भऽ जाएत। परिणाम उनटा भऽ जाइ छै। कहबाक तात्पर्य जे मूल भाषाक सतर्क अनुसरणक फेरमे हुनक लक्ष्य-भाषाक सहज प्रवाह बिगड़ि जाइ छन्‍हि। तँए अनुवादककेँ भाषाक फेरमे नै‍ पड़ि पूर्णतः भावग्राही हेबाक चाही। एकटा टंककक उदाहरण दऽ अनुवादक पण्डित श्री गोबिन्द झा अनुवादकक ऐ‍ श्रेणीकरण- शब्दग्राही, वाक्यग्राही आ भावग्राही आदिक पुष्टि कएने छथि। भाषाक प्रभाव अनेक प्रक्रममे प्रतिफलित होइत अछि‍‍। भारतीय शब्दशास्‍त्रमे एकर चारि प्रक्रम वर्णित अछि- परा पश्यन्ती, मध्यमा आ बैखरी। बैखरी थिक भाषाक ध्वन्यात्मक स्वरुप। यएह एक भाषाकेँ दोसर भाषासँ फराक करैत अछि। प्रक्रमक विभिन्न ध्वन्यात्मक प्रतीकसँ जे प्रतीत होइत अछि से थिक अर्थ। एकरे कहल जाइ छै मध्यमा, किएक तँ ई प्रक्रम ध्वनि आ भाव दुनूक मध्यमे पड़ैत अछि। पश्यन्ती केवल धि‍यान-चक्षुसँ देखल जाइत अछि। अही धि‍यान-चक्षुसँ भाषाक अर्थात्मक स्वरुप देखाइत अछि। प्रक्रममे आगाँ जा कऽ पश्यन्ती लुप्त भऽ जाइ छै। सकल भाव मिलि‍ एक अखण्ड महाभाव भऽ जाइ छै। तखन भावना परा पर पहुँचि जाइ छै। ई परा योगशास्‍त्र वा दर्शनशास्‍त्रक विषय थिक। परा छोड़ि शेष तीनू प्रक्रमक बोध नीक अनुवादककेँ हेबाक चाही- १ पहिने मूल भाषाक  बैखरीकेँ पकड़ू, २ तकरा द्वारा मूल भाषाक  मध्यमाकेँ पकड़ू ३ पुनः तकरा द्वारा मूल भाषाक पश्यन्तीकेँ पकड़ू ४ आब आेइ पश्यन्तीक आधारपर लक्ष्य भाषाक मध्यमाकेँ पकड़ू आ ५ तइ आधरपर लक्ष्य भाषाक बैखरीकेँ पकड़ू। एकरे नाओं थिक अनुवाद। ई प्रक्रिया मूल भाषाक ध्वन्यात्मक प्रतीकक decoding सँ आरम्भ होइत अछि आ भावक प्रक्रमपर आबि encoded होइत-होइत लक्ष्य भाषाक ध्वन्यात्मक प्रतीकक रुपमे परिणत भऽ जाइ छै। सरलता- अनुवादक भाषा एहेन हुअए जे जनसामान्य आसानीसँ बूझि सकए। ऐ‍सँ अनुवाद बेसी लोकप्रिय हएत आ अनुवादकक कार्य-प्रगति प्रभावित हएत। ऐ‍ सन्दर्भमे अंग्रेजी लेखक ग्रियर्सनक अनुसन्धानात्मक पोथीक मैथिली अनुवाद बिहारक ग्राम्य-जीवन निःसंदेह अनुकरणीय एवं सराहनीय अनुवाद-कार्य मानल जा सकैत अछि। बहुभाषिक व्याकरण वा क्रिया-कोश (Multi Lingual Verbal Dictionary) क निर्माण-कालमे ऐ‍ बिन्दुपर बेसी धि‍यान देल जेबाक चाही, जइ‍सँ आगाँक अनुवादककेँ अनुवाद-कार्य करबामे सुविधा हुअए। अनुवादक शास्त्रीयता नीचाँसँ ऊपर जेबाक चाही- आम लोकक ज्ञान यथा- लोक शब्दावलीक उपयोग, कृषकक ज्ञान यथा- कृषकक जीवन-यापनमे दैनिक बेवहारमे आबएबला शब्दाबलीक उपयोग जेना ऊपर उल्लिखित चेम्मीनक मैथिली अनुवाद मलाहिन उपन्यासमे कएल गेल अछि, तेहेन उपयोग आनो अनूदित पोथीमे कएल जेबाक चाही। तकनीकी शब्द यथा- मेडिकल साइन्सक अनुवादमे गामक पशुरोग-व्याधि‍क नामादिक उपयोग अनुवादमे हेबाक चाही। तहिना मानवजनित रोगोमे ग्रामीण लोकक देहाती रोगक नामावलीक उपयोग मैथिली अनुवाद लेल कएल जा सकैत अछि। संक्षिप्तता आ स्पष्टता- अनुवाद सरल संक्षिप्त आ एकदम स्पष्ट हुअए तइ लेल आवश्यक अछि जे बेसी-सँ-बेसी तकनीकी (Technical Meaning) शब्दावलीक उपयोग करैत, अर्थगूढार्थकेँ Foot Notes वा Bracket मे ओतै बुझा दी तँ से नीक रहत। अनुवादक शास्त्रीय सामग्रीक उपलब्ध्ता (History of knowledge: Text Translation in Maithili)- आब लिखित सामग्री खास कऽ अंग्रेजी (English) मे कम्प्यूटर (Computer), इन्टरनेट (Internet), ई-मेगजिन (e-magazines), ई-कोष (e-dictionary), ब्लॉग्स (Blogs) आदिपर उपलब्ध होइ छै। मुदा बिडम्बना अछि जे आजुक मैथिलीक लेखक-अनुवादक अंग्रेजी आ आध्ुनिक तकनीकी ज्ञानसँ अलगे पड़ाइत रहै छथि। मैथिलीमे अथवा मैथिलीसँ आन भाषामे नीक अनुवाद लेल अंग्रेजी भाषाक संग-संग आन भारतीय भाषाक खास कऽ दक्षिण भारतीय भाषाक ज्ञान राखब आ तकनीकी उपकरण यथा-कम्प्यूटर (Computer), एल सी डी प्रोजेक्टर (LCD Projector), कैमरा (Camera), सी डी/ डी. वी. डी. (Compact Disk/ Digital Video Disk), पेन ड्राइव (Pen Drive) आदि संचालित करबाक योग्ता एवं इन्टरनेट (Internet), ई-कोष (e-dictionary), ई-मेगजिन (e-magazines), ब्लॉग्स (Blogs) आदिक उपयोग करबाक दक्षता रहब अत्यावश्यक भऽ गेल अछि। एकर अतिरिक्त अनुुवादककेँ कतेक स्वतन्त्रता भेटबाक चाही? अनुवादक कतेक स्वतन्त्रता चाहै छथि? संस्था कतेक स्वतन्त्रता देबए चाहैए? आदि-आदि नीति आ सिद्धान्त अओर व्यावहारिक सम्बन्‍धपर अनुवादक स्तरीयता, पठनीयता, उपयेगिता, उपादेयता तथा अनुवादकक कुशलता आ प्रवीणता एवं अनुवाद-कार्यक सफलता निर्भर करै छै। अनुवादपर केन्द्रित ऐ‍ राष्ट्रीय सेमिनारमे अहू मूल बिन्दू सभपर विमर्श हएब आवश्यक अछि। धन्‍यवाद। जय मिथिला। जय मैथिली। सन्दर्भ संकेतः- १ अनुचिन्तन: पण्डित गोविन्द झा: नवारम्भ प्रकाशन पटना: २०१०: पृ.- ११३, २ अनुचिन्तन: पण्डित गोविन्द झा: नवारम्भ प्रकाशन पटना: २०१०: पृ.- ११५ ३ पं. भवनाथ मिश्र प्रकाशक स्वयं ग्राम-हटाढ-रुपौली पो.- झंझारपुर जि.- मध्ुबनी प्र खण्ड १९५१ ४ पं. दीनबन्ध्ु झा प्रकाशक स्वयं ग्राम-इसहपुर पो.- मनीगाछी जि.- दरभंगा मध्ुबनी १९५० ५ पं. दीनबन्ध्ु झा प्रकाशक- मैथिली साहित्य परिषद दरभंगा १९५० ६ सम्पा. डॉ. जयकान्त मिश्र प्रकाशक- इन्डियन काउन्सिल ऑफ एडभान्स्ड स्टडीज शिमला १९७३ ७ प्रकाशक- प्रज्ञा प्रतिष्ठान काठमाण्डू नेपाल १९७४ ८ सम्पा. गोविन्द झा प्रकाशक- मैथिली अकादमी पटना १९९२ ९ पं. मतिनाथ झा प्रकाशक- मिश्र बन्ध्ु प्रकाशन जमुथरि जि.- मध्ुबनी १९९७ १० डोमन साहु समीर प्रकाशक- विनोद कुमार चतुर्वेदी सिकन्दरा आन्ध्रप्रदेश १९९७ ११ सम्पा. गोविन्द झा प्रकाशक- महाराजाधि‍राज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउन्डेशन दरभंगा १९९९ १२ उमेश चन्द्र झा प्रकाशक- सुमित्रा प्रकाशन दरभंगा २००७ १३ सम्पा. गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा तथा विद्यानन्द झा प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन दिल्ली २००९ सुमित आनन्द संवाद-कार्यशालाक आयोजन भारतीय भाषा संस्थान मैसूरक तत्वावधानमे ल.ना. मिथिला विश्वविद्यालयक मैथिली विभागमे द्वि दिवसीय कार्यशाला २०-१२-२०१० तथा २१-१२-२०१० केँ सम्पन्न भेल। कार्यशालामे मैथिली जगतक अनुवादक एवं प्रकाशकगण भाग लेलनि। टेक्स्ट कोना छपए आ अनुवादकक समस्या की अछि आदि तथ्य पर चर्चा कएल गेल। साहित्यकार लोकनि अनुवाद कार्यमे वर्तनीक अनुशासनक पालन करबाले अनुवादकर्ता सभकेँ सुझाव देलनि। ऐ‍सँ पहिने संस्थानक मुख्य शैक्षणिक सलाहकार डॉ अजित मिश्र मैथिली अनुवाद साहित्यक इतिहास प्रस्तुत केलनि। ऐ‍ कार्यक्रममे मैथिली अकादमीक अध्यक्ष श्री कमलाकांत झा, डॉ शशिनाथ झा, डॉ वीणा ठाकुर, डॉ भीमनाथ झा, डॉ रामदेव झा, हृदए रोग विशेषज्ञ डॉ गणपति मिश्र, डॉ रमण झा, डॉ विभूति आनन्द, डॉ कमल कांत झा, श्री शरदेन्दु चौधरी, डॉ जगदीश मिश्र, डॉ यशोदा नाथ झा, डॉ देवकांत मिश्र सहित लगभग पाँच दर्जन प्रतिभागी लोकनि उपस्थित भऽ अपन-अपन विचार व्यक्त केलनि। धनाकर ठाकुर जगदीश प्रसाद मंडलक “गामक जि‍नगी‍” श्री जगदीश प्रसाद मंडलक “गामक जि‍नगी‍”कथा संग्रहमे १९ कथा छन्हि। कथा सबहक शीर्षक बहुत छोट राखब लेखकक वि‍शेषता छन्हिक मुदा ऐ‍‍ कारणे ई मुख्य पात्र प्रधान रहि‍ जाइत अछि‍। गामक जि‍नगी केना शहरसँ अलग अछि‍ संभवत: लेखक एकरा‍ प्रदर्शित करक प्रयास वि‍वि‍ध कथामे केने छथि‍। औद्यौगि‍क क्रांति‍क बाद बनल शहर गामसँ उपटल लोकसँ बसल अछि‍। गामसँ जीवि‍काक खोजमे गेल लोक, जे बादमे क्रमश: गाम छोड़ि‍ देलनि‍। गाम छोड़ि‍ कोनो शहरमे जेबाक कारण प्रारम्भिक अवस्थामे औद्यौगि‍क पूँजी हुअए, जइ‍‍मे गामक वर्णवैषम्यक भाव भऽ नै‍‍ रहल हुअए। मि‍थि‍लाक लेल कोसी-कमला समेत अनेक नदीमे आबएबला बाढ़ि‍ सेहो कारण रहल अछि।‍ ओना बाढ़ि‍ स्वयं सेहो बड़का औद्यौगि‍क देशक सामान बेचक प्रकरण-उपकरणमे बनएबला बड़का बैराज-बांध आदि‍क कारणसँ‍ अछि‍। लेखककेँ मनमे कचोट छन्हि जे लोक कि‍ए गाम छोड़ि‍ बाहर जाइत अछि, पंजाब तक, जकर परिणाम होइ छन्हि, बादमे छुटल नाव चलबैत, वा गामपर रि‍क्शार चलबैत लगक कसबा वा स्टे़शनसँ, जे पात्र कहैत छन्हि- “हमर गामक लोक पंजाब नै‍‍ जाइत अछि‍।‍” कि‍छु वर्ष पूर्व घोघरडीहा वा जयनगर सन स्टेशनसँ पंजाब आदि‍क छपल टि‍कट भेटै छलै जे एक दि‍नमे एक-एक स्टेशनसँ लाख-लाख टाकाक कटि‍ जाइ छलै, जइपर पंजाबमे हरित क्रांति‍ एलै। प्रति‍नि‍धि‍ कथा डाक्टर हेमन्त- स्वयं डाक्टर होइक चलते हम सर्वप्रथम ऐ कथाकेँ पढ़लौं। एक डाक्टरक बेटा डाक्टर हेमन्त प्राय: दरभंगामे काज करैत “लक्ष्मीपुर‍”(बाढ़ि‍क गाम नि‍र्मली लग) जाइत अछि, अधि‍कारीक आदेशसँ। चूँकि‍ ओ स्वयं एक गामसँ नि‍कलल अछि‍, पि‍ताजीक उपार्जित धनक बँटबारामे मुकदमेबाजीसँ त्रस्त अछि। डाक्टर हेमन्त तँ मि‍थि‍लेक शहरमे रहलाह। जतए कि‍ प्रमंडल एखन तक सहरसा या शहर-सन कहबैत अछि‍। जतए कोनो शहर शहर सन‍ नै‍ अछि,‍ बल्कि ‍ गामे‍क एक प्रति‍रूप अछि‍। मुदा हुनक बेटा कोनो दोसर प्रांतक शहरमे नौकरी लेल चलि‍ गेलखि‍न‍। डाक्टर नै‍‍ बनलखि‍न, यद्यपि‍ कहानीमे ई लि‍खल नै‍‍ अछि,‍ कि‍ए? मुदा संभवत: आब डाक्ट‍री पढ़नाइ टाकाबला काज भऽ गेल अछि‍ तँए। कि‍छु वर्ष पहि‍ने तकक बि‍हारक गुंडाराजमे फि‍रौती अपहरणक कथा सामान्य छल, जकर धमकी स्वरूप लाख टाका वा मौतक धमकी हेमन्तककेँ सेहो भेटलनि‍ मुदा ओहूसँ पैघ धमकी बाढ़ि‍ क्षेत्रमे काज करए जाउ वा जेल जे सामान्यत: सुनल नै‍‍ गेल अछि।‍ मुदा शासनक आतंक चोर-गुंडासँ कम नै‍‍ तकर उदाहरण अछि‍ ऐ‍‍मे। फि‍रौतीक मांगसँ बचबाक लेल यदि‍ बाढ़ि‍-ड्यूटीकेँ हेमन्त अंतमे धन्यवाद दैत तँ कथाक पूर्णतामे एक डेग होइत आ तहि‍ना बाढ़ि‍मे कतौसँ आएल कोनो परि‍वारमे पालिता सुकन्या सुलोचनाक प्रति डाक्टरक मनोभावक वि‍कास कथामे नै‍‍ भऽ पाएल। सुन्दरी सुलोचनाक आयु कि‍छु बढ़ा, नवयौवना बना आेइपपर कामुक मनोदशाक चि‍त्र खि‍ंचल जा सकैत छल वा एक छोट कन्याक रूपमे बालि‍का सुलोचनाक प्रति‍ वात्सल्य‍ताक जे मैथि‍ल परम्परा अनुसार होइत- “चलू दरभंगा ओतै‍ पढ़ब अहाँ।‍”कि‍एक तँ वि‍देशी मनोदृष्टि‍जन्य कामव्याधि‍सँ छोट बालि‍कामे कामुकता तकनाइ हमरा सभकेँ अग्राह्य रहैत। वा सुलोचना कि‍छु मास बाद दरभंगा कोनो बीमारी जेना साँपक वि‍ष, जकर चर्चा प्रारम्भमे अछि‍, लऽ डाक्टर हेमन्तक क्लिा‍नि‍कपर आबि‍ बचि‍ जइतथि‍ वा एन्टी-स्ने‍क भेनमक अभावमे तँ कहुना पहुँचियो कऽ दम तोड़ि‍ दि‍तथि‍ वा बचलाक बाद आेइ‍ समए डाक्टर हेमन्तक नोकरिया बेटा गामपर आएल रहैत आ ओकरा बि‍आहि‍ बंगलोर लऽ जइतथि‍। मतलब जे कथामे बात उठए, से पूर्ण हेबाक चाही। गामक पड़ाइन रूकि‍ जाए, दरि‍द्रा कम भऽ जाए आदि आ तहि‍ना भाषागत शुद्धता हि‍न्दीसँ लेल शब्द लेल सेहो समान “सामान‍”जकाँ ग्रहण करब उचि‍त लेखककेँ। कि‍ताबक छपाइ नीक मुदा फोन्ट पैघ हेबाक छल आ दाम कि‍छु कम अपेक्षि‍त छल जे प्रकाशकीय धर्मक अनुरूप होइत। बिपिन झा यान्त्रिक अनुवाद आ Polysemy संगणक केर विकासक संग यान्त्रिक अनुवाद संवादक सीमाकेँ विस्तृत कएलक। ओतै polysemy यान्त्रिक अनुवाद हेतु एकटा विकट समस्या केर रूपमे प्रस्तुत भेल अछि। कारण ई अछि जे मनुक्ख तँ मानवीय ज्ञान सीमा केर अधीन अछि मुदा मशीन तँ मात्र आेइ कार्यकेँ सम्पादित कऽ सकैत अछि मुदा इनपुटक रूपमे पूर्व प्रदत्त छै। प्रश्न ई उठै छै जे पोलीसेमी की थि‍क? ई यान्त्रिक अनुवाद आ बेवहारक दृष्टिसँ केना समस्या उत्पन्न करैत अछि? एकरा लेल की समाधान कएल गेल? ओ कतए तक सार्थक भेल? एकर आगू की भविष्य छै? सर्वप्रथम पोलीसेमी की थि‍क? पोली शब्दक अर्थ होइत अछि बहुत आ सेमी शब्दक अर्थ होइत अछि चिह्न। एवं प्रकारे पोलीसेमी ओहेन शब्द केर द्योतक अछि जे विविध अर्थकेँ प्रस्तुत करैत अछि। ऐ‍ विविध अर्थक कारण सन्देह उत्पन्न होइत अछि, जे एकर समुचित अर्थ की हएत? मानव मस्तिष्क तँ सन्दर्भानुकूल अर्थ जनित करबामे सक्षम भऽ समस्याकेँ प्रस्तुत हेबाक मार्ग अवरुद्ध करबाक प्रयास करैत अछि मुदा यन्त्र तँ ठहरल यन्त्र ओ अपनाकेँ अक्षम कहि या तँ जूआ पटकि दैत अछि अथव हास्यास्पद अर्थ प्रस्तुत कऽ दैत अछि। उदाहरण हेतु- आब साँझ भय गेल..। एकर अर्थ मानव हेतु सेहो सन्देह प्रस्तुत करैत अछि। विद्यार्थीक लेल पढ़बाक समए, चोरक हेतु चोरीक समए, गोप हेतु गोशालाक समए, विपत्तिमे पड़ल लोक हेतु अंतक समए रूपी अर्थ दैत अछि। मानव मस्तिष्क तँ सन्दर्भ देखि‍ अर्थ ग्रहण करत मुदा संगणक ई नै‍ कऽ असमंजसमे पड़ि जाएत। आब प्रश्न उठैत अछि जे ऐ‍ दिशामे की काज भेल? आ अखन धरि यान्त्रिक अनुवादमे पोलीसेमीसँ निदान हेतु की उपाए कएल गेल? पोलीसेमी अर्थात नानार्थी मूलतः निओ लैटिन “पोलीसेमस”सँ लेल गेल अछि। ‘पोली’ केर अर्थ होइत अछि बहुत आ ‘सेमी’ केर अर्थ होइत अछि चिह्न। एवं-प्रकारेँ पोलीसेमी नानार्थक शब्दकेँ द्योतित करैत अछि। उदाहरण हेतु ऐ वाक्यकेँ देखू- आब साँझ भऽ गेल। ऐ‍मे साँझ पद विभिन्न सन्दर्भमे विभिन्न अर्थ दैत अछि चरबाहा सभ लेल ‘मालजालकेँ गोशाला लऽ जेबाक बेर’ विद्यार्थी हेतु ‘पढ़बाक समए’ चोर हेतु ‘चोरि‍ करबाक समए’ दीपदेनहारिकेँ ‘दीप देबाक समए’ ऐ‍ तरहेँ अनेक शब्द ऐ‍ तरहक अछि जेकर भिन्न-भिन्न अर्थ होइ छै। ई नानार्थकता मानवमात्रकेँ अर्थनिर्धारणमे परेशान कऽ दै छै। किन्तु मानवीय ज्ञानसीमा केर कारण एकर निराकरण भऽ जाइ छै। ओतै संगणक हेतु तँ ई विशेष परेशानी उत्पन्न करै छै। एकर उदाहरण गूगल केर यान्त्रिक अनुवाद क्रममे देखि‍ सकै छी। आब प्रश्न अछि जे एकर समाधान की अछि? ऐ‍ सन्दर्भमे अनेकानेक प्रयास भेल जइ‍मे Bar-Hillel (१९६४), Katz एवं Fodor (१९६३) आदि केर प्रयास महनीय रहल। Katz एवं Fodor केर निबन्ध ‘A Theory of Semantic interpretation' केर योगदान महत्त्वपूर्ण रहल। Kelly and Stone (१९७५) १९७० धरि अपन ३० टा शिष्यक संग ६७१ टा शब्दक चएन कऽ अलगोरिद्म तैयार कएलथि। नानार्थी शब्दक झंझटि‍सँ मुक्त हेबाक एकटा उपाए ई भऽ सकैत अछि जे- नानार्थी शब्दक सूची बनए ओकर विविध अर्थ देल जाए एकटा प्रोग्राम बनए जे नानार्थीकेँ चिह्नित कऽ सकए संगे विविध अर्थ देखा सकए एहेन अल्गोरिद्म बनए जे यथासम्भव ई समस्या दूर कऽ सकए। आशा अछि जे उक्त प्रक्रिया लाभदायक हएत। यदि पाठकवर्गक कोनो अन्य विचार हुअए ऐ‍ समस्या केर समाधानक, तँ अवश्य सूचित करथि। (लेखक ऐ‍ विषएपर IIT Bombayमे अनुसंधान कऽ रहल छथि) वीरेन्‍द्र कुमार यादव महावि‍ष्‍णु यज्ञ-मेलाक दृश्‍य २८अप्रैलसँ १६मइ धरि‍ भक्‍ति‍मय वातावरणसँ अाच्‍छादि‍त इटहरी, नि‍रमली। जइमे मुख्‍य वि‍चारणीय बि‍न्‍दु- करीब दस दर्जन माटि‍क मुरूत, जे ऐति‍हासि‍क संगे‍ हि‍न्‍दू धर्म ग्रंथमे लि‍खल गेल धार्मिक घटना चि‍त्रक साक्षात् परि‍दृश्‍य छल। ऐ महायज्ञ मेलाक आयोजन कि‍छु साधुजन एवम् समाजक सहयोगसँ भेल। सभसँ पहि‍ने एगो खढ़ आ माि‍टक रंगल-टीपल सतयुगक कामधेनु गाए छल, जे गाए नि‍रंतर अठारह दि‍न धरि‍‍ दूध दइते रहि‍ गेल‍ आ श्रद्धालुजन आेइ‍ अमृतकेँ चाटि‍-चाटि‍ अपन जेबी ढील कएलक। ऐ‍ कामधेनु गाइयक देहमे सेकड़ो देवताक छोट-छोट मुरूत बनाएल छल। दोसर एकटा भगवान शंकरक पुत्र गणेशजी महाराजक मुरूत छल जे श्रद्धालुजनसँ ि‍बना दूगो टाका नेने लड्डू नै‍‍ दै छल। जे भक्‍तगण दूटा रूपैया गणेश जीकेँ चढ़बथि,‍ तकरा गणेशजी अपन सूढ़सँ एकटा लड्डू दै छल। आ से श्रद्धालुजन पूर्ण श्रद्धाक संग लड्डू लेबा लेल तैनात छल। ओना भीड़मे हम-पहि‍ने तँ हम-पहि‍नेक चक्करमे कएक गोटे घाइलो भेलाह, से अलग बात। दृश्‍य अद्भुत लागल। अद्भुत लगबाक कारण छल जे आइयो ऐ‍ तरहक बहुतयात लोकसँ हमर समाज भरल अछि‍। एतने नै‍,‍ ई स्‍पष्‍ट बुझना जाइ छल जे वि‍कास माने मेडि‍कले आ इंजि‍नि‍यरि‍ंग टा क्षेत्रमे जे भेल से भेल आ फेर‍ जे कि‍छु सड़क बान्‍ह बनबामे भेल मुदा गामक लोकक दशा-दि‍शा ओहि‍नाक ओहि‍ना अछि‍। ऐ‍ तरहेँ मुरूत बनबौनि‍हार आ बनेनि‍हार, दुनू गोटेक दि‍माग श्रद्धालुजनसँ पाइ ऐंठबामे पूरा कामयाबी हासि‍ल केलक। यज्ञ स्‍थलपर समुद्र-मंथन, सीता-हरण, हरि‍श्चन्‍द्रक श्‍मशान घाटक भव्‍य दृश्‍य जइ‍ठाम रानी शेव्‍यासँ पुत्र रोहि‍तक दाह-संस्‍कार करबामे कर-चुंगी लै छथि‍न, सेतु बाँध रामेश्वरम्, वि‍श्वमोहि‍नी, वीर हनुमान आदि‍-आदि‍ दृश्‍य छल। दोसर दृश्‍य यज्ञशालामे छ: सात सैकड़ माटि‍क बर्तन, नारि‍केल फल एकरंगासँ लपेटल कलशाक रूपमे सजाओल गेल छल, आगि‍ लागल अगरबत्तीक मुट्ठा, जअ-तील आ घीक जराइन गंधसँ परोपट्टा मह्-मह् करैत रहए। आेइ‍ बीच पंडि‍त लोकनि‍ “ओम भू र्भूव: स्‍व: तत्‍स वि‍तुरवरेण्‍यं भर्गो देवस्‍य धीमहि‍ धि‍यो यो न: प्रचोदयात्”क उच्‍चारण करैत हवनमे स्‍वाहा करै छलाह। एवम् प्रकारे करीब दर्जनो‍ एहन दृश्‍य बनाओल गेल छल जइ‍ठाम पाइक वर्षा होइ छल। सभठाम श्रद्धालु-भक्‍त जनक माध्‍यमसँ बरसाओल गेल पाइ समेटबाक लेल नि‍युक्‍त लोकनि‍क अभावमे कतेको चतुर भलमानुष अपनो गमछामे पाइ हसोथि‍ घर दि‍स वि‍दा होइ छलाह। यज्ञ स्‍थलपर एतेक लोकक भीड़ ऐ ‍लेल भेल जे रेडि‍यो स्‍टेशन भुरूकवासँ करीब दर्जन भरि‍ मैथि‍ली भाषी कलाकार आबि‍ करीब तीन घंटा स्‍टेज प्रोग्राम केलनि‍। ऐ‍ यज्ञमे भारी मेला लागल, सर्कस, झूला, मौतक कुइयाँ, रामलीला, थि‍येटर आदिक लोक लुभावन कार्यक्रम होइत रहल। रंग-बि‍रंगक मनि‍हारा आ मि‍ठाइक दोकान छल। बनि‍याँ सभ नेहाल तँ भइये गेल मुदा परेशानि‍यो कम नै‍‍ भेलनि‍। मि‍थि‍लांचलक ई इलाका कोसी आ बलानक मारल अछि‍। जतेक‍ गहुँम, तोरी, मसुरी‍, रैंची आ धनि‍याँ खेतमे उपजल छल, सभ बनि‍याँक घर चलि‍ गेल। गाम-गामसँ हि‍त-बोन, कर-कुटुम आसपासक लोकक घरमे चाउर लगि‍चा देलक। मुदा कोना परबाह नै‍‍, आखि‍र धर्मक काज भऽ रहल अछि‍ कि‍ने। कहबाक तात्‍पर्य अछि‍ जे आजुक आधुनि‍क आ वैज्ञानि‍क युगमे धोर धर्मांधता अओर अशि‍क्षा हमरा सबहक पि‍छड़ापनक मुख्‍य कारण छी। धर्मक प्रति‍ एतेक आन्‍हर भेनाइ जे खढ़ आ माटि‍क कामधेनु अमृत चुबाबए, गणेशजी लड्डू दि‍अए अओर हमर समाजक सोझ लोक सभ अपन मेहनतक कमाएल पाइ दऽ दऽ अमृत चाटए, लड्डू खाए एकरा धर्मान्‍धता नै‍‍ कहल जाए तखन की कही‍? ई हमरा-अहाँक लेल लाजक बात छी। धारयेत इति‍ धर्म:। धारण करबाक जोग बढ़ि‍याँ बात आ कर्म होइछ। सुन्‍दर कर्म धीया-पुताकेँ पढ़ाउ-लि‍खाउ, शि‍क्षि‍त बनाउ, जइ‍सँ अपन परि‍वारक संग समाजक लाेकक जीवन-स्‍तर बढ़ि‍याँ हएत। परि‍वार, समाज आ देश समृद्ध हएत। श्री मद् भागवत गीतामे योगीराज श्रीकृष्‍ण कहै छथि‍- “कर्मे यज्ञ छी आ कर्मक स्रोत स्वयं ब्रह्म अछि।” हम अध्यात्‍मि‍क वा पूजा-पाठक वि‍रोधी आकि‍ नास्‍ति‍क नै‍‍ छी मुदा धर्मक मौजूदा कर्मकाण्‍डी स्‍वरूप, आडंम्‍बर आदि‍मे वि‍श्वास नै‍‍ करै छी। हमर-अहाँक जवाबदेही बनैए जे समैक अनुकूल समाजकेँ सही दि‍शा देबाक लेल प्रयास करी, जइ‍सँ हमहूँ आ हमर देश रूस, अमेरि‍का, चीन, जापान जकाँ वि‍कसि‍त देशक श्रेणीमे आबए। रामभरोस कापड़ि "भ्रमर" अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन ः २०६७ सम्मानक एकटा नव अध्याय प्रारंभ भेल अछि अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन: २०६७ हाले काठमाण्डूमे सम्पन्न भेल अछि। ऐ‍ सम्मेलनक आन बहुतो विशिष्टतामे एकटा रहल, सम्मानित व्यक्तित्वक औपचारिक छनौट आ तकरा सम्मानपूर्वक प्रदान करबाक व्यवहार। ऐ‍सँ पूर्व भारतमे भेल अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन सभमे एकटा पूर्वमे छपा राखल सम्मानपत्रमे अओनिहार देखि‍ भरैत ‘मिथिलारत्न’ देबाक परम्पपराकेँ सर्वथा तोड़ैत व्यक्तिक गरिमाकेँ सेहो धि‍यानमे राखि ताम्रपत्रमे विशिष्ट प्रकारक फ्रेम लागल सम्मान पत्र, पाग आ दोसल्ला ओढ़ा सम्मान कएल गेल। ओहो नेपालक पहिल राष्ट्रपति डाॅ. रामवरण यादवक हाथे, अपनामे ई प्रतिष्ठा स्वयं अभूतपूर्व छल। ‘मिथिलारत्न’ सँ सम्मानित भेलाह प्रसिद्ध भाषाविद् डाॅ. योगेन्द्र प्र. यादव। तहिना नेपालक एकमात्र मैथिल पुरातत्वविद् श्री तारानन्द मिश्र। सभ कि‍यो ऐ‍ सम्मानसँ आह्लादित देखल गेलाह। सम्मानक क्रममे सभसँ विशिष्ट रहल नेपाली माटि-पानिक अपन छाप रखने ‘मिथिलाश्री’ सम्मान, जे अपन–अपन क्षेत्रमे विशिष्ट योगदान देनिहार मैथिल, अमैथिलकेँ सेहो देल गेल। ऐ‍मे डाॅ. प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ रहलाह, जनिका प्रथम नेपालीय मैथिली साहित्यक इतिहासकार आ संस्कृतिविद्केँ रुपमे सम्मानित कएल गेलनि। तहिना संस्कृतिविद् आ नेवारी भाषी सत्यमोहन जोशीजी सम्मानित कएल गेलाह। संस्कृतिविद् डाॅ. जगमान गुरुङ्ग, भाषा वैज्ञानिक डाॅ. नोवल किशोर राइ, भाषाविद् अवधी साहित्यकार विश्वनाथ पाठक, हिन्दीक साहित्यकार डाॅ. सूर्यनाथ गोप सेहो ‘मिथिलाश्री’सँ सम्मानित भेल छलाह। अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनमे ऐ‍ तरहेँ आन भाषा-भाषी विद्वान सभकेँ सम्मान करबाक ऐ शुभारंभसँ आनो भाषा-भाषीक बीच एकटा नीक संदेश गेलैए। भाषा साहित्यक क्षेत्रमे सहकार्य आ समन्वयसँ अन्तर सम्बन्धमे वृद्धि होइछ। मैथिली क्षेत्रमे सम्मान एवं पुरस्कारक कमीकेँ देखैत ऐ‍ तरहक प्रारंभसँ आगामी दिनमे लोकक हृदए आर विशाल हेतै आ ई सम्मान देबाक क्रम आगाँ एहिना जारी रहत से विश्वास उपस्थित सहभागी लोकनि व्यक्त करैत जाइत देखल गेल छलाह। अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन सफलतापूर्वक सम्पन्न: अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन पुस ७, ८ गते काठमाण्डूमे भव्यताक संग सम्पन्न भेल अछि। नेपाल–भारतक डेढ़ सएसँ उपर प्रतिनिधि सबहक सहभागितामे सम्पन्न भेल उक्त सम्मेलन १७ बिन्दुक काठमाण्डू घोषणापत्रक संग सम्पन्न भेल। प्रथम दिन पुष ७ गते काठमाण्डूक बसन्तपुरसँ मिथिला पहिरन आ पागमे सजल सैयो मैथिल सबहक आकर्षक जुलुश विभिन्न नारा लगबैत प्रज्ञा प्रतिष्ठान धरि आएल छल। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक भव्य सभा हॉलमे राष्ट्रपति डाॅ. रामवरण यादव सम्मेलनक उद्घाटन कएलनि। उद्घाटन समारोहमे डाॅ. रामवरण यादवक अतिरिक्त उप प्रधान मंत्री विजय कुमार गच्छेदार, संस्कृति मंत्री मृनेन्द्र रिजाल, भारतीय प्रतिनिधि डाॅ. बैद्यनाथ चौधरी बैजू अपन–अपन विचार व्यक्त कएने छलाह। तहिना समारोहमे सम्मेलनक संयोजक राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’ स्वागत मन्तव्य, आ कार्य सम्पादन समितिक सदस्य जीवछ मिश्र धन्यवाद ज्ञापन कएने रहथि। सम्मेलनमे तइ अवसरपर निकलल ‘स्मारिका’ आ राम भरोस कापड़ि‍ ‘भ्रमर’क टटका नाटकक पुस्तक ‘भैया अएलै अपन सोराज’क लोकार्पण राष्ट्रपति डाॅ. रामवरण यादव कएलनि। तकरा बाद ‘मिथिलारत्न’ सँ दू गोटे आ ‘मिथिलाश्री’ सँ ६ गोटे राष्ट्रपति हाथे सम्मानित भेलाह। सम्मेलनमे राष्ट्रपतिकेँ संयोजक ‘भ्रमर’ शाल आ पागसँ सम्मानित कएलनि। प्रारंभमे राम भरोस कापड़ि‍ ‘भ्रमर’ रचित थीम सौंगक गायन स्वागत गानक रुपमे गायक रामा मंडल लगायतक साथी सभ प्रस्तुत कएने छलाह। सम्मेलन समाप्तिक बादो राष्ट्रपतिजी सांस्कृतिक कार्यक्रम देखलनि जइ‍मे कुंज बिहारी मिश्रक विद्यापति संगीत छल। तकरा बाद साँझ ६ बजे धरि भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरु भेल जइ‍मे जनकपुरक रामानन्द युवा क्लव द्वारा ‘भ्रमर’ लिखित ‘जट–जटिन’ लोक नाट्यक सफल प्रदर्शन कएल गेल, नव शिल्प ओ शैलीक कारणे दर्शक सभ द्वारा खूब सराहल गेल। तखन मिथिलाक प्रसिद्ध नृत्यांगना डाॅ. नलिनी चौधरीक कत्थक नृत्य सभा कक्षकेँ मंत्रमुग्ध कऽ देने छल। दोसर दिन भिनसरे ९ बजेसँ महाकवि विद्यापतिकेँ समर्पित विचार गाेष्ठीक आयोजन कएल गेल, जकर प्रायोजन नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, संस्कृति विभाग कएने छल। डाॅ. योगेन्द्र प्र. यादव, श्री तारानन्द मिश्रक कार्य पत्र प्रस्तुत भऽ सकल। तहिना डाॅ. धीरेन्द्रकेँ समर्पित भव्यकवि गोष्ठीक आयोजन सेहो कएल गेल। समापन समारोहक मुख्य अतिथि उपराष्ट्रपति छलाह जे लगभग चारि घंटा कार्यक्रममे समए दऽ सहभागि सभकेँ आह्लादित केलखिन। ओ अपन भाषणमे आयोजनकेँ ऐतिहासिक बतौलनि। दोसर राति मिनापक प्रस्तुति ‘डोमकछ’ सभकेँ प्रभावित केलकै। सांस्कृतिक कार्यक्रमक दुनू दिन रश्मि रानीक गीतसँ श्रोता मस्तीक अनुभूति करैत रहल। विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना || 455 454 || विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना

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विंदेह भरैथिंली प्र्रत्ध-ब्रिंब्रह्ध-सभालोघत्ा विदेह-सदेह 90, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक ४१-१००) 4, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ प्रबन्ध-निबन्ध समालोचनाक एकटा समानान्तर संकलन SK, (A (\ रे २९) [ पर oe ZB eS S| eed ee 5.४ LY = a> = = | \@Ds शक a ASSIS A) pe Z = VP B <a iy Pee Cee) Nan G2 —— Be wae विदेह-प्रथम मैथिली unfeies ई-पत्रिका — —— ie ISSN 2229-547X VIDEHA — सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मण्डल। sd सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: AP कुमार झा आ पउ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा FART. कल सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक-नाटक-रंगमंच-चलचित्र: TIT ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद: पूनम मंडल आ प्रियंका झा. बल्ब “di सम्पादक-अनुवाद विभाग: विनीत उत्पल। हि S&S

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(ि जी किम as कवर आ बैक चित्र श्वेता झा चौधरी [ हा है ce i Se, ee Ot ara od श्रुति प्रकाशन a कार्यालय: 6/29, J] राजेन्द्र नगर, दिल्‍्ली-११०००८ FEAT: (099) २४८८६६४६-४७ BHA: (०११) २४८५८६६४८ website: http://www.shruti-publication.com E-mail: shruti.publication@shruti-publication.com | 2574 a 300/- US $25