1 2 ISSN 2229-547X विदेह सदेह -११ (विदेह-सदेह ११, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक १०१-११०) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य(प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना, नाटक-रंगमंच, विहनि-लघु-दीर्घ कथा आ बाल साहित्य) आ पद्य (पद्य आ बाल कविता-गजल )क एकटा समानान्तर संकलन) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मण्डल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक: नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद: पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग: विनीत उत्पल। श्रुति प्रकाशन ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रतिएवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नै कएल जा सकैत अछि। ISBN : 978-93-80538-86-0 ISSN: 2229-547X मूल्य : भा. रू. २००/- संस्करण : २०१२ © श्रुति प्रकाशन श्रुति प्रकाशन रजिस्टर्ड आॅफिस : ८/२१, भूतल, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- ११०००८. दूरभाष- (०११) २५८८९६५६-५८ फैक्स- (०११) २५८८९६५७ Website : http://www.shruti-publication.com e-mail : shruti.publication@shruti-publication.com Printed at : Ajay Arts, Delhi-110002 Typeset by : Umesh Mandal. Distributor : Pallavi Distributors, Ward no-6, Nirmali (Supaul). मो.- ९५७२४५०४०५, ९९३१६५४७४२ Videha Sadeha 11 : A Collection of Maithili Prose and Verse (source:Videha e-journal at www.videha.co.in). अनुक्रम गजेन्द्र ठाकुर सम्पादकीय: टॉमस ट्रांसट्रोमर/ विदेह साहित्य उत्सव २०१२/ दूर्वाक्षत/ मैथिली-सुरजापुरी-राजबंशी/ विदेह समानांतर साहित्य अकादेमी मैथिली कवि सम्मेलन २०११/ स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री”/ हिन्दी आ मैथिली आ साहित्यिक शब्दावली/ विकीपीडिया-गूगल-ट्विटर आदिपर मैथिली- तिरहुता आ कैथी यूनीकोड/ विद्यापति पुरस्कार कोषक पुरस्कार/ विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपेँ प्रसिद्ध)/ टैगोर लिटरेचर अवार्ड २०११/ समानान्तर परम्पराक विद्यापति आ पाग/ विदेह द्वारा मैथिली पोथी प्रदर्शनी शिव कुमार झा सम्पादकीय- बहिरा नाचए अपने ताल डा. अरुण कुमार सिंह उजड़ैत गाम: बसैत शहर?/ भाषा जातिगत सम्पत्ति नै अपितु सामाजिक सम्पत्ति राम भरोस कापड़ि भ्रमर मैथिली लोक संस्कृति संगोष्ठी अन्तरगत लोकनायक सलहेसः चर्चा–परिचर्चा कार्यक्रम सम्पन्न मधुपनाथ झा बिदापत नाच (फणीश्वर नाथ रेणुक रिपोर्ताजक अनुवाद) अतुलेश्वर सगर राति दीप जरए, आन्दोलन आ बभनभोज/ वैश्विक सोच?/ पाग, मिथिला आ जातिवादक राजनीति विनीत उत्पल आधुनिक मैथिली नाटक आ टुच्चा नाटककारक जातिवादी रंगमंचक अवधारणा/ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठी: सगर राति दीप जरय: एकटा बहन्ना पूनम मण्डल आरती कुमारी आ सगर राति दीप जरय/ मिथिला विभूति स्मृति पर्व समारोह २०१२ आशीष अनचिन्हार मैथिली गजलकार परिचय श्रृंखला/ "सगर राति दीप जरय"केर अन्त आ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठीक उदय सुमित आनन्द सोसाइटी टुडेक लोकार्पण परमेश्वर कापड़ि मिथिला राज्य संघर्ष समिति डॉ. दमन कुमार झा एकैसम शताब्दीक पहिल दशकमे मैथिली बालसाहित्य दुर्गानन्द मण्डल टैगोर साहित्य पुरस्कारक बहन्ने/ जीवन-संघर्ष (समीक्षा) डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” अम्बरा (समीक्षा) ओमप्रकाश झा बहुरूपिया रचना मे/ घोघ उठबैत गजल उमेश मण्डल मैथिली युवा रचना-धर्मिता: परंपरा परिवर्त्तन आ भविष्य सुजीत कुमार झा मिथिलाक कण-कणमे राम-सीता विहनिकथा- लघुकथा- दीर्घकथा किशन कारीगर अकछ भेल छी जगदानन्द झा मनु जबाड़ भोज/ अनाथ/ मार बाढ़नि- तेसरो बेटीए/ की भगवती हमर घर एती?/ एक करोड़क दहेज/ उपकार/ बलिक छागर/ खुशी/ आठ लाखक कार/ कुण्ठित मानवता दुर्गानन्द मण्डल कुकर्मा ज्योति झा चौधरी पुनरन्वेषण अमित मिश्र प्रेमक अंत/ मोछ/ चोरि कामिनी कामायनी संटूक उपनैन ओमप्रकाश झा निर्मोहिया/ गहींर आँखिक व्यथा/ ढेपमारा गोसाईं सुजीत कुमार झा नव व्यापार चंदन कुमार झा ठकबुद्धि/ लोहनावाली/ बुच्चू भइया/ समए होत बलबान/ अनकर दुर्गति जवाहर लाल कश्यप ड्युटी रवि भूषण पाठक तीनटा विहनि कथा/ ओक्कर तोहर हम्मर सपना सत्यनारायण झा डायरी/ पाहुन मुन्नाजी सबला पद्य सन्दीप कुमार साफी अप्पन गाँव शान्तिलक्ष्मी चौधरी गजल १-४ रमेश रञ्जन बारुद प्रकाश प्रेमी रे गोधिया तो कोन्नी छे? कामिनी कामायनी काशीक घाट/ फागुन राग ज्योति झा चौधरी प्रजातंत्रक पुनर्निमाण रुबी झा निर्मोही/ ओढ़नी लाल डॉ. धनाकर ठाकुर जँ हो अपना पर विश्वास ओमप्रकाश झा कुण्डलिया/ रुबाइ/ कविता/ गीत जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल गजल१-४/ सभ्यता आ संस्कृति मुन्नी कामत नोराएल आँखि/ किए छी हम अछूत/ हमर मिथिला हमर प्राण/ नारी पंकज झा स्वयंकेँ रीढ़ युक्त बनाबएमे लागल छी/ मानु ने मानु राजदेव मण्डल कामना अमित मिश्र गीत/ पहिल टिकुला/ बुढ़ी काकी/ गुलाम छी कनियाँक/ मच्छर/ आधुनिक बैण्ड नवीन ठाकुर द्वंद्व निर्वाह डॉ. अरुण कुमार सिंह भारतीय भाषाक हम बेटी मैथिली चंदन कुमार झा हेतै नवका भोर/ प्रतिज्ञा/ हाइकू/ भूख/ बिहाड़ि आनन्द कुमार झा मैया अहाँ बसै छी नवीन कुमार आशा विदेह परिवार बिनु रहब कोना/ गर्भक आवाज/ यौ भाइ दहेजक अन्त करु/ मिथिलाक की करू बखान नित्यानंद गायेन केर दूटा हिंदी कविताक मैथिली अनुवाद अनुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा कुरानक मैथिली अनुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा डॉ॰ शशिधर कुमर कोन खुशिएँ नाचि रहलह/ होरी नै, होरीक प्रात रहए/ लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत/ हमरा जुनि करिहेँ याद सखी श्यामल सुमन निरीक्षण/ सम्बन्ध/ बेटी/ मैथिल मिथिला नाज हमर/ हँसी मुँह पर साटय छी/ ई खटहा अंगूर छी/ संस्कार सन्तान मे/ कियो हमर संगी बनू/ रहबय कोहबर कत्तेक दिन/ मोन कियै सिंहासन पर/ चलू बैसिकय कानय छी/ गलती बारम्बार करू/ तखने जीअब शान सँ/ आँखिक नोर सँ/ जतबय अछि औकात करय छी/ कि मुखड़ा पर चान देखलहुँ/ फागुन मौसमक श्रृंगार दिनेश रसिया हम पत्रकार जवाहरलाल कश्यप यौ मीत अयोध्यानाथ चौधरी कोनो किम्मत पर मिथिला महान चाही रवि भूषण पाठक बामे गाम दहिने गाम इप्सिता सारंगीक ओड़िया कविता गप नन्द विलास राय मानवता/ शिक्षित बेरोजगार दमन कुमार झा एकरा की कहबै..? नारायण झा सम्मान/ रहुआ संग्राम/ मिथिला राज्यक आह्वान बेचन ठाकुर वनभोज रमेश मण्डल ई छथि स्कूल प्राइवेट ट्यूटर सोनू कुमार झा ‘रश्मि’ संतुलन किशन कारीगर मुखिया जी देथहिन/ पदक दुरूपयोग/ अगिला अंक मे छपत/ एना किए ई की?/ करीक्का रूपैया कपिलेश्वर राउत माइक ओद्रमे जे भाषा सिखलक मंगलेश डबराल- हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल (बेर-बेर कहैत छलौं हम, दिल्ली मे एकटा दिन, भोथिआएल, अभिनय, किछु कालक लेल, घर शांत अछि) स्व. लल्लन प्रसाद ठाकुर हे रे चन्दा शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ सगर राति दीप जरय कमल मोहन चुन्नू आजाद गजल १-२ अनिल मल्लिक गजल कुसुम ठाकुर हाइकू प्रेमचन्द्र पंकज आजाद गजल १-२ मिहिर झा हाइकू प्रभात राय भट्ट गीत १-४/ गजल शिशु उत्सव मिहिर झा बाल गजल १-२ अमित मिश्र बाल गजल चंदन कुमार झा बाल गजल १-८ जगदानन्द झा मनु बाल गजल रूबी झा बाल गजल डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” बर्खा रानी १-२/ मिथिलाक धिया/ नेनपन/ पर्यावरण बचाउ/ रौदी दाही/ हमहूँ आइ सँ इस्कूल जएबै/ कीनि दे हमरो खेलौना जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल बाल गजल जगदीश प्रसाद मण्डल लघुकथा- एकोटा ने अरविन्द ठाकुर मिथिलाक संस्कृति:किछु अप्रिय बिन्दु नाटककार गुणनाथ झासँ चन्दन कुमार झाक गपशप
सम्पादकीय- गजेन्द्र ठाकुर टॉमस ट्रांसट्रोमर स्वीडनक कवि टॉमस ट्रांसट्रोमरकेँ २०११क साहित्य लेल १.५ मिलियन डॉलरक नोबल पुरस्कार देबाक घोषणा कएल गेल अछि| स्वेडिश एकेडमी कहलक "ओ अपन घनगर पारदर्शी बिम्बसँ सत्यक एकटा नव द्वारक परिचय करेलनि"। हुनकर पोथी सबहक अंगरेजी अनुवाद रहनि "द ग्रेट एनिग्मा", "द हाफ फिनिश्ड हेवेन", द डिलीटेड वर्ल्ड"। ओ अस्सी बरखक छथि, १५ सँ बेशी कविता संग्रह लिखने छथि जे अंगरेजी आ ६० आन भाषामे अनूदित भेल अछि। हुनकर जन्म स्टोकहोममे भेलनि। ओ मनोचिकित्सक रहथि आ हुनकर कवितामे मानवताक गहन मनोविज्ञानिक विश्लेषण भेटैत अछि। हुनकर कविता गूढ़ मुदा सोझ होइत अछि। हुनकर कविता वैयक्तिक आ सार्वत्रिक दुनू अछि। हुनकर कविता एहेन गूढ़ नै होइए जइपर चिंता करैत रहू, वरन ओ धरातलसँ अस्तित्वक उच्च शिखर दिस लऽ जाइए। हुनकर स्वेडनक नम्हर शीतकालक विवरण, ऋतुक लय, आ प्रकृतिक सौन्दर्य वातावरणक अद्भुत विवरण हुनकर कवितामे भेटैत अछि। हुनकर माता स्कूल शिक्षिका आ पिता पत्रकार रहथिन आ ओ साहित्य, इतिहास, धर्मशास्त्र आ मनोविज्ञान पढ़ेने छथि। १९९० सँ ओ एकटा आघातक बाद बजबामे सक्षम नै छथि। १९९३ क बाद अमेरिकाक ककरो साहित्यक नोबल नै भेटल छै। १९७४ क बाद आब जा कऽ कोनो स्वेडिशकेँ ई पुरस्कार भेटल छै। नोबल समिति आब गएर यूरोपीय भाषाक बेशी साहित्यिक पोथीपर विचार करत। विदेह साहित्य उत्सव २०१२ विदेह साहित्य उत्सव २०१२ आ विदेह साहित्य सम्मान समारोह १४ जनवरी २०१२ केँ सम्पन्न भेल जतऽ विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल गेल आ कवि सम्मेलन सम्पन्न भेल। लोकक स्वतः-स्फूर्त सहयोग आ सहभागिता विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनक सफलताक रूपमे मोन राखल जाएत। विदेह सम्मान: विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान: १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११/ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल)/ २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२/ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह)/ २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह)/ २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक)/ २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) दूर्वाक्षत यजुर्वेदक अध्याय २२ मंत्र २२ केँ विश्वक पहिल राष्ट्रभक्ति गीत हेबाक गौरव प्राप्त छै। मुदा मिथिलामे दूभि-अक्षत छीटि कऽ ऐ मंत्रकेँ दूर्वाक्षत मंत्र बना देल गेल। बिहार स्टेट टेक्स्ट बुक पब्लिशिंग कॉरपोरेशन लि. दूर्वाक्षत नामसँ नवम वर्गक किताब छपने अछि। ऐ पोथीमे मिथिला आ मैथिलीकेँ पछुएबाक षडयंत्र पूर्ण रूपसँ दृष्टिगोचर होइत अछि। अठारह पन्नामे मिथिलाक एकटा जिलाक स्थायी बन्दोबस्तीबला जमीन्दारक जीवनी पढ़ाओल गेल अछि!! मैथिली लिपिक संरक्षणपर डेढ़ पन्नाक पचास बर्ख पुरान लेख अछि जकर आइक तकनीकी युगमे कोनो महत्व नै छै, प्रवासी मैथिल समाज लेख पुरातनपंथी अछि आ अखुनका बच्चाकेँ ई हास्यास्पद बुझेतै, प्रवासक अर्थ, मैथिलक अर्थ आ प्रवासक कारण सभ किछु बदलि गेल अछि। तँ की ई बच्चा सभकेँ गुलामीक पाठ पढ़ेबाक षडयंत्र नै अछि? लोक नवम वर्गक हिन्दी, अंग्रेजी, बांग्ला आ आन भाषाक पोथीसँ एकर तुलना करैए तँ स्थिति आर भयावह भऽ जाइए। शिक्षकसँ आग्रह जे जमीन्दारक जीवनी बच्चा सभकेँ नै पढ़ाबथु, प्रश्न-पत्र सेट केनिहारसँ आग्रह जे ओ जमीन्दारक जीवनीबला अध्यायसँ प्रश्न नै पुछथु। मैथिली-सुरजापुरी-राजबंशी मैथिली बाबूकेँ अपन ऐ राजनैतिक जमीनक अनुभव ओइ दलमे रहितो नै भेल हेतन्हि, जकरा कहियो ओ रामक संग पटेने रहथि। दलमे एकटा प्रभावी नेता कहै जाइबला बाबूकेँ कहियो पिछड़ल वर्गक नेताक रूपमे प्रस्तुत नै कएल गेल। मुदा राजनैतिक जमीनसँ बेशी जोड़तोड़मे माहिर बाबू दलसँ निकालि देल जाइते प्रतिपक्षी-दलक नजरिमे एना चढ़लाह जे हुनका प्रतिपक्षी-दल अपना दिससँ प्रदेशमे पिछड़ल वर्गक गद्दीपर विराजमान कऽ देलक। एकरा सुरजापुरीमे (भारत दिसुका किशनगंज आदि क्षेत्रमे) एना लिखल/ बाजल जाएत:- बाबूक अपना यहार राजनीतिक जमीनेर अहसास उस दलात रहले नी होबे। जहाक कोईखुन वहाय रामेर संगे सीचे छीले। दलात एक कद्दावर नेता कहा जनवार बाबू कोईखुन पिछवाड़ नेतार लखा पेश नी करील। लेकिन राजनीतिक से बेसी जोड़तोड़ोत माहिर बाबू दलार से निकलाते ही प्रतिपक्षी-दलाड़ नजरोत हिरंगदी चढ़ील कि वहाय पाटी अपनार बीती से प्रदेशोत पिछड़ार नेतार गद्दीत विरजमान करील। एकरा राजबंशी [नेपाल दिस सुरजापुरीकेँ राजबंशी भाषा कहल जाइ छै, झापा, सरनामति, चकमकी, मेची, टाघनडुब्बा (ताधंडुवा) आदिमे- राजबंशी आ सुरजापुरीमे मामूली अन्तर छै] मे एना लिखल बाजल जाएत:- बाबूर अपनार इर राजनीतिक जमीनेर ऐहसास उखान दल त रहते हुए भी नी होल, जइर कोधोय उम्हा रामेर संगे छिले। दलात एक कद्दावर नेता कहवार बाबूर कोधोय पिछड़ा नेतार लाखा पेश नी करे। माने राजनीतिक जमीनत भेल्ला जोड़तोड़ माहिर बाबू दल से निकलाले ही प्रतिपक्षी-दलार नजर एनंतिंज चढ़िल कि अम्हा पार्टीत अपनार तरफ से प्रदेशत छट जातिर नेतारक गद्धी पर बठाइ दिल। सुरजापुरी- भारतमे बिहारक किशनगंज आ पूर्णियाँ आदिमे गामे-गाम राजबंशी (महादलित) जाति द्वारा ई भाषा बाजल जाइत अछि। किशनगंजमे मुस्लिममे स्वामी जाइत खोट्टा आ सेवक जाति कुल्हिया कहल जाइ छथि। कुल्हिया जाति सेहो सुरजापुरी भाषा बजै छथि। राजबंशी आ जे आन जाति सभ कुल्हियाक आसपास रहै छथि से सुरजापुरी बजै छथि। ई भाषा मैथिली आ बांग्लाक मिश्रण अछि। कियो कियो बंगालक कूच बिहारक बाहे बंगाली आ नेपालक राजबंशी भाषाकेँ सेहो सुरजापुरी भाषा कहै छथि। किछु गोटेक मत छन्हि जे बांग्लादेशक लोकक भाषाक क्षेत्रीय भाषासँ मिश्रणक परिणामस्वरूप सुरजापुरी भाषा निकलल। पूर्णियाँ आ किशनगंजमे एक्के गाममे कुल्हिया आ राजबंशी लोकनि सुरजापुरी बजै छथि, संथाल लोकनि संथाली बजै छथि, बंजारा लोकनि बंजारा भाषा बजै छथि जखन कि शेष सभ गोटे मैथिली बजै छथि। जँ मिथिला राज्यमे ऐ क्षेत्र सभकेँ लेल जाए तँ हुनका सभकेँ हुनकर भाषाक विकासक गारन्टी देबऽ पड़त। की मिथिला राज्य अभियानकर्मी सभक सोच एतऽ धरि पहुँचलनि अछि? मुस्लिम आ गएर सवर्ण (आब सवर्ण सेहो) सरकारी-मैथिलीसँ दूर भागल आ उर्दू-हिन्दीक संग गेल। मुस्लिमक संग ई तमिल, मलयालम आ बांग्लाक (आ काश्मीरीक) अतिरिक्त सभ भाषामे भेल। काश्मीरमे तँ लोक बजैए काश्मीरी आ पढ़ाओल जाइ छै उर्दू- (बिहार मे जेना पढ़ाओल जाइ छै हिन्दी) , मुदा एकटा छोट राज्य सिक्किममे नेपालीक दबदबा छै मुदा तकर अतिरिक्त लेपचा/ भुटिया सेहो ओ पढ़बै छै, ऐ छोट भाषा सभकेँ कोनो खतरा नै छै, लेपचा लिपि सेहो सुरक्षित छै आ नेपाली भाषाकेँ ऐसँ बल भेटै छै। मुदा बगलेमे दार्जिलिंगमे (जे बंगालमे छै आ बंगालमे दार्जिलिंग छोड़ि शेष ठाम बांग्लाक आ दार्जिलिंगमे नेपाली भाषाक दबदबा ओहिना छै जेना बिहारमे हिन्दीक दबदबा छै), से उदारता नै छै। ओकर कारण अछि सिक्किमक भाषायी उदारता जे बिहारमे (आइये नै जमीन्दारीये राजसँ) मैथिली आ मिथिलाक्षरक विरुद्ध अछि/ छल। विदेह समानांतर साहित्य अकादेमी मैथिली कवि सम्मेलन २०११ दिनांक ९ जुलाइ २०११ केँ सायं ४.४५ बजेसँ राति ७.४५ बजे धरि विदेह द्वारा आयोजित पहिल समानांतर साहित्य अकादेमी मैथिली कवि सम्मेलन २०११ निर्मली (जिला सुपौल)मे सम्पन्न भेल। साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित कोलकाता मैथिली कवि सम्मेलन मे २१म शाताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविता संग्रह "अम्बरा"क लेखक राजदेव मंडल आन श्रेष्ठ कविकें नै बजाओल गेल आ ने कोनो सूचना देल गेल। साहित्य अकादेमीक प्रवेश निषेधक ऐ कृत्यक सुधार लेल विदेह द्वारा पहिल समानांतर साहित्य अकादेमी मैथिली कवि सम्मेलन २०११ दिनांक ०९ जुलाइ २०११ केँ निर्मली (जिला सुपौल) मे असर्फी दास साहू समाज महिला इन्टर महाविद्यालय परिसर (निर्मली- जिला सुपौल वार्ड नम्बर ७)मे आयोजित कएल गेल। ऐ मे ककरो प्रवेष निषेध नै छल। समारोहक उद्घाटन हरिनारायण कामत आ श्री रामजी मण्डल द्वारा दीप प्रज्वलित कऽ कएल गेल। समारोहक अन्तमे श्री राजदेव मण्डलक २०१० ई. मे प्रकाशित कविता संग्रह “अम्बरा”, जे २१म शाताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविता संग्रह मानल जा रहल अछि, क लोकार्पण सम्मिलित रूपेँ ६ गोटे (डॉ. बचेश्वर झा, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री रामजी प्रसाद मण्डल, श्री रौशन कुमार गुप्ता, श्री हरिनारायण कामत, श्री नन्द विलास राय) द्वारा सम्पन्न भेल। ऐ काव्य संध्यामे कविता पाठ केलन्हि- १.श्री राधाकान्त मण्डल (स्वागत गीत), २. उमेश पासवान (गेलहे घर छी, हाल, कबाड़ी), ३. श्री रामकृष्ण मण्डल छोटू (माइ), ४. श्री रामदेव प्रसाद मण्डल “झाड़ूदार” (५ टा गीत), ५. श्री नन्द विलास राय (इन्दिरा आवास), ६.श्री कपिलेश्वर साहु (कोसी), ७.श्री रामविलास साहु (३ टा कविता), ८. श्री उमेश मण्डल (२ टा कविता), ९. श्री राजदेव मण्डल (३ टा कविता), १०. श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (२ टा कविता)। सभ कविताक बाद कवितापर दुटप्पी समीक्षा सेहो भेल। कवि-सम्मेलनक अध्यक्षता श्री डॉ. बचेश्वर झा केलनि आ कार्यक्रमक संचालन श्री दुर्गानन्द मण्डल केलनि। ऐ कवि सम्मेलनक विशेषता ई रहल जे ऐ इलाकामे ऐ तरहक कार्यक्रम पहिले बेर आयोजित भेल, से श्रोता लोकनिक कहब छलन्हि। मुख्य अतिथि श्री जगदीश प्रसाद मण्डल कार्यक्रम बीचमे कहलनि जे ऐ कार्यक्रमकेँ एतेक हलतलबीमे आयोजित करबाक कारण ई भऽ गेल जे आइ साहित्य अकादेमी द्वारा कोलकातामे मैथिली कवि गोष्ठी कराओल जा रहल अछि, जे हमरा सभक लेल लाजिमीक बात थिक जे हमरा-अहाँक गाममे होमएबला कार्यक्रम कोलकातामे होइए आ हमरा-अहाँकेँ बुझलो नै अछि। लोक सभ ईहो कहलनि जे आइ धरि ऐ इलाकामे कार्यक्रम सभक संचालन हिन्दीमे होइ छल, ई पहिल बेर भेल अछि जे कोनो कार्यक्रमक संचालन ऐ इकाकामे मैथिलीमे भेल। स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” (१९११-१९९८): स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” केर जन्म १९११ ई. मे अपन मामागाम सतलखामे भेलन्हि जे हुनकर पैतृक गाम तरौनीक लगेमे अछि। यात्री जी अपन गामक संस्कृत पाठशालामे पढ़ए लगलाह, फेर वाराणसी आ कलकत्ता सेहो गेलाह आ संस्कृतमे “साहित्य आचार्य” क उपाधि प्राप्त केलन्हि। तकर बाद ओ कोलम्बो लग कलनिआ स्थान गेलाह, पाली आ बुद्ध धर्मक अध्ययनक लेल। ओतए ओ बौद्ध धर्ममे दीक्षित भऽ गेलाह आ हुनकर नाम पड़लन्हि -नागार्जुन। मुदा बादमे पुनः ब्राह्मण धर्ममे घुरलाह। यात्रीजी मार्क्सवादसँ प्रभावित छलाह, १९२९ ई. क अन्तिम मासमे मैथिली भाषामे पद्य लिखब शुरू कएलन्हि। १९३५ ई.सँ हिन्दीमे सेहो लिखए लगलाह। स्वामी सहजानन्द सरस्वती आ राहुल सांकृत्यायनक संग ओ किसान आन्दोलनमे संलग्न रहलाह आ १९३९ सँ १९४१ धरि ऐ क्रममे विभिन्न जेलक यात्रा कएलन्हि। हुनकर बहुत रास रचना जे महात्मा गाँधीक मृत्युक बाद लिखल गेल छल, प्रतिबन्धित कऽ देल गेल। भारत-चीन युद्धमे कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चीनकेँ देल समर्थनक बाद कम्युनिस्ट पार्टीसँ मतभेद भेलन्हि। जे.पी. अन्न्दोलनमे भाग लेबाक कारण आपात्कालमे हिनका जेलमे ठूसि देल गेल। यात्रीजी हिन्दीमे बाल साहित्य सेहो लिखलन्हि। हिन्दी आ मैथिलीक अतिरिक्त बांग्ला आ संस्कृतमे सेहो हिनकर लेखन आएल। मैथिलीक दोसर साहित्य अकादमी पुरस्कार १९६९ ई. मे यात्रीजीकेँ हुनकर कविता संग्रह “पत्रहीन नग्न गाछ”पर भेटलन्हि। १९९४ ई.मे ओ साहित्य अकादमीक फेलो -हिन्दी आ मैथिली कविक रूपमे- भेलाह। यात्रीजी जखन २० वर्षक छलाह तखन १२ वर्षक कान्यासँ हिनकर विवाह भेल। हिनकर पिता गोकुल मिश्र अपन समाजमे अशिक्षितक गनतीमे रहथि आ चरित्रहीन छलाह। यात्रीजीक बच्चाक स्मृतिमे छन्हि जे हुनकर पिता कोना हुनकर अस्वस्थ आ ओछाओन धएल मायपर कुरहड़ि लऽ मारबाक लेल उठल छलाह, जखन ओ बेचारी हुनकासँ कुमार्ग छोड़बाक गुहारि कऽ रहल छलीह। यात्रीजी मात्र छह वर्षक छलाह जखन हुनकर माए हुनका छोड़ि प्रयाण कऽ गेलीह। यात्रीजीकेँ अपन पिताक ओ चित्र सेहो रहि-रहि सतबैत रहलन्हि जइमे हुनकासँ मातृवत प्रेम करएवाली हुनकर विधवा काकीक हुनकर पिताक अवैध सन्तानक गर्भपातमे, लगभग मृत्यु भऽ गेल छलन्हि। के एहन पाठक हएत जे यात्रीजीक हिन्दीमे लिखल “रतिनाथ की चाची” पढ़बाक काल बेर-बेर नै कानल हएत। पिता-पुत्रक ई घमासान एहन बढ़ल जे पुत्र अपन बाल-पत्नीकेँ पिता लग छोड़ि वाराणसी प्रयाण कऽ गेलाह। कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप हम टा संतति, से हुनक पाप ई जानि ह्वैन्हि जनु मनस्ताप अनको बिसरक थिक हमर नाम माँ मिथिले, ई अंतिम प्रणाम! (काशी/ नवंबर १९३६) काशीसँ श्रीलंका प्रयाण, “कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप” ई कहि यात्रीजी अपन पिताक प्रति सभ उद्गार बाहर कऽ दै छथि। १९४१ ई. मे यात्रीजी अपन पत्नी, अपराजिता, लग आबि गेलथि। १९४१ ई. मे यात्रीजी दू टा मैथिली कविता लिखलन्हि- “बूढ़ वर” आ “विलाप” आ एकरा पाम्फलेट रूपमे छपबाए ट्रेनक यात्री लोकनिकेँ बेचलन्हि। जीविकाक ताकिमे सौँसे भारत घुमलाह। पत्नीक जोर देलापर बीच-बीचमे तरौनी सेहो घुमि कऽ आबथि। आ फेर आएल १९४९ ई., अपना संग लेने यात्रीजीक पहिल मैथिली कविता-संग्रह “चित्रा”। १९५२ ई. धरि पत्नी संगमे घुमैत रहलथिन्ह, फेर तरौनीमे रहए लगलीह। यात्रीजी बीच- बीचमे आबथि। अपराजितासँ यात्रीजीकेँ छह टा सन्तान भेलन्हि, आ सभक भार पत्नी अपना कान्हपर लेने रहलीह। यात्रीजी दमासँ परेशान रहैत रहथि। एमर्जेन्सीमे जेल गेलाह। यात्रीजी मैथिलीमे बैद्यनाथ मिश्र "यात्री" आ हिन्दीमे “नागार्जुन” क नामसँ रचना लिखलन्हि। “पृथ्वी ते पात्रं” १९५४ ई. मे “वैदेही”मे प्रकाशित भेल छल, हमरा सभक मैट्रिकक सिलेबसमे छल। यात्रीजी लिखै छथि- “आन पाबनि तिहार तँ जे से। मुदा नबान निर्भूमि परिवारकेँ देखार कए दैत छैक। से कातिक अबैत देरी अपराजिता देवीक घोघ लटकि जाइन्हि। कचोटेँ पपनियो नहि उठा होइन्ह ककरो दिश! बेसाहल अन्नसँ कतउ नबान भेलइए”? यात्री एकटा मिथ छथि? की यात्री एकटा मिथ छथि? ओ मुख्यतः हिन्दीक लेखक रहथि, मैथिलीमे ओ हिन्दीक दशमांशो नै लिखलन्हि। जे लिखबो केलन्हि तइमे सँ बेशी स्वयं द्वारा हिन्दीसँ अनूदित। मैथिली आ मिथिला क्षेत्रक शब्दावली आ संस्कृति हिन्दीक लोककेँ अबूझ आ तेँ रुचिगर लगलै मुदा तइमे सेहो ढेर रास कमी रहै जेना एकटा उदाहरण यात्री समग्रसँ- यात्री समग्र-पृ.२२० जेठ सुदी चतुर्दशी कऽ रहनि पीसाक वर्षी। पहिले वर्षी..पृ.. २२२- ..कहाँ जे एको दिनक खातिर जाइ, कर्ता बना, अषाढ़ बढ़ि तृतियाक तिथिपर पहिल। एहेन बेमारी आनो मैथिली-हिन्दी लेखकमे छन्हि। ई ऐतिहासिक लिखित तथ्य अछि जे गोनू झा १०५०-११५० मे भेलाह मुदा उषा किरण खान संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिसँ हुनकर शास्त्रार्थ करबै छथि (हिन्दीक ऐतिहासिक उपन्यास सिरजनहार, भारतीय ज्ञानपीठमे)। वीरेन्द्र झा कहै छथि जे गोनू झा ५०० साल पहिने भेला आ तारानन्द वियोगी गोनू झा केँ ३०० साल पहिने भेल मानै छथि (दुनू गोटेक हिन्दीमे प्रकाशित गोनू झापर पोथी, क्रमसँ राजकमल प्रकाशन आ नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित) तँ विभा रानीक गोनू झापर हिन्दी पोथी (वाणी प्रकाशन) मे कुणाल गोनू झाकेँ भव सिंहक राज्यमे (१४म शताब्दी) भेल मानैत छथि। जखन पंजीमे उपलब्ध लिखित अभिलेखन गोनू झाकेँ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिसँ दस पीढ़ी पहिने अभिलेखित करैत अछि, तखन ई हाल अछि। मिथिला क्षेत्रक शब्दावली आ संस्कृति- जे हिन्दीक लोककेँ अबूझ आ तेँ रुचिगर लगैे छै- तथ्यमे ई मैथिली-हिन्दी लेखक सभ अपन अज्ञानतासँ ढेर रास गलत तथ्य पड़सि रहल छथि, साम्प्रदायिक लेखक लोकनि गोनू झाक कथामे मुस्लिम तहसीलदारक अत्याचार घोंसिया रहल छथि (मुस्लिम लोकनि मिथिलामे गोनूक समए मे रहबे नै करथि)! यात्री समग्रमे बलचनमा नै लेल गेल कारण ओ हिन्दीक कृति अछि, ओकर मैथिली अनुवाद सेहो भ्रष्ट अछि, लगैए जेना अदहा अनुवाद केलाक बाद मैथिली लेल हुनका लग समयाभाव भऽ गेल होइन्ह। यात्री समग्रमे नवतुरिया लेल गेल, ओहो मूल हिन्दीमे अछि, किए मूल मैथिली कहि कऽ यात्री समग्रमे लेल गेल तकर जबाब सम्पादक देताह। मैथिलीमे प्रूफ रीडरकेँ सम्पादक कहेबाक सख छन्हि आ लोक ग्रियर्सन धरिक रचनाक रिप्रिन्ट अपन सम्पादकत्वमे करबा रहल छथि। एकटा दोसर उदाहरणमे पी.सी.रायचौधुरीक दरभंगा जिला गजेटियरक तेसर अध्यायक चारिटा उपशीर्षकक अंग्रेजी रचनाकेँ मोहन भारद्वाज अपन सम्पादकत्वमे रमानाथ झा रचनावलीमे -किनको कहलासँ सत्य मानि- रमानाथ झाक रचना मानि घोसिया देलन्हि, जखन की लिखित आ वैयाकरणिक शिल्पक आधारपर ओ रचना पी.सी.रायचौधुरीक अछि। यात्री स्वयं कहै छथि जे ओ मैथिली बलचनमा पहिने लिखलन्हि आ तकर हिन्दीमे अनुवाद केलन्हि। मुदा हिन्दी बलचनमामे ओ ई नै लिखै छथि आ ओकरा हिन्दीक पहिल आंचलिक उपन्यास कहै छथि। ई बेमारी आइयो मैथिलीक लेखककेँ गरोसने अछि आ यात्री जीक ऐ मे सायास-अनायास योगदान दुखदायी अछि। राजकमल यात्रीकेँ अमर-सुमन सन पुरान ढर्राक कवि कहै छथि, प्रायः यात्रीक छन्दक प्रति सजगतासँ राजकमलकेँ ई भ्रम भेल छलन्हि। चतुरानन मिश्र आ जगदीश प्रसाद मंडल कम्यूनिस्ट आन्दोलनसँ जुड़ल छथि, प्रायोगिक रूपमे, पार्टी स्तरपर, मुदा हिनकर दुनू गोटेक उपन्यास देखला उत्तर हमरा ई कहबामे कनेको कष्ट नै होइत अछि जे जइ रूपमे यात्री आ धूमकेतु मार्क्सवादक बैशाखी लऽ उपन्यासकेँ ठाढ़ करै छथि तकर बेगरता ऐ दुनू उपन्यासकारकेँ नै बुझना जाइ छन्हि। मार्क्सवादक असल अर्थ हिनके दुनूक रचनामे भेटत। कतौ पार्टीक नाम वा विचारधाराक चर्च नै मुदा जे असल मार्क्सक डायलेक्टिकल मैटेरियलिज्म छै, तकर पहिचान, जिनगीक महत्वपर विश्वास, द्वन्दात्मक पद्धतिक प्रयोग आ ई तखने सम्भव होइत अछि जखन लेखक दास कैपिटल सहित मार्क्सवादक गहन अध्ययन करत आ प्रायोगिक मार्क्सवादपर कताक दशक चलत आ दुनूक अन्तर बुझत। आ अन्तमे यात्रीजीक संस्कृत पद्य:- वासन्ती कनकप्रभा प्रगुणिता पीतारुर्णेः पल्लवैः हेमाम्भोजविलासविभ्रमरता दूरे द्विरेफाः स्ता यैशसण्डलकेलिकानन कथा विस्मरिता भूतले छायाविभ्रमतारतम्यतरलाः तेऽमी “चिनार” द्रुमाः॥ -बसंतक स्वर्णिम आभा द्विगुणित भऽ गेल अछि पीयर-लाल कोपड़सँ। स्वर्णकालक भ्रममे भौरा सभ एकरासँ दूर-दूर रहैत अछि। नन्दनवनक विहारकेँ जे पृथ्वीपर बिसरा दैत अछि, छाह झिलमिल घटैत-बढ़ैत जकर डोलब अछि चंचल आ तरल। ओइ चिनारकेँ हम देखने छी अडिग भेल ठाढ़। हिन्दी आ मैथिली आ साहित्यिक शब्दावली हिन्दी जै हिसाबे अपन भूगोल बढ़ेलक अछि ओइ हिसाबे ओकर शब्दावली नै बढ़ल छै, से हिन्दीसँ डरबाक कोनो प्रश्ने नै। हिन्दीक साम्राज्यवाद अंग्रेजीक साम्राज्यवादक स्थान लऽ लेने अछि आ सभ हिन्दी दिवसपर छोट भाषाकेँ गिड़बाक ओकर प्रवृत्तिपर बहस नै रोकल जा सकत। लैटिन/ दक्षिण अमेरिकाक सभटा मूल भाषा खतम भऽ गेल आ ओकर स्थान स्पेनिश आ पोर्तूगीज लेलक। स्पेन अजटेक सभ्यताकेँ खतम केलक, ओकर सभ चेन्हासी मेटा देलक, मुदा मेक्सिको तकर पश्चातापमे विश्वकप फुटबॉलक आयोजन लेल जे स्टेडियम बनेलक तकर नाम अजटेक स्टेडियम रखलक। डेनमार्कक शब्दकोष बड विस्तृत छै, प्रायः २३ वोल्यूम सँ बेशीमे छै, आप्रवासी प्रायः ओकर नागरिकता लेल लै जाएबला परीक्षामे डेनिस भाषामे अनुत्तीर्ण भऽ जाइ छथि। एकटा महिला जे डेनिससँ विवाह केने रहथि हुनकर बच्चा डेनमार्कक नागरिक भऽ गेल मुदा ओ कहलन्हि जे भाषा पेपर बड्ड कठिन छै, डेनिस सेहो ओइमे अनुत्तीर्ण भऽ जाइ छथि, जनसंख्या वा क्षेत्रफलक छोट रहब डेनिस वोकाबुलेरी लेल हानिकारक नै भेलै। साहित्यकक मूल सरोकार अछि विषय-वस्तुसँ। मुदा शब्दक अकाल जँ साहित्यकारेक मध्य रहत तँ ओ की संप्रेषण करताह, विषय-वस्तुकेँ कोना फरिछा पेताह। जे हाल हिन्दी साहित्यक अछि सएह मैथिलीक भऽ जाएत। शब्दावलीक ग्राह्यता नेटिव स्पीकरक गाममे बाजल जाएबला शब्दावली निर्धारित करत, संस्कृतिसँ दूर प्रवासी द्वारा बाजल जाएबला शब्दावली नै। आ जँ संस्कृतिसँ कटल प्रवासी द्वारा बाजल शब्दावलीकेँ आधारभूत बनाएब तँ नीक साहित्य कोड़ि कऽ निकालल बुझाएत आ गोलैसी आधारित समीक्षकक समीक्षित साहित्य नेचुरल बुझाएत। शास्त्रीय अनुशासन लेखक लेल अछि, पाठक लेल नै। लेखक जँ गजल, रोला, दोहा, कुण्डलिया शास्त्रीय आधारपर लिखताह तखने पाठककेँ नीक लगतै, जँ लेखक मेहनतिसँ दूर भगताह तँ साहित्यिक पाठकीयता घटत। शास्त्रक बान्ह तोड़बाक विधि सेहो शास्त्रक मध्य छै, सावित्री मंत्र जँ शास्त्रीय कट्टरतासँ देखी तँ ओ गायत्री छन्दमे नै छै, मुदा हम सभ ओकरा गायत्रीमे मानै छी कारण गणना पुरेबालेल स्वः केँ सुवः कएल गेलै। दरभंगाक मजहर इमामकेँ "पिछले मौसम का फूल" पर उर्दू लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल गेल। ऐ संग्रहमे गजल (बहरयुक्त) ५५ टा आ आजाद गजल (बे-बहर) ३ टा छै, मुदा पाठक हुनका गजल लेल मोन राखने छन्हि, ओकरा मतलब नै छै जे, जे गजल ओकरा नीक लगलै से बहरमे छै वा नै, ओकरा तँ नीक लगलै। आ की ई संयोग छी जे बहरयुक्त गजले ओकरा नीक लगलै? लेखकक आइडियोलोजी पानिमे नून सन हेबाक चाही, पानिमे तेल सन नै आ ऐपर हम पहिनहियो लिखने छी। यात्री आ धूमकेतुकेँ कम्यूनिस्ट पार्टीक सोंगरक आवश्यकता पड़लन्हि कारण वामपंथ “नीक सेन्ट” आ “डिजाइनर वीयर”क भाँति हिनका सभ लेल फैशन छल, से बलचनमा कांग्रेस आ समाजवादी पार्टीसँ हटलाक बाद कम्यूनिस्ट आ लालझंडामे सभ समस्याक समाधान तकैए, ओकरा यात्रीजी सभ समाधान ओइमे दै छथिन्ह। धूमकेतुक पात्र लेल सेहो लाल झंडा लक्ष्मण बूटी अछि। मुदा ई लोकनि कम्यूनिस्ट मूवमेन्टसँ -फैशनक अतिरिक्त- जुड़ल नै छथि तेँ हिनकर साहित्यमे आइडियोलोजी तेल सन सहसह करैए। आब आउ चतुरानन्द मिश्र आ जगदीश प्रसाद मण्डलक मैथिली साहित्यपर। चतुरानन्द मिश्रक उपन्यासमे वा जगदीश प्रसाद मण्डलक मैथिली साहित्यमे कतौ लालझंडा वा कम्यूनिस्ट पार्टीक चर्च अहाँ देखने छी? एतए जे भेटत से अछि असल मर्क्सक वामपंथी द्वन्दात्मक पद्धति, जीवनपर विश्वास, माने आइडियोलोजी नूनसन मिलल। आ की ई मात्र संयोग अछि जे चतुरानन्द मिश्र जीवनक प्रारम्भमे साहित्य लिखै छथि आ जगदीश प्रसाद मण्डल जीवनक उत्तरार्धमे, अन्तिम केस खतम भेलाक बाद? जगदीश प्रसाद मण्डलक गाम बेरमाक जमीन्दार ठाकुर जी हमर पितयौत भाइकेँ कहलखिन्ह जे जगदीश प्रसाद मण्डल सत्य हरिश्चन्द्र छथि, हमर गामक गौरव छथि। आ से तखन, जखन जगदीश प्रसाद मण्डल कम्यूनिस्ट मूवमेन्टक नेतृत्व केलन्हि दसो बेर जेल गेलाह, केस हुनके सभसँ लड़लन्हि आ तकर परिणाम भेल जे बेरमामे आइ दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै छै। आइयो ओ फूसक घरमे रहै छथि आ तीन बजे उठि कऽ डिबिया लेस कऽ मैथिली साहित्य लिखै छथि आ हुनकर बेटा हुनका आइ धरि लिखैत नै देखने छथिन्ह, जे कखन ओ लिखै छथि, भोगेन्द्र झाक नेतृत्वमे ओ प्रण लेने रहथि जे जखन बाजब, सभ मैथिलीमे बाजब। से हुनकर बेटा हुनका मैथिलीक अतिरिक्त दोसर भाषा बजैत नै सुनने छथिन्ह। आ सएह कारण अछि जे हुनकर विषय-वस्तु नवीन होइत अछि, हुनकर शब्दावली नेटिव स्पीकरक शब्दावली अछि, जे ओइ विषय-वस्तुकेँ फरिछेबामे सफल होइत अछि आ आवश्यक अछि। हुनकर लोक, हुनकर गाछ-बृच्छ, हुनकर फूलपात, हुनकर खेत खलिहान असल अछि, जमीनी अछि, पतालसँ कोड़ि कऽ निकालल नै। आ हुनकासँ प्रेरणा लऽ प्रवासमे रहनिहार नव साहित्यकार मैथिली लिखबासँ पहिने मिथिलाक इतिहास-भूगोल आ संस्कृतिक ज्ञान प्राप्त करथु, तखने हुनकर साहित्य फराक भऽ सकतन्हि। ऐ लिंकसँ राधाकृष्ण चौधरीक “मिथिलाक इतिहास” आ जगदीश प्रसाद मण्डलक “गामक जिनगी” पढ़ू https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ आ मैथिली शब्दावली लेल ई लिंक देखू http://videha.co.in/new_page_13.htm बेरमाक ठाकुरजी सन लोकक विचार हमरा लेल बेशी महत्व राखैए, बनिस्पत गोलैसी केनिहार साहित्यकारक/ समीक्षकक जिनकर आयातित शब्दावलीबला साहित्य कोना मैथिली पाठक घटेलकै; आ खाँटी शब्दावली कोना मैथिली साहित्यक स्तर ऊँच केलकै, आ पाठक बढ़ेलकै, ई आब ककरोसँ नुकाएल नै अछि। उपन्यास लेल दू-दू बेर बूकर पुरस्कार आ साहित्यक लेल नोबल पुरस्कारसँ सम्मानित जॉन मैक्सवेल कुट्सी भाषाक सन्दर्भमे कहने रहथि जे अफ्रीकान्स आ अंग्रेजी भाषाक द्विभाषिया माहौलमे हुनकर अंग्रेजी लेखन हुनका लेल बहुत रास संप्रेषण सम्बन्धी समस्या सोझाँ अनैत छल। ओ अफ्रीकान्ससँ अंग्रेजीमे तकर प्रतिकार स्वरूप ढेर रास अनुवाद केलन्हि। मुदा मैथिलीक साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता (आ किछु ऐ पुरस्कार लेल ललाइत आकांक्षी लोकनि) जे तथाकथित साहित्यकार लोकनि छथि, से जइ प्रकारेँ मैथिली आ हिन्दी दुनूक डोरी पकड़ि माहौल खराप करबामे लागल छथि, से जॉन मैक्सवेल कुट्सीसँ किछु शिक्षा ग्रहण करताह, से मात्र आशा कऽ सकै छी। अमेरिकामे ३५० शब्दक अंग्रेजीक "हाइ प्रेक्वेन्सी" आ ३५०० "बेसिक वर्ड लिस्ट" हाइ स्कूलक छात्र लेल छै जे क्रमशः कॉलेज आ ग्रेजुएट स्कूल (ओतए पोस्ट ग्रेजुएटकेँ ग्रेजुएट स्कूल कहल जाइ छै) धरि पहुँचलापर दुगुना (गएर भाषा फेकल्टीक छात्र लेल) भऽ जाइ छै। साहित्यक विद्यार्थी/ साहित्यकार लेल ऐ सँ दस गुणा अपेक्षित होइत अछि। हिन्दीमे -अपवाद स्वरूप आंचलिक पोथी छोड़ि- हिन्दीक कवि आ उपन्यासकार अठमा वर्गक २००० शब्दक शब्दावलीसँ साहित्य (पद्य, उपन्यास) रचै छथि आ मैथिलीक किछु साहित्यकार ऐ बेसिक २००० शब्दक वर्ड लिस्टकेँ मैथिलीमे आयात करए चाहै छथि, आ ओतबे धरि सीमित रहए चाहै छथि, जखन जापानी अल्फाबेटक चेन्ह ५०० धरि पहुँचि जाइ छै। विकीपीडियापर मैथिली विदेहक तेसर अंक (१ फरबरी २००८)मे हम सूचित केने रही- “विकीपीडियापर मैथिलीपर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नै छल, कारण मैथिलीक विकीपीडियाकेँ स्वीकृति नै भेटल अछि। हम बहुत दिनसँ ऐमे लागल रही आ सूचित करैत हर्षित छी जे २७.०१.२००८ केँ (मैथिली) भाषाकेँ विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छै, मुदा ऐ हेतु कमसँ कम पाँच गोटे, विभिन्न जगहसँ एकर एडिटरक रूपमे नियमित रूपेँ कार्य करथि तखने योजनाकेँ पूर्ण स्वीकृति भेटतै।” आ आब जखन तीन सालसँ बेशी बीति गेल अछि आ मैथिली विकीपीडिया लेल प्रारम्भिक सभटा आवश्यकता पूर्ण कऽ लेल गेल अछि विकीपीडियाक “लैंगुएज कमेटी” आब बुझि गेल अछि जे मैथिली “बिहारी नामसँ बुझल जाएबला” भाषा नै अछि आ ऐ लेल अलग विकीपीडियाक जरूरत अछि। विकीपीडियाक गेरार्ड एम. लिखै छथि ( http://ultimategerardm.blogspot.com/2011/05/bihari-wikipedia-is-actually-written-in.html ) -“ई सूचना मैथिली आ मैथिलीक बिहारी भाषासमूहसँ सम्बन्धक विषयमे उमेश मंडल द्वारा देल गेल अछि- उमेश विकीपीडियापर मैथिलीक स्थानीयकरणक परियोजनामे काज कऽ रहल छथि, ...लैंगुएज कमेटी ई बुझबाक प्रयास कऽ रहल अछि जे की मैथिलीक स्थान बिहारी भाषा समूहक अन्तर्गत राखल जा सकैए ?..मुदा आब उमेश जीक उत्तरसँ पूर्ण स्पष्ट भऽ गेल अछि जे “नै”।” रामविलास शर्माक लेख (मैथिली और हिन्दी, हिन्दी मासिक पाटल, सम्पादक रामदयाल पांडेय) जइमे मैथिलीकेँ हिन्दीक बोली बनेबाक प्रयास भेल छलै तकर विरोध यात्रीजी अपन हिन्दी लेख द्वारा केने छलाह, जखन हुनकर उमेर ४३ बर्ख छलन्हि (आर्यावर्त १४/ २१ फरबरी १९५४), जकर राजमोहन झा द्वारा कएल मैथिली अनुवाद आरम्भक दोसर अंकमे छपल छल (ओना ई दुनू लेख, रामविलास शर्मा आ यात्रीक, भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ निम्न कोटिक अछि)। उमेश मंडलक ई सफल प्रयास ऐ अर्थेँ आर विशिष्टता प्राप्त केने अछि कारण हुनकर उमेर अखन मात्र ३० बर्ख छन्हि। जखन मैथिल सभ हैदराबाद, बंगलोर आ सिलकन वैली धरि कम्प्यूटर साइंसक क्षेत्रमे रहि काज कऽ रहल छथि, ई विरोध वा करेक्शन हुनका लोकनि द्वारा नै वरन मिथिलाक सुदूर क्षेत्रमे रहनिहार ऐ मैथिली प्रेमी युवा द्वारा भेल से की देखबैत अछि? उमेश मंडल मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक लोकक कण्ठक गीतकेँ फील्डवर्क द्वारा ऑडियो आ वीडियोमे डिजिटलाइज सेहो कएने छथि जे विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। नीचाँक पाँचू साइट विकी मैथिली प्रोजेक्टक अछि, प्रोजेक्टकेँ आगाँ बढ़ाउ। राजेश रंजन आ संगीता कुमारीक मैथिली फेडोरा प्रोजेक्ट/ फ्यूल प्रोजेक्ट http://maithili.sourceforge.net/ http://ansiss.org/ http://fedoraproject.org/ https://fedorahosted.org/fuel/wiki/fuel-maithili http://l10n.gnome.org/teams/mai http://translate.fedoraproject.org/languages/mai राजेश रंजन आ संगीता कुमारीक मैथिली स्पेलचेकर http://extensions.services.openoffice.org/project/dict-mai मैथिलीमे संपूर्ण कंप्यूटर सहित ऐ प्रसिद्ध ब्राउजरकेँ मैथिली जनसमूहक उपयोग लेल एक स्वैच्छिक समूह (मधेपुराक राजेश रंजन आ संगीता कुमारी) तैयार केलनि। http://www.mozilla.org/en-US/firefox/all.html आब फायरफॉक्सक अन्तिम मैथिली वर्सन जारी-संगीता कुमारी आ मैथिली टीमक प्रयाससँ भेल ई सफल, फायरफॉक्स-मोजिला अपन जालवृत्त http://blog.mozilla.org/l10n/2012/08/28/maithili-localization/ पर २८ अगस्त २०१२ केँ ई घोषणा केलक। विदेह गोष्ठी: (६ आ ७ दिसम्बर २००८ आ फेर १३ आ १४ दिसम्बर २००८/ फेर ५ आ ६ दिसम्बर २००९ आ १२ आ १३ दिसम्बर २००९/ फेर ४ आ ५ दिसम्बर २०१० आ ११ आ १२ दिसम्बर २०१०/ फेर अन्तिम परिचर्चा १७ आ १८ दिसम्बर २०११ आ २४ आ २५ दिसम्बर २०११ केँ मैथिली लेल गूगल ट्रांसलेटर टूलकिट, गूगल लैंगुएज टूल, कैथी आ मिथिलाक्षर दुनू लिपिकेँ यूनीवर्सल कैरेक्टर सेट (यूनीकोड) मे एनकोड करबाक आवेदनक स्वीकृतपर आ विकीपीडिया मैथिली पर परिचर्चा आ तकर सन्दर्भमे प्रैक्टिकल लैबोरेटरीक प्रदर्शन निर्मली, जिला सुपौलमे भेल। ओतए ढेर रास सम्बन्धित एक्सपर्ट उपस्थित रहथि। तकर बाद किछु आलेख आ रचना डाक आ ई मेलसँ सेहो आएल। तकर संक्षिप्त विवरण नीचाँ देल जा रहल अछि।) गूगल ट्रांसलेटर टूलकिट आब सोर्स आ टार्गेट दुनू भाषाक रूपमे मैथिलीकें स्थान देलक . देखू http://support.google.com/translate/toolkit/bin/answer.py?hl=en&answer=147837 आ http://translate.google.com/toolkit/list?hl=en#translations/active विदेहक विरोधक बाद गूगल बिहारी नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक गप मानि लेने अछि, "विकीपीडिया मैथिली "क आवेदन पहिनहिये विदेह द्वारा देल गेल आ पहिनहिये बिहारी नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक गप विकीपीडिया मानि लेने छल। गूगल मैथिली: गूगल लैंगुएज टूल- http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseProject एतए अंग्रेजीमे भाषामे Bihari चुनू आ अपन योगदान गूगल ट्रांसलेट लेल करू, आ कएल सम्पादन बदलबा काल कारण मे (अंग्रेजीमे) "बिहारी" नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक चर्चा करू; ऐ लिंकपर अनुवाद करू; गूगल एकाउंटसँ लॉग इन केलाक बाद । http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseActivity?project=gws&langcode=bh ऐ लिंक http://www.google.co.in/language_tools?hl=en केँ मैथिलीक उपलब्धता लेल चेक करैत रहू। विदेहक एकटा आर सफलता- गूगल सर्च इन्जिन आब मैथिलीमे- गूगल सर्च इन्जिन आब मैथिलीमे- पहिने गूगल एकरा बिहारी भाषा मानै छल, मुदा विदेहक विरोधक बाद गूगल मानि लेलक जे मैथिली भाषाक अलग सर्च इन्जिन देल जाए। विदेहक विरोधक बाद विकीपीडिया ई पहिनहिये मानि लेने अछि। https://www.google.com/webhp?hl=bh अछि लिंक। [गूगल कम्पनी "बिहारी" नामसँ सर्च इन्जिनक प्रारम्भ केलक, मुदा बिहारी नाम्ना कोनो भाषा अछिये नै। एक गोटे बिहारीक अनुवाद अंगिका कऽ देलन्हि (जेना विकीपीडियामे bh कोडमे बिहारी भाषाक बदला भोजपुरी कियो कऽ देलन्हि) आ से गूगल अंगिका कऽ कए सर्च इन्जिन आबि गेल। फेर विदेहक विनीत उत्पल पत्र लिखलन्हि आ विदेह द्वारा समस्त अनुवाद वोलन्टीयर रूपमे कएल गेल, लोको सभसँ अपील कएल गेल मुदा बाहरी लोकक योगदान शून्य रहल, जे एकाध केबो केलन्हि से रोमनमे, ओकरा ठीक कएल गेल। आब गूगल मैथिली रूपमे सर्च इन्जिन देखा रहल अछि, मुदा अखनो ढेर रास काज बाकी अछि, अखनो विकीपीडिया/ गूगलमे bh अछिये आ ऐ कोडकेँ हटेबा लेल प्रयास कएल जा रहल अछि।-ऐ विषयपर विदेह गोष्ठीक चर्चा देखू http://esamaad.blogspot.in/2012/01/blog-post_08.html लिंकपर।] अनुवाद पूर्ण भेलाक बाद मैथिली एतऽ आओत: http://www.google.com/language_tools?hl=bh http://www.google.com/language_tools VINIT UTPAL's LETTER-http://groups.google.com/group/google-translate-general/browse_thread/thread/65656d86716ddf18/a9bdfbc9eac5a7a1?lnk=gst&q=maithili#a9bdfbc9eac5a7a1 सूचना: १. कैथी आ मिथिलाक्षर दुनू लिपिकेँ यूनीवर्सल कैरेक्टर सेट (यूनीकोड) मे एनकोड करबाक अंशुमन पाण्डेय द्वारा देल आवेदन स्वीकृत भಽ गेल अछि। आब ई दुनू लिपिक यूनीकोड फॉन्ट बनेबाक क्रिया क्यूमे लागि गेल अछि आ जखन एकर सभक बेर एतै ऐ दुनू लिपिक आधारभूत फॉन्ट बनेबाक क्रिया शुरू भऽ जाएत। मिथिलाक्षरक आधारभूत फॉन्टक नाम तिरहुता रहत (जेना देवनागरीक आधारभूत फॉन्टक नाम मंगल आ बांग्लाक आधारभूत फॉन्टक नाम वृन्दा अछि)। मिथिलाक्षरक फॉन्ट लेल तेसर बेर संशोधित आवेदन देल गेल रहए, दोसर आ तेसर आवेदनमे विदेहक योगदानक विस्तृत चर्चा भेल अछि, यथा- [Figure 11: Excerpt from a Maithili e-journal published as PDF (from Videha 2011: 22; Videha: A fortnightly Maithili e-journal. Issue 80 (April 15, 2011), Gajendra Thakur [ed]. http://www.videha.co.in/ ."Gajendra Thakur of New Delhi graciously met with me and corresponded at length about Maithili, offered valuable specimens of Maithili manuscripts, printed books, and other records, and provided feedback regarding requirements for the encoding of Maithili in the UCS."-Anshuman Pandey.] । यूनीकोड पर साहित्य अकादेमीक दिल्ली कथागोष्ठीमे पर्चा वितरण: डॉ. रमानन्द झा रमण जी द्वारा यूनीकोड पर साहित्य अकादेमीक कथागोष्ठीमे पर्चा वितरण कएल गेल। ऐसँ मात्र ई स्पष्ट भेल जे पर्चा लिखिनिहारकेँ नहिये यूनीकोडक विषयमे कोनो जानकारी छन्हि आ नहिये वेस्टर्न वा यूनीकोड दुनू फॉन्टक निर्माण कोनो प्रारम्भिक ज्ञान छन्हि। हँ ऐ परचाक ओइ सभ लोक लेल महत्व छै जे सीखए चाहै छथि जे पूर्वाग्रहपूर्ण आ पक्षपातपूर्ण मैथिली साहित्यक इतिहास कोना लिखल जाए। ऐसँ पहिने चेतना समितिक स्मारिकामे यूनीकोड लेल चेतना समितिक योगदानक चर्चा देखैत छी! तिरहुता यूनीकोड आवेदनकर्ता अंशुमन पाण्डेय जखन पटना गेल रहथि तँ हम हुनका कहने रहियन्हि जे विद्यापति भवनमे शिव कुमार ठाकुरक दोकान छन्हि, ओतऽ सँ अहाँ मैथिलीक किताब कीनि सकै छी, मुदा दू तीन दिन ओ दोकान आ समिति बन्द रहलाक कारण ओतऽ सँ घुरि गेला, बादमे ओतए एक गोटे कहलकन्हि जे सभ दिन अहाँ अबै छी, से ई समिति अखन कमसँ कम १४-१५ दिन आर बन्द रहत कारण दू ग्रुपमे झगड़ा-झाँटी भऽ गेल छै। ई अनुभव लऽ कऽ ओ घुरल रहथि आ से समिति अपन स्मारिकामे यूनीकोड लेल ओ जे योगदान देलक तकर चर्चा करैत अछि! गोविन्द झा जीक पता मँगलापर एक गोट विद्वान् (!) हुनका कहलखिन्ह जे धुर ओ की बतेता, आ गोविन्द झा जीक पता नै देलखिन्ह आ तखन दोसर ठामसँ हुनका पता उपलब्ध करबाओल गेल। सूचना: २. विकीपीडिया मैथिली: मीडियाविकीक २६०० संदेश अंग्रेजीसँ मैथिलीमे विदेहक सदस्यगण द्वारा अनूदित कऽ देल गेल अछि। आब http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate?task=untranslated&group=core-mostused&limit=2000&language=mai ऐ लिंकपर Group मे जा कऽ ड्रॉपडाउन मेनूसँ अ-अनूदित मैसेज अनूदित करू। जँ अहाँ विकीपीडियाक ट्रान्सलेटर नै छी तँ http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator ऐ लिंकपर मैथिलीमे ट्रान्सलेट करबाक अनुमतिक लेल अनुरोध दियौ, ऐ सँ पहिने ओतै ऊपरमे दहिना कात लॉग-इन (जँ खाता नै अछि तँ क्रिएट अकाउन्ट) कऽ आ प्रेफरेन्समे भाषा मैथिली लऽ अपन प्रयोक्ता खाताक लिंककेँ क्लिक कऽ अपन प्रयोक्ता खात पन्ना बनाउ। किछु कालमे अहाँकेँ ट्रान्सलेट करबाक अनुमति भेट जाएत। तकरा बाद अनुवाद प्रारम्भ करू। http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator http://meta.wikimedia.org/wiki/Requests_for_new_languages/Wikipedia_Maithili http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate?task=untranslated&group=core-mostused&limit=2000&language=mai http://incubator.wikimedia.org/wiki/Wp/mai http://translatewiki.net/wiki/MediaWiki:Mainpage/mai सूचना ३: TWITTER IN MAITHILI क्लिक करू: http://translate.twttr.com/welcome आ नीचाँ जाउ [Don't see your language? We're continually reviewing the list of languages we support, and would love your feedback] – फीडबैक क्लिक करू आ मैथिली लेल अधिकसँ अधिक संख्यामे आवेदन करू, कारण सेहो निर्धारित स्थानमे लिखू। विद्यापति पुरस्कार कोषक पुरस्कार मैथिली भाषा, साहित्य, कला संस्कृतिक लेल नेपाल सरकार द्वारा स्थापित सभसँ बड़का राशिक पुरस्कार। विद्यापति पुरस्कार कोषक लेल विभिन्न पाँच विद्यामे २०१२ (२०६८ कातिक १८ गते नेपाल सरकार एक करोड़ रुपैयाक विद्यापति पुरस्कार कोषक स्थापना कएने छल, तकरा बाद र्इ पुरस्कार पहिल बेर देल जा रहल अछि।) दू लाखक नेपाल विद्यापति मैथिली भाषा साहित्य पुरस्कार मैथिलीक वरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र विमलकेँ, एक लाखक नेपाल विद्यापति मैथिली कला संस्कृति पुरस्कार शहीद रंजु झाकेँ, एक लाखक नेपाल विद्यापति मैथिली अनुसन्धान पुरस्कार डा. रामावतार यादवकेँ, एक लाखक नेपाल विद्यापति मैथिली पाण्डुलिपी पुरस्कार साहित्यकार परमेश्वर कापडिकेँ , एक लाखक नेपाल विद्यापति मैथिली अनुवाद पुरस्कार डा. रामदयाल राकेशकेँ देबाक घोषणा भेल अछि। विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपेँ प्रसिद्ध) बाल साहित्य लेल विदेह सम्मान २०१२ श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ हुनकर बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह "तरेगन" लेल देल जा रहल अछि। ई पुरस्कार विदेह नाट्य उत्सव २०१३ क समारोहमे देल जाएत। “तरेगन” केँ सभसँ बेशी वोट भेटलै। तीनटा पोथी १.जगदीश प्रसाद मण्डलक तरेगन, २. जीवकान्तक “खिखिरक बीअरि” आ ३.मुरलीधर झा क “पिलपिलहा गाछ” केँ विदेह www.videha.co.in पर भऽ रहल ऑनलाइन वोटिंगमे राखल गेल छल। विशेषज्ञक मतानुसार “पिलपिलहा गाछ”मे बहुत रास कथा अछि जकरा बाल कथा नै कहल जा सकैए, तइ दुआरे ऐ पोथीकेँ लिस्टसँ हटा देल गेल कारण ई पुरस्कार बाल साहित्य लेल अछि, ओनाहितो ऐ पोथीकेँ सभसँ कम वोट भेटल रहै। ऐ पोथी सभक अतिरिक्त आन पोथी सभपर विचार नै कएल गेल कारण ओ सभ पोथीक आकारक नै वरन् बुकलेटक आकारक छल। टैगोर लिटरेचर अवार्ड २०११ साहित्य अकादेमीक टैगोर लिटरेचर अवार्ड २०११ मैथिली लेल श्री जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ हुनकर लघुकथा संग्रह "गामक जिनगी" लेल देल गेल। कार्यक्रम कोच्चिमे १२ जून २०१२केँ भेल। मैथिली लेल विवादक अन्तक कोनो सम्भावना नै देखबामे आबि रहल अछि। ऐ पुरस्कारक ग्राउण्ड लिस्ट बनेबा लेल एकटा तथाकथित साहित्यकारकेँ चुनल गेल जे प्राप्त सूचनाक अनुसार जातिक आ संकीर्णताक आधारपर पोथीक नाम देलन्हि जइमे नहिये नचिकेताक पोथी रहए, नहिये सुभाष चन्द्र यादवक आ नहिये जगदीश प्रसाद मण्डलक; संगे ई ग्राउण्डलिस्ट बनौनिहार तथाकथित साहित्यकार विदेहक सहायक सम्पादक मुन्नाजीकेँ कहलन्हि जे जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ ऐ जिनगीमे टैगोर साहित्य पुरस्कार नै देल जेतन्हि!। रेफरी जखन ७ टा पोथीक नाम पठेलन्हि तखन ओइमे चन्द्रनाथ मिश्र "अमर"क अतीत मंथन सेहो रहए जखन कि ओ पोथी निर्धारित अवधि २००७-२००९ मे छपले नै अछि, तँ की बिनु देखने पोथी अनुशंसित कएल गेल? ऐ तरहक ग्राउण्ड लिस्ट बनेनिहार आ बिनु पढ़ने पोथी अनुशंसित केनिहार रेफरीकेँ साहित्य अकादेमी चिन्हित करए, आ नाम सार्वजनिक कऽ स्थायी रूपसँ प्रतिबन्धित करए, से आग्रह; तखने मैथिलीक प्रतिष्ठा बाँचल रहि सकत। एतए ईहो तथ्य अछि जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक समन्वयक श्री विद्यानाथ झा विदित अखन धरि ने पुरस्कार भेटबाक सूचने आ ने पुरस्कार लेल बधाइये श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी केँ देलन्हि अछि जखनकि मण्डल जी पुरस्कार लऽ कऽ घुरि कऽ आबियो गेल छथि। संगहि टैगोर साहित्य पुरस्कार मैथिली लेल पहिल बेर श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ देल जएबा सम्बन्धमे दरभंगा आकाशवाणी कोनो प्रकारक सूचना प्रसारित नै केलक आ दरभंगा, मधुबनी आदिक हिन्दी समाचार-पत्र सेहो ऐ सम्बन्धमे कोनो समाचार प्रकाशित नै केलक जखनकि देशक सभ राष्ट्रीय अंग्रेजी पत्र ( http://esamaad.blogspot.in/2012/06/tagore-literature-awards-national-media.html ) एकर सूचना बिनु कोनो अपवादक प्रकाशित केलक। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक, आकाशवाणी दरभंगाक आ दरभंगा-मधुबनीक हिन्दी समाचार पत्रक पत्रकार लोकनिक संकीर्ण जातिवादी चेहरा नीक जेकाँ सोझाँ आबि गेल। मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक असली चेहरा तखन सोझाँ आओत जखन ऐ बर्खक मूल साहित्य अकादेमी पुरस्कारक घोषणा हएत। श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक "गामक जिनगी" मैथिली साहित्यक इतिहासक सर्वश्रेष्ठ लघु कथा संग्रह अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ बधाइ। समानान्तर परम्पराक विद्यापति आ पाग मौर कोढ़िलाक बनैत अछि आ पागसँ फराक अछि। कर्ण कायस्थमे सेहो सिद्धान्त कुमरम आदिमे मात्र पाग पहीरि कऽ विध होइत अछि, ओहो सभ बियाह करऽ पाग नै मौर पहीरि कऽ जाइ छथि। पूर्णियाँक ब्राह्मणमे नव-िवाहिता बरसाइतमे मौर पहीरि कऽ वटवृक्ष धरि जाइ छथि। पाग मात्र आ मात्र मैथिल ब्राह्मणक बियाहक विध-बाधक प्रतीक अछि। विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थमे ठक्कुर विद्यापति कृता लिखल अछि/ आ ओ विद्यापति ब्राह्मण छथि। हमर उद्देश्य मैथिली पदावली बला विद्यापतिसँ अछि, हुनका किए पाग पहिरा कऽ "हम्मर विद्यापति" बना लेल गेल। ई तखन नै भेल जखन बिदापत नाचक माध्यमसँ आठ सए बर्ख गएर ब्राह्मण समुदाय विद्यापतिकेँ जिएने रखलक, मुदा तखन भेल जखन बंगाल विद्यापति आ गोविन्ददासक पदावलीकेँ अपन बना लेलक मुदा बंगालेक विद्वान राजकृष्ण मुखोपाध्याय सर्वप्रथम १८७५ ई. मे कहलन्हि जे विद्यापति मिथिलाक कवि छथि आ बंगालेक नगेन्द्रनाथ गुप्त सर्वप्रथम कहलन्हि जे गोविन्ददास सेहो मिथिलाक कवि छथि आ जखन ई तथ्य सोझाँ उठल तँ पहिने तँ सगर बंगाल हुनकापर मार-मार कऽ उठल आ बादमे मानि गेल। राजकृष्ण मुखोपाध्याय जइ विद्यापतिकेँ मिथिलाक कहने रहथि ओ पदावलीक विद्यापतिक सन्दर्भमे छल, संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरः केँ बंगाल कहियो अपन नै कहने छल। ज्योतिरीश्वरक संस्कृत धूर्तसमागम नाटक आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक गोरक्षविजय नाटक मध्य देल मैथिली गीत सेहो पदावलीक पुरान परम्पराक द्योतक अछि आ ऐ दुनू लेखकपर मैथिली पदावलीक प्रभाव देखबैत अछि। फेर मिथिलाक विद्वानकेँ सोह एलन्हि आ विद्यापतिक संस्कृत-अवहट्ठ ग्रन्थ, गोविन्ददास नाम्ना आ विद्यापति नाम्ना पञ्जीमे उपलब्ध विवरण दऽ विद्यापति ठाकुर आ गोविन्ददास झा (!!!) निकालल गेल, एतऽ रमानाथ झाक पञ्जीक सतही ज्ञान आ सीमित दृष्टिकोण नोकसान पहुँचेलक। फेर अनचोक्के पाग पहिरा कऽ (मिथिला सांस्कृतिक परिषद- ई संस्था भारतक स्वतंत्रताक बाद विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ हुनका ब्राह्मण घोषित करबाक कुकृत्य केलक) विद्यापति (मैथिली बला, संस्कृत बला नै) केँ "हम्मर विद्यापति" ब्राह्मण वर्ग द्वारा बना लेल गेल। मुदा कवीश्वर ज्योतिरीश्वर सन बहुत रास कवि पञ्जीमे उपलब्ध छथि। आ जे नामक अन्तर विद्यापतिमे आबि जाइ छन्हि (जखन कि सभ काज प्लानिंगसँ भेलै तैयो एकटा सबूत बचि गेलै) से ज्योतिरीश्वरमे किए नै अबैए। पूर्णियाँमे ग्रामदेवताक पूजामे हम गेल छी आ राम ठाकुर (भगवान)केँ देवता रूपमे ढेपाबला खेतमे हम देखने छी, कियो जोति देने रहै। मिथिलासँ छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेशमे बरही (काष्ठकार) मिथिलासँ गेला तँ मैथिली भाषी हेबाक कारण लोक हुनका झाजी कहए लागल, आ ओ सभ आब झा टाइटिल रखै छथि। बंगालक मालदह जिलामे ४-५ गाममे मैथिल ब्राह्मणक टाइटिल ओझा छै, आ अलीगढ़मे मैथिल ब्राह्मण (ब्रजस्थ मैथिल)क शर्मा। पञ्जीमे कतेक विद्यापतिक विवरण उपलब्ध अछि, आरम्भक कोनो विद्यापतिमे झा आ ठाकुर नै लागल छै (पता नै रमानाथ झाकेँ कोना भेटि गेलन्हि!): १.पनिचोभ सँ विद्यापतिसुत रमापतिक विवाह विद्यापतिक- माता(देवदासी)-दूषण पंजी २.महो केशवो सुत म.म.पाō गोविन्दा सुता महो लक्ष्मीझनाथ म.म. विद्यापति म.म. दामोदर ३.महामहो विद्यापति गंगोली सँ मानकुढ़ वासी कविराज गणेश्वछर ४.घोसोतसँ म.म. गोविन्दु सुता म. लक्ष्मी धर म.म. विद्यापति ५.राजपण्डित म.म. उ. विद्यापति ६.करमहासँ देवनाथ सुत कवि विद्यापति ७.गुणपति सन्तिति-पठोङगी)।। विद्यापति-पुडरीक-मछदी। केशव-अमरावती।८.।। सिंहाश्रम सँविद्यापति द्दौo भागीरथ सुतौ कुलेश्वेर: ९.सिधूक: ए सुता देल्ह न विश्वभनाथ श्रीनाथा: सिंहाश्रम सँ विद्यापति दौ।। १०.मिश्र जयदेव (७६/०६) सुता नगवाड़ घोसोत सँ महामहोपाध्या:य विद्यापति दौ ११.महामहोपाध्या७य गोविन्दु सुता महामहो लक्ष्मीथनाथा परनामक (२०९/०५) ठकरू मo मo उपाo विद्यापति १२.द्दौo।। एवम् ठo विद्यापति मातृक चक्रं।।१३.महोमहोपाध्या७य विद्यापति सुता अनिरूद्ध अनन्ति अच्युथता: एकहरा सँ काशी दौ १४.सदुoसुपे सुतौ दामोदर: ए सुतौ डालूक: पवौलीसँ गोढि दौ डालू (३४/०६) सुतो विद्यापति १५.सुता शिरू पदम लाखू गादूका: एकहरा सँ श्री कर सुत चान्दस दौ खौआल सँ भूले द्दौo मधुसूदन सुता उमापति (८४/०१) विद्यापति १६.मुसै सुता खौआल सँ डालू सुत विद्यापति दौ भण्डारिसम सँ शुभे द्दौo ठo १७.सोदरपुर सँ छोटाई दौ (२८/०८) बसाउन सुता पशुपति विद्यापति १८.कल्याखण सुता करमहा सँ विद्यापति दौ १९.जालय सँ रामेश्विरसुत महिघर दौ यमुगाम सँ गेणाई द्दौo विद्यापति सुतो भगीरथ: २०.हरखू गोविन्दाघ सकo गुणे सुत विद्यापति दौ सुरगन सँ होरे द्दौo २१.कृष्णगपति सुता मुरारि विद्यापति प्रजापति टकबाल सँ रामकर दौ।।२२.कविन्द्र पदांकित मo मo उo रघुनाथा करमहा सँ विद्यापति दौ २३.सुतो विद्यापति माण्डदरसँ यग्य पति दौ २४.तल्हकनपुर सँ गढ़वय द्दौ. विद्यापति २५.यशु सुतो रविपति रूद्रपति विद्यापति चन्द्रसपति २६.नरउन सँ विद्यापति दौ २७.रविपति सुतो कृष्णूपति विद्यापति घुसौत सँ होरे दौ।। २८.विद्यापति सुता बेलउँच सँराम दौ २९.गुणे सुत गौरीपति विद्यापति लक्ष्मीापति कुलपतिय: दरिo दिवाकर दौ ३०.महिपति झाक मातामह कवि कोकिल विद्यापति ठाकर) दामोदर सुतो पाँसदु. हरिदेव: नरउनसँ माङनि दौ ३१.गणपति सुतो कवि कोकिल राजपण्डित मo मo उपाo विद्यापति: ए सुतौ हरिपति धनपति।। ३२.महामहोपाध्यामय विद्यापतिसुता हृषिकेश ३३.हरपति सुता विद्यापति काशी दामोदरा:३४.रतिपति सुता सोदरo विद्यापति दौ ३५.विद्यापति प्रपौत्र पौत्र हरिश्वार धनेश्व्र सुतो गोन्दूदक पालीसँ ज्ञानदौ।।३६.विद्यापति द्दौ. वेणी सुतो रविनाथ: ३७.सोदरo विद्यापति द्दौo निकार ३८.श्रीपति सुतो विद्यापति परानौ दरिहरा ३९.सोदरo विद्यापति द्दौo मिश्र कमलनयन सुता हरिअम सँ बछाई दौ ४०.रवौआलसँ सोने दौ देवनाथ सुतो कवि विद्यापति पचही सोदरपुरसँ जगन्नातथ दौ ४१.गोपी सुतो विद्यापति वाचस्पवति शीवा हरिअमसँ नारायण दौ।।४२.विद्यापति निधि प्र. धरापतिय: ४३.तरौनी करमहासँ महिधर दौ।।(४६/०३) विद्यापति (१११/०३) सुतो मधुसूदन: ४४.कुलानन्दन हृदयनन्द नो कर. पनाई दौ (१०९//१०६) विद्यापति (३१४/०५) सुता प्रितिनाथ शोभनाथ महिनाथा: ४५.उँमापति सुत विद्यापति सुतो जयपति: ४६.जागू सुता सुरपति हरिपति प्रभापति गिरपति विद्यापतिय: ४७.हचलू सुता हरपति विद्यापति महो ज्ञानपति दिनपति मणिकंठा ४८.कृष्ण७ सुता रमापति श्रीपति रत्नदपति विद्यापति: बूधवाल सँ धीरू दौ।।४९.दाशे सुता दयोरी खण्डतबला सँ गोपीनाथ दौ (८५//०२) विद्यापति सुत जीवनाथ ५०.नरउन सँ विद्यापति द्दौo ५१.धर्माधिक रणिक बाटू सुतो विद्यापति ५२.सोदरपुर सँ गयन दौ विद्यापति सुता रमापति होरिल हररवू जिवाईका माण्ड९र सँ सोढू दौ।। ५३.खौआल सँ रघुनाथ दौ (५४//०७) विद्यापति सुत जानू ५४.टकबालसँ विद्यापति द्दौ मतिनाथ ५५.खण्डईबलासँ विद्यापति सुत जीवनाथ दौ ५६.करमहा सँ विद्यापति द्दौo विश्वनाथ ५७.कृष्णिपति सुतो उँमापति (बo २८/०१) विद्यापति (३०२/०३) पण्डु४आ सँ पाँ भगीरथ दौ ५८.महो हरिकृष्ण सुता खौआल सँ विद्यापति दौ ५९.मधुसूदन सुतो विद्यापति: अलय सँ अनिरूद्ध दौ ६०.माण्डपर सँ देवशर्म्म् द्दौo विद्यापति सुता नरउन सँ बदनी दौ ६१.ठo श्या.म सुतो पुरन्देर परमानन्दोद माण्ड४र सँ विद्यापति दौ ६२.विद्यापति सुता सोदरपुर सँ जयराम ६३.धर्मेश्वरौ खौआल सँ हराई सुत मनोहर दौ रूद सुतो राम: गंगोली सँ देवे दौ विस्फीज सँ कवि कोकिल राज पण्डित मo मo पाo विद्यापति द्दौo राम सुतो भिरवूक: फनन्दोह सँ लोचन दौ पकलिया सँ दिनू द्दौo भिरवू सुतो हराइक: सोदरपुर सँ विर सुत हरिदौ खौआल सँ शुभे द्दौo हराई सुता मोहन मनोहरा कमल नारायणा: सोदरपुर सँ जगन्ना थ सुत भवानी दौ भवानी सुतो हरिदेव सदायकौ हरिअम सँ गोविन्दआ सुत श्रीधर दौ सकo जागे द्दौo मनोहर सुता करमहा सँ रतनपति सुत कृष्णआदाश दौ कृष्णददाश सुता सोदरपुर सँ मधुसूदन सुत सुन्द र दौ (४७//०५) दरिहरा सँ मुशाई द्दौo हरि सुतो प्राणपति: सोदरपुर सँ नारायण सुत ननू दौ (११०//०१) (१०१//०१) नारायण सुतो ननूक: वुधवाल सँ बहुड़ी दौ (१८०/०४) दामोदर सुतो बहुड़ीक: सोदरपुर सँ परमानन्दा सुत कांगव दौ परमानन्दु सुतो कांगव: माण्डहर सँ हलघर सुत पीताम्बार दौ (५८//०५) करमहा सँ श्रीराम द्दौo कांगव सुता करमहा सँ शिवदेव सुत कारम दौ माण्डमर सँ वावू दौहित्र दौo ६४. वावू दुर्गापति सिंह: सुतो वावू विद्यापति सिंह: करमहा सँ हरिनाथ सुत तारानाथ दौ ६५. खौआल सँ युवराज द्दौo बावू विद्यापति सिंह सुतो वावू गिरिजापति सिंह ६६.वावू गंगापति सिंह सुता भेषपति सिंह विद्यापति सिंह ६७.वावू भेषपति सिंह पत्नीआ अन्तगर्जातीय ए सुत हंसपति सिंह: वावू विद्यापति सिंह सुतो रमन कुमार सिंह:६८.बाला सुतो भैया कल्याुणौ खौआल सँ विद्यापति दौ ६९.विश्विनाथ काशीनाथा: अलय सँ विद्यापति दौ ७०.पाठक विद्यापति सुतो दुखमंजन कलरौ आसी एकहरा सँ उँमानन्दत दौ ७१.नरपति सुता कल्यााणपुर विस्फीु सँ सुन्दमर दौ कमलनयन सुत नारायण सुतो सुन्द र: करमहा सँ विद्यापति दौ ७२.मुरारि सुता दामोदर विद्यापति महिघर आनन्दाण:७३.विद्यापति सुता पद्मापति सभापति आदिपति गणपतिय:।। ७४.विद्यापति सुतो छीतू परमानन्दोा माण्ड र सँ नरपति दौ बहेराढ़ी सँ गदाधर द्दौo ७५.अलय सँ कमल सुत नकटू दौ. विद्यापति सुत जीवनाथ सुतो परम: दरि. राम दौ।। ७६.करमहा सँ विद्यापति सुत मधुसूदन दौ ७७.मानी सोदरपुर सँ वाचस्पौति सुत विद्यापति दौ ७८.खण्डुबला सँ वावू दुर्गापति सिंह सुत वावू विद्यापति सिंह दौ ७९.खौआल सँ विद्यापति दौ ठ. मधुरापति सुतो वाछ शिवानन्दसनो८०.सोदरपुर सँ बैद्यनाथ द्दौ. हरिकृष्ण सुता खौआल सँ मधुसूदनसुत विद्यापति दौ ८१.मधुसूदन सुत विद्यापति दौ ८२.दरिहरा सँ रमापति सुत वेणी दौ अलय सँ कृष्णापति सुत विद्यापति द्दौ ८३.अलय सँ विद्यापति द्दौ.॥ ८४.ज्योण. शिवनन्दबन सुतो विद्यापति . ८५.खौआल सँ भवदेव सुत विद्यापति दौ. ८६.पाठक कृष्ण्पति सुतो उषापति विद्यापति . ८७.विद्यापति सुतो दुखभंजन कलरो एकहरा सँ देवानन्दस सुत उँमानन्दि दौ ८८.अलय सँ विद्यापति सुत कलरु दौ ८९.कारु सुता पिताम्बर विद्यापति देवकीमाना का सोदरपुर सँ वैदयनाथ सुत जयि दौ ९०.सुरोइ प्र. शारदानन्द सुता गौरीनन्दसन वाचस्प ति प्र. विद्यापति दिवाकर प्र. मन्दूि रत्नािकर प्र.भ्र. भोलन जी का नग. घुसौत सँ दामोदर सुत उग्रमोहन दौ एकहरा सँ शोभानन्द. द्दौ.९१.खौआल सँ विद्यापति दौ. आब आउ मूल मुद्दापर। हमरा राजपण्डित आ आर कतेक रास धर्माधिकारणिक विद्यापति सभ जैमे एकटा देवदासीक पुत्र सेहो रहथि, केर ब्राह्मण हेबामे कोनो सन्देह नै अछि। हम विद्यापति ठक्कुरः आ कीर्तिलता कीर्तिपताका नै वरन विद्यापति पदावलीक गप कऽ रहल छी। तेँ कोनो ओझरीमे नै रहल जाए।आब आउ गएर ब्राह्मण द्वारा गाओल बिदापत, जे ज्योतिरीश्वरसँ पूर्व (सम्भवतः ) नौआ ठाकुर जातिमे भेल रहथि आ तकर प्रमाण ज्योतिरीश्वर द्वारा वर्णन रत्नाकरमे ऐ कविक चर्चा अछि। विद्यापतिक कोनो पदावलीक रचनामे अपन संस्कृत/ अवहट्ठ लेखक हेबाक चर्च नै केने छथि। मुदा हुनकर रचना (संस्कृत आ अवहट्ठक विरुद्ध, जे दोसर विद्यापतिक रचना छी, जे ब्राह्मण रहथि) सर्वहाराक लेल जे दर्द अछि से संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिमे किए नै अछि? संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति तँ सर्वहारासँ घृणा करै छथि आ लिखित रूपमे कट्टर ब्राह्मण छथि। मुदा पदावलीक विद्यापति तँ निश्छल छथि, किछु कट्टर पद कट्टर ब्राह्मणवादी सम्पादक लोकनि द्वारा घोसोआओल गेल अछि (हास्यास्पद रूपमे)। पिआ देसान्तर (विद्यापतिक बिदेसिया)क कन्सेप्ट आब सुधीगणक समक्ष अछि आ मैथिल बिदेसिया लोकनिक वर्तमान दुर्दशाक बीच ई महाकवि विद्यापतिक प्रति ससम्मान अर्पित अछि। की ई दर्द अवहट्ठ आ संस्कृतक विद्यापतिमे छन्हि? पदावली एकटा पैरेलल संस्कृतिक द्योतक अछि। एक्के समयमे संस्कृत आ अवहट्ठ एक्के लेखक लिख लेत, ओकरा कष्ट छै जे अवहट्ठमे लिखलापर विद्वान ओकर उपहास करै छथि, मुदा ई दर्द की एकर लेशोमात्र पदावलीक विद्यापतिमे छन्हि? ओतए तँ उल्लास आ दर्द छै, सर्वहाराक उल्लास आ दर्द। ओ विद्यापति जे संस्कृत आ अवहट्ठ मे लिखलन्हि ओ राजपण्डित छला से विद्वान रहथि, हुनका अवहट्ठोमे लिखलापर लोक निन्दा करन्हि। मुदा मैथिलीक विद्यापति जे पैरेलल परम्पराक अंग छथि, ओइसँ दूर छला। ई पैरेलल परम्परा ऋगवेदक समयसँ छै (ओइ समयमे नाराशंसी रहै)। ई पैरेलल परम्पराक विद्यापति नौआ ठाकुर जातिक रहबे करथि, वा ब्राह्मण जातिक रहबे करथि, से इतिहास ओइपर मौन अछि। मुदा लोककथा आ परम्परा, बिदापतक सर्वहारासँ सघन सम्बन्ध, बिस्फीक परम्परा हुनका गएर ब्राह्मण सिद्ध करैए। संस्कृत आ अवहट्ठक कोनो पाँति नहिये ओइ विद्यापतिक पदावलीक चर्चा करैए आ नहिये पदावली, पदावलीक विद्यापतिक संस्कृत वा अवहट्ठ केर रचनाक चर्चा करैए। संस्कृत आ अवहट्ठ मुस्लिम आक्रमणक, जनौ आ मन्दिर भ्रष्ट हेबापर दुखी अछि मुदा पदावली तँ सर्वहाराक हर्ष, उल्लास आ संघर्ष अछि; ओइ तरहक हाक्रोस ओतए नै, हुनका समएमे तँ प्रायः मुस्लिम मिथिलामे रहबो नै करथि।आ जखन मैथिलीबला विद्यापति ब्राह्मण रहबो करथि वा नै तहीपर सवाल अछि तखन पाग पहिरा कऽ कोन सोच हम सभ पैदा कऽ रहल छी, "विद्यापति" हम्मर छलाह की नै? की विद्यापतिक ब्राह्मण नै रहलासँ ओ हमर नै हेताह? की हुनकर "पिआ देशांतर" बला माइग्रेशन बला गीत महत्वहीन भऽ जेतै? की हुनकर शृंगारिक गीतक मात्र चर्चा कोनो षडयंत्र तँ नै? विद्यापति सन कविकेँ पाग पहिरा कऽ जातिगत बन्धनमे बान्हब कतेक सही अछि? "मध्यकालीन मिथिला"मे विजय कुमार ठाकुर लिखै छथि: "मिथिलाक धार्मिक क्षेत्रमे एहि सामन्तवादी युगीन धार्मिक विचारधाराक प्रभाव एहन सर्वव्यापी छल जे एखनहुँ एहि परम्पराक निम्नलिखित अवशेष समाजमे विद्यमान अछि: ...(घ) पाग सेहो तांत्रिक विचारधारासँ सम्बद्ध अछि।" (पृ.२६) तँ ईहो तंत्र मंत्र बियाह उपनयन धरि ने रहए दियौ। किए ओइ पैरेलल परम्पराक विद्यापतिकेँ ओइमे सानै छियन्हि। महाकवि विद्यापति- कवीश्वर ज्योतिरीश्वर(लगभग १२७५-१३५०)सँ पूर्व (कारण ज्योतिरीश्वरक ग्रन्थमे हिनक चर्च अछि), मैथिलीक आदि कवि। संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरःसँ भिन्न। सम्भवतः बिस्फी गामक नौआ ठाकुर श्री महेश ठाकुरक पुत्र (परम्परा अनुसार)। समानान्तर परम्पराक बिदापत नाचमे विद्यापति पदावलीक (ज्योतिरीश्वरसँ पूर्वसँ) नृत्य-अभिनय होइत अछि। विद्यापति ठक्कुरः १३५०-१४३५ विषएवार बिस्फी-काश्यप (राजा शिवसिंहक दरबारी) आ संस्कृत आ अवहट्ठ लेखक। कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, गोरक्षविजय, लिखनावली आदि ग्रंथ समेत विपुल संख्यामे कालजयी रचना। ई मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)सँ भिन्न छथि। बोधि कायस्थ: विद्यापति ठक्कुरःक पुरुष परीक्षामे हिनक गंगालाभक कथा वर्णित अछि। महाकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व मैथिली पदावली सभक लेखक) क विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित आ बादमे विद्यापति ठक्कुरक (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक) विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित भेल। उगना महादेव: महादेव (उगनारूपी) विद्यापतिक ऐठाम गीत सुनबा लेल उगना नोकर बनि रहै छलाह। मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व) आ विद्यापति ठक्कुरः (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक आ राजा शिवसिंहक दरबारी) दुनूसँ सम्बद्ध कऽ उगनाक ई कथा प्रसिद्ध भेल। विदेह द्वारा मैथिली पोथी प्रदर्शनी १. ‘विदेह’क पहिल मैथिली पोथी-प्रदर्शनी, दिनांक- २७.०९.२००९ स्थान- नई दिल्ली स्थित श्रीराम सेन्टरक प्रेक्षागृहमे। अवसर- ‘जल डमरू बाजे’ नाटक-मंचन। २. ‘विदेह’क दोसर मैथिली पोथी-प्रदर्शनी, दिनांक- ०३.०४.२०११ स्थान- रामानन्द युवा क्लब, जनकपुरधाम, नेपाल। अवसर- ‘सगर राति दीप जरय’क ६९ म कथा गोष्ठी। ३. ‘विदेह’क तेसर मैथिली पोथी-प्रदर्शनी, दिनांक- १२.०६.२०१० स्थान- कबिलपुर, लहेरियासराय, दरभंगा। अवसर- ‘सगर राति दीप जरय’ ७० म कथा गोष्ठी। ४. ‘विदेह’क ४म मैथिली पोथी-प्रदर्शनी, दिनांक- ०२.१०.२०१०, स्थान- बेरमा (तमुिरया) जिला- मधुबनी। अवसर- सगर राति दीप जरयक ७१म कथा गोष्ठी। ५. ‘विदेह’क ५म मैथिली पोथी-प्रदर्शनी, दिनांक- दुर्गापूजा- २०१० स्थान- बेरमा (तमुिरया), जिला- मधुबनी। ४ दिवसीय प्रदर्शनी। ६. ‘विदेह’क ६अम मैथिली पोथी-प्रदर्शनी, दुर्गापूजा- २०१० स्थान- घोघरडीहा (मधुबनी) दुर्गापूजाक मेला परिसर। ७. ‘विदेह’क ७म मैथिली पोथी-प्रदर्शनी, दुर्गापूजा-२०१०, स्थान- हटनी (मधुबनी) दुर्गापूजाक मेला परिसर। ८. ‘विदेह’क ८म मैथिली पोथी-प्रदर्शनी, दिनांक- ०४.१२.२०१० स्थान- व्यपार संघ भवन, सुपौल। अवसर- सगर राति दीप जरयक ७२म कथा गोष्ठी। ९. ‘विदेह’क ९म मैथिली पोथी-प्रदर्शनी, दिनांक- ०५.१२.२०१० स्थान- महिषी (सहरसा) अवसर- सगर राति दीप जरयक ७३म कथा गोष्ठी। १०. ‘विदेह’क १०म मैथिली पोथी-प्रदर्शनी, दिनांक- ०९.०७.२०११ स्थान- अशर्फीदास साहु समाज महिला इंटर महाविद्यालय परिसर- निर्मली (सुपौल), अवसर- सामानांतर साहित्य अकादमी मैथिली कवि सम्मेलन-२०११ ११. ‘विदेह’क ११म मैथिली पोथी-प्रदर्शनी, दिनांक- ०२ नवम्बर २०१० स्थान- एस.एम. पब्िलक स्कूल परिसर झिटकी-वनगामा (मधुबनी), अवसर- स्कूल वार्षिकोत्सव। १२. ‘विदेह’क १२म मैथिली पोथी-प्रदर्शनी, दिनांक- सरस्वती पूजा- २०११, स्थान- चनौरागंज (मधुबनी), अवसर- सरस्वती पूजा नाट्य उत्सव- २०११ १३. ‘विदेह’क १३म मैथिली पोथी-प्रदर्शनी, दिनांक- १०.०९.२०११ स्थान- हजारीबाग (झारखण्ड), अवसर- सगर राति दीप जरयक ७४म कथा गोष्ठी। १४. ‘विदेह’क १४म मैथिली पोथी-प्रदर्शनी, दिनांक- दुर्गापूजा-२०११ स्थान- बेरमा (मधुबनी) ४ दिवसीय प्रदर्शनी। १५. ‘विदेह’क १५म मैथिली पोथी-प्रदर्शनी, दिनांक- ०२.११.२०१० स्थान- उच्च विद्यालय परिसर- खरौआ जिला- मधुबनी। अवसर- महाकवि लालदासक १५५म जयन्ती समारोह। १६.विदेहक १६म मैथिली पोथी प्रदर्शनी १०-११ दिसम्बर २०११ केँ ७५म सगर राति दीप जरएक अवसरपर , १० दिसम्बर २०११ केँ साँझ ६ बजेसँ शुरू भेल, स्थान-कॉपरेटिव फेडेरेशन हॉल, निकट म्यूजियम, पटनामे शुरू भेल आ ११ दिसम्बर २०११क भोर ८ बजे धरि चलल। १७.१७म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी:- २२-२४ दिसम्बर २०११ केँ गुवाहाटीमे। २२-२३ दिसम्बर २०११ केँ प्राग्ज्योतिष आइ.टी.ए. सेन्टर, माछखोवा, गुवाहाटी- ७८१००९ (२२ दिसम्बर २०११ केँ ४ बजे अप्राह्णसँ ९ बजे राति धरि आ २३ दिसम्बर २०११ केँ ११ बजे पूर्वाह्णसँ ३ बजे अपराह्ण धरि आ २३ दिसम्बर २०११ केँ फेर ५ बजे अपराह्णसँ देर राति धरि) आ २४ दिसम्बर २०११ केँ भोरसँ राति धरि स्थान- रूम संख्या २१७, होटल ऋतुराज, माछखोवा, गुवाहाटीमे। अवसर मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समितिक आयोजित "अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन" आ "आठम मिथिला रत्न सम्मान समारोह" ( २२ दिसम्बर २०११) आ "विद्यापति स्मृति पर्व समारोह" (२३ दिसम्बर २०११) । १७म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी ग्राहकक आग्रहपर एक दिन लेल (२४ दिसम्बर २०११ केँ ) बढ़ाओल गेल। १८.१८म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी-तिथि १४ जनवरी २०१२ स्थान- अशर्फीदास साहु समाज महिला इंटर महाविद्यालय परिसर- निर्मली (सुपौल), अवसर- समानांतर साहित्य अकादमी मैथिली साहित्य उत्सव- सह विदेह सम्मान समारोह (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार) १९.१९म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी- २७ जनवरी २०१२ (शुक्र दिन), अवसर स्थानीय कवि परिषद (सलहेस बाबा परिसर- औरहा, प्रखण्ड- लौकही)क चारिम वार्षिकोत्सव- २०१२ २०.२०म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी- जे.एम.एस. कोचिंग सेन्टर , चनौरागंज, झंझारपुर, जिला-मधुबनी, अवसर विदेह नाट्य उत्सव २०१२ दू दिन दिनांक २८.०१.२०१२ आ २९.०१.२०१२ २१. २१म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी (अवसर बीसम नव दिल्ली विश्व पुस्तक मेला २०१२ जखन भारतीय सिनेमाक सए बर्ख, दिल्लीक राजधानी रूपमे सए बर्ख आ रवीन्द्रनाथ टैगोरक १५०म जयन्ती संगे पड़ि रहल अछि, एकर आयोजक रहैत अछि नेशनल बुक ट्रस्ट, भारत, सौजन्य अंतिका प्रकाशन) २५ फरबरी २०१२ सँ ०४ मार्च २०१२,प्रतिदिन भोर ११ बजेसँ ८ बजे राति धरि, स्थान- अंतिका प्रकाशन , स्टाल ८०-८१, हॉल ११, प्रगति मैदान, २०म नव दिल्ली विश्व पुस्तक मेला २०१२ नव दिल्ली। ई विश्व पुस्तक मेला दू सालमे एक बेर होइत अछि आ ४० साल पहिने १९७२ ई. मे एकर पहिल आयोजन भेल छल। सम्पादकीय: शिव कुमार झा “टिल्लू” बहिरा नाचए अपने ताल प्रस्तुत शीर्षक हमर कोनो अपन रचनात्मक क्रियाशीलता नै बाल-कालमे “मिथिला मिहिर” पढ़ैत छलौं। साप्ताहिक मिहिरक सभ गोटे अंकमे ऐ शीर्षकसँ एकटा स्थायी स्तंभ छपैत छल। बड़ बेथा भऽ रहल अछि जे भारत वर्षक प्रमुख भाषा सभ आगाँ बढ़ि रहल अछि आ हम सभ अपनामे ओझाराएल छी। जौं आत्मीय भऽ कऽ धियान देल जाए तँ सामाजिक स्ांरचनाक मध्य सामंजस्य होइछ। सनातन संस्कृतिमे “जाति”क विभेद बेशी रहल मुदा सभ वैदिक संस्कारमे अछोपक महतकेँ सेहो नकारि नै सकै छी। हमरे पूर्वज लिखने छथि “कर्म प्रधान विश्व करि राखा” प्राचीन भलमानुष शब्देटा मे सही एकरा स्वीकार तँ कएलनि। तँए सभकेँ जातिसँ अपन उठि कऽ सोचबाक चाही। आन जातिकेँ के कहए मिथिलामे तँ ब्राह्मणोक मध्य बड़का विभेद छै, जौं ई विभेद मात्र वैवाहिक संस्कार धरि सीमित रहितै छल तँ येन-केन प्रकारेण स्वीकार्य, मुदा “पिपरी” जे हमर भोज्य संस्कृतिक विशेष चिन्ह थिक ओकरो देबएमे बड़ भारी खाधि भऽ गेल छै। अन्तर्द्वन्द्व मात्र एतबे धरि नै, भलमानुष वर्गक कोनो कवि तँ एतए धरि लिखने छथि- अड़ड़िए कोदड़िए आ मुसवरय, ई मरय तँ मैथिलक पाप टरय अरड़िए मैथिल ब्राह्मणक एकटा मूल होइछ, ऐ श्रेणीक ब्राह्मण दड़िभंगा जिलाक “नेहरा” आ समस्तीपुरक “भिड़हा” गाममे भरल छथि। वएह नेहरा जकरा कहियो “मिथिलाक पेरिस” कहल गेल अछि। आब कहल जाए “मैथिल” ऐ दोहामे कवि ककरा मनने छथि? मात्र श्रोत्रिय, भलमानुष आ उच्चमूलक जयवार ब्राह्मण। जौं एहेन कवि लेल आन ब्राह्मणो अछोप तँ आन जातिकेँ की कहल जाए? विद्यापति स्मृति पर्व समारोह वा कोनो मंच हुअए, हास्यपर थपड़ी बजएबाक लेल ऐ प्रकारक दोहा मिथिलाक पहिचान मानल जाइत रहल अछि- रैनी भैनी ओ रौतिनियाँ दीप गोधनपुर कैथिनियाँ पाँच गाम पचही परगन्ना उत्तम गाम ननौर तेली सूरी बसए मधेपुर लंठक ठठ्ठ लखनौर’ जौं मधुबनी जिलाक मात्र ऊपर िलखल किछुए गाम भलमानुषक गाम तँ गोपेश, सरस, गजेन्द्र वा आनंद भलमानुष नै? समस्तीपुर जिलामे भलमानुषक तात्विक विवेचन तँ आर विचित्र ढंगे कएल गेल अछि- “श्रोत्रिय सलमपुर रानी टोल किछु घर टभका आर सभ चोर” धन्यवाद देबाक चाही एहेन प्रसंगक व्याख्याताकेँ जे ई बिसरि गेल छथि जे “चोर”क कोनो जाति नै होइ छै, ओ तथाकथित भलमानुषक परिवारमे सेहो जन्म लऽ सकै छथि वा लै छथि। केओ नै सोचलथि जे हरिवंश तरूण सन प्रांजल साहित्यकार मात्र एक्केटा मैथिली रेडियो नाटक “उगना रे मोर कतए गेलैं” किए लिखलथि? एक बेर समस्तीपुरक लब्धप्रतिष्ठ शल्य चिकित्सक डॉ. आर.पी. मिश्रा हिन्दुस्तान दैनिकमे अपन आलेखमे लिखने छलाह जे अधिकार देबए काल हमरा सभकेँ दछिनाहा कहल जाइत अछि तखन मैथिलीकेँ आगाँ बढ़एबाक आशा हमरासँ किए करै छथि? फणीश्वरनाथ रेणु, पोद्दार रामावतार अरूण सन रचनाकारकेँ केओ मैथिलीमे लिखबाक प्रेरणा किए नै देलकनि? गजेन्द्र ठाकुर, उमेश मण्डल आ शिवकुमार झा सन साधारण लोक समाजक सभ वर्गक रचनाकारकेँ प्रोत्साहित कऽ सकै छथि तँ प्रवीण साहित्यकारसँ की हमर आश रखनाइ अपराध? भुवनेश्वर सिंह भुवनकेँ अर्न्तमनसँ श्रद्धांजलि दै छियनि जे एकटा हिन्दीक महाकवि आरसी प्रसाद सिंहकेँ मैथिलीमे लिखबाक प्रेरणा देलनि। जखन समस्तीपुरमे मैथिलीक अस्तित्वक रक्षार्थ आन्दोलन होइत अछि तँ डाॅ. नरेश कुमार विकल सभसँ आगाँ रहै छथि। १९६०-७० मे हिनक कविता सभ मिथिला मिहिरमे छपैत छल तखन मैथिली साहित्यक इतिहासमे डॉ. दुर्गानाथ झा श्रीश हिनक नाओं किए नै देलन्हि आ रामदेव झा साहित्य अकादेमीक कथा संचयनमे हिनकर कथा किए नै लेलन्हि? हमर कहब ई नै जे सबहक दृष्टिमे सभ लोक रहिते छथि, मुदा जौं आत्मीय भऽ कऽ सोचल जाए तँ सभ प्रश्नक समाधान छै। “मिथिलामे रहनिहार सभ लोक मैथिल” ई उल्लेख सभ मंचपर कएल जाइत अछि। ऐ तरहक उल्लेखसँ भ्रम उत्पन्न भेनाइ स्वाभाविक। जेना अपना चारि बेटामे सँ कोनो बेटाकेँ बेर-बेर माए कहै छथि जे “तोँ हमरे बेटा छेँ।” तँ ओइ पुत्रक दिमागमे निश्चित उत्पन्न हएत जे शायद हम दोसर नारीक पुत्र छी। मैथिली आर्य परिवार समूहक पहिल भाषा थिक जेकरापर जातिवादी कलंक लागल अछि। ऐ भाषाकेँ ब्राह्मणवादी प्रवृतिसँ झाँपि देबाक विरोध आवश्यक भऽ गेल। जखन लालूजी बी.पी.एस.सी.सँ एकरा बाहर केलनि तँ मात्र किछु चानन-ठोपधारी धरि एकर विरोध सीमित रहि गेल छल। ई प्रश्न विचारणीय अछि जे बिलट पासवान विहंगम, महेन्द्र नारायण राम, प्रो. रवीन्द्र चौधरी आ डॉ. मोतीलाल यादव सन किछु विद्वतकेँ छोड़ि आन जातिक लोकक मध्य मैथिलीक प्रति दर्द किए नै भेल छल। कोना हेबो करितए? जखन साहित्यो अकादेमी सलाहकार बोर्डक अध्यक्ष पहिने डॉ. रामदेव झा तकर बाद हुनक ससुर चन्द्ररनाथ मिश्र ‘अमर’क पश्चात रामदेव झाक समधि विद्यानाथ झा विदित, तखन आन जातिकेँ के कहए ब्राह्मणोमे विरोधाभास संभव छै। माल महराजक िमर्जा खेलए होली। साहित्य अकादेमी देशक जनताक ऊपर लागल कर (टेक्स) सँ चलैत अछि। भातसँ सन्ना भारी, मिथिलामे ब्राह्मणक आबादी मात्र पाँचसँ छओ प्रतिशत आ संपूर्ण मैथिलीपर हुनके अधिकार। अहूमे किछु पागधारी ऐ साहित्यिक मंचकेँ पँजियौने छथि। मैथिली गाममे रहिनिहार आम लोकक भाषा थिक। जखन मिथिला राज्यक बात होइत अछि तँ बेगूसराय के कहए हम सभ बाँका धरि चलि जाइ छी मुदा जौं अधिकारक गप तँ समस्तीपुर आ मधेपुरा आदिक ब्राह्मणो सभ भदेसक मानल जाइ छथि। ओना भदेसक ब्राह्मणमे सँ किछु साहित्यकार जेना सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, मार्कण्डेय प्रवासी, कीर्ति नारायण मिश्र सन किछु लोक सम्मानित कएल गेल छथि किएक तँ ओ सभ दरभंगा आ पटनाक बीच झुलैत उत्तरबरिया संस्कारिक लोकक विदूषक रहलाह। ऐ बेरक साहित्य अकादेमी पुरस्कार तँ निर्लज्जताक पराकाष्ठाकेँ पार कऽ देलक। वर्तमान मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्यकार जगदीश प्रसाद मंडलक नाओं निर्णायक मंडल धरि नै पहुँचल। उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ आ सुभाष चन्द्रय यादवपर भारी पड़ि गेलाह चन्द्रनाथ मिश्र अमरक चेला उदयचन्द्र झा विनोद, कहिया धरि एना चलैत रहत? गलती पछातिक साहित्यकार अथवा दछिनाहा ब्राह्मण साहित्यकारो सबहक छन्हिप। अपने पाग पहिर ई बिसरि जाइ छथि जे जइ समाजक ओ प्रतिनिधित्व करै छथिन ओ कहियो हुनका माफ नै करतनि। पाग मात्र ब्राह्मण आ कर्ण-कायस्थ परिवारक सकल मंगलकार्यमे पहिरल जाइत अछि। आन जातिक मध्य एकर कोनो प्रयोजन वा परंपरा नै। तखन मिथिलाक सभटा साहित्यिक समारोहमे पाग पहिरेबाक प्रथाकेँ की मानल जाए? चाटुकार ब्राह्मण साहित्यकार ऐ प्रथा द्वारा की प्रमाणित करबए चाहै छथि जे मैथिली मात्र ब्राह्मणेटा केर भाषा थिक? गलती किछुए लोक करैत अछि आ दोष सम्पूर्ण समाजपर मढ़ल जाइत अछि। ब्राह्मणोमे स्व. गोपालजी झा गोपेश, स्व. कालीकान्त झा ‘बूच, स्व. चतुरानन मिश्र, श्री सत्यनारायण झा, डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र, डॉ. विद्यापति झा आ स्व. प्रो. रामकृपाल चौधरी ‘राकेश’सन रचनाकारक संग न्याय नै भेल किएक तँ ओ सभ ऐ चाटुकार मंचक सदस्य नै छलथि वा छथि। तँए समन्वयवादी ब्राह्मण साहित्यकारकेँ ऐ गिरगिटिया लोक सभसँ मैथिलीक रक्षा करए पड़तनि। हम साहित्यमे आरक्षणक समर्थन नै करैत छी मुदा सबहक प्रति सम्यक भाव रखबाक चाही। विगत १० समारोहसँ सगर राति दीप जरयमे मैथिलीक साम्यवादी प्रांजल साहित्यकार जगदीश प्रसाद मंडल भाग लऽ रहल छथि मुदा गोधूलि बेलामे प्रारम्भ होमएबला ऐ कथागोष्ठीमे हुनका कथा-पाठक आइ धरि रातिक १ बजेसँ पहिने अवसर नै देल गेल अछि। कवि राजदेव मंडल, मेघन प्रसादकेँ अनुवादक कोनो एसाइनमेंट नै भेटलनि। हम विश्वासक संग कहै छी जे राजदेव मंडल, मेघन प्रसाद आ दुर्गानंद मंडल खुशीलाल झासँ श्रेष्ठ अनुवादक सिद्ध हेताह। डॉ. रवीन्द्र चौधरी मोहन भारद्वाजसँ श्रेष्ठ आलेख लिखै छथि। बेचन ठाकुर आ डॉ. उदय ना. सिंह नचिकेता महेन्द्र मलंगियासँ नीक नाटककार छथि। डॉ. शेफालिका वर्मा उषाकिरण खानसँ श्रेष्ठ महिला रचनाकार छथि। आनंद कुमार झाकेँ जे सम्मान देल गेल तेकर हम समर्थन करैत छी। परंच जौं ओ आनंद पासवान वा आनंद मंडल रहितथि तखन ई संभव छल? जौं आधुनिक पीढ़ीक लोक ऐ कु-बेबस्थाक विरोध नै करताह तँ संभव अछि जे हमर स्वर्गीय पिता कालीकांत झा ‘बूच’क कविताक ई पाँति सत्य प्रतीत भऽ जाए- “दिवस निकट ओ आबि रहल अछि हेती मैथिली सभसँ कात...।” ओना ऐ ब्राह्मणवादी सोचबला किछु संस्थाक सम्यक कार्यक सराहना करब सेहो आवश्यक। जेना मिथिला सांस्कृतिक परिषद जमशेदपुरक वार्षिक कलेण्डरमे पागबला संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक संग-संग लोकदेव सलहेसक फोटो देखि नीक लागल। ऐ लेल प्रो. अशोक अविचल आ प्रो. रवीन्द्र चौधरीक संग-संग श्री एस.एन. ठाकुर आ सम्पूर्ण परिषद् धन्यवादक पात्र छथि। ऐ प्रकारक समन्वयवादी सोचकेँ शतश: नमन। अंतमे, हमर आग्रह यएह जे सम्यक दृष्टिकोण राखब अनिवार्य नै तँ मुख्य धार सुखा जाएत आ समानांतर धार बहबे करत। डा. अरुण कुमार सिंह उजड़ैत गाम : बसैत शहर? की कहू, बहुत दिन पर १ जून २०१२ केँ महावीर हास्पीटल गेल रही। हास्पीटल की गेलौं, मित्र मंडली संग कोशी कात जएबाक अवसर परि लागि गेल। अवसरो एहन जे नागो बाबू सेक्रेटरीक नातिक जन्म-दिन पटनासन शहरकेँ छोड़ि कोशीक कछेरपर बसल ‘बलुआहा’ आ पूर्वी तटबन्धक कातमे स्थापित महिषी प्रखंडक एकलौता कॉलेज, माने शिक्षकक, छात्रक, समाजक कॉलेज नै अपितु सेक्रेटरीक वैयक्तिक सम्पत्ति, मे मनाओल जा रहल छल। ऐ अवसरपर शिक्षित आज्ञाकारीक फौजमे हमहूँ समाहूत छलौं। जहिना ओइ ठाम पहुँचलौं कि सेक्रेटरीक नजरि हमरापर पड़तहि कहि उठलाह, “ओ अरूण बाबू! कहिया एलौं, खोजो-खबरि नै रखैत छी। अपने तँ मैसूर जाएकेँ हमरा सभकेँ बिसैरिए गेलौं। आब हम हिनका सभक लेल कतेक खटू। आब हमरो उमैर भेल। अहाँ तँ जनितै छिऐ, जे काज टाकासँ हेतै ओ तँ टकै करतै ने। देखियौ ने टाकाक अभावमे कॉलेजक छतक ढलाइ रूकल अछि आ एकटा बात बुझलौं कि नै, ऐ बेरसँ फस्ट पार्टमे एडमिशन सेहो हएत।” तखने हुनक नाति आबि कहैत छनि जे- “नानाजी हमरा पैसाब लागल अछि, हम कतए पैसाब करब, ऐ ठाम कतौ बाथरूम कहाँ देखै छिऐ? तइपर ओइ ठाम जमकल बैसल एम. ए. पास सभमे सँ केओ बाजि उठलाह- ‘एतेकटा फील्ड अछि, कतौ अहाँ पैसाब कए लिअ।’ ओ बच्चा कनेक काल चुप रहल आ सोचैत बाजि उठल- ‘एना कतौ खूजलमे बाथरूम कएल जाइ छै, जँ इन्फेक्शन भए जाएत तँ?’ नामी-गिरामी विश्वविद्यालय सभसँ प्राप्त डिग्रीधारीक लेल ऐ प्रश्नक कोनो उत्तर नै छल। अच्छा छोड़ू, हमहूँ कोन फेरामे फँसि गेलौं, आधुनिकता, वैज्ञानिकता एवं प्रकृति-परंपरामे ओझराएल जा रहल छी। अखन जन्म-दिनक केक कटबामे एवं मासुक भोजमे बिलम्ब छल। भगवान जी, अरबिन्द जी, प्रांजल भाइजी एवं विजय जीक विचार भेल जे किऐ नै ऐ बीचक समयमे कोशीपर बनैत पुल देखल जाए। सभ गोटे ए.सी. सँ सुसज्जित गाड़ीमे बैसि कोशी बान्ह दिस बिदा भेलौं जे कॉलेजसँ मात्र एक किलोमीटरपर छल। ‘बलुआहा’ बाजारमे ओ लोकनि अपन-अपन पसिन्नक हिसाबसँ खएबा-पिबाक लेल वस्तु-जात किनैत गेलाह। गाड़ीकेँ बान्हपर लगा सभ गोटे ओतुका दृश्य एवं बनैत पुलक कार्य केर गतिशीलताक आनन्द खाइत-पीबैत लेब प्रारंभ कएल। ऐ ठाम हम एकटा बात कहि दी जे विजय जी, जे अपन पंचायतक प्रधान (मुखिया) सेहो रहि चुकल छथि, सहरसा जिलाक महिषी प्रखण्डक सभसँ पैघ जमींदार स्व. गंगा बाबूक एकलौता पुत्र थिकाह। करीब सतरह वर्ष पहिने प्रो. (डॉ.) सुभाषचन्द्र सिंह (मैथिली प्राध्यापक, ए.एन.कॉलेज, पटना) जीक आवास बहादुरपुरमे हुनकासँ परिचय भेल छल एवं परिचय आत्मीयतामे परिवर्त्तित भेलोपरांत ओ कहने छलाह, कहियो अहाँ हमर गाम चलू; हम अहाँकेँ कोशी नदीमे नाहपर बैसा झिलहरिक संग कोशीक ओइ पारक अपन कचहरी (कामत, बासा) देखाएब। समय सापेक्ष नै भेलाक कारणेँ एहन संभव नै भए सकल छल। मुदा आइ कोशी बान्हपर गप्पक क्रममे ओतेक वर्ष पहिलुका बात चलि पड़ल। ओ बाजि उठलाह- ‘अरूण जी आब हमर कचहरीपर चारि चक्का चलि जाइत अछि।’ हम ई सुनि विस्मित तँ भेबे केलौं, अविश्वसनीयता सेहो हुलकी मारि रहल छल। बान्हेपर सभ गोटेक विचार भेल जे तेसर दिन हम सब कोशीक ओइ पार कचहरीपर जाएब एवं ओइ ठाम दिन-रातिक भोजन कए रातिएमे आपस भए जाएब। विजय जी ओतैसँ मोबाइलक माध्यमे अपन कचहरीक मैनेजरकेँ बीस-पच्चीस गोटेक दिनुका एवं रतुका भोजनक व्यवस्था करबाक लेल आवश्यक निर्देश दए देलन्हि। पछाति हम सभ कॉलेज आबि भोजनोपरांत सहरसा घुरि गेलौं। पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमक अनुसारेँ कोशीक पुबरिया एवं पछबरिया धारक बीच अवस्थित झारा पंचायतक शिशौना गाम जएबाक जे तिथि निश्चित छल ओकरा प्रति हम कनेक उदासीन छलौं, किएक तँ सूर्य भगवानक प्रकोपक कारणेँ प्रचण्ड गरमीमे घरसँ बहराएब लू केँ आमंत्रण देब सन छल। की कहू! निर्धारित तिथिकेँ फोनक घंटी बाजब प्रारंभ भए गेल एवं हमरो जाइए पड़ल। सहरसासँ जाइबलाक लेल दूटा ए.सी. युक्त स्कारपियो लागल एवं हम सभ ओइमे सबार भए बिदा भए गेलौं ‘उजड़ैत गाम आ बसैत शहर’क वास्तविकताक अवलोकनार्थ। ए.सी. युक्त गाड़ी एवं ठण्ढा पेय पदार्थक कारणेँ यात्रामे कोनो बेसी तकलीफ नै भए रहल छल। हम सभ बलुआहामे कोशीपर बनैबला पुल टपि ओइ पार शिशौना गाम दिस बढ़लौं। ओइ पंचायतक प्रधान (मुखिया) श्री अरूण यादव जनिक पैतृक गाम शिशौने छनि, सेहो हमरा सभक स्वागतार्थ एवं रस्तामे कोनो तरहक तकलीफ नै हुअए, तइ लेल हमरा सभक संग छलाह। कामतपर शीघ्रातिशीघ्र पहुँचबाक लेल सड़क मार्गकेँ छोड़ि कोशी नदीक काते कात गाड़ी बढ़ए लागल। बाढ़ि अएबासँ बहुत पहिनहि कोशीक कटनियाँ एवं ओइसँ उपटैत लोकक दृश्यसँ हृदय तँ द्रबित भेबे कएल, अपितु कोशी मैयाक एहन ताण्डवसँ डरो भेल जे कहीं हमरो सभक गाड़ी कटनियाँक कारणेँ नदीमे नै समा जाए। ओइ ठामक लोकक जीवन केर मार्मिक चित्रण मैथिली साहित्यकेँ के कहए, भारतक अनेको साहित्य मध्य विद्वान लेखक लोकनि प्रस्तुत कए चुकल छथि, तेँ ओतुका दुरूहताक हम की बखान करू, एहन शब्द-सामर्थ्य हमरामे नै अछि। ए.सी. युक्त गाड़ी रहलोपर हम सभ सुरूज भगवानक प्रकोपक पूर्ण अनुभव कए रहल छलौं, परंच ओइ ठामक नेना-भुटका, वृद्ध-वणिता सभ केओ अपन-अपन काजमे मस्त छल। कोशी मैयाक धारमे छोट-छोट नेना-भुटकाकेँ उमकैत देखलौं तँ हमर देहक रोइयाँ डरसँ भुटकए लागल जे कहीं ई सभ भासि ने जाए। ओ सभ तँ जेना एहन स्थितिसँ अनभिज्ञ अपनामे मस्त भए कोशी मैयाक धारमे निश्चित भए उमकैत छल जेना मायक कोरामे नेना। खेत वा खेतक बीच टायर गाड़ी एवं ट्रैक्टरक लीख पर चलैत हमरो सभक गाड़ी धूरा उड़बैत, खीरा, ककरी, परोड़, सजमनि, कदीमा, मुंग एवं मकइक भुट्टाक ठाम-ठाम लागल ढ़ेरीक अनुपम दृश्य देखि लागल जेना अनपूर्णा स्वतः ऐठाम बास करैत होथि, गंगा बाबूक कचहरी एवं युवा प्रधान अरुण यादवक गाम पहुँचि गेल। शिशौना पहुँचिते सम्पूर्ण गामक लोक स्वागतार्थ एवं जिज्ञासार्थ आबि गेलाह। महपुरा निवासी श्री रामनरेश सिंह उर्फ ‘मुखियाजी’ आकाशवाणी पटना, विजयजी, प्रांजल भाइजी एवं अरबिन्दजी केँ ओतुक्का लोक पहिनेसँ चिन्हैत छल, तेँ हुनका सभकेँ ओ लोकनि नाम एवं सम्बन्धक आधारपर प्रणाम करैत गेलाह। हम, मदनेश्वर ठाकुर उर्फ ‘भगवान जी’ (महिषी), मिथिलेश, लक्ष्मण एवं सिकन्दरकेँ औपचारिकता एवं आतिथ्यवश प्रणाम करैत बैसाओल गेल। अरूण यादव जे ओइ गामक बेटाक अतिरिक्त विकासपुत्र प्रधान (मुखिया) एवं विजयजी, जे ओइ गामक जमीन्दार छथि, दुनूक लोकप्रियता ओइ ठाम एकत्रित ग्रामीणक आवभगतसँ बुझना गेल। किछु समयोपरांत विजयजीक इशारापर खस्सीक मासु, भात, रोटी, सलाद एवं दहीक संग भोजन लगाओल गेल एवं हम सभ भोजनोपरांत आरामक मुद्रामे आबि गेलौं। पाँच-छओ बजे साँझक लकधक हम सभ कोशीक पछबरिया धार, जे बेलदाबर नदीक नामसँ जानल जाइछ एवं ऐ नदीमे कोशीक कोनो धारसँ पैघ माछ पाओल जाइछ, क कात गेलौं, जतए हटिया लागल छल। हम सभ ओइ बेलदाबर नदीक कछेरपर छोट-छीन हटियाक अवलोकन केलौं एवं पान खाइत ओतुक्का स्थितिपर बात करैत रहलौं। हम एवं मुखिया जी (आकाशवाणी, पटना) केँ छोड़ि सभ गोटे बेलदावर नदीमे उतरि खूब उमकैत गेलाह एवं भगवान जी ओइ क्रममे अपन गरक सोनाक बनल मायतारा मैयाक चकती सेहो गमा देलनि। झलफल भेलोपरांत हम सभ कचहरीपर आपस अबैत गेलौं। गरमीक अधिकताक कारणेँ ओइ गामक दुइ मंजिला स्कूलक छतपर ओछाओन लगाओल गेल एवं हम सभ ओइ ठाम आराम करए लगलौं। शिशौनाक पूब भागमे एकटा पैघ भवनक निर्माण कार्य देखि हम पूछि बैसलौं जे एतेक पैघ पक्का के बनबा रहल अछि, तइपर ओतुक्का मुखियाजी अरुण यादव कहलनि जे ई बाढ़ि राहत सेन्टरक रूपमे सभ गाममे बनाओल जा रहल अछि। कोशीक ढेबमे बसल गाममे दू महला स्कूल, बाढ़ि राहत भवन, कतौ सौलिंग युक्त सड़क तँ कतौ-कतौ कच्ची सड़क, जे एक गामसँ दोसर गामकेँ जोड़ैत, एतबे नै गामक बीचो-बीच सिमेन्टसँ ढालल सड़क देखि एवं ओतुक्का लोकक मुँहसँ नीतिश राज्यक सुशासनक बखान सुनि बिहारक कल्याणक संभावना जगैत देखलौं। रातिमे हम सभ फेर भात-रोटी, माछ, सलाद एवं दहीक संग भोजन केलौं एवं पान खाए सहरसा आपस जाए देबाक आग्रह कएल तँ ओइ ठामक लोक कहए लगलाह जे एना कतौ भेलैए जे एतेक रातिकेँ द्वारि परसँ अतिथि बिदा हएत। गौंआ सभकेँ मनबैत हम सभ बिदा भए सहरसा अपन-अपन आवास पर पहुँचि गेलौं। मुदा हमर मनमे बसल ‘उजड़ैत गामःबसैत शहर’क संगक संग, जे ओही ठाम सभ तरहेँ खारिज होइत प्रतीत भेल, सद्यः देखल कोशीक बीच बसैत गाम शिशौना, ओइ ठाम निवास करैत निश्च्छल लोकक सम्पूर्ण विकास दिस उठाओल सरकारक डेग अओर तेज कोना हुअए, तही बीच ओझरा गेल। भाषा जातिगत सम्पत्ति नै अपितु सामाजिक सम्पत्ति भाषाक उत्पति समाजमे भेल अछि अओर समाजक विकास भाषाक आधारपर होइछ। ऐ तरहेँ भाषा अओर समाज दुनू अन्योन्याश्रित अछि। ऐ मादे हम कहए चाहै छी जे मैथिली भाषा कोनो जाति विशेषक सम्पत्ति नै अपितु ई तँ सामाजिक सम्पत्ति थिक। सामाजिक व्यवहारे भाषाक मुख्य उद्देश्य अछि। भाषाक विकास आ संरक्षण समाजमे होइछ अओर एकर प्रयोग सेहो समाजमे होइछ। मैथिलीकेँ दूरगामी क्षति पहुँचाबैबला किछु लोकक कहब अछि जे घर-घरारी सदृश मैथिली सेहो हमरा सभक पैतृक संपत्ति अछि, जे कि सर्वथा अनुपयुक्त, किएक तँ सम्पूर्ण मिथिलामे रहएबला सभ वर्गक नेना जन्मेसँ अपन मातृभाषा मैथिली बजैछ। हम सभ भाषाक बलेँ असगरमे सोचै एवं मनन करै छी मुदा ओ भाषा ऐ सामान्य यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकपर आधारित भाषासँ भिन्न होइछ। भाषा आद्योपांत समाजसँ संबंधित होइछ। भाषा एक सामाजिक सम्पत्ति अछि। ऐसँ स्पष्ट होइत अछि जे कोनो साहित्यकार वा भाषा प्रेमी भाषाक निर्माता नै भए सकैछ। भाषामे होइबला परिवर्तन व्यक्तिकृत नै भएकें समाजकृत होइछ। भाषाक सामाजिक स्तरपर अन्तर भए जाइछ। विस्तृत क्षेत्रमे बाजल जाएबला भाषाक आपसी भिन्नता देखल जाए सकैछ। सामान्य रूपमे सम्पूर्ण मिथिलाक लोक मैथिलीक प्रयोग करैछ मुदा अलग-अलग क्षेत्रक मैथिलीमे पर्याप्त भिन्नता होइछ। एहन भिन्नता ओकर शैक्षिक, आर्थिक, व्यावसायिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा भौगोलिक स्तरक कारणेँ होइछ। पढ़ल-लिखल लोक जतबा साकांक्ष भएकेँ भाषाक प्रयोग करैछ, साधारण अथवा बिनु पढ़ल-लिखल लोक ओतेक साकांक्ष भएकेँ भाषाक प्रयोग नै कए सकैछ। एहन स्तरीय बात कोनो भाषाक समय विशेषमे कएल गेल भाषा-प्रयोगसँ अनुभव कएल जाए सकैछ। विश्वक सभटा काजक संपादन प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूपेँ भाषेक माध्यमसँ होइछ, ई तथ्य सर्वमान्य अछि। सभटा ज्ञान भाषेपर आधारित अछि। व्यक्ति-व्यक्तिक संबंध वा समाज-व्यक्तिक संबंध भाषाक अभावमे असंभव अछि, इहो भाषाक सर्वव्यापकताक प्रबल प्रमाण अछि। मनुष्यक संग-संग भाषा सतत गतिशील रहैछ। समाजक संग भाषाक आरंभ भेल अओर आइ धरि गतिशील अछि। मानव समाज जाधरि रहत ताधरि भाषाक अस्तित्व बनल रहत। कोनो व्यक्ति वा समाजक द्वारा भाषामे कमोवेश परिवर्त्तन कएल जाए सकैछ, परंच एकरा समाप्त करबाक सामर्थ्य ककरोमे नै रहैछ। भाषाक परिवर्त्तनशीलताकेँ व्यक्ति वा समाज द्वारा रोकल नै जा सकैछ। संसारक सभ वस्तु सदृश भाषा सेहो परिवर्त्तनशील अछि, जेना संस्कृतमे ‘साहस’ शब्दक अर्थ अनुचित वा अनैतिक काजक लेल उत्साह देखाएब छल, मुदा आब ई शब्द मैथिलीमे नीक काजमे उत्साह देखैबाक अर्थमे प्रयुक्त होइछ। भाषा परिवर्त्तनशील अछि। ईएह कारण अछि जे सभ भाषा एक युगक बाद दोसर युगमे पहुँचि कए बहुत फराक भए जाइछ। ऐ प्रकारेँ परिवर्त्तनक कारणेँ भाषामे विविधता आबि जाइछ। जँ भाषा-परिवर्त्तनपर साफे नियंत्रण नै राखल जाएत तँ तेजीसँ परिवर्त्तनक परिणामस्वरूप किछुए दिनमे भाषाक रूप अबोध्य भए जाएत। भाषा-परिवर्त्तन पूर्ण रूपसँ रोकल तँ नै जा सकैछ, परंच भाषामे बोधगम्यता बनाकेँ रखबाक लेल ओकर परिवर्त्तनक क्रममे एकटा मानक रूप रहब अति आवश्यक। अन्ततः हम कहए चाहब जे भाषा अपन समाजक संप्रेषणक अन्यतम साधन थिक। एकर माध्यमसँ वर्त्तमान एवं अतीतकेँ परखल जा सकैछ संगहि ओकर भूत एवं वर्त्तमानक पृष्ठ भूमिपर भविष्यकेँ देखल जा सकैत अछि। भाषा मुखरित भए व्यक्तिककेँ सम्प्रेषित करैछ, मुदा कतेको बेर मौन रहि सम्पूर्ण समाजक भावनाकेँ अभिव्यक्तत कए दैत अछि। भाषाकेँ भाषेक माध्यमसँ बुझल जाइछ आ तेँ ई प्रक्रिया एतेक सरल प्रतीत होइत अछि। यद्यपि इहो देखल जाए सकैत अछि जे हम सभ एकर सही क्षमताकेँ नै आँकि दिगभ्रमित भए जाइत छी। अंततः समाजेकेँ बहुत रास चीज गमाकेँ एकर क्षतिक आकलन करए पड़ै छै, जेकि कोनो भाषाक विकासकेँ अवरूद्ध ओ गतिहीन बनबैछ। राम भरोस कापडि भ्रमर मैथिली लोक संस्कृति संगोष्ठी अन्तरगत लोकनायक सलहेसःचर्चा–परिचर्चा कार्यक्रम सम्पन्न मिथिलाञ्चल नेपालक होइक वा भारतीय क्षेत्रक, जँ एक गोट लोकगाथाक महानायक ककरोे जीवन चरित्र बेसी लोकमुखी, जनजन बीच चर्चित, लोकप्रिय छै तँ ओ थिकै लोकनायक सलहेसक। सिरहा जिल्ला अन्तर्गत महिसौथामे जन्मल सलहेसक जीवन काफी आरोह–अवरोहसँ भरल छै। विभिन्न लोकगाथा गायक सभ कथानकक विभिन्न भेदकेँ जनसमक्ष लाओल करैत अछि। तन्त्र-मन्त्र आ सिद्धिक कथा सभ ऐमे भरपूर देखल जाइछ। सुगा सलहेसक गुप्तचर होइछ जे मन्त्रीक रूपमे सेहो प्रतिष्ठित छै। हाथीक नाउँ भौरानन्द राखल गेल छै तँ स्वयं सलहेसकेँ मानिक दहसँ भँमरा बना कए मालिनी सभ चोरा कऽ लऽ जाइछ। सम्भवतः एहन प्रसङ्ग सभ गाथा गायक सभक मुहसँ थपैत आएल भऽ सकैछ। मुदा एकटा बातमे सभ एकमत होइछ जे सलहेसक जन्म महिसौथा, राजा कुलेश्वरक दरबारमे पहरेदारी, चोरीक आरोप, जेलचलान आ अन्तमे मालिनीद्वारा मुक्ति। ओ देवताक रूपमे दुसाध जातिमे पूजित छथि। दलित उत्थानक निमित्त सयौं वर्ष पूर्व सामन्तसँ (चुहड़ सामन्त!) लड़ि कऽ अपने छुट्टे राज्यक स्थापना आ न्यायक लेल लोकप्रियताक चरममे पहुँचैत ‘देवता’क आस्पद प्राप्त कऽ पूजित हएब स्वयं जयबर्धन सलहेसक जीवन गाथाक अत्यन्त रोचक पक्ष थिक। सलहेस गाथामे एक दिश प्रेम छै तँ दोसर दिश तत्कालीन मिथिला क्षेत्रमे उत्तरी आक्रमणकारी सभसँ एकर रक्षाक चुनौती सेहो छै। सामन्त सभसँ समाजकेँ जोगएबाक गहन जिम्मेबारी थिक तँ परनिर्भरतासँ मुक्त भऽ अपन सैन्यशक्तिक विकास कऽ अपन सत्ताक स्थापनाक गहन लक्ष्य सेहो। अद्भुत पराक्रमी छलाह सलहेस। सभ चुनौती सभकेँ सामना करैत अन्ततः अपन अभियानमे सफल भऽ महिसौथाकेँ राजधानी बनौलनि । नेपाली भूमिक ई वीर लोकनायक, मुदा आइ धरि शिष्ट साहित्यक संरक्षक सभ द्वारा उपेक्षित रहैत आएल अछि। किए एना भेल तँ तकर एक्केटा कारण देखि पड़ैछ, दुसाध सभक कुलदेवताक प्रति किए अनावश्यक उत्सुकता! अन्य जाति वा वर्गमे अस्तित्वे नै रहल कवि लोकनि, साहित्यकार सभक जथाभावी रचना सभ उत्खनन कऽ कऽ नयाँ–नयाँ इतिहास रचनिहार सभ सिरहा जिल्लाक चौहद्दीमे अपन शौर्यपूर्ण जीवन बितौनिहार महानायक सलहेस जानाजानी उपेक्षित कएल गेलाह आ परिणमतः आइ हुनका बारेमे लोककण्ठमे बाँचल अबैत गाथा सभ आ तकरा मञ्चमे प्रदर्शित करऽबला नाच सभ विलुप्त भऽ रहलैक अछि। ईएह कठिन अवस्थाकेँ ध्यानमे राखि सलहेसक जीवनवृत्तमे केन्द्रित भए एकटा बृहत् गोष्ठी करबाक विचार आइसँ तेरह महिना पहिने आएल आ नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठानक संस्कृति विभाग अन्तर्गत एकरा सामेल कएल गेल। हम एकर कार्ययोजना बनबैत काल भारतीय मर्मज्ञ विद्वान सभकेँ एकटा पैनल बनेलौं, जे सभ सलहेसक सन्दर्भमे निरन्तर लिखैत आबि रहल छथि। नेपालक किछु विद्वान सभकें सेहो आग्रह कएल। अन्ततः नेपाल आ भारतसँ चारि चारि गोट कार्यपत्र तय भेल आ पत्राचार-सम्पर्क कएल गेल। एकर कार्यक्रम स्थल लहान (सिरहा) राखल गेल, जत्तऽसँ सलहेसक कीड़ाभूमि सभ लगेमे अवस्थित छै। समय २०६९ साल बैशाख २० आ २१ गते राखल गेल। सभ तैयारी पूर्ण भऽ गेलाक बाद बैशाख १८ गते जनकपुरमे दुखद घटना भेल, बम बिस्फोटमे तत्काल चारि गोटेक आ बादमे एक गोटेक मिला पाँच गोटेक मृत्यु भऽ गेल। सभ दिश शोकक लहरि, आक्रोश देखल गेल। बन्द, हड़ताल शुरू भेल। परिणामतः कार्यक्रम अन्तिम क्षणमे स्थगित करऽ पड़लै। फेर दोसर तिथि २०६९ साल असार ४, ५ गते राखल गेल। देहकेँ डाहैत गर्मीमे भारतीय एक दर्जन विद्वत् वर्ग आ नेपालक तरफसँ सेहो एक दर्जन विद्वत् वर्ग सभक समुपस्थितिमे उक्त गोष्ठी लहानमे दस बुँदे लहान घोषणापत्र जारी करैत सम्पन्न भेल अछि। ऐ गोष्ठीमे अपन आर्थिक सहयोग द्वारा वी.पी. कोइराला भारत–नेपाल प्रतिष्ठान पैघ काज केलक, जकर प्रशंसा समस्त उपस्थित सहभागी लोकनि केलनि। अखाढ़ ४ गते सूचना तथा सञ्चार मन्त्री राजकिशोर यादव उद्घाटन केलनि। हुनक हाथसँ नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठान द्वारा प्रकाशित “आँगन” पत्रिकाक चारिम अंक सलहेस विशेषांक आ रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’क नवीनतम कृति ‘समय–सन्दर्भ’क विमोचन केलनि। तहिना सलहेस लोकनाचकें मञ्चीय रूपमे जिवन्त राखऽमे सिरहाक शैनी पासवास आ सलहेस गायनकें अपन कण्ठमे बचा कऽ रखनिहार मधुरी दासकें दोसल्ला आ प्रशंसा–पत्र प्रदान कऽ सम्मान कएल गेल छल। कार्यक्रममे सभापतित्व करैत संयोजक ‘भ्रमर’ विषय–प्रवेशक क्रममे लोकनायक सलहेसक चित्र अंकित टिकट प्रकाशन करबाक आ चोहरबा चौकमे चूहड़मलक प्रतिमा स्थापनाक मांग केलनि, जकरा मन्त्री यादव सहर्ष स्वीकार करैत नेपाल सरकारसँ होबऽबला सम्पूर्ण सहयोग उपलब्ध करेबाक विश्वास सेहो दिऔलनि। कार्यक्रममे कार्यपत्र आ टिप्पणी सभ अतिरिक्त संयोजक ‘भ्रमर’ द्वारा विद्वत्सभक बीच चारिबुँदे अवधारणापत्र प्रस्तुत कएल गेल छल, जइमे व्यापक छलफल आ निष्कर्षक लेल चारि गोट समूह बनाओल गेल। जे ५ गते स्थलगत स्थल सभक भ्रमणक समापन बैठकमे विभिन्न सुझाव सभक संग प्रस्तुत कएने छल। स्थलगत भ्रमणमे सलहेस फुलबारीक विचित्र रचना प्रक्रियासँ अवगत भेलाह तँ सलहेस गाथामे निके महत्वक साथ आएल कमलदहमे कमल लोप भऽ कऽ सेहो पर्यटकीय आकर्षण यथावत रहल बात सब विद्वान सभ महसुस केने छलाह। गोष्ठी सह कार्यशाला-गोष्ठीमे अन्तमे दस बुँदे लहान घोषणा–पत्र जारी कएल गेल छल। घोषणापत्रमे जिल्ला अथवा अन्य भागमे रहल सलहेस मन्दिर (गहबर) सलहेस फुलबारी, मानिक दह, पकड़िया गढ़, कमलदह, उत्तरवाहिनी, कमला आ नन्द महिरी सन स्थल सभक संरक्षण, सम्बर्धन करब जरुरी अछि। सलहेस गाथामे वर्णित स्थल सभ नेपालेमे अवस्थित भेल हेबाक कारणे एकर संरक्षण–सम्बर्धनक दायित्व सरकारक अछि। एहना स्थल सभक विकासक पहल हेबाक चाही! स्थल सभक उत्खनन हेबाक चाही। सलहेस फुलबारीकेँ विश्वसम्पदा सूचीमे सूचीकृत कएल जाए्, एकरा सिमसार क्षेत्रक रूपमे मान्यता देल जाए, सन-सन मांग कएल गेल अछि। अन्य मांगमे सलहेस प्रतिष्ठानक गठन हुअए, सलहेस अंकित डाक टिकटक प्रकाशन हुअए, सलहेस गाथा संग जोड़ल ठाम सभकें सम्पर्क मार्ग बनाओल जाए्, सलहेस फुलबारी निकट राजमार्गमे सलहेसक मूर्ति आ भव्यद्वारक निर्माण हुअए्, सलहेसकें राष्ट्रिय विभूति घोषित कएल जाए आ संग्रहालयक स्थापना हुअए। सलहेस सम्बन्धी एना कय वैज्ञानिक ढंगसँ गोष्ठीक आयोजन प्रथम शुरुआत भेल हेबाक बात बतबैत उपस्थित नेपाल–भारतक विद्वतजन सभ अनुसन्धानक अभाव रहलाक कारणें एकरा निरन्तरता देल जेबाक चाही। दूदिना गोष्ठीमे भारतसँ डा. रमानन्द झा ‘रमण’, डा. बुचरु पासवान, डा. कमलकान्त झा, डा. भुवनेश्वर गुरमैता, चन्द्रेश, डा. मोहित ठाकुर, पंचानन मिश्र आदि छलाह तँ नेपाल दिशसँ डा. रामदयाल राकेश, पुरातत्वविद् तारानन्द मिश्र, प्राज्ञ रमेश रञ्जन झा, पूर्व सांसद नथुनी सिंह दनुवार, डा. पशुपतिनाथ झा, प्रा. परमेश्वर कापड़ि, डा. रेवतीरमण लाल, गोपाल झा आदि विद्वान सभक सहभागिता छल। बिदापत नाच (मूल रिपोर्ताज फणीश्वरनाथ रेणु – भावानुवाद मधुपनाथ झा) बिदापत नाच ऐ नाचक उत्पत्ति दरभंगा जिलामे भेलै, एहन अंदाज कएल जाइ छै | लेकिन अपने मातृभूमिमे ई कोन तरहक अवस्थामे अछि एकरा कहबाक जरूरत नै बुझाइत अछि, परंच उत्तरी बिहारक किछु जिला आ भागलपुर, पूर्णिया आदिक गाम सभमे आइयो एकर कद्र छै। ई छोटका लोक सभक नाच बनि कऽ रहि गेल अछि। तथाकथित भद्र समाजक लोक एकरा देखबामे अपन हेठी बुझै छथि। मुदा मुसहर, धाँगड़, दुसाधक ठाम विवाह, मुंडन संगे अन्य अवसरोपर एकर धूम मचल रहै छै। ऐ नाचमे सात-आठ टा कलाकार रहै छै आ दुइए टा वाद्य यन्त्र- मृदंग आ मंजीरा रहै छै। तँ चलू। बिदापत-नाचक आनंद उठाबी। अपन भद्रताकेँ किछु काल लेल त्यागि.... धृंग धा, धृंग धा तिन्ना- बाजि कऽ मृदंग बौक भऽ गेल। कुन कुन कुन कुन... मजीरा स्वरमे संग देलकै। गननायकं फलदायकं पंडितम् पतितम्... अहाँ सभ हँसू जुनि। ई मंगलाचरण छलै, शुद्ध संस्कृतमे। धृंगा धृंगा धृंगा धृंगा- मृदंग बाजऽ लागल। किनकां, किनकां, किनकां, किनकां.. मजीरा संग देलकै। नाचैबला चारू तरफ जेम्हर-जेम्हर समाजी छल, चक्कर देनाइ शुरू केलक। ओकर पाछू बिपटा सेहो घिरनी जकाँ चक्कर लगा रहल छल आ मुँहकेँ रंग-बिरंगक बनबैत ओय -ओय -ओय -ओय बाजि रहल छल। धिरिनांगी, धिरिनांगी, धिरिनांगी, धिरिनांगी- मृदंग ताल बदलि दोसर सुर निकाललक। किनकां, किनकां... आब रहए दिअ। बड़ नचौलौं... आब बादमे नाचक कथा हेतै। नाच करैबला एकेटा जगहपर जमा भऽ झूमऽ लागल। धिरिनांगि तिनता, तिटक-तिटक धा, तिटकल गदगिन धा। ताल समाप्त भेल आ नाचो शेष भऽ गेल आ नाचैबला सभ घोघ तानि दर्शक मंडलीमे जा बैसल। नाचमे जे बिपटा बनल छल ओ नाच करनिहारकेँ ताकऽ लागल। धृंगा-धृंगा... 'धिन-तिनक तिनक, धिन तिनक-तिनक'- मृदंग बाजल। समाजी सुरमे सुर मिलेलक। 'हे लेल परबेश परम सुकुमारि हंस गमन वृषभान दुलारि....' नचनियाँ सभ उठि बिपटा लग आबि गेल आ हर्षित भऽ बिपटा ओय ओय ओय ओय केनाइ शुरू कऽ देलक। 'धिन-तिनक् तिनक् धिन-तिनक् तिनक्' 'हे ! तन मन बदन पवन सहजोर हे दामिनी ऊपर उगलन्हि चाना...' नाच करऽबला सभ घोघ हटा लेलक आ चंद्रमुख (घुटल दाढ़ी, मोंछ आ बेडोल, केहने सन कऽ मुँह) देख दर्शको सभ हँसैत-हँसैत नेहाल भऽ जाइत अछि। नचनियाँ निच्चाँ दिस ताकि रहल, लाज सँ लज्जावती लता सन सिकुड़ल नाच कऽ रहल छल वा छली। बिपटा ओकरा अपना दिस आकर्षित करबाक कोशिश कऽ रहल अछि। “हे बिहँसि उठलि पिऊ देखि सुहागिनी लाज बदन लेल फेरि..” नचनियाँ बिहुँसि कऽ मुँह फेर लेलक। हँसऽ कालमे तमाकुल सेवनसँ जे दाँत सभ कारी भेल छल से चमकि उठल। कृपया अहाँ सभ शांत भऽ जाउ। जी, जी हँ। विद्यापतिक पदावली भऽ सकैत अछि, परंच ई छी 'बिदापत नाच'। न्यू थियेटर्स, विद्यापति, कानन बाला. पहाड़ी सान्यालक बक-बक बंद करै जाउ। आखिरी अलाप शुरू कऽ देलौं। अहाँ सभकेँ कतेक बुझाउ जे ई 'बिदापत नाच' छिऐ आ ओ नाच करैबला टहलू पासवान, ओकर बाप बड़का डकैत छल। बापकेँ काला पानीक सजा भऽ गेलै। माय केकरो आन सने चलि गेलै आ ई बच्चेसँ नाचऽ लागल। अपन जवानीक दिनमे एकर धूम मचल रहै छलै... धूम मचबै छलै धूम। एकर आवभाव देखि तँ परबतिया अपन बसल-बसाएल गृहस्थी छोड़ि एकरा सने रातिये राति पड़ा आएल। हँ तँ टहलू पासवान गाबि सकैत अछि जे... अँगना आएत जब रसिया पलट चलब हम इषत् हँसिया कान्ह जतन बहु करयिन्ह धृन्ना धृंगा, तिना-तिन्ना- मृदंग आब दोसर ताल बदललक। किन्ना- किन्ना.. मंजीरा सेहो ताल बदललक। “सखि हे... सखि हे, कि पूछसि अनुभव मोहे..” “जनम अवधि हम रूप निहारलौं, तबहु न तिरपित भेल |" 'अरे ? चुप ! चुप !!' -बिपटा खिसिया कऽ चुप करा रहल अछि। एक टा समाजी गमछाक कोड़ा बनेनाइ शुरू केलक। बिपटा कहनाइ आरम्भ केलक जे ओकरा पीट कऽ अनेरे समए बर्बाद कएल जा रहल अछि। जमींदारक जूता खाइत-खाइत ओकर पीठक चमरी मोट भऽ गेल छै। ओ अइ लेल मात्र चुप करा रहल छल.. “कि ओ जन्म भरि केकर रूप निहारैत रहल'... जखन ओकरा बुझा गेलै जे ओकरे रूप, तँ खुशी भऽ तुरंत पॉकेटसँ एकटा छोटका एना निकालि सगर्वसँ अपन मुँह देखऽ लागल। गीत समाप्त भेल, आब बिपटा महादेवक बेर छनि। -हे नेक जी (नायक जी)। -हूँ। -आब हमरो सुनू। “बाप रे! बाप रे कोन दुर्गति नहि भेल सात साल हम सूद चुकाओल, तबहुँ उरिन नहि भेलौं। कोल्हुक बड़द सन खटलौं राति-दिन कारज बढ़त हि गेल थारी बेच पटवारीकेँ देलियन्हि, लोटा बेच चौकीदारी। बकरी बेच सिपाहीकेँ देलियन्हि फटकनाथ गिरधारी।“ किछु बुझलिऐ अहाँ सभ.. अहूँ सभ पूराक पूरा फटकनाथ गिरधारी छी। कने दर्शककेँ देखियन्हु ने जे ओ सभ की बुझलनि जे हँसैत-हँसैत पेटमे दर्द हुअ लगलनि। 'धृंगा-धृंगा, धिधिन्ना तिन्ना '.... “सखि हे! ई माह भादर, भरल बादर, शून्य मंदिर मोर।...” सुन्दर! सुन्दर!! ठीके विद्यापति मैथिल कोकिल.... अहाँ सभ फेर भसियाए लगलौं, अहूँ सभ बिपटासँ कम नै छी। कतबो मना कएल जाए ओकरा जकाँ सभ गीतपर किछु ने किछु सुनाबऽ लागै छी। ई लिअ, बिपटा महोदय फेर टपकला... “ई माह भादर, बरिसे बादर, चुअत छप्पर मोर।” “हहा-हहा ...!!” दर्शक मंडली हँसैत-हँसैत लोट-पोट भऽ रहल अछि। हँ एक टा बात कहब बिसरि गेलौं जे बिपटा अपनाकेँ कृष्ण बुझैत अछि आ परदेशी साजन सेहो, लेकिन संगे इहो बात नै बिसरैत अछि जे कि ओ कलरू मुसहर अछि, हलहलियाक रहनिहार आ मनुष्य रहितो ओ बुझै छै जे कोल्हूक बड़दसँ बेसी ओकर हैसियत नै छै। नाचएबला सभ जखन ओकर गरदनिमे बाँहि मान-अभिमानसँ प्रेमक प्रदर्शन करैत बुझबैत छै कि ---माधव तजि के चललौं विदेश।.. तखनि ओ बिसरि जाइत अछि जे ओ कृष्ण अछि आ गोकुलसँ मथुरा जा रहल अछि। ओकरा सामने जीवनक विषमता मूर्त रूप भऽ नाचि उठै छै आ ओ बुझबै छै- – 'नहिं बरसल अदरा (आद्रा नक्षत्र) नहि अशरेस, चारु दिस देखै छी बुढ़ियाक केश .... माछ काछू सब गेल पाताल, अब कि पड़त सखि महा अकाल, दिन भरि खटि के एक सेर धान, एकरा से कैसे बचत परान, छोडि- छोडि सजनि जाइ छी विदेश’ फेर दोसरे क्षण जखन नर्तक गाबऽ लागै छै- 'गोद लय बलमाकेँ चललि बाजार हटिया के लोग पूछे, के लागे तोहार। सासू जी के लड़िका, ननद के जेठ भाय, पूर्व के लिखल स्वामी छिक् हे हमार।' आब बिकटा बच्चा जकाँ जिलेबी, बताशा आ खिलौना लेल छिरिऐ लागल.. तखने एकटा नचनिया गीत गेलक-- “राति जखन भिनसरवा रे, पहूँ (स्वामी) आयल हमार। कर कौशल कर कँपइत रे हरवा उर जार कर पंकज उर थपइत रे मुखचन्द्र निहार” बिपटा बीचेमे रोकि कऽ एकटा समाजीसँ एकर अर्थ बुझबै लेल कहै छै आ समाजी खुलि कऽ अइ गीतपर टीका करऽ लागल। केना नायिका पुआरपर अपन झोपड़ीमे सुतल छलय आ बिपटा आएल छल। चलू दर्शक सभक बीचमे। कारी-कारी मोटगर आ गठगर देहबला नवयौवना मंद-मंद मुसकीकेँ दबा आ एक दोसरकेँ केहुनिया-केहुनिया कऽ कनफुसकी करैमे आनंदित भऽ बिपटाक दिस एक टक निहारि रहल छलि। अधेड़ उम्रक मौगी सभ बनावटी तामस व्यक्त कऽ युवती सभकेँ रोकए चाहै छै, लेकिन दबल हँसी आ गुदगुदायल हृदए कखन मानै छै। एम्हर नचनियाँ सभ आलाप कऽ उठल। “चलू मन, चलू मन ... ससुरालि जइबै हो रामा, कि आहो रामा, नैहरा मे अगिया लगाइब रे कि... युवती चंचल भऽ जाइ छै आ युवक लोकनिक नसमे बिजली दौड़ऽ लगलनि। नाच आब खत्म हुअबला छै- “चलू मन, चलू मन धिन धिनक धिनक, धिन धिनक धिनक… कि आहो रामा, नैहरा मे अगिया लगाइब रे कि ...! डिम डिमिक डिमिक, डिम डिमिक डिमिक ...” अरे ई की? ओहो, चेथरू गुँसाइ जी छथि। गुँसाइ जी कबीरक भक्त छथि। दस-पंद्रह साल पहिने जमींदार साहबक कहलापर ओ झूठ गवाही नै देलनि। ऐपर जमींदार खिसिया कऽ गुँसाइ जी केँ बेघर कऽ देलकनि आ तखनेसँ ओ बैरागी भऽ गेला। खंजरी, झोरा आ चिमटा, जटा आ नमगर दाढ़ी... ई लिअ। गुँसाइ जी खंजरी बजा बजा नचनियाँ संगे नाच करऽ लागला... “डिम डिमिक डिमिक, डिम डिमिक डिमिक कि आहो रामा नैहरा मे अगिया.. बात ई छै जे चेथरू गुँसाइ जी अइ गीतकेँ पूरा निर्गुण मानै छै। अहा! ओकर धँसल आँखिमे नोर चमकि उठै छै। आ नाच समाप्त भऽ गेल। (फणीश्वरनाथ रेणुक ई रिपोर्ताज साप्ताहिक “विश्वामित्र”क १ अगस्त १९४५ क अंकमे प्रकाशित भेल छल। ई हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद फणीश्वरनाथ रेणुकेँ समर्पित कएल जा रहल अछि।) अतुलेश्वर
सगर राति दीप जरए , आन्दोलन आ बभनभोज कथा साहित्यक प्रकाशन करए वला पत्र-पत्रिका अभावक कारण एकटा प्रश्न ठाढ़ भेल कि यदि मैथिलीक रचनाकारकें अपन रचनाक लेल कोनो मंच नहि भेटत तँ मैथिली आबयवला समयमे रचनाकारक अभाव सँ गुजरि सकैत अछि। आ मैथिली भाषा आ साहियक क्रान्तिकारी पुरुष डा.काञ्चीनाथ झा किरणक जन्म दिवसक अवसर पर लोहना गाममे जे समारोह आयोजन भेल छल ओहिमे पंजाबी भाषामे जहिना भरि रातिक कथा गोष्ठी कयल जा रहल छल ओहिना मैथिली भाषामे आरम्भ कयल जाए। आ कथा साहित्यक पुरोधा आ युवा साहित्यकारक पथपर्दशक स्व. प्रभाष कुमार चौधरीक नेतृत्वमे ई आन्दोलन प्रारम्भ भेल । कहल जा सकैछ जे काल सापेक्ष ई आन्दोलन मैथिली साहित्य लेल वरदान साबित भेल,कारण कतेको कथाकार, आलोचक एहि आन्दोलन सँ मैथिली साहित्य मध्य उपस्थित भेलाह तँ दोसर दिश एक नव आलोचनाक बाट फूजल। मुदा आइ काल्हि तँ एहि मे कथाक चर्चा सँ बेशी मानकीकरण,कखनो जातिवाद,कखनो भत्ताक गप्प होइत अछि। एतेक धरि जे कथाक गोष्ठीक अस्मिता पर कुठाराघात करैत किछु मैथिली अहित सेवी लोकनि ओकरा सरकारी संस्थाक कार्यक्रमसँ जोड़ि ओकर अस्मिता आ स्वतंत्रताक नष्ट करबाक प्रयास क’ रहल छथि। कारण जखनहिं साहित्य अकादेमी आ सरकारी संस्था सभसँ जोड़ल जाएत तँ एहि गोष्ठी सँ जनसहभागिता कम भेल जाएत आ कथा गोष्ठी अपन उद्देश्यक बाटसँ भटकि जाएत ई षडयंत्र हमरा जनैत एहि कारणेँ कएल जा रहल अछि , जे मैथिलीमे नव-नव रचनाकारक अभाव हुअए आ मैथिली साहित्य किछु वर्ग धरि सिमटि जाए। एहि तरहेँ बहुतों गोटा एहि बेरक कथा गोष्ठीकेँ सगर राति दीप जरएक श्रृंखला सँ नहि जोड़बाक आग्रह कयलन्हि अछि समर्थन हमरो अछि,कारण यदि हम सभ विरोध नहि करब तखनि ई लोकनि हमर सभक अस्मिता पर एहिना आघात कयल करताह आ जेकरा रोकब आवश्यक अछि, एहि लेल एकजूट होयब जरूरी अछि।नहि तँ एकटा आन्दोलन षडयंत्रक फाँसमे समाप्त भ’ जाएत। हँ एहि गोष्ठी मे एकटा बात उठल छल जे बभनभोज। गोष्ठी कथा गोष्छी नहि भ’ बभनभोज भ’ गेल , ई सगर राति दीप जरए लेल एकटा आर आघात भेल । आशा करब आदरणीया विभा रानी सँ जे एहि आन्दोलनक दीपकेँ उद्देश्य सँ नहि भटकय देथि पुनः माँ जानकीक भाषा मैथिलीक आन्दोलन अपन उद्देश्य मे लागि जाए। आ सगर राति दीप जरए मैथिली कथा साहित्यक दीपकेँ मात्र जरौने टा नहि रहए ओ सम्पूर्ण विश्वमे मैथिली कथा साहित्यक दीप जगमगबैत रहए । एहि कामनाक संग हम सभ पुनः अपन आन्दोलनक नेतृत्व स्वयं करी आ घुसपैठिया लोकनिकेँ एहि आन्दोलन सँ भगाबी । एहि उद्देश्य संग दक्षिण भारत आबि आ माँ जानकीकेँ मोन पाड़ि। वैश्विक सोच ? की, मैथिली साहित्यमे आइ काल्हि एकटा नव संस्कार वैश्विक सोच देखबामे आबि रहल अछि? प्रायः तकरहि सिद्ध करबाक लेल युवा रचनाकार धरि अपन भाषिक मर्यादाकें तोड़ि रहल छथि। सभसं बेसी दुखद पक्ष अछि जातिवादक नारा। हमरा सभकें ज्ञात अछि जे भारतीय राजनीतिमे एहन नारा राममनोहर लोहियाक देन थिक, खास कऽ उत्तर भारतमे। ठीक ओहने सन नारा मैथिली साहित्यमे तारानंद वियोगी लगाएब प्रारम्भ कएलनि अछि। एतय हुनक नाम उद्धृत करबाक प्रयोजन एहि कारणें भेल जे ओ अपनाकें ‘ नन मैथिल’ कहैत छथि। से कोन आधार पर? हमर एकटा मित्र छथि मणिपुरक, जे नेपाली भाषी छथि मुदा अपनाकें मणिपुरी कहाएब पसिन्न करैत छथि। ओ जखन वियोगीजीक उक्त अंश पढ़लनि तँ हमरासँ पूछि बैसलाह जे- अतुल यो लेखक मिथिलाको हो, हम कहलियनि- हो! ओ ई बुझि हँसय लगलाह। हमरा बड्ड खराब लागल। मुदा मोने मोन सोचलहुँ जे ई नव पंडित छथि, आधुनिक समयक नव वर्ग, नव सामंत। एहन वर्गमे अवसरवादिता चरम पर देखल जा सकैत अछि आ ओ सभ कखनो ओकर लाभ लेबासँ चुकए नै चाहैत छथि, ओइ लेल जतेक नीचाँ तक जाए पड़नि। तें एहन चरित्रबला साहित्यकार सभसँ मिथिलाक विषयमे एहिसँ नीक सोचब अकल्पनीय होएत, ठीक तहिना जेना एकटा अंग्रेज भारतक विषयमे सोचैछ। हमरा जनैत वियोगीजीकें ई बुझल छनि जे यदि ओ ई बात मैथिल समाजक विषयमे कहथि जे हम सभ मैथिल नहि छी ( जातिवादक सहारा बिना लेने ) तँ हमरा विश्वास अछि हुनका बड्ड फज्जति हेतनि। तें जातिवादक ढालपर अपनाकें मिथिलासँ दूर देखएबाक प्रयास करैत छथि। ठीक,एहिना मर्यादा तोड़ैत देखाइत छथि किछु नवतुरिया सेहो, जिनका नै तँ मैथिली साहित्यक गम्भीर अध्ययन छनि आ नहिये साहित्यिक मर्यादा बुझल छनि। कारण ई युवा लोकनि साहित्यिक आ मिथिलाक चिंतनसँ बेसी आरोप आ प्रत्यारोपमे समय आ शब्द बर्बाद करैत छथि। जेना आशीष अनचिन्हार अपन विकीलीक्सक खुलासामे शब्द सभक जे प्रयोग कएने छथि जे हुनक साहित्यिक अनुभवहीनताकें देखबैत अछि। हुनक आक्रोश सत्य ओ उचित भऽ सकैत अछि मुदा ओहनो स्थितिमे शब्दक प्रयोगक एकटा सीमा छैक, जकरा लांघब शिष्ट समाजक लेल उचित नै। बहुतो टिप्पणी पढ़बाक क्रममे सेहो किछु टिप्पणी पढ़ल, लागल जेना ई लोकनि मात्र मैथिली साहित्यक तथाकथित दुर्बल पक्ष पर टिप्पणी कऽ सकैत छथि, आर किछु नै। ओना हुनका लोकनिक टिप्पणीसँ मैथिली साहित्यकें कोनो प्रभाव नै पड़तैक से हुनका बुझक चाही। कारण किछु व्यक्तिक हो-हल्लासँ सार्थक काज रूकि नै सकैछ। ओ सभ एकटा वर्ग आ व्यक्ति धरि मैथिली साहित्यकें राखय चाहैत छथि, जे हुनक संर्कीणताक परिचय दैछ। यदि हुनका लोकनिसँ सार्थक काजक विषयमे पुछल जाएत तँ कहताह मैथिलीमे पाठक नै अछि। तँए ई रिस्क लेब निरर्थक। ओ लोकनि मात्र मैथिली साहित्यक खिधांस करताह, मैथिली साहित्यक सेवा नै। से किएक? ऐ बीच मैथिली साहित्यक लेल किछु सार्थक प्रसंग सेहो दृष्टिगोचर भेल अछि। से थिक विलक्षण दू टा पोथीक प्रकाशन। दुनू पोथी अपन बात रखबामे सफल भेल अछि। जीवकान्तक आत्मकथ्यात्मा पोथी नै मात्र गाम आ खेतीक महत्वकें जगजियार करैछ, अपितु अपन गाम आ धरतीक प्रति अनुराग सेहो उत्पन्न करैत अछि। जीवकान्तक लेखनीक अपन विशेषता छनि जइ कारणें हुनक लेखन सदैव एकटा नव भाव दैत आएल अछि। एहिना डॉ० वीणा ठाकुरक पहिल उपन्यास ‘ भारती’ मिथिलाक नारीक चेतनाक कथा तखन कहैत अछि जखन कि सम्पूर्ण भारतवर्षमे नारी चेतनाक विषयमे सोचलो नै जा रहल छल। ओइ समयमे ओ सम्पूर्ण भारत वर्षक विषयमे सोचि रहल छलीह। उपन्यासक कथा वस्तु नारी चेतना धरि सीमित नै रहि राष्ट्रीय जागरणसँ भरल अछि। अतिशयोक्ति नै हएत जे वर्तमान मिथिला आ भारत वर्षक परिस्थितिकें ई उपन्यास पूर्ण सार्थक आभास दैत अछि। हमर एकटा नेपाली भाषी कवि मित्र, जे दार्जिलिंगक थिकाह, देश, भाषा, समाज आ साहित्यपर चर्चाक क्रममे बहुत दुखी होइत कहैत छथि जे आदमी-आदमीक बीच एक दोसराक प्रति घृणाक भावनाक जन्म किएक भऽ रहल अछि आ ओ ऐपर घंटो अपन अभिमत दैत रहैत छथि, आ हमहूँ सभ हुनक ऐ चिन्तापर सहमत होइत रहैत छी। ई उद्धरण देबाक पाछाँ हमर ई अभिप्राय अछि जे हमरा सभकें जतेक सभ्य होएबाक चाही ओइसँ बेशी हमरा लोकनि असभ्य भऽ रहल छी आखिर किएक? की, एकर पाछाँ विश्व-मंच प्राप्त करबाक सपना अछि? एहन सपना तँ सभकें होएबाक चाही, मुदा सभ्यता-संस्कृतिक बलपर कतेक धरि उचित? लिखबा-पढ़बाक क्रममे सभसँ आगाँ अपन सभ्यता-संस्कृतिकें राखब बड़ आवश्यक ओ उचित सेहो। (अतुलेश्वरजी, तारानन्द जीक जातिवाद दोसरे तरहक छन्हि- ओ लिखै छथि- "एतए तं मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। ठीके तं छै। पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी।" ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ पर मिथिलाक विभिन्न जातिक ऑडियो आ ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-video/ पर वीडियो रेकॉर्डिंग ऑनलाइन उपलब्ध अछि जइमे डोम-मल्लिक (जकरा वियोगीजी मेहतर कहै छथि आ ओकरा आ ओकर भाषासँ घृणा करै छथि)क रेकॉर्डिंग सेहो श्री उमेश मंडल जीक सौजन्यसँ अछि। महेन्द्र मलंगियाक काठक लोक आ ओकर आंगनक बारहमासा जइ तरहेँ दलितक भाषाक कथित मैथिली (मलंगियाजीक सृजित कएल)क प्रति घृणा आ कुप्रचारक प्रारम्भ केलक तारानन्द वियोगी ओकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। ई ऑडियो आ वीडियो रेकार्डिंग अन्तिम रूपसँ ऐ घृणा आ कुप्रचारकेँ खतम कऽ देने अछि आ विश्व ई सुनि आ देख रहल अछि जे जातिगत आधारपर मैथिली कोनो तरहेँ भिन्न नै अछि। वियोगीजी अपन ऊर्जा ऋणात्मक दिशामे लगबै छथि आ तकर कारण अछि हुनक दृष्टि आ आइडियोलोजीक फरिच्छ नै हएब आ तेँ दोसराक समालोचना ओ बर्दास्त नै कऽ सकै छथि। पाण्डिचेरी सन छोट इलाकामे सेहो कएक तरहक तमिल प्रयुक्त होइ छै, तँ की ओकरा कोनो जाति-वर्ग-धर्मकेँ अपमानित करबा लेल प्रयोग कएल जाए। डॉ. धनाकर ठाकुर सेहो साहित्य अकादेमीपर आंगुर उठेबासँ दुखी रहथि आ विदेहक सह-सम्पादक श्री उमेश मण्डल जी केँ कएकटा मेल पठेलन्हि। ओ जगदीश प्रसाद मण्डल आ उमेश मण्डलक असली मानकीकृत भाषाक पक्षमे नै छथि, भाषा विज्ञानपर जखन उमेश मंडल बहसक प्रारम्भ केलन्हि तँ ओ अपनाकेँ डॉक्टर बना लेलन्हि आ बहसमे भाग नै लेलन्हि। बेनीपुरीक "अम्बापाली" नाटक हिन्दीमे छै, एन.सी.ई.आर.टी. ओकरा स्कूलक पाठ्यक्रममे लगेलक मुदा सम्पादक कहलन्हि जे "क्रिया ’है’ क अनुपस्थिति" जेना "वह जा रहा", बेनीपुरीपर स्थानीय क्षेत्रक प्रभावक परिणाम अछि आ तेँ सम्पादक मण्डल ओकर ऐतिहासिकताकेँ देखैत स्कूली पाठ्यक्रममे रहलाक बादो ओकरा सम्पादित नै कऽ रहल अछि। मुदा जखन उमेश मण्डल/ जगदीश प्रसाद मण्डल/ राम विलास साहू लिखै छथि, ओ जाइत, ओ खाइत, तँ "सगर राति"मे भाषा-विज्ञानसँ अनभिज्ञ विशेषज्ञ सभ किछु एहेन सलाह दऽ दै छथि जे मैथिलीक मूल विशेषते गौण पड़ि जाए, मैथिलीसँ प्रभावित बेनीपुरीक हिन्दी, एन.सी.ई.आर.टी.क सम्पादकसँ मैथिलीक नामपर बचि जाइत अछि, मुदा मैथिलीमे पसरल जातिवाद ओकरा नै छोड़बापर बिर्त अछि। से जातिवादी मानसिकता सी.आइ.आइ.एल.क अनुवाद मिशनक परिणामकेँ सेहो भयंकर रूपेँ प्रभावित करत, कारण ओइमे छद्म मानकीकरणक आधारपर अनुवाद कार्यशाला आयोजित भऽ रहल अछि। मैथिलीक तथाकथित स्थापित/ पुरस्कृत साहित्यकार यावत असल मानकीकरणकेँ नै पकड़ताह, हुनकर अस्तित्व उपरोक्त राक्षसी प्रतिभा (विषय-वस्तु आ भाषा दुनू दृष्टिकोणसँ) सभक सोझाँमे मलिछौने रहत। छद्म मानकीकरण: एकटा खास जातिवादी स्कूलक विचारकेँ प्रश्रय देलाक परिणाम, जे एकाध किताब सी.आइ.आइ.एल. मैथिलीमे निकाललक अछि आ जइ तरहेँ ओकर मानकीकरण प्रोजेक्ट सालक सालसँ बिना परिणामक चलि रहल छै। सी.आइ.आइ.एल.क अनुवाद मिशनक आरम्भिक मेहनति अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारक कार्यशाला अछि, ओकरा पाठकसँ कोनो मतलब नै छै आ ने असल पठित साहित्यकारक साहित्यसँ। से ओकर परिणाम वएह हेतै जे साहित्य अकादेमीक छै। अमरजी लिखै छथि- साहित्य अकादेमीक पोथी सभ गोदाममे सड़ि रहल छै। असल मानकीकरण: मिथिलाक सभ क्षेत्रक सभ जातिक बाजल जाएबला मैथिलीक आधारपर गहन विचार विमर्शसँ बनाओल मानकीकृत मैथिली। एकर बानगी ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर देल बेचन ठाकुर/ जगदीश प्रसाद मण्डल आदिक रचनामे भेटत। फील्डवर्क ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ पर देल -मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत (सौजन्य: उमेश मंडल)- ४६ टा ऑडियो फाइलमे भेटत आ ऐ लिंकक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-video/ - मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत (सौजन्य: उमेश मंडल) - ४४ टा वीडियो फाइलमे भेटत तथा २००० पाठकक विचारपर आधारित सारांश ऐ लिंकपर http://www.videha.co.in/new_page_13.htm भेटत। ऑडियो आ वीडियो फाइल महेन्द्र मलंगिया द्वारा “काठक लोक” आ “ओकर आंगनक बारहमासा” द्वारा प्रचारित शोल्कन्हक कथित (इजाद कएल) मैथिलीपर अन्तिम प्रहार अछि। राक्षसी प्रतिभा: पूरा ब्राह्मणवादी मैथिली साहित्यकारक अपठित दुनियाँ एक दिस आ जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुरक पठित दुनियाँ दोसर दिस, जकरा ब्राह्मणवादी मैथिली साहित्यकार लोकनि “राक्षसी प्रतिभा” सम्भवतः आलोचनात्मक रूपमे कहताह/ कहै छथि मुदा हमरा मोने ओ हुनका सभक हारिक शुरुआत अछि।- गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक) [[ Taranand Viyogi मिथिला के कुछ लडके इनदिनों फेसबुक पर मैथिली लेखकों से लड रहे हैं। मुझे तो पता भी नहीं था, देवेश ने आग्रह किया तो लडाई देखने मैं भी उनके आंगन गया था। मजा नहीं आया। लडके इस तरह विवस्त्र होकर लड रहे थे कि शामिल होने का मन भी नहीं किया।
लडाई की कुल जमा वजह यही दिखी कि लडके (और, उनके बुजुर्ग) मैथिली साहित्य में अपना स्थान चाहते हैं। यश और सम्मान। वाजिब बात है। यह उनको मिलना चाहिए। इसके लिए कई तरीके आजमाए जाते रहे हैं। एक पुराना तरीका है--सही-गलत मुद्दे खोज-खोजकर अपने सीनियर की कटु आलोचना करना और जहां तक बन पडे उन्हें गालियां देना। ये हर जगह होता है, हर पीढी में होता है।
लेकिन, इसके साथ-साथ अच्छा लिखना भी पडता है। ये लडके इन्टरनेट की विस्तृति और व्यापकता का गहरा ज्ञान रखते हैं। हथियार के तौर पर इसके उपयोग की समझ भी उनमें है। पर, ये अच्छा लिख नहीं पा रहे हैं। गहराई इनमें नहीं है। न संवेदना के स्तर पर न ज्ञान के स्तर पर। इसका जतन भी वे नहीं कर पा रहे हैं। पर, हडबडी है।............देखकर दुख होता है।
सीनियर के तौर पर गलियाने के लिए मुझे भी चुना गया है। खुशी हुई कि चलो, इस लायक समझा गया, 'नन-मैथिल' होने के बावजूद। मगर, दुख भी हुआ कि ये लडके ब्रह्म-वाक्य भाखने का दम्भ तो रखते हैं पर वास्तविक तथ्यों के बारे में कितना कम और अधूरा जानते हैं।देखिए, मुझे गाली देने के लिए ये 'जमीन्दार' शब्द चुनते हैं।
मेरी पुरस्कृत किताब 'ई भेटल तं की भेटल' के बारे में बहुत अद्भुत जानकारी इसमें दी गई है। समझें, मेरा भी 'ज्ञान-वर्द्धन' हुआ, खुद अपने बारे में। लिखा है कि ये किताब मेरी हिन्दी किताब 'यह पाया तो क्या पाया' का मैथिली रूपान्तर है। अबे यार, पूछ तो लिया होता। 'यह पाया.....' १५० पृष्ठों का कहानी-संग्रह है जो २००५ में प्रेस गया पर प्रकाशक के महिमा-वश अब तक भी बाहर न आ सका। इसलिए लिखनेवाले ने इस किताब को कहीं देखा भी न होगा। पर, लिख दिया मजे से। और, इसी बिना पर मुझे गलियाये जा रहे हैं।
अरे पंडित, कुछ तो स्तर निभाना सीख। कुछ तो गहरा हो यार। कुछ तो खयाल कर कि 'साहित्य' के क्षेत्र में काम करने आए हो, और वो भी विद्यापति की भाषा में। क्या होगा कल तुम्हारी 'मां मैथिली' का?..
Avinash Das Great View! Congrats!! Salaam!!! April 14 at 12:06pm ·
Manoj Karn ai nab ukas pakasak darsnarth dhanyabad.-munnajee. April 15 at 7:34pm via · Vikash Jha taranand sire....main ek baat ye puchna chahta hun ki aapne apne aapko non-maithil kyun likha hai..ye baat mujhe pachi nahi...jara khulasa kijiyega... April 15 at 7:41pm ·
Shri Dharam @Vikash ji maithilik tathakthit beta sab yatree je son la ka viyogi ji dhari jahi tarhen gariya rahal chathi tehna men keo ahi tarhen sochi sakait achi. jahi lekhak lokani ken gari del jarahal chani tinka jo maithili sn nikalidel jay t banchat kee ANNDA???? April 15 at 11:22pm ·
Vikash Jha Shri Dharam...tain ne kahlaun ..jakahn sir kahalkhin hum non maithil chi bada dukh lagal...kiyek t e sab jaun naie rahthin t kona kaaj chaltaie...e t uchit naie ne ki kakro saun 2 ta gaier sunla per ham apna aap ke oie community saun alag k li??? April 16 at 1:28pm ·
Mihir Kirti @ taranand--------------- vah main to kayal ho gaya aapki samvedna kaa jab hamre sahitykar vibhuti ji ko putrashok hua tha aur unnko akademi purskar mila tha to aapne samy -saal me main use santavna purskar kaha ----- us samay aapki samvedna ko kya lakva maar gaya thaa.......... April 16 at 1:48pm ·
Sunil Kumar Mallick Viyogi G Pranam Bahut dinak bad aahank kalam sa likhal Sabda sab bhetal khusi lagal. Sange dukh seho je kichh nenpani dekhaba balak chalte aahan maithili pratik aahank apan yogdan ke kyo bisair nai sakaiye. Dosar aahan apna ke Maithil Nai kahai chhi ta apne ki chhi ? what's your identity? Tesar aahank Jawab hindi me aayael kiye apan bhasa maithilike Kakro sa kam bujhai chhiyai? Abhivyaktik Madhyam ke roop me maithili ke lag sabda Bhandarak kami chhaik ki? charim aa antim wakya je aahan likhne chhi je
'साहित्य' के क्षेत्र में काम करने आए हो, और वो भी विद्यापति की भाषा में। क्या होगा कल तुम्हारी 'मां मैथिली' का? ki Maa maithili aahank Nai ? Viyogi san sidhasta writer aa maithili Pratik Dharna katau ne katau Bad taklif detai maithili me kaj kenihar lok sab ke. Besi Bajal hoi ta chhama kayal jetai. Sunil Mallick President Mithila Natyakala parishad, janakpurdham, Nepal May 13 at 8:51pm via ·
Vinit Utpal 'samay sal' me ' lattar kaka' ke ohi sal i gap chapa chal jahi sal hunka puraskar bhetal. hamun padhne rahi.sanket del gel chhal. मैथिली मे जं फूइसक आंधी चलत, तं कोना बांचत हमर भाखा by Avinash Das on Sunday, June 19, 2011 at 4:52pm written by तारानंद वियोगी मैथिलीक सुप्रसिद्ध लेखक डा० विभूति आनन्द आइ बहुत दुखी भ' क' हमरा फोन केलनि। भाव-विह्वल छला आ ताहि संगे आक्रोशित जकां सेहो। हम पुछलियनि - भाइ, की बात? ओ बेर-बेर कहथि - 'अहां कें एना नहि बजबाक-लिखबाक चाही।' हम चकित रही जे आखिर एहन कोन बात हम बजलहुं वा लिखलहुं जाहि सं हमर ई आदरणीय लेखक एहि तरहें दुखी छथि। बात जे ओ कहलनि, ताहि सं हम बुझलहुं जे हुनकर क्यो अपेक्षित हुनका कहलकनि जे तारानन्द वियोगी 'विदेह' (मैथिली इन्टरनेट पत्रिका एवं फेसबुक-ग्रुप) मे कहलखिन जे विभूति आनन्द कें जे साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटलनि, से बेटाक मृत्युक सान्वना-स्वरूप। हमर देह सिहरि गेल जे हे भगवती, ई लीला। एहि बात सं तं हम निश्चिन्त रहबे करी जे एहि तरहक घटिया बात हम आइ तं की जे कहियो बाजिये नहि सकै छी। मोन मे यैह आएल जे गजेन्द्र ठाकुर हमरा सं दुश्मनी निमाहैत-निमाहैत की आब एते पतित भ' गेला? पछिला तीस बरस सं साहित्य मे हमर बहुत दुश्मन भ' चुकलाह अछि। हमरा खिलाफ मे जते लिखल गेल अछि, तकरा जं पुस्तकाकार छपाओल जाय तं पांच सौ पृष्ठक विशाल ग्रन्थ भ' जेतै। एकरा हम कहियो बेजाय नै मानलियै, उनटे अपन सौभाग्य मानलहुं जे जीबन्त-जागन्त लोक छी तं वैचारिक विरोध तं हेबे करत। तकरा सब कें पढबाको फुरसत हमरा नै रहैए। अपन काज करी कि घून-सून लेने घुरी? मुदा ओ कहलनि तं हम कने ताक-झांक केलहुं। एतबा बात तं प्रायः सब गोटे कें बूझल हएत जे इन्टरनेट पर वा फेसबुक मे सैकडोक संख्या मे फरजी एकाउन्ट छै, जे साइबर-युद्ध मे नकली सेनाक काज करै छै। कतेक बेर तं ई डिसाइड करब कठिन भ' जाइ छै जे के असली आ के नकली। जे किछु। एहने एक कोनो बन्धु बहुत उद्दंड भाषा मे लिखलनि अछि जे ई बात हम तहिया कहने रही, जहिया विभूति जी कें अकादमी पुरस्कार भेटल रहनि आ साक्ष्य के तौर पर 'समय-साल' पत्रिका के उल्लेख कएल गेल छै। गजेन्द्र जी एहि कथन कें अपन स्वीकृति प्रदान केलनि अछि। हम विभूति जी कें सब बात कहलियनि। पुछलियनि---'की अहां कें मोन पडैए जे हम तहिया ई बात कहने रहियै?' मुदा, हुनको ई बात अविश्वसनीय लगलनि। अन्त मे ओ 'समय-साल' निकाललनि। सरिया क' देखलनि। अन्त मे फेर वैह हमरा फोन क' क' सूचित केलनि जे अहांक ई बात कहबाक तं कतहु कोनो जिक्र नहि अछि। ओ हमरा पर दुखी भेल छला, ताहि लेल अपसोच प्रकट केलनि। फेर गप भेल जे हमरा एहि बातक खंडन प्रकाशित करबाक चाही। हम भारी छगुन्ता मे छी जे की खंडन प्रकाशित करी? अनजान मे गलती हो तं आदमी सुधरि सकैए। एतए तं मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। ठीके तं छै। पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी। खंडन केने सं की हएत? हम पहिनो खंडन क' चुकल छी। मुदा ओ सब अपन खुट्टा ठामे पर गाडने रहला। उनटे बकथोथनि करए लगलाह। तैयो, विभूति जीक सम्मानार्थ हम इन्टरनेट सं जुडल मैथिलीक पाठक-लेखक-एक्टिविस्ट लोकनि कें सावधान करै छियनि जे 'विदेह' मे छपल कोनो बातक विश्वसनीयता अत्यन्त संदिग्ध होइ छै। ई छौडा-मारडि के खेती छिऐक, नै उपजल तं अथी सती.....। जं कोनो कारण सं विश्वास करब बहुत जरूरी हो तं साक्ष्य के परीक्षण स्वयं क' लेथि। Ajay Karn परम आदरनिये तारानंद जी, अपनेक टिपण्णी फेश बुक पर अध्यन करबाक सुअवसर भेटल त हम अपनाके धन्य बुझलौं. एही टिपण्णी में अपने मुख्य रूप सं आदरनिये डा० विभूति आनन्द सं वार्तालाप करीत जाइन परेत छी मुदा छोट मुह आ पैघ बात ...किछु संदर्भित उल्लेख सं वक्तिगत रुपें हम असहमत छी .(1) अपनेक अनुसार "मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। " सब मैथिल अपनेक ई बात सं सहमत होयता मुदा प्रश्न जे ई "सुनियोजित अभियान" चला के रहल छथि? ..... हमर वक्तिगत विचार जे ई अभियान हम सब मैथिल बंधू समलित रूप सं संचालित क रहल छी. ( ख़राब नें मानब मुदा जखन अपनेक पुत्रक फेश बुक देखल तं भाषाक स्तम्भ में मैथालिक कोनो चर्चा नै छल) तै एकर सफाइ लेल मेहतरक फौजक नै अपन कर्तब्यक मांग थिक जाहि सं एकरा बजबूत आ समृद्ध कैल जाए.(2) भाषा कोनो उपजातिक ( अपने उध्ह्रित केने छी जे " पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी। ") संपत्ति व एकाधिकारक चीज कदापि नें भ सकित अछी आ मैथिलि त एकदमे नै | ई त कोनो बिसेष प्रान्त, स्थान व् देसक अलंकार थिक . अइयो ब्राह्मण या मेहतर सं कही बेसी आन उपजतिकलोकक भाषा मैथली थिक .(3) अपने कहलों जे " 'विदेह' मे छपल कोनो बातक विश्वसनीयता अत्यन्त संदिग्ध होइ छै" मुदा हम विदेहक नियमित पाठक छी आ लगभग विदेह में छपल सब बात हमरा त विश्वसनीय लागल.अंत में कहब जे छौडा-मारडि के खेती छिऐक तहिलेल विश्वसनीय छिऐक..!!!विदा लेबं सं पाहिले अपने सं निवेदन जे जं हमर उपुक्त कोनो बात सं ज अपनेक असुबिधा वा कष्ट पहुंचल होए त हम छमाप्रार्थी छी ... June 20 at 8:03am ·
लत्तड -फत्तड ककाका जे खिस्सा समय सालमे अबै छै ओइमे लिखल छलै (वियोगीजी-अहाँकेँ संकेत क') जे विभूतिजीक पुरस्कारकेँ अहाँ सांत्वना पुरस्कार लइखि क' पठेने रहियन्हि आलेखमे जे ओ नै छपलनि मुदा लत्तड -फत्तड ककाक खिस्सामे लिखि देलन्हि। आ जखन अहाँक ऐ आलेख (विदेह फेसबुक) पर एकटा पाठक ई प्रश्न उठेलन्हि तकर दू मासक बाद अहाँकेँ एकर जवाबक खगता की पड़ल:- .. June 20 at 8:05am ·
Priyanka Jha viyogiji , je charcha ahank videha par del gel aalekh me uthal chhal kee o charcha maithili sahityakar madhya nai chhal, sabh ek dosra ke kahait rahait chhathi je shardindu ke ahan ee patra va aalekh pathene rahiyanhi, je vinit ji likhne chhathi se sanket hamhoo samay saal me dekhne chhii, kono satya va jhooth je ek kaan se dosar kaan aa aab facebook par aabi gel takar javab te maangale jayat, videhak jatek dushman badhtai o tatek aagan badhat..gajendra thakur se ahan ke kon dushmani achhi? ee spasht nai kay saklau.... June 20 at 8:08am ·
Avinash Das Priyanka Jha जी, केओ केकरो आलेख पठेलकय, नइं छपलइ, घुरा देल गेलय, ओइ आलेख मे एहन कोनो बात रहय, जो अशोभनीय छलइ - की ई सभ गप मैथिली साहित्य के उच्च विमर्शक कोनो माहौल बनबय छई? अफवाह आ कानाफूसी कि साहित्यक विमर्शक केंद्र मे हेबाक चाही? गजेंद्र ठाकुर नीक काज कए रहल छथि ... मुदा अपने काज मे अइ स्तरक बातचीत लाबि क ओ अपन सभटा उल्लेखनीय काज के मिटा देब' चाहैत छथि - तं दोसर की क' सकैत छैक!!! June 20 at 8:14am ·
Avinash Das खोजी पत्रकारिता उ हएत जखनि वियोगी जी के उक्त आलेख अहां सब प्रकाशित क' सकी। June 20 at 8:16am ·
Priyanka Jha अविनाशजी , अहाँकेँ कियो कहत जे कौआ कान ल' गेल तँ कौआ केँ खेहारब आकि कान ताकब.. June 20 at 8:21am ·
Priyanka Jha जै सम्पादकीयक आधारपर तारानन्द जी गप उठेने छथि ओ देखू. http://www.videha.co.in/aboutme.htm June 20 at 8:21am
Priyanka Jha विदेह फेसबुकमे हम पहिनहिये (अहाँक कहबासँ पहिने) ई आलेख कमेंटक संग पेस्ट क' देने छी,.. June 20 at 8:22am ·
Priyanka Jha ऐ सम्पादकीयमे वियोगीजीक कथनक विपरीत (जे सम्पादक अपन सहमति देखेने छथि) मात्र तथ्यक निरूपण कएल गेल छै..कानाफूसी बड्ड दिन भेलै आ तकर कोन ग्रुप जिम्मेवार अछि से अहाँकेँ बुझले हएत.. सम्पादकीयक अंश द' रहल छी.."तकर बाद तारानन्द वियोगी जीक हिन्दीमे रंग-तरंग आ अभद्र भाषा (रे-रे सम्बोधित कएल भाषा) मे पोस्ट दोसर ठाम आएल (विदेहक फेसबुक चौबटियापर) आ अपनाकेँ ओ गएर-मैथिल घोषित कएलन्हि आ सम्वेदनाक गप उठेलन्हि। ओइपर एकटा पाठक हुनका लेल मैथिलीक उपयोगिता पुरस्कार पएबा धरि सीमित बतेलन्हि तँ दोसर पाठक हुनकर सम्वेदनाक स्वरकेँ फूसि बतेलन्हि आ हुनका अपन “समय साल” मे पठाओल लेखक विषयमे मोन पाड़लन्हि जकर चर्चा बहुत दिन धरि मैथिली साहित्य मध्य चलैत रहल छल- ऐ लेखमे ओ विभूति आनन्दकेँ मैथिलीक मूल साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल जएबाकेँ सान्त्वना पुरस्कार बतेने रहथि कारण ओइ बर्ख हुनकर जवान बेटाक मृत्यु भऽ गेल छलन्हि। ई पाठक वियोगीजी सँ प्रश्न केलन्हि जे तखन की अहाँक सम्वेदनाकेँ लकवा मारि गेल छल। एकटा पाठक प्रश्नक जवाबमे श्रीधरम कहलन्हि जे जाइ तरहेँ मैथिलीक किछु बेटा सभ यात्रीसँ वियोगी धरिक लेखनीक मौलिकतापर प्रश्न उठेने छथि तँ ओइ स्थितिमे कियो अही तरहेँ सोचि सकैत अछि। ओ ईहो कहलन्हि जे जँ हिनका सभकेँ हटा देल जाए तँ मैथिली साहित्यमे की बचत अण्डा !! बहुत दिनक बाद सुनील कुमार मल्लिक सेहो ऐ पोस्टपर वियोगीजी सँ प्रश्न केलन्हि जे अहाँ मैथिल नै छी तँ अहाँक आइडेन्टिटी की छी? "... June 20 at 8:26am ·
Priyanka Jha वियोगी डिसकसन सुरू केलन्हि, ओइपर अविनाशजी अहूँक कमेंट छल wow great views क' कय, आ ओइ पाठकक जवाब वियोगी जी नै देलन्हि..किए.. आ आब दू मासक बाद फोन एलापर आलेख लिखलन्हि..किए? फेर समय-साल मे ओ आएख पठेलन्हि आ ओ नै छपलै वा जे भेलै..मुदा ओही पत्रिका मे चुटकुलानन्द जेकाँ कोनो लत्तर कॉलममे ई बात एलै.. तकर की जवाब अछि. कियो कहय कौआ कान ल' गेल तँ पहिने कान देखबाक चाही..विदेह फेसबुकपर ई आलेख हम छपि देने छी..मुदा wow.great क बाद अहाँ प्रयः ग्रुप छोड़ि देने ask to join group क्लिक करू..हम रिक्वेस्ट एक्सेप्ट क' लेब, तखन अहाँ ओ पढि सकब.. June 20 at 8:32am ·
Avinash Das फुरसति मे आराम सं पढ़ब अहां सभके गप... June 20 at 8:52am · -अही तरहक ढेपा फेकौवलि सगर राति दीप जरए (कबिलपुर, जनकपुर, सुपौल, हजारीबाग, पटना आदि) आ आन मैथिली कार्यक्रममे सेहो होइत रहैत अछि, कुर्ता फाड़ाफाड़ीसँ लऽ कऽ गारि-गरौअलि धरि। जँ वियोगीजी सम्वेदनाक गप रङ-तरङक भाषामे उठेलन्हि तँ ओइपर भेल कमेन्टपर ओ तखने उत्तर दऽ दैतथिन तँ गप तखने खतम भऽ जइतए, जँ ओ कोनो आलेख “समय साल”केँ पठेलन्हि आ ओकर सम्पादक ओइ आलेखकेँ नै छापलक आ उन्टे सभकेँ कहैत फिरल (जेना देवशंकर नवीन हमरा कहलन्हि जे शरदिन्दु चौधरी हुनका ई गप कहलखिन्ह), वा कोनो व्यंग्य स्तम्भमे चुटकी लैत रहल, तँ ऐ तरहक गपाष्टक, जेकि घृणित साजिश भऽ सकैत अछि, केँ उठा कऽ खतम करबाक चाही, नै कि तोपल रहऽ देबाक चाही।जँ सम्पादकमे कोनो कटु चीज छपबाक हिम्मत नै छै तखन ओ गपाष्टकक माध्यमसँ रस किए लऽ रहल अछि? आ जँ ओ ई बिनु आलेख भेटनहिये कऽ रहल अछि तँ किए कऽ रहल अछि वा कियो दोसर व्यक्ति ओकर नामसँ ई “लूज टॉक” कऽ रहल अछि तँ की ओ अपन पत्रिकामे स्पष्टीकरण दइए आ से नै दइए तँ तकरा की मानल जाए? आ जे ई सभ बुझितो अनजान बनल अछि, मौन अछि आ ओकर अभद्र नोटपर जखन कियो ई प्रश्न उठबै छै तँ मौन रहैए आ फोन अबै छै तखन फेरसँ अभद्रतापर उतरि जाइए आ जकरासँ जिनगीमे कहियो भेटो नै भेल छै ओकरा कहै छै जे दुश्मनी निमाहि रहल छी, तकरा की कहल जाए! “ये पाया तो क्या पाया” २००५ सँ २०१२ मे कोन प्रेसमे छै जखन अपने पाइसँ छपेबाक छै तखन देरी किए? एकटा पाठक पुछलकन्हि जे ओकर किछु पन्ना स्कैन कऽ कए दऽ दियौ, तकरो डेढ़ दू साल बीति गेलै, ऐ पाण्डुलिपिक एक्को पन्ना सोझाँ नै आएल, एत्ते दिनमे तँ डेढ़ सए पन्नाक नव पोथी लिखा जाएत! आ आशीष अनचिन्हार “साहित्यिक वर्णसंकरता”क गप उठेलन्हि, एक्के रचनाकेँ हिन्दी-मैथिली दुनूमे मौलिक कहि छपेबाक घृणित प्रवृत्तिक गप उठेलन्हि, तँ की ओ गलत छल। आ जँ “ये पाया तो क्या पाया” २००५ सँ प्रेसमे छै, आ ई गप डेढ़ दू साल पहिने कहल जा रहल छै तखन आइसँ सात साल पहिने लेखक स्वयं “कर्मधारय”क फ्लैपपर एकरा कोन मुँहे प्रकाशित पोथीक सूचीमे रखने छथि? पुरस्कार पेबा लेल विदेहक विरुद्ध कोनो समझौता तँ लेखककेँ साहित्य अकादेमीसँ नै करए पड़लन्हि? एकटा महानुभाव शंकरदेव झा हमरा फोन केलन्हि जे विभूति आनन्दक पुरस्कारकेँ भीमनाथ झा अपन “टावर चौक परसँ” मे सांत्वना पुरस्कार कहने छथि, मुदा ओइ पोथीमे जखन हम देखलौं तँ ई गप नै छै, वरन उन्टे सौंसे साहित्यिक समाजक ऐ घटनासँ स्तब्ध हेबाक चर्च छै। ऐ तथाकथित साहित्यकार सभक मनोवृत्ति एहने छै! जे सम्वेदनहीन काज लोक स्वयं करैए तकर आरोप विदेहपर लगा कऽ सत्यक उद्घाटनकेँ रोकल नै जा सकत, हमर, हमर पत्नीक आ विदेहमे हमर सहयोगीकेँ ई-पत्र आ फोनपर पढ़ल गारिक अभिलेखन जँ कएल जाएत तँ एकटा पोथी तैयार भऽ जाएत, आ ओइ कालमे ई सभटा आपसी विरोधी एकट्ठा भऽ जाइए। लोकक “लूज टॉक” केलाक बाद भगबाक आदति एक तरहेँ मौन स्वीकारोक्ति होइए आ बहुत बादमे नठबाक आदति ऐ रोगकेँ आगाँ बढ़बैए, आ से तखने दूर हएत जखन ऐ तरहक सभ गप सत्यताक संग अभिलेखित हएत (भलहिं लोक एकरा “दुश्मनी निमाहब” कहि ब्लैकमेल करबाक कोशिश करथु।) कोन-कोन अभद्र भाषासँ सम्बोधित करथु) आ ऐ तरहक अभिलेखन विदेह द्वारा आगाँ सेहो कएल जाइत रहत। - गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक) ]] पाग, मिथिला आ जातिवादक राजनीति- असममे एहि बीच चलि रहल बिहू पर्व कोनो जाति वा धर्मसँ बान्हल नहि अछि। कहि सकैत छी एहि पावनिक अवसर पर सम्पूर्ण असामबासीक मोनमे एकेटा शब्दक संचार होइछ आ से थिक प्रेम। प्रेम छैक प्रकृतिसँ, लोकसँ, सभ जीव-जन्तुसँ। एहिमे ने कतहु कोनो बान्ह छैक आ ने कोनो सीमा। सभगोटए एहि पुनीत अवसर पर अपन निष्ठा आ सिनेहकेँ एहि रूपें उपस्थापित करैछ, जे लोकक मोनमे ई अभिलाषा वर्षोभरि जोर मारैत रहैत छैक जे बिहू कहिआ आओत आ हम सभ फेर एहि पाबनिकेँ प्रेम-भावसँ मनायब। हुनका लोकनिक मोनमे कतहु एहि विषयक चर्चा नहि जे बिहू कत’ सँ आयल, ई ककर छी, ओ सभ तँ मात्र एतबे जनैत छथि जे ई प्रेमक पाबनि थिक। जापी,गमोछा, बिहू गीत ई किनकर, एहि पर कोनो माथापच्ची नहि, मात्र पावनिक ई सरंजाम असमियाक प्रतीक थिक। एहि प्रसंगकेँ एतए उठएबासँ हमर मतलब अछि जे आइ काल्हि, खासकए मिथिलामे, किछु युवा तुर्क लोकनि विषय बिना बुझने अपन ज्ञान झाक उपयोग प्रारम्भ कए दैत छथि। एम्हर देखल गेल अछि जे किछु गोटे पागकेँ एकटा जाति सँ बान्हि मिथिलाक अस्मिता पर चोट क रहल छथि, प्राय: हुनका अस्मिताक महत्ता ज्ञात नहि छनि। किछु दिन पूर्व पागक मादे मनोज कर्ण उर्फ मुन्नाजी कहलनि जे ई ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक उपयोगक छी। मुदा, एतए हमर कहब अछि जे ओ आजुक गुटबाजीसँ प्रभावित भए ई व्यथा व्यक्त कएलनि, हुनका प्राय: खूब नीक जकाँ बूझल हेतनि जे पाग सम्पूर्ण मिथिलाक गौरवक प्रतीक थिक, प्राय: हुनका देखल होएतनि जे मिथिलाक सभ जातिक लोक अपन बिआहमे एकर उपयोग करैत छथि, से चाहे घुनेसक भीतरमे हो वा मौरक। सत्य पूछी तँ एहन-एहन सोचक कारणेँ हमरा कखनो-कखनो डर लगैत अछि जे ई सभ कखनो इहो कहि सकैत छथि जे विद्यापति मात्र जाति विशेषक साहित्यकार थिकाह, मखान मात्र जाति विशेषक उपयोगक वस्तु थिक, धोती पहिरब तँ जाति विशेष कर्त्तव्य थिक आदि-आदि। एहि विषय पर सोचला पर लगैछ जे जखन सामंत अपनहिंमे लड़ि कमजोर हुअए लगैत छथि तँ ओसभ एकटा नव कूटनीतिक चालि चलि शोषितक नेता बनि हुनका माध्यमे अपन काज सुतारबाक प्रयास प्रारम्भ कए दैत छथि आ तेँ इहो सोच हमरा जनैत ओही नव धाराक सामंती सोचक उपजा छी। किन्तु हुनका लोकनिकेँ आब सावधान भ जएबाक चाहियैन्ह जे अपने कतबो फुटक राजनीति करब, अपन काज सुतारबाक लेल हाथ-पएर मारब, मुदा कार्यसिद्धि असम्भव। आब मिथिलाक आमजन अपन अधिकार आ अस्मिताक प्रति सचेत-सचेष्ट भए गेल छथि। तैँ ई पाग, मखान, माछ कोनो जाति विशेषक संपत्तिक घोषणा करबासँ पूर्व ई सोचि लेब आवश्यक जे ई मिथिलाक अस्मिता छी आ एहि पर सभ मैथिलक अधिकार छैक। अन्तमे मिथिलामध्य जुड़-शीतल चलि रहल अछि , गाछ-बीरिछ क जड़िमे पानि देल जा रहल अछि, सभ अपन पूर्वज आ अपनासँ छोटकेँ जुड़ा रहल छथि आ एहने समयमे हमरा मोन पड़ैत अछि युवा साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक लिखल ओ आखर – “भेल प्रेमक रौदी एहि जगमे तेँ धधकए सभतरि दावानल जुड़शीतलक जल-थपकीसन बरिसाउ प्रिये कने प्रेमक जल.....।” (मौर कोढ़िलाक बनैत अछि आ पागसँ फराक अछि। कर्ण कायस्थमे सेहो सिद्धान्त कुमरम आदिमे मात्र पाग पहीरि कऽ विध होइत अछि, ओहो सभ बियाह करऽ पाग नै मौर पहीरि कऽ जाइत छथि। पूर्णियाँक ब्राह्मणमे नव-विवाहिता बरसाइतमे मौर पहीरि कऽ वटवृक्ष धरि जाइत छथि। पाग मात्र आ मात्र मैथिल ब्राह्मणक बियाहक विध-बाधक प्रतीक अछि। विजय कुमार ठाकुर लिखै छथि: "मिथिलाक धार्मिक क्षेत्रमे एहि सामन्तवादी युगीन धार्मिक विचारधाराक प्रभाव एहन सर्वव्यापी छल जे एखनहुँ एहि परम्पराक निम्नलिखित अवशेष समाजमे विद्यमान अछि: ...(घ) पाग सेहो तांत्रिक विचारधारासँ सम्बद्ध अछि।" (मध्यकालीन मिथिला पृ.२६) - सम्पादक) विनीत उत्पल
आधुनिक मैथिली नाटक आ टुच्चा नाटककारक जातिवादी रंगमंचक अवधारणा/ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठी: सगर राति दीप जरय: एकटा बहन्ना/ (सम्पूर्ण लेखमे लेखक सेहो शामिल अछि, हुनका परछाय कऽ नै देखल जाए)
लोकतंत्रक परंपरा अछि जे आलोचना हेबाक चाही। जौं आलोजना सहबाक क्षमता केकरोमे नै अछि तँ ओ लोकतांत्रिक तँ कोनो विधिए नै भऽ सकैत अछि। ओ तँ तानाशाह भेल। अहिनामे तँ समाजमे विकृति अएबे करत आ से विकृति मिथिलामे देखल जा रहल अछि। एकरा कहएमे कोनो संदेह नै अछि जे गारि सभ लोक संस्कृतिक हिस्सा अछि। मुदा कोनो भी रचनात्मक लोक अहि शब्दक प्रयोग, जातिवादी गारिक प्रयोग, कोना करैत अछि, अहि पर हुनकर योग्यता आ क्षमताक आकलन कएल जाइत अछि।
दिल्ली मे आयोजित साहित्य अकादमी कथा गोष्ठी तथाकथित ७६म सगर राति दीप जरय (!) संपूर्ण देश आ विदेश मे रहए बला मैथिली भाषीक आगू कतेको रास प्रश्न छोड़ि देलक। जइ राति ई गोष्ठी भऽ रहल छल, मात्र १८ लोक भोर धरि बचल, ३४ टा लोकक सोंझा अप्पन-अप्पन खिस्सा कागज देख कऽ सुना रहल छल, तखने राजधानी दिल्ली सँ एक हजार किलोमीटर दूर मिथिला क कतेको गाम मे रहए बला लोक द्वारा मचान आ चौबटिया पर कतेको रास लोक मुहजबानी खिस्सा-पिहानीक क्षमताक परिचय दऽ रहल छल। हुनका नै तँ कोनो माइकक जरूरत छल, नहिये मसनदक आ नहिये खाइ कऽ चिंता छल। ओ ओ लोक छल जे दिन भरि मजूरी कऽ सांझ केँ बैसि कऽ टाइम पास कऽ रहल छल। एना मे जे दिल्ली मे कथा गोष्ठी भऽ रहल छल हुनकर आयोजक लोकनि लेल नहिये बंगला कवि रवीन्द्र नाथ ठाकुर महत्वपूर्ण छल (रवीन्द्र नाथ ठाकुर साहित्य अकादेमीक मार्च क्लोजिंगक बचल फण्डक लूट बनि कऽ रहि गेलथि, कारण कथा रवीन्द्रमे रवीन्द्र छोड़ि सभ किछु छल) नहिये मैथिली/ हिन्दीक कवि बाबा नागार्जुन। ई वएह बरख छी जखैन रवीन्द्र नाथ ठाकुरक डेढ़ सएम बरखी मनाओल जा रहल अछि। तमाम संस्थान पाइ उगाहि रहल अछि। जखैन की ई बरख बाबा नागार्जुनक जन्म शताब्दी बरख सेहो अछि। बिहार सेहो अप्पन स्थापनाक सौवां बरख मना रहल अछि। अहि ठाम प्रश्न अछि जे की मैथिली भाषाक लेल रवीन्द्रनाथ ठाकुर अहम छथि वा बाबा नागार्जुन वा दुनू। तखन की मानल जाए जे पूंजी आम लोक आ संस्कृति पर हावी भऽ रहल अछि। एकटा कहबी अछि, पूंजी असगरे नै आबैत अछि, ओ अपना संगे एकटा संस्कृति सेहो आनैत अछि। यएह पूंजी मिथिला केँ खा रहल अछि। मुट्ठी भरि लोकक पाकेट भाषा मैथिली बनि रहल अछि, बाकी सभ मुँह ताकि रहल अछि। रवीन्द्रक विरोध करबाक कोनो प्रयोजन नै अछि मुदा बाबा नागार्जुन केँ बिसुरि कऽ हम हुनका सम्मान दैक प्रयत्नक विरोध तँ अवश्य हेबाक चाही। जखैन देशक राजधानी दिल्ली मे कथा गोष्ठी भऽ रहल अछि, तखन हम अप्पन भाषाक कवि बाबाक नाम फण्डक लेल नै लऽ कऽ कवि रवीन्द्रकेँ नेमप्लेट बना कऽ सम्मान दिऐ, ई केहन मानसिकता अछि। अप्पन दीपक नीचाँ अन्हार आ भरि शहर ढ़िंढोरा, केहन सिद्धांत अछि? अप्पन घर केँ अन्हार राखि कऽ दोसर घरक लेल दीप लेसी, ई केहेन विकृत दुनियाक दृश्य अछि। एखन जखैन किसान मरि रहल अछि, संपूर्ण मिथिला बाढ़ सँ त्रस्त अछि। ढेर रास लेखन समाजसँ बेरल लोक लिखि रहल अछि आ गद्य/पद्यमे प्रमुखतासँ शामिल अछि। अहि परिस्थितिमे एकटा सामान्य मैथिलीक लोक लेल कवि रवीन्द्र प्रासंगिक अछि वा बाबा नागार्जुन। दिल्लीक लिट्ल थियेटर ग्रुप, मंडी हाउस मे हिन्दीक लेखक अज्ञेयक रचना पर हुनकर जन्म शताब्दीक लेल नाट्य प्रस्तुति केलक। मुदा जखैन जे संस्था अपनाकेँ नाट्य संस्था कहि कऽ पताका फहराबऽ चाहैत अछि, मुदा ओकरा भंगिमा, अरिपन, कोलकाता आ जनकपुरक रंगमंच आ विदेह समानान्तर रंगमंचक जानकारी नै अछि, ओकर सँ सभ कियो अपेक्षा करत जे ओ बाबा नागार्जुनक रचना पर कोनो कार्यक्रम जरूर करताह। मुदा, ई नहि भेल। किए? किएकि सरकार पाइ नै देलक। तखन सगर राति दीप जरयक माला उठेबाक कोन खगता छल, जोड-तोडसँ अर्द्धनारेश्वरक बोकारोक प्रस्ताव अस्वीकृत भेल (उमेश मण्डल जीक ऐपर विदेहमे विस्तृत रिपोर्ट आएल अछि। जखन राबड़ी बंटैत अछि तखन जे क्यो 'क्यू" मे ठाढ़ हेता, सभकेँ राबड़ी भेटत। मुदा, बलिहारी तखैन ने जखैन अहाँ लीक सँ चलि आ अप्पन शर्तक आधार पर सरकारी फंड लऽ सकी। फंडक लेल हम कोनो उत्सव करी, ई कतय क आ केहन सिद्धांत अछि।
जौ हम कनी कालक लेल मानि ली जे हम रविंद्र सँ प्रभावित छी तखन हुनका सँ सीखैक जरूरत अछि नै की फंड लऽ पेट भरबाक। आइ धरि बंगालक सभ घरमे रवीन्द्र संगीत गायल आ सुनल जाइत अछि मुदा मिथिलाक घर मे विद्यापति संगीतक केहन हाल अछि, ई केकरो सँ नुकायल नै अछि। जातिवादी मैथिली रंगमंच तँ मैथिलीकेँ लेलिये गेल छल मुदा विदेह समानान्तर रंगमंच ओकर सोझाँमे अवरोध बनि आबि गेल। जखैन की कवि विद्यापति कवि रविंद्र सँ कतेक पुरान छथिन, ई सभकेँ बुझल अछि। समूचा बंगाल घुरि कऽ आबि जाउ, ओतय बंगला भाषाटा बाजल जाइत अछि मुदा मिथिलामे अंगिका, वज्जिका जेहन कतेको भाषा अही जातिवादी लेखन आ रंगमंचक कारण मैथिलीसँ निकलि कऽ अप्पन अस्तित्व टा नै बना लेने अछि, मैथिली केँ चुनौती सेहो दऽ रहल अछि।
आइ जकरा काल्हिक जन्मल मैथिली क टुच्चा नाटककार आ नाटक कहि कऽ जातिवादी रंगमंचक भड़ैत भर्त्सना कऽ रहल छथि ओ टुच्चा कोना भऽ सकैत अछि, जे बिना कोनो तामझामक, बिना मीडिया प्रबंधनक, बिना प्रचारक, बिना कोनो संस्थागत सहयोगक, अप्पन रचनात्मकता मे लागल अछि। ओ टुच्चा कोना अछि जिनकर नाटक देखहि बला लोक केँ दू टाइमक रोटी नै भेटैत अछि, मुदा नाटक जरूर देखैत अछि। आ नाटको दलित विमर्शपर, सूचनाक अधिकारपर, जाति-पातिक कट्टरतापर, भ्रूण हत्यापर। हुनका लग अप्पन गाड़ी नै अछि, बुल्लै दू कोस धरि चलि कऽ नाटक देखैत अछि। भरि-भरि राति हुनकर नाटक देखल जाइत अछि, ६-६ घण्टाक नाटक, एतेक पैघ नाटक मराठीमे सेहो एकाधेटा अछि, मैथिलीक जातिवादी रंगमंचक नाटक आ हिन्दीक नाटकक तँ चर्चे ब्कार। आ नै हुनका लग लाइट लेल बड़का-बड़का बल्ब अछि, नै ओतेक तकनीक, मात्र प्रतिभा अछि, समाजकेँ बचेबाक लेल जातिवादी रंगमंचक विरुद्ध समानान्तर रंगमंचक संकल्पना अछि आ तखन ओ टुच्चा कोना अछि। हुनकर नाटक लेल गाम-घरमे, चौबटिया पर गप होइत अछि, मुदा अखबार, मैथिलीक जातिवादी संस्था सभक पत्रिका या विदेहक अलाबे इंटरनेट पर चर्चा नै आबैत अछि, तखन ओ टुच्चा कोना अछि? जे कियो मैथिली केँ लऽ कऽ 'डिप्रेस्ड’ अछि, तँ ओहेन मानसिकता केँ किछु नै कएल जा सकैत अछि। हिन्दी राजभाषा अछि नै कि अप्पन सभक मातृभाषा। दुनियाक सभ भाषाक सम्मान करबाक चाही, मुदा अप्पन भाषाक दांव पर नै। ई छद्म रंगमंचकर्मी लोकनि अपन जातिवादी नाटकक तुलना हिन्दीक नाटकसँ कऽ गर्व अनुभव करै छथि, जखैन की सत्य अछि जे हिन्दीसँ पुरान साहित्यिक भाषा मैथिली अछि आ हिन्दीबला सभ ज्योतिरीश्वरक मैथिली धूर्त समागमक हिन्दी अनुवाद कऽ कहियासँ नै खेला रहल छथि, ऐ मैथिलीक जातिवादी रंगमंचकर्मी आ नाटककारकेँ ई बुझलो छन्हि जे भारतेन्दुक “अन्धेर नगरी...” ज्योतिरीश्वरक मैथिली धूर्त समागमक अनुकरण मात्र अछि?
जे कियो असली मैथिल होएत ओ अप्पन मां केँ बेचि कऽ नै खा सकैत अछि। अप्पन मिथिला सीताक मिथिला अछि।,माँकेँ सम्मान दैबला। हिन्दी पेट भरयबला, नौकरी भेटयबला भाषा अछि। मिथिला आ मैथिली सँ सभक आत्म सम्मान जुड़ल अछि। जेकरा लग आत्मा नै अछि ओकरा लऽ कऽ किछु कहल नै जा सकैत अछि। आइ किछु लोक मिथिलाक गद्य/पद्य क हिन्दी मे अनुवाद कऽ रहल अछि। अहि ठाम सवाल अछि जे की अहि सँ मैथिली भाषाक प्रचार भऽ रहल अछि आ दोसर भाषा मजबूत भऽ रहल अछि? जखैन धरि आन भाषाक रचना मैथिली मे नै आएत ता धरि मैथिली मजबूत कोना होएत, आ जँ अहाँ घरमे मजगूत नै हएब तँ बाहरमे सम्मान भेटत? एक बेर अप्पन मोनमे ताकि कऽ हिम्मत करए पड़त जे हम अप्पन माँ मैथिली लेल की कऽ रहल छी। माँ अप्पन नेना केँ छातीक दूध पिआबै अछि मुदा ओ नेना पैघ भेले पर माँ केँ नै बेच दैत अछि। माँ, माँ होइत अछि। की अहाँ अप्पन माँ केँ जिंस-टॉप पहिरा कऽ बाजार मे लऽ जाइत छी? की अहाँ अप्पन माँ केँ बाजार मे ठाढ़ कऽ नीलाम करैत छी? की अहाँ कोनो पुरस्कार पेबा लेल अप्पन माँ केँ केकरो आर लग पोसिया लगाबैत छी, नै ने। तखन मैथिली संग ई किए कऽ रहल छी, एक बेर कनी सोचियौ तँ। पूनम मण्डल आरती कुमारी आ सगर राति दीप जरय डॉ. आरती कुमारी (१९६७-२०१२)क काल्हि रातिमे मृत्यु भऽ गेलन्हि। पति श्री अनिल कुमार रॉय आ पुत्र अनुराग कुमार आ पुत्र उज्जवल प्रकाश केँ छोड़ि ओ चलि गेलीह। हुनकर मृत्युसँ मैथिली साहित्य जगत सन्न अछि। हुनकर एकटा पोथी प्रकाशित अछि "मैथिली मुक्तक काव्यमे नारी"। महिषीमे ७३म सगर राति दीप जरय क माला ओ भागलपुर लेल उठेने रहथि, आ तकरा बाद ओ अस्वस्थ भऽ गेलीह, कोलकातामे ऑपरेशन भेलन्हि। किछु सामन्ती प्रवृत्तिक लोककेँ हुनकर सगर राति दीप जरय क माला उठेनाइ नै अरघलन्हि आ हुनका द्वारा भागलपुरक साहित्यकारसँ माला उठेबासँ पहिने नै पुछबाक, आ "जँ भागलपुर मे सगर राति दीप जरय हएत तँ कियो नै आएत" आदि गप कहि मानसिक वेदना पहुँचा कऽ दीप आ रजिस्टर लऽ लेल गेल, आ सगर राति दीप जरय भागलपुरमे नै भऽ सकल। आ सगर राति दीप जरय पर जे ग्रहण लागल से अखन धरि लागले अछि। हम सभ कहनहियो रहियन्हि जे जँ अहाँ भागलपुरमे सगर राति दीप जरय करय चाहै छी तँ निश्चिन्त भऽ करू, सभ पहुँचत, मुदा ओ कहने रहथि जे ओ सगर राति दीप जरय करय चाहै छथि, मुदा विवादमे नै पढय चाहे छथि। स्व. आरती कुमारीकेँ कृतघ्न समाज दिससँ श्रद्धांजलि। Shyam Darihare 74wa SAGAR RATI DEEP JARAY-- 10 SEPT 2011. Sthan:- HAZARIBAGH. ( Patna ke taraf sa Hazaribagh me pravesh sa pahile N.H. par Vinoba Vhave University Gate chhaik. University gate sa ek minat baab dahina me ekta barka maidan chhaik waih chhaik HOME GUARDS TRAINING CENTRE. Ohi Gate par sipahi sa puchhari karu o hall dhari pahuncha det. SAB MAITHILI KATHAKAR aa KATHPREMI LOKaNIKE SADAR HAKAR. Like · · Unfollow Post · August 11, 2011 at 3:48am Shefalika Verma and Kislay Krishna like this. Arvind Thakur बढियां खबर ! बधाइ !रोमन लिपि मे लिखबाक अनेक खतरा छै,एकटा एतहु देखाइत अछि -कथाप्रेमी कें कठप्रेमी पढय मे बेसी सुविधा बुझाइ छै|सभ गोटे देवनागरी मे लिखबाक हिस्सक बनाबी त नीक |हम गोष्ठी मे आयब,दरिहरे जी| August 11, 2011 at 7:29am · Like · 2 Hirendra Kumar Jha Bhagalpurak arth ahzaribag hit chhaik ? August 13, 2011 at 1:13am via · Unlike · 2 Hirendra Kumar Jha Bhagalpurak arth Hazaribagh kona bhay sakait chaik ? ehi san ta prathak samapti bhay jayat. punarbichar karu. Hirendra August 13, 2011 at 1:15am via · Unlike · 1 Ajit Azad aarti ji goshthi karba me saksham nai chhaith. hunke se puchhla par ee bha rahal chhaik. aarti ji gambhir roop se bimar chhaith aa kolkata me 3 maas se ilaaj kara rahlih achhi. August 13, 2011 at 6:10am · Like Kislay Krishna ee ektaa vikalp rup me sojha aayal achhi.... August 13, 2011 at 8:07am · Like Gajendra Thakur आरती जी २४ सितम्बर केँ गोष्ठी करबा लेल तैयार छथि तकरा बादो हुनका सँ मौका छीन कऽ मात्र दस दिन पहिने गोष्ठीकेँ हजारीबाग लऽ जेबाक की प्रयोजन..? Hirendra Kumar Jha जी सँ हम सहमत छी..आब जखन १० सितम्बर तिथि घोषित भऽ गेल तखन आब ओ पाछाँ हटि जाथि से अलग बात, मुदा की हुनका ई भरोस देल गेलन्हि जे अगिला गोष्ठी वएह करेतीह? हम पहिनहियो कहने रही जे हुनकासँ बिना पुछने कोनो निर्णय नै लेबाक चाही..यदि हजारीबागमे गोष्ठी हुअए तँ सशर्त हुअए जे अगिला गोष्ठी आरती जी करेतीह..ई दवाब जे अहाँक अहठाम २४ सितम्बर केँ कियो नै आएत/ अहाँ भागलपुरमे ककरोसँ नै पुछलिऐ..आदि बना कऽ हुनकासँ जबरदस्ती हँ कहेबाक कोनो मतलब नै.. August 17, 2011 at 7:39am · Like Ajit Azad jahiya 10 setamber ke ghoshna bhel...tahi se ek ghanta pahine tak aarti ji lag date final naih rahain. ham fon kayliyai ta o kahlih je AAI RAIT ME HAM AHAN KE KAHAB...KARAN JE EK GOTE HAMRA AARTHIK SAHYOG KARBA LEL CHHAITH...YADI O GACHHI LETAH TA HAM 19 YA 20 SEPTEMBER KE KARAB. ham puchhaliyain 19 ke ya 20 ke? o kahalain EHI DOONU TITHI ME SE JAHIYA SHAIN PARTAIK TAHIYA. ham kahaliyain je ehi doonu tarikh ke shain nai parait chhaik. takhan o garbara gelih. hamhi kahaliyain je 24 ke bha sakait achhi muda durga puja 28 se chhaik...ki ahan 3 september ya 10 september me se kono din kara sakait chhi? o taiyar nai bhelih. ham kahaliyain je takhan ahan 24 ke kareba lel swatantra chhi...aa ham aybo karab muda besi lok nai autah...dosar gap je ekhno tak ahank date final nai achhi ( karan, o takhno ber-ber kahait chhalih je ham ek gote se baat karab takhan date ghoshit karab). ham hunak swasthya aa aarthik sthiti ke dekhait kahaliyain je ahan baad me jahiya thik bha jayab tahiya karab. o kahalain JE HAM SANJH ME AHANKE FINALLY KAHAB. baad me o ohi samay pradip bihari ji ke sabhta baat kahalkhin. pradip ji hunka bujhelkhin je ahan ekra presstige issue nai banau...sabh ahank heet me kaih rahlah achhi. o maini lelkhin aa register hunke patheba lel sahmat bhelkhin. ekar baad pradip bihari ji turat hamra fon kaylain je aarti ji taiyar chhith je agila goshthi hazaribagh me hoiek. pradip ji hunka eeho kahalkhin je ahan ee gap ajit ji ya raman ji ke seho kaih diyoun muda o kahalkhin je ham VIDEHA me kaih dait chhiyaik, sabhke khabar bha jaytaik. ham aai tak videha me hunak kono statement nai parhal. hamra lagait achhi je ehi mamla ke tool nai del jai...o yadi agila goshthi karay chahait chhaith ta o karaith, ehi me kakro kiyaik kono aapatti hetaik. ee goshthi june me hebak rahaik...arthat may me date ghoshit bha jaybak chahi chhal. o june me 10 aa 11 ke saharsa me sahitya acsdemik seminar me aayal chhalih...ham takhno hunaka puchhaliyain je kahiya karbaik goshthi...o july me karbak baat kahlain. tabat tak hunak mon kharab bala baat nai rahaik. julu me kolkata me o kavita path karba lel bimarik avastha me aayal chhlih. takhno ham puchhne rahiyain je kahiya karab goshthi? o kahalain je september tak ta ham kolkate me rahab (under treatment). takar baade karab. August 17, 2011 at 10:55am · Like Ajit Azad ek ber ehi tarhak ghatna aar bhel chhaik. dr dhirendra ji janakpur me karbaik prastav darbhanga goshthi me delkhin muda 4-5 maas tak o nai kara saklah takhan pt. govind jha daman kant jha jik sahyog se patna me karoune rahaith. aarti jik paksha me sabh achhi muda hunak sthiti thik nai chhain...ehi mamila me bhagalpurak lok besi nik se kaih sakait chhaith. मिथिला विभूति स्मृति पर्व समारोह २०१२ दिल्लीक रफी मार्गपर अवस्थित मावलंकर सभागारमे २० मइ २०१२ केँ मिथिला विभूति स्मृति पर्व समारोह २०१२ सम्पन्न भेल। दिल्लीक विकासमे बिहारीक योगदान सभसँ बेशी अछि, ई गप दिल्लीक मुख्यमंत्री शीला दीक्षित २० मइ २०१२ ई. केँ अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा आयोजित मिथिला विभूति स्मृति पर्व समारोह २०१२ मे मिथिलाक विशिष्ट विभूति सभकेँ सम्मानित करबाक बाद देल अपन भाषणमे कहलन्हि। ई जे दिल्लीक प्रशंसा विश्व भरिमे भऽ रहल अछि से बिहारी लोकनिक योगदानसँ विशिष्ट बनल अछि, ओइमे सँ किछु गोटेकेँ सम्मानित कऽ हुनका खुशी भेल छन्हि से ओ कहलन्हि। ओ महाबल मिश्र सांसदकेँ मैथिलीक प्रयोगमे लाज करबा लेल हँसी मे आलोचना सेहो केलन्हि, ओ कहलन्हि जे मैथिलीक प्रचार-प्रसार एकर विकास लेल जरूरी अछि, ओ कहलन्हि जे जँ महाबल मिश्र मैथिलीक प्रयोग करितथि तँ ऐ सँ हुनकर मैथिलीक ज्ञानमे अभिवृद्धि होइतन्हि। ओ भाजपा सांसद प्रभात झासँ कहलन्हि जे ओ अपन मूल प्रदेशक मैथिली भाषी सांसदसँ संसदमे मैथिलीक प्रयोग लेल प्रेरित करथि। शीला दीक्षित दिल्लीक मैथिली-भोजपुरी अकादमीक काज असंतोषजनक हेबाक गप कहलन्हि आ ओकर काज आगाँ ब्ढ़ेबामे सरकार सहयोग देत से कहलन्हि। महाबल मिश्र मिथिला विभूति स्मृति पर्व समारोह २०१२ मे मैथिलीमे अपन भाषण देलन्हि। ऐ अवसर पर पूर्व सांसद श्री गौरीशंकर राजहंस आ दिल्लीक पूर्व विधायिका आ सांसद कीर्ति आजादक पत्नी श्रीमती पूनम आजाद सेहो रहथि। सांसद प्रभात झा सीताक जन्मस्थली पुनौरा (सीतामढ़ी), विद्यापतिक जन्मस्थली बिस्फी (जिला दरभंगा) आ कालिदासक ज्ञानप्राप्ति स्थली उच्चैठ (जिला मधुबनी) क पर्यटन उद्देश्यसँ बढ़ावा देबाक आवश्यकता जनौलनि, ऐ स्थल सभक वर्तमान दुर्दशाक ओ चर्च केलन्हि आ ऐ संगे आन पर्यटन स्थल सभक विकास हेबाक आवश्यकता जनौलनि। अखिल भारतीय मिथिला संघक महासचिव श्री विजय चन्द्र झा अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा कएल जा रहल कार्यक जनतब देलन्हि आ मैथिलीक विकास लेल सभकेँ आगाँ एबाक आह्वान केलन्हि। मिथिला विभूति स्मृति पर्व समारोह २०१२ मे रंगमंच अभिनेत्री श्रीमती प्रेमलता मिश्र प्रेम, नाट्यकार श्री महेन्द्र मलंगिया, नाट्य निर्देशक श्री उत्पल झा, मैथिलीक ई-पत्रकार आ राष्ट्रीय सहाराक श्री हितेन्द्र गुप्ता, ध्रुपद गायक श्री अभय नारायण मल्लिक, शतरंज खिलाड़ी श्री श्रीराम झा, गोल्फ खिलाड़ी श्री अशोक कुमार, चिकित्सक डॉ. राज्यवर्धन आजाद, चिकित्सक डॉ. अजय चौधरी , उद्यमी श्री अनिल कुमार शर्मा, गायिका श्रीमती कुमुद झा, श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर (गीत-संगीत), श्री गजेन्द्र नारायण सिंह (संगीत) आ दिल्ली नगर निगमक हालक निर्वाचित पाँच टा पार्षद श्री सुनील झा, श्री रामदयाल महतो, श्रीमती तिलोत्तमा चौधरी, श्रीमती विमला देवी आ श्रीमती कल्पना झा सहित १९ गोटेकेँ मिथिला विभूति सम्मानसँ सम्मानित कएल गेल। श्री गजेन्द्र ठाकुरकेँ “पुरातात्विक तिरहुता भोजपत्र अभिलेखक पुनरोद्धार आ गूढ़ाक्षरकेँ स्पष्ट कऽ तकर देवनागरीमे लिप्यंतरण” लेल मिथिला विभूति सम्मानसँ सम्मानित कएल जेबाक छल मुदा कोनो कारणवश ओ सम्मान लेबा लेल नै एलाह। (स्रोत समदिया) आशीष अनचिन्हार मैथिली गजलकार परिचय श्रृंखला भाग-1 जीवन झा आधुनिक मैथिलीक पहिल गजलकार। परिचय----स्व.जीवन झा जन्म हरिपुर गाम ( प्रखंड-सरायरंजन, समस्तीपुर ) 1856 ई.मृत्यु काशीमे 1920 ई, प्रेमशंकर सिंह हिनकर जन्म आ मृत्यु 1848-1912 लिखै छथि, काशीराजक दानाध्यक्ष पदपर बहुत दिन रहथि, हिनक चारिटा नाटक सुन्दर संयोग, नर्मदा सट्टक, मैथिली सट्टक आ सामवती पुनर्जन्म।सामाजिक विषयपर मैथिली नाटक लिखबाक प्रारम्भ ईएह केलनि, संस्कृत परम्परा रखैत फारसीसँ प्रभावित हिनकर नाटक अछि, नाटकक बीचमे ई गीत-गजल दै छला। जन्मक कोनो तिथि नै अछि। हिनक मृत्यु इ.1912 केर बैशाख शुक्ल सप्तमीकेँ भेलन्हि। हिनक गजल प्रस्तुत अछि| प्रस्तुत गजल हिनक सुन्दर संयोग नाटकसँ लेल गेल अछि जे की 1905 इ. मे लिखल गेल छल। कविवर जीवन झाक नाटक सुन्दर संयोगसँ लेल मैथिलीक पहिल गजल सुन्दर संयोग चतुर्थ अंकमे लेखक स्वयं (गजल) कहि एकरा सम्बोधित कएने छथि। (गजल) आइ भरि मानि लिअऽ नाथ ने हट जोर करू। देहरी ठाढ़ि सखी हो न एखन कोर करू ॥१॥ हाय रे दैव! इ ककरासँ कहू क्यो न सुनै। सैह खिसिआइए जकरा कनेको सोर करू ॥२॥ लाथ मानै ने क्यो सभ लोक करैए हँसी। बाजऽ भूकऽ ले जँ कनेक जकर सोझ ओठ करू ॥३॥ जाइ एखन ने धनी एक कहल मोर करू। आन संगोर करू एहि ठाम भोर करू ॥४॥ ( मैथिली गजल शास्त्र आलेख भाग-९सँ साभार ) गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-2 आरसीप्रसाद सिंह मानलजाइत अछि जे जीवन झा केर बादमैथिलीमे आरसी प्रसाद सिंहगजल लिखला। हिनक जन्म इ 19अगस्त1911मे समस्तीपुरक "एरौत" नामकगाममे भेल। मैथिलीमे लिखबासँपहिने ई हिन्दीमे ख्यातिप्राप्त भए चुल छलाह। हिन्दीमेहिनक "कागजकी नाव,मधु-सन्देश,बसंतकोकिल,याद,अभेद,वर्षा-गीत,क्योंप्यार करता हूँ,मनारहा हूँ उन्हें,मौनरहने दो,उल्टीनगरी,स्वर्णकिरण,आरसी"" नन्ददास"आ"संजीवनी"नामककाव्य ग्रंथ अछि तँ मैथिलीमे"माटिकदीप "" पूजाकफूल "आ"सूर्यमुखी"काव्यग्रंथ अछि। इ.1984मे"सूर्यमुखीलेल हिनका मैथिली लेल साहित्यअकादेमी पुरस्कार भेटल। हिनकमृत्यु इ.15नवम्बर1996मेभेल। इहो जीवने झा जकाँ एक-दूटागजल लिखला। प्रस्तुत अछि हिनक"गुलाबीगजल "| गुलाबीगजल-आरसीप्रसादसिंह अहाँकआइ कोनो आने रंग देखइ छी बगएअपूर्व किछु विशेष ढंग देखइछी चमत्कारकहू, आइकोन भेलऽ छि जग मे कोनोविलक्षणे ऊर्जा-उमंगदेखइ छी बसातलागि कतहु की वसन्तक गेलऽिछ, फुललगुलाब जकाँ अंग-अंगदेखइ छी फराकेआन दिनसँ चालि मे अछि मस्ती मिजाजिदंग, कीबजैत जेँ मृंदग देखइ छी कमान-तीरचढ़ल, आओरकान धरि तानल नजरिपड़ैत ई घायल,विहंगदेखइ छी निसासवार भऽ जाइछ बिना किछु पीने अहाँकआँखिमे हम रंग भंग देखइ छी मयूरप्राण हमर पाँखि फुला कऽ नाचय बनलविऽजुलता घटाक संग देखइ छी।। लगैछरूप केहन लहलह करैत आजुक, जेनाकि फण बढ़ौने भुजंग देखइ छी उदारपयर पड़त अहाँक कोना एहि ठाँ विशालभाग्य मुदा,धऽरेतंग देखइ छी कतहुने जाउ,रहूभरि फागुन तेँ सोझे अनंगआगि लगो,हमअनंग देखइ छी ई गजल शिव कुमार झा जीक सौजन्यसँअछि जे की एकरा अनचिन्हार आखरपर दू साल पहिने प्रस्तुत केने रहथि। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-3 मायानंदमिश्र मैथिली गजलक चर्चित आ कुख्यात दूनू रूपमे स्थान। मायानंद मिश्रक ई कथन जे मैथिलीमे गजल नै लिखल जा सकैए, अनघोल मचेने रहए। मुदा मैथिली गजलक पहिल अरूजी मने गजल शास्त्रकारश्री गजेन्द्र ठाकुर मतें "मायानंद मिश्रक मात्र एतबा अभिमत रहन्हि जे वर्तमानमे मैथिलीमे बहरयुक्त गजल नै लिखल जा सकैए। तँए ओ स्वयं अपने गीतल नामसँ गजल रचना केलन्हि ( ऐठाम मोन राखू जे माया बाबू मैथिलीमे गजलकेँ नाम गीतल देने छलखिन्ह जे कि अस्वीकार्य छल ) मुदा आन-आन गजलकार सभ एकरा दोसर रूपमे लेलक आ परचारित केलक जे मायाबाबूक कथन थिक जे मैथिलीमे गजल लिखले नै जा सकैए। गजेन्द्रजी आगू लिखै छथि जे ई माया बाबूजँ ई कहबो केलखिन्ह जे मैथिलीमे गजल नै लिखल जा सकैए तँ ई कथन हुनकर सीमाक संग-संगओहि समय सभ गजलकारक सीमा छल।कारण ओहि समय एकौटा गजलकार मैथिलीमे बहरयुक्त गजल नै लीखि सकलाह आ माया बाबूक उक्तिकेँ सत्य करैत रहलाह।मुदा बाद मे इ. 2008मे अनचिन्हार आखरक आगमन होइते माया बाबूक सभ मत-अभिमत धवस्त भए गेल। हिनक जन्म 17अगस्त 1934 ई.केँ सुपौल जिलाक बनैनियाँ गाममे भेलनि।भाङ्क लोटा, आगिमोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु-हिनकरकथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़िपात पाथर , मंत्र-पुत्र,खोताआ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग,प्रथमंशैल पुत्री च,मंत्रपुत्र,पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि।1988- हिनका(मंत्रपुत्र,उपन्यास)पर मैथिलीक साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कए गेलन्हि। प्रबोध सम्मान 2007सँ सम्मानित। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-4 गंगेशगुंजन 1942 जन्मस्थान- पिलखबाड़,मधुबनी।श्रीगंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथमचौबटिया नाटक बुधिबधियाकलेखक छथि आ हिनका उचितवक्ता(कथासंग्रह) कलेल साहित्य अकादमी पुरस्कारभेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्तमैथिलीमे हम एकटा मिथ्यापरिचय, लोकसुनू (कवितासंग्रह), अन्हार-इजोत (कथासंग्रह), पहिललोक (उपन्यास),आइ भोर (नाटक)दुखकदुपहरियामे (गजलसन किछु) प्रकाशित।हिन्दीमे मिथिलांचल की लोककथाएँ, मणिपद्मकनैका- बनिजाराकमैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आशब्द तैयार है (कवितासंग्रह)।१९९४-गंगेश गुंजन(उचितवक्ता,कथा)पुस्तकलेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँसम्मानित । जहाँधरि गजलक गप्प छै तँ ई मैथिलीमे" गजलसन किछु " लिखलाआ ओहो मात्र दस-पनरहटा।हिनक पोथी " दुखकदुपहरियामे " एकरबानगी देखल जा सकैए। मैथिलीकपहिल अरूजी गजेन्द्र ठाकुरकमतें.......मायानन्दमिश्र “गीतल” कहि आ गंगेशगुंजन “गजल सन किछु मैथिलीमे”कहि जे गलत परम्पराकेँ जारीरखबाक निर्णय लेने छथि तकराबाद मुन्ना जी आ आशीष अनचिन्हारजँ बिना छन्द/ बहरकगजल लिखै छथि तँ एकरा हम मायानन्दमिश्र, गंगेशगुंजन आ लालकिलावादी अ-गजलकारलोकनिक दुष्प्रभावे बुझै छी। गजलकार परिचय श्रृंखला भाग-5 श्रीमती शेफालिका वर्मा जी मैथिलीक पहिल महिला गजलकार छथि। किछुए ( दसक भीतर ) गजल लिखने छथि। जन्म:९ अगस्त, १९४३,जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा:एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय), ए. एन. कालेज, पटना मे हिन्दीक प्राध्यापिका पदसँ सेवानिवृत्त । नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि:करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना:झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर; विप्रलब्धा (कविता संग्रह), स्मृति रेखा (संस्मरण संग्रह), एकटा आकाश (कथा संग्रह), यायावरी (यात्रा-वृत्तान्त), भावाञ्जलि (काव्य-प्रगीत) , किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल (हिन्दी) । २००४ ई.मे- डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्माकेँ, पटना;यात्री-चेतना पुरस्कार भेटलन्हि। ऐ फोटोमे श्रीमती शेफालिका वर्मा जी बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमारसँ पुरस्कार ग्रहण करैत। गजलकार परिचय श्रृंखला भाग-6 हिनक एक-दूटा गजल अछि आ गजलक संबंधमे हिनक एक-दूटा लेख १९८४-८५केँ बीचमे प्रकाशित भेल। कथाकर, समीक्षक, अनुवादक, ग्रंथ सम्पादक । साहित्य अकादेमीक मूल एवं अनुवाद पुरस्कार प्राप्त कर्त्ता ल. ना. मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगाक मैथिली विभागक पूर्व प्राचार्य । प्रकाशन: पसिझैत पाथर, (अनु.) आदि । १९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी)लेल साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित ।१९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू) लेल साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-7 प्रस्तुत अछि किछु एहन गजलकारक सूची जे कि छिटपुट गजल लिखला आ अन्यविधामे महारत हासिल केलाह। ई सूची शुरूसँ एल क' एखनधरिक अछि। संगे-संग भारत आ नेपाल दुन्नू मिला कए अछि। जँ ऐमे कोनो नाम छूटि गेल हुअए तँ ओ अहाँ सभ तुरंत सूचित करी से हमर आग्रह।ऐ सूचीकेँ आलवे बादमे एकटा आर एहने सूची आएत जाहिमे ओहन नव गजलकारक नाम रहत।--------- मुंशी रघुनंदन दास, यदयनाथ झा यदुवर, बाबू भुवनेश्वर सिंह भुवन, आनंद झा न्यायाचार्य, रमानंद रेणु, फूल चंद्र झा प्रवीण, वैकुण्ठ विदेह, शीतल झा, प्रेमचंद्र पंकज, प.नित्यानंद मिश्र, शारदानंद दास परिमल, तारानंद झा तरुण, रमाकांत राय रमा, महेन्द्र कुमार मिश्र, विनोदानंद, दिलीप कुमार झा दिवाना, वैद्यनाथ मिश्र बैजू, विलट पासवान विहंगम, सारस्वत, कर्ण संजय, अनिल चंद्र ठाकुर, श्याम सुन्दर शशि, अशोक दत्त, कमल मोहन चुन्नू, रोशन जनकपुरी, जियाउर रहमान जाफरी, धर्मेन्द्र विहवल्, सुरेन्द्र प्रभात, अतुल कुमार मिश्र, रमेश रंजन, कन्हैया लाल मिश्र, गोविन्द दहाल, चंद्रेश, चंद्रमणि झा, फजलुर रहमान हाशमी, रामलोचन ठाकुर, विनयविश्व बंधु, रामदेव भावुक, सोमदेव, रामचैतन्य धीरज, महेन्द्र, केदारनाथ लाभ, गोपाल जी झा गोपेश, नंद कुमार मिश्र,देवशंकर नवीन,मार्कण्डेय प्रवासी,अमरेन्द्र यादव। कुल 51टा बहुत रास नाम धीरेन्द्र प्रेमर्षि जी द्वारा संपादित गजल विशेषांक पर आधारित अछि। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-8 विभूति आनंद (जन्म-4/10/1955 ) हिनक गजल संग्रह " उठा रहल घोघ तिमिर " ( प्रकाशक-भारती संस्थान (पटना) ) बर्ख JUNE 1981मे आएल। आ ई मैथिलीक पहिल गजल संग्रह बनल। हिनक संबंधमे मैथिली गजलक पहिल पूर्णकालिक आलोचक आ समीक्षक श्री ओम प्रकाश जी कहै छथि.................. " हमरा हिसाबेँ काफियाक दोख पृष्ठ बीस, बाईस, चौबीस, पचीस, अट्ठाईस, उनतीस(संयुक्ताक्षर काफियाक नियमक दोख), बत्तीस आ सैंतीस मे सेहो अछि। एकर सबहक विस्तृत वर्णन देब हम अपेक्षित नै बूझि रहल छी, कियाक तँ इ हमर उद्देश्य कथमपि नै अछि। गजल संग्रहक सब गजलक विषय-वस्तु नीक अछि आ गजलकार अपन भावना नीक जकाँ प्रकट केने छथि। किछु गजलक काफिया आ रदीफक दोख जँ कात कऽ कऽ देखी, तँ इ गजल-संग्रह एकटा नीक गजल-संग्रह अछि। गजलकारक गजल कहबाक क्षमता सेहो नीक बुझाईत अछि। हमरा ई अचरज लागि रहल अछि जे ऐ संग्रहक बाद गजलकारक दोसर गजल-संग्रह किया नै आएल अछि। एकर कारण तँ गजलकारे केँ पता हेतैन्हि, मुदा अपन अनुभवक आधार पर हम कहऽ चाहै छी जे श्री विभूति आनन्द नीक गजल लिख सकैत छथि। जँ बहरक विचार नै करी, तँ २०१२ मे आएल श्री अरविन्द ठाकुरजीक गजल-संग्रह सँ करीब एकतीस बर्ख पहिने १९८१ मे लिखल गेल एहि संग्रहक गजल सब उम्दा कहल जा सकैत अछि। एकर कारण इ जे एहि संग्रहक गजल सब मे काफियाक नियम-पालनक प्रतिशत वर्तमान समयक संग्रह सब सँ बेसी अछि। कथ्यक मजबूती सेहो नीक कोटिक अछि। खाली कुहरल तुकमिलानी केने गजल नै कहल जा सकैत अछि, इ गप एहि संग्रह केँ पढलाक बाद एखुनका गजलकार सभ केँ सेहो बुझेतन्हि, इ आशा अछि। इहो एकटा अचरजक विषय अछि जे जखन मैथिली मे नीक गजल एतेक साल पहिनो कहल गेल छल, तखन एकर बाद गजलक विकास-यात्रा पचीस-तीस बर्ख धरि कतऽ आ किया ठमकि गेल। बीचक अवधि मे मैथिली गजलक विकासक धार मे बान्ह किया बनि गेल छल, इ विचारणीय गप अछि। ओना आब इ बान्ह टूटि रहल अछि आ आशाक नब जोति मे मैथिली गजलक घोघ उठि रहल अछि। " श्री आनंद जीक अन्य विवरण एना अछि----------- जन्म: शिवनगर, मधुबनी, बिहार। चर्चित कवि, कथाकार, संपादक । प्रकाशित कृति टूटा उपन्यास टूटा समीक्षा, तीन टा कथा संग्रह, टूटा गीत-गजल संग्रह ओ चारिटा कथा-संग्रह प्रकाशित।२००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा)मैथिली लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार । गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-9 स्व. कलानंद भट्ट गाम--- उछटी ( दरभंगा) जन्म----15 मइ 1941, मृत्य----5 अक्टूबर1994 प्रकाशित कृति---------- कान्ह पर लहास हमर( गजल संग्रह) अप्रकाशित पांडुलिपि--- हिलकोर ( रुबाइ संग्रह) गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-10 अनंत बिहारी लाल दास"इन्दु"1928-2010 प्रकाशित पोथी (मात्रगजलक दए रहल छी एहिकेँ अतिरिक्तोहिनक पोथी सभ छन्हि) 1) नवीन मैथिलीगजल-----शाइर अनन्तबिहारी लाल दस "इन्दु" 2) मधुर मैथिलीगजल------शाइर अनन्तबिहारी लाल दस "इन्दु" ( इन्दु जीक संग्रहकजानकारी हमरा सरस जी द्वाराभेटल अछि हलाकिं हुनको लग दूनूसंग्रह नै छन्हि) उपल्बधि---- 2007मे- अनन्तबिहारी लाल दास “इन्दु जीकेँ”(युद्ध आ योद्धा-अगमसिंह गिरि, नेपाली)लेलसाहित्य अकादेमी मैथिली अनुवादपुरस्कार प्राप्त भेलन्हि। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-11 रवीन्द्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र-महेन्द्र नामक चर्चित जोड़ीक ई रवीन्द्र छथि। हिनक एकटा गजल संग्रह छन्हि---लेखनी एक रंग अनेक ( पूर्वांचल प्रकाशन ( पटना ), वर्ख-१९८५.) हिनक अन्य विवरण एना अछि-- जन्म पूर्णिञा जिलाक धमदाहा ग्राममे 1936 ई. मे भेलन्हि । नेने अवस्थासँ गीत गएबामे एवं कविता लिखबामे विशेष रुचि । कोनो मंच पर ठाढ़ भेला पर ई सहजहि श्रीताकेँ आह्लादित करैत छथि । हिनक सात गोट मैथिलीक गीत संग्रह, एक मिनी महाकाव्य, एक प्रयोगधर्मी काव्य, एक उपन्यास, एक नाटक ‘एक राति’ एवं एक हिन्दी नाटक,आ उपरोक्त गजल संग्रह प्रकाशित भेल छन्हि । गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-12 सियारामझा "सरस" --10 JULY 1948,जन्म स्थान -मेंहथ, मधुबनी बिहार। गजल संग्रह--- 1) शोणिताएल पएरक निशान ( प्रकाशक-सरला प्रकाशन, मेहथ, प्रकाशन साल-1989) 2) लोकवेद आलालकिला ( संपादित) ( प्रकाशक---विद्यापति सेवा संस्थान, प्रकाशन साल-1990) 3) थोड़े आगि थोड़ पानि ( प्रकाशक---नवारम्भ, प्रकाशन साल-2008) विशेष------श्रीसरस जी अनचिन्हार आखर द्वाराप्रायोजित मैथिलीमे देल जाएबला गजल लेल पहिल सम्मान "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदासम्मान"क पहिल मुख्य चयनकर्ता छलाह जे किई. 2011मे शुरू भेल छल। हिनक अन्यविवरण एना अछि--- प्रसिद्ध गीतकार-गजलकार,बादमे कथा लेखन प्रारम्भकेलनि । अन्य प्रकाशित कृति---- आँजुर भरि सिंगरहार---कविता---१९८२, गीत रश्मि---गीत ( संपादन)--१९९४, नै भेटतौ खालिस्तान--गीत--१९९४, आखर-आखर गीत ---गीत--१९९९, चन्नाक पहाड़ ( अनूदित उपन्यास, साहित्य अकादेमीसँ प्रकाशित--१९९९), उगैतसूर्यक धम्मक (कथासंग्रह) आ उपरोक्तगजल संग्रह। गजलकार परिचय श्रृंखला भाग-13 तारानन्द वियोगी 12/5/1966 महिषी, सहरसामे जन्म। पहिल पोथी अपन युद्धक साक्ष्य (गजल संग्रह) १९९१ मे प्रकाशित। अन्य पुस्तक हस्तक्षेप (कविता-संग्रह), अतिक्रमण (कथा-संग्रह), शिलालेख (लघुकथा संग्रह), कर्मधारय( आलोचना )। राजकमल चौधरीक कथाकृति एकटा चंपाकली एकटा विषधर संकलन-सपादन। साहित्य अकादेमी मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार २०१०-तारानन्द वियोगीकेँ पोथी "ई भेटल तँ की भेटल" लेल। यात्री-चेतना पुरस्कार २०१० ई.मे सेहो प्राप्त भेलन्हि। " हालचाल " आ " संकल्प " नामक दूटा पत्रिकाक किछु अंकक संपादन। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-14 रमेश-1961 गजल संग्रह---नागफेनी---IPSITA PUBLICATION, 1990 ई सियाराम झा सरस जीक छोट भए छथिन्ह आ सरस-रमेश जोड़ीक रमेश छथि। जन्म स्थान मेंहथ, मधुबनी, बिहार। चर्चित कथाकार ओ कवि । प्रकाशित कृति: समांग, समानांतर, दखल (कथा संग्रह),संगोर, समवेत स्वरक आगू, कोसी धारक सभ्यता, पाथर पर दूभि (काव्य संग्रह), प्रतिक्रिया (आलोचनात्मक निबंध),आ उपरोक्त गजल संग्रह गजलकार परिचय श्रृंखला भाग-15 सुरेन्द्र नाथ प्रकाशित गजल संग्रह- गजल हमर हथियार थिक ( नवारम्भ प्रकाशन, साल 2008) जन्म-3-2-1951 प्रकाशित पोथी--- १) दृष्टिकोण ( आलोचना आ व्यंग) 2000मे प्रकाशित २) समय शिला ( कथा) 2008 ३) मंडन मिश्र मीमांसा, अद्वैत समागम ( संपादित) 2008 गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-16 राजेन्द्र विमल, जनकपुर, नेपाल प्रकाशित गजल संग्रह----सूर्यास्तसँ पहिने मैथिली, नेपाली आ हिन्दी भाषाक प्राज्ञ विमल शिक्षाक हकमे विद्यावारिधि (पी.एच.डी.)क उपाधि प्राप्त कएने छथि।कम्मो लिखिकऽ यथेष्ट यश अरजनिहार डा. विमलक लेखनीक प्रशंसा मैथिलीक सङ्गसङ्ग नेपाली आ हिन्दी साहित्यमे सेहो होइत रहलनि अछि। त्रिभुवन विश्वविद्यालयअन्तर्गत रा.रा.ब. कैम्पस, जनकपुरधाममे प्राध्यापन कएनिहार डा. विमलक पूर्ण नाम राजेन्द्र लाभ छियनि। हिनक जन्म २६ जुलाई १९४९ ई. कऽ भेल अछि। साहित्यकारक नव पीढ़ीकेँ निरन्तर उत्प्रेरित करबाक कारणे ई डा.धीरेन्द्रक बाद जनकपुर-परिसरक साहित्यिक गुरुक रूपमे स्थापित भऽ गेल छथि। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-17 अरविन्द ठाकुर प्रकाशित गजल संग्रह---बहुरुपिया प्रदेश मे। ( नवारम्भ प्रकाशन, साल नवम्बर-2011) अन्य प्रकाशित कृति---- परती टूटि रहल अछि ( कविता), अन्हारक विरोधमे ( कथा) जन्म---14 February 1957, सुपौल गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-18 सुधांशु शेखर चौधरी 1922-1990 प्रकाशित गजल संग्रह- गजल ओ गीत ( किछु गीत छै ऐमे आ किछु गजल) जन्म दरभंगाक मिश्रटोलामे 1922 ई. मे भेलन्हि तथा मृत्यु 1990 ई. मे भेलन्हि । किछु दिन विभिन्न जीविकामे रहि पश्चात् साहित्यकारक जीवन प्रारम्भ कएल । किछु दिन ‘बैदेही’क सम्पादन श्री सुमनजी एवं श्री कृष्णकान्त मिश्रजीक संग कएल तत्पश्चात् 1960 ई. सँ 1982 ई. धरि पटनामे ‘मिथिला मिहिर’’क सफल सम्पादन कएल ।हिनक दू गोट नाट्यकृति-‘भफाइत चाहक जिनगी’, लेटाइत आँचर’, तथा ‘पहिल साँझ’ हिनक नाटकक नीक व्यावहारिक अनुभवक परिचायक अछि ।छद्मनामसँ हिनक दू गोट उपन्यास मिहिर’ मे प्रकाशित भेल अछि । हिनक उपन्यास ई वतहा संसार’ जे मैथिली अकादमी द्वारा प्रकाशित भेल आ जाहि पर 1980 क साहित्य अकादमीक पुरस्कार देल गेल । गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-19 जगदीश चन्द्र ठाकुर "अनिल" विशेष---- अनचिन्हार आखर द्वारा प्रयोजित मैथिली गजल लेल देल जाए बला " गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" लेल हिनका साल २०१२ लेल मुख्य चयन कर्ता बनाएल गेल अछि। मूल नाम जगदीश चन्द्र ठाकुर, जन्म: 27.11.1950,शंभुआर, मधुबनी । सेवा निवृत बैंक अधिकारी। मैथिलीमे प्रकाशित पोथी-1. तोरा अडनामे -गीत संग्रह-1978; 2. धारक ओइ पार-दीर्घ कविता-1999 संप्रति- धुरझार गजल लीखि रहल छथि। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-20 कालीकांत झा "बूच" 1934-2009 हिनक किछु गजल उपलब्ध अछि | हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई. मे भेलनि । पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह । माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह । अंतरस्नातक समस्तीपुर काॅलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात् बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि । बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विषेश रूचि छल । मैथिली पत्रिका - मिथिला मिहिर, माटि - पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समय पर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि । जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि । साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक विकास (संपादक डाॅ बासुकीनाथ झा ) मे हास्य कथा कारक सूची मे डाॅ विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्यक उल्लेख कयलनि । मैथिली अकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल ।श्रृंगाररस एवं हास्य रसक संग-संग विचार मूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डाॅ दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि । प्रकाशित कृति (मृत्योपरांत) : कलानिधि- कविता-संग्रह। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-21 धीरेन्द्र प्रेमर्षि ई मैथिली गजलक पहिल वीर छथि जे अपन पत्रिकाक माध्यमे पहिल गजल विषेशांक निकालथि। व्यक्तिगत विवरण पूर्ण नामः धीरेन्द्र झा प्रचलित नामः धीरेन्द्र प्रेमर्षि जन्मस्थानः गोविन्दपुर, गा.वि.स. वार्ड नं.-१, बस्तीपुर, जिला- सिरहा, नेपाल जन्मथितिः वि.सं. २०२४, भादब १८ गते (३ सितम्बर १९६७) शिक्षाः स्नातक पिताक नामः पं. कृष्णलाल झा माताक नामः आनन्दीदेवी झा मूल वृत्तिः नेपाल सरकारक नोकरिहारा (कृषि विभागअन्तर्गत Plant Protection Officer) प्रकाशित साहित्यिक कृतिः समयलाई सलाम (नेपाली गजल-सङ्ग्रह) प्रकाशकः खेमलाल-हरिकला स्मृति समाज कल्याण प्रतिष्ठान, चितवनः २०६५ मलङ्गियाका मैथिली एकाङ्की (नेपालीमे अनूदित एकाङ्की-सङ्ग्रह), प्रकाशकः खेमलाल-हरिकला स्मृति समाज कल्याण प्रतिष्ठान, चितवनः २०६५ कर्मयोद्धा योगेन्द्र साह नेपाली (सम्पादन),प्रकाशकः मिथिला नाट्यकला परिषद, जनकपुरधामः २०६५ कोन सुर सजाबी ? (मैथिली गीत-सङ्ग्रह),प्रकाशकः नेपाल राजकीय प्रज्ञा-प्रतिष्ठानः २०६१ अगहन भगता बेङक देश-भ्रमण (कनक दीक्षितक चर्चित पोथीक मैथिली रूपा झाक सङ्ग सहअनुवाद), प्रकाशकः रातो बङ्गला किताब, पाटनढोका, ललितपुरः २०५९ आसिन मैथिली कविता-सङ्ग्रह, सं. (आठम शताब्दीसँ बीसम शताब्दीधरिक प्रतिनिधि मैथिली कविसभक कविताक सङ्कलन) प्रकाशकः नेपाल राजकीय प्रज्ञा-प्रतिष्ठानः २०५१ स्वप्नकथा चलिरहल अछि (नेपालीसँ मैथिलीमे अनूदित गोविन्द गिरी प्रेरणाक कविता-सङ्ग्रह), प्रकाशकः मैथिली विकास मञ्च, काठमाण्डूः २०५० फुच्चे सिस्नुपानी धीरेन्द्र प्रेमर्षि विशेष (नेपाली हास्यव्यङ्ग्य रचनासभक सङ्ग्रह),प्रकाशकः सिस्नुपानी नेपाल, सम्पादकः माणिकरत्न शाक्यः २०६२ शैक्षिक कृतिःखिस्सा-पिहानी (मैथिली लोककथासभ सङ्गृहीत बालसन्दर्भ पुस्तक), प्रकाशकः पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुरः २०६३ हमर मिथिला (मैथिली संस्कृतिसम्बन्धी लेखसभ सङ्गृहीत बालसन्दर्भ पुस्तक),प्रकाशकः पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुरः २०६३ मैथिल विभूतिसभ (मैथिल विभूतिसभक जीवनी सङ्गृहीत बालसन्दर्भ पुस्तक),प्रकाशकः पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुरः २०६३ हमर मैथिली पोथी (कक्षा १, २, ३, ४ आ ५ क ऐच्छिक मैथिली विषयक पाठ्यपुस्तक),प्रकाशकः पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुरः २०५४ सँ २०५८ धरि मैथिली (कक्षा ९ आ १० क ऐच्छिक मैथिली विषयक पाठ्यपुस्तक) प्रकाशकः पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुरः २०५७ आ २०५८ हिन्दी (कक्षा १० क ऐच्छिक हिन्दी विषयक पाठ्यपुस्तक) प्रकाशकः पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुरः २०५८ साङ्गीतिक कृतिः डेग (शान्तिक लेल युवा जागरण तथा सशक्तिकरणसम्बन्धी मैथिली गीतसभक सङ्ग्रह) प्रकाशकः संस्कार मिथिला, गोविन्दपुर, सिरहाः २०६६ बैशाख भोर (सकारात्मक सोच तथा शान्ति–सद्भाव सम्बर्द्धनसम्बन्धी मैथिली गीतसभक सङ्ग्रह) प्रकाशकः सम्झौता नेपाल, काठमाण्डू, २०६५ जेठ नेहक बएन (शान्ति तथा सद्भाव सम्बर्द्धनसम्बन्धी मैथिली गीतसभक सङ्ग्रह) प्रकाशकः सम्झौता नेपाल, काठमाण्डू, २०६४ कार्तिक गाना-बजाना (विविध मनोरञ्जनात्मक मैथिली गीतक सङ्ग्रह) प्रकाशकः गंगा कैसेट, नयादिल्लीः २०६३ बैशाख भजन दिव्यानन्द (चट्याङ मास्टर रचित नेपाली भजनसभक सङ्गीत-निर्देशन एवं गायन) प्रकाशकः श्रीमती कान्ता गौतमः २०६१ आसिन वन-गीत (संरक्षणसम्बन्धी चेतनामूलक मैथिली आ भोजपुरी गीतसभक सङ्ग्रह) प्रकाशकः बाइसेप एसटी, काठमाण्डू, नेपालः २०६१ चेतना (सामाजिक परिवर्तनक दिस उन्मुख मैथिली गीतसभक सङ्ग्रह) प्रकाशकः एक्सनएड नेपालक सहयोगमे संस्कार मिथिलाः २०६० अगहन Song of Light : प्रियतम हमर कमौआ (सार्थक गीति क्यासेट तथा पहिल मैथिली सीडी) प्रकाशकः म्यूजिक नेपालः २०५८, सीडीक प्रकाशकः म्यूजिक मिथिला प्रेम भेल तरघुस्कीमे (विविध मनोरञ्जक मैथिली गीतसभक सङ्ग्रह, क्यासेट तथा सीडी) प्रकाशकः मास्टर क्यासेटः २०५८ सिस्नु 2000.COM (हास्यव्ङग्यात्मक क्यासेट) प्रकाशकः सिस्नुपानी नेपाल आ रीमा क्यासेटः २०५७ सिस्नुपानी (हास्यव्ङग्यात्मक क्यासेट) प्रकाशकः सिस्नुपानी नेपाल आ रीमा क्यासेटः २०५६ सिस्नुपानीले (उद्देश्यमूलक हास्यव्यङ्ग्यात्मक गीतसभक सङग्रह) प्रकाशकः सिस्नुपानी नेपाल, हास्यव्यङ्ग्य सदनः २०५५ सुरक्षित मातृत्व गीतमाला (सन्देशमूलक नेपाली, मैथिली, भोजपुरी गीतसभक सङग्रह) प्रकाशकः सुरक्षित मातृत्व नेटवर्क, नेपालः २०५५ सुखक सनेस (बालस्वास्थ्य तथा परिवार कल्याणसम्बन्धी मैथिली गीतसभक सङ्ग्रह) प्रकाशकः सेभ द चिल्ड्रेन, यूएसएः २०५४ कलियुगी दुनिया (नेपालसँ बहराएल मैथिलीक पहिल गीति क्यासेट) प्रकाशकः सिम्फनिक रेकर्डिङ प्रा.लि.: २०४७ प्रकाशोन्मुख कृतिः सूत्रधार (मैथिली हाइकू-सङ्ग्रह) शब्द-सारथी (मैथिली गजलसङ्ग्रह) एमकीक जतरा (मैथिली गीत-सङ्ग्रह) साँपक पएर (मैथिली निबन्ध-सङ्कलन) ओ गीत कोन गाबए? (मैथिली कथा-सङ्ग्रह) सिनुराएल सुरूजदिस (मैथिली कवितासङ्ग्रह) नेताको मुसावतार (नेपाली हास्यव्यङ्ग्य-सङ्ग्रह) The मुड्की (संयुक्त नेपाली हास्यव्यङ्ग्यक सङ्ग्रह) श्यामप्रसादक निबन्ध (मैथिलीमे अनुवाद कएल गेल) मैथिली कथा-संसार (प्रतिनिधिमूलक कथासभक सङ्ग्रह) रचनात्मक कार्यानुभव तथा संलग्नताः रेडियो नेपाल, समाचार-वाचक तथा सम्पादक (मैथिली, नेपाली आ हिन्दी समाचार) अवधिः वि.सं. २०४९ पुससँ वि.सं. २०६१ चैत्र मसान्तधरि कान्तिपुर एफ.एम., मैथिली कार्यक्रम ‘हेल्लो मिथिला’ आ ३ अन्य, परिकल्पना तथा प्रस्तुति अवधिः वि.सं. २०५८ फागुनसँ वर्तमानधरि नेपाल एफ.एम., समावेशी लोकतन्त्रसम्बन्धी कार्यक्रम ‘आवाज’, संयोजन आ निर्देशन अवधिः वि.सं. २०६३ अखाढ़सँ वर्तमानधरि नेपाल 1 टेलिभिजन, नेपाली साहित्यिक कार्यक्रम ‘राम्रो कस्तो राम्रो’क प्रस्तुति अवधिः वि.सं. २०६४ साओनसँ एक सालधरि गोरखापत्र दैनिक, ‘नयाँ नेपाल’ परिशिष्टअन्तर्गत मैथिली खण्डक संस्थापक संयोजक अवधिः वि.सं. २०६४ आसिनसँ छओ मासधरि पल्लव, मैथिली साहित्यिक मासिक पत्रिका, सम्पादक तथा प्रकाशक अवधिः वि.सं. २०५० अखाढ़सँ वर्तमानधरि पल्लवमिथिला, दोसर मैथिली इन्टरनेट पत्रिका (साहित्यिक), सम्पादक तथा प्रकाशक अवधिः वि.सं. २०५९ माघ मैथिल समाज, सामाजिक तथा सांस्कृतिक त्रैमासिक, सम्पादक अवधिः वि.सं. २०५८ असोजदेखि वर्तमानधरि फित्कौली, नेपाली हास्यव्यङ्ग्यसम्बन्धी मासिक पत्रिका, संयुक्त सम्पादक अवधिः वि.सं. २०६२ अखाढ़सँ वर्तमानधरि कामना, नेपाली सिनेमासिक पत्रिका, सम्पादक अवधिः वि.सं. २०५३ चैत्रसँ २०५५ माघधरि ज्ञान-गङ्गा, साहित्य तथा विविध समसामयिक विषयसभक पत्रिका, संयुक्त सम्पादक अवधिः वि.सं. २०५९ बैशाखसँ वर्तमानधरि यती, स्वास्थ्य, यौन तथा परिवार कल्याणसम्बन्धी त्रैमासिक पत्रिका, कार्यकारी सम्पादक अवधिः वि.सं. २०५४ अगहनसँ २०५५ पुसधरि अन्य उल्लेख्य गतिविधिः नेपालक अधिकांश राष्ट्रीय अखबार तथा साहित्यिक पत्रपत्रिकामे नियमित रूपेँ कथा, कविता, गीत-गजल, हास्यव्यङ्ग्यसन साहित्यिक तथा अन्य समसामयिक लेखन। नेपाल, भारत, अमेरिका आ यूएइसँ प्रकाशित भेनिहार विभिन्न पत्रपत्रिका एवं नेट म्याग्जिनमे मैथिली, नेपाली आ हिन्दी भाषाक एक हजारसँ बेसी लेख-रचना प्रकाशित। बीबीसी नेपाली सेवा आ अल इण्डिया रेडियोसहित अनेको पत्रपत्रिका, रेडियो तथा टेलिभिजन कार्यक्रममे साहित्यकार तथा भाषा अभियानी / संस्कृतिकर्मीक रूपमे अन्तर्वार्ता प्रसारित। कामना प्रकाशनक ‘नेपाल समाचारपत्र’ मे एक वर्षधरि सम्पादकीय पृष्ठक संयोजन। कान्तिपुर एफ.एम. मे हास्यव्यङ्ग्यसम्बन्धी नेपाली भाषाक साप्ताहिक कार्यक्रम ‘कुर्सीमाथि फर्सी’, एच.बी.सी. एफ.एम. मे साप्ताहिक मैथिली कार्यक्रम ‘चौबटिया’, मेट्रो एफ.एम. मे दैनिक विश्लेषणात्मक नेपाली कार्यक्रम ‘मन्थन’ क निर्देशन तथा सञ्चालन। स्वतन्त्र समाचार सेवाक insonline.net मे पहिल नेपाली अनलाइन श्रव्य समाचारक शुरुआत। ‘हिमालय टाइम्स’, साप्ताहिक ‘नेपाल’ ‘दृष्टि’, ‘बुधबार’, ‘हिमाल’ आदि पत्रिकामे स्तम्भ लेखन। ‘लेकाली सङ्गीत-यात्रा’ समेत अनेको महत्त्वपूर्ण पोथीक भाषा-सम्पादन एवं भूमिका लेखन। कथा, पटकथा, संवाद लेखन- मैथिली टेलिशृङ्खलाः ‘अन्हरजाली’, ‘आशीर्वाद’ आ ‘दूमहला’। नेपाली कथानक चलचित्र ‘दुलही’ क लेल कथाविचार तथा गीतलेखन। जङ्गल साहित्यिक गोष्ठीसमेत कतिपय साहित्यिक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमक संयोजन। नेपाली टेलिशृङ्खला ‘आगन्तुक’, नेपाली टेलिशृङ्खला ‘गोनू झा’ मे गीत, सङ्गीत, गायन। नेपाल, भारत तथा कतारमे अनेको साहित्यिक / साङ्गीतिक समारोहमे सहभागी। पहिल मैथिली टेलिफिल्म ‘मिथिलाक व्यथा’, ऐतिहासिक मैथिली टेलिशृङ्खला ‘महाकवि विद्यापति’ तथा नेपाली टेलिशृङ्खला ‘मदनबहादुर-हरिबहादुर भाग २’ मे अभिनय। विकट हिमाली जिला हुम्लाक इतिहासमे पहिलबेर नाटक मञ्चन एवं अन्य विभिन्न स्थानपर नेपाली, मैथिली तथा हिन्दी भाषाक नाटकसभक निर्देशन, लेखन तथा मञ्चन। प्रज्ञा-प्रतिष्ठानक नृत्य-सङ्गीत समिति तथा लोकसाहित्य समितिक सदस्य रहि क्रियाशील। जगदम्बाश्री पुरस्कार (२०५८) तथा नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठानद्वारा आयोजित प्रथम मिथिला चित्रकला प्रतियोगितासहित कतोक कविता तथा गजल प्रतियोगितामे निर्णायकक भूमिका निर्वहन। संस्थागत आबद्धताः संस्थापक अध्यक्ष, कला-संस्कृति-सञ्चार संस्थाः संस्कार मिथिला संस्थापक अध्यक्ष तथा संरक्षक, मैथिली विकास मञ्च संस्थापक तथा उपाध्यक्ष, सिस्नुपानी नेपाल, हास्यव्यङ्ग्य सदन सदस्य-सचिव, फूलकुमारी महतो मैथिली सम्मान समिति, काठमाण्डू सदस्य-सचिव, वैद्यनाथ-सियादेवी मैथिली पुरस्कार प्रतिष्ठान, काठमाण्डू कार्यसमिति सदस्य, नेपाल मैथिल समाज, काठमाण्डू केन्द्रीय सदस्य, नेपाल साहित्यिक पत्रकार सङ्घ केन्द्रीय सदस्य, भाषिक अधिकार संयुक्त सङ्घर्ष समिति अन्य कतोक सङ्घ-संस्थामे आजीवन तथा मानार्थ सदस्य एवं सलाहकार पदक तथा सम्मानः राष्ट्रिय स्रष्टा सम्मान- २०६८ (प्रगतिशील तथा देशभक्त सांस्कृतिक मञ्च ) सशक्त सञ्चारकर्मी पत्रकारिता पुरस्कार- २०६८ (प्रेस काउन्सिल नेपाल ) जन-अभिनन्दन- २०६८ (सिरहा समाज सेवा, काठमाडौँ ) मिथिला दूत सम्मान- २०६७ (मैथिली सेवा समितिसहित दर्जनभरि संघ-संस्था, काठमाण्डू) मधुरिमा फूलकुमारी महतो सांस्कृतिक सम्मान- २०६५ (मधुरिमा कला केन्द्र, काठमाण्डू) लोकतान्त्रिक स्रष्टा सम्मान- २०६४ (अविरल साहित्य समाज, सिन्धुपाल्चोक) विद्या-वाचस्पति (D.Lit.)- ई. २००७ (विक्रमशिला विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार) मैथिली सङ्घर्षशील व्यक्तित्व सम्मान- २०६३ (मैथिली साहित्य परिषद्, लहान) साहित्य भास्कर- ई. २००६ (अखिल भारतीय भाषा-साहित्य सम्मेलन, भोपाल, म.प्र.) उत्कृष्ट सङ्गीतकार सम्मान- ई. २००६ (संस्कृति मिथिला, सहरसा, बिहार) जनअभिनन्दन- २०६२ (मैथिली सेवा समितिसहितक सङ्घ-संस्था, विराटनगर) मिथिलारत्न सम्मान- ई. २००५ (अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन, नयादिल्ली) वागेश्वरी सम्मान- २०६२ (वागेश्वरी सेवा समिति, राजविराज, सप्तरी) सलहेस महोत्सव सम्मान- २०६१ (सलहेस संरक्षण समिति, सिरहा) ‘माटी की गंध’ कथा पुरस्कार- ई. २००३ (अभिव्यक्ति प्रकाशन, शारजाह, यूएई) नवरङ्ग सम्मान- २०५७ (नवरङ्ग साहित्य प्रतिष्ठान, धरमपुर, झापा) भानु पदक- २०५४ (भानु कला केन्द्र, विराटनगर) विदेश-भ्रमणः भारत, चीन आ कतार। सम्पर्क पताः पोष्टहार्भेष्ट व्यवस्थापन निर्देशनालय, श्रीमहल, पुल्चोक, ललितपुर, नेपाल। फोन नं.: ९७७-१-५५३६९९४ / ९८४१२८०७३३ ईमेल- dhipre@yahoo.com आ dhipre@gmail.com नोट: पल्लवमिथिला मैथिलीक दोसर इंटरनेट पत्रिका अछि जखन की वास्तविकता ई थिक जे भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल आ अखनो ५ जुलाइ २००४ सँhttp://www.videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर अछि, मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ" विदेह " पड़लै। ई टिप्पणी मात्र इतिहास शुद्धता लेल अछि। मैथिलीक पहिलसँ लए क' एखन धरिक हरेक इंटरनेट पत्रिकाक नाम, यूआरएल, ओकर पहिल पोस्टक तारीख ऐ ठाम देखल जा सकैए---http://www.videha.co.in/feedback.htm जँ किनको लग 5/7/2004 सँ पहिनुक लिंक छन्हि तँ प्रस्तुत कएल जाए। ( ऐ फोटोमे धीरेन्द्र प्रेमर्षि, हुनक पत्नी रूपा झा आ हुनक दू गोट बालक।) विदेहक फेसबुक भर्सन http://www.facebook.com/groups/videha/ पर भेल टिप्पणी देल जा रहल अछि। ई इतिहास शुद्धता लेल नीक अछि। You, Ashutosh Mishra, Prabin Chaudhary Pratik, Rajeev Ranjan Mishra and12 others like this. Jan Anand Mishra Premarshiji ekta star bain chukal chhaith 6 hours ago via Mobile · Unlike · 1 Ashish Anchinhar आ हमर कोशिश रहल अछि जे स्टारक स्टार सभ सेहो ऐ फोटोमे आबथि से आबि गेल छथि।. 6 hours ago · Like · 4 Dhirendra Premarshi आशिषजी, धन्यवाद परिचय शृङ्खलामे हमरा रखबाक लेल। पल्लवमिथिलाक सन्दर्भमे हम पहिनहु कहने रही जे वर्ष २००३ जनवरीसँ शुरू भेल छल मुदा ओकरा हम निरन्तरता नहि दऽ सकलहुँ। तेँ ओइपर हमर कोनो दाबा नहि अछि। हँ ओहिमे वर्तमानधरि सेहो लिखाएल अछि जे सर्वथा गलत अछि। अइ बायोडाटामे कने सम्पादन जरूरी छलै से नहि भऽ पाएल अछि। ओना पल्लवमिथिलाकेँ भाषाविद डा रामावतार यादव सार्वजिनक कएने छलाह से समाचारो छपल छल। मुदा हमरा ओ कटिंग तकबामे सेहो भाङठ हएत। कारण हम व्यवस्थापनक मामलामे बड्ड कमजोर छी। 3 hours ago · Unlike · 3 Dhirendra Premarshi २०५९ माघे संक्रान्तिदेखि नेपालको मैथिली भाषाको पहिलो इन्टरनेट पत्रिका पल्लव www.pallavmithila.mainpage.net सुरु गरिएको छ। यो पत्रिका काठमाडौँस्थित मैथिली विकास मंचको तर्फबाट धीरेन्द्र प्रेमर्षीद्वारा सम्पादन तथा प्रकाशन गरिन्छ। यसमा मैथिली भाषामा विविध साहित्यिक सामग्री राखिएका छन्। हरेक महिना यसका सामग्रीहरू अद्यावधिक गरिन्छ। (सम्प्रति नेपालक सूचना आयोगक अध्यक्ष विनय कसजूद्वारा लिखित पुस्तकमे सेहो पल्लवके बात राखल गेल अछि। एकर जे लिंक छै से अस्थायी प्रकृतिक भेलाक कारणे आब नइ भेटैत अछि। डा कसजूक किताबक लिंक अइठाम दऽ रहल छी-http://www.kasajoo.com/itbook_vinaya.pdf) mainpage.net: The Leading Main Page Site on the Net www.mainpage.net 2 hours ago · Like · Ashish Anchinhar हम http://www.pallavmithila.mainpage.net/ आhttp://www.pallavmithila.net/ दुनू खोलबाक प्रयास केलौं मुदा नै खुजलhttp://pallav.blogsome.com/ खुजल आ ओ १७ मइ २००६ केर अछि आhttp://hellomithila.blogspot.com/सेहो खुजल जे ३ मइ २००६ केर अछि। भऽ सकैए ओ डोमेन नेम डिलीट भऽ गेल हुअए, मुदा जँ डिलीट भेल डेटा देखी तँ तै हिसाबे सेहो भालसरिक गाछ २००० ई.सँ yahoogeocities पर निरन्तर छल, मुदा याहू द्वारा geocities सर्विस बन्द भऽ गेलाक बाद ओहो डोमेन नेम बन्द भऽ गेल, आ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html आ http://www.videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html ५ जुलाइ २००४ सँ निरन्तर मैथिलीक सभसँ पुरान स्वरूपमे उपलब्ध अछि, नचिकेताक नाटक विदेहक आठम अंकसँ धारावाहिक प्रकाशित भेलै आ ओ जखन २००८ मे पोथी रूपमे एलै तखन इन्टरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ २००० ई. मे गजेन्द्र ठाकुर जी द्वारा कएल जेबाक चर्च ओतए छै। (लिंकhttp://sites.google.com/a/shruti-publication.com/shruti-publication/Home/NO_ENTRY_MA_PRAVISH.pdf?attredirects=0) अहाँक दुनू लिंक जे खुजि रहल अछि ओकर चर्च सेहो अंतिकाक इन्टरनेट पत्रिका विशेषांकमे गजेन्द्र ठाकुरजी केने छथि। ओना अहाँक देल सूचना महत्वपूर्ण अछि आ भालसरिक गाछक बाद दोसर इन्टरनेट पत्रिका पल्लवकेँ मानल जा सकैए। तदनुसार अहाँक बायोडाटामे सम्पादन कऽ रहल छी। mainpage.net: The Leading Main Page Site on the Net www.mainpage.net 32 minutes ago · Like · Dhirendra Premarshi अहाँ सही कहै छी आशिषजी। ई बात हम उपरका कमेंटमे सेहो लिखने छी। (एकर जे लिंक छै से अस्थायी प्रकृतिक भेलाक कारणे आब नइ भेटैत अछि।) ओना एकटा बात हम कहि दी जे हमर ई दावा नइ अछि मात्र जानकारीभरि अछि। आब जेँ कि ओकर प्रमाणो खतम भेल जा रहल छै तेँ भऽ सकैए जे हम ओ विवरणो हटा दी। 22 minutes ago · Unlike · 1 Ashish Anchinhar हँ मेनपेज डॉट नेट डोमेन नेम प्रायः खतम भऽ गेल छै, तकरा बाद कियो दोसर गोटे ओकरा लेने छथि प्रायः। तै दुआरे मेनपेज डॉट नेटक सब डोमेन पल्लव सेहो खतम भऽ गेल हेतै। तै हिसाबे सेहो भालसरिक गाछ आ आर किछु साइट जे याहूसिटीज केर अन्तर्गत २०००मे गजेन्द्र ठाकुर जी द्वारा शुरू भेल सेहो याहू द्वारा जियोसिटीज बन्द कऽ देलाक बाद खतम भऽ गेलै मुदा अखनो एकर सभ सँ पुरान लिंक ५ जुलाइ २००४ अखनो अछिये। ओइ हिसाबे सेहो भालसरिक गाछ पहिल आ पल्लव दोसर इन्टरनेट पत्रिका सिद्ध होइए आ तदनुसारे परिवर्तन/ सम्पादन कऽ देने छी.. सादर। about a minute ago · Like गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-22 विजय नाथ झा प्रकाशित गीत-गजल संग्रह---- अहींक लेल ( प्रकाशन साल 2008, प्रकाशक -शेखर प्रकाशन) पिता-प. रतिनाथ झा ( पूर्व विभागाध्यक्ष प्राच्य दर्शन विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) गाम---ग्रम-पोस्ट---तलपुरवा, बाँसी, सिद्यार्थनगर,( उत्तर प्रदेश) शिक्षा---विज्ञान स्नातक ( काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) वृति---पत्रकारिता आ स्वतंत्र लेखन, आर्यावर्तक संपादकीय विभागमे विविध सेवा, चुटकुलानंदक चिट्ठी केर लेखन, आकाशवाणी आ दूरदर्शन पटनामे कविता पाठ आ अन्यान्य तरहवक प्रसारण गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-23 राम भरोस कापड़ि भ्रमर, 1951 प्रकाशित गीत-गजल संग्रह----मोमक पघलैत अधर जन्म-बघचौरा, जिला धनुषा (नेपाल)।बन्नकोठरी: औनाइत धुँआ (कविता संग्रह), नहि, आब नहि (दीर्घ कविता), तोरा संगे जएबौ रे कुजबा (कथा संग्रह, मैथिली अकादमी पटना, १९८४), मोमक पघलैत अधर (गीत, गजल संग्रह, १९८३), अप्पन अनचिन्हार (कविता संग्रह, १९९० ई.), रानी चन्द्रावती (नाटक), एकटा आओर बसन्त (नाटक), महिषासुर मुर्दाबाद एवं अन्य नाटक (नाटक संग्रह), अन्ततः (कथा-संग्रह), मैथिली संस्कृति बीच रमाउंदा (सांस्कृतिक निबन्ध सभक संग्रह), बिसरल-बिसरल सन (कविता-संग्रह), जनकपुर लोक चित्र (मिथिला पेंटिङ्गस), लोक नाट्य: जट-जटिन (अनुसन्धान), घरमूहाँ ( उपन्यास)२०१२। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता- श्री राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' (2010) गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-24 नरेश कुमार विकल जन्म 27 जुलाइ 1950 भगवानपुर देसुआ (समस्तीपुर) प्रकाशित कृति---- अरिपन, महुआ मदन रस टपकय, बिन बाती दीप जरय ( काव्य-) कथा-संग्रह- भरि गेल दर्दक इनार। उपन्यास- टहकैत टीस। नाटक- चोखगर खौंच। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-25 योगानंद हीरा ई पहिल गजलकार छथि जे मैथिलीमे पूर्ण रूपेण आ पहिल बेर अरबी बहरक पालन केलथि। मुदा एही कारणे मैथिली संपादक सभ हिनका कात कए देलकन्हि मूल नाम---योगानंद दास हीरा जन्म-30-1-1940 गाम--डुमरी, पत्रालय-गणपतगंज, थाना-राघोपुर, जिला सुपौल शिक्षा-- हिन्दी भाषामे मास्टर डिग्री लेखन---मैथिली आ हिन्दी दूनूमे प्रकाशित पोथी--- नीड़ की तलाश, भले आदमी की तलाश ( उपन्यासिका), सिमटती छाया ( कहानी संग्रह), एक अच्छा मैं ( एकांकी संग्रह), आज की कहानी ( नाटक)। सभ प्रकाशित पोथी हिन्दीमे। मैथिलीमे जल्दिये हिनक पोथी आएत। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-26 गजेन्द्र ठाकुर, पिता-स्वर्गीय कृपानन्द ठाकुर, माता-श्रीमती लक्ष्मी ठाकुर,जन्म-स्थान-भागलपुर 30 मार्च 1971 ई., मूल-गाम-मेंहथ, भाया-झंझारपुर,जिला-मधुबनी (बिहार)। शिक्षा: एम.बी.ए. (फाइनेन्स), सी.आइ.सी., सी.एल.डी., कोविद। विदेहक http://www.videha.co.in प्रधान संपादक सहित अनेको वेबसाइटक संचालक आ पथप्रदर्शक। प्रकाशित गजल संग्रह----धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ विशेष------ हिनक चारिटा मुख्य विशेषता अछि--- 1) ई मैथिलीक पहिल अरूजी छथि, आ 2) हिनका माध्यमे मात्र बारह सालमे कुल ३५०-४००टा नवलेखक आ कतिआएल लेखक सामने अएलाह। 3) अन्तर-महाविद्यालय क्रिकेट प्रतियोगितामे "मैन ऑफ द सीरीज" (1991), सम्प्रति अमेच्योर गोल्फर| 4)अंतर्जाल लेल तिरहुता आ कैथी यूनीकोडक विकासमे योगदान आ मैथिलीभाषामे अंतर्जाल आ संगणकक शब्दावलीक विकास, मैथिली विकीपीडियाक स्थापक। गूगल मैथिली ट्रान्सलेटमे योगदान आ शब्दकोषक वृहत संकलन ओ प्रकाशन। संस्कृत वीथी नाटकक निर्देशन आ ओइमे अभिनय। अन्य लेखन: प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग-१ सहस्रबाढ़नि (उपन्यास) सहस्राब्दीक चौपड़पर (पद्य संग्रह) गल्प-गुच्छ (विहनि आ लघु कथा संग्रह) संकर्षण (नाटक) त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन (दूटा गीत प्रबन्ध) बाल मण्डली/ किशोर जगत (बाल नाटक, कथा, कविता आदि) उल्कामुख (नाटक) सहस्रशीर्षा (उपन्यास) प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग दू (कुरुक्षेत्रम अन्तर्मनक-२) धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ (गजल संग्रह) शब्दशास्त्रम (कथा संग्रह) जलोदीप (बाल-नाटक संग्रह) कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देवनागरी वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur.pdf तिरहुता वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur_Tirhuta.pdf ब्रेल वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur_Braille.pdf सहस्रबाढ़नि_ब्रेल मैथिली (पी.डी.एफ.) सहस्रबाढ़नि_ब्रेल-मैथिली मिथिलाक इतिहास- भाग-२ (शीघ्र) जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी (शीघ्र) The Comet The_Science_of_Words On_the_dice-board_of_the_millennium A Survey of Maithili Literature- Vol.II- GAJENDRA THAKUR (soon) Learn Mithilakshar Script तिरहुता (मिथिलाक्षर) सीखू Learn_MithilakShara_GajendraThakur.pdf Learn Braille through Mithilakshar Script ब्रेल सीखू LearnBraille_through_Mithilakshara.pdf Learn International Phonetic Script through Mithilakshar Script अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला सीखू Learn_International_Phonetic_Alphabet_through_Mithilakshara.pdf सह-लेखन: गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा MAITHILI-ENGLISH DICTIONARIES Maithili_English_Dictionary_Vol.I.pdf MaithiliEnglishDictionary_Vol.II_GajendraThakur.pdf ENGLISH-MAITHILI DICTIONARIES VIDEHA ENGLISH MAITHILI DICTIONARY EnglishMaithiliDictionary_Vol.I_GajendraThakur.pdf जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.)--मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.)--मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध (Click this link to download) http://www.box.net/shared/yx4b9r4kab (Click this link to download) OR right click the following link and save target as:- http://videha123.wordpress.com/files/2009/11/panji_crc1.pdf AND click this link to download some of the jpg images of palm-leaf manuscripts of Panji. http://www.esnips.com/web/videha AND CLICK EACH OF THE FOLLOWING 17 LINKS TO DOWNLOAD ALL THE 11000 JPG IMAGES IN 17 PDF FILES. पंजी (मूल मिथिलाक्षर ताड़पत्र) दूषण पंजी मोदानन्द झा शाखा पंजी मंडार- मरड़े कश्यप-प्राचीन प्राचीन पंजी (लेमीनेट कएल) उतेढ़ पंजी पनिचोभे बीरपुर दरभंगा राज आदेश उतेढ आदि छोटी झा पुस्तक निर्देशिका पत्र पंजी मूलग्राम पंजी मूलग्राम परगना हिसाबे पंजी मूल पंजी-२ मूल पंजी-३ मूल पंजी-४ मूल पंजी-५ मूल पंजी-६ मूल पंजी-७ गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-27 मु्न्ना जी प्रकाशित गजल संग्रह----माँझ आँगनमे कतिआएल छी। अन्य प्रकाशित पोथी----प्रतीक ( विहनि कथा ), हम पुछैत छी ( साक्षात्कार) शीघ्र प्रकाश्य पोथी---- भैया जी ( उपन्यास) आ एकटा हाइकू संग्रह हिनक अन्य विवरण एना अछि------मूलनाम- मनोज कुमार कर्ण, जन्म–27 जनवरी 1971 (हटाढ़ रूपौली, मधुबनी), शिक्षा–स्नातक प्रतिष्ठा, मैथिली साहित्य। वृत–अभिकर्त्ता, भारतीय जीवन बीमा निगम। पहिल विहनि कथा–‘काँट’ भारती मण्डनमे 1995 पकाशित। पहिल कथा–कुकुर आ हम, ‘भरि रात भोर’मे 1997मे प्रकाशित। एखन धरि दर्जनो विहनि कथा, लघु कथा, क्षणिका, गजल आ विहनि कथा सम्बन्धी आलेख प्रकाशित। मुख्यतः मैथिली विहनि कथाकेँ स्वतंत्र विधा रूपेँ स्थापित करबाक दिशामे संघर्षरत। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-28 शान्तिलक्ष्मी चौधरी ई श्रीमती शेफालिका वर्मा जीक बाद मैथिलीक दोसर महिला गजलकार छथि आ सभसँ पहिने अनचिन्हार आखर द्वारा हिनका गजल लिखबाक लेल प्रेरित कएल गेल। मने ई अनचिन्हार आखरक खोज थिकीह। श्रीमति शांतिलक्ष्मी चौधरी, ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी आ राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री, आओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी आ दिल्ली स्कूल ऑफ इकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक आ समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनी छथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी आ एकटा समाजशास्त्री सँ सानिध्यक चलिते आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु आ खास कऽ महिलाजन्य सामाजिक समस्या आ प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-29 सदरे आलम "गौहर" विशेष---अनचिन्हार आखर द्वारा प्रयोजित मैथिली गजल लेल देल जाए बला " गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" बर्ख 2011क विजेता छथि। धातव्य अछि जे ई ऐ सम्मानक पहिल विजेता छथि। गाम-पुरसौलिया, भाया- जयनगर, जिला मधुबनी। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-30 अनिल कुमार मल्लिक ( अनचिन्हार आखर पर " अनिल " नामसँ उपस्थित ) हिनक परिचय हिनक अपने शब्दमे------- हम अनिल कुमार मल्लिक पिता श्री सुरेन्द्र लाल मल्लिक माता श्रीमती सुशिला देबी मल्लिक l हमर जन्म २२ दिसम्बर १९६२ मे झापा जिला, मेची अंचल, नेपाल मे भेल l हमर पुर्खा ग्राम महिशारि, थाना सिंघबारा, जिला दरिभंगा सॉ छलाह, करिब ११० साल पहिने राणा शासन के समय हमर बाबा स्व. जिवनाथ मल्लिक नेपाल अयलाह, सरकारी नोकरी गोश्वारा मे भेटलन्हि आ बाद मे पटवरिका भेटलन्हि त नेपाल के भ' क' रहि गेलहूँ हम सभ l हमर १० कक्षा तक के शिक्षा झापा के इस्कुल मे भेल, स्नातक तक के शिक्षा हमरा बिरगंज आ काठमाण्डु मे भेटल, जन प्रशासन बिषय मे स्नातकोत्तर के अन्तिम बरख छल मुदा कारण बस पुरा नहि क' सकलहूँ l २ भाई छी, ४ बहिन… हम सभ सॉ जेठ छी भाई के बिबाह बिदेह ग्रुप मे सदस्य छथि श्री बृषेश चन्द्र लाल, हुनकर जेष्ठ कन्या सॉ भेल l हमर मातृक समैला, ग्राम पोष्ट पचाढी, जिला दरिभंगा भेल l हमरा मैथिली भाषा आ अपन संस्कृती प्रति के प्रेम हमरा अपन दादी स्व.जोगमाया देबी सॉ भेटल ओ हमर आदर्श छथि l हम कओलेज के समय मे नाटक सभ लिखैत छलहूँ, गीत इ सभ गबैत छलहूँ सांस्कृतीक कार्यक्रम सभ मे नेपाली, हिन्दी, बाङ्ला या त फेर राजबंशी भाषा मे l मैथिली मे लिखनाई बुझू विदेह सॉ जुडला'क बाद मात्र सुरु भेल l मास साइत अक्टूबर २०११ मे पहिल पोष्ट छल "आखर आखर शब्द लिखै छी" l २ पुत्र'क पिता छी, पत्नी संगीता कुमारी कर्ण छथि l आशिष जी'क बताओल बेसीक कॉन्सेप्ट पर सरल बर्ण पर गजल लिखैत छी, एकटा दबाई के कम्पनि मे ब्यवस्थापक छी आ अपनो नीजी ब्यवसाय अछि त समय के कने कमी रहैत अछि l अन्चिन्हार आखर त कय बेर इ सोचि भिजिट करैत रहलौं की संभवतः हमहूँ सिख जायब मुदा नै सिख सकलहूँ अखनि धरि l हमरा नेपाल मे लोक मैथिली मे लिखैथ, पढैथ, भाषा के सम्मान भेटै से नीक लगैत अछि त जे समय भेटैत अछि कोशिष करैत छी, एकर अलावा अपन जन्म स्थान के बच्चा सभ'क शिक्षा प्रति सचेत छी आ जे संभव होइत अछि करवा'क चेष्टा करैत छी गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-31 मिहिर झा ई अनचिन्हार आखरक खोज छथि। विशेष---- मिहिर जी " अनचिन्हार आखर " द्वारा आयोजित पहिल आन-लाइन मोशायराक विजेता छथि। हिनक परिचय हिनक अपने शब्दमे------- गाम - लखनौर (झंझारपुर) जन्म - २ जून १९६३ शिक्षा - स्नातक (विज्ञान) , स्नातकोत्तर (प्रबंधन) संप्रति - जे. आई. आई. टी विश्वविद्यालय. नोएडा मे डिप्टी रजिस्ट्रार परिवार - पत्नी - श्रीमती वंदना झा, पुत्री - श्रुति आ श्रिया , पुत्र - आशीष अभिरुचि - साहित्य ( पद्य ), "अनचिन्हार आखर" के प्रेरणा सों गजल विधा मे प्रारंभिक प्रयास आकांक्षा - विश्व स्तरीय साहित्य मे मैथिली साहित्य के शीर्षस्थ देखब गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-32 ओमप्रकाश हिनक परिचय हिनक अपने शब्दमे------- हमर नाम ओम प्रकाश झा अछि। हम ओम प्रकाश नाम सँ गजल लिखैत छी। हमर बाबूजीक नाम श्री पीताम्बर झा आ माताजीक नाम श्रीमती रामकुमारी झा अछि। हमर जन्म ०५ दिसम्बर १९६९ ईस्वी मे हमर नानीगाम चुन्नी, पत्रालय मधेपुर, जिला मधुबनी मे भेल अछि। हमर पैतृक गाम ड्योढ, पत्रालय घोगरडीहा, जिला मधुबनी अछि। हम छह भाई बहिन मे सब सँ जेठ छी। दसवींक इम्तहान १९८४ मे बीरपुर, जिला सुपौल सँ पास केने छी। अन्तरस्नातक १९८६ मे सी. एम. साइंस कओलेज, दरिभंगा सँ आ स्नातक १९९० मे लंगट सिंह कओलेज, मुजफ्फरपुर सँ पास केलहुँ। सरकारी सेवा मे १९९२ मे अयलहुँ। २००१ मे प्रोन्नति भेंटला पर आयकर अधिकारी भेलहुँ आ विभिन्न स्थान सँ होइत एखन भागलपुर मे पदस्थापित छी। साहित्यक प्रति प्रेम पिता सँ भेंटल अछि। ओहो साहित्य अध्ययन मे बहुत रूचि राखै छथि आ गोट आध रचना सेहो करैत रहै छथि। हमर पढाई केर विषय विज्ञान रहल मुदा साहित्यक प्रति प्रेम ओहो समय उत्कट छल आ अपन डायरी मे किछु किछु लिखैत रहै छलौं। मुदा नै ककरो ओ रचना देखेलियै आ नै सुनेलियै। हम २०१० सँ फेसबुक पर सक्रिय भेलौं आ २०११ मे विदेह ग्रुप मे शामिल कएल गेलौं। इ घटना हमरा लेल परिवर्तनक घटना छल। विदेह पर आदरणीय गजेन्द्र भाई आ अनुज आशीष भाई (हमरा सदिखन लागैए जे इ हमर हराएल अनुज छथि, जे एकाएक भेंटला) सँ सम्पर्क भेल। इ दुनू गोटे हमर भीतर मे नुकाएल गजलकार केँ बाहर आनि दुनियाक सामने ठाढ कऽ देलखिन्ह। ओहि समय आशीष भाई हमरा अनचिन्हार आखर मे योगदान लेल आमन्त्रित केलथि। अनचिन्हार आखर पर हमरा गजलशास्त्रक नियम सब पढबाक अवसर भेंटल, जे हमरा लेल बहुत उपयोगी सिद्ध भेल। आशीष भाईक प्रेरणा पर हम अरबी बहर मे गजल लिखनाई शुरू कएलौं। हमर लिखल गजल अनचिन्हार आखर ब्लाग पर पढल जा सकैए। हम गजलक अलावे कथा, पद्य आ समीक्षा सेहो लिखै छी, मुदा मुख्य रूप सँ हम गजलकार छी। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-33 अमित मिश्र हिनक परिचय हिनकेँ शब्दमे---- बाबू जी-श्री नविन कुमार मिश्र माँ- श्रीमती विभा देवी हम सम्तीपुर जिलाक रोसड़ा थाना अंतर्गत करियन नाम क गाम के रहनिहार छी ।हमर जन्म 11 / 1/1993 मे भेल। बाबू जी एकटा किसान छथि तेँए हमर प्रारंभीक पढ़ाइ गामक इस्कूल मे भेल आ हाइ इस्कूल बैद्यनाथ पूर सँ 2008 मे मैट्रीक केलौँ । इंटर सी .एम .साइंस काँलेज दरभंगा सँ भेल आ एतै सँ गणीत सँ स्नातक क रहल छी । हमरा भाषा सँ कोनो विषेश प्रेम नै रहल । आ मैथिली आफसनल रहबाक कारण कहियो नै पढ़लौँ मुदा हमर बाबा स्बर्गीय भोला ईसर {हमर बाबा तक ईसर लिखाइ छल मुदा बाबू जी सँ मिश्र भ गेल जे की हमर फरीकक आनो चाचा सब लिखै छथि } शिक्षक छलथिन तेँए हम भाषा सँ बेसी दूरो नै छलौं । 2008 मे हम पहिल बेर लिखलौँ जे की एकटा मैथिली मे भगवती गीत छल आ तेकर बाद प्राय: मैथिली , हिन्दी , भोजपुरी मे गीत आ बाद मे मैथिली मे किछु कविता लिखलौं । हमर किछु मित्र किछु गीत सब सुनने छलथि आ किछु गामक किर्तन मे गेने छलौँ बाद बाँकी सब डायरीये मे समेटल छल मुदा 2012 के जनवरी मे विदेह सँ जुड़ला के बाद हमर रचना अपने सबहक संग भेटल । जनवरीक अन्त मे श्री आशीष अनचिन्हार जीक आशीर्वाद भेटल आ अनचिन्हार आखर सँ भेँट भेल । गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-34 चंदन कुमार झा ई अनचिन्हार आखरक खोज छथि। हिनक परिचय हिनकहि शब्दमे---- पिता-श्री अरूण झा माता-मीना देवी जन्म-०५-०२-१९८५ ग्राम-सड़रा,मदनेश्चर स्थान पोस्ट-मदना थाना-बाबूबरही जिला-मधुबनी जन्म-स्थान-सिसवार (मामा गाम मे) नाना-स्व० शुशील झा (राजाजी) आरंभिक शिक्षा-मामा गाम मे (१०वाँ धरि) आँगाक शिक्षा- अन्तर-स्नातक (वाणिज्य) एवं स्नातक (वाणिज्य) दरिभंगा सँ, चंद्रधारी महाविद्यालय.,वित्तीय-प्रबंधन मे डिप्लोमा (वेलिंगकर इन्सटीच्युट आफ मैनेजमेन्ट,मुम्बई) व्यवसायिक जीवन- एकटा बहुराष्ट्रीय कंपनी मे लेखा-विभाग मे कार्यरत परिवार-निम्न मध्यम वर्गीय कृषक परिवार रुचि-अध्ययन-अध्यापन,नाटक-संगीत,सामाजिक सरोकार सँ जुड़ब आ' साहित्यिक गतिविधि. साहित्य लेखन-२००० ईस्वी सँ.कएक गोट कविता,लेख ईत्यादि दरभंगा रेडियो स्टेशन एवं विभिन्न पत्र-पत्रिका सभ सँ प्रकाशित-प्रसारित. किछु व्यक्ति जिनकर अनुकंपा सँ कहियो उॠण नहि होयब- श्री विजयकांत मिश्र (अध्यापक)-कन्हई,श्री शंभूनाथ झा-सुसारी,श्री ताराकांत झा (संपादक,मिथिला समाद),डा० धिरेन्द्र नाथ मिश्र (मैथिली विभागाध्यक्ष,सी.एम.कालेज) (हम ई त' नहि कहि सकब जे मैथिली सँ हमरा कहियो भेँट नहि छल किएक त' हम मैट्रिक सँ स्नातक धरि सभ दिन एच्छिक विषय के रूप मे एकरा पढलहु.हाँ तखन मैथिली व्याकरण सँ कहियो भेँट नहि भेल अवश्य. हमरा कहियो मैथिली पढब आ'कि लिखबा मे बेशी दिक्कत नहि भेल किएक तए जहिना बजैत-सुनैत छी ओहिना लिखैत छी आ' सभ दिन मैथिली साहित्य रुचिकर लगैत रहल अछि...मुदा, मैथिली मे कविता ईत्यादि हम लिखनाय चालू कएलहुँ एकरा पाँछा हमर पारिवारिक आर्थिक विपन्नता छल..एकटा एहन समय आयल जखन लगैत रहय जे पढाइ बिचहि मे छोड़य पड़त किएक त' अभिभावक पढौनिक खर्चा देबय मे असमर्थ भऽ गेल रहथि ..खोलि कय कहियो नहि कहलथि..सभदिन उत्साहित करैत रहलथि..मुदा जहिया दरभंगा सँ गाम जाइत छलौ मासक खर्च अनबा लेल माँ-बाबूजीक चिन्ता स्पष्टतः दृष्टिगोचर होइत छल..लोकक धिया-पुता गाम अबैछ त' माय-बाप हर्षित होइत छैक...हमर माय कनैत छल...मुदा, खून बेचि पढेबाक जिद्द आ तइँ पढाइ नहि छोडल भेल...एहि समय मे परमादरणीय श्री ताराकांत झा जी (संपादक-मिथिला समाद) एकटा सुझाव देलनि जे दरभंगा रेडियो-स्टेशन मे हरेक-मास किछु कार्यक्रम कऽ किछु धनार्जन कयल जा सकैत अछि आ' मासक खर्छ निकालल जा सकैत अछि. हमरा ई सुझाव सूट कयलक आ' फेर सँ नव-उत्साहक संग अपने धनार्जन कय पढबाक विचार ठनलहु. तत्काल एकटा प्राइवेट स्कूल मे मास्टरी पकडि लेलहु...फेर डा. धीरेन्द्रनाथ मिश्र (तत्काळीन बिभागाध्यक्ष-मैथिली , सी.एम.कालेज) के मार्गदर्शन भेटल..केन्द्रिय पुस्तकालय, दरभंगा मे भरि दुपहरिया अगबे मैथिली के पोथी पढी ....जे मोन मे अबैत गेल लिखैत गेलहु आ' एक साल मे पचास टा सँ बेशी कविता लिखलहु....आब मोनो लागय लागल..नित नव उल्लास ......रेडियो स्टेशन सेहो ३-४ टा कार्यक्रम करबाक अवसर देलक...स्नातक खतम भेल..आगाँ पढबाक मोन छल दू टा छोट भाइक भविष्य सोचि अपन भविष्य दाँव पर लगा देलियैक...रोजी-रोजगारक अवसर मे मुम्बई चलि गेलहु..क्रमशः दिन घुरल ..फेर अपनो जहाँ धरि सकलहु आगाँ पढलहु..(फाइनान्स सँ डिप्लोमा कयलहु).....एखनहु पढतहि छी...मझिला स्नातक कयलक..छोटका भाइ एखन इंजिनीयरिंग कय रहल अछि...आब संतोष अछि....त्यागक फल भेटल...हाँ एहि झमेला मे पछिला छह बरख मे साहित्यिक रचनात्मका जेना हेराय गेल छल..मुदा संजोग जे कलकत्ता स्थान्तरित भेलहुँ..फेर ताराकांजी भेटलाह आ' नवउत्साह पाबि किछु लिखबाक प्रयास शुरू कयलहु..किछु सफलता सेहो भेटल..आ' फेर विदेह भेटल..एकर सुधि पाठक भेटल..गुरूरूप मित्र भेटल ......आ' सभटा हेरायल सपना जेना भेट गेल...अरे बाप रे ई कथा त' अनावश्यक नमहर भेल जा रल अछि..एकरा एतहि खतम करू...अहाँ सभक स्नेह बेर-बेर किछु नव लिखबाक...जिनगीक गुनबाक लेल प्रेरित करैत रहैत अछि ...एहने स्नेह सभ दिन बनल रहय एतबहि भगवती "वैदेही"सँ कामना.) गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-35 श्रीमती रूबी झा ई अनचिन्हार आखरक खोज थिकीह। पिता--स्व. ताराकान्त झा नैहर--- बेला सिमरी, जिला खगड़िया सासुर--ग्राम-पो. --- समसा मनसौरचक, जिला बेगूसराय पति---श्री कमला कान्त झा शिक्षा--- स्नातक ( संस्कृत ) गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-36 प्रस्तुत अछि समवेत गजलकार परिचय। ऐमे कुल 27 गजलकार छथि। किछु गजलकारक विस्तृत परिचय देबाक इच्छा छल, मुदा बेर-बेर आग्रहक बबजूद ओ लोकनि नेट पर उपल्बध रहितो अपन परिचय नै पठा सकलाह तँए मात्र हुनक नामोल्लेखसँ काज चला रहल छी। ई सभ गजलकार अनचिन्हार आखरक खोज छथि। त्रिपुरारी कुमार शर्मा,सुनील कुमार झा, विकास झा रंजन,रोशन,दीप नारायण विद्यार्थी,प्रवीन नारायण चौधरी प्रतीक, विनीत उत्पल, भावना नवीन, भाष्कर झा, रवि मिश्रा भारद्वाज, जगदानंद झा मनु, अजय ठाकुर मोहन, प्रभात राय भट्ट, श्रीमती इरा मल्लिक, मनोहर कुमार झा, प्रवीन नारायण चौधरी, स्वाती लाल, नितेश झा रौशन ,कुमार पंकज झा, उमेश मंडल, मनीष झा बौआ भाइ, अभय दीपराज, नवल श्री पंकज, मनोज, कुंदन कुमार कर्ण, मुकुंद मयंक, अविनाश झा अंशु| विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंच मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक जन्मदाता: सभसँ बेसी मैथिली नाटकक निर्देशन: राजरोगसँ दूर: जातीय रंगमंचक विरुद्ध बेचन ठाकुर जीक संघर्ष (मुन्नाजी आ अजित आजादक सोझाँमे मलंगिया जीक भड़ैत प्रकाश झा जकरा लेल कहै छथि- भरि दिन केश काटैत रहै छल- पाठकक लेल ई सूचना जे जातिवादी रंगमंचसँ जुड़ल लोक केश काटनाइकेँ खराप बुझै छथि, संगहि ईहो सूचना जे बेचन ठाकुर सैम पित्रोदा (जे भारतमे टेक्नोलोजी मिशनक प्रारम्भ केलन्हि) सन बरही जातिक छथि, जातिवादी रंगमंचकर्मी लोकनि हुनकर गौँआ अंतिकाक सहायक सम्पादक श्रीधरमसँ कन्फर्म कऽ सकै छथि): हिनका नामसँ कतेको रेकॉर्ड दर्ज अछि, जेना संस्कृतक बाद पहिल बेर मैथिलीमे भरत नाट्यशास्त्रक रंगमंचक संकल्पनाक अनुसार नाटक, मात्र महिला नाट्यकर्मीक माध्यमसँ ६-६ घण्टासँ ऊपरक नाटकक मंचन (जखनकि जातिवादी नाट्यकर्मी अदहा घण्टा- ४५ मिनटक नाटकक निष्पादन लेल महिला रंगकर्मीक लेल बौखैत रहै छथि, कारण हिनकर सभक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। मुदा सभ कान्तिदर्शीकेँ जातिवादिताक कोप, गारि गंजन सुनऽ पड़ै छै, मुदा बेचन ठाकुर एक्केटा छथि...हमरा सभ नाट्यकर्मी, रंगमंचकर्मी, नाटककारकेँ हुनकर मैथिली समानान्तर रंगमंच, जे २५-३० सालसँ अनवरत चलि रहल अछि, पर गर्व अछि। मिथिलाक समाज जँ जातिवादी रंगमंचक बावजूद नै टूटल अछि तँ तकर कारण अछि बेचन ठाकुर जीक मैथिली समानान्तर रंगमंच... आ से मलंगिया जीक काल्हि जन्मल भड़ैत सभकेँ नै बुझल छन्हि, मुदा मलंगिया केँ बुझल छन्हि जे हुनकासँ बेशी संख्यात्मक आ गुणात्मक नाटक/ एकांकी बेचन जीक लिखल छन्हि आ ओइ बेचन ठाकुर आ गुणनाथ झाक एकांकी मैथिली एकांकी संग्रहमे नै देलन्हि.. एकलव्यक औंठा द्रोण कटबा लेलन्हि, मुदा एतऽ तँ गुरुक औंठा मलंगियाजी कटबा रहल छथि..
Gajendra Thakur मलंगिया जीक एकटा बयान आयल रहए, जे विदेहमे सेहो आएल रहए, ओ कहने रहथि जे नेपाली नाटकक स्थिति बड्ड दयनीय छै, मुदा ओतुक्का रंगकर्मीक प्रशंसा केने रहथि। विदेहक ऐ न्यूजक बाद हमरा जनकपुरमे हंगामा भेल रहै आ हमरो मेल पर नेपालसँ ढेर रास मेल आएल रहए, ई लिखैत जे मलंगिया जी जइ थारीमे खेलन्हि ओहीमे छेद केलन्हि। हुनकर मैथिली एकांकी संग्रहमे संकलित एकांकी सभक संकलन हुनकर नाटकीय सोचपर प्रश्न लगबैत अछि। ओइमे किछु एहेन एकांकी राखल गेल जे कहियो कोनो रूपमे नाटककार/ रंगमंचकर्मी नै रहथि; ओतै बहुत रास श्रेष्ठ नाटककार जातिक आधारपर बारल गेलाह। ओइ संग्रहक (साहित्य अकादेमीसँ २००३ ई.मे प्रकाशित)क भूमिकामे मलंगिया जीक अभद्रता ओही तरहेँ अछि जेना २०१० ई.मे प्रकाशित हुनकर छुतहा घैलमे अछि.. हुनकर जातिगत कट्टरता आर बढ़ल अछि। हुनकर सोच आर घटल अछि।
Ram Bharos Kapari Bhramar Sthiti aab spast bharahal aichh.Chintaniya aa bicharniye bat aichh. Ashish Anchinhar मलंगिया जीक नाटक विद्वेष बढ़बैत अछि, हुनकर राड़ आ शोल्कन्हक प्रति आ ओकर भाषाक प्रति घृणा गएर ब्राह्म्ण केँ मैथिलीस‘ं दूर केलक अछि। Monday at 09:08 • Like • 3
Lalit Kumar Jha SRIMAN APAN SOCH BADHAU DOSAR KE SOCHAK CHINTA JUNI KARU Monday at 09:10 • Like • 1
Ashish Anchinhar जहिया गजेन्द्र ठाकुर आ भ्रमर अपन सोच बदलि लेता तहिया मैथिली मरि जाएत। Monday at 09:12 • Like • 4
Ashish Anchinhar Lalit Kumar Jha---ठीके कहैत छी भाइ ओना एकटा गदहाक मर्म दोसरे बड़का गदहा बुझि सकैए। एहि मामिलामे मतलब गदहपनमे अहाँ हमर सीनियर भेलहुँ। सधन्यवाद भाइ|... Monday at 09:14 • Like • 4
Ashish Anchinhar गजेन्द्र ठाकुर- छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल छुतहा घैल महेन्द्र मलंगियाक नवीन नाटकक नाम छन्हि। ऐ छोटसन नाटकक भूमिका ओ दस पन्नामे लिखने छथि। पहिने ऐ भूमिकापर आउ। हुनका कष्ट छन्हि जे रमानन्द झा “रमण” हुनका सुझाव देलखिन्ह जे “छुतहर घैल”केँ मात्र “छुतहर” कहल जाइ छै। से ओ तीन टा गप उठेलन्हि- पहिल- “तों कहियो पोथी के लेखी, हम कहियो अँखियन के देखी।” दोसर- यात्री जीक विलाप कविता- “काते रहै छी जनु घैल छुतहर आहि रे हम अभागलि कत बड़।” आ कहै छथि जे ओइ कविताक विधवा आ ऐ नाटकक कबूतरी देवीकेँ शिवक महेश्वरो सूत्र आ पाणिनीक दश लकारसँ (वैदिक संस्कृत लेल पाणिनी १२ लकार आ लौकिक संस्कृत लेल दस लकार निर्धारित कएने छथि..खएर…) कोन मतलब छै? तेसर ओ अपन स्थितिकेँ कापरनिकस सन भेल कहैत छथि, जे लोकक कहलासँ की हेतै आ गाम-घरमे लोक “छुतहर घैल” बजिते छैक!! मुदा ऐ तीनू बिन्दुपर तीनू तर्क मलंगियाजीक विरुद्ध जाइ छन्हि। “अँखियन देखी” आ लोकव्यवहार “छुतहर” मात्र कहल जाइत देखलक आ सुनलक अछि, घैलचीपर छुतहरकेँ अहाँ राखि सकै छी? लोइटसँ बड़ैबमे पान पटाओल जाइ छै तखन मलंगियाजीक हिसाबे ओकरा “लोइट घैल” कहबै। घैल, सुराही, कोहा, तौला, छुतहर, लोइट, खापड़ि, कुड़नी, कुरवाड़, कोसिया, सरबा, सोबरना ऐ सभ बौस्तुक अलग नामकरण छै। फूलचन्द्र मिश्र “रमण” (प्रायः फूलचन्द्रजी “छुतहा घैल” शब्दक सुझाव हँसीमे देने हेथिन्ह, आ जँ नै तँ ई एकटा नव भाषाक नव शब्द अछि!!)क सुझाव मानैत मलंगिया जी “छुतहर घैल” केँ “छुतहा घैल” कऽ देलन्हि, ई ऐ गपक द्योतक जे हुनका गलतीक अनुभव भऽ गेलन्हि मुदा रमानन्द झा “रमण”क गप मानि लेने छोट भऽ जइतथि से खुट्टा अपना हिसाबे गाड़ि देलन्हि। आ बादमे रमानन्द झा “रमण” चेतना समितिसँ ओइ पोथीकेँ छपेबाक आग्रह केलखिन्ह आ, चेतना समिति मात्र २५टा प्रति दैतन्हि तेँ ओ अपन संस्थासँ एकरा छपबेलन्हि, ऐ सभसँ पठककेँ कोन सरोकार? आब आउ यात्रीजीक गपपर, यात्रीजीकेँ हिन्दी पाठकक सेहो ध्यान राखऽ पड़ै छलन्हि, हुनका मोनो नै रहै छलन्हि जे कोन कविता हिन्दीमे छन्हि, कोन मैथिलीमे आ कोन दुनूमे, से ओ छुतहर घैल लिखि देलन्हि, एकर कारण यात्रीजीक तुकबन्दी मिलेबाक आग्रहमे सेहो देखि सकै छी। आ फेर आउ कॉपरनिकसपर, जँ यात्री जी वा मलंगिया जी “घैल छुतहर”, “छुतहर घैल” वा “छुतहा घैल” लिखिये देलन्हि तँ की नेटिव मैथिली भाषी छुतहरकेँ “घैल छुतहर”, “छुतहर घैल” वा “छुतहा घैल” बाजब शुरू कऽ देत। से कॉपरनिकस सेहो मलंगियाजीक विरुद्ध छथिन्ह। कॉपरनिकसक किंवदन्तीक सटीक प्रयोग मलंगियाजी नै कऽ सकलाह, प्रायः ओ गैलिलीयो सँ कॉपरनिकसकेँ कन्फ्यूज कऽ रहल छथि, कॉपरनिकसक सिद्धान्तक समर्थन पोप द्वारा भेल छल आ कॉपरनिकस पोप पॉल-३ केँ अपन हेलियोसेन्ट्रिक सिद्धान्तक चालीस पन्नाक पाण्डुलिपि समर्पित केने रहथि। खएर मलंगियाजीक विज्ञानक प्रति अनभिज्ञता आ विज्ञानक सिद्धान्तकेँ किवदन्तीसँ जोड़बाक सोचपर अहाँकेँ आश्चर्य नै हएत जखन अहाँ हुनकर खाँटी लोककथा सभक अज्ञानताकेँ अही भूमिकामे देखब। Monday at 09:17 • Like • 4
Ashish Anchinhar गजेन्द्र ठाकुर- छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल------“अली बाबा आ चालीस चोर”- सम्पूर्ण दुनियाँकेँ बुझल छै जे ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि जे “अरेबियन नाइट्स (१००१ कथा)” मे संकलित अछि आ ओइमे विवाद अछि जे ई अरेबियन नाइट्समे बादमे घोसियाएल गेल वा नै, मुदा ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि, ऐ मे कोनो विवाद नै अछि। बलबनक अत्याचार आदिक की की गप साम्प्रदायिक मानसिकता लऽ कऽ मलंगिया जी कहि जाइ छथि से हुनकर लोककथाक प्रति सतही लगाव मात्रकँण देखार करैत अछि। “मिथिला तत्व विमर्श” वा “रमानाथ झा”क पंजीक सतही ज्ञान बहुत पहिनहिये खतम कऽ देल गेल अछि, आ तेँ ई लिखित रूपसँ हमरा सभक पंजी पोथीमे वर्णित अछि। गोनू झा विद्यापति सँ ३०० बर्ख पहिने भेलाह, मुदा मलंगियाजी ५० साल पुरान गप-सरक्काक आधारपर आगाँ बढ़ै छथि। हुनका बुझल छन्हि जे गोनूकेँ धूर्ताचार्य कहल गेल छन्हि मुदा संगे गोनूकेँ महामहोपाध्याय सेहो कहल गेल छन्हि से हुनका नै बुझल छन्हि!! गोनू झाक समयमे मुस्लिम मिथिलामे रहबे नै करथि तखन “तहसीलदारक दाढ़ी” कतऽ सँ आओत। लोकक कण्ठमे छुतहर छै ओकरा “छुतहा घैल” कऽ दियौ, लोकक कण्ठमे “कर ओसूली”करैबलाक दाढ़ी छै ओकरा “तहसीलदार”क दाढ़ी कहि साम्प्रदायिक आधारपर मुस्लिमकेँ अत्याचारी करार कऽ दियौ, आ तेहेन भूमिका लिखि दियौ जे रमानन्द झा “रमण” आ आन गोटे डरे समीक्षा नै करताह। एकटा पैदल सैनिक आ एकटा सतनामी (दलित-पिछड़ल वर्ग द्वारा शुरू कएल एकटा प्रगतिवादी सम्प्रदाय)क झगड़ासँ शुरू भेल सतनामी विद्रोह औरंगजेबक नीतिक विरोधमे छल आ ओइमे मस्जिदकेँ सेहो जराओल गेलै, मुदा गोनू झाक कर ओसूली अधिकारी मुस्लिम नै रहथि, लोककथामे ई गप नै छै, हँ जँ साम्प्रदायिक लोककथाकार कहल कथामे अपन वाद घोसियेलक आ लिखै काल बेइमानी केलक तँ तइसँ मैथिली लोककथाकेँ कोन सरोकार? फील्डवर्कक आधारपर जँ लोककथाक संकलन नै करब तँ अहिना हएत। महेन्द्र नारायण राम लिखै छथि जे लोककथामे जातित-पाइत नै होइ छै, मुदा मलंगियाजी से कोना मानताह। भगता सेहो हुनकर कथामे एबे करै छन्हि। आ असल कारण जइ कारणसँ ई मलंगिया जीक नाटकक अभिन्न अंग बनि जाइत अछि से अछि हुनकर आनुवंशिक जातीय श्रेष्ठता आधारित सोच। हुनकर नाटकमे मोटा-मोटी अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक घीच तीरि कऽ सत्रहटा दृश्य अछि, जइमे पन्द्रहम दृश्य धरि ओ छोटका जाइतक (मलंगियाजीक अपन इजाद कएल भाषा द्वारा) कथित भाषापर सवर्ण दर्शकक हँसबाक, आ भगताक भ्रष्ट-हिन्दीक माध्यमसँ छद्म हास्य उत्पन्न करबाक अपन पुरान पद्धतिक अनुसरण करै छथि। कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह ओ सोलहम दृश्यसँ करै छथि मुदा बाजी तावत हुनका हाथसँ निकलि जाइ छन्हि। आइ जखन संस्कृत नाटकोमे प्राकृत वा कोनो दोसर भाषाक प्रयोग नै होइत अछि, मलंगियाजीक भरतकेँ गलत सन्दर्भमे सोझाँ आनब संस्कृतसँ हुनकर अनभिज्ञताकेँ देखार करैत अछि आ भरत नाट्यशास्त्रपर हिन्दीमे जे सेकेण्डरी सोर्सक आधारपर लोक सभ पोथी लिखने छथि, तकरे कएल अध्ययन सिद्ध करैत अछि। Monday at 09:19 • Like • 4
Ashish Anchinhar गजेन्द्र ठाकुर- छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल----मलंगियाजीक ई कहब अछि जे नाटक जँ पढ़बामे नीक अछि तँ मंचन योग्य नै हएत, वा मंचन लेल लिखल नाटक पढ़बामे नीक नै लागत? हुनकर संस्कृत पाँतीकेँ उद्घृत करबासँ तँ यएह लगैत अछि। जँ नाटक पढ़बामे उद्वेलित नै करत तँ निर्देशक ओकर मंचनक निर्णय कोना लेत? आ मंचीय गुण की होइ छै, अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक सत्रहटा दृश्य, तथाकथित निम्न वर्गकेँ अपमानित करैबला जातिवादी भाषा, भगताक “बुझता है कि नहीं?” बला हिन्दी आ ऐ सभक सम्मिलनक ई “स्लैपस्टिक ह्यूमर”? आ जे एकर विरोध कऽ मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक परिकल्पना प्रस्तुत करत से भऽ गेल नाटकक पठनीय तत्त्वक आग्रही आ जे पुरातनपंथी जातिवादी अछि से भेल नाटकक मंचीय तत्वक आग्रही!! की २१म शताब्दीमे मलंगियाजीक जाति आधारित वाक्य संरचना संस्कृत, हिन्दी वा कोनो आधुनिक भारतीय भाषाक नाटकमे (मैथिलीकेँ छोड़ि) स्वीकार्य भऽ सकत? आ जँ नै तँ ऐ शब्दावली लेल १८०० बर्ष पुरनका संस्कृत नाटकक गएर सन्दर्भित तथ्यकेँ, मूल संस्कृत भरत नाट्यशास्त्र नै पढ़ैबला नाटककार द्वारा, बेर-बेर ढालक रूपमे किए प्रयुक्त कएल जाइए? माथपर छिट्टा आ काँखमे बच्चा जँ कियो लेने अछि तँ ओ निम्न वर्गक अछि? ओकर आंगनक बारहमासामे ओ ऐ निम्न वर्गकेँ राड़ कहै छथि, कएक दशक बाद ई धरि सुधार आएल छन्हि जे ओ आब ओइ वर्गकेँ निम्न वर्ग कहि रहल छथि, ई सुधार स्वागत योग्य मुदा ऐ दीर्घ अवधि लेल बड्ड कम अछि। बबाजी कोना कथामे एलै आ गाजा कोना एलै आ ओइसँ बगियाक गाछक बगियाक कोन सम्बन्ध छै? मलंगियाजी अपन जाति-आधारित वाक्य संरचना, आ भ्रष्ट-हिन्दी मिश्रित वाक्य रचना कोना घोसिया सकितथि जँ भगता आ निम्न वर्गक छद्म संकल्पना नै अनितथि, ई तथ्य ओ बड्ड चतुराइसँ नुकेबाक प्रयास करै छथि, आ तेँ ओ मेडियोक्रिटीसँ आगाँ नै बढ़ि पबै छथि। आ तेँ हुनकामे ऐ नाट्य-कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह तँ छन्हि मुदा सामर्थ्य नै आबि पबै छन्हि। Monday at 09:19 • Like • 4 जातिवादी रंगमंचक भाषाक बानगी: Lalit Kumar Jha GAJENDRA JI CHHERAIT CHHAITHI GAJENDRA JI K APRAMANIK TATHA ASANGAT TIPPNI SABH PADHLAK BAD EAH LAGAIT ACHHI JE GAJENDRA JI LIKHAIT NAHI CHHAITH CHHATHI, LIDDI KARAIT CHHATHI. AAOR E BAL- BAL KA NIKLAIT RAHAIT ACHHI. HINAK E LIDDI MAITHILI SANSAR KE GHINA DET. KIYEK TA MAITHILI SANSAR CHHOT ACCHI. TE HINKA ANGREJI ME LIKHBAK CHHAHI. KARAN AKAR CHHETRA VISAL CHHAIK. AK KON ME HINAK LIDDI PACHA LETAIN. Monday at 10:09 • Like
Ashish Anchinhar मलंगिया जीक नाटक विद्वेष बढ़बैत अछि, हुनकर राड़ आ शोल्कन्हक प्रति आ ओकर भाषाक प्रति घृणा गएर ब्राह्म्ण केँ मैथिलीस‘ं दूर केलक अछि। Monday at 10:12 • Like • 4
Ashish Anchinhar lalit ji ahank pita aa ahank bhasha dunu ekke tarahak achhi, abhadra Monday at 10:12 • Like • 4
Ashish Anchinhar मलन्गिया जी छेड़ि घिनौने छथि Monday at 10:13 • Like • 4
Ashish Anchinhar Lalit Kumar Jha---ठीके कहैत छी भाइ ओना एकटा गदहाक मर्म दोसरे बड़का गदहा बुझि सकैए। एहि मामिलामे मतलब गदहपनमे अहाँ हमर सीनियर भेलहुँ। सधन्यवाद भाइ|... लिद्दीक ज्ञान देखि हम आर बेशी सन्तुष्ट छी , अहाँ अवश्य गदहपनमे हमर सीनियर भेलहुँ Monday at 10:14 • Like • 4
Ashish Anchinhar ललित जी अहाँ आ अहाँ पिता मलंगिया जी दुनू गोटेक भाषा एक्के तरहक अछि.. अभद्र Monday at 10:15 • Like • 4
Umesh Mandal मलंगिया जीक जीवनक प्रभाव हुनकर बच्चापर देखबामे अबैत अछि.. एतेक असभ्य? हुनकर (मलंगिया जी क) नाटक लोककेँ घृणा करब सिखेने अछि से सिद्ध भेल। ललित जी, गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली/ अंग्रेजी/ तिरहुता मैथिली सभटा ग्रन्थक सूची एतए अछि: गजेन्द्र ठाकुर प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग-१ सहस्रबाढ़नि (उपन्यास) सहस्राब्दीक चौपड़पर (पद्य संग्रह) गल्प-गुच्छ (विहनि आ लघु कथा संग्रह) संकर्षण (नाटक) त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन (दूटा गीत प्रबन्ध) बाल मण्डली/ किशोर जगत (बाल नाटक, कथा, कविता आदि) उल्कामुख (नाटक) सहस्रशीर्षा (उपन्यास) प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग दू (कुरुक्षेत्रम अन्तर्मनक-२) धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ (गजल संग्रह) शब्दशास्त्रम (कथा संग्रह) जलोदीप (बाल-नाटक संग्रह) कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देवनागरी वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur.pdf तिरहुता वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur_Tirhuta.pdf ब्रेल वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur_Braille.pdf सहस्रबाढ़नि_ब्रेल मैथिली (पी.डी.एफ.) सहस्रबाढ़नि_ब्रेल-मैथिली मिथिलाक इतिहास- भाग-२ (शीघ्र) जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी (शीघ्र) The Comet The_Science_of_Words On_the_dice-board_of_the_millennium A Survey of Maithili Literature- Vol.II- GAJENDRA THAKUR (soon) Learn Mithilakshar Script तिरहुता (मिथिलाक्षर) सीखू Learn_MithilakShara_GajendraThakur.pdf Learn Braille through Mithilakshar Script ब्रेल सीखू LearnBraille_through_Mithilakshara.pdf Learn International Phonetic Script through Mithilakshar Script अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला सीखू Learn_International_Phonetic_Alphabet_through_Mithilakshara.pdf गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा VIDEHA ENGLISH MAITHILI DICTIONARY जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.)--मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.)--मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध (Click this link to download) http://www.box.net/shared/yx4b9r4kab (Click this link to download) OR right click the following link and save target as:- http://videha123.wordpress.com/files/2009/11/panji_crc1.pdf AND click this link to download some of the jpg images of palm-leaf manuscripts of Panji. http://www.esnips.com/web/videha AND CLICK EACH OF THE FOLLOWING 17 LINKS TO DOWNLOAD ALL THE 11000 JPG IMAGES IN 17 PDF FILES. पंजी (मूल मिथिलाक्षर ताड़पत्र) दूषण पंजी मोदानन्द झा शाखा पंजी मंडार- मरड़े कश्यप-प्राचीन प्राचीन पंजी (लेमीनेट कएल) उतेढ़ पंजी पनिचोभे बीरपुर दरभंगा राज आदेश उतेढ आदि छोटी झा पुस्तक निर्देशिका पत्र पंजी मूलग्राम पंजी मूलग्राम परगना हिसाबे पंजी मूल पंजी-२ मूल पंजी-३ मूल पंजी-४ मूल पंजी-५ मूल पंजी-६ मूल पंजी-७ MAITHILI-ENGLISH DICTIONARIES Maithili_English_Dictionary_Vol.I.pdf MaithiliEnglishDictionary_Vol.II_GajendraThakur.pdf ENGLISH-MAITHILI DICTIONARIES EnglishMaithiliDictionary_Vol.I_GajendraThakur.pdf विदेहक सदेह (प्रिंट) अंक VIDEHA print form विदेह ई-पत्रिकाक पहिल 25 अंकक रचनाक संग containing matter from first 25 issues of Videha e-magazine देवनागरी वर्सन SADEHA_VIDEHA_DEVNAGARIVERSION_PART_1.pdf SADEHA_VIDEHA_DEVNAGARIVERSION_PART_2.pdf तिरहुता वर्सन SADEHA_VIDEHA_TIRHUTAVERSION_PART_1.pdf SADEHA_VIDEHA_TIRHUTAVERSION_PART_2.pdf विदेह ई-पत्रिकाक २६ म सँ ५० म अंकक बीछल रचनाक संग containing matter from 26th to 50th issue of Videha e-magazine विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक PANJI_CRC.pdf - File Shared from Box - Free Online File Storage www.box.com Monday at 10:32 • Unlike • 4
Umesh Mandal ललित जी, सात जन्म लेबए पड़त अहाँकेँ आ मलंगिया जी केँ, अहाँ लिद्दीक विश्लेषण करैत रहू Monday at 10:33 • Unlike • 5
Ashish Anchinhar ललित जी तँ गदहा छथि तँए खाली लिद्दिएक विश्लेषण कए सकैत छथि Monday at 10:48 • Like • 4
Shiv Kumar Jha सात जन्म नै ललित जी,आ मलंगिया जी केँ,सत्तरि जन्म लेबऽ पड़तन्हि। Monday at 10:55 • Like • 3
Sanjay Kumar Jha हद क देलियै अपने सब. अपना में लड़ी क , गारी फज्जती क क की मैथिलि आ मिथिला के निक होयत, इ अहाँ सब सोचलाहूँ एको बेर. बंद करू इ प्रलाप आ सब गोटे मिली के एहन काज करू जाहि से की मैथिलि आ मिथिला के उन्नति हुअय. धन्यवाद. Monday at 22:02 • Like • 1
Gunjan Shree आई काल्हि सब एक दोसरा के दुसबा में लागल अछी,जौ कियो ग़लत केलक अछी त जिनका खराब लगलैन्ह हुनका चाही जे ओहि सौ आगू आबि क ओहि सौ बढ़िया करै,कोनो डैरि(line) के मेटा क छोट केनेय छोट लोकक काज होइत चेक,ओना facebook पर इ सब झगड़ा नही करय जाय से निबेदन..... Tuesday at 02:30 • Like • 3
Vinit Utpal दिल्ली में भेल साहित्य अकादमी कथा गोष्ठी में मलंगिया जी के सुपुत्र अप्पन पिताजीक नाम से पुरस्कार शुरू करबाक लेल लोक सें निहोरा करैत छलाह. अहि लेल अजित आजाद जी के खुशामद सेहो करैत छल जे अहां हमर बाबूजी के नाम पर अहि काजक ले आगा आबू. अजित आजाद जी के कहब छल जे अहि लेल एक लाख टका अहां कोनो संस्थान के जमा क दियो आ ओकर ब्याज से पुरस्कार शुरू भ जायत. मुदा हमरा जानल ई गप आगू नहि बढ़ल. ललित जी, अहिना गजशास्त्र लिखैत रहू. अहां के बुझले होयत जे 'हाथी चले बाजार, कुत्ता भूके हजार'. हाथी के डर से जंगल के राजा नुकायल घुरैत अछि आ अहां ते चिट्टा ते छी नहि जे गज के नाक में घुसि के किछु क सकब. Tuesday at 04:35 • Unlike • 4
Ashish Anchinhar गुंजन बौआ, ई ककरो दुसबाक नै वरन् मलंगिया जीक जातिवादी रंगमंचक विरोध छै, आ ओइसँ कए किलोमीटर पैघ डैरि बेचन ठाकुर जी द्वारा खीचि लेल गेल छै, देखल जाए http://maithili-drama.blogspot.in/ विदेह मैथिली नाट्य उत्सव maithili-drama.blogspot.com Tuesday at 07:28 • Like • 4 •
Umesh Mandal http://maithili-drama.blogspot.com/2011/09/blog-post_25.html Tuesday at 09:28 • Like • 3
Umesh Mandal http://maithili-drama.blogspot.com/2011/08/blog-post_1815.html विदेह मैथिली नाट्य उत्सव: बेचन ठाकुर -बाप भेल पित्ती maithili-drama.blogspot.com Tuesday at 09:29 • Like • 3
Umesh Mandal http://maithili-drama.blogspot.com/2011/08/blog-post_8210.html विदेह मैथिली नाट्य उत्सव: अधिकार- बेचन ठाकुर maithili-drama.blogspot.com Tuesday at 09:29 • Unlike • 5
Umesh Mandal जाधरि समीक्षाकेँ खिच्चातानी आ खिच्चातानीकेँ समीक्षा अहाँ बुझैत रहबै गुंजनश्रीजी, ललित जी आ संजय जी ताधरि अहाँसभ अहिना ओझरीमे रहब, Tuesday at 09:36 • Unlike • 5
Ashish Chaudhary कलकत्तामे गंगा झा छथि, नाट्य निर्देशक, ओ मलंगिया जीसँ कहलखिन्ह जे नाटकमे जातिवादी गारि कम कऽ दैले तैपर हुनका मलंगियाजी जवाब देलखिन्ह जे मलंगियाजीकेँ जतेक गारि अबै छनि तकर दसो प्रतिशत नाटकमे नै आएल छै, शर्मनाक। Yesterday at 06:23 • Like • 2
Ashish Chaudhary बेचन ठाकुर नाटककार आ नाट्य निर्देशक http://maithili-drama.blogspot.in/p/blog-page.html मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटककार आ नाट्य निर्देशकक रूप्मे उभरि कऽ आएल छथि, तै पाछाँ बेचन जीक उत्कृष्ट जिनगी आ सोच छन्हि। विदेह मैथिली नाट्य उत्सव: पेटार maithili-drama.blogspot.com Yesterday at 06:26 • Like • 2
Ashish Anchinhar मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक जन्मदाता: सभसँ बेसी मैथिली नाटकक निर्देशन: राजरोगसँ दूर: जातीय रंगमंचक विरुद्ध बेचन ठाकुर जीक संघर्ष (मुन्नाजी आ अजित आजादक सोझाँमे मलंगिया जीक भड़ैत प्रकाश झा जकरा लेल कहै छथि- भरि दिन केश काटैत रहै छल- पाठकक लेल ई सूचना जे जातिवादी रंगमंचसँ जुड़ल लोक केश काटनाइकेँ खराप बुझै छथि, संगहि ईहो सूचना जे बेचन ठाकुर सैम पित्रोदा (जे भारतमे टेक्नोलोजी मिशनक प्रारम्भ केलन्हि) सन बरही जातिक छथि, जातिवादी रंगमंचकर्मी लोकनि हुनकर गौँआ अंतिकाक सहायक सम्पादक श्रीधरमसँ कन्फर्म कऽ सकै छथि): हिनका नामसँ कतेको रेकॉर्ड दर्ज अछि, जेना संस्कृतक बाद पहिल बेर मैथिलीमे भरत नाट्यशास्त्रक रंगमंचक संकल्पनाक अनुसार नाटक, मात्र महिला नाट्यकर्मीक माध्यमसँ ६-६ घण्टासँ ऊपरक नाटकक मंचन (जखनकि जातिवादी नाट्यकर्मी अदहा घण्टा- ४५ मिनटक नाटकक निष्पादन लेल महिला रंगकर्मीक लेल बौखैत रहै छथि, कारण हिनकर सभक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। मुदा सभ कान्तिदर्शीकेँ जातिवादिताक कोप, गारि गंजन सुनऽ पड़ै छै, मुदा बेचन ठाकुर एक्केटा छथि...हमरा सभ नाट्यकर्मी, रंगमंचकर्मी, नाटककारकेँ हुनकर मैथिली समानान्तर रंगमंच, जे २५-३० सालसँ अनवरत चलि रहल अछि, पर गर्व अछि। मिथिलाक समाज जँ जातिवादी रंगमंचक बावजूद नै टूटल अछि तँ तकर कारण अछि बेचन ठाकुर जीक मैथिली समानान्तर रंगमंच... आ से मलंगिया जीक काल्हि जन्मल भड़ैत सभकेँ नै बुझल छन्हि, मुदा मलंगिया केँ बुझल छन्हि जे हुनकासँ बेशी संख्यात्मक आ गुणात्मक नाटक/ एकांकी बेचन जीक लिखल छन्हि आ ओइ बेचन ठाकुर आ गुणनाथ झाक एकांकी मैथिली एकांकी संग्रहमे नै देलन्हि.. एकलव्यक औंठा द्रोण कटबा लेलन्हि, मुदा एतऽ तँ गुरुक औंठा मलंगियाजी कटबा रहल छथि..
Rishi Kumar Jha GAJENDRA JI CHHERAIT CHHAITHI GAJENDRA JI K APRAMANIK TATHA ASANGAT TIPPNI SABH PADHLAK BAD EAH LAGAIT ACHHI JE GAJENDRA JI LIKHAIT NAHI CHHAITH CHHATHI, LIDDI KARAIT CHHATHI. AAOR E BAL- BAL KA NIKLAIT RAHAIT ACHHI. HINAK E LIDDI MAITHILI SANSAR KE GHINA DET. KIYEK TA MAITHILI SANSAR CHHOT ACCHI. TE HINKA ANGREJI ME LIKHBAK CHHAHI. KARAN AKAR CHHETRA VISAL CHHAIK. AK KON ME HINAK LIDDI PACHA LETAIN. — in New Delhi. Like • • Monday at 9:58am • Shubh Narayan Jha and 3 others like this.
Lalit Kumar Jha bahut badhiya Monday at 10:07am • Like
Naresh Jha bahut uchit likhne chi rishi Monday at 12:39pm • Like
Ajit Azad are chhoro bhi yaar...apne dil ko itna bara kar lena chahiye ki isme saundar bhi sama jai
जातिवादी रंगमंचक भाषाक बानगी:
Mukesh Jha vinit utpal pyada/pyaja no -420विनीत उत्पल जी के लेल जिनका आँखी में रतौधी छैन | अपन आलेख मे लिखैत छैथ जे बाबा के उपर कोनो कार्यक्रम नई भेल अछि | यो उत्पल जी जौ नौकरी के बाद जे समय बचैत अछि से यदि चमचैई के अलावा अहि तरहक आयोजन देखबा मे केने रहितियेक त अहि तरहक भ्रम नहि होयत | उम्मीद अछि आगू स ध्यान राखब |
Mukesh Jha Sujhal yo vinit utpal jee
Mukesh Jha जत्त मलंगिया जी के नाटक के तुलना भारतीय रंगमंच के प्रसिद्ध नाटककार जेना मोहन राकेश, विजय तेंदुलकर, गिरीश कर्नाड, बादल सरकार आदि स भ रहल छैक ओहि ठाम आई कालिह मे जनमल मैथिली के टुच्चा नाटकार आ नाटक स तुलना केनाई बेईमानी अछि |
Mukesh Jha से बेईमान सब स पुछियोक भाई | 23 hours ago • Like Anuradha Jha अहि मे कोनो दू मत नई जे महेंद्र मलंगिया मैथिली के सर्वश्रेष्ट नाटककार छैथ | 23 hours ago • Like Anuradha Jha मलंगिया जी पर जाही तरह फेस बुक पर किछु लोक अनाप सनाप लिखी क श्रेष्टता पाब चाही रहल छैथ से सर्वदा गलत अछि | श्रेष्टता पेबाक कोनो दोसर बाट ताकल जा सकैत अछि | किछु लोकक पोस्ट आ भाषा घोर आपत्ति जनक अछि | अहि स मिथिला मैथिली के अपमान भ रहल अछि | कुंठा स ग्रसित नई हाउ आ अपन नीक काज कय क अपन स्थान बनाव नई की खिच्चम तानी मे लागल रहैत जाऊ | 23 hours ago • Like Prakash Jha मैथिली नाटकक ज्ञान सब के नै छनि. जे लोकनि नाटक वाकि रंगमंच स' जुड़ल छथि हुनका सभ स' विचार लेल जयबाक चाही. जेना कि कुणाल जी, गगन जी, किशोर केशव, प्रेमलता मिश्र प्रेम, शिवनाथ मंडल, यदुवीर यादव आदि आदि....बाँकी फेसबुक पर जे भ' रहल अछि ओकर तह मे किछु आर अछि. कोनो खास व्यक्ति केँ मात्र साहित्य अकादेमी पुरस्कार दियबाक लेल भ' रहल अछि. एही बीच महेन्द्र मलंगिया जीक पुस्तक आबि गेलन्हि कि ई लोकनि डरि गेल छथि... त' लगल्न्हि अछि उंटा चालि चल' .... 23 hours ago • Like Mukesh Jha उचित कहल अनुराधा जी मुदा किछु बेकहल लोक के कोना रोकल जा सकैत अछि | जे की अपना आ अपन खानदान के श्रेष्ट बनेबाक लेल सब कर्म करबाक लेल तैयार छैथ | जिनका मे टेलेंट हेतैन तिनका जोर जबरदस्ती नई कर परैत छैक से के बुझेतैन महामुर्ख लोकनि के | मलंगिया जी के नाटक जतेक लोकप्रिय अछि प्रेक्षक के बीच मे किनक नाटक लोकप्रिय अछि से कहौत नबका जन्मौटी नाटक के हितेषी लोकनि ? 23 hours ago • Like Mukesh Jha ओहो त एकर मतलब ई जे मात्र ई ओझराब के योजना भरी अछि ?
Ashish Anchinhar एखन हमरा मोबाइल पर एकटा नम्बर सँ फोन आएल छल जकर नम्बर अछि----08595372399 । फोन करब बला कहलाह जे हम बजरंग मंडल छी। आ इ कहू जे आशीष चौधरी के छथि। हम कहलिअन्हि जे से तँ प्रकाश झासँ पूछि लिअ। ओ हमरा कहलाह जे हम प्रकाश झासँ किएक पुछबै। आ बातचीत क्रममे कहलाह जे हमर नाम किएक फेसबुक पर आएल। हम कहलिअन्हि जे हमरा जे अहाँ भोरमे अहाँ कहलहुँ जे रातिमे इ सभ मारए बला छलाह। मुदा हम रोकबा देलहुँ। बातचीतकेँ अंतमे बजरंग जी इहो कहलाह जे फेसबूक पर इ बात आनि बहुत गलत केलहुँ अछि। सभ गोटाकेँ धआन देआबी जे बजरंग मंडल मैथिली फांउडेशनसँ बेसी जुड़ल छथि जे की मैलोरंगसँ टूटि कए बनल एकटा संस्था अछि। मुदा फोन करए बला कहलाह जे हम दोसर बजरंग मंडल छी। भए सकैए जे दूटा बजरंग मंडल होथि मुदा ई संभव नै छै जे ओ दूनू के दूनू बजरंग मंडल हमरा चिन्हैत होथि। ओना जँ बजरंग जीकेँ अवाजसँ ई स्पष्ट छल जे कोनो दबाबमे जरूर छथि।ओना जँ बजरंग जी चाहथि तँ अपन पहिचान दए सकै छथि। फोन नम्बर सेहो ट्रेस भए जेतै।
संगे-संग प्रकाश झा स्वंय अपने मूँहसँ मुन्ना जीकेँ कहलकै जे अंतो-अंत धरि हम आशीष अनचिन्हारकेँ मारबै ताहि पर मुन्ना जी कहलखिन्ह जे हम अनचिन्हार संगे परिचय करबा दै छी कने छूओ क देखिऔ। ताहि पर प्रकाश झाक एकटा परम ब्राम्हणवादी सहयोगी मुन्ना जीकेँ कहलखिन्ह जे अहाँ बचा लेबै अनचिन्हारकेँ । ताहि पर मुन्ना जी कहलखिन्ह जे हम सभ कहै नै छिऐ करै छीऐ खाली एकबेर छू क देखिऔ। ताहि पर प्रकाश झा कहलखिन्ह जे कोनो बात नै देखिऔ जे की होइ छै। जँ साहित्य अकादेमीक ओहि कथा गोष्ठीक फोटो-विडियोकेँ देखल जाए तँ ई स्पष्ट अछि जे प्रकाश झा-मुकेश झा हमरा मरबा लेल व्यग्र छल।उपरमे एकटा फोटो राखि रहल छी जाहिमे की कए रहल अछि प्रकाश से देखू---- मुदा मुन्ना जीक कहलाक बाद डरें किछु नै कएल पार लगलै प्रकाश झा एनड मुकेश झा कम्पनीकेँ।
Ashish Chaudhary मलंगिया आ प्रकाश झाक इशारापर भ्रमरजीक विरुद्ध मिथिलादर्शन आ आन-आन ठाम चिट्ठी भेजनिहार मुकेश झा आब इन्टरनेट पर आबि गेल अछि, ऐ फ्रॉड आइ.डी.सँ सावधान। ई ककरो दोसरा द्वारा संचालित होइत अछि.. सावधान। ... मलंगिया जीक नाटक लोककेँ बेसी कट्टर बनेलक अछि, गएर ब्राह्मण मैथिलीसँ दूर भागल अछि। ... प्रकाश झा आ मुकेश झा घोषणा केने रहथि जे २४ मार्च २०१२ क साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठीमे आशीष अनचिन्हारकेँ मारताह, बजरंग मण्डल ओतए आशीष अनचिन्हारकेँ ऐ मादे सतर्क सेहो केने रहथि। मुदा छूलो भेलन्हि?malangiya ji jatek mehnati lathait posai me lagelanhi tatek jan neek naatak likhbai me lagabitathi te aai mukesh jha, rajiv mishra, lalit jha, prakash jha san nirlajjak aavashyakta nai rahitanhi Bhaskar Jha भाई एहन ऎहन आपत्तिजनक गप के जतय तुलि देबय ओतय बढत! किनको व्यक्तिगत सोच आ आपत्ति के सार्वजनिक नहिं कयल जयबाक चाही। विद्वजन के अपन अपन मतानतर होयत छई। वोहि मतानतर पर हम - अहां आपस में नहिं लड़ि। दूनू महान व्यक्तित्व के धनी छथि। दूनू गोटे सं हमरा सबके सीखबाक चाही। 7 April at 21:35 • Like • 1
Ashish Chaudhary भाइ पत्रिका सभमे लठैतक छद्म नामसँ चिट्ठी पठेबाक प्रवृत्तिपर किछु तँ कमी आएत।
Ashish Chaudhary भाइ पत्रिका सभमे लठैतक छद्म नामसँ चिट्ठी पठेबाक प्रवृत्तिपर किछु तँ कमी आएत। 7 April at 21:46 • Like • 2
Bhaskar Jha हां सेहो बात सही अछि 7 April at 22:05 • Like • 1
Manoj Jha इ सब मिथिला मैथिली के लेल दुर्भाग्यक गप्प थिक .. 7 April at 22:55 via Mobile • Like • 3
Umesh Mandal सामंती लोकनिक बेवहारिक परिचय.... 8 April at 01:40 • Like • 1
Shubh Narayan Jha kane positive bha chalba sa maithili ke vikas chhaik ne ki ek dosra ke khichay kela sa
Ashish Anchinhar जातिवादी रंगमंचक शब्दावलीक बानगी:-जातीय रंगमंचक भाषाक बानगी:- Prakash Jha सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना सुश्री ...... आजकल दिल्ली में ही हैं. 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Vinit Utpal जातिवादी रंगमंच क प्राइवेट पार्टी मे ५-१० मिनट यात्री आ राजकमल कें देल गेलन्हि आ ओकर फोटो १०-२० साल धरि बेचल जाएत , ई जातिवादी रंगमंच अखबारक कतरन समेटैत अछि. 4 hours ago • Unlike • 1 Vinit Utpal (यात्रीक जन्म ३० जून १९११ छन्हि ) 4 hours ago • Like Ashish Anchinhar विनीत भाइ ई सभ फण्ड केर खेला छै जहिया फण्ड भेटतै तहिये बाबा मोन पड़तिन्ह आ सातो जन्म धरि फोटो लगा इ बाबू सभ हल्ला मचेताह।.... 4 hours ago • Like Ashish Anchinhar भाइ एकट गप्प इहो जे जेना जातिवादी रंगकर्मी सभ अपन दिमाग मे कूड़ा-कर्कट भरने रहै छथि तेनाहित अपन घर-आफिस कतरनसँ भरने रहै छथि। ई कतरन सभ फण्ड उगाही केर नीक साधन छै जातिवादी सभ लेल। जँ ई कतरन नै रहतै तँ फण्ड देतै के। ओना विनीत भाइ अहाँक जानकारी लेल ई कहि दी जे पेड पत्रकारितामे पाइ दए न्यूज छपा लेब जातिवादी सभ लेल कोनो बड़का गप्प नै। फोटोशापसँ ब्रोशर बना लेनाइ सेहो आसान छै। प्रिंटर सँ पर्चा सेहो छपा लिअ। भारत सरकार फण्ड देबा कालमे इएह सभ देखैत छै।.. 4 hours ago • Like Mukesh Jha यो अनचिन्हार जी काज कय क हल्ला करैत छीयेक आहाँ और आहाँ के ग्रुप भूते त बाबा के नाम पर एकटा गोष्टीयो नई कायल भेल | 4 hours ago • Like Mukesh Jha यो अन्चिहार जाहि ग्रुप के पोसुवा छी आहाँ ओही ग्रुप स एक बेर मंडी हाउस मे एकटा बाबा के नाम पर गोष्टी करबा क देखा दियह | 4 hours ago • Like Rajiv Mishra kya bat hai mukesh bhai gargara diye... 4 hours ago • Like Ashish Anchinhar जातिवादी रंगकर्मीक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। .... 12 minutes ago • Like Ashish Anchinhar राजीव मिश्रा, प्रकाश झा आ मुकेश झा सन भड़ैतक चलते कियो परिवार आ बहु बेटीक संग जातिवादी रंगमंचक समारोह (प्राइवेट पार्टी)मे नै जाइए। about an hour ago • Like Ashish Anchinhar जातिवादी रंगमंचक शब्दावलीक बानगी:Mukesh Jha साहित्य अकेदमी पुरस्कार के कारण भ रहल अछि राजनीति | जातिवाद के हवाला दय कय रहल छैथ किछु चिन्हार आ किछु अनचिन्हार लोक घिनायल राजनीति | यो महामहिम लोकनि साहित्य अकादेमी पुरस्कार कोनो जाती विशेष के नई भेटैत छैक, उत्कृष्ट रचना के देल जायत छैक | सबुर राखु रचना मे दम्म होयत त अवश्य भेटत, अन्धेर्ज जुनि हाउ | जिनका पुरस्कार दियाब चाहैत छियेन हुनका कहियोन जे साहित्य के कोनो एक विधा के मजबूत करताह | खने कविता, खने कहानी आ आब नाटक मे सेहो अपन कलम भाजीं रहला अछि, यो ताहि स नही चलत, | खैर हल्ला करब त दओ दिया से भारी बात नई | मुदा ऐना नई चलत, जाही नाटक के आहाँ लोकनि पुरस्कार दियाबह लेल व्यग्र छि, ताहि मे दम नई अछि, आधा किताब एक सीन मे आ बांकी आधा मे ७ गो सीन, से नई होयत छैक यो सरकार | आ कनि दिमाग लगाब लेल सेहो कहियोन नाटककार महोदय के -- | नाटक के अपन व्याकरण छैक तकरा अनुसरण करैत लिखता त मंचित होमा मे असोकर्ज नई हेतैक | ध्यान दियोक |आ बेसी स बेसी मंचिंत नाटक के महत्व होयत छैक | about an hour ago • Like Ashish Anchinhar ई डायलोग- "Mukesh Jha साहित्य अकेदमी पुरस्कार के कारण भ रहल अछि राजनीति | जातिवाद के हवाला दय कय रहल छैथ किछु चिन्हार आ किछु अनचिन्हार लोक घिनायल राजनीति | यो महामहिम लोकनि साहित्य अकादेमी पुरस्कार कोनो जाती विशेष के नई भेटैत छैक, उत्कृष्ट रचना के देल जायत छैक | सबुर राखु रचना मे दम्म होयत त अवश्य भेटत, अन्धेर्ज जुनि हाउ | जिनका पुरस्कार दियाब चाहैत छियेन हुनका कहियोन जे साहित्य के कोनो एक विधा के मजबूत करताह | खने कविता, खने कहानी आ आब नाटक मे सेहो अपन कलम भाजीं रहला अछि, यो ताहि स नही चलत, | खैर हल्ला करब त दओ दिया से भारी बात नई | मुदा ऐना नई चलत, जाही नाटक के आहाँ लोकनि पुरस्कार दियाबह लेल व्यग्र छि, ताहि मे दम नई अछि, आधा किताब एक सीन मे आ बांकी आधा मे ७ गो सीन, से नई होयत छैक यो सरकार | आ कनि दिमाग लगाब लेल सेहो कहियोन नाटककार महोदय के -- | नाटक के अपन व्याकरण छैक तकरा अनुसरण करैत लिखता त मंचित होमा मे असोकर्ज नई हेतैक | ध्यान दियोक |आ बेसी स बेसी मंचिंत नाटक के महत्व होयत छैक |" प्रकाश झा मुन्नाजीकेँ बेचन ठाकुरक नाटकक (जिनका ओ भरि दिन केश काटैबला कहैए) विषयमे ई गप कहने रहन्हि। आब सिद्ध् भेल जे ई मुकेश झा नै प्रकाश झा अछि। 5 minutes ago • Like Ashish Anchinhar प्रकाश झा बाउ: टिनही चश्मासँ देखू बेचन ठाकुरक नाटक: "आधा किताब एक सीन मे आ बांकी आधा मे ७ गो सीन"- दुनिया लग ई किताब छै आ अपन भड़ैती जारी राखू, झूठक खेतीक संग: अहाँ भड़ैतीक अलाबे आर किछु नै कऽ सकै छी बाउ। एतए पोथीक लिंक अछि, पढ़ू आ माथ पीटू https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/BechanThakur.pdf?attredirects=0 https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/BechanThakur.pdf?attredirects=0 8869256024489431480-a-videha-com-s-sites.googlegroups.com A few seconds ago • Like • Ashish Anchinhar मलंगिया जी केँ सेहो पढ़बा देबन्हि- गुणनाथ झा कहै छलाह जे होइ छल जे उमेरक संग मलंगियाजी आधुनिक रंगमंच बुझि जेताह., मुदा काश... https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/BechanThakur.pdf?attredirects=08869256024489431480-a-videha-com-s-sites.googlegroups.com about an hour ago • Like • Sangeeta Jha gajendra jee prasidh hobay ke lel badhiya chai prasidh aadmi ke aalochna karu.aakhir malangia jee ke naam dekh ka lok kum sa kum aahan ke naam padhiye let.Ona suraj oar thuku tha thukappne par parai chai. mathili ke jeevan ahak soch par nirbhar chai aascharya 54 minutes ago • Unlike • 1 Gajendra Thakur जातिवादी रंगमंचक महिला विरोधी, दलित पिछड़ा विरोधी प्रवृत्ति दुखी करैत अछि। समानान्तर रंगमंच एकर विरोधमे आजन्म ठाढ़ रहत।
Poonam Mandal काल्हि मलंगिया जीक मैलोरंगक (जकर आइ काल्हि अध्यक्ष देवशंकर नवीन छथि) दूटा सदस्य प्रकाश झा आ मुकेश झा एकटा महिलाकेँ बदनाम करबाक कोशिश (हम कोशिशे कहब, कारण हिनका सभक औकात ततेक नै छन्हि जे ओइमे ई सफल होथि, साहित्यिक सम्वेदनाक विश्लेषण ओ कऽ सकता?) केलन्हि। संगे ई दुनू गोटा जगदीश प्रसाद मण्डल आ बेचन ठाकुर जीक प्रति जातिगत अपशब्द सेहो कहलन्हि। अही तरहक जातिगत टिप्पणी देवशंकर नवीन द्वारा वैदेही पत्रिकामे सुभाष चन्द्र यादव जीक विरुद्ध सेहो कएल गेल रहए। की एक्कैसम शताब्दीक ई सभ लेखक छथि? एक्कैसम शताब्दीक रंगमंचकर्मी छथि? मैलोरंग पत्रिकामे प्रेमराज नामसँ अनलकान्त (गौरीनाथ- अंतिकाक सम्पादक)केँ गारि देनिहार मैलोरंगक वर्तमान वा पूर्व अध्यक्ष अपन नाम किए नै सोझाँ आनलन्हि, किए प्रकाश आ मुकेशक कान्हपर बन्दूक राखि ओ प्रेमराजक छद्म नामसँ गारि पढ़लन्हि, पत्रिकामे जे ई मेल प्रेमराजक देल अछि ओ बाउन्स कऽ रहल अछि। मलंगियाकेँ बुजुर्गक रूपमे सम्मानदेबाक आग्रही जगदीश प्रसाद मण्डल आ बेचन ठाकुर केँ किए गरिया रहल छथि? Ashish Anchinhar धरती गोल छै..... प्रेमराजकेँ त्रिकालज्ञसँ भेँट भैए गेलै।.. "सगर राति दीप जरय"केर अन्त आ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठीक उदय २१ जुलाइ २००७केँ सहरसा "सगर राति दीप जरय"मे जीवकांत जी मैथिलीकेँ राजरोगसँ ग्रसित हेबाक संकेत देने छलाह। आ तकरा बाद लेखक सभकेँ मैथिलीकेँ ऐ राजरोगसँ बचेबाक आग्रह रमानंद झा रमण केने छलाह। मुदा हमरा जनैत- ई मात्र सुग्गा-रटन्त भेल। कारण ई राजरोग आस्ते-आस्ते जीवकांत जी आ रमण जीक आँखिक सामने मैथिलीकेँ गछाड़ि लेलकै। मैथिलीक ई रोगक बेमरिआह स्वरूप आर बेसी फरिच्छ भऽ कऽ दिल्लीक धरतीपर "मैलोरंग" द्वारा संचालित आ साहित्य अकादेमीक पाइक बलें कुदैत "सगर राति दीप जरय" मैथिली भाषाकेँ मारि देलक। २४ मार्च २०१२केँ साँझ धरिलोक भ्रममे छल जे दिल्लीमे "सगर राति दीप जरए" केर आयोजन भऽ रहल छै। संयोजक देवशंकर नवीन माला उठेने रहथि, मुदा आगाँ प्रकाश आ फेर मैलोरंग नै जानि कतऽ सँ आबि गेलै, आ अतत्तः तखन भेलै जे बादमे पता चललै जे ओ सगर राति नै छल ओ तँ "मैलोरंग" द्वारा संचालित आ साहित्य अकादेमीक पाइसँ आयोजित मात्र कथा गोष्ठी छल। मैलोरंग एकरा ७६म "सगर राति दीप जरय"क रूपमे आयोजित करबाक नियार केने छल मुदा "सगर राति दीप जरय" मे आइ धरि सरकारी साहित्यिक संस्थासँ फण्ड लेबाक कोनो प्रावधान नै रहै, से ई ७६म "सगर राति दीप जरय"क क्रम टूटि गेलै आ तँए ई ७६ कथा गोष्ठीक रूपमे मान्यता नै प्राप्त कऽ सकल। पाइ साहित्य अकादेमीक लागल छलै एकर प्रमाण फोटो सभमे सहयोगक रूपे " साहित्य अकादेमी"क नाम देखाइ स्पष्ट रूपे पड़त। आ अकादेमीक पर्यवेक्षकक रूपमे देवेन्द्र कुमार देवेश आएल छलाह। साहित्य अकादेमी द्वारा मैथिलीक ऐ एकमात्र स्वायत्त गोष्ठीकेँ तोड़बाक प्रयासक साहित्य जगतमे भर्त्सना कएल जा रहल अछि। ओना हम स्पष्ट कही जे राजरोगकेँ हटेबाक बात करए बला रमानंद झा रमण सेहो ऐ कूकृत्यकेँ आँखिसँ देखलन्हि आ मौन सम्मति देलनि। आब चूँकि ई "सगर राति दीप जरए" नै छल तँए आगूक एकर विवेचन हम मात्र कथा गोष्ठीक रूपमे करब। चूँकि लोकमे भ्रम पैदा कएल गेल छलै जे ई "सगर राति दीप जरए" अछि तँए विदेह दिससँ पोथीक स्टाल लगाएल जा रहल छल कथा स्थलपर, मुदा ओही समय "मैलोरंग"केर कर्ता-धर्ता प्रकाश झा द्वारा ऐपर रोक लगा देल गेलै। प्रकाश जी कहलखिन्ह जे जँ फ्रीमे बँटबै तखने स्टाल संभव हएत। मुदा हुनक विचारकेँ स्टाल व्यवस्थापक आशीष चौधरी द्वारा नकारि देल गेल। आ एकर विरोधमे विदेहक संपादक गजेन्द्र ठाकुर कथास्थलसँ निकलि गेलाह। ऐकथा गोष्ठीक शुरूआतमे ओना हम अपने फेसबूकपर घोषणा केने रही जे गजल आ हाइकूक पोस्टर प्रदर्शनी करब सगर रातिमे, मुदा जखन ओ सगर रात छलैहे नै तखन हम सभ कतए करब आ ताहिपर विदेह पोथी स्टालक विरोधक बाद! हमरा लोकनि एकर विरोध करैत ऐ पोस्टर प्रदर्शनीकेँ स्थगित कऽ देलौं। ऐ कथा गोष्ठीक आरंभ बारह गोट पोथीक विमोचनसँ भेल। जइमे कुल पाँच हिन्दी-उर्दूक पोथी छल आ सातटा मैथिलीक। अजुका मने दिल्ली बाल सगर रातिसँ पहिने हम २००८मे रहुआ संग्राममे भाग लेने रही। ओ हमर पहिल सगर राति छल। पूरा उत्साहसँ भरल रही। मुदा जेना जेना राति बितैत गेल हमर उत्साह बिलाइत गेल आ अंतमे ३ बजे रातिमे जखन हमरा कथा पढ़बाक मौका भेटल तखन हम जागल रही ओहि सत्रके अध्यक्ष शिवशंकर श्रिनिवास जागल रहथि आ दू-चारिटा अनचिन्हार लोक जागल रहथि ( अनचिन्हार लोक ताहि सामयकेँ हिसाबसँ उमेश मंडल, जगदीश प्रसाद मंडल, फूल चंद्र मिश्र रमण इत्यादि) आ बाद-बाँकी तथाकथित समीक्षक-आलोचक एवं हरेक सगर रातिमे अपन भाँज पुरबए बला लोक सभ सूतल रहथि मने तारा बाबूसँ लए क' रमानंद झा रमण धरि। ओही दिन हमरा अनुभव भेल जे जँ कुम्भकर्ण सबहक बीच वेद-पाठ करब तँ अपने पापक भागी बनब। अस्तु हम ओहि कथा गोष्ठीक वहिष्कार केलहुँ आ आ कथा नै पढ़लहुँ। मुदा जखन गोष्ठीक कर्ता-धर्ता ( संयोजनक नै) कुंभकर्णे छथि तखन हमर एहि वहिष्कारक चर्चा केना हो। ओना ओहि कथा गोष्ठीक वहिष्कारक कारण छल जे " जँ समीक्षके कथा नै सुनताह तँ हम पढ़ब केकरा लेल। आब अहाँ सभ कहि सकैत छी जे अहाँ आम श्रोताकेँ अपन कथा सुना सकैत छलहुँ। इ गप्प सत्य मुदा बेरमा छोड़ि हमरा कतौ आम श्रोता नै भेटल। हम अपने तँ बेरमामे नै रही मुदा ओकर विडियो जे कि यूट्यूबपर छै ताहिमे इ स्पष्ट रूपें देखल जा सकैए।आब आबी दिल्लीक एहि कथा-गोष्ठीपर। इ कथा-गोष्ठी अपना-आपमे कतेको कीर्तिमानकेँ स्थापित केलक आ धवस्त केलक। जँ भारतीय दर्शनमे वर्णित आत्मा आ पुनर्जन्म सत्य छै तँ आदरणीय प्रभाष चौधरी जीक आत्मा कुहर-हुकरि रहल हेतन्हि। ओ एहि दिनक कल्पना केनहो नै हेताह। एहि कथा-गोष्ठीक किछु कीर्तिमान देखल जाए।---- 1) रहुआ संग्रामसँ जे मैथिली साहित्यमे गैर ब्राम्हण मुदा टेलेन्टेड प्रतिभा एनाइ शुरू भेल छल से एहिठाम टुटि गेल। कथा गोष्ठीक निअम छलै जे कथाकार-साहित्यकार वा श्रोता अपन खर्चापर एताह-जेताह मुदा बात जखन दिल्लीकेर होइ तँ संयोजक अपन इष्ट सभहँक लेल नीक जकाँ पाइ खरचा केलाह। एकर परिणाम कतेक भयंकर हेतै से सहजहि सोचल जा सकैए। दिल्लीसँ पहिने हरेक कथा गोष्ठीक निअम छलै जे " जे कथाकार पहुँचता से कथा पढ़ताह"। मुदा एहि बेर संयोजक घोषणा केलाह जे जिनका हम निमंत्रण पढ़ेबन्हि सएह एताह वा जिनका एबाक छन्हि से अपन स्वीकार पत्र पठाबथि। भविष्यपर एहि निअम सेहो प्रभाव पड़तै से लागि रहल अछि। अस्तु एहि एतेक कीर्तिमान स्थापित केलाक बाद जे इ गोष्ठी भेल आब ताहिकेँ देखी--- ई कथा गोष्ठी आठ सत्रमे बाँटल छल। अध्यक्ष छलाह गंगेश गुंजन आ संचालक छलाह अजित कुमार अजाद। साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीक पहिल सत्रमे विभूति आनन्द (छाहरि), मेनका मल्लिक(मलहम) आ प्रवीण भारद्वाजक (पुरुखारख) कथाक पाठ भेल। कथापर समीक्षा अशोक मेहता आ रमानन्द झा रमण केलन्हि। अशोक मेहता कहलन्हि जे विभूति आनन्दक कथामे किछु शब्दक प्रयोग खटकल। मेनका मल्लिकक भाषाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे एतेक दिनसँ बेगूसरायमे रहलाक बादो हुनकर भाषा अखनो दरभंगा, मधुबनीयेक अछि। प्रवीण भारद्वाजक कथाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे कथाकार नव छथि से तै हिसाबे हुनकर कथा नीक छन्हि। रमानन्द झा रमण विभूति आनन्दक कथामे हिन्दी शब्दक बाहुल्यपर चिन्ता व्यक्त केलन्हि। मेनका मल्लिकक कथाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे महिला लेखन आगाँ बढ़ल अछि। प्रवीण भारद्वाजक कथाक भाषाकेँ ओ नैबन्धिक कहलन्हि आ आशा केलन्हि जे आगाँ जा कऽ हुनकर भाषा ठीक भऽ जेतन्हि। तकर बाद श्रोताक बेर आएल, सौम्या झा विभूति आनन्दक कथाकेँ अपूर्ण, ओइ इलाकासँ कटल लगलन्ह् मुदा ओ कहलन्हि जे हुनका ई कथा नीक लगलन्हि मुदा ऐमे कमी छै, देवशंकर नवीन विभूति आनन्दक पक्षमे बीच बचावमे (!!!) एलाह मुदा सौम्या झा अपन बातपर अडिग रहलीह। आशीष अनचिन्हार विभूति आनन्दसँ हुनकर कथाक एकटा टेक्निकल शब्द "अभद्र मिस कॉल"क अर्थ पुछलन्हि तँ देवशंकर नवीन राजकमलक कोनो कथाक असन्दर्भित तथ्यपर २० मिनट धरि विभूति आनन्दक पक्षमे बीच बचाव करैत रहला (!!!), अनन्तः विभूति आनन्द श्रोताक प्रश्नक उत्तर नै देलन्हि। दोसर सत्रमे विभा रानीक कथा सपनकेँ नै भरमाउ, विनीत उत्पलक कथा निमंत्रण, आ दुखमोचन झाक छुटैत संस्कारक पाठ भेल। विभा रानीक कथा पर समीक्षा करैत मलंगिया एकरा बोल्ड कथा कहलन्हि, सारंग कुमार कथोपकथनकेँ छोट करबा लेल कहलन्हि, कमल कान्त झा एकरा अस्वभाविक कथा कहलन्हि आ कहलन्हि जे माए बेटाक अवहेलना नै कऽ सकैए, मुदा श्रीधरम कहलन्हि जे जँ बेटाक चरित्र बदलतै तँ मायोक चरित्र बदलतै। कमल मोहन चुन्नू कहलन्हि जे ई कथा घरबाहर मे प्रकाशित अछि। आयोजक कहलन्हि जे विभा रानीक कथा सपनकेँ नै भरमाउ केँ ऐ गोष्ठीसँ बाहर कएल जा रहल अछि। विनीत उत्पलक कथा निमंत्रण पर मलंगिया जीक विचार छल जे ई उमेरक हिसाबे प्रेमकथा अछि। सारंग कुमार एकरा महानगरीय कथा कहलन्हि मुदा एकर गढ़निकेँ मजगूत करबाक आवश्यकता अछि, कहलन्हि। श्रीधरम ऐ कथामे लेखकीय ईमानदारी देखलन्हि मुदा एकर पुनर्लेखनक आवश्यकतापर जोर देलन्हि। हीरेन्द्रकेँ ई कथा गुलशन नन्दाक कथा मोन पाड़लकन्हि मुदा प्रदीप बिहारी हीरेन्द्रक गपसँ सहमत नै रहथि। ओ एकरा आइ काल्हिक खाढ़ीक कथा कहलन्हि।दुखमोचन झाक छुटैत संस्कारपर मलंगिया जी किछु नै बजला, ओ कहलन्हि जे ओ ई कथा नै सुनलन्हि। सारंग कुमार एकरा रेखाचित्र कहलन्हि। कमलकान्त झाकेँ ई संस्कारी कथा लगलन्हि। श्रीधरमकेँ आरम्भ नीक आ अन्त खराप लगलन्हि। शुभेन्दु शेखरकेँ जेनेरेशन गैप सन लगलन्हि आ कमल मोहन चुन्नूकेँ ई यात्रा वृत्तान्त लगलन्हि। दोसर सत्रमे श्रोताक सहभागिया शून्य जकाँ रहल। ोसर सत्रक बाद भोजन भेल। भोजनमे भात-दालि तरकारी, भुजिया-पापड़, दही आ चिन्नी बेसी बला रसगुल्ला छल। आ भोजनक बाद शून्यकाल। शून्यकाल केर माने जे भोजन करू आ कथा स्थलकेँ शून्य करू। मुदा अधिकाशं छलाहे आ किछु जेनाकी विभूति आनंद शून्यमे विलीन भऽ गेल छला। (शून्यमे विलीन विभूति आनन्द, महेन्द्र मलंगिया आ रमानन्द झा रमण) [प्रभाष कुमार चौधरीक छातीपर औंघाइत आ सूतल मैथिलीक कुम्भकर्ण लोकनि] शून्य कालक दौरान हीरेन्द्र कुमार झा द्वारा मैथिलीमे बाल साहित्यकेर विकासक बात राखल गेल। ओ जोर देलन्हि जे बाल साहित्य मुफ्तमे बाँटल जेबाक चाही। किछु गोटेँ ऐ बातपर जोर देलन्हि जे भविष्यमे जे सगर राति हएत ओइमे सँ कोनो एकटा आयोजन पूरा-पूरी बालकथा पर हेबाक चाही। मुदा आशचर्यक विखय ई रहल जे देवशंकर नवीन" इंटरनेट पर विदेहक माध्यमे आबैत बाल साहित्यकेँ बिसरि गेलह जखन की ओ इंटरनेटक गतिविधिसँ परिचित छथि। ओही क्रममे आशीष अनचिन्हार द्वारा हीरेन्द्र जीकेँ मुफ्त डाउनलोड प्रक्रिया बताएल गेल। मुदा नतीजा वएह- जनैत-बुझैत इंटरनेटपर सुलभ बाल साहित्यकेँ एकटा सुनियोजित तरीकासँ कात कएल गेल। बात जखन हरेक विधामे बाल साहित्य लिखबा पर आएल तखन पहिल बेर आशीष अनचिन्हार द्वारा मैथिलीमे "बाल गजल" केर परिकल्पना देल गेल। मुदा एकटा बात रोचक जे बाल साहित्यकेर चर्चा पुरस्कारक बात पर अटकि गेलै। किनको ई दुख छलन्हि जे आब हमर सबहक उम्र बीति गेल तखन ई शुरू भेल। तँ किनको ई दुख छलन्हि जे अमुक अपन कनियाँ केर नामसँ व्योंतमे लागल छथि। ऐ बहसक दौरान अविनाश जी ऐ बातपर जोर देलन्हि जे "बाल कथा"क तर्ज पर "व्यस्क कथा" सेहो हेबाक चाही। ओना जे पटना सगर रातिमे सहभागी हेताह से अविनाश जीसँ नीक जकाँ परिचित हेताह से उम्मेद अछि। धनाकर जीक रंगीन जलपर रिपोर्ट कएक ठाम आएल अछि(विदेह फेसबुक आ घर बाहरमे सेहो)। शून्यकालक बाद तेसर स्तर शुरू भेल- ई विशुद्भ रूपे विहनि कथापर आधारित छल। ऐमे मुन्ना जी चश्मा, सेवक आ कट्टरपंथी नामक तीन टा विहनि कथा पढलन्हि। अरविन्द ठाकुर दूगोट विहनि कथा-दाम आ अगम-अगोचर पढलन्हि। प्रदीप बिहारी बूड़ि नामक विहनि कथा पढ़लन्हि। ऐ सत्रक मुख्य बात ई रहल जे मुन्ना जी लघुकथा नै बल्कि विहनि कथा कहबा पर जोर देलन्हि मुदा हुनकर उन्टा अशोक मेहता कहलन्हि जे लघुकथा नाम ठीक छै। ऐ सत्रमे मुन्ना जी सगर रातिकेर कोनो एकटा आयोजन विहनि कथापर करबा पर जोर देलन्हि। श्रोतामेसँ आशीष अनचिन्हार मुन्ना जीक विहनिकथा "चश्मा"केँ आधुनिक जीवनमे पनपैत नकली संवेदनाकेँ देखार करैत कथा कहलन्हि। ऐसँ पहिने देवशंकर नवीन जी समाजमे पसरैत असंवेदनाकेँ रेखांकित केने छलाह अपन वक्त्व्यमे। अनचिन्हार संवेदनाक एहू पक्षपर नवीन जीकेँ धेआन देओलखिन्ह। ऐ विहनि कथा सभपर अनेक टिप्पणी सभ आएल। मुदा वएह जे नीक लागल, बड्ड नीक आदि फर्मेटमे। चारिम सत्रमे हीरेन्द्र कुमार झाक दीर्घकथा " एकटा छल गाम" आ पंकज सत्यम केर कथा " एकटा विक्षिप्तक चिट्ठी" आएल। एकटा छल गाम पर चुन्नू जी कहलखिन्ह जे कथा बेसी नमरल अछि मुदा कथ्य नीक अछि। श्री धरम जी चुन्नू जीक आलोचनासँ सहमत छलाह। संगे संग चुन्नू जी कहलखिन्ह जे ऐमे गामक चिंता नीक जकाँ आएल अछि। आ श्रीधरम कहलखिन्ह जे दलित उभार जँ ऐकथामे अबितै तँ आर नीक रहितै। श्रोता वर्गसँ आशीष अनचिन्हार द्वारा कमल मोहन चुन्नू जीकेँ कहल गेलन्हि जे या तँ ओ जगदीश प्रसाद मंडलक कथा नै पढने छथि वा बिसरि गेल छथि। जँ चुन्नू जी जगदीश मंडल जीक कथामे अबैत गामक चिंताक बाटे हीरेन्द्र जीक गामक चिन्ता देखथि तँ ओ आरो नीक जकाँ आलोचना कऽ सकै छलाह। हमर ऐ बात पर आयोजकक एकटा परम ब्राम्हणवादी सदस्य कहलाह जे अहाँ जगदीश मंडल जीक कथाक उदाहरण दिअ हम देबए लेल तैयार छलहुँ मुदा संचालक ओइ ब्राम्हणवादी सदस्यकेँ बतकुट्टौलि करबासँ रोकि देलन्हि। ऐ सत्रक आन आलोचक सभ प्रदीप बिहारी, अविनाश, रमण कुमार सिंह आदि छलाह। पाँचम सत्रमे दीनबंधु जीक कथा "अपराधी", विनयमोहन जगदीश जी "संकल्पक बल" आ आशीष अनचिन्हारक "काटल कथा" पढ़ल गेल।आशीष अनचिन्हारक कथा पर चुन्नू जी कहलाह जे शिल्प क तौर पर ई असफल कथा अछि संगे संग कोन बात कतए छै से स्पष्ट नै छै। पाठक कन्फ्यूज्ड भऽ जाइत छथि। ऐबातकेँ आर बिस्तार दैत कमलेश किशोर झा कहलखिन्ह जे ऐ कथामे सेन्ट्रल प्वांइट केर अभाव छै। मुकेश झा कहलखिन्ह जे अनचिन्हार जीकेँ कोनो डाक्टर नै कहने छथिन्ह जे अहाँ कथा लीखू। तेनाहिते आशीष झा( पति कुमुद सिंह) कहलखिन्ह जे हमरा आधा बुझाएल आधा नै बुझाएल ई कथा छल की रिपोर्ट से नै पता। विनयमोहन जगदीश जी पर चुन्नु जी कहलखिन्ह जे कथामे नमार बेसी छै। ई लोकनि दीनबंधु जीक कथाक सेहो आलोचना केलन्हि मुदा चलंत स्टाइलमे। छठम सत्रमे काश्यप कमल जीक दीर्घकथा- भोट, कमलेश किशोर झाक -गुदरिया पढल गेल। लिस्टमे तँ कौशल झाक न्याय नामक कथा सेहो छल मुदा पढ़बा काल धरि ओ स्थल पर नै छलाह। भोट कथा पर मुन्ना जीक कहब छलन्हि जे हँसीसँ सूतल लोककेँ जगा देलक ई कथा। कमलेश जीक कथा सेहो नीक छल मुदा वएह चलंत आलोचना। सातम सत्रमे अशोक कुमार मेहता-"बाइट", कमलकांत झा -"विद्दति" आ महेन्द्र मलंगिया जीक कथा- लंच (वाचन प्रकाश झा) आएल। हीरेन्द्र झा मेहता जीक कथाकेँ कमजोर गढ़निक मानलन्हि। कमलकांत जीक कथाकेँ सुन्दर वर्णनात्मक खास कऽ बस बला प्रसंग केँ नीक कहलखिन्ह। मलंगिया जीक कथाकेँ नीक तँ कहलखिन्ह मुदा इहो कहलखिन्ह जे अंत एकर कमजोर छै। चुन्नू जी बाइट कथाक गढ़निकेँ कमजोर मानलन्हि आ कमलकांत आ मलंगिया जीक कथाकेँ अपराधिक पृष्ठभूमि बला मानलन्हि। आठम सत्र अध्यक्षीय भाषण आ हुनक शीर्षक हीन मौखिक कथासँ समाप्त भेल। एतेक भेलाकेँ बाद अगिला सगर राति ( के जानए जे फेर कथा गोष्ठी)क संयोजक केर खोज शुरू भेल। पहिल प्रस्ताव अरविन्द ठाकुर सुपौल लेल देलखिन्ह आ दोसर विभारानी चेन्नै लेल। आ तेसर प्रस्ताव दिल्लीसँ भवेश नंदन जीक छलन्हि। सभसँ राय पूछल गलै। बहुत गोटेँ चेन्नैक पक्षमे एलाह। अंततः ७६म "सगर राति दीप जरय"क विभारानीकेँ रूपमे एकटा महिला संयोजक सगर रातिके भेटल| सुमित आनन्द सोसाइटी टुडेक लोकार्पण अर्द्धवार्षिक द्विलिपि संयुक्त ‘सोसाइटी टुडे’क लोकार्पण ल. ना. मिथिला विश्वविद्यालय जुबली हॉलमे यू. सी. प्रायोजित समाज शास्त्रक राष्ट्रीय संगोष्ठीमे दि. 25.03.2012 केँ भेल। लोकार्पणकर्ता छलाह उक्त विश्वविद्यालयक माननीय कुलपति डॉ. समरेन्द्र प्रताप सिंह जखनकि अध्यक्षता कयलनि प्रतिकुलपति डॉ. ध्रुव कुमार। शोध्-पत्रिका हाथमे नेने अन्य विशिष्ट विद्वान जे गदगद मुद्राामे मंच पर उपस्थित छलाह से उक्त विश्वविद्यालयक कुलसचिव डॉ. विजय प्रसाद सिंह, एफ. ए. डॉ. सी. आर. डीगवाल, समाजशास्त्राी डॉ. के. एल. शर्मा, डॉ. हेतुकर झा, सी. एस. एस. ठाकुर, विधान पार्षद डॉ. विनोद कुमार चौधरी, वि.वि. समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. विद्यानन्द झा डॉ. विश्वनाथ झा, सुमित आनन्द आदि। सभाकेँ सम्बोध्ति करैत एहि शोध् पत्रिकाक एडीटर एवं प्रख्यात समाजशास्त्री डॉ. विश्वनाथ झा, प्राचार्य एवं अध्यक्ष, समाजशास्त्र विभाग, सी. एम. कॉलेज, दरभंगा, मंचपर उपस्थित एहि शोध् पत्रिकाक मैनेजिंग एडिटर श्री सुमित आनन्द केँ धन्यवाद दैत बजलाह जे एकर प्रकाशनक पूर्ण श्रेय एही प्रतिभावान कर्मठ युवक केँ छनि जनिक सत्प्रयाससँ ई अंक रजिस्ट्रेशन नम्बरक संग प्रकाशित भए सकल। कार्यक्रमक शुभारम्भ ‘जय-जय भैरवि’ सँ भेल जखनकि, कार्यक्रमक संचालन पुतुल सिंह कयलनि। परमेश्वर कापड़ि संयोजक मिथिला राज्य संघर्ष समिति
नेपाल संघीयताक दिशामे डेग बढारहल समयमे विभिन्न क्षेत्र, वर्ग, धर्म, लिङ, जाति आ भाषाभाषी तथा समूहसब अपन अपन अधिकारक माँग करैत विभिन्न प्रकारसँ आन्दोलन करैत आविरहल अछि । जे सबहक लोकतान्त्रिक अधिकार छैक । लोकतान्त्रिक आचरण अनुरुप भ’ रहल आ होबएबला हरेक अधिकारवादी आन्दोलनक नामपर किछु समूह देशभरि पसरिरहल अराजकताप्रति समितिक गम्भीर ध्यानाकर्षण भेल अछि । मिथिला राज्यक माँगप्रति समर्थन कएने कहैत नेपाली काँग्रेसक नेता विमलेन्द्र निधिक जनकपुरस्थित घरपर तोड़फोर कएल गेल घटनाके मिथिलाराज्य संघर्ष समिति भत्र्सना करैत अछि । तहिना राजधानीमे सञ्चारकर्मी उपर भेल आक्रमणके निन्दा करैत अछि । एहन अराजकतत्वके पहिचान क’ कारवाही करए समिति सरकारसँ माँग करैत पीडितके क्षतिपूर्तिक माँग करैत अछि । डॉ. दमन कुमार झा, अध्यक्ष, मैथिली विभाग, जगदीश नंदन महाविद्यालय, मधुबनी . एकैसम शताब्दीक पहिल दशकमे मैथिली बालसाहित्य बालसाहित्य नेनाक साहित्य थिक, नेनाक हेतु लिखल साहित्य थिक, नेनाक हेतु अर्थात नेनाकें सत्पथपर अनबाक हेतु लिखल साहित्य. ओ सत्पथपर कोना आओत, कोन माध्यमसं आओत,तकर प्रमुख स्रोत अछि बालसाहित्य. बालसाहित्यक प्रति नेनाक आकर्षण ओहि मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाक परिणाम थिक जे ओकरा आकर्षक वस्तुक प्रति जिज्ञासु बनबैत छैक. जिज्ञासा शांत करबाक इच्छा एतेक प्रबल रहैत छैक जे से ओकरा पाठशालामे शांत नहि भ’ पबैत छैक.ओ ओकरा जेना-तेना शान्त कर’ चाहैत अछि. साक्षर भेलापर तें ओकरा पोथी पढबाक रूचि जगैत छैक. तें बालसाहित्यक स्वतंत्र अस्तित्व छैक. अपना सभक समक्ष बालसाहित्यक की स्थिति अछि, से ककरो सं नुकायल नहि अछि. बालसाहित्य समृद्ध नहि अछि, ई तथ्य थिक. किएक नहि अछि – ई चिन्ताक विषय थिक .ताहू सं अधिक चिन्तनक विषय थिक. सभसं प्रधान कारण अछि प्राथमिक विद्यालयमे मैथिलीकें शिक्षाक माध्यम नहि होयब .एखन हमरालोकनि एहि प्रयासमे लागल छी जे कहुना ई सरकारी स्कूलमे शिक्षाक माध्यम रूपमे स्वीकृत भ’ जाओ .सरकार कहैत अछि जे -- से तं अछिए .विद्यार्थी पढिते नहि अछि ,अभिभावक अपन पाल्यकें पढ़वहि नहि चाहैत अछि .ताहिमे सरकार की क’ सकैत अछि ?ई तं एक समस्या भेल. मानि लिय’ ताहिमे हमरालोकनि कने सफलो भ’ गेलहुँ ,प्राइमरी स्कूलमे मैथिलीक माध्यमसं पढ़ौनी शुरूहो भ’ जायत तं ताहि सं की समस्याक समाधान भ’ जायत ? हम बुझैत छी नहि .कारण ,कतेक प्रतिशत नेना सरकारी स्कूल मे पढ़’ जाइत अछि ?असल समस्या तं अछि पब्लिक स्कूलक .जाधरि मिथिलाक सभ पब्लिक स्कूलमे मैथिली नहि लागू होयत ,विषयक रूपमे सेहो आ माध्यम रूपमे सेहो ,तावत धरि नेनाकें अपन मातृभाषाक दिस आकृष्ट करब आकास-कुसुमे रहत . नेनाकें जैह पढाइ होयतैक ,सैह ने ओ पढतैक ?की ओकरा सं ई अपेक्षा करबैक जे ओ कहय जे हम हिन्दीमे नहि पढब ,अंगरेजीमे नहि पढब, हम मैथिलीए मे पढब ? नेना ई नहि कहत. ई कहत नेनाक माता-पिता, अभिभावक .मुदा नेनाक बेसी अभिभावक कें ई बुझले नहि छनि जे मैथिलीओ मे बालसाहित्य छैक . हम कहैत छी छैक, आन भाषाक तुलनामे कम भने रहौक ! एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकपर ध्यान दी तं अनेको बालसाहित्यक पोथी विभिन्न विधामे प्रकाशित अछि . कविता ,कथा ,जीवनी ,निबंध ,विज्ञानविषयक पोथी, चित्रकथा आदि .ई दशक मैथिली बालसाहित्यक लेल एक आओर कारणे महत्वपूर्ण रहल अछि. एही दशकमे साहित्य अकादेमी द्वारा मैथिली बालसाहित्य पुरस्कार सेहो प्रदान कयल जाय लागल . अद्यावधि दू गोट पोथीकेँ पुरस्कृत कयल गेल अछि . ओ थिक तारानंद वियोगीक दीर्घबालकथा – ‘ई भेटल तं की भेटल’ ?आ दोसर थिक ले.कर्नल मायानाथ झाक बालकथासंग्रह – ‘जकर नारि चतुर होइ’ . ‘ई भेटल तँ की भेटल’ तारानंद वियोगीक कथा-पोथी थिक. एहिमे मोद्गल आ ग्लावक खिस्सा अछि. दुनू ऋषि छथि, दुनू शिष्यकें शिक्षा दैत छथिन . मुदा ग्लाव मोद्गल कें कखनो मोजर नहि दैत छथिन . ओ सदिखन अहंकारमे जीबैत छथि. एकदिन मोद्गल ग्लावक शिष्य सुतापी द्वारा समाद पठौलथिन जे अहाँक गुरु ग्लाव चारिम वेदक विषयमे की बुझैत छथि? जखन सुतापी चारिम वेदक विषयमे पुछलथिन तं ग्लाव बजलाह – तीन वेद कोन कम भेलै जे ओ चारिम लेल झखै छथि ? मोद्गल ई सुनि बुझि गेलाह जे ओ असली ऋषि नहि छथि. मोद्गल हुनका सं एक प्रश्न पुछलनि. प्रश्न छल –‘एकटा कियो छथि, हुनका बारह टा मिथुन छनि, चौबिस योनि छनि, एक आँखि भृगु छथिन, दोसर आँखि अंगिरा छथिन. बुझनिहार हुनका शक्ति कहै छनि, हुनके असरापर सभ टिकल अछि. अहाँक गुरूजी कहथु जे वास्तवमे ओ के छथि ? हुनक रहस्य की छनि? हुनका कियो कोना पाबि सकैत अछि?---प्रश्नक उत्तर ओ जहिया चाहथि, तहिया देथि. खोज क’ लेथि, मुदा जं उत्तर नहि द’ सकताह तं हुनक नाश निश्चित अछि . ई सुनि गलावक हाथ–पयर सुन्न हुअ’ लगलनि. राति–राति भरि जगल रहला .अंतमे ओ मोद्गलक शिष्य बनि गेलाह .ज्ञानप्राप्तिक बाद जखन उपदेशक बेर अयलनि तं मोद्गल गायकें देखा हुनक सेवा करवाक हेतु कहलथिन. एक साल बाद मोद्गल गलाव सं पुछलथिन की सिखलहुँ---गाय कें घमण्ड नहि छनि . घमण्ड व्यर्थ चीज थिक. पुनः मोद्गल बेंग सं शिक्षा लेबा लेल कहलथिन .एक साल बाद पुछलथिन ,तं गलाव बजलाह ---ओ जीवनक पारखी होइत छथि भगवन् ! कोनो हालमे जीबी सकै छथि. ओ समय कें चिन्है छथि. दुर्दिनकें बर्दास्त करै छथि . ठीक अछि, एखन उपदेशक समय नहि आयल अछि .अहाँ गाछ–बृक्ष सं शिक्षा लिय’ . गलावकें गाछ –वृक्ष कें सेवा करैत असली ज्ञानक प्राप्ति भेलनि. ओ बजलाह–गाछ अपना लेल किछु नहि करैत अछि. ओ दोसरेक हेतु होइत अछि .जखन एहि बातक भान गलावकें भेलनि तं ओ गाछकें पकड़ि क’ कान’ लगलाह . ई दृश्य देखि मोद्गल गदगद भ’ गेलाह .गलाव मोद्गलकें देखि चिकरि उठलाह ---भेटि गेल गुरुदेव ....हमरा सभ-किछु भेटि गेल .ग्लावक मुखमण्डल पर ज्ञानक अखंड ज्योति जगमगा रहल छल .कथाकार ई कह’ चाहैत छथि जे सभसँ पैघ सेवा परोपकार थिक . दोसर पुरस्कृत पोथी थिक ले.कर्नल मायानाथ झाक – ‘जकर नारि चतुर होइ’ .एहिमे एक्कैस गोट कथा संगृहीत अछि .सभ कथा मनोरंजक आ उपदेशात्मक अछि .जे नेना कें मनोरंजनक संग ज्ञानक ज्योति सेहो देखबैत अछि. सभ कथा बुद्धिक महिमा देखबैत अछि ,ज्ञान दैत अछि जे बिना सोचने किछु नहि करी ,नारीक चतुर्य, निरंतर अध्यवसाय, समयक पाबंद होयब आदि बीजमंत्र सिखबैत अछि. कथाक भाषा सरल , सरस आ बोधगम्य अछि . बालमनक संग–संग किशोर मनकें सेहो ई कथा सभ उद्वेलित करैत अछि . एहि महक अधिकांश दादा-दादी, माय-पितिआइनिसं कथा सुनि क’ लिखल गेल अछि .कथाकार जेना कथा सुनलनि, ठीक तहिना लिखबाक प्रयास कयलनि अछि. मात्र छओ गोट कथा लेखकक अपन छनि, यथा ----ख्याली पुलाव ,लुच्चा गीदर, उपाय आ अपाय, अकठ-विकठ , प्रभुलीला एवं भगवान जे करैत छथिन. सुनल कथामे एक अछि – साहसी फुद्दी. ई कथा नेनामे सभ गोटे सुनने होयब .कथा कहबाक ढंग गद्य–पद्यमय अछि .एहि कथामे ई शिक्षा देल गेल अछि जे हारि नहि मनवाक चाही. लगन रहत तं सफलता भेटबे करत . एहने एकटा कथा अछि – टिकरमबाजी. एहि महक किछु कथा दीर्घ अछि .किछु प्रमुख कथा थिक—प्रारब्ध ,प्रेतवास, भन्नू, आंतरिक प्रेम . हिनके दोसर बालकथा संग्रह थिकनि--- ‘इजोत’. जाहिमे नबासी गोट कथा अछि . एहि कथा सभपर प्रकाश दैत प्रो. भीमनाथ झा कहैत छथि-----‘’सभ कथा प्रेरक अछि ,ज्ञानवर्धक अछि ,मनुष्यक उदात्त भावनाकें जगोनिहर अछि ,कुसंस्कारी अन्हार घरमे संस्कारक इजोत खिरौनिहार अछि .विशेषतः किशोर लोकनिक हेतु तं ई प्रकाशपुन्जे थिक’’.१ से ठीके ले. कर्नल मायानाथ झा धियापुताक हेतु प्रकाश पुन्जे भ’ क’ अवतरित भेलाह अछि. ई एहिना लागल रहताह तं नेना लोकनिक हेतु एक-सं-एक कथा जे विलुप्त भ’ रहल अछि ,से सामने अबैत रहत . एहि महक किछु प्रमुख कथा अछि ---साहस ,विषक बदला , क्षमा ,बलिदानी ,शिक्षा ,मातृभाषाक सेवा . ‘दहीक खोंइचा’---पंडित श्री चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ कें लिखल छनि. एहिमे छबीस गोट कथा संगृहीत अछि. अमरजीक लिखल कथा हो, सेहो नेना लोकनिक हेतु हो, तँ मनोरंजक होयबे करत. ताहिमे संदेह नहि. कहबाक छटा एकदम रम्य अछि. पढैत जाउ, हँसैत जाऊ. पहिले कथा – दहीक खुइंचा मे कोनो कविजी दहीक छाल्हीकें दहीक खुइंचा कहलनि. तकरे रोचक वर्णन भेल अछि .तहिना, एकटा कथा कहबाक लुतुक पर आधारित अछि – ‘अहाँके...’ . जाहिमे सभ बातमे अहाँके लगाक’ कथाके रोचक बना देल गेल अछि .तहिना, बकरीक हसबैंड, तामस , मुट्ठी आ चुटकी ,कचोट ,सोहारीक जरुआ मनलग्गू कथा अछि . एहि महक ‘भूजा’ कथा देखल जाय ---------------‘’जलखैमे भूजा हमरा सभ दिन सं प्रिय रहल अछि .एक दिन भूजा फंकैत काल भूजा शब्दक अर्थ दिस ध्यान चल गेल. एकाएक एक टा अर्थ बिजली जकाँ माथमे चमकि उठल ------‘भू’ मने पृथ्वी ,ताहिमे ‘जा’ अर्थात जन्म लेने छथि जे, से अर्थात सीता .तुरंत दुनू पयर मोड़ि, ठेहुन भरें बैसि, भूमिमे माथ सटा भूजाकें प्रणाम कयल आ गुरूजीकें जा क’ कहि देलियनि ---अपने नहि बुझबै. संस्कृतक बात थिकै .’’२ ‘प्रेत कथा’----एकर लेखक हंसराज थिकाह .एहिमे छओ गोट कथा अछि .’प्रेतविवाहपद्धति’ आ ‘यावत पढबह रूद्र’ बाललोककथा थिक. एहिमे प्रेतयोनिक अद्भुत् कृत्य सभकें रोचक ढंगसं प्रस्तुत कयल गेल अछि . ‘मैथिली लोककथा’----रामलोचन ठाकुरक लिखल छनि. एहिमे छतीस गोट लोककथा संगृहीत अछि. लोककथाक मादे स्वयं लेखकक मंतव्य छनि जे ------‘’लोककथाक सभसँ प्रमुख विशेषता थिक जे ई अलिखित अछि आ आरंभ कालसं आइ धरि एक कंठसं दोसर कंठमे प्रवाहित आबि रहल अछि .एहि कारणे एकर बाहरी रूपमे परिवर्तन अबस्से भेलै-ए, परन्च आंतरिक रूपमे कोनो टा परिवर्तन नहि भेलै-ए. एकर मौलिकता ओहिना छैक.’’३ एहि महक किछु कथा दीर्घ अछि .सभ कथा रोचक आ मनोरंजक अछि .यथा-–गदहा, खेने कोनो ने दोष, काजरि, एकटा गरीब वाभन रहथि, नारद मुनि आ साँप, लालबुझक्कर आदि. ‘पिलपिलहा गाछ’ -----मुरलीधर झाक ई बालकथा संग्रह थिक .एहिमे एक्कैस गोट कथा संगृहीत अछि. कथा सभ सरल आ छोट-छोट वाक्यमे लिखल अछि .एहि पोथीक पाठक बारहसं सत्रह वर्षक नेना भ’ सकैत अछि, जखन ओकर मानसिक स्तर ऊँच भ’ जायत छैक . एहि संग्रहक प्रसंग डॉ. रामदेव झा लिखैत छथि जे -----‘’एहि संग्रहक कथा सभ मे पुरान मानसिकताक अनुरूप बालमानसकें बोझिल बना देनिहार अकर्तव्यताक निषेध ,कर्तव्यताक आदेश अथवा नैतिकताक उपदेश देवाक बलात् चेष्टाक स्थान मे घटित घटना ,पात्रक स्वभाव ओ चरित्र अथवा आचरणक माध्यमे अनायास सहज रीतिसं सद्भावना ओ सत्प्रेरणाक सन्देश सम्पुटित अछि जे बाल वर्गीय पाठकक चरित्र –निर्माणमे परोक्ष भावसं सहायक भ’ सकैछ .’’४ कथामे ठाम –ठाम चित्रक प्रयोग कयल गेल अछि जे कथाकें आकर्षक बना देलक अछि .कथाक नामकरण ‘पिलपिलहा गाछ’ आमक गाछ पर कयल गेल अछि ,जे अत्यन्त दुर्वल ,क्षीणकाय ,मरदुआरी अछि .अन्य कथा सभमे भैयारी , धैर्य , हर्षक नोर , कृतज्ञ , मर्यादा ,तृप्त ,जुग-जुग जीबू आदि प्रमुख अछि .संग्रहक कलेवर आकर्षक अछि . वर्तमान कालमे बाल साहित्यक क्षेत्र मे ऋषि वशिष्ट बढियाँ काज क’ रहल छथि. हिनक किछु बालपोथी आयल अछि .यथा --- ‘कोढ़िया घर स्वाहा’ ,’झुठपकरा मशीन’ आ ‘जे हारय से नाक कटाबय’ . ‘कोढ़िया घर स्वाहा’ मे आलसी मनुष्यक चित्रण कयल गेल अछि .आलस कें अपना भीतर पैसय नहि दी जाहि सं कोनो भारी नोकसान भ’ जाय . ‘झूठपकरा मशीन’ नैतिक शिक्षा पर आधारित अछि. एहिमे छात्रसं तंग आबि क’ गार्जियन झूठ पकर’ वाला मशीन होयबाक बात सोचैत छथि, जाहिसँ ओ झूठ नहि बाजय तकर प्रयास करइ छथि. ‘जे हारय से नाक कटाबय’ लोक कथा पर आधारित अछि. ई तीनू पोथी मैथिली बालसाहित्यक विकासमे सहायक सिद्ध भेल अछि. श्री जगदीश प्रसाद मंडलक – ‘तरेगन’ प्रेरककथाक एक महत्वपूर्ण संग्रह थिक . मैथिली बालसाहित्यक क्षेत्रमे बाल-चित्रकथा एकटा अपूर्व आनंदक सृष्टि कयलक अछि. ई एकटा आंदोलन थिक . एहि क्षेत्रमे देवांशु वत्स आ प्रीति ठाकुर नीक काज क’ रहल छथि .हिनका लोकनि सं आगुओ आशा कयल जाइत अछि .देवांशु वत्स ‘नताशा’ नामक पहिल मैथिली चित्रश्रृंखला प्रकाशित क’ नेनाक हाथमे पोथी पहुंचा देलनि .ओकरा सुन्दर-सुन्दर चित्र आ सटीक आ छोट-छोट वाक्यक माध्यमसं मनोरंजनक वस्तु प्रदान क’ देलनि. एहि पोथीमे अठतालीस गोट रोचक घटना अछि .एही क्रम कें आगू बढबैत प्रीति ठाकुर सेहो नीक काज क’ रहलीह अछि .हुनक ‘गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा’ एवं ‘मैथिली चित्रकथा’ ई दू टा पोथी प्रकशित भेलनि अछि .एहिमे गोनू झाक छोट-छोट खिस्साकें चित्रक माध्यम सं प्रस्तुत कयल गेल अछि. जे नेना लोकनिकें मनोरंजन प्रदान करैत अछि . बालकविता ==== मैथिली बालकविताक क्षेत्रमे नव-पुरान दुनू कोटिक कवि विशेष रूपसं आकृष्ट भेलाह अछि. ताहिमे प्रमुख छथि--- गोविन्द झा ,चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’, जीवकांत , सरसजी ,भोला झा विमल ,कालीकांत झा ‘बूच’, सत्यनारायण झा, डॉ.आर.के.रमण, गजेन्द्र ठाकुर आदि . सभसं पहिने मैथिलीक सुप्रतिष्ठित साहित्यकार जीवकांतक चर्चा करब .हिनक लगातार चारि गोटे बालकविता संग्रह एहि अवधिमे प्रकाशित भेलनि अछि. गाछ झूल-झूल में 63 गोट कविता छनि, छाह सोहाओनमे 57 गोट, खिखिरक बिअरिमे 12 गोट आ ‘हमर अठन्नी खसलइ वनमे’ मे 20 गोट बालकविता संगृहीत अछि . जीवकान्तक बालसाहित्यकें डॉ.प्रेमशंकर सिंह चरि भागमे विभाजित कयलनि अछि—‘’वात्सल्य भावमया, वात्सल्य समय, शिशु बोध आ शिशु कल्पना’’.५ जीवकान्तक बालकवितामे खेलकूद, पढाइ-लिखाइ, प्राकृतिक सुषमाक विविध स्वरूपक चित्रण भेटैत अछि, ताहिमे जीवनक विभिन्न पक्ष, बाध-बोन, महापुरुषक जीवनी आदि सहजतासं ताकल जा सकैत अछि .यैह कारण थिक जे जीवकांत नव क्षितिजक अन्वेषण करैत सार्थक जीवनमूल्यकें स्थापित करबाक प्रयासमे लागल छथि. नेनाक जिद्दकें जीवकांत कोन तरहें चित्रित कयलनि अछि से देखल जाय ‘’बाबक पेन’मे --- ‘’ लेब अहाँकें पेन बाबा / ए बी सी डी हमहूँ करबै / लेब अहाँ कें पेन ...... गंदा पेन अहाँ हमरा दय / किए ठकै छी / अपने निकहा पेन नुकाकए / खूब लिखइ छी .... देशप्रेमक-सन्देश सूचक हिनक ‘देश’ कविता देखल जाय’’ ....६ ‘’धोन्हि फाड़ि कए उगय गोसैयाँ हमर देशमे / चारि रंग केर छइ सतभैया हमर देशमे. पर्वत टपि कए पक्षी आबइ हमर देशमे / लोल भिजाओलक बहुते जलमे हमर देशमे’’ ...७ ‘छाह सोहाओन’क भूमिकामे पंडित गोविन्द झा हिनक बालकविताक प्रसंग लिखैत छथि जे -----‘’हमरा जनैत प्रस्तुत पुस्तकमे कमसं कम दू गोट कविता एहन अछि जे ‘बाबा ब्लैकशिप’ आ ‘ट्विंकल –ट्विंकल’ सं टक्कर ल’ सकैत अछि .पहिल थिक---एक एक दिन ताक धिनाधिन .......आ दोसर थिक ---पिपरक पात हवा मे डोल......’’ ८ हमरा विश्वास अछि जे एहन गीत सभकें जं एक बेर मैथिल नेनाक ठोर पर चढाय देल जाय ,तं इहो बाबा ब्लैकशिप जकां मिथिलाक घर-घर मे पसरि जायत .हिनक पद्यकथा पर आधरित दू गोट पोथी अछि. ‘खिखिरक बीयरि’ एवं ‘हमर अठन्नी खसलइ वनमे’ . खिखिरक बीयरिक सरल शब्दावली आ तुक–छंद, नेनाकें सहजें अपना दिस आकर्षित करैत अछि. ’नवान’ मे मिथिलाक चित्र देखल जाय .....’’..सुगा खोलल ललका लोल / बाजल ओ बोली अनमोल / धानक खेत झुकइए शीश / हम लाएब दाना दस-बीस . आएल सुन्दर अगहन मास / धान भरल अछि पूरा चास / करब नबान देखायब मेल /सभ मिलि करबै उत्सव खेल’’९ . तहिना ‘हमर अठन्नी खसलइ वनमे ‘क सभ कविता मिथिलाक संग-संग पोराणिक –ऐतिहासिक चरित पर आधारित अछि .हिनक बाल कविताक प्रसंग डॉ. भीमनाथ झा लिखैत छथि ----‘’जहिना कथानकक भिन्नता तहिना छंदक विविधता आकृष्ट करैछ ,चमत्कृत सेहो .कोनो छंद प्राय: दोहराओल नहि गेल अछि .प्रत्येक छंद कसल-सधल अछि. काव्यप्रवाह कलकल करैत अछि .कथा सभक मूलमे अछि पाठककें शिक्षित करब, देशप्रेमक भावना भरब, आलस्य कें हरब तथा मानवताक सेवा लेल प्रेरित करब.’’१० एहि तरहें जीवकान्तक कवितामे ठेठ मैथिली शब्दक प्राचुर्य अछि ,लोकोक्तिक सुन्दर प्रयोग भेल अछि. हिनक बालकविता संग्रह मैथिलीक बालकाव्य साहित्यक अनुपम धरोहर थिक . पं. श्री गोविन्द झाक बालसाहित्यक क्षेत्र मे महत्वपूर्ण योगदान छनि. हिनक ‘पाकल आम’ कविता ककर ठोरपर नहि आयल छैक? एम्हर हिनक ‘प्रलाप’ नामक कविता संग्रह आयलनि अछि, ताहि मे किछु बाल कविता सेहो छनि. ओही महक ‘हेंको-हेंको’ कविताक निम्नलिखित पंक्ति देखल जाय ,जे नेना कें उपदेशपरक छैक ------- ‘’सभसं पैघ बुद्धिकें मानह बुद्धिक बिनु सब गुन हो गोबर खूब पढ़ह ओ बुद्धि बढाबह मन लगाय पहिनहुं सं दोबर नहि तं तोहूँ कहयबह गदहा उघबह मोटा हेंको –हेंको पएबह नित सब ठाम अनादर खएबह सोंटा हेंको-हेंको’’११ पं.श्री चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’क कवितासंग्रह ‘’ठाहि-पठाहि’’ मे किछु बालकवित संगृहीत अछि . ‘दिगदिग थैया लड़ेलड़े’ क किछु अंश देखल जाय, जे अबोध नेना पर आधारित अछि -------‘’दिग दिग थैया लड़ेलड़े / काज करक अछि बड़ेबड़े / लड़िते चललहुँ जें सय डेग / बढ़िते चल जायत ई वेग /मा , मामा ,बाबा,सब बोल / सिखलाहु ,करइत छी अनघोल’’ ...१२ गजेन्द्र ठाकुर अपन पोथी –‘कुरुक्षेत्रम अन्तर्मनक’ ल’क’ बालसाहित्यक क्षेत्रमे प्रमुखताक संग उपस्थित भेलाह अछि. वर्तमान जीवनशैलीक सभपक्षकें हिनक बालकविता समाहित कयने अछि. हिनक बाल कवितामे शहरी आ ग्रामीण परिवेशकें सहजे देखल जा सकैत अछि .यथा क्रिकेट खेल पर हिनक कविता देखू ----------हम बाबा करू की पहिने/ बालिंग आ की बैटिंग /बालिंग कय हम जायब थाकि / बैटिंग करि हम खायब मारि ?/ पहिले दिन तू भासि गेलह / से सुनह ई बात बौ़आ / बैटिंग –बालिंग छोड़ि छाड़ि / पहिने करह ग’ फिल्डिंग हथौआ .. १३ (पृष्ठ -७.१२१ ) एकर अतिरिक्त भोला झा विमलक-- ‘सुप्रभात’ ,कालीकांत झा ‘बूचक’—‘कलानिधि’ ,आ ललित कुमार झाक—‘सोन्हगर –सोन्हगर गीत’ संग्रहमे सेहो बालकविता आंशिक रूप मे छपल अछि . विज्ञान ==== ‘हमर बीच विज्ञान’ ई पोथी विज्ञानविषयक थिक. दैनिक जीवन मे उपयोग होएवला वैज्ञानिक उपकरणक प्रति जिज्ञाशाकें ई शांत कर’वला अछि .एहिमे विशिष्ट वैज्ञानिकक व्यक्तित्व आ सौरमण्डलक गतिविधिक विशद चर्चा भेल अछि. एहि पोथीक लेखक छथि प्रो.धीरेन्द्र कुमार झा, जे स्वयं भौतिकीक विद्वान ओ प्रोफेसर छथि. एहि पोथीमे लेखक नेनाक उत्सुकताकें तार्किक रूप सं ,सहज ,सरल शब्दमे शांत करवाक प्रयास कयलनि अछि .ई पोथी ने केवल नेनाक अपितु वयस्कोक हेतु ओतबे लाभकारी अछि .कतहु-कतहु अर्थ व्यापकताक हेतु अंगरेजी शब्दक उपयोग भेल अछि .एहिमे 43 गोट निबंध अछि ,जे विभिन्न विषयक अछि ,यथा ----ग्रह-उपग्रह की थिक, विज्ञान विभूति नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. सुब्रमण्यम चंद्रशेखर, एटम बम : उद्भव ओ विकास , यन्त्र मानव रोबोटकें बुझू ,विज्ञानक चमत्कार ‘कम्प्यूटर’ , मंगलग्रहक अनुसन्धान आदि. किछु लेख प्रदूषणपर आधारित सेहो अछि. जीवनी ==== ‘कालजयी’ नामक पोथी डॉ. हरिप्रसाद वर्माक लिखल छनि ,जाहिमे 20 गोट जीवनी अछि. भाषा सहज एवं बोधगम्य अछि .कम शब्दमे बहुत बात समेटल गेल अछि .एहिमे जाहि महापुरुषक व्यक्तित्वकें चित्रित कयल गेल अछि ,ताहिमे प्रमुख छथि ---झाँसीक रानी लक्ष्मीबाइ ,राम प्रसाद विस्मिल, विरसा मुंडा ,भगत सिंह ,चंद्रशेखर आजाद, खुदीराम बोस आदि .झाँसीक रानी लक्ष्मीबाइक एक अंश देखल जाय -------‘’मणिकणी उर्फ मनुक जन्म 16 नवंबर 1834 ई. मे भेल छल .मात्र चारि वर्षक अवस्था मे मायक छत्रच्छाया सं वंचित भ’ गेली .पिता श्री मोरोपंत हिनक शिक्षा–दीक्षा क व्यवस्था घरे पर कयल. मात्र 13 वर्षक अवस्था मे झाँसीक महराज गंगाधर राव संग हिनक विवाह भेलनि .विवाहोपरांत हिनक नाम रानी लक्ष्मीबाइ राखल गेल .’’१४ सभ जीवनी आदर्श एवं उत्प्रेरक अछि . उपन्यास ==== उपन्यासक रूपमे ‘चन्द्रहास’ नामक अनूदित बालउपन्यास आयल अछि ,जकर अनुवादक प्रो. अमरनाथ झा छथि .ई रायबहादुर ए.सी. मुखर्जीक मूल अंगरेजी उपन्यास –The story of Chandrahas’क मैथिली अनुवाद थिक .एहिमे एकटा नेनाक खिस्सा अछि जे बाद मे चन्द्रहास भ’ राजा बनाओल जायत अछि. चन्द्रहास जखन नेने रहैत अछि तं एकरा भगवतभजन नीक लगैत छैक. इएह गबैत-गबैत एकदिन कन्तलक राजभवन धरि पहुँचि गेल. ओत’ राजा पंडित लोकनि कें उपहार बांटि रहल छलाह,एकर भजन सुनि ठमकि गेलाह .ओकरा भीतर बजाओल गेल .पांच वर्षक नेनाक आकर्षक दीप्त आँखि ओ सुन्दर मुँह देखि सभ मुग्ध छल.ओ भजन गयबाक उद्देश्यकें स्पष्ट करैत कहलक – ‘’एकमात्र अभिलाषा ईश्वरमे विश्वास रखवाक अछि आ ओहि विश्वासकें जन-जनमे प्रचार करब कर्तव्य बुझैत छी.’’ राजाक मुख्य पुरोहित बालकक पूरा शरीर देखि राजासँ कहलनि जे ई बालक राजकुमार प्रतीत होइत अछि .ओकर ललाट पर राज चिह्नों देखलनि. ओ एकरा अपने राजदरबारमे राखि उचित शिक्षा-दीक्षाक संग अपन कन्यासं विवाह कराय राजसिंहासनक भावी उत्तराधिकारी धरि बनयबाक बात कहलनि. एम्हर राजाकमंत्री घृत दुष्ट छल. ओकरा ई नहि सोहयलैक. ओ राजाक बेटीसं अपन बालक मदनक विवाह करबय चाहैत छल.ओ एकरा अपहरण क’ मरबा देबाक योजना बनओलक. ताहिमे ओ सफल नहि भ’ सकल .चांडाल सभ भगवानक प्रति एकर असीम भक्ति देखि छोडि देलकैक आ ओहो सभ भगवत भजनमे लागि गेल . ओ बालक कोना –कोना संकटसं उबरैत अछि आ अन्ततः गद्दीनसीन होइत अछि ,तकर रोचक – रोमांचक वर्णन अछि. नेनाक उत्सुकताकें बढबैत कथा चरमधरि जायत अछि.अनुवाद सुन्दर अछि. एहिमे बच्चेसं भगवानक प्रति आस्था देखाओल गेल अछि. पत्रिका ====एम्हर नव कलेवरमे आकर्षक रूप-सज्जाक संग नचिकेताक संपादनमे कोलकातासं ‘’मिथिला दर्शन’’ नामक द्वैमासिक पत्रिका प्रकाशित भ’ रहल अछि .ताहू मे ‘नेना-भुटका’ नामसं बाल स्तम्भ अछि . नचिकेताक कथा -‘उकरू काकाक उनटा पुरान, डॉ.अणिमा सिंहक –शिशु गीत,जीवकान्तक –लिख रे सोनू ,रामलोचन ठाकुरक –अटकन मटकन ,करिया झुम्मरी ,चेत कबड्डी ,हुक्कालोली ,अप्पन गाम, ऋषि वशिष्टक कथा – ने घरक ने घाटक, आदि प्रमुख रचना थिक.एकर मुख्य आकर्षण वर्ग–पहेली थिक, जे नेना लोकनिकें मनोरंजनक संग ज्ञानवर्धन सेहो करैत अछि. कुमार राधारमण धन्यवादक पात्र छथि, जे ओ नेनालोकनिक जिज्ञासा कें बुझलनि आ ओहि अनुरूप वर्ग –पहेली कें रखलनि. पत्रिकाक छपाई –सफाई अत्यंत उच्चकोटिक अछि ,जे नेनाकें आकर्षित करैत अछि. नेपालक श्री रामानन्द युवा क्लव ,जनकपुरधामसं सेहो एक गोट पत्रिका प्रकाशित भेल अछि ,जकर नाम –‘मैथिली चौपाड़ि’ अछि. एहू मे उच्चस्तरीय बाल रचना प्रकाशित होइ़त रहैत अछि. बाल साहित्य एतबे किन्नहुं नहि अछि. एहिसं कतोक बेसी अछि .हमरा जे तत्काल उपलब्ध भ’ सकल तकर मात्र सूचना टा देल अछि .नेनालोकनिकें पोथीओ किनबाक अभ्यास लगयबाक चाही . ई काज नीक जकाँ अभिभावके क’ सकैत छथि. ई संतोषक बात थिक जे मैथिलीमे किछु नवागन्तुक कवि –साहित्यकार शिशु साहित्यक निर्माणमे सफल भेलाह अछि .परन्तु हुनक संख्या कम अछि .एहिमे आओर विकासक आवश्यकता अछि .अंत में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोरक एहि कथन सं अपन बात समाप्त कर’ चाहैत छी .ओ कहैत छथि -----‘’बालसाहित्यक सृजन सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक कर्म थिक .यदि पैघ लेल लिख’वला साहित्यकार नेनाक लेल नहि लिखलनि ,ओहिसँ पैघ अभागल आर के होयत जे ओ अपन नेनपन कें फेर सं जीवि सकबाक सुअवसर गमा देलनि ?’’ सन्दर्भ –संकेत १. इजोत-ले.कर्नल मायानाथ झा ,प्र.-अंतिका प्रकाशन ,दरभंगा ,प्र.सं.-२०११. भूमिका –भीमनाथ झा पृ-७ २. दहीक खुइंचा –श्री चंद्रनाथ मिश्र ‘अमर’, प्र.-नवरत्न गोष्ठी ,प्र.सं.-२००७, दरभंगा, पृ.६९ . ३. मैथिली लोककथा –रामलोचन ठाकुर ,प्र.-अरुणोदय प्रकाशन ,कोलकाता, दो.सं.-२००६. सन्दर्भ –कथा . ४. पिलपिलहा गाछ –श्री मुरलीधर झा ,प्र.-मिथिला रिसर्च सोसाइटी,लहेरियासराय, प्र.सं.-२०१०,भूमिका- डॉ.रामदेव झा पृ -८ . ५ मैथिली बाल-साहित्यक स्थिति ओ अपेक्षा –सम्पादक.डॉ.सत्य नारायण मेहता .प्र.-चेतना समिति ,पटना ,प्र.सं-२०११, लेख-मैथिली-बाल-काव्यधारा –प्रो. प्रेमशंकर सिंह पृ.-१२. ६. गाछ झूल-झूल-जीवकांत, प्र.-चतुरंग प्रकशन ,बेगुसराय ,प्र.सं.-२००४.पृ.-३५. ७. छाह सोहओन –जीवकांत, प्र.-शेखर प्रकशन,पटना,प्र.सं.-२००६, पृ.-१८. ८. तत्रैव-भूमिका-पंडित गोविन्द झा ९. खिखिरक बीअरि- जीवकांत, प्र.-किसुन संकल्प लोक ,सुपौल प्र.सं.-२००७, पृ.-३७. १०. हमर अठन्नी खसलइ वनमे –जीवकांत,प्र,-जखन तखन,दरभंगा, प्र.सं.-२००९, भूमिका-भीमनाथ झा ११. प्रलाप-गोविन्द झा ,प्र.-नंदन प्रकाशन ,पटना,प्र.सं.-२००१,पृ.-६३. १२. ठाँहि-पठाँहि –श्री चंद्र नाथ मिश्र ‘अमर’,प्र.-नवरत्न गोष्ठी ,दरभंगा,प्र.सं.-२००१. १०९. १३. कुरुक्षेत्रम अन्तर्मनक –सं.-गजेन्द्र ठाकुर पृ.-७.१२१. १४. कालजयी –डॉ.हरिप्रसाद वर्मा ,प्र.-हरिप्रभा ,दरभंगा. पृ.-१८. दुर्गानन्द मण्डल टैगोर साहित्य पुरस्कारक बहन्ने तारीख 10/6/2012 दिन रवि, िनरमलीसँ पटना जेबाक हेतु, स्थानिय मिलानपथसँ संध्या 8 बजे सरकारी बस द्वारा गोसाइ-पीतरकेँ सुमरि, आरक्षित जगहपर बैसल। मनमे सदिखन देव-पीतरक यादि, ताकि यात्रा शुभ हुअए। िनर्धारित समैसँ बस खुजल। भुतहा, नरहिया, फुलपरास होइत चनौरागंजमे काका (श्री जगदीश प्रसाद मण्डल) केँ गोर लागि आदरक संग बैसाओल। हुनका छोड़क हेतु बेरमा गामक कतौक लोक जेना कपिलेश्वर राउत, लक्ष्मी दास, शिवकुमार मिश्रा, अखिलेश, सुरेश, मिथिलेश आदि आएल छलन्हि। राति भरि देव-पीतरकेँ सुमरैत तीन बजे भोरमे दुनू बापुत पटना पहुँचलौं। बससँ उतरि पलेटफार्मकेँ गमछासँ झारि बैसलौं। ओंघीसँ आँखि डोका सन-सन आ रंग अरहुल सन। जाकि आँखि मुनलौं आकि काका उठौलन्हि जे उठु-उठु प्रात भऽ गेल। से ने तँ नदी-तदी तरगरे फीर लिअ। फरीच्छ भेलासँ सुलभ शौचालाइयोमे नम्मर लगाबए पड़त। सएह कएल। आँखि मिड़ैत डेग शौचालय दिसि बढ़ौल। बेरी-बेरी दुनू बापुत नदी फिरलौं। गामक बनाओल दतमनि, जेकर अगिला मुँह थकुचल आ पछिला भाग चीरल। मुँहमे दऽ चारिये घुस्सा ऐ कातसँ आेइ कात धरि दऽ कुरूर-आचमनि कऽ आगू बढ़लौं। एम्हर काका अखियासै छलाह जे चाहक दोकान केम्हर छैक। जे पहिने एक-हक गिलास चाह पीब लैतौं तखन जे होइतै से होइतै। गाँधीमैदानक उत्तरवारि कातमे धुआँ होइत देखलिऐ। तखन भरोस भेल। सहटि कऽ लग गेलौं। चुल्हि पजारनहि छल। ब्रेंचपर बैसेत दू गिलास चाहक आग्रह केलौं। समए साफ भऽ गेल रहैक। काका कहलनि जे से नै तँ कोनो टेक्सीबलाकेँ ताबत भाँजि ने लिअ, जे ओ हवाइ अड्डा जाएत जौं जाएत तँ पाइ कत्ते लेत? एकटा मुँहसच्च आदमीकेँ देखि हाक देलिऐ। आबि गछलक। भाड़ा एक साए लेत सेहो कहलक। चाह पीब दुनू बापूत टेक्सीमे बैसलौं, बैसिते विदा भेल। दुनू बापूत अनभ्ाुआरे रही। नै जानि हमरा कहैमे गलती भेल आकि ओकरा सुनैमे। ओ तँ हवाइ अड्डाक बदला मिठापुर बस अड्डा लऽ अनलक। आब तँ भेल तीतम्हा, ओ कहए जे नै सर हमरा तँ अहाँ बस अड्डा कहलौं, हवाइ अड्डा नै। से ने तँ हमरा भाड़ा दिअ आ हम जाएब। कनी काल तँ केनादन लागल, मुदा फेर ओकरे कहलिऐ बरनी जे लेबह से लिहह मुदा हमरा सभकेँ हवाइ अड्डा उतारह। ओ कहलक ओतए जेबइ तँ और एक साए टाका लेब। ऐ तरहेँ दू साए रूपैआमे हवाइ अड्डा पहुँचलौं। हवाइ अड्डामे जइठाम परम सिनेही श्रीमान् गजेन्द्र बाबूसँ साक्षात् दर्शन भेल। नमस्कार पाती भेलाक बाद बहुत बेसी उत्साहक संग हमरा लोकनिकेँ अपना गाड़ीसँ हवाइ अड्डाक भीतर लऽ गेलाह। लऽ जाइत जनौलन्हि जे हवाइ जहाजक यात्राक की केना निअम होइत छैक। गाड़ीसँ उतरलाक बाद गजेन्द्र बाबू हमरा दुनू बापुतक पाँच-सात गोट फोटो खिचलन्हि। हमहूँ हुनक फोटो अपना कैमरामे लेलौं। मोबाइलक घड़ीमे सात बाजि गेल छल। हमरा लोकनि एक-दोसरासँ फराक होबक स्थितिमे आबि.....। गजेन्द्र बाबू अपना बासापर गेलाह आ हम दुनू बापूत अपन-अपन पहिचान पत्र लऽ नीक लोक जकाँ लाइनमे ठाढ़ भऽ गेलौं। जनीजाति जकाँ मोटरी-चोंटरी तँ बेसी छल नै आ ने पंजबिया (पंजाब कमाइबला) जकाँ गरमियो मासमे कम्मलक मोटा। तँए कोनो दिक्कतो नहिये भेल। जाँच-परताल करा लेलाक बाद प्रतीक्षालय जा आरामसँ बैसिलौं। काकाकेँ कने चाहक खगता बूझि आग्रह करैत अपनो सुतारलौं। ओना आदति भलहिं काकाकेँ छन्हि आ से नित्य दू बजे स्वयं बना कऽ पीबक, मुदा हमरा से नै, पहिनहि कहि आएल छी जे भरि रातुक जगरना छल। तँए प्रति कप चालिस टाका देबामे अखरल नै। ऐ तरहेँ किछु कालक पछाति पुन: घोषणा भेल आ फेर दुनू बापूत लाइनमे लागि हवाइ अड्डाक भीतर मैदानमे गेलौं। दुइयो डेग तँ ने होइतै तइले अनेरे एकटा बड़का बस छल। जइपर चढ़ि हवाइ-जहाज लग गेलौं। पहिले भरि मन निगहारि-निगहारि कऽ देखलौं। पुन: अपना देवता-पीतरकेँ सुमरि हवा-जहाजक सीढ़ीपर चढ़ि भीतर गेलौं। मुँहेपर सिलेब रंगक चारिटा बच्चिया नाक-भौह चमका-चमका स्वागतमे हाथ जोड़ि अंग्रेजीमे कहलक- वेल्कम सर। आ भभा कऽ हँसि देलक जेना पढ़ौल सुगा हुअए। हवाइ जहाजमे सीट दुनू बापूतक एक्केठाम छल। सीट हेरि दुनू बापूत पहिने हबा-जहाजक भीतरक वातावरणक अवलोकन कएल। एना लगए जेना भरि जहाजमे बरफ खसि रहल होइ आ तइपरसँ गम-गम से करैत। बाहरमे जत्ते गर्मी भीतर ओतबए ठंढा कनिये कालक बाद मन एकदम्म शान्त भऽ गेल। तेकर बाद दूटा वयस्क बालक आबि अंग्रेजीमे किदैन-कहाँदन कहि हिन्दीमे दोहरौलक। जेकर भाव छल जे हमरा लोकनिसँ आग्रह करैत कहल गेल जे आब ई हाबा-जहाज अपना स्थानसँ ससमए मुम्बइ लेल उड़ान भरत। कुल तीन घंटा तीस मिनटक भीतर अपना स्थानपर पहुँचत। तँए अपने अपने लोकनि अपना-अपना सीटपर राखल बेल्टसँ डाँढ़ बान्हि ली। सएह करइ गेलौं। हवाइ-जहाज गुड़कए लगल। करीब बीघा दसे गुड़कलाक बाद वाया मुँहे घूमि अपन दिशा आ दशा बना बड़ी जोरसँ गुड़कए लगल। गुड़कैत-गुड़कैत एक्केबर हबा-जहाज साफे कऽ धरतीकेँ छोड़ि अकासमे उड़ए लगल। जी तँ सन् रहि गेल। मुदा किछु कालक बाद स्थिर भेल। खिड़कीसँ निच्चाँ तकलौं। आहिरे बल्लैया ई तँ किछु कतौ ने देखिऐ। सौंसे उज्जर-उज्जर बादलेटा। बादलक संग हबा-जहाज उड़ल जा रहल छल। हबा-जहाजक भीतर टेम-टेमपर चाह-जलखै भेटैत रहल मुदा बड़ मगह..। खएर छोड़ू। नअ पाँचमे जे हबा-जहाज खुलल ओ एक-पैंतिसमे मुम्बइ हवाइ-अड्डापर पहुँचलौं। करीब पनरह मिनटक बाद लोक सभ उतरए लगलाह। पाछू-पाछू हमहूँ दुनू बापूत उतरलौं। उतरिते मुम्बइ हवाइ-अड्डा देखि चकबिदोर लगि गेल। सभटा तँ देखलो सुनलो नहिये। काकाक सह पाबि कल्लौ करबाक लेल एकटा होटल पहुँचलौं। भोजन-साजन कऽ पुन: घूमि हवाइ-अड्डापर आबि लाइनमे लागि सामान चेक-चाक करा टीकट लऽ भीतर प्रवेश कएलौं। काकाक चाह पीबाक समए सेहो भऽ गेल रहनि। ई हमरा बूझल छल जे गाममे अपनेसँ बना साढ़े तीन बजेक लबधब पीबै छथिन। जहाज तँ चारि चालिसमे छल। हाथमे एक घंटा समए देखि एक-कप काैफी चारि बीस दस टाकामे किन दुनू बापूत पीबलौं। कनिये कालक पछाति घोषणा भेल पटने जकाँ लाइनमे लागि मुम्बइसँ कोच्चि लेल भीतर जा बैसलौं। बैसिते अपन घरक गोसाइ आ देव-पीतरकेँ सुमरब सहजहि मनमे आबए लगल। पहुलके जकाँ सभ अनुभव करैत कोच्चि पहुँचलौं समए होइत रहै छह चालिस। मोबाइलक सुइच ऑन केलौं होइते एकटा संदेश अाएल जे अंग्रेजीमे छल जेकर मैथिली रहए- हम प्रवीन कुमार सहयोगी मोहित रावत दिल्ली, उज्जर आ नील रंगक कमीज पहिर निकास द्वार लग ठाढ़ छी। हमरा दुनू बापूतकेँ धोती-कुर्ता देखि ओ पुछलनि- “अपने जगदीश प्रसाद मण्डल? हम प्रवीण कुमार। आउ अपनेक लोकनिक गाड़ी ठाढ़ अछि जे होटल छोड़ि देत।” गाड़ीक चालक आगू बढ़ि दुनू बैंग लऽ सम्हारि कऽ रखलनि। दुनू बापूत गाड़ीमे बैसलौं आ गाड़ी आगाँ ससरल। करीब चालिस मिनटक उपरान्त एकटा दस मंजिला मकान पूर्णत: वातानुकुलित, गोकुलम पार्क होटल कोच्चि, लग रूकल। यूनीफार्ममे सजल दरमान होटलक दरबज्जा खोलि ठाढ़ छल। गाड़ीक ड्राइवर बाहरक दरबज्जा खोललक। दुनू बापूत बहर भेलौं। दरमान झुकि कऽ स्वागत केलनि। भीतर गेलौं आकि नजरि एकटा अठारह बर्खक नवयौवना अति विलक्षण स्वभाववाली हिन्दी आ अंग्रेजीमे नीपुण अपन परिचए अंग्रेजीमे देलक। जेकर भाव छल, हम पूर्णिमा सैमसंग कम्पनीक तरफसँ सेवामे ठाढ़ छी। कहू हम अपनेक की मदति कऽ सकैत छी? पूर्णिमाक दुनू हाथ जोड़ब, निच्चा उज्जर तंग जीन्स आ ऊपर सुगापाखि रंगक टीसर्ट, नम्हर-नम्हर कारी भौर केशक किछु लट दहिना कातक छातीपर खसल। तिलकोरक फड़ सनक दुनू ठोर लाल टुहटुह। भरि आँखि काजर। खूब नम्हर-नम्हर हाथ आ पोरगर-पोरगर ओगरी सभ जे कोनो नीक कम्पनीक चमकीबला नहरंगासँ रँगल। दुनू हाथ जोड़ि मूर्ति जकाँ ठाढ़ छल। देखिते मन गद्गद् भऽ गेल। जे एहि वयस्क वालिका एतेक शालीन! हमरा अपनो भाग्यपर गौरव भेल जे धनि हमर मिथिला, धनि हम मैथिल आ धन्य हमर मैथिली। जइ प्रतापे हम दुनू बापूत टैगोर साहित्य पुरस्कार प्राप्त करबाक हेतु मिथिलाक गाम बेरमा, भाया तमुरिया, जिला मधुबनीसँ चलि कोच्चि पहुँचलौं। रिसेप्सनपर उचित आदर-भावोपरान्त रूममे नम्बर चारि साए छह केर कुंजी जे ए.टी.एम कार्ड जकाँ छल। पूर्णिमा हमरा सबहक संग आइ ओइ कुंजीसँ रूम खोलल। संगे ओही कार्ड रूपी कुंजीकेँ एकटा दोसर खोल्हियामे पैसौलक तँ भरि घर इजोत पसरि गेल। दू बेडक रूप। उज्जर धप्-धप् गद्दा-तोसक तकिया आदि अत्याधुनिक छल। सामने टेबुलपर एकटा एल.सी.डी, फोन आ चाह बनेबाक सभ सरमजाम छल। चाहक सरमजान देखिते काका तँ गद्गद् भऽ गेलाह कहलनि- “दुर्गानन्दजी, सभसँ पहिले एकटा चाह पीबू।” सएह कएल। चाह पीबैत टीबी खोलि कने काल देखलौं। तात् पूर्णिमा मन पड़लीह हुनकासँ हमरा एकटा बेगरतो छल। ओ अपन नम्बर देने छलीह डायल केलौं पाँचे मिनटक पछाति भीतर एलीह ओही अदाक संग। आग्रहपर बैसलीह। खगता कहलनियनि जे हमर कैमराक बेटरी डॉन भऽ गेल अछि कने चार्ज होइतए। पूर्णिमा हर्षक संग बेटरी लऽ रातुक भोजनक विषयमे सेहो बता देलनि। आ ई कहैत बाहर जेबाक अनुमति चाहलनि जे हम अही फ्लोरपर रूप नम्बर चारि साए दूमे छी। अपने लोकनिकेँ कोनो खगता हुअए तँ नि:संकोच बजा लेब। हम अहीं सबहक सेवार्थ आएल छी। धन्यवाद कहैत दुनू ठोरकेँ विहँुसबैत पूर्णिमा रूमसँ बाहर भेलीह। लागल एना जेना बिजली चल गेल हुअए आ रूम अन्हार गुज-गुज भऽ गेल हुअए। पछाति थोड़ेकालक, काका मोन पाड़लनि जे भोजनो करबै? हम कहलियनि- निश्तुकी। अपन-अपन कुर्ता पहिर दुनू बापूत भोजनक लेल द्वितीय तलपर पहुँचलौं। एक नजरि घुमा चारू कात देखलौं। अलग-अलग टेबुल आ कुर्सी लागल। सभ टेबुलपर कनिये टा-टा तोलिया, प्लेट, उज्जर धप्-धप् गिलास, पानिक बोतल आ काँटा चम्मच राखल छल। कने काल धरि दुनू बापूत गुमसुम रहलौं। जे पूछि-पूछि परसि-परसि खुआओत। मुदा ओतए तँ अपने-अपने परसि खाइबला हिसाब छल। बड़नी बड़ बेस। एकहक टा प्लेट लऽ दुनू बापूत आगाँ बढ़लौं। जे चीज-बौस चिन्है छेलिऐ ओ एकाधटा टुकड़ी उठा-उठा अपनो प्लेटमे राखी आ कक्कोकेँ दियनि। मुदा जे अनचिन्हार चीज-वौस छल तइमे पूछए पड़ए। सेहो हिन्दीमे नै किएक तँ हिन्दी तँ कियो बुझबे ने करए। मैथिली कथे कोन जे मैथिलो आब टाटा-बाइ-बाइ करैए। तखन पूछि-पाछि अपन-अपन पसिनक सभ सामग्री लऽ भोजन केलौं। भोजनक तँ विन्यासे जुनि पूछू, उत्तर भारतसँ लऽ दक्षिन भारतक सभ किथुक पूर्ण बेवस्था छल। भरि पोख भोजन दऽ दुनू बापूत आगाँ बढ़लौं देखलौं जे एकटा कराहीमे खीर सन किछु खाद्य पदार्थ छलैक। अपना जोगरक लेलौं। खाइते मन गद्गद् भऽ गेल। तत्पश्चात आइसक्रीम लऽ भोजन सम्पन्न करिते रही ताबत् मोहित रावत जी हमरा लोकनिक खोज-पुछाड़ि करैत लग पहुँचलाह। हाल-चाल भेल। आराम करए गेलौं। भीनसर तरगरे उठि नहा धो कऽ तैयार भेलौं। जलपान केलाक बाद दुनू बापूत होटलक निचला तलपर आबि सामाचार पत्र आदि देखि रहल छलौं तखने रेणुका वातरा जी एलीह। सबहक कुशल-छेम जानि आनन्दित भेलीह। एक-दोसरक परिचए-पात भेल। आ हमरा लोकनि ए.जे हाॅलक लेल विदा भेलौं। हॉल देखि मन गद्गद् भऽ गेल। ए.जे.हॉल पूर्णत: वातानुकुलित बैस पैघ हॉल। जइमे हजारक-हजार विद्वान लोकनि बैस सकैत छथि। बेस ऊँचगर मंच। जइपर दहिनासँ चढ़क लेल आ वायसँ उतरक हेतु सीढ़ी बनल छल। कथाकार-साहित्यकार लोकनिक बैसैक बेवस्था, मिडियाबलाक आ आमंत्रित अतिथिक सबहक अलग-अलग बेवस्था छल। दिनक तीन बजे पत्रकार लोकनिक संग भेँटवार्ता छल। एक कात सातो विद्वान, कथाकार, उपन्यासकार आ कवि लोकनि आदिक बैसैक बेवस्था छल जिनका आगाँ नाओं लिखल नेमप्लेट छल। आही दीर्घामे रेणुका वात्रा सेहो बैसलीह। बेराबरी सभ विद्वान लोकनि अपन-अपन पोथीक एक झलक अंग्रेजीमे रखलनि। तकर पछाति काका अपन पोथी संबंधी विचार मातृभाषा मैथिलीमे रखलनि। पूरा कक्ष विभिन्न प्रकारक कैमराक फ्लैशसँ चमकि रहल छल जेना साओन-भादवक बद्रीमे रहि-रहि बिजलोका चमकैत रहैत। विचार रखलाक बाद सभ विद्वान लोकनिसँ विभिन्न प्रकारक प्रश्न लऽ लऽ पत्रकार लोकनि लूझि पड़ला। सौभाग्यसँ हमहुँ विदेह प्रथम ई पाक्षिक पत्रिकाक सह सम्पादकक प्रतिनिधित्व करबाक हेतु उपस्थिति रही। आ पत्रकार लोकनिकेँ मैथिलीसँ हिन्दी आ अंग्रेजीमे भरि पोख संतोष प्रदान कएल। पाँच केम्हर दऽ कऽ बजलै सेहो नै बूझि पेलौं। सभ कियो ए.जे. हॉलक सभाकक्षमे प्रवेश कएल। अपन-अपन स्थान ग्रहण केलौं। आ शुरू भेल टैगोर लिटरेचर अवार्डक कार्यक्रम। ई तेसर पुरस्कार समारोह छल जेकर आयोजन ऐबेर कोच्चिमे भेल रहए। जइमे विभिन्न भाषामे साहित्यक योगदान हेतु सातटा भारतीय भाषाकेँ चुनल गेल, अंग्रेजी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, नेपाली आ सिन्धी रहए। जे पुरस्कृत कएल गेल। कोच्चिक बारह जूनक संध्या सैमसंग इण्डिया आ साहित्य अकादेमी द्वारा साहित्यमे स्वोत्तम योगदानक लेल सातो भाषाक लेखककेँ पुरस्कृत करबाक लेल तैयार छल। जेकर चयन साहित्य अकादेमीक पंच-परमेश्वर द्वारा भेल छल। एक झलक ओइ महान विभूतिक लेल जे क्रमश: ऐ तरहेँ उपस्थिति छलाह- 1. श्री अमिताभ घोष, अंग्रेजी, सी ऑफ पॉपिज, 2. श्रीमती शीलाकोलम्बकर, कोंकणी गैर्र, 3. श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, मैथिली, गामक जिनगी, 4. श्री अॅकिथम अच्युतम् नामबुदरी, मलयालम- अंथिमानाकालम, 5. श्री एन. कुंजमोहन सिंह, मणिपुरी, एना कैंगे केनवा माटे, 6. श्रीमती इंद्रमणि दरनाल, नेपाली, कृष्णा–कृष्णा आ 7म श्री अर्जन हसीद, सिंधी, ना अएना ना। एे कार्यक्रमक मुख्य अतिथि, डॉ. एम. विरापा मोइली, ओ.एन.भी कुरूप, एम.पी. विरेन्द्र कुमार, श्री अग्रहारा कृष्णमूर्ति, सचिव साहित्य अकादेमी दिल्ली आ श्री बी.डी. पार्क प्रेसीडेन्ट एण्ड सी.ई.ओ. साउथ-वेस्ट एसिया, मुख्य कार्यालय एच.क्यू, सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स छलाह। कार्यक्रमक दौरान नोवेल पुरस्कारसँ पुरस्कृत महाकवि रविन्द्रनाथ टैगोर केर संबंधमे अपन-अपन बहुमुल्य विचार रखलनि। कार्यक्रमक उद्-घोषिकाक रूपमे साहित्य एवं कलाक दुनियाँक प्रसिद्ध टी.भी. एंकर, मॉडल रजनी हरिदास द्वारा जबर्दस्त प्रस्तुति सबहक मनकेँ मोहि लेलक। कार्यक्रममे पुरस्कार वितरण हेतु उद्घोषणक पछाति विजेता विद्वान लोकनि मंचासीन होथि आ पुरस्कृत भऽ अपन-अपन स्थानपर आपस आबथि। पुरस्कारक रूपमे गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोरक एकटा बेस किमती मूर्ति, एकटा चिक्कन साल एवं एकानबे हजार रूपैयाक चेक प्रदान कएल गेल। बीच-बीच मिडियाक कैमरा बिजलोका जकाँ लौकैत रहल। पुरस्कार पाबि श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी अपन लिखल पोथी गामक जिनगीक विषयसँ पूर्व पोथी प्रकाशक श्रुति प्रकाशनकेँ धन्यवाद दैत विस्तारसँ मातृभाषामे अपन वानगी प्रस्तुत कऽ मिथिला आ मैथिलीक मर्यादाकेँ बढ़ौलनि। कार्यक्रमक समापन भरत नाट्यमक प्रसिद्ध नरर्तकी, कलाकार पद्मश्री शोभनाचन्द्र कुमार द्वारा भयंकर उत्साहपूर्ण स्तरीय नृत्यक संग भेल। पाँच बजे संध्यासँ दस बजे राति धरि बूझू जे छओ आंगुर घीऐमे छल जकर सफलताक श्रेय सुश्री रूचिका बत्ता, रेणुका भान, सैमसंग इण्डिया, बी.डी.पार्क आदिकेँ छन्हि। जे समस्त कार्यक्रमक दौरान काग चेष्टा आ बकोध्यानम् रूपमे रहला/रहलीह। ऐ सबहक पश्चात हमरा लोकनि होटल आबि स्वरूचि भोजन कऽ आराम केलौं। प्रात: भने चारि बजे भोरमे अभिवादनक संग हाथ हिलबैत गाड़ीमे बैसलौं। मुदा अखनो ओ हमरा मने अछि......। ताबत गाड़ी कोच्चि हवाइ-अड्डाक लेल प्रस्थान कऽ चुकल छल। राति दस-बजैत-बजैत यात्राक सम्पूर्ण आनन्द लैत दुनू बापूत गाम बेरमा-गोधनपुर आबि गेलौं। । :: दुर्गानन्द मण्डल समीक्षा- जीवन-संघर्ष मैथिली साहित्याकाशमे एकटा एहेन नक्षत्र जे अद्रा नक्षत्र जकाँ सुधी पाठककेँ सभ तरहेँ मनोरंजनसँ लऽ आदर्शवादी समाज, व्यक्ति, व्याक्तिक कुत्सिष्त एवं दमित भावना, मनमे उठैत विभिन्न प्रकारक समस्या आ ओकर निदानक रूपमे भरिपोख मार्ग दर्शन करैत अछि, जीवन-संघर्ष। जीवन संघर्ष थिक आ संघर्षे जीवन। जौं जीवन अछि आ जीवनमे संघर्ष नै तँ ओ जीवन जीवन नै। तहिना जदी संघर्ष अछि तँ ओ संघर्षे जीवन थिक। एक-दोसराक बिना दुनू शब्द अक्षुण्न सन बुझना जाइत अछि। जीवन अछि तँ संघर्षसँ अपने बचि नै सकै छी आ जौं संघर्षेकेँ जीवन मानि लेब जीवन थिक। अर्थात् जीवन-संघर्ष उपन्यास अपन संज्ञाक अनुसार आदिसँ अंत धरि खड़ा उतरल अछि। सम्पूर्ण उपन्यासमे जे पात्र लोकनि छथि ओ कखनो संघर्षसँ अलग नै भऽ सकला अछि। जे संघर्षकेँ स्वीरकार कऽ लेलन्हि हुनका जीवनक लेल एक नै अनेको बाट स्वागतार्थ प्रकृतिक संग नैसर्गिक सुख लऽ उपस्थित भेल। उपन्यासकार एकटा लब्ध प्रतिष्ठित जाहुरी जकाँ विभिन्न प्रकारक संघर्षकेँ जे देखौलन्हि तँ ओकर समाधानो तकबामे कतौ पाछाँ नै रहला। जीवनमे संघर्षक समाधाने तँ जीवनक अभिप्राय थिक। ऐ बातकेँ स्पष्ट करबामे उपन्यासकार शत-प्रतिशत सफल भेलाह। उपन्यासक आदियेमे उपन्यासकार बँसपुरा गामक एक गोट नवविवाहित यौवना जे जीवनक आ यौवनक सुआद मात्र बुझने हेतीह। गामक सटले आयोजित दुर्गापूजाक मेला देखए गेलीह। गनगनाइत मेला चहुओर लॉडस्पीकरक गगनभेदी आबाज चरिकोसिक नीन्न उड़ेने, गामक तीनटा लफुआ छौड़ा बहला-फुसला कऽ भनडार घर लऽ जा हुनका संग बलत्कार.....। समाजक सामंतवादी व्यवस्थाक ज्वलंत उदाहरण अछि। आखिर ऐ तरहक जे बेवस्थाक हमरा समाजक बीच बाल-बच्चामे व्याप्त अछि जे माए-बहिनक संग बलात्कारक संग प्रस्तुत हुअए तखन इज्जत केकर बँचि पाओत? के इज्जतदार रहताह? एकटा प्रश्नचिन्ह छोड़बामे उपन्या्सकार पूर्णत: सफल भेलाह अछि। समाजमे व्याप्त ई जे कुबेवस्था अखनो अछि निश्तुकी ओ हमरा सभकेँ लज्जित करबामे कनियो धोखा-धड़ी नै। जइसँ संभव अछि जे समाजक ऐ कुबेवस्थासँ गाम-घरक धारमे पानिक बदला शोनित बहए लागत। उपन्यासकारक उपन्यासक उदाहरणसँ स्पाष्ट जे पत्नी-बेटीक मुँहक बात सुनैत-सुनैत पतिकेँ कहलक- “जहिना हमर बेटीक इज्जत सिसौनीबला लुटलक तहिना सिसौनीक दुर्गास्थानमे मनुखक बलि परत।” मुदा बाह-रे उपन्यासकार! जखन सम्पूर्ण बँसपुराबला सिसौनीबलाकेँ कचरमबध कऽ लहाशक ढेरी आ शोनितक बहबैले तैयार रणक लेल शंखनादक ध्वनि, लाठी, फरसा, ग्रांस लऽ मरै आ मारैले सिसौनी दिस बिदा भेल तखन गामक सभसँ बेसी उमेरक मनधन बाबा द्वारा रस्तापर चेन्ह दऽ ई कहब- “ऐ ढाँहिसँ जौं कियो एक्को डेग पएर आगाँ बढ़ेबह तँ हम एत्ते प्राण गमा देब।” मनधन बाबाक ई एक वाक्य, आगिमे पानिक काज केलक। सभ शान्त भऽ जाइ छथि। तखन सिसौनी दुर्गापूजाक प्रतिरूप बँसपुरामे कालीपूजा ठानल गेल। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष चुनल गेलाह। एक्कैस आदमीक कमिटी बनाओल गेल। कोनो काज हुअए ओ सर्वसम्मपतिसँ हुअए। ऐठाम उपन्यासकार सामाजिक सद्भावनाकेँ स्पष्ट करबामे शत-प्रतिशत सफल भेलाह। जे उत्तर आधुनिक कालक मध्य उन्नत समाजवादी दर्शनक कसौटीक झलक सहजहि भेल। समाजकेँ आगाँ बढ़ेबामे दसगर्दा काज जरूरी अछि। जाधरि लोकक मनमे दसनामा काजक प्रति झुकाउ नै हेतैक ताधरि समाज आगू मुँहेँ बढ़त केना? समाजेक बीच मंगल सन सोझमतिया लोक अछि तँ गणेश सन ठकहर सेहो। जइ संबंधमे उपन्यासकार कहए चाहैत छथि- “एक्के कुम्हारक बनाओल पनिपीबा घैल सेहो छी आ छुतहरो। मुदा देखैमे दुनू एक्के रंग होइ छै।” उपन्यासकारक नजरि लगिचाइत अमवसिया दिन साँझे दिवाली आ निशा रातिमे कालीपूजा। गाममे आएल धी-बहिनसँ बेसी साइरे-सरहोजि, तहूमे परदेशिया सारि-सरहोजि आबि कऽ गामक तँ रंगे बदलि देलक। मेलाक लेल मुजफ्फरपुरसँ नाटक आ मेल-फिमेल कौव्वालीसँ लऽ महिसोंथाक नाचक आयोजनक संग विभिन्न प्रकारक दोकान सभपर नजरि सेहो छन्हि। मेलामे विभिन्न प्रकारक दोकानक बीच, चेस्टरबला दोकान सेहो उपन्यानसकारक नजरिसँ नै बचि सकल तँ दोसर दिस रमेसरा सन लोकक ई कथन- “धूर बूड़ि दिल्लीस तँ हौआ छिऐ।” अर्थात् पलायनवादी संस्कारकेँ चुनौती दैत गामेमे आयोजित कालीपूजामे बाजार देखि चारि-पाँच हजारक समान बनौलक। जे नोकर नै बनि मालिक बनब! कतेक पैघ स्वाभिमानक परिचायक अछि? एवं प्रकारे विभिन्न प्रकारक जाति विशेषसँ जुड़ल व्यवसायपर बल दऽ ग्रामीण उद्योगकेँ बढ़ाबा देलन्हि , जे सम्राज्यवादी प्रदुषणकेँ साफ करैत अछि। ऐ प्रकारे उपन्यासक सार समस्त मिथिला आ मैथिल समाजक समस्याकक चित्रण करै छथि। समाजक बीच व्याप्त विभिन्न प्रकारक समस्या जे खाहे पलायनवादी होइ वा किसान मजदूरक। सरकारी मसोमातक होइ वा सामाजिक मसोमातक। विभिन्न प्रकारक जाति विशेषसँ जुड़ल व्यवसायसँ हुअए वा कोसी कहरक समस्या। हमरा समाजक बीच धर्मक आड़िमे राजनैतिक समस्या सभपर उपन्यासकारक दूर दृष्टि छन्हि। खास कऽ विधवाक लेल कएल गेल प्रयासक पाछाँ बूझना जाइत अछि जे उपन्यासकार कोनो-ने-कोनो रूपमे नायकक भूमिकामे होथि। चूँकि विधवाक समस्याकेँ एतेक लगसँ देखब आ ओतेक बढ़िया समाधान निकालब साधारण व्यक्तिक लेल संभब नै। अधंविश्वासक आड़िमे भगति खेला केकरो शीलभंग करब आ जहल खटब, सेहो उपन्यासकारक नजरिसँ नै बचि सकल। समाजेक मंगलक विचार जोगिन्दारकेँ नीक लागब आ सामाजिक विधवाक सहायताक उपाए करब, किनको नीक लागि सकैत अछि। एतबे नै, दुखनीक विचारकेँ दुखनियेक शब्दमे उपन्यासकार लिखलन्हि- “हमहूँ तँ पाइयेबला ऐठीन रहलौं मुदा सभ सुख-सुविधा रहितो ओकरा एहेन नीन कहाँ होइ छै।'' देखै छी जे पेट खपटा जकाँ खलपट छै, भरिसक खेबो केने अछि कि नै। तखन जोगिन्दिर घुट्ठी हिलबैत बाजल- “काकी, काकी....।” आ मोटरी खोलि जोगिन्दनर जोर भरि साड़ी, साया आ एकटा आंगीक संग दसटा दस टकही आगूमे राखि देलक। ऐ तरहक समाजक दबल, कुचलक मसोमात वर्गक सेवाधारीक रूपमे हुनक यथार्थ सेवा भावना ओहिना झलकि रहल अछि, जे ओ कतेक पैघ समाजसेवी छथि। ऐ तरहेँ उपन्यासक एक-एक पाँति जीवन-संघर्षक सार्थकताकेँ प्रमाणित करैत अछि। पाठककेँ उपन्यास- जीवन एकटा संघर्षक रूपमे बुझना जाइत अछि। प्रस्तुत उपन्यासमे सभ तरहक उदाहरण- हँसब, बाजब, कानब, मारि-पीट इत्यादिसँ लऽ नव उत्साह, नव चेतना आ नव दिशा भेटैत अछि। आन कोनो ओझराएल उपन्यासकार जकाँ जिनगीकेँ कोनो चौबट्टीपर नै छोड़ि बल्कि एकटा नव सृजनात्मक रास्ता खोजि पाठकक संग समाजोक लोककेँ देखौलन्हि अछि। जहिना नदीक पानि अपना जीवनमे अनेको उतार-चढ़ाबकेँ पार करैत अपन बाट अपने बनबैत अछि तहिना प्रस्तुत उपन्यासमे उत्पन्न भेल समस्याक समाधान करैत समाजोकेँ एकटा प्रशस्त मार्ग देखबैत निर्विरोध आगाँ बढ़ल जा रहल अछि। उपन्यासमे एकटा समस्या नै अपितु अनेको समस्या उपस्थित होइत अछि मुदा ओइ समस्याक स्वत: बुधि-विवेक द्वारा निदान सेहो समस्येसँ निकलैत अछि। समाजक सभ वर्ग चाहे ओ दुखनी हुअए आकि पवित्री, श्यामा हुअए आकि तमोरियावाली भौजी। नारीक एकटा सशक्त शक्तिक रूपमे देखा उपन्यासकार एकटा कृत केलन्हि अछि। सम्पूर्ण उपन्याससमे उपन्यासकार मिथिला समाजक सभ्यता एवं मान्यताकेँ देखाएब सेहो नै बिसरला अछि। मैथिल बेटीक प्रेम माए-बापक प्रति श्यामा द्वारा आनल गेल पाँच गो दलिपुरी, एक धारा चाउर, सेर तीनियेक खेसारी दालि, एकटा उदाहरण अछि। ओतबए नै, मसोमात दुखनीक बेटा भुखना द्वारा आनल रूपैयाक गड्डी देखि ई बाजब आ सोचब- “झाँपह-झाँपह नै तँ लोक सभ देखि लेतह। आखिर ढहलेलो अछि तँ बेटे छी किने।” मने-मन भगवानकेँ गोड़ लागि बाजल- “भगवान केकरो अधलाह नै करै छथिन।” उपन्याँस जेना-जेना आगाँ बढ़ैत अछि सारगर्भित भेल जा रहल अछि। पाठक एकसूरे पढ़ैक लेल बाघ्य छथि। उपन्यासक मादे भोजनो-भातक धियान नै रहि जाइत अछि। अंत: उपन्यासक सारक रूपमे प्रोफेसर कमलनाथ द्वारा प्रस्तुत कथन- “रतुका घटना दुखद भेल। मुदा ओ काल्हुक भेल। कालक तीन गति, भूत, वर्त्तमान आ भविष्य । जे समए बीत गेल वएह समए वर्त्तमान आ भविष्यक रास्ता देखबैत अछि। ढंगसँ एकरा बुझैक खगता अछि। दुखक भागब माने आएब भेल।” ऐ प्रकारे जीवन-संघर्ष उपन्यास कल्पना नै अपितु यथार्थपर आधारित बुझना जाइत अछि। तँए अंतमे ई कहब जे आशाक संग जिनगीकेँ आगू मुँहेँ ठेलैत पहाड़पर चढ़ा अकाशमे फेक दियौक। स्पष्ट अछि जे जीवन संघर्ष थिक आ संघर्ष जीवन, अर्थात् जगदीश प्रसाद मण्डलक जीवन-संघर्ष। आ प्रकाशक छथि नागेन्द्र कुमार झा जे मैथिली साहित्याकाशमे पोथी प्रकाशनक झंडा फहरा-फहरा कऽ बहुत किछु कहि रहल छथि। ऐ लेल श्रुति प्रकाशनक संग उपन्यासकारकेँ सेहो दुर्गानन्द तरफसँ बहुत-बहुत साधुवाद। डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” पोथी समीक्षा - अम्बरा कोनहु भाषाक जिबैत होयबाक प्रमाण की ? इएह जे जाहि क्षेत्र विशेष मे ओ भाषा बाजल जाइत अछि ओहि क्षेत्रविशेष केर हरेक व्यक्ति (वा अधिकांश व्यक्ति) ओहि भाषा केँ अपन मातृभाषाक रूप मे बजैत हो । “हरेक” मतलब हर वर्गविशेषक लोक – चाहे ओ कोनहु वयसमूहक हो, चाहे ओ कोनहु जातिक हो, चाहे ओ कोनहु धर्मक हो अथवा कोनहु व्यापार / व्यवसाय सँ जुड़ल हो । मात्र बजैत हो - सएह टा नञि, अपितु ओहि भाषाविशेष मे अपन रचनात्मक ओ सर्जनात्मक योगदान सेहो करैत हो । “मैथिली” केँ सम्पुर्ण रूपेँ ई सौभाग्य आइ धरि कहियो नञि भेँटि सकल । एक दिशि, कोनहु “एक समूह” कोनहु “दोसर समूह” केँ मैथिली नञि बाजय देलखिन्ह वा नञि पढ़ए - लिखए देलखिन्ह आ “मैथिली” केँ अपन बपौती सम्पत्ति बना कऽ रखलन्हि । दोसर दिशि, चुँकि “पहिल समूह” मैथिली केँ अपन बपौती सम्पत्ति कहि देलन्हि तेँ “दोसर समूह” सेहो मैथिली बाजब वा मैथिली पढ़ब – लिखब छाड़ि देलन्हि । मैथिलीक लेल ई परम दुर्भाग्यक गप्प रहल । घऽर - घरारी आ सम्पत्तिक बँटवारा भऽ सकैत छै, माएक नञि; मैथिल लोकनि केँ से बात बुझबा मे बहुत विलम्ब भेलन्हि । कारण जे हो, पर “माए मैथिली” केँ ई सौभाग्य आन समकक्ष भाषाक अपेक्षा बहुत काल धरि नञि भेँटि सकलन्हि । सम्प्रति खुशीक बात ई जे पछिला किछु वर्ष सञो समय बदलल अछि आ हरेक वर्गविशेषक लोक अपन रचनाशीलता सँ माए मैथिलीक आँचर भरि रहल छथि । शुरुआत मे गति बहुत सुस्त छल आ श्री विलट पासवान “विहंगम” वा स्व॰ फजलुर्रहमान हासमीजी सन एक – आधहि टा नऽव नाम देखबा मे अबैत छल पर आइ एहेन नाँव सभक संख्या बहुत तेजी सञो बढ़ल अछि । एहने एक गोट वरिष्ठ रचनाकार छथि श्री राजदेव मण्डलजी । आइ हुनिकहि लिखल एक गोट काव्य संग्रह “अम्बरा” केर समिक्षा लऽ कऽ हम अपनेक सोझाँ उपस्थित छी । “अम्बरा” - रचनाकारक गोटेक पचहत्तरि टा काव्य रचना केँ अपना मे समाहित कएने अछि । सभटा कविता “अमित्राक्षर छन्द” मे अछि । पर डेरएबाक काज नञि; “अमित्राक्षर छन्द” रहितहुँ “मित्राक्षर छन्द” केर रचना सन प्रतीत होयत आ पढ़बा मे ओहने लयबद्ध आ रुचिगर लागत । यथा :- अहाँ कहैत छी – कायर बनबसँ नीक हिंसक भऽ जाएब से अछि ठीक लोक कहत - वाह-वाह किन्तु हमरा लगैत अछि ई अधलाह ......................... “अहिंसक वीर” बिनु उचित शब्द केर भाव मरि जाइत अछि आ बिनु भावक शब्द तँ शब्दकोशहि बुझू । पर ई दोष एहि कविता संग्रह मे कतहु देखबा मे नहि आओत । उचित शब्द ओ समीचीन भाव केर अजगुत संगम देखबा मे अबैछ । जेना कि तप्त रेतपर फरफड़ाइत माछ कानि – कानि कऽ रहल नाच रेतापर फाड़ैत चीस उड़बाक लेल आसमान दिश अभागल देहसँ झड़ए लागल चाँदीकेँ कण झूमि उठल कतेको आँखिक मन जरि रहल माछक तन ........................ “बाउल परक माछ” सम्पुर्ण काव्य रचना विशुद्ध खाँटी मैथिली मे थिक; हँ कत्तहु – कत्तहु किछु हिन्दी शब्दावलीक प्रयोग ठीक सँ मेल नञि खाइत अछि, पर से अत्यल्प । भाषा बहुतहि सहज ओ स्वभाविक थिक आ ताहि कारणेँ पढ़बा काल घटनाक्रम वा वर्णित विषय पाठककेँ अपना समक्ष घटित होइत प्रतीत होएतन्हि । जेना कि देखल जाओ शब्द नहि रहल दिलक बोल तेँ नहि रहल ओकर मोल ......................... ................. बजैत रहैत छी अमरीत बोल भीतर रखने बीखक घोल ......................... “दिलक बोल” कोनहु साहित्य मे जँ विविधता नञि हो तँ ओ सम्पुर्ण नञि कहबैछ । जहिना भोजन मे षड्रस केँ भेनाइ आवश्यक तहिना साहित्य मे नवरस ओ तकर उपरस सभक समावेश परमावश्यक । मात्र शिंगार ओ भक्ति रसोपरस सँ साहित्य समग्र नञि भऽ सकैछ – एहि प्रकारक साहित्य श्रृजन एकभगाह ओ असन्तुलित कहबैछ । “अम्बरा” मे ई दोष नञि । एहि छोट – क्षिण काव्य संग्रह मे बहुत अधिक “विषय - वैविध्य” थिक । हरेक रचना भाव – स्वभाव मे एक दोसरा सँ भिन्न । आ इएह एकर सभसँ पैघ विशेषता थिक । एक दिशि “जाति” आ “हम फेर उठब” सन रचना जञो सामाजिक वैषम्य पर प्रहार करैछ तँ दोसर दिशि “ज्ञानक झण्डा” सन कविता समाज मे पसरल अंधविश्वास आ अशिक्षा पर । कमजोर वा दलित व्यक्तिक मनोदशाक केहेन मार्मिक चित्रण कएल गेल अछि से देखू टप – टप चुबैत खूनक बूनसँ धरती भऽ रहल स्नात पूछि रहल अछि चिड़ै अपना मन सँ ई बात आबऽ बाला ई कारी आ भारी राति कि नहि बाँचत हमर जाति ..... ? ......................... “चीड़ीक जाति” “हथियारक सभा” आ “अहिंसक वीर” सन रचना कोनहु समस्याक शान्तिपुर्ण समाधान करबा पर ओ अहिंसा पर जोर दैछ आ अनेरोक रक्तपात व नक्शलवादी प्रवृत्ति केँ विरोध करैत बुझना जाइछ । देखल जाओ सुनह लगाबह ध्यान खोलह अपन अपन कान तब भेटतह आजुक सम्मान बिनु देहसँ गिरौने रकत कऽ सकैत छह दोसर जुगत ................................................ ......... बिनु हिंसाकेँ जे कएने होयत हृदयपर राज ओकरे भेटत ई अमूल्य ताज ........................ “हथियारक सभा” एहि पोथी मे “मुनियाँक चिन्ता” आ “कथीक गाछ” नामक बालकविता सेहो अछि, जाहिमे बहुत सुन्नर ढंग सँ बाल मनोभाव केँ व्यक्त कयल गेल अछि । मुनियाँक छोट भाए केर जन्म भेलै, पूरा परिवार खुशी मना रहल छल आ मुनियाँ कानि रहलि छलि । पुछला पर की उत्तर भेटलैक से अपनहु सभ सुनू ई तँ छै खुशीक बात जनमल तोरा भाए कतेक खुशी छह तोहर माए दादी, सबटा जानै छी हम ओहि लए नहि कानैत छी चिन्ता अछि हमरा आब के कोराकेँ लेत दूधो माए पिबऽ नहि देत ........................ “मुनियाँक चिन्ता” “गाछक हिस्सा” आ “गाछक बलिदान” पर्यावरण असन्तुलन ओ तकर रक्षण दिशि ध्यानाकृष्ट करैछ जखन कि “मनोवाणछित चान” आ “परेमक अधिकार” किञ्चित् शिंगार रसक कविता थिक । “बाढ़िक चित्र” नामक कविता मे २००८ ई॰ मे कुसहा लऽग टुटल कोसीक बान्ह सँ आयल बाढ़िक बहुत मर्मस्पर्शी आ सजीव चित्रण कयल गेल अछि । किछु अंश द्रष्टव्य थिक एहसरि अर्धनग्न स्त्री परिश्रान्त मुख क्लान्त बैसल अछि धारक कात देह स्नात जिअत अछि कि मुइल साइत सोचि रहल अछि इएह बात एखनहि निकलल अछि संघर्ष कऽ बाढ़िक धारा सँ ........................ “बाढ़िक चित्र” सम्प्रति मैथिली साहित्यक दशा – दिशा, मैथिलीक प्रति कविक प्रतिबद्धता ओ ताहि सन्दर्भ मे देल गेल स्पष्टीकरण देखल जाओ दोसरोक माय अछि हमरे माय तँ कि यौ भाय अपना मायकेँ बिसरि जाइ .......................................... मैथिलीक अछि असीम भण्डार एहि बात केँ हम सोचि ली घर भरल हो जखन दोसरासँ किएक पैंच ली राखि संतोष करी उपाय की यौ भाय । ........................ “माय” ओना तँ हरेक कविता चर्चाक अपेक्षा रखैत अछि पर से सम्भव नञि । जहिना भात सीझलै कि नञि से ओहि मे सँ मात्र एक टा दाना केँ छूबि अन्दाज लगाओल जा सकैछ आ तहिना उपरोक्त किछु उदाहरण सभ सँ समग्र पोथीक अनुमान । व्याकरण केर दृष्टिकोन सँ एहि पोथीक एक गोट खास विशेषता अछि जे विभक्ति (कारक चिन्ह वा शब्द) प्राचीन मैथिली जेकाँ मूलशब्द केर संगहि लिखल गेल अछि ।* अन्त मे मैथिलीप्रेमी पाठक लोकनि सँ एतबहि कहए चाहबन्हि कि ई कविता संग्रह हुनिका आशा सञो बेसी रुचिगर लगतन्हि । पोथीक नाँव :– अम्बरा ( मैथिली कविता संग्रह) लेखक :– श्री राजदेव मंडल प्रकाशक :– श्रुति प्रकाशन ८/२१, भूतल, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली - ११०००८ दाम :– १०० टाका मात्र * प्राचीन मैथिली मे संस्कृतक प्रभावक कारणेँ कारक चिन्ह वा विभक्ति मूलशब्दक संगहि लिखल जाइत छल । आधुनिक मैथिली मे बहुधा फुटका कऽ लिखल जाइत अछि अथवा मिश्रित स्वरूप मे । मिश्रित स्वरूप - माने कि किछु कारक चिन्ह संग मे (यथा – कारणेँ) आ किछु फुटका कऽ (यथा – चौकी पर) । संस्कृत मे विभक्ति चिन्ह वा शब्द नञि होइत अछि अपितु मूल शब्द मे विकार उत्त्पन्न कए “शब्द वा धातु रूप” बनाओल जाइत अछि तेँ ओ हमेशा मूलशब्दक संगहि रहैछ । पर मैथिली समेत आन आधुनिक भारतीय आर्यभाषा सभ मे ई शब्दविकृति वा धातु विकृति नञि होइछ (अधिकांशतः) आ तेँ कारक केर विभक्ति निरूपनार्थ अलग आखर वा शब्द होइत अछि । ओमप्रकाश झा १. बहुरूपिया रचना मे २. घोघ उठबैत गजल १. बहुरूपिया रचना मे गजल मे हम रूचि राखैत छी। संगहि मैथिली मे थोड बहुत गजल सेहो लिखै छी आ गजलक पोथी सब पढबाक इच्छा रहै ए। मैथिली मे बहुत कम गजल संग्रह अछि आ ओहो सुलभ नै होइत रहै ए। एहन परिस्थिति मे हमरा श्री अरविन्द ठाकुरजीक सद्यः प्रकाशित मैथिली गजल संग्रह "बहुरूपिया प्रदेश मे" पढबाक अवसर भेंटल आ हम एहि पोथी केँ आद्योपान्त पढलहुँ। सबसे पहिने हम श्री अरविन्द ठाकुरजी केँ मैथिली गजलक पोथी लिखबाक लेल बधाई दैत छियैन्हि। मैथिली गजलक उत्थान लेल प्रत्येक डेग हमरा महत्वपूर्ण लागै ए। पोथीक गेट अप बड्ड सुन्नर अछि। टाईप आ कागतक कोटि सेहो उत्तम अछि। पोथीक भूमिका गजलकार अपने लिखने छथि आ ओहि मे गजल आ एहि संग्रहक सम्बन्ध मे बहुत रास गप सब कहने छथि। जेना पृष्ठ संख्या सातक दोसर पारा मे गजलकार कहैत छथि जे "मैथिलीक मिजाजक सीमा (इ मैथिलीक नहि, हमर अपन सीमा भऽ सकैत अछि) केँ देखैत गजलक व्याकरण (रदीफ, काफिया, मिसरा, मतला, मकता आदि)क स्थापित मापदंडक कसबट्टी पर हमर सभ गजल खरा उतरत तकर दाबी तऽ नहिए टा अछि बल्कि हम तँ इ सकारय चाहै छी जे--------------------------------- हमर सीमाक कारणेँ प्रस्तुत गजल मे कएक जगह सुधि पाठक लोकनि केँ त्रुटि भेटि सकैत छनि।" एहि पाराक अन्त मे ओ कहै छथि जे बहरक दोख किछु शेर मे भेटि सकैत अछि। हम गजलकारक सराहना करैत छी जे ओ भूमिका मे अपने कएक ठाम बहरक आ आन दोख हएब स्वीकार कएने छथि। पोथी केँ आद्योपान्त पढला पर हमरा इ नै बुझाएल जे एहि संग्रहक गजल सब कोन-कोन बहर मे लिखल गेल अछि। अरबीक कोनो टा बहर मे कोनो गजल नहिए अछि, मैथिली मे आइ-काल्हि प्रयुक्त होइ बला सरल वार्णिक बहर मे सेहो कोनो गजल नै अछि। गजलकार केँ प्रत्येक गजल मे इ लिखबाक चाही छल जे कोन बहर मे गजल लिखल गेल अछि। जँ इ "आजाद-गजल"क संग्रह थीक, तँ हुनका एहि बातक उल्लेख करबाक चाही छल। भूमिकाक उपरोक्त पाराक शुरू मे गजलकार कहै छथि जे मैथिलीक मिजाज केँ देखैत एहि मे उर्दू-हिन्दी गजलक मिजाजक नकल करबाक प्रयास कएल जाइत तँ एकरा बुधियारी नहिए टा कहल जायत आओर सफलता सेहो नहि भेंटत। हम हुनकर गप सँ सहमत छी जे नकल करब उचित नहि। मुदा एकटा गप हम कहऽ चाहैत छी जे प्रत्येक विधाक एकटा नियम होइत छै आओर जाहि क्षेत्र मे ओहि विधाक उदय भेल रहैत छै ओहि क्षेत्र मे स्थापित भेल नियमक पालन केने बिना कोनो रचना मूल विधा मे कोना भऽ सकैत अछि। जेना मैथिली मे समदाउन आ सोहरक परम्परा छैक आ जँ पंजाबी मे वा गुजराती मे वा की कोनो आन भाषा मे समदाउन आ सोहर गाबऽ चाही तँ नियम कोना बदलि जेतैक। जँ नियम बदलतै तँ ओ दोसर चीज भऽ जेतैक। तहिना गजल अरब क्षेत्र मे जन्म लेलक आ इ स्वाभाविक छै जे एकर नियम (व्याकरण) ओहि क्षेत्रक स्थापित मानदण्डक आधार पर बनल। स्थापित मानदण्डक पालन करब नकल नहि कहल जा सकैत अछि। आ जे नकलक गप करी तँ 'गजल' कहब अरबी-हिन्दीक नकल थीक। एक दिस गजलकार 'गजल' कहबाक लोभ नै छोडि रहल छथि आ दोसर दिस गजलक व्याकरणक नियम पालन केँ नकल कहै छथि, इ उचित नै बुझाएल। गजल स्थापित मानदण्ड पर जँ नै कहल गेल तँ रचना केँ गजलक स्थान पर दोसर नाम देल जा सकैत अछि। पृष्ठ संख्या दस पर दोसर पारा मे गजलकार कहै छथि जे ओ जीवन सँ सिदहा लैत छथि। इ स्वागत योग्य गप भेल। जीवनक सिदहा सँ तैयार व्यंजन सोअदगर हेबे करतै। मुदा भोजन बनबै काल चाउरक सिदहा पानि मे सोझे फुला कऽ परसि देला सँ भात नहि कहाइत अछि। चाउरक सिदहा केँ अदहन मे देल जाइ छै तखन भात तैयार होइ छै। तहिना जीवनक सिदहा जँ व्याकरण, नियम आ चिन्तन-मननक अदहन मे पकाओल जाइत अछि तँ सोअदगर रचना भेटैत अछि। विधा विशेषक मापदण्ड तोडबाक क्रांतिकारी घोषणा कएला टा सँ किछु विशेष फायदा वा उमेद तँ नहिए जगै ए। जँ कियो मापदण्ड तोडै छथि, तँ मापदण्ड पर चलै बला केँ नकलची आ बाजीगर कहब उचित नहि। गजल आ फकरा आ दोहा मे थोडेक अन्तर तँ छै जे रहबे करतै। अस्तु, इ गजलकारक अपन विचार छैन्हि आ आब प्रकाशित सेहो छैन्हि। गजल संग्रहक सब गजल पढलौं। विषय वस्तु सब नीके लागल। गजलक व्याकरणक आधार पर कहि सकैत छी जे बहरक दोख तँ प्रत्येक गजल मे छैक आ जँ इ आजाद-गजलक संग्रह थीक तँ गजलकार इ गप कतौ नै कहने छथि। गजलकार केँ स्पष्ट करबाक चाही छल जे कोन कोन बहर मे गजल सब लिखल गेल अछि। हमरा बुझने गजलक कोनो शीर्षक नै होइत अछि, मुदा प्रत्येक गजल केँ एकटा शीर्षक देल गेल अछि। बहरक अतिरिक्त रदीफ आ काफियाक नियमक सेहो कएक ठाम पालन नै भेल अछि आ इ गप गजलकार भूमिका मे सेहो स्वीकार कएने छथि। जेना पृष्ठ बाईस मे मतलाक दुनू पाँति, दोसर शेर आ पाँचम शेर मे काफिया मे 'आयब' प्रयोग भेल अछि, तँ दोसर आ चारिम शेर मे 'अब' क प्रयोग अछि। पृष्ठ चौबीस मे मतलाक पहिल पाँति मे काफिया मे 'अ' आयल अछि आ दोसर पाँति आ अन्य शेर मे 'आत' आयल अछि। पृष्ठ पच्चीस मे काफिया की छै, से नै बुझाएल। पृष्ठ तिरपन मे प्रत्येक पाँति मे काफिया एकदम फराक फराक अछि। पृष्ठ अनठाबन मे मतला, दोसर शेर आ चारिम शेर मे काफिया मे 'अल' प्रयुक्त अछि आ आन सब शेर मे काफिया मे 'अ' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ उनसठि मे सेहो रदीफ आ काफियाक स्पष्टता नै अछि। पृष्ठ छियासठि मे काफिया मे कतौ 'अल' आ कतौ 'आओल' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ सडसठि आ तिहत्तरि मे सेहो काफियाक नियमक उल्लंघन भेल अछि। तहिना संयुक्ताक्षर बला काफियाक नियम सेहो एक दू ठाम हमरा हिसाबेँ ठीक नै अछि। एकर अतिरिक्त आओर कएक ठाम काफियाक नियमक पालन नै भेल अछि। हम उदाहरण स्वरूप किछु पृष्ठक उल्लेख कएलहुँ। हमर इ उद्देश्य नै अछि जे खाली दोख ताकल जाय, मुदा जँ गजल कहै छियै तँ गजलक नियमक पालन हेबाक चाही। सब गोटे केँ जानकारी लेल इ बता दी की बिना रदीफक गजल तँ भऽ सकैत अछि, मुदा बिना दुरूस्त काफिया भेने गजल नै भऽ सकैत अछि। भूमिका सँ एकटा बात आर स्पष्ट होइ ए जे गजलकार मई २००८ सँ मैथिली मे गजल लिखब शुरू केलथि, ओना ओ हिन्दी मे पहिनहुँ गजल लिखैत छलाह। एकर मतलब इ भेल जे गजलकार "अनचिन्हार आखर" (मैथिली गजल केँ समर्पित ब्लाग) सँ बहुत बाद मे मैथिली गजल लिखब शुरू कएने छथि आ मैथिली गजलक वरीयता मे बहुत बाद मे आयल छथि। "अनचिन्हार आखर" ब्लाग देखला सँ पता चलै छै जे गजलकार एहि ब्लाग पर सेहो अपन कएक टा गजल २००९ सँ एखन धरि देने छथि। ओ "अनचिन्हार आखर" ब्लाग सँ चिन्हार छथि, तैँ इ उमेद अछि जे एहि ब्लाग पर प्रकाशित मैथिली गजलक विस्तृत व्याकरण केँ जरूर देखने हेताह। इ उमेद छल जे प्रस्तुत गजल संग्रह मैथिली गजलक नब पीढी लेल एकटा उदाहरण बनत। मुदा एहि संग्रह मे गजलक व्याकरणक जे उपेक्षा भेल अछि, जे गजलकार भूमिका मे स्वयं स्वीकार कएने छथि, निराशा उत्पन्न करैत अछि। मुदा इ संग्रह गजलकारक पहिलुक मैथिली गजल संग्रह अछि, तैँ गजलक व्याकरणक गलती भेनाई स्वभाविक अछि। आशा व्यक्त करै छी जे हुनकर आगामी गजल संग्रह मैथिली गजल मे अपन अलग स्थान राखत। २ घोघ उठबैत गजल मैथिली गजलक पहिलुक प्रकाशित पोथी "उठा रहल घोघ तिमिर" पढबाक सौभाग्य भेंटल। ऐ गजल संग्रहक गजलकार श्री विभूति आनन्द छथि। एहि पोथी मे कुल चौंतीस गोट गजल अछि। पूरा पोथी केँ एकहि बैसार मे पढि गेलहुँ आ बेर-बेर पढलहुँ। सबसे पहिने हम श्री विभूति आनन्दजी केँ मैथिली गजलक पहिलुक संग्रह प्रकाशित करबा लेल धन्यवाद दैत छियैन्हि। एहि पोथीक भूमिका मे गजलकार कहै छथि जे "मैथिलीक गजल सोझे-सोझ हिन्दी सँ प्रभावित अछि मुदा हिन्दी जकाँ जमल नञि अछि एखनो धरि।" आगू हुनकर कहनाई छैन्हि- "पारम्परिक व्याकरण सम्बन्धित अगणित त्रुटि सभ ठाम लक्षित होएत। ओना हम दुस्साहसपूर्वक साहस करैत रहलहुँ अछि जे कथ्य-सामंजस्य लए व्याकरण दिस सँ यदि मूँहो घूमा लेल जाए तँ कोनो हर्ज नञि। किए तँ हम मानैत छी जे ई पाठ्यक्रमक वस्तु नञि अछि। विद्यार्थी मूर्ख नञि बनत। तैं की ------------------------ व्याकरण सँ भयभीत भऽ नञि लिखल जाए।" गजलकारक पहिलुक कथनक सम्बन्ध मे हमर निवेदन अछि जे गजलक परम्परा अरबी-फारसी सँ शुरू भेल अछि आ ओतहि सँ आन भारतीय भाषा मे पसरल अछि। हिन्दी-उर्दू मे गजल कहबाक परम्परा मैथिली सँ पहिने शुरू भेल, तैं बहुसंख्य लोक दिग्भ्रमित भऽ जाइत छथि जे मैथिलीक गजल हिन्दी गजलक नकल छी वा ओइ सँ प्रभावित भेल अछि। गजलकार सेहो एहि मिथ्या धारणा सँ प्रभावित छथि। आब गजलक व्याकरण थोड-बहुत समन्जनक संग सब भाषा मे तँ एक्के रहत। ऐ स्थिति केँ हमरा हिसाबेँ "प्रभावित भेनाई" कहबाक कोनो औचित्य नै अछि। गजलकारक दोसर कथन देखि हम निराश भेल छी। पता नै किया एखन धरि जे दुनू गजल संग्रह (सबसँ पहिलुक आ सबसँ अंतिम प्रकाशित) पढलहुँ, एहि दुनू मे गजलकार कथ्य-सामंजस्यक आगू व्याकरण केँ कोनो मोजर नै देबऽ चाहैत छथि। एकटा गप मोन रखबाक चाही जे साहित्यक निर्माण वैयाकरणिक अनुशासनक बादे सफल भेल अछि। इ फराक गप अछि जे समय-काल आ स्थानक हिसाबेँ सर्वमान्य परिवर्तन व्याकरण मे होइत रहल छैक। बिना वैयाकरणिक अनुशासनक भाषा पढबा, लिखबा आ बाजबा जोग रहत? जिनका मे साहित्य निर्माणक माद्दा छैन्हि, हुनका मे व्याकरण केँ पालनक साहस अबस्स हेबाक चाही। आब हम एहि संग्रहक गजलक सम्बन्ध मे किछु गप कहऽ चाहब। इ गजल संग्रह ओहि समय मे लिखल गेल अछि जखन मैथिली गजलक व्याकरण आ बहरक सम्बन्ध मे बहुत बेसी जनतब सार्वजनिक नै छल। हम एकरा एना कहऽ चाहब जे इ गजल संग्रह "अनचिन्हार आखर" जुग सँ पूर्वक गजल अछि जखन बहर, रदीफ आ काफियाक नियमक पालनक विषय मे बहुत रास गप सर्वजन सुलभ नै छल। एहि हिसाबेँ जँ ऐ संग्रहक गजल सभ मे बहरक दोख छैक तँ इ स्वभाविक बुझाईत अछि। एहि संग्रहक कोनो टा गजल कोनो बहर मे नै अछि। तैं ऐ संग्रहक वैध गजल (जाहि मे काफियाक नियमक पालन भेल हुए) सभ केँ "आजाद-गजल"क श्रेणी मे राखल जा सकैए। आब गजलक काफिया आ रदीफक सम्बन्ध मे किछु गप। एहि संग्रहक बहुत रास गजल मे काफिया आ रदीफक नियमक पालन भेल अछि। मुदा कएक गजल मे रदीफ आ काफियाक गलती अछि। जेना पृष्ठ चौदह पर मतला देखला पर बुझाईत अछि जे "इ मौसम" रदीफ अछि आ "लागैए" आओर "उलाबैए" काफियायुक्त शब्द अछि। मुदा दोसर शेर आ आगूक आन शेर मे एकर पालन नै भेल अछि आओर शेर सभ बिना रदीफक "अ" काफियायुक्त अछि। पृष्ठ पन्द्रह पर सेहो यैह दोख अछि, जाहि मे मतला मे रदीफ "कहाँ रहल"क प्रयोग अछि आ आन शेर सभ बिना रदीफक "अल" काफियायुक्त अछि। एहने दोख पृष्ठ सोलह मे देखल जा सकैत अछि, जतय मतला मे "करै छह" रदीफ मानल जयबाक चाही। ओना ऐ गजलक आन शेर सभ मे दू टा काफियाक सुन्नर प्रयोग अछि, जे नीक लागैए। हमरा हिसाबेँ काफियाक दोख पृष्ठ बीस, बाईस, चौबीस, पचीस, अट्ठाईस, उनतीस(संयुक्ताक्षर काफियाक नियमक दोख), बत्तीस आ सैंतीस मे सेहो अछि। एकर सबहक विस्तृत वर्णन देब हम अपेक्षित नै बूझि रहल छी, कियाक तँ इ हमर उद्देश्य कथमपि नै अछि। गजल संग्रहक सब गजलक विषय-वस्तु नीक अछि आ गजलकार अपन भावना नीक जकाँ प्रकट केने छथि। किछु गजलक काफिया आ रदीफक दोख जँ कात कऽ कऽ देखी, तँ इ गजल-संग्रह एकटा नीक गजल-संग्रह अछि। गजलकारक गजल कहबाक क्षमता सेहो नीक बुझाईत अछि। हमरा ई अचरज लागि रहल अछि जे ऐ संग्रहक बाद गजलकारक दोसर गजल-संग्रह किया नै आएल अछि। एकर कारण तँ गजलकारे केँ पता हेतैन्हि, मुदा अपन अनुभवक आधार पर हम कहऽ चाहै छी जे श्री विभूति आनन्द नीक गजल लिख सकैत छथि। जँ बहरक विचार नै करी, तँ २०१२ मे आएल श्री अरविन्द ठाकुरजीक गजल-संग्रह सँ करीब एकतीस बर्ख पहिने १९८१ मे लिखल गेल एहि संग्रहक गजल सब उम्दा कहल जा सकैत अछि। एकर कारण इ जे एहि संग्रहक गजल सब मे काफियाक नियम-पालनक प्रतिशत वर्तमान समयक संग्रह सब सँ बेसी अछि। कथ्यक मजबूती सेहो नीक कोटिक अछि। खाली कुहरल तुकमिलानी केने गजल नै कहल जा सकैत अछि, इ गप एहि संग्रह केँ पढलाक बाद एखुनका गजलकार सभ केँ सेहो बुझेतन्हि, इ आशा अछि। इहो एकटा अचरजक विषय अछि जे जखन मैथिली मे नीक गजल एतेक साल पहिनो कहल गेल छल, तखन एकर बाद गजलक विकास-यात्रा पचीस-तीस बर्ख धरि कतऽ आ किया ठमकि गेल। बीचक अवधि मे मैथिली गजलक विकासक धार मे बान्ह किया बनि गेल छल, इ विचारणीय गप अछि। ओना आब इ बान्ह टूटि रहल अछि आ आशाक नब जोति मे मैथिली गजलक घोघ उठि रहल अछि। उमेश मण्डल मैथिली युवा रचना-धर्मिता :: परंपरा परिवर्त्तन आ भविष्य “रचनाक धर्मिता, साहित्य सृजनक धर्म एवं ओकर भविष्य” कतेक महत्वपूर्ण विषय अछि। प्रतिपाद्य विषयपर जतबा रचना पढ़ल गेल संभव, विचारणीय अछि। सन्दर्भक मूल अछि इमानदारीसँ, निष्पक्ष भऽ रचना करब, रचना एवं रचनाकारक धर्म-कर्म यएह थिक। धर्म-कर्म, काम-धाम दुनूक प्रयोग अपना सबहक बीच होइत आएल अछि, सभ बजैत आएल छी, रहै छी। विचारणीय अछि जे जहिना कर्म-धर्म, ओहन काजकेँ कहल जाइत जे धर्मक रास्तासँ चलैत अछि। आ कर्मक अर्थ काम सेहो होइत अछि। जेकरा संग धाम शब्दक प्रयोग होइत अछि- काम-धाम। धाम अलंकार रूपमे प्रयोग होइत अछि जेकर तात्पर्य स्थानसँ होइत अछि जेना वैद्यनाथ धाम। स्पष्ट अछि अपना सबहक धाम मिथिला थिक, मिथिला धाम। आ मिथिलाक विकास उद्देश्य। जइ देशमे अनेको भाषा, अनेको जाति-सम्प्रदय एक संग डेग-मे-डेग मिला चलैत आबि रहल अछि। हमरा सभकेँ ओइ शक्तिकेँ चिन्हबाक अछि, पकड़बाक अछि एवं मजगूतीसँ पकड़ि रखबाक अछि। जे एतेक पैघ देशकेँ एक तागमे बान्हि कऽ रखने अछि। आ ई चीज कोनो आइये नै भेल, अदौसँ आबि रहल अछि। उदाहरण लेल अहाँ कोनो गामकेँ लऽ लिअ। गामक श्रेष्टता ओइ गामकेँ होइ छैक जइ गाममे छत्तिसो वर्णक बास अछि। ऐ छत्तिसो वर्णकेँ आर्थिक आ वौद्धिक रूपमे देखल जाए तँ गरीबसँ गरीब (भिखमंगा) आ अमीरसँ अमीर छथि। जहिना निम्नसँ निम्न जाति एवं उच्चसँ उच्च जाति सेहो गाममे समाजमे बसै छथि। मुदा सामाजिक बंधन ओहन अछि जे सभ अपना-अपना सीमामे स्वतंत्र रूपसँ जीब रहल छथि। देखि सकै छी, सोचि सकै छी जे एक्के गामक एक धरतीपर भिन्न-भिन्न सम्प्रदायक उत्सव-समारोह साले-साल होइत आएल अछि, होइत रहैए। हमरा सभकेँ ऐ सभ महत्वपूर्ण विन्दुपर विचार कऽ ओइ शक्तिकेँ अक्षुण्न रखबाक दायित्व बनैत अछि। जइसँ मात्र वर्त्तमाने नै भविष्य सेहो सशक्त रहत एवं दुनियाँक समक्ष जइ विशेषताक लेल अपन सबहक पहिचान अछि सेहो बनल रहत। समस्या जटील जरूर बूझि पड़ैए मुदा समाधानक उपाय सेहो समाजेमे अछि। समाजेक भीतर अछि। जे सनातनी पद्धति माने परिवत्तनीय पद्धतिसँ समाधान कएल जा सकैए। हँ एहेन जरूर भऽ गेल अछि जे आकाश-पातालक दूरी बीचमे बनि गेल अछि। मुदा की हम सभ हाथ-पएर समेटि थुसुकुनिया मारि ली? सीरा नै भट्ठा दिसि दहाइत रही? अपना महत्वकेँ बिसरि जाय? नै। बल्कि, कान ठाढ़ कऽ सुनबाक, बुझबाक एवं किछु करबाक लेल अपनाकेँ तैयार करबाक चाही। अपन मिथिलाक वैदिक पद्धतिपर नजरि लऽ जाए इमानदारीसँ बुझबाक अछि। भारतीय चिन्तनधारामे पातालोसँ आकाश आ आकाशोसँ पाताल आबि जाए तकर संवाद परिचालन होइत रहल अछि। दृढ़ता अनबाक लेल ऐठाम एकटा कहावत मोन पड़ि रहल अछि जे कहबी छै ‘बिना कारणे टिटही नै लगै छै।’ मूल प्रश्न अछि- समाज केना सशक्त बनए, देश केना सशक्त बनए। ऐ दायित्वकेँ बूझि रचनाक सृजन हेबाक चाही। तँए साहित्य की? साहित्य दर्पण आकि दर्शन? साहित्य दर्पण थिक, मात्र कहने व्यापकताक अभाव बनल रहि जाइत अछि। दर्पणक शीशाक एक भागमे पॉलिश कएल रहैत अछि। जेकर परिणाम होइत अछि जे ओ एकभगाह भऽ जाइए। युवा साहित्य सृजक भाय-बहिन, अपना सभकेँ विचार करबाक आवश्यकता अछि जे साहित्य आखिर छी की? दर्पण आकि दर्शन? जइमे चारू दिशा देखल जाइत अछि। भौगोलिक भाषामे दिशा िनर्धारित अछि, पूब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण, ऊपर-नीचा इत्यादि। मुदा दर्शानिक भाषामे वएह चीज विचारधारा कहबैत अछि। जे परिवक्व भेलापर दर्शनसँ दिग्दर्शन बनि जाइत अछि। आ वएह विचारधार रूपमे आगू सेहो बढ़ैत अछि। अहीठाम हम सभ विचार करी जे हमरा सबहक लक्ष्य केहेन हेबाक चाही ओइ पॉलिश कएल एकभग्गु शीशा सन जे मात्र एक दिशा देखि एकभग्गु भेल रहत? नै। बल्कि ई सोचबाक अछि जे चारू दिशा केना देखब, चौमुखी एवं सर्वांगिन विकास केना होएत। तइ लेल ओहन दर्शन, ओहन दृष्टिकोण या फेर ओहन विचारधारकेँ पकड़ि चलबाक अछि आ रचना करबाक अछि। जइमे हमर सबहक विविधता, व्यापकताक रक्षा भऽ सकए। साहित्य समाज वा देशक ओहन सम्पति छी जे कठीन-सँ-कठीन परिस्थितिक रस्तो बतबैत अछि आ आगू बढ़ैक उपाए सेहो करैत अछि। मुदा तइ लेल समाज आ देश-दुनियाँक गहन अध्ययन, चिन्तन-मननक संग रचनाक जरूरति अछि। भारतीय चिन्तनधारा ओहन िचन्तनधारा थिक जेकरा समुचित ढंगसँ रखलापर केहनो अन्हर-तुफान किएक ने उठौ मुदा ओहन डोलान नै डोलत जेहन डोलैत रहैए या फेर डोलबाक भय बनि गेल अछि। मुदा तइ लेल हमरा सभकेँ थोड़ेक व्यापकता दिसि बढ़ए पड़त, समाज दिशि बढ़ए पड़त। व्यक्तिवादी आ जातिवादी सोचसँ ऊपर उठि सामाजवादी एवं साम्यवादी सोचक पूजारी बनबाक खगता अछि। हमरा अहाँक मात्र नै जन-जनक दायित्व अछि जे संग-संग चलि दुनियाँक बीच अपन मातृभूमि, मातृभाषा, साहित्य, संस्कृतिकेँ ओइ रूपेँ जीवित बना कऽ राखी जे समृद्धशाली देशक मुख्य पहिचान अछि। आब अपन वक्तव्यमे विराम दैत एक फराक प्रसंगपर विचार करब आवश्यक बूझि आदेश लिअए चाहब आ कहब चाहब जे आजुक ऐ संगोष्ठिक आयोजक साहित्य अकादेमी अछि। जे प्राय: साहित्य समृद्धि लेल गोष्ठी-संगोष्ठि करबैत रहल अछि। किछु दिन पूर्व कोलकातामे सेहो भेल छल। आ होइते रहैत अछि। से प्राय: राजधानी, नगर-महानगरमे होइत रहैए। ओना प्रवासी मैथिली सेवी लेल हेबाको चाही। जे सभ जनै छी। मुदा गोष्ठी गामो-घरक शहर-कसबामे हुअए जेना झंझारपुर, मधेपुर, सकरी, धनश्यामपुर, मधुबनी, जयनगर, लोकहा, फुलपरास, िनर्मली, कुनौली, भपटियाही, सरायगढ़, या फेर पूर्णिया-समस्तीपुरक गामक कसबामे। ई सभ मैथिलीक नेटिव स्पीकर क्षेत्र छी। ऐ सभ क्षेत्रमे सेहो गोष्ठी-संगोष्ठी हेबाक चाही। ऐसँ आरो साहित्यकार सभ सोझा औताह। संभव, जे दिल्ली-मुम्बइ, कोलकाता आ पांडीचेरीक गोष्ठीसँ बेसी लाभदायक सिद्ध हुअए। खरचो कम आ लाभो बेसी, जइसँ एकान्त बासक साहित्य सृजक लोकनि मात्र नै अपितु पाठाकोक संख्यामे अप्रत्याशित वृद्धि होएत। जन-जनमे उत्साह सेहो जगत जइसँ हम सभ मजगूत हएब। काल्हियो कवि गोष्ठीक आयोजन हुअएबला अछि संभत: अही परिसरमे। ओइमे एकैसम शताब्दीक पहिल दसकक सर्वश्रेष्ठ कवि राजदेव मण्डल आ आन-आन कतेको कविकेँ कोनो सूचना नै छन्हि। जे दुखत अछि। आ ऐ तरहक सूची बनौनिहार लोकनिक सोचमे कि छन्हि से वएह सभ बता सकताह। ओ लोकनि गामक माटि-पानिमे लटा कऽ जीवकोपार्जनक संग साहित्य सृजन करैत रहलाहेँ। हुनको सभकेँ सूचना हेबाक चाहैत छल। ओतबे नै, अझुको गोष्ठीमे बहुतो युवा रचनाकार जेना उमेश पासवान, आशीष अनचिन्हार, चन्दन झा, संजीव साफी, विनीत उत्पल, संजय कुमार मण्डल, ज्योति सुनीत चौधरी, मुन्नी कामत, अमित मिश्र, अखिलेश कुमार मण्डल, सुमित आनन्द आ मनोज कुमार आदिकेँ कोनो सूचना नै देल गेलनि। अंतमे, प्रसंगसँ हटि चरचा कएल जे आवश्यक छल। जौं ऐसँ किनको दुख पहुँचल हेतनि तइ लेल क्षमा मंगैत एकबेर फेर साहित्य अकादेमीक संग अपने लोकनिक प्रति सादर आभार व्यक्त करैत अपन वाणीकेँ विराम दैत छी। सुजीत कुमार झा मिथिलाक कण कणमे रामसीता जनकपुरमे मात्र नहि पुरे मिथिलाञ्चलक घर घरमे सोहर गाओल जा रहल अछि । सभकेँ घरमे एक्के रंगकेँ उत्साह अछि । भगवान रामक रविदिन जन्म दिवस रहल अछि । उत्साहकेँ वर्णन करैत जनकपुर ७मे रहल मधुवनी वाली कहैत छथि भगवानक जन्म भलेही अयोध्यामे भेल होइक मुदा उत्सव हुनकर ससुरारिमे सेहो कम नहि । ओ सोहरकेँ एक पाँति सुनबैत कहैत छथि जँ जन्मल रघुनन्दन वन्धन टुटल रे, ललना हरि देलक दन्त गराई तुतना भेल मुरझाइृ......। जनकपुरक दू टा दरवारकेँ ओहिना सजाओल गेल अछि जेना विवाहपञ्चमी कालमे सजाओल जाइत अछि । सजाबएमे मिथिला दरवार आ अयोध्या दरवारमे प्रतिस्पर्धा देखल गेल अछि । अयोध्या दरवार अर्थात राम मन्दिरकेँ सजावएमे ओतएकेँ महन्थ एतेक व्यस्त छथि जे पते नहि चललन्हि शुक्रक राति कोना वित गेल । जन्मक उत्साह वर्णन करैत राम मन्दिरक महन्थ राम गिरी कहैत छथि जेना लागि रहल अछि हमरा घरमे भगवानकेँ जन्म भऽ रहल होइक । भगवानक जन्म त्रेता युगमे किए नहि भेल होइक यदि किछु आकर्षण नहि रहितैक तऽ आखिर एतेक लोक राम नवमीमे जनकपुर कोना अबैत । जनकपुर नगर पालिका ४ क पण्डित विद्यानन्द झा कहैत छथि औजी जँ रेल ठीक रहितैक, बस जीप आबएकेँ भारत सँ जनकपुरधरिकेँ नीक सुविधा रहैत तऽ देखितहुँ कतेक लोक जनकपुर अबैत अछि । भगवान राममे जे शक्ति अछि ओ कतए पाओत । राम नाम उरमे गहिओ जा कै सम नहि कोइ । जिह सिमरथ संकट मिटै दर्शु तुम्हारे होइ ।। जिनकर सुन्दर नामकेँ हृदयमे बसा लेला मात्र सँ सम्पूर्ण कार्य भऽ जाइत अछि । जिनकर समान कोनो दोसर नाम नहि अछि । जिनकर स्मरण मात्र सँ पुरे संकट समाप्त भऽ जाइत अछि । कलयुगमे नहि योग, नहि यज्ञ आ नहि ज्ञानक महत्व अछि । एक मात्र रामक गुणगाने सम्पूर्ण जीवकेँ उद्धार कऽ सकैत अछि । सन्तसभक कहब अछि । प्रमु श्री रामक भक्तिमे कपट, देखावा नहि आन्तरिक भक्ति मात्र आवश्यक अछि । गोस्वामी तुलसी दास कहैत छथि ज्ञान आ वैराग्य प्रभुकेँ पेवाक लेल मार्ग नहि अछि । वल्की प्रेम भक्ति सँ पुरे मैलि धोवा जाइत अछि । प्रेम भक्ति सँ मात्र श्री राम भेटैत अछि । छुटहि मलहि के धोएं । धूत कि पाव कोइ वारि विलोए ।। प्रेम भक्ति जल विनु रघुराइ । अभि अन्तर मैल कबहुँ न जाइ ।। अर्थात मैलिकेँ धोला सँ कि मैलि छुटि सकैत अछि । जलकेँ मथला सँ कि कोनो घी भेट सकैत अछि । अहिना पे्रम भक्तिरुपी निर्मल जलक विना भितरक मैलि कहियो नहि छुटि सकैत अछि । प्रभुकेँ भक्ति विना जीवन निरस अछि अर्थात रसहिन । प्रभु भक्तिक स्वाद, एहन स्वाद अछि जे एहि स्वादकेँ बुझि गेल ओकरा संसारक सभ स्वाद फिका लागत । भक्ति जीवनमे ओतवे महत्वपूर्ण अछि जतेक स्वादिष्ट भोजनमे नुन । भगति हीन गुण सव सुख ऐसे । लवन विण बहु व्यञ्जन जै से ।। अर्थात जेना नुनकेँ विना बढिया सँ बढिया भोजन स्वाद हीन होइत अछि ओहिना प्रभुकेँ चरणक भक्ति विना जीवनक सुख समृद्धि सभ फिका होएत अछि । रामक ऐतिहासिकता चैत महिनाक शुक्ल पक्षक नवमी तिथिक दिन भगवान रामक जन्म भेल अछि । भारतक चेन्नईकेँ एक गैरसरकारी संस्था भारत ज्ञान कतेको वर्षक शोध सँ ई पत्ता लगौलक अछि जे रामक जन्म ५११४ ई.पू. १० जनवरीक भेल छल । रामक विषयमे ई शोध मुम्बईमे कतेको वैज्ञानिक, विद्वान, व्यावसाय जगतक आगु प्रस्तुत कएल गेल छल । एहि शोधक तथ्यपर प्रकाश पारैत एकर संस्थापक ट्रष्टी डिके हरि कहलन्हि एहि शोधमे वाल्मीकि रामायणकेँ मूल आधार मानैत अनेक वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक, ज्योतिषीय आ पुरातात्विक तथ्यकेँ सहयोग लेल गेल अछि । रामक मिथिला संगक सम्बन्ध भगवान रामकेँ मिथिला संग सम्बन्ध सेहो प्रगाढ अछि । भगवान रामक विवाह मिथिला नरेश जनकक पुत्री सीता संग भेल रहय । मिथिलाक कण कणमे राम सीता रहल अछि । जनकपुरमे मात्र नहि पुरे मिथिलाञ्चलमे कोनो उत्सव होइक राम सीताक गुणगान विना ओ उत्सव पूर्णे नहि होइत अछि । जनकपुरक जानकी मन्दिरक महन्थ राम तपेश्वर दास वैष्णव कहैत छथि मन्दिरमे हरेक समय रहैत छी हरेक समय ई बुझाइत रहैत अछि भगवान राम जानकी एहिठाम छथि । ई स्थिति मिथिलाञ्चलक कतहुँ जाइत छी तऽ बुझाइत अछि । फेर जँ मिथिलाञ्चल सँ बाहर गेलहुँ तऽ कतहुँ नहि अनुभव होइत अछि ओ कहलन्हि । ३ किशन कारीगर अकछ भेल छी। (एकटा हास्य कथा) आई दस वर्षक बाद किछु काज स दरभंगा आएल रही। भींसरे भींसरे टेन स दरभंगा स्टेशन उतरले रही कि ने की फुराएल टहलैत टहलैत विश्वविद्यालय कैंपस आबि गेलहुँ। ओतए आबिते मातर सभटा पुरना संस्मरण कॉलेजक पढ़ाई विद्यार्थी जीवनक सभटा हँसी ठीठोला श्यामा माए मंदिर के चक्कर लगाएब जस के तस मोन परि गेल। ओई दिन सोमवार रहै तहू मे सावन महीनाक सोमवारी भक्त लोकनिक भिड़ भिंसरे स बढ़ि गेल रहै की कॉलेज के विद्यार्थी धीया-पूता जवान बुढ़ पुरान सभ पूजा करै लेल अपसियाँत भेल। विशेष कऽ माधवेश्वरनाथ महादेव मंदिर मे और बेसी भीड़। श्यामा माए मंदिर लग पोखरि अछि ओतए माधवेश्वर महादेवक मंदिर सेहो छैक। ओही ठाम श्यामा माए के दर्शन कए बाबाक पूजा लेल महादेव मंदिर अएलहुँ। बाबा के जल बेलपात चढ़ा पूजा केलाक बाद मंदिर स बाहर निकैल बैग पीठ पर लए बिदा भेल रही। कैमरा गारा मे लटकले रहए बिदा होइते रही की पोखरी घाट लक बाबा भेंट भए गेलाह। ओ बजलाह हौ बच्चा के छियह कारीगर एम्हर आब। बाबाक लग मे जा हुनका प्रणाम केलियैन त ओ बजलाह नीके रहअ। अईं हौ कारीगर इ कहअ दारही कटा लेबह से नहि अहि दुआरे त चिन्हैअ मे धोखा भए गेल। गारा मे कैमरा लटकल देखलिय त मोन परल जे कहीं तू दरभंगा आएल हेबह। आब ज तूं दरभंगा आबिए गेल छह त हमर पंचैती कए दैए हौ बच्चा कि कहियअ हम त अकऽक्ष भेल छी। बाबाक गप सुनी हमरा हँसी स रहल नही गेल। हँसैत हँसैत हम बजलहुँ अइ यौ बाबा अहाँ किएक अकऽक्ष भेल छी आ कथिक पंचैयती। बाबा तामसे अघोर भेल बजलाह अईं हौ कारीगर हम अकऽक्ष भेल छी आ तू दाँत चिआरै मे लागल छह। हम बजलहु यौ बाबा अहाँ जुनि खिसियाउ एकटा गप कहू त अहू सन औधरदानी महादेव ज अकऽक्ष भेल अछि त हमरा सभहक केहेन हाल हेतै। बाबा अपने त सौंसे दुनियाक पंचैयती करैत छी हम एकटा छोट छीन भक्त अहाँक पंचैती कोना करब। बाबा फेर बजलाह हौ बच्चा अप्पन सप्पत कहैत छियैह सत्ते मे हम बड्ड अकऽक्ष भेल छी। हम बजलहुँ यौ बाबा अकऽक्ष त हम मीडियावला सभ भेल छी ख़बर लिखैत आ संपादित करैत, एक चैनल के नोकरी छोरि दोसर चैनल के नाकरी पकड़ैत, मीर्च मसल्ला वला ख़बर बनबैत सुनबैत, चैनल मालिक के दवाब रूआब सहैत, बौक जेंका चुपचाप अकऽक्ष भेल छी। हमर गप सुनि बाबा बजलाह आब हमरो गप सुनबहक की अपने टा कहबहक। हम बजलहुँ नहि यौ बाबा इहेए बात त पुछै लेए छलहुँ जे अहाँ किएक अकऽक्ष भेल छी। बाबा डमरू डूगडूगबैत बजलाह हइए लेए सुनह सबटा राम कहानी जे हम किएक अकऽक्ष भेल छी। हौ बच्चा पहिने एकटा फोटो खीच दैए ने भने चैनलो पर ब्रेकिंग न्यूज़ चला दिहक जे बाबा अकछ भेल छथि। लोको त बुझतै ने जे हम केहेन कष्टमय जिनगी जीबि रहल छी। हम बजलहुँ ठीक छैक बाबा अहाँ बजैत जाउ आ हम रेकड केने जाइत छी आ फोटोओ खीच दैत छी मुदा इ कहू जे आई अहाँक त्रिशूल कतए रहि गेल। बाबा अंगोछा स मुँह पुछैत बजलाह हौ कारीगर की कहियअ हौ हम जिबैत जिनगी अकछ भेल छी। गणेश कार्तिक दुनू टा खूरलुच्ची हरदम लड़ाई करैत रहैए एकटा कहैत छै जे हम त्रिशूल ल के नाचब त दोसर कहैत छै जे हम डमरू बजा के नाचब। अहि कहा कही मे इ दुनू टा मुक्कम-मुक्की घिच्चा-तिरी क हमर डमरू सेहो फोरि दैत अछि। एकरा दुनू टा दुआरे हम अकछ छी। हौ बच्चा ततबेक नही कि कहियअ हौ नहा धोहआ के बघम्बर पसारि दैत छियैक मुदा कार्तिक के मयूर ओकरा ओई गाछ पर स ओई गाछ पर ल जा के लेरहा घोरहा दैत अछि। तै पर स गणेशक मूस ओकरा कूतैर फूतैर दैत अछि। तूही कहअ त बिना बघम्बर के कोना हम रहब कियो देखनिहार नै कोइ ने टहल टिकोरा क दैत अछि हम त तहु दुआरे अकछ भेल छी। तूहीं कहअ ने आबक धीया-पूता के लिखा पढ़ा के कि हेतै। हम बजलहुँ आब की भेल यौ बाबा। हमर गप सुनी ओ बजलाह हौ बच्चा तूं बरि खाने बुझहैत छहक कहलियअ त जे हम अपने घरक लोक स अकछ भेल छी। हौ बच्चा तोरा सभटा गप की कहियअ जहिया स गणेश के शिक्षामित्र के नोकरी भेटलै आ कार्तिक के पुल बनबै के सरकारी ठिकेदारी भेटलै दुनू गोटे एक्को बेर घूइरो के ने देखैत अछि जे हम जीबैत छी आ की मूइल। तही दुआरे तूंही कहअ ने एहेन धीया-पूता कोन काजक जे बूढ़ माए बाप के बुरहारी मे मरै लेल गाम मे असगर छोड़ि दैत अछि आ अपने नोकरी मे मगन भेल सभटा आचार-विचार बिसरैत सामाजिक कर्तव्य सँ मुह मोड़ि लैत अछि। ई गप कहैत-कहैत बाबाक आखि नोरा गेलैन ओ आंखिक नोर पोछि हिंचकैत बजलाह हौ बच्चा आब बुरहारी मे गौरीए दाए टा एकमात्र सहारा। मुदा आब हुनको अवस्था भेलैन ओकरो की दोष। कहैत छियैए जे भांग पीस दियअ त गौरी दाए बजैत छथि आब हमरा भांग पीसल नहि होएत बेसी छौंक लागल अछि त चलि जाउ विश्वविद्यालय कैंपस, शंकरानंद ओइ ठाम भरि छाक भांगक लस्सी पीबि लेब। ओइ ठाम सीएम सांइस आ मारवाड़ी कॉलेज के विद्यार्थी सभ भांग खाई लेल सेहो अबैत छैक। हौ बच्चा हम त तहू दुआरे अकछ भेल छी। आब हम एक्को मीनट दरभंगा मे नहि रहब तूं हमरा नेने चलह अपने संगे दिल्ली। हम तोरे साउथ एक्स वला डेरा पर रहब ज जारो बोखार लागत त ओही ठाम एम्स मेडिकल लग्गे मे छै ओतए देखाइओ दिहअ। हम बजलहुँ हं हं बाबा चलू ने इ त हमर सौभाग्य जे अहाँक टहल टिकोरा करबाक हमरा अबसर भेटत। बाबा बजलाह हौ बच्चा एकटा गप तोरा कहनाइ त बिसैरे गेलियै रूकह कनि, हइए मोन परि गेल। कारीगर सभटा गप तू की सुनबहअ हौ हम की कहियअ ई भागेसर पंडा दुआरे सेहो हम अकछ भेल छी। हम हुनका स पुछलियैन से किएक यौ बाबा। त ओ बजलाह हौ कि कहियअ आब महादेव मंदिर मे बोर्ड लगा देलकैयै। हम जिज्ञासावस पुछलहु कथिक बोर्ड यौ बाबा। ओ फेर बजलाह हौ बच्चा श्यामा माए मंदिर मे एकटा बोर्ड लागल छैक मुंडन-51रू, यज्ञोपवित-151रू, विबाह-251रू, आ बलिप्रदान-501रू तही के देखा देखी भागेसरो हमरा मंदिर मे एकटा बोर्ड लगा देलकैए जे बाबाक स्पेशल पूजा-501रू, डमरू बजा के पूजा करब-201, दूध चढ़ाएब-151 आ भांगक स्पेशल परसादी-101रू। देखैत छहक जहिया स ई बोर्ड लगलैह तहिया स त हम और बेसी अकछ भेल छी। हम बजलहुँ से किएक यौ बाबा त ओ बजलाह कि कहियअ विद्यार्थी सभ भांगक परसादी दुआरे मंदिरे मे मुक्कम मुक्की, घिच्चम-तिरी, देह हाथ तोरा-फोरी कए लैत अछि। ततबेक नहि पिछुलका सोमवारी दिन त कि कहियअ एकरा सबहक झग्गरदन मे हमर त्रिशूल टुटि गेल हम त आब तहु दुआरे अकछ भेल छी। ओ सभ नीक नहाति पढ़तह नहि आ परीक्षा मे फेल भेला पर वा कम नम्बर अएला पर हमरो गरिअबैत अछि। जे हे जरलाहा महादेव केहने बेईमान छह पास करा दैतह से नहि हौ बच्चा हम त आब तहू दुआरे अकछ भेल छी। जगदानन्द झा 'मनु' ग्राम पोस्ट- हरिपुर डिह्टोंल, मधुबनी जबाड़ भोज एकादशाक भोज, गामक डीलर साब केँ बाबूक एकादशा | डील-डोल सँ सम्पूर्ण जेबाड केँ नोतल गेल | दसो गामक लोक सभ कियो बैल गाड़ी सँ कियो साईकिल सँ कियो पएरे, साँझक छ ए ' बजे सँ लोकक करमान एनाइ शुरू | नोथारी सब आबि-आबि कँ बैसति | बैसअ केँ पूर्ण व्यबस्था | करीब पेंतीस हाथक तँ डीलर साब केँ दलाने छनि आ आबैबला आगुन्तक केँ धियान राखि दलानक आगाँक बारी-झारी केँ साफ सुथरा कए कँ एहेन सामियाना लागल जे ओहि में पाँच सए लोग एक संगे बैस सकैत अछि | व्यबस्थाक कोनो कमी नहि | भोजन सँ पूर्ब सब व्यबस्था देखि रमणजी स्वं केँ रोकि नहि सकला आ अपन लग में बैसल सुबोधजी सँ बजला - "कीयौ दोस्त डीलर तँ कोनो तरहक कमी नहि छोरलनि, एतेकटा सामियाना, एतेक लोक केँ नोतनाइ........." सुबोध - "हाँ" रमण - "जबाड नोतनाइ कोनो मामूली गप्प छैक ओहू में एतेक डील-डोल सँ, खाजा, मूँगबा, पेन्तोआ, रसगुल्ला आ सभ नोथारी केँ एक-एकटा लोटा सेहो |" सुबोध - "सुनलहुँ तँ हमहुँ इहे सभ | " रमण - " कि अपने की कहै छीयैक, सभटा कतेक खर्चा डीलर केँ लागि जेतैन |" सुबोध - "हम कोना कहु, हम तँ नहि कहियो जबाड खुवेलहुँ |" रमण - "छोरु अहाँ केँ तँ सदिखन मुह फुलले रहैए, ओना हमारा हिसाबे आठ-दस लाख रुपैया तँ लगबे करतैन |" सुबोध - "आठ-दस लाख रुपैया डीलर केँ लेल कोन भारी ओनाहितो हुनकर बरखो केँ लौलसा छ्लैंह जे कहिया बाबू मरथि आ ओ दिन आबि गेलहि तँ खुश तँ हेबे करता, ख़ुशी में आठ लाख की आ दस लाख की..... |" अनाथ अस्सी बरखक सोमनाथजी भरल-पुरल संसार छोरि अपन प्राण विशर्जन कए लेला | सभ मनोकामना पूर्ण तैयो सांसारिक मोह माया सँ बान्हल, सभ कियो हुनक मृत देह केँ चारू कात सँ घेरने, दुखी, व्याकुल, कनैत | दुटा बेटा, दुनूक पुतौह, पोता-पोती सब संगे, खाली बड़का बेटा मुंबई में नोकरी करैत | हुनको तिन चारि दिन पहिले सोमनाथजीक बिगरल स्वास्थ केँ बाबत फोन भए गेल रहनि आ ओ गाम हेतु बिदा सेहो भए गेल रहथि | आब कोनो घड़ी आबि सकैत छलथि | सोमनाथजी बड़का बेटाक आगमन | हुनका आबैत देरी सभ समांगक कननारोहट में बिरधि भए गेलनि | हुनकर छोट भाई हुनका देखते देरी भरि पाँज कँ पकरि कनैत - "भईया --- बाबू छोरि चलि गेला हुं-हुं ..... आब केँ देखत ... " बड़का छोटका केँ करेज सँ लगेने हुनक पीठ केँ सहलाबैत स्नेह सँ -"नै रे तूँ किएक कनै छें, तोरा लेल तँ एखन हम जीबैत छीयौक तोहर सब कीछ | अनाथ तँ आई हम भए गेलहुँ, मए चारि बर्ख पहिले चलि गेली आ आई बाबूओ...." मार बाढ़नि- तेसरो बेटीए हेमंत बाबूक बेटी रोशनी, अपन नामक अनुरूपे अपन कृतीक पताका चारू कात लहराबति, आईएएस केँ परीक्षा में भारत वर्ष में प्रथम दस में अपन स्थान अनलथि | समाचार सुनि हेमंत बाबू दुनू परानीक प्रशन्नताक कोनो ठीकोने नइँ | जे सsर सम्बंधी आ समाजक लोक सुनलनि सेहो सभ दौड-दौड आबि हेमंत बाबूकेँ बधाइ दैत | रोशनी बड्डका जेठका सभ केँ प्रणाम करैत आशीर्वाद लैत | फूलो काकी फूल जकाँ हँसैत- बजैत एलि, रोशनी हुनक दुनू पैर पकरि आशीर्वाद लेबैक लेल झुकलि | फूलो काकी रोशनी के अपन करेजा सँ लगबैत टपाक सँ बजलि- "हे यौ हेमंत बौआ, अहाँक तेसर ई फेक्लाही बेटी त ' सगरो खनदान केँ जगमगा देलक |" हुनकर एहि गप्प पर सभ कियो ठहाका मारि क ' हँसय लागल | मुदा हेमंत बाबूक आई सँ एक्किश बर्ख पाछूक यादि में विलीन भय गेला - - दुटा बेटी भेला बाद कोना ओ बेटाक इक्षा में मंदिरे -मंदिरे देवता पितर केँ आशीर्वाद लेल भटकैत रहथि | मुदा हुनकर सबटा मेहनत बेकार भेलनि जखन हुनक कनियाँक तेसर प्रसब पीड़ा केँ बाद फूलो काकीक अबाज हुनकर कान में परलनि -"मार बाडहैन ई तेसरो बेटीए जन्म लेलक....." एहि बातक आँगा हुनका किछु नहि सुनाई देलकैंह | जेना की अपार दुख सँ मोन में कोनो झटका लागल होइन, ओ अपन जगह पर ठार केँ ठारे रहि गेल रहथि | की भगवती हमर घर एती? मोहंती बाबा | सगरो गामक बाबा | गाम में सब हुनका बाबा कहि कय संबोधित करै छनि जेकर कारण छैक हुनकर बएस | पनचानबे बर्खक मोहंती बाबा अपन कद काठी आ डीलडोल सँ एखनो अपन उम्र केँ पछुआबैत, लाठी टेक क ' गामक दू चक्कर लगा क ' आबि जाई छथि | मुदा अपन गाम भगवतीक दर्शन करैक हेतु कहियो नहि जाई छथि | गाम में बनल विशाल भगवतीक मंदिर, भगवती बड्ड जागरन्त चारू कातक बीस गाम में भगवतीक महिमाक चर्चा छैन्ह | गामक मानयता केँ हिसाबे गामक सब कियो एक ने एक बेर भगवती घर दर्शन हेतु अबश्य जाई जै छथि | गर्मीक छुट्टी में बाबाक पोता जे की दिल्ली में कोनो प्रतिष्ठित काज करै छला, गर्मी बिताबै आ आम खेबाक इक्छा सँ गाम एला | ओहो गामक परम्पराक निर्वाह करैत भगवतीक दर्शन कय क' एला | एला बाद दलान पर बैसल बाबा संगे गप सप होइत रहलै | गपक बिच संजय बाबा सँ पुछलाह-" बाबा अहाँ भगवती घर नइँ जाई छियैक |" बाबा -"नइँ" संजय -"किएक" बाबा -"हौ बौआ, भगवती घर त' सब कियो जाइत अछि, मुदा भगवती केकरो-केकरो घर जाइ छथिन | हम अपन मन आ स्वभाब केँ एहेन बनाबैक प्रयास में छी जे भगवती हमर घर आबथि |" संजय बाबाक मुँह सँ एहेन दार्शनिक गप सुनि अबाक रहिगेल आ सोचय लागल जे की ओकर मन आ स्वभाब एहेन छैक जे कहियो भगवती ओकर घर एती ? आ ओकर अबाक रहैक कारण रहै सायद नइँ | एक करोड़क दहेज संजना आ संजय केँ विवाहक तैयारी में जोर-सोर सँ संजना केँ पिताजी आ हुनक सभ परिबार तन-मन-धन सँ लागल | संजना आ संजय दुनु एक्के संगे मेडिकल में पढ़ै छल ओहि बिच दुनु में पिआर भेलैंह आ आब सभहक बिचार सँ विवाह भय रहल अछि | चूकी संजय केँ पिताजी अपन ऑफिस कए काज सँ युएसए गेल रहथि आ एहि ठाम हुनक अभाब में हुनकर सबटा काज हुनक छोट भाई अर्थात संजय केँ कक्का केलन्हि | आब काईल्ह विवाह छैक त' ओ आई गाम एलाह | गाम परक सभ तैयारी देख ओ प्रशन्न भेला | बातक क्रम में हुनका ज्ञात भेलन्हि जे कन्यागत दिस सँ पंद्रह लाख रुपैया दहेज सेहो संजय कें कक्का तय केलन्हि आ कन्यागत देबैक लेल सेहो मानि गेल छथि | मानितथि किएक नहि उच्च कुल-खनदान, वर डॉक्टर,वरक बाबू बड्डका डॉक्टर, गाम में सय बीघा खेत, बेनीपट्टी में शहरक बीचो-बिच चारि बीघाक घडारी | मुदा संजयक बाबू केँ ई बात सँ किएक नहि जानि खुसी नहि भेलैंह | ओ तुरंत ड्रायबर केँ कहि गाड़ी निकलबा कन्यागत ओहिठाम पहुँचलाह | काईल्ह विवाह छै आ आई वरक बाबूजी उपस्थीत, मोनक संका केँ नुकबैत कन्यागत दिस सँ कन्याँक बाबू सहीत सभ दासोदास उपस्थीत | पानि, चाह शरबत, नास्ता,पंखा सब प्रस्तुत कएल गेल | संजयक बाबू ओई सभ केँ नकारैत दू टूक बात संजनाक बाबू सँ बजलाह -" समधि कनी हमरा अपने सँ एकांत में गप्प करैक अछि |" हुनक संकेत पाबि सभ गोते ओहि ठाम सँ हति गेलाह,मुदा सभहक मोन में अंदेसा भरल, कतेको गोटा दलानक कोंटा सँ सुनैक चेष्टा में सेहो | सभ केँ गेला बाद संजयक बाबू संजनाक बाबू सँ -"समधि ! हम त' एखने दू घंटा पहिने युएसए सँ एलहुँ क्षमा करब पहिने समाय नहि निकालि पएलहुँ, मुदा ई की सुनलहुँ अपने पन्द्रह लाख रुपैया दहेज में दय रहल छी |" संजनाक बाबू दूनू हाथ जोरने -"हाँ समधि जतेक अपनेक सबहक मांग रहनि हम अबस्य पूरा करबनि |" संजयक बाबू -"जखन मांगेक बात छैक त' हमरा एक करोड़ रुपैया चाही |" ई सुनिते संजनाक बाबुक आँखिक आँगा अन्हार भय गेलैंह, आ आनो जे सुनलक सेहो दांते आँगुर कटलक | संजनाक बाबू पुर्बबत दूनू हाथ जोड़ने -"एहेन बात नहि कहु समधि पंद्रह लाख जोडै में त' असमर्थ छलहुँ आ ई एक करोड़ त' हम अपनों बीका क' नहि आनि सकै छी |" कहैत निचा झुकलनि शायद संजयक बाबूक पएर पकडैक चेष्टा में मुदा निचा झुकै सँ पहिले संजयक बाबू हुनका उठा अपन करेजा सँ लगा -"ई की पाप दय रहल छी, पएर त' हमरा अपनेक पकरबा चाही जे अपने अपन बेटी दय रहल छी | आ रहल पाई त' हमरा एक्को रुपैया नहि चाही भगबानक कृपा सँ हुनक देल सब किछ अछि | आ एक करोड़क बात तकरा क्षमा करब ओ छ्नीक ठीठोली छल, जखन मांगने पंद्रह लाख भेटत त' एक करोड़ किएक नहि जे आगु कोनो काजो नहि कर' परए | आ दोसर की अपनेक बेटी आ हमर पुतौह एक करोड़ सँ कम केँ छथि हा हा हा .... | एका एक चारू कात नोराएल आँखि सँ ड़बड़बेल खुशिक ठहाका पसरए लागल | उपकार रग्घू कनियाँ पीलिया सँ ग्रस्त अंतिम अवस्था में दिल्लीक लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में आई दस दिन सँ भर्ती जीवन आ मृत्युक बिच संघर्ष करैत | पीलिया केँ अधिकता आ कोनो आन कारणे आँखि में से इन्फेक्सन भय गेलनि | लोकनायक जयप्रकाश अस्पतालक डाक्टर रग्घू सँ कहलकनि जे कनियाँक आँखि लोकनायक जयप्रकाश अस्पतालक बगले में आँखिक अस्पताल गुरुनानक आई हॉस्पिटल छैक ओहिठाम सँ जाँच करा क' आनै लेल | रग्घू डाक्टरक बात मानि एहि काज में लागि गेला | लोकनायक आ गुरुनानक दुनु सरकारी अस्पताल छैक तैं खर्चाक बात नहि मुदा रग्घू केँ बोनि मजुरी रहैन रोज कमाऊ आ रोज खाऊ आ आई दस दिन सँ अपन बोनि छोरि कनियाँ संगे एहि ठाम अस्पताल में छथि | दस दिन सँ नव काज नै | जमा पूंजी खत्म | एखन तत्काल लोकनायक सँ गुरुनानक अस्पताल तक जाई में पन्द्रह रुपैया जईती आ पन्द्रह रुपैया आईबती, कुल तिस रुपैया चाहि | हुनका लग छलनि कुल दस रुपैया | ओहि दस रुपैया में अपन किछ नास्ता भोजन सेहो, कनियाँ केँ त' अस्पताले में भेट जाइ छलनि | ओई ठाम सँ काज करै लेल कतौ जेबों करता ताकी पाई होईन त' कम सँ कम दस रुपैया बस भारा चाहियैन | इ सब समस्या केँ जनैत रग्घूक कनियाँ रग्घू सँ कहलनि- " फोन कय क' अपन भैया सँ दू सय रुपैया मईन्ग लिय, काइल्ह-परसु काज केला बाद पाई होएत त' दय देबैन |" रग्घू अपन कनियाँ केँ कन्हा पर उठा लोकनायक सँ गुरुनानक अस्पताल केँ लेल बिदा भ' गेला आ चलैत-चलैत बजला -"अहाँ जुनि चिंता करु, रिक्सा सँ नीक सबारी हमर पिठक होएत आ रहल इ मुसीबत त' ई त' चारि दिन बाद खत्म भय जाएत मुदा केकरो उपकार सधबै में पूरा जीवनों कम परत |" बलिक छागर बिवाहक मंडप, चारू-कात हँसी- मजाक, हर्ष-उल्लासक वातावरण, मुदा दूल्हा चूप,शांत | बराती में सँ एक दोस्त दोसर सँ -"बताऊ एतेक खुशिक वातावरण में सब प्रसन्य अछि परञ्च वरक मुँह पर खुसी नहि देखा रहल अछि किएक ?" दोसर दोस्त भांगक नसा में हिलैत-डूलैत -"भाई बलि सँ पूर्व छागर कएतौ प्रसन्य रहलैए |" 2-जगह महानगरीय जिवन के अव्यवस्थित आ व्यस्त जिवन में समाय के आगु लचार आजुक जिवन शैली | रामप्रकाश के माय अपन बेटा-पुतौह आ पाञ्च बर्खक पोता कए दर्शन आ किछु दिन हुनक संग बिताबैक लोभ में अपन गाम सँ दिल्ली रामप्रकाश लग एलथि | रामप्रकाश एहिठाम सरकारी दू कोठलीक मकान में रहै छथि | माय कए आगमनक बाद, जगह कें दिक्कत कारणे हुनकर ओछैन बालकोनी में एकटा फोल्डिंग खाट पर लगाएल गेल | राति में एसगर निन्द कें अभाबे करट बदलैत, माय कें मन में ओहि दिनक सुमरण आबि गेलैन्ह, जखन गामक फुश कें एक कोठलीक घर में केना ओ दुनु बियक्ति अपन तिनटा बच्चा संगे गुजारा करैत छलथि, मुदा आई एहिठाम ओ बच्चा दू कोठलीक घर में मायक निर्वाह में असमर्थ बालकोनी में ओछैन केलक | माय कें आँखि सँ नोरक बूंद टपकैत, नै जानि केखन आँखि लाइग गेलैन्ह | खुशी कलुआही, बुध दिनक हटिया, चारुकात भीर-भार, बेपारी आ खरीदारक हल्ला-गुल्ला, कियो बेचै में व्यस्त तs कियो कीनै में मस्त | दीनानाथजी अपन कनियाँ संगे हटिया में प्रबेश कएलथि | हाटक मुँहे पर एकटा सात-आठ बर्खक बच्चिया हाथ में धनी-पात लेने हल्ला करैत -"एक रुपैया कें दू मुठ्ठी, एक रुपैया कें दू मुठ्ठी" मुदा सब कियोक ओकर बातकें अनसुना करैत हाटक भीर में बिलीन भेल जाएत | दीनानाथजी सेहो ओकर बात कें सुनैत हाटक भीर में मिल गेलाह | दू घंटा बाद, जखन दीनानाथजी अपन खरीदारी पूरा केलाक बाद हाटक मुँह पर वापस एला तs देखला, धनी-पात बाली बच्चिया पूर्ववत असगरे हल्ला करैत | दू मिनट मोन भय ओहिठाम ठार भेला | हुनक कनियाँ -"चलून धनी-पात तs अपने बारी में बड्ड अछि " दीनानाथजी -"कनी रुकू ", कहैत आगु धनी-पात बाली बच्चिया सँ -"कोना दै छिही बुच्ची" बुच्ची-" बाबु एक रुपैया कें दू मुठ्ठी, मुदा एखन तक किच्छो नै बिकेल, अहाँ एक रुपैया कें तिन मुठ्ठी लय लिय " दीनानाथजी -"सबटा कतेक छौ" बुच्ची गनैत -"एक,दू,- - सात, आठ - - - बारह,तेरह - - - उनैस, बीस, बीस मुठ्ठी बाबूजी " दीनानाथजी -"सबटा दय दे " कनियाँ -"हे-हे की करब ?" दीनानाथजी कनियाँ कए इशारा सँ चुप करैत, अपन कुर्ताक जेबी सँ एकटा दस रुपैयाक नोट निकालि कs बुच्ची कें देला बाद धनी-पात लैत, ओहिठाम सँ बिदा भय गेला | घर अबैत, दलान पर बान्हल जोड भैर बरद, हुनक आहटे सँ अपन-अपन कान उठा कय मानु सलामी देबअ लागल | ओहो आगु आबि कs स्नेह सँ दुनु कें माथ सहलाबैत,अपन झोरी सँ धनी-पात निकालि नाईद में दय देलखिन्ह | कनियाँ-"ई की कएलहुँ दस रुपैयाक धनी-पात बरद कए दय देलियै, एतेक कए घास लैतहुँ तs बरद भैर दिन खैतए " दीनानाथजी -"कोनो बात नहि दस रुपैया तs सभ कें देखाई छैक मुदा ओई धनी-पात बाली बच्चिया कें मुँह पर जे असंतोस,निरासा आ दुखक भाब रहैक ओ केकरो नै देखाई | आ देखलीयै बिकेला बादक खुसी, ओई खुसिक मोल कतौ दस रुपैया सँ बेसी हेतैक |" आठ लाखक कार कलुआही जयनगर राजमार्ग, बरखाक समय, पिचक काते-कात खधिया सब में पानि भडल | दीनानाथजी आ हुनक जिगरी दोस्त रामखेलाबनजी, दुनू गोटा अपन-अपन साईकिल पर उज्जर चमचमाईत धोती-कूर्ता पहिर, पान खाइत, मौसमक आनन्द लैत बतियाइत चैल जाइत रहथि | कि पाछु सँ एकटा नव चमचमाईत बड्डका एसी बुलेरो कार दीनानाथजी कें उज्जर धोती-कूर्ता पर थाल-पानि उड़बैत दनदनाईत आगु निकैल गेल | दुनु दोस्तक साईकिल एका-एक रुकल | रामखेलाबनजी हल्ला करैत कारबलाकें गरिएनाई शुरू केलैन्ह | दीनानाथजी- "रहए दियौ दोस्त किएक अपन मुँह खराप करै छी, एसी कार में बंद कि सुनत, भागि गेल | ओनाहो ओ आठ लाखक कार पर चलैत अछि, हम आठ सय कें साईकिल पर छी तs पानि- थालक छीत्ता तs हमरे परत |" कुण्ठित मानवता घर में मुरारीजिक कनियाँ अपन आठ बर्खक बेटा आ पाञ्च बर्खक बेटी कें कोनोना सम्हारै में लागल, मुदा हुनक मोनक भाव सँ साफ देखा रहल छल जे हुनकर मोन पुर्णतः मुरारीजी पर लागल छलैन, जे की रातिक दस बजला बादो एखन तक नोकरी सँ घर नहि एलथि | कोनोना दुनु बच्चाकें सुतेलथि | समयक सुई सेहो आगु वरहल | दस सँ एगारह बाजल | हुनक मोन में संका सबहक आक्रमण भेनाई स्वभाबिक छल | इना त एतेक राति पहिले कहियोक नहि भेलै | सहास करैत घर सँ बाहर निकैल, अपन भैंसुरक अंगना पहुँचली | हुनका सब कें कहला बाद शुरू भेल युद्धस्तर पर मुरारीजिक खोज | मुदा सब मेहनत खाली मुरारीजिक कोनो पता नहि | हुनक आडामिल जाहिठाम ओ काज करैत छलथि सँ ज्ञात भेल जे हुनक छुट्टी तs साँझु पहर पाँचे बजए भs गेल रहैन आ ओ अपन साईकिल सँ एहिठाम सँ बिदा सेहो भय गेल रहथि | तकैत-तकैत भोरे चारि बजे हुनक मृत-देह पिपरा घाटक सतघारा बला धूरि पर भेटल | देखते मातर सबहक हाथ-पएर सुन्न | कनाहोर मचल | बाद में स्थानीय प्रतक्षदर्शी सँ ज्ञात भेल की ओ एहिठाम साँझ कए साते बजे सँ छथि, किछु गोटे हुनका हाथ-पएर मारैत देखि बजैत रहेजे -'बेसी शराब पि क' ड्रामा कय रहल अछि |' मुदा हाय रे कुण्ठित मानवता कियोक हुनक बास्तबीक कारण बुझहक प्रयास नहि कएलक, नहि तs ओ एखन जिबैत रहितथि | हुनका तs एपेडेंसीक दर्दक बेग रहैन आ समय पर उपचार नहि हेबाक कारणे ओ चलि बसला | दुर्गानन्द मण्डल कुकर्मा मिथिलांचलक राजधानी जिला मधुबनी धरमपुर गाममे एकटा प्रकाण्ड विद्वान ज्योतिषी रहै छलाह। ज्योतिषी विद्यामे एकदम निपुण जइसँ भूत, वर्त्तमान आ भविष्यक नीक ज्ञाताक रूपमे जानल जाइ छलाह। एक दिन मधेपुर प्रखण्डक लौफा गामसँ सत्यनारायण भगवानक चौपहरा पूजा करा सबेरे-सकाल गाम अबै छलाह। बाटमे, जोरला गाम जखन एलाह तँ देखलनि। हाइ स्कूल जोरलाक पाछाँ बहति मरता धारमे एकटा नरमुण्ड धारक कातमे राखल छैक। जइपर लिखल छलै “किछु कर्म भऽ गेलै आ किछु बाकी अछि। एकटाक जनम आ तीनक मृत्यु।” ज्योतिषी जीकेँ हरलनि ने फुड़लनि, नरमुण्डकेँ उठा झोरामे रखि लेलनि। घर आबि चुपचाप, एकटा उज्जर कप्पासँ बान्हि, चिनवारमे खोंसि देलनि। मुदा पण्डिताइनकेँ ऐ संबंधमे किछु ने कहलकनि। एक-आध दिनक बाद पण्डिताइनक नजरि ओइ उज्जर कप्पापर पड़लनि। सोचथि आखिर की बात छिऐ जे आन दिन जे किछु ज्योतिषीजी लाबथि तँ हलसि कऽ कहथि जे पण्डिताइन ई लिअ उ लिअ, हे एकरा राखू ओकरा उसारू। मुदा.....। पण्डिताइनकेँ हरलनि ने फुड़लनि ओ जिज्ञासावस कप्पामे बान्हलकेँ उतारि कऽ देलखनि, नरमुण्ड देखिते बताहि भऽ गेलीह आ तामसे ओइ नरमुण्डकेँ उक्खरिमे दऽ समाठ लऽ बढ़ियासँ कुटि बुकनी-बुकनी कऽ देलनि। आ एकटा सीसीमे ओइ बुकनीकेँ भरि भनसा घरक चारमे खोंसि देलनि। आ सगर पोखरिमे एकटा मात्र पोठी जे कहबी छै, अति सुन्नरि नाम सुनयना वएस सोलह बर्ख अपन बेटीकेँ कहलनि- “ऐ सीसीमे माहुर अछि। एकरा कियो ने छुअए आ ने खाए, जौं खएत तँ मरि जाएत।” सुनयना नामक अनुरूप ओतबे सुन्नरि। बेस गोरि-नारि नमगर-छड़गर-पोरगर केराक वीर जकाँ कोमल आ सुन्दर। सोल्हम साउन पार केने, अनेरे आँखियोक भाषासँ गप्प करैवाली। सुनयनाक आँखिमे धार तेहेन जे बिनु कटनहि आँखिसँ घाएल करैवाली। दिन-राति प्रेमक बोखारमे बौआइतो मुदा ज्योतिषीक मर्यादाकेँ अखन धरि बचौने। उमेरक संग जे लांछन होइ छै से एक-कान-दू-कान होइत पण्डिताइन आ ज्योतिषी जीक कानमे पहुँचए लगल। कहबियो ठीके छै जे बेटी जखन जुआन होइ छै तँ घरबैयाकेँ बादमे मुदा बहरबैयाकेँ पहिने पता लागि जाइ छै। टोल-पड़ाेसक लोक काना-फुसी करए लगल जे पण्डिताइनक बेटी तँ फल्लमाक बेटासँ बुढ़ियागाछीमे गप-सप्प करै छलै। एक-आध दिनक बाद फेर कियो गप्प उखाड़ि दइ जे ज्योतिषी जीक बेटी तँ अरूण डाक्टरसँ हँसि-हँसि कऽ काली स्थानमे गप करै छलै। एकदिन सुखेतोवाली कनिया बाजलि छलीह जे पण्डिताइनक बेटी रामदेब बाबूक खेतमे बदामक साग तोड़ै छलै। हुनक मझिला बेटा आड़िपर ठाढ़ भऽ रेडी बजबै छलै आ बड़ीकाल धरि दुनू गोटे हँसि-हँसि कऽ गप-सप्प करै छलै। अर्थात् एक-आध दिनक पछाति सुनायनासँ जुड़ल कोनो-ने-कोनो गप्प-सप्प चलिते रहैत छलै। ज्योतिषीजी बेटीक ई किरदानी सूनि सत्यनारायण भगवानकेँ कहथिन- “हे भगवान एक तँ एकटा कुलकन्या देलह, तहूपर एतेक मानि हानिक गप्प! एे सँ तँ खनदानक बड़ हानि भऽ रहल अछि। ऐसँ तँ नीक होइत जे सुनायना जहरो-माहुर खा लइतए आ ऐ दुनियाँसँ उठि जइतए।” ई गप्प बूझू जे हरिदम ज्योतिषी जीक मुँहसँ निकलैत रहै छलनि। सुनायना एकदिन सुनलक, दोसर दिन सुनलक आ तेसर दिन जखन सुनैत-सुनैत बरदाससँ फाजिल भऽ गेलैक तँ सोचलक जे भनसा घरक चारमे माए तँ माहुरक एकटा सीसी खोंसि रखने अछि। से आइ उ माहुर खा अपन प्राण तियागब। सुनायना ओइ राति सएह केलक। मुदा ओ तँ जहरक सीसी छल नै। छल तँ ओइ नरमुण्डक चूर्ण जइपर लिखल छलै, किछु भऽ गेल आ किछु बाकी..। जे खएलासँ सुनायना मरल तँ नै मुदा गर्भवती जरूर भऽ गेलीह। आब तँ दिन बीतल, मास बीतल। एक-कानसँ-दू-कान गुल-गुल हुअए लगल जे ज्योितषीक बेटी तँ आब पेटसँ छैक। एत्ते दिन कहै छलियनि तँ ज्योतिषीजी आ पण्डिताइन मुँहपर माछियो ने बैसए दैत छल। विसबासे ने होइत छलनि। अाब देखथुन अपन बेटीक किरदानी। जे बापक दुलारू धिया दूरि गेली दूरि गेली, आ माथापर तम्मा लऽ कऽ उड़ि गेली उड़ि गेली। आब देखथुन जे बेटी केहेन कुलगोरनि छन्हि। देखिते-देखिते नअो मास बीतल आ सुनायना देलनि एकटा अति सुन्दर बालकक जन्म। जेकर भाग्यक रेखा किछु औरे कहि रहल अछि। मुदा पण्डिताइन आ ज्योतिषीजी ओकर नाओं रखलनि ‘कुकर्मा’। एक दिनक गप छी। जे ओइ राज्यक रानीकेँ माछ खएबाक मोन भेलनि। राजाक आदेश भेल, मलाह बजाओल गेल। नीकसँ-नीक माछ मारबाक आदेश दऽ देल गेल। संयोग एहेन जे कनिये कालमे निक्के माछ ऊपर भेल। मलाह राजाक आदेश पाबि सोझे रनिवास धरि गेल आ रानीक हाक देलकनि। हाक सुनि रानी महलसँ बाहर एलीह। तँ देखै छथि जे आंगनमे बड़ सुन्दर माछ राखल अछि। मुदा माछ देखि जेतबए मन प्रसन्न भेलनि मल्लाहकेँ देखि मन ततबए दुखी। किएक तँ मल्लाह रानीकेँ देखि लेलकनि। रानीकेँ तँ तामसे मन माहुर-माहुर भऽ गेलनि। मनमे उठलनि जे केहेन मुर्ख राजा छथि जे हमर इज्जतिकेँ इज्जति नै बूझि जेकरे-तेकरे महलमे पठा दैत छथि। ई तँ नीक बात नै भेल। आ तामसे मलहाकेँ, अनाप-सनाप बजैत धक्का दऽ बाहर करबा देलकनि। आंगनमे जे माछ राखल छल। ओ ई सभ खेला देखि जखन बर्दास्त नै भेलै तँ ओ माछ हँसि पड़ल। आब तँ रानीकेँ कोनो अर्थे नै लगनि जे माछ हँसल तँ किअए? आब रानी राजाकेँ कहलनि- “ई माछ हँसल किअए, से कहू नै तँ हम अन्न-पानि तियागि देब।” रानीक गप सुनि राजाकेँ किछु फुरबे नै करनि। असमंजसक स्थितिमे आबि राजा भरि राज्यमे ढोलहो दिआ देलखिन जे रानीकेँ देखि माछ किअए हँसल? जे ई बात बता देत ओकरा भरपुर इनाम भेटत अन्यथा छअ मासक जहल दऽ देल जाएत। राज्यक पैघसँ पैघ विद्वान, पण्डित, ज्योतिषी लोकनि एलाह। दरबार लागल। मुदा माछ किअए हँसल रहए से कारण कियो नै बता सकलाह। जइ कारणे हुनका सभकेँ छअ मासक जहल दऽ देल गेलनि। अंतमे धरमपुरक ज्योतिषीजी बजाओल गेलाह। अबेर भेने ज्योतिषीजी राजाकेँ समाद पठा देलनि जे आइ तँ आब अबेर भऽ गेल तँए आइ नै, काल्हि तरगरे आएब। प्रात भने ज्योतिषी स्नान-धियान कऽ चानन-ठोप दऽ विदा भेला राज-दरबार दिस। कुकर्मा जे बथानपर मालक थैरमे खेलाइत छल, देखलक जे ज्योतिषीजी चलला राज-दरबार दिस। कुकर्मा बाजल- “नाना, यौ नाना कतए जाइ छिऐ? हमहूँ जाएब यौ नाना।” ज्योतिषीजी अनेक प्रकारे कुकर्माकेँ फुसलौलनि। मुदा तखनो कुकर्मा बात मानक हेतु तैयार नै। एक्केटा जिद्द धेने जे आइ हमहूँ जाएब अहाँ कतए जाइ छिऐ। हारि-थाकि ज्योतिषीजी बजलाह- “राज-दरबार।” “किअए?” -कुकर्मा बाजल। ज्योतिषीजी कहलखिन- “रानीकेँ देखि माछ किअए हँसल, राजा ऐ रहस्यकेँ जानए चाहै छथि। जे सही उत्तर देथिन तेकरा उचित इनाम भेटतैक अन्यथा छअ मासक जहल। से तूँ अखन धिया-पुता छह नै जाह।” मुदा तैयो कुकर्मा मानैले तैयार नै। फेर बाजल- “नाना अहाँ बुतै ऐ बातक जबाक नै देल हएत। अहाँकेँ तँ ई बुझले नै अछि जे हमर माए कोन कुकर्म केलक आ तइ दुआरे हमर नाम कुकर्मा राखल गेल। की अहाँ वा कियो देखने छेलिऐ? से नै तँ अहाँ राजाकेँ जबाक की देबै। अहाँ हमरा नेने चलू राजाकेँ हम जबाब देबै। नै तँ अहाँकेँ छअ मासक जेल हेबे करत।” ज्योतिषीजी कुकर्माकेँ संग कऽ लेलनि। पहुँचला राज-दरबार। दरबार लागल। प्रश्नक संग शर्त राखल। सुनि ज्योतिषी बजलाह- “ई छोट-छीन प्रश्न हमरासँ नै पूछल जाए। एकर जबाब हमर नाति कुकर्मा देत।” राजा एक िदस कुकर्माकेँ देखथि तँ दोसर दिस प्रश्नक जटिलताकेँ। मनमे भेलनि जे आइ दुनू गोटाकेँ जलह लिखले छन्हि। प्रश्न सुनि कुकर्मा बाजल- “राजा सहाएब, ऐ प्रश्नक रहस्यकेँ नहिये बूझू तहीमे कल्याण अछि।” मुदा राजाक जिज्ञासा बढ़िते गेल। अंतमे राजा आदेश पाबि कुकर्मा बाजल- “राज सहाएब, अखनो सोचि लिअ। भलाइ अहीमे अछि जे नै बुझियौ। अन्यथा अकल्याण निश्चित।” मुदा राजा बातकेँ मानैले तैयारे नै होथि। तखन कुकर्मा बाजल- “जौं अपने ऐ रहस्यकेँ बुझबे करब तँ रानीकेँ राज-दरबारमे बजाओल जाए।” राजाकेँ आदेश पाबि रानी आ हुनक दुनू दाइ सेहो बजाओल गेल। कुकर्मा बाजल- “राजा सहाएब, दस हाथक दुरीपर दूटा खम्हा गारल जाउ। आ भरि जाँघ ऊपरमे एक खम्हासँ दोसर खम्हामे एकटा मजगूत रस्सी बन्हबा देल जाउ।” तहिना कएल गेल। ओकर बाद कुकर्मा रानीकेँ कहलक- “रानी, आब अहाँ ऐ रस्सीकेँ फानू।” रानी रस्सीकेँ फानि गेलीह। तकर बाद रानीक संग आएल एकटा दाइकेँ कहलक जे आब अहँू ऐ रस्सीकेँ फानू। दाइ फानए लगल। तखने कुकर्मा हुनक साड़ीक एकटा खुट पकड़ि लेलक। दाइ फानल सारी खूजि गेल। भरल दरबारमे दाइ चिन्हार भऽ गेलीह जे ओ दाइक रूपमे मौगी नै मरद छल। तहिना दोसरो दाइक सएह रूप। उहो दाइ मरदे। सबहक पोल खूजि गेल। तखन कुकर्मा बाजल- “राजा सहाएब, अखनो बुझलिऐ जे माछ किअए हँसल छलै? जइ रानीकेँ अपन प्रजाकेँ पुत्र वत्सल मानक चाही तकरा देखि ओ अनेरे क्रोधसँ आन्हर भऽ गेलीह। आ अनेको तरहक बात कहलनि। मुदा जे स्वयं स्त्रीक भेषमे दूटा मरदकेँ अपन भजार बना मौगीक रूपमे रखने छथिन। तकर कोनो लाजे-गराइन नै। यएह सभ किरदानी देखि, तखन उ माछ हँसल छल।” राजा सभ वृतान्त देखि सुनि म्यानसँ तलबार निकालि रानी सहित दुनू मरदकेँ दू-दू खण्ड काटि देलक। जहलमे भरल सभ विद्वान आ ज्योतिषी लोकनिकेँ मुक्त कऽ देल गेल। धरमपुरक ज्योतिषी जीकेँ उचित आदर-सम्मानक संग प्रयाप्त अशर्फी पुरस्कार स्वरूप देल गेल। ज्योतिषी जीकेँ कुकर्मा प्रतापे जय-जयकार भेल। ऐ तरहेँ ओइ मुण्डपर लिखल ई बात सत्य भऽ गेल- जे किछु होतब से भऽ गेल, किछु बाँकी छै एकक जन्म आ तीनक मृत्यु। ऐ तरहेँ कुकर्मा अपनो खूब नाम कमेलक आ अपन माए सुनायनाक लाज बचेलक। ज्योति झा चौधरी पुनरन्वेषण कनिक देर भऽ गेल छल अन्वेषिका (अन्वी ) के काज पर पहुँचय मे असलमे पहिल बेर तऽ बेसिये पहिने आबि गेल छली से भेलैन जे बाहर नास्ता कऽ क आबि जाथि। कॉलेज के पढ़ाई अखन पूरे भेल छलैन से एकटा सांस्कृतिक परिषद् मे स्टीवार्डक काज पकड़ि लेने छली। कस्टमर सर्विस के अनुभवक संगे मंगनी मे मनोरंजन सेहो होयत छलैन। गेट पर बैसर्ल बैसल लोकक गिनती वा टिकट चेक करू. ककरो किछु जानकारी चाही होय तऽ से दियऊ आ कार्यक्रमक आनन्द लीय।कखनो भारतीय संगीत समरोह तऽ कखनो डायमण्ड जुबली मनाबैत जैज बैण्ड के शो. कखनो आइरिस नृत्य तऽ कखनो जाइव. कखनो बच्चा सबहक नाटक मण्डली तऽ कखनो वृद्ध सबलेल पुरान फिल्म। आहि बॉलीवुड नृत्य सिखाबई वला संस्थानके वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह छल। बाहर सैण्डविच कीनली आ बसे के भोजनालय बूझैत काज दिस भगली तैयो कनी देर भऽ गेलैन।मुदा ई असगर नहिं छली जे देर छली। एकटा आर बालिका जकर पैर में मोच आबि गेल छलै सेहो कातमे बैसल छल।ओ जखन लोक सब अन्दर चलि जैतई तखन गेट लग जाय क बैसतई। अन्वी के मैनेजर ओकरे संगे काज दऽ देलकैन। कार्यक्रम शुरू भेल।मैनेजर कहलकैन जे अहॉं सब बालकोनी के सीट पर बैसू आ लोक सबपर नजरि राखू।अन्वी ओहि रोमन बालिका संगे बालकोनी मे जा कऽ बैसि गेली। ओ बालिका वैशाखी पर छलै। कनिये देर मे सबटा शान्त भऽ गेल आ कार्यक्रम शुरू भेल।इम्हर अन्वीजी के ओहि शान्त बालिका सऽ बातचीत सेहो शुरू भेल।स्वभाविक छलै जे अन्वीजी अपन बात ओकर पैरक स्थितिक कारण पूछैत केलखिन आ ओ होली जे अखने बीतल छल के विषय मे बात करै लागल।ओकर किछु नब सहेली भारतीय छलै जकरा संगे ओ भारतीय अन्दाज मे बात केनाई सीखने छल।ओ होलीमे अपन मित्र सब संगे खूब होली खेलायल छल।बातचीत सऽ अन्वीजीके ज्ञात भेलैेन जे ओकर चेहरा के उदासी मात्र पैरक दर्द सऽ नहिं आयल छहि वरन् ओकरा अपन पुरूषमित्र सऽ दू सालक गड़बड़ायल दोस्ती के कारण सऽसेहो छल। आ एहन समय मे ओकरा अपन नब संगी सब बड़ सहयोगी लागैत छल। ओहि बालिका के भारतीय विशेषतः बॉलीवुड संगीत बड़ रूचिगर लागैत छलै।से ओ बहुत आनन्द लऽ रहल छल संगीत के। बीच बीचमे अपन मायके प्रति कृत्रिम रोष सेहो प्रदर्षित कऽ रहल छल आ ओहि सब अदाकारी मे अन्वेषिकाजीके अपन देशक सुगन्ध आबि रहल छलैन।अतेक विविधता सऽ भरल शहरमे सेहो आइ फेर अन्वीजीके अपन जीवनशैली उत्कृष्ट लागि रहल छलैन। जीवन मे ऊँच नीच तऽ होयते रहैत अछि मुदा ओहि के कोन संस्कृतिमे सबसऽ बढ़िया समाधान छहि से ताक अन्वीजीके उड़ानक सीमा फेर छोट कऽ देलकैन। अमित मिश्र , गाम-करियन, जिला -समस्तीपुर कथा - प्रेमक अंत
आइ भोरे सँ आनंदक मोन कतौ अनत' अटकि गेल छलै । की करबाक चाही , की नै करबाक चाही ? गाम -घर मे की भ रहल छै ? एहि तरहक कोनो प्रश्नक जबाब पता नहि छलै । अपन सूधि-बूधि बिसरि गामक अबारा पशु जकाँ इम्हर-उम्हर भटकि रहल छल । पैघ केश-दाढ़ी , मैल-चिकाठि गंजी-पेँट मे अपना -आप सँ बतियाइत देख जँ केउ अनचिन्हार पागल बूझि ढेपा मारत त' कोनो आश्चर्यक बात नहि । आनंदक इ डेराउन रूप देख क' गामक लोक सब अपना मे बतियाइ छल जे परसू जखन दिल्ली सँ गाम आएल छल त' बड-बढ़ियाँ सब कए गोर लागि , काकी-कक्का , कहि क' नीक-नीक गप करै छलैए मुदा इ एके राति मे की भ' गेलै जानि नहि? लागै छै जे मगज कए कोनो नस दबा गेलै आ रक्तसंचार बंद भ' जाएबाक कारण मोन भटकि रहल छै । इहो भ' सकै यै जे बेसी पाइ कमा लेलकै तेए दिमाग खराप भ' गेलै वा भ' सकै छै जे पागल कए दौड़ा पड़ल होइ । आब एसगर कनियाँ काकी की सब करथिन , आब टोलबैये कए मिल क' राँची कए पागल वला अस्पताल मे भर्ती कराब' पड़तै , नै त' काल्हि जँ टोलक कोनो नेना कए पटकि देतै त' ओकर जबाबदेही के लेतै ? अनेक तरहक प्रश्न-उतर , सोच-बिचार के बाद टोलबैया सब निर्णय लेलक जे आइ साँझ धरि देखै छीये ,जँ ठीक नै हेतै त' साँझ मे सब गोटा मिल जउर सँ हाथ पएर बान्हि देबै आ काल्हि भोरका ट्रेन सँ राँची चलि जेबै । जे खर्च-बर्च लागतै से कनियाँ काकी देथिन ,जँ एन.एच लग बला एको कट्ठा घसि देथिन त' ओतबे मे आनंदक बेरा पार भ' जेतै ,आखीर जमीन बेचथिन किएक नहि ,बेटो त' एके टा छेन । कनियाँ काकी मतलब आनंदक माए सँ बीन पुछने टोलबैया ,सब हिसाब-किताब क' लेलक ।
उम्हर टोलबैया सब जमीन बेचेबाक ,आनंद कए पागल बना राँची पहुँचेबाक जोगार मे छल आ इम्हर आनंद एहि सब सँ अंजान अपन धुन मे कखनो बड़बड़ाइत , कखनो हाथ चमकाबैत गामक पूब गाछी दिश कए बाट धेने जा रहल छल । गाछी मे एकटा झमटगर आमक गाछ त'र बैस रहल ,गाछ सँ खसल टिकुला बिछ क' जमा केलक आ एक-एक टिकुला उठा सामने पड़ल पत्थर पर मारैए जखन सब टिकुला खतम भ' जाए त' फेर सँ बीछ पहिले जकाँ पत्थर पर मार' लागैए । कतेको घंटा एनाहिते करैत रहल । समय आ सुरूज उपर चढ़ैत गेलन्हि आ आब सुरूज देब सीधे माँथ पर आबि गेलन्हि । रौद सीधे आनंदक देह पर पड़लै , जखन गरम लागलै त' ओत' सँ उठि क' गाछक जैड़ मे सटि क' बैस रहल , टिकुला फेकनाइ बंद क' सामने देखलक ,सब किछ बदलल-बदलल बूझहेलै , नै पहिलुका रंग आ नै पहिलुका आनंदक लहर भेटल |
तीन वर्ष पहिले एत' भीड़ लागल रहै छलै गामक युवा वर्गक पहिल पसंद छलै इ मैदान जे आब खेत बनि गेल छलै , गामक नेना-भुटका सँ नम्हर धरि गेंद-बल्ला- बिकेट ल' भोरे सँ मस्त भेल एत' खेलै छलै ।एहि ठामक मजा ल'ग टि.भी वला आइ .पि .एल एको क्षण नै टीक सकै छलैए , मुदा मैदानक मालिक कए इ खेल नीक नहि लागै छलै तेँए एक दिन राता-राती सौँसे मैदान जोति देलक आ राहरि बाउग क' देलक । तहिये सँ खेलक इ आशियाना उजरि गेलै । आनंद कए एहि मैदान मे पाकल गहुमक बालि देखेलै जे हवा सँ टकरा कोनो कमसीन नाच' वाली के पातर डाँर कए लचक जकाँ बेली डाँन्स करैत छलैए । सुरूजक किरण ओहि पाकल बालि कए और स्वर्ण रंग द' रहल छल ।पूरा खेत रावणक सोना कए लंका जकाँ रौद मे चमकि रहल छल , दुपहर कए गर्मी मे चलैत लू सँ काँपैत हवा मे फराक-फराक आकृती सब बनबै छलै कखनो डेराउन त' कखनो मनोरम , एहि दृश्य मे डूबल कखन आँखि लागि गेलै जानि नहि । आँखि लागैत देर नहि आनंद एहि दुनियाँ कए छोड़ि श्वप्न नगर मे चल गेल । ओहि अद्भुत श्वप्न परी कए देश मे यादि आब' लागलै आइ सँ तीन साल पहिलुक ओ दिन . . . । ............ काँलेजक पहिल दिन , गामक उच्च विद्यालय सँ पास भ' लाखो छात्र-छात्रा नव सपना संग पैघ-पैघ शहर कए नामी काँलेज सब मे नामाँकन करेलक आ तकर बाद 10-10 टा किताब क झोरा छोड़ि दू टा काँपि ल' काँलेजक गेट पर स्वतंत्र मोन सँ छात्र-छात्रा सब कए लागै जे स्वतंत्रताक लड़ाइ जीत लेलक ,गजब कए मुस्कान सबहक अधर पर नाचि रहल छल । स्कुलक टाँप आनंदो अपन काँलेज पहुँचल मुदा काँलेज कए गेट पार करै कए साथ ओहि ठामक काज देख अधरक मुस्कान बीला गेलै । छ'-सात टा लड़का-लड़की एकरा घेर लेलक आ सबाल-जबाब कर' लागल कखनो एकर त' कखनो हेयर स्टाइलक , कखनो पहिराबा कए त' कखनो गाम-खानदान कए मजाक कर' लागल । आनंद कए तामस तरबा सँ मगज धरि पहुँचि गेलै मुदा नव अछि कैये की सकै यै ?
तखने एकटा लड़का एगो गुलाबक फूल दैत कहलक ,"रै , सामने ललकी ओढ़नी मे पिछु घुमल जे लड़की ठाढ़ छौ ओकरा हमरा दिश सँ आइ लव यू कहि क' इ गुलाब देने आ ।"
आनंदक मोन नहि मानै छलै तेँए ओ हिलबे नै केलै ,जखन सब देखलक जे इ नहि जा रहल अछि त' एक चमेटा मारैत घेकलि देलक जै सँ आनंद खसैत-खसैत बचल , ओ समझि गेल जे जँ एकर बात नहि मानब त' मारत तेँए मोन मसोसि क' गुलाब उठा ओहि लड़की लग चल गेल । ओकर पिछ आनंद दिश छलै तेँए ओकर मुँह देखाइ नै पड़लै खैर आनंद कहलक ,"मैडम ,"
इ सुनि लड़की पलटल , आनंद के ओकर मुँह चिन्हार लागलै , लाल लिपिस्टीक सँ रांगल ठोर आँखिल काजर , केशक स्टाइल आ एकर चिर-परिचित परफ्युमक खुशबू ,सब किछ चिन्हार सन लागलै मुदा मोन नहि पड़ि रहल छल जे ओ के छथि?
आनंद अपन बात आगु बढ़ेलक ,"मैडम , हम जे किछ कहब सँ हमरा सँ ओ छौड़ा सब कहबा रहल अछि तेँए हमरा माँफ करब ओ हरीयरका टिशर्ट वला अहाँ कए आइ लव यू कहलक यै आ इ गुलाब देलक यै ।"
गुलाब दै काल ओहि चिन्हार मुदा अनचिन्हार सन लड़की कए हाथक स्पर्श मात्र सँ अंग-अंग एना सिहरि गेलै मानु जे 440 वोल्ट कए झटका लागल हो । ओ लड़की गुलाब ल' बाजल ," कोनो बात नै हम खराप नहि मानलौँ ,ओ अबारा छौड़ा-छौड़ी हब हमरो रैगीँग लेलक आ अहूँ कए ल' रहल अछि , ओना अहाँ . . . " ओ लड़की अपन बात खतमो नहि केने छलै की प्रिंसपल साहेब ओहि ठाम आबि गेलन्हि , प्रिँसपल साहेब कए देख रैगीँग लेनिहार सब छौड़ा-छौड़ी पड़ा गेल । आनंद आ ओ लड़की दूनू प्रिंसपल साहेब कए गोर लागलक आ हुनके संगे क्लास दिश चलि देलक । गामक स्कुल मे लड़का-लड़की अलग-अलग बेँच पर बैसै छलै मुदा एहि ठाम एहन भेद-भाव नहि छलै , जेकरा जत' मोन होइ ओ ओत' जा क' बैसल । आनंद आ ओ लड़की संग एके बेँच पर बैसल , ऐ दिनक बात संयोगे सँ वा जानि-बूझि क' तीन दिन धरि संग उठला बैसला कए बादो कोनो तरहक बात-चित नै भेलै । चारिम दिन पहचान -पत्र पर मोहर लगाबै लेल जखन दूनू समान्य कक्ष गेल त' ओहि लड़की कए नाम-गाम पढ़लक तकरा बाद ओ अनचिन्हार लड़की पूर्णत: चिन्हार भ' गेल तेँए आनंद बाजल ," सीमा , हमर नाम आनंद अछि आ अहीक गाम के छी । दूनू गोटे सतमाँ धरि एकै स्कुल मे पढ़लियै आ तकरा बाद अहाँ बजार आबि गेलौँ आ हम गामे मे रहि गेलौँ , यादि ऐल की नै ?"
सीमा जखन अपना बारे मे एतेक बात सुनलक त' उहो बाजल ,"हाँ आनंद ,सब किछ यादि अछि ।हमरा पहिले दिन सँ होइ छलैए जे अहाँ कए कतौ देखने छी मुदा लाजे किछ नहि बाजै छलौँ" "
आनंद मोने-मोने बड खूश छल कारण एहि अंजान शहर मे केउ त' चिन्हार अछि ।मोहर मरबा दूनू बगीचा मे जा क' बैसल आ पुरना बात कए मोन पाड़' लागल , पाकरि त'र गर्दा आ कंकर भरल भाटि मे बोरा पर बैस क' पढ़ाइ , बूढ़बा इमली गाछक मीठगर इमली . भूट्टू मास्टर साहेब , अपन बचपन मे एतेक हेरा गेल जे कखन साँझ भ' गेलै पता नहि चलल । जखन गाछ पर चिड़ाँइ अनघोल कर' लागल तखन दूनू बचपन सँ निकलल ।
एहिना समय बीतैत गेलै । एहि व्यस्त शहर कए व्यस्त जीवन मे एक पटरी पर दौड़ैत दूनू कए दोस्ती एक्सप्रेस कखन प्रेमक स्टेशन पर आबि गेलै , दूनू मे सँ ककरो पता नहि चलल । नव उमरि मे प्रेम भेटला कए बाद एकटा अलगे उर्जा कए संचार अंग-अंग मे होब' लागलै , दूनू कए नजरीया सत प्रतीशत बदलि गेलै , काल्हि धरि किताब-काँपि ,पढ़ाइ-लिखाइ कए बारे मे सोचै वला आइ अपन भविष्यक बारे मे सेच' लागलै , अपन-अपन कैरियर कए लेल सोचबाक लेल नव-नव सपना कए महल बनब' लागलै , राति दिन भोर-साँझ एक-दोसरक नैनक झील मे डूबि जीबनक सब सँ पैघ आनंदक अनुभूति कर' लागलै । बाट चलैत जग सँ अंजान भ' इएह पाँति गुनगुनाब' लागलै
भेटल अहाँ के संग हमरा जहियेसँ जिनगी हमर लेलक करोटो तहियेसँ
हम एकरा की कहब छल एहन भाग बैसल छलौँ हम बाट मे दुपहरियेसँ
गेलौँ शिखर पर भेल जे एगो स्पर्श जुड़ि गेल साँस प्राण संगे कहियेसँ
छी ग्यान{GYAN} के पेटी अहाँ जादू गजल शाइरक कोनो कलम लागै हँसियेसँ
हम भेल नतमस्तक लिखब कोना शब्द शाइर "अमित" छी संग हमरा जहियेसँ
कहल गेलै यै जे जँ सच्चाइ कए संदुक मे बंद क' सात ताला मारि सागर मे भसा देल जाए तैयो एक-ने-एक दिन ओ ताला तोड़ि समाजक सामने जरूर आबै छै , आ जँ ओ सच्चाइ लड़का-लड़की कए प्रेमक होइ त' ओ जंगल कए आगि-जकाँ क्षण मे सगरो पसरि जाइ छै । इ समाज एहन सच्चाइ पर हास्य-व्यंग आ चुटकी लेब' लागै छै । आनंद-सीमा कए प्रेमक खिस्सा काँलेजक बाउण्ड्री तोड़ि सीमा कए बाबू जी डाँ. देबेन्द्र धरि पहूँचि गेल ।ओ आनंद कए डराब'-धमकाब' लागलन्हि मुदा आनंद आधुनिक लोक रहितो आधुनिक नहि छल , आइ -काल्हि कए लोक प्रेम-प्रेम नहि वासना बूझैत छथि , हुनका लेल आ आधुनिक प्रेमक अंत मात्र शारीरीक मिलन होइत धेन आ तकरा बाद ओ प्रेम गटर कए कीड़ा जकाँ अशुद्ध भ' जाइ छै । मुदा आनंदक मोन मे ऐ तरहक कोनो बात नहि छलै , ओ अपन प्रेम कए सम्मान द' वियाह धरि पहुँचाब' चाहै छलैए तेँए कोनो तरहक धमकी एकरा पर असर नहि क' सकलै , संगे सीमा सेहो डाँ . देबेन्द्र पर अपन प्रेम सफल करबाक लेल दबाब देब' लागलै । तीनू अपन-अपन बात पर अड़ि गेल । इएह घिचम-तीड़ा कए बीच दूनू इंटर कए पढ़ाइ खतम केलक । समय बढ़ैत गेल संगे प्रेमक गाछ फूलाइत रहल आ डाँ . देबेन्द्र पैघ-पैघ ढेला फेक एहि फूलाइल गाछ कए फूल तोड़ैत रहलन्हि , अंतत: एक दिन डाँ. साहेब आनंद कए अपन डेरा बजौलनि ।
आनंद गुनधुन मे पड़ल जखन सीमा कए डेरा पहुँचल त' डाँ . देबेन्द्र कहलनि ,"देखू अहाँ दूनू कए प्रेमक आगू हम हारि गेलौँ , हम एहि वियाहक लेल तैयार छी मुदा वियाह कोनो बच्चा कए खेल नहि छै , वियाहक पश्चात बहुतो रास जीम्मेदारी माँथ पर आबि जाइ छै । बियाहक बाद सीमा कए कत' राखब ? "
आनंद बाजल ," हमहू जानै छी जे वियाह कोनो खेल नहि छै आ जहाँ धरि वियाहक बाद रहै कए सबाल छै त' गाम मे अपन-घर अछि । अहाँ जानिते छी अपन जमीनो अछि त' ओत' हमरा दूनू गोटा कए जीवन बढ़ियाँ जकाँ कटि जाएत ।"
"मुदा हमर बेटी गाम मे नहि रहि सकै यै किएक त' ओ बजार मे सब सुबिधा सम्पन्न घर मे रहि रहल अछि । हमरहमर बेटी गामक भनसा घर मे घुआँ नै पियत ।"
"आब गामो मे विकास भ' रहल छै हमरो गाम मे गैस .सड़क , रेल आ बिजली कए सुविधा अछि तेँए कोनो तरहक दिक्कत नहि हेतै । तैयो जँ सीमा कए इच्छा बजार मे रहबाक हेतै त' गामक कोनो जमीन बेचि बजार मे घर बना लेब । " आनंद सँ लबालब भरल बाजल ।
देबेन्द्र बाबू चाह आ बिस्कुट कए ट्रे आनंद दिश बढ़ाबैत बाजलन्हि ." से सब त' ठीक छै मुदा एतेक जल्दी इ सब नहि भ' सकै यै ।" दु -तीन चुस्की चाह सँ घेँट भिजेला कए बाद बात आगू बढ़ेलन्हि ," एखन अहाँ दूनू कए उमरि कम अछि आ ऐ उमरि मे कानून वियाहक आदेश नहि दै छै .दोसर विआहक बाद घरक खर्चा बैढ़ जाइ छै ।एखन अहाँ अपन माए पर निर्भर छी आ माए खेती-बाड़ी पर , आ सब जानै यै जे खेती सँ एतेक कमाइ नहि होइ छै जै सँ आधुनिक साज-समान कए साथ बजार मे जीवन ऐश-मोज सँ कटि सकै । जा धरि अहाँ अपन पएर पर नहि ठाढ़ हेएब ता धरि केऊ बेटी वला अपन बेटी कए हाथ अहाँ कए हाथ मे कोना द' देत आखिर सब माए-बाप कए किछ स'ख-मनोरथ होइ छै की नै?"
चाहक कप राखैत आनंद कने चिन्तीत मुद्रा मे बाजल ," अहाँक बात सत्य अछि हमहुँ इ नहि कहै छी जे एखने हमर वियाह क' दिअ , जहाँ घरि अपन पएर पर खड़ा होइ कए बात छै त' हमर इंटर भैये गेल ।हमर नानी गामक किछ लोक दिल्ली मे रहै छथि त' हम सोचै छी जे ओतै जा किछ दिन काज करब , तखन धरि उमरि भ' जाएत तकर बाद हमर वियाह क' देब ।"
डाँ0 साहेब अधर पर कुटिल मुस्कान फैलाबैत बाजलन्हि ." अहाँक इ बात हमरा नीक लागल ।अहाँ अपन पएर पर ठाढ़ भ' जाउ हम अश्वासन दै छी अहाँ प्रेम सफल करबा देब ।"
एहि भेँट कए बाद आनंद के सीमा सँ वियाह करबाक सपना सच लाग' लागलै । ओ अपन प्रेमक सफलाता कए लेल कठीन सँ कठीन काज करबाक लेल तैयार छल । अपन पढ़ाइ बीच मे छोड़ि दिल्ली जाएबाक मोन बना लेलक । कनियाँ काकी कए सब बात बता तीन दिन कए बाद दिल्ली कए गाड़ी पकरि दिल्ल चलि गेल । अपन प्यार , अपन गाम . अपन सीमा सँ हजारो किलोमीटर दूर दिल्ली कए भीड़-भाड़ वला गली , बड़का-बड़का सोसाइटी मे हेराएल-भुतलाएल काज खोज' लागल । बड दौड़ धूप कए बाद रिश्ता कए मामा अपन सेठ सँ बात क' 12 घंटा कए नोकरी आ पाँच हजार दरमाहा पर काज धरा देलकै । भोर सँ साँझ धरि हड्डी तोड़ला कए बादो एते कमाइ नहि होइ छलै जाहि सँ कहि सकैए जे आब परिबारक भार उठा सकै छी । सब राति सीमा कए फोटो करेजा सँ साटि कसम खाए जे काल्हि आइ सँ बेसी मेहनत करब । उम्हर आनंद सीमाक प्रेम मे अपन देह गला रहल छल आ इम्हर सीमा अपन पढ़ाइ आगु बढ़ा रह छलै । समय तीब्र गती सँ बढ़ैत गेलै , आनंदो कए परमोसन होइत गेलै , आब 15000 टका कमाइ बला सुपरबाइजर भ' गेल । आफ ओकरा लाग' लागरै जे ओ अपन आ सीमा कए बजार मे रहै कए खर्च कमा लै यै त' ट्रेन ध' गाम आबि गेल । गाम आबिते देर नहि , सब सँ अपन दोस्त सब सँ सीमा कए बारे मे पुछलक त' पता लागलै जे देबेन्द्र बाबू ओकर वियाह अपने हाँस्पिटलक डाँ0 सँ ठीक क' देने छथिन ।सीमा कए मोन बदलि गेल छै आ दू दिन बाद गामे मे वियाह छै । इ शुभ सन अशुभ समाचर सूनै कए साथ आनंद बौक भ' गेल , किछ फुरेबे नै करै , जकरा लेल पढ़ाइ छोड़लक , 12-12 घंटा देह गलेल , से ओकरा छोड़ि दोसर सँ वियाह क' रहल छै ।
आनंद कए विश्वास नहि भेलै तेँए ओ सीमा कए घर सँ बहराए कए बाट जोह' लागल । सँयोग सँ ओहि साँझ गामक बजार मे भेँट भ' गेलै , सीमा कए संगे केउ नहि छलै तेँए बीना कोनो झंझट कए आनंद सीधे सीमा लग गेर । सीमो आनंद कए देख रूकि गेलै । आनंद सीमा लग जा बाजल ." सीमा , अहाँक बाबू जे किछ चाहैत छलथि ओ सब हम पूरा क' देलौँ । आइ हम 15000 टका कमा लै छी आ कानून कए मुताबीक उमरि भ' गेल तेँए अपन वियाह मेँ आब कोनो रूकाबट नहि अछि । अहाँक बाबू जी हमरा अश्वासन देने छलथि मुदा हम सूनि रहल छी जे अहाँक वियाह काल्हि कोनो डाँक्टर सँ भ' रहल अछि । अहाँ हमरा सँ प्रेम केरै छलौँ तखन आ सब की भ' रहल छै ? अहाँ एकबेर अपना मुँह सँ कहि दिअ जे अहाँ मात्र हमरे सँ प्रेम करै छी आ इ वियाहक बात झूठ अछि ।"
आनंदक बात सूनि ओ मृग समान कारी नैन लाल भ' गेलै ,मुँह पर कठोरता कए भाव नाच' लागलै , ओ मीठ बाजै बला जवान सँ आगिक धधरा जकाँ शब्द बहरेलै ," इ सबटा बात एकदम सत्य छै ,जहिया अहाँ सँ प्रेम केलौँ तहिया हम बच्चा छलौँ मुदा बाबू जी हमर आँखि खोलि देलनि । हमर बराबरी क' सकी एतेक अहाँ क ओकाइध नहि अछि । अहाँ मात्र इंटर पास छी आ हमर M.B.B.S कए फाइनल इयर छै । एकटा 15 हजार कमाइ वला कए हाथ मे अपन हाथ द' हम अपन जीवन किएक बर्बाद करब ? जतेक अहाँ एक महिना मे कमाइ छी ओतेक हम एक दिन मे खर्च करै छीयै । जीवनक ग्राफ पर अहाँ बाँटम मे छी आ हम टाँप पर , बाँटम आ टाँप सदिखन पैरलल रहै छै रहै छै आ अहाँ त' जानिते छी जे पैरलल लाइन कखनो मिलै नहि छै तेँए अपन दूनूक मिलन संभबे नहि अछि ।अहाँ अपध दिल आ दिमाग सँ हमर नाम मेटा लिअ । अहाँ हमर संगी छी तेँए वियाह मे आएबाक निमंत्रण द' रहल छी ,मोन हेएत त' आबि क' देख लेब हमर होइ वला ब'र कए । हमरा बहुत काज अछि ,हम जा रहल छी ।अहूँ हमरा बिसरि क' घर जाउ|"
इ कहि सीमा कार मे बसि गर्दा उड़ाबैत ओहि ठाम सँ चलि गेल । आनंद ओहि गर्दा सँ नहा गेल । दुनियाँ नाच' लागलै ,चक्कर आब' लागलै आ आनंद बीच्चे सड़क पर खसि पड़ल ।
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इ सब सपना बनि गाछ तर सूतल आनंदक आँखि मे नाचि रहल छल तखने गाछ सँ एकटा टिकुला टूटि आनंदक मुँह पर खसलै । टिकुला के चोट लागैते नीन खुजि गेलै । उपर चंदा मामा चमकि रहल छरखिन ,तारा टिमटिमा रहल छर , चारू कात अन्हार पसरि गेल छलै । गाम दिश देखलक त' गामक छोर पर नव कनियाँ सन सजल घर साफ-साफ देखाइ देलकै । लाल-पियर-हरीयर बाँल भूक-भूक क' रहल छलै ।डि.जे वला बैण्ड पर बाजैत नवका धुन बाताबरण मे अनघोल क' रहल छलै ।आनंदक मोन मेँ गजबे तूफान उठ' लागलै ।सोचै , जकरा लेल एतेक मेहनक केलौँ सएह नै भेटल । की हमर गलती इ अछि जे हम गरीब छी? जाति त' एकै छै तखन की हमर गलती इ अछि जे हम एक समाज आ एक गामकए छी वा इ जे हम कहियो प्रेम केलौँ ? बहुतो रास सबाल मन मे उठै छल आ बहुतो सबाल आँखि सँ बहैत नोर क' रहल छल । तखने अकाश मे बिजुरी जेना चमकि उठलै , उपर लाल-पियर - हरीयर आगिक चिनगी चमक' लागलै ,ब्राम-ब्रूम क' फटक्का फूट' लागलै । आनंदक आँखि सँ नोरक धार गाछक जरि के पटा रहल छल । ब्राम ब्रूम फटक्का फूटि रहल छल आ आइ फेर एकटा प्रेमक अंत भ' रहल छल । कथा -- * मोछ * मिथिलाक लोक जहिना दही-चुड़ा माछ .मखान आ पान कए प्रेमि होइ छथि ओहिना गप्प-सड़क्का कए सेहो बड़का प्रेमि होइ छथि । जँ दु-चारि टा संगी एकठाम जुटला आ गप्प नै भेल ,एहन भS नै सकै यै । देश-विदेश , घर-दुआरि , क'र-कुटमैती , वियाह-द्विरागमन , फिल्म-राजनीति बहुतो रास शिर्षक छै ,गप्प करबाक लेल ।गाम-घर मे ताशक चारि-चारि टा चौकरी एक्के ठाम भेटत आ उहो ठाम गप्पक सुगंध भेटै छै । खुदरा मे गप्प तS हाट-बजार , ट्रेन-बस , गाछी-बिरछी ,बाध-बन आदि जगह भेटबे करै छै मुदा थौक मे गप्पक सरोबर बहै छै ,चाहक दोकान पर । हम्मर गामक चौक पर एक्केटा चाहक दोकान छै , सुरेन्द्र कए चाहक दोकान । साँझ कS गामक सब बड़-बुजुर्ग ओही दोकान पर जुटै छथि आ चाहक चुस्की संग फुटै छै गप्पक फटक्का । हम्मर एकटा फरीक मे कक्का छथि ,मधु कक्का , जेहन नाम तेहने काम , मुहँ सँ सदिखन मधु चुबैए छेन । मधु कक्का कए गप्प बड़ नीक होइ छै ,हिनकर गप्प सुनबाक लेल साँझ कS चाहक दोकान पर भीड़ जुटल रहै छै । चाह संग बिस्कुट ,समौसा , लिट्टी , जीलेबी . सेहो बड़ बिकाइ छै , इएह कारण छै जे सुरेन्द्र मधु कक्का कए फ्रि मे चाह , बिस्कुट आ कहियो-कहियो जीलेबी .समौसा दS छै । आ एकर बदला मे कक्का नव-नव गप्प सुनबै छथिन। गप्प आ मधु कक्का कए महिमा अपरंपार छै जतेक बखान करब ततेक कम मुदा एहि ठाम कोनो गप्प नहि एकटा घटना बता रहल छी । एक बेर हम अपन किछु दोस्त संगे ओहि देकान पर नाश्ता करबाक लेल गेलौँ । दोकान पर पएरो राखै कए जगह नै छलै , किछ गेटा तीनू बेँच पर बैसल छलखिन आ जिनका जगह नहि भेटलनि से ठार छलखिन , सबहक बीच मे ऊँचगर कुर्सी पर मधु कक्का बैसल छलखिन । हम कक्का कए देखलौँ तS जा कS गोर लागलियनि । हमरा देख कक्का बाजलाह ," बौआ , दरभंगा सँ गाम कहिया एलहो ।" "कक्का काल्हि साँझ मे एलौँ " हम सामने मे ठार होइत कहलयनि । हमरा दिश कनेक काल देखला कए बाद कहलखिन ," बौआ , वियाह भS गेलS की ?," हम अकचका गेलौँ जे कक्का एहन प्रश्न किएक पुछि रहल छथि । हम मुड़ी निच्चा केने बाजलौँ ,"कक्का ,एखन तS पढ़ि रहल छी , कत्तौ नोकरी भेटत तहन ने नीक दहेज ,नीक कनियाँ आ नीक ठाम वियाह हएत , ओना अहाँ एहन प्रश्न किय पुछलियै ।" " तोरा नहि मोछ छS नहि दाढ़ी छS आ नहि टिक छS , तS हम की बुझियै , हौ , जेकरा वियाह भेल रहै छै तकरे ने इ सब नहि रहै छै । " कक्का बड़ा शान्ती सँ बाजलाह । हम्मर समझ मे इ तर्क आबि नहि रहल छल । आखिर मोछ सँ वियाहक कोन संबंध , कोन प्रयोजन । लाजे हम्मर मुड़ी माटि मे धैस रहल छलै मुदा हमहूँ शहरी छौड़ा छलौँ चुप कोना रहब , तेँ हिम्मत कS कहलौँ ," कक्का ,अहूँ गजबे बात करै छी आब वियाह सँ मोछक कोन संबंध आ टिक नै राखब तS नवका फैसन छै । " " देखहक , देखहक भाई सब छौड़ा कोना बाजै छै ।" कक्का भीड़ दिश देखैत जोर सँ बाजलाह , " रौ , वियाह भेला कए बाद मर्द ,मर्द नै रहै छै ओ मौगी भS जाइ छै आ जमाना जानै छै जे मौगी कए मोछ , दाढ़ी आ टिक नहि होइ छै , तोरा तS सदियह ऐ मे से किछ नहि छौ , जँ एखनो तोँ अपना कए मर्द कहै छेँ तS जरूर तोहर वियाह भS गेल छौ ।" लोक सब हम्मर आ कक्का कए बार्तालाप सुनै छलैए आ मुस्की मारै छलैए । आइ कक्का कए नजैर पर हम चैढ़ गेल छलौँ । मोने मोने हम क्षण कए के गरियाबै छलौँ जखन ऐ देकान पर आयबाक लेल सोचने छलौँ । सब चाहक चुस्की आ हम्मर बेज्जती सँ मुड-फ्रेस कS रहल छलैए । हम खिसिया कS कहलियै ,"कक्का .राम भगवान कए देखू , कृष्ण भगवान कए देखू , किनको मोछ नहि छै तS की ओ मर्द नहि छलाह ।" " बौआ , ओ भगवान छलखिन तूँ तS मनुक्ख छेँ , जेना राम जी 14 वर्ष बन मे रहलखिन आ कृष्ण जी गीता कए उपदेश देलखिन , एहन एक्को टा काज तूँ कS सकै छें? जँ भगवानक देखसी करै छेँ तS भगवान जेकाँ कर्म कS कए देखा , तहन फ्रि भS जेबेँ मोछ राखै सँ ।" कक्का कए तर्कक सामने हम कमजोर भS गेल छलौँ ,हमरा किछ फुरेबे नहि करै छलैए ,मुदा हमहूँ नव जमाना कए ,नव विचारधारा ,आ नव समाज मे जियै बाला प्राणी छी तS फेर एतेक जल्दी हारि कोना मानि लेब ।हम फेर कने सोचि कS कहलौँ ," आइ कए जमाना मे मुर्ख वा विद्वान सब पाइ चाहै छै , मोछ नहि , आ जँ मोछ राखब तS कोनो नामी कंपनी नोकरी नहि देतै आ जँ नोकरी नहि भेटत तS टाका नहि भेटत आ जँ टाका नहि रहत तS भुखल मरब , एहि कारणे कक्का मोछ राखनाइ जरूरी नहि छै ।" फेर कनेक काल ठमकी कक्का कए मूँह पर आबैत भाल पढ़बाक कोशिश केलौँ आ फेर सँ हम अप्पन तर्क देलौँ ," आइ फिलम मे बड़का-बड़का हिरो सब बिन मोछ कए अभिनय करै छै और एक्के दिन मे लाखक-लाख टाका कमा लै छै , जाँ मेछ राखितै तS हमरा हिसाबे ओ सड़क पर रहितै । एकटा बात और मोछ बाला छोड़ा कए कोनो आधुनिक लड़की पसंद नहि करै छै ,आब केउ मुर्खे हेतै जे मोछ राखि कS अपन पएर पर कुल्हरि मारतै ।" हम मोने-मोने सोचै छलौँ जे ऐ बातक कोनो काट कक्का लग नहि हेएत किएक तS महगाई कए जमाना मे टाका सब कए चाही ।मुदा कक्क तS कक्के छलाह ओ कोना हारि जेताह ।ओ चट दS अपन बात कहलनि ," हम मानलियौँ जट टाका सबहक प्रथम जरूरत छै मुदा फिलम मे काज करै बाला मर्द नहि होइ छै ,अरे ऊ तS अपना संगे बाँडीगार्ड कए फौज लS कS घुमै छै ,भीड़ मे नहि आबS चाहै छै , लाड़का लड़की कए रूप धS मूँह झाँपि कS बहराइ छै , ओकरा करेजे नहि छै खुलेआम धुमै कए , जे सदिखन डर मे जियै छै , आब तूँ ही कह जे ओ मर्द छै की मौगी ।सब नवयुवक ओकर अनुकरण करै छेँ आ मोछ कटाबै छेँ ।लाज कर रौ बौआ ,लाज कर ।" कक्का कए बात सुनि हम फेर सँ निरूतर भS गेलौँ । हमरा लSग आब कोनो एहन ठोस तर्क नहि छल जै सँ हम निमोछिया कए जीता सकितौँ ।हमरा चुप देख कक्का बाजलाह," बौआ ,शास्त्र-पुराण मे अनेको ऋषि-मुनी लिखने छथिन जे माय-बाप कए मरला कए बादे मोछ कटाएबाक चाही ।मोछ तS मर्दक पहचान छै । पहिलुक जमाना मे मोछे सँ बुझहा जाइ छलै जे के बलगर आ के कमजोर छै ।मोछक भेराइटी होइ छलै , छोटका मोछ ,हिटलर कट मोछ , पतरका मोछ आ सब सँ नीक मोछ होइ छलै कान धरि बाला मोछ । पाकल ,कारी ,लाल , कंघी मारल, गोल-गोल औँठिया मोछ ,रौद मे चमैक कs मुँहक तेज बढ़ाबै छलै ।आब तs इ सब सपना भs गेलै । आब तS सब किछ छोट भS रहल छै ,छोट मनुष्य ,छोट गाड़ी , छोट बर्तन ,छोट नाम जेना माँम डैड ब्रो , छोट कपड़ा , छोट टिक , आ सफाचट मोछ । जेना फैसनक कारण सब किछ छोट भS रहल छै हमरा बुझना जाइ यै मुनुक्खक ऊँचाइ बकरी जेकाँ भS जाएत । बौआ हम सब मिथिलाक छी ,मिथिलाक नाउ ,संस्कार ,संस्कृती ,इज्जत कए माटि मे नहि मिला ।विद्यापति ,उदयनाचार्य ,मंडन सन विद्वानक धरती सँ मोछ रूपि धरोहर फैसनक सागर मे नहि भसा । मोछ राख ,टिक राख , जनेऊ पहिर आ शान सँ कह हम मिथिलाक छी , हम मैथिल छी ।" हम लाजे मुड़ी निच्चा केने कहलियै," कक्का कान पकड़ै छी , आइ सँ हम मोछ नहि काटब आ अपन संगीयो सब सँ कहब मोछ नहि काटबाक लेल ,अपन संस्कृती बचाएबाक लेल ।" सब ताली सँ हम्मर बातक समर्थन केलक । चाहक दोकान पर सँ भीड़ छटS लागल । । विहनि कथा चोरि विद्याधर बाबू । साहित्यकार ।जीभ पर साक्षात सरस्वती कए बास । साहित्यक सब विधा पर एक समान पकड़ छलनि मुदा पाइ कए अभाव मे एको टा पोथी छपल नहि छलनि । एक दिन साँझ मे बजार दिश जाइ छलाह । पहुँच गेलाह पुस्तक महल । एकटा सुन्नर काँभर वला पोथी आकर्षित केलकनि तेँए किन लेलाह । घर पर आबि पढ़ै लए बैसलाह , जेना-जेना पन्ना उलटाबैत गेलाह तेना-तेना आँखिक गोलाइ पैघ होइत गेलै । काँभर कए पाछु लेखक कए नाउ पढ़लन्हि ,आँखि और पैघ भ' गेलै । सोच' लागलन्हि टका , मनुख-जानवर .गाड़ी-घोड़ा कए चोरी त' देखने छलौँ मुदा शब्दक चोरी पहिल बेर देखलौह । आन चिजक चोरी मे त' पता चलि जाइ छै मुदा मुँह सँ निकलैत बोल कए चोरी मे कनिको पता नहि चलै छै । धन्य छथि एहन चोर आ धन्य छेँन चोरी कए स्टाइल . . . । । कामिनी कामायनी संटूक उपनैन बसकट्टी धरि त’ सब किछु बड नीक जकॉ चलि रहल छल . ।मंझौल वाली काकी अपन .चारों पोता के उपनैन लेल कहिया .सॅ नहि देवता पीतर के भखनै छलीह. . . . . . चारों परदेया बेटा आखिर छुट्टी ल क’ गाम में आबि क’ उपनैन करए लेल तैयार की भेला . . कका काकी के जेना बूडल राज्य भेंट गेलन्हि. . .चारू दिस जेना रोनके रौनक । पूरा घर दलान ढौरल गेल. . .खेत खरिहान साफ सफाई भेल ।दलान क सोझा राखल जारैन गोरहा सब के पछुअैती में आमक गाछक तर तेना क’ तह लगा क’ राखल गेल जे क’ल’ प’ हाथ पैर धोबै लेल आबय वला लोकक नजरि में नै गडै । पछवारि टोल .. .टोलबा प’ कत्त कत्त नै लोक दौडैत रहै दिन भरि. . . काजक ब्योंत में .. । “हे .. ओकरा सब के साफ सुथरा में चलए. . बूलए के आदति छैक .. . .ई गामक रस्ता .. .आ’ ओहि में बसबिट्टी. . . . . . . कनि महेसबा के कहियौ. . .नीक जकॉ एतए सॅ अपन बसबिट्टी धरि के रस्ता साफ करि देतै. . .भरि टोलक लोक त’ जेना . . . ।” काकी. महेसबा के माय सॅ बजैत बजैत. .नाक भौं सिकोडति अपन ऑचरि उठा क’ नाक प’ राखि नेने छलीह ।ओ कठजीव. . . तुरंते आबि क ल’ग में ठाढ़ ‘हजार रूपैया सॅ कम नञि लेब .. .एतेक गंदा है ऊहॉ .. . .।”ओ अलगे नाक ऑखि मूनैत. . भिनकैत भिनकैत जेना बाजल त’ काकी तुरंते हामी भरि देलखिन्ह. ‘रे .. .जो. . न । .. पाय कौडी जे हेतै से त’ देबे करबौ न।’ आ. बसकट्टी के बाद महेसर. . अपन गाल बजबैत .. . जनानी सॅ भरल ऑगन में अंगेठी. मोचाड लईत बाजि रहल छल. ‘दू .दिन से. . बलू. . . . . . टोली वला सब के रोकने रहियै. . .ऊहॉ गंदा नै करै लै .. .छौडा सब के बिस्कुट चॉकलेटक लालच देलियै. . . देखलियै . . .आहॉ सब कत्ते साफ सुथरा हल्लै. . .सडक . .. आ’ बसबिट्टी. . . एतेक साफ त’ कलक्टरो के नै रहै. . . ।’ गणेश .सुरेश .. .दिनेश तीनों संगहि बाजल. . . “तैं न तोरा प’ ई बडका काज छोडल गेल छलौ. . .तू बड काबील छै. . .।’ ताबैत में सॅझला भाय मॉ के तकैत आंगन में अयला . ‘हलवाय के कत्त बैसैल जाए. ।’ काकी झट दनी भगवती घर सॅ कोनो काज छोडि बहरेली. “ललन बाबूके दरवज्जा प’ बैसाबही नै .. . ओतय अ’ड’ छै. . . आ’ जगहो चौरस. . ।’ म्ॉझला भाय जे चारों कात खरिहान सॅ ल’क’ पिछुबाडि धरि साफ सफाई भेल जगह के फेर सॅ साफ करबा में लागल छलाह ‘कुटुम सब के एला सॅ पहिनहीं चारों लैट्रिन बाथरूम एकदम चकाचक भ’ जेबाके चाही।” छत के ऊपर मॅडबा बनाओल गेल छल .. मॅडवा. छाजए के .. . .. .चरखट्टी के .मधुर .. गीत नाद सॅ चारो कातक वातावरण मॅह मॅह करए लागल छल . .. लाल पीयर धोती .. .अंगना सॅ छत धरि डोरी प’ सुखैत. .बड मनोरम दृश्य उत्पन्न केने छलै. . । कुम्हैनिया के ऑगन में पैसैत मातर .. .दीसपुर वाली पीसी चिकरए लगलीह ‘आय गै. . .आब तोरो सबके बिदागिरीए करबा क’ आनल जेतौ .. . .दू दिन सॅ मुनमा . .दौग दौग क’ जा रहल छै. . कुम्हर टोली .. .आ’ तोरा सब के कनियो दरेग नैं .. जे जल्दी जल्दी हाथी घोडा रैंग ढोर क’ पठाबी. . . अखन बरूआ सब बरमस्थान जेतै .. .घोडा चढाबए लेल. . . आ’ तू एखने आबि रहल छैं. . मार बाढैन तोरा. . ।’ कुम्हैंनियॉ .. .गोगैं करैत बाजल “दीदी. . .केते लगन हैक भरि गाम में . . .मूडन . .उपलैन. . .वियाह. . . हाली हाली त’ सबके समान पहुॅचाईये रहल छिये . .”आ हुनक क्रोध सॅ बचाबा लेल दॉत निपोरि क’ ठिठियाय लगलै. . . । “नेग दियौ. . बडकी पीसी बरूआ के. ।” “हे . .हम बरूआ के बापे के पीसी छिए. . . .छिनरो .. .ई हो नै .. बूझल छौ. . .।” बडकी पीसी ओकरा दबाडैत. . . .चिकरैत बजली ‘गै आबै जाही बरूआ के पीसी सब. . .कुम्हेंनिया के नेग दै जाही ।” नेग खोंईछ में राखैत. .ओकरा मुॅह प’ प्रसन्नता के लहरि दौड गेल रहै । गोटागोटी करैत सब कुटुम सब आबि गेलाह. . .दलान प’ पूरूख आ’ घर ओसारा प’ स्त्रीगण . .. । बिध बाध सबटा ऊपर छत प’ मॅडबा लग भ’ रहल छलै. . .जेठ मास. . .सरबत लस्सी सब के इंतजाम करि क’ राखल छल. तौला के तौला जमल दही बोरा मे भरल चूडा. मूॅगबा पैनतोआ . मुदा परसनहारे निपता . .. हलवैया .. .एखनधरि. . .आगि नै पजारने . “ मार बाढनि जनपिट्टा के. . .रै बौआ .. .केहेन हलबैया आनलैंहै. ।” संझला भाय कुरसों वाली पीसी के गप प’ ही ही करि क’ हॅसए लगला “ततेक लगन छै. . .सबटा हलवैया .. .पहिनहीं सॅ बुक .. . एक गोट पीपरौलिया बाला गछने छल. . .एन मौका प’ धोखा द’ देलकै. . .ई नब छै. . .हमरे ओतए सॅ काज सीखतै. . . ।” “केहेन जुलुम केलही तुहु रे .. ऐ सॅ’ नीक त’ हमरे कहितहि त’ सब मिल जुल क’ भानस करि दैतियौ।” किनको पानि भेटन्हि त’ चाह नै. . .किनको दबाए खेबाके रहैन्ह .. मुदा भिनसरे सॅ बासी मुॅहे. . .।भीषण अव्यवस्था . .... ब्डकी कनिया घोघ तर. सॅ छोटकी ननदि के बजौलखिन्ह .. “कीचन में जाकए फटाफट .. कुकर में भात चढा दियौ. . .दीदी सब भूखले छथिन्ह .. .हलबाई सॅ दालि तीमन आनि क’ हिनका सब के खुआ दैतियैन्ह . ।” मॅझिला भाय के सासुर सॅ बड बेशी पाहुन आ’ सबसॅ कम चुमौन .. . .. ।पाहुनक खातिर दारी हुनके प’ छलैन्ह .. .मुदा बडका पद सॅ रिटायर्ड ससुर के कुरसी लग नीचा बैस क’ ओ हुनकर म्ूॅह देखैत पैर में चुरूक भरि तेल पचब ‘में लागि गेल छलथि ।बडका भाय ब्रह बनल मडॅवे प’बैसल .. .सॅझिला हलुवाई के टीक प’ ठाढ़ . .कतहॅू किछु चोरा नै लिअ .. .छोटका. . जै पाहुन दिस खेनाय पिनाय ल’क’ जाथि. . . ओहि ठाम बैस मुख्यमंत्री बनबा के अपन उत्कृष्ट महत्वकांछा के घोडा प’ घोडसवारी करए लागैथ. . . बचला . .कका स्वयं . . .त’ अस्सी बरखक अथबल . . सुनाईयो नहि पडैन्ह. . ।
मॅझली भौजी . . .अपन तीनों भौजाई . .बहिन आ’ माय के ल’क’ घरक पट बंद करि लेलथि ।दू घंटा के बाद पट खुजलै. . .त’ छोटकी ननदि सबहक कान में फुसफुसा क’ कहि रहल छलीह ‘देखलियै .. जादू. . .आयल छलैथ त’ सब केहेन कारी कारी झमारल झमारल . . . .आ’ घर बंद करि क’ कोन एहेन क्रीम पाउडर लगैेलथ जे सब गोर गोर. . .कि कपडा लत्ता. . .बनारसी . पटोर. . ।” बडकी भौजी छोटका भायके बरूआ के केश नेने छलथि ताहि लेल ओ अनौने .. . .।काकी .कहनौ छलखिन्ह. “बडकी बीमारे रहै छै. . .मझॅलीए ल’ लैतै केश. . ।” त’ मॅझली चट सॅ चमकि क’ बजलीह “ंंमॉ हमरा सधा क’ पठौतिह. . ।” हारि क’ बडकीए कनिया के लेबए पडलै केश . .। सबसॅ मुॅहजोर मैझिली. . . . . कत्थी लेल ककरो एक रत्ती पानियो लेल पूछतथि ।बेर बेर नूआ फेर क’ अपन संबंधी लग जा बैसैथ ।बिध लेल सोर होय “है मॅझली भौजी .. .है. . संटु के धोती दियौ नै. . .।’ कनि भन भनाइत कनि मुॅह चमकाबैत .. . रानी रूपमती के अंदाज में अपन पएर उठबैत आबैथ । “चारू बरूआ के समान एक ठाम डाला प’ राखि दियौ. . ।बेर बेर आबए पडै छै. . .।’ ननकू बाजल त’ मॅझली अपन करिया मुॅह चमकाबैत .. . बजलीह “सबहक हम ठेका नेने छी की. . . हमरा संटु बाबू सॅ मतलब अछि ।’ दनौही में . . .बरूआ सब नहा ‘क’ ठाढ़ . .बडकी भौजी छोटका बरूआ के बिधकरी .. .ओकरे में लागल. . .अपन बेटा के धोती कुरता बिसरि गेलथि ।काकी के तामस चढय लगलै. . मॅझली के छोट बुद्वि के जबाब नै. . एतेक दिन सॅ बाहरि रहै छै. . तैयो. .किछो बाजबै त’ भरल आंगन में घिनमाघिन करए लागत ।” कल्याणपुर वाली पीसी एईठ क’ बजली” ऐ बाहर रहने की होय छै. . चालि .. प्रकृति .. बेमाय .. ई तीनों संगहि जाय. . .माय केहेन छै. . ककरो सॅ बजबो नहिकेलकै. . दछिनाहा सब. . ।” ननदि सब फेर ननकू के निहोरा करि क दौडेली . ‘जो बौआ भगवती के सोझा में ललका डाला प’ शुभम के पीरा धोती राखल छै. नेने आ दौडल .. ।”ओ बिफरल “हम त’ मझली भौजी के पहिनहि कहने रहियै. . कहलखिन्ह जे ठेका लेने छियै ।” मुदा ननकू जल्दी सॅ सायकिल सॅ जाकए धोती नेने आयल । उम्हर पोखरि सॅ घुरि क’ ऑगन पहुॅचैत मातर दोसरे दृश्य . . .हलवैया एखन धरि भोजन नै बनौने .. . तरकारी बनि क’ एक दिस राखल . . .आब पूडी छानय लेल लोहिया चढा रहल छल. . . “एै रौ. . .एतेक देर किएक भेलौ. ।सांझ पडि रहल छै .. कुटुम सब भुखलै. . बैसल छथि .. ।”बडकी पीसी के गप प’ हलवैया बाजल. . . ‘तखनी सॅ चाह कौफी. . बनाय रहल छलीयै. . मंझली कनिया आबि क’ कहलखिन्ह. .दस बीस गो परोठा बना दिय हुनकर बाबू भाय सब नै खेने छथिन्ह .. ।” “हलबैया लग सॅ सब टा रसगुल्ला गायब छै. . कन्हैया कहलकै .. मॅझली कनिया कोठरी में पहुॅचा दै लेल कहने छलखिन्ह ।”छोटकी ननदि का्रेध मगज प’ चढल .।काकी क’ ल जोरि के बेटी के चुप करौलन्हि. ‘ . घिना नै . .कत्तो सॅ सुनतौ त’ जुलुम भ’ जेतै .।’ “छोटका दियर आबि क’ मॅझली भौजी के कहलखिन्ह “भौजी अहॉ अपना सर कुटुम के त’ भोजन करा दियौ ।” रंगल टीपल मुॅह प’ विचित्र सन भाव आनैत पटुआ सन तित स्वर में बाजि उठलीह ‘लाज नै होईत अछि .. ।’ई वाक्य के व्याख्या तखन भेल जखन पोल खूजलै जे ओ त’ पहिनहीं अपन कुटुम सब के खुआ पिया चुकल छलीह .. मुदा चाहै छली जे सब कियो हुनके कुटुम के आव भगत में लागल रहै . मॅडबा प’ बरूआ सब के भीख देबा काल .. मॅझली फेर अडि गेली “पहिनै हुनके माय भौजाय भीख देथिन्ह. ।”काकी के मन घोर भ’ गेलन्ह ।बडकी पीसी आगॉ बढि क’ बजलीह “कनिया पहिने घरक लोक भीख देतै ..तखन बाहरक़ . ।अहिना बिध होईत छै. . .।हुनक ऑखि लाल होमय लगलैन्ह . .माथ प’ कनि घोघ तानैत .. .कन्हुआ क’ बडकी दियादिनी दिस देखली .. । ‘एकरे खातिर माथ प’ नूआ आ घोघ तानए पडैत अछि .. ।’मोने मोन गरीयेने छलीह ।मुदा मोन मसोसि क’ भिक्षाटनक विधि संपन्न होमय देलखिन्ह । उपनैनक परात चारूकात अहि बातक चर्च होमय लगलै. . ‘मंझली कनिया के सबटा कुटुम बिगैड क’ चलि जायथ रहलखिन्ह. . .नीक जकॉ सुआगत जे नहि भेल रहैन्ह. . ।’ छोटका भाय अपन कपार ठोकैत बजला “आहि रे बा. . सब के छोडि क’ हुनके सब में लागल रहितहू सब गोटे. ..अपन जमाय बेटी त’ सब लाज धाक तजि क’ लागले छलैन्ह ।जै कुटुम के आव भगत में त्रुटि रहि गेलन्हि. . ओ बेचारा सब त’ किछु नहि बजलखिन्ह. . ।” काकी ऑखि सॅ ईसारा करि ओहि प्रसंग के समाप्त करबा लेल कहि क’ ओहि ठाम सॅ उठि क’ जायत रहल छलीह। शाश्वत कथा पार्टी सम्पन्न होबैत होबैत. . . राति के बारह बाजिए गेलए. . .।भरि पेट खा पीबि क’ लोकवेद त’ जाईत रहल . . .मुदा घनश्याम गार्डन के कनि कात मे जेबा लेल ठाढ केदारनाथक हाथ कसिक पकडि बड करूण स्वर मे बाजल. . . ‘आय अहॉ नहि जाऊ भाय. . . मन बड उदास लगैत अछि. ।’ ‘उदास. .’ . केदारनाथ के हॅसी नहिं लगलैन्ह. . . एतेक बडका धूमधाम . लाईट साउंड़ . ...पौप .. . .. फिल्म स्टार वाला पार्टी. . .सुरा .. सुन्दरि. . . .के बावजुदो जीनगी के ओ रस नहि प्रदान कयल .. .जेकरा लेल. . .किंस्यात हुनक मोन चातक पाखी सन लालायित रहैन्ह. . .।लिफ्ट सॅ दुनू सीधे टॉप फ्लोर के अपन भव्य ड्राईंग रूम मे जाकए दरवज्जा बंद करि संपूर्ण संसार सॅ ओझल भ’ गेलथि । “की गप करू. . . . आफिसक़ . . .स्त्रीक .. . प्रॉपर्टीक़ . .शहरक़. . . .”। “नै ......नै. . .किछु आन .. . फुसियाही. . . खिस्सा कहॅ..ु।” “आन कोन. . .बीतलाहे आब खिस्सा छैक़ . यर्थाथ . . .भोगल. . .”.। “शहरक खिस्सा मे की छै. . .कोन सुआद. . .खाली भटकाव. . .निरासा. . .भय .. .आतंक़ . .। .” “बेस. . तखन गामक खिस्सा सुनब. . .।’ “कोन गामक।” “कोनो गामक . . . नाम मे की राखल छै. . . चरित्र त सबहक एकरंग .. . .माटि पानि के गमक त’ एक .. . . आ मष्तिष्क मे बसल सुसुप्त आकांक्षा. .. अतीत के फेर सॅ जीबाक चाह .. . हॅ गामे के कहू. . . . हालाकि गामक जीनगी बड कम दिन बीतैलहु. . .. बड अभिलाष छल समस्याग्रस्त गाम सबहक उत्थान लेल . . .अवस्स किछु विशेष काज करब. . . मुदा सामर्थवान भैयौ क’ तेहेन नै जीनगी के मकडजाल मे ओझरा गेलहु. . .जे मोन अहुरिया काटि क’ रहि जाएत अछि. . . देखाबटि मे पानि जकॉ. .पाय बहा देल जाय छै. . .अहि सॅ अपन मातृभूमि. . के. . .कतेक हाथ. . .के काज़ . .कतेक के रोटी. . . .आदरि सॅ भेंट सकैत अछि. . .आस नहि छूटल अछि . ..एखनो. . आब भगवानक कीरपा जहिया. . . . .तखन सुरू करू खिस्सा .. . .।’ खिडकीसॅ दूर. . .अन्हार समुद्र मे. . .चमकैत लाईट. . .कोस्ट गार्ड. . वा व्यसायिक जहाज के निहारैत . .. कनि काल धरि मौन रहला. . .हुनको ऑखि किछु भरभरायल सन छल. . . .जेना अतीत क ताप सॅ दग्ध भ’ सीमा विहिन होमय लेल बाट ताकैत छल. . .नहुॅ नहु. . करि क’ मुॅह खोलला. . “राजा जनकक जुग के सुनब की. . .लखिमा ठकुराईन जुगक .. .की सोनिया गॉधी के जुगक़ . ।” “वाह. . . ईतिहासक की काल विभाजन कयल अपने. . .अदभुत. . .। इंदिरा आ सोनिया के मध्य समयक खिस्सा कहू।’ “ खिस्सा मे काल के बड महत्व छैक़ ।अहि सॅ अहॉ ओहि कालक राजनैतिक आर्थिक़ . सामाजिक आ मनोवैज्ञानिक स्थिति के अवलोकन करि सकैत छी ।सुनु. . .. गामक स्त्री.. समाजक खिस्सा. . पोस्ट इंदिरा गॉधी पीरियड .. . .. “एकटा छली सोनदाय एकटा चानदाय ।दुनु एकदोसरा लेल साक्षात जमराज .. .जौं एकटा के अवसरि भेटतैन्ह त’ दोसरा के सदेह जमलोक पहुचा दैतैथि. . .मुदा .. .मनुक्खक मजबूरी. . . .ताहि लेल कतेको दशक सॅ एक दोसरा के सहि रहल छलथि. . .।ओना दुनु अपन अपन बल देखेबा सॅ बाज नहि आबैथ .एकटा अपन घरक बल .. दोसरि समाजक़ . .। आ’ अहि धमगज्जरि मे आनंद उठाबैत समाज .. .। ओही दिन आंगन मे उसीनिया भ’ रहल छल. . .धानक़ . .जाड मास .. .सोनदाय खबासिन लग मोडहा प बैसल देखि रहल छली. . . .कि ताबैत चानदाय डगरा मे कनी चाऊर आ बूट नेने अयलथि।डगरा कनि कात मे ओसारा दिस राखि मिझैल एकचुल्हिया प’राखल खापडि उठा क’ कहलखिन्ह. . “गै .. मरदन्नी बाली .. . .ई खापडि चढा क’ ओय चुल्ही प’हम्मर चाउर आ’ बूट भूजि दे।’धान उसिना गेल रहै. . हॉय हॉय कनस्तर उतारि क’ मरदन्नी बाली आंगन मे उझीलए लागल. . . ।जरैत ऑच देखिक चानदाय खापडि चढा देलथि आगि प’ ।ई देखि क’ सोनदाय के सौंसे देह मे खौंता फुकि देलकन्हि. . .।चट सॅ मोढा सॅ तमैक’ क’ उठि धीपल खापडि हुनक देह प’ फेंकैत धधकैत अंगार सन बोल बजली ‘बड शौख अर्ररेलन्हि अछि भुज्जा खायक े .. त’ कनसार मे भूजा लौथ नै दरवज्जे लग त’ छै. . . अन्हार भ’ रहल छै. . .हिनका सूझै नै छन्हि .. ।”ओ मुडि क’ डगरा उठबैत छलीह . . ....धीपल .खापडि हुनक पीठ प’ खसलैन्ह. . .ओ चिचिया क’ दलान दिस भागल छलीह .. ।पीठ पर का नूआ कारी सॅ रंगेबाक क्रम मे कनि लहकियो गेल रहै ..।” “सोनदाय एहेन चंठ किएक़ . . .कि चान दाय हुनक सौतिन छलीह।” “ओह अहॉ की बाजि गेलौं ।आय के जुग मे सैोतिन के बॉटि खूटि क’ सरकारे भिन्न करि दैत छै .. .तै ओ दूनू सौतीन त’ नहिए टा छलीह .. । खैर .. .जे. . .से. . .चान दाय कुहैर कुहैर क ओ राति कटली .. .जेना विगत मे अनेको अवस्से कटल हेतैन्ह. . ।आ भिनसरे कियो आंगन मे सोनदाय सॅ कहय एलैन्ह जे तीन पहरि राति मे . . .एकपेडिया सॅ बाध दिस हुनका जायत देखल गेल । सोन दाय दस ठाम सॅ मुॅह बिचुका क’ अपन अनंत घृणा देखाबए चाहली. . .मुदा क्षण मात्र मे अपना के रोकि क’ एकगोट मॉजल कूटनीतिज्ञक जेकॉ अडोसिया पडोसिया के सुना क चिकरैत अपन छाति पीटय लगली “ई हमरा कत्तो के नहि छोडलथि. . आब त’ ई की की नाच नै नचौती।दैव रौ दैव ।आब हम करू त’ की करू .. .क़त्तेक पैघ ई फसादी छथि गै म्या। ” मुदा के गेलय धडफडायल पोखरि . . .तालाब. . .रेलक पटरी प’ ताक़ . . . .। दिन चढैत. . . बीतैत .. . .ई खबरि टोल की सौंसे गाम मे बूलए टहलए लगलै. . . आ’ राति देखि सबहक संग खबरि सेहो निफिकिर भ’ सूति रहल. . .छल । दिन .. सप्ताह. . .महीना बीत गेलै. .टोल समाजक दिनचर्या ओहिना चलैत रहल. . . ।आ’ फेर एक दिन. . . .चानदाय. . ओहि गाम की. . .ओहि टोलक अपन ओही दलान क चौकी प’ बैसल देखाय पडली “बहिन बजेने छल. . . .. दुखित छै. . .के जेतै देखय .. . शोणितक हिलकोर हमरा रोकि नहि सकल छल. . .छोट बहिन . .बेटी दाखिल. . .कोरा कॉख क’ खेलौने छियै. . . ।” सोनदाय आंगन सॅ चारिटा सोहारी . आ’ कनि भाटा अदौडी के तरकारी. . .एकटा .. . कनकट्टा अलमुनिया के झॅपना मे राखि .. .. .जखन की हुनक भनसा मे स्टीलक थारी बाटी भरल छल . . . . ..भातिजक हाथे पठा देने रहैथ .. .। “ ई कोन खिस्सा भाय. . .एहनो कोनो खिस्सा होय छै. . . ई त’ विशुद्व रूप सॅ त्रिया चरित्र के बखान करि रहल छी. . .जेकरा शास्त्र सेहो ‘नेति नेति’ करि निषेध कयने अछि ।” “त्रियाचरित्र कत्त. . . .ई त मानव मनोविज्ञानक रहस्यमय वर्णन थीक़ . .. .अब्बल आ’ बलमानक’ .. दीया आ’ तूफानक़ . .खिस्सा छै .. . शाश्वत कथा. . . .जुग जुग सॅ चलैत एलैए. . . .की दरिद्र .. .की मातवर .. . की पढल . .की मूरूख .. .की शहरि .. की गाम. . .सब ठाम एकरे तांडव .. .मुदा आधुनिक समाज आब एकर विश्लेषण करय लागल. . कि आखीर एना किएक़ . . ।त’ अपने कनि अपन वाणी के विराम दियौ आ’ हमर श्रवणामृत वाणी सॅ अपन कर्ण कुटीर के गुंजायमान करू । सोनदाय चानदायक संघर्ष क’ कथा अपन चरमोत्कर्ष प’ चढल चलल जाइत रहलै आ’ हिनका हुनका .. बडका छोटका .. सबके भावनात्मक धरातल प’ सब प्रकारक रस प्राप्त होबैत रहल .. . । मुदा खिस्सा त’ खिस्सा नहिं भ’ क’ जीबनक अंग बनि गेल छल ताहि लेल लोकवेद के तेहेन कोनो उत्सुकता नहि बॉचल छलै . .। उत्सुकता भेलय .. . . मुदा तखन .. .जखन हंसा एसगरे जायत रहलै . .. .कलपैत. . . .कनैत. . .बोकरैत .. . पेटकुनिया . . .देने. . .उपस्थित समाज सॅ क’ल’ जोरि क’ माफी मॉगैत. .. . . एकला चलो रे. .. एसगरे जाए रहल छली. . . .मान अपमान सॅ भिन्न. . . भूख पियास सॅ मुक्त. . .अपन आन. . .नीक बेजाय सॅ पृथक़ . . .। . .. कोठरी फोलल गेल. .त’ ऊपर चार मे . लाले लाल. .सुखैल जारैन खोंसल. . .निकालल गेल त’ करीब मन भरि. . . . मटकुडी सब मे . .सरबा सॅ मूॅह बंद करि राखल. . . चीनी. . . चाहक पत्ती. . .अचार .. .दालि. . . आमिल. . . सत्तु. . .अदौरी .. .चाऊर. . .घीऊ. . . .नहि जाने कत्त्ोक चीज पतियानी सॅ लगा क’ राखल. . . .चौकी के नीचा .. टुटलहिया बाकस मे .. .एगारक जोड नूआ. . .चारि टा शॉल. . .पॉच टा . . साया .. चारि टा आंगि ..दू टा स्वेटर. . . . . . चानी के हॅसुली.. . . .पनरसै टाका .. .बीस पैसाही .. .एक टा मटमैल सन बटुआ मे मूह बान्हि क’ राखल .. ।.. . कतेक रास अठन्नी .. चौअन्नी पॅचपैसाही. . .एक टा लत्ता मे लटपटायल. . . .। ओकरा ऊपर मे नीमक पात. .बाकस के ऊपर गोईठा .खडही. . बोरा. . .केथरी. . ।. ई एत्ते टा . . .राज पाट .. .लोकक ऑखि ढाबूस बेंग जकॉ बहरायल. . . टोलक लोक संगे भरि गामक लोक ई रानी महारानी के साज समान देखए लेल आबैत काल अपना मुॅह मे किसीम किसीम के गप सप्प भरने. आबै. . .आ .. पागुर करैत . . .गप के उनटैत पनटैत अपन विचार के परम सत्य मानैत. . .जाईत रहैत छल । “घोर आश्चर्य नै मदन भाय. . . .जेकरा की नै .. .।’ “जौं पहिनहिं सॅ बूझल रहितै. . .।’नबका घरक सीमटी बाला सीढी प’ बैसल आन आन लोकक संग ..सोन दाय के पच्छ मे समय जेना ठाढ भ’ गेल छलै .. .सहस्त्रो जिव्हा सॅ बाजय के मौका दईत “से सएह अहॉसब कहै जाईयौ. . .बडका बाबू .. .तखन हमर कोन दसा बाकी रखने छलीह .. .ईरनी बिरनी सन बगै बनौने. . .फाटल पुरान पहिरने . . .हिनका हुनका दरवज्जा प’ बैसल पहरि धरि. . . .नोर बहाबैत. . .खिधांस करैत. . .अपन दुखक फकरा पढैत. . . . .कोन गिन्जन नहि कयलथि हम्मर .. . .हुनका गेला के बाद त’ जेना आर सॉड बनि गेल छलथि .. . बज्जर खसौ ई सरकार के खैरात की बॅटनाय सुरू कयल .. .नीक नूकूत घरक नककटौन जनानी सब लाज धाक तजि क’ पॉत ीमे जाकए ठाढ़ . . . . ।’’ “ जाए दियौ. . .ई काल. . .अहि सब तरहक हिसाब किताबक लेल नहि अछि. . . .आब सोचू जे की कयल जाय. . .।बेर त सरासरि ससरल जा रहल छैक .।’ मझॅला कका आगॉ बढि क’ सोनदाय के व्यतीत सॅ वर्तमान मे तीर तारि क अनला .त’ ओ हडबडा गेलीह. . . ‘गै म्या. . . .केना की हेतै . . .।’ .’हुनक ऑखि भटभट चूबए लगलैन्ह .. . ताबैत भीमनाथ आबि क बाजल “तोंही जे कनबीही तखन कोन काज हैतै. . .भायजी सब बाहरे. . .।’ ओ धडफडा क’ ऑचरिक खूॅटी सॅ ऑखि मीडैत बजली. . “हॅ मझिला बौआ .. .आगि त हुनका भीमे देतैन्ह .. . जीवितौ एयह सेवा सुश्रुषा कयने छलैन्ह. . . तखन आब. . की. . ... ।’ उम्हर हुनके स्ांजोगल लकडी घी आदि ल ‘ क’हुनक आखिरी काज लेल लोक वेद प्रस्थान करैत गेल । कहुना करि क’ राति कटल. . .तीन दिन मे अहि सॅ उग्रास भ। एकाध नोर कानि सोनदाय अपन दलान प’ बैसली. . “गेली बेचारो. . . .अही लेल दुनिया मे अतेक छल कपट. . . अतेक हाय हाय. .’ आध्यात्म संग बैराग्य सेहो हुनका ग्रसित करि लेलकैन्ह.. “कहै छै लोक . . .करनी देखीह मरनी बेर. . . चटपट मे उडि गेलीह. . . हम्मर की गति होयत. . .।”
“केहेन खिस्सा अपने पसारि रहल छी श्रीमान. . . जेकर नै कोनो ओर नै छोर. . . .ई की बॉचल जा रहल छै. . .अहि मे कोन मनोविज्ञानक झलकि .. . . ।’ “मनो विज्ञानक झलक़ . . . .एके बेर थोडबै झलकि उठतै .. आकास मे पूरनमासी के चान सन . . . .संच मंच भ’ क बैसू सोमरस क’ आस्वादन करैत रहू .. . कनि मनन करू तखन नै मरम धरि पहुॅचब। तखन किछु दिन टोलक चर्च क’ विषय सोनदाय. . . . सोनदाय .. . सोनदाय .. .।आब हुनक सब हीत एतय .. .आ’ महान बैरी. . .अधर्मी सासुर बाला. . “मार बाढनि .. झॉट बाढैन .. ओहि नगरक लोक के. . .देखियौ त’ करेज़ . .समाद प’ समाद पठाओल गेलै. . .तखनो नै कियो धुरि क’ अयलै. . . हिस्सा बॅटवा काल सत्तासोढे पैलवार छै. . .जाऊत सब पहिने खोजो पुछारि करैत छलै. . .”. . .। “जाय देथुन्ह बहिन. . .ओ बेचारी के जे गति लीखल छल से गति भेलय ।’ मुदा सोनदाय के हुनक गति वा र्दुगति सॅ कोनो तेहेन फिकीर नै छल .. .ओ त’ अपने चिन्ता मे डूबल. . . .ओहि दिन सॅ. . .अहुरिया कटैत छलीह .. .दू बजे दिन सॅ चारि बजे धरि सब लोकवेद ओही काज मे ओझरायल आ’ ओ मौका देखि ओही कोठरी मे पैसि . . . ढकना ढकनी गेरूआ सीरक . .मटकुडी .. . पेटीए टा नहि .. .छोटसन ठेंगा सॅ चार के कोन कोनसॅ झॅमारि क’ अलगा क’ देखलथि. . .मुदा क़त्तौ नै भेटलै. . . .पहसौल वाली के बजा क’ घर ओसारा नीपबैत काल. . .सेहो अपने मुस्तैद रहली. . . कत्तौ ककरो हाथ नै लागि जाए .. .।मुदा कोन फल .. . । भीमनाथक माय पुछलखिन्ह. . ‘पाय के की करथिन्ह बहिन. .’ .। ‘हम अपन हाथ उठाक’ किछु नै करबै .. .अहॉ सब के जेकरा देबा तेबा के अछि . नूआ फट्टा. . सब बॉटि दियौ .. .हम की करबै राखिक।’ सोनदायक प्रवासी पूत सब अयलन्हि. . . ओहि रहस्यमय वातावरण के चीरबा के क्रम मे व्यथित भ’ बजली ‘बौआ रौ. . .ओ त. घर सॅ पडा क’ राधेश्यामक दरवज्जा प’जा बैसलखून. . . .. भरि गामक लोककें कहने फिरथि. . .जे फलनामा के बौह हमरा खाय लै नहि दैत अछि. . .।राधेस्यामक घरवाली सोहाडी पका क’ चारि सांझ खुऔलकैन्ह त’ बाडी झाडी सॅ तीमन तरकारी .. .लताम केरा .. न्ो .बो. . .अररनेबा . . चोरा चोरा क’ ओकरा द’ अबथिन्ह. . .।की पाबनि की तिहार सब मे भंगट. . ..छठियो मे अहिना कयलन्हि. . . परना के परात सीताराम कहलेन्हि जे “काकी .. .अहॉ हुनका खाय लेल किएक नहिं दै छियैन्ह .’ बाजय पडल ‘जे बौआ आंगनि मे पॉच परकारक अन्न सुखाति रहैत छै .. .ओ उठा क’ ल’ लैथ .. हम हाथ पकडबै तखन नै. . . .।मुदा बौआ .. हमरा बड बेनग्गन कएने रहैथ छथि .. . .भात रोटी पठेबै त’ ककरा दलान प’ . . . कोनो ठेकान हिनकर .. . ।” “बेटा .. .. .तौं हुनका दू सौ अढाई सौ टाका द’ दहुन. . .जे सब हुनका खुएने छलखिन्ह. . .।” ई कही ओ अपन महान उदारता के परिचय देलथि त’ बेटा एक पहर सोच मे पडि गेलाह. . .जीबैत हुनका चोरा क’ पाय दी . . तैयो माय हुनका आने माने सॅ गरियाबै. .. अपन पैलवारक दू बरखक नेना के सेहो हुनका लग ठाढ नै होमय दैथ ..जौं कोनो पुतौह माथ मे कनि तेल कुड द’ दैन्ह ..वा पएरजॅतबा के दुस्साहस करैथ.. पकडा गेलीह .. .हुनका वा हुनक धिया सबहक नजरि सॅ तखन फेर ओकर गंजन गंजन. . . तखन चोरा नुका क’ कियो किछु समान .किछु पाय देबा सॅ नहि चूकै .. .. .आय एहेन उच्च विचार । “खिस्सा के अंत एयह अछि जे पचासो वरखक अपन रोआब .. कूटनीति .. .बदला .. .ईष्र्या.. . द्वेष प’ परदा देनाय सोनदाय के समाजक संग अ.पनो नजरि मे आवश्यक भ’ गेल रहै .. .किएक त’ चानोदाय आब बेचारी बनि क’ सबहक सहानुभूति हसोथि नेने रहैथ. . . आब हुनक सबहक मुॅह बन्न करबाक जरूरति अहि लेल पडि रहल छलैन्ह जे आब ओहो एसगरूआ भ’ गेल छलथि. . . धिया पुत्ता बालिग भ’ क’ अपन अपन लोल मे तिनका ल’ एक गोट नव घोसला के निर्माण हेतु उडि चुकल छल. . . .असहनीय एकांत .. . भातीज भीमनाथ. . पीसे काल सॅ आबि क’ नागनाथ जकॉ शरण ल’ नेने छलाह. .मुदा ओकर अपन स्वारर्थ . ।तखन उठबा बैसबा लेल लोकक आवश्यकता त’ पडिते छै. . .चाहै .. कतबो भरल पेट वाला होथु .. . । चरखा मे पूनी जकॉ गप कटैत किछु लोकक जीवन कटैत रहैत छैक़ . .आब अपन पच्छ मे लोक समाज के करबाक छलैन्ह . ..त’ दलान प’ बैसारी मे चाह पानि सेहो आंगन सॅ पठबए लागल छलीह. . .। “कथा के क्रम मे किछु उटपटांग तथ्य सोझा आयल अछि. . . जेना सोनदाय बेकल भ’ क’ की तकैत रहल छलीह. . .।” “अहिरेबा. . . .अहॉ एखन धरि ओहि सूत्र के गहिएने बैसल छी. . . . .बेस. . . ..त’ भेलय की जे चानदाय के कान मे सोनक मोटगर माकडी छलैन्ह. . .दप दप पीयर . . . .ओ गत भेला सॅ पहिनहीं सॅ हुनक कान सॅ गुम भ’ गेल छलै. . . ठोस. . एकदम दू भरि के. . .गरा मे सोनक सीकडी. . .।सोनदायके नजरि ओहि प’ गीद्व जकॉ गडल छल. . . भॉति भॉति के आसंका मोन मे घेरने. . .कतहु अपन बहिन के त’ नहि द’ देलथि. . . .वा राधेस्यामक घरवाली चारि सांझ रान्हि क’ खुओलकन्हि . . .वएह त’ ठकि फुसिया क’ नहि ल’ लेलकैन्ह. . . ।” आ’ ओ मनोविज्ञानबला कोन गप. . .एखन धरि त’ हमरा पकडि मे त’ नहि आएल अछि ।” “नहिं आयल त’ सुनु .. .अब्बल दुब्बर सेहो अपन भविष्यक’ लेल कतेक चिन्तित रहैत अछि . . . . ।जखन चान दाई के कोठरी सॅ जारनि अन्नपानि सब निकसल. . .त’ किछु लोकक कहबा छल जे ‘भरिसक संभावित बाढिक आसंका सॅ ओ अपन सबटा चाक चौबन्द बन्दोबस्त कए नेने छलीह .. जे कम सॅ कम कोठरी मे पडल पडल दू टा सोहारी त’ पेट मे जायत. . .। किछु आओर लोकक कहबा छल जे ओ अप्पन आखिरी कर्मक तैयारी अपने सोझा करि चुकल छलीह. . . . . .जानैत छलीह जे आगॉ नाथ नै पाछॉ पगहा के आगि देत .. . के क्रिया कर्म करत. . कोना क’ पैठ होयत .. से सबटा ब्योंत करि क’ रखने छलीह. . . । मर्मक गप ई भेलय जे भरि जीनगी ईलटल बिलटल सन रहियो क’ हुनका अपन अगिलका जनमक चिन्ता छल. . . .सोनदायक पैलवारक लोक नूका चोरा क’ किछु पाय टाका सदिखन दईतै रहैन्ह .. . आ ओ अन्तत .. गहन रूप सॅ एकरा ओकरा माध्यम सॅ चीज वोस्त मे बदलति रहली. . .मुदा ककरो कानो कान खबरि नै भ’ सकलै. . ।” “बेस. . . .आब त फरीछाऊ .. जे सोनदाय आ’ चानदाय मे कोन तरहक संबंध छल. . .।किएक ओ एक दोसराक’ शोणितक पियासल छलीह. . . ।” “एखन धरि अहॉ बूझि नहि पयलहु. . .त’ हमरे मुॅह सॅ सुनु. . .सोनदाय भाऊज छलथि चानदायक .. . ।” खिस्सा सुननिहार व्याकुल भ कानय लगला. “भाय .. .ई त अहॉ हमरे पैलवारक कथा कहलहूॅ. . . चानदाय हमर पीसी छलीह .. ।” खिस्सा कहनिहार के नशा सेहो चढि चुकल छल ।ओहो विहृवल भ’ कानय लगला. . . “चानदाय हमरे काकी छलीह .. . जमीन जायदाद क’ कागद प’ औंठा त’ लगबा लेलथि . . बाप पित्ति. . .मुदा कहियो घुरि क’ झॉकय नहि गेलथि जे पति विहिन अब्बल नारि भाऊजक खोरनाठी के ताप सहि कोना जीबैत अछि .. .।” आ’ दूनू धनाढय मित्र नवी मुंबई नरूल के ओही एन आर आई बिल्डिंगक बारहवीं मंजिल के अपन पैंट हाऊस मे फफकि फफकि क’ एक पहरि धरि कानैत रहि गेल रहैथ । ओमप्रकाश झा ओमप्रकाश झा निर्मोहिया हुनकर नाम छल सदानन्द मंडल। माता-पिता हुनका सदन कहैत छलखिन्ह। हुनका नेनपने सँ नाटक-नौटंकी सब मे पार्ट लेबाक शौक छलैन्हि। कनी कऽ कविता शेर सब मे सेहो हुनका मोन लागैत रहैन्हि। ओ अपन उपनाम निर्मोही राखि लेने छलैथ। नाम पूछबा पर अपन नाम सदन निर्मोही बताबैत छलाह। शनैः-शनैः हुनकर नाम निर्मोही जी, निर्मोही आ निर्मोहिया प्रसिद्ध भऽ गेल छलैन्हि। घर-परिवारक लोकक अलावे दोस्त महिम सब हुनका निर्मोही नाम सँ जानऽ लागल छल। हुनकर एकटा बाल सखा छलैथ जिनकर नाम छल घूरन सदा। घूरन सेहो निर्मोही जकाँ नाटक कविताक शौकीन छलाह आ एहि सब मे भाग लैत छलाह। ओ अपन नाम दीवाना राखने छलाह। निर्मोही-दीवानाक जोडी पूरा परोपट्टा मे प्रसिद्ध छल। दुर्गा पूजा मे गाम मे नाटक बिना निर्मोही-दीवाना केर सम्भव नै छल। कोनो आयोजन हुए वा ककरो एहिठाम बरियाती आबै आ की कतौ अष्टजाम होय, सबठाँ निर्मोही आ दीवानाक उपस्थिति परम आवश्यक रहै। निर्मोही-दीवाना गामक लेल नौशाद, खैय्याम, रफी, मुकेश, किशोर आदि सब छलाह। जखने गाम मे कोनो सान्स्कृतिक कार्यक्रम होय की लोक जल्दी सँ जा कऽ अगिला सीट लेबाक कोशिश करैत छल जाहि सँ निर्मोही-दीवानाक नीक जकाँ देख सकल जाइ। कहै केर इ तात्पर्य की निर्मोही आ दीवाना सबहक मनोरंजनक पूर्त्ति करैत छलाह। नाटकक आयोजन मे उद्घोषक जखने कहै की आब निर्मोही दीवाना मन्च पर आबि रहल छथि की तालीक गडगडी सँ पूरा आकाश बडी काल धरि गनगनाईत रहै छल। मन्च पर आबैत देरी दुनू गोटे जनता केँ नमस्कार कऽ कए शुरू करैत छलाह- "हम छी निर्मोही-दीवाना, सब दुख सँ अनजाना, लऽ कए आबि गेल छी, मनोरंजनक खजाना।" आ की लोक ताली बजबय लागै। तकर बाद फिल्मी गाना, पैरोडी, कविता, शाईरी आदि सँ ओ दुनू गोटे पूरा मनोरंजन करैत छलखिन्ह। तहिना गाम मे कोनो बरियाती आबै तऽ इ दुनू गोटे ओहि दरबज्जा पर पहुँचि जाइ छलाह। हुनकर सबहक इ सेवा निशुल्क रहैत छल। कियो भोजन करा दैत छल, तऽ ठीक, नै तऽ कोनो बात नै। हिनकर सबहक कोनो माँग नै छलैन्हि। नेनपने सँ हमरा मोन मे हिनका सबहक प्रति बड्ड आदर छल। हिनकर सबहक निस्वार्थ सेवा देखि हमरा सदिखन यैह लागल जे इ सब सही मे साधु छथि। हिनका सबहक परिवारक खर्चा कहुना कऽ चलैत छल। कखनो माता-पिताक हुथनाइ आ कखनो कनियाँक बात कथा। मुदा हिनका सब पर कोनो असर नै छल। साँझ होइत देरी दुनू मुखियाजीक पोखरिक भिंडा पर आबि जाइत छलाह, जतय पहिने सँ छौंडा आ जुआन सब हिनकर सबहक प्रतीक्षा मे बैसल रहैत छलाह। तकर बाद शुरू भऽ जाइत छल मुशायरा इ शायर-द्वय केर। समयक गाडी तेजी सँ भागैत रहल। हम पढि कऽ किरानीक नौकरी करऽ लागलौं। गाम एनाई कम भऽ गेल। शुरु मे तऽ नियम बना कऽ होली, दुर्गा पूजा, छठि मे आबैत रहलौं। बाद मे इहो एनाई जेनाई बड्ड कम भऽ गेल। गाम मे धीरे धीरे सब किछ बदलि गेल। नाटकक चलन सेहो खतम भेल जाईत छल। ओकर बदला मे थेटर आ बाईजीक चलन बढल जाईत छल। बरियातीक स्वागत सत्कार मे अपनैतीक स्थान पर यान्त्रीकरण जकाँ बेबहार हुए लागल छल। निर्मोही आ दीवानाक पूछनिहारक संख्या सेहो घटल जाईत छल। घूरन सदा अपन परिवारक दारूण स्थिति देखि नौकरीक जोगाड मे लागि गेलाह आ कहुना कऽ एकटा प्राइवेट प्रेस मे दरिभंगा मे नौकरी करऽ लागलाह। ओ अपन बाल सखा सदानन्द मंडल उर्फ सदन निर्मोही केँ सेहो लऽ जेबाक प्रयास केलखिन्ह, मुदा निर्मोही नहि गेलथि। निर्मोहीक स्थिति आरो खराप भेल गेल आ तमाकूलक खर्ची तक निकलनाई भारी हुअ लागल। मुदा निर्मोही अपन कविता शाईरीक शौक नै छोडलैन्हि। एक बेर दुर्गा पूजा मे गाम एलहुँ। साँझ मे मेला घूमै लेल गेलौं। पता चलल जे एहि बेर एकटा पैघ थेटर आयल अछि। हम कक्का सँ निर्मोहीजी दिया पूछलियैन्हि। कक्का कहलथि जे ओ बताह भऽ गेल छथि। कतौ कोनटा मे ठाढ भऽ कऽ अपन बडबडाईत हेताह। हम चारू कात ताकऽ लागलौं। देखलौं जे मेलाक एकटा अन्हार कोन मे ओ वीर रसक कविता पूरा जोश मे पाठ करैत छलाह आ बच्चा सब हुनकर चारू कात घेरा बना कऽ ताली बजबैत छल। हम लग गेलौं। निर्मोहीजीक दाढी पूरा बढल छल। आँखि मे काँची, उजडल केश, फाटल कुरता.... हमर मोन करूणा सँ भरि गेल। हम गोर लागलियैन्हि आ पूछलियैन्हि- "कक्का चिन्हलौं?" ओ हमरा धेआन सँ देखि बजलाह- "अहाँ ओम थीकौं ने।" हम- "अहाँ अपन की हाल बना लेने छी। काकी आ बच्चा सबहक की हाल?" निर्मोही- "यौ सब कहुना कऽ जीबि रहल छै। खेनाईक जोगाड कहुना भऽ जाईत अछि।" हम- "कविता शाईरीक की हाल?" निर्मोही- "कियो पूछनिहार तऽ रहल नै। बस अपने रचना करैत छी आ नित्य साँझ मे पोखरिक भिंडा पर जा कऽ असगरे पाठ करैत छी। लोक बताह कहैत ए। सब बुडिबक छथि। साहित्य आ रचनाक महत्व की बूझताह।" हम- "कोनो नौकरी नै केलियै अहाँ?" निर्मोही- "हमर जन्म नौकरी करबा लेल नै भेल अछि। हम अपन जिनगी गीत-संगीत आ शाईरीक नाम लिख देने छी।" हम- "इ तऽ ठीक अछि। मुदा काकी आ बच्चा सभक तऽ सोचियौ।" निर्मोही- "अरे सभक देखनिहार भगवान छथि। भगवान सभक जोगाड करथिन्ह।" हमरा रहल नै गेल आ हम किछ आर्थिक मदति करबाक कोशिश केलौं, मुदा ओ लेबा सँ मनाही कऽ देलथि। कहलथि- "अहाँक चाह पीबि लेलौं, बस वैह बहुत अछि। हमरा कोनो मदति नै चाही।" हम हुनका सँ अनुमति लऽ कऽ मेला सँ गाम दिस चललहुँ। सोचऽ लागलहुँ जे इ कोन बतहपनी भेल। परिवारक विषय मे नै सोचबाक छलैन्हि तऽ बियाह किया केलाह निर्मोही जी। फेर इहो सोचऽ लागलौं की समाजक लोक मनोरंजन तऽ चाहै छथि, मुदा मनोरंजन पर पाई नै खर्च करऽ चाहै छथि, से किया। नीक सँ नीक कलाकार जँ अपन कोनो रोजगार नै करै तऽ भूखले मरि जाईत ए। समाज एहन निर्मोही कियाक अछि। जे कहियो सबहक तालीक केन्द्र रहैत छलाह, से आब सब केँ बताह किया बूझा रहल छथिन्ह। यैह सब सोचैत हम निर्मोहीजीक आंगन पहुँचि गेलौं। आंगन मे हुनकर कनियाँ बैसि कऽ तरकारी काटै छलीह। हम गोर लागैत कहलियैन्हि- "काकी की हाल चाल?" ओ फाटल आँचर सँ अपन माथ झाँपैत कहलथि- "कहुना कऽ जीबि रहल छी बउआ। तेहेन निर्मोही सँ बाबू बियाह करा देलथि, जिनका पर-परिवारक कोनो मोह नै छैन्हि।" हम- "काकी, कक्का तऽ साहित्य संगीत मे लागल छथि। हुनका एना निर्मोही जूनि कहू।" काकी- "जँ एहन गप अछि तँ साहित्ये संगीत सँ बियाह किया नै कऽ लेलथि? दू टा बेटा जुआन भऽ कऽ कतौ पलदारी करैत छैन्हि। बेटी केँ बियाहक कोनो चिन्ता नहि। एहन कोन साहित्य प्रेम? हमर ससुर बीमार भऽ कऽ दवाईक अभाव मे तडपि तडपि कऽ मरि गेलाह। हुनकर मरलाक बाद ओ केश आ दाढियो नै कटेलथि। इ कोन बतहपनी भेलै?" हम ओतय सँ चलि देलहुँ। सोचऽ लागलौं जे सब लेल ओ निर्मोही आ हुनका लेल सब निर्मोही। समयक पहिया घूमैत रहल। १० बरख बीत गेल। गरमी छुट्टी मे बच्चा सब केँ लऽ कऽ गाम आयल छलहुँ। एक दिन दलान पर बैसल छलहुँ की रमन भाई कहैत अयलाह- "निर्मोही गोल भऽ गेलाह। किछ दिन सँ बिछौन धेने छलाह। कोनो गम्भीर रोग सँ पीडित भऽ गेल छलाह।" हम रमन भाईक संग निर्मोही जीक दलान पर गेलौं। ओतुक्का दृश्य बड्ड कारूणिक छल। काकी उठा उठा देह पटकै छलीह आ कानैत छलीह इ बाजि बाजि जे जिनगी भरि निर्मोहिया रहलौं आ आइयो निर्मोहिया बनि उडि गेलौं। हम आंगन मे पडल लहाश केँ देखलहुँ। बाँसक चचरी पर सदानन्द मंडल उर्फ सदन निर्मोही उर्फ निर्मोहिया शांति सँ पडल छलथि। एकदम शांत, बिना कोनो मोह केँ दीर्घ विश्राम मे छलाह निर्मोही जी। पूरा गाम ओतय जुटल छल आ निर्मोहीक संगीत कविताक चर्चा करैत छल। हम दलानक कोठरी मे गेलहुँ जतय निर्मोही रहै छलाह। एकटा टूटलाहा काठक अलमीरा मे हुनक हाथ सँ लिखल ढेरी पाण्डुलिपि पडल छल। किछ दीमक सँ खाएल छल आ किछ कागतक सियाही पसरि गेल छलै। हुनकर सिरमा तर मे एकटा कागत छल जै पर किछ लिखल छल। इ हुनकर अन्तिम रचना छल, जे पूरा नै छल। ऐ मे लिखल छलः- इ जग छै निर्मोही, बन्धन तोडि कऽ उडि जाउ। आब नै घूमू, कियो कतबो कहै जे घुरि जाउ। गहींर आँखिक व्यथा आइ-काल्हि शहरी मध्यवर्गक भोरका रूटीन सब ठाम एक्के रहै ए। चाहे ओ छोट शहर हुए वा महानगर। जँ घर मे स्कूल जाइवाला बच्चा आछि तँ भोरे-भोर उठू आ बच्चा केँ तैयारी मे लागि जाउ। एक नजरि घडी दिस रहै छै जे कहीं लेट नै भऽ जाइ। बस स्टाप पर अलगे भीड आ जे अपने सँ स्कूल पहुँचाबै छथि, हुनकर सभक भीड स्कूल गेट पर। कम बेसी सभ शहरक हाल एहने रहै ए। भागलपुर सेहो एहि सब सँ फराक नै छै। भोर मे सात बजे सँ लऽ कऽ साढे आठ बजे तक सौंसे ट्रैफिक जाम आ भीड भाड रहै छै। संजोग सँ हमहुँ एहि भीड भाडक एकटा हिस्सा रहै छी। छोटकी बेटी केँ स्कूल पहुँचेबाक हमरे ड्यूटी रहै ए। अलार्म लगा कऽ भोरे भोर छह बजे उठि जाइ छी। जौं छह सँ आगू सुतल रहलौं, तँ श्रीमतीजीक सुभाषितानि शुरू भऽ जाइ छै जे हे देखियौ आइ स्कूल छोडेलखिन्ह। जखन सात पर घडीक काँटा आबि जाइ ए तखन हबड हबड बेटीक डैन पकडने स्कूल दिस भागै छी आ जँ समय पर गेटक भीतर ढुका देलियै, तँ बुझाइत अछि जे दुनिया जीत लेलौं। इ तँ भेल नित्यक कार्यक्रम। आब किछ विशेष। स्कूलक इलाका मे नित्य भोरे बहुत रास अभिभावकक जुटान हेबाक कारणेँ गपक छोट छोट ढेरी टोल बनल रहै ए। सभक अपन अपन ग्रुप छै आ इ ग्रुप सभक जुटान हेबा लेल ढेरी चाह आ पानक दोकान सभ सेहो। अस्तु, तँ हमरो एकटा ग्रुप बनि गेल अछि, जाहि मे ब्लाक वाला ठाकुरजी, कालेजक प्रोफेसर दासजी, पोस्ट आफिस वाला शर्माजी, कपडा दोकान वाला मोहन सेठ, सर्वे वाला मेहताजी आ आरो किछ गोटे शामिल छथि। हम सब नित्य बच्चा केँ स्कूल छोडलाक बाद ओतुक्का घनश्यामक चाह दोकान पर जुटै छी आ चाहक संग भरि पोख गपक सेहो रसास्वादन करै छी। निजी समस्या सँ लऽ कऽ देशक राजनीति, अमेरिकाक दादागीरी, सचिनक सेनचुरी, आर्थिक समस्या, टूटल रोड, बिजलीक कमी, मँहगीक मारि, कम दरमाहा आदि बहुते विषय सब पर नित्य अंतहीन बहस होइत रहै ए। कहियो काल जँ बेसी लेट भऽ जाइ ए तँ घरनीक तामस सँ भरल फोन हमर सभक सभा भंग कऽ दैत ए। कखनो कऽ मोबाईल फोन पर तामसो होइ ए जे केहन सुन्नर बहस चलै छल आ बहसक असमय मृत्यु भऽ जाइ ए एकटा फोन काल पर। खैर इ भेल हमर भोरका नित्य कार्य। आब हम मूल कथा दिस बढै छी। घनश्यामक चाह दोकान पर एकटा छोट बच्चा काज करै छल। नाम छलै बिनोद आ हमरा सब लेल ओ छल छोटू। घनश्याम कहै छलै बिनोदबा। इ बिनोद, बिनोदबा वा छोटू जे कहियै दस बरखक हएत। एक दिन बहसक विषय वस्तु छल चाइल्ड लेबर। हम सब अपन चिन्ता प्रकट करै छलौं। ठाकुरजी बजलाह जे यौ ऐ दोकान मे जतय छाह पीबै छी सेहो एकटा बाल मजदूर काज करै ए। एकाएक हमरा सभक धेआन छोटू पर चलि गेल। एतेक दिन सँ इ गप नजरि मे किया नै आबै छल, यैह सोचऽ लगलौं। ठाकुरजी घनश्याम केँ कहलखिन्ह जे बाउ इ गलती काज केने छी अहाँ। पुलिस पकडत आ मोकदमा सेहो हएत। घनश्याम बाजल जे अहाँ जूनि चिन्ता करू। हमर पूरा सेटिंग अछि। लेबर आफिसक बडा बाबू हमर ग्राहक छथि आ कोतवालीक दरोगा सेहो एतय आबै छथि। आइ तक तँ किछ नै कहलाह आ आगू देखल जेतै। हम बजलौं- "से तँ ठीक ए, मुदा इ कहू जे एते छोट बच्चा सँ काज करेनाई अहाँ के नीक लगै ए।" घनश्याम- "जखन एकर बापे केँ नीक लगै छै तखन हमरा की जाइ ए। तीन सय टाका महीनवारी दय छियै।" हम धेआन सँ बिनोद केँ देखलौं। ओकर आँखि बड्ड गहीर छलै। कोनो सुखायल सपना जकाँ ओकर आँखि मे काँची सुखा कऽ सटल छलै। हमर हृदय करूणा सँ भरि गेल। हमरा रहल नै गेल। हम ओकरा लग बजेलियै आ पूछलियै- "बउआ कोन गाम घर छौ।" बिनोद बाजल- "हम्मे जगतपुरो केँ छियै।" हम- "बाबूक की नाम ए।" बिनोद- "हमरो बाबूरो नाम जीबछ दास छै।" हम- "पढै नै छी अहाँ? किया काज करै छी?।" बिनोद- "हमरो बाबू कहलकौं जे काम नै करभीं, त घरो मे चूल्ही नै जरथौं। ऐ सँ हम्मे काम पकडी लेलियै।" हम- "हम अहाँक बाबू सँ भेंट करऽ चाहै छी।" बिनोद ताबत हमरा सँ नीक जकाँ गप करऽ लागल छल आ मुस्की दैत कहलक- "हमरो बाबू आज अइथौं। थोडा देर रूकी जा, भेंट होइ जेथौं।" हम ओतै बिलमि गेलौं। कनी काल मे कनियाँ फोन केलथि- "आइ आफिस नै जेबाक ए।" हम- "बस आधा घण्टा मे आबै छी।" कनियाँ- "इ महफिल आ चौकडी अहाँ केँ बरबादे कऽ कऽ छोडत। जे फुराइ ए सैह करू।" हम देखलौं जे मण्डलीक सब सदस्यक मोबाईल टुनटुनाईत छल। खैर कनी कालक बाद एकटा दीन हीन व्यक्ति दोकान पर आयल। बिनोद कहलक- "हमरो बाबू आबी गेल्हौं। जे गप करना छौं, करी लए।" हम ओहि व्यक्ति सँ पूछलौं- "अहीं जीबछ दास थिकौं।" ओ बाजल- "जी मालिक। केहनौ खोजी रहलौं छलियै हमरा।" हम- "अहाँ अपन छोट बच्चा सँ मजदूरी कियाक करबै छियै? ओकर पढै लिखैक उमरि छै। आओर सरकारी कानून सेहो बनि गेल अछि जे अहाँ बच्चा सँ मजदूरी नै करा सकै छी।" जीबछ- "अरे मालिक सरकारो की करतै? फाँसी लटकाय देतै? घरो रहतै त भूखले मरी जेतै।" हम- "कतेक बाल बच्चा अछि अहाँक?" जीबछ- "पाँच गो बेटा औरो दू गो बेटी छै।" हम- "ककरो पढबै छियै की नै?" जिबछ बिहुँसैत कहलक- "पहीले खाना पीना पूरा होतै तभें नी पढाई होतै।" हम- "एते जनसंख्या कियाक बढेने छी?" जीबछ- "आब होइ गेलै त की करभौं। हमे भी बच्चा मे मजदूरीये केलियौं मालिक। हमरा और के भाग मे यही लिखलो छौं।" हम- "देखू जे भेल से भेल। बच्चा केँ मजदूरी छोडाउ आ स्कूल मे भर्ती करू। सरकार दुपहरियाक खेनाई सेहो दै छै। नै तँ हम लेबर विभाग मे खबरि कऽ देब। कनी एक बेर बिनोदक आँखिक सपना दिस देखियौ। ओकर की दोख छै? कमे अवस्था मे केहन लागै छै। अहाँक दया नामक वस्तु नै ए की? अहींक बच्चा थीक। सरकारक ढेरी योजना छै। अहाँ लोन लऽ सकै छी। अपन कारोबार कऽ सकै छी। नरेगा मे रोजगारक गारण्टी छै। इंदिरा आवास मे मकान लऽ सकैत छी।" पता नै हम की सब कहैत चलि गेलौं। हमरा चुप भेलाक बाद जीबछ बाजल- "मालिक अपने सब ठीके कहलियै। लेकिन सबे जगहो पर कमीशनो खोजै छै। हमे कहाँ से देभौं कमीशन। ढेरी इनक्वाइरी औरो चिट्ठी पतरी होइ छौं। एतना लिखा पढी औरो दौडा दौडी हमरा से नै सपरथौं।" हम- "ठीक छै, एखन तँ हम जाइ छी, मुदा अहाँ केँ जे कहलौं से करब आ कोनो दिक्कत हएत तँ हमरा सँ भेंट करब। हम अहाँक चिट्ठी बना देब आ जतय कहऽ पडत कहि देब।" फेर हम घर चलि गेलौं। सभा विसर्जित भऽ गेल छल। दोसर दिन जखन स्कूल गेलौं, तँ फेर सँ घनश्यामक दोकान पर चाहक जुटान भेल। आइ बिनोद दोकान पर नै छल। हम गर्व सँ बाजलौं- "देखलियै बिनोदक मुक्ति भऽ गेल। आब ओकर गहीर आँखिक सपना फेर सँ हरिआ जाएत।" घनश्याम कहलक- "नै सर, बिनोदबाक बाप अहाँ सब सँ डरि गेल आ हमरा ओतय सँ हटा लेलक। कहै छल जे कहीं साहब सब पकडबा नै दैथ, तैं एकरा कोनो दोसर ठाम रखबा दैत छियै।" हम अवाक रहि गेलौं। बिनोदक गहीर आँखिक सपना हमरा नजरिक सामने ठाढ भेल हमरा पर हँसि कऽ कहै छल- "सब सपना पूरा होइ लेल थोडे होई छै। किछ सपनाक अकाल मृत्यु भऽ जाइ छै। हमरो अकाल मृत्यु भऽ गेल अछि। अहाँ व्यर्थ हमरा जीयेबाक प्रयास कऽ रहल छी।" हम हताश भऽ गेलौं। ओहि दिन सँ बिनोद केँ बहुत ताकलियै, मुदा पूरा भागलपुर मे ओ कतौ नै भेंटल। बच्चा सबहक बडा दिनक छुट्टी मे एकटा भाडाक गाडी सँ गाम जाइ छलौं। बाट मे नारायणपुर मे चाह पीबा लेल गाडी रोकलौं, तँ देखै छी जे बिनोद ओहि चाहक दोकान पर काज करैत छल। हम ओकरा दिस बढलौं की ओ जोर सँ कानऽ लागल। दोकानक मालिक हमरा कहलक- "बच्चा केँ किया डरबै छियै?" हम- "नै डरबै नै छियै। हम ओकरा जानै छियै।" दोकानक मालिक- "से तँ हम देखिये रहल छी। चुपचाप चाह पीबू आ अपन गाम दिस जाउ।" ताबत कनियाँ सेहो आबि गेली आ कहऽ लागली- "अहाँ केँ बताह हेबा मे आब कोनो कसरि नै रहि गेल। चलू तँ चुपचाप।" हम देखलौं जे बिनोद कतौ नुका गेल छल अपन गहीर आँखिक सपना समेटने आ हम चुप भऽ गाडी मे बैसि गेलौं। ढेपमारा गोसाईं मोबाईलक अलार्मक घर-घरी सुनि कऽ मिश्राजीक निन्न टूटि गेलैन्हि। ओ मोबाईल दिस तकलाह आ अलार्म बन्न करैत फेर सुतबाक उपक्रम करऽ लागलाह। आ की कनियाँक कडगर आवाज कान मे ढुकलैन्हि- "यौ किया अनठा कऽ पडल छी? साढे पाँच बजै छै। उठू, नै तँ बच्चा सभ केँ इसकूल लेल के तैयार करओतैक। हम नस्ता बनाबै लेल जा रहल छी। भरि दिन तँ अहाँ आफिस मे कुर्सी तोडबे करै छी, कनी घरो पर धेआन दियौ।" मिश्राजी बिना कोनो विरोध केने पोस माननिहार माल जाल जकाँ चुपचाप बिछाओन सँ उतरि बाथरूम मे ढुकि गेलाह। निवृत भेलाक बाद बच्चा सब केँ उठाबऽ लगलाह। बच्चा सब हुनकर कुशल नेतृत्व मे इसकूल जयबा लेल तैयार हुए लागल। एकाएक बडका बेटा राजू बाजल- "पापा अहाँ हमर कापी आनलहुँ?" मिश्राजी- "नै, बिसरि गेलहुँ। काल्हि आफिस मे बड्ड काज छल।" राजू बाजल- "अहाँ तीन दिन सँ बिसरि रहल छी। रोज आफिसक काजक लाथे हमर कापी नै आबि रहल अछि। अहाँ केँ हमर काज मोन नै रहैए।" ओम्हर सँ कनियाँक स्वर भनसाघर सँ बहराएल- "इ तँ हिनकर पुरान आ पेटेण्ट बहाना अछि। घरक कोनो काज मे हिनकर कोनो अभिरूचि नै छैन्हि। आइ हम अपने तोहर कापी आनि देबह।" कहुना बच्चा सब केँ तैयार करा मिश्राजी बस-स्टाप धरि बच्चा सब केँ छोडि डेरा अएलाह तँ कनियाँ एकटा नमहर लिस्ट हाथ मे थमा देलखिन्ह। सब्जी, आटा, दूध आ आन वस्तु सबहक लिस्ट। मिश्राजी बजलाह- "कनी दम धरऽ दियऽ। हम बडद जकाँ भरि दिन लागल रहै छी, तइयो अहाँ सब केँ हमरे सँ सिकाईत रहैए।" कनियाँ कहलखिन्ह- "बियाहि कऽ अहाँ आनलहुँ आ सिकाईत करै लए भाडा पर लोक ताकी हम?" बेचारे मिश्राजी चुपचाप बाजार दिस ससरि गेलाह। बाट मे बाबूजीक फोन मोबाईल पर एलेन्हि- "हौ, मकानक देबाल नोनिया गेलैक। रंग करबाबै लए पाई कहिया पठेबहक?" मिश्राजी बिहुँसैत बजलाह- "अगिला मास पाई पठा सकब।" पिताजी खिसियाईत कहलखिन्ह- "कतेको मास सँ तौं अगिला मासक गप कहै छह। इ अगिला मास कहियो आओत की नै।" मिश्राजी केँ अपन गामक सीमान परहक ढेपमारा गोसाईं मोन पडि गेलैन्हि, जकरा पर सब कियो आबैत जाईत एकटा ढेपा फेंकि दैत छलै। हुनका बुझाइ लगलैन्हि जे ओ ढेपमारा गोसाईं भऽ चुकल छथि। दस बजे मिश्राजी आफिस पहुँचलाह। कनी काल मे आफिसर अपना कक्ष मे बजा कऽ पूछलखिन्ह- "काल्हि एकटा अर्जेण्ट फाईल नोटिंग लए देने छलहुँ आ अहाँ बिना काज केने भागि गेलहुँ।" मिश्राजी- "सर, बिसरि गेलियै। एखन कऽ दैत छी।" आफिसर- "नित यैह बहाना रहैए। किछो यादि रहैए अहाँ केँ?" मिश्राजी सोचऽ लागलाह- "इहो नै छोडलक। कुर्सी पर बैसल अछि तँ हुकूमत देखबैए।" आफिसर हुनका चुप देखि कहलैथ- "की कोनो नब बहाना सोचै छी की? जाउ काज कऽ कऽ दियऽ।" मिश्राजी- "सर, कहलौं ने बिसरि गेल रही। तुरत कऽ दैत छी।" आफिसर- "अच्छा, रोज तँ यैह बहाना रहैए। किछो मोन रहैए की नै? अपन नाम तँ मोन हैत ने। की नाम अछि अहाँक श्रीमान विनय मिश्राजी।" मिश्राजीक मूँह सँ हरसट्ठे निकलल- "ढेपमारा गोसाईं।" सुजीत कुमार झा नव व्यापार साँझक सात बाजि गेल छल । साधना एखनधरि नहि आएल छलीह । नेहा वरण्डापर उदास बैसल मम्मीके प्रतीक्षा कऽ रहल छल । जीतेन्द्र प्रसाद भितर रुममे दर्दसँ परेशान छलाह । यद्यपि दर्द आइ किछु कम छल मुदा, ओ भितरकँे कछमछीसँ तनावमे छलाह । साँझक चारि बजे चाह पिलाक बादसँ ओ आ नेहा साधनाक प्रतीक्षाकऽ रहल रहैथि । चारि बजे पंकज ब्याट–बल खेलऽ चलि गेल छल । रीना सङीसँ भेट करऽ गेल छल । रहि गेल छला जीतेन्द्र प्रसाद आ नेहा । साधना भोरे जलपानकऽ कऽ घरसँ निकलल छलीह, ई कहिकऽ जे बेरियाधरि चलि आएब । बहुत रास काज अछि कहि गेल छलीह, कपड़ा बेचबाक अछि, मिश्राजीके घर भेट करबाक लेल जएबाक अछि, महिला क्लवमे अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसक कार्यक्रममे जएबाक अछि आ बजारसँ दोकानक लेल समान किनवाक अछि, बेरियाधरि आबि जाएब । जीतेन्द्र प्रसाद सोचि रहल छलैथि, ‘की भऽ रहल अछि ? साधना हरदम घरसँ बाहर रहऽ लागल छथि । की भऽ गेल छैन्हि हुनका ? पता नहि कपड़ाक व्यपार आ दोकानकँे की भऽगेल अछि ? किए आवश्यकता अछि साधनाकेँ एतेक काज उठएबाक ?’ ओ सोचैत जा रहल छलाह, ‘एखन तऽ आजुक दबाइ सेहो बजारसँ लेबाक अछि । पंकज सेहो खेलकऽ नहि आएल अछि । नहि जानि की भऽगेल अछि एहि घरकेँ ?’ नेहाकँे बजाकऽ ओ अपना लग बैसा लेलैन्हि । जीतेन्द्र प्रसाद आ नेहा दुनू उदास रहैथि । प्रसंग बदलैत जीतेन्द्र नेहाकँे चाह बनएबाक लेल कहलैन्हि । बूझल छलैन्हि जे चिनी समाप्त भऽ गेलै मुदा, ककरो अनबाक पलखैत नहि छै, तखने नेहा इहो कहलक जे ‘घरमे चाहपत्ती नहि अछि ।’ जीतेन्द्र प्रसाद नेहाक बात सुनलैन्हि । क्षण भरिके लेल ओ किछु विचलित भऽगेला आ फेर शुन्यमे ताकऽ लगलाह । जीतेन्द्र प्रसादक मोन विद्रोहकऽ उठल, ‘की एहनो कतहु घर भेलैए, जतऽ कोनो सामञ्जस्यता नहि । एकरा तऽ होटल सेहो नहि कहल जा सकैए, की विमार हएब कोनो अपराध अछि ? ओ जानि बूझिकऽ तऽ विमार नहि पड़ल छथि । डाक्टर तऽ कहैत अछि बहुत बेसी काज कएलासँ बहुत थकावट आबि गेल अछि, शरीरकेँ आराम तथा मस्तिष्ककँे शान्तिक आवश्यकता अछि । मुदा कहाँ अछि शान्ति ?’ ओ सोचैत रहलाह, सोचिते रहला । पंकज आबि गेल । रीना सेहो आबि गेल । जीतेन्द्र प्रसाद सभ किछु देखैत रहलाह, हुनका किछु बाजब, नहि बाजब बराबरे छल । एहि घरक सभ सदस्य पूर्ण स्वतन्त्र छल । रीना भानस घरकँे एक सर्वेक्षण कएलक, फेर पंकजसँ किछु कहलक, पंकज बजारसँ किछु समान अनलक । भोजन बनल । राति आठसँ उपर बाजि रहल छल, दोकान बन्दकऽ कऽ दीपक सेहो चलि आएल छल । रीना दीपककेँ बजार पठाकऽ जीतेन्द्र प्रसादक लेल दबाइ मगबओलक । रातिक दश बाजि गेल अछि । नेहा सूति रहल अछि । रीना आ पंकज अपना रुममे किछु पढ़ि रहल छल । जीतेन्द्र प्रसाद ओछाएनपर पड़ल–पड़ल किछु सोचि रहल रहैथि –एकटा बात छोड़िकऽ दोसर, दोसर छोड़ि कऽ तेसर । साधनाकँे केओ स्कुटरसँ छोड़ि गेलैन्हि । स्कुटरक आवाज सूनिकऽ रीना आ पंकज बाहर आएल । साधना अबिते जीतेन्द्र प्रसादके रुममे चलि अएलीह तथा बगलमे सूति रहलीह । रीना आ पंकज ठकुआएल सन किछु देर ठाढ़ रहल आ चुपचाप घूमि गेल । जीतेन्द्र प्रसाद देखिते रहलाह, फेर बात चलएबाक हिसाबसँ बजलाह, ‘कहाँ छलहुँ एखनधरि, घरमे नहि चाहपत्ती, नहि चिनी, नहि चाउर, नहि दबाइ । बेरिएमे आएब कहने छलहुँ ? ‘हँ, मुदा कि कहुँ महिला क्लव चलि गेलहुँ प्रीति पकड़िकऽ लऽगेल । ओतऽ सुषमा भेट गेल । अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसक बैसार छल मनोरमाक घरपर । निन्न आबि रहल अछि । सूति रहू ?’ ‘किए, की बात अछि ? आँखि अहाँक लाल बुझाइत अछि ।’ ‘हँ, कनि–मनि लऽ लेने छी, लेडिज ड्रिंक । ओतेक नहि लगैत छैक । क्लवक आइ वर्षगाँठ छल । मधु दिससँ पार्टी छल । अगिला बेर हमरे नम्बर अछि ।’ साधना कहिते–कहिते सूति रहलीह । जीतेन्द्र प्रसाद सुनैत रहला आ सोचैत रहलाह, ‘की भऽ गेल अछि हिनका ? की भऽ गेल अछि एहि घरकँे ? केमहर जा रहल अछि साधना ? की हएत आगाँ ? नहि, आब एकर अन्त करहे पड़त । कोना चलत एना ?’ हुनक हृदयक दर्द बढ़ि गेल । ओ हाथसँ छातीकँे दबा करोट फेरैत रहलाह । रुमके बल जरैत रहल, ओ सोचैत रहलाह ..... आइ एहि शहरमे अएला लगभग दश बर्ष भऽ गेल अछि । आएल छला तऽ कनिक तलब छलैन्हि मुदा कतेक शान्त जीवन छल, कतेक सुखद छल ई घर । साँझ पड़िते अफिससँ घर अएबाक मोन करऽ लगैत छल । कतेक मेल छल घरकेँ एक–एक प्राणीमे । तहियासँ कतेक अन्तर आबि गेल अछि एखन । तहियासँ तलबमे सेहो दूगुणा बृद्धि भऽगेल अछि । दश वर्षमे एहि शहरकँे कोना–कोना परिचित भऽगेल अछि । शहरक सभा सोसाइटी सँ सम्बन्ध भऽगेल अछि । ई शहर तऽ आब अपने भऽ गेल अछि । साधना आब शहरक महिला क्लवमे जाए लागल छथि । महिला क्लव आब तऽ हुनकापर छा गेल छैन्हि । आब साधनाकँे रुपैयाक लोभ भऽगेल अछि । तहिया कतेक नीक छलीह साधना । थोड़बे रुपैयामे घरक खर्च बढियाँ जकाँ चला लैत छलीह । घरके सभ समान ओहीे पैसासँ कीनल गेल अछि आ आइ की भगेल अछि ? साधना दोसरके देखासिखी दोकानो खोलि लेने छथि । ओहूसँ पैसा अबैत अछि मुदा, तैयो घरक खर्च नहि चलैत अछि । कहियो चाहपती नइँ, कहियो चिनी नइँ, कहियो ई नइँ तऽ ओ नइँ । कतेक झगड़ा ! हँ, ओ झगड़े तऽ छल दोकान खोलबाक लेल । कतेक सम्झओने छलहुँ साधनाकेँ । हमर असली धन तऽ नेहा, रीना आ पंकज अछि । यदि इएह सभ ठीक जकाँ पढ़ि–लिख लेत तऽ एहिसँ बड़का धन आओर कि हएत । एकरो सभकँे स्कुलसँ अएलाक बाद ममत्व चाही । एकरो सभक विषयमे पुछऽबला होएबाक चाही । मुदा की साधना कोनो बातके बुझती ? मानलहुँ हम दोकानमे किछु नहि करैत छी, मुदा घर तऽ बिगरल जा रहल अछि । बच्चा की बुझैत हएत ? की बुभैmत साधना ई सभकऽ रहल छथि ? ओह, की भऽ गेल अछि साधनाकेँ ? कपड़ाक व्यपार ! ओहो एकटा कथे अछि । साधना कहैत छलीह, ‘कपड़ा बढ़ियाँ बिकाएत ।’ कतेक बिकाएल कपड़ा ? महिला क्लवक ई दोसर उपहार छल कि महिला क्लवमे लोक कपड़े किनत दैनिक ? के बुझाओत साधनाकेँ ! जयनगर जाउ, सीतामढ़ी जाउ, कपड़ा लाउ, प्रदर्शनी लगाउ तखन जाकऽ थोकमे कपड़ा बिकाइत अछि । की भऽ गेल अछि हमर जीवनकँे ? साँझमे अफिससँ आउ तऽ स्वयं चाह बनाउ । दीपककँे की पड़ल अछि ? आइ हमरा घरमे अछि, काल्हि दोसर घरमे चलि जाएत । पैसा कतऽ बँचैत अछि ? हमर तलब अछि, दोकानके पैसा अछि मुदा एकटा छोटको बिमारीमे कर्जा लेवाक अवस्था चलि आएल । लोक ओतबे अछि । इएह पंकज अछि । पहिने क्लासमे प्रथम करैत छल । शिक्षककेँ प्रिय छल । आब फेल होबऽ लागल अछि । कतेक उदास रहैत अछि पता नहि ककरा सभकेँ सङी बना लेने अछि ? ‘की भऽ गेल अछि एहि दश वर्षमे,’ जीतेन्द्र प्रसाद सोचैत रहलाह, बल्व जरिते रहल । ओ करोट फेरैत रहलाह मुदा, साधना निफिक्किर सूतल रहलीह । भोरमे साधना दीपककँे बजार पठाकऽ घरक लेल समान मगबओलैन्हि । घरके ठीक कएलैन्हि । नेहा, रीना, पंकज सभ साधनाक आगाँ कतेको समस्या सुनओलक । साधना किछु देर सुनैत रहलीह, किछु कालक बाद ओकरा सभकेँ किछु कहलीह मुदा, बातक अन्त भेल नेहाक पिटाइसँ । ‘आखिर अहाँ कोन तमाशा बना रहल छी ? की भऽगेल अछि ? अहाँ कतऽ अबैत जाइत रहैत छी ? किछु देर घरोमे रहू आ बच्चाक देख–भाल करु,’ जीतेन्द्र प्रसादके तामस बढैÞत जारहल छल । ‘तऽ की करु ? ई सभ काज बन्दकऽ दिऔ ? आब जखन बजारमे कपड़ा बिकाए लागल अछि, दोकान चलऽ लागल अछि, तऽ की बन्दकऽ दिअ दोकानकेँ ? घरमे बैसल रहब तऽ सभ काज ठप्प भऽ जाएत ।’ ‘मुदा घरो तऽ नहि चलैत अछि । घरमे कम पैसा तऽ नहि अछि । घर चलएबाक लेल बढ़िएँ तलब भेटैत अछि । एहिसँ कम तलब भेटैत छल तहिया ई हाल नहि छल । एतेक मारि–पीट, एतेक झगड़ा नहि होइत छल ।’ ‘हम तऽ अहाँके किछु करहोके लेल नहि कहैत छी, हम स्वयं कऽ रहल छी । घर बाहर घूमि रहल छी । शुरुमे तऽ अहुँ मदति कएने छलहुँ, बच्चा आब तऽ छोट नहि रहि गेल अछि, अपन काज स्वयं कऽ सकैत अछि । घरमे एकटा नोकरो अछिए । की हम नोकरनीए बनिकऽ रहू सभ दिन ?’ ‘ओह, अहाँ इहो तऽ सोचू जे हम विमार छी । उठिकऽ स्वयं चलि फिर नहि सकैत छी । बजारसँ समान नहि आनि सकैत छी । बच्चाकँे पढाइ सेहो बढियाँसँ नहि चलि रहल अछि । एहिसँ बढिकऽ तऽ पैसा नहि अछि । जखन हमही सभ नहि रहब तऽ की हएत पैसा लऽ कऽ ? लड़का गुण्डा–आवारा भऽ जाएत तऽ की हएत ? अहाँकँे बन्द करऽ पड़त ई सभ कारोवार । ई घर अछि कोनो बजार नहि, होटल नहि । याद राखू, घर अछि ।’ ‘चाहे जे भऽ जाउ, हम दोकान बन्द नइँ करब । कपड़ाक व्यपार नहि बन्द करब । चाहे बच्चाकँे होस्टलमे पठाउ वा घरमे पढ़ाउ । अहाँकेँ बेमारीएमे कतेक खर्च भेल अछि, किछु बूझल अछि अहाँकेँ ? घरक खर्च कतेक बढ़ि गेल अछि, किछु बूझल अछि अहाँकेँ ?’ जीतेन्द्र प्रसाद टूटि सन गेल छलाह, ‘हम की देखू ? बच्चा होस्टल जाएत तऽ खर्चा बढ़त की घटत ? हमरा बिमारीमे पैसा लागल तऽ की हमर पैसा किछु नहि बचल छल ? अहाँ की कहऽ चाहैत छी ? की मतलव अछि अहाँकें ? ’ दुनूके स्वरक आवाज बढैÞत जा रहल छल । बातचित आब झगड़ाक रुप धारणकऽ लेने छल । तखने रीना चाहक कप लऽकऽ रुममे पहुँचल । चुप्पी । साधना चाहक कप जीतेन्दं्र प्रसाद दिस बढ़ा देलीह । किछु देरक शान्ति । दूनु एक दोसरकेँ देखैत रहल मुदा किछु नहि बाजल । साधना कपड़ा लऽकऽ बाथरुम चलि गेलीह । जीतेन्द्र प्रसाद चुपचाप पड़ल रहलाह । पाएर लग नेहा बैसल छल । एखनधरि पत्रिका सेहो चलि आएल छल । मोट अक्षरमे महिला दिवस मनएबाक कार्यक्रम छपल छल । शहरक लेडिज क्लवमे महिला वर्ष मनएबाक पुरा कार्यक्रम छल । साधना कार्यक्रमक संयोजक छलीह । कलवेल बाजि उठल । नेहा गेट खोललक । ‘मम्मी अछि, बौवा ?’ ‘हँ, छैक । अपने के ?’ ‘कहियौन्ह मिश्रा जी आएल छथि ।’ मिश्राजीक नाम सुनिते साधना जल्दी–जल्दी वाथ रुमसँ निकललीह । ‘बेटी, एक कप चाह पियबियौन्ह, कनी जल्दी । ’ साधना कपडा बदलि लेलीह । रीना चाहक कप रुममे रखलक साधना सेहो मिश्रा जी सँग चाह पीलैन्हि आ बैग उठा लेलैन्हि । ‘हँ, तऽ हम जा रहल छियौ । जल्दिए अएबाक कोशिस करबौ । रीना, भोजन बनालिहँे । रुपैया अलमारीमे छौ ।’ जीतेन्द्र प्रसाद चुपचाप सुनैत रहलाह, साधना मिश्राजीक स्कुटरपर बैसि विदा भऽ गेलीह । चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार ठकबुद्धि विलट राम पहिल बेर दूनू प्राणी गाम आयल अछि.संग मे दूनू बच्चा सभ सेहो अयलहि अछि.गंगाधर पण्डित कार सँ उतरैत विलट, ओकर कनिञा आ' बच्चा सभके देखने रहथि.अनमन विदेशी लगैछै. गोर धप-धप बच्चा सभ. कनिञा सेहो बड्ड सुन्नरि छैक.विलट त' पहिनहि जँका अछि.गहुँमक रंग सन मुदा मूँहक चमक बढ़ि गेलैक अछि.किएक नहि बढतै कलक्टरक पोस्ट कोनो मामूली पोस्ट नहि होइ छै.जिलाक राजा होइत अछि कलक्टर.तखन राजसी ठाठ-बाठक चमक त' एबे करतै.कनिञा बिभा कुमार सेहो एस.डी.ओ.छैक.दू बरखक जुनियर छै कनिञा विलट सँ.दिल्लीए मे दुनू प्रेम विवाह केने रहए.बेचनी, विलटक माय दियामान सँ फाटल जा रहल छै.पाँच बरखक पोता राकेश आ' दू बरखक पोती रश्मि के देख ओकर खुशीक कोनो ठेकान नहि छै.बेर-बेर दुनू के करेजा सँ सटाबैत अछि.राकेशक मुँह सँ "दादी" शब्द सुनतहि ओकर आँखि नोरा जाइत छै.आँचरक खूट सँ बेर-बेर अपन आँखि पोछि लैत अछि बेचनी. भरि गामक लोक करमान लागल छै विलटक दलान पर. गंगाधर पण्डित जी, दयाकांत मास्टर साहेब,किरतु मुखिया,...गामक मुँहपुरूख बच्चा बाबू सेहो कुरसी लगा बैसल छथिन्ह.एतबे मे रश्मि के कोरा मे नेने विलट सेहो आँगन सँ दलान पर अबैत अछि.विलटक अबिते ओहिठाम कुरसी पर बैसल सभ लोक ठाढ़ भऽ जाइत अछि.विलट,बच्चा बाबू,पण्डितजी,मास्टर साहेब,सभ के पएर छूबि गोर लगैत अछि.मास्टर साहेब विलट के भरि पाँज पकरि छाती सँ सटा लैत छथिन्ह.हुनका मूँह पर गर्वक भाव स्पष्ट देखार भऽ रहल छैन्ह जे हुनकर विद्यार्थी आइ कलक्टर बनि गेल.विलट सभ के विनम्र भावे बैसबाक आग्रह करैत अछि.सभ बैसथि अछि. भरि गौँआ के आइ गर्व भऽ रहल छैक जे ओकरा गाम मे एकटा कलक्टर सेहो छैक-बच्चा बाबू विलट दिस तकैत बजलाह........एक्केटा नहि दू टा बच्चा बाबू -पण्डित जी बिचहि मे बच्चा बाबूक बात कटैत कहलखिन्ह.कनिञा सेहो अगिला साल धरि कलक्टर बनिए जेतीह ने...पण्डित जी आँगा बजलाह.विलट किछु नहि बाजल.खाली मुस्कियाएल रहए कने. आँगन सँ गोपीया, विलटक पितियौत एकटा छिपली मे पाँच-छह कप चाह नेने आयल.सभ गोटे चाह पिबै लगलाह.एतबे मे बुद्धिनाथ सेहो विलटक दलानक आँगा बाटे कोम्हरो जाइत रहथि....कतौ जाइत नहि रहथि..ओ त' विलटे सँ भेँट करय आयल रहथि मुदा विलट ल'ग बच्चा बाबू के देखि दोसर बाट पकड़ि लेलथि.सात पुरूखा सँ दुनूक परिवार मे एक-दोसराके निच्चा देखेबाक होर मचल छन्हि.पुस्तैनी दुश्मनी चलैत छन्हि."देखहक बच्चा बाबू केहन निर्लज्ज भऽ गेल, बेचनीक दुआरि पर बैसि आब चाह पिबैत अछि....चमारक दुआरि पर..राम-राम." -ई बात कंटीर सँ कहैत काल बुद्धिनाथक स्वर मे अपन दुश्मन सँ पाँछा भऽ जेबाक खौँझी स्पष्ट प्रतीत भऽ रहल छलैन्हि. राकेश हाथ मे एकटा गेन नेने दलान पर आयल आ' विलट के अपना सँग खेलबाक लेल जिद्द करय लागल. बच्चा बाबू ओकरा अपना कोरा मे बैसा लेलखिन्ह आ' गाल पर चुम्मा लऽ लऽ दुलारऽ लगलखिन्ह.बच्चा बाबूक कोरा मे अपन पोता के बैसल देखि बेचनी के करीब तीस बरख पहिलुका बात मोन परि गेलइ.छहे मासक रहैक विलटु..हाँ विलट..भरि गौँआ आ' बेचनी सभ तऽ विलटुए कहैत छलै विलट के.बेचनी लेल तऽ विलट एखनहु विलटुए अछि. ओहि दिन बेचनी एसगरे रहए घर मे.सासु नैहर गेल रहए.ससुर सासु के पहुँचाब गेल रहथिन्ह.विलटक पिता सेहो कोनो आन गाम गेल रहय रसनचौकी बजबै लेल.नवहथ बाली गिरहतनी माने बच्चा बाबू गिरहतक घरबालीके बच्चा होनहारी रहए.प्रसवपीड़ा उठि गेल रहए.बच्चा बाबू गिरहत के हुनकर बाबू माने बड़का गिरहत पठेने रहथिन्ह माय के बजा अनय लेल.असमंजस मे परि गेल रहए बेचनी......घर मे पुरूष-पात नहि छै.ओकरा एखन सालो नहि पुरलैए सासुर बसना. कोना जेतइ घर से बाहर...? छह मासक बच्चा के कत' रखतइ...?.ओ'तऽ आई धरि कहियो, ककरो परसौती करेबो नहि केलकइ....मुदा, नहि जेतइ त' पसारी छियैक गिरहत छुटि जेतइ....बोनि मरि जेतइ....मालिक की कहतइ....तहू मे बड़का गिरहत.....सौसे गाम हुनकर धाक करै छै....बड़का कलेवर बला लोक छथि...अन्ततः बेचनी अपन पितीया सौस के संग कऽ गेल रहए.विलटु के सेहो संगे नेने गेल रहए. छए मासक बच्चा के कत' रखितइ. सूरेश बाबू जनमल रहथिन्ह.बड़का गिरहत, बच्चा गिरहत सभ गिरहतनि,सभ केयो बड्ड हरखित रहथिन्ह.बेचनी सेहो मोने मोन निचेन भेल रहए जे गिरहत नहि छुटलै.बेटा जनमलैन्ह तै बोइनो बेशी कऽ के भेटतइ.घोघ तनने, विलटुके कोरा मे उठेने विदाह भेल रहए कि तखने पएर मे किछु अभरल रहए.घोघ त'र से नहि देखायल रहए ओकरा. अरे बाप रे ..जुलूम भऽ गेलै..मैँयाक पितरिया लोटा छुआ गेलै...कोनो बच्चा चिकरि उठल रहए.बेचनी के देह जेना पथरा गेल रहै ई बात सुनितहि देरी...बु......दी,ख...राही..,असर्ध-असर्ध गारि पढ़ैत बच्चा बाबू बेचनी दिस मारय लेल हुरकल रहै..ओ'तऽ बेचनी के पितिया सौस पएर पर खसि परल रहै बच्चा बाबू आ' बड़का गिरहत के तँइ जान बचलै.एकएक टा बात,एकएक टा गारि बेचनी के एखनहु ओहिना मोन छै.एखन धरि नहि बिसरल भेलैए ओहि अपमान के...विलटुआ के बाप जखन गाम अयलहि तऽ सभटा बात बेचनी कहि देलकै आ' दुनू परानि ओही दिन सप्पत खैने रहै जे आब ओ ककरो पसारी बनि के नहि रहत.छुटि गेलै गिरहत..छुटलै कि छोड़ि देलकै...फेर विलटुआक बाप रसनचौकी बजाके आ' बेचनी खेत मे बोइन कऽ के विलटु के पढेलकै.......कलक्टर बनेलकै.परूका साल विलटु के बाप चलि गेलै बेचनी के असगरे छोड़ि के.नहि...नहि ओ एसगर कहाँ अछि......भरल-पुरल परिवार छै.एहन परिवार जकरा देख ककरा ने सेहन्ता लगैत छै.बेचनी के आँखि फेर नोरा गेल रहै.ओ फेर आँचर सँ आँखि पोछि लेलक.एतेक दिन बेचनी के एकटा प्रश्न बेर-बेर मोन मे उठैत छलै जे बच्चा बाबूक पुतोहु डाक्टरनी छै.ओहो तऽ परसौती करबै छै लेकिन ओकर छूअल किछो किएक नहि छुआएत छैक...?..मुदा आई अपना दलान पर बच्चा बाबू के चाह पिबैत देख बेचनी के एहि प्रश्नक उत्तर सेहो भेट गेलै. मंच सजल छैक.मंच पर विलट बैसल अछि.गामक गणमान्य लोक सभ सेहो बैसल छथि.विलटक सम्मान समारोह आयोजित कयल गेल अछि.सभटा खर्च बच्चा बाबू केलखिन्ह.माइक पर किरतु मुखिया भाषण दऽ रहल छथिन्ह.-"हमर गामक श्री विलट राम,कलक्टर बनि गेलाह. ई हमरा सभक लेल गौरव के बात अछि.हम सभ आइ हुनका समस्त ग्रामीणक तरफ सँ सम्मानित करब..." बच्चा बाबू विलट के पाग, माल आ' दोपटा पहिराय सम्मानित करैत छथिन्ह.विलटक मुँह पर एखनो बस मुस्की टा छै.ओकरा सभटा बुझल छैक.बच्चा बाबूक किरदानी...मायक ब्यथा...समाजक चापलूसी..सभ जनैत अछि विलट आ तइँ ओकरा माथक पाग कोनो ठकक द्वारा पहिराओल टोपी सँ बेशी नहि लगैत छैक.मुदा,आब विलट ठकाइ बला नहि अछि आर तइँ ओकरा बच्चा बाबूक ठकबुद्धि पर हँसी लगैत छैक. लोहनावाली भोरक करीब सात बजैत रहै. लोहनावाली भनसाघर मे चुल्हा पजारति रहय.सिमसल चेरा पजरैत नहि रहय खाली धुआँइत छलैक. धुआँ भरल भनसाघर. फुकैत-फुकैत अकच्छ मोन भेल छै. आँखि फुटि रहल छलैक ओहि धुआँभरल भनसाघर मे. आँखि लाल बून्न भ' गेल रहय. आँखि सँ नोर बहय लागल रहय मुदा कनैत नहि रहय एखन लोहनावाली. ओ त' आँखि मे धुआँ लागि गेल रहय तइँ नोरा गेल रहय.कानल त' राति मे रहय ओ. भरि राति कानल रहय...भरि राति कि जीवन भरि त' कनिते रहल अछि. ...नहि..नहि..जीवन भरि नहि .....जहिया से एहि घर मे वियाहि के आयल अछि तहिया से..जा धरि वियाह नहि भेल रहै, नैहर मे रहैत रहय, कहियो कोनो दुख-दर्दक भान नहि भेलै.बेटी भऽ जनम नेने छल तइयो बड्ड प्रेम भेटैत छलै माय-बापक.तीन भाय-बहिन मे एसगर बहिन तहू मे सबसे छोट.सभक मुहलगुआ..मायक रधिया..बाबूक राधा बेटी,......लोहनावाली........चुल्हि फुकैत लोहनावाली. राति मे फेर जुगेसरा पी के आयल रहय.बड़का पियक्कर निकलि गेलैए.रोज ताडी-दारू चाही.सभटा जथा-पात बेचि पीबि गेलै.बड्ड मना करैत छैक लोहनावाली मुदा के सुनैए ओकर गप्प. बेचारी के रोज गारि-फज्झति सुन' पड़ैत छै उनटे.की करतइ अबला नारी, सहि लैत छैक सभटा.मुदा आब ओकरो कखनो-काल बर्दाश्त सँ बाहर भऽ जाइत छैक.मोन होइछै जे मरि जाय.एहन जीवन से त' मुइनहि नीक.फेर, दूनू बच्चा के मुँह देखि शांत भऽ जाइत अछि.आठ बरखक सुधीर आ पाँच बरखक सरिता छैक.इसकुलक मास्टर कहैत छथिन्ह जे सुधीर पढ़ै मे बड्ड तेज छैक आ' तइँ एतेक मारि-गारि खेलाक बादो लोहनावालीक एकेटा मनोरथ जियौने छैक जे सुधीर पढ़ि लेतै त' सभटा कलेश दूर भऽजेतइ.सरिता त' बेटी छियैक.अनकर धन.बस कोनो नीक ठाम बियाह भऽ जेतइ तँ सभ चिन्ता दूर भऽ जेतइ लोहनावाली के....आँच एखनो नहि पजरलैए...बियनि तकैत लोहनावाली. रामावतार, लोहनावालीक जेठ भाय. बड्ड स्नेह करै छै लोहनावाली से रामावतार. कोनो एहन मास नहि होइछै जे ओ' नैहर से लोहनावाली ले सनेस नहि अनैत हो...सनेस की आब त' लोहनावालीक गुजरो नैहरेक बल पर होइ छै. हरदम पाइ-कौड़ी नैहर से अबैत रहैत छै.पन्द्रहो दिन नहि भेलैए दू गारी आमक चेरा पठा देने रहै रामावतार.एखनो सौसे दरबज्जा पसरल छै. पानि मरैले रौद मे देने रहए.ओही चेरा मे से एकटा घीचि के जुगेसरा राति मे मारने रहै लोहना बाली के. पाँजर मे एखनो कारी-सियाह चेन्ह भेल छै. ई चेन्ह त' तइयो मेटा जेतइ मुदा करेजा मे जे अपमान आ' दुत्कारक चेन्ह लागल छै से त' मुइनहि मेटैते....आँचर सँ नोर पोछैत लोहनावाली. परसू रामावतार आयल रहै. जाइत काल गोरलगाइ मे एक सय टाका दैत गेल रहै लोहनावाली के. एकमास से सुधीर किताब कीनि दै ले हल्ला मचौने छेलइ.पचास टाका किताबे किनइ मे खर्च भऽ गेल रहय.बीस टाका गामबाली काकी से पैँच लेने छल.सरिताक दबाइक खातिर. ओहो सधा देलकै. तीस टाका बचल छेलै.ओहे तीस टाका काल्हि साँझ मे जुगेसरा के देने रहै लोहनावाली आ' बेर-बेर बुझा के कहने रहय जे घर मे सिधहा खतम भऽ गेल छै से ई पाय कत्तौ अनतऽ नहि खर्च करबा लेल.....अनतऽ की......एहि पाय के पीबै लेल नहि.मुदा हेहर भऽ गेल छै जुगेसरा.कोनो मतलब नहि छै ओकरा जेना बहु बच्चा से. दारू भेट जाउ बस आर किछ नहि चाही.भरि दिन टहलानी मारैत रहै छै.कोने-कोन गाजा तकैत रहैत छै.महा निशाँबाज भऽ गेल छै...पीबि गेलै ओहो तीस टाकाक दारू.साँझखन छूछै हाथ डोलबैत अबैत देख लोहनावाली के तामश चढ़ि गेल रहए.तामश एहि दुआरे नहि चढ़ल रहए जे ओ की खायत,लेकिन धिया-पुता के कोना भूखले सूत' देतइ.साँझे सँ बाट तकैत छल चुल्हि लग बैसलि.एकोरत्ती मोन मे विचार नहि अछि? कोना के पी गेलियै?...एतबे बाजल रहै लोहनावाली कि धेले चेरा मारि देलकै जुगेसरा.लोक-लाजक डर की बाजत.चुप्पे रहि गेल लोहनावाली.ओहन झाँट-बिहाड़ि एलै किछु नहि बुझलकै ओ.सून्न भऽ गेल रहैक ओकर दिमाग जेना.सभटा चेरा भीजि गेलइ.सुधीर आ' सरिता मायक कोरा मे मूड़ी नुकौने निन्न पड़ि गेलै.भुखले सूति रहलै...आ टक-टक तकैत रहि गेल लोहनावाली....भरि राति कनैत रहल लोहनावाली. जखन लाल बहादुर शास्त्री देशक प्रधानमंत्री बनल रहथि तखन देशमे अन्न-संकट छल आ' ओहि समय मे गाम-घर मे एकटा प्रथा जनमल जे गृहणी लोकनि जखन सिधहा लगाबय लागथि तखन ओहि मे सँ एकमूठ्ठी चाउर निकालि के अलग राखि लैत छलीह आ' एकरा मुठिया चाउर कहल जाइत छल.एहि जोगाओल चाउरक उपयोग ओ' विपरीत काल मे घर चलैबाक लेल किनइ-बेसाहइ मे करैत छलीह.लोहनावाली सेहो माय के देखने रहै मुठिया चाउर जोगबैत आ' तइँ ओहो जोगा के रखइत छल मुठिया चाउर. पैर नहि उठैछै भनसाघर दिस जाइक लेल.की करतइ ? भरि राति धीया-पुता भूखले छै.जल्दी-जल्दी चुल्हा लग आयल जे किछ बना के देतइ बच्चा सभ के. सुधीर के बजेलक आ एकटा तौला मे राखल मुठिया चाउर के पोटरी बान्हि दालि किनबा ले दोकान पठा देलकै.ओही तौला मे सँ सिधहा सेहो निकाललक.आँच धधकि गेलै.कतेक दिन तक ओ चलेतै घर एहि मुठिया चाउरक बलेँ...सोचैत अछि लोहनावाली..अधहन चढ़बैत लोहनावाली...सुधीरक बाट तकैत लोहनावाली.आब तऽ एकटा सुधीरे सँ आशा छैक जकरा बलै दिन काटत लोहनावाली. विहनि-कथा -बुच्चू भइया बुच्चू भइया करमान लागल लोक..अनघोल भेल सौंसे गाम..जकरे देखू तकरे आँखि मे नोर..सगरो संताप पसरल..नहि रहलथि बुच्चू भैया आब एहि दुनिया मे.पचासी बरखक अवस्था भ गेल रहन्हि तइयो सभ बुच्चू भइये कहैत छलन्हि. नेना-भुटका, जर-जवान, बुढ-पुरान,स्त्री-पुरूख..सभक भैया..बुच्चू भैया छलाह. अनकर कोन कथा अपनो बेटा-पोता सभ त' बुच्चू भइये कहैत छलन्हि.कोनो बेशी पढल-लिखल नहि छलाह मुदा बेबहारिक गेयान सँ परिपूर्ण.समाज मे घुलल-मिलल लोक.ककरो-कहियो कोनोटा खराप नहि सोचलखिन्ह जीवन भरि.सभके हरदम नीके रस्ता देखबैत रहलाह.भरि गाम मे ककरो ओहिठाम कोनो तरहक दसगरदा काज मे बिन-बजौनहु पहुँचि जाइत रहैत.कोनो तरहक राग-द्वेश नहि.एकदम शुद्ध-मना.एही गुण सभ दुआरे तऽ एतेक सम्मान भेटै छलन्हि सभठाँ.अनकर कोन कथा बड़का पण्डिजी सेहो हिनकर मान करै छलखिन्ह.उमेर मे नमहर रहितौ ओहो बुच्चुए भइया कहैत छलखिन्ह. दलान पर कुरसी लगा बैसल बुच्चू भइया...अबैत जाइत लोक..के छोट..के पैघ..सब बइस रहैत छल हुनका सँ दू आखर सुनबा लय..... जिनगीक उँच-नीच गुनबा लय.....खिस्सा-पिहानी सुनबा लय.कल्ला तर पान..ठहक्का मारैत बुच्चू भइया नजरि के सोझाँ ओहिना नाचि रहल छथि.आँखि हमरो नोरा गेल. माँझ अँगना उत्तर मूँहे सूतल छथि बुच्चू भइया.मूँह पर एखनो हँसी पसरल..दिव्य ललाट. गौदान-वैतरनी भ' गेल...बाँसक रथ सवार बुच्चू भइया विदाह भेल छथि अंतिम यात्रा पर...कन्नारोहट उठल सगरो..शांत बुच्चू भइया ..आइ नहि पोछलखिन्ह ककरो नोर.सिरहौना-पोछौना..आमक लकड़ी बोझल गेल..सभ काठी चढौलक श्रद्धांजलि-सवरूप.मुखाग्नि पड़ल..सरर..धुमन..गमकथि बुच्चू भइया.चर्चा-परिचर्चा..केयो बजलइ-"एकबेर बुच्चू भइया के कोनो बात लेल तामश उठि गेलनि.बौसति कियो कहलकन्हि -अहूँ के बड्ड तामश उठैत अछि. हमरा त़ऽ हरदम तामश उठले रहैत अछि, चट्ट दऽ कहने रहथिन्ह बुच्चू भइया"-सभ हँसऽ लागल...धधरा जोर भऽ गेलइ..हँसैत बुच्चू भइया. बिहनि कथा समए होत बलबान
मालिक बाबा..माने श्री सुरुज ठाकुर..जमाना केँ जमींदार. एकटा समय छलै जखन बारह सौ बिगहा जोतैत रहथि. इनार,पोखरि,कलम-गाछी कथुक अभाव नहि.परोपट्टा मे नाम रहैन्ह. आँगा-पाँछा हरदम चारिटा लठैत रहैत छलन्हि.एही शान-रोआब दुआरे बड़का-छोटका सभ मालिक कहैत छलन्हि..एखनो कहैत छन्हि...कियो मालिक बाबा त' कियो मालिक काका. मुदा आब ओ समय नहि छन्हि.सुख-भोगक पाँछा निर्भूम भ' गेलाह.अपना खेतक लवाणो नहि होइत छन्हि.हँ घरारी एखनो पुरने छन्हि.बीच गामपर कम से कम पाँच बिगहा के. चारू कात जंगल जनमल रहैत छै आ' बिच मे पुरना हबेली छैन्ह.कतेको ठाम ढहल.मुदा रोआब एखनो पुरनके.चिनीया बिमारी छन्हि तइयो डाक्टर ल'ग जेबा सँ पहिने भरि पोख रसगुल्ला खा' लैत छथि. कहैत छथि -फेर सार डाक्टर मना करत. पहिने खा' लेब' दे. बात-बात मे गारि देब आदत बनल छैन्ह मुदा हुनकर गारि ककरो खराप नहि लगैत छैक.सभ असिरबादी बुझैत अछि. परुका मलकाइन मरि गेलखिन्ह.बडड् प्रेम छलन्हि दुनू परानी मे.जहिया से मलकाइन मरलखिन्ह, मालिक बाबा बताह बनल रहैत छथि.एकदिन बारीक आमक गाछ पर कोइली बाजब सुनि अनेरे गरियाब' लगलाह.कोनो नेना ई घटना देखि लेलक. मालिक बाबा..कूउ..अनायास ओकर मुँह सँ बहरा गेलै. माइये-बहिन ओकरा गरिया देलखिन्ह.असर्ध गारि सभ. फेर की ई त' खिस्सा बनि गेल..मालिक बाबा ..कूउ..की बच्चा..की चेतन..सभ खौँझाबय लागल आ' असिरबादी सुनय लागल. काल्हि मलिकाइन के बरखी छियैन्ह. एगारह टा ब्राह्मण के खुएथिन्ह तकरे इंतजाम मे लागल रहथि.घामे-पसेने तर.थाकि गेल रहथि. दरबज्जा पर बसि रहलाह.खरिहान मे एकटा बकरी चरैत रहय.बारी मे फेर कोइली बाजल..कूउ..तामस चढि गेल रहन्हि..मुदा गारि नहि बहरेलन्हि मुँह सँ..आँखि भीज गेलन्हि. गमछा लय मूह-आँखि पोछय लगलाह. बकरी मेमिया उठल..बुझेलन्हि जेना मलकाइन बौसि रहल हो. कहैत होइथिन्ह -"समय होत बलबान" विहनि कथा अनकर दुर्गति हाथ मे झोड़ा नेने, मोने मोन किछो गुनधुन मे पड़ल हम बजार दिस चलि जाइत रही. एतबे मे हमर लंगोटिया भजार भुटकून सोझाँ मे आबि गेलाह. ओ बम्बई सँ घर घुमल छलाह.दहिना हाथ मे अटैची रहैन्ह आ' बामा कान्ह पर बेश भरिगर बैग.नीक कमाइ छथि से सुनैत छलहुँ मुदा आइ हुनकर पहिरन-ओढ़न देख सबुत भेट गेल. लगीच अबितहि भरि पाँज पकडी लेलाह...की हाल-समाचार छौ रौ भजार..बाप रे कतेक दिनुका बाद भेँट भेल अछि..एह धन्य भए गेलहु..बजलाह. हमरो मोन हुनकर एहि मित्रता आ' हमरा प्रति स्नेह देखि गद-गद भ' गेल.पुछलियैन्ह ..की हाल छह..बहुत दिनुक बाद गाम मोन पड़लह. बिहुसैत बजलाह, काज-राज मे व्यस्त रहैत छी..समये नहि भेटैत अछि जे गाम आयब. ई त' आठम दिन बियाह छी तँइ आबय पडल. हम पुछलियैन्ह-ठीके ? ओ गंभीर होइत बजलाह-हाँ एहिठाम बगले मे रखबारी...फेर पुछलाह-मुदा तोँ एना किएक पुछलैह -"ठीक्के"?. हम कने अनमनस्क होइत बजलहुँ-नहि..नहि..अहिना..हमरा त' बिसबासे नहि भ' रहल अछि...ओना ई साल बड्ड शुभ छै देखहक ने बिदेसराक सेहो बियाह भ' गेलै. आब ओ' हम्मर बात बुझिगेल रहय.बिहुँसैत बाजल-ऐ रौ तु हमरा बुढ़ बुझैत छैह जे हमर गिनती ओहि पैतालिस बरखक बिदेसरा से करैत छैँ. हम हसैँत कहलियन्हि-नहि...नहि ..अरे हमरा कहने हेतै त' हम त' तोरा एखनो एहू पैतिस बरखक अवस्था मे अठारह बरिखक छौडा कहबह मुदा ई त' गौआ सभ कहैत रहैत छह. भुटकुन हँसैत बाजल-हाँ...हाँ..ठीके कहबी छै ने जे अप्पन बियाह भ' गेल त' लगने खतम. हम कहलियैन्ह - नहि..नहि ई कहबी विल्कुल गलत अछि. हमरा बुझने कोनो विवाहित व्यक्ति ई नहि चाहैत होयत जे अनकर विवाह नहि हो. भुटकुन आश्चर्यचकित होइत बाजल-से कियेक ? दोसरक दुर्गति के नहि देखय चाहैत अछि ?-हम कहलियैन्ह.ओ भभा के हँसय लगलाह. जवाहर लाल कश्यप विहनि कथा ड्युटी रमेसरा हाथ मे दवाई के पार्सल लेने घुमि रहल छल / बार- बार पता बला पर्ची के देखैत छल / कतेक आदमी स ओ पता पुछि चुकल छल / कियौ सही उत्तर नहि देने छल / जेठक गरमी मे गाम स आयल सीधा- सादा बच्चा बंबई सन शहर मे परेशान भ गेल /गर्मी स बेहाल पुरा मुह लाल भेल पशीना स भीजल सरीर आ संगे भीजल कपडा ओ एक रोड स दोसर रोड, एक गली स दोसर गली, मे घुमि रहल छल /आ पता छलहि जे भेट नाहि रहल छल / दुपहरिया मे लोक सबहक आन जान सेहो कम छल ताहि लेल पता खोजय मे और दिक्कत भ रहल छल / तखने ओ एकटा बुड्डा के देखलक ओकरा जान मे जान आयल, जे शायद ई सही पता बता सकैत अछि /ओ पता के पर्ची देखेलक नवनीत बिलडिंग अपोजिट बैंक आफ इंडिआ बान्द्रा ईस्ट/ बुड्डा कहलक आगे से राईट लेकर पहला छोरकर दुसरा लेफ्ट् लेना वहीं है / सामने बैंक आफ इंडिआ देखि मोन खुशी स भरि गेल/ बैंक आफ इंडिआ के सामने बला बिलडिंग मे ओ घुसि गेल / गेट पर वाचमैन नहि रहै ओ अंदर घुसि गेल /सामने स एकटा साहेब के आबैत देखि ओ ठाढ भ गेल / साहेब क्रोध मे पुछलखिन्ह किधर जाना है ? बिना पुछे अंदर कैसे आ गया ? वाचमैन किधर है ? ताबटिधरि मे वाचमैन आबि गेल / साहेब तमकि क पुछलथि तुम लोग किधर रहता है ? चोर -उच्चका अंदर घुस जाता है / वाचमैन आव देखलक ने ताव, थप्परे-थप्पर रमेसरा के मारय लागल आ अप्पन ड्युटी के निर्वाह करय लागल / रवि भूषण पाठक तीनटा विहनि कथा १ तीन-चारि सालक छौड़ी मुदा अलबत्ते चरफर ।बाजै भूकै ,चलै-फिरै ,दौड़ै-घूमै मे केकरो बूझि नइ पड़ै जे ई एत्ते छोट छैक आ माए कें हरदम सर्टिफिकेट दिय’ पड़ै ।छोट मोट टोहल होए ,दोकानक काज ,कंसार जेनए ,बथुआ तोरनए ,हकार देनए आ जनी-जाति सबक बीच मे बैसि के गीत-नाद मे पाछू पाछू सूर मिलेनइ.....अलबत्ते रहै राम सोहागक बेटी ।आ बुचिया के माए कहबो करै ...ई रहै त’ बेटे मुदा भगवान के नीन्न आबि गेलेन आ ई बेटी भ’ गेलै । आ जखन बोखार लागलै ,तखन पूरा दू महीना तक भूपेंद्र डॉक्टर आबिते जाइत रहलै ,कखनो ई दवाए त’ कखनो ऊ दवाए .....आब ई टॉनिक दियओ , आब छोटका गोट्टी शुरू करू आ जखन बेमारी कम हेबाक कोनो लक्षण नइ देखेलकए तखन कहलखिन जे एकरा दरभंगा मे फलां बाबू ओइ ठाम देखाबू ।आ फलां बाबू देखिते कहि देलखिन ,जे एकरा त’ बड़का बोखार अछि ,मुदा कहलखिन एना जे भूपेंद्रक प्रति मोन मे ककरो कोनो शंका नइ जनमै ......आखिर चेला त’ हुनके रहेन ।
आब बात एना फसलै जे ठीक हेतै त’ कते हेतै आ पैसा लागतै त’ कत्ते लागतै ......राम सोहागक ओकादि क’ पूरा मानचित्र डॉक्टर साहेब एक-दू दिन मे बना देलखिन ,आ पूरा दया देखबैत मात्र महीसे बेचेलखिन .......बेटी जाइत बला बात.....फलां बाबू जे अपन डिग्री क’ अंत मे एफ0आर0सी0एस0 लगबैत छथिन स्पष्टे कहलखिन जे यदि बेटा रहत तखन त’ हम आर किछु कहतौं ,मुदा ई त’ बेटिए अछि तें आब जत’ अछि कथा के ओतै समाप्त करू आ राम सोहाग अपन छोटकी बेटी के नेने गाम आबि गेला ।बेटी जे ने बाजि सकै छलै ,ने उठि-बैस सकै छलै ।सूतले सूतल खाए आ पैखाना करै ।टोल पड़ोसक लोक सब शुरू मे आबैत गेलै ,कुशल क्षेम आ भगवानक नाम.......राम सोहाग सेहो पंजाब चलि गेला....आब बचलै केवल बुचिया आ ओकर माए ......आ माए सेवा कर’ लागलै ,भगवान ,भाग के गारि-बात कहैत .......ओइ दिनक प्रतीक्षा कर’ लागलै जखन कि बुचिया क’ प्राण छूटतै आ बुचिया कें ऐ कष्ट सँ मुक्ति मिलतै........... २ भाय साहेब कार सँ मामा गाम जेबा के विचार बनेलखिन ।भौजी निच्चे आंखिए एना देखलखिन जेना ऐ यात्रा मे भाय साहेब सब किछु लुटा देता । फेर भौजी कें बौंसए क कम सँ कम पनरह साल पुरान तरीका अपनाबैत कहलखिन ‘चिन्ता नइ करू ।बहुत दिन बाद जा रहल छी ,खाली हाथ कोना आबए देता , आ माए सेहो कत्ते दिन बाद गेलै हन ।‘ भौजी क’ चिंता तैयो समाप्त नइ भेलेन ,तखन भाए साहेब बड़का बेटा के सेहो तैयार क देलखिन ।मानि लियओ जे जेना खरचा हेतइ त हेतइ विदाइयो त ऽ हेबे करतइ । आ विदाइ के समै बेटा के पांच सौ टका मामा देब ऽ लागलखिन त ऽ छौड़ा बाप दिस देख ऽ लागलए । भाए साहेब के पित्त चढ़ेन जे छौड़ा लै किएक नइ छइ आ वौआ बूझइ जे लेला क ऽ बाद पप्पा डांटि ने देथि । आ माए गुम्मे रहलखिन भाए कें पैसा खर्च होए के चिंता अलग आ वौआ गाड़ी सँ आयल से चिंता अलगे ............ ३ एकात वला रस्ता दूनू कवि भोरूका टहलौनी मे एहन रस्ता खोजि लेलखिन ,जइ रस्ता मे केओ नइ देखाइ ।कखनो काल कोनो सरलहिया कुकुर ,कखनो कोनो कबाड़ी तेजी सँ आबादी दिस बढ़ैत ,बस यैह हलचल ।ने एक्कोटा अखबार वला कऽ सायकिल ने इसकुलिया बस क धूम-धक्कर ,कखनो-कखनो हनुमान मंदिर सँ भजन कऽ आवाज आबै ।भजनो नबका धुन पर ,कविगण ऐठाम निचेन सँ अपन पेट पर ढ़ोल बजा सकैत छला ,पेटे नइ ,पीठो दिस आ नीच्चों ,ऐठाम के देखए वला ।आ ऐठाम खूब नीक जँका विरोधी पर टिप्पणी कएल जा सकैत छलै आ रंगबिरही गारि सेहो । ओक्कर तोहर हम्मर सपना (दीर्घकथा) नाम:सूर्यकांत उमेर :बयालिस वर्ष रंग:गोर लंबाई:पांच फीट नओ इंच वामा आंखिक ऊपर मे आ दहिना बांहि पर चोटक निशान समस्तीपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक ,करियन शाखा क’ एकटा खाता नम्मर (हम नम्मर सार्वजनिक नइ क’ रहल छी) पहिले पहिल मात्र यैह सूचना फैक्स क’ माध्यम सँ दिल्ली सँ राजीव झा जी भेजला ।राजीव झा दिल्ली पुलिस मे उपनिरीक्षक छथिन ,आ हुनका पता छलनि जे सूर्यकांत हमर पिसियौत भाय छथि ...........दिन छलै सोलह अगस्त दू हजार दस ।जखन हमरा बूझा गेल जे सूर्यकांते भाय ई डायरी लिखला तखन हम कहलियेन जे ई डायरी भेज दियअ । ई डायरी अजीब तरीका सँ लिखल गेल छैक ।जत्ते दिलचस्पी अपना प्रति ओतबे समाजक प्रति ।ओना डायरी क’ बहुत रास बात हमरा अनसोहांत लागल .........कखनो कखनो एत्ते कि सूर्यकांत अप्पन मर्यादा धोए देने हो..........मुदा ऐ विषय मे हम किछु नइ कहब किएक त’ गजेंद्र जी कहला कि डायरी के मूले रूप मे छापल जाय ,तें डायरी क’ कंटेंट पर हमरा किछु नइ कहबा के अछि .......ओहुना मरल आदमी के विषय मे की कहल जाए ? हमरा तऽ ईहो नइ बूझबा मे आबि रहल अछि कि ऐ डायरी मे किछु साहित्यिक तत्व अछि वा नइ ? कखनो डायरी तथ्य आ समै कऽ संदर्भ स्वीकारैत छैक आ कखनो नइ ,कखनो –कखनो तऽ डायरी अप्पन रूप के छोड़ैत संस्मरण ,कथा ,कविता दिसि भागऽ चाहैत अछि ।कखनो –कखनो सपना कऽ रूपक मे समाहित हेबऽ लागैत अछि ।डायरी लिखलो छैक मिथिलाक्षर मे आ हमर मिथिलाक्षर रहबो करए कमजोरे ,तें एकटा ईहो मेहनत बढि़ गेल । मुदा गजेंद्र जी कऽ ई कहतब छनि जे एगो –दूगो पृष्ठ के नित्यप्रति सुलेखित करैत भेजैत रहू । डायरी कें प्रस्तुत करैत सभ सँ पहिले हम राजीव बाबू कें धन्यवाद दैत छिएन जे ओ अप्पन व्यस्त दैनंदिनी कऽ बीच सूर्यकांत कऽ डायरी मे दिलचस्पी देखेलैथ आ एहियो सँ आगू बढि़ हेरायल डायरी कें खोजि निकालला । ई डायरी सूर्यकांत भायकऽ मकान मालिक राखि लेलकइ आ कोनो साहित्यिक वस्तु बूझि बेचबा के फिराक मे रहए ।ऐ डायरी कऽ तथ्य के प्रस्तुत करैत हम सूर्यकांत भाय कऽ आत्मा सँ क्षमा मांगैत छी ,किएक तऽ डायरी मे कतेको एहन चीज छैक ,जइ सँ विवाद उत्पन्न्ा होयत आ मृतात्मा कऽ संबंध मे भ्रांति उत्पन्न भऽ सकैत छैक । मुदा ऐ धन्यवाद आ क्षमाप्रार्थना कऽ प्रासंगिकता तखने ,जखन डायरी मे कोनो सत्व हो ।डायरी मे कतहु कतहु शीर्षक छैक आ कतहु नइ ।सबसॅं नमहर शीर्षक छैक ‘ओक्कर हम्मर तोहर सपना ‘ ।आ डायरी कऽ पहिल पृष्ठ पर एकटा छोट शीर्षक रहै ‘सोयरी आ सपना ‘।ऐ खेप मे ‘सोयरी आ सपना’ प्रस्तुत अछि । सोयरी आ सपना ई कोनो अद्भुत सपना नह रहै ।सभ लोक अपन अपन बच्चा क' लेल एहिना सपना देखै छैक ,आ ई ओकर पहिलो सपना नइ छलै ।पहिलो नइ ,दोसरो नइ ,तेसर ........ ,मुदा आइ सँ तीस-चालीस साल पहिने तीन टा बच्चा बहुत सधारण बात छलै ,से दम्पति अपन सपना के देखबा ,सपना के अगोरबा ,पोसबा के सब उपक्रम करैत गेल ।सपना मे पानि देनइ ,सपना के हवा लगेनइ ,सपना मे सँ आकुट बाकुट कें साफ केनए ,सपना के चोर-शैतान सँ बचाबैत ,लोक-वेद के कहैत गुणैत ।सपना के हाथ-पैर ,मुंह-कान सब बनलए ।ऐ मे लगभग नओ महीना लागि गेलइ ।आ ई नओ महीना कोना बीतलइ दम्पति के पते नइ चललै । एक दिन मिथिला क एकटा गाम मे सपना के धरती पर उतारबाक व्यवस्था प्रारंभ भेल । तीन -चारि टा जनानी ,एकटा चमैन ,आगि-पानि ,तेल-मौध,साबुन-कपड़ा आ गीत-नाद । आ वौआ रे अलगे समै छलै ,ओइ समै मे ,बच्चा जनमै काल एकटा खास भूमिका लेल किछु जनाना कें बजाओल जाइत छलै ,ऐ मे सबसँ प्रशिक्षित जनाना ओइ वर्ग सँ होइत छलखिन जे मिथिले नइ समस्त भारतवर्षक जाति-विचार मे अछोप मानल जाइत छलै ,मतलब सबसँ महत्वपूर्ण काज आ काज केनिहार क दरजा अछोपक ।ई सब बात बाद मे ,पहिले सपना कऽ स्पर्श ,गंध सँ मोन के भिजा तऽ लेल जाए । आ सपना कें जमीन पर उतारबा क जिम्मेवारी ओइ वर्ग के हाथ मे जेकरा सपना देखबा कऽ मनाही हो । मुदा ‘लैंडिंग ऑफ ड्रीम्स’ कऽ मजबूत पायलट सभ अपन-अपन अनुभव कऽ बलें अभियान कें सफल दिशा दैत रंगबिरही बात ,कखनो टोल पड़ोस कखनो धर्म पुराण कखनो शरीर विज्ञान आ यौन विज्ञान सेहो ...... जनी-जातिक मजाक स्वप्नागमन मे निहित वेदना के कम करैत । आ सपना के छोट छोट हाथ छलै ,छोट छोट पएर ....आंखि कान सब छोट छोट ।आब सपना स्वयं अपना लेल सपना देख सकैत छलै ................ मुदा सपना के नून नइ चटाएल गेलै , ई दम्पति कनि अलग रहै यैह बात नइ ,बच्चा ‘बच्चा’ रहै ,बच्ची नइ ।आ सपना एखन सीधा-सीधी बाट चलैत रहै ,भूख ,प्यास ,गरम-ठंड केवल सपना मे आबै ,आ ईहो कोनो सपना देखए के उमेर छलै...............जे बाप माए क’ सपना सएह बच्चा क’ । आ छोट-छोट सपना के पूरा करए लेल माए-बाप रहबे करथिन ,से अपन सुविधा के समेटैत वौआ कऽ आवश्यकता पर केंद्रित भऽ गेलै घर । एखन तक सपना मे सपना कऽ मथफुटौएल नइ भेलै । से किएक? त’ एखन छोटका सपना के हाथ पएर नइ भेल छलै ,ओकर आंखि नइ फुटलै छल एखन ,तें ओकरा देखाओल गेलै जे वौआ रे सपना एहिना देखबा कऽ चाही आ सपना मे मात्र यैह सब देखबा के चाही ।से तीन –चारि साल तक ककरो ई बात दिमागो मे नइ एलै जे ऐ परिवारक प्रत्येक सदस्य के कोन मात्रा मे सपना देखबा कऽ चाही ।एखन तक खाए-पीबए ,पहिरनइ-ओढ़नए ,गीत-गानक सीमित बाईस्कोप छलै ..... आ ओइ समै मे गाम मे बाईस्कोप देखबै वला आबैत छलै आ ओकर चकरका पेटी मे आठ-दस टा खिड़की रहैत छलै आ घूमैत फोटो कऽ साथ गीत सेहो सुनाइत छलै ।फोटो आ गीत मे सामंजस्य हेबाक चाही से वौआ के ओइ समै मे नइ बुझेलए । आ वौआ नइ चिन्हैत छलै तें एके सिनेमा मे मरलका पृथ्वी राजकपूर सँ लऽ के सरलका गोविन्द प्रधान तक के फोटो अजीबे आकर्षक लागै ।फोटो कऽ मुद्रा ,जइ मे मारनए-पीटनए ,हँसेनए ,दौड़ेनए तऽ रहबे करए छौड़ा-छौड़ी एक दोसर के पकड़ने सेहो रहै ।आ वौआ कें ओइ समै मे ई बूझऽ आबि गेल छलै जे वौआ अलग होइ छइ आ बुच्ची अलग .............. आ वौआ कऽ जखन नाम लिखेलइ तऽ वौआ एगो झोरा आ एगो बोरा नेने ईसकुल पहुंचि गेलइ । ईसकुलो मे वौआ अप्पन बोरा कें छौड़ा सभक बोरा मे सटा के राखए ।ईसकुल कऽ वातावरण वौआ के बेसी नइ नीक लागलै ।ऐ ठाम मरसैब सब हिंदी बाजैत छलखिन आ हाथ मे मोटका सटक्की राखैत छलखिन । वौआ के तऽ ईहो पता नइ रहै जे हिंदी कोनो भाषा होइत छैक ,हां ओ सब जे बाजैत छलखिन से गाम मे केओ नइ बाजैत रहै ...........मुदा नइ ऊ जे नीरस भैया आबै छथिन कहियो कहियो गाम ,आ ऊ जे कुमल भैया छथिन्ा ,ऊ दूनू गोटे गामो मे हिंदी बजैत छथिन ,तऽ की हिंदी बहरिया भाषा भेलै ,गाम परक नइ रोड परक ,ईसकुलक भाषा ।मुदा ओइ बात सभक लेल ओइ समै कोनो अवकाश नइ छलै ,ई कोनो सपना नइ छलै ,तें झोरा ईसकुल तक राखि बहुतो बच्चा मंदिर दिसि निकलि जाइ आ वौओ सएह करए ।मंदिर पर ,पोखरि दिसि ,गाछी मे ओ सभ समान मिलैत छलै ,जेकरा सपना मे देखल आ सोचल जा सकैत छैक । कनैलक फूल ,कक्का कऽ ललका लताम ,हुनकर बँसबीट्टी ,उत्तरबाय टोलक ईमली आ पवितरा आ डोमा कऽ तार आ तरकुल मे बहुत नशा छलै ।आ ईसकुलक सर्वमान्य मुद्रा पिनसिल छलै ,मतलब पिनसिलक कनी टा टुकड़ा मे तार कऽ कनी गो हिस्सा मिलबा कऽ गारंटी छलै । ओइ समै मे वौआ के बूझल नइ छलै जे पवितरा दुसाध छैक आ पवितरा के छुइ देला सँ हड्डी तक छुआ जाइत छैक ! ओइ समै ईहो नइ बूझल छलै जे डोमा डोम जाति कऽ बच्चा नइ कुम्हार छैक आ डोमा नाम राखि एगो जोगटोम कएल गेल रहै ,आ ईसकुल मे डोमा कऽ माए –बाप कें ई साबित करबए मे दम लगब’ पड़लै जे डोमा कऽ असली नाम सुकुमार छैक । मुदा वौआ रे हम्मर स्थिति किछु अलग रहै ,आइ तक घर मे हमरा केओ नइ सुनलकै हमरा जन्मक कहानी ।ने माए ने बाबू ने भाय-बहिन सब ।हम विशुद्ध पुरहितिया घर मे जनम लेलियइ ।घरक पूरा अर्थव्यवस्था बाबू के द्वारा सांझ मे आबइ वला सीदहा पर निर्भर रहै ,तें घरक पूरा राजनीति जजिमनिका पर केंद्रित छलै ।भोर मे बाबू नहा-सोना पूजा कऽ लेला के बाद सीधे भागथिन गयघट्टा ।आ ई गायघाट गाम हुनकर समस्त योग्यता आ विद्वता कऽ मंच छलै ।ऐ ठाम हुनका लेल कोनो कंपटिशन तऽ नइ रहै ,तें साबित करबा आ नइ करबा सन किछु नइ रहै मुदा ई जे निर्दन्द्व संभावना छलै से कतेको संभावना कें नून चटा के मारि देलकए ।एकर धरती एको डेग नइ छलै ने अकाश एको हाथ के तें वामन कें वामने रहि मरबा के छलै ,ऐ ठाम विष्णु मात्र सत्यनारयण कथे मे रहथिन ,हुनकर दस टा पचास टा रूप कहियो सपना मे आयल ,विराट रूपक बाते छोड़ू । ऐ ठामक विष्णु लक्ष्मी सहित आबैत रहथिन आ कहियो चौबन्नी ,कहियो अठन्नी ,कहियो सवा रूपैया आ कहियो ‘बाद मे दऽ देब’ कऽ पुनरूक्ति सुनाबैत गौलोक चलि जाइत छलखिन ........................ कांटी आ मरिया जजिमान आ पुरहितक सम्बन्ध पता नइ कोदारि आ बेंटक संबंध छैक वा कांटी आ मरिया क’ । बुझाइत तऽ एहिना छइ जे एगो मरिया हेतै त’ दोसर के कांटी बनय्यै पड़तै ।आ एहनो कोनो जोगाड़ नइ बैसै छैक जे कांटियो रहि के मरिया क’ मारि नइ खाए पड़ै । आ मरिया रहि के केओ ऋषि मुनि बनल रहए ,से हमरा जनैत तऽ असंभवे बूझू .....ओना हम पुरहित रहियइ आ हमर भरि दिन जजिमनिके मे बीतए ......वियाहे-श्राद्ध नइ ,मारि-पीट , गारि-उपराग ,टोना-मानी सभक हिस्सान ।हअर जोतनइ ,चौकी केनए ,बाउग केनइ ,कमौनी ,पानि देनए ,खाद छिटनइ ,जजात के घोघेनए ,दाना पुष्ट. भेनए ,कीड़ा लागनइ ,दवाइ के स्प्रे ,सूखनए ,काटनए ,दउनी वा झंटेनइ ,कखनो कखनो मशीन सँ दउनी..........अन-पानि सुखेनए आ कोठी अथवा बोरा मे राखनए .......ऐ सब प्रक्रिया मे हमर सक्रिय भागेदारी रहैत छलै आ हम दिने नइ गुनैत रहियइ ,कखनो कखनो सलाहक स्वकरूप समाजिक आ वैज्ञानिक सेहो भ’ जाइत रहै ।हम कोनो मार्क्स वादी बात नइ करैत छी ,ने हम ई मानैत छी जे उत्पा्दन प्रक्रिया मे हमर समान भागेदारी रहै .......ने विश्वाहस क’ स्तिर पर ने समाजक स्तीर पर । अपन भूमिका के अवमूल्य न नइ करितौं ई कहबा मे हमरा कोनो लाज नइ कि मिलै वला प्रतिफल असंतोषजनक ,असमान आ अमानवीय छलै ।कोठी आ खरिहान के भरै मे सांस्कृितिक सहयोगी आ मिलै छलै आसेर ,सेर भर अगऊं ।एगो दूगो बाबू सब छलखिन जे साल मे एक –दू बेर पसेरी भरि दाना दैत छलखिन ।आ ई हमर खानदानी कर्त्तूव्यब छलै कि जजिमानक समृद्धि क’ प्रति विरक्तिक भाव बनेने रहियइ ।भगवती अन्न पूर्णाक पूजा मे कतओ कमी छलै आ अन्निपूर्णों खूब तमाशा देखबैत रहथिन ...........
आ जजिमानक पुरूखा सभक बरखी ,छाया ,एकोदिष्ट क’ तिथि हमरा मुंहजबानी यादि रहै ......यादि रहै यैह बात नइ ,यादि केनए परमावश्याक रहै ,महाकर्त्ताव्य ............शायदेसंयोग यदि कहियो बिसरि गेलियइ त’ ओइ दिन जजिमान महासामंत भऽ जाइत छलैखिन आ हम महादास......आ मृत्यु.दंड सँ कनिये छोट दंड रहै ई वाक्यन ‘हमरा अहांक कट्टमकट्टी ।हम आब फलां पंमडी जी सँ पूजायब’ ।आ जइ दिन बाबू के ई बात पता लागेन ,हमर देह ,हाथ ,माथ पर हुनकर खड़ाम आ लाठीक चेन्हू अहां गिन नइ पेतियइ .........ओना माए गानैत छलखिन आ कखनो बाबू आ कखनो दुनियो के ......कानबो करथिन आ गारियो देथिन.........
एतबे नइ एकादशी ,त्रयोदशी ,चतुर्दशी ,पूर्णिमा अमावस्यान सब........जेना सूर्य आ चन्द्रनमा हमरे पूछि के डोलैत छथिन ।आ कोन एकादशी करियौ आ कोन छोडि़यौ ...ईहो बात विधिपूर्वक हेबाक चाही ।आ बात-बात पर महादेव पूजा ।पान सौ आ हजार त’ डेलीए पूजाथिन ,मुदा कहियो कहियो सवा लाख महादेव क’ बात सेहो होए ...आ ओइ दिन त’ एकटा उत्सकवक वातावरण बनि जाए ,ओइ दिन बाबू महंत जँका करथिन ,किएक त’ हजार दूहजार सभक घर मे बनए आ बाबूए हुनका सभ के दक्षिणा बांटथिन ।आ बाबू ईमानदारी पूर्वक दक्षिणा बांटथिन तें हुनका कहियो पंडितक अकाल नइ पड़लेन ।हरदम टोल-पड़ोसक पंडित सभ आगू-पाछू करैत रहए ।आ ई कोनो महादेव पूजे तक सीमित होए ,एहनो बात नइ रहै ,कहियो श्राद्ध कहियो बरखी कहियो उपनेन-वियाह........एहिना चलैत रहए ।आ बाबू चाहथिन छल तखन सभ दिन पारसे आबैत रहतै छल ,मुदा बाबू पारस लेबाक विरोधी छलखिन ।जत्तेि ब्राह्मण होए ,ओतबे क’ भाड़ा लियओ ,दुनिया क’ ठीकेदारी नइ......
वैदिक कर्म शुभक हो वा अशुभक ,जजिमान सभ एकटा खास नजरि सँ पुरहित कें देखैत छलखिन ।हुनका लेल आदर्श पुरहित ओ भेल जे मैल चिकाठि पहिरने हो ,चाहे धोती हो वा कुरता एक दरजन ठाम ओइ पर चिप्पी हो ।अहांक मोंछ-दारही बरहल हेबाक चाही ,अहां टुटलकी चप्पहल या बिना चप्पओले के यात्रा करैत हो ।यदि अहां साफ-सूतरा कपड़ा-लत्ताह पहिरने छी आ पएर मे जुत्तो. हो तखन त’ बूझू जे ने केवल अहांक धर्म भ्रष्टा अछि बल्कि जजिमनिका मे कनफुसकी क’ केंद्रविंदु सेहो अछि ।सब कहत ‘देखियौ ने कनेक जुत्ताम देखियौ ,बाप के खड़ाम खटखटबैत जिनगी गुजरि गेलेन आ बेटा ......’ आ फेर तखन बहुत रास खिस्सा एहनो जइ मे हुनकर बाप आ बाबा हमरा बाबू आ बाबा के खाली पएर देखि द्रवित भ’ गेलखिन आ प्लासस्टिक वला जुत्ताह वा चप्पबल वा खड़ाम दऽ देने हेथिन ।
आ भाय लोकनि ध्याटन देबै मैथिली मे एहन कहबी सबसँ बेशी छैक ,जइ मे अहांक तुलनात्मयक महत्ताल स्पएष्टब होइत अछि मतलब नीचा दिस ,खराब दिस ,जेना कि ‘बापक नाम लत्तील फत्तीा ,बेटाक नाम कदीमा ‘ ,’खाए लेल खेसारी आ .....पोछै लेल जिलेबी ‘ , ‘पूजी ....नइ चाभी क’ झब्बा ‘ , ‘नमहर नाग बैसल छथि आ ढ़ोरहाय मांगै पूजा ‘ आदि आदि ।आ ई सभ कहबी जत्तेज लौकिक अनुभव सँ भरल होए अहांक अपमानित करबा लेल पर्याप्तज रहै ।मुदा ई सुनला के बादो कोनो उत्त र नइ देबाक रहए ।एगो बात ईहो छलै जे जकरा कर्म करबाक रहै ,ओ चाहे किछो पहिरए ,खाए ,पीबए ,अहांक लेल खास ड्रेसकोड ।मतलब बाप मरै फलनमा के आ केश छिलाबैथ पंडित राम । सम्माान आ अपमानक एहन दुर्लभ संगति हमरा मूने कोनो सभ्य ता ,कोनो समाज मे असंभव अछि ।आ मैथिल ब्राह्मणक चरम लक्ष्य् सभ दिन चूड़े दही रहल ।हरिमोहन बाबूक दार्शनिक अंदाज जत्तेे ‘खट्टर कका क’ तरंग’ मे चूड़ा दही चीनी मे विस्ता र लैत अछि ,ओहियो सँ बेशी ।एकटा भोजन ......नइ भोजने मात्र नइ.....अलगे आकर्षण ......अलगे नशा ।एकटा सुस्तीओ ,संतोषक भाव ।त्रिगुण केवल सानै काल तक ,ओकरा बाद विषम भावक सह-अस्तित्वा ।दांत चूड़ा पर प्रहार करैत आ जीभ आ कंठ दही के ससारैत आ चीनी मुंहक सभ अंग सँ मेलजोल बरहाबैत ।अंत मे विषमता समाप्त आ सभ तत्वी अपन अपन वैशिष्ट्यअ के समाप्त करैत .......।आ चूड़ा दही एहन नै बुझियौ जे केवल खाइए वला मे सुस्तीस बरहाबैत हो ,खुएनहार मे सेहो तेहने आलस्यब बरहाबैत छैक । चूड़ा दही खुएबा मे अहांक करबा के की अछि ? चुड़ा कुटाएल बोरा मे राखल ,दही पौरल आ चीनी दोकान सँ खरीदल ,तखन त’ मात्र अंचारक सहारे सेहो अहांक ‘ए’ ग्रेड मिलि सकैत छैक .....हम धर्म ,पुण्यद आ पितरक बात अखन नइ क’ रहल छी ।जे होए चूड़ा दहीक नशा एहन रहै जे इसकुलक समै मे इसकुल कालेजक समै मे कालेज छोड़लियइ ।ने घअर दुआरि ने खेती बाड़ी ।कोन कुटुम कोन कुटमैती ।ने समाजक नौत-निमंत्रण ने पावनि तिहारि ।बस अर्जुन जँका ...संभवत: ओ मांसाहारी रहै तें माछक आंखि मे तीर मारलकए आ हम सर्वाहारी मैथिल ....चूड़ा दही क’ गंध दिस आंखि मूनने बरहैत आ हमर प्रेम चातको सँ बेशी ,हम्मरर धियान बगुलो सँ बेशी ,हमर क्रोध सिंहो सँ बेशी आ हमर भूख सांपो सँ बेशी आन्हहर।मुदा रूकू महराज हम किछु बेशीए बाजि गेलौं हमर भूख चाहे जेहन होए दुर्वासा आ भृगुक क्रोध किताबे तक सीमित रहलै ,हम अपन जिनगी मे त’ नइ देखलियै जे केओ जजिमान अहांक उचितो क्रोध कें सकारने हएत ।भृगु अपन क्रोध कें ने छिपेलखिन ने सम्हालरलखिन आ भगवान विष्णुक के धएले लाति करेजा पर मारि देलखिन आ भगवानो केहन त’ पूछलखिन ‘हे ब्राह्मण श्रेष्ठक चोट त’ नइ लागल ।हम्म र करेज त’ पाथरक अछि ,मुदा अहांक पएर त’ कमलोऽ सँ बेशी कोमल ‘ ।ई प्रसंग ब्राह्मणवादक संरक्षणक एकटा नमूना अछि कि कोना वैचारिक स्त र पर यथास्थितिवादक समर्थन कएल गेलै । फेर लक्ष्मीई क’ क्रोध आ पुन: भृगु कें क्रोधित भऽ कें भृगुसंहिता लिखनए आ लक्ष्मी के संबोधित ई गर्वोक्ति कि ‘जे ब्राह्मण ई पोथी परहत ,ओकरा लग तों दौड़ल जेबहीं ‘ ।
एकटा बात आर अहां अपन दैनंदिनी के चाहे जेना व्यावस्थित राखियौ ,एक चीज लेल हरदम तैयार रहियौ ।अहांक कखनो बुलाहट आबि सकैत अछि .......नइ नइ उपनेन वियाह त’ पहिले सँ निश्चित रहैत अछि ,मुदा सत्यननारायण कथा ,महादेव पूजा ,कोनो गुप्त् उद्देश्यछक लेल ब्राह्मण भोजन आ एहने सन बहुतो रास प्रसंग ,जइ ठाम अल्प्सूचना पर अहांक उपस्थिति अनिवार्य आ कखनो कखनो लठैत वला भाषा ‘यादि राखब पंडित जी समै खराब छैक छओ सँ सात नइ हेबाक चाही ‘ ।आ ग्याारह टा ब्राह्मणक निमंत्रण छैक त’ ग्याउरह टा हेबाक चाही ,औ जी साहेब आब गाम मे नइ छइ त’ नइ छइ ,हम कतऽ सँ लाबी ।सब गाम छोडि़ के दिल्ली ,पंजाब रहै छैक ।बहुतो लोक गामो मे छैक त’ अपन अपन काज धंधा मे व्यकस्तस ।ओ चूड़ा दही खेबा लेल तीन घंटा बेरबाद नइ करता ।ओना त’ काज चलिए जाए मुदा कहियो काल एहन स्थिति उत्पलन्ऩ होए कि लागै आइ नऽ छऽ भइए के रहत ।कोनो कोनो जजिमान कें होए कि कम ब्राह्मण हम पारस जमा करबा लेल आनलौं ।कखनो कखनो त’ हद भऽ जाए जजिमान सब नाओ गिनाबऽ लागता ,फलां पंबडित त’ गामे मे रहैत छथिन ,आ चिल्लांनक भतीजा सेहो ............. आ जजिमनिका क’ एकटा खास शिष्टा चार रहै ।प्रणाम त’ सब अहींके करैत छलथि ,मुदा अहां आर्शीवाद एकटा विशेष संबोधन के साथ दिअओ ।‘खुश रहियौ हाकिम’ ‘आनंद सँ रहियौ सरकार’ ‘जिमीन्दाकरक जय जय हो ‘ ‘राजा सदैव विजयी रहथि ‘ ।मतलब जजिमानक प्रणाम सूदि समेत लौटाबए क’ व्यावस्थाा रहै ।आ कोनो कोनो गुंडा टाईप के पंडित जी ऐ व्यरवस्था के दोसर रूप दऽ दैत रहथिन जेना ओ जजिमान के देखिते चिचियाथिन ‘जय जय बम बम’ , ‘जय हो जय हो ‘ आ पता नइ ऐ मे ककर जय आ ककर बम बम रहै ।मुदा ई व्यडवस्थाम विभिन्नू रूपांतरणक साथ आगू चलैत छलै ।आ दूनू तत्व यैह चाहथिन जे हम कांटी नइ मरिये रही ,मुदा ई केवल सोचबाक बात नइ रहै ...........
आब कनेक पुरहितक दृष्टिकोण ।तमाम नीचता कें छुपबैत अपन क्षुद्रता कें गौरवान्वित करैत पुरहित चाहैत छलखिन जे संसारक तमाम सिंहासन हुनके लेल रहै ।कखनो सर्दी-बुखार ,कखनो जाड़क मारि आ कखनो अलसियाइत पंडी जी बिन नहेने ,तेल चानन लगा झुठौंआ फूसौंआ के कंपकंपाइत रहथिन कि हुनकर ख्यातति एहन पंडित क’ रूप मे होए जे अपन तपस्याे सँ हवा-बसात के जीति नेने होए ।आ अपन अल्पा संस्कृएत ज्ञान कें कखनो लय ,कखनो रटंतु विद्या सँ सुरक्षित करैत ऐ ठामक सब पंडित ई साबित करैत रहिथिन जे उदयनाचार्यक सब पोथी हुनका पास ।किछु लोकनि ऐ भ्रम के सेहो पोसैत छलखिन कि संभवत: लोक विश्वािस केने जा रहल अछि कि वास्तसव मे उदयनाचार्यक असली वारिस यैह छथि ........ ई पंडित जी छलखिन ,एहन तारनहार जे मंत्रच्यु त ,विचारविहीन आ तर्कशीलता सँ योजन भरि दूर ।अपन जन्मनक बल पर ,तीन-पांचक बल पर ,गाल बजेबाक कौशल आ ठोप-ठंकारक बलें ।मंत्र कतबो मूल्यनवान हो ,दू-चारि टा शब्द अपने गीलने ,दू-चारि टा कुल खानदानक नाम पर आ दू-चारिटा संभावित दक्षिणाक विचारमग्न ता सँ भ्रष्ट होइत.......धियान आबिते फेर सँ हाथ-आंखि हिलबैत भगवान के ठकैत आ जजिमान के भरोस दीबैत कि ‘हमरा सन शुद्ध पूजा केओ ने करा सकैत अछि ‘ । मुदा पुरहित आ जजिमान मे एकटा लिखित समझौता रहै ।भोजन कतबो विशिष्टत आ वैविध्यय सँ भरल होए जजिमान कहथिन ‘जे नून चूड़ा छैक ,आबियौ आ ग्रहण करियौ ।‘ आ भोजन कतबो सरल-गेन्हारयल होय पंडित जी कहथिन ‘ऐ सँ बढि़ के बाते होइत छैक ।‘ मुदा कखनो कखनो विजय बाबू सन मर्दराज सेहो छला जे ऐ लीक के अपन स्व भावे तोड़बाक प्रयास करैत छला ।ओ साफ कहथिन’पंडी जी चिंता नइ करियौ ,आराम सँ खाएल जाओ ।पर्याप्तक दही छैक ,नून चुड़ा वला कोनो बात नइ’ ,तैयो विजय बाबूक ई यथार्थवादी रूख कोनो स्थारयी प्रवृत्तिक रूप धारण नइ केलकै ।आ ई द्विपक्षीय समझौता संभवत: जजिमानी व्यीवस्थारक सर्वोच्चत तत्वइ रहै । यद्यपि पंडित लोकनि जखन एक-दोसरा सँ बात करथि त’ ओ प्राय: दक्षिणा संबंधी होए ।जजिमानक खिधांश ,जजिमनिकाक भोजनक निंदा ,नून ,मिरचाय तेज हेबाक चरचा ,दूध ,दही कम हेबाक बात हरदम सजनिये ,हरदम घिउड़े ,कखनो के सब दिन राम तोरय..........छि: छि: सोहारी मे घृतक नामोनिशान नइ ,आ खीर मे पानि एकदिस आ दूध एक दिस आ चाउर भोकारि पारि के कानैत ।बेलना टूटबाक बात आ मकई क’ रोटी ब्राह्मण के दैत जजिमान सब ।घोर कलियुग ,एहन एहन जजिमान के कत’ सँ पुण्यो हेतै ।संकल्पज आ दक्षिणा मे एकटका दूटका देबा ,कखनो ऊधारिये रहि जेबाक चिंता ।अपन कुटिल पांडित्ये आ दुनिया दारी सँ लोक कें ठकबा सम्बिन्धीद विस्तृनत विमर्श आ दोसर के फटकारि देबा आ चमत्कृडत करबाक कतेको कथा ।गलत-सलत मंत्र परहेबाक प्रसंग बत्तीरसी के खोलि के हँसबा के अवसर दैत आ अपने मूने त्रुटिरहित चलाकी ....... दोसर दिस जजिमानो सब अपन हकिमई ,जमिंदारी आ लंठई क’ चर्चा क’ संग ।विविध प्रसंग जइ मे पुरहितक गलती कें ओ पकडि़ नेने हो ,एहनो प्रकरण जइ मे पुरहित सब कें अपन दानशीलता सँ ओ मोहि नेने होथि ।कखनो कखनो त’ एहन बात कि पहिले त’ बिन जजिमनिका पेट कि पांजरो नइ भरैत रहेन ,मुदा आब कने मजगूत भ’ गेला ।आ ऐ पेट-पांजर क’ चर्चा प्राय: होइत छलै । जजिमान-पुरहितक ई कांटी-मरिया निरंतर ठोकाइत रहला के बादो हमरा ई कहबा मे कोनो हर्ज नइ कि जजिमनका मे कतेको आदमी एहनो छथिन ,जे ऐ जजिमान-पुरहितक संबंध सँ आगू छथिन ,आ ओ हमरा लेल कोनो बाप-पित्तीभ सँ कम नइ ।चाहे जानकी बाबू होथिन वा मकसूदन बाबू ,इंजीनियर साहेबक परिवार हो वा बैद्यनाथपुर मे शशि के आंगन मे ओ वृद्ध मसोमात ।ई सब लोक हमरा लेल हमरा खानदानक लेल पारिजात बनि के रहला आ हमर सब कष्टे हिनका लोकनि के छाया मे हेरायत चलि गेल ।नित्यरप्रति क’ भेंट आ हिनकर सभक दुलार कहियो वास्त विकता सँ परिचय नइ होम’ देलक ,नइ त’ पुरहितक जिनगी कोनो माली ,कोनो धानुक ,कोनो धोबी सँ कोन प्रकारे बेशी छैक ।ओहो सब अपन हिस्सार लैत छैक आ हमहूं । यदि फल महत्विपूर्ण छैक त’ एना सोचनए बहुत बेजाए त’ नहिये............................... जेठक पोखरि सभ प्राय: सूखि जाइत छैक ,मुदा एकदम सूखले बूझि यदि पोखरि कें पार कर’ लागब ,तखन पएर कनि कनि धस’ लागत आ एक क्षण रूकि कें अपन दूनू हाथ सँ एक कोबा माटि हटा के देखिअओ .....तुरत्ते जलक धार अपन उपस्थिति सँ अवगत करा देत..... भिजा के , गरमी सोखि के आ अहांक भ्रांत धारणा मे अपन विनम्र हस्तक्षेप करैत ,तें अओ बाबू भैया सत्य ओएह नइ थिकइ जे आंखिक समक्ष हो ....सत्य कने उद्योगक मांग सेहो करैत छैक ।तें हम अपन गामक परिचय कोना दी ,बड्ड अशौकर्य मे पड़ल छी । ई गाम मिथिलाक ,भारतक आ ब्रह्मांडक एकटा सधारण ग्राम .....अपन खेती-बाड़ी ,खान-पान ,गीत-नाद ,बोली-वाणी ,सामूहिकता क’ विभिन्न कसौटी पर ...एकटा सधारण ग्राम ।एकर चर्चा कोना शुरू कएल जाए , टोल सँ ,जाति सँ ,खेत-पथार सँ ,बड़का लोकक स्वघोषित महानता वा छोटका लोक पर आरोपित ओछपन सँ...... सब मिलाके एके बात छैक ।पहिले टोल सॅं शुरू कएल जाए ।चारू दिशा क’ नाम पर चारि टोल ,उत्तरवारी ,दक्षिणवारी ,पूवारी ,पछवारी अथवा डीह टोल ।दिशाधारित ऐ विभाजनक अलावे बभनटोली ,गुअरटोली ,चमरटोली ,दुसधटोली आ राजपूतक एकटा अलगे टोल ।दुसाधक तीनटा बिखरल बिखरल टोल ,तहिना चमार सभ सेहो दू ठाम समटल.....। विभिन्न टोलक प्रति आन टोलक नवीन नवीन रूख ,नवीन दृष्टि आ ओकर चर्चा मे एकटा अपमानजनक टोन ।जेना उत्तरवारी टोल अपना मूने सबसॅं बेशी सुसभ्य ,दक्षिणवारी टोल सबसँ बेशी लंठ ,पूवारी टोल सबसँ बेशी एडवांस आ डीह टोल सबसँ बेशी जेनुइन छलै ओ दोसर टोलक हिसाबें उत्तरवारी टोल मे सबसँ बेशी बतहपन ,दछिनवारी टोल मे मूर्खता ,पूवारी टोल मे दिखाबा आ डीह टोल मे उत्थरपन भरल रहै । आ एहिना मूल ,गोत्र आ बैसारी क’ हिसाबें सेहो अपना के नीक ,सभ्य आ दोसर के ओछ ,असभ्य मानबा के बहुत रास घटना ,कहबी ,वृतांत......आ जखन एक जाति मे एते बखरा तखन पूरा गाम मे कतेक .........ओना आपुसी गपशप मे पूरा गाम गामे छलै आ नीक-खराप दूनू साथे चलैत छलै.......
उमा बाबू भूगोल पढ़ाथिन त’ टंगड़ी हिलबैत रहथिन आ मोटका करची क’ सटक्की सँ अपन तरवा पर हरदम चलाबैत रहथिन जेना कि केओ मजूर अपन हांसू के पिजबैत छैक ....ओ कहथिन जे आबादी बसै आ घरक समूहक गठन एकटा खास पैटर्न पर होए छैक आ विश्वक विभिन्न भागक लोक सब अलग-अलग पैटर्न पर अपन निवास बनबैत छैक ,उमा बाबू ईहो कहथिन जे यदि केवल भारते के देखल जाए त’ उत्तर भारत आ दक्षिण मे असंख्य पैटर्न ........गंगा ,गोदावरी ,रावी,गंडक ,कोशी सभक पेट मे अलग अलग श्रृंगार ।केवल मिथिले नइ मिथिलो मे समस्तीपुर के देखियौ उत्तर मे अलग आ दक्षिण मे अलग ।उत्तर मे घर पर घर आ सटल सटल टोल ,जखन कि दक्षिण मे हटल हटल घर ।विशाल खेत आ तखन एकटा दूटा घर ,खूब फैलल गाछी बिरछी तखन किछुए टा घर ।आ घरक अवस्थिति केहन त’ पोखरि ,रोड वा मंदिरक आस-पास ।अपने गामक विचार करियै त’ पूरा ब्राह्मणक आबादी नबकी पोखरि ,नौला आ बरी पोखरिक चारू कात वा फेर डीह पर कचहरी ,इसकूलक चारू कात आ रोसड़ा-बहेड़ी मार्ग पर । आ सबसँ उस्सर ,बंजर ,सक्कत जमीन पर चमार आ दुसाधक आबादी ,एकदम बबूर जँका ,कत्तउ जनमि जाइत हो ,खेतक आडि़ पर ,पोखरिक मोहार पर ,गाछीक खत्ता मे लोकपरिया पर ,पीचरोडक दूनू कात आ श्मशान मे सेहो........ने खाद देबाक काज आ ने पानि देबाक चिंता।मुदा सबसँ सक्कत , सूर्य भगवान आ सभ्यताक समस्त गरमी के सोखैत जहिना के तहिना ......एकदम हरियर पत्ती .......बाभनक दांत पर घुस्सा मारैत ,भोर सांझ.......आ जखन सभ हरियरका जजाति सूखि जाइत हो तखन बबूरक पत्ती आ ओकर फअर सभक जान बचाबैत........तहिना चमार आ दुसाध सेहो अपन छोट दुनिया मे एकदम मस्त आ हरियर । गामक सब सरल गेन्हायल पानि ,गनगी बरसा आ बिना बरसा के पूबरिया ढ़लान होयत चमरटोली दिस चलि जायत ।आ चमरटोली जे गामक पूबरिया सीमान पर बसाएल गेल छलै ,समस्त अग्राह्य सेवा क’ लेल ,जत’ के लोक सभ के ई कहबाक अधिकार नइ छलै जे अओ बाबू अपन देहक ,घरक ई दुर्गन्ध हमरा दिसि किएक बहा रहल छी \ ई आबादी जेकर पेट ,देह आ मोनक चर्चा तक अश्पृश्य छलै .....देहे नइ मोन तक छुआ जाए वला .....गंगा जल ,नइ गंगो जल नइ पवित्र करत ,हड्डी तक छुआए वला गनगी.........स्मृति आ वर्णगत विभिन्न श्लोक ,कहबी ,हवा-पानि ,भूत-प्रेत पर्यंत तक फैलल...... यद्यपि चमार सब पूरबिये सीमान पर समटि गेल छलै ,मुदा दुसाध सब जीयत रहै ,डीहक सक्कत जमीन पर ...आ जेकरा जीन मे घुसल रहै संकट निवारण लेल साहस ,उद्योग ,आ ओ सप्पत खेने रहै अपन राजा जी के .....राजा जी हुनकर कुल देवता नइ रहथिन ,ओकर अप्पन राजा जी ,हँ मिथिलाक आदिवासी दुसाधक राजा जी .....आ राजा जी पहिले महल ,गद्दी ,दरबार छोड़लखिन आ किताब ,पुरातत्व सँ सेहो हुनकर निशानी मिटि जाइत रहल.....मुदा राजा जी बसल रहलखिन दुसाध सभक करेज मे - कते घोड़ा तोहर राजा कते दुश्मनमा के धरती चलै अकाश हो........ आ राजा जी आ राजा जी क· घोड़ा दूनू अपन मूल स्वरूप के पानि जँका छोडि़ देने रहै आ राजा जी मने घोड़ा आ घोड़ा मने राजा जी ,तें घोड़ा चढ़एबा क पूजा बेशी धूमधाम सँ होइत छलै आ राजा जी वला उत्सव दुसाध सभ मे एकटा खास उत्साह,आत्मविश्वास जनमाबैत छलै ,मुदा राजा जीक मन्दिर कोन ठाम बनै,विद्यालय पर ,आचार्यक डीह पर वा दुसधटोली मे ......ई खिस्सा कनेक बाद......... अपन गामक चर्चा कोना करी ,खूब मीठ प्रशंसा सँ .....जेना कि केवल मीठे-मीठ अनुभव होए ।केवल मीठ अनुभव तखने संभव ,जखन कि एक-दू दिनक लेल पिकनिक पर आयल जाए ,मुदा जखन जिनगीए बिताबै के अछि तखन केवल मैथिली शरण गुप्त क भंगिमा ल· के कोना जीयब आ बात बात मे ग्रामीण जीवन ,भारतक प्राचीनता आ महानता क पाठ कोना कएल जाए .....आ मैथिली मे सेहो गुप्त जी नइ मैथिली शरण सभक कमी नइ ,जे बात बात मे मिथिलाक महानताक बखान करैत रहता ,हुनकर ग्रामीण जीवन क फॉर्मेट पहिले सँ सुनिश्चित रहै छैक ,केवल विवरण भरबाक काज......छोड़ू ऐ सब कें.......चलू हम अप्प्न डायरीक ई पाठ अहींक कविता सँ प्रारंभ करैत छी ।
(आगूक तीन-चारि टा पन्ना फाटल अछि) सत्यनारायण झा डायरी बैसाख मासक बर महत्व छैक मुदा एहि बेर एहि मास मे असहनीय घाम भ’ रहल छैक |कइएक ठाम सं नोत पता छल |ब्याह ,द्विरागमन ,उपनयन सं पूरा मिथिला पटल छल |घाम त’ बर रहैक ,तैयो दिनांक १४ ४ ०१२ जुड सि तल दिन बिदा भेलौ अपन देस,अपन गाम |गाड़ी लेलौ आ अपने चलबैत बिदा भेलौ |संग मे पत्नी रेणुजी रहथि आ पितयौत अनुज चि० जी० सुरेश जे पतरातु थर्मल कॉलेज मे शिक्षक छथि |ओ एक दिन पहिनहि आबि गेल छलाह |छह वजे भोर मे बिदा भेलौ आ पहिल पराव दरभंगा मे छोट साढू डा० महादेव जी ओहिठाम छल जे हम सभ नौ वजे पहूँच गेलौ |एक तरह बुझू पहुनाइ प्रारम्भ भ’ गेल छल |जखन हमर ब्याह भेल रहय त’ हमर सारि कंचन झा मात्र दु सालक रहथि मुदा आब, आब त’ ओ बुढ़िया नानी जकाँ गप्प करैत छथि |कियैक नहि आखिर उमरो त’ पुरे तेतालीस भ’ गेल छनि |काँलेज टीचर छथि तै गप्प हकबा मे पटु भ’ गेल छथि |सुन्दर चाह पियेलनि आ जलखइ त’ एहन सुन्दर बनेने रहथि जे मोन हुए आंगुर चटिते रही |दुनू बहिन मे नैहर क’ गप्प ततेक ने होमय लगलनि जे बुझाय जे आइ एतहिये ने रहय परय |जखन बहिन बहिन क’ भेट होयत छैक तखन दुनिया मे दोसर रहिये नहि जायत छैक |बस नैहर |से हम देखल गप्प तुरत खतम होयबाला नहि छैक| जलखइ क’ कने देह सोझ करय लगलौ ता आँखि लागि गेल |आँखि फुजल त’ देखैत छी बारह पर घड़ीक दुनू सूई छल |एम्हर देखल दुनू बहिनिक गप्पक प्रबाह रुकबाक नाम नहि छल |बहुत कहला सुनला पर दुनू गोटाक गप्प रुकल |एम्हर पुनः आग्रह होमय लागल जे बसिया बड़ी खा लिअ|आइ जुड़सितल छैक |नहिये मानलनि दुटा बड़ी खाइए परल | मधुबनी २ बजे पहुचलौ |सुखद आनन्द भेल जे पचासी बरखक हमर सासु बालकोनी मे ठाढ़ हमरा सभक बाट तकैत रहैथि |पहुचते पहिने त’ माय ,बेटी क’ डटलखीन जे कतेक देरी क’ देलही |भोरे सं बाट देखैत छलियौक \फेर माय कहलखिन ,नहा ले आ फेर किछु खा ले तखन गप्प करिहे |स्नान त’ हम सभ पटने मे केने रही | हिनकर छोटकी भाउजि ,विभा सरबत बनेलनि ,मैझली चाह बनेलनि आ जेटकी सरहोजि पुछलनि,ओझा ,आइ त’जुड़सितल छैक |ओहुना बरकी बौआ लेल बड़ी त’ बनेबे करितियनि |नैहर मे बेटी आबय त’ बड़ी सं स्वागत होयत छैक |से देखियौ जुड़सितल छैक तै बड़ीक त’ ई पावनिए छैक |ओहुना अहाँक सार कहलखिन्ह जे ओझा अबैत छथीन तै माछ त’ बनबे करय |से अहाँ आजुक दिन माछ खेबैक ?हम कहलियैन ,आहाँ केहन बताहि जकाँ गप्प करैत छी |आजुक दिन ज’ माछ भेट जाय त’ बुझू भरि सालक यात्रा बनि गेल |जल्दी थारी लगाउ |भोजनोप्रांत साझ मे मधुबनी सं अपन गाम पिलखवार चलि गेलौ | मधुबनी सं गाम गेलौ त’ रास्ता मे सड़क दीस ध्यान गेल |२००५ मे नीतीश जी पहिल बेर मुख्यमंत्री भेलाह आ एहि क्षेत्र सं श्री विनोद नारायण झा जीतलाह त’ एहि क्षेत्रक लोकक सुबिधा लेल रांटी चौक सं राजनगर तक पक्की सड़क बनायल गेल |मुदा चारि पाँच बरखक अंदर सड़क जीर्ण शीर्ण भ’ टूइट गेल अछि |एहि रोड पर एखन तक मेंटिनेन्स नहि भेल अछि |ई स्थित रहतैक त’ फेर १० साल पहिने वाला स्थिति भ’ जेतैक | गाम पहुँचलौ |दरवाजा लोक सभ सं पूरा भरल छलैक |मिन्टूक ब्याह काल्हि छैक |हमर पूज्य अग्रज श्री रघुबंश झा जी पहुँच गेल छलाह |अनुज सर्व नारायण जी सेहो उपस्थित छलाह |अन्य पितियौत सभ सभ ठाम सं आबि गेल छलाह |मास्टर साहेब बेटाक ब्याह छनि | मास्टर साहेब श्री अमरनाथ झा हमर पितयौत अनुज छथि |हम सभ भाई जखन कोनो काज मे पहुचैत छी त’ आनन्दक समुद्र मे नहाय लगैत छी |सभहक आकर्षण हमर अग्रज रहैत छथि |हुनका दसटा लोक घेरने रहैत छनि आ ओ सुन्दर सुन्दर अपन गप्प सभ दैत रहैत छथिन |गुप्तचर अधिकारी छलाहे ,तै गप्पक कमी रहिते नहि छनि |गाम अबिते लगैत अछि जेना सभटा तनाव समाप्त भ’ गेल |अपन गाम ,अपन लोक , बचपनक बाल संगी सभ ,काकी ,काका सभ सं गप्प क’ मोन आनन्दित भ’ जायत अछि |एहि सं आनंदक बात आओर की हेतैक |बाल संगी यार जखन भेटैत अछि त’ मोन अनेरे प्रसन्न भ’ जायत अछि |भोर मे सभ कलम गाछी गेलौ |पूरा गाम आमरस भ’ गेल छैक |ब्रह्मस्थान मे पहिलुका बर –पाकरि गाछ एखनो याद भ’ जायत अछि |हमर प्रपितामह सुनाम धन्य नैयायकि पं० कैलाश झाक लगाओल ओ बर –पाकरि पूरा टोल क’ सितलता प्रदान करैत छलैक |मुदा एकदिन ओ बिहारिक वेग सहन नहि क’ सकल आ धड़ाम सं खसि परल |कतबो बाउंड्री परौक,मंदिर बनैक मुदा पहिलुका नैसर्गिक सुंदरता आब कहाँ ?दुर्गा घर विशाल बनि गेल छैक |मुदा दुर्गा स्थान आ माध्यमिक विद्यालयक जमीनक अतिक्रमण भ’ रहल छैक | आइ सवेरे सं चहल पहल छैक |साँझ मे मिंटूक व्याह चचराहा गाँव मे हेतनि |बरियाती लेल सभ तैयारी क’ रहल छैक | उपेंद्रा सभक दाढ़ी मोछ कपचि रहल छैक |बगुला सन् उज्जर धोती पहिर यार दलान पर पहुँचि गेल छैक |साँझ मे मार्शल आ सुमो सं वरियाती गंतब्य दिस बिदा भ’ गेल |रांटी ,मंगरौनी ,पिलखवार मिथिलाक प्राचीनतम गाम थीक |एखनो मिथिलाक संस्कृति एहि गाम सभ मे भेटत |शुद्ध मैथिली भाषा ,मैथिल भेषभूषा,आ मैथिल संस्कार एखनो एहिठाम जिबैत छैक |मैथिलीक गीत एखनो ललना सभ बर टोप टहंकार सं गबैत छथि |अयलै शुभ क’ लगनमा शुभे हे शुभे क’ संग वरियाती विदा भेल |मधुबनी सं जितवारपुर वेल्ह्वार सिविपटी होयत कलुआही चौक पहुचलौ आ नरार कोठी होयत चच्रराहा |सड़क कतौ ठीक नहि छल |बिहारक विकास एहि सभ ठाम नहि छैक | अखबार मे जे पढ़ैत छी ओ अखबारे तक छैक |हमरा गाम मे दु मास सं विजली देवी गुम छथि |ट्रांसफोर्मर जरि गेल छैक |पूरा गाँव जेनेरेटर सं लाइन नेने अछि |मधुबनी में १० वजे राति क’ बाद लाइन अबैत छैक \बिहारक विकास देहात मे देखायत |आखिर ई सरकार की क’ रहल अछि ? मैथिलक बरियातीक भोजन आब आधुनिक भ’ गेलैक अछि |पहिने कम बरियाती रहैत छलैक त’ स्वागतो सत्कार नीक होयत छलैक ,आब लोक की करत |जस्य जनारो तस्य गिर गिरी |पहिलुका बरियाती ,आह पुछू नहि |खाय मे आ खुआबै मे होर रहैत छलैक |सात्विक भोजन रहैत छलैक |आसन लगैक ,पात लगैक ,दोना मे सचार लगैक |मुदा आब ने ओ लोक आ ने ओ कराह |आबक बौअया सभ क’ पुछियोन जे बिझकी केकरा कहैत छैक |सौजन केकरा कही |नहि कहता |मैथिलक अपन परम्परा छैक जे बर अल्प खर्च मे निमहि सकैत छैक मुदा आडम्बर बेसी भ’ गेल छैक |एक दोसर सं प्रतियोगिता भ’ गेल छैक |गरीबक बेटी कतबो संस्कारी रहय ,कतबो सुन्दर रहय ,ज ओकरा बाप क’ टाका नहि होयक त’ नीक ब्याह नहि होयतैक |मुदा टाका बाला अपन कुरूपो कन्याक ब्याह नीक सं नीक घर मे करैत छथि |ई समस्या मिथिले मे नहि पूरा देस मे पसरल अछि |एकर निदान सरकारे टा क’ सकैत अछि मुदा वोटक राजनीति नीक काज करहि नहि देतैक |एकर परिणाम पूरा समाज भोगि रहल अछि |१० -१५ प्रतिशत क’ लेल ८० -८५ प्रतिशत कियैक कष्ट करत ? बरियाती मे पायर धोबाक परम्परा समाप्त भ’ गेल ओना आब पायर मे माटियो नहि लागल रहैत छैक |आज्ञाक डाला एखनो अबैत छैक |परिछनि सं ब्याह तक पहिलका आ एखुनका मे फर्क नहि |एकटा बात नीक देखल |बरियाती खा क’ तुरत चलि देलक |पहिने हमरा सभक गाम मे रहैक जे ब्याह भेलाक बाद बरियाती भोजन करैक आ भोजन क’ कनियाँ क’ सोहाग अर्थात आशीर्बाद द’ बरियाती तुरत बिदा भ’ जायक | खर्चक हिसाबे बरियाती ओही दिन चलि जाय से नीक ब्यबस्था |हमहू सभ ओही दिन भोर मे १६ ४ ०१२ क’ गाम चलि एलौ |सभ भरि दिन सुतले रहल |साँझ मे चाह पीबि बाध बोन घुमय चलि गेलौ |पूरा बाँध हरियर लगैत छल |शुद्ध वायु ,शुद्ध वातावरण | १८. ०४. ०१२ –आइ जूहीक ब्याह छैक |जुही हमर भगिनी छी |जरैल जेबाक अछि |जरैल बेनीपटीक नजदीके छैक |घरक बच्चा बच्चा जरैल जेतैक |२१ आदमी जरैल पहुचलौ |मधुबनी सं धकजरी तक नीक रास्ता छल मुदा धकजरी सं जरैल बहुत खराब रास्ता छल |बिजली ओहू एरिया में नहि छलैक |विकासक कोनोटा चिह्न नहि देखायल |बेनीपटी मधुबनी जिलाक एकटा अनुमंडल छैक |जरैल बेनीपटी सं ५-६ कि० मी० हेतैक |मुदा बर पिछरल |ब्याह नीक जकाँ संपन्न भ’ गेलैक |१९ ०४ .२०१२ क’ जरैल सं पुनः गाम चलि अयलौ | एक दिन २१.०४.२०१२ क’ कपिलेश्वर स्थान गेलौ मुदा रोड बर खराब | रहिका प्रखंड कार्यालय देखबाक मोन भेल |११ वजे तक कियो नहि आयल छल |प्रखंड कार्यालय मे विकासक नहि गंद्गीक वयार बहैत छल| पता चलल जेकरा जखन मोन हेतैक आबि जायत ,बेसी कर्मचारी भागले रहैत छैक |सेवा यात्राक बढ़िया प्रभाव छैक | गाम पर २३.४.२०१२ ,२५ .०४ .०१२ क’ फेर कइएक ब्याह,द्विरागमन छलैक मुदा हम गामे रहलौ |गमैया भोज खेलौ |आ भोरे २६.०४ ०१२ क’ मधुबनी पहुचलौ |आइ आयूषक उपनयन मे विष्णु –बरुआर जेबाक छैक |आयुष हमर ज्येष्ठ सार श्री प्रमोद जीक नैत छनि अर्थात अलकाक पुत्र |अलकाक बर इच्छा जे हम सभ उपनयन मे बरुआर आबी |अपनो इच्छा छल जे बरुआर जाय |बरुआर मधुबनी सं ४० कि० मी० छैक |समस्त परिवार क’ जेबाक रहैक |तीन टा गाड़ी सं हम सभ बिदा भेलौ |मधुबनी ,राजनगर ,पिपराघाट , बाबूबरही होयत मिर्जा पुर चौक पहुचलौ |एतबा दुर नीक सड़क छलैक |मिर्जापुर सं बरुआर ४-५ कि० मी० छैक |४ -५ कि० मी० एहन बिकट मार्ग रहैक जेकर वर्णन कइए नहि सकैत छी |पैघ पैघ खाधि ,उभर खाभर रास्ता |बाबा आदम ज़माना क’ वाट |लागे नहि जे पहुचब|मुदा पहुचलौ |अलकाक घर पुस्तैनी छलैक |वाटक दर्द दरवाजा पर आबि बिसरा गेल |लागे जेना कोनो पिकनिक स्पॉट पर आनन्द ल’ रहल छी |गाम मे एकटा विष्णुक सुन्दर मंदिर छैक |कुल मिलाक’ बरुआरक यात्रा सुखद छल |ओही दिन ११वजे रात्रि मे वापस मधुबनी आबि गेलौ |२७ .४ .२०१२ क’ आराम केलौ आ २८ .४.२०१२ क’पटना वापस भ’ गेलौ | ई डायरी लिखबाक किछु उद्येश्य अछि |मिथिलाक कइएक गामक भ्रमण कयल |कतेक लोक सभ सं भेट भेल |मिथिलाक विकासक अवलोकन कयल |सरकार एहि बेरक टेन्योर में लोक के खाली परतारि रहल अछि |पाँच साल पहिने जे काज जाहि स्थिति में रहैक ओहिना छैक |जे काज रोडक भेल छलैक ओहो टूइट रहल छैक |ग्रामीण क्षेत्रे नहि मिथिलाक कोनो शहर में विजली नहि |उद्योग धंधा बंद छैक |बच्चाक स्कूल ठीक सं नहि चलैत छैक |मिथलाक हृदयस्थली मधुबनी छैक आ मधुबनीक हृदयस्थली पंचकोसी छैक \ रांटी ,मंगरौनी ,पिलखवार पंच कोसीक हृदय छैक ,जतय सं मिथिला ,मैथिली भाषाक विकास भेलैक |ओ तीनू गाम मधुबनीक सटल छैक मुदा ने सड़क ,ने विजली ,ने नहर ,ने बढ़िया स्कूल –किछु नहि |मुदा सरकारी तंत्र ढोल पिटैत अछि |हमरा जबाब चाही ,हमरा हिसाब चाही | पाहुन: प्रयाग राजक शिव कोटिक नारायणी आश्रम |गंगाकात मे एहि आश्रमक अनुपम सौंदर्य छैक |पुबारिकात गंगाक कल कल छल छल धारा बहैत छैक |एहि आश्रम सं सटले बगल मे एकटा फूसक मरैया छैक ,जे बाबाक प्रेम कुटी सं प्रसिद्ध छैक |ओहि कुटी मे एकटा साधु लगभग बारह बरख सं रहैत छैक |साधु बर बुढ़ लगैक छैक |सोन सन उज्जर केस आर पैघ पैघ दाढ़ी आ मोछ |साधु केकरो सं बात नहि करैत छैक |हँ भोरे चारि बजे साधु गंगा स्नान करैत छैक आ घंटो गंगा कात मे बैसल गंगाक कल कल छल छल जल क’ बर ध्यान सं देखैत रहैत छैक |दु साल पहिने तक साधु कतौ चलि जाइत छलैक ,कइएक दिन तक गायब रहैत छलैक मुदा एम्हर दु साल सं कतौ नहि जायत छैक |बस नारायणी आश्रम मे कोनो समागम रहैत छैक त’ अवश्य कतौ कोनो कोन मे बैसल प्रवचन सुनैत रहैत छैक | एहि चारि पाँच दिन सं साधु कतौ नहि जाइत छैक ,भरि दिन कुटी मे परल रहैत छैक |प्रायः बीमार रहैत छैक |उठियो नहि होयत छैक |राति बारह बजे साधु क’ बर मोन खराब भ’ गेलैक ,लगैक आइ नहि बचतै ?कियो लग मे नहि छैक |ओकरा छैहे के ?कुटी मे मुसक बिहरि बहुत छैक |दुटा मुस ओकरा टुकुर टुकुर ताकि रहल छैक | साधु करोट फेरलक |ओकरा मानस पटल पर ओहिना सबटा दृश्य देखाय लगलैक |ओ सोचैत अछि कियो ओकरा महात्मा कहैत छैक आ कियो ओकरा पागल कहैत छैक |कियो ओकरा अंदर मे ओकर दुःख नहि देखैत छैक |ओकरा देखि सभ हँसैत छैक मुदा ओकरा लोकक उपेक्षाक कोनो ध्यान नहि रहैत छैक |ओकरा याद परलैक ,”एकदिन माय बजा क’ कहने रहैक ,रे बउआ ,गरमीक छुट्टी मे बहिनक सासुर चलि जो | ,माय आँहा सही कहैत छी |हम काल्हिये लालगंज चल जायब ,हम माय क’ कहने रहियैक | ठीके बहुत दिन भ’ गेल बहिन सं भेट केना |आ सही मे हम भोरे बहिनक सासुर लालगंज चलि गेलौ |ओहि समय हमर आयु पन्द्रह –सोलह बरखक छल होयत |दु मासक गरमीक छुट्टी रहैक |दु मास ओतहि रहि गेल रही |जेठ मास रहैक |रोहनिया आम पाकय लागल रहैक |सभ बच्चा –बुढ़ आमक गाछी मे जखन तखन जायत रहैत छलैक |केखनो क’ बिहारि उठैक त बाले –बच्चे सभ गाछी दिस भागैक |हमहू ओही बच्चा सभक संग गाछी भागइ छलियैक |ओहि अन्हर बिहारि मे ने सरिता सं भेट भेल रहय |सरिता हमरे बहिनिक एकटा फरिकक बेटी छलीह |सम्बन्धे हमरा बहिनिक ननदि रह्थीन |सरिता तेरह –चौदह बरखक छलीह |एक दिन साँझ में बिहारि उठलैक |सभक संगे हमहू गाछी दिस भागलौ |गाछीक दृश्य बर मनमोहक रहैक |बिहारि ततेक पैघ रहैक जे एक गाछ दोसर क’ छुबैक |सभ गाछ जोर जोर सं हिलैत छलैक |चारुकात आम भट भट खसैत छलैक |सभ धिया पुता दौड़ दौड़ क’ आम बिछैक |हमहू खुब दौड़ धुप करी |बच्चा सभ जिम्हरे सं भट शब्द सुनैक तिम्हरे दौड़ लगाबैक |एक बेर एकटा आम खसलैक |भट शब्द सुनिते हम उम्हरे भागलौ |जहिना हम आम उठाबय लगलौ तहिना हमरा सं पहिने सरिताक हाथ आम पर परलैक |हमर हाथ सरिताक हाथक उपर परल |बरीकाल तक ओही हालत मे रहलौ |बरीकालक बाद कोकिल कंठी आवाज सुनलौ |यौ ,पाहुन ,ई आम हमर भेल |पहिने हमर हाथ आम पर परल अछि |हम कहलियनि ,सत्ते कहलौ !अहीक आम भेल |मुदा हम तखन सं दौरिते छी मुदा एकोटा आम हमरा नहि भेटल अछि |खाली हाथ जायब त’ बहिन की कहती |कहती तोरा कोनो लुरि नहि छह |एकोटा आम अनितह त’ कम सं कम चटनी त’ बनितैक ,तै ई आम हमरा द’ दिअ |सरिता बजलीह , यौ पाहुन, एहन बात कियैक बजैत छी |एकेटा आम ल’ क’ जायब त’ भउजी हँसतीह नहि ?अपना झोरी सं ओ दसटा आम हमरा देलनि |हमरो मोन प्रसन्न भ’ गेल |ओहि दिन सं सरिता सं सभ दिन गाछी मे भेट होमय लागल |आब सरिता सं भेट करय हम असगरो गाछी जाय लगलौ |गाछी मे आओर छोड़ी सभ रहैत छलैक |गाछी मे कइएक प्रकारक खेल सभ होयत छलैक |डारि पत्ता ,चोर सिपाही ,कबड्डी ,पचीसी ,कौआ ठुठी आ गोटरस |हुनके सभक संग खेलायत छलौ |एक दिन चोर सिपाही खेल प्रारम्भ भेलैक |एहि खेल मे सभ चोर बनैक आ एकटा सिपाही बनैक |सिपाही जहिना जहिना चोर सभ क’ तकने जाय ,ओ चोर सिपाही बनि जाय आ दुनू मिलि आब ताकब सुरुह करैक ,एहिना जे भेटल जायक ओ सिपाहीक संग भ’ दोसर क’ तकै |अंत मे जे पकराय ओ सिपाही बनैक आ बांकी सभ चोर बनैक |हम सभ चोर बनि नुकाय गेलौ आ एकगोटा सिपाही बनलाह |सभ जतय ततय नुकाय लेल गेल |कियो कोनो आमक गाछक अढ़ मे ,कियो गाछक झुरमुट मे ,कियो कतौ त’ कियो कतौ |हम देखलौ जे एकठाम बहुत धानक पुआलक टाल रहैक ,हम उम्हरे नुकाय गेलौ |एकठाम देखलियैक तीन चारिटा टाल सटले सटले रहैक ,ओहि मे दोगी सेहो बनल रहैक |हम उम्हरे बिदा भेलौ |ओही दोगी सं सरिता हमरा इशारा केलनि |हमहू ओही दोगी मे सरिता सं सइट नुका रहलौ |पहिने त’ सिपाही दिस ध्यान रहे मुदा धीरे धीरे लागे जेना देह में रोमांच होमय लागल |मोन मे एकटा अज्ञात आनन्दक अनुभव होमय लागल |दिल दिमाग पर जेना नसा चढ़ल जायत छल | सरिताक डाँर पर हमर हाथ अनायास चलि गेल आ धीरे धीरे हाथ हुनका पीठ पर चलि गेल |सरिता सेहो हमरा पांखुर पर अपन माथ ध’ देलनि आ बेसुध जकाँ अपन हाथ हमरा गरदनि पर ध’ देलनि |हमर मोन घबराय लागल आ ओही मुद्रा मे सरिता क’ अपना छाती सं सटा देलियनि |सरिता एकोरत्ती प्रतिरोध नहि केलनि |एही बीच सिपाही सभ पहुँचि हल्ला करय लागल जे दुटा चोर संगहि पकरायल \दुनू क’ सिपाही बनय परतैक|हम दुनू संगहि सिपाही बनलौ मुदा हमरा त’ किछु देखेबे नहि करय |एखन तक हम मदहोशे रही |बुझेबे नहि करय जे कतय सं की भ’ गेलैक |देह एखनो कोनों अज्ञात आनन्द सं थर थराइत छल | राति मे भोजन करैत रही मुदा मोन कोनों आनन्द सं आनन्दित छल |बहिन कइएक बेर बजबो केलनि जे एना मथसुन्न जकाँ कियैक छह |पूछै छियह किछु त’ जबाब नहि दैत छह ?मोन ठीक छह कि नहि ?हम कहलियैन ,बहिन मोन त’ ठीक अछि ,कनेक माथ दुखा रहल अछि |खा कय सुतय चलि गेलौ |नींद की होयत ?खाली वैह दृश्य दिमाग मे घुमैत छल |एहि सं पहिने एहि तरहक अनुभव कहाँ कहियो भेल छल |ओ आनन्द स्मरण होयते मोन आओर आनन्दित भ’ जायत छल |कहुना क’ नींद भेल | दोसर दिन कोनों काज सं सरिता बहिनक घर आयल छलीह |बहिन भनसा घर में कोनों काज में ब्यस्त छलीह |सरिताक नजरि हमरा पर परलनि |पहिने त’ कनेक लजा गेलीह मुदा पुनः हमरा कहलनि ,यौ ,पाहुन ,भउजी कतय छथिन |हम भनसा घर दिस इशारा केलियनि |ओ बहीन सं जोरन मंगलखिन |बहिन एकटा कटोरी मे कनिक दही जोरन लेल देलखिन |ओ जाय काल कहलनि ,पाहुन ,आइ गाछी नहि जेबैक ?हम कहलियैन , भोजन कयलाक बादे बहिन गाछी जाय देतीह |ओहि दिन तीन बजे क’ बाद गाछी गेलौ |एखन गाछी मे दोसर कियो नहि आयल रहैक |सरिता सं ओहिना किछु गप्प होमय लागल |हमरा पुछला पर कहलनि जे पढ़य में मोन बर लगैत अछि मुदा गणित बर कमजोर अछि |गाम मे कियो पढ़बै बाला नहि छैक |सरिता वर्ग नवम् मे पढ़ैत छलीह |हम ओहि समय ग्यारह अर्थात मैट्रिक मे चलि आयल रही | दोसर दिन सं हम सरिता क’ गणित पढ़ाबय लगलियनि |हम बहुत मनोयोग सं पढ़बैत छलियनि आ ओहो खुब मोन लगाके पढ़ैत छलीह |पढ़बैत काल हम कतबो डटैत छलियनि ओ हंसय लगैत छलीह |हुनका हसैत देखि हमारो हँसी लागि जायत छल |एहिना मे दस पन्द्रह दिन आओर बित गेलैक | एक दिन हम गाम बिदा भ’ गेलौ | जाय काल सरिता भेट करय आयल छलीह |याद अछि एकांत पाबि कहने छलीह ,यौ पाहुन ,आब कहिया दर्शन हेतैक ?गाम जाकय त’ हमरा बिसारिये जायब ?सरिताक आँखि ढबढबा गेल छलनि |एकटा कोनों अदृश्य आकर्षण रहैक जे हमरा दुनू क’ एक दोसर दिस आकर्षित करैत छल |हमरा गाम जेबाक मोन नहि रहय मुदा स्कूल फूजि गेल छल तै जाय परल |हम सरिता क’ कहलियनि ,हम शीघ्रे आयब | गाम आबि पराते दरिभंगा चल गेलौ |ओतय मोन त’ नहि लागे मुदा एक दु दिनक बाद पढ़नाय पर ध्यान देबय लगलौ |पढ़ाय एकटा साधना छैक |साधना मे जतेक लिप्त रहै छैक ,साधक क’तदनुसार फल भेटैत छैक |हमहू एकसाल कतौ नहि गेलौ आ अपन पूरा ध्यान पढ़ाय मे लगेलौ |एहि एकसाल हम सरिता सं सेहो संपर्क नहि कएल |मैट्रिकक परीक्षा समाप्त भ’ गेल |दु मासक फेर छुट्टी भ’ गेल |हम अपन गाम आबि गेलौ |एक दिन माय क’ कहलियनि जे एक साल भ’ गेल बहिन क’ भेट नहि केलियैक अछि से लालगंज जेबाक मोन होयत अछि ?माय तुरत आज्ञा देलनि जे बहिन क’ गाम चलि जाय लेल |दोसर दिन भोरे लालगंज गेलौ |साँझ मे लालगंज पहुचलउ|बहिन बर प्रसन्न भेलीह |सांझे सं सरिता सं भेट करय लेल मोन छटपट करे मुदा सरिता भेट भेलीह दोसर दिन |सबेरे ओ बहिनक अंगना अयलीह |हमरा असोरा पर बैसल देखि हिनका बर खुशी भेलनि |एकटक सं हमरा दिस तकैत रहथि |हमरो नजरि सरिता पर गेल |ओ नजरि झुका लेलनि |सरिता क’ देखि हम त’ अबाक भ’ गेलौ |अय ,एक साल पहिने जे सरिता फूलक कोढ़ी छलीह से आब अर्द्ध बिकसित फूल भ’ गेल छथि |जे सरिता पहिने एकटा फ्राक पहिरने रहैत छलीह से आब ओढ़नी ओढ़ने छलीह |चंचल सरिता आब गंभीर भ’ गेल छथि |हुनका देखि हम हरबरा गेलौ |सहसा हमरा मुँह सं निकलि गेल ,आउ ,सरिता , अहींक बाट हम रातिये सं तकैत छी |सरिता बजलीह ,यौ पाहुन ,एके साल मे आहाँ झुठो बाजय लगलौ अछि |एहन हमरा दिस ध्यान रहैत त’ एकोटा समाद दि तौ ?ओ त’आइ भोरे मदन भाइजी कहैत छलखिन जे साँझ में हमर सार कमल अयलाह अछि |जहिना हम अहाँक नाम सुनलौ ,दौडल आयल छी |सरिता हमरा माफ करू ,गलती भ’ गेल |ओना हम गाम सं अहींक भेट करय आयल छी |सरिता चुप चाप अपन अंगना चल गेलीह |एहिबीच एकटा घटना भ’ गेलैक |हँ ,घटने कहक चाही |बहिन कहलनि ,कमल ,तू आबिये गेल छह ,हमरा दु चारि दिन लेल गंगा स्नान करय सिमरिया जाय क’ अछि |केकरा पर घर छोड्बैक |तू रह्बह त’ हम दुनू गोटा निश्चिन्त भ’ जायब |तोहर भोजन ताबे सरिता बना देतह |हम हुनका माय क’ कहि देलियनि अछि | ओना बहिन नहि रहती से सुनि नीक नहि लागल मुदा पता नहि एकटा अदृश्य कोनों शक्ति देह मे रोमांच उत्पन्न क’ रहल छल | भोरे बहिन मिसरक संग गंगा स्नान करय सिमरिया चल गेलीह |बहिन भोरे हमरा लेल भोजन तैयार क’ देने छलीह |राति में ठीक सं नींद नहि भेल छल |दस बजे स्नान केलौ |तत्पश्चात भोजन क’ सुति रहलौ |चारि बजे उठलौ आ बहार निकलि पोखरिक मोहार पर टहलय लगलौ |सूर्यास्त भेलाक बाद घर लौटलौ |सरिता कनेक कालक बाद अयलीह |दीप ज़रा हमरा लग बैसलीह |हम कहलियैन ,आइ त’ आहाँ अपना पाहुन क’ एको बेर खोजो नहि केलियनि |ओ कहलनि ,नइ यौ पाहुन !हमरा माँ क’ बुझल छलैक जे दिनक भोजन अहाँक लेल भउजी बना क’ गेल छथि |ओना हम आयल रही त’ आहाँ सुतल रही |हम घूमि गेल रही |सरिता फेर पुछलनि ,बाजू ,की खायब ?आहाँ जे खुआयब सैह हमरा लेल अमृत छैक |सत् पूछी त’ अहांके देखिये क’ हमर पेट भरि गेल |यौ पाहुन ,कतेक झूठ बजैत छी |सरिता भोजन बनाबय भनसा घर चलि गेलीह आ हम छत पर जा घुमय लगलौ |सरिता एक घंटाक उपरान्त छत पर अयलीह |हम आ ओ ,पटिया बिछा एकहि ठाम बैस गेलौ | पूर्णिमा दिन रहैक |चान अपन पूरा प्रकाश पसारि देने छलखिन |बसंतक मादकता प्रकृति मे पसरल छलैक |आमक सुगंध चारुकात गमकैत छलैक |भौरा गुंजायमान केने छलैक |कोयलीक कु कु वाताबरण मे मिठास भरि देने रहैक |केखनो क’ दक्षिण पवन मंद मंद बहैत छलैक | शान्ति ब्याप्त छलैक |दुटा हृदयक धरकनक आवाज हमरा दुइए गोटा क’ बुझा रहल छल |हम दुनू गोटा पटिया पर बैसल छी |मलयानिल जोर सं चललैक आ सरिताक ओढ़नी उरि हमरा देह क’ झाँपि देलक |हुनकर केसक लट हुनक लाल लाल कोमल कपोल पर लहरि मारय लगलनि जेना मेघ चान क’ ढकि दैत छैक |हम सरिताक ओढ़नी हुनका माथ सं ओढ़ा घूँघट बना दैत छियैन आ हुनकर दुनू कपोल पर अपन दुनू हाथ द’ ओहि चान क’ निहारैत छी |सरिता एक बेर हमरा दिस तकैत छथि आ नजरि झुका लैत छथि |हुनक ई रूप हमरा एतेक आंदोलित केलक जे हम अपना क’ नहि रोकि सकलौ |हुनका अपना करेज सं सटा लेलियनि |बरीकाल तक एहिना हुनका अपना करेज सं सटेने रहलियनि |सरिता अपन दुनू हाथ उठा हमरा गरदनि पर दय अपन माथ हमरा हृदय पर समर्पण क’ देलखिन |लागल जेना चान क’ मेघ झाँपि देलकै ,पुरा अन्हार भ’ गेलैक |हमर मोन जेना अपना नियंत्रण सं बाहर होमय चाहैत छल |ओही समय में बाँसक झुरमुट सं एकेबेर पक्षीक समूह कोलाहल करय लगलैक |हमर चेतना घूमि आयल |सरिताक बात त’ मोन क’ आओर स्थिर क’ देलक |ओ हमरा जांघ पर अपन माथ द’ कहलनि ,प्रियतम ,चान मे आहाँ की देखैत छियैक ?चानक प्रकाश देखैत छियैक ,चानक मुस्कराहट देखैत छियैक |सरिता पुनः कहलनि मुदा चान में ओ दाग देखैत छियैक |सरिताक बात हमरा अंतरात्मा क’ छू लेलक |हम कहलियनि ,प्रिये ,ओहि चान जकाँ हमरा चान क’ दाग नहि लगतैक |हमर चान त’ ओहू चान सं बेसी चमकतै |हम बारी काल तक हुनका माथ में अपन आंगुर चलबैत रहलियनि |आकाश मे चान हमरा सभ क’ देखि स्थिर भ’ गेलैक |पक्षी सभ जे कनेक काल पहिने कलरव करैत रहैक अपना खोता मे शांत भ’ गेलैक ||जेना पक्षी सभ क’ हमरा प्रेम पर विश्वाश भ’ गेलैक |बाताबरण मे निरवता पसरि गेलैक | नीला आकाशक नीचा मात्र हम आ सरिता |कोनो शब्द नहि |कोनो आवाज नहि |मात्र हमरा दुनुक साँसक आवाजक अनुभूति होयक | हम दुनू प्रकृतस्थ भेलौ |मुदा सरिता हमरा जांघ पर अपन माथ द’ आकाश दिस तकैत रहथि |हुनका माथ क’ सह्लाबैत हम पुछलियनि ,सरिता की सोचैत छी ,की देखैत छी ?ओ कहलनि ,प्रियतम ,हम बहुत दुर टिमटिमायत ओहि तारा क’ देखैत छियैक |हमरो जीबन ओही तारा जकाँ टिमटिमा क’ रहि जायत |टिमटिमाइत ओही तारा जकाँ हमहू एहि संसार मे ने रहि जाय ?सभक ध्यान त’ झिलमिल चाने पर रहैत छैक |यौ पाहुन ,हम आइ नीक कएल की बेजाय से हम नहि जनैत छी मुदा हमर रोम रोम अहाँक’ समर्पित अछि |आब इ जिनगी अहाँक संग ,नहि त’ फेर एहि देहक स्पर्श मृत्वे करतैक | हमर हृदय चित्कार क’ उठल |हम अपन प्रियतमाक मुँह पर अपन हाथ ध’ देलियनि आ हुनका अपना करेज सं सटा लेलियनि |प्रियतमा अहूँ एहि बात क’ गेठ बान्हि लेब जे प्रियतमा छोरि एहि देह पर मृत्वेटाक बस चलतैक |सरिता सेहो हमरा मुँह पर हाथ ध’ देलखिन |सरिता खुशी सं हमर गरदनि मे दुनू हाथ द’ झुलि गेलीह |” दुनू बर प्रसन्न |प्रेमालिंगन मे दुनू डूबल |तेसर दिन बहिन बह्नोई गाम अयलखिन |एक सप्ताह के बाद कमल गाम चलि गेलाह |रिजल्ट निकलनि |प्रथम श्रेणी सं पास केलनि |गाम सं पटना आबि गेलाह |पटना साइंस कओलेज मे नाम लिखेलाह |अपना गति सं जिनगी चलय लगलैक |कमल पढ़ाई पर ध्यान देबय लगलाह |बीच बीच में सरिता सं पत्र द्वारा गप्प होयत रहलनि |सरिता सेहो पढ़य पर ध्यान देबय लगलीह |एहि तरहे समय बितैत गेलैक |कमल पटना मे एम् एस सी मे पहुचलाह आ सरिता सी एम कओलेज ,दरभंगा में बी ० ए ० मे पहुचलीह |सरिताक पिताजी विश्व विद्यालय मे काज करैत रहथिन |तै सरिता दरभंगा मे नाम लिखेलनि |दुनुक बीच पत्र ब्यबहार अबाध गति सं होयत छलनि |एहि बीच कहियो कहियो कमल दरभंगा आबि सरिता सं कओलेजक परिसर में भेट क’ जाइत छलखिन |दुनुक बीच प्रेम प्रसंग अबाध गति सं चलैत छलैक |सरिता आब गुलाबक कोढ़ी वा अर्द्ध विकसित फूल नहि छलीह ,आब ओ गुलाबक पूर्ण फुलायल फूल छलीह ,पूर्ण नव यौवना अ कमल सुन्दर ,सुशील युवक एकबेर महात्मा करोट फेरबाक प्रयास केलक मुदा निरर्थक |देह मे मात्र अस्थियेटा शेष छैक |एकबेर जोर सं निःश्वास लेलक आ कनेक स्थिर भेल |पुनः ओकरा मानस पटल पर चलचित्र जकाँ दृश्य घुमय लगलैक | “कतेक खुशी सं जीबन बितैत रहय |सरिता सन प्रेमिका भेटल छल जिनकर प्रेरणा सं सभ किछु सुन्दर गति सं चलैत छल |प्रेम आ कर्तब्यक बीच झुलैत नहि छलौ |सुन्दर ढंग सं समय बितैत छल |एम० ए० मे विश्वविद्यालय मे प्रथम आयल रही |पटना साइंस कओलेज मे ब्याख्याताक पद पर आरूढ़ भ’ गेल छलौ |” कमलक प्रत्येक सफलता सं सरिता खुश रहैत छलीह |दुनुक संपर्क सूत्र जुटल छलनि |सरिता सेहो बी० ए० क’ गेल रहथि |सरिताक रिजल्ट देखि कमल दरिभंगा आयल रहय |दुनूक भेट साँझ मे भेलैक |विश्वविद्यालयक सकटमोचन मंदिर मे, दुनू गोटा बजरंगबली क’ दर्शन केलाक बाद नौरगना पैलेसक सामने पार्क मे एकठाम बैसल |कमल पूछने रहैक ,आगुक पढ़ाईक बारे मे मुदा सरिता कहने रहैक ,पाहुन ,आहाँ पढ़ाइक बात नहि करू |पाहुन ,हम अहाँक प्रेमक आगि मे जरि रहल छी आ हमर पिताजी हमर ब्याहक गप्प सुरुह क’ देने छथि |हम आहाँ कोना परिणय सूत्र में बन्हायब ताहि लेल सोचू |कमल कहने रहैक जे सरिता स्थिर रहू |सभ ठीके रहतैक |कमल घूमि क’ पटना चल गेलाह |किछु दिन एहिना बितलैक |कमल सोचैत छल| कोना प्रस्ताव पठायल जाय ,ताबे बीचे मे सरिताक पत्र भेटलैक | लालगंज , दि० १५.०२.१९७५. प्रियतम ,प्रणाम , हम अपन हाल की लिखू |हमर स्थिति त’ ओहि स्वाती चिरइ जकाँ अछि जे बरखाक एक बूंद जल लेल आकाश दिस तकैत रहैत अछि |हमर एक एक क्षण कोना बितै अछि कहि नहि सकैत छी |हमर ब्याह हमर पिताजी ठीक क’ लेलखिन |ब्याहक दिन फागुन शुदि पंचमी रवि अर्थात १० मार्च क’ निर्धारित भेलैक अछि |हे प्रियतम ,आहाँ कत ’ नुकायल छी |आहाँ त’ बुझते छी हमर ब्याह त’ कतेक दिन पहिने भ’ गेल अछि |आब एहि देह क’ पर पुरुष कोना छूअत |एहि सं त’ मरि गेनाइ नीक |हे पाहुन ,हमरा एहि जाल सं मुक्त करू |शीघ्र आउ ,नहि त’ फेर एहि लोक मे नहि भेटब | अहींक प्रतीक्षा मे ,सरिता | कमल क’ हाथ मे जहिना पत्र भेटलैक ,लगलैक जेना ई संसार घूमि रहल छैक |कमल क’ बुझेबे नहि करैक जे कोना एहि बिपति क’ पार लगायब |ओ तुरत दरिभंगा बिदा भेल |सीधे सरिताक पिताजी सं भेट केलक आ अपन सभ स्थिति स्पस्ट क’ देलकनि |सरिताक पिताजी कमल क’ आश्वस्त केलखिन आ कहलखिन जे सरिता जतय चाहतैक ओतहि ब्याह हेतैक मुदा नव स्थितिक कारण किछु समय लागत |कमल प्रसन्न भ’ पटना लौट गेल मुदा किछु दिनक बाद पुनः एकटा पत्र भेटलैक | प्रियतम , पिताजी आहाँ क’ ठकि लेलनि |हमर ब्याह आइ भ’ गेल |समाजक डर सं हमहू किछु बाजि नहि सकलौ |हमरा सिउथ मे जे सिंदूर देलक अछि ,हमर मोन में त’ ओ नहि अछि |तै हम निर्णय केलौ अछि जे अपन जीबन लीला समाप्त क’ ली |तै ब्याहक बादे हम घर सं भागि गेलौ |हम अहूँ लग कोन मुँह ल’ क’ जायब ?हमरा आहाँ लग गेने आहाँ क’ पराभव भ’ जायत |आब हमर जीबन नरक भ’ गेल |आब केकरा ल’ जीयब |पाहुन ,आब एहि जन्म मे भेट नहि होयत |हमर सभ कहल सुनल माफ करब | मरैयो काल अहाँक हाथक स्पर्श हमरा रोमांचित क’ रहल अछि |पाहुन ,झूठ नहि कहैत छी अहाँक स्मरण होयते पुरा देह ओहिना काँपि रहल अछि जेना प्रथम अभिसारक समय देह काँपल छल | बस आब किछु नहि कहब |अहूँके दुखे होयत |भ’ सकय त’ हमरा बिसरि जायब |पाहुन ,हमर अंतिम प्रणाम | अहींक अभागल ,सरिता | पत्र देखि कमलक आँखि सं अश्रुपात होमय लगलैक |ओ भाव विह्वल भ’ गेल |तुरत पेंट शर्ट पहिर बिदा भेल, सरिताक ताकय |कतय कतय ने सरिता के ताकय लेल गेल मुदा सरिता कतौ नहि भेटलैक |कमल सोचलक ई संसार बेकार छैक |जखन सभ सं प्रिय हृदये हेरा गेल तखन आब जीबन मे रहिये की गेल अछि |” आइ बारह बरख सं एहि शिव कोटिक कुटी मे रहैत अछि |संसार मे ओकरा लेल रहिये की गेलैक जेकरा लेल चिंता करत |कियो किछु द’ दैत छैक त’ खा लैत अछि ,नहि कियो किछु देलकै त’ कतेको दिन भुखले रहि जायत अछि |मुदा नित गंगा स्नान करैत अछि आ नित गंगाक कल कल छल छल प्रबाह के देखैत रहैत छैक |गंगाक प्रबाहे जकाँ ने ओकर सरिताक प्रबाह रहैक |एहिना ने ओहो कल कल छल छल करैत रहैत छलैक |गंगाजले जकाँ ओ हो ने स्वच्छ ,निर्मल आ सीतल छलैक |ओकरा होयत छलैक जे गंगाकाते में ओकरा सरिता सं कहियो ने कहियो भेट हेतैक मुदा एखन तक कहाँ सरिता अयलैक ? साधुक’ बुझेलैक आब साँसों लेबा में दिक्कत होयत अछि |मुदा ई की, दुर बहुत दुर की देख रहल छैक ?उपर नीला आसमान मे सरिता नव बधुक रूप मे ओकरा निहारि रहल छैक | पता ने ओकरा कतय सं शक्ति आबि गेलैक आ जोर सं भागल आ सरिता क’ भरि पाँज क’ पकरि कानय लागल | भोरे कुटी लग बर भीर रहैक |आश्रमक लोक ठठरी बना नेने रहैक |साधु क’ उठा ओहि पर ध’ देने रहैक |लोक सभ कुटी क’ अंदर देखय लगलैक जे कि सभ छैक |सरिताक पत्र छोरि किछु नहि रहैक |लोक आब बुझलकै जे साधु त’ प्रेमक पुजारी छल |ओहि कुटीक नाम प्रेम कुटी राखि देल गेलैक | सन्दीप कुमार साफी अप्पन गाँव अप्पन गाँव अछि साफ लग-लगमे कलम गाछ स्वच्छ हवाक सुगन्ध सुंगहाएत बाट बटोहीक मन बहलाएत हँटि-हँटि कऽ पोखरि इनार स्नान करै छी ओइ किनार महारपर सुन्दर पाखैर गाछ कौआ मएना करए किलोल भोरे देखै छी कौल्ह चलैए रस-गुड़क सुगन्ध आबैए हरियर-हरियर गहुमऽ खेत कालसँ बहैए कमला रेत गाँवसँ बनल शहर बजार खूब बनए पापड़ अचार गामक छी ई रीति-रिवाज सभक करए आदर सत्कार शान्तिलक्ष्मी चौधरी गज़ल १
रगरी भौजी देखहि तँ कोना हाथ मोचारै छै गे दाय
बलजुमरी पटकि केँ कोना रंग लगाबै छै गे दाय
मलपुआ सनक गाल रंगि बनि गेलै हैँ दलिपूरी
खोंटि-खोटिं बड़ी केहन-कहाँ रूप बनाबै छै गे दाय
खाय लेनय छै भाँग फेटल औंटल खुआक मोदक
भंगजिलेबिये सन घुमल डाँर नचाबै छै गे दाय
सैलज भौजी आय भs गेलै केहन निरपट निर्लज
कोना दबाड़ि छौंड़ि केँ पुरुख चालि देखाबै छै गे दाय
रसिया भौजी सँ हारि दिअर-जन धs लेलकै दुआर
बहिनोक सोझहाँ कनियो लाज नै देखाबै छै गे दाय
बिन भौजी फगुआक अँगना लागै जेना भुतबँगला
रँगरस तँ चहटगर भौजीये बनाबै छै गे दाय
"शांतिलक्ष्मी" केँ तँ भौजी लागै बयस शिक्षाक मास्टरनी
नवतुरिया केँ देह रसक पाठ पढ़ाबै छै गे दाय
........वर्ण २०......
गज़ल २
देह मे सटलै जखन देह सिहरि गेल देह
केरौ छोड़ि केँ खेसारी से नेह सिहरि गेल देह
विज्ञापनक युग मे स्त्री देहक होइ बड्ड मोल
मरैत देखि वात्सल्य सिनेह सिहरि गेल देह
जीवनक धार मे जाइत रही ओहिना भासल
सुनि हुंकरैत कोशीक ढ़ेह सिहरि गेल देह
बन्हटुट्टी बाढ़ि मे दहि गेल धानक बौग-रोप
बिच्चे खरिहान देखि ई मेह सिहरि गेल देह
गामघर छोड़ि-छाड़ि लोक परदेस दिस भागै
परती नै पाबि हरक रेह सिहरि गेल देह
गामक डीह डावर बेचि शहर चलि एलहुँ
भेटै तँ चैन बाहरे नै गेह सिहरि गेल देह
मराठी मानुख कहै पुरबिया, असामी बिहारी
तहु मे बाँट भदेस-विदेह सिहरि गेल देह
दस दशक बाद मिथिला कि एहने नै रहतै
"शांतिलक्ष्मी" केँ छै कुनु नै थेह सिहरि गेल देह
....वर्ण १८.......
गज़ल ३
झोंटे पकड़ि जँ लिढ़येलकौ तँए हे हुरिया सती
हँ गे ठोंठे दाबि धकियेलकौ तँए हे हुरिया सती
सदि एबहि हमरा बहु सेँ बकथोथैनि करय
तँ डेने पकड़ि मोड़ियेलकौ तँए हे हुरिया सती
सासु पुतौहुक झगड़ा होइते छै सभक घर मे
गरियेलिही यैह बुझेलकौ, तँए हे हुरिया सती
हे गे माय छियै की कंकही पड़ल रहय छै पाछु
यैह किटकिट सभ खेलकौ तँए हे हुरिया सती
मजा लुटय ले धियापुता केँ जनमाय ढ़ेंगरेलैं
सैँय की सुहृदय पोसलकौ, तँए हे हुरिया सती
सैँये के माथ हाथ राखि खो नै सप्पत गे डनियाही
कुचालियै भैयो लतियेलकौ तँए हे हुरिया सती
एहन कुपुत्र देखि काकी कहतौ "शांतिलक्ष्मी" सत्ते
दैव किनको बाँझे राखलकौ तँए हे हुरिया सती
........वर्ण १९......
गजल ४
गोर गाल पातर ठोर छै
कमल ओस आखि नोर छै
दीन दुख भीजै गाल पर
काँपैत ठोर तिलकोर छै
लाल गाल गरम तरुआ
रंजै मोन मुदा इन्होर छै
बाप तारी माय व्यभचारी
भाय दुनू सिनहा चोर छै
थाल मे छै कमल फुलल
भँमराक हाँज मे होर छै
कवि हौथि वा कोदरवाहा
रस मे सभ सराबोर छै
मँहकै पानि पींगील पढ़ै
धर्मात्मो माछे के चटोर छै
गरीब बेटी सभक भौजी
"शांतिलक्ष्मी" तेँ नोरै झोर छै रमेश रञ्जन
बारुद
कतेक धृष्ट छै बरुदक वेगवान कण छेदैत चलि जाइत छै शरीर कमसँ कम जाति भेद तँ करितै
आन्दोलनक जाति आन्दोलनकारीक जाति मिथिला आन्दोलनक विध्वन्सक चौसरपर तेहने चीत्त–पट्टक खेल रचने अछि
आन्दोलनपर गढ़गर जातिक रंग लेपन कऽ कऽ नरसंहारसँ रक्तच्छादित अपना देहके आकाशमे भूर कऽ कऽ वर्षाब चाहैत अछि मुसलाधार पानि रक्तरञ्जित शरीर साफ–सफाइक लेल
मुदा वारुद वेगवानके पलखति कहाँ जे सोचैत पुछैत आन्दोेलनकारीक जाति आ तखन शरीरक अन्तर भाग तकक यात्रा करैत प्रकाश प्रेमी रे गोधिया तो कोन्नी छे ? रे गोधिया तो कोन्नी छे , एन्हर आ चल देखे तमासा । माईयक छाति चिरे खातिर , नेतवा आउर फेकै हई पासा ।। रे गोधिया तो कोन्नी छे , एन्हर आ ..........................
रे जई अचराने दुध पिने हई, तकरे इज्जत लुटाबेला, जाइतक नाम पसाहि लेस, ठहक्का माईर पिटै हई तासा । माईयक छाति चिरे खातिर, नेतवा आउर फेकै हई पासा ।। रे गोधिया तो कोन्नी छे , एन्हर आ ..........................
छुच्छ दुलार अन्हरोने हई, पितियाईनक शान सोहरोने हई, माइयक ममता बिसैरके देखहि, कईने हई परोसिया पर आसा । माईयक छाति चिरे खातिर, नेतवा आउर फेकै हई पासा ।। रे गोधिया तो कोन्नी छे , एन्हर आ ..........................
रे बिसैरके देखहि घुघुवामना, डिगडिगथैया चनामना , झिझिरकोना आ सुरसुरके , हरिमे ठोकि करतै दुर्दाशा । माईयक छाति चिरे खातिर, नेतवा आउर फेकै हर्ई पासा ।। रे गोधिया तो कोन्नी छे , एन्हर आ ..........................
नै एक खण्ड नै दू खण्ड, कऽ कऽ देखहि खण्ड खण्ड, कहै हई माईयक बोलिके, ई त हई बभनाके भाषा । माईयक छाति चिरे खातिर,नेतवा आउर फेकै हई पासा ।। रे गोधिया तो कोन्नी छे , एन्हर आ .......................... कामिनी कामायनी काशीक घाट बाबन टा घाट सॅ टघरैत बहैत नुकैत . . .मुस्कैत ऐंठैत. . .उमकैत झूमैत. . हॉफैत चलि रहल अछि नाह मद्विम मद्विम .. . . ऊपरि आकाश केर अपन बाहुपाश में नेने कारी कचोर मेघ छिटकौने सबटा जट्टा बनौने बडका छॉहरि दैत जेठक जरैत रौद सॅ बचवा के असीरबाद पानि कम छै दूर दूर धरि सूखल कछार भनभनाति. . .असंख्य बौलक स्वर पर्यावरणक अधोगतिक पसारए चाहैत अछि खिस्सा मुदा हुनकर पठाओल हकार हुनक दरबार नहि सुनब आजु हम केकरो आनक विलाप नहिं देखब हम मंडिल के दुर्गति पंडा सबहक लूट खसोट वृद्व आ’ नगर वधू. .. प’ विभत्स रस क लेपन वा चहूॅ दिस पसरल कूडा कचरा के साम्राज्य खसत त’ अवस्स नोर हमर आय मुदा विश्वनाथे के मंडिल मे जाए दीवोदास क् राज्य मे औघड के त्रिशूल प’ बसल जे धाम वएह त’ हमर काशी हमर प्राण वएह त’ हमर स्वप्नक चिर प्रतीक्षित गाम ।। 2सारनाथक संत तपस्वी इम्हर एकांत में प्रकृति सुन्नरि के रूप लावण्य निहारि एतेक ऐश्वर्य पाबि कतेक आनंद भेटल अपनेक मुख मंडल सॅ ज्ञात होबि रहल अछि यद्यपि छी ध्यानमग्न अपन पॉच शिष्यक संग गाछक नीचा तीतैत अविचल .. . . काल वा मौसमक प्रहार सॅ विजय वा पराजयक आस सॅ पृथक एकसरि लडैत अपना सॅ बढैत जा रहल छी र्निद्वन्द्व. . . सहस्त्रों बरख पहिने देल ओ प्रवचन अनुगुॅजित भ’ रहल अछि शंखनाद बनि मॅह मॅह करैत अछि वातावरण चारूकात अपनेक दैहिक सुवास सॅ ओहि दिन सॅ विलमल समय . . . चकित ..मुदित सीखा रहल अछि अष्टांगी मार्गक चरम ऊद्देश्य समेटने अपन बोरिया बिस्तरा नेने हाथ मे. छडी कमंडल .. . . ओहि चिरंतन बाट के बटोही जेकर पाथेय मात्र सत्य छै जीवनक कटुतम सत्य। । फागुन राग फागुन मे रास रचाऊ सखी फागुन मे. .।। 2. . पीयरी पहिरने खेत मे देखियौ. . . नाचि रहल अछि जौवन. . . . सिनुरिया सन दहकि रहल अछि. . . चारूकात वन उपवन .. . . गरमाहट सॅ भरल ई सूरज .. . आब नै मूॅह नुकाबै. . . जोर जोर सॅ चलैत वसंती. . . सेहो डहकन गाबै. . . . मन उमकि रहल बेजोड़ . . चाहै सीमा तोडि लै फागुन मे. . . . .. .।।2 असगर कोना रहब फाग मे हिय हम्मर नहि मानै. . गाछ बिरीछ सब मुसिक रहल अछि कि सोचै कि जानै. . . . आस बढा क’ पॉती लिख लिख़. . पठबैत हम प्रियजन के. . . मग मे बैसल बिहुॅसि उठैत छी. . दीप जरा नैनन के. . . . हम्मर आंगन स्नेहक धाम बनल फागुन मे .. . .।।2 गठजोरि खेलु फाग सखी फागुन मे. . . . ई पूआ . . . ई मालपूआ. . . . ई दहीबडा. . . .मूॅगबा .. .इमरती .. . पहिने खेलू फाग पोख भरि पेट मे तखने ससरती. . . . बिन पीने . . मदिरा भॉग . .बौरैलौ फागुन मे. . . .. बलजोरि खेलूॅ फाग सखी फागुन मे. . . . .।।2
ज्योति झा चौधरी प्रजातंत्रक पुनर्निमाण प्रजातंत्र पर विचारविमर्श के भष्ट आ के आदर्श राजनीति मे आनी सदाचार मिटाबी सबतरहक भष्टाचार जागरूक रहय सब जनता व्यर्थ नहिं होय ककरो नागरिकता होय परीक्षा राजनेता के योग्यताक तखने भेटय आज्ञा चुनाव लड़बाक वैह नागरिक क सकय मतदान जकरा होय अधिकारक पूर्ण ज्ञान साक्षरताक प्रसार जहिना आवश्यक अनिवार्य जानकारी तहिना लोकतंत्रक किछु आधारभूत पाठ्यक्रम के ईच्छा ताहिमे होय बढ़िया परीक्षा बिना उत्तीर्ण भेने नहिं सम्भव चुनावक उम्मीदवार आ मतदाताक पद रुबी झा निर्मोही निर्मोही संग जोरल प्रेम क कहानी , सानै छी नोरसँ प्रेमक पिहानी , मौधमे बोरि-बोरि कहै छलाह . ... तखन केहन ओ प्रेमक बयना , केने सराबोर छथि ओतबे ,, नोरसँ हमर दुनु नयना , हाथमे हाथ दऽ बझबै, कोना ओ प्रेमक परिभाषा . हज़ार खंड केलाह आइ ओ , हमर मोनक सभ आशा , मोन मे आश छल काटब, हुनका संगे जिनगानी, किछु दितौं किछु लितौं , हम हुनका प्रेमक निशानी , हुनक स्वभाव रसिक भ्रमर , केर होइ अछि तहिना , रस पिबथि चंपा चमेली , खन गुलाब पर तहिना , जुनी कहिओ करब बिस्बास , पुरुख प्रेम पर यै सहेली , कहिओ नै सुलहए उलझल रहए सदिखन ई अछि पहेली पूरुखक , प्रेम जेना कागजक नैया , भिजय तँ गोबर सुखय तँ रूइया ओढ़नी लाल ओढ़नी लाल चुनर के , लिपटि लिपटि कऽ अहाँसँ, हम्मर प्यासल नयनकेँ, सदिखन हँसबैत राखैत छल , कखनो उड़ए ओ झकोर हवा संग , कखनो समेटी जाइ बाँहिमे , कखनो कान्हा पर ब्याकुल भय , ससरैत खसकैत रहैत छल , हुनक कानमे जा कऽ कखनो किछु छातीसँ कखनो सटि जाइत छल , हुनक धरकन केँ गिनि गिनि कऽ , ओ उठैत बजरैत रहैत छल , कखनो हुनकर कमरबंद बनि , कखनो गालकेँ छुबैत छल , कखनो पीठ पर जा कऽ बेशरम , ससरैत ढलकैत रहैत छल , कखनो तँ देखू ई जाजिम बनि कऽ , कखनो कोरामे सूति जाइत छल , कखनो हुनकर हाथकेँ ऐ दुलारे , सदिखन हमरा सतबैत छल , एकरा माथ पर नै रखु अहां , अहांक ओढ़नी अछि हम्मर दुश्मन , हमरा अहांक बीच आबि कऽ सदिखन , किएक ई बेशरम रहैत छल , डा. धनाकर ठाकुर (26.5.2012क फारबिसगंजमे 24म अन्तरराष्ट्रिय मैथिला सम्मेलनक काव्य संध्यामे मंच पर रचित आशु कविता।) जँ हो अपना पर विश्वास
चाही त सुना सकैत छी राति भरि अहाँकेँ बना-बनाकेँ कविता चाही त झुमा सकैत छी राति भरि अहाँकेँ बना-बनाकेँ कविता
मुदा करब नहि से सुनु बस किछु पांति पांति अछि इ भोगल पांति अछि इ भीजल जीवनक धारमे डूबैत-उतराइत अपन मंझधारमे।
जरैत रौदमे पैघ बाधमे एक हरियर गाछ हारलकेँ जीवनक आश
गर्मीमे पीपरिक हरियर-हरियर पात जरैत जीवनक आश।
भादवक घटाटोप मेघक रातिमे बिजलीक इजोत भटकल पथिककेँ देखाइत बाट भेटल जीवनक आश।
दाहल कोशीमे दहाइत लोक देखल एक गाछक लबदलि डारि भेटल जीवनक आश।
नागक फूफकारसँ गेल जीवनक आश उड़ैत बाजक झपट भागल नाग भेटल जीवनक आश। शीतमे हरियर-हरियर दूबि पर ओसक धवल बिन्दु उगलाह सूर्य सप्ताह पर भेटल जीवनक आश।
समुद्रमे डूबैत जहाजीक लग डगल जमीनक ढ़ेप डूबैतकेँ भेटल जीवनक आश।
जीवन जखन हारैत देखाइत अछि कतहुसँ भेटैत अछि जीवनक आश जँ हो अपना पर विश्वास। ओमप्रकाश झा कुण्डलिया/ रुबाइ/ कविता/ गीत कुण्डलिया आइ-काल्हि बाबा सभक लोकप्रियताक देखैत एकटा रचना प्रस्तुत अछि। निर्मल मोन सँ बाबाजी दए छथि आशीष। खाता नंबर अहाँ लिखू, जमा कराबू फीस। जमा कराबू फीस, बिगडल काज बनत, केनेए जे हरान, से सबटा कष्ट जरत। कहैए "ओम" धरू बाबाक चरण-कमल, फीसक लियौ रसीद, भेंटत कृपा-निर्मल। रुबाइ कोना कऽ रंगलक करेज केँ इ रंगरेज, रंग छूटै नै। नैन पियासल छोडि गेल, मुदा आस मिलनक टूटै नै। हमरा छोडि तडपैत पिया अपने जा बसला मोरंग, बूझथि विरहक नै मोल, भाग्य इ ककरो एना फूटै नै। मनुक्ख (कविता) जिनगीक कैनभस पर, अपन कर्मक कूची सँ, चित्र बनेबा मे अपस्याँत मनुक्ख, भरिसक आइयो अपन हेबाक अर्थ खोजि रहल अछि। हजारो-लाखो बरख सँ, बहैत इ जिनगीक धार, कतेक बिडरो केँ छाती मे नुकेने, भरिसक आइयो अपन सृजनक अर्थ खोजि रहल अछि। राजतन्त्र सँ प्रजातन्त्र धरि, ऊँच-नीचक गहीर खाधि, सुरसाक मुँह जकाँ बढले अछि, भरिसक आइयो इ तन्त्र सभक अर्थ खोजि रहल अछि। कखनो करेजक बरियारी, कखनो मोनक राज सहैत, बढले जाइ छै मनुक्खक जिनगी, भरिसक आइयो मोन आ करेजक अर्थ खोजि रहल अछि। गीत शिवरात्रिक अवसर पर एकटा प्रस्तुति- गौरी रहि-रहि देखथि बाट, कखन एता भोलेनाथ। आंगन मे मैना कानि रहल छथि, मुनि नारद केँ कोसि रहल छथि। ताकि अनलाह केहन बर बौराह, गौराक जिनगी भेल आब तबाह। मैना पीटै छथि अपन माथ, कखन एता.................... भूत-बेतालक लागल अछि मेला, प्रेत पिशाचक अछि ठेलम ठेला। पूडी पकवान कियो नै तकै छै, सब भाँग धथूरक खोज करै छै। कियो नंगटे, कियो ओढने टाट, कखन एता................... कोना कऽ गौरी अपन सासुर बसतीह, विषधर साँप सँ कोना कऽ बचतीह। पिताक घरक छलीह जे बनल रानी, कोना लगेतीह आब ओ बडदक सानी। आब तऽ किछ नै रहलै हाथ, कखन एता..................... गौरीक मोनक आस आइ पूरा हएत, बर बनि अयलाह शम्भू त्रिभुवन नाथ। जगज्जननी माँ गौरी शंकर छथि स्वामी, जग उद्धारक शिव छथि अन्तर्यामी। फेरियो हमरो माथ पर हाथ, कखन एता....................... "ओम" बुझाबै, सुनू हे मैना महारानी, इ छथि जगतक स्वामी औढरदानी। भोला नाथक छथि नाथ कहाबथि, सबहक ओ बिगडल काज बनाबथि। शिव छथि एहि सृष्टि केर नाथ, कखन एता................... जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल गजल १ हम तमसायब गजल सुनायब अहाँ अगुतायब गजल सुनायब | ई सौंसे आकाश हमर छी उडि-उडि आयब गजल सुनायब | माइक करजा माटिक करजा हमहूँ चुकायब गजल सुनायब | पाप कते भरि गेल मोनमे गंगा बनायब गजल सुनायब | लगतै आगि अहू जंगलमे कतहु पड़ायब गजल सुनायब | अहाँक हृदयमे घ’र हमर अछि घुरि– घुरि आयब गजल सुनायब | ताकब बाट अहाँक जीवन भरि सपन सजायब गजल सुनायब | २ गाछी लुबधल आम साढू चलू चलै छी गाम साढू | हम नहि जायब वरियातीमे मोने अछि ओ जाम साढू | लोक बहुत छोट-सन लागल जकर बड़ीटा नाम साढू | एकेटा अछि घ’र रावणक भरि गाँ अछि बदनाम साढू | हमरा खातिर गाम स्वर्ग थिक आ घर चारू-धाम साढू | ३ किछु एहने-सन लागि रहल अछि चोरे जोर सं बाजि रहल अछि | रहता लाखो युवक कुमारे सएह जमाना आबि रहल अछि | दुलहा आ दुलहिन उदास छथि वरियाती टा नाचि रहल अछि | जकर मूँह चिन्है छै बारीक वएह मुंगबा पाबि रहल अछि | ककरहु ले’ मुनहारि साँझ ई कियो पराती गाबि रहल अछि | एहि भीड़मे चीन्हब मोसकिल कंठ ककर के दाबि रहल अछि | ४ हाँ जे तकलियै,हम बुझि गेलियै ताकि मुसुकेलियै, हम बुझि गेलियै | कोइली कुहुकलै आमक डारि पर अहाँ जे बजलियै, हम बुझि गेलियै | रिमझिम-रिमझिम साओन आ भादो अहाँ जे कनलियै, हम बुझि गेलियै | गुमकीक बाद बिजलोका आ अन्हड अहाँ चुप भेलियै, हम बुझि गेलियै | २ सभ्यता आ संस्कृति ( कविता ) हम कहलियनि हमरा नोकरी भेटि गेल बाबूजी प्रसन्न भ' गेलाह हम कहलियनि हम अपन विवाह सेहो ठीक क' लेलहुँ बाबूजी नाराज भ' गेलाह हम कहलियनि विवाहमे दस लाख भेटत बाबूजी प्रसन्न भ' गेलाह हम कहलियनि टाका कनियाँक नाम पर बैकमे जमा रहत बाबूजी नाराज भ' गेलाह हम कहलियनि कनियाँ सेहो नोकरी करैत छथि बाबूजी प्रसन्न भ' गेलाह हम कहलियनि कनियाँ सेहो संगे आबि गेल छथि बाबूजी सन्न रहि गेलाह ! मुन्नी कामत नोराएल आँखि उजरल घरमे पोखरिक पानि पीब रहल अछि अखनो लोक पूछि रहल अछि मासुम बच्चा कहिया तक भोगबै हम ई सोग। केना उजरल घर बसतै केना एकर नोर सुखतै आैर कतेक दिन अहिना भोगतै ई भोग। सबहक दाता वएह एगो माता जिनकर अछि समान पूत कोइ कहाबए हिन्दू-मुस्लिम आ कोइ अछूत। भाइ-भाइकेँ जातिमे बाँटि धुतकारैत देखैत छी समाजमे की कहब हम ई विडम्बना कतेक चोट लगैत अछि काेढ़मे। किए छी हम अछूत वएह विधना हमरो बनौलक वएह रँग-रूप-गुण देलक पर अबिते ऐ संसारमे परजाति कहि कऽ सभ धुतकारलक। पहिले जाति बारि कऽ गाम बँटलक मनक संग पाइनो बँटलक नै ई कोइ सोचलक हमरा मनुख देखि कऽ सभ मुँह फेरलक। कहू पर हे बुधिजीवि हमरेसँ सभ उद्धार होइए हमर बनेलहा दौरा देवताक सिरपर चढ़बैत अछि वएह माटिपर हमहूँ ठाढ़ छी तँ हम किअए अछूत कहाइ छी!! कविता- हमर मिथिला हमर प्राण हमर मिथिला हमर जननी हमर इएह परान अछि देखलौं तँ बर दुनियाँ आगू मुदा मिथिले हमर जान अछि। एतुक्का माटिमेे खुशबू संस्कारक जे नै बुझै केकरो आन अछि आनोकेँ अपना बनबैए यएह मिथिलाक पहिचान अछि। जतए गोबरक होइत अछि पूजा बगरोकेँ मिलैत दुलार अछि ई पावन धरती हमर एतए जननी धाम अछि। जे एलाह एतए बसि गेलाह कखनो राम तँ कखनो उगना छेलाह देवतो ऐ माटिसँ करैत दुलार अछि एहेन पवित्र हमर भूमि एहेन सुन्दर हमर गाम अछि। नारी िनर्मल अछि, ओ ममता अछि िनर्मल हुनकर दुलार ओ नारी अछि ऐ समाजक जइमे रचल-बसल अछि संसार। नै भेटलनि अनुकूल परिवेश हुनका ने ज्ञानक सार तैयो हैरत छी देखि कऽ कतेक उच्च, आदर्श अछि हिनकर विचार हर युगमे दबबैत आएल हिनका अगुआए समाज। मुदा कहि रहल अछि आइ नारी जननी छी हम समाजक हमहीं बदलब एकर सोच-विचार पैदा करब अपन कृतिसँ संस्कार िनर्मल रहब हम, ममता रखब बाँटब जन-जनमे प्यार। पंकज झा स्वयंकेँ रीढ़ युक्त बनाबएमे लागल छी भ्रस्टाचार स त्रस्त, लोक छिलमिला रहल छैथ, आंदोलनक बिगुल बजा रहल छैथ, मुदा ओ बेखबर छैथ, जे हुनको रक्त मे भ्रस्ट आचरण दौर रहल छैन, हुनक जन्म स पहिलही, हुनकर पिता, समाज, दहेजक दूषित बिचार स, हुनकर निर्माण प्रारंभ केलैन, विवाहे स- आधारे स, निर्माण के प्रारम्भे स, अपन दुर्बल्तक आर मे, हुनका जन्म देलखिन, आ समयक क्रम मे, हुनकर अब्चेतन मन के, हर भाग मे, भ्रस्टताक उदहारण भैर देलखिन, हुनक रक्त मे ओ तेज कहाँ, जहिना अनाज, फल, फसल , कित्रिम खाद के प्रयोग स, रश हिन् भ गेल अई, तहिना आइ के युवा उर्जा बिहीन छैथ, जिनका सिर्फ गर्दभ गान अबै छैन, अपन स्वाभिमान नै, ओ पिता के आर मे, आ पिता हुनकर आर मे, पुनः वैह चक्र चलबैत छैथ, आब कहू यौ युवा, कि बिना ध्यान, ज्ञान, विज्ञान के, अहाँ अई स उबैर सके छी, अहाँ लग समय कहाँ अई, मूल्य के मूल्य आंक्कै के, अहाँ लग उर्जा कहाँ अई, तटस्त रहै के, हमरा त बुझाना जैत अई, अहाँ वैह राक्षस छी, जेकरा स्त्री और धन दुनु देल जैत छल, आ समय के प्रवाह मे, कोनो वीर, अहाँ के छाती पर बज्र प्रहार कै, अहाँ के अंत करै छलाह, मुदा अई घोर कलयुग मे, ओ वीर कतय छैथ, से नै जनैत छी, मुदा ! स्वयं के रीढ़ युक्त बनाबय मे लागल छी, २ मानु ने मानु, नव चेतना स दूर, हम मैथिल मजबूर, सभ्य होबाक मुखौटा लगौने, स्वयं अपन रीढ़क हड्डी तोरै छी, जगलो में किछ नई बुझै छी, युवा छी, पर साहस कहाँ ? स्वाभिमान बनेबाक सामर्थ्य कहाँ ? समय संग चलैक, दृष्टी कहाँ ? प्रतिकार करैक, तर्क कहाँ ? मानु ने मानु, अहाँक अधोगतिक, बिज पहिनहि रोपल गेल अई, दहेजक बिष पैन स, अहाँक नहौल गेल, अहाँ महिक गेल छी, भिनैक गेल छी, प्रखर संस्कृति स लुढैक गेल छी, आनक पुरुसार्थ पर, ठाढ़ होबाक कोशिस, अपहिजे त बनाओत, क्रमशः और, राजदेव मण्डल कविता- कामना अपन-अपन कामना सबहक पास धरतीसँ पसरल अकास बढ़ले जा रहल मासे मास होइते बाधा दुखक आस आस िनरास तैयो आस- जिनगीक पाश निबुधिया पोता फानि कऽ बजल- “यौ, बाबा आबि गेल फागुन मास।” “हँ रौ बौआ रौदा भऽ गेल आब हएत जाड़सँ उबरास परसाल कहाँ भेल छल जाड़ ऐबेरक जाड़ तँ देहकेँ कऽ देलक तार-तार घुरमे जरि गेल सभटा लार-पुआर लगै छल नै बँचत जान लीलसासँ भरल छल खान दुनू बेटा भऽ गेल जुआन हमरो बढ़ि गेल सामाजिक शान पलिबारक भार उठौलक कान्ह आब निचेन भेल हमरो जान टहलब, बुलब किछु करब दान गाबि सकब सुखसँ भक्ति गान।” “यौ बाबा नै करू लाथ हमरा कहू एकटा बात झगड़ा केलक बाबूसँ काका माँगैत रहै तीन हजार टका कहै छलै- तोहर नै ठीक रहलौ ईमान भऽ गेलह पूरा बेइमान बाबू अछि सभ झगड़ाक जड़ि सनकेलकौ तोरा जिनगी भरि ऐ जाड़मे करतौ ओ परलोक बास बाँटि लेबो सभ चास-बास अपन-अपन चास, अपन-अपन बास देखिहेँ सिनेमा खेलिहेँ तास अपना सम्पतिकेँ करिहेँ नाश बाबा ठीके करबै परलोकबास बीतल जा रहल जाड़क मास।” घुमए लगलै माथक चाक बाबा भेल अवाक्। अमित मिश्र गीत
नैना कने मिला ले दिल मे अपन बसा ले /2/ हमरा भ' गेलौ तोरे सँ प्यार सजनी . . . नैना कने मिला ले . . . . . . . . .
दिन रहै छी सोचैत .राति रहै छी जागल हेतै मधुर मिलन इ आश रहै यै लागल /2/ नैना के बाट ध' क' दिल मे उतरि जो प्रेम नगर मे बसि जो जिनगी गुजरि जो तोरे नैन मे हमर संसार सजनी नैना कने मिला . . . . . . . . .
दुनियाँ के रीत केहन .भेल बिपरीत छै जानि नै तैयो किए लागल प्रीत छै /2/ साथ जे तोहर रहत दुनियाँ सँ लड़ि लेब एक दू बेर नै सए बेर मरि लेब नैन मिला क' प्रेम कर स्वीकार सजनी नैना कने मिला . . . . . . . कविता पहिल टिकुला मज्जरक दिन सँ पसरल सुगंध , हर्षित मोन सुंघि मातल गंध , फूसिये कहै छी कोयलक गीत सुन' जाइ छलौ , सच कहौँ बढ़ैत टिकुलाक दर्शन कर' जाइ छलौँ , डाँढ़ि-पात लुबधल हरियर टिकुला , पैघ-छोट ,वाह! केहन रूप दैब रचला , पहिल टिकुला सँ चटनी थारी सजल , साल भरि के बाद मुँहक स्वाद बदलल , एखने सँ मीठ राजा लागि रहल , बम्बई मालदह छकि क' खेबै आश लागल , धन्य भेल जिनगी देख पहिल टिकुला , "अमित" रसालक ध्यान मे बनल बगुला . . . । । कविता --बुढ़ी काकी इ अन्हार कोठरी मे रहै छथि बुढ़ी काकी . एकदम शांत जेना पत्थर के मुरत . धिरे-धिरे चरखा पर आंगुर चलाबैत बुढ़ी काकी . हवेली जे बगल मे खड़ा छै . ओकर महरानी छलथिन बुढ़ी काकी सजै छल फुलक सेज . लागै छलै मजदुरक भीड़ , सहारा दैत छली सबके बुढ़ी काकी , पर हाय; राम के ई सब नहि मंजुर छलै , नइ तs ठाकुर साहेब मरितैथ किएक , लक्ष्मी विधवा हेतैथ किएक , आब एलै जुआनक राज , नवका जमाना कए पुतौह कए नीक नहि लागलै बुढ़ी काकी , आखीर मातृत्व हारल आ कलयुग जीतल घर सँ निकालि देल गेलए बुढ़ी काकी . जीवन भैर सहारा दै वाली खुद बेसहारा भs गेलै . हुनक इ हालत के जिम्मेदार के छै . ह'म अहाँ वा खुद बुढ़ी काकी . . . . . . . . २ कविता -- गुलाम छी कनियाँक आइ हम बता रहल छी हालात इ दुनिया कए, कोना कs सुनाबी खिस्सा अपन कनियाँ कए , दिन भैर खटैत-खटैत सुखी गेल खुन शरीर कए , कनियाँ मोटा गेला मात्र एक बरिस मेँ , फूली कs भेल फुक्का अंग-अंग ओकर शरीर कए , आइ हम बता रहल छी हालात ई दुनिया कए , घर के सुप्रिम जज ई बात कोना नइ मानी . अपना लेल मधुर मलाई दोसर लेल छुच्छ पानि . दौड़ैत रहै छी पैदल कोन काज स्कुटर के , आई हम बता रहल छी हालात ई दुनिया के , नै पान खा सकए छी नै लौँग नै इलायची कानून जौँ तोड़ब गर्दन पर चलत कैँची , बेलना के माइर खाइ छी होई साफ हम झाड़ू से , आइ हम बता रहल छी हालात ई दुनिया कए . मैडम के जुल्म छै या तकदिर के सितम छै , कोना कs हम बताबी कतेक उदास हम छी , तुफान मे फसल छी आश नइ किनारा कए , आइ हम बता रहल छी हालात ई दुनिया कए , एकटा हमहीँ नै छी गुलाम कनियाँ के , हमरा सन कतेक भाई आओर छै दुनिया मे , कहियो लेबs अमित" सहारा बोतल ई जहर . आइ हम बता रहल छी हालात इ दुनिया के . . , मच्छर
मच्छर बड़ करेजगर होइ छै जानक बजी लगा सब कए क चुमै छै हमर घर में रहै छै हमरे खून चुसै छै अनमन घुसखोर कर्मचारी जेकाँ कान लग आबि भैरवी में सुन्नर गीत सुनबै छै अनमन चुनावक समय नेता जी जेकाँ मनुक्ख कए सचेत होइ सन पाहिले पड़ा जाइ छै अनमन ठग ,चोर ,पाकेटमार जेकाँ जहिना सगरो भ्रष्टाचार पसरल अछि ओहिना मच्छरों भ्रष्टाचार करै छै एक्के आदमी कए बेर-बेर चुसै छै अनमन मिलाबटी सामान बेच वाला बनिया जेकाँ मच्छरक जनसंख्याँ दिन-व-दिन बढ़त अनमन बेरोजगारी,गरीबी,आ दहेज़ जेकाँ किछु उपाय करू इ काटबे करत
अनमन आतंकवादी ,महगाई जेकाँ एकरा सँ छुटकारा कोना भेटत , चिंता कए विषय अछि अनमन बेटी कए वियाह जेकाँ हे मच्छर सन नीक देवता ,अपना में कते गुण समेटने छि आइ सँ ''अमित '' अहाँक चेला बनल अनमन कोनो पार्टी कए चमचा जेकाँ ||
४
कविता- आधुनिक बैण्ड
काल्हि छलौँ सुतल मचान पर , तखने किछु बड्ड जोर सँ बाजलै , लड़खड़ा क' खसलौँ दलान पर , झट पुछलौँ बड़का बेटा सँ , कहलक भुटकुनमा के विआह छै . ओही ठाम बैण्ड बाजए छै , बैण्ड ! आश्चर्य सँ खुजल रही गेल आँखि , बैण्ड एहन होई छै . हमरा जमाना मे होइ छलै एकटा ठेला . मधुरगर शहनाई के स्वर , ढोलक थाप . झाइलक झंकार , आ गीक गाबैत गबैया , मुदा आब , चारि{4} चकिया धुआँ उड़ाबैत ट्रक , ताही पर 10-20 टा ध्वनी विस्तारक यंत्र , तेज धुन , अश्लिल बोल , दारू पि नाचैत छौड़ा छौड़ी , ई पहचान अछि आधुनिक बैण्ड कए , फाटी जाइ ककरो कानक पर्दा , पैड़ जाइ दिल के दौड़ा , भ' जाइ ब्रेन हैमरेज , त' कोनो जुलुम नइ , ई बैण्डक धुन सुनि क' खुशी वा डर सँ जानवरो नाच' लागै छै , सच मे जमाना बदलि गेलै यै , . . । । नवीन ठाकुर द्वंद्व निर्वाह
बात हमरा सँ आंहाके, कहलो नै जायत ! बिन कहलो आँहा सँ रहलो नै जायत !
लैर लिय मोन में जतेक लरबाक हुवा , फेर आयब जखन वेग सहलो नै जायत !
आंहक घरक दोग सँ परिचित छि हम , कुछी नुकब चाहब , नुकालो नै जायत !
बेर रहैते कहू बात जे कहबाक हुवा , बेर बितला पर बात सुनलो नै जायत !
रैहितौं दुश्मन त कोनो गप नै छल , मुदा प्रेमी सँ आन्ह्के लरलो नै जायत !
अछि रिश्ता अपन मधुरता के संग , डा. अरूण कुमार सिंह भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर भारतीय भाषाक हम बेटी मैथिली हम बेटी तँ छी माय, अहिंक मुदा अष्टम अनुसूचिमे पहुँचि विकासक बाट जौहेत विस्तारक लेल छटपटाइत हम बेटी तँ छी परंच अहाँक प्रतीक्षाक केन्द्रबिन्दु नहि अहाँक सांस पर माय लिखल अछि कोनो आन नाम नहि दए सकैत छी हम अहाँकेँ आगियो धरि जन्मेसँ हक-वंचित एहिना, माय जखन नाम बनिकए भारतीय भाषा बनि जाइत छी तखनो एकटा प्रश्न नक्शा पर उभड़िये अबैछ हम के छी? अहाँक महीमा गीतमे अपन चर्चोसँ महरूम हमर नामक आगू ‘श्री’ लागो वा ‘मरहूम’ हम धनी रही वा गरीब अहाँकेँ की नहि जीत छी अहाँक नहि अहाँक हार छी हम जरैत दियाक पातर अन्हार छी अहाँ भारतीय भाषा छी माय हम मैथिली छी माय, हम मैथिली छी! चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान, मधुबनी, बिहार ||हेतै नवका भोर||
एतै जागृति हेतैक नवका भोर, घर-घर मे पहुँचत शिक्षा, शिक्षित हेतै सभ लोक, संपूर्ण धरा पर खुशिये पसरत, ककरो आँखि मे नहि रहतै नोर, नहि रहतै आतंक, आतंकी, आ आतंकवादक जोर, नहि रहतै राजनिति आ' जातिवादक गठजोड़, नवल दिवस, नुतन प्रभात, पुनि हेतैक नवल इजोर।. प्रतिज्ञा लय प्रतिज्ञा आउ चलू बदलय व्यवस्था देश के, परसय ले प्रेम-प्रसाद ओ' मेटबय ले ईर्ष्या-द्वेश के| रक्त-रण्जित हाथ के सिखबय ले सृष्टि-सर्जना, अधिकार-वंचित लोक में जगबय लय नूतन चेतना, ताकय चलू ओ' वाट जे पूरा करय उद्देश्य के | परसय ले प्रेम-प्रसाद ओ' मेटबय ले ईर्ष्या-द्वेश के|| हाइकू चैतक मास पछबा हन-हन माल चरैए । पड़रु पीठ बगुला बइसल ढील फँकैए । बूट मटर ओरहा सोन्हगर मुँह पकैए । आम्र मज्जर टिकुला लुधकल लुक्खी खाइए । जुड़-शीतल कटहर के बर बड़ी पकैए । हर्षित मोन कोइलीक बाजब गीत लगैए । भूख भूख निज-मानक जमाना मे केहन पसरल, लोक दोसराक सनमान करबहु बिसरल ।। अनका नीच देखेबा मे बुझय अपन श्रेष्ठता, सभ सँ श्रेष्ठ अपना के छै सभ बुझि रहल । निज-स्वार्थ सधबा मे रहय हरदम लागल , घेँट कटलै जँ ककरो त', हमर की बिगड़ल | बिहाड़ि छल दशो दिशा स्तब्ध, शांत, दम सधने, भयाक्रांत, गुमकी आ' उमस मेँ, सुखा रहल छल कंठ, चित्त भ' गेल छल- अक्खत तीत्त, फड़फड़ा रहल छल प्राण । पसरल छल वातावरण मे, सभतरि सन्नाटा । मुदा- पोखरिक मोहार परहुक, तारक गाछक कतार, आ' चौबटिया परहक, विशाल वटवृक्ष मात्र, करा रहल छल, अपन श्रेष्ठता एवम् विशालताक आभास क्रमशः, जना रहल हो जनु, अपन साम्राज्यक विस्तार केँ । आ'कि- उठैत अछि प्रबल-प्रचण्ड, प्रकृति-कोमलांगी के , वन-उद्यान के छाती चिड़ैत बिर्ड़ो । क्षणहि मे मचि जाइछ प्रलय, अर्रा-अर्रा खसय लगैछ, अभिमान सँ उठल तारक मूड़ी, आ' सीर समेत उपरि, खसैत अछि वटवृक्षो हारि, एहने होइछ बिहारि । आनन्द कुमार झा मैया अहाँ बसै छी मैया अहाँ बसै छी मिथिला नगरीक माँटिमे पुण्यभूमि उच्चैठमे ना कखनो काली बनि अहाँ एलौं कखनो दुर्गा अहाँ बनि गेलौं कखनो सीता बनि कऽ अहाँ भेटै छिऐ खेतमे मिथिला नगरीक माँटिमे ना मैया अहाँ… मण्डन भारती सेवलनि धाम रखलिअनि हुनको अहाँ शान कालिदासक आस पुरेलिअनि एकहि रातिमे पुण्यभूमि उच्चैठमे ना मैया अहाँ… जे किओ जपलनि अहाँ केर नाम पुरित कए देलिअनि सभ मांग एहि बेर बारी अछि आनन्दक एहि पाँतिमे पुण्यभूमि उच्चैठमे ना मैया अहाँ… नवीन कुमार ‘‘आशा’’ विदेह परिवार बिनु रहब कोना फाटल करेज के सिबब कोना विरह गीत मेँ सेहो नहि सुर ओहि मय तान लगायब कोना कलम जे चलल छल सजि के ओकरा उजर नुआ पहिनाबु कोना ज्ञान क अलख जे जगोलथि हमरा मय ओ प्रनेता के बिसरब कोना मचान पर बैसल सोचि ऐतबा बिछरल परिवार सँ मिली कोना विदेह परिवार छमा माँगु कोना बिना क्षमा के रहब कोना जीवन के इ शौक अछि बिनु रोजगारे रहब कोना ऐतबा लिख रहब कोना बिनु आशीष जियब कोना विदेह लेल रहब सदिखन उपस्थित पर किछु दिनक मोहलत माँगु कोना। [अपने सब सँ दूर रहेक उदासी अछि पर बिनु रोजगारे जीवन खाली अछि। विदेहक जनक गजेन्द्र ठाकुर आ समस्त परिवार के समर्पित] गर्भक आवाज
गर्भमे तोहर फकसियारी काटी जुनि हमरा सता गैय माँ । एक बेर जन्म लय कय, जिनगीक दुःख-सुख सिखय दे गैय माँ। माँ तुहि बुझमें दुःख हमर, दुनिया में पैर पसारैय दे गैय माँ। दाय, बाबा आ बाबु कतबो सतेथिन, मरहम तुहि त लगेमे गैय माँ। गर्भ में तोहर फकसियारी काटी, एक बेर जन्म दय दे गैय माँ। बाबु कतबो कहथिन अभिशाप, हम दूनूक आस बनबौय गैय माँ। गर्भ में बेटी फकसियारी काटे, ओकरा जुनि सता गैय माँ। बेटी जँ नहि लेते जन्म, दुनिया कोणा बढ़तैय गैय माँ। गर्भ सँ तोहर विनती करियौ, जन्म हमरा दय दे गैय माँ ।
यौ भाइ दहेजक अन्त करु किछु अवश्य षडयंत्र रचु कतेक दिन मुँह राखब बंद कखनो तय करू ऐकर अंत बेटी भेनाई अभिषाप नै थिक लक्ष्मीक होय ओ दोसर रूप ओकर सेहो अछि स्वप्न सजल दहेजक कीड़ाक करू शिकार जुनि पालि राखु ई विकार यौ भाई दहेज प्रथाक अंत करू। किछु अवश्य षडयंत्र गढ़ु जँ अहाँ बेटा के गढ़लौ कि ओहि मे निज स्वार्थ देखलौ बेटा जँ अछि अहाँक हीरा तॅ बेटी अछि बड़ बहुमूल्य दूनूक जॅ करि वियाह दहेजक अभहेलना करि यौ भाई दहेज प्रथाक अंत करू..............................। मिथिलाक की करू बखान
मिथिलाक की करू बखान कि गाऊ एकर गुणगान एहि धरती पर जॅ भेल जन्म तय बुझि अपना कें धन्य मिथिलाक अछि अलग पहचान हर ठाम छोड़ै अपन निशान जतय जतय पर पड़ल कदम ओहि ठाम फहरलि परचम मिथिलाक पेंटिग कय नहि जाने मधुवनी के ई पहचान दरभंगाक अछि अलगे शान जानल मानल पान मखान मिथिलाक की करू बखान कि गाऊ एकर गुणगान । जखन हम गुजरी सरिसब पाही सुने मय आवे शंकर मिश्र वाणी जकर सेहो अछि अलग पहचान मिथिलाक कि करू बखान कि गाऊ एकर गुणगान। जखन आवी मिथिला नगरी दही चूड़ा खाए पसरी दही चूड़ाक अलग पहचान अहि मय बसे मैथिलक जान मिथिलाक कि करू बखान कि गाऊ एकर गुणगान। जखन देखि माछक ठेला तखन बुझब सॉझक मेला जखन देखि जिबैत भाकुर नहि रहत मुह पर दू आखर मिथिलाक कि करू बखान कि गाऊ एकर गुणगान। एतय के धिया पुता माजल ओ रहति हरदम सजल हुनको अछि अलग पहचान हुनका मय बसे माता-पिताक प्राण कतबो ओ होयथि हुरदंग नहि करथि दोसर के तंग मिथिलाक की करू बखान कि गाऊ एकर गुणगान। मिथिलाक बूढ़ होयथि वा बच्चा हुनक मोन होयन्हि सच्चा एक दोसरक करथि सम्मान किया नहि होयथि अनजान मिथिलाक कि करू बखान कि गाऊ एकर गुणगान मिथिला महान मिथिला महान। नित्यानंद गायेन केर दूटा हिंदी कविताक मैथिली अनुवाद अनुवाद कर्ता आशीष अनचिन्हार १ हम नै चाहै छी अपना उपर संदेह हमरा अहाँक माँझ एहिना बनल रहए दूरी अम अपन सफाइ दए क नै करए चाहैत छी अपना उपर संदेह आ ने अहीँकेँ करए चाहैत छी बेइज्जत........ २ रौद पघलि रहल अछि मनुख सुखा रहल अछि जरि कए आ रौद पघलि रहल अछि------ राजा लूटि रहल मंत्री सूति रहल ओकील जागि रहल विपक्ष नाचि रहल कूकूर बाटपर भूकि रहल "हम" देखि रहल छी चुपचाप ई सभ। ५ प्रस्तुत अछि कुरानक मैथिली अनुवाद अनुवाद कर्ता ( आशीष अनचिन्हार) नोट-- ई अनुवाद मधुर संगम संदेश द्वारा अरबी-हिन्दी कुरान पर आधारित अछि---- तँ शुरू करैत छी आइसँ कुरान केर मैथिली अनुवाद। कुरानक पहिल अध्यायकेँ " अल-फातिहा" कहल जाइत छै। एहि अध्यायमे सात टा आयत छै ( आयत मने श्लोक )। ई सातो आयत पैगम्बर मोहम्मद मक्का नामक जगह पर कहला। १) शुरू करै छी अल्लाह खुदा भगवानक नामसँ जे की एकमात्र प्रशंसा केर हकदार छथि। २) जे की बड़का कृपाशील आ दयावान छथि। ३) जे की रोजे-रजा ( बदला लेबए आ देबएकेँ ) मालिक छथि। ४) जिनकर हम सभ पूजा करैत छिअन्हि आ जिनकासँ मदति माँगै छिअन्हि। ५) जे की हमरा सोझ आ सही बाटपर चलबा लेल प्रेरित करै छथि। ६) ओहि लोकक बाट पर सेहो चलबाक लेल कहै छथि जे की खुदा केर प्रिय छथि। ७) आ हुनका संग रहबा लेल सेहो प्रेरित करै छथि जे की ने नीच छथि आ ने पथभ्रष्ट। डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ कोन खुशिएँ नाचि रहलह मोन कहइछ “शशि” ने तोँ होरी मनाबह । कोन खुशिएँ नाचि रहलह - से बताबह ?? स्वर्ग मिथिला बनल छह, नर्कहु सँ बत्तर । अजेय दुर्गक, आइ हर प्राचीर विक्षत । माए मैथिली – तोहर जननी, केर हृदय मे, व्याप्त दुख केर होलिका - पहिने जराबह ।। मोन कहइछ .......... जनकजा सीताक जे छल मातृभाषा । महाकवि विद्यापतिक जे कीर्त्ति – गाथा । मेघनादक फाँस मे से छह अचेतन, आनि संजीवनि तोँ “शशि” तकरा जियाबह ।। मोन कहइछ .......... गाबि थाकल जकर महिमा, शास्त्र वेद पुराण अगनित । आइ तकरा नञि भेटल अछि, हा ! अपन पहिचान समुचित । आइ लागल छह ग्रहण मिथिलाक रवि केँ, एहेन दुर्गति पर ने तोँ डम्फा बजाबह ।। मोन कहइछ .......... होरी नै, होरीक प्रात रहए आइ गेल छलहुँ, हुनिका ओहि ठाँ, होरी नञि, होरीक प्रात रहए । काजक तऽ सिर्फ बहाना छल, छवि - दर्शन केर अभिलाष रहए ।। सोझाँ अएलीहि, किछु बात बनल । बढ़ि गेल जेना, मोनक हलचल । अति आनन्दित मुखमण्डल छल, आनन्दहि बिह्वल गात रहए । आइ गेल छलहुँ, हुनिका ओहि ठाँ, होरी नञि, होरीक प्रात रहए ।। नयन मिलल, पर थिर ने रहल । लाजेँ ने अधर किछु बाजि सकल । की भेल ? - हमहु स्तब्ध रही, मिलनक अजगुत एहसास रहए । आइ गेल छलहुँ, हुनिका ओहि ठाँ, होरी नञि, होरीक प्रात रहए ।। नहि रंग - अबीर - गुलाल चलल । नहि नयनहि केर ब्यापार चलल । पर अधर हुनिक रक्तिम – रक्तिम, ओ गाल गुलाबी – लाल रहए । आइ गेल छलहुँ, हुनिका ओहि ठाँ, होरी नञि, होरीक प्रात रहए ।। लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत । मुदा हम छी अहीं केर, अहीं केर रहब ।। नाम अहीं केर जपै छी, हम आठो पहर । ध्यान अहीं केर रहैछ, नञि केओ दोसर । अहाँ मानू ई सत्य, हम अहीं केर रहब । लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत ।। साओन–भादो केर राति वा हो चैती बसन्त । जेठ हो कि अषाढ़ , वा हो ठिठुरल हेमन्त । हाबा बहितहि रहैछ, हाबा बहितहि रहत । लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत ।। नञि कहियो मिझाइछ, प्रेम थिक ओ अनल । जरि अमृत भऽ जाइछ, वासना केर गरल । अहाँ अन्तऽहि सही, मन अहीं केर रहत । लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत ।। हमरा जुनि करिहेँ याद सखी हमरा जुनि करिहेँ याद सखी, हम तऽ किछु कालक संगी छी । जीवनक जँ राह अनन्त कही, हम क्षण भरि केर बस संगी छी ।। आइ एहि आङ्गन, आइ ओहि आङ्गन । हम एहि कानन सँ ओहि कानन । नञि अता – पता हम्मर किछुओ, हम मुक्त गगन केर पंछी छी । हमरा जुनि करिहेँ याद सखी, हम तऽ किछु कालक संगी छी ।। जिनगी मे बहुतहु भेंट होयत । बहुतो संगी सभ छुटि जायत । एक जायत तऽ दोसर आओत, अछि जीवन तऽ बहुरंगी ई । हमरा जुनि करिहेँ याद सखी, हम तऽ किछु कालक संगी छी ।। एक क्षण जञो हो मधुमय बसन्त । दोसर सम्भव पतझड़ - हेमन्त । थिक समय-समय केर फेर सखी, हम मित्र, बनल प्रतिद्वन्दी छी । हमरा जुनि करिहेँ याद सखी, हम तऽ किछु कालक संगी छी ।। श्यामल सुमन निरीक्षण अपने सँ देखब दोष कहिया अपन ध्यान सँ साफ दर्पण मे देखू नयन
बात बड़का केला सँ नञि बडका बनब करू कोशिश कि सुन्दर बनय आचरण
माटि मिथिला के छूटल प्रवासी भेलहुँ मातृभाषा विकासक करू नित जतन
नौकरीक आस मे नहिं बैसल रहू राखू नूतन सृजन के हृदय मे लगन
खूब कुहरै छी बेटीक विवाहक बेर अपन बेटाक बेर मे दहेजक भजन
व्यर्थ जिनगी अगर मस्त अपने रही करू सम्भव मदद लोक भेटय अपन
सत्य-साक्षी बनू नित अपन कर्म केर आँखि चमकत फुलायत हृदय मे सुमन सम्बन्ध साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी। वेदना हम हृदय के सुनाबैत छी।।
कहू माता केर आँचर मे की सुख भेटल। चढ़िते कोरा जेना सब हमर दुःख मेटल। आय ममता उपेक्षित कियै रति-दिन, सोचि कोठी मे मुंह कय नुकाबैत छी। साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी। वेदना हम हृदय के सुनाबैत छी।।
खूब नेनपन मे खेललहुं बहिन-भाय संग। प्रेम सँ भीज जाय छल हरएक अंग-अंग। कोना सम्बन्ध शोणित केर टूटल एखन, एक दोसर के शोणित बहाबैत छी। साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी। वेदना हम हृदय के सुनाबैत छी।।
दूर अप्पन कियै अछि पड़ोसी लगीच। कटत जिनगी सुमन के बगीचे के बीच। बात घर घर के छी इ सोचब ध्यान सँ, स्वयं दर्पण स्वयं केँ देखाबैत छी। साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी। वेदना हम हृदय के सुनाबैत छी।। बेटी माँगू दहेज भरमार यौ, चलू बड़का कहाबी।। भेटल पड़ोसी कय जे किछु दहेज। रखला एखन तक सबटा सहेज। कम नहि करब स्वीकार यौ। चलू बड़का कहाबी।। बेटा अपन छी बेटी छी आन। नहि दऽ सकै छी बेटी लऽ प्राण। दुनियाँ बनल व्यापार यौ। चलू बड़का कहाबी।। बेटा आ बेटी के अन्तर मेटाबू। बेटी जनम लियै थपड़ी बजाबू। बेटी सुमन श्रृंगार यौ। चलू बड़का कहाबी।। मैथिल मिथिला नाज हमर भेद भाव बिनु सबकय जोड़ू, बाँचत तखन समाज हमर सबकियो मिलिकय बाजू सगरे, चाही मिथिला राज हमर
राज बहुत पहिने सँ मिथिला, छिना गेल अछि साजिश मे जाबत ओ सम्मान भेटत नहि, बाँचत कोना लाज हमर
विविध विषय के ज्ञानी मैथिल, दुनिया मे भेटत सगरे मुँह बन्द राखब कहिया तक, के सुनतय आवाज हमर
आजादी के बादो सब दिन, भेल उपेक्षा सरकारी बहल विकासक गंगा प्रायः, बाँचल खाली काज हमर
सज्जनता श्रृंगार सुमन छी, दिल्ली बुझलक कमजोरी जागू मिथिलावासी आबो, मैथिल मिथिला नाज हमर हँसी मुँह पर साटय छी धीया-पुता दुख नहि बूझय, हँसी मुँह पर साटय छी खरचा एक पुराबय खातिर, दोसर खरचा काटय छी
आजुक युग मे कम्प्यूटर बिनु, नवतुरिया सब की पढ़तय मुदा माँग पर, टाका नहि तेँ, बच्चा सब केँ डाँटय छी
बनल बसूला सम्बन्धी-जन, बाजय मीठगर बोली यौ दुख मे रहितहुँ पर विवेक सँ, सभहक हिस्सा बाँटय छी
अपन हृदय मे भाव जेहेन छल, बुझलहुँ छै तेहने दुनिया चीन्हा गेल अछि अप्पन-अदना, हुनके सबकेँ छाँटय छी
सुमन संगिनी जीवन भेटल, रूप मनोहर काया संग दुख भीजल तऽ चोकर आमक, रूप देखिकय फाटय छी ई खटहा अंगूर छी किछु कुबेर के चक्रव्यूह मे, कानूनन मजबूर छी रही कृषक आ खेत छिनाओल, तहिये सँ मजदूर छी
छलय घर मे जमघट हरदम, हित नाता सम्बन्धी के कतऽ अबय छथि आब एखन ओ, प्रायः सब सँ दूर छी
काज करय छी राति दिना हम, तैयो मोन उदास हमर साहस दैत बुझाओल कनिया, अहाँ हमर सिन्दूर छी
एहेन व्यवस्था हो परिवर्तित, लोकक सँग आवाज दियौ एखनहुँ आगि बचल अछि भीतर, झाँपल तोपल घूर छी
बलिदानी संकल्प सुमन के, कहुना दुनिया बाँचि सकय नहि बाजब नढ़िया केर भाषा, ई खटहा अंगूर छी संस्कार सन्तान मे स्वजन मृत्यु पर कानैत बाजैत, गेल छलहुँ शमशान मे आनल जायब एहिना हमहुँ, आयल अचानक ध्यान मे
बाजी सब कियो राम नाम संग, सभहक गाति एहने होइछै बाहर आबिते फूसि फटक्कर, केलहुँ शुरू दलान मे
बात सदरिखन की लऽ एलहुँ, की लऽ जायब दुनिया सँ मुदा सहोदर सँ झगड़ा नित, होई छै नहि अन्जान मे
भाग्य लिखल जे हेबे करतय, काज करय के काज की चिकरि चिकरि केँ बाजू एतबे, दास मलूक सम्मान मे
सुमन मनुक्खक जीवन भेटल, घटना छी अनमोल यौ सफल तखन पल पल जीवन के, संस्कार सन्तान मे कियो हमर संगी बनू चलू ताकय छी मिलि भगवान, कियो हमर संगी बनू। कतऽ भेटला छी फुसिये हरान, कियो हमर संगी बनू।।
कियो कहय कण-कण मे, कियो कहय मन मे। कियो कहय गंगा मे, कियो पवन मे। नहि भेटल कुनु पहचान, कियो हमर संगी बनू।।
सुमरय छी दुख मे, बिसरय छी सुख मे। पूजा के भाव कतय, नामे टा मुख मे। छथि भक्तो बहुत अनजान, कियो हमर संगी बनू।।
करू लोक सेवा, तखन भेटत मेवा। लोक-हित काज करू, लोके छी देवा। सुमन कत्तेक बनब नादान, कियो हमर संगी बनू।। रहबय कोहबर कत्तेक दिन रहबय कोहबर कत्तेक दिन बनिकय अजगर कत्तेक दिन
शादी तऽ एक संस्कार छी जीबय असगर कत्तेक दिन
बिना काज के मान घटत नित फूसिये दीदगर कत्तेक दिन
बैसल देहक काज कोन छै एहने मोटगर कत्तेक दिन
आबहुँ जागू सुमन आलसी खेबय नोनगर कत्तेक दिन मोन कियै सिंहासन पर मोन कियै सिंहासन पर घर मे आफत राशन पर
काज करय मे दाँती लागय तामस झाड़ी बासन पर
लाज करू जे पाहुन जेकाँ खाय छी कोना आसन पर
खोज-खबर नहि धिया-पुता के बात सुनाबी शासन पर
बिना कमेने किछु नहि भेटत जीयब खाली भाषण पर
कहू सोचिकय कहिया सुधरब जखन उमरि निर्वासन पर
सुमन समय पर काज करू आ सोचू निज अनुशासन पर चलू बैसिकय कानय छी रीति बिगड़ि गेल जानय छी चलू बैसिकय केँ कानय छी
असगरुआ जौं नहि नीक लागय आओर लोक केँ आनय छी
समाधान आ कारण हमहीं बात कियै नहि मानय छी
पैघ लोक के बात, सोचबय के के एखन गुदानय छी
आस व्यर्थ छी बिना प्रयासक फुसिये गप केँ तानय छी
नीक आओर अधलाह लोक केँ कियै एक सँग सानय छी
लऽ कऽ चालनि सुमन हाथ मे नीक लोक केँ छानय छी गलती बारम्बार करू गलती बारम्बार करू अधलाहा सँ प्यार करू
दुर्गुण सँ के दूर जगत मे निज-दुर्गुण स्वीकार करू
दाम समय के सब सँ बेसी सदिखन किछु व्यापार करू
अपने नीचा, मोन पालकी एहि पर कने विचार करू
बल भेटत स्थायी, पढ़िकय ज्ञानो पर अधिकार करू
भाग्य बनत कर्मे टा फल सँ आलस केँ धिक्कार करू
प्रेमक बाहर किछु नहि भेटत प्रीति सुमन-श्रृंगार करू तखने जीअब शान सँ
समय के सँग मे डेग बढ़ाबी तखने जीयब शान सँ किछु ऊपर सँ रोज कमाबी तखने जीयब शान सँ
काका, काकी, पिसा, पिसी रिश्ता भेल पुरान यौ कहुना हुनका दूर भगाबी तखने जीयब शान सँ
सठिया गेला बूढ़ लोक सब हुनका बातक मोल की हुनको नवका पाठ पढ़ाबी तखने जीयब शान सँ
सासुर अप्पन कनिया, बच्चा एतबे टा पर ध्यान दियऽ बाकी सब सँ पिण्ड छोड़ाबी तखने जीयब शान सँ
मातु-पिता के चश्मा टूटल कपड़ा छय सेहो फाटल कनिया लय नित सोन गढ़ाबी तखने जीयब शान सँ
पिछड़ल लोक बसल मिथिला मे धिया-पुता सँ कहियो अंगरेजी मे रीति सिखाबी तखने जीयब शान सँ
सुमन दहेजक निन्दा करियो बस बेटी वियाह मे बेटा बेर मे खूब गनाबी तखने जीयब शान सँ
आँखिक नोर सँ
भेटेय छै फल अपन कर्मक जखन मानय छी फुटल नसीब तखन कहिकय कियै कानय छी
खेलहुँ नय नीक-निकुत कहियो ककर दोष कहू खाय छी कूटि केँ ओतबे नित लूटि आनय छी
रहल छी साल कतेक संगे आबो चीन्ह लियऽ बुझिकय खाट कियै हमरा नित गतानय छी
लोक मे पानि भऽ रहल कम आओर दुनिया मे आँखि के नोर सँ नित आटा हमहुँ सानय छी
लगल छी रोज प्रशंसा मे जिनका टाका छै हुनक खराब छलय नीयत जखन जानय छी
बूढ़ केँ ज्ञान बिसरि कहलहुँ बोझ भऽ गेला मोन सँ सोचि कहू हुनका के गुदानय छी
टूटल प्रतिज्ञा सुमन जखने तखन हूब घटल करू प्रयास खूब मन सँ किछुओ ठानय छी
जतबय अछि औकात करय छी
कत्तेक सुन्दर बात करय छी पाछाँ सँ आघात करय छी
जखनहि स्वार्थ सधल जिनका सँ तखनहि हुनका कात करय छी
सगरे देख रहल छी प्रायः झगड़ा हम बेबात करय छी
टाका सबटा गेल दहेजे डीह बेचि बरियात करय छी
कनिको दुख नहि सुमन हृदय मे जतबय अछि औकात करय छी खूब मोन सँ सभक सुनय छी
कनिये कनिये रोज लिखय छी छात्र एखन, साहित्य सिखय छी
भारी भरकम बात लिखल नहि घर-आँगन केर बात कहय छी
बेसी वक्ता, कम छै श्रोता कविता सँ सम्वाद करय छी
कहियो नहि मन-दर्पण देखल बाहर दर्पण रोज देखय छी
छी असगर ई भाव भीड़ मे बनिकऽ पानी संग बहय छी
एहि जीवन मे दुख ककरा नहि दुख मे नित मजबूत रहय छी
कियो सुमन के सत्य सुनल नहि खूब मोन सँ सभक सुनय छी कि मुखड़ा पर चान देखलहुँ कोना प्रियतम केँ रंगो लगाबी, कि मुखड़ा पर चान देखलहुँ। छोड़ि फगुआ केँ चौरचन मनाबी, कि मुखड़ा पर चान देखलहुँ।।
भरल हाथ मे रंग-गुलाल, सोझाँ मे अछि सुन्दर गाल, मोन करैया कऽ दी लाल। कोना जानितो इजोरिया भगाबी, कि मुखड़ा पर चान देखलहुँ।।
झालि, मजीरा बाजय ढ़ोल, गारि लगय अछि मीठगर बोल, बिना पानि के मचल किलोल। कोना प्रियतम के संगे नहाबी कि मुखड़ा पर चान देखलहुँ।।
जागू सजनी भऽ गेल भोर, गली गली मे मचलय शोर, खेलब फाग बहुत घनघोर। कोना जा कऽ सुमन केँ जगाबी कि मुखड़ा पर चान देखलहुँ।। फागुन मौसमक श्रृंगार होली छी रंगक त्योहार फागुन मौसम के श्रृंगार सगरे फगुआक गीत संग ढोल बजैया घर मे पिया बिनु कनिया किलोल करैया
पावनि बीतल भरि साल के, तखनहिं फगुआ आबय कहियो बोल फुटल नहि जिनकर, सेहो गीत सुनाबय साँचे, फगुनक दिन अनमोल लगैया घर मे पिया बिनु कनिया किलोल करैया
पूआ आओर पकवान बनाकऽ, सबकेँ खूब खुवेलहुँ एखनहुँ आँखि लगल देहरी पर, मुदा अहाँ नहिं एलहुँ खाय छी किछुओ तऽ मुँह मे ओल लगैया घर मे पिया बिनु कनिया किलोल करैया
बिनु जोड़ी के फागुन फीका, हरेक साल चलि आबू लोक-वेद आ हमरो संग मे, फगुआ खूब खेलाबू पिया, सुमन अहाँ केँ बकलोल कहैया घर मे पिया बिनु कनिया किलोल करैया दिनेश रसिया हम पत्रकार
हम छी एकटा पत्रकार न्याय दिलाबऽ के लेने छी भार जकर महिमा रहल अछि अपार मुदा तैयो किए मरैत अछि पत्रकार
कहाबै छी हमहीं देशक तेसर आँखि लगा कऽ सूर्यपंखी घोड़ाक पाँखि अन्याय निकाली हम सभ ताकि-ताकि सत्य आ निष्ठा पर रहै छी अटल तैयो किए पत्रकारे के गर्दनि कटल
हम सभ करै छी सत्य तथ्य के खोज सुबहसँ शामतक चाहे भुखल रही रोज चाहे रहऽ परए रौदमे खजुरक पात जेकाँ सोमत तब जाके करबै छी जनताकेँ सही बातकेँ अबगत तैयो किया सब देखाबैये हमरे लग तागत बाराके मरायल बिरेन्द्र शाह,ककरा आयल छल आह तब मरायल दिदी उमा सिंह, जकरा केलक संसारसँ बिदा अखन देखु यादब पौडेलके भेल उहे गती, तैयो नै आयल अछि शान्ति रोकु ई अत्याचार नै तँ आब करब हम सभ मिल कऽ पत्रकार जनक्रान्ति । जवाहरलाल कश्यप यौ मीत गाबु कोन गीत लिखु कोना गजल, जिन्दगी नहि छै, सुर-ताल मे सजल नहि छै कोनो मुखरा, ने कोनो अंतरा नहि वर्णक विचार, ने कोनो मात्रा बस अतुकांत कविता जेना, एकटा गति छै शुरु हेबाक, चलैत रह्बाक, खत्म हेबाक... ने कोनो मतलब, ने कोनो महत्व बस आकंक्छा के बलिवेदि पर जीवनक वलि देबाके छै हम नहि लिखैत छी कविता सब स पहिले टुटैत छी हम खत्म होइत अछि हम्मर इगो नष्ट होइत अछि हम्मर व्यक्तित्व तखन बनैत अछि कविता महान हम नहि लिखैत छी कविता कविता करैत अछि हम्मर निर्माण पानिक बुंद चढैत अछि आगि पर पानिक बुंद चढैत अछि आगि पर बनैत अछि भाफ मिलैत अछि प्रक्रिति मे खत्म होएत अछि ओकर अस्तित्व तखन बनैत अछि स्वच्छ निर्मल जल / आदमी चढैत अछि सत्यक ताप पर बनैत अछि दयाशील मिलैत अछि प्रक्रिति मे खत्म होएत अछि ओकर अस्तित्व तखन बनैत अछि मानव महामानव / अयोध्यानाथ चौधरी कोनो किम्मत पर मिथिला महान चाही
अपन धरती, अपन आसमान चाही कोनो किम्मत पर मिथिला महान चाही
आब जागि गेल छी, नहि सूतल छी हम अन्याय बहुत सहलहुँ ,नहि बुभूm हमरा कम अहाँक बन्दुक आ गोली के नहि परबाहि हमरा पीठ पर सहाय छथि राम आ लखन जिनका संगे मे तीर आ कमान सदिखन तंै ...कोनो किम्मत पर मिथिला महान चाही
बहुत शोषण कएलहुँ,विचार करु आब भाइचारा क नाम पर,अहाँ कयलहुँ हलाल हम स्वंय छी सक्षम,नहि आन चाही शासक नहि अहाँसन बेइमान चाही सभ मैथिलक मुँहपर मुस्कान चाही कोनो किम्मत पर मिथिला महान चाही
हमरे अन्न–धन्न सँ पालित छी अहाँ हमरे आम–माँछ खा आहलादित छी अहाँ कृतज्ञता सँ वढिकऽकोनो धर्म नहि होइछ कृतघ्नता सँ वढिकऽकोनो क्लेश नहि दैछ हम की कहब,अपने विचार चाही कोनो किम्मत पर मिथिला महान चाही
बरु सोनाक लंका होवऽअहींके नसीब हमरा फुस्से मे अपन पहिचान चाही अहाँक भाग मे रावण छथिहे ओतऽ हमरा त’ एतऽ अपन राम चाही कहू अहाँ सँ कथी मे छी हम कम कोनो किम्मत पर मिथिला ललाम चाही
कृषि योग्य उर्बर भूमि पसरल हमर हरीतिमाक अनुपम पसार छै एतऽ सुरभित समीर बहैत अछि सदैब कल–कल,छल–छल गीत गुनगुनाइत सदिखन हमरा वागमती,कोशी आ बलान चाही कोनो किम्मत पर मिथिलाधाम चाही
छठि पावनि मे सजल जल –किछेर केहन दिव्य दीपावली मे दीपक कतार केहन भव्य हमरा सूर्य –रश्मि रंजित भोर चाही राति के नौतैत गोधुलि चाही कोजागरा क पान आ मखान सन दिव्य कोनो किम्मत पर मिथिलाधाम चाही
राजधानी त’ बनले छै अदौ सँ एतए एहि मे मीन–मेष करबाक वात छै कतए विदेहक नगरी सँ उत्तम स्थान कोन हैत राम –जानकी क प्रणय कथा ककरा नहि मोन केओ की वनाओत, इ त वनले छैक कानो किम्मत पर जनकपुरधाम चाही
ज्ञान –पुञ्जक प्रसार एहीठाम सँ भेल शंकर–मण्डन आ याज्ञबल्यक धाम थिक ई गुरु गूड आ चेला चिनी वूझि गुमान करतै छी ज्ञान क श्रोत विसरि अनजान बनल छी नैतिकताक कनिञो त’ ध्यान चाही कोनो किम्मत पर मिथिला महान चाही
सीता, मैत्रेयी आ गार्गीक धाम छी ई उर्मिला–सन पतिव्रताक ठाम छी ई हमरे सँ अहाँक पहिचान बनल अइ एहि वात के सत्त् अहाँके ध्यान चाही नहि त कहु कतेक आओर वलिदान चाही कोनो किम्मत पर मिथिला महान चाही......... । रवि भूषण पाठक बामे गाम दहिने गाम 1 बागमती आ करेहक बीच ठाढ़ ई कोन चीजक पहाड़ हयौ कविकुलगुरू ई अहांक धर्मदण्ड नइ जे धरती के क्षणेक्षण नापैत हो ई थिक हम्मर गाम ताकैत चारूदिस इतिहासक अखण्ड आवागमनक साक्षी बनि तौलैत ब्रह्माण्डक पानि कखनो झुकि जाइत बागमती दिस कखनो करेह दिस ले ...ले...तू ले जेकरा काज हो जलक ई पानि केवल हाईड्रोजन आ ऑक्सीजनक यौगिके नइ मोनक पानि आत्माक पानि सेहो केवल मुंहक पानि नइ कालिदास आत्माक पानि मरै नइ बस एतबे लेल ठाढ़ ई करियन गाम ई गाम जानै छैक पानिक मोल तीन-चारि सौ फीट नीचा कअल ईनार गाम जेकर कुरसी बनल बाभन,कुरमी,धानुक गुआर दुसाधक हड्डी सँ सूरखी चूना बनि माटि मे मिलैत गेलै आ पहाड़ बरहैत गेलै एत्ते ऊंच.... एत्ते ऊंच.... कि नेपाल ,तिब्बत ,चीन मिलिओ के नइ डूबा पाबैछ करियन गाम 2 धनि जिरात धनि जिरात के नापै तोहर ऊर्वरता के जांचै तोहर जोस बस एक बेर सम्हरि के उपजि जो खुआ देबै पूरा दुनिया के एक सांझ सोहारी तीमन तरकारी आ बता देबै झिकुटी क’ मोल आ बस एके बेर सम्हरि के फरि जाइ खुटेरी बाबूक गाछी कलकतिया मालदह फौजली आ बीज्जू क’ असंख्य वर्णरस आ ई गंध फैलैत चलि जाइ दूर खूब दूर पूब दिस ...पूब दिस सहरसा ,पूर्णिया ,कटिहार आ ओहियो सँ आगू जत’ सँ बाबा आनै छथिन लाल-लाल झूमका ......... ओ गीत ओ सपना ...आ ओ जिनगी जुड़ाइत रहै ...जुड़ाइत रहै 3 उदयनाचार्य तऽ नहिये छथिन मुदा आचार्य लोकनि सँ जक-थक गाम इसकूल मे परहैत परहाबैत आचार्य हअर नेने कनहा पर आडि़ तोड़ैत बालि नोचैत आचार्य जजाति काटैत गारियो दैत बँटैया वला अधहा सँ चौथाई बनबैत आचार्य श्राद्ध मे वियाहक ,वियाह मे श्राद्धक उल्टा-पुल्टा मंत्र परहैत भोर पुतौह सांझ भाबौह के चुट्टी काटैत सोहराबैत आचार्य कष्ट काटैत जोगबैत बनबैत बेटा कें परहाबैत पटना दिल्ली नोकरी करत वियाह करब तिजौरी के साफ करैत आचार्य हम हमही बस हमरे टा अछि देखबैत सुनबैत आजुक आचार्य केओ एक-दू श्लोक किताबक नाम एक-दू प्रसंग सही गलत दोहराबैत तेहराबैत आचार्य । 4 चन्दा चूटकी क’ बाउल सीमेंट चूना सूरखी लेपैत एकटा गोर दक्क संगमरमरिया मूर्ति आनि जग जीत लेलकै हम्मर गौंआ मूरती क’ मुंह,आंखि बंद करैत बैसल मुद्रा मे मूरती के शुभ क्षण मे स्थापित करैत एकदम सक्कत सीमेंट सँ ’ हे आचार्य उठब बैसब नइ’ आ दू कुइंटल लोहा क ग्रिल बान्हि ’हे आचार्य निकलब नइ’ आ मूरती क’ हाथ मे एकटा किताब राखि ’ हे आचार्य दोसर पोथी नइ मांगब ‘ आ मूर्तिस्थापना क बरखी मनबैत ’ हे आचार्य आन दिन यादि नइ करब’ एक लाख ईंटा सँ बाउंडरी बान्हि ’हे आचार्य एमहर ओमहर बौएनए बंद करू’ 5 हे महाकवि यात्री एक दिन हमरो गाम आबू बैसू एक पहिर रूकू कनेक काल बतियाउ राति भरि वैह बेनीपुर ,बहेड़ी टपैत बरियाही घाट पार करैत दू कोसक चौरस हरियरी मे डूबल मिथिलाक ऐ भूखंड के थाहैत पहुंचू हमर गाम जत’ सूतल हजार बरिख सँ एकटा महावृद्ध । आबिते बात सुनिते अहांके बूढ़बाक हजार बरिस पुरान हड्डी मे फूटि उठतै नवपल्लव मिथिलाक भूगोल मे फैलल ओकर छाउर सांद्रित भ’ धनधान्य सँ भरि जेतै गामक आम मौह गाब’ लागतै मधुर संगीत मज्जर टिकुला ऐंठतै कोयली क’ कान ओहुना विद्यापतिनगर ,चौमथा ,झमोटिया क’ यात्री एक कोस पश्चिमे सँ बदलैत बाट बचैत करियनक झिकुटी सँ बनाबैत सुगम सुविधासंपन्न यात्रा मुदा देखिते अहांके बूढ़बा यादि कर’ लागतै ओ महायात्रा आ समाज ,इतिहासक ओ क्षण धर्मदर्शन मे लपटल ओ कालखंड यद्यपि अहांक विचार अलग आ बूढ़बो एकदम अलग तैयो ई भेंट सधारण नइ हेतै सधारण नइ...... 6 भगवान जगन्नाथक ऐश्वर्य के ललकारैत ई गाम डूबि रहल अपन छोटपन मे संस्कृत बूझबा सूझबा बाजबा बतियेबाक अहंकार आ अहंकार क’ कतेको वृत्त ठोप चंदने तक रूकल ठमकल किछु वृत्त एक-दोसर मे घुसियाइत नोकरी ,कुल ,जमीन ,पैसा आ बुद्धिक वृत्त आ सब घर मे एकटा मास्टर हेबाक दस सँ पांच तक पढ़ेबा आ नइ पढ़ेबाक ओतबे पुरस्कार महीने महीने दरमाहा उठेबा आ एकटा लिमिटेड दुनिया मे रहबाक खतरनाक संस्कार तहिना पूजापाठ ,गपशप ,दैनंदिनी नव-नव अहंकार गाम के घेरि रहल के कत्त’ कमाए छैक सरकारी आ बिन सरकारी एक नम्मर आ दू नम्मर बाउग कम काटए क’ बेशी हूनर बैंक मे अस्पताल मे ठीकेदारी सँ चोरि छिनरपन सँ...... गामक अहंकार त’ वैह छैक बस ओकर हुलिये बदललै आ वौआ जत’ रहै छें जे करै छें बस कमाइत रह आ अहंकारे संग बढ़बैत रह खोपड़ी सँ खपड़ा एकचरिया पक्का दूमहला तीनमहला ,चरिमहला....... (इप्सिता सारंगीक ओड़िया कविता “गप”, ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद इप्सिता सारंगी द्वारा आ अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) इप्सिता सारंगी (१९७५- )क दूटा ओड़िया कविता संग्रह पक्षी फेरिनी आ फेरिबा कथा प्रकाशित छन्हि। नहरिक थरथड़ाइत पाइनसँ एकटा नान्हि सन बुच्ची बहराइए थलथल कजरी सन। धरातलपर सूर्य अदहा झाँपल किरिणक बीच सुखाइए कजरी छोट कोट सन भऽ जाइए; स्वप्न- एकटा छोट राजकुमार अबैए एकटङा छरपान दैत हर्षित लैत ओकर हाथ अपन हाथमे खाली ओइ कोट लेल। ओ औंठा आकारक छोट राजकुमारी खोलैए अपन छोट बाकस, ओइ बुच्चीक ठोढ़पर प्रेमपूर्ण मुस्की दैत बिलाइए ओ। एकबेर ओ छोटकी बुच्ची खसैए नहरिमे भीजल फराक आँखि- भरल नोरसँ घोकचल; सीढ़ीसँ ओइ बुच्चीक पनिसोखा सन नोर बहार भेल औंठा आकारक छोट राजकुमार अपन मोलायम तरहत्थीक संग ओकर गाल आस्ते-आस्ते मीड़ैत अछि। ओकर नोरक रंगल बुलबुल्ला बिछि लैत आंगुर सभमे। .सूर्य ओकरा सभकेँ उधियाबैत; ओइ रंग सभकेँ राइतमे पसारैत ई रहए पिरौंछ भोरमे। ओ छोट बुच्ची अगिला भोर देखलक ओ नहरि- सुखा गेल, मुदा कजरी- अखनो अछि जिबैत ओइ छोटकी बुच्चीक बाट तकैत, आकि ओइ राजकुमारक? जिबैत टटका स्वप्न जकाँ तुरत्ते बहार होइत पिपनीसँ। नन्द विलास राय मानवता आनक गलती निङहारब ई नीक काज नै कखनो काल अपनो मुँह एेनामे निङहारल करू जौं दानवसँ मानव बनबाक अछि मानवबला कर्त्तव्य िनभाएल करू। जीत केर खुशीमे सभ रहैत अछि मगन हारिक दुखीमे अहाँ मुस्कुराएल करू दोसरक खुशी देखि जड़ी छी किएक देखि दोसरक तरक्की मरै छी किएक हएत केना अप्पन तरक्की विचारल करू की लऽ दुनियाँमे एलौं की लऽ कऽ दुनियाँसँ जाएब फेर एना किएक करै छी राति-दिन बाप-बाप ढौआ कमाबए लेल केलौं कतेक पाप जौं पापसँ मुक्ति चाहै छी अहाँ गरीब-गुरबापर अन्न-धन लुटाएल करू दोसरक खुशी लेल जौं जीत कऽ हारि सकी आनक बचेबाक खातीर घर अपन जाड़ि सकी धरतीपर केना मानवता जीबैत रहत अपना भरि अहाँ जुक्ती लगाएल करू अपना लेल तँ सभ जीबैत अछि अनका लेल जौं अहाँ जी सकी आनक उपकार खातीर जौं जहर पीब सकी मरियो कऽ केना लोक भऽ जाइत अछि अमर अहू गप्पपर थोड़ैक माथ लगाएल करू आनक गलती निङारब ई नीक काज नै कखनो काल अपनो मुँह ऐना निङहारल करू। शिक्षित बेरोजगार हम शिक्षित बेरोजगार छी परिवारपर बनल भार छी गौआँ समाजक लेल बेकार छी हम शिक्षित बेरोजगार छी बाबू हमरेपर भाषण झाड़ै छथि गप्पसँ हमरा मारै छथि हम मने-मन भनभनाइत छी गप्प मारि खाइ छी। हमर कनियाेँ हमरासँ रूसल अछि ओ कहै अछि हम कपारे फूटल अछि। की एक गद्दी सेनुरो देलौं जहियासँ गौना भऽ अहाँ घर एलौं की तेलौ सावुन अहाँकेँ हमरा लेल जुमैत अछि। की कहँू भाय लोकनि हमरा तँ किछु ने फुड़ैत अछि। कोड़ाक मारिसँ बेसी चोट लगैत अछि कनियाँक बातक हमरा के पतियाएत अपन दुख हम कहियौ ककरा कनियाँक बापो अपन बेटी हमरासँ बियाहि पचताइत अछि दिल्ली पंजाब पठेबाक लेल हमर माथ खाइत अछि। अाब नै गूजर हएत हमरा गाममे चलि जाएब दिल्ली आइये साँझमे ओतए करब कोनो काम ढौआ कमा, लाएब गाम। दमन कुमार झा एकरा की कहबै...........? १. अहाँक नजरि कतौ शून्य दिस तकैत बिना कोनो प्रयोजनकें जोरसं हँसैत हाथक चूड़ी एखन हरदम खनकैत पैरक नूपुर बिन प्रयोजने झनकैत बिना कोनो उत्सबकें लटकें सीटैत माथक बिन्दियाकें दर्पण हेरैत एकरा की कहबै ........? २. वर्षा भेला पर निंद उड़ि गेनाइ बिजली चमकला पर सर्द भ’ गेनाइ बेंगक टरटरी सं व्याकुल भेनाइ मोरक स्मरण सं छटपट केनाइ गीतक कोनो तान सुनि चंचल भेनाइ कनियो कोनो आहट सुनि पुलकित भेनाइ एकरा की कहबै .......? नारायण झा सम्मान हे जगदीश, एहेन दिन देखलौं ऐ मण्डल बीच, मण्डल पद पएलौं आरंभ कएल लेखन ऐ रहुआ धरतीसँ पहिल कथा संग्रह, गामक जिनगीक कथासँ रचना रसधार पटा जेना गंगा जट्टासँ सुवास गमकैछ कथा, नाटक, उपन्याससँ। हे युगपुरुष, टैगोर पुरस्कार पएलौं रहुआवासीक संग पारसमणि पुस्ताकलयक नयना जुड़ेलौं। अहाँक विविध विधा, जेना पसरल तरेगन जीवनक उत्थान-पतनसँ जीवन-मरण संग इन्द्रधनुषी अकास देखैत छी राति-दिन आँजुरि भरि अछि पंचवटी, गीतांजलि नीमन अपनेक लेखनी बढ़ि अकास चढ़हय सदिखन। हे जगदीश एहेन दिन देखलौं ऐ मण्डल बीच, मण्डल पएलौं।। रहुआ संग्राम कविता- कुर्त्ता उजरे, पैजामा उजरे। कान्ह्पर गमछा उजरे दलाने-दलाने छातथि अगबे गप। करथि वादा हुनकासँ लप्परक-पल दौग-दौग सभ नेना मांगैत छन्हिम पर्चा बाटेमे नै लगैत छैक कोनो खर्चा। की हौ मुखिया काका, की हेतै हाल मुर्गा बोतल की करतै एहुबरे कमाल। अहुँ सुनबै, तहुँ सुनहक एकर जर्जर हाल देखहक। अनाज, किरासन, इंदिरा आवास जरूर भेटतैक राखह बिसवास। ई गप मारि फटकबाक छै कोनो की करबाक छै। समाजक सेवा परम सेवा दिन-दिन भेटतैक एकर मेबा। कुर्त्ता उजरे, पैजामा उजरे कान्ह् परक गमछा उजरे।। मिथिला राज्यक आह्वान करू आंदोलन बनाऊ राज मिथिला जमि कऽ बनाऊ राज मिथिला। मिथिला थिक मिथिलावासीक करेज राखक अछि एकरा सभकेँ सहेजि। हाथ जोड़ैक समए बीत गेल अधिकार हथियेबामे देरी भऽ गेल। जनकक संग सीताक खा कऽ सप्पत सघर्ष सदिखन राखब तखनहि भेटत। आलस, भुख-पियास छोड़ि कऽ राति-दिनक संघर्ष कऽ। दिन-रातिक परिश्रम कऽ बजाउ घंटा तखने बाजत मिथिला राज बनबाक डंडा। अप्पन राज्यक अप्पन संस्कार अनुकरणीय होएत संसार। दिग-दिगंत पताखा फहरा सकैत अछि सफलताक बीआ बूना सकैत अछि। सम्पूर्ण मिथिलावासी होएताह आत्मनिर्भर सपनोंमे नै रहए पड़त ककरो पड़ िनर्भर। करू आंदोलन बनाऊ राज मिथिला जमि कऽ बनाऊ राज मिथिला। बेचन ठाकुर कविता वनभोज सगर राति वनभोज भऽ गेल मिथिलांचल छोड़ि दिल्ली चलि गेल। साहित्य. अपमान भऽ गेल, कथा गोष्ठी़क किल्लीऽ तोड़ि देल। हरिनक गवाही सुग्गर देल दुनू पड़ा कऽ जंगल गेल। जंगलमे मंगल भेल। हिस्सेऽदारक हिस्सा कटि गेल। जे भेल से नीके भेल, जेना रमायण महाभारत भेल। बुधिमे बियाधि भऽ गेल, कएल-धाएल पानिमे चलि गेल। रमेश मण्डल गाम- िनर्मली पोस्ट- िनर्मली वार्ड नं. 08 थाना- िनर्मली, जिला- सुपौल संप्रति- व्याख्याता (अंग्रेजी विभाग), अशर्फी दास, साहु-समाज इण्टर महिला महाविद्यालय- िनर्मली, सुपौल, मिथिला-बिहार। ई छथि स्कूल प्राइवेट ट्यूटर नन्हिटा स्कूलक दुनियाँमे रहैत अछि ई प्राईवेट ट्यूटर हँसैत पान चिबबैत दैत अछि ओ लेक्चर ओ समझैए ऐसँ पैघ नै ई दुनियाँ परंच सच ई अछि हिनकासँ बेसी कमाइए एकटा धुनिया किछु तँ घरक खर्ची काटि कऽ रहैत अछि मेन्टीनेन्समे प्रणाम सर सुनि कऽ बहकैत अछि सेन्टीमेंटमे ओ कहैत अछि हमरासँ नीक अछि कियो ऐ गाममे परंच सच्चाइ ई चट्टियो नै अछि हिनकर पएरमे अतेक कठिनाइ केर बादो ई स्कूल नै छोड़ता हिटलर जकाँ प्राचार्यक आगाँ हाथ ई जोड़ि बजताह- ट्यूशन मिलैक ई स्कूल अछि संगम बेतन अगर डेढ़ सए रूपैया अछि तैयो एक्को रत्ती ने गम कम बेतन पाबि हम सन्तुष्ट हो लेब सिर्फ दूटा ट्यूशन पकड़ा दिऔ केनाहितो जीब लेब हिटलर जकाँ प्राचार्य हिनका मनमानीसँ जोतैत कखनो ओ कार्यालयमे रखैत तँ कखनो ओ सब्जी अनबाक लेल पठबैत मिलब अहाँसँ फुसलाएब अहाँकेँ कि बच्चा दिअ हमरा विद्यालयमे अवश्य एकर संख्या बढ़त तँ खरिदब एक स्कूल बस एतै रहि प्राचार्यक जी-हजूरी करब अगर विचार नै मिलत तँ नबका स्कूल खोलब हिनक नारा अछि- अहाँ बच्चाकेँ स्वस्थ नागरीक बना देब मुदा हिनक पढ़ाओल बच्चा चाह-पान बेचैत नजर आऔत अंतमे रमेश सर अपन नसीहत भूल भऽ प्राइवेट ट्यूटर नै बनब नारियल बेचि लेब मजासँ रहब प्राइवेट ट्यूटरक ई दर्दनाक कहानी आ कतेक सच्ची कतेक सुहानी सोनू कुमार झा ‘रश्मि’, द्वारा –श्री विमल कुमार झा, ग्राम- हरिनगर ,पो.—रघुनीदेहट, जिला –मधुबनी . बिहार कविता संतुलन धरती पर पयर धरवा सं पहिने मुक्त हवामे साँस लेवासं पहिने अपन आँखिए किछु देखवासं पहिने मारल जाइत छी जन्म लेवा सं पहिने शो़कक लहरि पसरि जाइत अछि जाहि घर जन्म लैत छी कयल जाइत अछि जन्मे सं कुभेला सभक नजरिसं अबडेरल जाइत छी सभ दिन रहलहुं हम आगू भेटल जखन मौका हमरा तखन कियेक करइ छी हमरा संग अन्याय रोकै छी कियेक अयबा सं हमरा अछि प्रश्न ओहि मायसं हमरा कहबैत छथि जे एक्कैसम सदीक नारी उडितहु कोना आकाशमे माय जं गर्भमे दितथि मारि अछि हमर एकटा अर्जी नहि रोकू धरती पर अयवासं टूटि जायत सृष्टिक संतुलन केवल हमरेटा मरला सं किशन कारीगर मुखिया जी देथहिन (हास्य कविता)
बेमतलब के कोनो काज राज करैत छि हम त कहब एक्को टा खरहो ने खोंटू अहाँ हुनका वोट द दिऔन सब किछु त मुखिया जी देथहिन.
जबनका के बिरधा पिलसिन बुढ़बा सब के जबनका पिलसिन व्यर्थ समय गमाऊ त बेकारी पिलसिन सभटा पिलसिन त मुखिया जी देथहिन.
डिग्री डिप्लोमा नहि अछि तै सँ की ? आब पढाई लिखाई एकदम नहि करू हरदम हुनके संपर्क में रहू शिक्षामित्र के नोकरी त मुखिया जी देथहिन.
सरकारी खरांत हाई रे पंचायती राज आब रही नहि गेल कोनो काज राज बिरधा पेसन पास कराऊ कामिसन खाऊ रुप्पैयाक बंदरबांट त मुखिया जी करथिन.
ईंटाघर वाला के इंदिरा आवास टूटलाहा घर वाला के लागल तरास भुखले मरी जायब त बी. प. एल. अन्तोदय योजना में फेल भेलौहं की पास ?
अप्पन काज राज छोडि के ब्लोकक चक्कर लगाऊ मुखिया जी त भेंट भए जेताह चाहो पान के खर्च त उहे देथहिन.
कमाए खटाए के अहाँ करब की ? फुसियाँहिक हर कियक जोतब बँटा रहल अछि सरकारी खरांत अहाँ दौगल जाउ बाद में हमरा नहि टोकब.
मंगनी के चाउर दाइल सँ पेट भरी जायत कहियो भुखले नहि अहाँ मरब कोई ने अहाँ के टोके मुखिया जी ओ.के. मुखीये जी के कहल टा अहाँ करब.
राहत पैकेज के हेरा फेरी केलन्हि आब आंखि हुनकर चोन्हरेलैंह सरकारी लिस्ट में अहींक नाम टा अछि ओई पर साइन त मुखिया जी करथिहीन. पदक दुरूपयोग (हास्य कविता)
फेर भेटत नहि एहेन सुयोग अपना स्वार्थ द्वारे कानून बनाऊ-तोरू मनमर्जी सँ करू ओकर उपयोग अहाँ करू अपना पद के दुरूपयोग
सत्ताक कुर्सी पर बैसल छि अहाँ कोनो समस्या देखैत छि कहाँ मोन मोताबिक सी.बी.आइ के करू उपयोग अहाँ करू अपना पद के दुरूपयोग !
अरब-खरब घोटाला करू मुदा दाँत चिआरैत तिहर जेल सँ निकलू फेर मंत्री पद हथिआउ आ घोटाला करू सरकारी खजाना सुडाह क बैसू !
सत्ता कुर्सी आ सरकारी धन जन्मजात अहाँक बपौती छि अहाँ करू एककर खूब उपयोग करू अपना पद के दुरूपयोग
मूलभूत समस्याक समाधान किएक करब ? एही सँ किछु ने होयत ताहि दुआरे एहने योजना बनाऊ जाही सँ अहाँ अप्पन जेबी टा भरब
करू अन्याय मुदा बर्दी चमकाऊ अपनों घुस खाऊ नेताजी के सेहो खुआउ डरे कियो किछु बाजत कोना दमनकारी नीति अहाँ अपनाऊ
न्यायक कुर्सी बिका गेल देशक रक्षक बनी गेल भक्षक कागजी पन्ना पर आर्थिक योजना आम आदमीक कष्ट बुजहब कोना
मंत्री छि लालाबती गाड़ी में घूमूं जनताक खोज खबरि एकदम नहि करू एक्के बेर आब अगिला इलेक्शन में भोंट दुआरे जनता के मुहं देखू
दंगा फसाद अहींक इशारा पर पहिने सँ फिक्स भेल अछि वोट बैंक पोलिसी के करू उपयोग अहाँ करू अपना पद के दुरूपयोग !! अगिला अंक मे छपत रचना भेटल अहाँ के मुदा अगिला अंक मे ओ छपत बेसी फोन फान करब त फुसयाँहिक आश्वासन टा भेटत।
अहाँ के लिखल कहाँ होइए तयइो हमरा अहाँ तंग करैत छी हमरा त लिखैत लिखैत आँखि चोन्हराएल अहाँक रचना हम स्तरीय कहाँ देखैत छी।
रचना कोना क स्तरीय हेतैय सेहो त फरिछा के अहाँ किएक नहि कहैत छी हम रचना पर रचना पठबैत छी मुदा अहाँ त कोनो प्रत्युतरो ने दैत छी।
हम त कहलहुँ अहाँ के लिखल ने होइए नवसिखुआ के ने लिखबाक ढ़ग अछि कोनो पत्रिका में त छैपिए जाएत इहए टा एकटा भ्रम अछि।
ई भ्रम नहि सच्चाई थिक नवसिखुओ एक दिन नीक लिखत नहि छपबाक अछि त नहि छापू लिखनाहर के कतेक दिन के रोकत।
संपादक छी हम अहाँ की कए लेब मोन होएत त नहि त नै छापब बेसी बाजब त कहि दैत छी अहाँ के कनि दिन और टरकाएब।
रचना नुकाउ आ की हमरा टरकाऊ आँखि तरेरू अहाँ खूम खिसियाऊ कारीगर ने अछि डरैए वला किएक ने अहाँ पंचैती बैसाउ।
हे यौ वरीय रचनाकार महोदय पहिने अहुँ त नवसिखुए रही आ कि एक्के आध टा रचना लिखी समकालीन सर्वश्रेष्ठ बनि गेल रही।
सच गप सुनि अहाँ के तामस उठत तहि दुआरे किछु ने कहब कविता हम लिखब आश्वासन भेटिए गेल त आब की ओ त अगिला अंक मे छपत। एना किए ई की? हास्य कविता
एक्के कोइख सँ जनमल दुनू बेटा के डाक्टरी इंजीनियरिंग कराऊ मुदा बेटी के संस्कृते सँ मध्यमा कराऊ एहेन बेईमानी ऐना किएक ई की ?
दूल्हा अहाँ गरम-गरम खीर खाऊ अप्पन सुखलाहा देह के फुलाऊ दुल्हिन भुखले सन्ठी जेंका सुखाऊ ओकरा ने अहाँ सब पढाऊ-लिखाऊ ||
बेटी के पढ़ा लिखा के करब की ? ओकरा त चूल्हे फूकै लेल कहैत छी मुदा बेटा के पढ़ा लिखा के दाम दिग्गर में रुपैया खूब गनबैत छी ||
हाय रे नारा लगौनिहार सभ कागजी पन्ना पर बेटा बेटी एक समान मुदा असलियत में बेटा तों स्कूल जो बेटी तों भनसा-भात के कर ओरीयान ||
दुनू त अहींक संतान छी फेर एहेन बेईमानी ई की? बेटियों के पढ़ा लिखा मनूख बनाऊ अहाँ ओकरो त शिक्षित प्रशिक्षित बनाऊ ||
बेटा के पढबय के खर्चा अहाँ बेटीवाला सँ वसूल करैत छी हाय रे दहेज़ लोभी दलाल अहाँ के तैयो संतोख नहि भेल ई की ?
सामाजिक विकास लेल कही लेल "कारीगर" मुदा अहाँ इ गप किएक नहि बुझहैत छी समाज सँ पैघ अहाँक अप्पन स्वार्थ एहेन जुलुम ऐना किएक ई की ?
रुपैया गनै सँ नीक त ई जे बेटी के शिक्षित बनाऊ नहि गनाब रुपैया आ नहि केकरो सँ गनायब एखने सभ गोटे मिली सप्पत खाऊ ||
समाज आगू बढ़त त उन्नति होयत ई गप अहाँ किएक नहि बुझहैत छी आबो संकीर्ण सोच बदलू एही सँ बेसी फरिछा के "कारीगर" कहत की ? करीक्का रूपैया। (हास्य कविता) नेहोरा करैत करैत मरि गेल कारीगर नहि लियअ आ ने दियअ करीक्का रूपैया मुदा ई की कोनो काज करेबाक अछि त कहल जायत जल्दी लाउ करीक्का रूपैया। मौका भेटला पर सरकारी बाबू नहि छोड़त रूपैया बिन एक्को टा काज ने होएत अहाँ फायल ल व्यर्थ घूमैत छी यौ भैया काज करेबाक अछि त जल्दी लाउ करीक्का रूपैया।। कहलहुँ त स्वीस बैंक मे खाता खोलाएब चुपेचाप पार्टी ऑफिस मे चंदा जमा कराएब जीबैत जिनगी हम अप्पन मुर्ती बनाएब मोन होएत त विदेश यात्रा पर जाएब।। कतबो हल्ला करब तै स की स्वीस बैंक मे जमा रहत करबै की लुटा रहल अछि सरकारी खजाना अहुँ लुटु हमहुँ लुटैत छी जमा करू करीक्का रूपैया।। भ्रष्टाचाराक ढे़रीऔलहा संपति हमरे छी एहि दुआरे पक्ष-विपक्ष मे झगरा भेल औ भैया एक दोसराक मुँह पर करीक्का स्याही फेकलक राजनैतिक घमासान मचा देलक करीक्का रूपैया।। रामलीला मैदान मे जनआंदोलन भेल लोकपाल पर कोनो ठोस कारवाई ने भेल सरकार फोंफ काटि रहल अछि बुझलहुँ की साफ सुथरा लोकपाल कहियो आउत ने।। भ्रष्टाचार मे खूम नाम कमेलहुँ मुदा तइयो संतोष नहि भेल औ भैया भ्रष्टाचाराक रोटी खा देह फुलाउ संपैत ढ़ेरियाउ अहाँ जमा करू करीक्का रूपैया।। दुनियाक सभ सँ नमहर लोकतंत्र मे कुर्सी हथिएबाक होड़ मचल अछि अहाँ जुनि पछुआउ गठजोड़ करू यौ भैया चुपेचाप अहाँ जमा करू करीक्का रूपैया।। हल्ला-गुल्ला करने किछ काज ने होएत बिना किछ लेने-देने फायल ने घुसकत ईमानदारी स किछो नहि तकैत की छी जल्दी जेबी गरम करू लाउ अहाँ करीक्का रूपैया।। कपिलेश्वर राउत कविता- माइक ओद्रमे जे भाषा सिखलक परदेश जा सभ विसरलक। गाम आबि काहे-कुहे बजैए समाज कहैत आब बड्ड बुझैए। पढ़ल लिखल आर विगारलक बाल बच्चाकेँ कनभेन्ट धरेलक। चालि-ढालि अंग्रेजिया पकड़ि मातृभाषाकेँ खिल्ली उड़ौलक। अप्पन भाषा बिसरि बहरबैया भाषा अपनौलक। अहाँ मैथिलीकेँ केना आगू केलौं अपने तँ गेबे केलौं बच्चोकेँ भसिएलौं। जेतबो इज्जत गौआँ दइए परदेशी ओकरा थकुचैए। गौआँ-घरूआ मैथिली जियाबए परदेशिया बाहर भगाबए। कनिये अंग्रेजिया जोर लगबिऔ मैथिलीकेँ आगाँ देखबिऔ। जनक आ सीताक भाषा अपनाउ कर्म छोड़ू नै अपनाकेँ बनाउ। विद्यापति आ यात्री कहि गेला मण्डन आ अयाची कर्म वीर भेला। अप्पन भाषा सभ जन मिठ्ठा एकरा नै बुझू हँसी ठठ्ठा। मंगलेश डबराल- हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल मंगलेश डबराल- हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल मंगलेश डबराल- हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल बेर-बेर कहैत छलौं हम
जोर सं नहि मुदा बेरे-बेर कहैत छलहुं हम अप्पन गप ओकर सभटा दुर्बलताक संग कोनो उम्मीद मे बताबैत छलहुं निराशा विश्वास व्यक्त करैत छलहुं बिना आत्मविश्वासक लिखैत आ काटैत जाइत छलहुं ई वाक्य जे चीज अप्पन सबसे खराब दौर सं गुजरि रहल अछि बिखरल कागज के संभारैत छलहुं धुरा पौछैत छलहुं उलटैक-पलटैत छलहुं किछु क्रिया के अहिने जेना भेल, होयत रहल ऐना हेबाक चाहि, भऽ सकैत छल हेतियै ते की हेतियै।
(1994 मे रचित) --------- दिल्ली मे एकटा दिन
ओहि छोट सन शहर मे एकटा भोर वा सांझ वा कोनो छुट्टिक दिन हम देखलहुं गाछक जड़ मजबूत सं धरती के पकड़ल रहैत हवा छल जेकर चलहि सं आबो एकटा रहस्य बचल छल सुनसान सड़क पर एकाएक कियो प्रकट भऽ सकैत छल आबि सकैत छल कोनो दोस्तक आवाज कनि कालक बाद अहि छोट सन शहर मे आयलहुं शोर कालिख पसीना आ लालचक पैग शहर।
(1994 मे रचित) भोथिआएल शहरक पेशाबघर आ आर जानल-चिन्हल ठाम मे ओ भोथिआएल लोकक तकै बला पोस्टर एखनो साटल लखाह दैत अछि जे कतेको बरख पहिने दस-बारह बरखक उम्र मे बिना बतेने घरसँ निकलि गेल छल पोस्टरक मुताबिक ओकर लम्बाइ मझौला छै रंग गोर नै पिण्डश्याम छै हवाइ चट्टी पहिरले छै चेहरा पर कोनो चोटक निशान छै आ ओकर माय ओकरा बिना कानैत रहैत छै पोस्टरक अंत मे ई आश्वासन सेहो रहैत छै जे हरायल केँ खबर दै बला केँ भेटत यथासंभव उचित इनाम तखनो ओ केकरो चिन्हऽ मे नै आबैत छै पोस्ट मे छपल झलफल फोटोसँ ओकर बगेबानी नै मिलैत छै ओकर शुरुबला उदासी पर आब कष्ट झेलब बला ताव छै शहरक मौसमक हिसाबसँ बदलैत गेल अछि ओकर चेहरा कम खाएत, कम सुतत/ कम बाजैत लगातार अप्पन ठाम बदलैत सरल आ कठिन दिवस केँ एक जना बिताबैत आब ओ एकटा दोसर दुनिया मे अछि किछु कुतूहलक संग अप्पन गुमशुदगीक पोस्टर देखैत जकरा ओकर माता-पिता अखन धरि छपवाबैत रहैत छै जइ मे आबो दस वा बारह लिखल रहैत अछि ओकर उम्र। रचनाकाल: 1993 अभिनय एकटा गहीर आत्मविश्वाससं भरि कऽ भोरे निकलि जाइत छी घरसँ जइसँ दिन भरि आश्वस्त रहि सकी एकटा लोक सँ भेंट करैत मुस्काइत छी ओ एकाएक देखि लैत अछि हमर मिज्झर मन एकटासँ चटसँ हाथ मिलाबैत छी ओ बुझि लैत अछि जे हम भीतरसँ छी मिज्झर एकटा सखाक आगू चुप बैसि जाइ छी ओ कहैत अछि जे अहां दुब्बर-रोगियाहा सन लखाह दऽ रहल छी जे हमरा कहियो घरमे नै देखने छल ओ कहैत अछि जे आइ अहाँकेँ टीवी पर देखने छलहुँ एकदिन बाजारमे घुमैत छी निश्शब्द डिब्बामे बंद भऽ रहल अछि पूरा देश सम्पूर्ण जीवन बिकाबैक लेल एकटा नब रंगीन पोथी अछि जे हमर कविताक विरोध मे आएल अछि जइमे छपल सुन्नर चेहरामे कोनो कष्ट नै ठाम-ठाम नृत्यक मुद्रा अछि विचारक बदलामे हेयौ एकटा पूरा फिल्म अछि लम्बा अहाँ कीन लिअ आ खूब आनंद उठाउ शेष जे किछु अछि अभिनयक चारू कात शोर आबि रहल अछि मेकअप बदलहिक काल नै अछि हत्यारा एकटा नेनाक कपडा पहिनि कऽ आबि गेल छल ओ जकरा अपना पर घमंड छल एकटा खुशामदक आवाज मे गिडगिडा रहल छल ट्रेजडी अछि संक्षिप्त नम्हर प्रहसन सभ चाहैत अछि कोन तरहे छीन ली सभसँ नीक अभिनेताक पुरस्कार । किछु कालक लेल
किछु कालक लेल हम कवि छलहुं फाटल-पुरान कविताक मरम्मति करैत सोचैत कविताक जरूरत केकरा अछि किछु काल पहिने पिता छलहुं अप्पने नेना सबहक लेल बेसी सरल शब्द केँ खोजैत कखनो अपनो पिताक नकल छलहुं कखनो अप्पन पुरखाक परछार्इं किछु कालक लेल नौकर छलहुं सतर्क सहमैत बचल रहए रोजी-रोटी कहैत
किछु काल हम अन्यायक विरोध केलहुं फेर ओकरा सहैक तागति जुटैलहुं हम सोचलहुं जे हम अहि शब्दकेँ नै लिखब जइ मे हमर आत्मा नै अछि जे आतताइक अछि आर जइ मे खून जेहन टपकैत अछि किछु काल मे एकटा छोट सन खधाइ मे खसलहुं ई हमर मानवीय पतन छल
हम देखलहुं जे हम बचल छी आर सांस लऽ रहल छी आर हम क्रूरता नै करैत छी मुदा जे निर्भय भेल क्रूरता करैत जाइत अछि ओकर विरूद्ध हमर घृणा बचल अछि, यएह बड़का गप अछि
बचल खुचल कालकेँ लऽ कऽ हमर विचार अछि मनुख केँ छह आ सात घंटा सुतैक चाही भोर हम जागलहुं तँ यएह एकटा जानल-चिन्हल भयानक दुनिया मे फेर सं जन्म लेबाक छल यएह सोचलहुं हम किछु काल धरि।
रचनाकाल: १९९२ घर शांत अछि
रौद भीत केँ रकमे-रकम तपा रहल अछि लगे मे एकटा मद्धिम आँच अछि बिछौना पर एकटा गेंद पड़ल अछि पोथी चुपचाप अछि मुदा ओकरामे कतेक रास बिपैत बंद अछि
हम अधजागल छी आर अधसुतल छी अधसुतल छी आर अधजागल छी बाहरसँ आबै बला शोरमे केकरो कानैक शोर नै अछि केकरो धमकाबैक वा डरैक शोर नै अछि नै कियो प्रार्थना कऽ रहल अछि नै कियो भीख मांगि रहल अछि
आ हमर भीतर कनियो टा मैल नै अछि मुदा एकटा परछायल ठाम अछि जतय कियो रहि सकैत अछि आ हम लाचार नै छी ऐ काल मुदा भरल छी एकटा जरूरी वेदनासँ आ हमरा मोन पड़ि रहल अछि नेना कालक घर जकर अंगनामे चितंग भऽ हम पीठ पर धूप तापैत रही
हम दुनियासँ किछु नै मांगि रहल छी हम जी सकैत छी लुक्खी, गेंद वा घास सन कोनो जिनगी हमरा चिंता नै कहिया कियो झठहासँ हिलाकऽ ढाहि देतै ऐ शांत घरकेँ।
(रचनाकाल : 1990) स्व. लल्लन प्रसाद ठाकुर "हे रे चन्दा" हे रे चन्दा लेने जो सनेस पिया परदेश रे......... .चन्दा....। तोहें ने उगै छ आन्हर राति बिसरल रहै छी पिया केर पांति तोंहे जाँ उगै छ दीया बाती दीया बाती होइये मोन मे कलेश रे .......... .चन्दा...... । हम्मर दुःख केयो ने बुझैया कोना ओ रहै छथि केयो ने कहैया कहियौन्ह विकल छैन्ह हुनकर दासी हुनकर दासी रुसल किए छथि महेश रे ........... चन्दा....... । पांति हुनके आजु गाबय छी छवि में हुनके लीन रहय छी धैर्य नहि आब बसल उदासी बसल उदासी नहि अछि कोनो उदेश रे.............. .चन्दा रे.......... बहुत जतन सँ ह्रदय के बुझेलहुं नहि दोसर के हम किछु कहलहुं आस बनल अछि नहि हम बिसरि नहि हम बिसरि चाहि एतबहि, नय किछुओ बिशेष रे....... ..चन्दा जहिया मँगलहुं एतबे मँगलहुं सँग रही बस एतबे चाहलहुं जनम भरक दुःख कही केकरा सँ कही केकरा सँ गेलैथ ओ एहेन बिदेश रे.................. .चन्दा शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ कविता- सगर राति दीप जरय- राति माने कारी पहर गत्र-गत्र शांत जीव अजीव आक्रांत रजनीक लीलासँ क्षणिक बचबाक लेल लोक जरबैछ दीप सभ्यताक विकासक संग-संग मनुक्ख चेतनशील होइत गेल पहिने इजोतक लेल... खर-पुआर जारनि लत्ता नूआ फट्टा सूत छोड़ि रूइयाक बाती ढिबड़ीक बदला लेम्प बहकैत रोशनीमे गबैत पराती बुिधक विकास भेल... विद्युत तरंगमे गैसक उमंगमे विज्ञानक जय भऽ गेल... सभ ठाम इजोत मुदा! वैदेहीक घर अन्हार मात्र लिखते रहब ककरोसँ नै कहब के बूझत कथाक विकास ककरो नै छल आभास दधीचि बनि साङह लेने आबि गेलनि मैथिली कथा जगतमे प्रभास सुरुज दिन भरि अपन करेजकेँ जड़ा कऽ नै मेटा सकल ऐ वसुन्धरापर सँ विगलित मानुषक प्रवृत्ति प्रभास दीप बारि अपन करूआरि सम्हारि कथा सागरक जमल तरंगमे दिअ लगलनि हिलकोर... समाज जागत- ई छल विश्वास मुदा नै आदि भेटलनि नै भेटलनि छोर... किनछेरिपर अपस्यिात कथाकार लऽ लेलनि िनर्वाण जागरणक आशामे कहियो तँ सुखतनि वैदेहीक झहरैत नोर... चलि गेला अभिलाषा लेने उत्तराधिकारी सभ खेलाइत छथि अट्ठा बज्जर करिया-झुम्मरि उद्यत छथि अधिकार हरबाक लेल पाग पहिरबाक लेल सगर राति दीप जरय... रमण-विभूति गेरुआ गर लगौने छथि महेन्द्र मसनद पजिऔने छथि समालोचक- उद्घोषक सूतय मात्र वाचक मंच चिकरय... कहैत छथि बुढ़ छी तखन गोष्ठीमे आबि नाटक करबाक कोन प्रयोजन? दीप बारि दुआरि नै जराउ जे जगदीश जागल रहत ओकर गामक जिनगी के सुनत? ओ अछि समाजक कात कहियो होमए देब ओकर साहित्य साधनाक प्रभात किएक तँ ओ थिक वेमात्र जइ माटिक अन्हारकेँ सुरुज नै हटा सकल ओ केना हटत माटिक दीपक बल...? जौं दृष्टिकोणमे रहत छल तँ विवेक केना िनर्मल? ओइ कठकोंकारि सबहक बीच मैथिली छथि दुबकल सगर राति दीप जरय अन्हार घर संस्कार सड़य कथासँ केना पारस िनकसय...? कमल मोहन चुन्नू गजल 1 कगनीए पर नाह लगैए, बाजू नहि? आङ-समाङक धाह लगैए, बाजू नहि? मोसि-कलम-कागत धेने परोपट्टामे, एक्कहु नहि पुरखाह लगैए, बाजू नहि? भरल-पुरल दरबज्जा आँगन सबजनियाँ, दोगे-दोग अबाह लगैए, बाजू नहि? कोन बसात सिहकलै जनमारा पछबा, गामक-गाम रोगाह लगैए, बाजू नहि? जाहि आँखिमे भरि जिनगी बोहियइतहुँ हम, पेनी तकर अथाह लगैए, बाजू नहि ? होइत रहत एहिना मरलहबा गुरमिन्टी, लोके नहि इरखाह लगैए, बाजू नहि? ठीका-मनखपमे उजमहल धर्मध्वजी, नेत ओकर मरखाह लगैए, बाजू नहि? हड्डी-गुद्दा केर हबक्का- सौजनमे, कुकुरो आइ घबाह लगैए, बाजू नहि? 2 पाछू जँ नहि अंक तँ एसकर सुन्ना की? कानक बेतरे सोना की झुनझुन्ना की? जीरा लए जोलहाल जानकीक नैहर केर, पोखरिए महुराह तँ रोहु की भुन्ना की? सिरिफ अगौं लए रकटल- लुधकल भगिनमान तकर जजातक उपजा की मरहन्ना की? भङघोटनासँ अकछि लोक बन्हलक मुट्ठी तँ दरबारक कोट-कानूनक जुन्ना की? पथरौटी डिहवार छातियो पाथर के, तकर गोहरिया गुम्हरल की अँखिमुन्ना की? धातुक बासन टुटलोपर बोमियाइत अछि, मैथिल बासन साबुत की सकचुन्ना की? डंटी मारए जे बैसल सप्पत खा कऽ तकरा लए छै गाँधी की आ अन्ना की? ( दुनू गजल बिना बहरक अछि-सम्पादक) अनिल मल्लिक गजल अहाँ के देखब कोना आब हम, अछि हमर भाग जडल अहाँ सॉ भेटव कोना आब हम, अछि हमर भाग घटल सँगे चलबै जीवन भरि बचन इ, जे अहाँ तोडि देलिएै समेटब कहू कोना आब हम, स्वप्न हमर भाफ बनल अहाँ लेल खेल छल किछु दिन के, की कोनो मजबूरी छल सूनलौं ने किया किछु हमर, मोने मे हमर बात रहल बन्द अछि मुट्ठी मे खुसी हमर, इ केहन भरम मे छलौं सुखल बालु जकाँ जे ससरल, खाली हमर हाथ रहल फटैत छाती ल देखैत रहलौं, घुरि कs अहाँ तकलौं कहाँ देह के राखू कतेक दिन हम, देखू हमर जान चलल राति जे छत पर छलौं देर तक, कारी असमान तकैत जेना बादल हम छलौं ठहरल, ओ हमर चान चलल जागल छी बहुत दिन सॉ आब, सुतितौं हम चिर निद्रा मे निन्द आबै कहाँ कहियो जेना, आँखि मे हमर काँट गडल ----- (सरल बर्ण २२) कुसुम ठाकुर हाइकू समृद्ध भाषा मैथिली मिथिलाक जायत हेरा लाज होइछ बाजब कोना भाषा पढ़ल हम दोषारोपण नेता अभिभावक नहि कर्त्तव्य देशक नेता नहि जनता केर स्वार्थे डूबल करू ज्यों स्नेह माँ आ मात्रि भाषा सँ संकल्प लिय आबो तs जागू मिथिला केर लाल प्रयास करू अबेर भेल तैयो विचार करू अछि सन्देश प्रेमचन्द्र पंकज गजल १ हम बात अहीं केर मीत कहब, नहि गजल कहब बरु कहब मीठ नहि, तीत कहब, नहि गजल कहब चाङुर अपन पसारि रहल अछि माथापर सम्बन्धक बाज कोन विधि बाँचत प्रीत कहब, नहि गजल कहब कतबो माँटि सुँघाएब तैओ नहि मानब हम अप्पन हारि चारु नाल पछाड़ि अपन हम जीत करब नहि गजल कहब गगनक मुँहकेँ चूमए कतबो ठाढ़ अहाँ केर शीसमहल बस कखनहुँ बालुक भीत करब नहि गजल कहब हाथ पसारब रहत पसरले, मुँहे टेढ़ करब तँ की कनि दूसि मुँह विपरीत चलब, नहि गजल कहब २ गजलक बहन्ने हम आंगन- घर- दुआरि लिखब बाध-बन- कलमबाग-बेख –बसबारि लिखब साँढ़ छैक छुट्टा आ पाड़ा मरखाह कतैक बाँचल फसिलकेर सुरजाक रखबारि लिखब थानामे नाङट भेलि रमियाक हाकरोस- सुननिहार केओ नहि तकरे पुछारि लिखब बारल खेलौनासँ, पोथीसँ दूर कएल जिनगीक बोझ उघैत नेनाक भोकारि लिखब नाचि रहल लोक आइ असली नचनिञा सभ नचा रहल परदासँ केओ परतारि लिखब फाटल अकास छै सीअत के-कते कोना लिखब जे “पंकज” बेर-बेर विचारि लिखब ( दुनू गजल बिना बहरक अछि-सम्पादक) मिहिर झा हाइकू ची ची करैत बगडा केर बच्चा ताकय पानि कारी बिलाड़ि बीच दुपहरिया बगडा बच्चा दाना पानि ने माय बाप बाहर नीचा बिलाड़ि एहि रौद मे बिन पान्खि, निर्बल हरि बचाउ प्रभात राय भट्ट गीत १ परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ मिथिला के हम बेट्टी छि मैथिलि हमर नाम यौ जनक हमर पिता छथि जनकपुर हमर गाम यौ जगमे भेटत नै कतहूँ एहन सुन्दर मिथिलाधाम यौ परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ मिथिला के हम बेट्टा ची मिथिलेश हमर नाम यौ मिथिला के हम वासी छि जनकपुर हमर गाम यौ ऋषि महर्षि केर कर्मभूमि अछि मिथिलाधाम यौ परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ मिथिलाक मैट सं अवतरित भेल्हीं सीता जिनकर नाम यौ उगना बनी महादेव एलाह पाहून बनी कय राम यौ धन्य धन्य अछि मिथिलाधाम,मिथिलाधाम जगमे महान यौ परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ हिमगिरी के कोख सं ससरल कमला कोशी बल्हान यौ मिथिला के शान बढौलन मंडन,कुमारिल,वाचस्पति विद्द्वान यौ हमर जन्मभूमि कर्मभूमि स्वर्गभूमि मिथिलाधाम यौ परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ कपिल कणाद गौतम अछि मिथिलाक शान यौ विद्यापति के बाते अनमोल ओ छथि मिथिलाक पहिचान यौ जगमे भेटत नै कतहूँ एहन सुन्दर मिथिलाधाम यौ परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ २. प्राचीन मिथिला मिथिला के मिथिलेश्वर महादेव हम की कहू यौ स्वम अहाँ छि अन्तरयामी अहाँ सभटा जनैतछी यौ बसुधाक हृदय छल हमर महान मिथिला इ हमही नै शाश्त्र पुराण कहैय यौ मिथिलाक जन जन छलाह जनक एही ठाम ताहि लेल नाम पडल जनकपुर धाम राजा जनक छलाह राजर्षि जनकपुरधाम में सीता अवतरित भेलन्हि मिथिले गाम में मिथिलाक पाहून बनी ऐलाह चारो भाई राम विद्यापती के चाकर बनलाह उगना एहि ठाम चारो दिस अहिं छि महादेव जनकपुर के द्वारपाल पुव दिस मिथिलेश्वरनाथ पश्चिम जलेश्वरनाथ उत्तर दिस टूटेश्वरनाथ दक्षिण कलानेश्वरनाथ किनहू भs सकय मिथिलाक प्राणी अनाथ इ ध्रुव सत्य अछि प्राचीन मिथिलाक परिभाषा एखुनो अछि एहन सुन्दर मिथिलाक अभिलाषा ३ गीत सुन सुन रे सुन पवन पुरबैया की लेने चल हमरो अप्पन गाम हमर जन्मभूमि वहि ठाम जतय छै सुन्दर मिथिलाधाम //२ देश विदेश परदेश घुमलौं मोन केर भेटल नहीं आराम साग रोटी खैब रहब अप्पने गाम जतय छै सुन्दर मिथिलाधाम //२ घर घर में छन्हि बहिन सीता राजर्षि जनक सन पिता सभ केर पाहून छथि राम जतय छै सुन्दर मिथिलाधाम //२ काशी घुमलौं मथुरा घुमलौं घुमलौं मका मदीना सभ सँ पैघ विद्यापति केर गाम जतय छै सुन्दर मिथिलाधाम //२ हिमगिरी कोख सँ बहैय कमला कोशी बल्हान तिरभुक्ति तिरहुत छै जग में महान दूधमति सँ दूध बहैय छै वैदेहीक गाम जतय छै सुन्दर मिथिलाधाम //२ ४ गीत बसु दरभंगा मधुवनी चाहे जनकपुर हम सभ छि मिथिलावासी रहू जतय दूर बसु बिराटनगर राजविराज चाहे लहान हम सभ मिथिलावासी हमर मिथिला महान बसु सीतामढ़ी शिवहर चाहे मुजफरपुर हम सभ छि मिथिलावासी रहू जतय दूर घर आंगनमे बहैय हमरा कमला कोशी बल्हान भाईचारा प्रेम देखैला चालू अयाचिक दलान राजर्षि जनक आँगन अवतरित भेल्हीं जनकदुलारी मिथिला केर पाहून बनलाह राम लखन धनुषधारी बसु मलंगवा जलेश्वर चाहे समस्तीपुर हम सभ छि मिथिलावासी रहू जतय दूर मिथिलाक गौरव मंडन कपिल कणाद वाचस्पति जन जन केर आत्मा छथि कवी कोकिल विधापति बसु अररिया खगड़िया चाहे भागलपुर हम सभ छि मिथिलावासी रहू जतय दूर बसु सहरसा सुपौल मधेपुरा चाहे पूर्णिया सम सभ छि मिथिलावासी जनै समूचा दुनिया बसु नेपाल बिहार मुंगेर कटिहार चाहे बेगुसराय हम सभ छि मिथिलावासी कियो नहि पराय गजल मिथिलाक पाहून भगवान श्रीराम छै जग में सब सं सुन्दर मिथिलाधाम छै मिथिलाक मईट सं अवतरित सीता जग में सब सं सुन्दर हुनक नाम छै मिथिलाक शान बढौलन महा विद्द्वान कवी कोकिल विद्यापति हुनक नाम छै भS जाएत अछि सम्पूर्ण पाप तिरोहित मिथिला एकटा पतित पावन धाम छै भेटत नै एहन अनुपम अनुराग प्रेम परागक कस्तूरी मिथिलाधाम छै घुमु अमेरिका अफ्रीका लन्दन जापान जग में नै कोनो दोसर मिथिलाधाम छै मिथिला महातम एकबेर पढ़ी जनु मिथिला सं पैघ नै कोनो दोसर धाम छै जतय भेटत कमला कोशी बलहान अयाचिक दलान,वही मिथिलाधाम छै गौतम कपिल कणाद मंडन महान प्रखर विद्द्वान सभक मिथिलाधाम छै ऋषि मुनि तपश्वी तपोभूमि अहिठाम छै "प्रभात"क गाम महान मिथिलाधाम छै .............वर्ण:-१५........... मुन्नाजी सबला नारी! सभ दिन, पुरूषक गातमे जीवाक सुअवसर पबै-ए। आइ पिताक तऽ काल्हि पातिक। बुढ़ारी बितैत छैक संततिक छत्र छायामे। आ ओ निश्चिंत भऽ उघै-ए अपन सतीत्व। नेना- ओ नेनपन के बितबैया दुलार मलारमे रहैए खेलाइत पर पुरूषक कोरामे, उएह ओकर खेलौना सेहो होइत छैक पिता, कक्का, आओर भइया आदिक संगोरमे जुआनी- ओकरा संगी सबहक बीच बितबैए। आब ओ डेरए लगै-एपुरूषक स्पर्षसँ। परंज्च अहू ठाम ओकर रक्षक पुरूषे होइत छैक पतिक रूपमे। मातृत्व- मातृत्वक रक्षा करै-ए, संतानके सर्वस्वक अधार मानि। जीबै-ए भैसूर आ ससूरक बीच। सभ मिलि सतर्क रहैत छैक, ओकर मातृत्वक रक्षार्थ। बुढ़ारी- जँ भऽ जाइत अछि विधवा, शोक संतप्त भऽ जीबाक लेल होइ-ए बाध्य, परञ्च सत्य! कही तऽ- ओ तऽ एखनो सुरक्षित अछि। किएक तऽ डेन धऽ सत्य के भोगबाक सामर्थ्य देबाक लेल तैयार अछि पुत्र। वास्तवमे अब्बल तऽ ओ भेल-ए पितृहीन भऽ के। शिशु उत्सव मिहिर झा बाल गजल १ नुनु हे रौ तू किया हरदम कानै छे राति दिन तू हमर माथा भुकाबै छे हेलै छे केरा डम्फर के बना जहाज़ पोखरियो मे रोज तू रेस लगाबै छे एक हाथे धेने पेंट दोसर मे डन्टा रोड़ी के मारि ठोकर गर्दा उडाबै छे घूमि घुमि गाछी तू बीच दुपहरिया दलुआ क कलम से आम चोराबै छे २ झमझम बरखै बुन्नी रौ टमटम चलबै मुन्नी रौ आगू पाछू मलहा डोलय खत्ता मे बड गडचुन्नी रौ आम तोडय झाम गूडय डोमा देलक चुनचुन्नी रौ राजा के बेटा मारय ढेपा कुकुर भुकै मधुबन्नी रौ अमित मिश्र बाल गजल आइ तारा केर नगरी सँ एथिन माँ , अपन कोरा झट द' हमरा उठेथिन माँ , खेलबै माँ संग आ रूसबै हँसबै , पकड़ि आँङुर गाम-घर मे बुलेथिन माँ , थाकि जेबै जखन , भोजन करा हमरा , गाबि लोड़ी आँचरक त'र सुतेथिन माँ , राम कक्का के परू छैक मरखहिया , सुरज के बकरी सँ हमरा बचेथिन माँ , हमर संगी संग माँ के घुमै सर्कस , आबि घर हमरो सिनेमा ल' जेथिन माँ , कत' सँ एलै मेघ कारी इ , अंबर मे , "अमित" मन डेराइ यै कखन एथिन माँ . . . । । बहरे-कलीब फाइलातुन-फाइलातुन-मफाईलुन 2122-2122-1222 चंदन कुमार झा सररा, मदनेश्वर स्थान मधुबनी, बिहार बाल-गजल दऽ रहल छी अपन शपथ, नै कानू बौआ लेबनचूस लऽ पप्पा औताह, कुचरे कौआ हम तऽ माय छी सत्ते,मुदा बेबस लाचारे कीनि खेलौना देब कतऽसँ,नहि अछि ढौआ भरना लागल खेत, महाजन के तगेदा फेर कोना के सख पुरौताह बाप कमौआ अहीँ पुरायब सख सेहन्ता आस धेने छी अहीँ जुड़ायब छाती बनिकऽ पूत कमौआ कबुला,पाती,विनय,नेहोरा, करैछी भोला बेलपात "चंदन" चढ़ायब खूब चढ़ौआ --------वर्ण-१६---------- २ मस्जिद जखने परल अजान कोइली ठनलक पराती गान कौआ डकलक खेत खरिहान बगुला खत्ता बिच करय स्नान गर-गर दुध दुहैछ बथान टक-टक पड़रू लगौने ध्यान बाबा छथि बाड़ी बान्हथि मचान बाबी अँगना मेँ लगाबथि पान टुह-टुह लाल पूब असमान 'चंदन'जलखै मे दूध मखान ३ बुच्ची पहिरलक सोन गहना, बौआके डाँर झूले लाल फुदना ।
साजि-राजि दूनू गेला मेला देखऽ, हाथ मे पाइ छलै बारह अना ।
मुरही-कचरी, आ' बतासा-लड्डू रंग-विरंग किनलक फुकना ।
झूललक झूला नाच देखलक, "चंदन" घुमल घर सोना-चना । ४ साँझ परल, बैसि पिपर पर चिड़ै करय पंचैती, सूगा-मैना ब्याह रचाओत बगुला करय घटकैती ।
फुदकि-फुदकि के फुद्दी नाचय फेर हेतै वनभोज, कौआ पिजबैछ लोल कोइली गाबि रहल छइ चैती ।
बगरा-परबा अपस्याँत अछि इंतजाम मे लागल, डकहर बैसल सोचि रहल कोना हेतै कुटमैती ।
पोरकी पिपही बजा रहल छै टिटही पिटै ढोलक, मोर नचैछै ता-ता-थैया "चंदन" अद्भुत ई कुटमैती ।
५ नवका कुर्ती नवके सलवार पहिर कय बुच्ची भेल तैयार
ललका फीताक गुहलक जुट्टी बाजे रुनझुन पायल झन्कार
हाथक बाला खन-खन-खनके टम-टम चढि के गेल बजार
ढोलक-पिपही आ तमाशा-नाच सूनल देखल हरख अपार
बाबाक हाथ पकड़ि कए बुच्ची प्रमुदित घुमय हाट-बजार ६ चार पर छै कौआ बैसल, माँझ अँगना बौआ बैसल । घुट-घुट खाथि दूध-भात, मायक कोरा बौआ बैसल । राजा-रानी सुनथि पिहानी, मइयाँ कोरा बौआ बैसल । ओ-ना-मा-सी सिखथि-पढ़थि, बाबाक कोरा बौआ बैसल । सुग्गा-मेना संग खेलै छथि, "चंदन" अँगना बौआ बैसल । ७ कुकरुकू जखन मुरगा बाजल, किरिण सुरूजक मूँह मेँ लागल । कौआ डकलक कोइली बाजल, आँखि मिड़ैते चुनमुन जागल । नहा-सोना के कयलनि जलखै, इसकुल गेलथि घंटी बाजल । दीदीजी बड्ड नीक लगैत छन्हि, मास्टर जी के छड़ी लय भागल । कान पकड़ि के उठक-बैठक, तैयो खेले पर मोन छै टाँगल । "चंदन" टन-टन घंटी बजलै , छुट्टी भेलइ घर दिस भागल ८ बेंग बजय छै टर-टर-टर्र बगरा उड़य फर-फर-फर्र । झरना झहरे झर-झर-झर्र, बाँस बजय छै कर-कर-कर्र । मिल चलय छै धर-धर-धर्र, साँप ससरलै सर-सर-सर्र । चुनमा छाती धक-धक-धक्क, डरसँ कापय थर-थर-थर्र । पप्पा एलखिन भागि गेल डर, बात पदाबय चर-चर-चर्र । जगदानन्द झा मनु बाल गजल ----------------------- चम चम चम चम तारा चमके बौआ कए हाथक तरुआ गमके कारी बकरी,नब उज्जर महिष लाल बाछी किए दौर-दौर बमके बौआक घोरा सय-सय कए देखू काका कें घोरा पिद्दी कतेक कमके बाबी कें साडी मए कें लहंगा बहे बौआ कें गघरी त कतेक झमके बौआ हमर आब गुमशुम किए किएक नै ठुमुक-ठुमुक ठुमके ( वर्ण-१३ ) रूबी झा बाल गजल हेरौ बौआ तूँ ऐना रुसल छेँ किए , दूध-भात लेल तूँ बैसल छेँ किए , मुँहमें खूएब आ कोरा बैसाएब , गए कें दूध लेल अरल छेँ किए , किन देब गेन लाल आ घुरकुन्ना , छोर ने जिद्दपन डटल छेँ किए , आबो दहुन बाबा के देठुन पेंरा , पेंरा सन नीक कि नठल छेँ किए , कहबै नाना कें देथुन धेनु गैया, आबो बरेडी पर चढ़ल छेँ किए..| वर्ण-१३ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” बर्खा रानी - १ बर्खा रानी ! आऽ गे आऽ । राति अएबेँ, से एखने आऽ । इस्कूल जा - जा रोजे थकलहुँ, आइ अपन तोँ खेल देखा ।। एखने आ, गए एखने आऽ । आइ अपन नञि भाओ बढ़ा । एतेक बरस तोँ झमकि झमकि कऽ, रस्तेँ – पएरेँ हो नञि थाह ।। बर्खा रानी ! एहि ठाँ आऽ । अप्पन रिमझिम गीत सुना । दुपहरिया धरि खूब बरसिहेँ, फेर कने लीहेँ सुस्ता ।। बर्खा रानी ! आब ने आऽ । दम्म धरै, तोँ ले सुस्ता । संगी – साथी शोर करैए, खेलब - कूदब – करब मजा ।। २ बर्खा रानी ! आब ने आऽ । दम्म धरै तोँ ले सुस्ता । हाथ – पएर सभ ठिठुरि गेल अछि, आब तोँ रौदक दरस देखा । बर्खा रानी ! आब ने आऽ ।। खेल – कूद सभ बन्न पड़ल अछि, संगी – साथी पड़ल बेमार । सर्दी–खाँसी, ढों–ढों, खिच–खिच, ककरो धएने अछि बोखार । सभठाँ एहने सनि किछु चर्चा, एहने सनि किछु दुखद समाद । पसरल कए ठाँ रोग मलेरिया, हैजा डेंगू कालाजार । आङ्गन सगरो चाली सह – सह, आब ने एहेन रूप देखा । बर्खा रानी ! आब ने आऽ ।। बाट – घाट कादो – किचकाँही, डूबल सौंसे खेत - पथार । माल–जाल सभ ठिठुरि मरै अछि, मच्छर – माछीक बढ़ल पसार । लेन कटल अछि, फेज उड़ल अछि, देखब टी॰ भी॰ तोहर कपार । दुष्कर सौंसे आबाजाही, कतेक लोक करतै बैसार ? जतहि सञो अएलेँ ततहि पड़ा जो, आब ने अप्पन मूँह देखा । बर्खा रानी ! आब ने आऽ ।। मिथिलाक धिया हऽम धिया मिथिला मैथिल केर, मैथिली हम्मर नाम । हमही जानकी, हम वैदेही, सीता हमरहि नाम ।।
भारतवर्षक पूब दिशा मे, मिथिला हम्मर गाम । संग नेपालक पूब ओ दक्षिण, हमरहि बास सुठाम ।।
कहियो हम मिथिलाक माटि पर, ज्ञानक दीप जरओने छी । की मिथिला ? सौंसे भूतल केँ, हम विज्ञान सिखओने छी ।।
हमही कहियो छलहुँ गार्गी, हमही मैत्रेयी बनलहुँ । मण्डन शंकर वाग्युद्ध केर, सूत्रधार हमही बनलहुँ ।।
ब्रम्हज्ञान लौकिक - परलौकिक, हम भामति, सञ्चित कयलहुँ । पर की भेल ? आइ हमरा अहँ, शिक्षा सञो वञ्चित कयलहुँ ।।
एहनो दिवस रहल जहिया, नञि चिट्ठी - पत्री हम जानी ।* मिथिला केर बेटी बनि कऽ, हम खुशी मनाबी, वा कानी ।।
एखनहु बड़ - बड़ गप्प हँकै छी, धिया – सिया कहि पड़तारी । पर की अतबहि अछि दुलार, की अतबहि केर हम अधिकारी ??
तिलकक नाँव सँ हक्कन कनै छी, छी सत्ते ई महामारी । पर बाबू ! की कहियो सोचल, अपने केर की जिम्मेदारी ??
की अपनेक ई सोच उचित, जे बेटी अनकहि घर जयतीह ?** पढ़ा - लिखा कऽ की होयत, जँ कमा – खटा अनकहि देतीह ??**
अनकर दोष कहू हम की, जँ अपनहि लोकक सोच एहेन । गप्पक छुच्छ दुलारहि की, जँ व्यवहारहि मे भोंक एहेन ??
सोचू कक्का ! अपनहु घर मे, कहियो तँ अनकहि धी अओतीह । जँ अनकहु सोच अहीं सन हो, तँ भौजी पढ़ल कोना अओतीह ??
छी किछु लोक तँ आओरो बढ़ि कऽ, तथाकथित सज्जन समाज । कोखि मे खेलैत अपनहि धी केर, वध करैछ, सरिपहु ने लाज ।।
हमरहु इच्छा दुनिञा देखी, आ दुनिञा केर संग बढ़ी – चली । हमरहु इच्छा खेली – कूदी, आ संगहि संग हम पढ़ी – लिखी ।।
मुट्ठी भरि मैथिल ललना केर, नाँव गना जुनि बहटारू । अपन हृदय सँ अपनहि पूछू, मूँह घुमा, जुनि गप्प टारू ।।
* सन्दर्भ देखू श्री “अक्कू” जीक गीतक पाँती सखी पिया केँ पत्र आइ हम, कोना कऽ लिखबै हे ? ककरा सँ अ – आ – क – ख – ग – ङ सिखबै हे ? ............................................................... पाँचे बरष सँ फुलडाली लए, तोड़ब सिखलहुँ फूल अरहूल । जानी ने हम चिट्ठी - पत्री, छी बेटी मिथिला केर मूल ।
** ई विचार हमर अप्पन नञि थिक, परञ्च अपनहि मैथिल समाजक देन थिक । केओ गोटे जखन अपन बेटी केँ इन्जिनियरिंग केर पढ़ाई केर लेल पठाए रहल छलाह तँ हुनिकहि किछु सम्माननीय सर – सम्बन्धीक ई कटाक्ष स्वर छलन्हि । सभसँ दुखक बात जे ई स्वर अपन समाजक मुर्ख – अशिक्षित लोकनिक नञि अपितु किछु अति विद्वान, प्रतिष्ठित लोकनिक छलन्हि । नेनपन (बालगीत) खेलै – कूदै - मौज मनाबै, नेनपन होइ छै खेलबा लए । पर पढ़ाई सेहो आवश्यक, नेनपन होइ छै पढ़बा लए ।। मीठगर – मीठगर नीक लगए, पर जँ सदिखन मिट्ठहि भेटए । बढ़ए मोटापा गेंड़ा सन, आ सुस्त मोन हो, जी उचटए । नोनगर, खटगर, तीत जरूरी, भोजन मे रुचि रहबा लए । तेँ पढ़ाई सेहो आवश्यक, नेनपन होइ छै पढ़बा लए ।। खेल – कूद नेनपन केर गहना, व्यक्तित्वक संपोषक छी । खेल – कूद सिखबैछ बहुत किछु, तेँ ओ अति आवश्यक छी । पर पढ़ाई बिनु खेल – कूद बस, अनुचित – जीवन जिउबा लए । तेँ पढ़ाई सेहो आवश्यक, नेनपन होइ छै पढ़बा लए ।। उचित समय पर खेली – कूदी, उचित समय अध्ययन - अध्यापन । एकक परिपूरक दोसर छी, सम्यक अनुपातेँ परिपालन । सुख – दुख जिनगी केर दू पहिया, दुहु जरूरी जिउबा लए । नेनपन केर आधार गढ़नि पर, जिनगी खल – खल हँसबा लए ।। पर्यावरण बचाउ (बाल कविता) एक छल राजा, एक छलि रानी, सुनने होयब कतोक पिहानी । आइ कहानी मे नञि राजा, नहिञे थिकीह कोनहु रानी ।। सुनू आइ एहने एक खिस्सा, जकर पात्र हम सभ प्राणी । सुरूजक धियापुता नवग्रह अछि, धरा - दुलारी - धी - रानी ।। इएह माटिक उपजा छी हम सभ, हम सभ इएह धरतीक सन्तान । एकरहि छाती चीरि उगैत’छि, गहूम धान आ आम लताम ।। ओकरहि हरियर - हरियर आँचर, गाछ बिरिछ पोषए अछि प्राण । माए थिकीह हम आओर कहू की, करू की हुनि महिमा गुणगान ?? ई धरती अनुपम छी बौआ, जिनगी केर प्रत्यक्ष ठेकान । आन कतहु एखनहु धरि दैय्या, जिनगी तँ अछि बस अनुमान ।। आइ एखन धरि जे बूझल अछि, धरती सभसँ अजगुत छी । एहि धरती केर जैवक्षितिज पर, मनुखक रचना अद्भुत छी ।। पर “अद्भुत” केर अहङ्कार मे, अपनहि नाश करै छी हम । ठोहि पारि विज्ञान कनै अछि, देखि अपन अनुचित उपक्रम ।। हबा बहै अछि जहर भरल, आ पानि प्रदूषित कलुषित अछि । कतेक अनेरो हल्ला – गुल्ला, माथ मनुक्खक बोझिल अछि ।। अपन माए केर प्राण बचाबी, आउ आइ संकल्प करी । हाबा – पानि आ माटि बचाबी, पर्यावरण प्रशस्त करी ।। कम - सँ - कम ततबा रोपी, जतबा गाछी हम नष्ट करी । विज्ञानक सद् - अर्थ बुझी, नञि अनुचित बूझि अनर्थ करी । रौदी – दाही (बाल कविता) ई विदेह – मिथिला केर धरती, अजबहि एक्कर खिस्सा यौ । एहि ठाँ जिनगी हारि ने मानय, केहनो विषम समस्या यौ ।। देखू सूरज माथ चढ़ै अछि । माथ सँ टप - टप घाम चुबै अछि । धरती जरइत अछि धह - धह कऽ, बरखा दाइ निपत्ता यौ । एहि ठाँ जिनगी हारि ने मानय, केहनो विषम समस्या यौ ।। रस्तेँ – पएरेँ, धूर उड़ैए । कुक्कुरहु हकमए, छाँह तकैए । कोन दैत्य केर पहरा पड़लै, पोखरि – सूखल खत्ता यौ । एहि ठाँ जिनगी हारि ने मानय, केहनो विषम समस्या यौ ।। जोतल खेत पड़ल अछि परती । दमकल केर अछि बाढ़ल चलती । दमकल केर सेहो दम अछि निकलल, जड़ि गेल बीया कत्ता यौ । एहि ठाँ जिनगी हारि ने मानय, केहनो विषम समस्या यौ ।। पानि पतालहि धँसैत गेल अछि । कऽल ईनारहु भँसकि गेल अछि । सूतल इन्द्रदेव केँ मनबथि, झिझिया खेलथि धीया यौ । एहि ठाँ जिनगी हारि ने मानय, केहनो विषम समस्या यौ ।। बरखा बरिसल, लोक नचैतछि । हऽर - बरद आ बीया तकैतछि । जहिना - तहिना, जतबा - जे हो, धनरोपनी भेल बढ़िञा यौ । एहि ठाँ जिनगी हारि ने मानय, केहनो विषम समस्या यौ ।। बरखा झर – झर बरसि रहल अछि । हृदय लोक केर हहरि रहल अछि । इन्द्रक कोप, की सभ मेहनति केँ, करत फेर बेपत्ता यौ ? एहि ठाँ जिनगी हारि ने मानय, केहनो विषम समस्या यौ ।। कोशी उमरल, कमला उफनल । बागमती – गण्डक सेहो चतरल । सहमि गेल हँसइत जिनगी, की करतीह कोसी मैय्या यौ ? एहि ठाँ जिनगी हारि ने मानय, केहनो विषम समस्या यौ ।। बान्ह टुटल कत धार फुटल नव । भाँसि दहायल, जलमज्जित सभ । लोक मरैए, हक्कन कनैए, गामक – गाम निपत्ता यौ । एहि ठाँ जिनगी हारि ने मानय, केहनो विषम समस्या यौ ।। हमहूँ आइ सँ इस्कूल जएबै (बालगीत) हमहूँ आई सँ इस्कूल जयबै, सीखबै बहुते बात । आब ने रहबै मूरूख बनि कऽ, करबै ने कोनो लाथ ।। धनरोपनी - कमठैनी लए ने, करब पढ़ाई केँ कात । आब ने पेट – दरद फुसिये, ने आब दुखेतै माथ ।। हमहूँ पढ़बै भरि संसार, आ मिथिला केर इतिहास । पढ़बै कोना हेतै भारत, आ मिथिला केर विकास ।। की विद्यापति, प्रेमचन्द, गोर्की, होमर लिखलाह । कतऽ ठाढ़ छी, की करैत छी, नीक छी की, अधलाह ?? हमहूँ पढ़बै चान – सुरूज आ ग्रह - उपग्रहक खगोल । मिथिला – भारत केर चौहद्दी, दुनिञा केर भूगोल ।। हमहूँ सीखबै नापब – जोखब, गणितक औना पथारी । नञि हिसाब सँ हम घबड़एबै, कतबो हो ओ भारी ।। हमहूँ बुझबै जीव – जन्तु केर, बनल कोना छै देह । कोना यन्त्र सभ काज करै छै, अणु – परमाणुक भेद ।। धियापुता मिथिलाक नान्हि टा, पर बड़का अभिलाषा । साक्षर भारत, साक्षर मिथिला, शिक्षित मिथिलाभाषा ।। कीनि दे हमरो खेलौना (बालगीत) माए गे माए ! कीनि दे हमरा खेलौना । कनिञा – पुतरा केर दिन गेलै, लेब ने हम झुनझूऽऽना ।। हम्मर इसकुल केर संगी सभ, जानि ने की – की लाबैए । “मैथिल बुड़िबक” कहि कऽ हमरा, ओ सभ रोज सिहाबैए । हमरो कीनि दे बार्बी गुड़िया, डिज्नी बला खेलौना । माए गे माए ! कीनि दे हमरा खेलौना ।। केओ उड़ाबए हवाई – जहाज, केओ मोटर केँ दौड़ाबैए । केओ हाथ बन्दूक लऽ घूमए, विडियो – गेम देखाबैए । सभहक हाथ रिमोट खेलौना, हमरा लग टुनमूऽऽना । माए गे माए ! कीनि दे हमरा खेलौना ।। धिया भारती – सिया हमर, आ बौआ गौतम – मण्डन । धिया हमर बुधियारि बहुत, आ बौआ तेहने सज्जन । जुनि कानू, मोन छोट करू नञि, कीनि देब बहुते खेलौना । माए गे माए ! कीनि दे हमरा खेलौना ।। जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल बाल गजल घरसँ होउ बहार बेटी बाट तकैछ पहाड बेटी | खपटा थिक सोना आ चानी उत्तम स्नेहक धार बेटी | गेल जमाना तिलक दहेजक सरस्वतीक संसार बेटी | नैहर सासुर तीर्थ धाम सब भ’ गेल आइ बजार बेटी | आब पताल ने जेती सीता सुन्दर यैह विचार बेटी। जगदीश प्रसाद मण्डलक एकटा बाल कथा ‘एकोटा ने’ पुरमपुर गाममे पुरन कक्काक परिवारकेँ गौआेँ आ अनगौआेँ पुनचन परिवारसँ जनैत छन्हि। ओना अस्सी बर्खक अवस्थामे कहियो पुरन काका कनमा-कनइ नै पढ़लनि मुदा कनमा-कनइ दुनूक किरदानी देखि-देखि सदिखन क्षुब्ध रहै छथि। गरे ने बैसै छन्हि जे जे वस्तु तरजूपर रखि बटिखाड़ासँ तौलल जाएत, ओ जँ बँटैत-खोंटैत, पौआ-कनमा होइत रत्ती-माशामे चलि जाएत तँ चलि जाएत, मुदा दुनियाँक एते नमहर धरती केना बँटाएत-खोंटाएत कनमा-कनइ-फनै दिसि पहुँचि जाइए। बादलक किरदानी की पतालक पानि सोखि लेत? जँ सोखए चाहत तँ राखत कतए? हवा-बिहाड़ि केत्तेकाल अँटका कऽ रखि सकैए। खैर जे होउ मुदा पुरन काका करैला लत्तीक मचान जकाँ अपना परिवारकेँ बना हरिअर, तड़गर खेबे करै छथि। जहिना सक्कत-कड़गर बीआ धरती धारण करिते, दीयाक तेल-बत्ती जकाँ अपन तिल-तिल अर्पित करए लगैत अछि तहिना ने करैलोक बीआ केने अछि। वएह अंकुर ने धरती धारण करैत ऊपर आबि लत्ती बनि लतड़ए लगल। भलहिं पातर-छीतर कड़चीक आलम संग मचानपर किअए ने पहुँचल हुअए। तँए कि ओ अपन शरीरक रच्छा करैत मुँह बँचबैत नै पहुँचल? जरूर पहुँचल अछि। पुरन काकाक परिवारोक सभ तेहने छन्हि जे अपनामे जे घंघौज होन्हि मुदा काका लग पहुँचते मन सकदम भऽ जाइत छन्हि, किअए तँ सभ बुझैत जे अगिआएलमे हँसियो ही-ही-आ कऽ धड़ैत छै। तँए जहिना रस्तापर ऐँठैत-जुठैत चलैत साँप बोहरिमे प्रवेश करिते सोझ भऽ जाइत तहिना काकाक सोझमे परिवारक सदस्य। ओना, बिनु पएरक चलैबला साँप माटपर चलि केना सकैए। मन-चित्त मारि पुरनो काका राति-दिन परिवारेक पाछू लगल रहै छथि। अखनो मनमे ओहिना ओ बात तड़गर बनल छन्हि जे वीर भोग्या बसुंधरा। जे ऐ धरतीसँ प्रेम करत ओकरे प्रेमी बनि धरतियो चुम्मा लेत। कखनो माए बनि, कखनो भाए-बहिन बनि। चेतनसँ बालबोध धरिक परिवार पुरन काकाक छन्हि। तालो मेल अजीव छन्हि। चेतन सभ पुरनकाकाकेँ गार्जन बूझि अपन छुट्टी नेन रहैए तँ बालो-बोध सभ अपन बाबा बूझि अपन सभ किछु बुझैए। परिवारक सभसँ छोट बच्चा चारि सालक छन्हि। तालो-मेल नीक छन्हि। अंगनाक सभ समाचारक समदिया रहितो संवाद-बाहकक काज करिते छन्हि। एहेन चेला भेटबो मोसकिल। मुदा से तँ छन्हिये। नवका दोसितियारे तँए बेसीकाल एकठाम रहने चाहो-बिस्कुट संगे करै छथि। काका खुशी जे अपन बात पहिने उसारि, भरि दिन गप सुनैले तैयार रहैए। आ पोता दीनमा खुशी जे आँखि-कान तँ तखने काजक बनत जखन ओकरासँ काज कराएब। नइ तँ गमे-गमे गेड़ी बनि जाएत। मुदा से कहाँ होइ, एक काने सुनै आ दोसर काने उड़ि जाए। उड़ैत-उड़ैत सुतली रातिमे सभ उड़ि जाए। वसन्तक आगमन भऽ गेल। किछु दिन पूर्ब जे जाड़सँ जड़िआएल छल, पालासँ पलाएल छल ओ फुड़फुड़ा कऽ उठल। सुखाएल-सड़ल लत्ती आ कुमही जकाँ पबिते वसन्ती हवामे उड़ए लगल। मुदा तैयो बेदरंग भेल धरती, घर-अांगन जकाँ बाहरै-सोहरै ले इशारा दिअए लगल। रसे-रसे रस भरल हवाक रमकी रमकए लगल। जहिना सेवा िनवृत्तिक समए कोनो अफसरकेँ स्वर्ग सुझैत तँ कोनोक आगूमे नांगट नर्कक नाच होइत अछि, तहिना शिशिर -सिरसिराइत समए- वसन्तक बीच होइत। मुदा से बात पुरन काकाक परिवारमे नै छन्हि। कोल्हुक बड़द जकाँ सभ परिवारक अपने-अपने नाचक पाछू लागल रहैत छन्हि। दिन उगिते दीनमा, बाइस खा जत्ताक -माटिक बनाओल- दुनू पट्टा दुनू हाथमे नेने दरबज्जाक आगूमे बैसि, रस्ताक धूरा-गरदाकेँ जत्तामे पीसए लगल। बिनु देखनौं आशा बनले रहै जे बाबा दरबज्जेमे छथि। सुतल छथि कि जागल, तइसँ कोन मतलब दीनमाकेँ। ओ तँ अपन काजमे बेहाल। मनमे रहबे करै जे चाहक बेर भऽ गेल अछि माए चाह आनि देबे करतनि, हमहूँ पीबे करब। परिवारक बोझसँ दबल थोड़े रहै जे नून नै अछि तँ केसक तारीखपर जाए पड़त। जहिना तत्ववेत्ता तत्वचिन्तनमे रमल रहैत तहिना दीनमा अपन काजमे हराएल। कोन मतलब ओकरा रहै जे बुझैत, काजक हराएल अधखड़ुआ रहि जाइए। माइक हाथक चाह देखिते दीनमा, जत्ता छोड़ि आगूए आगू दरबज्जाक ऊपर चढ़ल। दीनमापर नजरि पड़िते पुरन काका मुस्की दैत कहलखिन- “की दीनबाबू, चाहो-ताहक बेर भेलैए आकि नै?” तहि बीच चाह नेने पुतोहु पहुँच गेलनि। दीनमाक नजरि देबालमे टँगल हनुमान जीक छातीक रामपर पहुँचि गेल। देबालमे सटल फोटो देखि दीनमा बाजल- “बाबा, उ फोटो उतारि दिअ।” दीनमाक बात सुनि पोल्हबैत पुरनकाका कहलखिन- “बौआ, पहिने चाह पीब लिअ, पछाति ई सभ हेतइ?” जना बुझले रहै तहिना दीनमा बाजल- “पहिने अहाँ पीब ने लिअ, पाछू हम पीब।” बहाना पकड़ाइत देखि पुरनकाका कहलखिन- “हमरा हाथमे गिलास अछि केना उतारल हएत?” चाह पीब, खिड़कीपर राखल खुरपी उतारि पुरनकाका बाड़ी-झाड़ी दिसि विदा होइक विचार केलनि। हाथसँ खुरपी छिनैत दीनमा आगू-आगू विदा भेल। दाड़िमक बाड़ी पहुँचि काका हिया-हिया हियबए लगलाह। गाछक जड़िमे पानिक अभाव बूझि पड़लनि। मुदा गाछक डगडगी आ फूलसँ लदल गाछ देखि मन ललिया गेलनि। लाल-लाल फूलसँ लदल गाछ। सभ डारिमे फूल लागल। खुरपी नेने दीनमा खाधि खुनैक जगह हियबैत। जँ कियो पैघ अफसर नै बनि पाओत तँ कि ओ ओहिना रहि जाएत। हिया-हिया फूलकेँ देखैत हरिआएल-हरिआएल फड़ो देखलनि। मन भेलनि जे जतबे-ततबे जड़ि सबहक खढ़ उखाड़ि दिएे। मुदा नजरि दाड़िमक काँटपर गेलनि। डारिये काँट भऽ जाइए। ऊपर-निच्चा सगतरि काँट। जखने अपने खढ़ उखाड़ए लगब तखने इहो -दीनमो- किछु ने किछु करए लगत। तहूमे खुरपी हाथेमे छै। तेहेन झाड़ी अछि जे सुगबा साँप जकाँ माथमे गड़तै कि गरदनिमे तेकर कोन ठेकान। जखने काँट गड़तै कि कानब शुरू करत। जखने कानत तखने ओकरा चुप करब आकि गाछक जड़िक खढ़ उखाड़ब। समझौता करैत काज मनमे एलनि। काज ई जे फड़क गिनती कऽ ली। दीनमा हाथक खुरपी आड़िपर रखि, कोरामे उठा काका कहलखिन- “बौआ, अहाँकेँ नेने हम टहलब आ अहाँ फड़ गनब।” नव फड़क गिनतीक काज देखि दीनमाक मन खुशीसँ आरो खुशिया गेल। मुदा कट्टा भरि झाड़ीक बगानमे पचासोसँ ऊपर गाछक फड़ केना गनि लेब। तहूमे बीसे तक गनल होइए। गाछक सभ फड़ अपने हिया-हिया देखथि, जे फड़क बीच कीड़ोक असर भेलहेँ आकि नै। अपने तँ एक्केटा गाछक फड़ देखि अन्दाजि लेलनि जे कते हएत? जहिना गोल-गोल, किछु नमती नेने लाल-लाल फूल हरिअर होइत अपन जिनगीक फल पकड़ि रहल अछि, तहिना तँ गोटि-पङरा कड़ुआएल आमक आकार सेहो पकड़ि रहल अछि। एकसँ दोसर गाछक फड़ गनैमे दीनमा बेर-बेर बिसरि जाए। कखनो गिनतिये छूटि जाइ तँ कखनो अंके बिसरि जाए। कखनो बीससँ ऊपर नै बढ़ल। अंतमे काका पुछलखिन- “बौआ, कते फड़ भेलह?” बाबाक प्रश्न सुनि दीनमाक मुँहसँ निकलि गेल- “दसटा।” “अच्छा बड़बढ़िया। आब एतए आबि के खेलिहह। ओगरबाहियो भऽ जेतह आ खेलबो करबह।” नीक फसल भेलनि। खेबा जोगर फल हुअए लगल। फड़ फल बनि गेल। ओना सजमनि फड़क-फड़े रहि जाइत। मुदा दाड़िम, आम, लताम इत्यादि फड़सँ फल बनि जाइत अछि। अंतिम अवस्था अबैत-अबैत तूबि-तूबि फल अपने खसए लगल। गाछक सभ फल समाप्त भऽ गेल। जहिना परसौती जनानाकेँ देख-भालक जरूरति पड़ैत तहिना ने बाड़ियो-झाड़ीक अछि। ई सोचि पुरनकाका दीनमाक संगे दाड़िमक गाछ लग पहुँचलाह। जे कहियो फड़ फूलसँ लदल छल ओ सून-सून भेल, अपन बेथा सुना रहल अछि। व्यथित मने दीनमाकेँ पुछलखिन- “बौआ, कते फड़ अछि?” विचलित होइत दीनमा बाजल- “एकोटा ने।” “ऐ लेल विचलित किअए होइ छी। जहिना समए आएल छलइ तहिना फेनो औतै।” “केना औतै?” “समए अनुसार एकर ताक-हेरि करबै तँ एबे करतै।” अरविन्द ठाकुर मिथिलाक संस्कृति:किछु अप्रिय बिन्दु मिथिला वर्तमान मे एकटा मिथक मात्र अछि|आइ ने एकर कोनो भुगोल अछि आ ने कोनो संवैधानिक अस्तित्व|अत्योक्ति नहि होयत,जँ कही जे मिथिले जकाँ मिथिलाक संस्कृति सेहो एकटा मिथके अछि|राज्याश्रयी विद्वतजन द्वारा लिखल आ शिक्षा-व्यवसाय सँ जुड़ल पंडितजन द्वारा बेर-बेर दोहरायल गेल ओहि तथाकथित स्वर्णिमकालक गौरवशाली अध्याय सभक वर्तमान मे कोनो अवशेष-प्रमाण नहि देखाइत अछि|एकांगीए सही,भूत मे जँ आगि रहय त वर्तमान मे छाउर देखाइ पड़बाक चाही ने? विदेह माधवक आगमन आ हुनक पुरोहित गोतम रहुगण द्वारा अग्नि प्रज्ज्वलित कए भूमिक पवित्रीकरण सँ एहि आलोच्य क्षेत्र मे आर्यसंस्कृतिक सूत्रपात मानल जाइत अछि|एहि सँ पूर्व एकरा द्रविड़-किरातक मिश्रित संस्कृतिक स्थल अथवा व्रात्यलोकनिक निवास-स्थल मानल जाइत रहल अछि|व्रात्यलोकनिकेँ आर्य मानबाक आग्रह सेहो किछु इतिहासकारक छनि|एहि आर्यीकरणक पश्चात वर्ण-व्यवस्थासँ जाति-व्यवस्था,समाजसत्ताक प्रभुत्वसँ व्यक्तिसत्ताक प्रभुत्व,परिवर्तनशीलतासँ जड़ता आ उदारतासँ कट्टरता धरि पहुँचैत एहि क्षेत्रक समाज इतिहासक कोन-कोन अन्हार-इजोतक खोह सभमे ढुकैत-बहराइत वर्तमान धरि पहुँचल अछि,ताहिपरसँ एखनो बहुत रास आवरण सभ हटब बांकिए अछि|इतिहास जँ रस्ता देखबैत अछि तँ रस्ता भोतियाबितो अछि|ओहुना इतिहास पर शासक-समाजक वर्चस्व रहल अछि आ कोनो कालमे आम-अवामक की स्थिति छलय ताहिपर इतिहास सभ आन्हरे सदृश्य रहल अछि|राज्याश्रयी विद्वतजन केँ जनसमाजक स्थिति-चित्रणक ने बेगरता रहनि आ ने पलखति|तेँ इतिहासक भूल-भुलैयामे घुसलाक बादो आ बेर-बेर ‘खुल जा सिमसिम’कहलाक बादो कएकटा चोरदरबज्जा अदृश्य आ कएकटा दरबज्जा बन्द भेटैत अछि आ तेँ हमरासभक सोच-विचार एकटा अनिश्चितताक बिरड़ोमे पताबय लागैत अछि,स्थिर नहि भए पबैत अछि|जनसमाजक दुख-सुखक महासागरमे जा डुबकी नहि मारल जाएत,संस्कृतिक मोती कि पाथर कोना भेटत?ओम्हर हमर सभक शिक्षातन्त्र सेहो इतिहासक पाठ्य-पुस्तक आ अपन बनायल विचार-परिधिसँ बाहर जयबाक अनुमति नहि दैत अछि|सृजनात्मक लेखन यथास्थितिक बैरी मानल जाइत अछि आ तेँ जखन-जखन एहन प्रयास होइत अछि त विरोधीक रुपमे शिक्षातंत्रक संग-संग लाठी-फ़रसा लएकए तैयार मिथिलाक रुढिवादी आ यथास्थितिवादी तत्व ठाड़ भेटाइत अछि|किन्तु सृजनात्मक लेखनक प्रतिनिधि सुच्चा साहित्यकार प्रतिरोध आ असहमतिक संस्कृतिक संवाहक होइत अछि आ तेँ ओकरा शिक्षाव्यवसायी-पन्डितलोकनिक बिरादरीसँ फ़राक अपन सोच आ लेखन दुनूमे रचनात्मक दुस्साहस करैए पड़तै आ मिथिलाकेँ आइ एहने दुस्साहसी सभक बेगरता छै| बेगरता छै जे परम्परा आ लीकसँ हटि इतिहास आ संस्कृतिक अज्ञात-अबूझ पक्षसभक ईमानदार उत्खनन कएल जाय|बेगरता छै जे यथास्थितिक बिषायल सस्सरफ़ानीमे फ़ँसल संस्कृतिक व्यापकताकेँ बाहर आनल जाय आ अभिव्यक्तिक सभटा खतरा मोल लेल जाय|जँ कोशीक रत्न साहित्य-संस्कृतिक अग्रदूत संतकवि लक्ष्मीनाथ गोसाइकेँ राज्याश्रयजीवी सम्पादक-संकलक मैथिली कवि नहि मानैत छथि त बेगरता छै जे एकर विरोधमे बगावत हेबाक चाही-मठ,मठाधीश आ मठसैन्यकेँ धराशायी करबाक हद धरि|बेगरता छै जे संस्कृतिक नव इतिहास लिखल जाय|मिथिलाक महान विभूति राष्ट्रकवि दिनकरक कहब छनि-“साहित्यक ताजगी आ बेधकता जतेक शौखिया लेखकमे होइत अछि,ओतेक पेशेवरमे नहि|कृतिमे प्राण ढारैक दृष्टान्त बरोबरि शौखिया लेखके दैत छथि|थरथराहटि,पुलक आ प्रकम्प,ई गुण शौखिएक रचनामे होइछ|पेशेवर लेखक अपन पेशाक चक्करमे एना महो रहैत छथि जे क्रान्तिकारी विचारकेँ ओ खुलिकए खेलय नहि दैत छथि|मतभेद भेलहु पर ओ हुकुम,अंतत:,परम्परेक मानैत छथि|संस्कृतिक इतिहास शौकिये शैलीमे लिखल जाए सकैत अछि|इतिहासकार,अक्सर,एक वा दू शाखाक प्रमाणिक विद्वान होइत छथि|एहन अनेक रास विद्वानक कृति सभमे पैसिकए घटना आ विचार सभक बीच सम्बन्ध बैसयबाक काज वएह कए सकैत अछि ,जे विशेषज्ञ नहि अछि,जे सिक्का,ठीकरा आ ईंटाक गवाहीक बिना नहि बाजबाक आदतक कारणें मौन नहि रहैछ|सांस्कृतिक इतिहास लिखबाक, हमरा बुझने दूएटा मार्ग अछि|या त वएह बात धरि महदूद रही,जे बीसो बेर कहल जाए चुकल अछि आ,एना,अपनो बोर होउ आ आनोकें बोर करू;अथवा आगामी सत्यक पुर्वाभास दिअओ,ओकर खुलिकए घोषणा करू आ समाजमे नीम-हकीम कहाउ,मूर्ख आ अधकपारीक उपाधि प्राप्त करु|” ई दू-टूक कहल जयबाक चाही जे कोनो क्षेत्रक संस्कृति ओहि क्षेत्रक राजा अथवा शासकक बपौती नहि होइछ|संस्कृति होइछै समाजक,जाहिमे शासक-शासित,राजा-प्रजा सभ सन्निहित छै|दोसर शब्दमे संस्कृतिक मात्र आ एकमात्र श्रोत वा केन्द्र मनुष्य आ ओकर जीवन अछि| मनुष्यक समाज ,ओकर सामाजिक संरचना,ओकर खान-पान,रीति-रिवाज आदिक सम्मिलित स्वरूप एहि संस्कृतिक निर्माण करैत अछि|एकरे पसारसँ एकटा क्षेत्र-विशेष अपन एकटा अलग पहचान विकसित करैत अछि जे ओहि क्षेत्र-विशेषक संस्कृति कहल जाइछ|तेँ कोनो क्षेत्रक संस्कृतिक उत्स ओहि क्षेत्रमे रहनिहार मनुष्य,ओकर समाज आ ओकर सामाजिक संरचनामे खोजल जयबाक चाही| देशक अन्य भूभाग जकाँ एतहु आर्यलोकनि आर्येतर जाति संग मिलि जाहि समाजक रचना कयलनि सएह आर्य अथवा हिन्दूलोकनिक बुनियादी समाज भेल आ आर्य-आर्येतर संस्कृतिक मिलनसँ जे संस्कृति जनमल से एतहुका बुनियादी संस्कृति भेल|ई जे बुनियादी समाज भेल,तकर सुसंचालन लेल वर्णाश्रम-व्यवस्था बनल जे कालान्तरमे जाति-व्यवस्थामे परिणत भेल|तेँ मिथिलाक संस्कृतिक यथार्थकेँ बुझबाक लेल देवालय,पोखरि,माछ,मखान,पान आ पाग आदि-इत्यादिक बाइस्कोप देखयसँ पहिने एहि वर्ण-वर्ग-जाति व्यवस्थाक व्रणकेँ फ़ोड़ब आ निर्ममतासँ एकर खैंटी उतारब बहुत आवश्यक अछि|ई पीड़ा देत,दुर्गन्ध पसारत,मुदा एकरा निर्मूल करबाक लेल अथवा वर्त्तमान सामाजिक-आर्थिक परिस्थितिक आवश्यकतानुसार नवीकृत (renewal)करबाक लेल ई जोखिम लेबहि पड़त|मिथिलाक संस्कृतिक प्राचीन निरन्तरताक खूबी-खामीकेँ बुझबाक लेल आ वर्तमान चुनौती सभसँ जुझैत भावी उत्कर्ष पर लए जएबाक लेल एहि व्यवस्थाक संकल्पना,एकर बीजारोपण व सिंचन सँ लएकए एकर पुष्पित-पल्लवित होइत,मौलाइत,क्षरण दिस जाइत आ रोग-दोषसँ ग्रसित भए वर्त्तमानक निकृष्टतम रूप धरि पहुँचैक सम्पुर्ण प्रक्रियाक वैचारिक शल्य-चिकित्सा(चीड़-फाड़) बहुत अनिवार्य भए गेल अछि|एहि समुद्रमन्थनसँ विष बहरयबाक संभावना सेहो अछि किन्तु सामाजिक सत्यक अमृत प्राप्त करबाक लेल ई जोखिम लेबए पड़त|जाधरि एहि सामाजिक संरचनाक रोग-दोषकेँ नीकसँ बूझल नहि जेतैक ताधरि ने एकर कायाक सम्मानजनक नाश सम्भव छै आ ने एकर कायाकल्पक कोनो सम्भावना छै|मिथिले नहि,सम्पूर्ण भारतीय समाजक सांस्कृतिक उत्थान-पतनक जड़िआठमे इएह वर्ण सँ रुपान्तरित जाति-व्यवस्था अछि| विदेह माधव एलाह,हुनक पुरोहित गोतम रहुगण अग्नि प्रज्ज्वलित कएलनि,आवश्यकतानुसार जंगल-झाड़ जराओल गेल,खेती योग्य समतल भूमि बनाओल गेल,समाज सभ्यता आ विकास दिस अग्रसर भेल|आर्य-अनार्यक सम्मिलन सँ बनल मिनजुमला संस्कृति विकसित भेल|कालक्रममे एकीकृत आ व्यवस्थित समाजक रचनाक्रममे परिवर्तनीय वर्णाश्रम-व्यवस्था विकसित भेल|ई वर्णव्यवस्था अपन समयक सर्वाधिक वैज्ञानिक आ व्यावहारिक समाजव्यवस्था छल जखनकि विश्वक अनेकानेक भूभाग तखनो अविकसित आदिम अवस्थामे पड़ल छल|ई व्यवस्था सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक चारि खाम्हबला सशक्त अधिरचना छल|एहि वर्णसमाजमे सामाजिक श्रम,सामाजिक रक्त-सम्बन्ध एवम सामाजिक विचारक नियम परिवर्तनीय छल|सामाजिक व्यक्ति अपन योग्यता,क्षमता आ अभिरुचिक अनुसार सामाजिक श्रमकेँ अंगीकार कए अपन जीवनयापन लेल ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शुद्रक रोजगारमूलक चक्रसँ अपन वर्ण आ श्रम-प्रकार चुनि ओहिमे अपन प्रतिभा आ सामर्थ्यक सदुपयोग आ प्रदर्शन करबाक लेल स्वतन्त्र छल|ओ अपन रागात्मक आकर्षणक आधार पर रक्त-सम्बन्ध स्थापित कए सामाजिक व्यक्ति बनबाक लेल स्वतन्त्र छल|ओ प्रत्येक सामाजिक पहलू पर निर्भीकतापुर्वक अपन विचार व्यक्त करबाक लेल स्वतन्त्र छल|अपन प्रकृतिमे पूर्ण समाजवादी वर्ण-समाज प्राकृतिक सन्साधन पर बेसी आ सामाजिक श्रमसँ अर्जित साधन पर कम निर्भर छल|प्रत्येक व्यक्तिक रोटी आ आजादीक गारन्टी छल|सृजनात्मक संस्कृतिसँ आलोकित ओ काल ताधरि रहल जाधरि ओहि व्यवस्थामे परिवर्तनशीलता रहलै|जँ देखल जाय त सामासिक संस्कृतिक बीजारोपण आ ओकर तीव्र विकासक ओएह कालावधि छल|एहिकालमे सामाजिक श्रम-संस्कृतिक महत्ता त स्थापित भेबे कएल;महासागर,वनप्रदेश,गिरिप्रदेश,मरुप्रदेश,हिमप्रदेश,आकाश आदि पर विजय प्राप्त कए ओकरा अपन अधीन करबाक घातक प्रवृतिक जगह पर ओकरा अपन मित्र बनाए ओकर संरक्षण करबाक संस्कार सेहो जन-जनमे विकसित भेल|देहक नश्वरता आ आत्माक अमरताक सिद्धान्त मनुष्यकेँ अपन भावी पीढीक भविष्यसँ जोड़लक|ई ओ समय छलै जखन विद्यानुरागी आ विद्वानकेँ ब्राह्मणत्व भेटैत छलै,अजुका जँका नहि जे ब्राह्मण वन्शमे जन्म लेलहु त विद्वान होयबे करब|ई ओ समय छलै जखन रणकौशलमे निपुणता क्षत्रियत्वक पैमाना होइत रहय,अजुका जकाँ नहि जे ओहि कुलमे जनमलहुँ त वीर होयबे करब| एकरा जनसंख्याक दबाव कही,वा तत्कालीन समाजक समयगत बाध्यता जे वर्णाश्रम अधिरचनाक परिवर्तनशीलता अपन निरन्तरता कयम नहि राखि सकल आ तकर परिणामस्वरूप अपरिवर्तनीय जन्मना जाति-व्यवस्था अस्तित्व मे आयल|समाज-सत्ताक क्षरणस्वरूप व्यक्ति-सत्ताक बढैत वर्चस्व सेहो एकटा कारण भए सकैत अछि|इएह जन्मना जातीय समाज हमरा सभक वैभवशाली मानवीय संस्कृतिक क्षरणक महत्वपूर्ण कारक भए गेल अछि| जाहि मिथिक नाम पर मिथिला बनल आ जनक वंशक स्थापना भेल,जाहि विदेहकेँ मनु महराज ‘वैश्य द्वारा ब्राह्मणीक गर्भसँ उत्पन्न सन्तान ‘ कहय छथि आ जेकर वर्गीकरण व्रात्यक रुपमे सेहो होइत अछि,ताहि वंशक सीरध्वज जनकक सभामे ‘जनक(वैदेह)वस्तुतः जनक(पिता)छथि’कहैत आ’जनक-जनक‘ उच्चरित करैत ब्रह्मविद्याक ज्ञान लेबाक लेल विद्वतजन सभ दौगैत छलाह|विश्वामित्रक श्रेणी क्षत्रियक छलनि मुदा हुनक प्रबल विद्यालोलुपता अंततः हुनका ब्रह्मर्षिपद उपलब्ध करबैलकनि|अऊँठा कटबाइओकए एकलव्य प्रमाणित कयलनि जे धनुर्विद्यामे पारंगत होएबाक लेल क्षत्रिय होयब त कात जाय दिअ,गुरू आ ब्राह्मणक सदेह उपस्थिति अथवा शिक्षा कतहुसँ आवश्यक वा अनिवार्य नहि अछि|शंबूक अपन घेंट कटबयसँ पहिने विद्वान होएबाक लेल ब्राह्मण होएबाक अनिवार्यताकेँ आधारहीन प्रमाणित कए चुकल छलाह| अपरिवर्तनीय जन्मना जाति-व्यवस्था धरि अबैत-अबैत हमरा सभक समाज कवचमे बन्द घोंघा सदृश्य भए गेल|ई कवच छल पुर्वाग्रहक|जाति-प्रथासँ उपजल एहि स्थितिक मादे समाजविज्ञानी जवाहरलाल नेहरूक कहब छनि जे’भारतमे दुनू बात एके संग बढल|एकदिस त विचार आ सिद्धान्त मे हम सभ बेसी सँ बेसी उदार आ सहिष्णु होएबाक दाबी कएलहुँ|दोसरदिस,हमरसभक सामाजिक आचार अत्यंत संकीर्ण होइत गेल|ई फाटल व्यक्तित्व,सिद्धांत आ आचरणक ई विरोध,आइधरि हमरासभक संग अछि आ आइओ हमसभ ओकर विरुद्ध संघर्ष कए रहल छी|कतेक विचित्र बात अछि जे अपन दृष्टिक संकीर्णता,आदत आ रिवाज आदिक कमजोरीकेँ हमसभ ई कहि अनठिआए देबए चाहैत छी जे हमरासभक पुरखा बड़का लोग छलाह आ हुनकर बड़का-बड़का विचार हमरासभकेँ विरासतमे भेटल अछि|किन्तु,पुरखासभसँ भेटल ज्ञान आ हमरासभक आचरणमे भारी विरोध अछि आ जाधरि हमसभ एहि विरोधक स्थितिकेँ दूर नहि करब,हमरासभक व्यक्तित्व फाटल के फाटले रहि जाएत|’नेहरूक ई कथन मिथिलो पर अक्षरसः लागू होइत अछि|अपरिवर्तनीयता आ जन्मना-एहि दुनू सुरक्षा-कवचसँ संरक्षित मिथिलाक मार्गदर्शक वर्ग आत्ममुग्धता,आलस्य आ मुफ्तखोरीकेँ अपन हक मानि लेलक|श्रेष्टताबोधक पाखंड मिथिलाक ग्रहणशक्तिकेँ गीलि गेल|’जे हम छी,हमरा लग अछि,सएह सर्वश्रेष्ट अछि’क डपोड़शंखी मानसिकता बाहरसँ उत्कृष्टतम चीजहुँकेँ लेब अस्वीकार करए लागल|विदेशी आक्रांतासभक शासनाधीन नहि रहितय त अनेकरास कला,शिल्प,तकनीक,विधा जे विदेशीसभक संग आयल छल,मिथिला समाज तकरोसँ वंचित रहि जैतय|ई मजबूरीमे ग्रहण कएल गुणसभ छल जे हमरासभक गंग-जमुनी संस्कृतिकेँ समृद्ध कयलक,जकरापर आइ हमसभ गर्व करय छी| कोशी नदी मिथिलाक नम्हर भूभागक भाग्यनियंता रहल अछि|एकदिस ई हमरासभक धार्मिक-सांस्कृतिक भौतिक धरोहरसभकेँ नष्ट-भ्रष्ट कयलक अछि त दोसरदिस एकरे चलतबे अपरिग्रह आ संघर्षक संस्कृति निर्मित आ विकसित भेल जेकर सीधा लाभ सामान्य जन-समाजकेँ भेटल|विशिष्ट जन-समाज एहि संस्कृतिसँ अलगे-थलग रहबामे कुशल मानलनि|जँ संघर्ष-संस्कृतिकेँ सर्वस्वीकृति भेटल रहितय त क्षत-विक्षत लोकजीवनक जीजीविषाक परिणामस्वरूप शासनमे आयल खेतिहरसमाजक प्रतिनिधि गोपाल आ सत्ताक निरंकुशताक विरुद्ध जनांदोलन कए शासनमे आयल भीम केवट निर्विवाद नायकक सूचीमे होयतथि| हमसभ जाहि आर्य-आर्येतर सभ्यता-संस्कृतिक संवाहक मानल जाइत छी ओ समन्वयवादी,सामासिक,समावेशी संस्कृति छल|आर्य मनीषी लोकनि हमरासभकेँ ’वसुधैव-कुटुम्बकम’क मंत्रसँ सिक्त कएने छलाह|इएह संस्कृति छल जे सनातन धर्मकेँ एतेक विस्तार देलक|एहि सनातन-सागरमे आबि विदेशी आक्रांतासभक सैकड़ो रक्त-समूह भारतीय भए गेल|सनातन धर्मक विस्तार हमरसभक संस्कृतिओकेँ निरन्तर समृद्ध कयने गेल|सम्पूर्ण मिथिलाकेँ प्रमुखतः सनातनी मानल जाइत अछि|किन्तु,आइ हमसभ ई स्वीकार करी जे हमसभ अपन पूर्वजक नीक,इमानदार आ सुयोग्य उत्तराधिकारी प्रमाणित नहि भए सकलहुँ आ ओहि सनातन-सामासिक संस्कृतिकेँ अक्ष्क्षुण्ण नहि राखि सकलहुँ|जे समाज अपन धूर विरोधी बुद्धकेँ अपन अवतार घोषित करबाक उदारता देखयलक,वएह समाज मैथिल-महासभाक आयोजक भेल|जाहि बौद्धिक वर्ग पर वर्ण-जाति संरचना-संरक्षणक भार छलय सएह वर्ग परम स्वार्थी बनि अपन रक्त-शुद्धताकेँ रेकर्डेड करयबाक उताहुलतामे पंजी-प्रवन्धक व्यवस्था कए लेल|वेदव्यास एतेक ध्यान राखलनि जे’चातुर्वर्ण्य मया सृज्यते’कृष्णावतार-मुखसँ कहबएलनि,मुदा सत्ता-संरक्षणक आत्ममुग्धतामे पंजी-प्रवन्धक औचित्य लेल कोनो लोकलाजक पालन नहि कएल गेल|”मिथिला”आ”मैथिल”शब्दक प्रयोगकेँ हमसभ जतेक विराट आ व्यापक अर्थवत्ता प्रदान करिऔक,एहि दुनू शब्दक अर्थ आम-अवाममे की लगाओल जाइ छै,से ककरोसँ नुकायल नहि अछि|एतय मिथिलाक सामाजिक बुनावटक रग-रग चिन्हयबला साधु-जनकवि वैद्यनाथ मिश्र यात्री जीक एकटा लेखक अंश देब समीचीन बुझाइत अछि-“मैथिल महासभाक सिद्धान्तानुसार मैथिल ब्राह्मण तथा कर्ण कायस्थ(!)मात्र सुच्चा मैथिल थिकाह|मिथिलाक सीमाक भीतर बसैत,मिथिलाक अन्न-जलसँ निर्वाह करैत,विशुद्ध मैथिली बजैत भूमिहार-क्षत्रिय आदि अन्य जातीय यदि क्यो अपनाकें मैथिल कहताह तँ जातीय महासभा नांगरि ठाढ क क हुनका दिस बधुआएत,मुँह विजकौत|परिणामस्वरूप हुनका लोकनि अपना घर-आंगनमे व्यवहृत भाषा-ठेठ मैथिलीकें मैथिली कहबामे अपन हेठी बुझै लागल छथि|’हम मैथिल नहि,बिहारी थिकहुँ’-ई भावना हमरा लोकनिमे जाहि तेजीसँ पसरि रहल अछि,से देखि एहन कोन मैथिल हृदय हैत जे आहत नहि भ रहल हो?मिथिलेश-सुधारक मिथिलेश(?)जाहि संस्थाक कर्णधार होथि,तकर एहि प्रकारक संकुचित सिद्धांत देखि मिथिलाक लाख-लाख अधिवासी-जे मैथिल होइतहुँ मैथिल नहि,क्षुब्ध अछि|चिरकालसँ अपनहि घरमे,अपनहि बन्धु-वर्गक द्वारा ठोंठिऔल गेल मिथिलाक सन्तान आइ यदि आजिज आबि अपनाकें बिहारी कहब आरंभ कैलक अछि तँ एहिमे केकर दोष?’महासभा’क कतोक सदस्यक मनमे घुरि-फिरि ई बात अबैत हेतैन्हि जे मिथिलाक सकल अधिवासीकें मैथिल मानि लेला सँ मैथिलत्वक अग्रगण्य अंगमे धार्मिक वा समाजिक धक्का लगवाक सम्भव|” यात्री जीक ई विचार आइ सँ 73वर्ष पहिने विभूति,फरवरी 1938 अंकमे छपल छल|एहि स्थितिमे आइओ कोनो सकारात्मक परिवर्तन नहि भेल अछि,उन्टे बिगड़ले अछि| वर्ण-व्यवस्थाक बिगड़ल निकृष्ट रूप जाति-व्यवस्थाक औचित्य-अनौचित्य पर घमर्थन होइत रहल छै,होइत रहतै,मुदा एहि यथार्थसँ मुँह नहि मोड़ल जाय सकैत अछि जे मिथिलाक सांस्कृतिक उत्थान-पतनमे ई व्यवस्था अनिवार्य आ महत्वपूर्ण कारक रहल अछि आ रहत|आल्हा-रुदल,नैका-बनिजारा,लोरिकायण,भगैत आदिक जे लोकगायनक संस्कृतिक परम्परा रहय अथवा छै,तकर निर्वहनमे आइ धरि केओ द्विज किऐक नहि एलाह?ई ठेकेदारी की मात्र सोल्हकनक छिअय?मैथिली मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक भाषा छै आ एहिसँ सम्बन्धित सभटा संस्था-पुरस्कार पर इएह दुनू जातिक आधिपत्य छै-एहि आरोपक कोनो प्रायोगिक खण्डन आइ धरि किऐक नहि भए सकल?भाषा सेहो संस्कृतिक आवश्यक आ अविभाज्य अंग छै|जँ भाषा समावेशी नहि हएत त समावेशी संस्कृति कोना विकसित हएत? ई प्रसन्नताक गप अछि जे जँ राजनीतीक क्षेत्रकेँ छोड़ि दी त सामाजिक जीवनमे जाति-पातिक महत्ता समाप्त प्रायः छै|एकर कारण खुलल अर्थव्यवस्थाक नीती होअय,भौतिकवादी होड़ होअय वा एहि दुनूक चलतबे बढल जीवन-संघर्ष,किन्तु जाति-पाति अजुका लोकक विचार-सूचीमे बहुत नीचाँ छै आ मात्र चुनावेक बेरमे शीर्ष पर आबय छै|तेँ समरसताक संस्कृतिकेँ फिलबक्त सतह पर कोनो खतरा नहि देखाइत अछि|एहि क्षेत्रक ऊर्वर माटि-पानिमे सामासिक संस्कृतिक बीआ तेहन सघन छीटल छै जे बेमुरव्वत मौसम आ लापरवाह किसानक अछैतहुँ ई पनुकैत रहय छै,फसिल दैत रहय छै आ एतहुका वासीकेँ जीवित आ गतिवान बनेने रहैत छै|किन्तु कतहु गहींरमे आगि भए सकैत छै|तेँ समयक तगादा छै जे वर्त्तमानमे जातीय-व्यवस्थाकेँ कोनो तार्किक आ वैज्ञानिक निष्कर्ष धरि आनल जाय,अन्यथा सांस्कृतिक उत्कर्षक लक्ष्य पायब सन्देहास्पद अछि|जवाहरलाल नेहरु कहने छलाह-“आइ हमरासभक समक्ष जे प्रश्न अछि,ओ मात्र सैद्धांतिक नहि अछि,ओकर सम्बन्ध हमरसभक जीवनक सम्पूर्ण प्रक्रियासँ अछि आ ओकर समुचित समाधान आ निदाने पर हमरसभक भविष्य निर्भर करैत अछि|साधारणतः,एहन समस्यासभकेँ सोझराबयमे नेतृत्व देबाक काज मनीषी लोकनि करैत छथि|किन्तु ओसभ काज नहि एलाह| ओहिमे सँ किछु त एहन छथि,जे एहि समस्याक स्वरुपहिकेँ नहि बूझि पाबि रहल छथि|बकियासभ हारि मानि लेने छथि|ओ सभ बिफलता-बोधसँ पीड़ित आ आत्माक संकटसँ ग्रस्त छथि आ बुझिए नहि पाबि रहल छथि जे जीवनकेँ कोन दिशा दिस मोड़ब उचित होयत|”नेहरुक एहि निराश टिप्पणीक बाद वैश्विक समाजवादी चिन्तक एंजेल्सक ई वक्तव्य विचारणीय अछि-“कोनो खास आर्थिक संरचनाक समस्याक समाधान ओही संरचनाक नियम के अनुसार कएल जायब अनिवार्य अछि,जँ कोनो दोसर संरचनाक नियमसँ ओकर समस्याक समाधान कएल जायत त ओ बेजाय ढंगसँ विद्रूप भए जायत|”एंजेल्सक एहि कथनमे हमरासभक जातीय(आर्थिक)संरचनाक समस्याक समाधानक कुंजी नुकायल अछि|मिथिला आ भारतक लेल सांस्कृतिक संकटक कारण बनल जातिप्रथाक वर्त्तमान संकटक समाधान एहि जातिप्रथाक संरचनाक भीतरे अछि|एकरे नियमसँ एकरा युगानुरूप उपयोगी बनायल जाए सकैत अछि आ ई काज हमरेसभकेँ करए पड़त|मिथिलाक संस्कृतिक इएह तगादा अछि|मिथिला आ एकर संस्कृतिक उत्कर्षक इएह टा मार्ग अछि| नाटककार गुणनाथ झासँ चन्दन कुमार झाक गपशप चन्दन कुमार झा: अपनेक जुड़ाव साहित्यक संग कोना भेल ? गुणनाथ झा : साहित्यसँ जुड़ाव तऽ छात्र-जीवने सँ छल । हमर पिताजी पं॰घनानाथ झा सेहो साहित्यकार छलाह । हुनकर तीनटा कृति प्रकाशित सेहो भेल छलन्हि । हुनकर लिखल "भक्त गोविन्ददास" आ' "धरु गोविन्दक पएर" ग्रन्थालय सँ प्रकाशित भेल छलन्हि । ई दुनू पोथी गोविन्ददासक जीवनी छलैक । एकर अलावे "सहोदर वृहत गल्प" सेहो प्रकाशित भेल छलन्हि । हुनकर लिखल "चामुण्डा" आ' "सैव्या हरिश्चन्द्र" एखनो अप्रकाशित अछि मुदा पाण्डुलीपि एखनो उपलब्ध भऽ सकैत छैक । ई पोथी सभ आब हमरो ल'ग उपलब्ध नहि अछि । भऽ सकैत छैक जे दरभंगाक पुस्ताकलयमे कतहु होइ वा पं.चन्द्रनाथ मिश्र"अमर"जी ल'ग सेहो भऽ सकैत छन्हि । ई पोथीसभ जखन प्रकाशित भेलैक तखन हम स्नातकमे पढ़ैत रही आ' हमहीँ एकर प्रूफ देखने रही । ओहि समयमे साहित्य पढ़बाक रुचि तऽ रहए मुदा साहित्य-लेखन हम कोलकाता एलाक बाद प्रारंभ कएलहुँ । चन्दन कुमार झा: अहाँ कोलकाता कहिया ऐलहुँ आ' एतय मैथिली साहित्य आ'रंगमंच सँ कोना जुड़लहुँ ? गुणनाथ झा : हम दिसम्बर १९६३ ईस्वीमे कलकत्ता आयल छलहुँ । तारीख हेतैक २३ वा २४ दिसम्बर । ओहि समयमे हम एम.ए. द्वितीय बरखक छात्र रही आ' एतय एबाक मुख्य-प्रयोजन छल आगाँक पढ़ाइ करब । जीवनमे पहिल बेर कोनो महानगर देखलियैक । कलकत्ता प्रथम दृष्टिए बड़ नीक लागल । ऐठाम हमर प्रथम ठेकान वा बासा छल भवानीपुर । जतए स्व. जयदेव लाभक ठेक रहन्हि । हम हुनके लग रही । ओतए हम मात्र तीन-चारि दिन रहलहुँ आ'एहि क्रममे स्व.श्रीकांत मण्डल भेँट भेल रहथि आ फेर ओ हमर परममित्र भऽ गेलाह । फेर किछु मास हुनके संग बीतल आ कालक्रममे कतेको बासा बदलल तकर आब ठेकानो नहि अछि ।ओही समयमे श्रीकांतजी सँ जे गप्प-सप भेल रहए तकर निचोर जँ कही तऽ यएह छल जे मैथिलीमे आधुनिक नाटकक परम अभाव छलैक जखन कि बङलामे सब प्रकारक नाटक लिखल गेल आ' मंचित होइत छलैक । श्री प्रवीर मुखर्जीक नाट्यदल"राजा-साजा" सँ श्रीकांत जी जुड़ल छलाह । प्रवीरबाबू स्वयं नाटककार, अभिनेता आ निर्देशक छलाह । ओ मैथिली नाटक सभक निर्देशन सेहो करैत छलाह । हमर "पाथेय"के सेहो ओ निर्देशन कएने छलाह आ एकर उल्लेख यादवपुर विश्वविद्यालय सँ प्रकाशित नाट्य-संकलनमे सेहो अछि । प्रवीरदाके नाटकक नीक परख रहन्हि । एहि तरहेँ हुनका सभक गोष्ठीमे श्रीकांतजीक संगे अबरजात भऽ गेल आ कलकत्ता अयलाक बाद शीघ्रे हम मैथिली नाट्य गोष्ठी " मिथिला कला केन्द्र" सँ जुड़ि गेलहुँ । बादमे एकर मंत्री सेहो भेलहुँ ।मुदा एहिक्रममे परमश्रद्धेय प्रबोधबाबूक अथक प्रयासक बादो हमर अपूर्ण पठन-पाठन चिरदिनेक लेल अपूर्ण रहि गले आ एलआइसीमे कार्यरत भऽ गेलहुँ । चन्दन कुमार झा: अहाँ नाट्य-लेखन दिश कोना आकर्षित भेलहुँ ? गुणनाथ झा : कलकत्ता अएलाक बाद एहिठामक मैथिलजनक स्थिति देख मोनमे जेना उड़ि-बीड़ी लागि गेल रहए । दरभंगा धरि हमरा ई ज्ञान नहि रहए जे हमर समाजक लोक एतेक निराखर,एतेक अकिञ्चन आ परदेशोमे एतेक अवहेलित सन जिनगी जिबैत छथि । एहिठामक मैथिल-मैथिलीक ई दृश्य हमर निन्न जेना तोड़ि देलक । मोनमे बेर-बेर हुअए जे स्वजनक एहि दुर्दशाक प्रतिकार हेतु किछु करी । एहन संयोग भेलैक जे एकदिन रासबिहारी मोड़ पर फेर वएह बात उठलै जे कहियो श्रीकांत जी कहने छलाह । स्व.सुखदेव ठाकुर चर्च कए देलखिन्ह जे मैथिली भाषामे आधुनिक नाटकक लेखन नहि भऽ सकैछ । ओहिदिन ई बात जेना हमरा मोनमे गड़िगेल । मोनहि मोन प्रण लेलहुँ जे हम लिखब मैथिलीक आधुनिक विषय पर नाटक । विषय हमरा ल'ग रहबे करए । आ' से एक्कहि मासक अवधिमे हम मधुयामिनी आ पाथेय लिखलहुँ ।ओना एहिसँ पूर्व हम कनिञा-पुतरा लिखने रही मुदा ओकरा हम अपनहुँ आधुनिक नाटकक श्रेणीमे नहि गनैत छी । हमर आधुनिक नाटक-लेखन यात्रा "मधुयामिनी"सँ प्रारंभ भेल । फेर हम कनिञा-पुतरा, शेष नञि, आजुक लोक, लाल बुझक्कर, सातम चरित्र आ' जय मैथिली लिखलहुँ । महाकवि विद्यापति नामक एकटा एकांकी सेहो लिखने छी मुदा आब सोचैत छी जे एकरा पूर्णांक नाटक बना दियैक । एहि नाटक सभक कतेको बेर मंचन भेल । एकर अलावे हालहिमे बाङ्गला एकाङ्की नाट्य-संग्रह जाहिमे बांग्लाक २४ टा नाटककारक २४ टा एकांकीक संकलन अछि,तकर बांग्लासँ मैथिली अनुवाद कएलहुँ । ई पोथी साहित्य अकादमी दिल्ली सँ प्रकाशित अछि । मुदा अपन लिखल नाटक सभमे मात्र “पाथेय” प्रकाशित अछि सेहो आब बजारमे पोथी उपलब्ध नहि छैक । हमरो ल'ग मात्र एक्कहिटा प्रति बाँचल अछि । मधुयामिनी आ सातम चरित्र लोकमंच नामक नाट्य-पत्रिकामे प्रकाशित भेल रहए । चन्दन कुमार झा: नाटकक अलावे अपने कोनो आन विधा मे किछु लिखलियैक ? गुणनाथ झा : हाँ नाटकक अलावे हम किछु कविता आ आलेख सेहो लिखलहुँ । ई सभ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे छपल जेना पटना सँ प्रकाशित "मिथिला मिहिर"मे आ' देवघरसँ प्रकाशित "स्वदेशवाणी" मे । चन्दन कुमार झा: अहाँ मिथियात्री नामक नाट्य संस्था सेहो शुरु कएने रही तकर मादेँ किछु जानकारी देल जाउ । गुणनाथ झा : जखन हम कलकत्ता आएल रही तहियो आइए जकाँ मिथिला-मैथिली सँ संबंधित अनेक संस्थासभ छलैक । ओहि समयमे दयानंद ठाकुर एकटा नव नारा देने रहथिन्ह जकर चर्चा एखन कतहु नहि होइत देखैत छी । ओ कहलथिन्ह जे सभसंस्थाके एकीकरण कएल जाए मुदा ओहि समयमे हम एहिबातक विरोध कएने रहियैक । हमर मानब रहय जे सभ संस्था सब यदि अलग-अलग थोड़बो-थोड़बो काज करतैक तऽ मैथिलीक लेल कुल मिलाके बेशी काज हेतैक आ एहि सँ मैथिलीक बेशी प्रचार-प्रसार हेतैक । एहि क्रममेँ आपसी मतांतरक चलते मिथिला कला केन्द्र बंद भऽ गेल । हम स्व. फुलेश्वर झा, स्व. विश्वंभर ठाकुर,निरसन लाभ, दयानाथ झा, सूर्यकांत झा,आ' राजेन्द्र मल्लिककेँ संगे मिथियात्रिक स्थापना केलहुँ । दोसरदिश सीताराम चौधरी सेहो मैथिली रंगमंचक स्थापना केलाह । मिथियात्री बेशी दिन नहि चललै मुदा एकर नाट्य प्रस्तुति सालमे दू बेर होइत छलैक आ' आन-आन संस्था सभ प्रायः सालाना आयोजन करैत छल से कम्मो समयमे एकर नाट्यमंचनक संख्या एतेक भऽ गेलैक जे ई मैथिली रंगमंचक इतिहासक एकटा अभिन्न अंग बनि गेल रहैक । मुदा अपन मध्यायुक अबितहि हम आकस्मिक रूपेँ बीमार भऽ गेलहुँ आ' अपेक्षित सहयोगक अभाव मे बुझू तऽ दिवालिया भऽ गेलहुँ ।फलतः ने अभिष्ट दिशामे कोनो काज भऽ सकल आ ने आने किछु । लेकिन सभसँ बेशी जे बातक कचोट अछि से जे आन-आन संस्था सभ तऽ चलिते रहलैक लेकिन फेर हमर कोनो प्रयासक कतहु चर्चो तक किएक नहि भेलैक ? एहिसाल फेर किछु युवासभ सक्रिय भेलाह अछि आ' आशा करैत छी जे पूर्वक “मिथियात्री” आ “झंकार” आपसमे मीलि "मिथियात्रीक झंकार"केँ तत्वाधानमे अगिला दिसंबर तक गोटेक नाटकक मंचन करत । चन्दन कुमार झा: गुणनाथ झा मैथिली रंगमंच सँ कतिआएल गेलाह तकर कोन कारण अहाँक नजरि मे अबैत अछि ? गुणनाथ झा : ओना तऽ हमर जन्मो दरबारेक परिवेशमे भेल छल मुदा बचपने सँ हमरा कहियो दरबारीपन नहि सोहाएल । शाइद तइँ हम एकात कऽ देल गेलहुँ । सभदिन हमर मूलमंत्र रहल अछि -"एकला चलो" लेकिन अपन काज करैत रहू । बीचमे कतेको संस्था वा रंगमंच हमरा सम्मानित करबाक आ'कि कहियौ जे अपना गुटमे सम्मिलित करबाक प्रयास कएलनि मुदा हम अपनाभरि एहिसभ सँ बचबाक प्रयास कएलहुँ । हम बुझैत छी जे एखन तक हम कोनो एहन काज करबे नहि कएलहुँ जाहि हेतु हमरा सम्मानित कएल जाए । हमर सोचल बहुत रास काज एखनो अपूर्ण अछि । ई सभ काज जहिया पूर्ण होयत तहिए हम मैथिलीके किछु सेवा कए सकलहुँ से बूझब । ओना कोनो संस्था हमरा सम्मानित केलक कि नहि एहिबातक हर्ष-विषाद हमरा मोनमे कहियो नहि रहल । हमरा लेल असली सम्मान हमर नाटकक दर्शकक थोपड़ी अछि । एकबेर "पाथेय" केर संबंध मे रामलोचनजी कतहु लिखने रहथिन्ह जे पाथेय तऽ एहन नाटक छैक जकरा यदि मंच पर सँ केयो एकगोटे पढ़ि मात्र देतैक तइयो दर्शक नहि हिलत । हमरा लेल एहन तरहक समीक्षा सभसँ पैघ सम्मान थिक । ओना कुल मिलाकऽ कहब जे क्रमशः लोकक धारणा बदलि रहल छैक । आस्था कतहु ने कतहु छैक मुदा कष्ट होइत अछि जखन काजके आगाँ बढैत नहि देखैत छी । संस्था सभसँ साहित्य आ' समाजकेँ कल्याण होइत नहि देखैत छी । चन्दन कुमार झा: अपने कहल जे एखनहु किछु काज अपूर्ण अछि । कोन काज छैक ई सभ ? गुणनाथ झा : सभसँ पहिने तऽ जे किछु लिखने छी से समाजक लेल लिखने छी । तैँ समाजक चीज समाजक हाथमे पहुँचि जाइ से प्रयासमे लागल छी । एकरा अलावे मैथिली रंगमंचक उत्थान होइ ताहि खातिर सेहो काज करब । अहाँ मैथिली नाटकक भविष्य केहन देखैत छी ? नाटक एकटा पैघ आ' क्लिष्ट विधा छैक । एकरा लेल रंगमंच चाही संगहि दर्शक सेहो चाही । मुदा, वर्तमान मे नाटकक स्तर आ कलाकारक गुटबाजीमे दर्शक कमि गेलैए । एहनामे कखनो काल तऽ बुझाइत अछि जे मैथिलीमे नाटक कहीँ खतमे ने भऽ जाइ । फेर जखन कखनो नवतुरियाक सक्रियता देखैत छिऐक तऽ एकटा आस सेहो जगैत अछि । चन्दन कुमार झा: फेर मैथिली नाटकक विकास कोना हेतइ ? गुणनाथ झा : नाटकक विकासके लेल आवश्यक छैक जे सम-सामयिक विषय पर केन्द्रित भऽ नाट्य-लेखन कएल जाए । नाटक बिना गुटक वा मंडलीक संभव नहि मुदा रंगमंचक गुटके रचनात्मक हेबाक चाही । नाटकमे संवादक भाषा पर सेहो धेयान देब आवश्यक होइत छैक । भाषा ओहन होइ जकरा पात्र सुगमतापूर्वक उच्चारण कए सकय आ' दर्शकके सेहो तत्काल भाव स्पष्ट होइ। एहिसँ ओवर-एक्टिंग सेहो नहि हेतैक । लेकिन भाषाक सुगमता माने एकदम्मसँ बोलचालक भाषा सेहो नहि हेबाक चाही । साहित्यक गरिमाकेँ सेहो धेयानमे राखल जेबाक चाही । एहिठाम हमरा एकटा बात मोन पड़ैत अछि जे बहुत दिन पहिनेके बात छैक । एकटा नाटककार, जिनकर स्थान वर्तमान मैथिली रंगमंच पर सर्वश्रेष्ठ कहल जाइत छन्हि, के पहिल नाटकक मंचन होइ बला रहैक । संयोग सँ हमर एकटा परिचित कलाकार ओहि रिहर्सल मे रहथि । रिहर्सलेके क्रममे निर्देशक ओहि नाटककारके सूचित कएलखिन्ह जे अहाँक एहि नाटकमे बड्ड गारि छैक से कने कम्म कऽ दियैक । तकर प्रत्युत्तर दैत ओ नाटककार कहलखिन्ह जे हमरा अपना जतेक गारि अबैत अछि ओकर दसांशो नहि एहि नाटकमे छैक । हमरा हुनकर ई बात सुनि छगुन्ता लागि गेल । आब कहू जे एहि सँ नाटकक स्तर केहन बचतैक ? नाट्यकारके हरदम ई प्रयास करबाक चाही जे मैथिली नाटक सर्वभारतीय मंच पर प्रतिष्ठित होइ । मैथिलीक नाटकक पोथीके भारतक आन-आन भाषामे अनुवाद कएल जाए आ' मंचन कएल जाए । तखने मैथिली नाटकक विकास हेतैक । चन्दन कुमार झा: तकनीकी दृष्टिकोण सँ मैथिली नाटक कतेक पछुआएल छैक ? गुणनाथ झा : बहुत..बहुत पछुआएल छैक । एतय आइधरि कोनो एहन संस्था नहि छैक जतए नाटकक समुचित पढ़ाइ आ ट्रेनिंग देल जाए । बंगाली रंगमंच सँ कतेको गोटे सिनेमामे गेल लेकिन मैथिली रंगमंचमे कतहु एहन व्यवस्था नहि छैक । संगीत आ मंच परहुक प्रकाश व्यवस्था सेहो नाटक मंचनक हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण होइत छैक आ से एहि क्षेत्र सभक विकास हेतु सेहो प्रयासक जरुरति छैक । रंगमंच सँ जुड़ल संस्था सभकेँ नाट्यगृह बनेबा पर सेहो धेयान देबाक चाही । चन्दन कुमार झा: वर्तमान मे कोन नाटककार अहाँकेँ सभसँ बेशी प्रभावित करैत छथि ? गुणनाथ झा : आधुनिक मंच पर हम जतेक नाटककारके पढने-देखने छी ताहिमे कियो हमरा प्रभावित नहि करैत छथि । पुरानमे ईशनाथ झाक “उगना” आ“चीनीक लड्डू” एवं गोविन्द झाक “बसात” हमरा बेस प्रभावी लगैत अछि । चन्दन कुमार झा: कहल जाइत छैक जे मैथिली रंगमंच पर गुटबाजी के संगे जातिवादिता सेहो छैक । अहाँक केहन अनुभव अछि ? गुणनाथ झा : हाँ...हम एहि सँ सहमत छी । ओना हमरा व्यक्तिगत रूपे कहियो एहिसँ (जातिवादिता) पाला नहि पड़ल अछि मुदा छैक ..निश्चिते छैक से हम अनुभव कएल । लेकिन ई सभटा नाटकक विकासक बाटमे बाधक छैक । एहिसभसँ हमरा सभकेँ खासकऽ नवतुरियाकेँ बचबाक चाही । रंगकर्मी के जाति-पाति से कोनो लेना-देना नहि हेबाक चाही । ओकरा लेल तऽ रंगमंचे मंदिर हेबाक चाही । ओना एहन तरहक बात बेबहार किछु पाइक लोभमे सेहो किछु लोक करैत छथि । मुदा ई सर्वथा निंदनीय अछि । चन्दन कुमार झा: अहाँक अगिला योजना की सभ अछि ? गुणनाथ झा : अगिला योजना कहबे केलहुँ जे सर्वप्रथम अपन अप्रकाशित कृतिसभकेँ प्रकाशित करेबाक चेष्टा करब बादबाँकि आब अपना तऽ किछु बचल नहि अछि ।कोनो ने कोनो विधि सभटा एहिसभमे उत्सर्ग भऽ गेल ।से आब जीवनो मात्र समाज आ' साहित्येक बलेँ व्यतीत करबाक अछि । चन्दन कुमार झा: नवतुरिया के किछु कहए चाहबनि ? गुणनाथ झा : नवतुरिया केँ एतबे कहबनि जे ओ अपन काज करथि । गुटबाजी आ' जातिवादक फेरमे नहि पड़थि । जौं गुटबाजी रचनात्मक उद्देश्य के लेल हो तऽ गुटबाजियो नीक । जीवनमे कखनो घबरेबाक नहि चाही । समाजक लेल सदति क्रियाशील रही । हमर जीवन एकटा पाठ अछि आ हम एहिसँ जतबा सिखलहुँ ताहि आधार पर कहब जे बाधा-विघ्न जिजीविषाकेँ मात्र तीव्र आ' जाग्रत करैत छैक । विदेह सदेह:११ || 551 552 || विदेह सदेह:११
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TAGORE Lirerature AWARDS ae 2077 Winner Profiles MMS. SHEELA KOLAMBKAR ‘Awarded for Geera Language - Konkani Gonre - Short Stories Ms. Sheela Kolambkar is a renowned writer, who has written several short stories, poems and essays which have been translated in various languages such 9s English, Portuguese, French, Marathi, Hindi, Telugu and Malayalam, She has been bestowed with Sahitya Akademi Award for 'Bhuim-Chafim’ and *Bhangarachen Sukne’ in the year 997 and 2007 respectively. Ms Kolambker's: ‘collection of short stories: is an eloquent display of the agonies faced by women in @ male dominated society. Her work demonstrates her prowess in describing the finer nuances of a woman's relationships with the men who ‘come in her life —a child, husband, friends, and even acquaintances snd well-wishers. As one of the first femaie Konkani writers; Ms Kolambkar's path breaking writing has contributed immensely to the shaping of the Konkani literature. Geera collection covers literary work of the author spanning aver 25 years. MR. K. KUNJAMOHAN SINGH Awarded for Eina Kenge Kenba Natte Language — Manipuri Gonre - Short Stories. ‘Mr. Kunjamohan's book containing हैं short stories and spread over 08 pages, displays his mastery in the art of storytelling. In almost all the stories featured in the book, the contemporary situations of Manipur are beautifully portrayed in 8 language familiar to common people. N. Kunjamonan Singh is widely known 28.2 writar af short stories and he has algo translated from Bangla into Manipuri, Rabindranath Tagore's famous novel ‘Gore’. mr uAGbjsid pita hawt’ Awarded for Gaamak Jing? Language ~ Maithill Genre — Short Stories Mr, Jagdish Prasad Mandal is a well Known wiiter with @ Masters in Arts. His Work spans genres of novels, short storles, seed stories, long slories or posms thet present vivid description of life in Mithils initiating resurgence in Maithili literature. First published in 2009, Gaamak Jingi is & collection of Maithili ‘short stories which depict different facets of village life. The stories here represent the joys and sorraws, pleasures and pain, agony and ecstasies of the life of people of these villages. The way these stories. capture the nuances of language of men and women of different castes and classes in Mithilanchal makes this collection worthy of this award. Some of his other famous works Includes novels such 25. Maulail Gachhak Phool, Jingik Jeet, and Uthan Patan, anthology of poems like Indradhanushi Aakash, Gitanjali and Raiit Din & plays such as Compromise and Jhameliya Biyah,
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