SADEHA — 13

Publication: SADEHA · Issue: 13
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1 2 ISSN 2229-547X विदेह सदेह -१३ (विदेह-सदेह १३, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक ११६-१२०) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मण्डल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक: नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक-सूचना-सम्पर्क-समाद: पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग: विनीत उत्पल। श्रुति‍ प्रकाशन ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. २००/- संस्‍करण : २०१३ © श्रुति‍ प्रकाशन श्रुति ‍प्रकाशन रजि‍स्‍टर्ड आॅफि‍स : ८/२१, भूतल, न्‍यू राजेन्‍द्र नगर, नई दि‍ल्‍ली- ११०००८. दूरभाष- (०११) २५८८९६५६-५८ फैक्‍स- (०११) २५८८९६५७ Website : http://www.shruti-publication.com e-mail : shruti.publication@shruti-publication.com Printed at : Ajay Arts, Delhi-110002 Typeset by : Umesh Mandal. Distributor : Pallavi Distributors, Ward no-6, Nirmali (Supaul). मो.- ९५७२४५०४०५, ९९३१६५४७४२ Videha Sadeha 13 : A Collection of Maithili Prose and Verse (source:Videha e-journal at www.videha.co.in). अनुक्रम गजेन्द्र ठाकुर सम्पादकीय विहनि कथा रामवि‍लास साहु  घुसहा घर/ इमानदारीक पाठ/ बौआ बाजल सत्यनारायण झा सुटिया मुन्नी कामत कैंसर जगदानन्द झा मनु प्रेमक बलि अमित मिश्र परिभाषा सन्दीप कुमार साफी साउस पुतोहु/ सगुन लघुकथा कैलास दास लाँज वीरेन्‍द्र कुमार यादव बाबाक गाछी डॉ अरूणा चौधरी छलना डॉ. अजीत मिश्र व्यथा जगदीश प्रसाद मण्‍डल इमानदार घूसखोर कामिनी कामायनी कठजीब जगदानन्द झा मनु कमलू खुशबू झा रुपाली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना संजीव कुमार शमा महाकवि‍ पं. लालदासक १५६म जयंती समारोह सन्दीप कुमार साफी आत्मकथा उमेश मण्डल दोसर चरणक पहिल सगर राति दीप जरय दरभंगामे सम्पन्न- डिजिटल फॉर्ममे ३७ टा पोथीक लोकार्पण प्रमोद रंगिले प्रचण्ड प्रयोग कएलथि नया हथियार- मधेसी मोर्चा बेवकुफ बनए लेल भऽ गेल तैयार आशीष अनचिन्हार माहिया/ लघु-दीर्घ निर्णय डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र मेवाड़ आ मालवाक सांझी लोककला : एक परि‍चय गजेन्द्र ठाकुर विद्यापति: किछु प्रचलित कुप्रचारक निराकरण रामभरोस कापडि भ्रमर ह्वेन सांगसं चीनमे भेंटघांट नागेन्द्रकुमार कर्ण सुजित कुमार झा पर खुशबू झा  मैथिली कथा संग्रह जिद्दी पढ़लापर नवेंदु कुमार झा आर्थिक संकट मे चेतना, दू दिनक हएत समारोह पूनम मण्डल १.दाग (उपन्‍यास) : गौरीनाथ- लोकार्पण २."सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे ३.समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव/ वि‍देह वि‍चार गोष्‍ठी एक झलक हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ" मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल पद्य किशन कारीगर  घोटालाबला पाइ अजीत मिश्र दीआबाती श्याम दरिहरे ओबामा ओबामा ओबामा मिहिर झा विदागरी/ गजल पंकज चौधरी (नवलश्री) चारिटा गजल बिन्देश्वर ठाकुर अभागलमे शुभकामना एक  /अस्पतालक हाल  /जनकपुरक रेल्वे  /एक एहनो नारी /गजल १-२/ गीत १-२/ चेतना अमित मिश्र भगवती गीत/ गजल अच्‍छे लाल शास्‍त्री कि‍सानक भेल पि‍सान/ आबो चेत चलू जगदानन्द झा मनु उगैत सूरज पएर पसारि/ गजल १-११ कैलास दास कम्प्यूटर/ नेता जी प्रमोद रंगीले मच्छर राज जवाहर लाल कश्यप  गीत कपि‍लेश्वर राउत रौदी ओम प्रकाश गजल १-२ शिवनाथ  यादव/ अर्चना  कुमारी इन्दिरा आवास हेमनारायण साहु हम छी नीमक गाछ/ जोन-बोनि‍हार शिव कुमार यादव ई की भेल/ मिथिला गीत शिव कुमार झा "टिल्लू" सिनेह शंभु सौरभ गीत राजदेव मण्‍डल चि‍र प्रतीक्षा/ हाथ/ ठक/ बलात्/  झूठक गि‍यान/ जेहने अहाँ तेहने हम/ इमानदारी/ बीआ/ उपयोग/ द्वन्द्व/ कुहेस/ जानवरक बोली डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” मृगतृष्णा  मे  पानि  तकै  छी/ आइ  अहाँ  बड़ नीक  लगै  छी मुन्नी कामत  सिया तोरे कारण/ ठिठुराबैत जाड़/ बंदिश/ पैसा सँ बियाह/ काँच बाँस जकाँ लचपच उमरिया/ मनक वेदना/ शरहद/ भेल पुरा आस/ भाइयक स्नेह/ अलहर मेघ शेफालिका वर्मा रे मन प्रबीण चौधरी प्रतीक देखही रौ मिता सत्यनारायण झा हे भगवान आशुतोष मिश्र गीत रूबी झा गजल १-३ शान्तिलक्ष्मी चौधरी जर-जाजन/ दुर्गापूजा नंद वि‍लास राय वोट पवन कुमार साह मि‍थि‍ला वासी बिपिन कुमार कर्ण देखु केहेन ई भारत ि‍नर्माण रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ एकटा अनुपम गीत बिनीता झा भूखल/ प्रकृति बाल मुकुंद पाठक गजल १-१० सन्दीप कुमार साफी कातिकक पूर्णिमा/ गामक इनार/ माघक शीतलहरी/ रसगुल्लाक जबार अंशु माला पाण्डेय मिथिला महान विनीत उत्पल  गजल अनिल मल्लिक गजल १-२ किशन कारीगर लोक करए लूटमार जेकाँ शिशु उत्सव शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ बिना रदीफक बाल-गजल मुन्नी कामत बेटी/ कारी-बजार/ शब्दक खेल/ मांॅ बता तूँ एगो बात/ अनहार घरमे हत्या/ जतरा/ अंकक मेल/ माय हमरा एगो बहिन आनि दे राजदेव मण्‍डल छीपपर दीप रामवि‍लास साहु मेघक बरि‍आती बाल मुकुन्द पाठक बाल गजल जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’   बाल गजल १-२/ बाल गीत अमित मिश्र बाल गजल जगदानन्द झा मनु बाल गजल/ माटिक बासन (बाल लघुकथा) दुर्गानन्‍द मण्‍डल नेना लेल सुन्दर चि‍त्रकथा नाट्य उत्सव मुन्नी कामत एकांकी -हत्यारा समाज/ जिन्दगीक मोल महेन्द्र मलंगिया मूर्दाः श्रृंगार संघर्ष आ द्वन्द्व गोविन्द झा गाम जएबै गाम जएबै गाम जएबै ना

गजेन्द्र ठाकुर सम्पादकीय (समन्वय २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव, दिल्लीक बहसक आधारपर) की मैथिली साहित्य अपन मूल स्वरमे ब्राह्मणवादी अछि? हमर उत्तर दुनू अछि- हँ आ नै। जँ अहाँ मिथिला दर्शन, अंतिका, पागबला विद्यापति पर्व समारोह केनिहार चेतना समितिक घर-बाहर, झारखण्डक सनेस वा जखन-तखनक लेखकक जातिक प्रोफाइल देखि कऽ कहि रहल छी, जातिवादी रंगमंचक मात्र दू जातिक कट्टर दर्शकक अहंकेँ संतुष्ट करबा लेल प्रयुक्त कएल जा रहल आपत्तिजनक शब्दावलीक निर्लज्जतापूर्ण प्रयोगक आधारपर कहि रहल छी, साहित्य अकादेमीमे आइ धरि सभटा आठो समन्वयक जातिक प्रोफाइलक आधारपर कहि रहल छी, सी.आइ.आइ.एल, एन.बी.टी., बा साहित्य अकादेमीक दुब्बर-पीअर कपीश संकलन आ कार्यक आधारपर कहि रहल छी, आकाशवाणी दरभंगा वा हिन्दी अखबारक दरभंगा संस्करणक आधारपर कहि रहल छी तँ उत्तर हँ अछि। मुदा जँ ज्योतिरीश्वर पूर्व/ श्रीधर दास पूर्व बिन पागबला गएर ब्राह्मण विद्यापति, बा पिताक मृत्युक पाँच बर्ख बाद जन्म आ चर्मकारिणीसँ विवाह केनिहार तत्वचिन्तामणिकारक गंगेश जिनकर प्रेमकविता विलुप्त कऽ देल गेल, भोरुकवा एफ.एम. चैनल, फुलप्रास लगक पकड़िया गाम (पोस्ट रतनसारा) क रामलखन साहुजी पुत्र स्व. खुशीलाल साहुजी जे २५ सालसँ नाच पार्टी कम्पनी खोलने छथि आ दसो बिगहा बोहा देलनि, बा ऐ बेर दुर्गापूजामे नै किछु तँ सए नाच पार्टी नाच केलक; ई सभ देखी तँ उत्तर नै अछि। आ जँ आकाशवाणी दरभंगा, दरभंगाक हिन्दी अखबार, आ मैथिलीक ऊपरवर्णित पत्रिका ओकरा समाचार नै बुझैए आ कोनो साधारण नाटककारक/ लेखकक सालाना उर्सक न्यूजक आधारपर मैथिली नाटककेँ मृत घोषित करैत साक्षात्कार छपैए तँ ई ओकर समस्या छै। विद्यापतिक पदावलीक आधारपर भऽ रहल बिदापत, आ ओही पदावलीक पिआ-देशांतर (माइग्रेशन)क आधारपर भऽ रहल पिआ देशान्तरक पार्टी सभमे सेहो कमी आएल अछि, मुदा जँ अनुपात देखल जाए तँ मुख्य आ समानान्तरक बीच अखनो एक आ निनानबे केर छै तखन तँ ई गएर ब्राह्मणवादी ने भेल। पर्वत ऊपर भमरा सूतल मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे उठू-उठू मालिन बेटी गाँथू गिरमल हार हे। जँ शब्द शास्त्रम केर ऐ गीतमे धीरेन्द्र प्रेमर्षिकेँ सर्वहाराक गीत नै शास्त्रीय गीत देखबामे अबै छन्हि तँ ई गीत विदेह ऑडियोमे अपलोड छै, आ ओ ओही पात्रक टोल (चर्मकार टोल) सँ रेकॉर्ड कएल गेल छै जकर ई कथा छिऐ, आ यएह गएर-ब्राह्मणवादी परम्पराक जीत अछि। विद्यापतिक कोन परंपरा- जतऽ ओ वर्णाश्रम व्यवस्थाक समर्थन करै छथि बा स्त्रीक दर्दकेँ भोगैत: कौन तप चकलहूँ भेलहूँ जननी गे बा गरीबक व्यथा -सुख सपनेहूँ नहिं भेल, गबै छथि एतौ उत्तर वएह अछि। समानान्तर परम्परा मुख्यधारा लेल सर्वदा फैशनक रूपमे छै। ज्योतिरीश्वर आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति सेहो धूर्तसमागम आ गोरक्षविजय नाटकमे क्रमशः एकरा फैशनक रूपमे लेलन्हि। अवहट्ठ सेहो साहित्यिक भाषा रहै, आ समानान्तर परम्पराकेँ मुख्य धाराक प्रगतिशील लोक द्वारा फैशनक रूपमे प्रयोग कएल गेलै। जन कवि वा एक्टीविस्ट २-४-१०-२५-५० धरि पद्य लिखि कऽ संतुष्ट नै होइ छै, मुदा जँ ई फैशनक रूपमे प्रयुक्त हुअए तँ से ज्योतिरीश्वर आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक संग यात्री-नागार्जुनक फैशनपरस्त प्रगतिशील मैथिली कवितामे अबै छै। मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्वक बिनु पागबला गएर ब्राह्मण विद्यापतिक परम्परा तँ बिदापत, पिआ देशान्तर आ रामदेव प्रसाद मण्डल झारुदारक झारू/ महाझारूमे देखा पड़त, हजारक हजार झारू लिखि कऽ बोहा देलनि, हमरा सन लोक जँ ओइमेसँ किछुओ लिखि कऽ टाइप कऽ लै छी तँ तकरो संख्या सए-दू सए ओहिना भऽ जाइ छै। जँ तरौनीक लोकनाथ झाक घरपर बैसि वर्णाश्रम धर्म बला कविता पदावलीमे घोसिया दियौ, शिव सिंह, लखिमाक नाम घोसिया दियौ तँ ज्योतिरीश्वर पूर्व पदावलीक लय टूटि जाइए, आ बिदापत आ पिआ देशान्तर पार्टी ओकर मंचन गायन नै कऽ पबैए आ ई षडयंत्र बिनु परिश्रमेक खतम भऽ जाइए। ‘डायसपोरा कम्यूनिटी’ धरि पहुँचबाक उद्देश्यमे कनेक असहमति अछि, जे काज अखन हेबाक चाही से अछि नेटिव स्पीकर जतए रहि रहल छथि ओतुक्का दुष्प्रचारक लेल ई सूचना समाज आगाँ आबए। वंचित, महिला आ समानान्तर परम्पराक स्पोक्सपर्सनक रूपमे। जहाँ धरि मैथिली प्रिन्ट मीडियाक गप अछि, ओतौ समानान्तर लेखन क्वालिटी आ क्वान्टिटी दुनूमे ९०% स्थानपर अछि। इन्टरनेट तँ बोनस छिऐ, ४-५ सए मैथिली पोथी, दस हजार मैथिली ताल-पत्र पीडी.एफ. कैमरा रेडी कॉपीक रूपमे विदेह आर्काइवमे मुफ्त डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। ओइमे देवनागरीक अतिरिक्त तिरहुता आ ब्रेलमे सेहो मैथिली अछि। गूगल आ विदेहक सौजन्यसँ चारि सएसँ ऊपर पोथी गूगल बुक्समे १००% ब्राउज आ डाउनलोड लेल उपलब्ध छै; ऐमे सँ मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी-मैथिली डिक्शनरीक सात टा पोथी/ फाइल क्रिएटिव कॉमन्स (एट्रीब्यूशन-शेयर अलाइक)लाइसेन्सक अन्तर्गत १००% ब्राउज आ डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि, माने कियो एकर उपयोग क्रेडिट दऽ कऽ (माने साभार लिखि कऽ) आ अही तरहेँ आगाँ लाइसेन्स वितरित करबाक शर्त स्वीकार कऽ कए कऽ सकै छथि, एकरामे वृद्धि कऽ एकर संवर्धन आ व्यावसायिक उपयोग कऽ सकै छथि। ‘डायसपोरा कम्यूनिटी’ नेटिव कम्यूनिटीक प्रति अपन कर्ज उतारि रहल अछि। नेटिव स्पीकर बड्ड आगाँ बढ़ि गेल अछि, ओकर सोच आगाँ छै, ओ समानान्तर परम्पराक लेखनसँ अपनाकेँ आइडेन्टिफाइ कऽ रहल अछि, मुदा सुखाएल मुख्यधारा समाजसँ सकारात्मक दिशा आ समए क्षेत्रमे पाछाँ अछि। १ विदेह भाषा सम्मान 2012-13  अनुवाद पुरस्कार 2013, युवा पुरस्कार 2012 आ 2013 फेलो (समग्र योगदान) क लेल विदेह सम्मानक घोषणा 2013 फेलो (समग्र योगदान)क विदेह सम्मान- श्री राजनन्दन लालदास केँ। युवा पुरस्कार 2012- श्रीमति ज्योति सुनीत चौधरीकेँ “अर्चिस” कविता-हाइकू संग्रह लेल। अनुवाद पुरस्कार 2013- श्री नरेश कुमार विकलकेँ मराठी उपन्यास “ययाति”क मैथिली अनुवाद लेल। मूल पुरस्कार 2012 आ बाल साहित्य पुरस्कार 2 012 लेल विदेह सम्मानक घोषणा पहिनहिये भ’ गेल अछि।

विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध)

1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) २ फणीश्वर नाथ रेणु एकटा लोकगीतक विद्यापति भूमिका महाकवि विद्यापतिपर “खोज”करैत काल हमरा लागल जे एक अध्यायक शीर्षक राख’ पड़त- “खेतिहर-बोनिहार आ बहलमानक कवि विद्यापति”। कारण पूर्णियाँ-सहरसाक इलाकामे आइयो विद्यापतिक पदावली गाबि-गाबि क’ भाव देखाक’ नाचैबलाक मण्डली सभ अछि। ऐ मण्डली सभक नायक महिसवार, चरबाह आ गाड़ीक बहलमाने होइ छथि प्रायः। मैथिल पण्डित लोकनिसँ पुछलौं , ई कोना भेल? बजला, अहाँ कोन फेरामे पड़ल छी? अही सभ मूर्खक कारण आइ विद्यापतिक दुर्दशा भ’ रहल अछि। ऐ मामूली लोक सभक मोनमे जखन एलै विद्यापतिक नामपर “चारिटा पदावली” जोड़ि देलक। ..अहाँ दिग्भ्रमित भ’ रहल छी।.. मिथिलाक पण्डितक वर्जना-वाणीपर कान-बात नै दैत हम सहर्ष सहरसा (बा सहर्षा?) यात्राक तैयारी शुरू क’ देलौं। ..कनचीरा गाम एकटा एहन गाम अछि जइपर दू-दू जिलाक जिला अधिकारीक शासन चलैत अछि। अदहा गाम सहरसामे, अदहा गाम पूर्णियाँमे।  ... कनचीराक विद्यापति-मण्डलीक नाम दुनू जिलाक लोक लै छथि। ... जइ दिन कनचीरा गाम पहुँचलौं, गाममे एकटा अघट घटना घटित भ’ गेल रहै। दस सालसँ इलाकाक प्रतिनिधित्व करैबला नेताजी चुनावमे चितंग भ’ गेल रहथि। तइ द्वारे ओइ राति नाच-गानक दोसरे मतलब निकालल जा सकै छल, ऐ डरे “विद्यापति-मण्डली”क नायक जनकदास नाच करबाक अनुमति नै देलनि।  दोसर राति ओ बड्ड खुशामद करेलाक बाद अनुमति देलनि। नायक जनकदास बड्ड तर्क-वितर्क केलाक बाद घुमा-फिरा क’ दोहरा-तेहरा क’ कहलनि, “विद्यापति- नाच” क जन्म हुनके परिवारमे पहिले-पहिल भेल। विस्तारसँ ओ कहियो किछु नै कहलनि। आ हुनका जखन ई विश्वास भ’ गेलनि जे “विद्यापति नाच मण्डली”क नामपर खर्च करबा लेल हजार- दू हजार टाका सरकारक खजानासँ ल’ क’ हम नै बहराएल छी, तखन ओ मृदंगपर थाप देलनि। राति भरि नाच देखैत रहलौं। गाए चरबैबला छौड़ा, साड़ी पहीर विरहिनी राधा बनि गेलि आ कानि-कानि गाबए लागलि- “कतेक दिवस हरि खेपब हो, तुम एसकरि नारी!” दोसर दिन, जनकदाससँ ऐ नाचक उत्पत्तिक इतिहास पुछलौं तँ ओ बाजल- नै जानि कहियासँ ऐ नाचक मूलगैनी हमरा परिवारमे चलैत आबि रहल अछि। जनकदासक ऐ उदासीक कारण छल- हमर टेपरेकार्डर।.. चुप्पे-चुप्पे सभ गीत फीतामे अहाँ भरि लेलौं, चलाकीसँ। मंगनीमे अपन काज सुतारि लेलौं अहाँ? आ, अंतिममे पचास टाका नगदी देलाक बादो ओ हमर ऐ प्रश्नक कोनो उत्तर नै देलनि कि खेतिहर-बोनिहार, चरवाह आ बहलमान सभ कहिया आ केना विद्यापतिक पदावलीकेँ गाबि-गाबि नाचब प्रारम्भ केलनि। जनकदासक पलानीमे पुआरपर पड़ल रही दिन भरि, ओकरा दया नै लगलै। ओकर मसोमात जवान बेटी हमरा दिससँ पैरवी केलक, तखनो ओ नै पसिझल, अपन खानदानीक “हँसी” करबैबला गप के “गजट” मे “छापी” कराब’ चाहत? बुरहा जनकदास बड़द खोलि चरबै लेल चलि गेला। हम ओकर पलानीमे पड़ल रहलौं आ तकर बादे एकटा खिस्सा सुनलौं बा सपना देखलौं बा “भ्रम”मे पड़ि गेलौं- ई नै कहि सकै छी। ३ की मैथिली मात्र मैथिल ब्राह्मणक भाषा छी? सेन्टर फॉर स्टडी ऑफ  इण्डियन ट्रेडिशन्स- मैथिली साहित्यसँ ऐ संस्थाक की सरोकार छै? विद्यापति सेवा संस्थान आ चेतना समिति राजनैतिक संस्था अछि- पागबला संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक सालाना विद्यापति पर्व करबाक अतिरिक्त एकर सभक की काज छै? ऑल इण्डिया मैथिली साहित्य समितिक पड़ोसीयोकेँ पता नै छै जे ई संस्था छैहो बा नै, जयकान्त मिश्रक मृत्युक बाद ऐ संस्थाक मान्यता बरकरार किए छै, की जयकान्त मिश्रक मैथिली लेल कएल अहसानक पारिश्रमिक हुनकर बेटी-जमाए लऽ रहल छथि। अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद की अछि आ एम.बी.बी.एस. डॉक्टर, जिनका साहित्यसँ कोनो सरोकार नै छन्हि, किए वोटक अधिकार लेल ऐ मुइल संस्थाक पता अपन नामसँ दै लेल तैयार भेल छथि। मिथिला सांस्कृतिक परिषद तँ विद्यापतिकेँ पागबला फोटो पहिरा कऽ विद्यापतिक नै मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार करबाक दोषी अछिये। तँ की ई मैथिल ब्राह्मणक खाँटी संस्था सभ मैथिलीकेँ मैथिल ब्राह्मणक भाषा बनबै लेल (साहित्य अकादेमी दिल्लीमे) मात्र वोट आ कब्जाक राजनीतिक अन्तर्गत साहित्य अकादेमीक मैथिली कन्वीनर चुनबाक लेल संस्थाक रूपमे काज कऽ रहल अछि, आ तेँ अस्तित्वमे अछि? की मैथिली मात्र मैथिल ब्राह्मणक भाषा अछि? साहित्य अकादेमी, दिल्लीक पुरस्कारक बँटवारा (!!!) देखी तँ उत्तर की अछि? (कुल बँटवारा ४३ बेर- २०११ धरि) मैथिल ब्राह्मण -३६ बेर!! कायस्थ-५  बेर राजपूत-२  बेर गएर सवर्ण- 0000 बेर!!!! विद्यापति पुरस्कारक घोषणा दू लाखक पुरस्कार रामभरोस कापड़ि भ्रमरकेँ विद्यापति स्मृति दिवसक अवसरपर नेपाल सरकार द्वारा गठित विद्यापति पुरस्कार कोष सोम दिन पुरस्कार सभक घोषणा कएलक अछि । घोषित उक्त पुरस्कार सभमे सभसँ महत्वपूर्ण पुरस्कार दू लाख टाकाक एकटा आ एक एक लाखक चारिटा पुरस्कार रहल अछि । दू लाख टाकाक नेपाल विद्यापति मैथिली भाषा साहित्य पुरस्कार नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ एवं संस्कृति विभाग प्रमुख प्राज्ञ राम भरोस कापड़ि भ्रमरकेँ देबाक निर्णय कएल गेल अछि । तहिना मैथिली कला संस्कृति पुरस्कार मैथिलीक नाटककार महेन्द्र मलंगियाकेँ,  मैथिली अनुसंधान पुरस्कार डा. योगेन्द्र प्रसाद यादवकेँ, मैथिली अनुवाद पुरस्कार पंडित सूर्यकान्त झा आ मैथिली पाण्डुलिपि पुरस्कार विराटनगरक राम नारायण सुधाकरकेँ देबाक निर्णय कएल गेल अछि । रामभरोस कापडि ‘भ्रमर-जन्मः      २००८ साल, साओन, बधचौडा, जि. धनुषा, शिक्षाःएम.ए. (त्रि.वि.वि.) पी. एच. डी. (मानद) सम्प्रतिः   सदस्य, प्राज्ञ परिषद्, नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठान, कमलादी।प्रकाशित कृति- काव्यः बन्न कोठरी औनाइत धुंवा (कवितासंग्रह): २०२९ साल, नहि, आब नहि (दीर्घकविता)      २०३६ साल, मोमक पघलैत अधर (गीत, गजल), अप्पन अनचिन्हार (कवितासंग्रह): १९९० ई., भयो अब भयो (अनुवाद) बस अब नही  (हिन्दी अनुवाद) । कथासंग्रहः  तोरासंगे जएबौ रे कुजवा (कथासङ्ग्रह) १९८४ ई., हुगली ऊपर बहैत गंगा (कथासङ्ग्रह) २०६५ । उपन्यासः घरमुहाँ २०६९ । नाटकः    रानी चन्द्रवतीः २०४५ साल, एकटा आओर वसन्तः २०५२ साल, महिषासुर मुर्दावाद एवं अन्य नाटकः २०५४ साल, भ्रमरका उत्कृष्ट नाटकहरू (नेपाली अनुवाद) २०६४ भैया अएलै अपन सोराज (नाटक) २०६७ । शोधः   जनकपुरधाम र यस क्षेत्रका सांस्कृतिक सम्पदाहरूः २०५६ साल, राजकमलक कथासाहित्यमे नारीः २०६४ साल, लोकनाट्यः जट–जटिनः २०६४। मैथिली लोकसंस्कृति (आलेख संग्रह)     २०६६ । तराईको फांट देखि हिमालको कांख सम्म (आलेख संग्रह), प्रकाशकः साझा प्रकाशन, २०६७ । विविध:आजको धनुषाः २०३९ साल, जनकपुर लोकचित्रः २०४६ साल । समयको अन्तराल पछ्याउदै(आलेख संग्रह, २०६६ साल) ठेकान पर (विचार संग्रह), समय–सन्दर्भ (निबन्ध संग्रह) २०६८ । सम्पादनः मैथिली पद्यसङ्ग्रहः (नेपाल राजकीय प्रज्ञाप्रतिष्ठान): २०५१ साल, लाबाक धान (कवितासङ्ग्रह) २०५१ साल, त्रिशूली (स्व. माथुरद्वारा लिखित खण्डकाव्य) २०४९ साल,             नेपालक मैथिली पत्रकारिताः २०४४ साल, मैथिली लोकनृत्यः भावभंगिमा एवं स्वरूप (नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान) २०६१, अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन आ नेपालः       २०६५ साल, हम और तुम (हिन्दी कवितासंग्रह): २०६६ साल । मैथिली नाटक–संग्रह (नाटक संग्रह) २०६७, महाकवि विद्यापति आ नेपाल(निबन्ध संग्रह) २०६८, मैथिली लोक संस्कृति संगोष्ठी प्रतिवेदन,२०६९,लोकनायक सलहेस (निबन्ध संग्रह) २०६९ । सम्मान:      नेपाल राजकीय पज्ञा–प्रतिष्ठान द्वारा प्रदत्त प्रथम ‘मायादेवी प्रज्ञापुरस्कार’ द्वारा सम्मानितः   २०५२ साल, विद्यापति सेवा संस्थान,  दरभङ्गाद्वारा ‘मिथिला विभूति’ सम्मान, शेखर प्रकाशन, पटना द्वारा ‘शेखर सम्मान’, ने. मैथिली साहित्य परिषद्, जनकपुर द्वारा ‘वैदेही प्रतिभा पुरस्कार, अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन मुम्बई द्वारा ‘मिथिलारत्न’ सम्मान, मधुरिमा नेपाल द्वारा ‘मधुरिमा सम्मान’, चेतना समिति, पटना द्वारा यात्री चेतना पुरस्कार,          साझा प्रकाशन द्वारा साझा लोक संस्कृति पुरस्कार (२०६८) आदि दर्जनो सम्मान,           पुरस्कार प्राप्त। विशेषः पूर्व अध्यक्षः साझा प्रकाशन ,ललितपुर। विशेष उल्लेखनीय- नेपालक पहिल आधुनिक कथा संग्रह “तोरा संगे जयबौ रे कुजबा “(१९८४ ई.) क प्रणेता”। नेपालक पहिल आ आइधरि एक मात्र साहित्यकार जकर कथा संग्रह “तोरा संगै जयबौरे कुजवा” क प्रकाशन बिहार (भारत) क सरकारी संस्था मैथिली अकादमी कएलक।      सम्पूर्ण मैथिली साहित्यमे पहिल प्रेमपरक दीर्घकविता “नहि, आब नहिं” क कवि ।      नेपाल राजकीय प्रज्ञा–प्रतिष्ठानसं पहिल बेर प्रदान कएल गेल “मायादेवी प्रज्ञा–पुरस्कार”(२०५२) क प्राप्तकर्ता जकर प्रशस्तिमे लिखल गेल छल–मैथिली भाषा साहित्य एवं मैथिली पत्रकारिताक क्षेत्रमे विशिष्ट योगदानक लेल । नेपालसं प्रकाशित पहिल मैथिली समाचारपत्र “गामघर साप्ताहिक”क सम्पादन–प्रकाशन, जे अनवरत रूपें विगत तीस वर्षसं प्रकाशित भऽ रहल अछि । नेपालसं  प्रकाशित पहिल आधुनिक कविता संग्रह “बन्न कोठरीः औनाइत धुआँ”क कवि ।   नेपालक पहिल मैथिली कवि जकर कविता बंगला भाषामे अनुवाद भऽ साहित्य अकादमी, दिल्लीक संग्रहमे छपल। पहिल साहित्यकार जकरा साझा प्रकाशन, ललितपुर द्वारा सर्वप्रथम “साझा लोक संस्कृति”पुरस्कार प्रदान कएल गेल।      नेपालक पहिल मधेशी एवं मैथिली साहित्यकार जे साझा प्रकाशनक गरिमामय अध्यक्ष पद पर नियुक्त भेल आ प्रज्ञा–प्रतिष्ठानमे सदस्य नियुक्ति (२०६७, माघ २१ गते) धरि बनल रहल। नेपालक पहिल मैथिली साहित्यकार जे सर्वप्रथम नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठानक प्राज्ञ सभा सदस्य बनल आ बादमे प्राज्ञ परिषद् सदस्य सेहो वर्तमानमे अछि । साझा प्रकाशनक अध्यक्षक रूपमे पहिल बेर नेपाली बाहेक मैथिली समेतक भाषाक प्रकाशनक शुभारम्भ कएल, जाहिमे पहिल मैथिली बालकथा संग्रह “बगियाक गाछ” प्रकाशित भेल। नेपालमे पहिल बेर काठमांडूमे अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन (२०६७) क सफलतापूर्वक आयोजन कएल, जकर उद्घाटन नेपालक राष्ट्रपति आ विसर्जन नेपालक उपराष्ट्रपति कएलनि । काठमाण्डूमे आयोजित सार्कस्तरीय कवि गोष्ठीमे सर्वप्रथम नेपालक मैथिली कविक रूपमे प्रतिनिधित्व कएल । नेपालक पहिल साहित्यकार जकर रचना नेपालक पाठ्यक्रममे मात्र नहि बिहारक मैथिली पाठ्यक्रममे सेहो पढाई भऽ रहल अछि । नेपालक सर्वाधिक मौलिक रचनाक लेखक । एखन धरि तीन दर्जन धरि सभ पुस्तक प्रकाशित ।  तत्कालीन नेपाल राजकीय प्रज्ञा–प्रतिष्ठानक प्राज्ञ सभाक सदस्य होइते सर्वप्रथम प्रज्ञा–प्रतिष्ठानद्वारा मैथिलीमे “आँगन” पत्रिकाक प्रकाशन प्रारम्भ कएल । अन्य गतिविधि अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन, दिल्लीक आयोजनमे होबऽ बला अन्तर्राष्ट्रिय सम्मेलनमे भारतक मुम्बई, कलकत्ता, चेन्नई, तिरुपति आ गुआहाटीमे नेपालक प्रतिनिधि मंडलकें नेतृत्व करैत भाग लेल । “एकटा आओर वसन्त” फिल्मक निर्माण-कथा-पटकथा-सम्वाद-गीत लेखन । नेपाल टेलिभिजन लेल जनकपुरधाम पर डकुमेन्ट्री लेखन-प्रदर्शन। “सीता” लगायतक किछु नेपाली फिल्ममे गीत लेखन। नेपाल सरकार संस्कृति मंत्रालयद्वारा गठित विद्यापति पुरस्कार कोषक विधान, मापदण्ड निर्धारण कार्यदलक सदस्य आ अन्तर्राष्ट्रिय स्तरक अवधारणा पत्र प्रस्तुत (बादमे एहिमे व्यापक परिवर्तन कऽ) विवादित बनादेल गेल) । नेपाल पत्रकार महासंघक का.वा. अध्यक्ष (धनुषा) आ नेपाल प्रेस युनियन, (धनुषा)क अध्यक्षक रूपमे काज कऽ चुकल । नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठानक प्राज्ञ सदस्यक हैसियतसं मैथिली लोक नाट्य जट–जटिनक गीत संकलन कऽ तकरा रेकर्डिङ कराओल आ जटजटिनक कथानककें नाट्य रुपान्तर कऽ मंचपर प्रदर्शित कएल जे अद्यावधिक जारी अछि । नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठान द्वारा राजा सलहेसपर नेपाल–भारतक विद्वान् सभक गोष्ठी कएल आ कार्यपत्र सहित एकटा पुस्तक प्रज्ञा–प्रतिष्ठानसं “लोकनायक सलहेस” प्रकाशित कएल । जनकपुरधाममे सर्वप्रथम “अखिल नेपाल मैथिली साहित्य परिषद्”क गठन २०३० सालमे कएल आ लगभग डेढ दशक धरि विद्यापति पर्व लगायत अन्य मैथिली गतिविधि संचालन कएल । मैथिली पत्रिका “अर्चना” “आंजुर” आ “गामघर” क माध्यमसं आइ काल्हिक बहुतो मैथिली साहित्यकारकें साहित्य क्षेत्रमे पदार्पणक अवसर प्रदान कएल। राष्ट्रिय, अन्तर्राष्ट्रिय स्तरक गोष्ठी, सेमिनार सभमे कार्यपत्र प्रस्तोता एवं सहभागिताक रूपमे आमंत्रित भऽ भाग लेल। नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठानमे सर्वप्रथम विद्यापति स्मृति पर्व मनएबाक शुभारंभ कएल। आजुक तिथिमे नेपालमे मैथिली साहित्यक कोनो विधामे सर्वाधिक रचना लिखबाक श्रेय प्राप्त। नेपाल सरकार, संस्कृति मन्त्रालय द्वारा राष्ट्रगानकेँ मैथिली अनुवाद करएबाक क्रममे मैथिली अनुवादक हेतु विज्ञ मनोनित कएलापर राष्ट्रगानकें मैथिलीमे अनुवाद कऽ मूल गीतक संगीतकार अम्बर गुरुङसँ प्रमाणित करा मन्त्रालयमे बुझाओल। समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL -समन्वय २०१२: भारतीय लेखनक उत्सव:२-४ नवम्बर २०१२: (इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव) -एकर साइट अछि http://samanvayindianlanguagesfestival.org -समन्वयक छथि सत्यानन्द निरूपम आ गिरिराज कराडू -उत्सवक निदेशक छथि- राज लिबरहान -उत्सवक एडवाइजरी बोर्डमे छथि-आलोक राय, के.सच्चिदानन्दन, लक्ष्मण गायकवाड, ओम थानवी, महमूद फारूकी, ममता सागर, रवि सिंह, सीतांशु यशचन्द्र, तेमशुला आओ। -आयोजन कमेटीमे छथि- १.इण्डिया हैबीटेट सेन्टरक प्रोग्राम टीम, २.पारस नाथ, अनन्त नाथ। -सहयोगी छथि, दिल्ली प्रेस आ प्रतिलिपि बुक्स। -समन्वय २०११ मे मैथिलीक प्रतिनिधित्व केने रहथि- गंगेश गुंजन। http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2011/gangesh-gunjan/ समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL Venue: Indian Habitat Centre, Lodhi Road, New Delhi -- 110 003 http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/schedule/ http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/arvind-das/ http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/gajendra-thakur/ http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/udaya-narayana-singh/ SAMANVAY 2012 Venue: Indian Habitat Centre, Lodhi Road, New Delhi -- 110 003 2 November 2012 Afternoon 4.00- 4.30: Inauguration By Chandrashekhar Kambar, Ratan Thiyam 4.45 – 5.45: Opening Session: Boli is Back Speakers: Ratan Thiyam, Kashinath Singh, Gurvinder Singh, Nilesh Mishra Moderator: Alok Rai 6.00 – 7.00: Opening Reading Nabaneeta Dev Sen, Sitanshu Yashaschandra, Udaya Narayana Singh, Mamang Dai, Arun Kamal, Arjun Deo Charan, Narender Singh Negi 7.15 – 8.15: Evening Performance Ugana re: Vidyapati by Shovana Narayanan ———————————————————————————————————————————————— 3 Nov 2012 10.30-11.30: Manipuri: The Idea of Nation Speakers: Yumlembam Ibomcha, Dr. Dhanabir Laishram, Bijoykumar Tayenjam Moderator: Robin Ngangom 11.45-12.15: Interaction: Mapping Cities Kashinath Singh, Laxman Gaikwad, Om Thanvi 12.30-1.30 Maithili: Love’s Own Language Speakers: Uday Narayan Singh, Dev Shankar Naveen, Gajendra Thakur Moderator: Arvind Das 2.30 -3.30 Kannada: Tales of Modernities: Small Spaces, Big Ideas Speakers:Gopalkrishna Pai, Banu Mushtaq, B.T. Jahnavi Moderator: Mamta Sagar 3.45-4.15 Interaction Munawwar Rana 4.30-5.30 English: Where’s My Reader? Speakers: Palash Krishna Mehrotra, Biman Nath, S.Hussain Zaidi, Madhuri Banerjee Moderator: Jai Arjun Singh 5.45-6.30: Future of Indian Languages Publishing in Digital Era Speakers:Akshay Pathak, Prem Prakash, Shiva Kumar Moderator: Rahul Dixit 7.00-8.30 Evening Performance: Kashmiri Sufiyana Kalam Gulzar Ahmad Ganie and party ———————————————————————————————————————————————————— 4 November 2012 10.00-11.00 Oriya: Reclaiming Language, Space and Body: Women Writing Speakers: Pratibha Ray, Sarojini Sahoo, Yashodhara Mishra, Aparna Mohanty Moderator: Paramita Satpathy 11.15- 12.15: Folk Performance: Pad Dangal Jagan, Dhavale and others Introduction: Prabhat 12.30-1.30 Marathi: The City of No Outsiders Mumbai Speakers: Arun Sadhu, Hemant Divate Moderator: Prakash Bhatambrekar 2.30-3.30 Kashmiri: My Reality, My Language Speakers: Shahnaz Rasheed, Gulshan Badrani, Elyas Azad Moderator: Nisar Azam 14 3.45-4.15: Interaction Girish Kasaravali, Banu Mushtaq, Mamta Sagar 4.30-5.30: Hindi: Culture and Power: A Tale of Seven Cities (Allahabad, Benares, Bhopal, Delhi, Kolkata, Lahore, Patna) Speakers: Kashinath Singh, Ashok Vajpeyi, Arun Kamal, Alka Saraogi Moderator: Neelabh 5.45- 6.30: Mind Your Language Speakers: Sneha Khanwalkar, Varun Grover, Ratan Rajpoot, Simran Kohli Moderator: Vineet Kumar 6.30 – 7.00: Award Ceremnoy and Closing Speakers: K. Satchidanandan, Raj Liberhan, Paresh Nath, Anant Nath, Satyanand Nirupam, Giriraj Kiradoo 7.15 – 8.30: Evening Performance Solo by Rabbi Shergill २ चीनक लेखक "मो यान (लेखकीय नाम मो यान, वास्तविक नाम गुआन मोये) " केँ साहित्य लेल २०१२ क नोबल पुरस्कार देल जेतन्हि, स्वेडिश एकेडमी ११ अक्टूबर २०१२केँ ई घोषणा केलक। प्रेस कॉनफेरेन्समे कहल गेल जे "मो यान" लोकगाथा, इतिहास आ समकालीन घटनाक मिलनसँ जागल अवस्थाक आभासी(जागल अवस्थाक स्वप्न)वास्तविकताकेँ चित्रित करैत छथि। मो यान पहिल चीनक नागरिक छथि जिनका साहित्य लेल नोबल पुरस्कार देल जेतन्हि। पूर्वी चीनक शाण्डोंग प्रान्तमे हिनकर जन्म भेलन्हि, मो यान (१९५५- ) क माता-पिता किसान छलखिन्ह। जखन ओ १२ बर्खक रहथि तखन सांस्कृतिक क्रान्तिक बाद हुनका स्कूल छोड़ि पहिने खेती आ फेर फैक्ट्रीमे काज करऽ पड़लन्हि। फेर ओ “जन स्वतंत्रता सेना”मे चलि गेला, हुनकर पहिल लघुकथा १९८१ ई. मे प्रकाशित भेलन्हि। ओ अपन लेखनमे अपन युवावस्था आ अपन जन्मस्थलीक वर्णन करै छथि, जेना “रेड सोर्घम- लाल ज्वार”मे, ऐपर फिल्म सेहो बनल, डकैती, जापानी कब्जा आ बोनिहारक दुखद स्थितिक ऐमे विवरण अछि। उपन्यासक अतिरिक्त हुनकर लघुकथा सभक संग्रह प्रकाशित छन्हि। मो यानक कहब छन्हि जे एकटा महान उपन्यास लिखल जाएब अखन बाकी अछि। समारोह १० दिसम्बरकेँ हएत। पुरस्कारमे ८० लाख क्रोनर (स्वेडन) देल जाइत अछि जे लगभग दस लाख डॉलर (अमेरिका)क बराबर अछि। ३ ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२)-विदेह भाषा सम्मान (प्रसिद्ध समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार) श्री राजदेव मण्डल जीकेँ हुनकर कविता संग्रह "अम्बरा" लेल देल जा रहल छन्हि। राजदेव मंडल अम्बरा-कविता-संग्रह आ हमर टोल (उपन्यास) लिखने छथि। अम्बरा https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Ambara_Rajdeo_Mandal.pdf?attredirects=0  सँ आ हमर टोल https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/HammarTol_Rajdeo_Mandal.pdf?attredirects=0  सँ डाउनलोड कएल जा सकैत अछि। http://www.videha.co.in/  पर भऽ रहल ऑनलाइन वोटिंगमे ऐ पोथीकेँ सभसँ बेशी वोट भेटलै। वोटिंगक परिणाम ऐ तरहेँ रहल: श्री राजदेव मण्डलक “अम्बरा” (कविता-संग्रह) 12.67% श्री बेचन ठाकुरक “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक) 11.02% श्रीमती आशा मिश्रक “उचाट” (उपन्यास) 6.34% श्रीमती पन्ना झाक “अनुभूति” (कथा संग्रह) 4.68% श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”क “नो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक) 5.23% श्री सुभाष चन्द्र यादवक “बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह) 4.96% श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह) 5.23% श्रीमती शेफालिका वर्माक “किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा) 8.54% श्रीमती विभा रानीक “भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक) 6.61% श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह) 5.51% श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह) 4.96% श्री महेन्द्र मलंगियाक “छुतहा घैल” (नाटक) 9.64% श्रीमती नीता झाक “देश-काल” (कथा-संग्रह) 5.51% श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह) 7.16% Other: 1.93% श्री राजदेव मण्डल जीकेँ बधाइ। हुनका ई सम्मान विदेह नाट्य उत्सव २०१३ क अवसरपर देल जाएत। ४ मैथिलीकेँ बी.पी.एस.सी.सँ हटाबै लेल लालू प्रसाद जिम्मेवार वा मैथिलीक कट्टरपंथी प्रोफेसर सभ जिम्मेवार- जखन लालू प्रसाद पहिल बेर मुख्यमंत्री बनल रहथि तखन बी.पी.एस.सी. नाम आ टाइटिलक संग बिहार प्रशासनिक/ आर्थिक/ (आ सम्भवतः वन आदि) सेवाक रिजल्ट सभ हिन्दी अखबारमे छापने रहए। मैथिल ब्राह्मण सफल उम्मीदवारसँ ई लिस्ट भरल रहए, झा-झा देखि लोक घबड़ा गेल रहए। की ९०% मार्क्स हिसाब छोड़ि मैथिली लिटेरेचरमे आबि सकैत अछि? बी.पी.एस.सी. मे एल.एस.डब्लू., भूगोल आदिक मार्क्स सेहो कोनो कोनो साल बहुत अबै छलै, मुदा एना नै, आ ओइमे कोनो एक टाइटिलकेँ फाएदा नै होइ छलै। मैथिलीक प्रोफेसर सभक मूल्यांकनमे देखाओल गेल मूर्खतासँ लालू प्रसादपर चारू दिससँ दवाब पड़लन्हि, हुनकर सामाजिक न्यायक हँसी उड़ाओल गेल आ अन्ततः हुनका बी.पी.एस.सी.सँ मैथिलीकेँ हटाबऽ पड़लन्हि। आ तखन हुनका ज्ञात पड़लन्हि जे ई तँ मैथिल ब्राह्मणोक ९०% लोकक हृदएमे कोनो शूल उत्पन्न नै कऽ सकल। जे २-४ सए गोटे प्रशासनिक/ आर्थिक/ (आ सम्भवतः वन आदि) सेवामे मैथिलीक कारणसँ गेलथि, वएह मात्र जँ कोनो मैथिली पत्रिकाक ग्राहक बनि जाथि तँ मैथिली पत्रिका सभक ई स्थिति नै रहत। मुदा ऐमेसँ ९९% केँ आइ मैथिलीसँ कोनो सरोकार नै अछि। मैथिलीक कट्टरपंथी मूर्खाधिराज प्रोफेसर सभ जातिवादिताक कारण मैथिलीक जे नोकसान पहुँचेलन्हि से इतिहास हुनका सभकेँ क्षमा नै करत। ५ “विद्यापतिक मिथिला सांस्कृतिक परिषद द्वारा यज्ञोपवीत संस्कार आ पाग-प्रतिष्ठापन” संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापति ठक्कुरः आ कविकोकिल विद्यापतिक बीचक अन्तर "मिथिला सांस्कृतिक परिषद" आ ओइसँ जुड़ल "किशोरीकान्त मिश्र" आदि नै बुझि सकला वा नै बूझऽ चाहलन्हि। ऐतिहासिक लिखित तथ्य अछि जे गोनू झा १०५०-११५० मे भेलाह मुदा उषा किरण खान संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिसँ हुनकर शास्त्रार्थ करबै छथि (हिन्दीक ऐतिहासिक उपन्यास सिरजनहार, भारतीय ज्ञानपीठमे)। वीरेन्द्र झा कहै छथि जे गोनू झा ५०० साल पहिने भेला आ तारानन्द वियोगी गोनू झा केँ ३०० साल पहिने भेल मानै छथि (दुनू गोटेक हिन्दीमे प्रकाशित गोनू झापर पोथी, क्रमसँ राजकमल प्रकाशन आ नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित) तँ विभा रानीक गोनू झापर हिन्दी पोथी (वाणी प्रकाशन) मे कुणाल गोनू झाकेँ भव सिंहक राज्यमे (१४म शताब्दी) भेल मानैत छथि। जखन पंजीमे उपलब्ध लिखित अभिलेखन गोनू झाकेँ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिसँ दस पीढ़ी पहिने अभिलेखित करैत अछि, तखन ई हाल अछि। समानान्तर परम्पराक विद्यापति आ पाग- विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थमे ठक्कुर विद्यापति कृता लिखल अछि/ आ ओ विद्यापति ब्राह्मण छथि। हमर उद्देश्य मैथिली पदावली बला विद्यापतिसँ अछि, हुनका किए पाग पहिरा कऽ "हम्मर विद्यापति" बना लेल गेल। ई तखन नै भेल जखन बिदापत नाचक माध्यमसँ आठ सए बर्ख गएर ब्राह्मण समुदाय विद्यापतिकेँ जिएने रखलक, मुदा तखन भेल जखन बंगाल विद्यापति आ गोविन्ददासक पदावलीकेँ अपन बना लेलक मुदा बंगालेक विद्वान राजकृष्ण मुखोपाध्याय सर्वप्रथम १८७५ ई. मे कहलन्हि जे विद्यापति मिथिलाक कवि छथि आ बंगालेक नगेन्द्रनाथ गुप्त सर्वप्रथम कहलन्हि जे गोविन्ददास सेहो मिथिलाक कवि छथि आ जखन ई तथ्य सोझाँ उठल तँ पहिने तँ सगर बंगाल हुनकापर मार-मार कऽ उठल आ बादमे मानि गेल। राजकृष्ण मुखोपाध्याय जइ विद्यापतिकेँ मिथिलाक कहने रहथि ओ पदावलीक विद्यापतिक सन्दर्भमे छल, संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरः केँ बंगाल कहियो अपन नै कहने छल। ज्योतिरीश्वरक संस्कृत धूर्तसमागम नाटक आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक गोरक्षविजय नाटक मध्य देल मैथिली गीत सेहो पदावलीक पुरान परम्पराक द्योतक अछि आ ऐ दुनू लेखकपर मैथिली पदावलीक प्रभाव देखबैत अछि। फेर मिथिलाक विद्वानकेँ सोह एलन्हि आ विद्यापतिक संस्कृत-अवहट्ठ ग्रन्थ, गोविन्ददास नाम्ना आ विद्यापति नाम्ना पञ्जीमे उपलब्ध विवरण दऽ विद्यापति ठाकुर आ गोविन्ददास झा (!!!) निकालल गेल, एतऽ रमानाथ झाक पञ्जीक सतही ज्ञान आ सीमित दृष्टिकोण नोकसान पहुँचेलक। फेर अनचोक्के पाग पहिरा कऽ (मिथिला सांस्कृतिक परिषद- ई संस्था भारतक स्वतंत्रताक बाद विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ हुनका ब्राह्मण घोषित करबाक कुकृत्य केलक) विद्यापति (मैथिली बला, संस्कृत बला नै) केँ "हम्मर विद्यापति" ब्राह्मण वर्ग द्वारा बना लेल गेल। मुदा कवीश्वर ज्योतिरीश्वर सन बहुत रास कवि पञ्जीमे उपलब्ध छथि। आ जे नामक अन्तर विद्यापतिमे आबि जाइ छन्हि (जखन कि सभ काज प्लानिंगसँ भेलै तैयो एकटा सबूत बचि गेलै) से ज्योतिरीश्वरमे किए नै अबैए। आब आउ गएर ब्राह्मण द्वारा गाओल बिदापत, जे ज्योतिरीश्वरसँ पूर्व (सम्भवतः) नौआ ठाकुर जातिमे भेल रहथि आ तकर प्रमाणमे ज्योतिरीश्वर द्वारा वर्णन रत्नाकरमे ऐ कविक चर्चा अछि। विद्यापतिक कोनो पदावलीक रचनामे अपन संस्कृत/ अवहट्ठ लेखक हेबाक चर्च नै केने छथि। मुदा हुनकर रचना (संस्कृत आ अवहट्ठक विरुद्ध, जे दोसर विद्यापतिक रचना छी, जे ब्राह्मण रहथि) सर्वहाराक लेल जे दर्द अछि से संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिमे किए नै अछि? संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति तँ सर्वहारासँ घृणा करै छथि आ लिखित रूपमे कट्टर ब्राह्मण छथि। मुदा पदावलीक विद्यापति तँ निश्छल छथि, किछु कट्टर पद कट्टर ब्राह्मणवादी सम्पादक लोकनि द्वारा घोसोआओल गेल अछि (हास्यास्पद रूपमे)। पिआ देसान्तर (विद्यापतिक बिदेसिया)क कन्सेप्ट आब सुधीगणक समक्ष अछि आ मैथिल बिदेसिया लोकनिक वर्तमान दुर्दशाक बीच ई महाकवि विद्यापतिक प्रति ससम्मान अर्पित अछि। की ई दर्द अवहट्ठ आ संस्कृतक विद्यापतिमे छन्हि? पदावली एकटा पैरेलल संस्कृतिक द्योतक अछि। एक्के समयमे संस्कृत आ अवहट्ठ एक्के लेखक लिख लेत, ओकरा कष्ट छै जे अवहट्ठमे लिखलापर विद्वान ओकर उपहास करै छथि, मुदा ई दर्द की एकर लेशोमात्र पदावलीक विद्यापतिमे छन्हि? ओतए तँ उल्लास आ दर्द छै, सर्वहाराक उल्लास आ दर्द। ओ विद्यापति जे संस्कृत आ अवहट्ठ मे लिखलन्हि ओ राजपण्डित छला से विद्वान रहथि, हुनका अवहट्ठोमे लिखलापर लोक निन्दा करन्हि। मुदा मैथिलीक विद्यापति जे पैरेलल परम्पराक अंग छथि, ओइसँ दूर छला। ई पैरेलल परम्परा ऋगवेदक समयसँ छै (ओइ समयमे नाराशंसी रहै)। ई पैरेलल परम्पराक विद्यापति नौआ ठाकुर जातिक रहबे करथि, वा ब्राह्मण जातिक रहबे करथि, से इतिहास ओइपर मौन अछि। मुदा लोककथा आ परम्परा, बिदापतक सर्वहारासँ सघन सम्बन्ध, बिस्फीक परम्परा हुनका गएर ब्राह्मण सिद्ध करैए। संस्कृत आ अवहट्ठक कोनो पाँति नहिये ओइ विद्यापतिक पदावलीक चर्चा करैए आ नहिये पदावली पदावलीक विद्यापतिक संस्कृत वा अवहट्ठ केर रचनाक चर्चा करैए। संस्कृत आ अवहट्ठ मुस्लिम आक्रमणक, जनौ आ मन्दिर भ्रष्ट हेबापर दुखी अछि मुदा पदावली तँ सर्वहाराक हर्ष, उल्लास आ संघर्ष अछि; ओइ तरहक हाक्रोस ओतए नै, हुनका समएमे तँ प्रायः मुस्लिम मिथिलामे रहबो नै करथि।आ जखन मैथिलीबला विद्यापति ब्राह्मण रहबो करथि वा नै तहीपर सवाल अछि तखन पाग पहिरा कऽ कोन सोच हम सभ पैदा कऽ रहल छी, "विद्यापति" हम्मर छलाह कि नै? की विद्यापतिक ब्राह्मण नै रहलासँ ओ हमर नै हेताह? की हुनकर "पिआ देशांतर" बला माइग्रेशन बला गीत महत्वहीन भऽ जेतै? की हुनकर शृंगारिक गीतक मात्र चर्चा कोनो षडयंत्र तँ नै? विद्यापति सन कविकेँ पाग पहिरा कऽ जातिगत बन्धनमे बान्हब कतेक सही अछि? "मध्यकालीन मिथिला"मे विजय कुमार ठाकुर लिखै छथि: "मिथिलाक धार्मिक क्षेत्रमे एहि सामन्तवादी युगीन धार्मिक विचारधाराक प्रभाव एहन सर्वव्यापी छल जे एखनहुँ एहि परम्पराक निम्नलिखित अवशेष समाजमे विद्यमान अछि: ...(घ) पाग सेहो तांत्रिक विचारधारासँ सम्बद्ध अछि।" (पृ.२६) तँ ईहो तंत्र मंत्र बियाह उपनयन धरि ने रहए दियौ। किए ओइ पैरेलल परम्पराक विद्यापतिकेँ ओइमे सानै छियन्हि। आ ई कुकृत्य किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषद केलक। ऐ तरहक लोक जै मिथिलाक संस्कृतिक रक्षक, ओ संस्कृति आ भाषा जँ आइयो बाँचल छै, तँ ई ओइ संस्कृति आ भाषाक विशेषता छिऐ। आ रामलोचन ठाकुर अही प्रतिक्रियावादी "किशोरीकान्त मिश्र"क मंचसँ मंच सापेक्ष बयान देलन्हि (उपन्यासक संख्याक सम्बन्धमे) जकर कोनो ऐतिहासिक महत्व नै छै। चेतना समितिक पत्रिकामे मानेश्वर मनुज सेहो मंच सापेक्ष बयानमे जगदीश प्रसाद मण्डलक उपन्यासक संख्या मात्र ४ लिखलन्हि!!! जगदीश प्रसाद मण्डलक नाममे जँ मण्डल टाइटिल नै रहैत मात्र जगदीश प्रसाद रहैत तँ रमानाथ झाक अनुयायी हुनका श्रोत्रिय, अमर-रामदेव झाक अनुयायी हुनका ब्राह्मण आ "लालदासक स्मारिका"क लेखक वर्मा जी हुनका कायस्थ घोषित कऽ दैतथि। आ ्जँ जगदीश प्रसाद मण्डलक फोटो उपलब्ध नै रहितै तँ किशोरीकान्त मिश्रक प्रतिक्रियावादी मिथिला सांस्कृतिक परिषद जगदीश प्रसाद मण्डलक यज्ञोपवीत संस्कार कऽ हुनका पाग पहिरा फेर वएह कुकृत्य करितए जे ओ विद्यापतिक संग एक हजार सालक बाद केलक। आ बेरमाक कोनो बुढ़बा माटिक ढिमकाकेँ देखबैत जगदीश प्रसाद "झा/ ठक्कुरः" केर काल्पनिक घराड़ी, यएह छी, घोषित कऽ दितए। मलंगियाक बेटा, रामदेव झाक बेटा आ ढेर रास छद्मनामीक देल गाड़ि सेहो विदेहमे बिना काँट-छाँटक छपने अछि, जे लोक पढ़ि सकए, किछु गाड़ि जे नै छापल जा सकैए, सएह टा नै छपने छी। आ गारिक डरसँ अखन धरिक मैथिली आ मिथिलाक इतिहासकार ऐ विषयपर इशारा तँ केलन्हि मुदा आगाँ नै बढ़ला। तेँ ओ ज्योतिरीश्वर(१२७५-१३५०) पूर्व विद्यापतिये रहथि से फेर सिद्ध होइए। जयदेव (लगभग १२००)क गीत-नृत्य आ किरतनियाँ ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक पदावली मेल खाइत अछि, संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक काव्य सौष्ठवसँ मेल नै खाइत अछि। आब पुनः आबी मिथिला सांस्कृतिक परिषदक मंच जतएसँ रामलोचन ठाकुर मंच सापेक्ष बयान देलन्हि। ई परिषद विद्यापतिक यज्ञोपवीत संस्कार नै, मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार केलक। ओकर विद्यापतिकेँ पहिराओल पाग, कोलकातासँ बिन्ध्येश्वर मण्डल आ श्रीकान्त मण्डलकेँ लुप्त कऽ देलक आ मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार पूर्ण भऽ गेल। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक जातिगत कट्टरताक बानगी देखी:- कीर्तिलता- जाति-अजातिक विवाह अधम कएँ पारक। पुरुष-परीक्षामे विद्यापति कथा कहैत-कहैत लेखकीय वक्तव्य दै छथि कि राजपूतक स्त्री चरित्रहीन होइत अछि, ई ओहिना भेल जेना अथर्ववेदमे शूद्रक पत्नीकेँ बिना स्वीकृतिक कियो हाथ पकड़ि लऽ जा सए बला वक्तव्य। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति जाति-अजातिपर विशेष बल दै छथि, रक्त शुद्धता/ जाति हुनका लेल महत्वपूर्ण छन्हि। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति कहै छथि- अकुलीन कोनो दयाक अधिकारी नै अछि!! आ सौन्दर्य मात्र धनिक आ विशिष्ट वर्गक एकाधिकार अछि!! संस्कृत आ अवहट्ठबला (किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषदक जनौ आ पागबला) विद्यापति कहै छथि- जाति सामाजिक जीवनमे अन्तिम निर्धारक तत्व अछि। जे खराप कुलमे जन्म लैए ओ दुष्ट दिमागक साँप मात्र बनि सकैए!! किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषदक जनौ आ पागबला संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति कहै छथि- ओ देश जतऽ जातिक निअम लागू नै होइए से म्लेच्छ देश थिक( Aspects of Society and Economy of Medieval Mithila)- Upendra Thakur अमीर खुसरोसँ पहिने पागक वर्णन हमरा नै भेटल अछि। मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति (पदावलीक लेखक) कहै छथि:- नृप इथि काहु करथि नहि साति। पुरख महत सब हमर सजाति॥ ताहि द्वारे राजा ककरो दण्ड नहि दैत छथि आ सभटा पैघ लोक एके रंग छथि। गोविन्ददासक पद्यो क्लिष्ट छलन्हि आ एकर समानान्तर परम्परा सेहो नै छल (सम्भवतः सवर्ण मध्य प्रचलनक कारण ई दुनू चीज छल), से बिदापत नाच जकाँ ओ एतुक्का माँटिमे संरक्षित नै भऽ सकल। गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणिक चर्चा मुदा वर्धमान जे हुनका सुकविकैरवकाननेन्दुः कहै छथि, ओ कविता सभ कतऽ गेल? पक्षधर लिखैपर प्रतिबन्ध लगेलन्हि मुदा रघुनाथ शिरोमणि आ हुनकर शिष्य “उदयन” आ “गंगेश”क कृतिकेँ रटि कऽ चलि गेलाह आ नवद्वीपमे नव्य-न्याय स्कूलक स्थापनाक संगे बंगालसँ विद्यार्थी एनाइ बन्द भऽ गेल। ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति:- कश्मीरक अभिनव गुप्त (दशम शताब्दीक अन्त आ एगारहम शताब्दीक प्रारम्भ)- ग्रन्थ “ईश्वर प्रत्याभिज्ञा- विभर्षिणी” मे विद्यापतिक उल्लेख करै छथि। श्रीधर दासक सदुक्तिकर्णामृत, - श्रीधर दास विद्यापतिक पाँच टा पद उद्धृत केने छथि जे विद्यापतिक पदावलीक भाषा छी। “जाव न मालतो कर परगास तावे न ताहि मधुकर विलास।” आ “मुन्दला मुकुल कतय मकरन्द” (मध्यकालीन मिथिला, उपेन्द्र ठाकुर) ज्योतिरीश्वर (१२७५-१३५०)  षष्ठः कल्लोल- ॥अथ विद्यावन्त वर्णना॥….. विदातञो आस्थान भीतर भउ. तका पछा तेलङ्गी. मरहठी. वि।दओतिनी दुइ चित्रकइ गाङ्ग जउन निहालि अइसनि देषुअह. चउआञ्चरि चीरि एकहोङ्क परिहने …….से कइसन देषु. जइसे प्रयागक्षेत्र सरस्वतीकेँ गङ्गाजमुनाक सम्वाहि। का हो तइसे ता विदाञोतके दुअओ सम्वाहिका हो भउअह . दशञुन्धी राजा अवधान कराउ. विदाञोत आस्थान वइसु. (विदाञोत (पुरुख) भीतर भेल, तकर पाछाँ तेलङ्गी, मरहठी। विदओतनी (स्त्री) दूटा रंगक गङ्गा यमुनामे नहायलि एहन देखाइए। चारि-चारि आँचरबला चीर एकहकटा पहिरने। से केहन देखू. जेना प्रयागक्षेत्र सरस्वतीकेँ गङ्गाजमुनाक संगबे तेहने ओइ विदाञोतकेँ दुनू सम्वाहिका। दशञुन्धी राजाकेँ अवधान करेलक, विदाञोत स्थानपर बैसला। अष्टमः कल्लोलः- ॥अथ राज्य वर्णना॥ …विदाञोत त।न्हिक गीत. नृत्य. वाद्य. ताल. घाघर परिठरइतेँ आह… विदाञोत लोकनिक गीत, नृत्य, वाद्य, ताल, घाघर पहीरि कऽ भेल। उगना महादेव: महादेव (उगनारूपी) विद्यापतिक ऐठाम गीत सुनबा लेल उगना नोकर बनि रहै छलाह। मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व) आ विद्यापति ठक्कुरः (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक आ राजा शिवसिंहक दरबारी) दुनूसँ सम्बद्ध कऽ उगनाक ई कथा प्रसिद्ध भेल। बोधि कायस्थ: विद्यापति ठक्कुरःक पुरुष परीक्षामे हिनक गंगालाभक कथा वर्णित अछि। महाकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व मैथिली पदावली सभक लेखक) क विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित छल आ बादमे विद्यापति ठक्कुरक (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक) विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित भेल। विद्यापति ठक्कुरःक संस्कृत साहित्य मिथिलाक विद्वान परम्पराक लोपक बाद सोझाँ आएल, आ संस्कृत साहित्यमे विद्यापति ठक्कुरःक कोनो खास चर्च नै भेटैत अछि आ बंगालक विद्यार्थीक एनाइयो कम भऽ गेल छल, जे अबितो रहथि हुनका लेल विद्यापति ठक्कुरःक संस्कृत आ अवहट्ठ साहित्य समकालीनक साहित्य छल जे खतम होइत विद्वता परम्पराक साहित्य छल आ सेहो तखन लिखाइये रहल छल, मुदा ज्योतिरीश्वर-पूर्व पदावली प्रसिद्धि प्राप्त कऽ लेने छल। ओइ कालक गोनू वा विद्यापतिक समय पाग रहबो करए सेहो निश्चित नै, कारण अमीर खुसरो (१२५३-१३२५) मात्र एकर चर्च केने छथि। विजय कुमार ठाकुर एकरा सामन्तवादी प्रतीक आ तंत्र मंत्रसँ सम्बद्ध मानै छथि। मुस्लिम आक्रमणक बाद अधीनस्थ सामन्तकेँ ई पहिराओल गेल हएत आ ई मुस्लिम टोपीसँ मेल खाइतो अछि, आ मात्र ब्राह्मण-कायस्थ मुस्लिम आक्रमणक बाद मिथिलामे सामन्त रहथि (राजपूत नै) आ आइयो अही दू वर्गक बीच ई कहियो काल बियाह आदिमे प्रयुक्त होइए। महाकवि विद्यापति- कवीश्वर ज्योतिरीश्वर(लगभग १२७५-१३५०)सँ पूर्व (कारण ज्योतिरीश्वरक ग्रन्थमे हिनक चर्च अछि), मैथिलीक आदि कवि। संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरःसँ भिन्न। सम्भवतः बिस्फी गामक नौआ ठाकुर श्री महेश ठाकुरक पुत्र (परम्परा अनुसार)। समानान्तर परम्पराक बिदापत नाचमे विद्यापति पदावलीक (ज्योतिरीश्वरसँ पूर्वसँ) नृत्य-अभिनय होइत अछि। विद्यापति ठक्कुरः १३५०-१४३५ विषएवार बिस्फी-काश्यप (राजा शिवसिंहक दरबारी) आ संस्कृत आ अवहट्ठ लेखक। कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, गोरक्षविजय, लिखनावली आदि ग्रंथ समेत विपुल संख्यामे कालजयी रचना। ई मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)सँ भिन्न छथि। साहित्य अकादेमीमे समन्वयक पद लेल कालाबाजारी (ब्लैक मार्केटिंग)- एकटा रिपोर्ट साहित्य अकादेमी दिल्लीक मैथिली समन्वयक चुनाव लेल जे संस्था सभ निर्धारित अछि ओकर नाम अछि:- विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा; सचिव वैद्यनाथ चौधरी “बैजू” आ अध्यक्ष- पं. चन्द्रनाथ मिश्र अमर। अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद, दरभंगा; सचिव डा. गणपति मिश्र , अध्यक्ष रहथि स्व. जयमन्त मिश्र। चेतना समिति, पटना, सचिव श्री विवेकानन्द ठाकुर, अध्यक्ष श्रीमति प्रमीला झा। राँटी मधुबनीक कोनो संस्था, सम्भवतः वर्तमान अध्यक्ष श्री हेतुकर झा। किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषद (जे संस्था विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ हुनका ब्राह्मण घोषित करबाक कुकृत्य केलक), वर्तमान अध्यक्ष श्री सुरेन्द्र नारायण झा आ सचिव गंगाधर झा। पंचानन मिश्रक अखिल भारतीय मैथिली साहित्य समिति, इलाहाबाद; आ मैथिली लोक साहित्य परिषद, कोलकाता, सम्भवतः वर्तमान अध्यक्ष- अणिमा सिंह (सम्भवतः मैथिली लोक साहित्य परिषद आब ऐ लिस्टमे नै अछि कारण आधिकारिक मैथिली साहित्यिक संस्था सभक लिस्टमे साहित्य अकादेमी, दिल्ली ऐ संस्थाक नाम नै देने अछि।)। ऐ मे सँ किछु संस्थाक नाम आ वर्तमान अध्यक्ष आदिमे परिवर्तन सम्भव अछि।

ऐ मे सँ अधिकतर संस्था कागजी अछि वा साहित्यिक नै राजनैतिक अछि आ जातिवाद, क्षेत्रवाद आ आनुवंशिक आधारपर संचालित अछि। साहित्य अकादेमी, दिल्लीक आधिकारिक मैथिली साहित्यिक संस्था सभक लिस्ट MAITHILI 01. The Secretary All India Maithili Sahitya Samiti Tirbhukti 1/1B, Sir P.C. Banerjee Road Allahabad-211 002 02. The General Secretary Akhil Bharatiya Maithili Sahitya Parishad C/o Dr. Ganapati Mishra Lalbag Darbhanga-846 004 03. The Secretary Chetna Samity Vidyapati Bhawan Vidyapati Marg Patna-800 001 04. The Secretary Mithila Sanskritik Parishad 6 B, Kailash Saha Lane Kolkata-700 007 05. The Secretary Vidyapati Seva Sansthan Mithila Bhavan Parishar Darbhanga-846 004 06. The Secretary Centre for the Study of Indian Traditions Tantrabati Geeta Bhavan Ranti House, Ranti Madhubani-847 211 राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ (सुभाष चन्द्र यादव) जे साहित्य अकादेमी द्वारा रामदेव झा आ मोहन भारद्वाजक कृपासँ प्रकाशित नै भऽ सकल। https://docs.google.com/a/videha.com/viewer?a=v&pid=sites&srcid=dmlkZWhhLmNvbXx2aWRlaGEtcG90aGl8Z3g6NDNiMmVhYThlOTNiMDA5Zg राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ (सुभाष चन्द्र यादव) download link https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Rajkamal_Monograph.pdf?attredirects=0&d=1 https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Rajkamal_Monograph.pdf?attredirects=0&d=1 dbb13891-a-96a2f0ab-s-sites.googlegroups.com September 11 at 11:28pm · Like · 1 · Remove Preview Gangesh Gunjan राजकमल जी (विनिबंध)क प्रकरण कान मे पडल तं छल, से कतोक वर्ख भ गेलै आब| मुदा से एहन कुरूप छैक से अहींक एहि फेस बुकिया समाद मे स्पष्ट भेलय| तें एकर धन्यवाद अहीं कें दैत छी गजेन्द्र जी |... ओना वास्तविक तं ई जे सम्पूर्ण पढबा सं पहिने मोन "विरक्त" भ' गेल | नै पढि भेल आगाँ ! नीक केलौहें नेट पर द' क'| समकालीन आ आगत पीढ़ी सेहो बुझओ ई कारी-कथा! हमरा सन लोकक विडम्बना देखू जे पूरा प्रकरण अपन अनुज- मित्र- अग्रज सं जुडल अछि| से एहन ऐतिहासिक दुर्घटना भ' गेल अछि ! उत्तरदायी व्यक्तिगत हम कतहु सं नै | मुदा साहित्यिक पीढ़ीक नैतिकता सं "अपराध बोध" सहबा लेल अभिशप्त छी| उपाय ? सस्नेह,

11 सितम्बर 2012 11:26 pm को, Gajendra Thakur < Thursday at 2:13pm via  · Unlike · 4 Gajendra Thakur गंगेश गुंजन जीक हिम्मत प्रशंसनीय अछि। जँ स्टेटस-को केर विरोध शुरूसँ भेल रहितै तँ परिस्थिति भिन्न रहितै, सए अछि उपाए। विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपेँ प्रसिद्ध) ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२)-विदेह भाषा सम्मान (प्रसिद्ध समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार) श्री राजदेव मण्डल जीकेँ हुनकर कविता संग्रह "अम्बरा" लेल देल जा रहल छन्हि। राजदेव मंडल अम्बरा-कविता-संग्रह आ हमर टोल (उपन्यास) लिखने छथि। अम्बरा https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Ambara_Rajdeo_Mandal.pdf?attredirects=0  सँ आ हमर टोल https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/HammarTol_Rajdeo_Mandal.pdf?attredirects=0  सँ डाउनलोड कएल जा सकैत अछि। http://www.videha.co.in/  पर भऽ रहल ऑनलाइन वोटिंगमे ऐ पोथीकेँ सभसँ बेशी वोट भेटलै। बाल साहित्य लेल विदेह सम्मान २०१२- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ हुनकर बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह "तरेगन" लेल ई पुरस्कार देल जा रहल अछि। ई पुरस्कार विदेह नाट्य उत्सव २०१३ क समारोहमे देल जाएत। “तरेगन” केँ सभसँ बेशी वोट भेटलै। तीनटा पोथी १.जगदीश प्रसाद मण्डलक तरेगन, २. जीवकान्तक “खिखिरक बीअरि” आ ३.मुरलीधर झा क “पिलपिलहा गाछ” केँ विदेह www.videha.co.in  पर भऽ रहल ऑनलाइन वोटिंगमे राखल गेल छल। विशेषज्ञक मतानुसार “पिलपिलहा गाछ”मे बहुत रास कथा अछि जकरा बाल कथा नै कहल जा सकैए, तइ दुआरे ऐ पोथीकेँ लिस्टसँ हटा देल गेल कारण ई पुरस्कार बाल साहित्य लेल अछि, ओनाहितो ऐ पोथीकेँ सभसँ कम वोट भेटल रहै। ऐ पोथी सभक अतिरिक्त आन पोथी सभपर विचार नै कएल गेल कारण ओ सभ पोथीक आकारक नै वरन् बुकलेटक आकारक छल। विहनि कथा रामवि‍लास साहु घुसहा घर मुखि‍याजी पंचायतक गामे-गाम आम सभाक बैसार लेल डोल्हो दि‍यौलनि‍। गामक लोक सभ एकजुट भऽ आम सभामे पहुँचलाह। सभाकेँ संवोधि‍त करैत मुखि‍याजी बजलाह- “ऐ बैसारमे सभ कि‍यो मि‍ल ि‍नर्णए लि‍अए जे पंचायतक गरीब आ मसोमात, जि‍नकर घर टुटल-फाटल होइ वा रहबा योग नै होइ छै। ओइ व्‍यक्‍ति‍क सूची बनाएल जाउ। हुनका सभकेँ सरकार तरफसँ घर बनबैले इन्‍दि‍रा-आवास योजनासँ रूपैया भेटतनि‍।” वार्ड सदस्‍यक सहयोगसँ मुखि‍याजी लग इन्‍दि‍रा आवासबला सूची पहुँचल। बि‍हानेसँ मुखि‍या जीक दलाल सभ सूचीमे नामांकि‍त व्‍यक्‍ति‍सँ भेँट कऽ एक-एकटा फार्म दऽ कहि‍ देलक जे फार्म भरि‍ कऽ मुखि‍याजी लग जमा करै जाउ आ बैंकमे खाता सेहो खोलबा लइ जाउ। संगे संग पाँच हजार रूपैआ सेहो दि‍अए पड़त। तखन इन्‍दि‍रा आवास भेटै जाएत। बहुत गोटे तँ अपन गाए-महि‍ंस-बकरी-छकरी-गहना-जेबर जेकरा जे गर लगलै बेचि‍ कऽ रूपैआ दऽ रूपैआ उठेलक। कि‍छु आदमी एहनो छल जेकरा सकर्ता नै भेलै ओ वंचि‍त रहि‍ गेल। बदलामे पाइबला लोक अपना नामे उठा लेलक। कि‍छु दि‍नक बाद रघि‍या मसौमात इन्‍दि‍रा-आवास ले फार्म भरि‍ मुखि‍या जी लग पहुँचलीह। मुखि‍याजी फार्म पढ़ि‍ बजलाह- “पहि‍ले इन्‍दि‍रा आवासमे पचीस हजार भेटै छलै आब चालि‍स हजार भेटै छै मुदा आगू भेटैबला साइठ हजार भेटतै। जइमे पच्‍चीसमे पाँच हजार आ अखन चालि‍समे दस हजार खर्चा लगै छै मुदा आगू साइठमे पनरह हजार लगतै।” रधि‍या सुनिते कानि‍-कलपि‍ कऽ अपन मजबूरी सुनौलकनि‍। मुखि‍याजी मुड़ी डोलबैत बजलाह- “यइ काकी, हमरे केनेे नै ने होइ छै, डेगे-डेग हाकि‍म-हुकुम बैसल छै। ओहो तँ कटि‍या सोन्‍हा कऽ रखने रहै छै तेकरा की हेतै। आ हमरो कोनो दरमाहा भेटै छै हमहूँ तँ ओहीमे नि‍महै छि‍ऐ। तँ ई हेतौ जे हम अपनबला नै लेबो।” सुनि‍ रधि‍या सभ बात सुनि‍ परि‍स्‍थि‍ति‍ बूझि‍ आपस आबि‍ गेलीह। बुधनी बुढ़ि‍या गाममे सभसँ उमेरगर। जुआनि‍येमे घरबला बाढ़ि‍मे डुमि‍ मरि‍ गेलखि‍न। दूटा बेटाक संग बुधनी कहि‍यो हि‍म्‍मत नै हारलि। संघर्ष करैत आत्‍म-ि‍नर्भरतापर धि‍यो-पुतोकेँ सक्कत बनौने छथि‍। हलाँकि‍ आर्थिक रूपे कमजोरे छथि‍। एक दि‍न मुखि‍या जीक नजरि‍ बुधनी बुढ़ि‍यापर पड़लनि‍ आ देखि‍ते पुछलखि‍न- “गामक बहुतो लोक सभ लाभ लेलक मुदा तूँ कोनो फारमो नै भरलीही? तोरा तँ दूटा लाभ भेटतौं। एकटा वृद्धा-पेंसन ओ दोसर इन्‍दि‍रा आवासक।” बधनी बजलीह- “ऐमे कोनो खर्चो-वर्चो लगैए?” मुखि‍याजी- “हँ, वृद्धा-पेंसनमे पाँच सए आ इन्‍दि‍रा-आवासमे पनरह हजार।” बुधनी- “हम ई लाभ नै लेब।” मुखि‍याजी- “कि‍अए नै लेब?” बुधनी- “घूस दऽ कऽ घर बनाएब तँ ओइ घूसहा घरमे रहैबला केहेन हेतै?” मुखि‍याजी आ बुधनी बुढ़ि‍याक गप अपना घरक कोनचर लगसँ रधि‍या मसोमात सुनैत छलीह अपना मनकेँ बुझबैत बजलीह- “इन्‍दि‍रा आवास कि‍अए घूसहा घर कहि‍यो ने।” इमानदारीक पाठ ननुआँ पुछलक कनुआँसँ- “भैया आइ-काल्हि‍ तँ गामोक स्‍कूलमे बड़ सुवि‍धा पढ़ाइ होइ छै तैयो वि‍द्याथी सभ शहरक स्‍कलमे कि‍अए पढ़ै छै?” कनुआँ जबाब देलक- “गामक इस्‍कूलमे इमनदारीक पाठ आ शहरक इस्‍कूलमे रोजगारक पाठ पढ़बै छै।” “से केना?” -ननुआँ पुन: पुछलक। कनुआँ उत्तर देलक- “गामक इस्‍कूलमे एहेन पाठ पढ़बै छै जे कहुना साक्षर भऽ जाए, गाए-भौंस चराबए आ नमहर भेलापर हर-फार जोतए, खेती करए। अन्न उपजा कऽ अपनो खाए आ आनोकेँ खि‍याबए। ई छि‍ऐ ने इमानदारीक पाठ मुदा शहरक इस्‍कूलमे वि‍द्यार्थी सभकेँ रोजगारक पाठ पढ़बै छै। ओ सभ पढ़ि‍-ि‍लखि‍ रोजगार लेल आन-आन शहर चलि‍ जाइ छै। अपन घर-परि‍वार आ समाज सेहो छुटि‍ जाइ छै। समाजसँ बेमुख भऽ जाइ छै। आब तोहीं कह जे इमानदारीक पाठ के पढ़तै?” बौआ बाजल पढ़ल-लि‍खल बेरोजगार छी मुदा दि‍न केना कटै छल तकर कोनो सुधि‍-बुधि‍ नै छल। ऊपरसँ परि‍वारक बोझ, आगू पढ़बाक इच्‍छा रहि‍तो कि‍छु नै कऽ सकलौं। एक दि‍न मनमे फुराएल जे कि‍छु नेना-भुटकाकेँ पढ़ाएल जाए। अहुना तँ हम बुड़ि‍आएले छी औरो बुड़ि‍या जाएब। एक दि‍न भोरमे बौआ-बुच्‍चीकेँ ओसारपर पढ़बै छलौं। दुनू बेरा-बेरी प्रश्न पुछए आ हम उत्तर दइ छेलि‍ऐ। अहि‍ना स्‍थि‍ति‍मे बौआ पुछलक- “लोक एत्ते मेहनतसँ कि‍अए पढ़ैए, जे पढ़ैए सेहो आ जे नै पढ़ैए ओहो तँ एक ने एक दि‍न मरि‍ऐ जाइए?” बौआकेँ हम समझबैत कहलि‍ऐ- “जीवन-मरण तँ प्रकृति‍क नि‍अम छी। ओ नि‍रंतर होइत रहैत अछि‍।” बौआ फेर पुछलक- “तखनो लोक कि‍अए पढ़ैए?” “मनुख पढ़ि‍-लि‍ख ज्ञान अर्जित करैए आ ओइ ज्ञानसँ अपन जि‍नगीकेँ सुलभ बना असली जि‍नगी जीबैए। लोक पढ़ि‍-लि‍खि डाक्‍टर-इंजि‍नि‍यर, औफि‍सर, कवि‍ लेखक आ उपदेशक इत्‍यादि‍ बनैए। अच्‍छा ई कहह जे तूँ की बनबऽ?‍” बौआ बाजल- “हम पढ़ि‍-लि‍ख कोनो काज कऽ सकै छी मुदा कवि‍-लेखक नै बनब। सभ कमा कऽ सुख-मौजसँ जि‍नगी बि‍तबै छथि‍ मुदा कवि‍-लेखककेँ कोनो कमाइ नै होइत छन्‍हि‍।” सत्यनारायण झा विहनि कथा:-- सुटिया अन्हार गुफ्फ ।हाथ हाथ नहि सुझैत । आकाश साफ़ रहैक ।पूरा आकाश तारा सं आच्छादित ।निरवता तँ तेहन रहैक जे हृदय मे अनेरे सनसनाहट बुझाय ।भगजोगनिक यत्र तत्र प्रकाश रात्रिक निरवता कऽ आओर प्रखर केने रहैक ।पक्षी सभ अपना खोता मे तेना ने सुतल रहैक जे कतौ सं कोनो आवाज नहि अबैत रहैक ।एकदम शांत ।वायुक वेग मे केखनो कऽ बाँसक झुरमुट ऊपर नीचा भऽ जायक लगैक जेना कोनो अदृश्य शक्ति ओकरा हिला रहल छैक ।     एहन अन्हरिया राति नहि देखने छलियेक  ।हम ओही दिन कतेको अंतराल कऽ बाद इलाहाबाद सं गाम आयल रही ।हम ओहि समय इलाहाबाद मे पढ़ैत रही ।भोजनोपरांत हम अपन दलान पर सुतल रही ।नींद नहि होयत रहय ।दोसर पहर राति बित गेल रहैक ।कनेके काल पहिने बाँध बोन में गिदरक  हुआ हुआ सुनने रहियैक ।कतबो प्रयास करी नींद हेबे नहि करय ।छटपट करैत परल रही ।तखने दलानक कात कनैलक गाछ लग कुकुर कानय लगलैक ।कुकुरक रुदन हमरा देह मे कपकपी भरि देलक ।कनेक मोन कऽ स्थिर केलौ ।आब बुझायल निद्रा देवीक आगमन भऽ रहल छनि । अर्द्धावस्था मे रही ।तखने बुझायल पुबारी कात सं दुर दुर सं केकरो विलाप करबाक आवाज आबि रहल अछि ।निद्रा देबी पुनः लंक लेलनि ।एतेक राति मे के कानि सकैत छैक ?अनुमान सं बुझायल जे मलहटोली सं कनबाक अवाज आबि रहल छैक ।विलाप तँ एहन करैक जेना अंतरात्मा सं चित्कार करैत होयक ।ओह ,कियो भारी बिपति मे कानि रहल छैक ?ओहिना ओछेन पर  परल रही ,ताबे आँगन दिस सं माय अयलीह आ उठा कहय लगलीह जे लगैत अछि जेना सुटिया कनैत छैक ।ओकर बेटा बच्चेलाल बर जोर दुखित छैक ।मियादी ज्वर लगैत छैक ।सुटियाक नाम सुनिते मोन दुःख सं भरि गेल ।ओ हमरा घरक खबासनी छल ।एकेटा बच्चा भेल रहैक तँ ओकर पति भोकरहा मरि गेलैक ।बेटाक कारण सगाइ नहि केलक ।ओकर निर्बाह हमरे घर सं होयत छलैक ।हमरा सात्विक सिनेह सुटिया सं छल ।हम ओकरा बेटा सं चारि पाँच सालक पैघ रहियैक ।बच्चे रही तँ सुटिया हमरा मायसन सिनेह देने छल ।बर माने ।हम बच्चे सं ओकर पाछू पछु दौड़ैत रहैत छलौ ।आत्मीय सिनेह छल ।गाम आबी तँ सुनिते ओ दौड़ जायत छल ।अपना हाथे पानि पियाबति छल ।हमरा माय कऽ पूरा सम्हारैत छलैक ।आइ नहि आयल तँ मोन में एकबेर ठह्कल मुदा भेल नहि बुझल हेतैक ?आब तँ ओकरो बच्चेलाल सोलह –सत्रह बरखक भऽ गेलैक ।मुदा ----।मायक मुँह सं जहिना सुनालियैक ,तुरत ओकरा घर दिस भागलौ ।वास्तव मे बच्चेलाल कऽ तुलसी पीड़ा लग सुता देने रहैक  आ ओकरा देह पर सुटिया अपन देह बजारि चिचिया रहल छलैक  ।हमरा देखिते सुटिया पैर पर अपन कपार पीटय लागल ।ओ  बेहोश भऽ गेलैक  ।ओकर दांती छोरेलियैक मुदा होश मे अबिते ओ ओहिना कपार पिटय लगैक ।बच्चेलाल निष्प्राण भऽ गेल रहैक ।ओ एहि दुनिया कऽ छोरि चुकल छल । कनेकालक बाद लोक सभ एकटा ठठरी बना कऽ अनलकै \ ओहिपर बच्चेलाल कऽ धय देलकै आ राम  नाम सत्य  छै ,कहैत ,सभ श्मशान दिस बिदा भऽ गेलैक । ओकरा अंगना सं सभ चलि गेल रहैक ।सुटिया असगरे कनैत रहैक ।बगल मे हमहू ठाढ़ रहियैक ।एक बेर ओकर आँखि हमरा आँखि सं मिललय ।ओकर दर्द जेना हमरा पूरा शरीर मे समा गेल ।नहि रोकि सकलौ अपना कऽ आ ओकरा भरि पाँज पकरि अपना करेज मे सटा लेलौ आ जोर जोर सं कानय लगलौ जेना माय कऽ पकरि बेटा कनैत छैक । मुन्नी कामत विहनि कथा- कैंसर रोगी- बाप रे बाप ........आब नै जिबै....... माय गे माय..............हो...........दौड़ऽ होउ लोक सब डॉक्टर- चुपु, ई अस्पताल छिऐ, अहाँ कऽ दलान नै जे एना ढ़करै छिऐ। की भेल, देखै सँ तँ भला चंगा छी, कोन तकलीफ यऽ। रोगी- डॉक्टर साहेब, हम एगो आम आदमी छी। हमरा कैंसर भेल अछि जे हमर प्राण लऽ कऽ हमर पीछा छोड़त। हमरा मरै कऽ गम नै अछि पर हमर पुरे परिवार कऽ सेहो ई कैंसर अपना गिरफत मे लऽ रहल अछि। की हमरा आ हमरा परिवार कऽ मुक्ति मिलत? डॉक्टर- हअ-हइ, किएक नै। दुनियामे एहन कोनो बीमारी नै अछि जकर आइक युगमे इलाज नै होइत अछि। पर अहाँ कऽ आ अहाँक पुरे परिवार कऽ कैंसर अछि ई अहाँ केना जनै छी? एना भइए नै सकैत अछि। देखै सँ तँ अहाँ पागल नै लगैत छी, फेर पागल जेकाँ बात किए करैत छी। पहिले जॉंच कराउ, फेर इलाज शुरू करब। रोगी- डॉक्टर साहेब, की जाँचब अहाँ, कि हमरा घरमे आइ सात दिन सँ सब उपास यऽ कि नै? सरकार घर मे गोदामक-गोदाम अन्न सड़ैत अछि पर हम गरीब एक मुटठी अन्न लऽ तरसि रहल छी। आकि ई जाँचब जे हम कतेक दिन सँ प्यासल छी। ने देह मे आगि लगबै लऽ मटिया तेल अछि ने जहर खाइ लेल जेब मे पाइ। डॉक्टर- अहाँ की कहि रहल छी? हमरा समझमे किछु नै आबि रहल अछि। रोगी- कहियो गरीबी कऽ जिंनगी जिलिऐ हऽ डॉक्टर साहेब। हमरा मंॅंहगाइ, गरीबी, लाचारी आ बेरोजगारी अइ तरहक अनेक बिमारी गरसने अछि जे आब कैंसरक रूप लऽ लेलक। कहुँ अहि लाइलाज बिमारी कऽ इलाज अछि अहाँक डॉक्टरी दुनियामे? डॉक्टर- ऐ बिमारी सँ तँ कोइ नै बचल अछि। ई तँ दिन-प्रतिदिन भयंकर रूप लेने जाइ यऽ। अकरा सँ मुक्ति तँ मौते दिया सकै यऽ। जगदानन्द झा मनु प्रेमक बलि प्रवल आ सुमन एक दोसरसँ बहुत प्रेम करैत छल | दुनू संगे- संग बितल पाँच बरखसँ पढि रहल छल आ ओहि समयसँ दुनूक बिचक चिन्हा परिचय कखन अगाध प्रेममे बदैल गेलै से दुनूमे सँ केकरो सुधि नहि रहलै | आब दुनूक प्रेम अपन चरम सीमा पर पहुँच चुकल छैक आ एक दोसरकेँ बिना जीवनक कल्पनो दुनूक लेल असहनीय छैक | दुनूक प्रेम आब दुनूक एकान्तीसँ निकैल कालेज कम्पलेक्समे गमकए लगलै आ तरे-तरे गाम तक  सेहो | मुदा  रुढ़िवादी ताना-बानामे बुनल समाजक व्यवस्थामे दुनूक मिलन आ  विवाहक कल्पनो असंभव छलैक | किएक तँ  प्रवल ब्राह्मण आ सुमन तेली जातिकेँ छल आ प्रवलक मए बाबू आ समाजकेँ लोग एहि बिजातीय विवाहकेँ पक्षमे कोनो हालतमे तैयार नहि | एहि सभ गप्पक अनुभब प्रवल आ सुमनकेँ सेहो भेलैक मुदा ओहो दुनू अप्पन प्रेमसँ बन्हल वेबस | करए   तँ करए की ? समाजक व्यबस्थाक कारणे विवाहक कल्पने मात्रसँ देह सिहैर जाई | दुनूक प्रेम आब ओई   सिखर पर पहुँच गेलैक जतएसँ वापसीक कोनो गुंजाइस नहि | मए बाबू  सभटा जनितो समाजक डरे  गप्प मानैक तैयार नहि | एक दिन दुनू गोटा एहि विषय पर गप्प करैत रहे, प्रवल बाजल -" चलू दुनू गोते दिल्ली,मुम्बई भागि ओहि ठाम विवाह कए लेब नहि कोनो समाज नहि गाम आ नहि मए बाबूक डर |" सुमन - "से   तँ ठीक छैक मुदा हम अपन जीवन जीबैक लेल हुनक जीवनसँ कोना खेलव जीनक जीवैक आसा अपना दुनू गोते छी | सोचू हमरा भगला बाद हमर मए बाबूकेँ आ अहाँक भगला बाद अहाँक मए बाबूकेँ समाजमे की प्रतिस्ठा रहि जेतैंह आ ओकर बाद हुनक जीवन केहन हेतैंह आ एहेन कए कs की हम दुनू अपन जीवनकेँ खुश राखि पाएब | प्रेम  तँ तियागक नाम छैक | ऐना एकटा अनुचीत डेग उठा कए हम अपन प्रेम कए बदनाम कोना कए सकै छी | रहल मिलन आ वियोगक गप्प तँ  मिलनकेँ लेल एकैटा जन्म नहि छैक, एहि जन्ममे नहि अगिला जन्ममे अपन मिलन अबस्य होएत |" सुमनकेँ ई गप्प सुनि प्रवल किछु नहि बाजि पएल ओकरा अपन करेजासँ सटा जेना सभ किछु बिसरि जएबाक प्रयास कए रहल अछि | अगिला भोरे-भोरे गामक पोखरि मोहार पर पीपड़  गाछक निच्चा भिड़क करमान लागल | सामने पीपड़ गाछसँ प्रवल आ सुमनकेँ मुइल देह फसड़ी लागल लटकल | दुनूकेँ आँखि बाहर निकलल जेना  समाजसँ एखनो किछु प्रश्न कए रहल अछि - ऐना कहिया तक, प्रेमक बलि लेब ? अमित मिश्र विहनि कथा परिभाषा माएक मोन एकाएक बड खराप भऽ गेल ।गाममे एहि रोगक डाँक्टर नै छथि तँए एकटा मित्रक संग शहर एलौँ ।रवि दिन ,क्लिनिक बंद ।डाक्टर साहेबक डेरापर जाएबाक योजना बनल ।मुदा . . . । पिछला दू घंटासँ गली-गली भटकि रहल छी ।जालमे फँसल माछ जकाँ मोहल्ला भरिमे अहुरिया काटि रहल छी ।लोक सबसँ पूछि रहल छी ,मुदा . . .। डाँक्टर साहेबक डेरा नै भेटल । मोन खौंझा गेल । मित्र बजलनि ,"जानबरसँ पूछि रहल छी तँए जबाब नै भेटैत अछि ।" ई सुनि एकटा लड़का रूकि गेल आ कहल ,"भाइजी एकरे नाम तँ शहर छै ।गामक लोक अगल-बगलकेँ दस गामक लोककेँ चिन्हैत अछि मुदा शहरमे बायाँ हाथ, दायाँ हाथकेँ नै चिन्है छै। एक फ्लैटमे जन्मदिन होइ छै आ दोसरमे श्राद्ध, ककरोसँ कोनो मतलब नै। शहर तँ शमसान थिक जतऽ तांत्रिक बनि लोक अपन स्वार्थपूर्तिक लेल तपस्या कऽ रहल छथि । किओ ककरो खोज-खबरि नै लै छथि, नै तँ तपस्या भंग भऽ जेतै। ईएह तँ थिक शहरक परिभाषा।" इम्हर सह-सह करैत मनुखक बीच डेरा खोजबामे असमर्थ भेलहुँ आ उम्हर माएक साँसक डोर टूटल । सन्दीप कुमार साफी दूटा विहनि कथा १ साउस पुतोहु -कनियाँ, घरमे छी यै? -की भेलनि माए? -आँइ यै छौँकावाली, एतेक निचेनसँ सितै किए छी यै? दुपहरक काज-राज अहिना पड़ल छै। कनी म्हिसोकेँ पानि देखा ने दियौ, पियासल महीस खुट्टा तोड़ि रहल छै। एतेक कहूँ मनुख सुतए। कतेक नीन आबैए अहाँकेँ यै। -तँ की करू, सुतबो नै करू। भरि दिन खटैत-खटैत हाथ-पएर कारी-झामर भऽ गेल। ओम्हर चिलका तंग करए, इम्हर भानससँ तंग। हिनका होइ छै, हम भरि दिन खटैते रही, हमरासँ नै हएत महीसकेँ पानि पिआए। हमर माथ बड़ जोर दुखाइए, डाँर-पिट्ठी सेहो तोड़ने जाइए। एखन हमरासँ किछु नै हएत कएल। -आँइ यै, एतेक कहूँ पुतोहु बानसब्बर हुबए। सुनियौ यै ढुकरीक माए। अहाँ सभ कहबै जे साउसक दोख। हम की बैसल छी। भरि दिन गोरहा पाथैत-पाथैत दुपहर भऽ गेल, एक टाएर गोबर छल हन। एखन तक पूजो नै केलौं। कखैन खाएब कोनो ठीक नै। ऐ महरानीकेँ देखियौ जे हमरेपर हाथ-पएर चमकाबैए। बड़का छोटका कऽ आइयक कनियाँ कोनो माने-मतलबे नै राखैए। अपन जएह मोन भेल वएह केलक। के खेनहारकेँ देखैए, जे ससुर भैंसुर खेलक की नै, अपन पेट भरि गेल, दोसर आब जेना रहए। अपन भूख तँ चुल्हा फूक, दोसरक भूख तँ माथा दुख।भगवान हमरे बेटाक कपाड़मे ई नसिनियाँ बथाए छल। जाइ छी नहाइ लए, एकरासँ मुँह लगाएब तँ अपने मुँह खराब हएत। मुदा एकरा जाबे तक बेटासँ पिटबाएब नै ताबे तक हमहूँ सुख-चैनसँ नै रहब। हमहूँ ऐ कनसिनियाँकेँ देखा कऽ रहब, जँ बेटा वशमे रहत तँ ऐ जनानीकेँ केहन होइ छै। साउससँ जबाब-सवाल केनाइ सभ हम देखा देबै। महीस जेना नाथि देबै। पुतोहु- देखियौ यै मकरा काकी। हम सभ सुनि रहल छी। साउस कहूँ पुतोहुपर एतेक आगि-बाउल ढारै अइ यै। खिखरी माए, हमर साउस पहिने पुतोहु नै छलै की, जे पुतोहुकेँ एना सताबै छै। जँ ई बुढिया बेटासँ हमरा मारि खिया देलकै तँ घरमे यएह रहत की हमहीं रहब। झोँटा-केस हम नै उखाड़ि लेलिऐ तँ फेर की। साउस- यै, सुनियौ यै टोल-पड़ोसक लोक सभ। ऐ भत खोखरीकेँ हम कोन आगि-बाउल ढारि देलिऐ जे ई हमर झोटा-केस उखारत। कोनो हमरा कियो देखनाहर नै अए। आइ आबऽ दही बुढ़बाकेँ, नै किछु कहलकौ तँ फेर की। पुतोहु-हाँ-हाँ, देखब ने अहाँ हमर की बिगाड़ि लेब। जँ बेसी ओम्हर-आम्हर करब तँ हम छोटका भाएकेँ फोन कऽ के नैहरे चलि जाएब। तखन अहाँ अहिना असगरे चुल्हा फुकैत रहब। कहिया मरतै ई बुढ़िया, हमरा जानपर अछि। २ सगुन ठकोकाका-हर्षित बाबू। एना माथपर हाथ धेलासँ काज-राज चलैबला नै अछि। किएक तँ अपन मिथिलामे भऽ एलैए जे परम्परा, तेकरा तँ निभाबैए पड़त। किएक तँ अखुनका जइ मनसूबे चलि रहल अछि, तेकरा संग हमरा लोकनिकेँ चलऽ पड़त ने। अच्छए, खएर बात अपन समाजमे गरीब होइए वा धनिक, मुदा बेटी विवाह कोनो धरानीए भइए जाइत अछि। तइ लेल घबड़ेबाक कोनो बात नै। सभ बाबा उगना ठीक कऽ देथिन। ठीक छै तँ जाइ छी हर्षित बाबू, ठीक छै। हर्षित बाबू-आ ठको काका। हाँ कहू, की कहै छी। देखियौ जे चढ़ैत शुद्धमे बेटीक कन्यादान कऽ के हम सभ दिल्ली जल्दी जाए चहै छी। तइ दुआरे काका हम अहाँकेँ सलाह लिअ लए आएल छी। जल्दीसँ कतौ भाँज लगेबै। ठकोकाका-हर्षित बाबू। ओना हम सखबारमे एगो लड़का देखने छलिऐ, हमरा बड पसन्द आएल। लड़का बंगलोरमे इन्जीनियरिंगक तैयारी करैत अछि। बुझबामे आएल, लड़का नीक गोत्रसँ संलग्न अछि। भाव-विचार बड मधुर आ स्वभाविक सेहो छै। मुदा हर्षित बाबू, लड़का कऽ माय-बाप नै अछि, ओकरा मामा-मामी आ नाना-नानी पालने अछि। हर्षित बाबू-ठकोकाका, जँ अहाँ ओ भाँज लगबितौँ तखन तँ बुझु जे सभ ठीके-ठाक रहितै। ठकोकाका-ओ लड़का बुझु जे अहाँकेँ सेट भऽ गेल। सगुन ठीक अछि अहाँक यौ हर्षित बाबू। हर्षित बाबू-शुभ लगनमे देरी की। जे नगद लेता अओर लड़का जे लेतहिन। हम सभ देबनि दै लेल। चैनकेँ गलामे देबनि, मोटर साइकिल देबनि। मुदा ओ लड़का हमरा बड पसन्द आएल। ठकोकका, अहाँ जल्दीसँ ई चक्कर चलाउ। हमर कन्यादान भऽ जाए। जल्दीसँ सगुन लऽ कऽ जाउ, गोर लगै छी। कैलास दास जनकपुर लघुकथा लाँज सावित्री लाँज देखिकऽ छक्क पड़ि गेल। ओ जे सोचने छल ओहि सँ उल्टा नजरि अबए लागल। सावित्री लँजक ओछाओन पर बैसल छल की पवन ओकर देह पर हाथ राखि सहलाबए लगल। पवनक हाथ सावित्रीक देह पर पड़ैैत सावित्री पवनक मोनक भाव बुझि गेल आ ओ बाजल ‘पवन हम सोचने छली कि लाँज मतलब विदेश मे कामकाज करएवाला सभक फोटो रहैत होतैक आ कोना कोना विदेश मे जा कऽ लोक रहैत अछि । काम करैत अछि ओ सभ देखबैत छैक । मुदा अहाँ तऽ......’ पवन सावित्रीकेँ आओर नजदीक बैसिकऽ अपन हाथ आगाँ बढ़बैत अछि कि अनायासे देह पर हाथ पड़ला सँ सावित्री चिहुकि उठल आ पवन सँ फेर सँ कहैत अछि, ‘अहाँ की कऽ रहल छी ।’ सावित्री देह पर सँ पवनक हाथ हटबैत कहैत अछि ‘चलू लाँज देखि लेलहुँ । ’ सावित्रीके वियाह रंजनसँ भेल छल । दुनू गोटेमे बड प्रेम छल । ओकर प्रेमक चर्चा भरि गाम छल । दुनू गोटेक सुमधुर प्रेममे दू वर्ष कोना बीत गेल पतो नहि चलल । दू वर्षक क्रममे एकटा लडका भेल । बड स्नेह सँ ओकर नाम राजा रखलक । मुदा हुनकर स्वस्थ्य कहियो नीक नहि रहए । ओ चाहैत छल राजा पढिके बडका लोक बनैक । मुदा एहिके लेल बहुत पैसाके आवश्यकता अछि । रंजन गरीब तऽ अवश्य छल मुदा सावित्रीक प्रेम आ सहयोग पाबि कऽ कहियो अपने आपकेँ अभाव महसुस नहि कऽ रहल छल। एक कट्ठा घरारी आ पाँच कट्टा खेत अछि रंजनकेँ। माय—बाबु आ तीन व्यक्ति अपने लगा कऽ पाँच गोटेक परिवार अछि। दिन बितैत गेल आ परिवारिक भार सेहो बढैत गेल। एगो कमाइबला आ पाँच गोटे खाएबला। पैसाक अभाव स्वभाविक अछि। राजाक पढाइ सेहो। जेकरा सँ कर्जा लेने रहैक ओ सभ किछु दिनक बाद सेहो तङ्ग करए लागल। एक दिन तङ्ग भऽ कऽ सावित्री बाजल, ‘इहा रहला सँ कर्जा नहि सधत। बौआक पढाइक कर्जा आ पछिला किछु कर्जा सेहो अछि। बुझाइए घर पर रहला सँ कर्जा सभ नहि सधत। एक बेर अहुँ विदेश जा कऽ देखतहुँ।’ सावित्री उदास भऽ बाजल ‘कर्जा सेहो सधि जाएत आ राजुक पढाइ लिखाइ कऽ लेल....।’ ‘माय—बाबु आ अहाँकेँ छोडि कऽ हमरा कनिको विदेश जएबाक मोन नहि होइए। सुनैत छिऐ विदेशमे सेहो अब बड ठगी होइत अछि । फेर राजा सेहो छोट अछि । ताहुमे उ सभ दिन बिमारे रहैत अछि। तेएँ....।’ ‘जाइ देबक मन ककरो थोरही होइत अछि। मुदा हारने करब की? अपन सभ सम्पति बेचिओ देब तऽ कर्जा नहि सधत आ एता रहला सँ दिन-प्रतिदिन कर्जा बढिते जाएत। दू—तीन सालके तऽ बात अछि । फेर सुखे—सुख रहत। देखियो ने भण्डारीकेँ सेहो अपने जेकाँ हाल रहैक। मुदा विदेश जाइते ओकर सभ दुःख दूर भऽ गेलैए। पक्काक कोठा सेहो बना लेलक आ अपन बच्चा सभकेँ बोर्डिङ्ग स्कूल मे पढबैत अछि’ सावित्री बाजल। ‘लेकिन अहाँ बिना एक दू वर्ष की, एको दिन मुस्किल अछि.।’ ‘सुखे कोइ थोरही नहि जाइत अछि । भगवाने हमरा सभक एहन कऽ देलक तँ की करबै....।’ सावित्री रंजनकेँ समझाबके प्रयास कऽ रहल छल । ‘सएह तँ अहुँकेँ बात साँचे अछि । मुदा जाएबाक लेल तऽ कम्तिमे एक लाख रुपैया चाही ।’ ‘ओकर चिन्ता नहि करु अहाँ । विदेश जाएवालाके नाम पर जतेक रुपैया चाही ओतेक गाम मे भेट जाइत अछि ।’ किछु दिनक बाद रंजन पासपोर्ट बना विदेश चलि गेल । रंजनकेँ विदेशमे काम बढिए भेट गेल। महिनाक बीस पच्चीस हजार खाए पी कऽ बचा लैत अछि। दू वर्ष बितलो नहि छल कि ओ सभ कर्जा सधा लेलक। कर्जा सधिते रंजनकेँ बडका होबएके सपना बढैत गेल। राजा केँ सेहो जनकपुरक एकटा बोर्डिङ्ग स्कूलमे नाम लिखबा देबक लेल कहि देलक। राजा आब जनकपुरक हॉस्टलमे रहि कऽ पढय लागल। रंजन आब घर बनएबाक लेल सोचए लागल। जहिना अपन पत्नी सावित्रीसँ प्रेम छल आब रंजनके कतारमे रुपैया सँ प्रेम भऽ गेल। दू वर्ष बीतल की ओ फेरसँ दू वर्षक लेल पासपोर्टमे समए बढा लेलक। सावित्री आब असगरे भऽ गेल। राजा छलैक तऽ ओकरो संग समय कटि जाइत छल। बुढ साउस—सासुर बेसी समय खेतक कामकाज मे लागल रहैत अछि । ओना तऽ सावित्री समय काटय लेल घरमे टिवी, भिसीडी सेहो लगा लेलक। एक दिन सावित्री माछ लाबए धनौजी बजार गेल। ओतहि बजारमे सावित्रीक नैहरकेँ सहेली गीतासँ भेट भऽ गेल। दुनू गोटे घरक बातचित बतिआए लागल। बातचित करैत—करैत कोना साँझ भऽ गेल पतो नहि चलल। किछुए देर बाद पश्चिम दिससँ अन्हर तुफान जेकाँ बादल गरजए लागल। देखिते—देखिते टिपटिप कऽ पानी पडए लागल। एकाएक सावित्रीकेँ घरक याद आएल आ ओ बाजल ‘गे देखही पानिओ पड़ए लगलै? कतेक दिनक बाद भेटलेहे सेहो बतियाइ के समयो नहि छै। जो दोसर दिन बतिआएब। ’ कहि कऽ दुनू गोटे दू दिस चलि गेल। सावित्री जोर सँ झटकारैत घर दिस जाए लागल। जखने ओ बजार सँ निकलि कऽ चोउरीक गाछ लग पहुँचल की अन्हर—तुफान संगहि पानी जोर—जोरसँ पडैय शुरु कऽ देलक । एक तऽ अन्हार रहैक दोसर मे पानिके संगहि अन्हर बिहारि। एहन मे सावित्रीकेँ आगाँ बढएके हिम्मत नहि भऽ रहल छल आ ओ एगो गाछ लग जा कऽ ठाढ भऽ गेल। सावित्री असगरे गाछ लग डराएल जेकाँ ठाढ छल। अन्हर बिहारि गाछकेँ उखारि फेक देत जेना लागि रहल। गाछ छोडिके जाएके विचार होइक तऽ बुझाए हावा उड़ाके लऽ जाएत। गाछक जड़िमे सावित्री चुपचाप बैसि गेल । किछुए देरक बाद जखन अन्हर तुफान रुकल तऽ सावित्री ठाढ़ भऽ जाएके सोचि रहल छल कि बाजार दिससँ एगो साइकिलबला आबि सावित्रीकेँ मुँहपर टर्च बारलक। टर्चक छर्ररा देखिकऽ सावित्री डर सँ थरथर कपए लागल । सावित्री केँ जेना लागि रहल छल आइ हम बाँचि कऽ घर नहि जा सकब। ओ अपन चेहरा केँ छुपाबए के कोशिशमे लागि गेल। ‘अहाँ के छी। अकेले इहा की कऽ रहल छी ।’ साइकिलबला बाजल। सावित्री मर्दक आवाज सुनिकऽ आओर भयभीत भऽ गेल आ थरथराइत बाजल ‘हम एतही.., लखौरी ....जाएब । बजार आएल छलहुँ । पानी घेर लेलक तँ....’ साइकिलबला सावित्रीक नजदीक पहुँचकऽ—‘चलु हम अहाँकऽ घर धरि छोड़ि दैत छी। अहाँक गामसँ आगाँ हमरे गाम अछि औरही।’ ‘नहि ई जाथुन, हम चलि जाएब।’ सावित्री हिम्मत कऽ कऽ बाजल। ‘डराउ नहि, हम अहींके पड़ोसी छी। किछु नहि हएत।’ साइकिलबला आग्रह स्वरमे बाजल। दुनू गोटेक गाम जाएबला एकेटा रास्ता भेलाक कारण सावित्री संगहि जएबाक लेल तैयार भऽ गेल। साइकिलबला आगाँ आगाँ टर्च बारि रहल छल आ सावित्री साइकल केँ पकड़ने पाछु पाछु जाए लागल। बाटमे अबैत काल दुनू गोटेकेँ परिचय सेहो भेल । दुनू गोटे धराशयी बातसभ बतियात—बतियात गाम पहुँच गेल । ‘एतेक बतिया लेलहँु आ नामो नहि जनलहुँ, की नाम अछि’ साइकिलबला पुछलक- ‘सावित्री’ ‘अहाँक’ सावित्री हँसैत बाजल ‘पवन’ ‘जखन पड़ोसी छी तऽ चलु ने घरो दुआर तँ देखि लेब ।’ सावित्री डराइते बाजल । ‘आइ नहि फेर दोसर दिन । ओना हमर गामक चउरी आ अहाँक गामक चउरी एके छैक। काल्हि खेत पर अएबाक सेहो छैक। हमहुँ विदेशे छलहुँ। दू महिना भेल एतए आएला,’ पवन बाजल । ‘एखन जाइ दिअ, बड अन्हार लगैत छैक,’ पवन मुस्कैत चलि गेल। सावित्री किछु क्षण पवनकेँ ओहिना देखैत रहि गेल। जखन पवन ओकरा सँ परोछ भऽ गेल तखन ओकर ध्यान टुटल आ घरक कामकाजमे लागि गेल। खाना बनबैत कालमे सावित्रीकेँ अपने आप हँस्सी सेहो अबैत रहए । जखन ओ सुतल छल तऽ सोचाए लागल ‘पवन नीक व्यक्ति अछि। अगर ओ नीक नहि रहितैक तऽ बाटमे हमरा किछुओ कऽ सकैत छल। बातो बड नीक—नीक करैत अछि। लोक सभ कहैत अछि मर्द महिलाकेँ देखिकऽ हैवान भऽ जाइत अछि, मुदा सएह तँ पवन मे नहि देखलहुँ।’ सावित्री फेर सँ अपन कपाड़ झटैत ‘हुँ... ओकरा सँ हमरा कि लिअ दिअ के। जतह के छलैक ओतह चलि गेलैक।’ कपारकेँ ठोकैत ‘हमर दिमागे जे अछि नहि बिना कामकेँ सोचए लगैत अछि ।’ किछु देर बाद फेरसँ रंजन दिस ध्यान लगबैत सुति रहल । सावित्री भोर होइते खेत पर पहुँच गेल छल । ओ चारु दिस चकुआए लागल । कतौ केकरो नहि देखि रहल छल । जेना लागि रहल छल ओ केकरो खोजि रहल हुअए आ ओ व्यक्ति नहि भेटला पर उदास भऽ गेल हुअए । किछु देरक बाद सावित्री उदास भऽ घर दिस जऽ रहल छल कि पवन केँ अपन जनकेँ हल्ला करैत अवाज सुनिकऽ सावित्री रुकि गेल। जखन पवन नजदीक आएल तऽ सावित्री बाजल ‘अहुँकेँ खेत एम्हरे छैक नहि ।’ ‘हँ....इहे खेत अछि’ इशारा करैत पवन बाजल । सावित्री किछु देर रुकल आ फेरसँ घर चलि गेल । सावित्रीकेँ गेलाक बाद पवनक हृदय जोर-जोरसँ धडकए लागल। ओ सोचए लागल किछु देर आओर रुकतैक तँ की भऽ जएतै। कतेक मीठ बजैत अछि सावित्री। बुझाइए बात करिते रहती। ठाढ भऽ सोचए लागल कोनो बहन्ने सावित्रीसँ भेटबाक लेल उपाय सोचए पडत । एकदिन फेरसँ पवन बाजर दिस जा रहल छल कि ओ घर दिस रुकिकऽ इम्हर ओम्हर ताकए लागल कि देखलक सावित्री कल सँ पानी भरि रहल अछि । पवनकेँ देखिकऽ सावित्री घर दिस जाए लागल कि पवन बाजल, ‘बौआक समाचार सभ केहन अछि। बढिया सँ तऽ पढैत अछि की नहि?’ ‘छुटीमे घर लऽ अएबै । अखन जनकपुरे अछि ।’ सावित्री बजैत घरमे घुसि गेल । एक दिन सावित्री अपन खेत लग घुमि रहल छल की धराक दऽ पवन पहुँचल आ सावित्री सँ बाजल —‘अहूँ कतेक व्यस्त रहैत छी सावित्री’ कामधाम रहितैक तब ने व्यस्त। दिनभरि तँ ओहिना घरेमे रहैत छी। सोचली कनिक खेतेमे घुमि फिर ली ।’ सावित्री बाजल । किछु देर धरि सावित्री आ पवन बीच बातचित भेल । एहि क्रममे दुनू एक दोसरसँ खोलिकऽ बाजए लागल । किछुए दिनक भेटघाट सँ पवन मनहि मन सावित्री प्रति भावुक बनि गेल । एक दिन सावित्री पुछलक —‘पवन विदेश मे केहन घर दुआर सभ होइत छैक। बडका....बडका... घर दुआर सभ होइत होतैक ने।’ ‘अपना इहा केँ जे लँज सभ होइत छैक नहि ओहने —ओहने मकान सभ विदेश मे रहैत छैक ।’ पवन बाजल । ‘आइए लँज केकरा कहैत छैक.....लँज केहन होइत छैक । अपनो सभके यहाँ लँज छैक ।’ सावित्री उत्सुकता पूर्वक बाजल । ‘जनकपुरेमे तऽ लँज छैक ..। नहि देखने छियए ..। कहियो जनकपुर जाएब तऽ देखा देब ।’ पवन कनिका स्थिरसँ बाजल । सावित्रीके लँज देखबाक इच्छा जागि गेल । ओनी पवन केँ सेहो सावित्री प्रति उत्तेजना बढैत गेल । भेटक क्रम बढैत गेल । एक दिन सावित्री केँ श्रीमान् रंजन विदेश सँ रुपैया पठोलक । जखन ई बात सावित्री पवन केँ कहलक तऽ ओ मनेमन गदगद भऽ गेल आ कहलक —‘चलु जनकपुरमे रुपैया छोडा देब आ लाँज सेहो देखा देब ।’ सात्रिवी आ पवन जनकपुर आएल । सभसँ पहिने ओ प्रभु मनि ट्रान्सफरसँ रुपैया छोडौलक आ दुनू गोटे होटल मे जाऽकऽ खाना सेहो खएलक । एकरबाद पवन बाजल —‘देखियौ एहि कोठाके भितर लँज छैक । एकरा देखएके लेल किछु रुपैया लगैत छैक । चलु आइ अहाँकेँ लँजो देखाइए दैत छी ।’ पवन सावित्री के पकडएके प्रयास कएलक । ओ अपन बातक जालमे फसाबए चाहलक। कनिक देरक लेल सावित्रीकेँ रुकि जायके मोन कएलक मुदा ओकर आगुमे रंजन आ राजाक आकृति आबि गेल ओ पवनकेँ लँजमे ठेलैत सडक पर चलि आएल । ओकरा बुझाएमे चलि आएल छल एहि ठाम रुकि गेलहुँ तऽ अनर्थ भऽ जाएत सोचैत ओ सिधे गाम चलि गेल । वीरेन्‍द्र कुमार यादव लघुकथा बाबाक गाछी आमसँ लदल गाछ। बि‍नु ओगरबाहक गाछी तुलसि‍या चाँपक कछेरमे। तुलसि‍या गाममे अभि‍जात वर्गक लोक सबहक संगे एक घर अक्षोप सेहो छल। राजू मल्लि‍क ओइ अछोप परि‍वारक पढ़ल-लि‍खल युवक छल। सरकार आरक्षणक पक्षमे ओही गाम-पंचायतकेँ सुरक्षि‍त कए लेलक। गामक प्रमुख लोक सभ वि‍चार कए कऽ राजूकेँ मुखि‍या आ मोहि‍नीकेँ प्रति‍नि‍धि‍ चुनलक। मोहि‍नी ओही गामक पैघ शशि‍बाबूक पुत्र वधु छलीह। मोहि‍नीक पति‍ भरि‍-दि‍न गाँजा-भांग पीबैत, बि‍नु धि‍या-पुताक जवानि‍येमे स्‍वर्ग चलि‍ गेल। नव ि‍नर्वाचि‍त प्रति‍नि‍धि‍ सबहक सम्‍मेलन भेल, जइमे पहि‍ल बेर मोहि‍नी आ राजूक भेँट भेल। आ ई भेँट दुनू गोटेक छातीमे मीलक पथ्थर जकाँ गड़ि‍ गेल। दुनूक मोनमे एक-दोसरकेँ अपनेबाक आग सुनगए लगल। पि‍रि‍तक आतुरतामे मोहि‍नी चैत-बैसाखक रौदमे बाबा गाछी दि‍स‍ वि‍दा भेल। बाबा गाछीक बगलमे चाँपमे राजू मल्लि‍क अपन सुगर टहलाबए गेल छल। राजूपर मोहि‍नीक नजरि‍ पड़ि‍ते मोहनीक प्रीति‍ उमड़ि‍ पड़ल। मोहि‍नी जोरसँ बाजि‍ उठल- “राजू, एम्‍हर गाछक छाँहमे आउ, ओतए रौदमे कि‍एक खून सुखबै छी?” एतेक सुनि‍ते राजू दौग कऽ मोहि‍नी लग आबि‍ गेल। मोहि‍नी राजूक हाथ पकड़ि‍ कऽ लगमे आनए चालहक, मुदा राजू अपनाकेँ अछूत बूझि‍ अलग भऽ गेल। मोहि‍नी एकटा फकड़ा सुनबैत राजूकेँ अपना लगमे खींच लेलक- “प्‍यास ने मानए धोबी घाट, नीन ने बुझए टुटल खाट आ प्रीति ने मानए ओछी जात।‍” राजूक देहपर मोहि‍नीक हाथक स्‍पर्शसँ राजूक हृदए शीतल भऽ गेल आ मोनमे भेलै जे ई चमत्‍कार केना भऽ गेलै जे एतेक पैघ घरक पुत्र-वधुक लगमे हम बैस गेलौं। मोहि‍नी बाजल- “ऐ राजू अहाँ हमरा हृदैमे छी। हम अहाँकेँ ईश्वरसँ आगू मानै छी। हमर जीवनक संगी बनबाक लेल स्‍वीकार करू।” एतेक बात सुनि‍ते राजू बाजल- “ई केना होएत? अहाँ पैघ लोक छी आ हम अछूत। ओना तँ अहाँक नजरि‍ पड़ि‍ते हमहूँ ई सूधि‍ बि‍सरि‍ जाइ छी जे हम अक्षोप छी। मोहि‍नी बाजल इंसान अछोप नै होइत अछि‍। कर्मसँ लोक ऊँच आ नीच होइत अछि‍। बाबा साहेब अम्‍बेदकर जाति‍सँ अछोप छलाह मुदा ओ अपन शि‍क्षा आ कर्मसँ ऐ समाजकेँ देखौलक जे समाजक आगूक पाँति‍मे हुनक स्‍थान छन्‍हि‍।” मोहनी आ राजूक प्रेम-प्रसंग बीचेमे कलुबा जे शशि‍ बाबूक मुँह लगुआ आ चालि‍सँ चुगला छल, कि‍छु दूरसँ ई खेला देखैत पोखरि दि‍स जाइत छल। कलुआ अपन नजरि‍ पड़ि‍ते राजू डरसँ सहमि‍ गेल आ इशारासँ मोहि‍नीकेँ देखौलक। मोहि‍नी राजूकेँ हि‍म्‍मत बन्‍हैत अलग भऽ गेलीह। आ फेर भेटबाक समए नि‍श्चि‍त केलक। ऐ प्रेम-प्रसंगक चर्चा सौंसे गाममे होमए लागल। हिम्मत बान्‍हि‍ कलुआ शशि‍बाबूसँ ई बात कहैत रहनि‍ ओही समैमे गामक औरो पैघ लोक सभ आबि‍ गेल आ शशि‍बाबूकेँ उतार-चढ़ाउक बात कहए लागल। शशि‍बाबू बाजलाह- “रजुआक बाप रामा डोमकें बोलाबा भेजू।” बोलाबाक लेल गेल धीरू रामा डोमकेँ सभटा बात बतौलक। रामा डोम दारू पीब कऽ मस्‍त छल। मालि‍कक बोलाबापर रामा दौगल आएल आ दुनू हाथ जोड़ि‍ बाजल- “मालि‍कक जे हुकुम हेतै हम मानब।” कलुआ बाजल- “रे राम तूँ चारि‍ दि‍नमे ऐ गामसँ आन गाम चलि‍ जो, फेर घुरि‍ कऽ ऐ गाम नै अबि‍हेँ।” रामा डोम मालि‍कक हुकुम मानैत बाजल- “मालि‍क अहाँक हुकुमक पालन अवस्‍स करब।” ई कहि‍ रामा डोम ओइठामसँ वि‍दा भऽ गेल। घर पहुँचि‍ रामा, पुत्र राजूकेँ थप्‍पड़ मारैत कहलक- “तोरा होश-हवाश नै, एतेक जुलुम कि‍एक केलेँ।” राजू कनैत बाजल- “बाबूजी, हमर कोनो दोख नै, हम ि‍नर्दोष छी। रामाक गुस्‍सा शान्‍त भेल।” भोरबाक चारि‍ बजि‍ते बगलक गामसँ अजान सुनि‍ते मोहि‍नी घरसँ भऽ बाबा गाछी आएल। ओही गाछीमे राजू छल। दुनू गोटे गाम छोड़ि‍ चलि‍ गेल। भोर होइते ई खबरि‍ सौंसे गाम आगि‍ जकाँ पसरि‍ गेल। शशि‍बाबू गामक लोकसँ वि‍चार केलक आ थानामे अपहरणक रपट लि‍खैलक जइसँ राजू आ रामाक नाम देलक। ओम्‍हर राजू मोहि‍नीक संगे कोर्ट मैरेज केलक आ कि‍छु दि‍न अनतए रहबाक नि‍श्चय केलक। तइ बीच गामक लोक सभ रामा डोमकेँ पुलि‍ससँ पकड़बा देलक। पुलि‍स मारि‍-पीट कऽ रामाकेँ जहल पठा देलक। ई खबरि‍ सुनि‍ते राजू मोहि‍नीक संग कोर्टमे हाजि‍र भेल। रामाक जमानत करौलक आ गाम दि‍स वि‍दा भेल। राति‍मे रामा, राजू आ मोहि‍नी गाम आएल। भोर होइते सौंसे गामक लोक शशि‍बाबूक दुआरि‍पर जमघट लगा देलक। कि‍यो बाजैत- “ई डोमरा छातीपर मुँग दररि‍ रहल अछि‍।” तँ कि‍यो बाजए- “एहेन हुलुम कहि‍यो नै भेल रहए।” ऐ तरहेँ चुपचाप शशि‍बाबू सुनैत रहला। कि‍छु कालक बाद बजलाह- “हे यौ समाजक लोक सभ परि‍वर्त्तन दुनि‍याँक नि‍अम छी। काल्हि‍क ऊँच आइ गहींर, काल्हि‍क पैघ आइ बरोबरि‍। बदलैत कालक चक्रसँ कि‍छु सि‍खबाक चाही। आब अपना सभकेँ कोनो चारा नै अछि‍। मोहि‍नी ि‍वधवा पुत्रवधु छी, जन-प्रति‍नि‍धि‍ सेहो बना देलि‍यनि‍। समाजकेँ सही आ नव दि‍शा देबाक लेल प्रति‍नि‍धि‍ होइत अछि‍। अपना सभ रूढ़ि‍वादी वि‍चारक ति‍याग करू। वि‍धवा वि‍वाह होबाक चाही। संगहि‍ ऊँच-नीचक भेद-भाव छोड़ू। सभ लोक ईश्वरक संतान छी। कि‍यो ऊँच-वा-नीच नै होइत अछि‍। सभकेँ समान बुझबाक चाही। अंतरजातीय वि‍आहकेँ सरकार प्रश्रय दऽ रहल अछि‍। ऐ अवसरपर समाजक लोककेँ हम आइ साँझक ि‍नमंत्रण दइ छी। साँझमे सामाजि‍क रि‍ति-रेबाजक अनुसार मोहि‍नी आ राजूक बि‍आह होएत।” ई सभ गप्‍प कहैत शशि‍बाबू उठि‍ गेलाह आ कलुआ केर संग रामा डोमक घर दि‍स वि‍दा भेल। साँझमे राजू दुल्‍हा बनि‍ बरि‍आतीक संग शशि‍बाबूक दुआरि‍पर पहुँचल मोहि‍नी आ राजूक बि‍आह भेल। शशि‍बाबू अपन दोसर टोलक कामत परहक घर-दुआरि‍ आ जमीन मोहि‍नी आ राजूकेँ देबाक घोषणा केलनि‍। ऐ तरहेँ आधुनि‍क समता-मूलक लोक जकाँ राजू आ मोहि‍नी जीवन-बसर करैत ग्राम-पंचायतक प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करए लगलाह। डॉ अरूणा चौधरी, अध्यक्षा, मैथिली विभाग, मगध महिला कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय, पटना लघुकथा छलना ओकर नाम छलैक ‘छलना’। हम जखन-जखन ओकर नाम सुनैत छलियैक तँ आश्चर्य होइत छल जे एकर माय-बाप केँ आर कोनो दोसर नाम नहि फुरेलैक ? एक दिन संयोग सँ ओकर माय सँ भेंटि भेल। हमरा रहल नहि गेल। देखिते; पुछिये त लेलियैक- ऐँ यै अहाँकेँ आरो कोनो दोसर नाम बेटी लेल नहि फुराएल ? ओ एकटा दीर्घ निःश्वास छोड़ि हमरा दिस निर्मिमेश दृष्टिएँ तकैत चुपचाप ओतए सँ ससरि गेल। ओकर ताकब हमरा नीक नहि लागल - हम कने अप्रतिभ भए उठलहुँ। किछु दिनक बाद एक दिन छलना, हमरा सँ भेँट करए आएल गोड़ लागि पैर लग बैसि गेल। हम कतबो कहलियैक - उपर सौफा पर बैसि, मुदा कथिलए, ओ ओतहि ओहिना बैसल रहल। बड़ी कालक बाद नहुँ-नहुँ बाजल-अपना ऑफिस मे हमरा नौकरी नहि रखा देब! बरू दाइएक काज करब, खुब मन लगाकए काज करबैक, ककरो शिकाए तक मौका नहि देबैक। हम अहाँ केँ अप्रतिष्ठा नहि होमए देब। एके साँसमे ओ समटा बाजि गेल स्वर कने मध्यम, मुदा उत्साह आ उमंग सँ भरल ओकर हृदयक भावना हमरा वंशी जकाँ खींच रहल छल। ओकर बाजब; ओकर शुद्ध-शुद्ध उच्चारण सुनि आश्चर्यचिकित भेलहुँ- पुछलियैक; किछु, पढ़लो-लिखल छैं ? ओ मुड़ी निहुरौने बाजल हँ, बी.ए. पास छी सुनि जेना हम आकाशसँ खसलहुँ। विश्वासे नहि भए रहल छल ओकर बातक। सोचय लगलहुँ-स्त्रीक घरसँ बहराएब, आजुक स्त्री शिक्षाक बात, सरकारक प्रयत्न, महिलाक उत्थानक प्रति लोकक मानसिकता, जागरूकता, वैश्वीकरणक पराकाष्ठा-भक टुटल-देखैत छी ओहिना पैर लग निहुरल बैसल अछि, छलना। हमरा अनुमान छल-कहुना ‘क’ ‘ट केँ पढ़ि लैत होएत भरिसक। मुदा ई एहन साधारण कद-काठीक छौड़ी एतेक पढ़ल होएत से त’ सपनहुँ मे नहि सोचने छलहुँ। गाम मे पढ़ाई कएने छें ? बाजल-पूना मे बाबू छलथि, ओतहि उच्च विद्यालय सँ मैट्रिक पास कएलहुँ मुदा बाबू चलि बसलाह। बाबूक कमाईसँ कहुना घर चलैत छल। ताहि पर सँ हमर पढ़ाईक खर्च हुनका बड़ शौक छलनि जे बेटी पढ़ि-लिख बडका ऑफिसर बनए। हमहु मने-मन सपना देखैत छलहुँ। मन लगा पढैत छलहुँ जे बाबूक विश्वास नहि टुटैन्ह। मैट्रिक अब्वल नम्बर सँ पास कएलहँु। वजिफा भेटल तँ सपरिवार खूब प्रसन्न भेल। मन मे आन्तरिक सन्तोष भेल जे हमर पढ़ाईक चिन्ता सँ बाबू फारिग भए जएताह ओहिना हुनका पर अपन सात बहिनक दायित्व छलनि। बाबू भाई-बहिन मे सब सँ जेठ। जखन सब छोटे रहथि-हमर दादाक मृत्यु भए गेलनि। ता धरि दसमे मे पढ़ैत छलाह - धरक भार आ बहिन सभक बियाहक समस्या सँ विचलित छलाह। पढुआ कक्का पूनाक एक बैंक मे चपरासीक नौकरी लगवा देलखिन्ह। ताहि सँ सातो बहिन यथासाध्य वर-घर कए निश्चित भए गेलाह। बाबू पारिवारिक दायित्व सँ चैन भए अपन व्यक्तिगत जीवन दिस अग्रसर होइत माय केँ गाम सँ पूना बजा लेलखिन। तीनू गोटा सुख-सुविधा सँ रहए लगलहँु- माय घर सम्हारय, बाबू बैंक आ हम निश्चित सँ कॉलेज...... एक दिन कॉलेज सँ आबि बैग-बस्ता रखिते छलहुँ कि मकान मालकिन स्वर सुनलहुँ - कतए छीयै बैंक सँ फोन आएल अछि- बैंक मे डकैती भए गेल छैक, किछु गोटे घायल अछि, किछुक मृत्यु भए गेल छैक। करेज कांपए लागल मोन सशंकित भेल- की भेलैया ? दौड़लहुँ बैंक दिस। पता लागल बाबूकेँ गोली लागल छन्हि आ ओ अस्पताल मे छथि, खून बहुत बहि गेल छनि, हमर खून देल गेलनि मुदा हमर खून हुनका बचा नहि सकलनि। हमर सबहक दुनियाँ उजड़ि गेल। माए एहि दुःख सँ एखन धरि उबरि नहि सकल अछि। ओकर अन्तर्मन मे कतहुने कतहु बाबूक मृत्युक एकटा कारण हमहुँ छियैक। कारण लगैछ जेना माए सोचैत छल-आब तीन-गोटेक छोट-छीन परिवार, गाम मे रहब-थोड़-बहुत जमीनक उपजा-बाड़ी सँ गुजर-बसर करब। मुदा हमर पढाई आ बाबूक आस, ओकर मोनक बात पूरा नहि भए सकलैक। बाबूक लालसा छलनि, हमर खूब-पढब-लिखब आ खूब नीक वर-घर मे विवाह, करएबाक-लगैत अछि जेना अर्थाभाव मे बहिन सभक विवाहक कमी’ हमर विवाह धनी-गणमान्य परिवार मे कराए पूरा करए चाहैत छलाह। अपन हृदयक टीस केँ हमर उज्जवल भविष्यक निर्माण सँ दूर करए चाहैत छलाह। माएक गाम मे रहबाक इच्छा केँ हमर उज्वल भविष्यक निर्माण सँ दूर करए चाहैत छलाह। माएक गाम मे रहबाक इच्छा केँ मोनमे दाबि बैंक मे नौकरी करिते रहि गेलाह। के जनैत छल जे विधिक विधान एहन होएत ? एहि असामयिक घटना सँ माए जेना माटिक मूरत भए गेल। मृत्युक समाद सँ गम्मी लादि देलक कोनो प्रतिक्रिया नहि, निर्विकार भाव सँ लोकक मूँह तकैत रहैत छल। आस-पड़ोसक लोकक प्रयास सँ ओकरा येन-केन प्रकारेण सामान्य अवस्था मे आनल गेलैक तखन जे ओ क्रन्दन कएलक से कहि नहि, सभ लोक भाव-विहुल भए उठल। कनेक शान्त भेलाक बाद, ओ हमरा गारि-श्राप देमए लागल-ओकर मुँह सँ अन्तिम बहराएल शब्द छलैक-छलना। अपन एहि नवीन नामकरणसँ हमहुँ शत-प्रतिशत सहमत छी कारण नहि हमरा पढ़ैक उत्कंठा रहितए आ नहि बाबूक मोन मे हमर उज्जवल भविष्यक एतेक महत्वाकांक्षा त हम सभ माएक इच्छानुसार गाम चलि गेल रहित हुँ आ हमरा माएक जीवनक संग एतेक टा छल नहि होएत ?

ओकर तँ जीवने उजड़ि गेलैक ! एहने आशा विहीन अन्धकारमय जीवनक कल्पनासँ ओ पुनः जेना बौक भए गेल। एखन ओ सामान्य लोक जकाँ क्रिया-कलाप करैछ किन्तु दिमाग ओकर सुन्न भए गेल छैक। संग रहैत अछि मुदा अनभुआर चलैत-फिरैत, हिलैत-डोलैत कठपुतली सन। हम, अवाक भेल बडी काल धरि ओकर एकतरफा बार्तालाप आ घटना सुनैत रहलहुँ चुपचाप। मोन दुखी अशान्त अखिन्न भए गेल। तथापि एखनो मोन मे जिज्ञासा बनले रहल ओकर नाम की छियैक? हम पुछिये बैसलियैक गे तोहर असली नाम की छौक? ओ मुड़ी निहुरौने उत्तर देलक ‘आशा’।

 डॉ. अजीत मिश्र, मैसूर। लघुकथा व्यथा ‘भाग, भाग एहि ठामसँ, नहि तँ कोनो दशा बाँकी नहि रखबौक, इह मुँह जे लगैत छनि, भागि जो, नहि तँ कान-कपाड़ फोड़ि देबौक’- बंगला भाषामे किछु एहने-एहने वाक्य सुनितो हम अत्यन्त स्थिर भए ओहि रोगीकेँ सान्त्वना दैत कहए लगलहुँ- ‘हे अहाँ घबराउ जुनि, सभ किछु ठीक भए जाएत। मात्र किछु काल स्थिर भए रहू।’ हमर एहन कहला पर ओ आर जोर सँ बपहारि काटए लगलीह, किछु काल लेल तँ हमरो लागल जे कोन कार्यमे फँसि गेलहुँ, मुदा फेर अपनाकेँ मनबैत हुनका शान्त करबाक प्रयास करैत रहलहुँ। मुदा ओहो कोनो एम्हर-ओम्हरकेर माटिसँ नहि बनलि छलीह, लागल जेना भगवान हुनका बनएबामे अपन सभ कलाक प्रयोग कएने छलाह। हमसभ एक दिस आ ओ रोगी दोसर दिस, जे करीब पच्चीससँ तीस वर्षक सुन्दर कायाक एकगोट महिला छलीह, जनिक व्यथा देखि सम्पूर्ण कम्पार्टमेन्टक लोक व्यथित छल, सभ केओ राम-राम, शिव-शिव कए रहल छलाह जे कहुना नीक नहाँति ओ रोगी खड़गपुरधरि पहुँचि जाथि। आइ लागि रहल छलैक जे खड़गपुर हावड़ासँ सए नहि, हजार कीलोमीटर दूर हो। हम एक बेर फेर अपन ज्ञान झाक प्रयोग करबाक निर्णय कए रोगी लग जाए अत्यन्त शान्त स्वरेँ हुनका कहलिएनि– ‘देखू, हमसभ आब मात्र किछुए कालमे खड़गपुर पहुँचि जाएब आ अहाँक उचित प्रतिकार प्रारम्भ होएत। ओतए नामी डॉक्टरसभ आबि अहाँक चिकित्सा करताह, जँ यात्रामे जएबाक योग्य होएब तँ आगाँ चलब, नहि तँ ओतहि उतरि आपस अपन घर चलि जाएब। मुदा एहि एक घंटाक लेल हम किछु दवाइ दैत छी, तकरा मुँहमे राखि जँ अहाँ बीस मिनट धरि किछु नहि बाजब तँ तत्काल अहाँक कष्ट दूर भए जाएत आ हमसभ सेहो गन्तव्य धरि पहुँचि जाएब।’ हमर ई कथन कार्य कएलक, ओ हमर आदेशक पालन प्रारम्भ कए देलनि। हम कहलिएनि- ‘कनी मुँह खोलू तँ, जीहकेँ उपर करु, हँ, हँ, चित्त भए केँ पड़ि रहू।’ हमर सभ आदेशक ओ शतश: पालन कए रहल छलीह। ठीक एहने समयमे मन पड़ि आएल मैथिली साहित्यक प्रसिद्ध एकांकी ‘छींक’, जाहिमे एकटा बंगाली डॉक्टर मैथिलक चिकित्सा कएल करैत छथि, एतए हमरा उनटा अवसर भेटि रहल छल। बंगालीक चिकित्सा एक मैथिलक हाथेँ। हम ओहि एकांकीक किछु डॉयलागकेँ स्मरण कए ओतए प्रयोगमे आनब प्रारम्भ कएल, ‘जुआन’ कहने ‘यौवन’क सन्देहक कोनो डर नहि छल, तेँ निश्चिन्त भावेँ हुनक जाँच प्रारम्भ कएल। हुनक जाँच कएलाक बाद हम एकटा दवाइ हुनकर मुँहमे दए एकबेर फेर बीस मिनट धरि नहि बजबाक आग्रह कएल। किछु काल धरि तँ ओ स्थिर रहलीह, मुदा बीच-बीचमे हुनक आह हमरासभकेँ आहत कए रहल छल। भगवानक रक्ष जे हमसभ खड़गपुर एही स्थितिमे पहुँचि गेलहुँ, ओतए पूर्व सूचना रहबाक कारणेँ रेल विभागक किछु प्रसिद्ध चिकित्सक अपन दल-बलकेर सङ उपस्थित रहथि। गाड़ी रुकतहि ओ सभ ओहि रोगीक लग पहुँचि अपन औजार-पाती सरिआबए लगलाह। ओ सभ अपन कार्यमे लगबे करितथि कि रोगी बहुत जोरसँ चिचिआइत गाड़ीसँ नीचाँ उतरबाक लेल गेट दिस दौड़लीह। सभ हाँ-हाँ करैत हुनका पाछाँ लागल, मुदा ओ तँ एकहि छरपानमे प्लेटफॉर्म पर उतरि चिचिआइत रहलीह। हुनक एहन स्थिति देखि चिकित्सक दलक सङ-सङ परिजन दौड़लाह। मुदा ओ रोगी ककरो अपना लग आबए देबाक हेतु तैआर नहि, ओ जोर-जोरसँ बंगला भाषामे किछु चिचिआ रहल छलीह। एक तँ अस्वस्थता आ दोसर स्टेशनक चहल-पहल, हुनक कोनो वाक्य ककरो बुझबामे नहि आबि रहल छल। एहि उहा-पोहमे विचित्र स्थिति भए गेल, एक दिस गाड़ीकेँ खोलबाक व्यग्रता तँ दोसर दिस रोगीक असहजता, ककरो किछु फुरिए नहि रहल छलैक। रोगीक पति द्वारा बीच-बीचमे सहटबाक प्रयासो कएला पर ओ आरो जोरसँ चीत्कार मारि उठथि। आब हमरहु रहल नहि गेल, नीचाँ उतरि ओहि रोगीक दिस ताकल। हमरा तकला पर लागल जेना ओ रोगी अपन व्यथा हमरासँ बाँटि रहल होथि। किछु आशान्वित भए हुनका दिस बढ़लहुँ, ओ निरपेक्ष रहि हमरा दिस तकैत रहलीह। एतबा कालमे हम हुनका लग पहुँचि गेल छलहुँ, आग्रह-अनुरोध करैत ओहि डॉक्टरक दलकेँ चलि जएबाक हेतु कहि रहलि छलीह। हुनक कहब छलनि जे हम एहि डॉक्टरसभसँ नहि देखाएब, ई सभ हमरा मारि देत। हमर सभक एहि वार्तालापक क्रममे हुनक पति सेहो लगमे आबि गेल छलाह। रोगी एक झटकामे बढ़ि हुनका चेतौनी देब प्रारम्भ कएलनि- “जतबा काल ई डॉक्टरसभ नहि चलि जाएत, हम गाड़ीमे चढ़बे नहि करब, हमरा एहि डॉक्टरसभसँ नहि देखएबाक अछि। हमरा सङ तँ एहेन सुन्दर डॉक्टर छथि, तनिका छोड़ि आब हम ककरोसँ नहि देखाएब।” हुनक एहन कहबाक सङ हमर रोइयाँ ठाढ़ भए गेल, हुनक पति सेहो हमरा दिस किंकर्त्तव्यविमुढ़ भेल देखए लगलाह। हमरा दुहूक स्थिति विचित्र भए गेल छल। हम हुनका बुझबैत कहलिएनि- “देखू, सभ विभागक अलग-अलग डॉक्टर होइत छथि, अहाँ केँ जे बीमारी अछि, तकर हम डॉक्टर नहि। ओकर डॉक्टर तँ ओएह सभ थिकाह, तेँ नीक होएत जे अहाँ हुनकासँ देखबा लिअए।” “नहि, नहि, एहन नहि भए सकैछ। अहाँ डॉक्टर छी ने ? बस हम देखाएब तँ अहीँसँ, नहि तँ ककरोसँ नहि।” एहि बीच गाड़ीक एटेन्डर सेहो आबि हुनका बुझएबाक प्रयास कएलक- ‘एहि डॉक्टरसभसँ देखा लिअए, ई तँ सङमे चलिए रहल छथि, जँ आवश्यकता पड़त तँ ई फेर देखबे करताह।’ मुदा एहि सभक हुनका पर कोनो प्रभावे नहि पड़ि रहल छलनि। ओ अपन जिद्द पर अड़ल रहलीह। अन्तत: रेलवे विभागक ओहि डॉक्टर दलमे सँ एकगोटए हमरा सभक सङ भुवनेश्वर धरि लेल सङ कए देल गेलाह, जाहिसँ बाटमे विषम स्थिति अएला पर उचित प्रतिकार कएल जाए सकए। गप्प एहन छलैक जे हम हावड़ा-मैसूर स्पेशल रेलगाड़ीसँ मैसूर जाए रहल छलहुँ। गाड़ी खुजतहिँ हमर अगिला कम्पार्टमेण्टमे हल्ला-गुल्ला मचि गेल। पछाति पता चलल जे एकटा रोगी ओही गाड़ीसँ भेल्लोर जाए रहल छथि, जनिक स्थिति बड़ गड़बड़ा गेल छनि। हुनका संग चलनिहार व्यक्तिक संग-संग देखनिहार-सुननिहार सभ केओ चिन्तित छलहुँ। ओ विचित्र प्रकारक रोगी छलीह, कष्ट तँ ठीके छलनि, मुदा ओ भगल सेहो खूब कए रहल छलीह, जकर अनुमान प्राय: सभ यात्रीकेँ भए रहल छलनि। सभकेँ आश्चर्य लागि रहल छलनि जे हुनक परिवार एहन रोगीकेँ लए एतबा दूर किएक जाए रहल छथि। ओहि रोगीकेँ एकदम ठीक-ठाक रहैत एकाएक एहन दौड़ा अबैत छलनि, जाहिमे ओ अपन सभ किछु बिसरि घोर कष्टमे पहुँचि जाइत छलीह। हुनक परिवारक कहब छलनि जे करीब तीन महीनासँ हुनक इएह स्थिति छनि, गामसँ शहर धरिक प्राय: सभ नामी-गरामी डॉक्टरसँ जाँच भेल, मुदा बीमारीक पता नहि चलि सकल। अन्तत: हारि-थाकि भेल्लोर जाए जाँच करएबाक योजना बनाओल गेल। एही क्रममे हावड़ासँ गाड़ी खुजलाक दसो मिनट नहि बीतल छलैक कि हुनका ओएह दौरा आबि गेलनि। सभ केओ चिन्तित भए उठलाह, तखने अपन आगाँ राखल यात्रीगणक लिस्टमे हमर नामक आगाँ डॉक्टर लागल देखि ओहि बॉगीक एटेन्डर हमरा समक्ष आबि कहि उठल- ‘सर एक मिनट प्लीज’ एकाएक एटेन्डरक मुँहसँ बंगलामे एहन वाक्य सुनि पहिने तँ चौकलहुँ, मुदा फेर ओकरा अनुसारेँ अपन सीटसँ उठि ओकर लगीच गेलहुँ। ‘ की यौ की गप्प छैक’ - हमहूँ मैथिलीमे पूछि देलियैक। ओ कनी आर लगीच आबि कमे जोरसँ फेर बंगलामे पूछलक- ‘की अपने डॉक्टर छिऐक?’ हम किछु उत्तर दितियैक ताहिसँ पूर्व एकगोट युवक सेहो हमरा सभक बीच आबि अत्यन्त जिज्ञासु भए हमर उत्तर सुनए लगलाह। हम फेर मैथिलीमे कहलिऐक- ‘औजी हम डॉक्टर तँ छी, मुदा दवाइ-बारीक नहि, हम तँ पोथी-पतराबला डॉक्टर छी।’ हमर एहन कहला पर ओहि दुहूक सपना टूटबाक प्रत्यक्ष दर्शन हमरो भेल। दुहू गोटए माथ पकड़ि लगक सीट पर बैसि गेल, आ हम किंकर्त्तव्यविमुढ़ भेल हुनका सभकेँ देखैत रहलहुँ। किछुऐ क्षणक बाद जेना ओहि एटेन्डरकेँ कोनो उपाय सुझलैक, ओ अत्यन्त तीव्रताक संग उठि फेर हमर लगीच आएल आ फुसफुसाइत कहि उठल- ‘सर, अपने तँ पोथी-पतराक डॉक्टर छिऐक, पोथी-पतरातँ सभकेँ मार्ग देखबैत छैक, की अपनहुँ हमरा सभकेँ उचित बाट देखा सकैत छी?’ ओ निरपेक्ष भावेँ सभ किछु बाजि गेल आ एम्हर हम भँवर जालमे फँसैत गेलहुँ। हमरा तँ किछु बुझबामे आबिए नहि रहल छल, हम कोन आ कोना बाट देखेबैक, से फुरिए नहि रहल छल। एहि बीच तेसर व्यक्ति सेहो उठि ठाढ़ भए हमर लगीच आबि एकटक हमरा देखि रहल छलाह। हम तीनूगोटए तीनूक प्रतीक्षामे रही जे आब ओ बजताह तँ ओ। मुदा सभकेओकेँ ठक्कमुड़ी लागि गेल छल। अन्तत: हमहिं चुप्पी तोड़ैत ओहि एटेन्डरसँ पूछि बैसलिऐक- ‘औ की गप्प छैक, कनी फरिछाकेँ तँ कहू, जाहिसँ ओहि समस्याक समाधान ताकल जाए, जाहि हेतु अहाँ सभ अत्यन्त व्यग्र छी।’ हमर एहि वाक्यक ओहि दुहू व्यक्ति पर अत्यन्त प्रभाव पड़ल। फेर हमरा जे कहलनि से सुनि हमरा तँ बुझू साँप सुँघि लेलक, डेग ने आगू बढ़ि रहल छल आ ने पाछू, ने हँ कहैत बनैत छल आ ने नहि कहैत। एही उहापोहमे फँसल हम किछु मिनटक हेतु आँखि मुनि बैसि रहलहुँ। एक दिस छल परहितक मामिला तँ दोसर दिस छल छद्मक आसरा। एकक रक्षा कएने दोसरक अहित भए रहल छलैक, किछु फुरिऐ नहि रहल छल। एकाएक जेना हृदयक कोनो कोनसँ एकटा उहि आएल आ तनि ठाढ़ भए ओहि दुहू व्यक्तिक अनुसारेँ ढोग करबाक निश्चय कए लेल। हुनका सभक कहब छल जे हम तत्काल पोथी-पतड़ा छोड़ि दवाइ-बीरोक डॉक्टर बनि हुनक रोगीक परीक्षण करी आ तत्काल किछु उपाय ताकी। एतबा सूचना तक तँ हम निरपेक्ष बनल रहलहुँ, मुदा हुनका सभसँ अग्रिम जे सूचना भेटल ताहिसँ एहि छद्म रुप धरबाक योजना बना लेल। ओ सभ कहलनि जे एहि रोगीकेँ कष्ट तँ अवश्य छनि, मुदा ताहिसँ बेसी छनि शंकाक बीमारी। जँ हुनका उचित रुपेँ बुझाओल जाए तँ हुनक विषम कष्टकेँ थोड़ेक कालक हेतु रोकल जाए सकैत अछि। ई सूचना हमरा सोचबाक हेतु बाध्य कएलक जे जखन जीवने एकटा नाटक थिक तँ एहि तरहक नाटक कएने कोनो हर्ज नहि। इएह सभ सोचि हम अपन स्वीकृति हुनका सभकेँ दए देल आ बाट भरि डॉक्टर बनि ओहि मानसिक रोगीक उपचार करैत रहलहुँ। एहि क्रममे कखनो हींगोली तँ कखनो पचनोल, कखनो कॉफी बाइट टॉफी तँ कखनो अल्पेनलीभक ‘डोज’ दैत काठपाडी स्टेशन धरि पहुँचि गेल छलहुँ, जतए उतरि ओ रोगी अपनाकेँ पूर्ण ठीक मानि अस्पताल जएबासँ मना कए रहलि छलीह। हमर गाड़ी सीटी देलक आ हम छड़पि अपन गाड़ी धएल। अफरा-तफरीमे ओहि व्यक्तिक फोनो नम्बर नहि लए सकलहुँ, जाहिसँ हुनक बादक स्थितिक पता चलि सकितए। एक दिस तँ अपना माथ पर जीतक मुरेठा बान्हल देखि गद्-गद् भए रहल छलहुँ, मुदा हृदयक कोनो कोनमे एखनहुँ ई व्यथा छल जे की हम ठीक कएलहुँ? जगदीश प्रसाद मण्‍डल लघुकथा- इमानदार घूसखोर चुनमुन बाबूकेँ सभ जनैत, चाहे ओ आम आदमी होथि‍ वा कचहरीक वकील, मुंशी, कि‍रानी, चाहे इनटेलि‍जेन्‍स  वि‍भागक अफसर होथि‍ वा प्रशासनि‍क, जे ओहन घूसखोर जि‍ला भरि‍मे कि‍यो नै छथि‍ मुदा ईहो सभ जनैत छथि‍ जे जि‍नगीमे कहि‍यो अपन इमान नै डि‍गौलनि‍। जि‍ला सत्र न्‍यायालयक प्रथम श्रेणीक जज चुनमुन बाबू छथि‍। अोना हुनकर असल नाओं सुरेन्‍द्र  प्रसाद छि‍यनि‍ मुदा दादीक पहि‍ल पोता रहने उपहार देल नाओं चुनमुन छि‍यनि‍ जे पछाति‍ बाबू जोड़ा गेलनि‍। उर्फ कए कऽ अपनो चुनमुन बाबू लि‍खते छथि‍ जे नेमप्‍लेटमे सेहो छन्‍हि‍। ओना बहुतो, प्रेमचंद आ दि‍नकरजी सन भेलाह जि‍नकर असली नाओंसँ बेसी लोक उपनामेकेँ जनैत छन्‍हि‍। बच्‍चेसँ चुनमुन बाबू इमानदारीक ि‍नर्वहन करैत आएल छथि‍ जेकर फलाफल सेहो जीवि‍तेमे भेट रहल छन्‍हि‍। पढ़ै-लि‍खैमे एते इमानदार रहलाह जे कहि‍यो मौलि‍क रचना छोड़ि‍ नोट-फोटक सहारा नै लेलनि‍। जइसँ सभ दि‍न नीक रि‍जल्‍ट होइत रहलनि‍। ओना सुभ्‍यस्‍त परि‍वार रहने कहि‍यो अर्थक अभाव सेहो नहि‍ये भेलनि‍। मुदा अपनो पढ़ैमे एते इमानदारी रखैत छलाह जे शि‍क्षकसँ परि‍वार धरि‍ नजरि‍मे रहलाह। एम.ए; एल.एल.बी. कए प्रथम श्रेणी जि‍ला सत्र न्‍यायाधीश बनलाह। चारि‍ भाँइक बीच सए बीघासँ ऊपरे जमीन छन्‍हि‍ जइमे तीन भाँइ नोकरी करै छथि‍ आ एक भाँइ देवेन्‍द्र प्रसाद गि‍रहस्‍थी करै छथि‍। गि‍रहस्‍थीक अर्थ खाली खेति‍ये करब नै, बल्‍कि‍ परि‍वारकेँ संचालि‍त करब सेहो होइत, जे छलनि‍। नोकरिहरो भाँइ सभकेँ नै बूझि‍ पड़नि‍ जे खानदानी परि‍वारमे कनि‍यो कतौ घून-घान आकि‍ दि‍वार-गराड़ लागल अछि‍। परि‍वारक ऐ काजमे चुनमुन बाबूक वि‍चार काज केलकनि‍। ओहए कहलखि‍न जे जखन हम सभ तीनू भाँइ नोकरी करै छी तखन खेत आ परि‍वार देवेन्‍द्रक भेलनि‍, जइ दि‍न हमसभ रि‍टायर भेलापर‍ आएब तइ दि‍न अगि‍ला वि‍चार करब। मनमे ईहो रहनि‍ जे जखने हम सभ खेत बाँटि‍ लेब तखने ढेर तरहक बि‍‍हंगरा उठत। एक तँ ओहि‍ना जमीन जाल छी तइपर भैयारीक तँ आरो महाजाल। जे सम्‍पति‍ आइ धरि‍ मान-प्रति‍ष्‍ठा बनल रहल अछि‍ वहए गाड़ा-घेघ बनि‍ सभटाकेँ धोइ-पोछि‍ एकबट्ट कऽ देत। जखन जि‍नगीमे माने-प्रति‍ष्‍ठा नै तखन जि‍नगि‍यो तँ एक्‍सपायर डेटक दबाइसँ बेसी कि‍छु नै। एक तँ अोहुना समए ि‍नर्धारि‍त अछि‍ जे कते उमेरमे बेटाक बि‍आह आ कते उमेरमे बेटीक बि‍अाह करक चाही, तहूमे देहक लक्षण आगूमे ढाढ़ भऽ जाइ छै। से सुरेन्‍द्रक पि‍ता गौड़ीनाथ सेहो केलनि‍। जखन सुरेन्‍द्र प्रसाद बी.ए.मे पढ़ैत छलाह तखने बि‍आह कऽ देलखि‍न। कहैले तँ ईहो अछि‍ जे जखन पढ़ि‍-िलखि‍ अपना पएरपर ठाढ़ भऽ जाइ तखन बि‍आह करैक चाही, मुदा जइठाम पएरपर ठाढ़ होइक बेवस्‍थे नै रहत तइठाम कि‍ सभ अवि‍वाहि‍त बनि‍ बबाजि‍ये भऽ जाए। कओलेजक अवस्‍थामे सुरेन्‍द्र प्रसाद रहथि‍ मुदा मि‍सि‍यो भरि‍ मनमे नै उठलनि‍ जे अखन बि‍आह अनुचि‍त हएत। साहि‍त्‍यसँ दि‍लचस्‍पी रहबे करनि‍ तहूमे मध्‍ययुगीन साहि‍त्‍यसँ बेसी रहलनि‍ तँए मनमे चप-चपि‍ये रहनि‍। पि‍तोक मनमे कहि‍यो दहेजक लोभ नै उठलनि‍ जे नीक शि‍क्षा पाबि‍ नीक नोकरी भेटलापर नीक दहेजो भेटै छै। सामान्‍य गि‍रहस्‍त परि‍वार जकाँ अपन दायि‍त्‍व बूझि‍ समैपर काज समेटि‍ लेलनि‍ कि‍अए मनमे उठि‍तनि‍ जे बेटाकेँ पढ़ैमे बाधा उपस्‍थि‍त हेतनि‍। तँए मन खुशीसँ खुशि‍आइते रहनि‍। एम.ए.क पहि‍ल सत्रमे जखन सुरेन्‍द्र पढ़ैत छल तखन जौंआ बेटी भेल। नैहरेमे पत्नी रहथि‍न। ओना साले भरि‍पर दुरागमन भऽ गेल रहनि‍। जौंआ बेटी देखि‍ माएक मनमे तँ कनी सोगो पैसलनि‍ मुदा नानीक मनमे तते खुशी रहनि‍ जे सोल्हो आना नाति‍ने पाछू बेहाल रहए लगली। खुशीक कारण रहनि‍ जे तेहेन जुग-जमाना भऽ गेल अछि‍ जे अनेरे लोक बेटाक आशा करैए, तइसँ नीक बेटि‍ये। जँ बेटीकेँ नाति‍ नहि‍ये देखत तैयो जँ दुनू बेटीक जि‍नगी-जान रहलै तँ कहि‍यो माएकेँ थोड़े दावाइ-दारू आकि‍ कपड़ा-लत्ताक दुख हुअए देत। अपनो पहि‍रन जँ दैत रहतै तैयो सभ दि‍न हराएले रहत। तहूमे तेहेन कपड़ा सभ बनि‍ रहल अछि‍ जे तीन साल तक नबे रहैए, आ चलत कते दि‍न तेकर कोनो ठीक छै। सुइटर बि‍नैक लूरि‍ सि‍खा देबै, भरि‍ बाँहि‍सँ लऽ कऽ अाधावाहिंक तते दैत रहतै जे दस-दसटा साटि‍ कऽ पहि‍रत। कि‍ करतै माघक जाड़। ओना सुरेन्‍द्रक माइक मनमे सेहो खुशि‍ये रहनि‍ जे भगवान अपना कोखि‍मे बेटी नै देलनि‍ तँ कि‍ हेतै पोतीक कन्‍यादानक बाट तँ खुजि‍ये गेल। जे नारी एकोटा कन्‍यादान नै केलक ओ चाहे जे हुअए मुदा माइक एक सूत्रमे कम जरूर रहत। जि‍ला सत्र न्‍यायालयक न्‍यायाधीश बनि‍ जुआइन करए सुरेन्‍द्र प्रसाद आइ जेताह। असीरवाद दैत माइयो आ पि‍तो कहलखि‍न- “बौआ, नमहर काजक भार उठबए जेबह तँए नमहर बनि‍ काज करि‍हह।” माता पि‍ताक असीरवाद सुनि‍ सुरेन्‍द्र कि‍छु नै बाजल मुदा मनमे एकटा प्रश्न घुरि‍आए लगलनि‍, जे माए बूझि‍ गेलखि‍न। तोसैत कहलखि‍न- “बौआ, सभ दि‍न एकार बनि‍ पढ़लह-लि‍खलह मुदा अपन परि‍वार अपने आगू नीक होइ छै तँए पत्नि‍यो आ चारू कनटि‍रबि‍‍योकेँ संगे नेने जाह।” सोझामे गौड़ीनाथकेँ देखैत तँए सुरेन्‍द्र कि‍छु बाजए नै चाहैत मुदा मन गुनगुनाइत जे माए बूझि‍ गेलखि‍न। बजलीह- “बौआ, अपन बच्‍चाकेँ अपने देख-रेखमे पढ़ाएब बेसी नीक होइ छै, सेहो हेतह, आइ-काल्हि‍ देखै छि‍ऐ दूधे लगसँ बच्‍चा हटि‍ जाइ छै। दोसर हमरा सबहक आशा कते दि‍न करै छह, सेहो सीखल नै रहतह तँ अगि‍लाकेँ कि‍ सि‍खेबहक। मनमे होइत हेतह जे पि‍ता कि‍ कहताह मुदा नोकरीक अर्थ तँ ई नै ने होइ छै जे गामे छोड़ि‍ देब, परि‍वारे छोड़ि‍ देब। मौका-मुनासि‍ब अबैत-जाइत रहि‍हह। बेटा धन छि‍अह, तोरा माल-जाल जकाँ थोड़े डोरी बान्‍हि‍ राखल जाएत। ई होइत हेतह जे परि‍वार टूटि‍ जाएत, से भ्रम हेतह। भदवारि‍ मासमे हि‍मालयक पानि‍क मि‍लान समुद्रसँ भऽ जाइत अछि‍ जे अनदि‍ना माने आन मौसममे धार कमजोर वा सुखने  छूटि जाइत अछि‍ मुदा फेर भदवारि‍मे कि‍ देखै छहक। परि‍वार एक धार छी जेकर प्रवाह स्‍वच्‍छ पवि‍त्र बनि‍ अनवरत सामाजि‍क दि‍शामे बहैत रहए यएह ने भेल। छाती सक्कत कए कऽ घरसँ जाह।” अखन धरि‍ सुरेन्‍द्र प्रसाद छाती सक्कत करबक अर्थ खाली कहावते धरि‍ बुझैत छल मुदा माइक असीरवादक शब्‍द मनमे हौंड़ मारलकनि‍। छाती सक्कत करब बाता-बातीमे सक्कत करब आकि‍ काजमे सक्कत करब, वि‍चार सक्कत करब आकि‍ पवि‍त्र वि‍चार सक्कत करब, पवि‍त्र वि‍चार संग पवि‍त्र जि‍नगी सक्कत बना चलब आकि‍ सक्कत मनुष्‍य बनब। समुद्रक पानि‍ जकाँ जते डुबकुनि‍याँ मारैत तते अथाह दि‍स डुमल जाइत। अनायास मनमे उठलनि‍, आएल शुभक लगनमा शुभे हे शुभे...। माइक शुभ बात सुनि‍ शुभेक्‍क्षु नजरि‍सँ दलदलाइत सुरेन्‍द्र बाजल- “माए, तोहर असीरवाद शि‍रोधार्य अछि‍। मुदा समस्‍यो तँ जि‍नगीक बाधक बनि‍ दानव जकाँ अबैत रहै छै।” आेना सुरेन्‍द्र खुशीमे दहलि‍ गेल छल जइसँ ऐ वि‍चारपर नजरि‍ नै गेलनि‍ जे बड़का जंगलक कातमे पहि‍ने झाड़े-झूड़ रहै छै जइमे छोट-छोट जानवर बास करैत अछि‍। तहि‍ना ने मनुक्‍खोक बोन छै जइमे पहि‍ने छोटका जीव-जन्‍तु रहैत छै। चुपचाप भेल पि‍ताक मनमे नचैत जे जूरशीतलक अछींजल जकाँ, घरसँ नि‍कलि‍ दोसराक सेवामे जा रहल अछि‍ कि‍ ओकरा बसाओत आकि‍ उजाड़त। मुदा बि‍नु गहन लगने अनुमानि‍ते ने हएब। जहि‍ना कओलेजक पहि‍ल दि‍न, सासुरक पहि‍ल भेँट, दोस्‍तीक पहि‍ल मि‍लन भेने स्‍वत: हृदए डगमगाए लगैत, जे सुरेन्‍द्रो प्रसादकेँ कार्यालय पहुँचते हुअए लगलनि‍। नव-नव संगी सभ आबि‍-आबि‍ भेँट करए लगलनि‍। संगि‍यो बेसी ओहन नै, जे समतूल हुअए। मुदा सुरेन्‍द्र अवाक। सोझे नमस्‍कारक उत्तर नमस्‍कारमे दैत रहलाह। मात्र हाजरी बनाएब छलनि‍ तँए काजक भारो बेसी नहि‍ये। संगी सभ कमि‍ते असकरे रहि‍ गेलाह। मनमे परि‍वार आ दरमाहा संगे सोझा-सोझी उठलनि‍। दरमाहा तँ सीमि‍त परि‍वारक स्‍तरक हि‍साबसँ बनैत छै, तहूमे जे देश जेहेन रहल ओकर ओइ तरहक बनै छै। पाँच गोटेक परि‍वारमे छह गोटे अखने छी। तहूमे चारि‍टा बेटि‍ये अछि‍। समाजो तेहेन अछि‍ जे दहेजक सवारी कसबे करत। घर भाड़ा, बि‍जली-पानि‍, इन्‍कम टेक्‍स इत्‍यादि‍ कटि‍ये जाएत तखन हाथमे कते आओत? महगी अपना चालि‍ये चलबे करै छै। तहूमे तेहेन लफड़ल डेग पकड़ि‍ लेने अछि‍ जे मध्‍यवर्गीय जीवन धारक मोनि‍ जकाँ चकभौंर लऽ रहल अछि‍। मन वि‍षसँ बि‍साइन हुअए लगलनि‍। ओना काज नै रहने कार्यालय समैसँ पहि‍ने छोड़ब पहि‍ल दि‍न उचि‍त नै हएत। कुरसीक मुरेड़ापर मुड़ी अॅटकौने अकास दि‍स देखैक कोशि‍श करैत रहथि‍ मुदा कार्यालयक छतमे रोकाएल रहनि‍। चारि‍ बजे कार्यालयसँ नि‍कलि‍ सुरेन्‍द्र प्रसाद सोझे डेरा दि‍स वि‍दा भेलाह। रंग-बि‍रंगक टीका-टि‍प्‍पणी रस्‍तामे होइत। कि‍छु नीको कि‍छु अधलो। परदेशमे पति‍ कमेताह, से खुशी पत्नी सुनैनाकेँ रहबे करनि‍। चारू बेटीक बीच सुनैना यक्षि‍णी जकाँ पति‍क आगमनक प्रति‍क्षा बेर-बेर नजरि‍ उठा-उठा करैत। ओसारपर पति‍केँ पहुँचते सुनैना मुस्‍की भरल नजरि‍क तीर छोड़लनि‍। पगलाएल मन सुरेन्‍द्र प्रसादक। जि‍नगीक समस्‍यासँ पगलाएल। ओना कि‍यो खुशि‍योसँ पगलाइत अछि‍ तँ कि‍यो दुखोसँ। मुदा सुरेन्‍द्र पगलाएल रहथि‍ अपन आगूक जि‍नगीक समस्‍यासँ। अपनाकेँ संयमि‍त करैत बेटीक हाथ पकड़ने कोठरी पहुँचला। पत्नी चाह अनलनि‍। दुनू गोटे चाह पीबैत गप-सप शुरू केलनि‍। अपन आमदनी देखबैत सुरेन्‍द्र बजलाह- “अपन परि‍वार भेल जेकर आमदनी सत्तरि‍ हजार महि‍ना भेल, तइमे घर भाड़ा, इन्‍कम टैक्‍सक संग कतेको जमा करैक सूत्र लागल अछि‍। घर केना चलत से तँ अपने दुनू गोरे ने वि‍चारब।” जेना सुरेन्‍द्र प्रसाद अपन मोटा पत्नीपर पटकए चाहलनि‍ तहि‍ना पत्नी भोली-बौलक गेन जकाँ उनटबैत बजलीह- “देखू हमर कुल-खनदान एहेन नै रहल जे केकरो अधि‍कार छीनत। जे काज अहाँक छी ओ अहाँक भेल आ जे हमर छी ओ हमर भेल। छह मास पछाति‍ पेटक बच्‍चाक दुख माइये बुझैत अछि‍ बाप थोड़े बूझत। आकि‍ कहि‍यो कि‍छु कहबो केलौं।” दू-हत्‍थी बौल फेकैत सुरेन्‍द्र बजलाह- “कहलौं तँ बेस बात मुदा पढ़लौं-लि‍खलौं दुनू गोटे फुट-फुट इसकूलमे, सभ दि‍न रहलौं फुट-फुट मुदा धीया-पुता तँ सझि‍या भेल कि‍ने, तखन देह छि‍पौने काज चलत?” सुनैना अपनाकेँ कमजोर पबैत बजलीह- “अहाँक जे वि‍चार अछि‍ से बाजू जे अनुकूल हएत मानि‍ लेब जे नै हएत अोकरा तत्‍काल रखि‍ लेब।” एक गंभीर चि‍ंतक जकाँ सुरेन्‍द्र बजलाह- “जते हमरा दरमाहा भेटत ओ अहाँ हाथमे दऽ देब। अपना वि‍चारे परि‍वार चलाएब।” नोकरीकेँ जि‍नगीक धार बूझि‍ परि‍वारक सवारी नावपर चढ़ा भवि‍ष्‍य दि‍स बढ़लाह। मनमे उठलनि‍ जे एक बेर पत्नीकेँ पूछि‍ लि‍यनि‍ जे केना घर चलाएब मुदा मनकेँ मने रोकि‍ कहलकनि‍ जखन कुल-खनदानक रक्षक छथि‍ तखन कि‍छु बाजब उचि‍त नै हएत। अपना लेल सोचब नीक हएत। चलैत धारमे नावकेँ हवा-बि‍हाड़ि‍, पानि‍-पाथरसँ सामना करए पड़ै छै। जखने वेतनक भीतर परि‍वार चलत, तखने एक वान्‍हल परि‍वार जकाँ आगू बढ़ब। जहि‍ना समाज अपन रोग अपने अराधि‍ लेलक जइसँ  सभ रोगा गेल तखन अपन रोग के देखत। मुदा एहनो तँ रोग होइते अछि‍ जाधरि‍ दोसर नै बुझैत ताधरि‍ दोसरकेँ नै कहल जाइत। कमा कऽ परि‍वारमे आनब पत्नी देखबे करतीह, आमदपर आमद देखि‍ चसकबे करतीह, जते चसकती तते लोक देखबे करत। कोनो कि‍ केकरो आँखि‍ सीयल छै जे नै देखत। मुदा बेटा-बेटीक बि‍आह-दान -पढ़ा-लि‍खा सक्षम बना जि‍नगीमे उतारैक अवस्‍था धरि-‍ जँ नै कऽ लेब तखन कोन मुँहे समाजमे जीब। नीक हएत जे जहि‍ना होशि‍यार रोगी दवाइये दोकानपर दवाइ खा लइए आ घरपर अनबे नै करैए, तेहने जँ उपाए होइ तँ नीक हएत। नजरि‍ काज दि‍स बढ़लनि‍। कोन एहेन कोर्ट-न्‍यायालय अछि‍ जइमे काजक बोझ नै पड़ल अछि‍। आनसँ भि‍न्न अपन पहचान बनबैक प्रश्न अछि‍। मनक उत्साह जगलनि‍। कार्यालय संग डेरामे काज करब। काज बढ़ौने जँ कि‍छु हथि‍आइयो लेब तँ ओते अनुचि‍त नै हएत। जँ से नै करब तँ परि‍वार साधारण नै असाधारण रूपमे ठाढ़ भेल अछि‍। खेनाइ-पीनाइसँ लऽ कऽ पढ़ौनाइ-लि‍खौनाइ धरि‍ तँ बेटे-जकाँ हएत। पढ़ाइ समाप्‍त होइते वा होइपर रहि‍ते बि‍आहक भूत कपारपर चढ़ि‍ जाएत। ई काज केकर हेतै? तखन? जाधरि‍ प्रति‍कूलकेँ अनुकूल बना नै चलल जाएत ताधरि‍ सड़क परक गाड़ी जकाँ दुर्घटनाकेँ के रोकत। जहि‍ना ओकाइतसँ भारी ढेंगकेँ बाँसक जोगार लगा उनटा-पुनटा घुसकाओल जाइत अछि‍ तहि‍ना उनटबै-पुनटबैक जोगार करए पड़त। मुदा अनुचि‍त रूपमे? नहि‍! कदापि‍ नै!! तखन? हँ तखन अछि‍ जे अपन काज की अछि‍? यएह ने जे लोकक झगड़ाक मुकदमाक ि‍नर्णए करब। जेकर नोकरी करै छि‍ऐ ओकर काज अनकासँ बेसी करब। यएह जि‍नगीक पहि‍चान हएत कि‍ने। अनेरे कि‍अए एते मुकदमा कोर्टमे पड़ल अछि‍। महि‍नामे बीसटा मुकदमाक फैसला करब। जहि‍ना सभकेँ सभ ओझरबैक पाछू लगल रहैत अछि‍ तहि‍ना ने कोटो-कचहरी भऽ गेल अछि‍। ओना काज करैक दि‍शा सभकेँ र्नि‍धारि‍त अछि‍ तखन कि‍अए ने अपन बाट पकड़ि‍ तेज गति‍‍ये चलब। संकल्‍पि‍त होइत मन ठमकलनि‍। केकर फैसला करैक अछि‍ ओकरे ने जे अपन बात अपने नै बूझि‍ अनेरे ओझराइत आबि‍ गेल अछि‍। एकक ओझरीसँ दोसर ओझराएल अछि‍। जहि‍ना रग्‍गड़ करैत आबि‍ गेल अछि‍ तहि‍ना हमहूँ दू-चारि‍ रन्‍दा चला आरो चि‍क्कन कऽ देब। बीसटा केसक फैसला मासक काजक संग डेढ़ लाखक ऊपरी आमदनी सेहो करब अछि‍। दुनू पार्टीसँ पाइ लेबै। जेकरा पक्षमे हेतै ओ अपने भेल आ जेकरा वि‍पक्षमे हेतै ओकर घुमा देबै। केकरो संग अनुचि‍त नै करब। मुदा लोको तँ शेतानक चरखि‍ये अछि‍, जे वि‍चारलौं से चलए देत कि‍ नै। कि‍अए ने चलए देत? चरखीकेँ चरखा बना घुमाएब तखन अनेरे ने सभ सुधरि‍ जाएत। मुदा चरखीकेँ चरखा बनत केना? हँ कि‍अए ने बनत? जखने काजमे तेजी आनब तखने ने काज मुँहथरि‍ लग पहुँचत। हँ मास-दू मास फोंक जाएत मुदा तेसर मास अबैत-अबैत तँ गर पकड़ि‍ये लेत। जखने केसक बहस करा फैसला करैक स्‍थि‍ति‍मे आओत, तखने ने ससारैक गर भेटत। तीन-तीन दि‍नपर तारीख देबै अनेरे ने मासे ि‍दनमे ठहि‍या कऽ लि‍खाइ-फीस जमा करत। चुनमुन बाबूक दस बर्ख नोकरी पुरि‍ गेलनि‍। अनढड़न फुलवाड़ीक फूल जकाँ चारू बेटी खि‍लए लगलनि‍। तइपर अनढड़न भगवान तीनटा बेटी आ दूटा बेटा आरो देलकनि‍। मुदा पति‍-पत्नीक बीच सि‍नेहमे कमीक पेंपी पोनगए लगलनि‍। सुनैनाक मन कनैत जे भगवान तते धीया-पुता दऽ देलनि‍ जे के कतए बौआएत तेकर ठीक नै। तेहन जुग-जमाना भऽ गेल जे नि‍हत्‍था बाप-माए बेटीक पार-घाट केना लगाओत। अपने (पति‍) कहि‍यो एक पाइ अनुचि‍त नै कमाइ छथि‍ कि‍ समाज हमरा छोड़ि‍ देत। बि‍नु दहेजक बि‍आह बेटी सबहक हएत? कतए सँ आओत। ओना पत्नि‍क मलि‍न चेहरा देख चुनमुन बाबू परखैक परि‍यास करैत छलाह मुदा लाख समस्‍याक बीच सुनैना पति‍ लग पत्नि‍ये जकाँ रहैत छलीह। काजक भार पति‍पर छेलन्‍हि‍‍हेँ। बेसी समेओ ने भेटैत छलनि‍ जे बेसी बातो करि‍तथि‍। दोसर साँझ, चाह नेने सुनैना पति‍क हाथमे दैत आगूमे ठाढ़ भऽ गेलीह। जहि‍ना देवालयमे भक्‍त कि‍छु याचना करए ठाढ़ होइत तहि‍ना सुनैना भऽ गेलीह। सुरेन्‍द्रक मनमे मि‍सि‍यो भरि‍ जि‍नगीमे प्रति‍कुलता नै। एक घोंट चाह पीब सुरेन्‍द्र बजलाह- “मन मन्‍हुआएल देखै छी?” ढलान पाबि‍ जहि‍ना पानि‍ ढलकि‍ जाइत तहि‍ना ढलकैत सुनैना बजलीह- “एक तँ भगवान बेइमान भेला जे केकरो रोटि‍योपर ने नून केकरो बोरे-बोरे नून दइ छथि‍न। नअ-नअटा बाल-बच्‍चाक परि‍मार्जन करब नान्‍हि‍टा खेल छी।” सुनैनाक वि‍चार मुँहसँ नि‍कलबो नै कएल छलनि‍ तइ बीचेमे सुरेन्‍द्र बजलाह- “खेल-खेल‍ खेलौं।” कहि‍ चुप भऽ गेलाह। आँखि‍ उठा पत्नीक आँखि‍पर अँटकबए चाहैत छलाह मुदा रोगाएल-सोगाएल-पीड़ाएल सुनैनाक आँखि‍मे सुखाइत जि‍नगीक बालुक टीला छोड़ि‍ आर कि‍छु ने देख पड़ैत छलनि‍। कामिनी कामायनी लघुकथा कठजीब नाम त’ हुनक पिता पितामह बड़ दीव ‘अन्नपूर्णा’ धयने छ्लखिंन्ह ,मुदा कपार , कत्त के अन्न आ’ केहेन पूर्ण ? आ’ शने;शने; लोक वेद हुनक नाम के छोट करैत करैत ,अंत मे पुरनी दाय बना क’ भरि टोल कि भरि गाम लेल जेना निश्चित करि देलकइ। हुनक आबक रैन बसेरा वा घर जे कहि दादे कका के गोहाली छल । ओ त’ आब अपने नै छलाह ,काकी छलखिन्ह।त’ हुनके आग्रह प’ ओ जखन अपन पिता के डीह स उपाड़ी फेकल गेली त’ हुनक अनंत धार नॉर के पोछै लेल नबकी काकी अपन आचरि बढ़ोने छलखिन्ह ।अप्पन झोरा झपटा   ,गेरुआ ,सीरक ओछोंन बीछोन टूटलाही फूटलाही कासा ,पितड़िया बासन उसरगलहा लोटा  सब सईत समेट क, रखलन्हि।आ’ ओहि दिन स  ओ हुनक अघोषित अड्डा । भरि टोल मे दु चारि त आँगन एहेन छल जतए हुनक बैसब उठब छल ।मुदा हेम क्षेम त’ सबस ।बड़ कम लोक हुनका अनेरे बइसल वा तमसाइत देखने होयत ।सदिखन कोल्हू के बरद बनल काज मे जुटल ,पाईन बुनि के हुनके चिंता, टहटहौवा रौद के हुनके चिंता , रोपनि  कटनी के हुनके चिंता ,ससुर बाइस बेटी के भार साठे के हुनके चिंता , दुरगमनीया कनिया के अहिब के फड़ बनबए के हुनके चिंता ,भरि गाम के नौतल हकारल अहिबाती  के तेल सिनुर परसब के हुनके चिंता ,पाहून पड़क के आव भगत के हुनके चिंता, एतबा नहि परसौती के दबाए रानहब ,सोइरी मे चिल्का चिलकोड़ लेल चमाइन बजाएब ,किसुनमा दोकान स चीज़ वोस्तआनब   केकरो कोनटा लागि क सीआईडी गिरि करब   , सत पुछू त’  हुनक चिंता अनंत छल ।नई  घर , , नई घराड़ी   आगा नाथ नई पाछा पगहा , , तखन माथ प’ एतेक बोझ  ,, , । तखन जे नहीं करबे पापी पेट , , । ‘दाय    सुने   छथिंह  ,   कनी सोनरबा ओत चली जाथु , , ,एखन धरि नंकिरबा के कानक कुंडल नहीं पठेलकई । , , कखनों  कोनो गाम बाली बाजि उठेक “ये दाय  ,कनी डोमबा के ओत जाकय चारि टा सूप  ,, कोनिया ,डगरा आ’ दुई टा चलनी लेल समाद पठा देथुंह ‘ ,, मुनेशरा के कहने रहिए मार बाढ़ेन्न जरलहबा के अपन ससुरारि मे जाकए बईस  रहलई , , कहथीन कनी परसू भिनसरे पठा देतय’।   आधा घोघ आधा मोड़त काढ़ने कोनो भौज दूरखा स’ झकैत बजा लईत छलिह ‘दीदी , , एखनि धरि संजुआ के बाबू नै एलखींन जोगबन्नी से , ,बड़का गाम बला ,जमाए आबि क’ द्लान प’ बईसल छथिन्ह,घर मे किछू कत्तों नै , , ,एक कप चाह  देबए से नई दूध ,नई चाहक पत्ति , , ,कनी किसुनमा के दोंकान मे ई फुलही थारी बंधकी राखि क’ किछू पाए ल’आबौथ आ’ कनमा भरी घी आ’ मखान सेहो ल’ लिहथि’। आ’ हुनक ई सहयोगात्मक  काज गामे टा  मे नहीं अटकल छल ।दु ई कोश दूर मधबन्नी सहर  “दाय  ,, पर पाहून लेल तुलसी फूल चौर निघटी गेल छईक, , दुइयों सेर ल’ लिहथि , नारिकेरक तेल , कडु तेल ,हींग ,किनको खरपा, टकुआ ,लहठी ,टिकुली ,सिनुर , बांग , फुइस फड़क ,लटखुट ,चरखा,बेलना ,पापड़, पटिया ,, ,जेठक कड़ कड़कडौआ  रौद , , माथ प’   पथिया मे बड़का बोझ रखने  , ,धिपईत कारी स्याह पघिलल पिच रोड , , , पएर मे नै कोनो चट्टी   , , ,घामे पसीने अपस्यात , , सबहक चीज बोस्त किन बैसाही क’ आनि दैत छलिह त’ ओय दिन हुनक बड़ मान, कियो कियो बियेन स’ हौंक सेहो दैन । दिन त’ दिन ,घोर निशा रैतियो मे हुनक निस्वार्थ सेवा लेबा स’ लोक नहि हीचूके ।संकराति के दोसरे राति धीरुवा के पेट मे मोचाड उठलई , , जे ओ छर पट्टी काटय लागल ,, ,घर  मे सुतल अहि खाट प’ कखनो   माए के उठाबै  त’ कखनो ओहि खाट प’ सुतल काकी के , ,।अलसायल ,ओंघाएल दुनु बिछाऊँन प’ पडल पडल बजलथी ‘की होएछो?’ “माए गे बाड़ी जाएब’।  आब त’ दुनु के नींद पड़ेल ।ललटेंमक टेमी उकसबईत माए बजलिह ‘भरी दिन हुरईत रहेत अछि आ’ सुतली राति मे हिनका दिशा फिरबा के ज़ोर मारे  छैन ।अहि जड़ काल मे ,अनहार मे ककरा  उठबिए’ ।काकी के तुरंत फुरेलेंह ‘पुरनी दाय के कहथुन नै’ । “आब के जेतय गोहाली हुनका उठाबै’ । माए कनी ओकताएल सन बजली त’ पितीयानि हाफ़ी लईत सीरक तर स’ बजली “ बिसरी गेलखिन ईएह त’ कहने रह थीन  जे आय कोनो पुरुख पात द्लान प’ नै छै ओसारा प सुति रहबई ,कहथून नै’।  माए सेहो सिरके तर स’सोर  पाड़ली  ‘ दाय , ,यई पुरनी दाय , , ,यई मरि गेलहू की जिबते छी’ ।मुदा हुनक स्वर बाहरि के घोर अंधकार स’ एकाकार होइत शून्य मे बिला गेल छल।इमहर धीरुवा पेट पकड़ने अहि कोन स’ ओहि कोन  मोंगरी माछ जका तड़फैत, , घरे मे भ’जायत गे , , दे ललटेंम , ,हम एसगरे जायब , , मुदा ललटेंमक प्रतीक्षा सेहो नहीं करि सकले आ’ जिन जका दौड़ीक बाड़ी के केवाड़ी खोली चुकल छल ।माय हदबदा  क’ उठली , , ‘भरी दिन अगत्ति धिया पूता के चक्कर मे कनी काल चैन स’ पड़िओ नही सकैत छि राइतो मे सेह’ । आ ओसारा प’ आबि भीम जका फोंफ काटेत दाय के देह हिल्बइत बजली ‘यई भिशिंड़ जका सुतल छी ,, क तेक मोट निन भ’ गेल   , कुंभकरंक कान कटल्हू ,’।दाय हड्बड़ा क’ उठि बैसली ‘की भेले  ,की भेले’ ।त’ माए बजल खिन ‘हे ते की अंगोरा , , धीरुवा अन्हारे मे भागले बाड़ी दिस , डोलमे पानि लक  कनी जाथुन, हैया लीअ ललटेंम’ ।बोरा ओढने खालिए पएर भुतहा बाड़ी मे डोल नेने चलि गेल छलिह। दाय के खेनाय कखनों  अहि आँगन स’ कखनों ओहि आँगन स’ भेटय ।स्त्रीगन सभक कहबी छल जे ओ जीभ के बड़ पातर  ,ओना सब कीछू भकोसी जाए छथी  ,सब किछू मे की , , जेना  चारी दिनका मटकूड़ि मे सड़ल दही ,ट्टायल खाजा  ,बज़्जर भेल ठकुआ  ,, आ’ कटहरक को स’ ल’ क’ ओकर कामड़ी नेरहा धरि । आ’ पचि सेहो जायन्ह ।आकड़ पाथर पचाबए वाला जीब ,गज़ब के पाचन शक्ति ।  दुपहरिया क’ बइसारी मे स्त्रीगन सब हुनक पाचन शक्ति के एक स’ एक उदाहरण दैत हस्सी ठठा करैत अपन मोंन बहटारई छलिह। भरि दिन काज ‘यै दाय ,कनी हमर राहड़ी राखल छै उलैल  , दस सेर लगीच  दरड़ि देथुंह कनी  ,कनी अरबा चौर क चिक्कस सेहो पीस दिहथी कतेक दिन स’  बंभोलिया के बगिया खेबाक मोन करैत छै’.।आ’ दाय टोलक भौजी स’ ल’क’ हुनक पुतहुओ सबहक अड़हैल काज मे दासोदास भेल ।कखन भोर होए आ’ कखन सांझ ,,के जाने । कखनों काल जौ कोनो काज नै त’ जनानी के बइसारी मे कोनो अधलाह काज  वा झगड़ा फसाद के गप्प प’ कोनो पुतहु बाजि उठए ‘ई काज पुरनिए दाय के भ’ सकैत अछि ,’ वा ‘ई लुतरी लाड़ब मे वएह ओस्तद छथीन’।सेहो परोछ मे नै मुहे प’ ।दाय गुमसुम भ’ जायथ, , कखनों “ह ह हम कीएक कहबई , ,सप्पत खुआ लीय’ ।मुदा हुनका त’ पूतौह सभक टोंट आ’ अपमान सहबा के जेना आदति पड़ी गेल छलैन । काज तिहारक घर मे दाय के काज पानक लत्ती जका लतरल चलल जाए ।कखनों सिनेह स’ त’ कखनों आदेश स’ तिरस्कार स’ लोहछल बोल स , “ऐ यै  ,देखियोन्ह त’ हिंकर सौख , , किदन कहबी छै जे  , ,जेकरे दादा  ,, मर बाढ़्नि ,बिसरिओ गेलिये  ,उठु ,ई अदौड़ी खोटय अहाँ की बैसि रहलहु बौवासिन सब जेंका , ,जइयो कनी गुवरबा के कहने आबिओ बीस सेर दूध काल्ही भोर स’ भोर पहुँचा दै आँगन मे  ,” “ ललबा  अखन धरि नै एलई बजार स’ चौक प’ दारू तारु त’ नै पीबए लगलई ,कनी देखथुन त , आ हे  जों भेटईन्ह त’ कहिहथी जे हम ओकरा नानी गामक बाट मोंन पड़ा देबई जखनहमारा स’ पईच लेब आयत” ।  आ’ पुरनी दाय  ,भुट्ट ,कनी मोट गर गेंद जका अहि ठाम स’ ओहि ठाम गुड़कइत ।मौसम चाहे कहनों होय लोक के त’ अपन बेगरता पुर हेबा क चाही।ओय हुईल मालि मे केदन त’ हुनका खाय लेल पुछैन्ह ,आ’ सांझे मे खाइतथि त कोन जुलुम भ’ जेतय । जहिया ककरो  आँगन मे काज तिहार रहए ,ओय दिन हुनक मैल नुआ के जबर्दस्ती हटा क’ साफ सुथरा व नब नुआ अपन आसन जमा लईत छल ,दाय के त’ छवि सेहो बदलि जायन्ह।ओ थुस्स स’ नई कत्तों बईसइथ, अपन पएर प’, पीढ़ा प’ चौखटी प’ ,पटिया प  ,नब नुआ नई मैल भ जाए । अहि नुआ के एवज मे मास मास दिन धरि रातिदिन खटनाइ  ,अहि बीच जों केकरो खड़ सेहो छुबए लगथि त’ घरक मलकाइन चिचिया उठेथ ‘हे लोक सब देखियोन्ह चक्र चालि हिनकर , ,नब नुआ देलीयेन्ह भोजन बेर मे दौगल ओतिह  , आ’ काज क’ बेर दोसरा के आँगन सूईझ रहल छनहि , ,कनिओ धाक छईन आखि मे’। आ’ एकर ओकर काज करि क’ पेट भरब के प्रक्रिया सुखद त’ नहीये रहल हेतइक।हिनका हुनका आँगन स थारी गोहाली मे पहुँच त’जाए आ’ के जाने अहि मे कोनो दिन उपासे सुइत रहैत हेती । लाचार बेसहारा अनिश्चित जिनगी के एक टा बडका ऐब सेहो गहूम मे सूड़ा जका सेनहियाएल छल हुनका मे ,आंखि बचा क’ कोनो बोस्त इमहर स’ ओमहर  करब के , बड़का चीज क त्तय ,मुदा किछों, , ।आ’ ककरो गरुड पुराण सुनबा काल जखन पंडित जी क’ प्रवचन चलै ,कोन पाप के कोन दंड भेटैत छै नरक मे , चोरनी के नाम प, दाय दिस ताकि ताकि क’ स्त्रीगन  सब मुसके ,एक दोंसरा के बीट्ठू कटे ,।एकर आभास भेला के बावजूदों दाय निर्विकार भाव स’ अपन बड़का बडका आंखि ,नाक ,कान सब के एक सीध मे राखि क’ कथा  वाचक् के  चरण कमल मे बकोध्यान लगौने बइसल । टोलक कोन मे अपन सहोदर भाय भाउज , एकटा बहिन ,सेहो बाल विधवा  ,, सासुर स’ देउर  आयल छलेनह लेब’ त’ अपन जनक् क प ए र छानि  कानए लगलिह दहो बहो कि हम आब नहीं जायब ओहि नगर ,। माए बाबू बेटी के दुख देखबा मे अपना के असमर्थ बुझेत कनीए दिन मे धरती स’ अलोप भ’गेलथि ,आ’ भोजाय नामी नट्टीन्न, , भाय घरबाली के मुट्ठी मे ,। पहिने त’ सब कियो संगे रहे छलथि,  कतबों गुहागिज्जी होए ,मुदा ओय दिन नही जानि कोन गप्प प’ झगड़ा झाटी भेलय ,आ’ पटलपुर वाली हुनक सिकी मौनी, अड़जाल खड़जाल नुआ ,झोरा आदि सबटा निकालि दिरघु कका के खरिहान मे फेंक देलखिन ।गोबर स’ घर आँगन नीप क’ गंगाजल छीट डंका के चोट प’ ई उद्घोषित करी देलथी जे पुरनी दाय ह मरा लेल मुइल छथि। तहन बास के दईतन्हि ,नबकी काकी के छोड़िए क’ ।गोहाली मे त’ आब गाय बरद छै ने । योग्य पूत सब  ,किओ कीछू बिगाडिओ नै सकेत छल । मुदा सहोद्र भाय लेल हुनकर अनुराग रहि रहि क’ चुबै न   , ,छोट छोट भातिज भतीजी सब के इमहर उमहर स चोरएल ,नुकेल समान द’ दैत ।राइत बिराति सबहक आंखि बचा के ओकर आँगनो चली जाथि।भौज सेहो आब तेहन डाहीन नहि रहल छली । ‘नुनु (छोट भाय ) कतदन पड़ा क’ चलि गेलय ,नई खाय के ठेकान नई पीबय के, धिया पूता सब बिलटी रहल छै” ।ककरो ओसारा प बइसी जखन ओ विलाप करैत त’ लोकक मों न खिन्न भ जाए “ऊह फुटली आंखि नै देखेत छनही आ’ हिनक व्याकुलता देखियौन्ह”। एक राति पटोर बाली काकी चुप्पे पएर दाबि हिनका पाछा अपन आँगन मे अयली ,त’हींकर करनी देखि हुनका सौसे देह मे खौता फुकि देल कैन “हे ,हे ।हे दाय , , की करैत छी?”  कनी कड़गर सन स्वर मे बजली ,त’ ओ घबड़ा क’ मड़ुआ के ढेर प’ख़सी पडली आ’ हुनक मुंह स निकसि गेलन्ह “मड़ुआ चोरबे छी”। भिनसरे सौसे टोल मे हल्ला भ’ गेले ‘दाय मड़ुआ चोरबे छली राति मे’ ।मुदा हुनका लेल धन सन ,ओ मजगुत प्राणी ,ओमहर इमहर बुलैत टहलेत ,कोनो कोनो काज् क ब्योंत मे अपना के एना खटबईत जेना ई कथा कोनो आन के भ’ रहल होय । पराग कका  बनारस मे रहेत छला ,माए  के देख चारि दिन लेल आयल छ लैथ,नबका धुइस छ्लेन्ह ,, , बड़  गरम ,  , ,जाड़क मास ,घर मे अलगन्नी प रखने छलथी ,कतेक ताकल गेल  ,धरती गिड़ गेलै की अकास खा गेलै,  कत्तों ने भेटलै ।ओ अहुरिया काटि क’ आपस छली गेलाह बनारस । “घर स आखिर लेते के ?’आ’ शक के सुइया सदी खन दाय प’ जा क’ अटकीजाए ,मुदा प्रमाण की ?’ आ’ एकटा धाक सेहो ,फुइस अकंड़ नई उठाबी ककरो ,।कियो इहों बाजी उठेक , ‘जाय  दिओ गरीब ,अबला  छ थिन्ह ,पराग बाबू के एकबाल बनल रहौक ’।  “मुदा ओ केलखिन की ? ओढ़ेत बिछबइत त किओ नहीं देखलख’ । “भौजाई के द’ आएल हेती राताराती’। आ’ सब किओ बईस क’ अपन अपन मगज मारी करी क’ गहीड श्वास छोड़ैत मौन भ जायथ। हुनका खेनाय देबा मे त’ सबके अखरए लगे ।नीत रोगी के पुछै के ,, भाति भाति के फकड़ा पढ़ल जाए ।एक दिन क’ पाहून के तरुवा तीमन ,स चार लगा क’ लोक खुवा देत छै,मुदा नीत दिन ,”  । क हुना करि क’ हुनका सोझा थारी पठा दैल जाए छल।केकरो भुखल ने रखबा चाहि ,धर्म के नाम प, कर्तव्य के नाम प’ हुनका खेनाय भेटन्ह । मुदा ओय दिन जखन दुरगमनिया कनिया के पाजेब कोहबरे स’ हेरा गेले तखन त’ हुनक सौस महेशक माए के तामसे जेना बुट्टी बुट्टी चमकय लगलन्ह  ‘ई जुलुम आब ने सहबा जोगर छैक ,महेशक विवाह में नबका नुआ देने छलियेन्ह” ।ओ अहिना अगिया बेताल छलिह,तुरंत फाड़ बान्ह वाली  ज़नानी । भानस चढ़ल चुल्ही प’तेकरा छोड़ि झटा झट बढ़ ली गोहाली दिस ,अपना पीठ प’ चारि ज़नानी के फौज नेने ।चीज क’ नाम प’ गेरुआ खोल मे डोरी लगा क’ एक टा झोरा ,दुई तीन टा नुआ,एक गोट चादरी,केथरी,आ’ एक टा खूब मोटगर सन गेरुआ ।सब टा मैल चिक्कट ,कखनों काल साफ करैत ,इमहर ताकल,ओमहर ताकल ,अहि दोग देखल ,ओई दोग देखल,। माटि मे त गाड़ि क’नहि रखने छथी,मुदा तेहन कोनो चेन्ह नहि देखाय । एक जन के जे अपना के जासूस क महतारी बुझैत छलिह,के नजरि मोटका गेरुआ प’अटकल छल ,समस्त भीड़ के उक्साबईत बजली ‘गेरुआ के देखू नै’ । नेता के आदेश के पालन तुरंत होब लागले ,आय जेना महान रहस्यक उदघाटन होबए जा रहल छल ,अहि समाजक सब स’ भ्रष्ट आ’ पतित ,चोर क’ चारित्रिक हनन होबि रहल छल ,प्रमाणक संग । गेरुआ के सियों न खोलल गेल, तेकरा निच्चा फेर मुंह बन्न,,आखिर मे सर्व सम्मति स’ गेरुआ के फाड़ी देल गेल ,आब ओत ठाढ़ ज़नानी सबहक  आंखि फाटल रही गेलय ,केकर सरौता,केकर पनबट्टा,केक्कर नुआ, केकर आंगी, साया, केकर कुर्ता,  ,, मुदा पाजेब कत्तों नहि निकललै ।  दाय ककरो काज स’ लोहरबा ओत गेल छलथि । ताबेत में ढनमनाई त ढनमनाइत ओहो आबी  परमान पुर बाली के  दु आरि  प    सुस्ताए लेल बइसी  गेल छलिह । गोहाली मे बिरनी के छत्ता जकां   उमड़ल भीड़ देखि  ओहो ओत स’उठी अकचकायल सन ओत आयल छलिह ।आ’ ई प्रलयंकारी दृश्य देखि ओ जेना बज्र भ गेल छलिह ,एकदम शून्य ,जेना पाथर  , , , ।चुप्प् चा प  लद स ‘ओत बैसि रहली ।साक्षात ताड़का बनल महेष् क माए के मुंह स धधकल  धधकल अंगोरा निकलि रहल छल “पाजेब की केलिये? नब नुकूत कनिया के छले ,एहेन कोन सौख मौज बुढाढ़ी मे पईस गेल ,पाए के बेगरता छल त’ हमारा कहितहु” । “यए काकी ,सोनरबा के ओतय राखी देने हेथिह”   आए काल्ही बड़ एनाय जेनाय  होय छन। सोनरबा ओत मदना के दौडएल गेल ।मुदा ओ  एक्दमे नकारी देलके ,केहनों सप्पत खे बा लेल तैयार ,  ,।कियो मुसकी माँरेत बाजल “ओ किए नाक प’ माछी बैसय देतै, , कहबी छईक चोर चोर मोसियौत”। बाजि ताजि क’,माथ कपार भंगैत   ओ खोजी दल ओहि ठाम स’आपस भ गेल छलिह..त’ लोक के लगलए आब बेचारी मुंह उठा क’ कोना जिबती,कोनो पोखरी ,  धार मे संहिया जेती वा जहर माहुर खा क’ सूती रहती ।किछू दयामंत  सबके हुनक दुर्गति प’ आंखि झहरय लगलेन्ह ,’सब साय पूत बाली सब जेना दुधक धोल हौक ,अब्बल दूब्बल प’सिथूवा चोख”। त’किछू करेजगर ज़नानी के अपन ऐब नुकबए के बहन्ना भेट गैल ।‘ई त’सिन्हा चोर निकलली ,ओय दिन दूध औट क चीन _बारे  प’ छोड़ि देने रहिए ,जे कनी सुसुम हेते तखन पौर क’ सिक प’लटका देबै ।मुदा कनिए काल मे नहा क’ आबे छी त’आधा दूध गायब ,दाय  ओसारा प,सिलौट प, मसल्ला पिसेत छलिह” ।मुदा सत छल जे बीमार दियादनी के गायक दूध पिनाए हुनका नहीं सोहाए आ’कखनों,बिलाड़ी के नाम प,कखनों   उधिया क। खसबा के अड़ में कनी पैइनफेंट के अपने पीबी जायथ।   ओम्हर  साँझ पड़बा स’ पहिने कनिया के भाय नैहर स, दौगल एलै ,पाजेब नैहरे मे छूटि गेल रहै ।महेशक माए अहि खबरि के पीबी गेलिह ,एतेक शक्ति त नहीं छलेन्ह जे जा क’ दाय स माफी मांगि लइतथी । ओए राति केकरो घर क थारी  दाय छूबों नहीं कयल्खींह ।कोना गिड़ल जेते अन्न ,एहेन कलंक्क ॰बाद । भिनसर  भेने सब देखलक “दाय अपन गेरुआ के सीबी रहल छलिह । कनिए कालक़ बाद टोल मे एकरा ओकरा आँगन जा क कतो दालि ,कत्तों चिक्कस ,कुटिया पिसिया मे  एना लागी गेल छली जेना किछू गप्पे नहि भेल होमए । जगदानन्द झा मनु, ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी लघुकथा- कमलू पूष मास, जाड़ अपन चरम सीमापर । लगातार पन्द्रह दिनसँ शितलहरी । गामक एकटा टूटल- फूटल खोपड़ीक असोरा । जाड़सँ बचैक हेतु असोराकेँ बाँकी दुनूकात बोड़ाक ओहाड़ । एकटा पुरान टूटल-फूटल चौकीपर पुआरक ओछैन, ओहिपर करीब सत्तैर बरखक बेमार असहाय कमलु । माए-बाबू बड्ड सिनेहसँ ओकर नाम कमल रखने रहथि, मुदा अभाब आ गरीबीसँ संघर्ष करैत -करैत कमलसँ कमलुमे बदैल गेल । गरीबी आ बुढ़ापा ओहिपर बीमारीसँ सताएल जीर्ण-शीर्ण शरीर, अभाबक कारण अप्पन बएससँ दस बरखक बेसीएक लगैत । उपरसँ जाड़क एहन हाल । जाड़सँ कपैत लगातार खोंखी करैत । खाँसैत-खाँसैत कखनो बिचमे राहत भेटै छै तँ मुहसँ, कहु तँ करेजासँ दर्दक थकान संगे दुख मिलल आह ओकर मुहसँ निकलैत । ओहि आहसँ किन्चीत एक बेर पाथरो पिघैल जाए, मुदा कमलुक आह सुनै बला ओकर दर्दकेँ बुझै बला ओहिठाम कियोक नहि । नै कियो देखभाल करै बला आ नै कियो पुछै बला । मुदा कमलुक आह आ खोंखीकेँ शाइद एहि बातक ज्ञान नहि, तैँ तँ ओ रुकैक नाम नहि लए रहल छलै । खोंखी आओर बेसी असहनीय आ विभत्स्यए भेलजा रहल छलै ।। खोंखीक वेककेँ सम्हालेमे असमर्थ, कमलु एकाएक अपन सम्पूर्ण बलकेँ एकठ्ठा करैत अपन दुनू हाथसँ छातीकेँ कैस कए दबाबैत बैस रहल, कि तहने ओकरा पानिक तलब महसुश भेलै । आ ओकर मुहसँ अनायास निकैल परलै -"पानि -पानि " मुदा ! अभागा कमलु ! असहाय कमलु ! ओहिठाम ओकर बास्ते एक घूँट पानि दै बला कियोक नहि । इ बिचार कमलुकेँ मोनमे अबैत देरी ओकर मुहपर दर्द भरल व्यंगक एकटा मुस्की चमैक गेलै । जेना ओ अपन वाक्यपर पचता रहल हुए । अपन दर्दकेँ ठोरपर अनि दाँतसँ कटैत, लाठीक सहारा लैत चौकीक निच्चा राखाल पानिक लोटा लेबक लेल झुकल । बहुत संघर्सकेँ बाद लोटा उठाबैत जल्दी-जल्दी दू घोंट पानि अपन हलकमे उतारि लेलक । परञ्च पानि पीबैक बाद ओकरा लग एतेक बल नहि रहलै जे ओ लोटाकेँ फेरसँ नीँचा राखि सकै । लोटा ओकर हाथसँ छूति कए गुरैक गेलैक । लोटाक बचल पानि चारू कात नीच्चाँ बहि कए मानु कमलुक तकदीर आ एकाकीपर ठहाका लगाकए हँसैत होए ।  कमलु सेहो अपने खाली लोटा जकाँ चौकीपर पसैर जाइत अछि । परला बाद ओकर दहिना हाथ ओकर दुनू आँखिकेँ झैंप दै छैक । मानु अपन आँखिकेँ झाँपिक नोर नुकाबैक प्रयास कए रहल हुए । मुदा निर्लज्य नोर छैक की रुकैक केँ नामे नहि लए रहल छैक । आ ई नोर छैक, ओकर बुढ़ाड़ीकेँ ? ओकर बीमारीकेँ ? ओकर भूख-प्यासकेँ ? नहि नहि नहि । तँ ई नोर किएक ? केकरा लेल ? ई नोर छैक ओकर मनोरथक हत्याकेँ । ई नोर छैक ओकर छिरयाइत सपनाकेँ, जेकरा की ओ अपन सोनीतसँ पटेने रहए । ओकर नोर छैक की रुकैक नाम नहि लए रहल छैक । मुदा मोन स्वप्नील दुनियाँक इन्द्रधनुषी अतीतमे हिलकोर मारै लगलै । जखन ओ उनैस बीस बरखक जबान सुन्नर युबक रहए । माए बड्ड मनोरथसँ ओकर ब्याह रचेने रहथिन । बाबू तँ कखन एहि दुनियाँसँ गेलखिन ओकरा मोनो नहि । बाबूक सभटा भार माए उठेलखिन । केखनो ओकरा बाबूक कमी नहि होबए देलखिन । ब्याह भेलै । घरमे एकता सुधड़ कनियाँ एलखिन । समय खुशी-खुशी बीतै लगलै । मुदा ब्याहक पाँच बर्ख बादो ओकर घर नेनाक जन्म नहि भेलै । कमलु दुनू व्यक्तिक तँ जे हाल, ओकर माएकेँ तँ नेनाक अभाबमे दिन काटब मुश्किल भए गेलनि । फेर शुरू भेल कोबला-पातिरक दौड़ । माँ भगवतीक मंदिरमे पातैर राखल गेल । भगवान सत्यनारायणक कथाक कोबला राखल गेल । भगवतीक इच्छासँ ओहो दिन आएल । कमलुक कनियाँ गर्भवती भेली आ नियत समयपर एकटा सुन्नर बालकक जन्म भेलै । सून घरमे बसन्तक आगमन भए गेलै । कमलु माएक तँ खुशीक मारे धरतीपर पएर नहि टिकैत छलनि । छ्ठीहार दिन समूचा गाम माछ भात खूएल गेल । सत्यनारायण भगवानक कथा कराएल गेल । माँ भगवती घरमे पातैर देल गेल । बच्चाक नाम राखल गेल, राज ! राज कमल । सम्पूर्ण वातावरण खुशीसँ गमकए लागल । जे आबए कमलुकेँ बधाइ दइत । आखिर दे किएक नहि ? सात बर्खक बाद जे बाप बनल रहए । माँ भगवतीक माया जखन नहि देबक रहनि नहि देलखिन । देबए लगलखिन तँ एककेँ बाद एकटा, कमलु चारिटा पुत्रक पिता बनल । घर गृहस्थी खुशी-खुशी चलए लगलै । एहि बीच कमलुक नोकरी सेहो लागि गेलै । आर्थिक चिन्ताक समाधान सेहो भए गेलै । चारू बेटाकेँ यथासामर्थ नीकसँ शिक्षा दिएलक । समयकेँ काल चक्रमे, कमलुक माए अपन जीवनक सम्पूर्ण सुख भोगि स्वर्ग चलि गेली ।  देखतए-देखतए कमलुक चारू पुत्र युवा भेल । ओकरो सभहक घर बसबक समय आबि गेल । नीक लोक-बेद देख कए चारू बेटाक ब्याह केलक । कमलुक घर पोता-पोतीसँ भरि गेल । भरल-पुरल घर देखब शाइद नीयतिकेँ मंजूर नहि । अथबा कमलुक भागमे एहिसँ आगाँक सुख भोगब नहि लिखल रहै । आथिक युग आ परिबारक बोझसँ लदल, कमलुक चारू बेटा एक एक कए रोजी रोजगारक खोजमे ओकरा लगसँ दूर होति गेलै । चारू बेटा अपन-अपन परिबारक संगे शहरमे बसि गेल । रहि गेल कमलु आ ओकर संग देबैक लेल ओकर अर्धांगिनी, पत्नी ओकर चारू पुत्रक माए । जेना-तेना दुनू प्राणीक जीवन चलैत रहए । परञ्च केखन तक ? जेना भोरक बाद साँझ होइत छैक, प्रतेक शुरुआतक अन्त होइत छैक, ओनाहिते प्रतेक जीवनक मृत्यु । कमलुक कनियाँ सेहो जीवनसँ लडैत लडैत कमलुक संग नै दए पेली आ एक दिन कमलुकेँ छोरि स्वर्ग लोक चलि गेली । आब कमलु निदान्त असगर रहि गेल । आधा तँ कमलु ओहि दिन मरि गेल । बाँकी जीवन जे शेष रहै ओहिसँ निकैल कए अपन अतीतमे हरा गेल छल । मुदा नै जनि कखन ओ अपन अतीतक दुनियाँसँ नीकैल गेल रहए । अथबा कखन निकालि देल गेल रहए, बिधाताक हाथसँ । नोर सुखा कए ओकर गालपर पपड़ी जैम गेल रहै । दुनू आँखि खुजल । ओहे खुजल आँखिसँ अपन अतीतकेँ निहाईर रहल छल, कमलु । आओर ओहे खुजल आँखि आब शाइद केकरो बाट देख रहल छैक । शाइद अपन बेटा सभक । अगिला भोरे, गामक किछु लोक एकटा अर्थीकेँ उठेने जा रहल छलै ।  "राम नाम सत्य छै, सभक इहे गत छै ।"  "राम नाम सत्य छै, सभक इहे गत छै ।"  रस्तामे एककात ठार एकटा शहरी युबक, जेकी अर्थी देख कए रुकि गेल रहए । लग एला बाद ओहिमे सँ केकरोसँ पूछैत छै - "के छथि भाई " ओकर उत्तरमे गामक एकटा लोक बजैत छथि, जे की ओहि शहरी युबककेँ नहि चिन्हैत छथि - "छथि कतए, कहियौंह छलथि । छलथि हमरे गामक एकता अभागल, चारि-चारिटा बेटाक बाप रहितो, असगर । बेचारा ! अभाब एवं बेमारीसँ असगरे लडैत-लडैत मरि गेला । आब मुखाग्नीयो देबैक हेतु अप्पन कियोक नहि, सभ अपने-अपनेमे व्यस्त । कमलु नाम छलनि हिनकर ।" "कमलु" कमलु नाम सुनैत देरी ओ शहरी युबक जोर-जोरसँ दहाड़ि मारि-मारि कए कनए लागल । ओकर कनैक कोनो पार नहि । ओकर करून रुदनमे एतेक दर्द रहै कि ओकरासँ सभकेँ सहानुभूति भए गेलै । "किए भाई अपने किएक एतेक कानै लगलौं ।"  "अरे ! हम अभागल नहि कानब तँ आओर के कानत ।" ई कहैत ओ अपन जेबीसँ एकटा टेलीग्राम निकाइल कए देखेलकै जे कोनो ग्रामीण द्वारा कमलुक बेटा राजकमलकेँ कमलुक बीमारीक खबर लेल लिखल गेल रहै । खुशबू झा रुपाली ‘बउवा,बउवा .........। कत गेल बउवा ?’ माए बजली ‘कतौ खेलाइत हैत ।’ अतेक कहैत माए अपन काजमे लागि गेली । इम्हर बाबुजीके अपन छोटकी बेटी सँग बतिएब आ बेटीके लाड करब पसिन छलन्हि । ताएँ जाऽ धरि बेटीके नहि देखब हुनकर नयनके चयन नहि भेटतन्हि । ताबतेमे जेठकी बेटी बजली, ‘पापा बउवा गार्डेनमे असगरे गाछ बृक्ष सँग बतियाति छली ।’ ‘अएँ कि भेल ? असगरे एना किए ? कियो किछु कहि देलक ?’ एकै स्वाँसमे पुछल गेल पापाक प्रश्नक जबाब देब बउवाक बसके बात नहि छल । बस शुरु भऽ गेल लाड । तखने बेटा आएल बैसि गेल पापाक पजरामे आ ओ पोल खोलैत बाजल, ‘पापा अहाँ बउवाके अतेक लाड किया करैत छी ? बुझल अइ बउवाके पढैमे नहि मौन लगैत अछि । तएँ हम डँटने छलहुँ ।’ बस बेटाक बात सुनिते बाबु खिसिया गेला आ बजलथि, ‘तु बौवाके डटबएँ तँ निक नहि हएतौ । तोरा कि बुझाइत छौ बउवा नहि पढतै ? देखिहे एक दिन हम्मर सपना इहे पुरा करत ।’ इ सुनिते बउवा तऽ खुसि सँ फुलि गेल मुदा सभ किछु सुनि रहल माएँ बेटाक पक्ष लऽ बजली, ‘हमर बेटा ठिके तऽ कहैय, .........’ताबतेमे सभक बातके रोकैत बडकी बेटी बैसाली बजली,‘ बुझल अछि पापा अपन गाममे सेहो आब बोर्डिङ स्कुल खुजल अछि । ताएँ बउवा रुपालीके अहिमे एडमिशन करा दिऔ ।’ बैशाली छली बड टैलेन्ट , सभ क्षेत्रमे हुनकर हात पकरय बला किओ नहि । पढाई खेलकुद आ घर घरुवारी सभमे आगा । अपना सँ बडका व्यक्ति सँग बात चति करब हुनका पसिन छलन्हि । तँए जानकारी सेहो बड बेसी, आ नम्र सेहो ओतबए । तखन तऽ घरमे माँए पापाक बाद दुनु भाए बहिन दिदिक बात कहियो नहि नकारथि आ जे कहब उएह करब । तँए अपन दिदीक गप्प सुनैत भाए सेहो समर्थन कएलन्हि । ओ तऽ स्कुलक पुरा डिटेल कहि देलक । ओना सोनुक कम्पिटशन सेहो अपना सँ सिनीयर व्यक्ति सँग रहनि । अर्थात बैशाली सँ चारि बर्षक छोट भाए सोनु सेहो अपन दिदी सनक सभ क्षेत्रमे आगू । इएह कारण छल जाहि सँ बाबू जखन नोकरी पर सँ अबैथ तऽ दुनु भाए बहिनक पढाईके सम्बनधमे बुझय एक बेर अबश्य पहुँचैथ हाई स्कुल । ओतय पहुँचैत गर्भ सँ माथ उँच भऽ जाइन कारण सभ शिक्षक दिस सँ बेटी बैशाली आ बेटाक बडाई सुनयके भेटनि हुनका । दुनु अपना–अपना कक्षाक लिडर । आब एहन होनहार बच्चाक बात नहि मानब एहन कोन पिता हएता ? तँए ओ सेहो कहलथि ‘ठिक छई हम आइए बोर्डिङ स्कुलक प्रिन्सीपल सँग भेट करब ।’ अतेक बात भेल मुदा एकान्त प्रिय, परीक दुनियामे भुतलाए बाली रुपाली किछु नहि बजली । हुनका तऽ जेना किछु लेल सोचहे नहि पडैन । अतेक ध्यान राखय बला माए बाबु जी आ भाए बहिन जे भेटल रहैक । बस रुपालीके सोचबाक छल तऽ एक्कहिटा बात की परीक दुनियाँ हुएय जतय अपने पाँचु गोटे सधि खन सँगे रही । बेसी बाजब, सँगी बनाएब अहि सभ सँ दुर रहल रुपालीक दिनचर्या सभ सँ अलग । खाएब आ गार्डेनमे खेलाएब बस इतबए रुपालीक दिनचर्या । अबोध रुपालीके बुझल नहि छल की ओहो कहियो जीवनक यात्रा पर असगरे निकलत । दोसर दिन पापा गेलथि स्कुलक प्रिन्सीपल सँग भेट करबा लेल । बातचीत भेल, ओहिके दोसर दिन सँ तय भऽ गेल बउवाके स्कुलक यात्रा । घरमे सभकेउ खुशी रहैक रुपालीक एहन यात्राक लेल । सँगहि अबोध रुपाली सेहो बिन बुझले खुशीके हिसा बनि रहल छल । भोरे–भोरे सभ किओ रुपालीक चिंतामे जुटि गेलथि । इम्हर बउवा अपने चकीत छल किए सभकेउ ओकरा एना कऽ तैयार कऽ रहल अछि । खाना बनल बउवाके खुवाओल गेल, एकटा अलग पोशाक पहिराओल गेल । रुपालीके दहि चिनी खुवा माए बिदा कएली आ पापा हाथ पकरि स्कुल दिस गेला । ओतय पहुँच रुपाली बच्चाक जमात, शिक्षकसभक भिड देखि कानय लागल मुदा रुपालीक कानब पापा ओहि दिन बेवास्ता कऽ ओहिठाम सँ आगू बढि गेलथि । बस ! इएह पहिल दिनक यात्रा रुपालीक जीवनक अनन्त यात्रा बनि गेल । कहिया बउवा रुपाली समझदार आ बुझनिक घरक सदस्य बनि गेल एहि बातक किनको अनुभवो नहि भेल । सभ किछु बदलि गेल । रुपालीक उमेर, पारीवारीक सदस्य, सभ किछु । दिदी बैशालकि आब अपन अलग छोट सुन्दर परिवार भऽ गेल, भइया सोनु अपन लक्ष्य प्राप्तीक बाटमे व्यस्त, पापा नोकरीक अन्तिम समयक लुफ्त उठा रहल आ माँए एखनो रुपालीक चिन्तामे व्यस्त । मुदा जँ किछु परिवर्तन नहि भेल ओ छल रुपालीक स्वभाव । परीक दुनियाँ एखनो रुपालीक लेल महत्वपुर्ण अछि । सभक सँग रहब रुपालीक सपना एखनो मरल नहि अछि । मुदा ई अधुरा सपना कहियो पुरा नहि भेल कियक तऽ रुपाली सनक सफा हृदयक व्यक्तिके एहि ठाम भेटल तऽ मात्र निराशा । अपन पढाईक क्रममे जखन रुपाली नौ, दश कक्षा पार कएलक तखन ओकरा किछु सँगी भेटल जे रुपालीक अपन बिबाहीत दिदीक बिछोडक बादके कमी पुरा कऽ रहल छल । मुदा दिदीक कमी पुरा करब कठिन छल किएक तऽ ओ रुपालीक लेल मात्र दिदी नहि सहेली छलथि । अचानक दिदीक बिबाह रुपालीक मनके नहि निक जँेका प्रभावीत कएलक । किछु दिन तऽ किनको सँग बातो नहि करैक ओ । जेना कोनो सिख भेटल हुएय रुपालीके । दिदीके गेलाक बाद रुपाली बुझि गेल ककरो पर आश्रित नहि होयबाक चाहि । दिन बितैत गेल मुदा असगर रहि रहल रुपालीके पापा, भईया आ दिदीक दुरी एकटा प्रश्न ठाढ कऽ दैक । जेना ई दुरी रुपालीक लेल स्लो प्वाइजन हुएय ? जे समय–समयमे अपन बिसके असर देखा दैक । स्कुल जिबनमे पारीवारीक व्यक्ति सँग बनय लागल दुरी कलेजक यात्राक बादो एकटा प्रशनक जवाफक खोजिमे लागल रहल रुपाली । सभ किछु बुझलक मुदा सम्बन्धके लऽ कऽ मनमे प्रश्न घुमैत रहैक । रुपालीके तिन–चारि महिना पापाक लेल इंतजार करय पडला सँ अबोध मनमे नोकरीक प्रतिक दृष्टि नकारात्मक बनि गेल । ‘एहन काज किए करी जे परिवार सँ दुर कऽ दिए ?’ रुपालीक ई प्रश्नक उत्तर देब सम्भव नहि छल । तँए अहिके केउ पागलपन कहि बातके टारि दैक । सम्बन्धके लऽ कऽ बहुत पोजेसिव रहल रुपाली । जतय ओ किछु सोँचैथ होइक ओहि सँ बहुत अलग । ई दुनियाँ अपनेमे व्यस्त । इएह व्यस्त दुनियाक हिस्सा बनल रुपाली सम्बन्ध तऽ बनौलक जाहिमे किओ रहैक ओकर सँगी तऽ किओ पे्रमी । मुदा एहि सम्बन्धमे सेहो भेटल तऽ एकटा प्रश्न । एकान्त प्रिय रुपालीक आगू फेर सँ एकटा प्रश्न सामने आएल । ‘कि अपन स्वार्थ पुर्तिक लेल मात्र सम्बन्ध बनाएल जाइत छैक ?’ रुपालीक मनक एहन प्रश्न दुनियाँक आगू प्रस्तुत भेल । रुपाली अपन सँगी ओ अपने बनौने रहैक । मुदा सभ मतलबी, अपन आबश्यक्ताक समयमे रुपालीके याद सभ किओ करैक मुदा जखन रुपालीके उपर किछु समस्या हुएय तऽ सभकिओ साइड लागि जाइक । बस समय–समयमे कखनो सँगीक स्वार्थीपना तऽ कखनो पे्रममे धोखा एहि सभ सँ रुपालीक मनमे गहिर घाउ बना देलक । मुदा तखनो रुपालीक यात्रा समाप्त नहि भेल ओ आगा बढल । आब आरम्भ भेल रुपालीक अफिसीयल यात्रा । ओ अपन पढाई समाप्त कऽ काज शुरु कएलक । बहुत खुशी छल ओ अपन माँए बाबुक लेल किछु करबाक मौका भेटला पर । एकटा नयाँ रुपालीक जेना जन्म भेल हुए । एकटा नयाँ जोश जाँगर देखबाक भेट रहल छल रुपालीमे । मुदा एखनो ओकर मनक अबोधपना समाप्त नहि भेल छल । बस फरक छल तऽ एकैटा आब ओ एहि संसार आ परीक दुनिया बिचक फरक बुझि गेल छल । मुदा एखनो ओ अपन अस्तीत्व खोजि रहल छल परीक दुनियामे । उमेर सँ परीपक्व मुदा हृदय पुरा पुर बच्चा जेहन अबोध । मुदा ई रुपालीक मजबुरी कहि वा आबश्यक्ता एहि सजिव दुनियाँके घृणा करय बाली रुपाली अपना लेल एकटा जगह स्थापीत कएलक । शायद ई पे्ररणा ओकरा अपन पारीवारीक सदस्य सँ भेटल हुएय । तँए छल कपट, धोखा आ दानवीय विचार सँ भडल एहि समाजमे ओ आगु बढैत गेल आ बस बढैत गेल.......। मुदा एकटा अलग संसारक परीकल्पना ओकरा एखनो पाछु नहि छोडलक । एखनो पे्रम, स्नेह, मित्रता आ भातृत्व सँ भडल अलग संसारक कल्पना रुपालीक हृदयक एकटा हिस्सा बनल अछि मुदा ई ओकर हृदय धरि सिमीत रहि गेल......। किओ आगू नहि अएल रुपालीक एहि काल्पनीक संसारक हिस्सा बनबाक लेल । आ बस अधुरा आ एकल बच्चा आई परीपक्व रुपाली भेलाक बादो अधुरा अछि । संजीव कुमार शमा महाकवि‍ पं. लालदासक १५६म जयंती समारोह दि‍नांक २० नभम्‍वर २०१२केँ महाकवि‍ पं. लालदासक १५६म जयंती स्‍थानीय लालदास जमा दू उच्‍च वि‍द्यालयक प्रांगणमे महाकवि‍ पं. लालदास जयंती समारोह समि‍ति‍ खड़ौआ द्वारा समारोहपूर्वक मनाओल गेल। समारोहक मुख्‍य अति‍थि‍ जि‍ला उपवि‍कास आयुक्‍त श्री ओम प्रकाश राय आ समारोह समि‍ति‍क अध्‍यक्ष झारखण्‍ड वद्युत बोर्डक पूर्व चेयरमैन डाॅ. हरि‍वंश लाल संयुक्‍त रूपे वि‍द्यालय प्रांगणमे स्‍थापि‍त महाकवि‍क प्रति‍मा आ मंचपर स्‍थि‍त महाकवि‍क तैल चि‍त्रपर माल्‍यार्पण आ संगहि‍ दीप प्रजज्‍वलन कऽ समारोहक वि‍धिवत उद्घाटन केलन्‍हि‍। गामवासी कन्‍हैया कृष्‍ण कायस्‍थ स्‍वागत भाषण दैत सभ आगत अति‍थि‍गणक स्‍वागत आ सबहक प्रति‍ अपन आभार व्‍यक्‍त केलन्‍हि‍। वरि‍ष्‍ठ समाजसेवी वयोवृद्ध स्‍वतंत्रा सेनानी भरत नारायण कर्ण वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍य भाषण दैत बजलाह जे महाकवि‍ महाराज रामेश्वर सि‍ंहक दरबारमे दरबारी पंडि‍तक रूपे वि‍द्यमान छलाह। महाराज हुनक विद्वतासँ आहुत भऽ हुनका पंडि‍तक उपाधि‍सँ वि‍भूषि‍त कएने छलखि‍न्‍ह। अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍यमे डॉ. एच.बी.लाल मात्र दू पाँति‍ कहलन्‍हि‍ जे महाकवि‍क जयंती समारोहक जगह स्‍मृति‍ समारोह हम सभ मनाबी से नीक। आ दोसर महत्वपूर्ण इशारा केलन्‍हि‍‍ जे वास्‍तवमे हम सभ मि‍थि‍लांचलक साहि‍त्‍यि‍क मंचक गरि‍माकेँ पागक चलनि‍सँ कमजोर करै छी। पाग सम्‍पूर्ण मि‍थि‍लाक नै छी। जखने जागी तखने प्रात कहि‍ अध्‍यक्षीय भाषणमे बि‍नु पूर्ण वि‍राम लगौनहि‍ हाथ इशारासँ हि‍न्‍दीक वि‍द्वान, प्रखर वक्ता कुमार रामेश्वर लाल दासकेँ करबाक आग्रह कएल जेकरा कुमार साहेब सहर्षतापूर्वक स्‍वीकार केलन्‍हि‍। जखन कि‍ स्‍वस्‍थि‍ वाचन पं. शि‍व कुमार मि‍श्र द्वारा प्रस्‍तुत कएल गेल। मुख्‍य अति‍थि‍ डीडीसी श्री ओ.पी.राय अपन वक्तव्‍य दैत कहलन्‍हि‍ जे महाकवि‍ लालदास द्वारा मैथि‍ली भाषामे रचि‍त रचना रमेश्वर चरि‍त मि‍थि‍ला रामायणक प्रासंगि‍कता अखनो बनल अछि‍। ओ आवश्‍यकता जतौलन्‍हि‍ जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक धरोहरक रूपमे महाकवि‍क रचनाकेँ यथाशीघ्र प्रकाशि‍त करा पाठकगणक बीच पहुँचक चाही। अपन उद्गार व्‍यक्‍त करैत ओ ईहो कहलन्‍हि‍ जे कलाक उपयोग आत्‍मचि‍ंतनक लेल हेबाक चाही, छलबाक लेल नै। ओ वसुधैव कुटुम्‍बकमक उक्‍ति‍केँ चरि‍तार्थ करबा लेल सुधि‍ श्रोतागणसँ आग्रह केलन्‍हि‍। महाकवि‍क व्‍यक्‍ति‍व एवं कृति‍त्‍व वि‍षयपर आयोजि‍त परि‍चर्चामे साहि‍त्‍य अकादेमीक अनुवाद पुरस्‍कारसँ सम्‍मानि‍त प्रो. खुशीलाल झा जतौलनि‍ जे महाकवि‍ द्वारा रचि‍त रमेश्वर चरि‍त मि‍थि‍ला रामायणपर वाल्‍मीकि‍ रामायणक प्रभाव अछि‍। संगोष्‍ठीमे साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा टैगोर साहि‍त्‍य पुरस्‍कारसँ सम्‍मानि‍त मैथि‍लीक समन्‍वयवादी साहि‍त्‍यकार श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल अपन उद्गार व्‍यक्‍त करैत कहलन्‍हि‍ जे पं. लालदास बहुमुखी प्रति‍भाक धनी छलाह। जि‍नकर लेखनी मैथि‍ली भाषा साहि‍त्‍यकेँ अमरत्‍व प्रदान केलक अछि‍, जे आइयो डेढ़ सए बर्ख बि‍तलाक बादो एना बुझा रहल अछि‍ जे ओ अपन लेखनीक माध्‍यमे अखनो माँ-मैथि‍लीक सेवा कऽ रहला अछि‍। मण्‍डलजी ईहो इच्‍छा जतौलन्‍हि‍ जे “महाकविक साहि‍त्‍यमे आध्‍यात्‍मि‍क चि‍ंतन” वि‍षयक संगोष्‍ठी आवश्‍यक अछि‍। संग-संग धर्म, सप्रदाय एवं आध्‍यात्‍म ऐ तीनूकेँ अपना ऐठाम सानि‍-बाटि‍ कऽ देखबापर चि‍ंता व्‍यक्‍त केलनि‍। आजुक समैमे नवतुरि‍या आ बूढ़ साहि‍त्‍य प्रेमी लोकनि‍ अपन मातृभाषामे रचना कऽ अपना साहि‍त्‍यकेँ संपन्नता प्रदान कऽ रहल छथि‍। जे मैथि‍ली साहि‍त्‍य आन्‍दोलनमे मीलक पत्‍थर साबि‍त भऽ रहल अछि‍। परि‍चर्चाक क्रममे मैथि‍ली पत्रि‍का “झारखण्‍डक सनेस”क सम्‍पादक डाॅ. अशोक अवि‍चल महाकवि‍क व्‍यक्‍ति‍त्‍वपर प्रकाश दैत कहलन्‍हि‍ जे पं. लालदास दर्शनक साक्षात् प्रति‍मूर्त्ति छलाह। हि‍न्‍दी, संस्‍कृत, ऊर्दू आ फारसीक उद्भट वि‍द्वान रहि‍तो महाकवि‍ मातृभाषा मैथि‍लीमे उच्‍चकोटि‍क ग्रंथक रचना कऽ जननीक हद तक अपन करजा उतारबामे सफल भेलाह। डॉ. अवि‍चल वि‍द्यानुरागी लोकनि‍सँ आग्रह केलन्‍हि‍ जे गाम खड़ौआमे महाकवि‍क नामे एकटा प्रकोष्‍ठ बनाओल जाए जइमे यथासंभव हुनक पाण्‍डुलि‍पि‍क संग्रह होइ आ संगे हुनक प्रकाशि‍त अप्रकाशि‍त रचनाक संग्रह कएल जाए। जइसँ अबैबला पीढ़ी आ गवेषक लोकनि‍केँ ऐसँ हुनका वि‍षयमे वि‍स्‍तृत जानकारी भेट सकतन्‍हि‍। शि‍क्षावि‍द अवकाश प्राप्‍त शि‍क्षक हरि‍नारयण झा वि‍द्वातपूर्ण शैलीमे अपन वि‍चार प्रस्‍तुत करैत कहलन्‍हि‍ जे महाकवि‍ द्वारा रचि‍त रामायणमे माँ सीताक वर्णन पुष्‍कर काण्‍डमे वि‍लक्षणतापूर्वक कएल गेल अछि‍। माँ सीता शक्‍ति‍क अधि‍ष्‍ठात्री छथि‍, एकरा ओ अपना पद्यमे वर्णित कए मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामोकेँ मानबा लेल मजबूर कएल। श्री झा एे अवसरपर सभ गोटेसँ आग्रह केलन्‍हि‍ जे जइ धरणीपर माँ सीता अवतरि‍त भेलीह ओइ धरापर महाकवि‍क अवतरण भेल हम सभ कि‍यो बि‍ना कोनो भेदभावक माँ मैथि‍लीक धरणी धराकेँ पुष्‍पि‍त-पल्‍लवि‍त करी। यएह हमरा सबहक महाकवि‍क प्रति‍ श्रद्धांजलि‍ होएत। वि‍द्यालय समि‍ति‍क अध्‍यक्ष अनूप कश्‍यप माननीय डीडीसी साहेबकेँ वि‍द्यालयक उत्‍थान व वि‍कासक दि‍स धि‍यान आकृष्‍ट करबैत बजलाह जे वि‍द्यालयक सर्वांगीण वि‍कास भेला उत्तर ऐ क्षेत्रक धि‍या-पुतामे शि‍क्षाक संपूर्ण वि‍कास भऽ सकत जे सही अर्थमे महाकवि‍क प्रति‍ श्रद्धांजलि‍ हएत। समारोहक दोसर सत्रमे काव्‍य गोष्‍ठीक आयोजन भेल जकर अध्‍यक्षता शब्‍द-साधक श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल आ संचालन चर्चित उद्घोषक श्री संजीव कुमार शमा द्वारा कएल गेल। काव्‍य-गोष्‍ठीक आरम्‍भ वि‍द्यापति‍ सम्‍मानसँ सम्‍मानि‍त कवि‍ शंभु सौरभक काव्‍यसँ भेल।‍ तहि‍ना दोसर काव्‍यक पाठ मैथि‍ली प्रखर समालोचक श्री दुर्गानंद मण्‍डल केलन्‍हि‍। तकरा पछाति कवि‍गणमे श्री बेचन ठाकुर, श्री राम वि‍लास साहु, श्री लक्ष्‍मी दास, श्री उमेश नारायण कर्ण, श्री नन्‍द वि‍लास राय, श्री रामसेवक ठाकुर, श्री शशि‍कान्‍त झा, श्री हेमनारायण साहु, श्री कपि‍लेश्वर राउत, श्री शि‍वकुमार मि‍श्र अपन-अपन काव्‍य पाठसँ श्रोतावृंदकेँ काव्‍य रसमे सराबोर करैत रहलाह। जखन कि‍ डॉ. अवि‍चल अपन कवि‍ता ‘संस्‍कृति‍क साड़ापर’ सुना सामाजि‍क अपसंस्‍कृति‍सँ सजग हेबाक दि‍स इशारा केलन्‍हि‍। दोसर दि‍स युवा कवि‍ लोकनि‍मे श्री उमेश पासवान, श्री नारायण झा, श्री अखि‍लेश कुमार मण्‍डल, संतोष कुमार महतो, वि‍कास कुमार झा, ओमजी अपन-अपन नूतन काव्‍यसँ दस्‍तक देलन्‍हि‍। युवा संघर्षशील कवि‍ उमेश मण्‍डल अपन गजल सुना श्रोतागणसँ वाहवाही लुटलन्‍हि‍। काव्‍य गोष्‍ठीक समापन अध्‍यक्ष श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक काव्‍यसँ भेल। काव्‍यक शीर्षक छल ‘चल रे जीवन चलि‍ते चल’ काव्‍यक माध्‍यमसँ श्री मण्‍डल श्रोतावृंदकेँ काव्‍यमे दर्शनक दरसन करा काव्‍यक गंभीरतासँ परि‍चय करौलन्‍हि‍। संपूर्ण काव्‍य गोष्‍ठीमे काव्‍य-समीक्षकक नाते मैथि‍ली साहि‍त्‍यक स्‍तंभकार डाॅ. अशोक अवि‍चल अपन प्रखर वुद्धि‍मताक प्रतापें कवि‍ लोकनि‍क काव्‍यक समीक्षा कऽ कवि‍ आ श्रोतागणकेँ काव्‍यक मर्मसँ परि‍चए करोओल आ शुभकामनाक संग जोश बढ़बैत रहला। कवि‍ गोष्‍ठीमे काव्‍य-समीक्षा एकटा नव प्रयोग भेल। जकर श्रेय श्री संजीव कुमार शमाकेँ जाइ छन्‍हि‍। संपूर्ण कार्यक्रमकेँ उद्घोषक संजीव शमा द्वारा सजाओल गेल छल। अपन वि‍द्वतापूर्ण शैली आ वाक्-चातुर्यसँ उपस्‍थि‍त श्रोतावृंदकेँ आह-एवं-वाहक लेल मजबूर कएल। माधुर्य ग्राह्य भाषा शैलीक कारणें सुधि‍ श्रोताक मानस पटलपर छाएल रहला। मंचस्‍थ अति‍थि‍, कवि‍, समीक्षक, वक्‍ता इत्‍यादि‍ जेतेक साहि‍त्‍यानुरागी छलाह सभकेँ समारोह समि‍ति‍ पूष्‍पमाल एवं चादरि अर्पित कए सम्‍मानि‍त कऽ अपनाकेँ गौरव महशूस केलक। मि‍थि‍ला मैथि‍ली मंचक स्‍थापि‍त कलाकार रामसेवक ठाकुर पंकज झा आ चंदन द्वारा सांस्‍कृति‍क कार्यक्रमक प्रस्‍तुति‍ सराहनीय छल। समारोहकेँ सफल बनेबामे आयोजन समि‍ति‍क सदस्‍य सुनील कुमार दास, डॉ. अरवि‍न्‍द लाल, ि‍नर्मल कुमार दास, वि‍नय कुमार दास, योगानंद लाल दास, प्रभात कुमार दास, राजेन्‍द्र कुमार दास, आ अजय कुमार दासक भूमि‍का महत्तपूर्ण छल। अंतमे जयंती समारोह समि‍ति‍क सचि‍व श्री भागीरथ लाल दास धन्‍यवाद ज्ञापन करैत जंतव्‍य देलन्‍हि‍ जे आगू साल वि‍द्यालयक स्‍वर्ण जयंतीक अवसरपर कार्यक्रम दू-दि‍ना हएत, जकर हकार उपस्‍थि‍त सभ सुधि‍ श्रोतागणकेँ मंचसँ देल गेल। ऐ अवसर पर पछि‍ले बर्ख जकाँ अहू साल वि‍देह मैथि‍ली पोथी प्रदर्शनीक भव्‍य प्रदर्शन सेहो छल। सन्दीप कुमार साफी, जन्म ७ जून १९८४ पिता श्री सीताराम साफी, माता- श्रीमती सीता देवी, गाम- मेंहथ, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी। शिक्षा- बी.ए. (प्रतिष्ठा), मैथिली। (मैथिलीमे दलित आत्मकथाक सर्वथा अभाव रहल अछि। सन्दीप कुमार साफीक आत्मकथा मैथिली आ मिथिलाक साहित्य, समाज आ संस्कृतिकेँ हिलोरैत ओइ अभावक पूर्ति करैत अछि।– सम्पादक, विदेह) आत्मकथा जीवन एगो संघर्ष होइत अछि, संघर्षमय होइत अछि। ऐ संघर्षमे कियो-कियो आगू निकलि जाइत अछि तँ कियो अप्पन जीवनमे बहुत पाछू छूटि जाइत अछि। ओही संघर्षमय दुनियाँमे एगो हम छी, जिनकर नाम अछि संदीप साफी माने किरण। स्कूलमे सन्दीप नामसँ चिन्हल जाइबला अओर गाममे सभ किरण नामसँ पहचानैए। ग्राम+पोस्ट मेंहथ, भाया- झंहझारपुर, जिला- मधुबनीक रहनिहार हमर जन्म निर्धन गरीब परिवारमे भेल। हम जातिक धोबी छी, हरिजन (दलित) छी। गाममे सभ क’ कपड़ा धो क’ माँ-बाबू हमरा सभक पालन-पोषण केने अछि। हम चारि भाइ-बहीन छी, जइमे हम सभसँ बड़का छी, तइसँ छोट हमर भाइ-बहीन सभ अछि। हमर जन्म 07.06.1984 ई. मे भेल। ओइ जमानामे सस्ता सभ किछु, तैयो हमरा सबहक भरन-पोषण झूर-झूरइतो चलए। अ-आ सँ कबीर कान तक हम सभ दुखीरामसँ पढ्लौं। किछु दिन बाद बाबूजी सरकारी स्कूलमे नाम लिखा देलक। सरकारी स्कूलमे पढ़ाइ चलै तँ ठीके-ठाक मुदा हम सभ ओतेक किछु बुझि नै पबिऐ। ओहेन गारजनो होसगर नै जे देखबितए जे की लिखलएँ, की सिखलएँ। मुदा धीरे-धीरे आगू बढ़लौं। छोटमे माए एकटा बकरी किनलक जे ओकरोसँ किछु रुपैया आमदनी हएत तँ कहुना गुजर-बसर हएत। थोड़ेक दिन बकरी सेहो चरेलौं अओर बकरी बेचि हमर माँ ओहीसँ एकटा बाछी लेलक जे ओइसँ दूधक आमदनी हएत आ ओइ पाइसँ अपन परिवार सुखीसँ गुजर करब। ई सभ काज करैत बाबूजी संगे लोकक ऐठाम कपड़ा पहुँचेनाइक सेहो काज करैत छलौं। पिछला पाँच दस सालमे जमाना बहुत आगू बढ़ि गेल। पहिले एते बोइन नै भेटैत छलै जेतेक अखुनका समएमे भेटैत अछि। पहिने एक मोटा कपड़ा धोइ छल हमर माँ-बाबू तँ गिरहस्त सभ पाँच सेर धान नै तँ दू किलो आँटा दैत छलै। कियो कपड़ा दुआइ तरे पाइयक आमदनी नै रहलासँ मजूरीमे दू-तीन किलो अल्लूए द’ देलक। पहिने पाइ महग छलै आ अन्न-पाइन सस्ता छलै। गाममे सबहक माय-बाबू इस्कूल भेजै मुदा हम जाइ लोकक कपड़ा पहुँचाब’, तइयो सौँझका टेममे अंगनामे बोरा बिछा क’ पढ़ैले बैसए हमर पिसियौत भाय राजू भैया, तखन हमहूँ पढ़ैले आबी तँ दू-कानसँ बीस कान तक सिखलौं। ओकरा बाद अप्पन गामक इस्कूलमे नाम लिखा देलक, हेडमास्टर छल पहिने कोइलखक यादवजी, हुनका कहि बाबू, जे एकरा कनी देखबै। किछु दिन अहिना समए कटल, चौथा-पचमामे बढ़ला बाद किताब पढ़ला किछु आबि गेल तँ गारजीयन कहलक जे चलि जा बौआ पीसा संगे, ओतै नेपालमे रहिह’। गामपर खर्चाक दिक्कत तँ हेबे करइए, से नै तँ ओतै काज-राज करिह’ अओर ओतै रहिह’। पढ़ाइ-लिखाइ आब छोड़’। पढ़ि-लिखि क’ की हेतै। 1994 ई.क समएमे हम चलि गेलौं नेपाल। ओतै दीदी संगे रही, सभ दिन कपड़ा धोइ अओर संगे पहुँचाबैले जाइ। अओर आबी तँ लकड़ी चुल्हापर भानस करी। भोरे तीन बजे उठी कपड़ा धोइले। ओइ समए हमर उमेर बुझू जे 11-12 क’ छलए। किछु दिन ओहू ठाम गुजारलौं। तकरा बाद हम फेर गाम एलौं। हमर बाबू कहलनि जे आब नै जा, किछु दिन पढ़’। कमसँ कम मैट्रिको तक पढ़ि लेब’ तँ कतौ ने कतौ सरकारी नोकरी भइये जेत’। हमरा जेतबे जुड़त ओतबेमे हम गुजर करब मुदा तूँ पढ़’। तकरा बाद हम कोठिया इस्कूलमे नाम लिखेलौं। ओइ ठाम छठासँ किलास चलै छलै। फेर थोड़ेक दिन गामेमे रहि क’ माल-जाल चरा क’ हाइस्कूल तक गेलौं। मुदा समए एहेन आएल जे फेर हम पढ़ाइ छोड़ि पंजाब चलि गेलौं। ओइ समएमे हम छलौं नौमामे। गेलौं ओइ बास्ते जे हमरासँ छोट बहीन छल, घरक गारजन कहलक जे बौआ गाममे रहलासँ आब किछु नै हेतौ, से नै तँ चलि जा लोक सभ संगे बड़का कक्का लग चण्डीगढ़। कतौ नोकरी धरा देत’, कइहक हमर नाम जे बाबू कहलक य’। हमर कक्का बित्तन साफी जे बी.ए.क डिग्री प्राप्त केने छलए, वएह सोचि हमर बाबू हुनका लगमे पठौलनि जे ओकरा कनीक बुइध चै, कतौ नीक नीक नोकरी पकड़ा देतै। मुदा हमरा लगमे कोनो सर्टिफिकेट नै रहए, से हमरा कतौ छोटो-मोटो काजपर नै राखए। कोनो औफिसोमे नै राखए जे ई तँ पढ़ल लिखल नै अछि, सभ दफतरमे से कहए। आखिरीमे काका एगो प्रेस आइरनक दोकान क’ कहलक, एतै आइरन कर। नया आइरनक दोकान, कोइ ग्राहक आबै, कियो नै आबै। एक-दू महिनाक बाद काका हमरापर शक करए लागल जे ई पाइ कमाइ अइ मुदा हमरा नै दइए। हमरा मनमे बहुत दुख हुअए जे हम कत’ आबि गेलौँ, खेनाइ खाइ ल’ जाइ तँ कहए जे दोकानक भाड़ा आब तोरे भर’ पड़त’ चाहे दोकान चल’ या नै चल’। ई सभ सुनि मन व्याकुल भेल जे आब ऐठाम हमरा रहलासँ कोनो फाएदा नै हएत। आब एत’सँ जाइए पड़त। ओही ठाम गामक कतेक लोक रहै छल, तेकरा कहि-सुनि हम कोठीमे काज करए लगलौं। एक महिना भेल तँ गाम जाइ क’ भाड़ा भ’ गेल। एलौं काका लगमे जे हम गाम जा रहल छी। तँ काका कहलक, रुकि जा, हम टिकट बना दै छिअ। एक दू दिन रुकि जा। गामक लोक जाइत छै, तेकरा संगे हम गाम पठा देब’। तइ बिच हमरा संग एहो घटना भ’ गेल जे हमरा पएरमे आइग लागि गेल। हमरा पूरा पएरमे पएरसँ एड़ीसँ जांघ तक झड़कि गेल। आब हम बड़का समस्यामे फँसि गेलौं। उ घाव हमरा तीन महिना तक घिघरी कटेलक। असगरे साइकिलसँ एक पएरे पाइडिल मारि क’ ऊँच-नीच रस्तापर सँ जाइ छलौं दवाइ कराबैले चण्डीगढ़ शहरसँ दूर छै गाम धनास, ओइठाम। कम पाइमे डाक्टर दवाइ दै छलै। सप्तामे तीन बेर जाइ छलौं दवाइ कराबैले। जेहो रुपैया कोठीसँ कमा क’ अनने छलौं सभ पाइ कक्काकेँ द’ देलौं। एकर समाचार जखन हमर माँ आ बाबूकेँ पहुँचल तँ बहुत कानल जे कोहुना बौआ केकरोसँ पाइ ल’ क’ तूँ गाम आबि जो। ओही ठाम छै बुधन अओर कोरैला, तेकरासँ पाइ ल’ क’ गाम चल्इ आ। हम गामेपर ओकरा पाइ द’ देबै। ओही समएमे हमर बोर्ड परीक्षाक फॉर्म भराइ छलए, यएह कातिक अगहन महिनामे हमरा केकरो द्वारा चिट्ठी समाद आएल जे जल्दी गाम आब’ जे किछु दिन पइढ़ो लेब’ अओर घाव से छुटि जेत’। हमर फॉर्म हमर संगी मनोज पासवान सभ भरि देल। किछु बुझल ने सुझल, ने गणितक ज्ञान ने संस्कृतक ज्ञान। तैयो परीक्षा मधुबनीमे वाटसन स्कूलमे भेल सन 2000 ई. मे जखन दू महिना बाद रिजल्ट निकलल तखन मनमे जएह धुकधुकी छल सएह भेल। हम परीक्षा पास नै क’ पेलौं। आब तँ अओर मोन दुखी भ’ गेल जे आब की कएल जाए। तकरा बाद कोइ ने कोइ कहलक जे संस्कृत बोर्ड सँ परीक्षा दहक। एक बेर बाबू तँ हमर मानलक मुदा माँ कहलक जे आब सभ पढ़ाइ-लिखाइ चलि जा ममियौत भाए संगे बंगलोर। हम फेर बंगलोर चलि एलौं। ऐठाम काज भेटल खानाक केटरिंगमे, कुक सबहक कपड़ा धोइ क’ काज भेटल। किछु दिन बाद गामपर सँ हमर विवाहक बातचीतक समाचार आएल जे तूँ गाम आब’। फरबरी-मार्चमे हम गाम गेलौं। बाबूजीकेँ कहलियनि जे विवाहमे जे दहेज देत’ ओइ दहेजसँ अओर एक सालमे किछु रुपैया अओर लगा क’ बहिनक कन्यादान सेहो क’ लेब। किछु भाड़ा-बर्तन अओर ओइमे लगा देबै। ई सभ मजबूरी देख हमर विवाह 2002 मे भेल, पण्डौल गाममे, जइ गामक पड़ोसमे कनी हटि क’ अछि भवानीपुर गाम, जइ ठाम महादेव उगना रूप धारण क’ विद्यापतिकेँ दर्शन देने छलनि जे अखन मिथिलामे सुप्रसिद्ध अछि, कवि विद्यापति अओर उगना महादेव। हमर विवाहक पश्चात एक बेर फेर हम संस्कृत बोर्डसँ परीक्षा देलौं, अओर ओइमे हम द्वितीय श्रेणीसँ उत्तीर्ण भेलौं। हम ई परीक्षा केथाही-रामपट्टी स्कूलसँ देने छलौं 2005 मे। तेकरा बाद पुनः हम अपने गाम लगमे कॉलेज छल शिवनन्दन-नन्दकिशोर महाविद्यालय, भैरवस्थान ओइमे एडमिशन करा क’ आइ.ए. मे हम फेर आबि गेलौं बेंगलोर। तकरा बाद ओइ केटरिंगमे आदमी बढ़ि गेलासँ हमरा ओइठाम काज नै भेटल तँ हम फेर एतौ एकटा कोठीमे काज पकड़लौं अओर गाम आबि क’ इण्टरमीडिएट परीक्षामे फेर शामिल भ’ गेलौं आ अहूमे सेकेण्ड डिवीजनसँ पास भेलौं, कोठीएमे समए बचए तँ पढ़बो करी, किताब गामसँ ल’ क’ जाइ छलौं। संग-संग बहिनक कन्यादान सेहो भ’ गेल भगवतीक दयासँ। ओही विवाहमे किछु खर्चा आ कर्जा भ’ गेल बेसी। कोठीमे दू हजार रुपैया दिअए महिना, ओइमे घरक खर्चा अओर ओम्हर अपन पढ़ाइक परीक्षा फीस, पलसमे परिवारक सेहो खर्चा। फेर बी.ए. मे नाम लिखेलौं अओर फेर चलि गेलौं बंगलौर। हमर विषय छल आर्ट जे कोनो ट्यूशन बिना पढ़ि सकै छलौं। हमरा इण्टरमीडिएटमे हिन्दी विषयमे ज्यादा अंक आएल छल मुदा अपने नै रही गाममे तँ हमर संगी छल राकेश कुमार ठाकुर, लगैमे हजाम, वएह छल हमर फॉर्म भरनिहार, परीक्षा शुल्क जमा केनिहार, हुनका मैथिलीमे ज्यादा अंक एलै, ओइ वास्ते हमरो उ यएह ऑनर्स विषय रखबा देलक। गाम एलौं तँ मन किछु पछताइतो छल जे आबक जमानामे आर्ट क’ पढ़ाइ कियो पढ़ै छै, मुदा  मैथिलीक जखन नाम सुनलिऐ तखन मन गदगद भ’ गेल। हँ, मुदा किताब भेटल बहुत मेहनति क’ कए। हर साल पाँच सएमे किताब खरीद’ पड़ए, ओहूमे जेरोक्स पन्ना। तेकरा पढ़ि क’ हम बी.ए. फर्स्ट क्लाससँ 2011 ई. मे पास केलौं ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटा, कामेश्वर नगर दरभंगासँ। ता’त हमरा बालो बच्चा भेल। पढ़ाइ संग-संग एकरो सबहक देख-रेख केनाइ माय-बापक दायित्व होइ छै। तखन हम फेर गामसँ बेंगलोर आबि गेलौं। कतेक बेर पैराशुट रेजीमेंटमे बेंगलोरमे भर्तीमे बहालीमे गेलौं मुदा असफल रहलौं। ऐबेर गाममे एस.टी.ई.टी.बला परीक्षामे सेहो शामिल भेलौं मुदा उहो असफल रहल। आबि गेलौं बेंगलोर जे आब ओतेक कोनो नीक एजुकेशनो नै अछि जे कतौ नोकरी हएत, तैयो कोनो काजमे लागल छी। भगवतीक दया, आगू हुनका हाथमे छनि। हमरा दूटा बेटा अछि अओर एकटा बेटी, बड्क्ष अछि राजकुमार साफी, छोट बेटा सागर कुमार साफी। तइसँ छोट अछि राज नन्दनी कुमारी। अखन ई सभ आंगनवाड़ी स्कूलमे पढ़ि रहल अछि। ओतेक पाइ अछि नै जे प्राइवेट स्कूलमे धीया-पुताकेँ पढ़ाएब, दिनोदिन महगाइ बढ़ले जाइत अछि। हम सभ बी.पी.एल. कोटिमे शामिल छी। धीरे-धीरे एतबो शिक्षा भेलाक बादो कोनो नोकरी नै भेटैए। लोक कहै छलए जे एतेक पढ़निहार बड़का अफसर होइत अछि मुदा हम सभ किछु नै क’ पाबि रहल छी। हमरा संगीतसँ बेसी मिलान रहैत अछि। गीत गेनाइ हमरा बहुत नीक लगैत अछि। मैथिली होइ बा नेपाली बा हिन्दी, हम ओहू गीतकेँ गाबि सकै छी। कीर्तन-भजन केलौं अपने गामघरपर संगी-साथी संग। जीवन एगो घड़ीक सुइया होइत अछि, दिन भरि, राति भरि चलिते रहैए, कखनी बन्द भ’ जाएत किनको नै थाह अछि। हम अप्पन ऐ मैथिलीक माटि-पानिसँ जुड़ल हरएक बातक सम्मान करब। अप्पन भाषाकेँ ऊँच शिखरपर पहुँचेबाक प्रयास करब। हम मैथिल छी, मिथिलेमे रहब अओर पोरो साग तोड़ि क’ गुजर करब। सादा छी सादा रहब। जय मिथिला, जय मिथिला धाम, प्रणाम। उमेश मण्डल दोसर चरणक पहिल सगर राति दीप जरय दरभंगामे सम्पन्न- डिजिटल फॉर्ममे ३७ टा पोथीक लोकार्पण पूर्वपीठिका: -"सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे -आयोजक छथि श्री अरविन्द ठाकुर --"सगर राति दीप जरय"क पहिल चरणमे बहुत रास घुसपैठिया घुसि गेल रहथि आ ई अपन मूल उद्देश्यसँ दूर भऽ गेल छल। -लोक भरि राति सुतैत रहथि, जातिवादिताक स्वर सोझाँ आबि गेल छल, लॉबी बना कऽ होइत समीक्षा आ ब्राह्मणवादी-आमंत्रण धरि गप पहुँचि गेल छल। साहित्य अकादेमीक हस्तक्षेपसँ मामला आर गरबड़ा गेल। ७५म सगर राति दीप जरयमे पटनामे किछु गोटे द्वारा शराब पीलापर धनाकर ठाकुर विरोध सेहो प्रकट केलन्हि। तकर बाद ओहीमेसँ किछु गोटे ऐ गोष्ठीकेँ दिल्ली लऽ गेला, मुदा विभिन्न कारणसँ आ साहित्य अकादेमीक दवाबपर मैथिली पोथी प्रदर्शनी नै लगाओल जा सकल, कारण आयोजक तकर अनुमति नै देलन्हि, ऐ साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीकेँ ७६म -"सगर राति दीप जरय"क मान्यता नै देल जा सकल (ओना किछु ब्राह्मणवादी कथाकार आ घुसपैठिया लोकनि एकरा ७६म सगर राति दीप जरय कहि रहल छथि!!) । ७६म -"सगर राति दीप जरय"क आयोजन विभा रानी द्वारा चेन्नैमे भेल जतए मात्र एकटा कथाकार पहुँचला। कियो माला नै उठेलनि आ सगर राति दीप जरयक पहिल चरणक दुखद अन्त भऽ गेल। --"सगर राति दीप जरय"केँ फेरसँ जियेबाक प्रयत्नक स्वागत कएल जा रहल अछि। "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ केँ "किरण जयन्ती"क अवसरपर आयोजित भऽ रहल अछि। आशा अछि जे ई नव "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय पुनः अपन ओइ पथपर आगाँ बढ़त, जे प्रभास कु. चौधरी ऐ लेल सोचने छला। सगर राति‍ दीप जरय- कि‍रण जयन्‍ती केर अवसरपर दि‍नांक १ दि‍सम्‍बरक साँझ ६ बजेसँ भि‍नसर ६ बजे धरि‍ दरभंगाक कटहलवाड़ी स्‍थि‍त एम.एम.टी.एम महावि‍द्यालयक प्रेक्षागारमे सगर राति‍ दीप जरय-कथा गोष्‍ठीक आयोजन अरवि‍न्‍द ठाकुर जीक संयोजकत्‍वमे भेल। ऐ गोष्‍ठीक उद्घाटन डी.आइ.जी. राकेश कुमार मि‍श्र दीप प्रज्‍वलि‍त कऽ केलनि‍। डॉ. भीम नाथ झाक अध्‍यक्षता एवं अजीत आजाद जीक संचालनमे ऐ भरि‍ राति‍क कार्यक्रमकेँ तीन सत्रमे बाँटि‍ आगू बढ़ाओल गेल। पहि‍ल सत्र छलै उद्घाटनक दोसर  लोकार्पण आ तेसर कथा वाचन सह समीक्षाक। मध्‍यांतर सेहो भेल जइमे नीक भोजनक आ लगभग दससँ बीस मि‍नट धरि‍क आरामाक बेवस्‍था छल। अहाँकि‍ ई बेवस्‍था गोष्‍ठीमे आनायास भेलै, भेलै ई जे भोजनक प्रवन्‍ध साकट लेल अलग। जइसँ दू तोजीमे भोजन कराओल गेलै। जइमे समए लागल। आ एकटा आर महत्‍वपूर्ण बात ई जे मंच संचालक अजीत आजादजी स्‍वयं दुनू सत्रक भोजनमे टहलि‍-टहलि‍ भोजन करबेलखि‍न। अर्थात् पहि‍ल तोजीमे भोजन केनि‍हार कथाकारकेँ लगभग बीस मि‍नट सुतैक अवसर भेट गेलैक। सत्रक आरम्‍भ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल लि‍खि‍त एगारह गोट पोथीक लोकार्पण जे पी.डी.एफ फाइलमे सी.डी.क रूपमे भेल जेकर वि‍वरण एना अछि‍- गीतांजलि‍ (गीत संग्रह), इन्‍द्रधनुषी अकास (कवि‍ता संग्रह), तीन जेठ एगारहम माघ (गीत संग्रह), राति‍-दि‍न (कवि‍ता संग्रह), अर्द्धांगि‍नी.. सरोजनी.. सुभद्रा.. भाइक सि‍नेह इत्‍यादि‍ (लघुकथा संग्रह), शंभुदास (दीर्घकथा संग्रह), बजन्‍ता-बुझन्‍ता (वि‍हनि‍ कथा संग्रह), कम्‍प्रोमाइज (नाटक), झमेलि‍या बि‍आह (नाटक), पंचवटी (एकांकी संचयन) आ सतभैंया पोखरि‍ (लघुकथा संग्रह)। तकर बाद श्री गजेन्‍द्र ठाकुर लि‍खि‍ल ९ गोट पोथी लोकार्पण (सी.डी.) मे भेल। तकर सबहक वि‍वरण एना अछि‍- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग-१, सहस्रबाढ़नि (उपन्यास), सहस्राब्दीक चौपड़ि‍पर (पद्य संग्रह), गल्प-गुच्छ (विहनि आ लघु कथा संग्रह), संकर्षण (नाटक), त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन (दूटा गीत प्रबन्ध), बाल मण्डली/ किशोर जगत (बाल नाटक, कथा, कविता आदि), उल्कामुख (नाटक) आ सहस्रबाढ़नि उपन्‍यासक अंग्रेजी अनुवाद The Comet नामक पोथी जेकर अनुवादक थि‍कीह श्रीमती ज्‍योि‍त सुनीत चौधरी। एही कड़ीमे ऐ  दुनू रचनाकारक अलादा वि‍देह-सदेह भाग-५सँ१० धरि‍क संकलन जे वि‍देह मैथि‍ली लघुकथा, वि‍देह मैथि‍ली नाट्य उत्‍सव, वि‍देह मैथि‍ली पद्य, वि‍देह मैथि‍ली प्रवन्‍ध-नि‍वन्‍ध, वि‍देह शि‍शु उत्‍सव आ वि‍देह मैथि‍ली वि‍हनि‍ कथाक छल। ततबे नै एगारहटा आर रचनाकारक पोथी सी.डी. रूपमे सबहक बीच आएल जइमे १. वर्णित रस- (कवि‍ता संग्रह) उमेश पासवान (औरहा, मधुबनी), २. नव अंशु- (गजल, रूवाइ आ कता संग्रह) अमीत मि‍श्र (करि‍यन, समस्‍तीपुर), ३. रथक चक्का उलटि‍ चलै बाट- (कवि‍ता संग्रह) राम ि‍वलास साहु (लक्ष्‍मि‍नि‍या, मधुबनी), ४. कि‍यो बूझि‍ ने सकल हमरा- (गजल, रूवाइ आ कता संग्रह) ओम प्रकाश झा (भागलपुर), ५. बाप भेल पि‍त्ती आ अधि‍कार- (नाटक) बेचन ठाकुर (चनौरागंज, मधुबनी), ६. हम पुछैत छी- (साक्षात्‍कार) मनोज कुमार कर्ण, मुन्नाजी (रूपौली, मधुबनी), ७. हमरा बि‍नु जगत सुन्ना छै- (गीत-झारू संग्रह) रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ (ररूआर, सुपौल), ८. क्षणप्रभा- (कवि‍ता संग्रह) शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ (करि‍यन, समस्‍तीपुर), ९. हमर टोल- (उपन्‍यास) राजदेव मण्‍डल (मुसहरनि‍याँ, मधुबनी), १०. मोनक बात- (गजल, रूवाइ आ कता संग्रह) चंदन झाक आ ११म नीतू कुमारीक मैथि‍ली चि‍त्र कथा, ऐ तरहेँ ऐ गोष्‍ठीमे, कुल्‍लम 37टा पोथी लोकार्पित भेल। कथा पाठ आ तइपर समीक्षकक टीप्‍पणी ऐ गोष्‍ठीक वैशि‍ष्‍टय अछि‍। पहि‍ल पालीमे श्रीमती वीणा ठाकुर, आशा मि‍श्र, ज्‍योत्‍सना चन्‍द्रम, श्‍याम भाष्‍करक लघुकथा आ उमेश मण्‍डलक वि‍हनि‍ कथाक पाठ भेल। समीक्षीय टीप्‍पणी भेल। अहि‍ना आगूक पालीमे कथाकार अपन नूतन कथाक पाठ केलनि‍- बेचन ठाकुर- वेस्‍ट मैडम लक्ष्‍मी दास- टाइपि‍स्‍ट चन्‍देश्वर खाँ- नाओल्‍द अनमोल झा- फाइल, सेयर मुरलीधर झा- मनुक्‍ख अभि‍षेक- महापुरुष रामाकान्‍त राय ‘रमा’- वकवास रामवि‍लास साहु- घूसहाघर नारायणजी- छत्ता शैलेन्‍द्र आनन्‍द- फोरलेन पवन कुमार साह- अपन रीति‍ सुभाषचन्‍द्र सनेही- बूढ़ी नन्‍द वि‍लास राय- बाबाघाम उमेश पासवान- अजाति‍ अशोक कुमार झा- माछक मोटरी परमानन्‍द प्रभावकर- परि‍वर्त्तन फूल चन्‍द्र मि‍श्र प्रवीण- परि‍वर्त्तन दुखमोचन झा- समरथको नहि‍ दोष गोसाई दुर्गानंद मण्‍डल- कुकर्मा जगदीश प्रसाद मण्‍डल- अनदि‍ना, बुधनी दादी शि‍व कुमार मि‍श्र- नापता शशि‍कान्‍त झा- दूरी अच्‍छेलाल शास्‍त्री- गामक लोक शीर्षकक कथा पढ़लनि‍। हलाँकि‍ शास्‍त्री जीक कथाक वाचन मात्र एक पृष्‍ठ  सुनला पछाति‍ रोकि‍ देल गेल ई कहि‍ जे ई कथा नै आलेख थि‍क। अच्‍छेलाल शास्‍त्रीक ई पहि‍ल मंच रहनि‍ जइपर ओ कथा पढ़ि‍ रहल छलाह, ओना कवि‍ता आइ तीस बर्ख पहि‍नेसँ लि‍खैत छथि‍। ई मंचक अध्‍यक्ष संग संचालक एवं ऐ दुआरे केलनि जे पृष्‍ठ भरि‍क वाचनमे कथोप-कथन कि‍एक नै आएल। शास्‍त्री जीक कहब छलनि‍ जे कथोप-कथन कोनो कथाक एक तत्‍व थि‍क से हमरो बूझल अछि‍ आ तकर समावेश अवश्‍य केने छी मुदा से आगू अछि‍ माने अगि‍ला पृष्‍ठमे। तथापि‍ कथाक वाचन रोकि‍ देल गेलनि‍। आ अच्‍छेलाल यादव शास्‍त्री अपन कथाक अपूर्ण पाठसँ नि‍रास रहि‍ गेलाह। अमीत मि‍श्र, मुकुन्‍द मयंक, अमलेन्‍दु  शेखर पाठक, रौशन झा इत्‍यादि‍ व्‍यक्‍ति‍क कथाक पाठ सेहो भेल आ तइपर टीप्‍पणी गुनजाइश हि‍साबे। टी‍प्‍पणीकार सभ छलाह- फूलचन्‍द्र मि‍श्र रमण, रमानंद झा रमण, भीमनाथ झा, अशोक मेहता, दुर्गानन्‍द मण्‍डल, कमल मोहन चुन्नु, नारायणजी, कुमार शैलेन्‍द्र, जगदीश प्रसाद मण्‍डल, कमलाकान्‍त झा (जयनगर), योगानंद झा इत्‍यादि‍। आगि‍ला ‘सगर राति‍ दीप जरए’ कमलेश झाक संयोजकत्वमे घनश्‍यामपुरमे हेबाक घोषणा सेहो भेल। दीप आ उपस्‍थि‍ति‍ पुस्‍ति‍का स्‍थानीय संयोजक अरवि‍न्‍द्र ठाकुर कमलेश झाकेँ हस्‍तगत करा गोष्‍ठीक समापनक घोषण केलनि‍। प्रमोद रंगिले प्रचण्ड प्रयोग कएलथि नया हथियार- मधेसी मोर्चा बेवकुफ बनए लेल भऽ गेल तैयार जनकपुरधाम: एकीकृत नेकपा माओवादीक अध्यक्ष प्रचण्ड प्रधानमन्त्रीक लेल मधेसी मोर्चा नीक रहत, बतौलन्हि अछि। राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव प्रधानमन्त्रीक लेल सहमति करए देने  दोसरका अल्टीमेटम सेहो अहिना समाप्त भेलाक बाद तथा कांग्रेस  दिस सँ प्रधानमन्त्रीक लेल अपन उम्मेदवार श’सील कोइरालाकेँ खड़ा करौलाक बाद प्रचण्डक एहन अभिव्यक्ति आएल अछि। ओना तँ माओवादी सँ हरेक काम पुछिकऽ करएबला मधेसी मोर्चा दिससँ प्रधानमन्त्रीक प्रस्ताव माओवादी अहिसँ पहिनहु आएल छल मुदा प्रधानमन्त्रीक लेल प्रस्तावित भेल गच्छदारक भूमिका मधेसी मोर्चामे नीक नै रहलासँ हुनकर नाम बादमे बिसराओल गेल छलै।  माओवादीकेँ नाया हथियारक रुपमे प्रयोग होबएबला मोर्चा दिससँ नाया प्रस्ताव तमलोपाक अध्यक्ष महन्थ ठाकुरक नाम आएल अछि। ओना तँ चुनावेमे हार पौने ठाकुर एखन धरि नै मधेसक लेल किछु कएने छथि नै तँ किछु बजने छथि। एहन अवस्थामे प्रधानमन्त्रीक लड्डू पौनाइ कोनो छोट बात नइ अछि। यदि गप्प कएल जाए राष्ट्रपतिकेँ अल्टिमटमकेँ तँ ओहन अल्टीमेटम कतेक बितल, अइके गणना नइ कएल जा सकैए। बेर-बेर संविधान बनाबएकेँ समए बढ़ैत-बढ़ैत संविधान सभे विघटन भऽ गेल मुदा एखनो धरि नइ दल सभमे कोनो किसीमके कनीको लाज लागल नै बुझि पड़ैत अछि। एम्हर प्रधानमन्त्रीक लेल राष्ट्रपति समक्ष निवेदन देने किसोरी महतो मौकामे चौका मारए लेल एकदम तैयार बैसल छथि। राष्ट्रपतिक दोसरो देल गेल सहमतिक समए बितलाक बाद अदालत निवेदक महतोकेँ प्रधानमन्त्री किए नइ बनाओल गेल, ओही केँ लेल स्पष्टीकरण मंगलक अछि। एक दिससँ देखल जाए तँ राष्ट्रपति रामवरण यादव सेहो कम मजबूर  नइ छथि। संविधान सभाक देहावसान भेलाक बाद संसदीय पद्धति द्वारा बनाओल गेल राष्ट्रपतिकेँ सेहो कोनो अधिकार नै रहत, से धमकी प्रमुख दलक प्रमुख नेता सभसँ अएलाक बाद चुलबुल पाण्डे जी चुलबुल करनाइए बन्द कए देने छथि। आब जेना लगैए, देशक एहन अवस्थामे निकास निकालयके लेल किनको दबंग बनहिटा पड़त। नइ तँ नेपाल विश्वक भ्रष्ट मुलुकमे ३७ अम स्थान मात्रे नइ, नम्बर एक बनैत देर नइ लागत। बिना संविधानक चलि रहल देशकेँ अफगानिस्तान बनैत देर नइ लागत। मधेसक मुक्तिक लेल सशस्त्र भूमिगत रुपमे युद्ध कऽ रहल मोर्चा सभकेँ नेपाल सरकार किछे महिना पहिले वार्तामे आबए, आवहन कएने छलथि। मुदा जखन ई मोर्चा सभ वार्तामे अएलथि तखन सरकारकेँ कोनो मतलब नइ देखल जा रहल अछि। मधेसीक नेता सभ ई सभ देखिओ कऽ चुप्पी किए सधने छै? कहीं फेरसँ देश द्वन्द्वमे नइ फँसि जाइक। यदि एहन भेल तँ अहिके जिम्मेवार यएह दल सभ रहत। दोसर दिस प्रचण्ड सँ अलग भेल माओवादी दल वैध पक्षधर नेकपा– माओवादी देशकेँ जल्दीए निकास नइ निकालत तँ हम सभ फेर सशस्त्र युद्ध करए जंगल ढुकब, जेहन चेतावनी बेर-बेर दऽ चुकल अछि। एहन अवस्थामे नेता सभकेँ इमानदार बननाइ जरुरी रहल अछि। पड़ोसी देश भारतक राज्य बिहारक उदाहरण देखाबएबला नेपाली नेता सभ एखन बिहारक तरक्कीक उदाहरण सेहो देखौक आ सिखाबौक। किएक तँ नेता सभक नौटंकी करए स्थल नेपालकेँ बनाओत तँ जनता किन्नहु नै स्वीकार करत। ध्यान दिअ। आशीष अनचिन्हार- माहिया हम प्रयासरत छलहुँ जे लघु-दीर्घ निर्णय भाग-२ एही अंकमे आबए मुदा कनेक नमहर चर्चा हेबाक कारणें बेसी समय लागि रहल छै..... तँए ऐ खेप एकटा नव विधापर गप्प करी। ऐ विधाक नाम थिक " माहिया " । ई विधा मूलतः पंजाबी साहित्य केर थिक आ पंजाबीसँ उर्दूमे आएल आ तकरा बाद सभ भाषामे पसरल। ई विधा मात्र तीन पाँति केर होइत छै जाहिमे पहिल पाँतिमे 12 मात्रा दोसरमे 10 मात्रा आ फेर तेसरमे 12 मात्रा होइत छै आ सङ्गे-सङ्ग पहिल पाँति आ तेसर पाँतिमे काफिया ( तुकान्त ) होइत छै... तँ देखी एकर संरचनाकेँ------ पंजाबीमे माहियाक पहिल पाँतिक संरचना अधिकांशतः 2211222 अछि मने दीर्घ-दीर्घ-लघु-लघु-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ। तेनाहिते दोसर पाँतिक संरचना अछि 211222 दीर्घ-लघु-लघु-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ आ फेर तेसर पाँतिक संरचना पहिल पाँतिक बराबर अछि मने 2211222 मने दीर्घ-दीर्घ-लघु-लघु-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ। ओना ई अधिकांश संरचना अछि। ऐकेँ अलावे किछु हेड़-फेड़क संग आन-आन संरचना सेहो भेटैत अछि। मुदा ई निश्चित छै जे हरेक पाँतिमे दीर्घक बेसी संख्या रहने लयमे ई खूब आबि जाइत छै माहिया छन्दमे अर्थक चारि तरहें विस्तार होइत छै... १) या तँ पहिल आ दोसर पाँति मीलि कए एकटा अर्थकेँ ध्वनित करै आ तेसर पाँति अलग रहै, २) या तँ दोसर पाँति आ तेसर पाँति मीलि कए कएटा अर्थकेँ द्वनित करै आ पहिल पाँति अलग रहै, ३) या तीनू पाँति मीलि कए एकटा अर्थकेँ ध्वनित करै ४) या दोसर पाँति एहन होइ जे पहिलो पाँति सङ्ग मीलि अलग अर्थ दै वा तेसर पाँति सङ्ग मीलि अलग अर्थ दै। माहिया छन्दक स्थायी अधार श्रृगांर रस थिक मुदा आधुनिक समयमे ई हरेक विषयमे लिखल जाइत अछि। उदाहरण स्वरूप देखू हमर दूटा माहिया--- १) तीरसँ ने तरुआरिसँ हम डरै छी आब हुनक नजरिकेँ मारिसँ २) डोलैए मोन हमर उठल आँखिसँ भाइ करेज मथैए हमर मैथिलीमे ई माहिया छन्द अज्ञात अछि.. आउ एकरो आगू बढ़ाएल जाए..... खास कए जे कवि श्रृगांर रसमे भीजल रहै छथि। आशीष अनचिन्हार लघु-दीर्घ निर्णय हमर ऐ लेखमे मात्र पं. गोविन्द झा जीक चर्च अछि तकरा अन्यथा नै लेल जाए से हमर आग्रह। पं. गोविन्द झा जीकेँ हम मैथिली व्याकरणक धूरी मानैत ई लिखल अछि। निश्चित रुपें पं. जी अपन अग्रजसँ नियम ग्रहण केने छथि आ अपन अनुज सभकेँ बेसी प्रभावित केने छथि तँए हम मात्र पं. जीक उपर ई लेख केन्द्रित केलहुँ जाहिसँ हुनक अग्रज आ हुनक अनुज सभ ऐ लेखक माँझमे आबि सकथि। तँ आउ कने चली मात्रा केना गानल जाइत छै ताहिपर। मात्रा गनबाक लेल  मोन राखू जाहि अक्षरमे "अ", "इ", "उ", "ऋ" एवं "लृ" नुकाएल हो तकरा लघु मानू आ तकरा बाद सभकेँ दीर्घ। संगहि संग अनुस्वार तँ दीर्घ अछि मुदा चन्द्रबिन्दु लघु। चन्द्रबिन्दु जँ लघु अक्षरपर रहतै तँ लघु मानल जेतै आ जँ दीर्घ अक्षरपर रहतै तँ दीर्घ मानल जाएत। संगहि-संग जँ कोनो शब्दमे संयुक्ताक्षर हुअए तँ ताहिसँ पहिलेक अक्षर दीर्घ भए जाइत छैक चाहे ओ लघु किएक ने हुअए। उदाहरण लेल--प्रत्यक्ष शब्दमे दूटा संयुक्ताक्षर अछि पहिल त्य एवं क्ष। आब एहिमे देखू "त्य" सँ पहिने "प्र" अछि तँए ई दीर्घ भेल आ "क्ष" सँ पहिने "त्य" अछि तँए इहो दीर्घ भेल। ई नियम जँ दू टा अलग-अलग शब्द हो तैयो लागू हएत जेना उदाहरण लेल--- हमर प्रेम छी अहाँ... ऐमे "प्रे" संयुक्ताक्षर भेल आ ताहिसँ पहिने बला शब्द " र" दीर्घ भए जाएत। मतलब जे "हमर" शब्दक अंतिम अक्षर "र" दीर्घ भए जाएत । सङ्गे-सङ्ग मोन राखू "न्ह" आ "म्ह" संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला शब्दमे लघु दीर्घ सेहो हएत। जेना की "कुम्हार" मे "म्ह" सँ पहिने "कु" दीर्घ भेल तेनाहिते "कन्हाइ" शब्दमे सेहो "न्ह"सँ पहिने "क" वर्ण दीर्घ भेल। क्ष, त्र आ ज्ञ संयुक्ताक्षर अछि। तेनाहिते.... प्र, र्व, आदि सेहो संयुक्ताक्षर अछि। मुदा "मृत" शब्दमे "मृ" संयुक्ताक्षर नै अछि। गजलमे दूटा लघुकेँ एकटा दीर्घ सेहो मानल जाइत छै। बहुत गोटेंकेँ समस्या होइत छन्हि जे इ लघु-दीर्घ कोना होइत छै। प्रस्तुत अछि किछु उदाहरण--- बिगड़ि-----------एहि शब्दकेँ ह्रस्व-दीर्घ मानू वा दीर्घ-ह्रस्व मानू। बहरक जेहन जरूरति हो। अरबी बहरमे तीन टा लघु सँ कोनो बहर नै छै तँए लघु-लघु-लघु मानबाक कोनो जरूरति नै। हुनकर---------- एहि शब्दकेँ दीर्घ-दीर्घ मानू वा दीर्घ-लघु-लघु मानू वा लघु-लघु-दीर्घ दीर्घ मानू जेहन जरूरति हो। अरबी बहरमे चारिटा लघु सँ कोनो बहर नै छै तँए लघु-लघु-लघु-लघु मानबाक कोनो जरूरति नै। घर------- एहि शब्दकेँ दीर्घ मानू वा लघु-लघु बहरक जेहन जरूरति हो। चोर------ इ साफे तौर पर दीर्घ-लघु अछि। जँ कोनो शेरमे एना पाँति छै--- बिगड़ि चलै । आब एहि दू शब्दकेँ बान्हू। या तँ अहाँ " बिग" मने एकटा दीर्घ मानू आ "ड़ि" मने एकटा लघु फेर "च" एकटा लघू भेल आ "लै" एकटा दीर्घ। एकर मतलब जे " बिगड़ि चलै" केर संभावित बहर भेल--दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ। एहि शब्दकेँ एकटा आर रूप दए सकैत छी जेना की---- "बि" के लघु मानू "गड़ि"केँ दीर्घ मानू आ फेर "च" एकटा लघू भेल आ "लै" एकटा दीर्घ। एकर मतलब जे " बिगड़ि चलै" केर संभावित बहर भेल--- लघु-दीर्घ-लघु-दीर्घ। आब एहि दू रूपकेँ अहाँ बहरक हिसाबें प्रयोग करू। कतेको आदमी " बिग" केँ दीर्घ मानताह फेर "ड़ि" "च" केँ मिला दीर्घ मानताह आ "लै" भेल दीर्घ मने दीर्घ-दीर्घ -दीर्घ मुदा इ रूप गलत भेल। मुदा ऐठाम एकटा गप्प मोन राखू जे किछु शब्दमे धेआन सेहो राखए पड़त जेना एकटा शब्द " कमल " लिअ। आब जँ अहाँ एकर उच्चारण क-मल ( मने लघु-दीर्घ) करबै ताहिसँ एकटा फूलक अर्थ निकलत मुदा जखन अहाँ एही शब्दकेँ कम-ल ( मने दीर्घ-लघु) करबै तखन एकर अर्थ घटनाइमे हेतै जेना - पानि कम'ल की नै इत्यादि। तँए हमर आग्रह जे पहिने कोनो शब्दकेँ उच्चारणक हिसाबेँ अर्थ देखू जाहिसँ उच्चारण अनर्थ नै हुअए। मैथिलीमे वर्तनीकेँ हिसाबेँ ई उदाहरण देखू---- लए---- ह्रस्व-दीर्घ लs------ह्रस्व ल'------ह्रस्व लय--- ह्रस्व-ह्रस्व वा दीर्घ इएह निअम कए, कs वा स', भए भs वा भ' लेल छै आन प्रारूप लेल एहने बात बूझल जाए। ऐठाम ईहो कही जे लघु लेल ह्रस्व शब्दक प्रयोग सेहो कएल जाइत छै तेनाहिते दीर्घ लेल गुरू शब्द छै। ई तँ छल सूत्र रूपमे। कने एकरा फरिछा कए देखी------ 1)    1) पं. गोविन्द झा अपन पोथी " मैथिली छंद शास्त्र" ( मिथिला पुस्तक केन्द्र दरभंगासँ प्रकाशित, द्वितीय संस्करण १९८७)मे पृष्ठ १३ मे लिखैत छथि जे " सँ, जँ, तँ, हँ आदि गुरू अछि" मने चंद्रबिंदुकेँ पं. गोविन्द झा जी दीर्घ मनने छथि। मुदा फेर पं. गोविन्द झा जी शेखर प्रकाशनसँ २००६मे प्रकाशित अपन पोथी " मैथिली परिचायिका" केर पृष्ठ २०पर लिखै छथि जे " अनुस्वार भारी होइत अछि आ चंद्रबिंदु भारहीन" मने ऐ पोथीमे पं. जी चंद्रबिंदुकेँ लघु मनने छथि आ एहने सन विचार ओ मैथिली अकादेमीसँ २००७मे प्रकाशित अपन पोथी "मैथिली परिशीलन"क पृष्ट ३५पर देने छथि। आब हमरा एहन पाठक लेल ई बड़का प्रश्न अछि जे चंद्रबिंदुकेँ लघु मानल जाए की दीर्घ, कारण एकै पं. गोविन्द झा जी अपन भिन्न-भिन्न पोथीमे भिन्न विचार देने छथि आ ई प्रचारित करबाक उपक्रम करै छथि जे जाहि पोथीमे हम जे लीखि देलहुँ से सही अछि। जँ पं. गोविन्द झा जी बाद बला पोथीमे लीखि देने रहितथिन्ह जे " मैथिली छंद शास्त्रमे चंद्रबिंदु केर सम्बन्धमे हम जे लिखने छी से गलत थिक आब आब हम ऐ पोथीमे एकरा सुधारि रहल छी" तखन हमरा जनैत भ्रम नै पसरितै आ ऐसँ हुनक महानता सेहो सिद्ध होइत। मुदा से नै भेल। कोनो भाषाक वैयाकरणक उपर ओहि भाषाक हरेक लोककेँ विश्वास होइत छै। मैथिल सेहो पं. जीपर विश्वास करैत छथि ( हमरा सहित) आ तँए बहुत मैथिल लोकनि चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि बैसल छथि। एकर सभसँ बड़का उदाहरण श्री रमण झा सन अलंकार शास्त्री अपन पोथी " भिन्न-अभिन्न"क पृष्ठ ६७-७३ मे देने छथि जतए श्री रमण जी पं. गोविन्द झा जीक संदर्भ दैत चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि लेने छथि। अस्तु ई गप्प फरिछाएल अछि जे चंद्रबिंदु लघु होइत अछि आ अनुस्वार दीर्घ। एही क्रममे एकटा आर गप्प भए सकैए जे पं. गोविन्द झा जी कविवर सीताराम झा जीक कविताकेँ देखि चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि लेने होथि तँ से गप्प फराक, कारण कविवर सीताराम जी अपन अधिकांश कवितामे चंद्रबिंदु युक्त लघु शब्दकेँ दीर्घ जकाँ प्रयोग केने छथि। मुदा ऐठाम ई मोन राखए पड़त जे छंदमे जरूरति पड़लापर ( मात्र आवश्यक स्थितिमे) लघुकेँ दीर्घक बराबर वा तेनाहिते दीर्घकेँ लघु बराबर उच्चारण कएल जाइत रहलै। तँए जँ कविवर सीता राम जी जँ आवश्यकता पड़लापर जँ चंद्रबिंदु युक्त लघुकेँ दीर्घ जकाँ प्रयोग केने छथि ताहिसँ ओ नियम नै बनि जेतै वस्तुतः नियम तँ इएह छै जे चंद्रबिंदु लघु अछि। एकटा गप्प आर संस्कृतमे लघुकेँ दीर्घक बराबर वा तेनाहिते दीर्घकेँ लघु बराबर उच्चारण मान्य नै छै। मैथिलीमे लघुकेँ दीर्घक बराबर वा तेनाहिते दीर्घकेँ लघु बराबर उच्चारण प्राकृत एवं अप्रभंश भाषासँ भेल अछि। 2)   2)  मैथिली छन्द शास्त्रक पृष्ठ १४पर पं. गोविन्द झा जी लिखै छथि जे ----" न्ह आ म्ह संयुक्ताक्षरसँ पूर्व लघु वर्ण गुरू नै होइत अछि, कन्हाइ, कुम्हार, एहिठाम क ओ कु गुरू नहि थिक।" मुदा जँ अहाँ मैथिली उच्चारणकेँ अकानब तँ साफ-साफ सुनबामे कन् + हाइ ध्वनि आएत तेनाहिते कुम् + हार ध्वनि सुनबामे आएत। मैथिलीमे क + न्हाइ वा कु + म्हार ध्वनि कदाचिते भेटत आ जेना की गजल उच्चारणपर आधारित अछि तँए गजलमे कन्हाइ लेल दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत आ कुम्हार सेहो दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत। ओना गजलेमे किएक हरेक छन्द, हरेक पद्य उच्चारणपर अछि तँए हरेक छंदमे कुम्हार दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत। आब कने आर विस्तारसँ चली। उर्दू भाषामे न्ह, म्ह आ ल्ह सँ पहिनुक अक्षर दीर्घ नै होइत छै मने जे जाहि सङ्गे ल्ह, म्ह वा न्ह रहैत अछि तकरे उपर ओ प्रभाव दै छै जेना " तुम्हारा " ऐ शब्दक उच्चारण उर्दूमे "तु + म्हारा" होइत छै तँए उर्दूमे " तुम्हारा लेल लघु + दीर्घ + दीर्घ प्रयोग होइत छै। ओना ऐठाम ई कहब बेजाए नै जे उर्दूमे न्ह, म्ह, ल्ह केर ध्वनि संस्कृतसँ आएल मुदा उर्दूक सचेष्ट विद्वान सभ उच्चारण अपने हिसाबसँ रखलथि। उर्दूक ई उच्चारण हिन्दीमे आएल ( बजबा कालमे उर्दू आ हिन्दी एक समान होइत अछि)। मुदा जँ मैथिली उच्चारणकेँ देखबै तँ साफे-साफ अंतर बुझना जाएत। आ एही अन्तरक कारणें मैथिल हरेक आन राज्यमे जल्दिये पहिचानमे आबि जाइत छथि। मैथिलीमे आने संयुक्ताक्षर जकाँ म्ह,न्ह आ ल्ह केर प्रभाव होइत छै तँए कुम्हार आ कन्हाइ लेल दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत। संस्कृतमे सेहो “ म्ह, ल्ह आ न्ह “सँ पहिने केर लघु दीर्घ मानल जाइत छै। आब देखू तुलसी दास जी द्वारा लिखल ई स्त्रोत------------- नमामी शमीशान निर्वाण रूपं विभू व्यापकम् ब्रम्ह वेदः स्वरूपं पहिल पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि---- ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घदोसरो पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि-----ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ | आब ऐ श्लोकक दोसर पाँतिक ब्रम्ह शब्दपर धेआन देबै सभ बुझबामे आबि जाएत। 3)    3) पं. गोविन्द झा जी मैथिली छंद शास्त्रक पृष्ठ १३मे संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर दीर्घ हएत की लघु तकर व्यवस्था देखेने छथि। हुनका मतें जँ एकैटा शब्दमे संयुक्ताक्षर हो तखने टा संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ हएत। सङ्गे-सङ्ग ईहो कहने छथि जे प्रचलित समासमे जँ अलगो-अलग अक्षर छै तखन संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ हएत। सङ्गे-सङ्ग ओ एकर सभहँक अपवाद सेहो देने छथि। लगभग इएह नियम मैथिलीक सभ लेखक अपनेने छथि। सङ्गे हम ईहो कहि दी जे हिन्दीयोमे एहने सन नियम छै ( आन आधुनिक भारतीय भाषामे की छै से हमरा नै पता) मुदा ई नियम संस्कृतमे नै छै। संस्कृतमे चाहे एकै शब्दमे संयुक्ताक्षर हो की अलग-अलग शब्दमे दूनू स्थितिमे संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ हएत। संस्कृत पद्यक किछु उदाहरण देखू------पहिने आदि शंकराचार्यक ई निर्वाण षट्कम देखू----------- मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे न च व्योम भूमिर् न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश: न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव: न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा: न यज्ञा: अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद: पिता नैव मे नैव माता न जन्म न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् पहिल पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि---- ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ --------| दोसरो पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि-----ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ--------- । जँ अहाँ नीकसँ पढ़बै तँ पता लागत जे संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर जे अलग शब्दमे छै ओहो दीर्घ भए रहल छै। आब शंकराचार्योसँ पहिनुक रचना देखी। तँ पढ़ू रावण रचित ई शिवतांडव स्त्रोतम्। एहूमे संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ भेल अछि चाहे ओ एक शब्दमे अछि वा अलग शब्दमे। लघु-दीर्घक-लघु-दीर्घ-----ऐ रूपकेँ पालन 14 श्लोक धरि पालन कएल गेल अछि। जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् । डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥ 1 ॥ जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- -विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि । धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥ 2 ॥ धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे । कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥ 3 ॥ जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे । मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥ 4 ॥ सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः । भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥ 5 ॥ ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- -निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् । सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥ 6 ॥ करालफालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- द्धनञ्जयाधरीकृतप्रचण्डपञ्चसायके । धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- -प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥ 7 ॥ नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्- कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबन्धुकन्धरः । निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥ 8 ॥ प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा- -विलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् । स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥ 9 ॥ अगर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम् । स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥ 10 ॥ जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस- -द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालफालहव्यवाट् । धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥ 11 ॥ दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्- -गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः । तृष्णारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥ 12 ॥ कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् । विमुक्तलोललोचनो ललाटफाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् सदा सुखी भवाम्यहम् ॥ 13 ॥ इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम् । हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥ 14 ॥ पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे । तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥ 15 ॥ ऐ के अलावे पूरा संस्कृत पद्ये एकर उदाहरण अछि। मुदा से देब ने हमरा अभीष्ट अछि आ ने उचित। मैथिलीमे ई नियम नै छै तकर कारण प्राकृत-अप्रभंश भाषाक प्रभाव छै। मैथिली सहित आन-आन आधुनिक उत्तर भारतीय भाषामे ई सेहो ई नियम नै मानल जाइत छै प्राकृत-अपभ्रंशक प्रभावें। आब ई देखू जे ई प्राकृत-अपभ्रंश कोन भाषा थिक। प्राकृतक सम्बन्धमे नाट्य शास्त्रक प्रणेता भरत मुनि कहै छथि जे------ एतदेव विपर्यस्तं संस्कार गुण वर्जितम् विज्ञेयं प्राकृतं पाठ्यं नाना वस्थान्तरात्मकम्। मने जे मूल शब्दक अक्षरकेँ आगू-पाछू कए वा सरलीकृत कए बाजब प्राकृत पाठ कहाइए। ऐठाम मूल शब्द मने संस्कृतक शब्द भेल, मुदा मूल शब्द कोनो भाषाक भए सकैए। तेनाहिते आचार्य भर्तृहरि जी प्राकृतक सम्बन्धमे कहै छथि जे -------- दैवीवाक् व्यवकीर्णेयम शकतैरभि धातृभिः मने जे दैवीवाक् ( संस्कृत ) अशक्त लोकक मूँहमे आबि भिन्न-भिन्न रूपमे आबि जाइ छै। मुदा महाभाष्यकार पतञ्जलि प्राकृतकेँ अपशब्दक रूपमे देखैत छथि आ हुनका मतें ऐ तरहक अपशब्दक प्रयोग चाहे ओ बाजल जाइ की सूनल जाइ दूनू रूपमे अधर्म थिक। प्रायः-प्रायः हरेक भाषाविज्ञानी प्राकृतक बाद बला रूपकेँ अपभ्रंशक नाम देने छथिन्ह। लगभग नवम आ दशम शताब्दी धरि प्राकृतक प्रयोग खत्म भए गेल छल आ अपभ्रंशक प्रयोग शुरू भए गेल छल। मुदा ऐ ठाम मोन राखू जे अधिकांश भाषाविज्ञानी अप्रभंशकेँ प्राकृतसँ अलग मनने छथि मुदा दूनूक प्रकृति एक समान हेबाक कारणें " प्राकृत-अपभ्रंश " नाम बेसी चलै छै। प्राकृतमे शब्दक निर्माण मुख्यतः लोक रूचिपर निर्धारित छै ने की व्याकरणपर। एकटा उदाहरण देखू-----चन्द्र शब्दसँ चन्दा प्राकृत शब्द भेल मुदा इन्द्र शब्दसँ इन्दा शब्द नै बनल ब्लकि इन्दर शब्द बनल। तेनाहिते वधू शब्दसँ बहु बनि तँ गेल मुदा साधु शब्दसँ साहु नै बनल। साहु अलग शब्द अछि। आ लगभग एहने हालति अपभ्रंशक अछि। ई बात जननाइ महत्वपूर्ण अछि जे जेनाहित प्राकृत लेल मूल शब्द संस्कृत छै तेनाहिते अपभ्रंश लेल मूल शब्द प्राकृत छै। आ बादमे एही अपभ्रंशसँ मैथिली आ आन आधुनिक भारतीय भाषा सभहँक जन्म भेल। ओना प्राकृतक बहुत रूप छै। तेनाहिते अपभ्रंशक सेहो अनेको रूप छै। मैथिलीमे अपभ्रंशकेँ अपभ्रष्ट वा अवहट्ट सेहो कहल जाइत छै। मुदा ई प्राकृत रूप हरेक समयमे होइत रहलैए। वेदक नाराशंसी एकर उदाहरण अछि | आ ऋगवेदमे ओहि समयक सामानान्तर भाषाक बहुत रास शब्द भेटत। तेनाहिते अशोक वाटिकामे हनुमान जीक ई चिन्ता जे हम सीता जीसँ देवभाषामे गप्प करी की मानुषी भाषामे सेहो ऐ गप्पक प्रमाण अछि जे ओहू समयमे संस्कृतक समानान्तर भाषा छलै आब ओकर नाम मानुषी होइ की वा अन्य कोनो। महत्वपूर्ण तँ ई छै जे वेदसँ लए कए एखन धरि संस्कृतक समानान्तर धारा बहैत रहल आब भले ही ओकर नाम जे रहल होइ। संस्कृत शब्द जखन प्राकृत रूपमे आबए लगलै तखन संयुक्ताक्षर शब्दपर बहुत बेसी प्रभाव पड़लै। जँ गौरसँ देखबै तँ पता लागत जे प्राकृत बाजए बला सभ संयुक्ताक्षर शब्दकेँ अपन लक्ष्य बनेने छल ताहूमे एहन संयुक्ताक्षर बला शब्द जे शब्दक शुरूआतमे छल। एकर कारण छलै जे संयुक्ताक्षर बला शब्दकेँ बजबामे बहुत सावधानी आ शिक्षा चाही छल। संस्कृतक संयुक्ताक्षर बला शब्द प्राकृतमे दू रूपमे तोड़ल गेल--- १) जै संस्कृतक शब्दक शुरुआत संयुक्ताक्षरसँ भेल छै तकरा प्राकृतमे पूरा-पूरी लोप कए देल गेलै। केखनो-केखनो शुरूआतक संयुक्ताक्षरकेँ बादमे आनि देल गेलै जेना----- “ग्रह” संस्कृत छै मुदा एकर प्राकृत “गिरहो” छै। तेनाहिते स्कन्द लेल खन्दो, क्षमा लेल खमा वा छमा, स्तम्भ लेल खम्भ, स्खलितं लेल खलिअं, क्लेश लेल किलेसो इत्यादि। २) जँ शब्दक शुरुआत छोड़ि कतौ संयुक्ताक्षर छै तँ केखनो ओकर लोप भए गेल छै वा नव रूपमे संयुक्ताक्षर छै जेना ---- चतुर्थी लेल चउत्थी, चैत्र लेल चइत्ता, चन्द्रिमा लेल चन्दिमा, क्षेत्रम् लेल छेतम् आदि-आदि। कुल मिला कए प्राकृत-अपभ्रंशमे एहन स्थिति बनल जे दूनू भाषामे सँ कोनो भाषामे एहन शब्द नै छलै जकर शुरूआत संयुक्ताक्षर शब्दसँ होइत हो। एतेक विवेचनाक बाद हम अपन मूल उद्येश्य दिस चली। हमर मूल उद्येश्य छल जे मैथिलीमे संस्कृते जकाँ अलग-अलग शब्द रहितों संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर दीर्घ किएक नै होइए। आब जँ गौरसँ उपरका विवरण पढ़ने हएब आ जँ आर प्राकृत-अपभ्रंशक पोथी सभ पढ़ब तँ पता लागत जे प्राकृत-अप्रभंशमे तँ संयुक्ताक्षरसँ शुरूआत शब्द छैके नै। आ मैथिलीयो अपभ्रंशसँ निकलल अछि आ प्रारंभिक मैथिलीमे संयुक्ताक्षरसँ शुरूआत होइत कोनो शब्द नै अछि। आ तँए मैथिलीमे संस्कृतक ई नियम नै आएल। आ अहाँ अपने सोचियौ ने जे जै भाषामे संयुक्ताक्षरसँ शुरू होइत शब्द छैके नै से एहन तरहँक नियम किएक राखत। मुदा जँ नवीन मैथिली भाषाक किछु प्रतिष्ठित लेखकक रचनाकेँ देखी तँ ओ मात्र क्रियापदकेँ छोड़ि सभ संस्कृतक शब्द ( तत्सम शब्द )केँ प्रयोग केने छथि। आन-आन कम प्रतिष्ठित लेखक अपन रचनामे तत्सम शब्दकेँ फिल्मी मसल्ला मानि जोरगर प्रयोग करै छथि। एतबा नै पं. गोविन्द झा जी अपन पोथी "मैथिली परिशीलन"क पृष्ठ २९-३० पर गौरव पूर्वक नवीन भारतीय भाषा ( जै मे मैथिली सेहो अछि )केँ तत्सम निष्ठ हेबाक बहुत रास फायदा गनौने छथि। आब हमरा सन जिज्ञासु लग ई प्रश्न अपने-आप आबि जाइए जे जँ संस्कृतक शब्द लेलासँ बहुत रास फायदा भेलै ( वा भए सकैत छै ) तखन तँ संस्कृतक सम्बन्धित नियम लेलासँ सेहो फायदा भेल रहितै ( वा भए सकैत छै )। ओनाहुतो मैथिलीमे वा अन्य कोनो आधुनिक भारतीय भाषाक पद्यमे संस्कृत शब्दक प्रयोग होइ छै तखन ओ नियम स्वतः पालन भए जाइत छै। अहाँ अपने मैथिली महँक एहन कोनो पद्य गाउ जाहिमे संयुक्ताक्षरसँ शुरू होइत कोनो संस्कृत शब्द हो स्वतः अहाँकेँ बुझा जाएत जे अलग शब्द रहितों संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर दीर्घ होमए लगैत छै।  ऐठाँ फेर मोन राखू जे प्राकृत-अपभ्रंश भाषामे एहन शब्द छलैहे नै जकर शुरूआत संयुक्ताक्षरसँ होइ तँए ओहि भाषामे ई नियम नै पालित भेल। आब एतेक विवेचनक बाद अहाँ सभकेँ मामिला बुझबामे आएल हएत। तँए हमर आग्रह जे जँ ऐ नियमसँ बचबाक हो तँ संयुक्ताक्षरसँ शुरू होइत शब्दक तद्भव रूप प्रयोग करू जेना " प्रकाश " लेल परकाश, " प्रयोग " लेल परियोग इत्यादि। हमर कहबाक मतलब जे जेना पुरना कालमे प्राकृत संयुक्ताक्षरकेँ हटा देलकै वा आधुनिक कालमे बंगला भाषामे संयुक्ताक्षर हटि गेलै तेनाहिते मैथिलीमेसँ संयुक्ताक्षर सेहो हटा दिऔ। आ जँ अहाँ संस्कृते शब्द लेब तखन पूरा नियम सहित लिअ। आब अहाँ जँ सकांक्ष पाठक हएब तँ हमरासँ पूछब जे जँ केओ संस्कृत छोड़ि आन भाषाक शब्द लेत तखन की ओहि भाषाक नियमक पालन करत ? ऐ लेल हमर उत्तर रहत जे नै। कारण संस्कृत हमर मूल भाषा थिक तँए ओकरा दिस ताकब हमर मजबूरी नै बल्कि कर्तव्य सेहो अछि। मुदा ओकरा छोड़ि जँ आन भाषाक शब्द लै छै तखन ओकरा मैथिलीक नियम हिसाबें प्रयोग करू। जेना की अरबी-फारसी-उर्दू भाषामे " ग़ज़ल " लिखल जाइत छै मने ग आ ज केर निच्चा नुक्ता लगाएल जाइत छै मुदा मैथिलीमे नुक्ता नै छै तँए मैथिलीमे " गजल " लीखू। नुक्ता लगा कए लिखब बेकार । कोनो संस्कृतक शब्दकेँ वा अन्यदेशीय शब्दकेँ मैथिलीकरण कोना करी आ कोना नव शब्द बनाबी तकर विवेचना आगू हएत। ई छल हमर पहिल तर्क। आब कने दोसर तर्क दिस चली--- संस्कृत पद्यमे एकटा पाँतिकेँ इकाइ मानल जाइत छै। आ जँ हम शब्दकेँ भिन्न-भिन्न करै छिऐ मने अलग-अलग शब्दक संयुक्ताक्षरसँ भेल दीर्घ नै मानै छिऐ तँ एकर मतलब जे हम पाँतिकेँ नै बल्कि शब्दकेँ इकाइ मानि रहल छिऐ आ हमरा जनैत पद्यमे शब्दकेँ इकाइ मानब उचित नै। पद्यमे इकाइ सदिखन पाँति होइ छै। एकटा विडंबना देखू जे मैथिलीक सभ व्याकरण शास्त्री आ कवि लोकनि शब्दकेँ इकाइ तँ मानै छथि मुदा जखन जगण-मगण केर गिनती करै छथि तखन पाँतिकेँ इकाइ मानि लै छथि। एकटा उदाहरण लिअ जे की वसन्त तिलका छन्दक अछि। ऐ छन्दक व्यवस्था एना अछि---- तगण+ मगण+जगण +जगण + गा + गा मने की ----दीर्घ-दर्घ-लघु +दीर्घ-लघु-लघु +लघु-दीर्घ-लघु +लघु-दीर्घ-लघु +दीर्घ+ दीर्घ आब एकर पद्य उदाहरण देखू---- " ई ने अहाँक सन वीरक काज थीकs" ( कविवर सीताराम झा, मैथिली छन्द शास्त्र, पृष्ठ-४५)। ऐ एकटा पाँतिमे देखू जे " ई " आ "ने " दूटा अलग-अलग शब्द अछि सङ्गे-सङ्ग तेसर शब्द " अहाँक" केर पहिल अक्षर " अ " लए कए मात्र एकटा " तगण "बनल अछि। आब हमर कहब अछि जे जँ अहाँ पद्यमे शब्देकेँ इकाइ मानै छिऐ तखन दू-तीनटा अलग-अलग शब्दकेँ सानि एकटा जगण-मगण किएक बनबै छी। जँ केओ शब्देकेँ इकाइ मानै छथि तकर मतलब ई भेल जे ओ अपन पद्यमे एहन शब्दकेँ प्रयोग करथि जे हरेक जगण-मगण मने कोनो दशाक्षरी खण्ड लेल समान रूपसँ रहए। तँए हमर मानब जे संस्कृतक पद्ये जकाँ जँ अलग-अलग शब्द होइ तैयो संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक बला अक्षर दीर्घ हएत। ऐठाँ ई मोन राखू जे एकटा पाँति खत्म भेलै तँ ओ इकाइ खत्म भेलै। आब जँ दोसर पाँतिक शुरूआत संयुक्ताक्षरसँ भए रहल छै तकर प्रभाव पहिल पाँतिक अन्तिम शब्दक अन्तिम अक्षरपर नै पड़त। …………………  क्रमशः जारी.............. डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र मेवाड़ आ मालवाक सांझी लोककला : एक परि‍चय महि‍ला संस्कृति रक्षण केर संवाहि‍का छथि‍। ई परम्परा सनातनसँ शाश्वत अछि‍। संस्कृति ‍ अगर लोक संस्कृति‍ हो तँ महि‍ला लोकनि‍केँ लगभग एकाधि‍कार भऽ जाइत छन्हि‍। जइ कार्य, संस्कार, रीति‍ इत्यादि‍केँ शास्त्रीय परम्परा द्वारा महि‍ला लोकनि‍ नै कऽ पबैत छथि‍ तकरा लोकपरम्परा आ लोक वि‍धान द्वारा विस्तारसँ करैत छथि‍। मि‍थि‍ला संस्कृति ‍मे तुसारी, मधुश्रावणी, आम-महु बि‍आह, जटा-जटि‍न, बि‍आहक पश्चात् कोहबर घरमे सम्पादित अनेक दि‍नक वि‍धि‍-बेवहार एकर उदाहरण अछि‍। लोक परम्परा समन्वित परम्परा होइत अछि‍। एक वि‍धि‍क संग अनेक क्रि‍या-कलाप आ रचनात्मकता संलग्न रहैत अछि‍- पूजा पाठ, तंत्र-मंत्र, पि‍तृ आराधना, गीत-संगीत, जादू-टोना, वस्‍त्र वि‍न्‍यास, वि‍भि‍न्न कलाक प्रदर्शन इत्‍यादि‍। सभ आपसमे ताना बाना जकाँ जुटल। एक-दोसरक प्रति‍ समर्पित। एककेँ बि‍ना दोसरक सम्‍पादन असंभव। 15 दि‍नक पि‍तृपक्ष एखने अर्थात् 15 अक्‍टुबर 2012क समाप्‍त भेल अछि‍। ऐ पन्‍द्रह दि‍नमे हमरा लोकनि‍ अपन समस्‍त स्‍वर्गवासी पि‍तृ एवं मातृकेँ स्‍मरण करैत हुनका लोकनि‍केँ तील-जलसँ तृप्‍त करैत छी। आवाह्न तर्पन आ पुन: जयबाक ि‍नवेदन : “ऊँ आगच्‍छन्‍तुमे पि‍त्र इमम्  ग्रहनन्‍तु जलाजलि‍म्।।” "हे पि‍त्र (मातृ) आऊ आ जलकेँ स्‍वीकार करू। आब अहाँ देवलोकमे छी। तँए हमरा लोकनि‍क कल्‍याण करू।" ) पि‍तृ पक्षमे लगातार पन्‍द्रह दि‍न धरि‍ राजस्‍थानक मेवाड़ (अर्थात् उदयपुर, महासमद) आ मध्यप्रदेशक मालवा (उज्‍जैन, इन्‍दौर ग्‍वालि‍यर आदि‍))))) ) मे कुमारि‍ कन्‍या सभ सांझी पूजैत छथि‍। सांझीमे अनेक तरहक चि‍त्रकलाक आ वि‍म्‍बक ि‍नर्माण करैत छथि‍, गीत गबैत छथि‍ आ अन्‍तत: सांझीकेँ जलकरमे भसा दैत छथि‍। सांझीक पूजा स्‍वर्गीया मातृ लोकनि‍क, आवाह्न आ कृतज्ञताक अर्पन मानल जा सकैत अछि‍। सांझीक पूजा आ प्रचलन ओना तँ राजस्‍थान, मध्‍यप्रदेश, पश्चि‍मी  उत्तर प्रदेश, उतराखण्‍ड , उड़ीसा आ अपन मि‍थि‍लोमे कुनो ने कुनो रूपमे व्‍याप्‍त अछि‍। हरि‍याणामे ई सेहो बहुत उत्‍कृष्‍ठतासँ मनाएल जाइत अछि‍। सांझी केर अनेक नाम  यथा- सांझी, सांजी, संझ्या, संध्‍या, संधा, हांजी, हज्‍जा इत्‍यादिसँ जानल जाइत अछि‍। पि‍तृपक्षमे पन्‍द्रह दि‍न धरि‍ मेवाड़ आ मालवाक कुमारि‍ कन्‍या लोकनि‍ घरक बाहरी देबालपर गाएक गोबरसँ  आ माटि स   मोटगर लेप बना एक तरहक वर्गाकार आकृति‍ कऽ ओइपर वि‍भि‍न्न तरहक चि‍त्रांकनक ि‍नर्माण करैत छथि‍। संगे अनुष्‍ठान, गीत-नाद, पूजा-पाठ सेहो चलैत रहैत छैक। ओइ समैमे अगर उज्जैन शहरक सि‍ंहपुरा आदि‍ क्षेत्रमे जएब तँ लागत जेना कुनो कला ि‍दर्घाक  वीथिका मे आबि‍ गेल छी। कलाकृति‍केँ देखि‍ भाव-वि‍भोर भेने बि‍ना नै रहब। तेरहम दि‍न कि‍ला-कोटक ि‍नर्माण होइत छैक। कि‍ला कोटक अर्थ भेल कलाकेँ चारुदिस सँ राजमहलक कि‍ला जकाँ गढ़ बना देनाइ। अन्‍तत: पन्‍द्रहम दि‍न सांझीक पूरा रूप प्रसस्‍त भऽ जाइत छैक। पन्‍द्रहमे दि‍नक सांझमे तमाम चि‍त्रकेँ खुरेचि‍ कुमारि‍ कन्‍या, नव ब्‍याहल लड़की (जे बि‍आहक प्रथम वर्षमे सांझी देवीक उद्यापन करैत छथि‍।) समस्‍त खुरचल सामग्रीकेँ लऽ पोखरि‍ धार, नदी आदि‍मे वि‍सर्जन कऽ दैत छथि‍। वि‍सर्जनक दृश्‍य बड्ड भावमय होइत छैक। लड़की सभ गबैत, नचैत नव वस्‍त्रसँ सजल माधुर्यक वातावरण बनेने रहैत छथि‍। सांझीमे प्रयुक्त वि‍म्‍ब आ रूप सांझी लोककथाक आधारपर होइत छैक। गोबरसँ नीप बेस बना ओइपर फुलक पंखुरी, चमकम कागत आदि‍सँ चि‍त्र बनाएल जाइत छैक। सांक्षी देवीक गीत गएल जाइत छैक। कि‍छु चि‍त्र एहनो होइत छैक जे नव ब्‍याहताकेँ पारि‍वारि‍क जीवनक आवश्‍यकताकेँ सूचि‍त अथबा प्रदर्शित करैत छैक। ओइ श्रेणीमे टी.वी., फ्रीज, मोटर बाईक, गैसक चुल्हा आ सि‍लि‍ण्‍डर इत्‍यादि‍ सेहो मनोहारी ढंगसँ चि‍त्रि‍त कएल भेट जाएत। सांझी के छलीह? ऐ सम्‍बन्‍धमे अनेक तरहक दंत कथा छैक। जेना कि‍ सांझी दुर्गाक एक रूप छथि‍; ब्रह्माक पुत्री छथि‍; सांझी पार्वती अर्थात शि‍वक अर्धांगि‍नी छथि‍; सांझी वैदि‍क देवी छथि‍ जि‍नकर उपासना संध्‍या  अर्थात् सांझमे कएल जाइत अछि‍; सांझी लक्ष्‍मी नारायणक प्रति‍रूप छथि‍; सांझी नवदुर्गाक प्रति‍मूर्ति छथि‍; सांझी बृन्दावन धामक देवी छथि‍; सांझी राजस्‍थानक संगानेरक कन्‍याक छथि‍ जि‍नकर बि‍आह अजमेर छलन्‍हि‍; सांझी कुमारि‍ कन्‍या–सबहक अराध्‍य आ प्रीय देवी छथि‍, सांझी राजस्‍थानक बगड़ावत क्षेत्रमे लोक आख्‍यायनमे प्रशंसि‍त देवी थीकीह आ अन्‍तत: सांझी सूर्य देवक  अर्धांगि‍नीक रूपमे सेहो जानल जाइत छथि‍। चि‍त्रि‍त चि‍त्रांकन आ मनुक्‍खक आकृति‍सँ एना ज्ञात होइत अछि‍ जे सांझी एक ब्‍याहल कन्‍या छलीह। जिनकर वैवाहक जीवन सफल नै रहलनि‍। अनमेल बि‍आह छलन्‍हि‍। पति‍, सासु, समाज सभ शोषण केलकन्‍हि‍। कुमारि  कन्‍या सभ भोरे उठि‍ ताजा गोबर चूनि‍ फूल, पत्तीक बेवस्‍था कऽ सांझी कलाक  निर्माण  मे लागि‍ जाइत छथि‍। देबाल एक क्षेत्रकेँ वर्गाकार आकृति‍केँ गोबरक आ  माटिक  लेपसँ भरल जाइत अछि‍। परम्‍परा आ व रूचि‍केँ मि‍श्रण कऽ मोटीफ केर निर्माण होइत अछि‍। हरेक कन्‍याक कल्‍पनाशीलता भि‍न्न होइत छन्‍हि‍। माय, पि‍ति‍याइन सभ सेहो मदति‍ करैत छन्‍हि‍ जइसँ सांझी रमणगर आ सौन्‍दर्यसँ परि‍पूर्ण भऽ जाइक। बनेबाक सामग्रीक रूपमे गोबर, फूल, पात, धास, मक्कैक बालि‍, रंगारंग कागज, टीन फ्वाइल, कौड़ी, बांसक -बत्ती, सि‍न्‍दुर कुमकुम इत्‍यादि‍क प्रयोग सबतरि‍ भेटत। मालवा अर्थात उज्‍जैन दि‍स गुल-तेवारी, गेन्‍दा लाल, चमेली, बरमासा फूल जेकरा सदा सुहागन सेहो कहल जाइत छैक केर प्रयोग होइत छैक। गुलाबी, उज्‍जर, पीकीस ब्राउन, आदि‍ रंगक वि‍शेष स्‍थान होइत छैक। सर्वप्रथम आंगुरसँ प्रथम परतक निर्माण   कैल जाइत छैक। जकरा गोहाली कहल जाइत छैक। ऐमे वर्गाकार क्षेत्र अथवा अष्‍टकारक निर्माण गोबर आ माटि‍क मोट लेपसँ देबालपर कएल जाइत छैक। प्रथम तीन आंगुरक सहायतासँ फीगरक निर्माण केलाक बाद फुल, पात, घास, आदि‍सँ साटि‍ फीगरकेँ सजाएल जाइत छैक। प्रथम दिनक  डि‍जाइनकेँ दोसर दि‍न उखाड़ि‍ देल जाइत छैक। प्रत्‍येक ति‍थि‍क अनुसारे मोटीफक  निर्माण कएल जाइत छैक। राजस्‍थानक एक  गाममे प्रयुक्त तेरह दि‍नक सांझी चि‍त्रण हमरा एना भेटल- एकम (पहि‍ल)- वन्‍दरावल बीज (दोसर)- बीजना (पंखा) तीज (तेसर दि‍न)- तीन, ति‍वाड़ी (तीन खि‍ड़की) चौठ (चारि‍म दि‍न)- चौपड़ पंचम (पॉचम दि‍न)- पांच कुवारे (पाँच कुमार बालक) छठम (छठम दि‍न)- फूल छड़ी (फूलक डंडा) सातम (सातम दि‍न)- साति‍या (स्‍वास्‍ति‍क) आठम (आठम दि‍न)- अष्‍टकोणी बाजोट (बैसैबला टूल) नम (नवम दि‍न)- डोकरा-डोकरी (बुढ़आ बुढ़ी) दशम (दसम दि‍न)- दस पकवान (दस तरहक ब्‍यंजन) ग्‍यारस (ग्‍यारहम दि‍न)- जनेऊ बारस (बारहम दि‍न)- सीड़ी (सीढ़ी) तेरस (तेरहम दि‍न)- कोंट (ऐ दि‍नक सांझीमे सभ दि‍नमे युक्‍त चि‍त्रक ि‍नर्माण कएल जाइत छैक। एकरा अलाबे आरो बहुत रास बि‍म्‍वक  निर्माण  होइत छैक।) सांझी कलाक रूप आ ओकर अर्थ लोक कलामे आश्चर्यजनक ज्ञान आ परम्‍पराक समावेश होइत छैक। कुनो चीज निरर्थक  नै भेटत। जेना कि‍ कतौ-कतौ सातम दि‍न हत्‍यारी-हतम केर रूपक वि‍न्‍यास करबाक परम्‍परा छैक। तइ दि‍न ओइ आत्माक स्‍मरणमे रूपकेँ गढ़ल जाइत छैक जि‍नकर या तँ हत्‍या भऽ गेलन्‍हि‍ या ओ स्‍वयं आत्‍महत्‍या कऽ लेलन्‍हि‍। नवम दि‍नमे डाकरि‍या नम बनैत छैक। ओइ दि‍न बुढ़ आ बुढीक चि‍त्रण होइत छैक जे नवमी तिथि में अई जीवनकेँ ति‍याग केलन्‍हि‍। बीजना या बीजनी खजुर पंखाकेँ कहल जाइत छैक। तेसर दि‍न ति‍वाड़ी अर्थात तीनटा खि‍ड़कीक निर्माण  कएल जाइत छैक। चौपड़ खेलक चि‍त्रण चारि‍म दि‍न कएल जाइत छैक। कतौ-कतौ छठम ति‍थमे फूल छाबरी अर्थात् फुलडालीक निर्माण  करबाक परम्‍परा भेटत। सति‍या अथवा हति‍या स्‍वास्‍ति‍ककेँ कहल जाइत छैक। एकर निर्माण  सामान्‍यतया सातम दि‍न कएल जाइत दैक। अठकली फूलक निर्माण आठम दि‍न कएल जाइत छैक। कतौ-कतौ नवम ति‍थि‍मे नंगटा-नंगटी (वाद्य यंत्र) रचना सेहो कएल जाइत छैक। लोक परम्‍परा शास्‍त्रीय परम्‍परामे सेहो प्रयुक्‍त कएल जाइत छैक। राजस्‍थानक श्रीनाथ जीक मंदि‍रमे मुर्तिक पाछाँ पि‍छवाइ कला आ केराक पातपर सांझी बनैत छैक। एकर दोसर ठाम जलमे सांझी बनैत ैछक। वृन्‍दावनमे फर्शपर रंगोलीक रूपमे अनेक तरहक रंग आ चाउरक आंटाक प्रयोगसँ कलात्‍मक सांझी राधा आ कृष्‍णक प्रेमकथा आ भक्‍ति‍केँ स्‍मरण करबाक अप्रतीम कलाक रूपमे बनाएल जाइत छैक। बहुत तँ जानकारी नै अछि‍ परन्‍तु बुझना एना जाइत अछि‍ जे मि‍थि‍लामे सांझ पूजक परम्‍परा आ कुमारि‍ कन्‍या सभ द्वारे तुसारी  पूजन सांझीक परम्‍पराक एक रूप अछि‍। नेपाल आ उत्तराखण्‍डमे सेहो कि‍छु एहन परम्‍पराक वि‍धान छैक। एक दि‍न राजस्‍थानक उदयपुरसँ हल्‍दी धाटी घूमए लेल गेल रही। ओतए केर सांझी स्‍थानीय फूलक सहायतासँ बनाएल जाइत छैक। आ ओइमे राधा-कृष्‍णक प्रेमक प्रबलता दृष्‍टि‍गोचर भक्‍ति‍-भावसँ कलात्‍मक रूपे होइत छैक। फूलक एहेन वि‍न्‍यास अन्‍यत्र असंभव। ओना लोककलामे कून नीक आ कोन खराप ई कहब असंभव मुदा मालवा  अबि‍ते मातर सांझीक कलासँ कुनो बटोही मंत्र मुग्‍ध भऽ जाइत अछि‍। ओतए केर नायि‍का केर आँखि‍ अतेक कतरगर  जे मोन करत दखि‍ते रही। जेहने कि‍शोरी तहने चि‍त्रकला। मोन करत केकर प्रशंसा करी चि‍त्रक अथवा चि‍त्र बनेनि‍हारि‍केँ? राजस्‍थानमे एक कथा पता लागल। संझा छलीह सांवरि‍ आ सामान्‍य गरीब घरक कन्‍या। हुनकर बि‍आह कि‍छु खाश परि‍स्‍थि‍ति‍मे एकटा नांगर ब्रह्मण जेकर नाम खोड़या ब्राह्मण रहैक- करा देल गेलन्‍हि‍। बेचारी संझाकेँ सासुरमे बड्ड कष्‍ट भेलन्‍हि‍। पति‍ कहि‍यो हुनकर भावनाकेँ सम्‍मान नै देलकन्‍हि‍। नैहरमे जनम हेबाक तुरंत बाद माय मरि‍ गेलथि‍न्‍ह। कष्‍टेमे जनम भेलनि‍, वि‍कट स्‍थि‍ति‍मे बि‍आह भेलन्‍हि‍ आ कष्‍टेमे मरि‍ गेलीह सांझा। हुनका मरला उत्तर दैव लोकमे स्‍थान भेटलनि‍। आ जे कुमारि‍ कन्‍या श्राद्ध पक्षमे हुनकर तेरहसँ पन्‍द्रह दि‍न अराधना करतीह ति‍नकर वैवाहि‍क जीवन सफल रहतैक। अही तरहक लोक मान्‍यता ओइ क्षेत्रमे छैक। मि‍थि‍लाक सामा-चकेबा पाबनि‍ जकाँ मालवामे सांझीक भाइ-बहि‍नक सम्‍बन्‍धकेँ मधुर बनेबैबला लोक-उत्‍सव मानल जाइत छैक। लड़की सभ अपन बीराजी (भैय्या)क लेल मंगल कामना करैत छथि‍। जे चीज नै भेटैत छन्‍हि‍ तइ लेल भायसँ नि‍वेदन कऽ ओइ चीजकेँ मंगा संझाक नीक जकाँ  निर्माण , पूजा-पाठ करैत छथि‍। अन्‍तत: यएह कहल जा सकैत अछि‍ जे सांझी लोक परम्‍पराक एक अनुपम उदाहरण अछि‍. अहेन उदाहरण  जइमे चि‍त्रकला, नृत्‍यकला, संगीतकला, वस्‍तुकला आदि‍क सम्‍न्‍वि‍त समावेश भेटत। ऐ तरहक अनुपम लोक कलाक रक्षण भेनाइ अनि‍वार्य। गजेन्द्र ठाकुर विद्यापति: किछु प्रचलित कुप्रचारक निराकरण

फणीश्वरनाथ रेणु बिदापत नाचपर रिपोर्ताज लिखलनि जे १ अगस्त १९४५ ई. केँ साप्ताहिक “विश्वमित्र”मे प्रकाशित भेल। ऐ रिपोर्ताजक महत्व अछि, कारण ई ऐ विषयपर ज्योतिरीश्वर द्वारा लिखित विवरणक ७०० बर्ख बाद लिखल गेल आ ऐ ७०० बर्खमे जे विद्यापतिकेँ समानान्तर परम्परा जिआ कऽ रखलक। आ जे एकरा जिआ कऽ रखलक ओकरासँ अनचोक्के विद्यापति छीनि लेल गेलन्हि। बिदेश्वर ठाकुर विद्यापति गीत गबैत आ हाक्रोश करैत मृत्युकेँ प्राप्त केलन्हि जे विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ ब्राह्मण सभ छीनि लेलक। ब्रह्मपुराक कानूनगो बद्री प्रसाद ठाकुर, पोखरिभीड़ाक बिनोद ठाकुर, रुद्रपुरक सरयुग ठाकुर आ मेंहथक जयराम ठाकुर आ बिस्फीक सौँसे गाम आइयो ई रटि रहल छथि। शालिग्राम यादव, अवधिया ठाकुर बिस्फी गामक परम्पराक गवाह छथि। विद्यापति कर्मकाण्डीय अपहरण मे हुनकर जन्म आदिक प्रति सभ तरहक अनर्गल तर्क उपस्थित होइत रहल मुदा हुनकर समानान्तर परम्पराक मादे कोनो शोध-पत्रमे चर्चो धरि नै भेल। ई आलेख बिदेश्वर ठाकुर सन हजारक हजार समानान्तर परम्पराक लोकक प्रति समर्पित अछि जे बिदापतक ज्योतिरीश्वर आ फणीश्वरनाथ रेणुक दुनू आलेखक बीच विद्यापतिकेँ जिआ कऽ रखलन्हि।

मिथिलाक शतपथ ब्राह्मणक परम्परा आ मिथिलाक समानान्तर परम्परा: वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदसँ पहिनेसँ भाषा अस्तित्वमे रहल हएत। कतेक मौखिक साहित्य जेना गाथा, नाराशंसी, दैवत कथा आ आख्यान सभ ओहिमे रचल गेल हएत। एहने गाथा सभक गायकक लेल “गाथिन”, “गातुविद्” आ “गाथपति” ऋगवेदमे प्रयुक्त भेल। वैदिक कालेसँ गाथा आ नाराशंसी समानान्तर रूपमे रहल। प्राकृतसँ वैदिक संस्कृत बहार भेल आकि वैदिक संस्कृतसँ प्राकृत? वेदमे नाराशंसी नाम्ना जन आख्यान यएह सिद्ध करैत अछि जे दुनू समानान्तर रूपेँ बहुत दिन धरि चलल। ई समानान्तर परम्परा दुनूकेँ प्रभावित केलक। आब ऋगवेद देखू- ओतए दुर्लभ लेल- दूलभ, (ऋगवेद ४.९.८) प्रयोग की सिद्ध करैत अछि? अथर्ववेदमे पश्चात् लेल पश्चा (अथर्ववेद १०.४.१०) की सिद्ध करैत अछि? गोपथ ब्राह्मणमे प्रतिसन्धाय लेल प्रतिसंहाय की सिद्द करैत अछि? (गोपथ ब्राह्मण २.४)। जे आर्य छथि से भारतक पच्छिम भागसँ मिथिलामे एलाह, आ हुनका सभक एबासँ पूर्व वेदक किछु अंश विद्यमान छल, तेँ ने बहुत रास शब्द जे मैथिलीमे अछि, बहुत रास उच्चारण जे मैथिलीमे अछि ओ वैदिक संस्कृतमे अछि, मुदा लौकिक संस्कृतमे नै अछि। अविद्या, कर्मसिद्धान्त, जन्म आ पुनर्जन्मक आवाजाही आ मोक्ष ई सभ अनार्यसँ आर्यकेँ भेटलै। तेँ ने उपनिषदमे मोक्ष प्राप्तिक मार्ग छै, स्वर्ग प्राप्तिक नै। मोक्ष भेटत कोना? यज्ञ केलासँ? नै, ई भेटत ज्ञानसँ आ मनन-चिन्तन आ समाधिसँ। राजा जनकक संरक्षणमे याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषदक तिरहुतक अनार्य क्षेत्रमे रचना केलन्हि। वाचस्पति मिश्र सांख्यकारिकाक सन्तावनम सूत्रक व्याख्या करैत कहै छथि जे की ई कहि सकै छी जे अचेतन दूध केर पोषणसँ परु पोसाइए आ अचेतन प्रकृतिक संचालनसँ जीवकेँ मुक्तिक ज्ञान भेटैए? ईश्वर तँ स्वयंमे पूर्ण छथि तँ ओ कोन उद्देश्ये विश्वक सृष्टि करताह आ जीव लेल जँ ओ सृष्टि करताह तँ सृष्टिक बादे तँ जीव बन्हाइए आ सृष्टिसँ पूर्व तँ बन्हेबाक प्रश्ने नै अछि, तखन जीवक प्रति कथीक दया? से प्रकृति द्वारा सृष्टि होइए आ जीव अपन प्रयाससँ अपवर्गक प्राप्ति करै छथि। आ विवेकसँ होइए प्रलय। से ईश्वरवाद नै निरीश्वरवाद अछि वाचस्पतिक व्याख्या। प्रकृति संचालनमे जँ ईश्वर भाग लै छथि तँ ओ चेतन प्रक्रिया हएत जे कोनो उद्देश्येसँ हएत आ तकर कोनो खगता ईश्वरकेँ छन्हिये नै। न्यायसूत्रक रचना केनिहार मिथिलाक गौतम सोलह पदार्थक ज्ञानसँ जीवक निःश्रेयस प्राप्त करबाक चर्च करै छथि, मुदा ऐ सभमे ईश्वरक कतौ चर्च नै अछि जे हुनको द्वारा मुक्ति सम्भव अछि। वैशेषिक सूत्र कहैए जे वेद विद्वान लोकनि द्वारा रचल गेल अछि नै कि ईश्वर द्वारा। कुमारिल भट्ट कहै छथि जे सृष्टिक पूर्व ईश्वरक विषयमे कोनो विश्वसनीय चर्चा असम्भव अछि। 

शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धारा, आ तकर समानान्तर मुख्यधारा: ब्राह्मण आ गएर ब्राह्मणवाद मिथिलामे शुरुएसँ रहल अछि। ज्योतिरीश्वर लिखै छथि- बौध पक्ष अइसन- आपात भीषण। अगतिशील शतपथ ब्राह्मणक परम्परा नामक साम्यताक कारण संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ पूज्य बनबैपर बिर्त अछि। ऋक् आ नाराशंसी, महाकवि विद्यापति आ पागबला विद्यापति, मोक्ष आ स्वर्ग-नर्क ई दुनू परस्पर विरोधी विचारधारा मिथिलामे रहल।  शतपथ ब्राह्मणक विदेघमाथव आ पुराणक निमि दुनू गोटेक पुरोहित गौतम छथि से दुनू एके छथि आ एतएसँ विदेह राज्यक प्रारम्भ। माथवक पुरहित गौतम मित्रविन्द यज्ञक/ बलिक प्रारम्भ कएलन्हि आ पुनः एकर पुनःस्थापना भेल महाजनक-२ क समयमे याज्ञवल्क्य द्वारा। मैत्रेयी, याज्ञवल्क्य, सीता, जनककेँ रटैत-रटैत ई परम्परा विद्यापतिक यज्ञोपवीत संस्कार आ पाग प्रतिष्ठापन जइ तीव्र गतिये केलक से ओकर शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल। 

१७६० ई.क माधव सिंहक शाखा पञ्जीक आदेशक बाद मिथिलामे ब्राह्मण आ कायस्थ मध्य नव-कुलीनवादक प्रसार भेल आ भलमानुस (बत्तेसगमिया) उपजातिक कर्ण कायस्थमे आ स्रोत्रिय उपजातिक मैथिल ब्राह्मणमे उत्पत्ति भेल, ओइसँ शारीरिक आ मानसिक बीमारी ऐ दुनू उपजाति मध्य भयंकर रूपसँ बढ़ल, संगे बहुविवाह, बाल-विवाहक आ विधवाक संख्यामे अत्यधिक वृद्धि भेल। आ ईहो जइ शान्तिपूर्ण रूपसँ आ तीव्रगतिसँ भेल से शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल। 

विद्यापतिपर दिनेश्वर लाल आनन्द आ रामवृक्ष बेनीपुरीक विचार!! दिनेश्वर लाल आनन्दकेँ भ्रम रहन्हि, ओइ कालमे पञ्जी गुप्त चीज रहै, जे संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापतिक विषएवार बिस्फीकेँ पञ्जीमे जयवार (निम्न कोटिक) कऽ देल गेल रहै। शाखा पञ्जी १७६० ई.सँ पहिने रहबे नै करै आ तकर प्रमाण अछि जे अयाची मिश्रक मूलक निचुलका पीढ़ी स्रोत्रिय उपजातिमे अछि आ ब्राह्मण उपजातिमे सेहो। ई ओहिना अछि जे सिन्धु घाटी सभ्यतामे बड़द रहै मुदा गाय नै (सीलपर), मुदा बिनु गाय बड़दक उत्पत्ति कोना हएत। दिनेश्वर लाल आनन्दकेँ पञ्जीक सभ तथ्य उपलब्ध नै रहन्हि, प्रायः पदावली बला विद्यापति आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक एक्के हेबाक दुष्प्रचारमे हुनका लागल हेतन्हि जे अवहट्ठमे लिखबाक कारण जँ विषएवार बिस्फीकेँ पञ्जीमे जयवार करबाक सम्बन्धसँ जोड़ल जाए तँ विद्यापति ठक्कुरः किए क्रान्तिकारी भेलाह से व्याख्या कएल जा सकत। मुदा दिनेश्वर लाल आनन्द सेहो मानै छथि जे पदावलीक हुनकर (विद्यापतिक) हाथक तँ छोड़ू, हुनकर कालोमे संगृहीत पदक कोनो विवरण नै अछि। मुदा से कोना सम्भव जखन संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति अपन संस्कृत आ अवहट्ठ ग्रन्थ सभ टहंकारसँ आरम्भ आ समापन करै छथि, के राजा-रानी हुनका प्रेरित केलखिन्ह, ककर आश्रित छलाह, सभ वर्णन दैत। पूर्ण लेखकीय अन्दाज, सरस्वती आ लक्ष्मी दुनुक बल; तखन पदावलीमे से किए नै? दिनेश्वर लाल आनन्द गुम्म छथि। संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापति अपन आश्रयदाताक विषयमे लिखने छथि मुदा कोनो संस्कृत आ अवहट्ठ ग्रन्थमे अपना विषयमे किछुओ नै लिखने छथि। ओ अवह्ट्ठ लिखबोमे दवाबक अनुभव करै छथि, जे तखुनका मुख्य परम्पराक साहित्यिक भाषा छल। मुदा ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापतिक प्रभाव एतेक छलन्हि जे हुनका संस्कृत नाटक गोरक्षविजयमे मैथिली गीत लिखऽ पड़लन्हि (जेना विदाञोतक पहिल रिपोर्ताज लिखनिहार ज्योतिरीश्वरकेँ संस्कृत नाटक धूर्तसमागममे मैथिली गीत लिखऽ पड़लन्हि)। गोविन्द झा ज्योतिरीश्वरक विदाञोतमे विद्यापतिक परम्परा देखि लै छथि, चर्च करै छथि मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिकेँ आगाँ किए नै बढ़ा पबैत छथि जखन बिदेश्वर ठाकुर गाबि-गाबि कऽ प्राण त्यागि रहल छथि? विद्यापति नाटकमे विद्यापतिकेँ प्यास जतऽ लगलन्हि ओ नाटक लेखकक गाम कोना भऽ जाइए? सभ अपना-अपना हिसाबसँ “हम्मर विद्यापति”पर नाटक लिखि रहल छथि।

रामबृक्ष बेनीपुरी लग सेहो पञ्जीक तथ्य नै छन्हि। एकटा उपजातिक बनोतरी आ किंवदन्तीक आधारपर ओ केशव मिश्रक विद्यापतिपर हँसब लिखै छथि; द्वैत परिशिष्टक ई केशव मिश्र वाचस्पति-२ (१४००-१४९०) क पौत्र छथि। एकटा आर केशव मिश्र (११५० लगभग) छथि जे तर्कभाष लिखै छथि आ जकर समीक्षा तत्वचिन्तामणिकारक गंगेशक पुत्र वर्धमान “तर्कप्रकाश”मे करै छथि। आनन्द कुमारस्वामे जतेक शोध १९१५ ई. मे केने रहथि ओइसँ एक्को डेग आगाँ नहिये बेनीपुरी जा सकलथि नहिये आनन्दस्वामीक सए बर्ख बाद कियो दोसर मुख्यधाराक शोधकर्ता जा सकल छथि। वएग उगनाक कथा बेनीपुरी कहै छथि, मुदा महादेव संस्कृत आ अवहट्ठक कट्टर विद्यापतिक “शैवसर्वस्वसार”पर कैलाशमे नचता आकि ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापतिक नचारीपर, ओइपर गुम छथि। आनन्द कुमारस्वामी जकाँ बेनीपुरीकेँ बुझल छन्हि जे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक हाथक लिखल भागवत उपलब्ध अछि आ इहो जे विद्यापतिकेँ गंगालाभ कोना भेलन्हि, गंगा हुनका अपनामे लीलि लेलखिन्ह। आनन्द कुमारस्वामी जकाँ बेनीपुरीकेँ संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक लिखल पुरुषपरीक्षाक विषयमे सुनल छन्हि मुदा पढ़ल नै छन्हि, आ से नै तँ हुनका बुझल रहितन्हि जे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति गंगालाभक कथा बोधि कायस्थक विषयमे लिखने छथि। ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक विषयमे ई कथा उगनाक कथा सन प्रचलित छल जे बादमे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिसँ कर्मकाण्डीय रूपमे जोड़ल गेल आ पुरुषपरीक्षाक कथा बोधि कायस्थ एकर प्रमाण अछि। कीर्तिपताकाकेँ बेनीपुरी मैथिली गीतक संग्रह कहै छथिइ!! पूछि-पाछि कऽ शोध कएल जाइ छै? जे आधार कुमारस्वामी सए बर्ख पहिने रखलन्हि, ओइपर सुखाएल मुख्यधारा किए नै आगाँ बढ़ल कारण ई शतपथ ब्राह्मणवादी मुख्यधारा ओकरा एकर अनुमति नै दै छै। मुदा बिना कोनो प्रमाणक शिवसिंहक मित्र पुरादित्यकेँ भूमिहार ब्राह्मण सिद्ध कऽ दै छथि, ओहिना जेना गोविन्ददास (झा) केँ रमानाथ झा स्रोत्रिय बतेलन्हि (सुकुमार सेन तकरा हास्यास्पद मानै छथि), आ रामदेव झा ब्राह्मण सिद्ध करै छथि आ कालिदासकेँ वर्माजी (लालदास स्मारिकामे) कायस्थ सिद्ध करै छथि। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति पूर्ण कर्मकाण्डक संग पुस्तकक प्रारम्भ आ अन्त करै छथि, राजा-रानी-आश्रयदाताकेँ मोन पाड़ै छथि मुदा अपन चर्च नै करै छथि। मुदा पदावली लोककण्ठमे किए रहि गेल, पुस्तकक तामझाम ओ तकरा किए नै देलन्हि, कारण ओ हुनकासँ कए सए पूर्वक रचना छल, जखन पागक उत्पत्ति मिथिलामे नै भेल छल। पदावलीमे रूपनारायण, शिवसिंह, लखिमा, देव सिंह, हर सिंह, पद्म सिंह, विश्वास देवे, अर्जुन-अमर, राघव सिंह, रुद्र सिंह, धीर सिंह, भैरव सिंह, चन्द्र सिंह आदि बादमे घोसिआएल गेल, जे गीतक लयकेँ प्रभावित करैत स्पष्ट रूपसँ दृष्टिगोचर होइत अछि। संस्कृत-अवहट्ठबला विद्यापति भू-परिक्रमा (देव सिंह), कीर्तिलता (कीर्ति सिंह आ वीर सिंह), कीर्तिपताका, गोरक्षविजय (शिव सिंह), लिखनावली (पुरादित्य), दान वाक्यावली (रानी धीरमति) आदि स्पष्ट रूपसँ राज्याश्रित रचना छल। गोरक्षविजय नाटक भैरव पूजाक अवसरपर लिखल गेल आ ऐ मे धूर्त समागम सन मैथिली गीत छल जे ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक भयंकर प्रभाव स्वरूप छल। नामक असमानता नै रहैत तँ ज्योतिरीश्वकेँ ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति बना देल जाइत।  तत्वचिन्तामणिकारक गंगेश १२००० ग्रन्थक बराबर एकटा ग्रन्थ लिखलन्हि। प्रोफेसर दिनेशचन्द्र भट्टाचार्य “हिस्ट्री ऑफ नव्य-न्याय इन मिथिला” मे लिखै छथि- “The family which was inferior in social status is now extinct in Mithila…Gangesha’s family is completely ignored and we are not expected to know even his father’s name.” आ ई सभ सूचना, ओ लिखै छथि, हुनका प्रो. आर.झा (रमानाथ झा) देलखिन्ह! आब आउ पञ्जीमे वर्णित तथ्यपर- ओइमे स्पष्ट रूपसँ लिखल अछि जे तत्वचिन्तामणिकारक गंगेशक जन्म पिताक मृत्युक पाँच वर्ष बाद भेलन्हि आ ओ चर्मकारिणीसँ विवाह केलन्हि, तँ ई गप रमानाथ झा दिनेशचन्द्र भट्टाचार्यसँ किए नुकेलन्हि? एकटा उपजाति द्वारा हिनकर मूर्खसँ विद्वान बनबाक गपपसारल गेलन्हि आ हिनका खतम करबाक साजिश भेल। गंगेशक पुत्र वर्द्धमान गंगेशकेँ सुकविकैरवकाननेन्दुः कहै छथि। मुदा गंगेश सन प्रसिद्ध विद्वानक कविता कोन साजिशक अन्तर्गत आइ उपलब्ध नै अछि से ऊपर देल उदाहरणसँ स्पष्ट अछि। बंगालक वासुदेव पक्षधर मिश्रक सहपाठी रहथि, मिथिला पढ़ैले एला, शलाका परीक्षा उत्तीर्ण केलन्हि आ सर्वभौम उपाधि भेटलन्ह्। वासुदेव गंगेशक तत्वचिन्तामणि आ उदयनक न्यायकुसुमांजलिक कारिकाकेँ कंठस्थ कऽ लेलन्हि। पक्षधर आ आन मिथिलाक शिक्षक तत्वचिन्तामणि लिखबाक (प्रतिलिपि करबाक) अनुमति नै दै छला! वासुदेवक शिष्य रघुनाथ शिरोमणि अपन गुरु पक्षधर मिश्रकेँ शास्त्रार्थमे हरा प्रमाणित करबाक अधिकार लेलन्हि। नव्यन्याय स्कूलक नवद्वीपमे वासुदेव-रघुनाथ द्वारा स्थापना भेल। पक्षधर मिश्र संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक समकालीन छला। आ रघुनाथक संग बंगालसँ मिथिला विद्यार्थीक आगमन बन्द भऽ गेल।

शिवसिंह द्वारा संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ जे बिस्फी ताम्रपत्र देल गेल तकरा ग्रियर्सन फर्जी कहलन्हि कारण ओ विद्यापतिक पदावलीसँ परिचित रहथि आ बूझि गेल रहथि जे ओइ विद्यापतिकेँ ई ताम्रपत्र भेटब असम्भव छल। मुदा ई ताम्रपत्र तँ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ भेटल छलन्हि आ दुनूक बीचक अन्तर ग्रियर्सन नै सोचि सकला। मुदा से म.म. हरप्रसाद शास्त्री सोचलन्हि आ ऐ ताम्रपत्रकेँ असली बतेलन्हि।

श्रीधरदासक सदुक्तिकर्णामृतमे कैवर्त पपीहाक गंगापर स्तुति गीत अछि। राधाकृष्णक गीत अछि। लक्ष्मणसेनक राज कवि धोयी (जोलहा) रहथि। लखिमा ठकुराइन पदावली नै लिखलन्हि संस्कृतमे पद्य लिखलन्हि (ग्रियर्सन)। श्रीधरदासक अभिलेख अंधरा ठाढ़ीमे अछि आ ओ नान्यदेव आ गंगदेवक मंत्री रहथि। हुनकर वंशज अमिअकर संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक समकालीन रहथि। गंगदेवकेँ उपेन्द्र ठाकुर कलचुरी मानै छथि। विजय कुमार ठाकुर कलचुरि कर्णक स्तुतिमे सदुक्तिकर्णामृत (श्रीधरदास)क विद्यापतिक गीतकेँ मानै छथि। राधाकृष्ण चौधरीक मत ऐ सँ भिन्न छन्हि। कोनो परिस्थितिमे ई विद्यापति ज्योतिरीश्वर पूर्व रहथि। “रामचरित”- विग्रहपाल-३ कर्णकेँ हरेलन्हि, ऐ सम्बन्धमे बेगूसरायसँ उत्तर १६ किमी. नौलागढ़सँ दूटा पाल अभिलेख राधाकृष्ण चौधरीकेँ भेटलन्हि। ओहो कर्ण ११म शताब्दीक छथि। धूर्त समागम सेहो दक्षिण भारतमे प्रसिद्ध अछि। रामभरोस कापडि भ्रमर यात्रा प्रसंग

ह्वेन सांगसं चीनमे भेंटघांट हमसभ हाइस्कूलक पाठ्यक्रममे ह्वेनसांगकेँ सम्बन्धमे पढैत छलहुँ । चिनी यात्रीसभ भारतधरि पहुँचि बौद्धधर्मक ग्रन्थसभकेँ संकलन कऽ चीन लऽ गेल छल । विकट वाट–अथक यात्री । महिनोक सफर । हमसभ चीनक सांस्कृतिक राजधानी सियानमे आबि गेल छी । विजिंगसं दूघंटाक उडानक बाद काल्हिए एत्त आएल रही । आसीन ७ गतेसं नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक नौ सदस्यीय प्रतिनिधि मण्डल सात दिनक चीन भ्रमणमे अछि । सात गते काठमाडौसं चायना ईस्टर्न एयरलायन्ससं हमसभ कुनमिंग आयल रहीआ ओत्तसं ओही दिन विजिंग पहुंचल रही राति ११ बजे करिब । विजिंगमे तीन दिन रहि क काल्हि चीनक सांस्कृतिक राजधानी सियान आयल रही । आ आई सियानक बासी रहल ह्वेन सांगक विशिष्ट कृतित्वक अध्ययनमे लागल छी । सरिपहुं आइ एकटा विशिष्ट व्यत्तित्वक कृतित्वसँ साक्षात्कारक समय छल । हमर चुलबुले गाइड मोनिका (पश्चिमी नाम) हमरासभकेँ डा.सीन टेम्पलमे लऽ जा रहल छली । एतय ओकरे शब्दमे सियान जौैंग अर्थात हमसभ जकरा ह्वेन सांग कहैत छिएै,क बासस्थान, कृतिसभसँ परिचय कराबय लेल ओ बेसब्र छलीह, मन्दिर बनौल गेल जत्त ओ बौद्ध कृतिसभक चिनी अनुवाद कएलन्हि । हुनक अनुवाद कएल किछु कृति ओतहि राखल अछि । भारतसँ घुरलाक बाद तत्काले सम्राटद्वारा कएल गेल स्वागत आ अन्य क्रियाकलापसभ देवालपर लिखल भव्य चित्रसभ बताबि रहल छल । प्रकोष्ट भितर ह्वेन सांगकेँ भव्य प्रतिमा सेहो स्थापित अछि । तहिना बाहर कम्पाउण्डमे सेहो हुनक विशाल प्रतिमा राखल गेल अछि । ओ सियानके बासी छलाह । तएँ सियानवासी हुनका बहुत बेसी सम्मान करैत अछि आ हुनका स्मृतिकेँ सम्बद्र्धन करएमे दत्तचित्त भऽ लागल अछि । ११९ ई सन पूर्व सियानमे बेस्टर्न हान डाइनेस्टी समय दिस सिल्क कारोबार ओतय होइत छल । पाछु इएह सिल्क व्यापार सियान होइत समुद्रतट धरि पसरल । ई व्यापारिक बाट पाछु सिल्करोडक नामसँ प्रसिद्ध भऽ गेल । जखन चीनमे सन २५ दिस इस्टर्न हान पिरियडक समयमे भारतीय बुद्धिज्म चीनमे प्रवेश पौलक , सम्भवतः ओकर बाट सेहो इएह सिल्करोडे छल । तांग राजवंशक प्रारम्भिक समय ६२९ सन दिस ह्वेन सांग ओएह सिल्करोड होइत भारतधरिक यात्रा कएने छलाह —बुद्ध साहित्य,दर्शन प्राप्त करबा लेल ।ओ सन ६४५ मे सियान घुरलाह आ बडका ध्ष्मि नययकभ एबनयमब या म्ब ऋष्भल त्झउभि कँ निर्माण भेल । ह्वेनसांग सन ६०० मे जन्मल छलथि , ६१३मे बौद्ध भिक्षु बनलान्ह, ६२९ सँ ६४५ धरि भारत भ्रमण कएलन्हि, ६४५ सँ ६६४ धरि बौद्ध साहित्यक अनुवाद कएलन्हि , सन ६६४ मे हुनक देहाबसान भ गेलन्हि । हमरासभकेँ विस्तारपूर्वक ओहि पैगोडाकेँ जानकारी प्राप्त भेल । मनमे उठल अनेको जिज्ञाशाकेँ सेहो शान्त करबाक अवसर पौलहुँ । चीनमे देखय लायक बहुत चीज अछि । आठ हजार ई.पूर्वधरिक अवशेषसभ संग्रहालयमे देखलहुँ तऽ ३००० सँ ५००० हजारधरि ई पूर्वक साबूत आ विकसित सामग्रीसभ देखलाक बाद सभ्यता आ संस्कृतिक विकासमे चिनियां भूमि अन्य क्षेत्रसँ आगां आ बेसी सम्पन्न किए अछि से आभास होइत अछि । आव विश्वास होइत अछि जे लिपिक विकास किया चीनेमे भेल छल । चीन भ्रमणक एहि प्रसंगमे अनेकौं ऐतिहासिक तथ्यसभसं साक्षात्कार करबाक अवसर भेटल । तखन लागल चीन मात्र सातम् आश्चर्यक लेल मात्र नहि, अपना भितर अनेकौ आश्चर्यसं भरल सामग्रीसभ संरक्षित क रखने अछि, जकरा देखा क एखन आर्थिक उपार्जन मात्रे नहि अपन परम्परा आ सांस्कृतिक सम्पदाकें विश्वकें अगाडी समधानि क प्रस्तुत करबाक पैघ काजसेहो क रहल अछि । चीनक विकासक गति ठीके प्रशंशायोग्य मानल जएबाक चाही । नागेन्द्रकुमार कर्ण सुजित कुमार झा पर कहल जाइत अछि, इख नहि भेल मनुष्य आ विष नहि भेल साँप कोन काजकेँ । तहिना साहित्यमे सेहो होइत अछि । कवि, लेखक अथवा साहित्यकार कहए चाहने बात पाठक अथवा श्रोता नहि वुझिसकल तऽ ओकर कोन अर्थ ? एकटा लेखक कहए चाहने अथवा देबए चाहने सन्देश श्रोता वा पाठक अनुसार फरक फरक हएत मुदा विनु सन्देशक ओ साहित्य विनु काजक होइत अछि । ओहन साहित्य चिरस्थायी सेहो नहि होइत अछि । मनोरञ्जनक लेल मात्र सिमित रहैत अछि । नहि तऽ ओहिकेँ लेल कवि, लेखक अथवा साहित्यकारकँे भरमग्दुर प्रयत्न करए पड़ैत अछि । अपन रचनाकँे चिरस्मरणीय बनाबए तथा ओहिकँे सान्दर्भिकताक लेल साहित्यकारकँे बहुत प्रयत्न करए पड़ैत अछि । तएँ आबए बला पुस्तासभक समयमे सेहो ओ रचनाक सान्दर्भिकता रहौक । हालहि मैथिली साहित्यक नवउदयीमान कथाकार एवं पत्रकारसुजीतकुमार झाक कथा संग्रह जिद्दीक सम्बन्धमे किछु लिखबाक प्रयत्न कएने छी । इएह भादव २३ गते महोत्तरी जिल्लाक जलेश्वर स्थित नेपाल पत्रकार महासंघ महोत्तरी शाखाक सभाहलमे आयोजित समीक्षा तथा परिचयात्मक कार्यक्रममे उठल सवालसभकेँ सेहो मनन कएलहुँ आ ई कथा संग्रह पढि कऽ अपन मोन भितर उठल बातसभकँे एतह रखवाक प्रयास कएलहुँ अछि । साहित्यकँे विविध विधासभमे सँ कथा विधा सेहो एक अछि । गद्य विधाकेँ एक सशक्त आ छोट समयमे पढि कऽ सम्पन्न करय बला आ प्रशस्त सन्देश देवाक सामथ्र्य कथामे होइत अछि । कविशेखर ज्योतिरीश्वर ठाकुर सँ शुरु भेल मैथिली साहित्यकँे गद्य अखन धरि अनवरत रुपमे आगु बढि रहल अछि आ गद्यकँे एक सशक्त विधा कथा रहल अछि । कथामे कोनो एक पक्षक बातकेँ उठाओल गेल अछि जे ई विधा पुरान मानल जाइत अछि । । पहिने–पहिने उपदेशात्मक कथासभ, नैतिक कथासभ, परिक कथासभ , भगवान आ दैत्यक कथासभ सुनाओल जाइत छल । धीरे धीरे सामाजिक घरातलक यर्थाथताकेँ समेटि कऽ यर्थातवादी कथासभ लिखाए लागल । मैथिली कथा साहित्यकेँ बात कएल जाए तऽ बहुत लम्बा परम्परा नहि रहलाक बादो एहिकँे गुणात्मक रुपमे नीक स्थिती रहल अछि । संस्कृतक कथासभकँे अनुवाद सँ शुरु भेल मैथिली कथा साहित्यकँे शुरुवात पत्रपत्रिका सँ भेल तथ्य रहल अछि । मैथिली पत्रपत्रिकाक प्रकाशन संगहि मैथिली कथा साहित्यकँे शुरुवात भेल मैथिली साहित्यिक इतिहास पुस्तकमे उल्लेख अछि । बासुदेव ठाकुरक सप्तध्याधा सँ शुरुवात भेल मैथिली कथा साहित्यकँे इतिहास अखन धरि रातो नदिमे बहि रहल पानि जेकाँ अछि । कोनो नदिमे जहिना बाढि अबैत अछि आ चलि जाइत अछि । ओहिना साहित्यमे सेहो प्रकाशनक बाढि आएल आ सुखाएल । संख्यात्मक रुपमे ओतके कथा संग्रहक प्रकाशनसभ नहि रहलाक बादो गुणात्मक रुपमे कोनो भाषा सँ मैथिली कथाक स्तरीयता कम नहि अछि । कथाक विभिन्न वादसभमे मैथिली साहित्यकारसभ कलम चलौने देखल गेल अछि । बासुदेव ठाकुरक सप्तध्याधा सँ शुरु भेल मैथिली कथा साहित्य लेखनीक इतिहासमेृ पं. सुन्दर झा शास्त्रीक अखनु बखारी नै फुजलै, डा.धीरेन्द्रक हिचुकैत बहैत सेती, डा.राजेन्द्र बिमलक इ कथा हमरे थिक, राम भरोस कापड़ी भ्रमरक कथा संग्रह तोरा संगे जयबौ रे कुजवा, डा.रेवती रमण लालक माधव नहि अएला मधुपुर सँ, डा.सुरेन्द्र लाभक कथायात्रा, अयोध्यानाथ चौधरीक एकटा हेरायल सम्बोधन, राजेश्वर नेपालीक सोमली, वृशेष चन्द्र लालक माल्हो आ सुजीतकुमार झाक चिडैं पश्चात आएल जिद्दी कथा संग्रह मुख्य अछि । एहिकेँ बाहेक बहुत कथा संग्रह आ कथासभ मैथिली साहित्यमे प्रकाशन भेल अछि जे उत्कृष्ट सेहो अछि । डा. धीरेन्द्रक अभिभावकीय परम्परामे बढल मैथिली कथा साहित्यमे विषयवस्तुक व्यापकता, राजनीतिक वदलावक प्रभाव, नेपालीय माटिपानिक गंध, पारिवारीक, सामाजिक, साँस्कृतिक आ राजनैतिक जीवन आ ओतए सँ पड़ल उतार चढाव देखल जाइत अछि । कथाशिल्पक दृष्टि सँ नव–नव प्रयोग सेहो देखल गेल अछि । तहिना उतारचढावक बीच वितल समयमे नेपालीय माटिमे मैथिली कथा संग्रह जिद्दीक प्रकाशन भेल अछि । कथाकार सुजित कुमार झाक पहिल कथा संग्रह चिडै आ तकरबाद आएल रिपोर्टर डायरी आ तेसर कृतिक रुपमे आएल कथा संग्रह जिद्दी वास्तवमे मैथिली साहित्य भण्डारमे बृद्धि भेल अछि । हुनकर दुनू पुस्तक सँ परिमार्जित आ सशक्तरुपमे जिद्दी कथा संग्रह आएल कहबामे कोनो भांगठ नहि अछि । कथा संग्रह जिद्दीमे नेपालीय मैथिली नारीसभक विषयवस्तुसभ उठाओल गेल अछि । एहि संग्रहक मुख्य पात्रसभ नारी अछि तऽ कथा सेहो नारीक आसपास घुमैत रहल कथा संग्रह जिद्दी नारीवादी कथासंग्रहकेँ रुपमे आगा आएल अछि । कथाकार सुजित कुमार झाकेँ नारीवादी कथाकारक रुपमे देखल गेल अछि । कथा संग्रह जिद्दीमे कथाकार नारीक सामाजिक, साँस्कृतिक, राजनीतिक स्तर पड़ल प्रभाव, एहि सँ सामाजिक जनजीवनमे पड़ल असर, अगामी दिनमे एहि सँ पड़ल जाएबला सामाजिक विखण्डनक खतराकेँ सुक्ष्मरुपमे देखल गेल अछि । कथा संग्रह यर्थातक धरातलमे ठाढ़ अछि । यद्यपि ई कथा संग्रह बेसी आदर्शोन्मुख यर्थातवाद दिस गेल अछि । एक दर्जन कथा समाविष्ट रहल कथासंग्रह जिद्दीमे हरेक कथा एक अलग छाप छोड़ए सफल भेल अछि । कथाक अन्त नहि पढए धरि कथावस्तुक शिर्षक अपुर्ण लगैत अछि । मुदा कथा पढलाक बाद एक निमेषमे मिथिलाञ्चलक धरातलीय यर्थात मानस पटलपर आबि जाइत अछि । पारस्परिक स्नेह, विश्वास, बलिदान, सेवा, करुणा, अनुशासनक धरातलमे रहि कऽ अपन मोन, सम्मान बचौने मिथिलाञ्चलमे ओ बातसभ समयानुक्रममे घटल घटनाक प्रेरणा सँ कथा जन्मल अछि । आ कथाकार कथासभक मार्फत ओ बातसभकेँ पुनःस्थापना होएबाक बात पर जोड़ देने छथि । सरसरती रुपमे माला बनाएल शैलीमे आगा बढैत जाएब आ अन्तमे पाठककेँ सोचमग्न बनाबैत कथाक इतिश्री करब कथाक महत्वपूर्ण बाट अछि । कथा संग्रहमे रहल १२ टा कथासभ मे सँ सभ उत्कृष्ट रहल अछि । पहिल कथा पूmल फुलाइए कऽ रहलमे महिलाक अथक प्रयास आ दृढ इच्छाक नमुना प्रस्तुत कएल गेल अछि तऽ महिलाकेँ एक्को् बेर नहि पुछि अभिभावक लडकीक विवाह करब, विवाहक समयमे लड़का पक्षद्वारा झुठ बाजब, दहेज आ रंगक कारण विवाहमे समस्या आएब सहितक समस्याकेँ सेहो देखाओल गेल अछि । जे समस्या मिथिलाञ्चलक घरघरमे रहल अछि । जेना उच्च विचार आ अथक प्रयास पश्चात इलेनोर रुजबेल्ट सँ अपन अपांग पतिकेँ राष्ट्रपति सन गरिमामय पदमे पहुँचाओल गेल छल । पूmल फुलाइएकऽ रहलमे जगदीशकेँ पिंकी अपन दृढ इच्छा शक्ति आ प्रयत्न सँ सहायक स्टेशन मास्टर बनाए कऽ छोडलन्हि । तहिना दोसर कथा नव व्यपारमे आधुनिक होइत गेल महिलाक जीवनशैली आ एहि सँ पड़ल जाएबला पारिवारिक कलहकेँ एकटा विम्वक आधारमे उजागर कएल गेल अछि । खाली घर सँ साउस, पुतहुँ आ पति बीचक अन्तरद्धन्द्ध, साउस पुतहुँक कलह, दाइकेँ पोतापोती प्रतिकँे मोहक संग संग दोसर भावनाकेँ कदर नहि कएला पर परिणामकेँ उजागर कएल गेल अछि । दू विचार, दू समयक प्रतिनिधित्व सेहो कएने अछि । तहिना लाल डायरी कथा हिन्दु आ मैथिली समाजमे रहल अन्धविश्वासकेँ देखाओल गेल अछि । जिद्दी कथा सँ अभिभावक जेना बेटा बेटीकेँ अनुशासनमे रखैत अछि । तहिना बेटा बेटी बनबाक यर्थातताकेँ स्वीकार कएने अछि । तहिना समयमे नहि चेतल गेल तऽ जिद्दीक परिणाम की होइत अछि से प्रष्ट अछि । बिना छलकपट, निर्देष आ व्यवहारिक भऽ मेहनत कएलापर सफलता अवश्य भेटैत अछि सन्देश जादु कथा छोडने अछि । ओतबे मात्र नहि आदर्श, अर्थहीन यात्रा, व्यर्थ उडान आ निष्ठा की देखावा कथामे नारी चरित्रक मनोविष्लेषण कएल गेल अछि । समाज की कहत ? दिखावाकँे लेल समाजमे भऽरहल कृकृत्य आ हदकँे वयान ओ कथासभमे कएल गेल अछि । तहिना केहन सजायमे धर्मपुत्रीक रुपमे घरमे आएल चमेलीकेँ हुनक घरपरिवार आ सतबा माएकेँ अपन बेटा भेलाक बाद कएल गेल व्यवहार आ ओकरबाद चमेली भोगने पीडाकेँ देखाओल गेल अछि । अन्तिम कथा मेनकामे राजिव सरकँे व्यवहार आ स्नेह सँ मेनकाक मोन भितर उब्जल उतार चढावकेँ देखाओल गेल अछि । समग्रमे कहल जाए तऽ कथा संग्रह जिद्दी बेसी आदर्शबादक नमुना प्रस्तुत कएने अछि तऽ महिलाकेँ मुख्यपात्रक रुपमे ठाढ़ अछि । समाजक विकृति, विसंगती, नीक बेजाए सभक हकदार प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष रुपमे महिला भेल वयान कएने अछि । तहिना मिथिलाक नारीसभकेँ आगा आ स्वछन्द भऽ आगा बढबाक प्रेरणा सेहो ई कथासंग्रह देने अछि । महिलासभक पक्षमे वकालत सेहो करैत अछि । मुदा की अपनासभक समाजमे आबि रहल पश्चिमी संस्कृति आ ओकर विकृति, विसंगतीक जिम्मेवार महिला अछि । की महिला आब जननीक बदला संहारकर्ता बनि रहल अछि । की मिथिलाक नारी आब सीता जेकाँ प्रतिव्रता आ सीता जेकाँ बनए सँ चुकल छथि ? यावत गम्भीर प्रश्नसभ सेहो ई कथासंग्रह उठौने अछि । पुरुषवादी सोच आ मानसिकताक कारण ई प्रश्नसभ जायज हएत ? मुदा महिलाक कारण समाज बदलल, समाज नीक आ सुशिक्षित बनैत गेल यर्थात कथाकार देखए नहि सकल अछि । साहित्यकार समाजक यर्थातताकेँ लाबि कऽ अपन रचना मार्फत सभक समक्ष पहुँचेबाक काज कएने छथि । कहल जा रहल अछि कोनो समाजक अध्ययन करवाक चाही तऽ ओ समाजक साहित्य पढलापर पहुँच जाएत । एहि सँ साहित्यकारकेँ गम्भीर आ चेतनशील भऽ रचना करय लेल प्रेरित करैत अछि । कथाकार पुरुषकेँ दोष नहि देखौने छथि । की मैथिली समाजमे सभ दोष महिलेके होइत अछि पुरुष मात्र रबर स्टाम्प अछि । ई सभ बात नहि आएब कथासंग्रहक कमजोर पक्ष सेहो देखल गेल अछि । कतिपय कथा दुखान्त सँ सुखान्त दिस आगा बढल अछि । कतेको स्थानमे दुःखान्त सँ शुरु भऽ दुःखान्तमे जा समाप्त होइत अछि । कथाकार सुजित कुमार झाक रचनासभ आओर उत्कृष्ट रचनासभ आबैक तकर अपेक्षा अछि । एक प्रकारक शैली सँ कथासंग्रहकेँ कनी ओझराहटिमे रखलाक बादो यर्थातताकेँ दृष्टिकोण सँ अब्बल अछि । भाषाशैली, मैथिली कहवी, प्रकृति तथा व्यक्ति वर्ण सेहो बढिया आ मिठासपूर्ण रहल अछि । पुस्तकक नामाकरण युगानुकुल कथासभ आएल अछि से सुखद बात अछि । मैथिली कथा साहित्यमे रौदी पड़ल समयमे एकहि वर्षमे दू दू टा कथा संग्रह आएब वास्तवमे कठिन काम अछि । मुदा ओ चुनौतीकेँ सेहो स्वीकार करैत सुजितक संग्रह प्रशंसनीय अछि । तहिना आफन्त नेपाल सेहो कथा संग्रहकेँ प्रकाशन कऽ बजार धरि लौने प्रति धन्यवादक पात्र रहल अछि । मैथिली साहित्य क्षेत्रकेँ एकटा आशाक केन्द्र आ भरोसाक साहित्यकारकेँ आगा बढाएब प्रात्ेसाहन कएने काजक लेल आफन्त नेपालकेँ साधुवाद देबहे पड़त । खुशबू झा मैथिली कथा संग्रह जिद्दी पढलापर

साहित्यमे किछु पढबाक मोन भेल तऽ हम कथे पढैत छी । कखनो काल समाचार बनबैत–बनबैत थाकि गेलहुँ तऽ नेटपर कोनो कथा खोजए लगैत छी । युवा पत्रकार सुजीत कुमार झाक कथा संग्रह जिद्दी जखन हमरा भेटल एमएकेँ परीक्षा चलैत समयमे पढि लेलहुँ । सुजीतक पहिल कथा संग्रह चिड़ै आ दोसर कृति रिपोर्टर डायरी हम एहि सँ पहिने पढि लेने छी । कथ्यक हिसाव सँ चिडै आ जिद्दीमे खासे अन्तर नहि लागल । मुदा क्रमशः उचाई धऽ रहल छथि से पढबाक क्रममे हमरा भेटल । कोनो व्यक्तिकेँ एक वर्षमे ३ टा पुस्तक आएब साहित्यकेँ प्रति सुजीत कतेक समर्पित छथि तकर एहि सँ बडका उदाहरण दोसर नहि भऽ सकैत अछि । फेर जाहि रुप सँ हिनकर पुस्तक चर्चामे आबि रहल अछि हिनका लेल मात्र नहि मैथिली साहित्यक लेल सेहो उपलब्धीक बात अछि । जिद्दी एहि पुस्तककेँ नाम एकटा कथाक कारण पड़ल से हमरा नहि लगैत अछि । जिद्दीक वारहो कथामे जिद्द भडल अछि । जँ ओ जिद्दी नाम सँ कथा नहि लिख कितावक नाम मात्र लिख देने रहितथि तैयो फरक नहि पडैत ।

१ सय १४ पृष्ठक एहि कथा संग्रहमे १२ टा कथा अछि । पहिल कथा ‘फूल फुलाइएकऽ रहल’ संग्रहक नाम सँग पुरा वष्तुनिष्ट बुझाइत अछि । अहुँमे जिद्द अछि । कथामे पिंकी अपन अधुरा सपनाके टुटैत नहि छोडि एकटा दृढ विश्वासक सँग पुरा कऽ एकटा सच्चा आ कर्तव्यनिष्ट पत्निक रुपमे ठाढ़ भेल छथि । तहिना ‘नव व्यपारमे’ साधना उपर आधुनिकताक प्रभाव देखाओल गेल अछि जे अपन पति आ घर दुआरक जिम्मेवारीकँे बिसरि क्लब आ राजनीतिक हिस्सा बनल छथि । ‘खाली घर’, ‘लाल डायरी’, ‘जिद्दी’, ‘जादु’, ‘आदर्श’, ‘अर्थहिन यात्रा’ आ ‘व्यर्थक उडान’ ई सभ कथामे महिलाक मनोविज्ञानके चित्रण बहुत सुन्दर ढंग सँ कएल गेल अछि । तहिना ‘निष्ठा कि देखावा’ मे अपन कर्तव्यके समाजक लेल मात्र निर्वाह करय बला औपचारिकता बुझि पतिक सेवा करय बाली नकारात्मक विचारधाराक महिलाक चित्रण कएल गेल अछि । ‘केहन सजाय ?’ नामक कथामे कामनी मैडम जेहन जुझारु महिला जे अवलाके सवला बनैत देखि खुश होइत छली । ओहन सकारात्मक विचारधाराक महिलाक प्रस्तुत कएल गेल अछि तऽ ओ कथामे पुत्र भेलापर गोद लेल वच्चाकेँ छोड़ि देबएबला घटना पढि रोइया ठाढ कऽ दैत अछि । ‘मेनका’मे एकटा एहन महिलाक चित्रण अछि जे एकटा बेरंगक जीवन बिता रहल छली मुदा जखन रंग भड़य बला भेटल तऽ ओ अपन रंग उजारय बाली जेहन नहि बनबाक प्रण कएलन्हि आ अपन बेरंग जिनगीक दोसर यात्रा तय कएलन्हि । अर्थात महिलाद्वारा पीडित महिला दोसरकँे पीडा नहि देबए चाहलथि । अर्थात पुरा कथा संग्रह महिला आ महिलाक आचरण पर केन्द्रीत अछि जे एहि समाजक सत्यताक उजागर करैत अछि । एहिमे प्रस्तुत सभ महिलाक मोनमे एकटा अलग द्वन्द्व प्रस्तुत कएल गेल जे एहि पुरुषबादी समाजक देन अछि । आ ई काल्पनिक कथा होइतो एकटा कटु सत्य बातक पोल खोलि दैत अछि । एहि संग्रहक मोलिकते इएह अछि । हम चाहब सुजीतक नयाँ पुस्तक जल्दि आबए । खास कऽ महिला सँ जुड़ल समस्यासभकेँ आओर गम्भीरता संग उठैक एकर अपेक्षा हमरा तऽ अछिए । मैथिलीके पुस्तक प्रकाशन काज दुरुह भेलाक बादो आफन्त नेपाल जिद्दी पुस्तक छापयके प्रयत्न कएलक अछि । एहिके लेल आफन्तोके धन्यबाद देबहे पडत । नवेंदु कुमार झा आर्थिक संकट मे चेतना, दू दिनक हएत समारोह मिथिलांचलक प्रतिनिधि सांस्कृतिक संस्था चेतना समिति द्वारा प्रति वर्ष आयोजित त्रिदिवसीय विद्यापति स्मृति  पर्व समरोह ऐ वर्ष दू दिवसीय हएत। 26 आ 27 नवम्बर केँ आयोजित ऐ समारोहक दरमियान कवि गोष्ठी विचार गोष्ठी, सांस्कृतिक कार्यक्रम आ नाटकक मंचन कएल जाएत। सूत्रसॅ भेटल जनतबक अनुसार चेतना समिति, आर्थिक संकटक दौरमे अछि तैॅ ऐ वर्ष मात्र दू दिनक समारोह हएत। समितिक मठ विद्यापति भवनक गोटेक एक वर्षसॅ पुननिर्माणक काज चलि रहल अछि तेॅ समितिक आमदनी घटि गेल अछि। आमदनी घटलाक संग महगीक ऐ दौरमे खर्च कम नै भेल आ समितिपर आर्थिक संकट आबि गेल अछि तेॅ अपन सीमित संसाधनक कारण आर्थिक संतुलन बनाएल रखबाक लेल बहु प्रतीक्षित वार्षिक आयोजनक समय अवधिमे कटौती कएलक अछि। समारोहक आयोजन लेल भेल बैसारक दरमियान विद्वान सचिव, कर्मठ अध्यक्ष आ जीनियस मार्गदर्शक समितिक आर्थिक संकटक जनतब दैत समारोह मात्र दू दिन आयोजित करबाक निर्णय सुनौलनि तँ समितिक मठाधीश सभक स्वाभिमान एकाएक जागि उठल आ ओ ऐपर अपन विरोध जनौलनि मुदा तीन सदस्यीय ई प्रतिभा सम्पन्न कोर कमिटी ऐपर कान नै देलक आ अपन निर्णयपर मोहर लगैबामे सफल रहल। ओना तॅ देशमे विदेशी निवेशक कारण आर्थिक संकटक बदरि लगबाक आशंका विरोधी दल केँ भऽ रहल अछि मुदा ऐ आर्थिक संकट सभसॅ पहिल शिकार जेना चेतना समिति भऽ गेल अछि। समितिक ऐ निर्णयसॅ राजधानी पटनाक सक्रिय सामाजिक-सांस्कृतिक मैथिलजन आक्रोषमे छथि। ओ समितिकेँ आर्थिक संकटसॅ उबारबाक लेल अपन योगदान देबऽ चाहैत छथि मुदा चेतनाक मठाधीश कर्ताधर्ता जेना अचेत भऽ गेल छथि। हुनका समाजसॅ सहयोग लेबऽ मे कोनो रूचि नै छनि। ओ अपन असफलताकेँ उजागर नै होमए देबऽ चाहैत छथि तँ बाबा विद्यापतिक मठ बनल चेतना समितिक मठाधीशक गर्दनिमे घंटी बन्हबाक लेल सेहो ओ अपन समयक बर्बादी बुझि रहल अछि। पटनामे एक समय समितिक सक्रियताक कारण तीन दिन विद्यापति स्मृति पर्व समारोह प्रदेश भरिमे चर्चाक विषय बनैत छल। समय दर समय आम मैथिलक प्रति समितिक उदासीनता सॅ ऐ समारोहक दायरा घटैत जा रहल अछि आ कहियो हार्डिंग पार्क सन पैघ मैदान ऐ समारोहक लेल छोट पड़ि जाइत छल तँ आब उद्घाटन समारोह आ कवि सम्मेलनक लेल जगह पैघ भऽ जाइत अछि। मैथिल जनक ऐ समारोहक प्रति घटैत रूचिक कारण समारोह पर अस्तित्वक संकट आबि गेल अछि। तीन दिनक वार्षिक आयोजन आब दू दिवसीय भऽ रहल अछि। दू दिनक कार्यक्रम आयोजित करबाक निर्णयक बचावक लेल समिति सेहो जोड़गर तर्क रखने अछि। समिति सूत्र ऐ संबंध मे तर्क दऽ रहल अछि जे विद्यापति भवनक पुनर्निर्माण आ कार्यक्रम स्थल नै भेटलाक कारण अवधि घटाओल गेल अछि। कार्यक्रम प्रति वर्ष निश्चित समयपर निर्धारित अछि तँ समिति कार्यक्रम स्थल आरक्षित करबामे विलम्ब किए केलक, ऐपर मौन अछि। दरअसल समितिपर व्यक्तिवादी एकाधिकार हावी अछि। ऐ एकाधिकारक चुनौती देबाक साहस केओ नै करऽ चाहैए। एक दिस समिति ऐ वार्षिक आयोजनकेँ औपचारिकता बुझि रहल अछि तँ राजधानीक मैथिल जन सेहो एकर जयबारी आयोजन बुझि अपन उपस्थिति दर्ज करैबाक प्रयास करैत छथि। (मुख्यमंत्री पाक यात्राक बिहार सरकारक आन समाद www.prdbihar.gov.in or www.prdbihar.gov.org पर उपलब्ध अछि। पूनम मण्डल-१.दाग (उपन्‍यास) : गौरीनाथ- लोकार्पण २."सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे ३.समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL/ ३ नवम्बरकेँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद, ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति आ मैथिलीमे प्रेमक गीतपर भेल बहस १ दाग (उपन्‍यास) : गौरीनाथ- लोकार्पण बहुत दिन भेल, एक्कैस वर्ष, मातृभाषाक प्रति अनुरागक एक टा विशेष क्षण मे मैथिली मे लिखबाक लेल उन्मुख भेल रही—1991 मे— एहि एक्कैस वर्ष मे लगभग दू गोट कथा-संग्रह जोगर कथा आ दू गोट वैचारिक (आलोचनात्मक, संस्मरणात्मक आ विवरणात्मक) पुस्तक जोगर लेख यत्र-तत्र प्रकाशित आ छिडि़आयल रहितो ओकरा सभ केँ पुस्तकाकार संग्रहित करबाक साहस एखन धरि नइँ भेल। ई प्राय: अनके कारणेँ, जकर चर्चा बहुत आवश्यक नइँ। मुदा, ई उपन्यास एहि लेल पुस्तकाकार अपने सभक समक्ष प्रस्तुत क’ रहल छी जे एकरा पत्र-पत्रिका द्वारा प्रस्तुत करबाक सुविधा हमरा लेल नइँ छल। मुदा हमरा लग ई विश्वास छल जे मैथिलीक ओ पाठक वर्ग पढ़’ चाहताह जे प्राय: तेरह वर्ष सँ 'अंतिका’ पढ़ैत आयल छथि। मैथिली पत्रकारिताक दीर्घकालीन ओहि इतिहास—जे मैथिली पत्रिका पाठकविहीन आ घाटा मे बहराइत अछि—केँ फूसि साबित करैत जे पाठक वर्ग 'अंतिका’ केँ निरंतर 'घाटारहित’ बनौने रहलाह हुनक स्नेह पर हमरा आइयो विश्वास अछि। निश्चये ओ पाठक वर्ग हमर उपन्यास सेहो कीनिक’ पढ़ताह आ हमर पुरना विश्वास केँ आरो दृढ़ करताह। —लेखक Price : 150.00 INR स्त्री आ शूद्र दुनू केँ हीन आ मर्दनीय मान’वला कुसंस्कृतिक अवसानक कथा जे अपन तथाकथित 'ब्रह्मïशक्ति’क छद्ïम अहंकार मे परिवर्तनक ईजोत देखिए ने पबै यए...जखन देख’ पड़ै छै तँ पाखंडक कील-कवच ओढि़ लै यए, अहुछिया कटै यए, घिनाइ यए आ अंतत: एक टा 'दाग’ मे बदलै यए जे कुसंस्कृतिक स्मृति शेषक संग परिवर्तनक संवाहक, स्त्री आ शूद्रक, संघर्ष-प्रतीक सेहो अछि। उपन्यास पठनीय अछि, विचारोत्तेजक अछि आ मैथिली मे बेछप। —कुणाल गौरीनाथ मैथिलीक चर्चित आ मानल कथाकार छथि। पठनीयता आ रोचकता हिनकर गद्य मे बेस देखाइत अछि। माँजल हाथेँ ओ ई उपन्यास लिखलनि अछि। गौरीनाथ मैथिली साहित्यक आँगुर पर गनाइ वला लेखक मे छथि जे जाति-विमर्श केँ अपन विषय वस्तु बनौलनि। आन भारतीय भाषा मे साहित्यक जे लोकतांत्रिकीकरण भेल, तकर सरि भ’क’ हेबाक मैथिली एखनो प्रतीक्षे क’ रहल अछि। ई उपन्यास मैथिली साहित्यक लोकतांत्रिकीकरण लेल कयल एक टा सार्थक आ सशक्त प्रयास अछि। 'दाग’ अनेक अंतद्वंद्व सबहक बीच सँ टपैत अछि विश्वसनीयता, रोचकता आ लेखकीय ईमानदारीक तीन टा तानल तार पर एक टा समधानल नट जकाँ। एत’ सामंतवाद आ ब्राह्मणवादक मिझेबा सँ पहिनेक दीप सनहक तेज भ’ जायब देखाइत अछि। धुरखुर नोचैत नपुंसक तामस आ वायवीय जाति दंभ अछि। नवतुरियाक आर्थिक कारणेँ जाति कट्टरताक तेजब सेहो। दलित विमर्श अछि, ओकर पड़ताल सेहो। दलितक ब्राह्मणीकरण नहि भ’ जाय, तकरो चिंता अछि। दलित विमर्शक मनुष्यतावाद आ स्त्रीवादक नजरिञे पड़ताल सेहो। आकार मे बेसी पैघ नहियो रहैत एहि मे क्लासिक सब सनहक विस्तार अछि अनेक रोचक पात्रक गाथाक बखान संग। आजुक मैथिल गाम जेना जीवंतता सँ एहि उपन्यासक पात्र बनि केँ सोझाँ अबैत अछि, से अनायासे फणीश्वरनाथ रेणु केँ मन पाडि़ दैत अछि। गामक नवजुबक सबहक दल यात्रीक नवतुरियाक योग्य वंशज अछि। जँ आजुक मिथिला, ओकर दशा-दिशा आ संगहि ओत’ होइत सामाजिक परिवर्तन रूपी अमृत मंथनक खाँटी बखान चाही, तँ 'दाग’ केँ पढ़ू। एहि रोचक आ अत्यंत पठनीय उपन्यासक व्यापक पाठक समाज द्वारा समुचित स्वागत हैत आ गाम-देहात सँ ल’क’ नगर परोपट्टा मे एहि पर चर्चा हैत, एहेन हमरा पूर्ण विश्वास अछि। —विद्यानन्द झा स्त्री आ दलित एहि दुनू विमर्श केँ एक संग समेट’वला उपन्यास हमरा जनतब मे मैथिली मे नहि लिखल गेल अछि। ई उपन्यास एहि रिक्ति केँ भरैत भविष्यक लेखन लेल प्रस्थान-विन्दु सेहो तैयार करैत अछि। 'दाग’ अपन कैनवास मे यात्रीक 'नवतुरिया’ आ ललितक 'पृथ्वीपुत्र’क संवेदना केँ सेहो विस्तार प्रदान करैत अछि। ताहि अर्थ मे ई मैथिली उपन्यास परंपराक एक टा महत्त्वपूर्ण कड़ी साबित हैत। 'नवतुरिया’क 'बम-पार्टी’क विकास-यात्रा केँ 'गतिशील युवा मंच’ मे देखल जा सकैत अछि। जाति, धर्म, लिंग आदि सीमाक अतिक्रमण करैत मनुष्य ओ मनुष्यताक पक्ष मे लेखकीय प्रतिबद्धताक प्रमाण थिक सुभद्रा सनक पात्रक निर्माण जे अपन दृष्टि सँ जातीय-विमर्श सँ आगाँक बाट खोजैत अछि, 'पहिने मनुष्य बचतै तखन ने प्रेम!’ अभिनव कथ्य आ शिल्पक संग मिथिलाक नव बयार केँ थाह’वला उपन्यास थिक 'दाग’। —श्रीधरम उसार-पुसार ई उपन्यास हम लगभग दस वर्ष पहिने लिखब शुरू कयने रही। 2003 मे। एक्कैसम शताब्दीक नव गाम मे तखन धरि जे किछु थोड़ेक सामाजिकता बचल छल, एहि बीच सेहो खत्म जकाँ भ’ गेल। खगल केँ के देखै यए, हारी-बीमारी धरि मे तकैवला नइँ! अहाँक नीक जरूर दोसर केँ अनसोहाँत लगै छै। लोभ-लिप्साक पहाड़ समस्त सम्बन्ध आ हार्दिकता केँ धंधा आ नफा-नुकसान सँ जोडि़ देलक अछि।...गाम सँ बाहर रह’वला भाइ-भातिज केँ बेदखल करबाक यत्न बढ़ल अछि। खेती-किसानीक जगह व्यापार आ बाहरी पाइ पर जोर। सुखितगर होइते लोक शहर जकाँ आत्मकेन्द्रित भ’ रहल अछि आकि नव तरहक दबंग बनि रहल अछि, नंगटै पर उतरि रहल अछि। संगहि की ई कम दुखद जे जाति-धर्म, पाँजि-प्रतिष्ठा सनक मामिला मे एखनो; थोड़े कम सही; उग्र कोटिक सामाजिक एकता, आडम्बर आ शुद्धता देखाइते अछि?... सवर्ण समाज दलित-अछूतक कन्या पर अदौ सँ मोहित होइत रहल आ एम्हर आबि विवाह आदिक सेहो अनेक घटना सोझाँ आयल। मुदा दलित युवकक संग गामक सिरमौर पंडितजीक कन्याक भागि जायब, घर बसायब आ ओकर स्वावलंबी हैब पागधारी लोकनि केँ नइँ अरघैत छनि तँ एकरा की कहबै? खेतिहर समाज लेल खेती-किसानी सँ बढि़ ताग आ पाग कहिया धरि रहत से नइँ कहि सकब!... ओना मिथिला-मैथिल-मैथिलीक मामिला मे 'पूबा-डूबा’क हस्तक्षेप पश्चिमक श्रेष्ठता-ग्रंथि केँ कहियो स्वीकार्य नइँ रहल—खासक’ शुद्धतावादी लोकनि आ पोंगा पंडित लोकनि केँ!... निश्चये ओहेन व्यक्ति केँ मैथिल समाजक ई पाठ बेजाय लगतनि जे मनुक्ख आ मनुक्ख मे भेद करै छथि, एक केँ श्रेष्ठ आ दोसर केँ हीन बुझैत छथि!... सिमराही-प्रतापगंज-ललितग्राम-फारबिसगंज बीचक आ कात-करोटक 'पूबा-डूबा’ गाम-घरक किछु शब्द (ककनी, कुरकुटिया, ढौहरी, दोदब आदि), किछु ध्वनि, भिन्न-भिन्न तरहक उच्चारण आ वर्तनीक विविधता कोसी-पश्चिमक किछु पाठक केँ अपरिचित भनहि लगनि, आँकड़ जकाँ प्राय: नइँ लगबाक चाहियनि किएक तँ कोसी पर नव बनल पुल चालू भ’ गेल अछि...जाति मे भागनि आकि अजाति मे, बेटी-बहिन घर-घर सँ भागबे करतनि...ताग आ पाग धयले रहि जयतनि!...नव-नव बाट आ पुल आकर्षक होइत छै! से जनै अछि छान-पगहा तोड़बा लेल आकुल-व्याकुल नव तुरक मैथिल कन्या! हँ, पंडिजी बुझैतो तकरा स्वीकार’ नइँ चाहैत छथि। उपन्यासक अन्तिम पाँति पूरा क’ हम विश्रामक मुद्रा मे रही...कि पंडीजी, माने पंडित भवनाथ मिश्र, आबि गेलाह। पुछलियनि—पंडित कका, अंकुरक प्रश्नक उत्तर के देत? कहू, ओकर कोन अपराध?... पंडित कका किछु ने बजलाह, बौक बनि गेलाह!...मुदा हुनका आँखि मे अनेक तरहक मिश्रित क्रोध छलनि! ओ पहिने जकाँ दुर्वासा नइँ भ’ पाबि रहल छलाह, मुदा भाव छलनि—खचड़ै करै छह! हमरा नाँगट क’क’ राखि देलह आ आबो पुछै छह...जाह, तोरा कहियो चैन सँ नइँ रहि हेतह!... अंकुरक छाती पर जे दाग अछि, तेहन-तेहन अनेक दाग सँ एहि लेखकक गत्र-गत्र दागबाक आकांक्षी पंडित समाज आ विज्ञ आलोचक लोकनि लग निश्चये अंकुरक सवालक कोनो उत्तर नइँ हेतनि। सुभद्राक तामस आ ओकर नजरिक दापक दाग सेहो हुनका लोकनिक आत्मा पर साइत नहिए बुझाइत हेतनि!... मुदा सुधी पाठक, दलित समाज सँ आगाँ आबि रहल नवयुवक लोकनि आ स्त्रीगण लोकनिक नव पीढ़ी जरूर एकर उत्तर तकबाक प्रयास करत, से हमरा विश्वास अछि। —गौरीनाथ 01 सितम्बर, 2012 २ "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे -"सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे -आयोजक छथि श्री अरविन्द ठाकुर --"सगर राति दीप जरय"क पहिल चरणमे बहुत रास घुसपैठिया घुसि गेल रहथि आ ई अपन मूल उद्देश्यसँ दूर भऽ गेल छल। -लोक भरि राति सुतैत रहथि, जातिवादिताक स्वर सोझाँ आबि गेल छल, लॉबी बना कऽ होइत समीक्षा आ ब्राह्मणवादी-आमंत्रण धरि गप पहुँचि गेल छल। साहित्य अकादेमीक हस्तक्षेपसँ मामला आर गरबड़ा गेल। ७५म सगर राति दीप जरयमे पटनामे किछु गोटे द्वारा शराब पीलापर धनाकर ठाकुर विरोध सेहो प्रकट केलन्हि। तकर बाद ओहीमेसँ किछु गोटे ऐ गोष्ठीकेँ दिल्ली लऽ गेला, मुदा विभिन्न कारणसँ आ साहित्य अकादेमीक दवाबपर मैथिली पोथी प्रदर्शनी नै लगाओल जा सकल, कारण आयोजक तकर अनुमति नै देलन्हि, ऐ साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीकेँ ७६म -"सगर राति दीप जरय"क मान्यता नै देल जा सकल (ओना किछु ब्राह्मणवादी कथाकार आ घुसपैठिया लोकनि एकरा ७६म सगर राति दीप जरय कहि रहल छथि!!) । ७६म -"सगर राति दीप जरय"क आयोजन विभा रानी द्वारा चेन्नैमे भेल जतए मात्र एकटा कथाकार पहुँचला। कियो माला नै उठेलनि आ सगर राति दीप जरयक पहिल चरणक दुखद अन्त भऽ गेल। --"सगर राति दीप जरय"केँ फेरसँ जियेबाक प्रयत्नक स्वागत कएल जा रहल अछि। "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ केँ "किरण जयन्ती"क अवसरपर आयोजित भऽ रहल अछि। आशा अछि जे ई नव "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय पुनः अपन ओइ पथपर आगाँ बढ़त, जे प्रभास कु. चौधरी ऐ लेल सोचने छला। ३ समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL/ ३ नवम्बरकेँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद, ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति आ मैथिलीमे प्रेमक गीतपर भेल बहस -भारतीय भाषा महोत्सव  २ नवम्बरकेँ प्रारम्भ भेल- -ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक जीवनपर आधारित "उगना रे" पर कथक नृत्यांगना शोभना नारायणक नृत्य लोककेँ मंत्रमुग्ध केलक -समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL/ - ३ नवम्बरकेँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद, ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति आ मैथिलीमे प्रेमक गीतपर भेल बहस -बहसमे भाग लेलनि उदय नारायण सिंह नचिकेता, देवशंकर नवीन, विभा रानी आ गजेन्द्र ठाकुर; आ मोडेरेटर रहथि अरविन्द दास -आकाशवाणी दरभंगा, हिन्दी अखबार सभक दरभंगा संस्करण, सी.आइ.आइ.एल. , साहित्य अकादेमी, नेशनल बुक ट्रस्ट आ अंतिका- मिथिला दर्शन, जखन-तखन केर लेखकक प्रोफाइल, विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ विद्यापति पर्व केनिहार चेतना समितिक पत्रिका घर बाहर, झारखण्ड सनेस आ जातिवादी रंगमंचक नाटकक शब्दावली आदि, ऐ सभ द्वारा मैथिली साहित्यकेँ ब्राह्मणवादी बनेबाक प्रयासक विरुद्ध गएर-ब्राह्मणवादी समानान्तर धाराक चर्च गजेन्द्र ठाकुर द्वारा भेल -ज्योतिरीश्वर पूर्व गएर ब्राह्मण विद्यापति आ ज्योतिरीश्वरक पश्चात बला कट्टर संस्कृत-अवहट्ठ बला विद्यापतिक बीच अन्तर गजेन्द्र ठाकुर रेखांकित केलन्हि पूनम मण्डल वि‍देह वि‍चार गोष्‍ठी एक झलक- आकाशवाणी दरभंगाक जातिवादी प्रवृत्तिक विरोधमे आ दसटा घोर जातिवादी परिवारक मैथिलीकेँ मारैक षडयन्त्रमे आकाशवाणी दरभंगा द्वारा देल जा रहल सहयोगक विरोधमे "विदेह गोष्ठी- सह कवि सम्मेलन" ७ अक्टूबर २०१२, स्थान, अशर्फी दास साहु-समाज महि‍ला इण्टर महावि‍द्यालय, निर्मली, सुपौल मे सम्पन्न भेल। लोकमे अपार उत्साह देखल गेल। ई तथ्य सोझाँ मे आएल जे मैथिलीक पहिल जनकवि आ मैथिलीक भिखारी ठाकुरकेँ सेहो डेढ़ साल पहिने फॉर्म भरबाओल गेलन्हि मुदा आकाशवाणी दरभंगा द्वारा कोनो सूचना तकर बाद नै देल गेलन्हि। ओ कहलन्हि जे  आकाशवाणी दरभंगा बाहर देबालपर "झारू" साटि देबाक मोन होइए। आकाशवाणी दरभंगा मैथिलीक जातिवादी रंगमंच आ साहित्यक प्रसारक आ प्रचारक बनि कऽ रहि गेल अछि। ि‍नर्मली/सुपौल- स्‍थानीय अशर्फी दास, साहु-समाज र्इ. महि‍ला महावि‍द्यालय परि‍सरमे दि‍नांक 7 अक्‍टूबरकेँ दुपहर 2 बजेसँ संध्‍या 6:30 बजे धरि‍ कवि‍, कथाकार, गीतकार, अल्हा गौनि‍हार, रसनचौकी बजेनि‍हार इत्‍यादि‍क संग-संग अनेक श्रोता सबहक जमघट कसबामे दलमलि‍त केलक। आकाशवाणी दरभंगाक जाति‍वादी प्रवृत्ति‍क वि‍रोधमे आ दसटा जाति‍वादी परि‍वारक मैथि‍लीकेँ मारैक षडयंत्रमे आकाशवाणी दरभंगा द्वारा देल जा रहल सहयोगक वि‍राधमे वि‍देह वि‍चार गोष्‍ठी सह कवि‍ सम्मेलन सुसम्‍पन्न भेल। कवि‍ राजदेव मण्‍डलक अध्‍यक्षतामे आ पवन कुमार साह एवं दुर्गानन्‍द मण्‍डल जीक मंचसंचालनमे पहि‍ल आ दोसर दुनू सत्रक अर्थात् वि‍चार गोष्‍ठी आ काव्‍य गोष्‍ठीक समापन भेल जेकर संयोजक रहथि‍ उमेश मण्‍डल। एहेन पहि‍ल बेर देखल गेल जे मि‍थि‍लाक कला-संस्‍कृतिक‍ हराएल प्रेमी अपन-अपन वि‍चार खुलि‍ कऽ रहखलनि‍। जेकर दू-टुक वि‍वरण ऐ तरहेँ अछि‍- शंभू सौरभजी- “हक-अधि‍कार आ कर्तव्‍यक संग लड़ाइ लड़ू तखन जे खोजि‍ रहल छि‍ऐ ओकर प्राप्‍ति‍ अवस्‍स हएत।” वीरेन्‍द्र कुमार यादव- “अपनामे एकता हेबाक चाही। तखने अधि‍कारक प्राप्‍ति‍ भऽ सकत। ओइ वर्गक लोक अपना सभकेँ सदि‍योसँ ठकि‍ रहल अछि‍।” रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’- “अपना संग भेल दरभंगा रेडि‍यो स्‍टेशनक फुसलाओल कथा वि‍स्‍तारसँ सुनेलन्‍हि‍।” राहुल कुमार साहु- “अपने सभ एकता करू आ हम सभटा-युवा क्रांति‍कारी अहाँ सबहक संग छी। अधि‍कार प्राप्‍ति‍ करबाक लेल जे करए पड़तै हम सभ संग रहब।” राम वि‍लास साहु- “मात्र सात प्रति‍शत लोक मैथि‍ली वि‍कासक हेतु अर्थात मि‍थि‍लाक साहि‍त्‍यि‍क वि‍कासमे जे कोनो सरकारी वा गैर सरकारी संस्था सभ अछि‍ तइपर कब्‍जा केने अछि‍। जे बि‍लकुल अनुचि‍त अछि‍, अनुचि‍त ई जे तखन तँ समुचि‍त वि‍कास तँ नै हएत। जखन कि‍ सामुहि‍क वि‍कास आवश्‍यक अछि‍।” मनोज कुमार साहु कहलनि‍- “अपने सभ अपन लेखनीक तागति‍केँ आओर बढ़ाउ आ तखन अधि‍कार प्राप्‍ति‍क लेल संघर्ष करू सफलता अवस्‍स भेटत, ई हमर शुभकामना।” कपि‍लेश्वर राउत कहलनि‍- “दरभंगा रेडि‍यो स्‍टेशनक जाति‍वादी बेवस्‍था अवि‍लम्‍ब हटबाक चाही। वास्‍तवमे तखने  मि‍थि‍लाक वि‍कास हएत। जगदीश प्रसाद मण्‍डलकेँ जे टैगोर लि‍टरेचर अवार्ड भेटलनि‍, जे मैथि‍ली लेल पहि‍ल अछि‍; से समाचार नहि‍येँ कोनो दैनिक अखबार (दरभंगा-मधुबनीक)मे छपल आ ने आकाशवाणीयेमे समाचार-प्रसारि‍त भेल। जे बहुत कि‍छु कहि‍ रहल अछि‍।” नंद वि‍लास राय- “मैथि‍लीक नामपर जे कोनो फंड सरकार द्वारा देल जाइए ओ मात्र मुट्ठी भरि‍ लोकक बीच रहि‍ जाइए। माने तेकर फैदा खाली दस प्रति‍शत ब्राह्मणेटा उठबैए। आेतबे नै, चौक-चौराहापर मि‍थि‍लाक मान-प्रति‍ष्‍ठा मात्र भोजनेकेँ कहैत रहैए।” कृष्‍ण राम कहलनि‍- “समाजकेँ खण्‍ड-खण्‍ड कऽ वर्णवादी बेवस्‍थाक तहत बाभन सभ बाँटि‍ कऽ बेवसाय कऽ रहल अछि‍।” हेम नारायण साहु‍- “मात्र मुट्ठी भरि‍ लोक अपन आधि‍पत्‍य कायम केने अछि‍ आ एमहुरका लोक सभकेँ गप-गप दऽ दऽ आ पूजा-पाठ करा कऽ आर्थिक आ मानसि‍क लूट करैत रहल अछि‍। ओ सभ रूपैयाक लेल जे-नै-सेहो कऽ सकैए आ कऽ रहल अछि‍।” राम प्रवेश मण्‍डल- “हम सभ जगबाक प्रयास कऽ रहल छी आ बूझू जे जागि‍ गेल छी। आब नि‍श्चि‍त अपन अधि‍कारकेँ पाबि‍ लेब।” वीपीन कुमार कर्ण- “जहि‍ना माताकेँ सम्‍मान हेबाक चाही तहि‍ना मैथि‍लीकेँ सेहो। एते दि‍न अपना सभ बूझू जे भाषाकेँ भरना लगा देने रहि‍ऐ आब ओ छोड़बैक समए आबि‍ गेल अछि‍। कथनी आ करनीमे अंतर खाली नै हेबाक चाही।” उमेश पासवान- “बाभन सभ मैथि‍लीकेँ कद्दै जकाँ धेने अछि‍। लेकि‍न आब हमरा सभ छोड़बै नै ढावक जकाँ दौग कऽ जेबै आ छोड़ा लेबै। खाली अपना सभमे एकता हेबाक चाही।” श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल- “कि‍छुये लोकक ई कि‍रदानी अछि‍ जे मात्र बोलि‍येपर काज चला रहल अछि‍। देखबै जे मक्कै खेतमे ऊचका मचान बना कऽ नेंगराे-लुल्‍हाकेँ ओइपर बैसा‍ बजबबैत रहैए जे “हैआ आबए दे,  के छि‍अँ रौ, अखने देखा दइ छि‍औ, रूक....।” अर्थात् टि‍टकारी दैत रहल छथि‍। मात्र एक धक्का देबाक जरूरति‍ अछि‍। परि‍णाम सामने आबि‍ जाएत आ समाजक वि‍कासक असली आ बुनि‍यादी रास्‍ता सबहक सोझामे आबि‍ जाएत मि‍थि‍लाक चि‍न्‍तन पंचदोवोपासनाक रहल अछि‍। कोनो साधारण चि‍ंतन नै।” नाटककार बेचन ठाकुर- “कि‍छुए लोक मैथि‍लीकेँ बपौती सम्‍पति‍ बूझि‍ शब्‍दजालमे फसा कऽ लूट कऽ रहल अछि‍। जे हर बहए से खढ़ खाए आ बकरी खाए अचार।” उमेश मण्‍डल- “ब्राह्मणोमे सभ ब्राह्मण ऐ खेलमे शामील नै छथि‍ मात्र पाँचसँ दस प्रति‍शत लोक ई कारनामा मैथि‍लीक संग कऽ रहल छथि‍। अोहुँमे माने ब्राह्मणोमे वंचि‍त साहि‍त्‍य-प्रेमी सभ्‍ा छथि‍। खाली ऐ पेंचकेँ बुझबाक अछि‍ आ तइपर धक्का लगेबाक अछि‍। मणि‍पद्मम आ हरि‍मोहन झाक साहि‍त्‍यक अखन तक जे मूयांकण भेल से संबंधि‍त वि‍चारधाक पहि‍चान छी...‍।” अच्‍छेलाल शास्‍त्री कहलनि‍- “संगठन हेबाक चाही तखने अधि‍कारक प्राप्‍ति‍ भऽ सकत; ऐ जगमे के नै जनैए बाभनक कारनामा।” कवि‍ उपेन्‍द्र नारायण अनुपम- “लक्ष्‍यपर पहुँचि‍ रहल छी आ पहुँचबे करब।” संचालक द्वय श्री पवन कुमार साह आ दुर्गानंद मण्‍डल- “मंच संचालनक क्रममे अपन उद्गार व्‍यक्‍त करैत कहलनि‍, एहेन-एहेन वि‍चार गोष्‍ठी मासे-मास हेबाक चाही। मि‍थि‍लाक वि‍कासक बाधापर बहुत रास जाति‍वादी मुद्दा अछि‍ जेकरा जँ साहि‍त्‍यकार-वि‍द्वान नै बुझताह तँ के....?” अध्‍यक्ष राजदेव मण्‍डल- “सम्‍बन्धि‍त वि‍षयपर अर्थात् ‘आकाशवाणी दरभंगाक जातिवादी प्रवृत्तिक विरोधमे आ दसटा घोर जातिवादी परिवारक मैथिलीकेँ मारैक षड्यन्त्रमे आकाशवाणी दरभंगा द्वारा देल जा रहल सहयोगक विरोधमे’ सभ वक्‍ताक वक्‍तव्‍य सुनलौं। ऐपर सामुहि‍क वि‍चार करैत वैधानि‍क तरि‍कासँ डेग उठाएब आवश्‍यक अछि‍। वि‍कासक क्रम तखने सोझराएत। नै तँ....!!!!! कवि‍ सम्‍मेलनक एक झलक- प्रेम आदि‍त्‍य कुमार- उपेदसात्‍मक कवि‍तक पाठ केलनि‍। वीपीन कुमार कर्ण- भारत ि‍नर्माण केना भऽ रहल अछि‍ आ केना हेबाक चाही तकरा उजागर करैत कवि‍ताक पाठ केलनि‍। शंभू सौरभ- लोक गीत सुना दर्शक दीर्घाक लोट-पोटक स्‍थि‍ति‍ बनौलनि‍। गुरु जीक चि‍त्र हुनक कवि‍तामे देखल गेल। रामदेव प्र. झारूदार- प्रदूषणसँ मुक्‍ति‍ लेल वृक्षा-रोपन कार्यक्रमपर बल दैत कवि‍ताक पाठ केलनि‍। दुगानंद ठाकुर- वर्षा कतए चलि‍ गेल...। तइ कारण फसि‍लक केहेन दुर्गति‍ भऽ गेल...। अपना कवि‍ताक माध्‍यमसँ रखलनि‍। कवि‍ उमेश पासवान- कतए हरा गेल छी यौ भाय सभ; कतए हरा गेल छी।’ कहैत भाव-वि‍ह्वल भऽ गेलाह। कवि‍ नंद वि‍लास राय- बेटी वि‍आहमे कतेक समस्‍या उत्पन्न होइए तेकर नीक चि‍त्र अपना कवि‍ताक माध्‍यमे रखलनि‍। पलल्‍वी कुमारी- जगदीश प्रसाद मण्‍डल लि‍खि‍त गीतांजलिक साभार करैत जुग-जुग आस लगेने मैइये शीत रौद चटैत एलौं... गीत गौलनि‍। अच्‍छेलाल शास्‍त्री- घर-घरमे दुख अछि पसरल‍, ऐ दुखमे केना लुटनाहार लूटि‍ रहल अछि‍ तेकर चि‍त्रण केलनि‍। बेचन ठाकुर- अखुनका समैक वि‍चि‍त्रताक वर्णक अपना कवि‍ताक माध्‍यमे केलथि‍। हेम नारायण साहु- हि‍नक कवि‍तामे केहेन-केहेन जुलुम भऽ रहल अछि‍ तकर साफ-नि‍च्‍छल चि‍त्र आएल। राम वि‍लास साहु- रौदीक वर्णक करैत सामाजक आडम्‍बरी सबहक चि‍त्रांकण केलनि‍। कवि‍ कपि‍लेश्‍वर राउत, राजदेव मण्‍डल, जगदीश प्रसाद मण्‍डल, पवन कुमार साह, दुर्गानन्‍द मण्‍डल इत्‍यादि‍ अनेको कवि‍ अपन-अपन नूतन कवि‍ताक पाठ केलनि‍। मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल) मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग दोसर परिच्छेद ऋष्यश्रृङ्क जन्मक वृतान्त महाकाव्य, पुराण आ दोसर पुरना ग्रंथक निर्मल जलमे प्रक्षेपक शैवाल जाल कम नै अछि। प्रक्षेपमे संकलित पुराकथाक तात्विक नीर क्षीर विवेचन निष्पक्ष प्रबुद्ध वर्ग कऽ सकैत अछि। महाभारतक वनपर्वक 110 केर ई वृतांत विश्वसनीय भऽ सकैत अछि जे महर्षि विभाण्डक मृगिसँ संभोग केने छल। कतेक परवर्ती ऋषिकेँ लऽ कऽ एहेन चर्चा अछि। ऋषि दम सेहो मृगिक संग संभोग केने छल। मृगवेशमे अप्पन कनियाक संग रतिक्रीड़ा करैत एकटा ऋषि पांडुक द्वारा वध कऽ देल गेल छल, आदि। (आदि पर्व 118) मुदा, नहि तँ ई विश्वसनीय अछि आ नहिये कोनो चिकित्साशास्त्रक आधार पर तथ्यपरक अछि जे कोनो मृगिक पेटसँ मनुखक शिशु जन्म लेने अछि। ऋष्यश्रृंङ्ग केँ लऽ कऽ कतेक आधारहीन लोकोक्ति प्रचलित अछि।  कतेक कथामे हुनका मृगिक पेटसँ जन्मल मनुखक नेनाक रूपमे देखाएल गेल अछि, जे पूरा तरहे भ्रामक अछि। महाभारत (शांतिपर्व 296) सँ ज्ञात होइत अछि जे वशिष्ठ, ऋष्यश्रृङ्ग, कश्यप, वेद, तांड, कृपाचार्य, कक्षिवत, कमठ, यवक्रीत, द्रोणाचार्य, आयु, मतंग, दत्त, द्रुमद, मात्स्य आदि ऋषि अशुद्ध योनीमे जन्म लऽ कऽ तपस्या कऽ मूल पिताक वर्णमे पहँुचल। ऐसँ ई स्पष्ट अछि जे ऐ सभ ऋषिक माय आर्येतर आ ब्रााह्णेतर  स्त्री छली। तइसँ हुनका अशुद्ध योनि कहल गेल। मुदा कर्मक सिद्धांतक अनुसार, ओ ऋषि अप्पन कठोर तपस्या आ साधनाक बल पर अप्पन पिताक कोटिमे पहुँचल। ई स्मरण रहबाक चाही जे स्त्री योनीक बिना मनुखक संततिक उत्पति असंभव अछि। पुरना भारतक संस्कृतिमे आत्मसात आ समन्वयक प्रवृत्ति एत्ते प्रबल छल जे तहियौका दूटा आदिम समूह आर्य आ अनार्यक परवर्ती जुग मे ऐ तरहेँ परस्पर समन्वय भऽ गेल जे ओ अप्पन गुणक कर्मक अनुसार चारि वर्णमे बँटि गेल। पूर्व वैदिक कालमे आठ तरहक विवाह नै छल। ई उत्तरकालक देन अछि, जे सूत्रकाल धरि आबैत-आबैत पूरा तरहे संगठित भऽ गेल छल। तहियौका समाज विवाहक सभ रूप केर मान्यता देने छल। स्थापना उत्तर वैदिक कालमे बड़ प्रचलित छल आ ऐ समन्व्यवादी प्रवृत्तिक प्रवर्तक दूरदर्शी ऋषिगण छल। ई भारतीय समाजक उत्कर्षक द्योतक छल। महर्षि विभाण्डक उत्तर वैदिककालक ऋषि छल। कोनो संदेड नै जे हुनकर स्त्री आर्येत्तर नारी छल। हुनका गर्भसँ एकटा प्रखर शिशुक जन्म भेल जे ऋष्यश्रृङ्गक नामसँ विख्यात भेल अछि। “भागवत दर्शन"क मुताबिक, विभाण्डक  त्यागी, तपस्वी, संयमी आ स्वाध्याय-परायण छल। एक दिन पोखरिमे ठाढ़ भऽ कऽ मुनि तप कऽ रहल छल। ओइ काल स्वर्गसँ उतरि कऽ उर्वशी ओतए नहाबै लेल आएल। हुनकर अनुपम रूप लावण्य देखि कऽ मुनिक मन विचलित भऽ गेल। ओ अपलक ओइ अप्सराक सौंदर्य देखैत रहल। अनजानमे हुनकर वीर्य स्खलित भऽ गेल। ओइ काल आश्रममे पलय बला एकटा हिरणी जल पीबय लेल आएल छल। ओ जलक संग ओइ अमोघ वीर्यकेँ सेहो पीब लेलक। ओ गर्भवती भऽ गेल। ओकर उदरसँ महामुनि ऋष्यश्रृङ्क जन्म भेल।1 कहल जाइत अछि जे ओ साधारण हिरणी नै छल। पूर्व कालमे ओ एकटा देवकन्या छल। कोनो पुण्यात्मा राजाकेँ देखि कऽ ओ हिरणी जकाँ अप्पन पैघ-पैघ आँखिसँ राजाक अनुराग पाबैक लेल हुनक विलोक कऽ रहल छल। ब्राह्माजी कन्याक ऐ अविनय व्यवहारकेँ देखि कऽ तमसा कऽ शाप दऽ कऽ मृत्य लोकक हिरणी बना देलक। शापमे आगू ई व्यवस्था देल गेल जे ओकर उदरसँ यशस्वी ऋषिक जन्म हएत, तखन ओ शापसँ मुक्त भऽ जाएत। वएह देवकन्या एतए हिरणी बनि कऽ रहए लागल। ओ अप्पन शापक खत्म हेबाक प्रतीक्षा करैत रहल। एक दिन उर्वशी ओम्हरसँ निकलल। जखन ओ अप्पन सखीकेँ हिरणीक रूपमे देखलक तँ ओइपर ओकरा बड़ रास दया आबि गेलै। ओ सोचए लागल जे कोन तरहेँ ओकर उदरमे ऋषिक शुक्राणु पहुँचए। ओइ काल पोखरिमे तपस्यारत विभाण्डक ऋषिपर उर्वशीक दृष्टि पड़ल। ओ लज्जा भरल भावकेँ देखाबैत पोखरिमे उतरल आ नहाबैक बहानासँ अप्पन समूचा अंगकेँ अनावृत करए लागल।2 विधिक विधान, मुनिक दृष्टि हुनकापर पड़ल। ओ कामातुर भऽ उठल आ हुनकर वीर्य स्खलित भऽ गेल। मृगी ओकरा पीब गेल आ एकटा पुत्रकेँ जन्म दऽ कऽ स्वर्ग सिधारि गेलि। मुनि विभाण्डक ओइ नेनाकेँ गो दूध पिया कऽ पालन-पोषण करए लागल। महाभारत आ श्रीमद्भागवतमे, विभाण्डक आश्रममे शापित देवकन्या मृगीक उदरसँ ऋष्यश्रृङ्गक जन्मक उल्लेख अछि।3 आजुक काल मे आदिवासी लोकमे पशुक नाम पर ओकर गोत्र जानल जाइत अछि, जेना डुंगडुंग (माछ), कच्छप (कछुआ), हांसदा (हंस) आदि। ओइ तरहेँ ऋष्यश्रृङ्गक मां मृग गोत्रीय आर्येतर कन्या छल। ओ एकटा रूपवती छल उर्वशी तरहे। तइसँ पुराणकार हुनका उर्वशीक सखिक तरहे उल्लेख केने छल। ऋष्यश्रृंगक मां केँ एकटा हिरण हेबाक एकटा मिथक अछि। ओ अयोनिज संस्कृतिमे जन्म लऽ कऽ ओकर नैसर्गिक गुण व रूप सौष्ठवक परिचायक छल। ओकर नाम मृगम्बदा छल। ओ रूपवती कन्या आषाढ़ पूर्णिमाक दिन एकटा महान शिशु केँ जन्म देलक जे संपूर्ण आर्यावर्तक तत्कालीन इतिहासकेँ एकटा नब धारा प्रदान कऽ गरिमा युक्त कऽ देलक।4 वाल्मीकि रामायणमे महर्षि कश्यपक पुत्र विभाण्डक आ महर्षि विभाण्डक पुत्र सुप्रसिद्ध मुनि ऋष्यश्रृङ्ग भेला।5 शास्त्रक गहन अनुशीलनसँ एहन लागैत अछि जे ऋष्यश्रृङ्ग अप्पन पिताक संग वनमे रहैत छल आ वनमे हुनकर लालन-पालन भेल छल। कोनो पुरनका महाकाव्य, काव्य वा पौराणिक ग्रंथमे हुनकर माँक उल्लेख नै भेटैत अछि। प्राचीन आख्यानमे योनिज आ अयोनिज, ऐ दू तरहक जातक उल्लेख भेटैत अछि। योनि शब्दक अर्थ मूलत: “घर" होइत अछि आ पुरान ग्रंथमे ऐ अर्थमे एकर प्रयोग भेटैत अछि।6 जिनकर जन्म घरमे नै भेल अछि, ओ अयोनिज संतान अछि। सीता, शकुंतला, द्रौपदी आदि अप्पन माता-पिताक अयोनिज संतान अछि। यज्ञभूमि मे 'वामदेव्यव्रत" केर उत्पन्न नेना सेहो ओइ कोटिमे आबैत अछि। जइ नेनाक जन्म अप्पन घरमे भेल ओ योनिज कहाबैत अछि। हम्मर विचारसँ ऋष्यश्रृंङ्ग अप्पन पिताक योनिज आैरस संतान छल। जन्मक पश्चात ऋषि अप्पन नेनाकेँ आर्येतर माँ सँ अलग कऽ विद्याध्ययन केर अप्पन तपोस्थलीमे राखलक। एकटा दोसर वृतान्तक मुताबिक, शिशुकेँ जन्म दऽ कऽ माँ स्वर्ग सिधार गेलि। तइसँ पिता विभाण्डक अपना लग राखि कऽ शिशुक लालन-पालन आ सभटा संस्कार देलक। महर्षि विभाण्डक ब्राह्माक मानस पुत्र मरीचिक वंश परंपरामे परम तेजस्वी आ वेद केर प्रकांड पंडित छल। महर्षि व्यास एकर वर्णन एना केने अछि, मरीचिॅ मानसस्य जज्ञे तस्यापि कश्यप:। मश्यपात्काश्यप: जात: तस्य सुतो विभाण्डक: ऋष्यश्रृङ्ग  तस्य पुत्रास्ति।।7 महर्षि विभाण्डक पुत्र ऋष्यश्रृङ्गक छह बरखक आयुमे उपनयन संस्कार करा कऽ यज्ञोपवीत धारण करौलक आ वेद विधिसँ वेदारंभ संस्कार कऽ गायत्री मंत्र प्रदान केलक। ब्राह्मचर्य धारण करा कऽ ब्राह्मचारी कठिन व्रत, तप, स्वाध्याय, प्रात: सायं गायत्री जप आदि कराबैत वेदक अध्ययन करौलक।8 (जारी...) किशन कारीगर घोटालाबला पाइ (हास्य कविता) ई पोटरी त हमरा सँ उठने नहि उठि रहल अछि कनेक अहूँ जोड़ लगा दिय भाई ई छी घोटालावला पाई। हम पूछलियन ई की छी ओ हमरा कान में कहलनि कोयला बेचलाहा सभटा रुपैया हम एही पुत्री में रखने छि . हमरा सात पुस्त लोकक गुजर एही रुप्पैया स चली जायत हम धरती में पैर नहीं रोपाब आई इ छि घोटालावला पाई। चुपेचाप थोड़ेक अहूँ लिय मुदा केकरो सँ कहबई नहि भाई सरकारी संपित हम केलियई राई-छाई इ छि घोटालावला पाई। कोयला भूखंडक बाँट-बखरा दुआरे मंत्रिमंडल के सर्जरी भेल लोक हो-हल्ला केलक मुदा कोयला दलाली के नफ्फा हमरे ता भेल। फेर मंत्री पद भेटैत की नहि? ताहि दुआरे चुपेचाप पोटरी बनेलौहं सभटा अपने नाम केने छि भाई ई छी घोटालावला पाई। देखावटी दुआरे सरकारी खजाना  पर बड़का-बड़का ताला लटकने छि मुदा राति होएते देरी हमीह भेष बदली खजाना लूटि लैत छी। मंत्रीजी के कहल के नहि मानत? सरकारी मामला में कियक किछु बाजत? चुपेचाप सभटा काज होयत छैक औ भाई ई छी घोटालावला पाई। अजीत मिश्र दीआबाती दी न-हीन हो वा धनवान आ शा भरल सभे जहान बा ट-घाटमे  गर्दमिशान ती रभुक्तिमे भरल महान। प कबान सङ हाथ मखान र ङ्ग-रङ्गकेर पाबि समान ब लिहारी एहि परब जुगाइन। म ङ्गल चहु, मिथिला महान हा थ माथ पर सभे जहान न त-मति हमसभ, हे भगवान। श्याम दरिहरे ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा ओबामा हंगामा हंगामा हंगामा जीतल ओबामा हारल अछि मेकन हारि गेल पालिन आ जीति गेल बैदन अमेरिका तऽ सहजे सुकराती नचैए दुनियाक लोक सेहो फगुआ गबैेए गोरकीक उपर करीक्कीक भाव बढ़ल व्हाइट हाउसक कुर्सी पर बलैकमैनक दाव लहल उजरत इराक नइ फनकत इरान नइ डूबत ने बैंक कोनो एआइजी की लेहमैन दुनियामे समताक डंका पिटायत लादेनके मानवसऽ इरखा मिटायत फूटत ने बम कतउ मरत ने लोक कतउ सस्तेमे तेल आ सस्तेमे गैस भेटत मड़रके बेटा आब नैनो चलायत सुकनीक देहमे एन्जलीना फुलायत चिबायब ने रोटी चाभब आब कूकी गंगाक बदला पेप्सीएमे नहायब गेनमाक बेटीके चान पर पठाएब बुधना आब घोंघाक माला ने पहिरत गीधना ने कहिओ भैंसी चरायत चन्डेभाइ किनि लेता जीन्स आ टी शर्ट भौजी के परसुए हालीउड घुमायब।

थीर रहू धीर धरू मोन भरमाउ नइ पानिएमे माछ अछि कुट्टी लुटाउ नइ कइओबेर अब्दुल्ला अछि नाचल अनठीया बिआहमे हरबड़मे खेयाली पुलाव बरकाउ नइ देखल छथि काटर आ देखले छथि क्लिंटन देखि लेलहुँ बुश देखलहुँ हुनकर फुस्स ओबामाक दीआमे तेल कते राखल अछि ओकरे ता अटकर लगाबऽ तऽ दीअऽ नवे अछि घोड़ा परेखऽ तऽ दीअऽ खाइए कते आ बहैए कते दुलकी चलैए की सरपट भगैए सम्हारत इरान की सुतारत पाकिस्तान कोरिया खेहारत की चीन परतारत काबुल बचायत की पछारत गऽ रूस की लेने देने पड़ि जायत हरो पालो थुस्स। मिहिर झा विदागरी विदागरी समेटल इयादक चित्र चलचित्र मिज्झर होइत भावनाक ओस अटकल गाल पर थरथराइत  शब्द स्पर्श सँ पूर्ण अंदेशा अनंत सूनपन केँ शांत हएत समुद्रक आवाज श्याम अरुण रुकल मिहिर झा गजल सारंगीक तार पर जेना फिरैत उँगरी जूता पर टकुआ संग छै चलैत उँगरी

देश बनल कूडा डिब्बा फैलल सौंसे गंध कौखन एम्पायर जेकाँ छै उठैत उँगरी अंग अंग कानि उपर आनि सेहो भरल लंकाक छोट रहितो छैक तनैत उँगरी

छौड लपेट माछ के निकबैत आ तरैत पिठाड सों सामा चकेबा के ढोरैत उँगरी 

छैक गाम अलग कुल परिवारो अलग  हृदय मिलबै छै सिंदूर करैत उँगरी पंकज चौधरी (नवलश्री)- चारिटा गजल गजल १ सभ मात-पिता केर शौख-सेहन्ता बौआ करता नाम मगन  जुआनिक  माया  नगरी  बौआ मनसुख राम बाबू-पित्ती घरक धरणि थम्हने छथि बनिकऽ खाम संतति  कर्मसँ  देह  नुकौने  करम केने अछि बाम बाबुक  अरजल  पर  में  फूटानी  माटि लगै नै चाम जँ अपना कन्हा हऽर पड़ल तऽ जय-जय सीता-राम अनतह  शोणित  सुखा  रहल  आ  घर  बहै  नै घाम बबुआनी  केर  अजबहिं  सनकी  बैरी भऽ गेल गाम ईरखे  नान्गैर  कटबै  लै जे  तेजलक मिथिला धाम परदेसक   माया  ओझरायल  घूमि  रहल  छै  झाम अपना  आँगन  सोन  छोड़ि सभ अनकर बीछी ताम घर छोड़ि घुर - मुड़िया खेलक  कहिया लागत थाम मोल  बुझै  नहि  भावक  भाषा भाव पूछए नहि दाम चलु  रहब  माँ   मैथिल  आँगन  नेह  बहै जहि ठाम "नवल"  निवेदन मैथिल जनसँ छोडू नै मिथिलाम छै  पागक शोभा  माथे पर  आ  चरणहि नीक खराम *आखर-२० २ बौआ केर छटिहारक राति मिथिला-विधिए नियारल काजर शुभग - सिनेहक ठोप करिकबा  मौसी हाथक पाड़ल काजर नवरातिक अहि शुभ - बेलामे अबै अष्टमिक राति डेराओन माय अपन संतति सभके  तैं आंखि दुनु चोपकारल काजर अन्हरिया  राति  अमावस  केर ई दीप - पुंज मुंह दूशि रहल राति दिवालिक लेसलहुं  टेमी तंत्र - मन्त्र उपचारल काजर कते  सुहन्गर  स्वप्न सजोने कजरायल आँखिक पेपनी पर बरसाति - पंचमी - मधुश्रावनि नवकनिया के धारल काजर नव - यौवन के नव - तरंग इ  "नवल" मोन भसियेबे करतै गोर - गोर चन्ना सन मुंह पर  सजनी कियै लेभारल काजर *आखर-२४ ३ सजनी रहि - रहि टेमी बारी भरि  कजरौटा  काजर पारी थोपि रहल छी  काजर सौंसे ओहिना  मादक नयना भारी आंखिसँ आँखिक फेरम-फेरी जेना  होय  मऊहक़ के थारी देह  रहल आ  प्राण  बिलेलै नयन - वाण सँ जिबते मारी करिया आँखिक पोखरि कात स्वपन  सेहन्ता  केर बैसारी कहू छोडि इ  आँखिक अमृत पीब कियैक  हम दारु - तारी मोन के जीतैऽ जे  तकरा पर "नवल" कियै ने जीवन हारी *आखर-११ ४ ई प्रश्न जे उठल  आब  बाबुक बाद के भऽ गेल कान ठाढ़ सभ दऽर-दियाद के उपजा के बेरमे तऽ हांसू पिजा रहल अहि खेतमे मुदा देत पाइन-खाद के ममरी तऽ खागेलै सभ लुझि-लपटि कऽ जे पेईनमे बंचल छै  से पीत गाद  के बाँटि-चुटि सभकिछु बखरा लगा लिय सहतैक  ई  अनेरे  बरदिक  लाद  के गीजल जे पाईके ओ भीजत की नोरसँ वानर की जानऽ गेल आदक सुआद के भतबऽरी के प्रथा ई चलल गामे-गाम कहतै समाद के  आ सुनतै समाद के करेजसँ  नञि ओ "नवल" पेटसँ छलै संबंध  केर  गंध  उड़ल  संग पाद  के *आखर-१५ बिन्देश्वर ठाकुर, धनुषा नेपाल, हाल; कतार बिन्देश्वर ठाकुर, धनुषा, नेपाल। हाल- कतार। अभागलमे शुभकामना एक 

अपने क्याम्पक एकान्त कुनामे  आकाशमे चमकैत तारासन  अबैए सपनाक ज्वारभाटा सभ हमरा मन मस्तिस्कमे आ गिजबैए  हमर जवानी आ भावना सभकेँ।।१।। 

बिगत साल जकाँ एहिबेर सेहो  चाहनाक डालापर हिम पहिर चलि गेल  समा चकेबाक गीत सुनऽ लेल  ई कान बहिर भेल? बहिनक समा फोड़ब  सेहो अधूरा रहि गेल।।२।। 

याद अबैए एखनो चूड़ा, दही, अचार  बहिन संग बिताएल समा-चकेबाक साँझ मुदा बिछड़लकऽ पीड़ासँ  मन दुखि रहल अछि  तन पाइक रहल अछि ।।३।।  हमरे सन बहुत लोकनि  बंचित छी चास प्रवासमे  ओ सम्पूर्ण अभागलमे  से हमर शुभकामना । ।।४।। अस्पतालक हाल  जनकपुरक अञ्चल अस्पताल  बनल अछि एक पैघ सबाल  समयमे जौँ नै ध्यान देबै तँ रुप इहो लऽ लेत बिकराल ।।१।। 

अव्यवस्थापन देखल  ऐ संस्थाक दोसर खराबी  नै भविष्यक प्रवाह अछि ककरो  करए सब अपन मनमानी ।।२।। 

स्वार्थक विष पीने सभ सेवक  नै लागए मन उपकारमे  रोगी ऐठाम खूनसँ लतपत  मुदा ओ ब्यस्त क्लिनिक संसारमे ।।३।। 

देशक सर्वोच्च जनशक्ति छी तँ  ऐ बातपर ध्यान धरी  रोगीक लेल भगवान बनब तँ  अपन कर्तब्यक बोध करी ।।४।। 

आबो दु:ख, पीड़ा जनताकेँ बुझब  इहे मनमे आस अछि  समय समयमे अस्पतालो टेबब  अटूट जनविश्वास अछि ।।५।। जनकपुरक रेल्वे  जनकपुरक रेल्वे स्टेसन  बनल अछि एक बज्र बिशेषण  जीर्ण अवस्थाक मर्म तँ जरुरी सेहो टालल दोसर सेसन। 

नेपालक एक मात्र रेल यातायात  सेहो बनल विश्वासघात  जनकपुरसँ निकलल गाड़ी  पटरी छोड़लक बिचे बाट। 

बौआ पुछलनि माए कहू  ई ट्रेन कहिया धरि चलत  माए बजलनि सुनु बौआ  कुर्सीक खेल जखन धरि चलत। 

घिचाघिच-मिचामिच छोड़िते  स्वर्ग भऽ जाएत अपन देश  समान विकास सभ ठाम हएत  नै रहत कोनो उलझन विशेष। 

रेल्बे आ ई रेलक चाट  बड पैघ समस्या छैक  निवेदन हमर सम्बन्धित सँ  जल्दी ऐपर ध्यान देबैक। एक एहनो नारी

चाही उनका स्ट्यान्डर्ड खाना  तित नै कि मिठ-मिठ खाना खर्च करऽ मे कनियो कम नै बस देखब सर्कस सिनेमा । 

भोरे उठि अबै छी जखने आर्थिक श्रोतक आधारपर  पिछुवारेसँ चुपे निकलल  सोपिङ करऽ बजारपर । 

नयाँ डिजाइनक सड़ी चाही अभिनेत्री सन गहना यौ  बात हिनकर छनि छुछे करु  कि करियै हम बहिना यै।

नव युक्तिसँ नव प्रेमी संग  प्रेमक नाटक थिक हिनकर काम  फँसलनि जे यिनका फेरामे  भागलाह ऐठाम बदनाम । 

पहिनेक नारी एही मिथिलाके  सहनशील कतेक सुशील छलीह आजुक नारी भौतिकवादमे  मैथिलानीक गुण बिसरि गेलीह। 

की हएत हमरा मिथिलाकेँ  नारी जौँ पथ छोड़ि देतीह  जीवनकेँ दू रथ होइ छै  बिन नारी कोना चलतीह। गजल 

मध्य राइत सपनामे हम नेपाल गेल छलौं छठिमे परिवार सङे बड खुशी भेल छलौं । ठकुवा भुसबा आरो सब किछु लऽ गेल छलौं  फठकाकेँ झोरा मुदा घरही बिसरि गेल छलौं। 

माए, बाबु, बहिन, भाइ कन्या छलीह साथमे  छोट छोट बातपर तैयो रुइठ गेल छलौं । 

प्रसाद खाइत काल निन्द खुलल जखने  अपने बिस्तरपर कतारमे सुतल छलौं । 

बिपदामे हएत साचे मजा करती साथी  धत् हम तँ बेकारमे सपनामे गेल छलौं । २ एखन धरि पैसा कमेलौं कि नै यै? खातामे पैसा पठेलौं कि नै यै? घरक स्थिति भाड़मे जाए मुदा  हमरा लेल हसुली बनेलौं कि नै यै?

फुसक घर हमरा काटऽ छुटैए  शहरमे बिल्डिङ बनेलौं कि नै यै?

फाटल पहिरु अहाँ ताहिसँ गम नै  हमरा लेल चुनरी लएलौं कि नै यै?

बहुते कमाइ छी बुधनाकेँ कहब हमरा लेल हिस्सा लगेलौं कि नै यै? गीत १ अनारसन छिटकल अहाँक जवानी  मदहोस देहियापर लाखो परेसानी  रस टपटप जेना पाकल अरनेबा  एकटा अदापर अछि दुनियाँ दिवाना। पायल बजा दिल घायल कएलौं  बिन बादल बर्षा करै छी  आबि आगू कोरामे बैसू   गाल दिअ कनी दाँत कटै छी। 

दिल तोड़ब अपराध छिऐक  दिल जोड़ब नै अछि कोनो पाप  बदनमे चोली आ कमरमे लहङा  चाही तँ अहाँ दिअ नाप। 

बड नीक लगै छी साड़ी अथबा  सुटो जखन लगबै छी  चाल चली अहाँ हिरनी जैसन  दिल हमर धड़कबै छी। 

२ बाल अहाँक रेशम रेशम  टमाटर जेहन गाल अछि  ओठ जेना स्वीट ललीपप  आ रुपो कतेक बबाल अछि। देख अहाँकेँ जिस्म सराबी  बढैत अछि हमर बेताबी  एकबेर बस प्रेम करऽ दी  नै हएत अहाँकेँ कोइ खराबी। 

दिल अहाँक निठुर सोना  चान्दी सन चमकैत मन  उपरसँ पिताएब बेसी  मुदा भीतरसँ नम्बर वन। 

जरुरी चीज जीवनमे चाही  अहाँ ओ बजार छी  सेब, सन्तोला,अंगूर आ  अहीं हमर अनार छी। 

हीरा, मोती, धन-दौलत  अहीं डोली कहार छी  बिन जीवन अन्हार अहाँकेँ  अहीं खुशीक बहार छी। चेतना 

स्वार्थ-स्वार्थसँ भरल संसार  छिनए सबके सब अधिकार  अपन स्वाभिमान बचएबाक हेतु करे लाखो अत्याचार।।१।। 

की कहु दुनियाँक रीत  किछु नै समझमे आबैए  अपन झूठ शान सौगात ला  मिथ्या दोस लगबैए।।२।। 

मानव भऽ मानवता भुलब  ई केहन अनैतिक बात कहू  नैतिक पतन,अस्तित्वमे दाग लऽ  आब कथीक पश्चताप कहू।।३।। 

अपील सुनु धधकैत इनसान  अपनही जैसन सबके मान  स्वार्थ बिना जौँ जिन्दगी टेबब  निश्चित बनत देश महान।।४।। अमित मिश्र भगवती गीत राति सुनहरी,उगल इजोरीया ,चक-मक चमकत चान यौ भऽ कऽ शेर सबार एथिन मैया हमरो गाम यौ कार्तिक एनिन  गणपति एथिन ,संगमे सब बहिनियाँ एथिन ललका चुनरी शोभैत हेतै ,रूपसँ मनमोहिनी हेथिन-2 सब मिल करबै हमहू-2बारम्बार प्रणाम यौ भऽ कऽ शेर सबार . . . . . . . निमियाँकेँ छाँवमे अम्बे ,बनौथिन अपन डेरा यौ गीतो हेतै झालियो बाजतै ,और बाजतै नगाड़ा यौ-2 झूमऽ लागथिन मैया भवानी-2 संग-संग सगरो गाम यौ भऽ कऽ शेर सबार . . . . . . कष्ट सबहक दूर करथिन ,करथिन नैया पार यौ अरहुल फूलक माला बनाबू ,चलू अम्बे द्वार यौ-2 अन्तमे जयकारा लगाबू-2 लऽ दुर्गाकेँ नाम यौ भऽ कऽ शेर सबार एथिन मैया हमरो गाम यौ-6 २ गजल

उठि कऽ बैसल मरदबा एखनी कुच्छो होतै की  छै समय ई भोरका एखनी कुच्छो होतै की साँप दू मूँहाँ भरल छै सगर घरमे की करबै बीनपर कठफोड़बा एखनी कुच्छो होतै की

नोट हमरे लोककेँ संग हमरे थानेदारो देश हमरे चोरबा एखनी कुच्छो होतै की

बाण चललै कोन देखू करेजा छलनी भेलै घावमे छल नेहिया एखनी कुच्छो होतै की

चान धरि पहुचल मनुख आब तारापर चलि जेतै  काल्हि घर ओतै मुदा एखनी कुच्छो होतै की

पाँति किनको छै गजल हमर भेलै ई कर्मक फल बादमे लिखबै कता एखनी कुच्छो होतै की

2122-2122-1222-222 अच्‍छे लाल शास्‍त्री पि‍ताक नाओं स्‍व. बि‍लट यादव गाम- सोनवर्षा कवि‍ता- कि‍सानक भेल पि‍सान देखू सभ जन महग भेल समान जखन सभसँ सस्‍ता बि‍कैत धान। कि‍यो अछि‍ चलैत चि‍बबैत पान जखन अखन कि‍सान भेल पि‍सान। खेल करैत अछि‍, बीचक दलाल तेजगर चक्कूसँ करैत हलाल। अछि‍ भड़ैत दूनू जेबीमे माल हाल देखि‍ रहल छी सालक साल। ठोकि‍ रहल अछि‍ सभ समस्‍या ताल सभ दि‍न कि‍सानकेँ बजरल ताल। नै कहैत कि‍यो कि‍नको हाल कहि‍यो दाही अछि‍ कहि‍यो अकाल। नै एकता जाधरि‍ कि‍सानक भेल चलैत रहत ताधरि‍ एहने खेल। कृषि‍ लागतपर हुअए उचि‍त दाम खुशी हुअए सभ लोक गामक गाम। जखन कि‍सानपर अछि‍ देशक ताज सभसँ कमजोर कि‍एक हुनक अबाज। सरकारकेँ चाही वि‍शेष धि‍यान सभ बात जानि‍ रहला भगवान। २ आबो चेत चलू जहन हम मनुख बनि‍ एलौं ऋृषि‍-मुनि‍क देशमे ति‍याग तपस्‍या दान परोपकार उद्देश्‍यमे। अखनो नै बाजू सूनू देखू कोनो झूठ असत्‍य अत्‍याचार तोड़ि‍ रहल सत्‍यक घूठ। देखलौं न्‍यालय-कचहरीमे झूठक बेवहार राखि‍ मि‍लान केहेन करैत एहेन वि‍चार। स्‍वदेशीसँ स्‍वदेशी टाका कमा रहल अछि‍ देशक जन-धन प्रगति‍क क्षण सभ गमा रहल अछि‍। कानून देशक नै मालि‍क जानि‍ रहल अछि‍ गलती करैत चलती धरैत फानि‍ रहल अछि‍। अंग्रेज भागि‍ गेल मुदा रहि‍ गेल बनल डगर पूर्खाक कृति‍ धूमि‍ल भेल सगर गाम-नगर। स्‍वदेश प्रेम नै जि‍नका ओ बनलाह दलाल नमक हराम देशक देशकेँ करैत हलाल। कानून जानि‍ मानि‍ प्रगति‍ करैत चलू देसमे जहन हम मनुख बनि‍ ेएलौं ऋृषि‍-मुनि‍क देशमे। जगदानन्द झा मनु, ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 1.कविता - उगैत सूरज पएर पसारि उगैत सूरज पएर पसारि धरतीक आँगनमे एलै लाल रंगक ओढ़नी एकर हरीयर खेतमे छिरएलै कोंढ़ी सभ मूरी हिला कए पंखुड़ीकेँ फैलेलक नचि-नचि कए नैन्हेंटा भोंडा खुशीकेँ नाच दखेलक लए संग अपन साजि बरयाति खुशी ओ संग अनने अछि संग एकरे उठल चिड़ै सभ आर मनुख सभ जगैत अछि माए सभ आँचरमे भरि कए नेनापर अमृत बरसेलै उगैत सूरज पएर पसारि धरतीक आँगनमे एलै बरदकेँ संग लए हरबाहा कन्हापर लादि हर आएल गाए महीषकेँ रोमि चरबाहा धरतीक आँगनमे बहि आएल छोट छोट हाथसँ नेना डोड़ी पकैर बकरीकेँ अनलक माथ पर ल' क' ढाकी खुरपी घसबाहीन झुमति निकलल एहन सुन्नर मनभाबक दृश्य भोरका कएलक उगैत सूरजकेँ तँ देखू केहएन सुन्नर दुनियाँ बनेलक । उगैत सूरज पएर पसारि धरतीक आँगनमे एलै । ****************************** गजल १ जीवन कखन तक छैक नै बुझलक कियो कखनो करेजक गप्प   नै जनलक कियो भेटल तँ जीवनमे सुखक संगी बहुत देखैत दुखमे आँखि नै तकलक कियो दुखकेँ अपन बेसी बुझै किछु लोक सभ भेलै जँ दोसरकेँ तँ नै सुनलक कियो सदिखन रहल भागैत सभ काजे अपन आनक नोर घुइरो कs नै बिछ्लक कियो जीवन तँ अछि जीवैत 'मनु' सभ एतए मइरो कs जे जीवैत नै बनलक कियो (बहरे- रजज, 2212 तीन-तीन बेर सभ पांतिमे) *********************************************** २ जखन खगता सभसँ बेसी तखन ओ मुँह मोड़ि लेलनि जानि आफत छोरि हमरा सुखसँ नाता जोड़ि लेलनि देखि चकमक रंग सभतरि ओहिमे बहि ओ तँ गेली जानि खखड़ी ओ हमर हँसिते करेजा कोड़ि लेलनि बन्द केने हम मनोरथ अप्पन सदिखन चूप रहलहुँ पाञ्च बरखे आबि देख फेर सपना तोड़ि लेलनि दुखसँ अप्पन अधिक दोसरकेँ सुखक चिन्ता कएने आँखि जे फूटै दुनू तैँ एक अप्पन फोड़ि लेलनि चलक सप्पत संग लेलहुँ जीवनक जतराक पथपर मेघ दुखकेँ देखते ओ संग 'मनु'केँ छोड़ि लेलनि (बहरे - रमल, मात्रा क्रम- 2122 चारि-चारि बेर सभ पांतिमे) ******************************************************** ३ किए तीर नजरिसँ अहाँकेँ चलैए  हँसी ई तँ घाएल हमरा करैए 

मधुर बाजि खन-खन पएरक पजनियाँ  हमर मोन रहि रहि कए डोलबैए   

छ्लकए हबामे अहाँकेँ खुजल लट  कतेको तँ  दाँतेसँ   आङुर कटैए ससरि जे जए जखन आँचर अहाँकेँ जिला भरि  करेजाक धड़कन रुकैए अहीँकेँ तँ मुँह देखि जीबैत 'मनु' अछि बिना संग नै साँस मिसियो चलैए (बहरे - मुतकारिब, मात्रा क्रम -122-122-122-122) *************************************************** ४ रहब आब नै दास बनि हम अपन नीक इतिहास जनि हम

जखन ठानलहुँ हम अपनपर समुद्रो लएलहुँ तँ सनि हम

उठा मांथ जतएसँ तकलहुँ दएलहुँ  तँ नक्षत्र गनि हम

हलाहल दुनीयाँक पीने चलै छी अपन मोन तनि हम

जमल खून मारलक धधरा लएलहुँ विजय विश्व ठनि  हम

(बहरे मुतकारिब, मात्रा क्रम-१२२) ५ जेना जेना राति बीतल जाइए तेना तेना देह धीपल जाइए जुल्मी संगे संग रहितो हे सखी नहिए हुनकर मोन जीतल जाइए योवनमे पुरबा बसातक जोड़ छै साबरिया बिनु नै त' जीबल जाइए डूबल निनमे सगर दुनिया छै जखन बीया प्रेमक एत' छीटल जाइए भोरे उठिते प्रेम बोरल 'मनु' छलौं लाजे मरि मुह आब तीतल जाइए (मात्राक्रम -222-2212-2212) ६ तेल बिनु जेना निशठ टेमी धएने बिनु पिया जीवन बितत कोना अएने

बरख बरखसँ हम तुसारी पूजने छी बुझब की सुख साँझ पाबनि बिनु कएने 

छै धिया सुख की बुझब कोना धिया बिनु  भ्रूण हत्यारा बुझत की बिनु पएने

मोल जीवनमे हमर बाबूक की अछि  मोन बुझलक छन्नमे हुनका गएने

रंग बदलति देखलौं  सभकेँ हँसीमे  देखि 'मनु' दुनियाँक रहलौं मुँह बएने

(बहरे रमल, २१२२-२१२२-२१२२) ७ जकर मोनक रावण नै मरलै राम आजुक कोना ओ बनलै डशल साँपक पइनो मंगै छै डशल मनुखक कनिको नै कनलै गेल आँगन घर सभ पलटै छै मोन भेटत कोना जे जड़लै हाथ रखने सभतरि भस्मासुर निकलितो साउध बाहर डड़लै छोड़ि ढेपापर चुगला 'मनु'केँ शहर दिस नेन्ना भुटका भगलै (मात्राक्रम-२१२२-२२-२२२) ८ सुरशाक मुँह बेएने महगाइ मारलक  बरख-बरख पर पाबि  बधाइ मारलक 

छलहुँ भने बड़ नीक  बिन बन्हले कतेक  गोर-नार कनियाँ संगक सगाइ मारलक 

झूठक रंगमे डूबि जीबितहुँ कतेक दिन  रंग ह्टैत देरी झूठक बड़ाइ मारलक 

सुधि बिसरि कए सभटा निसामे बहेलहुँ  दिन राति पीया कए गाम गमाइ मारलक 

भौतिक सुखमे डूबल 'मनु' सगरो दुनियाँ जतए ततए फरजीकेँ उघाइ मारलक     

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१७) ९ जे हँसी हमर सुनलहुँ अहाँ दर्दकेँ नै तँ बुझलहुँ अहाँ   दाँतकेँ बीचमे जीभ सन मोनमे अपन मुनलहुँ अहाँ

प्रेमकेँ नै किए चिन्हलहुँ देख मुह हमर घुमलहुँ अहाँ   

स्नेह आ प्रेम सभटा बिसरि मोनकेँ तोरि झुमलहुँ अहाँ

हाथ संगे खुशीकेँ पकरि हृदय मनुकेँ तँ खुनलहुँ अहाँ (बहरे मुतदारिक, २१२-२१२-२१२) १० अनकोसँ सम्बन्ध जोड़ाबै छै पाइ छोटकाकेँ बड्डका बनाबै छै पाइ फूसियो बिकाइ छै मोलेमे आइ तँ सतकेँ सभतरि नुकाबै छै पाइ ज्ञानक कनिको मोले नहि रहल प्रवचन सभटा सुनाबै छै पाइ नहि माए बाबू नहि भाइ बहिन दुनियाँमे सभकेँ कनाबै छै पाइ चिन्हार नै अनचिन्हार एहिठाम 'मनु' आइ सभकेँ हँसाबै छै पाइ (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३) ११ सभकियो दुनियाँमे किएक आँखि चोराबै छैक माँगि नहि लिए कियो तेँ सभकिछु नुकाबै छैक गरीबी भेलैक बहुते केहन ई व्यबस्था छैक गरीबी नहि सरकार गरीबेकेँ मेटाबै छैक साउस भेली सरदार गलती नहि हुनकर जतए ततए किएक पुतोहुकेँ जड़ाबै छैक जतेक दर्द बेटामे  बेटीयोमे ओतबे सभकेँ बेटा बिकाइ किएक बेटीकेँ सभ हटाबै छैक दुनियाँक रीत  एहन 'मनु'केँ नै सोहाइ छैक रहए जे खोपड़ीमे सभक घर बनाबै  छैक (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८) कैलास दास

कम्प्यूटर हमर काम अनेक अछि करैत नहि छी करबैै छी सभ क्षेत्र मे हम अबै छी । हम कम्प्यूटर छी

हम नहि झुठ बजैत छी बजबै तऽ पुछैत छी । करबै तऽ करैत छी । सभ क्षेत्र मे हम अबै छी ।

निरक्षर हम दोस्त नहि नहि जनने हमरा लोक बुझैत नहि अछि कामक हमर अन्त्य नहि अछि हम कम्प्यूटर छी

हम हँसबए आ खेलबय छी गेम फिल्म सभ देखबै छी । सभहक प्रोबल्म सोल्भ करैत छी हम कम्प्यूटर छी

तेल, मोविल हमर आहार नहि भाई वहिन आ साथीसँ सरोकार नहि परिश्रम हमर बाट अछि हमर नाम कम्प्युटर अछि

बिजुली पर हम चलैत छी ओकरा बिना हम मरल छी हम सभ क्षेत्रमे अबै छी हम कम्प्यूटर छी

हमर जे स्नेह करैत अछि ओकरा हम सभचिज दैत छी जे हमरा सँ दूरी रखैत अछि ओकरा हमहँु दूरे रखैत छी नेता जी हम देशक रक्षक छी हमरा सँ किछु सीखू देश रक्षा कोना करबै हमरा सँ ई पुछू।।

देश द्रोहीसँ सावधान रहू देशक रक्षाक लेल कुर्वान रहू लोभ लालच सँ सावधान रहू अपन विधान पर अड़ल रहू

भ्रष्टाचारसँ दूर रहू देशक झण्डाक शान राखू। मातृ भूमिक ऊँच्चा नाम करु देश रक्षाक लागि कुर्वान रहू।

अपन देशसँ प्रेम करु विदेशीसँ न्यारा रहू हरदम एक आवाज उठाउ देश रक्षाक लागि कुर्वान रहू

नेता जीक ई भाषण सुनालक बाद जनता लोकनि

जनता सभ लालच मे आएल मतदान दऽकऽ सेहो जितौलक खुशी खुशी खुशी आ हँसिते हँसिते मारि झगड़ा सेहो मचौलक।

नेता जीतक पद पर आएल अपन रुप रावण सन धएलक मने मने विचार करए के हमरा सँ दुशमनी कएलक।

अब जनताक विनती हे हमर भाग्य विधाता हमर अहाँ शान छी। देशक अहाँ जान छी। हमर अधिकार मिलत तखन अपन आशीर्वाद भेटत जखन

नेता जी कहैत छथि

ओ उपदेश हमर ढंोग छलै भ्रष्टाचारी करबाक समय अएलै नै हम करबै भ्रष्टाचारी कोना बढबए हम अगारी प्रमोद रंगीले मच्छर राज जनकपुर शहर पर करू सभ गाेटे नाज गुलाम बनू मच्छरक यएह अछि काज खुन पिपासु केँ देखू केहन छै अन्दाज सलाम ठोकू सभ गाेटे आबि गेल मच्छर राज पर्यटन दिवस नै , मनाउ मच्छर दिवस मच्छरसँ कटबैबला हाेउ विवश सुनु मच्छर संगीत बन्द करू अावाज सलाम ठोकू सभ गाेटे आबि गेल मच्छर राज

महलमे रहू या बनाउ झाेपडी सहनशीलता नै अछि तँ फोड़ू खाेपड़ी दिन भरिक टेन्सनकेँ अाउर बढाउ, जखन पड़ैए साँझ सलाम ठाेकू सभ गाेटे आबि गेल मच्छर राज

ऐ शहरमे रहै कऽ अछि तँ ई सत्य जानि लिअ ऐ दुखक निवारणा केउ नै करत, बात हमर मानि लिअ हारि मानि कऽ, देवता जानि कऽ पहिराउ ताज सलाम ठोकू सभ गाेटे अाबि गेल मच्छर राज जवाहर लाल कश्यप गीत ऑंखि सँ जे झहरल नोर तकरा सब देखलक, आह मे जे जरि गेल तकरा के देखतै/ मन्जिल जे छुलक, वाह वाह सब केलक/ राह मे जे रहि गेल तकरा के देखतै/ पंख छल छोट मुदा, छुबय आकाश छल/ हिम्मत नहिं हारब, अतेक विश्वाश छल/ जे छुलक आकाश तखरा सब देखलख/ बिच मे जे रहि गेल तकरा के देखतै/ नाव छल छोट मुदा जायब सागर के पार छल छोट पतवार मुदा, साहस अपार छल/ जे पार केलक तखरा सब देखलक/ बिच मे जे डुबि गेल तकरा के देखतै/ कपि‍लेश्वर राउत रौदी रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए चि‍रै-चुनमुनी चुन-चुना माल-जाल सेहो रि‍रि‍आइए माथ पकड़ि‍ मनुषी चि‍चि‍आइए रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए। नहरक बनाबटो अजीबे नहरक पानि‍ अछैत बहैए ऊपरका खेत पानि‍क बि‍ना नि‍चला खेत दहा रहलए रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए। कि‍सानक हालत कि‍यो ने पूछू सभटा धन उपजामे दइए कहि‍यो दाही कहि‍यो रौदी मेहनती कि‍सान तैयो हँसैए रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए। जेकरा हाथमे पानि‍ छै ओकर खेत लह-लहा रहल-ए दाही-रौदीमे जि‍नाइ जे जीलक ओ हरदम चैनसँ जि‍बैए रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए। कर्मयोगी जे बनल ि‍कसान ओ कर्मेकेँ प्रधानता दइए नसाखोरी आ गप-सपसँ रहबला तकर दि‍न अदि‍न होइए रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए। सांख्‍य योगी सुदामा बनली दरि‍द्र जीवन जि‍बैए कर्मयोगी कृष्‍ण बनि‍ कऽ स्‍वाबलम्‍बीकेँ सभ पूजैए रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए। पोथी-पतराक भवि‍ष्‍यवाणी वैज्ञानि‍को तर्क हेरैले रहैए। समए देखि‍ जे सुधरल तकरे सभ गुणगाण गबैए रौदी-दाहीमे वएह जि‍बैए रौदीक मारल सभ रि‍रि‍आइए। ओम प्रकाश गजल १ करेजक बात नै कहियो बनल एतय कियो सुनलक कहाँ मोनक कहल एतय सुखायल गाछकेँ पटबैसँ की हेतै फरत कोना जखन गाछे जरल एतय हँसी कीनैत रहलौं सदिखने ऐठाँ लए छी हम नुका आत्मा मरल एतय लिखलकै भाग्य बिधि सबहक अलग कलमसँ कपारक गप कियो नै पढि सकल एतय गडै पर शूल "ओम"क आह नै निकलै भऽ गेलौं सुन्न काँटे टा गडल एतय बहरे-हजज मफाईलुन (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ) - ३ बेर प्रत्येक पाँतिमे २ आँखिसँ नोर खसाबै छी किया एना मोती अपन लुटाबै छी किया एना खाली बातसँ भेंटत नै किछो एतय तखनो बात बनाबै छी किया एना सुनि बेथा तँ मजा लेबे करत दुनिया बेथा अपन सुनाबै छी किया एना अपने सीबऽ पडत फाटल करेजा ई अनकर आस लगाबै छी किया एना अमृतक घाट तकै छी बिखक पोखरिमे अचरज "ओम" कराबै छी किया एना (दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व) + (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ) + (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ) (मफऊलातु-मफाईलुन-मफाईलुन)- १ बेर प्रत्येक पाँतिमे शिवनाथ  यादव आ अर्चना  कुमारी इन्दिरा आवास इन्दिरा आवासक रुपया सभटा खा गेलै मुखिया, हकन कनै छै गामक दुखिया, सबटा खा गेलै मुखिया। इन्दिरा आवासक रुपया सभटा खा गेलै मुखिया॥ गरीब सभकेँ बुझै छै कुमहरक बतिया, सुनिते सिखाय दै छै जनताकेँ लतिया, घरसँ बेऽघर भेलै दुखिया, सभटा खा गेलै मुखिया। इन्दिरा आवासक रुपया सभटा खा गेलय मुखिया॥ हयौ जनता कतऽ जा करत अपन फरियाद यौ, किरानी चपरासी अफसर एके दियाद यौ, सबहक जालमे ओझरा गेलै दुखिया सभटा खा गेलै मुखिया। इन्दिरा आवासक रुपया सभटा खा गेलै मुखिया॥

बी.डी.ओ. विधायक डी.एम., सी.एम. लऽ गेलै, मुखियाकेँ मोछ कनिको नै टेढ़ भेलै, दौड़धुपमे बिलटि गेलै दुखिया, सभटा खा गेलै मुखिया, इन्दिरा आवासक रुपया सभटा खा गेलै मुखिया॥ हेमनारायण साहु हम छी नीमक गाछ जंगल झार बूझि‍ हमरा छोड़ने छी छी कतेक रोगक-नि‍दान से नै बुझै छी। बड़ गुनगर छी से बूझि‍ लि‍अ नै अछि‍ बि‍सवास तँ अजमाए लि‍अ। हम वातावरणकेँ शुद्ध करै छी अशुद्ध पवनकेँ शुद्ध करै छी। पात पीस कंकलि‍पर लगाउ डारि‍क दत्‍मनि‍सँ पैरि‍या भगाउ। टूसा तोड़ि‍-तोड़ि‍ मुँहमे खाउ पेटक कीड़ाकेँ जड़ि‍सँ भगाउ। फड़ तोड़ि‍ अर्क बनाउ अल्‍लू गाछकेँ पालासँ बचाउ। फड़क आँठीसँ तेल बनाउ बनाए औषधि‍ अनेक रोग भगाउ। बचल सि‍ट्ठीसँ जैवि‍क खाद बनाउ। खेतमे मि‍लाए सोना उपजाउ हम छी नीमक गाछ। डगर-बाटपर लगाउ गाम समाजसँ लऽ कऽ पर्यावरणकेँ नि‍रोग बनाउ। जोन-बोनि‍हार हमर कमाइपर सभ राज करैए हमरे मि‍लि‍ सभ शोषण करैए। अपनामे सभ एक बनल-ए‍ दबलाहा सभकेँ बैरजना बनबैए। जोन-हरबाह बना खटबैए खटबैत-खटबैत पसि‍ना चुबाबैए। उचि‍त बोनि‍ जँ मांगए जाइ छी बि‍नु पौने आपस होइ छी। भऽ जाइ छै अनभुआर जकाँ दौगैए पगलाएल कुकुड़ जकाँ। की दबल छी, दबाएले रहब कतेक दि‍न एना सहैत रहब? धोबि‍या पाट जकाँ पि‍टाइत रहब चक्कीक गहुम जकाँ पि‍साइत रहब? ऐ सबहक कि‍एक ने मोन बदलैए दलि‍त-गरीब दि‍स ने कि‍यो तकैए। हवाक रुखि‍ आब बदलि‍ रहल अछि‍ दलि‍त-पि‍ड़ि‍त सभ जागि‍ रहल अछि‍। सबहक बेटा-बेटी पढ़ि‍ रहल अछि‍ ज्ञानक दि‍या जराए रहल अछि‍। पलटी भऽ जाएत शोषणक चक्का मारत मि‍लि‍ सभ चौका-छक्का। शिव कुमार यादव कविता- ई की भेल

कन्नारोहट भऽरहल छल, भोरे-भोर हमर पड़ोसियाक आगन मे। हूलिमालि मचल छल गाम मे, अपस्याँत लोक, कानैत जनानी सब, सब आबि रहल छल ऐ आंगन मे।

हमहुँ बिछाउन सँ उठि पड़ैलौँ, जा पहुँचलौँ हूलिमालि मचल पड़ोसियाक आंगन। भारी लोक जुटल छल, मौगी-मूनसा आ धीया-पूता। खुसुर-फुसुर गप्प एक-दोसर मरद आ जनानी मे। हमरा किछु नै बुझना जाइत छल!

हम पुछलौँ, फन्ना काका कि भेलए यौ ? कहलक, फन्नाक ननकिरबी आगि सँ झड़कल मरल अछि। हम पुछलौँ, कोना यौ काका? कहलक, ननकिरबीक लहास ओकर सासुर सँ नैहर ऐलएयऽ। हम पुछलौँ, आगि मे कोना झड़कि मरल? कहलक, यएह तँ अखन नै बुझलौँ होउ बौआ।

हम जुटलौँ खोज-खबरि मे, ई कोना भेल? बात पता चलल, सब दहेजक अछि ई खेल।

भरल आंगनक भीड़ केँ चीड़ैत जखन पहूँचलौँ हम, लहास देखि ठाढ़ होमए कऽ हिम्मत नै रहल। खनए मे भीड़ सँ बहरइलौँ नोर टपकाबैत हम।

आंगनक हाल की छल ऐ क्षण, सोचि सकैत छी अहाँ? हमहुँ सोचि मे पड़ि गेलौँ, जे ई की भेल? कि! एखनो ऐ तरहक भऽ सकैए। लोक पढ़ैत-लिखैत छथि आ अपना केँ बुधियारो बूझैत छथि। मुदा? तैयो ऐ तरहक दृश्य देखऽ पड़ैत अछि! देह सिहरि उठल हम्मर, हमरो भगवान बहिन देने छथि।

मरद तँ मरद, जनानियो ऐ तरहक कुकर्म करैत छथि। अपने जनानी भऽ कऽ, एकटा दोसर जनानी केँ जड़ाबैत मारैत छथि। ई गामे टा नै, शहर मे सेहो खूब होइत अछि। अपना केँ सभ्य कहैबला लोक, एना खसि जाइत छथि।

टोल-पड़ोस आ समूचा गाम कानि रहल छल। ई की भेल, ई की कऽ देलक मुचंट दहेजक राक्षस ! जे कहियो ऐ गामक माटि आ आंगन मे, जनम् लेलक, हँसि-बोलि-खेलि नमहर भेल छलि। नवातुरे मे आइ "शिकुया", बीच आंगन मे झड़कल, जड़ल बौक बनि पड़ल अछि।

शिकुया "मैथिल" मिथिला गीत

एक माटिमे जनमल हमसब एक पानिसँ पलल-बढ़ल अखनो धरि अछि पसरल यौ माँ मिथिलेक सर-समाज यौ भलमानुष सुनु-सुनु -2 तै मिथिलाकेँ बिसरि कोना जेबए छै 'मैथिल'क ई निहोरा यौ भलमानुष सुनु-सुनु- 2

अंतरा:- 1. एहि मिथिलामेऽऽऽ  एहि मिथिला मे जनम लेलनि मंडन, अयाची, विद्यापति एहि मिथिलामे रहैत छलथि लोरिक, सलहेस, वाचस्पति सभ केओ संदेस दऽ गेलथि, सभ केओ कत्तर्व्य निबाहि गेलथि ताहि कत्तर्व्यकेँ निबाहि, ताहि संदेस पर चलु-चलु यौ भलमानुष सुनु-सुन----2

2. एहि मिथिला मे ऽऽऽ एहि मिथिला मे गीत सुनाबै कोशी-कमला आ बलान एहि मिथिला मे धार बहैए गंगा-जमुना आ गंडक नित-दिन धारक पानि चलैछ, नवरंगक नव बिचार लबैछ ककरो सँ नहि पानि डरैए, अप्पन बाट बनाबी-बनाबी  यौ भलमानुष सुनु-सुनु---2

माँ मिथिले-------4

3. एहि मिथिला मेऽऽऽ एहि मिथिला मे नै कोनो कमी अछि परब-तीहार आ सनेसक एहि मिथिला मे अछि पसरल कुटुम-सम्बंधी-अपनैती लोक समाज मे रहैत अछि हिलि-मिलि सभ केओ काज करैछ माँ मिथिले केँ आजाद करू, अनकर बाट कि जोहैत-जोहैत यौ भलमानुष सुनु-सुनु---2

शिकुया "मैथिल" शिव कुमार झा "टिल्लू"- सिनेह शंभु सौरभ, पता-गाम- भरवाड़ा, जि‍ला- दरभंगा। गीत चलैत चल चलैत चल पएरसँ पलैत चल तृण, तुषार तृप्‍त कण मृत्‍यु केर अदि‍प्‍त पल। जलैत चल......। मुद्रा अघाएल रहू प्रकृति‍ तत्व धैल रहू भावनाक लोलकीपर चेतना डम्हाएल रहू चलैत चल......। सि‍नेह भरल दृष्‍टि‍ हो स्‍वर्णमयी सृष्‍टि‍ हो कर्ममयी कामना फुलाएल सदा शि‍‍ष्‍ट हो स्‍वाँसमे हो स्‍वर-समर एक गीत, एक स्‍वर घेंटसँ मि‍ला कऽ घेंट वायुसँ मि‍लैत चल। चलैत चल......। बाट अनचि‍न्‍हार छौ सन्‍मुख अन्‍हार छौ बक्र धार चक्र बनि‍ कालचक्र ठाढ़ छौ छोट हृदए खोह छौ वयसो अजोह छौ वि‍षम बाट-घट छैक दौड़ैक बेछोह छौ चि‍न्‍तइ जे जीवनकेँ जीबैले योवनकेँ कर्मक आलोकमे मर्मकेँ छीलैत चल चलैत चल......। मानवता कानि‍-कानि‍ ठोहि‍ पारि‍ रहल मांगि‍ जि‍नगीक मोल रे खोल हृदए द्वारि‍ फानि‍ कान्‍ह परल भार छल मृत्‍युक हँकार छौ हि‍म्‍मतसँ काज ले ले-ऊँच पहाड़ छौ क्षि‍ति‍ज दृष्‍टि‍ हीन छैक कल्‍पना नवीन छैक तोँ प्रवीण यात्री बनि‍ सि‍न्‍धुमे पि‍लैत चल चलैत चल......। राजदेव मण्‍डल चि‍र प्रतीक्षा नीपलौं-पोतलौं घर-दुआर कतेक बेर केलौं झार-बहार अपनो केलौं सोलहो ि‍संगार कऽ रहल छी इंतजार उताहुल भेल मन पि‍आसल अछि‍ तन बि‍तल जाइत क्षण कखन हएत मि‍लन मनमे फुलाइत सुमन नमरले जाइत प्रतीक्षाक क्षण असोथकि‍त भऽ गेल नयन शंि‍कत छी बि‍फल हएत जतन नि‍न्नसँ बन्न भेल आँखि‍क कोर दुखाइत देहक पोरे-पोर मन घेराएल सपनाक शोर अहाँक झलक बुझाएल थोड़बे-थोड़ चौंकि‍ उठलौं नि‍न्न छल घोर नै भेल छल भि‍नसर-भोर पएरक चेन्‍हसँ हम मानि‍ रहल छी अहाँ अाएल छलौं से जानि‍ रहल छी पुन: एकबेर देहकेँ तानि‍ रहल छी बाधाक नि‍न्नकेँ तोड़ि‍-ताड़ि‍ बौआइत सपनाकेँ डाहि‍-जारि‍ खोलि‍ अपन सभ घर-दुआरि‍ चि‍र-प्रतीक्षा तन-मन सम्‍हारि‍। हाथ- हाथ ि‍सर्फ नै अछि‍ हाथ अन्‍हारमे जनमि‍ गेल एेमे नाक, कान, आँखि‍, दाँत इजोतेटा मे नै अन्‍हारोमे रहैत अछि‍ साथ सूँघैत अछि‍ सभ कात जानैत टेब-टेब‍ सभ बात हाथकेँ नै देखैत हाथ देखैत अछि‍ हाथक करामात कतए सँ कते धरि‍ पहुँचल हाथ हाथसँ मि‍लैत हाथ सि‍रजनक साथ भऽ जाइत अछि‍ वि‍ध्‍वंसक बात हाथ तँ अछि‍ हमरे साथ फेर कि‍एक हेतै अधला बात। ठक हम छी ठक नै कोनो शक झूठ गप भख साँचक नै परख शुरूमे ठकलौं घर-परि‍वार आगाँ ठकैत दुनि‍याँ-संसार टका-पैसा हजारक-हजार लगा देलौं सम्‍पति‍क अमार ठकैक आदति‍सँ नचार कतेको कनैत जार-बेजार आइ छूटल पूरा भक जखनि‍ हमर लगल ठक एहेन जीत पार भऽ गेल जि‍नगी बूझू बेमार भऽ गेल सभकेँ एहि‍ना उठैत हेतै दरद आइ हमहूँ करैत छी गरद साँच कतए सँ आब हम पाएब ठकबे करब वा ठका जाएब सोचब कोनो एहेन उपाए ऐ जालसँ बलात् घटना भेलै राति‍ अखने हेतै साइत चौबटि‍यापर पंचायत दोषीपर खसतै जूता-लाति‍ ऊपसँ हेतै जुरमाना लोक मारबे करतै ताना बात बढ़तै तँ जेतै थाना केहेन भऽ गेलै जमाना असगर केना कऽ नि‍कलत लोक राक्षस बैसल दोगे-दोग जेकरा संगे भेलै बलात् कानि‍ रहल अछि‍ भऽ कऽ कात- “एकबेर असगरमे नोचलक गात-गात सबहक सोझा कहए पड़तै वएह बात केना की सभ भेलै हमरा साथ लाज भरल बात केहेन अघात फेर वएह पीड़ा सहए पड़तै खोलि‍-खोलि‍  कहए पड़तै आँखि‍ ने देखै भरल नोर यौ आब कहि‍या हेतै भोर?” झूठक गि‍यान हमहीं देने रही झूठक गि‍यान बालपनमे धऽ लेलक कान हमरे देल अछि‍ ई सीख कखनो झूठ होइ छै ठीक झूठ बाजि‍ बचा लि‍अ जान बढ़ा लि‍अ मान-सम्‍मान घटि‍ गेलै सत्‍यक मान झूठकेँ धऽ लेलक कान करए लगलै झूठक बेपार बदलि‍ गेलै काज बेवहार धऽ लेलकै ओही दि‍न लीख आब केना कहबे ई नै नीक झूठक गबैत यशोगान भऽ गेलै आब ओ जुआन हाथमे लेने तीर कमान खींच लेत आब हमरे जान ओ नै छी कि‍यो आन सोझा ठाढ़ अपने संतान। जेहने अहाँ तेहने हम संगे-संग घुमलौं देश-कोस कतेक वि‍चारि‍ लगेलौं दोस दुनू गोटेमे भरल परेमक जोश खुशी रहत पल छल पूरा भरोस सभ कि‍छु छल एक्के समान दूटा देह एकेटा जान दोस बनबैत कात एतेक वि‍चार दुसमन बनबैत बखत भेलौं लचार नै सोचने छलौं अपना मन जे बनए पड़त आब दुसमन सन वि‍चार कऽ बनाबि‍तौं दुसमन नै जरैत आइ तन-मन दुसमनसँ कहाँ रहलौं कम जेहने ओ तेहने हम केकरोसँ कहाँ कि‍यो कम। इमानदारी इमानदारी बि‍कैत छै बेनाम लाख, करोड़ आ टका-छेदाम सभ रंग दाम सभ रंग नाम जेहने इमानदारी तेहने दाम देहाती दाम शहरी नाम जेहने टका तेहने काम इमान कहै सुनू हमर बोल हमर के लगा सकैत अछि‍ मोल टूटि‍ रहल अछि‍ पुरना खोल सहजहि‍ं फूटत नवका बोल। बेइमानी कठहँसी हँसैत अछि‍ ऊँच आसनपर वएह बसैत अछि‍ ओकरे भेटै आदर सम्‍मान इमानदारी पाबैत अपमान हमहँू नै बचल छी पूरा लगल अछि‍ बेमानीक धूरा खोजलौं ऐ पार-सँ-ओइ पार नै भेटल पूरा इमानदार बजलौं अहाँ बारम्‍बार कहू के अछि‍ इमानदार? बीआ बीआ नै अछि‍ खाली बीआ माटि, पानि‍, हवा प्रकाश सँ मि‍लतै आस छूबि‍ देत अकास आँखि‍ देख रहल अछि‍ साँच बीआ मध्‍य आँकुरक नाच कालकेँ कऽ रहल जाँच अन्‍तरमे बैसल गाछ एक-सँ-अनेक पसरल छेकने जाइत आगाँ ससरल दैत अछि‍ प्राण वायु बढ़ैत अछि‍ सबहक आयु। कि‍छु अछि बेसी कि‍छु अछि‍ कम अहीमे मि‍लल अछि‍ सत-रज-तम। एकरा अन्‍तरमे शक्‍ति‍ अपार जाएत एक दि‍न धरतीक पार बीजक प्रस्‍फोटन अछि‍ सार हरक्षण बनैत नव अाकार। उपयोग हे यौ श्रीमान्, अहाँ छी अदभुत लोग अहीं सँगे पौलौं हमहूँ सुख-भोग भरल-पूरल रहल हमरो घोघ भागल रहल दुखि‍या सोग देखलौं एहेन-एहेन दोग जे हमहूँ भऽ गेलौं बड़का लोग जतए तक पहुँचलौं ठीके नै छलौं ओइ जोग कि‍न्तु आइयो हम वएह छी कहाँ भेलौं नि‍रोग जे छल अपन तेकरो लग बनि‍ गेलौं आब कुलोग। काज पड़ल तँ ला ताकि‍ कऽ नुकाएल छौ कोन दोग भऽ गेल काज तँ हटा तुरत इहए छि‍औ संक्रामक रोग। आइ जनलौं कारण की छलै असली रोग अहाँ करैत रहलौं हरपल हमर उपयोग। (ई कवि‍ता “उपयाेग” श्री गजेन्‍द्र ठाकुरकेँ समर्पित, राजदेव मण्‍डल...) द्वन्द्व अधरति‍या भऽ गेल छै साइत अखने पहुँचलौं बौआइत सुनहट बाड़ीमे कोयलीक तान श्वेत शि‍लापर बैसल अछि‍ चान आधा मुखपर केश-पाश आधापर अछि‍ नोर, नि‍राश तैयो आस-पास छि‍टकि‍ रहल प्रकाश बि‍आहक बन्‍धन तोड़ि‍-ताड़ि‍ घर-पलि‍वारकेँ छोड़ि‍-छाड़ि‍ आएल अपने इच्‍छा कऽ रहल हमर प्रतीक्षा चि‍र प्रति‍क्षि‍त पि‍यासल मन कछ-मछा रहल तन छन-छन केना कऽ राखब मनकेँ सम्‍हारि‍ अन्‍तरमे उठल आन्‍ही-बि‍हाड़ि‍। बढ़ाएब हाथ अहाँ दि‍स लोककेँ उठतै रि‍श खुशीसँ भरत हमर मन दुसमन सभ करत सन-सन आपस घींच लेब हाथ तँ समाज रहत साथ अपने मनसँ हएत लड़ाइ लोक करैत रहत बड़ाइ। बाँहि‍ पसारि‍ बढ़ेलौं हाथ तरेतर घुमि‍ रहल अछि‍ माथ वि‍मूढ भऽ अड़ल छी द्वन्‍दमे पड़ल छी। कुहेस कतौ नै कि‍छु बचल अछि‍ शेष चारूभर पसरल कुहेस कठुआ गेल देह भीजल अछि‍ केश अधभि‍ज्‍जू सन भेल सभटा भेष घुरि‍या रहल छी ठामहि‍-ठाम कि‍यो नै देत अछि‍ समैपर काम टुटल जा रहल सभ आस ऊपरसँ लगि‍ गेल दि‍शाँस कुहेस और भऽ गेल सघन इजोत लगैत अछि‍ टीका सन। खेत-खरि‍हान, घर, जंगल-झार सभटाकेँ गि‍ंर गेल अन्‍हार उनटि‍ गेल अछि‍ जेना माथ छूटि‍ गेल सभ संग-साथ। नै भेटैत अछि‍ बाट नै अपन घाट लगे-लग औनाइत मन भेल उचाट सभ गोटे धऽ लेने छी खाट देखा दि‍अ जाएब कोन बाट। कहि‍या फटत ई कुहेस भेटत अपन घर परि‍वेश हे सुरूज कि‍रि‍णकेँ जगाउ आबो तँ ऐ कुहेसकेँ भगाउ। जानवरक बोली सुनहट बाट अन्‍हार भरल अछि‍ कि‍छो गोंगि‍या रहल देह थरथराइत मन डरल भूत जकाँ के अछि‍ अड़ल सुनमसान अछि‍ चारूभर ने लोग आ ने अछि‍ घर जानवर ठाढ़ अछि‍ आरि‍ ऊपर बाजि‍ रहल अछि‍ भऽ चरफर- “हे यौ, जल्‍दी लग आउ बोली सूनि‍ नै घबराउ कहब आब रहस्‍यक गप बोलीक लेल बड्ड केलौं तप अहाँ देलौं अपन बोली हमर पूरा भेल आसा नै घबराउ हम देब आब अपन भेस-भाषा।” जानवरक मुँहसँ मनुक्‍खक बोली सूनि‍ रहल छी अचरजमे डुमल अपने माथ घूनि‍ रहल छी। नै सुनब तँए कान मुनि‍ रहल छी वि‍कासक क्रमकेँ गुनि‍ रहल छी। डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४, मृगतृष्णा  मे  पानि  तकै  छी मृगतृष्णा  मे  पानि  तकै  छी, कोना  भेटत  से  अँहीं  कहू ? छाँह पकड़बा केर  इच्छा  अछि, कोना भेटत  से  अँहीं  कहू ?? अग्निराशि   पर  खाली  पएरेँ, निःसंशय  भऽ   कोना  चलू ? काँट  भरल  सभ  बाट-घाट मे, बिनु आहत भऽ  कोना चलू ?? रोपल बाँस आ आम आश अछि, फड़त  कोना  से  अँहीं  कहू ? सौंसे  विष  केर  धार   बहइए, अमिय कहाँ  से  अँहीं  कहू ?? राति अन्हरिया,  पुनमि बाद पख, चान भेटत  कोना - कतए कहू ? धारक गति अतिप्रबल  पूब दिशि, जायब  पच्छिम  कोना  कहू ?? आइ  अहाँ  बड़  नीक  लगै  छी जानि   किए   नञि,   आइ  अहाँ  बड़  नीक  लगै  छी । जानि   किए   नञि,   आइ  अहाँ  बड़  दीव  लगै  छी ।। जकर  राग  युग – युग सञो राजित, जकर  बोल  दिक् - दिक् मे भाषित, सरस   सिंगारहि   रस   अनुसिञ्चित,  गीत   लगै   छी । जानि   किए   नञि,   आइ  अहाँ  बड़  नीक  लगै  छी ।। जकर  परस  मरु,  उपवन  साजित, विद्युत - हास - चपल  तव  याचित, जकर   हृदय    प्रीतक   मोती,   से   सीप   लगै   छी । जानि   किए   नञि,   आइ  अहाँ  बड़  नीक  लगै  छी ।। माँझ   जलधि  लघु  द्वीप   समाने, हीरक - द्युति   जनु  कोयला  खाने, जार मास निशिभाग अन्हरिया,  राति प्रकाशित दीप लगै छी । जानि   किए   नञि,   आइ  अहाँ  बड़  नीक  लगै  छी ।। जकर  प्रतिक्षा  युग – युग  कयलहुँ, जनम-मरण कत’  छाड़ि कऽ अयलहुँ, कालक    गति    निर्बाधेँ,    पर   मनमीत   लगै   छी । जानि   किए   नञि,   आइ  अहाँ  बड़  नीक  लगै  छी ।। आइ याद हुनिक बहुते आयल आइ   याद   हुनिक,  बहुते  आयल । कऽ  गेल   मोन,  अतिशय  घायल ।। नञि जानि    कतऽ सँ     कोन  वेग, उड़ितहि – उड़ितहि  एहि ठाँ   आयल । संगहि   अपना,    हुनिकर    मोनक, सन्दर्भ   केहेन,   की – की,  आनल । अछि   अनुनादित    मस्तिष्क – मोन, किछु चंचल सनि, किछु किछु पागल ।। स्मृति   पटल   पर   द्योतित   सनि, छवि  हुनिकहि  सद्यः  अछि  आयल । पवनक  ओ  परस   अनुराग   भरल, जनु प्रीति हुनिक भरि - भरि लाओल । श्रवणहि  ओ  हास  श्रुतिगोचर  थिक, अछि  जकर  मोन अतिशय कायल ।। छी  बैसल  एहि   ठाँ   क्लासहि  मे, पर  मोन तँ  कोसहु  चलि  आयल । लेक्चर   श्रवणहि    श्रुतिगोचर   छी, मन   सन्निकर्ष    हुनिक   पायल । लगइत अछि  जेना  ओ  आइ  एतए, संगहि  तँ  सम्मुख  छथि  आयल ।। मुन्नी कामत सिया तोरे कारण जनक दुलारी सिया सहैत एलौं सभ दरद अहाँ किअए? रानी भऽ वनमे रहलौं पतिक खातिर सभ सुख ति‍यागलाैं पग-पगपर संघर्ष केलौं हर परीक्षामे खड़ा उतरलौं तँ फेर ई समाज नै अहाँकेँ अपनेलक किअए? जइ पति ले सभ किछु अहाँ ति‍यागलौं वएह अहाँकेँ ति‍यागलक किअए? किअए ने विद्रोह अहाँ केलौं नारीक हित ले अवाज उठेलौं। सदखिन सुनै छी हम एक्के बात। जहन सति सीता नै बचलै तँ केना बचतौ तोहर लाज? जौं एगो सीता जे अवाज उठैइतै, तँ फेर कोनो सीता नै परितारित होइतै। चुप रहैक ई सजा मिलैए, कतेक सीता नित वनवास भोगैए। ठिठुराबैत जाड़ एलैए जाड़ लऽ कऽ दुखक पहाड़। केना कटत दिन-राति‍ केना बीतत ई जाड़क कड़ारि‍। उजरल छौइन टुटल अछि टाट नै अछि कोनो ओहार घरक चारू कात अछि बाटे-बाट। पुआरक ओर्हना पुआरेक बिछौना केकरा कहै छै लोग कम्‍मल केना कहै छै होइ छै जाड़ सुहाना। कहियो घरसँ निकलि‍ कऽ देखियो एक राि‍त अतए बिता कऽ देखियो ठिठुइर कऽ मरैए लोग नित कतेक जना। गरिबेकेँ तँ भगवानो मारै छै अगर नै! तँ फेर पत्थरक देह बना किअए नै भेजै छैक। जे ढाहि‍ दइ सरकारक भीखकेँ अनुदानक नाओंपर भेटैत मजाकक इन्‍दि‍रा-अवास आ सरकारी राहत कोषकेँ। बंदिश हाथ-पएर दुनू अछि पर नै चलि पबै छी नै किछु करि पबै छी जुबान अछि पर बउक बनल छी बस आँखि सँ देख रहल छी कान सँ सुनि रहल छी अत्यन्त वेदनाक भट्ठीमे अपन देह झुलसा रहल छी जिंदा लहास बनि जी रहल छी ककरा सँ कही ककरा बुझाबी कि हमहुँ एगो जान छी कही ओइ व्यवस्था सँ कि व्यवस्था बनबैबला लोक सँ कि स्वयंसँ। सहज ई मानि ली कि हम चुप रहै लऽ बाध्य छी किएकि हम लड़की छी। पैसा सँ बियाह कक्का घरमे बाजै बधइया होइ छै बुचिया कऽ बियाह यौ चारि बहिन हमहुँ छी चारू कऽ चारू कुमार यौ। दिन-राति मेहननि करि रोटिये टा कऽ करि पबै छी जोगार यौ छी हम महगाइ आ गरीबी कऽ मारल अछि बाबू हमर किसान यौ। दिदियो कऽ देखै लेल ऐल गाम-गाम सँ कतेक ने बरतुहार यौ पसिन करि खाइयो कऽ गेल सबटा तरूआ आ पान यौ। तइयो अछि हमर दीदी २५ साल सँ कुमार यौ। कहलक सब बरतुहार बिना दहेजक केेना चलत काम यौ हम छी बेटा बाला अपन पैसा खर्चा करि नै करब बियाह यौ। अइ युगमे लड़की सँ नै पैसा सँ होइत अछि बियाह यौ। काँच बाँस जकाँ लचपच उमरिया काँच बाँस जकाँ लचपच उमरिया डगमगैत अछि डेग यौ केना भरब हम गगरी केना चलब डगर यौ। किया जनमलउ अहि धरती पर की छल हमर गुनाह यौ माय-बाबू नीक सँ बाइजो नै पाबलउँ बनलौं अपने हम माय यौ। ज्ञान,पोथियक दुनिया सँ रहलौं जे अनचिनहार यौ की कहब हम की केहन अछि हमर जिनगी भेल पुरे संसार अनहार यौ। मनक वेदना रहि-रहि एगो हुक उठै यऽ सउँसे देह दगद भेल जाइए आब नै बचत मान भऽ रहल छी हम निष्प्राण। जिनगी बनि गेल धुँआ हवा कऽ मलारो सँ कॉंपि उठै यऽ सब रूआ। अछि सब रस्ता अंजान करिया गेेल मनक अरमान कतऽ ठार छी कतऽ जा रहल छी नै अछि हमरा किछो ज्ञान पर बुझैत छी हम अतेक कि जिन्दगीक आखरी सफर लऽ जाइत अछि समसान। शरहद ई शरहद, ई सीमा कथी लऽ? जमीन बॉंटै लऽ! पर जमीनक संगे मन बँटाइत अछि इंसानकेँ इंसानसँ जुदा करैत अछि। हम एक जाति छी मानव जाति! फेर किए नै कोइ ई बुझैत छी जाति-पाति लऽ किए लड़ै छी? शरहद कऽ नाम पर भाइ-भाइ कऽ बाँटै छी धिक्कार अछि हमरा अपन मानवता पर जे अहि शरहदक सीमा मे बैंध गेल छी हमरा सँ नीक तँ ई हवा, पानि आ पक्षी अछि जे स्वतंत्र भऽ अइ छोर सँ ओइ छोर तक अपन दोस्त बनबैत अछि पर हम अइ दिवारक बिच कैद छी जब लगैत अछि जे आब दुरी मिटा जाएत भाइ-भाइ सँ गला मिलत तब ई दिवार आर मजबूत भऽ गगन केँ छुबऽ लगैत अछि आखिर कहिया ई शरहद हटत? कहिया ई मनक दिवार गिरत? हमर अबैबला पीढ़ी यएह दीवार मे कैद रहत? भेल पुरा आस उमरल ऐल देखी कारी मेघ चलि गेल धान पुबरिया खेत। बंजर भूमि आब पनिया जेतै मिटतै आब अपनो दुख सगरे अन्न उझला जेतै। बुच्ची लऽ लब आंगी अनबै तोरा लऽ लव साड़ी अबकी जतरामे निर्मली बजारक खेबै पकौरी। आइ पुबाइर बाध रोपबै काल्हि पछबाड़ि परसू उत्तरबाड़ि आ दक्षिणबाड़ि चारू दिस लहलहेतै खुशहाली सुख-सम्पन्न हम सब भऽ जएब। २ भाइयक स्नेह जब छोट छेलौं तँ कतेक स्नेह करै छल हमरा भइया हमर एगो लोर पर कतेक रूप बदलै छल भइया हाथी घोड़ा भालू बनि कऽ मनबै छल हमरा भइया। पहिलुक कर हमरा खिया कऽ फेर सुगा मैना कऽ हिस्सा सेहो खियाबै छल भइया। पर आब एगो अलगे रूप बदललखिन भइया भिन-भिनौजक खेल खेला रहल छथिन भइया। कतनो कनै छी तइयो नै देखै लऽ अबैए भइया। आब हम नै खेलबै ई खेल रहि नै सकबै भइया करि कऽ बैर भगवान हमरा फेरसँ बच्चा बना दइए हमरा भइया सँ ओ स्नेह मंगा दइए। ३ अलहर मेघ बजबैए मेघ तबला ढोल बरसाबैए पानि टिपिर-टिपिर झनर-झनर राग अनमोल। सन-सन-सन हवा सनसनाय तन-मन केँ ओ थिरकाबैत उड़ि जाए। झमकि कऽ आबैए कारी बादल चुमै लऽ धरतीक चरनकेँ तृप्त भऽ ई अल्हर बादल हँसैत खिलखिलाइत यएह आसमानमे पुनः विलुप्त भऽ जाए। शेफालिका वर्मा- रे मन आइ जीवनक इच्छा बनि बहरायल  निसांस रे मन दिग दिगंत भेल सुरभित  हमर आरती रहल अकम्पित आश उमंग नाचि थाकल नूतन नर्तन मधुर अकल्पित सौरभमय सुमन मौलायल  मुरझायल विश्वास रे मन अग जग शोभा निरखै आली मधु मधु मह मह हँसैत लाली जग पागल कि हमहीं पागल सोची थाकलों काल कराली आइ मानसक ऐ हलचलमे  उर हतास रे मन........... प्रबीण चौधरी प्रतीक देखही रौ मिता देखही रौ मिता एकटा छौड़ी चैन चोराकs चलि गेलै........ ओकर गाल छै गुलाबी ताहि पर तिल एकटा कारी नयन ओकर छै नशीली कए कs हमरा घाइल चलि गेलै देखही रौ मिता एकटा छौडी चैन चोराकs चलि गेलै........ सत्यनारायण झा हे भगवान - हुनका गामक पछिम ,एकटा छैक पोखरि, नाम छैक धोबिया पोखरि | कियो कहै छै, ओकरा धोबिया नामक लोक खुनेलकै , आ कियो कहै छैक ओकरा धोबिया जिन्न खुनेलकै | पोखरि मगर छैक बर गहीर,पातल कोर , कियो थाह नहि पाबि सकलै आइतक | भीड़ बर ऊंच छै , उपर सं देखय मे बर डेरौन लगै छै | चारु महार जंगल छै | ओहि महार पर हुरार रहै छै , ओहि पोखरि मे कियो नहाइत नहि छैक , दिनो मे डर लगै छै, राति मे त’ ओहि मे चुड़ैल नहाइत छैक  एक दिन हमहू चुड़ैल क’ देखने रहियैक , मारैत रहैक चुभकी ओहि मे नग्न भ’ क’ , हमहू डरे भागल रही, ओ पोखरि खुनिया छैक | दिन मे गामक लम्पट लुच्चा ओहि मे वसर करैत छैक, राति मे वैह सभ चोरि ,डकैती करै छै ,राहजनी करै छै, लोक क’ लुटै छै | देसक शासन धोबिया पोखरि छै , लम्पट ,लुच्चा एहि मे नहाइत छै , भ्रष्टाचार चुड़ैल छै ,ओ नंगटे चुभकी मारै छै | भ्रष्टाचारक जरि पातल तक छै , ई शासन अत्याचारी छै , एकरे डरे लोक भगैत छै , एहि मे कतेको हुरार छै , ई लोकक इज्जत लुटैत छै | हमरा गामक पछिम मे आमक गाछी छैक | सकरचुनिया,सिनुरिया ,सीपिया ,जर्दा, रंग विरंगक आम छलै| गाछ सभ छलै बर झमटगर , देखय मे लगै छलै बर सुन्दर | मुदा एकबेर कमला मैयाक मरकी अयलै , गाछ सभ सुखा गेलैक | बचलै मात्र पाँचटा गाछ, मुदा पाँचो उपर सं ठुठ, जेना कियो मुरी काइट नेने होयक | ओकर नाम परि गेलैक पचगछिया , पचगछिया भुताहि भ’ गेलै , भूत जोगिन नाच कर’ लगलै, सद्यः लोक देखै , लोक ओ वाट छोडि देलकै , राति क’ पहलमानो क’ ओमहर पसीना दै | हमर देस फूलक फुलबारी छल , एहि फुलबारी में नाना तरहक फूल छलै , राजेंद्र ,जवाहर ,सरदार फूल फुलायल छलै,  तिलक ,गोखले ,मालवीय गाछ लतरल चतरल छलै , मुदा कोन रोग धेलकै,सभ मरि गेलै , जे बचलै से कटहा फूल छैक , ओ चुभ सं गरि जाइत छैक | गोलाबक फूल तकने नहि भेटैत छैक , कमल फुलायत कोना ,सरोवर सुखायल छै, आब त’ गाछो कोकनले भेटैत छै | देस चलतै कोना,लोक जीतै कोना  मोसकिलक अम्बार छैक ,बतहाक राज छै  हे भगवान आबह तू ,जियाबह हमरा देस क’ , चारुकात कन्नारोहट भ’ रहल छै , चित्कार होइ छै ,वलात्कार होइ छै , सभ हक्कान कनैत छैक , मरै नहि छै मुदा मुर्दा भ’ गेल छै | हे खेवनहार कत’ नुकायल छह , अपन चक्र सुदर्शन उठाबह ,त्रिसूल सं माथ काटह पापी क’ , तोहर संतान ठोहि पारि कानि रहल छह ,चिचिया रहल छह , कहि रहल छह “ हे भगवान “ | आशुतोष मिश्र गीत अहाँ किए अखन एना छी  अखन अहाँ बहुत नेन्ना छी 

माए बापकेँ अहाँ सपना नीक रहब अहाँसँ परिकल्प्ना मोती सँ हम शब्द लिखी  अहाँ ओ हमर पन्ना छी 

अहाँ किए अखन एना छी अखन अहाँ बहुत नेन्ना छी रूबी झा गजल १

आंखि सँ दहs बहs नोर बहै छल ओ कहलेन धुर पानि रहल  आंखि हमर दुहु रंजित भेल केहन कठोर ओ नै जानि रहल श्वांस केर प्रवाहधारा थोड़ भs गेल प्राण नहि बांचल शेष जनु हुनका लेल छल सभ खेल तमाशा हम तरेगन गानि रहल 

गुदरी सिबि सिबि दिवस हम काटी अजीर्ण नुआ देह में छारल  साग पात तोरिकs जे आनलौ नोरे सँ हम ओकरा छानि रहल 

बारह बरख पर ओ एला एक घड़ी छाहों नहि भेटल हमरा  हरिबासर आ तीज सबटा केलौ कठिन ब्रत हम ठानि रहल 

विदीर्ण भs गेल मोन कल्पित भेल काया नोर सँ पोखरि बनि गेल  निर्दयी छलीतs ओ ओरे सँ छथि कथी लेल रूबी अहाँ कानि रहल 

सरल वार्णिक बहर वर्ण -२५ २ आश टूटल भाग फूटल 

आंखि इनहोरे सँ शीतल लेख भाग्यक जनु इहे छल 

ठोढ़ कम्पित मोन तीतल 

मलिन भेलै चान उज्जर 

राहु गरसिकs सौंस बैसल 

छन पलक के खिलल फूलो 

मौलि गेलै पुष्प कोमल 

पेट रूबी नूर बान्हल 

पहर चारू कानि काटल 

२१२२ -२१२२ सभ पांति में 

३ आइ हम बड़ उदास छी नै बुझी किए हतास छी छांह रौद आएत जाएत  लागै किए चैती बतास छी

आंखिसँ निन्न गेल कतए मुहं लगे सुखेल घास छी 

घर में नै नै बाहर चैन  नै निकले उहे भरास छी 

लागि अछि जगसँ विछुब्ध रूबी नेने अहाँ सन्यास छी 

सरल वार्णिक बहर वर्ण -१० शान्तिलक्ष्मी चौधरी जर-जाजन

भरिघर हुलिमालि-हुलास छै ईह, की पिहकारी, हास छै जमाय सुहासिनक जुमरट सारि-सरहोजिक रास छै

आँखिक चलै सतखेल दायकेँ फुटै परास छै जुमटल कुमार-वारक हिनके अखिहास छै

ककरो मचै प्रणय-उधम ककरो प्रेमक उपास छै परदेसी पी केँ प्राण कटै प्रीतक टाटट निसास छै

कुटुम-अतिथी सत्कारमे सभकियो दासम-दास छै अँगनाक तँ छोरू पिहानी दूआरो तेहने उलास छै

किओ चितंग अखरे चौकी कतौ मसलंगक विलास छै किओ टाँग उठौने टिटही अगरल अँगनीक घास छै

किओ धरै बहिनियारैक छौरीकेँ समधिकेँ समधीनक पिआस छै जीवह पपूकका सनक रसिक की गप्प, गप्पठंग, गपास छै

छोटका चौकी दs पानि भरल सेवामे तत्पर खबास छै जनौसँ पीठ कुरियावैत कुटुमक बस जल्दीसँ आबैक आस छै

नहायकेँ समधि मंत्र जापय माथ मे पड़ल तेल-फुलास छै लागल छप्पन-भोग आसन परसल समधिक परिहास छै

हौ लियौ, और लियौ ...मर्र एतै टा लहास छै छल्हिघर-दहि, गुदगर-रसगुल्ला आह, की खुआक सुवास छै

अन्नक छै निसाँ चढ़ल बहैत लेरोक की हवास छै माँछी नै दै कsल लेबै तैयौ नाक बाजेत खरास छै

किनको तलक पान-सुपारिक किनको खैनिक तलास छै किनको खुब चलैल कलक ठंढ पानिक तरास छै

मनोरंजनक समा बान्हल तीन ठाम पसरल तास छै रंग-डबल, गुलाम-पीयर पटक पर उठैत होहास छै

टोले टोल बिजहो भेलय भरिगाँ भोजक हुलास छै कहुना मैया पार लगेथिन मनमे इयह अभिलास छै

बाबा छथिन पतियाल धेनय मन कनै आँहुर-उदास छै जँ भेलय कनियो चौपट सभ खरचक सत्यानास छै

ब्राह्मण-रैजपुत-सोल्हकन खेलकै आब स्त्रीगणक झौंकास छै तखन बचतै करवारीक-घरवै चलु जल्दीये भेटल उगरास छै

किओ कहै जगकेँ थै-थै कतहुँ चुटकी-उपहास छै सर-समाजक काजे कून तैमे मिथिला किछ खास छै दुर्गापूजा

सिमसिम जाड़क हुलकी ओ भोरे केँ सितायब अधिराइते सँ भनभन भिनसरबे केँ जागब

हिंग रसूनक बदही सतसुइया केँ बान्हब नजरि-गुजरिकेँ जन्तर डायन-जोगिनके दागब

फुल चोरीके हो-हो बुढ़ियाक फौती सरापब भगजोगनीक रोसनी आँखिफाड़ि अधकोढ़ी निहारब

लालटेनक भकचोन्ह मिलिजुलि पार्थिब बनायब नेनतुर के भुसभुस ओ दादीक फटकारब

चिकैनि-गोबरौरके धवधव घुरघुराक चालब डेरहीक पिछड़ौन नेनाक जहिंतहिं नहायब

दोहारा तीराक लाली सिंगरहारक गमकब थलकम्मल फुलडाली कनेल-तरक हबगब

बेलपत्र काँटक सिबसिब दुइभक मुरी खोटब बेजन्त्री पत्ता केर गिनती मुरिपत्ता केराक काटब

मायक फिसफिस गौरीमंत्र बहिनदायक आरती गायब बाबा केर सप्तसती श्लोक हनुमानचलिसा एककंठेँ खेहारब

पानक बिचकी खिल्ली कतरा सुपारीकेँ खोंसब पिचकल मखाना पर किर्री ओंकरल मुँगकेँ प्रसादब

कुमारिक नववस्त्रम मुट्ठीमुट्ठी पान चिबायब पायल के झुनमुन नाक धरि सिनुर टघारब

ब्राह्मणक पीड़ही क्षीर-भोजन खायब दहुँदिश खीरक पत्ता निलका-माँछी नाचब

बान्हल बरदक हुरब कुकुर केँ दबारब बिज्जीकेँ कनकटुआ छागरकेँ नाँगरि मोचारब

खेसारिक छिम्मरि घासबोझ पर घोलटब लदहाक झुल्ला पालो पर झुलब

नीलकंठकेँ ढ़ेंपा  बिढ़निकेँ मारब रसचोभीक फुदफुद टिकुलीकेँ शिकारब

लिय आबि गेलीहेँ मैया धीयापुताकेँ खेलाअब आउ आबैजाउ गाम दुर्गापुजा मनायब नंद वि‍लास राय वोट पंचायत चुनावक पकड़ने छल प्रचार-प्रसारक बड्ड जोर सभ चौक-चौराहा पर छल रेडीक अावाजक शोर। बैसल रही हम अपन दलानपर चुनावक सरगर्मी रहए उफानपर ताबति‍मे हमर हरबाहा जकर नाम अछि‍ मंगला देखबा-सुनवामे तँ ओ बुरि‍बक लगैत अछि‍ मुदा अछि‍ बड्ड चंगला। आएल ओ कहलक- “गि‍रहत कनी खैनी दि‍अ।” हम खैनीक डि‍ब्‍बी दैत कहलि‍ऐ- “चुनाबह अपनो खा आ हमराे खुआबह।” ओ खैनी चुनौलक हमरो दि‍स बढ़ौलक हम एक जूम खैनी ढोर तरमे लेलौं। आ पुछलौं- “कहऽ मंगल की छअ समाचार वोट केकरा-केकरा दइले करैत छहक वि‍चार?” ओ बाजल- “की कहू गि‍रहत कि‍नडीडेट सभ ने दि‍न बुझैए ने राति‍ बुझैए आ जखनि‍-तखनि‍ भोट मंगैले चलि‍ अबैए।” हम कहलि‍ऐ- “आन पदक कण्‍डीडेट सभमे तँ करए पड़तह वि‍चार मुदा सरपंचमे मांगनि‍ दि‍आदे छह ठाढ़ आदमि‍यो नीक अछि‍ अनकासँ ठीक अछि‍।” ओ बाजल- “की कहलि‍ऐ गि‍रहत दि‍आद? परसाल हमर बकरी उखरि‍ कऽ ओकर चारि‍टा गाछ खाए लेने रहए कोबी तइले बि‍खनि‍-बि‍खनि‍ कऽ गारि‍ देने रहए हमरा ओकर मौगी ओकर गारि‍क लागल अछि‍ हमरा बड़ चोट हम ओकरा कि‍न्नौं नै देब अपन भोट।” पवन कुमार साह मि‍थि‍ला वासी कहबै छी हम मि‍थि‍ला वासी जेकर नै दुनि‍याँमे जोड़। माथ उठा कऽ, घुमरि‍-घुमरि‍ कऽ कहबै छी हम बड़ बेजोर। पलटि‍ कऽ देखू अपन इति‍हास ने बुझाएत कोनो उपहास। ई ओ माि‍ट अछि‍ जतए भेल पहि‍ले लोकतंत्रक वास। हम बुझै छी, लोकतंत्रमे सभ समान फेर बताउ कि‍एक बनल छी बइमान? जाि‍त-पाति‍क भेद छै, अपनेमे वि‍भेद छै। जाति‍क नाओंपर लेने छी कमान की यहए अछि‍ अपन इमान? एक वाक् एके गाम एक पोसाक एके नाम दरि‍द्र-सम्पन्नक कि‍ काम ऊँच-नीक सभ एक-समान। खाउ सप्‍पत एक बति‍या नै बात हुअए कहि‍यो बसि‍या। एक छी हम छी बेजोड़ नै टुटत कहि‍यो ई जोड़। बिपिन कुमार कर्ण देखु केहेन ई भारत ि‍नर्माण देशक आर्य भेलाह अनार्य नास्‍ति‍क राज आस्‍ति‍क गमार। प्रेम वि‍हीन भेल हि‍न्‍दुस्‍तान देखु केहेन ई भारत ि‍नर्माण। जनता जागरूक भेल होशि‍यार नोनि‍याँ रानी, गेनहारि‍क हार। गोपालकांडाक हवाइ अभि‍यान देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण। अमेरि‍का करता रि‍टेलक बेपार देशक आन मनमोहन, पवार। गोल अठन्नी रूपैया महान देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण। देशक हार पंजा सरकार ड्रोन ठाकरे भेल सरदार। देशद्रोहकेँ एहेन सम्‍मान देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण। देश हीरो खुर्शिद सलमान राज भैया केलनि‍ टु जीक दान। भेल घोटाला खानक खान देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण। ऐ युगक नायक अजमल कसाब कॉग्रेसक लेल ई भ्रमक जाल। करू नाथ क्षमा हे, प्रणव ि‍नधान देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण। अन्ना, बाबा घोल मचौलक गेल लोकपाल सि‍मरि‍या धाम। आजुक भारतक आत्‍म सम्‍मान देखु केहेन ई, भारत ि‍नर्माण। रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ एकटा अनुपम गीत झारू- गरीब भूखल कम रहै छै, भूखल बेसी रहै धनवान। गरीब भूख बस सुखल रोटी, अमीर भूखल हीराक खान। गीत- तूमलोग केना कऽ जीवि‍ते ओतए आपलोग जतए बेमार छै। असंतोषमे माथ दुखाइ छै स्‍वार्थक चढ़ल बोखार छै। अहाँ बाबू बनू बरूआर हम छी सेवाले तैयार। मान-सम्‍मानमे सभकेँ बरोबरि‍ जीबैक अधि‍कार छै। असंतोषमे......। आप उरू मोटर गाड़ी साइकि‍ल हमरो रहए तैयारी। एक दोसरक घाट उतारनाइ दुनि‍याँक बेवहार छै। असंतोषमे......। अहाँ पाबू पुआ-खीर चुल्हा बुझै ने हमरो भीड़ इज्जतसँ दू वक्‍तक रोटी हमरो तँ दरकार छै। असंतोषमे......। अहाँ पहि‍रू सूट-सफारी फाटए हमरो ने पढ़ि‍या साड़ी तन झाँपि‍ हमहूँ जीबी हमरो तँ सरोकार छै। असंतोषमे......। अहाँ शोभा महल अटारी झोपड़ी हमरो रहै तैयारी। सीर छुपबैले छत होइ ऊपर हमरो तँ दरकार छै। असंतोषमे......। बिनीता झा भूखल झरना अछि भूखैल  नदी से भेटक लेल  नदी भूखैल समुद्रक लेल भूक ओकर तइयो नै मेटेलय  उरि बैसल आकाश  बनि गेल ओ मेघ  बरसि परल फेर आइ धरती पर  करय लेल झरना स भेंट  ई भूख छी प्रकृतिक देन  अहि भूख स ने बचि सकल क्यौ  कि झरना कि मनुख चारू दिस लागल अछि सब क्यौ  भूखल मोन के शांत करय मे । प्रकृति आखरक नs भरोसे प्रकृति बिन आखरे सबटा बजैत प्रकृति

पात मे रूप सजौने प्रकृति फूलक सुगंधसँ गमकैत प्रकृति 

सूर्य आर चान सन चमकैत प्रकृति कल-कल बहैत झरना सन चहकैत प्रकृति

रास करैत चिड़ै चुनमुनीक संग अछि प्रकृति प्रेमीक प्रेममे निःशब्द आँखि लड़बैत प्रकृति

बिन कहने सबटा कहैत प्रकृति  आखरक कहाँ भेल मोहताज प्रकृति ? बाल मुकुंद पाठक गजल १

हाएत दिवाली जड़तै दीप आँगने आँगन बड़तै दीप घर दुआरि आँगन सँभमेँ डेगे डेऽग पर जड़तै दीप

अन्हार रातिमेँ इजोत दैले  मोमबत्ती संगे लड़तै दीप

चुक्का डिबिया सबसँ मिलके गाम प्रकाशसँ भरतै दीप

करै लेल घरकँ द्वारपाली  अन्हार रातिसँ लड़तै दीप

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 11 २

आँखिसँ खसैत नोर रुकत की नै नोरक सरस आबो सुखत की नै सुखिकऽ ठोर आब गेल अछि फाटि फाटल ठोर फेरोसँ जुटत की नै

बेकल जिनगी भरि गेल दर्दसँ करेजक बेकलता मेटत की नै

आँखिक पलक फूलि गेल कानि कऽ बंद भेल आँखि फेरो खुजत की नै

जीबाक चाह तँ हटि गेल मोनसँ मरलोऽ पर दुख ई छुटत की नै

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 13 ३

अहाँ बैसला पर कि पाएब एतौ रहब काजके बिन कि खाएब एतौ कतोऽ दुख कतोऽ सुख लिखल अछि तँ सबटा कियै हाथ कर्मसँ हटाएब एतौ

हयौ दोष आ गुणतँ हाएत सभँमेँ बिना गलत हम नै पराएब एतौ

अहाँ बिसरि अप्पन पुरनका बबंडर चलूँ नव विचारसँ नहाएब एतौ

कहल केकरो मानबै बात नै जौँ तँ भूखल अहाँ मरि कनाएब एतौ

बहरे-मुतकारिब ।फऊलुन(मने122)चारि बेर। ४

प्रेम नै भाइ ई जहर छै पोखिरसँ उठल बुझु लहर छै प्रेम मेँ जान जाएत चलि तड़पि के मरब ई जहर छै

नै परु प्रेमके जाल मेँ एखनो एकरे पहर छै

नै करु प्रेमके ई नशा ई तँ मिसरी धुलल जहर छै

प्रेमिका प्रेमिका नै रटू ई पसारैत बड़ कहर छै

ई मुकुन्दोँ फसिकँ ऐहिमेँ कहलक प्रेम नै जहर छै 

*बहरे- मुतदारिक ।  फाइलुन मने दीर्ध-ह्रस्व-दीर्ध चारि बेर । 5 अहाँ हमरा बिसरि रहलौँ वियोगे हम तँ मरि रहलौँ घुसिकँ कोनाकँ देहेमेँ अहाँ हमरा पसरि रहलौँ

बिसरऽ ई लाख चाही हम बनिकऽ लस्सा लसरि रहलौँ

कियै केलौँ अहाँ ऐना करेजसँ नै ससरि रहलौँ

छुटल घर आ अहूँ छुटलौँ दुखेँ हम आब मरि रहलौँ 

बहरे -हजज । 'मफाईलुन' (मने 1222) दू बेर ६

आइ हमर मोन बड्ड खनहन अछि ककरोसँ हमरा तँ नै अनबन अछि तरुआ तरकारी आ पापड बनि गेल देखूँ चूल्हा पर भातो ले अदहन अछि

आसिन एलै बजरखसुआँ गर्मी गेलै ठंढा ठंढा पुरबा बहै सनसन अछि

फेर दुर्गा मेला हेतै नाच आ लीला हेतै देखूँ खुल्ला पैसा बाजैत झनझन अछि

घर परिवार मे तिहार के दिन एलै अंगना मे चलैत नेना ढ़नमन अछि

कनिये दिनके तँ छै ई पावैनक मजा कातिकक बाद फेर ऊहे अगहन छै

सरल वर्णिक बहर , वर्ण 15 ७ फेर आइ आँखिसँ नोर बहाबै छी 

रहि रहि अहीकँ बात घुराबै छी कतै छै सिनेह ई कोना हम कहूँ

चलि आउ एखनो कियै सताबै छी ।

गेलौँ चलि कतौ हमरा बिसरिकँ

साँझेसँ अँहीँ लेल नोर खसाबै छी ।

देखूँ कानि कानि साँझसँ भोर भेलै 

भोरे भोर हम मदिरा चढाबै छी ।

मदिरोसँ बढिकँ अँहीँ मे नशा ये

ओहि नशा लेल फेरसँ बजाबै छी ।

नीन्नोँ नै आबै जौँ सपनो मेँ देखतौँ

सुतबा ले कतै मोनकेँ मनाबै छी ।

हाथ जोडिकँ ई कहौँ हे भगवान

कियै नै अहाँ मुकुन्दसँ मिलाबै छी ।।

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 13 ८ आस टूटल भाग भूटल आँखि इनहोरे सँ शीतल घुरिकँ आबूँ ई जिनगी मेँ यै छी अहाँ कियैक रुसल सिनेह केलौँ तेँऽ दुख पेलौँ कानियोँ के नै चैन भेटल लहर उठल करेजासँ लागै कि जेना साँस छूटल कि करबै जीके ई जिनगी अहाँक जौँ ना संग भेटल आस टूटल भाग भूटल आँखि इनहोरे सँ शीतल ९ गजल

आइ हम बड़ उदास छी ,कोना कहौँ ककरासँ

ओहि दिनसँ कानैत छी यौ,अहाँ गेलौँ जहियासँ हे यौ हमर प्रीतम ,अहाँ एखनो तऽ घर आबूँ

दिन राति हम एतबे , प्रार्थना करै छी दैबासँ

चारिये दिन तँ बुझियौ ,चारि साल सन बीतल

अहाँसँ बतियाइ लेल फोनो माँगलौँ अनकासँ

पछबा के बहलासँ ,बात एगो इयाद आएल

चलि गेलौँ नैहर हम तँ ,रुसल छलौँ अहाँसँ

चाही नै कपडा लत्ता ,और चाही नै धन दौलत

एतबे कहौँ मुकुन्द चलि आबु,जल्दी पटनासँ

सरल वार्णिक बहर वर्ण-18 १० गजल

कि लिखूँ हम गजल उमर नादान अछि हुनकर दीवाना ई दुनिया जहान अछि रुपकँ जलवा देखूँ लागै छथि चान सन गोल गोल गोर गाल पूर्णिमा समान अछि

केश अहाँक रेशम सन आँखि मृग जेना धायल भेलौँ देखिकँ होश नै ठेकान अछि

गुलाबी गाल पर नीक लागै ठोरक लाली अहीँमे अटिकल छौड़ासभँकँ जान अछि

कमर जे लचकैये देखि मोन बहकैये 'मुकुन्द' के लागे जेना हुस्नके दोकान अछि

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 16 सन्दीप कुमार साफी कातिकक पूर्णिमा जेबै देखैले मेला कमला क’ सभ सालमे मेला लागए जोर नहैले जाएब भोरे भोर हेतै ओही बाउलपर कुस्ती खाएब तोड़ि क’ कुसियार माए बहीन सभ खेलए सामा चकेवा भसब’ जाए ओइ किनार चुगलाकेँ चूड़ा दही खुआ क’ लेवान दिन चूड़ा कुटाए उक्खड़िमे। जोतलाहा खेतमे भसाबए सामा चकेवाकेँ पूर्णिमा नहाइले जाइ कमलामे मेला लागैए दुनू पारमे नाच तमाशा हुअए अल्हा रूदल बिकाए झिल्ली मुरही मिथिलामे माए बहीनक’ भाइयक मानल जाए ई पाबनि सालमे एक बेर नाम लिअए भाइक सभ बहीन हमर भइया रहए जुड़ाएल। गामक इनार चलए मिलान सभ लोककेँ भरै छलौं एक ठाम पानि अपनामे रहै चलए बाजा भूकी रहै चलौं सभ मिलि-जुलि क’ घर-घरमे आब भेल कल लोको सभ भेल अल कल खीचि ने पाबए इनारक रस्सी ने रहल टोलमे एकता के राखए पोखरि इनारक सेखता साविकक देन क’ होइए अभास कोनाकेँ बुझाएब पियास विलुप्त भ’ रहल अछि इनार कत’ गेल घैलाक पानि ओही ठाम करै छलौं स्नान रहै छल गामक शान देवी-देवता रहै छल प्रसन्न मन रहै छल शुद्ध रखै छलौं शुद्ध-अशुद्धक मान। माघक शीतलहरी बाप रे बाप होइए प्राण चलि जाएत मन नै होइए ओछैनसँ उठी जवान क ई हाल तँ बूढ़क की भरि माघ पिअब सभ की पाइनो बरफ भऽ गेल दिन भरि धुइनसँ आँखि नै सुजहाए ओछाइ-बिछाइ सभ गेल तीति सन-सन-सन-सन पछवा बहैए केरा पातसँ बुन्नी खसैए हाथ पएर सभ सुन्न भऽ गेल लोचना करए बाँझीक धधरा सुटकल रहैए दलानमे बगरा एक महिनासँ रौद नै भेल आलू गाछ सभ गलि गेल बाप रे बाप, होइए प्राण चलि जाएत रसगुल्लाक जबार नोत दै छी यौ नोत दै छी रसगुल्ला जबारक नोत दै छी हम आएल छी महरैल गामसँ समुच्चा गामकेँ नोत दै छी मुखिया जी यौ लखन काका आइ सौँझुका हम नोत दै छी पियोर छेनासँ बनल रसगुल्ला काशी भाइ यौ नोत दै छी पहिल तोरमे पहुँचब सभ गोटए सबेरे सकाल कऽ नोत दै छी पूरी तरकारी अओर देब तखन तइपर सँ देब रसगुल्ला तोपि नोत दै छी यौ नोत दै छी रसगुल्ला जबारक नोत दै छी अंशु माला पाण्डेय मिथिला महान

तरुआ तिलकोर तरल, खीर छल मखान, शीतल जल, मन भरल मुख सोहे पान। चनमो गगनमा, करै गुणगान मैथिल छी, मान अछि मिथिला महान।। विनीत उत्पल गजल नेनामे जखन कानैत रही, तूँ चुप हमरा कराबैत रहीँ हम नहि मानैत रही तँ तूँ प्रेमसँ हमरा खुआबैत रहीं तोहर आंचर छल ई दुनिया नहि हम किछु जानैत रही मन दब रहला पर हमरा लोरि गाबि कऽ सुताबैत रहीं पहर धरि काज केलाक बाद तूँ दम साधि कऽ सुतैत रही हमर टुहैक कानबसँ भरि-भरि राति माय जागैत रहीं लोकक उलाहना सुनैकऽ बादो नै कखनो तमसाबैत रही अपना नहि पीबि कऽ ओ दूध हमरा जरूर पियाबैत रहीं जन्मैत संगे देखै छी मायकेँ पहिने ठाढ़ कियो ओतय रही आँखिमे भरल नोरक संग उत्पलकेँ देखि मुस्काबैत रहीं सरल वार्णिक बहर वर्ण -23 अनिल मल्लिक गजल 

अहाँ मुसुकीसँ चान’क ईजोर भ’गेलै  राति छलैहे लगलै जेना भोर भ’गेलै हम अयलौं जखन अहाँ भन्सामे छलौं  मोनक इक्षा त’ तपैत इन्होर भ’गेलै 

राति निसबद छलै हमहुँ चुप्पे छलौं  अहाँक हँसी त’ पानिमे हिलोर ल’एलै 

घोघ कमाल केलकै हम सोचिते छलौं  श्याम रँग छलै कोना आब गोर भ’गेलै 

हम बजलौं कहाँ लोक बुझलक कोना  बौआ एतै चर्चा कोना बड्ड जोर भ’गेलै 

हमर हाल अहाँसँ कहि सकलौं कहाँ  कोमल ह्रदय ई कोना कठोर भ’गेलै 

दू मासक ई छुट्टी बितलै कत्तेक जल्दी  फेरो बिरहा आँखिमे देखू नोर ल’एलै ll (सरल वर्ण१५) २ बहीनक चोटी पकडि क’ खीचीएै गुल्लक कहियो फोडि दियै  पुजा करैक लेल फेरो हम ओकरा फूलो कहियो लोढि दियै कतेक उछन्नर करीएै ओकरा आओर फेरो मेल कतेक  खौंझाबय लेल बाउलक घरके कहियो कहियो तोडि दियै 

बरख बितैत अछि आब त’ राखी की आ भरदूतिआ केहन  पहिले ओकर कोनो पाबनि मे कहाँ एना कहियो छोडि दियै 

तेरह सँ तीन बननाई रीति छै खून कहूँ पातर होइछै  एखन रहि जाइ छै तार टूटले एकरा कहियो जोडि दियै 

माम अबै छलाह पैदले भिजैत कोशो कोश ओहि बरखा मे  सोचिते रहलौं हम जा क' सीनेहक खेत कहियो कोडि लियै 

गँगा नओतल जमुना कहिते आँखि केहन ओकर चमकै  अहि भरदूतीया मे त’ छी ठनने खुशी मे ओकरा बोडि दियै किशन कारीगर लोक करए लूटमार जेकाँ                          (हास्य कविता)

लोभी बैसल अछि लोभ मे जोंक जेंका ओक्कर चालि चलब झपटमार जेंका सरकारी खरांत लेल बेहाल भेल लोक करे लूटमार जेंका.

लोभी लोकक भीड़ मे केकरा समझाएब "कारीगर" बैसल अछि चुपचाप बौक जेंका बेईमान लोक नहि ईमानदारी सीखत? लोक करे लूटमार जेंका.

डेग-डेग पर भ्रष्टाचारी भेटत  ओ जाल बिछौने  बैसल अछि चालि चलब प्रोपर्टी दलाल जेंका लोक करे लूटमार जेंका.

सरकारी व्यबस्थाक हाल बेहाल भ्रष्टाचारक बढ़ी गेल अछि मकड़जाल एही ओझरी मे ओझराएल कतेक लोक मुदा नेता नाचै अपने ताल.

जनताक नाम पर फुसियाहिंक जनसेवा नेतागिरी के धंधा चमकि गेल सभ खाए रहल सरकारी मेवा जहिना बाढ़ी मे अपटल माछ कतेक रेवा.

बेमतलब के करै विदेश यात्रा विकसित योजनाक नाम पर बेहिंसाब खर्च करै जेना सरकारी धन छैक ओक्कर बपौती जेंका.

बाढ़ी-सुखार सँ लोक तबाह भेल मुदा कोनो स्थाई समाधान नहि कराउत हवाई सर्वेक्षण मे नेता जी फुसियांहिक बिधि टा पुराउत.

राहत आ बचाव के नाम पर रहत पैकेजक बंदरबांट भ रहल उज्जर कुरतावला सभ सँ आगू ओक्कर चालि चलब झपटमार जेंका. शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ बिना रदीफक बाल-गजल उगल सुरुज उठू बौआ भऽ गेलै भोर माॅझ आङहमे कौआ कौआ बनल मुँह जोर आँखि‍ काँची भरल सभ पि‍पनी सटल मुँह लाले लागय जेना पाकल परोर झट उठू फट करू अहाँ शौच स्‍नान बासि‍ भात संग रखने छी गौंचीक झोर घंटी बाजल गुरुदेव आबि‍ गेलखि‍न पहि‍ल कक्षाक नेना करय धनधोर नै मोनसँ पढ़ब तँ कि‍यो मानत केना जौं मुरुखे बौड़ाएब सभ बूझत चोर वागीश मात्र एक दीन-दुखि‍याक नाथ वर्ण आले तँ की ज्ञान दीप हएत गोर ईश जेठकेँ करु सि‍नेह छोटसँ राखू नि‍त राखब धि‍यान मान माइक कोर (वर्ण- 15) मुन्नी कामत बाल कविता १ बेटी छोड़ऽ कक्का बेटा-बेटी कऽ अंतरक खेल। सोचऽ तूँ एक बेर बेटा-बेटी मे की फरक भेल। बेटा कनेतऽ पर बेटी पोछतऽ लोर बेटा पर एक कुल मुदा बेटी पर दू कुल करतऽ इजोत। थाकि-हारि कऽ जब तूँ कतौ सँ एबहक कक्का स्नेह बरसाबै लऽ आगु जेतऽ बेटी। कुछ दिन कऽ मेजमान बनि ई तोरा घर आइल छऽ तोहर दुलार आ आशीष लऽ कऽ चुप-चाप चलि जेतऽ बेटी। तब फाटतऽ तोहर कोढ़ आ अंतरमन सँ एतऽ एगो आवाज कि अगला जनम तूँ फेर अइ आंगन मे अहियहन बेटी। २ कारी-बजार कारी-धन कारी-बजारी कारी चादरसँ लिपटल हमर देश अछि। केना बेदाग करब अकरा सगदर कारी-स्याह अछि। निचाँ-निचाँ की देखब जब उपरे अंधकार अछि कोनो दोसर नै रंग अतऽ सगदर कारी-बजार अछि। राष्ट्रपति होए या प्रधानमंत्री सब कऽ सब दरिद्र अछि कि कहब बेशर्मी कतेक हद तक अकरा देहमे समैल अछि। भगाबू अइ दिम्मक कऽ अपन घर सँ नै तँ ई हड्डी तक खाइ लऽ तैयार अछि सोचु -बिचारू अपनामे अहीं कऽ हाथमे कैलक सरकार अछि। ३ शब्दक खेल चुन्नु- अ सँ अनार आ सँ आम रटैत जी थोथरा गेल आब नै खेलब हम ई शब्दक खेल। मांॅ-    तँ चलू उराबऽ चलि पतंग हरियर अपन लाल ओकर पिअर भइया कऽ आब कहू सब मिलाकऽ कतेक उड़ि रहल अछि पतंग। चुन्नु- अतौ तँ अछि सवालक जाल मांॅ हमरा पहिले ई बता दिअ एक सँ आगाँ कतेक होइ छै से सिखा दिअ मांॅ-    तँ कहू आब कहियो नै उबबै अइ खेल सँ नै उलझबै अंकक अइ जाल सँ तब हम अहाँ कऽ सब सिखैब। सब सबालक जबाब अहाँ कऽ बनैब। ४ मांॅ बता तूँ एगो बात मांॅ बता तूँ एगो बात खोल तूँ ई मेघक राज के सब रहै छै ओतऽ कि छै ओकरा सबहक काज। भोरक सुन्दर सुरज दुपहर कऽ किए जरबै छै साँझ पड़ैत फेर कतऽ हरा जाइ छै। राइत कऽ अबै छै मामा सजा कऽ मोतियक थार कि ओतौ छै बहुत बड़का संसार। कहियो देखै छी कनिये कहियो बेसी कहियो तँ साफे नै देखाइ यऽ तूँ बता मांॅ मामा एना किए नुका-छुप्पी कऽ खेल खेलै यऽ। सुनु बउआ हमर बात बिना पढ़ने नै खुलत ई राज जेना-जेना अहांॅ पढ़ैत जएब सब भेद कऽ भेदैत जएब। ५ अनहार घरमे हत्या हम बेटी छी तँ हमर कोन दोष हमहुँ तँ एगो जान छी हमरो आँखि यऽ कान यऽ मुँह यऽ हम नै निष्प्राण छी। नै चलाबू एना कैंची हमर मन डराइ यऽ देखियौ हमर कटल हाथ सँ लाले खुन बहै यऽ। अनहार घर सँ तँ निकलऽ दिअ एक बेर तँ हमरो अइ निष्ठुर संसारकेँ देखऽ दिअ। केना लेलक अतऽ जन्म सिता ओइ रहस्यकेँ जानऽ दिअ हमरा नै मारू जकरा लोग पुजै छै ओइ मायक मँुह देखऽ दिअ। जतरा बाबू आबि रहल अछि जतरा लेब अहाँ सँ लब कपड़ा घुरै लऽ जएब अहाँ संगे मेला देखब ओतऽ कठपुतलीक खेला कीनब हम एगो उड़न जहाज तइ पर बैइठ घुमब सगरे संसार। अंकक मेल चलू खेलब आइ हम एगो खेल जइमे एक संगे करब कतेक अंकक मेल। 1.2.3.4.5.6.7.8.9.दस अइ सँ आगू चलत एगो बस। छुक-छुक नै ई तेज दौड़ै यऽ एक पर एक एग्यारह भऽ जाइए। एक पर दू बैठ 12 एक पर तीन बैठ 13 एक पर चारि बैठ 14 एक पर पाँच बैठ 15 एक पर छअ बैठ 16 एक पर सात बैठ 17 एक पर आठ बैठ 18 एक पर नअ बैठ 19 दू पर बैठ जिरो बीस भऽ गेल पहिले एक असगर छल आब उन्नीस टा भऽ गेल अहिना एकता अपन जीवन मे अहूँ लाउ मिल कऽ अपन शक्ति बढ़ाउ। माय हमरा एगो बहिन आनि दे। चल बजार उ बजैबला गुड़िया कीन दे। जे हमरा भइया कहत हर साल हमरा हाथ पर राखी बान्हत उ चुलबुलिया मुनिया आनि दे। किए तूँ हमरा असगर रखने छऽ हमरासँ बहिनक स्नेह छिनने छऽ तू अपन कान्हाकेँ द्रोपदी आनि दे माय हमरा एगो बहिन आनि दे। ककर भैया तोरा सतबै छउ कोन बात छै जे तोहर आँखि भरै छउ तूँहो तँ ककरो बहिन छी तँ फेर किए हमरा बहिन लऽ कंश बनल छी हमरा तूँ एगो मैका दऽ दे माय हमरा बहिनक जिनगी बाझि दे ई सोन चिरैया चिड़िया आनि दे माय हमरा एगो बहिन आनि दे। राजदेव मण्‍डल बाल कवि‍ता छीपपर दीप नमगर बाँसक छीप पर नाचैत दीप अपने देहकेँ जारि‍-जारि‍ तैयो टेमीकेँ सम्‍हारि‍ अन्‍हारकेँ ललकारि‍ हवासँ करैत मारि‍ एक्के धूनमे चलि‍ रहल समताक लेल गलि‍ रहल जेतबे क्षमता छै तेतबे दोग-दागमे फैलि‍ रहल बटोहीकेँ देखबैत बाट हरा ने जाइ कहीं कुबाट। देत प्रकाश सभकेँ लड़ैत अन्‍हारसँ भरि‍ राति‍ कि‍न्नौं नै देखतै केकरो रंग, रूप आ जाति‍। रामवि‍लास साहु बाल कवि‍ता मेघक बरि‍आती- तारबतोर पूरबा बहै दि‍न-राित बहै नै थके गति‍ मन्‍द पड़ि‍ते गर्मी चढ़ल असमान उसनि‍याँ करनाइ शुरू भेल एहेन अचरज कहि‍यो नै भेल गर्मी भगबै ले मेघक बरि‍आती शुरू भेल भंडार कोणसँ गरजैत ढनकैत सेना संगे मेघ धमकि‍ गेल आगू-आगू अन्‍हर बि‍हारि‍ पाछू संगे शीतल वयार ढन-ढन ढमकैत बि‍जुरी चमकैत मेघक बरि‍आती आबए लगल देखते मेघक बरि‍आती गर्मी जान बचा भागए लगल मेघक बरि‍आती पछारैत गेल झम-झम बर्खा बरसि‍ गेल गर्मीक परकोपसँ छुट्टी भेल मेघक बरि‍आती घूमि‍ घर गेल। बाल मुकुन्द पाठक बाल गजल

मेला चलब हमहुँ कक्का यौ पहिरब आइ सूट पक्का यौ खेबै जिलेबी आ झूलब झूला संगे संग किनब फटक्का यौ

बैट किनब क्रिकेट खेलै ले आबि कऽ खूब मारब छक्का यौ

साझेसँ अखारामे कुश्ती हेतै पहलवानोँ तँ छै लडक्का यौ

अन्तिम बेर छी एतौ हम तँ जाएब बाबू लऽग फरक्का यौ

कोरा मे कने लिअ ने हमरा ई भीड़ मेँ मारि देत धक्का यौ

चलू ने जल्दी किनै ले जिलेबी नै तँ उड़ि जाएत छोहक्का यौ

बाबूओसँ बेसी अहीँ मानै छी छी बड्ड नीक हमर कक्का यौ सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 11 जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ बाल गजल १ भोरहि सभकें आबि जगा कोइली हमरा आंगन आ। घ’रहुमे भऽ गेल दुगोला सभकें प्रेेमक पाठ पढ़ा। बात-बातमे खापड़ि फूटै सभकें सुंदर बोल सिखा। स’भ घ’र लागय अपने एहेन स्नेहक दीप जड़ा। लक्ष्मी आबथु स’भ घ’रमे दरिद्रताकें दूर भगा। मच्छर भरि गांमे पैसल सभ जनकें डेंगूसं बचा। २ कत’ खसलियै  यौ पापा कोना क’एलियै यौ पापा । पान तमाकुल गुटका खेलौं दांत गमेलियै यौ पापा । लीभर काज करत कहिया धरि शराब  पिलियै यौ पापा । खोलि देलक इसकूल घ’रमे कोना कमेलियै यौ पापा । महल छोड़िक’ जहलमे एलौं कते लुटलियै यौ पापा । लोकतंत्रकें जर्जर केलियै मूस बनलियै यौ पापा। बाल गीत सत्य अहिंसाकेर पुजारी  छला महात्मा गांधी ज्ञानक बड़की पैघ बखारी छला महात्मा गांधी। ओ कहलनि, एके छथि अल्ला-ईश्वर एके अछि मंदिर-मस्जिद एके थिक काबा-काशी, भारतवासीकेर  मूल एक थिक जाति एक थिक सभ छथि भारतवासी बूझि पड़ैए पड़ैए भव-भय हारी छला महात्मा गांधी ज्ञानक बड़की पैघ बखारी छला महात्मा गांधी। सत्याग्रहकेर केलनि तेहेन प्रचार, भागल भुल्ला लत्ते-पत्ते सात समुंदर पार ब्रह्मा, विष्णु और त्रिपुरारी छला महात्मा गांधी ज्ञानक बड़की पैघ बखारी छला महात्मा गांधी। ओ कहलनि सौंसे दुनियाकेँ बनय एकटा गाम, सभकें भेटै रोजी-रोटी स’भ चुआबए घाम दुनियामे सभसँ उपकारी छला महात्मा गांधी ज्ञानक बड़की पैघ बखारी छला महात्मा गांधी । अमित मिश्र बाल गजल

माँटिकेँ कर जोड़ि करियौ नमन बौआ देख रहलौँ आइ सुन्नर सपन बौआ भाग देशक ताग नेहक छी अहाँ यौ छी अहाँ गमकैत मैथिल सुमन बौआ

पानिमे डूबि जीबै छी मगर यौ देख लै ई विश्व ताकत अपन बौआ

मारि झगड़ा नै फँसै से मोनमे यौ शीत शोणित अपन नै छै जलन बौआ

चान सन सब गुण अहाँ एखन गढ़ू यौ समय छै एखन बनू नव रतन बौआ

फाइलातुन 2122 तीन बेर बहरे-रमल जगदानन्द झा मनु बाल गजल  चलै चुनमुन चलै गुनगुन तमासा घुमि कए आबी  जिलेबी ओतए छानैत तोहर भेटतौ बाबी 

पढ़ैकेँ छुटल झंझट भेल इसकूलक शुरू छुट्टी  दसो दिन राति मेला घुमि कए नव वस्तु सभ पाबी 

करीया बनरिया कुदि कुदि कए नाचै बजाबै बिन  चलै चल ओकरा संगे हमहुँ नेन्ना कनी गाबी 

बनल मेनजन अछि बकड़ी पबति बैसल अचारे छै  बरद सन बौक दिनभरि चूप्प रहए पहिरने जाबी    

बुझलकौ आब तोरो होसयारी 'मनु' तँ बुढ़िया गै  लगोने ध्यान वक कतएसँ सम्पति नीकगर दाबी    

(बहरे हजज) माटिक बासन केदार प्रसाद गामक एकटा कुशल कुम्हार । माटिक बासन जेना  घैल, ढाकन, मटकुरी बना अपन जीवन यापन करै छलाह । माटिक बासन बनेनाइ मात्र हुनक आजीवकाक साधन नहि भs कs हुनका लेल  एकटा सुन्नर कारीगरी छल । अपन काज करैकाल ओ ऐना तनमय भs जाइ छलाह जेना एकटा भक्त अपन अराध्य देवताक ध्यानमे अपन तन-मनक सुधि बिसैर जाइत छैक । ओ अपन स्वं साधनासँ धिरे-धिरे छठि मैयाक सुन्नर व आकर्षित हाथी सेहो बनबए लगला । हुनकर बनाएल माटिक बासन आ छठिक हाथीक बड्ड प्रशंसा होइत छल । धिरे-धिरे गामक परिवेश बदलए लागल । माटिक बासनक जगह स्टील आ आन-आन धातु लेबए लागल । केदार प्रसादजीक आमदनी कम होबए लगलन्हि मुदा ओ अपन काजक प्रति  निष्ठा आ समर्पणकेँ दुवारे कुम्हारक काज नहि छोरि पएला । हुनक सुन्नर सुशिल बेटा बिभू नेन्नेसँ अपन पुस्तैनी काजमे माँजल । ई कहैमे कोनो संकोच नहि जे ओ अपन बाबूओ सँ बीसे । केदार प्रसादजी एहि गपकेँ नीकसँ  बुझैत अपन होनहार पुतकेँ गुणसँ मोने-मोन खुस छलाह आ चिंतीत सेहो । चिंतीत एहि दुवारे की कुम्हारक काजक कि बर्तमान छैक आ कि भबिष्य हेतै से हुनका बुझल मुदा बिभूक हस्तकौशल देखि ओकरा एहि काजसँ बाहर केनाइ उचित नहि बुझलाह । बिभू सेहो इस्कूल पढ़ाइक संगे-संग अपन बाबूक सभटा गुणकेँ  अंगीकार केने गेल ।  अपन  बाबूक छठिक हाथीसँ आगू बढ़ि ओ मूर्तिकलामे अपन हस्तकौशलक उपयोग करै लागल । ओकर बनाएल मूर्तिक चर्चा गाम  भरिमे होबए लगलै । जतए ओकर बाबूक बनाएल छठिक हाथीकेँ एगारह टाका भेटन्हि ओतए ओकर बनाएल छोट-छोट कनियाँ- पुतड़ा सभकेँ सय-सबासय टाका भेटअ लगलै । बिभू अपन बाबूक देख-रेखमे मूर्तिकलामे दिनो- दिन आगू बढ़ए लागल । आब ओकर बनाएल माए सरोस्वती, कृष्णास्टमी, विश्वकर्मा पूजाक मूर्तिक माँग चारूकातक बीस गाम तक होबए लगलै मुदा बिभूक बाबू तैयो ओकर बनाएल मूर्तिमे कोनो ने कोनो दोख निकालि आ ओकरा अओर बेसी नीक मूर्ति बनाबैक प्रेरणा देथिन । बिभू सेहो हुनक गपकेँ मन्त्र मानि आगू आरो नीक मूर्ति बनाबएमे लागि जे । बिभू दसम वर्गकेँ बाद इस्कूली पढ़ाइ छोड़ि पूर्णतः मूर्तिकलामे अपनाकेँ समर्पित कए लेलक । अठारहम बरखक पूर्ण बुझनूक भs गेल आब ओकरा नीक बेजएकेँ ज्ञान भs गेलै । ओकर मूर्तिक प्रशंषा आब गाम नहि, जिला नहि राज स्तरपर होबै लगलै । आब  तँ ओकर बनाएल एक-एकटा मूर्तिकेँ दू-दू तिन-तिन हजार टाका भेटए लगलै । मुदा ओकर बाबू एखनो ओकर मूर्तिमे कोनो ने कोनो दोख निकाइल ओकरा आर सुन्नर मूर्ति बनाबैक निर्देश देथिन । पहिले बिभू हुनक गपकेँ मन्त्र मानि कमी दूर करैक चेष्टामे लागि  जाइ छल मुदा आब हुनक गपसँ ओकर मोन कतौ-ने कतौ आहत होइत छलै । मुदा बिरोध करैक सहाश नहि तेँ मोनकेँ मारि हुनक बताएल निर्देशमे लागि जाइ छल  । जेना-तेना काज आगू बढ़ैत रहल आ ओकर बनाएल गेल मूर्तिक चर्चा आब राजक सीमासँ निकैल बाहर दस्तक देबए लगलै । राजसरकारकेँ गृहमंत्रालयसँ बिभूकेँ पत्र एलै जाहिमे ओकर बनाएल गेल मुर्तिकेँ अखिल भारतीय मूर्ति प्रदर्शनीमे राखक व्यवस्था कएल गेल रहैक । सभटा खर्चा राजसरकारक आ विजेताकेँ देशक सर्वश्रेष्ट मूर्तिकारक सम्मानकेँ संगे-संग एक लाख टाकाक नगद इनाम सेहो ।   ई पत्र पाबि बिभूकेँ बड्ड प्रसंता भेलै । सभसँ पहिले दौरल-दौरल अपन बाबूकेँ एहि गपक सुचना देलक । केदार प्रसादजी सेहो बड्ड प्रसन्य भेलाह हुनकर जीवन भरिकेँ मेहनत रंग लाइब रहल छल । बिभू राति-राति भरि जागि-जागि कए अपन मार्गदर्शक गुरु बाबू संगे लागि गेल । एकसँ एक नीक-नीक मूर्ति बनेलक मुदा केदार प्रसादजी सभ मूर्तिमे कोनो ने कोनो कमी निकाइले देथिन । केदार प्रसादजीक बताएल कमीकेँ दूर करैकेँ बदला बिभूक मोनमे आब नकारात्मक प्रवृति घर करए लगले । हुनक बताएल कमीपर आब ओ सबाल-जबाब करए लागल । काइल्ह प्रतियोगता लेल मूर्ति भेजैक अंतिम दिन आ आइ बिभू अपन बनाएल मूर्ति सभमे सँ एकटा सभसँ नीक मूर्तिकेँ अंतिम रूप देबएमे लागि गेल । केदार प्रसादजी बारीकीसँ ओहि मूर्तिकेँ निरीक्षण करैत, बिभूक दिमागमे हलचल चलि रहल छल - "हाँ आब तँ ई कोनो ने कोनो गल्ती बतेबे करता ।" ततबामे केदार प्रसादजी अपन चुप्पीकेँ तोरैत बजलाह -"सुन्नर ! आइ तक बनाएल गेल मूर्ति सभमे सर्बश्रेस्थ ।" कनीक काल चुप रहला बाद फेर -"  मुदा ।" मुदा की आब  तँ  बिभूक मोन बिफैर गेलै - "अबस्य कोनो ने कोनो कमी गनेता ।" केदार प्रसादजी अपन गपकेँ आगू बढ़ाबैत -" ई जँ एना रहितेए तँ  आरो बेसी नीक, आ ई रंग जँ फलाँ फलाँ रहथि तँ  जबरदस्त होइते ।" नैन्हेटासँ जिनक गपकेँ मन्त्र मानि पूरा करैमे जि-जानसँ लागि जाइ छल आइ हुनक गपकेँ नहि पचा पएलक । बिफैर कए बाजि उठल -"रहै दियौ ! अहाँकेँ  तँ एनाहिते दोख निकालए अबैए, अपन बनेएल ढाकन बसनी  तँ कियो एको टाकामे नहि किनैए आ हम केतबो नीक मूर्ति बना लि कोनो ने कोनो दोख अबश्य निकाइल देब ।" बिभूक गप सूनिते मातर केदार प्रसादजीक शांत मुद्रा भंग भए सोचनीए भs गेलनि । एकटा नमहर साँस लैत बिभूक पीठ ठोकैत बजलाह -"बस बेटा बस ! जहिया व्यक्तिकेँ अपन पूर्णताकेँ आभाष भs जाइ छैक ओकर बाद ओकर जीवनक विकास ओतहिए रुकि जाइ छैक । पूर्णताकेँ आभास दिमागक आगू बढ़ैक चेतनामे लकबा लगादै छैक ।" किछु छन चुप्प,दुनू गोटे शांत । बिभूक आँखिसँ नोर टघरैत जे आइ ई की कए लेलहुँ, ओकरा अपन गल्तीक ज्ञान भs गेलै । केदार प्रसादजी आगू - "हमर सपना छल जे हमर बेटा राजक आ देशक नहि वरण दुनियाँक सर्वश्रेष्ट मूर्तिकार  बनत.....मुदा नहि । कोनो गप नहि हमराकेँ जनै छल ? कियो नहि । हमर बेटाकेँ पूरा राज जनैत अछि एकटा नीक मूर्तिकारकेँ रूपमे । हमरा लेल बड्ड पैघ गप अछि । मुदा हमर सपना ------- आब नहि पूरा होएत । ई कहि ओ ओहि कक्षसँ बाहर भs गेला । दुर्गानन्‍द मण्‍डल नेना लेल सुन्दर चि‍त्रकथा

श्रीमती प्रीति‍ ठाकुरक दू गोट चि‍त्रकथा (पहि‍ल गोनू झा आ आन मैथि‍ली चि‍त्रकथा, दोसर मैथि‍ली चि‍त्रकथा) मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे पहि‍ल बेर श्रुति‍ प्रकाशन नई दि‍ल्‍लीसँ प्रकाशि‍त भेल। दुनू चि‍त्रकथा एक संग श्री उमेश मण्‍डल जीक माध्‍यमे भेटल। एक-आधटा पन्ना उनटैबि‍ते मन गद्-गद भऽ गेल। लागल जे आब हम मैथि‍ल दरि‍द्र नै सभ कथुसँ सम्‍पन्न भऽ रहल छी। साहि‍त्‍यक तँ अनेको वि‍धा होइ अछि‍ जइमे कथा एक वि‍धा थि‍क तहूमे चि‍त्रकथा तँ बाल साहि‍त्‍य लेल प्रमुख। चि‍त्रकथाक माध्‍यमसँ अपन भूलल-बि‍सरल संस्‍कृति‍क झलक सेहो भेटैत अछि‍। नि‍श्चि‍त रूपे मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे एकर अभाव बहुत दि‍नसँ खटैक रहल छल। जेकरा श्रीमती प्रीति‍ ठाकुर अपन चि‍त्र कथा मैथि‍ल समाजक बीच राखि‍ एकटा असीम प्रति‍भाक परि‍चय देलनि‍ अछि‍। बुझना जाइ छल जेना हम अपनेकेँ स्‍वयं वि‍सरि‍ गेल छी। वि‍सरि‍ गेल रही ओइ समैकेँ जइ समैमे मैयाँ अपन पोता-पोती लऽ जा कऽ घूड़ लग बैसि‍ गोनू झाक खि‍स्‍सा सुनबैत छलीह जे अति‍ मनोरंजक आ गोनूक तीव्र बुधि‍क परि‍चायक छल। तहि‍ना आनो आनो कथा जेकरा प्रीति‍ जी चि‍त्रवत् कऽ हमरा लोकनि‍क साेझामे रखलीह। जइमे रेशमा-चूहरमल, नैका बनि‍जारा, ज्‍योति‍ पंजि‍यार, महुआ घटवारि‍न, राजा सलहेस, छेछण महराज आ कालि‍दास छथि‍। जे कहि‍यो आम छल, आब लुप्‍त प्राय: भेल जा रहल छल, ओकरा एकबेर पुन: परि‍चि‍त करौलनि‍। जइमे लोक जनलक जे रेशमा के आ चूहड़मल के? एतबे नै, प्रेमक पराकाष्‍ठाक परि‍चयक रूपमे जे लोकक ठोरपर हीर-रांझा वा लैला-मजनू रहैत छल, की ओकरासँ कम निस्‍वार्थ प्रेम रेशमा आ चूहड़मलक छल ई देखेबाकमे साकांक्ष रहलीह। जतए चुहड़मल दुधवंशी दुसाध जाति‍क तँ दोसर तरफ रेशमा भुमि‍हार ब्राह्मण जाति‍क बेटी। जखन जुहड़मलकेँ दंगल जीत कऽ अबैत देखलक तँ दुनूक भेँट गंगाक तटपर, ओतहि‍ प्रेमकथाक प्रारम्‍भ भेल। अर्थात् प्रेममे जाति‍-पाति‍सँ कोनो लेन-देन नै अपि‍तु प्रेम तँ प्रेम थि‍क। प्रेम कएल नै जाइ छै अपने भऽ जाइ छै। तहि‍ना नैका बनि‍जारा सेहो प्रेमेक पराकाष्‍ठाक परि‍चायक छी। भगता ज्‍योति‍ पंजि‍यार अपन वीरता आ पराक्रमक कारणे पूजि‍त भेल। आइ जँ धर्मराजक पूजा तँ ज्‍योति‍ पंजि‍यार सेहो पूजि‍त छथि‍। धर्मराजक भक्‍त ज्‍योति‍ पंजि‍यार बारह बर्खक तपस्‍याक बाद कंचन काया लऽ कऽ घूमि‍ घर एलाह। माइक कोखि‍ पवि‍त्र भेल। जे एहेन पैघ भगता ओकरा कोखि‍सँ जनमल। तहि‍ना महुआ घटवारि‍न सेहो अपन इज्‍जत बचाबए खाति‍र कौशि‍की धारमे जान गमा अपन सतीत्‍वकेँ अकिंचन बना कऽ रखलीह। राज सलहेसक कथा तँ नाचो रूपमे प्रसि‍द्ध अछि‍। जेकरा प्रीति‍जी चि‍त्रवत् कऽ इति‍हास बना देलनि‍। एकटा धरोहरक रूप दऽ देलथि‍। अनचि‍न्‍हार जकाँ छेछन महराज कथाक संग कालि‍दासक चि‍त्र कथा आ हुनक यादव कुलमे जन्‍म हएब, हुनक यर्थाथ परि‍चए भेल। बहुतोकेँ ई बूझल हेतनि‍ जे कालि‍दास तँ कर्ण-कायस्‍थ छलाह। ऐ लेल सेहो प्रीति‍ जीकेँ धन्‍यवाद। प्रीति‍ जीक दोसर रचना मैथि‍ली चि‍त्रकथामे कुल दस गोट कथा वर्णित अछि‍। जइमे राजा सलहेस, बोधि‍ कायस्‍थ, दीना-भदरी, नैका-बनि‍जारा, वि‍द्यापति‍क आयु अवसान प्रमुख अछि‍। ऐ प्रकारे दुनू चि‍त्रकथा पढ़लापर एहेन लागल जे ई कथा सभ ऐति‍हासि‍क महत पाओत। ऐ प्रकारक रचनाक सर्वथा अभाव सन छल। जेकरा प्रीति‍जी हमरा सबहक समक्ष राखि‍ एकरा धरोहरि‍ स्‍वरूप महत देलनि‍। ऐ पोथीकेँ नैना-भुटुकाक पहि‍ल पसि‍न कहल जा सकैत अछि‍। खास कऽ जे बच्‍चा नंदन, वालहंश, वा अन्‍य पोथी पढ़बाक हि‍स्‍सक लगौने छल आब ओ लेखि‍का द्वारा रचि‍त रचनासँ लाभ उठाओत। पोथीक प्रत्‍येक चि‍त्र तथ्‍यात्‍मक आ उद्देश्‍यपरक अछि‍। चि‍त्रकथाक माध्‍यमसँ प्रीति‍जी मि‍थि‍लाक वि‍लुप्‍त प्राय भेल वि‍षय-वस्‍तुकेँ कथाक रूप दऽ जीवंत कऽ देलनि‍। मैथि‍ली प्रेमी ऐ तरहक रचनाकेँ नजरअंदाज नै कऽ सकैत छथि‍। आबैबला पीढ़ीक लेल ऐ प्रकारक रचना नै मात्र मनोरंजक अपि‍तु प्रेरणादायक सेहो सि‍द्ध हएत। पोथीक सभसँ पैघ बात ई अछि‍ जे प्रत्‍येक चि‍त्र एकटा वि‍शेष अंदाज आ दशाकेँ प्रस्‍तुत करबामे सफल भेल अछि‍ जे लि‍खल गेल पाँति‍क भाव स्‍पष्‍ट कऽ रहल अछि‍। प्राय: सभ जाति‍क लोकक चि‍त्रण ऐ चि‍त्रकथामे समाएल अछि‍। जे प्रीति‍ जीक समन्‍वयवादी सोचक परि‍चायक अछि‍। प्रगति‍शील वि‍चार तँ सहजहि‍। मि‍थि‍ला सभ दि‍नसँ उदारक परि‍चायक रहल मुदा कि‍छु लोक बेवसायि‍क एवं जाति‍वादी सोचक लाड़नि‍ बीचमे चलौलनि‍ आ चलाइयो रहल छथि‍। हमरा हर्ख भऽ रहल अछि‍ ऐ चि‍त्रकथाक लेखि‍कापर जे एतेक सुन्‍दर, सुगम, आ प्रगति‍शील डेग बढ़ा मैथि‍ली साहि‍त्‍यक वि‍कासमे एकटा बेछप स्‍थान बनौलनि‍ अछि‍। हमर शुभकामना सतत रहत जे प्रीति‍जी ऐ प्रकारक रचना करैत रहती आ श्रुति‍ प्रकाशन प्रकाशि‍त करैत रहत तँ नि‍श्चि‍त रूपेँ मि‍थि‍ला, मैथि‍ली आ मैथि‍लामे रहनि‍हार सभ पूर्णत: समृद्ध भऽ जेताह। मुन्नी कामत एकांकी -हत्यारा समाज प्रथम-दृश्य सूर्यकला-     काकी...... हयइ लवकी काकी, कतऽ छेतहिन? लवकी काकी-  की कहै छिऐ कनियाँ! अतऽ पुबरिया घरमे छी आउ। सूर्यकला-     काकी, रमकलिया मै कऽ सुनै छिऐ फेर किछु छै, आइ भोरका गरी सँ रमकलिया बाबू लऽ कऽ गेलैए अल्ट्रासाउण्ड करबै लऽ दरभंगा। लवकी काकी- धैउररर उंउंउंउं पापी नरकी कऽ की बात करै छी... छौरा तँ जान सँ मारि देतै मौगीकेँ। देखियौ, देहमे कोनो जान छै जेे फेर गेलै खुुुुनमा-खून होइ लऽ। सूर्यकला-     की करतै काकी बेटी जनमा कऽ जे मै-बाप सब दिन मरतै, से बलू एक्के बेर मरि जा, वएह ठीक ने। आब तँ ई पाप घरही होइ छै। अकरा कोनो पाप नै समझदारी कहल जाइ छै। देखतुुहुन, अतेक दिन छेलै जे बेटीकेँ नै पढ़बै छी तैं उ बोझ अछि। आब तँ पढ़बैयोमे खर्चा आ बियाहोमे खर्चा होइत अछि। केना कऽ हम गरीब बेटी जनमैब। बेटा जनमा कऽ चौराहा पर राखि देब तँ दू साँझ हमर चुल्हा जरत, मगर बेटी तँ हर पग-पग पर कलंक बोटरने घर आनत। ओकर उजर चुनरीमे कारिख लगैत देर नै हएत। आब कहू काकी ओइ शर्मसँ मरी आकि अहिना मरी। लवकी काकी-  तोेहर बात सही छऽ कनियाँ पर अही सोचकेँ तँ बदलै कऽ छै। जे लोग निअम बनेने छै आ कहै छै बेटा बैटी एक समान, वएह बेटीक इज्जतक दुश्मन बनि जाइ छै। घोर कलयुग छै। सभ मजबूर छै।                  पटाक्षेप। दोसर-दृश्य रामेश्वर- रमकाली माय, की करबै, डॉक्टर साहेब कहै छै जे फेर बेटी  अइ। महग युगमे चारि टा बेटी पहिले सँ अछि। बेटाक खातिर छः बेर अहाँकेँ सफैया करा चुकलौं, आब तँ अहाँक शरीर देख डॉक्टर सफैया करैसँ सेहो मना करैत अछि। कहै छै जे अहाँक देहमे खूूून नै यऽ। चलू गाम चलू, ओतऽ निचेेेेनसँ विचारि कऽ कोनोे काज करब। कमला- हयौ रमकाली बाबू, हम अहाँसँ सभ बेर निहौरा करै छी कि अहाँ हमरासँ एतेक बड़का पाप नै कराउ। अकर बध हम दूनू परानिये टा कऽ नै पुरे परिवारकेँ लागत। आइ बेटी बेटासँ कम छै जे अहाँ बेटा लऽ आनहर भेल छी आ हमर जानक दुश्मन बनि रहल छी। रामेश्वर- अपन मुॅंह तूँ बंदे राख। नै तँ अतैसँ लतियाबैत गाम लऽ जेबौ। जेना अतेक साल तक मुँह सिने छँ तहिना आगुओ सिने रह। तूँ मर या जी, हमरा तकर परवाह नै अछि। जाबऽ तक तोरा देहमे जान छउ ताबऽ तक जेना जेना कहबौ करैत रह। कमला- तँ लऽ लिअ ने हमर जान, मुक्ति मिल जैत हमरा। अहाँक मारि-गारि सँ आ अइ पाप करैसँ............. रामेश्वर- की कहली पाप..... पाप नै करिऐ तँ की करिऐ। साले-साल बेटी जनमाबैत रहिऐ। जब हम घरसँ निकलैत छी तँ लरेग हमरा देख मुँह फेर लइए। भोरे-भोर कोइ हमरा देखै यऽ तँ कहै यऽ कि अही निपु़तराहाक दरसन करि हमर अजुका दिन खराब भऽ गेल। तूँ की बुजबिही कि अइ बदनामीकेँ लऽ कऽ हम केना तिल-तिल मरि रहल छी। चल घर चल, हम सफैया करैबला दवाइ लऽ कऽ अबै छी। पटाक्षेप। तेसर-दृश्य (कमला गाड़ीसँ उतड़ि किछु दूर चलैत बेहोश भऽ गिर पड़ैत अछि।) रामेश्वर- रमकाली माय..... रमकाली माय..... की भेल? कोइ कनी पानि दिअ। (एक व्यक्ति एक गिलास पाइन रामेश्वरकेँ पकड़ाबैत छथि। रामेश्वर पाइन कमलाक मुँह पर छिटैत अछि। कमला भक सँ आँखि खोलैत अछि।) कमला- कनी पियै लऽ पाइन दिअ। (रामेश्वर पाइनक गिलास कमलाकेँ दै छथि।) रामेश्वर- रमकाली माय, की भेल? ठीक छिऐ ने, टाइर गाड़ी मंगाबी घर पर सँ आकि रसे-रसे जएल भऽ जएत। कमला- हम ठीक छी। उ गाड़ीमे छेलिऐ ने, तइ सँ मन घूर गेल। अहाँ चलू, हम धीरे-धीरे अबै छी। (कमला मने-मन भगवानक स्मरण करैत कहैत छथि- हे भगवान, हमरा देहमे ई की भऽ रहल अछि जेना लगैए पुरा देह कोइ गोधना गोधै यऽ। कखनो कऽ तँ जेना पताए लगै छी। भगवान अगर हम मरि जाइऐ तँ हमर बाल-बच्चाक रक्षा करिहक।) पटाक्षेप। चौथा-दृश्य रामेेश्वर- कतऽ गेलिऐ..... लिअ, ई गोली खा लिअ। कमला- हमर बात मानू आ अइ बच्चाकेँ नै गिराउ। चारिम महिना चलि रहल छै। आबऽ दियौ जे आबैए, अपने भागे एतै। हमरा भागमे बेटा नै लिखल छै तैँ तँ नै होइ छै। हम ई दवाइ नै खएब। रामेश्वर- (एक थप्पर कमलाक गालपर दैत कहैत अछि) से किए एहन करम छउ तोहर जे तोरा कोइखमे बेटा पनपबे नै करै छउ। कोन गै घरमे आगि लगेने छेलही से एहन वंशहीन कोइख दऽ कऽ भगवान पठेलकौ। कुलक्छिनी.... कलंकनी, कहाँ कऽ हमरे कपारमे सटल छेल। चुपचाप ई दवाइ खा ले नै तँ जबरदस्तीयो खुऐल होइ छै हमरा, बुझलिही कि नै। कमला- ठीक छै, अहाँक मर्जीक खिलाफ आइ तक एको गो काज नै केलौं आ आइयो नै करब, अहाँ जे चाहै छी हम वएह करब। हम दवाइ खाइ छी, आगू राम राखए। (कमला दवाइ खाइ यऽ आ रामेश्वर पएर झमाड़ैत ओतऽ सँ चलि जाइ यऽ।) पटाक्षेप। अंतिम-दृश्य (गामक सरकारी अस्पतालमे अधमरा अवस्थामे कमला खुन सँ लतपत पड़ल अछि।) नर्स-   डॉक्टर साहेब, की करिऐ? कारनी कऽ हालत बहुत सिरियस भेल जाइ यऽ। खून बन्दे नै भऽ रहल अछि। देहक आधासँ बेसी खून निकलि गैलै, की करबै? डॉक्टर- हम अहाँ की करि सकै छिऐ। हम तँ बस प्रयास करबै जे कि राइतेसँ कऽ रहल छिऐ। इंसान जे जेना करै छै, तहिना पबै छै। (10 सालक रमकाली कनैत डॉक्टर लग अबै अछि। डॉक्टर साहेब देखियौ ने, माय कऽ की भेलैए। साँसो नै लै छै।) (डॉक्टर साहेब दौड़ कऽ कमला लग जाइ छथि जतऽ रामेश्वर कमलाक माथा अपना कोरामे लऽ कऽ विलाप करै छथि।) डॉक्टर- चुप रहू, अतऽ एना कननाइ बंद करू, सबहक जड़ि अहाँ छी। आब अइ लोरसँ हमदर्दी देखबै छी। (डॉक्टर कमलाक नारी देखैए आ आलासँ सेहो जाँच करैए।) रामेश्वर- की भेलै डॉक्टर साहेब, किए ई एना लारू-बातू भऽ गेलैए। डॉक्टर- अकरा मुक्ति मिल गेलैए। अहाँक अत्याचारसँ। आब ई अइ पापक नगरीकेँ छोड़ि चलि देलखिन। लऽ जाउ अकरा आ पुछबै कि अहाँक बेटा देने बिना ई किए दुनियाँ छोड़ि देलक। अहाँक मर्जी बिना किए आँखि बंद कऽ लेलक। जाउ आ पुछियौ। अकरा देहसँ निकलल अइ खुनक रेतसँ। अहाँ हत्यारा छी। बेटाक लालचमे घरवालीकेँ मारि देलौं। अहाँकेँ तँ मौतो नसीब नै हएत। रामेश्वर- हँ डॉक्टर, हम कातिल छी। अपन खुशीकेँ...अपन जीवन संगनीकेँ...अइ बच्चा सबहक ममताकेँ। डॉक्टर- आखिर कहिया तक अहाँ सब अनहार घरमे बैठल रहब। अइ अनहार घरसँ निकलू, देखियौ बाहर कतेक प्रकाश छै। हमरो बेटा नै छै, दू टा बेटी छै जे हमरा लऽ बेटा समान छै। फेर अहाँ किए बेटा खातिर अतेक भुखौइल छी। रामेश्वर- डॉक्टर साहेब, ई समाजक लोग हमरा निपुत्र कहि-कहि कऽ हमर जिनैइ दुर्लभ करि देलक आ बेटा पाबै कऽ  भूख अओर बढ़ा देलक। हम नै बुझलौं जे अकर अंत ई हएत। डॉक्टर- बेटा आ बेटी कोनो स्त्रीक भाग पर नै बल्कि पुरूष पर निर्भर करै छै। अइमे स्त्रीकेँ कोनो दोष नै छै। आइ देखियौ, एहन कोनो क्षेत्र नै छै जतऽ बेटी बेटाक बराबरीमे खरा नै छै, फेर ई भेद भाव किए? बेटी होय या बेटा, आखिर दुनू तँ अहींक अंश अहींक संतान छी। रामेश्वर- डॉक्टर साहेब, हमर तँ दुनियाँ उजड़ि गेल मुदा हम अन्हार सँ आब इजोतमे आबि गेलौं। हम अपन चारू बेटीकेँ खूब पढ़ैब-लिखैब आ बेटा सँ उच्च दर्जा देब। आब यएह हमर चौस कंधा छी। पटाक्षेप। नाटक जिन्दगीक मोल प्रथम-दृश्य राम रतन- बाबू सुतल छिऐ? भिक्खन- कि कहै छहक बउआ? जागले छिऐ, बाजऽ, बहुत परेशान लागि रहल छहक। राम रतन- बाबू, हम बाहर कमाइ लेल जाइ के सोचि रहल छी। तोहर की विचार छऽ। भिक्खन- नै बउआ, हम अतेक दिन तक तोरा नै कतौ जा देलियऽ। आबो नै जा देबऽ। तोरा सिवा हमरा के छै। तोहर माइ तोरा हमरा कोरामे दऽ कऽ दुनिया छोड़ि देलक। तहियासँ हमर सभ कुछ तूँ छहक। हम तोरासँ एक पल खातिर दूर नै रहि सकै छी। राम रतन- बाबू आब हम १८ बरसक भऽ गेलिऐ। हम अपन ख्याल राखैमे सक्षम छी। हमरा बाहरक दुनियाँ देखै कऽ एगो मौका दऽ दिअ, बस एक बेर जा दिअ, फेर अहीं संगे रहब। भिक्खन- नै, अबकी बैशाखमे तोहर बियाह करै कऽ अछि। बियाह करि लऽ, फेर तोरा जतऽ जाय कऽ मन हेतऽ जायहक। राम रतन- बाबू आब माइनो जाउ। किछु दिनक तँ बात छै। फेर अहाँ जेना कहब हम तहिना करब। भिक्खन- ठीक छै, अहाँक हठक आगू हमरा झुकइये पड़तै। ककरा संगे आ कतऽ जेबहक? राम रतन- बाबू, काल्हि फुलचनमा हिमाचल जा रहल छै। हम ओकरे संगे हिमाचल जाएब। भिक्खन- ठीक छइ, काइले जेबहक तब तँ पाइ कौरीक ओरियान करऽ पड़तै। कखुनका गाड़ीसँ जेबहक। राम रतन- रातिक ११ बजे निर्मली सँ गाड़ी पकड़बै। आब हम जाइ छी, अपन कपड़ा-लत्ता साफ करै लऽ। । पटाक्षेप। दोसर दृश्य भिक्खन- बउआ हइए..... फूलचन एलऽ। राम रतन- आबैय छी बाबू। कपड़ा पिनहै छी। भिक्खन- बउआ फूलचन। तूँ तँ ओतै रहै छहक। तोरा तँ ओतौका सभ किछु कऽ पता हेतऽ। फूलचन- हउ कक्का, तूँ चिंता नै करऽ। राम रतन हमरे संगे रहतै। ओतऽ ओकरा कोनो चीजक तकलीफ नै हेतै। भिक्खन- तूँ तँ दवाइबला कम्पनीमे काज करै छहक नऽ! कथीक काज करै छहक? फूलचन- हँ कक्का। दवाइयेबला कम्पनीमे छिऐ। ओइमे तँ बहुत तरहक काज होइ छै। जे काज भेटल सएह करि लेलौं। भिक्खन- अच्छा चलऽ, ठीक छै। राम रतन- चल फूलचन! भिक्खन- बउआ सभ किछु ठीकसँ लऽ लेलहक नऽ? आ सभ िदन हमरा फोन करैत रहिअ। बाहर जाए छहक, गाड़ी-घोड़ा देख कऽ चलइहक। राम रतन- ठीक छै बाबू, अहाँ चिंता बिलकुल नै करू। अपन ख्याल रखब। समय-समयपर खाना खाइत रहब आ बेसी काज नै करब। हम जल्दी घुइम-फिर कऽ आबि रहल छी। सबहक प्रस्थान! ।पटाक्षेप। तेसर दृश्य (हिमाचल पहुँच कऽ) राम रतन- फूलचन, आइ गामसँ एला छऽ दिन भऽ गेलैए। तूँ तँ काम पर चलि जाइ छऽ आ हमरा असगर पहाड़ जकाँ समय लगै यऽ। हमरो कतउ काज लगा दे नऽ। फूलचन- अच्छा ठीक छै। काल्हि हम अपन मालिकसँ तोरा लऽ बात करबउ। दोसर दिन फूलचन- राम रतन, काल्हिसँ तूँहो चलियहन हमरा संगे। ८ हजार मासिक तनखुआ पर हम तोरा लऽ बात केलियौहँ, मंजूर छउ नऽ। मन लगा कऽ काज करबही तँ अओर तनखुआ बढ़ेतउ। राम रतन- ई तँ हमरा लऽ बहुत खुशीक बात अछि। अखने हम बाबूकेँ ई शुभ समाचार दै छी। पटाक्षेप। चारिम दृश्य कम्पनीक कैनटिंगमे बैठ राम रतन आ फूलचन खाना खाइत गप्प करैत अछि। राम रतन- फूलचन अतऽ कोन काज होइ छै। हमरा सँ आइ कोनो काज नै करेनकैए। डॉक्टरबला कोट पहिरने एगो आदमी एलै आ हमरा एगो गोली खिया कऽ चलि गेलै। कुछो समझमे नै आबै छै, उ हमरा कथीक दवाइ देलकैए। ओतऽ चारि-पाँच गरऽ अओर छेलै, सभकेँ वएह दवाइ देलकैए। फूलचन- अतऽ अलग-अलग बिमारीक दवाइ बनै छै, ओकरे जाँच खातिर कम्पनी किछु लोककेँ नौकरी पर रखै छै, जइमे सँ एगो तुहो छी। राम रतन- ओइ दवाइसँ कोनो हानि तँ नै होइ छै? फूलचन- नै! अगर हेबे करतै तँ अतऽ डॉक्टरक आ दवाइयक कोनो कमी छै? जे खर्चा ओकर इलाजमे लगतै सभ कम्पनी देतै। हमहूँ तँ कतेक साल तक यएह काज केलिऐ, कहाँ किछु भेलै। एक आदमी- फूलचन, राम रतनकेँ पठाउ, डॉक्टर साहेब बजेने छै। फूलचन- जी। (रामरतनसँ) जो देखहीं की कहै छउ। राम रतन डॉक्टरक चेम्बरमे जाइत अछि। राम रतन- साहेब अहाँ बजेलौं। डॉक्टर- ई दवाइ खा लिअ आ एतऽ पड़ि रहू, किछु इन्जेक्सन लगेबाक अछि। दवाइ खा कऽ राम रतन सुइ लइ लऽ मेज पर लेट जाइए! २ घंटा बाद डॉक्टर- राम रतन ओ राम रतन उठू। डॉक्टर राम रतनकेँ हिलाबैत अछि आ फेर नब्ज देखऽ लागैत अछि! डॉक्टर- ई की, ई तँ मरि गेल। कियो अछि, डॉक्टर खुरानाकेँ बजाउ। डॉक्टर खुराना- की भेल? डॉक्टर- सर, एकरा देखू, की भऽ गेलै, नब्ज नै चलै छै। डॉक्टर खुराना- ओह नो! ई मरि गेल। कोन दवाई देलौं एकरा? डॉक्टर-सर ई तीनू। डॉक्टर खुराना- की अहाँ पागल छी? एक साथ एतेक दवाइ, सेहो पहिले बेरमे। पहिने अहाँ एकरा नींदक गोली खुएलौं, तकर बाद एतेक पावरक दू-दू इन्जेक्सन दऽ देलौं? डॉक्टर-सर आब की हएत? डॉक्टर खुराना- हमरा सभ ऐठाम तँ ई रोजक बात अछि। एकर परिवारबलाकेँ मुआवजा दऽ कऽ चुप करा दियौ, आ हँ जखन सभ चलि जाए तखन बॉडी बाहर निकालब। ता तक एकर मरबाक खबर ऐ चहरदिवारीसँ बाहर नै एबाक चाही, बुझि गेलौं। रातिक ९ बजे फूलचन- सर, राम रतन कतऽ अछि, ओकर छुट्टी नै भेल? डॉक्टर- आइ एम सॉरी फूलचन, राम रतन आब ऐ दुनियाँमे नै रहल। हमरा एकर अफसोस अछि। ओकर परिवारबलाकेँ कम्पनी एक लाख रूपैया मुआवजाक तौरपर देत। हम ओकरा नै बचा पेलौं। फूलचन मने-मन सोचैत अछि -आब हम की जबाब देब कक्काकेँ। केना कहब कि ओकर जिअइ कऽ सहारा छिन गेल। केना जिथिन ओ, हे भगवान, एना केना भऽ गेल। पटाक्षेप! अंतिम-दृश्य फूलचन- हेल्लो.. कक्का, तूँ जेना छहक तहिना अखने गाड़ी पकड़ि लए। राम रतन बहुत जोर बीमार छऽ। भिक्खन- बउआ, एक बेर हमरा राम रतन सँ बात करा दए। की भेलैए हमर बाबूकेँ। हम तँ देखनइयो नै छिऐ हिमाचल तँ केना एबऽ। फूलचन- कक्का, हमर छोटका भाइ तोरा लऽ कऽ एतऽ। ओ अखने तोरा घर आबि रहल छऽ, तूँ बस जल्दी आबि जा। भिक्खन- हम अबै छिअ बउआ, तूँ हमरा बउआक ख्याल रखियहक। फूलचन- ठीक छै, आब फोन रखै छिअ। कहैत-कहैत फूलचन कानऽ लगैत अछि दोसर दिन हिमाचल पहुँच कऽ भिक्खन-बउआ........बउआ राम रतन कतऽ छहक? फूलचन- कक्का पहिले अहाँ किछो खा लिअ। राम रतन ठीक यऽ। भिक्खन- पहिले हम अपना बेटाकेँ देखब तब किछो मुँहमे लेब। फूलचन भिक्खनक गला पकड़ि कानऽ लगैए आ सभ किछु बता दइए। भिक्खन- फूलचन, हमरा बेटाक जीवनक सौदा तूँ ८ हजार मे केलहक। तूँ सभ किछु जानै छेलहक, तइयो ओइ मौतक मुँहमे हमरा बेटाकेँ धकेल देलहक। तूँ हमर सभ किछु लऽ लेलहक, हमरा निष्प्राण बना देलहक। हमर बेटाक मौतपर हमरा १ लाखक भीख तोहर कम्पनी देतऽ, उ ओकरे मुँह पर फेक दिहक। हमरा नै चाही कोनो भीख। आइ हमर बेटा मरल, काल्हि ककरो अओरक बेटा मरत। आखिर ई मौतक खेल किए खेलल जाइए? जे दवाइक परीक्षण जानवरक ऊपर करबाक चाही ओकरा भोला-भाला गरीब मनुष्यक ऊपर करैत अछि। कि अकरा रोकै लेल कोनो कानून नै अछि? एक घार रूदनक संगे पटाक्षेप महेन्द्र मलंगिया मूर्दाः श्रृंगार संघर्ष आ द्वन्द्व ई सर्वविदित अछि — काव्येषु नाटकं रम्यम् । अर्थात काव्यमे नाटक सभसँ आनन्दप्रद अछि । एहिसँ दू टा बात अभरिकऽ हमरा लोकनिक सोझामे अबैत अछि — पहिल तँ ई जे नाटक एक प्रकारक काव्य अछि आ दोसर, ओहि काव्यमे सभसँ बेसी आनन्दप्रद । एहि दुनूमेसँ दोसर बातपर कोनो आंगुर नइ उठल अछि । एकरा ध्वनि मतसँ सभ स्वीकार कएलक अछि , मुदा पहिल बातपर आंगुर उठव शुरू भऽ गेल । सभसँ पहिने पंडित जगन्नाथ एहिपर आपत्ति उठौलन्हि । ओ कहलन्हि जँ रसव्यंजककेँ काव्य मानल जाए तँ नाटकीय अंग अभिनय आदिकेँ रसव्यंजक भेलासँ निश्चिित रूपेण एकरा काव्य कहबामे आपत्ति होयत । एहिना अलंकार चिन्तामणिक पंचम परिच्छेदमे जिनसेनाचार्य द्वारा – काव्यादौ नाटकादौ कहिकऽ अलग– अलग सत्ता स्वीकारल गेल अछि । ओेहूना जँ देखल जाए तँ काव्य काविक कर्म छियै आ नाट्य नटक । संगहि नाट्य खेल अछि जकरा देखल आ सुनल जा सकैछ । एहिमे आँखि आ कान दुनू व्यस्त रहैछ, मुदा काव्यमे काने टा । आचार्य भरत नाटक सम्बन्धमे सेहो कहने छथि व्रक्रीडनीयकममिच्छामो दृश्यं श्रव्यं च यद्भवेत । अर्थात नाटक खेल अछि, देखबाक चीज अछि आ ओ श्रव्य सेहो अछि । एतदर्थ एकरा मंचक विभिन्न प्रक्रियासँ गुजरऽ पड़ैत छैक । एहना स्थितिमे कोनो कवि वा उपन्यासकार वा कथाकार जखन एहि साहित्यिक विधासँ टपिकऽ नाट्य साहित्यक क्षेत्रमे अबैत छथि आ एकर मूल्यांकन करऽ लगैत छथि तँ ओतेक सटीक नइ भऽ पबैत छथि । लेखन आ सम्पादनसँ ल’ क’ समीक्षा धरि कतेको एहन स्थल हमरा भेटल अछि जतऽ ओ चुकल बुझना जाइत छथि । एहिसभक जँ उदाहरण देबऽ लागब तँ एकटा पोथा तैयार भऽ जाएत तथापि हम एक–आध टा उदाहरण अवश्य देबऽ चाहब । यथा—जीवन झाक नाटक ‘सुन्दर संयोग’ मे चतुर्थ अंकक पर्दा खसैत अछि । मंचपर कोनो पात्र प्रवेश नहि करैत अछि, मुदा सात–सात टा गीत नेपथ्यसँ चलैत रहैत अछि । एकर बाद रथोद्धतामे दू पाँती गबैछ, मुदा कादम्बरीक प्रवेश नहि देखाओल गेल अछि । पुनः जे नवम गीत अछि ओ नेपथ्यसँ अछि कि मंचसँ तकर उल्लेख सेहो नहि अछि । एकर मतलब जे नाट्यकारकेँ रंगमंचक जानकारीक अभाव छन्हि । एहिना मिथिला मिहिर, १३–०५–१९६२ ई. मे प्रकाशित राधाकृष्ण चौधरीक नाटक ‘राज्याभिषेक’ मे राजधर कहैत अछि – चलू, आइ संध्याकाल कोनो गाछी दिस घूमि आबी । पुनः कोष्ठमे देल गेल अछि — साँझुक पहर, तीनू गोटए गाछीमे पहुँचलाह आ देखलनि ओतऽ हाँजक— हाँज छौड़ीसभ विद्यापतिक गीत गाबि रहल अछि । ई लोकनि कातमे बैसि मजा लैत रहलाह ।’ आब साँझुक पहर, गाछीमे पहुँचब आ हाँजक–हाँज छौड़ीसभके विद्यापति गीत गबैतक जानकारी प्रेक्षककेँ कोना भेटतैक ? ने दृश्य परिवर्तन, ने चलबाक माइम, ने कोनो संवाद आ ने दृश्य निर्माण । जखन कि नाट्यकार आ संपादक जानल–मानल विद्वान छलाह । आब जँ समीक्षाक बात करी तँ ओकरा हास्यास्पद छोड़िकऽ आओर नहि किछु कहल जा सकैए । एहि बातक पुष्टिक दू–तीन वर्षक भीतर प्रकाशित किछु समीक्षासँ कएल जा सकैछ । हमरा नइ लगैए जे नाट्यकर्मक एकोरत्ती छूति हुनका लोकनिमे छन्हि । उपर्युक्त बात सभकेँ देखैत आब हम नाट्यकार रमेश रञ्जनपर अबैत छी । ई एकटा सफल अभिनेता रहलाह अछि । तें रंगमंचक जे तकनिक छैक ओकरा हिनका पूर्ण ज्ञान छन्हि । अतः एकर उपयोग अपना नाटकमे सफल ढंगसँ कएलनि अछि । एकर प्रमाण एहि नाटकक संवाद अछि जे अपना लयमे चलैत अछि । संगहि प्रत्येक संवादकेँ बजबामे ओष्ठकेँ सुलभताक अनुभव होइत छैक । किएक तँ संवाद छोट–छोट अछि । एकर जड़िमे हिनक अभिनेताबला गुण काज कएलक अछि । आखिर मंचपर संवाद अभिनेते बजैत छैक । तें ओ एहन संवादकेँ किन्नहुँ समावेश नहि करत जाहिमे ओष्ठ सुलभता नहि होइक । एतबए नहि, एकटा सफल निर्देशक सेहो रहबाक कारणेँ पात्रसभ सेहो मंचपर सक्रिय रहैछ । मंच निर्देश सेहो उचित ढंगसँ कएल गेल अछि । एमहर आबिकऽ किछु गोटे ‘पुरुष एक– पुरुष दू’ अथवा ‘युवक एक एक–युवती’ एक कहिकऽ जे नाटकमे पात्र रखैत छथि ताहिपर आपत्ति उठौलनि अछि । मुदा हम कहब जे एहन आपत्तिमे कोनो जान नहि अछि । आओर ई आपत्ति परोक्ष रूपसँ पाठ्य नाटकक ओकालत करैत अछि, मंचीय नाटकक नहि । किएक तँ नाटक पाठक वस्तु नहि, ओ तँ प्रेक्षकक वस्तु छियैक । आओर प्रेक्षकक हेतु नाटकमे युवक, पुरुष, स्त्री तथा युवतीक हेतु नाम दऽ देल गेल रहैत छैक । संवादमे पुरुष, स्त्री, युवक, युवती आदि कहिकऽ नहि अबैत छैक । मंचक आगाँ बैसल प्रेक्षककेँ केओ नहि कहैत छैक जे ई पुरुष एक वा दू छियैक । एहना स्थितिमे पुरुष एक वा दू पर आपत्ति उठाएब बिल्कुल असंगत लगैत अछि । एहि नाटकपर दुरुहताक चार्ज लगाओल गेल अछि । मुदा एहि मादे अपन विचार व्यक्त करबासँ पहिने हम प्रेक्षकक सम्बन्धमे किछु विचारणीय तथ्य दिस जाए चाहब – प्रेक्षक विभिन्न प्रकारक होइत अछि । आओर ई विभिन्नता वयस, शिक्षा, पेशा आदि पर निर्भर करैत छैक । बच्चा सभक वास्ते ओहन नाटक चाही जाहिसँ ओकर बालसुलभ जिज्ञासाक पूर्ति होइक । मुखौटा लागल पात्र आ अवस्थाक अनुकूल संवाद ओ सभ बेसी पसिन करत । तहिना निरक्षर आ अखरकट्टू प्रेक्षक ग्रामीण कलाकारद्वारा प्रस्तुत लोकनाट्यकेँ बेसी पसिन करत । किएक तँ एकरा बुझबाक लेल ओकरा बेसी मानसिक श्रम नहि करऽ पड़ैत छैक । इएह कारण अछि जे कोनो लोकनाट्यक पाछाँ निरक्षर आ अखरकट्टू जनसमुदाय ढंगरि जाइत अछि । ओहीठाम पढ़ल—लीखल लोक एहिमे नगण्येक बराबर रहैत अछि । एकरा लोकनिक हेतु ओहिसँ इतर नाटक चाही । एकटा बात आओर—देश, काल आ परिस्थिति नाटकक मीटर होइत छैक जाहिपर नाटक अपने आप बाजऽ लगैत अछि । तें जँ हमरा रेडियो नेपाल सुनबाक अछि तँ मीटरकेँ ओहिपर घुसकाकऽ आनऽ पड़त । हमरा नीक जकाँ मोन अछि जे एकटा मित्रकेँ सैमुअल बैकेटक नाटक ‘इण्ड गेम’ पढ़ऽ लेल देने रहियनि । एक मासक बाद हुनका कहलियनि जे नाटक पढ़ल भऽ गेल तँ दऽ दिय । एहिपर ओ जवाब देलनि जे ‘पढ़ल तँ नइ भेल अछि , मुदा लेब तँ लऽ लिय । कारण, हम बुझबे नइ करै छियै ।’ बैकेटक ओ नीक नाटक अछि जे द्वितीय विश्व युद्धक बाद लिखल गेल छल । एकरा हिटलरक पराजय आ वर्लिन पतनसँ जोड़ल जाए तँ सभ मिलि जएतै । एहिना ई नाटक ‘मुर्दा’ अछि । ओहि कालखण्डमे नेपालक शासन राजाक अधीन छलैक । यमराज एहिठाम राजाक प्रतीक अछि । चित्रगुप्त प्रधान दरबारी अछि जे राजाक छत्रछायामे विभिन्न कुकृत्य करैत अछि । देखल ने जाए—चित्रगुप्तः हँ सरकार, असलमे मृत्युभुवनकेँ स्वच्छ रखबाक दायित्व तँ हमर अछि । अपने तँ निमित्त पात्र मात्र छी । एहि संवादसँ ई बात साफ भऽ जाइत अछि जे मृत्युभुवन अर्थात नेपालकेँ केहन साफ करैत होएतैक । संगहि ई सफाइ ककरा नामपर होइत छैक तकरा लेल तँ निमित्त पात्र अछिए । एहि नाटकक केन्द्र विन्दु मुर्दा अछि जे सत्ताद्वारा बनाओल जाइत अछि । किएक तँ ओ मुर्दा मात्र पर शासन कऽ सकैत अछि, जागरुक लोकपर नहि । तें सत्ता चाहैत रहैत अछि जे सभकेँ मुर्दा बना दी । एहिव्रmममे सत्ता दू टा हथियार अपनबैत अछि – पहिल तँ ई जे ओ सुख–सुविधाक जाल फेकैत अछि । आइ — काल्हुक पूजीपतिसभ पूर्वक पूजीपतिकेँ गारि पढ़ैत छैक जे जखन बुझलकै जे मार्क्स एतेक प्रखर बुद्धिक अछि तँ ओकरा सभ सुख–सुविधा जुटाकऽ बेकार किएक ने कऽ देलक । एहि बातक चरितार्थ ई नाटक करैत अछि । देखल ने जाए— बूढ़ा ः ओ दूर होइत गेल हमरा सभसँ आ शासनक नजदिक होइत गेल । शासन ओकरा गुड़क ढेप बुझाइक । ओ बुझऽ लागल रहय जे एहिमे सटल रहलासँ हमरा स्वर्गी आनन्द भेटत । शासनक आनन्द अर्थात स्वर्गक आनन्द लेल जीवनकेँ छोड़ि देलक । आब तेसर मार्ग छैक दमन । एकर आगाँ लोक मुह नहि खोलि पबैत अछि । एहि बातक पुष्टि निम्नांकित संवाद करैत अछि — बूढ़ा ः एहि सभक बलपर अपना भीतरमे अद्भुत क्षमताक विकास कएनाइ एखन दुलर्भ छै । हवाक गतिक विरुद्ध के ठाढ़ हैत ? उफनैैत नदीक विपरीत दिशामे आगू बढ़बाक के दुस्साहस करत ? शासनक विरुद्ध स्वर निकालबाक इच्छा–शक्ति के देखाओत ? एहि तरहें नाट्यकार दमन आ पोषण सत्ताक दूू टा आँखि मानैत छथि जे अक्षरशः सत्य अछि । देखल जाए ई संवाद — युवक २ ः शासनक आँखिसँ दू टा रोशनी निकलै छै । एकटा जरबऽबला आ एकटा बढ़बऽबला । जे जिन्दा रहल तकरा जरौलक आ जे मुर्दा भऽ गेल ओकरा बढ़ौलक । एहिठाम जिन्दाक तात्पर्य ओहि व्यक्तिसँ अछि जे सत्ताक विरुद्ध किछु बजबालए तैयार होइत अछि । एहन व्यक्तिकेँ जराओल जाइत छैक अर्थात नाना प्रकारक कष्ट देल जाइत छैक । एकर विपरीत जे मौन भऽ गेल अर्थात मुर्दा भऽ गेल ओ विभिन्न तरहक सुख भोगैत अछि । उपर्युक्त हथकण्डा अपनौलाक बादो विद्रोहक ज्वाला फुटबे करैत छैक । आओर ओहि ज्वालामे केहनो तानाशाह भस्म भऽ जाइत अछि । एहन उदाहरणसँ इतिहास भरल पड़ल अछि । तें नाट्यकार हतोत्साह नहि होइत छथि । ओ एकटा बूढ़ पात्र गढ़ैत छथि जे समयकेँ घीचिकऽ अपना संग लऽ अनैत अछि । एहने वयक्तिपर तँ लोक विश्वास करैत अछि । एही विश्वासक प्रतिफल छैक जे पुरुष एक, दू, तीन आ चारि बूढ़ाक इर्द–गिर्द जमा भऽ जाइत अछि । ओ सभ चित्रगुप्त आ ओकर सहयोगीकेँ अपना घेरामे लऽ लैत अछि । एहना स्थितिमे यमराज सत्तासँ कोना अलग–थलग भऽ जाइत अछि तकर अनुमान सहजहिं लगाओल जा सकैछ । नाटकक महत्वपूर्ण श्रृंगार संघर्ष तथा द्वन्द्व अछि । ई संघर्ष तथा द्वन्द्व स्वीकृत यथार्थ आ अस्वीकृत यथार्थक बीच उत्पन्न होइत अछि । एहि स्वीकृत तथा अस्वीकृत यथार्थक संवाहक क्रमशः खलनायक तथा नायक होइत छैक । एहि दुनूक बीच घात–प्रतिघात चलैत रहैत अछि । नायक चाहैत अछि जे स्वीवृmत यथार्थक स्थानपर अस्वीकृत यथार्थकेँ स्थापित करी । अतः नायक आ खलनायकक बीच संघर्ष होइत छैक । एहन संघर्ष एहि नाटकमे भरपूर देखल जाइछ । यमराज अ चित्रगुप्त सभकेँ मुर्दा बनबऽ चाहैत अछि जकर प्रतिकार बूढ़ा करैत अछि । आ, जतऽ प्रतिकार होएतैक ओतऽ संघर्ष नहि होएबाक कोनो प्रश्ने नहि उठैत छैक । तहिना प्रस्तुत नाटकमे द्वन्द्व सेहो प्रचुर देखल जाइछ । नाट्यकार देखबैत छथि जे सत्ता लोककेँ मुर्दा बनबैत छैक आ से गुड़क ढेप देखाकऽ अथवा डंटा देखाकऽ । मुदा किछु लोक सोचैत अछि जे एहि दुनूक विरुद्ध ठाढ़ भेल जाए । एहना स्थितिमे युवक आ पुरुष लोकनिमे भयंकर द्वन्द्व उत्पन्न होइत छैक जे नाट्यकारक सफलताक द्योतक अछि । कोनो रचनाक वास्ते शीर्षक एकटा महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि । किएक तँ शीर्षक कोनो रचनाक विषयमे बहुत किछु कहैत छैक एहि दृष्टिएँ प्रस्तुत नाटकक शीर्षक ‘मुर्दा’ बहुत उपयुक्त अछि । किएक तँ मुर्दाक चर्चा प्रस्तुत नाटकमे बेर–बेर आएल अछि । अन्तमे हम इएह कहब जे प्रबुद्ध प्रेक्षकक बीच एहि नाटकक आदर हेतै से हमरा पूर्ण विश्वास अछि । नाट्य क्षेत्रमे नाट्यकारक भविष्य उजज्वल छन्हि से हम मानैत छी । गोविन्द झा (नाटक) गाम जएबै गाम जएबै गाम जएबै ना (आरम्भ 23.09.2012 ---- समाप्ति 17.10.2012) पहिल दृश्य [बूढ़ा खाट पर बैसल छथि। दूर सँ हल्ला सुनि पड़ैत अछि ---पकड़-   पकड़।  दौड़-जैड़। कोम्हर रौ। हे ओम्हर गाछी दिस। बूढ़ी दौड़ि कें अबैत छथि।] बूढ़ी – अएँ, ई कथीक हल्ला भए रहल छै ? बूढ़ा – के कहत कथी।. तान्त्रिक – (बाहरहि सँ) इएह हम कहब जे कथीक हल्ला थिकैक। बूढ़ी – आउ-आउ। हमरा तँ बड़ डर भए गेल। [ तान्त्रिक प्रवेश कए कुरसी पर बैसैत छथि ] तान्त्रिक – कोनो डरक बात नहि। एहि गाम मे तँ कोनो-ने-कोनो हल्ला-फसाद होइतहि रहै छै। बूढी – एखन कथीक हल्ला भेलै।? तान्त्रिक – फटफटिआ पर सबार चारि-पाँच टा छौंड़ी सब हुड़हुड़ करैत अएलै आ ओ रंगदार छौंड़ा रघुबिरबा अछि ने तकरा पकड़ि कें लए गेलै। बूढा – अपहरण ? तान्त्रिक – नहि, अपहरण नहि। बूढ़ा – तखन की? तान्त्रिक – एकटा छौंड़ी औकरा सँ बिआह करतै। बूढी – बलजोरी ? तान्त्रिक – हँ, सएह बूझू। बूढ़ा – विचित्र बात। तान्त्रिक – आजुक युग मे कोनो बा त विचित्र नहि। सुनू, बुझा दैछी। आजुक पढुआ छओंड़ा सभ हठे बिआह नहि करत। माए-बापक कथा के सुनैए। बाप एक सँ एक उत्तम कन्या तकैत रहथु, बेटा कें कोनो मतलब नहि। जखन जबानी जोर मारतै तँ बाट-घाट मे लुचपनी करैत फिरत। बूढ़ा – ठीके कहैछी अहाँ। तान्त्रिक – छौंड़ा कें एहि मे कोनो खतरा नहि। खतरा छै खाली छौंड़ी कें। तें छौंड़ी सभ एकटा दल बना कए अभियान चलओलक अछि जे एहन-एहन छुट्टा कुकुर सब कें एक-एक लड़ाकू छौंड़ी लगा नाथि देल जाए जे जीवन भरि टीक पकड़ने रहैक। बूढ़ा – ओ, आब बूझल। एही अभियान मे एखन ई रघुबिरबा पकड़ाएल। उचित सजाए भेटलैक। बूढ़ी – की करतै ओकरा? बूढ़ा – नहि बुझलिऐ? आर की, मन्दिर मे लए जा कए बिआह करा देतै। तान्त्रिक – अस्तु, छोड़ू अनकर गप। एखन हम एकटा शुभ संवाद लए आएल छी। बूढ़ा – केहन संवाद ? तान्त्रिक – हमरा हाथ मे एकटा एहन वस्तु आएल अछि जे पाबि कें अहाँ धन्य-धन्य भए जाएब। बूढ़ा – एहन कोन वस्तु से तँ कहू। तान्त्रिक – एक टा कन्यारत्न। परिचय सुनब? बूढ़ा – ( गम्भीर साँस लए ) कन्यारत्न. (गुम)। तान्त्रिक – (प्रतीक्षा कए) एना गम्भीर किएक भेलहुँ ? बूढ़ा – हमर सब हाल अहाँ कें बुझले अछि, तखन कहू की। तान्त्रिक – तैओ एक बात बूझि लिअ। गाम मे एखन जे घटना भेल अछि से गामहु सँ बेसी विदेश मे भए रहल अछि, तरीका भनहि किछु भिन्न हो। बूढा – जनै छी। बूढ़ी -  जनै छी ताहि सँ की। किछु सोचहु पड़त। तान्त्रिक – सोचल जाए। एखन आज्ञा हो। फेर भेट होएत। [ तान्त्रिकक प्रस्थान।] बूढ़ा – सुनलहुँ? बूढ़ी – सुनब की कपार। हम कहैत-कहैत हारि गेलहुँ जे बिमारिऔक लाथें बौआ कें बजा लिऔ, नहि तँ पछताएब।. बूढ़ा – की हैत बजा कए। अएले तँ छल परुकाँ कि तेसरुकाँ। की कहलक से मन पारू। बूढ़ी – मने अछि। बिसरत कोना। मुदा एक बेर जे हारए से कि फेर....? बूढ़ा – चुप रहू। हमर टूटल मन कें आओर नहि तोड़ू। जेहन हमर-अहाँक मन तेहन आजुक जनमल ओकर मन कोना हेतै। हम-अहाँ चुप्पे रही सएह उचित। बूढ़ी – अहाँ तँ कोनो बात मे तेना जिद पकड़ि लै छी जे हमरा किछु नहि फुरैए। जँ एक बेर बजाइए लेबै तँ कोन अनर्थ ...। बूढ़ा – हँ, भए जएतै अनर्थ। अहाँ नहि जनै छी जे आइ-काल्हि नीक नोकरीक की हाल छै। केहनो जरूरी काज रहए, जँ छुट्टी लेलहुँ तँ बूझू नोकरी गेल। हम अपन मोह-ममता देखू कि बेटाक कल्याण। अपना भरोसें जिबैत रहलहुँ, अपना भरोसें जिबैत रहब। अहाँ घबराउ नहि। बूढ़ी – जहिना अहाँ कें बेटाक नोकरीक चिन्ता अछि तहिना तँ हमरा अहाँक बिमारीक चिन्ता। बूढ़ा – हम ठीक भए रहल छी। कोनो चिन्ता नहि। [ अचानक डाक्टरक प्रवेश ] बूढ़ा – आउ-आउ, बैसू। बुझबिऔन हिनका। डाक्टर – (बूढ़ीक प्रति) ठीके कहलनि जनार्दन बाबू,  कोनो चिन्ता नहि। क्रमशः निकें भए रहल छथि। (आला लगाए देखि कें) ठीक छी। चित्त प्रसन्न राखू। एखन आज्ञा दिअ। मरीज सब बाट तकैत हैत। (बूढ़ा उठए लगैत छथि) अहाँ उठू नहि, बैसले रहू। फेर आएब दबाइ लेने।  (जाइत छथि)। बूढी – (ठाढि भए अरिआतैत) एक कप चाहो नहि देलहुँ। डाक्टर – (बूढ़िक कान लग) हृदय किछु कमजोर भए गेल छनि। हिनका हरदम प्रसन्न रखबाक प्रयास करू। हम तकर उचित उपाय कए रहल छी। बूढ़ी - कोन उपाए ? डाक्टर – से एखन नहि कहब। पछाति अपनहि बूझि जएबैक। [ डाक्टर जाइत छथि। बूढ़ी घुरि कें बूढ़ा लग आबि कें बैसैत छथि।] बूढ़ी – (बूढा कें माथ पर हाथ देने देखि) एना माथ पर हाथ किएक देने छी ? बूढ़ा – नहि पूछी सएह नीक। जँ मनक बात कहब तँ अहूँ हमरहि जकाँ माथ पर हाथ देब। बूढ़ी – ई कोना हैत जे अहाँ कनैत रही आ हम हँसैत रही ? बूढ़ा – अहूँ कनबा मे संग देबहि चाही तँ सुनू छाती कें मजगूत कए कें। (कनेक रुकि कें) एखन जे ओ घटना सुनल तकर की अर्थ से अहाँ नहि बुझलिऐ। सुनू हम बुझा दै छी हुनक पेटक बात। पहिल बात ई जे ओ हमरा चेतओलनि, जँ हम बेटा कें बजाए चटपट ओहि कन्यारत्न सँ विवाह नहि कराए देबैन तँ गामक वा विदेशक छौंड़ी सभ ओएह हाल करतनि जे रघुबिरबाक कएलक। बूढ़ी – ओ कोन बेजाए कहलनि। बूढ़ा – बात तँ बड़ सुन्दर, मुदा एना धमकी दए डर देखाए कुटुमैती होअए ? आ असल बात ई जे की बेटा अहाँक बात मानि कें दौड़ल आओत आ अहाँक बात मानि केँ ओहि कन्यारत्न केँ अपन अर्धांगिनी बनाए लेत ? बूढ़ी – तँ साफ-साफ जबाब दए दिऔन। एहि लेल मथा हाथ किएक ? बूढ़ा – हमरा मन कें अहाँ जतेक खोधब ततेक नव-नव राक्षस बहराइत जाएत। हमरा तँ लगैए जे अहाँक बेटा ओतहि विवाह कए चुकल अछि। तहिं दू-तीन बरख सँ आबि नहि रहल अछि। तेसराँ आएल रहए तँ अहाँ बड़ आग्रह कएने रहिऐक, मुदा टस सँ मस नहि भेल। किएक ? बूढ़ी – अहीं कहू किएक। बूढ़ा – हमरा तँ लगैए जे ता ओ विवाह कए चुकल छल। बूढ़ी – अहाँ तँ अनेरे किदन-कहाँदन सोचैत रहै छी। छोडू ई सभ चिन्ता।. चलू  भोजन करए। [ दूनूक प्रस्थान ] दोसर दृश्य [ ड्रॉइङ रूम मे एक उच्च अधिकारी आदित्य सिंह, हिनक यूरोपिअन पत्नी जेन क्रिस्टल उर्फ प्रभाक संग सोफा पर बैसल आ पाँच वर्षक बालक वरुण फर्श पर खेलाइत।] आदित्य – (मोबाइल कान मे लगबैत) आदित्य स्पीकिङ। मोबाइल – हम अपनेक गाम सँ बाजि रहल छी। आदित्य – की बात ? मोबाइल – अपनेक पिता बाबू जनार्दन सिंह....। आदित्य – कुशल छथि ने ? मोबाइल – हँ, जिबैत छथि। मुदा स्थिति नीक नहि छनि। अपनेक माता बेर-बेर कहैत रहलथिन जे बौआकें बजाए लिऔक। मुदा ओ नहि बजओताह। अपने यथासंभव शीघ्र आएल जाए। आदित्य – पिताजी अपने किएक नहि सूचित कएलनि ? मोबाइल – पुछै छिअनि तँ कहै छथि, अपना भरोसें जीलहुँ, अपनहि भरोसें जिअए दिअ। एक चिकित्सकक रूप मे हम अपन कर्तव्य बूझल जे अपने कें सूचित कए दी। आदित्य – ( मोबाइल कात कए पत्नीक प्रति) सुनलहुँ ? कनिआँक आँखि मे नोरे ने, पड़ोसिनि भोकारि पारथि। (प्रतिक्रिया जनबाक हेतु प्रभाक मुँह निहारै छथि)। प्रभा – हमर मुँह की निहारै छी। चलबाक इन्तिजाम करू। हमर फादर इन लॉ बड़ स्वाभिमानी आ स्वावलम्बी छथि। अन्तिमो अवस्था धरि ओ नहि बजओताह। क्षमा करी तँ तकर कारणो कहि दी। आदित्य – कहबाक प्रयोजन नहि। हम अपन अपराध स्वयं जनै छी। बेर-बेर बजबैत रहलाह, मुदा.....। प्रभा – मुदा अहाँ कें फुरसति नहि। लगैए जे अहाँ बाप केँ आगिओ नहि दए सकब। अहाँकें कोन ? अहाँ खूब भोगि चुकल छी माए-बापक दुलार। हम तँ ने माइक मुँह देखल ने बापक। सुनैत रही जे अहाँक देश मे सासु अपन पुतोहुक आबेस बेटिअहु सँ बेसी करैत अछि। इएह सोचि कें अहाँक संग धएलहुँ। मुदा अहाँ तीन वर्ष सँ ठकैत-फुसिअबैत रहलहुँ। अहाँक दोख नहि. हमर कपारक दोख। आदित्य – ( तेज अबाज मे ) अहीं सुनबैत रहब कि हमरो बात सुनब ? प्रभा – ( आओर तेज अबाज मे ) नहि सुनब अहाँक बात। सुनैत-सुनैत कान पाथर भए गेल। ( कनै छथि)। प्रवीण – (बाहरहि सँ) ई कोन नाटक भए रहल छै. मैडम ? आदित्य – प्रवीण , आबह-आबह। प्रवीण – (प्रवेश कए सविस्मय) अएँ. श्रीमतीजीक आँखि मे नोर ? आदित्य – ई एकटा विकट समस्या ठाढ़ कए देलनि अछि। प्रवीण – कोनो समस्या नहि। मैडम, एना नोर ढारने ई पाथर नहि पसिजत। पहिने नोर पोछू आ मन प्रसन्न करू। तखन देखू जे कोना ई मिस्टर सोल्यूशन छन भरि मे अहाँक सभ समस्याक समाधान कए दै छथि।   (आदित्य दिस आङुर देखाए) एकरा कानि-खीजि कें अहाँ नहि सोझ कए सकै छी। ( आदित्य सँ ) हओ, हमर कहल मानह आ तुरन्त गाम जएबाक तैआरी करह। एकसर नहि, तीनू एक संग। आदित्य – मुदा छुट्टी ? प्रवीण – मूर्ख छह तों। हौ, आइ-काल्हि नोकरी मे छुट्टी देल नहि जाइ छै, छुट्टी लेल जाइ छै। केवल सूचना दए निकलि पड़ह। हम छी ने, कोनो खतरा नहि। छुट्टीक मंजूरीक प्रतीक्षा करबह तँ बापक सराधो नहि कए सकबह। आदित्य – एकटा आओर विकट समस्या अछि तोहर मेम साहेब कें लए। कट्टर पुरना विचारक लोक हमर माता-पिता हिनका घरो नहि टपए देथिन। प्रवीण – हओ, एतेक दिन संग रहलह तैओ तों चीन्हि नहि सकलह हमर मेम साहेब कें। जे तोरा सन बेकूफ कें नाथि देलनि से अबस्से छन भरि मे सासु-ससुर कें रिझाए लेतीह। की से आत्मबल अछि ने, मेम साहेब ? प्रभा -  पुछलहुँ तँ जड़ि सँ सुनू। हमरा सन अभागलि दोसर नारी नहि भेटत। हम ने माए कें देखलहुँ ने बाप कें। एकटा अशरण वृद्ध शरण देलनि। जखन हिनका सँ विवाह भेल, मनहि मन प्रसन्न भेलहुँ जे आब सासु-ससुर सँ ओ दुलार भेटत जे माए-बाप सँ भेटैछै। एही लेल भारतीय पड़ोसी सँ साड़ी पहिरब सिखलहुँ। एही लेल बड़ जतन सं मैथिली सिखलहुँ। प्रवीण – बाह. अहाँ तँ मैथिली बजबा मे प्रवीणहु सँ प्रवीँण भए गेलहुँ। प्रभा – अहाँक मित्र कें अङरेजी सँ बड़ अनुराग। प्रवीण – तखन सिखलहुँ कोना ? प्रभा – ओ अङररेजी बाजथि तँ हम कान मूनि ली। एखनहु से जिद ठनने छी। मुदा....। प्रवीण – आब मुदा की ? आदित्य – हम एकसर तँ जएबा लेल तैआर छी, मुदा हिनका लए जएबा मे एकटा बाधा अछि। प्रवीण – केहन बाधा ? आदित्य – हम विवाह कएलहुँ से बात माए-बाप सँ आइ धरि छिपओने रहलहुँ। तखन कोना हिनका लेने....? प्रवीण – हम तोहर मनक सभ बात जनैछिअहु। तों बापक तीन–तीन टा बड़का अपराध कएने छह। पहिल – तीन बरख सँ माए-बाप कें मुह नहि देखओलह। दोसर – चुपेचाप विवाह कए लेलह। तेसर – इसाइ कन्या सँ विवाह कएलह। प्रभा – ठीक कहैछी अहाँ। एही लाजें...। प्रवीण – तों पढ़ि-लिखि कें लोढ़ा भए गेलह। हओ, जनै नहि छह, सभक बाप धृतराष्ट्र होइछै, पक्का धृतराष्ट्र। लाख अपराध माफ। तखन डर कोन ? बड़ क्रोध हेतनि त कहथुन, कान पकड़ि कें दस बेर उठह-बैसह। बस, सभ क्रोध निपत्ता। वरुण – ( खेलाएब छोड़ि कान पकड़ि कें उठब-बैसब सुनि कें स्वयं करैत ) डैडी, अहूँ एहिना करू ने। (हाथ पकड़ि घिचैत अछि। आदित्य संग दैछथिन।) प्रवीण – बाह रे बौआ, बाह ! एक्सेलेन्ट ! देखह, हओ.  बापक हृदय केहन हइछै। एहिना तों बापक आगाँ कान पर हाथ देने ठाढ़ भए जएबह कि बस, आनन्दे आनन्द। (प्रवीण सँ) बाउ. तों सब गाम जएबह। वरुण – सत्ते गाम जएबै ? आदित्य आ प्रभा – हँ, सत्ते गाम जएबै। [ वरुण नाचि-नाचि गबैत अछि। ताहि मे माए, बाप आ प्रवीण तीनू संग दैत छथिन ] गाम जएबै गाम जएबै जाम जएबै ना दही खएबै चूरा खएबै आम खएबै ना गाम जएबै गाम जएबै जाम जएबै ना दादा के देखबै दादी के देखबै भैया के दखबै ना गाम जएबै गाम जएबै जाम जएबै ना प्रभा – बस, नाच खतम। आब चलैचलू डिनर मे। [ सभक प्रस्थान ] तेसर दृश्य [ पुरान-सन पक्का मकान। नमहर बरंडा। बामा कात एक कोठली। बरंडा पर खाट, ताहि पर रोगग्रस्त बूढ़ा जनार्दन ठाकुर पड़ल। बूढ़ी पाएर जँतैत। खाटक एक कात किछु कुरसी ] बूढ़ा – अहाँ किछु कहए लागल रही ? बूढ़ी – हँ, ठीके। बूढ़ा – कहलहुँ नहि . बूढ़ी – हँ, मुह सम्हारि लेलहुँ। मनक बात मनहि राखल। बूढ़ा – से किएक ? बूढ़ी – कहैत-कहैत थेथर भए गेलहुँ। सभ बेकार। तखन फेर कहि कें कोन फल ? जेहने बाप चंठ तेहने बेटा। बूढ़ा – (उठि कें बैसैत क्रोध सँ) हे, हमरा जे कहब से कहू, हमर बेटा चंठ नहि अछि। कोना बुझाउ अहाँ कें जे नीक नोकरी केहन वस्तु थिकैक। की हमर मुह आ अहाँक मुह देखैत रहने ओकर मुह भरतै ? बूढ़ी – हमहूँ कोना बुझाउ अहाऎ कें। जेना अहाँ कें बौआक नोकरीक चिन्ता अछि तहिना तँ हमरहु अहांक प्राणक चिन्ता। बूढ़ा – देखू, पाँच-पाँच टा डाक्टर-वैद्य तत्परतापूर्वक इलाज कए रहल छथि। हम स्वस्थ भेल जा रहल छी। तखन कोन चिन्ता ? [ वाम दिस सँ आदित्य, प्रभा आ वरुणक प्रवेश। तीनू अलक्षित रूपें कात मे ठाढ़ छथि। ] आदेत्य – (कातहि सँ) इएह, इएह थिक हमर घर। बूढ़ी – (अबाज सुनि कें झटकारने आगाँ बढ़ैत कचकाए) अएँ, के ?  बौआ ? आबि गेल, आबि गेल हमर बौआ ! बूढा – (हड़बड़ाए उठि कें दौड़ैत) अएँ, अचानक आबि गेल ! आदित्य – बाबूजी, बाबूजी, एना नहि दौड़ू। खसि पड़ब। (बाँहि पकड़ि कें खाट पर बैसाए पिता आ माता कें प्रणाम करैत छथि) । बूढ़ा – (माथ पर हाथ दए पँजिअबैत) जहाँ रहह, निकें रहह। बूढ़ी – जुगजुग जीबह, निकें रहह। प्रभा आ वरुण – (दूरहि सँ कर जोड़ि कें) प्रणाम बाबूजी, प्रणाम माताजी। बूढ़ा – (दूनूक मुह निहारि सविस्मय) अएँ, ई के ? आदित्य – ( अचानक बूढ़ाक आगाँ ठाढ़ भए) बाबूजी, बाबूजी, हमरा ओहिना कान ऐंठू जेना नेना मे ऐंठै छलहुँ। ऐंठू, ऐंठू ने। (आँखि मे नोर )। बूढ़ा – (अकचकाए) अरे, तोरा ई की मोन पड़लहु। (मुह निहारि) अएँ, हँसीक जगह नोर किएक ? आदित्य – अहाँ नहि ऐंठब तँ हम अपनहि ऐंठैछी। [  आदित्य कान ऐंठैत उठैत -बैसैत छथि। वरुण नकल करैत अछि। प्रभा पकड़ि कें कोर लए लैछथिन। ] बूढ़ा – ( आदित्य कें पकड़ि खाट पर अपना लग बैसाए) एना नहि करह, बाउ। बात की थिकै से कहह। आदित्य – आइ, बाबूजी, अहाँक आगाँ आ माए, तोरो आगाँ हम लाज-बीज कात कए अपन अपराध कबूल करैछी आ तकर जे दण्ड हो से ......। बूढा – पहिने ई तँ कहह जे तों कोन अपराध कएलह। आदित्य – एक नहि, तीन-तीन टा अपराध। नम्बर एक – तीन वर्ष सँ गाम नहि अएलहुँ। नम्बर दू – अहाँ कें बिनु पुछनहि चुपेचाप विवाह कए लेलहुँ। नम्बर तीन – अहाँक प्रस्तावित कन्यारत्नक उपेक्षा कए एहि क्रिश्चन कन्या सँ विवाह कए लेल। आइ अहाँ एहि सभ अपराधक दण्ड दिअअ. हम सहर्ष भोगि लेब। [ आदित्य, प्रभा आ वरुण तीनू कर जोड़ने एक पाँत मे ठाढ़ होइछथि। एक मिनट सभ स्तब्ध भेल एक दोसराक मुह अपलक तकैत छथि। ] प्रभा – हम हिनकर पुतोहु दूरहि सँ गोड़ लगैछिऐन। ( आँजुर माटि धरि झुकाए प्रणाम करैत छथिन)। बूढी – (सहसा आगाँ बढ़ि कें कोर करैत) अहोभाग, अहोभाग हमर। केहन सुन्नर पोता आ केहन सुन्नरि पुतोहु। दूधे नहाउ पूते बिआउ। (बूढ़ा सँ) लछमी घर अइलीह। लग आबि कें आसिख दिऔन। ( प्रभा कें आशीर्वाद देबाक लेल हुनक माथ दिस हाथ बढ़बैत लग जाइत छथि।) प्रभा – (पाछु हटैत) हाँ-हाँ। हमरा छूबथु नहि। बूढ़ी – ( अकचकाए ठमकि के) अएँ, से किएक ? प्रभा – हम अङरेजक बेटी, अछोप। बूढ़ी – (मर्माहत भए दू डेग पाछु हटैत) अएँ, मे......म ! [ बूढ़ा अचानक बेहोस भए ठामहि पडि रहैछथि। ] बूढ़ी – ( छाती पिटैत) दैबा गे दैबा ! प्रभा – माइ गॉड ! हमरा सभक अबितहिं ई की भए गेलनि। आदित्य – दीज ओल्ड फोक कुड नॉट टोलरेट आवर प्रेजेन्स। लेट अस फ्लाइ बैक ऐज सून ऐज पॉसिबुल। प्रभा – प्लीज हैभ पैशेन्स ए मोमेन्ट। ( बूढ़ी सँ ) माजी, लग मे कोनो डाक्टर छथि ? बूढ़ी – हँ, लगहि मे छथि। चारिए-पाँच घर बामा दिस। प्रभा – हम डाक्टर कें बजा अनैछिऐन। ई पंखा हौंकैत रहथुन। किछु टोकथुन नहि। [ कनेक काल सभ स्तब्ध। प्रभाक संग डाक्टर अबैछथि। ] बूढ़ी – डाकदरबाबू. देखिऔन. की भए गेलनि हिनका। डाक्टर – घबराउ नहि। लगले ठीक भए जएतनि। (जाँच कए छाती पकड़ि कें डोलबैत) जनार्दन बाबू, मन केहन अछि ? बूढ़ा – ( अस्पष्ट ध्वनि मे ) म.....म,  मम...ता....। डाक्टर – की कहलहुँ ? बूढ़ा – ध....धर...धर। डाक्टर – डेलिमा. क्लिअर केस ऑफ डेलिमा। एक दिस ममता आ दोसर दिस धर्म – दूनूक प्रबल आघात सहि नहि सकलाह। आदित्य – एकर प्रतिकार ? डॉक्टर – पहिने ई कहल जाए जे अपने के ? आदित्य – ई हमर पिता, ई माता आ ई...। [ तीनूक बीच नमस्कार ] डाक्टर – तखन तँ एकर प्रतिकार अपनहि दूनूक हाथ मे अछि। खास कए अपनेक श्रीमतीजीक हाथ मे। प्रभा – से कोना ? डाक्टर – ममता कें ततेक जगाउ जे ओ धर्म पर विजय पाबए। अपने कें फोन हमही कएने रही। नीक कएल जे आबि गेलहुँ। आब कोनो चिन्ता नहि। होस आबि रहल छनि। कनेक काल मे नॉर्मल भए जएताह। एखन आज्ञा हो। [  डाक्टर जाइत छथि। आदित्य, प्रभा आ वरुण फेर ओआआहिना पाँती लगाए ठाढ़ भए जाइछथि। बूढ़ी भारी दुबिधा मे पड़लि बकर-बकर पुतोहुक मुह तकैछथि। ] आदित्य – बाबूजी होस मे आबि गेलाह । आब की कएल जाए। प्रभा – लेट मी प्ले ए ट्रिक नाउ। ( बूढाक लग जाए कें ) बाबूजी, आब  हिनक मन केहन छनि ? बूढ़ा – ठीक अछि। प्रभा – कहथु तँ, ई के थिकाह ? बूढ़ा – बेटा। प्रभा – हम के छी ? बूढ़ा – हमर पुतोहु। प्रभा – आ ई  ? बूढ़ा – ई हमर पोता। प्रभा – हम एतेक दूर सँ किएक अएलहुँ। बूढ़ा – अपन सासु, अपन ससुर आ अपन घर-आङन देखए। प्रभा – से तीनू देखि लेल। आब आज्ञा हो, जाइछी। बूढी – ( अकचकाए) अएँ, से किएक। प्रभा – हम अछोप मेम छी। हमरा रहने हिनकर घर छूति जएतनि। (कनैत) हाए रे हमर कपार। बड़ मनोरथ छल, नहि माए-बाप तँ सासु-ससुर सँ माए-बापक दुलार भेटत। ......तेहन पुरुखक हाथ धएलहुँ जे सासुओ-ससुर देखि कें दूर पड़ाइत छथि।.......हिनका लोकनिक भाखा सिखलहुँ, साड़ी पहिरब सिखलहुँ। सब बेकार, सब बेकार। बूढ़ी – ( दौड़ि कें जाए प्रभा कें पँजिआए आँचर सँ नोर पोछैत ) नहि बाजह, एहन कथा नहि बाजह हमर बेटी ( मुह चूमैछथि)। बूढ़ा – (उठि कें प्रभा कें डेन धए घिचैत) बेटी, पहिने बाप कें गोड़ लागह, तखन माए कें। प्रभा – ( ठेहुनिआँ दए बूढ़ाक पाएर पर माथ दए) प्रणाम,बाबूजी। बूढ़ा – (दूनू डेन पकड़ि कें उठबैत) कल्याणवती भव, सौभाद्यवती भव। प्रभा – बाबूजी, आब ई पड़ि रहथु ( बाँहि पकड़ि कें खाट पर बैसाए ओहिना बूढ़ी कें प्रणाम करैत छथि। छन भरि बूढ़ीक मुह निहारि कें ) मा, तों सत्ते हमरा अपन बेटी बुझैछें ? बूढी – सत्ते नहि तँ फूसि। प्रभा – हमरा तखन विश्वास हैत जखन तों हमर हाथक छूअल खएबें। बूढ़ी – खोआ दे जे खोअएबाक होउ। प्रभा – (बैग सँ टिफिन बॉक्स निकालि ओहि सँ एक-एक चमचा लए सभक हाथ मे दैत छथि, वरुण कें भरि प्लेट ) खो दही-चूरा-आम भरि पेट। वरुण – (खाइत आ नाचि-नाचि गबैत अछि) गाम जेबै गाम जेबै गाम जबै ना                                 दही खेबै चूरा खेबै आम खेबै ना गाम जेबै गाम जबै गाम जेबै ना ( माए-बाप कें हाथ पकड़ि कें घिचैत) प्लीज ऐकम्पनी मी । आदित्य – नहि मानत.। बड़ जिद्दी अचि ई छओंड़ा। ( तीनू नचैत-गबैत छथि।) [ तान्त्रिक, जोतखी, वैद्य आ होमिओपैथक प्रवेश। नाच समाप्त कए तीनू यथास्थान बैसैत छथि।] तान्त्रिक – सुनल जे अपने अचेत भए गेल रही, तें हमरा तोकनि पहुँचि गेलहुँ। एतए तँ आनन्दे-आनन्द देखैछी। बूढ़ा – ठीके छन भरि अचेत भए गेल रही। डाक्टर साहेब कहलनि, अधिक आनन्द भेला पर एना होइछै। आब ठीक छी। आनन्द कोना नहि हो। एतेक दिन पर ई पुत्ररत्न अएताह अछि। आदित्य – नमस्कार। बूढ़ा – आ तनिका संग ई पुत्रवधूरत्न प्रभा – नमस्कार। बूढ़ा – आ तनिका कोर मे ई पौत्ररत्न। तान्त्रिक – एना अचेत होएब नीक नहि थिक। फेर नहि हो तकर उपाए हम कए दैछी। ( बूड़ाक माथ पर हाथ दए फुसुर-फुसर मन्त्र पढि ) बस. मा दुर्गाक प्रसादें फेर कहिओ नहि हैत। जोतखी – औजी, ग्रह विपरीत रहतै तँ अहाँक मा दुर्गा की करतीह ? ग्रहक महिमा आब बड़का-बड़का वैज्ञानिको सब मानैत छथि। मूर्छा थिक मनक रोग। मनक मालिक थिकाह चन्द्रमा। सतत चानीक औंठी पहिरने रहू, फेर कहिओ एना नहि हैत। होमिओपैथ – कनेक मुह बाओल जाए ( बूड़ा मुह बबैछथि, डाक्टर चारि-पाँच गोली खसा दैछथि।) आदित्य – अपने किछु बजलहुँ नहि? होमि. - हमर बोलीक काज हमर गोली करैत अछि। वैद्य – मन तँ आनन्द-आनन्द भए गेल मुदा बल ? बूढ़ा – बल एखनहु नहि आएल अछि। वैद्य – ( एक पुड़िआ दैत) हमर ई भीमपराक्रम रस बकरीक दूध मे घोरि तीन दिन खाए लेल जाए। अपने भीमहि कें पछाड़ि देबनि ओहिना जेना जबानी मे पछाड़ैत रहिऐन। आदित्य – अपने लोकनिक फीस ? वैद्य – राम-राम! हमरा लोकनि कारनीक ओतए कहिओ एक टुक सुपारिओ नहि लेल! तान्त्रिक – हँ, तैओ जँ सत्कार करबाक हो तँ मा दुर्गाक प्रसादक संग एक साँझ....। वैद्य – धुरजी! एना घिनाउ नहि। आब चलैत चलू एतए सँ। हिनका बेटा-पुतहु सँ गप करए दिऔन। ( सभ चिकित्सक जाइत छथि।) आदित्य – बाबूजी, सुनल तान्त्रिक महोदयक प्रस्ताव? बूढ़ा – वैद्यजी भनहि धुरजी कहि देथुन, हमरा तँ बड़ आनन्द भेल। आदित्य – से किएक? बूढ़ा – सुनह। हमरा आशंका छल जे समाज बारि ने दिअए। समय बहुत बदलि गेलै। परन्तु समस्या अछि जे सम्हरत कोना.? हम सब अथबल आ तों सब परदेसी। बूढ़ी – ब्राह्मन मुह खोलि कें भात मङलनि तँ कोना नहि देबनि? जेना हैत तेना हम सम्हारि लेब। प्रभा – गुड आइडिआ! सुनैछी मिथिला मे खूब भोज होइए आ ताहि मे खूब व्यंग्य-विनोद. हास-परिहास होइए। आदित्य – ठहाका पर ठहाका चलैए। जे सुनैत रही से देखिए लिअअ। ( बूढ़ीक प्रति) माए, तों कोनो चिन्ता नहि कर। देखैत रह, आइए साँझ खन भोजक सभ सामग्री हबा गाड़ी पर आबि जाएत। बूढ़ा – भोजक ओरिआओन पछाति, पहिने भोजनक ओरिआओन होअओ। आदित्य - आइ पाँचो गोटए एक संग भोजन करब। माए, तोरहु हमरा सभक संग खाए पड़तौ। बूढ़ी – ( विस्मय सँ दाढ़ी पर हाथ दए ) गे मैया ! एहनो कतहु भेलैये। प्रभा – ओना नहि मानबें त हम पकड़ि कें अपना संग बैसा लेबौ। बूढ़ा – ( बूढ़ीक प्रति ) अहाँ जाउ पूआ-पकमान छानए । बूढ़ी – बेटी, चल हमरा संग. तोरा अपन घर-आङन, बाड़ी-झाड़ी देखा दैछिऔ। आदित्य – ( विनोदक मुद्रा मे ) तोहर घर छुततौ नहि ? बूढ़ी – छूतत किएक? लछमीक पाएर पड़त तँ अन-धन सँ भरल-पूरल रहत। [ बूढ़ी, प्रभा आ वरुणक प्रस्थान ] बूढ़ा – तोंहू ओहि कोठली मे विश्राम करह गए। बाट-घाटक थाकल-ठेहिआएल छह। हमरहु आब विश्राम करक चाही। [ दूनूक प्रस्थान। ] चारिम दृश्य [ दूनू कात चारि-चारि कुरसी। बीच मे चौकी। एक कातक कुरसी पर तान्त्रिक आ जोतखी। शेष खाली।] तान्त्रिक – मा दुर्गे, मा दुर्गे। देखू तँ अशिष्टता ! अतिथि आबि गेलाह आ घरबैआ घरहि मे सुटकल छथि। वैद्य – औजी, ई भोज नहि थिकैक, ई थिकैक पार्टी। पार्टी मामूली लोक नहि दए सकैए। आदित्य बाबू सुट-बूट, स्नो-पाउडर लगओने ने एक सेकेंड पहिने, ने एक सेकेंड लेट ठीक घड़ीक सुइ पर उपस्थित भए जएताह। तान्त्रिक – आ भानस-भात तकरो कतहु धुआँ-धुकुर नहि देखैछिऐ। वैद्य – बड़ भूख लागल अछि? जमाइन फाँकि कें आएल छी की? धैर्य धरू। समय पर सभ सामग्री पहुँचि जएतै। [ डाक्टर आ होमिओपैथ अबैछथि आ दोसर कातक कुरसी पर बैसैछथि।] होमिओ. – देखू तँ तमासा, एतेक दिन बापक कोनो खोजे नहि। बाप-पुरुखाक बनाओल मकान ढहल-ढनमनाएल जा नहल छनि तकर सुधिए नहि, आ पहुँचि गेलाह पार्टी कए कें अपन बड़प्पन देखबए। डाक्टर – पहुँचलाह कोना आ किएक से लग आउ, कानमे कहैछी। हम फोन कएलिऐन जे बाप मरै पर छथि तखन अएलाह। ने बाप कें बेटा सँ मतलब, ने बेटा कें बाप सँ। उँच्चा चढि-चढि देखा घर-घर एके लेखा। बूढ भेला पर हमरो-अहाँक इएह दशा हैत। वैद्य – आ पार्टी किएक भए रहल छै से बुझलिऐ ? तान्त्रिक – हम मुह खोलि कें बजलहुँ तें। वैद्य – मा दुर्गा अहाँ कें जीह तँ बड़ सुन्दर देलनि, मुदा बुद्धि देबा मे कने कंजूसी कएलैन। एकरा पार्टी नहि, बूढ़ाक श्राद्ध बूझू। तान्त्रिक – धुरजी ! बापक जिबितहि कतहु श्राद्ध भेलैए? वैद्य – जीबी तँ की-की ने देखी। आब इहो चललैए। बाप कें सन्देह जे मुइला पर बेटा श्राद्ध करत कि नहि। बेटा सेहो सोचलथिन श्राद्ध करए फेर आबए नहि पड़त। तान्त्रिक – ( घड़ी देखि ) आब गप बन्द। पार्टीक समय भए गेल। जे घड़ी ने साहेब पहुँचलाह। [ आदित्य, प्रभा, बूढ़ा, बूढ़ी आ तनिक कोर मे वरुणक प्रवेश। आदित्य ठाढ़ रहैत छथि, आओर सभ सोफा पर बैसैत छथि।] आदित्य – हम अपना दिस सँ आ पूज्य पिताजीक दिस सँ अपने लोकनिक अभिवादन आ स्वागत करैत छी। अपने लोकनि हमर पूज्य पिताजीक प्राणरक्षा कएल तदर्थ हम अपने सभक सदा आभारी रहब। हमरा ई जानि कें बड़ प्रसन्नता भेल जे चिकित्सा मे अपने लोकनिक प्रवीणता आ सेवापरायणताक प्रसादें हमर ई गाम आदर्श स्वस्थ ग्राम घोषित भेल। आइ हमरा अपने लोकनिक श्रीमुख सँ ई सुनबाक लालसा भए रहल अछि जे कोना-कोना अपने लोकनि हमर गाम कें ई सौभाग्य प्राप्त कराओल आओर कोना-कोना हमर पिता कें रोगमुक्त करैत गेलहुँ। धन्यवाद। ( प्रभाक लग बैसैछथि।) तान्त्रिक – ( ठाढ़ भए ) ओं नमो दुर्गायै। आदरणीय जनार्दन बाबू, आ आदित्य बाबू, एहि गाम कें ई सौभाग्य आन ककरो कएने नहि, मा दुर्गाक कृपा सँ प्राप्त भेलैक। हम घर-घर, गाम-गाम चन्दा माङि-माङि.... वैद्य – ( बीचहि मे ) अपन मकान बनओलहुँ। तान्त्रिक – ( तमसाए कें ) चुप ! पहिने हमरा बाजए दिअअ, पछाति जतेक बकबाक हो बकब। की कहैत रही ? हँ, मन पड़ल, चन्दा कए-कए ग्रामवासीक कल्याणक संकल्प कए तीन बेर सहस्रचण्डी महायज्ञ कएल। तहिआ सँ एहि गाम मे हमर चण्डीपाठे सभ रोगक रामबाण भए गेल। तैओ केओ-केओ आतुरतावश चण्डीपाठक संग-संग डाक्टर-बैदक औखधो भकसि लैत अछि, भनहि ओहि मे जहर-माहुर रहओ। डाक्टर – (ठाढ भए) की बजलहुँ, की बजलहुँ ? वैद्य – मुह सम्हारि कें बाजू  ! डाक्टर – कृपया सुनल जाए एहि दूनू धन्वन्तरिक एक प्रसिद्ध कथा। एक दिन ई तान्त्रिकजी आ बैदजी अपना मे की गप करैत रहथि से सुनल जाए। तान्त्रिकजी पुछलथिन बैदजी सँ, अओ, ने अहाँ चण्डीपाठ कएलहुँ. आ ने हम ककरहु कोनो दबाइ देलिऐक; तखन चिता किएक जरैत अछि ? वैद्य – चुप रहू। अहींक, अहींक इंजेक्शन तँ ओकर जान लेलकै। तान्त्रिक – एहन मुह रहत तँ बाट-घाठ मे मारि खाएब। होमिओ. – गरहत्ता दए गाम सँ बैलाउ एहि डाकू डकडरबा कें। डाक्टर – माफ कएल जाए। हम स्वयं पड़ा  जाए चाहैछी । अपने सभ शतमारी वैद्य आ सहस्रमारी वैद्यराज थिकहुँ। भुजैत आ भजबैत रहू एहि स्वस्थ ग्राम कें। तान्त्रिक – जनार्दन बाबू, कान खोलि कें सुनि लिअअ। गरहत्था दए कें एतए सँ निकालू किडनीक सौदागर एहि डकदरबा कें। नहि तँ खाउ अपम पार्टी अपनहि। चलैत चलू सभ केओ एतए सँ। प्रभा – हाए रे हमर कपार ! की करैत की भए गेल। जलदी पड़ाउ एहन गाम सँ। हमरा बड़ डर होइए। आदित्य – अहाँ घबराउ नहि। कने काल धैर्य धरू। प्रभा – माइ गॉड ! ( ठाढ़ि भए लग जाए कान मे ) एहि भयंकर आगि कें अहाँक चुरू भरि पानि किन्नहु मिझाए नहि सकत। जलदी पड़ाउ। आदित्य – कोनो डर नहि। छन भरि धैर्य धए देखू तमाशा। हम जनैछी, एहन सिचुएशन कें कोना कन्ट्रोल कएल जाइत अछि। प्रभा – बेस, लड़ैत रहू अहाँ एहि सिचुएशन सँ। हम आँखि मूनि लैछी। ( आबि कें बैसैछथि।) आदित्य – आदरणीय अतिथि गण, कृपया हमर दू शब्द सुनि लेल जाए, तखन जनिका जे करबाक हो से करैत जाएब। अपने लोकनिक एहि अनुपम प्रतिस्पर्धा कें देखि कें हमरा अपार आनन्द भेल। किएक तँ एकर मूल लक्ष्य रहल गामक लोक कें स्वस्थ राखब। तें हम सभ अतिथिक हृदय सँ प्रशंसा करैत छी। अपने सभ एक सँ एक आगाँ बढ़ि कें हमर पूज्य पिताक प्राणरक्षा कएल ताहि हेतु  हम अपने सभक प्रति आजीवन कृतज्ञ रहब। अपने सभक पाएर पकड़ि प्रार्थना करैत छी जे जेना हमर पिताक प्राण बचाओल तहिना हमर प्रतिष्ठा बचाओल जाए। वैद्य – बाह ! अपने बड़ कौशल सँ एहि विषम परिस्थिति कें सम्हारि लेल। तान्त्रिक – वैद्य जी भनहि सन्तुष्ट भए जाथु, हमर समाधान नहि भेल। हम अपनेक पूज्य पिताजीक मुह सँ ई सुनए चाहैछी जे ओ ककर  चिकित्सा सँ स्वस्थ भेलाह। [ किछु काल सभ बूढ़ाक मुह तकैत अछि। ] बूढ़ा – ( किछु काल सोचि कें ) हमरा पुछैछी तँ हम एतबे कहब जे हम ककरो चिकित्सा सँ नहि, बेटा सपरिवार आबि गेलाह तकर ततेक, ततेक आनन्द भेल जे सभ रोग-बलाए बिलाए गेल। [ सभ चकित भए एक दोसराक मुह तकैत छथि। ] डाक्टर – आब मुह की तकैछी। भेटि गेल उचित बिदाइ। चलैत चलू अपन-अपन घर। खाथु आदित्य बाबू अपन बापक श्राद्धक पिण्ड अपनहि। आदित्य – ( घबराए कें दूनू हाथ जोड़ि ) हम सभक पाएर धरैछी। एहन कठोर दंड देबा सँ पहिने एहि अपराधीक मुह सँ दू शब्द सुनि लेल जाए। बूढ़ा – ( आयासपूर्वक ठाढ़ भए कें ) एक बूढ़ आ ताहि पर चिर रोगी। हमरा होस नहि रहल जे की बाजी की नहि। माफ.....मा..(बोल लटपटाइत छनि आ खसैत जकाँ बैसि जाइत छथि।) आदित्य – पिताजीक एहन स्थिति कें देखैत कृपया अपने लोकनि छन भरि बैसि गेल जाए। ( सभ बैसैत छथि। ) सुनल जाए जे पिताजीक मुह सँ एहन कथा किएक बहरएलनि। ( प्रभा सँ ) कने पानि। (दू घोंट पानि पीबि कें ) सुनल जाए। हम आजुक दुनिआँक चकाचौन्ह मे पड़ि कें आ ( प्रभा दिस संकेत कए ) हिनक मायाजाल मे फँसि कें.... प्रभा – आ हमरा अपन मायाजाल फँसा कें। आदित्य – चुप रहू। एखन मजाक नहि। हमरा कनेको होस नहि रहल जे पिताक हृदय आ माताक ममता केहन होइछै। हम माए-बाप कें सालक साल कलपबैत-कनबैत रहलहुँ। धन्यवाद डाक्टर साहेब कें जे हमर ओ मोह निद्रा तोड़लनि। धन्यवाद एहि ( प्रभा दिस संकेत) ममतामयी नारीरत्न  कें जे हमरा मानू कान पकड़ि कें एतए घीचि अनलनि। बहुत-बहुत वर्ष पर एक संग बेटा, पुतोहु आ पोताक मुह देखितहि आनन्दक लहरी मे सभ रोगव्याधि दहा गेलनि । तहिं ओहन कथी मुह सँ बहराए गेलनि। एहि सभ दुखद घटनाक अपराधी हम छी। क्षमा करू अपने तोकनि। क्षमा करू बाबूजी। क्षमा कर माए। ( माए-बापक पाएर पकड़ि कें कनैत छथि। माए आँचर सँ नोर पोछैत छथिन। ) बूढ़ा – ( डेन धए उठबैत ) बाउ, ई अहाँक दोख नहि। ई एहि घोर कलिकालक दोख थिक। उठू आ सभ कें आदरपूर्वक भोजन करबिऔन गए। तान्त्रिक – आब वितम्ब किएक ? मा दुर्गाक प्रसादें बीझो होअओ। ( आगाँ आदित्य आ प्रभा, तनिक पाछाँ सभ चिकित्सक जाइत छथि.। ) बूढ़ी – बाउ, आँखि खोलह। आब भोज हेतै। चलह देखैले। वरुण – ( झट उठि कें हर्ष सँ हँसैत नचैत ) भोज हेतै  भोज हेतै  भोज हेतै ना भोज खेबै  भोज खेबै  भोज खेबै ना गाम जेबै  गाम जेबै  गाम जेबै ना भोज खेबै  भोज खेबै  भोज खेबै ना भोज खेबै  भोज खेबै  भोज खेबै ना [ बूढ़ी आ वरुणक प्रस्थान।  ] बूढ़ा – ( शून्य दृष्टि सँ चारू दिस ताकि ) चारू दिस सुन। सभ चल गेल, सभ। एहि सुन मे कतेक काल, कतेक काल एना बैसल रहब ? कतेक काल ? हमरहु आब जएबाक चाही।  कोम्हर ? कतए ? नेपथ्य सँ – जतए सँ फेर केओ घुरैत नहि अछि। यद् गत्वा न निवर्तते। यद् गत्वा  न निवर्तते विदेह सदेह:१३ || 455 454 || विदेह सदेह:१३

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fee tte =nt cus 'लोकार्पण, चर्चा आ नाट्य-प्रस्तुति 4 = am (उपन्यास) : गौरीनाथ प्रमुख वक्ता: सुकान्त सोम, सुरेन्द्र स्निग्ध, हृषीकेश सुलभ, प्रेम कुमार मणि 'तारानन्द वियोगी, मोना झा, डॉ. विनय कुमार “दाग 'क पहिल अध्याय ' ब्रहम-शक्ति 'क नाट्य-प्रस्तुति ye आन रूपांतरण आ निर्देशन : कुणाल Ss SPs स्थान: आई एम ए हॉल, दक्षिण गांधी मैदान, पटना ¥ तिथि आ समय : 25 नवम्बर, 2072, संध्या 04:30 बजे F 7:00 बजे आराम दि विशेष: अंतिका प्रकाशनक पुस्तक आ पत्रिका प्रदर्शनी mer 7 'एहिं अवसर पर मित्र सहित अपने सादर आमंत्रित छी। g निवेदक om wage मिश्र, सचिव आ समस्त भंगिमा परिवार, भंगिमा पटना, दूरभाष संपर्क : 9334339348

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