1 2 ISSN 2229-547X विदेह सदेह -१२ (विदेह-सदेह १२, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक १११-११५) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मण्डल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक: नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद: पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग: विनीत उत्पल। श्रुति प्रकाशन ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रतिएवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नै कएल जा सकैत अछि। ISBN : 978-93-80538-90-7 ISSN: 2229-547X मूल्य : भा. रू. २००/- संस्करण : २०१२ © श्रुति प्रकाशन श्रुति प्रकाशन रजिस्टर्ड आॅफिस : ८/२१, भूतल, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- ११०००८. दूरभाष- (०११) २५८८९६५६-५८ फैक्स- (०११) २५८८९६५७ Website : http://www.shruti-publication.com e-mail : shruti.publication@shruti-publication.com Printed at : Ajay Arts, Delhi-110002 Typeset by : Umesh Mandal. Distributor : Pallavi Distributors, Ward no-6, Nirmali (Supaul). मो.- ९५७२४५०४०५, ९९३१६५४७४२ Videha Sadeha 12 : A Collection of Maithili Prose and Verse (source:Videha e-journal at www.videha.co.in). अनुक्रम गजेन्द्र ठाकुर सम्पादकीय डा.राजेन्द्र विमल नव–नव क्षितिजक सन्धान करैत सुजीतक जिद्दी जितेन्द्र झा राजेश्वर नेपालीक सातटा कृति विमोचित अरविन्द श्रीवास्तव ‘मणिपद्मक काव्यकृतिक आलोचनात्मक अध्ययन’ पुस्तकक लोकार्पण मुन्नी कामत कतऽ जा रहल छी हम! दुर्गानन्द मण्डल जीवन-मरण: समीक्षा डॉ.अरुण कुमार सिंह स्वातन्त्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता/ मातृभाषाक माध्यमसँ उच्चशिक्षा आशीष अनचिन्हार काफिया मुन्नाजी बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा ओम प्रकाश झा मैथिली बाल गजलक अवधारणा/ भोथ हथियार जगदानन्द झा मनु बाल गजलक अवधारणा आशीष अनचिन्हार की थिक बाल गजल चंदन कुमार झा मैथिली बाल-साहित्य आ बाल-गजल अमित मिश्र बाल गजल: कोमल करेजक आखर मिहिर झा बाल गजल नवेंदु कुमार झा बिजलीक क्षेत्र मे आत्म निर्भरताक लेल सरकार कऽ रहल प्रयास/ पटना मे पसरत हीराक चमक/ निगरानी विभागक लेल बनि रहल विशिष्ट संवर्ग/ बिहार मे निवेशक इच्छा जनौलक रैनबैक्सी राजदेव मण्डल जगदीश प्रसाद मण्डलक कविता संग्रह: राति-दिन डॉ. धनाकर ठाकुर समीक्षा: फूल तितली आ तुलबुल (लेखक- श्री सियाराम झा सरस) कैलास दास म्याराथन दौड़ आ जनकपुर/ अंगना सुखल घरमे पानि/ महिलाक प्रेरक कथा संग्रह ‘जिद्दी’ सुजीत कुमार झा मिथिला पेन्टिङ्गक विदेशमे मांग बढ़ल- छत्तामे मिथिला पेन्टिङ्ग शत्रुधन प्रसाद साह मैथिली महिला आ जिद्दी विजय मस्त सुजीतक सम्पूर्ण कथा एकटा नया स्वाद देलक बलराम साहु विस्मित होइत हमर लोक संस्कृति पूनम मण्डल मैथिलीक तेसर विकीलीक्स/ मणिपद्म जयन्तीपर दिल्लीमे मिथिलांगन द्वारा कवि गोष्ठी ९ सितम्बर २०१२ केँ सम्पन्न विहनिकथा- लघुकथा- दीर्घकथा पंकज चौधरी (नवलश्री) विहनि कथा - ई नोर छै गरीबीक ओम प्रकाश झा विहनि कथा- प्रोग्रेसिभ/ बीस टाका राम विलास साहु विहनि कथा- स्कूलक खिचड़ी/ चोर-सिपाही चन्दन कुमार झा विहनि कथा- टटका रचना मुन्नी कामत विहनि कथा- टूटल मन जगदानन्द झा मनु रोटीक स्वाद/ अन्तिम जगह जवाहर लाल काश्यप विहनि कथा- जमाना बदलि गेलै कामिनी कामायनी लघुकथा- कलंकित चान/ उत्तराक नोर पद्य नन्द विलास राय कन्यादान/ बेपार मुन्नीकामत भ्रष्टाचारक प्रसाद/ तब हँसत तुलसी/ शिल्पकार/ याद गामक/ आसक किरण/ नारीक पहचान/ आजाद गजल १-२/ बेटी/ दहेजक आगि/ ओइ पार/ नेताजी/ पहिल बरखा/ किसान/ बूँदक मोल/ करी मिथिलासँ पहचान/ काइरझुमरी कोसी/ नै लेब आब हम दहेज/ मिथिलाक दादा/ पाहुनक माछ/ हमरा पागल कहैत अछि लोग/ सगरे अनहार अछि/ मायक रूदन/ मजबूर किसान/ बलराम साह द्वन्द्वक मझधार मुकुन्द मयंक कनियाँ विनीत उत्पल नामर्दक शहरमे/ गजल कामिनी कामायनी चिड़ैक अभिलाष मिहिर झा महगी/ हौ रामचंदर राजेश कुमार झा (कन्हैया) एकटा प्रेम बिरहक कथा/ माँ/ पश्चिमी सभ्यता/ तामस/ देश भक्ति नारायण झा एखनहु जकड़ल छी/ एकता इरा मल्लिक बैसू लगमे, नीक लगैए राम विलास साहु सिम्मर केर फूल/ ओलंपिक/ रौदी प्रमोद रंगीले नेताजी जिन्दाबाद अनिल मल्लिक गजल १-२ अविनाश झा अंशु गजल पंकज चौधरी “नवलश्री” गजल १-३ राजीव रंजन मिश्र गजल १-४ शिव कुमार यादव बरखाक मौसम ऐलए/ हमर एतबहि अपराध छल रूबी झा गजल १-२ कुसुम ठाकुर किछु हाइकू हेम नारायण साहु जुलुम भऽ रहल अछि.../ भष्टाचार/ समता बाल मुकुन्द पाठक गजल १-४ पवन कुमार साह भाय-यौ भाय-यौ../ मोनक बात राजदेव मण्डल कानैत हँसी/ कनहेपर भाेलबा/ महफा आ अरथी/ काटैत बीआ/ घरक आँखि/ अभ्यास/ अकाल शशिधर कुमर पूणा प्रवास सत्यनारायण झा ओहिना मोन अछि ओ दिन जगदानन्द झा मनु गीत १-५/ गजल/ हम एहन किएक छी?/ कोना मदर डे हैप्पी? किशन कारीगर हास्य कविता- पंडा आ दलाल/ फुसियाँहिक झगड़ा/ फोंफ काटि रहल सरकार/ घोंघाउज आ उपराउँज/ अहींटा एकटा नीक लोक छी शिव कुमार झा टिल्लू सुखार/ आजाद गजल १-२/ दृष्टिकोण शिशु उत्सव शिव कुमार यादव बाल गजल/ बौआ हमरा आब जुनि तंग कर रूबी झा बाल गजल १-१३ इरा मल्लिक बाल गजल १-२/ मेघ बरसलै मुन्नाजी बाल गजल १-३ प्रशांत मैथिल बाल गजल पंकज चौधरी (नवलश्री) बाल गजल १-८/ मेघक चोर जवाहर लाल काश्यप बाल गजल क्रांति कुमार सुदर्शन बाल गजल जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल बाल गजल अमित मिश्र बाल गजल १-३ ओमप्रकाश झा बाल गजल चंदन कुमार झा बाल गजल १-३ जगदानन्द झा मनु बाल गजल १-३ कुमार संभव ‘भारद्वाज’ हमर भारत देश महान मिहिर झा बाल गजल १-४ गजेन्द्र ठाकुर बाल गजल कैलास दास खोजए पड़त मातृत्व बालगीत जगदानन्द झा मनु करुण हृदयक मालिक महाराज रणजीत सिंह/ बाल प्रेरक विहनि कथा संकल्पक धनी विल्मा रुडोंल्फ प्रीति प्रिया झा ज्ञानक बल मुन्नी कामत बउआ देखहक चांदकेँ/ भोरक सनेस जगदीश प्रसाद मण्डल घटक काका नाट्य उत्सव मुन्नीकामत नाटकः- शिक्षित बेटी
गजेन्द्र ठाकुर सम्पादकीय मैथिली प्रतिभा पुरस्कारसँ ७ गोटे राजबिराजमे सम्मानित -मैथिली कवि परिषद (मैथिली साहित्य परिषदक शाखा)क , द्वारा ई पहिने मैथिली बाल प्रतिभा पुरस्कार रूपेँ देल जाइ छल। ई पुरस्कार मैथिली कवि परिषदक अध्यक्ष श्री महेन्द्र मण्डल बनबारी द्वारा प्रारम्भ कएल गेल रहए। ऐ बेरसँ एकर नाम मैथिली प्रतिभा पुरस्कार राखल गेल अछि। -कवि सागर वीर कादरी, रेडियो नाटक कलाकार जीबछ दास, भूपेन्द्र मण्डल, गायक देवेन्द्र साहा सोनी आ शिवशंकर यादव, मैथिली संगीतक क्षेत्रमे राम अधीन साहा आ प्रीति अधिकारीकेँ ई पुरस्कार देल गेलन्हि। -समन्वय २०१२: भारतीय लेखनक उत्सव:२-४ नवम्बर २०१२: (इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव) -एकर साइट अछि http://samanvayindianlanguagesfestival.org -समन्वयक छथि सत्यानन्द निरूपम आ गिरिराज कराडू -उत्सवक निदेशक छथि- राज लिबरहान -उत्सवक एडवाइजरी बोर्डमे छथि-आलोक राय, के.सच्चिदानन्दन, लक्ष्मण गायकवाड, ओम थानवी, महमूद फारूकी, ममता सागर, रवि सिंह, सीतांशु यशचन्द्र, तेमशुला आओ। -आयोजन कमेटीमे छथि- १.इण्डिया हैबीटेट सेन्टरक प्रोग्राम टीम, २.पारस नाथ, अनन्त नाथ। -सहयोगी छथि, दिल्ली प्रेस आ प्रतिलिपि बुक्स। -समन्वय २०११ मे मैथिलीक प्रतिनिधित्व केने रहथि- गंगेश गुंजन। http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2011/gangesh-gunjan/ सुभाष चन्द्र यादव "बनैत- बिगड़ैत" सँ जातिवादी मानसिकताक मैथिली साहित्यकारक कष्टक कारण स्पष्ट अछि। सुभाष चन्द्र यादव जै कम्यूनिटीसँ आबै छथि ओकरा धोखा नै दै छथि, ओकर समस्या, ओकर भाषा लेल संघर्षरत छथि, समझौता नै करै छथि, आइडियोलोजीमे स्थिरता छन ्हि (जे तारानन्द वियोगी आ महेन्द्र नारायण राममे नै छन्हि), आ सएह कारण अछि जे ओ ओइ जातिवादी मानसिकताक मोहन भारद्वाज, योगानन्द झा, रामदेव झा आदिक कोपक शिकार छथि (जखन कि तारानन्द वियोगी आ महेन्द्र नारायण राम स्वीकृत)। यएह कारण अछि जे जखन मैथिली लेखक संघमे सुभाषचन्द्र यादवक "बनैत बिगड़ैत"पर परिचर्चा आयोजित भेल तखन अशोक आ तारानन्द वियोगी अपन आलेख रखबाक हिम्मत जुटेलन्हि मुदा योगानन्द झा आ मोहन भारद्वाज मौन धारण केने रहलाह (नवेन्दु कुमार झा ओइ परिचर्चामे उपस्थित रहथि)। मुदा जखन कबिलपुरक ब्लैकमेलर सभक पत्र "विद्यापति टाइम्स" हम देखलौं तँ चकित रहि गेलौं- एकटा हेडिंग रहै - "घरदेखियासँ आगाँ नै बढ़ि सकला बनैत-बिगड़ैत केर लेखक- मोहन भारद्वाज"!!! -मैथिली लेखक संघक परिचर्चाक रिपोर्ट!!! योगानन्द झाक घृणित मानसिकता सोझाँ आएल छल हमरा लग। मोहन भारद्वाज ओइ खबरिक आइ धरि खण्डन नै केलनि, माने हुनकर सहमतिसँ ई झूठ प्रकाशित भेल। घर-बाहरमे आ मिथिला दर्शनमे कमल मोहन चुन्नूक "महेन्द्र मलंगिया" आ "मोहन भारद्वाज" सन जातिवादी मानसिकताक लोक लेल साहित्य अकादेमी पुरस्ककार वकालति जखन लगातार प्रारम्भ भेल तखन अनायास हमरा "विद्यापति टाइम्स" मोन पड़ि गेल आ पूरा साजिश सोझाँ आबि गेल। की ई सुभाष चन्द्र यादव बनैत-बिगड़ैतक विरुद्ध साजिश नै अछि? जखन नचिकेताक "नो एण्ट्री मा प्रविश"क विरुद्ध अमरेश पाठक, चन्द्रनाथ मिश्र अमर आ मायानन्द मिश्र एकजुट भऽ गेला आ प्रतिक्रियावादी कवि उदयचन्द्र झा विनोदकेँ पछिला साल अकादेमी पुरस्कार दिया देल गेल तखनो सभ किछु स्पष्ट छल। पढ़ू बनैत-बिगड़ैत http://sites.google.com/a/shruti-publication.com/shruti-publication/Home/Banait_Bigrait_SubhashChandraYadav.pdf?attredirects=0 ३ राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ (सुभाष चन्द्र यादव) जे साहित्य अकादेमी द्वारा रामदेव झा आ मोहन भारद्वाजक कृपासँ प्रकाशित नै भऽ सकल। https://docs.google.com/a/videha.com/viewer?a=v&pid=sites&srcid=dmlkZWhhLmNvbXx2aWRlaGEtcG90aGl8Z3g6NDNiMmVhYThlOTNiMDA5Zg राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ (सुभाष चन्द्र यादव) download link https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Rajkamal_Monograph.pdf?attredirects=0&d=1 https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Rajkamal_Monograph.pdf?attredirects=0&d=1 dbb13891-a-96a2f0ab-s-sites.googlegroups.com September 11 at 11:28pm · Like · 1 · Remove Preview Gangesh Gunjan राजकमल जी (विनिबंध)क प्रकरण कान मे पडल तं छल, से कतोक वर्ख भ गेलै आब| मुदा से एहन कुरूप छैक से अहींक एहि फेस बुकिया समाद मे स्पष्ट भेलय| तें एकर धन्यवाद अहीं कें दैत छी गजेन्द्र जी |... ओना वास्तविक तं ई जे सम्पूर्ण पढबा सं पहिने मोन "विरक्त" भ' गेल | नै पढि भेल आगाँ ! नीक केलौहें नेट पर द' क'| समकालीन आ आगत पीढ़ी सेहो बुझओ ई कारी-कथा! हमरा सन लोकक विडम्बना देखू जे पूरा प्रकरण अपन अनुज- मित्र- अग्रज सं जुडल अछि| से एहन ऐतिहासिक दुर्घटना भ' गेल अछि ! उत्तरदायी व्यक्तिगत हम कतहु सं नै | मुदा साहित्यिक पीढ़ीक नैतिकता सं "अपराध बोध" सहबा लेल अभिशप्त छी| उपाय ? सस्नेह,
11 सितम्बर 2012 11:26 pm ४ साहित्य अकादेमीमे समन्वयक पद लेल कालाबाजारी (ब्लैक मार्केटिंग)- एकटा रिपोर्ट साहित्य अकादेमी दिल्लीक मैथिली समन्वयक चुनाव लेल जे संस्था सभ निर्धारित अछि ओकर नाम अछि:- विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा; सचिव वैद्यनाथ चौधरी “बैजू” आ अध्यक्ष- पं. चन्द्रनाथ मिश्र अमर। अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद, दरभंगा; सचिव डा. गणपति मिश्र , अध्यक्ष रहथि स्व. जयमन्त मिश्र। चेतना समिति, पटना, सचिव श्री विवेकानन्द ठाकुर, अध्यक्ष श्रीमति प्रमीला झा। राँटी मधुबनीक कोनो संस्था, सम्भवतः वर्तमान अध्यक्ष श्री हेतुकर झा। किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषद (जे संस्था विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ हुनका ब्राह्मण घोषित करबाक कुकृत्य केलक), वर्तमान अध्यक्ष श्री सुरेन्द्र नारायण झा आ सचिव गंगाधर झा। पंचानन मिश्रक अखिल भारतीय मैथिली साहित्य समिति, इलाहाबाद; आ मैथिली लोक साहित्य परिषद, कोलकाता, सम्भवतः वर्तमान अध्यक्ष- अणिमा सिंह। ऐ मे सँ किछु संस्थाक नाम आ वर्तमान अध्यक्ष आदिमे परिवर्तन सम्भव अछि।
ऐ मे सँ अधिकतर संस्था कागजी अछि वा साहित्यिक नै राजनैतिक अछि आ जातिवाद, क्षेत्रवाद आ आनुवंशिक आधारपर संचालित अछि। ४ घर-बाहरक जातिवादी रंगमंचसँ जुड़ल वा सहिष्णु सम्पादक मण्डलक (वासुकीनाथ झा, रमानन्द झा रमण आ कमल मोहन चुन्नू) कृत्य: घर-बाहर जुलाई २०१२: ब्राह्मणवादी तेवर, माने चोरिक खुलेआम समर्थन। पंकज पराशर नामक चोरकेँ जुग-जुग जीबथु कॉलममे स्थान देल गेल अछि,जै मिथिलाक समाजमे बारहो वर्ण चोरकेँ खेहारि कऽ बाहर कऽ दै छै, ओतै मैथिली साहित्यक ब्राह्मणवादी सम्पादक मण्डल चोरक खुलेआम समर्थक बनि गेल, कारण चोर ओकर जातिक अछि। दोसर ऐ चित्र मे आनन्द कुमार झाकेँ युवा नाटककार सम्मान भेटलापर ऐ जातिवादी रंगमंचक सम्पादक लोकनिकेँ कष्ट छन्हि, - चयन प्रक्रियापर की सवाल उठल छल से अनुत्तरित अछि, माने ब्राह्मणवादी ब्लैकमेलिंग, जातिवादी रंगमंचसँ जुड़ु, सहयोगी बनू आ नै तँ ब्लैकमेलिंग झेलू। ४ ऐ बेरुका बाल साहित्य पुरस्कार मैथिलीमे अ-बाल साहित्य, मुरलीधर झाक "पिलपिलहा गाछ", केँ देल गेल, मुरलीधर झा निर्लज्जतापूर्वक फूल-माला-पाग पहीरि रहल छथि आ किछु जातिवादी लोक निर्लज्जतापूर्वक ई सभ हुनका पहिरा रहल अछि। प्रस्तुत अछि ऐ अंकमे ऐपर रिपोर्ट आ चन्द्रनाथ मिश्र अमर-रामदेव झाक तेसर पीढ़ीक गारिक अपशब्द। किछु मेल आ एस.एम.एस. सँ आएल गारिक संकलन ओइ रिपोर्टमे अछि। जिनका विजयदेव झा वा शंकरदेव झा (चन्द्रनाथ मिश्र अमर-रामदेव झाक तेसर पीढ़ी)क गारियुक्त पोस्टकार्ड-ई-मेल (वा अखबार-पत्रिकामे ब्लैकमेलिंगबला न्यूज) वा अपशब्दयुक्त एस.एम.एस. भेटल छन्हि ओ हमर ई-मेल ggajendra@videha.com पर स्कैन कॉपी अग्रसारित करथु वा मेल फॉरवार्ड करथु। एकर सभक अपशब्दयुक्त एस.एम.एस. हमर मोबाइल नम्बर ०९९११३८२०७८ पर अग्रसारित करू। ई सभ व्यक्ति जकर स्थान जेल छिऐ ओ नपुंशक जातिवादी साहित्यिक (!!) लोक सभक चलैत साहित्य अकादेमीक माध्यमसँ मैथिली साहित्यकेँ पछिला ४५ सालसँ ब्लैकमेल करैत रहल, मुदा तकर आइ अन्तिम दिन छल। एकटा अखबारमे ब्लैकमेलिंगबला न्यूज-रिपोर्टमे ई सभ ब्लैकमेलर नचिकेताकेँ मैथिल नै मानैए। नचिकेता, भीमनाथ झा आदि सेहो ऐ सभ लेल परोक्ष रूपसँ जिम्मेवार छथि, जे ऐ तरहक गारि-गरौअलि सुनैत रहला आ एकर सभक मोन बढ़ैत रहलै। मैथिलीक ब्राह्मणवादी आ कायस्थवादी (यएह दूटा वाद मे मैथिलीक पत्र-पत्रिका सभ बँटल अछि) पत्र-पत्रिकामे आपसमे घोर मतविभिन्नता छै, मारि-काटि छै मुदा विदेहक विरुद्ध ई सभ एक भऽ जाइए। नचिकेता जीक "मिथिला दर्शन" सेहो आब ब्राह्मणवादी पत्रिका भऽ गेल अछि, आ प्रधान सम्पादक जिम्मेवारीसँ बचि नै सकै छथि, हुनकर ई कर्तव्य छन्हि जे ओ अपन सम्पादक मण्डलमे सुधार करथु आ ओइमे किछु गोटेमे साहसक संचार करथु। सुकान्त सोमक एकटा आएल छन्हि मिथिला दर्शनमे। ओइ आलेखमे बहुत रास गलत तथ्य अछि। अतीत मंथन २००७ सँ २००९ मे छपले नै छै से हुनका नै बुझल छन्हि। गामक जिनगी मैथिली साहित्यक सर्वश्रेष्ठ कथा संग्रह छै ई तथ्य ओ स्वीकार नै कऽ सकला। मैथिलीमे कोहुना कोनो पोथीकेँ पुरस्कार भेटौ ई घुमा कऽ कहि अपन मंशा ओ प्रकट कऽ देलन्हि। भगलपुरिया जूरीकेँ ओ दरभंगिया जूरी सन बना कऽ प्रस्तुत केलन्हि, आ अहूमे हुनकर निरपेक्षता घास चरै लेल गेल बुझाइत अछि| सुकान्त सोमकेँ बुझल छन्हि जे कार्यक्रम बंगलोर मे भेलै! जखनकि कार्यक्रम कोच्चिमे भेल रहै। सुकान्त सोम टैगोर साहित्य सम्मानकेँ रवीन्द्र पुरस्कार कहि रहल छथि!! सुकान्त सोमक अघोषित जातिवाद बहुत किछु कहि जाइत अछि। डा.राजेन्द्र विमल नव–नव क्षितिजक सन्धान करैत सुजीतक जिद्दी
साहचर्य–सम्भूत रसोद्भावनाक चतुर, युवा कथाकार सुजीत कुमार झाक कथा मिथिलाञ्चलक महानगरोन्मुख शहरक विविधतापूर्ण परिवेश आ पात्रक स्थिति–मनस्थितिक सूक्ष्म चित्राङ्कन प्रस्तुत करैत अछि । प्रत्येक कथा कोनो एक गोट एहने शहरी पात्रक जीवनमे झटका नेने आएल कोनो निर्णायक मोड़क नाटकीय रुपमे जखन प्रत्यक्षीकरण करबैछ तऽ पाठक चिहँुकि उठैत अछि । सामान्य घटनासभक श्रृङ्खलासँ आरम्भ भेल कथा मध्यधरि अबैत–अबैत सूच्याग्र भऽ जाइत अछि आ अन्तमे एकटा ‘करेण्ट’ जेकाँ लगबैत अछि । – जेना सामान्य यात्रामे चलैत–चलैत केओ आगाँमे फँेच कढ़ने, नाङरिपर ठाढ़ गहुमन देखि नेने हो ! शिल्पक ई वैशिष्ठ्य हिनका मैथिलीक अन्य कथाकारसँ अलगहे फराक कए दैत अछि । महानगरोन्मुख समाजक चित्राङ्कनक संगहि कथा एक गोट मनोवैज्ञानिक सत्यक उद्घाटन करैत अछि । कथामे एक गोट एहन स्थल अबैत अछि जखन आश्चर्यचकित भेल पाठक सोचैत अछि, ‘ अरे ! ई की भऽ गेलै ?’ – आ तखने कथाक अन्त भऽ जाइ छै । अमेरिकी कथाकार ओ. हेनरीक स्मरण भऽ अबैछ । अवग्रहमे पड़ल पात्रक प्राण जेना अकस्मात् मुक्ति–पथ पाबि लैछ ! कथाकार सुजीत कुमार झाक कथाकारिताक दोसर उल्लेखनीय निजत्व थिक – अनतिदीर्घता अर्थात् संक्षिप्तता । हिनक कथाक घटना–परिघटना ज्यामितीय चित्र जेकाँ एक–दोसरकेँ कटैत, ओझराइत–सोझराइत आगाँ नहि बढ़ैछ । कथाक तीर सनसनाइत जाइत अछि आ अर्जूनक लक्ष्य–भेद जेकाँ चिड़ैक आँखिटा देखैत ओकर भेदन करैत अछि आ कुशल धनुर्धरक धनुर्विद्याक सफलताक प्रमाणसँ धन्य भऽ जाइत अछि । तँए कथासभमे एकटा प्रभावान्वितियुक्त त्वरा छैक । हिनक सभ पात्र खाँटी मैथिल थिकाह – विभिन्न जाति, वर्गक मध्यवित्तीय मैथिल । सुजीत कुमार मध्यवित्तीय मैथिल जीवनक सफल कथाकार छथि । परम्परागत मूल्यक सिमेण्टसँ ठोस बनल संयुक्त परिवारमे देखल जाइत पारस्परिक स्नेह, विश्वास, वलिदान, सेवा, करुणा, अनुशासन आदि श्रेष्ठ मानवीय गुणमे लागल पश्चिमी सोचक नोनीसँ उत्पन्न दरार देखि कथाकारक हृदय दरकि जाइत छैन्हि आ हुनक लगभग प्रत्येक कथा खण्डित होइत एहि मूल्यकेँ पुनस्र्थापित करबाक कलात्मक चेष्टा बनि जाइत अछि । सहज–स्वभाविक कथोपकथनक मुक्तावलीसँ बनल–बूनल ई कथा सभक कथाकारक अपन परिवेशक भोगल यथार्थ सभक चित्रावलीसँ सजाओल सुन्दर ‘अलबम’ थिक । कथाकार सुजीत कुमारक कथाक सेहो एक गोट प्रमुख तत्व थिक सहज मानवीय राग–बन्ध । सुप्रसिद्ध आलोचक ई.एम.एलब्राइड लिखने छथि जे कथा–साहित्यक समस्त भावात्मक तत्वमे एकटा प्रेमे एहन थिक जकर सर्वाधिक प्रयोग भेल अछि, कारण प्रेम मानव–स्वभावक सर्वव्यापक तत्व थिक । ‘पूmल फुलाइएकऽ रहल’ कथाक उच्च कुलशीला, सुशिक्षिता नायिका पिंकी अन्तद्र्वन्द्वक भंवरमे फँसि उबडुब करैत मुक्तिक हेतु तखन हाथ पएर भाँजऽ लगैत छथि । जखन हुनका पता लगैत छैन्हि जे जाहि पुरुषकेँ सहायक स्टेशन मास्टर कहि हुनक विवाह रचाओल गेल छल आ जकरा अपन सम्पूर्ण संचेतना समर्पण दऽ ओ इन्द्रधनुषी कल्पनाक इन्द्रजालमे ओझराएलि अपन सुधिबुधि हेरा चुकलि छलीह से सहायक स्टेशन मास्टर नहि एकटा साधारण पैटमैन अछि जे वस्तुतः अपन मालिक स्टेशन मास्टर आ सहायक स्टेशन मास्टरक घरलए बजारसँ झोड़ाक भोड़ा तरकारी कीनिकऽ अनैत अछि तऽ ओ सातम आसमानसँ खसैत छथि । मुदा, ई स्वयंसिद्ध नायिका अग्निकेँ साक्षी राखि लेल गेल पतिब्रत्य संकल्पकेँ स्मरण कए एकटा नव अवतार लैत छथि – अपन चिताक छाउरसँ पुनः उड़ि आसमानकेँ छुबैत मिथकीय पन्छी ‘स्फिङ्स’ जेकाँ ! नायककेँ एम.ए.धरि पढ़बैत छथि । अन्ततः नायक सहायक स्टेशन मास्टरक पदपर प्रतिष्ठित होइत छथि । ‘नयाँ व्यपार’–क रोगग्रस्त नायक जितेन्द्र प्रसादक हँसैत–खेलैत गार्हस्थ जीवन महत्वकांक्षाक बबण्डरमे उधियाकऽ तहस–नहस भऽ गेल अछि । स्वयं रोगशैय्यापर पड़ल छथि, बच्चासभ अपन–अपन व्यवसाय–संसारमे हेराएल अछि आ पत्नी साधना सड़कपर चलैत लोकक आँखिमे गरदा झोंकैत, मिश्राजीक स्कूटरपर बैसि, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसमे सहभागी होएबाक लेल उड़ि जाइत छथि । कथा वर्तमान पारिवारिक जीवनक विद्रूपता आ विसङ्गतिकेँ रेखाङ्कित करैत अछि । ‘खाली घर’–क नायक जयचन्द्र आ नायिका जानकी रेलक पटरी जेकाँ जीवन पर्यन्त समानान्तर चलैत छथि, मुदा कहियो, कखनो मीलि ने पबैत छथि । तकर कारण छैक पतिकेँ आदेश–अनुवर्तिनी ‘रोवोट’ नारीक चाहिऐन्हि, सासु–ससुरकेँ पुतहुक पटमासि कएल बहिकिरनीक बेगरता छैन्हि । मुदा पति अपन ‘स्व’–क संग जीवाक आकांक्षिणी छथि । एकटा शीतयुद्धमे जीवन बीति जाइत अछि, रीति जाइत अछि । ‘लाल किताब’ परामनोविज्ञानपर आधारित रहस्य–रोमाञ्चसँ भड़ल कथा थिक । सेवक प्रसाद यादवजी १८ गतेकेँ अपन कक्षमे एकसरि बैसलि कथा नायिका मित्रपत्नीकेँ अत्यन्त अनुराग पूर्वक एक गोट लाल डायरी भेंट कऽ गेल रहै छथि । मित्रपत्नीकेँ जबर्दस्ती हाथ पकड़ि ओ अपना लग बैसबै छथि–हाथ अकल्पित रुपें सर्द–हेमाल किए लगै छल से ओ बूझि नहि पबैत छथि । मुदा जखन मित्रक मृत्युपर शोकविह्वल भेल नायिका पति बाहरसँ आबिकऽ सेवक प्रसादक मृत्यु सत्रहे गते भऽ गेल होएबाक सूचना दै छथिन्ह तऽ ओ काँपि उठैत छथि । मायक सह पाबि गिन्नी पढ़ाइ छोड़ि नृत्यमे प्रशिक्षित भऽ आय दिन नव–नव ‘पब्लिक शो’ करऽ लगलीह । बाप अपन बेटीकेँ ग्लैमर दिशि आकृष्ट देखि चिन्तामग्न रहै छथि, मुदा जिदाहि पत्नीक आगाँ विवश रहै छथि । परिणामतः जखन पता चलल जे गिन्नी व्यसनी, व्यभिचारिणी आ गर्भिणी भऽ गेलि छथि तऽ वातावरण हाक्रोशकऽ उठैत अछि । ताबत बहुत बिलम्ब भऽ गेल रहैत छैक । ‘जादू’ कथाक नायिका सिम्मी घरपर जा कम्पनीक उत्पाद बेचऽबाली सेल्सगर्ल छलीह, मुदा हुनक मधुरवाणी आ शिष्ट व्यवहारक जादू रेणु आ हुनकर पतिक दिमागपर एना ने चढ़ल जे रेणुक पति हुनका अपन कम्पनीक नीक पदक हेतु अफर दऽ देलथिन्ह । परम्परावादी मूल्यक खण्डहरपर ठाढ़ होइत बलुआही पारिवारिक संरचनापर कठोर प्रहार अछि कथा– ‘ आदर्श’ परम्परावादी पति आ सासुकेँ लात मारि घर छोड़ि चलि तऽ अबै छथि अद्र्धआधुनिका शिक्षिका नायिका, मुदा पन्द्रह वर्षक पश्चात् जखन अपन कक्षामे एक गोट भविष्णु युवकक नाम ‘ आदर्श’ सूनि ओ चिहुँकि उठै छथि जेना ककोड़विच्छा अनचोकेमे डंक मारि देने होइक । आदर्शक पिताक नाम छै – अरुण, जिला न्यायाधीश, अर्थात् ओकर पूर्वपति । स्टाफ रुममे आबिकऽ धम्म दऽ बैसि जाइत छथि, मस्तिष्कमे अन्हड़–विहाड़ि नेने । एहि स्थलपर आबि विखण्डनवादी मूल्य हारि जाइत अछि आ संयुक्त परिवारक परम्परावादी मूल्य विजय घोष करैत अछि । ‘अर्थहीन यात्रा’क नायिका नेहा अपन पति माधवसँ एहि दुआरे असन्तुष्ट रहैत छथि जे ओ महत्वकांक्षाक उन्मादसँ ग्रस्त नहि छथि, पार्टी–क्लवक सौखीन नहि छथि, भौतिक चमक दमकमे विश्वास नहि करैत छथि, नेहाक लेल ‘ गिप्mट’ नहि अनैत छथि आदि । तलकालए ओ जानकीरामसँ विवाह करैत छथि, बेटी तेजिकऽ । फेर ओ जानकी रामकेँ छोड़ि अन्य पुरुष संगे रहए लगैत छथि – पति पत्नीवत्, मुदा अविवाहित । पश्चिमसँ आएल ‘लिविङ्ग टूगेदर’–क चपेटिमे पड़लि नेहा अन्ततः अपनहि लेल निर्णायक कारण पश्चातापक आगिमे धू–धूकऽ जरऽ लगैत छथि । प्रस्तुत कथा सेहो पछबा हवाक विरोध आ पुरवाक समर्थनमे देवाल जेकाँ ठाढ़ अछि । नारी मनोविज्ञानक सुन्दर आ यर्थाथवादी विश्लेषण प्रस्तुत करैत कथा ‘व्यर्थक उड़ान’–क नायक कार्यालयक काजसँ जे विराटनगर गेलाह तऽ दू–चारि दिन विलम्ब की भेलैन्हि नायिका ऊनी स्वेटर जेकाँ मोनमे लहराइत भावक रंग–विरंगी लच्छाकेँ ओझरबैत–सोझरबैत जँ दुर्भाग्यसँ वैधव्यक पहाड़ टूटि पड़ल होइन्हि तऽ शेष यात्रा कमलसंग बितएबाक, ओकरा संग हनीमून मनएबाधरिक कल्पनामे डूबि जाइ छथि कि धम्म दऽ पति जूमि जाइत छथिन्ह । ओ पतिकेँ भरि पाँज पजियाकऽ हबोढ़कार भऽ कानऽ लगै छथि । ‘निष्ठा कि देखाबा’ एक गोट घोर यथार्थवादी मार्मिक कथा अछि । नीमाक पति सोहनक दुनू किडनी सड़ि गेल छैक जकर प्रत्यारोपण डाक्टरक सलाह अनुसार भेल्लोरमे जा करएबाक बदला ओ पतिकेँ जल्दीसँ जल्दी गाम एहि दुआरे लऽ जाइत छथि जे सम्पति सम्बन्धी कागजात सभपर हुनकर हस्ताक्षर लेल जा सकए । पतिकेँ मरबाक चिन्ता नहि, सम्पति डुबबाक चिन्ता बेसी घेरने छैन्हि । मुदा भाग्यक व्यंग्य ई थिक जे अन्तिम साँसधरि पति हुनका पतिपरायणा मानैत छथि । ‘केहन सजाय’ एक गोट टुग्गरि बालिका चमेलीक कथा अछि । जकरा कोनो सन्तानहीन सम्भ्रान्त दम्पती गोद नेने छल, मुदा जखन ओहि दम्पतीकेँ अपन औरसँ सन्तान जनमि जाइत छैक, चमेली ओहि घरमे नहि, ‘महिला सदन’मे पठा देल जाइत छथि । ओ तऽ धन्य कही संस्थाक नव अध्यक्षा आ पूर्व प्रधानाध्यापिका कामिनी मैडमकेँ जनिक करुणापूर्ण प्रयाससँ ओ रितेशक संग परिणय सूत्रमे बन्हा जीवनक भसिआइत नाओक लेल किनार पाबि लैत छथि । मेनकाक कोमल नारी हृदयकेँ हँथोड़ैथि ‘मेनका’ जीवन झँझावातक आघात–प्रतिघातसँ नारी हृदय समुद्रमे उठैत उत्ताल तरङ्गक विक्षोभकारी कथा थिक । मेनका परित्यक्ता थिकीह । हुनक पति चन्द्रभूषण सुन्दरी युवती नीनाक मोहपाशमे ओझरा हुनकर परित्यागकऽ देने छलथिन । नारी–अहंपर चोट लगैत अछि । मेनका प्राध्यापन सेवामे संलग्न छथि, जतऽ हिनक सम्पर्क विवाहित सहकर्मी राजीव सरसँ होइत छैन्हि । राजीव सरक व्यक्तित्वक चुम्बकीय प्रभावमे मेनकाक व्यक्तित्व लौहकण जेकाँ आकृष्ट होइत अछि, मुदा जखन ओ सोचै छथि जे राजीवपत्नी आरतीक हेतु हुनक प्रणय–लीला नीना–कर्मसँ कम हिंसक किंवा घृणित नहि होएत तऽ ओ अपनामे सिमटिकऽ कठोर लौहपिण्ड बनि जाइत छथि, जे चुम्बककेँ घीचि सकैत अछि, मुदा चुम्बकसँ घिचा नहि सकैत अछि । कथाकार सुजीत कुमार झाक कथाक विषय– चयन, बनाबट आ बुनाबट, भाषा शैली आ कलात्मक उच्चतामे उत्तरोत्तर प्रौढ़ता अबैत जाएत आ ओ मैथिली कथाक हेतु एहिना विषय आ शिल्पक नव–नव क्षितिजक सन्धान करैत नव प्रतिमानक स्थापनामे सफल होएताह, हमर विश्वास अछि । जितेन्द्र झा राजेश्वर नेपालीक सातटा कृति विमोचित
पत्रकार तथा साहित्यकार राजेश्वर नेपाली लिखित ७ टा कृतिक एक्कहिबेर विमोचन कएल गेल अछि । राष्ट्रपति रामवरण यादव राष्ट्रपति भवन, शीतल निवासमे आसिन १३ गते शनिदिन आयोजित कार्यक्रममे नेपाली लिखित पोथीसभक विमोचन कएलनि ।
पुस्तकसभ नेपाली, मैथिली आ हिन्दी भाषामे अछि । जनकपुरमे रहि पत्रकारितामे सक्रिय नेपाली लिखित लोकतन्त्रको लालिमा आ विचारक्रान्ति नेपाली कविता संग्रह, गरिबको व्यथा नेपाली खण्डकाव्य, नव नेपाल हिन्दी कविता संग्रह, सोहागिन आ विचारक्रान्ति मैथिली कविता संग्रह आ क्रान्तिकारी सरयुग चौधरीको जीवनी विमोचित भेल । राष्ट्रपति रामवरण यादव राजेश्वर नेपालीक पत्रकारिता आ साहित्यिक योगदानके प्रशंसा कएने रहथि । नेपाली काँग्रेसक कृयाशील कार्यकर्ताक रुपमा प्रजातन्त्रक लेल संघर्ष करैत काल नेपालीक सँग बिताओल दिन राष्ट्रपति याद कएने रहथि ।
मिथिलाञ्चल क्षेत्रक विभूति, शहिदके विषयमे पत्रिकामे लिखिकऽ जीवन्त रखबाक काज नेपालीक सराहनीय पक्ष रहल राष्ट्रपतिक कहब छलनि । साहित्य, पत्रकारिता आ राजनीति तीनू क्षेत्रमे नेपालीक दखल रहल कहैत राष्ट्रपति यादव हुनका बहुआयामिक व्यक्तित्वके संज्ञा देलनि । “मिथिलाक पाबनि तिहार, ऐतिहासिक स्थल, आ विभिन्न महत्वपुर्ण राजनीतिक घटनाक विषयमे जानकारी लेबालेल नेपालीसँ सम्पर्क करैत छी” राष्ट्रपति कहलनि ।
नेपालीक कृतिमे स्वच्छन्दतावादी चेतनाक प्रवाह भेल बात प्रा. कुलप्रसाद कोइराला कहलनि । डा.रामदयाल राकेश राजेश्वर नेपालीके पत्रकारक रुपमे मात्र नहि साहित्यकारके रुपमे सेहो सम्मान भेटबाक चाही ताहिपर जोड देने रहथि । प्राध्यापक कुलप्रसाद कोइराला विमोचित पुस्तकसभमे व्यावसायिक दृष्टिसँ किछु कमजोरी रहितो भाव बुझएबामे सफल रहल कहने रहथि । नेपाली लिखित मैथिली कृति अन्य भाषाक हुनके कृतिपर भारी पड़ल हुनक टिप्पणी छलनि । तहिना आशा सिन्हा, पुरुषोत्तम दाहाल कृतिक विषयमे मन्तव्य व्यक्त कएने रहथि । रविन्द्र साह स्मृति प्रतिष्ठान, जनकपुरद्वारा आयोजित कार्यक्रममे वक्तासभ नेपालीक कृति सभमे समग्रमे सामाजिक चेतनाके उद्घाटित करबाक प्रयास भेल कहने रहथि । अरविन्द श्रीवास्तव ‘मणिपद्मक काव्यकृतिक आलोचनात्मक अध्ययन’ पुस्तकक लोकार्पण - मणिपद्म मैथिली साहित्यक पहिल जासूसी उपन्यासकार रहथि - मणिपद्म मिथिला क्षेत्रक लोकदेवताकेँ पहिल बेर साहित्यिक स्वरूप प्रदान केलनि - मैथिलीक गंभीर कविक रूपमे सेहो स्मरण कएल जाइत छथि मणिपद्म डा. ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म’ पौराणिक संस्कृतिक लोकगाथा अथवा कथाक रूपमे रचनाक संरचनामे अपन जीवनकालक अधिकांश भाग लगेलनि। परिणामस्वरूप- लोरिक मनियार, दीनाभद्री, राजा सलहेस, दुलरा दयाल, नैका बनिजारा, कुसुमा मालिन, मल्लवंश, चुहरमल इत्यादि पात्र जे अनादि कालसँ लोक कंठमे रचल-बसल रहथि, केँ साहित्यक रूप प्रदान कऽ लोक साहित्यकेँ मैथिली साहित्य सागरक द्वारा आम जन धरि पहुँचेलनि। लोक गाथा हमर पौराणिक संस्कृतिक आइक चिन्हासी छी। मैथिली साहित्य श्रृंगार तांत्रिक, आंचलिक विषयकेँ आधार मानि ओ कतेको उपन्यासक रचना केलनि। दर्जनसँ ऊपर हिनकर कथा, नाटक, एकांकी, महाकाव्य, मुक्तक काव्य आ निबंध सेहो छन्हि। गत बुधवार १२ सितम्बर २०१२ केँ सहरसामे ‘मणिपद्मक काव्यकृतिक आलोचनात्मक अध्ययन’ विषयक पुस्तकक लोकार्पण साहित्य अकादमी सम्मानसँ पुरस्कृत साहित्यकार प्रो. मायानन्द मिश्र द्वारा भेल। कार्यकमक अध्यक्षता मैथिली साहित्यकार डा. महेन्द्र झा केलनि। मुख्य अथिति डा. राजाराम प्रसाद, विशिष्ट अतिथि डा. शैलेन्द्र कुमार झा, डा. ललितेश मिश्रा, डा. विश्वनाथ विवेका, डा. के. एस. ओझा, डा. रेणु सिंह आदि रहथि। कार्यक्र्रमक शुभारंभ पुस्तकक लेखक डा. देवनारायण साह द्वारा आगत अतिथियक स्वागत भाषणसँ भेल आ ओ स्वयं लिखित पुस्तक ‘मणिपद्मक काव्यकृतिक आलोचनात्मक अध्ययन’ क महत्वपूर्ण बिन्दुपर प्रकाश देलनि। साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ पुरस्कृत विद्वान प्रो. मायानन्द मिश्र कहलनि जे डा. मणिपद्म बहुविद् साहित्यकार रहथि। ओ बहुविलक्षण कथा, उपन्यास आ काव्य लिखलनि जे लोकगाथापर आधारित रहए। मैथिली आ मिथिलाक संस्कृतिक विकासक लेल संघर्षमे ओ योगदान दैत रहथि। एहेन साहित्यकारक समग्र रचनाक आलोचनत्मक अध्ययन लिखि डा. देवनारायण साह प्राध्यापक एम. एल. टी. कालेज सहरसा श्रमपूर्वक कार्य कऽ एकरा चिरस्मरणीय बनेलनि। डा.महेन्द्र झा कहलनि जे ई मात्र संयोग अछि जे साहित्य अकादमीसँ पुरस्कृत डा. मणिपद्मपर डा. देवनारायण साह द्वारा लिखित पुस्तकक लोकापर्ण सेहो साहित्य अकादमीसँ पुरस्कृत साहित्यकार प्रो. मायानन्द मिश्रक हाथसँ भेल। डा. शैलेन्द्र कुमार रचनाक गंभीरतापर प्रकाश दैत कहलनि जे आइक समएमे मैथिली लेखन कला कम भेल अछि लेकिन डा. देवनारायण साह शोधार्थी छात्रक लेल उपयोगी पुस्तक लिखि मैथिली साहित्य जगतकेँ नव आयाम देलनि अछि। डा. ललितेश मिश्र पुस्तकक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि दिस ध्यान केन्द्रित कऽ कहलनि जे मैथिलीमे जासूसी उपन्यास सर्वप्रथम मणिपद्म लिखलनि। ऐ अवसर पर डा. राजाराम प्रसाद, डा. रामनरेश सिंह, डा. कुलानन्द झा, डा. दीपक गुप्ता, डा. एस. के. ओझा आ डा. रेणु सिंह लोकार्पित पुस्तककेँ समीचीन बतेलनि आ अपन विचार व्यक्त केलनि। मुन्नी कामत कतऽ जा रहल छी हम! कतऽ जा रहल छी हम! कतौै तपि रहल अछि, कतौै गलि रहल अछि, कतौै धँसि रहल अछि, तँ, कतौ उठि रहल अछि आइ धरती! तपा रहल अछि अकरा मनुखक बढ़ैत भूख, जे दिन-प्रतिदिन गाछ-वृक्ष काटि अकरा छत्रहीन बनबैत अछि। समाजक कुरीति अकरा गला रहल अछि। अपन बेटी पर देख अत्याचार ई बेबस भऽ धँसि रहल अछि। देख ई सभ विडम्बना मॉं धरती क्रोधसँ पहाड़ बनि संकल्प करैत अछि कि सम्पूर्ण जहाँक अइ विशाल चोटीसँ झाँपि अकर सर्वनाश कैर दी। मुदा ओ कुछ नै करै लेल मजबूर अछि। जेना आइ धरती बेबस लाचार आ कड़ीसँ बानहल देखाइत अछि ओहिना हमरा समाजमे नारीक स्थिति अछि। आइ भाइ जल्लाद बनल अछि आ बाप पापक रूप लेने अछि। प्राचीन कालसँ जइ रिश्ताकेँ भगवानसँ पहिल जगह मिलल अछि आइ ओकर नामो लइ सँ घृणाक बोध होइए। आइ हमरा समाजमे सभसँ अधिक नजाइज सम्बन्ध गुरू आ शिष्याक बीच अछि। हम एगो अरमान मनमे बसा अपन बच्चामे अच्छा संस्कार आ उच्च शिक्षाक अभिलाषा लेने गुरू लग जाइ छी मुदा वएह गुरू हमर आत्मसम्मान केँ ठेस पहुँचाबैत हमर बच्चाक साथ शोषण करैत अछि। भाइ शब्द अतेक पावन, अतेक पवित्र अछि कि सभ बहिन भाइ शब्दकेँ सम्बोघित करैत ई सोचैत अछि कि ई हमर केवल भाई नइ कृष्णक रूप अछि जे युग-युग तक हमर आबरू आ सम्मानक रक्षा करत। चाहे ओ चचेरा ममेरा फुफेरा भाइ किएक नइ हुअए। पर वएह भाइ जब अपन बहिनक विश्वास तार-तार करैत ओकरा संगे बलात्काकार करैए तँ ओकरा की नाम देल जाएत। जन्म देनहार बाप जकरा पिता परमेश्वर कहल जाइत अछि वएह बाप अपन जनमल बेटी संग पाप करैत अछि यएह समाजमे। आखिर कतऽ खडा छी हम, कतऽ जाइले डेग बढ़ा रहल छी एक पलक लेल, सोचलेसँ अहि गंदा पैर सँ चलि हम अपन स्वच्छ आ पवित्र समाजक निर्माण कऽ सकैत छी? केवल सादा कागज पर कलम दौड़ेनाइ सिखनेसँ संस्कार आ सोच नइ बदलैत अछि। अपन जमीर आ अपन आत्माक अवाज सुनु आ कहू कि बेटी कलंकक पुरिया अछि कि हमर समाज ओकरा कलंकित करैत अछि। दुर्गानन्द मण्डल जीवन-मरण: समीक्षा जीवन-मरण उपन्यास, एकटा लब्ध प्रतिष्ठित उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक अनुपम कृति अइ। हुनक लिखल अनेको उपन्यास, जे एक-सँ-बढ़ि-कऽ–एक अछि। जइमे उपन्यासकार द्वारा उठाओल गेल विभिन्न प्रकारक सामाजिक रूढ़िवादिताक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत कएल गेल अछि। मात्र प्रस्तुतिकरण धरि कथा नै अपितु ओकर सामाधान तकबामे सेहो उपन्यासकार सतत् सफल रहला अछि। प्रस्तुत उपन्यासमे मनुखक जे अपन जिनगी छै, ओकर जे अपन समाज छै, समाजक प्रति व्यक्ति विशेषक उत्तरदायित्व होइत अछि से, आ नवका पीढ़ी जे पश्चिमी सभ्यताक असभ्यतासँ ग्रसित भऽ असभ्य बनि गेला अछि तइपर उपन्यासक आरंम्भमे एकटा कसगर चोट देलनि अछि। देवनन्दन जे बेवसायसँ डाॅक्टर छथि, पत्नी शीला द्वारा जनलनि जे पिताक मृत्यु भऽ गेल तैयो घबरेला नै सोचलनि पिताक अपन समाज छन्हि जइ बीच ओ अपन जिनगी बितौलनि। तँए उचित हएत जे हुनका अपना समाजमे पहुँचा दियनि आ मृत्युक सभ कर्म सामाजेक अनुकूल बढ़ियासँ करी िनर्णए लेलनि। मोबाइलसँ नम्बर निकालि, टिपि अपन जेठ बेटा दयानन्दकेँ जनौलनि- “बच्चा, बाबू मरि गेलाह, तँए दुनू भाँइ गाम आऊ।” मुदा वाह रे पश्चिमी सभ्यता! देखू हमरा लोकनिकेँ केना ग्रसित केने अछि, दयानन्द बाजि उठलाह- “बाबू, ऐ लेल गाम किअए जाएब? आब तँ बिजलीबला शबदाहमे आसानीसँ काज सम्पन्न भऽ जाइत अछि” दयानन्दक विचार सुनि देवनन्दन कहलकनि- “बच्चा, सभ जीव-जन्तुकेँ अपन-अपन जिनगी होइत अछि। आ जे जेहने जिनगीमे जीबैत अछि ओकरा लेल वएह जिनगी आनन्ददायक होइत अछि। जेना, चीनी, मिरचाइ आ करैला तीनूक तीन तरहक स्वाद, मीठ, कड़ू आ तीत होइए। मुदा की मरिचाइक कीड़ा आबि करैलाक कीड़ा चीनीमे जीब सकत? कथमपि नै। जखन की ओ तँ अधलाहसँ नीकमे गेल।” पिताक बात सुनि दयानन्दकेँ आश्चर्य भेलनि, मुदा देवनन्दनक अनुसारे ऐमे आश्चर्य कोन। किएक तँ गामक दोसर नाम समाज सेहो छिऐ। जे शहर-बाजारमे नै अछि। ऐठाम उपन्यासकार समाजकेँ मानव नै मानवक जे मूल सभ्यता छै ओकरा एकैसम सदीक नव पीढ़ी लेल एकटा मिशाल देखौलनि अछि। जे वर्त्तमानमे आजुक पीढ़ी समाजकेँ नै बूझि किदैन बुझै छथिन, ओ बिसरि गेलाह जे समाज की थिक, ओकर मान-मर्यादा कि होइ छै, सामाजिक बन्धन की छी, ओकर कानून-कायदा की छै। आजूक वर्त्तमान आधुनिक समाज जइमे सभ अपने पाछू बेहाल रहैए। ओ केकर सुख-दुख, जीवन-मरणकेँ सुनत। ओ तँ भरिपेट नीक अन्न-तीमन खाएब मात्र जनैए। मुदा तइसँ कि मन थोड़े अस्थिर भऽ सकैए। जाधरि आत्माक संतुष्टि नै हेतैक। बुझेबामे केत्तौ कोनो प्रकारक किन्तु-परन्तु नै राखि, मनुक्ख एकटा सामाजिक प्राणी होइत अछि, ओकर अपन एकटा समाज छै, जइमे सभ एक-दोसराक सुखसँ सुखी आ दुखसँ दुखी होइ छथि, देखेबामे सफल भेलाह। वर्त्तमानमे जन्म जरूर जाति-समाजमे होइ छै, मुदा लगले आँखि-पाँखि भेने हमरालोकनि अपन मूल समाजकेँ भूलि-बिसरि आन समाजमे मिलि हूलि-मािल उठेने रहै छी। केतेक दुखक बात भेल। कला आ संस्कृितसँ दूर तँ स्वभाविक रूपे तँ छिहे ओना हम सभ कतेको नोर मंचपर किएक ने बहा ली। दोसर दिस उपन्यासकार मिथिलानिक एकटा गजब चित्र प्रस्तुत केलनि अछि। मैथिल नारि अपन पतिकेँ परमेश्वर मानै छथि। जिनकेपर हुनका भरि मांग सेनुर आ भरि हाथ चुड़ी रहैत छन्हि। अपना पतिक प्रति कतेक निष्ठा रखै छथि स्पष्ट अछि- “अदौसँ सावित्री, अनुसुर्इया आदि ऐ विषयमे जगविदित छथि। देवनंदनक माए सुभद्रा जिनका चेहरापर सोग नै अपितु सिनेह उमरि रहल छन्हि। मोने-मन आनंदित जे, जहिना हाथ पकड़लनि तहिना पार-घाट लगा देलनि। भड़ल-पुड़ल फुलवाड़ी अछि कतौ हेराएल रहब।” मिथिलानिक महान विचार आ तियागक स्तरकेँ कतेक सुक्ष्म रूपेँ उपन्यासकार रखलनि अछि। तियागक मूर्तिक रूपमे ऐ तरहेँ स्पष्ट अछि जे पतिकेँ मुइला बादो हर्ष छन्हि जे हमरा अछेत मरलाह से नीके भेलनि। अन्यथा मोनमे लागल रहैत जे हुनक शेष दिन केहेन...। सभ पौस-प्राणी गुनधुनमे पड़ल गाम चलल जा रहल छथि। देवनंदन सोचथि, से नै तँ आइ समाजक काज पड़त। समाजक की महत छै। मनुक्ख कोन तरहेँ सामाजिक प्राणी होइए, समाजक बीच बाबूजी केना जीबथि, कतेक परिवारसँ दोस्ती छलनि आ कतेकसँ दुश्मनी, गुनधुनमे पड़ल माएसँ पुछलखिन- “माए, कते परिवारसँ बाबूजी केँ दोस्ती छेलनि।” तखन माएकेँ मोन पड़लनि ओ समाज, जतए सभ मिलि कुमरम, बिआह, सामा, घरक गोसाँइसँ लऽ कऽ दुर्गा स्थानक गीत मोन पड़ए लगलनि। देवनंदनक बात सुनि माए-सुभद्रा बजलीह- “छिया, छिया। मिथिलाक समाज छी। ऐ समाजमे मुर्दा जरबैले, केकरो घरक आँगि मिझबैले, केकरो-साँप-ताप कटने रहल आकि गाछ-ताछपर सँ खसलापर केकरो कियो कहै नै छै। ई सामाजिक काज छी। तँए, अपन काज बूझि सभ अपने तैयार भऽ जाइत अछि।” ऐठाम उपन्यासकार मिथिला आ मैथिल समाजक एकटा विलक्षण उदाहरण द’ अपन सभ्यता आ संस्कृतिक परिचए द’ समाजक समुद्री रूपकेँ दर्शन करौलनि अछि। पूर्वोमे बाढ़ि एलापर करियाकाका आ देवनंदन द्वारा उठाओल गेल कदम आबैबला समाजक लेल एकटा आदर्श उपस्थित केलनि अछि। आखिर दिन बिसेक बाद सभ घूमि अपन-अपन घर आएल रहथि। ओही समाजक एकटा अभिन्न अंग देवनंदनक पिता जे समाजक प्रतिष्ठित व्यक्ति रघुनंदनक लहाश गाम पहुँचते आगू-आगू गाड़ी आ पाछू करमान लागल लोक दियादीमे सबहक चुल्हि मिझाएल। दोसर दिस उपन्यासकार जे मर्द-पुरुखक क्रिया-कलाप, स्त्रीगण सबहक गप-सप तँ एक दिस 111 बर्खक रधिया दादी गाइक गर्दनि जकाँ लटकल चमरी, बाइस गाहीक बर्ख भेल, पूर्वमे रधुनंदनकेँ कतेको दिन दूध पिऔने रहथिन, उपस्थित क’ सामाजिक आ मातृत्व प्रेमक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत केलनि। जिनका दादी जूरशीतलमे अछिंजलसँ असिरवाद द’ फगुूआमे रँगो खेलाइत छलीह। से सप्तरंगी समाजक इंद्रधनुषी संबंधक एकटा विलक्षण उदाहरण अछि। श्राद्ध-बिआह समाजेक काज होइते अछि। समाज तँ समाजे होइए तहूमे ओहेन समाज जइठाम रघुनंदनकेँ उत्तरे-दछिने सुता उज्जर दप-दप वत्रसँ छाँपि सिरहानामे धूप-गुगुल जरैत अछि। तइ बीच बचनू, चंचन, झोली, बौकू, बतहू देहपर तौनी आ डाँरमे धोती पहिरने कान्हपर कुरहरि नेने संग-मिलि कानी-गाबी आ हँसी ऐ सँ पैघ सुख केकरा कहबै? जइ सुखक लेल लोक नीच-सँ-नीच काज करैए मुदा पाबि नै पबैए। ऐठाम उपन्यासकार भौतिक सुखकेँ सुख नै मानि आत्मिक सुख, अतिइन्द्रिय सुख जइसँ आत्मिक शान्ति भेटैत छै, ओ वास्तविक सुख थिक। तँए मात्र दैहिक सुखकेँ क्षणिक आ आत्मिक सुखकेँ वास्तविक बता अपनाकेँ आध्यात्मिक हेबाक सेहो परिचय द’ समाजोकेँ आध्यात्मिक बातपर चिन्तन-मनन अनुकरणक प्रेरणा देलनि अछि। समाजक समस्त काजक जिम्मा करियाकाकापर छन्हि। समाजक ऊँच-नीच, छोट-पैघ सभ जातिक लोक, जाति-परजाति सभ मिलि रघुकाकाक काजमे पूर्ण सहयोग देबए चाहै छथि चाहे ओ िकर्तनिया हुअए आकि भजनिया, लेलहा हुअए आकि बौका, सुन्दर काका होथि वा छीतन भाय दुनू परानी जे जातिक डोम छथि। जे पूर्वमे गुनापर रघुकाकाकेँ पाँचटा गीत सुनौने छलाह। जीविते छथि छीतन भाय। छितनो भायकेँ बरियातीमे हकार देब नै बिसरब, समाजक जाति-पातिक कुप्रर्थासँ निकालि मनुक्खक जे एकटा अपन समाज होइछ, मनुक्खक जे एकटा जाति होइए जइमे सभ वर्ग आ वर्णक लोक रहैए, वास्तवमे ओ ने समाज छी। ओइ जातिगत भावनासँ ग्रसित समाजकेँ ऊपर मुँहेँ उठा स्वच्छ वातावरणमे शुद्ध साँस लेबाक बाट देखौलनि हेन। जहिना हवा अनेक गैसक मिश्रन छी तहिना तँ समाजो अनेक वर्ग आ वर्णक मिश्रण छी। जौं से नै तँ कियो एक-दोसरक बिना जीब सकत? संभव नै, मुदा से बुझैत लोक अपने स्वार्थमे आन्हर भेल रहैए। आ फल्लंमा डोम तँ फल्लांमा दुसाध ई संस्कार नैन्हियेटा सँ माए-बाप देबामे पाछू नै रहै छथि। आखिर एकटा प्रश्न हमरा तरफसँ, अहाँ प्रबुध समाजक लेल अछि, जौं समाजमे सभ जाति नै रहत तँ की समाजिक जीवन चलि सकत यदि हँ तँ केना? जौं नै तँ फेर एहेन भावना किएक? डोमसँ हम छूबल जाएब, मुदा ओकर बनाओल चीज-बौस गौसाँइ-पितरपर चढ़त तँ की इष्ट-देव नै छुऔत। जौं छुआएत तँ सनातनिये सँ किएक ने..... ? आ जौं देव-पितर नै छुआएत तँ हमरा-अहाँकेँ छुएबाक कोन आधार बनल अछि?? झाँपले परदामे उपन्यासकार जाति-प्रथाकेँ तोड़ि एकटा आदर्शवादी समाज स्थापनापर जोर देलनि। जहिना फुलवाड़ीमे जुही, चमेली फूल रहैत अछि तहिना गेना गुलाब सेहो। अधला नै तँ नीकक महत्ते की? तीत नै तँ मीठक स्वादे की? कारी नै तँ गोरे की? तहिना तँ समाजो एकटा फुलवाड़ी होइ छै। जइमे सभ तरहक लोकक अपन-अपन भूमिका होइ छैक। विचार करबाक थिक जे वैदिक पद्धतिपर चलए बला समाजक चित्र जे जहजहि उपन्यासमे आएल अछि से तँ सहज अछि। मुदा आजुक ओहन समाज जइमे अलगाव अछि। मनुक्ख-मनुक्खमे एतेक अन्तर किएक अछि? प्रश्नक संग इशारामे उत्तर सेहो बतेबामे उपन्यासकार पाछू नै हटलथि। जेकर स्पष्ट उदाहरण रघुकाकाक बरियातीमे छीतन भाय सदृश लोककेँ अपन बाजाक संग भजन करैले चलैक लेल कहि एकटा आदर्श समाजक परिपक्व छाप छोड़लनि अछि। ओतबे नै, एकटा कहावत अछि ‘भेल-गेलपर शिव जगरनाथ’ एहने एकटा व्यक्ति छथि फोंचभाय, पाही जमीनदारक टहलू धड़फराएल आबि छौंकए चाहै छथि ई बाजि- ‘सभ कथुक आरिऔन तँ देखै छी मुदा ससर आ घी कहाँ अछि?’ माने काज भँगठा एवं भरिया देबए चाहलनि। मुदा लेलहा फोंचभायकेँ चौहटैत ई सावित क’ देलकनि जे रघुकाका आ देवभाय सँ हमरो केकरोसँ कम अपेक्षा नै। फोंचभाय कएल काजमे केवल गलतियेटा तकैबला लोक छथि। मुदा हाय रे उपन्यासकार, समस्त उपन्यासमे जीवन थिक तँ मरण असंभावी.., ई खेल चलिते रहैए। अही समाजक बीच लोक जनमो लइए आ मरबो करैए। पैघत्व तँ ऐ बातमे अछि जे जइ समाजमे रघुबाबू सन दाता छलाह आइ ओकरे ऋृण चुकबए खातिर अर्थी उठबैले बुझू जे मािर भ’ रहल अछि। तही बीच लेलहाक मुँहसँ अनायास निकलल जे सुनै जाउ, कान्ही लगा उठबियनु नै तँ दरद हेतनि।’ सभ मानि गेल। एक दिस आंगनसँ लहास उठल आ दोसर दिस सहनाइपर विदाइक धून। आहहा... यएह तँ सुख आ दुखक दुिनयाँ छी। जीवन-मरणक सार्थकता छी। मुदा हमरालोकनि जीवनक एक्के भाग देखै आ जनै छी। जीवन आ मरण सृष्टिक चक्र छी। ऐसँ कियो बाँचल कहाँ। एक िदस करियाकाका आ दोसर दिस सुन्नरकाका रघुभायकेँ अंतिम प्रणाम कऽ डेग आगू बढ़ौलनि। पाछू-पाछू देवनंदनक हाथमे आगि अा कोहा दऽ पाछू-पाछू बरिआती सजि विदा भेल। तइ पाछू करियाकाका रेलगाड़ीक गार्ड जकाँ पाछू-पाछू। गाछी पहुँचि सभ कियो सभ कथुक जोगर अपना-अपना विवेकसँ लगा सिरहौना-पथौना रूपी औछाओनपर सुता एक-एक चेरा चढ़बैत छाती भरि ऊँच कऽ सुन्दरकाका देवक बाँहि पकड़ि धधकैत उक मुँहमे लगा देलकनि। बाँकी सभ काज समाजक निअमानुसार तेरहसँ सत्तर दिन धरि चलैत रहल। समाज तँ समाजक निअम। तही बीच हुलन दुनू परानी, जेकर आधा देह झाँपल आ आधा उघार छल, ओसरक नीच्चेसँ अपन कर्मकेँ धर्म बूझि प्रणाम केलकनि आ मने-मन सोचबो करए जे रघुबाबूक काजमे कत्ते वर्तन लागत। ईम्हर देवबाबू जिनका गाड़ामे उतरी छन्हि हुनकोसँ बेसी चिन्ता करियाकाकाकेँ छन्हि मुदा करियाकाकासँ कम कुसुमलाल पण्डितकेँ कहाँ छै? ओकरा तँ ऐ बातक चिन्ता छै जे श्रधुआ वर्तनक काज तँ दसम-एगारहम दिन हएत, मुदा दहीक लेल? ओतबे नै, रघुनन्दन बाबूक काजक मादे ततबेक चिन्ता राजेसर नौआकेँ सेहो। जेकर काज एक दिस पुजबैक प्रकिया तँ दोसर दििस कर्म सम्पन्न करेबाक। मुदा एतेक सभ किछु होइतौ अपना समाजमे जे पण्डितक किरदानी छन्हि तेकरो बखिया उघारैमे कतौ कमी नै रखला अछि। जे नायकक रूपमे शिवशंकर छथि जे अदौसँ अद्यतन आन-आन श्राध-कर्मक उदाहरण दऽ जजमानक खून उड़िस जकाँ पीबैत रहलाह जेकर साक्षात् उदाहरण सिट्ठी भेल समाज सबहक सोझामे अछि। मनुक्ख विचारसँ पैघ होइत अछि। विचार बदलल। नव पीढ़ीक प्रसादे सुन्दर आ दुधिगर गाए सभ सेहो गाममे आएल। तइ बीच चाहक संग सभ सभ अपन-अपन विचार रखलनि। जइमे सर्वसम्मतिसँ विचार यएह भेल जे पाँच गोटे विचार कऽ डेग उठाउ, (1) श्राद्ध घरवारी आ कर्ताक अनुकूल हुअए। दानस्वरूप मात्र झरखंडी बाछा नै दागल जाए। (1)(2) आन गामक पंच माने भोज खेनिहारसँ परहेज कऽ गामक सभ जातिकेँ खुऔल जाए आन गामक दोस्त–कुटुम-दिआद तँ रहबे करता। (1)ऐ प्रकारे उपन्यासक मादे उपन्यासकार हमरालोकनिक बीच व्याप्त विभिन्न प्रकारक नीक आ अधला प्रथा-रीति-चलनि-मान्यताक बीच विभिन्न प्रकारक लोक सबहक अमुल्य विचार आ ओही समाजक दालि-भातमे मुसलचन्दक उदाहरण दऽ ओकरासँ सावधान केलनि। सृष्टिक जे चक्र छी जीवन-मरण जइसँ कियो बँचि नै सकै छी जेकरा समाज आ कर्त्तकेँ मनोनुकूल कऽ समाजमे रचनात्मक काज करी ऐ लेल एकटा दिशा-िनर्देश देलनि। जेकरा देवनन्दन जी अपने शब्दे स्वीकार कऽ पिताक निम्मिते साले-साल भोजे नै वल्कि यथासाध्य कल्याणकारी काजक प्रेरणा देलनि। डॉ.अरुण कुमार सिंह स्वातन्त्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता ‘सर्वेभवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भाक्-भवेत्।’ उपनिषदक ई सूत्र वाक्य समरसतेक उन्नायक व परिचायक अछि। मानवमात्रक हितक कामना, सुख, समृद्धि एवं कल्याणक भावने सामाजिक समरसता अछि जे विभिन्न जाति, वर्ण, धर्म, सम्प्रदाय, भाषाई लोकक मन वाणी आओर कर्मसँ समरूप भए अपन प्रस्थिति एवं भूमिकाक निर्वाह करैत लक्ष्य प्राप्ति दिस प्रेरित करैछ। सामाजिक समरसता भारतीय संस्कृतिक आत्मा अछि। धर्म सापेक्षीकरण धर्म निरपेक्षीकरण, सर्वधर्म समभाव, मानवतावाद, बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय आदि अवधारणा सामाजिक समरसताक पोषक व परिणाम रहल अछि। विविधतामे एकरूपताक भावना समरसतेकेँ प्रतिनिधित्व करैत अछि। संत, साहित्यकार, समाजवैज्ञानिक आदि सब सामाजिक व्यवस्था एवं प्रगति लेल - सामाजिक संगठनक स्थिरता लेल सामाजिक समरसताक अपेक्षा करैत रहल अछि। सामाजिक समरूपताक प्रचार-प्रसारक प्रति साहित्यकार सदैव सजग रहलाह अछि। सामाजिक प्राणीक रूपमे ओ समाजक शिल्पीए टा नहि अपितु शिक्षक, पथ-प्रदर्शक, विश्लेषक व सर्जक सेहो अछि एतदर्थ हुनक सृजनमे सामाजिक समरसताक सन्देश रहब स्वाभाविके अछि। मिथिलेत्तर प्रान्त मध्य विद्यापतिक सम्मान आओर आधुनिक युगक प्रथम मैथिली गद्यकार चन्दाझाक यश देखिकेँ मिथिलाक विद्वानमे सेहो अपन निज भाषाक सेवाक उत्सुकता जागल जकर फलस्वरूप मैथिली कथासाहित्यक निर्माण प्रारम्भ भेल। मैथिली साहित्यक समालोचक डॉ. रामदेव झाक कहब छन्हि जे आरम्भमे मैथिली कथा लेखकक लेल रचनाक दुई आदर्श छल पहिल संस्कृत परम्पराक आख्यायिका-उपाख्यायन, नीति कथा आदि तथा दोसर पाश्चात्य परिपाटीक सामाजिक परिवेश पर रचित कथा उपन्यास। ओहि समय धरि अंग्रेजी वा अन्य पाश्चात्य साहित्यसँ मैथिली साहित्यकारक साक्षात् परिचय नहि भए सकल छल, परंच बंगला साहित्य मे पाश्चात्य कथा - उपन्यासक अनुवाद आओर ओहिसँ प्रेरित-प्रभावित अभिनव कथा-उपन्यास विशेष समृद्ध भए बंगाल आओर बंगालसँ बाहर लोकप्रिय भए चुकल छल। मिथिला आओर मैथिलीक पूर्वोत्तर राज्य-आसाम एवं बंगालसँ प्राचीन कालहिसँ घनिष्ट सम्बन्ध रहल अछि, जाहिक कारणेँ मैथिली कथा साहित्यक आरम्भिक कथामे बंगला साहित्यक प्रभाव दृष्टिगोचर होइत अछि। हम कहि सकैत छी जे एकरे फलस्वरूप मैथिली कथा साहित्य मे नव युगक संग-संग नव दृष्टिकोणक सूत्रपात भेल एवं पाश्चात्य साहित्य एवं भारतीय साहित्यसँ प्रभावित भए मैथिली कथासाहित्य क्रियाशील भेल अछि। मैथिली साहित्य मध्य 1922-23 ई. क आसपास जखन मौलिक कथा लिखल जाए लागल ताहि मध्य कुमार गंगानन्द सिंह, कालीकुमार दास, लक्ष्मीपति सिंह, कांची नाथ झा ‘किरण’ आदिक कथा मध्य मिथिलाक वर्त्तमान समाजक स्थितिकेँ देखैत मैथिली कथासाहित्यकेँ सामाजिक जीवनसँ जोड़बाक भरपुर प्रयास कएलन्हि। एहि मे कुमार गंगानन्द सिंहक ‘पंचपरमेश्वर’ एवं ‘बिहाड़ि’ मे सामाजिक समरसताक वातावरणक अक्षरशः पालन होइत देखल गेल छल। स्वातन्त्र्योत्तर युगमे मैथिली साहित्यकार लोकनि अपन साहित्य मध्य पात्र चयन करबामे क्रमशः आभिजात्य मोहक तिरस्कार करैत सामाजिक समरसताक नियोजन (समावेश) करैत गामघरक ओहि पात्रसभकेँ साहित्यमे प्रतिष्ठित कएलनि जे परम्परासँ शोषित ओ प्रताड़ित रहल छलाह। स्वातन्त्र्योत्तर कालक कथाकारमे ललित, राजकमल, सोमदेव, मायानन्द मिश्र, धीरेन्द्र, रामदेव झा, हंसराज एवं लिली रे आदि प्रमुख अछि। मैथिली कथा साहित्य मध्य सामाजिक समरसताक दिशामे वस्तुतः ललितेक ‘रमजानी’ ओहि समयक श्रेष्ठ कथा सिद्ध भेल जे अखन धरि टटका बनल अछि। हिनक ओवरलोड, कंचनियाँ, मुक्ति एवं जानवर आदि कथा मे समकालीन स्थितिकेँ चिन्हैत जीवनक यथार्थक चित्रणक क्रममे समाजक सामन्ती विकारकेँ जगजियार करैत सामाजिक समरसताक बोध तँ देलनि मुदा मुक्तिक रास्ता नहि बना सकलाह। धीरेन्द्रक अधिकांश कथाक जन्म समाजक ओहि क्षेत्रक व्यथासँ होइत अछि जे सामाजिक स्तर पर तिरस्कृत अछि। शारीरिक स्तर पर बात-बात पर दण्डित कएल जाइत अछि। आर्थिक स्तर पर औंठा बोरबा लेल अभिशप्त अछि। हिनक कथा घंटी, सवाइ, हिचुकैत बहैत सेती, गामक ठठरी, मादा काँकोड़, बन्हकी आदि कथामे सामाजिक समरसता देखार दैत अछि। रामदेव झाक मनुक संतान, एक खीरातीन फाँक आदि कथामे स्वतन्त्र भारतक आर्थिक संघर्षक सामाजिक भावनासँ जाति विभेदकेँ समाप्त करैत वर्ग-संघर्षसँ मुक्त भए जाइत अछि। सामाजिक एवं प्रशासकीय व्यवस्थाक विद्रूपताकेँ देखार करैत दलित वर्गक विद्रोहक स्वरकेँ संगठन मे परिवर्त्तन करैत तत्कालीन समकालीन जीवनक यथार्थक चित्रण करैत अछि। सोमदेव विशिष्ट कथाकार छथि। हिनक प्रमुख कथा भात, अंगाचोर आदि मे निम्न वर्गक जीवनक यथार्थक अत्यन्त आत्मीयतासँ चित्रण भेल अछि। प्रभाष कुमार चौधरीक ‘मलाहक टोल’ कथा शोषित वर्गकेँ अपन अस्तित्वक रक्षा लेल प्रेरित करैत अछि। रामानन्द रेणु आर्थिक विसंगति जन्य निम्न वर्गक दंश एवं कुण्ठाकेँ अपन कथा मध्य विश्लेषित कएने छथि। जीवकान्तक ‘इनकिलाव’ तत्कालीन राजनीतिक सामाजिक जीवनक यथार्थसँ अछि। 1970 ई. क दशकमे बैंकक राष्ट्रीयकरण, प्रिवीपर्सक समाप्ति, भूमि सुधार सम्बन्धी आन्दोलन, आदि किछु एहन घटना थिक, जाहिसँ सामाजिक जागरण भेल तँ दोसर दिस साम्यवादी आन्दोलनसँ पूँजीपति एवं श्रमिक मध्य संघर्षमे वृद्धि भेल। दलित वर्गमे सह-अस्मिताक भावमे वृद्धि भेल। एहि यथार्थक प्रवक्ता कथाकारक रूपमे सुभाषचन्द्र यादवक नाम महत्त्वपूर्ण अछि। हिनक महत्वपूर्ण कथा छन्हि- घरदेखिया, काठक बनल लोक, फँसरी एवं ‘बनैत बिगड़ैैत’ कथा संग्रहक कथा आदि। कथाकार दलित अस्मिताक स्वर दैत समकालीन यथार्थक चित्रणसँ पूर्ण सफल भेल छथि। कथाकार महाप्रकाश, सुकान्त सोम, मनमोहन झा, उपेन्द्र दोषी, उदयचन्द्र झा ‘विनोद’, रामनरेश सिंह, राजाराम प्रसाद, महेन्द्र, विभूति आनन्द, अशोक, रमेश, तारानन्द वियोगी, देवशंकर नवीन, प्रदीप बिहारी, रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’, रमेश रंजन, शैलेन्द्र आनन्द, केदार कानन, जगदीश प्रसाद मंडल, उमेश पासवान, डॉ. धीरेन्द्र, उमाकान्त, सुशील, रघुनाथ मुखिया, कामिनी कामायनी, ऋषि वशिष्ट, उमेश मंडल, वीरेन्द्र कुमार यादव, रामदेव प्रसाद मंडल झारूदार, मनोज कुमार मंडल, दुर्गानन्द मंडल आदि अपन कथा मध्य तथाकथित रूपेँ शोषित-दलित निम्नवर्गक छोटसँ छोट घटनाक्रमकेँ अपन कथानक बनबैत समाजक वास्तविक चित्रक चित्रण कए रहल छथि। एवं प्रकारेँ मैथिली कथा अपन स्वरकेँ परिवर्त्तित करैत, नव डेग दैत सामाजिक समरसता कायम करबा दिस विकासोन्मुख अछि। सहायक ग्रंथसूची 1 झा, बासुकीनाथ (डॉ.) (सम्पादक), समकालीन कथा साहित्यःसामाजिक परिप्रेक्ष्य, चेतना समिति, पटना,1976 2 झा, दिनेश कुमार(डॉ.), मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहास,मैथिली अकादमी, पटना, 1989 3 झा, श्री दुर्गानाथ ‘श्रीश’ (डॉ.), मैथिली साहित्यक इतिहास, भारती पुस्तक केन्द्र, दरभंगा, 1991 4 भारद्वाज, मोहन (सम्पादक), मैथिली आलोचना,पत्रिका, मित्र गोष्ठी द्वारा डॉ. भीमनाथ झा, लक्ष्मीसागर, दरभंगा, फरबरी 1992 5 झा, रामानन्द ‘रमण’(डॉ.), अखियासल, अखियासल प्रकाशन, लालगंज, मधुबनी,1995 6 नबीन,देवशंकर, आधुनिक साहित्यक परिदृश्य, अंतिका प्रकाशन, दिल्ली 2000 7 ठाकुर, प्रो. वीणा, वाणिनी, मिथिला रिसर्च सोसाइटी, कबिलपुर, लहेरियासराय, दरभंगा, 2010 8 झा, रामानन्द ‘रमण’(डॉ.), हिआओल, अखियासल प्रकाशन, लालगंज, मधुबनी,2012 9 झा बाल गोविन्द “व्यथित” (डॉ.) मैथिली साहित्यक इतिहास, पटना भारती भवन, 1981 10 झा, बासुकीनाथ (डॉ.) (सम्पादक) मैथिली साहित्यक रूपरेखा, पटना चेतना समिति, 1976 11. http://www.videha.co.in ************* मातृभाषाक माध्यमसँ उच्चशिक्षा किछु समयसँ देशमे उच्चशिक्षाक माध्यम एवं विषयवस्तुकेँ लए कए विमर्श चलि रहल अछि। एक दिस बाबा रामदेव अनशनक समय अपन मांग मे भारतीय भाषाक माध्यमसँ उच्च शिक्षाक मांग रखलन्हि, तँ दोसर दिस मुंबई उच्च न्यायालयक एक गोट फैसलामे कहल गेल अछि जे लोक सेवा आयोगक अंतिम परीक्षा अर्थात् साक्षात्कारमे परीक्षार्थी अपन मातृभाषामे जबाब दए सकैछ। एक तरहेँ ई कार्यपालिका पर दुईतरफा दबाब अछि । एक दिसतँ लोकतांत्रिक दबाब जनसमूहक रूपमे रामलीला मैदानमे जमा भएकेँ, तँ दोसर दिस न्यायपालिका भारतीय भाषाक पक्षमे निर्णय दए केँ। विश्वमातृभाषा दिवसक अवसर पर दिल्लीमे बुद्धिजीवी एवं लेखकक प्रतिनिधिमण्डल सरकारकेँ एक गोट विज्ञापन देने छलाह, जाहिमे कहल गेल छल जे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी नियमावलीमे पी.एच.डी.क लेल अनिवार्य दुई शोध-पत्रमे सँ एक मातृभाषामे हो। एहि तरहेँ देखल जा रहल अछि जे अंग्रेजीकेँ कात करैत भारतीय भाषाकेँ प्रश्रय देबाक बात शुरु भए चुकल अछि । मातृभाषा ओहन भाषा होइछ, जकर माध्यमसँ कोनो नेता अपन घर, परिवार आओर समाजकेँ बुझि पबैछ। पहिल भाषा होएबाक कारणेँ मातृभाषे कोनो व्यक्तिक चिंतन-प्रक्रियामे कार्य करैछ। एहि लेल प्रतिभाक सभसँ पैघ अभिव्यक्ति पहिल भाषे मे होइछ। जँ कोनो व्यक्ति बहुभाषी अछि तँ ओ पहिल भाषाक पृष्ठभूमि पर कोनो दोसर भाषा सीखैछ आओर एक तरहेँ चिंतन-प्रक्रियाक बीचे मे मातृभाषा आओर दोसर भाषाक बीच अनुवाद करैत रहैछ। एहि स्थितिमे ओ दोसर भाषामे कतबा निपुण अछि ई एहि पर निर्भर करैछ जे ई मानसिक अनुवाद ओ कतबा कम समयमे कए पबैछ। संविधान स्वीकृत 22 भाषामे जतबा उच्च शिक्षण कार्य भए रहल अछि, ओहिसँ बहुत बेसी एक मात्र अंग्रेजी भाषाक माध्यमसँ भए रहल अछि। आब प्रश्न उठैछ जे जाहि शिक्षण-पद्धतिकेँ मैकालेक विरासत एवं आओर अंग्रेजी साम्राज्यक विस्तार कहल जाइछ, ओकर कोनो ठोस विकल्प आइ धरि किएक नहि उभरि पाओल? एकर प्रमुख कारणमे भारतीय भाषाक आपसी संघर्षकेँ नजरअंदाज नहि कएल जाए सकैछ। दोसर ई जे एहि भारतीय भाषाक ज्ञान-परंपरामे कतए धरि पहुँच अछि? की आइ प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, चिकित्सा, विधि, प्रबंधन आदि विधाक उच्चतम रूपकेँ भारतक कोनो क्षेत्रीय भाषामे सहजतासँ अभिव्यक्त कएल जाए सकैछ? हमरा बुझने कठिन अछि। एहन बात नहि अछि जे भारतीयभाषाक क्षमता संदिग्ध अछि, जखनकि लोकभाषाक शब्द-सामर्थ्य बहुत रास भाषाक तुलनामे समृद्ध अछि। मुदा विषयवस्तुक उपलब्धता एकटा पैघ समस्या अछि। एहि बातकेँ सहर्ष स्वीकार कएल जएबाक चाही। ओनाहूँ कोन भाषामे कीसब सामग्री रहबाक चाही ई भाषा नहि, अपितु समाजक जिम्मेदारी होइछ। जँ भाषा दरिद्र अछि, तखनो आर समृद्ध अछि तखनो। विकासक अपन परिवेश आओर अपन शब्दावली होइछ, जकरा दोसर भाषामे सम्पूर्ण रूपसँ घुलि-मिलि जएबामे सालक-साल लागि जाइछ। उदाहरणस्वरूप ‘हेलो’ शब्दकेँ लेल जाए सकैछ। कहल जाइछ जे अमेरिकी आविष्कारक थॉमसन पहिल बेर टेलीफोनसँ ई जानबाक लेल जे ओकर आबाज पहुँचि रहल अछि कि नहि ताहि लेल ‘हेलो’ शब्द बजने छल। तहियासँ आइ धरि टेलीफोनक कतेक स्वरूप सोझ आएल, मुदा पहिल बेर बाजल शब्द ‘हेलो’ मे कोनो परिवर्त्तन नहि आएल। जँ इएह आविष्कार भारतमे भेल’ रहैततँ ई पहिल शब्द कोनो-ने-कोनो भारतीय भाषाक शब्द रहल होएत। जँ आत्मालोचनक दृष्टिसँ देखल जाए तँ भारतीय भाषाक वैज्ञानिकता पर कोनो संदेह नहि अछि। मुदा ओहिमे अभिव्यक्त विज्ञानकेँ संदिग्धताक घेरासँ बाहर नहि लाबल जाए सकैछ। किएकतँ विज्ञान एहि भाषामे जन्म नहि लैछ, अपितु अनुदित होइछ। आय जँ एक दिस विश्व बजार पर स्थापित होएबाक प्रतिस्पर्धा चलि रहल अछि तँ दोसर दिस अपन क्षेत्रीयताक पहचान समाप्त नहि भए जाए तकर दबाब सेहो देखल जाए रहल अछि। एहन परिस्थितिमे भारतमे उच्च शिक्षामे स्थानीय भाषाक प्रयोगक चहुँदिस मांग एक स्वागतयोग्य डेग भए सकैछ। परंच ओकर स्थायी स्तित्व तखन रहत जखन मूल एहि भाषामे पल्लवित-पुष्पित हो। भाषा अभिव्यक्तिक साधन होइछ; आत्माक अभिव्यक्तिक आओर सत्ता अभिव्यक्तिक सेहो। वर्त्तमान मांगक फलस्वरूप जाहि लोकभाषासँ भूख आओर प्रतिरोध अभिव्यक्त होइछ एवं एकरा माध्यमेँ सत्तामे घूसपैठक चर्चा सेहो भए सकैछ। की ई प्रयास सत्तासीन वर्गकेँ मंजूर भए सकैछ? तेँ ई देखब बेस उत्सुकताक विषय होएत जे कोर्टक फैसलासँ लाभान्वित होइत छात्र मातृभाषामे साक्षात्कार दए केँ चयनित होएबामे कतबा सफल होइछ। भारत एक बहुभाषिक देश अछि, जतए 1652 मातृभाषा अछि। संविधान जाहि 22 भाषाकेँ मान्यताक देलनि अछि ओहो कोनो अंतिम भाषा नहि अछि। संवैधानिक मान्यताक लेल बहुत रास भाषा-भाषीक एक पैघ समूह बरोबरि सक्रिय अछि, आओर कोनो एहन तर्क नहि अछि जकर आधार पर एकर सक्रियताकेँ नजरअंदाज कएल जाए सकैछ। जखन कोनो भाषा रोजगारसँ जुड़ैछतँ एहि तरहक प्रयासकेँ आर बल भेटैछ। ओनातँ मैसूर स्थित भारतीय भाषा संस्थानक अन्तर्गत भारतीय भाषाक भाषा वैज्ञानिक सांख्यिकी संकाय’मे नेचूरल लेंग्वेज प्रोसेसिंगक माध्मयमे मैथिलीकेँ मशीनसँ जोड़बाक काज प्ररांभ भए गेल अछि संगहि राष्ट्रीय अनुवाद मिशन ज्ञानपरक पोथीक भारतक 22 भाषामे अनुवादक योजनापर काज कए रहल अछि। एहि सबसँ माध्यम भाषे मे बदलाव आओत, जखनकि आवश्यकता एहि बातक अछि जे एहि भाषासभमे ज्ञानपरक सामग्री उपलब्ध हुए जाहिसँ समाजक आग्रह स्वतः एहि भाषासभक प्रति बनए आओर उच्च शिक्षामे भारतीय भाषाक संग-संग मैथिली सेहो अपन वृहत्तर दायित्वक सामंजस्यपूर्वक निर्वहन कए सकए। ई सब तखन संभव भए सकत जखन मैथिल (मिथिलामे निवास करए वला सभ जाति, वर्ग, धर्म एवं सम्प्रदायक लोक) अपन मौलिक चिंतन एवं शोधक माध्यमसँ एकर नेतृत्त्व करताह। आशीष अनचिन्हार- काफिया काफिया मने तुकान्त। आ तुकान्त मने स्वर-साम्यक तुकान्त चाहे ओ वर्णक स्वर-साम्य हो की मात्राक स्वर-साम्य। रदीफसँ पहिने जे तुकान्त होइत छैक तकरा काफिया कहल जाइत छैक। आ ई रदीफे जकाँ गजलक हरेक शेरक (मतला बला शेरकेँ छोड़ि) दोसर पाँतिमे रदीफसँ पहिने अनिवार्य रुपें अएबाक चाही। काफिया दू प्रकारक होइत छैक (क) वर्णक स्वर-साम्य आ (ख) मात्राक स्वर-साम्य। वर्णक काफिया लेल शेरक हरेक पाँतिमे रदीफसँ पहिने समान वर्ण आ तकरासँ पहिने समान स्वर-साम्य होएबाक चाही। एकटा गप्प आर, बहुतों शाइर खाली रदीफक बाद बला वर्ण वा मात्राकँे काफिया बूझि लैत छथि से गलत। काफियाक निर्धारण काफिया लेल प्रयुक्त शब्दकेँ अंतसँ बीच वा शुरू धरि कएल जा सकैए। उदाहरण देखू--------- करेज घसैसँ साजक राग निखरै छै बिना धुनने तुरक नै ताग निखरै छै एहि शेरक पहिल पाँतिमे रदीफ "निखरै छै" छैक। आ रदीफसँ ठीक पहिने "राग" शब्द छैक। जँ अहाँ "राग" शब्द पर धेआन देबै तँ पता लागत जे ऐ शब्दक अंतिम वर्ण "ग" छैक मुदा ऐ "ग" संग "आ" ध्वनि (रा) सेहो छैक। तहिना दोसर पाँतिमे रदीफ "निखरै छै"सँ पहिने "ताग" शब्द अछि। आब फेर अहाँ सभ "ताग" शब्दकेँ देखू। ऐमेे अंतिम वर्ण "ग" तँ छैके संगहि-संग "आ" ध्वनि (ता) सेहो छैक। मतलब जे उपरक शेरक दुनू पाँतिमे रदीफ "निखरै छै" सँ पहिने "ग"वर्ण अछि, "आ" स्वर (ध्वनि)क संग। अर्थात "आ" ध्वनि संगे "ग" वर्ण ऐ शेरक काफिया भेल। आब ऐठाम ई मोन राखू जे जँ उपरक ई दुनू शेर कोनो गजलक मतला छैक तँ ओइ गजलक हरेक शेरक कफिया "ग" वर्णक संग "आ" ध्वनि होएबाक चाही। अन्यथा ओ गजल गलत भए जाएत। आब ऐ गजलक दोसर शेरकेँ देखू-- इ दुनिया मेहनतिक गुलाम छै सदिखन बहै घाम तखन सुतल भाग निखरै छै ऐ शेरमे पहिल पाँतिमे ने रदीफ छैक आ ने काफिया मुदा दोसर पाँतिमे रदीफ सेहो छैक आ रदीफसँ पहिने शब्द "भाग" अछि। ऐ शब्दक अंतमे "ग" वर्ण तँ छैके संगहि-संग "ग"सँ पहिने "आ" ध्वनि सेहो छैक। ऐ गजलक आन काफिया सभ अछि "लाग", "बाग", "पाग"। एकटा आर दोसर उदाहरण देखू-- कहू की, कियो बूझि नै सकल हमरा हँसी सभक लागल बहुत ठरल हमरा ऐ मतलाक शेरमे "हमरा" रदीफ अछि। आ रदीफसँ पहिने पहिल पाँतिमे "सकल" शब्द अछि। संगहि-संग दोसर पाँतिमे "ठरल" शब्द अछि। आब हमरा लोकनि जँ एहिमे काफिया निर्धारण करी। दुनू शब्दकेँ नीक जकाँ देखू। दुनू शब्दक अंतिम वर्ण "ल" अछि मुदा पहिल पाँतिमे "ल"सँ पहिने "अ" ध्वनि अछि (क) आ दोसरो पाँतिमे "ल"सँ पहिने "अ" ध्वनि अछि (र)। तँ एहि दुनू शब्दक मिलानके बाद हमरा लोकनि देखै छी जे दुनूमे "ल" वर्ण समान अछि। संगहि-संग वर्ण "ल" सँ पहिने "अ" स्वर अछि। आब सभ व्यंजन हलन्तमे अ लगिते छै तखने ओ गुणिताक्षर बनै छै (कचटतप, य-ह) तँए ऐ गजलक काफिया कोनो कचटतप वर्ग(कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग) वा य-ह संग "ल" वर्ण भेल। आब शाइरकेँ बाँकी शेरमे काफियाक रूपमे एहन शब्द चुनए पड़तन्हि जकर अंतमे "ल" वर्ण अबैत हुअए एवं तइसँ पहिने कोनो "कचटतप, य-ह" भऽ सकैए। ऐ गजलमे प्रयुक्त भेल आन काफिया अछि-"जरल ", "खसल", "रहल" "कहल"| तेसर उदाहरण सेहो देखू- रानी मेघ सगरो जल पटाएत ना बौआ हमर खेलत आ नहाएत ना ऐ मतलामे "ना" रदीफ अछि। आ रदीफसँ पहिल पाँतिमे "पटाएत" शब्द अछि आ दोसर पाँतिमे "नहाएत"। जँ दुनू शब्दमे मिलान करबै तँ "एत" दुनू पाँतिक काफियामे कामन छै आ "एत" सँ पहिने "आ" स्वरक मात्रा छै (पहिल पाँतिमे "टा" आ दोसर पाँतिमे "हा"। ऐ मतलामे काफिया हएत "आ" मात्राक संग "एत" वर्ण समूह। ऐ गजलमे लेल गेल आन काफिया अछि बहाएत, बनाएत, चलाएत आ खाएत। जँ मतलाक दुनू पाँतिक काफियामे किछु वर्ण समूह कामन रहै छै तँ ओकरा तहलीली रदीफ कहल जाइत छै। उपरका मतलामे "एत"केँ तहलीली रदीफ कहल जाइत छै। काफियाक ऐ विवरणकेँ एना बूझी तँ नीक रहत- १) जँ कोनो मतलामे "छन" आ "दन" काफिया छै तँ ऐमे "न" वर्ण मूल वर्ण भेलै (काफियाक मिलान सदिखन अंतसँ कएल जाइत छै) आ ओइसँ पहिलुक वर्णक स्वर सेहो बराबर हेबाक चाही। उपरका उदाहरणमे "न" वर्णक बाद क्रमशः "छ" आ "द" वर्ण बचै छै आ दुनूक स्वर "अ" छै मने अकारान्त छै तँए कोनो मतलामे ई काफिया सही हएत। आब ऐ गजलमे आन शेर सभमे एहने काफिया हेतै जेना- "हन", "मन", "जीबन" आदि। ऐठाम ई बात बुझबाक अछि जे जँ मतलामे "छन" आ "धुन" रहितै तँ काफिया गलत भऽ जेतै कारण मूल वर्ण "न" केर बादक स्वरक मात्रा सेहो अनिवार्य रूपें मिलबाक चाही मुदा ऐ उदारहरणक एकटा काफियामे "न" केर बाद "अ" स्वरक गुणिताक्षर छै तँ दोसरमे मूल वर्ण "न" केर बाद "उ" स्वर छै, तँए ई गलत भेल। ऐठाम ईहो मोन राखू जे "छन" आ "दन" केर बाद कोनो आन शेरमे "धुन", "आन", "निन" आदि काफियाकेँ नै लऽ सकैत छी। ईहो मोन राखू जे एकै गजलक आन-आन शेरमे मूल वर्ण एकै रहतै। जेना उपरका उदाहरणमे "छन" आ "दन" काफिया छै तँ आन शेरक काफियाक अंतमे "न" वर्ण अनिवार्य रूपसँ रहतै। २) जँ कोनो मतलामे "जीवन" आ "तीमन" छै तँ काफिया "अ" स्वरक संग "न" मूल वर्ण हएत। आ तँए आन शेरक काफिया लेल "धूमन", "केहन", "पावन" एहन शब्द उपयुक्त रहत। ३) जँ कोनो मतलामे काफिया "तीमन" आ "नीमन" शब्द छै तखन कने धेआन राखए पड़त। दुनू शब्दकेँ धेआनसँ देखू, अंतमे "मन" वर्ण समूह उभयनिष्ठ छै तँ एहन काफियामे "मन" मूल वर्ण समूह भेल आ तइसँ पहिने दुनूमे "ई" स्वरक मात्रा छै (ती, नी) तँए एकर काफिया भेल "ई" स्वरक मात्राक संग "मन" वर्णक समूह। जँ कोनो शाइर "तीमन" आ "नीमन" केर बाद कोनो आन शेरमे "जीबन", "धूमन", "केहन", "पावन" काफिया लेताह तँ गलत हएत। सही काफिया हेत- "परिसीमन" आदि। ऐठाम ईहो मोन राखू जे जँ कोनो मतलामे "तीमन" आ "धूमन" काफिया छै तँ ओ गलत हएत कारण "मन" वर्ण समूहसँ पहिने एकटामे "ई" स्वरक मात्रा छै तँ दोसरमे "उ" स्वरक मात्रा। तेनाहिते "खाएत" एवं "आएत" काफियामे अंतसँ "एत" उभयनिष्ठ छै एवं तइसँ पहिने "आ" स्वरक मात्रा छै, तकर बाद आन शेरमे "जाएत", "नहाएत", "पाएत", "बुड़िआएत" आदि काफिया सही हेतै। ४) कोनो मतलामे "खौंझाएत" आ "बुझाएत" शब्दक काफिया नै भए सकैए से आब अहाँ सभ नीक जकाँ बुझि गेल हेबै। जँ कोनो शाइर एहन काफिया लै छथि तँ काफियामे "सिनाद दोष" आबि जाइत छै। ५) केखनो काल किछु एहन शब्द आबि जाइत छै काफियामे, जे अधिकांशतः एकसमान रहैत छै जेना- "पसार" एवं "सार"। ऐ दूटा शब्दमे अंतसँ "सार" उभयनिष्ठ छै आ केओ कहता जे "सार" सँ पहिने बला स्वरक मात्रा सेहो मिलबाक चाही। मने "पसार" एवं "सार" मे "प" अनकामन छै तँए " सार" सँ पहिने "अ" स्वर हेबाक चाही, मुदा शाइरीक निअमक हिसाबेँ मतलामे एहन काफियाक प्रयोग गलत होइत छै। अर्थात कोनो मतलामे अहाँ "पसार" एवं "सार", तेनाहिते "विचार" क संग "चार" आदि काफिया नै लऽ सकैत छी। ६) आब कने संयुक्ताक्षर बला काफियाकेँ देखी। किछु आर विवरणसँ पहिने किछु संयुक्त शब्द सभकेँ देखल जाए। प्रस्थान, चुस्त, दुरुस्त, किस्मत। आब ई देखू जे संयुक्त वर्ण अंतसँ कोन स्थानपर पड़ैत अछि। जँ ई अंतसँ तेसर आ ओकर बाद मने चारिम या पाँचम स्थानपर अबैत हो तँ काफियाक निअम पहिने जकाँ हएत। मुदा जँ इएह संयुक्त वर्ण काफिया बला शब्दक अंतसँ दोसर स्थान पर अबैत हो तँ कने धेआन देबए पड़त। मानि लिअ जे मतलाक पहिल पाँतिमे "मस्त" काफिया छैक। तँ आब हरेक काफियाक अंतमे "स्त" रहबाक चाही। उदाहरण लेल "मस्त" क काफिया "दस्त", "पस्त", "हरस्त" आदि भऽ सकैए। उदाहरण रूपमे एकटा शेरकेँ देखल जाए-- हएत कोना गुदस्त जीबन भेल चिन्तासँ हरस्त जीबन आब ऐ शेरमे रदीफ "जीबन" भेल आ पहिल पाँतिमे काफिया "गुदस्त" अछि, आब संयुक्ताक्षर बला निअमक हिसाबें काफिया बला शब्दमे अंतसँ दोसर वर्ण "स्त" होएबाक चाही। आब दोसर पाँतिके देखू रदीफसँ पहिने काफियाक रूपमे "हरस्त" अछि जकर अंतसँ "स्त" संगे-संग "अ" वर्णक स्वर साम्य सेहो छै जे निअमक मोताबिक सही अछि। ऐ गजलमे आन काफिया सभ एना अछि- "व्यस्त", "मदमस्त", "मस्त", "सस्त" आदि। उपरके निअम जकाँ मतलाक पहिल पाँतिमे जँ "मस्त" काफिया छै तँ ओकर बाद आन शेरमे "चुस्त" "सुस्त" आदि काफिया नै आबि सकैए। संयुक्ताक्षरक ई निअम मात्रा बला काफिया लेल कने अलग ढ़ंगसँ छैक। ७) तँ आब आबी कने "ए" आ "य" बला प्रसंगपर। ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। मुदा "ए" केर प्रयोग प्राचीन मैथिलीए सँ अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नै करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली " य "क अपेक्षा "ए"सँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। एतेक जनलाक बाद आबी "ए" वा "य" केर ध्वनि लोप पर। ओना "ए" वा "य" क संगे-संग आन ध्वनि लोप सेहो होइत छै मुदा ओकर चर्चा एतए आवश्यक नै। तँ देखी ध्वनि लोपक निअम- ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ "ए" वा "य" केर ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओइ सँ पहिने अंक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नै लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। आब एक बेर फेर घुरि जाइ उच्चारण पर। उच्चारणमे लोप-सूचक चिह्न ( ' ) वा विकारी (ऽ) केर कोनो महत्व नै होइत छैक। मने लोप सूचक चिन्ह वा विकारीसँ पहिने जे वर्ण छै तकरे पूरा-पूरी उच्चारण हेतै कनेक नमहर उच्चारणक संग ( मुदा ऐ कने नमहर उच्चारणक कारण ओ वर्ण दीर्घ नै मानल जाएत। डा. रामावतार यादव ऐ नमहर उच्चारणकेँ दीर्घ तँ मानै छथि मुदा गनतीमे शब्दकेँ लघु मानै छथि )। जेना "लए" शब्दमे ल केर बाद ए केर उच्चारण होइत अछि मुदा जखन ओही "लए" शब्दकेँ "ल'" वा "लऽ" लिखबै तखन ओकर उच्चारण बदलि जाएत आ एकर उच्चारण "ल" केर बराबर हएत। मतलब जे "ल'" वा "लऽ" केर उच्चारण "लए" वा "लय" शब्दसँ बिल्कुल अलग अछि। तेनाहिते "खस'" वा "खसऽ" केर उच्चारण "खसए" वा "खसय" शब्दसँ अलग अछि। एहन-एहन शब्द जकर अंतमे "ए" वा "य" लोप होइत होइ तकरा लेल एहने सन निअम हेतै। जँ कोनो शाइर ध्वनि लोपक चिन्ह वा विकारी बला शब्दक काफिया बनबै छथि तँ ओ धेआन राखथि जे हरेक काफियामे लोप-सूचक चिह्न ( ' ) वा विकारी ( ऽ) सँ पहिनुक वर्ण एकसमान राखथि। जेना "ल'" वा "लऽ" केर काफियाक बाद शाइर एहन शब्द चुनथि जकर अंतमे लोप-सूचक चिह्न ( ' ) वा विकारी ( ऽ) लागल हो तकरा बाद वर्ण "ल" हो जेना "चल'" वा "चलऽ"। जँ कोनो शाइर "राख'" वा "राखऽ" केर काफिया "बाज'" या "बाजऽ" रखताह तँ ओ गलत हेतै। "बाज'" या "बाजऽ" केर बाद "साज'" वा "साजऽ" काफिया हेतै। संगे-संग काफियाक उपरका बला निअम सभ पहिनेहें जकाँ अहूमे लागू रहत। जँ कोनो एहन शब्द जकर अंतमे "ए" वा "य" केर लोप भेल छै आ तइसँ पहिने कोनो मात्रा छै तँ ओकर काफिया लेल मात्राक काफिया बला निअम लागत जकर विवरण आगू देल जा रहल अछि। आब अहाँ सभ ई बूझि सकैत छिऐ जे -- लए---- ह्रस्व-दीर्घ लs------ह्रस्व ल'------ह्रस्व लय----- ह्रस्व- ह्रस्व वा दीर्घ आ दए, कए आदि लेल एहने सन निअम रहत। आशा अछि जे एतेक उदाहरणसँ ई निअम सभ बुझबामे आएल हएत। ८) पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जइ वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक ऐ बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ ऐ मे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नै भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ क सँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नै देखल जाइछ। आब कने आबी काफिया पर (ऐठाम हमर आग्रह जे पंचमाक्षरक प्रयोग कएल जाए। ओना पहिने हम अपने अनुस्वारक प्रयोग करैत छलौं मुदा आब पंचमाक्षरक प्रयोग करैत छी आ ईएह मैथिलीक हितमे छै) जँ मतलाक कोनो काफिया मे पंचमाक्षर वा अनुस्वारक प्रयोग छैक तँ हरेक शेरक काफियामे अनुस्वार वा पंचमाक्षर हेबाक चाही ओहो ठीक ओही स्थान पर जइ पर पहिल काफियामे छैक। जेना मानि लिअ कोनो मतलाक पहिल पाँतिक काफिया "बसंत" छैक, तँ आब अहाँकेँ ओहन शब्द काफियामे देबए पड़त जकर अंतसँ दोसर वर्ण पर अनुस्वार वा पंचमाक्षर अबैत होइक जेना की "अनंत", "दिगंत" इत्यादि। आ एहने सन निअम चंद्रबिंदु लेल सेहो छैक। एकटा बात आर जँ कोनो मतलाक दुनू पाँतिमे अनुस्वार बला काफिया छै तँ ओकर बाद बला शेरक काफिया लेल पंचमाक्षर बला शब्द सेहो लए सकैत छी जेना--- जँ मतलामे की "बसंत" आ "अनंत" छै तँ बाद बला शेरक काफिया लेल "दिगन्त" सेहो लए सकैत छी। आन सभ पंचमाक्षर लेल एहने निअम बुझू। मुदा एहन ठाम ई मोन राखू जे पंचमाक्षर अपने वर्गक हेबाक चाही। मात्रा बला काफिया पर विचार करबासँ पहिने कनेक फेरसँ तहलीली रदीफ आ मैथिली विभक्ति पर विचार करी। कारण जे मैथिली विभक्ति मूल शब्दमे सटि जाइत छैक। आ तँए ओ केखन काफियाक रूप लेत आ केखन रदीफक से बुझनाइ परम जरूरी। विभक्ति------ मैथिलीमे विभक्ति चिन्ह समान्यतः पाँच गोट अछि। कर्म---- केँ करण--- एँ /सँ अपादान-- सँ सम्बन्ध---क अधिकरण--मे /पर ऐकेँ अतिरिक्त विद्वान लोकनि कर्ताक चिन्हकेँ सुन्नाक रूपमे लैत छथि। ई पाँचो चिन्ह मूल शब्दमे सटि जाइत छैक। आ ऐ पाँचोमेसँ "एँ" चिन्ह मूल शब्दक ध्वनि बदलि दैत छैक। उदाहरण लेल देखू-- "बाट" शब्दमे "एँ" चिन्ह सटने " बाटेँ" होइत छैक। "हाथ" शब्दमे सटने "हाथेँ" इत्यादि। आब कने ई विचारी जे जँ कोनो शाइर एहन शब्द, जइमे विभक्ति सटल होइक जँ ओकर काफिया बनेता तँ की हेतै। ऐ लेल किछु एहन शब्द ली जइमे विभक्ति सटल होइक। उदाहरण लेल-- मूल शब्द-------------- विभक्तिसँ सटल शब्द हाथ------------------- हाथक /हाथेँ/ हाथसँ/ हाथमे/ हाथकेँ फूल-------------------- फूलक /फूलसँ /फूलेँ संग-------------------- संगमे /संगेँ राति------------------- रातिएँ/ रातिसँ /रातिमे ऐ विवरणकेँ हमरा लोकनि दू भागमे बाँटि सकै छी------ १) एहन मूल शब्द जे अंतसँ अकारान्त हुअए, आ २) एहन मूल शब्द जकर अंतमे मात्राक प्रयोग होइक १) आब जँ कोनो शाइर एहन मूल शब्द जे अकारान्त छैक आ ओइमे विभक्ति लागल छैक तकरा काफिया बनबै छथि तँ हुनका ई मोन राखए पड़तन्हि जे बादमे आबए बला हरेक आन-आन काफियामे वएह विभक्ति कोनो आन मूल शब्दमे आबै जे अकारान्त होइक संगहि-संग स्वर-साम्य सेहो रखैत हो। उदाहरण लेल----- मानू जे केओ मूल "हाथ" शब्दमे "क" विभक्ति जोड़ि "हाथक" काफिया बनेलक। दोसर आन-आन काफिया लेल ई मोन राखू जे आबए बला ओइ काफियाक अंतमे "क" विभक्ति तँ एबै करतै, मुदा विभक्ति "क"सँ ठीक पहिने अकारान्त वर्ण एवं स्वर-साम्य होएबाक चाही जेना की मानू "बात" शब्दमे विभक्ति "क"जुटला पर "बातक" शब्द बनैत अछि। आब पहिल काफिया "हाथक" आ दोसर काफिया "बातक" मिलान करु (काफियाक मिलान सदिखन शब्दक अंतसँ कएल जाइत छैक)। देखू पहिल काफिया "हाथक" आ दोसर काफिया "बातक" दुनूक अंतमे विभक्ति "क" अछि संगहि-संग विभक्ति "क" केर बाद दुनू काफियाक शब्द "थ" आ "त" अकारान्त अछि, संगहि-संग "हा" केर स्वर-साम्य "बा" सँ छैक। आब फेर तेसर शब्द "पात" लिअ आ जँ ओइमे "क" विभक्ति जोड़बै तँ "पातक" शब्द बनतै। आब पहिल काफिया "हाथक" आ दोसर काफिया "पातक" मिलान करु। देखू अंतसँ दुनू शब्दमे "क" विभक्ति छैक आ ठीक ओइसँ पहिने दुनू शब्द अकारान्त छैक आ संगहि-संग "हा" क स्वर-साम्य "पा"सँ छैक। एनाहिते दोसर उदाहरण देखू- मूल शब्द "पात" विभक्ति "मे" जुटला पर "पातमे" शब्द बनैत अछि। फेर दोसर शब्द "बाट" विभक्ति "मे" जुटला पर "बाटमे"। आब फेरसँ मिलान करु- दुनू शब्दक अंतमे विभक्ति "मे" लागल छैक। विभक्ति "मे" सँ ठीक पहिने अकारान्त वर्ण सेहो छैक संगहि-संग "पा" केर स्वर-साम्य "बा"सँ छैक। किछु आर उदाहरण लिअ- "कलमसँ", "पतनसँ", "बापकेँ", "आबकेँ" इत्यादि। मुदा ऐठाम ई बात एकदम धेआन राखू जे जँ कोनो शाइर लेखनमे हिन्दीक प्रभावसँ मूल शब्दमे विभक्ति नै सटबै छथि तैओ उच्चारणमे मूल शब्द आ विभक्ति स्वतः सटि जाइत छै तँए विभक्ति सटा कऽ लिखू वा हटा कए बिना रदीफक गजल हेबे करत। एकरा एना बूझी--- कोनो मतलामे " कलमसँ " आ " पतनसँ " काफिया बनि सकैए आ संगे-संग मतलामे " कलम सँ " आ " पतन सँ " सेहो काफिया बनि सकैए आ एकरा बिना रदीफक गजल कहल जाएत तेनाहिते "आँखिसँ" आ चाँकिसँ " काफिया सेहो ठीक रहत आ "आँखि सँ" आ चाँकि सँ " सेहो । ओना जँ कोनो उर्दू-हिन्दीक शाइर कोनो गजलमे " कलमसँ " आ " पतनसँ " वा " कलम सँ " आ " पतन सँ " काफिया देखताह तँ ओकरा गलत कहि देताह, मुदा ई बात सदिखन मोन राखू जे उर्दू-हिन्दी भाषा अलग छै आ मैथिली भाषा अलग छै, एकर व्याकरण आ उच्चारण पद्धति अलग छै तँए अरबीमे पारित पूरा-पूरी निअम मैथिलीमे लागू नै भऽ सकैए। २) एहन मूल शब्द जकर अंतमे मात्रा होइक ओकर काफिया लेल धेआन राखू जे विभक्तिक बाद ठीक वएह मात्रा स्वर-साम्यक संग एबाक चाही। उदारहरण लेल- आँखिसँ----चाँकिसँ----बाँहिसँ, इत्यादि रातिमे----जातिमे--- जाठिमे, इत्यादि घुटठीकेँ---गुड्डीकेँ---चुट्टीकेँ, इत्यादि पानिक--आनिक, इत्यादि केखनो काल दूटा विभक्ति एकै संग जुटि जाइत छैक जेना "रातिएँसँ" एहन समयमे अहाँकेँ दोसरो काफिया ओहने लेबए पड़त जइमे दुनू विभक्त समान होइक स्वर-साम्यक संगे। उदाहरण लेल " रातिएँसँ" केर काफिया "छातिएँसँ" "हाथिएँसँ" "बाटिएँसँ" आदि-आदि भऽ सकैत अछि। विभक्ति बला काफियाक संबंधमे एकटा आर खास गप्प। कोनो एहन मूल शब्द जकर अंत कोनो एकटा खास विभक्तिसँ साम्य रखैत हुअए, विभक्तिसँ पहिने बला वर्ण अकारान्त वा मात्रा युक्त (जेहन स्थिति) हुअए संगहि-संग ओइसँ पहिने स्वर-साम्य हुअए तँ ओ दुनू काफियाक रूपमे लेल जा सकैए। उदाहरण लेल एकटा विभक्ति बला शब्द "पातक" वा "बाटक" लिअ। आ आब एहन मूल शब्द ताकू जकर अंतमे "क" होइ, "क" सँ पहिने अकारान्त वर्ण होइक (जँ अकारान्त वर्णसँ पहिने स्वर-साम्य होइ तँ आरो नीक) तँ ओ दुनू (एकटा विभक्ति युक्त आ दोसर मूल) शब्द काफिया भऽ सकैत अछि। उदाहरण लेल उपर लेल दुनू विभक्त युक्त शब्द "पातक" आ "बाटक"क मूल शब्द "बालक" पालक" वा "चालक"सँ मिलाउ। जँ गौरसँ देखबै तँ पता लागत जे ई शब्द सभ काफिया लेल एकदम्म उपयुक्त अछि। तेनाहिते मात्रा बला शब्द जइमे विभक्ति सटल हुअए आ ओहन मूल शब्द जे ओकरासँ मिलैत हुअए एकदोसराक काफिया बनि सकैत अछि। जँ कोनो मतलाक अंत मूल शब्दसँ सटल विभक्तिसँ होइक तँ ओकरा बिना रदीफक गजल मानू। उदाहरण लेल- पसरल छै शोणित सगरो बाटपर घर-आँगन-बाड़ी-झाड़ी घाटपर ऐ गजलक आन अंतिम शब्द अछि---- "हाटपर", "खाटपर", "टाटपर"। देखू ऐ सभमे अंतसँ " पर " सेहो छै एवं " आ " स्वरक संग " ट " वर्ण सेहो छै। मुदा तैओ एकरा बिना रदीफक गजल मानल जाएत। आब कने मात्रा बला काफिया पर विचार करी। मैथिली वर्णमालामे १६ गोट स्वर देखाओल गेल अछि। अ, आ, इ, ई उ, ऋ, ॠ, लृ,( आ लृक आर एकटा दीर्घ रूप) ऊ, ए, ऐ. ओ. औ, अं एवं अः। जइमे "अ" तँ हरेक वर्णक (जइमे हलन्त् नै लागल होइक)मे अंतमे अबिते छैक। अन्य छह गोट स्वर ( ऋ,ॠ, लृ आ लृक आर एकटा दीर्घ रूप, अं एवं अः) खाली तत्सम शब्दमे अबैत छैक। बचल नओ गोट स्वर आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, एवं औ (एकर लेख रूप क्रमशः--ा, ि, ी, ु, ू, े, ै, ो एवं ौ अछि)। संगे-संग हम मैथिलीमे रेफ बला काफिया पर सेहो बिचार करब। मतलब जे ऐठाम हम कुल दस गोट मात्रा पर बिचार करब। मुदा ऐ दसोमे "इ", "उ" आ रेफ पर बिचार हम बादमे करब। एकर कारण जे मैथिलीमे ऐ तीनूक उच्चारण कने अलग ढंगसँ होइत अछि। तँ चली मात्रा बला काफिया पर। मतलामे रदीफसँ पहिने जँ वर्णमे कोनो मात्रा छैक तँ गजलक हरेक शेरक काफिया मे वएह मात्रा अएबाक चाही चाहे ओइ मात्राक संग बला वर्ण दोसरे किएक ने हो। पूब मे उगल ललका थारी त' देखू दूइभक घर चमा चम मोती त' देखू (अमित मिश्र) ऐ गजलमे लेल गेल आन काफिया सभ अछि- किलकारी, बेमारी, पारी, साड़ी आ तरकारी। ऐठाम ई धेआन देबए बला बात अछि जे मतलामे जे काफिया प्रयोग भेल छै तकर अंतमे " ई " केर मात्रा छै वर्ण मुदा अलग-अलग छै मुदा ओइसँ पहिने बला स्वर नै मीलि रहल छै एकर मतलब ई भेल जे मात्रा बला काफिया लेल शब्दक अंतमे जे मात्रा छै सएह आन शब्दक अंतमे अएबाक चाही बशर्ते कि वर्ण अलग-अलग हुअए। आब ऐठाम ई देखू जे जँ मतलामे " थारी " क संग साड़ी रहितै तखन आन काफियामे "ड़ी" वा " री" कामन रहितै आ तइसँ पहिने " आ" केर स्वर साम्य रहितै। जेना " बाड़ी ", उधारी, अधकपारी इत्यादि। जँ " थारी " आ " बाड़ी" केर बाद "मोती" शब्दक काफिया लै छी तँ सिनाद दोष आबि जाएत आ काफिया गलत भऽ जाएत। तेनाहिते जँ कोनो मतलामे " मोती " आ कोठी" काफिया लेबै तखन साड़ी, उधारी आदि काफिया भऽ सकैए। कोना से आब अहाँ सभ नीक जकाँ बुझि गेल हेबै। ऐ निअमक अधार पर हमर प्रकाशित पोथी " अनचिन्हार आखर " केर बहुत रास काफिया गलत अछि। मुदा ओइ समय हमरा लग काफिया जतेक समझ छल ओइ हिसाबसँ ओकर प्रयोग कएल। आ तँए ओइ पोथी महँक किछु काफियाक निअम आब पूर्णतः बेकार भऽ चुकल अछि। संगे संग ईहो धेआन राखू जे आन मात्रा बला कफिया लेल एहने निअम रहत। एकटा गलत उदाहरण देबासँ हम अपनाकेँ रोकि नै रहल छी। ई शेर हमरे थिक---- एनाइ जँ अहाँक सूनी हम नहुँएसँ सपना बूनी हम" (काफिया "ई"क मात्रा) गजलक अन्य काफिया अछि---- "चूमी", "पूछी", "बूझी", "खूनी", ,"लूटी", "सूती" आदि। आब ऐ शेरमे देखू दुनू पाँतिक काफियामे " नी " कामन छै आ तइ हिसाबसँ हमरा एहन काफिया चुनबाक छल जकर अंतमे " नी " अबैत हो आ तइसँ पहिने " ऊ " केर मात्रा हुअए। ऐ शेरमे " ऊ " केर मात्रा तँ लेल गेल अछि मुदा " नी " केर पालन नै भेल अछि तँए ऐ गजल महँक एकटा काफिया " खूनी " छोड़ि आन सभ ( जेना चूमी", "पूछी", "बूझी ""लूटी", "सूती" ) आदि गलत अछि| अन्य बचल मात्राक लेल एहने समान निअम अछि आ हरेक मात्राक एक-एकटा उदाहरण देल जा रहल अछि। १) छोड़ि कऽ जे बिनु बजने जा रहल अछि हृदै चिरैत आगि सुनगा रहल अछि ( काफिया " आ " केर मात्रा) ( गजेन्द्र ठाकुर ) ऐ गजल आन काफिया सभ अछि------कना, भसिया, जा, खा इत्यादि। २) "जँ तोड़ब सप्पत तँ जानू अहाँ फाँसिए लगा मरब मानू अहाँ" (काफिया "ऊ" क मात्रा) (आशीष अनचिन्हार, सरल वार्णिक) ऐ गजलमे लेल गेल अन्य कफिया- "गानू", "आनू", "टानू" आदि। ३) "मोन तंग करबे करतै देह भाषा पढबे करतै" (काफिया "ए"क मात्रा) ऐ गजलमे लेल गेल अन्य कफिया ---"खुजबे", "उड़बे", "सटबे" आदि अछि। ४) भोरे उठि मैदान गेलै बौआ ओम्हरहिसँ दतमनि तँ लेतै बौआ (आशीष अनचिन्हार ) (काफिया "ऐ"क मात्रा) ऐ गजलक आन काफिया सभ अछि- एतै, जेतै, बनतै, चलतै आदि-आदि। ऐ केर मात्राक एकटा आर उदाहरण देखू---- करबा नै मजूरी माँ पढबै हमहूँ नै रहबै कतौ पाछू बढबै हमहूँ (ओमप्रकाश ) ऐ गजलमे लेल गेल आन काफिया अछि------चढ़बै, मढ़बै, गढ़बै आदि-आदि। केखनो काल "ऐ" केर उच्चारण "अइ" जकाँ होइत अछि। जेना "सैतान" बदलामे सइतान, बैमानक बदलामे "बइमान" इत्यादि। ५) आब हरजाइकेँ तों बिसरि जो रे बौआ मोन ने पड़ौ एहन सप्पत खो रे बौआ (काफिया "ओ"क मात्रा) (आशीष अनचिन्हार, सरल वार्णिक) ऐ गजलमे लेल गेल अन्य कफिया------ओ, खसो, पड़ो इत्यादि अछि। ६) एक बेर फेर हँसिऔ कनेक ओही नजरि सँ देखिऔ कनेक (काफिया "औ"क मात्रा) (आशीष अनचिन्हार, सरल वार्णिक) ऐ गजलमे लेल गेल अन्य कफिया ---"रहिऔ", "चलिऔ", "बुझबिऔ" आदि अछि। **** केखनो काल "औ" केर उच्चारण "अउ" जकाँ होइत अछि। आब हमरा लोकनि फेरसँ एकबेर संयुक्ताक्षर बला शब्दपर चली। मात्रा बला संयुक्ताक्षर लेल पहिनेसँ कने अलग ढङसँ देखू। ई गप्प उदाहरणसँ बेसी फड़िच्छ हएत। मानू जे मतलाक पहिल पाँतिमे काफियाक रूपमे "चुट्टी" शब्द लेल गेल। आब दोसर काफिया लेल मोन राखू जे "ई" मात्रा युक्त कोनो शब्द भऽ सकैत अछि। उदाहरण लेल "चिन्नी", "बुच्ची", "खटनी" आदि "चुट्टी"क काफिया भऽ सकैत अछि। मुदा जँ मतलाक काफिया "मुट्ठी" आ "घुट्ठी" छैक तखन आन शेरक काफिया "चिन्नी" या "बुच्ची" नै भऽ सकैत अछि। कारण तँ अहाँ सभ बुझिए गेल हेबै। उम्मेद अछि जे उपर देल गेल मात्रा बला उदाहरणसँ काफिया संबंधी निअम बेसी फड़िच्छ भेल हएत। तँ आब चली "इ", "उ" आ रेफ पर। मैथिलीमे "इ" आ "उ" लेख आ उच्चारण दुनू पहिने लिखल आ कएल जाइत छैक। एकरा हम उदाहरणसँ देखाएब, तँ पहिने "इ" केर उदाहरणसँ शुरु करी। शब्द "राति" मुदा ओकर उच्चारण भेल "राइत", लिखल जाइए "गानि" मुदा बाजल जाइए "गाइन", तेनाहिते "पानि" केर उच्चारण "पाइन" भऽ गेल। मैथिलीमे वर्ण "इ" तेहन उत्फाल मचेलक जे बहुत आन शब्द सभ "इ" वर्णक संग लिखल जाए लागल जेना की "जाइत", "खाइत" आदि। एकटा आर महत्वपूर्ण गप्प, मैथिलीमे "इ"कार दू रूपमे प्रयोग होइत अछि- पहिल रूप भेल जइमे मात्रा अबैत अछि आ दोसर रूपमे "इ"कार वर्णक रूपमे अबैत अछि। पहिल रूपक उदाहरण "राति", "जाति" सभ भेल आ दोसर रूपक उदाहरण "जाइत", खाइत" सभ भेल। आब कने हमरा लोकनि काफिया पर आबी। जँ अहाँ कोनो एहन शब्दक काफिया बना रहल छी जकर अंतिम वर्ण "इ"कार युक्त अछि तँ अहाँकेँ आन-आन काफिया लेल "इ" कार युक्त वएह वर्ण लेबए पड़त जे पहिल काफियामे अछि। उदाहरण लेल जँ अहाँ "राति" शब्द काफिया लेल लेलौं तँ आब अहाँकेँ दोसर काफिया लेल "त" वर्ण "इ"कार युक्त हेबाक चाही। जेना कि "पाँति", "जाति", आदि अथवा एहन शब्द लिअ जकर अंतमे "त" होइक आ तइसँ पहिने "इ" वर्णक रूपमे रहए जेना की "जाइत"। एकर मतलब जे "राति" शब्दक काफिया लेल "जाति", "पाँति" क संगे "जाइत", "खाइत", "नहाइत" सेहो आबि सकैत अछि। आ हमरा जनैत ऐठाम मैथिली गजल उर्दू गजलसँ पूर्णतः अलग भऽ जाइत अछि। आ संगहि-संग ई विशेषता मैथिली गजलक एकटा अपन अलग छवि बनैैत अछि। आ ई विशेषता ह्रस्व "उ", "ऐ, "औ", आ रेफ बलामे सेहो अबैत अछि। आब कने ह्रस्व "उ" पर धेआन दी। मैथिलीमे जँ शब्दक अंतमे "उ" अबैत हो आ ठीक ओइसँ पहिने अकारान्त वर्ण हुअए तखन "उ" केर उच्चारण प्रायः औ/ अउ जकाँ होइत अछि। उदाहरण लेल मधु शब्दक उच्चारण मौध/ मउध होइत अछि। आ जँ "उ"सँ पहिने आकारान्त वर्ण हो तखन "इ"ए जकाँ "उ" केर उच्चारण पहिने होइत अछि। उदाहरण लेल "साधु" केर उच्चारण "साउध", "बालु" केर उच्चारण "बाउल" इत्यादि। ओना उच्चारण लेल आनो शब्द लेल जा सकैए। आब ई देखी जे ऐ प्रकारक शब्दक काफिया कोना बनतै। जँ अहाँ "उ" सँ पहिने अकारान्त बला वर्णसँ बनल शब्द काफिया लेल लैत छी तँ धेआन राखू जे आन-आन काफियाक उच्चारण "कोनो वर्ण( एक वा एकसँ बेसी) + औ/अउ + अंतिम निश्चित वर्ण" आबै। आब उपरकेँ बला शब्द "मधु"केँ लिअ। एकर उच्चारण "म + औ/अउ + ध" अछि, तँए एकर दोसर काफिया "कोनो वर्ण( एक वा एकसँ बेसी) + औ/अउ + ध" हेतै। आब जँ अहाँ दोसर शब्द "पौध" लेलहुँ, तँ एकर उच्चारण "प + औ/अउ + ध " अछि। अर्थात "मधु" केर उच्चारण "पौध" केर बराबर अछि। तँए "मधु" केर काफिया "पौध" हएत। एनाहिते आन-आन शब्द सभ काफियाक लेल ताकल जा सकैए। आब आबी ओहन शब्दपर जकर अंत "उ" होइक आ ठीक ओइसँ पहिने आकारान्त वर्ण होइक (जेना कि उपरमे एकर उच्चारण पद्धित देखा देल गेल अछि, तँए सोझे काफिया पर चली)। ठीक ह्रस्व "उ" जकाँ निअम छैक एकरो। मानि लिअ जँ अहाँ "बालु" शब्द लेलहुँ, तँ मोन राखू दोसर काफियाक उच्चारण "आकारान्त कोनो वर्ण + उ + ल" होइक जेना की "भालु" इत्यादि। संगहि-संग ह्रस्व "इ"ए जकाँ "चाउर" केर काफिया "चारु" एवं "बालु" केर काफिया "आउल" ( owl) भए सकैत अछि। मैथिलीमे बहुत काल "उ" आ चन्द्रबिंदु एकै संग अबैत अछि। जेना "कहलहुँ" ,"सुनलहुँ", "रहलहुँ" आदि। मानि लिअ जँ ई शब्द सभ जँ काफियाक रूपमे आबि रहल अछि तँ एहन समयमे धेआन राखू जे काफियामे ठीक वएह वर्ण "उ" आ चन्द्रबिंदुक संग आबए। से नै भेला पर काफिया गलत भऽ जाएत। उपरमे देल तीनू शब्दकेँ देखू । तीनू शब्दक अंत "ह" सँ अछि, ओहो "उ" आ चन्द्रबिंदुक संग। मने ई तीनू काफिया लेल उपयुक्त अछि। आघात बला शब्दक काफिया------- मैथिलीमे दू प्रकारक आघात अछि मात्रात्मक आ बलाघात। मुदा मात्रात्मक आघात ओतेक महत्व नै रखैत अछि, तँए हम एतए खाली बलाघात पर बिचार करब। मैथिलीमे कोन शब्दमे कतए आघात पड़त तकरा देखल जाए- १) दू वर्ण धरि बला एहन शब्द जइमे एकौटा गुरू वर्ण नै हुअए- एहन शब्दमे अंतसँ दोसर शब्द पर आघात पड़ैत छैक। जेना "घर", "बर"। एकर उच्चारण "घऽर", "बऽर" आदि होइत अछि। मतलब "घ" आ "ब" पर आघात पड़ल छैक। जँ एक या एकसँ बेसी दीर्घ हुअए तँ पहिल दीर्घ पर आघात पड़ैत छैक। जेना "हाथ", "खत्ता" आदि। मतलब "हा" आ "त्ता" पर आघात छैक। "हाथी" "माछी" । ऐ शब्द सभमे पहिल गुरू "हा" एवं "मा" पर आघात छैक। २) तीन वर्ण बला एहन शब्द जइमे तीनू लघु वर्ण हो- एहन शब्दमे अंतसँ दोसर वर्ण पर आघात पड़ैत छैक। जेना "तखन", अगहन" । ऐमेे "ख" आ "ह" पर आघात छैक। जँ एक या एकसँ बेसी दीर्घ हुअए तँ पहिल दीर्घ पर आघात पड़ैत छैक। जेना "ओसारा"मे "ओ" पर आघात छैक। "बतासा" मे "ता" पर आघात छैक। ३) चारि वर्ण बला शब्दमे अंतसँ दोसर वर्ण पर आघात पड़ैत छैक। उदाहरण लेल "भिनसर" मे "स" पर आघात छैक, "अगहन" मे "ह" वर्ण पर छैक। जँ चारि वर्ण बला ओहन शब्द जइमे दीर्घ सेहो छैक तकर आघात उपरमे देल गेल आने निअम जकाँ अछि। जेना "उच्चारण" मे च्चा पर आघात छैक। कुल मिला कऽ एकसँ चारि वर्ण धरिक शब्द लेल एकै रंगक निअम अछि। ३) पाँच वर्ण बला शब्दमे अंतसँ तेसर वर्ण पर होइत छैक चाहे ओ लघु हो की दीर्घ। मने पाँच वर्णमे आघात सदिखन बीच बला वर्ण पर पड़ैत छैक। उदाहरण लेल "देखलहक" मे अंतसँ तेसर वर्ण "ल" पर आघात छैक, तेनाहिते "कमरसारि" मे "र" पर आघात छैक, "कनपातर" मे "पा" पर आघात छैक। ४) छह आ छहसँ बेसी वर्ण बला शब्दमे दू ठाम आघात पड़ैत छैक। शब्दक अंतसँ दोसर वर्ण पर आ अंतेसँ चारिम वर्ण पर चाहे ओ लघु हुअए की दीर्घ। ऐठाम इहो मोन राखू जे शब्दक अंतसँ दोसर वर्ण पर पड़ल आघात बेसी कठोर मुदा चारिम स्थान पर पड़ल आघात मन्द होइत अछि। * विभक्ति बला शब्दमे आघात निर्धारित करबाक लेल विभक्तिकेँ हटा कऽ गणना करु। जेना की "पातक" शब्दमे आघात गणना "त" वर्णसँ शुरु हएत ने कि अंतिम वर्ण "क" सँ। सभ विभक्ति जुटल शब्द लेल इएह मोन राखू। आब कने आघात बला शब्दक काफिया देखी। एहन ठाम ई मोन राखू जे आघात बला स्थान आ वर्णक मात्रा समान रहए। उदाहरण लेल "घर" आ "मजूर" दुनूमे दोसर स्थान पर आघात छैक मुदा मात्रा अलग-अलग छैक, तँए ई दुनू एक-दोसराक काफिया नै बनि सकैए। तँ "घर" शब्दक काफिया लेल "बर", "तर", " हर", “भिनसर" आदि उपयुक्त रहत । आ "मजूर" लेल "मयूर", "हजूर" आदि उपयुक्त रहत। आनो-आन आघात बला शब्दक काफिया लेल ईएह निअम बुझू। ऐठाम हम फेर मोन पाड़ी जे काफियाक निर्धारण खाली मतलामे होइत छैक आ बाँकी शेरमे ओकर पालन। तँए जँ केओ मतलामे विभक्ति बला शब्दकेँ "फूलक" आ हाथक" काफिया लेताह तँ सही हएत आ बादबाँकी शेरमे "अक" काफियाक प्रयोग हेतैक। मुदा जँ केओ गोटे मतलामे "फूलक" आ "अड़हूलक" लेलक आ तकरा बादक शेरमे "हाथक" प्रयोग करत तँ ओ बिल्कुल गलत हएत। "फूलक" आ "अड़हूलक" बाद आन शेर लेल काफिया "ूलक" होएबाक चाही। आब कने "रेफ" बला काफिया पर बिचार करी। रेफ "र" वर्णक एकटा रूप अछि जे "र्" मने आधा "र्" मानल जाइत अछि। मैथिलीमे रेफ आ ओकर पूर्ण रूप ( र वर्ण ) दुनू चलैत अछि। जेना- मर्द------ मरद बर्खा-----बरखा बर्ख-----बरख चर्चा----चरचा उपरका चारिटा शब्द देखलासँ ई बुझाइत अछि जे रेफक पूर्ण रूप आ रेफ बला शब्दक उच्चारणमे कनेक अंतर भऽ जाइत छै। संगे-संग किछुए शब्द अपन रेफकेँ छोड़ि पूर्ण र केर स्वरूपमे अबैत अछि। तँए काफियाक संबंधमे हमर ई विचार अछि जे जँ शब्द रेफ युक्त हुअए मुदा बिना मात्राक हुअए तँ समान स्वर आ उच्चारणक प्रयोग करी। जेना मानि लिअ अहाँ मतलामे " सर्द " आ "पर्द" काफिया लेलहुँ आ तकरा बादक शेरमे " मरद" काफियाक प्रयोग हमरा हिसाबें गलत हएत कारण स्पष्ट रूपेँ "गर्द" आ "पर्द" शब्दक उच्चारण "मरद" शब्दसँ अलग अछि। तेनाहिते मतलामे "सर्द" आ "मरद" शब्दक काफिया गलत हएत। "मरद" शब्दक बाद "बड़द", "शरद", "दरद" आदि काफिया ठीक रहत। मुदा जँ कोनो एहन शब्द जकर अन्तमे रेफ हुअए आ संगे-संग ओ शब्द मात्रा बला हुअए तँ निअम बदलि जेतै। मतलब जे शाइर तखन बिना कोनो दिक्कतक काफिया बना सकैत छथि। कहबाक मतलब जे जँ अहाँ मतलाक पहिल पाँतिमे काफिया "गर्दा" लेलहुँ आ तकरा बाद आन काफिया बर्खा या बरखा लेलहुँ तँ बिलकुल सही हएत। आब अहाँ सभ बुझि सकैत छिऐ जे कोनो मतलामे "बर्खी" आ "करची" बनि सकैत अछि। स्वर साम्य, सिनाद दोष आ ईता दोष बला प्रसंग सभ आने काफिया जकाँ अहूमे लागू हएत। तेनाहिते ई मोन राखू जे जँ रेफ शब्दकेँ अंत छोड़ि (शुरूमे वा बीचमे कतौ) छैक तँ संस्कृतक शब्दमे तँ रेफे रहत मुदा विदेशज खास कऽ अरबी-फारसी आ उर्दू बला शब्दमे "र" भऽ जाइत अछि। जेना कि पर्वतकेँ " परवत" नै लिखल जा सकैए मुदा शर्बतकेँ "शरबत" जरूर लीखि सकैत छी। ऐठाम ई मोन राखू पर्वत आ शरबत दुनू एक दोसराक काफिया भऽ सकैए। काफियाक संबंधमे एकटा गप्प आर- काफियामे वर्ण "र" केर उच्चारण "ड़" क बराबर मानू संगहि-संग "स", "श" आ "ष" केर उच्चारण सेहो समान मानू। जइठाम "ष"क उच्चारण "ख" जकाँ हएत ततए पूर्ण "ख" काफियाक रूपमे आबि सकैत अछि। जँ "ढ" अक्षर शब्दक शुरूमे छैक तँ ओकर उच्चारण "ढ" जकाँ होइत छैक मुदा तकरा बाद ओकर उच्चारण "रह्" जकाँ छैक। आ हमरा विचारे काफियामे "ढ", "र" एवं "ड़" समान अछि। उदाहरण लेल "ठाढ़"क काफिया "विचार", "हुराड़" आदि भऽ सकैत अछि। केखनो काल "त्र" केर लेख रूप "तर्" आ "क्ष" केर लेख रूप "च्छ" अबैत अछि। शाइर उपरके निअमक हिसाबे एकर काफिया बनाबथि। आब कने शुरुआत बला प्रश्न पर चली। पहिल प्रश्न छल जे जँ कोनो मतलामे "छोड़ए" आ "फोड़ए" काफिया हुअए तँ बाद बला शेरमे काफिया की हेतै। उत्तर स्पष्ट अछि बाद बाँकी शेरमे काफिया "ओड़ए" वा "ओरए" हेबाक चाही। नै तँ गजल गलत भऽ जाएत। संगहि-संग दोसर प्रश्न छल जे जँ "छोड़ए" आ "फोड़ए" क बाद "जाए" हुअए तँ सही हएत की गलत। एकरो उत्तर स्पष्ट अछि- जाए क उच्चारण "ओड़ए" वा "ओरए" सँ नै मिलैत अछि तँए "जाए" काफिया "छोड़ए" आ "फोड़ए" क बाद गलत हएत। आब कने एक बेर काफियामे ईता दोष देखल जाए--- ईता दोष काफियामे बहुत बड़का दोष मानल जाइत छै। ऐपर कने विचार कऽ ली। एकरा चारि भागमे देखू---- १) ईता दोष मात्र मतलामे होइत छै। २) जँ मतलाक दुनू काफिया मात्रा युक्त हुअए वा प्रत्ययसँ बनल हो वा सन्धिसँ बनल शब्द तँ दुनू काफियाक मात्रा हटा दिऔ, वा प्रत्यय हटा दिऔ वा सन्धि विच्छेद कऽ दिऔ। आब ई देखू जे मात्रा, प्रत्यय वा विच्छेदक बाद जे पहिल शब्द बचल शब्द छै से सार्थक छै की निरर्थक। जँ दुनूमेसँ एकौटा निरर्थक अछि तँ चिन्ता करबाक गप्प नै कारण एहन स्थितिमे ईता दोष नै रहत। ३) जँ दुनू शब्द (मात्रा, प्रत्यय हटेलाक बाद वा विच्छेदक बाद) सार्थक छै आ ओइ बचल पहिल सार्थक शब्दक आपसमे काफिया बनि रहल छै तखन मात्रा वा प्रत्यय वा सन्धिबला शब्द सेहो काफिया बनत आ ऐमे ईता दोष नै हएत। ४) मुदा जँ दुनू शब्द (मात्रा, प्रत्यय हटेलाक बाद वा विच्छेदक बाद) सार्थक छै आ ओइ बचल पहिल सार्थक शब्दक आपसमे काफिया नै बनि रहल छै तखन मात्रा वा प्रत्यय वा सन्धि बला शब्द सेहो काफिया नै बनत आ ऐमे ईता दोष हएत। आब कने उदाहरणसँ देखी ऐ प्रकरणक- मानू जे मतलामे "बिमारी" आ "आदमी" काफिया छै। तँ आब जँ दुनूक मात्रा हटेबै तँ क्रमशः " बिमार " आ " आदम " शब्द बचै छै जे की सार्थक छै। मुदा "बिमार" आ " आदम" एक दोसराक काफिया नै बनि सकैए। तँए मतलामे "बिमारी" एवं " आदमी" काफिया नै बनत। उर्दूमे जँ केओ एहन काफिया बनबै छथि तँ ओकरा ईता दोषसँ ग्रस्त मानल जाइत छै। एकटा दोसर उदाहरण लिअ-- दोस्ती आ दुश्मनी मतलामे काफिया नै बनि सकैए। कारण वएह मात्रा हटेलाक बाद दोस्त आ दुश्मन शब्द बचै छै जे की दुनू सार्थक छै आ दुनू एक दोसराक काफिया नै बनै छै तँए दोस्ती आ दुश्मनी मतलामे काफिया नै बनि सकैए। मैथिलीमे प्रत्यय बला शब्द संग सेहो एना कएल जा सकैत अछि। प्रत्यय बला शब्दक किछु उदाहरण देखू- धान शब्दमे गर प्रत्यय लगेलासँ नव शब्द बनै छै "धनगर"। तेनाहिते मोन शब्दमे गर प्रत्यय लगेलासँ "मनगर" शब्द बनै छै (किछु गोटेँ मोनगर सेहो लिखै छथि)। एनाहिते आन प्रत्ययसँ बहुत रास नव शब्द बनै छै। आब कने ऐ नव शब्दक काफियापर आउ- जँ धनगर शब्दक काफिया मनगर बनेबै तँ ईता दोष नै रहतै। कारण जँ ऐ दुनू नव शब्दमे सँ गर प्रत्यय हटेबै तँ क्रमशः धन आ मन बचै छै आ दुनूमे काफिया सेहो बनि रहल छै (ऐठाम ई मोन राखू जे प्रत्यय हटलाक बाद धन शब्द मिलाएल जेतै ने की धान, तेनाहिते मन मिलाएल जेतै ने की मोन)। आब जँ मतलामे धनगर संगे दुधगर आबै तँ देखू की हेतै। प्रत्यय हटलाक बाद क्रमशः धन आ दुध बचै छै मुदा दुनू एक-दोसराक काफिया नै बनि रहल छै तँए धनगर आ दुधगर एक-दोसराक काफिया नै बनि रहल अछि। आन-आन प्रत्यय वा सन्धि वा मात्रा लेल एहने सन बुझल जाए। आब जँ बिमारी संग उधारी आबै तँ देखू की हेतै। बिमार एवं उधार दुनू शब्द (मात्रा, प्रत्यय हटेलाक बाद वा विच्छेदक बाद) सार्थक छै आ संगे संग दुनू एक दोसरक काफिया बनि रहल छै तँए बिमारी आ उधारी सेहो एक दोसरक काफिया बनत आ ऐमे ईता दोष नै रहतै। आब जँ बिमारी संग जिनगी लेबै तँ देखू की हेतै। बिमार एवं जिनग (मात्रा, प्रत्यय हटेलाक बाद वा विच्छेदक बाद) बिमार शब्द सार्थक छै मुदा जिनग शब्द निरर्थक तँए बिमारी आ जिनगी सेहो एक दोसरक काफिया बनि सकैए। किछु शब्द एहन होइत छै जकरा पर मात्रा रहैत छै तखन अलग मतलब होइत छै आ मात्रा हटलाक बाद दोसरे मतलब बनि जाइत छै जेना "कारी" तँ एकर मतलब भेलै रंग कारी। मुदा जँ एकर मात्रा हटा देबै तँ बचतै "कार" जे की गाड़ीक संदर्भमे सार्थक शब्द तँ छै मुदा मतलब दोसर छै। तँए अहूँ काफियामे ईता दोष नै रहत। आन शब्द एनाहिते ताकल जा सकैए। आब केओ कहि सकै छथि जे बिमार आ बिमारी शब्द अलग-अलग छै मुदा हमर कहब जे बिमार आ बिमारी दुनूक अर्थ एकदोसरामे निहित छै मुदा कारी आ कार शब्दमे से नै छै। अस्तु ई भेल ईता दोष प्रकारण। तँ आब आबी कने काफियाक दोसर प्रसंगपर--------- मैथिली आ उर्दू वर्णमालामे अंतर जखन मैथिली गजलमे निअम सभ लागू होमए लागल तखन बहुत लोक सभकेँ कष्ट शुरु भेलन्हि। जिनका सभकेँ कष्ट एखनो छन्हि ओहिमे दू तरहँक आदमी छथि। पहिल तरहँक तँ ओ भेलाह जे पहिनेसँ गजल लिखै छथि मुदा बिना कोनो निअमक आ निअम लागू भेलासँ हुनक सभ रचनापर प्रश्न चिन्ह लागि गेल तँए ओ सभ निअमक विरोध करए लगलाह। दोसर तरहँक आदमी ओ छथि जे गजल तँ नै लिखै छथि मुदा गजल विधाक विकास नै सोहेलन्हि तँए ओहो विरोध करए लगलाह। तँ हमरा लग एकटा एहन आदमी छथि जे अपने गजल तँ नै लिखै छथि मुदा निअमक विरोध करै छथि। पेशासँ ओ राज्य सरकारक उच्चस्थ पदाधिकारी छथि। एक दिन ओ कतहुँसँ उर्दूक एकटा नीक शाइर केर गजल पोथी किनलन्हि जे की देवनागरीमे लिप्यंतरण भेल रहै। आब भाइ मैथिली आ उर्दू तँ अलग भाषा छै से ओ पदाधिकारी नै बूझि सकलाह आ हमरासँ प्रश्न पूछि देलाह जे ई महान उर्दू शाइर फल्लाँ केर पोथी थिक आ ऐमे " त " अक्षर केर काफिया " थ " अक्षर छै मुदा अहाँ मैथिलीमे तँ " त" आ "थ" केर अलग निअम बना देने छिऐ। जे निअम उर्दूमे नै चललै से मैथिलीमे कोना चलत आदि-आदि। हम तँ गुम्म रहि गेलहुँ। बहुत हिम्मति कए हम हुनकासँ पुछलिअन्हि जे श्रीमान् अपने पढ़ि कए पास केने छिऐ की पाइ दए क'। आब तँ ओहि सरकारी पदाधिकारीकेँ तामस जे चढ़लन्हि से की कहू---| ई एकटा खिस्सा अछि मुदा एहन घटना अहाँ संग सेहो भए सकैत अछि। मानि लिअ जे अहूँ कोनो उर्दू गजलक देवनागरी लिप्यंतरण भेल पोथी किनलहुँ आ पढ़लापर देखलहुँ जे " भ " केर काफिया " ब" भेल छै तँ अहूँ भ्रममे पड़ि जाएब। मुदा ऐठाम मोन राखू जे उर्दू आ मैथिली भाषा अलग छै आ ओकर लिपि सेहो अलग-अलग छै तँए काफियाक निअम दूनू भाषामे थोड़े अलग रहतै। इहो मोन राखू जे उर्दू केर जन्म भारतमे भेलै मुदा लालन-पालन अरबी-फारसी बला सभ केलकै। फलस्वरूप उर्दू भाषामे भारतीय भाषाक संगे-संग अरबी-फारसीक निअम चलैत अछि।आ तँए हम अतए देवनागरी ( संगे संग मिथिलाक्षर सेहो ) आ उर्दू लिपिमे अंतर दए रहल छी जाहिसँ अहाँ सभ ओहि पदाधिकारी जकाँ भ्रमित नै हएब।---- देवनागरी ( संगे-संग मिथिलाक्षरमे सेहो ) कुल 16टा स्वर आ 36टा व्यंजन अछि मतलब जे हरेक ध्वनि लेल अलग-अलग अक्षर बनाएल गेल छै मुदा उर्दूमे किछुए अक्षर छै आ तकरामे नुक्ता लगा वा " ह" ध्वनिक प्रयोग कए नव शब्द बनाएल जाइत छै।नुक्ता लगा वा " ह ' मिला कए जे नव शब्द बनैत छै तकरा उच्चारणक हिसाबसँ चारि भागमे बाँटि सकैत छी-------------- a) जे लिखलो जाइत छै आ तकरा उच्चारणों कएल जाइत छै ( हर्फे मक्तूबा मलफूजा )------ई सरल बात छै आशा अछि जे एकरा बुझि गेल हेबै। b) जे लिखल तँ जाइ छै मुदा ओकर उच्चारण नै कएल जाइत छै ( हर्फे मक्तूबा गैर मलफूजा )------उर्दूमे बहुत रास एहन शब्द छै जाहिमे किछु अक्षर लिखल तँ जाइ छै मुदा ओकर उच्चारण नै होइत छै आ मात्रा गनबा काल सेहो ओकरा नै गनल जाइत छै जेना---- "तुम अपनी" ऐकेँ आवश्यकता पड़लापर "तुमपनी" सेहो उच्चारित कएल जाइत छै। आब देखू जे "तुम अपनी"मे अ लिखल छै मुदा ओकर उच्चारण नै भए रहल छै ( आवश्यकता पड़लापर ) । शब्दकेँ ऐ तरीकासँ मिलेनाइकेँ " अलिफ वस्ल'क निअम कहल जाइत छै। जे लिखल तँ नै जाइ छै मुदा ओकर उच्चारण नै कएल जाइत छै ( हर्फे मलफूज गैर मक्तूबा )----जेना पढ़ल तँ बिल्कुल जाइ छै मुदा लिखल बालेकुल जाइ छै। आ चूँकि उच्चारणमे आबि रहल छै तँए मात्रा सेहो गनल जाइत छै। एहन-एहन आर उदाहरण सभ अछि। एहन अक्षर जकर अंतमे " ह" केर उच्चारण होइक ( हाए मख्तूली )------------लगभग कुल चौदहटा अक्षर उर्दू वर्णमालामे संस्कृत वर्णमालासँ लेल गेल छै। ई अक्षर सभ अछि-----------ख, घ, ङ, छ, झ,ठ,ढ,थ, ध,फ,भ, ल्ह,म्ह आ न्ह। उर्दूमे ऐ शब्द सभकेँ एना लिखल जाइत छै------ क संग ह जोड़लापर ख ग संग ह जोड़लापर घ च संग ह जोड़लापर छ ज संग ह जोड़लापर झ ट संग ह जोड़लापर ठ ड संग ह जोड़लापर ढ़ त संग ह जोड़लापर थ द संग ह जोड़लापर ध प संग ह जोड़लापर फ ब संग ह जोड़लापर भ ङ, ल्ह, म्ह आ न्ह स्वतंत्र रूपेँ लिखल जाइत छै। आब अहाँ सभ देखि सकै छी जे देवनागरीमे तँ ख,घ इत्यादि लेल स्वतंत्र अक्षर आ तकर ध्वनि छै मुदा उर्दूमे एकरा लेल " ह' मिलाबए पड़ैत छै संगे संग ङ आदिक उच्चारणमे तँ " ह " छैके।आब जँ कोनो उर्दू शाइर " ह " फेंटाएल अक्षरक काफिया बनबै छथि तँ ओ उर्दूक उच्चारण परंपराक अनुसार " ह " केर उच्चारण नै करै छथि। तँए उर्दूमे " बात " शब्दक काफिया " साथ " बनि सकै छै। कारण " साथ "मे जे "थ" छै तकर "ह" निकालि देल जाइत छै। आन-आन " ह " मिश्रित शब्दक काफिया लेल एनाहिते बुझू। ऐठाँ ईहो मोन राखू जे मात्रा सेहो उच्चारणक हिसाबसँ गानल जाइत छै उर्दूमे तँए जँ कोनो देवनागरी लिप्यंतरण बला पोथी केर अधार पर मात्रा निकालि रहल छी तँ गड़बड़ भए सकैए। मूल उर्दू लिपि सीखू आ तकर उच्चारण सेहो तखने अहाँ उर्दू गजलक सही मात्रा पकड़ि सकै छी। 2) वर्तमान सभ भारतीय भाषा लिपि बामसँ दहिन लिखल जाइत अछि मुदा उर्दू दहिनासँ बाम। तेनाहिते देवनागरीमे शब्द रचना काल अक्षरक स्वरूप नै बदलै छै मुदा उर्दूमे बदलि जाइत छै। ऐकेँ अतिरिक्तो आन-आन अंतर छै जे व्यवहारिक स्तरपर बूझल जा सकैए। आब हमरा पूरा विश्वास अछि जे अहाँ सभ ओहि पदाधिकारी जकाँ भ्रमित नै हएब। एक बेर फेर मोन राखू जे देवनागरीक अलग-अलग ध्वनि लेल अलग-अलग अक्षर छै ( गाम घरक उच्चारणमे स, श आदि एसमान उच्चारण होइत छै जकर विवरण आगू देल जाएत ) मुदा उर्दूमे नै तँए देवनागरी ( मिथिलाक्षर )मे " त " केर काफिया " थ " नै बनि सकैए वा " प " केर काफिया " फ " नै बनि सकैए। ऐ विवरणक बाद आबी बहरपर---- बहर ---- गजल सदिखन कोने ने कोने बहरमे होइत छैक। बिना बहरक गजलक कल्पना असंभव। जेना छन्दक आधार लय होइत छैक तेनाहिते बहरक आधार अऱूज वा अऱूद होइत छैक। अऱूज वा अऱूद मने शेर मे निहित मात्रा-क्रम होइत छैक। अऱूज वा अऱूदके वज़न सेहो कहल जाइत छैक। बहरक चर्च आगाँ बढ़एबासँ पहिने एकटा गप्प आर| एहिठाम हम उर्दू बहर केर वर्णन कए रहल छी। आ मैथिली गजलमे इ बहर सभक प्रयोग मैथिली गजलक 100सालक इतिहासमे कहिओ नहि भेल | मैथिलीमे बहर नै छल मतलब कृत्रिम रूपेँ बहर नै छल। योगानंद हीरा जी बहुत पहिनेसँ अरबी बहरमे मैथिली गजल लिखैत छलाह, मुदा मैथिलीक बहर-अज्ञानी संपादक सभ हुनका कात कए देलक जाहिकेँ फलस्वरूप मैथिली गजलमे बहरक चर्चा नै भए सकल। मुदा हालहिमे गजेन्द्र ठाकुर द्वारा बहरे-मुतकारिबमे सफलतापूर्वक गजल लिखल गेल। तँए आब एकर चर्चा आवश्यक। ओना मैथिलीमे वार्णिक बहरक खोज सेहो गजेन्द्र ठाकुर द्वारा भेल अछि जकर अनुकरण प्रायः हरेक नव गजलकार कए रहल छथि। एहि लेखमे जतेक उदाहरण देल गेल अछि से वार्णिक बहर पर आधारित अछि। ओना एहि बहरक चर्चा हम बादमे सेहो करब। तँ पहिने उर्दूक बहर देखी। अऱूज वा अऱूदक अविष्कार हिजरीक दोसर सदीमे खलीले इब्ने अहमद बसरी केने छलाह। हुनका इ विचार मक्काक ठठेरा बजारमे बर्तन बनेबाक अवाज सूनि अएलन्हि। प्राचीन कालमे मक्काके अऱूज वा अऱूद सेहो कहल जाइत छलैक तँए बसरी ओहि मात्रा क्रमके अऱूज वा अऱूदक नाम देलथि। अरबी साहित्यमे 16 बहरक प्रयोग भेल। बादमे इरानमे तीन टा बहरक अविष्कार भेल। आब हम एहिठाम बहरक संक्षिप्त परिचय दए रहल छी। अरबी साहित्यमे बहर तीन खंडमे बाँटल गेल अछि 1) सालिम मने मूल बहर, 2 ) मुरक्कब मने मिश्रित बहर आ 3) मुदाइफ मने परिवर्तित बहर। एहि तीनूमेसँ मुदाइफ बहरके चर्चा हम बादमे करब| अरबीमे सालिम मने मूल बहर मे सात टा बहर अबैत अछि। आ मुरक्कबमे बारह टा। बादमे एही बारहके उलट-फेर करैत आठ टा आर बहर बनाएल गेल। कुल मिला कए मुरक्कब बहर बीस टा भेल। हम अपना सुविधा लेल मुरक्कब बहरकेँ दू खंडमे बाँटि देने छी। संगहि-संग सालिम बहरके हम "समान बहर" नाम देने छिऐक। आ मुरक्कब बहरक पहिल खंड (जाहिमे कुल सात टा बहर अछि) तकरा अर्धसमान बहर नाम देलिऐक आ मुरक्कब बहरक दोसर खंड जाहिमे तेरह टा बहर अछि तकर नाम "असमान बहर" देलिऐ। तँ आब एकर विवरण निच्चा देखू।। बहरसँ पहिने रुक्नकेँ बूझी। संस्कृतक गण जकाँ अरबी मे सेहो होइत छैक जकरा "रुक्न" कहल जाइत छैक। इ रुक्न आठ प्रकारके होइत अछि। जकर विवरण एना अछि------- रुक्नक स्वरूप मात्रा रुक्नक नाम मात्रा क्रम खमासी रुक्न 5 फऊलुन ( फ/ऊ/लुन) ISS (I/S/S) खमासी रुक्न 5 फाइलुन (फा/इ/लुन) SIS (S/I/S) सुबाई रुक्न 7 फाइलातुन (फा/इ/ला/तुन) SISS ( S/I/S/S ) सुबाई रुक्न 7 मफाईलुन (म/फा/ई/लुन) ISSS ( I/S/S/S ) सुबाई रुक्न 7 मुस्तफइलुन (मुस्/तफ/इ/लुन SSIS ( S/S/I/S ) सुबाई रुक्न 7 मुफाइलतुन (मु/फा/इ/ल/तुन ) ISIIS ( I/S/I/I/S ) सुबाई रुक्न 7 मुतफाइलुन (मु/त/फा/इ/लुन IISIS ( I/I/S/I/S ) सुबाई रुक्न 7 मफऊलातु (मफ/ऊ/ला/तु SSSI ( S/S/S/I ) ****** एहिठाम I मने 1 मने हस्व आ S मने 2 मने दीर्घ भेल संगे-संग खमासी मने पाँच मात्राक आ सुबाई मने सात मात्राक रुक्न भेल | एहि रुक्न सभकेँ इयाद रखबाक लेल गणितीय रूपसँ एना बुझू--------- a) एकटा लघुकेँ बाद जँ दूटा दीर्घ हो तँ ओकरा "फऊलुन" कहल जाइत छैक। b) एकटा लघुकेँ बाद जँ तीनटा दीर्घ हो तँ ओकरा "मफाईलुन" कहल जाइत छैक। c) जँ "मफाईलुन" केँ उल्टा करबै तँ "मफऊलात" बनि जाएत मने तीनटा दीर्घकेँ बाद एकटा लघु। d) दूटा दीर्घकेँ बीचमे जँ एकटा लघु रहए तखन ओकरा "फाइलुन" कहल जाइत छैक। e) "फाइलुन" केर अंतमे जँ एकटा आर दीर्घ जोडबै तँ ओ "फाइलातुन" बनि जाएत। f) "फाइलातुन" केर उल्टा रूप "मुस्तफइलुन" होइत छैक। g) शुरुमे एकटा लघु तकरा बाद एकटा दीर्घ तकरा बाद फेर दूटा लघु आ तकरा अंतमे एकटा दीर्घ हो तँ "मुफाइलतुन" कहल जाइत छैक h) "मुफाइलुन" केर अंतसँ तेसर या दोसर लघु हटा कए पहिल लघु लग बैसा देबै तँ "मुतफाइलुन" बनि जाएत। मने शुरुमे टूटा लघु तकरा बाद एकटा दीर्घ तकरा बाद फेर एकटा लघु आ तकरा बाद अंतमे एकटा दीर्घ। 1) समान ध्वनि---------एहि खंडमे कुल सात गोट बहर राखल जाइत अछि। जकर विवरण एना अछि-------- क) बहरे-हज़ज---------- एकर मूल ध्वनि अछि "मफाईलुन" मतलब I-S-S-S (1-2-2-2) मने हस्व् -दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ| इ ध्वनि शाइर अपना सुविधानुसार प्रयोग कए सकैत छथि। मतलब कोनो शाइर एक पाँतिमे एक बेर, वा दू बेर वा ...... कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) प्रयोग कए सकैत छथि, मुदा मात्रा-क्रम नहि टुटबाक चाही।आ जँ एहि ध्वनि के शेर के रुप मे देबै तँ एना हेतैक------ I-S-S-S I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S....................................... तँ इ भेल बहरे-हज़ज केर ढ़ाँचा। एहिठाम फेर एक बेर गौरसँ देखू। उपरका ढ़ाँचा सभमे दूनू पाँतिमे मात्रा क्रम एकै छैक। अर्थात ह्रस्व के निच्चा ह्रस्व आ दीर्घ। आ मोन राखू जँ अहाँ बहरे-हज़जमे गजल लीखि रहल छी तँ हरेक शेरक मात्रा क्रम इएह देबए पड़त। नहि तँ गजल बे-बहर कहाओत। श्री गजेन्द्र ठाकुर द्वारा लिखित बहरे हजज केर एकटा उदाहरण देखू--------------------- महामाला महाडाला करै स्वाहा लगैए ई अकासी आस छै सोझाँ झझा देतै लगैए ई कहैए ई मिलेबै आइ नोरोमे कने गोला जँ भांगे पीबि एतै, भावना पीतै लगैए ई जहाँ ताकी लगैए प्रेम बाझै छै सरैलामे खने भोकारि पाड़ैए हँसै नै छै लगैए ई टिपौड़ी छै बुझेबै बात की, धाही कनी देखू कटैया पानि जेना ओ, नचै नै छै लगैए ई गजेन्द्र पूब सुरुजक रहत देतै सूर्यकेँ झाँखी चढ़त आकास देखै बानसब्बरै लगैए ई अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे हज़ज केर उदाहरण देखू---------- उड़ल सबटा चिड़ैयाँ गाछपर फुर्रसँ जँ बैसल चारपर चारो खसल चुर्रसँ हमर गाड़ी लतामक डाढ़ि आ सनठी चलै छै तेज अपने मुँह करै हुर्रसँ गिलासक दूध मिसियो नीक नै लागै भरल तौला दही आँङुर लगा सुर्रसँ अपन बाछी अपन गैया त ता थैया अपन झबरा करै अपनपर नै गुर्रसँ फटक्का फूटलै ब्राम ब्रम ब्रूमसँ जड़ै छै छूरछूरी छूर्र छू छुर्रसँ मफाईलुन 1222 तीन बेर बहरे हजज ख) बहरे-रमल------- एकर मूल ध्वनि एना अछि--- फाइलातुन मने ----- S-I-S-S,अर्थात दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ। आब जँ एहि ध्वनि के शेर मे प्रयोग करबै तँ एना हेतैक--- S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-रमल। अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे रमल केर उदाहरण देखू---------- घोघ हुनकर उतरि गेलै पवन संगे ससरि गेलै आँखि रहि गेलै खुजल यौ रूप यौवन निखरि गेलै टोह मे छल मोन बगुला राशि सुन्नर उचरि गेलै चउरचन मे चान पूजब पावइन सब बिसरि गेलै जेठ मे मधुमास एलै गाछ नव दिल मजरि गेलै मधुप केलक आक्रमण बड काम मे सब लचरि गेलै अंशु आशक झाँपि लेलनि कुकुर पर जे नजरि गेलै पाप भेलै ,घोघ ससरल अमितके मन हहरि गेलै फाइलातुन ( I-U-U-U ) बहरे-रमल ग) बहरे-कामिल----- एकर मूल ध्वनि अछि "मुतफाइलुन" मने I-I-S-I-S मने ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ। शेरमे एकर ढ़ाँचा एना छैक------ I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-कामिल|अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे कामिल केर उदाहरण देखू---------- किछु बात एहन भेल छै घर घर त' रावण भेल छै बम फोड़ि छाउर देश छै जड़ि देह जाड़न भेल छै प्रिय नै विरह जनमै बहुत सजि दर्द गायन भेल छै जिनगी भ' गेल महग कते झड़कैत सावन भेल छै दस बात सूनब की "अमित" सब ठाम गंजन भेल छै मुतफाइलुन 11212 दू बेर बहरे -कामिल घ) बहरे-मुतकारिब-------- एकर मूल ध्वनि फऊलुन अछि मने I-S-S मने ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ। एकर ढ़ाँचा देखू------- I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-मुतकारिब| अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे मुतकारिब केर उदाहरण देखू---------- जखन राति आएल कारी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ जखन होइ घर मोर खाली पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ अहाँ दूर बैसल सताबैत छी साँझ-भोरे सदिखने सनेसोँ जँ आएल देरी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ बरसलै प्रथम बूँद वर्षा मिलन यादि आबै तखन यौ विरह केर तानल दुनाली पिया यौ अहाँ मोन पड़लौँ पिया जी जखन बहल पवना मधुर गीत गाबैत कोयल जखन काँट मे फसल साड़ी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौँ जँ देखब कतौ छिपकली डर सँ बोली फुटै नै हमर यौ जँ धड़कै हमर सून छाती पिया यौ अहाँ मोन पड़लौँ कने आबि नेहक जड़ल भाग फेरो सँ चमका दिऔ यौ अमित आश देखैत रानी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ बहरे -मुतकारिब {ह्रस्व-दीर्ध-दीर्ध 6बेर सब पाँतिमे } बहरे मुतकारिब बहुत लोकप्रिय आ संगीतमय बहर छै। आदि शंकराचार्य आ गोस्वामी तुलसी दास सेहो ऐ बहरक प्रयोग केने छथि। पहिने आदि शंकराचार्यक ई निर्वाण षट्कम देखू----------- मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे न च व्योम भूमिर् न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश: न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव: न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा: न यज्ञा: अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद: पिता नैव मे नैव माता न जन्म न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् आब देखू तुलसी दास जी द्वारा लिखल ई स्त्रोत------------- नमामी शमीशान निर्वाण रूपं विभू व्यापकम् ब्रम्ह वेदः स्वरूपं पहिल पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि---- ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घदोसरो पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि-----ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ नोट--- दोसर पाँतिमे ब्रम्हकेँ गेबा कालमे बर् = दीर्घकएल जाइत छै। ङ) बहरे-मुतदारिक--------एकर मूल ध्वनि अछि "फाइलुन" मने S-I-S मने दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ अछि। एकर ढ़ाँचा एना अछि------ S-I-S + S-I-S + S-I-S + S-I-S S-I-S + S-I-S + S-I-S + S-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि)| इ भेल बहरे-मुतदारिक। अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे मुतदारिक केर उदाहरण देखू कुकुर उनटल पड़ल लार पर बंदरो बैसलै चार पर मूस दौगै गहुँम भरल घर कोइली तन दै तार पर नादि पर गाय दै दूध छै नजर देने श्रवन ढार पर स्वागत लेल बौआ कए फूल मुस्कै गुथल हार पर भोर भेलै उठल राजा यौ अमित बौआ चढ़ल कार पर दीर्घ- हर्स्व -दीर्घ 3 बेर च) बहरे-रजज------ एकर मूल ध्वनि "मुस्तफइलुन" छैक। मने S-S-I-S मने दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ। एकर ढ़ाँचा एना हेतैक------ S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-रजज |अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे रजज केर उदाहरण देखू---------- बाल गजल कारी महिस के दूध उज्जर छै कते भरि मोन पारी पीबि दुब्बर छै कते रसगर जिलेबी गरम नरमे नरम छै लड्डू बनल बेसनक बज्जर छै कते छै पात हरियर फूल शोभित गाछ छै जामुन लिची आमक इ मज्जर छै कते दू एक दू आ चारि दूनी आठ छै अस्सी कते नै जानि सत्तर छै कते भालू बला देखाब' सबके नाँच हौ झट आगि छड़पै दौड़ चक्कर छै कते मुस्तफइलुन 2212 तीन बेर बहरे रजज छ) बहरे-वाफिर------------ एकर मूल ध्वनि "मुफाइलतुन" छैक मने I-S-I-I-S मने ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ। एकर ढ़ाँचा देखू------ I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि। इ भेल बहरे-वाफिर | अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे वाफिर केर उदाहरण देखू---------- खतम सब काज भेल हमर स्वतंत्र मिजाज भेल हमर कतौ जिनगी छलै धधकै खुशी पर राज भेल हमर पुरान जँ गाछ , मज्जर नव अपन त' अवाज भेल हमर सरस पल भेल बड दिनपर सदेह इलाज भेल हमर सदिखन गजल लिखैत रहब अमित नव साज भेल हमर बहरे-वाफिर मुफाइलतुन U-I-U-U-I 2 बेर सब पाँतिमे 2) अर्धसमान बहर-------- एहि खंडमे कुल 56 बहर अछि मुदा मात्र 7 टा प्रचलित अछि। एकरा हम अर्धसमान बहर एहि द्वारे कहैत छिऐक जे एहिमे हरेक पाँतिमे कमसँ-कम अनिवार्य रुपसँ दूटा ध्वनिके समान रुपमे प्रयोग करए पड़ैत छैक। आब शाइर एहि दूनू ध्वनिके एक पाँतिमे जाए बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) प्रयोग कए सकथि ओ हुनका ऊपर छन्हि। आ एहि खंडक सभ बहर लेल एहने सन बूझू।। एकर विवरण निच्चा देल जा रहल अछि। 1) फऊलुन + फाइलुन ( एकर उल्टा रूप सेहो छै.....) फाइलुन + फऊलुन 2) फऊलुन + फाइलातुन ( एकर उल्टा रूप सेहो छै.....) फाइलातुन + फऊलुन आ निच्चाक सभ बाँचल 26 टा बहरक लेल एनाहिते नियम छै। आ ऐ तरहें ऐ खंडमे कुल 56 टा बहर भेल। 3) फऊलुन + मफाईलुन 4) फऊलुन + मुस्तफइलुन 5) फऊलुन + मुफाइलतुन 6) फऊलुन + मुतफाइलुन 7) फऊलुन + मफऊलातु 8) फाइलुन + फाइलातुन 9) फाइलुन + मफाईलुन 10) फाइलुन+ मुस्तफइलुन 11) फाइलुन + मुफाइलतुन 12) फाइलुन + मुतफाइलुन 13) फाइलुन + मफऊलातु 14)फाइलातुन + मफाईलुन 15) फाइलातुन + मुस्तफइलुन 16) फाइलातुन + मुफाइलतुन 17) फाइलातुन + मुतफाइलुन 18) फाइलातुन + मफऊलातु 19) मफाईलुन + मुस्तफइलुन 20) मफाईलुन + मुफाइलतुन 21) मफाईलुन + मुतफाइलुन 22) मफाईलुन + मफऊलातु 23) मुस्तफइलुन + मुफाइलुन 24) मुस्तफइलुन + मुतफाइलुन 25) मुस्तफइलुन + मफऊलातु 26) मुफाइलतुन + मुतफाइलुन 27) मुफाइलतुन + मफऊलातु 28) मुतफाइलुन + मफऊलातु आब अहाँ सभ जरूर कहब जे जखन मात्र साते टा बहर प्रचलित छै तखन एतेक देबाक कोन काज। मुदा बेसी प्रचलित नै हेबाक मतलब ई नै छै जे ई गलत छै। वस्तुतः बहरक प्रयोग अभ्यास पर निर्भर छै आ हरेक शाइर अपना हिसाबसँ बहरक चुनाब करैत छथि। भए सकैए जे जाहि बहरकेँ अरबी जीह पर कठिनाह लागल हो से मैथिलीमे सहज लागए तँए ई सभ देल गेल अछि। तँ देखी ई सात टा बहु-प्रचलित बहर आ ओकर नामकेँ। क) बहरे-तवील--------- एकर मूल ध्वनि छैक " फऊलुन-मफाईलुन"। एकर ढ़ाँचा देखू------- I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S........................... एहि बहर आ एहि खंडक बाँकी अन्य छहो बहरक लेल एकटा आर बात मोन राखू जे ध्वनि जाहि क्रममे देल गेल अछि ताही क्रममे रहबाक चाही। जेना की बहरे-तवीलमे अहाँ देखलहुँ जे एकर ध्वनि एना छैक " फऊलुन-मफाईलुन" मुदा जँ अहाँ एकरा " मफाईलुन- फऊलुन" बला क्रममे रखबै तँ इ बहरे-तवील नहि हएत। अमित मिश्र जीक लिखल बहरे तवील देखल जाए------------ पुन: जोडि लेबै नेहकेँ डोर राजा जी कनेको बहै नै जानकेँ नोर राजा जी कने आउ राजा जानि नै की भ' जेतै यौ कनेको नचाबू प्रेमकेँ मोर राजा जी किए सुन्न भेलौं आइ बेमौत मारै छी कने आइ मस्तीमे करू शोर राजा जी जमाना मिलेतै नै सुनू बैलगा देतै अनाड़ी बुझै छै प्रेम छै चोर राजा जी चटा देब संगे प्यार के चाशनी हमरा अमीतो बुझू भेलै सराबोर राजा जी हरेक पाँतिमे "फऊलुन-मफाईलुन" अर्थात ( ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ सँ बनल बहरे तवील ) ख) बहरे-मदीद-----------एकर मूल ध्वनि अछि "फाइलातुन-फाइलुन"। एकर ढ़ाँचा एना छैक-------- S-I-S-S + S-I-S अमित मिश्र जीक लिखल बहरे मदीद देखल जाए------------ कोन टोना केलकै जोगिया सदिखन करेजा हमर जरिते रहल चोरि केने चैन होशो हमर सदिखन अनेरे उड़िते रहल नै छलै डर एत' मरबाक आ नै मोन मे दर्द अंदेशा छलै देख नवका एत' बहिते हवा से आब नेहक गजल मरिते रहल भागि गेलै कोन नगरक गली मे आइ देखा क' सतरंगी सपन बाट जोहैते भ' जेतै कखन की आँखिमे नोर बड भरिते रहल उजरि गेलै जखन कोनो उपवनक कोनटा परक गाछक फूल यौ तखन सबटा कोयलक मधुर बोली संग दर्दक हवा उड़िते रहल आइ खोजै छी अपन ओहि जादूगर कए फेर खेला खेलबै अमित केने आश नेहक सदिखने भीतरे-भीतर जरिते रहल बहरे मदीद फाइलातुन-फाइलुन ( I-U-I-I+ I-U-I ) 3 बेर ग) बहरे बसीत----- एकर मूल ध्वनि " मुस्तफइलुन-फाइलुन" छैक। एकर ढ़ाँचा एना हएत------------------ S-S-I-S + S-I-S देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे बसीतमे अछि----- बेटा अपन मुर्खके सोटासँ हम अकछ छी बाबाक फूटलहबा लोटासँ हम अकछ छी पेट्रोल कखनो त' कखनो गैस सब्जी महग काला बजारी करै कोटासँ हम अकछ छी बेटी कपारपर छै चिन्ता इ सदिखन बनल कनियाक नेहक भरल मोटासँ हम अकछ छी छै आगि धरती बनल नै पानि आकाश मे पीबैत कारी धुआँ मोटासँ हम अकछ छी दै यै भगा काज छोड़ा जीब कोना बचब छै खसल टाकाक लंगोटासँ हम अकछ छी रचना करै छी त' खर्चा होइ यै नै मुदा अतिथी अमित एत' दस गोटासँ हम अकछ छी मुस्तफइलुन-फाइलुन दू बेर बहरे-बसीत घ) बहरे-मुजस्सम वा मुजास----------------------------- एकर मूल ध्वनि " मुस्तफइलुन-फाइलातुन" छैक। एकर ढ़ाँचा एहन छैक--------- S-S-I-S + S-I-S-S अमित मिश्र जीक लिखल बहरे मुजास देखल जाए------------ बसलौँ अहाँ जखन मनमे हमरा चमकि गेल जिनगी अनमोल नेहक उड़ल खुशबूमे गमकि गेल जिनगी माधुर्य माँखैत खुजलै जखने कमल ठोर रानी लवणी सँ छलकैत ताड़ी बूझू छलकि गेल जिनगी गाबी अहाँ गीत मोने मोने जँ तैयौ गजब धुन मुस्की द' देलौँ चहटगर अमृत झमकि गेल जिनगी नीरीह जानबर बनि नैनक मारि खेलौँ सदिखने फूले छलै बाण नैनक तेँए धड़कि गेल जिनगी सगरो अहाँ के लिखल छवि डूबल कलम नेहमे यै गाबै अमित गजल लिखलक देखू दमकि गेल जिनगी बहरे मुजास ङ) बहरे- मुन्सरह----------- एकर मूल ध्वनि "मुस्तफइलुन-मफऊलात"। एकर ढ़ाँचा छैक--------------- S-S-I-S + S-S-S-I अमित मिश्र जीक लिखल बहरे मुन्सरह देखल जाए------------ आखर जखन रूपक लिखल उपमा सजल फूलक लिखल आदर्श छी रूपक बनल काजर नयन कातक लिखल सरगम अहाँक स्वर सजल मुस्की नगर तानक लिखल कहलौँ करेजक सब कहल किछु बात हम राजक लिखल चमकैत नभ मे छी चान तारा गजल हाटक लिखल मुस्तफइलुन-मफऊलातु च) बहरे-मजरिअ-------------- एकर मूल ध्वनि छैक "मफाईलुन-फाइलातुन" एकर ढ़ाँचा एना छैक-------- I-S-S-S+S-I-S-S छ) बहरे-मुक्तजिब------- एकर मूल ध्वनि छैक " मफऊलात-मुस्तफइलुन"। एकर ढ़ाँचा छैक----------- S-S-S-I +S-S-I-S ओम प्रकाश जीक लिखल बहरे मुक्तजिबमे लिखल ई गजल देखल जाए------------------- धारक कात रहितो पियासल रहि गेल जिनगी हमर मोनक बात मोनहि रहल, दुख सहि गेल जिनगी हमर मुस्की हमर घर आस लेने आओत नै आब यौ पूरै छै कहाँ आस सबहक, कहि गेल जिनगी हमर सीखेलक इ दुनिया किला बचबै केर ढंगो मुदा बचबै मे किला अनकरे टा ढहि गेल जिनगी हमर पाथर बाट पर छी पडल, हमरा पूछलक नै कियो कोनो बन्न नाला जकाँ चुप बहि गेल जिनगी हमर जिनगी "ओम" बीतेलकै बीचहि धार औनाइते भेंटल नै कछेरो कतौ, बस दहि गेल जिनगी हमर (बहरे मुक्तजिब) 49टा बाँचल बहरक नाम हमरो एखन धरि नै पता लागल अछि। पता लगिते जरूर कहब। 3) असमान बहर--------- एहि खंडमे कुल 213 गोट बहर अछि मुदा मात्र 13 टा प्रचलित अछि। एकरा हम असमान बहर एहि द्वारे कहैत छिऐक जे एहिमे हरेक पाँतिमे कमसँ-कम अनिवार्य रुपसँ तीनटा ध्वनिके समान रुपमे प्रयोग करए पड़ैत छैक।आब शाइर एहि तीनू ध्वनिके एक पाँतिमे जाए बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) प्रयोग कए सकथि ओ हुनका ऊपर छन्हि। आ एहि खंडक आर अन्य बहर लेल एहने सन बूझू। एकर विवरण निच्चा देल जा रहल अछि। ऐ असमान बहरक दू भागकेँ हमरा लोकनि देखी। पहिल भाग ओ भेल जाहिमे तीनटा अलग-अलग रुक्नकेँ एक पाँतिमे एक बेरमे प्रयोग कए जाइत छै। आ दोसर भाग ओ भेल जाहिमे दूटा एक समान रुक्न आ एकटा दोसर रुक्न लेल जाइत छै। तँ पहिने देखी ओ बहर जाहिमे तीनटा अलग-अलग रुक्नकेँ एक पाँतिमे एक बेरमे प्रयोग कए जाइत छै। 1) फऊलुन + फाइलुन + फाइलातुन ( एकर दूटा आर रूप हेतै) a) फाइलुन + फाइलातुन+फऊलुन b) फाइलातुन + फऊलुन + फाइलुन एनाहिते निच्चो बला सभक दू-दूटा आर रूप हेतै। कुल मिला ऐ खंडमे 45टा बहर प्राप्त भेल। 2) फऊलुन + मफाईलुन + मुस्तफइलुन 3) फऊलुन + मुफाइलतुन + मुतफाइलुन 4) फाइलुन + फाइलातुन + मफाईलुन 5) फाइलुन + मुस्तफइलुन + मुफाइलतुन 6) फाइलुन + मुतफाइलुन + मफऊलातु 7) फाइलातुन + मफाईलुन + मुस्तफइलुन 8) फाइलातुन + मुफाइलतुन + मुतफाइलुन 9) मफाईलुन + मुस्तफइलुन + मुफाइलतुन 10) मफाईलुन + मुतफाइलुन + मफऊलातु 11) मुस्तफइलुन + मुफाइलतुन + मुतफाइलुन 12) मुफाइलतुन + मुतफाइलुन + मफऊलातु 13) मफऊलातु + मुतफाइलुन + मुफाइलतुन 14) मफऊलातु + मुस्तफइलुन + मफाईलुन 15) मफऊलातु + फाइलातुन + फाइलुन आब आबी दोसर भागमे जाहिमे दूटा एक समान रुक्न आ एकटा दोसर रुक्न लेल जाइत छै........... हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग ( एकर तीन रूप हेतै ) फाइलातुन+ फाइलातुन+ मफाईलुन ( मने-----दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ+ दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ+ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ- दीर्घ) मफाईलुन+फाइलातुन+ फाइलातुन फाइलातुन+मफाईलुन+फाइलातुन आ) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै ) मफाईलुन+ मफाईलुन+फाइलातुन फाइलातुन+मफाईलुन+ मफाईलुन मफाईलुन+फाइलातुन+मफाईलुन इ) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) फाइलातुन+ फाइलातुन+ मुस्तफइलुन मुस्तफइलुन+फाइलातुन+ फाइलातुन फाइलातुन+ मुस्तफइलुन+फाइलातुन ई) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मुस्तफइलुन +मुस्तफइलुन + फाइलातुन फाइलातुन+मुस्तफइलुन +मुस्तफइलुन मुस्तफइलुन +फाइलातुन+मुस्तफइलुन उ) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) फाइलातुन +फाइलातुन + मुफाइलतुन मुफाइलतुन+फाइलातुन +फाइलातुन फाइलातुन +मुफाइलतुन+ फाइलातुन ऊ) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मुफाइलतुन+ मुफाइलतुन+फाइलातुन फाइलातुन +मुफाइलतुन+ मुफाइलतुन मुफाइलतुन+ फाइलातुन+मुफाइलतुन ए) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) फाइलातुन+ फाइलातुन+मुतफाइलुन मुतफाइलुन +फाइलातुन+ फाइलातुन फाइलातुन+ मुतफाइलुन+फाइलातुन ऐ) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मुतफाइलुन +मुतफाइलुन + फाइलातुन फाइलातुन+मुतफाइलुन +मुतफाइलुन मुतफाइलुन +फाइलातुन+मुतफाइलुन ओ) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) फाइलातुन+ फाइलातुन+मफऊलात मफऊलात +फाइलातुन+ फाइलातुन फाइलातुन+ मफऊलात +फाइलातुन औ) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मफऊलात +मफऊलात + फाइलातुन फाइलातुन+मफऊलात +मफऊलात मफऊलात +फाइलातुन+मफऊलात अं) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) मफाईलुन +मफाईलुन + मुस्तफइलुन मुस्तफइलुन+मफाईलुन +मफाईलुन मफाईलुन +मफाईलुन+मफाईलुन अः) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाईलुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मुस्तफइलुन+ मुस्तफइलुन+ मुफाईलुन मुफाईलुन+मुस्तफइलुन+ मुस्तफइलुन मुस्तफइलुन+मुफाईलुन+ मुस्तफइलुन क) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) मफाईलुन+ मफाईलुन+ मुफाइलतुन मुफाइलतुन+मफाईलुन+ मफाईलुन मफाईलुन+ मुफाइलतुन + मफाईलुन ख) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मुफाइलतुन +मुफाइलतुन +मफाईलुन मफाईलुन +मुफाइलतुन +मुफाइलतुन मुफाइलतुन +मफाईलुन+मुफाइलतुन आब आगूक हरेक वर्ग लेल एनाहिते तीन-तीनटा बहर बनैत रहत। हम समयक अबाभकेँ कारणै नै दए रहल छी। अहाँ सभ समय-समय पर एकरा बनबैत रहब। आब ऐठाम देखू जे कुल मिला कए ऐ विवरणमे 56टा वर्ग अछि आ हरेक वर्गमे तीन-तीन टा बहर अछि मने ऐ खंडमे कुल 168टा बहर भेल। ग) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग( एकरो तीन रूप हेतै) घ) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) ङ) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) च) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) छ) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ज) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) झ) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ञ) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ट) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ठ) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ड) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ढ़) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ण) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) त) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर एक बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) थ) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) द) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ध) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) न) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) प) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर एक बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) फ) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ब) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) भ) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) म) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) य) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) र) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ल) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) व) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) श) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ष) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) स) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ह) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) क्ष) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) त्र) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ज्ञ) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ऋ) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) लृ) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) कृ) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) खृ) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) गृ) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) घृ) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) चृ) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) छृ) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) मुदा ऐ 213 बहरमेसँ मात्र तेरहे टा बहुप्रचलित छै। आ बाद बाँकी केर उपयोग मुजाइफ रूपमे होइत छै। आब अहाँ सभ जरूर कहब जे जखन मात्र तेरहे टा बहर प्रचलित छै तखन एतेक देबाक कोन काज। मुदा बेसी प्रचलित नै हेबाक मतलब ई नै छै जे ई गलत छै। वस्तुतः बहरक प्रयोग अभ्यास पर निर्भर छै आ हरेक शाइर अपना हिसाबसँ बहरक चुनाब करैत छथि। भए सकैए जे जाहि बहरकेँ अरबी जीह पर कठिनाह लागल हो से मैथिलीमे सहज लागए तँए ई सभ देल गेल अछि। तँ देखी ई तेरह टा बहु-प्रचलित बहर आ ओकर नामकेँ। ई तेरहटा बहर एना अछि-------- क) बहरे-खफीफ------एकर मूल ध्वनि छैक "फाइलातुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन"| एकर ढ़ाँचा छैक------ S-I-S-S + S-S-I-S + S-I-S-S ख) बहरे-जदीद----- एकर मूल ध्वनि छैक "फाइलातुन- फाइलातुन-मुस्तफइलुन"| एकर ढ़ाँचा छैक---------- S-I-S-S + S-I-S-S + S-S-I-S देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे जदीदमे अछि- चादरो फाटल सड़ल बड उठबै कखन बाढ़ि एलै भासलै घर बनतै कखन कोन कोना नाह भेटत मजधार मे राति दिनकर दिन क' चन्ना बूझै कखन चोरि भेलै चैन आ चाहो के अमल देह टूटै दोष अनका देबै कखन डाँग लागै दैब के अधगेरे जखन पानि मानव एक बूँदो माँगै कखन बेचबै बेटा जँ जिनगी बचतै तखन अमित कह ने पानि सगरो घटतै कखन फाइलातुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन { I-U-I-I-I-U-I-I-I-I-U-I} एक बेर सब पाँति मे बहरे-जदीद ग) बहरे-सरीअ----- एकर मूल ध्वनि छैक " मुस्तफइलुन- मुस्तफइलुन-मफऊलात" | एकर ढ़ाँचा छैक------- S-S-I-S + S-S-I-S + SSSI देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे सरीअमे अछि----- भेटल अहाँके संग हमरा जहियेसँ जिनगी हमर लेलक करोटो तहियेसँ हम एकरा की कहब छल एहन भाग बैसल छलौँ हम बाटमे दुपहरियेसँ गेलौँ शिखरपर भेल जे एगो स्पर्श जुड़ि गेल श्वास प्राण संगे तहियेसँ छी ग्यानके पेटी अहाँ जादू गजल शाइरक कोनो कलम लागै हँसियेसँ हम भेल नतमस्तक लिखब कोना शब्द शाइर अमित छी संग हमरा जहियेसँ मुस्तफइलुन-मुस्फइलुन-मफऊलात ( I-I-U-I +I-I-U-I + I-I-I-U ) बहरे-सरीअ घ) बहरे-करीब------ एकर मूल ध्वनि छैक " मफाईलुन- मफाईलुन- फाइलातुन"| एकर ढ़ाँचा छैक---- I-S-S-S + ISSS + S-I-S-S देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे करीबमे अछि---- बिसरलौँ जग पिबै छी बोतल शराबक मनक मारल चुमै छी बोतल शराबक हमर छै जीत तड़िखानामे पियाबू अपन नामे लिखै छी बोतल शराबक हमर छै जान ई अंगुरक पानि नै छै बनै शोणित किनै छी बोतल शराबक शहर के कोन मैखान जत' पिलौँ नै जहर दर्दक कहै छी बोतल शराबक गिलाससँ आब पल भरि दोस्ती क' देखू घर स्वर्गक रहै छी बोतल शराबक जनम भेलै इयादक तहियेसँ झूमैँ अमित संगे रखै छी बोतल शराबक मफाईलुन-मफाईलुन-फाइलातुन बहरे-करीब ङ) बहरे-मुशाकिल------- एकर मूल ध्वनि छैक " फाइलातुन- मफाईलुन- मफाईलुन | एकर ढ़ाँचा छैक---- S-I-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे मुशाकिलमे अछि— हमर नेहक सजा जिनगी जड़ा देलक गीत दर्दक बना जिनगी कना देलक छै अनचिन्हार अपने नाम एखन यौ खेल झूठक जमा जिनगी हरा देलक नोर बहतै त' हमरे पर हँसत दुनियाँ कसम झूठे गना जिनगी लिखा देलक जहर के प्रेम मे खूनो जहर भेलै दाँत विरहक गड़ा जिनगी विषा देलक गाम उजड़ल शहर कानल हँसल जत' ओ भवर एहन फँसा जिनगी बझा देलक नै मवाली अहाँ हमरा कहू देखिक' नेह पागल बना जिनगी डरा देलक जीब कोना बचल जिनगी कहू एखन अमित मौतसँ सटा जिनगी मुआ देलक फाइलातुन-मफाईलुन-मफाईलुन बहरे-मुशाकिल च) बहरे-कलीब-------- एकर मूल ध्वनि छैक "फाइलातुन—फाइलातुन--- मफाईलुन" | एकर ढ़ाँचा छैक--- SISS--- SISS---- ISSS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे कलीबमे अछि----- युग विज्ञानक शोध एखन क' देखै छी अपन मन परबोध एखन क' देखै छी रहत जगमे अमर मानव मरत दानव नव मशीनक रोध एखन क' देखै छी भाग बनतै मात्र दस खा क' रसगुल्ला शक्ति के हम बोध एखन क' देखै छी सत्त सी ओ टू बनल झूठ आँक्सीजन कार्बनक अबरोध एखन क' देखै छी डाहि हम संस्कार संस्कृति मुस्कै छी मान लेल क्रोध एखन क' देखै छी देश चलबै छी त' सब राज के देखू जोड़ि कर अनुरोध एखन क' देखै छी बहरे-कलीब छ) बहरे असम------- एकर मूल ध्वनि छैक फाइलातुन--- मफाईलुन--- फाइलातुन | एकर ढ़ाँचा छैक---SISS---- ISSS--- SISS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे असममे अछि— आब आगिक पता पुछतै पानि ऐठाँ नै जड़त यौ कतौ घर लिअ जानि ऐठाँ कखन धरि लोक जड़तै चुप जानवर बनि तोड़बै जउर से लेतै ठानि ऐठाँ छै दहेजो त' महगाई कम कहाँ छै ओझरी सोझरेतै लिअ मानि ऐठाँ बदलतै समय सगरो नवका जमाना नै जँ बदलत त' ओ मरतै कानि ऐठाँ जे जनम देलकै हुनका बिसरलै सब माँथ पर जनकके रखतै फानि ऐठाँ भाइ मे उठम-बजड़ा नै आब हेतै आइ त' स्वर्ग के देबै आनि ऐठाँ आगि पर पानि नेहक हँसि ढ़ारि दिअ ने अमित सब के मिला सुख लिअ सानि ऐठाँ फाइलातुन-मफाईलुन-फाइलातुन ( I-U-I-I + U-I-I-I + I-U-I-I ) बहर-असम ज) बहरे कबीर----- एकर मूल ध्वनि छैक मफऊलातु--- मफऊलातु--- मुस्तफइलुन| एकर ढ़ाँचा छैक ---SSSI--- SSSI--- SSIS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे कबीरमे अछि----- असगर जनम लेलहुँ असगरे जी रहल अपने भाग अपनेपर भरोसा बचल मोनक खेतपर बजड़ा अपन खाइ छी गलती अपन तेँए बाट काँटसँ भरल मोजर नै सिनेहक भेल कहियो हमर अपने तोड़ि नाता शहर मे जी रमल दै छी दोष नेताके किए आब यौ अपने भोट दै छी घेँट अपने कटल लोभी छी अधम छी अमित भटकै सगर पक्षक नै अपक्षक मोन अपने बनल मफऊलातु-मफऊलातु-मुस्तफइलुन ( दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व+ दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व +दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ सँ बनल बहरे-कबीर ) झ) बहरे सगीर----- एकर मूल ध्वनि छैक मुस्तफइलुन--- फाइलातुन---- मुस्तफइलुन| एकर ढ़ाँचा छैक --SSIS--- SISS--- SSIS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे सगीरमे अछि----- ञ) बहरे-सरीम----- एकर मूल ध्वनि छैक मफाईलुन--- फाइलातुन--- फाइलातुन | एकर ढ़ाँचा छैक------- ISSS + SISS + SISS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे सरीममे अछि-किए एखन मोन हमर शाइर बनल छै लिखल जेकर नाम ओ एखन कटल छै बनाबी हम रूप जे शब्दक नगरमे नगर ओकर नैनके लागै जहल छै गजल जेहन हम लिखै सबदिन छलौँ से कहाँ हमरा मोनमे ओहन गजल छै दिनक काटै रौद रातिक चान धधकै बहर मारै जान पथ काँटक बनल छै कखन हारब जीवनक अनमोल पारी अमित जा धरि छी करै शेरक कहल छै मफाईलुन-फइलातुन-फइलातुन बहरे -सरीम ट) बहरे सलीम----- एकर मूल ध्वनि छैक --- "मुस्तफइलुन-- मफऊलातु---मफऊलातु"| एकर ढ़ाँचा छैक---- SSIS + SSSI + SSSI देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे सलीममे अछि-- खिड़कीसँ सीधे देखै छलौँ हम चान घन तिमिर मोनक छाँटै छलौँ हम चान हेतै अपन फेरो भेँट ओतै जा क' तेँ जागि आशा लगबै छलौँ हम चान दिन भरि समाजक पहरा कतेको नयन छवि संग तोहर भटकै छलौँ हम चान लागै तरेगण लोचन पलक झपकैत बनि मेघ घोघट लागै छलौँ हम चान शुभ राति फेरो भेटब अमिय नेहक ल' सब दिन अमित नव आबै छलौँ हम चान मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मफऊलातु {दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व} बहरे-सलीम ठ)बहरे हमीद----- एकर मूल ध्वनि छैक--- "मफऊलातु----मुस्तफइलुन----मफऊलातु"| एकर ढ़ाँचा छैक--- SSSI + SSIS + SSSI देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे हमीदमे अछि— नै जीयत शराबक नशा लागल लोक कोना हँसत कोनो दुखक खेहारल लोक काठी फेकबै आगि उठतै बोतलसँ नै रहतै जवानी अपन जाड़ल लोक के कानत कतौ आन लेए क'ह एत' नै छै समय ककरो अपन भागल लोक दै छै साँस कखनो अपन धोखा आब एहन नेहमे छै किए पागल लोक जड़तै एक दोसर सँ जिनगी मे जखन कटतै घेँट अपने सबर हारल लोक क्षण भरि के नवल दोस्त नै चाही आब हमरा अमित चाही अपन झाड़ल लोक मफऊलातु-मुस्तफइलुन-मफऊलातु बहरे-हमीद ड) बहरे हमीम--- एकर मूल ध्वनि छैक-- "फाइलातुन--- मुस्तफइलुन--- मुस्तफइलुन" |एकर ढ़ाँचा छैक-- SISS + SSIS + SSIS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे हमीममे अछि- आइ नौला* मे माछ चल मारब कने जाल मच्छरदानी वला फेकब कने बहुत टिकुला छै खसल गाछी भरल छै ओकरो झोरी भरि क' चल आनब कने माछ चटनी खाएब रोटी भात रौ डोलपाती चल संग मे खेलब कने छोट बौआ छी पैघ सन छै सोच रौ आब कखनो संसार नै बाँटब कने एक छी हम सब एक थारी मे रहब अमित नवका मिथिला अपन माँगब कने फाइलातुन-मुस्तफइलुन-मुस्तफइलुन बहरे-हमीम ऐकेँ अतिरिक्त केओ चारि-चारिटा रुक्नक समूह सेहो बना सकैत छथि। मुदा ऐठाम ई मोन राखू जे गजल पूरा-पूरी उच्चारण आ संगीतक नियम पर आधारित छै तँए बड़का-बड़का पाँति गेबामे नै बनतै तँए ई चारि आ ओहिसँ बेसी रुक्न बला गजलक सफलता बहुत कम्म भेटतै। आ जखन देखिए रहल छिऐ जे जखन 213 मे टा मात्र तेरहे टा प्रचलित छै जे की तीन रुक्नक समूह थिक। तखन चारि आ ओहिसँ बेसी बलाक सफलता कतेक हेतै से अंदाजा लगा सकैत छी अहाँ। आब हमरा लोकनि इ जानी जे अरबीक एहि आठो रुक्नकेँ मैथिलीमे केना बदलि सकैत छी। मैथिलीमे दू प्रकारक छंद पद्धति अछि-----मात्रिक आ वार्णिक | A) मात्रिक------ एहिमे दू, तीन, चारि, पाँच आ छह मात्रा खंडके जोड़ि कए अक्षर विन्यास कएल जाइत छैक। आ एहि अक्षर विन्यासकेँ गण कहल जाइत छैक। मात्रिक छंदमे पाँच टा गण होइत अछि----- क) ण (णगण) = द्विकल मने दू मात्राक खंड ख) ढ ( ढगण) = त्रिकल मने तीन मात्राक खंड ग) ड ( डगण) = चतुष्कल मने चारि मात्राक खंड घ) ठ ( ठगण) = पंचकल मने पाँच मात्राक खंड ङ) ट ( टगण) = षटकल मने छह मात्राक खंड एहि गणकेँ अतिरिक्त मैथिलीमे एक मात्रा, सात मात्रा आ आठ मात्राक वर्ण विन्यास सेहो होइत छैक। मुदा ओकरा गण नहि मानल जाइत छैक। कारण एक मात्रा अपूर्ण भेल। तेनाहिते सात वा आठ मात्रा बला विन्यास कोनो ने कोनो रुपेँ उपरक पाँचो गणसँ मिलैत अछि। उदाहरण लेल सात मात्राक वर्ण विन्यास देखू---" पहिराओल" = IISSI । आब एहिमे देखू पहिल तीन मात्रा मने ( IIS) चतुष्कलक रुप थिक आ अंतिम दूनू मात्रा मने ( SI ) त्रिकलक रुप थिक। आठ मात्राक लेल एहने सन गप्प। उपरक पाँचो मात्रा विन्यासकेँ अलग-अलग रुपेँ लिखल जा सकैए आ एहि हिसाबें ------ द्विकल- दू रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) घर = II 2) ओ = S त्रिकल- तीन रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) भिजा = IS 2) अपन = III 3) आब = SI चतुष्कल- पाँच रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) छौंड़ी = SS 2) तकरा = IIS 3) चुमान = ISI 4) फेकल = SII 5) सदिखन = IIII पंचकल- आठ रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) लड़ाकू = ISS 2) तिलकोर = IISI 3) हौहत्ती = SIS 4) तरेगन = ISII 5) सरधुआ = IIIS 6) जागरण = SIII 7) अंगूर = SSI 8) चहटगरि = IIIII षटकल - तेरह रूप मे लिखल जाइत अछि-- 1) सोहारी = SSS 2) बपखौकी = IISS 3) सुधामयी = ISIS 4) मादकता = SIIS 5) असगरुआ = IIIIS 6) सिताएल = ISSI 7) लालटेन = SISI 8) खटखटाह = IIISI 9) मोताबिक = SSII 10) अधमौगति = IISII 11) सुरेबगर = ISIII 12) राजभवन = SIIII 13) चपलचरण = IIIIII तँ चलू आब एहि पाँचो गणसँ अरबी रुक्न बनाबी। इ अरबी रुक्न आठ अछि । तँ देखू एकर नियम----- 1) जँ द्विकलक (णगनक) एहन रूप जाहिमे एकसरें दीर्घ मने--SS (जेना-जे, गे, खो, जो आदि) रहए आ तकरा बाद पंचकल (ठगण)क ओ रूप रहए जाहिमे पहिल वर्ण लघु आ तकरा बाद दूनू दीर्घ (ISS) हो तँ जे रूप बनत से उर्दू मे "फाइलातुन" कहबैत छैक। एकटा उदारहरण लिअ " गे सुशीला" एकर मात्रा क्रम अछि (SISS) ---- आब एकरा "फाइलातुन" (SISS) सँ मिलाउ| एकरा एना देखू------ S + ISS = SISS 2) जँ पंचकल (ठगण)क ओ रूप जाहिमे पहिने दूटा दीर्घ आ तकरा बाद एकटा लघु हो (SSI) तकरा द्विकल (णगन)क ओहन रूपसँ जोड़ू जाहिमे एकसरें दीर्घ (S) हो। तँ ओ "मुस्तफइलुन" ( SSIS) बनत। एकरा एना देखू---------SSI + S = SSIS 3) जँ त्रिकल (ढगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल लघु आ दोसर दीर्घ (IS) हो तकरा चतुष्कल (डगण)क ओहन रूपसँ जोड़ू जाहिमे दूनू दीर्घ (SS) छैक। तखन जे बनत तकरा "मफाईलुन" (ISSS) बनत मने। उदाहरण लेल---निशा एलै (ISSS)। एकरा एना देखू-----IS + SS = ISSS 4) जँ चतुष्कल (डगण)क ओहन रूप जकर शुरूआतमे दूटा लघु आ अंतमे एकटा दीर्घ होइ मने (IIS) तकरा त्रिकल (ढगण)क ओहन रूपसँ जोड़ू जाहिमे पहिल लघु आ अंतिम दीर्घ मने (IS) तँ "मुतफाइलुन" (IISIS) बनि जाएत। एकरा एना देखू-------IIS + IS = IISIS 5) जँ पंचकल (ठगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल लघु दोसर दीर्घ आ तकरा बाद अंतिम दूनू लघु मने (ISII) हो तकरा द्विकल (णगण)क ओहन रूपसँ जोड़बै जाहिमे एकटा दीर्घ होइक मने (S) तँ मफाइलतुन बनि जाएत। एकरा एना देखू------ISII + S = ISIIS 6) जँ चतुष्कल (डगण)क ओहन रूप जाहिमे दूनू दीर्घ हो (SS) मने तकरा त्रिकल (ढगण)क ओहन रूपसँ जाहिमे पहिल दीर्घ आ अंतिम लघु (IS) मने हो तँ "मफऊलात" (SSIS) बनत। एकरा एना देखू-----SS + IS = SSIS 7) पंचकल (ठगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल लघु आ तकरा बाद दूनू दीर्घ हो मने (ISS) से "फऊलुन" कहाइत अछि। एकरा एना देखू------ ISS 8) पंचकल (ठगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल दीर्घ आ तकरा बाद लघु तकरा बाद फेर दीर्घ हो मने (SIS) से "फाइलुन" कहल जाइत अछि। एकरा एना देखू------SIS *****मात्रा गनबाक लेल मोन राखू जाहि अक्षरमे "अ", "इ", "उ", "ऋ" एवं "लृ" नुकाएल हो तकरा लघु मानू आ तकरा बाद सभकेँ दीर्घ। संगहि संग अनुस्वार तँ दीर्घ अछि मुदा चन्द्रबिंदु लघु।संगहि-संग जँ कोनो शब्दमे संयुक्ताक्षर हुअए तँ ताहिसँ पहिलेक अक्षर दीर्घ भए जाइत छैक चाहे ओ लघु किएक ने हुअए। उदाहरण लेल--प्रत्यक्ष शब्दमे दूटा संयुक्ताक्षर अछि पहिल त्य एवं क्ष। आब एहिमे देखू "त्य" सँ पहिने "प्र" अछि तँए ई दीर्घ भेल आ "क्ष" सँ पहिने "त्य" अछि तँए इहो दीर्घ भेल। ई नियम जँ दू टा अलग-अलग शब्द हो तैयो लागू हएत जेना उदाहरण लेल--- हमर प्रेम छी अहाँ... ऐमे "प्रे" संयुक्ताक्षर भेल आ ताहिसँ पहिने बला शब्द " र" दीर्घ भए जाएत। मतलब जे "हमर" शब्दक अंतिम अक्षर "र" दीर्घ भए जाएत । मुदा इ मोन राखू "न्ह" आ "म्ह" संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला शब्दमे लघु दीर्घ नहि होइत छैक। जेना की "कुम्हार" मे "म्ह" सँ पहिने "कु" दीर्घ नहि भेल तेनाहिते "कन्हाइ" शब्दमे सेहो "न्ह"सँ पहिने "क" वर्ण दीर्घ नहि भेल। क्ष, त्र आ ज्ञ संयुक्ताक्षर अछि।तेनाहिते.... प्र, र्व, आदि सेहो संयुक्ताक्षर अछि। बहुत गोटेंकेँ समस्या होइत छन्हि जे इ लघु-दीर्घ कोना होइत छै। प्रस्तुत अछि किछु उदाहरण--- बिगड़ि-----------एहि शब्दकेँ ह्रस्व-दीर्घ मानू वा दीर्घ-ह्रस्व मानू। बहरक जेहन जरूरति हो। अरबी बहरमे तीन टा लघु सँ कोनो बहर नै छै तँए लघु-लघु-लघु मानबाक कोनो जरूरति नै। हुनकर---------- एहि शब्दकेँ दीर्घ-दीर्घ मानू वा दीर्घ-लघु-लघु मानू वा लघु-लघु-दीर्घ दीर्घ मानू जेहन जरूरति हो। अरबी बहरमे चारिटा लघु सँ कोनो बहर नै छै तँए लघु-लघु-लघु-लघु मानबाक कोनो जरूरति नै। घर------- एहि शब्दकेँ दीर्घ मानू वा लघु-लघु बहरक जेहन जरूरति हो। चोर------ इ साफे तौर पर दीर्घ-लघु अछि। जँ कोनो शेरमे एना पाँति छै--- बिगड़ि चलै । आब एहि दू शब्दकेँ बान्हू। या तँ अहाँ " बिग" मने एकटा दीर्घ मानू आ "ड़ि" मने एकटा लघु फेर "च" एकटा लघू भेल आ "लै" एकटा दीर्घ। एकर मतलब जे " बिगड़ि चलै" केर संभावित बहर भेल--दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ। एहि शब्दकेँ एकटा आर रूप दए सकैत छी जेना की---- "बि" के लघु मानू "गड़ि"केँ दीर्घ मानू आ फेर "च" एकटा लघू भेल आ "लै" एकटा दीर्घ। एकर मतलब जे " बिगड़ि चलै" केर संभावित बहर भेल--- लघु-दीर्घ-लघु-दीर्घ। आब एहि दू रूपकेँ अहाँ बहरक हिसाबें प्रयोग करू। कतेको आदमी " बिग" केँ दीर्घ मानताह फेर "ड़ि" "च" केँ मिला दीर्घ मानताह आ "लै" भेल दीर्घ मने दीर्घ-दीर्घ -दीर्घ मुदा इ रूप गलत भेल। किछु दिन पहिने हम ओम प्रकाश आ अमित जीकेँ कहने छलिअन्हि जे एना कए सकैत छी। मुदा तखन हमर ज्ञान कम्म छल। हुनका दूनू गोटेँकेँ अलावे सभ गोटेसँ आग्रह जे ओ आब एना नै करथि। मैथिलीमे वर्तनीकेँ हिसाबेँ ई उदाहरण देखू---- लए---- ह्रस्व-दीर्घ लs------ह्रस्व ल'------ह्रस्व लय--- ह्रस्व-ह्रस्व वा दीर्घ इएह निअम कए, कs वा स', भए भs वा भ' लेल छै आन प्रारूप लेल एहने बात बूझल जाए। B) वार्णिक छंदमे तीन-तीन मात्रा खंडक आठ विन्यास कएल जाइत अछि। एहि तीन-तीन खंडक गनणा "दशाक्षरी" पद्धतिसँ कएल जाइत अछि। इ एक प्रकारक सूत्र अछि। इ सूत्र अछि-----"यमाताराजभानसलगा"। एहि दसो अक्षरमेसँ पहिल आठ अक्षर आठो गणक नामक पहिल अक्षर थिक। आ इ आठ गण अछि----- य = यगण मा = मगण ता = तगण रा = रगण ज = जगण भा = भगण न = नगण स = सगण आ अंतिम दूटा अक्षर "लगा" कोनो गण नहि अछि। कारण इ जे वार्णिक छंदमे तीन-तीन मात्रा होइत छैक। मुदा "लगा" केर बाद कोनो अक्षर नहि अछि। तँए "स" के बाद कोनो गण नहि बनि सकैत अछि। आब गण बनेबाक तरीका देखू---- अहाँ जे गण बनबए चाहैत छी तकर पहिल अक्षर आ तकरा बादक दू अक्षर आरो लिअ। जे अक्षर क्रम आएत तकर मात्रा गणक मात्रा कहाएत। उदाहरण लेल मानू हमरा "मगण" बनेबाक अछि तँ सभसँ पहिने "मा" लिअ तकरा बादक दूशब्द अछि "तारा"। आब एकरा एकठाम लेने "मातारा" बनत। आब एकर मात्रा अछि---SSS | तँ इ भेल "मगण"। एकटा आर उदाहरण लिअ मानू हमरा जगण बनेबाक अछि तँ ज लिअ आ तकरा बाद दू शब्द अछि "भान"। तँ दूनू मिला कए "जभान" बनत मने "जगण" केर मात्रा क्रम ISIअछि। एनाहिते आठो गण बनैत अछि। आठो गणक रुप देल जा रहल अछि----- गणक नाम दशाक्षरी खंड मात्रा क्रम यगण यमाता ISS मगण मातारा SSS तगण ताराज SSI रगण राजभा SIS जगण जभान ISI भगण भानस SII नगण नसल III सगण सलगा IIS तँ चलू आब एहि आठो गणसँ अरबी रुक्न बनाबी। इ अरबी रुक्न आठ अछि । तँ देखू एकर नियम---- 1) यगण (ISS)सँ पहिने एकटा दीर्घ लगेने " फाइलातुन" बनत। मने S + यमाता = SISS = फाइलातुन ( वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी------- रगण मने (SIS) केँ बाद एकटा आर दीर्घ लगेने "फाइलातुन" बनत।मने SIS + S = SISS 2) रगण (SIS)सँ पहिने एकटा दीर्घ लगेने " मुस्तफइलुन " बनत। मने S + रगण = SSIS = मुस्तफइलुन (वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी----- तगण मने (SSI) केँ बाद एकटा आर दीर्घ लगेने "मुस्तफइलुन" बनत। मने SSI + S = SSIS) 3) यगण (ISS)केँ बाद एकटा दीर्घ लगेने "मफाईलुन" बनत। मने ISS + यगण = ISSS = मफाईलुन (वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी---- मगण मने (SSS) सँ पहिने एकटा लघु लगेने "मफाईलुन" बनत। मने I+SSS = ISSS 4) रगण (SIS) सँ पहिने दूटा लघु लगेने "मुतफाइलुन" बनत। मने II + रगण = IISIS = मुतफाइलुन ( वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी--- सगण मने (IIS) केँ बाद एकटा लघु आ तकरा बाद एकटा दीर्घ लगेने "मुतफाइलुन" बनत। मने IIS + I + S = IISIS = 5) जगण मने (ISI) केँ बाद एकटा लघु आ तकरा बाद एकटा दीर्घ लगेने "मुफाइलतुन" बनत। मने ISI + I + S = ISIIS 6) मगण मने (SSS) के बाद एकटा लघु लगेने "मफऊलात" बनत। मने SSS + I = SSSI = मफऊलात ( वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी----- तगण मने (SSI)सँ पहिने एकटा दीर्घ लगेने “मफऊलात” बनत। मने S + SSI = SSSI 7) यगण मने (ISS) पूरा-पूरी "फऊलुन" केँ बराबर अछि। 8) रगण मने (SIS) पूरा-पूरी "फाइलुन" केँ बराबर अछि। तँ दूनू प्रकारक छंद आ तकरा रुक्नमे बदलनाइ हमरा लोकनि सेहो देखलहुँ। तँ आब चलू तैआर भए जाउ गजल लिखए आ पढ़ए लेल। एहि लेखक सहायतासँ खाली मैथिलीए नहि कोनो आन भाषामे सेहो सही गजल लीखि सकैत छी, खाली काफियाकेँ नियम बदलि जेतै भाषाकेँ हिसाबें। मैथिलीमे बहर उपरमे हमरा लोकनि जतेक बहर देखलहुँ ताहि उपर मैथिलीमे आइ धरि गजल कहले नहि गेल। अर्थात जीवन झासँ लए कए 2008 धरि मैथिलीमे बहर नहि छल। बहर नै छल मतलब कृत्रिम रूपेँ बहर नै छल। योगानंद हीरा जी बहुत पहिनेसँ अरबी बहरमे मैथिली गजल लिखैत छलाह, मुदा मैथिलीक बहर-अज्ञानी संपादक सभ हुनका कात कए देलक जाहिकेँ फलस्वरूप मैथिली गजलमे बहरक चर्चा नै भए सकल। 2008क बाद गजेन्द्र ठाकुर उपरका बहरमे गजल तँ कहबे केलाह संगहि-संग मैथिली लेल एकटा अन्य बहर सेहो तकलाह जकर नाम देल गेल---वार्णिक बहर। एहि बहरक मतलब छैक मतलाक पहिल पाँतिमे जतेक वर्ण छैक ओहि गजलक आन हरेक शेरक पाँतिमे ओतबए वर्ण हेबाक चाही। उपरमे उदाहरण लेल हम अपन जतेक शेर देने छी ओ सभ सरल वार्णिक बहरमे अछि।तथापि एकटा उदाहरण आर----- जहिआ धरि हमरा श्वास रहत तहिआ धरि हुनक आस रहत आब एकरा गानू। एहि दूनू पाँतिमे 13-13 वर्ण अछि। इ भेल सरल वार्णिक बहर। वर्ण कोना गानल जाए ताहि लेल इ धेआन राखू----- हलंत बला अक्षरकेँ 0 मानू संयुक्ताक्षरमे संयुक्त अक्षरके 1 मानू। जेना की "हरस्त" मे स्त=1 भेल। तकरा बाद सभ अक्षरकेँ 1 मानू चाहे ओकर मात्रा लघु हो की दीर्घ। वार्णिक बहर दू तरहक अछि--- सरल वार्णिक बहर, आ वार्णिक 1) सरल वार्णिक बहर----- उपरका सभ उदाहरण सरल वार्णिकक अछि। 2) वार्णिक-------- एहिमे वर्णक संग-संग मात्राक सेहो धेआन राखए पड़ैत छैक। मने वर्णक संख्या तँ निश्चित हेबाके चाही संगहि-संग ह्रस्व के निच्चा ह्रस्व आ दीर्घ के निच्चा दीर्घ हेबाके चाही। उदाहरण लेल----- नचनी नाच नचा गेल प्रेम हुनकर जिनगी बाँझ बना गेल प्रेम हुनकर आब एहि शेरके देखू दूनू पाँतिमे 15 वर्ण तँ छैके संगे-संग पहिल पाँतिमे जाहि ठाम जे मात्रा छैक वएह मात्रा दोसरो पाँतिमे ओही ठाम छैक। तँ इ भेल वार्णिक बहर| जँ अहाँ एकरा मात्रा क्रम देबै तँ पता चलत जे एकर रुप एना छैक---- SSSI-ISSS-SISS आब कने इ विचारी जे मैथिलीमे कोन बहरके प्रधानता दी। जेना की हमरा लोकनि जनैत छी "सरल वार्णिक बहर" सभसँ बेसी हल्लुक अछि तँए गजलगो ( शाइर) शुरुआतमे एही बहर मे गजल लिखैत तँ नीक। तकरा बाद अभ्याससँ दोसर बहर (वार्णिक बहर) पर आबथि आ तकरा बाद उर्दू बला बहर पर हाथ अजमाबथि। एखन मैथिलीमे दोसर बहर अर्थात वार्णिक बहरक प्रारंभिक चरण चलि रहल अछि। अंतमे सबसँ खास गप्प गजल चाहे अहाँ कोनो बहर मे किएक ने लिखब रदीफ आ काफियाक नियम सभ लेल एकै रंग रहत। (ई आलेख शब्द साधक श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीकेँ समर्पित छन्हि।) मुन्नाजी बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा घड़ीक पेण्डुलम सन झुलैत जिनगीमे स्थिरता भागल फिरैए। ने देह स्थिर आ ने चित्त। केखनो क' तँ अपनो ठर-ठेकान हेराएल सन लगैए लोककेँ। जँ चिन्तनशील भ' ताकब तँ ठकाएल सन अनुभव हएत। एहन स्थितिमे कोनो नव सोच वा नव अवधारणाकेँ घीचा-तीरीमे फँसि जेबाक आशंका घेरि लैए। मुदा रक्षात्मको भ' वएह नव अवधारणा, नव प्रयोग,नव रचना साहित्यकेँ जिया क' रखबाक क्षमता देखबैए। पद्य विधाक एकटा रूप गजल अपन आ समाजक सौन्दर्यबोध करबैए। हासिक, रसिक भ' प्रेममे ओझरा उब-डुब करैत अपन बाट पर ससरल जाइत देखाइए। गजलक बढ़ैत लोकप्रियता आब अपन विस्तार तकैए। आब गजल सभ भावमे चतरल-पसरल जा रहल अछि। ऐ बीच चर्चित युवा गजलकार आशीष अनचिन्हार जी गजलक क्षेत्रमे एकटा नव अवधारणा रखलन्हि। साहित्य अकादेमी आ मैलोरंगक संयुक्त तत्वावधानमे भेल कथा गोष्ठी २४ मार्च २०१२केँ अनचिन्हार जी बाल गजलक अवधारणाकेँ स्पष्ट करैत कहलन्हि "जेना गद्य विधा वा अन्य विधामे बाल साहित्य लिखल जाइत अछि तहिना गजलमे सेहो बाल मनोविज्ञान पर आधारित बाल गजल लिखल जाए"।२४ मार्च २०१२ के प्रस्तुत कएल गेल बाल गजलक परिकल्पनाक विधिवत् घोषणा अनचिन्हार आखर आ विदेहक फेसबुक वर्सन पर २७ मार्च २०१२केँ होइते बहुत रास परिपक्व बाल गजल सभ सोंझा आएल। घोषणा होइते ऐ विधाक पहिल रचनाकार भेलाह आशुतोष मिश्रा जे की नेपालसँ छथि मुदा यदा-कदा लिखैत छथि। दोसर स्थान पर भेलाह जगदानंद झा मनु आ तकरा बाद तँ अमित मिश्रा, रुबी झा, नवल श्री पंकज, चंदन झा, मिहिर झा, मुन्ना जी आ आन गजलकार सभहँक बाल गजलक प्रकाशनक क्रम बनि गेल। आ ऐँ तरहेँ ऐ अवधारणाक प्रथमे चरण ठोस भ' सोंझा आएल , जाहिसँ एकर मजगूत भविष्यक आकलन कएल जा सकैए। संगे एकर पूर्ण संभावना सेहो जागल देखाइए। अनचिन्हार आखर द्वारा बाल गजलक महत्वकेँ देखैत " गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" अलगसँ देबाक घोषणा सेहो कएल गेल। आ ई मार्च माससँ प्रभावी मानल गेल। आ श्रीमती प्रिती ठाकुर जीकेँ मुख्यचयनकर्ती बनाएल गेल। एखन धरि जून मास धरिक प्रारंभिक चरणक चयन भेल अछि जे एना अछि----------------- १) मार्च लेल श्री मती रूबी झा जीकेँ चूनल गेल। २) अप्रैल लेल नवलश्री पंकज जीकेँ चूनल गेल। ३) मइ लेल अमित मिश्रा जीकेँ चूनल गेल। ४) जून लेल चंदन झा जीकेँ चूनल गेल। संप्रति विदेह द्वारा प्रस्तुत बाल गजल विशेषांक एकर आधारकेँ मजगूत करबाक दिशामे एकटा सशक्त प्रयास अछि जाहिसँ एकर विकासक संभावना अक्षुण्ण रहए। २. ओम प्रकाश झा मैथिली बाल गजलक अवधारणा जेना कि नाम सँ स्पष्ट अछि, बाल गजल माने भेल नेना-भुटकाक लेल गजल। बाल गजलक अवधारणा मैथिली मे एकदम नब अछि आ पहिल बेर २४ मार्च २०१२ केँ श्री आशीष अनचिन्हार ऐ अवधारणा केँ सामने आनलथि। बहुत अल्प समय मे बाल गजल बहुत प्रसिद्धि पओलक आ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभक एकटा विशाल पाँति ठाढ भऽ गेल। ऐ मे सर्वश्री गजेन्द्र ठाकुर आ आशीष अनचिन्हार जकाँ स्थापित गजलकार तँ छथि, एकर अलावे नब गजलकार सब सेहो बाल गजल कहबा मे विशेष अभिरूचि देखौलन्हि। बाल गजल कहनिहार नब गजलकार सभ मे सर्वश्री मिहिर झा, मुन्ना जी, इरा मल्लिक, अमित मिश्रा, चन्दन झा, पंकज चौधरी 'नवलश्री', राजीव रंजन झा, जगदानंद झा 'मनु', रूबी झा, प्रशांत मैथिल आदि अनेको गजलकार छथि। "अनचिन्हार आखर", जे मैथिली गजलक एकमात्र ब्लाग अछि, देखला पर पता लागैत अछि जे बाल गजलक अवधारणा अयलाक बाद सँ एखन धरि(ई आलेख लिखबा तक) ७३(तिहत्तरि) टा बाल गजल ऐ ब्लाग पर पोस्ट भऽ चुकल अछि, जे अपने आप मे एकटा कीर्तिमान अछि। खास कऽ एतेक कम समय मे एतेक पोस्ट आएब बाल गजलक लोकप्रियताक खिस्सा कहि रहल अछि। बाल गजलक विधा एकटा स्वतन्त्र विधा बनबाक बाट मे अग्रसर अछि, जे एतेक कम समय मे एतेक संख्या मे बाल गजल कहनिहार गजलकार आ बाल गजलक संख्या सँ स्पष्ट अछि। संगहि किछु लोक केँ मिरचाई सेहो लागब शुरू अछि आ ओ लोकनि बाल गजलक सम्पूर्ण अवधारणा केँ नकारबाक कुत्सित असफल प्रयास मे जत्र कुत्र अंट शंट पोस्ट देबऽ लागलाह। ई गप आर स्पष्ट करैत अछि जे बाल गजलक विधा मजबूती सँ स्थापित भऽ रहल अछि। कियाक तँ सफल व्यक्ति आ विधा सभक आकर्षणक केन्द्र बनैत अछि आ बाल गजल सेहो सभक आकर्षणक केन्द्र बनि चुकल अछि, चाहे ओ गजलकार होईथि, पाठक होईथि, आलोचक होईथि वा जरनिहार लोक सभ होईथि। जखन मैथिलि गजलक चर्च भऽ रहल अछि, तखन श्री आशीष अनचिन्हारक चर्चा स्वभाविक अछि। मैथिली गजलक विकास मे हुनकर योगदान हुनकर धुर विरोधी लोकनि सेहो मानैत छथिन्ह। मैथिली बाल गजलक अवधारणा लेल श्री आशीष अनचिन्हार मैथिली साहित्य मे अपन अनुपम स्थान बना चुकल छथि। बाल गजलक अवधारणा सेहो हुनके छैन्हि, जे बहुत सफल भेल अछि। आब किछु गप करी मैथिली बाल गजलक रचना सभक संबंध मे। हमरा विचार सँ बाल गजल नेना भुटकाक लेल रूचिगर तँ हेबाके चाही, संगहि ऐ मे कोनो स्पष्ट सामाजिक सनेस होइ तँ ई सोन मे सोहाग जकाँ हएत। ओना तँ सभ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभ ऐ मे सक्षम छथि आ नीक सँ नीक बाल गजल लिख रहल छथि, मुदा ऐ सन्दर्भ मे हम श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक बाल गजलक उल्लेख करब उचित बूझि रहल छी। हुनकर एकटा बाल गजलक मतला अछिः- कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी जँ रंग गुलाबी छै तँ जानू बार्बी ऐ गजल केँ पूरा पढि कऽ कने देखियौ। ई गजल कनिया पुतराक उल्लेख करैत नेना-भुटकाक मनोरंजन तँ करिते अछि, संगहि अजुका बाजारवादक बलिवेदी पर कुर्बान भेल मनुक्खक मार्मिक विवेचना सेहो करैत अछि। एहन आरो कतेको बाल गजल सभ "अनचिन्हार आखर" पर भेंटैत अछि, जकरा ऐ ब्लाग पर पढल जा सकैत अछि। ई गजलकार सभक सामाजिक संवेदना केँ प्रकट करैत अछि आ हम ऐ लेल सभ गजलकार केँ साधुवाद दैत छियैन्हि। हम एहने बाल गजलक आस गजलकार सभ सँ लगओने छी। कियाक तँ गजलकारक सामाजिक दायित्व सेहो छै, जे पूरा हेबाक चाही। आधुनिक मैथिली गजलकार सब मे ई क्षमता अछि आ ओ दिन दूर नै अछि जखन एक सँ एक सुन्नर आ बालोपयोगीक संगे सामाजिक समस्या पर बाल गजलक भरमार हएत। व्याकरणक हिसाबेँ मैथिली बाल गजल नीक बाट धएने अछि। अनचिन्हार आखरक टीमक परिश्रमक कारणेँ मैथिली मे बहरयुक्त गजलक काल शुरू भऽ चुकल अछि आ सरल वार्णिक बहर(जकर अवधारणा श्री गजेन्द्र ठाकुरजी देलखिन्ह) केर अलावे आब अरबी बहर मे गजल कहनिहार गजलकारक कमी नै छै। बाल गजल अपन शुरूआते सँ बहरयुक्त अछि, जे बाल गजलक लेल शुभ संकेत अछि। शुरूआतिए समय मे जे आ जतबा बाल गजल लिखल गेल अछि, ओ सभ बहर मे अछि, चाहे सरल वार्णिक बहर होइ वा अरबी बहर। बहरक अलावे रदीफ आ काफियाक नियमक पालन सेहो पूरा पूरा भऽ रहल अछि। व्याकरण पालनक ई प्रतिबद्धता निश्चित रूपे बाल गजलक सफलताक गाथा लिखबा मे सहायक हएत। मैथिली गजलक बढैत डेग संग आब मैथिली बाल गजलक डेग सेहो उठि गेल अछि। मैथिली बाल गजल जाहि द्रुत गति सँ अपन डेग उठओलक अछि, ऐ सँ तँ यैह लागैत अछि जे अगिला साल आबैत आबैत मैथिली बाल गजलक पोथी प्रकाशित भऽ सकैत अछि। संगहि इसकूलक पाठ्यक्रम मे बाल गजल सम्मिलित हेबाक संभावना सेहो साकार रूप लऽ सकत। पाठ्यक्रम मे सम्मिलित हेबाक बाद मैथिली बाल गजल सभ पढनिहार-पढौनिहारक संज्ञान मे नीक जकाँ आओत आ सामाजिक विकासक संरचना मे अपन महत्वपूर्ण योगदान, जे अपेक्षित अछि, सेहो दऽ सकत। २ भोथ हथियार श्री सुरेन्द्र नाथक कहल मैथिली गजलक संग्रह अछि "गजल हमर हथियार थिक"। ऐ पोथी मे हुनकर अडसठि टा गजल प्रकाशित भेल अछि। ई संग्रह २००८ मे आएल अछि जकर आमुख श्री अजीत आजाद जी लिखने छथि। ऐ पोथी केँ आदि सँ अन्त धरि पढबाक बाद हमर यैह अभिमत अछि जे गजलक व्याकरणक दृष्टिसँ ऐ संग्रह मे अनेको कमी अछि, जाहि सँ बचल जा सकैत छल। पृष्ठ संख्या १३, ६७ आ ७० परहक गजल मे चारिये टा शेर छै, जखन की कोनो गजल मे कम सँ कम पाँच टा शेर हेबाक चाही। संग्रहक कोनो गजल बहर मे नै अछि। हमर ई स्पष्ट मनतब अछि जे गजलकार केँ प्रत्येक गजल मे बहरक उल्लेख करबाक चाही आ जँ आजाद गजल कहने छथि तँ इहो स्पष्ट रूपेँ लिखबाक चाही। ऐ पोथी मे काफियाक गलती भरमार अछि। कतौ कतौ तँ ई बूझना जाइ छै जे गजलकार बिना काफिया आ रदीफक मतलब बूझने गजल कहबा लेल बैस गेल छथि। एकर उदाहरण पृष्ठ १५ परहक गजल पढबा पर भेंट जाइ छै। ई तँ हम एकटा उदाहरण कहि रहल छी। आरो गजल ऐ दोख सँ प्रभावित छै, जतय काफियाक नियमक धज्जी उडा देल गेल अछि। जेना पृष्ठ १८, १९, २०, २१, २७, २९, ३१, ३४, ३५, ३६, ३९, ४०, ४१, ४३, ४४, ४५, ४६, ४७, ५२, ५३, ५६, ५७, ५८, ६६, ६७, ६८,७०, ७१, ७२, ७४, ७५,७७, ७९ आदिमे काफिया तकलासँ नै भेंटैत अछि आ ऐ खोजमे मोन अकच्छ भऽ जाइत छै। ओना आनो पृष्ठ काफिया दोखसँ ग्रसित अछि, मुदा ई उदाहरण हम ओइ पृष्ठ सभक देने छी, जतय काफियाक झलकियो तक नै भेंटै छै। मैथिली गजल आइ जाहि सोपान पर चढि चुकल अछि, ओइ हिसाबेँ ऐ तरहक रचना गजलक नामसँ स्वीकृत होइ बला नै अछि। कियाक तँ बिना दुरूस्त काफियाक गजल नै भऽ सकैत अछि। ई संग्रह "अनचिन्हार आखर" युगक शुरूआत भेलाक बाद लिखल गेल अछि, तैँ हमरा ई आस छल जे गजलकार कमसँ कम काफिया आ रदीफक नियमक पालन ठीकसँ केने हेताह, कियाक तँ "अनचिन्हार आखर" जुग मे आब गजलक व्याकरणक सभ नियम चिन्हार भऽ चुकल अछि। मुदा गजलकार काफिया आ रदीफक नियम पालन करबामे पूरा असफल रहलथि। ओना ऐ संग्रहक काफिया दोखकेँ पोथीक आमुख लेखक श्री अजीत आजाद पोथीक आमुखमे दाबल आवाजमे स्वीकार करैत कहै छथि जे कतेको ठाम काफिया "गडबडायल सन" बुझना जाइत अछि। ओना ई अलग गप थिक जे काफिया "गडबडायल सन" नै अपितु पूरा पूरी गडबडायल अछि। फेर श्री आजाद ऐ गलतीकेँ झाँपबा लेल इहो कहैत छथि जे "रचनाकारकेँ अपन सीमासँ बाहर आबि शब्द-व्यापार करबाक चाही"। मुदा गजलक अपन व्याकरण छै, जकर पालन केने बिना रचना गजल नै भऽ कऽ पद्य मात्र रहि जाइत छै। गजल आ कविताक बीचक अंतर जे अंतर छै, से ऐ तरहक तर्कसँ समाप्त नै भऽ जाइ छै। काफिया, रदीफ आ गजलक व्याकरणक अनुपालन नै हेबाक कारणेँ श्री सुरेन्द्र नाथक ई संग्रह गजल संग्रह नै भऽ कऽ एकटा पद्यक संग्रह भऽ कऽ रहि गेल अछि। संवेदनाक स्तर पर किछु रचना नीक अछि आ जँ गजलकार गजलक व्याकरण पर धेआन देने रहतथिन्ह, तँ नीक गजल लिखि सकैत छलाह। गजलकारक ई पहिलुक मैथिली गजल संग्रह बहुत आस तँ नै जगबैत अछि, मुदा हुनकर संवेदनात्मक प्रतिभा देखैत हम ई आस जरूर करै छी जे ओ गजलक व्याकरणक पालन करैत आगू नीक गजल कहताह आ "गजल हमर हथियार थिक" केँ चरितार्थ करताह। गजल तँ हथियार होइते अछि, मुदा बिनु काफिया, रदीफ आ बहरक नियमक पालन केने रचना गजल नै होइत अछि आ भोथ हथियार भऽ जाइत अछि। पद्यक हथियार पर काफिया आ बहरक सान चढल हुनकर नब गजल-हथियारक प्रतीक्षा रहत। जगदानन्द झा मनु बाल गजलक अवधारणा बाल गजलक अवधारणा कोनो बेसी पुरान नहि अछि | आँखिक देखले- देखले चारि महिना भेल होएत | मुदा जेना कहल जाई छैक, कोनो कार्यक अथबा अबधारनाक सुरुवात कतौ नहि कतौ सँ होएते छैक | आ हम सब एखुनका समकालीन गजलकार (विशेष कए विदेह आ अनचिन्हार आखर सँ जुरल ) शोभाग्यशाली छी जे एहि महान घटनाक्रम केँ परोक्ष अपन आँखि सँ देख रहल छी आ इतिहास में धारनाक गवाह बनि कए आएब | ओना कोनो कार्य केँ हरदम दूगोट पक्ष होएत छैक एकटा पक्ष में तँ दोसर बिपक्ष में | बहुत रास बिपक्षक लोक केँ एखन तक मैथिली में गजल, सेहो नहि पचि रहल छैन आ अगुलका पीढी हुनका सब केँ सामने मैथिली में बाल गजल लए कँ उपस्थित भए गेल | ई हुनका सब केँ लेल अविश्वसनीय आ अपच भेनाई तँ स्वभाबिक छनि | किएक तँ बाल गजलक अब्धारनाक उत्पति एखन तक उर्दू आ हिंदीयो में चुप्पे अछि, ओहि ठाम मैथिली में गजल नहि पचबै बला सब केँ सोँझां में करीब चारि महिना में लगभग सय सँ बेसी सुन्नर-सुन्नर नेनपन सँ भरल बाल गजल हुनका सब लेल आश्चर्ज मुदा हमरा सबहक लेल प्रश्नताक विषय अछि | किछु लोक साँप केँ गेलाक बाद लाठी पितै में लागल रहैत छथि तँ किछु लोक एकटा सार्थक श्रीजन में, मुदा इतिहास बनाबै बला में नाम सदिखन श्रीजनकर्ता केँ अबैत छैक | हम सब केँ सब एखनका समय केँ श्रीजनकर्ता छी | बाल गजलक अबधारना कोना सम्भब भेलै आ कोन-कोन महिना में एकर पूर्ण जानकारी चन्दन झा जीक आलेख में नीक सँ अछि मुदा हम एतेक जरुर कहब जें एहि अबधारनाक जन्म आशीष अनचिन्हार जीक मोन सँ भेलैंह आ बहुत जल्दीए ई अपन स्वतंत्र छाप जन-जन केँ मोन पर छोरत | बाल मोनक कल्पना केँ कोनो सीमा नहि छैक, बस ओ कल्पना ओ चरित्र जे जीवनक भागमभाग में कतौ हमरा सब सँ हरा गेल, कनी काल केँ लेल सब किछ बिसरि कए बच्चा बनि कलम चलेने बाल गजल | एहि सन्दर्भ में गजेन्द्र ठाकुर जीक ई उक्ति सय टका ठीक छैन -"जे जतेक बच्चा बनि जेता ओ ओतेक नीक बाल गजल कहता " | बिनु पानिक नाउ चलाएब हम बिनु चक्काक गाडी बनाएब हम नहि बिना पानिक नाऊक कोनो प्रयोजन आ नहि बिनु चक्काक गाड़ीक कोनो प्रयोजन मुदा उपरका शेर में बाल मोनक परिकल्पना अछि आ ओ बाल मोन किछो कए सकैत अछि | बिनु पानिक नाऊ चला सकैत अछि, बिनु चाक्कक गाड़ी बना सकैत अछि, बाबा केँ घोरा बना सकैत अछि | ओहे बाल मोन जखन गंभीर होएत अछि तँ परदेश में बसल काका बाबु केँ बजाबैक हेतु चीत्कार करैत अछि - 'मनु' दै सपत घर घुरि आउ काका बाबु नेन्ना केँ कखन तक कोँढ ठोराएब आशीष अनचिन्हार की थिक बाल गजल किछु लोक "बाल गजल"क नामसँ तेनाहिते चौंकि उठल छथि जेना केओ हुनका अनचोकेमे हुड़पेटि देने हो। जँ एहन बात मात्र मैथिलिए टामे रहितै तँ कोनो बात नै, मुदा ई चौंकब हिन्दी आ उर्दूमे सेहो भए रहल छै। कारण ई अवधारणा मात्र मैथिलिए टामे छै आर कोनो भारतीय भाषामे नै। जँ हम कोनो हिन्दी-उर्दू भाषी गजलकार मित्रसँ "बाल गजल"क चर्च करैत छी तँ चोट्टे कहैत छथि जे उर्दूक बहुत गजलकार सभ बहुत शेरमे बाल मनोविज्ञानक वर्णन केने छथि खास कए ओ सुदर्शन फाकिर द्वारा कहल आ जगजीत सिंह द्वारा गाओल गजल----- "ये कागज की कश्ती वो बारिस का पानी" बला संदर्भ दै छथि आ ई बात ओना सत्य छै मुदा " बाल गजल"केँ फुटका कए ओकरा लेल अलग स्थान मात्र मैथिलिए टामे देल गेलैए। आ ई मैथिलीक सौभाग्य थिक जे ओ "बाल गजल"क अगुआ बनि गेल अछि भारतीय भाषा मध्य। आ विदेह एकर विशेषांक निकालल ताहि लेल हम एकरा धन्यवाद नै दए सकैत छीऐ कारण विदेह हमहूँ छी आ लोक अपना आपकेँ धन्यवाद कोना देत। जहाँ धरि बाल गजलक विषय चयन केर बात थिक तँ नामेसँ बुझा जाइत अछि ऐ गजलमे बाल मनोविज्ञान केर वर्णन रहैत छै। तथापि एकटा परिभाषा हमरा दिससँ ----" एकटा एहन गजल जाहि महँक हरेक शेर बाल मनोविज्ञानसँ बनल हो आ गजलक हरेक नियमकेँ पूर्ववत् पालन करैत हो ओ बाल गजल कहेबाक अधिकारी अछि"। जँ एकरा दोसर शब्दमे कही तँ ई कहि सकैत छी जे बाल गजल लेल नियम सभ वएह रहतै जे गजल लेल होइत छै बस खाली विषय बदलि जेतै। आब आबी बाल गजलक अस्तित्व पर। किछु लोक कहता जे गजल दार्शानिकतासँ भरल रहै छै तँए बाल गजल भैए ने सकैए। मुदा ओहन-ओहन लोक विदेहक ई अंक जे बाल गजल विशेषांक अछि तकर हरेक बाल गजल पढ़थि हुनका उत्तर भेटि जेतन्हि। ओना दोसर बात ई जे कविता-कथा आदि सभ सेहो पहिने गंभीर होइत छल मुदा जखन ओहिमे बाल साहित्य भए सकैए तँ बाल गजल किएक नै ? ओनाहुतो मैथिलीमे गजल विधाकेँ बहुत दिन धरि सायास ( खास कए गजलकारे सभ द्वारा ) अवडेरि देल गेल छलै तँए बहुत लोककेँ बाल गजलसँ कष्ट भेनाइ स्वाभाविक छै। की बाल गजल लेल नियम बदलि जेतैः जेना की उपरमे कहल गेल अछि जे बाल गजल लेल सभ नियम गजले बला रहतै बस खाली एकटा नियमसँ समझौता करए पड़त। माने जे बहर-काफिया-रदीफ आ आर-आर नियम सभ तँ गजले जकाँ रहतै मुदा गजलमे जेना हरेक शेर अलग-अलग भावकेँ रहैत अछि तेना बाल गजलमे कठिन बुझाइए। तँए हमरा हिसाबेँ ऐठाम ई नियम टूटत मुदा तैओ कोनो दिक्कत नै कारण मुस्लसल गजल तँ होइते छै। अर्थात बाल गजल एक तरहेँ " मुस्लसल गजल " भेल। बाल गजलक पूर्व भूमिकाः तारीखक हिसाबें बाल गजलक उत्पति २४.०३.२०१२ केँ मानल जाएत मुदा ओकर स्वरूप मैथिलीमे पहिनेहें फड़िच्छ भए चुकल छल। ०९ दिसम्बर २०११ केँ अनचिन्हार आखर पर प्रकाशित श्रीमती शांति लक्ष्मी चौधरी जीक ई गजल देखल जाए ( बादमे ई गजल मिथिला दर्शनक अंक मइ-जून २०१२मे सेहो प्रकाशित भेलै) आ सोचल जाए जे बिना कोनो घोषणाकेँ एतेक नीक बाल गजल कोना लिखल गेलै------------ शिशु सिया उपमा उपमान छियै हमर आयुष्मति बेटी मैत्रेयी गार्गीक कोमल प्राण छियै हमर आयुष्मति बेटी टिमकैत कमलनयन, धव-धव माखन सन कपोल पुर्णमासीक चमकैत चान छियै हमर आयुष्मति बेटी बिहुसैत ठोर मे अमृतधारा बिलखैत ठोर सोमरस शिशु स्वरुपक श्रीभगवान छियै हमर आयुष्मति बेटी नौनिहाल किहकारी सरस मिश्रीघोरल मनोहर पोथी दा-दा-ना-ना-माँ सारेगामा गान छियै हमर आयुष्मति बेटी सकल पलिवारक अलखतारा जन्मपत्रीक सरस्वती अपन मैया-पिताश्रीक जान छियै हमर आयुष्मति बेटी ज्ञानपीठक बेटी छियै सुभविष्णु मिथिलाक दीप्त नक्षत्र मातृ पितृ कुलक अरमान छियै हमर आयुष्मति बेटी "शांतिलक्ष्मी" विदेहक घर-घर देखय इयह शिशुलक्ष्मी बेटीजातिक भविष्णु गुमान छियै हमर आयुष्मति बेटी ..................वर्ण २२................ तेनाहिते एकटा हमर बिना छंद बहरक गजल अनचिन्हार आखर आ विदेहक फेसबुक वर्सन पर 6/6/2011केँ आएल छल से देखू-------------- होइत छैक बरखा आ रे बौआ कागतक नाह बना रे बौआ
देखिहें घुसौ ने चोरबा घर मे हाथमे ठेंगा उठा रे बौआ
तोरे पर सभटा मान-गुमान माएक मान बढ़ा रे बौआ
छैक गड़ल काँट घृणाक करेजमे प्रेमसँ ओकरा हटा रे बौआ
नहि झुकौ माथ तोहर दुशमन लग देशक लेल माथ कटा रे बौआ तेनाहिते ४ अक्टूबर २०१०केँ अनचिन्हार आखर पर प्रकाशित गजेन्द्र ठाकुर जीक ऐ गजलकेँ देखल जाए----- जे शब्दावलीक आधार पर बाल गजल अछि मुदा अर्थ विस्तारक कारणें बाल आ बूढ़ दूनू लेल अछि----- बानर पट लैले अछि तैयार बिरनल सभ करू ने उद्धार गाएक अर्र-बों सुनि अनठेने दुहै समऐँ जनताक कपार पुल बनेबाक समचा छैक नै अर्थशास्त्र-पोथीक छलै भण्डार कोरो बाती उबही देबाक लेल आउ बजाउ बुढ़ानुस - भजार डरक घाट नहाएल छी हम से सहब दहोदिश अत्याचार ऐरावत अछि देखा - देखा कए सभटा देखैत अछि ओ व्यापार ऐ तीनटा गजलक आधार पर ई कहब बेसी उचित जे बाल गजलक भूमिका बहुत पहिने बनि गेल छल मुदा विस्फोट 24/3/2012केँ भेलै। आ ऐ विस्फोटमे जतेक हमर भूमिका अछि ततबए हिनका सभकेँ सेहो छन्हि। 1 बाल गजल ई छौंड़ी थिक बिढ़नी सन सौंसे नाचै घिरनी सन बदमाशीकेँ तगमा छै मूँहक लागै हिरणी सन बैसल भूतक नानी बनि लागै छै मुँहचिरनी सन बच्चा लग बच्चा लागै बुढ़िया लग बततिरनी सन ई दुनियाँ झाँपै तैओ बेटी चमकै किरणी सन हरेक पाँतिमे दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ 2 बाल गजल भोरे उठि मैदान गेलै बौआ ओम्हरहिसँ दतमनि तँ लेतै बौआ पोखरिमे नीकसँ नहेतै धोतै चिक्कन चुनमुन बनि क' एतै बौआ सरिएतै पोथी पहिरतै अंगा इस्कूलो खुब्बे तँ जेतै बौआ नै रखतै दोस्ती खरापक संगे पढ़ि बड़का डाक्टर तँ बनतै बौआ सभहँक करतै मदति सोना बेटा सदिखन नीके बाट चलतै बौआ हरेक पाँतिमे दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ चंदन कुमार झा मैथिली बाल-साहित्य आ बाल-गजल मैथिली साहित्यक इतिहास करीब ८०० बरख पुरान छैक आ' से एकर समृद्धि विश्व-साहित्य जगत मे अपन फराक आ' बेछप स्थान बनौने अछि ताहि मे कोनो दू मत नहि.मुदा, जखन मैथिली साहित्यक एहि समृद्धि केँ ध्यान मे रखैत मैथिली बाल-साहित्य पर दृष्टिपात करैत छी वा' आन-आन भाषाक बाल-साहित्य सँ एकर तुलना करैत छी तऽ फेर ई नगण्यप्राय बुझना जाइत अछि.मैथिली भाषा मे बाल-साहित्य बहुत कम लिखल गेलैए एखनधरि. लेकिन, एकटा बात जरूर छैक जे मिथिला क्षेत्र मे घरक बुढ़-पुरान द्वारा धिया-पुता सभकेँ विभिन्न तरहक प्रेरणादायी खिस्सा पिहानी सुनयबाक प्रचलन बहुत पुरान छैक मुदा, एकरा बाल-साहित्य केऽ अंतरगत मान्यता नहि देल जायत किएक तऽ ई लिखित रूप मे नहि उपलब्ध अछि. बिभिन्न जगह पर एकर विभिन्न स्वरूप मे कथानक बदलैत रहैत छैक.लिखित रूप मे नहि हेबाक कारणेँ ई खिस्सा-पिहानी सुनब आ' सुनेबाक परंपरा सेहो विलुप्त भेल जाऽ रहल छैक. मैथिली बाल साहित्यक प्रादुर्भावकाल प्रायः बीसम शताब्दीक उत्तरार्ध केँ मानल जायत.ओना हमरा लग एखनधरि एकर कोनो प्रामाणिक तारीख तऽ उपलब्ध नहि अछि मुदा, बाल-साहित्य लिखनिहार पुरान साहित्यकार सभक रचनाकाल केँ धेयान मे रखैत हम ई बात अपन अनुमानक आधार पर कहि रहल छी.एहि समय मे पं.चंन्द्रनाथ मिश्र "अमर", पं. गोविन्द झा, मुरलीधर झा,कालीकान्त झा "बुच", रामलोचन ठाकुर सदृश मुर्धन्य विद्वान, स्थापित साहित्यकार आ' मैथिलीसेवी सभ अपन कलमक मोसि पिया मैथिली बाल-साहित्य केँ पोसलनि.फेर जीवकांत, सियाराम झा "सरस", सन लोकप्रिय साहित्यकार एकरा अपन आंगुर धरा डेगा-डेगी चलौलनि.एकैसम सदीक शुरुआत मे तारानन्द वियोगी,ले.क. मयानाथ झा, जगदीश प्रसाद मण्डल,गजेन्द्र ठाकुर आ' प्रिती ठाकुर, ईत्यादि सँ मैथिली बाल-साहित्य केँ बेश दुलार-मलार भेटि रहल छैक.वर्तमान मे ऋषि वशिष्ठ आ' डा. शशिधर कुमरक बाल-साहित्यक लेल कयल जा रहल अवदान सेहो उल्लेखनीय अछि.तखन आब ई आशा निश्चित रुपेँ कयल जाऽ सकैत अछि जे मैथिली बाल-साहित्य सेहो क्रमशः जवानी आ' प्रौढ़ावस्था केँ प्राप्त करत आ' चिरंजीवि बनत.एकर एहने उज्जवल भविष्य केँ देखैत साहित्य अकादमी दिल्ली सेहो मैथिली बाल-साहित्य केँ मान्यता दैत एकरा लेल पुरस्कारक प्रावधान कयलक अछि.अस्तु. मैथिली साहित्य जगत मे गजल सेहो कमोवेश नवके विधा कहल जायत.ओना एकर उद्भव मैथिली मे करीब सय बरख पूर्व भेल रहैक आ' फेर कहियो गजल तऽ कहियो गीतल के रुप मे ई अड़ल रहल मुदा, एहि गीतल-गजल सभ मे गजलक व्याकरण केँ कमोवेश एकात कऽ देल गेलैक.परिणामस्वरूप, मैथिली गजल आ' गजलकार मैथिली काव्यधारा सँ सभदिन कतिआएले रहल आ गजल सेहो सभदिन अपन अस्तित्वक लड़ाई लड़ैत रहल अछि. एकैसम सदीक एखनधरिक बारह बरख मैथिली गजलक इतिहास मे अन्यतम स्थान रखैत अछि. एहि समयावधि मे श्री गजेन्द्र ठाकुर आ' आशीष अनचिन्हारक अवदान अविस्मरणीय अछि. गजेन्द्र जी गजल व्याकरणकेँ पुष्ट करैत नहि खाली गजल लिखलाह अपितु सरल वर्णिक आ' सरल मात्रिक बहरक रूप मे मैथिली गजल संसार केँ दूटा अनमोल बहर वा गजल-छंदक ढाँचा देलखिन्ह जे हमरा सन-सन कतेको नवतुरिया आ' नवसिखुआ केs लेल गजल लिखबा हेतु सहायक सिद्ध भेल अछि.एहि सँ मैथिली गजल केँ अभूतपूर्व समृद्धि भेटि रहल छैक. वर्तमान मे मैथिली गजलक लेल आशीष अनचिन्हारक समर्पण वर्णनातीत अछि. आशीष जी उर्दू आ' अरबीक समृद्ध गजल व्याकरण केँ मैथिली भाषाक आवश्यकतानुसार जाहि तरहेँ सरलीकरण केलथि आ' फेर अनचिन्हार आखरक माध्यम सँ आम जनमानस मे बहर आधारित गजल कहबाक (लिखबाक) लेल रुचि जगा रहल छथि से जा'धरि मैथिली गजल इतिहास रहत ता' धरि हिनकर एहि अवदानक चर्चा अवस्से कयल जायत. मैथिली मे बाल-गजल एकदम टटका परिकल्पना अछि.आन भाषाक बाल-साहित्य सभ मे सेहो बाल-गजल किन्साइते हेतैक.उर्दू मे गजल माने प्रेमालापे बुझल जाइत छलैक पहिने मुदा, फेर गजलकार सभ एकरा विस्तार दैत एहि मे सामाजिक सरोकार केs सेहो समावेशित कयलनि लेकिन बाल-गजल ओत्तहु जनमल हेतैक ताहि मे हमरा शंके बुझना जाइत अछि. मैथिली मे बाल-गजलक परिकल्पना सर्वप्रथम २४ मार्च २०१२ केs आशीष अनचिन्हार द्वारा कयल गेल आ' फेर २७ मार्च केs आशीष जी सूचना देलनि जे २५ वा २६ मार्च केs मैथिलीक पुरान आ' स्थापित गजलकार मुन्ना जी द्वारा एकटा बाल-गजल लिखल गेल अछि.एहि तरहेँ मुन्नाजीक ई बाल-गजल मैथिली बाल-गजलक इतिहास मे प्रथम होयबाक गौरव पौने अछि.आशा करैत छी जे विदेहक एहि बाल-गजल विशेषांक मे ई बाल-गजल प्रकाशित होयत. बाल-साहित्य सृजनकाल मे बाल मनोविज्ञान केँ धेयान मे राखब परमावश्यक.एकटा उत्कृष्ट साहित्य लेल जरुरी छैक जे ओ' सरल, बोधगम्य आ' प्रेरणास्पद हो.जखन बाल-गजलक परिकल्पना मैथिली गजलकार सभक सोझाँ एलनि तऽ स्वाभाविक रुपेँ हुनका सभक मोन मे ई प्रश्न उठलनि जे एकर रुपरेखा केहन हेतइ.....एकर व्याकरण आ' भावपक्ष केहन हेबाक चाही...ईत्यादि.हुनकर सभक एहि जिज्ञासा केs शांत करैत गजेन्द्रजी कहलखिन्ह जे कायदा-कानून तऽ सामान्ये गजल जेकाँ रहतैक मुदा भावपक्ष एहन हेबाक चाही जे छोट-छोट धिया-पुता के रुचई.ओकर सभक मन-मस्तिष्क केँ पचई आ' तइँ जे गजलकार जतेक बच्चा बनि बाल-गजल कहताह(लिखताह) ओ' ओतेक सफल हेताह. उत्साह आ प्रतिभा सँ भरल अमित मिश्र,पंकज चौधरी "नवलश्री",जगदानन्द झा "मनु",रुबी झा, मिहिर झा,ईत्यादि सन नवगजलकार सभ गजेन्द्रजीक उपरोक्त कहल बात के पुर्णतः आत्मसात कयलनि.फलस्वरुप, २४ सँ ३१ मार्च २०१२ अबैत-अबैत, एक्के सप्ताह के भीतर गोट दसेक सँ बेशी बाल-गजल हमरा सभक सोझाँ आयल.एहि क्रम मे हमहू एक-दूटा बाल-गजल लिखबाक प्रयास कयलहुँ.मुदा,एहिठाम उल्लेखनीय बात ई जे मैथिली बाल-गजल प्रायः सोइरीये सँ अपन रूप आ भाव सँ आम जनमानस के आकर्षित-प्रभावित करय लागल.बहर आ'व्याकरणक मापदण्ड पर सोंटल आ' बिम्ब आ' भावसँ ओत-प्रोत मैथिली बाल-गजल अपन जन्महि कालसँ संकेत देमय लागल जे मैथिली बाल-साहित्य मे ओकर भविष्य बेश उज्जवल छैक आ'से लगभग चारिए मासक अल्पावधि मे एकसय सँ बेशी बाल-गजल एहि बातक प्रत्यक्ष प्रमाण अछि. अमित मिश्र एखन जीवनक छात्रावस्था मे छथि आ'से एखन हिनकर एकटा पएर नेनपन तऽ दोसर जुआनीक सोपान पर छन्हि आ' तकरे प्रतिफल छैक जे हिनका बाल मनोभावक सागर मे डूबकी लगबैत देरी नहि लगैत छन्हि.यैह कारण छैक जे ई बाल-गजलकारक पाँति मे सभसँ आगू ठाढ़ भेटैत छथि.एखनधरि गोट तीसेक सँ बेशीए बाल-गजल रचि चूकल छथि आ तइमे अधिकांश अरबी बहर पर आधारित अछि जे हिनकर गजलकारक रूप मे प्रतिभाक परिचायक अछि.ई दरभंगा मे रहैत छथि से हिनकर बाल-गजल सभ मे शहरी आ' ग्राम्य परिवेश मे बच्चा सभक मनोभावक अद्भुत चित्रण-वर्णन भेटैत अछि.ई कतहु- माटिक चाउर पानिक दूध पातक थारी बनेबै माटिक चुल्हा पर खीर रान्हि,तरकारी बनेबै आ' बालुक चिन्नी कादो के दही गेना फूलक चूडा़ हेतै घैलक (खपटा) चकला संठी के बेलना से पूड़ी बनेबै ....कहैत भेटताह त' कतहुः- पीठ पर छै बैग बौआ चलल इस्कुल लाल पियर ड्रेस चमके भरल इस्कुल नै पहाड़ा पढ़ब नै सीखब ककहरा आब छै कंपुटर सिखा रहल इस्कुल....आ' फेर व्यस्त माय-बाप आ' एकाकी होइत बचपन दिशि इशारा करैत कहैत छथि - नै जो पढ़ाबै के लेल इस्कुल माँ तू जाइ छैँ बदलै घर त' वनवास मे पंकज चौधरी "नवलश्री" सेहो प्रवासी छथि आ' गाम सँ दूर हिनका बेर-बेर नेना मे बितायल दिन इयाद अबैत छन्हि.तैँ सहजहि कहैत भेटताहः- देखि भूख सँ लोहछल नेन्ना दुख-सुख सभटा लोप भेलै भंसा घर मे घाम सँ भीजल काज करै सभ चुट-चुट माँ होय कहाँ अनका देखबैलै "नवल" ई मायक माया-तृष्णा भेर निन्न तइयो कहि खिस्से दूध पियाबय घुट-घुट माँ.....आगाँ कहैत भेटताह... मोन पड़ल ई किये अनेरे बात पुरनगर बचपन के आँखि नोरेलै मोन जड़ेलक याद रमनगर बचपन के बाबुक कनहा मायक कोरा अनुपम झूला सन घुआ-मुआँ ता-ता-ता थैया आर ठेहुनिया खेल छमसगर बचपन केँ. रूबी झा एकटा गजलकारि हेबाक संग-संग माय सेहो छथि से हिनकर बाल-गजल मे मायक ममता स्पष्ट दृष्टिगोचर होइत अछि.जेनाः- रुसिये गेल बौआ मनाएब कोना कए निर्धन माय बौआ बुझाएब कोना कए...फेर आगाँ कहैत भेटतीहः- चलल ठुमकि बौआ कते सोहावन लागै छै बाजल बौआ तोतल माँ मनभावन लागै छै. मनुजी बेशीकाल बालमन के अपन प्रेरक बाल-गजल सभक माध्यम सँ प्रेरित करैत भेटताह से अहूँ सभ देखू:- मुठ्ठी भरि बिया भागक अपन हम रोपि अपने माटि में हँसि हँसि कँ गौराएब आ' फेर... हमरा कहैत अछि "मनु" मूर्ख चरबाहा पढ़ि कए सभ चरबाहा के पढ़ेबौ हम माय नहि चरबै लेल गाय जेबौ हम पठा हमरा इस्कुल कॉपी पेन लेबौ हम. उपरोक्त शेर वा गजलांश सभ तऽ एकटा बानगी मात्र अछि.एखनधरिक बाल-गजल शतक पर यदि दृष्टिपात करब तऽ माय-बापक दुलार-मलार,भाय-बहिनक झगड़ा-झाँटी सँ लऽ के लक्ष्यप्राप्ति हेतु प्रेरणा आ संकल्प सभ किछु भेटि जायत. आ' फेर ई कहबा मे कोनो अतिशयोक्ति नहि रहत जे मैथिली बाल-गजल अपन छठिहारे सँ जीवकांत,सरसजी सन-सन निसन्न कवि सभक बाल-कविताक समकक्षी बनि गेल अछि अछि. अंत मे कहय चाहब जे विदेह जे ई बाल-गजल विशेषांक बहार करबाक नेयार केलक अछि से निःसंदेह मैथिली बाल-गजल आ' बाल-साहित्य इतिहासक विकास मार्गपर एकटा माइलक पाथर साबित होयत.एकरा आरो ठोस रूप देबाक मादेँ हमर सुझाव रहत जे एहि अंक मे सम्मिलित बाल-गजल आ' बाल-गजल सँ संबंधित आलेख केँ संग-संग एखनधरिक किछु उल्लेखनीय बाल-गजल सभकेँ एकठ्ठा कऽ एकटा छोट-छीन पोथीक रूप मे विदेह परिवार प्रकाशित कराबय आ' संपूर्ण मिथिला क्षेत्रक विद्यालय आ' पुस्तकालय सभमें उपलब्ध कराबय जाहि सँ बाल-गजलक परिकल्पना अपन उद्देश्य के प्राप्त करत.गाम-घरक नेना-भुटका बाल-गजल सँ परिचित हेताह आ' हुनका सभ मे मैथिली बाल-साहित्य पढ़बाक प्रति रुचि जगतैन संगहि मैथिली बाल-साहित्यक गजलकार सभक मेहनति सोकाज लगतनि.एहिठाम हम मिथिला क्षेत्रक ओहन विद्यालय,सामाजिक आ' शैक्षणिक संस्था,गायक,संगीतकार,ईत्यादि, सभ जे आर्थिक रुपेँ सबल छथि,सँ नेहोरा करब जे ओ बाल-गजल के ऑडियो-विडियो कैसेट,सीडी,डीविडी बना गामघरक अंगना-घर मे पहुँचेबाक प्रयास करथि.मैथिली बाल-गजलक भविष्यमे विकासक मादेँ हमर मनोरथ अछि जे ई धिया-पुताक ठोर पर ओहिना सजय जेना मैथिलानीक ठोर पर गोसाउनिक गीत,सोहर,चौमासा,बारहमासा,समदाउन बसल छैक.अस्तु. अमित मिश्र बाल गजल: कोमल करेजक आखर
आइ समाज के भेद-भाव ,ऊँच -नीच . जाति-पाति गसिया क' पकड़ने अछि । सब काज मे छल-कपट भ' रहल अछि मुदा इ जातिसँ अलग एकटा और जाति अछि । जहिना गाछमे अरहुल-गेँदा -गुलाब आकर्षित करैत अछि ओहिना इ जाति समाजक सब वर्ग के चुटकी मे अपन बना लैत अछि । इ ओ जाति अछि जै सँ जँ लोकक वश चलत त' कहियो बाहर नै हएत । इ जाति अछि "बाल जाति" । एहि दुनियासँ फराक बाल-मोनक एकटा अलगे दुनियाँ अछि । एत' ए .सी बला कार त' नै मुदा घुरकुन्ना अछि , एत' पुआ -पकवानसँ बेसी स्वादिष्ट तिलकोर पातक पूरी . जनेरक कुट्टी के तरकारी आ बालुक चिन्नी अछि । एहि दुनियाँ मे खेलक अंदाज अजुबा अछि , खेल बेसी अछि आ सबसँ बेसी अछि आपसी प्रेम । कोनो खेल होइ मिल-जुलि क' खेलै छथि । कखनो बाबा जकाँ खैनी चुनाबै छथि त' कखनो मास्टर जीक नकल करै छथि । कखनो हँसैत ,रूसैत छथि त' कखनो रूसल मे हँसै छथि । हिनकर हँसनाइ , कननाइ ,रूसनाइ , खेलनाइ सब नीक लागै छै आ इएह कारण छै जे लोक एहि दुनियाँ मे बेर-बेर आब' चाहै छथि । आखिर किएक नै औता , कहल गेलै यै ,"बच्चा भगवानक रूप होइ छथि ।" जहिना भगवानक महिमा अपार छै तहिना बाल मोन के कोनो सीमासँ नै बान्हल जा सकै यै । बाल मोन के शब्द मे बन्हनाइ जतबे आसान छै ओतबे कठीन सेहो छै ।बच्चाक करेज बड कोमल होइ छै तेँए एहन बात लिखबाक चाही जैसँ हुनक मोन प्रसन्न होइ , जे ओ सब दिन अपन दैनिक जीवन मे करै छथि । दोसर बात हम कह' चाहब जे बाल-विधा के सदिखन आशावादी हेबाक चाही ।
किएक त' जँ नेनपन सँ आशा लागल रहतै त' जीवनक सब वाधा के हँसैत-खेलैत पार कएल जा सकै यै । बाल विधाक शब्द सदिखन सरल हेबाक चाही । एहन पाँति जे सरल होइ आ जल्दीए भाव समझ मे आबि जाई . बाल मोन के क्षण मे प्रसन्न क' दै अछि । संगे जँ राइम्स मे लिखल गेल होइ त' नेनाक जीभ पर एहन चढ़त जे वयस्क भेलोपर नै उतरत । ऐ के लेल गजल उपयुक्त विधा अछि किएक त' गजल मूल रूपसँ राइम्से के खेला अछि । काफिया , रदीफ सब तुकान्ते के पालन करैत अछि । हरेक दोसर पाँति एहि नियम के पालन करैत अछि । कविता मे पाँतिक संख्याँ निश्चित नै अछि मुदा गजल मे कमसँ कम दस टा पाँति हेबाक चाही आ एते पाँति के इयाद करब कठीन नै अछि । एकटा बात और मोन राखू जे बाल-गजल मे गजलक व्याकरण मे कोनो परिवर्तन नै होइ छै । बाल-गजल मे मतल , मकता , काफिया , रदीफ आ बहर ओनाहिते रहतै जेना वयस्क गजल मे रहैत अछि । बाल मोनक सटीक आखर लिखबाक लेल , आँखि मुनि अपन नेनपन इयाद करू , इयाद करू जँ अहाँ की सब करै छलियै नेनपन मे , आ जे दृश्य देखाइ पड़ैए ओकर गजलक रूप मे शब्दबद्ध क' लिअ , नै त' अपन आस-पड़ोसक नेनाक आचरण देखू हुनक दैनिक क्रिया देखू , ओ की करै छथि देखू आ ओकरा शब्दसँ बान्हि लिअ । बाल मोनक कोनो सीमा नै अछि तेँए जे मोन अछि से लिखू मुदा शब्द सरल राखू । अपन रचना मे ग्यान-विग्यानक तड़का लगाबैत रहू आ कोमल करेजक आखर रचैत रहू । मिहिर झा बाल गजल कसीदा केर एक हिस्सा होएत छैक "नसीब" | "नसीब" मे कवि के केन्द्रविंदु ओकर अदम्य चाह, ओकर अपन प्रेमिका सों अगाध प्रेम, अपन प्रेमिका सों विरह आ ओहि विरह सों उत्पन्न असह्य विरह पीडा | एहि "नसीब" से जन्म भेल गजल के | गजल शुरुआत मे आ बहुत दिन धरी एहि विषयवस्तु (सृंगार, प्रेम,विरह आदि) पर आधारित छल | भौतिक रूप से छोट रहबाक कारण आ मनुखक सब सों आकर्षणक विषय वस्तु रहबाक कारण गजल सब से लोकप्रिय भ गेल आ धीरे धीरे कसीदा मृतप्राय भ गेल | गजल जखन विकसित भेल, सृंगार, प्रेम आ विरह के अलावा अपना मे नव नव आयाम जोडैत चल गेल | सामाजिक, भक्ति, राजनीतिक, व्यंग्य एकर अंग बनैत चल गेल | एतबहि ने, ई फ़ारसी, अरबी, उर्दू होइत अँग्रेज़ी आ आन पश्चिमी भाषाक संग हिन्दी, मराठी, गुजराती आ मैथिली मे अपन आत्मा के अक्षुण्ण रखने अपन रूप परिवर्तित करैत चल गेल |गजल के प्रभाव एतेक तीक्ष्ण रहल जे भाषा कोनो होउक, लोकक करेज मे ई सीधा स्थान बना लेलक | मैथिली गजल मे किछु मास पूर्व ग़जालकार लोकनि एक टा नव प्रयोग शुरू केलन्हि - "बाल गजल" | हमरा ज्ञातव्य मे एखन धरी कोनो भाषा मे बाल विषय वस्तु पर गजल नहि लिखल गेल अछि | शायद ई प्रयोग मात्र मैथिली गजल मे पहिल बेर शुरू भेल आ विदेह पर बहुत रास बाल गजल लिखल आ सराहल गेल | ई बाल गजल सब सरल वार्णिक बहर आ अरबी बहर दुनु मे समान मात्रा मे लिखल गेल | किछु बाल गजल बच्चा लोकनि के एतेक प्रिय लगलन्हि जे ओ सब अपन धुन मे ओहि गजल के घर पर गुनगुनाबय लगलाह | गजल के कोनो भाषा मे प्रवेश कय अपन स्थान बनेनाइ आब बहुत महत्वपूर्ण घटना नहि रहि गेल | लेकिन गजल विधा मे नया आयाम देनाइ एखनहु महत्वपूर्ण घटना छैक आ मैथिली और विशेष कय विदेह लेल ई सम्मान के वस्तु छैक जे ई गजल मे ई नव आयाम अनलक | सब बाल गजलकार के हार्दिक अभिनंदन आ धन्यवाद विदेह के जे बाल गजल विशेषांक निकाललथि | नवेंदु कुमार झा बिजलीक क्षेत्र मे आत्म निर्भरताक लेल सरकार कऽ रहल प्रयास बिजलीक संकट झेलि रहल बिहार के अगिला पांच वर्ष मे आत्म निर्भर बनैबाक लक्ष्य राखल गेल अछि। एहि वास्ते सरकार पुरान बिजली घरक मरम्मति संगहि नव बिजली घर बनैबाक दिस डेग उठौलक अछि। ऊर्जा मंत्री विजेन्द्र प्रसाद यादव जनतब देलनि जे प्रदेश मे एखन बिजलीक पैघ कमी अछि। सरकार एहि दिस डेग उठा रहल अछि। पुरान बिजली घरक मरम्मति आ नव बिजली घर सेहो बनाओल जा रहल अछि। एकर अलावा बिजलीक खरीदक लेल निजी कम्पनी सभ सॅ पैघ अवधिक समझौता कयल गेल अछि। उम्मीद अछि जे अगिला तीन वर्ष मे प्रदेश के मांगक अनुरूप बिजली भेटय लागत। सरकारक प्रयास अछि जे अगिला पांच वर्ष मे मांग सॅ बेसी बिजली उत्पादन कयल जाय। ओना प्रदेश मे गोटेक 3500 मेगावाट बिजलीक आवश्यकता अछि। केन्द्रीय पुल सॅ बिहार के गोटेक 1300 मेगावाट बिजली भेटि रहल अछि। श्री यादव जनौलनि जे वर्तमान स्थिति सॅ निपटबाक लेल खुलल बजार सॅ बिजलीक खरीद कयल जा रहल अछि। सरकार प्रदेश मे तीनटा नव बिजली घर बनाओल जा रहल अछि। औरंगाबाद नवीनगर मे एनटीपीसीक संग 2000 मेगावाटक बिजली घर बनाओल जा रहल अछि जे 2015 धरि चालू भऽ जायत। एहि ठाम सॅ 75 प्रतिशत बिजली बिहार के भेटत। बरौनी आ कांटी स्थित बिजली घटक क्षमता बढ़ाओल जा रहल अछि। कांटी मे 195 मेगावाटक आ बरौनी मे 200 मेगावाटक दू-दूटा इकाई स्थापित कयल जा रहल अछि। प्रदेश के बिजली संकट सॅ मुक्ति देयैबाक लेल सरकार पुरान बिजली घर सभक मरम्मति सेहो करा रहल अछि। एहि दिस तेजी सॅ काज भलि रहल अछि। उम्मीद अछि जे अगिला वर्षक अंत धरि कांटी आ बरौनी बिजली घरक मरम्मतिक काज पूरा भऽ जायत। एहि सॅ प्रदेश के गोटेक 400 मेगावाट बिजली भेटत ओतहि सरकार आब खुलल बजार सॅ सेहो बिजलीक खरीद कयल जा रहल अछि। मंत्री जनतब देलनि जे सरकार एनटीपीसी आ अदाणी पावर सॅ बिजली खरीद रहल अछि हालांकि एहि वास्ते सरकार के प्रति यूनिट 4.10 टाका बेसीक दाम लागि रहल अछि। पैघ अवधिक बिजली खरीदक समझौता सेहो कयल गेल अछि। एकर अंतर्गत तिलैया स्थित रिलांयंस पावरक मेगा थर्मल पावर प्रोजेक्ट सॅ बिजली खरीदक निर्णय लेल गेल अछि आ लातेहार स्थित एस्सा पावरक निर्माणाधीन बिजली घर सॅ 1000 मेगावाट बिजलीक खरीद कयल जायत। प्रदेशक कारोबारी बिजलीक क्षेत्र मे सरकार द्वारा कयल जा रहल प्रयास सॅ खुश छथि। हालाकि किछु कारोबारी बिहार राज्य विद्युत बोर्डक पारेषण क्षमता पर प्रश्न चिन्ह ठाढ़ कऽ रहल छथि। पटना मे पसरत हीराक चमक
देश मे हीराक तराशीक पैघ उद्योग अछि जे एखन धरि महाराष्ट्र आ गुजरात मे केन्द्रित अछि। एहि उद्योग मे पैघ संख्या मे बिहारी मजदूर कार्य रतहऽथि। बिहार सरकार आब राजधानी पटना के सेहो हीरा तराशबाक केन्द्रक रूप मे विकसित करबाक तैयारी मे लागि गेल अछि। सरकार एहि प्रयासक सकारात्मक परिणाम सेहो सोझा आबि रहल अछि आ निवेशक सेहो सरकारक एहि प्रयास केऽ मूर्त रूप देबाक लेल सोझा अपलनि अछि। जनवरी मास मे सम्पन्न प्रवासी भारतीय सम्मेलनक दरमियान किछु निवेशक निवेश करबाक इच्छा व्यक्त कयने छलाह। सरकार लगातार हुनक सम्पर्क मे अछि। एहि क्रम मे मुम्बईक श्रीनुज प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी के पाटलिपुत्रा औद्योगिक क्षेत्र मे जमीन उपलब्ध कराओल गेल अछि। ई कम्पनी नवम्बर मास सॅ कारखाना बनायब प्रारंभ करत। कम्पनी सूत्रक अनुसार ई कारखाना गोटेक दू वर्ष मेब नि कऽ तैयार भऽ जायत। सरकारक पटनाक लग-पासक क्षेत्र मे डायमंड कटिंग सेंटर स्थापित करबाक योजना सेहो बनौलक अछि। सरकारी सूत्र जनतब देलक अछि जे ज्यों एहि क्षेत्र मे बेसी निवेशक रूचि देखौलनि तऽ सरकार डायमंड कटिंग सेंटर स्थापित कऽ सकैत अछि। पटनाक लग-पास मे जमीनक कोनो दिक्कत नहि होयत आ सभ आवश्यक बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराओल जायत। प्रदेश मे हीरा तराशीक कारखाना खोलबाक लेल आगा आयल श्रीनुज प्राइवेट लिमिटेडक प्रवक्ता जनौलनि जे ई निर्णय सोच-विचारि कऽ लेल गेल अछि। एहि कारोबारक पारम्परिक केन्द्र गुजरात आ महाराष्ट्र अछि। एहि ठाम बेसी कारीगर आ श्रमिक बिहारक छथि। हीराक लेल प्रसिद्ध सूरत मे एहि क्षेत्र मे कार्यरत गोटेक तीस प्रतिशत श्रमिक बिहार छथि। पटना मे केन्द्र स्थापित भेलाक बाद एहि क्षेत्र मे कार्यरत प्रवासी बिहारी अपन घर आपस आबि एकताह आ हुनका रोजगारक नीक अवसर भेटि सकत। कम्पनीक प्रवक्ता जनौलनि जे एहि विषय मे पछिला दू वर्ष सॅ विशेषज्ञ सभ सॅ रायक बाद कम्पनी एहि योजना के अंतिम रूप देलक अछि। बिहार गहनाक पैघ बजारक रूपम े विकसित भऽ रहल अछि आ एहि ठाम कुशल श्रमिक सेहो छथि। गहनाक मांग बढ़त तें एहि ठाम कारखाना लगायब लाभदायक होयत। निगरानी विभागक लेल बनि रहल विशिष्ट संवर्ग प्रदेश मे भ्रष्टाचार पर पूरा तरहे रोक लगैबाक लेल निगरानी विभाग मे फराक सॅ सवर्ग गठित कयल जा रहल अछि। एहि विशिष्ट संवर्गक अधिकारी कें सीधा नियुक्त कयल जायता सरकार एहि वास्ते बिहार अन्वेषण संवर्ग नियमावली 2012 केऽ स्वीकृति दऽ देलक अछि। एकर अंतर्गत निगरानी अन्वेषण ब्यूरो आ विशेष निगरानी इकाईक अंतर्गत एकटा विशिष्ट संवर्ग तैयार कयल जायत। ई स्वतंत्र रूप सॅ काज करत। एकर पदाधिकारी के निगरानी विभाग सॅ बाहर स्थानांन्तरित नहि कयल जा सकत। एहि संवर्ग मे पुलिस उपाधीक्षकक 43 पद, पुलिस अधीक्षक स्तरक 13 पद आ पुलिस अवर निरीक्षक 21 पद होयत। बिहार मे निवेशक इच्छा जनौलक रैनबैक्सी देशक प्रसिद्ध दवाई कम्पन रैनबैक्सी लेबोरेट्रीज बिहार मे दवाईक कारखाना लगैबाक योजना बनौलक अछि। कम्पनी ई निवेश जनेरिक दवाई बनैबाक लेल करत। कम्पनी एहि वास्ते सरकार सॅ किछु मदतिक इच्छा जनौलक अछि। कम्पनीक वैश्विक दवाई कारोबारक अध्यक्ष राजीव गुलाटी जनौलनि अछि जे प्रदेश मे पछिला किछु वर्ष मे तेजी सॅ विकास भेल अछि। देशभरि मे तेजी सॅ विकास कऽ रहल बिहार मे पैघ अवसर अछि। ओ कहलनि जे कम्पनी जनेरिटक दवाईक बेसी सॅ बेसी प्रचार-प्रसार करऽ चाहैत अछि। बिहार सरकारक जेनेरिक दवाईक बढ़ावा देबाक प्रयासक नीक परिणाम सोझा आओत। एहि लेल सरकार सॅ जमीन आ बिजली सन जमीनी सुविधाक मदति भेटबाक आशा अछि। प्रदेश मे सुपर स्पेशलिटि अस्पताल पर सरकारक जोरक विषय मे श्री गुलाटी कहलनि जे एखन अस्पतालक लाभ समाजक उच्च वर्गक धरि सीमित रहैत अछि। सरकार के एखन जमीनक स्तर पर स्वास्थ्य सेवा के बढ़ैबा पर काज करबाक चाही। प्रदेश पैघ आबादी एखनो गरीबी रेखा सॅ नीचा अछि। एहि वर्ग के स्वास्थ्य सेवाक बेसी आवश्यकता अछि। ओ कहलनि जे देश भरि मे एखन गोटेक बीस हजार सॅ बेसी दवाई कम्पनी अछि मुदा देश मे नीक आ सस्त दवाईक पैघ आभाव अछि। एखनो पचास प्रतिशत आबादी धरि दवाई नहि पहूचि रहल अछि। तें राज्य सरकार सभ के एहि दिस डेग उठैबाक चाही। ज्यों बिहार सरकार एहि दिस डेग उठौलक आ कम्पनीक संग काज करबाक लेल तैयार भेल तऽ एहि मे कोनो परेशानी नहि होएत। राजदेव मण्डल जगदीश प्रसाद मण्डलक कविता संग्रह: राति-दिन मैथिलीक नव कविताक निरन्तर विकास भऽ रहल अछि। श्री जगदीश प्रसाद मण्डल पूर्ण निष्ठा आ तल्लीनताक संग ऐ विकास कर्ममे संलग्न छथि। आ तेकर प्रतिफल सम्मुख अछि- कविता पोथी- राति-दिन। ऐ पोथीमे 52 गोट कविता संकलित अछि। कविता भाव, बुधि कल्पना आर शैलीक समन्वित परिणाम थीक। ऐ गुण आदिसँ अलंकृत मानस सृजनक गम्भीर, सचेत प्रक्रियासँ संचालित भऽ सकैत अछि। तइ कारणे कवि अत्यधिक सवेंदनशील होइत अछि। हरेक कालावधिमे मनुखक अन्तसमे अभीप्सा पालित-पोषित होइत रहै छै आ ओइपर जखन तुषारापात होइ छै तँ जन मानस आन्तरिक वेदनासँ भरि जाइत छै। मोह भंग भऽ जाइत छै। बेकतीक अन्तसँ उपजै छै। विद्रोह, कंुठा, आक्रोश, संत्रास, क्षुब्धता, आत्म रक्षाक सबालादि। अही सबहक अभिव्यक्ति मैथिलीक नव कविता थीक। मण्डलजी सन सवेंदनशील कवि जे ऐ यथार्थकेँ भोगने छथि से केना चुप्प रहि सकैत छथि। हुनका लेखनीसँ तँ संघर्षक स्वर निकलबे करतैक। “जिनगीक होइत संघर्ष। सीमा बीच जखन अबैत मचबए लगैत दुर-घर्ष। घर्ष-दुरघर्ष बीच जखन जिनगी करए रस्सा-कस्सी। बीच समुद्र सिरजि मथान पकड़ए लगैत अपन-अपन रस्सी।” (संघर्ष) कवि अखण्ड राज भोगी सभपर व्यंग्य प्रहार करैत कहैत छथि- “मुसक खुनल बील पकड़ि नाग-नागिन कहबए लगैए। नागे तँ धरती टेकने छै अखण्ड राज भोगै छै।” (मानव गुण) किछु लोक बहुरूपिया बनल अछि। हरेक क्षण गिरगिट जकाँ रंग बदलैत रहैत अछि। समाजकेँ दिशा भ्रमित करैत अछि। ऐ सम्बन्धमे कविक उक्ति अछि- “गिरगिटिया मनुक्खो तहिना दिन-राति बदलैत चलैए गीरगिटेक जहर सिरजि-सिरजि बीख उगलैत चलैए। भेद-कुभेद मर्म बिनु बुझने देखा-देखी ओढ़ैत चलैए ओढ़ि-ओढ़ि ओझरा-पोझरा डुबकुनिया काटि मरैए।” (घोड़ मन, भाग-२) मनुखक रीत-नीत आ बेवहारमे कतेक परिवर्त्तन भऽ गेलैक अछि। बदलैत जुग-जमानापर हिनकर कहब छन्हि- “जुग बदलल जमाना बदलल बदलि गेल सभ रीति-बेवहार। चालि-ढालि सेहो बदलि गेल बदलि गेल सभ आचार-विचार। मुदा, राति-दिन एको ने बदलल नै बदलल चान, सूर्ज, अकास। पूरबा-पछबा सेहो ने बदलल नै बदलल जिनगीक बिसवास।” (जुग बदलल जमाना बदलल) अंग्रेजी भाषापर शब्दक प्रहार करैत कहैत छथि- “अंग्रेजी पढ़ि अंग्रेजिया बनि-बनि पप्पा-मम्मी आनत घर। बाप-दादाक कि भेद ओ बुझत अड़ि-अड़ि बाजत निडर।” (घरक लोटिया बुड़ले अछि) समाजक रूप वर्णन ऐ पाँतिसँ लक्षित भऽ रहल अछि- “अगम-अथाह रूप समाजक असथिर भऽ सागर कहबैए। बर्खा बुन्नी बीच-बीच ओला-पाथर बरिसा दइए। पबिते पाबि पृथ्वी पसरि धरिया-चालि धड़ए लगैए। उट्ठी-बैसी खेल खेलैत मोइन-धार बनबए लगैए। टूक सुपारी समाज कटि-कटि टुकड़ी जाति बनल छै।” (अपनेपर) नव बिम्वक प्रयोग संवेदनशीलता आ मार्मिकताकेँ संगे होएबाक चाही। आ से मण्डल जीक कवितामे विषयक अनुरूप बिम्बक प्रयोग भेल अछि। “झिलहोरि झील खेलाइत रश्मि आकर्षित-आकर्षण करैए। प्रेमास्पद पबिते पाबि प्रेम-प्रेमी कहबए लगैए। पाबि प्रेमी प्रेमी जखन सागर गंगा मिलए चाहैए। बॉसक पुल बना समुद्र गंगा-सागर स्नान करैए।” (शील) “अजस्र धार भवसार सजल छै। नाओं एक खाली पड़ल छै।” (संघर्ष) स्थितिक अनुकूल बिम्ब, नव उपमान, प्रतीक नव कविताक लेल साधन मानल गेल अछि। आ से ऐ संग्रहक सभ कवितामे परिलक्षित भऽ रहल अछि। “जहिना धरती अकास बीच गाछ-विरीछ लहलह करैत। तहिना विवेक विचार संग सदि हँसि-गाबि कहैत।” (प्रिय) मण्डलजी प्रिय कवितामे शैली आ भाषाक सम्बन्धमे कहने छथि- “सम्पन्न शब्द, शैली सम्पन्न शब्द कोष सिरजए लगै छै। जड़ि-छीप पकड़ि भाषाक संसार-साहित्य गढ़ए लगै छै।” रातिक अवसान भेलापर दिनक आगमन निश्चिते होइत अछि। जे कटुसत्य अछि। राति-दिन सर्वजन परिचित शब्द अछि। शब्दमे व्यापकता सेहो अछि। राति-दिन कविता संग्रहक शीर्षक अनुकूल अछि। कविता सबहक भाव, विषय, उद्देश्य इत्यादि ऐ शीर्षकमे छिपल अछि। साँझ-भोर कवितामे कविक कथन उजागर भेल अछि- “केकरो साँझ केकरो भाेर छी केकरो उदय केकरो अस्त छी। दिनक अस्त साँझ अगर छी राइतिक तँ उदये छी। बारहे घंटा दिनो चलै छै ततबे टा ने राइतियो होइ छै।” पुरान ठाठ आ खूँटा विछिन्न भऽ रहल छै। नवका-नवका जिनगीक खूँटा आ घर ठाठ करए पड़तै। तँए कवि “चेतन चाचा” कविताक माध्यमे कहने छथि जे ई काल चेतबाक थिक- “चेत-चेत चलू चेतन चाचा सरसड़ाइत समए ससरैए। समए छोड़ि कतबाहि जखने ठहकि-ठहकि नक्षत्र कहैए। आगू डेग उठबैसँ पहिने चारू दिशा देखैत चलू। चारू कोण ठेकना-ठेकना आगू डेग बढ़बैत चलू।” तँए जिनगीमे सीखबाक उपक्रम होएबाक चाही। बिनु सीखने किछु नै भऽ सकैत अछि। “जिनगीमे किछु करब सीखू जिनगीमे किछु लड़ब सीखू। सभ जनै छी, सभ देखै छी अज्ञान-अबोध बनि-बनि अबै छी। सज्ञान-सुबोध तखने बनब संघर्षक बाट जिनगी धड़ब।” (किछु सीखू किछु करू) “मुँहक झालि” कवितामे कवि ललकारि कऽ कहि रहल छथि- “मुँहक झालि बजौने कि हएत, काजक झालि बजबए पड़त। फोकला-खाख अन्ने की सुभर दाना उपजबए पड़त।” कहबाक तातपर्य ई अछि जे सिरिफ गाल बजौने किछु नै होएत। कर्म करै पड़त। जइसँ देस-दुनियाँक कल्याण संभव भऽ सकत। तँए कर्मशील होएब परमावश्यक अछि। तखने अपन इतिहास लिखि सकैत छी। “कर्मक स्वरलहरी सीखू अपन इतिहास अपने हाथसँ स्वार्णाक्षरमे लिखनाइ सीखू।” अपन इतिहास अपनेसँ सृजन करब बहुत कठिन कर्म अछि। ऐ लेल सतत कर्म आ वश्वास चाही तखनहि संभव भऽ सकैत अछि। हम अज्ञ छी तथापि एतबा धरि जरूर कहब जे प्रस्तुत “राति-दिन” पोथीमे बोधक अनुकूल नव बिम्ब, प्रतीक, नव उपमान इत्यादिक प्रयोग भेल अछि। भाषा-शैलीमे आंचलिकता अछि। मिथिलांचलक गंध समाहित अछि। सुधी पाठकगण स्वागत करताह। आ संगहि नवाकुंरक लेल पाथेय बनत। २ डॉ. धनाकर ठाकुर समीक्षा: फूल तितली आ तुलबुल (लेखक- श्री सियाराम झा सरस) ३.६.२०१२क श्री सियाराम झा 'सरस'क पोथी ‘फूल तितली आ तुलबुल’क लोकार्पण रांचीमे भेलन्हि जाहिमे श्रीरमणजी, पटना मुख्य अतिथि छलाह। पोथी बै नी आ ह पि ना ला -१ यानी सतरंगी इन्द्रधनुषक रंगक जकां आबयबला सात कड़ीमे ई प्रथम अछि तकर विशेष संकेत पृष्ठ ४८मे (बाबा दिनकरमे पनिबोडा गीतके भीतर सातो रंग फरिछा देबाक छल). पोथीक अनेक पन्ना रंगीन अछि , बालोपयोगी अछि आ संस्कारवर्धक (पृ. २०मे अंटी-बँटी नहि कहू), आ ज्ञानवर्धक प्रायः सब पन्ना अछि जेना दिनक नाम(पृ. ३८), गाडीक प्रकार(पृ. ३९-४०), बापूक चरखा, सचिन, धोनी, विद्यापति, मंडेला, आवश्यकता आ आविष्कारमे मेट्रो रेलसँ मिसाइल कंप्यूटर तक, टाकाक लाथे (पृ.४२-४३मे) रूपाक नव निशान, खेल-खेलमे(पृ.४४-४५) कुश्तीस ओलम्पिक तक. विज्ञान लेखकक प्रिय विषय अछि (पृ.१८-१९,बिजली रानीमे पवन बिजली तकके चर्चा अछि संगही मिथिला-मैथिलीस प्रेमवर्धक (नेनाक मायस पृ. ६-७ मे नीक बात कहल गेल अछि जे मैथिली बाजय पढयबला सेहो नीक पद पर पहुँचैत अछि), मिथिलाक्षरहूँ अछि अंतमे. मिथिलाक एक नक्शा कतहु रहितय से नीक (अगिला कड़ीमे देल जाय), खेल -खेलमे सेहो राम, कृष्णक चर्चा(पृ. ४४-४५), जगदीशचन्द्र बसुक हँसैत-कनैत गाछक रूपमे ऋतु वर्णन(पृ.४९), सागरक वैविध्य वर्णन(पृ.६३-६४), विज्ञान प्रश्नोत्तरी(पृ. ६८), आविष्कारक माय आवश्यकता(पृ ७२) मे भारतक अंक- शून्यक अवदान आदि. म स मिथिला आर लेखक क गाम मेहथसँ आर की की नै ( पृ.६५)- एक कड़ी एहिना अ, आ सँ ज्ञ तक बनायल जा सकैत छैक बच्चाके अपन संस्कृतिक ज्ञान दैत. सब पन्ना सचित्र अछि ताकि नेना बुझि सकय अधिकाश गीत गेय अछि लगैत अछि बालोपयोगी जानि बहुत ठाम व्याकरणक नियम पालन नै भेल - जेना पोथीक नाममे फूलक बाद अल्पविराम (कोमा) बच्चा चुलबुलक नामके नेना भुटकाक उच्चारण तुलबुल आ एहेन अनेक ठाम (पृ.१४,.... ) बालक -बालिकाक जे चित्र मुखपृष्ठ पर देखावल गेल अछि ओहिमे कोनो गामक नहि, शहरीआ विकासकक परिचायक (पृ.२४) जखन की गामक चीज पर बहुत चर्चा अछि -चेत कबड्डी(पृ.५०), सोचु, सोचु(पृ.५१)मे किसानक महिमा) आ पर्यावरण(पृ.१२,२२,२३),आ रंगीन आर्ट पेपर पार्क फूलआ तितली, टून मून रे क जंतु संसार छपर छैयांक पनिबोडाक रंग, गाछ रोपिह फलदार, दादा-दादीक रोपल गुलाबक फूल(?) आ आन फूल पर बहुत चर्चा अछि, सौरमंडल , दुतियाक चान, (पृ.२५)क चुन्मुनी, २६, २७, २९ क आम, पृ.३३क बगुला, पृ.३५क फूलवती, बाबा दिनकर, ई धरती, सागरक संपदा, धरतीक सिगार चिडी-चुन्मुनी, गीध जकां दुर्लभ चिड़ी के बचबयके आग्रह, जाडक रौद, ऋतू वर्णनमे गाछ (पृ.४९), गाछ रोपीह (पृ.५७), सागरक सैर (पृ.६३),चिंता कचड़ास बचाब जल-नभ-स्थलके(पृ.६६), कछ्मछी(पृ.६७). एही लेल आ स्वतंत्रता हेतु, बाबा पोता गीत(पृ. ७१) मे अछि पर्यवरण, जल जीवन अछि (पृ.७६-७७ )मे जल संचय आ जल छाजनक बात अछि,बाघ मारक विरोध(पृ. ७९-८०) आदि. मुदा 'हैप्पी बल्थ डे'(पृ.१४)आआर्ट पेपर पर पर सेहो शुभ जन्मदिन आ तहिना दू-ददू बेर हैप्पी दिवाली आ हुक्का लोली(पृ.५४मे) मुदा भरदुतिया आ होली नहि भेटल जे सबस अधिक प्रिय बच्चाके स्वास्थ्य संबंधी नीक जानकारी(पृ.१५) संतुलित आहार (पृ.५५) नीक अछि जे नून आ चीनी कम खेबाक अछि आ फल फूल साग खेबाक आ पौष्टिक आहारक (पृ.१५,) मुदा टाफी चर्चा नै रहितय त नीक (पृ.२८), आमा माइक पेटारीमे (पृ.५२) ग्रामीण नुश्खा मे तुलसी, नेबो आदि ठीक मुदा धात्री फलं सदा पथ्यम नै देखल . संस्कार लेल अनेक बात अछि ((पृ.१६,३४) नब जटा - जटीन, विद्यार्थीक पञ्च लक्षणक सचित्र विवरण(पृ.५९), सर-कुटुम (पृ.४८), सीखक लेल भीख(पृ.८२), बालश्रमक विरोध(पृ.८३) ई ठीक बात नै . समाजक बिविध भागक जानकारी लेल मुस्लिम लेल अलीखान (पृ.६०), कारीगर (पृ. ६१-६२), राहुलक माता यशोधरास प्रश्न मार्मिक अछि (पृ.६९ )पिताजी कत गेलाह? आखर यागक धुआं मे शिक्षाक महत्ता अछि (पृ. ७०), मूलमंत्र(पृ. ७३-७४मे) सत्यनिष्ठा, समर्पणस गांधी, सचिन, कलाम बनक गाथा चिरई,चुट्टी, मूसक सतत कर्म जकां. भारत भक्तिक संग संगीतक वर्णन (पृ.७७), प्रकृति चित्रण अछि(पृ. ७८) आबी गेले अलेदाले भोर आ अनेक बालसुलभ गीत यथा (पृ.८१), अनेक सुधार अगिला संस्करणमे संभव अछि- बै नी आ ह पि ना ला क मैथिली पूरा रूप देनाई नीक जे केवल पीअ र लेल लिखी देलासँ भयजाइत (पि नहि) पृ.९- 'मात्रा के यात्रा' नहि 'मात्रक यात्रा'मे (आ तहिना बाबाक अंगुरी (पृ. ८१) 'बाबा के अंगुरी' क जगह), दीर्घे कीस दादीजी नीक रहैत -(स्कूलमे आब मिस पढ्बैत छथि दीदी कहाँ ?) पृ.१० एम् एल अ क उदहारण सटीक नै पृ.११- चटापटा शब्द ? पृ.४७- 'बड़े- बड़े' सपनामे, पृ.६३ सागरक 'सैर' मे हिन्दीक छाप अछि ( से आन अनेक आनो ठाम अछि) पृ.१२- स्कूलमे जाईबला बच्चा लेल हाती आ एहिना सब शब्द कियैक- या त नर्सरीक बच्चा लेल केवल अलग अध्याय हो (बादक बच्चा लेल ई अनुपयोगी गलत उच्चारण सीखबयबला जेना बिरस्पति(पृ. ३८) ? पृ. ३८- ६० अलीखानक इम्तिहान छनि त हुनक पिताजी नै अब्बाके आबक छल आ मायके नै अम्मीके आ तपक हुनका प्रयोजन? एहिना बहुत ठाम ध्यान राखी जे कोनो किताबक पाठकवर्गक आयु यदि तय अछि तखनहु ओकर विशेष आयु वर्ग लेल चीज बाँटल होयबाक चाही इन्द्रधनुषक सात रंग नै सात वर्ष तकके बच्चा लेल पोथी हर वर्ष लेल अलग अध्यायमे रहक छल आ जाहीमे पहिल माय लेल दोसर तुलबुल लेल आ एहिना होइत पांचम छठम लेल लिखैत काल शंकरक 'अपूर्णे पंचमे वर्षे.' जरूर याद राखक चाही - कार्यक्रममे गीतके प्रस्तुत करयबला जे बालक-बालिका छलथि ओहिमे अधिकांश शुद्ध उच्चारण कय सकयबला आयुवर्गक छलथि (पृ. ३०, ३१, ३७) ई ध्यान रखैत अध्यायभाजन अगिला कड़ीमे जरूर हो. लगैत अछि एतेक परिश्रमसँ तैयार किताबक ठीक सम्पादन नहि कयल गेल आ जे कियो सरसक गीतक प्रशंसक छलाह ओ सब एकर गीत बेर-बेर सुनि-सुनिकय सेहो केवल नीक -नीक बात बजयबला मुदा समाजमे स्वस्थ आलोचकक सेहो कमी नै पोथी लेखक सरस भनही दादा नहि भेलाह अछि (जे बादमे बात केला पर मालूम भेल) हमरा लागी रहल छल जे ई सरस ककाक(पृ.५ )नहि सरस दादाक उपहार अछि नेना भुटका लेल जे अनेक ठाम आयल अछि - बाबा, पोता संवाद(पृ. ७१), बाबाक अंगुरी (पृ. ८१) ('बाबा के अंगुरी' नहि). ८४ पृष्ठ + २४ आर्ट पृष्ठ पोथीक मूल्य १०१ रूपा अधिक नै अछि (जे कियो २०० रूपा राखि सकैत छल)- सरसजीक संपर्क – 9931346334, 0651-2560786 (NOTE-टाकाक जगह बेगुसरायक रूपा लिखब हमरा नीक लगैत अछि जे रानी विक्टोरियाक चांदीक/ सिक्का/ रूपा चाल जाहीस एक टाका बनल अछि) कैलास दास म्याराथन दौड़ आ जनकपुर जनकपुरक रंगभूमी मैदानमे शनिदिन भेल म्याराथन दौड़ प्रतियोगिता एखन धरिक ऐतिहासिक आ प्रथम रहल अछि । आयोजकक अनुसार एहि प्रतियोगितामे २० देशक सहभागीक आमन्त्रण कएल गेल छल । मुदा १८ देशक खेलाडी सभक भीसा पास नहि भेलाक कारण भारत आ नेपालक ७५ जिल्लाक एहि प्रतियोगितामे मात्र सहभागी भऽ सकल । ओना जनकपुरक लेल बहुत पैघ प्रतियोगिता छल । आयोजकक अनुसार चारि महिना पहिले सँ एकर तैयारी भऽ रहल छल । मुदा शनिदिन प्रतियोगिताक सफलता भेटल । स्थानीयवासीसभ म्याराथनक खेलाडी सभकँे सडक पर दौड़ देखि कऽ ताली बजा स्वागत कएने छलथि । भोरे सँ नगरक सफाई सँगहि पुुलिस, ट्राफिक आ एहिमे खटल स्वयं सेवक सभ व्यवस्थित करएमे जुटल छल । म्याराथन प्रतियोगिता तीन चरणमे बाटल गेल छल । फुल म्यराथन, मिनी म्याराथन आ भेन्ट्रान्स म्याराथन । मिनी म्यराथनमे खास कऽ जनकपुरक स्कुल सभक धियापुता सभक सहभागीता छल । भेन्ट्रान्स प्रतियोगितामे ४० वर्ष उमेरक व्यक्ति सभक सहभागिता छल आ फुल म्याराथनमे नेपाल भारत सँ आएल खेलाडी सभक सहभागिता छल । फुल म्याराथन प्रतियोगिता ४२ किलोमिटरक धरि छल । जनकपुरक रंगभूमि मैदान सँ प्रारम्भ भेल दौड़ ढल्केवर पहुँच कऽ फेर सँ जनकपुर आएल छल । मिनी म्यराथन प्रतियोगिता जनकपुरक रिङ्ग रोड कायम कएने छल । ई दौड देखबाक लेल नगर भितर स्थानीयवासी सभक भीड छल तऽ जनकपुर ढल्केवर सडकखण्डमे पुलिस स्वयं सवेक मात्र नहि एहि क्षेत्रक ग्रामीण जनता सभ उत्साह पूर्वक सडकक कातमे ठाढ़ भऽ खेलाडी सभकेँ ताली बजा कऽ स्वगत कएने छल । बीच बीचमे खेलाडी सभक लेल पानिकँे सेहो व्यवस्था छल । फुल म्याराथनमे प्रथम होबएवलाकँे ५० हजार, दोसर होबएवला २५ हजार आ तेसर होबएवला १० हजार पुरस्कार देल गेल अछि । तहिना मिनी म्याराथनमे प्रथम होबएवलाके १० हजार, दोसर होबएवलाके ५ हजार आ तेसर होबएवलाके ३ हजारक पुरस्कार देल गेल अछि । भेन्ट्रान्स म्याराथन विजेताक लेल प्रमाणपत्र देल गेल अछि । कोनो खेलाडीक लेल पुरस्कार सँ महत्वपूर्ण हुनक प्रतिभा पर देश आ समाज गौरवान्वित होइत अछि । शनिदिन भारत आ नेपाल बीच भेल खेलमे नेपाली खेलाडी मात्र विजयी भऽ सकल अछि । एहि सँ अनुमान लगाओल जा सकैया जे एखनो नेपालक मधेशमे भावी खेलाडी सभ अछि । मुदा हुनका सभक अवसर नहि भेटलाक कारण ओ सभ अपन प्रतिभा देखाबए सँ वञ्चित होइत आएल छथि । स्वास्थ्यए जीवन अछि आ स्वस्थ्य रहबाक लेल खेलकुदक विकास आवश्यक अछि । एकटा कहावत अछि जे जतए कला सँस्कृति आ खेलक विकास होइत अछि ओतए पूर्ण स्वास्थ्य वातावरणक विकास होइत अछि । तएँ कहल जाए तऽ म्याराथन प्रतियोगिता सँ एतुका धियापुताकँे मात्र नहि सम्पूर्ण नगरवासीक लेल गौरवक विषय छल । एहिमे सहयोग करएवला सभक धन्यवाद आवश्य देबहेटा पड़त । म्याराथन प्रतियोगिता जाहि रुप सँ व्यवस्थित होएवाक चाहि ओ तऽ नहि भेल मुदा आयोजकक प्रयासकँे सेहो धन्यवाद देबहे पड़त । शनिदिन ऐतिहासिक धरोहर रंगभूमि मैदानमे खेलाडी सभक उत्साह आ उमंग सँ खचाखच भडल छल । खास कऽ कहल जाए तऽ स्थानीय बालबालिका जखन दौड रहल छल ओकरा पाछू हुनक अभिभावक सेहो देखिकऽ बड खुशी व्यक्त करैत छल कि जीत मात्र सफलता नहि होइत अछि । कम्तिमे एहि प्रतियोगितामे भाग लेबाक लेल अवसर तऽ भेटल । मिनी म्याराथन प्रतियोगिताक सहभागी विद्यार्थी सभक अखन धरि किताब आ टिवीमे मात्र देखि कऽ कल्पना कएने होइतो मुदा शनिदिन जखन स्वयं सहभागी भेल तऽ हुनका सभक एकटा सिख भेटलन्हि जे हमहँु सभ आबएवला दिनमे जीतक सफलताक प्रयास करी । ई प्रतियोगिता सँ जनकपुर धार्मिक पर्यटकीय सँगहि खेलकुदक एकटा भूमि सेहो अछि सन्देश दऽ रहल अछि । ओना एहि प्रतियोगिताक सफलतामे साथ देने सम्पूर्ण युवा क्लव, संघ संस्था सहितक व्यक्ति सभक धन्यवाद नहि एहि सँ पैघ काज करवाक उम्मिद रखवाक अपेक्षा करैत छी ।
अंगना सुखल घरमे पानि 'अंगना सुखल, घरमे पानि, भरि बर्खा उपछु पानि ।' एकर मतलव स्पष्ट रुपे सभ किओ बुझि गेल होएब जे वर्षा होइते नगरमे रहयवाला सभकेँ कतेक सुख आ कतेक आनन्द अबैत अछि । आनन्दक मतलब सडक पर गंगा जमुना जेकाँ पानिक धार बहैत रहैत अछि आ लोक सभ मोटरसाइकिल, साइकिल, जीपकार चला-चला कऽ आनन्द लैत रहैत अछि । ओतबे नै, बौआ बुच्ची सभ पानिक आनन्द अओर बेसीए लैत रहैत अछि। ओ सभ अपन दुर्दशा बिसरि जाइत अछि, पानिमे खेलबाक क्षणमे । ओतबे कहाँ, बुद्धिजीवी सभ सडकक दुनू कात बड आनन्द पूर्वक ठाढ. पानिक आनन्द उठबैत रहैत अछि । देखबामे अबैत अछि, सडक कातमे रहल दोकान सभमे पानि घुसल अछि । कोनो दोकानदार समान सभ निचाँ-उपर करएमे व्यस्त नजरि अबैत छथि तँ कोनो पानि उपछैत-उपछैत अपसिहात भेल रहैत छथि । ओइ समयमे ओ दृश्यकेँ कतेको गोटे मनोरञ्जनकेँ रुपमे लैति छथि तँ कतेको गोटे दु:ख व्यक्त करैत छथि। ओना वर्षा बन्द भेलाक बाद दू-चारि घण्टामे सडकक पानि बहि नदीमे चलिए जाइत अछि। मुदा घरमे पैसल पानि एकटा पोखरिक आकार लऽ कऽ दू चारि दिन धरि घर विहीन कऽ दैत अछि । जिनकर बीस/पच्चीस वर्ष पुरान घर अछि, हुनका घर रहितो गाम घरसँ बेकार जीवन रहय लेल बाध्य कऽ दैत अछि। उपरसँ वर्षा आ निचा घरमे पोखरि जकाँ पानि । आखिर सोचियौ एकर दोषी के छथि? नगरमे रहयवाला लोक वा नगर विकासक सम्बन्धमे सोचएवाला बुद्धिजीवी, कर्मचारी अथवा नेपाल सरकार? कोनो नगर विकासक लेल एकटा कानून होइत अछि । आ ओइ कानूनक दायरामे रहि कऽ विकास करबाक दायित्व सभ गोटेकेँ होइत अछि । मुदा एहेन प्रावधान जनकपुरमे नै अछि । नहिये अखन धरि छलै । एकर नतीजा अछि 'अंगना सुखल घरमे पानि' । प्रत्येक वर्ष नयाँ घर बनैत अछि । पुरनका घर सँ दू चारि फिट उपर । नयाँ सडक बनैत अछि एक दू फिट उपर । एहने यदि बेरबेर होइत रहलैक तँ नगर भितर रहएबला कहियो शहरक अनुभूति नहिए कऽ सकैत अछि। घर निर्माणक लेल घरक ऊँचाइ, सड़क उचाइक मापदण्ड लाबही टा पड़तै । ओतबे नै आब बनयवाला घर शहरक अनुरुप होएबाक चाही तइपर सभ गोटेकेँ विचार करए पड़तैक । नै तँ जहिनाक तहिना। ई तँ वर्षाक समस्या भेल। गर्मीक समस्या सेहो किछु कम नै अछि। सड़कसँ आगि उगलैत रहैत अछि । बाटमे चलबाक ककरो हिम्मत नै होइत अछि । ओतबे कहाँ जनकपुरक प्राय: सभ कलक पानि सेहो सुखा जाइत अछि । जनकपुर धार्मिक पर्यटकीय स्थल मात्र नै अछि, र्इ एकटा मिथिलाक राजधानी सेहो अछि । धर्म संस्कृति, कला, भेषभूषा आ माता जानकीक जन्म स्थल। किन्तु शहरक जे संरचना होएबाक चाही, विकासक गति आ सोच होएबाक चाही से कोशो दूर पाछु अछि। जनकपुरमे आबि कऽ माता जानकीक दर्शन कएला सँ पर्यटक मात्र धन्य-धन्य नै हएत । पर्यटक लेल पर्यटकीय वातारणकेँ बनाबए पड़तै। पर्यटकक लेल मनोरञ्जनात्क, दार्शनिक, घुमफिर करयवाला शुद्ध वातावरण होएबाक चाही। पर्यटक सभ कोनो समय, मौसम, दिन, महिनामे आबि सकैत छथि । मुदा सोचियौ यदि पर्यटक चैत बैशाखक कडा धूपमे आबि जाए तँ हुनका सभक लेल कोनो पार्किङ्ग, आनन्द करयवाला स्थल, घुमफिर करयवाला बाटघाट नै अछि। कडा धूपमे एक ठाम सँ दोसर ठाम नै आबि जा सकैत छी । सडकपर नाक मुँह कपडासँ झाँपि कऽ चलए पडैत छैक । साउन भादबमे पर्यटक आएल तँ नै नाला आ नै सडकक पता लगा सकैत अछि । सभ गोटेकेँ जनकपुरक बात बुझल अछि मुदा सभक चुप्पी प्रश्न चिन्ह ठाढ. कऽ दैत अछि। जनकपुरक बुद्धिजीवी सभ जनकपुरक शहरीकरण आ धार्मिक पर्यटकीय स्थल बनेबाक लेल कतए हेरा गेल छथि। विचार विमर्श आ विकास दिस अग्रसर होबए लेल हुनका सभकेँ कोन गेठरीमे बान्हि देल गेल अछि से नै खुलि रहल अछि । एकटा कहावत छैक 'आवश्यकता अविष्कारक देन होइत अछि ।' तँए यदि जनकपुरक विकासक आवश्यकता बुझाइत अछि तँ जनताकेँ सडकपर आबहे पडतै । नै तँ 'अंगना सुखल, घरमे पानि, भरि बरखा उपछु पानि ।' महिलाक प्रेरक कथा संग्रह ‘जिद्दी’
समाजके परिपक्व, विकृति आ विसंगति रहित वातारणक निर्माणमे साहित्यके महत्वपूर्ण योगदान होइत अछि । हमरा एतेक भूमिका लिखएके पाछु मैथिली भाषाक युवा साहित्यकार एवं पत्रकार सुजीत कुमार झा तेसर कृति कथा संग्रह ‘जिद्दी’ पढ़लाक बाद लागल । हुनकाद्वारा लिखित कथा संग्रह ‘जिद्दी’मे १२ टा कथा राखल गेल अछि । ओना कथा लिखबाक काज गहन अध्ययन चिन्तन आ लम्बा समयक साधना बिना सम्भव नहि होइत अछि । मुदा कथा लिखैतकाल लेखककेँ लेखन समय सन्दर्भ, सामाजिक वातावरण आदी इत्यादिसभकेँ ध्यान देबए पड़ैत अछि । ताहिमे युवा पत्रकार तथा कथाकार सुजीतकुमार झा लगभग सफल देखल गेल छथि । ओ एकटा कथाकार मात्र नहि छथि, विभिन्न सञ्चारमाध्यममे काज कऽ कऽ अनुभव प्राप्त करवाक गन्ध एहि कथा संग्रहमे देखल गेल अछि । कथा संग्रह ‘जिद्दी’ मनोवैज्ञानिकढ़ङ्ग सँ सत्यक खोजी करैत अछि । प्रत्येक कथाकेँ एहिना बढाओल गेल अछि जे पाठक पढैत—पढैत आब आगा कि हएत कहैत आश्चर्यमे पड़ि जाइत अछि आ कथाक अन्त होइत अछि । डा. राजेन्द्र विमलक शब्दमे सुजीतक कथाक घटना परिघटना ज्यामितिय चित्र जेकाँ एक दोसरकेँ कटैत, ओझरबैत सोझरबैत आगा बढैत रहैत अछि । कथाक तीर सनसनाइत जाइत अछि आ अर्जूनक लक्ष्य भेद जेकाँ सुगाक आँखिमे मात्र भेदन करैत अछि । ‘फूल फुलाइए कऽ रहल’ कथा उच्च कुलशील, सुशिक्षिता नायिका पिंकी अन्तरद्वन्दमे फसल रहैत अछि । पिंकी एमए पास कएने अछि । बेटी कतबो पढल लिखल किए नहि होइक दोसरकेँ घरमे जाए पड़ैत छैक वएह बुझि बेटी बेसी पढाबएकेँ आवश्यकता ई समाज नहि बुझैत अछि । मुदा पिंकीक मायबाबु बेटा बेटी समान होइत अछि कहि एहि प्रथाकेँ तोडवाक प्रयास कऽ अपन बेटी पिंकीकेँ एमए धरि पढबैत अछि । जखन पिंकीक मायबाबु विवाहक लेल समतुल्य बरक खोजी करैत छथि तऽ लडका पक्षक अभिभावकसभ पिंकीक पढाइक महत्व नहि बुझि दहेज मांगैत अछि । पिंकीक मायबाबु मांग अनुसार दहेज नहि दऽ सकलापर पिंकीक विवाहक उमेर वितैत जाइत अछि । एक दिन पिंकीक बाबु रेल यात्रा कएने रहथि । ओहि क्रममे स्वजाति युवा सँ भेटघाट होइत अछि आ ओ लडका अपने सहायक स्टेशन मास्टर रहल परिचय दैत अछि । पिंकीक माय बाबु पिंकीक सम्बन्धक चर्चा ओ लडका सँग करैत अछि आ सहायक स्टेशन मास्टर रहल लडका ओ कथा स्वीकार करैत अछि । इम्हर पिंकी सेहो सहायक स्टेशन मास्टर सुनिकऽ अपने भाग्यमानी छी समझि हर्षित रहैत अछि आ विवाह सेहो होइत अछि । किछु महिनामे पिंकीकेँ सभ यथार्थ जानकारी भऽ जाइत अछि । जे लडका हुनका सँ सहायक स्टेशन मास्टर कहि कऽ विवाह कएने रहैत अछि अपन सम्पूर्ण समर्पण कएने रहैत अछि ओ लडका स्टेशन मास्टर नहि एकटा साधारण पैटमैन रहैत अछि । सुनलाक बाद पिंकी किछु समयक लेल क्षतविक्षत भऽ पागल जेकाँ करय लगैत अछि । ओकरा आँखि सँ निन्न गाएब भऽ जाइत अछि आ रात भरि सोचिते रहि जाइत अछि । पिंकी अपन मोनमे ठानि लैत अछि जे धोखेबाज लडका संग नहि रहब ? व्याकुल भऽ जाइत अछि । रातभरि ओ नहि सुतैत अछि । फेर भोर होइते सोचैत अछि आब हम कि करु ? सम्बन्ध विच्छेद कएलाक बाद कतए जाउ ? घरक लोकसभ कि कहत ? एहिमे मायबाबुक कि दोष ? धीरे–धीरे हिम्मत जुटा संकल्प लैत अछि केहनो भेलाक बादो अपन श्रीमानकेँ स्टेशन मास्टर बनाए कऽ छोडब । हुनक श्रीमान् एसएलसी धरि मात्र पढल रहैत अछि । हुनका क्याम्पसमे नाम एडमिशन करा अपनो एकटा बोर्डिङ्ग स्कुलमे नोकरी करय लगैत छथि । सात वर्षमे ओ श्रीमानकेँ एमए पास करबैत अछि तकरबाद हुनका स्टेशन मास्टरमे नियुक्त होइत अछि । सात वर्षमे हुनकासभकेँ एकटा बेटा सेहो होइत अछि । ई कथा पढलाक बाद काली दासक घटना स्मरण अबैत अछि । काली दासक सेहो प्रेरणाक स्रोत कनिए छल ।एहि कथामे सेहो करीब—करीब एहने संदेश रहल अछि । ‘नयाँ व्यापार’ कथामे रोगग्रस्त नायक जितेन्द्र प्रसाद आ महत्वकाँक्षी हुनक श्रीमती बीचक अवस्थाकेँ चित्रण कएल गेल अछि । अतिमहत्वाकाँक्षाक कारण लोक कतए चलि जाइत अछि से एहि कथामे देखाओल गेल अछि । तहिना तेसर कथा ‘खाली घर’मे परिवारिक जीवनमे होबएबला उथल—पुथलकेँ बढिया सँ चित्रण कएल गेल अछि । संगहि एकर निष्कर्ष परिवार संस्थाकेँ बढाओल गेल अछि । एहन कथा ‘आर्दश’मे सेहो अछि । विवाह संस्थाकेँ तोडला पर अन्ततः पछताए पडैत अछि । दुनू कथाक निष्कर्ष रहल अछि । ‘लाल किताब’ कथाक माध्यम सँ भुतप्रेतक बातकेँ देखाओल गेल अछि । विज्ञान कतए सँ कतए पहुँच गेलाक बादो भूतप्रेतक कथासभ आबि रहल अछि । ‘जिद्दी’ कथा एकटा महिलाक महत्वकांक्षा आ ओतए सँ उत्पन्न परिस्थितिकेँ देखाओल गेल अछि । अपने नहि कऽ सकल काज बेटीक माध्यम सँ कएल जा रहल अछि । एहि कारण माय बेटीकेँ हरेक इच्छा पुरा करैत अछि । ई हरेक इच्छा बेटी व्याभिचारिणी आ दुव्र्यसनी भऽ जाइत अछि । ‘निष्ठा की देखावा’ कथा आधुनिकताक नाममे देखल गेल बिकृति दिस संकेत कएने अछि । एक गोटे महिलाकेँ पति सँ बेसी पतिक मृत्युक बाद अपने कोना सुरक्षित रहब तकर चिन्ता रहैत अछि । वर्तमान समयमे समाज कतए चलि गेल आ ओकर नहि नीक अवस्थाकँे चित्रण कएल गेल अछि । ‘केहन सजाय’ कथा संग्रहक सभ सँ बढिया आ कमजोर दुनू अछि । जे कथ्य एहिमे उठाओल गेल अछि ओ गजबकँे अछि । मुदा एकर अन्तिम निष्कर्षकेँ कथाकार सुजीत सुकान्त बनेबाक प्रयासमे आगिकेँ ठण्डा कऽ देने छथि । ‘मेनका’ आ ‘जादु’ कथा सेहो बढिया अछि । समग्रमे कहल जाए तऽ सुजीत कुमार झाक कथाक विषय चयन, बनावट तथा भाषा शैली बढिया अछि । हुनक पहिल कथा संग्रह चिडैÞ सँ शुरु भेल यात्रा उडान भड़ि रहल संकेत दऽ रहल अछि । मुदा साहित्य साधनाक विषय अछि । जतेक साधना कएल जाए फल ओतक बढिया प्राप्त होइत अछि । तएँ साधनाकेँ निरन्तरता देबए पड़तन्हि । सुजीत कुमार झा मिथिला पेन्टिङ्गक विदेशमे मांग बढल -छत्तामे मिथिला पेन्टिड्ड मिथिला पेन्टिङ्गकेँ देश विदेशमे मांग भऽ रहल समयमे पेन्टिङ्ग व्यावसायीसभ नयाँ नयाँ चीजमे पेन्टिङ्ग बना कऽ बजारमे आनए लागल अछि । एहि क्रममे जनकपुरक नारी कला केन्द्र कुवा छत्तामे मिथिला पेन्टिङ्ग पारि बजारमे आनएकेँ तैयारी कऽ रहल अछि । केन्द्रक प्रमुख संतोष मिश्रक अनुसार जल्दीए अन्तराष्ट्रिय बजारमे मात्र नहि जनकपुर सहित सभ ठाम एहन छत्ता भेटत । साढे तीन सय रुपैया सँ साढे चारि सय रुपैयामे ओ छत्ता उपलब्ध हएत । नारी कला केन्द्रक मंजुला ठाकुरक नेतृत्वक कलाकार मिथिला पेन्टिङ्ग बला छत्ताकेँ आकृति देने छथि । केन्द्रक प्रमुख मिश्रक अनुसार छत्तामे मिथिला पेन्टिङ्ग राखएकेँ सल्लाह अष्ट्रेलियन नागरिक टोनी सेन्ड्रेस देने छलथि । हुनके सल्लाह अनुसार छत्तामे मिथिला पेन्टिङ्गक रुप देल गेल ओ कहलन्हि । मिथिला पेन्टिङ्ग बला छत्ता अमेरिकाक सन्ताफेमे होबएबला सांस्कृतिक प्रदर्शनीमे सेहो राखल जाएत । १९८९ ई. मे जनकपुर नगरपालिका १२ कुवामे स्थापित नारी कला केन्द्रमे मिथिला पेन्टिङ्ग सँ जुडल विभिन्न आकृतिसभ बनाओल जाइत अछि । जनकपुरमे बनल मिथिला पेन्टिङ्गकेँ अन्तराष्ट्रीय स्तरमे बहुत मांग रहल अछि । एहि ठाम नेपाली कागजमे मिथिला पेन्टिङ्ग, अएना, कप, सिलाई कढाई, सेरामिक्सक सामानसभ बनाओल जाइत अछि । अमेरिकी नागरिक क्लियर वर्कटद्वारा शुरु कएल गेल नारी कला केन्द्रकेँ एखन अष्ट्रेलियन दूतावास सहयोग कऽ रहल अछि । शत्रुधन प्रसाद साह मैथिली महिला आ जिद्दी
मैथिली भाषामे पुस्तक प्रकाशनक अभाब रहल समयमे युवा पत्रकार सुजीत कुमार झा मैथिली साहित्यक क्षेत्रमे एकटा नव आयामक रुपमे स्थापित भऽ रहल छथि । पत्रकारिता सन व्यस्त पेशा सँ जुड़ल अवस्थामे सेहो साहित्यक क्षेत्रमे सेहो डेग राखव अपने आपमे कम भारी बात नहि रहल अछि । ओतबे नहि तीन–तीन महिनामे पुस्तक प्रकाशन करवाक उद्घोष करव आ सफलता सेहो प्राप्त करब आजीगुजी बात नहि अछि । पहिल कथा संग्रह ‘चिडै’क माध्यम सँ मैथिली साहित्यमे प्रवेश कएने सुजीतक दोसर कृति ‘रिपोर्टर डायरी’ आ एकर किछुए दिनमे प्रकाशित भेल कथा संग्रह ‘जिद्दी’ सेहो ओतबे लोकप्रिय रहल अछि । जिद्दीक पहिल कथा “फुल फुलाइए कऽ रहल” कथामे मैथिली नारी संग भऽ रहल व्यवहारकँे प्रष्ट रुपमे देखाओल गेल अछि । एहि कथामे महिला संग हुनक पति झुठक नाटक कऽ विवाह करैत छथि मुदा पतिक वास्तविक अवस्था आ हैसियत देखलाक बाद कथाकँे नायिका अन्तरद्वन्द्वमे परैत अछि मुदा अन्तमे गम्भीर भऽ सोँचलाक बाद महत्वपुर्ण निर्णय लऽ हुनक पतिद्वारा देखल गेल सपनाकँे पुरा करय ओ सफल भेल छथि । ई कथा पढलाक बाद हमरा काली दास स्मरण आबि जाइत छथि । हुनको जीवनकेँ महत्वपूर्ण बनाबएमे हुनक पत्नीक महत्वपूर्ण भूमिका रहल अछि । मिथिलाञ्चलक कतेको व्यक्तिकेँ काली दास वनाबएमे एखनो हुनकर कनिया सहायक भऽ रहल अछि । तहिना ‘नव व्यापार’ कथामे रोगी पात्र जितेन्द्र प्रसाद आ आधुनिकताक फैशनमे डुबल कनिया बीचक अवस्थाकँे स्पष्ट चित्रण अछि । एहि कथाक माध्यम सँ परिवारिक कलह आ कथित आधुनिकता परिवारकेँ तहसनहस कऽ सकैत अछि तएँ परिवारमे मेलमिलापक वाताबरण होबए पर जोड देल गेल अछि । तेसर कथा ‘खाली घर’ परिवारिक जीवनमे होबयबला उतार चढाब आ उथल पुथलकेँ देखाओल गेल अछि । खाली घर कथामे परिवारिक जीवनक महत्व नीक जेकाँ कथाकार देखाबए सफल भेल छथि । जोशमे होस नहि गुमाबक चाही एहि कथाक संदेश अछि । ‘लाल किताव’ कथामे समाजक पुरान सोच आ भुतप्रेत प्रतिकँे विश्वासकँे सेहो देखौने छथि । मुदा सुजीतक कहबाक अन्दाज गजब अछि । जिद्दी कथामे एकटा महिलाक महत्वकाँक्षा आ ओहि सँ उत्पन्न होबयबला परिस्थितिक देखौने अछि । तएँ ओहिठाम हुनक माए अपन ईच्छाकेँ पुरा करय लेल बेटीकेँ आगा बढबैत छथि । अभिभावककेँ धियापुतापर नियन्त्रण आवश्यक अछि ई संदेश करिव करिव एहि कथापर लागु होइत अछि । मुदा कथाकार ई स्थिति महिलेपर किए चुनलथि से नहि बुझिसकलहुँ । ओ महिलाकेँ बेटाकेँ सेहो एहि घटनामे सहभागि करा सकैत छलथि । ‘निष्ठा की देखाबा’ कथा समाजमे आधुनिकताक नाममे पसरल विकृतिकँे नीक जेकाँ प्रस्तुत करय सफल भेल छथि । एहि ठाम महिलाक अपन पतिक मृत्यु सँ बेसी पतिक मृत्युक बाद कोना सुरक्षित आ नीक जेकाँ रहब ताही बातक चिन्ता रहैत छन्हि । तहिना ‘केहन सजाय’ कथा सेहो बहुत नीक अछि । एहि कथामे समाजमे रहल अपराधी सभ उपर होबए बला सजाय आ देशक कानुनी व्यवस्थाके देखावय खोजने अछि । तहिना ‘मेनका’ आ अन्य कथासभ सेहो एक पर एक रहल अछि । कोनो कथा आलोचना करय जेहन नहि अछि । सुजीतक कथा संग्रहमे रहल भाषा शैली, कथाक बनाबट बहुत नीक अछि आ आम मैथिली प्रेमी सभक लेल बहुत बेसी लोकप्रिय कथा संग्रह बनए से आशा करैत छी । ओना हमरा विश्वास तऽ अछिए । मैथिली भाषाक कितावक अभाब रहल समयमे आबि रहल सुजीतक कथा संग्रह सभ अहिना लोकप्रिय बनैत रहत से कामना अछि । एहि सँ मैथिली साहित्यप्रति युवा सभ प्रेरित तऽ हेबे करत संगहि मैथिली पाठककेँ संख्यामे सेहो बढोत्तरी हएत । सुजीतक चारिम कृतिक प्रतिक्षामे हमरा तऽ रहबे करत । लेखक खोज पत्रकारिता केन्द्र काठमाण्डू सँ आवद्ध छथि । विजय मस्त सुजीतक सम्पूर्ण कथा एकटा नया स्वाद देलक
की भेलै, मम्मी ? कोनो पहाड़ टूटि गेलै, कथिलाए दुखित छेँ । ककरो मृत्यु भऽ गेल छै । हम डाक्टर लग जाइत छी, एक घण्टाक बात अछि, बस्स सभ किछु नरमल । जिद्दी कथाक नायिका गिन्नीद्वारा वाजल गेल ई वाक्य आजुक आधुनिकताक नामपर सिगरेट, दारु आ यौन सम्बन्धके फैशन रुपमे अपना रहल मैथिल समाजक युवा युवतीक कथा व्यथाके कथाकार सुजीत कुमार झा वहुत सरल तरीकासँ प्रस्तुत कएने छथि । २०६९ साउनक अन्तिम सप्ताहमे बिमोचित पत्रकार आ साहित्यकार सुजीत झाजीक तेसर कृति जिद्दी कथा संग्रहक १२ गोट कथा हम बहुत रोचक आ जिज्ञासु भऽ पढलहुँ । ओना हुनक पहिल कृति चिडैं सेहो पढवाक अवसर भेटल छल, वहुत रोमान्चित लागल रहए । एकटा साहित्यके विद्यार्थीक नजरिसँ सुजीत जी मिथिला समाजमे व्याप्त पौराणिक परम्परासँ लऽकऽ आधुनिकताक छोट—छोट विषयसभके अपन कलमक माध्यमसँ सुसज्जित करयमे सफल छथि । यदि सुजीतजी अपन पाठकक विचारके सम्बोधन करैथि तऽ हमर ईच्छा अछि जे ओ अपन तेसर कृतिक लाल डायरी आ जिद्दी कथाके उपन्यासक रुपमे आगामी दिनमे रचना करथि । लाल डायरी आ जिद्दी पढैत काल हम कथामे एनाक डुवलहुँ जे एकर कथाक रुपमे अन्त हमरा दुःखीत कऽ देलक । ताहि कारणे ई प्रतिक्रिया लिखवाक लेल हम विवश भऽ गेलहूँ । ओ दूनु कथाक कथ्य गजब छल आ तहिना शिल्प । जिद्दी कथा संग्रहक पहिल कथा “फूल फुलाइएकऽ रहल” मे जाहि तरिकासँ नायिका अपना आगु आएल समस्याके समाधान कयलक अछि एहि समाजक महिलासभक लेल एकटा उपदेश अछि । दोसर कथा “नव व्यापार”क महिला क्लब आ साधनाके अपना परिवार मे रहिकऽ एतेक वेशी स्वतन्त्रता मैथिल समाजमे जूनि भेटैय । तहिना तेसर कथा “खाली घर” आई काल्हि अपनाके आधुनिक बुझनिहार महिला जिनका अपने निर्णयसँ पाछतावा हुए, ताहिके कथाकार चित्रण करएमे सफल भेल छथि । चारिम कथा “लाल डायरी” । मुदा जतेक सत्य अछि यादवजीकें मृत्यु १७ गते भेल अछि, ओतवे निर्र्विवाद सत्य अछि फागुन १८ गते सांझ हमरा घरपर यादवजीके आएब जेकर प्रमाण लाल डायरी अछि । वाक्य हमरा झकझोरि देलक आ लागल वास्तवमे आदमीके शरीरे मरैत अछि आत्मा नहि । विज्ञान युगमे सेहो एहिबात के एहसास कराओल गेल अछि । एकर प्रस्तुति एहिमे सजिवता आनि देने अछि । तहिना पांचम कथा जिद्दी प्रत्येक परिवारक माता पिताके अपना धियापुताक देलजाएवला स्वतन्त्रताके सँग—सँग हुनका प्रति आओर जिम्मेवारीक उपदेश दैत अछि । सुुजीतक जादूक ओ सामान बेचनिहार युवती वास्तवमे हमरो सम्मोहित कऽ देलक । सातम कथा आदर्श हमरा कोनो खासे प्रभावित नई कऽ सकल । मुदा अर्थहीन यात्रामे नेहा, जिनकर व्यक्तित्व एक चुम्बक जेका छलैन्हि कोनो पुरुष स्वयं खिचाक चलि अबैत छल ताहिके ओ मात्रै नहि समाजक बहुतो नेहा सभ दुरुपयोग करैत छथि । जाहिके कारण हुनक वैवाहिक जीवन अस्वस्थ रहल । ई कथा मात्र नई समाजक ऐना अछि । व्यर्थक उडानक सम्बन्धमे एक्कहिटा बात कहब कि सुजीत जी मानव जातिक ओ उड़ान जे बहुत कम समयमे बहुत बड़का होइत छैक, जे बहुत थोर लोक बुझि सकैया ताहिके अत्याधिक चतुरताक संग प्रस्तुत कएने छथि । नवम कथामे नीमाद्वारा अपना पति सोहनक लेल कएल गेल व्यवहार पर जेना श्रीनाथ चिन्तित छलथि, हमरो मोनमे स्याह प्रश्न आएल कि सोहनक पत्नीक व्यवहार निष्ठा छल कि देखावा ? सङ्गग्रह एगारहम कथा केहन सजायक चमेलीक प्रश्न — कोन अधिकारसं ओ हमरा पोसलन्हि आ फेर हमरा जनसागरमे भंसा देलन्हि, हम जन्मसँ अनाथ छी , ओतही पलितहुँ एहि गन्दा वातावरणक असरि तऽ नहि पडितए । हमर विश्वास किए तोड़ल गेल ? प्रश्न मात्रे चमेलीक नै भऽ समाजक प्रत्येक बच्चाक अछि, जे पोसपुत वा सतवा माता पिताकसंग रहैथ छथि आ दुःख भोगैत छथि । अन्तिम कथा मेनकाके हमर ह्ृदयसं धन्यवाद अछि । की आब तऽ अहँु नीना बनि गेल छीक जवाफ नहि ओ चिचएलहि आ एकटा सुखी परिवार विध्वंश होबए सँं बचि गेल । ई कृतिक रचनाकारक विषयमे कहलजाए त हमरा चिन्हल जानलमे सुजीतजी सन बहुत कम छथि जिनका मुहसँं कहियो अपशब्द नहि सुुनलहुँ आ सदिखनी हँसैंत रहैत छथि । समग्रमे जिद्दी कथा संग्रह एकबेर सभके पढबाक चाही हमर तऽ इहे सल्लाह अछि । किताबक प्रिन्टिङ्ग, डिजाइन सेहो बढिया अछि । प्रकाशकके सेहो धन्यवाद देब जे बढिया किताब पढबाक अवसर देलन्हि । लेखक राजनीतिकर्मीक अतिरिक्त युवा कवि छथि । बलराम साहु विस्मित होइत हमर लोक संस्कृति काठक खराम, मुजक चटकुनी, हाथसँ लिखल कोहवर, बिआहक गीत, सोहर-समदाउन, फगुआक जोगीरा, भोरका पराती, बटलगनी, डोमकच, जट-जटीन, शामा-चकेबा, भगैत, नचारी, अल्हा–ऊदल, ब्रजभान, सीत-बसंत, राजा-सल्हेशक अमर गाथाक नौटंकी, विभिन्न अध्यात्मिक-समाजिक घटनाक्रमपर आधारित नाटक आ नौटंकी, गामक घूर आ घूर लग होइत पंचपती, पचमेड़क जलखै, ताबापर तरल तिलकोरक तरूआ, कोजगराक मखान, चूड़ा-मुरहीक सनेश, पुरनीक पात, ओहार लागल बैलगाड़ी, जवारी भोज, ससूर-भैंसूरक धाक, पैघक पएर छूबि लेल असीरवाद यएह सभ तँ मिथिलाक अद्वितीय संस्कार आ संस्कृति अछि। मुदा अत्याधुनिक भौतिकवाद आ अधकचरा पश्चिमी संस्कृतिक समागमक कारणें उपरोक्त विशुद्ध देशी शब्दक अनेकानेक शब्द नवका पीठीक लेल अनभुआर भऽ गेल। नवतुरिया लोकनि ऐ शब्दकेँ विदेशज बूूझि रहल छथि। जौं किछु परम्परागत संस्कृति अवशेषक रूपमे बँचलो अछि तँ नव पीढ़ी ओकरा ओछ, घटिया आ हीनताक प्रतीक मानैत छथि। दोसर दिस किछु परम्परागत लोक संस्कृति आजुक भौतिकवादी व्यवस्थाक प्रभावमे अपन स्वरूप बदलि नव नाम आ स्वरूपसँ प्रचलित भऽ स्वयंकेँ विकसित कहेबाक प्रयास कए रहल छथि। सोहर-समदाउन, जट-जटीन, पराती, भगैत, अल्हाक स्थान आॅरकेस्ट्रा आ फुहर भोजपूरी गीत तँ अल्हा-ऊदल, दीनाभद्री, राजा सल्हेसक अमर गाथा नंग-धरंग अपसंस्कृतिक परिचायक थियेटरसँ विस्थापित भऽ गेल, भाँगक गोली विदेशी शराब आ देशी पाउचमे हेरा गेल, गामक पंचायत इतिहासक हिस्सा बनि गेल, फगुआक जोगीरा आ जूरशीतलक नचारीपर बैशाखीक भाँगड़ा भारी पड़ि गेल, गामक मेला, हाट-बाजारक मौल संस्कृतिमे पूर्ण रूपेण समावेसित भऽ अपन अस्तित्व मेटा देलक अछि। हमर समाज विभिन्न अवसरपर अल्हा-ऊदल, कुमर व्रजभान, दीना भद्री, सीत-बसंतक अमरगाथा देखि आ सूनि स्वयंकेँ गौरवान्वित बुझैत राजा हरिश्चन्द्रक सत्यवादी स्वरूपसँ प्रेरणा लैत छल तँ श्रवणकुमारक नाटकसँ मातृ-पितृ भक्तिक ज्ञान प्राप्त करैत स्वयंकेँ श्रवण कुमार बनबाक प्रयाश करैत छल। पूनम मण्डल मैथिलीक तेसर विकीलीक्स -साहित्य अकादेमीक मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार प्रौढ कथा संग्रह(रामदेव झाक भातिज मुरलीधर झाक पिलपिलहा गाछ) केँ देबा लेल जिम्मेवार जूरीक खुलासा- ब्लैकमेलर ब्राह्मणवादी समालोचक मोहन भारद्वाज एण्ड कम्पनीक कुकृत्य सोझाँ आएल -मोहन भारद्वाज विद्यानाथ झा विदितक चमचागिरीमे बहुत दिनसँ लागल छथि। -विद्यानाथ झा "विदित"क निम्न कोटिक उपन्यास "विप्लवी बेसरा"क कएक पन्नाक गदगदी समीक्षा "पक्षधर" नाम्ना पत्रिकामे मोहन भारद्वाज केने रहथि, मैथिली समालोचनाक क्षेत्रमे ई एकटा कारी अध्याय अछि। -मोहन भारद्वाज रमानाथ झा ग्रन्थावलीमे पी.सी. रायचौधुरीक रचना रमानाथ झाक नामसँ अपन सम्पादकत्वमे छपबा देलन्हि। -टैगोर साहित्य सम्मानमे हिनको पोथी फाइनल धरि पहुँचल रहए, मुदा एकटा गएर ब्राह्मण, गएर कर्ण कायस्थ जूरी हिनकर लिलसापर पानि फेरि देने रहथि आ पुरस्कार जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ भेटि गेल छल। -हालेमे चेतना समितिक मुख -पत्र घर-बाहर श्रीमान मोहन भारद्वाजकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार देबा लेल फतवा जारी केने अछि। ऐ फतवा अन्तर्गत अशोक आ महेन्द्र मलंगियाकेँ सेहो साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल जएबाक गप अछि। -प्रबोध सम्मान लेल महेन्द्र मलंगियाक संग मिलि कऽ जे ई कैनवेसिंग केने रहथि आ दुनू गोटेकेँ ओ प्राइज भेटल रहन्हि से जगत ख्यात अछि। -मोहन भारद्वाजक जातिवादी चेहरा जगत ख्यात अछि, हिनकर असल नाम आनन्द मोहन मिश्र अछि। "विद्यापति टाइम्स" मे योगानन्द झा आ विद्यानाथ झा विदितक जमाए शंकरदेव झा (रामदेव झाक बेटा) संग मिलि कऽ जे ई सुभाष चन्द्र यादवक "बनैत बिगड़ैत" क खिलाफ अभियान शुरू केने रहथि से जगत ख्यात अछि, मैथिली समालोचनाक क्षेत्रमे ई एकटा कारी अध्याय अछि।। -आब एतेक केलाक बादो जँ ऐ बेरुका साहित्य अकादेमी पुरस्कार मोहन भारद्वाज विद्यानाथ झा विदितक राजमे नै लऽ सकथि वा महेन्द्र मलंगिया/ अशोककेँ नै दिअबा सकथि तँ से आश्चर्ये हएत। -साहित्य अकादेमीक मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार प्रौढ कथा संग्रह(विद्यानाथ झा विदितक समधि रामदेव झाक भातिज मुरलीधर झाक पिलपिलहा गाछ) केँ दिएबामे ब्राह्मणवादी मोहन भारद्वाजक संग देलनि एकटा आर मैथिल ब्राह्मण भाग्यनारायण झा आ चेतना समितिक कोषाध्यक्ष रहल कर्ण कायस्थ महेन्द्र नारायण कर्ण। पूर्वपीठिकासँ पहिने: -रामदेव झाक भातिज मुरलीधर झा केँ प्रौढ़ साहित्य (!!) लेल मैथिलीक साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार २०१२ -मुरलीधर झा केँ ई पुरस्कार अ-बाल कथा संग्रह "पिलपिलहा गाछ" लेल देल जा रहल अछि। -मुरलीधर झाक पोथीक आमुखमे सेहो "पिलपिलहा गाछ" मे सेहो ऐ पोथीक किछु कथाक पैघ लोकक लेल हेबाक संकेत अछि, आ मुरलीधर झा लिखलन्हि जे ओ अपन कक्का (रामदेव झा) क कहलापर ऐ पोथीकेँ बाल साहित्यक रूपमे छपबा रहल छथि। हालेमे मिथिला दर्शन मे ऐ पोथीक प्रकाशित समीक्षामे सेहो ई गप कहल गेल छै जे एकर किछु कथा पैघ लोकक लेल छै। विदेह बाल साहित्य पुरस्कार २०१२ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपमे प्रसिद्ध) लेल भऽ रहल वोटिंग (www.videha.co.in )सँ "पिलपिलहा गाछ" पोथी केँ एकर अ-बाल साहित्य भेलाक कारणसँ हटा लेल गेल छल। -रामदेव झाक भातिज मुरलीधर झा केँ प्रौढ़ साहित्य (!!) लेल मैथिलीक साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार २०१२ भेटबाक सूचना श्री शंकर झा १७ अगस्त २०१२ केँ बेरमा गाम जा कऽ श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ देलन्हि। ओ कहलन्हि जे "पिलपिलहा गाछ" पोथी केँ साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार २०१२ देल जएबाक निर्णय भऽ गेल छै आ शीघ्र साहित्य अकादेमी, दिल्ली एकर घोषणा करत। ओना श्री शंकर झा पहिने एक बेर विवादमे आबि चुकल छथि जखन "साहेब राम दास" विनिबन्ध पोथी "भारतीय साहित्यक निर्माता शृंखला"मे हुनकासँ साहित्य अकादेमी द्वारा लिखबाओल गेल छल!! "साहेब राम दास"पर डॉ. पालन झा पी.एच.डी. केने छथि आ ई शोध श्री दुर्गानाथ झा श्रीश (आब स्वर्गीय) केर अन्तर्गत भेल छल। "साहेब राम दास"पर डॉ. पालन झाक निबन्ध विदेह ई-पत्रिका (www.videha.co.in ) मे सेहो आएल छल आ ल.ना.मिथिला वि.वि.क मैथिली विभागमे ऐ शोधक एक प्रति राखल सेहो अछि, तकर बादो "साहेब राम दास" विनिबन्ध श्री शंकर झाक नामसँ छपल !!! ऐ गपसँ साहित्यिक क्षेत्रमे आक्रोश व्याप्त भऽ गेल छल। ब्राह्मणवादी समीक्षक मोहन भारद्वाज द्वारा पी.सी.रायचौधुरीक रचनाक कॉपीराइट हनन: अपन सम्पादकत्वमे रायचौधुरीक रचना रमानाथ झाक नामसँ छप्लनि: सहयोगी रहल सी.आइ.आइ.एल. ब्राह्मणवादी समीक्षक मोहन भारद्वाज: रामदेव झासँ मिलि कऽ भोंकलनि सुभाष चन्द्र यादवक पीठमे जातिवादी छुरा विद्यानाथ झा विदितक चमचागिरीमे लागल ब्राह्मणवादी समीक्षक मोहन भारद्वाज: मैथिली समालोचनाक कारी अध्याय: चमचागिरी समीक्षाक मोहन भारद्वाज द्वारा स्थापना रामदेव झाक मूर्ख बेटा विजयदेव झाक फोन नम्बरसँ उमेश मण्डलकेँ पठाओल एस.एम.एस. "गजेन्द्रक पोसुआ अपन परतर हमर परिवारसँ जुनि करू बाउ आ फेसबुकपर जे नाटक क' रहल छी ओइसँ पैघ नाटक हमरा अबैए। कहबी छै फल्लाँ धोबीकेँ लूरिसँ बनल भगता मंडल अपन बापकेँ परतर आ तुलना ककरासँ क' रहल छी बाउ पहने फल्लाँ धो आउ तखन हमरा परिवारक योगदानपर चर्चा करब बाउ अपनेक पिताकेँ कोना अकेदमी एवार्ड भेटल आब ओइपर अहाँ लेख पढ़ब बुरी रे लिखनाइ की होइ छै से हम सीखा देब।" महेन्द्र मलंगियाक मूर्ख बेटा ललित कुमार झाक हाथ जे रामदेव झाक मूर्ख बेटा विजयदेव झाक फोन नम्बरसँ उमेश मण्डलकेँ पठाओल ऐ एस.एम.एस. सँ सिद्ध होइए। "बहुत-बहुत धन्यवाद, समदिया पहिल बेर नीक समाचार सुनौलक हमरा, हमर एक हेराएल मित्र हमरा नाइजीरियासँ फोन केलनि, फूइसक खेती चालू रहय मण्डल" (+२३४८०३९४७२४५३नाइजिरिया ललित कुमार झा) (विजयदेव झा +९१९४७०३६९१९५) विजयदेव झाक ड्रग एडिक्ट बला भ्रष्ट-अशुद्ध अंग्रेजीमे पठाओल अभद्र ई-मेल, पैरवीसँ पास करैक निशानी Vijay Deo Jha Mar 19 to Gajendra Dear, Sri Gajendra Thakurji I am writing you this mail in response to sustained campaign by your close group forming E-Samadiya and others including Umesh Mandal and one ghost lady Priyanka Jha against me that I obtained assignment from the Sahitya Akademi. I have attached scanned copy of the reply of Sahitya Akademi in this regard. Dear sir, as your supported E magazine had published the report of an RTI indicating my name one who has obtained translation assignment that you people propagated some sort of Wikileaks. Dear Sir, your energetic team did not apply its mind to ascertain the fact of the assignment and thereafter. Though during the debate I found your esteemed literary colleague Priyanka Jha down to the gutter--she had neither the manner nor mind to enter into a debate of literary kind. I rest this matter here. But I will like you to publish this letter and my version with same prominence the way I was targeted. I don't have mail id and phone number of Shree Umesh Mandal and Priyanka Jha to reply them. I mailed you also because of the reason that you have been in touch with these two. Regards Vijay Deo Jha Jun 4 to Gajendra Dear Sir, Please refer to my previous mail along with attachment. I had requested you to give space to my statement in you E Samadiya blog against libelous content published against me regarding taking benefit from Sahatiya Akademi. I understand that you have a busy schedule in politics of literature apart from your job. I understand that you people are prone to forget to repair mistakes and nonsense delivery of allegation. Sir let me be very specific that you had leveled certain charges against me and I made my reply along with official communication received from SA. Don't you think that you should act as a gentleman to publish my version and the letter to clear my stand. Sir I am frivolous and flippant kind of person rather I am a very no-nonsense kind of people. You must be wondering that I am chasing you like anything over a petty issue. The charges you leveled against me could be petty in your consideration but for me it a serious matter. I am amazed that how person like you who is calmouring to be maker of Maithili Literature has been behaving shamelessly. Some two and half month back I had sent you the mail with the request. I had sent mail to Umesh Ji also. Your silence suggests you people are standing nowhere on the integrity index and how a so called intellectual and writer like you can be third rate cheat. I am also looking for that fantastic lady Priyanka Jha. Hadn't she been a lady I would have given her piece of my mind. Sorry for being harsh but you have forced me to be so. 29 AUGUST 2012 09.15 PM मैं इस बात के लिए खेद प्रकट करता हूँ की मेरी वजह से आपका लीटर भर खून जल गया होगा. आप और आपके अनुचरों की भाषा उस तिलमिलाहट को दिखाती है वैसे मुझे बहुत सारे सज्जनों ने फोन पर आपसे मूह न लगाने की सलाह दी क्यूँ की आपने किसी को नहीं छोड़ा है सब को गाली दी है ऐसे में मैं क्या. छोड़िये इन बातों को, मेरा मेल आप खूब प्रकाशित कर रहे हैं आप. मैं ने आपको एक और मेल भेजा था हिंदी में क्यूँ की मेरी अंग्रेजी या तो बुरी है या फिर आपके समझ से बाहर है. वह मेल भी प्रकाशित करें हाँ लेकिन ईमानदारी होनी चाहिए क्यूँ की मेरे ड्रग एडिक्टेड टेक्स्ट को आप अपने करप्ट एडिटिंग के द्वारा अपने लायक बना देते हैं. मूल सवाल यह देखने में आया है की आप मेरे सवालों को अपने ब्लॉग और साईट पर जगह नहीं देते. अगर आप वह मेल प्रकाशित कर दें तो मुझ जैसे मुर्ख के असलियत के साथ साथ लोगों को आप जैसे महान इंटरनेटी फेसबुकिया साहित्यकार के असलियत का भी पता चल जायेगा. आप एक महान फेसबुक साहित्यकार हैं आपका बस चले तो मैथिली के सारे साहित्यकारों का संहार कर दें. अपने सभ्य तमीजदार टीम और उसके भाषा में बारे में क्या ख़याल रखते हैं गजेन्द्र सर. अच्छा है की लोग उन्हें भी पढ़ रहें हैं. एक बात तो है की अगर साहित्य अकादमी में मैथिली न होता तो आप जैसे पैसा पीटने वाले लोग साहित्यकार बनने की कोशिश नहीं करते. आप किसी साहित्य की सेवा नहीं कर रहे हैं. जब आदमी पैसा कमा लेता है तो उसे यश कमाने की भूख लगती है लेकिन वह पैसे से नहीं कमाया जा सकता है ना सर. मुर्ख हूँ आपके शब्दों में लेकिन है यह है पते की बात. सर बहुत सीधा सा सवाल पूछता हूँ की आप इतना बड़ा ढोंग कैसे कर लेते हैं मसलन घोर ब्रामहण विरोधी आदि आदि. यह जो जातिसूचक टाईटिल आपने लगा रखा है उसे तो पहले हटायें फिर जनेऊ हटायें फिर यह सब बाचन करें. यह बात मैंने आपको पिछले बार भी पुछा था जब आप प्रियंका झा बन कर हम से पेंच लड़ा रहे थे. मैं आप के किस रूप की पूजा करू आप कब किस रूप में दर्शन देते हैं श्रीमान यह बड़ा गंभीर तत्व ज्ञान का विषय हैं. श्रीमान यह बताएं की जब आपको यह दिव्यज्ञान प्राप्त हुआ था की आपको साहित्य में भी हाथ आजमाना चाहिए उस वक्त आपकी उम्र क्या थी? क्या मेरे पिताजी के उम्र से अधिक या उनके बराबर. जबाब देने से पहले सोच लें क्यूँ की मेरे पिताजी (आपके शब्दों में बाप, यह आपका तमीज है) और आपके पूजनीय पिताजी हमउम्र ही होंगे. यह आप तय करेंगे की मेरे पिताजी साहित्यकार हैं या नहीं या आपका वह गुमास्ता आशीष तय करेगा? अच्छा आप एक बात बताएं बुरा न मानें तो क्या आपलोग अपने पिताजी को बाप ही कहते हैं. एक काम करें अपना मूह उठायें और थूकें और देखें की थूक कहाँ गिरता है आपके चेहरे पर या सूर्य पर. कौन सा डिबेट आप कर रहे थे आप? आपको इस बात की जानकारी भी नहीं होगी की मैं आपका बहुत बड़ा प्रसंशक रहा था मेरे पास आप के द्वारा पंजी प्रथा पर काम किया गया अद्भुत सीडी है जिसे मैं लोगों को दीखता था. लेकिन आपने अपने टुच्चे हरकत से मुझे तो ज़लील किया ही मेरा विस्वाश भी तोडा की आप सही में आदरणीय हैं. मुझे क्या पड़ी है की किसको अवार्ड मिले लेकिन आपने मुझे अपने घटिया राजनीति का शिकार बनाया. मेरे लिए सारे साहित्यकार बराबर हैं और सम्माननीय क्यूँ की वह साहित्य की सेवा कर रहें हैं. मैं ने पिछली बार भी आप लोगों को तभी रोका और टोका था जब आप लोगों ने मायानादं मिश्र को गन्दी गन्दी गलियां दी थी. लेकिन गाली गलौज करते हुए आप उस सीमा तक चले गए जहां आप जाहिल नज़र आते हैं और मैं किस जाहिल से बहस कर रहा हूँ? किसी का अपमान ना करें और किसी पर गलत आरोप न लगायें. आश्चर्य है की आप ने मुझे क्यूँ साहित्य अकादमी के विवाद में घसीटा जब मुझे पता ही नहीं की क्या हो रहा है ? एक अच्छे और ज़िम्मेदार व्यक्ति की तरह मैं ने अपनी सफाई दी थी और यह आशा किया की आप मेरी बातों को भी रखेंगे. लेकिन आप ने ये क्या किया? सर जी घटियापन की एक हद होती है और आपका वह हद कहाँ ख़तम होता है और कहाँ शुरू वह बस आप बता सकते हैं. यह मेल मैं आपको उत्तेजित करने के ख़याल से कतई नहीं लिख रहा हूँ. आप इसे पढ़े और मनन करें की आप कैसे कैसे अपने इज्ज़त का बट्टा खुद ही लगा रहे हैं क्यूँ की आपके बारे में लोगों के विचार सुन कर मैं सकते में पड़ गया. यह जीवन आपका है इसके मालिक आप खुद हैं. मैं तो बस आपके लिए प्रार्थना कर सकता हूँ ऊपर वाला मेरी बात सुने. आप मेरे बड़े भाई की तरह हैं. और हाँ यह सब मैं आपके चापलूसी के लिए नहीं लिख रहा हूँ. स्वभावतः मैं लड़ाकू नहीं हूँ लेकिन लड़ने से पीछे नहीं रहता. सादर चरण स्पर्श आपका अनुज विजय (हाँ आपको मेरे मोबाईल लोकेसन को ट्रेस करने के लिए मेहनत नहीं करनी चाहिए आपका मेरे ऊपर आपका स्वाभाविक अधिकार है जो किसी साहित्यिक इज्म से ऊपर है. यह मेरा आपको,लिखा गया अंतिम मेल है) आशीष अनचिन्हारकेँ फेसबुक मैसेजपर सेहो ई मूर्ख विजदेव मैसेज केलक एखने हमर फेसबुक मैसेजमे रामदेव झाक मूर्ख बेटा विजयदेव झाक मैसेज आएल अछि जे हम बिना काँट-छाँटकेँ दए रहल छी। ऐ मैसेजसँ अहाँकेँ ई पता लागि जाएत जे कोना रामदेव झा आ हुनक दूनू बेटा मने विजय देव झा आ शंकर देव झा गारि बलेँ मैथिलीकेँ बहुत दिन धरि ब्लैकमेलिंग केलकै। संगे-संग हम ईहो कहए चाहब जे ऐ ब्लैकमेलिंगमे रामदेव झा आ हुनक बेटा संगे मोहन भारद्वाज, महेन्द्र मलंगिया, चेतना समीति आ आर किछु साहित्यकार सभ अनवरत सहयोगी रहल छथि। मुदा आब जे विदेह आंन्दोलन भए रहल अछि ताहिसँ घबड़ा कए ई सभ अभद्रता कए रहल अछि। मुदा आब से चलए बला नै छै। तँ पढ़ू हुनक मूल मैसेज---- हे रे अशीषवा, गजेन्द्र के पोसुवा, पतचटवा औकात देख क बात कर बालगोविन्द जनामि क ठाड़ भेलौं ने की कहै जे छै नबका जोगी के गांडी में जट्टा SATISH VERMA LIKHAI CHHATHI...Satish Verma Isi Bhagwa Shankardev jha ko maine bahut pahle apne lekh me khub lapeta tha. Darsal Agnipushp sampadit samvad patrika me Gujrat danga aur Narendra modi ke role par meri ek kahani chapi thi,jis par usne badi hi behuda tippani ki thi,jiska jawab maine rachna,darbhanga,vishwanathjee ke patrika ke jariye diya tha.shunt ho gaye the shankardev babu,aukat nap gayi thi unki. VINIT UTPAL..LIKHAI CHHATHI .. Vinit Utpal क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पर गरल हो, वह क्या जो दन्तहीन, विषहीन और अत्यंत सरल हो.गाली देब परम्परा अछि. जिनकर जेहन संस्कार, हुनकर मुंह से तहिने बोली.रचनात्मकता में जीवन अनुभव के बड़ रास योगदान होयत अछि. फेर संस्कार ते घर से भेटैत अछि. अशीषवा,पोसुवा, गांडी, जट्टा एहन शब्द अलंकारक प्रयोग करहिक अर्थ अछि जे अखनो लोक में आदिम संस्कार से जुडल अछि. ई सब शब्द साहित्य से दूर भ रहल अछि. ताहि सं विजयदेव झा सहित तमाम मैथिली से जुडल अहिने प्रबुद्ध लोक सें आग्रह जे अहां सब शब्दक संगे आओर एहिने शब्दक प्रयोग क मिथिलाक शब्दकोष के समृद्ध करल जाय. कियाकि तथाकथित ब्राहमणवादी साहित्यकार घर में ते एहन शब्दक प्रयोग करैत छथिन आ अप्पन नेना सभ के सिखाबैत अछि मुदा अप्पन लेखनी में प्रयोग नहि करैत अछि. रामदेव झा, शंकरदेव झा आ विजयदेव झा:ब्लैकमेलर फैमिलीक आज अखबारमे निकालल न्यूज रामदेव झा, शंकरदेव झा आ विजयदेव झा:ब्लैकमेलर फैमिलीक आज अखबारमे निकालल न्यूज रामदेव झा, शंकरदेव झा आ विजयदेव झा:ब्लैकमेलर फैमिलीक आज अखबारमे निकालल न्यूज पूर्वपीठिका: -रामदेव झाक बेटा विजयदेव झा द्वारा फोन नम्बर +९१९४७०३६९१९५ सँ उमेश मण्डलकेँ धमकी -रामदेव झाक बेटा विजयदेव झा जइ नम्बरसँ फोनपर धमकी देलक से लोकेशन ट्रेस कऽ लेल गेल अछि -फोन नम्बर +91-9470369195- location-Bihar- signalling GSM- longitude 26.11346972320883 latitude 85.27224719999998 -BIHAR & JHARKHAND- Operator : BSNL- Signaling :CDMA -उमेश मण्डलकेँ देख लेबाक आ उठा लेबाक धमकी देलक विजयदेव झा -हालेमे साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कारमे प्रौढ़ साहित्यपर पुरस्कार ओकर पितयौत भाइ मुरलीधर झा केँ देल गेल, जकर घोर विरोध भऽ रहल अछि -विजयदेव झा गाड़ि-गलौज सेहो केलक -विजयदेव झा एक दिससँ सुभाष चन्द्र यादव, प्रियंका झा, प्रीति ठाकुर, प्रबोध नारायण सिंह, उदय नारायण सिंह नचिकेता, उमेश मण्डल, ज्योत्सना चन्द्रम, विभूति आनन्द, भीमनाथ झा, उषाकिरण खान, यात्री, शरदिन्दु चौधरी, सुधांशु शेखर चौधरी सभकेँ गरियेलक। -ओ ईहो कहलक जे प्रीति ठाकुरकेँ बाल साहित्य पुरस्कार नै देल गेल, तेँ सभ विरोध कऽ रहल अछि, ऐसँ पहिने ओ फरबरीमे कहने छल जे जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ मूल साहित्य अकादेमी पुरस्कार नै देल गेलै तँइ विरोध भऽ रहल अछि। -विजयदेव झा कहलक जे प्रीति ठाकुर, सुभाष चन्द्र यादव, नचिकेता, जगदीश प्रसाद मण्डल, गजेन्द्र ठाकुर आदिकेँ ऐ जन्ममे ओ सभ साहित्य अकादेमी पुरस्कार नै प्राप्त करऽ देतै। मणिपद्म जयन्तीपर दिल्लीमे मिथिलांगन द्वारा कवि गोष्ठी ९ सितम्बर २०१२ केँ सम्पन्न -मणिपद्म जयन्तीपर दिल्लीमे मिथिलांगन द्वारा कवि गोष्ठी ९ सितम्बर २०१२ केँ सम्पन्न -कवि गोष्ठीक संचालन मानवर्धन कण्ठ केलनि। -कुमार शैलेन्द्रक कविता पाठक दौरान दर्शक दीर्घासँ अभद्रतापूर्ण टोका-टोकी भेल। शुरूमे कुमार शैलेन्द्र टिप्पणी केने रहथि जे महेन्द्र मलंगिया जी कविता नै लिखै छथि। मंचपर कुमार शैलेन्द्रक टिप्पणी छल जे कविता नै लिखिनिहार नीक नाटक नै लिखि सकैए। तकर बाद महेन्द्र मलंगियाजी बिनु कविता पढ़ने उठि कऽ चलि गेलाह। तकरे बदलामे कुमार शैलेन्द्रक कविता पाठक दौरान दर्शक दीर्घासँ अभद्रतापूर्ण टोका-टोकी भेल। जातिवादी रंगमंचक दू ग्रुपक बीच भऽ रहल ऐ घटनाक्रमक बाद संचालक शान्ति बनेबाक अपील केलन्हि। तकर बाद टोका-टोकी केनिहार पाँचो व्यक्ति सेहो किछु कालमे चलि गेला। -रवीन्द्रनाथ ठाकुर, मुन्नाजी, विनीता मल्लिक, मानवर्धन कण्ठ , कुमार शैलेन्द्र, रमण कुमार सिंह आदि कविता पाठ केलन्हि। · Satya Narayan Jha, Poonam Mandal and Indra Bhushan Kumar like this. · Sanjay Choudhary जे कियो ई रिपोर्ट लिखने छथि ओ सभागार मे उपस्थित नई छलाह । कार्यक्रम बहुत नीक वातावरण आ नीक माहौल मे संपन्न भेल । कुमार शैलेंद्र जी महेंद्र मलंगिया जीक नामो तक नई लेलखिन्ह । रिपोर्ट लिख' बला सं अनुरोध जे आँखि मुईन क' झटहा नई फेकू , अहांक विश्वसनीयता समाप्त भ' जैत । Thursday at 7:03am · Like · 1 · Rawindra Das je kyo ehan reporting karet chi o chahait chi je maithil sab jati ke larai me ojhraol rahathi aa ehin kaj ta bahuto lok ka rahal chathi kala me pit ptrakarita ke kono jagah nai chaik o rajnitikik patrakarita karu aa chadm nam sa nahi likhu Thursday at 10:41am · Like · 1 · Rawindra Das मुदा एक टा काज ओ बखूबी क रहल अछि आ दिन प्रतिदिन क रहल अछि . ओ काज अछि जातिवादिताक नाम पर झगरा केनाइ साहित्यकार सभ केर खुलेआम फसबूक आ ब्लोगक माध्यम स गारि पढ्नाई Thursday at 11:43am · Like · 1 · Poonam Mandal संजय चौधरी जी, कुमार शैलेन्द्र जी रवीन्द्र सुमनकेँ कहने रहथिन्ह दुनूमे सँ कोनो एक गोटा सँ पुछि लेब, हमर समदिया ओतए उपस्थित छल। अहाँ जातिवादी रंमंचसँ जुड़ल छी तेँ अहाँक छटपटाएब निश्चिते, मिथिलांगन केँ जँ अपन प्रतिष्ठा बचेबाक छै तँ अहाँ सन लोकसँ दूरा बनाबए पड़तै। मलंगिया जे मणिपद्मक विषयमे एकांकी संग्रह (साहित्य अकादेमी) मे जे लिखने छथिन्म्हह से अहाँकेँ नै बुझल हएत। पढ़ू आ मलंगिया जीक चरित्रक विषयमे बुझू। 3 hours ago · Unlike · 1 · Poonam Mandal रवीन्द्र दास जी। आँखि मुनि लेलासँ जँ समाधान निकलितै तँ दुनियाँमे कोनो समस्ये नै रहितै। काला आ साहित्यमे मैथिला ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ जै तरहेँ जातिवादी राजनीति कऽ रहल छथि/ केने छथितकर विरोध पीत पत्रकारिता छै। अहाँ आइ.डी. हमरा छद्म बुझा रहल अछि कारण जे अहाँ कॉपी-पेस्ट केने छी (साहित्यकार सभ केर खुलेआम फसबूक आ ब्लोगक माध्यम स गारि पढ्नाई) आदि, से एकटा चोर का "राड़ केँ सुख बलाय" केर लेखक "रोशन कुमार झा"क पोस्ट छिऐ। ओइ चोरकेँ पहिनहिये समदियासँ बैन कऽ देल छै। ओकर कुकृत्य नीचाँक लिंकपर देल अछिhttp://esamaad.blogspot.in/2012/09/blog-post_502.html 3 hours ago · Unlike · 1 · Gajendra Thakur जातिवादी रंगमंच आ ओकर संगी साथी सभक निर्लज्जता आँखि खोलएबला अछि। Poonam Mandal जातिवादी रंगमंच जीवन झाक सुन्दर संयोगक मंचन २०१२ मे करैए आ कहैए जे ई पहिल मंचन छिऐ, जखनकि मलंगियाजीक जन्मसँ पहिने एकर मंचन भऽ चुकल अछि। संजय चौधरीजी अहाँ आ अहाँक संगी सभक जातिवादी रंगमंचक आ ओकर संगी साथीक विश्वसनीयता आ रवीन्द्र दासक पीत पत्रकारिता कहिया ने खत्म भऽ गेल देखू लिंक http://maithili-drama.blogspot.in/2012/06/blog-post_29.html Kumar Shailendra samadiya me chapal riport ekdam galat anuchit aa bhramak achi.Ehan galat prachar nai karbaak chahi. malangiyajee bimar rahathi o aayalo nahi rahathi. ham aa sanjay choudhry hunka ghar par dekhi aayal rahi.Hamar kawitak khoob swagat bhel rahay karan o hamar doo masak darbhanga prawas par kendrit rahay. Samadiya me chapal ripot pardhlak baad hamra pahil khep e bujhba me aayel je videh sa jural lok sab katek grinit abhiyan chala rahal achi. Poonam Mandal जातिवादी रंगमंचसँ जुड़ल कुमार शैलेन्द्रक झूठ घृणित, आ डरपोक जातिवादी रंगमंच जे चोर रोशन कुमार झा (राड़के सुख बलाए केर लेखक)सन कॉपीराइट चोरक संगी अछि, केर असली चेहरा अछि, जे प्रोग्राम सभमे अभद्रता करैए, एक दोसरासँ लड़ैए मुदा विदेहक विरुद्ध एक भऽ जाइए। http://esamaad.blogspot.in/2012/09/blog-post_502.html Gajendra Thakur कुमार शैलेन्द्र आ आन जातिवादी रंगमंचकर्मीक ई पुरान आदति छन्हि, भोजपुरी-मैथिली अकादेमीक सेमीनार मे कुमार शैलेन्द्र आ किछु आर गोटेक मंचेपर वाक युद्ध हम आँखिसँ देखने छी (प्रायः देवशंकर नवीन संगे), मुदा अगिले सेमीनारमे माहान मलंगिया, महान देवशंकर, महान गुंजन, महान सुभाष चन्द्र यादव आदिक जयघोष सेहो शैलेन्द्र लगेने रहथि, आ तैपर मलंगियाजी देवशंकर नवीनकेँ कहने रहथिन्ह- की भऽ गेलै आइ कुमार शैलेन्द्रकेँ, उलटा धार बहा रहल अछि। about a minute ago · Like Gajendra Thakur झूठपर टिकल अछि जातिवादी रंगमंच। किछु वीडियो ऐ दुनू कार्यक्रमक विदेह वीडियोमे भेटि जाएत, भऽ सकैए नरम-गरम दुनू घटना भेटि जाए। a few seconds ago · Like Gajendra Thakur रोशन कुमार झा नाम्ना जातिवादी चोरक संग जातिवादी रंगमंच आ कुमार शैलेन्द्रक साँठ-गाँठ सोझाँ अछि। तखन ककर गप ठीक मानल जाए, झूठ आधारित जातिवादी रंगमंचक वा सत्य आधारित समदियाक?? Poonam Mandal ऐ चोरक संगी साथी (शंकरदेव झा, कुमार शैलेन्द्र, अमलेन्दु शेखर पाठक आदि) सभक गपपर विश्वास कएल जा सकैए? a few seconds ago · Like Poonam Mandal अखनो जगदीश प्रसाद मण्डलक रचना जातिवादी रंगमंचक सहयोगीक सह पर ई चोर रोशन झा ऊपरक देल लिंकपर चोरेने अछि। http://esamaad.blogspot.in/2012/09/blog-post_502.html Sanjay Choudhary गजेंद्र ठाकुर जी आ पूनम मंडल जी अहाँ सब गैर जातिवादी रंगमंच ल' क' दुनियाँ के सामने कियेक नई अबई छी 11 hours ago · Like Sanjay Choudhary अहाँ सब लग जतेक गैर जातिवादी नाटक अछि हमरा पठा दिय आ संगहि जतेक गैर जातिवादी कलाकार सब छथि तिनको कहियो जे हमरा सब संग आबि क' नाटक करैथ तखने जातिवाद समाप्त हैत । अगर जातिवाद छैक त' ओकरा समाप्त कर' के प्रयास हेबाक चाही ताही लेल सब जाति के लोक सब के मंच पर आब' पड़तय । हमरा सब लग जे कलाकार आ नाटक उपलब्ध रहैत अछि ओही सं काज चलब' पड़ेयै । अहाँ सब गैर जातिवादी कलाकार हमरा खोजि क' दिय अपन गैर जातिवादी कलाकार सब के कहियो जे हमरा सब संग मिल क' काज करत । दिल्ली सन शहर मे नाटक केनाई बहुत जोखिम के काज छैक आरोप लगेनाई बहुत छोट गप होईत छैक अपन रोजी रोटी छोड़ि क' नाटक मे लाग' पडैत छैक । और अहाँ सब सबटा चीज के मटियामेट कर' मे लागल रहै छी । एना हल्ला मचब' सं नीक हैत जे एकटा विकल्प दियौ मैथिली रंगमंच के जे गैर जातिवादी होईक । जातिवाद समाप्त भ' रहल छैक मुदा अहाँ सब ओकरा हावा देब' मे लागल रहै छी । जखन देखू जातिवाद शब्दक ढिंढोरा पिटैत रही छी । अगर सामर्थ अछि त' दिल्ली मे एकटा गैर जातिवादी रंगमंच स्थापित करू हमहूँ ओही रंगमंच सं जुड़ि जैब । 10 hours ago · Like Priyanka Jha http://maithili-drama.blogspot.in/ विदेह मैथिली नाट्य उत्सव maithili-drama.blogspot.com 47 minutes ago · Unlike · 2 · Remove Preview Gajendra Thakur संजय जी, उपरका लिंकपर समानान्तर रंगमंच ( गैर जातिवादी समानान्तर रंगमंच) आ नाटक भेटि जाएत, अहाँ केहेन रंगमंचसँ जुड़ल लोक छी जे अहाँकेँ ई बुझलो नै अछि? ओना ई अहीं टाक नै सम्पूर्ण जातिवादी रंगमंचक समस्या अछि अहाँक ई प्रश्न "अहाँ सब गैर जातिवादी रंगमंच ल' क' दुनियाँ के सामने कियेक नई अबई छी" कूपमंडूकताक द्योतक अछि वा जातिवादी कट्टराक। अहाँ लग गएर ब्राह्मण-गएर कायस्थ किए नै आबि रहल अछि ओइपर सोचू, लोककेँ पठेबै तँ ओ जाएत? पहिने भरोसा कायम करू, की भरोसा काएम कऽ सकल छी? दिल्ली सन शहर मे नाटक केनाइ "विदेह समानान्तर रंगमंचक" मूल उद्देश्य नै छै, कारण विदेहसँ जुड़ल लोक भरि विश्वमे छथि, आ मिथिलामे "विदेह समानान्तर रंगमंचक" होइत अछि, होइत रहत। मैथिली रंगमंचकेँ विकल्प देल जा चुकल छै। जे जातिवादी शब्दावली अहाँक आ अहाँ सन दोसर जातिवादी नाटककारक नाटकमे छन्हि तकर बाद अहाँ सोचियो केना लेलिऐ जे लोक अहाँ सभक घृणाक रंगमंचसँ जुड़त? रोजी-रोटी छोड़ि कऽ समाजकेँ बँटबाक काजमे लगनाइ जँ अहाँक प्रियोरिटी अछि तँ ओकरा (जातिवादी रंगमंचकेँ) जड़िसँ खतम केनाइ हमर प्रियोरिटी अछि, आ से प्रियोरिटी हमरा सभक गामसँ शुरू भेल अछि जतए नेटिव स्पीकर बसै छथि, फण्ड आधारित दिल्ली नै। मराठी नाटक शोलापुर आ मुम्बै आ गुजराती नाटक अहमदाबाद आ भरूच निर्धारित करैत अछि। अहाँकेँ कोना शक भऽ गेल जे मैथिली नाटक दिल्ली निर्धारित करत आ साम्प्रदायिक नाटककार निर्धारित करता? हमरा सभक सामर्थ्य आस्ते-आस्ते अहाँ लोकनिकेँ देखाइ पड़िये रहल अछि, पड़िते रहत, .. फूल्स पाराडाइजसँ हमरा लोकनिकेँ कोनो मतलब नै। 32 minutes ago · Unlike · 1 Gajendra Thakur आब ऐ रिपोर्टपर घुरी- जातिवादी रंगमंच आ ओकर संगी साथी सभक निर्लज्जता आँखि खोलएबला अछि। गिरगिट सेहो हिनका लोकनिक रंग बदलबाक आ झूठ बजबाक क्षमता देखि लजा जाएत। 18 minutes ago · Unlike · 1 Poonam Mandal संजय जी, पहिने तँ कुमार शैलेन्द्र, रवीन्द्र दास आदि जे झूठ बाजल छथि ओइ लेल ओ सभ माफी मंगथु, अहूँकेँ सभ गप बूझल छल मुदा अहाँ गपकेँ झाँपै-तोपैक प्रयास केलौं, किए? फेर कुमार शैलेन्द्र , अमलेन्दु शेखर पाठक, रवीन्द्र दास आदि जै चोर रोशन कुमार झा (जकर डायलोग रवीन्द्र दास कॉपी केने छथि) केँ जातिवादमे झोंकि जगदीश प्रसाद मण्डलक रचनाक चोरिक बादो पाछासँ सह दऽ रहल छथिन्ह, तकरा लेल की सजा छै? की एकर बादो अहाँ लोकनि सहयोगक आशा रखै छी? पंकज चौधरी (नवलश्री) विहनि कथा - ई नोर छै गरीबीक
दक्षिण-पूब भरसँ अटूट मेघ घेरैत देखि बुधनी पूवैर बाधक एकपेरिया बाट पर नमहर-नमहर डेग झटकारने घर दिश विदा भेल. माथ पर घासक छिट्टा, कांख तऽर थोड़ सुखैल राहटक जारैन आ खोइंछ में नुका धेने छल सात-आठ टा रस्फट्टू आम जे अबैत काल बाट में बिछने छल अल्हुआ वला खेत लगका कलकतिया आमक गाछ तर सँ.. गाम परहक चिंता जान खेने जा रहल छलै. सात वरखक बेटा बंटी के घरे पर छोड़ि आयल छल. ओना ओ तऽ छाल छोड़ेने छल बाध अबै लेल मुदा रौद तेहन ने चंडाल उगल छलैक जे बुधनी के मोन नहि मानलकै आ ओकरा सुगिया काकी अंगना छोडि आयल छल. बुधनी के सभ सँ बेशी चिंता अहि गप्पक छलै जे जों ओकरा घर पर पहुंचै सँ पहिने वरखा शुरू भ गेलै तऽ जुलुम भऽ जेतै. चिपरी सभ बाहरे में सुखाइत छलै आ अंगना में खुद्दी सेहो पसारल छलै...आ हाँ चार पर बिरियो तऽ देने छलै बना कऽ सुखाई लेल, सभटा चौपट भऽ जेतै.. विचारक अहि उथल-पुथल में अगुताइल भागल जैत छल घर दिश. घर पहुँचते देरी छिट्टा अंगना में पटकि पहिने बंटी के सोर पारलक. ता धरि तऽ एकदम गुप्प अन्हार भऽ गेल छलैक आ जोड़-जोड़ सँ बिजलोका लोकय लागल छलै. संगहिं मेघ सेहो ढन-ढन गरज लागल छलै. बुधनी हडबडा कऽ सभटा काज करय लागल. आ बंटी... ओहो पाछू कियैक रहत..! ओहो छोटकी पथिया में चिपरी समेट कऽ उठाब लागल. कने कालक बाद खूब जोड़ सँ वरखा शुरू भऽ गेलै. बुधनी बंटी के लऽ कऽ दौड़ कऽ घर दिश भागल...मुदा ताहि सँ की..? घर की कोनो अंगना सँ नीक छलै..! सड़ल खऽर... मोनो नहि जेऽ कैऽ वरख भऽ गेल छलै छड़वेला. कोरो-बाती सेहो सड़ल-गलल. ओहिना टुक-टुक मेघ देखाइत...! राति कऽ बंटी घरे में बैसले-बैसल चंदा मामा सँ बतिया लैत छल आ तरेगन सँ खूब लुका-छिपी खेलैत छल. सौंसे घर में गर-गर पाइन चुबैत. कनिए काल में घर पाइन सँ भरि कऽ डबरा भऽ गेल. बुधनी छिपिया लऽ पाइन उपछ लागल. ओ पाइन उपछैत-उपछैत अप्सियांत भेल छल. आ बंटी.... ओकरा लेखे केहनो सन नहि....आ रहबे कियैक करतैक...? ओ तऽ कागतक नाह बना घर में अई कोन सँ ओई कोन धरि बहा कऽ आनंद सँ विभोर भऽ रहल छल. कने कालक पश्चात जहन खेलाइत-खेलाइत बंटी थाकि गेल तऽ नाह के ओहिना पाइने में हेलैत छोडि बुधनी के कोरा में जा बैसल आ बाजल माय गे भूख लागल अछि, किछु खाई लेल दे ने...! बुधनी एक दू बेर तऽ अन्ठेलक मुदा जहन बंटी छाल छोड़बय लागल तऽ बुधनी चिनवार पर बासन सभ के उनटा-पुन्टा कऽ देख लागल. किछु नहि भेटलैक...किछु रहतैक तहन ने भेटतै. मुदा बंटी कियैक मानत..आ फेर जे माइन गेल से नन्ने की..? बुधनी अकबकैल ओकर मूंह तकैत छल तखने कोठिक गोड़ा पर राखल मरुआ रोटिक एकटा टुकड़ी पर ओकर नजरि गेलै. बुधनी मोन पारय लागल जे कहिया के छियैक.... हाँ मोन पड़ल परसुए भोर में तऽ बनने छलियैक.. बुधनी ओ मरुआ रोटी पर थोड नून आ सुखायल अचार धऽ बंटी के दऽ देलकै. बंटी मगन भऽ खाय लागल. नेनाक चंचल मोन तऽ देखू…खाइत-खाइत बंटी बाजल माय गेऽ दू टुकड़ी पियाउज दे ने..! बुधनी सौंसे घर ढुरलक तऽ आधा टा पियाउज भेटलै.. ओ पियाउज सोहि बंटी के देबय लागल....! बुधनिक आंखि में नोर भरि गेलै. बंटी माय के मुंह दिश तकलक तऽ बाजल…की भेलऊ माय कियैक कने छिही. नहि तऽ कहाँ कनैत छी हम. नहि-नहि फेर नोर कियैक बहि रहल छौ. मोन खराब छौ की.. माथ दुखाई छौ, हम जाइंत दियौ...? नहि बउआ किछु नहि भेलै हमरा. हमरा कियैक माथ दुखैत…? ई सुनि बंटी चहकि कऽ बाजल... ओहो आब बुझलियौ तों पियाउज कटलहिन्ह हैं तैं तोरा आंखि सँ नोर बहैत छौ - छैऽ नेऽ..? बुधनी मोने-मोन सोचे लागल जे बउया तोड़ा कोना कहियौ जेऽ ई नोर माथ दुखेबाक कारणे आ की पियाउज कटबाक कारणे नहि बहि रहल अछि.... इ नोर...इ नोर तऽ गरीबी केर छैक. मुदा बुधनी सभटा दर्द अपना मोन में समेटने विरोगे लोल कोंचियाबैत आ जबरदस्तिये कनी मुस्कियैत बाजल "हाँ बउया पियाउज कटलियै तहि दुआरे नोर बहय लागल...! बंटी मायक ई गप्प सुनि ठिठिया कऽ हंसल आ मरुआ-रोटी-नून-अचार पियाउजक टुकड़ी संगे खाय में मगन भऽ गेल. गाल पर नोरक सुखायल धार नेने बुधनी के ओकर नेनपनक सत्य आ सुन्दर छवि देखि अजीब सन संतोषक अनूभूति भऽ रहल छलय..!!! ओम प्रकाश झा विहनि कथा- प्रोग्रेसिभ शर्माजी आ हुनकर कनियाँ पूरा समाजमे प्रोग्रेसिभ कहाबैत छलथि। एकर कारण ई छल जे दूटा बेटीक जन्मक उपरान्त शर्माजी बिना बेटाक लालसा केने फैमिली पलानिंगक आपरेशन करा लेने छलाह आ दूनू बेकती बेटी सभक लालन पालनमे कोनो कसरि नै छोडने छलखिन्ह। बेटी सबकेँ पढेबा लिखेबामे पूरा धेआन देने छलखिन्ह आ ओकरा सभकेँ तमाम सुख सुविधा देबामे पाँछा नै रहैत छलखिन्ह। समाजमे शर्माजी दूनू बेकती बहुत आदरणीय आ उदाहरण छलथि। बेटी सभकेँ आ शर्माजीक कनियाँकेँ कोनो दिक्कत नै होई, ऐ लेल शर्माजी किछो करबा लेल तैयार रहैत छलाह। घरक काजमे मदतिक लेल एकटा दाई राखल गेल छल जे चौबीसो घण्टा हुनकर घरे पर रहैत छलैन्हि। ओकर नाँउ छलै मीतू आ ओ बयसमे बारह-तेरह बरखक छल। ऐ हिसाबेँ ओ एखन बच्चे छलै आ पेटक मजबूरीमे हुनकर घरमे काज करबा लेल बाध्य छलै। घरक पूरा साफ सफाई, पोछा, बासन माँजनाई आ कपडा धोनाई ओकरे जिम्मा छलै। दिन भरि खटिकऽ ओ थाकि जाईत छल आ साँझुक बाद झपकी लेबऽ लागैत छल। जखने ओकरा झपकी आबै की मलकिनीक प्रवचन ओकर निन्न तोडि दैत छलै। रातिमे सभक खएलाक उपरान्त ओ सभटा बासन माँजि लैत छलै आ तकर बादे खाई लेल बैसै छलै। खएबामे सबहक बचल खुचल ओकरा नसीब होईत छलै। शर्माजी अपन बेटी सभक सब फरमाईश पूरा करैत छलखिन्ह आ कोनो वस्तुक माँग भेला पर बाजारसँ तुरंत ओ वस्तु आनैत छलथि, चाहे ओ कोनो खेलौनाक फरमाईश होई वा कोनो भोज्य सामग्रीक। जँ कखनो मीतू बाल सुलभ लालसामे ओइ वस्तु सभ दिस ताकियो दैत छलै की शर्माजीक कनियाँ अनघोल उठा दैत छलखिन्ह जे आब हमर बेटी सभकेँ ई वस्तु सब नै पचतै, देखू कोना नजरि लगा देलक ई निराशी। एकर अलावे आरो ढेरी गपक प्रसाद मीतूकेँ भेंट जाईत छलै, तैं बेचारी ऐ सब फरमाईशी वस्तु दिस धेआन नै देबाक प्रयास करैत छल, मुदा बच्चे छलै तैँ कखनो कालकेँ गलती भइये जाईत छलै। एकदिन शर्माजीक बडकी बेटी गुलाबजामुनक फरमाईश केलकै। शर्माजी साँझमे घर आबैत काल बीसटा गुलाबजामुन सबसँ नीक मधुरक दोकानसँ कीनिकऽ नेने अएलाह। पहिने तँ दूनू बेटी आ हुनकर कनियाँ दू-दूटा गुलाबजामुनक भोग लगेलखिन्ह आ तकर बाद बचलाहा मधुरकेँ फ्रिजमे राखि देल गेलै। मीतू कुवाचक डरे ऐ मधुर दिस ताकबो नै केलक आ नै ओकरा खएबा लेल भेंटलै। मुदा मधुरक सुगंध ओकरा बेर-बेर अपना दिस आकर्षित करऽ लागलै। ओ एकटा योजना मोने मोन बनेलक आ चुपचाप घरक काज करऽ लागल। रातिमे भोजन कएलाक उपरान्त शर्माजीक कनियाँ ओकरासँ बासन मँजबेलखिन्ह आ एकर बाद ओकरा खएबा लेल बचलाहा सोहारी आ तरकारी दैत ई ताकीद केलखिन्ह जे हम सुतै लेल जाई छियौ, तूँ खा कऽ अपन छिपली माँजि सुतै लए जइहैं। ओ स्वीकृतिमे अपन मुडी हिलेलक आ खएबा लेल बैसि गेल। शर्माजीक कनियाँ तकर बाद सुतै लए चलि गेलीह। आब मीतू मधुर खएबाक अपन योजना पर काज शुरू केलक। पहिने तँ जल्दीसँ सोहारी तरकारी समाप्त कएलक आ तकर बाद नहुँ नहुँ डेगे फ्रिज दिस बढल। एकदम स्थिरसँ ओ फ्रिजक फाटक खोललक आ फ्रिजसँ मधुरक पैकेट निकालि कऽ एकटा गुलाबजामुन मुँहमे राखलक। फेर ओ सोचऽ लागल जे जखन एकटा खाइये लेलौं तखन एकटा आर खा लेबामे कोनो हर्ज नै छै। तैँ ओ एकटा आर गुलाबजामुन निकालि मुँहमे धरिते छल की पाँछासँ शर्माजीक कनियाँ ओकर केश पकडि घीचि लेलखिन्ह। असलमे खटपटक आवाज सुनि हुनकर निन्न टूटि गेल छलैन्हि। आब तँ मीतूक जे हाल भेलै से जूनि पूछू। मुँहमे गुलाबजामुन ठूँसल छलै तैँ ओ गोंगिया लागल। शर्माजीक कनियाँ ओकरा पर थापड आ लातक बौछार कए देलखिन्ह। संगे अपशब्दक नब महाकाव्यक रचना सेहो करैत पूरा घरकेँ जगा देलखिन्ह। सब मिलिकऽ मीतूक अपशब्द आ थापडक खोराक दए गेलखिन्ह। जखन ओ सब गारिक पूरा शब्दकोश पढि गेलखिन्ह आ मारैत हाथ दुखाबऽ लागलैन्हि तखन ओ सब हँपसैत ठाढ भऽ गेलथि। शर्माजीक कनियाँ मीतूक झोंटा घीचैत कहलखिन्ह जे हम सब प्रोग्रेसिभ छी, तैं छोडि देलियौ नै तँ आन रहितौ ने तँ बलि चढेने बिना नै छोडितौ। ई कहि ओ सब अपन बेडरूम दिस विदा भेलथि आ मीतू कानैत अपन बोरा लेने ओसारा दिस सुतै लेल बढि गेल। विहनि कथा- बीस टाका हम भोरे भोर उठि कऽ अपन बगीचा मे फूलक गाछ सब केँ पटबै छलहुँ। करीब सात-सवा सात बाजैत हेतै। तावत सडक दिस सँ हो-हल्ला सुनायल। हमर निवास मुख्य सडकक काते मे अछि, तैं सडक पर होय बला सब घटना आ दुर्घटना देखाइत आ सुनाइत रहैए। हम हल्ला सुनि सडक दिस ताकलहुँ। देखै छी जे हमर फाटकक ठीक सामने मे एकटा मिनी ट्रक लागल अछि आ ओकरा आगाँ एकटा सिपाही मोटरसाईकिल लगा कऽ ठाढ अछि। ओ सिपाही ट्रकक ड्राईवर केँ गरियौने जाईत छल आ ट्रक जब्त करबाक धमकी सेहो दऽ रहल छल। सिपाही कहलक- "नो इंट्रीक टाईम भऽ गेल छै आ तों सब ट्रक शहर मे ढुका देलही। आब चल थाना, जब्ती हेतौ ट्रकक। तोरा सबकेँ बूझल नै छौ जे सात बजेक बाद नो इंट्री भऽ जाइ छै।" ट्रक पर पाछाँ मे एकटा महीस छल आ ओइ महीसक संग एक गोटे ठाढ छल जे कने कडगर भऽ बाजल- "यौ सिपाही जी, एखनी सात बाजि कऽ पाँचे मिनट भेल छै आ हम सब शहर मे जखन ढुकल छलियै तखनी पौने साते बाजै छलै। आब ई नो इंट्री कोना भऽ गेलै। शहर मे ढुकबा काल ओतुक्का सिपाही जी केँ नजराना सेहो देने छियै, अहाँ मोबाईल सँ फोन कऽ कऽ बूझि लियौ।" आब तँ सिपाही जे बमकल से नै पूछू। सोझे ड्राईवर लग गेल आ बाजल- "पाछाँ मे ओकील चढेने छी की? सार हमरा कानून झाडैए। ओकरा तँ जे हम करबै से केलाक बादे बूझतै ओ .................., तू चाभी ला, ट्रक जब्त हेतौ। सात बाजि कऽ दस मिनट भऽ गेल छै आ नो इंट्री मे ट्रक ढुका कऽ कानून छाँटै जाइए।" ड्राईवर ऐ लाइनक पुरान खेलाड छल। ओ हाथ जोडैत कहलकै- "सरकार, कथी लए तमसाई छी। ओ मूर्ख छै। अहाँ हमरा सँ गप करू ने। हे ई लियऽ दस टाका चाह पानक खर्चा आ हमरा जाई दियऽ बड्ड दूर जेबाक छै।" सिपाही कने नरम होईत ओकर हाथक टाका दिस लुब्धता सँ ताकैत कहलक- "हे रौ तू होशियार बूझाईत छैं, मुदा दस टाका सँ काज नै चलतौ। बड्ड महगी छै, बीस टाका निकाल।" ड्राईवर बाजल- "पछिलो चौक पर पाई लेलखिन्ह सिपाही जी आ अगिलो चौक पर लेबे करथिन्ह। एकटा महीसक पाछाँ कतेक जगह काटब अहाँ सब। सरकार पएर पकडै छी, अहाँ एहि सँ काज चला लियऽ।" सिपाही गरमाईत कहलक- "चल थाना। टाईम खराप नै कर। बोहनी बेर मे भोरे भोर सबटा नाश नै कर। तोहर दिमाग ठेकाना पर नै छौ।" आब ओ ड्राईवर बूझि गेल रहै जे ई सिपाही मानै बला नै छै। ओ तुरत बीस टाका निकाललक आ सिपाही दिस बढेलक। सिपाही चारू कात देखैत मुट्ठी मे बीस टाका दाबलक आ चेतावनि दएत कहलक- "जो भाग जल्दी, तोहर नसीब ठीक छौ। बडा बाबूक नजरि मे जँ आबि गेलही बाउ तँ ओ बिनु एक सय केँ नै छोडथुन्ह। हुनकर मौर्निंग वाकक समय भऽ गेल छैन्ह। आबिते हेथुन्ह केम्हरो सँ।" ई कहैत ओ सिपाही अपन मोटरसाईकिल इस्टार्ट कएलक आ विदा भेल आ ट्रक सेहो दस मिनटक घेंघाउज आ बीस टाकाक दक्षिणाक बाद गन्तव्य दिस चलि देलक। राम विलास साहु दूटा विहनि कथा :: स्कूलक खिचड़ी एकटा अभिभावक तमसा कऽ स्कूल पहुँचलाह। हेड मास्टरकेँ उपराग दैत बजलाह- “पढ़ाइ-लिखाइ तँ जएह-सएह होइए। खाली खिचड़ीयेमे बेहाल रहै छी। जखन धिया-पुता पढ़बे नै करतै तखन तँ हाकिम-हुकुमक तँ बाते छोड़ू चपरासियो नै बनतै। एसँ नीक तँ प्राइवेटे स्कूल ने जइमे दूटा पाइये ने लगै छै, पढ़ाइ तँ नीक होइ छै। आइ तक ऐ स्कूलक बच्चा पढ़ि कऽ कोन नाम कमेलकै।” मास्टर सहाएब शान्त भावसँ अभिभावककेँ समझबैत बजलाह- “देखू, तमसाउ नै कोनो हम खिबै छी खिचरी। ई तँ सरकारक योजना छी। ऐ योजनासँ लाभो बहुत छै। निच्चासँ ऊपर धरि सभ माले-माल होइ छै।” अभिभावक बजलाह- “से केना?” मास्टर सहाएब कहलखिन- “सहीमे प्राइवेट स्कूलक बच्चा सभ पढ़ि-लिखि हाकिम-हुकुम बनै छै। आ ईहो देखैत हेबै जे ओ सभ माए-बाप, गाम-समाजकेँ छोड़ि एवं मातृभूमिकेँ बिसरि जाइए, बूझू बौर जाइए। से तँ ऐ स्कूलक बच्चामे नै हाेइए।” चोर-सिपाही माघ मास अन्हरिया राति। ओस-कुहेससँ हाथो-हाथ ने सुझैत। एकटा चोर चारि कऽ भागल जाइ छल। तखने एकटा सिपाही गस्तीमे आबि रहल छल। चोर सिपाहीकेँ देखिते भागल। चोर बूढ़ छल मुदा सिपाही बलंठ छलै। भागैत चोरकेँ रपटि कऽ पकड़लक सिपाही। पकड़ि हाजति लेने जाइ छल। चोरकेँ डंढ़ासँ देह थरथराइ छल। मने-मन ईहो सोचै छल जे केना ऐ यमराजक हाथसँ बचब। थोड़े आगू चलि कऽ देखल जे सड़कसँ हटि एकटा घूर रहै। आगि देखिते चोर बाजल- “सर, अहाँ एत्तै रहू आ हम ओइ धूरासँ कनी बिड़ी नेसने अबै छी?” सिपाही कने सोचि कऽ बाजल- “अरे, तूँ हमरा मूर्ख बुझै छेँ रे! आ जे तूँ भागि जेमे तँ हम तोरा पतालमे खोजबौ? चूपचाप एतए बैस हम अपनेसँ बीड़ी सुनगेने अबै छी।” चन्दन कुमार झा विहनि कथा- टटका रचना
लीलाधर बाबू एकटा कॉलेज मे प्रोफेसरी करैत छथि.प्रोफेसरी कि करताह, बुझू तऽ भरिदिन विभाग मे बैसल गप्प हँकैत छथि.मैथिली पढ़ैले कएक टा विद्यार्थी आब कॉलेज मे नाम लिखबैत अछि ? से सभ मैथिली प्रोफेसर सभकेँ बैसारी मे रहि-रहि कऽ जहिना किछु लिखबाक झोंक चढैत छैक तहिना पछिला करीब सात-आठ बरख सँ कलाधर बाबू के सेहो कखनो-काल चढैत छन्हि.प्रायः सब विधा मे कलम अजमा चुकल छथि मुदा मोशकिल जे एखनधरि स्थापित साहित्यकार नहि भऽ सकलाह.अछैतो रचना आ' किताब छपेबा हेतु पुँजीके किताब नहि छपा रहल छथि.सोचैत छथि जे पहिने किताब पढैबला तऽ ताकि ली.विभिन्न पत्रिका के नियमित पाठकक सदस्यता ग्रहण कयने छथि, बस अही लोभे जे एहि पत्रिका सभ मे हुनको रचना छपन्हि.मुदा संपादक, आ' तहू मे मैथिली के विद्वान तऽ अपने कम्म टेड़ियाह नहि होइछ से हिनकर पठाओल रचना सभकेँ कोनो पत्रिका मे उचित स्थान नहि भेटैत छन्हि.एहि समस्या सँ त्राणक खातिर विचार भेलन्हि जे किएक ने संपादक जी सँ मुखोत्तरी अनुरोध कएल जाए आ' से एकटा संपादक ल'ग पहुचलाह.नमस्कार-पाती आ' परिचय-पातक बाद लीलाधर बाबू अपन दूटा टटका रचना संपादक दिश बढ़बैत बजलाह- " कने एकरा देखल जाओ.ई हमर एकदम्म टटका रचना अछि.अपन पत्रिकाक अगिला अंक मे शामिल करी से अनुरोध." फेर भेलन्हि जे ई विनय-वचन हुनक प्रोफेसरक कद के देखैत संपादक महोदय के कही हल्लुक नहि लागल होन्हि तइँ कनेक आर पालिश करैत बजलाह -" एहि प्रतिष्ठित पत्रिका मे यदि हमर रचना के अपने जगह देब तऽ ई हमरा लेल गौरवक गप्प होयत". संगहि जोड़ति गेलाह जे-"हम एहि पत्रिकाक नियमित पाठक सेहो छी". संपादक महोदय रचना पर अपन कैंचिआयल दृष्टि देलाक बाद कहलखिन्ह - " ओना तऽ ठिक्के अछि मुदा हम अपन पत्रिका मे जे स्तर के रचना छपैत छियैक ताहि अनुरूपेँ कनेक हल्लुक बुझना जाइत अछि". फेर भेलन्हि जे कहीँ एकटा नियमित पाठक ने हाथ से छिटकि जान्हि से बात के सम्हारैत बजलाह- "ठीक छैक, एखन ई रचना राखि दियौक,हम छपबाक कोशिश करब". लीलाधर बाबू केँ अपन रचनाक संग होइ बला लीला के भान भऽ गेल रहन्हि.ओ चोट्टहि संपादक महोदय सँ विदा लेलाह.जखन दू मास बीत गेलैक तऽ एकबेर फेर लीलाधर बाबू ओहि संपादक महोदय के कार्यालय मे जुमि गेलाह. संपादक महोदय के पुरना गाहकि मोन पड़लनि आ लीलाधर बाबू के संबोधित करैत बजलाह-" ओ..की कहू...पछिला दू मास मे ततेक ने रचना सभ आबि गेलैक जे अपनेक के रचना के हम जगह नहि दऽ पौलहु.लेकिन अगिला अंक मे...." लीलाधर बाबू हुनकर बात के बिच्चहि मे कटैत बाजि उठलाह-" कोनो बात नहि...हम ओहि रचनाक मादेँ अपने सँ पुछारी करय लेल नहि आयल छी". आ फेर एकटा विजीटिंग कार्ड संपादक महोदय दिश बढ़बैत बजलाह जे - " ई हमर संपादन मे नव पत्रिका बहार होमय जा' रहल अछि. हम जनैत छी जे संपादक के अपने पत्रिका मे अपन रचना छापब उचित नहि बुझाइत छन्हि.तइँ अहाँ ल'ग यदि कोनो टटका आ' प्रकाशन योग्य रचना हो तऽ अवश्य प्रेषित करी". संपादक महोदय झट दऽ टेबुलक दराज मे अपन टटका रचना ताकय लगलाह....अगिला अंक सँ लीलाधर बाबूक रचना सभ सेहो पत्रिका सभ मे छपय लागल. मुन्नी कामत विहनि कथा टूटल मन एगो जान छल हमरा संगे, ९ महिनाक सुख-दुखक संगी। अनेकानेक सपना हमर, अनेक सवालक जवाब छल। बहुत खुश रहए हमर परिवार। रहै इंतजार सबहक नयनमे कि कहिया ई मास खत्म हएत आ गुॅंजत किलकारी आंगनमे। आइ ओ इंतजार खत्म भेल। हम एगो मासूमकेँ जन्म देलौं, हम अपन अंशकेँ ऐ संसारमे आनलौं। हमरा लेल ओ ने बेटा छल ने बेटी। बस हमर संतति छल, हमर अरमान, हमर सपना, हमर भविष्य छल। पर कोइ नै बुझलक हमर ई आश, कहलक कि दुनियामे आँखि खोलैसँ पहिले ओ आँखि मूइन लेने छल। हम संतोष कइर लेलौं, ई नै बुझलौं कि बेटाक लालचमे ओ बेटीकेँ माइर देलनि। जे हाथ ओइ मासुमक गला पर छल उ एक बेर नै कांपल, ओकर कान अकर रूदनकेँ नै सुनलक। ई हमरे टा नै बहुत नारीक कथा छी। हम अवला नै पर ऐ समाज आ अपनाकेँ आगु अवला बनैल गेल छी, जबतक हम जुर्म सहैत रहै छी तबतक हम परित्याग, शांति आ ममताक मूर्ति छी। जब ओकर जुर्मकेँ आगु खरा उतरै छी तँ हम कुलच्छनी आ कलंकनी छी। आखिर हमहूँ ऐ संसारक गारीक एगो पहिया छी, अगर एगो पहिया निकलि जएत तँ असगर कतेक दूर तक अहाँ नै संसारकेँ लऽ जा सकब। कहिया तक बेटीक बली चढ़बैत रहब आ मायक कलेजाकेँ छन्नी-छन्नी करैत रहब। जगदानन्द झा मनु रोटीक स्वाद आई दस बर्खक बाद कियोक पाहून छोटकी काकीक अँगना एलैंह | पहुनो परख गरीबक घर अँगना किएक एता | छोटकी काकी ओनाहितो गरीब मसोमात एहनठाम कि सेबासत्कार भेटक उम्मीद | पाहुनो केँ तँ हुनकर बहिनक बेटा | ओकरा ओ बारह बर्ख पहीले देखने रहथि आ आब ओ सत्रह बरखक पाँच हाथक जबान भए गेल अछि | आबिते अपन मौसी केँ पएर छू कए गोर लगलक | "केँ बौआ चिन्हलहुँ नहि ?" "मौसी ! हम लोटन, अहाँक बहीन मालती केँ बेटा |" मौसी (छोटकी काकी) दुनू हाथे स्नेह सँ लोटन केँ माथ पकैर अपन करेजा सँ सटा -" चिन्हबौ कोना, मूडने में पाँच बर्खक अवस्था में जे देखलीयै से देखने देखने, आई कोना ई गरीब मौसीक इआद आबि गेलौ |" लोटन - "मौसी मधुबनी में हमर परीक्षाक सेंटर परल छल आई परीक्षा खत्म भेल तँ मोन में भेल मौसीक घर सौराठ तँ एहिठाम सँ कनिके दूर छैक भेट कए आबि " मौसी -" जुग- जुग जीबअ नेन्ना, एहि दुखिया मौसीक इआद तँ रहलै | आ मालती केहन ? ओझाजी केहन ?" लोटन -"सब कियो एकदम फस्ट किलास, दनादन, ओ सब आब छोरु पहिले किछ नास्ता कराऊ, मधुबनी सँ सौराठ पएरे अबैत-अबैत बड्ड भूख लागि गेल |" सुनिते मातर मौसीक छाती में धक सँ उठल, ओ मने- मन सोचए लगलि - नेन्ना केँ की खुवाऊ ? घर में किछो नहि अपने तँ माँगि बेसए क गुजरा कए लै छी एकर नास्ता भोजनक व्यवस्था कतए सँ होएत | " हुनक सोच केँ बिचे में तोरैत लोटन फेर सँ बाजल -" मौसी जल्दी बड्ड भूख लागल |" अपना केँ सम्हारैत मौसी -"हाँ एखने हम भात, दालि, भुजिया, तरुआ, नीक सँ बना कए नेन्ना केँ दै छी, अहाँ कनी बैसू |" इ कहैत मौसी भंसा घर दिस बिदा भेली, जहन की हुनका बुझल जे घर में किछ नहि अछि | मुदा हुनका पाँछा-पाँछा लोटन सेहो आबि -" नहि मौसी एतेक काल हम नहि रुकब पाँच बजे मधुबनी सँ बाबूबरहीक अन्तीम बस छै आ चारि एखने बाजि गेलै |" मौसी अपन घरक हालत देखि लोटनक गप्पक उतर नहि दए सोचय लगलि - "आह ! मजबूरी नेन्ना केँ रूकैयो लेल नहि कैह सकै छी |" एतबा में लोटन भंसा घरक बर्तन सब केँ देखि बाजल -" एहि बर्तन सब में सँ जे किछ अछि दए दिए |' "हे राम !"- मौसीक मन कनाल, बर्तन में किछ रहैक तहन नहि | आगु हुनक मूह बंद भए गेलैंह, बकोर लगले केँ लगले रहलनि | बड्ड सहास सँ गप्प केँ समटैत बजली -"नहि बौआ किछ नहि छौ, हम एखने बिना देरी केने बनाबै छी |" लोटन -"नहि नहि मौसी बनाबै केँ नहि छै, बस छुटि जाएत |" एतबे में लोटनक नजैर टीनही ढकना सँ झाँपल कोनो समान पर परल | आगु जा ढकना उठा -"हे मौसी ई की ?" मौसी अबाक, कि बजति, पहील बेर नेन्ना आएल आ ओकरा खूददीक रोटी खुआउ ओहो राइते केँ बनल | राति में एकटा खूददीक रोटी बनेने रहथि, आधा खा आधा ढकनी सँ झाँपि राइख देने रहथि | लोटन ओहि रोटी केँ दाँत सँ काटि कए खाइत आगाँ बाजल -" एतेक नीक रोटी तँ हम कहीयो खेन्हें नहि छलहुँ, मए तँ खाली छाल्ही भात, दूध-भात, दूध-रोटी, खुआ-खुआ कए मोन घोर क दैए | आहा एतेक स्वाद तँ पहील बेर भेट रहल अछि |" मौसी लोटनक गप्प आ ओकर खएक तेजी देख बजली - "रुक-रुक कनी आचारो तँ आनि देबअ दए |" ई कहि मौसी अचार ताकै लेल एम्हर -उम्हर ताकै लगली मुदा अचार कतौ रहै तहन तँ भेटै | लोटन -"रहअ दीयौ, एतेक नीक इ मोटका रोटी रहै अचार केँ कोन काज | रोटी तँ खतम भए गेल | मौसी बकर-बकर ओकर मूह तकैत रहली | लोटन -" अच्छा आब हम जाई छी, घर देख लेलीयै फेर मधुबनी एलहुँ तँ अहाँ लग जरुर आएब, मुदा हाँ एहने नीकगर मोटका रोटी बनेने रहब " इ कहैत मौसी केँ गोर लागि लोटन गोली जकाँ बाहर आबि गेल | मुदा बाहर एला बाद मौसीक दयनीय हालत देखि ओकर दुनू आँखि सँ नोरक धार बहैत रहै |
अन्तिम जगह फेकना | मए बाऊ की नाम रखलकै गाम में केकरो नहि बुझल आ किंचीत ओकरा अपनों इआद होए की नहि | ओ एहि उपनाम सँ गाम भरि में जानल जाइत छल | खेतिहर मजदूर मुदा जीवन भरि उर्मील बाबूक छोरि दोसर केँ खेत पर काज नहि कएलक | हुनके जमीन पर जनमल आ हुनक एवं हुनके परिवार केँ जीवन भरि सेबा करैत एहि संसार सँ अपन पार्थिक शरीर छोरि बिदा भए गेल | जेकर जन्म भेलैक ओकर मृत्यु निश्चिन्त छैक एहि सत्य केँ मोन राखि फेकनाक समांग सब ओकर अन्तिम क्रियाक तैयारी में लागि गेल | उर्मिल बाबू नोत पुरै लेल दोसर गाम गेल रहथि | गामक सीमा में पएर राखिते मांतर कएकरो सँ फेकनाक मृत्युक समाचार भेट गेलैंह | सुनि दुखी मोने घर दिस डेग झटकारलैंह | किछु दूर एला बाद रस्ते में हुनका फेकनाक शवयात्राक दर्शन भेलैंह | फेकनाक समांग सभ हुनका देख ठमैक गेल | उर्मिल बाबू चटे जा कए फेकनाक झाँपल मूह उघारि ओकरा मूह देखला आ नम आँखि सँ फेकनाक बेटा सँ पूछलथि - "अग्निदाह केँ व्यबस्था कतए छैक |" " ठूठी गाछी में मालीक |" " दूर बुरि कहिंके, कनीक हमरो आबैक इंतजार तँ करै जैतअ, जीवन भरि हमर जमीन पर काज केलक आ आब मूइला बाद ठूठी गाछी.... | चलअ हमर कsलम चलअ, हमर कsलम में नहि जगह केँ कमी अछि आ नहि गाछक ओतए दुनूक व्यबस्था छैक " ई कहैत उर्मिलबाबू आगू-आगू आ सभ हुनक पाछु-पाछु हुनकर कsलम दीस बिदा भए गेल | जवाहर लाल काश्यप विहनि कथा जमाना बदलि गेलै रमेश बाबा दलान पर बैसल रहैत आ रामायण गाबैत छलाह। बाहर दू टा बच्चा खेल रहल छल । ओ दुनु बहुत हल्ला कऽ रहल छल जइ लेल बाबा केँ बहुत दिक्कत भऽ रहल छल । ओ बेर- बेर बच्चा केँ चुप रहय लेल कहैत छलाह मुदा बच्चा चुप नहि भऽ रहल छल। ई देखि हमरा सेहो तामस आबि गेल । हम दुनु बच्चा केँ दु थापर लगा देलियै । बच्चा कानैत आंगन चलि गेल । आंगन मे बच्चा केँ माय पुछलखिन्ह "के मारलकौ"? बाबा हमरा कहलथि बौआ जमाना बदलि गेलै । पहिले जे बच्चा आंगन मे कानैत पहुँचैत छल तँ माय पुछैत छल किएक मारलखुन्ह ? अर्थात कि गलती केलहीं, आब पुछैत अछि के मारलकौ"? मतलब ककर अतेक हिम्मत भेलै जे तोरा मारलकौ । कामिनी कामायनी लघुकथा कलंकित चान ओ टूहटूह इजोरिया . . सम्पूर्ण आकाश पर पूर्ण चंद्रक एकाधिपत्य. .दूर दूर धरि ठहक्का मारैत चॉदनी।नीचाधरती पर शीतल अमृतक धार .. ।ओहि निरमल धार सॅ सींचल गाछ . बिरीछ .खरिहान. दलान . .. बाडी झाडी .. ।पूबरिया बाडी मे पतियानी लागल केरा के गाछ .. मे लटकल घौंद .. .नीचा आलू के फसील .. . ओही इजोरिया राति मे सब किछु एक दम फरिच्छ देखाए पडैत छल । शंभु बाबू के भरि भरि रात नीन्न नै होबैत छलैन्ह. . चारि दिन पहिनहि जेहल सॅ छुटि क’ आयल छलाह .. .अंगरेजक जमाना. . क्रांतिकारी सब के घातक अपराधी मानि लोमहर्षक यातना देल जाए. दुनु टांग बान्धि क’ टेबुल पर राखि ओ मोटका हंटरक मारि .. .. दनादन . .बेहोश सेहो नै रहै दे. . पानि पिया पिया क’ होश मे आने . .पानियो भरि छांक नै पीबै दै .. घोंट भरि दैत गिलास झीक लैक़ . पानि पीयाबए बला .. हंटर बरसाबए बाला सब स्वदेशी .। .मात्र एक गोट. . ललका मूॅह वाला बिलाडि के ऑखि वाला . .अफसर अंगरेज़ ।. .. ओ प्रताडना ओ कष्ट .. सात दिन कोना एकांत वास .. ई सब हुनक दिमाग के भॅभोरि क’ राखि देने छल. .त’ ओहि मे सुखद सुमंगल नीन्न क’ प्रवेश हो त’ कोना हो । ओ पीडादायी .. एकाकी जीवन सॅ बचबा लेल लोक पैलवार आ’ समाजक निर्माण कएने अछि. ।किएक त’ ओ सामाजिक प्राणी अछि ।किछु मे त’ लागल रहैत अछि जा धरि धरती पर रहैत अछि। स्वराज्य क’लेल लडय वला के उद्देश्य सेहो सएह छल नै कि अपन समाज पर अपन बनाओल कानून के मध्य जीवन यापन करब . .ई विदेशिया सब हक गुलामी आ’ अत्याचार किएक सहब ।हॅ .. नीन्न नैं अबैन्ह त’ मोन दुनिया जहानक’ खोंचि खॉचि मे ओझरा जाएन्ह । ई भरिपोख इजोरिया के आनंद .. . .. ।अपन दलान पर ओ एसगरे नै सुतैत छलाह . .चारि टा खटिया आ’ पॉच टा चौकी आओर बिछैल छलै. . सब पटोपट .. .नीन्न क’ जादूगरनी खाली हिनके लग नहिं आबि रहल छल ।मोन भेलैन्ह. . .बिछौन सॅ उठि क’ रस्ता पर टहली. . आलस लगलैन्ह. . . ..मोन अपन खुरलुच्ची पन मे लागल. . नचबैत रहल बडी काल धरि. . ।जखन लग्घी लगलैन्ह. . त’ उठैए पडलैन्ह. . ।दलान क’ ठीक सोझॉ रस्ता छलै आ’ तकरा लगले हुनकर आ माझिल भायक खरिहान. .. . .सात भायक भैयारी मे बखरा बॉट हाले मे भेल रहे. . पहिने त’ साझीए छलैथ सब कियो. . मेल जोल पूर्ववत ..बीच मे रस्ता खरिहान आ’ दुनु कात सबहक पोखरा पाटन घर दुआरि. . .।बडका भायक घराडी . .पूबरीया बाडी के दहिन .. बाम कात भालसरिक . . आम लताम .कागजी नेबो अररनेबा क मध्य मे मुस्कैत कदंबक गाछ ठाढ़ । अहि टूह टूह इजोरिया मे सब किछु ओहिना चमकैत देखाय पडि रहल छल ।मौसम कनि सर्दियाय लागल छलै. . कनि कनि धुऑ धुऑ सन . .सेहो लगैक़ . मुदा ई धुॅआ सेहो पघिलल चानी सन लगैक।खरिहानक दॉया कात गोहाली. .एक कोठरी मे चारू गाय पागुर करैत दोसर मे बरद चारू. . मूॅह तकैत बैसल. . लग पास के चार सब पर सजमनि कदीमा भथुआ . के लत्ती छारल . ..सब टा मिल क’ बड सुन्नर दृश्य उपस्थित करैत छल . .।एकरे सब के निहारैत निहारैत औचक हुनक धियान. . कदंबक गाछ तरि ऊज्जर नूआ मे बुलैत स्त्री पर पडलैन्ह .. एक छन के लेल देह क’ रोईयॉ रोईया ठाढ भ’ गेलन्हि. . . . किंस्यात कोनो चुडैल. . पिशाचिन .. .ओहिना बाट पर ठाढ दम सधने ओ नाशै रोग हरै सब पीडा. . .सुमिरैत ओकरे परनजरि गडौने रहला ।नैं बड लाम नै बड छोट. . मध्यम कद काठी के . . .देखैत देखैत. . कदंबक गाछ तरि जाकए विलिन भ’ गेलए. .।सब टा भूतक सुनलाहा खिस्सा मोन पडए लगलैन्ह।अहि टोल मे . .सैझला भायक पुतौह सोईरीए मे मूईल छलिह. .चिल्का जीबैत रहि गेल छल. . ।लोक कहै .. एहेन स्त्री के आत्मा अपन बच्चा पर लागल रहै छै. . ओ ओकरा पर झपट्टा मारए के फेराक मे राति भरि अहुरिया कटैत रहै छै . .।कियो कियो कदंबक गाछ तर अधरतिया मे कानब के स्वर सेहो सुनैक़. ।कियो . .बाडी मे .. पोखरिक महाड पर केश छिटकौने नचैत सेहो देखै. . मुदा नेने सॅ क्रान्तिकारी आदमी. .हुनका अहि सब पर कहियो विसबास नै भेलन्हि. . तखन ज्ञात जगत सॅ बेसी रहस्यमय अज्ञात लोक अछि. . । मुदा ओ त’ बीसीये.ा बरख पहिनुक्का खिस्सा अछि ।कनिए काल मे एक गोट लमगर पुरूख सेहो दृष्टिगोचर भेल रहे. .ओहो ओहि कदंबक गाछ तरि विलिन. . ओहि गाछक पिछुआति मे बडका गाछी छलै. . ।ओ चौंकला . .एहेन लीला त’ ओ भूत परेतक कहियो नहिं सुनने छलैथि. . अहि गंभीर चिंता मे डूबल छलाह कि कखन नीन्न आबि दबोचलकैन्ह . नहिं पता ।बडका मोटका लोहा के हथकडी . . .हंटर. . आ ..लोम हर्षक चित्कार . कियो हुनक टांग झीक रहल छल. . ड़रौन स्वप्न सॅ घबडाक’ ओ ऑखि खोलला. त’ फरिच्छ भ’ गेल छलै. . खुभिया खबास. .आबि क हुनक पएर जॉति रहल छल .। ओकरा संगे अपन खेत पथार गाछी देखैत . ..ओ रतुका प्रसंग उठौलाह . .मस्तिष्क मे बाध बोन के स्थान परवएह घुमि रहल छल ।खुभिया बड बुधियार. .एक एक आखर सोचि समझि क’ बाजए बला . .आज्ञाकारी सेहो . .हुनके समवयस्क .. .ओकर पूरा खानदान हुनके सबहक रैयत . .।रतुका प्रसंग पर ओहो अपन अकिल लगबैत चुडैल . .राकसक गप के समर्थन कएने छल । दुपहरिया मे ओ अपन दलान सॅ टहलैत बुलैत . . खरिहान. . पूबरिया बाडी के नांघैत. . कदंबक दिस गेला .. ओ त’ बडका कका के घरक पछुऔत छल . .दलान त’ हुनक दलान सॅ सोझे देखान्हि .. मुदा घर खरिहान क ऊत्तर बारी मे बनल गोहाली सॅ झॅपा जाए छलै. कदंबक गाछ दिस एकदम एकांत .. ऊम्हर राहडि सॅ भरल खेत. . इम्हर ओम्हर केरा के ढेर रास गाछ .. . . . नीचा जमीन एकदम साफ़ . .एकदम अ’ड ।दिनों मे कियो नुकैल लोक के देख नहि सकैत छल .. .।आ’ अहि गुनथुन मे सुरूज महाराज अपन सातों घोडा के हॉकैत हाफैत . .अपस्यात भेल . पच्छिम क्षितीज पर अस्त होयबाक ओरियौन करि रहल छला ।.अपन . सुवर्णमयी रश्मि के खिहारि खिहारि क पकडैत अन्ततः अस्तगामी भेला ।ताहि समय मे सूरूज डूबबा सॅ पहिनहीए घरक चार सॅ उठैत धॅू स्वच्छ आकास के मलीन करए लागै. . ई धूॅआ कतै पैघ संकेत छलै समाज मे . .।जांै केकरो घर सॅ एकोदिन धूॅआ नै निकलै. . पडोसिया स हजो पीसी तुरंत टोकि दै.थ . “आय यै . .अहॉ के घर मे काल्हि चूल्हि नै जरल की . .।’ आ ओ गिरहस्थिन डब डब भरल ऑखि सॅ नीचा तकैत नहूॅ नहूॅ बाजि उठे ‘कि कहै छथीन . .बहिन. . . घर मे एक टा दाना नै छै. . धिया पुत्ता सब के बाडी झाडी सॅ लताम तोडि क’ द’ देलियै. . .हिन्कर मोन खराप छन्हि . .केना की करीयै . .किछु नै फुरैत अछि. ।’ “ अॅ यै हमरा अछैत अहॉ उपास पडब . . .सुइद मूर लगा क’ द’ देब जहिया हैत. आय ई पसेरी भरि अन्न राखू .।’ आ’ तुरंत चूल्हि पजरि जाए । सांझे सकाले खा पीबी क’ पुरूष पात अपन अपन दलान ध’ लैथ छलैथ .।स््रत्रीगण क’ राज त’ घरे अांगन टा मे. . .छहरि देबार क’भीतर ओ सब शेरनी .बीर बंकाडा ..।मुदा जखने घर सॅ बाहरि के कोनो काज पडै. . त’ होश हवास गुम. .तखन पॉच बरखक पुरूष बच्चा से हो हुनका सब पर भारी पडय लागै. . ।पुरूषक एतेक वर्चस्व एहै जे . .स्त्री की गाछ बिरीछ सेहो डरे थरथर कॉपै ।स्त्री आ’ पुरूष के गिरहस्थी रूपी गाडी के दूनू पहिया मानल गेल अछि . तखन दूनू मे एतेक विभेद किएक़ . .शंभू बाबू स्त्री शिक्षा के पक्षधर छलाह .. . . .ओ राजा राम मोहन राय . .केशव चन्द्र सेन. . गॉधी. .नेहरू सॅ विशेष प्रभावित छलाह .हुनके सह पर सम्पूर्ण परोपट्टाके स्त्रीगण तकली :टकुआः आ चरखा पर सूत काटि क’ दैन्ह आ’ ओ मधुबनी जा कए खादी भराड मे जमा क’ दैथ. . ओही ठाम सॅ बांग .. :तूर : आनि क’ सेहो वएह देथ ।घर पैलवार के सबसॅ छोट भाय. .हुनकर गप गॉधी जी सुनने छलथि. . पंचकोशी के क्रान्तिकारी जुवक सब सुनै छल. .बहिन ..भौजाय. . भतीजी सब के चिठ्ठी पतरी लिखए जोगर पढाय वएह करौने छलथि .। राति आयल ।फेर वएह उछन्नर .. नीन्न हुनक लग पास आबि के सब के बेसुध करि दै. . मुदा हिनका छकाबए लागैन्ह. . ।निशा रात्रि . .. चारहु कात. .सुन मसान . बाध बोन सॅ नढिया .गीदडि . .कूकूर क कानब. भौंकब ।वएह टूह टूह इजोरिया .. फेर सॅ आकाश देवी धरती परअपन अमृत घट ऊझीलबा लेल उत्सुक . . .शीतल बयार बहय लगलै. . ।आ’ ई कहबी जे अद्र्व रात्रि मे भूत प्रेत भ्रमण करैत रहै छै. . हुनका बड अनसोहॉत लागैन्ह . .।ई त’ ब्रम्ह सॅ साक्षात्कार करबा क’ मुर्हूत अछि ।मोन अहिना बऊआबैत ढहनाबैत .. . .अॅखि के अपना संग नेने ओही कदंबक गाछ तरि स्थिर भेल ।रतौंधी बला बुढबा चौकीदरबा के स्वर से हो बन्न भ’ गेल छलै।मुदा आय कोनो परि वा चुडैलएखन धरि नहिं आयल छल । आ’ हुनका भेलन्ह किंस्यात भ्रम भेल होयन्हि । . .एहेन पवित्र जगह मे .. कदंब .केरा .नेबो लग कतो ओहेन ओहेन अतृप्त आत्मा भटकै । आकाश मे पितडिया थारी जकॉ पूर्ण शशि अपन हास परिहास मे लागल छल .दुधिया चांदनी. .बरैक बरैक क’ ओस बिन्दु के रूप धरि थारी सॅ खसैत रहल छल . .।आब हुनक धियान सबहक दलान .चार .. खपडैल . .कोठा खरिहान गाछ बिरीछ सॅ ढनमनाइत. . .लग पास मे सूतल चारि टा खाट आ’ पॉच टा चौकी पर सूतल पैघ भाय आ’ बेटा भातीज सब सॅ निकसि विधु प पडलन्हि कतेक सुन्नर . . जेकर सहोदर बिष हुए. जे खारा पानि सॅ उत्पन्न . .अशांत उद्विघ्न जननी के कोखि सॅ एहेन शीतल सुन्नर संतान के जन्म . .कुदरत वा ईश्वर. . अपरंपार हुनक लीला ।चरखा चलबैत झूकल बुढिया जेना इसारा सॅ हुनका दिस सोमरस फेंकलकैन्ह. . ओ लोकि क’ पीने छलाह. . .।टुन टुन. . छमछम . .अप्सरा . .नाचि रहल अछि. . इन्द्रक दरबार मे. . घूॅघरू आ’ तबला के जुगलबन्दी. . वाह वाह .. अप्सरा जीत रहल अछि .. झन झनन . .झन .. नीन्नटूटि गेलन्हि. . परात भ’ गेल छलै. . .बरदक गरा मे बान्हल छोट छोट घंटी बाजि रहल छल. .कत्तो कियो पराती गाबि रहल छल. .।खुभिया आय हर जोतय लेल बरदक सेवा मे अन्हारे सॅ लागि गेल छल ।नींमक ‘ठारि नमा क’ दतमनि तोडला आ’ ओहो खुभिया संगे भमरा बाला खेत पहुॅचला “एतेक चाकर चौरस खेत अहि चऽऽर मे ककरो नैं छै भायजी ।’खुभिया जहन कहलकै .. त’ ओ गॅहिया क’ चारूकात हेरए लगला. . गौरव सॅ हुनक सीना आओर चौडा भ’ गेल छल ।खेतक कनिए कात सॅ बडका नदी के धार बहै छलै .. ..मुदा ओहि दिस सॅ ओय खेतक लेल .. कोनो विघ्न नैं छलै. . माटि कटबा के कोनो भय फिलहाल त’ नहिए छल ।लहलह करैत धान अगहन्नी. . ।किछु आओर अपन खेत घुमए लेल दूर दराज मे देखाए पडि रहल छल ।पहिनुका जमाना .बॅटेदार सब सेहो ईमान बाला. . मालिकक घरक भले पॉच बरखक बच्चे किएक नै ठाढ होय. .. हुनका परोछ मे.. कटनी नै करै ।एक एक टा खेत सोना उपजै छलै सोना . .सबहक दलान पर पुआरक बडका बडका टाल .. . . किछु के बडका बडका बखारी सब दूरे सॅ झलकै. . अन्न पानि राखए लेल. . माटिक कोठी त’ घरे घर छईए छल ।छोट सॅ छोट जमीन बाला के साल भरि क’ फसल त’ निकलिए जाए । जखन भूतही बलान मे बाडि आबै तै बरख त’ तबाही मचबे करैक ।ओना कृषि प्रधान समाज मे गामक सबलोकक पेट त’ भरिए जाए .. ओय समे के जाए छलै कमाबए लेल परदेस. . ताहू मे तिरहुतिया सब .. बड कम . .. ।हॅ आन आन जगह के लोग त’ ताहू समय मे त्रिनिदाद. . मॉरिशस. . कत्तएकहॉ नै जाए .. आ जौं लोक गेलो हेताह त’ हुनक भत्र्सने भेल हेतन्हि तत्कालिन समाज मे. . ।किछु पंडित सब .. बंगाल चलि गेला. . किछु आगरा. काशी .जयपुर आदि आदि जगह .. मुदा तखन हुनक भॉति भॉतिक कपोल कल्पित खिस्सा जन साधारणक मनोरंजन सेहो करैक । धीरे धीरे अंधेरिया राति होमय लगलै .. आब दृष्टि ओतेक ताकतबर नहिं लगै .. चारहू कात घुप्प अन्हार. . सबहक दलान पर मद्विम करि क’ जरैत लालटेम . ..पन्दरह दिन धरि प्रकृति के लटारम अहिना चल्ौत रहल .. आकास मे चमकैत .. कोटि कोटि तरेगन. . .फेर इजोरिया आबए लेल जोर मारए लागल छलै. ।अध रतिया क’ कनिक टा के चान आबि धरती के छबि निहारए लागै । आय राति मे . . . .जखन ओ गायत्री जप करैत बैसल छलाह .. फेर देखैत छथि. . अहि बेर स्त्री के माथ पर नूआ नै बडका बडका झमटगर केश. . .ओ बडका कका के दलान दिस बढल मुदा फेर ओ कदंबक गाछ दिस मुडि गेल. .।कनिए काल मे .. एक गोट लमगर पुरूष . .बडका कका के दलान सॅ उतरि धड झुकौने ओहि कदंबक गाछ मे विलिन भ’ गेल । अकस्मात हुनक मस्तिष्क मे कौंधलन्हि ई त’ काशी थीक बडका कका के पूत. . . .मुदा ओ स्त्री . . .ओ . .. के .. . ्र.।आ अही प्रश्नक उत्तर प्राप्त केनाय हुनका लेल अंगे्रज के देश सॅ खदेडनाय सॅ बेशी आवश्यक बुझाय पडय लागल छलैन्ह ।एक मोन भेलैन्ह जे पएर दाबि क’ एकर पछोर धैल जाए . .. . मुदा दोसरे छन अपन छुद्र विचार पर हुनका ग्लानि भेलन्हि ।नीक बेजाए . .पाप पुण्यक तत्व मीमांसा मे पौडैत हुनका ओंघी धरि दबोचलकन्हि । कएक दिन धरि बडका बडका केस हुनक मोन के ऊनक बडका गुच्छा जकॉ ओझरेने रहलन्हि . .ककरा सॅ पूछि. . .कोना की सोचतै लोक़ . ।मुदा नहि रहल गेलन्हि त’ भोजन समाप्त केला के बाद आने माने सॅ ज्योतिषक खिस्सा सुनबैत बजलैथ ‘स्त्री के बडका बडका केस. . डाढ सॅ नीचा . .ओकरा राजरानी बनबै छैक़ . ।’ अहि प्रसंग प. भॉति भॉति के मुॅह बिचकबैत. . हुनक . .गृहस्वामिनी बजलीह ‘ऐंऽऽऽऽऽऽऽऽऽह अंगोरा . . .बडका कका जे बूढ मे छौडी बियाहि क’ अनने छलथि. . से त’ बरकेसा रानी अछि. . ड़ाढ सॅ नीचा नागीन जकॉ लहरैत मोटका जुट्टी. . .मुदा राजरानी के कोनो लच्छन त’ नहिं देखाय पडलै ककरो ।सोलहम बरख होईत होई त कका के सेहो सुरधाम पठा देलकन्हि ।एक टा मुसरी धरि के जनम नहिं द’ सकलै बेचारो. ..जीब रहल छथि सतवा पूत आ’ पूतौहक नौडी बनि ।कत्तेक गंजन करै छन्हि .. सनतीया के माए. . ।’ बस . . .हुनका सूत्र वाक्य भेंट गेल छलैन्ह । जड काल नीक जकॉ सुरू भ’ गेल छल. . मोफलर सॅ कान बन्हने. . मोटका चद्दरि ओढने . . बाध मे बूलैत काल खुभीया सॅ बजला. “ ऐं रौ. . . .हमरा टोल मे भूत आ’ चुडैल क’ खेल कोना संभव छै .. . .. ई यज्ञ भूमि. . . हमर बाबा परबाबा कतेक रास यज्ञ .हवन पूजा पाठ केन्ो छलैथ एतय .. ।’ खुभिया गुमसुम . .माथ झुकौने धार क पानि मे उमकैत माछ सबके हेरैत रहल छल ।कनि काल बिलमि क’ बाजल ‘भायजी . . .जौं अहॉ सराप नै दी आ’ खराप . नै मानी त’ एक टा एकान्ति हमरो आहॉ सॅ करबा के लालसा छल ।’ ‘केहेन गप करए छ .. तोरा एहेन लोकके आय धरि कियो गारि वा सराप त’ कात जाओ कियो रे कारो करि क’ बाजल छ. . तू अपने एतेक बुद्वियार. . पैघ छोट के आदर करए वला . .एहेन विचार तोरा मन मे कोना एलो .. तू त’ हमर सबस बिसबासी लोक छ . ।’ बड गहीड सॉस खीचैत बाजल. . “मुदा ई गप जौं तेसरा के कान मे जेतै. . त’ हमर सबहक जीबन परलय भ जेतै ।’ “नै नै. . हे ले. .हम अप्पन जनेऊ के सप्पत खाए छी ..तेसर कान मे त’ हमरा मुॅह सॅ नहिए जयतौ. . ।’ “भायजी. . हमर आंगन बाली बडका कका के घराडी पर काज करै छै .. . एक दिन बडकी काकी ओकरा सप्पत द’ क’ पेट गिराबए के दबाय दोसरा गाम के एक टा बैद सॅ म्ांगबौलखिन्ह .. ।आ’ ई कहलखिन्ह जे जौ कियो जानत त’ हम जहर माहूर खा क’ त’ मरि जाएब . .आ’ ई पाप तोरे माथ पर जेतौ .. तोहर बाल बच्चा परजेतौ. . ।’हम त’ ओहि दिन बुझि गेल रहिए .. .मुदा डरे हम की बजितौं . .कासी बाबू सेहो आबि क’ हमरा दूनू परानी के धमका क’ गेल छलखिन ।’ ओ ठक बक जकॉ कतेक काल धरि खुभिया के देखैत ठाढ रहि गेल छला. . ।सम्पूर्ण शरीर मे अजीब सनक प्रकंपन होमए लागल छल्ौन्ह. . .. ।असक्त भ’ खेतक आरि पर बैस रहल छला। बडका कका के ई चारिम विवाह छलैन्ह. . . दू टा स्त्री त’ तेसर आ’ चारिम प्रसव काल मे वीर गति के प्राप्त कएने छलथि . .तेसर के बाप अपन बेटीके सासुर के मूॅहे नहि देखए देलखिन्ह .. तीनो नाति भगिनमान बनि क’ मातृके मे रहि गे ल छला । . .ई चारिम . .पचास बरखक वय मे. . . ओ एकर पुरकस जोर लगा क’ विरोध कएने छला . .त’ वृद्वजन हुनका दबाडि देने छलथि . . ‘तौं त राति दिन गॉधी .. चर्चिल . .चाऊ करैत करैत अंगरेजी विद्या पढि अंगरेज भ’ चुकल छ।आहि रे बा . .अहि मे हर्ज की. . . घोडा आ’ पुरूष कहियो बूढ होय छै. . जखन समाज मे बहू विवाह प्रचलित छैक . चारू कात तुरूकक राज . .ओही कुकर्मी सबहक हाथ सॅ अपन स्त्री सब के बचेनाय . .अपन जाति बचेनाय हमर सबहक कत्र्तव्य थीक . .त’ अहि मे अहींके किएक दोष बूझि पडैत अछि. . सबसॅ बेसी अक्कीलगर अहीं छी।निरधनक बेटी के एक टा आश्रय भेट जेतै. . ।’ हॅ आश्रय त’ अवश्य भेट गेल रहै. . भरि जीवनक लेल. . भले बारह बरखक कन्या पचास बरखक बर. .।छल . .छदम . .व्यभिचार . .शोषण. . स्त्री के जीवन के जोंक जकॉ ग्रसित कएने अछि ।नारी मुक्ति के लेल ओ किछु नहि कए सकला .। किछु काल क बाद हुनक नजरि ऊपर आकास मे अटकल . .जतए ओए दिन बडका चान छल . .अखन दिवाकर महाराज स्थापित छैथ।मुॅह सॅ निकलि गेलन्हि. “ .कमजोर चान कलंकित अछि कि प्रचंड शक्तिमान भानु .. ।’। इति।। उत्तराक नोर केहेन उदासी के मोटगरि चद्दरि मे लपेटल लटपटायल . ई जगह .. .लागि रहल अछि ।जेना सदाबहार गाछक सबटा पात झरि गेल होय ।सायं सायं बहैत बसात मे कत्तेको रूदनक स्वर मिलि क’ एकटा भयंकर चित्कार करि रहल अछि ।ओ गाछ . ओ बिरीछ. . ओ चिडै. . ओ चुनमुनी .. .. अपन उत्साह बिसरि कहुना करि अपन दिन कटैत हो जेना ।दूर .. पहाड .. . शाश्वत भ्रमक परदाफाश करबा क प्रयास मे प्रकृति के रहस्यवादी दृष्टिकोण सॅ फराक हटि क’ किछु आओर राग अलापि रहल छल ।कत्तेक अपरिचित भ’ गेलै. ई सब जे कहियो ओकर जीवन क ह्दय प्रदेश बनि चुकल छल । कसकि त’ उठल रहै मोन । बड दिन क’ बाद . . आंगुर प’ गिनलक . .पॉच सावनक बाद .. . ओ आयल छल मसूरी फेर सॅ .. ।जगह त’ वएह छलै. . ओहिना आकास. . के छुबैत. . पहाड़ . .पहाड .. प’ झूमैत हरियर कचोर ऊॅच ऊॅच गाछ. . . ओहिना साफ . धोल चमकैत वातावरण. . .ओहिना मकान क छत प’ कार . . .मुदा ओकरा ओकर जादुई आकर्षण बड निघटल लगलै ।ओ गप नै छलै. . जे ओकरा बौरा देने छलैक़ . . कि खिलखिल करैत .. जीन्दगी सॅ लब लब भरल।. . . ओ वसंत. . सन्न सन्नबहैत बयार सडकक कात बेंच प’ बैसैत मातर ओकर धियान दूर पर्वत प ससरति कारी सन कोने बिन्दु जकॉ वस्तु प’ पडलै. . वायनोकूलर सॅ झट देखलक़ . बकरी .. पहाडी बकरी .. ओकरा हॅसी लागि गेलए. . ठठा क’ हॅसि पडल छल. . बकरीयो के की सूझलै. . ओत्ते ऊपर चरय लेल गेल ।ओही दिन पूर्णिमा के चॉद ओही बकरी के झुंड सॅ कनिए उपर विश्राम करैत ओही परम सुन्दरता के निहारि रहल छली ।ओकर नजरि आब चॉद प’अटकि गेलय ।मुॅह सॅ स्वर फुटि पडलै. ‘चलो दिलदार चलो. . .चॉद के पार चलो. . . । . . ‘हम है तैयार चलो. . ।’आ विकल के स्वर मे स्वर मिलाएब ओकरा फेर सॅ जोर सॅ ठहाका लगाबए प’ मजबूर करि देने छल .. जे कनि क्षण के लेल ओही ठाम गूॅजए लागल छल।छुट्टी के दिन ओ दुनु अहिना सांझ पडय सॅ पहिने बौआबैत ढहनाबैत . .ओए पहाडी के चप्पा चप्पा छानि मारै. .गहराई मे उतरै. . चढाई प दौड दौड क’ चढबाक कोससि मे हाफैत हॉफैत ओही ठाम ओंघडा जाए. .. मौसम त’ अपने आप मे निराला. . .भंगतडाह. . .कखनो रूइस रहलौ. . कखनो. . कानए लगलहूॅ. . कखनो मंद मंद मुस्की. कखनो छिडियाएल. .. आब के संभारत. . .मुदा पहाड ओकर सब रूप प’ न्योछावर. . . कनियो रोषराख नै. . ..सनातन प्रेमी जे छलै. . ।साफ सुथरा निप्पल पोतल आकाश मे नहिं जानि कतय सॅ औचक मे कारी स्याह मेघ आबि झमाझम बरसि जाए .. .माल रोड प’ घुडसवारी करैत दुनु एकदम भींग जाए. . .तहन थर थर कॉपैत देह मे गरमी आनबा लेल. . लग पास के कॉफी हाउस मे जाकए चैन पाबए ।कैमल बैक हिल्स. . प’ घुमैत. . कंपनी बाग के झुल्ला प’ झुलैत. . .दिन सोन चिरैया सन फुर्र सॅ उडि जाए .। लोकक नजरि के बेपरवाही सॅ फेकैत. . विकल .. ओकरा एक छण के लेल एसगर नै छोडय चाहै. . ।. उत्तरा के ओकरा सॅ भेंट सीनियर्स के फेयर वेल पार्टी के मंच प’ भेल रहै. . जखन दूनू गोटे एक टा कोरस गेने छल. . .कि जादू छलै. . ओकर आवाज मे. . राजस्थानी सूफी गायक बला . . देखैतो राजपुरूष. . .राजस्थान के बासिन्दो छलै.. . अहि सॅ बेशी ओकरा किछु जानबा के उत्कंठा कहियो भेबो नै कैल रहै । गीत संगीत सॅ दुनु के लगाव एक टा नव रिश्ता कायम करि देने छल. . जे सर गम के सातो स्वर मे ओ दुनु सेहो समाहित ।कैम्टी फॉल मे नहैत. . .धनोल्टी के गेस्ट हाउस के बरामदा प’ राखल बडका कुरसी प’ बैस. . ओ दूनू त संगीतक नदी मे पौडैत गप सॅ बेसी गीते गाबैत रहैत छल । सुरकंडा देवी के यात्र्रा लेल वएह जिद केन्ो रहै. . नै त’ विकल के धरम करम सॅ कोनो मतलब नै. . .मुदा ओतेक ऊॅचाई प’ मेघक अपन घर मे. . . देखलक एकरा की झूंड के झूंड खिहारैत. . पकडि लेलक जेना ओकरे सबहक सुआगत लेल ठाढ़ . भयंकर नाद से विष वमन करैत बरसैत रहल. . ।ऊत्तरा के त’ हिम्मत प’ मनोमन पाथरि लदा गेल रहै ।ओ त’ गाडिए मे बैसल रहल. . मुदा. . विकल पानि के चिरैत. . ऊपरक चढाई प चढैत रहल मात्र ओकरे लेल ।ओतेक पानि मे पिच्छडि के बिन परवाह केने .. अपना के चार्वाक शिष्य घोषित करए वाला. . । बाजै ओ बड कम . .मुदा ओकर ऑखिक छलकैत भाव मे उत्तरा के सब प्रश्न क’ उत्तर भेंट जाय ।ओकरा प्रेम के आध्यात्मिकता पर नजरि पडय लगलै. . .अहि इंस्टीच्यूट मे आबए सॅ पहिने ओकरा होशे हवास कत्त छलै. . इम्हर ओम्हर ताकए झॉकए के. . .पढाई. . पढाई आ’ पढाई. . .सदिखन प्रथम प्रथम पाबैत .. .ओकर मनोबल. . अप्रत्याशित रूपेन ताकतवर भ’ चुकल छल. . . आ जखन अहि ठाम आयल. . .अहूॅ मे प्रथम. . .।ओकरा लागै असफलता की होबैत छै. . .केहेन होय छै आकांक्षा के अपूर्ण रहि जेनाय ।घर सॅ बाहरि धरि ओकरा प’ ईश्वरक असीम अनुकंपा. . ओ त’ धरती सॅ जेना पचास फीट ऊपर .।आ’ विकल सॅ मिलब ओकरा लेल अप्रत्याशित अनुभव छल .. .प्रेमक प्रथम अनुभूति. ... . . .माता पिता के विरोध केनाय स्वभाविक छलै . क़त्तेको सुयोग्य वर छॉटिक क’ रखने रहैथ. .जै पर ओ आंगुर रखै. .।मुदा ओकर प्रचंड जिद्द. . .आब ओहि मे अहंकार से हो संग ध’ नेने रहै. . .जाति पॉति .. आब के मानै. . छै. . ई जिन्दगी फेर नै भेटत. . . ।के गारंटी लै छै जे स्वजातिय मे विवाह केला सॅ स्वर्ग जेबा के रास्ता खुलि जाए छै. .।आब एत्तेक योग्य . . .निर्णय लेबा मे माहिर संतान के सोझा कोन माता पिता टिकतैथ. . .हथियार खसा देलखिन । विकल कहल. . .हमर अहि संसार मे अप्पन कहए बला अछिए के. . पता . .नहि क़त्तय जनम लेलौ. . .केहेन मॉ के प्रेम ..होय छै. . केहेन पिता के दुलार होय छै .. .अनाथालय मे पलल बढल . . ।अहॉ लेल त’ अप्पन जान देबा के मौका आयत पाछॉ हटय बला प्राणी हमरा नहिं बूझब ।अहॉ सॅ हमरा संसार भेंट गेल. . जेना प्रेमक प्रथम पाठक ज्ञान क’ संग संसारक ज्ञान भेल. ।’ओ कुमारक गरिदनि प’ एक हाथ रखने .. गाडी के खिडकी सॅ बाहर . . प्रकृति के अवलोकन मे लागल छल. . क़ि . .किरर. ऽऽऽऽऽ््््. संगे गाडी रूकि गेलै. . । ‘की भेलै. . .ओ अकचकाएल. . “ट्रैफिक जाम. .’ . रहस्यमय मुस्कुराहट संग विकल बाजल । ‘पहाडो प’ ट्रैफिक़ . ।’ ओकरा मुॅह सॅ निकलल आ’ दुनू खूब जोर सॅ एक स्वर मे हॅसि पडल छल ।सोझा मात्र तीन टा गाडी लागल .. .पुलिस कंट्रोल करैत .. । जाडक छोटका दिन जकॉ अति शीघ्र ट्रेनिंगक ओ अल्पावधि बीत गेल छल. . .बिना झंझट. . खर्च वर्च के कोर्ट मे जाकए. . अपन जन्मजन्मांतर के संबंध पर मोहर लगबा लेलक .. ।एतेक लग रहिओ क’एक दोसर के किछु जानबा बूझवा के मौको नञ्ािं भेटलै . . .तखन लागै संगीते जीन्दगी छै. . मुदा बाद मे लगै . . ओ त’ मात्र .. दूनू के कॉमन हॉबी. . आर की.. । अचानक ओकर हाथ मे ज्ोना माइक्रोस्कोप आबि गेलै. . .ओकर. . बैसब. . ओकर उठब .. पहिने कोना बजै छलै. . आब. . .नै कोनो तमीज नैं तहजीब .. . छोट छोट गप प’ चिडचिडायल सन. . .एक दिन जूत्ता पर पॉलिस नै लागल रहै त’ तामसे आन्हार भ’ पियुन प’ जूत्ता फेंक देलकै. . हजारि रंगक अजगुत गारिक संग । पोस्टिंग त’ दूनू के एके शहर मे छलै .. मुदा दू मिनिस्ट्री मे ।आ अही बीच जेना प्रेमक रंगीन चादरि के एके धोआन मे रंग जबरदस्त भखरए लगलै .. ।छोट छोट गप. . सोचलक . .आर सब मैनर्स त’ सीखिए जैतै. . .मुदा एकरा भीतर तामस किएक एत्तेक भरल छै. . ओ कोना कम हेतै. . .कोन दुख छै. . .कोन अपराध भाव सॅ ग्रस्त छै. . बजतै. . तखन नै .. किछु समाधान . .कोनो काउंसिलिंग हेतै । अहि पोस्टिंग मे ओकर प्रथम शिशु के जन्म भेल रहै. . .मैटरनिटी लीव प छल. . .कुदरत के अजगुत ईनाम पाबि क’ ओकर आत्मा परि तृप्त भ’ गेल छल. . आब किछु नै चाही प्रभु. . .अपन कृपा अहिना बरसेने रहब ।ओकर मॉ पापा आबि क’ किछु दिन ओकर सुख मे शामिल भेल छलखिन्ह. .। विकल के सुभाव ओकरा किछु विशेष बदलल लागै. . ।ऑफिस सॅ आबैत मातर बच्चा के कनी मन्ाि कोरा कॉख मे ल क’. . चाह ताह पीबि क’ सीधे अपन स्टडी मे चलि जाए. . ।कोनो खास गप सप्प नै. गीत संगीतक दरिया जेना सुखा गेल छल .. . .राति मे डिनर करैत दोसर कमरा मे जा कए सूति रहै. . बच्चा भरि राति कॉय कूय करैत सूतै जे नै दैक़ . इहो सही. . ओ त दिन मे सूति क’ नीद पूरा करि लैत छै. . मुदा विकल के दिन मे कत्त चैन . . । छुट्टी मे पडल पडल. .आब ओ बड बोर होबए लागल छल. . बच्चा के कामकाज देखभाल करए बाली बंगाली आया के वात्सल्य प्रेम देखि ओकर मन एकदम प्रसन्न .. ओकरे नीन सूतै ओकरे नीन जागै. . नहायब सफाई. . नैपकिन बदलब. . डिटॉल सॅ ओकर कपडा सब के पखारब . .एकदम समय प’ दूध बना क’ बोतल सॅ पियाएब. .सांझ मे प्रैम प’ सूता क अहाते मे कनी मन्ाि घूमा दै. . एक बेर ओकरा कहबा क’ देर छलै. . ओ फट स’ सीख क’ अनुकरण करए लागै. . ।उमहर सॅ धियान हटि क’ विकल प केन्द्रित भ’ गेलै. . .एतेक उदासीनता किएक एकर व्योहार मे. . .कनियो कोनो अपना पन नै. . पी 0आर 0के स्टाफ जेना बस ठोर पटपटा क’ हाल चाल पूछि लै. . ।नै ऑखि मे ओ चमक .. नै. . ठोर प’ मुस्कुराहट. .. . । ओकरा मोन पडलै. . .पहिनो त’ ओ नहिए बाजै. . छल बेसी. . जखन दूनू के भेंट होय. . त’ गीतकार .. संगीतकार क चर्चा सॅ सुरू होय आ’ गीत प’ आबि क’ समाप्त. . .।किंस्यात किछु परेशानी सॅ गुजरि रहल होयत ।घर मे पडल पडल ओकर दिमाग शैतानक अड्डा बनि गेल छल. सोचलक . बड आराम भेल आब ड्युटि ज्वाइन करि लेबा क’ चाही .. दू मास त’ भैए गेलै. . । एक दिन ओकरा जखन रहल नै गेलै. . ओ चुप्पे ओकर स्टडी मे जा कए पाछॉ सॅ ओर गरा मे हाथ धरि क’ अपन कान ओकर गाल मे सटबैत बाजल ‘कि भ’ रहल छै एतेक मुस्तैदीसॅ।’ हास्य मे कहल ई शब्द ओकरा एकदम चौंका देलकै. . चट सॅ अपन डायरी बन्न करि ओ अपना के ओकर बाहुपाश सॅ मुक्त करैत ठाढ भ’ गेल छल .. ‘अरे चलू तैयार भ’ जाए हमसब एक टा नाटक देखय चलैत छी ।’आ’ हाथ पकडने बाहर बरामदा मे चलि आयल छल । ओय दिन जे भेल हो मुदा एक टा संशय के बीजारोपण त’ अवश्य भ’ गेलै . .। ओकर मन औउनाइत रहलै. . ओ लिख की रहल अछि जे ओकरा सॅ दुराव छिपाव करए पडि रहल छै .।परोछ मे ओही कोठरी मे जाए त’ आलमरी मे ताला लटकैत. . .के जानै कुन्जी कत्तय छै. . ।आब जखन ठानिए नेने रहै ..रहस्यक उदघाटन करए लेल तखन कोन गप . .।ओय कोठरी मे बगीचा दिस सॅ सेहो एक टा खिडकी छलै. . जै प’ सदिखन परदा फैलल रहै छल।दिने मे ओ ओही परदा के कनी घिसका देने रहै ।रात के बारह बाजल . .चारों कात अन्हार .. सन्नाटा. . ।सब कियो खा पीबि क’ सूतल .. कुमार अंगेठीमोचाड करैत कुरसी सॅ उठल. .. ड़ायरी के अनबीरा मे बन्न करि कुरसी प’ चढि कुन्जी के रोशनदान मे राखि देलक ।बस . .ओ दिन छलै .. . । चक्र सुदर्शन सॅ ओकर गरा कटि गेल रहै . . .मस्तक . .कुरसी प’ बैसल .. शरीर. . धरती प’ खसल. .शोणित सॅ .. लथपथ. . .पॉच पॉच हाथ तडपैत. . .मुदा कत्तेक तडैपतैक़ . कनिए काल मे शान्त भ’ गेलै. . टेबुल प’ राखल मस्तक आब पूर्ण गंभीर भ’ क’ आगूॅ के रणनीति सोचैत रहल. . .।मामला गहीड छलै . .सोचबा मे समय लगलै । घर के शान्ति सामान्य रहल्ौ. . .भोजन बनै. . खेनाय खायल जाए. .बच्चा के झूला प’ झूलायल जाय. ..दासी मुसीक मुसीक क’ मेमसाहब के रंग बिरंगी किस्सा कहै. . मेम साहब ठहक्का मारै. . . मुदा ज्वाला मुखी धधकैत रहलै. . लावा नै बहरैलै. .तै स की . । अपन टा्रन्सफर नार्थ ईस्ट मे करा क’ बिना खड खडकेने . .निःशब्द महात्मा बुद्व जकॉ निशा रात्रि के फ्लाईट सॅ ओकर ओही घर सॅ .. पलायन भ’ चुकल छल । जीवन सॅ जीवन पथक लंबाई बेसी होइत एलैहैं ।नीचा हेरब . .खाधि. . गुफा. . वन .. पहाड़ . सागर. . .उपर मात्र एक टा नीरभ्र आकाश. .. .रंग बिरंगी उडैत पाखी . असीम शान्ति के खजाना .. .ऊपर सॅ धियान नीचा एलै. . ताकब सूरू कयल.. ..कोन पन्ना . .कोन पोथी. . कोन पंथ. . मंदिर .मस्जिद. .चर्च . .गुरूद्वारा . .गोनपा. . .ध्यान . .योग़ . ।मस्तिष्क फेर सॅ गरिदनि सॅ जुडि गेलै. . आब ह्दय मे जे परिवर्तन भेल होय. . दिमाग एकदम शान्त. . ।जीवन क’ ओही नाटकीय मोड प ‘यवनिका पतति’ कहि कहिया कत्त नै पूर्ण विराम लगा देल गेल छल।कोनो ‘हयु एन्ड क्राय’ नै मचलै । मसूरी मे फेर अयबा के कोनो सरकारिए प्रयोजन छलै ।आय ओकरा संग ओकर कोर्स मेट वान्या छल।समय अपन शाश्वत फेरी लगबैत ओहि ठाम कनि विसेष काल के लेल विलमल छल. .थाकल थेहियाएल. . ओंघाइत. . ओकर विश्राम क’ मूड देखि जडि चेतन सब अपन श्वॉस रोकने. . कियो कोनो उकठ्ठी नै करै. . कनियो सोर नै हुए . .।सडकक कात बनल बेन्च प’ बैसल ओ ओहिना सोझा के पहाड प’ दूर्््ऽऽऽऽऽऽ्चरैत
बकरी के देखय लागल।ओही दिन जेकॉ आय सेहो बकरी चरैत छल. . कारी कारी बिन्दु मात्र ।ऑखि मे चमैक उठलै. . . ‘गडेरिया क’ जीनगी. . पहाड हो वा रेगिस्तान . असुविधा .. कष्ट सॅ भरल. . दीन हीन लाचार बीमार ‘ भीतक छोट छोट घर .. .उजडल उडल छप्पर . . माटीक चूल्ही प’ चढल माटीक बासन .मे . . .खदकैत. . भात. . . .माटिए के परात मे .. सानैत. . बाजरा के आटा . .चुनरी सॅ गंदा हाथ पोछैत. . खीझैत. . धूऑ सन मूॅह वाली स्त्री. . नीमक गाछ तर पडल खटिया .. चीलम पीबैत. . खोंखी करैत जर्जर वृद्व. . .ताड के पटिया प’ चीक्कट केथडी .. .फुल्लल हाथ पयर . .पीडा सॅ कहरैत कृशकाय वृद्वा. . . कनिए हटि क’ पॉच. सात ..नौ .. बरखक नंग धडंग धीयापुत्ता . करिक्का बकरी के बच्चा संग खेलाइत ..गाछ सॅ बान्हल माटिक बासन मे पानि पीबैत बूढ घोडा चारहु कात पसरल लिद्दी. .।’ घबडा क’ ओ ओही दिस सॅ मुॅह फेर नेने छल. ।मुदा कनिए काल मे नै जाने ओकरा की फुरलै ।वान्या के ई प्रसंग सुना ओ ओकर मन्तव्य जानबाक’ कोरसीस कयल. . ‘ई बता जे ओ गडेरिया पैलवार केकर प्रतिक्षा करैत रहै छल .. ओहेन नितांत गरीबियो मे ओकरा केकर आस छल हेतैक ।’ देवदार के सुडौल वृक्ष निहारैत. . वान्या कनि काल मुस्कैत रहल फेर ओकरा दिस ताकैत बाजल. ‘आर केकर . .ओही रोटी ठोकए वाली के जे मैल हाथ अपन चुनरी मे पोछैत छल .. आ .. जेकर तीनों बच्चा बकरी के बच्चा संग दौड लगबैत छल. .ओकरे .घरबला के .. आखिर ओही पैलवार मे ओकरा अलावा और के हेतै कमाए बला . . ।’ “की।” “नै एकदम ठीक ।कोनो पढल लिखल अपन पैर प’ ठाढ जागरूक स्त्री एहेन पैलवार के किएक शत्रु बनतै ।’ “मतलब’ ।वान्या कनि अचरज सॅ . कनि गहन दृष्टि सॅ ओकरा दिस ताकलक। “तौं नै बूझबही।’अनंत मे ताकैत .. अत्यंत विरक्त भाव स क’हि’ ओ वान्या संग ओहीठाम सॅ उठि वापस अपन गेस्ट हाउस मे चुपचाप चलि आयल छल .।। नन्द विलास राय कविता- कन्यादान हम छी बड़ परेशान यौ बाबू हम छी बड़ परेशान। हमरा माथपर लादल अछि तीन-तीन कन्याँदान। खेत-खरिहाँन बेचि जेकरा पढ़ेलौं पढ़ा-िलखा कऽ मनुक्ख बनेलाैं ऊहो भऽ गेल विरान। राति-दिन एतबे सोचैत रहै छी केना बचत हमर मान हमरा माथपर लादल अछि तीन-तीन कन्याँदान। आइक युगमे बेटी बिआहब रहि नै गेल आसान। ओकरा लेल तँ पहाड़ बनल अछि जे छथि कोनो किसान मनमे घुरिआइत रहैत अछि केना हएत ऐ समस्या केर निदान। डर रहैए हरिदम मनमे इज्जत ने हुअए निलाम जेकरा-जेकरा अप्पन बुझैत छलौं सभ भऽ गेल आन। अाँखिक सामने नचैत रहैत अछि बेटी तीनू जवान हमरा माथपर लादल अछि तीन-तीन कन्याँदान। दहेज खातिर मानव भऽ गेल दानव के पोछत हमर नोर हम केकरा लग कानब सबहक हृदए भऽ गेल कठोर विद्वानो सभ भऽ गेल बैमान हमरा माथपर लादल अछि तीन-तीन कन्याँदान। जहियासँ बरतुहार गेल आपस हमर कनियाँ धऽ लेलीह ओछान। वर खोजैत-खोजैत चप्पल हमर घँसि गेल पड़लौं हम बेराम। हमरा माथपर लादल अछि तीन-तीन कन्याँदान। एहेन मनुक्ख आइ धरि नै भेटल जे करत हमरापर उपकार बिना दहेजक बेटा बिआहि कऽ हमरा माथसँ उतारत भार। एहेन मनुक्ख जौं हमरा भेटताह जे करताह एहेन शुभ काम। चादरि-मुड़ेठा मखानक मालासँ हुनकर करब सम्मान। बेपार एक दिन कनियाँ हमर बाजलि- “यौ, पढ़लौं-लिखलौं मुदा नै भेल कोनो नौकरी तँ अहिना रहब बेकार किएक नै शुरू करैत छी कोनो छोटो-छिन बेपार हे! कहाबत छै जे ने करए कपार से करए बेपार।” हम कहलिऐ- “पूजी केर केना हएत जोगार?” ओ बजलि- “हम नैहरसँ आनि देब पचीस-पचास हजार तहीसँ शुरू कए लेब कोनो छोट-मोट रोजगार। जौं परिस्थितिसँ अखन जाएब हारि तँ अबैबला धिया-पुता देत अपना सभकेँ गारि।” हम कहलिऐ- “अहाँक बड़ नीक अछि विचार जल्दीसँ नैहर जाउ आ ओतएसँ ढौआ मांगि लाउ।” भरि दउरा सनेस लऽ ओ नैहरा गेलीह भोरे बैरंग आपस एलीह। हम पुछलियनि- “की यै, भऽ गेल ढौआक जोगार?” हमर कनियाँ बजलीह- “हम बाबू-मायसँ कहलियनि हमरा किछु टकाक अछि दरकार सोचैत छी शुरू करैले कोनो बेपार। ओ सभ बजलाह, हम अपने छी लाचार कतएसँ देब तोरा टाका पचीस-पचास हजार।” हम कहलिऐ- “ओ सभ छथिन अमीर हम सभ छी गरीब अमीरकेँ कहिया गरीबसँ रहलनि सरोकार।” मुन्नी कामत भ्रष्टाचारक प्रसाद एगो खेल खेलैत देखलौं स्कूलमे हरा गेल छल खिचरी सभ प्लेटमे। देख कऽ भेल अचम्भा पुछलौं सर ई कोन अछि जादू-टोना सर कहलखिन कि कहब हम केहन अछि भ्रष्टाचारक मारि अबैए तँ यऽ भरल प्लेट मुदा मिलैत अछि यएह जादूक खेल। एक मुट्ठी बरका बाबू एक मुट्ठी छोटका बाबू दू मुट्ठी अफसर साहेब आ झपटैत अछि तीन मुट्ठी कलर्क बाबू देखते-देखते गाममे फकाइत अछि मुट्ठी-मुट्ठी अहिना बटैत अछि। जकरा देखू टक लगेने अछि कहैत छथि हमरा दिअ ई तँ सत्यनरायण भगवानक प्रसाद अछि।
तब हँसत तुलसी हम एक पुरूषक बेटी छी एक पुरूषक बहिन एक पुरूषक पत्नी तँ एक पुरुषक मॉं हर पग-पग पर हर संघर्षक बीच हर सुख-दुखमे हर रूपमे हम पुरूषक संगे ठार छी हमरो मुँहमे वएह जुवान अछि हमरो दृष्टि वएह देखैत अछि हमरो दिमाग वएह सोचैत अछि हमरो जिगर मे वएह साहस आ हौसला अछि आइ पुरुषक संगे चलैमे हम समर्थ छी तँ फेर किए आइयो १००मे सँ ७५ महिला घरेलू हिंसाक शिकार अछि ई हमरा लेल नै हे बद्धिजीवी अहॉं लेल शर्मक बात अछि। आबो जागु हे मानुस विकसित अपन विचार करू नारीकेँ परितारित करनइाइ छोड़ूू नव युगक निर्माण करू। जतऽ नै हएत नारीक इज्जत ओइ समाजक केना विकास हएत केना रहत हँसैत तुलसी केना आंगन मुस्कुरैत माँक पूजा पहिले करि नतमस्तक भऽ मन झुकाए देखयौ फेर काल्हि अपन कतेक सुन्दर अछि हँसैत खेलाइत। शिल्पकार आइ हम देखै छी जइ दिस वएह दिस ठार एगो शिल्पकार अछि दौड़ रहल यऽ सभक सभ अइ रेसमे लऽ कऽ अपन औजार कहि रहल अछि देव हम संसारकेँ नव रूप रंग आकार। मुदा ककरो नै टटोलैत देखै छी खुदकेँ नै निखारैत अपन प्रतिभा आ गुणकेँ। ई संसार तँ परिपूर्ण अछि सभ लोभ मोह आ भय सँ दूर अछि फेर अकरा हम कि देव अकार रूप रंग आ प्रकार। बनाबै कऽ यऽ तँ बनाउ अपन प्रतिमा अपन ओजार सँ निखारू मानवता खुदमे अपन उच्च विचारसँ।
याद गामक गामक बर मन पड़ै यऽ पिपरक गाछ पुरबा बसात पिअर सरसो मन पड़ै यऽ। लटकल आम मजरल जम गमकैत महुआ मन पड़ै यऽ। धारक खेल कदबा खेत रोटी-चटनी मन पड़ै यऽ। बाधक झिल्ली मुठिया धान पुआरक बिछौैन मन पड़ै यऽ। घुरक आगि पकैल अलुहा ओ गपशप मन पड़ै यऽ। गामक बर मन पड़ै यऽ।
आसक किरण अखार बितल सौन बितल बितल जाइ यऽ भादबक बहार सुइख गेल सभ इनार-पोखैर नै बरसल अबकि एको अछार। बजर भेल मॉं धरती कारी सभ गाछ-पात कोन पाप भेल हमरा सब सँ आबो तँ बताबऽ हौ सरकार। नै खाइ लऽ अन्न नै बुझबै लऽ तरास अहिना तक बितेबएय और कतेक मास आब समटऽ अपन भाभट दए हमरा सभकेँ जिऐ कऽ आसार हे भगवान तूँ बरसाबऽ पानिक बोछार।
नारीक पहचान देख कऽ चिड़ै-चुनमुन मन होइत छल कि हमहुँ उड़ी अम्बरमे। जा कऽ देखी घरक अलावा की अछि अइ संसारमे। भइया संगे हमहूँ जाइतौं स्कूल उलझल रहितौं किताबमे। मुदा जब निहारलौं अपन दिस छल बानहल जंजीर पएरमे। माय कहलक हमर मान आ बाबुक पगरी छै दुनू तोरे हाथमे। नैन टा हमर उछलैत मन मरि गेल विडम्बनाक अइ संसारमे। सपना देखैसँ पहिले जगा देलनि सुनि मायक वचन बहुत कचोट भेल मनमे। हम बेटी छी आकि अवला जे चुप रहैक यएह इनाम मिलैत अछि पुरूष सत्तातमक अइ समाजमे।
आजाद गजल १ मनमे आस सफर लम्बा अनहार बहुत पनपि रहल अछि मनमे सुविचार बहुत
नै डर अछि मिटै कऽ हमरा एको रती बढ़ैत ने रहए चाहे ई अत्याचार बहुत
सर उठा कऽ चलैत रहब हम सदिखन दिलमे अछि घुरमि रहल धुरझार बहुत
बेदाग रहत चुनरी सीताक बुझल अछि से देहमे अछि अखनो प्राण आ इनकार बहुत
चिड़ैैत रहब अनहारक कलेजा छी ठनने मुन्नीकेँ मिलत अइसँ आगू प्रकार बहुत
२ मुदत्ते बाद महफिलसँ मुँह झाम निकलल बेकार छल निकलल जेना काम निकलल हरा गेल भीड़मे आबि कऽ ताकी निङ्गहारि नतीजा जे छलै निकलबाक सरे-आम निकलल छिन गेल सरताज हमर खाली माथ हँसोथी बेबस बनि लाचार शर्मसार अवाम निकलल फेर सत्तामे अबैक उम्मीद नै एक्को रती घुरब नै फेर आइ ओ देने पैगाम निकलल
सच तँ ई अछि राजनीतिमे दाग लागल मुन्नी अपनेे करमसँ कत्लेआम निकलल
बेटी बेटी अभिशाप नै वरदान अछि। तिलकक बिहारिसँ बेटीकेँ नै बहाबू ई छी घरक लक्ष्मी अकरा नै समान बनाबू। नै अछि ई बोझ नै अभागी शक्तिक ई प्रतिरूप अछि अकरा नई शापित बनाबू। दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती संगे सीतो अइमे समाइल अछि हिनकर आॅंचलमे हमर काल्हि अछि अकरा नै कलंकित बनाबू। दहेजक आगि सुनथुन यै सासुमा हमहूॅं छी किनको बेटी हमहूॅं किनको दुलार छी हमहूॅं ९ महिना किनको कोइखमे आस आ ममता सँ सिंचल छी। नै बुझियौ आन हमरा हमहूॅं एगो मायक अंश छी लऽ कऽ आइल छेलौं आश एगो कि, माय कऽ छोड़ि, माय लग जाइ छी, बाबू छोड़ि बाबू लग यएह अरमान बसैनउ हम सपना सजेने एलौं हम। बाबू हमर अछि गरीब बेटीक कन्यादान कऽ कए तँ राजा जनको भऽ गेल छल फकीर जब दिलक टुकड़े सोंइप देलकनि तँ कि आगाँ चाह रखैत छी। दहेजक खातिर कतनो बेर अहॉं हमरा जरैब तइयो नै अहॉं अपन एक बितक पेटक अग्निकेँ बुझा पएब छोड़ू ई लालच, मोह अहूॅं तँ ककरो बेटी छी। आइक नै तँ काल्हिक चिंता करू घरमे बेटी अछि अहूँक जवान अपन नै तँ ओकर परवाह करू। ओइ पार तूँ बता रे माझी कि छै ओइ पारमे माय, बाप,भाइ, बहिन अपन, पराया सभ नाता, रिश्ता मिलतै ओइ संसारमे। सुनै छिऐ राजा हुअए या रंक छोड़ऽ पड़तै सभकेँ ई देहक संग तूँ बता रे माझी बिन देहक वएह मलार मिलतै ओइ संसारमे। नै मंजिलक अछि खबर नै रस्ताक पहचान तूँ बता रे माझी अन्हार राह पर चलैत हम एकोगो राह बना पेबै ओइ पारमे। नेताजी सफेद लिबासमे लिपटल नेताजी हाथ जोड़ि, नतमस्तक नेताजी जुबान खामोश, अबोध नेताजी देखियौ आइल हमर गाम हमर पालन हार, नेताजी। मॉंगै लेल भीख आश लगौने नेताजी भिखक नाम पर खून मॉंगैत अछि, नेताजी। कतेक सालसँ हम सभ चुसाइत छी आब बस पाइन अछि देहमे यौ नेताजी। ब्ुझि रहल छी करतुत अहॉंक सफेद वस्त्रक भीतर कारी मन अहॉंक नेताजी। कतनो खाइ छी तइयो दैतक खुनल पेट नै भरैत अछि अहॉंक नेताजी। ज्यों फेर पकड़ा देब बंदूक हवलदार बनि हमरे सभ पर दहारब अहॉं यौ नेताजी। पहिल बरखा छू कऽ हमर मनकेँ गुदगुदेलक ओ प्यारसँ छुलक हवाक झोका हमरा अपन शीतलताक मलारसँ। छिटका रहल छल चॉंद-चॉंदनी जे थपथपैलक हमरा गालकेँ अपन ममतामय दुलारसँ। झमौक कऽ ऐल कारी मेघ नहलाकऽ गेल अइ जहाँ केँ अपन होठक मिठास सँ। छू कऽ हमर अंग-अंगकेँ चुइम कऽ धरतीक कण-कणकेँ पुचकारलक सहलैलक अपन स्नेहक बरखा सँ। किसान होइत भिनसरे अजबे नजारा सभ गामक कोइ पकड़ि बड़दक जुआ कोइ खाय रोटी संग नुनमा दौड़ल अपन काम पर। सबे परानी माइट संगे अपन जीवन बिताबैए बच्चा तँ बच्चा बड़को अहिना पोसाइए। दिन-राइत मेहनत कइर ई धरतीक कौइख सँ अन्न उपजाबैत अछि नै कोनो थकान अकरा नै ककरो सँ शिकाइत अछि। एहन निर्मल अछि हमर किसान जिनकर प्रतिदान आ संतोषे संस्कार आ पहचान अछि। बूँदक मोल फाटल धरती जरल घास एक बूँद पानि बिनु अछि सभक सभ उदास। नै बुझलौं हम प्रकृतिक निअम तँइ कानै पड़त आब कतेक जनम। आइ बुझितौं मोल जे पाइनकेँ तँ एना पियासल नै मरैतौं जाइन कऽ। बहुत नाच नचेलौं छन्नी-छन्नी धरतीकेँ केलौं अपन सुविधा खातिर धरतीकेँ सिमेंट बालु सँ झाँपि देलौं वएह अपमानक बदला छी ई लागए नै पएरमे माटि तकर सजा छी ई आब तँ लोरोमे नै पानि अबैए जकरा पीब हम पियास बुझाबी बुझा रहल यऽ आइ ओइ एक बूँदक मोल छल हमराले ओ कतेक अनमोल। करी मिथिलासँ पहचान चलू मिथिला, सुनियौ मैथिली कतेक मीठ ई बोल यौ मिसरी घुलल अछि हर शब्दमे करिरौ एकर मोल यौ। सीताक नैहर एतए उगनाक ई प्रिय स्थान यौ ऋषि-मुनिक भूमि ई अछि एतऽ विद्वानक खान यौ। होइत भिनसर सुगा सीता-राम पढ़ैत अछि बउआ नुनु कहि सभ बात बजैत अछि करियौ अइ भूमिक पहचान यौ। एतए कऽ माछ-पानक दुनिया करैए बखान यौ धोती-कुरता आ पाग अछि पुरूषक पोषाक यौ। अइ धरती पर हम जनमलौं अछि ओइ जनमक कोनो नीक काज यौ फेर-फेर हम एतै जनमी अछि अतनी प्रार्थना भगवान यौ। काइरझुमरी कोसी दू-चाइर दिन नै आइ सात दिनसँ ऊपर भेल कोसी कारिझुमरी सभ लेने चलि गेल। नै खाइ लऽ अन्न अछि नै पिबै लेल पानि ऊ डसिनिया सभ ढेकारैत लऽ गेल। बाउ हरैल अछि भाइ ढिस भऽ पड़ल अछि राइते-राइत आएल एहन निरलज्जिया जे कुहरा कऽ चलि गेल। नै बचल एक कनमो किछो नै भाइ-बाप नै रिश्तेदार कोइ असगर ठार छी कछारिमे ई कोसी कारिझुमरी असहाय छोड़ि हमरा हँसैत चलि गेल। नै लेब आब हम दहेज दहेजक खातिर गिर गेलौं हम मानवताक समाजमे। कि कहब आब अपन दुखरा कि लिखल छल कपारमे। धोती-कुरता पहिर कऽ बाबू ठाठसँ चिबबैत पान अछि हमरा बना कऽ पापी आब ओ कात अछि। पढ़ि-लिख हम बानर बनलौं बाबूक बातमे एलौं दहेज लऽ कऽ केहन काज केलौं नै बुझलौं नारीक शक्ति नै ओकर सम्मान केलौं। कि कहब आब हम कि कतेक घिनौन कुकर्म केलौं। मिथिलाक दादा खेत बेच मन कारी झाम मुदा खाइए माछ सुबह-शाम। जमीनक मोल नै जानैए ई पुरखा अरजलहा बेचैमे लागैए कि। बैठल-बैठल ताल करैए पटुआ धोती पहिर गाम घुरैए। चुप रहि कऽ सभ नाच नचाबैए हुक्का गुरगुड़बैत अपन काज सलटियाबैए। फाटल जेब मुदा ऊँच शान देखियौ मिथलाक एगो ईहो पहचान। तइयो खुआबैए ई बुढ़बा सभकेँ नित पान आ मखान। पाहुनक माछ एलखिन पाहुन लऽ कऽ माछ भदवरियामे नै अछि सुखल कोनो गाछ। माँ हम करबै आब कोन काज कोना रखबै मान कोना सजेबै साज। सुनु कनिया हमर बात छानि उजारू करू ई काज। नै केना बना कऽ देबै रामकेँ केना उपासल रखबै। छानि उजरतै तँ फेर बनेबै मुदा रूसल पाहुन केना मनेबै। पजारू चुल्हा पड़लैए साँझ लगाउ आसन परसू तिमन संगे तरल माछ। हमरा पागल कहैत अछि लोग लरखड़ाइत कदम थरथड़ाइत होठ नसाबाज हम नै, अछि जालिम सभ लोक। चोरी केलौं नै मुदा चोर कहेलौं पर डकैती करि बाइज्जत घूमि रहल अछि लोग। एक मु़ट्ठी अन्न लऽ तरसि रहल छी देखियौ गोदामक-गोदाम अन्न सरा रहल अछि लोग। हम मेहनतो करि नै अपन पेट भरि पाबै छी पर हमर सरकार भरल पेट अरबोक घोटाला करैत अछि आब सोचियौ सभ लोक। सगरे अनहार अछि भ्रष्ट आ भ्रष्टाचारसँ भरल पूरा संसार अछि कोइ नै बॉंचल अतऽ सौंसे ओकरे राज अछि। कोइ देखा कऽ लुटैए कोइ चोरा कऽ लुटैए तँ कोइ शरमा कऽ लुटैए लुइटिक अतऽ बजार अछि। के कहत ककरा अतऽ सभ एक प्रकार अछि गर्भमे सिखैए भ्रष्टाचार यएह नव युगक संस्कार अछि। कदम-कदम पर घूस दैत मानव अइ दुनियामे अबैए आगुओ घुसे दैत घुसकैल जाइए हर मोर पर देखबैत यएह नाच अछि घुस दैबला सभसँ बड़का बइमान अछि। मायक रूदन सोचलौं बेटा बेटी भेल रोपलौं आम बबुल उगि गेल। छापि रहल अछि समाजक अत्याचार केना बचैब हम १८ बरख अकर लाज। ई हमर बोझ नै हमर अंश छी जकरा हम नैनामे बसैब मुदा केना कऽ सियाही भरल घरमे अपन चुनरी बचैब। कलंक बेटी नै ई समाज अछि जे युग-युगसँ उज्जर चुनरीमे लगबैत दाग अछि। चारू दिस छल लक्ष्मण रेखा तइयो हरण भेल सीता सुलेखा। कऽ रहल अछि मजबूर हमरा बेटीसँ दूर हमरा। शूल बनि मनमे गड़ैए बेटी तैँ गर्भमे चुभैए बंद करू आब अत्याचार बसाबऽ दिअ हमरा बेटीक संसार। अपना दिस निहारू। बड़ केलौं उक्टा पेंच अक्कर खिद्यांस ओकर धेंस कहियो तँ आंगुर अनेरो उठाउ अपन मनकेँ बुझाउ। उठैए जे एगो आंगुर ककरो दिस तीन आंगुर देखबैए यऽ अपने दिस। मारू अइ साँपकेँ निकालू मनक अइ काँटकेँ जतेक साफ नजर रखबै दुनिया ओतेक सुन्दर देखबै। बहुत भटकलै खोजैले भूत दुबकि कऽ बैठल छल हमरे करेजामे बनि कऽ सूत। मजबूर किसान बाबू केना हेतै आब पाबनि त्योहार। बीसे-बीस दिन पर हेतै खर्चाक भरमार नै अगहनक करारी पर देतै कोइ पैंच उधार बाबू केना हेतै आब पाबनि- त्योहार। छुछे छाछी रहि जेतै अबकी चौरचनमे मरूआ भेल अलोपित आब मिथिलामे केना कि उपाय करिऐ कतऽ सँ करिऐ हम जोगार बाबू केना हेतै आब पाबनि-त्योहार। जतरामे धिया-पुता लव कपड़ा मंगै छै दिवालीमे फटक्काले कनै छै छट्ठी मइयाक की अरग देबै अइ बार बाबू केना हेतै आब पाबनि-त्योहार। बलराम साह द्वन्द्वक मझधार एकटा एहेन लोक जेकरा करिया आखरसँ भेँट नै एकटा एहेन लोक जेकरा हाथमे अखवार अछि। एकटा एहेन नेना जेकरा पेटमे अन्न नै एकटा एहेन नेना जेकरा खेलौनाक भरमार अछि। एकटा ओ समाज जे खाइत नित मारि अछि तँ एकटा ओ समाज जेकरा हाथमे तरूआरि अछि। एकटा ओ जाति जिनक बौआक पएर पवित्र अछि एकटा ओ जाति जेकरा छुनिहार पापक भागीदार अछि। देखबामे कहबामे हम सभ छी एक्के मुदा हमरा मोनमे आइयो द्वन्दक मझधार अछि। मुकुन्द मयंक कविता- कनियाँ कनियाँक आयल लगबो नै कएल एक्को साल भs गेल कनियाँ मास्टरीमे बहाल जहिया सँ भेली ओ टिचर बदलि गेल हमर फ्युचर पहिने करै छलौं मालिकक जी हजुरी आब बनि गेलौं घरक बिल्ली हम करै छी घरक काज बुढ़िया करैए बच्चाक परिस्कार बुढ़बाकेँ छै आब देखनाहर सोचै बुढ़िया करितौं मुर्खे कनिया काटए तँ नै पड़ितए घुसकुनियाँ विनीत उत्पल नामर्दक शहरमे आइ जइ कालमे हम सभ रहि रहल छी, ओ नामर्दक जुग अछि हमर कवितामे नामर्द कोनो जाति नै अछि वा कोनो मनुष्यक शारीरिक अवगुणक उपहास नै कएल जा रहल अछि ई छी मानसिक दिवालियापनकेँ लऽ कऽ एकटा शब्द कहैत छी जे हम वैश्विक भऽ गेलौं ग्लोबल विलेजक कांसेप्ट आगू राखि रहल छी ट्विटर, फेसबुकक जमानामे रहैत छी मुदा रहैत छी नामर्दक शहरमे आइ सांस्कृतिक आ सामाजिक दिवालियापनक ई हाल अछि जे कोनो स्त्री जातिकेँ कोनो तरहेँ अहाँ सहायता नै कऽ सकैत छी कोनो दलित जातिकेँ कोनो तरहेँ अहाँ सहायता नै कऽ सकैत छी कोनो हासियासँ बहराएल लोकक सहायता नै कऽ सकैत छी ऐ नामर्दक शहरमे जौँ अहाँ अपन सहृदएता देखाएब अहाँक चरित्र, व्यवहार, मेल-जोलक प्रति विषवमन हएत, गारि-फजीहत हएत साहित्यिक विद्वान छद्म नामसँ अहाँक माय-बहिन एक करत अहाँकेँ नै बुझाएल हएत जे हुनकर शब्दकोषमे केहन-केहन शब्द अछि केहन-केहन सोच अछि, केहन-केहन वाक्य अछि ओना चिन्ताक कोनो गप नै अछि, जौँ अहाँ अपना दिससँ नीक छी जकरा लग जे शब्द हएत, जेहन संस्कार भेटल हएत, जेहन मायक दूध पीने हएत ओकरासँ बहराइक ताकति ओकरामे नै छै यएह ओकर असली रूप छै, जे रहैत अछि नामर्दक शहर मे। गजल बाट जोगैत तँ आँखि पथराएल नै कहियो प्रेम बिना जे जिनगी सरियाएल नै कहियो अहाँक सुनि कऽ नाम किछु फुरैत नै हमरा लिखै-पढ़ौक लेल किछु फुराएल नै कहियो
अहाँक आवाज सुनि थरथराबैत छी हम एहन मीठ बोल कियो सुनाएल नै कहियो
देखि कऽ अहाँक ओ मुखड़ा आ ओ सुनर नूर चोन्हराबैत छै आँखि बिसुराएल नै कहियो
कहैत अछि उत्पल भाव लऽ कऽ ओ प्रेम संग प्रेम करू वा नै करू, ई नुकाएल नै कहियो सरल वार्णिक बहर वर्ण -१७ कामिनी कामायनी चिड़ैक अभिलाष एक पाखी मीत सॅ किछु कहि रहल छल डारि कत्तेक हम देखल अहि जनम में भेट नहि पाओल हमरा कत्तौ बसेरा आस के एक खड नेने ठाढ एत्त । कखनो त’ कत्तो कोनो बिरीछ भेटत घर के एक नींव राखि .. . .. . . . खोंता सॅ बाहर हमहूॅ भरि पोख हेरब हमरो अंडा हमरो चिल्का हमरो संगी हमहूॅ कत्तौ चैन सॅ किछु राग टेरब मीत घूरल देर धरि निःचेष्ट भ’ क’ छोट एतेक स्वप्न कतैक ई अकिंचन भॉपि क’ ओकर एहेन मनोभावना के उडि चलल घबडा क’ ओ कमजोर पंखी। मिहिर झा महगी बुन्न बुन्न रिसैत महँगी बना लेलक दरारि कमला क बाढ़ि सन हू हू बहैत संपोला से अजगर बनैत चट करैत गामक गाम एकहि संग कोनो स्थान सुरक्षित नहि त्राण पबै लेल तथाकथित सरकार फाटक खोलैत बान्ह के रहि रहि के आ कहैत सांत्वना शब्द ई जरूरी छैक देशक भविष्य लेल जतय वर्तमाने अन्हार छैक हौ रामचंदर हौ रामचंदर की दिन छैक जी सरकार ओ दीन छैक
जमाना देखही तंग करै य जी दुखी मोन के चंग करै य दलान किया खाली पडल छै चाहक लोभ जे नै बचल छै
ठाढ सोझाँ अछि पहिर के चट्टी सरकार ओकर चलै छै भट्ठी
बेचैन मोन कोना रहू गाम सरकार अपने के दियौ त्राण
सब छोडब त लोक की कहत मोन साधब त वाह वाह करत राजेश कुमार झा (कन्हैया) एकटा प्रेम बिरहक कथा सुनबै छी एकटा प्रेम बिरहक कथा जे आगि लगा दए गेल हमरा ओ व्यथा छोड़ि कऽ हमरा एना चलि गेली ओ जेना कायाक कमान लए गेली ओ सुखो हमरासँ एना रुसि गेल जेना दुखक मझधारमे छोड़ि गेलीह ओ आब नै भूख लगैए नै प्यास जेना मरुभूमिमे असगर छोड़ि गेली ओ आब तँ विक्षिप्त प्रेमी सन हाल अछि सभटा सुधि-बुधि बिसरा गेली ओ हुनकासँ भेटो नै कए सकैत छी किएक तँ नै मिलैक सप्पत दए गेलीह ओ सबहक चेहरामे हुनके चेहरा ढुँढइ छी ह्रदयमे एहन फोटो बसा गेली ओ नीने टा आब बस नीक लगैए सुन्नरी सपनाक खजाना दऽ गेली ओ कखनो कोनो जे आहट सुनै छी, बुझैए एक बेर सतहीँ मे फेर आबि गेली ओ एकांतमे बैस चिट्ठी लिखै छी फाड़ै छी नै फुड़ाइए सभटा शब्द चोरा गेली ओ प्रतीक्षा खत्म कए जरुर फूलो फुलायब जे मिलनक कोरही छोड़ि गेली ओ माँ भगवन जते सृष्टि रचने छथिन, सभ सृष्टिमे सभसँ नीक छथि माँ. महाभारतमे युधिष्ठिर कहलखिन, ऐ धरतीयो सँ पैघ छथि माँ माँक बारेमे की लिखू, ऐ सोचसँ परे छथि माँ. नौ महिना ओ कोख मे राखै छथि, प्रसवक पीड़ा सहै छथि माँ बच्चाकेँ छाती लगा कऽ सुतबै छथि, अपने राति-राति भरि जागल रहै छथि माँ. बच्चाकेँ निक- निकूत खुआबै छथि, अपने कए साँझ भूखल रहै छथि माँ. बच्चाकेँ आँचरमे छुपबै छथि, अपने हर दुख झेलै छथि माँ. बच्चाकेँ जौँ कुनू कष्ट होइ छै, ओकर दर्द महसूस करै छथि माँ. बच्चा चाहे हुनका कइटा रहैए, सूर्य प्रकाश जकाँ एकरंग प्यार करै छथि माँ. बच्चा चाहे बूढ़े भऽ जाए, तैयो हुनका बच्चे समझै छथि माँ, बच्चा चाहे केतबो गलती करए, बिना माफी माफ करै छथि माँ. बच्चा चाहे जेहेन सोचैए, बच्चा निकक लेल जीवन बितबै छथि माँ. बच्चा जे मइ टूअर हैछथि, हुनकासँ पूछियौ केहेन होइ छथि माँ, बच्चाक सोचसँ चैन तखने होइ छथि, जहन ई दुनियासँ जाइ छथि माँ बच्चा सँ हुनका एते मोह छनि, मरला बादो लगैए दुआर पर बाट ताकै छथि माँ, माँकेँ नै बिसरियौ नै दुःख पहुँचाबियौ, थालमे खिलल सरोज छथि माँ पश्चिमी सभ्यता छोड़ू छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाजक अपन सभ्यता पुकारैय माय - बाप क सेवा परम कर्तव्य छी, ओ बालिग होयते ठुकारावैय. सेवा- काल तन -मन सँ सेवा करै छी, ओ वृधाश्रम मे पहुँचावैय. छोड़ू छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाजक अपन सभ्यता पुकारैय पुकारैय .. अर्धांगिनी संग जीवन बिताबै छी, ओ जीवनमे छोड़ैय जोड़ैय छोड़ू छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाज क अपन सभ्यता पुकारैय. रिश्ता - नाता लेल त्याग करै छी, ओ अकरा पाइसँ तौलैय . संगी - साथी लेल जान दै छी, ओ दिनमे दू चारिटा जोड़ैय तोड़ैय. छोड़ू छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाज क अपन सभ्यता पुकारैय संयुक्त परिवारमे ख़ुशीसँ रहै छी, ओ तनहा असगर रहैय. अकेलापन तँ महसूसे नै होइ छै, ओ अइ लेल नशा पान करैय . छोड़ू छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाज क अपन सभ्यता पुकारैय नै सिखु हुनकर ई अवगुण, ओ डिस्को पबमे शराब- सिगरेट पिबैय , सिनेमा इंटरनेटसँ दुइर भऽ, ओते नाबलिको गलत सम्बन्ध बनबैय. छोड़ू छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाज क अपन सभ्यता पुकारैय सिखु हुनकर किछु निक गुण , ओ शहर सड़ककेँ गन्दा नै करैय. हुनके चलते आइ औरतो , खुलिकऽ अपन बिचार प्रगट करैय. छोड़ू छोड़ू ई पश्चिमी सभ्यता, मानव समाज क अपन सभ्यता पुकारैय तामस देखियौ देखियौ ई बढ़ैत तामस, अन्यायक बीज अन्कुरेनेयऽ, . सहनशक्ति हुनका नै छनि, बात-बात पर लड़ैय. मरै-मारैपर उतारू होइ छथि, बात किछु नै रहैय. एक दिन सड़कपर देखलौं, बेकसूर गरीबकेँ मारैय. तहन शोर मचेलौं, तैयो लोक नै एतऽ आबैय . लोक देखैत जाइय, कियो नै एतऽ रुकैय. तहन ओ आयल हमरा लग, धक्का दैत भगैय. अबाक देखते रहलौं, ई एना किए करैय, ओकरा जाइते सब पूछैय चोट तँ बेसी नै लागलय. पुछलिअनि अपना सभकेँ अकर आदति नै पड़लय, जखन देश गुलामे छल तखने सँ खूनमे तँ नै बसलय, पड़ोसी अइ ठान अन्याय होइ छै लोक गेट लगौनेय अपना सबहक सहन शक्तिए ओकरा बढ़ावा देनेय उठू उठू आबाज दियौ जों एक नै छी तैं तँ ई डरेनेय. छोड़ू छोड़ू ई मांस मदिरा यएह तँ तामसी बनेनैय आउ सपथ लिअ अइ तामसकेँ शरीरसँ भगौनैय देश भक्ति भारत देश यऽसभदेशमे महान हम सब छी, अही मायक संतान
राम-कृष्णक धाम छी, ई यऽ एहेन पावन गंगा-यमुना बहै छथि, अमृत धार जेहेन
भारत देश यऽ सभ देशमे महान हम सभ छी, अही मायक संतान
ई छी ब्रह्मंडक, सृष्टिक शान एतऽ जनम लऽ बढ़ल हमर मान
भारत देश यऽ सभ देशमे महान हम सभ छी, अही मायक संतान
एही गोद मे खेलिकऽ भेलौं जबान यएह हमरा लेल, उपजेलथि अन्न-पानि
भारत देश यऽ सभ देशमे महान हम सभ छी एही मायक संतान
हम बनऽ चाहै छी, एहन सुंदर संतान जिनकर माला जपैए एहन वीर जबान
भारत देश यऽ सभ देशमे महान हम सभ छी एही मायक संतान
निकालब कट्टरता-आतंकबादक जान मिटा देबै ऐ दुश्मनक नामो निशान
भारत देश यऽ सभ देशमे महान हम सभ छी एही मायक संतान
लड़ैत-लड़ैत जौं चलि गेल जान करै छथिन भगवानो ओकर सम्मान
भारत देश यऽ सभ देशमे महान हम सभ छी एही मायक संतान
भारत माँ पर, भऽ जाउ बलिदान ओइ वीरक, होइ छै सृष्टिमे पहचान
भारत देश यऽ सभ देशोमे महान हम सभ छी एही मायक संतान
दिया दिअ माइसँ एकटा इहै वरदान हर बार जनम ली एत्तै चाही बनी हिन्दू-मुसलमान भारत देश यऽ सभ देशमे महान हम सभ छी एही मायक संतान नारायण झा एखनहु जकड़ल छी
अप्पन देस आ अप्पन गॅाव पर पूर्वहि पड़ल स्वच्छन्दताक छॉव एखनहु धरि छी हम जकड़ल डेन पकड़ि जाइछ पकड़ल । परम्परा आ मनगढ़ बात डेग . डेग पर खींचॅए हाथ विचार सदिखन राखि सुविचार गढै़त रही नीक आचार । आजादीक दिन होयत तखन पवित्र जखन आनोक नयना सॅ देखव चित्र नीकक सदिखन गमकए सुगंध बेजाइक पल पल गन्हकए गंध । देखाबी हम मेहनत कॅ फुलाबी छाती अपनहि मेहनत सॅ मेहनतक फल होइछ मीठ छीनल संपदा सदिखन तीत । हे शिक्षार्थीए हे नवतुरिया खोलू चौपतल ज्ञानक पुरिया दुनिया अछि लोक भॅाति . भॅाति सॅ बनल एखनहु धरि ठाड़ छी परतंत्रक पॉति मे अड़ल । अप्पन देष आ अप्पन गॅाव पर पूर्वहि पड़ल स्वच्छन्दताक छॉव एखनहु धरि छी हम जकड़ल डेन पकड़ि जाइछ पकडल ।
एकता बंधू एकताक डोर सॅं बॉंटू सूत-सूत कॅं डोर मे नहि चोट खाउ अनेकताक रोड सॅं गढू एकताक जोर मे। न केयो हिन्दु न मुसलमान सभ थिकहु विवेकी इंसान न केयो सिक्ख न ईसाई सभ थिकहु छोट-पैघ भाई-भाई। सभ तनक लहुक कण मिलाउ देखु एकहि सन किया करब मानवताक डाह सोचव तँ नीनो मे आयत आह। जे थिकाह अल्ला, हुनकहि राम जे थिकाह ईसा, कहैत छी श्याम कखनहुँ बनि साई, कखनहुँ हनमान सभ देव-देवीक थीक नाना नाम। जाति -पाति छूआ-छुत एहि सॅं रहु सभ अछुत पूत बनि भारत मॉं कए जुनि दुतकारू एहि मॉं कए एक भॅं लगाउ जयकारा गुंजा दिअयो भू-नभ-तारा जय भारत-भूमि जय हे माता अपनेक छी सभहक विधाता बंधू एकताक डोर सॅं बॉंटू सूत-सूत कॅं डोर मे नहि चोट खाउ अनेकताक रोड सॅं गढू एकताक जोर मे। इरा मल्लिक बैसू लगमे, नीक लगैए अहाँ कहै छी , बैसू लगमे, नीक लगैए। नेह नयन निहारब सजना, बड नीक लगैए। हाथ केँ हाथ सँ साथ मिलल, जखन पयलौँ नेह अहाँके, जीवन डोर मे बान्हि पिया, सोहागिन बनलौँ अहाँके, अहाँ हँसै छी सौँसे घर आब , झिलमिल चाँद लगैए, नेह नयन निहारब सजना, बड नीक लगैए। सुध बुधि नै अछि अपन आब तेँ, मुखड़ा देखि अहाँके, सिंगार अहीं छी, साज अहीं, पिया! प्यार बसल अँगनामे, अकछ करै छी पिया हमरा, तहियो बड नीक लगै छी, घर मे होली, दशमी, दिवाली, निशदिन आब लगैए। अहाँ कहै छी, बैसू लगमे, बड नीक लगैए। नेह नयन निहारब सजना, बड नीक लगैए। राम विलास साहु सिम्मर केर फूल लाल-लाल सिम्मर-फूल देखि सुग्गा ललचाइ फूल रंग भोगार भेल सुगा गेल लुभाइ अपन उद्देश्य बिसरि सिम्मरकेँ सोइरी लेलक बनाइ सोइरी सेबैत-सेबैत सुग्गाकेँ चिल्का गेल हेराइ फूलसँ फलसँ बनैत धरि सुग्गा रहल उपास फल एहेन ललिचगर लोल मारिते उड़ि जाए सुग्गाक उपास नै टुटल पारनमे की खाएत आश लगौने सुग्गा सिम्मरपर भेल िनरास लोभमे फँसि सुग्गा अपने कर्मपर पचताए शोगाएल सुग्गा बाजल रूप रंग देखि नै लोभाउ रूपक माया जाल फँसि भुखले तेजब प्राण। ओलंपिक बच्चासँ बूढ़ भेलौं बड़-बड़ खेल देखैत रहलौं पैंसठ बरख आजादियोक भेल मुदा पूर्ण आजादी कहियो ने देखलौं आइ धरि सरकारक कठखेलमे ओलंपिक खेल शुरू भेल जनताक विकेट गिर गेल देसक रूपैया खेल-खेलमे मूड़ि-सूधि सभ सधि गेल सभ शहरमे स्टेडियम बनि गेल गाममे बेरोजगारी बढ़ि गेल आजाद देशमे के आजाद भेल आजादीक झंडा फहरौने की ओलंपिक तगमासँ गरीबी-बेरोजगारी मिट गेल जखन आजाद देशक जनता अखनो बाटीमे भीख मंगैए तखन सरकार ओलंपिकमे अरबो रूपैया किअए लगबैए एतेक रूपैया खेती-उद्योग आ रोजगारमे किअए ने लगबैए जखन देशमे एतेक गरीबी छै आलंपिककेँ की जरूरी छै जखन देशक आत्मा गाम-घरमे बसै छै तँ गाम-वासी किअए एतेक उपेक्षित छै जे गामक लोक नरकमे जीबै-मरै छै गामवासीक लहु बेचि सरकार ओलंपिक खेलै छै ओइसँ गरीबकेँ की भेटलै जखन खोदै छै पहाड़ तँ मूस भागि जाइ छै। रौदी माथपर हाथ धेने खेतिहरक आँखिसँ गिरलै नोर धरती सुखलै धान जरलै खेतमे फटलै दरारि सुखले साउन-भादौ बितलै खेतिहरक नसीब फुटलै खेतसँ उड़ै छै धूल जरैत खेत देखि दिल जरैत जरि गेलै सबहक तकदीर की खेबै अपना की खेतै धिया-पुता सोगसँ घटलै शरीर पूर्वा-पच्छिया फोंक गेलै सभ नक्षत्र बनलै ठक ऋृतु बदललै मौसम बदललै धतरीक दरारि फटले रहलै पानि बिनु सभ जीब तेजै छै नित्य परान रौदी-दाही बहुते देखलौं एहेन जुलुम कहियो नै देखलौं अछैतै ओरूदे गेलै परान ई मुसिबत के हरि लेतै जखन भगवान, सरकार दुनू बेमुख बनल छै खेतिहारक दुख के पतिएतै मांगै छै पानि तँ डीजलक अनुदान भैटै छै। प्रमोद रंगीले नेताजी जिन्दाबाद नेताजी मंचप भाषण दऽ रहलए सभ दिनक काज ओ कऽ रहलए। भाषण सुनैत सुनैत एकटा अभागल, उठल गडगडाकऽ जेना भऽ गेल पागल । कनिक देर मनकेँ शान्त कऽ कऽ सहलक । तहन जाकऽ मनक बकार फोड़लक। रौ तोरा सँ वढ़ियाँ कुत्ता........। सुनबिही कखन जखन लगतौ जुत्ता। दोसरक माल खा खा कऽ बढालेलेँ पेट। यएह कारण सँ घटल छौ तोहर रेट। नेताजी पहिने घबड़ाएल, कनिक धड़फड़ाएल, तहन जाकऽ मेकमे गड़गड़ाएल। देखियौ देशमे शान्ति लाइब देली। पैसा केँ लुटएला भलेही मुँह बाइब देली। देश एखन राहतक साँस लऽ रहल छै। भलेही कर्सी आन्दोलन भऽ रहल छै। देखियौ शिक्षा कतेक आगू भागि गेल। भले शैक्षिक संस्थामे ताला लागि गेल। देखियौ विदेशमे बहुतकेँ रोजगारी लगा देली। भलेहि अपन देशकेँ रोजगारीक पैसा खा गेली। देखियौ सभतैर बिजलीबती मिल गेल छै। भलही बिजली बिलमे जनता सभ हिल गेल छै। देखियौ अपन देशक गरीबी मिट गेल। भलेहि धनीकहा सभ दस महला पिट गेल। हमरा जीता देब तँ हम आउर विकास लाएब ओइमे सँ पचहतर परसेन्ट मात्रेेे खाएब। अहाँ सभकेँ खुश राखक हमर वादा अइ। बुझि गेली हमर कि इरादा अइ। वेवकुफ जनता आउर वेवकुुुफ भऽ गेल। गलती ओ कऽ कऽ सभ क्रेडिट लऽ गेल। भाग्य यएह रहत कतनौ होउ बरबाद प्रेम सँ कहू नेताजी जिन्दावाद । अनिल मल्लिक गजल १ हे राम पुछैत छी अहाँ सँ कहू किए दोष हमरा पर लादल गेल जमीन मे समयलौं हम अपने की जीवीतेमे हमरा गाडल गेल अहील्या सुखी छलौं पाथर बनी कS ने बेदना ने कोनो संबेदना छल उद्धार केलौं किए की अपमान सही कहाँ ओहि दुष्ट के मारल भेल
हे श्याम सुन्दर हे मुरलीधर कहू प्रीत मे हमर कोन खोट छलै बिरह अग्नी मे जरैत रहलौं हम किए प्रीत चिता मे जारल गेल
हे कृष्ण कहैत छलौं सखी हमरा बहीनक हमरा सम्मान भेटल नोर बनी बहल दर्द हमर जखन पाँच पती सँ बिआहल गेल
हे बालकृष्ण अहि यशोदा के मातृत्वक बदला अहाँ किए अश्रु देलौं गोकुल छोडि मथुरा गेलौं कहियो हाल पुछब से कहाँ आयल भेल
नारी पर अत्याचारक क्रम सुरुआत तहिए सँ भेल स्वीकार करु नाक जे काटल सु्र्पणखा के कहू कोन न्याय सीद्धान्तक पालन भेल
इतिहास के अपन ईक्षा सँ सभ अपने तरह सँ लिखैत रहल निधोक घुमैत अछि अन्यायी कहाँ समाज मे एहन के बारल गेल २ चार पर सँ खसैत पानि ओरिआनी मे सँ बहैत रहै ओहि मे जे बच्चा सभहक कागजक नाओ चलैत रहै
माँ खिसिआए कनि जलखै खा ले केओ कहाँ सुनैत छलै गडै गैंची आ कबै माछ लेल पैनी मे बँसी पथैत रहै
समय नेनपन के एक्को बेर ओह घुमि फेरो अबितै सँगी बिनु ने दिन कटै बिन बातो केखनो लडैत रहै
आम तोडै सभ नजरि बचा कखनो मकै के बालि तोडै पकडि लै त' कान पकडि क' बाबु के आगाँ लबैत रहै
जिनगी के खाता बही मे यादि के हिसाब लिखैत सभ छै तहिआ ने छलै कोनो चिन्ता निफिकिर सभ घुमैत रहै
बितल बरख दशमी मे गेल छलौं हम गाम अपन पोखरि पर ई बात चलल सपना सन लगैत रहै
(सरल वर्ण २१) अविनाश झा अंशु गजल मूँह जाबि देलक आब हरियरी देतै ई तानाशाही हमरासँ नै सहल जेतै बेसी तंग केलक आब करब विरोध, हमर धक्कामे पत्ता जेना उड़िया जेतै
बदला लेब एहन जे राखत ओ मोन दोबारा निकट एबाक हिम्मत नै हेतै
बेर-बेर पश्चाताप करत नोर बहा-बहा आब तहियो ओकरा पर दया नै हेतै
घुमत नव जोगाड़ मे इम्हर –उम्हर आब कोनो मूँह जाबि लगाबऽ नै देतै
(बिना रदीफक गजल वर्ण -१५) पंकज चौधरी “नवलश्री” गजल १ एक नजरि हुनकर पड़लै जे हमरा पाँजसँ ससरल मोन दूक्षण लेल भसियेलय जे से एखनो धरि नञि सम्हरल मोन कात -करोटे ताकैत बस हुनके चारु दिस छइ पसरल मोन सखी -बहिनपा संग ओझरायल देखिकऽ हुनका पजरल मोन हुनके आँचरिके अऽढ भेलहुँ जिनका कनखीसँ कचरल मोन सभ कतरा में प्रेमक -पोखरि सरस एना भेल कतरल मोन मधुरिम आंइखसँ नेह पीबिकऽ नेह - धरा पर चतरल मोन हुनकर नेहक अचल मेहसँ स्नेह - लता बनि लतरल मोन सगर बाट स्वागत के सेहन्ते अलकतरा बनि पलरल मोन स्पर्श पाबिकऽ पैरक हुनकर मधुर छुअनसँ सिहरल मोन हुनका अबिते कोयली कुह्कल बनिकऽ फगुआ मजरल मोन छोइड़ गेली ओ विरहक रउदी जड़ल-पाकल झखड़ल मोन प्रेमक पोखरि लए छपकुनिया धिया -पुता सन उमरल मोन स्वपनलोकमें भुतियाअल सन भूख-प्यास तक बिसरल मोन गोह्न्छल -लोह्छल भेल मलीन कखनहु पित्ते अकरल मोन सिनेह - दुलारक तइयो भूखल नञि दुलारसँ अभरल मोन मुदा आब तऽ गप्पहिं दोसर धन -वैभव आँगन नमरल मोन अइ कलयुगिया करिया- युग में भावहीन भेल भखरल मोन सुख -सुविधासँ नेहक परितर दुःख -दुविधासँ हहरल मोन "नवल" सिनेह केर करुण दशा ई देखि कष्टसँ कहरल मोन *आखर-२५ (तिथि-०४.०४.२०१२) २ काजरसँ शोभा आँखिक की आंखिसँ शोभित काजर करिया जादूसँ केलक सभके सम्मोहित काजर नजरि नञि ककरो लागय जादू - टोना छू- मंतर डायनो -जोगिन के केलक मोन के मोहित काजर लागै नजरि नें अपना की लेती प्राण अनकर ओ फँसल मोन दुविधा में ई देख अघोषित काजर सम्हारल जेतै कोना कऽ ई भाव करेजक भीतर परसैऽ प्रणय - निवेदन नैन नवोदि काजर ई मेघो देखि लाजयल जे कारी खट-खट काजर "नवल" कलंकक सोझा भऽ गेल अलोपित काजर *आखर-१९ ३ किछु फुरा नञि रहल की करी नञि करी अनचिन्हार के कोनाकऽ मनाएल जाय ओ हमर के हेती हम हुनकर के छी ई सरोकार कहुना तऽ फरिछाएल जाय
हुनक आंखि लाजे धंसल जा रहल शब्द ठोढ़क थरथरी में फँसल जा रहल ओ बजती ने किछु हमरा टोकने बिना ई गप्प कोन ब्योंते फेर अगुवाएल जाय
आंखि हुनका सँ जखने मिला हम लेलौं कारी पोखरि में लागल बिला सन गेलंहु ने रातुक पहर ने तरेगन उगल ई भ्रमित मोन जगले में सप्नाएल जाय भने छलियै बान्हल नयन मेहसँ नञि तऽ उधिया कऽ खसितउं हुनक नेहसँ कते काल हेललहुं मगन आंइख में आब करेजा में सेहो तऽ सन्हियाएल जाय
नहि जानि कोना ई कखन भऽ गेलय छलय अनचिन्हार जे से अपन भऽ गेलय दू क्षण में कए जीवन के ललसा पुड़ल ई सच में भेलै कोना पतियाएल जाय
अपन मोन पर अपने अधिकार नञि आब हुनका बिना हमहूँ चिन्हार नञि हुनके सँ छइ अथ-श्री इति-श्री "नवल" प्रेम में ई मगन मोन भसियाएल जाय
*आखर-३१ राजीव रंजन मिश्र गजल १ भोरहिं भोर उठल बौआ अंगना में खेलय छै भूलि बिसरी कए सभटा चारू कोने दौरय छै ओकरा ने कोनो मतलब ककरो सँ कखनहु दौरि धुपि थाकै जखने भूख लगै त कनय छै बौआ खुर खुर दौरय आँगन आर दरवज्जा बाबा के देलहा डाँरक् टुनटुनिया बाजय छै देखइ बाबा दाइ कक्का आ दीदी सभ विभोर भ बौआ सभके तोतर बोली में बात सुनाबय छै माँ चौका सए घोघ तानि ऐली बाटी में दूध लेने देखि परैल कोन्टा पर माँ बौआ के नीहोरय छै बाबु आनि उठा कोरा में चूमि चाटी क नीक जकाँ बैसेला ओकरा माय ठन ओ तैय्यो अकरय छै माय हूलसि कए चुचकारि नेन्ना के कोरा लए घोटे घोंट दूध पियाबै बौआ पिबै बोकरय छै राजीव अनुपम छवि बिलोकि माय सन्तानक विभोर भ मायक पैर पर माथ झुकाबय छै (सरल वार्णिक बहर) वर्ण-१८ 2 हम भारत के वीर जवान बनब हम मिथिलाक पुत महान बनब घर हमर जे उजरल लचरल बसबय के एकर समान बनब माय गे पढ़बौ हम खुब मोन लगा नै पढ़ल लिखल बईमान बनब घर समाज के देखति सुनति हम पुरजोर इजोरियाक चान बनब पछुआयल छै देश कोस मिथिला के अगुआ भए सुधारक तान बनब काज करब हम सबके संग लए आ मैथिल जन मुहंक गान बनब हम सप्पत खाइत छी आइ माय गे मातृभूमि मिथिला केर मान बनब (सरल वार्णिक वर्ण-१४) 3 माँ गै आइ बता किया चंदा में कारी छै हमरा कह किया सवाल ई भारी छै देखल सदिखन तोरा काज करैत मुदा बैसल बाबु कियाक बेगारी छै हम्मर अंगा सभ फाटल पुरान आ तोरो त बस गानल दुय्ये टा सारी छै सब खाय अपन घर नीक निकुद हमरा लेल किया जे नून सोहारी छै भातक संग अगबे सन्ना सब दिन दाईलो राहरिक बदले खेसारी छै कनिके टा घर दुआरि अपन छैक आँगन में नहि एक्क्हू टा गै-पारी छै बुझी हमहूँ सबटा नहिं नेन्ना छी गे जे ई सभटा टाका केर मारामारी छै हमहूँ पढ़बै आ बड्ड पाई कमेबै लिखल तोरो भागे महल अटारी छै धीरज राखि तू जीबैत रह माय गे बेटा तोहर बुझै सब बुधियारी छै (सरल वर्णिक वर्ण-१४) 4 पढि लिखि कए बौआ बाहर रहतै सत बाबा के कहल आखर रहतै दिन पलटतय हमरो सबहक भरल घर नोकर चाकर रहतै लक्षण करम एकर लागैत अछि बौआ सबतरि भए धाकर रहतै मोनक हमरो सुनथिन भगवान करेज अपन भए चाकर रहतै माय बहिन खानदानक पुरतय बौआ सबहक लेल सागर रहतै बढ़तय दिन दुना राति चारिगुन्ना भरल नित बौआक गागर रहतै (सरल वार्णिक बहर, वर्ण- १४ शिव कुमार यादव गीत: बरखाक मौसम ऐलए बरखाक मौसम ऐलए, साउनक मास चलल बरखा ऐलए-बुन्नी ऐलए, बूनेँ-बून पानि बरसल।
जान भेटल सुखल दुभिमे, छोट-नमहर लत्ती लतरल गाछ-बिरिछ, घास-पात हरिआएल, माल-जालक मनमा जुड़ाएल। कतौ-कतौ तँ रौदिए अछि, गाछ-बिरिछ मुरझाएल मुदा कि करबै? मनुषक करनी जे गाछ-बिरिछ काटल।
कोशी-कमला उछललि, उछलल नहरि-गंडकक कतहु-कतहु तँ बान्हो टुटल, तँ कतेको गामो दहाएल।
कतौ अछि जलामए बाड़ी-झाड़ी आ खेत-पथार, तँ, कतहु अछि दरार पड़ल सुखाएल चौरी-चाँचड़।
बौआ बुचकुन छुपर-छापरि खुब कऽ रहल, तँ धीया-पुता आ मुनसा अछि माँछक जोगाड़िमे लागल।
मधुश्रावणी सेहो भेल, आ हएत भोला बाबाक पूजा आ व्रत सभ सोम तँ व्रत रखती कतेको कन्या, अछि ई साउनक मास।
घंटीक टुन-टुनक मिठास सगरो, चलल हर-बड़द खेत दिस, कादो भेल, बीआक आँटी लऽ चलल जन रोपनी लेल।
मेहनत कऽ रहल अछि कृषक मंडली खूब जतन सँ "शिकुया", तखने तँ फसलि लहलहाइत अछि आ अन्न भेटैए।
हमर एतबहि अपराध छल
हमर एतबहि अपराध छल हम नीच जातिक छौड़ा, हमर एतबहि अपराध छल।
गरसा नेने ठाढ़ अछि तमसाएल बीचे बान्ह पर, गरदनि आइ काटि देबै, जँ टपलै फेरो सँ आब फलनाक छौड़ा हम्मर दूरा।
छै एहनो लोक मुचंट जे आगाँ पिछाँ किछु नै सोचए, पढ़ल-लिखल आ ऊँचक नाँच नचए, अप्पन कपाड़ि छोड़ि कऽ अनकर धीया पुता केँ दुसए।
सोझा हमहीं पड़ल छलिऐ हमरे पर ओ दौड़ल छल, हम तँ अनभिज्ञ अबोध नेना, खनए मेँ तीतल बिलाड़ि जकाँ हम ओतऽ सँ पड़ाएल छलौं।
हमर एतबहि अपराध छल, गामक लोक मने हमर माय डाइन। सात दिन सँ ओकर छौड़ा, बोखारि मे बिछौना पर पड़ल छल।
कि! एखनो धरि लोक मानैए, डाइन जोगन सँ डरइए? हम तँ अबोध नेना छी, बापक मुइने बटुबर छी।
बापक मुइने माय भसिआएल छल, सदिखन किछु नै किछु निहारैत छलि, अपने मेँ किछु बिचारैत छलि, अप्पन घर-आँगन केँ सरिआबैत छलि, तैँ, लोक डाइन बिचारि बजाबैत छल।
जइ गिरहत काजे बाप मुइल, ओ उलटे गरिआबैत अछि गए मौगी, अप्पन मरदकेँ खएबे केलाँ, आब हमरा पर डेनियाँ लागल छैँ, कि-कि नै कहि लोककेँ ओ बताबइए।
हमर एतबे अपराध अछि, लोकक मोने हमर माय नै चलल तैँ, लोक सदिखन दुत्कारैत अछि, चुड़ैल डाइन कहि बजाबैत अछि।
एतेक खीझैत होइतौँ समाजक लोक सँ, माय माहुर आनि नै खएलक, हमरे लेल ओ जीबैए, अनकर आस छोड़ि कऽ एसगरे ऐ निःदर्द दुनियाकेँ पछाड़ैए।
"शिकुया" हमर एतबे अपराध छल, हम नीच जातिक छौड़ा हमर एतबे अपराध छल। रूबी झा गजल १
लेलहुँ सुख भरि पाँज पकड़ि हम गेलौं माँ के कोर पसरि हम ऐना नहि बाजू वयस बितल एखन छी बालकक उमरि हम
अनुपम माँ के छाँह आँचरक प्रेमसँ गेलौं तैं तs लभरि हम
पैघो भेलहुँ जगत टहललौँ माँ सन नहि पाओल नजरि हम
आशीषसँ माँ के विजय सगर रहबै रूबी अमर अजरि हम
२२ -२२२१ -२१२ सभ पांति मे २ भs गेल लजौनी केर पात सन मौलाएल जिनगी अछार परहक भात सन कठुआएल जिनगी अधखिलल पुष्प जेना फूलवारी में खसल कत्तो कहै लेल पुष्प सुन्नर नहि तs सुखाएल जिनगी
समय संग जौं एखन धरि हम नै बदलि पेलौ तैं बनल इनारक बेंग सन औनाएल जिनगी
ताकि रहल छी एतs ओतs जे अपन भाग्यकरेख हाथसँ जनु रेख मेटल आ की हेराएल जिनगी
निरर्थक बीतल जीबन रूबी बिनु परोजनके आब नहि शेष किछ पानि में भसिआएल जिनगी
सरल वार्णिक बहर वर्ण -१९ कुसुम ठाकुर हाइकू समृद्ध भाषा मैथिली मिथिलाक जायत हेरा लाज होइछ बाजब कोना भाषा पढ़ल हम दोषारोपण नेता अभिभावक नहि कर्त्तव्य देशक नेता नहि जनता केर स्वार्थे डूबल करू ज्यों स्नेह माँ आ मात्रि भाषा सँ संकल्प लिय आबो तs जागू मिथिला केर लाल प्रयास करू अबेर भेल तैयो विचार करू अछि सन्देश हेम नारायण साहु जुलुम भऽ रहल अछि... कोनो काज नै बिनु घूसक होइए ई देखि कऽ मन बौड़ाइए। समए एहेन बित रहल छै केकरो कोइ नै चिन्है छै हाकिमक कोन गप कहै छी चपरासियो नै ओना टेरै छै। कर्मचारीक तँ जूनि पूछू रखने एकटा पीठू छै। जखने पहुँचब झट दऽ कहि देत एकटामे पाँच सए लगै छै। पंचायतक तँ बाते छोड़ू मुखिया आँखि मुनि सुरकै छै बिना टाकाक आवास नै दइ छैक। एतेक महग एकर साइन छैक ओ सभ जइठाम बैसल छै बिना लेने नै बक्सै छै। जेकरा नै छै बोल ऐ युगमे ओकरा कोइ नै देखै छै। ओना चलत नै काज आब सभ कोइ मिलि फूकब बिगुल आब। ढाहि देबै घूसक पहाड़केँ नै छोड़ब ऐ दुष्ट समाजकेँ। नव ढंगसँ नव समाजकेँ गढ़ि देव ई नव इतिहासकेँ। भष्टाचार सभठाम होइए धक्कम-धुक्का जइठाम जाइ छी खाइ छी मुक्का। सबहक बन्न अछि चीलम-हुक्का बैस कऽ जरदगव मारैए मुक्का। गामसँ लऽ पंचायत धरि ब्लॉकसँ लऽ जिला धरि। धुमौआ चेअर बैसल धुरफन्दा एँठ रहल धैर्य सभसँ चन्द। आगू जतेक बढ़ैए जनता ओतबे पैघ बैसलए हन्ता। किएक ने एकर सोच बदलैए औंघाएल मनुक्ख मुँहभरे खसैए। कतेक दिन एना होइत रहत िदन-दुखिया एना पिसाइत रहत। समता मोन पड़ैए मधुमाछी छत्ता अनगिनित मधुमाछी मिलि बना रहल अछि अपन छत्ता। नै केकरोमे भेद-भाव सबहक मनमे एके भाव। दिन राति सभ जूटल रहैए अमृत रस चूसि भरैए रहैए। बाग-वगियामे धुमैत रहैए मधुर गीत गबैत नचैए फूल-पातपर गाबि-गाबि लाबि-लाबि मधु सृजैए हृदए सबहक जुड़बैत रहैए। बाल मुकुन्द पाठक गजल १ लोक कहैत छथि जे हम छी शराबी शराब पीबै छी कियो बात मानै नै छी छै की खराबी शराब पीबै छी हम तँ दिन राइत घुरिआइ छी मोन पाड़ि रहि रहि हुनकर याद आएल बात घुराबी शराब पीबैत छी एक दिन उ हमरा नजरमे बसेला प्यार जगेला हम दिलकेँ हुनक प्यारमे दौड़ाबी शराब पीबै छी कहियो गाछीमे बैस नयन मिलेला मोबाइलसँ बतियेला दिन राति हुनक यादसँ अपनाकेँ सताबी शराब पीबै छी उ अपन दुनिया बसेलाऽ हमरा पागल बनेला हुनकर चक्करमे मुकुन्द भेलै शराबी शराब पीबै छी २ हे भगवान अपन ताकत देखा दिअ हुनका क्षण मे हमरा लग बजा दिअ बहुत दिनसँ तरसैत छी प्रेम लेल सोलहो श्रृंगार मे एहि ठाम पठा दिअ दिन- राति आँखि सँ कोसी गंडक बहबौँ बान्ह टूटल ई गामक गाम बहा दिअ कानैत कानैत हमरा अहाँ हँसा दिअ हुनको हमरे सन हालत बना दिअ असगर बैसल नै नीन्न नै चैन आबै मुकुन्द हमरासँ तँ गले लगबा दिअ ३ अहाँक बिना कोना कऽ रहबै हम चाँन जकाँ मुँह नै बिसरबै हम बड़ दिनसँ प्यासल छी मिलनले सिन्धुक गहराइ मे डुबबै हम अहाँ रुप केर भरल खजाना छी तँए रुपक दीवाना बनबै हम अछि मोरनी सन के चालि अहाँ के अहाँक संगे नाँचि कऽ देखबै हम ई मोन कहै छै एक ना एक दिन अहाँ सँ कतौ नै कतौ भेटबै हम मुकुन्द पुछैत अछि हे मृगनैनी कहि दिन कनियाँ बनबै हम ४ अहाँक गेलासँ आब जिनगी एकारि लागै हमरा तऽ एको दिन साल जकाँ भारि लागै देह हाथ सुखल हमर केशोँ नै माथामे अएनामे देखलासँ बड़का बेमारि लागै खाइ पीयैमे हमरा किछो नीको नै लागैए भात दालि कि खाएब निको नै सोहारि लागै कि कहब हम बाबूकेँ केना देखेबै मुँह पटनामे पढ़ल अनेरे मोन भारि लागै देखै छी फोटो जौँ उ आर याद आबैत छथि मुकुन्दकेँ अहाँ बिना रहल लचारि लागै सरल वर्णिक बहार वर्ण-१६ पवन कुमार साह भाय-यौ भाय-यौ...... चलू चलू चलू चलू चलू चलू मिथिला गाम लागल छै ऐ ठाम सुन्दर धाम भाय-यौ भाय-यौ......। सुन्दर गाम, सुन्दर नाम सुन्दर खान, सुन्दर पहचान एहेन अछि अपन मिथिला गाम भाय-यौ भाय-यौ......। मिठगर बोली मिठगर बात दुस्मनो समैपर होइए साथ सभ मिलि-जुलि रहए नै देखबै गुमान एहेन अछि अपन मिथिला गाम भाय-यौ भाय-यौ......। गाछ-बिरिछ कत्ते सुहाबै कोइलीक कू मनकेँ भावै स्वच्छ हवा ऐ जगहक रग-रग देहकेँ तृप्ति कराबै नै भेटत कतौ एते आराम एहेन अछि अपन मिथिला गाम भाय-यौ भाय-यौ......। मोनक बात मोनक बात मोने रहि गेल असरा फेर बर्षक पूरा नै भेल दिलक बात दिले रहि गेल मनक बात मोने रहि गेल। विचारि-विचारि हम चलैत गेलौं पास जा कऽ सभ किछु विसरलौं नजरि हमर पराइते-पराइते एक्केठाम एहेन बसि गेल मनक बात मोने रहि गेल। सोचलौं आब ओ तकबे करत आँखिक इशारा देबे करत आगू-पाछू हम करैत छलौं मुदा हमर सोच व्यर्थ भऽ गेल मनक बात मोने रहि गेल। राजदेव मण्डल कानैत हँसी घटि गेल बीचक दूरी गप्पसँ बेसी डोलैत मुड़ी किछु नै जानै छी तैयो अपन मानै छी एककेँ सुख दोसराक सुख दूनू मिलि भऽ जाइत अछि दुख एक गोटेक आँखिक नोर दोसरकेँ दुखक नै ओर भीज रहल अछि अन्तरक पोरे-पोर ई नै रूकत कतबो लगाएब जोर संचय कएल एक-एकटा कण कतेक भरिगर भेल छल तन निकलि गेलासँ आब केहेन हल्लुक लगैत अछि मन माए एकदिन कहने रहए साइत सभटा सहने रहए बाटसँ भऽ कऽ कात वएह भोगल बात कहैत नीक अधलाह फाटि कलेजा निकलै दाह दू बून सूखल हँसी नोर जल अथाह कहलौं-सुनलौं भऽ गेल गप्प एहेनठाम की करिते रहब तप हे, रहै छी कतए कहाँ गप्प कतौ नै बजबै अहाँ बिसरि थाल-कादोमे धँसल कानैत-कानैत खिखिया कऽ हँसल लवका शक्ति जागि गेल हँसलासँ दुख भागि गेल। कनहेपर भाेलबा हड़बिर्ड़ो मचल अछि मेलामे धिया-पुता हरा गेल ठेमल-ठेलामे दूनू पच्छ अछि पूरा तगड़ा शुरू भऽ गेलै मेलेपर झगड़ा कोइ एँठ-कुठपर खसल चिचियाइत कोइ भीड़मे फँसल मँुहपर डर नाचि रहल अछि सभ अपने दुख बाँचि रहल अछि के कोनए भऽ गेल निपत्ता केकरो नै चलि रहल पत्ता “हे रौ सुन-ढोलबा हरा गेल भोलबा गाँजा पीबैत छन छलै सँगे की कहबो, छौड़ा छै अधनंगे तकैत-तकैत करए लगल दरद कानि-कानि ओ करैत हेतै गरद।” गाँजाक चिलम जेबीमे रखलक आँखि उनटबैत ढोलबा कहलक- “छौड़ा छह पाछू कान्हपर चढ़ल तूँ जाइ छह आगू बढ़ल निशाँमे अहिना हरेबह काका चिनाय कन्हेपर भोलबा आ भोलबे नै।” “बुधि हरा गेल हमर साइत कन्हेपर भोलबा ओकरे ले औनाइत कन्हेपर छौड़ा बैसल बिसरि गेलौं डर छल पैसल।” बजल बुढ़बा- छौड़ाकेँ दैत चमेटा- “तूँ बेटा छेँ की टेटा हमर मन भऽ गेल अधीर कान्हपर बैसल छेँ भऽ कऽ बहीर।” थप्पर लगिते उपजल आनि छौड़ा बजल कानि-कानि- “आँखि रहितो किछु नै सुझै छह अपनाकेँ बड़ काबिल बुझै छह।” महफा आ अरथी कारी आ उज्जर वस्त्र अछि पसरल नापैत-जोखैत जा रहल छी ससरल पैघ भेल जा रहल अछि दूरी धेने कड़ी आ गोंतने मुड़ी ऊँच-गहींर आ समतल नव-नव दृश्य बनए पल-पल काठ-कठोर बनल हरपल छन मात्र होइत अछि चंचल टपैत देस-कोस बनैत दुसमन-दोस दुखमे होश सुखमे बेहोश काल जीत रहल अछि उमेर बीत रहल अछि तैयो जोड़ैत घटी-बढ़ती आगू शेष ऊसर-परती कतबो नापब नै होएत नापल धरती महफा शुरू केलक अन्त करत अरथी। काटैत बीआ छुटैत निसाँस जेना निकलए जान ऊपर ताकए खाली आसमान नीचा डहि रहल पोसल बीआ देखि-देखि फाटै छै हीया हँसुआसँ काटि रहल फसल केर सीना देह भीजल अछि घाम-पसीना करए पड़त आगूक आस अपनहि काटैत लगाओल चास थरथराइत हाथ जानैत अछि बीआ रहि-रहि केना कानैत अछि हँसुआ कहै आ सुनै कान फुलकी फुला गेल बहि गेल निशान आब कि रोपबह हे किसान जेतबे बोझ बीआ ततबे धान। घरक आँखि रहै छलौं केतबो व्यस्त देखबाक अभ्यस्त ठमकि जाइत छल पएर ठीक ओही स्थलपर सम्हारि एकबेर झाँकि घरक आँखि मध्य ओ मोहक रूप ठाढ़ भेल गुप-चुप चित्र आँखिमे चमकि उठैत छल मनक कण-कण गमकि उठैत छल किछु दिनसँ भेल िनपत्ता बिनु देने अता-पत्ता तैयो आदतिसँ लचार भऽ ठाढ़ भऽ गेलौं शून्यमे ओहिना जहिना पहिने छल तहिना ओ नै अछि ई छी मनक खेल ठमकि ठाढ़ भेल तकै छी ई हमरा की भेल की हमरा आँखिमे हुनक बास भऽ गेल आकि हमर आँखि ओ रूप मिलि एकेटा अकास भऽ गेल। अभ्यास नै ऐपार नै ओइपार खसल छी मँझधार पानि अछि अगम-अथाह मनमे निकलबाक चाह डुमैत भसिआइत सम्हारि रहल छी उनटा धाराकेँ झमारि रहल छी छूटि जाएत घर-पलिबार टूटि रहल अछि मोह केर तार जरूरी छलै धीरजसँ सीखब बूझि समझि मनमे लिखब कछेरमे केने रहितौं हेलबाक अभ्यास एना नै टुटैत हमर आस पछताबासँ नीक सेाचब आगू की हएत ठीक। अकाल परसाल तँ बचलौं बाल-बाल ऐबेर धऽ लेलक असुर अकाल खाली पेट नै फुटतै गाल सबहक भेल अछि हाल-बेहाल। हर-हर पुरबा बहि रहल अछि कानि-कानि काका कहि रहल अछि- झर-झर आगि बरिस रहल अछि धानक बीआ झड़कि रहल अछि। पियाससँ धरती फाटि रहल अछि मवेशी दूबिकेँ चाटि रहल अछि कतेको माससँ नै खसल एको बून पानि की भेलै केना भेलै से नै जानि अपनहि उजारलहक अपन सुख-चैन गाछ कटौलहक फानि-फानि। जलक महत बुझए पड़त नै तँ ई दुख सहए पड़त काल चढ़ए तँ बिगड़ए बानि घुन सँगे सतुआ देलहक सानि चारूभर पसरल घुसखोरबा पापी खसल पड़ल अछि पूरा चापी टक-टक तकैत अछि अफारे खेत पानि बिनु उड़ैत अछि सूखल रेत पछिला करजासँ हाल-बेहाल ऐबेर बिका जाएत देहक खाल नै रोपल जाएत एको कट्ठा धान केना कऽ बचत सालभरि प्राण ऊपर अछि धूरा भरल आसमान नीचा अछि परिवारक मान-सम्मान लोक कहैत अछि- धीरज धरह सरकार देतह हम कहैत छी- तेजगर लोक सभटा खेतह रहब छूच्छे केर छूच्छे आमजनकेँ कतौ ने कियो पूछए बाहर कतए जाएब यौ भाय बेंगू परदेशमे धऽ लेत डेंगू ने खेबाक नीक आ ने सुतबाक ठीक जेबीसँ पाइ लेत उचक्का झपटि-झींंक कियो लेत बेचि कियो लेत कीनि ठामहि रहि जाएत कपार परक ऋृण कतए बेचब कतएसँ आनब पाइ नै रहत तँ कथी लऽ कऽ फानब। आब अछि आशा अगिला जेठ यौ अन्नदाता घटा दियौ अन्नक रेट सभ काटि रहल एक-दोसरकेँ घेंट केना कऽ भरतै सबहक पेट। मनमे छल चाह धियाकेँ करब बिअाह धऽ लेलक अकालक ग्राह आब केना कऽ करब निरवाह केना कऽ पढ़तै धिया-पुता फाटल वस्त्र आ टुटल जूत्ता देहमे नै बचल आब तागत-बुत्ता दुआरिपर कनैत अछि भूखल कुत्ता। सभमे परिवर्त्तन सभमे उत्थान ठामहिपर अछि हमर गहुम-धान धन्य हे ज्ञान धन्य विज्ञान हमरो दिस दियौ एकबेर धियान वएह खेत-पथार, वएह खरिहान घरो छै टुटले कतए देखबै मकान कतए बेचबै कतए रखबै धान नै छै बजार नै छै गोदाम वएह खाद-बीआ ओहिना पानिक दाम वएह हड़-बड़द ओहिना बथान। यौ सरकार करू जलक प्रबन्ध फेर उठतै धरासँ धानक गन्ध दमकल, नलकूपक करू उपाए चन्द धार-नदीपर करू तटबन्ध। हम छी ऐ अंचलक किसान देशक बढ़ेबाक अछि मान-सम्मान बचेबाक अछि सबहक प्राण भूखसँ दिएबाक अछि त्राण हम करब संघर्ष नै छी बेजान फेरसँ गाएब कजरी गान। शशिधर कुमर पूणा प्रवास बरष दू हजार एक । मिथिला सञो पूनाक, प्रवास शुरू भेल ।। दरिभंगा नञि, पटना सँ, पकड़ल जे रेल । पूना – कल्याण नञि, कुर्ला धरि गेल । कुर्ला सञो भी॰टी॰ वा, दादर, कल्याण जा, बऽस - ट्रेन भेटल, से पूना धरि गेल ।। बरष दू हजार एक, सुन्नर समाद भेटल । दरिभंगा सञो पूना, सप्ताहिक ट्रेन चलल । टिकट कटओलहुँ झट, पूजा आ छठि छल । चढ़लहुँ जे पूना मे, दरिभंगे डेग उठल ।। तकर बाद कहियो ने, ओहि ट्रेनक संग भेल । आर॰ए॰सी॰ – वेटिंग की, नो – रूमक ढंग भेल । कुर्ला – कल्याण भाया, फेरो प्रवास रहल । ट्रेनक आवृत्ति बढ़ओ, मोन मे से आश छल ।। बरष दू हजार तीन, फेरो एक बजट – रेल । पटना सञो पूना लए, एक नऽव ट्रेन देल । चमचमाइत डिब्बा सभ, बड़ नीक लगैत छल । नवकनिञा सनि सजलि, मोन केँ हरैत छल ।। आइ दू हजार बारह, देखल कतोक खेल । पटना सप्ताहिक सँ, दैनिक भए गेल । एक्सप्रेस रहए तहिया, सुपर - फास्ट भेल । “तीन” सञो प्रवास केर, साधन इएह भेल ।। नीक बात पटना, बनल अति – तेज । मुदा किए दरिभंगा, रहल बकलेल ? भरि दिनक जतरा कऽ, पटना पहुँचलहुँ हम । पटना सञो पूना केर, बाट आब धएलहुँ हम ।। पटनाक ट्रेन केँ, ई की भए गेल छल ? नवकनिञा असमय मे, बुढ़िया बनि गेल छल । सेकेण्ड नञि, थर्ड हैण्ड, रिपेयर सेट बॉगी छल । पुछबा पर बूझल, कलकत्ताक लॉबी छल ।। बीझ लागल लोहाक, चिप्पी सभ साटल छल । किछु तँ अपर – बर्थ, ढेकी सनि लागल छल । खएबा लए डेस्क होइछ, सेहो बिलायल छल । बाहर सञो डिब्बा धरि, राँगल - पोतयल छल ।। रतुका समय बेस, निन्न बड्ड लागल छल । अपरबर्थ - बत्ती तेँ, माथहि पर टाँगल छल । स्वीचक गुलामी सँ, ओहो स्वतन्त्र छल । राति भरि आँखि पर, दिनकर प्रचण्ड छल ।। मोन पड़ल एहने सनि, पहिनहु किछु भेल छल । गंगासागर गाड़ीक, डिब्बा बदलाएल छल । इण्टरसिटीक सेहो, एहने किछु बात छल । कहिया धरि मिथिला – बिहारक ई हाल रहत ?? सत्यनारायण झा ओहिना मोन अछि ओ दिन ओहिना मोन अछि ओ दिन , जखन आहाँ नान्हिटा रही ,अंगना मे खेलाइत रही , डेगा डेगी दैत रही ,खसैत रही ,परैत रही , कुदैत रही फनैत रही आ माँटि मे ओंघराति रही , निश्च्छल पवित्र मादक मुस्कान देने , सदिखन चंचल ,किछु ने किछु खेल करैत अपन अधबोलिया भाषा मे सभक’हँसबैत कतेक सुखद आनन्द लगैत छल ओ नेनपन करेज मे सटा लैत छलौ अपन पुत्र सुमन | जखन आहाँ डेगा डेगी सं दौड़य लगलौ , हर बिरडो उठौने ,पटका पटकी करैत , अपन नेनपन सं सभ क’ खिचैत आँगन मे नचैत ,दलान पर खसैत माईक आँचर तर नुकाइत ,पिताक कोरा मे हँसैत खींच लैत छलौ अपना आगोश मे संतोष भ’ जाइत छल’ अहाँक भरोस मे तृप्त भ’ जाइत छल आत्मा आनन्दित होयत हेताह परमात्मा सोचय लगैत छलौ अहाँक नेनपन सुखक अनुभूति होयत छल सदिखन तेजस्वी ,चंचल ,मनोयोगी आ प्रतिभा विलक्षण अदम्य साहस ,अदम्य उत्साह आ कठिन परिश्रम गुरु भ’ पढ़बय लगलौ आ शिष्य भ’ पढ़य लगलौ परिबाक चान जकाँ धीरे धीरे बढ़य लगलौ लोक चकित छल ,हम चकित छलौ ओजस्विता ,स्पस्टवाणी आ धवल प्रखरता दुपहरियाक सूर्य जकाँ प्रचंड ताप , लह लह ,दह दह करैत असीम मनस्ताप योगी जकाँ सतत तपस्या मे लीन लागे जेना अहाँक श्रृष्ट सभ सं भिन्न देखि करेज पहाड़ जकाँ भ’ जाइत छल एकाग्रता देखि मोन तृप्त भ; जाइत छल होमय लागल समाज मे शोर , बढ़य लगलौ आहाँ चतुर्दिक विकासक ओर प्रतिभाशाली छात्रक सभ गुण छल मेहनतिक फल आबय लागल पल पल कओलेज मे पढ़ैत छलौ ,आगा बढैत गेलौ विद्या अर्जन मे क्षुधा बढैत गेल ,अजगर जकाँ पसरैत गेल उच्च आकांक्षा ,प्रयास तीब्रतर ,प्रतिभाक संग विशाल लक्ष्य दर मुदा कठिन तपस्या सफलता दुर ,तोरय लागल अहूँक सूर सफलता असफलताक खेल ,अहूंक संग किछु दिन भेल | कुंठित मोन रहैत छल ,भीतर सं हृदय कनैत छल निश्छल पवित्र संयत भेल ,भीतर सं अशांत मुदा अहाँक साहस लेल जीवनक डोर घीचैत ,आशाक संचार लैत चकित भ’ जाइत छलौ अदम्य साहस देखैत भाग्य पलटल समय करबट लेलक सफलता पर सफलता धरौहि लागल पुनः शोर भेल चारुकात ,उपद्रवी सभ मचाबय लागल उत्पात कतेक कटल कतेक मरल कतेक भेल बताह हमर बात कतेक क’ लगैत छलैक कटाह मुदा गंगाजल जकाँ कल कल छल छल निर्मल स्वच्छ ,धवल शुद्ध प्रवाह ने कियो रोकि सकल ने कियो बान्हि सकल गंगाक धार सतत बहैत गेल कतेक ठाम अटकल कतेक ठाम भटकल पुनः अपना वेग सं वहैत रहल कतेक लोक स्नान केलक ,कतेक लोकक प्यास शांत केलक उपद्रवियो सभ शांत भ’ गेल ,हमरो बहुत आराम भ’ गेल अस्तित्व बिसरि गेलौ हम अपन ,संसार मे बस एकटा सुमन अपन आभा समेट लेलौ ,अहाँक अस्तित्व मे अपना क’ समा लेलौ ओही मे आनन्द छलौ ,ओही मे खुशी छलौ जीवनक लक्ष्य आब पुरा भेल ,तृष्णा राखब हम कथी लेल हमरा जिनगीक जे छल अरमान ,सबटा पुरा क’ देलनि भगबान | ओहो बहुत खुशी रहत छली ,अपना दूधक बलिहारी दैत छली दूधक इज्जत रखने छलनि पूत ,सभ क’ कोखि में होयक एहने सपूत | केखनो क’ ओ दैत छली उलहन ,बेटाक शक्ति सं ओ छली विह्वल देखि हमरा लगैत छल हँसी ,बेटाक प्यार क’ देखत हमरा सं बेशी | आहाँ बढैत गेलौ दिन बदलैत गेल ,गंगाक धार बरी दुर चलि गेल धारक प्रवाह कम होमय लागल कतेक लोक खुशी सं भेल पागल गंगा पहुँच गेल एक ठाम ,ओ सोचय लागल एक शाम आगू दीवार पाछू दूरी ,देखाइत नहि अछि सफलताक धुरी अदम्य उत्साह आ उमंग ,सबटा संगे मुदा समय बड कम मुदा एकबेर पुनः पहाड़ तोरलौ ,जीबनक समग्र लक्ष्य पेलौ गंगा कहबी या पद्मा ,हुगली कहबी या भागिरथी सफलताक बाट ताकय परत ,आब आहाँ नहि छी पथी | कठिन नहि छैक किताबक परीक्षा पास करब कठिन छैक जीबनक परीक्षा पास करब जीबनक हर मोर पर ,हर खुशी हर लम्हा मे संग रहब हम सभ ,संग रहब हम सभ माय बाप क’ की चाही ,पुत्रक खुशी पुत्रक चाह हर समय भेटत ,हर समय पायब,हमर आशीष हमर उत्साह | हमर अंतिम इच्छा ,हमर पैघ आकांक्षा अहाँक पितृ –मात् प्रेम ,अहाँक बंधुत्व –प्रिया प्रेम समाजक प्रति बनू प्रकर्ष ,देत अहाँक आनन्द आकर्ष | जगदानन्द झा मनु गीत १
नैहरसँ एलै नै कोनो संदेश पिया घर बसलहुँ दूर परदेश भैया बिसरलहुँ बाबू नहि एलहुँ दुनियाँकेँ रीतमे किएक भगेलहुँ सखी बहिनिपा सभटा छूटल नेनपनकेँ जोड़ल सभटा सपना टूटल रानी कहि कहि मए अहाँ पोसलहुँ बर्खसँ आइ मुँहो नहि देखलहुँ छूटल टोल आ बाट सभ छूटल अपन गामक कौओ नै भेटल नै आब बेसी हम सहि सकबै आउ भैया 'मनु' नै तँ हम नै जीबै | ---------------------------------------- गीत-२
भोलेबाबा हौ खोलबअ केखन अपन द्वार ) -२
हम दुखिया जन्मे कए दुखल एलहुँ तोहरे द्वार भोलेबाबा हो - - - - - अपन द्वार
तन दुखिया अछि मन अछि दुखिया दुखिए जन्म हमार सुनि महिमां भोले एलहुँ तोरे द्वारे करबअ केखन हमर उद्धार भोलेबाबा हो - - - - - अपन द्वार
मुनलह तु अपन नयना मुनलह हमर कपार एलहुँ भटकैत,भटकैत तोरे द्वारे मुनलह किएक अपन केबार
भोलेबाबा हो - - - - - अपन द्वार ) -२
-------------------------------------------------- गीत-३
लगबियौन-लगबियौन हिनकर बोली ई, दूल्हा आजुकेँ हिनकर बड्ड मोल छैन, ई तँ दूल्हा आजुकेँ हिनकर बाबू बिकेलखिन लाखे, बाबा कए हजारी लगबियौन मिल जुइल कs बोली ई दूल्हा आजुकेँ
हिनकर गुण छैन बरभारी, ई रखै छथि दूटा बखारी दरबज्जा पर जोड़ा बडद,रंग जकर छैन कारी भैर दिन ई पाउज पान करैत छथि, जेना करे पारी भोरे उठि ई लोटा लs कs पीबए जाए छथि तारी
साँझु-पहर चौक पर जेता, चाहीयनि हिनका सबारी ई छथि माएक बड्ड -दुलरुआ,हिनका दियौंह एकटा गाड़ी हिनकर गुण छैन बरभारी ई पिबई छथि खाली तारी हिनका पहिरs आबै छैन नहि धोती, दियौन जोर भैर सारी
लगबियौन-लगबियौन हिनकर बोली ई,दूल्हा आजुकेँ हिनकर बर मोल छैन, ई तँ दूल्हा आजुकेँ
गीत-४
(आलू कोबी मिरचाई यै, की लेबै यै दाय यै / दाय यै )-२
कोयलखकेँ आलू, राँचीकेँ मिरचाई यै बाबा करता बड्ड, बड़ाई यै / बड़ाई यै आलू कोबी - - - - - - -दाय यै
नहि लेब तँ कनी देखियो लियौ देखएकेँ नहि कोनो पाई यै / पाई यै आलू कोबी - - - - - - - - दाय यै
दरभंगासँ अन्लौंह विलेतिया ई कोबी खाए कs तs कनियाँ बिसरती जिलेबी
कोयलखकेँ आलू ई चालू बनेतै धिया-पुताकेँ बड्ड ई सुहेतै राँचीसँ अन्लौंह मिरचाई यै की लेबै यै दाय यै / दाय यै
( आलू कोबी मिरचाई यै, की लेबै यै दाय यै / दाय यै )-२
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गीत-५
यै सुंदर-सुंदर कनियाँ, अहाँकेँ बाजे बड्ड नीक पैजनियाँ | ई झुमकी,लाली,बिंदियाँ, चम्-चम् चमके अहाँकेँ ओधनियाँ ||
कनिको तँ संहालू अपन, ओ मुस्की चौबन्नी बाली | नै तँ लs लेत हमर जान , यै कनियाँ -झिटकी बाली ||
ई कल्पतरु सन बिखरल , मनोहारी कंचन-वेश | बिषधरसँ बेसी मादक , ई सुंदर अहाँक केश ||
रहितों जँ हम कवी , रचितहुँ सुन्नर कविता | बस मोने-म़ोन देखै छी, हम अहाँक छबिता || गजल रंग देखू भरल अछि सभतरि तँ खूनसँ देश गेलै गैल बैमानीक घूनसँ
साग तरकारी कते भेलै महग यौ आब छी पोसैत नेना भात नूनसँ
नामकेँ लत्ता गरीबक देहपर अछि लदल कबिलाहा कते छै गरम ऊनसँ
छैक भिसकी रम बहै भरपूर सबतरि एखनो हम गुजर केलौं पान चूनसँ
मारि गर्मी लेल 'मनु' बेबस कते छी ओ तँ अछि पेरीसमे पोसाति जूनसँ
(बहरे रमल, मात्राक्रम-२१२२) हम एहन किएक छी?
हम एहन किएक छी ? माटि-पानि छोरि कए जाति-पाति पर लडैत किएक छी ? हम एहन किएक छी ?
आएल कियो हाँकि लेलक जाति-पाति पर बँटि देलक ऊँच-निच केँ झगरा में अपन विकास छोरि देलहुँ हम एहन किएक छी ?
केँ छी अगरा केँ छी पछरा सभ मिथिलाक संतान छी फोरि कपार देखु तँ सबहक सोनित एके छी हम एहन किएक छी ?
मुठ्ठी भरि लोक अपन स्वारथक कारणे अपना सब केँ तोर रहल अछि मोर रहल अछि जाति पाति में ओझरा कए मिथिलाक विकाश रोकि रहल अछि
धरति केँ कोनो जाति है छैक ? मएक कोनो जाति है छैक ? तँ हम सब सन्तान बटेलौंह कोना ? हम एहन किएक छी ?
आबो हम सँकल्प करि जाति-पाति पर नहि लरि अपन मिथला हमहि संभारब सप्पत मात्र एतबे करि हम एहन किएक छी ?
कोना मदर डे हैप्पी? आब केहन जमाना आबि गेल बर्ख में एक्के दिन मए केँ यादि करै छी, 'मदर डे' केँ नाम पर मए केँ याद करै छी की हुनक सुखएल घा केँ काठी कए कँ जगाबै छी |
हम बिसैर गेलहुँ अपन मए केँ मुदा ओ नहि बिसरली, जाहिखन हुनका भेटलैन्ह सुन्दर कार्ड 'हैप्पी मदर डे' लिखल भेलैन्ह करेजा तार-तार नोर टघैर कए अपन स्पर्श सँ गाल केँ छुबैत हुनक करेजा तक चलि गेल आ करेजा में बंद महामए केँ कोंढ़ सँ सोनित में डुबल शव्द निकलल आह! की ई हमर ओहे लाल ? जेकरा पोसलौं खून सँ पाललहुँ अपन दूध सँ अपने सुतलहुँ भिजल में ओकरा लगेलहुँ करेज सँ | आई चारि बर्ख सँ भेटल नहि रहि रहल अछि परदेश अपन कनियाँ सँग बिसरि गेल बिधवा मए केँ आई अकस्मात मए यादि एलैह ई सुन्दर चिट्ठी (कार्ड) पठेलक मुदा की लिखल ? 'हैप्पी मदर डे' नमहर साँस लैत हुनक मन आगु बाजल जखन मदरे नहि हैप्पी तँ कोना मदर डे हैप्पी तँ कोना मदर डे हैप्पी ? किशन कारीगर हास्य कविता पंडा आ दलाल एकटा गप साफे बुझहू त ई दुनू ममिऔते पिसिऔते छि एकटा अछि जं पंडा त दोसर अछि दलाल.
साहित्यों आब एकरा दुनू सँ अछूत नहि रहि गेल पंडा बैसल अछि पटना में त दिल्ली में बैसल अछि दलाल.
सभटा साहितिय्क आयोजन में रहबे करत एककर सझिया-साझ हँ ओ में छि नहियों में छि सभटा लकरपेंच लगाबै तिकडमबाज.
की दरभंगा आ की कलकत्ता? सभ ठाम बैसल अछि तिकडमबाज अपना-अपना ओझरी में ओझरौत आ सुढ़िये नहि देत कोनो काज.
पहिने ई काज हमही शुरू केलौहं बड़-बड़ बाजै भाषाई पंडा धू जी एककर श्रेय त हमरा ताहि दुआरे अपस्यांत भेल दलाल.
खेमेबाजी आ गुटबाजी केलक सत्य बजनिहार के धमकी देलक अपना स्वार्थ दुआरे ई सभ भाषा साहित्यक सर्वनाश करेलक.
अपने मने बड्ड नीक लगइए मुदा आई "कारीगर" किछु बाजत कहू औ पंडा आ दलाल एहेन साहित्य समाज लेल कोन काजक?
साहित्य समाज जाए भांड में एकटा दुनू के कोन काज साहित्यक ठेकेदारी शुरू केलक ई दुनूटा भ गेल मालामाल. फुसियाँहिक झगड़ा जतैए देखू ततैए देखब झगड़ा बेमतलबो के होइए रगरम-रगड़ा जातिवाद त कियो क्षेत्रवाद के नाम पर लोक करै फुसियाँहिक झगड़ा। चुनावी पिपही बजैते मातर की गाम घर, आ की शहर-बज़ार एहि सँ किछु होना ने जोना मुदा लोक करै फुसियाँहिक झगड़ा। फरिछा लेब, हम ई त तूं ओ हम एहि ठामहक तूं ओई ठामहक एक्के देशवासी रहितहु हाई रे मनुक्ख लोक करे फुसियाँहिक झगड़ा। अपने देश मे एक प्रांतक लोक दोसर प्रांतक लोक के घुसपैठी कहि खूम राजनीतिक वाहवाही लूटैए दंगा-फसाद, आ कि-की ने करैए। नेता सबहक करनामा देखू ओ करैथ वोट बैंक पॉलिसी के नखरा हुनके उकसेला पर भेल धमगिज्जर आ लोक केलक फुसियाँहिक झगड़ा। लोक भेल अछि अगिया बेताल नेता नाचए अपने ताल कछमछि धेलक चुप किएक बैसब आऊ-आऊ बझहाउ कोनो झगड़ा। जातिवाद के नाम पर वोट बटोरू दंगा-फसादक मौका जुनि छोड़ू अपना स्वार्थ दुआरे भेल छी हरान क्षेत्रवादक आगि पर अहाँ अप्पन रोटी सेकू। की बाबरी आ की गोधरा कांड बेमतलब के भेल नरसंहार कतेक मरि गेल, कतेको खबरि नहि मुदा एखनो बझहल अछि सियासी झगड़ा। देश समाज जाए भांड़ मे नेता जी के कोन छनि बेगरता जनता के बेकूफ बनाउ हो हल्ला आ कराऊ कोनो झगड़ा। फोंफ काटि रहल सरकार रंग विरंगक डिग्री डिप्लोमा लेने रोड पर घूमि रहल युवक बेकार देशक कर्ता-धर्ता चुप्पी लधने छथि आ फोंफ काटि रहल सरकार। बुनियादी शिक्षाक दरस एक्को मिसिया ने खाली किताबी ज्ञान देल गेल छैक आ परीक्षा पास कए डिग्री लेने घूमि रहल अछि युवक बेरोजगार। ओकरा नहि कोनो लुड़ि-भास तोतारंटत आ परीक्षा पास बेबहारिक जिनगी मे फेल भ गेल कियो भूखले मरै अहाँ के कोन काज। परीक्षा प्रणाली आ पाठ्यक्रम एहेन किएक अहिं फरिछा के कहू औ सरकार फुसियाँहिक डिग्री डिप्लोपा कोन काजक कतेक लोक एखनो अछि बेकार। कुर्सी पर बैसल छी त कोना बुझहब कि होइत छैक लाचारी आ बेकारी रोजगारक अवसर बंद केलियै कतेक बढ़ि गेल अछि बेरोजगारी। अहिंक पैरवी पैगाम सँ अलूइड़ लोक सभ के नोकरी भेट गेल मुदा मेहनत क पढ़निहार सभ पक्षपात नीति दुआरे बेकार भ गेल। दू टा पद दू लाख आवेदन कर्ता एकटा पद मंत्री कोटा सँ विज्ञापन पूर्व फिक्स भेल अछि बिधपुरौआ परीक्षा टा करौताह। मेहनत क ईमानदारी सँ लिखित परीक्षा पास क लेब मुदा इंटरव्यू मे अहाँ के तेरह डिबिया तेल जरतौह। ईमानदारी पर अड़ल रहब कारीगर त इंटरव्यू मे कैंची चलत योग्यता रहैतो अहाँ भ जाएब बेकार मुदा फोंफ काटि रहल सरकार।। घोंघाउज आ उपराउंज हम अहाँ के गरिअबैत छि अहाँ हमरा गरिआउ बेमतलब के करू उपराउंज धक्कम-धुक्की करू खूम घोघाउंज. कोने काजे कहाँ अछि आब ताहि दुआरे त आरोप-प्रत्यारोप मे ओझराएल रहू मुक्कम-मुक्की क करू उपराउंज . श्रेय लेबाक होड़ मचल अछि अहाँ जूनि पछुआउ कंट्रोवर्सी मे बनल रहू फेसबुक पर करू खूम घोघाउंज. मिथिला-मैथिल के नाम पर अहाँ अप्पन रोटी सेकू अपना-अपना चक्कर चालि मे रंग-विरंगक गोटी फेकू. अहाँ चक्कर चालि मे लोक भन्ने ओझराएल अछि अहाँ फेसबूकिया ग्रुप बनाऊ अपनों ओझराएल रहू हमरो ओझराऊ. ई काज हमही शुरू केलौहं नहि नहि एक्कर श्रे त हमरा अछि धू जी ई त फेक आई.डी छि अहाँ माफ़ी किएक नहि मंगैत छी? बेमतलब के बड़-बड़ बजैत छी त अहाँ मने की हम चुप्पे रहू? हम की एक्को रति कम छी फेसबुक फरिछाऊ मुक्कम-मुक्की करू. आहि रे बा बड्ड बढियां काज गारि परहू, लगाऊ कोनो भांज कोनो स्थाई फरिछौठ नहि करू सभ मिली करू उपराउंज आ घोंघाउज. अहींटा एकटा नीक लोक छी "कारीगर" कतेक दिन बाद परीक्षा पास केलक ओ त बड्ड बुडिबक अछि अहाँ त बड्ड पहिने बड़का हाकिम बनि गेलौहं ताहि द्वारे अहींटा एकटा नीक लोक छी .
अहाँक सफलताक राज त कहियो ने कियो कही सकैत अछि अहाँ अपने लेल हरान रहैत छी आ अहींटा एकटा नीक लोक छी .
सर समाज सँ कोनो मतलब नहि रखलौहं परदेश मे दूमंजिला मकान बना लेलौहं गाम घर सँ स्नेह रखनिहर कें अपनेमने अहाँ बुडिबक बुझहैत छी .
अप्पन सभ्यता संस्कृति अकछाह लगइए ओकरा अहाँ बिसरै चाहैत छी परदेश मे रंग-बिरंगक संस्कृति मे अहाँ के नीक लगइए खूब मगन रहैत छी.
धियो-पूता के मातृभाषा नहि सिखबैत छि ओकरा अंग्रेजी टा बजै लेल कहैत छी मत्रिभाषक आंदोलन चलौनिहर बुडिबक आ अहींटा एकटा नीक लोक छी. गाम घर पछुआएल अछि रहिए दिऔ नहि कोनो माने मतलब राखू अहाँ ए.सी. मे बैसल आराम करैत छि अहींटा एकटा नीक लोक छी.
सर-समाज सँ स्नेह रखलौहं तहि द्वारे हम बकलेल बुडिबक घोषित भेल छी अहाँ रुपैया कम ढ़ेरी लगेलौहं तहि द्वारे अहींटा एकटा नीक लोक छी.
खली रुपैया टा चिन्हैत छी अहाँ बिधपुरौआ बेबहर करैत छी. पाइए अहाँ लेल सभ किछु आ अहीं टा एकटा नीक लोक छी.
कियो पहिने कियो बाद मे मेहनत करनिहार त सफल हेबे करत ओकरा अहाँ प्रोत्साहित कियक नहि करैत छी? यौ सफलतम मनूख अहींटा एकटा नीक लोक छी. शिव कुमार झा टिल्लू कविता सुखार काल रहसल त्रास बहकल मधुमासे संत्रास महकल अषाढ़ कुपित इन्द्र रूसल जल बुन्न बिनु बिआ विहुसल आड़ि चहकल खेत दड़कल प्रशान्तक प्रकोपे मनसून सरकल शोषित कलकल जुआनी गरकल रोहिणी-आरदरा सुखले रमकल “ग्लोबल-वार्मिग” फनकल क्षुब्ध प्रकृति सनकल विज्ञानक चमत्कारमे उच्छ्वास छनकल गाछ काटि फोर लेन बनेलौं पहिने किअए नै नवगछुली लगेलौं अपने गतिक स्टेयरिंग पकड़लौं मजूर किसानकेँ घर बैसेलौं कृषि प्रधान देशमे नोरक स्नात आँखिक शोणितसँ केना भीजत पात? ऐ बेर सुखाड़ साउनो बीतल दीनक आत्मा तीतल भदैया बूड़ल रब्बीक कोन आश सुक्खल मुरदैया मरूझल कास अगिला साल आओत बाढ़ि देलौं खेतिहरकेँ ताड़ि? वाह रौ विज्ञान वाह रौ धनमान बिनु हथिहारें लेलें गरीब-गुरवाक जान जकर भऽ सकए संलयन आ विघटन आयुर्वेदमे तइ रसायनक चर्चा विज्ञानक बाढ़िमे सगरो पाॅलीथीन कागत छोड़ि वाॅटि रहलौं प्लास्टिकक पर्चा आजुक रसायनसँ माटिक कोखि उजड़ल ठुट्ठ डाॅट किछु नै मजड़ल प्लास्टिक छोड़ि लिअ जूटक बोरा पाॅलीथीन नै ठोंगा-झोरा छोड़ रौ धनचक्कर एडभान्स बनबाक चक्कर पकड़ेँ अपन बाप पुरुखाक देल हथियार धरे मौलिक संस्कार केमिकलसँ नहा तँ लेबें मुदा! की चिबेबें....? आजाद गजल (1) कालरात्रिमे महमह दिनमान कोना आएत मोनमे पाप झबरल भगवान कोना आएत नहि जड़ै प्राण वायु मरल सरल देह संग अधम नीचाँ खसत धर्म गगनमे बिलाएत माँझ आंगन काँटक बोन नहि रोपू प्रियतम काग कोइली सन कोमल संतान कोना पाएत विरह मासमे ने सोहर सोहनगर लगै छै कंठमे पित्त चभटल मधुगीत कोना गाएत अपने करू रास लीला नेना दूध बिनु कानए कर्मभीरू पुरुखकेँ जयकार कहेन हाएत (2) कहू की बात हम मानिनि कलुष भऽ गेल अछि अर्पण कोना सहबै अखल कंटक दबै छै टीसतर तर्पण सोहाबै नै खुशी सरगम समाजक हास परिलक्षित धुनै छी देल कालक गति गदराबै नै विकल जीवन पतित नियति आकुल भेलै जड़ल अर्णव तरंगे छै सूतल ईश सभ पंथक एलै समभावमे विचलन बाहरसँ जे जत्ते गुमसुम हिआसँ ओ ओते बिखधर चानन बहलै उषाकाले वाह रौ जहानक संकर्षण भेटल जेकरा जतऽ अवसरि हाथ धोलक हलालीसँ नीतिक मंचपर चढ़िते करै माटि नेह प्रति गर्जन दृष्टिकोण हिआक दू गोट रूप अवलोकन आ वाचन पहिलुक मात्र अपनहि लेल दोसर समाजकेँ जनयबाक लेल पहिलुक जौं सद्गमनीय स्व-संतोष आ कल्याणकारी जीवन ओहेन व्यक्तिमे दोसरक कोनो आवश्यकता नै हमर जीवन “पोथीक फूजल पन्ना” सभ वाचन दइत पोथीक आखरक संग-संग जौं पटल अर्थात् पृष्ठ कारी केना आखर देखाएत? एहेन फूजल अर्न्तमनक कोनो प्रयोजन नै मनसा-वाचा कर्मना तीनू त्रिवेणीक धार जकाँ विलग... छिड़िआएल... ई बेवस्थाक फेर नै आ ने जाति-वंशक प्रभाव जौं रहितए तँ बैरमखाँक आंगनमे रहीम फुदकैत केना? जखन गुरुजीक मुखसँ पहिल बेर सुनलौं आश्चर्य लगल छल डार्विन जौं ई सुनितए तँ वंश-सिद्धान्त नै लिखतए किएक अछि दृष्टिकोणक फेरि? ई मात्र अर्थयुगक विजय सभ आगू जेबाक लेल बपहारि काटि रहल नीक गुण-धर्मसँ नीक बाटपर नै कुकरम करब मुदा सभसँ आगू नाचब पथ्य स्वादहीन होइछ बाबाकेँ ब्रह्मपहरमे दुग्ध पानक अभ्यास छलनि हमहूँ प्रयाग कएलौं दूध तँ िनरंतर नै रहि सकल मुदा! सुरापान धरि अवश्य करए लगलौं अपने टा नै समाजक जातिक भारसँ दाबल भरिआक बीच कुहरैत संस्कारी दिलीप कोनो राज पुत्र नै रैदासक वंशज दिलीप खूब पढ़ैत छल हम घुमैत छलौं आब ओकरो सिखा देलिऐ दुनू पिबैत छी वाह रे मनुक्खक मोन ऐ सँ नीक चाली नोन देखिते बाट बदलि लइत हम मनुक्ख छी आर्यावर्त्तक वैदिक सनातन पालक पुरुष सूक्तसँ देल उपाधि ब्रह्मकुलक पूत हमहीं भँसै छी कोनो ने मानवताक भीत ससरए नानक-रैदास ईसा बुद्ध परशुराम बुद्ध कृष्ण राम सुरगण कुहरि रहल रहीमक अस्तित्व वाम अंतमे कनै छी देखि अवोध चिलका बिलखइए अपन संग दोसरोक कल्याण नै सोचलौं की भेटल मनु-वंशकेँ नाश कऽ देलौं तँए जे देखू वएह सोचू वएह अर्न्तमन सएह वाचन नीक केलक नीक भेटल अधलाह परिणाम स्वत: भोगैए ईश्वर छैक की नै विषय गौण बुझू मुदा! प्रकृति तँ अवश्य जकर डांगमे कोनो ध्वनि नै अधलाह परिणाम भोगबे करत अधरकेँ हिआसँ जोड़ि हमर दृष्टकोण नीक चिचिआउ नै सोचू..... अान्हर रहू मुदा सबहक कल्याण करू जौं एतेक शक्ति नै तँ अपने कल्याण करू जहानमे दृष्टिकोणक विहान अवश्य हएत। शिशु उत्सव शिव कुमार यादव बाल गजल पूर्णिमा मेला ऐलए गे माँ मेला देखऽ हमहुँ जेबए गे माँ इस्कुल मे सेहो छुट्टी देलकए गे माँ दोस-मीत मेलाक ओरिओन कैलकए गे माँ बड़की दैया के संग लऽ लेबए गे माँ दाए-बाबा के सेहो कहि देबए गे माँ गामक कतेक लोक मेला चलतए गे माँ काका-काकी आ बौआ सेहो तैयार भेलए गे माँ मेला गाम सँ दुर लगए गे माँ पैरे-पैर नए, तोरा कोरा मे बैठबए गे माँ मेला मे बड़ भीड़ लगलए गे माँ आँगुर तोहर धरने रहबए गे माँ खुब जतन सँ मेला देखबए गे माँ "शिकुया" घिरनी-मिठाइ-झिल्ली कीनबए गे माँ बौआ हमरा आब जुनि तंग कर बौआ हमरा आब जुनि तंग कर तोरा सँ आब हम हारि मानै छी भोरे सँ तोँ खूब अपस्याँत कऽ देलैँ इस्कुल जो आब हम एतबा जानै छी
कानए जुनि देखहीं बौआ बुच्ची इस्कुल छै भोरे सँ तोरा हम फुसलाबै छी
नीक सँ जो, केकरो सँ नै लड़िहैँ रुक तोहर अंगा आ पेंट सरिआबै छी
खूब जतन सँ पढ़िहैँ अप्पन दैया संग तोरे सभसँ हम सपना सजाबै छी
गाम-समाज आ देशक नाम ऊँच करिहैँ "शिकुया" तोरे सँ हम आस लगाबै छी रूबी झा बाल गजल १ निन्न सँ मातल अछि बौआ आबि कऽ सूताउ यै कतय गेलि बौआ माए ओछैन तँ ओछाउ यै खेलके नै ओ दिने सँ केहेन कठोर माइ छी भेल नै भानस तँ चड़े दूध नेना बुझाउ यै खन बाबा खन हमरा कोरा झुकि खसय छी अहाँ झट सँ जा किछु तँ बौआकेँ खुआउ यै कते महग गए किनलौं दुलरा पोता लेल नेना काया मे दूध बुन्न नै झट सँ पिआउ यै आबू यौ बौआ हमही दै छी अहाँकेँ दूध पिआ कनी ''रूबी'' आबि नेनाकेँ लोड़ियो तँ सुनाउ यै आखर -१७ २ दाइ कने दे तँ हमरो तेल गमकौआ लगेबै माँथ परमे हमहुँ टिक़ुली झलकौआ लगेबै तेल लगा हम गुहबै जुट्टी लाल बान्हब फित्ता जुट्टी मे फूल फित्ता केर हम फलकौआ लगेबै भैर भैर हाथ हमरो दाइ गै चूडी पहिरा दे आगु पाछु दुनु कात कंगन खनकौआ लगेबै सोनरा सँ दलहिन एहन सन पायल किन दे ओइमे हम सौंसे झुनकी तँ झनकौआ लगेबै एकेटा चीज आर छै ललका साडी ओहो किन दे साड़ीमे हम चान आ सितारा चमकौआ लगेबै आखर~१८ ३ आ रौ छौरा बान्हि दियौ तोहर हम झोट्टा रौ ढील लिख सोहैर गेलौ आब हेतौ जट्टा रौ हे रौ कने छौरा कऽ पकड़ि कऽ आन भगतौ देख तँ कसि कऽ पकड़ जा ओकर गट्टा रौ दलान पर सँ बजा आनलौं फेर भगलै आब जौँ पकरबौ तँ तोरा मारबौ सट्टा रौ ऐ बेर दुर्गा मे कटबा देब तोहर लापेट छागरो तँ दाइ कबूलने छथुन जोट्टा रौ छोर नै छूबौ तोहर केश खएले कने आ राखने छी आ नै चुड़ा दही भऽ जेतौ खट्टा रौ आखर~१६ ४ चलहिन आइ तूँ गाम पर खुएबौ हम तोरा मारि गै चोरी कऽ के हाथ नुका कऽ बड़ बनल छैं तों होशियाइर गै पहिने खेत सँ मटर चोरेलैं गाछक तों बैर झटाहलैं हम जौं माँगी तोरा सँ तँ बिखिन्न बिखिन्न पढ़ै छैं गाइर गै नानाक देलहा फराको तों फारलहीं माँ कऽ जा कहबौ हम अपनों तोरा काँट गरलौ बैरोक तोड़लहिन डाइर गै मोन छौ की उलहन माँ क बटेदार सँ सुनेबे करेभिन सौंसे देह तँ चुट्टा बिन्हलकौ कतेक चलबें तों झाइर गै पढ़ लिखमे नै मोन लगे छौ उचक्की बनि घूमल चलै छैं के तोरा संग बियाहो करतौ कोना बसबें ससुराइर गै आखर -२२ ५ हे रौ बौआ तों एना रुसल छेँ किए दूध-भात लेल तों बैसल छेँ किए रे तोरा तँ खुएबौ कोरामे सुतेबौ माएके दूध लेल अरल छेँ किए कीनि देबौ लाल गेन आ घुरकुन्ना छोड़ ने जिद्दपन डटल छेँ किए आबो दहुन बाबा के देथुन्ह पेरा पेरा सन नीक की नठल छेँ किए कहबै नाना के देथुन्ह धेनु गैया आबो बड़ेरीपर चढ़ल छेँ किए वर्ण-१३ ६ चलय ठुमकि बौआ कते सोहावन लागय छै बाजय बौआ तोतल माँ मनभावन लागय छै दादी केर आँचर तर जाए नुकाय गेल बौआ खेलै चोरीया नुकैया मोन भुलावन लागय छै दादी केर पनबसन सँ बौआ खाय लेल पान ठोर लाल पिक दाढी पर लुभावन लागय छै उल्टे खराम बाबा केर एना पहिर लेल बौआ खसय खन उठय जिया जुरावन लागय छै जिद्द ठानलैन बौआ लेब देवी आगुक मिसरी डटलैन माँ फुसीये नोर बहावन लागय छै वर्ण १८- ७ रुसिये गेल बौआ मनाएब कोना कए निर्धन माय बौआ बुझाएब कोना कए ठाढ भेल कटोरी भरि माँगय छै दूध चिक्कस के झोर ले बजाएब कोना कए एहन किए निर्धन बनाओल विधाता दूधो नहि जूडय जुड़ायब कोना कए देलक जे जन्म पुराओत सैह विधाता लाज हुए अनका बताएब कोना कए मानि जाउ बाबू अहाँ छी बड्ड बुधियार छूछ माय जिद्द के पुराएब कोना कए (वर्ण १५) ८ कंटीरबा आ कंटीरबी माँ बापक लेल दुनू आँखिक पुतली एकटा अछि हीरा त' दोसर मोती भेल दुनू आँखिक पुतली बौआ खेलय गेल गेंद कब्बडी बुच्ची खेलय कनिआ-पुतरा डाँर में घुघरू पैर पाजेब बाजि गेल दुनू आँखिक पुतली ठुमैक चलै अछि बौआ ललन छ्मैक चलै बुच्चीया लालपरी जुडबै छाती माँ के बापक ओ शान भेल दुनू आँखिक पुतली बौआ खेलक खोआ मिश्री बुच्ची खेलक करकर कचरी माछ फरिछ बाजै बुच्ची बौआ त' तोतला गेल दुनू आँखिक पुतली रूबी लेल दुनू गौरब छै बौआ राजाबाबू बुच्ची छै लालपरी बनै कोनो हाकिम बच्चे ओ माँ बाप लेल दुनू आँखिक पुतली वर्ण-२३ ९ हे रौ गुलेटेनमा सुन रौ टुनटुनमा एलै छुट्टी गर्मी क' चल इस्कूल क' कहिये हम टाटा आब भेलै छुट्टी गर्मी क' अन्हर बताश में खूब हम घुमब गाछी जा आमो चुनब पाकल आमक रस निचोरब आई चढ़लै छुट्टी गर्मी क' मेघ बुन्नी में खूब नहायेब माई क' हम बातो नै मानब हत्ता-खत्ता में चल मान्छ जा' क' मारब बढ़लै छुट्टी गर्मी क' हाट बजार में त' बाबु संग जेबै लेमंचुस बिस्कुट खेबै मेला में जा' क' हम झुला झुलब कम बचलै छुट्टी गर्मी क' इस्कूल क' गृहकार्य बांचल अछि रत्तियो नै त' वक्त छैक अछि मोन विधुआयेल किये ख़तम भ' गेलै छुट्टी गर्मी क' सरल वार्णिक बहर वर्ण -२२ १० टुअर टापर बहिन कs टुअरे एकटा भाई छैक सड्क कात मे बैस कs कोना झिल्ली मुरही खाई छैक माँथ मे नै तेल छैक एको बुन छिट्टा जकाँ केश छैक सभ कियो क रहतो ओ केहन टुअर बुझाई छैक तन नै चिथरो देने पढेता लिखेता की साढ़े बाईस देशक भविष्य देखियौ किये एहन कs घिनाई छैक दर्जन पुराब मे निर्लज्ज कs लागये छै मोन कतेक छी तs हम बड्क़ा एको बेर कहितो नै लजाई छैक कतबो करता बाप- बाप रोकल जाई जनसंख्याँ पढ़ल लिखल गदहा एता बड़ बेशी देखाई छैक कतै करब बखान मातबरी मे नुकैल गरीबी कs नेना सभक दशा देखि 'रुबी' कs किछ नै फुराई छैक आखर --२० ११ मए गै आकाश सौ ओ चन्ना मंगा दे हनुमान जी ध्वजा केर फन्ना मंगा दे े रोज ईस्कुल जा क भ गेलहु हरान सर सौ आई छुट्टी क बहन्ना मंगा दे दाई केलेन अनोना माँ क एकसन्झा दाई आगु सौ आलू केर सन्ना मंगा दे िददी खेलक बर्फ ललका धान बेिच हमरो कनेक दाई सौ मरधन्ना मंगा दे नै िलखब िसलेट पर नै चोक माटी बाबु सौ कलम एकोटा पन्ना मंगा दे आखर~१४ १२ कक्का के अंगना में लीची केर गाछ फरल बेजौर गै गेन खेलय गेल दुलरुआ गेन खेलल बेजौर गै काकी बजथिन कोठा चढ़ी सुनु ऊपराग बौआ माय अहाँ केर बौआ लड़ीकबा लीची क' तोरल बेजौर गै आंखि मे नोर भैर क' बजै बौआ सुन गै माई हमर माँ हम किछुओ नै जानि लीची कतए छल बेजौर गै मांथ धय बैसली बौआ माई कोन करू हम उपाए सच बजै छै काकी नेनोक छै नोर बहल बेजौर गै असमन्जस परलै रूबी बौआ बिहुँशे मुख दबाई पाछु हाथ नुकेने झोरा अछि लीची भरल बेजौर गै सरल वार्णिक बहर आखर -- २० १३ जए दे हमरो दिदी केर सासुर गै माँ हमहु खेबै माँछ भात आ काकुर गै माँ जिजा भए क संग हम खेलब कबड्डी बहिन संग मे पकरबै दादुर गै माँ दिदी देलकै चुप्पे चिट्ठी देबै जा जिजा क भेंट करै ल दिदी भेल छै आतुर गै माँ बहला फुसला मना जिजा के ल आनब ध घिसिया क आनब नै त पाखुर गै माँ एना नै डांटे हमहु आब बरका भेलौ मुह फुला बैसै नै हो पित्ते माहुर गै माँ आखर~१५ इरा मल्लिक बाल गजल 1 डेग हमर छोट एखन लछ्य बहुत दूर अछि नापि लेबै सफलताक बाट मेहनतिसँ बुझै छी केतबो बाधा एतय बाटमे ढकेलि आगू बढ़बै मनमे जँ ठानि लेलौँ फेर पाछु मुड़ि नहि सकै छी मिथिलाक गौरवगाथासँ कहाँ कियौ अनजान छै छलै कहियो दिव्य मिथिला एखन तँ माटि फकै छी खूब पढ़ि आगू बढ़बै देशक हित काज करबै स्वर्णिम मिथिलाके सपना अपन आँखिमे तकै छी मिथिला अछि सुँदर ठोप भारतक ललाट केर विश्वमे सम्मानित हो से भगीरथ प्रयास करै छी (वर्ण -19) 2 सौँसे गाम तूँ मारने फिरैछेँ भरिके खूब टहल्ला रौ जँ पढ़ै लिखै लेल कहबौ तँ बहुत करै छेँ हल्ला रौ छौँरा सब सँग खेलै छे भरि दिन कबड्डी गुल्ली डँडा नहि परलौ एखन धरि तोरा बपहियासँ पल्ला रौ आबय दहिन गाम हुनका देखथुन तोहर लिल्ला दैवो नहिँ बचेथुन जखन तोरथुन तोर कल्ला रौ हम्मर बातक मोजर नै कैन्को ख़ूब कर्हि बदमस्ती एकै बेरक सटकानि सँ खुलि जेतौ ग्यानके तल्ला रौ आखर 20 बालगीत- मेघ बरसलै मेघ बरसलै, धरती बिहुँसलै, भीजय गहे गह, धरती बनल छै रानी, राजा बनलै मेघ, ढमढम बाजै ढोल नगाड़ा! बिजली चमकलै, ह्रदए हहरलै. सखी बसै दूर देश, नाचि रहल छै , छमछम छमछम, वन मे मोरनी मोर, ढमढम बाजै ढोल नगाड़ा! घिर घिर आओल, कारी बदरिया, बरसै रस मेघ फुहार, देखि रहल छै इन्दर राजा, धरती अछि रसे विभोर, ढमढम बाजै ढोल नगाड़ा! मुन्ना जी बाल गजल 1 शुन्य भेल स्वप्न नुका क' राखू अपन संस्कार जोगा क' राखू अछि सूट-बूट शिक्षोमे लागू मोनकेँ मैथिल बना क' राखू कंप्यूटर गेम अछि सुन्नर मगज टटका बना क' राखू नेना लक्ष्यहीन नहि हुअए तकर जोगार धरा क' राखू केकरो बानि रहए केहनो हृदेसँ अपन बना क' राखू वर्ण----11 2 अ सँ अनार अछि मिट्ठ कसगर आ सँ आम लागैए बड्ड रसगर पिज्जा बर्गर तँ घुसि गेल मोनमे केखनो कतौ दबा दैछ असगर शिक्षा माध्यममे अंग्रेजी भेल हावी फैशन अंग्रेजिया छै रभसगर पीढ़ी नवकाकेँ नव रूपेँ सजाउ अपन संस्कृति भ' गेल अजगर तकनीकी ज्ञानमे नेना बढ़ए आगू पितोक मोन होइछ हुलसगर वर्ण-----13 3 "ए"सँ एप्पल सेव कहाइए "बी"सँ बुक ज्ञान दए जाइए अंग्रेजीमे लीन भ' नेना सभ माइक बोली बिसरि जाइए निज खगता जानि क' पढ़ाइ विकासक सनेश द' जाइए बूढ़ लोक अछि धरती पर नेनाक बास चान भ' जाइए वाइसँ यंग छै किछुए दिन ज़ेडसँ सभ जीरो भ' जाइए वर्ण----11 २ प्रशांत मैथिल बाल गजल शब्दक मूर्त्ती गढ'क चाही खूब मोन स पढ'क चाही हमही अयाचीक शंकर इतिहास के रच'क चाही थैआ डेगा डेगी लऽरे लऽरे खसि उठिक बढ'क चाही नञि बाँचल फुनगी डारि आ चान पर चढ'क चाही कनिञा पुतरा साम चको नाम भारती मढ'क चाही वर्ण-१० पंकज चौधरी (नवलश्री) बाल गजल १ संचमंच भऽ रह्बौ सदिखन आब नै करबौ हुलहुल गै मोन लगा कऽ पढ़बौ देखिहन्हि जेबौ सभ दिन इसकुल गै संगी संगे हिल - मिल रहबै पैघ के सभटा कहल करबै कान पकड़लौं आब ने करबौ बदमाशी हम बिलकुल गै खाय-काल नकधुन्नी केलहुं तैं लटि कऽ हम एहन भेलहुं डाँड़ सँ पेंटो सर-सर ससरल अंगो होई छै झुलझुल गै सागो खेबय सन्नो लेबय आब नै कखनो मुंह बिचकेबय परसन देऽ तीमन - तरकारी दालि दे आरो दू करछुल गै दूध पीबि हम सुरकब दही खूब खेबय खाजा-पनतोआ तइ पर सँ हम आमो खेबऊ पीयर-पाकल गुलगुल गै देह्गर-दशगर संगी-तुरिया हमरा आंइख देखाबै जे कसरत करबै देह बनेबै करतै डरे ओ छुलछुल गै आशीर्वचन तोहर अमृत सन आँचरि आँगन ममता के राजा बेटा "नवल" तोहर माँ चहकत बनि कऽ बुलबुल गै ***आखर-२३ 2 आमक गाछपर झूला लगाएब ना अपनों झूलब सभके झुलाएब ना केरा डम्फोरि आ लत्ती मोटका आनब सउन बाँऽटि कऽ जउड़ बनाएब ना कखनहुं ऊंचगर निच्चा कखनहुं झूले संग हमहुँ आएब-जाएब ना खसतय गोपी धऽपर -धऽपर- धप झूला के बहन्ने ठाईढ डोलाएब ना कियो बीछय गोपी हेतै नहि झगड़ा हम सभ संगी मिल-जुलि खाएब ना कसि-कसि कऽ आर झूलाबय हमरा ऊँचगर जा हम चान के पाएब ना ठाढ़ि ओदरतय झूला जों टूटतय "नवल" चट सभ दौड़ पड़ाएब ना ***आखर-१४ 3 इसकुल के बस्ता छै भारी हम नञि टंगबौ टांगै तू पाइनक थरमस हमरा चाही माँ दऽ दे नै मांगै तू मोरक चित्र बना कऽ आनऽ देलथि हमरा मैडम जी फोटो तोड़े पाड़य पड़तउ सुन लेकिन नै रांगै तू छिट्टा तर जे धैल नुका कऽ भनसा घर गमकलै माँ संग सोहारी पाकल कोआ खेबय कटहर भांगै तू ओलती के काते-काते हम ठाढि गुलाबक रोपने छी ओरिया कऽ धान पसारय माँ फूलक गाछ नै धांगै तू "नवल" छोट नञि आब ओते काज अढा किछ हमरो हमरा हाथ पघरिया दऽ दे माँ जारणि नञि पांगै तू ***आखर-२० 4 काँचे खटहा सरही पड़ मे मारय मूस हबक्का यौ लड्डूओ नञि खा हेतय ओकरा दांत कोंतेतै पक्का यौ राति दिवालिक दीप जड़ेबै खेबै हम बताशा लड्डू हुक्कालोली गेनी भंजबय फोड़बय खूब फटक्का यौ चिप्स-चरौरी चूड़ा भूजल लागत करू तइयो खेबै बीछ-बीछ मिरचाय दीयउ भूजा हमरो दू फक्का यौ बारी मे जा कोना चलेबै अप्पन छोटकी कठही गाड़ी माटिक नमहर ढेपा तर फँसतै गाड़ी के चक्का यौ पन्नी ताकू गेन बनाकऽ अंगनें मे किरकेट खेलेबै गेंद दियौ गुड़कौवा हमरा हमहूँ मारब छक्का यौ बंटी सँ नञि मीत लगेबै सी नम्मर के छै बदमाश अपने मारि बझाबै सभ सँ हमरा कहै उचक्का यौ इस्कुल के बस्ता मे राखल मुरही नै मसुवाई कहीं "नवल" हाट के बाट तकै छै कचरी आनब कक्का यौ ***आखर-२० ५ अहि बाटी मे अगबे रोटी चिन्नी संग-संग दूधो कम ई बाटी छऊ तोहर भईया ई बाटी नहि लेबौ हम चोरा-चोरा क चिन्नी फंक्लैं माँ के जा कहि देबौ हम नञि त एकटा फाँक अचारक दे उताइर क खेबौ हम खुरलुच्ची बनि लुच-लुच करबैं नानी मोन पड़ेबौ हम आब जों बिठुआ कटबैं भैया दांते कैट कनेबौ हम सुन गे बहिना तोरो अहिना कहियो मजा चखेबौ हम ककरो स जो झगड़ा हेतौ आब नञि तोरा बचेबौ हम हासिल पड़का जोड़ ने कहियो तोरा आब बतेबौ हम चलहिन इस्कूल मैडम जी सँ पक्का माईर खुएबौ हम नवलश्री "पंकज" ६ निश्छल-निर्मल कोमल बचपन धिया-पुता केर अलगहिं जीवन चलैत रहछि सभके अंतर्मन भावक अजबहिं कूटन - पीसन छै देह लेढायल मोन ई कंचन कमल-फूल सन लागै अनमन क्षण ठिठियै क्षण कानै अनढन चट सलाह आ झट द अनबन बस टांट सोहारी बसिया तीमन उठि भोरहरबा सभ सँ नीमन इस्कूल सँ बचबा लेल धरछन नीक लगई छई मरुआ मीरन कितकित पाड़ल सगरो आँगन चईत-कबड्डी मुँह मे सदिखन हो मेघ-सुरुज या चान-तरेगन जहि पर हाथ धेलक से अप्पन "नवल"कथी फुरि जेतय कक्खन बाल-मनक नै किछु परिसीमन वर्ण- १३ (सरल वर्णिक बहर) ७ मोन पड़ल ई कियै अनेरे बात पुरनगर बचपन के आंखि नोरेलै मोन जड़ेलक याद रमनगर बचपन के बचपन दाबल - गाड़ल - बिसरल यौवन के मादकता मे खोलि रहल छी खाली मोटरी बैसल असगर बचपन के बाबुक-कनहा मायक-कोरा अनुपम झूला सन घुआ-मुआँ ता-ता-ता थैया आर ठेहुनिया खेल छमसगर बचपन के ठकि-फुसला क कते खुयेलइन्ह दूध-भात आ गूड़क पूआ चंदा-मामा आर मौसी-बिलाय नेह हिलसगर बचपन के बस फूईसक खेती द्वेषक दोषी "नवल" जुआनी निर्संतोषी धाह जुआनिक जड़ा गेलै ओ गाछ झमटगर बचपन के --- वर्ण - २३ --- (सरल वर्णिक बहर) ८ कीन दे कचरी-झिल्ली-बऽरी लवणचूस आ कुट-कुट माँरी लोढि बाधसँ धान जे अनलौं भूजि दे मुरही भुट-भुट माँ धान अगोअं केऽ जेऽ उसरगल तकर कीन दे फीता-बाला काकी जे देलखिन्ह बाला से हाथमे होई छई छुट-छुट माँ ललका फीता गूहल जुट्टी तेल सँ माथा गमकै गम-गम थकरै केश जहन ककबा लऽ ढील केऽ मारै पुट - पुट माँ देखि भूख सँ लोहछल नेन्ना दुःख-सुख सभटा लोप भेलै भंसा घर मे घाम सँ भीजल काज करै सभ चुट-चुट माँ होय कहाँ अनका देखबैलै "नवल" इ मायक माया-तृष्णा भेड़ निन्न तइयो कहि खिस्से दूध पियाबय घुट-घुट माँ --- वर्ण- २२ --- (सरल वार्णिक बहर) बाल कविता- मेघक चोर
माँ गैऽ तूँ ई कहलें हमरा मेघ में नै छै पोखरि-डबरा झम-झम मेघ अतेऽ बरसै छै कहै कतऽ सँ पाइन अबै छै ? घैलक-घैल जे उझलि रहल छै मेघ में चोरबा टहलि रहल छै !
माँ गै माँ ई बात बता तूँ सुरुज जनै की कोनो जादू ? पूब सँ उगलै पश्चिम डुबलै पूबे सँ फेर कोना निकललै ! वैह चोरबा ई काज करै छै सुरुज उठा कऽ पूब धरै छै
माँ गैऽ चानक गोल कटोरी कियो करै छै राइत कऽ चोरी किछ दिन पहिने सउँसे देखल आइ राइत में अदहा भेटल मेघो में बड्ड चोर रहै छै चोरा-चोरा जे चान कटै छै
कतेक तरेगन संग उगै छै चोरबा के नै कियो धरै छै भरिसक सभ अपने लेल जागल मनुखक आदत ओकरो लागल छोड़ की ककरो मुँह लागब हम आइ राइत अपने जागब हम !!! जवाहर लाल काश्यप बाल गजल खसलै पर नहिं कनलै बौआ खसलै पर फेर उठलै बौआ हाथ पकडि चललै बौआ हाथ छोडि क चललै बौआ अपने पैर पर दौडलै बौआ चान के छू लेलकै बौआ क्रांति कुमार सुदर्शन बाल गजल एखन देख'मे छोट लगै छी तैयो कछुआ चालि चलै छी पएर हमर डगमग करैए तैयो हम नभ-चान देखै छी बोली हमर क क ट ट प प तैयो महान बनब से स्वपन देखै छी बहुत दूर अछि दिल्ली अमेरिकाक नाम सेहो सुनै छी चढ़ब हम चान आ मंगल पर आब कहू की हम अँहासँ कम लगै छी जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल बाल गजल
रोज उठैछी भोरे-भोरे घूमि अबैछी भोरे-भोरे ।
दूर-दूर धरि हरियर धरती देखि अबैछी भोरे-भोरे ।
धरती मैया सभहक मैया निहुरि कहैछी भोरे-भोरे ।
आम-डारि पर गाबय कोइली गीत सुनैछी भोरे-भोरे ।
माए-बाबू भगवान हमर छथि चरण छुबैछी भोरे-भोरे ।
माटि-पानि ले’ तन-मन-जीवन प्रण ई करैछी भोरे-भोरे । अमित मिश्र बाल गजल 1 भनसा धर दिश दौड़लनि बौआ अपन जलखइ माँगलनि बौआ बीच आँगन मे ऊँच पिढ़ी लगेला छरपला , डोलल खसलनि बौआ देखलनि माँ के ठाढ़ हाथ फैलेने चोट बिसरि कोरा बैसलनि बौआ दादी एलखिन लेने बाटी बौआ के दूध देख क' बाटी फेकलनि बौआ बाबू खेलखिन मिरचाइ सोहारी हुँनको चाही से जीद धेलनि बौआ गेँद गुड्डा हाथी , देब मोटर कार बहुते मनेलौँ नै मानलनि बौआ संग मे जाएब घुमै लए सर्कस अमित सँ चारि लड्डू लेलनि बौआ बर्ण-13 2 सखी सब गेल लागल छैक रेला चल चलेँ गै माइ घूमै लेल मेला चल कहै छल सरबतीया सजल छै सर्कस कुकुर बानरक देखै लेल खेला चल कते छै भीड़ छोड़े नै पकड़ आँङुर उठा ले अपन गोदी तखन मेला चल स सीँ पू पीँ करत बड पीपही फूक्का गुड़ीया कीन दे सब भरल ठेला चल कने छै भूख झिल्ली देख लागल गै गरम कचरी कने मुरही ल' केला चल मफाईलुन [U-I-I-I तीन बेर सब पाँतिमे] बहरे हजज ३ आइ मेला मे माँ झुनझुना किने दे चल सिया झा के मीठ पेड़ा किने दे कह कटै छै छागर किए खून पसरल लिखल छै जत' कटनाइ पतरा किने दे लाल पूक्का दे गै पियर फूल छापल लाल देबै मिरचाइ सूगा किने दे नाच नाचै नटुआ कते भीड़ लागल हमहुँ सीखब बजेनाइ बाजा किने दे दीप चल बारब हमहुँ मंदीर जगमग "अमित" करबै उपवास केरा किने दे फाइलातुन-मुस्तफाइलुन-फाइलातुन 2122-2212-2122 बहरे-खफीफ ओमप्रकाश झा बाल गजल करबा नै मजूरी माँ पढबै हमहूँ नै रहबै कतौ पाछू बढबै हमहूँ हम छी छोट सपना पैघ हमर छै गे कीनब कार जकरा पर चढबै हमहूँ टूटल छै मडैया आस मुदा ई छै सोना अपन छत कहियो मढबै हमहूँ चारू कात पसरल दुखक अन्हरिया छै कटतै ई अन्हरिया आ बढबै हमहूँ पढि-लिख खूब सब तरि नाम अपन करबै जिनगी "ओम" सुन्नर ई गढबै हमहूँ दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ (मफऊलातु-मफाऊलातु-मफाईलुन)- एक बेर प्रत्येक पाँति मे चंदन कुमार झा बाल-गजल 1 चार पर छै कौआ बैसल, माँझ अँगना बौआ बैसल । घुट-घुट खाथि दूध-भात, मायक कोरा बौआ बैसल । राजा-रानी सुनथि पिहानी, मइयाँ कोरा बौआ बैसल । ओ-ना-मा-सी सिखथि-पढ़थि, बाबाक कोरा बौआ बैसल । सुग्गा-मेना संग खेलै छथि, "चंदन" अँगना बौआ बैसल । वर्ण-१० 2 बाल गजल कुकरुकू जखन मुरगा बाजल, किरिण सुरूजक मूँह मेँ लागल । कौआ डकलक कोइली बाजल, आँखि मिड़ैते चुनमुन जागल । नहा-सोना के कयलनि जलखै, इसकुल गेलथि घंटी बाजल दीदीजी बड्ड नीक लगैत छन्हि, मास्टर जी के छड़ी लय भागल । कान पकड़ि के उठक-बैठक, तैयो खेले पर मोन छै टाँगल । "चंदन" टन-टन घंटी बजलै , छुट्टी भेलइ घर दिस भागल वर्ण-१३ 3 बेंग बजय छै टर-टर-टर्र बगरा उड़य फर-फर-फर्र । झरना झहरे झर-झर-झर्र, बाँस बजय छै कर-कर-कर्र । मिल चलय छै धर-धर-धर्र, साँप ससरलै सर-सर-सर्र । चुनमा छाती धक-धक-धक्क, डरसँ कापय थर-थर-थर्र । पप्पा एलखिन भागि गेल डर, बात पदाबय चर-चर-चर्र । वर्ण-१२ जगदानन्द झा मनु बाल गजल १ हेरौ कोआ खसा दे एगो आम हमरो लेल देबौ बाली मए जे देतै दाम हमरो लेल चल-चल गे बूचनी चलै आब खेलएब भ ' गेल देलकै जे मए काम हमरो लेल नहि छ्मकै एना लए कँ अपन गुडिया तोरा सँ सुन्नर देथीन राम हमरो लेल बहुत केलहुँ काज कमेलहुँ बड्ड राज आबो तँ घुरि आउ बाबू गाम हमरो लेल सबकेँ नाम गे मए कते सुन्नर-सुन्नर किएक नहि 'मनु' सन नाम हमरो लेल (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१६) २ नेन्ना हम मए केँ आँखि जूराएब मिथिला केँ अपन सोना सँ चमकाएब मूरत सभ घरे रामे सिया केँ देखु एहन आँन कतए मेल देखाएब गंगा बसति पावन घर घरे मिथिलाक डुबकी मारि कमला घाट नाहाएब मुठ्ठी भरि बिया भागक अपन हम रोपि अपने माटि में हँसि हँसि कँ गौराएब 'मनु' दै सपत घर घुरि आउ काका बाबु नेन्ना केँ कखन तक कोँढ ठोराएब (बहरे रजज, २२२१) ३ चम चम चम चम तारा चमके बौआ कए हाथक तरुआ गमके कारी बकरी,नब उज्जर महिष लाल बाछी किए दौर-दौर बमके बौआक घोरा सय-सय कए देखू काका कें घोरा पिद्दी कतेक कमके बाबी कें साडी मए कें लहंगा बहे बौआ कें गघरी त कतेक झमके बौआ हमर आब गुमशुम किए किएक नै ठुमुक-ठुमुक ठुमके (सरल वार्णिक, वर्ण-१३ ) कुमार संभव ‘भारद्वाज’ (उम्र-12 बर्ष, कक्षा-8, ग्राम- लहुआर, पत्रालय तेलहर, अंचल-महिषी, जिला-सहरसा, बाबू चतुर्भुज सिंहक प्रथम पौत्र छथि। मूल रूपसँ हिन्दीमे लिखल गेल ‘मेरा भारत देश महान’ हिनक पहिल कविता छियनि।) मैथिली अनुवादक: डॉ. शंभु कुमार सिंह हमर भारत देश महान हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान विद्या केर भंडार एतय अछि कुरीति केर विनाशक अछि आन कलामे परिपूर्ण अछि व्यापक अछि ई अनुपम अछि, हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान कहल जाइछ एहि देशक आगू सब क्यो माथ झुकौने अछि आन नदी आ पर्वत सभ सेहो एकर गुणकेँ गौने अछि, एहि धरती पर गंगा-यमुना केर बहैत निर्मल धारा अछि, हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान वीर पुरूषसँ भरल पड़ल ई हमर मुल्क हमर समाज ई कुँवर सिंह आ गाँधीजी केर यैह निवास स्थान अछि, एहि धरती पर जनम नेने छथि राम, कृष्ण ओ बुद्ध सेहो एहि धरती पर जनम नेने छथि सीता ओ सावित्री सेहो, हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान। मिहिर झा बाल गजल 1 झमझम बरखै बुन्नी रौ टमटम चलबै मुन्नी रौ आगू पाछू मलहा डोलय खत्ता मे बड गडचुन्नी रौ आम तोडय झाम गूडय डोमा देलक चुनचुन्नी रौ राजा के बेटा मारय ढेपा कुकुर भुकै मधुबन्नी रौ 2 उजरा भात गढका दूध बड़का थारी चाही नै खेलेबौ कनिया पुतरा नबका गाड़ी चाही भैया पहिरै नबका अंगा दशमी आ फगुआ बेटा हमहु छियौ तोहर आब नै छारी चाही भैया गेन खेलाई छौ टुकटुक हम छी ताकै दूध भात भ कात नै हेबौ हमरो पारी चाही काकाजी कान मचोरथि तोडी जखन टुकला अपन लीची अपने झाँटी हमरा बाड़ी चाही श्यामा लाई खूब खुवाबे टाटक भुरकी बाटे ओहि टाटके काटि खसाबी हमरा आरी चाही ३ खा ले रे बौआ दूधे भात ठुनकि नै हो ठाढ कात पढि बनबे तू बी डी ओ मोन राख हमर बात पैघे के सब दै छै ध्यान तोंही पेबें पहिल पात छौ जे दुत्कारैत एखन कान पाथि सुनतौ बात मोन लगा जॉं पढबे तू टाका के हेतौ बरसात ४ छुनकी हीरा गीतिया सोनू पाछू लागि सब रेल बनू ईंजन बनि हम आगू छी गार्ड बनता अपन मोनू दूध सोहारी कोयला पानी सकरी टीसन ठाढ गोनू फ्री टिकट सब आबि चढु सीट सबटा अपने जानू गजेन्द्र ठाकुर बाल गजल कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी जँ रंग गुलाबी छै तँ जानू बार्बी बोने-बोने फिरैए जे दैता सभ वनसप्तो लऽ घूरलि मानू बार्बी सात रंग लऽ भोर भेले गाममे परी रहैए गाम अकानू बार्बी कननी दूर हेतै बच्चा सभमे भरल आँखि बिसरी ठानू बार्बी पानि अकास धरती जा-जा घूमी पंख लगा टिकुली अकानू बार्बी धम्म गुड़िया संग खेलू कूदू राति सपनाउ निन्न आनू बार्बी सुता दियौ ऐ गुड़ियाकेँ आ सुतू चढ़ि ऐरावत दिन गानू बार्बी कैलास दास खोजए पड़त मातृत्व बालगीत
हमरा अखनो स्मरण अछि बाल्यकालमे हमरा सभक खेलय वाला एकटा समूह छल । ओहिमे लडका–लडकी के अछि कोनो मतलव नहि । एकटा हाफ पैन्ट आ गँजी लगा कऽ कोनो आम गाछ होए वा घरक दलान चाहे कोनो सार्वजनिक स्थल किए नहि होएँ । झुण्ड बना कऽ कबड्डी, आम गाछी, गोटी गोटी सँगहि खपडाके फुटलहवा लऽकऽ जमिनमे चिर पारि ‘रेङ्ग, रेङ्ग ’खेलतहुँ त कखनो विद्यालय के घर या अपने दलाने मे जा कऽ पाच गोटे मिलकऽ ‘झिझिर कोनो झिझिर कोना कोन, कोन कोना जाउँ । साउस मारलक ठुमका पुतौहुँ कोना जाउँ’ स्मरण अबय त मनेमन अखनो मुस्की सेहो होबय लगय । ओहि समय केँ बहुत किछु याद त नहि अछि मुदा एकटा हाँस्य व्यँङ्ग हम सभ एहनो करैत छली । ‘अण्टा रे भण्टा हम दू भाई पटना जाई झुमका लाई सासु के पहिनाई तऽ पुतहुँ झुमकाई ।’ लेकिन आई हम सभ फेर सँ ओहि बाल अवस्था सभक बीच जाएबाक मौका मिलैत अछि तऽ आश्चर्य लगैत अछि । ओना तऽ पहिले जाका बच्चा सभक झुण्डो नहि अछि । आ एछियो तऽ ओकरा सभक बीचमे एहन गीत सुनवाक अवसर मिलैत अछि– ‘परदेशी, परदेशी, जाना नही मुझे छोडके, मुझे छोड्के ।’ ‘चलि आना तू...तू.. पान की दूकान पे साढे तीन साढे तीन बजे ...।’ गाम ओहे छैक मुदा दलान नहि अछि । बच्चा बुच्ची ओहने अछि मुदा वातारण नहि । गाछवृक्ष छैक लेकिन ओ समूह आब नहि । मातृत्व बाल गीत (फकरा) के स्थान मे हिन्दी, अँग्रेजी,भोजपुरी वातावरण सभ ठाममे छा गेल छैक । कखनो काल हमरा सभक बीच झगडो होइत छल मुदा मुडही, लाई, चाउरक रोटी, भूजा खाएक लेल मुदा अखन देखैत छी सिंगरेट, दारु, गुटका पान परागके लेल आई हमर भाज त काल्हि तू नहि खुवाएबे त देखैबो कहि क झगडा करैत अछि । वास्तव मे कखनो काल बडा आश्चर्य होइत अछि कि देखते–देखते ऐहन परिवर्तन कोना भऽ गेलय । एकटा हम सभ रही जे गुरु जी के देखते नुका जाई । मायबाबु आ अपना से बडका से हरदम डर लगाय । आई परिवर्तन सँगहि बच्चामे शिष्टाचार, आदर स्वभाव किछुओ नहि अछि । कोन बुढ, कोन जवान सभलगय एक समान । तखन एकर दोषी के त ? अवसय एहन वातावरण बनाबयमे हमरे सभक दोष अछि । जाधरि हम कमजोर नहि भेली त हिन्दी, अँग्रेजी आ भोजपुरी वातावरण हमरा उपर कोना चढि गेल । एकर खोजी करबाक अखनो आवश्यकता अछि । जाधरि मैथिली मातृत्व बाल साहित्य के अगाडि नहि लाएब तऽ दोसरक कला संस्कृति भेषभूष आ वातावरण एहने हमरा सभक उपर लदाइत रहत । ऐकर परिणाम भेटत भूखमरि, लुटपाट, धोखाधरी एतबे नहि अपन बालबच्चा अपने माय बाबु के भुला कऽ कखन की करत नहि कहि सकैत छी । तँ एकरा सभक दूर करबाक लेल मैथिली मातृत्व बाल साहित्यके अगाडि बढाबही पडत । ओना तऽ गैर सरकारी संस्था आसमान नेपाल बालबालिकाक लिखल ‘बाल शक्ति पत्रिका’ तीन महिना पर प्रकाशित कय रहल अछि । एहि सँ ओकर समाधान नहि अछि । ओहि मे एकदूगो बाल कविता सँ मात्र मैथिली मातृत्व के नहि बचा सकैत छी । ऐकरा लेल एखनो बुढ पुरानक बात विचार आ ओहिक समय वातावरण के ब्यख्या करही टा पडत । जगदानन्द झा मनु करुण हृदयक मालिक महाराज रणजीत सिंह पंजाब प्रान्तक राजा महाराजामे सँ महाराज रणजीत सिंहक नाम हुनक न्यायप्रियता एवं सुशासनक लेल पसिद्ध छनि| एक समयक गप अछि, महाराज रणजीत सिंहजी अपन प्रजाक सुख दुख देखै लेल घोड़ापर सबार अपन सिपाही संगे राज भ्रमणपर निकलल रहथि | महाराज सेना सहित रस्तापर आगू बढ़ैत रहथि की कतौसँ एकटा पाथर उड़ि कs आबि महाराजकेँ बिच्चे माथपर लगलनि| पाथर लगिते हुनकर माथसँ सोनितक टघार बहए लगलनि| महाराज अपन एक हाथसँ घोड़ाक लगाम पकड़ने, दोसर हाथे चट कपारकेँ दाबि लेलनि | सिपाही सभ पाथरक दिसामे दौड़ल| किछु घड़ी बाद ओ सभ एकटा नअ-दस बरखक फाटल चेथड़ी पहिरने, गरीब नेनाकेँ लेने आएल| महाराजकेँ पुछला उत्तर एकटा सिपाही बाजल जे ई नेना पाथर मारि-मारि कए आम तोड़ै छल, ओहे पाथर आबि कs महाराजक माथपर लागल | महाराज रणजीत सिंह ओइ डरैत नेनाकेँ अपना लग बजा, स्नेहसँ ओकर माथपर हाथ फेरैत एगो सिपाहीकेँ आज्ञा देलनि - "पाँच पथिया आम, दू जोड़ी नव कपड़ा आ सएटा असरफी लए कs ऐ नेनाकेँ आदर सहित एकर घर छोड़ि आएल जाए| महाराजक आज्ञाक तुरंत पालन भेल | मुदा महाराजक निर्णयकेँ नै बुझि सेनापति, सहास कए कs ऐ तरहक फैसलाक कारण पुछिए लेलक| सेनापतिक प्रश्नक उत्तर दैत महाराज बजलाह -"जखन एक गोट निरीह गाछ पाथर मारला उत्तर फल दs रहल छै तखन हम तँ ऐ प्रान्तक राजा छी| हमर प्रजा हमर पुत्र तुल्य अछि, एहन ठाम हम कोना फल देबऽसँ वंचित रहि जाइ | गाछ अपन सामर्थे फल दै छै, हम अपन सामर्थे, ऐमे अजगुतक कोन गप| एहन उदार, न्यायप्रिय, वात्सल्य आ करुण ह्रदयक मालिक छलाह महाराज रणजीत सिंह | बाल प्रेरक विहनि कथा संकल्पक धनी विल्मा रुडोंल्फ बिल्मा रुडोंल्फक जन्म तेनेसेस शहरकेँ एक गोट गरीब परिवारमे भएलैंह | चारि बरखक अबस्थामे डबल निमोनियाँ आओर कालाजारक प्रकोपक संगे-संगे ओ पोलियोसँ ग्रस्त भs गेलिह | ओ अपन दुनू पएरकेँ सहारा देबैक लेल ब्रैस पहिरैत छलिह | डाक्टर तँ एते तक कहि देलकैन्ह जे ओ जीवन भरि अपन पएर सँ चलि फिर नहि सकतिह, मुदा हुनकर माए हुनका हिम्मत बढ़ेलखिन्ह आ कहलखिन्ह -"दृढ़ शंकल्प, लगन, आ कठिन मेहनत सँ जे कोनो काज कएल जाए भगवान ओकरा अवश्य पूरा करैत छथिन्ह |'' इ गप्प सुनि विल्मा निश्चय कएलैन्ह जे ओ दुनियाँकेँ सभसँ तेज धाविका बनतिह | नअ बरखक अबस्थामे डाक्टरक मना कएला बादो ओ अपन पएरक ब्रैस उतारि कs अपन पहील डेग जमीनपर बढ़ेलीह | १३ बरखक अबस्थामे अपन पहील दौड़ प्रतियोगतामे भाग लेलैन्ह आ सभसँ पाछू रहलीह | ओकर बाद दोसर, तेसर, चारिम, पाँचम प्रतियोगता सभमे भाग लैत रहलीह आओर सभसँ अन्तिम स्थानपर आबैत रहलीह | आ इ प्रयास ताबत तक रहलैन्ह जाबत कि ओ दिन नहि आबि गएल जहिया ओ प्रथम एलीह | १५ बरखक अबस्थामे विल्मा टेनिसी स्टेट यूनिवर्सिटी गएलीह, जाहि ठाम हुनक भेट एडटेम्पल नामक एकटा कोचसँ भेलैन्ह | हुनका ओ अपन मोनक इच्छा बतेलीह, जे ओ दुनियाँकेँ सभसँ तेज धाबिका बनऐ चाहैत छथि | हुनक दृढ़ इच्छा शक्तिकेँ देखैत टेम्पल हुनक कोच बनब स्वीकार कएलैन्ह | अंतमे ओ शुभ दिन आएल जहिया विल्मा ओलम्पिकमे भाग लs रहल छलीह | ओलम्पिकमे दुनियाँकेँ सभसँ तेज दौड़ए बला सभसँ मुकाबला रहैत छैक | विल्माक मुकाबला जुताहैनसँ छलैन्ह जिनका कियो नहि हरा पएने छल | पहील दौड़ १०० मीटरकेँ छल जाहिमे बिल्मा जुताहैन केँ हरा कs पहील स्वर्णपदक जितलीह | दोसर दौड़ २०० मीटरकेँ एहुमे विल्मा, जूताकेँ दोसर बेर हराकए अपन दोसर स्वर्णपदक जितलीह | तेसर आ अन्तिम दौड़ ४०० मीटर रिले रेस छल आ विल्माक सामना एकबेर फेरसँ जुतासँ छलैन्ह | एहि अन्तिम आ निर्णायक दौड़मे टीमक सभसँ तेज धाबिकाकेँ बिच सामना छल | दुनू टीमसँ चारि चारिटा सर्बश्रेष्ठ धाविका, करू अथवा मरुक मुकाबला | विल्माक टीमकेँ तीनटा धाविका रिले रेसकेँ शुरूआती तिन हिस्सामे दौड़लीह अ आसानीसँ बेटन बदललीह | जखन विल्माकेँ दौड़क बेर एलैन्ह तँ हुनकासँ बेटन छूटि गएलैन्ह मुदा ओ अपनाकेँ सम्हारैत, खसल बेटन शिर्घतासँ उठाबैत मशीन जकाँ तेजीसँ दौडैत जुताकेँ तेसरो बेर हरा कs तेसर गोल्ड मेडलक संगे-संगे दुनियाँकेँ नम्बरएक धाविका बनि अपन सपना पूरा करैत इतिहासक पन्नामे अपन नाम स्वर्ण अक्षरसँ लिखेलथि | ई अमीट इतिहास १९६० कए ओलम्पिककेँ अछि जाहिमे एकटा लकबाग्रस्त महिला दुनियाकेँ सर्वश्रेष्ठ धाविका बनल छली | एहेन सफल व्यक्तिक खिस्सासँ अपनों सभकेँ मोनमे सफलता प्राप्तिक लालसा अबस्य जगल होएत | कठिनाई सफलताक पहील सीढ़ी छैक, दृढ़ शंकल्प आ विश्वासक संग डेग आगु तँ बढ़ाऊ सफलता अहाँक चरण चूमत | प्रीति प्रिया झा कविता- ज्ञानक बल भोर भऽ गेल सुरुजदेव आबि गेलखिन फेरसँ नव दिनक आरंभ.... नव आशाक संग गामक लोक अपन काज आरंभ कएलनि एक्के गाम मुदा वएहमे किछु धनिक शेष िनर्धन धनिकहा लोक निकलला धनिक काजक संग गरीब गरिवहे रहि गेल हऽर जोति माल-जाल चराबऽ लेल जमीन्दार की जानथि गरीवक हाल ओ तँ मात्र आदेश देबए जानथि गरीबक व्यथासँ रस निकालथि बड्ड अनर्थ भऽ रहल आब बदलऽ परत समाज मुदा ई केना कएल जाय? एक्केटा उपाए अछि... ज्ञान ज्ञानक मंचपर केओ पैघ नै केओ छोट नै नै केओ राजा केओ रंक नै आबि रहल ओ दिन जखन ाानक बलपर सभ एहत समान जे हकसँ अछि वंचित ओकरो आसन भेटत तँए धनक हुलि-मालि छोड़ि ज्ञानक स्त्रोत बढ़ाउ सभ पूर्ण भऽ जाएत। मुन्नी कामत बउआ देखहक चांदकेँ बउआ देखहक चांदकेँ। चंदा मामा दूर छै देखहक कतेक मजबूत छै नित कटै-छटै छै तइयो हंसैत छै कतेक अटल निर्भय छै। बउआ तुहो अहिना बनिहक दुखसँ नै कहियो घबरैहक गिरबहक तबे तँ चलनाइ सिखबहक लगतऽ चोट तँ सम्भलनाइ सिखबहक देखऽ अइ चांदकेँ जे घटैत-घटैत मिट जाइ छै पर एक बेर नै घबड़ाइ छै धीरे-धीरे फेर आगा बढ़ि परपूर्ण भऽ कऽ पुनः आसमान मे खिलखिलइ छै। भोरक सनेस उठऽ हौ बउआ उठू यइ बुच्चिया देखियौ नजारा भिनसरक भागल अनहरिया भेल इजोत करू स्वागत दादा सूरजक। जतेक भिनसर उठबहक बउआ ओतेक नमहर हेतऽ दिन कुल्ला-आछमन कैर लए आशीष अपन नमहरक। भिनसरे नहेने सँ मन तरो-ताजा हएत निरोग बनल रहब अहाँ नै दरकार हएत कोनो डॉक्टरक। खुब पढ़ि-लिख बउआ-बुच्ची आगू-आगू दौड़ैैत चलू अछि अहीं कंधा पर भार अपन देसक। जगदीश प्रसाद मण्डल बाल विहनि कथा- घटक काका एहेन अगिआएल क्रोध घटक बाबाकेँ जिनगीमे पहिल दिन छलनि, जेहेन आइ भोरे उठलनि। एक तँ ओहुना देह घटने थोड़-थाड़ क्रोध सदिखन रहबे करै छन्हि मुदा घटबी जिनगीमे घटती काज भेने जहिना होइ छै तहिना भेलनि। ओना देहक घटबी अनका जकाँ नै छलनि, किएक तँ सभ दिन रहने केकरो फेहम बनल रहै छै, सभ किछु दुरुस्त रहै छै, मुदा तइसँ भिन्न घटक बाबाकेँ भेलनि। जेना केरा गाछक वा अनरनेबा गाछक पानि सुखने खलपैट जाइए तहिना भेने घरक पहिलुका सभ कपड़ो-लत्ता आ जुतो-चप्पल भऽ गेलनि। दहेजुआ देल कुरतो-गंजी आ जुत्तो-पप्पल ढील-ढीलाह बनि गेलनि। एकर माने ई नै जे कुरतो-गंजी आ जुतो-चप्पल बढ़ि कऽ ताड़ भऽ गेलनि तँए ढील-ढीलाह भऽ गेलनि। अपने सुखि कऽ पलास भऽ गेल छथि। ओना घरमे तते-रास कपड़ो-जुत्तो-चप्पल छन्हि जे अपन जीता-जिनगीकेँ के कहए जे मुइलोपर दान-पुन करैत उगड़िये जेतनि। मुदा कुछप भेने ओहो सभ कुछपिये जेतनि जइसँ कोनो सोगात नै लगतनि। जँ अपनो पहीरता तँ लेबरे जकाँ लगता आ दानो-पुन करता तैयो सएह हेतन। खैर जे होउ, मुदा औझुका अगिआएल क्रोध बिनु हवोक ने पजरि जाए तेहने लहलही छन्हि। कनभेंटक सातम श्रेणीक पोती सरस्वती जिज्ञासु बनि पुछलकनि- “बाबा, पढ़ल-लिखल लड़काक संग बिनु पढ़ल-लिखल लड़कीक बिआह कते करौलिऐ आ बिनु पढ़ल-लिखल लड़काकेँ पढ़ल-लिखल लड़कीक संग कते करौने हेबइ?” पोतीक पुछल प्रश्नक उत्तर बाबा नकारि केना सकै छथि। कविताक तुकवन्दी जकाँ कुछप किअए ने होउ, मुदा लय तँ भरबे करत। छ-अनियाँ मुस्की दैत घटक बाबा कहलखिन- “कोनो की डायरी लिखि कऽ रखने छी, अनगिनती बूझह।” बाल मन सरस्वतीक अनगिनतीमे ओझरा गेल। मुदा जहिना भूखक तृष्णाकेँ पानियोसँ किछु समए विलमाओल जा सकैए, मुदा तृष्णो तँ तृष्णा छिऐ। ठोस जहिना पानिमे नै भसिआइत, पानि हवामे नै उड़ैत तहिना सरस्वतीक तृष्णा नै उड़ल। पुन: दोहरा कऽ बाजल- “बाबा, बिआह किअए होइ छै?” पाँच किलो मोटरीकेँ तँ टारि देलिऐ, मनहीकेँ केना टारबै। जहिना पएर पड़िते साँप फन-फना उठैए तहिना घटक बाबाकेँ फनफनी उठलनि। एक तँ ओहुना घटबी देह थरथराइते रहै छन्हि तइपर आरो धऽ लेलकनि। मुदा जहिना गनगुआरि देख नागक फनकी टूटि जाइत तहिना दस बर्खक पोतीकेँ सोझमे ठाढ़ भेने घटक काकाकेँ भेलनि। नाट्य उत्सव मुन्नी कामत नाटकः- शिक्षित बेटी प्रथम-दृश्य दुलारी- माय..................बाबू...... देखियौ, हमर परिक्षाफल ऐल। जइमे हम सभसँ अघिक अंक सँ उतीर्ण भेलौं। फूलदाय- एना किए चिकरैय छऽ। लगैए जेना कानक झिल्ली फाटि जएत। सभ काज राज छोड़ि कऽ मुँह केँ अगोरने रहै छऽ किताबेमे। आब ई चिटठा लऽ कऽ डकरने फिरै छऽ। सभ तोहर बापक सनकी छियौ जे तूँ एना उधियाइ छी। ला अनऽ, आइ अकरा चुल्हामे झौकि दै छिऐ। दुलारी- माय, ई एक टुकरा कागज नइ, हमर साल भरक मेहनत छिऐ, हम नइ देब। फूलदाय- तूँ नइ देबही तँ आइ ई झारू तोरा पीिठ पर टुइट जेतौ। (फूलदाय झारू लात घुसा दुलारी पर बरसाबैत भद्दा-भद्दा गारि दैत आ हुनकर हाथसँ अंकपत्र लऽ कऽ खुण्डी-खण्डी कऽ दैत अछि।) पटाक्षेप दोसर दृश्य खट्ठर-दुलारी बेटा, दुलारी कतऽ छहक। दुुलारी-अबै छी बाबू जी! खट्ठर- आइ तँ तोहर परीक्षाफल अबैबाला छेलऽ, कि भेलऽ? अच्छा जा तूँ अपन अंक-पत्र नेने आबऽ। हम तोरा लऽ एगो तोउफा आनलिअ, जकरा देख तूँ खुश भऽ जेबहक। हम तोरा लऽ कलम आनलिअ, आब जल्दी जा कऽ हमर उपहार नेने आबऽ। (दुलारी चुपचाप ओतै बैठ दुनू आँखि सँ नोर बहाबैत यऽ, तखने फूलदायक प्रवेश।) फूलदाय-अहींक दुलार अकरा बिगाड़ि कऽ राखि देलकैए। जेना पढ़ि-लिख कऽ हमरा कमा कऽ खिऐत बड़का मसटरैन बनबै लऽ चलल, के करतै बियाह। कतौ बिएबहक तँ पहिले चुल्हा लग घुसकेतऽ बेटीकेँ। कॉपी-कलम पकड़ा नै ओकिली करै लऽ लए जेतऽ, बुजलहक कि नै। खट्ठर-बेटा, तोहर मायक तँ आदते छऽ बजै कऽ। छोड़ऽ, तूँ कहऽ की भेलऽ स्कूलमे। (दुलारी नोराइल आँखिसँ चुपचाप माय आ बाबू दिस निहारैत रहैए।) फूलदाय-गइ सून, दुआर पर गोबरक ढेर,ी जो उठाकऽ महार पर पाथने आ। आ अकर बात सुनमे तँ अहिना कुहल जेमऽ। बर ऐल पढ़ै-लिखै बाली। देखै छियौ, आब तोरा के पढ़बै छौ। खट्ठर-अहॉं बताह छिऐ कि! अपनो जनमल आन लगैए अहाँकेँ। तँइ तँ तूँ निपुत्र छी। डाइन कहाँकऽ। भगवान तोरा बाँझे रखितौ तँ नीक होइत। पटाक्षेप तेसर दृश्य (किछु दिन बाद दुलारीक शिक्षकक हुनकर घरपर आगमन।) शिक्षक-खट्ठर................यौ खट्ठर...... कतऽ छी यौ। खट्ठर-मास्टर साहेब प्रणाम। शिक्षक- प्रणाम-प्रणाम! लिअ, आइ हम अहाँ कऽ मुँह मीठ करै लऽ एलौंए। खट्ठर- की खुशीमे! शिक्षक- किए, अहाँ कऽ नै बुजहल अछि जे अहाँक बेटी अहि गामक संगे अपन जिलोक नाम रौशन केलक। आइ हमरा गर्व भऽ रहल अछि जे हम दुलारी जेकाँ होनहार छात्राक शिक्षक छी। खट्ठर-पर दुलारी तँ हमरा किछु नै कहलक। हम तँ ई बुझै छेलौं कि दुलारी बोड परीक्षामे असफल भऽ गेल। दुलारी..........बेटा दुलारी........ दुलारी- जी बाबूजी! खट्ठर-बेटा, हमरासँ अतेक खुशीक बात केना छुपा कऽ राखि लेलौं। दुलारी-बाबूजी, ऊ माय हमर अंकपत्रकेँ.. (कहैत दुलारी कानऽ लगैए।) शिक्षक-दुलारी, आइ तूँ गर्वसँ हमरा सभक सर ऊँच कऽ देलऽ। खट्ठर! दुुलारीकेँ सरकार १० हजार रूपैया आ इंटर कॉलेजमे दाखिला संगे दू सालक पढ़ै-रहै आ खाए कऽ खर्चा सभ देत। आ हम शिक्षकगण स्कूलक तरफसँ ५ हजार रूपैया अहाँ केँ देब जे अहाँ अपन बागमे अतेक सुन्दर फूल उगेलौं, पूरे समाजसँ लड़ि अपन बेेटीकेँ आगू बढ़ेलौं। आब सभ अपन बेटीकेँ बेटा जेकाँ पढ़ैत। पटाक्षेप चौथा दृश्य (अपन पत्नीसँ) खट्ठर-आब कहू बेटी कमाकऽ देलक कि नै! हम एहन दीप जरेलौं जकर प्रकाश पुरे जिलाक लोक देखलक। कि अहाँक मन अखनो अनहार यऽ? फूलदाय-हमरा माफ कऽ दिअ दुलारी बाबु, हमरा सँ गलती भऽ गेल, हम अनपढ़ नै। बुझलौं शिक्षाक की मोल होइए। जब हम घर सँ निकलै छेलौं तँ लोग सभ ताना मारै छेल, कहै छेल, बेटीकेँ बेटा जकाँ स्कूल भेजनेसँ देखबै, नाक कटैत। आइ जाइ छी हम, वएह लोग केँ कहै लऽ कि देखियौ, हमर बेटी नाक नै कटौलक बल्कि सर ऊँच केलक। खट्ठर-अच्छा चलू, दुलारी आब दू साल पढ़ै लऽ पटना जएत, तकर तैयारी करू। फूलदाय- हऽ दुलारी बाबु, जरूर। पटाक्षेप अंतिम दृश्य (दू सालक बाद।) खट्ठर-बेटा, आब आगू कि करबहक? और पढ़बहक! दुलारी-बाबु आगाँ तँ पढ़ब मुदा अहि संगे हम एगो काम सेहो करब, अपन गाममे प्रोढ-शिक्षा अभियान शुुरू करब। खट्ठर- ई की होइ छै! दुलारी-बाबू जाबऽ तक जड़ि नै स्वच्छ हौत तँ निक डारि केना पनपत। जबतक नारी शिक्षाक मोलक एहसास नै हएत तब तक कोय अपन बेटीकेँ नै पढ़ैैत। बाबू हम अपन गामक सभ बेटीकेँ दुलारी बनैत देखऽ चाहै छी। खट्ठर-हँ बेटी, अहिमे हम अहाँक संग छी। अक्षर-अक्षर दीप जलत कक्का-काकी,बाबा-दाय सभ मिल कऽ पढ़त तबे बेटा-बेटीक भेद मिटत आ समान हक सँ दुनू आगू बढ़त। विदेह सदेह:१२ || 437 438 || विदेह सदेह:१२
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जी . एकटा “आरो कारण wa झारखण्ड मे परदेसीक विभाजनक समय मे झारखण्डक प्रतिव्यक्ति आय जतेक आगमनक। एहिठामक राजाकेँ जनता सँ अनाज आ जंगली छल ताहि मे हास भेल अछि। आइ सम्पूर्ण भारत में खाद्य-पदार्थ भेंट-स्वरूप जखन-तखन प्राप्त होइन। ule साक्षरताक न्यूनतम दर बिहार मे अछि, आ तकरा बाद रेवाज मे गड़बड़ी भेलाक बाद राजा स्वैच्छिक सोगाइत we झारखण्डेक स्थान छैक। कानूनी लगान बना देलनि। आदिवासी जनता एकर विरोध आवश्यकता अछि स्थिति क' ओकर पूर्ण व्याप्त मे कयलक। छोटानागपुरक राजा स्थिति क' अपन अनुकुल देखबाक , समस्या aw गंभीरताँ सँ लेबाक। बहरिया लोकक बनयबाक लेल बाहरी लोक क' मुख्यत: उत्तर बिहार तथा. प्रति आक्रोश क' आन्दोलन मे बदलबाक प्रयास पहिनहु ः उत्तर प्रदेशक बासी a बजौलनि। हुनका सभ क' लगान मेल छल। उनैसम शताब्दीक अन्त मे, टाना भगतक वसूलबाक लेल गामक सम्पदाक ठीकेदारी आ पट्टोदारी द' . प्रादुर्भाव सँ पहिंने, झारखण्डक महान जननेता बिरसा देलथिन। आदिवासीक सम्पर्क हिन्दू सँ बढलनि। परिणाम. मुंडाक आन्दोलन भेल रहय। यद्यपि ओ आन्दोलन धार्मिक मेल जे एहिठामक आदिवासी राजा सिंहभूमिक राजपूत छल, मुदा ओहि, सँ दिकूक विरोध मे एकटा वातावरण परिवार मे बिआह aw’ लेलनि। आदिवासी सँ हिन्दू ara तैयार भेल weal ओकर प्रभाव स्थायी नहि भ' सकल। परिवारक अपेक्षितारय परदेसी सभ सँ बढ़' ame आइ सँ . आब जे स्थिति अछि ताहि मे झारखण्ड, ओहि ठामक लगभग चारि wa वर्ष पहिने छोटानागपुरक राजा छप्पन at आदिवासीक शोषण लेल दिक्कू बनब जरूरी afe छेक। राजपूत परिवार aw मध्य प्रदेश सँ आनि अपन सेना मे. भू-दखलीकरण आ बाजारवादक अस्त्र art भाला-बर्छी शामिल कयलनि। एहिना बाहर सँ आयल HTH आदर सँ बेसी असरदार अछि। a भ्रष्टाचारी आ अत्याचारी a मे राजा सँ उपाधि भेटलनि। एहने उपाधि थिक नारायण, dea पहिल काज थिक। ओ ferry आ आदिवासी-कोनों ax आ राम। राँचीक बॉरैया आ रातू थाना क्षेत्र मे नारायण. देह धारण कयने fe सकैत अछि। आँखि साफ रहय, आ राम तथा माण्डर मेन्द ओहिठामक लोकक नाम मे. ठीक सँ देखेत रही तँ ae सँ भरल रस्ता क' सेहो आइयो yea अछि। झारखण्डक अधिकांश भाग मे जे. आसानी सै पार कयल जा सकैत of. कुम्हार, बरही, सोनार, तेली , जोलहा आदि छथि से wet किन्तु, प्रस्तुत उपन्यासक अन्त ue ate होइत | आगमनक देन थिक। कारीगर आ मजदूरे नहि, aq oan अछि। विविधता भारतक गौरव थिक। एहिठाम विभिन्न पुजारी Bel बाहरेक छथि। रामगढ़क घटवार लोकनि समुदायक बास अछि। तखन जे fra में एकसूत्रता छैक लगभग तीन wa वर्ष पहिने बंगाल सँ तीन wa घोषाल . सैह थिक भारतीय संस्कृति। भारतक एहिं सामाजिक प्रकृति ब्राह्मण क' रजरप्पाक fee देवीक पूजा aH क' बुझेत। amit बढ़बाक अछि। .विदितजी अपन प्रसिद्ध aa अनलनि आ हुनका पण्डा बना क' ओहिठामक . पुस्तक - संताली मैथिली ओ मे कहेत छथि जे हम जागिरदारी द' देलनि। ः संभगोटे भारतक मूलवासी छी। आदिवासी आ गैर आदिवासी, एहिं प्रकार' आजुक झारखण्ड मे आदिवासी क'. आनार्य on आर्यक भेद अवसरक असमानताक देन अछि। फुटकायब कठिन अछि। तखन एतेक अवश्य जे of विकासक सुविधा-असुविधाक परिणाम अछि। विप्लबी अहलादि क' आनल लोक क' काल बेसाहब बूझल जाइत . बेसरा एहि मान्यताक भौतिक सत्यापन थिक। विसंगति ch” | अछि। बिहार सँ woe भेलाक बादक झारखण्ड मे. संगति देबाक मुखर आह्वान थिक। आदिवासीक संख्या मात्र 28 प्रतिशत अछि। बिहार-झारखण्ड शांति निकेतन, पी. पी. ठाकुर पथ शिवपूरी पर्व, पटना-23 न
नौकरी भ जाइत de a मोहरीलालक आत्मीय कम्पाउन्डरक ANT गूँजि. उठल। उपन्यासक समाप्ति जाहि पड़ाओ पर मदति सँ गौरी सेहो नर्स बनि जाइत अछि। गौरी कम्पाउन्डरेक tied अछि de एकरा. वैचारिकता. प्रदान करैत अछि। ओहिठाम FHSS मे ted अछि। कम्पाउन्ठरक बहिन विचारबाक बात ई अछि जे की झारखण्डक गौरीक एहिना ः बाँसुरी आ गौरी मे घुद़ी-सोहार हेम-छेम अछि। ई de हत्या होइत रहत? ई. हत्या गौरीक ate, एकटा सपना, बाँसुरी अछि जे धौना क' आसाम अबैत काल ट्रेन मे. एकटा मनोरथक हत्या. थिक। आदिवासी जन-जीवनक मेटल रहैक। से जखन धौना गौरी dee we कोकडाझाड़ सुख-समृद्धिक हत्या थिक। एहिं अत्याचार & अविलम्ब अबैत अछि तखन ओकरा बाँसुरी सँ सेहो भेंट होइत Sal रोकल जाय से आवश्यक AT, प्रश्न अछि जे कोना प्रेमलीलाक त्रिकोण aia अछि। प्रेमाख्यान आ ओहि मे रोकल जाय, के रोकत? उपन्यास मे एकर एक्केटा उत्तर त्रिकोणक समावेश सँ उपन्यास मे रोचकता add छेक। . देल गेल अछि। साधु dard 'बनला सँ काज नहि चलत, एकरा बाद कथा बड़ तेजी सँ बढ़ैत अछि। स्थान, तीर-धनुष आ हथियार ल क' लड़ाई कर' पड़त। समय, घटना-सभटा बदलि जाइत अछि। गौरी आसाम सँ उपन्यासक कथा एही समस्या तथा समाधान पर झारखण्ड sad अछि। बिहार सँ फराक da wre समाप्त eed अछि। किन्तु, उपन्यासक विषय एतहि खतम राज्य-झारखण्ड। आदिवासीक झारखण्ड। अपन झारखण्ड। * नहि होइत अछि। st amit seq अछि। बहुत-किछु मुदा, प्रश्न अछि- कोना अपन? कतेक अपन? de tga on सोचबाक da कहेत अछि। झारखण्ड राज्य विचार-बिन्दु अछि जत' उपन्यासकार पाठक क' पहुँचाबय a 2000 go में बनल हो, आदिवासी क्षेत्रक रूप में चाहैत छथि गौरी अपन। नानाक संग भुईटिकडी otf एकर-इतिहास बड़ पुरान अछि। एन्थ्रोपोलिजिकल सर्वे ह जाइत fs झारखण्ड बनिए गेल अछि, आब wat ऑफ इन्डियाक पीपुल site shear नामक पोथी (खण्ड आसाम, बंगाल वां मुंबई जेबाक कोन काज'-नाना मनेमन . सोलह) मे कहल गेल अछि जे झारखण्ड क्षेत्र मे बसनिहार aida छथि। गौरी भुईंटिकरी आयल ds नानाक अपेक्षित . पहिल समुदाय मुण्डारी भाषाभाषी छल जे तीस हजार वर्ष सरमाजीक सक्रिय सहयोग सँ राँचीक अस्पताल मे नौकरियों. पहिने एतय आयल Teal तकरा बाद विभिन्न समय मे af गेलैक। सरमाजी भुईटिकरीक कोयला ware लीज विभिन्न भाषा आ संस्कृतिक लोक एतय अबैत रहलाह। ई लेबयवला मालिकक मैनेजर छलाह। गौरी हुनका wT स्थिति आजुक झारखण्ड आ बिहारेक नहि सम्पूर्ण पूर्वी L मोटर साइकिल पर आबाजाही कर' लागल। राँचीक SP भारतक अछि। एक समय Wd जखन झारखण्डक क्षेत्रीय ; रीसोर्टक टेबुल पर डोसा खयलक। Tele स्थान पर परिंचिति पूर्वी मध्यप्रदेश सँ राजमहलक पहाड़ी आ गंगा ‘ सरमाजीक कीनल जीन्स सर्ट on सलवार-सूट view af व्याप्त od ई क्षेत्र बनिया-व्यवसांयी Wows कॉँ लागल। आ, एक राति जखन सरमाजीक पुरूषार्थक प्रत्यक्ष खनिजक व्यापारी तथा तीर्थाटन करयवला धर्मत्माक अनुभव कयलक तखन बाँसुरी क' fata देलकैक जे आकर्षणक केन्द्र रहल अछि। उपन्यास में मैनेजर सरमाजी घौना सन gist पैरूषवला सँ ओ बिआह नहि करत। मुद्दा, अपन परिचय wa देलनि अछि- ' हमर माय मिथिलाक aa सोचैत छलीह से भेलनि नहिं। कोयला खदानक Sel ओकर नैहर रहैक बीना। हम तँँ कहियो मातृकक _.... मालिकक वासनापूर्ति ओ नहि कयलथिन? तैँ ओकरे qa नहि देखलहूँ। सुनै छी जे एखनुका सुपौल जिला मे गोली सँ ae गेलीह। नाना साधु-संन्यासीक जीवन Bo चकला निर्मली अछि, तकरे लग में ओ गाम अछि। हमर त्यागि फेर विप्लवी बेसरा बनि गेलाह। जय झारखण्डक माय मैथिली ada छलि। हमर बाप संताली भाषी रहथि
[ we मनुवादी, आ आब पाश्चात्यमार्गी, बनयबाक क्रम में. से पुरना जमानाक बात दोसर Bell अपना सभक पुरखा आदिवासीक धर्म-कर्म तथा जीवनशैली क' हेय दृष्टि सँ लोकनि बीछि-बीछि क' तेहने om बसलाह जे ठाम 4 देखेत छथि। stows तथ्य क' बिंसरबाक प्रयास ata रतीक तडर मे खान छल आ ऊपर मे जंगल। पुरना जमाना : छथि जे हमरा सभक मूलग्राम एक अछि, हमसभ समाजी मे जे हालत रहल हो से हम ने जनै छी, लेकिन एखनुका ot, ओ हमर ae छथि। जमाना मे खान आ जंगल दुनूक मालिक स्वयं सरकार भ' डॉ0 विद्यानाथ झा 'विदित' एही विषक ow ‘fact गेल अछि en हमसभ ओहि कीमती सम्पत्तिक बिना बेसरा' में उजागर . कयलनि अछि। ई उपन्यास waa खेबा-खर्चक मंगनीक ओगरबाह बनल छी।' जेना होइत . नामक आदिम समुदाय पर केन्द्रित अछि। संताल मे बारहटा. SH, माय-बापक ममता पछुआ गेलैक। धौनाक fae कुल tha छैक। ताही मे एकटा गोत्र अछि बेसरा। प्रस्तुत. आगाँ बढ़ि गेलैक। घौना आसाम पहुँच गेल। मुदा, पचगछिया उपन्यास बेसरा गोत्रक लोकक शील-स्वभाव, राग-विराग. eR पहुँचबाक रास्ता मे, बस में, बाँसुरी सनक an रीति-नीति सँ परिचित करबैत अछि। ada सहयात्रीक जे मनगर निकटताक अनुभव भेल रहैक से समय-सालक संग ओकर आचार-विचार मे आयल परिंवर्चन बेर-बेर मोन SH संयोगवश गौरी सँ पहिले दिन भेंट पर सेहो ध्यान राखल गेल अछि। सभ सँ पैघ बात date भ' गेलैक on बाँसुरीक प्रति जागल उत्कण्ठा गौरीक जे दुतकारल-कतिआयल एहि पारिवारिक सदस्य क.. खिस्सा सुनबाक. इच्छा क' आतुर क' देलकैक। ः जगयबाक, जागल क' संघर्ष चेतनाक पाटि पकड़्यबाक ae fae शुरू ta अछि पाँचम अध्याय जे am we में कयल गेल अछि से मैथिली साहित्यक | सँ-गौरीक माय-बापक प्रसंग a बीच-बीच मे आदिवासी नव आयाम अछि। मैथिली मे आदिवासी जनजीवन पर. जीवनक अनेक उपकथा अबेत अछि। जेना, लालबाबाक कथा अछि, कवितो मे प्रसंगवश उल्लेख अछि, yer इमानदारी आ नैतिकताक कथा। पाथरपाड़ाक सरदार आ औपन्यासिक विस्तारक संग ई पहिल कृति थिक। कुली पाड़ाक मजदूरक कथा। चायबगानक मालिक-मैनेजर ue कृति क' रचनाकार उपन्यास कहलनि ats! आ.ओहिठामक कर्मचारीक sedan कथा। ई संभ क्षेपक किन्तु, कथा-संयोजनक दृष्टिएँ एकर ठाठ किछु दोसर . कथा आदिवासी जीवनक कटु-मधु दृश्य क ' प्रस्तुत करैत प्रकारक अछि। गुजराती मे उपन्यास क' नवलकथा कहल otf एहि सँ पूँजीपति मालिकक राजनीति आ बामपंथी जाइत छैक। 'विप्लबी बेसरा' sea: नवल कथा थिक। मजदूर नेता मोहरी लालक हत्याक रहस्य बुझबा में अबैत दादी-नानीक खिस्साक शैली मे, अनेक खण्ड में, wre अछि। मोहरीलाल on ओकर पत्नी रमियाक मृत्युक are ad कथा कहल गेल अछि। de ढंग, ae बान्ह॑-काट, . गौरीक कथा शुरू होइत अछि। ated रोचकता। पंचगछिया गाम। सोहराय पावनि। सुफलक ताधरि उपन्यासक उत्तरार्ध आबि जाइत अछि एगारहम पत्नी फूलमनि घर-आँगन कँ सजा रहल STS! बेटा धौना _ अध्याय। आदिवासी जीवन प्रणालीक अनुरूप उपन्यासक बहिनक विदागरी ara’ गेल Se आसामक चायबगान मे. नायिका प्रधान बनायब आवश्यक छल, त. एकैसम अध्याय काज करयवला संगी टेकलाल सँ भेंट होइत छैक। tear «sata अन्त धरि मोहरी लालक बेटी, विपलवी बेसरा हर daw अपना संग आसाम a’ जाय चाहैत ote. बनल साफाहोड़क नतिनी, गौरीक खिस्सा विस्तार 4 : माय-बापक स्नेह नाकर-नुकुर करैत छैक। धौना आदिवासी कहल जाइत अछि। धौना अपने & पढ़िए लैत अछि, गौरी जीवनक गतिमति क' फरिछबैत अछि-' अहाँ जे कहैत छी . क' सेहो पढ़ा दैत अछि a पास धौना aw facie में
ea समीक्षा विप्लवी बेसरा : विषय आ विचार - श्री मोहन भारद्वाज मेथिल मनीषी याज्ञवल्क्य आ हुनक कृति शतपथ मिथिला की झारखण्ड की बिहारक आर्यीकरण संभव ब्राह्मण wf प्रमाण मानी ¢ मिथिलाक आदिवासी अनार्य. भेल। आर्यीकरणक एहि प्रक्रिया मे जे छूटि गेलाह से <.. रहथि। मिथिला जंगली क्षेत्र छल। वैश्वानर सरस्वती सँ.. आइयो आदिवासी कहबैत छथि। अन्य अपना SAAT पूब दिस बढ़ेत गेलाह आ सदानीरा धरिक भूभाग au do फराक, cea सभ्य, cared श्रेष्ठ gad छथि। क' आर्यक प्रवेश क' सुगम बनौलनि। तकरा are आजुक एतबे नहि, एहि प्रकारक सभ्य लोकनि अपन आचार-विचार ः aD 4
| = ro ee a | re * सुभाषचन्द्र Wet | - Se Ca we मोनोग्राफक बारे में ee ip re राजकमल चौधरी at जायत' । मीटिंगक बाद सुरेश्वर झा आ रामदेव झा इलाहाबाद : qi 7 i So) मोनोग्राफ लिखबाक काज | जयकांत flor भेंट aes चल गेलाह- साहित्य अकादेमीक अगिला =e a «Bae 993 ई:क अंतमे मैथिली संयोजक बनबाक पैरवीमे । डी Same tea छल | सुनलहूँ जे. मोहन भारद्वाज पॉडुलिपि पढ़िक५ रामदेवे झाक लाइन पकड़ि लेलनि । | |... dts यादव | wige अकादेमीक एहि idl wes लगलाह जे मैथिली साहित्यवला खंड कने और पैघ ws | frofad एहन wdat feel; राजकमलक यौन जीवनक ईं अंश हटा 'दिऔ, ओ अंश हटा | व्यक्ति खिसिया गेलाह, जिनका art ने कोनो कारणे .ई विश्वास feat आदि । राजमोहन झा आ aad’ ओ अपना ढंगे बुझा-सुझा | छलनि जे राजकमल पर मोनोग्राफ लिखबाक लेल Se सर्वाधिक उपयुक्त . कड तेना तैयार HS लेलनि जे आब हुनका बदलामे Be sy हमर } an योग्य छथि । मैथिलीमे निस्संदेह अनेक योग्य व्यक्ति छथि on go पांडुलिपिकें अयोग्य घोषित ars लगलाह महाप्रकाश एहि बात काज किनको देल जा सकैत छल । लेकिन मैथिली परामर्श मंडलक sas सुकांतक फज्झैतो कयलथि । पांडुलिपिक प्रकाशनक चिंताक wife बैसारमे ई निर्णय भेल ताहिमे कोनो दोसर नाम नहि छल । देवकान्त .. कारण हम ओहिमे few जोड़बाक आ ओकरा संपादित करबाक झा प्रस्ताव देलनि आ att स्वीकृत भड गेल । ae तैयार भड Teg | लेकिन ई जोड़-घटाव बहुत मामूली छल । मोनोग्राफ लिखबामे हमरा बहुत विलम्ब भेल । ओकर पांडुलिपि हम. पांडुलिपि मोहन भारद्वाज के घुरा देलियनि । fee दिनक बाद ओ 996 ई.क अप्रैलमे कलकत्तामे भेल बोर्डक मीटिंगमे जमा कयलहूँ | wes लगलाह आहाँ जे fae कहलिऐक अछि से निष्कर्ष रूपमे Wet मे पांडुलिपि रामदेव झाके समीक्षा हेतु द५ देल गेलनि । ई बात. अलगसँ लिखि ws es दिऔ । मोनोग्राफके पी-एच.डी. थीसिस बना ठीक नहि भेल, से मीटिंगक ae तखन बुझायल जखन मोहन. tare हमर कोना इच्छा नहि छल | निष्कर्ष Act हम. एकदम तैयार भारद्वाज एहिं दिस ध्यान दिऔलनि i मीटिंगमे हम रामदेव झाक . नहि भेलहूँ । ताथरि ई तय as गेल छलैक जे साहित्य अकादेमीक *पसीझैत पाथर 'क प्रस्तावित अंगरेजी अनुवादक विरोध कयने छलिऐक। अगिला मैथिली संयोजक रामदेव झा dae | मोहन भारद्वाजक पाँच-छह मास गुजरि गेलाक बादो जखन रामदेव झा अपन समीक्षात्मक . परामर्श मंडलक सदस्य बनबाक रहनि आ से हुनका रामदेवे झा बना रिपोर्ट नहि पठौलथिन as विश्वास भड गेल जे ओ हमरा विरोध सकैत छलनि; बनाइयो देलथिन । पता चलल हमर मोनोग्राफके' ओ करबाक मजा चखा रहल छथि I रिजेक्ट as देलनि । कारण ई जे विनिबंध लेखक पांडुलिपिमे | Wed: साहित्य अकादेमीकें हम पत्र लिखलिऐक जे समीक्षक्सँ रिपोर्ट _ अपेक्षित संशोधन आ परिवर्तन लेल तैयार नहि भेलाह । अविलम्ब मंगाओल जाय | अंततः आठ महीनाक बाद जनवरी 9978 _ हमरा लेल ई बड़ पैघ आघात आ चुनौती छल | हम ओकर हिन्दी रामदेव झा रिपोर्ट जमा sacs । पांडुलिपिके” ओ अस्वीकृत कड देने amare करब आरंभ कयलहूँ । we प्रसंगमे हमरा केदार काननक pore । हुनक रिपोर्ट ‘ars का प्रतिवेदन ' प्रकाशित कयल जा रहल.. अविस्मरणीय सहयोग भेटल । मोनोग्राफक प्रतिलिपि तैयार करबाक आ अछि । ओहि रिपोर्टक जवाब, जे हम साहित्य अकादेमीके पठौने छलिऐक, .. ज्ञानरंजनसँ ओकर प्रकाशन संबंधी गप्प करबाक श्रेय Harts छनि gs सेहो *वाचक का प्रतिवेदन 'क तुरंत बाद छापल जा रहल अछि। मोनोग्राफ़ पहिने i998 ई.मे पहल पुस्तिका रूपमे छपल आ 20077 रामदेव झा द्वारा रिपोर्ट जमा करबा सँ पहिने मोहन भारद्वाज दिल्ली गेल... सारांश प्रकृॉशिनसँ किताब रूपमे । आब ओ मैथिलीमे छपि रहल अछि । छलाह तँँ हमरे कहला पर ओ साहित्य अकादेमीक उपसचिव रमेश एहि मैथिली रूपमे किछु एहनो चीज अछि जे हिन्दीमे,नहिं अछि । । भसीन सँ गप्प कयने छलथि । तकर सूचना दैत ओ लिखने छलाह- ue मोनोग्राफक fede बहुत प्रशंसा Ae । प्रकाश मनु आ लीलाधर ‘onda d अहाँक पत्रक प्रसंग गप्प भेल । ओ कहलनि जे अन्यथा रिपोर्ट. मांडलॉईक प्रशंसात्मक समीक्षा हिन्दीक पैघ आ प्रतिष्ठित पत्रिकामे अयला पर पुन: दोसर ted रिभ्यू कराओल जयतैक । पोथी wade, छपल | हमरा लग प्रशंसाक अनेक पत्र आयल | बहुत Tice चिट्ठी कने-मने संशोधन Sts पड़य से संभव । अहाँ निशिचंत रहू ।' fafams ओकर खोज करैत रहल | बहुत Ties राज्कमलक बारेमे पांडुलिपि अस्वीकुत हेबाक आशंका तैँ रहबे करय । रच्छ ई छल जे. अपन संस्मरण लिखि ws पठौलक | मैथिली जगतमे एकरा रिजेक्ट परामर्श मंडलक एकटठा और मीटिंग, जे ओकर आखिरी मीटिंग होड़त, 9 करबाक बहुत विरोध आ आलोचना भेल । पत्रिकामे उतरा-चौरी, अप्रैलमे निर्धारित छल, जाहिमे सदस्यक रूपमे उपस्थित रहि हम अपन _ उकटा-पैंची आ विवाद चलल । एहिमे सर्वाधिक मुखर रमेश छलाह । पांडुलिपिके बचेबाक प्रयास HS सकैत छलहूँ । दिल्लीमे मीटिंगसँ _ मैथिली-हिन्दीक रचनाकार डॉ० 'सुवास कुमार, जे हैदराबाद पहिने भसीन कहलनि जाहि नाम पर आपत्ति हो, तकर विरोध अहाँ विश्वविद्यालयमे हिन्दीक प्रोफेसर आ अध्यक्ष आ वेस्ट इंडीजमे कैक मीटिंगेमे. करब । मीटिंगमे निर्णय भेल जे पांडुलिपिक समीक्षा wre साल भिजिटिंग प्रोफेसर were, एहि मोनोग्राफक ata लिखने रहथि कराओल जाय | ककरा देल॑ जाय ? सभ चुप छल । सुझाव रामदेवे .. : उलटाने लगा तो खत्म किये बिना चैन न पड़ा । पूरा पढ़ गया- जिसे झा feed आयल- मोहन भारद्वाज । हमरा भसीनक सलाह HA कहते हैं, एक ही साँसमे | बड़ा मनोयोग पूर्वक लिखा है आपने, और पड़ल, लेकिन ई नहिं खटकल जे रामदेव झा किएक मोहन भारद्वाजक बड़ा ही संयत होकर । राजकमल पर इससे बेहतर कोई रचना मैंने नहीं | é नाम सुझा रहल छथि । हमरा मोहन भारद्वाज पर अविश्वास नहि रहय देखी है । जानकारी और विश्लेषण दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत उत्कृष्ट आ हम चुप रहि Fee | बादमे मोहन. भारद्वाज कहलथि- ate) और समृद्ध है यह पुस्तिका । खुशी की बात है कि सारांश प्रकाशन से अहाँक मोनोग्राफ बचि गेल । हमरो लागल जे ठीके. आब ओ oft | seer Golan होने वाला है । oS ————— re का FR 05-0650 5 नाना न ८ = % लि
अछि | आवश्यकता अछि अपन परम्परा के जनवाक, ओहि & परिचित होयबाक | दरभंगा जिला गजेटियर (2964) क A! श्री रमानाथ झा AST मे | ( एहि दृष्टिकोण सँ रमानाथ झा मिथिलाक सांस्कृतिक उत्कर्ष तथा सारस्वत साधनाक + विद्यानाथ झा लिखित श्री रमानाथ झाक साहित्यिक कृतिक विवरण में लिखल " विभिन्न पक्ष पर प्रकाश देलनि अछि ule मे प्रमुख अछि स्थान-गौरव । मिथिला अछि जे दरभंगा जिला गजेटियर मे मेन ऐण्ड aad हिनके रचना थिक | गजेटियरक | 4 जनपदक अनेक परिसर अपन विशिष्टताक कारणे महत्वपूर्ण अछि | ओकर गुणवत्ता भूमिका में पी. सी. रायचौधुरी सेहो सहयोगक लेल रमानाथ झा के धन्यवाद देने | 4 आ महत्ता B तखने जानल जा सकैत अछि जखन ओकर भूगोल आ इतिहास छथिन | Fer, गजेटियर मे मेन ऐन्ड मैनर्स नामक ST शीर्षक वा उप-शीर्षक ae * a अवगत भेल जाय। मधुवनी, सरिसब, बहेड़ा आदि किछु स्थानक भौगोलिक आ dea) उन्ततः डॉ. प्रभाकर झा सँँ सम्पर्क mame | ओ गजेटियरक तेसर Se | ऐतिहासिक विवरण ta रमानाथ झा ओहि क्षेत्रक सांस्कृतिक महिमा, साहित्यिक यायक चारिटा उप-शीर्षकक लेखन के" रमानाथ झाक रचनाक रूप मे चिन्हित गरिमाक विवेचन कयलनि अछि । ई उदाहरण मात्र Pen मिधिलाक एहन सभ कयलनि। तदनुसार रचनावली मे ओ चारू अंश उप-शीर्षकक संग समाविष्ट स्थानक, परिसर-विशेषक अध्ययन अपेक्षित अछि। अछि | ला मिथिला & परिचितिक दोसर आयाम अछि एहिठामक विदत-परम्परा कँ -मोहन “भारदाज जानब। मिथिला मे धीमानक अभाव कहियो नहि भेल। बौद्धिक चिन्तन-मनन मे शिवपुरी; पटना । मिथिला सर्वदा अग्रणी रहल अछि | एहिठामक सारस्वत साधना केँ सर्वत्र आदरक 2 ais, शाप दृष्टि & tea गेल अछि। किन्तु आजुक मैथिल अपन ओहि इतिहास केँ नहि | P जानि रहल अछि। जिज्ञासु लोक & सेहो जनबाक आधार नहि भेटैत छैक। | रमानाथ झा fe मैथिल अक्षर-पुरुषक परिचय-पत्र प्रस्तुत a wie दिशा मे i श्लाघनीय काज कयलनि अछि | परमगुरु गंगेश्वर आ वाचस्पति मिश्र सैँ पदूमविभूषण | [प्र डा. अमरनाथ झा, ज्योतिरीश्वर आ परमहंस विष्णुपुरी सँ कुमार गंगानन्द सिंह एवं सरसकवि ईशनाथ झा afte व्यक्तित्व-प्रकाशन a मिथिलाक सारस्वत प्रतिभा के . , जनबाक आधार आ दृष्टि Fea अछि। एहि प्रसंग पंजी-व्यवस्थाक सेहो उपयोग ' मी मेल अछि। dot सँ मिथिलाक इतिहास संकलित करबाक पहिल सार्थक प्रयास | रमानाथ झा द्वारा कयल गेल अछि। परिचेताक रूप मे कार्य करबाक इच्छुक अन्वेषक-समीक्षक के पंजी व्यवस्थाक स्वरूप ot महत्वक ज्ञान, ओकर उपयोग- है | प्रणात्लीक जनतब रमानाथ झाक एतदूसम्बन्धी Perr सँ होइत अछि। ry रमानाथ झा एकठाम लिखने छथि जे साहित्यक शरीर थिक भाषा | मैथिली ri भाषाक छवि-छटा, ओकर मधुरता मिथिलाक साहित्य केँ उत्कृष्ट बनौलक अछि। | area व्यापकता देलक अछि। किन्तु, आइ मैथिली भाषा संकटापनन अछि। ः मैथिलीक. प्रश्न पर आन्दोलन करबाक प्रयोजन भड wea अछि। रमानाथ झा i { मैथिलीक वर्तमान समस्या पर गम्भीरता &, विस्तार a विचार कयलनि अछि | ae j प्रसंग लिखित Farr सभ हुनक सुविचारित मान्यता Sf अवगत होयबाक अवसर ai de जछि। मैथिलीक वाचिक आ लिखित, साहित्यिक आ साहित्येतर स्वरूप एवं i; i feat) पर ऐतिहासिक oer मे कयल गेल हुनक विचार-विमर्श तथ्यक उपस्थापन है, He हि teen, aera पर चलबाक तर्जनी-संकेत सेहो थिक | id jie of creer अन्तिम Pare अछि-द पीपुल ऑफ मिथिला | है भ YP Wien one शारि उप-शीर्षक मे विभाजित अछि पी.सी.राय चौधुरीक (0. आता erent का ससतावती os प्राक्कथन : I5 ७ | दर ही é
FJ : आनन्द Chaily झा ON युवा TOI | 'एहिए वर्ष सँ प्रारंभ साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार युवा नाटककार आनन्द कुमार झा के देल गेल अछि। मेहथ (झंझारपुर) निवासी आनन्दजी जखन उच्चस्तरीय अध्ययन हेतु कोलकाता गेलाहं त' ओतय ओ | रंगमंच सँ जुड़ गेलाह आ कोकिल मंचक श्रीगंगा झाक निर्देशन मे हिनकर लिखल नाटक सब मंचित होमय arma किछुए दिन पछाति पुनः हिनका अपना गाममे tea पड़ि गेलनि। आनंदजी झंझारपुर में एकटा पुस्तक | केन्द्र स्थापित कए अपना व्यवंसायक संग AMIS मे लागल रहलाह। एमहर किछु दिन ओ फारबिसगंज में | सेहों अपन सेवावधि बिताओल मुदा किछुए दिन पछाति ओ पुन: गाम ध' dere) सम्प्रति आनंदजी दिल्ली | में निवास क' रहल छथि। हिनक पुस्तक ‘sar परिवर्तन (नाटक ) कँ साहित्य अकादमी पुरस्कृत कएलक अछि। यद्यपि पुरस्कृत करबाक प्रक्रिया पर मारिते रास प्रश्न चिहन लंगाओल गेल अछि तकरा रहितो नाटक | को पुरस्कार fear युवा रंगकर्मी के पुरस्कार अवश्ये उत्साहजनक कहल जाय। हिनक लिखल किछु प्रमुख | > नाटक अछि - राकाक मोल, कलह, बदलैत समाज, धधाइत नबकी कनियाँक लहास, हठात परिवर्तन आदि। हिनक किछु अप्रकाशित नाटक मंचनक oe जोहि रहल अछि। पारिवारिक परिस्थितिक चोरानुकी आ तकर वैषम्यक संग निरन्तर संघर्ष करैत आनंदजी आइयो नाट्यलेखन में सक्रिय छथि। एहिं युवा नाटककार कँ aE अशेष बधाइ। न -सम्पादक FC, जुलाई-सितम्बर, 20I2 —
80|| fate सदेड१२ | eee *. आत्मकथ्य a, सुभाषचन्द्र यादव 5 जज a, Sees एहि मोनोग्राफक बारे में दी | राजकमल चौधरी we जायत' | मीटिंगक बाद सुरेश्वर झा आ रामदेव झा इलाहाबाद डी रा te 4 \ मोनोग्राफ लिखबाक ae जयकांत fet te कर: चल गेलाह- साहित्य अकादिमीक अगिला aS हमर 0993 ई.क अंतमे . पैथिली संयोजक बनबाक पैरबीमे । : Ras छल । सुनलहूँ A मोहन भारद्वाज पाडुलिपि पढ़िक रायदेवे Fee लाइन पकड़ लेलनि । ) सुभावचन्दर यादव साहित्य अकादेमीक एडिं . ओहो कह लगलाह जें मैथिली साहित्यवला खंड कने और पैघ as | निर्णय एहन कतेको feat; राजकमलक यौन जीवनक ई अंश हटा 'दिऔ, ओ अंश हटा | | व्यक्ति खिसिया गेलाह, जिनका कोनो ने कोनों कारण ई विश्वास... दिभ आदि । राजमोहन pa आ सुकांतकें” ओ अपना दंगे बुझा-सुझा | pati जे राजकपल पर मोनोग्राफ लिखबाक लेल वैह सर्वाधिक उपयुक्त as tar तैयार ws लेलनि जे आब हुनका बदलामें यैह दुनू हमर आ योग्य छथि । बेथिलीमे निस्सदेह अनेक योग्य व्यक्ति छथि आई... यांडुलिपिके” अयोग्य घोषित wes लगलाह । सहाप्रकाश एहिं बात care किनको देल जा सकंत छल | लेकिन मैथिली परामर्श rises ces सुकांतक फन्झैतों कयलखि । घांडुलिपिक प्रकाशनक चिंताक cant बैसारमे ई निर्णय घेल ताहिमे कोनो दोसर नाम नहि छल eee ar हम HEN arg जोड़बाक आ ओकरा संपादित करबाक 'इग प्रस्ताव Saft आ ओ स्वीकत 5 गेल । लेल तैथार ws गेलहूँ । लेकिन ई जोड़-घदाव बहुत मामूली छल । मोनोग्राफ लिखबामे हमरा बहुत विलम्ब भेल । ओकर पांडुलिि हम. पांडुलिपि मोहन भारद्वाज के" घुरा देलियनि Pang दिनक बाद at 3996 ई.क अप्रैले कलकत्तामे भेल बोर्डक मीटिंगमे जमा कयलहूँ | कह: लगलाह आहाँ जे किस्टू कहलिऐक, अछि से निष्कर्ष रूपमे मीदिंगे मे यांडुलियि रापदेव इनके समीक्षा हेतु दः देल गेलनि are अलग लिखि as as दिआ । मोनोग्राफके' tect, थीसिर्स बना | re नहिं भेल; से मीटिंगक बाद तखन बुझायल जखन मोहन. देवाक हमर कोना इच्छा नहि छल | निष्कर्ष लेल हम, एकदम तैयार | भारद्वाज एहिं दिस ध्यान दिऔलनि vier हम रामदेव झाक .. नहिं भेलहूँ । ताथारि ई तय भर गेल छलैक जे साहित्य अकादेपीक “पसीकौत पाथर 'क प्रस्तावित अंगरेजी अतुवादक feta ae छलिऐक। .. अगिला मैचिली संयोजक रामदेव pr हेताह । मोहन भारद्वाजक पाँच-छह मास गुजरि गेलाक are जखन Tee झा अपन समीक्षात्कक परामर्श पंडलक सदस्य बनबाक रहनि आ से हुनका रामदेवे झा बना रिपोर्ट नहिं पठौलचिन त विश्वास ws गेल जे ओ हमरा विरोध. सकैत छलनि; बनाइयों देलिन । पता चलल हमर मोनोग्राफके” ओ करबाक मजा चखा रहल छथि | fetes as देलनि । कारण fa विनिबंध लेखक पांडुलिपिये | 'फलतः साहित्य अकादेमीके हम पत्र लिखलिऐक Beaters रिपोर्ट. अपेक्षित संशोथन आ परिवर्तन लेल तैयार नहिं भेलाह । | अविलम्ब मंगाओल जाय । अंततः आठ महीनाक बाद जनवरी 7997H .. हमरा लेल ई बढ़ te आधात आ चुनौती छल । हम ओकर हिन्दी रामदेव झा रिपोर्ट जमा कयलयि rata ओ अस्वीकुत कर देने. अनुबाद कर आरंध कयलहूँ | एहि प्रसंग हमरा केदार काननक “wear । हुनक रिपोर्ट 'वाचक का प्रतिबेदन' प्रकाशित कयल जा रहल ... अविस्परणीय सहयोग भेटल । मोनोग्राफक प्रतिलिपि तैयार करबाक आ | अछि ओहि रिपोर्टक जवाब, जे हम साहित्य अकादेमीके पढौने छलिऐक, .. ज़ानरंजनसें ओकर प्रकाशन संबंधी गप्प करबाक श्रेय केदारेकें छनि । ई सेहो 'बाचक का प्रतिवेदन'क तुरंत बाद छापल जा रहल अछि। मोनोग्राफ़ पहिने १998 ई.मे पहल पुस्तिका रूपये छपल OM 20077 | रामदेव झा द्वार रिपोर्ट जमा करना से पहने मोहन भारद्वाज दिल्ली गेल... सारांश प्रकाशनसें किताब रूपमे । आब ओ मैथिलीमे छपि रहल अछि। ic were तैँ हमरे कहला पर ओ साहित्य अकादेमीक उपसचिव Tet एदि fret रूपसे fire ut चीज अछि जे fe नहिं अछि। { 'भसीन सें गप्य wat weir । तकर सूचना दैत ओ लिखने छलाह- . एहि मोनोग्राफक हिन्दीमे बहुत प्रशंसा भेल । प्रकाश मनु आ लीलाथर “भसीन से अहाँक पत्रक प्रसंग गण्प भेल । ओ कहलनि जे अन्यथा रिपोर्ट. यांडलॉईक प्रशंसात्मक समीक्षा हिन्दीक पैघ आ प्रतिष्ठित पत्रिकामे sae पर पुनः दोसर गोटेसें fee कराओल जयतैक । पोथी छपतैक, weer । हमरा लग प्रशंसाक आनेक पत्र आयल | बहुत गोटय चिट्ठी कने-सने संशोधन aes पड़य से संयव । अहाँ निशिचंत रहू fears ओकर खोज करैत रहल । बढुत गोटय राज़कमलक बारेमे पांडुलिपि अस्वीकत हेवाक आशंका तें रहबे करय । रच्छ ई छल जे. अपन संस्मरण लिखि es पठौलक | मैथिली जगतमे एकरा रिजेक्ट wong संडलक एकटा और मीटिंग, जे ओकर आखिरी मीटिंग visa, rare बहुत विरोध आ आलोचना भेल | पत्रिकामे उतरा-चौरी, अप्रैलपे निर्धारित छल, जाहिये सदस्थक रूपमे उपस्थित रहि हम अपन _ उकटा-पैंजी आ विवाद चलल । एहिमे सर्वाधिक मुखर रमेश छलाह | चांडुलियिके बचेवाक प्रयास as whe छलहूँ | feet थीटिंगसँ मैधिली-हिन्दीक रचनाकार डॉ० सुबास कुमार, जें हैदराबाद पहिने भसीन कहलानि जाहि नाम पर आपत्ति हो, तकर विरोथ अहाँ .. विश्वचिद्यालयये हिन्दीक प्रोफेसर आ अध्यक्ष आ वेस्ट Yah कक मीटिंगेमे करन । मीटिंगमे निर्णय भेल जे घांडुलिपिक समीक्षों फेरसें _ साल भिजिटिंग प्रोफेसर छलाह, एहिं मोनोग्राफक area लिखने रहथि 'कराओल जाय । ककरा देल जाय ? सथ चुप छल । सुझाव रापदेवे ae लगा तो खत्म किये बिना चैन न पढ़ा । पूरा पढ़ गया- जिसे डा दिससें आयल- मोहन भारद्वाज । हमरा 'भसीनक सलाह मोन तैँ .. कहते हैं, एक ही साँसमे । बड़ा मनोयोग पूर्वक लिखा है आपने, और ge, लेकिन ई नहिं खटकल जे रामदेव इग किएक मोहन भारद्वाजक .. बड़ा ही संयत होकर । राजकमल पर इससे बेहतर कोई रचना A नहीं I जाम सुझा रहेल छचि । हमरा मोहन भारद्वाज we अविश्वास नहि रहय... देखी है । जानकारी और विश्लेषण दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत उत्कृष्ट आ हम चुप रहिं गेल । बादमे मोहन 'भारद्वाज कहलथि- ane और समृद्ध है यह पुस्तिका | at की बात है कि सारांश प्रकाशन से अहाँक योनोग्राफ बचि गेल । हमरो लागल जे ठीके. आब ओ whe इसका पुर्रकाशन होने वाला है | भय रचा अ BR 05-05 9 2 पदक os % %
82|| विदेह सदेड१र हर qr, आ आब पाश्चात्यमार्गी, बनयबाक क्रम में. से YET जमानाक बात दोसर छल। अपना सभक पुरा आदिवासीक धर्म-कर्म तथा जीवनशैली a हेय दृष्टि से. लोकनि बीछि-बीछि क' तेहने ठाम बसलाह जै ठाम घ देखैत छथि। ओ ue तथ्य w बिसरबाक प्रयास करैत aie तडर में खान छल आ ऊपर में जंगल। पुरना जमाना fa जे हमरा सभक मूलग्राम एक अछि, हमसभ समाजी AT हालत रहल हो से हम नै जनै छी, लेकिन एंखनुका छो, ओ हमर समा छथि। जमाना में खान आ जंगल दुनूक मालिक स्वयं सरकार भ' डॉ0 विद्यानाथ झा “विदित' wet चिषक क '*विप्लवी. गेल अछि आ हमसभ ओहिं aah सम्पत्तिक बिना बेसरा' में उजागर कयलनि अछि। ई उपन्यास dat खेबा-खर्चक मंगनीक atone बनल छी।' जेना होइत नामक आदिम समुदाय पर केन्द्रित अछि। संताल में area Sw, माय-बापक ममता पदुआ गेलैक। धौनाक जिद कुल गोत्र छैक। ताही में एकटा गोत्र अछि बेसरा। प्रस्तुत. आगाँ बढ़ गेलैक। थौना आसाम पहुँच गेल। मुद्दा, पचगछिया उपन्यास बेस गोत्रक लोकक शील-स्वभाव, ofa सैँ पाथरपाढ़ा waar रास्ता में, बस में, बाँसुरी सनक an रीति-नीति सेँ परिचित करबैत अछि। बदलैत सहयात्रीक 9 मनगर निकटताक अनुभव a रहैक से समय-सालक संग ओकर आचार-विचार में आयल परिवर्तन बेर-बेर सोन पड़ैक। संयोगवश गौरी सँँ पहिले दिन भेंट पर सेहो ध्यान राखल गेल अछि। सभ सं पै बात ई अछि. भ' गेलैक आ बॉसुरीक प्रति जागल उत्कण्ठा गौरीक जे दुतकारल-कतिआयल Ue पारिवारिक सदस्य क'. खिस्सा Gare इच्छा क' आतुर क' देलकक। 'जगयबाक, जागल a संघर्ष चेतनाक पाटि पकड़यबाक दोसर खिस्सा शुरू det अछि पाँचम अध्याय जे काज ve में कयल गेल अछि से मैथिली aes सँ-गौरीक माथ-बापक प्रसंग ai बीच-बीच में आदिवासी नव आयाम अछि। मैथिली में आदिवासी जनजीवन पर. जीवनक अनेक उपकथा अबेत afer जेना, लालबाबाक कथा अछि, कबितों में प्रसंगबश उल्लेख अछि, asl इमानदारी आ नैतिकताक कथा। पाथरपाडाक सरदार आ औपन्यासिक विस्तास्क संग ई पहिल कृति थिक। कली पाड़ाक मजदूरक कथा। चायबगानक मालिक-मैनेजर vie कृति क' रचनाकार उपन्यास कहलनि अछि। . आ.ओडिठामक कर्मचारीक दावपेंचक कथा। ई सभ शषेपक किन्तु, कथा-संयोजनक. दुष्टिएँ एकर ae किछु दोसर wen आदिवासी जीवनक कटु-मधु दृश्य ow प्रस्तुत करत प्रकारक अछि। गुजराती में उपन्यास क' नवलकथा कहल safer एहिं a पूँजीपति मालिकक राजनीति आ बामपंथी जाइत Gar “बिप्लबी बेसरा' बस्तुत: नवल कथा थिंक। . मजदूर नेता मोहरी लालक हत्याक रहस्य बुझवा में अबैत दादी-तानीक खिस्साक शैली में, अनेक खण्ड में, एकटा fel मोहरीलाल आ ओकर पत्नी रमियाक मृत्युक बादे ad कथा कहल गेल aol ae ढंग; ae बान्हं-काट, thts कथा शुरू होइत अछि ओहने रोचकता। पंचगछिया गाम। सोहराय पावनि। सुफलक ताथरि उपन्यासक send आबि जाइत अछि एगारहम eet फूलमनि ae ati कैँ सजा रहल अछि। बेटा shat अध्याय! आदिवासी जीवन प्रणालीक अनुरूप उपन्यासक बहिनक feet ara’ गेल da आसामक चायबगानमे .. नायिका प्रधान बनायब आवश्यक छल, 7 एकैसम अध्याय aaa करयवला संगी टेकलाल a भेंट होइत छैक। dae अर्थात् अन्त धरि मोहरी लालक बेटी, विपलवी बेसरा det अपना संग आसाम ल' जाय चाहैत अछि। - बनल साफाहोड्क नतिनी, गौरीक खिस्सा विस्तार सेँ . माय-बापक स्नेह ARR करत छैक। घौना आदिवासी. कहल जाइत अछि। धौना अपने ते पढ़िए लैत अछि, गौरी जीवनक गतिमति a फरिछबैत अछि-' आहाँ जें कहैत छी aw! सेहो पढ़ा दैत अछि बी.ए, पास धौना & मिलौट्री मे
fade सदेह:१२ || 83 ae न जाइत छैक त' मोहरीलालक आत्मीय कम्पाउन्डरक aa गूँजि उठल। उपन्यासक समाप्ति जाहि पड़ाओ पर दि सैं गौरी सेहो नर्स बनि जाइत ऊछि। गौरी कम्माउन्डसेक होइत अछि सैह एक, वैचारिकता, प्रदान करत अछि। ओहिठाम कोकदाझाड मे रहैत अछि। कम्पाउन्ठरक बहिन... विचारबाक बात ई अछि जे की झास्खण्डक गौरीक एहिना बॉँसुरी आ गौरी में घुट्ी-सोहार हेम-छेम अछि। ई वैद wen होइत wea? ई हत्या गौरीक नहिं, wre eT, बॉसुरो अछि जे घौना क' आसाम अबैत काल ट्रेन मे एकटा मनोरथक. हत्या firm आदिवासी जन-जीवनक मेटल रहैक। से जखन धौना गौरी d भेंट करय कोकडाझाड़ सुख-समूदिधिक हत्या थिक। ee अत्याचार क' अविलम्ब ia अछि तखन ओकरा बाँसरी सैं सेहो भेंट होइत छैक। रोकल जाय से आवश्यक! मुद्दा, प्रश्न अछि जे कोना प्रेमलीलाक त्रिकोण बनैत sits) प्रेमाख्यान on ओहिं में रोकल जाय, के रोकत? उपन्यास में एकर एक्केटा उत्तर Frauen समावेश of उपन्यास में रोचकता ade छेक। ter गेल अछि। ary संन्यास aren af काज नहिं चलत, xn बाद कथा बड़ तेजी सँँ ade अछिं। स्थान, तीर-धनुषर आ हथियार ल॑ क' लड़ाई कर' पड़ता समय, घटना-सभटा बदलि जाइत अछि। गौरी आसाम सै... उपन्यासक कथा एडी समस्या तथा समाधान पर झारखण्ड sia अछि। बिहार सै फराक भेल wwe समाप्त होइत अछि। किन्तु, उपन्यासक विषय uals खतम राज्य-झारखण्ड। आदिवासीक arcane) अपन शारखण्ड। * नहिं weg ifn ओ आगाँ wha af) age fore जुदा, wer अछि- कोना अपन? कतैक अपन? te देखबाक आ सोचवाक सेल bs अखि। झारखण्ड राज्य चिचार-बिन्दु अछि जत' उपन्यासकार पाठक का पहुँचाबय ..भने 2000 fo में बनल हो; आदिवासी dap रूप मे ada ofa गौरी अपन। नानाक संग afer af एकर-इततिहोस बड़ पुरान अछि! एन्योपोलिजिकल सर्वे जाइत अछि' झारखण्ड बनिए गेल अछि, आव ककरों.. ऑफ इन्डियाक पीपुल औफ इन्डिया तामक पोधी (खण्ड आसाम, बंगाल वा मुंबई जेबाक कोन काज'-नाना He, सोलह) में कहल गेल अछि जें झारखण्ड aa मे बसनिदार सोचैत छथि। गौरी feed आयल as नानाक अपेक्षित. पहिल समुदाय मुण्डारी भाषाभाषी छल जे तीस हजार वर्ष सरमाजीक सक्रिय सहयोग सँँ रॉंवीक अस्पताल में नौकरियों. पहिंने Gra आयल रहय। तंकरां बाद विभिन्न समय में Sie गेलैक। सरमाजी facta कोयला खदानक लीज विभिन्न भाषा on संस्कृतिक लॉक Goa sda रहलाहं। ई लेबबवला मालिकक मैनेजर छलाह। गौरी हुनका संगे स्थिति आजुक झारखण्ड on farts नहिं सम्पूर्ण पूर्वी | ec साइकिल पर आबाजाही कर' लागला er अभिनव. भारंतक अछि! एक समय Te जंखन arcane क्षेत्रीय १. शसोर्टक टेबुल पर डोसा खबलक। सादीक स्थान पर. परिचिति पूर्वी मध्यप्रदेश सैँ राजमहलक पहाड़ी आ गंगा है... सरमाजीक कौनल जीन्स सर्ट आ सलवार-सूट ves oh व्याप्त oe ई क्षेत्र बनिया- व्यवसायी dos कॉँ लागल। आ, एक राति जखन सरमाजीक पुरूपार्थक ee खनिजक व्यापारी तथा afer करववला चर्मात्माक अनुभव wae wer aig w लिखि देलकैक जे. आकर्षणक केन्द्र रहल अछि। उपन्यास में मैनेजर सरमाजी चौना सन ara पैरूषवला सैँ ओ बिआह नहिं करत। मुद्दा, अपन परिचय एना देलनि अछि- “हमर माय मिथिलाक ga tide ate से भेलनि नहिं। कोयला खदानक ver ओकर नैहर रहैक SH हम तैँ कहियो मातृकक | _ te arom ओ नहिं are? तें औकरे मुँह नह देखलहँ। से ta age सुषौल जिला में गोली सै मारल गेलीह। नाना साधु-संन्यासीक जीवन क'. चकला निर्मली अछि, तकरे लग में ओ गाम अछि हमर cathe the बिप्लवी daa afi गेलाह। जय झारखण्डक . माय मैथिली बजैत छलि। हमर बाप संताली Teter”
84|| Rte Wasa 'एकटा 'आरो कारण रहय झारखण्ड में परदेसीक विभाजनक समय मे झारखण्डक प्रतिव्यक्ति आय जतेक आगमनक। एहिंठामक राजाकँ जनता a अनाज आ जंगली छल ताहि में हास भेल अछि। आइ सम्पूर्ण भारत में खाद्य-पदार्थ भेंट-स्वरूप जखन-तखन प्राप्त होइन। एहिं. साक्षेरताक न्यूनतम दर बिहार में अछि, आ तकरा बाद tas में गड़बड़ी भेलाक बाद राजा स्वैच्छिक सोगाइत॑ Haas स्थान Ba कानूनी लगान बना देलनि। आदिवासी जनता एकर विरोध आवश्यकता अछि स्थिति क' ओकर पूर्ण व्याप्त में कयलक। छोटानागपुरक राजा स्थिति क' अपन oye देखबाक, समस्या क' गंभीरतों A लेवाक। बहरिया लोकक बनयबाक लेल बाहरी लोक कर मुख्यतः उत्तर बिहार तथा. प्रति आक्रोश क' आन्दोलन में बदलबाक प्रयास पहिनहु उत्तर प्रदेशक बासी क' बजौलनि। हुनका सभ we te छल। उनैसम' शताव्दीक अन्त में, सना भगतक बसूलबाक लेल गामक सम्पदाक ठीकंदारी आ पटटंदारी द'.प्रदुर्भाव सं पहिंने, झारखण्डक महान जननेता बिरसा देलथिन। आदिवासीक सम्पर्क हिन्दू सै बढ़लनि। परिणाम. मुंडाक आन्दोलन 'ेल रहये। यद्यपि ओ आन्दोलन धार्मिक Sa जे एहिठामक आदिवासी राजा सिंहभूमिक राजपूत छल, मुदा ओहि, सँँ दिकूक विरोध में एकटा वातावरण परिवार मे बिआह क' लेलनि। आदिवासी सँ हिन्दू बनल तैयार भेल रहय। ओकर प्रभाव स्थायी नहि भ' सकल। fare अपेक्षितारय परदेसी सभ dae’ ome aed आब जे स्थिति अछि ताहि मे झारखण्ड, ओहि ठामक लगभग aft aa वर्ष पहिने छोटानागपुरक राजा छप्पन 2 आदिवासीक शोषण लेल Pas, बनब जरूरी ale छैक। राजपूत परिवार a मध्य प्रदेश oo आनि अपन सेना मे. भू-दखलीकरण आ बाजारवादक अस्त कोनों भाला-बर्छी शामिल कयलनि। एहिना बाहर सै आयल ब्राह्मणक' आदर. सै बेसी असरदार अछि। a श्रष्यचारी आ अत्याचारी क में राजा सँ उपाधि भेटलनि। एहने उपाधि थिक नारायण, चीन्हब पहिल काज थिक। ओ दिक्कू आ आदिंवासी-कोनों नन्द आ राम। date alten आ रातू थाना क्षेत्र मे नारायण. देह धारण aah रहि ae अछि। आँखि साफ रहय, आ राम तथा माण्डर मेन्द ओहिठामक लोकक नाम में ठीक सँँ देखैत रही. ते कॉट .सँ भरल सस्ता क' सेहो art जुटल अछि। झारखण्डक अधिकांश भाश में जे आसानी at पार कयल जा सकैत अछि।.. कुम्हार, बरही, सोनार, तेली, steer आदि छथि से wt किन्तु, प्रस्तुत उपन्यासक अन्त एवहिं नहिं होइत || आगमनक देन थिक। कारीगर an मजदूरे नहिं, Ja st अछि। विविधता. भारतक गौरव थिक। एहिठाम विभिन्न पुजारी सेहो बाहरेक छथि। रामगढ़क घटवार लोकनि . समुदायक बास अछि। तखन जे भिल्लता में एकसूजता छैक लगभग तीन wa वर्ष पहिने बंगाल सँ तीन wa Storer Ge थिक भारतीय संस्कृति। 'भारतक एहिं सामाजिक प्रकृति ज्राह्मण क' रजरप्पाक छ़िन्नममस्ता देवीक पूजा were a gaa आगाँ बढ़बाक अछि। विदितजी अपन प्रसिंदूध da अनलनि आ हुनका पण्डा बना क' ओहिठामक पुस्तक - संताली मैथिली ओ में कहैत छथि जे हम जागिरदारी =’ देलनि। संभगोटे भारतक मूलवासी छी। आदिवासी आ गैर आदिवासी, ue प्रकार' आजुक झारखण्ड मे आदिवासी worn on आर्यक भेद अवसरक असमानताक देन अछि। फुटकायब कठिन अछि। तखन ate अवश्य जे आई. विकासक सुविधा-असुविधाक परिणाम afer विप्लबी अहलादि क' आनल लोक क' काल बेसाहब बूझल wet बेसरा एहिं मान्यताक भौतिक सत्यापन थिक। विसंगति क . अछि। बिहार सै फराक भेलाक बादक झारखण्ड में. संगति देबाक मुखर आह्वान थिक। आदिवासीक संख्या मात्र 28 प्रतिशत अछि। बिहार-झारखण्ड शांति Prem, पी. पी. ठाकुर पथ शिवपुरी पर्व, पटना-23 te