SADEHA — 14

Publication: SADEHA · Issue: 14
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ISSN 2229-547X विदेह सदेह -१४ (विदेह-सदेह १४, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक १२१-१३२) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००-अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html, http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००-अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि,'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. २०००/- संस्‍करण : २०१३, २०२२ Videha Sadeha 14 : A Collection of Maithili Prose and Verse (source:Videha e-journal issues 121-132 at www.videha.co.in). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-३७२) गजेन्द्र ठाकुर - नाटक- गंगा ब्रिज, मैथिली:२०१२ २०१२ आ मैथिली भाषा आ साहित्य, विद्यापति, टैगोर लिटरेचर अवार्ड, गूगल विदेह बुक्स, साहित्य अकादेमीमे मैथिली समन्वयकक मनोनयन आ साहित्य अकादेमीक पुरस्कारक राजनीति, पागक राजनीति, प्राथमिक आ मध्य विद्यालयमे शिक्षाक माध्यम मैथिली माध्यमसँ, नेपाल मे मैथिली, की मैथिली मात्र मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी?, विदेह: लोगो:: विद्यापति:उगना:मिथिला:मैथिली, अनुवाद कथा, मैथिलीमे गजल, धूर्त-समागम वर्सन २०१३-१७ (पृ. २-५७) जगदीश प्रसाद मण्‍डल- लघुकथा-पटि‍याबला (पृ. ५८-७१) बिन्देश्वर ठाकुर- टेनामेनी, दुर्भाग्य, घुसखोर, छुआछुत, प्रेम-पत्र , भुखाएल जानवर सभ बिपतियाक विदेश (पृ. ७२-७८) नवेंदु कुमार झा- गाम मे विज्ञान केँ लोकप्रिय बनबऽ मे लागल छथि मानस बिहारी, बाँटल गेल मैथिली: बरत मिथिला (पृ. ७९-८७) सत्यनारायण झा- भोला, स्मरण (पृ. ८८-९६) शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’- द्वि‍रागमन, सबल समाजक अर्न्‍तद्वन्‍द्वपर सकारात्‍मक प्रहार (पृ. ९७-१०८) अमित मिश्र- हारल विजेता, दरमाहा, हँसी, अधिकार, भूख (पृ.१०९-१३०) जवाहर लाल कश्यप- सीता (पृ. १३१-१३१) सुमित आनन्द- शोध-पत्रिका मैथिली केर लोकार्पण (पृ. १३२- १३३) जगदानन्द झा ‘मनु’- वसिअतनामा, बुढ़ारीक डर, जादूक छड़ी, नेनाक सनेस, बाबाक हाथी, जुग-जुग जीबए..., समय चक्र, आस्था, तरेगन, गारेन्टी (पृ. १३४-१४९) राम भरोस कापडि भ्रमर- यात्रा प्रसंग- रायपुरक मिथिला महोत्सबः उत्साहक बाढि आ मनीष झा (पृ. १५०-१५४) रमेश रञ्जन- मैथिली बालनाटक सीमा विस्तार करैत — ‘चौआरि’ (पृ. १५५-१६४) प्रसुन सिंह- नारीक चरित्र सभसँ रंगल कथासंग्रह ‘जिद्दी’ (पृ.१६५-१६७) ओम प्रकाश झा- गजलक लेल (समीक्षा) (पृ. १६८-१७०) विनीत उत्पल- हम आन्हर रही तइसँ प्रैक्टिस खूब केलौं: राजकुमार झा (विनीत उत्पल संग अन्तर्वार्ता) (पृ. १७१-१७८) उमेश मण्‍डल- साक्षात्‍कार श्री राजदेव मण्‍डलक संग, वि‍देह नाट्य उत्‍सव- २०१३, वि‍देह सम्‍मान समारोह, कवि सम्मेलन, एकांकी आ नाटक (सतमाए, गंगा ब्रि‍ज, जट-जटीन, जजाति, ऊँच-नीच, साइकि‍लक पाय) (पृ. १७९-२०७) आशीष अनचिन्हार- भक्ति गजल, भविष्य (पृ. २०८-२१२) अवनीश मण्‍डल- गप्‍पक खौंइचा (पृ. २१३-२१३) मुन्नी कामत- पाँत-पातसँ बनल परिवार (पृ. २१४-२२२) शारदानन्द दास परिमल- राजनन्दनक आत्मालाप (पृ. २२३-२२९) कामिनी कामायनी- घुइर ताकू, माटीक मुरुत (पृ. २३०-२५१) कैलास दास- ममता (पृ. २५२-२५८) डॉ. शंभु कुमार सिंह- पाखलो (कोंकणी उपन्यास)- तुकाराम रामा शेट- मैथिली अनुवाद- डॉ. शंभु कुमार सिंह (पृ. २५९-३६३) अशोक मनभुटकर-हर एक लोक आ माटिक कथा (‘पाखलो’)-अनुवाद शम्भु कुमार सिंह (पृ. ३६४-३७२) पद्य- खण्ड (पृ. ३७३-७३६) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल- की भेटल आ की हेरा गेल, भक्ति गजल, किछु गजल (पृ. ३७४-४३४) पंकज चौधरी नवलश्री- किछु बाल गजल, किछु भक्ति गजल, किछु गजल (पृ. ४३५-४५६) मनोज कुमार मण्‍डल- कित -कित, सुन बाबू सुन, लोभ, बक-बक, इंजन, रे मन! कऽ ले कनी विश्राम, भाव भरल अछि मनमे, के छथि धर्मात्मा, बचपन, नहि त'अ ई बहि चलत, हम छी पागल, प्रश्न (पृ. ४५७-४७०) मो. गुल हसन- उदास लागै..... (पृ. ४७१-४७२) अमित मिश्र- किछु बाल गजल, किछु भक्ति-गजल, आइ मिथिलामे सीया सीया शोर भऽ गेलै, नेङगरा दरबान, पतंग बनाबै रे, बाबाकेँ, उसनल अण्डाक न्याय, राति दिवालीक, जनमदिनक शुभकामना, प्रमाण, गीत, जीवन एहिना चलैत रहै छै, जागू, मित्र, समयक संग, नारीक रूप (पृ. ४७३-४९५) कुन्दन कुमार कर्ण- बाल गजल, गजल (पृ. ४९६-४९७) आशीष अनचिन्हार- नुकाएल बलात्कारी रूप, किछु गजल (पृ. ४९८-५०३) किशन कारीगर- होरी मे मचाउ हुरदंग, डिनर डिप्लोमेसी, दूधपीबा नेना, मनुक्ख बनब कोना? (पृ. ५०४-५११) मुन्नी कामत- किअए बेटी बनेलहक विधाता?, दुनियाँ तबाह भऽ गेल!, बेटी-लहास, फगुआ, आनहर कानुन (पृ. ५१२-५१८) प्रीति प्रि‍या झा- कऽ देलखि‍न उपकार महाशय (पृ. ५१९-५२१) राजीव रंजन मिश्र- गजल, जानकी गीत (पृ.-५२२-५२३) राजदेव मण्‍डल- पसरैत प्रशाखा, खसैत बुन्‍द, गन्‍तव्‍यक भरम, दरदक भोर, केहेन मांग, लटकल छी, बटमारि‍क गीत, रूचि‍गर, बजैत एकान्‍त, स्‍वरक चेन्‍ह, सुखक भाय, हएत अगारी, मनुखदेवा, अप्‍पन हारि, दगध सुर, इजोतक वस्‍त्र, बाबा केर लाठी, गीतक पूर्व संगीत, शि‍शुक स्‍वर, बोलती बन्न, दि‍लक आवाज, नेंगरा मजदूर, मनक दुआर, छाँहक रूप (पृ. ५२४-५५३) राम वि‍लास साफी- पढ़ल-लि‍खल तनि गौर करि‍यो बबूआ (पृ. ५५४-५५६) सन्तोष कुमार मिश्र- गुलामी डे (पृ. ५५७-५५९) जितेन्द्र ‘जितु’- गरीबीक जाड़, कथी लए...?, यथार्थ (पृ. ५६०-५६६) राजेश कुमार झा- जों अहाँ नै छी (पृ. ५६७-५६७) शान्ति लक्ष्मी चौधरी- मतिभ्रम (पृ. ५६८-५६९) शेफालिका वर्मा- अहाँक गाम कतऽ अछि?, पाहन अप्पन प्राण भेल ! (पृ. ५७०-५७१) बिनीता झा- वरदान, तम्बाकू दिवस पर, चैन, देखू आइ एफबी परक खेल (पृ. ५७२-५७६) कामिनी कामायनी- ई केक्कर शोणित ?, खिड़की, भरोस, पुष्पांजलि, आस्थाक पूर्ण कलश, खिलैत पलास वन, आधुनिक स्त्रीगण (पृ. ५७७-५९५) अनिल मल्लिक- गजल (पृ. ५९६-५९६) बिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली"- भक्ति गजल, किछु गजल, प्रवासक वेदना, सुनि लिअ दू बात हमर, अन्हार जिनगी, हिसाब जिनगीक, खूनक ढेला संग नव पुस्तक पतन, प्रेमक फल, पिया अहाँक यादमे, हमर समाज बौरा गेल (पृ. ५९७-६१२) अब्दुल रजाक- गणतान्त्रिक देश (पृ. ६१३-६१४) जगदानन्द झा ‘मनु’- किछु रुबाइ, बाल गजल, किछु भक्ति गजल, किछु गजल, बाल कविता- होएत जँ (पृ. ६१५-६३९) शिव कुमार यादव- किछु गजल (पृ. ६४०-६४४) रामवि‍लास साहु- सुखल खेत आ भूखल पेट, मि‍थि‍लाक पि‍यास, कि‍अए छुबाइ छी, पुसक राति, केना कहब भारत महान (पृ. ६४५-६५२) रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’- किछु झारू, किछु गीत (पृ. ६५३ ६५६) शि‍व कुमार झा “टि‍ल्‍लू”- पुरीक यात्रा (पृ. ६५७-६६५) सुमित मिश्र- किछु भक्ति गजल, किछु गजल (पृ. ६६६-६७२) सुरेन्द्र शैल- मुदा करबै की?, बटोही, नवका महेशवाणी, चुहाड़ (पृ. ६७३-६७९) बाल मुकुन्द पाठक- किछु गजल (पृ. ६८०-६८७) पसुपुलेटि गीता- मूल तेलुगु कविता: पसुपुलेटि गीता; तेलुगुसँ हिंदी अनुवाद: आर.शांता सुंदरी; हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद: विनीत उत्पल (दिल्लीक बलात्कारक घटनापर)- दुमर्जा (पृ. ६८८-६९१) हेम नारायण साहु- हम छी मैथि‍ल (पृ. ६९२-६९४) डॉ. शि‍व कुमार प्रसाद- खेबैया, माय हमर नव कुम्‍भ नहेली, देख एलौ हम पटना, शहर ओ गेल......, बौआ केर उबटन (पृ. ६९५-७०४) बेचन ठाकुर- स्‍वागत गीत (प्रि‍य पाहुन......,अति‍थि‍गण स्‍वागतम्......) (पृ. ७०५-७०७) रामचन्‍द्र प्रसाद- प्रदूषण, कि‍सानक हाल (पृ. ७०८-७११) क्रान्ति कुमार सुदर्शन- प्रेम शब्द (पृ. ७१२-७१२) नवीन कुमार ‘आशा’-हनीमून (पृ. ७१३-७१४) बृषेश चन्द्र लाल- कहिआधरि ढुनैत रहब ! (पृ. ७१५-७१६) ओम प्रकाश झा- किछु गजल (पृ. ७१७-७१८) मिहिर झा- भक्ति गजल (पृ. ७१९-७१९) प्रदीप पुष्प- गजल (पृ. ७२०-७२०) इरा मल्लिक- किछु भक्ति गजल, गजल, कविता, होलीक एक दूटा पाँति (पृ. ७२१-७२८) रमा कान्त झा- होलीक हुरदंग (पृ. ७२९-७३०) बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक (पृ. ७३१-७३६) 2

गद्य खण्ड गजेन्द्र ठाकुर नाटक- गंगा ब्रिज गंगा ब्रिज पात्र: बच्चा १ जे अभियन्ता बनैए बच्चा २ अभियन्ताक मित्र (बादमे मुख्य अभियन्ता बनैए) बच्चा ३ (जे बादमे मजदूर बनैए) मुख्यमंत्री मीत बाउ लाला दादा बिलट इन्जीनियरक पत्नी ठिकेदार मजदूर शिक्षक (वा शिक्षिका)१ शिक्षक (वा शिक्षिका)२ किछु छात्र-छात्रा ढोलहो देनहार डंका बजेनहार (दूटा लोक) बतही माए पैघ भाए पल्लव एक स्टेजक एक कात किछु मजदूर सभ खट-खुट कऽ गिट्टी पजेबा तोड़ि रहल छथि लगैए जे गंगापुलक मरोम्मति भऽ रहल अछि, कारण किछु मजदूर जय माँ गंगे कहि मंचक नीचाँ प्रणाम सेहो कऽ रहल छथि। स्टेजक दोसर कात दूटा लोक नीचाँ राखल नगाड़ा-ढोलपर चोट दऽ रहल अछि। तखने एकटा ढोलहो देनहारक प्रवेश। ढोलहो देनहार : गंगा ब्रिज। पवित्र गंगापर बनल ऐ पुलक मरोम्मति लेल मजदूर चाही। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभ कियो आवेदन दऽ सकै छथि। (ढोलहो दैत) सुनै जाउ, सुनै जाउ।… गंगा ब्रिज। पवित्र गंगापर बनल ऐ पुलक मरोम्मति लेल मजदूर चाही। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभ कियो आवेदन दऽ सकै छथि। एकटा लोक (डंका बजेनाइ छोड़ि काज करैत मजदूर सभकेँ अकानैत ढोलहो देनहार लग अबैए , मुदा दोसर लोक आस्ते आस्ते डंका बजबिते रहैत अछि): देखै छिऐ जे काज तँ चलिये रहल छै, तखन फेर? ढोलहो देनहार: (ओइ लोक दिस ध्यान नै दैत कृत्रिम रूपसँ बजैत) एतबे मजदूरसँ काज नै चलतै। पूरा पुल हिल रहल छै। (ढोलहो दैत) सुनै जाउ, सुनै जाउ।… गंगा ब्रिज। पवित्र गंगापर बनल ऐ पुलक मरोम्मति लेल मजदूर चाही। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभ कियो आवेदन दऽ सकै छथि। दोसर लोक (डंका बजेनाइ छोड़ि कऽ ढोलहो देनहार लग अबैए): एतबे दिनमे कोना ई हाल भऽ गेलै। सुनै छिऐ जतेक पाया ऐ पुलमे छै ततेक कताक करोड़ टाका एकरा बनबैमे खर्च भेल रहै। ढोलहो देनहार: (अहू लोक दिस ध्यान नै दैत कृत्रिम रूपसँ बजैत) काज ढंगसँ नै भेल रहै। सुनै जाउ, सुनै जाउ...। गंगापर बनल ऐ पुलक मरोम्मति लेल मजदूर चाही। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभ कियो आवेदन दऽ सकै छथि। सुनै जाउ, सुनै जाउ। एकटा लोक: (दर्शक दिस तकैत) देखै छिऐ, जहिया बनिये रहल छलै, बनि कऽ तैयारो नै भेल रहै, तहियेसँ ऐ पुलक मरोम्मति शुरू छै। दोसर लोक: (ओइ लोकपर ध्यान नै दैत दर्शक दिस तकैत) चिप्पीपर चिप्पी पड़ि रहल छै। उद्घाटनसँ पहिनहिये सँ चिप्पी पड़नाइ शुरू भऽ गेल रहै। ढोलहो देनहार: (दुनू लोकपर ध्यान नै दैत आँखि मुनैत बजैत) सरकारी पुल छिऐ, चिप्पी नै पड़तै तँ इन्जीनियर आ ठिकेदारक घरपर छज्जा कोना पड़तै। सुनै जाउ, सुनै जाउ...। एकटा लोक: (ढोलहो बल दिस आब मुँह करैत बजैए) हौ ढोलहोबला, से तँ बुझलिऐ, मुदा से ने कहऽ जे दुनियाँ मे आनो ठाम पुल बनै छै, से ओतुक्का इन्जीनियर आ ठिकेदारक घरपर छज्जा पड़ै छै आकि नै हौ। ढोलहो देनहार: (ओइ लोक दिस अचकचा कऽ तकैत) किजा ने गेलिऐ, मुदा सुनै छिऐ अंग्रेजबला पुल मजगूत होइ छलै। (दर्शक दिस तकैत) सुनै जाउ, सुनै जाउ...। दोसर लोक: (पहिल लोक दिस आब मुँह करैत बजैए) हौ, अनेरक पाइ आबै छलै लूटिक तँ जे एकाध टा पुल अंग्रेज बनेलकै से मजगूते ने हेतै हौ। एकटा लोक: (दोसर लोक दिस आब मुँह करैत बजैए) ई इन्जीनियर आ ठिकेदार सभ लूटिमे अंग्रेजसँ कम नै छै, मुदा पुल मजगूत किए नै बनबै छै हौ। ओइ बनबैमे अंग्रेज सन किए नै छै हौ। दोसर लोक: (पहिल लोक दिस मुँह करैत बजैए) मजगूत बना देतै तँ फेर मरोम्मतिक ठेका कोना भेटतै हौ। (ढोलहो बल दिस आब मुँह करैत बजैए) की हौ ढोलहोबला.. ढोलहो देनहार: (दोसर लोकक गपपर ध्यान नै दैत) किजा ने गेलिऐ। सुनै जाउ, सुनै जाउ...। गंगापर बनल ऐ पुलक मरोम्मति लेल मजदूर चाही। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभ कियो आवेदन दऽ सकै छथि। सुनै जाउ, सुनै जाउ। (ढोलहो बला चलि जाइए।) पहिल लोक:आब सरकारो की करतै, लोके सभ गड़बड़ छै। दोसर लोक:लोक ककरा कहै छिहीं, हम आ तूँ। पहिल लोक: नै रौ। इन्जीनियर आ ठिकेदार। दोसर लोक:धुर बूड़ि, आब अंग्रेजक सरकार थोड़बे छै। पहिल लोक:तँ की अर्थ बदलि जेतै। दोसर लोक:हँ रौ। पहिल लोक:तँ इन्जीनियर आ ठिकेदार लोक नै भेलै। दोसर लोक:नै। पहिल लोक:तँ की भेलै। दोसर लोक:ओ सभ भेलै सरकार। पहिल लोक: धुत्, सरकार मनुक्ख थोड़े होइ छै। दोसर लोक:मनुक्खे होइ छै। राजो महराजा सभ जखन मनुक्खे होइ छलै, अंग्रेजो सभ जखन मनुक्खे होइ छलै तखन ई तँ स्वतंत्र भारतक सरकार छिऐ। पहिल लोक:अच्छा, तखन पटना आ दिल्ली मे सरकार छै से की छिऐ रौ। दोसर लोक:ओहो सरकारे छिऐ। पहिल लोक:धुर्, ई इन्जीनियर तँ गामेक लोक छै। गामक लोक कतौ सरकार भेलै हँ, गाममे तँ जमीन्दारक अमला टा केँ लोक सरकार कहै छै। दोसर लोक:आदति छै लोककेँ तेँ जमीन्दारक अमलाकेँ अखनो सरकार कहै जाइ छै। किछु दिन बिततै, ओकरा सभकेँ लोक सरकार नै कहतै। पहिल लोक:तूँ तँ अन्तर्यामी बुझाइ छेँ। आर सभ की हेतै रौ। दोसर लोक:सरकार इन्जीनियरकेँ बहाल केने छै, ठिकेदारसँ काज करबै छै, ई सभ सरकार छिऐ। ई सभ जे चाहते सएह हेतै। पहिल लोक:हमरा आ तोरासँ किछु नै हेतै? दोसर लोक:हम आ तूँ किछु लोककेँ चुनबै। ई सभ ओकरा सभक कहलमे रहतै। पहिल लोक:रौ, सरकारी कर्मचारीमे तँ गामक चौकीदारो छै, ऑफिसक चपरासीयो छै। तँ ओहो सभ सरकार भऽ गेलै। दोसर लोक:हँ रौ। पहिल लोक:तखन अपने सभ खाली लोक भेलिऐ। जे करतै यएह सभ करतै। दोसर लोक:अपने सभ चुनबै, आ ओकरा सभक कहलमे ई सभ रहतै। पहिल लोक:माने अपने सभक कहल मे रहतै (किछु ओकरा बुझाइ नै छै, मुँहपर भाव अबै-छै जाइ छै।) दोसर लोक:हँ, सएह ने भेलै। पहिल लोक: (किछु ओकरा बुझाइ नै छै, मुँहपर भाव अबै-छै जाइ छै।) देखा चाही सरकारक राज…. पाछाँसँ दू-दूटा तिरंगा झण्डा लेने बच्चा सभ अबैए। संगमे दूटा शिक्षक छै। एकटा शिक्षक (बा शिक्षिका) आगाँ-आगाँ आ एकटा शिक्षक (बा शिक्षिका) पाछाँ-पाछाँ चलि रहल छथि। सभ मजदूरकेँ एक-एकटा झण्डा दऽ देल जाइ छै। “ओइ दुनू टा लोककेँ सेहो एक-एकटा झण्डा देल जाए”- ई गप शिक्षक इशारामे कहै छथि, मुदा झण्डा घटि गेलै, से ओ दुनू खाली हाथ रहि जाइ छथि आ सभक मुँह ताकऽ लगै छथि। मजदूरक सोझाँ ओ दुनू लोक ठाढ़ भऽ जाइए आ फेर डंके लग आबि ठाढ़ भऽ जाइए आ आश्चर्यसँ देखऽ लगैए। त्रिवार्णिक झण्डा लऽ कऽ बाकी सभ गोटे मंचपर छितरा जाइ छथि आ स्टेजपर ठाढ़ भऽ जाइ छथि। उल्लासक वातावरण सगरे पसरल अछि, दुनू लोककेँ छोड़ि सभक मुँहपर (मजदूर सभक सेहो) हँसी-प्रसन्नता आबि जाइ छै। जखन सभ ठाढ़ भऽ जाइ छथि तखन दुनू शिक्षक (वा शिक्षिका) बच्चा सभक आगाँ आ दर्शक सभक सोझाँ ठाढ़ भऽ जाइ छथि। “१५ अगस्त” ई नारा दुनू शिक्षक बाजै छथि आ “स्वतंत्रता दिवस” ई सभ मिलि कऽ (दुनू लोक केँ छोड़ि कऽ) बाजै छथि। शिक्षक (वा शिक्षिका) १: बौआ-बुच्ची। आइ ई त्रिवार्णिक झण्डा हमरा सभक हाथमे फहरा रहल अछि। पहिने हम सभ दोसराक अधीन छलौं, पराधीन छलौं, ई झण्डा झुकल छल, फहरा नै सकै छलौं। झण्डा फहराइत रहए ओइ लेल हमरा सभकेँ जोर लगाबैत रहऽ पड़त। (चारू दिस हाथ पसारैत) ऐ इलाकामे आब खुशी पसरत। जमीन्दारक राज खतम भऽ गेल। सभ कियो पढ़ि सकै छथि। झगड़ा-झाँटी, युद्ध, आब सभ खतम भऽ गेल। हमरा सभक जीवनमे एकटा नवका भोर आएल अछि। नवका शिक्षा, नवका खेतीक चलनि हएत। शिक्षक (वा शिक्षिका) २: बड़का चिमनीक धुँआ आ बड़का-बड़का बान्ह। बिलैंतसँ आबैबला सभ समान चिमनीबला फैक्ट्रीमे तैयार हएत। बड़का-बड़का बान्ह ओइ धारकेँ बान्हि-छेक कऽ सञ्जत कऽ देत। खूब उपजत खेत, बर्खा बरखत इन्द्रक नै, हमरा सभक प्रतापसँ। खेते-खेत बहत धार, हएत पटौनी। छोट-पैघक भेद मेटा जाएत। शिक्षक (वा शिक्षिका) १: छोट-पैघक भेद मेटा जाएत? बड़का चिमनीक धुँआ आ बड़का-बड़का बान्ह छोट-पैघक भेद मेटाएत? शिक्षक (वा शिक्षिका) २: हँ। पटौनी हएत खेते-खेत। बिलैंतसँ आबैबला सभ समान आब एतै चिमनीबला फैक्ट्रीमे तैयार हएत। शिक्षक (वा शिक्षिका) १: बड़का बान्ह आ बड़का फैक्ट्रीसँ ढेर रास समस्या सेहो आबै छै। ओकर निदान जरूरी छै। विकास एकभग्गू भऽ जाएत। शिक्षक (वा शिक्षिका) २: विकास एकभग्गू कोना हएत? शिक्षक (वा शिक्षिका) १: बड़का फैक्ट्री सभ ठाम नै लागि सकत, कतौ-कतौ लागत, ओतऽ बोनिहारक पड़ैन हएत। बड़का बान्ह बनलासँ ओकर भीतरक गामसँ सेहो लोकक पड़ैन हएत। बड़का बान्ह जँ मजगूत नै हएत तँ ओ टूटत आ प्रलय आएत। बड़का फैक्ट्री आ बड़का बान्ह लोकक जिनगीकेँ छहोछित कऽ देत। शिक्षक (वा शिक्षिका) २:एक पीढ़ीकेँ तँ बलिदान देबैए पड़त। बच्चा सभ, बाजै जाउ। अहाँ सभ देश लेल अपनाकेँ समर्पण करब आकि नै। शिक्षक (वा शिक्षिका) १: बच्चा सभ, बाजै जाउ, अहाँ सभ की बनऽ चाहै छी। समाजकेँ की देबऽ चाहै छी। बच्चा १: हम इन्जीनियर बनब आ सड़क, पुल, नहर बनाएब। जइसँ लोकक दुःख दूर हेतै। बच्चा २: हमहूँ इन्जीनियर बनब। बड़का-बड़का बान्ह, बड़का-बड़का चिमनीक धुँआ। धुँआ सुंघैमे हमरा बड्ड नीक लागैए। कतेक नीक दिन आएत, बड़का-बड़का बान्ह, बड़का-बड़का चिमनी देश भरिमे पसरि जाएत। बच्चा १: मुदा धुँआसँ खोँखी होइ छै। हमर माए खोँखी करैत रहैए। हमरा धुँआसँ परहेज अछि। बच्चा २:मुदा हमर माए तँ भनसाघर जाइतो नै अछि। मुदा हम जाइ छी, चोरा-नुका कऽ, आ धुँआक गंध, बड़का देवार, ई सभ हमरा बड्ड नीक लगैए। (एकटा बच्चाक धरफड़ाइत प्रवेश) बच्चा-३: हमर बकड़ी देखलिऐ यौ। (सभ चुप्प भऽ ओकरा दिस देखऽ लागैए।) बच्चा ३: (मुँहपर हाथ रखैत, कने हँसैत) पढ़ाइ होइ छै एतऽ यौ। जय भारत, जय भारत, जय भारत.. हमर बकड़ी (पाछाँ दिस तकैत).. ओम्हर देखै छी। (बच्चा ३ क प्रस्थान) शिक्षिका २: नीक गप। मुदा विकास केहन हुअए, ई सभ हमरा सभक हाथमे नै अछि। पटना आ दिल्लीमे ई निर्णय हएत जे हमरा सभ लेल केहन विकास हेबाक चाही। शिक्षिका १: नीक गप। नीक गप जे हमरा सभक विकास लेल पटना आ दिल्लीमे सोचल जा रहल अछि। मुदा ओतऽ बैसि कऽ वा एकाध दिनक हलतलबीमे कएल दौड़ासँ ओ सभ उचित निर्णय लऽ सकता? जे से, मुदा हम सभ समाज लेल काज करी, से सतत ध्यान रहए। पूरा इमानदारीसँ, जान जी लगा कऽ ऐ देशक इतिहास हमरा सभकेँ बनेबाक अछि, से ध्यान रहए। आइ १५ अगस्त १९४७ केँ हम ई प्रण ली, वचन दी। सभ बच्चा: हम सभ वचन दै छी, हम सभ पूरा इमानदारीसँ जान जी लगा कऽ ऐ देशक नव इतिहास लिखब। (“१५ अगस्त” ई नारा दुनू शिक्षक बाजै छथि आ “स्वतंत्रता दिवस” ई सभ मिलि कऽ (दुनू लोक केँ छोड़ि कऽ) बाजै छथि, दुनू लोक मंचक कोनमे कतिआएल सन ठाढ़ छथि। बच्चा आ शिक्षक सभ मजदूर सभसँ झण्डा आपस लऽ लै छथि। मजदूर सभ फेर बैसि कऽ ठक-ठुक करऽ लगैए। दुनू लोक ओतै हतप्रभ ठाढ़ रहैए। फेर पर्दाक पाछाँ कोनमे देखऽ लगैए जेना ककरो एबाक प्रतीक्षा कऽ रहल हुअए। तखने दुनू हरबड़ा कऽ जाइए आ एकटा कुर्सी आनि कऽ राखैए। एकटा ४०-४५ बर्खक अभियन्ता मंचपर अबैए। अभियन्ता कनेक हाँफि रहल अछि, कुर्सी देखिते ओ धबसँ ओइ कुर्सीपर बैसि जाइए। फेर साँस स्थिर कऽ ठाढ़ होइए। ठक-ठुक बन्द भऽ जाइ छै आ मजदूर सभ फ्रीज भऽ जाइए, ओ दुनू लोक कोन दिस डंका लग चलि जाइए आ फ्रीज भऽ जाइए। अभियन्ता बाजऽ लगैए।) अभियन्ता: (कुर्सीकेँ झमाड़ैत) एना। एना हिलि रहल अछि ई, ई गंगा ब्रिज। सीमेन्ट, बालु, गिट्टीक कंक्रीटसँ बनल ई पुल कठपुलासँ बेशी हिलैए। जहिया आबै छी, मरोम्मतियेक काज चलैत रहै छै। वन-वे, एक दिस; एक्के दिसुका मात्र भऽ कऽ रहि गेल अछि ई। एक्के दिस पुल खुजल छै, दोसर दिस कोना चलत, अदहा पुलपर मरोम्मतिक काज भऽ रहल अछि। (तखने ओ आभासी रूपमे हिलऽ लगैए आ ओकर बाजब थरथरा उठै छै।) ई पुल तँ एत्ते हिलि रहल अछि जत्ते गामक कठपुलो नै हिलैए। (तखने एकटा ठिकेदार अबैए।) ठिकेदार (अभियन्तासँ): हइ इन्जीनियर। तोहूँ वएह कऽ वएह रहि गेलेँ। बालुकेँ एना कऽ चालनिसँ चालू, ओना कऽ चालू, जेना ओ चाउर दालि हुअए मुदा हम सेहो चाललौं। ठीक छै ठीक छै। तूँ कहै छलेँ जे रोटी बनेबा लेल जेना चालै छी तहिना पुल बनेबा लेल चालू, तखने नीक रोटी सन नीक पुल बनत। ठीक छै ठीक छै। फेर एतेक सीमेन्ट, एतेक बालु, एतेक.. हम कहने रही जे हम तोहर सभ गप मानब, मुदा तखन नेता, दोसर इन्जीनियर, गुण्डा, एकरा सभकेँ कमीशन कतऽ सँ देबै? तोरा कहलासँ बालु चालऽ लगलौं आ कमीशन बन्द कऽ देलिऐ। हमर तँ किछु नै भेल मुदा तोहर बदली भऽ गेलौ, तोहर दरमाहा बन्न भऽ गेलौ। बच्चा सभक नाम स्कूलसँ कटाबऽ पड़लौ, गाम पठाबऽ पड़लौ बच्चा सभकेँ। हम कहने रहियौ तोरा, जे बालु चालब, एतेक सीमेन्ट, एतेक बालु, सभ निअमसँ देबै। हमरा की? इलाकाक पुल, सड़क… जतेक मजगूत रहतै ततेक ने नीक। हमरो लेल नीके। मुदा हमरा बूझल छल जे तोहर बदली भऽ जेतौ। चीफ इन्जीनियर, नेताक दहिना हाथ.. पहिने हमरे कहने रहए तोरा रोलरक नीचाँमे पिचड़ा कऽ दैले.. बइमान चीफ इन्जीनियर। देख, पहिने हमरो होइ छल जे तोहूँ ओकरे सभ जेकाँ छेँ, अपन रेट बढ़ाबैले ई सभ कऽ रहल छेँ। मुदा बादमे हम देखलौं जे नै, तूँ अलग छेँ। मुदा हम की करू? हम अपन बच्चाक नाम स्कूलसँ नै कटबा सकै छी। मुदा जौँ तोरा सन चीफ इन्जीनियर आबि जाए.... कहियो से दिन आबए... तखन हम फेरसँ बालु चालब शुरू करब आ वएह चालल बालु, एत्ते बालु एत्ते सीमेन्टमे मिलाएब। एत्ते बालु, एत्ते सीमेन्ट, सभटा ओहिना जेना अहाँ तूँ कहै छलेँ। मुदा जखन तोरा सन कियो आबए तखने किने। ताधरि तँ... (अभियन्ता आ ठिकेदारक प्रस्थान। लागल जेना फ्रीज लोककेँ अभियन्ता आ ठिकेदारक गपक विषयमे बुझल नै भेलै जेना ई सभ आभाषी छल। दुनूटा लोक फ्रीज स्थितिसँ घुरि असथिरसँ डंका बजबऽ लगैए आ तखन मजदूर सभ सेहो फ्रीज स्थितिसँ आपस आबि जाइए आ फेरसँ ठकठुक करऽ लगैए। दुनू लोक डंकाक अबाज आस्ते-आस्ते तेज करऽ लगैए आ फेर ठक-ठुकक अबाज मद्धिम पड़ि जाइए आ डंकाक अबाजक संग पर्दा खसैए।) पल्लव दू (इन्जीनियरिंग कॉलेजक दीक्षान्त समारोह, विद्यार्थी सभ ठाढ़ अछि आ शिक्षक (बा शिक्षिका) भाषण दऽ रहल छथि। अभियन्ता आ अभियन्ताक मित्र सेहो विद्यार्थी सभ मध्य ठाढ़ अछि।दुनू लोक डंकाक संग कोनमे बैसल अछि।) शिक्षक/ शिक्षिका १: अहाँ सभक आइ ऐ इन्जीनियरिंग कॉलेजमे अंतिम दिन अछि। एतुक्का जीवन आ असल जीवनमे बड्ड अन्तर छै। आब अहाँ सभकेँ धूरा-गर्दामे जेबाक अछि। काज करबाक अछि। मोन लगा कऽ काज करबाक अछि। एतेक काज करबाक अछि जे ई खेत सोना उपजाबऽ लागए। लोकक जीवनमे समृद्धि आबि जाए। दिन-राति नै देखबाक अछि। यएह हमर दक्षिणा हएत। ऐ दीक्षान्त समारोहमे अहाँ सभसँ हम यएह आग्रह करै छी। हमर देश, हमर लोक बड्ड मुश्किलसँ स्वतंत्र भेल अछि। मुदा ई स्वतंत्रता मानसिक रूपसँ आबि जाए तखन ने। आर्थिक रूपसँ हम दोसरासँ स्वतंत्र भऽ जाइ, ककरो आगाँ हाथ नै पसारऽ पड़ए, बजबाक स्वतंत्रता तखने आबि सकत। अभियन्ता माने बनेनहार, सर्जक। सड़क बनेनहार, नहर बनेनहार, पुला बनेनहार। अभियन्ता माने जोड़ैबला। ई पुल लोककेँ लोकसँ जोड़त। सड़क सभ बनत। लोकक जीवनमे गति आएत, दौगत जिनगी। नहरि, पोखरिसँ भरल इलाकामे सोना उपजत। (विद्यार्थी सभक करतल ध्वनि।) शिक्षक/ शिक्षिका २:अहाँ सभकेँ बड़का-बड़का काज करबाक अछि। बड़का-बड़का बान्ह बनेबाक अछि। ओहीसँ विकास हेतै, ओहीसँ तेजीसँ विकास हेतै। सगरे विश्वमे अही तरहेँ विकास भेल छै। भारतकेँ स्वतंत्रता भेटल छै, आ ई स्वतंत्रता तखने काएम रहि सकत जखन तेजीसँ विकास हएत। आ तेजीसँ विकास हएत बड़का-बड़का फैक्ट्री आ बड़का-बड़का बान्हसँ। शिक्षक/ शिक्षिका १: ओना तँ हमरा विकासक ओइ बड़का पथसँ मतभिन्नता अछि, कारण बड़का फैक्ट्रीमे हमर लोक मजदूरे बनि कऽ ने रहि जाए, बड़का मजगूत पक्का बान्ह बनबैमे जतेक पाइ चाही तत्ते ऐ देश लग छैहो नै, तखन बड़का कच्ची बान्ह कतेक गामकेँ अपन पेटमे लेतै, ओतेक मजगूत नै रहतै, टुटैत भंगैत रहतै, सदिखन ओकर मरोम्मतिये होइत रहतै। शिक्षक/ शिक्षिका २: मुदा मुजफ्फरपुरक ऐ दीक्षान्त समारोहमे विकासक पथक दिशा नै तय कएल जा सकैए। ओ तँ दिल्ली आ पटनेमे तय हएत। आब…(जोरसँ बजैत) ऐ दीक्षान्त समारोहमे सभसँ बेशी नम्बर लऽ कऽ पास केनिहार छात्रकेँ हम बजबऽ चाहै छियन्हि। (अभियन्ताकेँ हाथक इशारासँ बजबैए आ मेडल पहिराबैए)। (विद्यार्थी सभक करतल ध्वनि। शिक्षक/ शिक्षिकाक प्रस्थान।) अभियन्ताक मित्र: दोस। अभियंत्रणक पढ़ाइमे तँ तूँ बाजी मारि गेल छेँ। आब असल जिनगी शुरू हएत। देखी ओतऽ के बाजी मारैए। अभियन्ता: अभियन्ताक जीत छै जे ओकर बनाएल पुल कतेक मजगूत छै, ओकर बनाएल नहरि आ बान्ह पानिक निकासीमे बाधा तँ नै दै छै। ओ लोकक जिनगी सुखी बना पाबैए आकि नै। काज समयसँ पूर्ण होइ छै आकि नै। ओइ परीक्षामे ककरा कतेक नम्बर अबै छै तहीसँ ओकर जीत-हारि निर्धारित हेतै। अभियन्ताक मित्र: बड़का काजमे कने-मने गलती तँ होइते रहै छै, हेबे करतै। जे कहीं भाइ, हमरा तँ बड़का छहर, बड़का फैक्ट्री, बड़का चिमनी बड्ड नीक लगैए। धुँआक सुगन्ध तँ हमरा बच्चेसँ नीक लगैए, तोरा तँ बुझले छौ। अभियन्ता:आ हमर माएकेँ धुँआसँ खोँखी होइ छै, हमरा धुँआ नीक नै लगैए। तोरा तँ बुझले छौ। अभियन्ताक मित्र:देख भाइ, हमरा आ तोरामे की अन्तर अछि। हम तँ ओइ पथपर आगाँ बढ़ि जाएब जे दिल्ली बा पटना हमरा लेल निर्धारित करत। मजगूत बड़का पक्का बान्ह बनाबैले कहत तँ से बनेबै, कमजोर बड़का कच्चा बान्ह बनाबैले कहत तँ से बनेबै। जे उपरका हाकिम कहत से करबै। अभियन्ता: चाहे ओ नीक हुअए बा खराप। अभियन्ताक मित्र: ऊपरमे बैसल छै तँ कोनो गुण छै तेँ नै बैसल छै। आ गुणी लोक अधला गप किए कहतै? अभियन्ता:तखन एतऽ पढ़ि कऽ, ज्ञान अर्जित कऽ कऽ की फाएदा? अभियन्ताक मित्र:छोड़ भाइ। अभियन्ता:जीत आ हारिमे बड्ड कम अन्तर होइ छै। जीत आ हारिक परिभाषामे सेहो बड्ड अन्तर छै। जे काज हम गलत बुझै छिऐ, जे मार्ग हम गलत बुझै छिऐ ओइ काजकेँ हम कोना करब, ओइ मार्गपर हम कोना बढ़ब। अभियन्ताक मित्र: भाइ, जेना जीत आ हारिक परिभाषा अलग होइ छै तहिना तँ सही आ गलत काज, सही आ गलत मार्गक सेहो अलग-अलग परिभाषा होइत हेतै। अभियन्ता: होइत हेतै ककरो लेल, सही तँ सही रहतै आ गलत गलते रहतै। अभियन्ताक मित्र: देख भाइ। हम तँ सुखितगर परिवारसँ छी, मुदा तूँ तँ साधारण परिवारसँ छेँ। हम तँ कमाइ-धमाइ नै करब, गलत-सलत नै करब तैयो हमर परिवारकेँ फर्क नै पड़तै। मुदा तोरापर तँ पूरा परिवार निर्भर छै, आस लगेने छौ। अभियन्ता: भाइ, ई स्वतंत्रता तँ सभ लेल आएल छै। तोरा लागै छौ जे हम गरीब छी, आ कियो तेहनो छै जे हमरोसँ बेशी गरीब आ लचार अछि। किछु एहनो छै जे तोरासँ बेशी धनीक आ सामर्थ्यवान छै। अभियन्ताक मित्र: जेना.. अभियन्ता: ओ सभ जे सभ आदेश देतै आ तूँ आँखि मूनि कऽ तकर बात मानबेँ। अभियन्ताक मित्र:देखहीं। आब पुरनका जमीन्दारी तँ गेलै। आब जे नबका देश सभ छै ओइमे ओही लोक सभक चलती हेतै जे नवका व्यवस्थामे पैसि पेतै। जे नवका जमीन्दार चुनावमे जीत जेतै, से बचतै, बा जकर बच्चा नवका सरकारमे आगाँ जेतै से बचतै। तकरे धन बचते, तकरे ऐश्वर्य काएम रहतै। अभियन्ता: आ आगाँ बढ़ब माने? अभियन्ताक मित्र: माने सत्ताक ऊपर, सत्ताक सीढ़ीक ऊपर, जतेक ऊपर जे चढ़तै से ततेक पैघ सत्ताबला हेतै। तोरा लग ई मौका आएल छौ आ हमरो लग आएल अछि। मुदा दुनूमे कनी अन्तर सेहो छै। तोरा सत्ता प्राप्त करबाक छौ आ हमरा सत्ता बचेबाक अछि। अभियन्ता:की ओइसँ तूँ तृप्त भऽ जेमे। अभियन्ताक मित्र:से आइ कोना कहियौ? से तँ जिनगीक अन्त कालेमे कहल जा सकैए। अभियन्ता:मुदा जिन्गीक अन्तकालमे जँ तोरा बुझाउ जे ई सभ सत्ता भ्रम रहए, जे असल तृप्ति नै भेटल, तखन? अभियन्ताक मित्र: तखन तखने सोचबै? अखन तँ सएह सोचाएल अछि जे कहलियौ। अभियन्ता: आ तहिया जँ घुरबाक मोन हेतौ तखन कोना घुरबेँ? अभियन्ताक मित्र: चल, पश्चाताप कऽ लेब तहिया। मुदा जँ से तोरा संग हौ? तखन तूँ कोना घुरबेँ? अभियन्ता:सही गलत केना भऽ जेतै भाइ। अभियन्ताक वर्ग: यएह जिद ने तोरा खा जाउ। आइ खुशीक मौका छै, आइ तूँ जीतल छेँ तेँ आइ तोरे गप सही, मुदा आइये धरि। (तखने दुनू लोक डंका बजबऽ लगैए। अभिन्ता, अभियन्ताक मित्र संग सभ विद्यार्थी मंचसँ बहरा जाइए।) (बच्चा ३ जे आब पैघ भऽ गेल अछि आ ठेला चलबैए, प्रवेश करैए।) ठेलाबला: हमर ठेला कियो गुरका कऽ लऽ गेल। (दुनू लोकसँ) ई भीड़ कतऽ गेलै हौ। पैघ पढ़ाइ बला कॉलेज छिऐ, की बदलतै पढ़ि कऽ, देखा चाही। (दुनू लोकसँ) ठेला देखलहक हौ हमर। कियो लऽ गेल गुरका कऽ। (प्रस्थान) पहिल लोक: (दोसर लोकसँ) रौ, ई कोन कॉलेज छै रौ। दोसर लोक:सरकार बनबै छै ई कॉलेज। पहिल लोक:सरकार बनबै छै? दोसर लोक:हँ रौ सरकार बनबै छै। पहिल लोक:मुदा ओ इन्जीनिअर तँ कहै छलै जे ओ सरकार नै बनत। लोके रहत। दोसर लोक:मुदा ओकर संगी की कहै छलै से नै सुनलहीं। पहिल लोक:सुनलिऐ, ओकरा तँ कनी बेसिये हरबड़ी छलै। दोसर लोक:एहेन आनो स्कूल कॉलेज छै रौ, सरकार बनाबैबला। पहिल लोक:ठीके रौ। दोसर लोक:हँ रौ ठीके। पहिल लोक:ओतौ दू तरहक विद्यार्थे तँ नै हेतै रौ? दोसर लोक:सभ ठाम दू तरहक विद्यार्थी रहै छै। एकटा जे सरकार बनि जाइ छै आ दोसर जे लोके बनल रहऽ चाहै छै। पहिल लोक:आ से सरकारोमे रहै छै की? आ लोकमे? दोसर लोक:सरकारोमे लोक रहै छै आ लोकोमे सरकार। पहिल लोक: (ओकरा किछु नै फुराइ छै) एक्के कॉलेज, एक्के स्कूल आ दू तरहक विद्यार्थी? दोसर लोक: सभ स्कूल आ कॉलेजमे दू तरहक मास्टर रहै छौ रौ बूड़ि। दू तरहक विचार घुरमैत रहै छै ओइ स्कूल कॉलेजमे। तरा-उपड़ी.. पहिल लोक:विद्यार्थी सभकेँ तँ घुरमा लागि जाइत हेतै रौ। दोसर लोक:घर-पड़ोसी, सेहो तँ स्कूले छिऐ ने रौ बूड़ि। सेहो असरि करतै की नै। पहिल लोक: (डंकापर एकटा चोट दैए आ फेर सोच लगैए) असरि करतै? (फेर डंकापर एकटा चोट दैए) असरि करबे करतै।(सोचऽ लगैए) देखा चाही की होइ छै। (दोसर लोक डंकापर एकटा चोट दैए। पहिल लोक दोसर दिस ताकऽ लगैए। फेर एकटा चोट पहिल लोक दैए, फेर दोसर लोक डंकापर चोट दैए। आ फेर दुनूक मुँहपर हँसी आ बेरा-बेरी डंकापर चोट दैत डंकाक गति बढ़ऽ लगैए। पर्दा खसैत अछि।) पल्लव तीन (गामक दृश्य। अंगनामे अभियन्ताक बतही माए आ कनियाँ काकी बैसल छथि, आ अभियन्ता ठाढ़ अछि।) कनियाँ काकी: (अभियन्तासँ) आबऽ बाउ, एतऽ बैसऽ। बतही माए: आइ अहाँ ऐ गामक पहिल इन्जीनियर बनि गेलौं। पिता रहितथि तँ कत्ते खुशी होइतथि। कनियाँ काकी:की करबै कनियाँ, मुदा अहाँक बेटा अछि धरि बापे सन जिदियाह। बतही माए: से तँ अछिये। कनियाँ काकी:कियो कतबो भाङठ लगेलकै मुदा पढ़ाइ पूरा केबे केलक। बतही माए: गाममे एकटा एम.एल.ए. भेबो कएल तँ सेहो चण्डाल भऽ गेल। नै जानि कोन अराड़ि ठाढ़ कऽ लेलक। एकटा दसखत कऽ दितए तँ एतेक कष्ट जे हमर बाबूकेँ पढ़ाइमे भेल से नै होइतए। कनियाँ काकी:खाली भोट कालमे मोन रहै छै। तखन कतेक मीठ बोल भऽ जाइ छै यै। बतही माए: आ बादमे लोककेँ कहै छै, की होइ छह तोरे भोटसँ जीतल छी। कनियाँ काकी: से एम.एल.ए.केँ हम सुना एलियनि हेँ। बतही माए:कहिया यै। कनियाँ काकी: से नै बुझलिऐ। बेटाक दुरागमनमे पीअर बच्चा एम.एल.ए.क अंगनामे ओलबा-दोलबा उठा दै गेलै जे कनियाँक कानबला हरा गेलै। सिपहिया गेटे बन्न कऽ देलकै जे जावत कानबला नै भेटतै तावत कियो बाहर नै जा सकैए। मार बाढ़नि। बतही माए:देखू तँ। कनियाँ काकी: आ सुनू ने। फेर कानबला कनियाँक केशमे भेटलै, तखन गेट खोललकै। झाँट बाढ़नि गै दरबारकेँ। मुदा टटीबाकेँ खूब सुनेलिऐ आ तइ लाथे अपन बाउक कागचपर जे पीअर बच्चा दसखत नै केलक सेहो सुना देलिऐ। बतही माए: हमरा बतहिया कहऽ जाइ लागल अछि। आब बुझौ, बतहियेक बेटा ने इन्जीनियर भेलै। अभियन्ता: जे भेलै से आब गुजरि गेलै। गामक लोक पढ़ि जेतै से एम.एल.ए. केँ नै ने सोहेतै। के टहल टिकोरा करतै? लोक आगाँ नै बढ़ए, की ऐ लेल देश स्वतंत्र भेल छै? बतही माए: सभ अपन-अपन काज जतनसँ करए, जान-जी लगा कऽ करए। कनियाँ काकी: की ई गप एम.एल.ए. लऽ नै छै यै? बतहिया कहतै, देखू तँ.. अभियन्ता: काकी, माएकेँ लोक बतहिया कहै छै तँ काल्हि हमरो लोक बतहा कहऽ लागत। तैँ डरि कऽ की हम कर्तव्यक पालन नै करी, बेइमान बनि जाइ? कनियाँ काकी: नै बच्चा, से तँ आब सभ बुझि गेल छै जे कतेक जिदियाह छह तूँ। जान-जी लगा कऽ काज करत, से सभकेँ बुझल छै। (नेपथ्यसँ अबाज- हाकिम आएल अछि कि?) (पैघ भाए प्रवेश करैत अछि।) पैघ भाए- बौआ, दलानपर लोक सभ जुमल अछि। कनी बहार दिस ऐब। अभियन्ता- अच्छा भाइ। (माए आ कनियाँ काकीक प्रस्थान आ लोक सभक आगमन।) दादा:(अभियन्तासँ) हाकिम, आइ कहऽ तोरा की चाही? टोल, गाम, इलाकामे शोर भऽ गेलै। बड़का-बड़का लोक मुँह तकिते रहि गेल। मुदा गामक, इलाकाक पहिल इन्जीनियर अपन गामेक भेल। पहिने हाकिम सभ फिरंगी सभ होइ छलै, ई पीअर बच्चा, एम.एल.ए., ई सभ छोटका जमीन्दार छल, बड़का जमीन्दार सभ एकरा सन-सन जमीन्दारकेँ जखन मोन जोकही पोखरिमे भरि-भरि राति ठाढ़ कऽ दै छलै। ई हमर हाकिमक कागचपर दसखत नै केलक! भोट दऽ कऽ जितबै जाइ गेलिऐ, जे गामक, इलाकाक कल्याण करत, मुदा केलक किछु नै। आब तँ पाँच साल ओकरो पुरि जेतै, आब देखबै छिऐ। पटना विधानसभामे एक्को बेर नै बाजल इलाकाक कल्याणक लेल। लाला: हइ दादा, से नै कहक। एक बेर बाजल रहए पटना विधासभामे ओ। (व्यंग्यसँ नकल करैत बजैत) हुजूर, हमर खेत नील गाय चरि जाइए, से ओकरा मारै लेल, डरबै लेल बन्दूकक लाइसेंस देल जाए। (सभ ठहक्का लगबैए।) बाउ: हौ लाला। ओहो जमाना छलै, खतम भेलै। कहियो देहसँ बलगर लोकक चलती छलै, फेर कुल-खानदानक चलती एलै। आब हाथसँ काज करैबलाक समए आएल छै। पढ़ाइ-लिखाइपर रोक लगेने आब रोक लगतै हौ? बिलट: हौ बाउ। ठीके कहै छह। जे हवा बहल छै हौ से कियो रोकि देतै हौ। बाउ: हौ बिलट। प्रयास तँ केबे ने केलकै रोकबाक। मुदा हमर इन्जीनियर हाकिम बड्ड जिद्दी छै हौ। आइ हमर भैयारी जिबैत रहितै तँ देखितहक शान। टोलकेँ माथपर उठा लैतै हौ। गर्द कऽ दैतै हौ। मुदा बापक कमी कक्का सभ पूरा करतै हौ। रौ मीत, बाउ बच्चाक दोकानपर जो आ कहिहैं चारि अढ़ैया चिन्नी दरबज्जापर पठाएत, जल्दी। हमर नाम लिखबा दिहैं। लाला: से नै हेतऽ, हम्मर नाम लिखबा दिहैं रौ। दादा- नै रौ, हम्मर नाम। बिलट- हे, बाउ बच्चा कोनो तोरा सभक टोलक छिअ। हम्मर नाम लिखबा दिहैं रौ छौड़ा। मीत- (एक हाथ मोड़ने) एक-एक अढ़ैया चारू गोटेक नामपर लिखबा देबऽ। (सभ हँसऽ लगैए।) ढोलहो देनहार: नवका इन्जीनियर हाकिम आइसँ गामक बाहरक धारक पुल बनाओत, छोटका पुल। ओकरा सड़कसँ जोड़ल जाएत। सभ अपन-अपन खेतक माँटि जौँ सड़कपर काटि कऽ देबै तँ जे काज साल भरिमे हेबाक से एक मासमे भऽ जाएत। सुनै जाउ, सुनै जाउ....। नवका इन्जीनियर हाकिम आइसँ गामक बाहरक धारक पुल बनाओत, छोटका पुल। (तखने मजदूर सभ कोदारि लऽ कऽ आबि जाइए, चारिटा कोदारि एक गोटेक हाथमे बेशी छै, लाला, दादा, बिलट आ बाउकेँ ओ एक-एकटा कोदारि दऽ दै छै। सभ काल्पनिक रूपसँ माटि उखारऽ लगै जाइए। मीत सभकेँ देखैत इशारा दैत ढोलहो देनहारक संग प्रस्थान करैए। अभियन्ता जेबीसँ इन्ची टेप निकालैए आ नाप-जोख करऽ लगैए।) पल्लव चारि (पटनामे मुख्यमंत्रीक कार्यालय। मुख्यमंत्री कुर्सीपर बैसल छथि आ मुख्य अभियन्ता कल जोड़ि कऽ ठाढ़ छथि।) मुख्यमंत्री- देशकेँ स्वतंत्र भेना कतेक साल भऽ गेल मुदा पटनामे गंगा नदीपर एकोटा पुल नै बनल। बड्ड प्रयास केलापर ऐबेर एकरा लेल फण्डक व्यवस्था भेल अछि। अहाँ संग बैसकी ऐ लेल बजाओल गेल अछि जे एकरा लेल जे टेण्डर देल जाएत तकर छार-भार मुख्य अभियन्ते पर ने रहै छै। अखबारमे विज्ञापन दऽ दियौ मुदा.. (मुख्य अभियन्ताकेँ बजबै छथि आ कानमे किछु फुसफुसा कऽ कहै छथि) ..बुझि गेलिऐ ने। अपन मोनमाफिक लोककेँ एकर ठेका भेटए। आ अहाँ संगे इन्जीनियरिंग कॉलेजसँ कतेक रास विद्यार्थी बहरेला, हुनका सभकेँ आब नीक अनुभव भऽ गेल छन्हि। ओइमे सँ ढङक अभियन्ता सभकेँ आनू जे अपन काज नीक जेकाँ जनैत होथि। मुख्य अभियन्ता: हँ, से तँ करैए पड़त। नै तँ ऐ ठिकेदार सभपर लगाम केना कसल हएत। (मुख्य अभियन्ताक प्रस्थान।) मुख्यमंत्री: (दर्शक दिस ताकि) ई गंगा ब्रिज विकासक गति बढ़ा देत। लोक जे शिथिल भऽ बैसल अछि, आवाजाही करऽ लागत। लोकक दिमाग आवाजाहीसँ खुजतै। (नेपथ्यसँ तालीक गरगड़ाहटि) बड्ड मोश्किलसँ स्वतंत्र भेल अछि लोक। मुदा ऐ स्वतंत्रता लेल जतेक बलिदान देबऽ पड़ल अछि, ओइसँ बेशी बलिदान देमए पड़त ओकरा बचेबा लेल। ई धार, ई पुल, सभ बलिदान मंगैत अछि। (मंचक दोसर दिस हाथसँ संकेत करैत) ई गंगा, की बुझाइए बिनु बलिदाने ऐपर पुल बनि सकत? खून चाही एकरा। की दऽ सकब अहाँ? (नेपथ्यसँ- हम सभ खून देब, जतेक चाही खून देब।) मुख्यमंत्री- यएह सुनऽ चाहै छलौं हम। यएह देखऽ चाहै छी। हम अपन भविष्यक पीढ़ी लेल जतेक बलिदान देब, ततेक बेशी सुखी भविष्यक पीढ़ी हएत। (मुख्य अभियन्ता अबैए। मुख्यमंत्री दर्शक दिससँ मुँह घुमा कऽ ओकरा दिस मुँह कऽ लैए।) मुख्य अभियन्ता: गप भऽ गेल अछि। ठिकेदार कमीशन दै लेल तैयार अछि। मुख्यमंत्री: आ लोक बलिदान दै लेल। (दुनूक ठहक्का।) मुख्य अभियन्ता: इन्जीनियरक लिस्ट तैयार कऽ रहल छी। काज करैबला लोक चाही नै तँ ई ठिकेदरबा सभटा लूटि खाएत। मुख्यमंत्री: कमीशन गछि कऽ कोनो खरीद लेने अछि ठिकेदरबा। सवारी कसने रहए पड़त। नै तँ लोकक बलिदान खाली चलि जाएत। (दुनूक ठहक्का) पल्लव पाँच (हैल्मेट पहीर कऽ अभियन्ता आ मुख्य अभियन्ताक प्रवेश, हेल्मेट पहिरने मजदूर सभक प्रस्थान।) अभियन्ता: काजक प्रगतिसँ, काज करबाक तरीकासँ हम खुशी नै छी। नै तँ कोनो प्रकारक सुरक्षाक इन्तजाम अछि आ ने समानक गुणवत्तापर कोनो ध्यान अछि। काज सेहो सभटा दू नम्बरक भऽ रहल अछि। सुरक्षाक इन्तजाम रहितए तँ एतेक मजदूर धारमे खसि कऽ, खधाइमे खसि कऽ मशीनपर खसि कऽ नै मरितए। घाइल मे सँ कतेको केँ बचाओल जा सकै छल। फर्स्ट-ऐड धरिक व्यवस्था नै अछि। पछिला मास तीस टा मजदूर मरि गेल। एक सालमे तीन सए मजदूर मरि गेल। मात्र दस गोटेक परिवारकेँ अनुकम्पाक अनुशंसा भेलै। दोसर सभक फाइल जे हम बढ़ेलौं, तकर की भेलै। मुख्य अभियन्ता:देखू, अहाँ हमरा संगे पढ़ै छलौं। अहाँ काबिल इन्जीनियर छी मुदा अहाँ इन्जीनियरिंग धरि अपनाकेँ सीमित किए नै राखै छी? अहाँ बिना बातक अनुकम्पा आ अनुदानक मुद्दा किए उठा रहल छी। अहाँ बड़-बरनी फाइल बढ़ा देलिऐ, आब आगाँ की भेलै, किए भेलै, ओइसँ अहाँकेँ की मतलब अछि? अभियन्ता: माने? इन्जीनियरिंग माने मजदूर जानक कोनो मोल नै। बोनिहारक जिनगी चलि गेलै मुदा ओकर परिवार? ओकर की हेतै? ओकर भोजन केना चलतै? ओकर बच्चाकेँ माए-बापक स्नेह कोना भेटतै? काल्हि तँ दुनू बोनिहार-बोनिहारिन वर-कनियाँ पुलक पायासँ नीचाँ खसि कऽ मरि गेलै। ओकर बच्चाक भार की सरकारपर नै छै। आ ओ पाइ सरकारक जेबीसँ जेतै, ओइमे अहाँकेँ कोन नोकसान अछि। मुख्य अभियन्ता: देखू। एतेक मृतकक संख्या जँ सोझाँ एतै तँ हमरा आ मुख्यमंत्रीपर आरोप लागत। गधमिसान मचि जेतै। मजदूर सभ ठाम-ठामक अछि, मुदा जँ समाचार बहरेतै तँ पूरा देशमे आगि लागि जेतै। विश्वमे बदनामी हेतै। खूनी मोकदमा चलतै। नै हमहीं बचब, नहिये मुख्यमंत्री बचता। अहाँक चलते ई सभ हेतै। अही दुआरे हम अहाँकेँ अनने रहौं ऐ प्रोजेक्टमे? एतेक पैघ प्रोजेक्टमे दुइयो हजार बलि गंगा मैया नै लेथिन्ह? मुदा ऐ प्रोजेक्टक समाप्तिक बाद जे सम्मान हमरा भेटत ओइमे अहूँक हिस्सा रहत। अभियन्ता: ओही हिस्सासँ डरा रहल छी हम। सम्मानक हिस्साक संग ऐ बलिक बा हत्याक हिस्सा सेहो भेटत, ओकर हिस्सा नै चाहै छी हम। मुख्य अभियन्ता: अहाँ जे करऽ चाहै छी ओइसँ विकास रुकत। अभियन्ता: कोन विकास। कोन मोलपर हएत ई विकास। आ कतेक दिनक लेल अछि ई विकास। मुख्य अभियन्ता: दुनियाँमे सभ ठाम अहिना विकास भेल छै। अभियन्ता: तेँ ऐ पुलक मरोम्मति उद्घाटन भेलासँ पहिनहियेसँ हेबऽ लागल छै। तेहेन मजगूत अछि ई विकास। मुख्य अभियन्ता: (कने जोरसँ) दुनियाँमे सभ ठाम अहिना विकास भेल छै। अभियन्ता: तेँ लोक कहऽ लागल अछि जे अंग्रेजक पुल ठाढ़े छै आ स्वतंत्र भारतक पुल बनैसँ पहिनहिये टूटि रहल छै! मुख्य अभियन्ता: (जोरसँ) दुनियाँमे सभ ठाम अहिना विकास भेल छै। अभियन्ता: तखन तँ लोक बाजऽ लागत जे अंग्रेजेक राज नीक रहै। मुख्य अभियन्ता: बाजऽ दियौ। अभियन्ता: लोक कहत जे सभटा पाइ अभियन्ता खा गेलै। मुख्य अभियन्ता: बाजऽ दियौ। अभियन्ता की अपन जेबीमे राखत, एतै खर्चा करत। बरखा भारतेमे हेतै इंग्लैण्डमे नै। अभियन्ता: इन्जीनियरिंगक अलाबे अर्थशास्त्रक सेहो अहाँ अध्ययन केने छी । पोवर्टी एण्ड अनब्रिटिश रूल ऑफ इण्डिया- दादाभाइ नौरोजी। ड्रेन ऑफ वेल्थक सिद्धान्त। दादाभाइ सोचनहियो नै हेता जे स्वतंत्र भारतक अभियन्ता लेल ओ ई सिद्धान्त देने छथि। मुख्य अभियन्ता: माने अहाँक अलाबे सभ गलत छै? अभियन्ता: नै, हमरा तँ लगैए जे हमरा अलाबे सभ सही छै। मुदा तखन छोट-छोट चीजकेँ पैघ किए बना रहल छी? मुख्य अभियन्ता: अहाँ जकरा छोट गप कहै छी, बुझै छी, से छोट नै छै। अभियन्ता: अहाँक हाथमे शक्ति अछि। मुख्यमंत्री धरि अहाँक मुट्ठीमे छथि। बदली कऽ दिअ हमर। मुख्य अभियन्ता: बदली नै कऽ सकै छी। लोक अहाँक संग अछि। मजदूर अहाँक संग अछि। चुनाव आबैबला छै। मुख्यमंत्रीक आदेश छन्हि, अहाँक बदली हम नै कऽ सकै छी। अभियन्ता: तखन? मुख्य अभियन्ता: अहाँक कोनो गप हम नै मानि सकै छी। अभियन्ता: तखन? मुख्य अभियन्ता: तखन देखै छी, बुझब तँ अहाँ नहिये। पल्लव छह (मुख्यमंत्री आ मुख्य अभियन्ता बैसल छथि) मुख्य मंत्री: काजकेँ डिस्टर्ब कऽ रहल अछि। प्रगतिक विरोधी अछि। एहेन लोक सभकेँ की कहू। मुख्य अभियन्ता: बदली कऽ दियौ। चुनावमे देरी छै। लोक बिसरि जाएत। मुख्यमंत्री: लोक तँ बिसरि जाएत मुदा विपक्षी पार्टी गप खोधत। एकरा तँ मोन होइए गोली मरबा दिऐ। मुख्य अभियन्ता: एहेन गलती जुनि करब। भगत सिंह बनि जाएत। मुख्यमंत्री: कोना भगत सिंह बनि जाएत? आब अंग्रेजक शासन थोड़बे छै। प्रगति विरोधी अछि ई इन्जीनियर। आतंकवादी बना देबै। मुख्य अभियन्ता: आतंकवादी नै बना सकै छिऐ। सरकारी कर्मचारी छी, इन्जीनियर छी। पब्लिक थोड़बे छी जे आतंकवादी बना देबै। मुख्यमंत्री: करप्शन चार्जमे फँसा दियौ। छापा मरबा दियौ। मुख्य अभियन्ता: दू नम्बर पाइ लैते नै अछि, छापामे खाट टा घरमे भेटत। मुख्यमंत्री: कोनो तँ कमी हेतै। से ताकू। मुख्य अभियन्ता: जिदियाह अछि, यएह कमी छै। मुख्यमंत्री: तखन मरबाइए दै छिऐ। कोनो कमी नै छै तँ जीबि कऽ की करत? मुख्य अभियन्ता: एहेन गलती जुनि करब। महात्मा गाँधी बनि जाएत। जीजस क्राइस्ट बनि जाएत। मुख्यमंत्री: कमी ताकू। अहाँ संगे तँ ओ शुरूसँ पढ़ल अछि। ओकरा नै मारऽ चाहै छी तँ ओकरामे कमी ताकू। आ कमी नै ताकि सकै छी मारि नै सकै छी तखन की करू। आत्महत्या करबा दियौ? मुख्य अभियन्ता: आत्महत्या करैबला जीब नै अछि ओ। जिदियाह अछि। मुख्यमंत्री: तँ ओकरा मरबा कऽ आत्महत्या केलक से हल्ला कऽ दियौ। मुख्य अभियन्ता: ई गप कियो कियो नै मानत। सभ यएह कहत जे हत्या भेलै। मुख्यमंत्री: तखन? मुख्य अभियन्ता: ओकरा मरऽ पड़तै। ओकर हत्या हेतै। मुख्यमंत्री: आ से नै हत्या लगबाक चाही आ नहिये आत्महत्या, तखन तँ ओकर बुढारी तक रुकऽ पड़त। मुख्य अभियन्ता: (क्रूर हँसी हँसैत) नहिये ओ हत्या हत्या लगतै आ नहिये आत्महत्या। ओ दुर्घटना लगतै। दुर्घटना… ऐ स्वतंत्र देशमे पब्लिककेँ आतंकवादी बना कऽ मारल जेतै आ ऐ तरहक लोककेँ दुर्घटनामे। मुख्यमंत्री: (क्रूर हँसी हँसैत) धऽ दियौ तखन रोलरक निच्चाँमे। मुदा ई समुच्चा घटना एकदम दुर्घटना लगबाक चाही, लोक जँ बुझि गेल जे मारल गेल छै तँ ठीके अनेरे ओ हीरो बनि जाएत। मुख्य अभियन्ता: बहुत दुख हएत हमरा ओकर मृत्युसँ। हमरे संग पढ़ै छल। बड्ड काबिल इन्जीनियर छल। (पर्दा) पल्लव सात (लाश राखल छै, दूटा बच्चा आ इन्जीनियरक विधवा हिचुकि रहल अछि।) बतही माए: छोड़ि गेल...हौ देब। बतहीक बेटा बतहा। (लाश उघाड़ि कऽ देखैत बेहोश भऽ खसि पड़ैए।) बाउ-भैयारी गेल। पहलमान कक्काक रहैत भातिज पिचड़ा भेल पड़ल अछि। हौ भैयारी, की जवाब देबऽ तोरा हौ। दादा- कहै जाइ छै जे दुर्घटना छिऐ। दुर्घटनामे एना कऽ पिचड़ा होइ छै। रोलर तँ ओनाहियो अस्थिरसँ चलै छै। लाला-आइ धरि सुनने छलहक रोलरसँ पिचा कऽ कियो मरल होइ, रोलरसँ दुर्घटना होइ छै हौ। बिलट-ककरा बले छाती फुलेबै हौ, ककरा कहबै संघर्ष करै लेल। के करतै मेहनति हौ, के करतै कानूनक पालन। मीत-के सत्य बजतै हौ, मुदा नै बजबै तँ हाकिम की कहत हौ बिलट काका। नै संघर्ष करबै तँ हाकिम की कहतै हौ। नै मेहनति करबै तँ, नै कानूनक पालन करबै तँ, तँ कोना फुलेबै हाकिमपर छाती हौ। पैघ भाए: केहेन चण्डाल भऽ गेल। पैघ भाए जिबिते छै, आ छोटका छोड़ि गेल। बतहा.. चाटी उठबैले चन्ना गाछी चलि जाइ छल।हौ, ई पृथ्वी छिऐ, एतऽ बाहरक शक्ति नै आबै छै। एतुक्के लोकक हाथमे छै नीक आ अधला। बेसी अधले छै तँ अधले नै बनल भेलऽ? पृथ्वी, अकास ओहिना ठाढ़ छै। ई अन्याय देखियो कऽ भूकम्प नै एलै, अन्हर बिहाड़ि नै एलै। दुनियाँ अहिना चलैत रहतै। (जेना अन्हर-बिहाड़ि आएल छै, सभ हाथपर मुँह लऽ लैत अछि।) (बच्चा ३ जे आब मजदूर बनि गेल अछि धरफड़ा कऽ प्रवेश करैत अछि। आँखि कारी आ नोराएल आ कपड़ा लत्ता फाटल छै।) मजदूर: नोकरी लेल गेलौं। ठेला चलबैत थाकि गेलौं। नोकरी लेल ठकि-फुसिया कऽ लै जाइ गेल। भदोही। (भदोही नाम अबिते कूही भऽ जाइए, थरथड़ाइत कानैत स्वरमे बजैए) काज रुकिते लोहाक छड़सँ मारै छल। एक टाइम खेनाइ। आँखिमे निन्न आएल आकि थापड़। स्वतंत्र देश। स्वतंत्र स्कूल। स्वतंत्र कॉलेज। (पैघ भाएसँ) की भेलै हौ। मरि गेलै। पैघ भाए: मारि देलकै। मजदूर: मारि देलकै बा मरि गेलै, जान तँ निकलिये गेलै ने हौ। किए मारलकै? पैघ भाए: गंगा पुल, बलि लेलकै ई गंगा पुल। मजदूर: ढोलहो पीटै छलै, मजदूर चाही, मजदूर चाही। गंगा पुलक मजदूरे बनि जइतौं, अनेरे भदोही गेलौं, से मोनमे हुअए मुदा आब तँ। पैघ भाए: भने चलि गेलऽ भदोही, नै तँ मजदूर सभक ढेर बलि चढ़ल छै। मरि जइतह। आ तकर विरोध ई इन्जीनियर करितै आ ओहो पिचड़ा भऽ जइतै। मजदूर: मुदा भदोही सँ जे हमरा सभकेँ छोड़ेलक? पैघ भाए: ओहो पिचड़ा भऽ गेल हेतै। मजदूर: पिचड़ा भऽ गेल हेतै। जाए दैह, जाए दैह भदोही। जौं नै पिचड़ा भेल हेतै तँ बचेबै ओकरा। (मजदूरक प्रस्थान। फेर आगमन।) मजदूर: कनी पुल देखितिऐ। कनी पटना देखितिऐ। जाए दैह, जाए दैह भदोही। जौं नै पिचड़ा भेल हेतै तँ बचेबै ओकरा। (पर्दा) पल्लव आठ (एक्के पोथीक ढेर रास प्रति लोकार्पण लेल राखल अछि। किताब मुख्य अभियन्ता द्वारा लिखल छै आ मुख्य मंत्री एकरा रिलीज कऽ रहल छथि। कोनमे डंका राखल अछि आ दुनू लोक ठाढ़ छथि।) मुख्यमंत्री: हमरा खुशी अछि। (विश्राम) हमरा खुशी अछि जे बत्तीस सालक सरकारी सेवाक उपरान्त “गंगा ब्रिज”, ई पोथी मुख्य अभियन्ता मात्र लिखि सकै छथि। कवर नीक, पन्ना नीक, छपाइ नीक। एक-एक पाँती निष्पक्ष। कोनो इतिहासकार ऐपर आँखि मुनि कऽ विश्वास कऽ सकै छथि। लिखितम्, लिखितकेँ काटि सकत? गंगा ब्रिजक जे मूल भावना छलै, माने लोककेँ लोकसँ जोड़नाइ, ओकरा मुख्य अभियन्ता पूरा केलन्हि। आब नै हमहीं मंत्री छी, आ ईहो रिटायर भऽ गेल छथि। मुदा गंगा ब्रिज ठाढ़ अछि, मुदा गंगामे आब पानिये कम भऽ गेल अछि। ठीक छै, ई ब्रिज हिल रहल छै, जर्जर भऽ गेल छै। मुदा आइबला तकनीक तखन कहाँ रहै। नबका मुख्यमंत्री अही गंगाब्रिजक बगलमे दोसर गंगा ब्रिज बनेबाक घोषणा कऽ देलनि अछि। दुनियाँमे कोन चीज अजर-अमर छै। ऐ पोथी “गंगा ब्रिज”क लेखककेँ हम नीकसँ, व्यक्तिगत रूपेँ चिन्है छियन्हि। हमरे मुख्यमंत्रित्व कालमे ई मुख्य अभियन्ता रहथि। अपन ईमानदारी लेल जानल जाइत रहथि। (मुख्य अभियन्ता हाथ जोड़ि मुस्की दै छथि।) हिनके निर्देशनमे ई पुला बनलै। ठीक छै, ठाक छै। (विश्राम) ठीक छै जे ई पुला किछु दिनमे टूटि जेतै आ बगलेमे नव पुल ठाढ़ भऽ जेतै। मुदा ओइ टुटल पुलकेँ ई पोथी “गंगा ब्रिज” इतिहासमे अमर कऽ देतै। ऐ पोथीमे हमरो चर्चा मुख्य अभियन्ता केने छथि (मुस्की दैत) किछु बेशिये बड़ाइ कऽ देने छथि। मुदा हम तँ जनसेवक छी, जनताक सेवा लेल हम जे किछु केलौं तकर वर्णनक कोनो खगता नै छल, ओ तँ हमर कर्तव्य छल। (विश्राम) फेरसँ मुख्य अभियन्ताकेँ अपन कर्मठ जीवन, ईमानदार चरित्र लेल एकबेर बधाइ दै छियन्हि। मुख्य अभियन्ता: मुख्यमंत्री जी हमर मेन्टर रहथि। हिनका लेल हमरा हृदैसँ श्रद्धा अछि। ऐ पोथीमे किछु किछु गोटे द्वारा कएल किछु अशोभनीय घटनाकेँ छोड़ि देल गेल अछि। इतिहास घृणा पसारबाक माध्यम ने बनि जाए तैँ। प्रकृतिमे बदलाव एलै, धार सुखा गेल छै, ई सभ आ आर किछु चीज, जे तकनीकी मुद्दा छै, ऐ पुलपर असरि केलकै। नवका पुल जाधरि बनतै, ताधरि पुरनका पुल चलिते रहतै। आ ई पोथी पुरनका पुलकेँ अमर कऽ देतै। ओकर पायासँ लऽ कऽ अन्तिम पुल धरिक फोटो ब्लैक एण्ड ह्वाइट आ रंगीनमे ऐ पोथीमे छै। (विश्राम) ईमानदारी तँ हेबाके चाही। (मुस्की दैत) मुख्यमंत्रीजी हमरा अनेरे लज्जित कऽ रहल छथि। जँ ईमानदारी रहै तैँ ने ई पुल एतबो दिन टिकलै। ऐ पोथीमे तीसे गोटेक नाम परिशिष्टमे देलाछि जे ऐ पुल निर्माणमे अपन बलि देलन्हि। हुनके लोकनिक स्मृतिमे ई पोथी समर्पित अछि। एकटा लोक: (डंकापर चोट दैत) आ … (मजदूर धरफड़ा कऽ प्रवेश करैए।) मजदूर: कतेकोकेँ मारि देल गेलै, तकर विवरण कतऽ भेटत। मुख्य मंत्री: (मुस्की दैत) धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद। दोसर लोक: (डंकापर चोट दैत) मनुक्खक बलि देनिहार लोकक बलि गंगा मैया मांगि रहल छथि, तेँ ने सुखाएल जा रहल छथि। मुख्य अभियन्ता: (मुस्की दैत) धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद। (ढोलहो देनहारक प्रवेश) ढोलहो देनहार: सुनू-सुनू, सुनै जाउ। गंगा ब्रिजपर मजदूरक जरूरी छै। एक दिसका रस्ता बन्न कऽ कए दोसर दिसका रिपेयर चलि रहल छै। मजदूर: (डंकापर चोट दैत) हौ, जहियासँ ऐ पुलक उद्घाटन भेल छै तहियेसँ रिपेयरक ठक-ठुक शुरू भऽ गेल छै। ढोलहो देनहार: सुनै जाउ, सुनै जाउ। (मजदूर सभ ठक-ठुक कऽ रहल अछि, कोनो आँकड़ पाथर स्टेजक पाछाँ अन्हारमे फेकैत अछि। कोनो मजदूर जय गंगे बाजि उठैत अछि।) दोसर लोक: (डंकापर चोट दैत) आ… मजदूर: कियो भदोहीसँ मजदूरकेँ आजाद कऽ जाइ छै। कियो गंगा पुलक सोझाँ पिचड़ा भऽ जाइ छै। यएह सभ असल जुल्मी छै। (हाक्रोश करैत) यएह सभ असल जुल्मी छै हौ, असल जुल्मी। अरे ओइ इन्जीनियर सन लोक आबि कऽ आशा दिया जाइ छै। नै तँ कहिया ने परिवर्तन आबि जइतै। लोक परिवर्तन आनि दैतै हौ। (हाक्रोश करैत) असल जुल्मी छै इन्जीनियर सन लोक आबि कऽ आशा दिया जाइ छै। मुख्य अभियन्ता: (मुस्की दैत) धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद। मुख्य मंत्री: (मुस्की दैत) धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद। (पटाक्षेप।) गजेन्द्र ठाकुर मैथिली:२०१२ मोबाइलपर जखन हम मैथिलीमे बात करै छी तँ हमर सहकर्मी गौरी भोला कहै छथि- “बड्ड मीठ भाषा अछि।” गायत्री व्यंकट कहै छथि- “अहाँक भाषा मैथिली अछि आ हम सभ अपन बेटीक नाम मैथिली राखै छी।” ऐ मिठासक भितुरका खटास हम हुनका बुझा नै पबै छियन्हि। २०१२ आ मैथिली भाषा आ साहित्य: २०१२ विभिन्न कारणसँ मैथिली भाषा आ साहित्यक इतिहासमे मोन राखल जाएत। ऐ वर्षक शुरुमे चनौरागंज (झंझारपुर) मे बेचन ठाकुर जीक नेतृत्वमे जातिवादी रंगमंचक विरुद्ध समानान्तर मैथिली रंगमंचक “पहिल विदेह मैथिली नाट्य उत्सव” २०१२ क प्रारम्भमे सम्पन्न भेल। बेचन ठाकुर विगत २५-३० वर्षसँ मैथिली नाटकक निर्देशक रहल छथि, दर्जन भरि नाटक ओ लिखने छथि, जे अनेकानेक बेर मंचित आ प्रशंसित भेल अछि। ऐ बेरुका नाट्य उत्सवक थीम रहए “भरतक नाट्य शास्त्रक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली नाटक आ रंगमंच”। दू दिनक ऐ दिन-रातिक महोत्सवमे जगदीश प्रसाद मण्डलक नाटक “वीरांगना”, बेचन ठाकुरक नाटक “विश्वासघात” आ गजेन्द्र ठाकुरक नाटक “उल्कामुख” मंचित भेल। एकर अलाबे नारी सशक्तिकरण/ लोकगाथा आधारित एकाङ्कीक प्रदर्शन सेहो भेल। विद्यापति: विद्यापति मैथिलीक महाकवि छथि। परम्पराक अनुसार ओ एकटा हाजाम ठाकुर परिवारक छथि। ज्योतिरीश्वर ठाकुर हुनकर विवरण “वर्ण रत्नाकर” मे केने छथि आ श्रीधर दास हुनकर पदावलीक उल्लेख उदाहरण सहित “सदुक्ति कर्णामृत” मे केने छथि। श्रीधर दास आ ज्योतिरीश्वरक परवर्ती संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक विद्यापतिक उल्लेख मैथिल ब्राह्मणक पंजीमे भेल अछि। परन्तु किछु ब्राह्मणवादी संस्था सभ द्वारा ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति केँ ब्राह्मण बना देबाक आ हुनका “पाग” पहिरा “यज्ञोपवीत संस्कार” करबाक प्रयास मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार करबाक षडयंत्रक रूपमे देखल जा रहल अछि। साहित्यिक जगतमे सम्पूर्ण साल ऐपर चर्चा होइत रहल आ ई मामिला सालक अन्तमे भेल “इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव” मे सेहो उठल। विद्यापति पर्वक माध्यमसँ मैथिल ब्राह्मणक एकटा कट्टरवादी ग्रुप जातिवादी रंगमंचक साथ मिलि कऽ मैथिली पर कब्जाक कोशिशमे लागल रहल आ सामान्य लोक ऐसँ दूर भऽ रहल छथि। टैगोर लिटरेचर अवार्ड: मैथिलीक लेल पहिल टैगोर लिटरेचर अवार्ड श्री जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ “गामक जिनगी” लघुकथा संग्रह पर देल गेल। परन्तु एकर चर्चा दरभंगा सहित मिथिलांचलक कोनो हिन्दी अखबार नै केलक, आकाशवाणी दरभंगा सेहो पूर्ण चुप्पी साधने रहल आ अपन जातिवादी चरित्र लोक सभक सोझाँ राखलक। गूगल विदेह बुक्स: विदेह द्वारा गूगलक सहयोगसँ ४०० सँ बेशी मैथिली किताब गूगल बुक्स पर १००% ब्राउज आ डाउनलोडक सुविधाक संग ऑनलाइन कएल गेल। अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोषकेँ कॉमन क्रिएटिव शेयर अलाइक लाइसेन्सक अन्तर्गत रिलीज कएल गेल। साहित्य अकादेमीमे मैथिली समन्वयकक मनोनयन आ साहित्य अकादेमीक पुरस्कारक राजनीति: साहित्य अकादेमीमे मैथिली समन्वयकक चयनक लेल ६ टा जातिवादी संगठनकेँ साहित्य अकादेमी मान्यता देने अछि। ई संगठन सभ मैथिलीक ८ म समन्वयकक मनोनयन केलक अछि। ई संयोग अछि बा दुर्योग कि आइ धरि एकर सभ समन्वयक मैथिल ब्राह्मण भेल छथि, ऐ बेर सेहो ई क्रम जारी रहल। युवा पुरस्कार देबामे सभ निअम खतम करैत रेफरी द्वारा नाम देल सभ पुस्तकपर विचार करबासँ मना कऽ देलनि आ एक साधारण पुस्तककेँ ई पुरस्कार देलनि जकर लेखक मूलतः हिन्दीमे लिखै छथि। पागक राजनीति: ब्राह्मणवादी पागक राजनीतिकेँ तखन बड्ड पैघ धक्का लागल जखन खरौआमे महाकवि लालदास जयन्तीक अवसरपर पहिल बेर आयोजक लोकनि ई मानलनि जे ई जाति विशेषक परिधान मिथिला मैथिलीक मंचपर प्रयोग नै कएल जएबाक चाही आ ओ सएह केलनि। एकरा समानान्तर विचारधाराक बड़ पैघ विजयक रूपमे देखल जा रहल अछि। प्राथमिक आ मध्य विद्यालयमे शिक्षाक माध्यम मैथिली माध्यमसँ: सुप्रीम कोर्टक निर्णयक बादो अखनो मिथिलामे शिक्षाक माध्यम मैथिली नै अछि। ऐ सम्बन्धमे एकटा बैठक निर्मलीमे भेल जइमे जगदीश प्रसाद मण्डल, राम विलास साहु, राजदेव मण्डल, वीरेन्द्र यादव आदिक उपस्थितिमे राहुल कुमार जीक संयोजकत्वमे विदेह विचार गोष्ठी सम्पन्न भेल आ हस्ताक्षर अभियान भेल। परन्तु ई चिन्ता सेहो प्रकट कएल गेल जे मैथिली साहित्यक वर्तमान जातिवादी आ प्रतिक्रियावादी सिलेबसकेँ बदलल जाए, आततायी जातिवादी जमीन्दारक जीवनी कोन गुलाम मानसिकताक अन्तर्गत सिलेबसमे राखल गेल अछि? कोसी पुलक उद्घाटनक अवसर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमारकेँ ऐ सम्बन्धमे स्मार पत्र देल गेल। एकर अलाबे विदेह गोष्ठी (परिचर्चा/ प्रैक्टिकल लैबोरेटरी प्रदर्शन) साहित्यक विभिन्न आयामपर सम्पन्न भेल। नेपाल मे मैथिली: डेनमार्क एम्बैसीक सहयोगसँ  "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" (रमेश रञ्जन लिखित नाटक) कई दर्जन स्थानपर मंचित भेल। विद्यापति पुरस्कारक घोषणा भेल, दू लाखक पुरस्कार रामभरोस कापड़ि भ्रमरकेँ भेटलनि। रंगमञ्च आयोजनामे जनकपुरमे मैथिली नाटक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न भेल। सांस्कृतिक कार्यक्रममे गीत एवं नृृत्य प्रस्तुत भेल। जानकी नवमी पर जनकपुरमे बम विस्फोट भेल, झगड़ू मण्डल सहित कई संस्कृतिकर्मीक हत्या भेलनि। परमेश्वर कापड़ि घाइल भेला। स्वस्थ्य महिला स्वस्थ्य परिवार- स्वस्थ्य समाज मूल नाराक संग यदुकोहा आ माची झिटकहियामे सड़क नाटक प्रदर्शन भेल। परिवार नियोजनपर आधारित जंगलमे मंगल नामक मैथिली भाषाक सड़क नाटक पिसिआइ नेपालक सहयोगसँ प्रतिविम्ब रंगमञ्च जनकपुर प्रदर्शित केलक। युवा नाट्यकला परिषद परवाहा देउरी द्वारा बिक्रमी शम्वत २०६९ क पूर्व सन्ध्यामे अन्तरराष्ट्रिय मैथिली नाटक महोत्सव आयोजित भेल, उदघाटन गणतन्त्र नेपालक पहिल राष्ट्रपति डा.रामवरण यादव केलनि। महोत्सवमे नेपाल आ भारतक आठ नाट्य समूह भाग लेलक। नचिकेता क "एक छल राजा"क मंचन सरस्वती पूजनोत्सव तथा वसन्त पंचमी मेला २०६८ क अवसर पर तिलाठी मे भेल। हम जखन बच्चा रही तँ गाममे “देशी कौआ” आ “कार कौआ” दुनू देखाइ पड़ैत छल, “कार कौआ” चकमक आ कर्कश, “देशी कौआ” हल्लुक रंगक आ मधुर आवाजबला। लोक ककरो कर्कश बोलीकेँ सुनि बजै छला- “केना कार कौआ सन बजै छेँ।” एम्हर किछु बर्खसँ “देशी कौआ” विलुप्त भऽ गेल अछि, लोक सभकेँ एकर दुख छै। चारू दिस कार कौआक साम्राज्य व्याप्त अछि। की मैथिली मात्र मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी? यदि साहित्य अकादेमी आ जातिवादी संस्था सभक वश चलितै तँ उत्तर हँ रहितै। परन्तु समानान्तर विचारधारा आ समानान्तर रंगमंच ऐ धारणाकेँ ध्वस्त कऽ देलक। ऐ लिंक http://www.videha.co.in/new_page_15.htm पर विदेह मैथिली विहनि कथा,  विदेह मैथिली लघुकथा, विदेह मैथिली पद्य, विदेह मैथिली नाट्य उत्सव, विदेह मैथिली शिशु उत्सव, विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना ऑनलाइन उपलब्ध अछि। विनीत उत्पलक आर.टी.आइ. क जे उत्तर साहित्य अकादेमी देलक अछि ओ साहित्य जगतकेँ लज्जित करैत अछि। समन्वयक आ ओकर एडवाइजरी बोर्डक सदस्य सभ जइ तरहेँ सभटा असाइनमेन्ट स्वयं आ सर-सम्बन्धीकेँ दऽ देलनि ओ ऐ संस्था सभक ब्राह्मणवादी प्रवृत्तिकेँ सोझाँ अनैत अछि। राजदेव मंडल, रामविलास साहु, उमेश पासवान, रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार, जगदीश प्रसाद मंडल, उमेश मंडल, सुभाष चन्द्र यादव, प्रेमशंकर सिंह, डॉ. उदय नारायण सिं‍ह "नचिकेता", मेघन प्रसाद आदि लेखक निःस्वार्थ भावसँ मैथिलीकेँ प्राणवायु दऽ रहल छथि। विदेह: लोगो:: विद्यापति:उगना:मिथिला:मैथिली I. महाभारतमे उल्लेख अछि, जे इन्द्र-ध्वजा गाढ़ नील रंगक होइत छल। रामक ध्वजा लाल-गेरुआ रंगक छलन्हि आ’ एहि पर कुलदेवता सूर्यक चित्र अंकित छल। महाभारतमे अर्जुनक ध्वजा पर वानरराजक चित्र छल। नकुलक ध्वजा पर सरभ पशुक चित्र छल। अथर्ववेदक अनुसार सरभ पशु दू माथक , दूट सुन्दर पंख बला, एकटा नमगर पुछी बला आ’ सिंहक समान आठ नोकगर पैरक आँगुर युक्त्त होइत छल।अभिमन्युक द्वजा पर सारंग पक्षी छल। दुर्योधनक ध्वजा सर्पध्वजा छल। द्रोणक ध्वजा पर मृगछाल आ’ कमण्डल छल।कर्णक ध्वजा पर हाथीक पैरक जिंजीर छल, आ’ सूर्य सेहो छलाह। भगवान विष्णुक ध्वजा पर गरुड़ अंकित अछि। शिवक ध्वजा पर नंदी वृषभ अंकित अछि। दुर्गा मण्डपमे शस्त्र,ट्क्का,पटह,मृदंग, कांस्यताल(बाँसुरीकेँ छोड़ि), वाद्य ध्वज,कवच आ’ धनुष केर पूजन होइत अछि। एहिमे सर्वप्रथम खड्गक पूजा होयबाक चाही। तकरा बाद चुरिका, कट्टारक, धनुष, कुन्त आ’ कवच केर पूजा आ’ फेर चामर,छत्र,ध्वज,पताका,दुन्दुभि,शंख, सिंहासन आ’ अश्व केर पूजा होइत अछि। हमरा हिसाबे मिथिलाक कोनो झंडा बिना एहि सभक सम्मिलनक संपूर्ण नहि होयत। I. इन्द्रस्येव शची समुज्जवलगुणा गौरीव गौरीपतेः कामस्येव रतिः स्वभावमधुरा सीतेव रामस्य या। विष्णोः श्रीरिव पद्मसिंहनृपतेरेषा परा प्रेयसी विश्वख्यातनया द्विजेन्द्रतनया जागर्ति भूमण्डले॥9॥ उपर्युक्त पद्य विद्यापतिकृत शैवसर्वस्वसारक प्रारम्भक नवम श्लोक छी। एकर अर्थ अछि- उत्कृष्ट गुणवती, मधुर स्वभाववाली, ब्राह्मण-वंशजा, नीति-कौशलमे विश्वविख्यातओ’ महारानी विश्वासदेवी सम्प्रति संसारमे सुशोभित छथि, जे पृथ्वी-पति पद्मसिंहकेँ तहिना प्रिय छलीह जहिना इन्द्रकेँ शची, शिवकेँ गौरी, कामकेँ रति , रामकेँ सीता ओ’ विष्णुकेँ लक्ष्मी॥9॥ II. मधुबनी जिला मुख्यालयसँ दक्षिण पण्डौल रेलवे-स्टेशनक निकट भवानीपुर ग्राम बसल अछि। एहि गामक निकट छह फीट नीचाँ जमीनमे एकटा शिव-लिंग अछि, जे उग्रनाथ महादेवक नामसँ प्रसिद्ध अछि। एहन विश्वास लोकमे छैक जे पन्द्रहम शाब्दीक आरंभमे हुनकर सहचर उगना, जखन महाकवि प्यासे अप्स्याँत छलाह, हुनका अपन जटासँ गंगाजल निकालि कय पियओने रहथि। एहि पर कविकेँ शंका भेलन्हि, आ’ ओ’ कविसँ असली परिचय पुछलन्हि। तकर बाद एहि स्थान पर शिव हुनका अपन असली रूपक दर्शन देलन्हि। एहि कथा पर विश्वास तखने भ’ सकैत अछि, जखन तर्क आ’ विज्ञानक संग श्रद्धाक मिश्रण होय। शंकराचार्यक विष्यमे कहल गेल जे ओ’ अपन कमंडलमे धार भरि लेलन्हि। भेल ई जे बाढ़िमे बेचेमे पहाड़ रहलाक कारण एक दिशि बाढ़ि अबैत छल आ’ एक दिशि दाही। बीचक गुफाकेँ शंकर अपन शिष्यक सहयोगसँ तोड़ि जखन कमण्डल लेने बहरओलाह तँ लोक देखलक जे दोसर कात पानि आबि रहल अछि। सभ शंकराचार्यक स्तुति कएलन्हि, जे अहाँ अपन कम्मंडलमे धार आनि हमरा सभकेँ दाही सँ आ’ दोसर कातक लोककेँ बाढ़िसँ मुक्त्त कराओल। अहाँ कमण्डलमे पानि आ’ धार अनलहुँ। बादमे अवसरवादी लोकनि एकरा क्मत्कारसँ जोड़ि देलक। आशा अछि जे अहाँ सेहो अपन लेखमे उगनाक कथाक तर्क आ’ श्रद्धासँ विवेचना करब। बीस मार्चकेँ १४ दिनुका मिथिला क्षेत्रक गृही परिक्रमा, आइ काल्हि जनकपुरक, दू टा डालाक संग- १.मिथिला बिहारी जी आ किशोरीजी आ आर मारिते रास ढेर मन्दिरक/ भक्तक डाला सभक संग कुआ रामपुर दऽ कऽ जनकपुरमे प्रवेश करैत छथि। कतेक भक्त तँ अपन पशुक संगे परिक्रमा करैत छथि। ई परिक्रमा कचुरी मठ, धनुषासँ शुरू होइत अछि आ अमावस्याक रातिमे पहिल विश्राम हनुमान नगर आ चतुर्दशी दिन पन्द्रहम विश्राम जनकपुरमे होइत अछि। २१ मार्चकेँ फागुन परिक्रमा दिन ई यात्रा जनकपुर नगरपालिकाक परिक्रमाक अंतरगृह परिक्रमा (लगभग 8 किलोमीटर) क संग होइत अछि। २२ मार्चकेँ जनकपुर आ आसपासमे होली मनाओल जाइत अछि। जनकपुर मध्य परिक्रमाक १५ स्थल आऽ ओतुक्का मुख्य देवता १. हनुमाननगर- हनुमानजी २.कल्याणेश्वर- शिवलिंग ३.गिरिजा-स्थान- शक्ति ४.मटिहानी- विष्णु मन्दिर ५.जालेश्वर- शिवलिंग ६.मनाई- माण्डव ऋषि ७. श्रुव कुण्ड- ध्रुव मन्दिर ८.कंचन वन- कोनो मन्दिर नञि मात्र मनोरम दृश्य ९.पर्वत- पाँच टा पर्वत १०.धनुषा- शिवधनुषक टुकड़ी ११.सतोखड़ी- सप्तर्षिक सात टा कुण्ड १२.हरुषाहा- विमलागंगा १३. करुणा- कोनो मन्दिर नहि मात्र मनोरम दृश्य १४. बिसौल- विश्वामित्र मन्दिर १५.जनकपुर। अन्तमे फेर जनकपुरमे खतम भऽ जाइत अछि। भक्त सभ बारहबीघा मैदान आ धर्मशाला सभमे ठहरैत छथि। लघु परिक्रमा आठ कि.मी. , मध्य परिक्रमा 40 कोसक (128 कि.मी.) आ वृहत परिक्रमा 268 कि.मी. होइत अछि। १.उग्रतारा स्थान- मण्डन मिश्रक कुलदेवी/ गोसाउनी महिष मर्दिनी भगवती, महिष्माती। १४म शताब्दीमे राजा शिव सिंहक ज्येष्ठ रानी पद्मावती एतए एकटा मन्दिर बनबेलन्हि। खण्डवला राजवंश कालमे सेहो एतए मन्दिरक रख-रखाव होइत छल आ राजा आसिन नवरात्रमे एतए पूजा आ रहबाक लेल अबैत रहथि। तारा भक्त लोकनि दुर्गापूजाक समयमे एतए खूब मात्रामे अबैत छथि ! २.कपिलेश्वर स्थान- मधुबनीसँ पाँच किलोमीटर पश्चिम माधव मन्दिर आ पुरान शिवलिंग, सांख्य दर्शनक जनक कपिल एतए मन्दिरक स्थापना करबओलन्हि। एखुनका मन्दिर दरभंगा महाराज राघव सिंह द्वारा २५० वर्ष पहिने बनबाओल गेल। प्राचीन कालमे समुद्र हिमालय धरि पसरल छल आ फेर जमीन पसरल। जखन बंगालक खाड़ीक निकट गंगासागर तीर्थ लग कपिल सगरक ६०००० पुत्र / सैनिककेँ जरा देलन्हि तखन ओ कपिलेश्वर अएलाह। एखन गंगासागर सेहो समुद्रसँ कनेक हटि कए अछि। जानकी नवमी- वैशाख शुक्ल नवमी- मानुषी। रामनवमी- चैत्र शुक्ल नवमी। विद्यापतिक मृत्यु तिथि कार्तिक धवल त्रयोदशी-देसिल बयना । विवाह पंचमी- अगहन शुक्ल पंचमी। शतानन्द पुरहित-राम सीताक विवाह। मरवापर मिथिला चित्रकला आ परिचन, गोसाउन गीत आ नैना जोगिन ओहिना जेना जुगल सरकारक विवाहमे भेल रहए, आइयो। मिथिला प्राचीन कालमे मैथिलक भूमि विदेहक नामसँ- जकर राजधानी मिथिला रहए- स्थापना मिथी (भविष्य पुराण) द्वारा। दोसर नाम विदेह, मिथिला, तीरभुक्ति, तिरहुत, तपोभूमि, साम्भवी, सुवर्णकानन, मँतिली। मिथिला माहात्म्य (वृहद विष्णु पुराण)- वृहद परिक्रमा- सम्पूर्ण मिथिलाक परिक्रमा एक सालमे। 268 कि.मी.। कौशिकीसँ शुरू भए सिघेश्वर स्थान, ओतएसँ सिमरियाघाट, फेर हिमालयक फुटहिल्स, फेर कौशिकी होइत सिँघेश्वरस्थान। मध्य परिक्रमा- 40 कोस (128 कि.मी) 5 दिनमे, मुदा आइ-काल्हि 15 दिनमे। फाल्गुन शुक्ल पक्षक पहिल तिथिकेँ (अमावस्या) दिन शुरू होइत अछि आ पूर्णिमा दिन खतम होइत अछि। फागुनक परिक्रमा सभसँ बेशी प्रसिद्ध अछि मुदा परिक्रमा कातिक आ बैशाखमे सेहो कएल जा सकैत अछि। पाणिनी- मिथिला ओ नगरी छी जतए शत्रुक मर्दन कएल जाइत अछि। जनक- जन (विश)सँ व्युत्पत्ति। निमी द्वारा वैजयंती (जनकपुर) आ मिथी द्वारा मिथिला नगरक स्थापना। शरभ नकुलक झंडापर रहए, मिथिकल जानवर जकरा दू टा माथ, दू टा पाँखि, एकटा नमगर पुच्छी, आ सिँह जकाँ 8 टा नह होइत अछि। जखन भगवन विष्णु नरसिंह अवतार लेलन्हि तखन हुनका प्रसन्न करबाक लेल शिव शरभक रूपमे जन्म लेलन्हि। मिथिला चित्रकलाक पाँच रंग- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरक द्योतक। अंकुश- दू फेँरक बरछा- स्पीयर जाहिसँ हाथीकेँ नियंत्रित करैत छी, गणेश जीक अंकुश मूसकेँ नियंत्रित करैत अछि। यूनीकोड- 1200 साल पुरान फिगराइन आ 500 साल पुरान पाण्डुलिपि। संयुक्ताक्षर- कोष्ठकक संख्या जे बंगालीमे नहि अछि वा बिल्कुल अलग अछि- कवर्ग (10), खवर्ग (4), गवर्ग (8), घवर्ग (4), ङ वर्ग (4) चवर्ग (6), ज वर्ग (5), झ वर्ग (4) ट वर्ग (3), ठ वर्ग (2), ड वर्ग ( 2), ढ वर्ग (3), ण वर्ग (6), त वर्ग (6) , थ वर्ग (3), द वर्ग (8), ध वर्ग (3), न वर्ग (6) प वर्ग (8), फ वर्ग (2), ब वर्ग (4), भ वर्ग (3), म वर्ग (11) अंत-संयुक्ताक्षर य वर्ग (2), र वर्ग (2), ल वर्ग (4), व वर्ग (4), श वर्ग (9), ष वर्ग (8), स वर्ग (8), ह वर्ग (8) तीन वर्णक संयुक्ताक्षर- (49) चारि वर्णक संयुक्ताक्षर (1) बिकारी (1), ग्वंग ह्रस्व-दीर्घ (2), अंजी एक टाइप अंशुमन पाण्डे द्वारा वर्णित (5) प्रकार आर। संस्कृत-अवह्ठक विद्यापतिक नेपाल लखिमाक संग पलायन- घुरलाक बाद अंतिम रचना दुर्गा भक्ति तरंगिणी ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति झूमर, नचारी, महेशवाणी, जोग उचिती, बटगवनी, परिछनि, कोबर, पराती, बारहमासा, मान, तिरहुत, दृश्यकूट, शिव, भगवती आ गंगा, विष्णु, शक्ति, हर-गौरीक विषयमे गीत लिखलनि| अनुवाद कथा गुणाढ्यक पैशाची भाषाक वृहत् कथाक क्षेमेन्द्रक कथा मंजरी वा सोमदेवक कथासरित्सागरक अनुवाद होएबाक कथा कथा कहबाक शैली सेहो भऽ सकैए मुदा ई अनुवादक कथाक प्रारम्भ तँ कहिते अछि। अनुवादक इतिहास बड्ड पुरान छै। कोनो प्राचीन भाषा जेना संस्कृत, अवेस्ता, ग्रीक आ लैटिनक कोनो कालजयी कृति जखन दुरूह हेबऽ लागल तँ ओइपर चाहे तँ भाष्य लिखबाक खगताक अनुभव भेल आ कनेक आर आगाँ ओकरा दोसर भाषामे अनुवाद कऽ बुझबाक खगताक अनुभव भेल। प्राचीन मौर्य साम्राज्यक सम्राट अशोकक पाथरपर कीलित शिलालेख सभ, कएकटा लिपि आ भाषामे, राज्यक आदेशकेँ विभिन्न प्रान्तमे प्रसारित केलक। भाष्य पहिने मूल भाषामे लिखल जाइत छल आ बादमे दोसर भाषामे लिखल जाए लागल। मैथिलीसँ दोसर भाषा आ दोसर भाषासँ मैथिलीमे अनुवाद लेल सिद्धान्त: मैथिलीसँ सोझे दोसर भाषामे अनुवाद अखन धरि संस्कृत, बांग्ला, नेपाली, हिन्दी आ अंग्रेजी धरि सीमित अछि। तहिना ऐ पाँचू भाषाक सोझ अनुवाद मैथिलीमे होइत अछि। ऐ पाँच भाषाक अतिरिक्त मराठी, मलयालम आदि भाषासँ सेहो सोझ मैथिली अनुवाद भेल अछि मुदा से नगण्य अछि। मैथिलीमे अनुवाद आ मैथिलीसँ अन्य भाषामे अनुवाद ऐ पाँचू भाषाकेँ मध्यस्थ भाषाक रूपमे लऽ कऽ होइत अछि। अहू पाँच भाषामे हिन्दी, नेपाली आ अंग्रेजीक अतिरिक्त आन दू भाषाक मध्यस्थ भाषाक रूपमे प्रयोग सीमित अछि। अनुवादसँ कने भिन्न अछि रूपान्तरण, जेना कथाक नाट्य रूपान्तरण वा गद्यक पद्यमे पद्यक गद्यमे रूपान्तरण। ऐ मे मैथिलीसँ मैथिलीमे विधाक रूपान्तरण होइत अछि आ अनुवाद सिद्धान्तक ज्ञान नै रहने रूपान्तरकार अर्थ आ भावक अनर्थ कऽ दैत अछि। मैथिलीमे आ मैथिलीसँ अनुवादमे तँ ई समस्या आर विकट अछि। उत्तम अनुवाद लेल किछु आवश्यक तत्त्व: शब्दशः अनुवाद करबा काल ध्यान राखू जे कहबी आ सन्दर्भक मूल भाव आबि रहल अछि आकि नै। श्ब्द, वाक्य आ भाषाक गढ़नि अक्षुण्ण रहए से ध्यानमे राखू। मूल भाषाक शब्द सभ जँ प्राचीन अछि तँ अनूदित भाषाक शब्द सभकेँ सेहो पुरान आ खाँटी राखू। मूल आ अनूदित भाषाक व्याकरण आ शब्द भण्डारक वृहत् ज्ञान एतए आवश्यक भऽ जाइत अछि। मूल भाषामे मुँह कोचिया कऽ बाजल रामनाथ, उमेशक प्रति सम्बोधनकेँ रामनाथो, उमेशोक बदलामे रामनाथहुँ, उमेशहुँ कऽ अनुवाद कएल जाएब उचित हएत मुदा सामान्य परिस्थितिमे से उचित नै हएत। से शब्द, भाव, प्रारूपमे सेहो आ मूल कृतिक देश-कालक भाषामे सेहो समानता चाही। अनुवादककेँ मूल आ अनूदित कएल जाएबला भाषाक ज्ञान तँ हेबाके चाही संगमे दुनू भाषा क्षेत्र इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञान सेहो हेबाक चाही। ई मध्यस्थ भाषासँ अनुवाद करबा काल आर बेसी महत्वपूर्ण भऽ जाइत अछि। ऐ परिस्थितिमे “दुनू भाषा क्षेत्रक इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञान” सँ तात्पर्य अनूदित आ मूल भाषा क्षेत्रसँ हएत मध्यस्थ भाषा क्षेत्रसँ नै। कखनो काल मूल भाषाक कोनो भाषासँ सम्बन्धित तत्त्व वा गएर भाषिक तत्व (सांस्कृतिक तत्त्व) क सही-सही उदाहरण अनूदित भाषामे नै भेटैत अछि आ तखन अनुवादक गपकेँ नमराबऽ लगैत छथि वा ओइ लेल एकटा सन्निकट शब्दावली (ओइ नै भेटल तत्त्वक) देमए लगैत छथि। ऐ परिस्थितिमे सन्निकट शब्दावली देबासँ नीक गपकेँ नमरा कऽ बुझाएब वा परिशिष्ट दऽ ओकरा स्पष्ट करब हएत। ऐ सँ मूल भाषासँ मध्यस्थ माषाक माध्यमसँ कएल अनुवादमे होइबला साहित्यिक घाटाकेँ न्यून कएल जा सकत। कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध), निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक पोथीक अनुवाद करबा काल किछु विशेष तकनीकक आवश्यकता पड़त। निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद ऐ अर्थेँ सरल अछि जे ऐ सभमे विस्तारसँ विषयक चर्चा होइत अछि आ सर्जनात्मक साहित्य {कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध)} क विपरीत भाव आ संस्कृतिक गुणांक नै रहैत अछि वा कम रहैत अछि। संगे एतए पाठक सेहो कक्षा/ विषयकक अनुसार सजाएल रहैत छथि। केमिकल नाम, बायोलोजिकल आ बोटेनिकल बाइनरी नाम आ आन सभ सिम्बल आदि जे विशिष्ट अन्तर्राष्ट्रीय संस्था सभ द्वारा स्वीकृत अछि तकर परिवर्तन वा अनुवाद अपेक्षित नै अछि। सर्जनात्मक साहित्यमे नाटक सभसँ कठिन अछि, फेर कविता अछि आ तखन कथा, जँ अनुवादकक दृष्टिकोणसँ देखी तखन। नाटकमे नाटकक पृष्ठभूमि आ परोक्ष निहितार्थकेँ चिन्हित करए पड़त संगहि पात्र सभक मनोविज्ञान बूझए पड़त। कवितामे कविताक विधासँ ओकर गढ़निसँ अनुवादकक परिचित भेनाइ आवश्यक, जेना हाइकूक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद करै बेरमे मैथिलीक वार्णिक ५/७/५ क मेल जँ अंग्रेजीक अल्फाबेटसँ करेबै तँ अहाँक अनूदित हाइकू हास्यास्पद भऽ जाएत कारण अंग्रेजीमे ५/७/५ सिलेबलक हाइकू होइ छै आ मैथिलीमे जेना वर्ण आ सिलेबलक समानता होइ छै से अंग्रेजीमे नै होइ छै। ऐ सन्दर्भमे ज्योति सुनीत चौधरीक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद एकटा प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। कविताक लय, बिम्बपर विचार करए पड़त संगहि कविता खण्डक कविताक मुख्य शरीरसँ मिलान करए पड़त। कथामे कथाकारक आ कथाक पात्रक संग कथाक क्रम, बैकफ्लैशक समय-कालक ज्ञान आ वातावरणक ज्ञान आवश्यक भऽ जाइत अछि। आब महाकाव्यक अनुवाद देखू, रामलोचन शरणक मैथिली रामचरित मानस अवधीसँ मैथिलीमे अनुवाद अछि मुदा दोहा, चौपाइ, सोरठा सभ शास्त्रीय रूपेँ अनूदित भेल अछि। संस्कृत भाषाक अनुवादक माध्यमसँ पाठन आंग्ल शासक लोकनि द्वारा प्रारम्भ भेल। ऐ विधिसँ ने लैटिनक आ नहिये ग्रीकक अध्यापन कराओल गेल छल। ऐ विधिसँ जँ अहाँ संस्कत वा कोनो भाषा सीखब तँ आचार्य आ कोविद कऽ जाएब मुदा सम्भाषण नै कएल हएत। जँ कोनो भाषाकेँ अहाँ मातृभाषा रूपेँ सीखब तखने सम्भाषण कऽ सकब, संस्कृति आदिक परिचय पाठ्यक्रममे शब्दकोष; आ लोककथा आ इतिहास/ भूगोलक समावेश कऽ कएल जा सकैत अछि। संगणक द्वारा अनुवाद: सर्जनात्मक वा निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद संगणक द्वारा प्रायोगिक रूपमे कएल जाइत अछि मुदा “कोल्ड ब्लडेड एनीमल” क अनुवाद हास्यास्पद रूपेँ “नृशंस जीव” कएल जाइत अछि। मुदा संगणकक द्वारा अनुवाद किछु क्षेत्रमे सफल रूपेँ भेल अछि, जेना विकीपीडियामे ५०० शब्दक एकटा “बेसी प्रयुक्त शब्दावली” आ २६०० शब्दक “शब्दावली”क अनुवाद केलासँ, गूगलक ट्रान्सलेशन अओजार आदिमे आधारभूत शब्दक अनुवाद केलासँ आ आन गवेषक जेना मोजिला फायरफॉक्स आदिमे अंग्रेजीक सभ पारिभाषिक संगणकीय शब्दक अनुवाद केलासँ त्रुटिविहीन स्वतः मैथिली अनुवाद भऽ जाइत अछि। मैथिलीमे गजल मैथिलीमे गजल भैये नै सकैए, कहले नै जा सकैए, से गप आब कियो नै बजै छथि। कारण गजल, बहर युक्य आ आजाद, दुनू मैथिलीक पाठककेँ हिलोरि देने छै। मुदा भक्ति गजल, बाल गजल आदिक सन्दर्भमे किछु गोटेक मत छन्हि जे गजल गजल छिऐ, से ओकर विभाजन नै कएल जाए। मुदा भक्ति गजल आकि बाल गजल गजलक विभाजन नै, गजलक स्पेसिअलाइजेशन छी। हाइकूक निअमक पालन करितो जँ प्रकृतिपर नै लिखलौं तँ ओ भेल शेनर्यू। कबीरक उलटबासीक प्रभाव अछि आकि ई गजलक स्वभाव अछि जे एतऽ प्रेमक महत्व छै, भक्ति प्रेमक संगे अबै छै, आ कने उलटबासीक संग जेना प्रेम अबै छै तहिना भक्ति। मुदा ई भक्ति झझा दैत अछि। अमित मिश्र लिखै छथि:- विषकें पी नीलकण्ठी छी बनल यौ होश दैवक उड़ल से जीयेलौं अहाँ तखने जगदीश चन्द्र ठाकुर "अनिल लिखै छथि:- तों विपत्तिमे दौगल अएलें हम तोरे हनुमान बुझै छी धूर्त-समागम वर्सन २०१३-१७ वीणा ठाकुर जीक साहित्य अकादेमी दिल्लीक मैथिली परामर्शदात्री समिति- (धूर्त-समागम वर्सन २०१३-१७) ऐमेसँ असाइनमेण्ट बला साहित्यकार, रिपीटेड आ साहित्य दुनियाँ सँ कोनो सरोकार नै रखनिहार सभ शामिल छथि, जेना कामदेव झा, कुलानंद झा, नरेश मोहन झा, रवीन्द्रनाथ झा आदिक नाम ब्राह्मणवादी पत्रिका टा पढ़निहार सेहो नै सुनने हेता।) -पूर्ण लिस्ट अछि:- कामदेव झा, ललिता झा, अशोक कुमार झा, शंकरदेव झा, कुलानंद झा, नरेश मोहन झा, खुशीलाल झा, रवीन्द्रनाथ झा आ गलतीसँ झा-झाएक्सप्रेसमे डा॰ शिव प्रसाद यादव सेहो चढ़ि गेला। जगदीश प्रसाद मण्‍डल लघुकथा-पटि‍याबला जेठ मास, दि‍नक तीन बजैत। देखैमे राति‍सँ बहुत बेसी नमहर दि‍न बनैत मुदा जहि‍ना कायाक संग माया आ रौदक संग छाया चलि‍ते रहैत तहि‍ना नमहर दि‍नक संग धूपो एते बढ़ि‍-चढ़ि‍ जाइत जे मझोलको दि‍नसँ, श्रमशक्‍ति‍क दौड़मे छोट बनि‍ जाइत। सूर्यक शक्‍ति‍वाण एते उग्र रूप पकड़ि‍ लइत जे धरति‍यो ताबा जकाँ आगि‍ उगलैपर उताहुल भऽ जाइत। धरती-अकास बीच लुलुआएल लू एक-ताले बाधमे नचैत। जेना राम-रावणक बीच वा महाभारतक सत्तरहम दि‍न भेल, तहि‍ना। तेहने तीरसँ बेधि‍त सुलेमान बेहोश भेल ओइ चि‍ड़ै जकाँ श्‍याम सुनरक दरबज्‍जापर आबि‍ दावामे साइकि‍ल ओंगठा ओसारक भुँइयेपर चारू नाल चीत खसि‍ते आँखि‍ मूना गेलै। जहि‍ना बन्न आखि‍ साँस चलैत अधमड़ूक होइत तहि‍ना भेल। बेरूका चाह पीबैक अभ्‍यास श्‍याम सुनरकेँ, तीन बजेक। बगलक घरक ओसारपर चाह बनबैत रहथि‍ तँए साइकि‍लक खड़खड़ाएबसँ नै परेखि‍ सकलाह जे वाण लगल बाझ जकाँ कि‍यो छथि‍। साइकि‍लक बात सामान्‍य तँए समुद्र उपछबसँ नीक जे जइ काजमे हाथ लागल अछि‍ अोकरा पूरा ली। सएह केलनि‍। चाह पीबैत दरबज्‍जापर अबि‍ते देखलनि‍ जे ई अधमड़ू भेल के छि‍याह। मुँह नि‍हारलनि‍ तँ चि‍न्‍हल चेहरा सुलेमानक। आँखि‍ बन्न, कुहरैत मनबलाक तँ बोलि‍यो अस्‍पष्‍टे जकाँ भऽ जाइ छै, तँए बाल-बोध वा पशु जकाँ दुख बूझब कठि‍न भऽ जाइत, तथापि‍ छाती थीर करैत श्‍याम सुनर टोकलखि‍न- “सुलेमान भाय, सुलेमान भाय?” पानि‍क तहक अवाज जहि‍ना ऊपर नै अबैत मुदा पानि‍क ऊपरक अवाज कम्‍पि‍त होइत, लहरि‍क अनुकूल ततए धरि‍ जाइत जतए ओ पूर्ण अस्‍थि‍र नै भऽ जाइत। श्‍याम सुनरकेँ उत्तर अबैसँ पहि‍नहि‍ मन पड़ि‍ गेलनि‍ भि‍नसुरका अवाज। “पटि‍या लेब पटि‍या, पटि‍या लेब पटि‍या।” मुदा लगले मनकेँ नअ घंटा उचटि‍ कहलकनि‍। भरि‍सक रौदक चोट आ मेहनति‍क मारि‍सँ एते बेथा गेल छथि‍ जे आँखि‍ खोलैक साहसे नै होइत छन्‍हि‍। चि‍न्‍हल दरबज्‍जा आ चि‍नहार बोली अकाि‍न करोट फेड़ैत अध-खिल्‍लू आँखि‍ उठा सुलेमान बाजल- “श्‍याम भाय, केकर मुँह देखि‍ घरसँ नि‍कललौं जे एको पाइक बोहनि‍ नै भेल। उधार-पुधार ऐ उमेरमे खाएब नीक नै बुझै छी, कखन छी कखन नै छी, केकरो खा कऽ मरब तँ कोसत। जलखै खा कऽ जे नि‍कललौं, सहए छी। खाली पेटमे पानि‍योँ भोंकबे करै छै। पेटमे बगहा लगैए।” सुलेमानक बात सुनि‍ श्‍याम सुनरकेँ भेलनि‍ जे भरि‍सक एकरे बि‍लाइ कुदब कहै छै। भुखाएल बि‍लाइ जहि‍ना छटपटाइत अपनो बच्‍चाकेँ कंठ चभैले तैयार हुअए लगैत तहि‍ना भरि‍सक होइत-हेतइ। मुदा रोगो तँ असान नै एक संग कते तीर लागल छन्‍हि‍। कोनो घुट्ठीमे तँ कोनो बाँहि‍मे कोनो छातीमे तँ कोनो माथमे। भूख-पि‍यास, थकान इत्‍यादि‍सँ बेधल छथि‍। तोसैत श्‍याम सुनर कहलखि‍न- “सुलेमान भाय, आँखि‍ नीक जकाँ खोलू। एके कप चाह बनौने छलौं जे आँइठ भऽ गेल अछि‍। बाजू पहि‍ने चाह पीब आकि‍ खेनाइ‍ खाएब?” पाश भरल बातमे आस लगबैत सुलेमान बाजल- “भाय, ऐ घरकेँ कहि‍यो दोसराक बुझलौं जे कोनो बात बजैमे संकोच हएत। देहमे तते दर्द भऽ रहल अछि‍‍ जे कनी पीठि‍पर चढ़ि‍ खुनि‍ दि‍अ पहि‍ने, तखन बूझल जेतै।” सए घरक जुलाहा परि‍वार गोधनपुरमे। झंझारपुरसँ पूब सुखेत पंचायतक गाम गोधनपुर। जइठाम मरदे-मौगि‍ये मि‍लि‍ बि‍छानक कारोबार करैत अछि‍। गाम-गामसँ मोथी कीनि‍, अपनेसँ सोनक डोरी बाँटि‍ बि‍छान बीनि‍, उत्तरमे अंधरा ठाढ़ी, दछि‍न घनश्‍यामपुर, पूब घोघरडीहा आ पछि‍म मेंहथ-कोठि‍या-रैमा धरि‍क बजार बना कारोबार करैत अछि‍। ओना जुलाहा खाली गोधनपुरे टामे नै आनो-आनो गाममे अछि‍ मुदा बि‍छानक कारोबार गोधनपुरे टामे होइत। शहर-बाजरमे जहि‍ना रंग-बि‍रंगक वस्‍तु-जात बि‍काइत तहि‍ना गामो-समाजक बजारमे चलैत अछि‍। जइमे रंग-बि‍रंगक वस्‍तु-जातक बि‍‍क्री-बट्टा चलैत अछि‍। कि‍छु वस्‍तुगत आ अछि‍ कि‍छु भावगत। साइयो परि‍वार अपन-अपन क्षेत्र बना भि‍नसरे जेर बना-बना नि‍कलि‍ जाइत अछि‍। ओना कहि‍यो काल सुलेमानो जेरेमे नि‍कलैत, मुदा आइ असगरे नि‍कलल छल। अपनामे सीमाक अति‍क्रमण करबो करैत आ नहि‍यो करैत। खुल्‍ला बजार तँ ओहए ने टि‍काउ होइत जे बि‍सवासू वस्‍तुक वि‍क्री करए। नै तँ घटि‍या माल आ बेसी दाममे वस्‍तुक वि‍क्री हएत। मुदा गोधनपुरक पटि‍याबलामे से नै एकरंगाह वस्‍तु, एक रंगाहे दाममे बि‍काइत। पीठ-सँ-घुट्ठी धरि‍ जखन श्‍याम सुनर दस बेर बुललाह तखन सुलेमान पड़ले-पड़ल बाजल- “भाय, आब उतरि‍ जाउ। एह, अरे बाप रे आेइ जि‍नगीसँ घुरलौं। मन हल्‍लुक भेल।” कहि‍ फुड़फुडा कऽ उठि‍ बैसैत बाजल- “भाय, अचेत जकाँ भऽ गेल छलौं। आँखि‍ चोन्‍हि‍या गेल छलए। सौंसे अन्‍हारे बूझि‍ पड़ए लगल छलए। ई तँ रच्‍छ रहल जे दरबज्‍जाक पछि‍ला देबालक ठेकान रहल, नै तँ कतए बौआ कऽ मरि‍तौं तेकर ठीक नै।” श्‍याम सुनर सुलेमानक बातो सुनैत आ मने-मन वि‍चारबो करैत जे हो-न-हो दरबज्‍जापर मरि‍ जाइत तँ मुँहदुस्‍सी चि‍ड़ै जकाँ लोक केना मुँह दुसैत तेकर कोनो ठीक नै। जइठाम घरपर चि‍ड़ै बैसने घरक सभ कि‍छु चलि‍ जाइ छै तइठाम कि‍ होइत। मुदा जइ दुर्गति‍क दुर्गपर सुलेमान पहुँचि‍ गेल छल ओइठाम मनुखक मनुखपना केहेन होइ, ईहो तँ अछि‍। सत्तरि‍-पचहत्तरि‍ बर्खक सुलेमान सभ दि‍न पचास कि‍लो मीटर बि‍छानक बोझ लऽ कऽ टहलि‍ बेचि‍ जीवि‍कोपार्जन करैत अछि‍, ओहनकेँ कि‍ कहल जाए। जे खून-पसीना एकबट्ट कऽ जीब रहल अछि‍। ओकर अंतीम बोलो कि‍यो परि‍वारक सुनि‍ पबि‍तै? मन ठमकि‍ते पुछलखि‍न- “सुलेमान भाय, आब केहेन मन लगैए, कि‍छु खाइ-पीबैक इच्‍छा होइए?” मुस्‍की दैत सुलेमान बाजल- “भाय, आब जीब गेलौं। आब खेबे करब कि‍ने। कि‍छु दि‍न आउरो दुनि‍याँक खेल-बेल देखि‍ लेब।” जहि‍ना गुड़-घाउक टनक जते बहैसँ पहि‍ने रहैत अछि‍ मुँह बनि‍ नि‍कलि‍ते कि‍छु बेसि‍या जाइत मुदा मूल-खि‍ल नि‍कलला पछाति‍ सुआस पड़ए लगैत, जइसँ रूप बदलि‍ जाइ छै, पाशा आस लगबए लगै छै, तहि‍ना सुलेमान बाजल- “भाय, सरेलहा भात-रोटी खाइक मन नै होइए।” “तखन?” “टटका जे गहुमक चारि‍टा रोटी भऽ जाइत तँ मन ति‍रपि‍त भऽ जइतए। ताबे नहा सेहो लेब।” सुलेमानक बात सुनि‍ श्‍याम सुनर कहलखि‍न- “कल देखल अछि‍? वाल्‍टीन-लोटा आनि‍ दइ छी, नीक जकाँ नहा लेब।” श्‍याम सुनरक बात सुनि‍ हँसैत सुलेमान बाजल- “भाय, एना कि‍अए बजै छी। पचासो दि‍न पानि‍ पीने हएब, आ कतेको दि‍न नहेने हएब, तखन कल देखल नै रहत। लोटा-बाल्‍टीन कथीले आनब, अांगनमे काज हएत। हम सभ तरहक लूरि‍ रखने छी ओहुना ठाढ़े-ठाढ़ वा बैसि‍ कऽ नहा लइ छी आ जँ सासुर-समधि‍और गेलौं तँ लोटो-बाल्‍टीन लऽ कऽ नहा लेलौं। ओना भाय, की कहू लोको सभ अजीब-अजीब अछि‍। ने माल-जाल जकाँ नागरि‍ छै‍ आ ने मनुखपना छै। एक दि‍न अहि‍ना रौदमे मन तबधि‍ गेल। एक गोरेक दरबज्‍जापर कल देखलि‍ऐ, साइकि‍ल अड़का नहाइले गेलौं। मन भेल पहि‍ने चारि‍ घोँट पानि‍ पीब ली। तही बीच एकटा झोंटहा आबि‍ झटहा फेकलक जे कल छुबा जाएत।” सुलेमानक बात सुनि‍ श्‍याम सुनरक मनमे वाल्‍मीकि‍ आबि‍ गेलखि‍न। तमसा नदीक तटपर वाण लगल क्रोंच पक्षी। मुदा अपनाकेँ सम्‍हारि‍ कहलखि‍न- “अहूँ सुलेमान भाय कोन खि‍स्‍सा भुखाएलमे पसारै छी। झब दे नहाउ, आंगनमे ताबे रोटी बनवबै छी।” सुलेमान कल दि‍स आ श्‍याम सुनर आंगन दि‍स बढ़लाह। जहि‍ना भोजनक पूर्व स्‍नानसँ खुशी होइत तहि‍ना सुलेमान कल दि‍स बढ़ला। मुदा श्‍याम सुनरक मनमे प्रश्न-पर-प्रश्न उठए लगलनि‍। पहि‍ल प्रश्न उठलनि‍ जे मृत्‍युसज्‍जापर पड़ल यात्रीकेँ वा फाँसीपर चढ़ैत यात्रीकेँ पूछि‍ भोजन देल जाइत अछि‍ तइठाम अपना मुँहेँ सुलेमान कहलक जे गहुमक रोटी। बि‍नु मेजनक गहुमक रोटी ओहने होइत जेहेन डम्‍हाएल मालदह आम। जँ सोझे रोटी कहैत तँ मड़ुआ रोटीक मेजन अचार, पि‍आजु, नून-मि‍रचाय, तेल सेहो होइत, मुदा टटका गहुमक रोटी केहेन हएत? सभकेँ अपन-अपन प्रेमी होइ छै। जँ से नै होइ छै तँ जूरशीतलमे बसि‍या अरबा चाउरक भात लेल पहि‍ने लोक तड़ूआ-भुजुआ कि‍अए बना लइए मुदा तँए कि‍ मोटका चाउरक बसि‍या भातक प्रेमी नून-पि‍आजु-अँचार नै हेतै। मुदा जते जल्‍दि‍वाजीक जरूरति‍ अछि‍ -जल्‍दि‍वाजी ऐ लेल जे भुखाएल पेट स्‍नानक पछाति‍ दोसर रूप पकड़ैत- तइमे रसदार तरकारी बनाएब संभव नै, तँए दूटा घेरा पका चटनी आ रोटीसँ काज चलि‍ सकैए। सएह केलनि‍। स्‍नान कएल नोतहारी जकाँ दरबज्‍जापर अबि‍ते सुलेमानक भुखाएल मन प्रेमी भोजनक बाट तकए लगल। बेर-बेर आंगन दि‍स‍ तकैत। आगूमे थारी देखि‍ते सुलेमानक मन साओनक सुहावन जकाँ हरषि‍ उठलनि‍। रोटीक पहि‍ल टूक चटनीक संग मुँहमे अबि‍ते दँति‍या कऽ दाँत पकड़ि‍ जीह रस चूसए लगलनि‍। रस पबि‍ते वि‍हुँसैत सुलेमान बाजल- “भाय, दुनि‍याँमे कतौ कि‍छु ने छै। छै सबटा अपना मनमे। जाबे आँखि‍ तकै छी ताबे बड़बढ़ि‍याँ, आँखि‍ मुनि‍ते दुनि‍याँ धि‍या-पुताक खेल जकाँ उसरि‍ जाइ छै। अपने मुइने सृष्‍टि‍क लोप भऽ जाइ छै।” सुलेमानक गंभीर वि‍चार सुनि‍ श्‍याम सुनरक मनमे उठलनि‍ जे भोजैत जँ भोजहरि‍क रसगर बात सुनैत तँ ओ आरो बेसी आनन्‍दि‍त होइत छै। मुदा अपन बात तँ बि‍नु प्रश्न पुछने नै हएत। द्वैतमे दुनि‍याँ हेराएल छै। बाढ़ि‍ आएल धार जकाँ कतए-सँ-कतए भसि‍या जाएत तेकर ठेकान रहत। श्‍याम सुनर पुछलखि‍न- “सुलेमान भाय, ऐ उमेरमे एत्ते भारी काज कि‍अए करै छी?” श्‍याम सुनरक प्रश्न सुनि‍ सुलेमान वि‍ह्वल भऽ गेल। जि‍नगीक हारल सि‍पाही जकाँ तरसैत बाजल- “भाय, जखन अहाँ घरक बात पुछि‍ये देलौं तखन कि‍अए ने सभ बात कहि‍ये दी।” सुलेमानक बात सुनि‍ श्‍याम सुनर बूझि‍ गेला जे बरि‍आतीक भोज हुअए चाहैत अछि‍, से नै तँ चरि‍आ दि‍यनि‍- “सुलेमान भाय, कहने छलौं जे गरम-गरम रोटी खाएब सराएल नै खाएब आ अपने गपक पाछू सरबै छी?” श्‍याम सुन्‍दक बात सुनि‍ हाँइ-हाँइ दूटा रोटी आ अधा चटनी खा एक घोंट पानि‍ पीब सुलेमान बाजल- “भाय, माए-बापक बड़ दुलारू बेटा छेलिऐ। खाइ-पीबैक कोनो दुख-तकलीफ परि‍वारमे नै रहए। कपड़ाक कारोबार छल। चरखा चलबैसँ लऽ कऽ खादी भंडारसँ हाट धरि‍क कारोबार छल।” श्‍याम सुनरक मनमे उठलनि‍- मोबाइल, टी.बी, कम्‍प्‍यूटर, कपड़ा, जूतासँ घर भरल रहै छै मुदा सबुरक कतौ ठेकान नै। भरि‍ पेट अन्न नै, फटलो वस्‍त्र नै, छुच्‍छहो घरमे सवुर केना फड़ि‍ जाइ छै!! सुलेमानक परि‍वारि‍क जि‍नगीक ललि‍चगर गप सुनि‍ श्‍याम सुनर जि‍ज्ञासा केलनि‍- “ओ कारोबार कि‍अए छोड़ि‍ देलि‍ऐ। मेहनतो आ आमदोक खि‍यालसँ तँ नि‍के छलए?” बामा हाथ चानि‍पर ठोकैत सुलेमान बाजल- “गाम-गामक बाबू-भैया सभ गरीबक कारखाना उजाड़ि‍ देलक। खादी भंडारकेँ लूटि‍ लेलक। छुच्‍छे हाथे कि‍ करि‍तौं।” फेर जि‍ज्ञासा करैत श्‍याम सुनर पुछलखि‍न- “कोन-कोन तरहक कपड़ा बनबै छेलि‍ऐ?” सुलेमान- “पहि‍रन वस्‍त्रसँ लऽ कऽ ओढ़ैक सलगा धरि‍ बनबै छेलि‍ऐ।” डुबैत नाव देखि‍ जहि‍ना नइया -नावि‍क- नि‍राश भऽ जाइत जे जँ जि‍नगी बचि‍यो जाएत, तँ जीब केना। तहि‍ना सुलेमानक तरसैत मन काँपए लगल। आगू बढ़बैत श्‍याम सुनर पुछलखि‍न- “ई तँ धि‍या-पुताक खेल भेल, जाए दि‍औ।” श्‍याम सुनर सुलेमानकेँ तँ कहि‍ देलखि‍न मुदा मन ठमकलनि‍। काजक रूपमे समाज बटल अछि‍। ओइ काजक लूरि‍ तँ ओकरा लेल सुरक्षि‍त अछि‍। जँ कागजी ज्ञानक अभावो रहतै आ वि‍कसि‍त बेवहारि‍क ज्ञान देल जाइ तँ कि‍ घर-घर पाठशाला नै बनतै। जरूरत छल समायानुकूल ओकरा बनबैक। से नै भेल। तेसर रोटी खाइत सुलेमान बाजल- “भेल तँ सहए, मुदा परि‍वार बि‍लटि‍ गेल।” परि‍वारक बि‍लटब सुनि‍ श्‍याम सुनर आगू बढ़ि‍ पुछलखि‍न- “अपन परि‍वारक कारोबार मरि‍ गेल तेकर पछाति‍ कि‍ केलि‍ऐ?” श्‍याम सुनरक प्रश्न सुनि‍ उत्‍साहि‍त होइत सुलेमान बाजल- “कि‍ केलि‍ऐ? हमरो जुआनीक उठानि‍ रहए। मनमे अरोपि‍ लेलि‍ऐ जे दुनि‍याँमे कतौसँ कमा कऽ परि‍वार जीवि‍त रखबे करब।” सुलेमानक संकल्‍पि‍त बात सुनि‍ वाह-वाही दैत श्‍याम सुनर पुछलखि‍न- “दोसर कोन काज केलि‍ऐ?” सुलेमान- “गाम-गामक कपड़ा बुनि‍नि‍हार बम्‍बई चलि‍ ऐलि‍ऐ।” “बम्‍बईमे कतए?” “भि‍वंडी। भि‍वंडीमे लूम चलै छै। ओइमे कपड़ा बुनाइ होइ छै। गमैया लूरि‍ तँ रहबे करए, लगले नोकरी भऽ गेल। ओना मजदूरी रेट कम रहए मुदा काजक माप सेहो रहै। जते करब तते हएत। जुआन-जहान रहबे करी दि‍नकेँ ने दि‍न आ राति‍केँ ने राति‍ बुझि‍ऐ। खूब कमेलौं।” श्‍याम सुनर- “तखन ओकरा कि‍अए छोड़ि‍ देलि‍ऐ?” श्‍याम सुनरक बात सुनि‍ सुलेमानकेँ ओहि‍ना भेलनि‍ जहि‍ना चोटेपर दोहरा-तेहरा कऽ चोट लगलासँ होइत। कुम्‍हलाएल फूल जकाँ मुँह मलि‍न आ ठोरमे फुड़फुड़ी आबए लगलनि‍ नमहर साँस छोड़ैत बाजल- “भाय, चारि‍ साल खूब कमेलौं, पाँचम साल बि‍हारी-मराठीक हल्‍ला उठल। हल्‍ले नै उठल कतेकेँ जान गेल, कतेकेँ बहु-बेटी छि‍नाएल, कतेकेँ कमाइ लुटाएल। सभ कि‍छु छोड़ि‍ जान बचा गाम अाबि‍ गेलौं।” श्‍याम सुनर- “गाममे आबि‍ फेर कि‍ केलि‍ऐ?” सुलेमान- “तेही दि‍नसँ पटि‍याक ई कारोबार शुरू केलि‍ऐ। सभ परानी लागल रहै छी, घीचि‍-तीड़ि‍ कऽ कहुना दि‍न बीतबै छी।” श्‍याम सुनर- “सुलेमान भाय, हम ई नै कहब जे अहाँ नै काज करू, मुदा काजक ओकाति‍ तँ देखए पड़त कि‍ने। कहुना-कहुना तँ चालीस-पचास कि‍लोमीटर साइकि‍ल चलबि‍ते हेबै?” “हँ से ने कि‍अए चलबैत हेबै। आब कि‍ ओ कोस रहल जे घंटामे एक कोस लोक चलै छलै।” “एक तँ अोहि‍ना शरीर ढील भऽ रहल अछि‍ तइपर साइकि‍ल चलबै छी। ततबे नै हो-न-हो कतौ रस्‍ता-पेरामे गीरि‍ये परब आ हाथ-पएर टूटि‍ जाएत तँ के देखत?” एक तँ सुलेमानक जरल मन ठंढ़ाएल तइपर सँ परि‍वारक लेल हाथ-पएर टुटब सुि‍न बाजल- “भाय, केतबो अन्‍हारमे अनचि‍न्‍हार लोक ढेरि‍या कि‍अए ने गेल, मुदा हमहूँ कोनो समाजक लोक छी तँए सभ समाज अपन-अपन धर्मक पालन करैत अछि‍। तहूमे हम तँ चि‍न्‍हार छी, गोटे-गोटे अनठा कऽ आगू बढ़ि‍ जाइत मुदा सभ तेहने तँ नहि‍ये अछि‍। तहूमे जागल लोककेँ थोड़े वि‍नास होइ छै।” सुलेमानक जागल बात सुनि‍ श्‍याम सुनर ठमकलाह। बात तँ बड़ सुनर अछि‍ मुदा जागलक की अर्थ बुझै छथि‍, से बि‍नु जनने बात नै बूझि‍ सकब। एके चीजक नाओं-शब्‍द ढेर अछि‍, नाओंक संग काज जुड़ल अछि‍। तइठाम बि‍नु पुछने काज नै चलत। पुछलखि‍न- “भाय, जागल केकरा कहै छि‍ऐ?” जेना सुलेमानकेँ रटले होइ तहि‍ना धाँइ-दऽ बाजल- “भाय, जखन आँखि‍ मूनल देखै छि‍ऐ तँ बूझि‍ जाइ छि‍ऐ जे सूतल अछि‍ आ आँखि‍ तकैत रहैए तँ बूझि‍ जाइ छि‍ऐ जे जागल अछि‍।” फेर ताकब आ मुनबक ओझरी श्‍याम सुनरकेँ लगलनि‍। मुदा ओझरीमे नै आगू बढ़ैत पुछलखि‍न- “कते गोटेक परि‍वार अछि‍।” सुलेमान- “अछि‍ तँ बहुत मुदा चारू बेटीकेँ सासुर बसेने अखन तीनि‍ये गोरेक अछि‍।” श्‍याम सुनर- “बेटासँ ने कि‍अए ई काज करबै छी। ओ तँ जुआन हएत?” बेटाक नाओं सुनि‍ सुलेमान वि‍ह्वल भऽ गेल। जेना कतौ सुख-दुख दुनू बहि‍न गारा-जोड़ी कऽ सामाक गीत गबैत तहि‍ना सुलेमान बाजल- “भाय, उमेरक ढलानेमे बेटा भेल। सभसँ छोट अछि‍। ओकरो दू अक्षर नै पढ़ा देबै, तँ लोक कि‍ कहत?” लोक लाज सुनि‍ श्‍याम सुनर हरा गेला। एहनो जि‍नगीमे लोक-लाज जीवि‍त अछि‍। वि‍हुँसैत पुछलखि‍न- “मन लगा कऽ पढ़ैए कि‍ने?” केकरा मनक बात ऐ युगमे के कहत। सभ अपने बेथे बेथाएल अछि‍। सुलेमान बाजल- “भाय, से तँ ओकरे मन कहतै जे मन लगा कऽ पढ़ै छी कि‍ मन उड़ा कऽ पढ़ै छी।” “अहाँ कि‍ देखै छि‍ऐ?” “भाय, हम तँ अपना धंधामे लागल रहै छी। तखन केना देखबै?” “संगी-साथी सभ कहैत हएत कि‍ने?” “हँ, से तँ कहैए जे जाइए पढ़ैले आ चलि‍ जाइए सि‍नेमा देखए, मैच देखए।” “परीछामे पास करैए कि‍ने?” “हँ से तँ ढौऔ-कौड़ी लगने पास कइये जाइए।” “तब तँ आशा अछि‍?” “हँ, से तँ ओकरेपर टक लगौने छी। जँ कहीं नोकरी भेलै तँ दि‍ने बदलि‍ जाएत।” बेटाक बात छोड़ि‍ श्‍याम सुनर पुछलखि‍न- “घरवाली कि‍ सभ करै छथि‍?” पत्नीक नाओं सुनि‍ सुलेमान पसि‍ज गेल। पत्नी, पत्नी रहल? संग चलनि‍हारि‍, काँट-कुशक परवाह केने बि‍ना कखनो गुरुक काज करैत तँ कखनो संगीक, कखनो प्रेमीक, जि‍नगीक अंति‍म क्षण धरि‍ रहैक प्रतिज्ञा...। बाजल- “भाय, कहुना कऽ बुढ़ि‍या भानस भात कऽ लइए। वेचारी दमासँ पीड़ि‍त अछि‍।” “इलाज कि‍अए ने करा दइ छि‍यनि‍?” “गरीब घरक लोकक इलाज कि‍ हेतै। जते पथ होइ छै तइसँ बेसी कुपथ होइ छै। तखन तँ चाहै छी जे वेचारी पहि‍ने मरए।” “से कि‍अए?” “एतेटा जि‍नगीक सभ कमाइ लुटा जाएत, जखन हम मरि‍ जेबै आ ओइ वेचारीक भीखक कलंक लागत।” सुलेमानक बात सुनि‍ श्‍याम सुनर गुम भऽ गेलाह। कि‍छु काल पछाति‍ कहलखि‍न- “आइ रहि‍ जाउ। काल्हि‍ ऐम्‍हरेसँ बेचैत-वि‍कनैत चलि‍ जाएब।” हँसैत सुलेमान बाजल- “भाय, जेना आइ एको पाइ बोहनि‍ नै भेल तेना नीके हएत। मुदा, बेमरयाह घरवालीकेँ एक नजरि‍ नै देख लेब से केहेन हएत।” (बि‍छान, पटि‍या, चटाइ आ गोनरि‍ बुननि‍हार एवं बेचि‍नि‍हार लेल...) बिन्देश्वर ठाकुर, धनुषा, नेपाल। हाल-कतार। टेनामेनी

- मोदिर हम आइ कामपर नै जाएब ,कारण ३ महिनाक तलब बाकिए अछि । - रौ छौड़ा तोँ बेसी बुझै छिही। अतेक आदमी हमरा बातक जबाबे नै देलक आ तो हमरा संगे दिलग्गी करबे? - ई सभ तँ मुर्ख छै । किछु लोग अहाँसँ डरैत अछि जे सुपत कहलापर नोकरीसँ हाथ धोबऽ पड़तै। मुदा अधिकारक लेल डरब नीक नै। - ठिके छै, कनिक तोँ ने जो, तब देख लिहें एकर दुर्दशा । - हम मेहेनती आ इमन्दारे नै, जमानक सेहो पक्का छी। अपन हक लेने बिना हरगिज नै जाएब। -काल्हि भोरे-भोर कम्पनीसँ वार्निंग लेटर एलै। १ दिनक अनुपस्थितिमे ३ दिनक पगार सेहो काटि लेलकै। साथे-साथ महनथाक सभ समान लाधि कऽ लऽ गेलै दोसर ठाम, कम्पनिएक गाड़ीसँ। महन्था आँखिसँ नोर ढारैत रहला मुदा कियो हुनकर पुकार नै सुनलकै आ नै कियो अबाजे उठेलकै। दुर्भाग्य आइ भोरेसँ घरमे रमझम छै । सब केउ निक निक कपड़ा लगौने छै। चारुदिस एन्डकोके गीत गुन्जयमान भऽ रहल छै महेशराक घरमे। रहौक किए नै, हुनकर छोटकी बहिनक विवाह जे छनि। मुदा महेशराक कन्याकेँ एकटा कोनमे बैसि कनैत देख कऽ हुनक सास बजलनि- "कन्या ई की, एखन तँ बरातियो नै आएल, बुच्ची बिदाहो नै भेल आ अहाँ एखनेसँ नेप ढारऽ लगलौं।" मुदा के बुझतै सोनापारीवालीक मन भरल बेदना? एतऽ सभक पति लगे छै आ ओ सभ अपन पतिक साथ प्रसन्न छथि, मुदा हुनकर पति एहन शुभ अवसरपर हुनकासँ अलग कतौ दूर देशमे कोइला कटैत होताह।

घुसखोर -सर नमस्ते हमरो पास्पोर्ट बनएबाक अछि । हेतै कि नै ? -हइ, बैस ओम्हर, एखन हम व्यस्त छी, देखै नै छिही? ताबे जो, बजैबौ तँ अबिहे। -हेतै। शेनियासँ पाछू आएलि दु गोटेकेँ पैसा लऽ कऽ तुरन्त पासपोर्ट दैत देखि जखन सी.डी.ओ. केँ कहलक तँ ओ बाजल- "रे बुरि, ई लोक तँ नीक छै आ बुधियार सेहो। तोरो अहिना हाथक हाथ पास्पोर्ट चाही तँ चाह पान खियाबै पड़तौ, नै तँ तारिख ढोइत रह सरकारी वकील जकाँ। छुआछुत -धनमन्ती बौआ गे, जल्दी-जल्दी पानि भरै ने, हमरो भरऽ के अछि। ओतऽ बाबा प्रतीक्षामे हेतौ पानि पिबाक लेल। -हँ हँ दाइ, बस, भऽ गेलै। ले भ’र। बुढ़ियाक पानि भरिते काल मोसाफिरक छोटका बेटा आबि गेलै। बुढ़िया भरल घैलाक पानि फेकैत, "रै छौड़ा, तोरा आँखिमे मराछाउर देने हौ ? देखै नै छिही जे हम पानि भरै छी ? मचरुवा कहि कऽ पानियो छुआ देलक हमर। ओम्हर जो, ताबे बादमे अबिहें।" छौड़ा बकुवा कऽ ठाढ़ बस बुढ़ियाक मुँह तकैत रहि गेल। प्रेम-पत्र 

हमर प्राणप्यारी नम्रता  मनभरिके माया आ स्नेह मात्र अहाँकेँ।  हम ऐठाम कुशल रहि अहाँक कुशलताक कामना करैत छी। अहाँक वियोगमे बिना पानिक माछ आ बिना नेहु कऽ माँस बनल हम एतऽ परिवारक भरण-पोषण लेल श्रमजीवीक टोपी लगा दिन काटि रहल छी।  काल्हिक फोनसँ साच्चे हमर मन बड दुखित अछि। अहाँक उपराग छल जे हमरा बिसरि गेलौं, बराबर फोन नै करैत छी। अहाँकेँ हमर ख्याले नै अछि। मुदा सत्य ई नै छै। किएक तँ हम तँ बस शरीर छी जहिकऽ आत्मा अहाँ छी। जौँ श्वास लेबऽबला फोक्सो हम छी तखन ऑक्सीजन तँ अहाँ छी। आब अहीं कहू जकरा बिना हम एक पल बाँचि नै सकब, ओकरासँ अलग रहबाक कल्पना कोना करब? मुदा तैयो परिस्थिति लोककेँ दोसर कऽ सामने विवश कऽ दै छै। आन लग काम करब, ओहो प्रचण्ड गर्मीमे, बड पैघ बात छै। घरमे बसिया-कुबसिया किछु नै खाइ छलौं। मुदा एतऽ सुखल खबुस चिबाएब लत भऽ गेल अछि। नेपालमे रहैत काल विदेश माने स्वर्ग हएत से कल्पना करैत छलौं। ओतुक्का लोक सभ आनन्दसँ, खुशी साथ जीवन व्यतीत करैत हेताह, से भ्रम छल। पैसा जेना गाछसँ हिला कऽ लाख- दू लाख पठबैत अछि, तहिना बुझाइत छल। शायद एखन अहूँ ओहे सोचैत हएब। मुदा देखू ह्रिदेश्वरी, सत्य ई नै छै। स्वर्ग कहल ई जगह वियोगाभासमे तड़पि-तड़पि मरऽबला स्थान छै। एतऽ पैसाक महत्व संगे मनुष्यक खरीद-बिक्री होइ छै। दोसर दिस रातिमे अहाँ संग बिताएल ओ पल सभ,स्नेहक तीत-मीठ गप-सप बिढ़नीक खोता जकाँ हमरा मानस पटलमे आबिकऽ निन्द तोड़ि दैए। कखनो-कखनो विदेश छोड़ि कऽ अहीं संग ओइठाम साग-पात खा दिवस गमएबाक इच्छा होइए। मुदा विगतक दु:ख-दर्दसँ मन तरसि जाइए। सच्चे, नीक खाना, नीक कपड़ा आ नीक गहना लेल कतेक तरसि गेल छलौं। नीक खाएब आ नीक लगाएब सपना भऽ गेल छल।  एतऽ आबि परिवार टेबब एकटा किनर मिलल अछि। दायित्व पूरा करबाक एकटा सहारा अछि। हम एतबेमे खुशी छी। मुदा तैयो फोन करबाक पर्याप्त पैसा आ समय नै हएब, दोसरक वशमे बड़द जकाँ जोताएब, घर- परिवारसँ दूर रहब चिन्ताक विषय थिक।  एहन विषम परिस्थितिमे हमर साथ देब, आत्मविश्वास बढ़ाएब, अपनामे धैर्यताक बान्ध मजगूत राखब अहाँक कर्तव्य अछि। कारण अहाँक धैर्यता आ आत्मविश्वासे प्रवासमे हमरा हौसला प्रदान करत।  अन्तमे समय-समयमे फोन करैत रहब से वाचाक संग एखन विराम। बाँकी दोसर पत्रमे। 

अहाँक स्नेही  एकान्त राम मरुभूमि टोल,कतार भुखाएल जानवर सभ

कतेको दिन बाद आइ फेर सप्तरङ्गी आकाश देखऽ मे आएल । मौसम पूरा साफ आ बुलन्द। ऊपरसँ टिप-टिप पानि पड़ि रहल, जेना बसन्तक आगमन भेल हुअए। मुदा मन्टुटियाक आँखि नोरसँ भरल। पिजड़ामे कैद भेल सुगा जेहन छटपटा रहल। सच मानू तँ ऐठाम सँ भागि जएबाक प्रयासमे मुदा ई असम्भव।  मन्टुटिया एकटा नेपाली नारी अछि जे १ साल पहिने कमएबाक लेल कतार आएल रहए। गामपर घरबला दोसर महिला संगे विवाह कऽ एकरा छोड़ि देलाक बाद अपन एकटा बेटीकेँ माए-बाप लग राखि दर-दर ठोकर खाइत कतार पहुँचलीह। एतौ ओतेक नीक काम नै मुदा एगोट शेख[माली]क घरमे कामकाज मिललै। दु:ख तँ बड छलै, तैयो अपन बाध्यता आ विवशता देखि दिन काटऽ लागल।  मन्टुटिया देखऽमे पातरे-छितरे, श्याम रङ्ग, ने बेसी नम्हर, ने बेसी छोट। लगभग २५ बर्षक कड़ा जवानी। छोट-छोट आँखि आ दहिना गालपर तिलबा ततेक ने शोभै जे लोक सभ पछाड़ी लागि जाथि। ओना काम घरक करितो शरीरक सिटसाट कम नै करै। कतेक दिन तँ ड्राइभर लोकनि सेहो रुपैयापर प्रस्ताव आगू बढौने रहै पर ओ सभ सफल नै भेलाह, कारण इज्जत बेचि खाएब मन्टुटियाकेँ पसन्द नै छनि।  कतारक राजधानी दोहासँ २ किलोमीटर पश्चिम नजमा जाएबला बाटमे होली डे बिल्ला होटलक पछाड़ीमे मन्टुटिया मालिकक घर छै। अपने बुढबा २ टा शादी कएने छथि आ एखन ५५ सालक भऽ गेलाह। बुढबाकेँ १ बेटी आ ४ बेटा मिला कुल ५ गोट धियापुता छनि। जइमे जेठ बेटीक विवाह भेल छै, सउदीये रहै छै कहाँदन। बाँकी सभ कुमारे। खुल्ला साँढ़ जकाँ।  हिनकर बेटा सभ ततेक ने छिचोरा जे शुरुए दिनसँ मन्टुटियाक पछाड़ी हाथ धो कऽ पड़ल छै। अतेक दिन तँ कोनो विधी बचि गेलाह। मुदा आजुक दिन मालिक दुनू मल्कानिक संग हुमरा करबाक लेल सउदी गेल। एहने मौकाक इन्तजार छलै ओइ कौआ-चिल सभकेँ।  भरि दिन कतऽ रहै नै पता मुदा साँझ पड़िते धमधम चारु भाइ आएल। प्रमुख गेट बन्द कएलक। अपन कोठामे जा खाना देबाक लेल किलोल कएलक। मन्टुटिया खाना लऽ जखने आएल ओहो गेट बन्द भऽ गेल। निच्चामे पान-परागक पौच, मेग्डोनेल शराबक बोतल तैयार, जेना पूर्व योजना रहए। साथे टी.भी मे थ्री एक्स प्लेयर लगा काम उत्तेजनाक प्रयासमे। एकर अतिरिक्त एकटा कोनो गोली रहै जे जूसमे धऽ कऽ मन्टुटियाकेँ पिया देलकै। मन्टुटियाक माथापर कामदेब ताण्डव करए लागल। रङ्गमंच रन्कैत गेल। नाटक क्लाइमेक्स तरफ लम्कैत गेल। धीरे-धीरे सभपर जवानीक भूत चढ़ैत गेल आ भुखाएल जानवर सभ मन्टुटियाकेँ लुटैत रहल। मन्टुटिया लुटाइत रहल, लुटाइत रहल...... बस लुटाइत रहल। बिपतियाक विदेश [विहनि कथा ] कतेको दिनसँ मुह घोकचौने बिपतियाक ओठपर आइ भरल मुस्कान अछि। कारण तीन महिनाक बाद पश्चिम दिससँ चान्द उगल। माने कम्पनी आइ तलब देबाक लेल राजी भेल। तीन महिना धरि विभिन्न बहाना बनाकऽ टारैत छल। अगला महिना, अगला महिना, अगला महिना..... । मुदा तीन महिना बाद कामदार सभ जब उखड़ल तँ कम्पनी सेहो विवश भऽ गेल सेलरी देबाक लेल। मुदा ओतेक सोझिया नै रहैक कम्पनीक मनेजर। लेबर सभकेँ ठकि फुसला कऽ एक महिनाक तलब देलक आ २ महिनाक राखिए लेलक। अन्तत: जे हुअए, सभ कामदार खुश भेल। बिपतिया सेहो खुश भेल।  सेलरी लऽ पैसा गनैत अछि तँ मात्र पाँच गोट नमरी। पहिनेसँ आएल मुस्कान बिपतियाक मुहसँ बिला गेलैक। ओ चिन्तित भऽ गेल। कारण खानाक पैसा बङ्गालीकेँ उधारिए छलै। चुल्हा चौका चलाएब हेतु घरमे पठाबै पड़तनि। ओतबे कहाँ, महन्थास लेल ढौवा नै बुझैताह तँ ५०००० क सुइद-सुइद जोड़ि कऽ २ लाख बनाइए देतै। आब की करत, बिपतिया गम्भीर सोचमे पड़ि गेल। "घर परिवार छोड़ि कऽ सात समुन्द्र पार अएली पत्थर फोड़ऽ मुदा तैयो घर नै चलल आ पेटो नै चलल, धिकार अछि हमर मेहनेत आ हमर कामकेँ "बरबड़ाइत आ लथरैत जेक्रीत ZEKREET क ट्रस्ट एक्सचेन्ज trust exchange मे जा प्रभु मनी ट्रान्सफर द्वारा पत्नीक नामसँ खाना पैसा बाहेक सभ पठा देलक। आरो नै किछु तँ ओइ महन्था धनिककेँ कर्जा तँ सधतै। नवेंदु कुमार झा गाम मे विज्ञान केँ लोकप्रिय बनबऽ मे लागल छथि मानस बिहारी मिथिलांचलक पिछड़ल क्षेत्र मे नेना सभक मध्य विज्ञानक प्रति जागरूक करबाक लेल अभियान चलाओल जा रहल अछि। ऐ अभियानक अंतर्गत नेना सभ खेल-खेल मे विज्ञान केँ समझि-बुझि रहल छथि। महत्वबला ऐ अभियानक नेतृत्व पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलामक सहयोगी रहल भारत सरकारक पूर्व वैज्ञानिक मानस बिहारी वर्मा कऽ रहल छथि। बाढ़ि प्रभावित दरभंगा जिला मे ऐ अभियानक सफलताक बाद आब एकरा पूरा प्रदेशमे चलेबाक योजना अछि। दरभंगा जिलाक घनश्यामपुर प्रखंडक छपेर गाम भोउरक निवासी श्री वर्माक मोबाइल विज्ञान प्रयोगशाला (एमएसएल)क प्रशंसा पूर्व राष्ट्रपति डाक्टर कलाम तँ करबे कएलनि संगहि बिहारमे एकरा लोकप्रिय बना ओ नेना आ शिक्षक सभक आँखिक तारा सेहो बनि गेल छथि। वैज्ञानिक आ बुद्धिजीवी सभक संस्था विकसित भारत फाउंडेंशनक नींव रखनाहार श्री वर्मा वर्ष 2010 मे बाढ़ि प्रभावित कमला बलान क्षेत्र सँ मोबाइल विज्ञान प्रयोगशाला प्रारंभ कएने छलाह। बाढ़ि प्रभावित दरभंगा, मधुबनी आ सुपौल जिलाक मे ई प्रयोगशाला चौबीस हजार छात्रक मध्य विज्ञानकेँ लोकप्रिय बनौलक अछि आ 758 शिक्षक केँ प्रशिक्षित सेहो कएलक अछि। ई प्रयोगशाला 2100 गामक दौरा सेहो कएलक अछि। अगिला वर्ष प्रयोगशालाक संख्या तीन सँ बढ़ा कऽ दस करबाक योजना अछि। श्री वर्माक अनुसार 1990 मे आन्ध्र प्रदेशक कुप्पम मे विज्ञान केन्द्रक मे गुड़ीबंका गामसँ प्रारंभक बाद मोबाइल प्रयोगशाला महत्वपूर्ण काज कएलक अछि। एखन धरि गोटेक 30 लाख छात्र ऐ मोबाइल प्रयोगशालासँ विज्ञानसँ संबंधित संवाद स्थापित कएलनि अछि। अगस्त्य फाउंडेंशन आ विकसित भारत फाउन्डेशन बिहार द्वारा प्रदेशमे मोबाइल प्रयोगशालाक कारण नेना सभ विज्ञानक प्रति जागरूक भेलाह अछि। जइ विद्यालय मे ऐ प्रयोगशालाक दौरा भेल अछि ओतए छात्र सभक उपस्थिति बेसी बढ़ल अछि। श्री वर्मा जनौलनि जे एक विद्यालयमे छओसँ सात बेर एम एम एल केँ लऽ जएबाक लक्ष्य अछि। एखन धरि तीन-चारि बेर एक विद्यालयक दौरा भेल अछि। प्रारंभिक अनुभव जनतब दैत अछि जे छात्र सभमे विज्ञानक प्रति आ ऐ विषयक प्रति सोच बदलल अछि। छात्र सभ मे प्रश्न पूछब, विश्लेषणात्मक सोच अपन सहपाठीसँ विचार-विमर्श करबाक क्षमता बढ़ल अछि, एम एस एल मे कक्षा छओ सँ बारह धरिक छात्र केँ ध्यान मे राखि विज्ञान मॉडल तैयार कएल गेल अछि। एन सी ई आर टी क पाठ्यक्रम पर आधारित एकर एक सय साठि विज्ञान मॉडल विषय केँ बुझबाक अंतर दृष्टि पैदा कऽ रहल अछि। ऐ अभियानक उद्देश्य बिहारमे बेसी नेना केँ वैज्ञानिक बनाएब अछि। ऐ सँ छात्र सभमे विज्ञानक प्रति रूचि बढ़ल अछि। शिक्षक सभ सेहो मांग करैत छथि जे बेसीसँ बेसी बेर प्रयोगशाला हुनक विद्यालय मे आबए जइसँ विद्यालय मे विज्ञानक शिक्षकक जे कमी अछि ओकरा दूर कएल जा सकए। लाइट कांबेट एयरक्राफ्ट परियोजनाक सुपरसोनिक जहाज तेजसक सफलताक संग तैयार करबा मे प्रोजेक्ट डायरेक्टर (जेनरल सिस्टम)क पद पर काज कऽ चुकल 69 वर्षक श्री वर्मा जनौलनि जे बिहार प्रतिभाक जमीन अछि। विज्ञानक प्रति नेना सभ मे रूचि जगेबाक अछि। विद्यालय सभ मे जमीनक स्तर पर संरचनाक अभाव मे ई एकटा चुनौतीबला काज अछि मुदा इमानदारीसँ प्रयास कएल जाए तँ ऐ मे सफलता अवश्य भेटत। श्री वर्मा विज्ञानकेँ लोकप्रिय बनेबाक संगहि उतर बिहारमे कोसी आ ओकर सहायक नदी सभक आबएबला बाढ़िक समस्याक क्षेत्रमे जियोमार्फो डायनेमिज्मक अध्ययन कऽ रहल छथि। हुनक उद्देश्य बिहारमे बाढ़िक समस्याक वैज्ञानिक अध्ययन करबाक अछि। श्री वर्मा मानैत छथि जे केन्द्र आ राज्य सरकार द्वारा बाढ़ि प्रभावित क्षेत्र मे नदी सभक हाइड्रोलॉजिकल विशेषताक अनदेखी कऽ पुल आ बान्ह आदि बनाएब भूल अछि। भारत सरकारक पूर्व वैज्ञानिक मानस बिहारी वर्मा दरभंगा जिला मे प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण कएलाक बाद मधुबनीक जिला मधेपुरक जवाहर उच्च विद्यालय सॅ मैट्रिक परीक्षा पास कयलनि। पटना अभियंत्रण महाविद्यालयसॅ मैकेनिकल इंजीनियरिंगक पढ़ाइ पूरा कएलनि। पूर्व राष्ट्रपति डाक्टर कलामसँ हुनक पहिल भेँट इंटीग्रेटेड मिसाइल प्रोग्रामक सिलसिलामे रक्षा अनुसंधान विकास संगठनमे कार्यरत रहलाक दरमियान भेल छल। दरभंगा मे बिहार सरकार द्वारा स्थापित वीमेन्स इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नोलॉजीक संचालन मे सेहो हुनक महत्वपूर्ण योगदान अछि। दिसम्बर मास मे दरभंगा मे आयोजित विज्ञान मेला मे पूर्व राष्ट्रपति डा. कलाम उपस्थित भऽ श्री वर्माक लगन आ योगदानक प्रशंसा सेहो कएने छलाह। मोबाइल विज्ञान प्रयोगशाला बिहारक संगहि आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा आ महाराष्ट्र मे सफलताक संग काज कऽ चुकल अछि। बाँटल गेल मैथिली: बरत मिथिला बिहार मे न्यायक संग विकासक दावा करएबला नीतीश सरकारक टेढ़ नजरि मिथिला आ मैथिलीपर लागि गेल अछि। विकासक पिटा रहल ढोलक संगहि प्रदेशमे विकासक बाट खूजल अछि, मुदा विकासक सीमाकेँ बान्हि देल गेल अछि। ओना तँ विकासक धार पूरा प्रदेशमे बहि रहल अछि मुदा विकासक जे परिभाषा नालंदा जिला आ मगध क्षेत्रमे लागू भऽ रहल अछि ओइसँ शेष बिहार विशेष कऽ मिथिला अवश्य वंचित अछि। कुशासनक मारि सहल बिहारमे सुशासनक जे बाट देखाओल गेल अछि ऐमे मिथिला आ मैथिलीक परिभाषा बदलि गेल। केन्द्रक सरकार हुअए कि प्रदेशक सरकार, दूनू मिथिला आ मैथिलीक उपेक्षा कऽ रहल अछि। केन्द्रीय रेल बजटक संगहि बिहारक आम बजटमे मिथिलाकेँ तकैत रहि जाएब। ज्यों केन्द्र उपेक्षा कऽ रहल अछि तँ ओकर कारण सेहो वाजिब अछि। सत्ता प्राप्तिक लेल वोटक राजनीति होइत अछि। ओना संवैधानिक रूपे देशमे लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था मुदा विशेष लाभ ओइ क्षेत्र अथवा सरकार समर्थक दलकेँ होइत अछि जकर सहारासॅ सरकार बनैत अछि। ऐ फार्मूलामे मिथिला असफल अछि। केन्द्रमे सतारूढ़ दलकेँ मिथिलांचलसँ खरड़ि कऽ बाहर कऽ देल गेल अछि। प्रदेशमे सतारूढ़ गठबंधककेँ अपार समर्थन देब सेहो मिथिलापर भारी पड़ि रहल अछि। निरंकुश भेल सरकार अब मिथिलाक आ मैथिलीक पहचान भिरबऽ पर लागि गेल अछि। जगत जननी माता सीताक भाषा मैथिलीपर तलवार चलि गेल अछि आ जगत जननीक मातृभूमि मिथिलापर संकटक तलवार लटकि रहल अछि। खएर, ई सभ तँ सत्ताक खेल अछि। सत्ता अपन हिसाबसँ रणनीति बना शासनक संचालन करैत अछि। बिहारक वर्तमान नीतीश सरकार जइ रणनीतिपर शासन चला रहल अछि तकर सोझ नोकसान मैथिली केँ भेल अछि आ मिथिलाक नोकसानक बाट धऽ लेने अछि। मिथिलाक जनता अपन मांगक लेल संघर्ष कऽ रहल अछि। ऐ क्रममे फराक प्रदेशक मांग सेहो उठैत रहैत अछि। सरकारकेँ मिथिलाक आवाज नै सुनाइ पड़ि रहल अछि। मिथिलाक लड़ाइकेँ कमजोर करबाक लेल सरकार साजिश कऽ रहल अछि। ई साजिश आब हमरा सभक सोझाँ अबि गेल अछि। जगत जननीक मातृभाषा मैथिलीकेँ बॉटि मैथिलीक हक लेल चलि रहल संघर्षकेँ कमजोर कएल गेल अछि। प्राथमिक स्तरसँ मैथिली भाषामे पढ़ाइ हुअए, ऐ लेल कतेको वर्षसँ संघर्ष चलि रहल अछि। कांग्रेसक शासन कालमे ऐ लेल मैथिली भाषामे पोथी सेहो प्रकाशित कएल गेल छल। मुदा ओ मात्र कागज धरि सीमित रहल, ऐसँ मैथिलीकेँ कोनो लाभ नै भेल तँ नोकसान सेहो नै भेल। नीतीश सरकार प्राथमिक स्तरसँ मातृभाषामे पढ़ाइ प्रारंभ कएलक अछि। ऐमे बिहारक क्षेत्रीय भाषा मैथिली आ भोजपुरीक संग अंगिका आ बज्जिकाकेँ जगह दऽ मैथिली भाषाक बँटवारा कऽ मैथिली भाषाक अस्तित्वपर प्रश्न चिन्ह ठाढ़ कऽ देलक अछि। मैथिली, भोजपुरी भाषाक पोथीक संगहि अंगिका आ बज्जिका भाषामे सेहो छपलक अछि। मातृभाषा बँटि गेल। मातृभूमिमे बँटबाक साजिश भऽ रहल अछि। मिथिला आ मैथिलीक नामपर राजनीति कऽ रहल राजनेता आ मैथिल विद्वान मौन धारण कएने छथि। सत्तारूढ़ दलक अंग प्रदेशक एकटा नेताक इशारापर मैथिलीक महत्वकेँ कम करबाक लेल अंगिकाकेँ महत्व देल गेल अछि। दोसर दिस अंगिकाकेँ सेहो आगाँ कएल गेल अछि। ई जनतब अछि जे प्रति पाँच कोसपर भाषाक स्वरूप बदलि जाइत अछि। अंगिका आ बज्जिका मैथिली भाषाक बहिन अछि। क्षुद्र राजनीतिक लाभक लेल मैथिली प्रेमक नौटंकी करएबला राजनेता मैथिली भाषाकेँ बाँटि चैनक बासुरी बजा रहल छथि। हमरा सभ एतेक पैघ बेवकूफ छी जे ओइ राजनेताकेँ माथपर बैसबैत छी जे भाषाक विरूद्ध साजिश करैत अछि। अंगिका आ बज्जिका फराक भाषाक रूपमे कोनो एक दिन अस्तित्वमे नै आबि गेल अछि। ऐमे सत्ताक शीर्ष नेतृत्वक हाथ अवश्य रहल हएत। मिथिला आ मैथिलीक पहरूआ कहएबला राजनेता सभकेँ एकर जनतब नै भेल हएत ई मानऽबला गप नै अछि। दरअसल मजगूत सत्ताक आगाँ मिथिलाक वर्तमान राजनेता असहज छथि। स्वतंत्राक ६४ वर्षक बादो मिथिला आ मैथिली पिछड़ल अछि। बावजूद एकर मिथिलावासी अपन हिसाबे जीवनक गति आगाँ बढ़ा रहल छथि। मिथिलाक भूमि शांतिक केन्द्र अछि, ऐठाम उग्रताक कोनो जगह नै अछि। देशमे भाषा आ प्रदेशक लेल कतेको उग्र आंदोलन भेल अछि जइमे किछु सफल सेहो भेल। ई जनैत जे सरकार उग्रताक भाषा बुझैत अछि मिथिलावासी अपन हिसाबे आंदोलन आ राजनीति करैत छथि। संगहि राजनीतिक महत्व सेहो अछि। बिहारक बँटवारा उग्र आंदोलनक परिणाम आ तात्कालिक सत्ताक कुर्सी बचैबाक लेल ओकर महत्वक परिणाम अछि। आंदोलनक मिथिला प्रतीक्षा कऽ रहल अछि। क्षुद्र राजनीतिक लाभक लेल मैथिलीक अस्तित्वपर जे प्रश्न ठाढ़ कएल गेल अछि ओकर मुँह तोड़ उत्तर देबाक लेल हमरा सभकेँ सजग होमए पड़त। मातृभाषाकेँ सरकार बाँटि देलक अछि तँ मातृभूमि मिथिलाक कपारपर संकट अछि। जिलामे पसरल मिथिला अंग, बज्जिकांचल, सीमांचल आ सुरजापुरीक रूपमे बाँटल जा रहल अछि। एक समए छल जखन मिथिला किछु वर्षक लेल प्राकृतिक कारणसँ दू क्षेत्रमे बँटि गेल छल। कोसीपर पुलक अभावमे मिथिला फराक भऽ गेेल छल। केन्द्रमे अटल बिहारी वाजपेयीक नेतृत्वबला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार कोसीक महासेतुक जे उपहार देलक ओइसँ मिथिला एक अवश्य भेल मुदा बिहारक राजग सरकार वाजपेयीक ऐ उपहारक हिसाब मैथिलीक आ मिथिलाकेँ बाँटि चुकता करबापर लागल अछि। मिथिलावासी अपन अधिकारक प्रति सजग भऽ जाथि ऐसँ पहिनहि नीतीश सरकार ओकर धरती पकड़ैबाक लेल तैयार अछि। कोनो संस्कृतिकेँ नष्ट करबाक लेल आवश्यक अछि जे पहिने ओकर भाषाकेँ नष्ट कऽ देल जाए। ज्यों भाषा मरि जाएत तँ ओकर भू-भाग मेटाय मे कोनो समय नै लागत, से नीतीश सरकार पूरा मनोयोगसँ कऽ रहल अछि। भारतीय संस्कृतिक रक्षा करबाक दाबा करएबला राजनीतिक दल आ संगठन सेहो नीतीश सरकारक ऐमे डेगसँ डेग मिला कऽ चलि रहल अछि। श्री रामक जन्म भूमिक लेल पूरा देशकेँ अपना माथपर उठबऽ बला दल आ संगठन जगत जननी सीताक मातृभूमि बँटैत देखि रहल छथि। वोटक राजनीतिक भेट चढ़ि गेल अछि जगत जननीक मातृभूमि आ मातृभाषा। आ राष्ट्रवादी सांस्कृतिवादी सभ आँखि पर पट्टी बान्हि निश्चिंत छथि। मैथिली प्रदेशक एकमात्र भाषा अछि जकरा संविधानक अष्टम् अनुसूचीमे स्थान भेटल अछि। ई भाषा सरकारक संरक्षकक अधिकारी अछि। आन प्रदेशमे कामकाजमे क्षेत्रीय भाषाक महत्व अछि। संविधानक अनुसूचिमे स्थान प्राप्त ऐ भाषाकेँ सरकार संरक्षण दऽ देबऽ मे असफल रहल आ एकर महलकेँ कम करबामे कोनो कसरि नै छोड़लक अछि। सरकारक लाभसँ ई भाषा वंचित अछि। कोनो मैथिली पत्र-पत्रिका सरकारक विज्ञापनक लाभ नै उठा सकैत अछि। कि एक तँ सरकारक विज्ञापन नीितमे मैथिली भाषाक कोनो स्थान नै, ज्यों सरकार भाषाकेँ संरक्षण नै दऽ सकैत अछि तँ ओकरा खंडित करबाक सेहो ओकरा कोनो अधिकार नै छै। हमरा जनैत एखनो बहुसंख्यक मैथिली भाषाीकेँ ऐ तथ्यक जनतब नै अछि जे हमर भाषाकेँ बॉटि देल गेल अछि। ऐमे दोष हमर सभक सेहो अछि। हमरा सभ अपन मातृभूमिक संगहि मातृभाषासँ दूर भऽ रहल छी। उच्चस्थल भेलाक बाद मैथिली भाषामे गप नै करब हमरा सभक पिछड़ल हेबाक हीन भावना प्रदर्शित करैत अछि। ज्यों स्वयं सजग नै रहब तँ एकर लाभ दोसर अवश्य उठाओत। दोसर मैथिलीक राजनीति कएनिहारक जे अछि ऐसँ ऐ भाषापर एक खास वर्गक भाषा हेबाक मोहर लागि रहल अछि। हमरा सभमे अपन भाषाक प्रति समर्पणक भावनाक अभाव आबि गेल अछि आ भाषाक माध्यमसँ मात्र सरकारी लाभ आ पुरस्कार लेबऽ मे अपन सभटा विद्वता खर्च कऽ रहल छी। एकर लाभ दिग्भ्रमित क्षेत्रीय विद्यान उठा, राजनेताक लेल राजनीतिक अवसर उपलब्ध करा रहल छथि। मिथिला बरि रहल अछि, मैथिली बँटि गेल, हमरा सभ मौन छी। मिथिला नाम जाप कऽ राजनीति कएनिहार राजनेता, भाषाक विद्वान होएब आ ऐ भाषाक सहारा लऽ जीवन यापन कऽ रहल विद्वत समूहक कानपर ढील धरि नै चलि रहल अछि। स्वार्थक राजनीतिमे जगत जननीक मातृभूमि आ मातृभाषा बिहारक नीतीश सरकारक बलि चढ़ि गेल अछि। शांत पड़ल मिथिलामे अन्हरक कोनो संकेत नै भेटि रहल अछि। सरकारक गौण एजेंडा आब सभक सोझाँ आबि गेल अछि। भाषा बटल, क्षेत्र बटल, गाम बटल, घर बटल। की ऐ बँटवाराकेँ अपन नियति मानि हमरा सभ चुप्प रहब, समए अछि जागू हे मिथिला पुत्र। अहाँक प्रतीक्षा अहाँक मातृभूमि आ मातृभाषा कऽ रहल अछि। ज्यों से नै भेल तँ देश आ प्रदेशक मानचित्रपर हमरा सभ दूरबीन लगा तकैत रहब मिथिला आ मैथिली। सत्यनारायण झा विहनि कथा- भोला बैरक न० ९ आ कैदी न० ९ |भोला एकटा दुर्दांत कैदी छैक |आजीवन काराबासक दंड देल गेल छैक |१२ बरख सं जहल मे अछि |आइ हाजरीक बाद जेलर साहेब भोला क’ बजेलखिन |भोला आबि गोर लगलकनि आ मुँह दिस ताकय लगलनि ?जेलर साहेब कहलखिन ,भोला ,तोहर चरित्र आ काज देखि सरकार निर्णय लेलक अछि जे तोरा आँठ बरख पहिने रिहाई क’ देल जेतय आ जीवन यापन चलाबय लेल २ एकड़ जमीन आ इन्द्रा आबास सं एकटा घर आबंटन कयल जेतय |तोरा जल्दी छोरि देल जेतह | भोलाक चेहरा पर कोनो भाव नहि अयलैक |ओ उठि बैरक मे आबि गेल |चुप चाप परि रहल आ एकटक सं छत दिस ताकय लागल ?की भेटल हमरा ?एकटा छोट गलती हमरा कत’ पहुँचा देलक ?मुखिया जी सं कोटाक अन्न लेबय गेल रही |हुनकर बईमानी देखि नहि रहल भेल |कहलियैन ,मुखियाजी सभटा अन्न त’ कालाबाजारी क’ देलियैक ,आब २ किलो गहुम ल’ हमरा सभक पेट कोना चलत |मुखिया जी गरजि उठलाह ,सार ,कानून पढ़ैत छह ?हम कहलियैन गारि नहि पढू ?एहि पर ओ दनादन लात जूता चलबय लगलाह |कतेको लोक छल |कियो नहि बचेलक |अपमानक ज्वाला मे हम धधक’ लगलौ |मुखिया सं बदला लेबाक धुनि सबार भ’ गेल |एहने समय में एकटा नक्सली सं भेट भ’ गेल |ओकर बात सुनि बुझायल एकरा सं हितेषी दोसर कियो नहि |उपेक्षित ,शोषित आ प्रताड़ित लोकक मददि केनाइ ओकर संगठनक मुख्य काज छैक |हम ओ संगठन पकरि लेलौ |बदलाक भावना सं हमरा देह मे आगि लागल छल |मुखियाक पूरा परिबार के गोली मारि देलियैक |ओहि दिन सं कतेक ह्त्या कयल से अपनो गिनती नहि अछि |बेसी निर्दोषे मारल जायत छल |संगठनक काज सं हमर मोन नहि मिलैत छल |संगठनक काज नीरस लागे \भरि दिन लूट आ   ह्त्या |फायदा किछु नहि |कोनों सामाजिक काज नहि |मुखिया जकाँ संगठनों गलत लगैत छल |एहि लूट –ह्त्या सं ने समाज बदलल आने लोक |एक दिन पुलिसक हाथ परि गेलौ |आजीवन काराबास भ’ गेल |ताहि दिन सं जेल में छी |अपन गलती एतहि बुझलियैक|मुखिया मारलक त’ की भेलैक ?ओकर जवाव हम दोसर तरीका सं देने रहितियैक त’ आइ ई दशा नहि ने होयत ? जीवनक कोन रसक हम आनन्द लेलौ ? आइ बारह बरख सं जेल में छी |सभक सेवा  जेल मे कयल | लोक हमर नाम भोला गाँधी राखि देने अछि |भोला एक बेर करउट फेरलक |बाहर सं कियो उठेलकै |जेलर साहेब रहथिन |एकटा कागज़ पर दस्तखत करेलखिन आ जेल सं आजाद हेबाक कागज़ देलखिन | जेलक बरका फाटक फुजलैक |भोला बाहर आयल |बरबस आँखि ऊपर आकाश दिस चलि गेलैक |बहुत ऊपर किछु पक्षी क’ उड़इत देखैत रहल बरी काल धरि | स्मरण आइ एकटा पुरान फोटोक एल्बम भेटल |जिज्ञासुबस उलटाकय देखय लगलौ \तीन चारिटा फोटो एहन भेटल जेकरा देखि स्मृति पटल पर एखनो ओ दृश्य उपस्थित भ’ गेल |मोतीलाल नेहरु रीजिनल  इंजिनियरिंग कओलेज ,इलाहाबाद मे पढ़ैत रही |हम सभ मैथिल विद्यार्थी मिलिकय कओलेज मे मैथिली साहित्य परिषदक स्थापना केने रही | मास मे दु बेर नियमितरूप सं बैसक होयत छलैक आ  बैसकीक विवरण मिथिला मिहिर मे  छपबाक लेल पटना पठा देल जाइत छलैक आ मिथिला मिहिर मे सबटा विवरण छपैत छलैक |हमरा लोकनि मिथिला मिहिर कओलेज मे मंगबैत छलौ |कओलेज मे ओना चारिटा शिक्षक मैथिल छलाह मुदा नियमित बैसक मे भाग लैत छलाह तत्कालीन इलेक्ट्रोनिक्सक  प्रोफ़ेसर डा० बी० डी० चौधरी ,जे प्रायः  ओहि कओलेजक एखन  वर्तमान डायरेक्टर छथि |चौधरी जी नियमित बैसक मे भाग लेथि आ हमरा सभ क’ मार्गदर्शन सेहो करथि \परिषदक हम अध्यक्ष रही | परिषद नीक जकाँ चलि रहल छल |परिषद ततेक बढ़िया चलैत छल जे कतेक ननमैथिल बिहारी छात्र संस्था सं जुरय लगलाह आ  आयोजन सभ  मे भाग लैत छलाह |मैथिली छोडि कोनो दोसर भाषाक प्रयोग नहि कएल जाइत छलैक फलस्वरूप बहुत ननमैथिल सभ मैथिली छिट फुट बाजय लगलाह | मैथिली भाषाक रीढ़ प्रो० डा० श्री जयकांत मिश्र ओहि समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे अंग्रेजीक  बरिष्ठ शिक्षक छलाह |मैथिली भाषाक कर्ता धरता ,साहित्य अकादमीक मैथिली भाषाक प्रतिनिधि |डाक्टर मिश्रक मैथिली प्रेम आ हुनक काज जग जाहिर छल |मैथिली भाषा कोना आगा बढ़त ताहि लेल ओ अपन सभ शक्ति लगा देने छलाह |हम हुनकर ख्याति  बहुत पहिने सं जनैत छलौ |डा० मिश्र अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषदक अध्यक्ष छलाह |तै जखन इलाहाबाद मे नाम लिखायल त’ मैथिली लेल एकटा ललक छल |इलाहाबाद डा० मिश्रक नगरी छनि ,तैं मैथिली मे बहुत किछु जनबाक ,सिखबाक सुअवसर प्राप्त होयत ?सत्य पुछी त’  एहि नगरी मे मैथिलक  एकटा खास प्रतिष्ठा छलैक |मैथिल क’ एहिठाम बहुत इज्जत सं देखल जाइत छलैक |जखन ओहि नगर मे पहुचलौ त’ मैथिल त’ भेटथि मुदा मैथिली नहि भेटय |कोनो खास एक्टिभिटी नहि देखियैक |आश्चर्य लागे ?अपना मोन नहि माने जे एहि नगरी में मैथिलीक कोनो एक्टिभिटी नहि ?नव लोक एबं नव छात्र रहने कतौ नीक सं संपर्क नहि होयत छल मुदा जहिना जहिना समय बितैत गेलैक आ हमरा सबहक परिषद जहिना नीक जकाँ स्थापित भ; गेल ,धीरे धीरे संपर्को बढ़य लागल, तहन एतबा बुझबा मे भांगट नहि रहल जे एहि ठाम मैथिली साहित्यक काज त’ जरुर होयछ मुदा मैथिलक संगठन बहुत कमजोर छैक |एहिठाम मैथिल संगठन मृत प्राय छैक | जखन हमरा ई बात मोन मे दृढ़ भ’ गेल त’ हम एकटा लेख लिखलौ |लेख क’ शीर्षक छलैक ‘मैथिलीक दुर्दशा आ प्रयाग “|लेखक आशय यैह रहैक जे प्रयाग मे मैथिलक कोनो संगठन नहि छैक |एहिठामक मैथिली मरणासन अवस्था मे छैक | लेख मिथिला मिहिर क’ भेज देलियैक |मिथिला मिहिर में लेख अक्षरशः छपलैक |ओहि समय मे हमहू त’ छात्रे रही तै संगठन क’ विषय मे ओतेक ज्ञान नहि छल ,तै ई बात नहि बुझि सकलियैक जे ई लेख सं किनका दुःख हेतनि | एकदिन क’ बात छैक |भोरे भोर लगभग ५बजे  रूमक दरवाजा खटखटेबाकक अवाज सुनबा मे आयल |नींद टूटि गेल |सोचल कोनो संगी होयत |इंजीनियरिंग कओलेज मे छात्र लोकनि राति मे देर तक जगैत छथि कारण अगिला दिनक काज रातिये मे करय परैत छैक |भोर मे ८.३० सं क्लास प्रारम्भ भ’ जाइत छलैक  |तै बर अनमनस्कक संग उठलौ आ दरवाजा खोलि देलियै | आश्चर्य सं आँखिक पुतली उपरे उठल रहि गेल |एक महानुभाव धोती पहिरने ,पायर मे कपड़ाक जुत्ता आ मौजा आ उपर सं ओभरकोट आ माथ मे मोफलर बन्हने |हमरा आश्चर्यचकित देखि ओ पुछलनि ,आप सत्य नारायण झा हैं ?हम अपन मुड़ी सहमति मे डोला देलियैन |ओ महानुभाव मैथिली मे बजलाह ,हमर नाम थीक प्रो० डा० जयकांत मिश्र ,इलाहाबाद विश्वविद्यालय |किछु क्षणक लेल हम विस्फारित नेत्र सं हुनका दिस तकैत रहलौ मुदा तुरत प्रकृतस्थ होयत गोर लगलियनि आ कुर्सी दय बैसय लेल आग्रह केलियनि |वास्तव मे हमरा खुशीक ठेकान नहि छल |एतबे मोन मे आबे,  सामने जे बैसल छथि ओ विश्वविद्यालयक वरिष्ठ प्रोफ़ेसर आ मैथिलीक योद्धा डा० श्री जयकांत मिश्र छथि |हम अगल बगल सं कइएक संगी सभ क’ बजा लेलियैक |६-७ गोटा हमरा रूम मे पहुँच गेलाह | डा० मिश्र हमरा पुछलनि जे मिथिला मिहिर मे अहीं “मैथिलीक दुर्दशा आ प्रयाग”नामक आलेख लिखल अछि|  मिथिला मिहिर  कोटक जेबी सं निकालि देखेलनि |हम कहलियैन ,जी हमही लिखने छी |ओ सीधा प्रश्न पुछलनि ,”आहाँ मैथिली क’ बिषय मे की जनैत छियैक ,प्रयाग में किनका किनका जनैत छियैक ?हमरा बुझा गेल जे मामला किछु टेढ़ छैक तै हम चूपे रहलौ |ओहुना मैथिलीक भीष्म पितामह लग हमर औकाते की छल ?जे मैथिली भाषाक इतिहास पर डी०फ़िल० केने छलाह ,हुनका लग हमरा सन तुच्छ लोक जेकरा वास्तव मे मैथिलीक इतिहासक कोनो अध्ययन नहि छलै ,की बजितै ?ओहुना आइ काल्हिक युवक जकाँ हमर समय मुहफट नहि छल ,जे हमही सभ सं बेसी काविल छी |ओहन उदभट विद्वान लग हम की जिरह करितौ ?ओ कहलनि चुप रहने काज नहि चलत ?,आहाँ सं गलती भेल अछि |आहाँ माफीनामा लिखि मिथिला मिहिर  के भेजू |हम कहलियैन ,सर ,हम त’ मैथिली भाषा द’ नहि लिखल अछि |हमर स्पस्ट लेख मैथिल संगठन सं सम्बंधित अछि ,जे वास्तव मे संगठित नहि छैक \जखन संगठने नहि तखन भाषा ,समाज आ क्षेत्रक उत्थान कोना हेतैक ? ओ कहलनि संगठन लेल काज करब ?हम कहलियैन ,निश्चय काज करब |कहलनि माफी नामा नहि लिखब ?हम कहलियैन ,हम अपनेक विश्वविद्यालयक छात्र छी ,हमरा सं जौं भूल भ’ गेल होय त’ माफ कएल जाय |कहलनि ,अच्छा ,ठीक छैक |मुदा आहाँ अपना टीमक संग अगिला रवि दिन गंगा नाथ झा रिसर्च संस्थान मे  ४बजे साझ मे भेट करू |चलू ,आब आहाँ सबहक संग प्रयाग मे एकटा सशक्त संगठन तैयार करी |ओ चलि गेलाह | हमरा सभहक देह मे एकटा नव संचार जन्म लेलक |अगिला रबि क’ हम ५-६संगीक संग रिसर्च संस्थान पहुचलउ |ओ ओतहि रहथि |ओहिठाम आओर लोक सभ रहथि मुदा मुख्य छलाह डा० किशोर नाथ झा |ओहिठाम संगठन पर चर्चा भेलैक आ संगहि एकटा कमिटीक गठन कएल गेलैक |आब हम सभ पुरा शहर हरेक रबि क’ घुमय  लगलौ |हम ओहुना हुनका आबास पर जाय लगलौ |हमरा बहुत अंतरंगता भ’ गेल |मैथिलीक इतिहास भूगोल सभ हुनका मुहें सुनी |कहियो कहियो मैथिलीक पुस्तक सेहो हुनका सं ली आ पढ़ी |एहि तरहे संगठन सं लोक सभ जुरय लागल |बहुत दिनक बाद एकटा बैठक मे निर्णय भेल जे विद्यापति पर्व समारोह मनायल जाय ,जाहि सं दुटा बात होयत |पहिल मैथिल सभ क’ एक सूत्र मे जोड़ल जायत आ दोसर  संगठन कतेक मजबूत भेल तेकरो आकलन भ’ सकतैक | विद्यापति पर्व सफल हुए ताहि मे हम सभ जी जानि सं जुटि गेलौ |एहि काज लेल पुरा शहर क’ भ्रमण पुनः कएल गेलैक |डा० मिश्र अपनहु बेसी काल हमरा सबहक संग घुमैत छलाह |एक एक लोक सं संपर्क कएल गेलैक |इंजिनियरिंग कओलेज ,एग्री कलचर कओलेज ,कुलभास्कर आश्रम कओलेज ,मेडिकल कओलेज ,युनिभर्सिटी ,केनटोमेंट एरिया ,वमरौली एयर फ़ोर्स तथा रेलबेक संग नगर क’ कइएक मुहल्लाक हम सभ कतेको बेर घुमलौ |नीक संख्या मे लोक उपस्थित होयबाक सम्भावनाक अनुमान लगायल गेल |सभ दिन घूमी आ साँझ मे डाक्टर साहेब क’ रिपोर्ट दैत छलियैन |ओ कतेक खुशी होयथि तेकर वर्णन नहि  क’  सकैत छी |एक मैथिल क’ दोसर सं खुब संपर्क भ’ गेलैक |आब विद्यापति समारोहक रूप रेखा तैयार होमय लगलैक |निर्णय भेलैक जे उदघाटन कर्ता हास्य सम्राट श्री हरिमोहन झा जी ,मुख्य अतिथि कवि वर श्री राम कुमार वर्मा केर निमंत्रण पठायल जाय |स्वागताध्यक्ष डा० श्री एस० एन० सिन्हा ,एच० ओ० डी० ,इंजिनियरिंग कओलेज क’ बनायल गेल |महासचिव हमरा बनायल गेल ,सचिव श्री सुरेश चन्द्र झा ,हमर प्रिय संगी,  संगहि  कार्यकारणीक सदस्य सभ बहुत गोटे  रहथि |ओहि समय क’ तमाम कलाकार ,कवि सभ क’ निमंत्रण पठायल गेल |ओहि समय क’ मिथिलाक लोक प्रिय जोड़ी रविन्द्र –महिंद्र क’ आमंत्रित कएल गेल आ ई लोकनि आयलो रहथि |निमंत्रित सबहक रहबाक ब्यबस्था इंजिनियरिंग कओलेज मे कएल गेल रहैक |सांस्कृतिक कार्यक्रम मे गीतनादक अलाबा एकांकी नाटक सेहो राखल गेल रहैक |नाटक रहैक “ उपनयनाक भोज” जे विशुद्ध हास्य नाटक छलैक |नाटक मे हम   ब्राह्मण बनल रही ,जमींदार बनल रहथि हमर प्रिय सहपाठी पुरुषोत्तम झा जी  ,टूनटूनमा ,जमीन्दारक नौकर बनल रहथि श्री हीरा कान्त झा ,अन्य कलाकार युनिभर्सिटी क’ रहथि | निर्धारित दिन क’ विद्यापति पर्वक कार्यक्रम प्रारम्भ भेलैक |अपूर्व सफलता भेटलैक |अथाह जन समूह उपस्थित छल |नाटक सभ कार्यक्रम  सं बेसी सफल भेलैक |नाटकक कथानक पूर्ण रूपे हास्य छलैक |’बहुरी झाक बेटा क’ उपनयन छलनि |समूचा गाम क’ नोत रहैक मुदा धोखा सं ब्राह्मण क’ नोत छुटि गेलनि |समूचा गाम खुब कच्ररमकुट क’ भोज  खयलक मुदा ब्राह्मण भुखले रहि गेलाह |आब ब्राह्मण सोचलनि जे एहन तिकरम लगाबी जे हुनको नोत भेटनि |ओ बहुरी झाक एकटा कुटुम्बक घोड़ा चोरा क’ कतौ जंगल मे नुका देलखिन्ह |घोड़ा ताकल गेल मुदा नहि भेटलैक |ब्राह्मण अपन पत्नी द्वारा प्रचार करबा देलखिन जे ब्राह्मण बहुत पैघ गुनी छथि ,ओ नह  पर काजर लगा चोर क’ पकरि लैत छथिन |अपने चोरायल घोड़ा क’ तंत्र बल सं कोना क’ ताकि दैत छथिन आ कोना फेर सं नोत परैत छनि ,यैह नाटकक मुख्य कथानक छलैक | हमरा सब जखन जखन नाटक क’ अभ्यास करी ,डा० साहेब ओतहि रहैत छलखिन आ जहाँ त्रुटि भेल तुरत सुधार करथीन |नाटक बढ़िया होबक  चाही , ताहि लेल नीक दिशा निर्देश देथिन |साज श्रृगार करय लेल एकटा बंगाली रंग कर्मी क’ मंगायल गेल रहैक |ओहि मोशायक नाम माया दास रहनि मुदा हम हुनका मेकप सं संतुष्ट नहि रही तै हम अपन मेकप अपने केलौ |हमरा याद अछि हम जहिना स्टेज पर गेलौ ,हमरा देखिये क’ दर्शक भभा क’ हंसय लागल |नाटक अत्यंत सफल भेलैक |लोक हँसैत हँसैत  लोट पोट भ’ गेलैक | नाटक ततेक सफल भेलैक जे हर साल नाटकक मंचन होमय लगलैक |दोसर साल “हथ टुट्टा कुर्सी “आ हिचकीक टोटमा “क’ मंचन भेलैक |बहुत दिन तक डा० जयकांत मिश्रजी सं सम्बन्ध रहल मुदा राउरकेला स्टील प्लांट मे नौकरी करबाक बाद धीरे धीरे संपर्क कम होयत गेल आ बाद मे लगभग संपर्क खतम भ’ गेल | एखनो इलाहाबादक स्मरण भ’ जाइत अछि |इलाहाबाद हमरा लेल सभ सं पैघ गुरु घराना अछि |आइ १९७२ ई० मे मनायल गेल विद्यापति पर्व समारोहक किछु फोटो एल्बम मे देखबाक सुअवसर भेटल आ स्मृतिपटल पर सभटा चल चित्र जकाँ उभरि आयल |कतेक सुखद दिन छल ओ | शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ द्वि‍रागमन आत्‍मासँ जीबाक प्रवृति रखेबला लोककेँ जखन परि‍स्‍थि‍ति‍वश अवि‍रल स्‍नात जीवन शैलीकेँ जीवाक अनर्गल प्रयत्न करए पड़ैत छैक तँ जीवनक शैलीमे परि‍वर्त्तन अवश्‍यंभावी भऽ जाइत छैक। इहए दशा मौलि‍क रसास्‍वादन करैत अपन साहि‍त्‍य साधनासँ समाजकेँ अनुशासि‍त स्‍वस्‍थ मनोरंजन देबाक प्रयत्न करैबला आशुकथाकारकेँ सेहो होइत अछि‍। हरि‍मोहन बाबू हास्‍य सम्राट छथि‍। मैथि‍ली कथाकेँ जनप्रि‍य बनेबाक दृष्‍टि‍ऍं हि‍नक प्रयास अतुलनीय मानल जाइत अछि‍। गंभीर चि‍न्‍तन हेतु अनुशीलन करबाक लेल सामाजि‍क अर्न्‍तद्वन्‍द्व ओ वि‍डम्‍बनाकेँ अपन सरल शैलीमे आरोहन कऽ मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ मनोरम रसास्‍वादन प्रदान केलनि‍। कि‍छु व्‍यति‍क्रमक क्रममे हास्‍य सम्राट ई बि‍सरि‍ गेलथि‍‍ जे गंभीर वि‍षय हास्‍यक छाल्हीक तरमे पानि‍-पानि‍ भऽ गेल छल। जकर प्रत्‍यक्ष प्रमाण हि‍नक चर्चित उपन्‍यास “कन्‍यादान” मानल गेल। सगरो आलोचनाक बाढ़ि‍ आबि‍ गेल छलनि‍। “बुच्‍ची दाइ”केँ एहेन अवस्‍थामे आनि‍ कऽ कि‍एक छोड़ि‍ देलनि‍? ओना ई कोनो असहज नै। मि‍थि‍लाक तथाकथि‍क भलमानुषक परि‍वारमे अखनो बहुत ठाम “बुच्‍ची दाइ” कानि‍ रहल छथि‍। अपस्‍याँत छथि‍ कतौ अपन सासुरक पीड़ासँ तँ कतौ अपन नैहरक देल लावण्‍य दुखमयी अश्रुसरि‍तासँ। जौं वि‍धवा भऽ जेतीह तँ समाजकेँ स्‍वीकार्य भऽ जाएत कि‍एक तँ उज्‍जर साड़ीमे वाला सवल समाजकेँ मान्‍य छैक। मुदा शि‍क्षा वि‍हीन बुच्‍ची दाइकेँ छोड़ि‍ पाश्चात्‍य जरदगब सी.सी. मि‍श्रा केना भागि‍ सकैत छथि‍...? बेटी दोसरक लाज होइछ। ओकरा इस्‍कूल नै पठा कऽ लालकाकी केना गलती नै केलखि‍न...। हरि‍मोहन जीक ऐ उद्देश्‍यहीन उपन्‍यासक आलोचना हि‍नका समस्‍याक तत्काल समाधान करबाक लेल प्रेरणा देलक। आशु कथाकार समाजक देल उपहासकेँ बर्दाश्त नै कऽ सकल आ तत्क्षण एकर समाधान लि‍खबाक लेल उद्यत भऽ गेल। शीर्षक देल गेल “द्वि‍रागमन”। स्‍वाभावि‍क छैक बेटी कोनो ढोलनाक ताग तँ नै जे सड़ि‍ गेला बाद नि‍कालि‍ कऽ दोसर तागमे गाँथल जाए। तँए द्वि‍रागमन दोसर केना करत। सी.सी. मि‍श्र पाश्चात्‍य जोकर बुच्‍ची दाइकेँ मॉडर्न वाला बना कऽ द्वि‍रागमन करत। कोनो न्‍यायाधीशसँ साक्ष्‍यक अभावमे नै चाहैत ि‍नर्दोषकेँ सजा दैत छैक तँ ओकर शब्‍द-शब्‍दक तादात्‍म्‍य अनर्गल लगैत। तहि‍ना हरि‍मोहन जीक द्वि‍रागमनमे जइ-जइ समाधानक वि‍न्‍दुक उत्‍कर्ष भेल ओ वएह प्रमाण नै दऽ सकल जकर हरि‍मोहन अधि‍कारी छथि‍। द्वि‍रागमन अपन मोनकेँ जवरदस्‍ती मनौअल करा कऽ हरि‍मोहन लि‍खलनि‍। एतेक तँ ि‍नश्चि‍त अछि‍ नैसर्गिक प्रति‍भाक धनी उपन्‍यासकार कतौ ऐ कचोटकेँ प्रत्‍यक्ष नै कएलनि‍। संग-संग कोनो पारखी ई दु:साहस नै कऽ सकैत अछि‍ जे ऐ उपन्‍यासक मान्‍यतापर प्रश्नचि‍न्ह लगाओत। द्वि‍रागमन सेहो कन्‍यादाने जकाँ अध्‍यायमे वि‍भक्‍त अछि‍। प्रयोगवादि‍ताक एहेन प्रमाण मैथि‍ली साहि‍त्‍यक महाकाव्‍य वि‍धामे मनबोध आ प्रवासी तथा काव्‍य वि‍धामे नचि‍केताकेँ छोड़ि‍ संभवत: आनठाम नै भेटत। मि‍स वि‍जली वि‍श्व-वि‍द्यालय अज्ञात यौवना आ मुग्‍धा छथि‍। सी.सी. मि‍श्रा हुनक फैन भऽ गेल छथि‍। सम्‍पूर्ण भाषणमे आर्यक मूल भाषक श्‍लोकक तार्किक वि‍वेचन वि‍श्व वि‍द्यालयक संग-संग चण्‍डीचरणकेँ झकझोकरि‍ देलक। वि‍द्योत्तमा “कालीदास” केँ कुमारसंभवमक नायक बना देने छलीह तँ ऐठाम चण्‍डीकेँ अपन “बुच्‍ची दाइ”मे सुयोग्‍य पाश्चात्‍य वालाक आश जागव उपन्‍यासक यथार्थवादी क्रांति‍ मानल जाए। जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल तत्‍क्षण तँ बेछप्‍प अवश्‍य छल। मि‍स वि‍जलीक भाषणमे जे आधुनि‍कताक लेब उपन्‍यासकार देखेबाक प्रयास केलनि‍ ओ पुरुष प्रधान संकुचि‍त मानसि‍कतासँ भरल कथाकथि‍त मि‍थि‍लाक सवल अर्थात सवर्ण समाज वि‍शेष कऽ कऽ ब्राह्मणमे अखनो स्‍वीकार्य नै ओहि‍ काल तँ सर्वथा असंभव छल। अखनो हमरा सबहक समाजमे स्‍त्रीकेँ सहचरी नै अनुचरी मानल जाइत अछि‍। अपन वेवाक हास्‍यसँ हरि‍मोहन तत्‍कालीन सार्मथ्‍यवान सबल मैथि‍लक अर्न्‍तदशापर तीक्ष्‍ण प्रहार केलनि‍, मुदा हास्‍य समागम मि‍श्रि‍त रहबाक कारणे ओ समाज एकर मर्मकेँ बूझि‍ नै सकल। जौं सभटा गप्‍प शुष्‍क दार्शनि‍क अंदाजमे लि‍खल जाइतए तँ हरि‍मोहन जीक द्वि‍रागमन ओहि‍ना अक्षोप भऽ जइतए जेना साम्‍यवादी जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक “मौलाइल गाछक फूल” आ सुभाष चन्‍द्र यादव केर “घरदेखि‍या” आ “बनैत वि‍गड़ैत”क अछि‍। एकटा ब्रह्मण साहि‍त्‍यकार द्वारा मनुवादी प्रवृति‍पर प्रहार समाज द्वारा मान्‍य तँ भेल मुदा मात्र हास्‍य आ रोचकताक कारणे। जौं हास्‍य नै रहि‍तए तँ चतुरानन ि‍मश्रक “कला” जकाँ दुति‍याक चान मानल जेबाक संभावनाक वि‍शेष छल। “अकाण्‍डताण्‍डव”मे लालकाकी, आवेश रानी, तारादाइ आ दुलारमनि‍क संवाद रूचि‍गर लगैत अछि‍। ऐठाम मि‍थि‍लाक परम्‍परावादी दृष्‍टि‍कोणकेँ उत्तम देखेबाक मूल कारण उपन्‍यासकार नारी शि‍क्षा ओ चेतनाक संग-संग अनुशीलनक अभाव मनैत छथि‍। एतेक तँ स्‍पष्‍ट अछि‍ जे रेवती रमण सन शि‍क्षि‍त भाइक कारणे सकल ग्राम्‍य नारी पात्रा बुच्‍ची दाइकेँ आधुनि‍क बनेबाक लेल तैयार भऽ जाइत छथि‍। पति‍ परमेश्वर होइत अछि‍। ओकर इच्‍छाकेँ केना नै पूर्ण कएल जाएत। ब्राह्मण परि‍वारक स्‍त्री केना दोसर बि‍आह करतीह? ऐ प्रकारक कल्‍पना हरि‍मोहन करबाक साहस नै कऽ सकलाह। ओ स्‍वयं परम्‍परावादी समाजक अंग छथि‍। तँए परम्‍परा आ आधुनि‍कतामे सामंजस्‍य स्‍थापि‍त कराबाक इच्‍छाशक्‍ति‍केँ नवल रूपेँ सजा कऽ बुच्‍ची दाइकेँ आधुनि‍क बना देलनि‍। कन्‍यादानमे उद्देश्‍यहीन अंति‍म यात्राक परि‍णति‍ इहए भेल जे एकटा मूर्ख वालि‍काकेँ जबरदस्‍ती ततेक आधुनि‍क बना देल गेल जे वर्तमान परि‍स्‍थि‍ति‍मे सेहो ग्राह्य नै भऽ सकैत अछि‍। ओइ कालक लेल तँ सर्वथा अनुपयुक्‍त भेल हएत। जे बुच्‍ची दाइ पहि‍ल राति‍ सी.सी. मि‍श्राक “नार्सिग” शब्‍दकेँ नरसि‍ंह लगा कऽ गारि‍ बूझि‍ गेली ओ आब डलसीक स्‍थानपर “क्रोटन”क गमला मंगवाक प्रेरणा अपन माएकेँ दैत छथि‍- ई तँ सर्वथा अपच्‍च मानल जाए। ओना “देशी मुर्गी वि‍लायती बोल” परि‍स्‍थि‍ति‍ वश संभव छैक मुदा प्रकृति‍ ओहूमे गाममे रहि‍ कऽ वयस भेल मुरुख वालाकेँ शि‍क्षि‍त बना कऽ एहेन परि‍वर्तन करबाक चेष्‍टा उपन्‍यासकारक अदूरदर्शिता मानल जाए। अशि‍क्षि‍त पुरुष वा नारी जखन परि‍स्‍थि‍ति‍वश पाश्चात्‍य संस्‍कृति‍ आरोहण करैत अछि‍ तँ चालि‍मे परि‍वर्तन संभव छैक। मुदा ऐठाम बुच्‍ची दाइमे शि‍क्षाक क्रमि‍क वि‍कास देखाओल गेल। पति‍क आलि‍ंगन आ सि‍नेहसँ वि‍मुख नारीकेँ परीक्षास्‍वरूप आधुनि‍क बनए पड़ल ऐ प्रसंगमे तँ बुच्‍ची दाइकेँ आर गंभीर बना देबाक आवश्‍यकता छल। मात्र लोकप्रि‍यता आ छद्म साहि‍त्‍य लोलपताक कारणे एतेक अलौकि‍क परि‍वर्तनकेँ समाजक लेल कोनो रूपेँ दि‍शा ि‍नर्देशि‍त नै मानल जा सकैछ। हरि‍मोहन सन पारखी रचनाकारक लेखनीक कमाल मानल जाए जे शैली ओ प्रवाहक संग-संग रोचकताक कारणे “द्वि‍रागमन” लोकप्रि‍य भऽ गेल अन्‍यथा जौं सामान्‍य साहि‍त्‍यकारक ई प्रयास रहि‍तए तँ कोनो रूपे साहि‍त्‍यक लेल उपयुक्‍त नै मानल जइतए। भाषा शैली ओ प्रवाहमे द्वि‍रागमन अभूतपूर्व कृति‍ थि‍क ऐमे कोनो संदेह नै। सरल ग्राम्‍य समाजक शब्‍द “धी-डाही”सँ लऽ कऽ पाश्चात्‍य उपक्रम धरि‍ कतौ ई नै बुझना जाइत अछि‍ जे हरि‍मोहन ओइ समाजक अंग नै छथि‍ जइ समाजक लेल संवाद लि‍खल गेल। अर्थात अज्ञसँ लऽ कऽ वि‍ज्ञ धरि‍ गामक “जरलाही” सन शब्‍द बाजैवाली महि‍लासँ लऽ कऽ मि‍स वि‍जलीक भाषण धरि‍ एकरूपता देखा कऽ ई प्रमाणि‍त तँ अवश्‍य कएलनि‍ जे हुनकासँ पैघ रोम-रोममे पुलकि‍त “मैथि‍ली पुत्र” ताधरि‍ तँ अवश्‍य नै भेल छल। सबल समाजक अर्न्‍तद्वन्‍द्वपर सकारात्‍मक प्रहार साम्‍यवाद मात्र कोनो राजनैति‍क चेतना नै अति‍क्रमणवादी बेवस्‍थाक वि‍रूद्ध एकटा समाजवादी वि‍चारधारा थि‍क। मैथि‍ली साहि‍त्‍यक संग ई बड़ पैघ वि‍डम्‍वना रहल जे वचनसँ तँ बहुत रास रचनाकार अपनाकेँ साम्‍यवादी मानैत छथि‍ मुदा जखन कर्मक बेर अबैत छन्‍हि‍ तँ कतौ कोनो सार्थकता नै। इति‍हास साक्षी अछि‍ कोनो भाषा साहि‍त्‍यक वि‍कास ओकर वि‍चारधाराक सम्‍यक सम्‍पोषणपर ि‍नर्भर रहल अछि‍। यूनानी साहि‍त्‍यकार होमरक इलि‍यड आ ओडेसी, कार्ल्‍स मार्क्‍सक दास कैपि‍टलसँ लऽ कऽ मैक्‍सि‍म गोर्की मदर आ माओत्‍से तुंगक आनकन्‍ट्राडि‍क्‍सन सन सारगर्भि‍त वि‍देशी पोथी समन्‍वयवादक स्‍थापनाक लेल क्रांति‍क द्योतक थि‍क। लि‍यो टाल्‍सटाय आ लेनि‍न ऐ दर्शनमे सूरमाक काज केलनि‍। आर्यावर्त्तक इति‍हास सेहो ऐसँ अक्षोप नै। रामचरि‍त मानसमे रामराज्‍यक परि‍कल्‍पना आ सवरीक सि‍नेह समन्‍वयवादक द्योतक थि‍क। मात्र चौपाइक कारणे ई ग्रन्‍थ जनप्रि‍य नै भेल। श्री मद्भागवत गीतामे कृष्‍णक उपदेश नि‍श्चि‍त रूपसँ शांति‍क लेल युद्धक प्रतीक मुदा ऐ क्रांति‍मे सेहो समाजमे समन्‍वयवादक आश लगाओल गेल। “देसि‍ल वयना सभ जन मि‍ट्ठा”क कतेको गुणगान कएल जाए मुदा हमर साहि‍त्‍यक इति‍हास श्रंृगार आ यशोगानसँ आगू नै बढ़ि‍ रहल छल। ऐ उपक्रममे ललि‍त आ धूमकेतु सन आधुनि‍क रचनाकार अवश्‍य समन्‍वयवादक आश लऽ कऽ एलाह। ऐसँ पूर्वक साहि‍त्‍य अपन समाजमे केतबो गुणगानक ध्‍वजकेँ जाज्‍वल्‍यमान करए मुदा आन क्षेत्रक लेल मात्र मधुर भाषा बनि‍ कऽ रहि‍ गेल जाइमे पग-पग पोखरि‍ माछ मखानसँ बेसी आश राखब अनर्गल छल। कर्मवादि‍ताक आधारपर जौं ि‍नर्णए कएल जाए तँ साहि‍त्‍यसँ साम्‍यवादक घृतगंध मात्र कि‍छुए साहि‍त्‍यकारक लेखनीसँ झहरैत भेटत, जइमे प्रमुख छथि‍ जगदीश प्रसाद मण्‍डल, बैद्यनाथ मि‍श्र यात्री, चतुरानन िमश्र, ललि‍त, धूमकेतु, गजेन्‍द्र ठाकुर, सुधांशु शेखर चौधरी, कुमार पवन आ श्रीमती कमला चौधरी। वास्‍तवमे मैथि‍ली उपन्‍यास वि‍धामे साम्‍यवादक संस्‍थापक वैद्यनाथ मि‍श्र यात्री (कृति-‍ पारो) आ चतुरानन मि‍श्र (कृति‍- कला) केँ मानल जा सकैछ। ई मात्र संयोग मानल जाए जे दुनू साहि‍त्‍यकारक कृति‍ एकहि‍ वर्ष सन 1947 ई.मे प्रकाशि‍त भेल। ओही कालमे यात्री परि‍पक्‍व रचनाकार भऽ गेल छलाह, मुदा चतुरानन एकटा काँच क्रांति‍वादी युवक रहथि‍। एकटा मजदूर आन्‍दोलनक नेतृत्‍व केनि‍हार 21 वर्षक नवयुवकक लेखनीसँ नि‍कसल ऐ उपन्‍यास नै समाजक लेल लि‍खल क्रांति‍गीतकेँ पूर्ण वैचारि‍क मान्‍यता कि‍एक नै भेटल ई वि‍चारनीय प्रश्न थि‍क। कलाक अति‍रि‍क्‍त चतुरानन मि‍श्रीजी वि‍कास, संझा माए, जागरण आदि‍ लघु उपन्‍यास लि‍खने छथि‍ मुदा सामान्‍य पाठकक लेल साहि‍त्‍यकार नै मानल जाइत छथि‍। कलाक पहि‍लुक प्रकाशन 1948 ई.मे भेल। मैथि‍ली अकादमी सन् 1948 ई.मे ऐ पोथीकेँ फेरसँ प्रकाशन केलक। हि‍रमोहन झा आ यात्री सन चर्चित लोकनि‍ एकर सारगर्भितासँ हर्षित भेलाह, मुदा पाग प्रधान मि‍थि‍लामे “कला”केँ कहए जे वाहवाहीक मुरेठा सेहो नै भेटल। समालोचक लोकनि‍ केतौ-केतौ मर्यादावश उल्‍लेख तँ करैत छथि‍ मुदा “क्रांति‍वीर” कहबामे संकोच होइत छन्‍हि‍ कि‍एक तँ ई साम्‍यवादी राजनीति‍ज्ञ कालसँ पूर्वहिं लि‍खब छोड़ि‍ देलक। आब प्रश्न उठैत अछि‍ जे चतुराननकेँ साहि‍त्‍यक महि‍मा मंडनक पि‍रही नै देल जाए कि‍एक तँ परि‍पक्‍व भेलाह वाद लि‍खनाइ छोड़ि‍ देलक आ संग-संग दोहरी चरि‍त्र जे जगदीश प्रसाद मण्‍डलकेँ सेहो महत्‍व नै देल जाए कि‍एक तँ ओ परि‍पक्‍व भेलाक बाद लि‍खलक आ लि‍ख रहल अछि‍‍ की ई उचि‍त...? एकटा समन्‍वयवादपर आघात मानल जाए। ई दुनू केकरो यशोगान आ केकरो तगेदासँ नै लि‍खलक। एकर एकर गंभीर परि‍णाम जे जगदीश प्रसाद मण्‍डलकेँ “टैगोर साहि‍त्‍य सम्मान” सन सम्‍मान भेटल मुदा मि‍थि‍लाक कोनो समाचार पत्रसँ ई प्रकाशि‍त नै भेल। मैथि‍ली भाषा मात्रमे ऐ प्रकारक अर्न्‍तद्वन्‍द्व संभव छैक। समन्‍वयवादसँ हमरा सबहक ऑत कि‍एक डोलि‍ जाइत अछि‍? एकर अर्थ स्‍पष्‍ट जे भाषाक प्रचारक आ संरक्षक लोकनि‍मे पारदर्शिताक संग-संग प्रति‍भा सेहो नै छन्‍हि‍ आ आत्‍मग्‍लानि‍ (complexion) सँ ग्रसि‍त छथि‍। मात्र 54 पृष्‍ठक एकटा छोट-छीन जेकरा अति‍वादी समालोचकक दृष्‍टि‍मे झुझुआन सेहो कहल जा सकैछ, औपन्‍यासि‍क कृति “कला” मि‍थि‍लाक नि‍रापद समाजक नारी दोहनक वृत्ति‍ चि‍त्र थि‍क। मैथि‍लीमे रचनाक संख्‍या बल आगालक ताल रचनाकारक स्‍तरक मूलाधार होइछ। “कला” पढ़लाक बाद ई अक्षरश: प्रमाणि‍त भऽ गेल। जइ समाजमे अखनो वि‍धवा बि‍आह अमान्‍य मानल जाइछ। ओइ समाजक एकटा नारीमे चेतना आ सकारात्‍मक परि‍णामक संग उद्देश्‍य प्राप्‍ति‍क आश लगभग 66 वर्ष पूर्व राखब एकटा क्रांति‍वादी वि‍चारधाराक कारण मानल जा सकैछ। महेश बाबू गरीब मुदा ऊँच-नीच बुझनि‍हार व्‍यक्‍ति‍ छथि‍। ओ अपन 10 वर्षक ज्‍येष्‍ठ कन्‍या “कला”क बि‍आह नै करए चाहैत छथि‍, मुदा पारि‍वारि‍क स्‍थि‍ति‍ आ समाजक दशो-दि‍शा महेश बाबूक मुख बन्न कऽ देलकनि‍ 50 बीघा जमीनक मालि‍क बूढ़ वर मनेजर भाइसँ कलाक बि‍आह करए पड़लनि‍। अपराधवोध नीक लोककेँ अवश्‍य होइछ। परि‍स्‍थि‍ति‍वश आर्थिक दृष्‍टि‍सँ नि‍:शक्‍त महेन्‍द्र बाबू बेटीक बि‍आहसँ पूर्वहि‍ अपन कनि‍याँक नाओंसँ समाजक आ परि‍स्‍थि‍ति‍क देल पीड़ाकेँ पति‍या स्‍वरूप लि‍ख नि‍पत्ता भऽ गेलाह। एकटा बूढ़ वरक कनि‍याँ जे क्षणहि‍ं पर्व कॉच कन्‍या छलीह आब वयससँ नै मुदा जीवन शैलीमे परि‍वर्तनसँ व्‍यस्‍थि‍त आ बेसाहु भऽ गेलीह। एक वर्षक दाम्‍पत्‍य जीवन व्‍यतीत केलाक बाद अज्ञात यौवना बालि‍का चि‍त्राक “बूढ़ वर” कवि‍ताक नायि‍का जकाँ वि‍ावा भऽ गेलीह। मुदा “जो रे राक्षस, जो रे पुरुष जाति‍। तोरे मारलि‍ हमरा सभ मरि‍ रहल छी...।” केर उद्घोष नै केलीह। माए-बाप आ समाजक देल अवांक्षि‍त वैधव्‍यकेँ मूक स्‍वीकारोक्‍ति‍ कलाक परि‍पक्‍वताक नै परि‍स्‍थि‍ति‍क ि‍नष्‍कर्ष भऽ गेल। “कला” वैधव्‍यक कष्‍टसँ कानलि‍ तँ रहथि‍ मुदा छोट वयसक कारणे जीवनमे एतेक भारी वि‍पत्ति‍क आगमन केर पूर्ण भान नै भेल छलनि‍। “अज्ञात नव यौवना” (कोनो राजकमलक कथानायि‍का नै मि‍थि‍लाक गुणगान करए बड़ा छद्म ब्राह्मण जाति‍क कन्‍या) वि‍धवा संकटा बनि‍ गेली। क्षणि‍क चुहचुहीसँ भरल कलाकेँ देख सासु कहलखि‍न- “वौआसि‍न केर वि‍धवाक शोभा नै संकटे थि‍क तँए हमर वि‍चार जे कहबा लि‍तहुँ?” फेर गंगा कातमे कलाक मूड़न भेल। ई मि‍थि‍लाक तादात्‍म्‍य, मैथि‍ल ब्राह्मणक शक्‍ति‍केँ की मानल जाए? इहए कारण थि‍क जे सम्‍पूर्ण भारतमे धर्म सुधार आन्‍दोलन भेल, मुदा मि‍थि‍लामे नै। ओना ऐ तरहक प्रवृत्ति‍ आन ठामक ब्राह्मणमे सेहो छन्‍हि‍, मुदा एतेक कट्टरता नै। अवलाक शोणि‍तसँ जाि‍तवादी हथि‍यारकेँ पि‍जा कऽ कहि‍या धरि‍ अपनाकेँ “सवर्ण” कहैत रहत, ई तँ अवर्णोक लेल ग्राह्य नै। जौं एतबे टामे “कला”क ललि‍त कलाक इति‍श्री भऽ गेल रहि‍तए तँ वि‍श्ेष गप्‍प नै छल। अवला ि‍नर्वला कलाकेँ हुनक दि‍अर सुन्‍दर बाबू जे वयसमे कलाक पि‍ताक समान छथि‍ चरि‍त्र हनन कऽ कुलक्षणा पति‍ता आ कलंकि‍ता माताक रूप दऽ देलखि‍न। कला गर्भवती भऽ गेलीह। भरि‍ दि‍नक गारि‍ आ शापसँ कला असहज भऽ सासुकेँ जबाव देलखि‍न- “अपन कोखि‍ केहन भेलनि‍ जे एहन सुपुत्र जे जनमओलनि‍। शौख केहन भेलनि‍ जे पचास वर्षक बूढ़ बेटा ले नअो वर्षक कनि‍याँ तकैत छलीह...।” सुन्‍दर बाबू जेे पहि‍ने कलाक चरि‍त्रहंता खलनायक छलाह आब मर्यादा पुरुषेत्तम बनि‍ माइक आदेशपर कलाकेँ मूर्छित कऽ देलनि‍। जखन वि‍यति‍ अबैछ तँ सगरो दि‍श अन्‍हार जेम्‍हरे जीव जेबाक प्रयत्न करैछ तेम्‍हरे संकट। कला भाग कऽ बनारस चलि‍ गेलीह। एकटा तथाकथि‍त मैथि‍ल भद्रमहि‍ला सोमदाइ कलाकेँ षडयंत्रसँ गयि‍का बना कऽ बेचए चाहैत छलीह। एकटा ब्राह्मणी सहायतासँ कला चरि‍त्र दोहणसँ बचि‍ तँ गेलीह मुदा पीड़ा अग्राहण भऽ गेलनि‍। परि‍णाम भेल आत्‍महत्‍याक प्रयास, मुदा अभागलि‍केँ मरनाइ सेहो कठि‍न होइछ। सात दि‍न अस्‍पतालमे रहलाक बाद जखन कि‍छु सुधार भेलनि‍ तँ डॉ. कलानंदसँ साक्षात्‍कार जीवनमे सुखद अनुभूति‍ लऽ कऽ आएल। युवक डॉ. कलानंद आत्‍महत्‍याकेँ उचि‍त नै मानैत छथि‍। ओ सुधारवादी ब्राह्मण छथि‍। वि‍धवाकेँ बि‍आह कऽ लेबाक चाही....। डॉ. कलानुदक तर्क कलाकेँ असहज लगलनि‍। ऐ समाजमे वि‍धवाक नारकीय स्‍थि‍ति‍सँ उद्वेलि‍त कला “सती प्रथा”केँ उचि‍त मानैत छथि‍। केहेन वि‍कट परि‍स्‍थि‍ति‍ थि‍क जइठामक नारी अवला जीवनक अभि‍शापसँ बेसी चरि‍त्र हननक डरसँ सती हएब उचि‍त बुझैत छथि‍। तथाकथि‍त पुरुषप्रधान सबल वर्गक नारी दि‍न भरि‍ खटैत रहए सभ दैनन्‍दि‍नीमे परि‍वारक सहयोगी मुदा यात्राकालमे अशुभ। आश्चर्य अछि‍ समाजक अग्र आसनपर बैसल धर्म ि‍नर्माता आ बेवस्‍थाक कथाकथि‍त मनुवादी प्रवृति‍ ओ दर्शन। जौं मनुवादकेँ हृदैसँ मानैत छथि‍ तैयो एहेन दृष्‍टि‍कोण हएब उचि‍त नै। मनु तँ एकर समर्थन कथमपि‍ नै कएने हेता। जौं हुनको इहए दृष्‍टि‍कोण छलनि‍ तँ एहेन व्‍यक्‍ति‍क लि‍खल स्‍मृति‍ समाजपर कलंक मानल जाए। ऐ क्रममे सभसँ नीक लागल चतुरानन जीक समन्‍वयवादी वि‍चारधाराक बेबाक वि‍श्लेषण। डॉ. कलानन्‍द अन्‍तरजातीय आ अन्‍तरप्रान्‍तीय ि‍बआहक समर्थक छथि‍ कलानंदक ऐ दृष्‍टि‍कोणकेँ साम्‍यवादी वि‍चारधाराक अनुशीलन हेतु चतुरानन जीक आत्‍म उद्वोधन मानल जाए। उपन्‍यासक ि‍नष्‍कर्ष सकारात्‍मक अछि‍। डॉ. “कलानंद” कलानंदसँ “कलाकान्‍त” अर्थात् कला दाइक पति‍ भऽ गेलाह। दंतहीन मैनेजर भाइ जकाँ नै सुन्‍दबाबूसँ संस्‍कृत शि‍क्षा ग्रहण करैवाली “कला”क सुयोग्‍य पति‍- डाॅ. कलानंद। कलाक जि‍ज्ञासा छलनि‍ जे वि‍धवा ट्रेनि‍ंग कैम्‍प चलैत रहए। ओ पूर्ण भेलनि‍। डॉ. कलानंद आब औषधालय खोलि‍ राजनीति‍मे कूदए चाहैत छथि‍। औषधालयसँ जे आमदनी हेतनि‍ ओइसँ परि‍वारक भरण-पोषण डॉ. साहेबक मूल उद्देश्‍य छन्‍हि‍। रचनाकार राजनीति‍ज्ञक लेल प्रश्न ठाढ़ कऽ देलनि‍ जे राजनीति‍मे रहैबला लोक समाज सेवाकेँ अपन उद्देश्‍य बनाबथु। राज्‍यक धनसँ परि‍वारक पोषण नै ई तँ “ऑनरेरी सर्विस” हेबाक चाही। कला सोलह बर्खक बाद अपन नैहर एलीह मुदा सभ कि‍छु नष्‍ट भऽ गेल छलनि‍। ऐ उपन्‍यासमे महाजनवादी सूदि‍खोरी प्रथाक वि‍रोध सेहो कएल गेल अछि‍। नि‍ष्‍कर्षत: ई उपन्‍यास वि‍न्‍याक दृष्‍टि‍सँ कि‍छु वि‍शेष नै कि‍एक तँ मैथि‍लीमे कथोपकथनसँ बेसी वि‍न्‍यासक महत होइत छैक। चोटगर आ रसगर गप्‍प ऐमे नै छैक तँए ई समालोचक लोकनि‍केँ नै पचलनि‍। जौं चतुरानन जीक ऐ तरहक दृष्‍टि‍कोण जे अखन धरि‍ मात्र कल्‍पना थि‍क, समाज द्वारा अर्न्‍तमनसँ स्‍वीकार कऽ लेल जाए तँ चतुरानन जीक लेखनीक सार्थकता परि‍लक्षि‍त होएत। ऐ मौलि‍क कृति‍क प्रासंगि‍कता समाजमे अखनो अछि‍। जे वर्ग स्‍वयंकेँ मस्‍ति‍ष्‍क कहैत छथि‍ ओइमे अखन धरि‍ सम्‍यक साम्‍यवादी तत्‍वक वि‍कासमे लागल धून अखन धरि‍ व्‍याप्‍त अछि‍। ओना स्‍थि‍ति‍ बदलि‍ रहलै आ बाल-बि‍आह लगभग मि‍थि‍लामे न्‍यून भऽ गेलैक मुदा काटर प्रथा आ वैधव्‍य जीवनक दारूणि‍क बेथाकेँ अखनो सबल समाजमे मान्‍यता छैक। ब्राह्मण शि‍क्षा स्‍पोतक मूलांकुर रहल छथि‍ तँए राजतंत्रीय बेवस्‍थामे पएर पुजेबाक हि‍नका अधि‍कार छलनि‍ मुदा कि‍ ऐ वर्गक वि‍द्धत लोकनि‍ ओइ अधि‍कारक प्रयोग समाजमे समन्‍वयवादी बेवस्‍थाक स्‍थापनाक लेल कऽ सकलनि‍? द्रवि‍ड़ समाजमे तँ बहुत हद धरि‍ जाति‍-पाति‍क दृष्‍टि‍कोणमे कमी आएल मुदा आर्य समूह वि‍शेष कऽ कऽ मि‍थि‍लामे अखन धरि‍ आनक प्रति‍माकेँ प्रोत्‍साहि‍त करब वा सांस्‍कृति‍क एवं सामाजि‍क वि‍कासमे भूमि‍का देबएमे सबल वर्गकेँ अखनो कचोट होइत छन्‍हि‍। जाधरि‍ ऐ मानसि‍कतासँ मुक्‍ति‍ नै भेटत चतुराननजी सन समन्‍वयवादी वि‍चारधारा पुरान रहि‍तो नूतन मानल जाएत। वि‍श्वास अछि‍ जे स्‍वयंकेँ मूल्‍यांकन कएल जाए जे हम सभ कतए जा रहल छी इहए “कला”क कलात्‍मता ओ तादात्‍म्‍यक सार्थक श्रद्धांजलि‍ हएत। अमित मिश्र, करियन ,समस्तीपुर, मिथिला ,बिहार हारल विजेता                                     पात्र

1. रोहित-  20 साल 2.मानू-    20 साल-   रोहितक दोस्त 3.चिट्ठी चाचा-  45 साल-  डाकिया 4.डाँक्टर बाबू -35 साल-  डाक्टर

(रोहितक दलान परक दृश्य एक कोणमे मौसमी फसलक किछु बोझ राखल अछि ।माँझमे टाटक घरपर हरियर तिलकोरक लत्ती लतरल अछि ।एकटा पुरान साइकिल टाटसँ सटा कऽ राखल अछि ।भऽ सकैए तँ एकटा नादि आ खुट्टा देल जा सकैछ ।रोहित साधारण कपड़ामे घरक आगू ,सोचैक मुद्रामे एक कातसँ दोसर कात टहलि रहल अछि ।रोहितसँ नीक परिधानमे मोनू पर्दाक पाछूसँ "रोहित-रोहित" चिकरैत मंचपर आबैत अछि ।आवाज सूनि रोहितक धियान टूटैत अछि आ फेर दुनू गला मिलैत अछि ।)

रोहित- मोनू ,ई क्रिचदार कपड़ा पहिर दुपहरियामे कतऽ जा रहल छें ।की कोनो खास गप छै की?

मोनू- खास गप की रहतै ।मोन भऽ गेलै ,पहिर लेलौं।ओना रहित ,आगूक की प्लान छौ? रोहित- (आश्चर्यसँ)प्लान।तोहर गप नै बुझलियौ ,कने फरिछा कऽ कह । मोनू- अरे मूर्ख करियरकेँ प्लान । रोहित- अच्छे-अच्छे बूझि गेलियै । मोनू- इएह तँ तोहर प्रोबलेम छौ ,तूँ बुझिते बड देरसँ छेँ ।कने सोच ,इन्टर केला दू वर्ष भऽ गेलै आ एखन धरि बेरोजगारे बैसल छी ।कोना पार हेतै जीवनक डगरिया रे भेया ।

रोहित- ठीके कहलें तूँ ।पिछला एक घण्टासँ हमहूँ इएह सोचै छलौं ।तोरा तँ बाबुओ जीक सहारा छौ मुदा हमर के? एकटा बूढ़ माए जे खाटो परसँ नै उठै छै ।कतौसँ एक्को टाकाक आमदनी नै छै हमरा ।बटैया करै छी ,दूध बेचै छी आ दवाइ-दारूक बाद जँ टाका बचै अछि तँ पोथी कीन पढ़ै छी ।तोरा की कहबौ ,हमर हालत तँ जानिते छें ।

मोनू- हँ हमरा बुझल अछि  तेँ ने दुनू गोटाकेँ आब नोकरीक बारेमे सोचऽ पड़तै ।जँ नोकरी नै भेल तँ जीनाइ मोशकिल भऽ जेतै । रोहित-  गप तँ सत्ते कहलें दोस ।दोस ,चरि चक्किया ए.सी बला गाड़ी देख मोन होइत अछि जे एक बेर हमहूँ चढ़ितौँ ।बजारक गप सूनि बजारेमे अपन छोट परिवार संग रहबाक मोन होइत अछि ।मुखिया जीक हाथमे मोबाइल देख कोनो नेना जकाँ मोन कानि जाइत अछि ।मुदा ई सब एकटा मरनासन्न सपना जकाँ लागैत अछि ,दोस ।भागमे लिखल छै दिल्ली-बम्बइमे बोरा उठेनाइ तँ चरिचक्किया कतऽसँ भेटत ।

मोनू- गलत बात ,बिल्कुल गलत बात ।मनुखकेँ एते उदास नै हेबाक चाही ,जँ जीलाकेँ तेसर टाँपर ,तोरा सन मनुख एते नकारात्मक सोच रखतै तँ बूझें प्रलय आबि गेलै । रोहित- सोच नकारात्मक नै छै भाइ ,मुदा हालत एहन नै छै जे सकारात्मक सोचब ।ई घोर मँहगाइक युगमे जीनगी जीबाक लेल टाका चाही आ टाकाक लेल बोरा उठबैये पड़तै । मोनू- फेर वएह बात ।अरे हम कहै छीयौ ,तोरा बोरा नै उठबऽ पड़तौ ,तोरा एहन गुणीकेँ तँ नोकरी डिबिया लऽ कऽ ताकै छै । रोहित-  एहनो कतौ भेलै यै ।आइ-काल्हि सरकारी नोकरी तँ ईदक चाने बनल छै । मोनू-  आ प्राइवेट । रोहित-  ओकरो लेल पहुँच चाही ।

मोनू- ( कर जोड़ैत) चूप रहू महराज ,चूप रहू ।एते भाषण जुनि मारू ।नोकरी लेल फारम भरऽ पड़ै छै ,अहाँ कतौ भरलौँ की नै? रोहित- हँ ,एकटा परीक्षा देने छी  ।अपन एक सालक बचाओल टाकाक हवण कऽ कऽ । मोनू- तँ फिकिर कथी के ?प्रतिक्षा करू ।एहि हवणक कुण्डसँ अमृतक घैल जरूर बहरेतै ।हमरा विश्वास अछि अहाँ जरूर पास करब । रोहित- तोहर मुँहमे मिश्री ।(गम्भीर होइत)जँ अमृत नै बहरेलै तँ बूझ हमर जीवन बेकार भऽ जेतै ।

(मंचक पाछूसँ साइकिलक घण्टी धिरेसँ बजनाइ शुरू होइत अछि आ धिरे-धिरे ध्वनी तीव्र होइत अछि ।रोहित आ मोनू उम्हरे देखऽ लगैत अछि ।पोस्टमैनक ड्रेसमे ।एक हाथमे किछु चिट्ठी आ कन्हपर एकटा बैग ,दोसर हाथसँ साइकिलक हेण्डिल पकड़ने ,मंचक एक कोणसँ चिट्ठी चाचाक प्रवेश होइत अछि ।)

रोहित ,मोनू- (एक साथ ,एक स्वरमे) प्रणाम चिट्ठी चाचा । चिट्ठी चाचा - खुश रहऽ बौआ । मोनू- कक्का ,आइ हम एकटा बात जानिये कऽ रहब । चिट्ठी चाचा- हँ हँ ,किएक नै जानबऽ ,जानि लए ।कोन बात जानबाक छऽ । मोनू- रोहित अहाँकेँ चिट्ठी चाचा किए कहै यै?

चिट्ठी चाचा-  बड पुरान गप छै ।(रोहित दिश इशारा करैत) ई तीन-चारि वर्षक हेतै ।हम सब दिन चिट्ठी बाँटैक लेल इएह बाटे जाइ छलियै आ एहिना जोरसँ घण्टी बजबैत छलियै ।हमर घण्टीक आबाज सूनि ई नाङटे गाँरि ,हँसैत -कूदैत सड़क धरि आबि जाइ ।

(रोहित लजा जाइत अछि)

मोनू- फेर की होइत छलै । चिट्ठी चाचा- पहिने ई सड़क कच्ची छलै ।पैघ-पैघ खाधि छलै सड़कपर ।साउन-भादो सौँसे सड़कपर थाल-कादोक शासन भऽ जाइ ।जखन ई कूदैत आबै तँ चुभ दऽ ओहि खाधिमे खसि पड़ै आ थाल-कादोमे सना कऽ भूत बनि जाइ छलै ।हा . .हा . .हा . . (सब हँसऽ लागैत अछि आ रोहित लाजे मूड़ि गोँति लैत अछि )

रोहित -  छोरू ने चाचा ,अहूँ कोन गप उठा देलौँ । मोनू-  नै नै ,हुअ दिऔ । चिट्ठी चाचा-  तकरा बाद जखन कखनो इ कानै तँ एकर बाबी कहथिन जे चिट्ठी बाला चाचा आबै छथुन ।ई बात सुनिते ई हँसऽ लागै आ वएह दिनसँ हमर नाम चिट्ठी चाचा पड़ि गेलै ।की हौ रोहित ,इएह गप छै ने? (रोहित स्वीकार करैत उपर-नीच्चा दू बेर मूड़ि डोलबैत अछि)

मोनू-चाचा ,तखन तँ अहाँक घण्टीमे बड पैघ जादू छै जे एकरा सनक उदास रहै बला मनुखकेँ हँसा दै छलै । चिट्ठी चाचा-  (आश्चर्यसँ ) उदास ।उदास किए रहै छै । मोनू-  इएह नोकरी चाकरीक चिन्तामे । चिट्ठी चाचा-  ले बलैया ।हम तँ गपक चक्करमे ओरिजने गप बिसरि गेलौँ ।नोकरीसँ इयादि आएल ,तोरा दुनूक नामे चिट्ठी एलै यै ।(दू टा चिट्ठी निकालि ,रोहित दिश घूमि) ई तोहर (मोनूकेँ दैत) आ ई तोहर । (दुनू लिफाफा फाड़ि , चिट्ठी पढ़ऽ लागैत अछि ।धिरे-धिरे रोहितक मौलाइल मुँहपर हर्षक रेखा आबऽ लागै छै ।एहने सन मोनूक मुँहपर सेहो ) मोनू- (खुशीसँ चिकरैत) मीता ,हमरा नोकरि लागि गेल । रोहित- (खुशीसँ) मीता ,हमहूँ परीक्षा पास कऽ गेलौँ ।इन्टरभ्यू परसू अछि । चिट्ठी चाचा- भगवानक घर देर छै ,अन्हेर नै ।तोरा दुनूकेँ नोकरी लगाइये देलखुन मैया रानी । रोहित-  चाचा ,एखन नोकरी नै लागल ।एकटा मौखिक परीक्षा एखनो बाँकिए अछि । चिट्ठी चाचा-  अरे जखन लिखित निकलि गेलै तँ मौखिको निकलिए जेतै ।चिन्ता जुनि करऽ ।नीके नीके जा ,परीक्षा दऽ ,नोकरी लऽ कऽ आबऽ ।मैया रानी भला करथुन ।अच्छेए ,हमरा और चिट्ठी बँटबाक अछि हम जाइ छीअ । रोहित-  ठीक छै चाचा । (घण्टी बजबैत चिट्ठी चाचा चलि जाइत छथि )

रोहित-  मीता ,तोरा कतऽसँ चिट्ठी एलौ ,कोन ठाम ,कोन कम्पनीमे ,केहन नोकरी लागलौ? मोनू-  कने साँस लऽ कऽ बाज ।एना जँ एक्के बेर प्रश्नक बाढ़ि आनबें तखन तँ हम भसिआइये जाएब । रोहित-  बुझलियै ,बुझलियै ।नै एक फेर ,बेरा-बेरी तँ उत्तर दे । मोनू-  दिल्लीसँ चिट्ठी आएल छलै ।जाहि कम्पनीमे बाबू काज करै छथिन ,ओहि कम्पनीमे सुपरवाइजरकेँ जरूरति छलै ,वएह पोस्ट हमरा भेटल अछि । रोहित-  मुदा कोना? मोनू-  ओकर ठिकेदार अपने इम्हरकेँ छलै ।बाबूजी ओकरा हमर पैरवी केलखिन तँ ओ तैयार भऽ गेलै ।बाबू जी दिल्ली एबाक लेल चिट्ठी भेजने छथिन । रोहित-  मीता ,जखन एगो दोस्त कामयाब होइ छै तखन दोसर दोस्तक करेजक एक कोणमे खुशीक वर्षा होइ छै आ दोसर कोणमे दुखक ठनका खसै छै ।खैर ,तोहर कामयाबीसँ हम खुश छी ,बड खुश छी ।हमर कामयाबी तँ एखनो माँझ सागरमे हेल रहल छै ,जानि नै भेटतै कि नै भेटतै ।

मोनू-  अपनेक बहुत-बहुत धन्यवाद खुश हेबाक लेल ।आब अहूँ इन्टरभ्यू देबाक ओरियान करू ,हमहूँ जाइ छी दिल्लीक लेल रिजर्वेसन कराबऽ । रोहित-  ठीक छै ।फेर इन्टरभ्यूसँ एलाक बाद भेँट हेतै । मोनू-  बेस्ट आफ लक । रोहित-  रूक ।एकटा बात और हमरा आबै धरि तूँ गामेमे रहिहेँ । मोनू-  से किएक ? रोहित-  जँ हम कामयाब भऽ जेबै तँ खुश हेबाक लेल । मोन-  हम तँ सदिखन खुश रहै छी ।ओना तोरा आबै धरि हम दिल्ली नै जेबौ । रोहित-  धन्यवाद । मोनू-(गाबैत अछि) हम होगेँ कामयाब ,हम होगेँ कामयाब ।

(दुनू पर्दाक पाछू चलि जाइत अछि )

        *************** पट-परिवर्तन **********************

(मंचपर बाटक दृश्य अछि ।पर्दाक एक कोणसँ रोहित मंचपर आबैत अछि ।पीठपर एकटा बैग लादल छै ,केश छिड़ियाएल ।उदास ,कननमुँह केने ,मंद चालसँ चलि रहल अछि ।तखने गीत गाबैत मोनूक मंचपर प्रवेश)

मोनू-   आबि गेलें नोकरी लऽ कऽ । (रोहित बिनु किछु बाजने चलिते रहैत अछि)

मोनू-  अरे रोहित ,तोरे कहै छीयौ ।रूक . .रूक ने । (रोहित फेर बिनु बाजने चलिते रहैत अछि ।मोनू दौड़ कऽ रोहित लऽग पहुँचैत अछि आ रोहितक हाथ पकरि लैत अछि ।रोहित रूकि जाइत अछि ।)

मोनू- कते देरसँ तोरा सोर करै छीयौ ।तूँ किछु सुनिते नै छें ।किछु तँ बाज ।कि भेलौ । (रोहित चूप अछि)

मोनू-  धन्य छी महराज ।एक दिश बाजैत-बाजैत हमर मुँह दुखा गेल आ दोसर दिश अहाँ फेविकाँलसँ अपन ठोर साटि लेने छी ।ठीके कहै छै परचारमे ,एक बार सट गया तो सौ साल धरि नै उखड़ेगा । (रोहित बिनु उत्तर देने चलबाक कोशिश करैत अछि ।मुदा मोनू बाँहि पकड़ि रोकि लैत अछि ।)

मोनू-  लगैत अछि बौआ नोकरी लऽ लेलनि । ई जीतक खुशीमे बौक भऽ गेलनि ।की महराज ,जीतैये बला गप छै ने? रोहित-  (दुख भरल आवाजमे ,धिरेसँ) नै ,हम ई खेल हारि गेलौं मीता ,हम नाकामयाब भऽ गेलौँ । मोनू- झूठ ,सरासर झूठ ।हम मानिये नै सकै छी ।तोरा सन मेधावी छात्र ई परीक्षामे फेल नै भऽ सकै छै ,किन्नौह नै । रोहित-  हम सत्त कहै छी मीता। एहि रेसमे जीतलौँ तँ मुदा सबसँ पाछु रहि कऽ । (मोनूक हँसैत मुँह उदास भऽ जाइत अछि )

मोनू- मूदा ई भेलै कोना? रोहित- टाका और पैरवीक चलते । मोनू- नै बुझलियौ ।कने फरिछा कऽ कह । रोहित-  संगमे पाइ नै छल । दस किलोमीटर धरि पैदल चलऽ पड़ल । मोनू-  की ओतऽ देरीसँ पहुँचलहीं । रोहित-   नै ,पहुँचलियै तँ सबेरे मुदा अंग-अंग थाकि गेल । मोनू -  तखन की भेलै | रोहित-  सब छात्रकेँ बेरा-बेरी बजाओल जाइत छलै ।इन्टरभ्यू कक्षसँ किओ मुस्कैत  तँ किओ काननमुँह केने निकलै छलै ।बेसी कानिते निकलै ।थाकल तँ पहिनेसँ छलौं ओकरा सबकेँ देख हम बड डरि गेलौं । मोनू- अच्छए ,से बात ।आब बुझलौं ।महराज डरि कऽ भागि एलनि । रोहित- नै नै ,एहन गप नै छै ।

मोनू-  तँ केहन छै से ने कह । रोहि-  पहिने पूरा सुन तँ बीच्चेमे लोकि लै छेँ । मोनू-  कह । रोहित-  साँझ होइत-होइत सबहक इन्टरभ्यू भऽ गेलै ।सबसँ अंतीममे हमर बारी एलै ।हमरा बजाओल गेल ।डेराइत-डेराइत हम अंदर गेलौं ।एकटा बड़का टाबूलक एक दिश तीन टा अफसर बैसल छलै ।दोसर दिश एकटा  कुर्सी खाली छलै ।हमरा बैसै लेल कहलकै तँ हम ओहि कुर्सीपर बैस गेलौं ,मुदा थाकल मोन एखनो डेराएले छल ।हम अपन सबटा सार्टिफिकेट देलियै ।ओ तीनू अफसर सार्टिफिकेट देखऽ लागलै । मोनू-सार्टिफिकेट देख तँ प्रसन्न भऽ गेल हेतै अफसर सब ।

रोहित-  हँ ।ओकर बाद तीनू बेरा-बेरी प्रश्न पूछऽ लागल ।अलग-अलग क्षेत्रसँ अलग-अलग तरहकेँ प्रश्न ।पहिने तँ हम घबरा गेलौं मुदा बादमे हमहूँ सब प्रश्नक उत्तर फटाक-फटाक देबऽ लगलियै ।जतबे जबाब दियै ततबे प्रश्न पूछै ।हमर जबाब सूनि तीनू अफसरक ठोरपर मुश्कान नाचऽ लागलै ।दस-पनरह मीनट धरि प्रश्न पुछिते गेलै आ हम जबाब दैत गेलियै ।अन्तमे ओ सब चुप भऽ गेल आ अपनामे तीनू कानाफूसी करऽ लागल ।ओहिमेसँ एकटा एजगर अफसर उठि कऽ हमरा लग आबि गेल ।हमहूँ ठाढ़ भऽ गेलौं ।ओ हमर पीठ ठोकि देलक आ बाहर जाइ लेल कहलक ।हम अपन सार्टिफिकेट सब समटि बाहर आबऽ लागलौं ।

मोनू-  जखन एते नीक इन्टरभ्यू गेलौ ।अफसर तोहर पीठ ठोकि देलकौ तखन नौकरी किएक नै भेटलौ ?तूँ फेल कोना कऽ गेलेँ ?शाइद तूँ मजाक करै छें ।झूठ बाजै छेँ ।

रोहित-  नै नै ।ने हम मजाक करै छी आ ने झूठ बाजै छी ।हम बिल्कुल सत्त बाजि रहल छी । मोनू-  तखन असलमे भेलै की? रोहित-   जखन हम बाहर आबै छलियै तखने एकटा अफसरक मोबाइल बाजलै ।ओ फोन उठा कऽ बतियाए लागलै ।ओकर बार्तालापसँ बुझना गेल जे कोनो बड़का नेताक फोन छै ।ओम्हरसँ किछु कहलकै तँ ओ अफसर कहलकै जे "सर ,आपका कनडिडेट इस लड़का से बहुत ज्यादा कमजोर है ।एक हीं सीट बचा है इसलिए नौकरी इसी लड़के को मिलेगा ।"उम्हरसँ और किछु किछु कहल गेलै मुदा अफसर ना-नुकुर करैत रहल ।अन्तमे अफसर कहलकै"अब सर आप नहीँ मानियेगा तो आपका काम करना हीँ पड़ेगा लेकिन दाम दस लाख लगेगा ।" ई कहि ओ फोन काटि देलकै ।तखन धरि हम बाहर आबि गेल छलौं ।

मोनू-  लागै छै पैरवीकेँ दानव पहुँच गेल छलै । रोहित-  शाइद ।एकर बाद जखन पास भेल छत्रक लिस्ट साटल गेलै तँ ओहिमे हमर नाम नै छलै । मोनू-  आब सब गप हम साफ-साफ बूझि गेलियै ।जा धरि टाका आ पैरवी बला रहतै ,जा धरि घूस लै बला लोभी अफसर रहतै ,ता धरि कोनो गरीबक कल्याण नै भऽ सकै छै । रोहित-  हम तँ पहिने कहने छलियौ , हमर कर्ममे सरकारी नोकरी नै ,बोरा उठेनाइ लिखल छै । मोनू-  चिन्ता जुनि कर ।मेहनत आ इन्तजारक फल मीठ होइ छै ।आइ नै तँ काल्हि तूँ सफल हेबे करबेँ ।

रोहित-  मोनू ।आब नै टाका अछि आ नै साहस बचल अछि ।आब कतौ कोनो परीक्षा देबाक इच्छा नै बचल अछि ।एतबेमे हमर जिनगी तहस-नहस भऽ गेल ।

मोनू-   एना जुनि फाज ।सदिखन अपन सोच पोजीटीभ बना कऽ राख । रोहित-   पोजीटीभ नै बनि पाबै छै यार ।माएक दबाइ खतम छै ।हाथमे एक्को टाका नै छै ।पहिनेसँ कर्जाक बोझ तऽर दबल छी ।आब तँ किओ कर्जो-पैंचो नै दै छै ।की करब ,कोना जीयब ,किछु नै फुराइत अछि ।एहनमे तूँ कहै छें पोजीटीभ सोचैक लेल ।एतऽ जीवन नीगेटीभ भेल अछि ,पोजीटीभ सोच कोन कुम्हारक चाकपर गढ़ब ।

मोनू-  मीता टाकाक चिन्ता जुनि कर ।काल्हि हम दिल्ली जा रहल छी ।हम अपन दरमाहा भेज देल करबौ ।तूँ खाली मेहनत कर ।मोन लगा कऽ पढ़ आ सरकारी नोकरी ले । रोहित   -- तूँ भेजबेँ वा किओ और देत ,हएत तँ कर्जे ने? मोनू-    हमर मदतिकेँ कर्जा नै मान ।एते दिन पढ़ैमे तूँ हमर मदति अपन ज्ञानसँ केलें  ,हमर टास्क बना कऽ केलें ,आइ हम तोहर मदति पाइसँ करबौ ।हिसाब बराबर । रोहित-  तैयो । मोनू-   तैयो ,तैयो की? तैयो-बैयो किछु नै ।मोन बेसी छोट नै कर ।सफरसँ थाकल हेबेँ ।जो स्नान -धियान कऽ ,पेट पूजा कर ।कने कालमे हमहूँ आबै छीयौ । रोहित-  की करबै पेट पूजा ।चाउरो-दालि तँ नै छै घरमे ।जीनगी गाराक घेघ भऽ गेल अछि ।कखनो कऽ होइत अछि एहन जीनगीसँ मरनाइ नीक । मोनू-   बेसी बात नै बना ।खुशी खुशी जो ।आराम कर ।थाकल देह छौ तेँ अल-बल सोचाइ छौ ।जो . . .जो . . . । (दुनू पर्दाक पाछू चलि जाइत अछि)

********************** पट -परिवर्तन ********************

(रोहितक दलानक दृश्य ।रोहित धरतीपर बेहोश पड़ल अछि ।वायाँ हाथक कलाइसँ खून बहि रहल अछि ।दायाँ हाथक लऽग एकटा चक्कू राखल अछि ।पर्दाक पाछूसँ रमेशकेँ सोर पाड़ैत मोनूक प्रवेश)

मोनू-  देखू ।यात्रासँ एतेक थाकि गेलै जे बीच्चे दलानपर सूति रहलै ।(रोहितक लऽग आबि ।घबराएल) ।अरे बाप रे बाप ।ई की भेलै? एकरा हाथसँ तँ खून बहै छै । (झूकि कऽ चक्कू उठा लैत अछि) अशांत मोनमे शाइद आत्महत्या करबाक प्रयास केलक ।अपनेसँ हाथक नस काटि लेलक ।अरे बाप रे बाप ।आब की करियै हम . . .डाँक्टर . . .डाँक्टर . . .किओ डाँक्टर के बजा . . .के . . .के . . .के जे . . .हमरे जाए पड़तै ।(चिकरैत) डाँक्टर बाबू ,यौ डाँक्टर बाबू ,दौरू यौ डाँक्टर बाबू . . .अनर्थ भऽ गेलै ,अनर्थ ।

(डाँक्टर बाबूकेँ सोर करैत मोनू मंचक एक कोणसँ पर्दाक पाछू जाइत अछि आ दोसर कोणसँ डाँक्टर बाबूक संग मंचपर आबैत अछि ।)

डाँक्टर बाबू- की भेलै? मरीज कतऽ छै? मोनू-  (रोहित दिश इशारा करैत अछि) इएह छै मरीज डाँक्टर बाबू । डाँक्टर बाबू-  की भेलै एकरा? मोनू-  हाथक नस काटि लेलकै ।बड खून बहि रहल छै ।जल्दी करू नै तँ मरि जेतै । डाँक्टर बाबू-   हम एकर इलाज नै कऽ सकै छी ।ई पुलिस केस अछि ,हम फँसि जाएब ।

(डाँक्टर बाबू बैग उठा जाए लागै छथि ,मोनू लपकि कऽ हुनक गट्टा पकड़ि लैत अछि )

मोनू-  (कानैत) अहाँ एहि धरती परक भगवान छी ।अहाँ एना जुनि बाजू ।एकर इलाज कऽ दिऔ । कर प्राण बचा लिऔ ।(डाँक्टर बाबूक पएर पकड़ैत) हम अहाँक पएर पकड़ै छी ,हमर मीतकेँ जीया दिअ ।अहाँकेँ हमर सप्पत ।इलाज शुरू करू ।

डाँक्टर बाबू-   पएर छोड़ हमर ।हम एकर इलाज कोनो कीमतपर नै करबै ।एकर इलाज कऽ कोनो संकट मोल नै लेब ।पहिने पुलिसकेँ बजा ।ओकरा एलाक बादे किछु हेतै । (डाँक्टर बाबू पएर छोड़बैक लेल जोरसँ झटका दैत अछि ।मोनू कने दूर गुरकि जाइ छै ।डाँक्टर बाबू जाए लागै छथि ।मोनू फेर हुनक बैग पकड़ि लैत अछि ।)

मोनू- जखन धरि पुलिस एतै तखन धरि हमर मीता मरि जेतै । डाँक्टर बाबू-  मरि जेतै तँ हम की करी?अपन प्राण दऽ दी ।मरि जेतै तँ मरऽ दहीं ई हमर टेन्सन नै छै । मोनू-  (जोरसँ बाजैत) धिक्कार अछि एहन डाँक्टरीपर ।एतऽ लोक मरि रहल छै आ अहाँ प्रवचण दऽ रहल छी ,कानून पढ़ा रहल छी ।की इएह सिखाओल गेल छल डाँक्टरी कालेजमे ।धिक्कार अछि एहन डिग्रीपर ।धिक्कार अछि मनुखतापर ।जाहि मनुखकेँ करेजमे मसियो दरेग नै हेतै ।जकरामे मनुखताकेँ सड़लो-गलल अंश नै बचल हेतै ,हमरा हिसाबसँ ओ एक माए-बापक जनमल भैये नै सकै छै ।

डाँक्टर बाबू-   (पिनकैत) रे छौड़ा ,तूँ हमरा गारि पढ़लें ।थम्ह तोरा देखबै छीयौं । मोनू-  (उपहास करैत) गारि ककरो उमरि देख नै पढ़ल जाइ छै ।किओ अपन नीक कर्मक प्रतापे इज्जत पाबै छै तँ किओ अपन खराप कर्मक प्रतापसँ गारि सुनै छै ।मुदा अफसोस अहाँ दुनूमे सँ एक्को टामे नै छी ।मनुखते नै तँ कर्म कतऽसँ ।

(तखने साइकिलक घण्टी बजबैत चिट्टी चाचाक प्रवेश)

चिट्ठी चाचा -  की भेलै ।एते हल्ला किए करै छऽ । मोनू-  हित आत्महत्या करबाक प्रयास केलक ।ओ वेहोश अछि ,आ ई (डाँक्टर बाबू दिश इशारा करैत) डाँक्टर इलाज करैसँ मना करै छथिन । चिट्ठी चाचा-   हौ डाँक्टर ।तोरा लऽग लूरि छऽ तखन तँ लोक पूछारि करै छऽ ।समाजक प्राणी भऽ समाजसँ एते कतिआएल रहनाइ नीक नै छै ।(हाथ जोड़ैत) हम तोरा आगू हाथ जोड़ै छीअ ।तोरासँ जेठ भऽ विनती करै छीअ ।एकरा जीया दहक ।एकरा गरीबक कल्याण कऽ दहक ।

डाँक्टर बाबू-   नै कक्का ।हमरा माँफ करू ।कोर्ट कचहरीक चक्करमे हम नै पड़ब । (डाँक्टर चलनाइ शुरू करैत अछि ।मोनू पाछूसँ डाँक्टरक गर्दनपर चक्कू राखि दैत अछि ।)

मोनू- (चिकरैत) डाँक्टर बाबू ।आइ जँ एतऽसँ हमर मीताक लहाश उठतै तँ हम अहूँक राम नाम सत्य कऽ देब ।

डाँक्टर बाबू-  (घबराइत) हे ,हे ,चक्कू हटा ,चक्कू हटा ।ई गलत कऽ रहल छें । मोनू-   आब सही -गलत फरिछेबाक शक्ति नै अछि हमरामे ।हम बस एतबे जानै छी ।आइ जँ एकर इलाज नै हेतै तँ हम एखने तोहर इलाज कऽ देबौ ।

(डाँक्टर घूरि कऽ रोहित लऽग आबैत अछि ।बैगसँ रूइ निकालि खून साफ करैत अछि ।मरहम पट्टी करैत अछि ।)

चिट्ठी चाचा-   केहन युग आबि गेलै ।युवा वर्गमे आब लड़ैक साहस बचबे नै केलै ।छोट-छोट सन दुख भेलापर आत्महत्या ।लागैछ एहि यांत्रिक युगमे लोको सब रोबोट बनि गेलै ,जकरामे कोनो संवेदना नै होइ छै ।नीक- बेजाए सोचबाक शक्ति नै होइ छै ।प्रतिस्पर्धाक दौड़मे जानि नै कते युवा मृत्युक माला पहिर लै छै ।छोट-छोट विपतिसँ डारा कऽ प्राण तियागि दै छै ।जानि नै कतऽ जा रहल छै ई देश ।जानि नै कहिया जागतै युवामे चेतना ।

(रोहितकेँ होश आबै छै ।ओ उठि कऽ ठाढ़ हुअ लागै छै ।मोनू सहारा दऽ कऽ उठबै छै ।)

रोहित-   (चारू कात  घूमि)  की हम स्वर्गमे छी ? की हमरा संग पूरा समाज मरि गेलै ? मोनू-  (चिट्टी चाचा दिश घूमि ।) चाचा होश आबि गेलै ।देखियौ ,देखियौ ,हमर मीत बचि गेलै ।जी गेलै । (डाँक्टर बाबू आ चिट्ठी चाचा रोहित लऽग आबि जाइ छथि ।)

रोहित-  हम मरऽ चाहै छी । हमरा किए जीएलें ।हमरा मरऽ दे । डाँक्टर बाबू-   भगवान जीवन देलखिन जीबाक लेल ,मरबाक लेल नै ।जँ मरनाइ नीक बात रहितै तँ आइ दुनियाँमे एक्को टा मनुख नै रहितै ।सब स्वर्गवासी भऽ गेल रहितै ।जीवनमे सदिखन खुश रहबाक चाही ,मरबाक नै ।देखै छऽ ,तोहर केस तँ हमर आँखि खोलि देलक ,तोरा सन युवाक आँखि आब कहिया खुलतै ?जानि नै ।

रोहित-   खुश ,कोना रहब खुश ।जीनगीमे जखन हारक सामना होइ छै तँ हँसी-खुशी ओहि हारक संग हेरा जाइ छै ,तखन मरनाइये नीक लागै छै । चिट्ठी चाचा-    एक बेर हारि जेबाक मतलब ई तँ नै छै जे जीवन भरि लेल हारि गेलियै ।एकटा घोंघा बेर-बेर देवालपर चढ़ैत अछि ,बेर-बेर खसैत अछि ,मुदा हारि नै मानैत अछि ।लगातार प्रयास करैत अछि आ एक दिन ओ देबालपर चढ़िये जाइत अछि ।हारि कऽ जीतैमे जे मजा छै से और किछुमे नै ।

डाँक्टर बाबू-   जे सब दिन जीतै छै ओ अपना-आपकेँ बलगर समझि लै छै ।ओकरा घमण्ड भऽ जाइ छै आ फेर ओ कहियो मेहनत नै करै छै ।मुदा जे सब दिन हारै छै ,ओ सब दिन मेहनत करै छै आ ओ जखन जीतै छै तँ विश्वविजेता बनै छै ।बुझलऽ । मोनू -   अरे ,एकटा परीक्षामे फेल भेलासँ कोनो प्रलय नै आबि जेतै ।जीवनमे एखन कतेको परीक्षा बाँकिए छै । मनुखक जिनगीत दोसर नाम थिक परीक्षा ।मनुख कते परीक्षासँ भागत ।डेग-डेगपर एकटा नव चुनौती भेटै छै ।तेँ हिम्मर राख आ सब किला फतह कर ।

चिट्ठी चाचा-   दू सए साल धरि प्रत्येक दिन ,प्रत्येक क्षण अंग्रेजसँ हम सब हारैत एलौं ।मुदा एक ने एक दिन जीत भेटबे केलै ।मनुखक जीवनमे हार जीत तँ चलिते रहै छै ।एहिमे आश्चर्यक कोन गप ? घबराइकेँ कोन गप ?

डाँक्टर बाबू-   मनुखकेँ अपन सब हारसँ सीख लेबाक चाही ।अपन कमजोरी दूर करबाक चाही ,नै अनुतिर्ण भेलापर परेशान भऽ आत्महत्या सन खराप डेग उठेबाक चाही । अजुक युवाकेँ ई सोच दिमागसँ निकालऽ पड़तै जे कोनो काजमे फेल भेलाक बाद एकर समाधान मात्र आत्महत्या छै ।

चिट्ठी चाचा-   रोहित । ई हार तोहर हार नै छलौ ।ई हार तँ ओ पैरवी बलाकेँ हार छलै जे तोहर ज्ञानक आगू हारि गेलै ।तूँ आब नव उर्जा संग ठाढ़ हो ,नव शक्तिक संग चोट कर ।तोहर विजय जरूर है ।कहाबत तँ सुनने हेबेँ , सए सोनारकेँ तँ एक लोहारकेँ ।एक ने एक दिन जिनगीक सब बाधा ,सब परीक्षा तूँ उतिर्ण हेबेँ ।

मोनू-   हँ मीता ,तूँ एखनो जीतल छेँ ।सब दिन जीतल रहबेँ ।

रोहित-   क्षमा करू ।माँफ करू ।हमर आत्मबल डोलि गेल छल ।हम भटकि गेल छलौं ।मुदा आब हम देबर मेहनत करब ।तखन धरि मेहनत करब जखन धरि ओ जीतल टाका आ पैरवी बलाक गालपर ई हारल विजेताक जीतक थप्पर नै पड़ि जाइ ।हम हमरा सन सब युवासँ कहऽ चाहब जे हमरा जकाँ आत्महत्या सन डेग किओ नै उठबू ।फेल भेलापर और बेसी जोशक संग जीतक मार्गपर आगू बढ़ैत चलू ।जीत भेटबे करत ।जाइ छी हमहूँ आब बेसी मेहनत कऽ अपन लक्ष्य धरि पहुँचब । हँ ,ई कहाबत सदिखन मोन राखब ,सए दिन सोनारकेँ तँ एक दिन लोहारकेँ ।

मंचपर सब हँसऽ लागैत अछि आ धिरे-धिरे पर्दा खसऽ लगैत अछि।                                      समाप्त दरमाहा

-नमस्कार घनश्याम बाबू, सब नीके ने? -नमस्कार, नमस्कार ।सब कुशल अछि ।अपन बताउ? -की कहौं, हालत पस्त अछि । -से किए यौ? हम तँ मजामे छी । - छऽ माससँ दरमाहा नै भेटल ।ओना अहाँ तँ अनुबन्धपर छी तखन एते ठाठ-बाठ कोना ? -असलमे सरकारी दरमाहा नै अछि तँ की भेल, जनताक दरमाहमे कोनो कमी नै अछि । -जनता अहाँकें पाइ किए देत? -आब मूर्खकें के समझेतै? टेबुलपर नै जा कऽ हमरा मार्फत काज करबाएत तँ दरमाहा देबैये पड़तै ने ?

 हँसी

-कतऽ गेलियै यै ? किछु बाजू तँ । -दुर . . .हमर बाँहि छोरू ।अहाँसँ बात नै करब हम । -हे हे एना जुनि करू ।अहाँ बतिआएब नै तँ हमर प्राणे चलि जाएत । -जाए दिऔ ।बढ़ियें हेतै । -आखिर हमरापर एतेक तामस कोन बातक अछि ? -सभक पति अपन पत्निकें सिनेमा-सर्कस घुमाबै छै आ अहाँ दिन-राति दर्शनो नै दैत छी ।काजो करैक एकटा सीमा होइ छै । -अच्छे, एकर तामस छै ।कने लऽग आउ . . .हम पाइ कामाइ छी जाहिसँ नून-हरदि चलैत रहए आ अहाँ चिन्ता मुक्त भऽ सदिखन हँसैत रहू ।असलमे अहाँक हँसी किनबाक लेल घरसँ बाहर रहै छी । अधिकार

- रौ कोनमा ,काल्हि कने रधियाक सासुर भार दऽ आबिहें । - मालिक, ककरो आर कहियौ ।काल्हि हमरासँ नै हएत । - से किएक रौ ? - अहाँकें नै बूझल अछि काल्हि एलेक्सन छै । - ओहिसँ की ? पेट तँ तोरा हमरे देल पाइसँ भरतौ ।नेता तँ नै एतौ । - तैयो मालिक जहिना हमर अधिकार अछि जे काज केलाक बाद अहाँसँ पाइ लेब तहिना भारत माता आ संविधानक अधिकार लेबैये पड़त ।छोड़ि कोना देब ।

 भूख

ओ पगली छलै ।पच्चिस-छब्बिस वर्षक भरल-पूरल देह मुदा दिमाग घसकल ।नित दिन टीसनपर इम्हरसँ उम्हर टहलनाइ ओकर मुख्य काज छलै । फेकल पन्नी वा अखबारक टूकड़ामे सटल अन्नक किछु दाना ओकर भोजन छलै ।आबैत-जाइत ट्रेन दिश एकटक देखैत ,कखनो कऽ कोनो खिड़की लऽग चलि जाइ ।फेर की टी॰टी॰क दबाड़ सुननाइ आ पुलिसक लाठी सहनाइ ,ओकरा लेल सबदिना छलै ।किओ ओकरा छूअ नै चाहै । एक दिन भोरे-भोर अखबारमे छपल एकटा खबरपर नजरि अटकि गेल ।काल्हि राति किओ ओहि पगली संग बलात्कार कऽ ओकर घेंट चापि देने छलै ।हमर मोनमे एकटा प्रश्न बेर-बेर उठि रहल छल ।की वासनाक भूख एते ताकतबर होइ छै जे जाति-पाति ,धर्म-कर्म आ मनुखक स्थिती धरि नै देखै छै ?लागि रहल छल जँ भूख एहिना बढ़ैत रहत तँ महाप्रलय आबैमे कम्मे दिन शेष छै । जवाहर लाल कश्यप विहनि कथा- सीता सीता वाह ! कि सुखद संयोग अछि , वियाहक नवम वर्ख मे मिथिलेश मिसर के एकटा बेटी भेलन्हि आ ओहो जानकी नवमी दिन / खुशी स मोन गदगद भेल रहैन्ह्, स्वंय देवी अबतरित भेलीह / नामाकरन के दिन बच्चा के नाम सीता राखल जाय / अधिकांश लोकक विचार भेल / मुदा बच्चा के माय सुनयना देवी सहमति नहि भेलीह / मि0- अहॉ कि नाम राखय चाहैत छी ? सु 0- किछु हो मुदा सीता नहि / मि0- कियैक , सीता नाम मे दिक्कत अछि ? किछु उत्तर नहि भेतल ... मिथिलेश मिसर और जोर स कहलथि, हम पुछैत छी कियैक ? सुनयना देवी शांति स उत्तर देलखिन्ह " हम नहि चाहैत छी जे हम्मर बेटी के नाम एहन स्त्री के नाम पर राखल जाय जे अपना संग भेल अन्याय के प्रतिकार नहि क सकलीह /" सुमित आनन्द शोध-पत्रिका मैथिली केर लोकार्पण शोध-पत्रिकाक लगातार आठ अंकक प्रकाशन एकटा महत्वपूर्ण गप्प थिक। ऐसँ भाषा साहित्यक विकास हएत। ई गप्प ल. ना. मिथिला विश्वविद्यालयक कुलपति डॉ. समरेन्द्र प्रताप सिंह कहलनि। ओ ऐ सराहनीय कार्यक हेतु विभागाध्यक्षा डॉ. वीणा ठाकुर एवं अन्य विभागीय शिक्षक लोकनिकेँ धन्यवाद देलनि। ऐ अवसरपर प्रति कुलपति डॉ. ध्रुव कुमार कहलनि जे मैथिलीक विकासेसँ मिथिलाक विकास हएत। ऐ हेतु सभकेँ गम्भीरतासँ डटल रहए पड़त। वित्तीय परामर्शी सी. आर. डीगवाल कहलनि जे शोध-पत्रिकासँ भाषा साहित्यक विकासक संग ओकरा नव दिशा सेहो भेटैत छैक। ऐ अवसरपर डॉ. सुरेश्वर झा चिंता व्यक्त कएलनि जे सामान्यतया लेखक लोकनि अपन प्रकाशित सामग्री शोध-पत्रिकाकेँ दए दैत छथि से नीक बात नै। ओ लोकनि नव लेखन करथु  ओतहि डॉ. भीमनाथ झा शोध-पत्रिकाक चयनित रचनाकेँ पुस्तकाकार करबापर बल देलनि संगहि ऐमे डॉ. रामदेव झा सन विद्वानक शब्दकोषकेँ संकलित करबाक हेतु प्रसन्नता व्यक्त कएलनि। ऐ अवसरपर मिथिला आवाजक सी. ई. ओ. श्री अजित कुमार आजाद शोध-पत्रिकाक प्रकाशनपर प्रसन्नता व्यक्त करैत मिथिला आवाजक हेतु रचनाकार लोकनिसँ सहयोगक बात सेहो कहलनि। कार्यक्रममे विचार व्यक्त कएनिहार अन्य वक्ता लोकनि छलाह डॉ. धीरेन्द्रनाथ मिश्र, डॉ. शशिनाथ झा, डॉ. रमाकान्त मिश्र, डॉ. मित्रनाथ झा एवं डॉ. कृष्णचन्द्र झा मयंक। ऐ कार्यक्रममे उपस्थित अन्य प्रमुख व्यक्ति सभ छलाह- डॉ. वैद्यनाथ चौधरी वैजू, डॉ. फूलचन्द्र मिश्र रमण, डॉ. नीता झा, डॉ. रमेश झा, श्री अमलेन्दु शेखर पाठक, डॉ. विभूति चन्द्र झा इत्यादि। कार्यक्रमक अध्यक्षता, स्वागत भाषण एवं अध्यक्षीय भाषण विश्वविद्यालय मैथिली विभागक अध्यक्षा डॉ.  वीणा ठाकुर कएलनि तथा मंच संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन ऐ विभागक प्राचार्य डॉ. रमण झा कएलनि। अमृृता, अर्चना एवं शीतल केर समवेत मंगलाचरणसँ प्रारम्भ भेल कार्यक्रममे श्री सुमित आनन्द स्वागत गीत प्रस्तुत कएलनि। जगदानन्द झा ‘मनु’, ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी वसिअतनामा सु०केँ व्याह दूतीवरसँ भेलन्हि | हुनक बएससँ करीब बीस बर्खक बेसी हुनक वर | हुनक वरकेँ पहिलुक कनियाँसँ एकटा बारह बर्खक बेटा | व्याहक पाँच वर्ख बादो सु०केँ एखन धरि कोनो संतान नहि | अपन माएक आग्रहपर सु० दू दिनक लेल अपन नैहर एली | एहिठाम माएकेँ केशमे तेल दैत – सु० केर छोट भाइ, “दीदीसँ पैघ पतिवरता स्त्री आइकेँ दुनियाँमे कियो नहि होएत |” सु०, “ ई एनाहिते कहैत छैक |” छोट भाइ, “नहि गे माए, दीदीकेँ देखलहुँ अपन बुढ़बा वरकेँ एतेक सेवा करैत जतेक आजुक समयमे कियोक नहि करतै |नहबैत-सुनाबैत तीन तीन घंटापर हुनका चाह नास्ता भोजन दैत भरि दिन हुनके सेवामे लागल आ हुनकासँ कनी समय भेटलै तँ हुनक बेटामे लागल अपन देहक तँ एकरा सुधियो नहि रहै छै |” सु०, “एहन कोनो गप्प नहि छै आ नहि हम कोनो पतिवरता छी | ओ तँ, ओ अपन वसिअतनामा बनोने छथि जेकर हिसाबे हुनक एखन मुइलापर हुनक सभटा सम्पतिकेँ मालिक हुनक बेटा होएत | आ जखन हमरा एकगो संतान भए जाएत तखन हुनक सम्पति, हुनक पहिलका बेटा आ हमर संतान दुनूमे बराबर बटा जाएत ताहि दुवारे बुढ़बाकेँ एतेक सेवा कए कऽ जीएने छी जे कहुना कतौसँ एकटा बेटा की बेटी भऽ जे नहि तँ एहेन बुढ़बाकेँ के पूछैए |” बुढ़ारीक डर नेना, “माए बाबीकेँ हमरा सभसंगे भोजन किएक नहि दै छियनि ?” माए, “बौआ बड्ड बुढ़ भेलाक कारणे हुनका अपन कोठलीसँ निकलैमे दिक्कत होइत छनि तैँ दुवारे हुनकर भोजन हुनके कोठरीमे पठा दै छियनि |” नेना, “मुदा बाबी तँ दिन कए बारीयोसँ घुमि कऽ आबि जाइ छथि तखन भोजनक समय एतेक किएक नहि चलल हेतैन|” माए, “एहि गप्प सभपर धियान नहि दियौ, एखन ई सभ अहाँ नहि बुझबै | बुढ़ सभकेँ एनाहिते है छैक |” नेना, “अच्छा तँ अहुँक बुढ़ भेलापर अहाँक भोजन एनाहिते एसगर अहाँक कोठरीमे पठाएल जाएत |” अबोध नेनक गप्पक उत्तर तँ माए नहि दए सकलखिन मुदा अगिला दिनसँ बाबीक भोजन सभक संगे होबए लगलन्हि | जादूक छड़ी चुनाब प्रचारक सभा | जनसमूहक भीर उमरल | नेताजी अपन दुनू हाथकेँ भँजैत माइकमे चिकैर-चिकैर कए भाषण दैत, “आदरणीय भाइ-बहिन आ समस्त काका काकीकेँ प्रणाम, एहि बेर पुनः अपन धरतीक एहि (अपन छाती दिस इशारा कए) लालकेँ भोट दए कऽ जीता दिअ फेर देखू चमत्कार | कोना नै सभक घरमे दुनू साँझ चूल्हा जरऽत | कोना कियो अस्पताल आ डॉक्टरक अभाबमे मरत | हमर दाबा अछि आबै बला पाँच बर्खमे एहि परोपट्टाक गली गलीमे पक्का पीच होएत | युवाकेँ रोजगार भेटत | बुढ़, बिधवा आर्थिक रूपसँ कमजोर वर्गक लोककेँ राजक तरफसँ पेंशन भेटत | भुखमरीक नामो निशान नहि रहत | बस ! एक बेर अपन एहि सेबककेँ जीता दिअ |” थोपरीक गरगराहटसँ पंडाल हिलए लागल | नेताजी जिन्दाबादक नारासँ एक किलोमीटर दूर धरि हल्ला होबए लागल |भीरमे सँ निकलि एकटा बुढ़ मंचपर आबि, “एहि सभामे उपस्थित सभ गण्यमान आ आदरणीय, नेताजी एकदम ठीक कहैत छथि |” ततबामे नेताजीक चाटुकार सभ, “वाह–वाह, बाबा केर स्वागत करू |” पाछूसँ दू तीनटा कार्यकर्ता आबि बाबाकेँ मालासँ तोपि देलकनि | बाबा अपन गरदैनसँ माला निकालि कए, “नेताजी एकदम ठीक कहैत छथि | एतेक रास असमान्य कार्य हिनकर अलाबा दोसर कियो कैए नहि सकैत अछि | जे काज ६६ बर्खमे नहि भेल ओ मात्र पाँच बर्खमे भए जाएत किएक की ओ जदुक छड़ी मात्र हिनके लग छनि जे एखने एहि सभामे अबैसँ पहिले भेतलन्हिए |” विहनि कथा - नेनाक सनेस “साँझकेँ छह बाजि गेलहि एखन धरि बौआ नहि आएल | भगवानपुर बालीक सेहो अता पता नहि | जा कए भगवानपुर बालीक अँगना देखै छी कि भेलहि |” ई द्वंद अछि एक गोट माएक मनक जीनक दस बरखक नेना दिनक एगारह बजे अपन काकी भगवानपुर बालीक संगे काली पूजाक मेला देखै लेल गेल छल मुदा साँझ परि गेला बादो एखन धरि नहि आएल छल | नेनाकेँ अपनासँ दूर केखनो छोरैक लेल ओ तैयार नहि मुदा नेनाक मेला देखैक लौलसाकेँ देखि ओकरा नहि रोकि पएलिह | जँ अपने जाइतथि तँ बोनिक हर्जाना आ ओहिपर सँ बेसी खर्चाक डर सेहो, कोनो ना पच्चीस रुपैयाक इन्तजाम कए नेनाकेँ काकी संगे पठा देने रहथि | की भेलै किएक देरी भेलहि एहि उधेरबुनमे रहथि की भगवानपुर बालीक शव्द हुनका कानमे कतौसँ परलनि | देखलनि तँ भगवानपुर बालीक आ हुनक नेनाक संगे संग गामक आओर लोकसभ हँसैत बजैत हाथमे माथपर झोड़ा मोटरी नेने आबैत | माए झटसँ आगू बढ़ि अपन नेना लग जा ओकर दाढ़ी छुबि, “ऐना मुँह किएक सुखएल छौ, किछु खेलएँ पीलएँ नहि? पाइ हएरा गेलौ की ?” मुदा नेना चूपचाप ठार | भगवानपुर बाली, “हे बहिन तोहर ई नेना, नेना नै बूढ़बा छौ |” माए, “किएक की भेलै |” भगवानपुर बाली, “सगरो मेला घूमक बादो किएक एक्को पाइ खर्च करत, नै खिलौना, नै मिठाइ, नै कोनो खाए पीबक चीज, भरि मेला पाइकेँ मुठ्ठीमे दबने चूपचाप सभ वस्तुकेँ देखैत रहेए |” माए, “किएक बौआ, किछु खेलएँ पीलएँ किए नै |” नेना चूपचाप अपन हाथ पाछू केने ठार | माएकेँ चूप भेला बाद अपन हाथकेँ पाछुसँ आगू अनि, हाथमे राखल डिब्बा माएकेँ दैत, “ई” माए डिब्बाकेँ देख कए, “ई चप्पल, केकरा लेल ?” नेना, “तोहर लेल, तुँ खाली पेएरे चलैत छलेँ ने |” माए झट नेनाकेँ अपन करेजसँ लगा सिनेह करैत, “हमर सोन सन नेना, भरि दिन भूखे पियासे अपन सभटा सऽखकेँ मारि कए हमर चिन्ता कएलक, हमरो औरदा लए कऽ जीबए हमर लाल|” विहनि कथा - बाबाक हाथी दिल्लीक कनाट प्लेशक प्रशिद्ध कॉफी हॉउसक आँगन | लूकझिक साँझ मुदा महानगरीय बिजलीक दूधसन इजोतसँ कॉफी हॉउसक आँगन चकमकाइत | एकटा गोल टेबुलक चारू कात रखल चारिटा कुर्सीमे सँ तीनटापर ‘अ’, ‘ब’ आ ‘स’ बैसल गप्प करैत संगे कॉफीक चुस्कीक आनन्द सेहो लैत | ‘अ’ आ ‘ब’केँ बिचक बात-चितमे गरमाहट आबि गेलै | ‘अ’, “रहए दियौ अहाँक बूते नहि होएत |” ‘ब’, “हाँ ई की कहलीयै हमरा बूते नहि  होएत, अहाँ बुझिते कि छियै हमरा बारेमे |” ‘अ’, “हम अहाँक बारेमे बेसी नहि बुझै छी परञ्च ई नै .......” ‘ब’, “हे आगु जुनि किछु बाजु, अहाँकेँ नहि बुझल जे अहाँक सोंझा के बैसल अछि ? हमर बाबाकेँ नअटा बखाड़ी रहनि, दलानपर सदिखन एकटा हाथी बान्हल रहैत छलनि | हमर परबाबाकेँ चालीस गामक मौजे छलनि | हमर मामा एखनो बिहारक राजदरवारमे तैनात छथि | हम स्वम एहिठाम योगाक क्लास रास्त्रपतिकेँ दै छीयनि |” ‘अ’ आ ‘ब’क गप्प बहुते देरीसँ चुपचाप सुनैत ‘स’ अपन कॉफीक घूंट खत्म कएला बाद खाली कपकेँ टेबुलपर रखैत, “यौ हम आब चली, अहाँक दुनूकेँ हाइक्लासक गप्प हमरा नहि पचि रहल अछि, हम तँ बस एतबे बुझै छी जे हमर अहाँक बाबू-बाबा आ स्वयं हमरा सभमे एतेक बूता होइत तँ हम सभ एना दिल्लीमे १५-२० हजारक नोकरी कए क’ आ भराक मकानमे जीवन बिता क’ अपन-अपन जिनगीकेँ नरकमय नहि बनाबितहुँ | ओनाहितो आजुक समयमे हाथी भिखमंगा रखै छैक आ दोसर राजमे पेट ओ पोसैत अछि जेकरा अपन घरमे पेट नहि भरि रहल छैक |” ‘स’केँ एकटुक तित मुदा सत्य गप्प सुनि दुनूक मुँह चूप | ‘स’ सेहो ई गप्प बजैत हिलैत डुलैत निसाक सरूरमे ओतएसँ बिदा भए गेल | मुदा ओकर बगलक टेबुलपर बैसल हमरा ‘स’क गप्प सए टका सत्य लागल | विहनि कथा - जुग-जुग जीबए...

“एखन ओ कतए अछि, कोना अछि, की करैत अछि, हमरा किछु पता नै, बस एतबेए बुझल अछि जे आइ ओकर जन्म दिन छैक |” पचपन बर्खक, उज्जर सारीमे लपटल बूढ़ बिधबा माएक दिमागक ई गप्प | एककेँ बाद एक खोल हुनक इआदक केथरीसँ निकैल-निकैल कए इन्द्रधनुषी आकाशमे हिलकोर मारि रहल छल | बैसल, हुनक सामने माटिक एकचूल्हीयापर चढ़ल भातक हाँड़ीसँ बरकैकेँ खड़-खड़-खड़केँ अबाज आबि रहल छल | भात जड़ि कए कोयला भऽ गेल रहति जँ चेराक आँच अपने जड़ैत-जड़ैत चूल्हासँ निकैल कए बाहर नहि जड़ए लगितै | “पन्द्रह बर्ख पहिने कहि गेल दिल्ली जाइ छी, खूब पाइ कमाएब | नीक घर बनाएब | तोरा नीक नीक सारी कीन कऽ आनि देबौ | बाबूक लेल सुन्नर साईकिल कीनब | मुदा ! सभ बिसैर गेल | शुरू-शुरूमे दू-तिन मासपर चिठ्ठीयो आबेए, छह महिना बरखपर किछु पाइयो आबेए मुदा बादमे सभ बन्द | कोनो खोज खबरे नै | ओकर गेलाक छह बरखक बाद बलचनमा मुँहे सुनलहुँ जे ओ दिल्ली बाली मेमसँ बियाह कए लेलक | आर कोनो समाद नाहि | बापोकेँ मुइला आइ पाँच बरख भऽ गेलन्हि, ओइहोमे नहि आएल | ओकरा तँ बापक दिया बुझलो हेतै की नै---- | आइ ओकर जन्म दिन छैक, लऽगमे रहैत तँ बड्ड रास आशीर्वाद दैतियैक मुदा दुरे बड्ड अछि | जतए अछि खुश रहेए.... जुग-जुग जीवेए... हमर लाल |”   

       विहनि कथा- समय चक्र 

किशुनक विशाल ड्राइंग रूम । तीन बीएचके फ्लेटमे आलीशान २५० वर्गफूटक हॉल नूमा ड्राइंग रूम ओहिमे ४८ इंचक सोनीक एलसीडी  टीवी लागल । डीस टीवी, म्यूजिक प्लेयर, फर्सपर जड़ीदार लाल रंगक विदेशी  क़ालीन । दवाल सभपर मनभावन मधुबनी पेंटिंग घरक सोभामे चारि चान लगाबैत । मोट- मोट गद्दाक बनल मखमली सोफा सेट, ओहिपर किशुनक मामा-मामी ओकर वेसबरीसँ बाट जोहैत, जे कखन ओ आएत आ ओकरासँ दूटा गप्प कए अपन समस्याक समाधन करी । हुनक दुनू प्राणीक  दू घंटाक प्रतीक्षा बाद किशुन, बोगला सन उज्जर चमचमाइत  बरका कारसँ आएल । घरक डोरवेल बजेलक घर खुजल । भीतर प्रवेश कएलक । भीतर पएर धरैत देरी ओकर नजैर अपन मामा- मामीपर परलैक । तुरन्त आगू बढ़ि हुनकर दुनू पएर छुबि आशीर्वाद लेलक । हाल समाचार पुछैत अपनो एकटा सोफापर बैसैत - "कएखन एलीऐ" । मामी - "इहे करीब दू घंटा भएले" । किशुन अप्पन कनियाँकेँ आवाज़ दैत - "यै, सुनैछीयै ! किछु चाह पानि नास्ता देलियैन्हेकी" । मामा - "ओसभ भए गेलै, बस अहाँसँ किछु जरूरी गप्प करैक  छल"। किशुन - "हाँ हाँ कहु ने, हमर सोभाग्य जे अपनेक किछु सेबाक मोंका भेटत" । मामा कनखीसँ इसारा कए मामीक दिस देखलाह, आ ओकर बाद मामी - " बौआ ! अहाँ तँ सभटा बुझिते छियै जे मामाक नोकरीक आइ- काल्हि की दशा छनि । कएखनो छनि तँ कएखनो नहि । रहलो उत्तर ई सात- आठ हजार रुपैया महिनाक नोकरीसँ की है छैक ...... (कनी काल चूप, आगू  सोचैत ) अहाँकेँ तँ बुझले अछि, बरुण आइ आइ टीक प्रवेश परीक्षा पास कए लेलक । आब ओकर एडमिशनकेँ आ किताब आदी लेल दू लाख रुपैया चाहीऐ । हिनका अपना लग तँ एको रुपैया नहि छनि, आ अहाँ तँ बुझिते छियै दियाद बाद कएकराकेँ दै छैक । बहुत आशा लए कए अहाँ लग एलहुँहेँ , अहाँ किछु रुपैयाक व्यवस्था कए देबै तँ छौड़ाक जिनगी बनि जेतै"।   सभ चूप्प । पिन ड्राप सैलेन्श । किशुन अपन आँखिसँ चश्मा निकालि दुनू आँखिक कोन कए सभसँ नूका कए पोछ्लक । कियो ओकर आँखिक कोनसँ खसैत नोरकेँ नहि देखने हेतै मुदा ओकर दुनू आँखिक कोनसँ नोरक दू दू टा मोती सरैक कए ओकर रुमालमे हड़ा गेलै । पुनः अपन चश्मा पहिरलक आ अपन आँखिक नोरक पाँछाँ करैत बीस बर्ख पाछू चलि गेल । जखन किशुनक माए बाबू आ मामा मामी एके झोपड़पट्टीक एके गलीमे रहैत छला । एक दिन ! महिनाक अन्त तक ओकर बाबूक हाथ खाली भए जेबाक कारण घरमे अन्नक अभाबे ओ अपन माएकेँ कहलापर एहि मामीसँ जा कहने रहनि दू सेर चौर देबएक लेल । मामी चौर तँ देलखिन मुदा ओहिसँ पहिने ठोर चिब्बैत कहने रहथिन - " की बाप पाइ नहि दए क गेलाह, एहिठाम कोन बखाड़ी लागल छैक "। ओ गप्प किशन आइ तक नहि बिसरल । आ ओकर आँखिक नोरक कारण इहे गप्प छल । ओहि  गप्पक कारणे आइ ओ झोपरपट्टीसँ निकैल एकटा नव दुनियाँमे पएर रखलक । पुनः अपनाकेँ वर्तमानमे आनैत किशन चट्टे अपन कोटक जेबीसँ चैक बुक निकालि, ओहिपर दू लाख रुपैया भरि मामाक दिस बढ़ेलक । मामा चैक लैत - "बौआ अहाँक ई उपकार हम कहियो नहि बिसरब, एखन तँ नहि चारि वर्खक बाद वरुणक नोकरी लगलापर सभसँ पहिने अहींक पाइ वापस करत" । किशन - "की मामा अहुँ लज्जित करै छी ई सभ कएकर छैक, की वरुण हमर भाइ नहि अछि । ई हमरा दिससँ एकटा छोट भेंट अछि । एकर चिंता अहाँ नहि करब । विहनि कथा- आस्था डोकहर राजराजेश्वर गौरी शंकरक प्राचीन आ प्रशिद्ध मंदिर | मंदिरक मुख्यद्वारकेँ आगू एकगोट अस्सी-पच्चासी बरखक वृद्धा, सोन सन उज्जर केश, शरीरक नामपर हड्डीक ढांचा, डाँर झुकि गेल | मुख्यद्वारक आँगाक धरतीकेँ बाहरनिसँ पएर तक झुकि कए बहारैत | ‘अ’ आ ‘ब’ दुनू परम मित्र, एक दोसरक गुण दोषसँ परिचीत, दुनू संगे मंदिरक आँगासँ कतौसँ कतौ जा रहल छलथि | मंदिरक सोंझाँ अबिते देरी ‘अ’ दुनू हाथ जोड़ि प्रणाम कएलनि | ‘ब’ सेहो तुरंते दुनू हाथ जोड़ि, झुकि कए मोने-मोन स्तुति करैत ओतुका धरतीकेँ छुबि माँथसँ लगा ओहि ठामसँ आगू बिदा भेला | ओतएसँ दस डेग आगू गेलाक बाद ‘ब’, ‘अ’सँ – “हे यौ अहाँ कहियासँ एतेक आस्तिक भऽ गेलहुँ, जे मंदिरक सामने जाइत मातर कल जोड़ि लेलहुँ ओहो हमरासँ पहिले |” आगू आरो चुटकी लैत – “भगवानो देख कए हँसैत हेता जे देखू ई महापातकी आइ आस्तिक भऽ गेल |” ‘अ’ शांतिकेँ तोरैत – “पहिले तँ ई अहाँकेँ के कहि देलक जे हम नास्तिक छी, हमहूँ आस्तिक छी, हमहूँ देवता पितरकेँ मानैत छी परञ्च अहाँक जकाँ पाखण्डी नै छी |  अंतर एतवे अछि जे अहाँ मंदिर मंदिर भगवानकेँ तकैत रहै छी, हम हुनका अपन मोनमे तकैत छी आ अपन करेजामे बसेने छी | आ रहल एखनका गप जे हम मंदिरकेँ सामने हाथ जोड़लहुँ, ओ तँ हम सदिखन अपन मोनमे बसेने हुनका हाथ जोड़ैत रहैत छी मुदा एखुनका हाथ जोड़ब हमर भगवानकेँ नहि, भगवानक ओहि भक्तकेँ छल, ओहि बृद्धाकेँ जिनक बएसकेँ कारने डाँर झुकि गेल रहनि मुदा एतेक अवस्थोमे भगवानक प्रति एतेक अपार श्रधा भक्ति, कतेक प्रेमसँ मंदिरक मुख्यद्वार बहारि रहल छली | हम ओहि भक्तक भक्तिकेँ, हुनक भगवानक प्रति आस्थाकेँ, हुनक बएसकेँ नमन केने रही |” विहनि कथा- तरेगन इजोरिया राति, चन्द्रमाक दूध सन इजोतसँ राइतो दिन जँका बुझाइत | माँझ आँगनमे पटीयापर, अपन बाबीक पाँजरमे सुतलसँ जागि कए तीन बरखक नेना एकटक मेघक तरेगन दिस टकटकी लगोने ताकैत | आँखिक पपनी एकदम स्थीर, उपरकेँ उपर आ निँचाकेँ निँचा, जेना की कोनो हराएल प्रिय वस्तुकेँ ताकि रहल हुए | किछु घड़ीबाद नेनाक बाबीक निन टूटल तँ नेनाकेँ बैसल देख ओहो हरबड़ा कए उठैत, “की बौआ किएक बैसल छ, आ ई मेघमे की देखै छ |” नेना धनसन बाबीक बोल ओकर कान तक तँ जाइ मुदा दिमाग तक नहि जाइ | ओ तरेगन दिस एतेक तन्मयतासँ देखेए जे ध्यान उम्हरे एकाग्र | नेनाक बाबी दुनू हाथसँ नेनाकेँ हिलाबैत, “बौआ की भेल, की देखै छी |” “तरेगन गनैछी |” “किएक |” “काइल्ह सरजू कहलक जे मुइलाबाद लोक तरेगन बनि जाइ छै तैँ हम तरेगन गानि कए देखै छी जे कोन कोन तरेगन बेसी अछि ओहिमे सँ अवस्य एकटा हमर माए हेती |” बाबी, नेनाकेँ दुनू हाथसँ अपन पाँजमे भरैत, “हमर नेना कतेक बुधियार भऽ गेलै, केकरो नजरि नै लगेए | अहाँक माए कोनो आजी गुजी थोरे रहथि जे ओ आजी गुजी तरेगन बनति, ओ देखू ओ—ओ सभसँ बेसी चमचमाइत तरेगन, ओ अहींक माए छथि |" गारेन्टी सुजीतजी मोटर साइकिल ड्राइव करैत पाँछा प्रशांत जीकेँ बैसोने | मिशर जीक दलानपर रुक्ला | आँगा-आँगा सुजीतजी हुनक पाछू प्रशांतजी, मिशरजी लग जा सुमितजी, “नमस्कार मिशरजी, हम कहने रही ने आयुर्वेदसँ समंधित, माँजीक गठियाक दवाइ | हिनकासँ मिलु ई प्रशांतजी, हमर सीनियर छथि | अपनेक सभ गप्पक उचीत उत्तर देता | ”मिशरजी, “नमस्कार- नमस्कार (कुर्सी दिस इशारा कए) बैसल जाउ|” तीनु गोटा कुर्सी ग्रहण कएला, तदुपरांत मिशरजी, “हाँ कहियौ |” प्रशांतजी, “हम एकगोट आयुर्वेदिक कम्पनीसँ जुड़ल छी आ हमरा सभ लग किछु असाध्य रोग जेना मधुमेह, गठिया, बी०पी०, हार्ड प्रोब्लेम आदिक सफल उपचार अछि | सुजीत भाइसँ ज्ञात भेल अपनेक माए गठिया---“ मिशरजी, प्रशांत जीक गप्प बिच्चेमे रोकैत, “हाँ, से सभ ठीके पहिले कहु गारेन्टी छैक |” प्रशांतजी, “गारेन्टी ! गारेन्टी कोना कहु मुदा ठीक होबाक सए टका विस्वास छैक |” मिशरजी, “हाँ इहे, जखन गारेन्टीए नहि तखन हम अपनेक गप्प कोना मानव |” प्रशांतजी, “सुनू-सुनू, हमर सभक पद्धति सुनला वाद अहाँ अपनो बुझबै आ मानबै जे गठियाक उपचार संभव छैक |” मिशरजी, “कोना मानू, अपने गारेन्टी देबै तहन ने मानब | आइ बिस बरखसँ कोनो डॉक्टर कोनो अस्पतालसँ ठीक नहि भेलै, अहुँ गारेन्टी नहि लए रहल छी आ अहीँ की दुनियाँक कोनो डॉक्टर गारेन्टी नहि लएत तखन कोना मानू |” प्रशांतजी, “देखू ई गप्प ठीके अछि जे दुनियाँक कोनो डॉक्टर गारेन्टी नहि लेत किएक तँ दुनियाँक कोनो डॉक्टर लग एकर इलाह नहि छैक | गठिया की भेलै ?....  अपन ठेहुनक दुनू हड्डीकेँ जोड़क बीचमे एकटा माँसुक टुकड़ा होएय छैक जेकरा कार्टिलेज कहल जाइ छैक आ ओहि कार्टिलेजकेँ ठीक आ तन्दुरुस्त राखैक लेल, हम जे भोजन खाए छी ओहि भोजनसँ एकटा ग्रीस जकाँ चिपचिपा पदार्थ निकलै छैक जेकरा साइनोवियस फ्लूड कहल जाइ छैक | भोजनमे पोष्टिक तत्वक कमी, प्रदुषण, बएसकेँ बेसी भेलासँ, आन आन कतेको कारणे अपन देहमे साइनोवियस फ्लूड बननाइ बन भए जाइ छै | जखने साइनोवियस फ्लूड अर्थात चिपचिपा पदार्थ ग्रीस खत्म भेल तखने दुनू हड्डीक बिचमे दबा पिचा कए मासुक टुकड़ा अर्थात कार्टिलेज कइट जाइ छैक | दुनू हड्डीक बिचमे गएप भए जाइ छैक आ दुनू हड्डीमे हड्डी घसेलासँ असहाय दर्द होइत छैक | कतेक गोटेकेँ तँ चलला उत्तर हड्डीमे हड्डी घसेलासँ आवाज सेहो होइत छै | आब देखियौ एहिठाम डॉक्टर कहैत अछि जे साइनोवियस फ्लूड अर्थात चिपचिपा पधार्थ ग्रीस बननाइ बंद तँ बंद एकर कोनो इलाज नहि, बेसीसँ बेसी जीवन भरि दर्द निवारक गोटी खाए कए दर्दसँ बँचि सकै छी | बेसी दर्द निवारक दवाई खेलासँ हार्ड आ किडनीपर से खराबअसर | आब देखियौ, हमरा सभ लग अछि समुद्री जड़ी बूटीसँ निर्मित -------, आ जिनक शरीरमे एक्को आना साइनोवियस फ्लूड बचल अछि एकर नियमित सेवन कएला बाद हुनक शरीरमे ई साइनोवियस फ्लूड बनेनाइ शुरू करत आ जखने साइनोवियस फ्लूड बननाइ शुरू होएत, मासुक टुकड़ा अर्थात कार्टिलेज पुनः मरम्मत भेनाइ आरम्भ भए जाएत | शरीरमे वर्तमान साइनोवियस फ्लूडकेँ उपस्थित मात्राक हिसाबे ६ महिनासँ एक सबा बरखक अधिकतम सेवन कएला बाद कोनो व्यक्ति अपन पएरपर चलएटा नहि दौड़ए लगता |” एतेक बड़का गठियापर व्याख्यान सुनि मिशरजी चुप्प, चुप्पी तोरैत, “हूँ ! सभ ठीक मुदा गारेन्टी....” प्रशांतजी, “अच्छा लिअ हम अहाँक माए केर ठीक होबैक गारेन्टी लै छी, अहाँक माए हमर माए | अहाँ एक सबा बरख हमर दवाइ दियौन, ठीक नहि भेली तँ पाइ वापिस |” आब तँ मिशरजीक बोल बन, जेबीसँ मोबाईल निकाइल बामे हाथे कएकटा न० लगेला बाद, “यौ सभ ठीक, आब तँ अहाँ गारेन्टीयो लए लेलहुँ मुदा एखन हमर छोटका भाइ फोन नहि उठा रहल अछि बादमे ओकरासँ गप्प कएला बाद हम कहब किएक तँ गप्प एक दू महिनाक नहि छै एक सबा बरखक छै |” एतवामे दलानक कोन्टासँ मिशरजीकेँ कनियाँक चूड़ीकेँ खनखनाइक आवाज एलन्हि | मिशरजी घुमि कए देखला उत्तर प्रशांतजीसँ, “ कनीक अबै छी |” कहैत उठि कनियाँ दिस चलि गेला | मिशर जीसँ हुनक कनियाँ, “हम सभटा सुनलहुँ, ई तँ ठीके अचूक इलाज छै आ अहाँ बुझिते छीऐ जे हमरो माए गठियासँ परेसान छै | अहाँ अपन माए लेल ली की नै हमरा नै बुझल मुदा काइल्ह चिन्टू गाम जा रहल छै, ६ महिनाक दवाइ लए कऽ चिन्टू दिया हमरा माए लेल पठा दियौ बांकी ६ महिना बाद फेरो कियो गाम जेबे करतै तखन |” कनियाँक गप्प सुनि मिशरजी वापस आबि कुर्सीपर बैसैत, “ठीक सर, आब अपने एतेक कहैत छी तँ ६ महिनाक दवाइ हमरा दए दिअ |” प्रशांतजी, “ठीक छैक परशु सुजीतजी अहाँकेँ दए देता |” मिशरजी, “परशु नहि हमरा काइल्ह भोरे चाही किएक तँ ई हमर माए लेल नहि हमर सासु लेल छन्हि आ काइल्ह भोरे १० बजे हमर सार चिन्टू गाम जा रहल छथि | तेँ तँ एक्के बेर ६ महीनाक दवाइ मंगा रहल छी |” प्रशांतजी, “कोनो बात नै काइल्ह भोरे ९ बजे तक मिल जाएत | सुजीत जीकेँ पाइ दए दियौन्ह मुदा हाँ  गएरेन्टी नहि भेटत |” मिशरजी, “किएक |” प्रशांतजी, “ई गारेन्टी अहाँक माए लेल छल, किएक तँ अहाँक माए हमर माए दोसर ओ हमर आँखिक सोझाँ छथि हुनका हम देखो सकै छीएन्हि, ठीक भेली की नहि मुदा अहाँक सासु... “ मिशर जी, जेबीसँ पाइ निकालि कए दैत, “यौ प्रशांतजी अहुँ की गप्प करै छी अहाँ देलहुँ हमरा बिस्वाश भऽ गेल ई पाइ राखू मुदा हाँ भोरे ९ बजे धरि दबाइ भेट जेबा चाही नहि तँ अपने बुझिते छियै कनियाँ सार सासु |” प्रशांतजी, “हाँ अवस्य, (उठैत) अच्छा आब आज्ञा दिअ |” दुनू गोटे बिदा भेला | मोटर साईकिलपर बैसला बाद बैसले- बैसल सुजीतजी, “प्रशांत भाइ देखलियैन्ह, माए लेल गारेन्टी चाही भाइ सभक सहमति चाही आ सासु नामे चट्टे ६ महिनाक पाइ निकैल गेलन्हि |” राम भरोस कापडि भ्रमर, सदस्यः नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान,काठमाण्डू यात्रा प्रसंग- रायपुरक मिथिला महोत्सबः उत्साहक बाढि आ मनीष झा

हम दू मास पूर्व इन्टरनेटपर रायपुर (छतिसगढ़, भारत)क मैथिली प्रवाहिका (मासिक पत्रिका)क आयोजनमे होबयबला अखिल भारतीय मिथिला महोत्सवक सूचना पढने रही । हिन्दीमे । किछु अनसोहाँत लागल रहय । किछु गोटे अपन प्रतिक्रियामे ई बात लिखबो कएने रहथि । जे से हम एकरा बिसरि गेल रही । मुदा एक दिन जखन दरभंगासँ गप्प करैत काल भाई चन्द्रेशक हडबडी शैलीमे ई सूचना भेटल जे हमरा रायपुर जएबाक अछि आ ओत्तय ओसभ हमरा सम्मानित करता तऽ जिज्ञाशा बढल । चिट्ठीक खोजबिन कएल । चिट्ठी राजविराज चल गेल बताओल गेल । जे सत्य नहि छल । तखन हम जिज्ञाशा कएल तऽ ओम्हरसँ एकटा हडबडाएल सन अध खिच्चडि भाषा मैथिली आ हिन्दीमे एकटा स्वर सुनि पडल –‘हम पठा देने छी, नहि भेटल अछि तऽ तुरन्त पठा रहलल छी ।’ कहबाक जरुरति नहि ई श्वर महोत्सवक संयोजक मनीष कुमार झाक रहनि , मैथिली प्रवाहिकाक सम्पादक । स्वरसं किछु बेशी व्यस्त, धडफडाएल आ उत्साही लोक लागल छलाह । एहिसं बेसी हमरा किछु जानल बुझल नहि छल । हम जाएब तएँ पटनामे जमायकेँ कहि दू गोट थर्ड एसीक टिकट बनबा लेने रही । अन्ततः पत्र हमरा मेलमे आएल आ हम सभ औपचारिकता पूरा कऽ रायपुर गेलहुँ । रायपुरमे होइत कार्यक्रम हमर जिज्ञाशा केन्द्रमे तऽ रहबे करे , एहि प्रवासमे जाहि उत्साहसँ एतेक भव्य आ पैघ कार्यक्रम करबाक साहस कएनिहार ई मनिष जी के छथि , ई हमर सभसँ बेसी जिज्ञाशाक विषय रहय । चौबीस घण्टाक रेल यात्रामे भागलपुरक डा. केष्कर ठाकुर जीक सानिध्यमे किछु बात बुझबो कएने रही जकरा आओर फरिछौलनि भाई योगानन्द झा जी । ई लोकनि रायपुर घुरि आएल रहथि वा मनिषसँ सम्पर्कमे रहथि । ओना तऽ डा. बुचरु बाबु सेहो मनीषक मनुसत्वक दर्शन कऽ चुकल रहथि आ ओहो हमर आगमनक समाद निरन्तर मनीष जी लग प्रवाहित करैत छलाह । जे से फागनु ११ गते (फरवरी २२ तारिख कऽ) ८ बजे राति कऽ जखन रायपुर रेलवे स्टेशनपर उतरलहुँ आ आन सहयात्री मित्र सभक प्रतिक्षा करैत छलहुँ तऽ डा. केष्कर ठाकुर जी हमरा दिश संकेत करैत एकटा पुष्ट देहयष्टिक छोटेकाँट–छाँटक व्यक्तिकेँ देखौलकनि–इएह छथि कापडि जी ! हम पलटलहुँ, आँखि मिलल , ओ व्यक्ति हाथमे राखल बडका बुकी( गुलदस्ता) हमरा दैत लगभग पैरपर झुकैत प्रमाण कएलक । डा. ठाकुरकेँ हुनक परिचय देबासँ पहिने हम बुझि गेलहुँ , ई हो न हो, मनीषेजी हएताह । बातो सएह रहैक । मनीष जी अपन दुलकी चालिमे अगिला डिब्बा दिस बढलाह आ एकटा छोटछिन गुलदस्ता एकटा महिलाकेँ धरबैत हमरा सभ लग आनि परिचय करौलनि । ओ जमशेदपुरसँ आएल रहथि । तखन हमरा सभकेँ स्टेसनसँ बाहर लऽ गेलाह आ सभकेँ गाडीसँ होटल पहुँचाओल गेल । हमराले छतिसगढ प्रशासनक न्यू सर्किट हाँउसमे आवासक व्यवस्था कएल गेल रहय । बीस पचिस मिनट पैदल आ १० मिनेट गाडीसँ जएबाक ठाममे । ई हमरा लेल दोसर सम्मान छल । एक मन भेल संगीसभक संग होटलमे बैसी, मुदा मनीष जीक आग्रह जे राज्य सरकारसँ हमरा लेल छुटिआयोल गेल आवासमे जाएब जरुरी । हमर खानपीनक व्यवस्था सभ ओतहि छल । मुदा हमर ई शर्त रहए , हम दिन भरि खानपीनक संग संगीसभक संग होटेलेमे बिताएब । सुविधा इहो जे ओतहि खानपीन आ कार्यक्रम स्थल सेहो । हम सर्किट हाउसमे गेला पर देखलहुँ –पाँच सितारा होटलक सभ सुविधा ओतय रहैक । मनीष जीक इन्तजाम पर हम फेर मुग्ध भेलहुँ । चारि दिन चारि राति हम ओत्तय बितौलहुँ । एकोरति आन ठामक आभास नहि भेल । कार्यक्रमसँ आयोजन धरि मनीष जी मात्र मनीष जी । एकटा बात खटकल–( ई एसगरिए किए कऽ रहल छथि । फेर भेल अपने दिल से जानीए पराए दिलका हाल , काज करैत काल एहिना काज कर पडैत छैक । मुदा से सभ क्षेत्रमे एहि तरहे दृष्टि दौडबैत हिनक सामथ्र्यपर हमरो मन हारि मानि लैत अछि । सभक ख्याल, सभक चिन्ता । वाह मनीष जी । हमरा लेल तेसर सम्मानकेँ अवसर तखन आएल जखन १२ गते कऽ अर्थात २३ तारिख कऽ भिन्सर ११ः३० बजे उदघाटन सत्र प्रारम्भ भेल । रायपुर क्षेत्रक संगहि मध्य प्रदेश, विहार, झारखण्डसँ एक सँ एक विद्वान, भाषा सेवी, मैथिल सभक वृहत उपस्थितिमे जखन कार्यक्रम शुरु भेल तऽ मंच संचालक डा. अशोक अबिचल हमरा अध्यक्षता करबाक लेल बजौलनि । मंचपर विहार सरकारक पूर्व संयुक्त सचिव डा. विद्यानन्द झा, विहार सरकारक बाल संरक्षण आयोगक अध्यक्ष श्रीमती निशा झा, मैथिली हिन्दी सुप्रसिद्ध गीतकार डा. बुद्धिनाथ मिश्र, टाटा मोटरक पूर्व वरिष्ठ सहायक मैनेजर , सेवानिवृत प्रो. चन्द्रशेखर खान , अन्तर्राष्टिूय मैथिली परिषद, उत्तर प्रदेशक प्रान्तिय अध्यक्ष पं. जगदिश चन्द्र शर्मा , मिश्र इस्पात प्रालिक अध्यक्ष राजेश्वर मिश्र,छत्तीसगढ पर्जटन मंडलके अध्यक्ष कृष्ण कुमार राय,विख्यात शिक्षा शास्त्री व इतिहासविद् डा.कृष्ण कुमार झा,ईन्दिरा गांधी राष्टीय कला केन्द्र नई दिल्लीके साउथ–ईस्ट एशिया हेड डा. वच्चन कुमार,बख्शी सृजन पीठ छत्तीसगढके अध्यक्ष डा. रमेन्द्रनाथ मिश्र सन सन दिग्गज व्यक्तित्व विराजमान छलाह । हम तखन आओर अचम्भित भऽ गेलहुँ जखन ओहि महत्ता समारोहक उदघाटन करबाक लेल हमरा आग्रह कएल गेल । ई सभ कार्यक्रम पूर्व निर्धारित छल , ई बात एकटा स्थानीय दैनिकमे छपल विज्ञापन देखलाक बाद ज्ञात भेल छल । मनीष लोककेँ बजबऽ मात्र नहि जनैत छथि । ओकर सम्मान करय सेहो जनैत छथि ई बात सभकेँ बुझयमे आबि गेल छलै । दरभंगाक डा. बैजु चौधरी सेहो एहने सन आयोजन करैत छथि मुदा गुणवत्तामे एकर चारियो अना नहि भऽ पबैत अछि । एसकरे ओहो , एसकरे इहो । दूनुमे बहुत अन्तर छैक । राजनीतिसँ बेसी विद्वतजनकेँ सम्मान रायपुरमे होइत देखल गेल यद्यपि मनीष जी सेहो राजनीतिक लोक छथि । छतिसगढक मुख्यमन्त्री डा. रमण सिंह लग पहुँच छनि । इहो कार्यक्रम छत्तिसगढ शासनक संस्कृत मन्त्रालयक सहकार्यमे भऽ रहल छनि । सभ किछु व्यवस्थित–आवास भोजन, आ कार्यक्रम स्थल । हँ कनेक त्रुटि कएलनि कार्यक्रमक रुपरेखा निर्धारित करैत काल समयक ठेकान नहि रखलनि । सम्मान करबाक क्रम निरन्तर जारी रहने निर्धारित कार्यक्रम बाधित होइत रहल । आ पहिल दिनक कार्यक्रम तऽ जेना तेना ठिके रहल । दोसर दिनक कार्यक्रममे बेसी कठिनाई भऽ गेलै । बारह घण्टाक बैसार । विचार गोष्ठी आ कार्यपत्रक बीच सम्मानक कार्यक्रम । डा. बुद्धिनाथ मिश्र खिसिआ गेलाह –एहना स्थितिमे हम नहि आएब । मनीष जी चुपचाप सहैत रहला , निर्मिमेष भावें । उदघाटनक बाद सम्मानक अवसर आएल । आयोजनक दोसर स्तम्भ अशोक चौधरीक हाथें मिथिला विभूति सम्मानसँ हमरा सम्मानित कएल गेल । निरन्तर फोनपर बनल मनीष जी एको क्षण मञ्चपर नहि बसि पौलाह । एम्हर सँ ओम्हर दौडैत । सभकेँ चित्त भरैत । आ से आबहु कालमे ककरो दुखी नहि कएलखिन्ह । आन कार्यक्रमसभ जकाँ अतिथिकेँ विदाई काल हर हर खट खट नहि भेल । सभ प्रसन्न भऽ घुरलाह – मनीष जीक सक्रियता, व्यवस्था आ उदार हृदयक प्रशंसा करैत । हुनक आग्रह जे काठमाण्डूमे हम हुनका अएबाक संयोग जुड़बियनि, हमरा पर भार अछि , देखी कहिया ई अवसर अबैत अछि । रमेश रञ्जन

मैथिली बालनाटक सीमा विस्तार करैत — ‘चौआरि’ प्राध्यापक परमेश्वर कापड़िक चौआरि नाटक सङ्ग्रह उत्कृष्ट पाण्डुलिपीक रुपमे विद्यापति पुरस्कार कोषसँ पुरस्कृत भऽ चुकल अछि । विद्यापति पुरुस्कार कोष वर्ष ०६८क प्रतिस्पर्धामे आएल विभिन्न विधाक पाण्डुलिपीमेसँ चौआरिकेँ पुरस्कृत करबाक निर्णय कएने छल । पुरस्कृत नाट्य सङ्ग्रह प्रकाशित भऽ रहल अछि । ई प्रसन्नताक विषय अछि ।

मैथिलीक यशस्वी प्राध्यापक तथा त्रिभुवन विश्वविधालय मैथिली विभागाध्यक्ष परमेश्वर कापड़िक रचनामे बाल आकर्षण रहलन्हिें । ओ बालमन आ बालपनसँ रचनाक जटिलतम प्रक्रियासँ यात्रा करैत छथि । तें स्वाभाविक आ यथार्थ घटनाक्रम सहितक रचना करबाक हुनका लग दक्षता छन्हि ।

वस्तुतः नेपालक मैथिली साहित्यक अवस्था देखल जाए तँ बाल साहित्यक अवस्था सन्तोषजनक नइ मानल जा सकैए । ताहूमे बाल नाटक लेखन तँ नहिए जकाँ भेलैए । एहनमे निरन्तर बाल नाटक लेखन कऽ कऽ ओ मैथिली साहित्यक दुर्वल पक्षकेँ सवल बनएबाक प्रयत्न कऽ रहल छथि । ताहू दृष्टिए ई कृति महत्वपूर्ण अछि ।

बहुतरास विद्वान कहलन्हिें आ हमहूँ कहैत छी जे कोनो नाटकक पूर्णता रङ्गमञ्चपर गेलाक बादे होइत छै । अर्थात नाटकक कसौटी छै मञ्च । एहि नाटकक मादे हमरा लग जे सूचना अछि ताहि आधारपर ई नाटक रङ्गमञ्चपर अखनिधरि नइ चढ़ल अछि । अर्थात प्रर्दशन पक्षकेँ परिक्षण होएब बाँकी छै । मुदा ई सर्वमान्य सत्य छै जे कोनो नाटकक सिर्जनक बहुआयामिक रुपके आरम्भ लेखन कार्यसँ होइत छै तें अहि नाटकक ताहि रुपमे विवेचना होएबाक चाही ।

जखन बाल नाटकक हमसभ बात करै छी तँ स्वाभाबिक रुपें ई प्रश्न जनमैत छै जे सामान्य रंङ्गमञ्च आ बच्चाक हेतु रंङ्गमञ्चमे की अन्तर छै ? एकर सौन्दर्यक स्तरपर विवेचना करबाक प्रयत्न होइत रहल अछि । मुदा सौन्दर्यात्मक स्तरपर रंङ्गमञ्चकेँ पृथक–पृथक आयुवर्गक लेल पृथक–पृथक रंङ्ग व्याख्या नइ कएल जा सकैए । कलाक दृष्टिए ई विभाजन असंभव छै । बच्चाक हेतु तैयार हुअऽवला प्रर्दशनमे ओहने शोध, कल्पना आ सौन्दर्यक आवश्यकता होइत छै । कोनो प्रकारक सिमीतता वा वाध्यात्मकता बाल रंङ्गमञ्चकेँ कमजोर बनौतै । एहनसन अवस्थामे रंङ्गप्रेक्षककेँ भूमिका महत्वपूर्ण भऽ जाइत छै । बाल दर्शक बिनु आग्रह आ वयस्क दर्शक पर्याप्त पूर्वाग्रहसँग नाटक देखबाक लेल अबैत अछि । कापड़िजीक ई नाटक बच्चाद्वारा मात्र प्रर्दशन होमए जोग नाटक अछि ? अथवा बच्चाद्वारा अभिनित बच्चा दर्शक हेतु ? अथवा सभ उमेर समूहक लेल ओतबे उपयोगी अछि ? निश्चये एहि आधारपर विवेचन अत्यन्त दुरुह छै , मुदा समान्यतः ई कहल जा सकैए जे बच्चाक हेतु नाटक रचना कएनिहारक आत्मा बच्चासन होएब अनिवार्य अछि । ओ लेखक बच्चासँ प्रेम करैत होइक आ बाल प्रतिक्रियाकेँ आदर ।

कोनो लेखककेँ अपन जीवन अनुभव आ अनुभूति लेखनकर्मकेँ दिशा प्रदान करैत छै । जाहि परिवेशमे पलैत–बढैत अछि तकर सौन्दर्य आ कुरुपताकेँ सुक्षम विशलेषण रचनाकेँ सहो अर्थवान बनबैत छै । परमेश्वर कापड़ि मिथिलाक सुच्चा ग्रम्य जीवनक अनुभूतिज्ञ छथि । हुनक अनुभूति मिथिलाक गामक सीमाकेँ अतिक्रमण नइ करैत छै । ओहि चौहद्दीक अन्तर विशिष्टताक सँग ओ रचै–बसै छथि ।

अहि नाटक सङग्रहमे ‘ले बलैया हिलोरि कऽ’ बच्चा सभ घोंघाँउज आ झगडादनसँ नाटक आरम्भ होइत अछि । पढ़ाइ ग्रामिण मिथिलाक कोनो ने कोनो रुपमे सभ वर्गक हेतु अनिवार्य भेल जा रहल छै । मुदा विधालयीय संस्कार आओर पारिवारिक संस्कारक बिचमे एकटा पैघ विषमता छै । जीवनक यथार्थ परिवशकेँ अस्वीकार कऽ कऽ कोनो तरहक औपचारिक शिक्षा पूर्णता दिस नइ जा सकैए । जीवन सुन्दर होइ छै, ओ कखनो अपरोजक आ अभद्र लागि सकै छै मुदा ओकर अन्तर सुन्दरता ओतबे निर्मल आ पवित्र होइ छै । अपना परिवेशगत यथार्थकेँ अस्वीकार कऽ कऽ कोनो विकासक्रम आगू नइ बढलैए । एहने कथावस्तुपर नाट्य सिर्जन कएल गेल अछि । हमरा बुझने नाट्यकार कने बेसिए वाल विधार्थीक हेतु शैक्षिक सामग्रीक प्रयोग कऽ देने छथिन । भाषाक स्तरपर सेहो अत्यन्त अस्वभाविक संवाद छै । मुदा नाटकियता बेजोड़ छै ।

चोआरि नाटक सङ्ग्रहमे नाटक ‘एलौ परिक्षा’ क पात्र, परिवेश आ कथ्य कोनो स्तरपर ग्राम्य सीमाक भंजन नइ करैत छै । मुदा लेखक अपन वौद्घिकता जतऽ–जतऽ प्रयोग करै छथि नाटकक गतिमे अवरोध अबै छै । परीक्षाक समयमे मात्र गम्भिर होएबाक वा परीक्षाकेँ भयावह अतंक जकाँ प्रस्तुत करबाक आम मनोविज्ञानकेँ नाट्य रुप देबाक क्रममे नाटक सम्प्रेषणक आधार संवाद बनैत अछि । कथाक सहज प्रवाहमे आरोपित सन्देश देबाक प्रयत्न सेहो छै । यथार्थवादी शैलीक ई नाटक रोचक छै, मुदा कथा, घटनाक्रम आ कथोपकथनमे विश्वासक संकट सेहो छै । बच्चाक बोलीमे प्रौढ़ताक प्रक्षेपण भेल छै । संवाद पात्रक उमेर आ परिपक्वतासँ बेसी प्रौढ़ भेलाक कारण अस्वाभाविक सेहो बुझाइत छै । जे नाटकक शौष्ठवकेँ क्षति करैत छै । अंग्रजी भाषाक अनावश्यक मोहसँ बचब जरुरी छलै । ग्राम्य भाषाक प्रयोगमे एकरुपता अहि नाटककेँ अओर शक्तिशाली बना सकै छलै ।

अहि सङ्ग्रहक दोसर नाटक छै ‘बोनिपर’ । किछु वर्ष पहिनेक नेपालक मिथिला क्षेत्र अभाव, गरिवी आ प्राकृतिक विपदाक संगम स्थल छल । सामन्तवादी चेतना, राज्य व्यवस्थामे एक जातीय वर्चस्व आ छुआछुत, भेदभावक चरम रुप भयावह छलै । निम्नवर्ग हिनतावोधमे जिबैत छल । ओ वर्ग ने सपना देखै छल आ ने सपनाकेँ सकार होएबाक कोनो आधार छलै । नियतवादी चेतना मिथिलाक श्रमिक वर्गक मूल चरित्र बनि गेल छलै । नाटककार परमेश्वर कापड़ि बोनिपर नाटकक माध्यमसँ ओहि वर्गक अवस्था चित्रण मात्र नइ केलन्हि अछि । आोहि वर्गमे भऽ रहल परिवर्तन संकेतकेँ सेहो चिन्हित केलन्हि अछि । ओकर सपना आ यथार्थकेँ सुन्दर नाट्य रुप । खास कए ओहि वाल पात्रक माध्मसँ मिथिलाक श्रमिक वर्गक आङ्गनक यथार्थ त्रासदीकेँ स्थापित करब निश्चये विलक्षण अछि । अपना आङ्गनक पीड़ासँ परिचित ओ बालचरित्र सामाजिक अवस्था आ परिवर्तनक अपेक्षाकेँ सहज आ प्रवृतिगत अभिव्यक्ति दैत अछि । बच्चामे अनुकरणक बेजोड़ क्षमताक सेहो ई नाटक एकटा वानगी बनि गेल अछि । जाहि विषयकेँ अत्यन्त गम्भिर आ जटील संरचनाक माध्यमसँ नइ कहल जा सकै छलै ओ बातकेँ खेल–खेलमे बच्चा कहि दैत छै । कखनो बुझाइत छै, सामाजिक परिवर्तन, सत्तामे सहभागिता आ स्वयंकेँ भागिदार बनएबाक प्रक्रियाक अते विशिष्ट विचार अहि बालपात्रक माध्यमसँ कहाएब अनुचित तँ नइ छै । मुदा ओ पात्र अपना इर्दगिर्दक सुगबुगाहटकेँ अकानै छै, सामाजिक उथल–पुथलकेँ प्रत्यक्षदर्शी बनै छै आ खेलक माध्यमसँ ओहिकेँ सिर्जनात्मक साँचामे ढालै छै । मने बच्चाक मनोचेतनाक अन्तर यात्रा नइ कएनिहार एहन नाट्य सिर्जना नइ कऽ सकैए । प्राध्यापक परमेश्वर कापड़िक ई कृति हुनक परिवेशगत विशिष्टता आ बालचेतनाक अन्तर अध्येताक सिर्जन प्रतिफल मानल जएतनि ।

तेसर नाटक ‘लील्लामे गील्ला काण्ड’ । मिथिलाक पारम्परिक खेलमे धार्मिक मीथक अद्भूत प्रयोग भेल अछि । राम, सीता वा रावणसन चरित्रकेँ बालमन बुझैत अछि लीलाक माध्यमसँ । लीलामे वर्णित पात्रकेँ अनुकरण करबाक क्रममे नाट्यरुप ग्रहण करैत अछि । आ ओ पात्रसभ समाजक समकालीन चरित्रकेँ स्थापित करैत अछि । समाजिक अवस्थिति, विद्रुपता, आ विडम्वनापर बाल नाटकक माध्यमसँ मारुक प्रहार होइत अछि । विकृतिजन्य विषयकेँ सेहो अत्यन्त सहजताक सँग प्रक्षेपित करैत अछि आ समाज गलत परम्परापर व्यंग्य करैत अछि । धार्मिक मीथक सजीव, सहज आ नव भावभूमिमे व्याख्या भेल अछि अहि नाटकमे । अहि बालनाटकमे स्त्री विमर्शक बात हएब चकित करै छै । अपना आङ्नमे महिला हिंसा अनेको रुप देखैए बच्चासभ । पुरुष आ महिलाप्रतिक सामाजिक आ पारिवारक दृष्टिकोणक ओ प्रत्यक्ष अनुभूति करैए । ओकरा सभमे अक्रमकता आ सहनशीलताक मनोविज्ञान ओहि तरहें निमार्ण होइ छै अथवा विद्रोह सेहो ओएह रुप छै जे सामान्यतः पुरुषवादी समाज निर्धारण कएने छै । करुण आ छटपटी छै जाहिमे संधर्षसँ बेसी निरिहता छै । इएह छै मिथिलाक नारीक अवस्था । ताहूमे निम्नवर्गिय परिवारक नारी तँ आओर ही्रसक पुरुषक सामना करक लेल वाध्य अछि । अहि यथार्थकेँ अत्यन्त सहजताक सँग धार्मिक मीथ आर आम प्रर्दशनक माध्यमकेँ नाट्य अर्थात लीलाक माध्यमे प्रकटीकरण भेल अछि ।

प्रा. परमेश्वर कापड़िक साहित्यकेँ बुझबाक लेल आवश्यक भऽ जाइत छै जे पाठक आ कि दर्शक लोक मर्मज्ञ हुअए । लोक आचार–विचार आ कि संहिता नइ बुझनिहारक हेतु हुनक साहित्य बुझबामे दुरुहता अनुभूति हेतै । मिथिलाक बच्चाक बात करी तँ खेल, गीत, फकड़ा आ कथा–पिहानीसँ सीधा संगति होइत छै । आधुनिक जीवनक सांस्कृतिक प्रदुषणक प्रभाव किछु वर्ष पहिने धरि मिथिलाक निम्न वर्गिय समुदायक आङ्गनमे प्रवेश नइ कएने छलै । एहनमे ओहि आयुमे प्रविष्ट कएल विषय–प्रसंङ्ग सदैवक लेल मनोमष्तिष्कमे सुरक्षित रहि जाइत छै । बालमनकेँ अत्यन्त जिज्ञासु कहल गेलैए । ओ सम्पूर्ण कथापात्रकेँ बुझबाक आ अपनहिं ढंगसँ विशलेषण् करबाक हेतु प्रवृति रहैए । अहि नाटकमे ओहि समयकेँ ओ यथार्थपरक ढंगसँ पकड़लनि अछि । बच्चाक सिर्जन संसारकेँ बुझबाक आ ओहिकेँ गहींरगर अन्वेषण माध्यमसँ नाट्य सिर्जन करबामे ओ सफल भेलाह अछि ।

अहि सङ्ग्रहक चारि गोट नाटकक परिवेश, पात्र, चरित्र, आ कथोपकथन, दृश्यवन्धमे खास नविनता आ विविधता नइ अछि । नाटककार नाटक अन्त करबाक हड़बड़ीमे छथि । विषय क्रम अहिं तरहें अबै छैक जेना एक्के नाटकक चारि टा दृश्य होइक । नाटक संरचनाक स्तथर परम्परासँ पृथक तँ नइ अछि मुदा समाजिक मूल्य आ विघटनक अवस्थाकेँ नव अर्थ जरुर प्रदान करैए ।

कोनो नाटककेँ सम्प्रेषणीयताक हेतु विभिन्न नाट्य तत्वक प्रयोग होइत छैक । मुदा नाटककार कथ्यकेँ नाट्य रुप देबाक क्रममे संवादकेँ आधार बनौलन्हि अछि । बच्चा शरीर क्रियाक माध्यमसँ बहुतरास अभिव्यक्ति देबऽमे सक्षम रहैत अछि । बहुतो खेलमे शरीर भाषाक उन्नत रुप देखल जा सकै छै । अहि नाटकसभमे खेलक मौलिक रुपकेँ भितरमे नाट्य अवस्थितिक निमार्ण आ कथ्यकेँ संयोजित करबाक प्रयत्न होएबाक चाही छलै जे नाटककेँ अओर कलात्मक, प्रभावकारी आ शिल्पगत नविनता दिस लऽ जइतै।

नाटकमे सभसँ बेसी बहश हुअऽवला पक्ष अछि संवाद । संवाद कहबाक नाट्यकारक अपन विशिष्टता छन्हि । अहि परिवेशक ओ मात्र अवलोकनकर्ता नहि भोक्ता छथि । तें भाषाक स्तरपर ई नाटक मैथिलीक सुच्चा नाटक बनल अछि । कोनो बातक ग्रहण करबाक आ प्रक्षेपण करबाक मौलिक रुप आ भाषा छै । प्रशिद्व नाटककार महेन्द्र मलंगिया छोट–छोट संवाद आ शक्तितशाली पात्रोचित भाषा गढ़िकऽ मैथिली नाटककेँ उच्चता प्रदान केलन्हि । ई कहब अनुचित नइ जे हुनक परवर्ती बहुतरास नाटककारपर मलंगियाक संवादशैलीक प्रभाव छै । कापड़िजीक पात्र ओहिना छोट–छोट मुदा शक्तिशाली संवादक माध्यमसँ नाटककेँ प्रभावकारी बनबैत छथि ।

नाटकक संवादकेँ रुपमे किछु एहन शव्दकेँ प्रयोग भेलैए जकरा गाड़ि कहल जाइ छै । मैथिली समाज आ शव्दकोषमे ओ शव्द गाड़िक रुपमे चिन्हित अछि । मुदा ई पहिल बेर नाट्यकार परमेश्वर कापड़ि मात्र प्रयोग केलन्हि से बात नइ छै । सभ्य समाज आ ऐ समाजक रुचि– अरुचि साहित्यक मापदण्ड एकटा खास खण्डमे निर्धाित करैत रहलै । मुदा साहित्यक मर्यादाक नामपर ओहि परम्पराकेँ ढोइत रहबाक प्रयोजन समाप्त भऽ गेल छै । तखन प्रशन ई जरुर छै जे पात्र, परवेश, कथ्य आ घटनाक्रम नाट्यभाषाक निमार्ण कऽ रहल छै कि नाट्यकार । जे नाटककार कथित अपशव्द बलात नाटकमे लएबाक प्रयत्न करै छै तँ ओ दोष जरुर छै । मुदा विशिष्ट नाटकीय अवस्थामे विशिष्ट नाटकीय भाषा मात्र नाटककेँ मुखर आ सान्दर्भिक बनौतै । अहि नाटकक पाठक आ नाट्यदर्शक भाषाक समूचित कि अनुचित ? अहि पर वहश विवेचन करए ।

नेपालक समकालीन मैथिली साहित्यमे लेखन गति अत्यन्त सुस्त अछि । तेहनसन अवस्थामे कापड़िजीक नाट्य सङ्ग्रह अहि भाषाक नाट्य परम्परा आ विकासक्रमक एकटा कड़ीक रुपमे खास महत्व राखत । अहि नाटकक मञ्चन अखनधरि नइ भऽ सकब निश्चित रुपें दुर्भाग्य अछि । मैथिली भाषी क्षेत्रमे बहुतरास नाट्य संस्था सक्रिय अछि, जाहि संस्था सभक लेल ई नाटक अत्यन्त उपयोगी भऽ सकै छलै । आबहु संस्था सभकेँ प्रर्दशन दिस आकृष्ट होएबाक चाही खास कए बहुतरास निजी आ सरकारी विधालय सभ अखनो शिक्षाक नामपर अत्यन्त धोकन्त विद्या दिस उन्मुख अछि । विद्यार्थीक समग्र वौद्विक विकासक हेतु सिर्जनात्मक चेतनाक विकास कतेक अपरिहार्य छै से बुझि अहि नाटक सभकेँ विधालय सभमे प्रर्दशनक उचित व्यवस्थापन कएल जा सकैत अछि । प्रर्दशन नाटककेँ पूर्णता प्रदान करै छै मुदा प्रर्दशनक मुहतक्कीमे नाटक लेखनपर विराम नइ देल जा सकै छै । नाट्यपाठ सेहो साहित्यक अन्य कोनो विधासँ प्रभावकारी आ संवेदनशील सिर्जन भऽ सकै छै । तें नाट्य लेखनक कोनो तरहक अवरोधकेँ अस्वीकार करैत सिर्जनशील सक्रियताकेँ स्वीकारल जाए । हम नाट्यकारक नाट्य विधामे निरन्तर सक्रिय लेखनक अपेक्षा रखैत मैथिली बाल नाट्य साहित्यकेँ श्रीवृद्विमे हुनक योगदान होइत रहए से कमना सेहो करब ।

अन्तमे महाकवि विद्यापति पाण्डुलिपी पुरस्कारसँ पुरस्कृत चौआरि नाटक सङ्ग्रहक पाण्डुलिपीक हेतु हार्दिक वधाइ । ई पोथी मैथिली नाट्य संसारमे जरुर आदर पाओत ताहि अपेक्षाक सँग ।

[रमेश रञ्जन नेपाल सङ्गीत तथा नाट्य प्रज्ञा–प्रतिष्ठान, कठमाण्डूक प्राज्ञ परिषद सदस्य छथि । ] प्रसुन सिंह, महोत्तरी नारीक चरित्र सभसँ रंगल कथासंग्रह ‘जिद्दी’ जिद्दी कथासंग्रहक बारेमे हम पहिलबेर सामाजिक सञ्जाल फेसबुकके माध्यमसँ जानकारी पएलहुँ । अप्पन गृह जिल्ला महोत्तरीक सदरमुकाम जलेश्वरमें एहि पोथीक विमोचन भेल खबर सुनिकऽ हमरा मनमे स्वभाविक एहि पोथीके बारेमे आओर जानकारी लेबाक इच्छा भेल । अप्पन बाल्यावस्थामें मैथिली भाषा सँ परिचित नहि होएबाक कारणसँ हमरा अप्पन मातृभाषा प्रति आओर वेस रुचि आ स्नेह अछि । एहि भाषाक बारेमे जतेक भऽ सकैय ओतेक जानकारी आ एहि सऽ सामिप्यता बढएबाक इच्छा हमरामे स्वभाविक अछि । संगैह साहित्यके विद्यार्थी आ प्रेमी होएबाक कारण सँ हमरा एहि पोथीक प्रति विशेष जिज्ञासा छल । कात्र्तिक मासमे हम विजयादशमीसँ छठि पावनिधरि जलेश्वरमें रहलहुँ । हमर भित्र नागेन्द्रकुमार कर्ण सँ भेटक क्रममें संयोगवश एहि कथा संग्रहक बारेमे हम हुनका सँ पुछलहुँ । भाइटीकाक दिन हुनकर गाम सुगामें चित्रगुप्त पुजाक अवसर पर गेल छलहुँ त ओ हमरा जिद्दी उपहारस्वरुप देलाह । पोथी भेटैत मन खुस भगेल । हमर पहिल मैथिली कृति पढबाक अनुभव केहन हायत से सोचिकऽ हम आओर प्रफुल्लित भऽ गेलहुँ । अगिला दिन भोरे उठैत हम जिद्दीके हातमे लेलहुँ । सुरुवातमे रहल टिप्पणी सभ पढिकऽ किछ पूर्वजानकारी लेलाक बाद हम एहि पोथीके पहिल कथा पढलँहु । कथा समापन होइते हमर भितरके पाठक प्रसन्न भगेल । हमरा लागल जे एहि कृत्ति पढबाक लेल हम एतेक बिलम्ब किया कएलहुँ । हमरा कथाकार सुजित कुमार झा आ एहि कृति प्रति और विश्वास बढल जखन पहिला कथा पढलाक बाद हमरा आरो कथा पढबाकलेल पन्ना उल्टएबाक इच्छा भेल । एकटा लेखकके विजयक लक्षण इहे छैक जे हुनकर कृत्तिके पाठकगण सुरु स लऽकऽ अन्तधरि पढबाक इच्छा होय । पिंकीके अपन संगै भेल धोखाके अवसरिमे परिवर्तन करैत देखलहुँ त ओकर विवेकके मन सलाम कयलक । तहिना ‘नव व्यापारक’ साधनाक असन्तुष्टि आ नारी अधिकारक अपव्याख्यासँ अप्पन घरसंसार प्रतिके जिम्मेवारी सँ दुर भेल देखलहुँ त लागल अपने अडोसपडोसके ककरो चित्रण छैक । ‘खाली घर’ आ ‘व्यर्थक उडानमे’ मुख्य पात्र सभक मनोवैज्ञानिकपक्षक सूक्ष्म दर्शन भेटल । तहिना ‘लाल डायरी’ मे एक उत्तम ‘सस्पेन्स थ्रिलर’क स्वाद भेटल त ‘जिद्दी’क गिन्नी अपने समाजक दीशाहीन नवपुस्ताक यथार्थपरक चित्रण अछि । जिद्दीक आओर कथामे से हो उठाएल गेल विषय वहुत यर्थार्थपरक अछि । एहि संग्रहक कथा पढलाक बाद हमरा लागल जे इ त अपने अडोसपडोसक काका, काकी, भाइ, वहिन, दाइ, आ बाबाक जीवनक चित्रण अछि । मनमे स्वाभाविक रुपसँ एकटा आवाज अवैत छल, ‘ एहन फलानाकसंग से हो भेल छल, फलानाके स्वभाव त ठिके एहिना छैक’ । जिद्दीक विशेषतासभक बात कएल जाए त एहिके प्रत्येक कथामे नारी मुख्य पात्र (एचयतबनयलष्कत) अछि । नारीक चरित्रक विभिन्न रंगक एहिमे प्रस्तुति कएलगेल अछि । पिंकी आदर्श जीवनसाथीक उदाहरण छथि त साधना एक लापरवाह गृहिणीके । गिन्नी अप्पन लक्ष्यसँ भटकल युवतीक प्रतिनिधि छथि त ममता कल्पनाक पङ्ख लगाबिकऽ उडान करनिहार स्वप्नप्रेमी महिलाक । निमाक पत्नीव्रताक ढोंग आ लालचि चरित्र पाठकक मन सिहोरि दैत अछि त कामनी मैडमक ममत्व करुणाक भाव जगबैत अछि । एहिसँ इ अनुभव होएत अछि जे अप्पन समाजमे बहुतरास महिला छथि जे अप्पन घरसंसार सम्हारिकऽ रहल छथि आ तेहनो महिला छथि जे कोनो नै कोनो कारणसँ अप्पन जीवनक माला समेटिकऽ नहि राखऽ सकल छथि । कथाकार झा एक ख्भचकबतष्भि (बहुमुखी) सर्जक छथि एहि बातक प्रमाण से हो एहिसँ भेट जाइत अछि । एक पाठकक नजरसँ देखि त जिद्दी कथा संग्रह पढलाक बाद हमरा एक रोमान्चकारी साहित्यिक यात्राक स्वाद भेटल जाहिमे अप्पन मिथिलाञ्चलक घरघरके कहानी वहुत कुशलतापूर्वक कथाकार झा प्रस्तुत कयने छथि । हुनकर आगामी कृतिक प्रतिक्षा करैत हुनका जिद्दीक लेल बधाइ दैत छी, संगैह हुनकर आगामी रचना सभकलेल शुभकामना दैत छी । ओम प्रकाश झा गजलक लेल (समीक्षा) श्री विजय नाथ झाजीक गीत-गजल संग्रहक पोथीक नाम अछि "अहींक लेल"। ऐ पोथीमे गीत आ गजलक फराक-फराक दूटा प्रभाग छै। हम ऐ पोथीक गजल प्रभागक संबंधमे ऐठाँ किछु चर्चा करऽ चाहब। ऐ पोथीमे गजलकार श्री विजय नाथ झाजीक अठहतरिटा गजल प्रकाशित भेल अछि। पोथीक गजल पढलासँ ई पता चलैत अछि जे किछु गजल केँ छोडिकऽ बेसी ठाँ काफिया आ रदीफक निअमक पालन कएल गेल अछि। पृष्ठ संख्या ४७, ५०, ५४, ५५, ५६, ६७, ७१, ७४, ७५, ८२, ९४, १०१, ११०, ११४ पर छपल गजलमे काफिया गडबडाएल अछि। ऐठाँ ई धेआनमे राखबाक चाही जे बिना दुरुस्त काफियाक रचना गजल नै भऽ सकैए। तखनो अधिकांश गजलक काफिया दुरुस्त अछि, जे गजलक विकास यात्राक हिसाबेँ एकटा नीक लक्षण अछि। काफिया, रदीफ आ गजलक व्याकरणक निअम पालन करबाक हिसाबेँ गजलकार ओहि गजलकार सभसँ फराक श्रेणीमे छथि जे गजलक व्याकरणकेँ नै मानबाक सप्पत खएने छथि। ऐ गजल संग्रहक गजल सब कोन बहरमे लीखल गेल अछि, ऐ पर गजलकार मौन छथि। गजलक नीचाँमे बहरक नाम जरूर लीखल जएबाक चाही। बहरक ज्ञान नब पीढीक गजलकार सभमे बढेबामे ई महत्वपूर्ण डेग हएत। ओना तँ गजलकार कोनो गजलक नीचाँमे बहरक नाम नै लीखने छथि, मुदा गजल सभकेँ पढलासँ ई पता चलैत छै जे ऐ संग्रहक ढेरी गजल एहन अछि जाहिमे अरबी बहरक निअमक पालन करबाक नीक प्रयास कएल गेल अछि। ई स्वागत योग्य गप अछि। ऐसँ इहो पता चलैत अछि जे गजलकार अरबी बहरसँ नीक जकाँ परिचित छथि आ जँ ई बात अछि तँ हुनका बहरक नाम गजलक नीचाँमे फरिछाकेँ लीखबाक चाही। ऐ संदर्भमे हम पोथीक सबसँ पहिलुक गजलक (पृष्ठ संख्या ४५) मतलाकेँ उद्धृत करऽ चाहै छी- हमर पूजा, हमर परिचय, हमर शृंगार छी अपने सकल सौभाग्य, मन, काया, रुधिर-संचार छी अपने आब एकर मात्रा संरचना पर धेआन दिऔ, तँ पता चलै छै जे ऐमे मूल ध्वनि मफाईलुन माने "ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ" सब पाँतिमे चारि बेर प्रयोग कएल गेल अछि। माने ई शेर बहरे-हजजमे कहल गेल छै। ऐ गजलक आनो शेरमे मोटामोटी किछु गलतीकेँ छोडि बहरे-हजजक प्रयोग अछि आ किछुठाँ वर्ण दुरुस्त कऽ देला पर ई गजल अरबी बहर बहरे-हजजमे अछि। ई एकटा उदाहरण अछि, एहन आरो गजल ऐ संग्रहमे छै जे वर्ण आ मात्रामे किछु परिवर्तन भेला पर अरबी बहरमे कहल मानल जाएत। हमरा ई आस अछि जे गजलकार अपन अगिला गजल संग्रहमे ऐ बातक धेआन राखताह आ अरबी बहर युक्त गजल कहिकऽ मैथिली गजलकेँ समृद्ध करताह। शेरक पाँतिक अंतमे पूर्ण विराम वा कोनो विराम चिन्ह नै लगेबाक निअम अछि, मुदा पोथीक गजलक शेर सभक पाँतिक अंतमे पूर्ण विराम लगाओल गेल अछि, जे निअमानुकूल नै अछि आ एकर धेआन राखल जएबाक चाही छल। संवेदनाक स्तरपर ई गजल संग्रह बड्ड नीक अछि आ गजलकारक विद्वताकेँ प्रकट करैत अछि। मुदा कएकठाँ भारी भरकम तत्सम आ संस्कृतक शब्दक प्रयोग गजलकेँ बूझबामे भारी बनबैत छै, जाहिसँ बचल जा सकैत छल। गजलमे क्लासिकल भाषाक प्रयोग नहिए हेबाक चाही, अपितु आम प्रयोगक भाषाक प्रयोग गजलक लेल बेसी नीक होइत छै। शेरमे एहन शब्दक प्रयोग जे आम बेबहारमे नै छै, गजलकारक शब्द सामर्थ्यकेँ तँ जरूर देखाबैत छै, मुदा शेरकेँ आम जनसँ दूर सेहो करैत छै। तैं शेर कहबाक काल हमरा हिसाबेँ बेसी क्लिष्ट भाषाक प्रयोगसँ बचबाक चाही। अंतमे ई कहल जा सकैए जे "अहींक लेल" पोथीक गजल प्रभाग मैथिली गजलक विकसित होइत रूपकेँ अस्पष्टे रूपेँ, मुदा देखबैत जरूर अछि। ई पोथी गजलक व्याकरणक हिसाबेँ किछु गलतीकेँ छोडिकऽ नीक प्रयास अछि। ऐ संग्रहक कएकटा शेरमे अरबी बहरक पालनक प्रयास महत्वपूर्ण आ नोटिस करबाक जोग अछि। कएकठाँ क्लिष्ट आ संस्कृतनिष्ठ शब्दक प्रयोगकेँ जँ कात कए कऽ देखल जाइ तँ संवेदनात्मक स्तरपर सेहो ई संग्रह नीक अछि। मैथिली गजलक विकास यात्रामे ई पोथी गजलक भविष्यक लेल नीक डेग अछि। हम आन्हर रही तइसँ प्रैक्टिस खूब केलौं: राजकुमार झा (विनीत उत्पल संग अन्तर्वार्ता) इतिहासक पन्नामे सभ कलाकारकेँ ठाम नै भेटैत अछि। वएह कलाकारकेँ आइ धरि याद राखल गेल अछि जकरा सत्ता प्रश्रय देने अछि। अहाँ मिथिलाक कतेक ओहन कलाकारकेँ जानैत छी जे बिना किनको प्रश्रय पओने अप्पन साधनाकेँ जीवित राखयमे सक्षम भेल अछि या ओ इतिहासक पन्नामे दर्ज अछि। चाहे दरभंगा राज हुअए या बनैली स्टेट या सोनवर्षा राज, राजदरबारी कलाकारक इतिहास दर्ज अछि। ऐ दरबारी कलाकारसँ फराक कलाकार केँ लऽ कऽ नै तँ अप्पन समाज जागरूक अछि आ नहिये इतिहास लिखएबला। स्वतंत्रता प्राप्तिक बादसँ वएह कलाकार प्रतिष्ठित भेल अछि जे सत्ता प्रतिष्ठानसँ जुड़ल रहल। हुनके मान्यता भेटल जिनकर गीत दरभंगा आकाशवाणीसँ प्रसारित भेल। मुदा ऐ गपसँ इनकार नै कएल जा सकैत अछि जे आइ धरि मुट्ठी भरि लोकक बपौती आकाशवाणी दरभंगाक संगीत विभागमे छाएल अछि।  जखनकि संपूर्ण मिथिलामे अनेको एहन कलाकार अछि जिनका लग संगीत साधनाक नै तँ समुचित साधन अछि आ नहिये हुनकर कोनो लिखित इतिहास भावी पीढ़ीकेँ भेटत। एक दिस रेडियोसँ मैथिली गीत सुनए बला लोक नै भेटैत अछि, ओतए सच्चाई ई अछि जे मुख्यधारासँ बाहर ई कलाकार जखैन गाम-घरक मचानपर अप्पन कलाकेँ प्रदर्शित करैत अछि तँ दर्शकक थपड़ीक आवाजक दम रेडियो स्टेशनसँ भेटएबला चारि-पाँच सए टकाक दामसँ बेसी ताकत राखैत अछि। एहने एकटा कलाकार अछि राजकुमार झा। प्रकृतिक करिश्मा सँ भगवान हुनका आँखि नै देलक मुदा हुनर एहन गलामे सुर आ आंगुरमे थिरकन एहन देलक जे जखैन ओ  संगीत साधना करैत अछि तँ एहन लागत जे सरस्वती सौंसे आबि कऽ हुनका पर सवार अछि। संगीतक एकटा तपस्वी राजकुमार झासँ वरिष्ठ पत्रकार विनीत उत्पलक गपशप- विनीत उत्पल:अहाँक संगीत शिक्षा कोना भेल? राजकुमार झा: हम गामे मे रहैत रही। नेनेसँ हमरा लखाह नै दैत अछि, मुदा छाँहीसँ हम लोककेँ कनी चीन्ह जाइत छी। स्पष्ट किछु नहिये बुझाबैए। गाम-घरमे संगीत माने भजन-कीर्तनक, नाटक सभक माहौल छल तेँ हमहूँ गाबए-बजाबएमे लागि गेलौं। हमर पढ़ाइ सोलह बरखक उम्रमे शुरू भेल। हमर गामक भाय नारायण झाक ओइ बरख माय मरल रहथिन। ओइ श्राद्धमे बड़ रास लोक सभ आएल छल। ओइमे नारायण भायक माध्यमसँ हम दरभंगा गेलौं। दरभंगाक नेत्रहीन विद्यालय (श्री कामेश्वरी प्रिया पुअर होम) मने राजकीय नेत्रहीन उच्च विद्यालय, दरभंगामे टेस्ट भेल। संगीतक जाँच भेल आ केलौं। ओतए पाँच बरख रहलौं। पढ़ाइ केलौं। संगीत, अंग्रेजी ओतए पढ़ैत रही। वर्ग एक सँ वर्ग तीन, फेर सीधे पाँच आ तीन बरखमे सतमा पास केलौं। मात्र छह बरखमे। 1988 मे मैट्रिक पास केलौं। विनीत उत्पल: फेर दरभंगासँ इलाहाबाद कोना गेलौं? राजकुमार झा: संगीतसँ मैट्रिक केलाक बाद इलाहाबाद आबि गेलौं। प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबादसँ एम.ए. केलौं। विनीत उत्पल: दरभंगा आ इलाहावादमे अहाँक संगीत गुरू के सभ छल? राजकुमार झा: दरभंगामे गौतम मिश्र, सुरेंद्र झा सँ संगीत सीखै छलौं। स्कूलमे तबलाक मास्टर कियो नै छल। हारमोनियम तँ हम अप्पन बाबूजी भुवनेश्वर झा सँ सिखलौं। इलाहाबादमे चंद्रभूषण पांडेय छल जे हमरा संगीतक पाठ पढ़एलक। हम गायन गौतम मिश्रसँ सिखलौं। चूंकि हम आन्हर छी तइसँ हम थ्योरी कतौ नै केलौं, प्रैक्टिकल बड़ केलौं। विनीत उत्पल:अहाँकेँ अप्पन कोनो संगी-साथीक ख्याल अछि? राजकुमार झा: हमरा संगे राम सागर पासवान, मोहन रावत बारीक, भगत झा, गंगा प्रसाद मेहता, रामवतार मंडल दरंभगामे पढ़ै छल। इलाहाबादमे भरत पांडेय, मक्खनलाल, अर्जुन पांडेय छल, मुदा सभ कियो कतए अछि, नै मालूम। विनीत उत्पल: अहाँ कोन सभ वाद्य बजा सकैत छी? राजकुमार झा: हारमोनियम, ढोलक, नाल, बांसुरी, कैसियो, गिटार, तानपुरा सभ किछु बजाबैक लेल जानैत छिऐ। हारमोनियम बजाएब तँ हम गाममे सिखलौं। विनीत उत्पल: अहाँकेँ संगीतक कोन राग बेसी पसीन अछि? राजकुमार झा: देखियौ, जे संगीतक आराधक अछि, हुनका कोन राग बेसी पसीन हएत या नै हएत, ई गप हेबाक नै चाही। किएकि राग एक तरहे तरकारीक मसाला छिऐ। जहिना नीक तरकारी बनाबैक लेल सभ मसाला चाही, ताहिना कोनो संगीत आराधककेँ सभ रागक जानकारी हेबाक चाही। मुदा यमन, राग भैरव, खवाज, राग देश, राग भोपाली, राग बिहाग, राग काफी बड़ पसीन अछि। यमनक उत्पति कल्याण ठाठ सँ भेल अछि। कोन मे कत्ते लय अछि, ई जानब आवश्यक अछि। विनीत उत्पल: अहाँकेँ कोन शास्त्रीय गायकक गायब पसीन अछि? राजकुमार झा: हमरा बैजू बावराक तान, भीमसेन जोशीक गायब बड़ पसीन अछि। विनीत उत्पल: संगीतक प्रोग्राम करए लेल या सुनए लेल जाइत छी? राजकुमार झा: जखन दरभंगामे पढ़ैत छलौं तँ दरभंगा टाऊन हॉलमे या फेर लहरियासरायमे प्रोग्राम सुनबाक लेल जाइत रही। जहियासँ गाममे रहए लगलौं तँ अपने पंचायतमे भजन-कीर्तन गाबै लेल जाइत छी। ओना बनमनखरी, बठैली, नोहर, दिग्घी (कटिहार), खारा, सिंगारपुर, आलमनगर, बुआरीमे कतेक बरख गाबैक लेल जाइत छी, जखन कियो बजाबैत अछि। विनीत उत्पल: कोनो नौकरी लेल गेलौं कि नै? राजकुमार झा: कस्तूरबा संगीत विद्यालय, नागपुर गेलौं तँ ओतए ओरिजनल मांगय लागल। कहलक जे डुप्लिेकट सँ काज नै चलत। हमरा पास डुप्लिकेट प्रमाणपत्र अहि कारण छल जे हम एम.ए. करहि कऽ बाद एक बेर फेर इलाहावाद गेल रही। ओतएसँ गाम घुरि रहल छलौं तँ इलाहाबादमे हमर ट्रेन रातिक दू बजे छल। हम इलाहाबाद स्टेशनपर आबि कऽ ओतए सुति गेलौं। दू बजे रातिमे ट्रेन आएल तँ एतेक धरफर भेल जे हमर सर्टिफिकेट सभटा कियो चोरा लेलक। एकर अलावा, नागपुरक भाषा दोसर छल, जकरा हम नै बुझि सकैत छलौं तइसँ गाम आबि गेलौं। विनीत उत्पल: अहाँकेँ संगीत साधनामे कोन तरहक दिक्कत आबैत अछि? राजकुमार झा: देखियौ, हम बेसी भजन गाबैत छी। ई साज-बाज बजायब सामूहिक काज अछि, कियो असगरे ई काज नै कऽ सकैत अछि। चूँकि हम आन्हर छी तेँ हमरा लोक सभ ठकि लैत अछि। तइसँ लोकपर विश्वास करब कठिन भऽ जाइत अछि। दोसर गप ई जे हमर कियो सहयोगी नै अछि। जौं केकरो राखै छिऐ तँ खच्चरपनी करए लागैत अछि। एनाउंस किछु सुनै छिऐ आ दै किछु आर छै। बाते करलकै एतबय टा मे, आ दै छै किछु अओर।  कतेक पैसा देब, ई कहि कऽ कियो नै लऽ जाइत अछि। विनीत उत्पल: गाबैक लेल सभसँ बेसी पाइ कतए भेटल? राजकुमार झा: एक बेर बठैली मे दू राति रहलौं आ 2200 रुपया देलक तँ खुशी भेल जे हमहूँ किछु कऽ सकैत छी। विनीत उत्पल: एखन अहाँ कोन काज करैत छी? राजकुमार झा: भैस चराबैत छी। विनीत उत्पल: गाममे संगीतक लेल कोनो समूह बनल कि नै? राजकुमार झा:-ठक्कन भाय, रतन भाय, गजो भाय, ठाकुर, बीजो से समूह बनल आरंभ भेल आ बनल रहल। हमरासँ पहिने भुवनेश्वर झा, हरिवल्लभ झा, उमाकांत झा, राधाकांत झा, लक्षो काका रहए। ओइ समयमे खूब चलै रहै। मुदा बादमे लोक सभकेँ घमंड भऽ गेलै। किछु गोटे गामसँ फिरार भऽ गेल, लोक कमाबै लागल आ बाहर चलि गेल। विनीत उत्पल: कोनो खिस्सा अहाँकेँ याद अछि, जखैन अहाँक योग्यताक मखौल उड़ाएल गेल? राजकुमार झा: एक बेर ग्वालपाड़ा गेलिऐ, राजपूतक प्रोग्राम छल। संजोगसँ हारमोनियम बजाबैबला कलाकार नै आएल। लोक सभ कहलक जे राजकुमार जी हारमोनियम नीक बजबै छथि। ऐपर हमरा कार्यक्रमक लेल तैयार कएल गेल। मुदा आर सभ कलाकार बाजल, 'ई तँ सूरदास छी, की बजाओत'। सभसँ सीनियर जे छल ओ पुछलक, -की बजबै छी, की गाबै छी। हम बाजलौं, -थोड़ बहुत बजबै छी। -हारमोनियम बजबै छी? की बुझल अछि? थोड़ो-मोर बुझल अछि ने? हम कहलौं- जे हारमोनियम बजबै छथि हुनकासँ कनी बेसी बजाबै छी। जे बेसी बजाबै छथि हुनकासँ थोड़े कम बजाबै छी। विनीत उत्पल: कोनो नशा करै छी कि नै? राजकुमार झा: नशा केलाक बाद किछु नै भऽ सकैत अछि। नशा करब गुनाह अछि। मुदा जखैन हम पढ़ाइ-लिखाइ छोड़लाक बाद तम्बाकू खाए लगलौं,  भैंसवार तँ हम रहबे करी, सुमन, बीजो, हम सभ कियो भैंसवार रहिऐ, बीजोक हाथसँ चुनौटी लऽ लेलौं, तइ दिनसँ खाइत छी। विनीत उत्पल: अहाँ बियाह किए नै केलौं? राजकुमार झा: कियो पिता लड़की दैक लेल तैयार नै भेल, तइसँ हमर ब्याह नै भेल। विनीत उत्पल: तखैन मनपर कंट्रोल कोना केलौं? राजकुमार झा: एखन हमर उमर 47 बरख भऽ रहल अछि। एकटा गप जानि लियौ जे ई मन केँ जतए दौड़ायब ओतए जाएत। मनकेँ कंट्रोल करहि सँ ओकर फाएदा होइत अछि। विनीत उत्पल: एखन अहाँ किछु सुना सकैत छी? राजकुमार झा: जब गाबैत छी तँ सभटा राग आगू आबि जाइत अछि। ओना एकटा यमन राग देखू, नीधागामापारेसा चले आना, घनश्याम चले आना, बस तू ही तो मेरे जीवन का आधार बने रहना मेरे श्याम चले आना। -जखन सुर मे रहैत छिऐ तँ सभ याद रहै छै। राग ठोर पर आबि जाइ छै। ओना नै फुराइ छै। विनीत उत्पल: अहाँ कोन तरहक गीत गाबै छिऐ? राजकुमार झा: जेहन समय तेहन गीत गाबै छिऐ। बसंत ऋतुक होलीक गीत गाबै छी। अरे मोरे भिनसरवा, कोयल कूकय छै, आमक मंजर पर मंजर गूंजय छै, जिनकर आदमी घरक मंुडेर पर, बैसल-बैसल काग कूकय छै। ई गीत बड़गांव (चंदा झा क मातृक) क चंदन क बनायल छै। हम सुनले गाबैत छी। विनीत उत्पल: अहाँ अप्पन गीत बनाबैत छिऐ? राजकुमार झा: हम गीत नै बनबैत छी। साज-बाज ठोर पर आबैत छै। उमेश मण्‍डल- साक्षात्‍कार श्री राजदेव मण्‍डलक संग उमेश मण्‍डल- सभसँ पहि‍ने वि‍देह साहि‍त्‍य सम्‍मान लेल अपनेकेँ बहुत-बहुत बधाइ...। राजदेव मण्‍डल- धन्‍यवाद। उमेश मण्‍डल-   अहाँक नजरि‍मे साहि‍त्‍यक उद्देश्‍य की अछि‍? राजदेव मण्‍डल- साहि‍त्‍यक उद्देश्‍य होइत अछि‍- लोक कल्‍याणक भावना। समाजक कल्‍याण करब साहि‍त्‍यक परम अभीष्‍ट अछि‍। मात्र अभि‍व्‍यक्‍ति‍ नै जेकर सम्‍बन्‍ध जि‍नगीसँ हुअए सहए सुच्‍चा साहि‍त्‍य अछि‍। उमेश मण्‍डल-   अहाँक साहि‍त्‍यमे इति‍हास/संस्‍कृति‍ (खास कऽ मि‍थि‍लाक) केना वर्णित होइत अछि‍? राजदेव मण्‍डल- सामाजि‍क यर्थाथक अभि‍व्‍यक्‍ति‍ जँ हेतै तँ इति‍हास आ संस्‍कृति‍क समावेश भ’ जेनाइ स्‍वाभावि‍के छै। जि‍नगीकेँ जनबाक लेल युगक चि‍त्र आवश्‍यक अछि‍, सँगहि‍ प्राचीण आ नवीन संस्‍कृति‍ आ संस्‍कारक समावेश होइते रहै छै। उमेश मण्‍डल-   दि‍नानुदि‍नक अनुभवक अहाँक साहि‍त्‍यमे कोन तरहेँ वि‍वेचन होइत अछि‍? राजदेव मण्‍डल-  यएह अनुभव तँ काव्‍यक हेतुमे मदति‍ करै छै। जगतकेँ अनुभव आ अध्‍ययनसँ अनुभवक प्राप्‍ति‍ होइ छै आ रचना करैत काल ओकर रूप प्रगट होइ छै। उमेश मण्‍डल-   साहि‍त्‍यक शक्‍ति‍क वि‍षएमे अपनेक की कहब अछि‍? राजदेव मण्‍डल- साहि‍त्‍यक शक्‍ति‍ तँ असीम अछि‍। एक दि‍स क्रान्‍ति‍क चि‍नगी अछि‍ तँ दोसर दि‍स शान्‍ति‍क बीज अछि‍। सामाजि‍क परि‍वर्त्तनमे ऐ शक्‍ति‍क अहम भूमि‍का रहैत अछि‍। उमेश मण्‍डल-   अहाँक साहि‍त्‍यमे पाप-पुण्‍यक विश्लेषण केना होइत अछि‍? राजदेव मण्‍डल- मानव हर क्षण परि‍स्‍थि‍ति‍क कड़ीसँ बान्‍हल रहैत अछि‍। परि‍स्‍थि‍ति‍ वश नीक-अधलाह, पाप-पुण्‍य होइत रहै छै। ओना ऐ शब्‍दक सम्‍बन्‍ध साहि‍त्‍यक अपेक्षा धर्मसँ बेसी अछि‍। उमेश मण्‍डल-   कल्‍पना आ यथार्थक समन्‍वय अहाँ अपन साहि‍त्‍यमे केना करैत छी? राजदेव मण्‍डल- तीव्रगति‍सँ बढ़ैत कालचक्र। आइ जेकरा कल्‍पना कहैत छी काल्हि‍ यर्थाथ बनि‍ जाइत अछि‍। साहि‍त्‍य लेल कल्‍पना आ यर्थाथक सम्मि‍लन आवश्‍यक होइते छै। उमेश मण्‍डल-   अहाँक साहि‍त्‍यमे पात्र जीवन्‍त भऽ उठैत अछि‍, तेकर की‍ रहस्य? राजदेव मण्‍डल- पात्र तँ समाजेसँ बि‍छल जाइत अछि‍। ओकरा सँगे जीअब, जाँचब, परखब आवश्‍यक अछि‍। पश्चात जँ ओकरा अभि‍व्‍यक्‍त करब तँ ओ जीवन्‍त हेबे करतै। उमेश मण्‍डल-   साहि‍त्‍य लेखन, वि‍शेष कऽ मैथि‍ली साहि‍त्य लेखन अहाँ लेल कोन तरहेँ वि‍शि‍ष्‍ट अछि आ एकर प्राथमि‍कताकेँ अहाँ कोन तरहेँ देखै छी? राजदेव मण्‍डल- ऐठाम आमजनक भाषा अछि‍ मैथि‍ली। जन-जन तक अपन अभि‍व्‍यक्‍ति‍केँ संप्रेषण करबाक लेल ऐ भाषाकेँ प्राथमि‍कता देमहि‍ पड़त। उमेश मण्‍डल-   की अहाँ कोनो तथ्‍यक झँपलाहा भाग उघारैत छि‍ऐक? अगर हँ तँ केना आ नै तँ किएक? राजदेव मण्‍डल- कोनो भाग ने उघड़ल अछि‍ आ ने झाँपल। सभटा सोझेमे अछि‍। लि‍खबाक आ देखबाक अपन-अपन दृष्‍टि‍कोण अछि‍। उमेश मण्‍डल-  अहाँ कहि‍यासँ लेखन प्रारम्‍भ केलौं, केकरा लेल लि‍खलौं, आइ-काल्हि‍ केकरा लेल लि‍ख रहल छी? राजदेव मण्‍डल- बून-बूनसँ सरोवर भरि‍ जाइ छै। दीर्घ काल तक अभ्‍यास अनवरत चलैत रहल। कल्‍पनाक मुरुत तँ पहि‍ने मनेमे बनै छै। पुरान छि‍टफुट पाण्‍डुलि‍पि‍ सभमे 1986 ई. तथा कोनोमे 1987 ई. अंकि‍त अछि‍। समाजक लेल लि‍खलौं आ आइयो हुनके लेल लि‍ख रहल छी। उमेश मण्‍डल-  की अहाँकेँ ई लगैत रहल अछि‍ जे मुख्‍य धारासँ अहाँ कति‍याएल गेल छी? अहाँक रचनामे समाजकेँ बाहरसँ देखबाक प्रवृति‍क की कारण? राजदेव मण्‍डल- धारा तँ अन्‍तरसँ फुटैत छै। अपन-अपन धारा होइ छै। मुख्‍य आ कति‍आएल कहि‍ की ओकरा रोकि‍ देब संभव छै? समाजकेँ मात्र बाहरसँ देख गंभीर रचना केना भ’ सकैत अछि‍। एक हृदए दोसरसँ नि‍वेदन केना करतै। ि‍वदेह-        अपन साहि‍त्‍य आ रचनामे की स्‍वयंकेँ पूर्णरूपसँ इमानदार राखब आवश्‍यक छै? राजदेव मण्‍डल- साहि‍त्‍य आ रचनामे जँ इमानदारी सुरक्षि‍त नै रहतै तँ फेर ओ कतए आ केना बँचतै। उमेश मण्‍डल-   मैथि‍ली साहि‍त्‍य आइक दि‍नमे की ई सभ (साहि‍त्‍यकार)क सामुहि‍क दोष स्‍वीकृति‍क रूप नै बुझना जाइत अछि‍?- राजदेव मण्‍डल- आइक दि‍नमे जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक स्‍थि‍ति‍ छै तेकरा लेल जे सभ दोषी छथि‍ हुनका सभकेँ स्‍वीकार करबाक चाहि‍यनि‍। पैघ लोकक तँ यएह पहि‍चान अछि‍ जे अपन दोषपर स्‍वीकारोक्‍ति‍क भाव प्रदर्शनमे कोनोटा झि‍झक नै देखबए। हमहूँ ओही श्रेणीमे आइक साहि‍त्‍यकार छी। तँए कि‍ हमहूँ दोषी नै छी? उमेश मण्‍डल-   की अहाँकेँ लगैत अछि‍ जे अहाँक पोथीकेँ हि‍न्‍दी, बंग्‍ला, नेपाली, अंग्रजी आदि‍ भाषामे अनुवाद कएल जाएत? तइ स्‍थि‍ति‍मे ओतए एकर कोन रूपेँ स्‍वागत हेतैक? की अहाँक साहि‍त्‍य ओइ भाषा आ संस्‍कृति‍ सभ लेल ओतबे महत्‍वपूर्ण रहतै जते ओ मैथि‍ली भाषा आ संस्‍कृति‍ लेल छै? अहाँक लेखन भाषा-संस्‍कृति‍ नि‍र्पेक्ष कि‍अए नै भऽ सकल? राजदेव मण्‍डल- दीर्घ काल तक प्रतीक्षाक उपरान्‍त तँ कहुना पाथी प्रकाशि‍त भेल। भाषांतर वा अनुवादक वि‍षएमे कि‍ सोचब। ओना हृदएस्‍पर्शी, सुच्‍चा साहि‍त्‍य सभ भाषाक लेल महत्‍वपूर्ण होइ अछि‍ आ सभठाम आदृत होइत अछि‍। भाषा-संस्‍कृति‍सँ ि‍नरपेक्ष भ’ रचना केना होएत। उमेश मण्‍डल-   अहाँक भाषा तँ मैथि‍ली अछि‍ मुदा अहाँक लेखनपर बाहरी भाषा, संस्‍कृति‍, वि‍चारधाराक प्रभाव पड़ल अछि‍, कतौ-कतौ ई स्‍पष्‍ट अछि‍ मुदा बेसी ठाम नै, एकर की कारण? राजदेव मण्‍डल- भाषा तँ बहैत नीर अछि‍। एकरा बान्‍हसँ घेरि‍ क’ राखब ठीन नै। बेकती आ स्‍थान सभमे परि‍वर्त्तन भ’ रहल छै आ हेबक सोहो चाही। परि‍वर्त्तन आ नि‍त-नूतनता आवश्‍यक छै। उमेश मण्‍डल-   अहाँक रचनाक प्रचार ऐ पुरस्‍कारक बाद भयंकर रूपसँ भेल अछि‍, अहाँकेँ ऐसँ केहेन अनुभव भऽ रहल अछि‍? राजदेव मण्‍डल- प्रसन्न छी ऐ बातसँ जे समाज आ खास क’ वुद्धि‍जीवी पाठक वर्ग हमरापर अनुग्रह केलथि‍। सभकेँ हृदएसँ नमन। वि‍देह नाट्य उत्‍सव- २०१३ मधुबनी जि‍लान्‍तर्गत चनौरागंजमे, राष्‍ट्रीय राजमार्ग-57क सटले उत्तरबारि‍ कात त्रि‍दि‍वसीय आयोजन जे “वि‍देह नाट्य उत्‍सव”क रूपेँ प्रसि‍द्ध अछि‍ आयोजि‍त भेल। आयोजन दि‍वस छल वि‍गत 15-सँ-17 फरवरी। वि‍देह प्रथम मैथि‍ली पाक्षि‍क ई-पत्रि‍काक नाट्य-रंगमंच-फि‍ल्‍म वि‍भागक संपादक श्री बेचन ठाकुरक संयोजकत्‍वमे ऐ आयोजनक सफल समापन भेल। दूटा नाटक, दूटा एकांकी नाटक, नुक्कड़, जट-जटीन, होली, झड़नी, गंगा झाँकी, ग्‍वाल-बाल झाँकी, बाल लीला झाँकी, लोक समूह गीत, स्‍वागत गीत, समूह नृत्‍य, हास्‍य-चटनी, महादेव-नचारी, राष्‍ट्रीय एवं भक्‍ति‍ परक झाँकी इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍ अनेक कार्यक्रमक प्रस्‍तुति‍क संग कवि‍ सम्‍मेलन तथा कला एवं साहि‍त्‍य क्षेत्रमे “वि‍देह सम्मान समारोह”क आयोजन सेहो कएल गेल। परोपट्टाक लोकक उपस्‍थि‍ति‍क अलाबे कवि‍-सम्मेलनमे तथा सम्मान समारोहमे आएल समस्‍तीपुर, दरभंगा, सुपौल तथा मधुबनी जि‍लाक वि‍शि‍ष्‍ट व्‍यक्‍ति‍क उपस्‍थि‍ति‍ ऐ वार्षिक कार्यक्रमकेँ अह्लादकारी ओ स्‍मरणीय बनौलक। पहि‍ल दि‍न अर्थात् 15 फरवरीकेँ दि‍नक 11 बजेसँ रात्रीक 10 बजे धरि‍, दोसर दि‍न माने 16 फरवरीकेँ मौसम खराप रहलाक कारणेँ दि‍नक 3 बजेसँ 11:30 बजे राति‍ धरि‍ तथा तेसर दि‍न 2 बजेसँ राति‍क 12 बजे धरि ‍उपरोक्‍त‍ वि‍भि‍न्न कार्यक्रमक प्रस्‍तुति‍क रूपरेखा रहल। ऐ सम्‍पूर्ण कार्यक्रमक वि‍डि‍यो रि‍काॅडि‍ंग सेहो कएल गेल अछि‍। प्राप्‍त सूचनाक आधारपर ऐ त्रि‍दि‍वसीय कार्यक्रमक सम्‍पूर्ण वि‍डि‍यो शीघ्रहि यू-ट्यूबपर सम्‍पूर्ण वि‍श्वमे पसरल वि‍देह-श्रोता-दर्शक तथा अन्‍य लेल उपलब्‍ध कराओल जाएत। भाषा सम्‍मान, मूल साहि‍त्‍य सम्‍मान, समग्र योगदान सम्मन, मांगनि‍ खबास सम्मन, आत्‍म ि‍नर्भर संस्‍कृति‍ संरक्षण सम्मन तथा अनुवाद पुरस्‍कार एवं “मानद् महत्तर सदस्‍यता” सम्मानक ऐ कड़ीमे 47 गोट सम्मानि‍त व्‍यक्‍ति‍क अह्लादकारी उपस्‍थि‍ति एे सम्मान समारोहकेँ सफलता प्रदान कएल। हलाँकि‍ मैथि‍ली पत्रकारि‍ता सम्मान तथा उपरोक्‍त वर्णित सम्मानक अनेक सूचीमे कि‍छु व्‍यक्‍ति‍ उपस्‍थि‍त नै भऽ सकलाह ति‍नका सभ लेल वि‍देह द्वारा पुन: दोसर सत्रक सम्मान समारोह अगामी मार्च माहमे, सुपौल जि‍ला अन्‍तर्गत ि‍नर्मलीमे आयोजि‍त हएत तेकरो उद्घोषणा मंचसँ कएल गेल। सम्मान समारोह, नाटक मंचन, एकांकी मंचन तथा कवि‍ सम्‍मेलनक समाचार वि‍स्‍तारसँ नि‍म्न अछि‍- वि‍देह सम्‍मान समारोह- उद्घाटन- कुमार रामेश्वरम् अध्‍यक्ष- डॉ. शि‍वकुमार प्रसाद। मंच संचालक- उमेश मण्‍डल। ‍ 1. श्री राजदेव मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सोने लाल मण्‍डल उर्फ सोनाई मण्‍डल, उमेर- 52, “अम्‍बरा” कवि‍ता संग्रह लेल वि‍देह मूल साहि‍त्‍य सम्‍मान-2012 सम्‍पर्क- गाम- मुसहरनि‍याँ, पोस्‍ट- रतनसारा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- 847452 2. डॉ. नरेश कुमार वि‍कल “ययाति‍” (वि‍. स. खाण्‍डेकर, मराठी)क अनुवाद लेल 2013क वि‍देह अनुवाद पुरस्‍कार। सम्‍पर्क- भगवानपुर, देसुआ समस्‍तीपुर बि‍हार। 3. श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. दल्‍लू मण्‍डल “तरेगन (बाल प्रेरक वि‍हनि‍ कथा संग्रह” लेल 2012क “वि‍देह बाल साहि‍त्‍य सम्‍मान” सम्‍पर्क- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) पि‍न- 847410 4. श्री राजनन्‍दन लाल दास (प्रति‍नि‍धि‍- डॉ. बुचरू पासवान) मैथि‍लीमे समग्र योगदान लेल “मानद् महत्तर सदस्‍यता” प्रदान कएल जा रहल अछि‍ 5. नृत्‍य अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 6. चि‍त्रकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जय प्रकाश मण्‍डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्‍डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्‍ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) 7. चि‍त्रकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री चन्‍दन कुमार मण्‍डल सुपुत्र श्री भोला मण्‍डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्‍ट- बेलही, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) संप्रति‍, छात्र स्‍नातक अंति‍म वर्ष, कला एवं शि‍ल्‍प महावि‍द्यालय- पटना। 8. हरि‍मुनि‍याँ वाद्य लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्‍व. रामस्‍वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 9. ढोलक-ठेकैता लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री कल्‍लर राम सुपुत्र स्‍व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 10. शि‍ल्‍प-वास्‍तुकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री राम वि‍लास धरि‍कार सुपुत्र स्‍व. ठोढ़ाइ धरि‍कार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 11. मूर्तिकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” घूरन पंडि‍त सुपुत्र- श्री मोलहू पंडि‍त, पता- गाम+पोस्‍ट– बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 12. काष्‍ट कला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री योगेन्‍द्र ठाकुर सुपुत्र स्‍व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 13. किसानी आत्मनिर्भर संस्कृतिक संरक्षण लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्‍व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 14. किसानी आत्मनिर्भर संस्कृतिक संरक्षण लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री रौशन यादव सुपुत्र स्‍व. कपि‍लेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्‍ट– बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 15. अल्हा/महराइ लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” मो. जीबछ सुपुत्र मो. बि‍लट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्‍ट- बड़हारा, भाया- अन्‍धराठाढ़ी, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०१ 16. जोगि‍रा गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री बच्‍चन मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सीताराम मण्‍डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 17. जोगीरा गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्‍व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 18. पराती गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री लेल्हु दास सुपुत्र स्‍व. सनक मण्‍डल पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 19. झरनी लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” मो. गुल हसन सुपुत्र अब्‍दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 20. नाल वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझूला, पोस्‍ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 21. मैथि‍ली लोकगीत लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्‍डल, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 22. मैथि‍ली लोकगीत लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” सुश्री सुवि‍ता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्‍डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्‍ट- बलि‍यारि‍, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 23. खुरदक वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री सीताराम राम सुपुत्र स्‍व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 24. खुरदक वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री लक्ष्‍मी राम सुपुत्र स्‍व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 25. कॉरनेट वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 26. लोक संस्‍कृति‍क संलक्षण लेल वि‍देह “मांगनि‍ खबास सम्‍मान” श्री राम लखन साहु पे. स्‍व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़ि‍या, पोस्‍ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) 27. मि‍थि‍ला चि‍त्रकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दि‍लि‍प झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 28. तबला वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री उपेन्‍द्र चौधरी सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 29. तबला वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्‍व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्‍ट- पीपराही, भाया- लदनि‍याँ, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 30. झालि‍ वादन लेल लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री कुन्‍दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्‍द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्‍ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०४ 32. झालि‍ वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्‍व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 33. मैथि‍ली लोकगाथा गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री रवि‍न्‍द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) 34. मैथि‍ली लोकगाथा गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री पि‍चकुन सदाय सुपुत्र स्‍व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 35. शास्‍त्रीय संगीत आ तानपुरा वाद्य लेल वि‍देह “मांगनि‍ खबास सम्‍मान” श्री रामवृक्ष सि‍ंह सुपुत्र श्री अनि‍रूद्ध सि‍ंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरि‍या, पोस्‍ट- बाबूबरही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 36. मृदन वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री खखर सदाय सुपुत्र स्‍व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 37. तरसा/तासा वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जोगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 38. रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री सैनी राम सुपुत्र स्‍व. ललि‍त राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 39. गुमगुमि‍याँ वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्‍व. श्री श्रीचन्‍द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 40. डंका/ढोल वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री योगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 41. डंफा वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धि‍यानी दास सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 42. डंफा वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री महेन्‍द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 43. नङेरा/डि‍गरी वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्‍व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) 44. रंगमंच अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 45. रंगमंच अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 46. रंगमंच अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्‍म ति‍थि‍- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) 47. रंगमंच हास्‍य अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” टाॅसि‍फ आलम सुपुत्र मो. मुस्‍ताक आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार)। कवि‍ सम्मेलन- अध्‍यक्ष- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल। मंच संचालक- उमेश मण्‍डल। समीक्षक- डॉ. योगानन्‍द झा तथा कुमार रामेश्वरम् एवं डाॅ. शि‍वकुमार प्रसाद। धन्‍यवाद ज्ञापन- श्री बेचन ठाकुर। कवि‍गण तथा कवि‍ताक नाओं- (1)  श्री शम्‍भु सौरभ- सुरूज मारए हुलकी (2)  श्री उमेश पासवान- कागज (3)  श्री रामविलास साहु- केना कहब भारत महान् (4)  श्री नन्‍द वि‍लास राय- मि‍थि‍ला वर्णन (5)  श्री श्री हेमनाराण साहु- हम छी मैथि‍ल (6)  श्री परमान्‍द प्रभाकर- खखनुआँ भुखल सुतलैए (7)  डॉ. योगानन्‍द झा (8)  मो. गुल हसन- कि‍सानक खरि‍हान (9)  श्री राजदेव मण्‍डल- जय हे कि‍सान (10) श्री उपेन्‍द्र नारायण अनुपम- गेल चौवन्नी (11) श्री कपि‍लेश्वर राउत- हमरा कि‍छु ने फुराइए (12) शशि‍कान्‍त झा- एतबे आंगन (13) श्री वि‍पीन कुमार कर्ण- व्‍यवस्‍थाक जाति‍-पाति‍ (14) गौरी शंकर साह- वि‍वाह वि‍वाद होइत (15) शि‍व कुमार मि‍श्र- मान (16) लक्ष्‍मी दास- हर जोति‍ हरबाह (17) डॉ. शि‍वकुमार प्रसाद- कजरौटी केर काजर संग (18) श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल- दि‍न राति‍क खेल। एकांकी आ नाटक “सतमाए” नाटककार- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल नि‍र्देशक- श्री बेचन ठाकुर पात्र- परि‍चय- (1)  बुद्धि‍धारी बाबू-  हाई स्‍कूलक प्रधानाध्‍यापक,             भूमि‍कामे- सुश्री पूजा कुमारी (2)  वि‍पति‍बाबू-      हाई स्‍कूलक एक गोट सहायक शि‍क्षक,    भूमि‍कामे- सुश्री सरस्‍वती कुमारी (3)  पुलकि‍त-       हाई स्‍कुलक चपरासी,                भूमि‍कामे- सुश्री संगीता कुमारी (4)  सुलक्षणी-      वि‍पति‍ बाबूक माए                   भूमि‍कामे- सुश्री ललि‍ता कुमारी (5)  शि‍वकुमार-     वि‍पति‍ बाबूक बटा-                  भूमि‍कामे- सुश्री ज्‍योति‍ कुमारी (6)  खजूरि‍या-      एक गोट ग्रामीण महि‍ला,               भूमि‍कामे- सुश्री सुलेखा कुमारी (7)  तेतरी-        दोसर ग्रामीण महि‍ला,                 भूमि‍कामे- सुश्री पुनम कुमारी (8)  चि‍न्‍तामणी-      एक गोट साधारण कि‍सान,             भूमि‍कामे- सुश्री रोशनी कुमारी (9)  सावि‍त्री-             चि‍न्‍तामणि‍क पत्नी,                   भूमि‍कामे- सुश्री रागि‍नी कुमारी (10) गीता-        चि‍न्‍तामणि‍क बेटी,                   भूमि‍कामे- सुश्री माला कुमारी (11) पुरोहि‍त-      गामक पंडीजी,                     भूमि‍कामे- सुश्री राधा कुमारी (12) जय मालाक कालाकार-        भूमि‍कामे- सुश्री खुशबू, पुनम, सुलेखा, रागि‍नी, सोनी कुमारी। (13) परि‍छन गीत-               भूमि‍कामे- सुश्री सुलेखा आ पुनम कुमारी मैथि‍ली नाटक “गंगा ब्रि‍ज” नाटककार- श्री गजेन्‍द्र ठाकुर ि‍नर्देशक- श्री बेचन ठाकुर पात्र-परि‍चय- (1)  बच्‍चा-1             मि‍थि‍लेश कुमार यादव (2)  बच्‍चा-2             आनन्‍द मोहन कुमार यादव (3)  बच्‍चा-3             कुणाल कि‍शोर ‘धीरज’ (4)  मुख्‍यमंत्री-            देवन कुमार मण्‍डल (5)  मीत-               बैद्यनाथ कुमार ठाकुर (6)  बाउ-               सोनू कुमार (7)  लाला-              गणेश कुमार (8)  दादा-               वलराम कुमार यादव (9)  बि‍लट-              अमि‍त आनन्‍द ·        अभि‍यंता-            कृष्‍ण कुमार यादव ·        अभि‍यंताक पत्नी-        रंजीत कुमार राम ·        अभि‍यंताक बेटी-        कणाद कि‍शोर ‘नीरज’ ·        अभि‍यंताक बेटा-        शुभम शंकर गुप्‍ता ·        ठीकेदार-             सूरज कुमार ·        पहि‍ल मजदूर-         ब्रह्मानंद कुमार यादव ·        दोसर मजदूर-         शि‍वकुमार यादव ·        तेसर मजदूर-          संतीत कुमार यादव ·        पहि‍ल शि‍क्षक-         कि‍शोर कुमार ठाकुर ·        दोसर शि‍क्षक-         अभि‍नाश कुमार साह ·        ढोलहो देनीहार-        राजेश कुमार महतो ·        पहि‍ल डंका बजेनि‍हार-    कमल कि‍शोर पंकज ·        दोसर डंका बजेनि‍हार-    कि‍शोर कुमार यादव ·        बतही माए-           उमेश कुमार राम ·        पैघ भाय-            सुभाष कुमार ·        अभि‍यंताक मि‍त्र-        सुनील कुमार महतो ·        कनि‍याँ काकी-         रामबाबू भारती ·        पुरान अभि‍यंता-        सि‍कन्‍दर कुमार यादव ·        पहि‍ल प्रोफेसर-         रमेश कुमार ·        दोसर प्रोफेसर-         मो. कलामुद्दीन अंसारी ·        इसकुल छात्र-         प्रभाष कुमार, शि‍वकुमार मुखि‍या, प्रशांत कुमार आ संजन कुमार ·        कॉलेजक छाद्ध-        कृष्‍णानंद कुमार, शि‍वजी मण्‍डल, गंुजन कुमार, अजीत कुमार मण्‍डल, रंजीत कुमार मण्‍डल, मि‍थि‍लेश कुमार राम, मो. इरफान अंसारी जट-जटीन- “जब-जब पढ़ए कहलि‍औ रे जटा.....” गीत प्रस्‍तुति‍- सुश्री ज्‍योति‍ कुमारी आ सुश्री बबि‍ता कुमारी। जटीन पक्ष- सुश्री दुर्गी कुमारी, श्वेता कुमारी, सीता कुमारी आ संगीता कुमारी। जटा पक्ष- सुश्री रीना कुमारी, पूजा कुमारी, कंचन कुमारी तथा पूर्णिमा कुमारी। एकांकी- “जजाति”‍ नाटककार- श्री नंद वि‍लास राय नि‍र्देशक- श्री बेचन ठाकुर पत्र-परि‍चय- (1)  फूलचन्‍द-      गामक एकटा खलीफा-    भूमि‍कामे- मो. नौशाद आलम (2)  वनवाली-       फूलचन्‍दक पि‍ता-       भूमि‍कामे- राम बाबू भारती (3)  मैलामवाली-                       भूमि‍कामे- अमि‍त आनन्‍द- (4)  गामवाली-                        भूमि‍कामे- वि‍क्की कुमार कर्ण (5)  ति‍लाठवाली-     फूलचन्‍दक पत्नी-        भूमि‍कामे- मि‍थि‍लेश कुमार यादव (5) महान सामाजि‍क मैथि‍ली नाटक- “ऊँच-नीच” नाटककार- श्री बेचन ठाकुर ि‍नर्देशक- श्री बेचन ठाकुर पात्र परि‍चय- (1)  मंगल मल्लि‍क-         रामनगर गामक डोम-           भूमि‍कामे- सुश्री राधा कुमारी। (2)  मरनी-              मंगल केर पत्नी-              सुश्री आशा कुमार। (3)  दुखन-              मंगल केर पुत्र मैट्रीक पास-      सुश्री श्वेता कुमारी। (4)  बुधन-               एकटा ग्रामीण-               सुश्री रीना कुमारी। (5)  चन्‍द्रेश झा-           एकटा सुखी सम्‍पन्न, कंजूश ब्राह्मण‍- सुश्री वीभा कुमारी। (6)  मनीषा-              चन्‍द्रेशक पत्नी-               सुश्री सुवि‍ता कुमारी। (7)  चन्‍द्रप्रभा-             चन्‍द्रशक इकलौती बेटी-         सुश्री ज्‍योति‍ कुमारी। (8)  रबीया-              मंगल केर दि‍याद भाय-         सुश्री बबि‍ता कुमारी। (9)  शशि‍कांत-            दारू दोकानदार-              सुश्री रोशनी कुमारी। ·        सीताराम-            एकटा गरीब आदमी-           सुश्री आरती कुमारी। ·        शीला-              ताड़ीवाली-                  सुश्री शगुफता परवीण। ·        देबन-               एकटा ताडी पि‍याक-           सुश्री दुर्गा कुमारी। ·        सुकराती-            दोसर ताड़ी पि‍याक-           सुश्री संगीता कुमारी। ·        छट्टू-               तेसर ताड़ी पि‍याक-           सुश्री प्रीति‍ कुमारी। ·        झि‍ंगूर-              एकटा नामी-गामी चाहबला-       सुश्री रानी कुमारी। ·        संजीत-              मैट्रीकक वि‍द्यार्थी-             सुश्री कंचन कुमारी। ·        हरीश-              मैट्रीकक वि‍द्यार्थी-             सुश्री पूर्णिमा कुमारी। ·        भोलू-               मैट्रीकक वि‍द्यार्थी-             सुश्री चाँदनी कुमारी। ·        गौरी-               पेपरबला-                  सुश्री पूजा कुमारी। ·        राम प्रवेश-           एकटा ग्रामीण-               सुश्री सरस्‍वती कुमारी। ·        इंजीनि‍यर-            मंगलक बेटा-                सुश्री प्रीति‍ कुमारी। ·        डाॅक्‍टर-             चन्‍द्रेशक बेटी-               सुश्री पूजा कुमारी। ·        लक्ष्‍मण-             लड़ि‍की छात्रावासक मालि‍क-      सुश्री आरती कुमारी। ·        ब्रह्मानंद-             वकि‍ल, चन्‍द्रेशक मि‍त्र-         सुश्री आरती कुमारी। ·        मणि‍कांत-            वुजुर्ग कायस्‍त-               सुश्री सोनम कुमारी। ·        शांति‍-              डॉक्‍टरक सहेली-                   सुश्री नीतू कुमारी। ·        नि‍त्‍यानंद मि‍श्र-         रेलमंत्री-                   सुश्री सीता  कुमारी। ·        वरूण झा-            ि‍नत्‍यानंद मि‍श्रक अंगरक्षक-       सुश्री सबि‍ता कुमारी। ·        ओपीनदर-            मंगलक पि‍ति‍औत सार-         सुश्री चि‍न्‍तामणि‍ कुमारी। ·        परमानन्‍द-            चन्‍द्रेशक पड़ोसी-             सुश्री दि‍व्‍या कुमारी। ·        कृष्‍णानन्‍द-            चन्‍द्रेशक पड़ोसी-             सुश्री राधा कुमारी। ·        उमा-               ब्रह्मानंदक बेटीक सहेली-        सुश्री सोनल कुमारी। ·        मोतीलाल-            पंचायतक सरपंच-             सुश्री सुधा कुमारी। ·        रामानंद-                   चन्‍द्रेशक अप्‍पन लोक-          सुश्री खुशबू कुमारी। ·        चन्‍द्रकांत-            चन्‍देशक अप्‍पन लोक-          सुश्री ज्‍योति‍ कुमारी। ·        उमाकान्‍त-            चन्‍द्रेशक अप्‍पन लोक-          सुश्री नि‍क्की कुमारी। ·        शोभाकान्‍त-           चन्‍द्रेशक अप्‍पन लोक-          सुश्री मानसी कुमारी। ·        इन्‍द्र नारायण-          चन्‍द्रेशक अप्‍पन लोक-          सुश्री सत्‍यम कुमारी। ·        लूटन-              दोसर पेपरबला-              सुश्री संगीता कुमारी। ·        नरेश-               पहि‍ल गुंडा-                 सुश्री खुशबू कुमारी। ·        भद्रेश-              दोसर गुंडा-                 सुश्री द्रोपदी कुमारी। ·        उग्रेश-              तेसर गुंडा-                 सुश्री सुषमा कुमारी। ·        सुरेश-              चारि‍म गुंडा-                सुश्री रंजीता कुमारी। ·        महेश-              पाँचि‍म गुंडा-                सुश्री बबली कुमारी। ·        जयमाला हेतु दाय-माय-   गीतहारि‍ सभ-               ....................... सुश्री सरस्‍वती कुमारी। सुश्री पुनम कुमारी। सुश्री सुलेखा कुमारी। सुश्री रागनी कुमारी। सुश्री खुसबू कुमारी। सुश्री उजाला कुमारी। सुश्री पूष्‍पा कुमारी। सुश्री सबि‍ता कुमारी। नुक्कर- “साइकि‍लक पाय” नुक्करकार- श्री बेचन ठाकुर प्रस्‍तुति‍- (1)  ि‍वपीन-        हेड मास्‍टर-          श्री कि‍शोर कुमार ठाकुर (2)  राम सेवक-     कि‍रानी-                   श्री अवि‍नाश कुमार साह (3)  वि‍द्यार्थी-                         श्री चन्‍दन कुमार, कुंदन कुमार, सोनी कुमारी, (4)  प्रभाष-                          प्रभाष कुमार, (5)  वि‍नय-                          वि‍नय कुमार (6)  वीरेन्‍द्रक पि‍ता-                     चंदन कुमार (7)  शालि‍नी-                         .............. (8)  मधुकर-                         चंदन कुमार महादेव गीत- “अब ने चढ़ब बरदपर हौ बाबा......” प्रस्‍तुति‍- श्री कि‍शोर कुमार यादव। स्‍वागत गीत-1 “स्‍वागत की लए करब अहाँक......” गीतकार- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल प्रस्‍तुति‍- सुश्री पुनम कुमारी आ सुलेखा कुमारी। स्‍वागत गीत-2 “अति‍थि‍ स्‍वागतम् अति‍थि‍ स्‍वागतम्.....” गीतकार- श्री बेचन ठाकुर प्रस्‍तुति‍- श्री अमीत रंजन। स्‍वागत गीत-3 “प्रि‍य पाहुन स्‍वागत स्‍वीकार करू......” गीतकार- श्री बेचन ठाकुर प्रस्‍तुति‍- श्री मनोज कुमार महतो। आशीष अनचिन्हार भक्ति गजल जखन विदेह द्वारा बाल गजल विशेषांक निकलल रहए तखन केओ नै सोचने रहए जे एतेक जल्दिए गजलक नव प्रारूप " भक्ति गजल " विकिसित भए जाएत। मुदा से भेल आ ताहि लेल सभसँ बेसी धन्यवादक पात्र छथि ओ लोक सभ जे की गजलक निंदा करैत छथि। कारण जँ ओ सभ नै रहितथि तँ आइ गजले नै रहितै.. बाल आ भक्ति गजलक तँ बाते छोड़ू। की थिक भक्ति गजल-- जहाँ धरि भक्ति गजलक विषय चयन केर बात थिक तँ नामेसँ बुझा जाइत अछि ऐ गजलमे भक्ति केर वर्णन रहैत छै। तथापि एकटा परिभाषा हमरा दिससँ ----" एकटा एहन गजल जाहि महँक हरेक शेर भक्ति मनोविज्ञानसँ बनल हो आ गजलक हरेक नियमकेँ पूर्ववत् पालन करैत हो ओ भक्ति  गजल कहेबाक अधिकारी अछि"। जँ एकरा दोसर शब्दमे कही तँ ई कहि सकैत छी जे भक्ति गजल लेल नियम सभ वएह रहतै जे गजल लेल होइत छै बस खाली विषय बदलि जेतै। मे भक्ति गजल बाल गजले जकाँ छै। की भक्ति गजल लेल नियम बदलि जेतैः जेना की उपरमे कहल गेल अछि जे भक्ति गजल लेल सभ नियम गजले बला रहतै बस खाली एकटा नियमसँ समझौता करए पड़त। माने जे बहर-काफिया-रदीफ आ आर-आर नियम सभ तँ गजले जकाँ रहतै मुदा गजलमे जेना हरेक शेर अलग-अलग भावकेँ रहैत अछि तेना भक्ति गजलमे कठिन बुझाइए। तँए हमरा हिसाबेँ ऐठाम ई नियम टूटत मुदा तैओ कोनो दिक्कत नै कारण मुस्लसल गजल तँ होइते छै। अर्थात भक्ति गजल एक तरहेँ " मुस्लसल गजल " भेल। किछु लोक आपत्ति कए सकै छथि जे गजल तँ दार्शनिक रहिते छै तखन ई भक्ति गजल किएक ? उचित प्रश्न मुदा हम कहब जे दर्शन आ भक्ति दूनूमे बहुत अंतर छै जकर चर्चा विद्वान सभ करिते रहै छथि तँए ई भक्ति गजल दर्शन बलासँ अलग भेल। तारीखक हिसाबें भक्ति गजलक उत्पति केँ मानल जाएत जनवरी 2012केँ मानल जाएत जाहिमे जगदानंद झा मनु जीक भक्ति गजल आएल। मुदा ओहूसँ पहिने मिहिर झा द्वारा एकटा आएल जे ताहि समयकेँ हिसाबसँ ठीक छल मुदा बढ़ैत ज्ञानक सङ्ग ओहिमे काफिया आदिक दोष बुझना गेल। मुदा  भक्ति गजल  स्वरूप मैथिलीमे पहिनेहें फड़िच्छ भए चुकल छल।  मैथिलीक प्रारंभिके दौरमे भक्ति गजल शुरुआत भए चुल छल कविवर सीताराम झा आ मधुप जीक गजलसँ सेहो शुद्ध अरबी बहरमे। मने 1928 धरि भक्ति गजल पूर्ण रूपेण स्थापित भए गेल छल मैथिलीमे। तँ एतेक देखलाक पछाति आउ देखी कविवर सीता राम झा आ ओहि समयक किछु भक्ति गजल---तँ आउ देखी 1928मे प्रकाशित कविवर सीताराम झा जीक " सूक्ति सुधा ( प्रथम बिंदु )मे संग्रहीत एकटा गजलकेँ जे की वस्तुतः " भक्ति गजल " अछि--- जगत मे थाकि जगदम्बे अहिंक पथ आबि बैसल छी हमर क्यौ ने सुनैये हम सभक गुन गाबि बैसल छी न कैलों धर्म सेवा वा न देवाराधने कौखन कुटेबा में छलौं लागल तकर फल पाबि बैसल छी दया स्वातीक घनमाला जकाँ अपनेक भूतल में लगौने आस हम चातक जकां मुँह बाबि बैसल छी कहू की अम्ब अपने सँ फुरैये बात ने किछुओ अपन अपराध सँ चुपकी लगा जी दाबि बैसल छी करै यदि दोष बालक तँ न हो मन रोख माता कैं अहीं विश्वास कैँ केवल हृदय में लाबि बैसल छी एकर बहर अछि-1222-1222-1222-122 मने बहरे हजज नोट--१) कविक मूल वर्तनीकेँ राखल गेल गेल अछि। विभक्ति सभ अलग-अलग अछि जे की गलत अछि। २) कवि द्वारा चंद्र बिंदु युक्त सेहो दीर्घ मानल गेल अछि जे की गलत अछि। प्रसंग वश ईहो कहब बेजाए नै जे कविवर अपन गजल समेत सभ कवितामे चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि लेने छथि। शायद तँए पं गोविन्द झा जी सेहो चंद्र बिंदुकेँ दीर्घ मानै छलाह आ जकर खंडन भए चुकल अछि। ऐकेँ अलावे मधुप जीक भक्ति गजल अछि। विजय नाथ झा जीक भक्ति गजल अछि। कहबाक मतलब जे अनचिन्हार आखरक आगमनसँ पहिनेहे भक्ति गजल छल मुदा ओकर नामाकरण ( पहिल रूपमे जगदानंद झा मनु ) अनचिन्हार आखरक पछाति भेल। वर्तमान समयमे हमरा छोड़ि लगभग सभ गजलकार भक्ति गजल लीखि रहल छथि जेना , जगदानंद झा मनु, चंदन झा, अमित मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री, बिंदेश्वर नेपाली, सुमित मिश्र, श्रीमती शांति लक्ष्मी चौधरी, श्रीमती इरा मल्लिक, ओम प्रकाश, बाल मुकुन्द पाठक, जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल, मिहिर झा, प्रदीप पुष्प, अनिल मल्लिक, राजीव रंजन मिश्र इत्यादि-इत्यादि। ऐ विषयमे आर अनुसंधानक जरूरति अछि ऐ छोट आलेख आ हमर छोट बुद्धिमे भक्ति गजल एहन विस्तृत वस्तु ओतेक नै आएल जतेक एबाक चाही। ओना हम फेर विदेहकेँ ऐ विशेषांक लेल धन्यवाद नै देबै कारण हमहूँ विदेह छी आ लोक अपना आपकेँ धन्यवाद कोना देत। विहनि कथा- भविष्य वाह... ई बच्चे सभ तँ भविष्य होइत अछि। वाह....................... अच्छा ई कहू जे अहाँके ए.बी.सी अबैए..? हँ.... वाह उत्तम। अपन देशक चौहद्दी अबैए ? हँ...... वाह.. खूब नीक. बाबा-परबाबाके नाम मोन अछि ? हँ... वाह---वाह की संस्कार अछि। अच्छा ई कहू जे अहाँके की नै अबैए ? जी हमरा बस लाज नै अबैए ---- अवनीश मण्‍डल विहनि कथा-गप्‍पक खाैंइचा स्‍कूलमे सरजी सँ पुछलि‍यनि‍- “सरजी, खोंइचा छोड़ाएल गप केहेन होइ छै?” सरजी कहला- “हौ बौआ, गपे तीन रंगक होइ छै। एकटामे खोंइचा होइते ने छै, दाेसरमे गुड़मी-खीरा जकाँ पातर होइ छै आ तेसरमे बेल जकाँ तेहेन सक्कत होइ छै जे ओ सोहेबे ने करैए।” मुन्नी कामत -एकांकी- पात-पातसँ बनल परिवार प्रथम-दृश्य- (बड़की भौजी असगरे तामशसँ लाले-लाल अछि, जेना लगैत अछि जे ओकरा देह मे आ बोलमे कोइ लुंगिया मेरचाय रगड़ि‍ देने हुअए।) बड़की भौजी-    उंउ कइर-झुमरि, कइर-लुठबी बुझै कि छै अपनाकेँ? हमरासँ मुँह लगाओत। नमहर छोटक लि‍हाज नै, बाप रो बाप मुँहमे मेचो नै परै छै बजैत कला। आय अबए दै छि‍ऐ टुनमा बाबूकेँ, कहबै नै बनत हमरा एे मोगिया संगे हमरा भीन करि‍ दिअए। (शंकर कअ प्रवेश) शंकर-        टुनमा माए, हे यैयय टुनमा माए, कि भेल? एना किआ तिलमिला रहल छी! असगरे केकरा संगे बात करै छि‍ऐ। बड़की भौजी-    ओइ ऊपरबला सँ, जे नमहर बना कऽ तँ पठेलक ऐ घरमे पर भैलू कुत्तो जकाँ नै यऽ। आब तँ छोटकीकेँ बोल फुटए लगलैए। अपन बेज्जति‍ करबैसँ नीक यऽ कि पहिले सर्तक भऽ जाइ। हम भीन हइ लऽ चाहै छी। शंकर-        धुर्रर, बताह भेलिऐ कि! लोग कि कहत चुप रहू। चलु हम हाथ-पएर धोने अबै छी जल्दि खेनाइ लगाउ बड़ जोड़ भुख लगल अछि आ अहूँ कनी संगे खा लिअ तामश हटि‍ जएत। (पटाक्षेप।) दोसर-दृश्य- पंकज-        छोटकी कि भेलै यइ? आय भौजी पुरे घरकेँ अपना माथपर उठेने छै। छोटकी-       अहाँकेँ भौजी बेसी बलगर अछि तइ खातिर छोट-मोट बातपर हंगामा खड़ा केने रहैए। असल बात तँ ई छै कि दुनू पावर मिलल छै ने, साउसोकेँ आ जेठानियोकेँ तँइ मति‍ छिन्नु भऽ गेल छै। पंकज-        (तमसा कऽ कहै।) अहाँकेँ बजैक तमीज नै अछि। अहाँ अपन माइयो संगे अहिना बजैत रहिऐ आकि अतए सठि‍येलियइ हेँ। ठीके भौजी कहै छै अहाँकेँ जुवान नै रेती छी रेती। खब्बरदार जे हमरा माए सनक भौजीक विरूध एको गो अनरगल शब्द बजलौं तँ जीह घीचि‍ लेब। धनि‍ ई भौजी जे हम जिंदा छी। बिनु माएक तँ हम अनाथे भऽ गेल रही, यएह भौजी जे माए बनि‍ हमरा सहारा देलक। आइ ओकर एगो बात अहाँकेँ घोंटल नै जाइए। छोटकी-       हम छोट छी तँ अकर मतलब कि बड़काकेँ एड़ी तर मसलैत रही। हम आगू भऽ कऽ लड़ैले नै जाइ छी, मुदा एगो बात बूझि‍ लिअ कोइ आगु भऽ कऽ जे हमरा बात कहत तँ पाछु सँ हम छोड़ब नै। नमहर लोककेँ अपन बेवहारसँ छोटक आगु नमहर भऽ कऽ रहए पड़ै छै तबे उ नमहर कहाइ छै। (दूरेसँ शंकरक अवाज सुनाइत अछि) शंकर-        बौआ पंकज हौ कथीकेँ बहस करै छहक दुनू गोरे। आबा घरसँ बाहर आबह। जेना छोट बच्चा लड़ाइ-झगड़ा कऽ फेर एक्केठीम आ ओकरे संगे हसए-खलए लगैत अछि तहिना एकरा दुनूकेँ झगरा छै। तूँ आब एना बात नै बढ़ाबह। पंकज-        अबै छी भैया। (पटाक्षेप।) तेसर दृश्य- (3-4टा बच्चाक संगे पायल आ काजल घरक बाहर खेलाइत अछि‍। खेल-खेलमे दुनू बहिन आपसमे लड़ए लगैए, तखने बड़की भौजी बच्चाकेँ चि‍ख-पुकार सुनि‍ घरसँ बाहर अबैए आ एक थप्पर अपन बेटी पायलकेँ आ एक थप्पर छोटकीकेँ बेटी-काजलकेँ मारैत अछि। (थप्पर लगैत पाँच सालक काजल मुँह भरे खसि‍ पड़ैत अछि। तखने छोटकियो दौगल अबैए।) छोटकि-       बाप रे बाप, मारि‍ देलक हमरा बेटीकेँ। मुँहसँ खुन बोकड़ैत अछि। कोइ दौगू डॉक्टरकेँ बजेने आउ। काजल... बेटी काजल....! (जहिना छोटकी काजलकेँ कोरामे उठाबैत अछि सभ अबाक् रहि‍ जाइत अछि। काजलकेँ मुँहसँ खुनक पमारा निकलैत अछि। काजल मुर्छित भऽ जाइत अछि। बड़की भौजी दौग कऽ एक लोटा पानि‍ अनैए आ काजलक मुँह पर पानि‍ छिटैए।) बड़की भौजी-    बुच्‍ची काजल, बाबू कि भेल आँखि‍ खोलू। छोटकी-       ई मगरमछक नोर लऽ कऽ सहानुभूति‍ देखबै लऽ अतए नै आउ। हमरा बेटीकेँ ऐ अवस्थामे पहुँचा कऽ आब हमदर्दी देखबै छी! अगर अहाँ एक बापक बेटी छी तँ हमरा नजरि‍सँ दूर भऽ जाउ। हम अहाँक मुँह देखए नै चाहै छी। (बड़की भौजी कनैत घर चलि‍ जाइत अछि। पंकज डॉक्टरकेँ संगे दौगैत अबैत अछि।) डॉक्टर-       (काजलकेँ देखि‍ ओकर खुन सब पोछैत) चिंताक कोनो बात नै छै, अगुलका दाँत ठोरमे कनियेँ गरि‍ गेल रहै आ छोट बच्चा छै तँइ मुर्छित भऽ गेलै। हम किछु दवाइ लिखि‍ दै छी। मंगबा लिअ तीन दिनक खोराक अछि आ घबरा नै किच्‍छो नै भेलै। बच्चाकेँ अहिना छोट-मोट चोट लगि‍ते रहै छै। पंकज-        चलु डॉक्टर सहाएब, हम अहाँकेँ छोड़ि‍ अबै छी। (पटाक्षेप।) चारि‍म दृश्य- (बड़की भौजी आ शंकर दुनूक बीच ऐ प्रसंग पर चर्चा होइत अछि।) शंकर-        पायल माए, अहाँ ई ठीक नै केलौं। घरक झगड़ाकेँ तामशसँ अहाँ छोट बच्चापर निकालि‍ लेलौं। बड़की भौजी-    छोटकी आ बौआ तँ यएह सोचै छै कम-सँ-कम अहाँ तँ हमरा समझू, हम तँ झगड़ा छोड़बै खातिर दुनूकेँ कनिकबे जोरसँ मारलिऐ, हमरा कपारमे दोष लिखल छेलै तँइ ई घटना घटलै। छोटकी-             घटना घटलै कि घटना घटेलिऐ। हमरासँ लड़ि‍ कऽ मन नै शांत भेल तँ हमरा बच्चोकेँ नै छोड़लौं। (पंकज दिश ताकैत) सुनै छि‍ऐ आय अखने भीन होउ नै तँ हम अपना देहपर मटिया तेल छीट कऽ आगि‍ लगा लेब। पंकज-        अच्छा शान्‍त रहू, हमहुँ नै आब जड़ि‍मे रहब। ऐ खुनक खेल खेलाइ सँ तँ नीक रहत जे अलगे रहू मुदा शांतिसँ रहू। शंकर-        बौआ कि बजै छहक तूँ। एकरा सभकेँ बातमे आबि‍ कऽ तुहों अहिना बजए लगलहक। खबरदार जे फेरसँ भीनक नाओं लेलहक। पंकज-        भैया, ई हमर आखि‍री फेसला छी। आब हम जड़मे नै रहब। शंकर-        बौआ, लोक कि कहतह, एना नै करह। जल्दि‍बाजीमे कोनो फेसला नै करल जाइ छै। पंकज-        हमरा लोकक परबाह नै छै अगर परवाह छै तँ अपन बच्चा आ परिवारक। जखनि हमर बच्चा लहु-लोहान छल तखनियेँ हमर मन तोरासँ भीन भऽ गेलौ। (सभ मुँह लटका अपना-अपना कमरामे चलि‍ जाइत अछि।) (पटाक्षेप।) अंतिम दृश्य- (घरक सभ सदस एक संगे एकट्ठा होइत अछि।) राधेश्याम-      बौआ पंकज, कि भेलै जे बात भीन-भि‍नाओज पर चलि‍ एलै। पंकज-        बाबु हम कोनो तर्क-वितर्क करैले नै चाहै छी, हमरा जड़मे नै बनैए तँइ हम भीन हएब। राधेश्याम-      छोट-मोट बातपर घबड़ेनाइ आ जि‍नगीक संघर्षसँ मुकरनाइ ई इंसानक काज नै भगोराक काज छी। पंकज-        बाबू, आय हमर बेटीकेँ ई हाल भेल काल्हि‍ किछु और हएत। अतेक दिनसँ काजलक माए संगे होइत रहै तँ हम किछो नै कहैत रहिऐ, आब हमरा बच्चा संगे करए लागल अखनो जे हम किछो नै बजब तँ कहीं काल्हि‍ अंजाम ईहोसँ बूड़ा नै हुअए। राधेश्याम-      बौआ, काजल संगे जे भेलै उ संयोग मात्र रहै। एनाहियो तँ भऽ सकैए कि काल्हि‍ आइयोसँ नीक होय। बौआ भिन्न भेनेसँ खाली अंगना नै मनो बटाइत अछि। सम्मलित परिवार एक शरीर जकाँ होइत अछि। जेना शरीरक कोनो अंगमे एगो काँट गड़ैसँ ओकर दरदक लहरि‍ पुरे शरीरमे दौगैत अछि तहिना सम्मलित परिवारमे कोनो एक व्यक्तिकेँ किछो हो छै तँ ओकर दरदक एहसास पुरे परिवारक हर सदस्यकेँ होय छै। असगर रहनेसँ इंसान स्वार्थी भऽ जाइत अछि। जेना शरीरक कोनो अंगमे घाव भऽ गेलापर ओकरा काटि‍ कऽ अलग करि‍ कऽ बजैए मलहम लगा कऽ ठीक करल जाइत अछि, तहिना परिवारक बीच बरहल मन-मोटओकेँ प्यारक मलहमसँ आ आपसी समझौतासँ दूर करैत अछि। आय बड़की कनियाँकेँ एक थप्पर तोरा नजरि‍ एलह आ ओकर अतेक सालक दुलार बिसरि‍ गेलहक। जे भौजी माए बनि‍ हरि‍दम तोरा आगु ठाढ़ रहह उ अगर तोरा बेटीकेँ एक थप्पर माइरे देलकह तँ कि गुनाह केलकह। छोटकि कनिया हमर एगो बात सुनह, सासुरमे सासु माएक रूप आ दियादिनी बहिनक रूप होइत अछि। अोकरा जाबे तक जि‍नगीमे उतारबहक नै घर स्वर्ग नै बनतह बस मकान बनि‍ कऽ रहि‍ जेतह। जतए रहै आ खाइक सुविधा होय छै और किछो नै। (सब एक संगे हाथ जोड़ि‍ कऽ) बाबु हमरा सभकेँ माफ करि‍ दिअ, हम सभकेँ सभ गुनेहगार छी। जँए अहाँकेँ मन दुखेलौं। हम आपसमे कहियो नै लड़ब ने कहियो भीन हएब। (पटाक्षेप।) इति। शारदानन्द दास परिमल राजनन्दनक आत्मालाप एहि आत्मालाप  मे प्रथम पुरुष अपन दीर्घकालक यात्राक अनुभव कें अपना मुहें व्यक्त कए रहल अछि जे स्वानूभूत तथ्यक विश्वसनीयता कें गंभीरता  सँ प्रभावोत्पादक बनबैछ । एकरा लिखबाक पाछाँ हमर उद्देश्य कोनो व्यक्ति विशेषक प्रसंशा नहिं, मुख्यत: नवका पीढी(नव लोक) कें एहि वास्तविकताक प्रति सजग आ सचेष्ट करब अछि जे कोनो महान उपलब्धिक हेतु ककरो कोन तरहें दीर्घकालिक तपस्या करए पड़ैत छैक ।जेना अदनासन देखाइत छुद्र चूटी(पिपिलिका) सेहो डेगा-डेगी चलि पहाड़ कें टपि जाइछ । ताहि क्रमंे हमरा बुझाइछ जे कर्णगोष्ठीक संग कर्णामृतोक यात्रा सभ तरहें साधन-सम्पन्न नहिं रहितहुं ई विगत बत्तीस वर्ष सँ चलि आबि रहल निरन्तर तपस्याक प्रतिफलन थिक जे "मिथिला-मैथिलीक विकास में कर्णगोष्ठी एवं कर्णपामृतक योगदान(१९७४-२०११)" सकलनक रूप मे हमरालोकनिक सोझाँ प्रस्तुत अछि ।

एहि प्रसंग मे कर्णगोष्ठी मुम्बई आर्थिक सहयोगक अवदान कए यज्ञक पुरोधाक भाँति पूण्यक भागी छथि ।एखनुक जे समसामयिक लोकक(खास क नवका पीढीक) मानसिकता कनिएं क क बहुत हसोथि लेबाक अछि(जेना उगल चान कि लपकू पूआ),ताहि प्रवृतिक संदर्भ  मे कर्णामृतक साधना एवं उपलब्धि द्रष्टव्य अछि ।राज नन्दन बाबूक निष्ठा जे एहि व्याजें सुव्यक्त होइछ ,वोहि मे कोनो तरहक आत्मश्लाघा नहिं भ क मात्र वस्तुनिष्ठ निरपेक्ष प्रदर्शन अछि जे आत्मालापक रचयिता द्वारा कएल गेल अछि ।वो एहि रीतिएंँ  मिथिला मैथिलक कृतज्ञता विज्ञापित कए रहलाह अछि,संगहिं नवका पीढी कें ओकर कर्तव्यक दायित्वबोध करेबाक उपादान सेहो उपस्थित कएलनि अछि ।

एहि आत्मालाप मे एक व्यक्ति नहिं संस्था बाजि रहल अछि जाहि सँ मिथिलालोकक आशा, अभिलाषा आ आकांक्षा संलग्न अछि ,से बात बुझबाक चाही  ।साहित्य मे सत्यक अभिव्यंजना एहुना होइछ,पाठक कें अपन मानस क्षितिज उदार बनाक रखबाक चाही, सैह हमर अभ्यर्थना । आत्मालाप - राज नन्दनक

   हमरा नहिं किछु चाह, मैथिलीक परिप्लावन  लए हमजीबइ छी ।    सुधी पाठकक लेल पत्रिका कर्णामृत कें नित डेबइ छी ।    तीन दशक कए पार वयक्रम वृद्ध अपन होइतहु सेबइ छी ।    यदपि छोट डोंगी कें जलधि मे रहि जलपोत जकाँ  खेबइ छी ।

   नित्तहु प्राच्य क्षितिज सँ दिनकरक अभिवादन अरुणिमा पबइ छी।    दिग-देशान्तर पार सँ अनिलक आनल सुखद समाद जे लई छी ।    बहुधा मेघाच्छन्न दिगन्तक रहनहुँ नभ निर्मेघ पबइ छी ।    पबइत पाणि-स्पर्श पयोदक संकेतल ,अभिराम रहइ छी ।

   लाभ ई नाम "राजनन्दन "भएने अछि एतवा जे हम ने थकइ छी ।    आधि-व्याधि बाधा कें पार नहिं जिजीविषा पर पाबै दइ छी ।   ओतबै नहिं हम व्यवधानहु सँ अभिनन्दित भए राज करइ छी ।   "मैथिलीक"आशीष अपरिमित मैथिलीक सेवा सँ पबइ छी ।

   "कर्णामृतक" अमिय संपोषित सेवा सँ जे अमृत  पबइ छी ।    बुन्न मात्र सँ परिप्लावित भए हम अजस्र सुखसिन्धु लहइ छी ।    "कर्मण्येवाधिकारस्ते" केर मिहिर- बलें घन तिमिर कटइ छी ।    की आश्चर्य  यदि भरि उड़ान हम सात समुद्रो पारक लइ छी ।

   मैथिली-साहित्यक मंजूषा मे स्वर्णिम संस्कृतिक धरोहर,    राखल रहए तेना जे भविष्यो पाबए संगति युगतक सुखकर ।    दिग-दिगन्त कें करति प्रहर्षित सुर-सरगम संगीतक फरहर,    शिवक नचारि-महेशवाणी सँ गूंजित जनकसुता केर नैहर ।

   गौरव सँ उच्छ्वसित बसातो सौरभ सुमनक सुखद पसारए ,    मार्तण्डक-ज्वाला प्रचण्ड सँ मैथिलीक हरियरी न हारए ।    आस्था तुंग हिमाद्रि-शृंग सन व्योम मध्य कीर्ति-ध्वज धारए,    जकर स्तवन मे आह्लादित मुग्ध भुवन आरती उतारए ।

   "कर्णामृत" सार्थक पीयूष जे अंजलि भरि-भरि जन तक आनए ,    गरिमा संग माधूर्य तिरहुतक बन्दनवार क्षितिज तक तानए ।    संभव तैं पुरि संग निसर्गो सुखद संयोग मुहूर्तक ठानए ,    बत्तिस ग्रं्थक भेल प्रकाशन हेतु प्राप्त अनुदान प्रमाणय ।

   लेसल  गेल "श्रीधरक" कर सौं "कर्णामृतक" जे टिम-टिम वाती ,    रहलहुँ  से उसकावति टेमी खरिका सँ, सेवति दिन-राती ।    निरवधि-काल विपुल पृथ्वी केर छुबइतक्षितिज रहत ई पाँती,    की न एहन सुधि-संरक्षण सँ होएत तृप्त मातु केर छाती ?

   की न मैथिलीक संतानहुँ कें पथ प्रशस्त होएत लेखा सँ ?    काल-भाल पर  कर्णामृत सँ टपकल स्मित बुन्न-रेखा सँ,    दूर अतीतक आँजुर सँ उठि अबइत सरगम अनदेखा सँ,    सहज सरल सम्बुद्धि सुपोषित प्रज्ञा केर उत्सुक पेखा सँ ।

   होइत रहल गुंजरित "सदुक्तिक" मंजुल स्वन अनवरत कान मे,    मधुर सारगर्भित प्रस्पन्दन उष्मा भरइत स्वत: प्राण मे ।    नौ सदीक विस्तार पार करि चलि अबइत उर्जा अम्लान मे,    कर्णामृतक सैह सुर-सरगम उर्मिल अछि एखनहुं उड़ान मे ।

   अमलिन स्मित-हरित सुधि-सुरभित भूमि ई यावतकाल रहए,    संस्कृतिक सुकुमार अरुणिमा-दीप्त मैथिलीक भाल रहए ।    तावत कर्णामृतो पसारति अविरत प्रीतिक ज्वाल रहए,    कर्णामृतक हिंडोल में झुलइत वृद्ध, वनिता आवाल रहए ।

   चाह हमर मैथिली-मानसक कर्णामृत ई मराल रहए ,    ताल दैत संतरण मे जकरा दत्त चित दिक् ओ काल रहए,    अमित उड़ान भरैत कल्पना जाहि छविक प्रतिपा़ल रहए,    होइत नित मैथिली-मनीषा जइ सँ सदति नेहाल रहए ।

   उत्पत्स्यति कोअपि समानधर्मा" भवभूतिक धार पकड़ने,    हम ने रहब त हमर तपस्या  धैर्यक पारावार पकड़ने,    दिवा-रात्रि केर चोरा-नुकी बिच प्रत्यूषक झंकार पकड़ने ,    बढ़त घार मे कालनिर्झरक ककरो शुभ अवतार पकड़ने ।

   नदी सदानीरा वसुन्धरा सरिताजल पटबैछ साल भरि  ,    धन्य होइछ आदित्य रश्मि-अभिषेकित भोरे जकर  भाल करि,    जतए उतरि नीरव-निरभ्र नभमे शरदक हो मुग्ध विभावरि,    रजनीगंधा केर  वितान मे थकए न मलयानिलो ताल  भरि ।

   नहिं विदेह नहिं सीरध्वज हम तदपि उर्वरा शक्ति उभारल,    नहिं नृप तइयो मिथिलामाटिक प्रतिभा कें दए  हाक उतारल ,    कृति कें भोला लाल दास केर दीपदान दए सुधि झंकारल,    मातृ-पितृ रृण भूमिक प्रति हम निज कृति सँ एहि भाँति उतारल ।

   प्रतिभापूंज मैथिली पुत्रक स्मृति मे जे अंक निकालल,    अर्घदान आलोकसुछन्दित अमरत्वक झंडा सन गाड़ल,    सारस्वत स्तंभ मेदिनीक व्योमक राखत छवि अजवारल,    रहत जाहि सँ लोक चेतना स्पर्शित भए सदति पखारल ।

   दीपशिखा केर रिजु कंपन सँ अट्टहास करि हँसत अमरता,    सतत सरस्वतिपुत्रक कर सँ उद्घाटित प्रातिभ उर्वरता,    अंगीभूत करत दर्शावोत मुड़ि इतिहास अपन तत्परता,    हरति  चलत जे दीर्घकाल तक सकल समाजक बौद्धिक जड़ता  ।

   पालन, पोषणआ विकास मे जतवा किछु पावोल समाज सँ,    तकर करति प्रतिपूर्ति किंचितो द क जाइ सुख अपन काज सँ,    सैह यत्न होइत आएल अछि सेवा में रहि "नन्दन राज" सँ,    कर्णामृत  कें लेल जुटाबति संगीतक हित साज-वाज सँ ।

   आसक, अभिलाषक,उल्लासक बनि पतंग नभ मे कर्णामृत,    दैत रहल आश्रय उमेद कें कते भविष्णु लेखकक,उड़ि नित,    प्रोत्साहन सँ नव प्रतिभा केर सुुष्ठु विकासो कएल सुनिश्चित,    कर्मनिष्ठ अविरत सेवा सँ अछि गौरवास्पद यशक सुअर्हित ।

   नहिं टिटही टेकल पर्बत सन,हमर भूमिका मैथिलीक प्रति,    हम होइत अभिसार तकै छी गगनक पार गगन तक उन्नति,    मैथिली संस्कृति-साहित्यक सम्मान करए उठि विश्वक सम्मति,    सफल अपन साधना तखन हम बूझि सकब जे पओलक सद् गति ।

   नगर-नगर हम छानति फिरलहुँ लेने कर मे लोटा-डोरी,    डगर-डगर पानिक तलाश मे कनहा लटकल  बोझने झोरी,    जते भए सकए लोकक मन सँ भावक संवेदना निचोड़ी,    किय न चेतना जगबइ खातिर भावक जल मे मधुरस घोरी?

   चलति बाट एकसरो हमेशा हमर इएह पाथेय रहल अछि,    मातृ-मंदिरक आराधन मे सेवा एहि विधि धेय रहल अछि,    राग जे कंठ सम्हारि सकए नहिं गीत हमर से गेय रहल अछि,    वाणी चिरकल्याणी बनि विचरए जन-जन मे श्रेय रहल अछि ।

   यदि नहिं मान बूझत मैथिल चलि जाए न जेना गेलीह वैदेही,    भेलीह भूमिगत लोकक रहितहु सुधि संवेदनशील,सुगेही,    ओ छलि मैथिली,इहो मैथिली शंका मन मे उठइछ मेहीं,    किए कि नवका लोक लगैत अछिमातृ-साहित्यक प्रति नहिं स्नेही ।

   लजविज्जी सुकुमार सदृश अनुराग होइत अछि साहित्यक प्रति,    से न प्रवाहित हो यदि सहजहिं होइछ संस्कृति कें बड़का क्षति,    जेना-जेना नव शहरी सभ्यता नवका लोकक मारि रहल मति,    भौतिक होइत विकासक सोझाँ संस्कृतिक झलकैत अछि अवनति ।

   अन्देसा मांत्सर्य सँ उपगत होइछ क्षितिज पर हमर चेतनक,    जखन तकै छी गगन भविष्यक एहि संध्या मे अपन जीवनक,    भेल जा रहल सिमटि संकुचित आपकतामय शील जन-जनक,    शहरक आकर्षण मे लुब्धल विसरि पुरातन मान साधनक ।

   शारदानन्द दास परिमल    ४ अगस्त २०१२,नई दिल्ली कामिनी कामायनी लघुकथा- घुइर ताकू छोटकी काकी काल्हि रातिए अपन पियरका नुआ के सोडर मे उसिनलन्हि। परात भेने बुचीदाय स बजलीह  ‘गे खुरलुच्ची ,चलमे गे बच्चा , पोखरि स ई पखारि आनु । जखन नामे खुरलुच्ची पड़ल छल त बूच्ची दाय शांत कोना रहितथि ,सदी खन सब ठाम ज़ेबा लेल बेकल  पाँच छौ बरखक उमरि।   ‘चलू’ ,ओ फट दनी गोटरस खेलेनाय छोड़ि जेबा लेल दुनु टांग  पटकेत उठल । एक हाथ मे पीटना आ दोसर मे अलमुनियम के कारी खटखट ,पिचकल पाचकलछोटकी डेकची  मे उसिनल नूआ । भरि बाट उठैत बैसेत रहली , चलल ने होय छन नीक स  ,  अहि मध्य आह ,उह करैत अपन जुगक खिस्सा,गप्प सप्प बांचैत जा रहल छली। ‘ओ जुग छल,बुझलही बुची,हमर सबहक किओ पैर ने देखने होयत ,चौखटि स बाहरि पएर राखि दी कक्कर मजाल ?सब  दलान  त बूढ़ा सब पकड़ने ,। बुढ़ पुरनिया के कतेक प्रतिष्ठा ,कतेक लेहाज़  । ओ आराम ओ सुख आब कतय,कलिजुगक पाप स आब त ने तेहन धरतिए उपजे छै,माले जालक बरक्कति छै ,लोक सेहो तेहन खविस भ गेले ,खेती छोड़ि नौकरी करय लागल अछि । लाजो धाक नै बचले ,दलान प कोनो बुढ़ नै बचलेथ , घरे घर चुलही तर पुरुख सब घुसनाए सुरू करी देलके । तहिया कनिया बहुरिया दरवज्जा की ,खिड़किओ धरि स बाहरि हुलकी मारब स परहेज करैत छल ,,,,आब त , की पोखेर ,की इनार’कत्त नै पैठ ओकर सबहक । ‘आ ओ जे मसूद पुर बाली छथि,हुनक ससुर बड़ गरीब ,एतेक गरीब जे पनि भरनी धरि नै राखि सकैत छलिह ,,मुदा कुलीन एतेक जे तेसरे पहरि राति उठी क पोखरी,इनार स पानि बाला काज फरिछा लैत छलिह।पुतौहों एहेने सुशील भेटलनहिं   ,,मुदा आब हुनके पुतौह के देखही ,गई म्या,घर बाला कत दन की दन करे छै,,कोट पहिर क बुले छै मौगी”। ,एक बेर जखन ओ गप्प सुरू करी दईथ ,त लगबे ने करे की ,कोनो बच्चा बुतरु लग मे छन्हि की कोनो चेतन । भाय भाय बड़ बड़ेने जाइथ। जौं किओ नहिओं होय सुनए बाला तइयो हुनकर वएह चालि । “ओह गे बच्चा ,गै हाथ पकड़ा गे,,,पएर मे बग्घा लागि गेले ,ओ हो हो ,अ ह ह ह ,,महादेव ई की केलहु ‘। हाथ त हुनक पकडबे पडले ,नूआ बाला बासन सेहो माथ प उठबय पडले “ह चलू आब , एतेक कष्ट होय अछि ,पुतौह ने पखारि देती” । पुतौह के नाम प हुनका एड़ि के गरमी मगज प पहुँच गेलन्ही “मार बाढ़नि छूतहड़िया के  ,   हम्मर नूआ धोत की ओ अप्पन गजेड़ी भंगेड़ि बापक     सारा निपत ,”। पोखरिक घाट प टांग पसारि काकी इतमीनान स बैसेत बजली “ला गे बच्चा ,बासन ला ‘। तसली स नुआ उनटि,ओहि मे पानि भरि लग मे राखि लेलथि आ नुआ प चुरू स पानि  ध ध क पीटना स पीटय लगलिह । “काकी बूढ़ मे ई पीयर नुआ ‘? “गे चुप रह बेटी देलक ; देखै छै जे झुरकुट बूढ़ बसन पट्टी बाली ,केहेन छाप बाला नुआ पहिरति अछि’। “काकी  , मुदा नूआ मे कनिको जान  नहिं, जे दिन नै चरर   बाजि जायत ,दोसर कीन लीअ’।   “ह गे तोरे बाप हमरा कमा क पठा देता’।   ‘मर्र,  हमर बाप  किए पाए पठौता ,अपन जे कोसल रखने छी गाड़ि क’ से कोन दिन लेल’। काकी भयंकर तमसा  गेली “तोरे नाना देने अछि कोसल गाड़ि क राखय लेल ‘। बुच्चिदाय चुप भ गेलिह । ठेहुन धरि वस्त्र उठा क ,घाटक तेसर   चारिम सीढ़ी प ठाढ़ नुआ के एक छोर एक हाथ मे पकडली ,आ शेष के जुमा क पानि मे फेकलनि,नुआ छत्ता जका फुलि गेले ,तहन दुनु हाथ स नहु नहु छोट करैत ,दुनु हाथे गारि क पानि बहरेलथि। “हरे राम ,हरे राम करैत पानि स बाहर भेली । फेर नूआ बाला बासन आ पीटना बूची दाय के थमा देलथी। आधे बाट पहुंचल हेतीह कि लुखिया दौगल आबेत छल  ‘यए दाय ,जल्दी चलियो बड़का गाम बाला पीसा अलखींनह ‘। काकी एक दमे चिहुक उठली  ‘गैई म्या ,जुलुम भेल आब ?की करू की नहीं करू ,पाहून एला हें ,दलाने प बेसल हेताह , कोन बाटे जायब आँगन ,नूओ नीक नै पहिरने छी”। बुच्चीदाय हुनक समस्या के समाधान करैत बजली “हमर बाड़ी दने चलि जायब ‘। आ काकी पछबड़िया बाट स ओकर बाड़ी के इंट देवार कहुना क पकड़ि पकडि अपन आँगन मे पइसल  छलिह। “की काकी पाहून गेला ‘?   “ह गे ,कखने गेलथि । ओ राज काज बाला लोक ,हुनका पलखति छनि सरोजक बर जका  नीफिकिर भ क ससुर क कप्पार प बेसबा के’ ओ त ककरो बरियातीमे आयल छला त एक रत्ती ससुर् क हेम क्षेम लेबय चलि आयल छला ,एक लोटा पानि पिलथि ,चारी टा दछीनी सुपारी आ, दु जोड़ जनेऊ बस ,आ जायत रहला” । ओ ओसारा प अपन नूआ के सरियाबैत बैस रहली  ‘की कहिएईन् बहिन ।ई सौराठ बाली निरासी , हमारा जिबय नहीं देत ,की पाहून ,की पड़क ,ई अठ्ठा बज़्जरि खसा दैत अछि ,देखियो ,,आय फेर भानस बन्न करी मुंह फुलौने अन्हारघर मे पेटकुनिया देने पड़ल अछि, दुनिया भरि के गरिओलक ,फज्जति फज्जति करी देलक  । ओ त पैत रखलथि गोसाई जे ओझा खान पीन नहि केलथि।  हम त हैया हाथ उठा क चिकरि चिकरि क उगलहा स कहैथ छिएईन्ह जे कुमार बेटा रहि जाए ,,ओहि गाम नै विवाह करी ,ई कोन जनमक पाप अछि हमरा कप्पार प  ’। बूची के दाय अचार मे तेल ढारैत मौन भ हुनक गप्प सुनि रहल छली। तखने बड़की काकी सेहो आबि गेली “की भेल ए कनिया ,किएक एना बताहि भेल छी,’’? अहि आहे माहे मे बुच्चिदाय के बड़ मोंन लगेंह । जों ओसारा प गप्प होय त आँगन मे फुसीओ कोनो काजक लाथे ठाढ़ भ जाए ,बड़ आज्ञाकारी बनि पान सुपारी के तश्तरी  सेहो ल आबे । खास करि क दादी सबहक गप्प त खिस्सो पिहानी स रमनगर ,जे विशेख करि क पुतौहे ल क होइत छले , , आ रंग बिरंगक भाव भंगिमा । जे कनिया के ओ बड़ नीक ,बड़ सुनरि बुझे हुनको सबहक पोल खोलल जाए ,चीरहरण होय एहेन गोष्ठी मे । बड़की काकी छोटकी काकी के दुख सुनि तमेक पडलिह ‘ये एतबा मे अगुता गेलोन्हु ,हमर सतलखा बाली सन बज्र खसौनी स त लाख कच्छ नीक अछि ,ओकरा त भगवती रूपो देने छथिंह,आ ई करिलुट्ठी। नहा सुना क भगबती के सीरा नीप ,धूप दीप देखा क कहलिए “कनिया ,काल्हिओ उपासे छल ,आईओ बड़ बेर भेले ,जे देब स द दिय खाय लेल ,बड़ भूख लागि गेल’ कि ननदि स लड़ी क जरैत चुल्ही मे पानि ढारि बजेत अछि ‘अंगोरा खौथ’। चूड़ा फुला क खेलहू कहुना करि क। {हुनका चूड़ा दहि नहिं रुचय छलेंह} कनी दिन लेल एले ह मालती ,ओकरा देखय नहीं चाहे छै। भरि दिन हड़ हड़ खट खट  ,कखनों क़हत हमरा नूआ नहिं किन देत छथि, कतेक बेर अहिना पड़ा क नैहर पहुँच जायत अछि ,महिंदर त नहिं जाय छन कखनों बिदागरी करबा क आनय लेल ,अपने बाप भाय आनि क सासुर मे बैसा दैत छें न । एतेक ईर ,की कहू  कनिया घुड़क मारि धोंकड़िए जनेत अछि , कखनों  काल मों न करैत अछि जे बाध बोन मे पड़ा जाइ ,घर त्यागि दी  ” । “काकी ये ,सबहक पुतौहे किएक खराप होईत छै? सौसे किए नीक रहैत छै”?बइसल बइसल बुचिया अपन मौत् क फरमान जारी करि देलक । “गै , तू हमरा सब के अधलाह कहबे’ ये मठौली बाली ,देखू  अपन ,कबौछ लगा क जनमेने रही की ? हे दाय ,जहि नग्र तू जेबए ,अखने स हक्कन नॉर कनैत हैत”। “तखन त ई हो नगर कानल हेतैक”। आ पूरा बाजियो नहिं सकल की गाल प बड़ी जोर् क थापड़ पड़ले , ‘मरि गेले हे हे” पाछा मुडी क ताकलक,त माँ छलिह घोघ तानने । “ऊँह मोने मों न त खुसी ए भेल हेतेंन सौस सबहक निंदा सुनि देखबै लेल मारैत छथी’कनैत बजेत भागल ओ ओत्त स । “की गे फुलेसरी ,आय तोही फूल ल क एला हें ,कहिया एलही सासुर स  , ,सौस केहन छौ ,माने दाने छौ की ?” लालकाकी मलिनिया स गप्प करय लगलिह ,आ ओ नोरे झोरे कनैत ,सौसक देलहा दुखक बखान करय लागल ,ओहि दुख स पड़ा क त नैहर आबि गेल अछि। “बज़्जर खसो ,’लाल काकी ओकर सौस प  बज्र खसब लागली । बूची दाय फेर उपस्थित “यै लालकाकी ,आब अहि जुग मे लोक बज्जर ने बम खसबे छै। अहु ओकर सौस प बम खसबीओ ,एके बम मे सुरलोक चलि जेते’। लाल काकी हसय लागली “ई छौडी त जुग मे भूर करैत अछि ,एखन की बुझबहक दाय’। कत्तय कोन गाम मे , सत्संग वा भागवत चलि रहल छै ,बड़की काकी के सब खबरि रहैत छलनहि । अपने सब बुढ़िया विदा होइते छलिह,आ हाथ हाथ भरि घोघ तनौने  कनिया बहुरिया सब के सेहो  संग नेने जायथ। “ये काकी {हलाकी ओ सब दादी छलिह ,मुदा धिओ पुत्ता सब हुनका सब के काकिए कहेंह } आहाँ सब त बुढ़ पुरानछी,पुतौह सब त आजुकाल्हिक छथिन्ह ,सिनेमा देखा दियौ ,मेला घूमा दियो ,,ई की अपना संग हिनको सब के बैतरणी पार करय लेल नेने जाय छी ?’ बूची के गप्प सुनि छोटकी काकी अपना सब मे हाथ मुंह चमकबैत नहुं नहुं बजली “ई बुचिया ,बड़ बदियल,की कहियन्हि, काल्हि कहलिए जे हमरा संग कनि पोखरि चलबे ,चलि त गेल मुदा भरि बाट से दिक केलक से बुझु नै, गाडल धन ,कोसल ,निकालु ,नबका नुआ किनु ‘’। बूची के कान मे ई गप्प पडी गेले ,ओकरो शोणित खौल गेले ,मन मे उठले ‘माथ प उठा क हिनकर मईल बासन ,हाथ पकड़ि हिनक हम पोखरि ल गेलहू आ ई हमर निंदा करेत छथी’। ओकरा खबरि छले ,कत्तों ज़ेबा काल हुनका किओ घुईर ताकू कहि दैक त ओ एकरा बड़ पैघ अप शकुन माने छलिह ।हुनक देह स धधरा उठय लागे छल,आ मुंह स लाबा फुटय लगे ।,आ नतीजा ,बजनीहार के बड़का बड़का गारि आ सराप । जतरा सेहो स्थगित करि दैत छलिह । बस बुची दाय चिकरली पाछा स “यै छोटकी काकी ,यै घुईर ताकू ,घुईर ताकू ‘। आब की ,  बिरनी के छत्ता उजड़िचुकल छल। ,छोटकी काकी ओहि माझ बाट प ठाढ़ भ सम्पूर्ण टोलक स्त्रीगनक सोझा  बुचिया के दादीए  के गरियाबे लागल छलिह जे एहेन उकट्ठी पोती हिनका कोन पाप क कारने भेलन्हि।आ अपन माय के हाथे तूर जका धुनाई सोचि क , बुचिया ओत’ स लंक लगा क पड़ायल छल ॥ लघुकथा- माटीक मुरुत चारहु कात कुहेस् क साम्राज्य ,मोटका ,मोटका ,उज्जर ,धप धप, धूस ओढ़ने गाछ बिरिछ ,सोझा के लतामक गाछ जे घर स दस डेग पर ठिठुरति ठाढ़ छल ,आंखिक दर्शन शक्ति स, बाहरि , , हिमालय के तराई मे बसल अहि छोट सन शहर प,अहिना पहिनहु स ,शरद रानी बिशेख वात्सल्य प्रेम स आविर्भूत रहैत रहल छली,आ एखन त, सद्यः हुनके प्रिय समय आ, साम्राज्य । ओहि प्रलयंकारी शीतलहरी मे घरक भीतर लोक वेदक हाथ पैर सुन्न भेनाय स्वाभाविक छल ,मुदा कोढ़ फाड़ैत करून चित्कार ‘ ‘गै म्या, गै म्या” सुनि कियो नहिं सिरक क’ तर नुकायल रहि सकल छल,धड़ाधड़ि अड़ोसीया  पड़ोसिया के दरवज्जा खुलि गेल छले। ओढ़ना ,कंबल ,मोफलर ,सौल मे बांहल ,छेकल लोग हिम मानव बनल  टौवाइत टौवाइत एक दोसर स, ओहि अनुत्तरित प्रश्नक समाधान पाबए लेल बेकल ,मुदा केकरो किछू नहि बुझल जे मिसेज ठाकुर के किएक गाड़ी प, उठा पुठा क, अस्पताल ल जायल गेल ,वा  के एना हाक्रोश करि रहल छल । गप्प खुजबा मे कनि काल त, अवस्स लागले ,मुदा तखन ककरो बिस्वास ने भ रहल छल मिसेज ठाकुर त, एना सपनों मे नहि करि सकैत छली ,तहन केकरो पेट मे पईस क त’ लोग नहीं देख सकैत अछि । असंख्य सम्बोधन स संबोधित मनुख सन हुनको संग समय भेष बदलि क; डेगा डेगी आगा आगा चलैत ,लुका छिपी खेलाइत पाया कातक ओहि राज्य मे जा क’ नूका रहल छल । एक बीत्त के घोघ तानने, ओ दस बरखक बहुरिया पाँच हाथ क  ललका नुआ मे लेपटायल भट भट खसैथ, त बेस लाम चाकर सौसक बज्र बोलक लगाम तुरत हुनक कान मे पड़ेंह “की खुआ क  माए बाप पोसलक ,जे दु डेग चललों ने होएयै” । सासुर मे त जेकर जे रिश्ता नाता होए ,तही स,संबोधित करेन्ह,मुदा परोछ मे सबहक लेल भानपुर बाली रहैथ,। अपन जन्म स्थानक नाम जेना अपन पीठ प’खोदबा क, स्त्रीगन सासुर जैत अछि ,आ,जीवनपर्यंत ओकर वएह नेसान बनि जैत छैक । आब नीक सुभाव रहल ,ठोर मुंह नीक रहल,पीत्तमरू रहल  त’ ओहि गांमक मान मरजाद बढल,बदियल ,मरखाह ,गुमान वाली भेली त, परात उठि क, किओ ओहि गामक नाम  लेबा के सोचिओ नहि सकैत छल । भानपुर बाली के गोतियो सब हुनक अदम्य जीवट आ, संघर्षशील जीवनक  चर्च  परोछ में करईत कखनों ने कखनों नतमस्त्क त’ भ’ जाएत हेताह ,मुदा प्रत्यक्ष मे लोक ओहि लोक क प्रशंसा केनाय उचित नहीं बुझे छै ,जेकरा स कोनो प्रकारक लाभ नै होय । एक सधल नटी सन दु टा खुट्टा पर बांहल ज़ोर प पएर ,आंखि एकदम ,सीध मे ,माथ पर चारी पाँच टा घैल ,,ह , भानपुर बाली एहीना पएर संभारि क, कतेको बेर अहि खूँट स’ ओहि खूँट आ, ओहि खूँट स, अहि खूँट आबैत जैत रहली ,मुदा तखन त’ हुनक धुआ देखि क दियाद  सभक हिय झरकि जाए । पेलवार क नजरि मे ओ अबला कतछलिह ,भरि मुह दांत भ’ गेल  छलन्हि,पीत्त देखाय पड़ ‘लागल छल,आ, माथ प, कनी टा टा सींघ सेहो देखाय पड़य लागल छल । मुदा ओ त बाद मे ।  , क’ ट’ करि क’ जोडि जाड़ि क’ चीठी पटरी लिखबा योग्य साक्षरता ,बेटी के पढ़ालिखा क जज बनेबा के छै की ?फुकते त’ चूल्हिए, बाला जमाना मे ,अतीतक ड्योढ़ि जे आब नब जमाए लेल पायस बनेबाक सेहो सामर्थ नहि रखैत छल,नवम दसम होइत ,सुखी सम्पन्न घर देखि अपन माथ क’ बोझ उतारि देल ,आब सासुर मे जे जेकर भाग्य ,भोगतै जिनगी ओहि भांति । तखन अपन छोट छोट हाथ स ओसारा प’ राखल बड़का सिलौट प’ मोटका लोढ़ी स’ मसल्ला पिसइत ,बड़की दियादिनी स’ नहु नहुं बजैथ “हम सबटा काज करि दैत छिएइन्ह,ई भानस करि लौथ हमारा रानहय नहि आबैत अछि,बाबू बड़ खिसियाय लागैत छथिंह,’ । दियादिनी मुसुकि क’ रही जायथि ,ससुर के गारि बात आंखि क’ सोझा नाचि उठेक “ई भानस मनुक्ख खेबा  जोगर छै ,दालि अनोन ,तरकारी मे एक ढ़ाकी नून ,’। सौस आगि प’ओडिका ल क घी ढ़ारैथ “सोइत्क बेटी छथि,सुकुमारि’ । गोर नारि ,पातर छितर ,कलसगर ,नीक आंखि नाक ,भानपुर बाली ,पीअर ,हरियर नुआ के देह मे ऊपर स’नीचा लपेटने निहुरि निहुरि क’ ओते बड़का टा आंगन मे दुनु  सांझ झाड़ू बहाड़ू करैत हाफ़य लागैत त’ पनभरनी बिजूरी ल’ग आबि क’ छीन लेन्ह बाढ्नि ‘है लभकी कनिया ,आहाँ किए छूबे हीए बाढ़्नि,हम कथि  ले हिये’। त’ घोघ क, नीचा स’ हुनक दाड़िमक बीज सन दांत चमकि जायन्ह।“सिखबाक चाहि नै,तखन नै बुझबे काज कोना होइत छै’। पाबनि तिहार मे जे नब नूआ आबै त पहिने घरक सब स्त्रीगन अपन अपन पसीन्न के चुनि लइथ,आब हुनका हरियर नै नीक लगे ,मुदा उपाय की ,दू नॉर कानि लइथ ,कतेक दिन धरि ओ नूआ ओहिना सन्दुक प’ राखल रहि जाए ,सब हुनक  अईठी प’ हसैत रहे कोन  कोन नै फकड़ा पढल जाए ,हारि क’ हुनका ओ नूआ पहिरैए पडैक । नहु नहु  आब हुनको सौख मौज जागय लागल रहेंह । अपन बड़का बड़का आंखि मे काजरि लगा क’ नीक जका नूआ पहिरै लागल छलिह । भरल दुपहरिया मे ,अपन कोठरिक दरबज्जा सटा , नीचा पटिया  ओछा क’ सीकी के बड़का पौती स’ कजरौटी,पोडर अफगान स्नो ,अलता ,टिकुली ,सिंदूरक कीया, किलिपक पत्ता ,ककबा संग बीत्त भरि के एना निकालि क’ पौती के सोझा ठाढ़ करैत । अपन बड़का बड़का केस के जुट्टी स’ निकालि क नारिकेर् क  तेल स बड़ी बड़ी काल धरि माथ् क मालिस करैत रहेथ 'फेर ककबा स' थकड़ईत थकड़इत पहिने बाम कात के जुट्टी गुथेथ,ओकर नीचा मे ललका फीता के खूब पैघ बड़का फूल बनाक ,ज़ोर स पीठ प फेक ,दोसर दिस क  जुट्टीगुथेथ, फूल बनाबैथ ,फेर दुनु के एक दोसर मे फसा क बीच माथ स कनी नीच क्लिप लगा क खोंपा  बनाबथि। गमछा के एक कोन के लोटा के पानि मे भिजा क' सबुंदानी मे राखल साबुन प रगड़ि मुह  पोछि  आंगुर स स्नो दुनु गाल प लगा बढ़िया स पचा क  पोडर लगेला के बाद  , टीकुली कपार प साटैथ,आखि मे काजर लगाक ,एना के हाथ मे उठा कनी काल धरि अपना के निहारैथ ,फेर नहीं जानि की सोची क' मुसुकि क ,सब चीज बोस्त ओरिया क मौनी मे ध ,कोठी के ऊपर राखि अपन पलंग प कनी काल पडल पडल घरक़ धरनि तकेत आंखि मुनि लइत छलिह ,की बेरहट लेल आंगन मे धिया पुता के आवाजाही सुरू भ’ जाय छल,फेर रतुका भोजनक ब्योंत ।कहिओ जखन अहि टोल,ओहि टोलक ससुर् बासि बेटी सब नैहर आबैथ त’ बड़का बाबा के हवेली के नब कनिया के देखय एबे करे जायथ,बड़की दादी हुलसि क’ हुनका सभके अपन ओसारा प’ राखल चौकी प,बैसबा स’ पहिने चद्दरी बिछेनाय नहिं बिसरथि । आ’ कनि काल् क गप्प सप्प के बाद पछबरिया घरक केबाड़ लग जा क’ बाजथि  ‘दाय सब एलखीन हें कनी बहरैयों घर स’ मुंह देखा दिओ”। छोटकी कनिया केबाड़ लग आबी क;   बड़का टा घोघ निकालि ,मुड़ी गोतने अपन दुनू पएर प  बैस रहैथ दादी कनि झांकी क’ देख लैथ फेर ,संतुष्ट भाव स ,केबाड़ खोलि आगाँ बढि कहथि “गे फूलो ,तुही देखा दहि नबकी भौजी के मुंह”। अपन विवाहक बाट जोहैत पितियौत ननदि फूलो चट स घोघ उठा क, मुड़ी पकड़ि तीनों दिस घुमा दैक ।  “कनिया बड़ सुन्नरि , केहेन परोड़क फाँक सन उछलल उछलल आंखि,  ठाढ़ नाक ,पनमा ठोर ” । कनिया के सुन्दरताई प अपन विचार परगट करि क जायत काल हुनका सबके  दादी आने की भानपुर बाली के सौस् क विलाप करेज  मे छूरा सन गड़य लागे “माटी के मुरुत एक टा गढ़ि क ध देलक,’ आ’ तेकरा बाद हुनक विपन्न नैहरक खोईचा छोड़ा क बखानय लगेथ त’ सुननहारों के अनसोहात लगे “जाए दिओ,बाप क धन स की होई छै, नीक लोक त भेट गेल” किओ ने कियो बजिए उठेक । गरमी मे सकाले भानस भात भ’ जाए आ’  घरक स्त्रीगण सब सेहो नीफिकिर भ; कखनों पछबरिया ओसारा प;कखनों पुबरिया बाड़ी बाला दुमुहा हवादार घर मे अपन किसिम किसिमक गप्प क पेटार खोलथि। टोल भरिक बेटी पुतहु सबहक बाजब, भूकब ,व्यवहार ,रूपरंग के  अपन अपन तराजू प जोखैत ,कखनों ओकिल त, कखनों जज के मुद्रा मे आबि जायथ। ओहि बइसारी में बुढ़ पुरनिया सौस लेल जगह नै रहे ,एक्छहे जुबती सब ;,बियाहल ,कुमारि, । ओत्त  पानिभरनी, कुटिया पिसिया करनिहारि ,मालिन ,धोबिन ,खबासिन तेकरो सभक पैठ छल,मुदा उमरि के मामले मे कोनो दरेग नहीं ,आब हस्सी ठठा लोक अपने तुरीया  मे करते न । बाजए के सबके समान अधिकार त नहि छले,मुदा किओ चुप्पों नै रहे ,मुंह दाबि क त पुतौह सब हँसे ,गामक बेटी त, ठिठिएबे करे ज़ोर स । एहने जेठक सुनसान दुपहरिया मे ,जखन एक दिन अपन कोठरिक केबाड़ ओठङ्गा क’ सिंगार पटार करबा लेल पटिया ओछा क’ जुट्टी खोलि कोठी पर स एना ककबा उतारक लेल हाथ बढोलन्हि की पएर दाबी क’ चुप्पे स पईसल छलखींह, उघरल माथ कपार ,छिटकल केस ,भानपुर बाली के जेना ठकबकी लागि गेले ,देहक शोणित बरफ भ दिमागक सबटा गतिबिधी के अवरुद्ध करि देलके , हुनक अहि मनोदशा के फायदा उठबईत  टुनटुन भैया झट दनी हुनका बाम हाथ स पजियाबईत दाहिना हाथे हुनक मुंह बन्न करि देलथि। खूब बुझल छलनहि,एखन आँगन मे कियो नहि ,माय अपन भगिनी के बियाह क हकार  पुरय लेल अपन नैहर गेल छली,बड़की भौजी अपन छोटकी बहिनक दुरागमनक लेल अपन नैहर गेल छलथि ,तीनों बहिन अपन  अपन सासुर ,खबासीन दुनु ,सेहो लगनक समय मे नौत हकार पूरय  कत्तों कत्तों आन गाम  गेल ,। टुनटुन भैया के मनोरथि प, भानपुर बाली धधकैत अँगोरा फेकलथि ,अचानक ओ सिंहनी बनि हुनक पकड़ि स, छूटि हुनक दाहिना हाथ प’ ततेक ज़ोर स अपन दांत गडौलथि जे हुनक छरपट्टी छुटि गेलन्ह ,एतबा मे ओ केबाड़ खोलि सोझे दलान दिस प्रेत बाधा स ग्रसित मनुख जका पड़ेली,पितिया सौस जनार्दनक माए ,जे अपन दलान स उतरि टेटरा म्या स, बांगक गाछ लग ठाढ़ भ गप्प करैत छली, बड़की काकी के आँगन स दौड़बक आबाज सुनी दुरखा लग आबी चिहुकि उठली “की भेल ये कनिया ,गई म्या , ,”बड़का बड़का केस ओहिना खुजल ,माथ  प नुआ ने , आंखि मे भयानक भय ,ज़ोर ज़ोर स, चलैत साँस,मुंह स त’ किछू नहीं बहरेलन्हि,मुदा ओ हुनका भरि पाँज पकड़ि ज़ोर ज़ोर स कानय लागल छलिह । इमहर उमहर कान ठाढ़ केने लोक बेद के देखि क जनारदनक माए हुनका हुनके आँगन मे पछबरिया ओसारा धरि डाढ़ पकड़ि क आनलखिन्ह । कनी काल धरि हुनक माथ प, हाथ राखि नोर पोछि,सप्पत तप्पत दइथ ,सब टा खिस्सा उगलबेलखिन । घर बला पढुया छलथी त, बेसि  काल पर्देसिए बनल । फेर त जा धरि सौस नहीं आपस अयली ताबे तक हुनका ओगरि क ओ हुनक ओसारा प सुतैत रहल छली । सौस के कान मे जखन खिस्सा गेलन्हि ,त’ ससुर आ’ भैसुर संग ओहो त्रिया चरित त्रिया चरितक डिडिंबी नाद करैत  हुनक हाथक  छूल नहिं खेबा क सप्पत संग पेटकुनिया द’ पुतौह के सरापय  लागल छलिह ,किएक त  ओहि दिन स’ टुनटुन भैया निपता भ गेल छलईथ । उमहर  एहने नीफिकिर दुपहरिया मे जुबती सबहक बइसारी मे भानपुर बाली हीरोइन भ  गेल छलिह । किओ कहेक“गाल प दांत गड़ा दैतथि नै, जे जिनगी भरि के चेनहासी भ’ जयतइन्ही’। किओ कहे “हम जे रहितिये त तेहन ठाम नै लात मरितिएई जे ज़नानी के नाम धरि बिसरि जैतथि’ ‘एहने चालि प घरबाली छोड़ि देने हेतैन्ह’। तेकरा बाद सब अपन अपन गामक छिनार पुरुखक अनंत खिस्सा बांचैत। आ , दोसर ठामक बैसारी मे,जतए ,थकुचल ,झुरकुट ,खुर्राट सौस सबहक गप्प चले ,टुनटुन बाबुके सुधपनि के;हरेराम कका के माए अपन गरदनि के मोटका हसूली छूबेत ,मिचिया मिचिया क बाजेथ     ‘कहिओ हमरा सब दिस नजरि उठा क, नहिं देखलन्ही, तेहेन लजकोटर ओ ,सदिखन माठ झुका क छलेथ’।  ‘यै गरिब् क बेटी आनलहु बीयाहि क तखन त एहने सन दिन नै देखौता बिधाता।‘ कानक माकड़ी झूलबईत अनारस बाली बाबी बाजैथ । आ ओहि बइसारी मे जनार्दनक माय सेहो रहेत “हम सब मुरुख छल प्रपंच की बुझबई  ,कहबी छै जे घोर कलिजुग आबि गेले,’।टुनटुन बाबू के जननी नॉर पोछि बाजेथ “ओ बतहा के की पता छले जे ओसारा  प राखल लोटा उठा क क’ल स पीबा लेल पानि भरनाय ओकरा एतेक महग पड़ते ,देह मे त अहि कुलछनी के आगि नेसने रहे छै’। छले त टूटल जमींदारी ,मुदा एखनों बड़का गिरहस्थ ,,जमीन जायदाद गाछी ,माल जाल  संगे दस टा धिया पुत्ता बाला नामी घर ,दू तीन टा पूत त’ ऊच शिक्षा प्राप्त करि बढ़िया नौकरी सेहो करय लागल छलथि। अहि प्रसंगक बाद भानपुर बाली के घरबला कोलेजक  एक टा छुट्टी मे जखन गाम एलथी ,त’ फेर ओ आपस अपन कोलेजक मुंह देखे नहीं गेला ,कनिया लग जे दु चारि पाय जोडल छल , पेटी मे आ’ देह पर जे सब आभूषण छल संग ध ,दुनु बेक्ती ओहि घर क मधुर छाहरि स निकलि दुनिया के अथाह महासमुंदर मे दहिया भसीया क  अपन बाट ताकय लेल जायत रहल छला । कतेको बेर एहेन देखल गेले जे साधारण सन बाट ,कखनों क तेहन भयौन मोड़ ल लेत छै ,जे एक दिस उंच पहाड़ आ’दोसर दिस लोंमहर्षक खाधि। लोकबेद के कहब छै जे अप्पन  बाट मनुक्ख अपने कहाँ बनबे छै ,ओकर बस चलिते त’ ओ चिक्कन चुनमुन गंगाजल स’ धोल रस्ता प,पएर रखिते,मुदा जीबनक रस्ता त’ वैह बनबैत अछि ,जे जीबन बनेबक ,ओकर संचार करबाक ,आ’ ओकर संहार करबाक भार उठौने अछि । तखन सुंदर ,सूचिक्कन बाट सेहो काँट कूस ,पाथर  ,पानि स’ भरि दुसाध्य भ’ गेले कोना ,से अदृष्ट जानेथ।भानपुर बाली संग  किछू एहेने भेल छले।ओहि जमाना के  इंजीनियरीङ्ग्क पढ़ाई डेढ़ बरख पहिनहि छोड़ि घर बाला सड़क प’ बौआ रहल छलथी। कनिया के मोसियौत बहिनक घरबला अहि मुसीबतक घड़ी मे सुग्रीव जका हुनक संग धेने रहल।मास दिन धरिअपन घर क छत हुनको माथ प’  राखि डिस्टिल्ड वाटर के फैक्ट्री में नौकरी के सेहो बेबस्था करा देलकन्हि। भानपुर बाली के की नाम छल हेतैन्ह की पता ,मुदा तत्कालीन रिवाज् क मोताबिक ,पहिलोठ संतान के नाम स म्या के नाम पड़ी जाए ,असेसरक माय ,बीन्नी के माय । धिया पुत्ता के बेर मे सेहो बिधाता जेना बाम बैसि रहल छलथी। मुदा कतेक बरखक बाद एक पर एक तराउपरि चारि टा धिया पुता स भगमान आचरि आ’ घर भरिदेलखिन्ह।आ ओतुक्का लोग हुनका सोना के माँ के नाम स चिन्ह लागल छल।  घरबला के त’ बुधिए बाम भ गेल रहेंह । अपन कुल खानदान क’ घमण्डक संग ओहि अधखिज्जु डिग्री के दंश हुनका सनकी सन बना देने छलन्हि। अपना ऊपर केकरो रोब जतेनाय हुनक पीत्त के तुरन्ते एड़ी स’ मगज धरि पहुंचा दैक। कार्य स्थल प’ नित्त दिन झंझट होमए लागल । घर आबि क’ भानपुर बाली प’ तामस झाड़ईथ ‘अहीके चलते हमरा आय ई दिन देखय पड़ि रहल अछि ,बड़ कष्ट छल त’ नदी पोखरि मे भसिया जयतों ,जहर माहुर खा सूती रहितों : तिरिया चरित्र मे फसि क, हम बर्बाद भ गेलों”। की करितथि भानपुर बाली ,बज्र सन बोल सुनैत सुनैत पाथर भ’ गेल छलथी पहिनहि स । बच्चा चारु इसकुल मे पढ़ैत छलेय । तनखा त’ कोनो खरापो नहिं छल । प्रतिदिन भोर मे काज प’ ज़ेबा काल पति कलह मचबैत  ‘अहाँ की बुझबै ,अपने त दरिद्रक बेटी छी, स्वाभिमान की होय छैक। आय हम अपन हिसाब करबा क रहबे ,ने बरदास होइत अछि कनहा के बोल”। भानपुर बाली आगा बढ़ी क हुनक माय बनी जायथ  ‘हमर गप्प छोड़ू ने ,मुदा अहा केकरो स याचना करय थोड़े जाय छी ,मेहनत करे छी,दुनिया करे छै, आब ई कोनो निषिद्ध चाकरी बाला जमाना त रहले नहिं ,देखियो बच्चा सब के निक इसकुल भेट गेले,सब त अहिं प, आश्रित अछि ने”। एक बेर  केकरो मुंह स  कत्तों सुनली ,जे सेना मे नीक नौकरी भेटेय छै । एक दिन घरबला के नीक मूड देखि क बजली त हुनक रौद्र रूप आ चिकरनाय सुनि क सब धिया पुत्ता कोठरी के मुंह लग आबि क’ ठाढ़ भ गेले “   हे देखैजाही एकर बुद्धि , तोहरि बाप रहतौ घर मे आ हम जाऊ सेना मे मरय”। मुदा कतेक दिन ,आखिर मे ओ नौकरी स इस्तीफा द देलथि। तखन एहने सन किछू भवितब्य के सोचि विचारि होसियारि भानपुर बाली पाँच  कोठरी के अपन मकान पहिनहि बनवा नेने छलथी ,एक टा बाईस कट्ठा के जमीन सेहो कीन लेने छलिह। आब घरबला जखन  त्यागपत्र द देलखीन त जे बकाया रुपैया भेटलनही,ओहि स खाली जमीन प, दू टा कोठरी गिलेबा प, ठाढ़ करि क’ जुत्ता के फैक्ट्री खोललन्हि। तीन टा कारीगर रखली । घरक सबटा काज सम्पन्न करि सीधे फैक्ट्री पहुंचथि ।  कखनों पतिदेव के अनेरे क्रोध देखि ,कारीगर सब के पोल्हा  क चाह पानि पिया क’ बुद्धि स’ काज लईथ। किछुए काल मे बिजनेस गति पकड़ि नेने रहेक । दुनु बेटी के कन्यादान करि गंगा नहा नेने छलैथ । मुदा बिपदा के ई कोना सोहेतेंह। ओ अपन चक्र चालि फेर स’ तेज करि देली । किओ कहलकैन सौस बड़ बीमार,किओ नै सेबा करे छेंन । जे पुतौह सब बड़ नाम गाम बाली छलिह ,धिया पुत्ता के पढ़ाबए के लाथे अपन अपन घरबला संगे बाहरि जायत रहली । एक टा बेटा त भागिए गेल छलेंह,मुदा तइयो पाँच टा पुतौह त बसिते छल ,आय बुढ़ारी मे ,बीमारी मे कियो काज क नै ।ई सुनि हुनक मोंन  कचोट स भरी गेलन्ही,आखिर ओ हमर स्वामी के माँ बाबू छथि,आ शास्त्र क बिधान अनुसारे हुनको धर्मक माँ पिता , हुनक करतब्य बोध हिय मे  उत्पात मचबए लागल । सबटा काज छौड़ि सौस लग आबि गेल रहैथ।ओ रोबदाब बाला धूवा ,मुट्ठी भरि के ठठरी बनल   बिछौन स सटल,ससुर सेहो दलान प पड़ल। मास दिन रहि क सब व्यवस्था दुरुस्त केली । जखन हुनक मुंह मे ओ कौर खुवाबथि सौस के आंखि स हर हर नॉर बहे लगै ,अपन दुनु हाथ जोडि ओ जेना हुनका स क्षमा मांगेथ । भानपुर बाली हाथ पकैड़ अपन माथ प राखि लइथ। ओछौने प नदी ,लग्घी होयन्ह , अपने स बिन घिनेने साफ करैथ ,दू टा मटकूड़ि राखीदेलथी,महेशक बेटी के हुनका कोठरी मे सूते के ,आ हुनक सब तरहक धियान राखय लेल  गछबा क  ओकर बियाह दानक सब टा  भार गछि लेलथि। भनसीया सेहो  राखि देलथी  ‘हम पाय देब आहाँ दुनू प्राणी के सेवा करबै खेबा पीबा मे ,पथ परहेज मे कोनो कोताहि नहिं हेबाक चाहि । कनी डेरो प हमरा देखनाय जरूरी अछि”। आ एक पएरसासुर आ दोसर डेरा प, रखने बरख धरि काटि देने छलिह । माय बाप संग ,गांमक लोग के आत्मा जुड़ा गेलय,आब हुनक कुल सील क डंका पिटाय लागल । किछू बरखक बाद जुत्ता फैक्ट्री बंद भ गेले ,घरबला के चिनिया बीमारी आ, ब्लड प्रेशर दबोचि लेलकन्ही। बेरा बेरी ससुर आ, सौस अपन अपन ठाम जायत रहला । इहों सबहक संग  ससुरक संपत्ति मे अपन हिस्सा बटबा लेलथी । मुदा बटाई प, ने लगा क, अपने स’ जन मजूर राखि खेती करबाबए के ठनली। परदेशक जमीन आ मकान बेचि क’गाम स सट्ल शहरि मे जमीन खरीद क’ मकान बना लेलथी जतय दियाद सबहक सेहो चास बास छलेन्ह। मकान क चारु कट छहरि द क  सोझा बदक फाटक सेहो ल्गबा लेलथी ,आंच  कट्ठा के ओहि चास बास मे आगा पाछा फल फूल के किसिम किसिम क गाछ  बिरीछ लगाबा लेलथि ।गाम प  बटला के बाद चालीस बीघा जमीन त’ हिस्सा मे पड़बे केलन्हि,आ ओ पोखरा पाटन बड़का हबेली मे छ टा कोठरी सेहो हिस्सा मे भेटलन्हि। अन्न पानि, उपजा बाड़ी बड़ नीक, गाय भइस पोसिया  लगा देने छलथी। साल भरि केअन्न  ओहि ठाम राखि क बाकी खेते स बेच दैथ। बड़का लग्गा बाला उपजाऊ जमीन ,जिनगी नीक जका कटय लागल । आ ई सबटा काज भानपुर बाली जनानी भईयो  क’ अपने करैथ ।आब उमरि सेहो भेलन्हि, आ’बेतहासा रौद बसात सहैत सहैत हुनको देह मे बीमारी पइस गेलन्ही।छोटका बेटा के  डाक्टरी मे नाम लिखा गेल छल, माय के सदी खन कहे , “बस कनी दिन रुकि जाऊ ,चारि बरख आउर ,हम नौकरी धेलउ की आहा के रानी जका बैसा क’ राखब ,ई बातरस ,ई दम फुल्ली सबटा दूर करि देब । बड़की पुतौह अपने सन कुलसील बाली आनली।बी एड करि रहल छल । पद्गाई के संगे गृहकार्य मे सेहो दक्ष ,अपन परिस्थिति के बुझए बाली ,पूजा पाठ करय बाली,सौस ससुर् क मान सम्मान देबए  बाली । मुदा पहिने कहल जे बिपदा के ने सोहेले बिन हड़ हड़ खट खट के जिनगी ।ओ कोना चाहितेथि जे आस क किरण कोनो ने कोनो दोग स हुनक जिनगी के इजोत स भरि दैक । दुनिया भरि के व्रत । ओहि नरक निवारण चतुरदसी  के परात उठली त घरबला के पलंगक नीचा खसल देखि सन्न रहि गेलिह ।बेटा पुतौह के मददि स कहुना करि ओछौन प’ सुथौलथी स्वास चलइ छल। अपने दौड़ गेली पड़ोसिया डाक्टर लग ,ओहो ओहिना भोरका चाहक कप सोझा क टेबुल प राखि झटकारैत संगे चलि अयलैन्ह। नॉरखसेबक काल नहीं छल ,तुरत एंबुलेंस मे लादि हुनका  नर्सिंग होम मे भरतीकराओल गेल ।  पक्षाघात क अटैक छल। शरीरक बाम अलंग सून। अहि बिपत्ति मे दुनु हाथ क मोटका सोनक बाला आ’ कांगुरिया आंगुरक बराबरि मोट गरा के चेन बिका गेलन्ही। मुदा संतोष छल सत्ती माय हुनक जान त बकसि देलखिन। पहिनहु ओ घरे मे रहैत छला,आब ओछौन प ,मुदा आंखिक सोझा त छलेथ ,आस त मन मे रहबे करेन्ह जे आए नै काल्हि,सखरा भगवत्ति के किरपा स उठि क अप्पन पएर प ठाढ़ त अवस्स हेता।आब  जे साधू ,संत ,बैद,डाक्टरक  अजगुत चमत्कारक  खिस्सा लोग सुनबे ओ आस् क डोरी पकड़ने दूर दूर धरि दौगति रहली । कोन जड़ी ,कोन  बूटी ,कोन तेल मालिस ,जादू टोना ,की सब नहि अजमबेत रहली ,मुदा हार नहि मानली ,बिसबास जीवित छलेनह। अहि मध्य खबरि भेटलनही जे छोटका बेटा जे अखन पहिले  बरख मेडिकल मे छल ,कोनो पहाड़िन स विवाह करि लेलके । दुख की आ कतेक होयतन्हि,किछू दिन भगवती के सोझा रिरियाती रहली ,मुदा मोंन  नै मानलकैन्ह त’ बस पकड़ि ओतेक दूर बेटा पुतौहक मुंह देखय औ बरखा बूनि के  परबाह नहिं करि क चलि पड़ल छलिह। फोन प गप्प भेल रहेंह ,सपूत बरुन बस स्टेंड प आबि दुनिया के सोझा माय के निहुरि क गोड़ लगलक । होटल मे ल जाक खुआदेलकईन्ह,आ फेर ओहि घूरती बस मे, ओहने मौसम मे रतुका  टिकस कटा क चढ़ा देलकेंह । सोचने रहैथ ,केकरो स विवाह करि लेलके त की ,आब त ओ हमर पुतौह भेली न ,त अपन कर्णफूल छोटका डिब्बी मे राखि पर्स मे ओरिया क ध नेने छलथी,कनिया के खाली हाथ कोना देखब । किछू टाका सेहो राखि लेलथी ,नब नब गिरहस्थी छै,ककरा स मांगते। अनहरिया रा ति ,कड़कैत बिजुरी ,बरसैत मेघ मे  तितति भीजति ,जखन ओ दरबज्जा खटखटौली,पुतौह के डरे हदास पईसी गेले ,अंदेसा भेलन्हि,खिड़की स झकलि ,माँ के देखि किछू पूछताथ करितथि तेइ स पहिनहि घर मे पएर रखैत बड़की पुतौह के भरि पाँज धरि मोन भरि कनली “केहन भ गेल बरुन ,अपन डेरो नै ल गेल ,आन लोक सन होटल मे खुआ क  अहि प्रलय काल मे ,बिन किछू सोचने रातराती बिदा करि देल। कतबों कहलिए कनी कनिया के मुंह देखा दे ,कहलक कोन सुन्नरी छै जे देखबै’। कनी दिनक बाद बरुनक फोन आबए लागले ,जायदाद मे  हमर बख़रा द दीय । हम अहि ठाम घर कीनब’। घर मे भूकंप आबी गेले ,चारुकात क धरतिए टा नहि,ऊपर अकास धरि डोलए लगलै। भानपुर बाली के सोझा परसल थारी निरैठे रहए लगलै ,हाथ पएर मे बग्घा लागए लगले,माथ टनके ,अनेरे बड़ बड़ाए लागल छलिह। “कोन  कोन दिन देखेता बिधाता ,जायदाद मे हिस्सा के मतलब जे ई घर बेचू ,गामक जमीन आधा करू ,गामक मकान आधा करू । तखन कोना करि क जीबनक भवसागर पार करब । तखन लोकबेद सलाह देलकेंह , बाटल जेते दादा के संपत्ति,बापक अरजल प हुनका अछैत किओ ने अपन जुईत चला सकैत अछि आ येह गप्प बड़का बाबू के सरबेटा जे नामी ओकिल छलथि सेहो कहलखिन ।“अशक्त बीमार बाप के सेवा करबा के फुरसति नहीं छेंन आ, संपति मे बख़रा तुरत चाहि, पढ़ाई लेल जे पाय पठा रहल छी ,सेहो बंद करू एहेन कपूत के’। मौसम अहि बेर केहेन तांडव केने छल। भयंकर ठंड । कम्मल ,सीरक मे भरि  दिन लपेट क त ओ बैसयबाली प्राणी नहिं छली , हाथक बुनल मौज़ा पएर मे ,साया के नीच गरम पैजामा ,कार्डिगन, ऊपर स मोटका पशमीना शौल मे अपना के नीक जका बानहि छेक क ब्रम्हबेला के  स्नान ,पूजा के बाद स इमहार उमहर लुड़ूखुड़ू मे लाइग जायथ । पुतहुक परीक्षा चलैत छलै। सबके चाह द क ,बाहर आँगन मे बोरसी मे आगि सुनगा क राखि देली,कनी काल मे निधु भ जेतैक त’ घरबला के कोठरी मे राखि,हुनकर मालिस करितथि। ताबैत  चाह ल’क बेसकी मे आबि गेलिह ,थर थरी लागए लगलैन्ह त, पर्दा लग रखल हीटर जे कनी खराप छलै ,कतेक दिन स  सोचने रहेथ ठीक करबाबक ,मुदा आय कपकपी बरदास नै भेलन्हि त जरा लेलखींह । कनिए काल मे गों गों के आबाज सुनि पुतौह पढ़ाई छोड़ि दौडलनन्हि,ओकरा भेले बाबूजी के कोठरी स स्वर आबि रहल अछि। मुदा ओ त बैसकी स आबेत  छ्लै, खिड़की के परदा पकड़ने ओ त नीक जका झरकि चुकल छलिह सबटा कपड़ा सुड्डाह  ,बाक बंद ,तुरत हुनक उठा क ,सूती चादरि आ,कम्मल मे लपेटि   बड़का अस्पताल ल जायल गेल डाक्टर नीचा  मुंह करि नीरास भ मुड़ी हिला देलके, नब्बे प्रतिशत झरकल ।   तीन दिनक भनक  कष्ट क उपरांत आखिरी मे माटि के मुरुत माटि जका भखरि गेल छलिह । इम्हर,मनुक्खक जाति, कियो कियो बिररो उड़ा देलके  ,आत्मह्त्या करि लेलथि,बेटा स परेसान छलखिन ,मुदा ओत्त उपस्थित सम्पूर्ण समाज किओ ने पतिएलके ,एहेन जीबट स्त्री त बड़ कम गढ़ैत छथिंह भगबती  ।कानेत कानेत पुतौह बजली “हीटर खराप छल ,ओहि मे करेंट आबैत छलै”। कैलास दास लघुकथा- ममता युग बदलतै समय नहि लगैत अछि । युग सँगहि मनुष्य नहि बदलि सकल तऽ ओकर बीच मजधार मे छोडिकऽ समय आगा निकलि जाइत अछि । एहने भेलन्हि ममता आ ओकर माय बाबु के । समय अनुसार ममताके माय बाबु नहि बदलल आ ममता के समय साथ नहि देलक । कहैत अछि, ‘अभावे झगडाके जडि होइत अछि ।’ जतए अभाव नहि छैक ओतह द्वन्द नहि होइत अछि । फेर तऽ बेटी होए वा बेटा सभ एक समान । २५ वर्ष पहिने जहिया ममता के जनम भेलन्हि चारुगाम सोर भऽ गेल रहैक, ‘गुमस्ता बाबा के पोती भेलन्हि ।’ दू पुस्तासँ ओहि खनदानमे एको गो बेटी नहि भेल रहथि । ओना गुमस्ता बाबा चाउरगामक जमिनदार सेहो छथि । बड धुमधामसँ खुशीयाली मनाओल गेल । ममताक छठिहारक दिन चारुगामा नौतल गेल रहैक । डिविया दशपैसीकेँ नाच सेहो आएल छल । छठिहारक दिन गुमस्ता बाबा नाचएवालाके सोनाके सिकरी दऽ देने रहथि । ममताके बड लार प्यार आ दुलार सँ लालन पालन भेल रहैक । मुदा भविष्य मे की हएतै कोई नहि जनैत अछि । गाममे बेटी बढत लिखत तऽ बिगडि जाएत रहल मनसाय के गुमस्ता बाबा तोडलक । ओ अपन पौती ममता के पढा लिखा कऽ निक डाक्टर बनाबए चाहैत छल । मुदा भेल ओकर उल्टा ? ममता स्वयं नहि बुझि पाबि रहल छल जे एहिमे गल्ती कतए भऽ गेल । ओ अपन खिडकीबाटे लोकके अबैत जाइत देखि रहल छल । एहिसँगहि अपन वर्तमान आ भविष्यकेँ सेहो तौल रहल छल । जहिया ओ विद्यालयमे पढैत छलथि तऽ सभ विद्यार्थी ममतेसँ प्रतिस्पर्धा करैत छल । चंचल तऽ ओ छलैए, पढएमे सेहो बड तेज रहैक । पाँच कक्षा धरि ओकरा कोई नहि प्रथम भेला सँ रोकने छल । मुदा जखन ओ छ कक्षा मे गेल तऽ दोसर विद्यालयसँ आएल राजेश सँ प्रतिस्पर्धा होबए लागल । प्रतिस्पर्धाक क्रममे कहियो काल दुनू गोटे बीच झगडा सेहो भऽ जाइत छल । सात कक्षा धरि जाइत—जाइत राजेश प्रथम स्थान ललौक आ ममता दोसर । राजेश मनिपुरसँ ममताक गाम घारोपुर मे रहल विद्यालयमे पढए अबैत छल । देखएमे राजेश तऽ ओतेक सुन्दर नहि रहथि मुदा पढएमे ओतबे तेज रहथि ओ एके वर्षमे ममताक नम्वर तऽ तोडबे कएलथि, सँगहि विद्यालयक विद्यार्थी आ शिक्षक सभक चहेता सेहो बनि गेल रहथि । ममता राजेश के देखि कऽ मनेमन खुब जरैत छल । किछु दिन धरि तऽ राजेशके टोकबो नहि कएन्हि । ममताक बाहेक राजेशके विद्यालय के सभ छात्रछात्र बजबैत छल आ राजेशो ओकरा सभके पढाईमे कोनो समस्या होइत छल तऽ सल्लाह दैति छल । एहिसँ ममताके आओर बेसी जलन होबए लागल । मुदा एगो इर रहैक ममताके जे राजेश पहिने बजाओत तऽ बजाएब नहि तऽ नहि । जतबे ममताके राजेशके बजाबएके मन करए ततबे पितो लहरए । जेना जेना समय वितैत गेल ममता राजेशके बजाबएके प्रयास करए लागल मुदा कोनो बहना नहि भेटलाक कारण बात नहि बनि पाबि रहल छल । संयोगे कहुँ परीक्षा समाप्त भेलाक बाद विद्यालयक पिकनिक मनाओल गेल । ओना ई पिकनिक विद्यालयकेँ छात्रा सभके मात्र होईत अछि । छात्रासभ खाना बनाकऽ शिक्षक सभके खिएबैत अछि । मुदा राजेश विद्यालयके सभसँ तेज आ आज्ञाकारी भेलाक कारण ओहि पिकनिकमे ओकरो रहिकऽ सहयोग कऽ देवाक लेल छात्रा आ शिक्षक सभक कहने रहथि । ओही क्रममे ममता पियाउज काटि रहल छल आ अपन सहेली सभसँ सेहो बात चित कऽ रहल छल कि हासु उछैटकऽ लागि गेलन्हि आ धरधरकऽ खुन बहए लागल । खुन देखिकऽ ममताक सहेली सभ बाजल ‘गे केना हात कटि गेलहुँ, किछु बानहु ला नहि अछि । किछु देर पानिमे हात राखि लेबे तऽ खुन बन्द भऽ जएतो ।’ कहिते छल कि राजेश अपन जेबसँ रुमाल निकालिकऽ चट दऽ ओकर हात बान्हि देलक आ हातके किछु खानधरि अपने हातमे दबौने रहल । राजेश के ई बानि देखिकऽ ममताके आँखिमे नोर आबि गेल मुदा किछु बाजि नहि सकल । ओहि दिनसँ ममताक सहेली सभ ओकरा खौझाबए सेहो लागल । कखनो काल ममताक सहेली सभक कहैत छलथि,‘ममता घमण्ट सँ भरल अछि मुदा राजेश सभके भले चाहैत अछि । पढहुँ मे तेज आ व्यवहारमे निक ।’ एक दिन ममता विद्यालयके वर्क बनाबएके बिसरि गेलथि । जखन स्कूल आएल तऽ ओकरा स्मरण भेलन्हि हम वर्क बनाबही के विसरि गेली । टेबुल के तेसर बेन्च पर राखल झोलामे सँ ममता काँपी निकालिकऽ झट दऽ होम वर्क बनाबए लागल । किछुओ देरक बाद मास्टर क्लस मे आबि गेल । राजेश होम वर्क काँपी सभ विद्यार्थी सभसँ लेबए लागल । मुदा जखन ओ अपन बेंग खोलए त ओहि मे होम वर्गवाला कापिए नहि छल । ओ सोचए लागल शायद आई घरहि मे तऽ नहि भेल गेलहुँ । किछु खानधरि ठाढ भऽ सोचि रहल छल कि ममता राजेश के कापी देति बाजल ‘साँरी ! हम होम वर्क बनाकऽ नहि आएल छलहुँ तएँ अपनेक कापी सँ सहयोग लेलीए ।’ ‘कोई बात नहि, मुदा कहि देने रहथि तऽ...’ राजेश कहलक ‘आब कहिएके लेल ।’ ममता बाजल । एहिना बातबिचतक क्रमम एसएलसी अबैत अबैत ओ सभ बहुत घनिष्ट मित्र भऽ गेलथि आ फेर जेना अन्य प्रेममे होइत अछि तहिना ओहो सभ विवाहक लेल तयारी शुरु कऽ देलन्हि । ममताक माए बाबुक कहब छल राजेशके माथ पर घडारी बाहेक किछु जमीन नहि अछि फेर एहि गामक जमिन्दारक बेटीसँग कोना विवाह करत । जातिके बात ओतेक नहि छल कारण दुनू स्वजातीय छली । मुदा बाबुक जमिन्दार अहमके परवाह नहि करथि ओ दुनू गोटे भागिकऽ विवाह कऽ लेलथि । राजेशके पढाईमे तेज होबएके फाइदा सेहो भेटल । भलहि ओ एसएलसीए पास छलथि मुदा हुनका एकटा कम्पनीमे जुनियर एकाउन्टेण्ट पदमे नोकरी भेट गेल । अपन घरसँ दूरे किए नहि होइक मुदा नोकरी भेटलाक कारण दुनू गोटेके जीवन बढिया जेकाँ चलए लागल । दुनू गोटे आइए सेहो कऽ लेलन्हि । भगवानके इच्छा किछु आओर छल । राजेश बिमार भऽ गेलथि । ममताके किछु फुराइए नहि रहल छल । आब की कएल जाए ? नैहरि सँ तऽ पुरे सम्बन्धे तोडि लेने छलथि । राजेशके गाम पर माएबाबु जिबैत नहि छल । भैया भौजी ककरा के होइत छैक । ओ बढिया जेकाँ बुझैत छली । तैयो ममता सभसँ पहिने भैया भौजीसँ सहयोगक याचना कएलन्हि । मुदा जेना बहुतो भैयाभौजी सँ होइत छैक तहिना हिनको निराशे भेटलन्हि । ममता दियादनी सल्लाह देलन्हि, ‘अहाँ अपन बाबुसँ कहियो सहयोग करबाक लेल, तिलको नहि लेने छिएन्हि । ’ ममता बुझि गेली भैसुर आ दियादनीसँ सहयोगके बात करब कोनो अर्थ नहि रखलक । ममता माएबाबु लग जाए नहि चाहैत छली मुदा कोनो विकल्प नहि भेटलाक बाद गेली । हुनका लागल छल बहुत दिनक बाद बेटीके देखलाक बाद कहुँ माएबापके मोन डोलि जाइक मुदा से नहि भेल । ओ घरमे बैसहुँ नहि कहलन्हि । बाबु मुसीके कहिकऽ भगा देलन्हि । जे मुंसी काकाके एक बेर हल्ला करैत छलथि तऽ तीन बेर हाजिर हाजिर करैत छलाह से हुनका घरसँ निकालि देलन्हि । ममता राजेशके कोनो हालतमे गमाबए नहि चाहैत छली । ओ अन्तमे राजेश अफिसमे गेली । राजेशक म्यानेजर सहयोग तत्काल नहि कएलक मुदा नोकरी देबएके वचन देलन्हि । राजेशके कहुनाकऽ दवाई आ घरक खर्चा हुनक आगा ठाढ छल । ओ हारिकऽ नोकरी करबाक लेल तैयार भऽ गेलथि । राजेशके घरमे छोडि ओ नोकरी करथि आ फेर घर पहुँचते फेरसँ राजेशके सेवा करए लगथि । म्यानेजरक आँखि हुनके पर घुरि रहल छल । ओ बढिया जेकाँ बुझि रहल छली । मुदा उपाय किछु नहि छलन्हि । एक दिन म्यानेजर किछु काजसँ हुनका रोकि लेलक फेर हुनकासँ गलत व्यवहारक प्रयास करए लागल । हुनका बुझए मे नहि आबि रहल छल आब कि कएल जाए । एकदिस म्यानेजरके बात नहि मानला पर राजेशक जीवन आ घर परिवार आ दोसर दिस एहि जीवनके नाम पर एतेक बडका धोखा । ममता म्यानेजरके आगूमे बहुत कनलथि तैयो कोनो प्रभाव नहि पडल । एक दिन राजेश के हालात बहुत बिगरि गेल । एहिसँ पहिने शहरक बढिया बढिया क्लीनिक सभमे राजेश के उपचार करा चुकल छल । मुदा किछु दिन सुधार रहल तकरबाद फेरसँ ओकर हालात बिगरैत गेल । ममताक किछु नहि फुरा रहल छल । ओकर दिमाग मे एकेटा बात रहैक जे शहरक बढिया बढिया डाक्टर सभसँ राजेशक इलाज नहि भऽ सकल तऽ आब कहाँ इलाज कराओल जाए । कतहुँ जाएबाक लेल पैसा चाही मुदा अखन तऽ पैसा नहि अछि । कोन परीक्षा भगवान लऽ रहल छथि । अब त एके टा भरोसा भगवाने पर । एक बेर सरकारी अस्पतालमे लऽ जाएल जाए । मुदा अस्पताल धरि लऽजा कऽ उपचार कराबी ममतासँग पैसा नहि छल । महिनो पुरा होबएमे पाँच सात दिन बाँकिए छल । राजेश के हालत देखिक ममता विलकुल विचलित होबए लागल । ओकरा किछु नहि फुरा रहल छल की करु की नहि । एहिसँ पहिने एक दिन कम्पनीक मालिक किछु काजसँ ममताके रोकि लेने छल आ ओकरासँग किछु गलत व्यवहारक प्रयास सेहो कएने छल । एहि सँ ममता कम्पनीसँ पैसा माँगए नहि चाहि रहल छल । मुदा कएल की जाए । ममता किछु खान धरि चुपचाप सोचैत रहल । फेरसँ अपन साहस जुटाकऽ कम्पनीमे गेल आ राजेशक स्थितिके बारेमे कहलक । कम्पनीक मालिक मुस्कुराइत बाजल, ‘ममता एखनो अहाँ के किछु नहि बिगरल अछि । सुन्दर मात्र नहि अहाँक अखण्ड रुप अछि । अहाँ एक बेर बाहि फैलाकऽ त देखु । राजेश आब बेसी दिनक मेहमान नहि अछि । फेर अहाँक ई सुन्दरता कोनो कामके नहि रहि जाएत ।’ ‘तब हम की करु मालिक’ ममता बाजल । ‘हमर सल्लाह मानब तऽ अहाँ छोडि दिए राजेश के, अहाँक लेल हम एकटा पक्का घर दऽ देब आ नोकरीमे पद सेहो बढा देब, मुदा हमरा सँग रहए पडत ।’ कम्पनीक मालिक बाजल । ममता बहुत बडका असमन्जसमे पडि गेल की करु, नहि करु सोचैत सोचैत हुनकर माथा मे चक्कर देवए लागल । फेर अपन बिखरल साहसक समेटिकऽ ममता बाजल, ‘मालिक ! राजेश के जिते जी कतबो सम्पति हमरा लेल किछु नहि अछि । हम एकटा वियाह महिला छी । वियाहल महिलाक लेल सभ अस्मिता अपन पुरुष के लेल होइत अछि । हम जहर खा सकैत छी मुदा ई कुर्कम हमरा सँ नहि हएत । हमर तलव दऽ दिए ।’ कहैत ममता अपन तलव लऽकऽ आबि गेल आ राजेश के सरकारी अस्पतालमे भर्ना करा देलक । राजेश के सात दिन धरि अस्पतालमे रखलक । ओकर बाद दू सय के दवाई डाक्टर साहेब लिखकऽ डिसचार्ज कऽ देलक आ कहलक ‘ई कोनो बडा रोग नहि अछि, आतमे मल जमि गेल अछि । चिन्ता करबाक कोनो हात नहि अछि । सभ ठिक भऽ जाएत । हा.. मुदा किछु दिन धरि राजेशक सुसम दुध दिए नहि बिसरब । किछुए दिनमे राजेश ठिक भऽ गेल । ममता सोचए लागल दुःखके जीवन कतेक कठिन होइत अछि । साँचेमे मानव जीवन कतेक स्वार्थी अछि । दोसर मे शहरक बहुत ठाममे राजेशक उपचार नहि भेल मुदा छोटछिन सरकारी अस्पतालमे राजेशक उपचार भेल । ऐकरा हम की बुझी परीक्षा आ पतिपत्नी बीच धर्म सोचैत कानए लागल । डॉ. शंभु कुमार सिंह- पाखलो (कोंकणी उपन्यास)- तुकाराम रामा शेट-  मैथिली अनुवाद- डॉ. शंभु कुमार सिंह एक आइ रबि छैक। हमर निन्न कने देरी सँ खुजल। हम अपन कम्मल सुलूकेँ ओढ़ा देलिऐक। ओछाओन पर पड़ल-पड़ल हमर नजरि देवाल पर गेल। गोविन्द अपना संगहि भगवानक दुनू फोटो ल’ गेल छल। चिक्कनि माटिसँ ढौरल देवाल पर आब कोनो फोटो नहि रहैक। ओ एकदम सुन्न बुझाइक। हम ओछाओने पर पड़ल-पड़ल सोचैत रही। गोविन्द नोकरी करबाक लेल पणजी शहरमे छल। बाबूजीक मुइलाक पश्चात् ओ अपन मायकेँ अपना संगहि पणजी ल’ गेल छल। हम दुनू गोटे एहि घरमे रहैत रही। हम आ हमर भगिनी। हम उठलहुँ, खिड़की खोललहुँ, आ दरबाजा खोलहि वला रही कि एतबहिमे आलेसक आवाज सुन’ मे आएल। “यौ पाखलो! एखन धरि सुतले छी? पाखल्या... यौ पाखल्या.....” बिना किछु बजनहि हम दरबाजा खोलि देलहुँ। हम दरबाजा बन्न केलहुँ आ एकटा बासन ल’ कए लगीचक होटल जएबाक लेल ओकरा पाछू-पाछू चुपचाप चलि देलहुँ। आलेस हमर नेनपनक मीत थिक। हमसभ एखनहुँ नीक मीता छी। एक्कहि ठाम काज करैत छी। ओहो ड्राइवर आ हमहूँ। एक्कहि कम्पनीमे नोकरी करैत छी आ एक्कहि रंगक ट्रक चलबैत छी। हमरा गुमसुम चलैत देखि ओ बाजल— “औ जी! कोन सोचमे डूबल छी? “किछुओ तँ नहि? चेतना अएलाक बाद हम कहलहुँ। “किछु कोना नहि? ओहिना बाजि रहल छी की? कने सोचू, जँ अहाँक बियाह भ’ जाय तँ भगिनीकेँ देख’ वाली किओ तँ भ’ जेतीह?” एहि बात पर हँसैत हम पूछि देलिऐक— “के देत हमरा अपन बेटी?” ई बात सुनितहि ओ जोर-जोरसँ हँसए लागल। ओकर हँसी रोकबाक लेल आ किछु आर बाजबाक लेल हम ओकरा सँ पूछलहुँ— “ऐं यौ आलेस, अहाँक पासपोर्ट बनि गेल की?” “हँ।” “तखन दुबई कहिया जा रहल छी?” हम पुछलियनि। “अगिला सप्ताह, कपेल (छोट गिरिजाघर)क प्रार्थनोत्सव केर बाद।” “कपेलक प्रार्थनोत्सव केर बाद?” “हँ, बरु ओहि दिन।” “ओहि दिन किऐक? उत्सवक बाद चलि जाएब…।” “नहि, असलमे ओहि दिन हमर मीत जा रहल अछि, एहि लेल हम ओकरहि संगे जा चाहैत छी।” “तखन तँ अहाँकेँ हमरा कम्पनीक नोकरी छोड़’ पड़त।” “एहन भिखमंगा नोकरी करबो के करए? ओहुना भारतमे रहि कए के नीक पाइ कमा सकैत अछि? ओतए मजूरीयो तँ बेसी छैक?” “तखन अहाँक विदेश जायब एकदम पक्का ने?” “हँ”, एतबा कहि ओ अपन पैन्टक बेल्ट आर कसय लागल। “विदेश जुनि जाउ।”, हम पछिला किछु दिनसँ आलेससँ कहैत रहिऐक। “हमरा बाटमे अड़ँगा जुनि लगाउ।”, ओहि समय ओ हमरा कहलनि। हम चुपचाप बाट चलैत रहलहुँ। जखन गोविन्द गाम छोड़ि पणजी शहर गेल छलाह, तखन हमरा बड़ खराप लागल छल, मुदा आब तँ आलेस अपन गाम आ देश छोड़ि परदेस जा रहल छल, आइ हमरा कनेको खराप नहि लागि रहल अछि। हम दुनू गोटे होटल पहुँचलहुँ। भीतर जयतहि सभ किओ हमरा घूरि-घूरि कए देखय लागल। हम मोनहि-मोन सोचलहुँ, “बुझाइत अछि जे ओकरा सभक नजरि हमर कैल टनटन केश आ कैल रोइयाँ पर चलि गेल छैक, हमर लहसुनियाँ आँखि, उज्जर चाम आ गसगर देह…” “पाखलो, अहाँक बासनमे दूध दी, आकि चाह?” होटलवला हमरासँ पूछलक। हम भरि बासन चाह ल’ लेलहुँ। दू टा बड़का पाँवरोटी आ एकटा कांकण (वलयाकार पाँवरोटी) लेलहुँ। आलेस अपन मीतक संग दुबई जाइवला बात करैत रहल। ओकर मीत ओतएसँ ओकरा लेल कोनो विदेशी समान लएबा लेल कहैत रहैक। विदेश जयबासँ संबंधित बात करएवला आलेसकेँ छोड़ि हम अपना घरक बाट लेलहुँ। पड़ोसक रुक्मिणी मौसी हमरा घर आयल छलीह। ओ सुलूकेँ उठा कए मुँह धोबाक लेल कहलथि आ ओकरा छींटगर लाल फ्रॉक पहिरैलथि। हमहुँ अपन हाथ-मुँह धो लेलहुँ। दू टा गिलासमे चाह ढ़ारलहुँ आ रुक्मिणी मौसीकेँ चाह पीबाक लेल पूछलियनि, “अहाँकेँ चाह चाही की?” “नहि बाउ! हम एखनहि घरसँ चाह पीबि कए आएल छी, ओहुना हम होटलक चाह नहि पीबैत छी।” रुक्मिणी मौसीक एहि जबाब पर हम चुप भ’ गेलहुँ। हम सुलूकेँ बजेलहुँ। ओ थपड़ी पाड़ैत हमरा लग आयलि आ पूछ’ लागलि, “मामा आइ रबि छियैक ने? आइ तँ अहाँ काज पर नहि जाएब?”हम ‘हँ’ कहि अपन माथ डोलौलहुँ। “मौसी आइ अहाँ हमरा अपना ओहिठाम नहि ल’ जाएब। आइ हम एतहि रहब…मामाक संगे।” ओ मौसीसँ बाजलि। “ठीक छैक दाइ.....आइ हम अहाँकेँ नहि ल’ जाएब।” हम दुनू गोटा चाह पीबैते रही तावत रुक्मिणी मौसी अपन डाँरक साड़ी सम्हारैत घरक बरतन-बासन धोबाक लेल चलि गेलीह। सुलूक बाबूजी ओकरा सम्हारबाक लेल तैयार नहि रहथि। ओहि समय ओ मात्र डेढ़ बरखक छलीह। नीक जकाँ बाजियो नहि होइक। केवल दूई चारि शब्दहि बाजि सकैत छलीह। आब तँ ओ साढ़े तीन बरखक भ’ गेल अछि, मुदा देखबामे पाँच-साढ़े पाँच बरखक बुझाइत छलीह। गोर-नार चेहरा! हम ओकरा माथ पर अपन हाथ फेरलहुँ। मोम-सन नरम केश आ लहसुनियाँ आँखि! हम ओकरा आँखिमे देखलहुँ, आ ओ हमरा आँखिमे देखलक। ओ अपन आँखि पैघ कए लेलक। ओकर लहसुनियाँ आँखिमे एक्कहि संग कैकटा दृश्य उभरि गेल। एहन बुझाइत छल जेना ओ किछु पूछए चाहैत छलीह! हमरा कने आश्चर्य भेल। “अहाँक लहसुनियाँ आँखिसँ हमर कोनो पुरान संबंध अछि!” हमर नजरि ओकर गुलाबी केश पर गेल। ने जानि किएक ओकर गोर-नार चाम, गुलाबी केश देखि हमरा एहन बुझाएल जेना पूरा आकाश मेघसँ आच्छादित भ’ गेल होअए, ठीक तहिना हमर मोन अतीतक स्मरणसँ भरि गेल…। ताधरि रुक्मिणी मौसी घरक काज पूरा क’ कए अपन घर जाहि पर रहथि, कि हम सुलूकेँ हुनका संगहि ल’ जयबाक लेल कहलियनि। “हम नहि जायब।” सुलू अपन माथ डोला कए जबाब देलक। “नहि, हमरा काज पर जयबाक अछि, अहाँ मौसीक संग चलि जाउ। दूपहरमे हम जल्दीए आबि अहाँकेँ ल’ आएब।” एतबा कहि हम सुलूकेँ समझएबाक प्रयास कएलहुँ। सुलू कानय लागलीह, मुदा पछाति जा कए ओ मौसीक संगे जयबाक लेल तैयार भ’ गेलीह। रुक्मिणी मौसी सुलूकेँ ल’ कए चलि गेलीह। हम दरबाजा बन्न क’ लेलहुँ। हमरा दिमागमे आयल सभटा पुरान स्मृति एकटा गरज आ चमक केर संगहि बिखरि गेल! बुझू हम अपना आपकेँ पूर्ण रुपेण ओकरहिंमे ताक’ लागलहुँ…. अपन पहिचानक खोज करय लागलहुँ…। दू गोविन्दक दादी द्वारा कहल गेल खिस्सा एखन धरि पाखलो केँ स्मरण छलनि। शाली आ सोनू दुनू भाय-बहिन रहथि। गामक सीमान पर हुनक घर छलनि आ अपन किछु खेती-बारी सेहो। ओ अपनहुँ खेती-बारी करैत छल आ दोसरोक खेतमे काज करबाक लेल चलि जाइत छल। एकर अतिरिक्त ओ गरमीमे मजूरीयोक काज करैत छल। एकदिन शाली लकड़ी काटबाक लेल जंगल गेल छलीह। कुमारि शालीक संग तीन टा आर स्त्री लोकनि छलीह। आन  दिन जकाँ ओ सभ लकड़ी काटि कए ओकर बोझ सेहो बना नेने रहथि; तखनहि हुनका सभकेँ सीटीक आवाज सुनबामे अयलनि। ओ चारू गोटे डरि गेलीह। ताहि दिन पाखले (पुर्तगाली फिरंगी) जंगलमे शिकार करबाक लेल अबैत छलाह, ओ सभ एहन सुनने छलीह। फिरंगी सभक मनमानी आ स्त्रीगण पर कयल गेल अत्याचारसँ ओ सभ परिचित छलीह। ओहि सीटीक आवाज सुनि  कए ओकरा सभक तँ जेना होशे-हवास गुम भ’ गेल। ओ सभ बहुत घबरा गेलीह। तावत हाथमे बंदूक नेने तीनटा पाखले ओतए पहुँचि गेल। बाघ केँ सोझाँ आबि गेलाक पश्चात् जेना लोक लंक ल’ लैत अछि ठीक ओहिना ओ सभ लकड़ीक बोझ छोड़ि भागल। तीनू पाखले ओकरा सभक पीछा करय लागल। अपन जान बचयबाक लेल भाग’ वाली शाली गिरैत-पड़ैत बहुत थाकि गेल छलीह। आब आर बेसी गतिएँ दौड़ब ओकरा बुता केर बात नहि रहि गेल छल। ओ पाछू ताकलक, तँ देखलक जे एकटा फिरंगी अपन कन्हा पर बंदूक आ छाती पर एकटा तमगा लगौने मिलिट्री वेशभूषामे ओकरहि पाछू दौड़ल आबि रहल छल। ओहि पाखलोकेँ देखि शाली अपन जान बचएबाक लेल अपन अंतिम शक्ति लगा कए दौड़लीह। ओ सभटा स्त्रीगणकेँ पाछू छोड़ैत आर जी-जानसँ दौड़’ लागलीह। बहुत बेसी दौड़बाक कारणेँ आब ओ थाकि कए चकनाचूर भ’ गेल छलीह। जोर-जोरसँ उपर नीचाँ करैत ओकर छाती आब फाटि कए बाहर निकलि जेतैक, ओकरा एहने बुझाब’ लागलैक। ओकर दौड़बाक गति मंद होम’ लागलैक आ एतबहिमे ओ पाखलो ओकरा लगीच पहुँचि गेल। लगीचक आन-आन स्त्रीगणकेँ छोड़ि ओ पाखलो शालिएक दिस बढ़ल आ अंततः ओ शालीकेँ अपन बाँहिमे कसि लेलक। एतबहिमे पाछूसँ दू टा आर पाखले ओतए पहुँचि गेल। ओहो सभ शालीक दिस अपन हाथ बढ़ौलक, मुदा ओ पाखलो ओहि दुनू पाखलेकेँ पुर्तगाली भाषामे किछु कहलकैक। ई सुनि ओ दुनू पाछू हटल आ आगू भागए वाली स्त्री सभक पीछा करए लागल। पाखलोक बाँहिमे शालीक साँस फूल’ लागलैक आ ओकर वाक् सेहो बन्न भ’ गेलैक। ओहि फिरंगीक देहमे शैतान आबि गेल छलैक! शालीकेँ होस आबि गेलैक। एखन धरि साँझ परि गेल रहैक। पूरा जंगलमे अन्हार व्याप्त भ’ गेल रहैक। एहि अन्हारकेँ देखि शालीकेँ बुझाइक जे जेना फेर ओकर दम निकलि जेतैक। ओकरा देह पर कोनोटा नूआ नहि रहैक, मुदा ओकरा देह पर किछु फाटल-चिटल नूआ राखि देल गेल रहैक।        ओकरा माथक नीचाँ कोनो कड़गर चीज रहैक, मुदा की? से पता नहि चलि सकलैक। ओ जड़वत भ’ गेलीह। ओकर करेज धक-धक करैत रहैक, देहक पोर-पोरमे दरद होइत रहैक। ओ जतय कतहुँ अपन हाथ रखैक ओकरा सूखल खून हाथ लागैक। ओ बहुत डरि गेल छलीह, मुदा कानि नहि सकैत छलीह। ओ उठि कए बैसि गेलीह; तखने अकस्मात् टॉर्चक इजोत भेलैक। ओकर इजोत ओकरा देह पर पड़लैक त’ ओकर आँखि चोन्हिया गेलैक। छन भरिक लेल अपन आँखि बन्न क’ कए फेर खोललक त’ देखलक जे वैह पाखलो ओकरा लगीच आबि रहल छलैक। आन दूटा पाखलो जतए ठाढ़ रहैक ओत्तहि रहल। पछाति जा कए ओ दुनू ओहि टॉर्चक इजोतमे आगू बढ़ि गेल। शाली दिस आबि रहल पाखलो नांगटे देह छल। ओ फेर डरसँ सिहरि गेलीह। ओ फटलका नूआ-फट्टा ल' कए अपना छातीकेँ झाँपैत ठाढ़ हेबाक प्रयास करए लागलीह, मुदा टूटल गाछ जकाँ धरती पर गिर गेलीह। ताधरि ओ पाखलो शालीकेँ झट दए अपन हाथेँ पकड़ि लेलक। ओ पाखलो शालीक देहक नीचाँ ओछाओल गेल कपड़ा उठा लेलक। शालीक माथक नीचाँ राखल टोपी शालीक माथ पर राखि ओ जोर-जोरसँ हँसय लागल। शालीक घबराहटि बढिते जा रहल छलैक। ओ डरेँ थरथर काँपय लागलीह। ओकरा बुझेलैक जे एकटा बड़का अजगर खूब पैघ मुँह बौने ओकरा अपन ग्रास बना लेतैक। ओ जोरसँ चिकरलीह, मुदा ओकर आवाज ओकरा मुँहसँ नहि निकलि सकल। ओ फेरसँ शालीकेँ चुम्मा-चाटी करब सुरह क’ देलकैक आ ओकरा अपन बाँहिमे कसि लेलकैक। ओहि अन्हार घुप्प जंगलमे ओ अजगर सरिपहुँ ओकरा अपना काबूमे क’ लेलकैक। झार-झंखार आ पात सभसँ अजीब तरहेँ आवाज आब’ लागलैक। · साँझ पड़तहि ई बात सौंसे गाममे पसरि गेलैक। सीता कहैत छलीह, जे कोना ओ पाखलोक चंगुलसँ बाँचि गेलीह। शाणूक घरनी बतबैत छलीह जे कोना पाखलो कुमारि शालीकेँ उठा कए भागि गेल ओ ओकर इज्जति लूटि लेलक। शालीकेँ तँ पाखलो नोचि-चोथि नेने हेतैक, ई सभ सोचि-सोचि आन सभ लोक ओकरा प्रति अपन दया भाव देखबैत रहैक।

            “पाखलो शालीक शीलभंग क’ देलकैक।” ई बात सौंसे गाममे आगिक भांति पसरि गेलैक। ओकर भाय जे नोकरीसँ घर घुरैत रहैक ओकरहुँ ई बात बुझनामे आबि गेलैक। ओ गोस्सासँ लाल भ’ गेलैक, संगहि डरि सेहो गेलैक। ओकरा हाथमे कुड़हरि रहैक जकरा ओ अपन कन्हा पर राखि लेलक। “एहि कुड़हरिसँ जँ हम ओहि पाखलोकेँ जित्ते नहि काटि देलियनि तँ हमरहुँ नाम नहि।” ओ बेर-बेर यैह शब्द दोहराबैत रहैक। शालीकेँ ताक’ जएबा लेल ओ कतेको लोकसँ मिनती केलक मुदा किओ ओहि अन्हार जंगलमे जएबा लेल किएक तैयार होइतैक? ओ एकटा लालटेम जरौलक आ एसगरे चलि देलक। लोक सभ ओकरा पागल कहए लागलैक। “पाखलो अहाँकेँ गोली मारि देत।” ई कहि लोक-सभ ओकरा डरएबाक प्रयास केलकैक मुदा ओ अपन जिद पर अड़ल रहल। ओ एसगरे चलि देलक, तखने दादी सेहो ओकरा संगे जएबाक लेल तैयार भ' गेलैक। दादी कार्रेर (बस) क चालक रहैक। शकल-सूरतमे ओ सोनूएँ-सन रहैक। दुनू युवा जएबाक लेल तैयार भ’ गेल। दादी शालीक कानमे किछु कहलकैक। ओ दुनू पातोलेक बाटे जंगल नहि जा कए सीधे गामक पुलिस स्टेशन दिस चलि देलक। एहन देखि गामक किछु आर बूढ़ आ जुआन सभ ओकरा संग भ’ गेलैक। सब किओ पुलिस-स्टेशन पहुँचि गेल। दादी पुलिस-स्टेशनक कैब, (पुर्तगाली पुलिस अधिकारी)  देसाई साहेबकेँ शोर पारलकैक। ओ दरबज्जा नहि खोलि खिड़की खोललक आ ओतहिसँ बाहरक दृश्य देखलक। “पाखलो भीतरमे छैक की?” दादी कान्स्टेबलसँ पुछलकैक। “नहि।”  साधारण भेषमे कान्स्टेबल कहलकैक। “तखन गेलैक कत”? दादी फेर पुछलकैक। “कार्मोक प्रधान आ हुनक दूई टा संगी भोरे-भोर शिकार पर गेल छथि, एखन धरि नहि आएल छथि। हुनका पणजी शहर सेहो जेबाक छनि, एहिलेल आब ओ काल्हिए औताह।” कान्स्टेबल कहलकैक। “साँचे?” “हँ, साँचे”, देवकीकृष्ण भगवानक किरिया। कान्स्टेबल देसाई कहलकैक। नहि, नहि ओ झूठ बाजि रहल अछि। हमरा सभकेँ पुलिस स्टेशनक भीतर जा कए देखबाक चाही। “पहिने दरबज्जा खोलू, हमरा सभकेँ देखि कए पाखलो भीतरे गुबदी मारि देने हैत।” सोनू जोरसँ चिकड़ि कए कहलक आ अपन कुड़हरि नचब’ लागल। जाउ! जाउ! बन्न करू अपन ई नाटक। कान्स्टेबल गोस्सासँ कहलकैक। “एखन जँ अहाँक बहिनक इज्जति पाखलो लूटि नेने रहितए तँ अहाँ कि एहिना चुप बैसि रहितहुँ?” सोनू गोस्सासँ बाजल। “आब अहाँ किछु बेसिए बाजए लागलहुँ अछि, एहिसँ बेसी जँ किछु बाजलहुँ तँ हमरा बन्दूक निकालए पड़त।” “अहाँ एना किएक बाजि रहल छी कॉन्स्टेबल?”  दादी बीचहिमे टोकलक। कारी शीशमक लकड़ी सन देहवला दादी कोयला जकाँ गरम भ’ गेल। “अहाँ कि कोनो बाहरी लोक छी? फिरंगीक पेटपोस्सा, अपन आ आनक कोनहुँ गरैन नहि? एहन-एहन केँ तँ पाखलोएक संग भगा देबाक चाही।” “हाँ साँचे!” एतबा कहि सभ लोक हँ मे हँ मिलेलकैक। नहि, नहि हमरा सभकेँ अहाँक बात पर भरोस नहि अछि। हमरा सभकेँ देखए दिअ, पाखलो निश्चिते भीतर दुबकल अछि। एतबा कहि सोनू भीतर जएबाक जिद करए लागल। “नहि, नहि एहन बात नहि छैक। जँ एहन रहतैक तँ अहाँ सभ एखन धरि पड़ा गेल रहितौं। पाखलो सँ अहाँ सभकेँ गोली खाए पड़ितए। अहाँ सभकेँ जँ एखनहुँ विश्वास नहि होइत अछि तँ भीतर आबि जाउ मुदा जल्दीए बहरा जाएब।” सभ किओ पुलिस स्टेशनक भीतर ढुकि गेल। ओतए तीनटा पुलिसक अतिरिक्त किओ नहि रहैक। एक कान्स्टेबल देसाई, दोसर नायक कासीम आ तेसर धोणू पुलिस। सोनू आ दादी, दुनू शालीकेँ ताकबाक लेल पातोलेक जंगल दिस चलि देलक। सोनू शालीक नाम ल’ ल’ कए चिकड़’ लागल, मुदा ओकरा कोनो जबाब नहि भेटलैक। जंगलमे भालू सभ कानैत रहैक। चारू दिस कीड़ा-मकोड़ाक आबाज अन्हार आ सन्नाहटि पसरल रहैक। दुनूगोटे राति भरि जंगलक खाक छानैत रहल मुदा ओकरा कानमे मात्र ओकरहि द्वारा लगाओल गेल आबाजक प्रतिध्वनि सुनाइत रहलैक। सोनू छन भरिक लेल बहुत निराश भ’ गेल। गाम-घरमे ककरो देहमे भा आबि गेलासँ जे स्थिति होइत छैक ओहिना सोनूक देह काँपए लागलैक। ओ अपन देह पर नियंत्रण केलक आ अपन आँखि नमहर क’ कए गोस्सासँ बाजए लागल— “हम सौंसे जंगलमे आगि लगा देबैक, आ जरा कए सुड्डाह क’ देबैक। यैह जंगल पाखलो केँ शरण देने छैक। सुड्डाह क’ देबैक एकरा, सुड्डाह क’ देबैक। ओ बुदबुदाब’ लागल।” एतबा कहैत ओ काँपए लागल। ओ लालटेमक बतिहरि उकसा देलकैक। लालटेमक इजोत भभक’ लागलैक। ओहि बतिहरिसँ ओ सौंसे जंगलकेँ जरएबाक तैयारी करए लागल, मुदा दादी ओकरा रोकि लेलकैक। “अहाँ ई कोन पगलपन क’ रहल छी?” “ई पगलपन नहि छैक दादी। एहि जंगलमे आगि लगा कए हम ओहि पाखलोकेँ सुड्डाह क’ देबैक।” सोनू अपन दाँत आ ठोर पीसैत बाजल। “नहि, नहि, एना ओ तँ नहि मरि सकत, हँ जंगल अवस्से जरि कए सुड्डाह भ’ जेतैक। एतबा कहि दादी ओकरा रोकबाक प्रयास केलकैक। एहि बातकेँ ल’ कए दुनूमे घिच्चातानी भ’ गेलैक, आ एहि बीच सोनूक हाथसँ लालटेम गिर गेलैक आ बुता गेलैक। चारू दिस घुप्प अन्हार भ’ गेलैक। बहुत राति भीजला पर ओ दुनू गाम घुरल। एखन मुर्गा पहिले-पहिल बाँग देने हेतैक। खाम्हसँ ओंगठि कए बैसल सोनूकेँ निन्न आबए लागलैक, तखनहि दरबाजा पर खट-खट केर आबाज भेलैक। सोनू उठि कए दरबाजा लग गेल। ओकरा दरबाजा लग पहुँच’ सँ पहिनहि दरबाजा धकेलि कए तीनटा पाखले भीतर आबि गेलैक। सोनू ओहि दरबाजा लग खाम्हे जकाँ ठाढ़ रहल! घरमे बरैत लालटेमक इजोतमे ओ पुलिस प्रधान कार्मो रेयस केँ चिन्ह गलैक । गोर-गहुमा चाम आ ताहिपर गुलाबी मोंछ। पुलिस प्रधान अपन कन्हासँ शालीकेँ नीचाँ उतारि देलकैक। ओ शालीकेँ कहुना बैसएबाक प्रयास केलक मुदा असफल रहल, हारि कए ओ अपन अंगा खोलि ओछा देलकैक आ ओहि पर शालीकेँ सुता कए तीनू पाखले घूरि गेल। ओकरा सभक जूत्ताक आबाज शनैः-शनैः कम भेल जा रहल छल। शाली धरतीए पर घोलटल छलीह। ओकर आँखि खुजले रहैक। सोनूकेँ तँ बुझू जे किओ ओकरा पएरमे काँटी ठोकि देलकैक, ओ भावशून्य  ठाढ़ भ' सबकिछु देखैत रहल। ओकर नजरि कोनमे राखल कुड़हरि पर गेलैक। लालटेमक इजोतमे ओहि कुड़हरिक चमकैत धार सोनूक असहायता पर हँसैत रहैक। ओ चमक सोनूक करेजकेँ चालनि केने जा रहल छल। सोनू जखन शाली लग आएल, तँ शाली नहुँ-नहुँ अपन आँखि खोललक। दुनूक अवाके बन्न भ’ गेल रहैक। सोनू शालीकेँ शोर पारलकैक तँ ओ ‘आहि-आहि’ कहि कए जबाब देलकैक। सोनू ओकरा पानि पीबाक लेल देलकैक। एतबहिमे सोनूक अंदरक भाव बाहर निकलि गेलैक। · शालीक शीलभंग कएलाक पश्चात् पाखलो ओकरा सोनूक ओहिठाम छोड़ि देने छलैक एहिलेल गामक लोक सभ सोनूकेँ समाज सँ बाड़ि देने छलैक। शालीकेँ गर्भ छनि ई बात सौंसे गाममे पसरि गेलैक। सौंसे गाममे ने तँ किओ सोनूसँ बात करैक आ ने किओ ओकरा काज पर बजबैक। सोनूक रोजी बन्न भ’ गेलैक। ओहि घटनाक दोसरहिं दिन शाली आत्महत्या करबाक प्रयास कएने छलीह, मुदा सोनूकेँ बीचहिं मे घर आबि जयबाक कारणेँ ओकर जिनगी बाँचि गेलैक। गर्भवती हेबाक लाजक कारणेँ ओ कैक बेर घरसँ भागि गेल छलीह मुदा सब बेर सोनू ओकरा घुरा लैक। ओकर घर गामक सीमान पर रहैक। एहि लेल गामक आन लोकसँ ओकरा विशेष संपर्क नहि रहैक। तकरा बादो गामक मौगी सभ शालीकेँ देखि ओकरा नाम पर थूक फेकैक। ओकरा पर फब्ती कसैत रहैक। शाली बेचारी सभ किछु सहन केने जा रहल छलीह। “चाहे जे किछु भ’ जाए मुदा अपन जान नहि देब शाली!” सोनू ओकरा कहलकैक। ओ इहो कहलकैक—“बीया चाहे कथुक हो वा केहनो हो जँ एकबेर ओ माटिमे पड़ि जाइत छैक तँ ओकर पालन-पोषण माटि कए करहि पड़ैत छैक। माटि बंजर नहि हेबाक चाही।” सोनूकेँ काज भेटब मोसकिल भ’ गेलैक, आ ओ दुनू प्रायः उपासे रहय लागल। उपरसँ लोक सभक ऊँच-नीच सुनैत-सुनैत ओ आजिज भ’ गेल छल। ओ बहुत परेशान रहय लागल। “जँ आर किछु दिन गाममे रहलहुँ तँ भूखसँ मरि जाएब आ लोकक ऊँच-नीच तँ सुनहि पड़त।”, एहना सोचि कए ओ एकदिन गाम छोड़ि कए शेलपें चलि गेल। शाली घरमे एसगरे रहि गेलीह। सोनू कहियो-काल गाम आबैक आ शालीकेँ अन्न-पानि द’ कए आपस चलि जाइक। भोरका पहर रहैक। शाली दरबाजासँ झलकैत सरंग दिस निहारैत छलीह। तखने ओ दरबाजासँ भीतर अबैत कार्मो प्रधानकेँ देखलकैक। ओकर तँ करेजा धक् द’ रहि गेलैक। अपन कनहा आ छाती पर तमगा लगौने कार्मो प्रधान अपना हाथक बंदूक धरती पर राखैत ओत्तहि बैसि गेल। शाली तँ डरक मारल काँपय लागलीह। कार्मो प्रधान ओकरा किछु कहय चाहैत छल मुदा बाजि नहि सकल। ओकरा कोंकणी नहि अबैत रहैक साइत एहि लेल ओ चुप रहि गेल। पछाति जा कए ओ जे किछु पुर्तगाली भाषामे कहलकैक ओकरा शाली नहि बुझि सकलीह। ओ शालीकेँ अपना लगहि मे बैसबाक इशारा केलकैक। आ फेर किछु खिन्न भ’ कए चुप रहि गेल। भ’ सकैछ जे ओकरा पश्चाताप भेल हो, “एहन शाली केँ लागलैक।” ओ उठल, अपन बंदूक अपना कनहा पर राखलक आ चलि देलक। ओकरा जूताक आबाज शालीक करेजक धुकधुकीक पाछाँ गुम्म भ’ गेलैक। शाली अपना घरमे पाखलो केँ सहारा देने छैक, किओ ई बात सौंसे गाममे छिड़िया देलकैक। ई खबरि सौंसे गाममे लुत्ती जकाँ पसरि गेलैक। सोनूकेँ ई खबरि जखन शेलपेंमे भेटलैक तँ ओ अपन हाथसँ कान दाबि लेलक। आब ओ कोन मुँहे गाम जाएत? ऐहन सोचि ओ अपन कान ऐंठ लेलक। कार्मो रेयश पुलिस स्टेशनक सभ पाखलोक प्रधान छल। ओकरा लिस्बनसँ भारत एनाइ छओ-सात बरखक लगधक भ’ गेल रहैक आ एहि गामक पुलिस-स्टेशनमे ओकर दोसर बरख रहैक। ओकर डील-डॉल- लाल, गोर, गुलाबी केश आ मोछ वला रहैक। बाघ-सन ओकर दुनू आँखिसँ लोककेँ डर भ’ जाइक। ओ जहियासँ एहि गाममे आयल तहिये सँ एहि गामक लोक पर अपन हुकुम चलबए लागल छल। दू महीना धरि ओ लोक सभकेँ खूब डरौलक-धमकौलक-सतौलक आ पीटलक। आब ओ लोककेँ सताएब तँ बन्न क’ देने छल मुदा गामक लोककेँ ओकरासँ बहुत डर लागैक। दोसरहिं दिन साँझकेँ जखन शाली अपन घरक दीप लेसैत छलीह, तखनहि दरबाजा पर जूताक आबाज सुनलक। कार्मो प्रधान सीधे घरमे घूसि गेलैक, आ बन्दूक कनहा परसँ नीचाँ राखि बैसि गेल। डरसँ शालीक हाथसँ दीप छूटि गलैक आ चारू दिस अन्हार भ’ गेलैक। प्रधान अपना जेबीसँ सलाइ निकालि दीप लेसलक आ हँसए लागल। ओकरा हँसबाक आबाजसँ पूरा घर गूँजायमान भ’ गेलैक। ओ शालीकेँ अपना लग बैसा लेलक आ ओकर गाल, ठोर आर ठुड्डीकेँ सहलाब’ लागलैक। ओ स्वयं हँसि रहल छल आ शालियो केँ हँसएबाक प्रयास क’ रहल छल। मुदा शाली डरसँ काँपि रहल छलीह। जाहि समय पाखलो शालीकेँ अपना बाँहिमे घीचैत छल ठीक ओहि समय ओकर नजरि ओकरा नोर पर गेलैक। ओ ओकर गरम नोरकेँ पोछलक आ ओकरा समझएबा-बुझएबाक लेल ओकरा पीठ पर थपकी मारए लागल। बादमे ओ शालीक ठुड्डीकेँ उठबैत ओकरा अपना दिस देखबाक लेल इशारा करए लागल। मुदा शाली ओकरा दिस नहि देखि सकलीह। ओ अपन दुनू हाथेँ अपन आँखि झाँपि, काँपैत-काँपैत ओतएसँ जयबाक उपक्रम करए लागलीह। एतबहिमे पाखलो ओकरा अपन दुनू हाथेँ अपना बाँहिमे कसि लेलकैक। दोसर दिनसँ भोरे-भोर गामक लोक सभ कार्मोकेँ शालीक घरसँ निकलैत देखलकैक। ओकरा देखतहि लोक सभ शालीक नाम पर थूक फेकय लागल आ ओकरा संबंधमे भिन्न-भिन्न प्रकारक बात सभ करए लागल। “हे-बे देखिऔक! शालीक भड़ुआ।” “ओ पाखलो केँ अपना घरमे राखि धंधा सुरह क’ देने छैक वा अपन नव दुनियाँ बसा नेने अछि?” “दुनियाँ केहन यौ? धंधा कहियौक, धंधा।” “छी! छी! ओ लाज-शरम पीबि गेल अछि।” “औजी! लाज-शरम रहतैक कतए सँ! ओ तँ अपन जातिओ-धरम भ्रष्ट क’ नेने अछि।” · तीन गामवलाक नजरिमे हम पाखलोएक रूपमे एहि धरती पर जनम लेलहुँ। ठीक ओहि साल पुर्तगाली सरकार गामसँ पुलिस-स्टेशन हटा लेलकैक। हमर बाप ओहि समय गाम छोड़ि पणजी शहर चलि गेलाह। हुनकर रूप कहियो हमरा आँखिक समक्ष नहि आबि सकल। नेनपनमे हम हुनका कहियो देखने रहियनि की नहि? सेहो हमरा स्मरण नहि अछि। हमर माए शाली, वास्तवमे एकटा देवीक रूपमे एहि संसार मे आएल छलीह। हुनकर वर्ण तँ श्याम छलनि मुदा सुन्नरि छलीह। एकदम सोटल देह। ओ प्रायः लाल आ कि हरियर रंगक साड़ी पहिरैत छलीह आ माथ पर सिनूरक टीका लगबैत छलीह। एहि परिधानमे ओ एकदम सुन्नरि लागैत छलीह। एकदम सांतेरी माए-सन। हमर जनम एकादशी दिन भेल छल, एहि लेल माए हमर नाम ‘विठ्ठल’ राखने छलीह। ओहि एकादशीक दिन सांतेरी मायक मंदिर मे त्योहार भ’ रहल छलैक। एहि धरतीक पाथरसँ बनाओल गेल श्री विठ्ठल केर कारी प्रतिमा ओहि दिन ओहि मंदिरमे स्थापित कएल गेल रहैक। ई बात हमर माए बतौने छलीह। ओ अपन मधुर आबाजसँ हमरा ‘विठू’ कहि बजबैत छलीह। कार्मो प्रधानकेँ पणजी शहर चलि गेलाक पश्चात् हमर मायक हालति आब सरिपहुँ बहुत खराप होमए लागल छल। सौंसे गाम ओकरा मंदिरक दासीक सदृश देखैत रहैक जखन कि ओ एकटा पतिव्रता नारी छलीह। गामहिमे एकटा ब्राह्मणक घरमे नौरीक काज क’ कए ओहिसँ प्राप्त मजूरीसँ ओ हमर पालन-पोषण कएने छलीह। दादी अपन बेटा गोविन्दक संग हमरहुँ स्कूल भेजए लागल। ओहि दिनसँ हम आ गोविन्द दुनू गोटे खास मीत बनि गेलहुँ। विद्यालयक प्रवेश-पंजीमे शिक्षक हमर नाम पाखलो लिख देलनि। अही नाम सँ हम ओहि विद्यालयमे मराठी माध्यमसँ चारिम कक्षा धरि पढ़ाइ केलहुँ। हाजरी दैत काल हमर एहि नाम पर हमरा कक्षाक आन-आन छात्र लोकनि हमर खूब मजाक उड़ाबए जे हमरा बहुत खराप लागैत छल। प्रवेश-पंजीमे हमर नाम पाखलो लिख देल गेल रहए इहो लेल हमरा बहुत खराप लागैत छल। गोविन्द हमरा सँ एक कक्षा आगू छल तकर पश्चातो हमरा ओकरासँ दोसती भ’गेल छल। हम ओकरा संगहि माल-जाल ल’ क’ जंगल धरि जाइत रही। जंगल जाइत काल हमरा काँट-कुशक कोनो डर नहि होइत छल। ओतए हम सभ कणेरा-काण्णां, चारां-चुन्नां (जंगली फल) खाइत छलहुँ। ‘घूस-गे बाये घूस’ (गोवाक क्षेत्रमे खेलल जाएबला एकटा खेलमे प्रयुक्त शब्द जाहिमे एहन मान्यता छैक जे ई शब्द बाजलासँ कोनो खास लोकक देहमे कोनो आत्माक प्रवेश भ’ जेतैक।) शब्द बाजि कए एक दोसरा पर भा आबए धरि कोयण्या-बाल, गड्ड्यांनी (गोवा क्षेत्रमे नेना सभक द्वारा खेलल जाएबला एकटा खेल।) आदि खेलैत छलहुँ। आन-आन चरवाह सभक सँग हमहुँ चरवाह बनि गेल छलहुँ। गोवा केँ स्वतंत्र हेबासँ पहिनुके बात थिक। तखन हमर उमिर नओ-दस बरखक रहल होएत। गामक बन्न पड़ल पुलिस-स्टेशन एकबेर फेर चालू भ’ गेल रहैक। ओतए तेशेर नामक एकटा नव पुलिस प्रधानक नियुक्ति भेल छलैक। ओ कहियो काल सैह पणजीसँ गामक पुलिस स्टेशन अबैत-जाइत छल। ओ अपना लेल ओतए एकटा धौरबी राखि नेने छल। ओकरा ओ अपना संगहि घोड़ा-गाड़ी पर घुमबैत रहैत छल। गामक बगल वला जमीनक लेल दत्ता जल्मी आ सदा ब्राह्मणक बीच बहुत दिनसँ विवाद छलैक। ओकरा सभक बीच मोकदमा चलि रहल छलैक। दू-तीन साल बीत गेलाक पश्चातो एखन धरि ककरहुँ पक्षमे फैसला नहि भेल छलैक। सदाकेँ एकटा युक्ति सुझलैक। एकबेर ओ नव पुलिस प्रधान (तेशेर)केँ अपना घर बजाकए खूब मासु-दारू खुऔलक-पिऔलक। ओहि दिन ओकर नजरि ओकरा स्त्री पर गेलैक। ओहि क्षण ओ ओकरा प्रति आसक्त भ’ गेल आ ओ जाहि कक्षमे रहथि ताहि दिस देखतहि रहि गेल। सदा प्रधानसँ विनती केलक जे ओ मोकदमा ओकरहिं पक्षमे करा दैक। कने काल चुप रहलाक पश्चात् प्रधान ओकरा हँ कहि देलकैक। शर्तक रूपमे ओ सदासँ ओकर स्त्री माँगि लेलकैक। सदाकेँ जल्मीक जमीनक संगहि-संग गामक सभसँ पैघ जमीन केगदी भाट(क्षेत्र विशेषक नाम) भेटए बला रहैक। चारिए-पाँच दिनक बाद पुर्तगालीक विरोधमे काज करबाक अभियोगमे दत्ता जल्मीकेँ भीतर क’ देल गेलैक। तकर बाद ओकर की भेलैक ताहि संबंधमे ककरहुँ कोनो पता नहि चलि सकल। केओ कहैक जे दत्ता फेरार भ’ गेलैक तँ केओ कहैक जे प्रधान ओकरा मारि देलकैक। ओहि दिनक बाद सँ सदाक घर लग सभ दिन एकटा गाड़ी लागए लागलैक। सदाक स्त्री सभ साँझकेँ नव-नव साड़ी पहिरए, नीक जकाँ अपन केश-विन्यास करए, काजर, बिंदी, पौडर आदि लगा अपन श्रृंगार करए आ तेशेरक गाड़ी मे बैसि जाए। तेशेरक गाड़ी सदाक बंगला पर धूरा उड़बैत फुर्र भ’ जाइक। दोसर भोर ओ गाड़ी हुनका एतए पहुँचा दैक। ओ गाड़ीक पछिला सीट पर लेटल रहैत छलीह। हुनकर केश आ चोटी सभ उजरल-उभरल रहैक, आँखिक काजर नाक आ गाल पर लेभराएल रहैत छलैक। मोकदमाक फैसला सदा जमींदारक पक्षमे भ’ गेल छलैक एहि लेल ओ सत्यनारायण भगवानक पूजा करबाक लेल सोचलक। पूजामे अएबाक लेल ओ भरि गामक लोककेँ हकार देलकैक। सदा ओ ओकर स्त्री पूजा पर बैसि चुकल छलीह। तखनहि प्रधान तेशेर अपन गाड़ी ल’ कए ओतए आबि गेल। ओ पूजा पर बैसलि सदाक स्त्रीकेँ उठा लेलक। पूजामे आएल सभ लोककेँ एहि घटनासँ बड्ड आश्चर्य भेलैक। केगदी चास-बास केर कागद-पत्तर सदाकेँ थम्हबैत ओ ओकरा स्त्रीकेँ ल’ कए आगू बढ़ल, तखनहि सदाक छोट भाय ओकरा रोकबाक प्रयास केलकैक। तेशेर ओकरा पर बन्दूकसँ निसान साधि लेलकैक आ आब गोली दागहि वला रहैक की सदा ओकरा रोकि देलकैक। तेशेर अपन बन्दूक नीचाँ क’ लेलक। तकरा पश्चात् ओ जनूकेँ एक दिस धकलैत ओकरा स्त्रीक हाथ पकड़ि आगू बढ़ि गेल। एहि पर सदा अपना स्त्रीसँ कहलकैक— “ओकरा संग एना जा कए अहाँ हमर नाक कटाएब की?” ई सुनि सदाक स्त्री अपन मुँह चमकबैत बजलीह— “अहाँकेँ नाको अछि की? जँ अहाँकेँ नाके चाही तँ हे ई लिअ...” एतबा कहि ओ अपन नाकक नथिया निकालि सदाक पयर लग धरती पर फेकि देलकैक आ प्रधान तेशेरक संग चलि देलक। तेसरे दिन प्रधान ओकरा ल’ कए पुर्तगाल चलि गेल। प्रधान तेशेरकेँ पुर्तगाल जेबासँ ठीक एकदिन पहिनुके गप्प थिक। रातिक लगभग दू वा तीन बजैत हेतैक। केओ हमरा घरक केबाड़ खोलि हमरा घर घूसि गेल। हमर माय कम कएल लालटेमक इजोतकेँ कने तेज केलक। देखलहुँ तँ एकटा अनभुआर लोक! ओ बाजल— “बहिन हमरा कतहुँ नुका दिअ, हमरा पाछू फिरंगी पुलिस लागल अछि। एकबेर जँ हम ओहि पुलिस प्रधान तेशेरक हाथ आबि गेलहुँ तँ ओ हमर जान ल’ लेत। हम जीवित नहि बाँचि सकब।”         एतबहिमे दूरसँ अबैत जूता ध्वनिसँ बुझाइक जे किओ आबि रहल छैक। हमर माय ओकरा ओढ़बाक लेल अपन साड़ी देलकैक आ ओ साड़ी ओढ़ाकए ओकरा हमरहिं लग सुता देलकैक। किछुए क्षण केर पश्चात् घरमे इजोत देखि प्रधान तेशेर हमरा घरमे घुसि गेल। हमर माय बहुत डरि गेलीह। तेशेर सौंसे घरक तलाशी ल’ लेलकैक आ ओतए के सूतल छैक? ओकरा संबंधमे पूछय लागल—हमर माय डरैत-डरैत बजलीह— “ओ हमर ब-ब-बहिन थिकीह.....साहेब।” एतबा सुनि ओ लोकनि चलि गेल। ओहि राति ओ अनभुआर लोक हमरहि ओहिठाम ठहरल ओ भोर होइतहि चलि गेल। ओ अपन नाम रामनाथ कहने छल आ ओ गोवाक स्वतंत्रता संग्राममे भाग नेने छल। ओ आ ओकर दूटा संगी, गामक पुलिस-स्टेशनकेँ उड़एबाक लेल आएल छल। ओकरा संगीकेँ तँ फिरंगी पकड़ि नेने छलैक मुदा एकरा पकड़बाक लेल ओ सभ एकर पछोर क’ रहल छलैक। ओ डाइनामाइट लगा कए पुलिस-स्टेशन उड़ा देलकैक। भोर होइतहि ई खबरि गाम आ आस-पासक इलाकामे पसरि गेलैक। ई ताहि दिनक गप्प थिक जखन गोवाकेँ मुक्ति भेटल छलैक। ओहि दिन दूटा बड़का धमाका सूनल गेल छलैक। ई धमाका बम केर छलैक, ई बात लोककेँ पछाति जा कए पता लागलैक। उजगाँव आ बाणस्तारी गामक दुनू पुल उड़ा देल गेल रहैक। भारतीय सेनाकेँ गोवामे प्रवेश करबासँ रोकबाक लेल ओ पुर्तगाली मिलिट्री द्वारा तोड़ल गेल छलैक। ओ के आ किएक तोड़ने छल, पहिने एहि बातक पता ककरो नहि चलि सकलै। दूपहरमे गामक आसमानमे एकटा हवाइजहाज उड़ैत रहैक। ओहि हवाइजहाजसँ परचा सभ गिराओल जा रहल छलैक जे हवामे लहराबैत रहैक। ओहि परचा सभकेँ लूटबाकक लेल हम सभ बच्चा लोकनि बहुत दूर धरि दौड़लहुँ। हमरो एकटा परचा भेटल, जकरा ल’ कए हम दादीक ओतए पहुँचलहुँ। परचा पुर्तगालीमे लिखल रहैक जकरा दादी हमरा सभकेँ अपन भाषामे सुनबैत रहथि—“ई इंडियन मलेटरीक पत्रक छैक। ओ कहने छथि— अहाँ सभ डरब नहि, अहाँ सभक जिनगीकेँ कोनहुँ खतरा नहि अछि। अहाँ सभ पुर्तगाली राजसँ मुक्त भ’ गेल छी।” ओहि दिन हमरा विद्यालयमे छुट्टी छल। कांदोले गाममे उत्सवक माहौल रहैक। किछु लोक लौह अयस्कक बार्ज (मालवाहक जहाज) सँ पणजी गेल छल। गोवाकेँ मुक्ति भेटलाक किछुए दिन बाद गोविन्दक दादी हमरा घर आएल छलाह। “भारत सरकार बहुत रास पाखले केँ पकड़ि ओकरा जहाजमे बैसा पुर्तगाल भेज देने अछि।” हमरा मायकेँ ई खबरि वैह देलनि। बुझाएल जे एहि खबरिसँ ओ किछु हतप्रभ भेलीह, मुदा ओ चुप आ गुमसुम रहलीह। हमर बाबूजी कार्मो चीफ, जे पणजी शहरमे छलाह, हुनकहुँ ओहि जहाजसँ भेज देल गेल छलनि, एहि लेल मायकेँ दुःख भेलनि की? से हम बुझि नहि सकलहुँ। मुदा बादमे हुनका आँखिमे नोर आबि गेल छलनि। · हम बारह-तेरह बर्खक रहल हएब, तखनहि हमर माय मरि गेलीह। बरखाक मौसम रहैक। कतेको दिनसँ दिन-राति लगातार बरखा भ’ रहल छलैक। नदीक बाढ़िक पानि गाम धरि पहुँचि गेल रहैक। गामक केलबाय मंदिरक चारू दिस बाढ़िक पानि आबि गेल रहैक। ओहि बाढ़िमे पाँचटा गर गिर गेल छलैक। माल-जाल आ गोहाल सभ बाढ़िमे भासि गेल रहैक। हमर घर सीमानक बाहर पहाड़ीक कोनमे कनेक ऊँच स्थान पर छल। एखन धरि बाढ़िसँ घरकेँ कोनो छति नहि भेल छलैक मुदा लगातार होइत बरखा आ हवाक कारणेँ हमरो घर ओहि दिन गिर गेल। घरक एकटा चार कर्र-कर्र केर आबाजक सँग टूटि कए गिर गेल। हम जखन सूतल रही तखने ओ हमरा पर गिरल। हम आ हमर माय दुनू गोटे मरि जइतौंक। हमर माय हमरा बचयबाक लेल दौड़ि कए अएलीह जकरा कारणेँ हुनका माथमे बहुत चोट लागि गेलनि। पहिने तँ हुनका माथ पर कोरो टूटि कए गिरल आ पछाति जा कए पूरा चारे हुनका माथ पर गिर गेलनि। ओ बेहोश भ’ गेलीह। हम हुनका मुँहपर पानिक छीट्टा देलियनि तखन हुनका चेत एलनि। हम बचि गेलहुँ आ हमरा चोट नहि लागल, ई जानि ओ बहुत खुश भेलीह। बादमे हमरा अपन गोदीमे ल’ कए खूब कानए लगलीह। जखन ओ हमरा गोदी नेने छलीह तखनहि हमरा हाथमे हुनक चोटसँ निकलल खून लागल। देखलहुँ तँ हुनका माथ मे चोट लागल छलनि। हुनक माथ काँच जकाँ फूटि गेल रहनि। हम जोरसँ चिकरलहुँ, मुदा माय हमरा चुप रहबाक इशारा केलथि। हमर चिकरब सुनि कए एहि बरखाक रातिमे किओ आबय बला नहि छल। हुनकर कहनानुसार हम हुनका लजौनीक पात पीसि कए हुनका माथ पर लगा देलियनि। किछु कालक बाद हुनका माथसँ खून बहब बन्न भ’ गेलनि। घरक बचलका हिस्साकेँ हम सोंगर लगेलहुँ। हवा बहते रहैक आ रुकि-रुकि कए बरखा सेहो भ’ रहल छलैक। संगहि हवा घरक बचलका हिस्साकेँ नोचने जा रहल छल। छप्पड़क बीच दए पानि आबि रहल छलैक। घरमे कनेको सूखल जगह नहि छलैक। मायकेँ बहुत चोट लागल छलनि तैँ ओ दरदसँ कराहैत छलीह आ बीच-बीचमे अपन टाँग हिला रहल छलीह। दीया जरा हम हुनका सिरमा लग बैसि गेलहुँ। दीयाक बतिहर हवाक कारणेँ बीच-बीचमे बुता जाइत छलैक जकरा हम फेरसँ जरबैत रही। अन्हर आ बरखा आओरो तेज भ’ गेल रहैक।  हम पानि गरम क’ कए मायकेँ पिऔलियनि। चोटक दरदक कारणेँ ओ भरि राति कुहरैत रहलीह। राति भीजला पर हुनका बोखार आबि गेलनि आ से बढ़िते गेल। “भोर होइतहि हम डाकदरकेँ बजा अनबनि।” हम सोचलहुँ। मुदा राति कटतहि नहि रहए। दोसर दिन, भोरे-भोर गोविन्दक दादी डागदर केँ बजा अनलनि। डागदर हुनका सुइया-दवाई देलथि, मुदा कोनो लाभ नहि भेल। ओ बीच-बीचमे आँखि खोलैत छलीह। हुनक सौंसे देह उज्जर भ’ गेल रहनि आ हुनक आँखि भीतर दिस घीचल जा रहल छल। हुनक हाथ-पयर काँपि रहल छलनि। ओ हमरा अपना लग बैसबाक इशारा केलनि। ओ हमरा किछु कहए चाहैत छलीह से तँ हम बुझि गेलहुँ मुदा ओ किछु बाजि नहि सकलीह। ओहि दिन हुनक बोखार बहुत बढ़ि गेल रहनि। हुनक आँखि बन्न होमए लागल रहए। बोखारसँ ओ काँपि रहल छलीह। बादमे हुनका गरसँ घर्र-घर्र केर आबाज भेल ओ ओहि आबाजक संगहि ओ जतए सुतल छलीह किछुए पलमे सभ किछु शांत भ’ गेल। ओ हमरा छोड़ि कए चलि गेलीह! हमरा अनाथ क’ कए चलि गेलीह! दादी एसगरे आबि कए अंतिम संस्कारक तैयारी करए लगलाह। शेलपें मे रहएवला मामा धरिकेँ खबरि देमए बला हमरा किओ नहि भेटल। बरखा बहुत जोरसँ सँ भ’ रहल छलैक। गाममे आएल बाढ़िक पानि एखन धरि घटल नहि छलैक। श्मशान घाट पर दादी एसगरे चिता पर लकड़ी राखैत जा रहल छलाह आ हम हुनक संग द’ रहल छलिऐक। हमर मायक अंतिम यात्रामे दादीक अलावे आन किओ नहि आएल रहए। अनहार-मुनहार भ’ गेला पर चिता बनि कए तैयार भेलैक। हम मायक लहाशकेँ चिता पर चढ़ा कए अपना हाथेँ आगि देलिऐक। मुदा चिताकेँ आगिए नहि लागैक। एकतँ तीतल लकड़ी आ ताहूपर बरखा से। दादी बहुत प्रयास केलनि, मुदा बरखा आ तेज हवाक कारणेँ चिताकेँ धाह धरि नहि लागि सकलै। अधरतिया भ’ गेल रहैक आ हम दुनू गोटा एखन धरि श्मशान घाटमे छलहुँ। चिताकेँ आगि लगएबाक प्रयासमे दादी थाकि चुकल छलाह। जखन कोनहुँ उपाय नहि चललनि तँ चुपचाप काम करए वला दादी किछु कालक ले ठाढ रहलाह आ बजलाह— “बाउ! अहाँक हाथे अहाँक मायक चिताकेँ आगि नहि लागि रहल अछि? आब की उपाय?” “आब कोनहुँ तरहेँ एहि लहाशकेँ माटिमे गारए पड़त!” एतबा कहि ओ कोदारिसँ माटि खोदब सुरह क’ देलनि। हुनकर बात सुनिकए हम सोचए लागलहुँ— “हँ, हम ठहरलहुँ भागहीन पाखलो! पाखलेक वंशज छी, एहि लेल हमरा हाथेँ मायक चिताकेँ आगि नहि लागि रहल अछि। हमरा पाखलो नहि हेबाक चाही। हमर ई पाखलेपन हमरा मोनकेँ चोट पहुँचा रहल छल। आइ एहि पाखलेपनक एहसास हमरासँ सहन नहि भ’ रहल छल।” एक आदमीक लम्बाईक बरोबरि एकटा खदहा खोदल गेल। “माटि देबासँ पहिने अपन मायकेँ प्रणाम करिऔन।” दादीक एतबा कहलाक उपरांत हम होशमे एलहुँ आ दुनू हाथ जोड़ि मायकेँ प्रणाम केलहुँ। · किछुए दिनमे हम पाखलोसँ खलासी बनि गेलहुँ। जाहि कार्रेर पर गोविन्दक दादी ड्राइवर छलाह ओहि कार्रेर पर ओ हमरा खलासीक रूपमे राखि लेलनि। हमर काज छल यात्री सभक समान उपर चढ़ाएब  आ उतारब। बाजारक दिन तँ कार्रेरमे बहुत भीड़-भाड़ रहैत छलैक। कार्रेर केर भीतर यात्री लोकनि, तँ उपर केलाक घौर, कटहर, अनानास सन बहुतो रास चीज होइत छल। कार्रेर बुझू हकमैत-हकमैत सड़क पर चढैत-उतरैत छल। मुदा जाधरि हम खलासी रहलहुँ ताधरि कार्रेरकेँ किछु नहि बिगड़लैक आ ने तँ हम एक्कहु टा ट्रिप चुकए देलिऐक। बस मालिकक भाय यात्री लोकनिसँ पाइ असूलैत छल। ओ बहुत ठसकमे घूमैत छल, मुदा राति होइतहि ओकर सभटा हेकड़ी खतम भ’ जाइत छल। घर पहुँचलाक बाद ओ पावलूक ओहिठाम जा कए भरि दम शराब पीबि लैत छल। एकदिन ओ हमरा शराब आनबाक लेल कहलनि। हम हुनका शराब तँ आनि देलियनि मुदा दादी हमरा देख लेलथि आ बहुत डाँट-फटकार केलथि। “आब फेर कहियो शराब आनए नहि जाएब।” एतबा कहैत ओ हमरा गामक केलबाय देवीक किरिया देलथि। एकटा आर एहने सन स्मरण......एकबेर गैरेजक मैकेनिक लाडू आ हम कार्रेर धोबाक लेल नाली पर गेलहुँ। हमसभ गाड़ीक पीतरिया चदराकेँ इलायचीसँ रगड़ि-रगड़ि साफ केलहुँ। गाड़ी धुबैत काल हमसभ पानिसँ भीज गेल छलहुँ। सौंसे देह जाड़सँ काँपए लागल छल, एहि लेल लाडू एकटा बीड़ी सुनगा कए अपना मुँहमे दबौलक आ गाड़ी धोबए लागल। ओ एकटा बीड़ी हमरो देलक। हमहुँ बीड़ी सुनगेलौं आ पीब’ लागलहुँ। एतबहिमे दादी ओतए पहुँचि गेलाह आ हमरा बीड़ी पीबैत देखि लेलथि। ओ हमरा पर बहुत गोस्सा भेलाह आ संगहि ओहि गोस्सामे हमरा पर कैक थापड़ मारि बैसलथि। हम कानए लागलहुँ। हम हुनकर पयर पकड़लियनि, माँफी माँगलियनि, मुदा एहि सभसँ दादीक गोस्सा कम नहि भेलनि। “आब जँ फेर अहाँ कहियो बीड़ी पीलहुँ तँ अहाँकेँ अपन मायक किरिया!” ओ हमरा किरिया देलथि। हम जहियासँ खलासी बनल छलहुँ तहियेसँ दादीक ओहिठाम रहैत छलहुँ। हम आ गोविन्द दुनू गोटे भाइक सदृश भ’ गेल छलहुँ। गोविन्द हमरासँ बेसी बुधियार आ चलाक छल, संगहि तत्वज्ञानी आ आस्तिक सेहो। हमर माय जहियासँ हमरा छोड़ि के गेल रहथि तहियेसँ हम प्रायः कानैत रहैत छलहुँ। एहना स्थितिमे नेना रहितहुँ गोविन्द हमरा समझाबैत-बुझाबैत रहैत छल। ओ कहैत छल, “अहाँकेँ पता अछि! जखन हमर तामू गाय बच्चा देने छलीह तँ ओहो चारिए मासक भीतर मरि गेल छलीह, तखन हुनका बाछाकेँ के देखने रहैक? ओहि समयक छोट बाछा आइ बड़का बरद बनि गेल छैक। पाखल्या! …..यौ पाखल्या! कानू जुनि! अहाँकेँ देखि हमरहुँ कानब आबि जाइत अछि।” हमर आजी सेहो पछिले साल भगवानक घर गेल छलीह। ओ कहैत छलीह, “सभटा जन्म लेबएबला प्राणीकेँ एकदिन मरहिं पड़ैत छैक, एकरा लेल लोककेँ दुख नहि करबाक चाही।” ई सभ सुनि कए हमर कानब बन्न होइत छल। हम ओकर भाषण सुनैत जा रहल छलहुँ आ ओ कोनो तत्वज्ञानी जकाँ बाजतहि जाइत छल...... “मनुक्ख जन्मक संगहि मृत्यु सेहो अपना संगहि आनने अछि। जन्मकालमे ओ नेना रहैत अछि, नेनासँ ओ जवान भ’ जाइत अछि, जवानसँ बूढ़ आ फेर जन्मक आखिरी आ अंतिम अवस्थामे मनुक्खकेँ मृत्यु भेटैत छैक। अवस्थाक एहि चक्रसँ हरेक प्राणीकेँ गुजरहि पड़ैत छैक। जतए-जतए प्राणी छैक ओतए-ओतए मृत्यु पसरल छैक। धरती हो, जल हो वा आकाश, सभठाम मृत्यु निश्चित अछि।” जखन हम हुनकासँ पुछियनि, “अहाँ ई सभ कतए सीखलहुँ? ई सभ अहाँ किताबमे पढ़ने छी की?” तखन ओ जबाब दिअए, “हमरा ई सभ विणे आजी बतबैत छलीह।” एकबेर फेर मायक याद अबितहिँ हमरा आँखिमे नोर आबि गेल आ हमरा समक्षहि हमरा छोड़िकए गेल हमर मायक मूर्ति हमरा सोझमे ठाढ़ भ’ गेल। रामायण, महाभारत आ आन-आन कथा-पिहानी सुनाब’ वाली....., हमरा मरगिल्ला खोआकेँ पैघ करएबाली....., हम बचि गेलहुँ एहि खुशीमे हमरा अपन छातीसँ लगबएवाली हमर माय....., अपना आँखिक सोझमे देखल गेल हुनक मृत्यु, हुनक लहाश, ई सभटा हमरा याद आबि गेल। आँखिमे आएल नोर पोछि हम हुनका प्रणाम केलियनि। · चारि गोविन्द जाहि बरख पणजीमे नोकरी पर लागल, पाखलो ओहि बरख लौह–अयस्क केर खदान पर ट्रक ड्राइवर बनि गेल। ओकर काज देखि कए एक बरखक भीतरहि कम्पनी ओकर नोकरी पक्की क’ देलकैक। ओकरा चारि सौ पचास रुपैया दरमाहा भेटैत रहैक आ एकर अलावे ओवरटाइम सेहो। ओकर खेनाय-पीनाय होटलमे होइत छलैक आ ओ कतहुँ सुति जाइत छल। पाखलो आ आलेस दुनू अपन पयरक तरेँ दूभिकेँ मसोड़ति लदानक गैरेज लग जा रहल छल। काल्हि आनल गेल लौह–अयस्क केर चूर्णक ढेर देखिकए ओ बहुत अचरजमे पड़ि गेल। ओ दुनू गैरेज पहुँचल। ट्रक स्टार्ट क’ कए धूराक मेघकेँ पाछू छोड़ैत ओ लोकनि ट्रक तेजीसँ बढ़ौलक। साँझमे पाखलो आ आलेस अपन-अपन ट्रक आनि गैरेज लग लगा देलक। ओ काल्हिक अपेक्षा आइ एक खेप बेसी लगौने छल। आइ दुनू बहुत बेसी प्रसन्न देख’ मे आबि रहल छल। पाखलो अपना देह पर एक नजरि देलक। ओ धूरा सँ सानल बुझाइत छल। ओकर कपड़ा पूर्ण रूपसँ धूरामे सानल रहैक। माथक केश, मोछ आ सौंसे देह धूरा सँ सानल रहैक। ओ हाथ-पयर धोबाक लेल आलेसक संग नल दिस चलि देलक। नल पर जमा भेल सभटा मजुरनी पाखलोक मजाक उड़ाब’ लागलीह। एकटा मजुरनी अपन एकटा छोट सन एना निकालि पाखलो केँ ओकर अपनहिं रूप देखबा लेल देलकैक। ओ एना लेलक, ओहिमे अपन अजीब रूप देखि ओकरा हँसी लागि गेलैक। ओकरा बुझेलैक जो ओ ललका मुँह बला बनरबा छैक। “पाखल्या, बगल वला झीलमे जेना धूरा जमैत छैक तहिना तोरहुँ देह पर जमल छह।” एकटा मजुरनी पाखलो केँ पयर सँ माथ धरि देखैत कहलकैक। “ओ तँ धूरेक मिल पर नोकरी करैत छैक।” एकटा दोसर मजुरनी ओकर मजाक केलकैक। ई सुनि सभटा मजुरनी हँसय लगलीह। ओकरा संग पाखलो सेहो हँसए लागल। “ओ धूरासँ भरल अछि एहिलेल अहाँसभ ओकरा पर हँसि रहल छी?” आलेस मजुरनीसँ पूछलकैक….; “नहएलाक बाद ओकरा देखि लेबैक, ओ सेब सन लाल आ एकदम फिरंगी सन भ’ जाएत, जे देखि कोनो बाप ओकरा अपन बेटी देबा लेल तैयार भ’ जेतैक।” “आलेस, पाखलोक लेल अहाँ अपनहि जातिमे कोनो कन्या ताकि दियौक”, पहिल मजुरनी कहलकैक। “…….से किएक? ओकरा तँ कोनो पाखलिने चाही। पाखल्या! अहाँ अपना लेल लिस्बन सँ एकटा पाखलिन ल’ कए आबि जाएब।” एहि बात पर सभ केओ हँसय लागल मुदा पाखलो केर भौंह तनि गेल। “ओ.......हो...... एकर मामाक बेटी छैक ने?” बीचहिमे स्मरण आबि गेलासँ दोसर मजुरनी पहिलसँ बाजलि। “एकर मामा सोनू परसूए शेलपें सँ गाम आएल छैक। ओकर बेटी बियाह करबाक जोग भ’ गेल छैक।” “शी..... ई तँ पाखलो छैक ने?” “पाखलो सँ ओकर बियाह.....? शी.....” पहिल मजुरनीक अपन डाँड़ पर बान्हल तोलिया झारैत कहलक। ओकर ई कहब सुनिकए सभ किओ चुप भ’ गेल। पाखलो केँ बहुत खराप लागलैक आ ओकर भौंह तनि गेलैक। नहा-धो कए ओ लोकनि नीचाँ उतर’ लागल। उतरैत काल आलेस सीटी बजा रहल छल आ पाखलो चुपचाप चलि रहल छल। ओहि मौनक स्थितिमे ओकरा अपन मामा, सोनूक पछिला बात सभ स्मरण आबि गेलैक। सोनूक बियाहमे पाखलोक माय, ओकरा गोदीमे ल’ कए गेल छलीह। बियाहसँ ठीक दू दिन पहिने, सोनू अपन बियाहक खबरि अपन बहिनकेँ देने छलैक। ओ बियाहमे कोनो बिध-व्यवहार करबाक लेल तैयार नहि रहथि, मुदा सोनूक जिद्दक कारणेँ ओकरा मानय पड़लैक। सोनूक दुनियाँ केवल दू बरख धरि चलि सकल। ओकरा एकटा बेटी भेलैक मुदा तेसरहि बरख ओकर घरनी ओकरा सदाक लेल छोड़िकए चलि गेलीह। पाखलो एकटा पैघ साँस छोड़लक। ढलानसँ नीचाँ उतरैत ओकर पयर लड़खड़ा गेलैक। आलेस आ पाखलो नदीक कछेर वला होटल पहुँचि गेल। आन दिन जकाँ ओ सभ होटलक भीतर जयबाक लेल अपन-अपन माथ नीचाँ झुकौलक। पाखलो चाह पीबि लेलक मुदा ओकरा दिमागसँ एखन धरि ओहि बातक निसाँ नहि उतरल छलैक। आलेस ओतए जमा भेल मित्र सभसँ गप्प करए लागल। पाखलो होटलसँ बाहर निकलल आ खेत दिस खुलल पेड़ा बाटे चलय लागल। ओ बहुत दुखी अछि, एहन ओकरा चेहरासँ बुझाइत छलैक। मजुरनी सभ द्वारा कएल गेल गप्पक नह ओकर करेजके नोचने-फारने जा रहल छलैक। “शी..... ई तँ पाखलो छैक ने?” “पाखलो सँ ओकर बियाह.....? शी.....” · ई आवाज मंगुष्ठी झरनाक पानिक छल, ने कि कपड़ा-लत्ता धोबा आ पानि भरबाक लेल आबए बाली कन्या आ स्त्रीगणक बाजबाक। आइ पाखलो कने देरीसँ आएल रहय। ओ किछु अन्यमनस्क सन लागैत छल। ओ झरनासँ गाम दिस जाएबला लोकपेड़िया दिस देखलक। ओहि लोकपेड़ियाक बाटेँ अन्हरिया गाममे पयर रखने छल। ओ अपन देह सँ कपड़ा उतारलक आ मंगुष्ठक गाछक जड़िमे राखि देलक। ओ झरनाक कछेरमे बैसि गेल। बहैत पानिमे ओ अपन पयर खुलल छोड़ि देलक। ओकरा जाड़ लागलैक। ओ जाड़ ओकरा नसमे समा गेलैक। ओ अपन आँखिक पिपनी बन्न क’ लेलक। दूपहरमे धूरा पर चलैत जे पयर छक-छक पाकैत रहैक ओहि पयरकेँ एखन जाड़ लागि रहल छलैक। ई सोचि पाखलो एकटा नमहर साँस छोड़लक आ आँखि बन्न क’ लेलक। ओ प्रायः आबिकए पहिने अपन पयर ठंढा पानिमे डुबबैत रहय। जखन सभटा कन्या आ स्त्रीगण पानि भरि कए चलि जाइक, तखनहि ओ नहबैत छल आ अपन कपड़ा-लत्ता धोबैत छल। ओ पानिमे डुबकी लगौलक। छपाक केर आवाज भेलैक एहिलेल ओ अपन माथ उठौलक तँ देखलक जे शामा हँसि रहल छलीह। ओहो हँसल। शामा झरनाक उपरका धार पर अपन घैल भरए लगलीह। “आइ पानि भरबामे देरी किएक भेल?” पूछबनि, पाखलो सोचलक। मुदा ओ चुप रहल। शामा घैल अपना डाँर पर राखलक आ छोटकी घैल अपना हाथमे राखि चलि देलीह। नजरिसँ दूर होइत धरि पाखलो ओकरा देखतहि रहि गेल। ओ होशमे आएल! की शामा पानिमे पाथर फेकने छलीह? ओ सोच’ लागल, ‘हँ’, ओकर एक मोन कहैत छलैक जे “ओ आएल छलीह आ हमरा सचेत करबाक लेल ओ पाथर फेकने छलीह। ओकर दोसर मोन कहैक– नहि, ओ पाथर मार’ एहन काज नहि क’ सकैत अछि। भ’ सकैछ उपरका मंगुष्ठ नीचाँ गिरल होइक।” ओ ई सोचतहिं छल ताधरि एकटा मंगुष्ठ पानिमे गिरलैक। पाखलो ओ लाल मगुष्ठ उठौलक। ओकरा फोड़लक। फोड़लाक बाद ओ ओहि खटमिट्ठी मंगुष्ठकेँ अपना मुँहमे लेलक। खाइत काल ओकरा एकटा घटना याद एलैक। एहि घटनाक बहुतो बरख भ’ गेल रहैक। जंगलमे काजू आ काण्ण खाइत-खाइत गोविन्द आ ओ एहि झरना पर आएल छल। मंगुष्ठी झरनाक मंगुष्ठ बहुत पाकि गेल छलैक। पाखलो आ गोविन्द ओहि मंगुष्ठ पर पाथर मारए लागल। ओहि समय शामा झरना पर आबि रहल छलीह, ई गोविन्द देखलक आ देखतहिं अपना हाथसँ पाथर फेकि देलक आ पाखलो सँ कहलकैक – “पाखल्या, हाथसँ पाथर फेकि दियौक, विन्या मामाक शामा आबि रहल छथि।” “किएक?” पाखलो पुछलकैक। “यौ, मंगुष्ठी झरनाक जगह ओकरे छैक ने, हमसभ जे मंगुष्ठ झटाहि रहल छी ई बात जँ ओकरा बाबूकेँ पता लागि गेलनि तँ से नीक गप्प नहि होयत। ओ गारिओ देताह आ मारबो करताह। गोविन्दक कहलाक पश्चातो पाखलो अपना हाथसँ पाथर नहि फेकलक। ओ लगातार झटाहते रहल। गोविन्दक रोकलाक पश्चातहिं ओ रुकल। ताबत शामा ओतए आबि गेलीह। ओ लाल रंगक पाकल मंगुष्ठकेँ देखलक। ओकरो मंगुष्ठ खएबाक मोन भेलैक। ओहो पाथर मारि-मारि मंगुष्ठ झखारए लागलीह। ओकर दू-तीन पाथरसँ एकटा पातो नहि गिरलैक। पाखलो आ गोविन्द दुनू हँसए लागल। ओ लजा गेलीह। ओकरहिं आनल पाथरसँ पाखलो मंगुष्ठ झटाह’ लागल। जल्दीए ओ पाथर ओतहि फेकि मंगुष्ठक गाछ पर चढि गेल आ मंगुष्ठक गाछक डारिकेँ हिलाब’ लागल। मंगुष्ठ सभ ढब-ढब कए गिरए लागलैक। छिट्टा आनबाक लेल शामा घर चलि गेलीह। मुदा आपस अबैत काल ओकरा संगे ओकर बाबूजी सेहो आबि गेलाह। धरती पर पसरल काँच मंगुष्ठ देखि कए ओ पाखलो केँ ओकरा माए आ ओकर जाति लगा कए गारि देलकैक। तकरा बादसँ जखन कहियो शामा ओकरा बाटमे भेटैक ओ अपन माथ झुकाकए चलि जाइत छलीह। जाहि दिनसँ पाखलो ड्राइवर भेल छल ताहि दिनसँ ओ मंगुष्ठी झरना पर नहएबाक लेल अबैत छल। पाखलो केँ देखि शामा कहिओ-कहिओ हँसि दैत छलीह। शामाक यौवनक भार देखि कए ओकरा मोनमे उमंग आबि जाइत छलैक। एकदिन तँ शामा ओकर आ गोविन्दक हाल-समाचार सेहो पूछने छलीह। ताहि दिन, ओ प्रायः पाखलो केँ देखि कए हँसैत छलीह आ पाखलोक मोनमे ओकरा प्रति नब अंकुर पनकी द’ रहल छलैक। पाखलो सँ ई खबरि सुनि, गोविन्द पाखलोक खूब मजाक उड़ौलक। “पाखल्या, हुनकर स्वभाव बहुत नीक छनि। ओ कने कारी अवश्य छथि मुदा देख’मे नीक छथि। अहाँक जोड़ी खूब जँचत।” ई बात पाखलोक मोनमे घूमैत रहैक आ ओ नहबैत काल अपना-आपमे ओ उफान महसूस करैत छल। दोसर दिन रबि रहैक। पाखलो घूमबाक लाथे बाहर निकलल। बाट चलैत-चलैत ओ मंगुष्ठ झरना लग पहुँचि गेल। झरनाक शीतल पानिसँ ओ एक आँजुर पानि पीबि लेलक आ लगीचक आमक गाछ दिस चलि देलक। ओहि आम गाछक नमहर जड़ि उपर धरि आबि गेल रहैक आ कोनो नेना जकाँ अपन कुल्हा उपर कए धरती पर पसरि गेल रहैक। पाखलो एकटा जड़ि पर बैसि गेल आ प्रकृतिक सौंदर्य देख’ लागल। आइ चैत मासक पूर्णिमा छलैक। गामक लोक सभ सांतेरी मंदिर लग बसंत पूजा करए बला रहैक मुदा ताहिसँ पहिने प्रकृति फूल आ फल सभक लटकनि लगा कए बसंत ऋतुक स्वागत क’ चुकल छलैक। आमक गाछक अजोह आम सभ गोटपंगरा पाकए लागल छलैक। काजूक गाछ पर लाल आ पीयर काजू लागल रहैक। हरियर अजोह काजू सभ पाकबाक बाट जोहि रहल छल आ एखन धरि डारि पर फुल्ली सभ डोलि रहल छलैक। शनैः–शनैः बसात सिहकए लागलैक। पाखलो केँ लागलैक– आब ई प्राणदायी बसात एहि प्रकृतिकेँ नब जान द’ देतैक। गाछ–बिरीछकेँ पागल बना देतैक। बसातक सिहकबक संगहि पाखलोक मोनमे विचारक लहरि हिलकोर मार’ लागलैक। ई बसात पच्छिम दिसक पहाड़केँ पार करैत, खेतक बीचोबीच धरतीकेँ चीरैत नदीकेँ पार करैत पूबरिया पहाड़ दिस उछलैत बिना रूकनहि आगू बढि जाएत। ओ कतए सँ आएल हेतैक? कोन ठामसँ आएल हेतैक? ई कहब ओतेक सरल नहि अछि। ओ सभ ठाम भ्रमण करएबला प्रवासी अछि। बसातकेँ अबितहिँ धरती ओहि बसातमे रंग उछालि ओकर स्वागत केलक। बसात धरतीक माथक चुम्मा लेलकैक। गाछ सभक आलिंगन केलकैक। लत्तीसभकेँ बाँहिसँ पकड़ि कान्ह पर राखलकैक आ फेर नीचाँ राखि देलकैक। फूल, फल आ पात सभक चुम्मा लेलकैक आ पूरा बगैचामे सभकेँ हाथसँ इशारा करैत ओ आपस चलि गेल। पाखलोकेँ मोनमे भेलैक, “जे हमहुँ बसाते जकाँ एहि इलाकामे घूमि-फिरि रहल अछि। हम अपन जन्महि कालसँ एहि इलाकामे रहि रहल छी। मुदा हम बसात जकाँ आबि कए चलि नहि जाइत छी अपितु एतुका निवासी भ’ गेल छी। एहि आम गाछक सदृश हमरहुँ जड़ि बहुत भीतर धरि गेल अछि। एहि माटिक बल पर हम पैघ भेलहुँ, फरलहुँ-फुललहुँ। एहि माटिक संस्कारमे पलल-बढ़ल पाखलो थिकहुँ हम।” साँझ खतम भ’ कए गोधूलि भ’ रहल छलैक। मंगुष्ठी झरना पर पानि भरि कए कन्या आ स्त्रीगण घर जा रहल छलीह। पाखलोक ध्यान ओमहर नहि छलैक, अपितु आइ शामा पानि भरबाक लेल नहि आएल छलीह, एहि लेल ओकरा जीवनकेँ फाँसी लागि गेल रहैक। हाड़-मांसुसँ बनल पाखलो केँ एकटा कुमारि कन्यासँ सिनेह भ’ गेल रहैक आ ओ ओकरासँ बियाह करबाक लेल सोचि रहल छल। जकरा एक नजरि देखि लेलासँ ओकरा नस-नसमे उमंग आबि जाइत छलैक वैह शामा आइ झरना पर नहि आयल छलीह, तैँ ओ अपनाकेँ मंद महसूस करैत छल। गोधूलि खतम हेबा पर रहैक आ अन्हार अपन पयर पसारि रहल छल। सांतेरी मंदिर लग पाखलोकेँ पेट्रोमैक्सक जगमग करैत इजोत देखा पड़लैक। ओकरा आइ होमएबला बसंत पूजाक स्मरण आबि गेलैक। बसंत पूजा दिन सांतेरी मायक पालकी बड़ धूमधामसँ बाहर निकलैत छैक। ओ प्रकृतिमे आएल बसंत ऋतुसँ भेंट करैत छथि। ओहि राति ओ मंदिर आपस नहि जाइत छथि अपितु बाहरे प्रकृतिक संग रहैत छथि। बसंत ऋतुक दिन गाम भरिक लोक भरि राति उत्सब मनबैत अछि। पूजाक लेल तँ शामा अवस्से अओतीह, तखनहिँ हम हुनकासँ भेंट क’ लेब। पाखलो सोचलक। शामासँ भेंट करबाक बहन्ने ओकरा पूरा देहमे जोश आबि गेलैक, आ गामक दिस जयबाक लेल ओ तीव्र गतिएँ चलए लागल। मंगुष्ठी झरना पर सभ दिन जकाँ पाखलो आइयो अपन कपड़ा धोबैत छल। रबि लगाकए आइ तीन दिन भ’ गेल रहैक। गोविन्द रबिकेँ किएक नहि अएलाह? ओ यैह सोचि रहल छल। एतबहिमे दूरसँ – “पाखल्या! यौ पाखल्या!” गोविन्द सन आवाज सुनबामे आएल। ओ पाछू घूमिकए देखलक। गोविन्दकेँ देखतहि पाखलो तुरन्त उठल आ ओकरा दिस दौड़िकए गेल। दुनू एक दोसरासँ हाथ मिलेलक। गोविन्दक कनहा अपन हाथसँ हिलबैत पाखलो पुछलकैक – “अहाँ रबि दिन किएक नहि एलहुँ?” “की कही, हमरा ऑफिसक मित्र लोकनि हमरा पिकनिक पर ल’ कए चलि गेल छलाह। हम जाएवला नहि रही, मुदा की करितहुँ ओ सभ हमरा जबरदस्ती ल’ गेलाह। हमर मोन करैत रहय जे आबि कए अहाँसँ भेंट करी।” गोविन्द अपन मोन खोलि देलक। “जाय दिअ, एखनहिं मिललहुँ यैह की कम अछि? “चलू पहिने अहाँ नहा लिअ” गोविन्दक कहला पर पाखलो झरनामे नहाबए लागल। गोविन्दकेँ किछु कहबाक उत्सुकता रहनि। ओ अपना हाथसँ पानि निकालि पाखलोक देह पर छिट्टा मारए लागल, पाखलो सेहो हुनका पर पानि फेकलक। ओहिसँ गोविन्दक कपड़ा नीक जकाँ भीजि गेलैक। पाखलो केँ कने खराप लागलैक। ओ गोविन्दसँ माफी माँगलक। गोविन्द एकरा सभकेँ मजाकमे उड़ा देलथि। पाखलो नहाकए अपन देह पोछलक। अपन कपड़ा सुखबाक लेल लारि देलकैक। बादमे दुनू गोटे आमक जड़ि पर आबि बैसि गेल। पाखलो गोविन्दक आँखिमे देखलक। गोविन्द किछु कहए चाहैत छल, ई हुनका आँखिसँ पाखलोकेँ पता लागि गेल। “कोनो नब समाचार?” पाखलो पुछलकैक। “समाचार? एकटा नब समाचार अछि।” “कोन समाचार?” “हमरा लेल एकटा संबंध आएल अछि।” “अहाँक लेल संबंध? कतएसँ? केकर?” पाखलो एकक बाद एक प्रश्न केलक। “ई सभ हम अहाँकेँ बादमे कहब। पहिने बताउ, जे शामा आइ पानि भरबा लेल आयल छलीह?” “हँ….नहि......, एखन धरि तँ नहि।” पाखलो सोचिकए जवाब देलक। “नहि ने? तखन तँ हमर अनुमान ठीके भेल। हम अहाँकेँ आर नहि उलझाएब। हमरा लेल विन्या आपाक दिससँ शामाक लेल संबंध आएल अछि। हम ओकरा साफ मना क’ देलिऐक।” पाखलोकेँ बतएबाक लेल आनल गेल रहस्य गोविन्द खोलि देलक। “मुदा संबंधक लेल अहाँ मना किएक कहलहुँ?” पाखलो फेर प्रश्न केलक। “एकर जवाब तँ बड्ड सरल छैक यौ।” गोविन्द बाजल— “शामाक जोड़ीक लेल अहाँक प्रयोजन अछि हमर नहि। अहाँकेँ स्मरण अछि, हम एकबेर अहाँकेँ कहने रही – “शामा आ अहाँक जोड़ी केहन रहत?” किछु कालक लेल दुनू गोटे चुप भ’ गेल। बादमे गोविन्द बाजए लगलाह— “हम दुपहरकेँ घर गेल रही। खएलाक बाद माय हमरा एहि संबंधक बारेमे बतौलनि। हम साफ मना क’ देलियनि, मुदा किएक? से नहि बतौलियनि।” “नहि गोविन्द, एहि संबंधकेँ नकारि अहाँ नीक नहि केलहुँ। अहाँ हमरा लेल त्याग क’ रहल छी। ई हमरा नीक नहि लागि रहल अछि।” पाखलो कहलक। “एहन नहि छैक पाखलो, अहाँ बुझैत नहि छी। अहाँकेँ किओ नहि अछि। आ शामा अहाँकेँ पसिन्न सेहो अछि। ओ अहाँकेँ भेटि जेतीह तँ हमरा खुशी होएत।” “मुदा हमरा संग.....” पाखलो किछु कह’ वला रहथि। “ओ सभ बादमे देखल जेतैक।” एतबा कहि गोविन्द चुप भ’ गेल। पाखलोक मोन विचलित भ’ गेलैक, मुदा शामाक सभ स्मरण एखनहुँ ओकरा मोनमे महकैत रहैक। शामा द्वारा गोविन्दक लेल कएल गेल पूछारि....., ओकर मीठ-मीठ बोली....., फूल-सन ओकर हँसी.....सभटा। ओकरा दुनूकेँ देखि शामा झरनासँ बिना पानि भरनहिं आपस चलि जाइत छलीह। तकर बाद ओ शामासँ भेंट केलक आ “हमरासँ बियाह करब?” पूछलकैक। शामा ओकरा “हँ” कहतैक ओकरासँ यैह अपेक्षा छलैक पाखलोकेँ, मुदा ओ बाजलि, “नहि अहाँ पाखलो थिकहुँ! ” पाखलो शामाकेँ किछु कहबाक लेल मुँह खोलनहि छल आकि ओ ओतएसँ चलि देलीह। पाखलोक मोन तँ बुझु जे नागफनी सँ भरल रेगिस्तानक सदृश भ’ गेलैक। · पाँच शंभुक होटलमे रातिक भोजन कएलाक पश्चात् हम दीनाक घर दिस चलि देलहुँ। आइ बहुत काज केने रही तहि लेल सौंसे देहमे दरद छल। भूइयाँ पर पड़ितहि हमरा निन्न आबि जाएत, एहन बुझाइत छल। बान्ह पर पहुँचबाक देरी नहुँ-नहुँ बसात सिहक’ लागल। अहा!........ केहन शीतल बसात छैक! बसात लगितहिँ देहमे हरियरी आबि गेल। बान्हक एक दिस खेत-पथार आ दोसर दिस मांडवी नदी बहैत छलैक। बगलक नारियरक गाछसँ आवाज आबि रहल छलैक। चारू दिस अन्हारे-अन्हार छलैक! एहि अनहरियामे जान आबि गेल रहैक। अन्हारमे उपर भगजोगनी भुकभुक करैत छलैक। नदीक कारी पानिमे माछ सभ उछलैत रहैक आ ओकर लहरि भगजोगिनिएँ  जकाँ दीप्यमान भ’ रहल छलैक। बान्हक बीचहि मे मूलपुरुष (ग्रामदेवता)क मंदिर नुकाएल रहैक। ओ मंदिर एकदम टूटि गेल रहैक। मंदिरक उपर चार नहि छलैक। मंदिरक चारू कातक देवाल सभमेसँ आगूक देवाल तँ एकदम्मे टूटि गेल रहैक। बाँकी तीनू देबाल पर सिम्मर, बर, अश्टी सन पैघ-पैघ गाछ सभ जनमि गेल छलैक। गोविन्दक विचारसँ मूलपुरुषकेँ खुब पैघ खुलल मंदिर भेटल छनि। ओ कहैत छल – “एहि चारू गाछ पर आकासक छत छैक आ एहि मंदिरमे मूलपुरुष रहैत छथि।” चलैत–चलैत हम मूलपुरुषक मंदिर लग पहुँच गेलहुँ। एहि मंदिरमे हम एकबेर साँप देखने रही, ओ स्मरण अबितहिं हमर सौंसे देह सिहरि गेल। नेनपनमे एकबेर हम आ गोविन्द माछ मारबाक लेल नदी पर गेल छलहुँ। बहुत कालक बाद हमरा बंसीमे एकटा खर्चाणी (माछ) फंसल छल। ओकरा हम एकटा नारियरक सिक्कीमे गूथि लेलहुँ। बाटमे मूलपुरुषक मंदिर भेटल। बंसी नीचाँ राखि हम दुनू गोटे मूलपुरुषकेँ गोर लागबाक लेल गेलहुँ। मूलपुरुषक कारी मूर्ति, मंदिरक टूटलका भागमे पाथरक ढेरीक बीचमे छलनि। हम अपन हाथक माछ मंदिरक सीढी पर राखि देलहुँ। हम दुनू गोटे मूर्ति लग माथ टेकलहुँ। ने जानि कतएसँ ओहि मूर्ति लगक पाथर पर एकटा साँप आबि अपन फन काढ़ि ठाढ़ भ’ गेलैक। हम दुनू गोटे बहुत डरि गेलहुँ आ पाछू हटि गेलहुँ। पछाति जा कए ओ साँप ससरि कए ओहि पाथरक ढेरीमे ढूकि गेल। गोविन्द तँ डरक कारणेँ बुझू जे पाथरे बनि गेलाह। हम सभ भगवानक सीढी पर माछ रखने छलहुँ, एहिलेल हुनका खराप लागलनि की? हमरा मोनमे एहन भेल। हम आपस सीढी लग गेलहुँ आ ओतए राखल माछ उठाकए नदीमे फेकि देलहुँ। हमसभ पुनः मूलपुरुषक पयर पर गिर कए हुनकासँ माफी माँगलियनि। हम गोविन्दसँ पूछलियनि, “हम माछ राखने छलहुँ एहिलेल मूलपुरुषकेँ गोस्सा आबि गेलनि की? मंदिर भ्रष्ट भ’ गलैक की?” “नहि यौ, एहन कतहुँ होइक? गामक लोकतँ हुनका माछो चढबैत छनि।” गोविन्द जवाब देलक। “तखन साँप किएक देख’ मे आएल? हम माछ राखने रही, एहिलेल मूलपुरुषक मंदिर भ्रष्ट भ’ गेलैक की?” “अहाँक माछ रखलासँ मंदिर कोना भ्रष्ट भ’ जेतैक?” “हम..............।” “चुप रहू, पाखलो भेलहुँ तँ की भेल? पछिला बेर तँ हम इमली आ आँवला रखने छलहुँ, तखनहुँ मंदिर भ्रष्ट भेल छलैक की? नहि ने! अहाँ चुप रहू आ ककरो किछु नहि बतेबैक।” हम मूलपुरुषक मंदिर लग पहुँचि गेलहुँ। मंदिरक चारू दिस पहाड़ छलैक आ बीचमे मंदिर। रातुक अन्हारमे पहाड़ कारी देखाइत रहैक। उपर तरेगणसँ सजल अकाश। जेना घरक धरेन आ छप्पड़, एहि दुनूक बीचसँ इजोत अबैत छैक ओहने इजोत अकाश आ पहाड़क बीच पसरि रहल छलैक। हम अपन जूता खोललहुँ आ मूलपुरुषकेँ गोर लागलहुँ। रातिक अन्हारमे मूलपुरुषक मूर्ति नहि लखा दैत रहैक। हमरा भेल जे जेना मूलपुरुष एतए अन्हारक एकटा बड़का टा रूप ल’ कए पूरा संसार पर पसरि गेल छथि। मूलपुरुषक मंदिर बहुत प्राचीन छैक। मांडवी नदीक कछेर पर एहि गाम केँ बसौनिहार आदिपुरूष वैह छथि। पहिने ई गाम बाढ़िमे डूबि जाइत छलैक मुदा मांडवी नदी पर बान्ह बान्हि ओ एहि गामक सृष्टि केने रहथि। हुनका मरलाक उपरान्त एहि गामक लोक सभ हुनकर स्मरणमे ई मंदिर बनौने छल। एहि तरहेँ ई मंदिर आ मूलपुरुष द्वारा बनाओल गेल ई बान्ह, दुनू बहुत पुरान अछि। हम मूलपुरुष द्वारा बनाओल गेल ओहि बान्ह दए चलि रहल छलहुँ। आ एहि बान्हक कारणेँ बसल गाममे हम, माने पाखलो रहैत रही। · दीनाक  बैसकी घरमे सभ दिन जकाँ हम चटाय बिछा कए बैसि गेलहुँ। दिनाक बेटा एकटा चिट्ठी आनि हमरा हाथमे थमा देलक। ओ चिट्ठी गोविन्देक छलैक। बहुत दिनक बाद ओ हमरा चिट्ठी लिखने रहय, एहिलेल हमरा बड्ड प्रसन्नता भेल। गोविन्दक संग घूमब-फिरब, केगदी भाटक पोखरिमे नहाएब, हेलब, ई सभ सोचैत-सोचैत हम चटाय पर सूति गेलहुँ आ माथ धरि कम्मल ओढ़ि लेलहुँ। बहुत राति बीति गेल, मुदा हमरा निन्न नहि आबि रहल छल। हमरा मोनमे केगदी भाटक पोखरिक चित्र बेरि-बेरि आबि जाइत छल! लील रंगक आकाशक प्रतिबिंब पानिमे चमकैत छलैक। आकाशक रंगीन मेघ पोखरिक लहरि पर हेलि रहल छल।  आकाश अपन छवि पोखरिक पानिमे देखि मोनहि-मोन खूब प्रसन्न होइत छल आ “ई रूप नीक नहि अछि।” ई सोचि ओ अपन रूपकेँ नव रूपमे रंगैत छल आ मेघक वस्त्र पहिरैत छल। पोखरिक लग केगदी (केबड़ा) झाड़ ओ केबड़ाक गाछ सभक बड़का टा जंगल रहैक, ओ पोखरिक महार केबड़ाक झाड़ीसँ भरल रहैक। जखन केबड़ाक झाड़ पर फूल फूलाइत छैक ओहि समय हमसभ नहएबाक लेल गेल छलहुँ। केबड़ा फूला गेल छलैक। पीयर-पीयर केबड़ा हरियर-हरियर पातसँ बाहर आबि, अपन जी देखा-देखा कए कबदा रहल छलैक। पूरा वातावरण केबड़ाक सुगन्धसँ भरल रहैक। हम आ गोविन्द पोखरिमे कूदि गेलहुँ। दुनूगोटे हेलैत-हेलैत केबड़ाक द्वीप लग पहुँचलहुँ। द्वीप पर केबड़ाक बहुत घनगर जंगल रहैक। दुनू गोटे केबड़ाक झाड़क अंदर घूसि केबड़ाक फूल तोड़ए लागलहुँ। फूल तोड़ि पोखरि पार केलहुँ। ओ सभटा पोखरिक कछेर पर राखि देलिऐक। बादमे बेंग जकाँ हमसभ पोखरिमे डुबकी लगौलहुँ। भरि दम साँस घीचि ओहिना पानिमे डूबि गेलहुँ, तँ ओहि साँसक संगे बाहर भेलहुँ। सौंसे देह डूबल छल, मुदा माथक केश हेलैत नारियर सदृश बुझाइत छल। हमरा गाम क्षेत्रफल आन गामक अपेक्षा कने पैघ छैक। गाममे खेतक मैदान, जंगल ओ पहाड़ हमरा सभकेँ घूमबाक लेल कम पड़ि जाइत छल। नाह पर पतवारि चलाबैत हमसभ नदीमे झिझरी खेलैत रही। नदीमे नहएलाक पश्चात् हेलिकए नदी पार करैत रही। अज्ञातवासक कालमे पांडव लोकनि द्वारा बनाओल गेल पोखरिमे हमसभ नहएबाक लेल जाइत रही। ओ पोखरि बहुत सुन्नर रहैक। पैघ-पैघ पाथर पर पोखरिक चारू दिस नीक चित्रकारी कएल गेल रहैक। चारू दिससँ सीढी होइत लोक पोखरिमे ढूकैक छल। पोखरिक चारू दिस पाथरक  मेहराब छलैक। हर एक मेहराबक भीतर दू-तीनटा कक्ष इजोतसँ भरल। एहि कक्ष सभक देबालक खाम्ह पर लत्ती सभ आ आदिकालीन माल-जाल, चिड़ै-चुनमुनीक आकृति बनल रहैक। एहन बुझाइत रहैक जेना एहि मनोहर आकृति वला कक्षमे भगवान अमृत-कलश राखि देने होथि, ठीक ओहिना लेटेराइट पाथरसँ निर्मित एहि पोखरिमे कौआक आँखि-सन साफ पानि देखिकए ककरहुँ मोन मुग्ध भ’ जाइत छलैक। एतेक स्वच्छ पानिमे हमसभ नहाइत छलहुँ। नहएलाक बाद गोविन्द मेहराबक कक्षमे जा कए कोनो ऋषि-मुनि जकाँ ध्यानस्थ भ’ बैसैत रहथि। तखन बुझाइक जे ओहि लेटेराइट पाषाणसँ महाभारतक काल घुरि एलैक। पछिला किछु सालक स्मृतिसँ हमर रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेल। ओह......हमर माय! हमरा एहने लागल, जे हमर साँस केओ बन्न क’ देलक, हमरा गरमे फंदा बान्हि देलक। एकबेर हम आ गोविन्द जखन एहि पोखरिमे नहा रहल छलहुँ तखनहिं भट बाबू ओहि बाटे जा रहल छलाह। हमरा पोखरिमे नहाइत देखि ओ, “पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक! पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक!” चिकर’ लागलाह! हुनकर चिकरब सुनि ओतए पाँच–छओ लोक जमा भ’ गेल। भट बाबू हुनका लोकनिकेँ आदेश देलथिन, जे ओ सभ हमर कान घीचि कए बाहर आनथि। ओ लोकनि हमर कान घीचैत हमरा बाहर आनलथि। बादमे भट बाबू अपन छड़ीसँ हमरा खूब मारलथि। ओ हमरा मारैत-मारैत सांतेरी मंदिर धरि ल’ गेलाह। भरि गामक लोक हमरा देखबाक लेल ओतए जमा भ’ गेल छल। ओ हमरा सांतेरी मंदिरक सीढ़ी पर नाक रगड़बाक लेल बाध्य केलथि। हम अपन नाक रगड़लहुँ, माँफी माँगलहुँ, मुदा ओ हमरा पोखरिक लग बला लोहाक स्तंभसँ बान्हि देलनि। काल्हिए हम एहि स्तंभ पर नारियर फोड़ने छलहुँ। सभक संग ढोल आ ताशा बजाकए शिगमो (धार्मिक उत्सव) खेलने छलहुँ आ आइ हम स्वयं गामबलाक लेल एकटा तमाशा बनल रही। भट बाबू हमरा उपर नारियरक खट्टा ताड़ी उझलि देलथि। एतबे नहि किओ हमरा उपर घोरणक छत्ता झारि देलक। घोरण काटतहि हम जोर-जोरसँ चिकरए लागलहुँ। मुदा हमर असहायता पर किनकहुँ कनेको क्षोभ नहि भेलनि। हमर ई हालति देखि गोविन्द कानैत-कानैत दौड़ल हमरा मायकेँ बजा आनलक। ओ “हमर बच्चा…”,“हमर बच्चा…”  कहैत कानल-कानल, दौड़ल एलीह मुदा हमरा सोझ अबितहिं ओ एकदमसँ गिर गेलीह। ओ बेहोश भ’ गेलीह आ बहुत काल धरि उठि नहि सकलीह। हुनका उठएबाक लेल हम दौड़हि वला रही, मुदा जतए बान्हल रही, ओत्तहि रहि गेलहुँ। हुनका किओ नहि उठौलक, उनटे लोक सभ ई तमाशा देखैत रहल। कनेक कालक बाद ओ अपन ठेघुन टेकैत उठलीह। हुनका नाकसँ शोणित बहैत रहनि। हाथ आ पयर मे घाव भ’ गेल रहनि। ओ उठि कए हमरा लग अएलीह आ “हमर बच्चा…” कहैत हमरा गर लगौलीह। हम दुनू गोटे कानए लागलहुँ। ओ हमर बन्हन खोलबाक प्रयास करए लागलीह मुदा ओहि समय चारि-पाँच लोक हुनका पाछाँ घीचि लेलकनि। बादमे हुनकहुँ घीचि कए मंदिर लग ल’ गेल। ओ हमरा छोड़एबाक लेल भट बाबूक हाथ-पयर पकड़ैत रहलीह मुदा ओ हुनका ठोकर मारि धकेलि देलनि। एतबा देखतहि हमरा गोस्साक पारावार नहि रहल। हमरा देहक गरम खून दौड़ए लागल। हम जतय बान्हल रही ओत्तहि चिकरि-चिकरि कए रहि गेलहुँ। बादमे हमर खून ठंढा भ’ गेल आ ओ शनैः शनैः हमरा शरीरसँ निकलि रहल अछि, बुझाबए लागल......, हमरा बुझाएल जेना हमरा पूरा शरीरक सभटा खून बहि गेल हो! हमर माय कानि रहल छलीह आ हुनका सभक पयर पकड़ि रहल छलीह, मुदा हुनक गोहारि किओ नहि सुनि रहल छल। ओ जहिना हमरा छोड़ाबए आगू आबथि, लोक हुनका रोकि लैक। बादमे जखन ओ गोस्सासँ महाजनकेँ गारि पढ़ब सुरह क’ देलनि तँ लोक सभ हुनकहुँ घसीट’ लागल आ जाहि स्तंभसँ हम बान्हल रही ओहि स्तंभसँ हुनको बान्हि देलनि। आब हमर मुँह पूब दिस तँ हुनक मुँह पच्छिम दिस भ’ गेल। हम दुनू गोटे एकहि स्तंभ सँ बान्हल छलहुँ, मुदा एक दोसराकेँ देखि नहि पबैत छलहुँ। ओ “हमर बच्चा…”,“हमर बच्चा…” कहि कए कानैत छलीह, तँ हम माय....., माय....., चिकरि कए कानि रहल छलहुँ। किछु समयक पश्चात् ओ कोनहुँ तरहेँ अपन हाथ पाछू आनि हमरा छूलनि। हम दुनू दिनभरि ओहि स्थिति मे रहलहुँ। पोखरिक शुद्धिकरण करएबाक लेल ओ होम-जाप करौलनि। चारिटा केराक थम्ह आनल गेल आ पुरहित लोकनि होम सुरह केलनि। ओ लोकनि होमाग्नि जरौलनि। मंत्रोच्चारण करैत ओ लोकनि ओहिमे समिधा झोंकए लगलाह। हमरा बुझाएल जे ई सभ हमरा आ हमरा माय, दुनूकेँ एहि आगिमे झोंकि देत। होम चलितहि काल एकटा पुरहित ओहि होमसँ आगि आनि हमरा पयर पर राखि देलक। हमरा बुझाएल, जेना हम काल्हि होलिका जरौने छलहुँ तहिना ई सभ आगि लगा हमरा दुनू माय-पूत केँ जरा देत। मुदा ओ एना नहि केलक। आगिक कारणेँ हमरा पयरमे फोका भ’ गेल छल जे दर्द करैत रहए। होम-हवन चलि रहल छल आ फाँसी पर चढ़’ वला अपराधी जकाँ हम जतए बान्हल रही, ओतहिसँ हुनका सभकेँ देखि रहल छलहुँ। गामक लोक सभ एहि घटनाकेँ एकटा उत्सव जकाँ देखि रहल छलाह। दादी ओहि दिन गामसँ बाहर गेल रहथि। साँझ खन घुरितहि गोविन्द हुनका हमरा सभक खबरि देलक आ संगहि ल’ कए पोखरि पर आबि गेल। हमरा आ हमरा मायकेँ स्तंभ सँ बान्हल देखि कए दादी बहुत दुखी भेलाह। जाहि दादीक आँखिमे हम आइधरि नोर नहि देखने रही; ओहि दिन देखि लेलहुँ। ओ हमरा छोड़ा देलथि। ओहि काल ई देखबाक लेल ओहिठाम गामक किओ नहि रहथि। एहि घटनाक पश्चात् हमरा गामक लोक पर कनेको गोस्सा नहि आएल, किएक तँ गाममे हमरा छोड़ाकए आनएवला आ गोविन्द सन हितैशी आर किओ नहि रहथि। नारियरक फुटलका खोली जकाँ गरि जाइवला एहि घटनाक स्मृति आब शेष रहि गेल अछि। एहि घटना सभमे सँ एक, स्तंभ पर नारियर तोड़बाक अछि, ई बताबए वाली हमर माय....., हमरा प्रह्लादक होलिकाक आगिसँ बचाबए वाली हमर माय....., हमरा आँखिक सोझ ठाढ रहलीह आ हमरा आँखिसँ अनायासे नोर खसय लागल। · हम गोविन्दक मायकेँ शोर पारलहुँ।  ओ हमरा घरक भीतरहिसँ आबाज देलथि। ओहि समय ओ चाउर बीछैत छलीह। ओ उठि कए बाहर एलीह आ हमरा देखि कए बजलीह, “आउ बाउ, बैसू!।” हम घरक अंदर गेलहुँ। ओ हमर हालचाल पूछय लागलीह। “एतेक दिन धरि कतए छलहुँ अहाँ?” “नहि बाय...... ” हम किछु कहए चाहैत छलहुँ “.... आइ-काल्हि काजमे बेसी व्यस्त रहैत छी ताहि लेल अएबाक अवसर नहि भेटैत अछि की?” “...असलमे आइयहु तेहने काज छल, मुदा गोविन्दसँ भेंट करबाक रहए एहिलेल ओवरटाइम छोड़िकए आएल छी।” ओ अदहनमे चाउर गिराब’ गेलीह आ हम ओहिठामक बेंच पर बैसि गेलहुँ। बेंचक एक कोनमे ट्रंक आ ओहिपर गोविन्दक किताब राखल छलैक। हम एकटा उपरला किताब निकाललहुँ, ओ अंग्रेजी मे छल, एहिलेल हम नहि पढ़ि सकलहुँ आ ओ आपस राखि देलिऐक। बादमे सबसँ नीचा वला किताब निकालहुँ, मुदा ओ पुर्तगाली मे छल एहिलेल ओहो राखि देलहुँ। ट्रंक लग कपड़ा टाँगबाक एकटा हैंगर रहैक जाहिपर दादीक दू टा कमीज आ गोविन्दक एकटा पैन्ट टाँगल रहैक। एखन धरि तँ गोविन्दकेँ पणजीसँ आपस आबि जएबाक चाही! एहिलेल हम खिड़कीसँ बाहर देखलहुँ। मुदा रस्ता सून छल। मैदानसँ होइत ओ रस्ता अपन देह टेढ-मेढ़ केने सीधे गाम धरि आबि रहल छल। आगू पैघ-पैघ गाछ-बिरीछक कारणेँ शहर गेल गोविन्दक छाँह धरि नहि बुझाइत छलैक। दादी बजारसँ आबि गेल छलाह। ओ हमर हालचाल पूछलनि। हम कनी मोटगर-डटगर भ’ गेल रही एहि लेल ओ हमर प्रशंसा केलनि। ओहि दिन दूपहर धरि दादी, ओकर माय, आ हम, गोविन्दक रस्ता-पेड़ा देखैत रहलहुँ। ओ नहि आएल, एहिलेल हमसभ कने निराश छलहुँ। बहुत कालक बाद हमसभ भोजन केलहुँ। दादी सुतबाक लेल गेलाह आ हम ‘पुनः आएब’ ई कहि चलि देलहुँ। रस्तामे आलेससँ भेंट भेल। ओकरा देखि हमरा कने आश्चर्य भेल, किएततँ ओ कहियो अपन ओवरटाइम नहि छोड़ैत छल। एतए धरि जे रबियोक दिन ओ भोरे-भोर उठि कपेल गेलाक बाद ओ काज पर जाइत छल। हम पुछलियनि— “आलेस! बीचहि मे काज छोड़िकए आएल छी की?” “आबए पड़ल! नारियरक गाछसँ रस निकाल’ वला मजदूर पेद्रूक देहांत भ’ गेलैक।” आलेस बतौलनि। “की भेल छलैक ओकरा?” हम पूछलहुँ। “पता नहि, हमरा निकलतहि ओ मरि गेल।” आलेस कहलनि। आलेसक संगहि हमहू ओकरा घर धरि गेलहुँ। दोसर दिन पेद्रूक अंतिम संस्कारमे हमरहु जाय पड़ल। छोटका गिरिजाघरक लगीच वला श्मशान घाटमे ओकर अंतिम संस्कार भेलैक। पेद्रू एकटा हिन्दू मौगी रखने रहए, किन्तु ओ ओकरासँ बियाह नहि केने रहय। ओ जा धरि छलीह ताधरि पेद्रूक संसार नीक जकाँ चललै, मुदा जखन ओ मरि गेलीह तँ ओकरा श्मशानक बाहरे गारल गेल छलैक। किएक तँ ओकर अंतिम संस्कार श्मशान घाटमे नहि करय देल गेल रहैक एहि लेल पेद्रू कानि रहल छल। ई घटना स्मरण अबितहि हम स्वयं उधेड़बुन मे पड़ि गेलहुँ। एहि उधेड़बुन मे हमरा एकटा पछिला गप्प स्मरण आबि गेल। एहि छोटका गिरिजाघरमे हमरा बपतिज्म (ईसाई धर्मदीक्षा) देल गेल छल। ताहि समय हम बहुत छोट छलहुँ। तखन स्कूलो नहि जाइत छलहुँ। अपन मायकेँ बता कए हम आलेसक ओहिठाम गेल रही। ओकरा घरमे ओकर पिताजी हमरासँ पूछलथि— “अहाँ त’ पाखलो छी ने?” “हँ” हम जबाब देलहुँ। “किएक तँ अहाँ पाखलो छी एहिलेल ईसाई भेलहुँ ने?” हम चुप रहलहुँ। “अहाँ काल्हि आलेसक संग आएब, काल्हि उत्सव छैक।” दोसर दिन हम आलेसक संग गेलहुँ। ओहि समय हमरा ओतुका पादरी बपतिज्म देलनि। एहि बातक खबरि हम ककरो नहि लागए देलिऐक। घर अएलाक बाद, आलेसक ओहिठाम जे हमरा बिस्कुट खएबा लेल देल गेल छल, ओकरा हमर माय बाहर फेकि देलथि। ओ हमरा धमकी देलथि—“विठू! एना जँ अहाँ ककरो-कहाँसँ किछुओ खएबाक चीज ल’ लेब तँ हम अहाँक जान ल’ लेब।” हमरा गाममे एहिसँ पहिने ईसाई आ हिन्दूक बीच कहियो झगड़ा-फसाद नहि भेल छल, मुदा ‘ओपिनियन पोल’क समय गामक बजारक वार्डमे ईसाई आ हिन्दू, दुनू समुदायक लोकक बीचमे झगड़ा भ’ गेल। ओहि दिन किओ एक दोसराकेँ ओकर धर्म लगा केँ गारि देलकै, आकि झगड़ा बाझि गेल। ओहि राति एक दोसराक घरक आगूक तुलसी चौरा आ क्रॉस तोड़ि देल गेल। घर-दरबज्जाक आगू तोड़ल गेल तुलसी चौरा आ क्रॉसक माटिक ढेर लागि गेल। दोसर दिन झगड़ा आर भयानक रूप ल’ लेलकै। लोक सभ डंडा, तलवार आ ढाल ल’ कए एक दोसराकेँ मारि देबाक लेल तैयार छलैक। किछुकेँ मारियो देल गेलैक। हम एहि दुनू समुदायक बीच घूमि रहल छलहुँ, आ की भ’  रहल छैक देखि रहल छलहुँ। हमरा मारबाक लेल किओ नहि अबैत छल। “हम नहि तँ ईसाई रही, आ ने हिन्दू, एहिलेल हमरा छोड़ि देल गेल की? हमर संबंध दुनूसँ अछि, एहिलेल हमरा ओ लोकनि नहि मारलनि की?” हमरा मोन मे एहि तरहक प्रश्न उठय लागल। दुनू समुदायमे हमर मीत लोकनि छलाह आ हम हुनका सभसँ मिलैत छलहुँ। जँ झगड़ा आर बढ़ि जेतैक तँ खूनक नाली बहि जेतैक, एहिलेल दुनू समुदायक लोक डरि गेलाह। बादमे हम दुनू समुदायक लोकसँ मिलिकए हुनका सभकेँ समझौलहुँ-बुझौलहुँ, हुनका बीच समझौता करबौलहुँ। ओहि समय हम हुनका सभकेँ एकजुट करएवला आ एक दोसराक समाद ल’ जाएवला दूत बनि गेल छलहुँ। एहि गाममे हमर परिचय फकत एतबा अछि जे हमर नाम पाखलो थिक, हमर जाति पाखलो थिक, आ हमर धर्म सेहो पाखलो थिक। · छओ केगदी भाटक पैंतीस-चालीस रैयत, मूलपुरुषक मंदिर लग जमा भ’ गेल छल। सुभलो आ सोनूक बीच बैसल दादी सभसँ नीक लगैत छलाह। रैयत, किसान, कुणवी (गोवा राज्यक आदिनिवासी) सहित गामक सभ लोक ओतए जमा छल। रैयत सभ अपन-अपन माँग ओतए राखलक। जमींदार ककरो घर तोड़ि देने रहैक तँ ककरो घर नहि बनाब’ दैत रहैक। किछु रैयतकेँ जमींदार बेदखल क’ देने रहैक तँ किछुकेँ हफ्ताक नारियर नहि देने रहैक। एहि तरहक बहुत रास माँग रहैक। सभक चेहरासँ गोस्सा आ नाराजगी झलकैत रहैक। प्रस्तुत कएल गेल सभ माँग पर जखन चर्चा होमए लागल तँ किछु हल्ला-गुल्ला होमए लागलै। सुभलो गाँवकर लोक सभकेँ चुप करबाक प्रयास केलनि, मुदा हल्ला आर बढ़िते गेल। तखनहि दादी उठि कए अपन दमगर आबाजमे बाजए लागल— “हम सभ एहि कांदोले गामक गाँवकर सदा जमींदारक केगदी भाट रैयत थिकहुँ। ओना हमरहिमे सँ किछु ओकरा खेतक हिस्सेदार सेहो छी। हम सभ ओकरा खेत-भाटमे काज करैत छी, मुदा हमरा जतबाक आवश्यकता अछि ततबो हमरा पेटकेँ नहि भेटैत अछि, अपितु ओ सभ जमींदारक गोदाममे चलि जाइत अछि। केगदी भाटमे हरएक नारियर तोड़बाक दिन लाखो नारियरक ढेरी लागि  जाइत अछि, मुदा सदा जमींदारक मर्जीक बिना हमरा सभकेँ एकोटा नारियर खएबा लेल नहि भेटैत अछि। एहि भाटमे नारियरक गाछ लगाबी हमसभ, ओकरा पानि पटा कए नमहर करी हमसभ, भाटमे खाद छीटी हमसभ, ओकर ओगरबाहि करी हमसभ, ओकर हत्ता बनाबी हमसभ, सुरक्षा करी हमसभ आ दू टा नारियर खएबा लेल हमरा सभकेँ जमींदारक मुँह देख’ पड़ैत अछि। एहि माटिक पूतकेँ एहि भाटमे घर-मकान नहि बनाब’ देल जाइत छैक। ताहू पर जबरदस्ती ओकरा सभक घर तोड़ि देल जाइत छैक। आब हमरा सभकेँ हमर न्याय भेटबाक चाही। हमरा सभ पर जे अत्याचार भेल अछि से दूर हेबाक चाही, माने दूर हेबाक चाही।” “हँ, हँ”, जमा भेल भीड़सँ एहि तरहक नारा सुन’ मे आएल। बादमे दादी आर जोरसँ बाजए लागल। ओकर आवाज लोकक कानमे गूँजए लागलैक। पाखलोक पूरा देहमे बिजलौका चमकि गेलैक। ओ अपन गरम भेल कान पर गोविन्दकेँ हाथ रखबाक लेक कहलकैक। भगवान पर अक्षत छीटलाक पश्चात् हुनकर गोहारि केलासँ जे लोकक शरीर पर भा आबि जाइत छैक, तहिना दादीक  भाषण सुनि कए लोक सभ पर भा आबि गेलैक, एहने बुझाइक! दादीक बाजब जारी रहैक— अपन मौगीक परतापें ओकरा ई केगदी भाट भेटल छैक। यैह सदा, दत्ता जल्मीकेँ जित्ते मारि कए ओकर खाजन भाट (क्षेत्र विशेषक खेत) फिरंगीक सहायतासँ अपना नामे करवा नेने अछि। ओकरा कनेको लाज-शरम नहि छैक। ओहू पर ओ गाममे राजा जकाँ घूमि रहल अछि। ई गाम सदा जमींदारक नहि थिकै। गामक खेत-भाट हमरा सभक थिक। एहि खेत मे काज करएवलाक खेत-भाट थिकै। कागत पर लिखा नेने ई ओकर नहि भ’ जेतैक। जँ एहन हेतैक तँ ओ एहि देशकेँ सेहो कागत पर लिखवाकेँ राखि लेत आ ओ एहि देशहुँकेँ कागत पर लिखि ककरो हाथेँ बेचि लेत। आब हमसभ जमींदारकेँ देखा देबैक जे ई खेत-भाट हमरे सभक थिक। खेत-भाटमे काज करएवलाक थिक। हमरा सभक असहयोगेक कारणेँ केगदी भाटमे नारियर तोड़ब एखन धरि बाँकी रहि गेल अछि। ओहि समय जमींदारकेँ एहसास भ’ जेबाक चाही रहए। मुदा ओ तँ अकिले केर आन्हर अछि। सुनलहुँ अछि जे भाटमे नारियर तोड़बाक लेल ओ गामसँ बाहरक पाडेकर (पेशेवर नारियर तोड़’ वला) केँ लाबए बला अछि। ओकरा अएबासँ पहिनहि हम सभ सभटा नारियर तोड़ि कए देखा देबैक जे ओ भाट हमरा सभक थिक। चलै चलू, आइए, एखने ओहि भाटक सभटा नारियर तोड़ि देबैक, चलै चलू, ढाल आ गड़ाँस ल’ कए अबैत जाउ! सभ किओ ओहि जोशक संग उठल आ ढाल-गराँस ल’ कए  केगदी भाटक दिस चलि देलक। भाटमे हर एक नारियरक गाछमे गुच्चाक गुच्छा नारियर लागल रहैक। एतेक पैघ केगदी भाट, जकर नारियर तोड़बाक लेल महीनाक महीना लागि जाइत छलैक, एकहि दिनमे एक चौथाई सँ बेसी नारियर तोड़ि देल गेलैक। गुच्छाक गुच्छा नारियर गिर रहल छल। भाटमे नारियरक बड़का-बड़का ढेर लागि गेल छलैक।  साँझ पड़ि गेल रहैक मुदा एखन धरि सभ किओ नारियर तोड़बामे व्यस्त रहए। एतबहि मे, “पाखलो गिर गेलैक, पाखलो गिर गेलैक”, एहन हल्ला मचि गेल। नारियर तोड़ब छोड़ि सभ किओ पाखलो लग जमा भ’ गेल। पयरक छान छूटि गेलाक कारणेँ पाखलो नारियरक गाछसँ नीचा गिर गेल छल। नारियरक गाछसँ ओकर पेट, जाँघ, हाथ-पयर आ छाबा घसीटा गेल छलैक जकरा कारणेँ ओकर चाम निकलि गेल छलैक। ललाटक घावसँ खून बहि रहल छलैक। दादी आ सोनू ओकरा सहारा दए उठाकए बैसैलक आ पानि पियौलक। होशमे एलाक पश्चात्, की भेल छल? ई जानि पाखलो हँसय लागल। बैसल पाखलोकेँ गोविन्द हाथक सहारा दए उठौलक। चलू, घर चलैत छी! गोविन्द पाखलोसँ कहलक। सोनू बाजल, “नहि, पाखलोकेँ हम अपन घर ल’ जाएब, ई बहुत जख्मी भ’  गेल छैक आ एकरा बहुत चोट लागल छैक। एकरा हम घर ल’ जा कए जे किछु दवाई-बिरो करबाक हेतैक से करबा देबैक।” ओहि दिनक नारियर तोड़ब बन्न भेल। पाखलो अपन मामाक घरक रस्ता पर चलि रहल छल। · दोसर दिन फेर नारियर तोड़ब सुरह भेल। पाखलो अपना माथ पर रुमाल बान्हि ठाढ भ’ गेल। दोसरा जकाँ ओहो नारियर तोड़बा लेल सोचि रहल छल, मुदा ओकर मामा ओकरा गाछ पर चढबासँ मना क’ दलकैक। एकर बाबजूदो ओ नारियर तोड़ि लितए, मुदा सौंसे देहमे भ’ रहल दरदक कारणेँ ओ एहन नहि क’ सकल। रजनी जीरा पीसि कए ओकरा पीठ आ कन्हा पर लगौने छलीह। घावसँ जीरा नहि निकलि जाय एहिलेल ओ नारियरक गाछ पर नहि चढ़ल। काल्हि रजनी पाखलोक शरीर पर भेल घावकेँ धो-पोछि कए दवाइ लगौने छलीह। ललाट पर जे  घाव भेल रहैक, ओहि पर दवाई लगा कए पट्टी बान्हने छलीह। कुल्हा आ पीठ पर जीरा पीसि कए लगौने छलीह। रजनीक ई रूप देखि कए पाखलोकेँ अपन मायक स्वरूप याद आबि रहल छलैक। रजनी केलबायक मूर्ति-सन सुन्नरि लागि रहल छलीह। रजनी ओकर मामा एकलौती बेटी छलीह। ओ बहुत शांत आ विनम्र स्वभावक छलीह। रजनी जखन दूध आनि कए पाखलोकेँ पीबाक लेल देने छलीह, ओ पीबैत काल पाखलोकेँ रजनीक वात्सल्य भावक एहसास भेल छलैक। क्षण भरिक लेल ओकरा मोनमे भेलैक जे एहि ममतामयी देवीक चरण छूबि ली। काल्हिसँ पाखलो एकटा अलगे दुनिया मे विचरण क’ रहल छल। ओकरा मोनमे कतहुँ कोनो मंदिरक रचना भ’ रहल छलैक। जखन जीपक हार्न सुन’ मे एलैक तखन पाखलो होशमे आएल। देखलक तँ केगदी भाटमे पुलिसक एकटा गाड़ी आएल छल, जकरा संगे सदा जमींदार सेहो छल। पुलिस जहिना केगदी भाटमे आएल तहिना हवामे दू-तीन फायरिंग केलक। सभ किओ डरि गेल आ नारियर तोड़ब बन्न क’ देलक। दादीकेँ बहुत गोस्सा एलै आ ओ गोस्सेमे सभसँ कहलक— “अहाँ सभ ककरो सँ डरब नहि। नारियर तोड़ब जारी राखू।” इन्स्पेक्टर अपन रूल हाथमे नेने आगू आएल। ओ दादीकेँ अपना हाथेँ पकड़लक आ ओकरा जीपमे बैसैबाक लेल घीच’ लागल। पाखलो ओकरा रोकलकै। सभ किओ पुलिसक चारू दिस जमा भ’ गेल। दू-तीन गोटे जीपमे बैसल जमींदारकेँ नीचा उतारि देलक। इन्स्पेक्टर चिकड़ल, आ गोस्सासँ बाजल— “अहूँ सभ जँ बेसी बकबक केलहुँ तँ अहूँ सभकेँ मारि लागत।” “जाउ, जाउ, चुप रहू! जँ अहाँ एतए बेसी रंगबाजी केलहुँ तँ एतए जमा भेल सभ गोटए अहाँ सहित अहाँक पुलिसो केँ पीटत। हमसभ पुर्तगाली पुलिसक हाथ तँ ढेर एलहुँ तँ अहाँ सभक हाथ कतएसँ आएब।” दादी चिकरल। ताधरि पुलिस पर किओ दू-तीन चपत धरा देलकै। ओ संभवतः पाखलो छलैक। इन्स्पेक्टर पाखलो केँ पकड़ि लेलक, मुदा दादी ओकरा छोड़ा लेलकै। इन्स्पेक्टर दादीक दिस ‘चिबा जाइ आकि गिर जाइ’ वला नजरिसँ देखलक। “अहाँ सभ एतए लोकक रक्षा करए आएल छी वा गोलीसँ उड़ाब’?” दादी इन्स्पेक्टरसँ पुछलकै। “अहाँ केँ तँ सबसँ पहिने ओहि लोककेँ अंदर करबाक चाही छल, जे अहाँकेँ एतए आनने अछि। वैह असली चोर थिक, लुटेरा थिक, आ दोसराक दम पर अपन पेट भरएवला थिक, आ ओकरहि कहला पर अहाँ हमरा सभकेँ चलान करए आएल छी?” दादी उच्च स्वरेँ इन्स्पेक्टरसँ पूछि रहल छल आ जमींदार गोस्सासँ दादीक दिस देखि रहल छल। “अहाँ हमरा थाना ल’ जएबाक लेल आएल छी ने! त हमरा सभकेँ ल’ चलू। सब किओ जीपक अंदर आबि जाउ।” एतबा कहैत पाखलो जीपमे बैसि गेल। ओकरा संगहि आर पन्द्रह-सोलह लोक जीपमे बैसि गेल। बाँकी लोकक लेल जीपमे बैसबाक जगह नहि छलैक। इन्स्पेक्टर आठ-नओ लोककेँ जीपसँ नीचा उतारि देलकैक आ बाँचल सात गोटा कए ल’ कए चलि देलक। बाँकी लोकनि ओहिना मुँह ताकैत रहि गेल। सातो लोककेँ ओहिदिन पुलिस-स्टेशनहिमे रहय पड़लैक। दोसर दिन सोनू आ सुभल्या गाँवकरक संग पाँच लोककेँ छोड़ि देल गेलैक मुदा दादी आ पाखलोकेँ नहि छौड़लकैक। जेना श्राद्धक घरमे छूतकाह रहैत छैक तहिना केगदी भाटमे नारियर यत्र-तत्र पड़ल रहैक मुदा किओ ओकरा हाथ नहि लगाबैक। गाममे एकटा आर पैघ घटना भ’ गेलैक। दादी सहित गामक आनो-आन लोक पर जमींदार मोकदमा क’ देलकैक। गामवला सभ सेहो मोकदमा लड़ल। मोकदमा बहुत प्रसिद्ध भ’ गेलैक मुदा फैसला जमींदारक पक्षमे भ’ गेलैक आ दादी आ पाखलोकेँ एक मासक कैद भ’ गेलैक। ओहि दिन गामवासीकेँ बहुत दुख भेल रहैक। दोसरहिं दिन जमींदारकेँ सेहो कैद भ’ गेलैक, किएक तँ ओ सरकार लग जमीनक नकली कागजात पेशी केने रहैक। दोसर दिस मजदूर आ रैयत लोकनिकेँ सेहो ओ बिना कारणेँ फँसौने छलैक, एहि गुनाहक खातिर जमींदारकेँ सजा भेटल छलैक। ‘जकर जोत तकर जमीन’, एहि नियमक तहत कार्यापाट आ उबरेदांडो गाम रैयत सभकेँ भेटलैक आ केगदी भाट, खाजन भाट मजदूर लोकनिकेँ। एहि गामवला सभकेँ बुझाइत छलैक जे आब ओ वास्तवमे स्वतंत्र भ’ गेल अछि। पूरा एक महीना धरि जेहलक सजा काटलाक पश्चात् दादी आ पाखलो छूटि कए आएल। भाटसँ नारियर चोरि करबा आ लोक सभकेँ भड़कएबाक जुर्ममे पाखलो आ दादीकेँ एक महीनाक सजा भेल छलैक। ओ दुनू गोटे बड़ स्वाभिमानक संग एलाह। गामक हितमे लड़एवला एकटा सम्माननीय गामवासीक नजरि सँ गामक लोक सभ हुनका लोकनिकेँ फूलक  माला पहिरा कए स्वागत कएल। लोक सभ दादीकेँ सम्मान दए गाम मे स्वतंत्रतताक उत्सवक मनौलनि। एहिसँ पहिने एतेक रास खुशी गामक लोक कहियो नहि महसूस केने रहए। दादीक घर मिलबाक लेल गाम ओ बाहरो सँ लोक सभ आबि रहल छल। एहि समय पाखलो दादीएक ओहिठाम बैसल रहए, मुदा पाखलो केँ किओ पुछलकै धरि नहि, एहिलेल ओकरा कने खराप लागलैक। “लोकक नजरि मे हुनका हमर पाखलेपन नजरि एलनि। हुनका सभक बीच हम एकटा पाखलो थिकहुँ” ओकरा लागलैक। ओ तखनहि ओतएसँ निकलि गेल। घरसँ बाहर एलाक बाद ओ सोनू मामाक घरक रस्ता पकड़ि लेलक। ओकरा मोनमे विचार आबि रहल छलैक—“रजनी हमरा देखि कए बहुत प्रसन्न हेतीह। ओ हमरासँ पूछतीह तँ हम हुनका कैदक सभटा खिस्सा सुनेबनि। हमरा पीठ पर जे रूलसँ मारल गेल अछि तकर दाग देखेबनि, ई देखि ओ अपन दुख प्रकट करतीह, आ फेर तेल गरम कए हमरा पीठ पर लगौतीह......।” सोचैत-सोचैत पाखलो सोनू मामाक घर पहुँचि गेल। रजनी ओकरा दूरहिसँ अबैत देखि लेलक। ओकरा चिन्हतहि ओ ‘विठू’ कहि दौड़ैत ओकरा सोझाँ आबि गेलीह। · सात कैदसँ छूटलाक पन्द्रहे दिनक अंदर दादीक देहान्त भ’ गेलैक। हमरा रस्ता दखौनिहार चलि गेलाह। खाली हमरे किएक? अपितु सौंसे गामे केँ सम्हार’ मे ओकर पूरा हाथ छलैक। सौंसे गामे कानि रहल छल। ओहि दिन केगदी भाटमे नारियर तोड़ैत काल दादी आ हमरा सभकेँ पुलिस पकड़ि कए ल’ गेल छल आ हमरा सभकेँ खूब मारल-पीटल गेल छल। पुलिसक मारिसँ दादीक एकटा पयरमे घाव भ’ गेल रहैक जे अन्त धरि ठीक नहि भ’ सकल रहैक। कैदसँ छूटलाक पश्चात् ओ घाव आर विस्तार भ’ गेलैक आ जतए घाव रहैक ओकर चारु भाग लोहा सदृश कड़ा भ’ गेल रहैक। घावसँ खून बहैत रहैक। गमैया डागडर आ बैद्य लोकनिसँ बहुतो दवाई-बिरो कएल गेल मुदा तकर कोनो असर नहि भेलैक। ओहि राति हम, गोविन्द, गोविन्दक माय, सुभलो गाँवकर आ गामक किछु लोग दादीक लग बैसल रही। दादीकेँ बोखार रहनि आ हुनक आँखि बन्न भेल जा रहल छलनि। अधरतियामे दादीक गलामे एकटा हिचुकी भेलनि आ ओहि हिचुकीक संगहि दादी अपन अंतिम साँस लेलनि। बुझाएल जेना ब्राह्माण्डसँ गरम श्वासक तंतु टुटि गेल हो।  बिना हिलल-डोलल हुनक शरीर शांत भ’ गेलनि। ओहि दिन  हमरा लागल जे हमरा पर बड़का बिपति आबि गेल। सौंसे गाम दादीक  अंतिम संस्कारमे आएल रहैक। गामक हितमे अपन जीवनमे कष्ट उठौनिहार दादीक ई आत्मबलिदान दिवस रहैक। अपन पिताजीकेँ मुखाग्नि दैत गोविन्द पर की बीतल हेतनि? ई अनुमान करब ओतेक सहज नहि अछि। हमरा मुँहसँ शब्द नहि निकलि रहल छल। एहि तरहक दुखक मापन कोनो मापक यंत्रसँ संभव छैक की? चिता धधकैत रहैक। गोविन्दक आँखिसँ बरखाक बूँद जकाँ अश्रुप्रवाह भ’ रहल छल। हमरा आँखिक तँ बुझू जे नोरे सूखि गेल हो। ई दृश्य हम अपन आँखिक सोझामे देखि रहल छलहुँ। गोविन्द ओहि दिनसँ गुमसुम रहय लागल। ओना तँ पहिनहुँ ओ बहुत किछु सोचैत आ गम्भीर रहैत छल, मुदा आब तँ ओ आओरो गंभीर रहय लागल। हम ओकरा समझेलहुँ-बुझेलहुँ, आ ओ बुझिओ गेल, मुदा ओ अपना आपकेँ बदलि नहि रहल छल। नोकरी पर जयबाक लेल ओकरा पन्द्रह दिन पहिनहि चिट्ठी आबि गेल रहैक, किन्तु ओ घरहि पर बैसल रहल। चिट्ठी एलाक एक मासक बादहि ओ नोकरी पर जा सकल। ओकर माय एतए घर पर एसगरे रहि जेतीह, एहि बातक दुःश्चिन्ता ओकर खेने जा रहल छलैक। ओ अपन माइयोकेँ अपना संगहि पणजी ल’ जयबाक लेल सोचलक। गोविन्दक माय अपन बेटाक संग पणजी जा रहल छलीह, एहिलेल हुनका बिदा करबाक लेल आस-पड़ोसक कैकटा स्त्रीगण आएल छलीह। गोविन्द अपन सभटा समान बान्हि नेने छल। अंत मे ओ देवाल पर लटकल दादीक फोटो आ महादेवक फोटो उतारि पणजी ल’ जाएवला समानक बीच राखि लेलक। भगवान जानथि एहि बातक खबरि गामक बुजुर्ग सुभलो गाँवकरकेँ कोना लागि गेलनि? ओ गोविन्देक घर दिस आबि रहल छलाह। हाथमे एकटा बाँसक लाठी नेने ओकरा जमीन पर टिकबैत ओ आगू बढि रहल छलाह। ओ तौलिया आ कमीज पहिरने छलाह। “ओ आबि रहल छथि”, ई गप्प हमही सोनूकेँ कहने रही। ओ घर धरि पहुँचि गेलाह। गोविन्द हुनका बजाकए बैसैलथि। “बेटा गोविन्द! अहाँ अपना माइयोकेँ पणजी ल’ जा रहल छी की?” सुभलो गाँवकर पूछलनि। “हँ” गोविन्द नहुएँ बाजल। “तखन हम जखन कखनहुँ एहि बाट दए जाएब तँ हमरा के बजाओत?” एहि प्रश्नक जबाब गोविन्द लग नहि रहैक। ओ चुप रहल। “ई गप्प हम बुझि सकैत छी जे नोकरिएक चलते अहाँकेँ पणजी जाए पड़ि रहल अछि, आ हमसभ अहाँकेँ बिदा करए आएल छी, ई कने नीक नहि लागि रहल अछि।” “आखिर हम की करी? नोकरीक कारणेँ जाए पड़ि रहल अछि।” गोविन्द बाजल। “आब गामक सीमान बाँचबो कहाँ केलैक? लोकबेद अपन सीमानकेँ लाँघि सौंसे दुनिया दिस अपन रुख क’ रहल अछि।” जाहि सोच-विचारसँ गोविन्द शहर जएबाक निर्णय केने रहए, ओ ओहि विषयमे कहि रहल  छलाह। कनेक काल धरि सभ किओ चुप रहल। “खैर! अहाँ जतए कतहुँ जाउ नीके रहू!” अपन ई इच्छा व्यक्त करैत सुभलो गाँवकर बाहर निकलि गेलाह। पणजी ल’ जाएवला सभटा समान ओ बान्हि नेने रहए। हम कहलियनि— “गोविन्द, गाड़ी छूट’ मे आब कम्मे समय अछि।” हमर कहब ओ संभवतः नहि सुनलनि। हुनकर आँखि भरि एलनि आ हुनका आँखिसँ टप-टप नोर खसय लागलनि। समान सभकेँ कन्हा पर लादि हम गाड़ी लग गेलहुँ ओकरा उपर चढ़ा देलिऐक। गाड़ी छूटबाक समय भ’ गेल रहैक। गोविन्द अपना मायक संगे ओहिपर बैसि गेल। हम पुछलियनि— “आब कहिया आएब?” “देखा पर चाही।” “एहि पन्द्रह दिनक बाद खामिणी आ सांतेरी देवीक मेला छैक, आएब की नहि?  आ अगिला तीन मासमे गामक केलबाईक शिगमो सेहो छैक। आएब की नहि?”  हम जल्दीसँ पूछलिऐक। “केलबाईक शिगमोमे आएब।” “आ खामिणी सांतेरी?” हम पूछलियनि। “नहि।” “हम एसगरे कोना आबि सकैत छी?” गाड़ी चलि पड़ल। हम आर जे किछु पुछलहुँ से सभटा ओहि गाड़ीक आबाजमे दबि गेल। गोविन्द अपन हाथ हिलाकए हमरासँ बिदा लेलनि। गाड़ी आगू बढि गेल आ अगिला मोड़क बाद ओ आँखिसँ ओझल भ’ गेल। · गोविन्दक पणजी चलि गेलाक पश्चात् हम अपना आपकेँ एसगरुआ बुझए लागलहुँ। हम दिनभरि पीपरक गाछक नीचा चबूतरा पर बैसि गोविन्देक संबंधमे सौचैत रही। ओहि समय सोनू मामा ओहि रस्ता दए जा रहल छलाह। ओ अपना डाँड़मे तोलिया लपेटने रहथि आ उपर उज्जर कमीज पहिरने रहथि। हमरा सोझ अबितहि ओ पूछलनि— “अहाँ एतए बैसि की सोचि रहल छी?” “किछुओ त’ नहि।” हम कहलियनि। “किछु कोना नहि, अहाँक मीत पणजी चलि गेलाह, अही लेल अहाँ उदास छी ने?” हम चुप रहलहुँ। “चलू, हमरा घर चलू।” हम हुनका संग चलि देलहुँ। पछिला किछु दिनसँ हम सोनू मामाक ओहिठाम आन-जान करैत छलहुँ। दुपहरिक रौदमे चलैत-चलैत हमसभ घर पहुँचलहुँ। घरक भीतर गेलाक बाद कने ठंढा महसूस भेल। लाल आ कारी रंगक फ्रॉक पहिरने रजनी दू लोटा पानि भरि बरंडाक बैसकमे राखि घर चलि गेलीह। हम दुनूगोटे हाथ-पयर धोबि तोलियासँ हाथ पोछलहुँ। भोजनक लेल पीढ़ी रखबाक आबाज अंदरसँ आएल। ताबत रजनी बाहर एलीह आ हमरा सभकेँ भोजन पर बजा कए ल’ गेलीह। हमरहु बहुत जोरसँ भूख लागल रहए। भोजन कएलाक पश्चात् हम बरंडाक सोपो (कुर्सीनुमा बैसकी) पर बैसि गेलहुँ। कोनो आन काजसँ हम घरसँ बाहर निकलहि वला रही तावत हमरा किओ आबाज देलक। “विठू।” हम उनटि कए देखलहुँ। ई रजनीए छलीह जे हमरा आबाज द’ रहल छलीह। “हँ।” हम ओकरा कहलिऐक। ओ हमरा माय सन मधुर आबाजमे बजा रहल छलीह। ओहि समय हमरा लागल जेना हम अतीतमे पहुँचि गेल छी। हमरा संबंधमे हमर सभटा खिस्सा सोनू मामा ओकरा बता देने रहथि संगहि हमर माय द्वारा राखल हमर नाम सेहो। रजनी हमरा किछु कहए चाहि रहल छलीह, मुदा बहुत देर धरि हुनका मुँहसँ कोनो शब्दे नहि निकललनि। ओ ओतहि ठाढ रहलीह। “विठू, अहाँ एतहि रहल करू। अहाँ अपन सभटा कपड़ा-लत्ता एतहि ल’ आउ।” ई सुनतहि हम ओकरा दिस आश्चर्यसँ देखलहुँ। बादमे हम अपन माथ झुका अपन पयर दिस देखए लागलहुँ। ओ हमरासँ बेर-बेर आग्रह केने जा रहल छलीह आ हम अपन पयर निहारने जा रहल छलहुँ। “किछु नहि सोचू, अहाँ एतहि रहू।” “ओ बेर-बेर हमरासँ आग्रह केने जा रहल छलीह। हुनकर आग्रह तोड़बाक हिम्मत हमरामे नहि रहए।” हम ‘हँ’ कहि देलिऐक। सात-आठ  मास धरि रजनी हमर सहोदर बहिन सदृश सेवा करैत रहलीह। हमरा कपड़ा-लत्ता, ओछाओन सभटा वैह साफ करैत रहलीह। नहएबाक पानि गरम करएसँ ल’ कए सभटा काज वैह करैत छलीह, एहिलेल हम कहियो काल गोस्सा क’ कए ओकरा डाँटियो दिऐक, मुदा ओ चुप रहैत छलीह। एकदिन हम हुनका कहलियनि,  “हम की अहाँक सहोदर भाय थिकहुँ जे अहाँ हमर एतेक ध्यान राखै छी?” एतबा सुनतहि हुनका आँखिमे नोर आबि  गेल छल। ओ अपन बाँहिसँ तकरो पोछलथि। “सहोदर नहि छी ताहिसँ की? से जे हो, छी तँ अहाँ हमर भाइए ने? आ हम तँ अहाँकेँ अपन सहोदरे भाय मानैत छी।” एतबा कहैत ओ कपसि-कपसि कए कानए लगलीह। हम हुनकासँ माँफी माँगलियनि। हमरो आँखिमे जखन नोर आबि गेल तखनहि ओ चुप भ’ सकलीह। हम जहिना हँसलहुँ, ओहो हँसय लागलीह आ कपड़ा धोबए इनार पर चलि गेलीह। हम चिन्तामे डूबि गेलहुँ। पाखलोक जनमल कतहुँ रजनीक भाय बनि सकैत अछि? खूनक संबंध नहिओ रहने ओ हमर बहिने  सदृश हमर सेवा करैत रहलीह, तेँ की ओ हमर बहिन नहि भेलीह? एहि तरह एकक बाद एक प्रश्नमे हम उलझैत गेलहुँ। फेर हम गोविन्दक प्रश्नक तंतु केँ सोझराबए लागलहुँ। ओहि दिन बेर-बेर याद आबि रहल छल। नारियरक गाछसँ गिरलाक बाद रजनीक दवाई लगेलासँ जे जलन भ’ रहल छल तकरा कम करबाक लेल ओ घाव पर नहुँ-नहुँ फूक मारि रहल छलीह। तखन हमर संबंध ओकरासँ की छल? हमरा ओ ओकरा बीच कोनो संबंध नहि रहलाक बाबजूदो ओ हमरा दबाई लगौलक। हम कष्टमे रही आ ओ हमरा घाव पर दबाई लगाब’ वाली ममतामयी छलीह। सभटा घावक संग-संग भौं आ पिपनीक घाव ठीक भ’ गेल रहए, मुदा ओतए करिया दाग रहि जएबाक कारणेँ रजनीकेँ बहुत खराप लागैक। ओ हमरा बेर-बेर कहैत छलीह— “भौं पर कारी दाग नहि रहबाक चाही। एतेक सुन्दर गोर-नार देह पर आमक कोलपति जकाँ बुझाइत अछि। आब ओकर की करब?” भौंहेक कारणेँ लहसुनियाँ आँखि बाँचि गेल। “हम चुपचाप ओकर गप्प सुनने जा रहल छलहुँ। कारी दाग रहि गेल छल, एकर हमरा एकोरत्ती दुख नहि छल। हमरा बुझाइत छल जे हमर लहसुनियाँ आँखि बाँचि जेबासँ नीक होइतए, ओकरा फूटि जेबाक चाहि रहए आ संगहि दागसँ सौंसे देह कारी भ’ जएबाक चाही रहए। हमरासँ हमर गोराइ सहन नहि भ’ रहल छल। मुदा भगवान हमरा गोर बनेने रहथि, एकरा लेल रजनी भगवानक उपकार मानैत छलीह।” “हमरा भगवाने भाय भेजने छथि, हमरा ओकरा ठीक करबाक अछि।” रजनी बेर-बेर बजने जा रहल छलीह आ हमरो भगवाने सदृश बनएबाक लेल हमर सेवा क’ रहल छलीह। तखन हम हुनका कहियनि, “हमरो भगवान देवी सदृश बहिन भेजने छथि।” एतबा कहितहि हमरा कानमे मंदिरमे बाजएवला घंटाक सदृश आभास होमए लागल। · आठ रजनीक बियाह भेल एक मास भ’ गेल रहैक। ओ दुरागमनमे अपन नैहर आबए वला रहथि, तैँ सोनू मामा खेतक काज जल्दीए निबटा कए आबि गेल छलाह। रजनीकेँ नीक खेती-बारी वला घर-बर मिलल रहैक तैँ सोनू मामा बहुत खुश छलाह। मुदा दोसर दिस हुनका एहि बातक दुखो रहनि जे बहुत कम्मे उमिरमे ओ रजनीक बियाह क’ देने रहथि। ओकरा नेनपनहिमे ओकरा माथ पर सांसारिक बोझ आबि गेल रहैक। ओकरा एहन बुझाइक। ओ पाखलो पर बेकारक शंका करैत रहथि, एहि बातक हुनका ग्लानि भ’ रहल छलनि। पाखलो आ रजनी, एक दोसराकेँ नीक जकाँ बूझैत रहथि, एहिलेल सोनू मामाकेँ एहिमे किछु खराप नहि बुझा रहल छल। मुदा जँ यैह संबंध कहियो कोनो दोसर मोड़ ल’ लिअए तखन? तखन तँ गाममे जगहँसाइये भ’  जाएत। ई गामे ओकरा छोड़’ पड़ि जाइतैक। एहिलेल ओकर मोन सशंकित रहैत छल। एहि खातिर जतेक जल्दी भ’ सकए, रजनीक बियाह भ’ जएबाक चाही, यैह नीक रहत। सोनू मामा सोचने रहथि। रजनीक बियाह करपें गामक भास्करक संग बड़ उधव-बाधवसँ भेल रहैक। बियाहक तैयारीमे पाखलो पन्द्रह-बीस दिन धरि बहुत कष्ट उठौने रहए। बियाहोक दिन ओ खूब मेहनति केने रहए। बियाहक दोसरे दिनक गप्प रहैक। रजनीकेँ घरमे नहि रहलाक कारणेँ पाखलो कनमूँह सन रहए। ओ एहिना घरसँ बहराइत छल, तखनहि दरबज्जा पर ओकरा सोनू मामासँ भेंट भेलैक। ओ पाखलोसँ पूछलनि—“की भेल?” “किछु नहि।”, कहैत पाखलो घरसँ निकलि गेल। ओहि दिनक बादसँ पाखलोक पहिनहि जकाँ होटलमे खेनाइ-पीनाइ आ कतहुँ सुति गेनाय आरंभ भ’ गेल। ओकरा बुझाइत छलैक जेना ओ एहि गाममे एकटा अजनबी सदृश छैक आ ओकरासँ सिनेह राखएवला एतए किओ नहि छैक। ओ बहुत उदास रहैत छल। ओकरा माथ पर किछु रेखाक अलावे किछु नहि देखाइक। बीच-बीचमे ओ खेनाइयो-पीनाइ छोड़ि दैक। ओ पूर्ण रूपेँ कमजोर हाथी सन भ’ गेल रहए। ओकर हाड़ सभ झलकए लागल रहैक, गाल पिचकि गेल रहैक आ आँखि धसि गेल रहैक। पाखलो काज पर नहि गेल छल। ओ दूपहरकेँ पीपरक गाछक चबूतरा पर बैसल रहए। आलेस आ ओकर मीत सभ काज पर सँ आपस आबि गेल रहथि। “पाखलो आइ काज पर नहि गेल आ भरि दिन चबूतरे पर बैसल रहल” ई कहि ओ सभ पाखलोकेँ किचकिचब’ लागल। “पाखलो! आइ अहाँ काज पर किएक नहि एलहुँ?” “ओहिना।” “ओहिना किओ अपन काज छौड़ैत छैक की? किएक यौ! अहाँ पाखलोक जनमल छी एहिलेल अहाँ मामा अपन बेटी नहि देलनि की?”  आलेसक एतबा कहब सुनि पाखलोकेँ बहुत गोस्सा आबि गेलैक। ओ गोस्से सँ आलेसक दिस देखलक। “अहाँ ओहिना हमरा पर नाराज नहि होउ। मामाक बेटीक बियाह भेलाक बादसँ अहाँ किछु बदलि सन गेल छी। अहाँक पागलपनक हालति देखिकए........।” “चुप रहू आलेस! हमरा बेकारक गोस्सा नहि दिआउ।” एतबा कहि पाखलो ओतएसँ चलि देलक। ओकरा आइ आलेस पर बहुत गोस्सा एलैक, मुदा करबो की करितए? यैह बात भरि गामक लोक-बेद बाजि रहल छल। तखन हुनका सभक मुँह पर के ताला लगाबए? हिनका सभक सोचे एहन छनि तखन कैल की जाय? पाखलो एहन सोचलक। ओकरा माथमे बहुत दरद भ’ रहल छलैक। “जँ हम एहिना सोचैत रहलहुँ तँ एक दिन निश्चिते हम पागल भ’ जाएब। हमरा मोनकेँ चिन्ता करबाक आदति सन भ’ गेल अछि, हम एकरा सँ नहि निकलि सकब।” सोचैत-सोचैत ओ रस्ता पर चलि रहल छल। जुवांव ओकरा आबाज देलकैक। जखन कि जुवांव केँ देखतहि ओकरा गोस्सा आबि जाइत छलैक, मुदा आइ ने जानि की भ’ गेलैक? पाखलो ओकरा जबाब देलकैक आ दारूखानामे पैसि गेल। जुवांव हँसल आ ओकरा बैसबाक लेल एकटा मछिया देलकैक। पाखलो बैसल नहि। ओ एकटा पँचटकही निकाललक आ ओकरा दिस बढेलक। जुवांव नारियरक फेनी (शराब) ओकरा गिलासमे ढारि देलकैक। क्षण भरिक लेल ओकरा मोनमे भेलैक जे एहि गिलाससँ जुवांवक माथ फोड़ि दी। जुवांव गिलास उठाकए पाखलोक हाथमे थमा देलकैक। नव गैंहकीक खुशीमे ओ हँसि रहल छल। पाखलो एकबेर गिलासकेँ मुँहसँ लगौलक आ क्षणहिमे हँटा लेलक। ओकरा गरामे जलन भ’ रहल छलैक तैयहुँ ओ गिलासकेँ मुँहसँ लगौलक आ गटागट पीबि गेल। ओकर गरा छिला गेलैक। खाली गिलास जुवांव फेरसँ भरि देलकैक। दोसर गिलास पाखलोक गरामे एकटा हिचुकीक संग अटकि गेलैक। गरा आ नाक जरय लागलैक। ओकरा लागलैक जे ओकर नियंत्रण बिगड़ि रहल छैक, ओ ओतहि बैसि रहल। रजनी घर आएल छलीह, एहन ओकरा किओ बतेने छलैक। एतबा सुनतहि ओ सोनू मामाक घर दिस अपन पयर बढौलक। घरमे सोनू मामा खेत जएबाक हड़बड़ी मे रहथि। हुनका कान्ह पर हर छलनि। पाखलो पूछलक— “रजनी आएल छलीह की?” “आएल छलीह। दू दिन रहि कए चलि गेलीह।” रजनी आएल छलीह, सोनू मामा हमरा किएक नहि बतौलनि? ओ सोनू मामसँ पूछबाक लेल सोचि रहल छल, मुदा चुप्पे रहल। बाहर जेबाक हड़बड़ीमे सोनू मामा अपन घरक केवाड़ बन्न केलनि आ पाखलो ओतएसँ मुँह लटका कए आपस भ’ गेल। · एक दिन आलेस पाखलोकेँ गोविन्दक संबंधमे खबरि देलक। गोविन्द अपन ऑफिसमे काज करएवाली एकटा ईसाई युवतीसँ बियाह क’ नेने छल। ई गप्प सुनि पाखलोकेँ बहुत आश्चर्य भेल रहैक। गोविन्दकेँ गाम एला एकटा अरसा बीति गेल रहैक। ओ मेला आ शिगमोमे सेहो नहि आएल छल। गोविन्दक संबंधमे ई खबरि सुनि ओ ओकरासँ भेंट करबा सोचलक। पणजी शहरक एकटा बड़का भवनमे गोविन्दक  ऑफिस छलैक। “हम ओहि ऑफिस कोना जाउ?” पाखलो यैह सोचि रहल छल। फेर ओ हिम्मत केलक। पणजी शहरक ‘जुन्ता हाउस’क  सीढी चढैत ओ ओकरा ऑफिस पहुँचल। ऑफिसक सभटा कर्मचारी ओ स्त्रीगण ओकरा  देख’ लागल। ई कोन नव प्राणी आबि गेल? सभ किओ आश्चर्यक दृष्टिसँ पाखलोकेँ देखए लागल। किछु स्त्री आ युवती सभ ओकरा देखिकए हँसय लगलीह। पाखलोकेँ अपना-आपमे कोनादन लागलनि। एतबहिमे अपन बॉसक केबिन गेल गोविन्द बहरायल। ओ पाखलोक लग आएल। गोविन्दसँ मिललाक बाद, ऑफिसक मायावी संसारमे आएल पाखलोकेँ कने राहत भेटलनि। “यौ गोविन्द!” पाखलो शोर पारलक। गोविन्द हुनका जबाब नहि द’ कए हुनकर हाथ थामि कैंटीन दिस ल’ गेल। दुनू एक दोसराक हाल-समाचार पूछलक। बहुतो दिनसँ गोविन्द गाम नहि गेल छल एहिलेल पाखलो ओकरा उलहन देलकैक। दुनू गोटे चाह पीबए लागल। “हम यैह एलहुँ।” एतबा कहैत गोविन्द बीचहिमे चाह पीब छोड़ि बहरा गेल आ जल्दिए एकटा युवतीक संगे घुरि आएल। ओ साड़ी पहिरने छलीह। हुनका माथ पर एकटा टिकुली सेहो रहनि आ ओ बहुत धनिक घरक बुझाइत छलीह। “ई हमर मिता थिक, हमसभ एकरा पाखलो कहैत छियैक।” गोविन्द ओकरा पाखलोक माने बुझेलकै। पाखलो ओकरा दिस देखलक। ओ हँसलीह। किछु काल पहिने यैह युवती पाखलोकेँ देखि कए हँसैत छलीह। गोविन्द पाखलो सँ आगू कहलकैक, “भविष्यमे यैह हमर घरनी हेतीह। हिनक नाम मारिया थिकनि।” पाखलो जखन आश्चर्यसँ गोविन्दक दिस देखलक तँ गोविन्द अपन माथ नीचा दिस झुका लेलक।  “जँ गोविन्द एकटा ईसाई युवतीसँ बियाह क’ लेत तँ गामक लोक एकरा संबंधमे की सोचत? ओ सभ की चुप बैसतैक?” पाखलोकेँ एहन बुझेलैक। मुदा ओ चुप रहल। बादमे ओ अपन एहि बेमतलबक विचारकेँ एकदिस राखि हँसए लागल। पाकलोकेँ हँसैत देखि बुझू जे गोविन्दक माथक भार कम भ’ गेलैक। “आब जाति-पाति आ धरम कतए रहि गेल छैक? दक्खिनी आ उत्तरी ध्रुव आब सटि गेल छैक।” गोवन्द एहने सन किछु बात करताह। पाखलोकेँ लागलैक। मुदा गोविन्द चुप रहल। पाखलोकेँ गोविन्दसँ बहुत रास गप्प करबाक छलैक, मुदा गोविन्द लग ओतेक समय नहि रहैक। बादमे पाखलो दुनूकेँ “अच्छा, फेर भेंट हेतैक!”, कहलक आ बहरा गेल। पाखलो लिफ्टमे चढ़ल। ओहि काल ओकरा एकटा बातक स्मरण भ’ गेलैक— “आलेस दुबई जाइवला छथि एहिलेल ओ पासपोर्ट बनएबाक जोगाड़मे रहथि। किछुए दिनमे ओहो विदेश चलि जेताह आ एहि तरहेँ गाममे हमर एकोटा मीत नहि रहि जाएत। हम एकदम एसगर भ’ जाएब।” ई गप्पतँ गोविन्दकेँ कहब बिसरिए गेलहुँ। आब तँ गोविन्दो कहियो गाम एताह, एहनो संभावना नहिएक बरोबरि छल। बुझाइत अछि जे गोविन्दो आब गामबलाक लेल बाहरिए लोक भ’ गेलाह। पाखलो लिफ्टसँ नीचा उतरए लागल तँ ओकर माथ घूमए लागलैक। ओकरा बुझेलैक, जेना-जेना लिफ्ट नीचा दिस जा रहल अछि तेना-तेना ओहो नीचा गिरल जा रहल अछि। लिफ्ट रुकलाक बाद ओ एसगर भ’ गेल, ओकरा एहने बुझेलैक। ओ लिफ्टसँ बाहर निकलल। पणजीसँ गाम अएबा काल बसमे ओकरा रुक्मिणी मौंसीसँ भेंट भेलैक। “रजनीकेँ बेटी भेल छैक।” ई समाचार पाखलो केँ वैह देने छलीह। ई सुनि पाखलोक खुशीक कोनो ठेकान नहि रहलैक। बससँ उतरि पाखलो एकपेड़िया हैत हाली-हाली गाम जाए लागल। साँझ पड़ि गेल रहैक। पूर्णिमाक चाँद आसमानमे साफ झलकैत रहैक। पाखलोक मोनमे रजनीक बेटीक छवि आबि रहल छलैक। ओ देख’ मे केहन हेतीह? ओ अपन माय-सन हेतीह आकि ककरो आन सन? एहि तरहक कैकटा प्रश्न ओकरा मोनमे उठए लागलैक। रजनीकेँ गोर रंग पसिन्न छैक। ओकरा चन्द्रमाक एहि ज्योत्सना-सन बेटी होमक चाही। काजर लगएलाक बाद कारी आँखि वाली ओकरहि सन सुन्नरि बेटी होमक चाही। पूर्णिमाक ज्योत्सना चारुदिस पसरल रहैक आ जेना नहरक पानि बहैत छैक तहिना ओकरा रस्तामे चन्द्रमा अपन ज्योत्सना पसारने छलैक। · रजनी पाँच महीनाक अपन बेटीकेँ संग लए कांदोले गाम अपन बाबूजीक घर आएल छलीह। पन्द्रह-बीस दिन बीति गेल छलैक, मुदा एखन धरि ओ अपन पतिक घर नहि गेल छलीह। ओ अपन बेटीक नाम सुलू राखने छलीह। ओ देख’ मे बहुत गोर आ सुन्नरि छलीह। ओकर केश गुलाबी छलैक आ आँखि लहसुनियाँ। ओ कोनो फिरंगीक बेटी सन बुझाइत छलीह। रजनीकेँ ओकर घरवला घरसँ निकालि देने छथि, ई अफवाह सौंसे गाममे पसरि गेल रहैक, आ साँचो रहैक। ओकर घरवला ओकरा मारि-पीटि कए सुलूक संग ओकरा बापक ओतए पठा देने रहैक। “रजनीकेँ पाखलोए सँ ई बेटी भेल छैक।” ई आरोप ओकर घरवला ओकरा पर लगौने रहैक, आ सरिपहुँ देख’ मे फिरंगी सन लागएवाली सुलूकेँ देखि लोको सभ एकरा साँच मानि नेने रहैक। रजनी अचानक अपना बेटीकेँ ल’ कए घर आबि गेल छथि। ओहि दिन ई सुनि सोनूकेँ बहुत धक्का लागल रहैक। ओ एना किएक एलीह? सोनूक मोनमे एहन प्रश्न उठए लागलैक। अपना बापकेँ देखि रजनीक सब्रक बान्ह टूटि गेलैक आ ओ कानए लगलीह। आखिर भेलैक की? ओ बुझिए नहि पाबि रहल छल। बादमे रजनीक देह पर दाग सभ देखि कए ओकरा सभकुछ समझमे आबि गेलैक। ओ रजनीकेँ सांत्वना देलकैक। बहुत देर धरि तँ ओ चुप रहलीह मुदा पछाति जा कए सभटा घटना हुनका बता देलीह। सुलूएकेँ ल’ कए ओकर घरवला ओकरा पर शंका करैत रहैक। ओकर ई आरोप रहैक जे,  “पाखलोए सँ रजनीकेँ ई बेटी भेल छैक।” ई आरोप साँचो भ’ सकैत अछि। सोनूओकेँ एहिना बुझेलैक आ ओकरा बहुत गोस्सा आबि गेलैक। ओकर आँखि लाल भ’ गेलैक आ ओ गोस्सासँ पाकलोकेँ गरियाब’ लागलैक। “पहिनहि हमर बहिन पाखलोक जातिमे हमर नाक कटा चुकल अछि। आ आब ओकरहि बीया हमरा बेटीक भविष्य खराप करबा पर तुलल अछि” सोनू बाजए लागल। बादमे ओकर गोस्सा आर बढिते गेलैक आ एहिसँ आगू ओ किछु बाजि नहि सकल। “एहिमे पाखलोक कोनो दोष नहि छनि। हमर घरेवला हमरा पर झूठ आरोप लगा रहल छथि।” रजनी सोनूकेँ कहलकैक। मुदा ओ ई सभ सुनबाक लेल तैयारे नहि छलैक। बहुत कालक बाद ओ सभ किछु सुनलक आ कहलक— “हमर तँ भागे फूटल अछि।” दोसर दिन ओ रजनीक घरवलासँ भेंट कए सभ किछु समझाकए कहलकैक— “सुलू सन बच्चा बहुतो लोककेँ भ’ जाइत छैक, ई सभ तँ भगवानक हाथमे छनि।” ओ बहुत समझएबाक प्रयास कएलक, मुदा रजनीक घरवला किछुओ नहि मानलकैक। सुलूक पालना आब नानाक घरमे झूलय लागलैक आ रजनी अपन बेटीक संग अपन समय बिताबए लगलीह। पाखलो एहि बीच प्रायः भोरे-भोर काज पर निकलि जाइत छल आ रातिएक पहर काजसँ घुरैत रहए। रजनीकेँ ओकर घरवला घरसँ निकालि देने छैक आ आब ओ अपन बापेक संग रहि रहल छलीह, ई गप्प ओकरा पता नहि रहैक। सभ किओ पाखलोकेँ एकटा अलगे दृष्टिसँ देखए लागल छल, मुदा लोक सभक ई दृष्टि पाखलोकेँ आने समय जकाँ बुझा रहल छलैक। पाखलो दूपहरकेँ होटल जाइत छल। होटलमे आर पाँच-छओ लोक बैसल रहैक आ गप्प क’ रहल छलैक। फेर ओकरा सभक हँसबाक आबाज एलैक। पाखलोकेँ भीतर घुसतहि आबाज बन्न भ’ गेलैक। बादमे ओ सभ पाखलोकेँ देखि फुसफुसा कए बाजब सुरह केलक। “हमरामे कोनो परिवर्तन भेल अछि की?” एहन प्रश्न पाखलोक दिमागमे एलैक। ओ अपन सौंसे देहकेँ निहारलक। ओहिमे कोनहुँ परिवर्तन नहि भेल छलैक। पैट-सर्ट जतए छलैक ओतहि तँ रहैक! आ दाढ़ी तँ ओ काल्हिए नौआसँ कटौने छल। एहना स्थितिमे हम हिनका सभकेँ कौआ कोना नजरि आबि रहल छी। पाखलोक मोन मे ई उधेड़बुन होमए लागलैक। रजनी गाम आएल छलीह, ई गप्प पाखलोकेँ बीस दिनक बाद पता लागि सकलैक। ओ दोसरहिं दिन भोरे-भोर उठिकए सोनू मामाक घर दिस चलि देलक। बियाहक बाद ओ रजनीसँ भेंट नहि केने छल। बीचमे ओ रजनीसँ भेंट करबाक लेल दू-तीन बेर सोनू मामाक घर गेलो रहैक, मुदा रजनीसँ भेंट नहि भ’  सकलैक। मुदा आइ ओकरा रजनीसँ निश्चिते भेंट हेतैक, ई जानि ओ जल्दी-जल्दी मामाक ओहिठाम पहुँचि गेल। दरबाजासँ भीतर जाइकाल ओकर माथ चौखटिसँ टकरा गेलैक, जकर आबाज सुनि रजनी बहरएलीह। देखलनि तँ पाखलो आएल छलाह। पाखलोकेँ देखि रजनी बहुत खुश भेलीह। “अहाँक माथमे चोट लागि गेल अछि ने!” रजनी पाखलो सँ पूछलक। “हँ! मुदा भेल किछु नहि।” “किछु नहि भेल! चलू देखए दिअ।” रजनी देखलनि, हुनका माथ पर एकटा टेटर भ’ गेल छलनि। रजनी ओकरा दबाबए लागलीह। “ओह! हमरा किछु नहि भेल अछि, आ ने दरदे क’ रहल अछि।” एतबा कहैत पाखलो अपन माथसँ ओकर हाथ हटा देलकैक। रजनी सुलूकेँ बाहर ल’ अएलीह का बजलीह, “देखू दाय! मामा आएल छथि।” पाखलोकेँ देखि सुलू हँसि पड़लीह। सुन्नरि सुलूकेँ देखि पाखलो रजनीसँ कहलकैक,  “रजनी, सुलूकेँ कारी काजर लगा देल करिऔक, नहि तँ एकरा ककरो नजरि लागि जाएत।” एतबा कहि पाखलो हँसय लागल। ताबत घरसँ निकलल सोनू मामा सेहो आबि गेलाह। सोफो (कुर्सीनुमा बैसकी) पर बैसल पाखलोकेँ देखि ओ ठाढ़े रहलाह आ दरबज्जा दिस आँगुरक इशारा करैत बजलाह, “निकल जाउ एतएसँ। आजुक बाद फेर कहियो हमरा ओतए नहि आएब।” पाखलोकेँ किछुओ बुझ’ मे नहि एलैक। ओ अवाक भ’ ओतहि ठाढ रहल आ सोनू मामाक दिस ताकतहि रहि गेल। सोनू मामा पुनः गोस्सासँ बाजए लगलाह, “अहीँक कारणेँ ई सभ भेल छैक। जँ अहाँ एतए नहि रहितहुँ तँ एतेक सभकिछु नहि होइतैक। अहींक कारणेँ रजनीक घरवला ओकरा घरसँ निकालि देने छैक। अहाँ एतए कहिओ नहि आबि सकैत छी।” पाखलो अवाक भए देखतहि रहि गेल। “रजनीक घरवला रजनी पर आरोप लगौने छैक जे एकर बेटी अहींक जनमल छी। अहीँक कारणेँ ई सभ भेल छैक, ई खबरि अहाँ नहि सुनने छी की? एतए अएबामे अहाँकेँ कनेको शर्म नहि भेल? दोसरक बेइज्जती कराब’ एतए आएल छी?” रजनी बीचहिमे टोकलक,  “एहिमे हिनकर कोनो दोष नहि छनि, अहाँ अनेर हिनका पर शंका क’ रहल छी।” रजनीक ई कहब सोनू मामा नहि सुनलथि। ओ बाजतहि जा रहल छलाह.... “अहीँक कारणेँ रजनीक भाग फूटि गेलैक। जँ अहाँ एतए आएब तँ लोकबेद एहि आरोपकेँ साँच मानि लेत, एहिलेल अहाँ एतए कहियो नहि आएल करु। पाखलोएक जाति हमर नाक कटौने अछि, ओकरे खून थिकहुँ अहाँ। पाखलोक वंशज छी अहाँ। अहीँ हमर बर्बादीक कारण थिकहुँ।” पाखलोक पयर थरथरबए लागलैक। ओकरा किछुओ समझमे नहि आबि रहल छलैक, मुदा धीरे-धीरे सभ किछु समझमे आबि गेलैक। ओकर बेटी फिरंगी-सन लागैत छलीह एहिलेल ओकर घरवला ओकरा पर ई  आरोप लगौने छल। पाखलो एहि संबंधमे किछु बाजए वला रहथि मुदा सोनू मामा ओकरा निकलि जएबाक लेल कहने रहथि एहिलेल ओ बाहर आबि गेल रहए। ओकरा माथमे चक्कर  भ’ रहल छलैक आ बुझाइत रहैक जेना ओ फाटि जेतैक। ओकरा दिमागमे सोनू मामा शब्द कोनो मड़िया जकाँ चोट क’ रहल छलैक। “.....रजनीक घरवला घरसँ बाहर क’ देलकैक.....रजनीकेँ अहीँसँ बेटी भेल छैक...... पाखलोएक जाति हमर नाक कटौने अछि..... पाखलोक वंशज छी अहाँ......अहाँ एतएसँ चलि जाउ।” · “बारह चौबीस ट्रकक दुर्घटना भ’ गेलैक!” “केकर? ट्रक ड्राइवर के छलैक?” “पाखलो!” एकटा खलासी नीचा आबि लोक सभकेँ ई खबरि देलकैक। सभ किओ उपर दिस दौड़ल। किछु गोटए ट्रकसँ गेल तँ किछु ओहिना दौड़ि पड़ल। रस्ता नदीक कछेर होइत एकटा घाटीक बीचसँ जाइत रहैक। रस्ताक एक दिस घाटी रहैक आ दोसर दिस खदहा! उपरका रस्तासँ जाइवला एकटा ट्रक नीचा खदहामे गिर गेल छलैक। ट्रकक परखच्ची उड़ि गेल रहैक जाहिमे पाखलो मारल गेल। एहन सभकेँ बुझाइत छलैक। किछु लोक नीचा गेल। देखलनि तँ क्षतिग्रस्त ट्रकक बगलमे पाखलो पड़ल छल। ओकरा देहक कपड़ा फाटि गेल रहैक आ सौंसे देह  नोचा गेल रहैक। पाखलो अपन क्षतिग्रस्त ट्रककेँ देखलक। ट्रकक अगिला शीशा टूटि गेल रहैक। लोहाक चदरा पूर्ण रूपसँ ट्रकसँ पिचकि गेल रहैक। ओकरा देखि पाखलोक आँखिमे नोर आबि गेलैक। पाखलो उठल। ट्रकक सामने गेल आ ओहि पर अपन हाथ फेरलक। आब ओहि ट्रक पर भगवानक कोनहुँ फोटो नहि रहैक, मुदा ट्रकमे लगाओल गेल चाननक माला एखनहुँ धरि रहैक जे कि पाखलो लगौने रहैक। पाखलो जखन ठाढ भ’ रहल छल तखन ओकरा कानमे बहुत रास प्रश्न सभ उठए लागलैक। दुर्घटना कोना भेलैक? हम बाँचि कोना गेलहुँ? एहि तरहक कतेको प्रश्नमे ओ उलझि-सन गेल। पाखलो नीचेसँ रस्ताक एक दिस झाड़ी दिस आँगुर देखौलक। ओकरा कमीजक एकटा बड़का टा टुकड़ी ओहि झाड़ीक बीच लटकल रहैक। दुर्घटनाक समय ट्रकक दरबज्जा अचानक खुजलैक आ ओ बाहर गिर गेल छल। ओतएसँ ओ सीधा झाड़ी पर गिर अटकि गेल, जाहिसँ ओकर कमीज फाटि गेलैक आ देह नोचा गेलैक। ओतएसँ ओ धीरे-धीरे नीचा गिरल, जखन कि ओकर साथी ट्रक गँहीरगर खदहामे गिर गेलैक। एतेक पैघ ट्रक आटाक लोइया बनि गेल रहैक आ एकटा हाड़-मांसक लोक बचि गेलैक। “पाखलोक भाग नीक रहैत तैँ ओ बचि गेल।” लोक सभ एहने कहैत रहैक। कारण ताकला उत्तर जखन लोककेँ जबाब नहि भेटैत छैक तँ ओ ओकरा अपन भाग पर छोड़ि दैत छैक। पाखलो केँ डागदरक ओहिठामसँ एलाक बाद कम्पनीक प्रबन्धक दुर्घटनाक जाँच करब सुरह केलक। प्रबन्धक ओकरासँ बहुत रास प्रश्न केलकैक, मुदा ओ एकोटा प्रश्नक जबाब नहि देलकैक। ओकरा दिमागमे दुर्घटनाक विषयमे किछुओ नहि रहैक। आइ भोरे जे किछु भेल छलैक, ओकरा दिमागमे बेर-बेर वैह प्रश्न आबि रहल छलैक। असलमे वैह प्रसंग दुर्घटनाक कारण छलैक। ओ भोरे सोनू मामाक ओहिठामसँ आएल आ ओहि तनावमे ट्रक पर चढि गेल। ट्रक चलबैत काल वैह घटना ओकरा दिमागमे चलि रहल छलैक। रजनीक संग भाय-बहिनक संबंध रहितो ओकरा पर ई आरोप लागल छलैक। सोनू मामा ओकरा कहने रहथि, “एतएसँ निकलि जाउ, आ कहिओ नहि आएब!”  “चलि जाउ” ई कहि ओकरा निकालि देल गेल छलैक। तखन सोनू मामाक रिश्तामे ओ किओ नै रहैक? पाखलो सोचि रहल छल। वैह विचार ओकरा दिमागमे टीस मारि रहल छलैक आ ओ अचेतन अवस्थामे चलि गेल छलैक। ठीक ओहि काल अगिला मोड़ पर ट्रकक दुर्घटना भ’ गेल रहैक। एखन धरि वैह विचार, वैह प्रश्न ओकरा दिमागकेँ झकझोरि रहल छलैक। कम्पनीक प्रबंधक द्वारा पूछल गेल सवालक जबाब हम नहि द’ रहल छलिऐक एहिलेल ओ गोस्सा भ’ गेल आ ओहि गोस्सा मे ओ हमरा गाल पर फटाफट दू-तीन थापड़ मारि बैसल। पाखलोक गाल पर थापड़क निशान भ’ गेलैक। ओ अपन गालकेँ हँसोतए लागल। तथापि ओकरा सौंसे देहमे भ’ रहल दर्द ओकरा ओतेक कष्ट नहि द’ रहल छलैक, मुदा भोरक घटनासँ जे ओकरा करेजमे घाव भेल रहैक ओ एखन धरि हरियर रहैक। · सात-आठ महीनासँ पाखलोक व्यवहार देखि लोककेँ बुझाइक जे पाखलो पागल भ’ गेल छैक। ओकर केश, दाढ़ी आ मोंछ बढि गेल छलैक आ ओहि दाढीमे ओकर मुँह नुका गेल रहैक। ओकर माथ तँ झलकैते नहि रहैक। गाल पिचकि गेल रहैक आ आँखि धँसि गेल रहैक। देख’मे ओ बहुत विचित्र लागि रहल छलैक। जँ कोनो अनजान लोक ओकरा देखि लैक तँ डरि जाइक। जाहि दिन ट्रकक दुर्घटना भेल छलैक ओहि दिन पाखलो जंगल चलि गेल रहैक। ओ ओत्तहि चारि-पाँच दिन बितौलक आ बादमे गाम घुरल। ओहि दिनसँ ओ गाममे अजीबोगरीब तरहेँ बाजए लागल आ संगहि अपन हाथ सेहो हिलबैत रहैत छल। बीच-बीच मे अपन आँखिकेँ सेहो विचित्र रूपसँ छोट-पैघ करैत रहैत छल। ओ दिनभरि घूमतहि रहैत छल। जंगल, भाट, मळार, दोउड़े आदि ठाम घूमतहि रहैत छल आ कतहुँ बैसि जाइत छल। नारियर, कटहर, आमक गाछ सब पर चढैत रहैत छल आ कतहुँ दूर अपन नजरि गड़ौने रहैत छल। लोक सभक कहब रहैक जे, “ओ बहुत डरि गेल छैक।” ओकरा कार्या केर देवचार (एकटा आत्मा) गड़ैस नेने छैक। लगातार काजसँ अनुपस्थित रहबाक कारणेँ कम्पनी ओकरा नोकरीसँ निकालि देने रहैक। यद्यपि ओकर जतेको हिसाब निकलैत रहैक से कम्पनी ओकरा द’ देने रहैक। ओ पाइ पाखलो ओहि दिन गामक बूढ़-बुजुर्ग आ नेना लोकनिमे बाँटि देने छल। दोसर दिन धरि ओकरा लग खएबा धरिक पाइ नहि रहलैक। ओ अपन पैन्टक जेबी उनटौलक आ ओहि स्थितिमे गाममे घूमए लागल। ओ मात्र घूमतहि रहैत छल। घूमैत काल ओकरा दिन-रातिक कोनो परवाहि नहि रहैत छलैक। एतेक धरि जे ओ रौद आ बरखामे सेहो घूमिते रहैत छल। ओकरा घूमबाक कोनहुँ सीमा नहि रहैक। ओकर किछु मीत लोकनि ओकरा कहियो काल चाह-पानि द’ दैत रहैक। कहियो काल खोआ-पीआ सेहो दैत रहैक, नहि तँ ओ भूखले रहैत छल। एहि सभक बाबजूद ओकर घूमब-फिरब बन्न नहि भेल रहैक। ओ कखनो केगदी भाटमे देखाइक तँ कखनहुँ खेतक बान्ह पर। ओ कहिओ ककरो भाटसँ नारियरकेँ हाथ धरि नहि लगौलक। ककरो कोनहुँ कष्ट नहि देलक, एकरा सभक बाबजूद लोक ओकरासँ डरए लागल छल। एतए धरि जे छोट-छोट नेनासभकेँ ओकर माय, पाखलोक नाम ल’ कए डराब’ लागल छलैक। ओहि दिन बरखा भ’ रहल छलैक। पाखलो सोनू मामाक घर लगक पीपरक गाछक नीचा ठाढ़ छल। ओकरा देखि रजनी दौड़कए ओकरा लगीच गेलीह ओकरा अपना घर बजा अनलीह। “सुलू दाई! एतए आउ, देखू अहाँक मामा आएल छथि।” रजनीक एतबा कहितहि सुलू घरसँ दौड़लि अएलीह, मुदा पाखलोकेँ देखतहिँ डरि गेलीह। “ई अहाँक मामा छथि! हुनका लग जाउ!” रजनी सुलूकेँ कहलथि। तखन पाखलोक बजएला पर सुलू ओकरा लग गेलीह। पाखलो ओकरा गोदी मे उठौलक आ फेर नीचा राखि देलकैक। सुलू हँसलीह। पाखलो सेहो हँसए लागल। दुनूक हँसी देखि रजनीकेँ नीक लागललैक। पाखलो अपन फटलका पैन्टक जेबीमे किछु ताकबाक प्रयास केलक मुदा ओकरा किछुओ नहि भेटलैक। तखन ओ अपन दोसर पैन्टक जेबीमे हाथ देलक आ ओहिसँ दू टा आमला निकालि सुलूक हाथ पर राखि देलक। बादमे ओ सुलूक माथ पर अपन हाथ फेरलक, ओकरा गाल पर चुम्मा लेलक आ दुलार-मलार करए लागल। “विठू!  अहाँ एहि तरहक पगलपन नहि करल करू, एहि तरहेँ पगलपन कए अहाँ अपन की हालति बना नेने छी से कहिओ देखने छी? अहाँक गाल पिचकि गेल अछि आ आँखि धँसि गेल अछि।” एतबा कहैत रजनीक आँखिमे नोर आबि गेलैक। ई देखि पाखलोक मोन सेहो पसीज गेलैक आ ओ बाजल— “अहाँ कानि किएक रहल छी?” “नहि तँ! हम कानि कहाँ रहल छी? ओहो! एखन धरि अहाँ ठाढे छी? आउ बेंच पर बैसू, हम भीतर जा रहल छी, पहिने अहाँकेँ किछु खुआएब तखन हमसभ गप्प-सप्प करब।” रजनी भोजन परसय भीतर चलि गेलीह। पाखलो सुलूकेँ दुलार करए लागल। रजनी पाखलोक लेल भोजन परसि बाहर आबि कहलीह, “चलू भोजन लागि गेल अछि।” एतबा कहि ओ ओकर हाथ धुआब’ लगलीह। एतबहिमे दरबज्जा पर किनको छाँही देखा पड़लैक। दरबज्जाक बाहर सोनू मामा अपन पयरक जूता निकालि रहल छलाह। सोनू मामाकेँ देखि पाखलो घरसँ भागल आ बहुत दूर धरि भागितहिँ रहल! सोनू मामा, रजनी आ सुलू ओकरा देखितहि रहि गेल। · पाखलो आब गाममे छोट-पैघक लेल हँसीक पात्र बनि गेल छल। नेना सभक संग आब पैघ लोक सभ सेहो पाखलोक मजाक उड़ाबए लागल छल। नेना सभतँ ओकरा पाछूए लागि जाइत छलैक। ओकरा पर पाथर फेकैक, ओकरा ‘पागल पाखलो’ कहि कुढाबैक। जखन पाखलोकेँ बहुत गोस्सा आबि जाइक तँ ओ नेना सभ दिस आँखि तरेर कए देखैक जाहिसँ नेना सभ डरि कए भागि जाइक। पाखलो कलमाक चबूतरा पर बैसल छल। तखनहि नेना सभक एकटा दल  आबि धमकलै। सभटा नेना ओकरा लग जमा भ’ गेल आ ‘पागल पाखलो’, ‘पागल पाखलो’ कहि ओकरा कबदाब’ लागल। एतबहिमे ओ अपन माथ नोचब सुरह क’ देलक आ फेर जोर-जोरसँ हँसैत बाजए लागल— “हम पागल पाखलो! हा, हा, हा, हा........ हम पाखलो नहि छी! हम पागल छी! पागल! हा, हा, हा, हा........।” “अहाँ पागलो छी ओ पाखलो सेहो छी।” नेना सभ बाजए लागल। एकटा नेनातँ ओकरा पर पाथर फेकि देलकैक आ पछाति जा कए सभटा नेना सभ हल्ला-गुल्ला करए लागल। “अहाँ पागल पाखलो, पाखलो, पाखलो।” पाखलो ओकरा सभक दिस आँखि तरेर कए देखलक आ “हम पाखलो नहि, हम पाखलो नहि” कहैत अपन माथ ओहिठाम चबूतरा पर पटकए लागल किछुए क्षणक बाद ओ बेहोश भए ओतए गिल पड़ल। तकर बाद ओतए जमा भेल नेना सभकेँ किओ भगा देलकैक। दोसर दिनसँ पाखलो रस्ता पर रौदे मे रहए लागल। अपन गोर देह, गुलाबी केशमे कारिख पोतए लागल। अपन कारी देहकेँ देखि ओ हँसए लागल आ रस्तासँ आबए-जाएबलाकेँ कहए लागल—“देखू! हमहूँ अहीँ सन बनि गेलहुँ ने?” अपना आपकेँ कारी करबाक लेल भरि-भरि दिन रौदमे ठाढ़ रहए लागल। कारिख लगा कए कारी कएल गेल ओकर देह किछुए दिनमे बेरंग भ’ गेलैक ओ फेर पहिने-सन देखाबए लागल। ओ अपन सभटा गुलाबी केश काटि लेलक आ पूरा टकला भ’ गेल। मोंछ आ दाढीक संग ओ अपन आँखिक पिपनी सेहो काटि लेलक। ओकर जतेको गुलाबी केश छलैक ओ सभटा काटि लेलक जकरा कारणेँ ओ आओरो बदरंग लागए लागल। ओहि दिन साँझकेँ ओ एकटा आमक गाछक नीचा जतेको सूखलका पात छलैक से सभटा जमा केलक आ ओहिमे आगि लगा देलक। “हमर गोर चाम जरि जेबाक चाही आ हमरा कारी भ’ जेबाक चाही।” एतबा सोचि ओ अपन फाटल कपड़ा सहित आगिमे ठाढ भ’ गेल। ओकरा कपड़ामे आगि लागि गेलैक। ओहि समय किओ आबि ओकरा आगिसँ बाहर धकेल देलकैक आ आगि मिझा देलकैक। ओहि आगिमे पाखलोक देहक किछु रोइयाँ झुलसि गेलैक। हाथ-पएर आ मूँहक चाम जरि गेलैक। देहमे फोका निकलि गेलैक आ सौंसे देह लाल भ’ गेलैक। अस्पतालमे जतए ओकरा राखल गेल रहैक, ओतए ओ दू दिन बितौलक। जहिना ओकर मोन कने नीक भेलैक ओहिना ओ दोसरहिं दिन अस्पतालक ड्रेसमे भागि गेल आ गाम आबि गेल। गामक लोककेँ अस्पतालक ड्रेसमे पाखलोक पागलपनक एकटा नव रूप देखबामे एलैक। ओ पहिनहि जकाँ गाममे एमहर-ओमहर घूमए लागल। पातोले जंगलमे किछु स्त्रीगण आ किछु युवती सभ लकड़ी बीछैत छलीह। ओकरा सभकेँ देखि पाखलो ओतए गेल। ओहिमे शामा सेहो छलीह। ओकरा देखि ओ शोर पारलक आ ओकरा लग गेल। शामा डरि गेलीह आ पाछू हटए लगलीह। पाखलो ओकरा रूकबाक लेल कहलकैक मुदा ओ रूकलीह नहि भागए लगलीह। “ठहरू, ठहरू!” कहैत पाखलो ओकरा पाछू दौड़ए लागल। दौड़ैत-दौड़ैत ओ रूकल। जोरसँ चिकरैत शामा गामक दिस भागलीह। “पागल पाखलो युवती सभक पाछू पड़ल छैक।” ई गप्प सौंसे शहरमे पसरि गेल। · नओ तेसर दिन धरि हम ओहि घटनाक संबंधमे सोचि रहल छलहुँ। हम की केलहुँ? किएक केलहुँ? हमरा किछुओ नहि बुझ’ मे आबि रहल छल। हम शामकेँ देखि ओकरा लग गेल छलहुँ। ओकरा आबाज लगेलहुँ। ठहरू! एहिमे हमरा किछु बेसी खराप नहि देखा रहल छल, मुदा आब यैह गप्प हमरा सालि रहल छल। हम किएक ओकरा रूकए कहलिऐक आ ओकरा पाछू किएक दौड़लिऐक? एहि तरहक प्रश्न हमरा दिमागमे बेरि-बेरि घूमि रहल छल। मुदा हँ...ओहि दिन खूब मोन लागल रहए। ओहि दिन शामाक ओतए जाएब व्यर्थ भ’ गेल रहनि। ओ हमरासँ बियाह करबाक लेल तैयार नहि छलीह आ हमरा पाखलो कहैत छलीह, ओहि मुँहेँ हम हुनका चिकरबाक लेल बाध्य केलहुँ! हमरा पागल कहैत छलीह ने! शी! शी! ई सब ठीक नहि। ओहि दिन ओकरा पयरमे काँट गरि गेल हेतैक! हम ई नीक नहि केलहुँ। रजनीक घरवला रजनीकेँ फेर अपना घर ल’ गेल छलाह। ऐहन लोक सभ बजैत छलाह। हमहूँ एहने किछु सुनने रही। ई गप्प साँच छैक की? यैह जानबाक लेल आ रजनीक संबंधमे पूछबाक लेल हम शामाकेँ रूकबाक लेल कहने रहिऐक। शामा हमर जान-पहिचानक छलीह, मुदा हमरा द्वारा ठहरू! ठहरू! कहबाक माने ओ किछु आर निकालि लेलथि की? आकि हम ओहिना हुनका रूकए कहलियनि? हमरा कोना जवाब नहि भेटि रहल छल। गोवा जखन स्वतंत्र भेल रहैक ओहि समय पाखलो लोकनि जंगलमे यत्र-तत्र नुका गेल रहए। भूखक कारणेँ ओ सभ जहर वला फल खा-खा कए मरि गेल छल। हमहूँ ओहिना मरब की? ई सोचि हम डरि गेलहुँ। हम द्वन्द्वमे पड़ि गेलहुँ आ हमरा मोनमे डर समा गेल। गाम जएबासँ हम डरि रहल छलहुँ। गाम जएबामे हमरा लाज लागि रहल छल। पाखलो युवती सभक पाछू भागि रहल छलैक। ओहो बापे जकाँ भ’ गेलैक। लोक सभ एहने कहैत रहैक। ओ सभ हमरा मारि देताह, हमरा मारताह आ जित्ते गारि देताह। हमरा छोड़ाकए आनएबला आब ओहि गाममे किओ रहबो नहि केलैक। दादीतँ नहिए रहलाह आ गोविन्द तँ गामे नहि अबैत छलाह। ओ तँ गामक लेल बाहरी लोक भ’ कए रहि गेलाह अछि, आ हम, एकटा एसगर पाखलो। गाम गेलहुँ तँ गामक नेना सभ हमरा पाखलो, पाखलो, पागल पाखलो कहि कए कढ़ौताह। सभ किओ हमरा पाखलोएक नजरिसँ देखैत रहए। हम ओकरा सभ जकाँ देखबाक लेल की नहि केलहुँ। कारी हेबाक लेल रौदमे ठाढ रहलहुँ आ गुलाबी दाढ़ी-मोंछ काटि लेलहुँ। अंतमे फोका हेबा धरि, घाव हेबा धरि हम अपन देह जरबैत रहलहुँ। देहक चाम जरि गेल आ घावसँ खून बहि गेल। वासनाक कारणेँ जनम लेबएवला पाखलेपन तँ आब हमरा देहसँ चलिओ गेल हैत। कंकाल पर ठाढ भेल एहि देहकेँ ई धरती सम्हारि नेने अछि। हमर पहिलुक रूप बदलि गेल अछि। सौंसे देह कारी भ’ गेल अछि। लोकक रुप रंग आ हमर रूप रंगमे आब कोनो फरक नहि रहि गेल अछि। हम एत्तहि जनमलहुँ, पैघ भेलहुँ आ हिनके सभक बीच रहलहुँ। हम एतुके लोक सभमे सँ एक छी। एहि माटिक संस्कारमे पललहुँ, बढ़लहुँ, तखन हम पाखलो कोना? हमर माय हमर नाम ‘विठू’ रखने छलीह! ओ हमरा विठूए कहि बजबैत छलीह। हमर नाम विठू थिक। एहि नामसँ किनकहुँ तँ बजएबाक चाही ने? आ जँ हमरा किओ विठू कहि नहि बजबैत अछि तँ की हम विठू नहि भेलहुँ? हम विठू छी! हम विठूए छी! रजनीक शोर पारब हम एखन सुनि रहल छलहुँ। हमर कान, मोन आ हमर सौंसे संवेदनाकें हम विठू छी, ई बूझ’ मे आबि रहल छल। जंगलक रस्ता पार करैत हम पहाड़ी पर चढ़ि गेलहुँ। ओहि पहाड़ीसँ नीचाँ रजनीक सासुर देखाइत रहैक। हम जखन पहाड़ीसँ नीचाँ उतरि रहल छलहुँ तखने हमरा स्मरण आएल। रजनीक घरवला ओकरा पर आरोप लगा ओकरा घरसँ बाहर निकालि देने रहैक आ एक बरखक बाद घर ल’ गेल रहैक। एखन जँ हम रजनीसँ भेंट केलहुँ तँ ओकर घरवला फेर ओकरा घरसँ निकालि देतैक। हमरा एहन लागल आ संगहि एकटा झटका सेहो। हम ओतहि ठाढ़ रहलहुँ। हमर एक मोन कहैत छल, जे हम ओतए गेलहुँ तँ नीक नहि हैत, आ दोसर मोन हमरा आगू दिस घीचि रहल छल। रजनीक घरवला ओकरा घर ल’ जा कए नीक केने रहए। हमरा ऊपर लगाओल गेल दोषारोपण आब नहि रहल। लोकक नजरिमे आब हम पाक-साफ छलहुँ। ओहो! नीके भेलैक। हमरा दिमागसँ द्वन्द्व हटि गेल। तनाव चलि गेल। आब हमरा आजादी महसूस भ’ रहल छल। आब हम रजनी आ सुलूसँ भेंट करब। रजनी हमरा भाय मानैत छथि आ हम ओकरा बहिन। ई गप्प हम ओकरा घरवलासँ कहबैक। बादमे हम निर्णय लेलहुँ आ पहाड़ी दए नीचाँ उतरए लागलहुँ। हम पहाड़ीसँ उतरि हाली-हाली जा रहल छलहुँ। ओतए कुळवाड्याक चरवाह नेना सभ हमरा देखलक। “यैह देखू पाखलो! यैह देखू पाखलो! पाखल्या!” ओकरा सभक ई शोर सुनि हम डरि गेलहुँ आ काँपए लागलहुँ ओ पहाड़ीक ढलानसँ दौड़ए लागलहुँ। पाखलो, पाखलो, एहि तरह आबाज पाछूसँ आबि रहल छल। हम दौड़ैत-दौड़ैत पहाड़क सुनसान घाटीमे पहुँचि गेलहुँ। साँझुक पहर ओहि घाटीक समूचा क्षेत्र बड्ड मनोरम बुझाइत रहैक। मुदा हम ओहि दिस बेसी ध्यान नहि देलहुँ। घाटी पार कए हम कारपें गामक सीमान पर पहुँचलहुँ। सीमानक लग एकटा बड़का टा झील रहैक आ ओहि झील लग एकटा पोखरि सेहो रहैक। रस्ता चलैत काल ओहि पोखरिमे किछु गिरबाक आबाज एलैक। हम पोखरिक लग गेलहुँ। एक ठाम पानिमे घुरमी होइत रहैक आ पानिक बुलबुला आबि रहल छलैक। चरवाह आकि आन किओ ओहि पोखरिमे किछु फेंकने हेतैक यैह मानि हम आगू-पाछू देखए लागलहुँ, मुदा ओतए किओ नहि छल। हम पोखरि कातसँ कुसरीक फूलक एकटा कोंढी तोड़लहुँ आ रजनीक घर दिस ओकरासँ भेंट करबाक लेल हाली-हाली चलए लागलहुँ। मुनहारि साँझकेँ हम रजनीक गाममे पयर राखलहुँ। ओतुका लोक सभ घरसँ बाहर आबि हमरा देखए लागल। हम रजनीक घर लग पहुँचि गेलहुँ। ओतए देहरीएसँ आबाज देलिऐक मुदा घरसँ कोनो उत्तर नहि आएल। हम ओतएसँ बहरएलहुँ, देखलहुँ घरसँ बाहर सुलू कानि रहल छलीह। हम ओकरा आबाज लगेलिऐक आ गोदीमे उठा लेलिऐक। ओ हिचुकी-हिचुकी कानि रहल छलीह। हम ओकरा चुप करबाक प्रयास केलहुँ। अपन हाथक कसरीक फूलक कोंढ़ी ओकरा हाथमे द’ देलिऐक। हम ओकरासँ पूछलिऐक—“माए कतए गेल छथि?” “हम नहि जनैत छी।” “हुनका बहुत मारने छथि।” “के, कखन?” “बाबा।” सुलूक कहब सुनि हमरा कने अजगुत-सन लागल। राति भ’ गेल रहैक। पड़ोसक दू-तीन गोटे हमरा लग अएलाह। पहिने तँ ओ लोकनि हमरासँ पूछताछ केलनि आ फेर रजनीक खबरि देलनि। “जाहि दिनसँ रजनीक घरवला ओकरा बापक ओहिठामसँ आनने छल, ओहि दिनसँ शराब पीबि-पीबि कए ओकरा मारए-पीटए लागल छल। तकरा बाद तँ नित राति ओकर घरवला रजनीसँ झगड़ा करैक आ मारैक। दू दिन पहिनहि ओ ओकरा घरसँ निकालि देने रहैक आ ताहि दिनसँ ओ घरक बाहरे देहरी पर रहि रहल छलीह।” सुलू हमरा गोदिएमे सूति गेल छलीह। बहुत राति भ’ गेल रहैक आ रजनी एखन धरि आपस नहि आएल छलीह। · रजनी पोखरिमे कूदि अपन जान द’ देने छथि, ई गप्प जँ हमरा रस्तासँ अबैत काल पता लागि जएतै तँ हम निश्चये हुनका बचा लेतिऐक। किओ पोखरिमे पाथर फेकने हेतैक एहिलेल पानिमे बुलबुला आबि रहल छलैक, हम यैह बुझने छलहुँ। ओहि समय ओहि पोखरिमे एहन हृदयविदारक मृत्यु नुकाएल रहैक, ई हमरा पता नहि छल। रजनीक घरवला ओकरा कांदोळे गामसँ आपस अनने रहैक, मुदा किछुए दिनक पश्चात् ओ फेर ओकरा पर वैह आरोप लगौने रहैक। रजनीकेँ मारए-पीटए लागल छलैक आ एकदिन ओकरा दागि देने रहैक। ओ ओकरा जीबैतै मारि देब’ चाहैत रहैक। ओहिदिन, “पाखलो युवती सभक पाछू लागल छैक।” हमरा संबंधमे ओकरा ई खबरि भेटल रहैक। ओहि दिनसँ ओ रजनीकेँ देहरीक बाहरे राखए लागल रहैक। रजनी तंग आबि गेल छलीह आ ओहि समय ओ सोहावतीक श्रृंगार केलक आ आत्महत्या करए चलि गेलीह। ओहि पोखरिसँ हम जे कुसरीक फूल निकालने छलहुँ से वास्तवमे ओ कुसरीक फूलक कोढ़ी नहि अपितु रजनीक खोपामे लगाओल गेल घरक बगैचा में फूलल मोगराक कली रहैक! यादक लेल सफेद, सुगन्धित! दस रजनीक याद में हमरा आँखिमे नोर आबि गेल छल आ हम ओहि समय वैह पोछि रहल छलहुँ, एहि सभ यादसँ हमरा मोनमे ओ सभ चित्र उभरि कए आबि रहल छल। हम पाखलो, एहि माटिक संस्कारमे पलल-बढ़ल विठू छलहुँ। एहि माटिक सबूत छलहुँ। बहुत कालसँ आकाशमे कारी-कारी मेघ घुमड़ि रहल रहैक। बिजलौकाक संग गरज भ’ रहल छलैक आ बरखा सेहो भेल रहैक, जकरा कारणेँ लाल माटिक सुगंध चारू दिस पसरि रहल रहैक। मिरगिसरा शुरू हेबामे एखन पन्द्रह दिन बाँकी रहैक। मिरगिसराक बरखा शुरू भेलाक पश्चात् गाममे खेती-बारीक काज आरंभ भ’ जाइत रहैक। एहि साल सोनू मामाक खेत परती रहि जेतैक, हमरा एहि बातक डर रहए। दू महीना पहिने सोनू मामाकेँ लकबा मारि देने रहैक। ओकर दहिना हाथ बेकाम भ’ गेल रहैक, जाहिसँ हाथ नहि हिला सकैत छलाह। अपन नातिनसँ मिलबाक लेल आ ओकरा देखबाक लेल ओ ओहू स्थितिमे गोविन्दक घर आएल छलाह। हुनक माथक केश उज्जर भ’ गेल रहनि आ देह बहुत कमजोर। एतए आबि ओ सुलूसँ भेंट केलनि। सुलूसँ गप्प केलनि, मुदा हमरासँ बिना गप्प केने ओ आपस चलि गेलाह। जँ ओ बरखामे भीजि के काज करताह तँ निश्चिते हुनक रोग आर बढि जेतनि आ ओहुना आब हुनकासँ कोनो काज कहाँ होइत छलनि। ओकरा एहन बुझेलैक। आ तखन ओ खेतमे हाथ बँटेबाक लेल रुक्मिणी मौंसीक माध्यमे खबरि भेजौलक। हमरा बुझाएल जे सोनू मामाक खेत परती रहि जेतैक, मुदा जाधरि हमरा देहमे जान अछि ताधरि कोनो डर नहि। भोरसँ दूपहर भ’ गेल रहैक। हम घरमे जतए बैसल रही ओतहि एकक बाद एक याद दोहरा रहल छलहुँ। आब सभटा याद खतम भ’ गेल, हमरा एहन लागल आ ओहि सून देवाल जाहिपर चिक्कनि माटिसँ ढौरल गेल रहैक ओकरा एकटक देखैत रही। हम घरक चारू दिस नजरि दौड़ेलहुँ, तखने हमरा रुक्मिणी मौंसीक ओहिठाम गेल सुलूक याद आबि गेल। आँखिक समक्ष ओकर निष्पाप, अनजान आ बहुत सुन्नर मूर्ति ठाढ भ’ गेल। ओकर लहसुनियाँ आँखिसँ सुखद भाव प्रकट भ’ रहल छलैक। तखन ओकर एतए नहि हेबाक बाबजूदो हमरा ओकरा माथ पर हाथ फेरबाक आ ओकर चुम्मा लेबाक इच्छा भेल। एतबहिमे दरबाजा खुजबाक आबाज भेल। देखलहुँ तँ सुलू घर आबि गेल छलीह। हमरा देखि ओकर खुशी दूगूणा भ’ गेलैक। ओ दौड़िकए एलीह आ जाधरि हम ओकरा गोदी लेतिऐक ताधरि ओ “मामा” कहि कए हमरा शोर पारलक आ हमरा पयरसँ लिपटि गेलीह। · अशोक मनभुटकर हर एक लोक आ माटिक कथा (‘पाखलो’)-अनुवाद शम्भु कुमार सिंह ‘पाखलो’ उपन्यासकेँ दुइए तीन बरखमे ख्याति भेटि गेल रहैक। ‘राष्ट्रमत’ द्वारा एकरा औपन्यासिक प्रतिस्पर्धामे पुरस्कार भेटलैक। कला अकादमीक पुरस्कार सेहो भेटलैक। ‘पाखलो’ उपन्यास पणजी आकाशवाणीसँ मराठी भाषामे नवोनाट्य स्वरूपमे प्रसारित भेल। एहि तरहेँ मराठी साहित्यमे सेहो पाखलो अपन उपस्थिति दर्ज करौलक। कोंकणी साहित्यमे ‘पाखलो’ अपन विशिष्ट शैलीक कारणेँ ठाढ रहल। तुकाराम शेटक ‘पाखलो’ क जड़ि आमक गाछ सदृश गोवाक माटिक गहराई धरि पहुँचि गेल। एहि माटिक सुगंध ‘पाखलो’क सौंसे जीवनमे सुरभित भ’ रहल अछि। मुदा ‘पाखलो’ सँ शालीकेँ जनमल एहि बच्चाकेँ अपनासँ दूर रखैत अछि। ओ अपना-आपसँ सेहो साक्षात्कार नहि क’ सकैत अछि। यैह तनाव, यैह व्यथा पाखलोक हृदयमे घर बना रहल अछि आ एहि व्यथासँ ‘पाखलो’ उपन्यासक जन्म भेल। कोंकणी साहित्यमे ‘पाखलो’क कथा एकटा नव आ ज्वलन्त विषय ल’ के आएल अछि। एहि उपन्यास विषय जतेक नव अछि ततबे मौलिक। पाखलोक बीजसँ गोवाक एक सामान्य स्त्रीक गर्भसँ पलिकए गोवाक माटिक संस्कारकेँ अपनएबाक लेल तड़पि रहल अछि। पाखलोक रूप, गुलाबी केश, लहसुनियाँ आँखि, लाली गोराय अछि, मुदा ओकरा पर जे संस्कार पड़ल छल ओ गोवाक माटिक, हिन्दूक, शालीक, विठूक छल। बाँकी गोवावासी जकाँ इहो पाखलो माटिएक विठू थिक, मुदा समाज एकरा पाखलोक नजरिसँ देखैत अछि। ओ शालीक विठू थिक। ओ विठूए थिक, ओकरा एहन बुझाइत छैक। मुदा समाज ओकरा विठू नहि बनए दैत छैक। लेखक श्री तुकारामक नजरिमे ई विरोधाभास देखबामे आएल। पाखलोक जीवनकेँ एक विरोध बना कए एकपक्षीय आधारक रचना कएल अछि। पाखलोक कथा घुलि-मिलि रंगीन भ’  गेल अछि। पाखलो बनि कए, विठू बनि कए...... ओहो एहि माटिक सपूत बनि जाए, एहि इच्छाकेँ पालि पाखलो पाठकक मोनमे एकटा विशिष्ट छाप छोड़ि दैत अछि। पाखलो उपन्यास पढ़ैत काल पाठक सेहो स्वयं पाखलो बनि जाइत अछि। यैह एहि उपन्यासक विशेषता थिक। उपन्यासक निवेदन दूई प्रकारसँ कएल गेल अछि—अध्याय 1,3,5,7,9 आ 10 मे पाखलो स्वयं निवेदनि करैत अछि आ 2,4.6,8मे लेखक स्वयं निवेदन करैत छथि। निवेदनक ई शैली केश जकाँ गूथल अछि, यैह एकर सौंदर्य अछि। मात्र लेखकक निवेदनक कारणेँ एहि उपन्यासक सौंदर्य नहि बढि जाइत अछि। एहि तरहक शैली आत्मनिवेदनात्मक उपन्यासक दोष, बन्हन मिटएबाक कारण बनि गेल अछि। विषयकेँ नीक जकाँ रँगि देबाक निवेदन शैलीक बहुत नीक जकाँ चित्रण भेल अछि। ई दुनू निवेदन शैली एक दोसराक पूरक थिक। तुकाराम शेट उपन्यासक सभटा प्रसंगकेँ बड़ सावधानीक संग रंगने छथि। कतहु अतिरेकक कारणेँ उपन्यासमे बाधा नहि आएल अछि। उदाहरण स्वरूप जखन शीलीक बलात्कार होइत छैक तखन यै प्रसंग लए ओ एहि तरहेँ लिखैत छथि। “ओहि अन्हार घुप्प जंगलमे ओ अजगर सरिपहुँ ओकरा अपना काबूमे क’ लेलकैक। झार-झंखार आ पात सभसँ अजीब तरहेँ आवाज आब’ लागलैक।” शालीक मृत्युक प्रसंग सेहो किछु एहिना अछि। पाखलो चिताकेँ आगि लगएबाक प्रयास करैत अछि मुदा जखन चिताकेँ आगि नहि लगैत अछि तँ दादी कहैत अछि— “बाउ! अहाँक हाथे अहाँक मायक चिताकेँ आगि नहि लागि रहल अछि? आब की उपाय?” पाखलोक दुर्दैव किछु शब्दमे लेखक एतए देखौने छथि। एकबेर पाखलो पोखरिमे नहबैत अछि, ई देखि बाबू भट “पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक! पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक!” चिकरए लागैत अछि। पाखलोकेँ घीचि कए ओकरा स्तंभसँ बान्हि ओकर हाल-बेहाल क’ दैत अछि। जखन शाली ओकरा छोड़ाब’ जाइत छथि, ओ ओकरो बान्हि कए राखैत अछि। ओकरा देखि पाखलोकेँ लगैत छैक— “हमरा देहक गरम खून दौड़ए लागल.... बादमे हमर खून ठंढा भ’ गेल आ ओ शनैः शनैः हमरा शरीरसँ निकलि रहल अछि, बुझाबए लागल......, हमरा बुझाएल जेना हमरा पूरा शरीरक सभटा खून बहि गेल हो!” पाखलोक असहायता संयमसँ खुजैत अछि। एहि सभटा प्रसंगकेँ जीवित रखबाक हेतु भाषाशैली सेहो ओतबे प्रभावी अछि। प्रसंगक लेल उपयुक्त अछि। जेना नालीसँ शांत पानि बहैत अछि तखन बहुत कोमल आबाज अबैत अछि, ओहिना एकर भाषा अछि। सुन्नरि युवतीक पयरक पैंजनीक आबाजमे हेरा जाएब-सन, जाहि तरहेँ आँखि बन्न क’ कए मात्र आबाज सुनि लैत छी ओहिना ओहि भाषाक मन्द आबाज ताकब, आ लय-तालकेँ ओ पाठक पर विजय प्राप्त करैत अछि। हृदयमे घर बना लैत अछि। एहि तरहक वाक्यमे भाषाशैली बहुत सुन्दर भ’ गेल अछि। लेखकक ई भाषा शैली प्रसंगक अनुसारेँ मोड़ लेबाक कारणेँ प्रसंगक सौंदर्य बढ़ि गेल अछि। पाखलो एहि उपन्यासक नायक अछि। एहि व्यक्तित्वक चारू दिस अन्य पात्र सभ अछि, सोनू, दादी, शाली, रजनी, आलेस, गोविन्द, सुलू ई सभटा द्वितीयक पात्र छथि। उपन्यासमे नायकक चरित्र-चित्रण बहुत नीक ढंगे कएल गेल अछि। अपन हृदयसँ निकलल व्यथा, वेदनाक सहारे ओ जीबि रहल अछि। ओकरा मेटएबाल लेल ओ संघर्ष करैत अछि। यैह पाखलोक जीवन थिक। जँ अपन व्यथामे नायक जड़ैतो रहल अछि तथापि ओ ओहि परिधिमे नहि रहैत अछि। केगदी भाटमे नारियर तोड़बाक लेल वैह आगू बढैत अछि। हिन्दू आ ईसाईक बीच भेल झगड़ाकेँ वैह सुलझबैत अछि, मुदा ओ अपन दर्द नहि बिसरि सकल। ओकरा बुझाइत छैक— “हम नहि तँ ईसाई रही, आ ने हिन्दू, एहिलेल हमरा छोड़ि देल गेल की? हमर संबंध दुनूसँ अछि, एहिलेल हमरा ओ लोकनि नहि मारलनि की?” अपन अस्तित्व ताक’वला ई पाखलो सोनू मामाक बेटीकेँ अपन बहिन बुझि सिनेह करैत अछि, मुदा ओहि सिनेहकेँ रजनीक अलावा किओ नहि बुझि सकल अछि। जाहिसँ ओकर व्यथा आओरो तीव्र भ’ जाइत अछि। पाखलोक मनोदशा देखएबाक लेल पाखलोक सही भावना व्यक्त करबाक लेल एतए लेखककेँ खूब अवसर भेटल छनि। दादी एतए समाजक एकटा विशिष्ट व्यक्ति छथि। पाखलोकेँ ई गाम नहि अपनौलक, एकरा बाबजूद दादी ओकरा अपन बेटा गोविन्दक सदृश सिनेह देलक। ओकरा नोकरी पर लगौलक। रैयत लोकनि पर भेल अत्याचारकेँ मेटएबाक लेल ओ महीना भरिक कैद काटलक। सोनू मामा सेहो पाखलोसँ सिनेह करैत छथि मुदा अपन बेटीक खातिर ओ पाखलोकेँ भगा दैत छथि। आन लोक जकाँ आ रजनीक पति जकाँ ओहो पाखलो पर आरोप लगबैत अछि। सोनू मामाक चित्रण उपन्यासमे अएलाक बाद ओकर व्यक्तित्व स्पष्ट नहि भ’ सकलैक। ओहिना शालीक व्यक्तित्व चित्रण जाहि ढंगे हेबाक चाही से नहि भ’ सकल। ओकरा तुलनामे रजनीक व्यक्तित्व नीक जकाँ उभरि कए आएल अछि। गोविन्द बुद्धिमान, होशियार, आ तत्वज्ञानी अछि, जे पाखलो स्वयं कहैत अछि—“मनुक्ख जन्मक संगहि मृत्यु सेहो अपना संगहि आनने अछि..... धरती हो, जल हो वा आकाश, सभठाम मृत्यु निश्चित अछि।” एहन तत्वज्ञानक शब्द कहएवला गोविन्द पाठकेँ नहि पचैत अछि। हमरा ई तत्वज्ञान हमर आजी देने रहथि, एहन स्पष्टीकरण जँ गोविन्दक मुँहसँ भेलो अछि तथापि नेनपनमे गोविन्द एतेक तत्वज्ञानक गप्प क’ सकैत अछि से कने अजगुत लगैत अछि, आ गोविन्द एकटा बुजुर्ग सन बुझाइत अछि। ओ तत्वज्ञानी आ बुद्धिमान होइतहुँ एकटा ईसाई युवतीसँ बियाह क’ लैत अछि, आ अपन गाम छोड़ि दैत अछि। भारतमे रहिकए पाइ नहि कमा सकैत अछि एहिलेल आलेस दुबई चलि जाइत अछि, मुदा पाखलो एहिगामक संस्कृति, माटिसँ चिपकल रहैत अछि। उपन्यासक एकटा गाम एहि उपन्यासक व्यक्तित्व भ’ गेल अछि। गोवाक माटिक विशेषता एहि गाममे देखाइत अछि। प्रकृति सौंदर्यक चित्रण बहुत नीक जकाँ दर्शाओल गेल अछि। रजनीकेँ ‘पाखलो’सन लड़की होइत छैक। गुलाबी केश, लहसुनियाँ आँखि, गोर चाम। वास्तवमे तँ ई लड़की रजनीकेँ ओकरा अपन पतिसँ होइत छैक तथापि ओ लड़की देख’ मे पाखलो-सन बुझाइत अछि एहिलेल ई पाखलोक पैदाइश छैक, ई आरोप ओकर पति ओकरा पर लगबैत छैक। रजनीकेँ पाखलोसँ लड़की हेबाक कारण ओकरा मोनमे पाखलोक प्रति शाश्वत प्रेम भ’ सकैत अछि। एहि मनोदशाक कारणेँ रजनीकेँ पाखलो सन लड़की हेबाक संभावना देख’ मे आबि रहल अछि। पाखलो गोवाक माटिक अछि। मुदा एकरा पढि मोनमे एहन शंका होइत अछि जे ‘पाखलो’क संबंध कतहु मराठी साहित्यमे चि.त्र्यं. खानोलकरक ‘चानी’ उपन्याससँ तँ नहि अछि? मुदा ‘पाखलो’क विशिष्टता ‘चानी’ मे नहि अछि। भूतकाल आ वर्तमान कालक स्पर्श एहि उपन्यासमे अछि। कथानकक परिधि पूरा करबामे दुनूक भूमिका अछि। एकटा रविक दिन सभटा पुरान स्मरण एकटा गरज आ चमकक संग खतम भ’ जाइत अछि। ओहिमे पाखलो अपन पहिचान ताक’ लगैत अछि। फेर पाखलो अपन जनमसँ लए आइधरिक कथा अपना मोनमे स्मरण करैत अछि। दूपहर भ’ जाइत अछि। सुलू पाखलोकेँ ‘मामा’ कहि ओकर पयर पकड़ि लैत अछि। कथानक केर परिधि पूरा भ’ जाइत अछि। वर्तमान कालसँ भूतकालमे जा कए ‘पाखलो’ फेर वर्तमानमे आबि जाइत अछि। उपन्यासक प्रारूप प्रशंशाक योग्य अछि। उपन्यासक हरेक अध्यायक अपन महत्व छैक। हरेक अध्यायक शुरूआत आ विशेष रूपेँ अंत कलात्मक अछि। नीचाँक उदाहरण देखू— “नहि अहाँ पाखलो थिकहुँ! पाखलो शामाकेँ किछु कहबाक लेल मुँह खोलनहि छल आकि ओ ओतएसँ चलि देलीह। पाखलोक मोन तँ बुझु जे नागफनी सँ भरल रेगिस्तानक सदृश भ’ गेलैक।” चारि “एहि गाममे हमर परिचय फकत एतबा अछि जे हमर नाम पाखलो थिक, हमर जाति पाखलो थिक, आ हमर धर्म सेहो पाखलो थिक।” अध्याय पाँच “रजनीकेँ गोर रंग पसिन्न छैक। ओकरा चन्द्रमाक एहि ज्योत्सना-सन बेटी होमक चाही…. काजर लगएलाक बाद कारी आँखि वाली ओकरहि सन सुन्नरि बेटी होमक चाही। पूर्णिमाक ज्योत्सना चारुदिस पसरल रहैक आ जेना नहरक पानि बहैत छैक तहिना ओकरा रस्तामे चन्द्रमा अपन ज्योत्सना पसारने छलैक।” “पाखलोक गाल पर थापड़क निशान भ’ गेलैक। ओ अपन गालकेँ हँसोतए लागल। तथापि ओकरा सौंसे देहमे भ’ रहल दर्द ओकरा ओतेक कष्ट नहि द’ रहल छलैक, मुदा भोरक घटनासँ जे ओकरा करेजमे घाव भेल रहैक ओ एखन धरि हरियर रहैक।” अध्याय आठ “ओहि पोखरिसँ हम जे कुसरीक फूल निकालने छलहुँ से वास्तवमे ओ कुसरीक फूलक कोढ़ी नहि अपितु रजनीक खोपामे लगाओल गेल घरक बगैचा में फूलल मोगराक कली रहैक! यादक लेल सफेद, सुगन्धित!” “ओ दौड़िकए एलीह आ जाधरि हम ओकरा गोदी लेतिऐक ताधरि ओ “मामा” कहि कए हमरा शोर पारलक आ हमरा पयरसँ लिपटि गेलीह।” दस हरेक अध्यायक एहि तरहक कलात्मक अंत छैक। हरेक अध्यायक अंतमे उपन्यासक अंत भ’ सकैत अछि। ई उपन्यास एतेक कलात्मक अछि। गोवाक संवतंत्रताक पार्श्वसँ ई कथा रंग आनैत अछि। स्वतंत्रता भेट’सँ पूर्वहि शुरू भेल ई कथा स्वतंत्रताक पश्चातो चलैत रहैत अछि। मुदा उपन्यासमे स्वतंत्रताक विषय जतेक एबाक चाही, से नहि आबि सकल अछि। मुदा एहि कारणेँ एहि उपन्यासमे बाधा आबि गेल छैक, से नहि छैक। ओहि समयक तीव्र स्वतंत्रता आन्दोलनक पदचिह्न जँ उपन्यासमे अबितैक तँ एकर पृष्ठभूमि आँखिकेँ जँचतैक। कार्मो चीफ जंगलमे शालीक बलात्कार करैत अछि, बादमे बहुत दिनक बाद, पाखलोक जन्मक बादो ओ शालीसँ भेंट करैत अछि। बिना बतौने ओकरो मोनमे शालीक प्रति सिनेह जागि जाइत छैक आ बलात्कारक तीव्रता कम भ’ जाइत छैक। कार्मो चीफक ई प्रकृति पाठककेँ उधेड़बुनमे डालि दैत छैक।......कार्मो चीफकेँ बेर-बेर शालीक ओतए देखि लोकसभ, “शालीक भड़ुआ।” कहैत छैक आ शालीक संबंधमे—“ओ पाखलो केँ अपना घरमे राखि धंधा सुरह क’ देने छैक वा अपन नव दुनियाँ बसा नेने अछि?” कहैत छैक। बलात्कारक तीव्रता कम कए लेखक पाठककेँ की कहए चाहैत छथि? ई बुझ’मे नहि अबैत अछि। पाखलोक ‘विठू’ एकबेर कहैत छैक—“ ओ एकटा पतिव्रता नारी छलीह” मुदा एकरो कोनो माने नहि निकलैत अछि। एहि तरहक किछु दोष एहि उपन्यासमे अछि, मुदा ई सूक्ष्म दृष्टिएँ देख’ बिना नजरिमे नहि अबैत अछि। पाखलो उपन्यास मात्र पाखलोक कथा नहि थिक। एकटा माटिक कथा थिक। हरेक लोकक, हरेक माटिक कथा थिक। एहन कथा इतिहास बतबैत अछि। हरेक लोककेँ इन्सानक रूपमे जीवन बितएबाक काल ओकरा अपन घर, अपन लोक, अपन समाजक आवश्यकता होइत छैक। अपन संस्कृतियोक आवश्यकता होइत छैक। जँ इ सभ ओकरा नहि भेटैत छैक आकि ओकरा एहि सभसँ दूर राखि देल जाइत छैक तखन ‘पाखलो’क उदय भ’ जाइत छैक। मोनक ई भावना, वेदना आ व्यथा मात्र गोवाक संस्कृतिमे उपजल एकटा पाखलो लोकक नहि थिक, अपितु सभ लोकक कथा थिक। केवल वातावरण ओ संदर्भ बदलि जाइत छैक। मूल भावना रहैत छैक ‘विठू’ बनि कए जीबाक। स्थान, काल आ मर्यादा एहि उपन्यासमे नहि अछि। एहिमे व्यक्त कएल गेल भावना, हरेक लोकक ज्वलंत कथा थिक, वेदना थिक। लोक सभमे सँ हरेक ‘पाखलो’ ‘विठू’ बनिकए जीबाक लेल संघर्ष करैत अछि। (कोंकण टाइम्स, दिवाली अंक, 1981 मे प्रकाशित आलेखक अंश, अशोक मनभुटकर) पद्य खण्ड जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल की भेटल आ की हेरा गेल ( आत्म गीत ) जीवनकेर   आंगनमे वसंत आयल कहियो हंसिते-हंसिते किछु कोंढी छल से फूल बनल झड़ि गेल मुदा छुबिते-छुबिते से टीस हृदयमे अछि एखनहुं किछु तप्पत-सन किछु सेरा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ बाबा छलाह खिस्सा कहइत सुनि-सुनि कऽ छल अजगुत लगइत ई झूठ छलै कि सत्ये छल रहि गेल मोन गुन-धुन करइत ओइ कृष्ण-कन्हैया केर  हाथे छल नाग कोनाकऽ नथा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल  आ की हेरा गेल । ऽ मोने अछि एखनहुँ ओ बिहाड़ि मोने अछि ओ फूही-पाथर मोने अछि ओ रौदी-दाही मोने अछि एखनहुँ भनसा-घर चुल्हा लग मायक चुप्पी पर कए बेर आँखि छल नोरा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ अंगनामे पमरिया नचइत छल सभ कबुला-पाती करइत छल ओ भोज-भात आ भार-दौर पाहुन वरियाती चलइत छल मूड़न- उपनयन- बियाहेमे छल सभक चेतना खिया गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । मोटका-मोटका पोथी पढलौं पोथी केर सभ पन्ना रटलौं छल प्रश्न कतेको सोझाँमे नहि तकर निदान कतहु देखलौं हम पौलहुँ एकदिन अपनाकेँ सय-सय बिर्रोमे घेरा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ हमरा सोझाँमे छल पर्वत हमरा सोझाँमे छल इनार हम कतऽ जाउ हम कोम्हर जाउ चहुँदिस पसरल टा छल अन्हार छल अनचिन्हार रस्ता सभटा छल पयर आगि पर धरा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ    की हेरा गेल । ऽ छल सुप्त हिमालय बरकि उठल अंतरमे धधरा धधकि उठल सय सय कोसी-कमला-गंडक कत घाव मोनमे टहकि उठल हम देखलहुं दूनू हाथ अपन मुट्ठी छल अपनहि कसा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ हम थाकि गेलहुं चलइत-चलइत हम कानि गेलहुं हंसइत-हंसइत अनवरत अभावक दुर्दिनसं हम हारि गेलहुं लडइत-लडइत नहि जानि कखन के सूतलमे कविताकेर अमृत चटा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

चलिते-चलिते भेटलाह रमण आ भेटि गेला श्री सोमदेव कोइलख विद्यापति पावनिमे भेटल आषीश मधुप किरणक सस्वर दू रचना केर पाठ छल पीठ हमर थपथपा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ कविता अयली जहिया संगमे भ’ गेल पैघ परिवार हमर यात्री, हरिमोहन, जीवकान्त शेखर, रवीन्द्र, मणिपद्म, अमर बाबू कक्का आ भैया सन छल नाम कतेको जोडा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

कविता संग हम जीबय लगलहुं बूलय लगलहुं झूलय लगलहुं जीवनकें उत्सव मानि सतत नाचय लगलहुं झूमय लगलहुं कवितासं प्रेमक बात हमर छल गाम-गाम गनगना गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

‘पारो’ पढिक’ छल कना गेल ‘खट्टर कक्का’सं हंसा गेल ‘बाबा डंडोत बच्चा जय सियाराम’ चिंतित मनकें गुदगुदा गेल ‘वस्तु’केर पिहानी ‘नानी’ पढि नहि जानि कते की सोचा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । लिखबा आ पढबा केर नशा सूनब आ सुनयबा केर नशा शब्दक सोना, हीरा, मोती देखब आ देखयबा केर नशा सदिखन आनन्दित रहबाले जीवनक अर्थ छल बुझा गेल हम सोचि रहल  छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ हम गाम-गाम घूमय लगलहुं सभठां सभ किछु देखय लगलहुं ‘नवतुरिया’कें ताकय लगलहुं ‘दुखमोचन’कें चीन्हय लगलहुं ‘मरनी’,‘बिल्टू’ केर देखि बगय छल अपन सभ दुख पडा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। कवितामे देखलहुं हिमगिरिकें कवितामे देखलहुं गंगाकें कवितामे देखलहुं अपनहि सन नहि जानि कते भिखमंगाकें छल नाम, मूल आ गोत्र सभक कवितामे सभटा बुझा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। ऽ हम आंखि खोलि चलइत रहलहुं घुमइत रहलहुं, देखइत रहलहुं पढइत रहलहुं, सुनइत रहलहुं गुनइत रहलहुं, धुनइत रहलहुं अहिनामे क्रमशः हमरहुसं ‘तोरा अंगनामे’ लिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की  भेटल आ की हेरा गेल । ऽ शशिकान्त-सुधाकान्तक जोडी हमरा शब्दहुकें पांखि देलनि उडि गेल शब्द सभ गाम-गाम, पटना, दिल्ली आ कोलकाता गुरूजन, प्रियजनक प्रशंसासं छल हमर आत्मा जुडा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। ऽ सतनारायणक कथा सुनलहुं ‘सपता-विपता’क व्यथा सुनलहुं चौरचनमे खीर आ पूरी, तं छठिमे ठकुआ-भुसबा खेलहुं दुर्गापूजामे बलिप्रदान छल प्रश्न मोनमे उठा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ चहुंदिस धधरा धधकैत छलै सभहक छाती धडकैत छलै सभ चिडै खेतमे छल कनइत सभहक खोंता उजडैत छलै

भ’ जाउ तृप्त हे अग्निदेव कनितो-कनितो छल बजा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

बच्चीकेर अएबासं पहिनहि जडि गेल घ’र जे फूसक छल छल हमर चाकरी केर चिन्ता तैपर कर्जा भरि टोलक छल

परिवर्तन केर सुख छलनि बुझू भेटबासं पहिनहि छिना गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । छल अति संघर्षक दिन घरमे ओ खटै छली, चुप रहै छली कहबा केर जे किछु रहै छलनि नोरेसं सभटा कहै छली

खगताक बाढिमे छलनि अपन गहनो-गुडिया सभ दहा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

घूमि गाम-गाम आ शहर-शहर किछु मांगि-चांगि क’ जे अनलहुं फाटल अंगा, फाटल जेबी की कत’खसल से नहि बुझलहुं

आगां तकलहुं, पाछां तकलहुं छल जांत पयरमे बन्हा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

अपनहि हाथें हम पत्र लीखि अपनहिकें कएलहुं सम्बोधन अपनहि अर्जुन,अपनहि केशव अपनहि बनि गेलहुं दुर्योधन

अपनहि अन्तरमे महाभारत अपनहि लोभें छल ठना गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

संघर्ष सत्य, थिक क्रान्ति सत्य सत्ये होइ छथि शिव आ सुन्दर जे भेटि गेल से अछि सुन्दर जे नहि भेटल से अति सुन्दर

सुन्दरतम तं थिक ओ घृत जे अछि हवन-अग्निमे ढरा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । हमरहि खातिर उनहत्तरिमे छल बैंकक राष्ट्रियकरण भेल, भेल तपस्या फलीभूत आ लागल जे नव जनम भेल

सभ रातिक होइए भोर अपन अस्तित्व पाठ ई पढ़ा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

एक दिस चाकरीक सुख-दुख छल दोसर दिस साहित्यक धारा तेसर दिस छूटल गाम-घर छल उड़ल-उड़ल मन बेचारा सपनामे छल हरियर धरती आ फूल कते नव फुला गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ओ मूल,गोत्र आ गाम हमर बाबाक धएल ओ नाम हमर ओइ माइक शीतल छाहरि केर आठो पल, आठो याम हमर

कर्तव्यक पावन धारामे क्रमशः सभ किछु छल बिला गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

पढलहुँ बच्चन आ दिनकरकें नजरूल, विमल आ शंकरकें आशापूर्णा,तसलीमा आ गुरूदेव रवीन्द्रक आखरकें

नागार्जुन आओर निराला केर खुट्टा छल मनमे गड़ा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

मिथिलाकें देखल मिथिलामे देखल मिथिला सीवानोमे पावनि-तिहार आ भोज-भात भेटल समता परिधानोमे

छल एतहु दसानन केर लंका रहिते-रहिते से बुझा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

हिमगिरि समान किछु पुरूष छला किछु भेटला गंगाजल समान दुविधामे जखन-जखन पडलहुँ हुनकहि चरित्रकें कएल ध्यान

हुनकहि सिनेह केर छाहरिमे मोनक सभ दुविधा मेटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

आतंकक छाया छल पसरल चहुँदिस अन्हारटा छल लतरल उत्पात मचौने छल दानव पीड़ा केर पर्वत छल अकड़ल सरस्वती कुहरैत छली हाथक वीणा छल छिना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। अपहरण जतय उद्योग बनल चंदाक वसूली रोग बनल मारि-पीट, दंगा-फसाद, छल लोकक खातिर भोग बनल छल जहाँ-जतऽ जे चिड़ै कतहु आकाश छोड़ि कऽ पड़ा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। एक बिपटा, कते मदारी छल सबहक सभसँ भैयारी छल गाड़ी छल उपरमे चितंग नीचाँ कुहरैत सवारी छल हम थहाथही देखइत रहलहुँ छल कंठ कतेको मोका गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। हे मित्र! बंधु ! परिवार हमर! हे  आंगन आ चिनुआर हमर ! जीवाकेर, बजबाकेर देखू क्यो छीन लेलक अधिकार हमर हमरहि सोझाँ माइक छाती पर पाथर छल क्यो खसा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । मा मिथिले ! क्षमा करू हमरा संकल्प अपन हम बिसरि गेलहुँ हमरहु मुट्ठीमे छल अकाश नहि जानि कतऽ हम पिछड़ि गेलहुँ हमरहि चुप्पी केर कारण क्यो अछि आँखि अहाँकेँ देखा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। की होयत ई जीवन लऽ कऽ? की होयत तन-मन-धन लऽ कऽ? की हएत जोगा कऽ आँखि अपन? आ की अरण्य क्रन्दन लऽ कऽ? कहइत अछि हमरा पंचवटी मैथिलीक काया सुखा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। बिजली कौखन कऽ अबै छली किछु हँसै छली, किछु कनै छली सभ बाट अहिल्या सन शापित नित बाट रामकेर तकै छली

निशिचरक उपद्रवसँ सभठाँ छल यज्ञस्थल सभ घिना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। हम थहाथही करइत रहलहुँ अन्हड-बिहाड़ि भोगइत रहलहुँ कूकुर, हाथी आ गहुमनसँ डरइत रहलहुँ, भगइत रहलहुँ

बतहा हाथी केर तरबा तर चुट्टी अनगिनती पिचा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। हम देखलहुँ सबहक सोझाँमे बकरीमे खुट्टा बान्हल अछि सौंसे आकाशक बदलामे कागत एक टुकड़ी तानल अछि

निर्वासित रहबा केर दुख छल मैथिलीक भाग्यमे लिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल।

देखलहुँ हम नवगछुलीकेँ देखलहुँ हम पुरना गाछीकेँ देखलहुँ हम गाछक धोधरिकेँ देखलहुँ हम गाछक बाँझीकेँ

छल हहरि गेल सभ गाछ, मुदा लत्ती-फत्ती सभ मोटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल।

मनकें जे आलोकित केलक से छल इजोत ‘मिथिला मिहिर’क ‘मिथिला दर्शन’ आ ‘माटि पानि’ ‘भारती’ आ विद्यापति पर्वक

‘जय जय भैरवि’ केर शंंखनाद चेतना-भूमिमे समा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल।

यात्री, हरिमोहन जगा गेला नित नऽव पराती सुना गेला आंगन-आंगन आ घर-घरमे मैथिलीक पूजा सिखा गेला

‘जय मैथिली’ कहइत-कहइत छल आँखि हुनक डबडबा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । हम गाम, शहर घुमइत रहलहुं भारतक भूमि चुमइत रहलहुं सभ जलकें गंगाजल समान देखइत रहलहुं छुबइत रहलहुं छत्तीसगढक ओइ धरती पर मिथिलाकेर धूआ देखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । बस नाव-नदी    संयोग कहू पूर्वक किछु कर्मक भोग कहू पाप-पुण्यकेर योग कहू अथवा नुकाइले दोग कहू सतपुराक ओ हरियर जंगल हमरहु अदिष्टमे लिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल  आ की हेरा गेल । रामक  वन-गमन जरूरी छल राजाकेर ओ मजबूरी छल सीताक हरणकेर पाछां  तं रावणकेर दसटा मूड़ी छल कैकेइक माथ पर ई कलंक मन्थराक हाथें लिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । छल धोन्हि बहुत लागल ओत्तहु छल लोक बहुत बांटल ओत्तहु देखलहुं सभठां  जंगलमे छल लोक बहुत जागल ओत्तहु नवकलश बहुत देखलहुं लेकिन छल  गाछ कतेको सुखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । माएसं भेटल जे शीतलता ओ निर्मलता आ भावुकता पाथेय बनल से हमराले ओ लोचकता आ व्यापकता कएटा पिच्छड़ छल बाट जतय खसबासं हमरा बचा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । संततिक बिछोहक दारूण दुख भरिसक जननी नहि सहि सकली चिंतासं जर्जर कायामे नहि सालो भरि ओ रहि सकली नहि जानि कोन नव दुनियामे प्राणक पंछी उड़ि पड़ा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। बाबूकें रहै छलनि हमरा बुधियार बनएबाकेर चिंता ओ देखथि लौकिक क्रिया-कर्म आ काज पड़ल सोझां सभटा पोथीसं हम्मर प्रेम देखि ओ छला बहुत किछु डेरा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। से पिता पुत्रसं हारि गेला आ जीत गेल पोथी-पतरा की गाम-घर, की क्रिया-कर्म ओ बिसरि गेला चिंता सभटा, की जन्मभूमि, की सर-कुटुंब सभ दुनियादारी बिला गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। हमरहि सोझांमे एक राति बाबूजी अंतिम सांस लेलनि तजि जीर्ण-शीर्ण एहि कायाकें नव कायाले’ प्रस्थान केलनि चलितो-चलितो एहि दुनियासं ओ छला बहुत किछु सिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। घुरलहुं कए वरखक बाद गाम उजड़ल उपटल बिलटल देखलहुं जै घरकें बाबू बना गेला ओइ घरकें खसल-पड़ल देखलहुं सभटा लताम, सभटा नेबो सभटा गुलाब छल सुखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। छल पथरायल संबंध शेष किछु वैचारिक अनुबंध शेष मनकें आनन्दित करबाले’ एखनहुं धरि छल किछु गंध शेष माइक हाथक पारल कोठी माइक सभटा दुख सुना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। हम देखलहुं उल्कापात कते हम सहलहुं झंझाबात कते परिजन-प्रियजनसं बिछुड़न केर संताप कते, आघात कते सुख-दुख केर नश्वरताक पाठ अस्तित्व गुरू बनि पढ़ा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। हमरहु जीवनकेर उत्सवमे छल श्रीरामक अवतरण भेल हमरहु अन्तरकेर सीताकेर जंगलमे छल अपहरण भेल

आ हमरहु हाथें रावणकेर दसटा मूडी छल कटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

सोचै छी पिता, पितामह सब हमरा संग एखनहु छथि जिबइत हम देखि रहल छी अपनामे सभकें चलइत, हंसइत-गबइत आइ,काल्हि,परसू सभटा अपनहि अन्तरमे समा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

जीवनकें पढलहुं बेर-बेर जीवनकें गुणलहुं बेर-बेर जीवनकें देखलहुं बेर-बेर जीवनकें भोगलहुं बेर-बेर

स्वर्ग, नर्क जिबितहिं सभटा अपनहि जीवनमे देखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

नहि बूझी जीवन केर मतलब ओहिना जीने चल जाइत छी नहि जानि पियास हटत कहिया ओहिना पीने चल जाइत छी

सभ विष शिवशंकर के समान जे जखन जतए अछि देखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

हम जाहि सुखक कामना करी से दुखमे होइछ परिवर्तित मुश्किल अछि झंझाबातहुमे राखब अपनाकें आनन्दित

अपनहि अन्तरमे बैसल क्यो गीताक पाठ अछि पढा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल ।

अपनहि हाथें हम छी लिखइत सौभाग्य अपन,दुर्भाग्य अपन अपनहि हस्ताक्षर देखै छी पाछां तकइत छी जखन-जखन हं, किछु हस्ताक्षर एहनो अछि जे अछि लेभरल वा मेटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । जे सुख भेटल, जे शांति भेटल अघ्ययन, मनन आ चिन्तनमे दुख-सुखकेर परिभाषा जानल की सफल, सुफल की जीवनमे एक दृष्टि नव, एक सृष्टि नव अपनहु अन्तरमे   समा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। सपना छल जे छी देखि चुकल सपना अछि जे छी देखि रहल सपने संगी अछि बनल हमर सपनेसँ हम छी सीखि रहल सपनेमे अहिना पड़ल-पड़ल हँसिते-हँसिते अछि कना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। जीवनक अर्थ तँ हर्ष भेल दोसर मतलब संघर्ष भेल हम ताकि रहल छी अपनामे की बाँचल आ की व्यर्थ गेल अछि वैह सुफल दुनियामे जे अपनाकें  कहुना बचा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । हम के छी, कतऽसँ आयल छी अछि अएबा केर  प्रयोजन की सुख-दुखक चक्रमे घूमि रहल अनवरत हमर ई जीवन की हमरा अन्तरमे बैसल क्यो अछि प्रश्न कैकटा उठा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ई देह अतिथि, ई प्राण अतिथि सम्मान अतिथि, अपमान अतिथि अछि लोभ, मोह आ मायाकेर अज्ञान अतिथि, विज्ञान अतिथि हम अहिना रहब स्थिर तहियो जहिया देखब सब बिला गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ई हाथ हमर, ई पएर हमर ई आँखि हमर, ई कान हमर ई देह हमर, ई मोन हमर ई प्राण हमर आ ध्यान हमर हम छी स्वामी एहि कायाकेर अछि ई रहस्य क्यो बुझा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल  आ की हेरा गेल। झंकार उठल,    टंकार उठल ओंकार उठल,  जैकार उठल जनकक आंगनसं दिल्ली धरि ‘जै मैथिली’      हुंकार उठल प्राप्त भेल  अधिकार अपन जे मंगनीमे छल छिना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । नहि द्रोण थिका    आदर्श हमर नहि श्लोक रटल हम गीता केर हमरा अन्तस्थलमे  सदिखन अछि नाम कैकटा सीताकेर जे स्वयं समाकऽ धरतीमे दुनिया भरिकें छथि जगा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । जतबा धरि जीवनमे शुभ अछि से अछि प्रसाद  सतसंगतिकेर आहार-विहारक    नियमितता शुभ चिन्तनकेर आ सदमतिकेर गुरूजन आ प्रियजन आशीषक अनमोल रत्न छथि लुटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । नहि दौड़ी हम काशी-प्रयाग नहि केलहुं हम   कबुला-पाती कयलनि जीवनभरि व्रत-उपव्रत दादी आ माए सबहक साती हुनकहि आशीषक गंगामे भरि पोख मोन अछि नहा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । क्षमा करू  हे पिता हमर बरखी-तरखी नहि करब ह’म नहि केश कटायब बेर-बेर नहि भोज-भातमे पड़ब ह’म हम मानब ओकरहि क्रिया-कर्म जे तृप्त जीबितहिं करा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। क्षमा करू हे मित्र हमर नहि आंखि मूनिकऽ चलब ह’म जे सहज, सरल आ सुन्दर हो ओही रस्तापर बढब ह’म अपनहि इतिहासक पन्ना किछु आंगुर हमरा पर उठा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। भोरे उठि स्मरण करै छी परिजन, प्रियजन, गुरूजनकें आसन-प्राणायामक आदति शुद्ध करैए तन-मनकें साहित्यक आनन्द हमर दिनचर्यामे अछि समा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । के जानय काल्हि रही ने रही मोनक सभ बात कही ने कही यात्री, हरिमोहनसं एखनहुं खाली नहि छथि मिथिलाक मही से सोचि सूप सन अछि करेज आ देखि नैन अछि जुड़ा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । सौंसे दुनियाले एक सूर्य सौंसे दुनियाले एक चान लाख तरेगन केर संग सौंेसे दुनियाले आसमान ओ कलाकार, ओ वैज्ञानिक सभ बना कतऽ छथि नुका गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। भगवानक दर्शन होइए शुभ चिन्तनमे, शुभ कीर्तनमे हरियर धरती, सुन्दर अकास शुभ दर्पणमे, शुभ अर्पणमे देखै छी चारूकात हमर अछि फूल कते नव फुला गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। हम छी कृतज्ञ एहि अस्तित्वक जे जीबा केर आधार देलनि मंगनीमे भेटल रौद, हवा आ देखबाले संसार देलनि दुविधासँ मुक्तिक मंत्र प्रबल पथ महाजनक अछि सिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल। हम छी ऊर्जा, जीवन-ऊर्जा हम उत्सव छी ऐ तन-मन केर शान्ति, प्रेम, आनन्द मात्र अछि लक्ष्य हमर एहि जीवन केर उत्साह भरल, उल्लास भरल उत्कर्षक पथ अछि देखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । भक्ति गजल गीता वेद पुराण बुझै छी कण कणमे भगवान बुझै छी तों विपत्तिमे दौगल अएलें हम तोरे हनुमान बुझै छी जकरा ल’ग विवेकक धन छै हम तकरे धनवान बुझै छी सभ नारीकें नमन करी हम परधन बालु समान बुझै छी घूस लेब आ देब कथू ले’ हम अपनहि अपमान बुझै छी सत्यक खातिर लडय स्वयंसं हम ओकरे संतान बुझै छी गजल खिडकी, केबार किछु नै, महल कोना भेलै ने रदीफ आ ने काफिया, गजल कोना भेलै । एसगर छलीह ओ आ छल दैत्य पांच टा नै जानि तमसगीरकें  रहल कोना भेलै  । ठीक छै वृद्धाश्रमे, हम आएब मासे-मासे ई बात अपन बाप कें  कहल कोना  भेलै । ओ खाइ छलि नून, मूर कि  गूड संगे रोटी कहू तं तीस साल धरि सहल कोना भेलै । जल, थल, अंतरिक्ष सभ भेल अपवित्र माफियाक सभठां एना दखल कोना भेलै । सरल वार्णिक बहर, वर्ण-16 गजल सुरूज तरेगन चानक दुनिया नीक हमर भगवानक दुनिया । सोचू त आइ करैए की-की अयाचीक सन्तानक दुनिया । बीया थीक महाभारतके ‘निर्भया’क अपमानक दुनिया । जीवनकें उत्सव बनबैत छी नव-नव अनुसन्धानक दुनिया । देखू दारूमे डूबल अछि जप-तप-योग-धियानक दुनिया । रहए निरोग, विलक्षण आ पावन अन्ना केर अभियानक दुनिया । मात्रा16 प्रत्येक पांतीमे गजल जुनि पूछू की करै छी हम नित्य स्वयंसं लड़ै छी हम । काल्हि डरैत छलौं अहांसं आइ स्वयंसं डरै छी हम । हम सत्य कें झूठ बुझै छी झूठ कें सत्य बुझै छी हम । अहां जगै छी, हम सूतै छी अहां सुतै छी, जगै छी हम । लोक कनैए, हम हंसै छी लोक हंसैए, कनै छी हम । लोक बजैए, चुप्प रहै छी एसग’रेमे बजै छी हम । मोन होइछ त कानी-खीझी मोन भेल त नचै छी हम । कन्यादान लगैए मुश्किल वेद-पुराण जनै छी हम । शत्रु, मित्र, देवी आ देवता स’भ स्वयंमे तकै छी हम । सरल वार्णिक बहर, वर्ण-10 गजल किछु गाबि लिय’, किछु गबा लिय’ जीवन थिक फगुआ, मना लिय’। ई सड़क बनल छै चलबा ले’ मोटर एहि ठाम सं  हटा लिय’। अछि मोन हमर त मिथिलेमे तनसं कतबो अहां खटा लिय’। हम तमसायब मैथिलीएमे अंगरेजी इ कतबो रटा लिय’। हमरो सहोदरे बुझू यौ भाइ हमरहु करेजसं  सटा  लिय’। नहि चीन्हय अपनो लोक  आब हे प्रभु अपने लग बजा लिय’। लछमी, दुरगा,सरस्वती बुझू हम लाज अहींक  छी,बचा लिय’। सरल वार्णिक बहर,वर्ण-12 गजल हम छी सीता आ राम अहां छी हमरे ले’ बदलाम   अहां छी । मन्दिर-मन्दिर कथी ले’ दौडू हमर त चारू धाम अहां छी । ड’र कथी के होयत हमरा स्ंाग-संग आठो याम अहां छी । आब दौडि  नै चलू बाट पर गाछक पाकल आम अहां छी । ताकथि रामक बाट  अहिल्या कोसीक कातक गाम अहां छी । ककरो गरदनि के माला छी ककरो लेल   खराम अहां छी । आइ अहांकें देखल जी भरि मानल पूर्ण  विराम अहां छी । सरल वार्णिक बहर,वर्ण-11 गजल माछ दही केरा केर भार थिक गजल ककरो ले’महफा कहार थिक गजल । ककरो ले’ पोखरि इनार आ कि मन्दिर ककरो ले’ हाट आ बजार थिक गजल । जिनगीमे कांट-कूस कांटहिमे जिनगी जिनगीमे जंगल, पहाड थिक गजल । जिनगीमे साओन आ साओनमे बादरि बादरिके रिमझिम फुहार  छी  गजल । ककरो  ले’ रातिक चकमक इजोरिया ककरो ले’ गुजगुज अन्हार छी गजल । दीयाबाती छठि जूडशीतल आ फगुआ जिनगीमे पावनि-तिहार थिक गजल । ककरो शुभकामना, करूणा आ ममता ककरो सिनेह आ दुलार थिक गजल । ककरो ले’ वरदान हंसी आ ठहक्काक ककरो ले’ नोरक टघार थिक गजल । ककरो ले’ सपना और ककरो ले’ नारा हमरा ले’ मुक्तिक विचार थिक गजल ।सरल वार्णिक बहर, वर्ण-15 गजल चान रहल चलिते अहिना बीतल युग तकिते अहिना । सुन्दर गीत अहां बनि गेलौं रहलौं हम गबिते  अहिना । वैह करू   जे हृदय कहैए लोक रहत बजिते  अहिना । भोर अबैए चुप्पे सभदिन सांझ रहल ढरिते अहिना । भीजि गेल पन्ना अखवारक नोर रहल चुबिते  अहिना । अपनहि सोझां ठाढ भेल छी हारि गेलहुं लड़िते  अहिना । फूलक गाछ निहारै छी हम लाज होइछ छुबिते अहिना । एहि डारि सं ओहि डारि पर लोक रहल उडिते  अहिना । सरल वार्णिक बहर,वर्ण-11 गजल लोक जतेक छथि दुनियामे । स’भ मगन छथि अपनामे । दारू पीबि अबै छथि अपने गलती तकै छथि कनियामे । हम अहां त कटलौं जिनगी भोज, भजन और  करजामे । सीता  बेटी, जमाए राम छथि कथीक कमी अछि मिथिलामे । गौआं- घरूआ परेशान अछि व’र और कनियां महफामे । बूढी के दिन-राति बितै छनि उलहन आ किछु फकरामे । सोचू की अन्तर अछि बांचल विश्वविद्यालय आ बनियांमे । सरल वार्णिक बहर, वर्ण-11 गजल धनसं सुन्दर तन चाही तनसं सुन्दर मन चाही

बाहर-बाहर दुनियां ई भीतर राम भजन चाही

नै चाही मोटर आ बंगला हमरा नीलगगन चाही

हम पावन आ शान्त आत्मा ई धियान सदिखन चाही

मित्र, मोक्ष नै चाही हमरा मरण और जीवन चाही

हानि-लाभ हो दुख-सुख हो बिछुडन आ’मिलन चाही सरल वार्णिक बहर,वर्ण-10 गजल मोटर आ ने महल चाही कविता गीत गजल चाही

ओ रस्तापर कांट छिटैए ओकरा लेल जहल चाही

महिशासुर अछि उत्पाती मां दुरगाक दखल चाही

किए’खाधि आ पर्वत कत्तौ स’भ खेत समतल चाही

घर दफ्तर वा करखाना सभठां लोक कुशल चाही

अहिल्याक संताप हरैले’ नयनमे गंगाजल चाही

भार चंगेरा मैथिलीक हो जागल मिथिलांचल चाही सरल वार्णिक बहर,वर्ण-10

गजल सदिखन कोनो बियोंतमे बाझल करैए आदमी आदमीकें कतेक पांतमे बांटल करैए आदमी

आदमीक विवेक देखलहुं सांढ आ महिशा जकां हरियर जजात बाधक धांगल करैए आदमी

आदमी केर रूप देखल बिलाइ आ कुकुर जकां आदमीक डरसं एतय भागल करैए आदमी

आदमी केर देशमे किए आदमी केर टान अछि आदमीक पेट पर किए नाचल करैए आदमी

सोचैत छी हम आदमीक सुविचार कें की भ’ गेलै आदमीकें पाइसं सतत नापल करैए आदमी

आदमी ले’ वैह सरिपहुं आदमी भगवान थिक आदमी केर दुख-दर्द जे बांटल करैए आदमी सरल वार्णिक बहर, वर्ण-19 गजल माटि-पानि ले’ देश-कोस ले’ अहांक योगदान की अहां उपस्थित छी दुनियामे तकर प्रमाण की

अहां बान्हि नेने छी पट्टी अपन दूनू आंखि पर आब अहां लेल कोनो राक्षस की आ भगवान की

ओ नंगटे ठाढ भ’ गेल अछि ऐ चौबटिया पर आब ओकरा लेल कोनो सम्मान की अपमान की

अहां जनैत छी लहरि गनि क’ कमाएब पाइ अहां लेल नोकरी की आ नून-तेलक दोकान की

अहां तं बातेसं क’ दै छिऐ सभकें लहूलुहान अहां ले’ कोनो तीर की आ अहां ले’ कोनो कमान की

अहां तं नारद छी घुमैत रहै छी तीनू लोकमे अहांक लेल बाइक की मोटर की वायुयान की

साल भरिसं संगे रहै जाइ छी अहां दूनू गोटे आब अहां सभक लेल परिछन की चुमान की सरल वार्णिक बहर, वर्ण-18 गजल बिना बियाहे घरमे कनियां केहेन लगैए कहू त काकी बदलल दुनियां केहेन लगैए वर कनियां दूनूक हाथमे सेर-तराजू दूनू पक्ष बनल अछि बनियां केहेन लगैए तारि देलक दूनू कुलकें पीओ बनिकऽ भौजी ई बेटी लछमिनियां केहेन लगैए जाहि घरमे क्यो रूसल क्यो भूखल हो ओतऽ झालि ढोलक हरमुनियां केहेन लगैए अहां आब तं दौड़ि सकैछी यौ बौआ आब अहांकें देब ठेहुनियां केहेन लगैए उठू मन्थरासं मुक्तिक किछु युक्ति करू शुभक घड़ीमे ई पेटकुनियां केहेन लगैए अहां स्वयं सामर्थ्यवान छी   हे राजन ककरो आगू करब खेखनियां केहेन लगैए गजल आखर-आखर सुनिते रहलौं हऽम अहां दिस तकिते रहलौं आइ एतऽ छी काल्हि ओतऽ छी सभदिन सभकें ठकिते रहलौं हंसै-गबैछी हम अनका लग एसगरमे हम कनिते रहलौं सभकिछु अथवा किछु नै चाही सभदिन अहिना रुसिते रहलौं ओ चलबाले बाट बनौलनि हऽम पथिक छी चलिते रहलौं एतऽ अन्हरिया रहलै सभदिन मोम जकां हम गलिते रहलौं कलियुग आर कते दिन रहतै सभदिन सभकें पुछिते रहलौं गजल अपन-अपन हम प्रणमे छी महाभारतक रणमे छी अहाँ अधर्मक संग ठाढ़ छी बुझू अंतिम क्षणमे छी धरतीमे छी अम्बरमे छी हम सृष्टिक कण-कणमे छी अपने लगमे ताकू हमरा ह’म अहाँक नयनमे छी नीक लगैए चान-तरेगन शब्दक नीलगगनमे छी सुखमे छी हम दुखमे छी जा मोहक बन्धनमे छी हमर अज्ञान हरू हे माता ह’म अहींक शरणमे छी गजल बीतल दुख के बात करै छी भोरे-भोरे पाप करै छी संग अहाँ के किछु नै जाएत हमर-हमर की जाप करै छी शब्दक लागल तीर हृदयमे किए एना आघात करै छी अहाँ की बुझबै कष्ट अभावक कोना साँझसँ प्रात करै छी पहिने मैल केलौं उज्जरकेँ आब मैलकेँ साफ करै छी दुख आएल सुख आबि रहल अछि किएक  बाप रे बाप  करै छी भरिसक हमरे कर्मक फल थिक जाउ अहाँकेँ माफ करै छी पंकज चौधरी नवलश्री बाल गजल दीदी जँ चढ़ि गेल कनहा-गाछी चट द' रूसल कोरा लए चुल्लरि भेटिते दोसर बहन्ना कानल आब कटोरा लए झिल्ली-कचरी घिरनी-फुकना बाबू गेलनि हाटसँ आनए साइकिलक घंटी बजिते दौगल दलान पर झोड़ा लए बैसल सभ झोड़ा घेरने अपन-अपन अनमाना लेल जे अनूप से बाँटि क' खेलक बँझि गेल मारि अंगोरा लए आँगन नीपल अरिपन पाड़ल आइ फेर छै पूजामानी आसन परमे त' पंडितजी बैसल ओ औनेलै बोरा लए घड़िघंटा आ शंख बाजि गेल चौरठ आ परसादी भेटतै "नवल" नञि लेतै एकटा लड्डू मुँह फुलेलक जोड़ा लए  *आखर-२२ बाल गजल दू टा बस सोहारी चाही माँ कम्मे तरकारी चाही पुरना छिपलीमे नै खेबौ हमरो नवका थारी चाही हमहूँ जेबै इसकुल बाबू पूरा सभ तैयारी चाही हाटसँ आनू पोथी-बस्ता मौजा-जूता कारी चाही इसकूलक जलखैमे हलुआ पूरी आ तरकारी चाही छीटब बीया गाछो रोपब आँगन लग फुलवारी चाही "नवल"सँ नै हम लट्टू माँगब हमरो कठही गाड़ी चाही मात्रा क्रम : आठ टा दीर्घ सभ पांतिमे बाल गजल संगी सभके संगे लै छी चल भैया पिकनिक मनबै छी माँ देतै चिक्कस आ चाउर बांकी बाबू के कहि दै छी चुल्हा जारनि बासन आनै आ सभकिछु मिलिजुलि पकबै छी तीमन करुगर मिठगर तस्मइ पूरी आ हलुआ बनबै छी केरा पातक थारी सुन्नर तूं सभ बैसै हम परसै छी "नवलसँ" कहि दे एतै ओहो झगड़ा-झंझट सभ बिसरै छी *मात्रा क्रम-आठ टा दीर्घ सभ पांतिमे बाल गजल देख भेलै भोर भैया आब आलस छोड़ भैया दाय-बाबा माय-बाबू लाग सभके गोर भैया गाछ नीमक ऊँच बड़ छै चढ़ि क’ दतमनि तोड़ भैया धो क’ मुँह चल ने नहा ली भूख मारय जोर भैया दालि बेशी भात ले कम खूब खो तिलकोर भैया खा क’ पुनि पोथी ल’ बैसी चल पढ़ै छी थोड़ भैया चल चलै छी खेल खेलब बनि सिपाही-चोर भैया ई सिनेहक ताग कहियो होय नै कमजोर भैया तों “नवल” भैया हमर छें हम बहिनिया तोर भैया *बहरे रमल/मात्रा क्रम-२१२२+२१२२ बाल गजल चार पर कुचरैत कौआ सभ सनेशा दैत कौआ टाट पर बैसल त' कखनो मेघमे उमकैत कौआ ताकि गोपी लोल मारै गाछ पर फुद्कैत कौआ काग दस टा मूस एगो ताहि लै झगड़ैत कौआ छीन हाथक सभ जिलेबी उड़ल पुनि बहसैत कौआ ऐंठ बासन देखि दौगल अन्न लै तरसैत कौआ भोज आँगन भाग जागै पात पर लुधकैत कौआ सूपमे खुद्दी पसारल दाय छथि उड़बैत कौआ देखि सूतल दाय के पुनि सूप दिस ससरैत कौआ "नवल" कागक अजब लीला लोक के नचबैत कौआ *बहरे रमल/मात्रा क्रम-२१२२+२१२२ बाल गजल

बोहनि के बेर छै बटुआ ओरियेने जाएत छल फुकना लिअ' फुकना लिअ' चिचियेने जाएत छल

सभटा फुकना के फूंकि-फूंकि डोरा लए बान्हि-बान्हि ओकरा ठेंगामे खोंसि-खोंसि सरियेने जाएत छल

मगन मस्त भेल झूमि-झूमि गामे-गाम घूमि-घूमि फूलल - फूलल फुकना के उड़ियेने जाएत छल

गहिंकीक बड़ भीड़ छलै नेन्ना सभ अधीर छलै तइयो सौदा सभसँ धरि फरियेने जाएत छल

अनमन लागैत छैक सींग पुछरी आ पाँखि सन  एना फुकनामे फुकने के सन्हियेने जाएत छल

बेसी नमहर फुलाबयमे फुकना जे फूटि गेलै ओ मोने-मोन सभके आब गरियेने जाएत छल

एकटा फुकना के फुटलासँ चारि आना छूटि गेलै रहि - रहिकऽ केश "नवल" कुड़ियेने जाएत छल

*आखर-१९ (तिथि-११.०९.२०१२) भक्ति गजल माय हम आराधक बनल छी सुनु याचना याचक बनल छी बस साधन भेटए आशीष के करी साधना साधक बनल छी सुर-तान के अवगति ने किछु वरदानसँ वादक बनल छी नौग्रहसँ लड़ैत नवरातिमे सप्त्शतिक पाठक बनल छी ममता भरल आँचरि भेटल "नवल" हम बालक बनल छी *आखर-१२ भक्ति गजल श्वेत अछि परिधान माँ हे ठोढ़ पर मुस्कान माँ हे हाथ पुस्तक कमल आसन सजल वीणा तान माँ हे भारती जय माँ भवानी जग करै गुणगान माँ हे बुधि बिना बकलेल सन हम माँगि रहलौं ज्ञान माँ हे क्रोध आलस लोभ भागय दूर हो अभिमान माँ हे "नवल" माँगत आर नै किछु पाबि ई वरदान माँ हे *बहरे रमल / मात्राक्रम-२१२२ भक्ति गजल हम दान मँगै छी माँ निज-मान मँगै छी माँ बस चानक किछु गुण दे नै चान मँगै छी माँ बकलेल बिना ज्ञानक बस ज्ञान मँगै छी माँ हम बेसुर बिनु रागक सुर-तान मँगै छी माँ सुन कोखि हमर जननी संतान मँगै छी माँ बड़ आश "नवल" रखने वरदान मँगै छी माँ मात्रा  क्रम : २२१+१२२२ भक्ति गजल श्वेत अछि परिधान माँ हे ठोढ़ पर मुस्कान माँ हे हाथ पुस्तक कमल आसन सजल वीणा तान माँ हे भारती जय माँ भवानी जग करै गुणगान माँ हे बुधि बिना बकलेल सन हम माँगि रहलौं ज्ञान माँ हे क्रोध आलस लोभ भागय दूर हो अभिमान माँ हे "नवल" माँगत आर नै किछु पाबि ई वरदान माँ हे *बहरे रमल / मात्राक्रम-२१२२ भक्ति गजल

माए हम आराधक बनल छी सुनु याचना याचक बनल छी

बस साधन भेटए आशीष के करी साधना साधक बनल छी

सुर-तान के अवगति ने किछु वरदानसँ वादक बनल छी 

नौग्रहसँ लड़ैत नवरातिमे सप्त्शतिक पाठक बनल छी

ममता भरल आँचरि भेटल "नवल" हम बालक बनल छी      

*आखर-१२ (तिथि-२१.०८.२०१२) गजल सगतरि बखान मिथिला कें महिमा महान मिथिलाकें छथि राम सजल बनि दुल्हा छाती उतान मिथिलाकें पाहुनसँ भरल अछि आँगन दलमल दलान मिथिलाकें धूमन गगूल शरबत आ परसबइ पान मिथिलाकें अवधेश देखि गदगद छथि सभ ओरियान मिथिलाकें अरिपन पड़ल सजल डाला देखब चुमान मिथिलाकें आओत "नवल" कोजगरा बाँटब मखान मिथिलाकें वर्ण क्रम: २२१२+१२२२ गजल जग भरिक उपरागसँ अकच्छ भेल छी राति-दिन लागैत दागसँ अकच्छ भेल छी मौध मुँह पर मुदा मोन माहुर भरल ऐ फुसियाहा अनुरागसँ अकच्छ भेल छी हम जँ बजलौं अहाँसँ त' रुसि रहता ओ ऐ संबंधक गुणा-भागसँ अकच्छ भेल छी दंश सहलौं कते मिसिया भरि मौध लेल प्रेमक मधुर परागसँ अकच्छ भेल छी "नवल" टूटितै नै जे निन्न होएतै एहन राति-राति भरिक जागसँ अकच्छ भेल छी *आखर-१६ गजल सभसँ ऊपर देश भारत जगसँ सुन्नर देश भारत मुकुट पर्वत हिन्द चरणहि छै रमणगर देश भारत माय मानी माटि के सभ तें हिलसगर देश भारत धर्म सभटा जाति सभटा बड़ दिलह्गर देश भारत अपन अन्नक बल भरै छै पेट अनकर देश भारत सहब ककरो यातना नै आब बलगर देश भारत ठाम सभके मान सभके "नवल" नमहर देश भारत बहरे रमल/मात्रा क्रम :२१२२+२१२२ गजल "गाँधीजी"क धरती पर बहलै शोणित केर धार कोना "भगत सिंह" केर आँगनमे जनमल अत्याचार कोना कतए गेलै "आजाद"क नगरी रूसि "लक्ष्मी" कत' पड़ेली देव आ विद्वानक नगरीसँ बिला रहल संस्कार कोना बिसरल-बिलटल छै अपनैती "मालवीय-मौलाना"कें जाति-पाति आ भेदभावक पसरल एते विकार कोना आब नै जनमै "लाल" किए की देशक माटि भेलै उस्सर लोभी-कपटी-कुकर्मी सभके लागल एते पथार कोना ने नेत ठीक ने नाम नीक टाका बल पर नेता बनलै करै ओसूली जनता सभसँ चतरल भ्रष्टाचार कोना मतकें मान बिना बुझने बेर-बेर मतदान केलहुं मतकें मान नै बूझब जा जागत गुम सरकार कोना छोड़ब नै अधिकार अपन फांड़ बान्हि ली चलू "नवल" बिनु मँगने नै भीख भेटै भेटत फेर अधिकार कोना आखर-२१ गजल प्रीत बनि क' हियामे रहबे करब हम बनि नेह शोणितमे बह्बे करब हम वेग मोडू बसातक हमर पएर छोडू बसातक संगे-संग बहबे करब हम किए बिसरैमे लागल छी हमरा अनेरे छाँह बनि अहाँ संग रहबे करब हम नै बुझलहुँ अहीं त' दोख अनकर कथी ई तिरस्कारक तीर सहबे करब हम छै किछु दिन लेल जिनगी तकर मोहे की रेतीक भवन बनि ढहबे करब हम मिठ लागत की क'रू तकर परवाह नै जे सच छै उचित छै कहबे करब हम अहाँ घोंटी गरल बूझि की पीबी सुधा कहि "नवल" नेह-छाल्ही त' मह्बे करब हम *आखर-१६ गजल हुनका संग लिअ' बढू आगाँ जे छथि अभियानक पक्षमे चलू करै छी नव पहल पुनि नव-क्रांतिक उपलक्षमे नमन करैत छी हुनका जे संग चलथि बनि सहभागी हुनको भ्रम के दूर करब जे सभ छथि ठाढ़ विपक्षमे चलू करी अनुपालन हुनकर जे छथि ज्ञानक अगुआ पछुवाएल छथि जे अज्ञाने तनिको आनब समकक्षमे कर्मठ छै जे कर्मभूमिमे हारत-जीतत हएत सफल ओ की जानै मोल एकर जे बस गप छाँटै सूतल कक्षमे "नवल" नाच नै आबै जकरा तकरा लै सभ अंगने टेढ़ घुरबाक लूरि ने जकरा से त्रुटि तकबे करतै अक्षमें *आखर-२२ गजल जिनगी भरि बस व्यर्थक चिंता मरितहुँ लागल स्वर्गक चिंता अन्नक खगल छै निर्धन चिंतित करए धनिकहो अर्थक चिंता पहिलुक भेटिते दसकें ललसा दस पुरिते शुरू शतकक चिंता बहुअक छथि बिआहल सभ मारल काँचकुमारकें घटकक चिंता आशा फ'रक लागल छै सभके ककरो "नवल" नै कर्मक चिंता *मात्रा क्रम: २२२+१२२+२२२ मनोज कुमार मण्‍डल सम्‍पर्क- बेरमा, तमुरि‍या, मधुबनी। कित -कित तूँ कित-कित खेल एक्के टांगपर रेंग-रेंग चारू कात घूम दोसर रोपने बनमे चोरनी नै तँ रानी बन बुच्ची तोरा टांग छौ दू एक टांगसँ रानी बनै छै दोसर रहने महरानी एहने छै जिनगीक खेल नीत चलत ओ पहुँचत नै अबेर रुकने-झुकतै माथ हरबेर। सुन बाबू  सुन सुन सुन सुन सुन बाबू सुन सीख एहेन गुण बाबाक पगरी आ बाबूक माथ नै करियनु कहिओ सुन्न सुन सुन सुन सुन दैया   सुन हीरा मोती की चमकतै चमकै छै तँ गुण गुणक गहना जे पहिरत से बनत गि‍रथनि‍ सुन सुन सुन धिया-पुता सुन सगतर छि‍ड़ि‍आएल छै गुणक मोती बुधि लगा कऽ जे भऽ सकौ से बीछ‍ सुन सुन सुन मुन्ना आ मुन्नी सुन मनक खेतमे बुधिक बिआ बून फड़तौ ओइमे कएक-ने-कएकटा गुण। लोभ कुत्तिया दिदिक बिआहमे घनेरो कुत्ता बरियाती आएल दोस्त रहनि‍ मूसाजी तिनको ओ संगे नेने एलाह सखी-बहिनपा देखैले एली बिलाइ मौसी सेहो एली मूसाजीकेँ देखते देरी जीसँ खसलन्हि‍ पानि मूसाजी लग सहटि‍ ओ बैसली बजलि एहेन सुन्नर कतए भेटत हमरा वर। बक-बक कर नै बक बक बनिहेँ नै ठक तूँ एहन महक खुजि जाए सबहक भक हेतौ नै तोरापर केकरो शक तूँ बुधिसँ अपनाकेँ ढक बनबे आँखि‍क तारा सबहक चलैत रह बेधरक। इंजन नम्हर-नम्हर लगि रहल छै दुइये पटरीपर चलि रहल छै एक्केटा इंजन केकटा डिब्बा सभकेँ इंजन खींच रहल छै रेलक ई अद्भुत खेल सभकेँ सुन्नर लागि रहल छै पगि भऽ बनि हम इंजन अहिना खींची अप्पन जीवन एहेन हमारा लागि रहल छै। रे मन! कऽ ले कनी विश्राम

रे मन! कऽ ले कनी विश्राम चलए पड़तौ दूर छै अप्पन गाम रुकमे तूँ जेते काल दौड़ए पड़तौ तते काल जन्मेसँ चलैत साँस बन्न हएत तेकरो नै छै तय काल रे मन! कऽ ले कनी विश्राम चलए पड़तौ दूर छै अप्पन गाम।

चलैत चल आ रचैत चल भऽ जेतौ कएक टा काज मेघ लगल छै कखन बरसत कमे भऽ जेतौ काज चलए पड़तौ दूर छै अप्पन गाम।

अखन-तखनक फेड़ा छोड़ जखने अलसेमे रुकतौ काज बाटेमे दिवस कटऔ जेमे कखन गाम। रे मन! कऽ ले कनी विश्राम चलए पड़तौ दूर छै अप्पन गाम जेमे कखन गाम...।

अपन नै छै मलाल रुकमे अतए सदि‍काल जेतबा दौग सकै छेँ दौग नै तँ नेहुँए-नेहुँए चल रे मन! कऽ ले कनी विश्राम चलए पड़तौ दूर छै अप्पन गाम जेमे कखन गाम...। भाव भरल अछि मनमे

भाव भरल अछि मनमे केवल एतबा अछि लाचारी हाथ हमर अछि खाली आंगनमे अछि बखारी पर नीज अधिकारसँ छी न्यारी।

चंद हाथमे फँसल अछि सम्पति सारी छाँह सदि‍खन जे रहै तिनका चाही बड़का सबारी समता ममतामे फँसल लागल अछि दुनियाँ दारी।

प्रकृति सदासँ सम छै तखनो बिसम हम छी मेघक बून्न आ सूरुजक किरि‍ण मिलैत सभके समान छै तखन कि‍एक एहेन समाज छै?

उपजेलक जे किओ अन्न सभ लऽ ओ अप्पने शोणित चूसि भूख मिटाबै छै गौ सेवासँ संचित पुण्य छिलैत घास बितबैत जीवन दूध लऽ जी जरल छै। के छथि धर्मात्मा

केहन सुन्दर केहेन निर्मल दीन रहितो उपासनामे लागल अपन सासक आसमे ओ सबहक प्राणक अभय दान दऽ रहल छथि खेतिहर किसान कहू एहेन के छथि धर्मात्मा?

लाख जरुरति‍ रहितो ओ मुँहपर मुस्की रखने छथि अपन पीड़ा छोरि ओ पर पीड़ा अपनौने छथि धूप छाँहक कोन परवाह मेघ बरसै आ माघक जाड़ सतत उपासनामे लागल किसान कहू एहेन के छथि धर्मात्मा?

ओ कर्मवीर ओ धर्मवीर जे करए सएह बनए धर्मक लीक भलहिं ओ अपने रहैत फकीर कर्म पथपर अपन जीवन अपनेहिसँ होम कऽ रहल छथि समए-कु-समय नव-नव अन्न सभकेँ भोग लगा रहल छथि कहू एहेन के छथि धर्मात्मा ?

कतए भेटत एहेन ति‍याग बिनु ति‍यागे प्रीति‍ कोन हएत कवि ताकि रहल छथि ई ति‍याग गली-गली भेटलनि‍ भलहिं केतौ भली बिनु कविक कविता बनल छै जीवन हँसी गाबि रहल छै कहू एहेन के छथि धर्मात्मा?

नै जीवनमे कोनो छंद नै छथि कोनो महंत बिनु झाइल मिरदंग हार नीकलि‍ रहल छै अभय ताल जे सुनत से भऽ जाएत मालोमाल कहू एहेन के छथि धर्मात्मा? बचपन

बचपन ओ सुखद पल जतए नै कोनो दुखक दल घत-घटमे भरल ओज बल ने दुबिधा आ ने चिंता छल खुगल हवामे स्वतंत्र जीवन ओ सि‍नेह भरल स्वछंद पल फँसल केना कतए दल-दल

बचपनक ओ साफ मन उज्जर धप-धप कऽ रहल छल ने राग आ ने द्वेष जगल छल ि‍सनेह पाबि‍ उमंग उमरै छल अपन परार नै लगि रहल छल बहति‍ पानि चलैत जीवन सुन्दर मन फारीछ जीवन छल

खेल-खेल हरिदम खेल खेल तँ जीवन बनल छल बनाबी केतेको दिन कागजक नाव जे पानिमे हेलैत छल  बैस काठ ओ गाड़ी बनैत छल बिनु बाटे सरपट दौगै छल कोनोटा खतरा नै जानि‍ परै छल

नीक अधलाह किछु नै सभके सभ एक्के रंग लगै छल छल नै प्रपंच केतौ चानी सन जीवन चमकै छल ओ बचपनक सि‍नेहील पल कि‍छु यादि‍ अछि कि‍छु भुला गेल जानि‍ नै कतए बिला गेल। नहि त'अ ई बहि चलत सुख -दुखक बीच बहैत कर्म सरिता'क नीर जीवनक ई छै सुधा छुधा मेटा लिअ वीर नहि त'अ ई बहि चलत

धारा गतिक अप्पन चाल बदलैत पाबि पवनक आस स्वकर्म सं होएत छै भूचाल लहड़ लहडा लिअ वीर नहि त'अ ई बहि चलत

कर्मवीरक जीवन अमृत कायरक विष पहाड़ कोन ठेकान ई भेटत जीवन लगा लिअ डुबकी अहिमे एकबेर नहि त'अ ई बहि चलत

अनंत फूल सं शोभाए मान महकैत मह -मह हर पल खेलैत काया -कामनिक बेर -बेर अप्पन नयन जुरा लिअ वीर नहि त'अ इ बहि चलत

काल गति एक रंग कर्म -अकर्मक संगे -संग शरीरक श्रम सामान बनल श्रमसाध्य सँ सर्व कल्याण करू वीर नहि त'अ ई बहि चलत हम छी पागल हम छी पागल तँए घरसँ छी भागल उदरक निमित्ते बनल छी अभागल।

मन अखनो रहैत अछि लागल हुनको जी हेतनि‍ हमरेपर लागल।

परधीन रहि सपना अछि लागल गाम छोरबाक मोहर अछि लागल।

माइक ममता बर छन्‍हि‍ जागल बाबूक मन मिलबाक छन्‍हि‍ लागल। हम छी पागल तँए घरसँ छी भागल उदरक निमित्ते बनल छी अभागल। प्रश्न हिमालयक शुद्ध बसात सन पसरल मिथिलाक भू-भाग सभ वर्गक मुँहसँ निकलैत सु-मधुर भावसँ भरल अमृत सदृश भाषा-मैथि‍ली।

मैथिलिक इतिहास कहैछ बड्ड पुरान छी हम अप्पन लिपी, अप्पन शैली पसरल शब्दक भंडार हमर नित सृजन होइत हमर शब्द मोटाइत रहैत अछि एक्कर शब्दकोषक पन्ना केना बिला गेल एक्कर पाठक बजत किछु लिखत किछु किएक घूसि गेलै लाज? अप्पनसँ आँखि‍ मिचौनी दोसरसँ मिलबैत हाथ के छथि जिम्मेदार एक्कर मिथिलाक बुद्धि-जीवी पर उठि रहल अछि प्रश्न दुखी छथि मैथिली दुखी छथि मैथिलिक सेवक जिनक जीवन बि‍त गेलनि‍ मैथिलीक साधनामे के कहत? कहिया मिलतनि‍ हुनकर सेवा-फल के ई कहत? मो. गुल हसन उदास लागै..... जरि‍ गेलै सुखि‍ गेलै बौक भऽ गेलै धान उदास लागै भैया कि‍सानक खढ़ि‍यान उदास लागै......। मेहनत बेकार भेलै बोनि‍-बुत्ता सेहो गेलै हाथो तरक गेल भैया लातो तरक सेहो गेलै केना कऽ करतै कि‍सान भाय लेबान उदास लागै भैया कि‍सानक......। कि‍सानक मनोरथ मोनेमे रहलै बि‍आह-दुरागमनक दि‍न पतरेमे रहलै नै जानि‍ कि‍अए सुखि‍ गेलै अासमान उदास लागै भैया कि‍सानक......। कि‍सानक पीड़ाकेँ कि‍यो नै बुझै छै धि‍या-पुता-बाल-बच्‍चा केना लि‍खतै-पढ़तै केना समस्‍याक हेतै नि‍दान उदास लागै भैया कि‍सानक......। बि‍हार सरकारसँ अर्जी गुल हसन करैए गीत माध्‍यमसँ सूचि‍त करैए सरकारे समस्‍याकेँ करतै नि‍दान उदास लागै भैया कि‍सानक......। अमित मिश्र, करियन ,समस्तीपुर बाल गजल

लहरि सागरक गाबै छै गीत कल कल सुनाबै छै

पानि सदिखन मचोरै ओ ढेह जे बनि कऽ आबै छै

कात आनै कते दूरसँ शीप मोती बहाबै छै

सूर्यकें जतऽ डुबाबै ओ चान ओतै उगाबै छै

ई तँ कखनो रुकै नै छै बढ़ब आगू सिखाबै छै

पानिमे जे लवण घोरल नीक भोजन बनाबै छै

मान छै ई तँ उपकारी अपन नदिकेँ बनाबै छै

फाइलातुन-मफाईलुन 2122-1222

बाल गजल

आइ दीदी लेल एलै बरियात गै चल सहेली देखबै फेरा सात गै

देख हमरा लेल एलै नव लंहगा एहिमे लागैछ  सुन्नर सन गात गै

चारि जनरेटर कते मचबै शोर गै मरकरीमे गाछकेँ चमकै पात गै

लाल छै पंडाल लागल छै भीड़ गै हाथमे माला लऽ दीदी एकात गै

गारि दै छै समधिकेँ भौजी देख ने तीन बाजल रातिकेँ भेलै प्रात गै

भेल की कानै हमर माँ परिवार गै संग छूटल "अमित" आश्चर्यक बात गै

फाइलातुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन 2122-2122-2212 बहरे-जदीद

बाल गजल बाबी कहै पाकड़िपर रहै छै भूत झटकैत चलि एतै नै तऽ जल्दी सूत

देखै छथिन नीनक देब घर घर जा कऽ जागल जँ किओ भेटै पकड़ि लै दूत

मालिश करै तेलक गाबि नव नव गीत काबिल कहै छथि आ नीक छी हम पूत

डिबिया जड़ै छै आ होइ झलफल आँखि नै आब उठबै भेलै सपन मजगूत

भोरे किए उठबै छथि करै छथि शोर यदि रातिमे "अमित"सँ ओ कहै छथि सूत

मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मफऊलातु 2212-2221-2221 बहरे-सलीम

बाल गजल काँपि रहलै मोबाईल बाजि रहलै ओकर टोन देख कुचरै छै कौआ जकाँ पड़ल ओ टेलीफोन

गीत गाबै चमकै भूक भाक लागै छै बड नीक झूमि रहलै सबहक देह नाँच करबै हम भरि मोन

छौंक लागल भनसाघर गमकल बनलै तरुआ फेर लेर अपने बाहर होइ पड़ल नै छै बेसी नोन

एक बीतक चाली छै पसरल आँगन कादो कीच आब कोना करबै खेल बचल नै छै कोना कोण

आब नै खेबौ बासी बचल भऽ जेबै हम बेमार काल्हि कहलनि डाक्टर सबसँ "अमित" जीवन सबहक सोन

फाइलातुन-मफऊलातु 2122-2221 दू बेर सब पाँतिमे भक्ति गजल भाँग खा कोना नशेरी भेलौं अहाँ भूत सन तन अपन कोना केलौं अहाँ

साँप माला साजि बसहा बुढ़बा लऽ यौ तीन लोकक नाँप कोना लेलौं अहाँ

विषकें पी नीलकण्ठी छी बनल यौ होश दैवक उड़ल से जीयेलौं अहाँ

तीन नैनक वाण खा जे जरि जरि मरल ओकरो सीधे तँ मोक्षे देलौं अहाँ

दानमे आगू अहाँ छी निर्धन बनल "अमित"कें शिव बिसरि कोना गेलौं अहाँ

फाइलातुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन 2122-2122-2212 बहरे-जदीद

भक्ति गजल सजल दरबार छै जननी भगत भरमार छै जननी

किओ नै हमर छै संगी खसल आधार छै जननी

भटकि रहलौं जगत भरिमे सगर अन्हार छै जननी

दुखक सागर बनल छी हम सड़ल पतवार छै जननी

दबल छी बोझ तऽर मैया अहींपर भार छै जननी

मफाईलुन 1222 दू बेर सब पाँतिमे बहरे-हजज

भक्ति गजल लिख रहल छथि पत्र सीता सुकुमारि यौ अपन पाहुन लेल नेहक रस ढारि यौ

उपरमे छै लिखल शादर अछि नमन यौ गामपर हेतै कुशल पूछै छथि सारि यौ

छी अयोध्यामे अहाँ हम जनकपुरमे सहल नै जेतै विरहकें ई मारि यौ

गाम जा गेलौं बिसरि निज पति धर्म यौ जोहि रहलौं बाट डिबिया बारि यौ

सून लागै घर बगैचा काटैत अछि प्राण बिनु तन हमर गेलै हारि यौ

हमर बहिनक हाल सेहो बेहाल अछि भाइ संगे आबि जैयौ दिअ तारि यौ

फाइलातुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन 2122-2122-2212 बहरे-जदीद

भक्ति गजल डूबि रहलै नैया बीच भँवर मैया काँपि रहलै छाती फेर हमर मैया

थाकि गेलौं तोहर घरक बाटपर माँ तन सकै नै चलबै कोन डगर मैया

तारि देलौं सबकें चरणमे बजा माँ बाज एतै बारी कखन हमर मैया

दानवक दलपर बनि काल टूटि पड़लें थम्हतै कहिया संकटक लहर मैया

जोड़ि कर विनति बस एतबे करब हम "अमित" दिश दे एक्को बेर नजर मैया

फाइलातुन-मफऊलातु-फाइलातुन 2122-2221-2122

भक्ति गजल लाल रंगक मोहमे फँसलनि हनुमान ते तँ लाले रंग सन बनलनि हनुमान

पवनपुत्रक नाम के नै जानै एतऽ सूर्यकें जहियासँ मुँह रखलनि हनुमान

काँपि रहलै राक्षसी सेना रण बीच प्रेत भूतक काल बनि हँसलनि हनुमान

राम सेवकमे सबसँ आगू हनुमान सुनि कऽ आज्ञा सिन्धुपर उड़लनि हनुमान

जपब चलिसा शुद्ध मोनसँ सब दिन भोर "अमित"पर तखनेसँ बड ढरलनि हनुमान

फाइलातुन-फाइलातुन-मफ ऊलातु 2122-2122-2221

भक्ति गजल आइ नाँचल मधुवन झूमि राधा संग प्रेममे नाँचल गोपी तँ कान्हा संग

खा कऽ मक्खन खेलथि खेल नटखट चोर साँझ धरि जंगलमे रहि कऽ मीता संग

नाथि देलनि नागक नाँक यमुना जा कऽ माँथपर चढ़ि केलनि नाँच यमुना संग

फोड़ि देलनि चूड़ी तोड़ि देलनि हार जखन रचलनि मोनक रास राधा संग

गायपर बैसल बजबैथ वंशी मधुर कान्हपर चढ़ि घूमथि गाम बाबा संग

फाइलातुन-मफऊलातु-मफऊलातु 2122-2221-2221 आइ मिथिलामे सीया सीया शोर भऽ गेलै आइ मिथिलामे सीया सीया शोर भऽ गेलै राति कारी छलै से इजोर भऽ गेलै

जनकक धिया जानकी एली घर घर बाजए बधैया छम छम नाचए बरखा रानी दूर भऽ गेलै बलैया धरती उज्जर, हरियर कचोर भऽ गेलै राति कारी . . . . .

उमरिक संग संग ज्ञानो बढ़ल बनली चंचल धिया आँगुर कंगुरिया शिव धनुष उठेलनि सगरो एकर चर्चा सीया धिया जगतमे बेजोर भऽ गेलै राति कारी . . . .

नित दिन गौरीक पूजा कएलनि वर परमेश्वर पएलनि त्याग तपस्या एहन देखू महलछोड़ि विपिन बौएलनि लव-कुशक प्रेम पुरजोर भऽ गेलै राति कारी . . . .

जानकी उत्सव आउ मनाबी बैसाखक शुक्ल नवमी जिनकर ऋणसँ उऋण ने हेतै ई मिथिलाक धरती "अमित" जागू नव दिवसक भोर भऽ गेलै राति कारी . . . . . नेङगरा दरबान

राजा जीक गाछीमे, दरबान बनि एलै चोर भरि राति खेलक आम चलि गेल भोरे-भोर कहियो लीची कहियो आम कहियो जामुन, कटहर बदलि-बदलि कऽ सब दिन खाए अंगुर आ बरहर मालीकें जे पता चलल तँ ओ बहुते तमसाएल आइ रातिमे सब सिखेबै, मुदा चोरबे नै आएल दोसर दिन जे चोरबा एलै, माली फोंफ काटै छल एकटा पुरना गाछपर चोरबा चुप्पेचाप चढ़ै छल एकटा ठाढ़ि कोकनल छलै पड़लै जखने टाँग ठाढ़ि सहित धरतीपर खसल टूटल हाथ आ टाँग ओ बुझै छल किओ नै देखै मुदा देखै छथि भगवान देलनि सजाय एहन जे बनि गेल ओ नेङगरा दरबान बाल कविता- पतंग बनाबै रे

पन्नी कागत फाड़ै रे सुन्नर पतंग बानबै रे मैदासँ बाटी भरै रे लाल आगिपर बरकाबै रे लस-लस लेइ बनाबै रे झारुक काठी आनै रे सीधा आ गोल राखै रे कागतक चिप्पी साटै रे लम्बा कागत काटै रे कोणपर पुँछरी बनाबै रे बहुते धागा आनै रे दू दिश भूर करै रे चल गुड्डीकेँ नाथै रे कनिये काल सुखाबै रे दैवा पवन बहाबै रे चल पतंग उड़ाबै रे बाधे बाधे दौड़ै रे अम्बरमे पतंग नाचै रे नीच्चा हमहूँ सब गाबै रे सब मिल पतंग बनाबै रे बाल कविता- बाबाकेँ

मोटका लाठी बाबाकेँ बड़का बाटी बाबाकेँ घर आँगन गुँजि रहल प्रेम भरल हँसी बाबाकेँ

भरल चुनौटी बाबाकेँ कान कनैठी बाबाकेँ नव नव सबकसँ छै भरल सबटा देल पोथी बाबाकेँ

कुर्ता -धोती बाबाकेँ कण्ठीक मोती बाबाकेँ एखनो सबटा इयाद अछि खिस्सा-पिहानी बाबाकेँ

डाँर झूकल बाबाकेँ दाँत टूटल बाबाकेँ कहिया एथिन भगवान घरसँ कते साल भेल देखल बाबाकेँ

बाल कविता- उसनल अण्डाक न्याय

एकटा राजा टुनटुन पूरमे राज करै छल बड नीकसँ एक दिन घटलै अजगुत घटना सोनमाकेँ पकड़ने एलै कोनमा कोनमा कहलक सोनमाकेँ देखू सरकार चोरा कऽ खेलक उसनल अण्डा राति अन्हार अण्डासँ मूर्गी बहरैतै ओहिसँ बहुते मुर्गी होइतै बेच बेच खूब पाइ कमैतौं बड़का गाड़ी बंगला किनितौं एकरा दिऔ सजा कड़ाइ हमरा दिआबू सबटा पाइ

राजा बहुते सोचमे पड़ल धियानसँ सबटा गप बूझल बूझि गेल कोनमाकेँ चालि बूधिक काल चलेलक हालि-हालि राजा कहलक सून रै कोनमा दौड़ल चलि जो अपन अंगना बबूरक गाछपर आम छै फरल तोड़ने आबें सबटा पाकल

कोनमाकेँ माँथा चकरेलै बबूरमे आम कतऽसँ एलै राजाकेँ निज शंका कहलक राज तखन गप बूझेलक जहिना बबूरमे नै आम फड़ै छै तहिना उसनल अण्डासँ नै मुर्गी जनमै छै कोनमा मानलक अपन गलती सोनमासँ भऽ गेलै दोस्ती न्याय देखि बड ताली बाजल नाँगरि दाबि कऽ कोनमा भागल राति दिवालीक

कारी-कारी राति डेराओन मुदा चमकि गेल दीप हजार मच्छर झड़काबैत हुक्का-पाती स्वाहा भेल कुरीतक संसार

पाड़ल अरिपन माँझ आँगन राँगल देबाल, चौकठि, केबार पुरना झगड़ापर पड़ल गर्दा भेलै नव जीवनक संचार

मधुर-मिठाइ, पूजा पाठमे लागल सभक घर-परिवार संग चुन्नू-मुन्नू, मुन्ना-टुन्ना लगा देलक फटक्काक पथार

राति दिवालीक सब दिन आबै सब दिन सजै मस्तीक बजार सब दिन आबथि लक्ष्मी मैया सब दिन राखब खोलि केबार

जनमदिनक शुभकामना

जनमदिन जे रामक एलै बनलै अगबे मधुर-मिष्ठान पात-पात हँसि-हँसि कऽ झूमै नाचै मोर, छेड़ै कोइली तान

कनियाँ-मनियाँ लड्डू बाँटथि ठुमकि-ठुमकि कऽ चलथि भगवान जखने रामके मधुर मुस्की छूटल काँपल रावण देलक पतनुकान

मातृ-पितृ भक्त, मर्यादा पुरूषोतम बाल-गोपल बनब ओहने महान सब साल आबि मेटाबू सघन तम जनमदिनक शुभकामना अछि भगवान प्रमाण

जेठक निर्मोही दुपहरियामे टूटल-भाँगल एकपैरियापर दुनियाँ भरिक विपतिक पहाड़ भरिगर बोझहामे बान्हि उठेने घामसँ भीजल चिर्री-चिर्री भेल कपड़ासँ भारतक गरीबीक प्रमाण दियाबैत खाधिसँ बचैत, झटकैत जाइत दस वर्षक लड़कीकेँ देखि कऽ प्रमाणित भऽ जाइ छै एकटा कथन जे सत्तमे महापापी छै मनुखक पेट गीत निरमोहिया अहाँ भेलियै पिया गामसँ किए चलि गेलियै पिया आँखिमे नोर दऽ गेलियै पिया इयादि अपन छोड़ि गेलियै पिया

भोर भेलै आ बाजल मुरूगबा कली खिल कऽ बनि गेलै फूल चहुँ दिश इजोतक भेलै राज्य चलल परीन्दा बान्हि हुजूम एहनमे इयादि आबि अहाँ सब किछु भऽ गेल धुआँ धुआँ आँखिमे नोर दऽ . . . . .

एलै वसंत आ एतै फागुन आम महुआ गेलै मजरि कू कू कुहकऽ लागल कोयलिया मधुसँ मधुकर गेलै तरि जाड़ बितल तरसैत ओछैना इहो मास बितत अहाँ बिना आँखिमे नोर दऽ . . . . . . . जीवन एहिना चलैत रहै छै

कखनो घटाउ आ कखनो जोड़ै छै कखनो गुणा कखनो भाग करै छै कखनो आगू कखनो पाछू घुसकै छै जीवन एहिना सतत चलैत रहै छै

कखनो दुखक भूकंप सुनामी आबै छै कखनो सुखक गमगम फूल बरसै छै कखनो भीड़मे कखनो एकान्त जीबै छै जीवन एहिना सतत चलैत रहै छै

कखनो पिछरै कखनो दौड़ै छै कर्मक पथपर काँट-रोड़ो भेटै छै नदी नाला सब बाधा लाँघै छै जीवन एहिना सतत चलैत रहै छै

किछुए दिनकेँ साँस भेटै छै जे किओ एक्को पल नै रुकै छै घड़ीक सुइया संग जे किओ बढ़ै छै वएह मानव एतऽ अमर रहै छै जे बैसल समय व्यर्थ करै छै वएह मनुख सब दिन कानै छै एहन लोक लेल किओ नै रूकै छै जीवन एहिना सतत चलैत रहै छै जागू

कान्हपर धेने झोरा-झपटा सौँसे माँथ चानन-ठोप्पा हाथ कमण्डल आरो चुट्टा दाढ़ी लटकल कोशो जट्टा नङ-धरङ रगरने भभूत नेने भागै बूझि कऽ भूत टाका-अन्न माँगैथ लऽ रामक नाम पैदल जाथि घर घर सब गाम एहिमे किछु छथि सत्ते भक्त आ किछु छथि ढोंगी ससक्त गलत काज आ अंधविश्वास हुनक खूनमे केने छै वास सब रोगक उपचारक दावा एह भेषमे ई सब छथि गामक बाबा ए .सी घर आ फूलक ओछेनपर धुमन आगरबत्तीक महक  आठो पहर शिष्य मण्डलीमे नर कम बेसी नारी सरकारी वा नीजी लागल पहरेदारी ई छथि सब शहरक बाबा हिनको छै बड पैघ पैघ दाबा सब समस्याक हिनका लग उपचार लाखक-लाख टाका देलापर भेटत साक्षात्कार किओ फेकबेलनि घरसँ बाहर मूर्ति किओ अपनेकेँ बतबै छथि अवतरित देवी अंधविश्वासक हिनको लग हल्ला पढ़ल जनताकेँ मूर्ख बनाबथि खुल्लम खुल्ला

जागू जागू एखनो यौ भाइ बादमे की हएत पछताइ दऽ दिऔ भूखलकेँ दूध-मेवा बाँटि दिऔ गरीबमे सब टाका नाङटकेँ पहिरा दिऔ कपड़ा एकरे दुआसँ शान्त हएत ग्रह-नछतरा तखने करताह भगवानो भलाइ जागू जागू एखनो यौ भाइ मित्र

किछु पुरना मित्र जेकर बस इयादे टा छल बचल बाधक गीत इस्कूलक खेल क्षणमे झगड़ा क्षणमे मेल किछु नीक किछु बेजाए गपशप बाल दिनक खून करै रपरप जेकरे संगे होइ छल साँझ-भोर ओ चन्ना आ हम चकोर मुदा समयक संग सब किछु बदलल सबपर आब टाकाक रंग पोतल सबहक मोन एना बदलि देलक आब देखिते ओ मित्र मुँह फेर लेलक । समयक संग

नै शेष बचल कोनो उमंग ठमकल सन जिनगीक तरंग कोना कऽ उड़तै मोनक पतंग आशक डोर बीच्चेमे भेल भंग सब ठाम राजनीतिक बड़का जंग अपनौती भैयारी भेल अपंग सालक साल एक्के ठाम सब प्रसंग टूटल छै देशक समाजक विकासक अंग

मुदा सदिखन बदलै छै जीवनक रंग बैसल रहलासँ नै जीतब कोनो जंग छोरू सबहक चिन्ता बनबू अपन एक ढंग अपन विकासक लेल करू अपनेकेँ तंग रूकू नै बढ़ैत रहू सदिखन समयक संग

"नारीक रूप" सब दिन देखैत छी सब अखबारक पहिल पन्नापर आइ एतऽ तँ काल्हि ओतऽ छीन लेल गेल नारिक इज्जत डाहि देल गेल कोमल कायाकेँ वा चापि देल गेल घेँट कोनो निसबद रातिमे हाट बजार सब ठाम देखैत छी छेड़छाड़ होइत कोनो नवयौवना संग आ ओहि नवयौवनाक राँगल चामपर आबै छै कने लाजक वा क्रोधक लाली सुरमासँ कारी भेल आँखि आ रंगीन पिपनीपर खीँच जाइ छै गोस्साक चेन्ह संगहि राँगल ठोरसँ निकलैछ मीठ तरंग "की तोरा घरमे बहिन नै छौ?" कहबाक मने रहै छै एक्के टा जे हमर सम्मान कर भऽ सकै यै ,हमरा बहिन नइ होइ भऽ सकै यै ,हम कहियो पति बनबे नै करी तखन नारिक ई दुनू रुपकेँ हम सम्मान नै करब तँ की हम नारिक अपमान करब? नै ।हम एखनो नारिक एकटा रूपकेँ मानै छी जे रुप हमरा जीवन देलक ओ रूप जेकर कोरामे खेलल छी ओ रूप थिक माएक रूप तेँ हम नारिक इज्जत कोनो पत्नी-बहिन रूपमे नै बल्कि अपन जननीक रूपमे करब कुन्दन कुमार कर्ण बाल गजल

फुल फुललै फुलबारीमें, बनल जतरा ताही ऊपर खेलैछै कते भमरा

नाचै मयुर डुबिक अपने मनक धुनमें लागै बड निक चुन चुन जे करै बगरा

सब गाछीपर जे बानर कुदै छरपै बर गाछीपरसं सुनबै सुगा फकरा

कोर्इली कुचरै गाछपर भिनसरमें बोली मधुर बहुत निक लागलै हमरा

खेलब कुदब अहीना फुलक सँग सदिखन  हम बांटब नितदिन पंक्षी क खुब अहरा

मफ्ऊलात्-मफार्इलुन्-मफार्इलतुन् २२२१-१२२२-१२११२ गजल

मोनके बात कहि दिअ प्रेमके संग बहि दिअ

दिल हमर अखन खाली ताहिमें प्रिय रहि दिअ

मीठगर चोट नेहक  कनि अहाँ प्रिय सहि दिअ

ठोरपर हँसिक मोती हँसि हँसिक प्रिय गहि दिअ

भावना हमर लिअ बुझि दर्द मधुरसन नहि दिअ -------------------------- फायलुन्-फाइलातुन्. २१२-२१२२ आशीष अनचिन्हार नुकाएल बलात्कारी रूप हरेक मर्दक भित्तर नुकाएल रहैत छै एकटा बलात्कारी रूप जकरा चाही समय आ सहयोग, आ हरेक घटनाकेँ पछाति बदलि जाइ छै दृष्टिकोण महिलाक चाहे ओ हमर माए-बहीनि होथि की महिला सहकर्मी वा की बाटपर चलैत कोनो अन्य स्त्री ओकरा सभ लेल घटनाक पछाति कोनो सम्बन्ध इयाद नै रहै आ रहै जाइ छै मोन जे हम स्त्री छी आ ओ पुरुष माए-बहीनि सेहो कनछिया कए देखए लगैत अछि आ महिला सहकर्मी सेहो.... ओना हमर माए-बहीनि केर परिवेश आ हमर महिला सहकर्मी केर परिवेश भिन्न छै मुदा एहन घटनाक पछाति ओकर सभहँक मनोवृति एकै भए जाइत छै हरेक स्त्री केर नजरिमे बनि जाइत छी अपराधी सन आ नै रहि जाइए घमण्ड अपन मोछपर लगैए जे जँ लागि जेतै आगि मोछमे तँ कतेक नीक रहितै आ पहिल बेर हमरा अपन मोछपर घृणा होइए आ हम कहियो ने कहि सकै छी जे बलात्कारी हम नै छी दोसर पुरूष छै कारण ई अपन जिम्मेदरीसँ भागब हएत हँ हम आइ इ स्वीकार करै छी जे हरेक मर्दक भित्तर नुकाएल रहैत छै एकटा बलात्कारी रूप हम अपनाकेँ साधू-महात्मा बनेबाक लेल हरेक स्त्रीकेँ माए-बहीनि नै कहबै मुदा हे स्त्री अहाँ जै स्वरूपमे हमरा लेल छी चाहे माए-बहीनि रूपमे वा प्रेमिका, पत्नी, बाटपर चलैत आन कोनो वा हरेक रातिमे जागि क' अपना माथापर वेश्याक चिप्पी सटने आइ हम लज्जित छी अपन मर्द होमएपर हम समवेत रूपसँ माफी मँगैत छी अहाँ सभसँ गजल लिखबाक छल गरीबक लचारी गजल देखू मुदा लिखल हम सुतारी गजल हम आब बेचि लेलहुँ हँसी ओ खुशी बाँचत कते समय धरि उधारी गजल अन्हार आब भगबे करत घरसँ यौ भगजोगनीक संगे दिबारी गजल सभ चप उलारकेँ खेलमे मग्न अछि जनताक टूटि रहलै दिहाड़ी गजल फरि गेल छै कबइ कवि अपन देशमे सौंसे सुना रहल बेभिचारी गजल दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ गजल

शोणितसँ छै बनल नोर हम्मर भेलै हँसी तँ अंगोर हम्मर

हम तँ छी आब साँझक भरोसे नीलाम भेल छै भोर हम्मर

हम देखबै किए दोसरक दिस तोंही तँ छहक चितचोर हम्मर

कोनो सुधार नै देशमे छै लोक तँ बड्ड कमजोर हम्मर

बाटक हिसाब नै पूछ मीता टुटि गेल आब संगोर हम्मर दीर्घ-दीर्घ-लघु-दीर्घ+ लघु-दीर्घ-दीर्घ+ लघु-दीर्घ-दीर्घ हरेक पाँतिमे गजल हाथ बढ़लै दुन्नू दिससँ डेग उठलै दुन्नू दिससँ थरथराइत देहक भास ठोर सटलै दुन्नू दिससँ कहि रहल ई गर्मी आब आगि लगलै दुन्नू दिससँ लात फेकै छै जनतंत्र लोक फँसलै दुन्नू दिससँ घोघ उठलै साँझे राति चान उगलै दुन्नू दिससँ बान्ह टुटलै एलै पानि लोक भगलै दुन्नू दिससँ दीर्घ-लघु-दीर्घ-दीर्घ + दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-लघु हरेक पाँतिमे गजल काशी काबा एक छै सभहँक दाता एक छै मतलब छै काजहिसँ ने खुरपी खाता एक छै धधकै छै स्त्री घरहिमे चुल्हा जाँता एक छै बँचले रहिअह सदति तों. नेता नारा एक छै ई छै दोसर सभ मुदा धरती माता एक छै हरेक पाँतिमे-- दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-लघु-दीर्घ मतला सधुक्करी पाँतिक अनुवाद अछि। किशन कारीगर होरी मे मचाउ हुरदंग (हास्य कविता) होरी मे मचाउ कनी हुरदंग खुशी सँ जिनगी हुए रंग-बिरंग “कारीगर” दैत अछि शुभकामना खूम होरी खेलाउ दोस महीमक संग। उज्जर मुहँ लाल-पीअर करू खुशी मनाउ कनियो ने डरू बुढ़बा बाबा मना करैथ त’ हुनका माथ पर रंग-बिरंग बैलून फोरू। रस्ता पेरा रंगीन भ’ गेल डंफा बजाउ फगुआ गाउ अहाँ अपने मने झुमू आई सभ मिली रंग घोरू। मलपुआ खाउ अबीर उड़ाउ आई केकरो नहि अहाँ छोड़ू पिचकारी मे रंग भरि ओकरा रंग-बिरंग क’ छोड़ू। कि बुढ़-पुरान कि छौंड़ा मारेर धियो पूताक मोन भेल रंगीन अबीर उड़ाउ खुशी मनाउ अंगने-अंगने होरी खूलाउ। आई कियो नहि मना करत सभ नाचै अपना ताले डंफा डूगडूगाउ ढ़ोलक बजाउ नाचू अहाँ अपना ताले। होरी आबि गेल औ भाई रंग घोरै मे जुनि पछुआउ हरमोनियावला हे यौ पिपहीवला आउ-आउ सभ मिली जोगीरा गाउ। कक्का औ बेसी नहि छिड़िआउ आई नहि मानब एक्को टा बात बाल्टी मे अछि रंग घोरल उज्जर मुह करब कारी सियाह। हँसी खुशी सँ होरी खेलाउ आ खा लियअ देसी भंग जिनगी होएत रंग-बिरंग होरी मे मचाउ कनी हुरदंग डिनर डिप्लोमेसी (हास्य कविता) डिनर टेबल पर परोसल अछि मटर पनीर आ शाही पनीर छौंकल अछि घी देसी आउ-आउ ई छी डिनर डिप्लोमेसी। हम सतारूढ़ दल वला छी आई सहयोगी दल वला लेल डिनर माने भोज आयोजित भेल हमरा समर्थन भेटल खूम बेसी। आब बाहर सँ समर्थन देनिहार बाकि रहि गेल छथि त आई हुनके नामे राजनीतिक डिनर ई छी डिनर डिप्लोमेसी। अहाँ सभ जे खाएब हम अहाँक फरमाईस पुराएब मुदा एकटा गप कहि दि हम बाहरि समर्थन के कहाबद्धि कराएब। भरि पेट खाई जाई जाउ अहाँ जे खाएब से हम खुआएब मुदा ई कहू त चुपेचाप रहब आ की मध्यावधि चुनाव करबाएब। धू जी महराज अहूँ त एकदम ताले करैत छी खाइत-पीबैत काल ई गप नहि पहिने दारू मँगाउ अहाँ बिदेशी। डिनर टेबुल के नीचा मे देखू बोतल राखल अछि देसी-बिदेशी भरि छाक पीब लियअ ई छी डिनर डिप्लोमेसी। अच्छा ई कहू त सरकार एतेक खर्चा अपना जेबी आ कि सरकारी खजाना सँ हमरा ध लेलक बेहोशी। होश मे आउ गठबंधन बचाउ हम सत्ता मे छी की कहू अपनो खर्चा सरकारी भेल बड्ड बेसी ई छी डिनर डिप्लोमेसी।। दूधपीबा नेना आजुके दिन जनमल “कारीगर” खुशी सँ हम कहू कोना? हर्षित भेल अछि मोन हमर देलहुँ स्नेहबश अहाँ जे शुभकामना। केखनो के हँसी हम केखनो अपने मने कानी मेला घूमै काल माए बाबू संगे करी हम कोनो बहन्ना। आई मोन होइए फेर सँ बनि जाए हम दूधपीबा नेना रूसल छी आई ने मानब हमरा किन दियए ने एकटा झुनझुना। दाई के कोरा मे खूम खेलाई बाबाक कोरा मे हम कानी मामा संगे आबि जो रे बौआ सोर करैथ हमर बुरहिया नानी। ओई कोरा सँ ओई कोरा जाई केखनो क’ कानी केखनो खेलाई फेर झुल्ला गाड़ी पर बैसी क’ अंगने-अंगने घूमलहुँ हम आई। कियो दुलारैथ कियो पुचकारैथ कान पकड़ि के उठाबैत-बैसाबैथ आउ बौआ एम्हर आउ सभ कियो हमरा सोर पारैथ। लुक्का-छिप्पी हम खूम खेलाई तहि दुआरे बड़का बाबू खिसिआइथ कतए हेरा गेल दुलरूआ बौआ टुकुर-टुकुर ताकैथ बुरहिया दाई। आइओ रूसले रहब आ कि हँसब खेलौना पिप गाड़ी, आ कि झुनझुना? जन्मदिन पर पुछलीह हमर माए किछु ने फुराए, की कहत दूधपीबा नेना। मनुक्ख बनब कोना? छीः छीः धूर छीः आ छीः मनुक्ख भ’ मनुक्ख सँ घृणा करैत छी ओही परमेश्वर के बनाउल माटिक मूरत हमहूँ छी अहूँ छी। केकरो देह मे भिरला सँ कियो छुबा ने जाइत अछि आबो संकीर्ण सोच बदलू ई गप अहाँ बुझहब कोना? अहिं कहू के ब्राह्मण के सोल्हकन? के मैथिल के सभ अमैथिल सभ त’ मिथिलाक मैथिल छी आबो सोच बदलू मनुक्ख बनब कोना? अपना स्वार्थ दुआरे अहाँ जाति-पाति के फेरी लगबैत छी मुदा ई गप कहिया बुझहब सभ त’ माँ मिथिले के संतान छी। पाग दोपटा मोर-मुकुट सभटा त’ एक्के रंग रूप छी मिथिलाक लोक मैथिल संस्कार एसकर केकरो बपौती नहि छी। एकटा गप अहाँ करु धियान सभ गोटे मिथिलाक संतान जाति-पातिक रोग दूर भगाउ सभ मिली कए लियअ गारा मिलान। अपने मे झगरा-झांटी बखरा-बांटी एहि सँ किछु भेटल नहि ने? सोचब के फर्क अछि नहि कोनो जादू टोना अहिं कहू आब मनुक्ख बनब कोना? बेमतलब के गप पर यौ मैथिल अहाँ एक दोसरा स’ झगरा करैत छी माए जानकी दुखित भए कानि रहल छथि ई गप किएक नहि अहाँ बुझहैत छी? सामाजिक-आर्थिक विकास लेल काज करु मिथिलाक माटि-पानि उन्नति करत कोना केकरो स’ कोनो भेदभाव नहि करु सप्पत खाउ अहाँ मनुक्ख बनब कोना? मुन्नी कामत किअए बेटी बनेलहक विधाता? पजेब अछि पएरमे जेकर घ्वनि मघुर अछि मुदा पकर बहुत मजगुत कहैत अछि कि तूँ अजाद छेँ मुदा अछि सीमा कदम-कदमपर। एगो एहेन दिवारक जे बनल अछि; बनु बालु-सिमेंटसँ सोचक दिवार! चाहे आसमानमे उड़ी हम मुदा ओइ दिवारक ऊंचाइ नै खतम होइत अछि आखिर कतेक जनम तक पाछाँ करत ई दिवार! आ कखैन तक हम कहब किअए बेटी बनेलहक विधाता!!! दुनियाँ तबाह भऽ गेल! बाबू किअए एहेन समैक घारा बदललैए सच्चे कहैए छेलैए मुसहरु कक्का “दू हजार बारहमे दुनियाँ तबाह भऽ गेलै! नित अतए अन्याय होइ छै” मनुख-मनुखकेँ मारने फिरै छै आन गोरेक कअ बात छोरह भाय-भाय आ बेटा बापकेँ कोदाइरसँ काटने फिरै छै। अपने घरमे सभ हराएल रहै छै पड़ोसी जकाँ सभ घोसि‍आएल रहै छै नै छै केकरोसँ मेल-मिलान घर-घर नचि‍ रहल छै कोन अभिशाप। अंगनामे तुलसी सुखाएल जाइ छै नारीक लक्ष्‍मी रुप हराएल जाइ छै नै डरै छैय कोइ भगवानसँ नित गिरै छै अपने इमानसँ। ईमानदारी लुप्त भऽ बेइमानी उजागर भेलै झूठक खेती पनपति‍ गेलै मनसँ मन दूर भेलै सच देखहक बाबू यएह छि‍ऐ ठीके दुनियाँ तबाह भऽ गेलै। बेटी-लहास एक-एक दिन बितल पुरल एक मास, अन्‍हार घरमे सूतल छेलौं हम नअ मास। देखै‍क बहुत जिज्ञासा छल हमरा ऐ घरक मालिककेँ जे नअ मास तक बिनु कहले मेटबैत अएल हमर सभ भूख पि‍यास। आइ भेटत रौशनी हमरा देखब हम संसारक चेहरा, लेब हम आइ नव जीवनक साँस पुरा हएत हमर आइ सभ आस। आँखि‍ बंद अछि किछो देख नै सकै छी हम मुदा महसुस भऽ रहल-ए एगो ब्रज हाथ, जे दबौचि‍ रहल अछि हमर कंठकेँ एगो अवाज जे बार-बार हमरा कान तक पहुँि‍च रहल अछि बेटी छि‍ऐ माइर दहि‍न! बस रूकि‍ गेल हमर साँस बनि‍ गेलूँ हम लहास। फगुआ सब मिलि‍ करैए हमजोली कान्ह संग गोपिया खेल रहल अछि होली। निला पिला लाल हरा अछि सभ रंग सुनेहरा आइ बेरंग नै रहैए कोय चाहे धोती होय या घाघड़ा। दादी चाउरक पुआ बनेतै माय दही आ खीर खियेतै बाबू देतै आशिष रंगा-रंग होय सबहक जिनगी जिबैए सभ लाख बरिस। ई अवसर नित अबैत रहैए ई मेल-मिलाप बनल रहैए नै हइय केकरोसँ झगड़ा सभकेँ मुबारक ई दिन प्यारा। आनहर कानुन देश-देशसँ एलै अवाज तैयो नै बदलल हमर समाज। नै होइए एकरा दरद कोनो नै देखैए ई कोनो पाप किएक तँ बानहल अछि एकरा आँखि‍पर कारी साँप। जे डसि‍ रहल अछि हमर संस्कारकेँ हमर अच्‍छाइकेँ आ करा रहल अछि हमरासँ नीत पाप। प्रीति‍ प्रि‍या झा कऽ देलखि‍न उपकार महाशय कऽ देलखि‍न उपकार महाशय बेटा बनि‍ जनम की लेलखि‍न लगैछ जेना अश्वमेघ यज्ञक वि‍श्ववि‍जेता- श्रीराम वा पुष्‍यमि‍त्र पाग-मौर मुरेठा ओ पगरी पहि‍रबाक उमेर भेलनि‍ नै की महाराजक भाव राजकुमारक ताउ वि‍कबाक लेल तैयार सत्‍य हरि‍श्चन्‍द्र वचन खाति‍र सेहो बि‍कल छलाह मुदा! तैयो माथ नि‍चाँ छलनि‍ एहेन वरदक कोन इज्‍जति‍ कोन मान....? बचबू भगवान एहेन दैत्‍यसँ आर्यावर्त्तक नारीकेँ चाम मोट, बोल चाखगर तराजू कमजोर पासंग भरि‍गर लाखक लाख टकाक संगे-संग सोनाक गरदाम चारि‍ चक्का चाही कि‍छु दि‍न पछाति‍ एरोप्‍लेन मांगतथि‍ कनि‍याँ चाहि‍यनि‍ वि‍श्वसुन्‍दरी डूमि‍ रहल समाज काटरक लीलामे दुर्भाग्‍य जे नारीक शत्रु नारी बापसँ बेसी माय पसारथि‍ गोरथारी जखन बेटीक माय तखन कनैत अछि‍ जखन बेटाक माय तँ मंगरैल बेटाकेँ “वासमती” सन कनि‍याँ चाहि‍यनि‍ एक्केटा कन्‍यामे सोल्होकला छत्तीसो गुण समाजक अद्योगति‍ उग्र भऽ गेल...। राजीव रंजन मिश्र गजल 

माए सदति अनमोल लगैत छथि मिठगर अमृत सन बोल बजैत छथि

सदिखन सहल सभ बात कचोट ने गाए बनल अहलाद बँटैत छथि

मोनक अपन सभ बात दबौवलथि सन्तान लै सुख चैन रचैत छथि

दमसब हुनक नित बाट सुझैत टा  बिहुँसथि मनुख जे नेह करैत छथि 

माए सुनर उपहार सनेश थिक खनहन रहथि "राजीव" रटैत छथि 

२२१२ २२१ १२१२ जानकी गीत 

माँ जानकीक जनमदिन घर घर मे हम मनाबी सभ मिलि ख़ुशी मनाबी अ-क्षत दीप हम जराबी  माँ जानकीक जनमदिन...........

मिथिला जिनक छल नैहर,मैथिल अपन छलथि यौ हम मैथिलक धरम बुझि,करतब अपन पुराबी  माँ जानकीक जनमदिन...........

मिथिलेशनंदनी छथि सदति ममताक रूप सुन्नर चललीह जे बाट सत्तक हम गीत हुनक नित गाबी  माँ जानकीक जनमदिन...........

धियाक रूपे गुनगर,भार्याक रूपे लुरिगर दुहि कुलकँ लाज रखलीह गहि मान हम बढाबी माँ जानकीक जनमदिन...........

हे माए हम छी बुरिबक,महिमा ने जानि सकलहुँ रही ने आब निरसल नब रूप धए देखाबी  माँ जानकीक जनमदिन...........

"राजीव" यैह बिनबैथ,जग जननि जानकीसँ मैथिलकँ ज्ञान जागय,इतिहास पुनि रचाबी  माँ जानकीक जनमदिन........... राजदेव मण्‍डल पसरैत प्रशाखा जर्जर बूढ़ अनचि‍न्‍हारक गाछ हवा नचा रहल छै नाच लटकल असंख्‍य डारि‍-पात चारूभर आ काते-कात सहने हएत कतेक अधात केतेक छूटल केतेक साथ करैत एक दोसरसँ बात परेमसँ भेल स्‍नात। हमर चलैत अन्‍ति‍म साँस स्‍वजन-परि‍जन आस-पास एकेटासँ बढ़ि‍ केतेक रास सँगे चलैत सि‍रजन वि‍नाश झूठ-साँच मध्‍य नचैत नाच हम बन छी अनचि‍न्‍हक गाछ। खसैत बुन्‍द खसैत बून-बून गाबै गुन-गुन चिड़ै चुन-चुन झि‍ंगुर झुन-झुन बरसैत मगन धन देखैत मन नयन नाचैत सुमन मन तृषि‍त भीजैत तन सूखल कण-कण अमृतसँ मि‍लन। चलैत रहत आखेट नै टुटत जि‍नगीक गेँठ आबि‍ गेल जेठ दुख गेल मेट सभ कि‍छु समेटि‍ आब हएत भेँट। गन्‍तव्‍यक भरम मन भऽ गेल पुलकि‍त गाबए लगलौं गीत मि‍लि‍ गेल मंजि‍ल भऽ गेल हमर जीत जेकरा बुझलौं मंजि‍ल ओ कहलक- “अहाँकेँ नै अछि‍ अकि‍ल लटकल छी अधरममे फँसल छी भरममे जेकरा ताकैले एते प्रयास से धेने अछि‍ अहींक आस कि‍एक बखतकेँ करै छी नाश ओ तँ अछि‍ अहींक पास।” दरदक भोर अखन‍ तँ भेलै दर्दक भोर साँझमे देखबै अन्‍ति‍म छोर चि‍चि‍आइत मन करै शोर कानब तँ सुखि‍ जाएत नोर तानब तँ छूटि‍ जाएत जोड़ डरे धेने छी केकर गोड़ थाह नै भेटए थोड़बो-थोड़ ताकब दरदक अन्‍ति‍म कोर छोड़ि‍ देत ओ हमर पछोड़। केहेन मांग असली मांग बजल अर्द्धांग “जि‍नगी भरि‍ बनले रहब बताह काटि‍ते रहब हम कठ आ काह पलि‍वारक नै अछि‍ परबाह डूमि‍ जाएत आब घरक नाह जरि‍ गेल सभ मनक चाह केना कऽ चलब काँट भरल राह।” करै छी जौं गप्‍पपर वि‍चार मन बहैत अछि‍ तेज धार तँए, पटि‍यापर पटुआ गेलौं लाजे कठुआ गेलौं केना करब एकरा सम्‍हार पाबि‍ नै रहल कोनो पार रखबाक छै सबहक मान करए पड़त एकर नि‍दान। लटकल छी दुनू हाथ अछि‍ कड़ीसँ बान्‍हल ओहीपर हम अँटकल छी पएरक नीचाँ उधि‍अाइत समुंदर आसमानमे लटकल छी छड़पटेलासँ हाड़-पांजर दुखाइत अछि‍ बेसी चि‍चि‍एलासँ कंठ सुखाइत अछि‍ कहुना कऽ जीब रहल छी जि‍नगीक जहर पीब रहल छी नीचाँ गीरब तँ डूमि‍ मरब तँए की हम लटकले रहब आब नै मानब जेकरा नै देखने छी तेकरो जानब बन्‍हन तोड़ि‍ नीचाँ फानब नै डरबै कठि‍न कारासँ लड़बै वेगयुक्‍त धारासँ करबे करब पार उधि‍आइत तेज धार देख रहल छी समुद्रक कछेर तोड़ए पड़त आब कड़ीक घेर जेकरा करबाक चाही सवेर तेकरे केलौं अबेर। बटमारि‍क गीत कि‍एक कऽ रहल छी एना ठेमम-ठेल यौ हम नै छी बकलेल यौ। जहूक लेल हम छी जोग तहूसँ भेल छी अभोग कि‍अए ने भेट रहल अछि‍ जगह हमरो लेल यौ हम नै......। हमरो मन छल गबि‍तौं गान घटले जाइत अछि‍ मान-समान कष्‍टमे रहत जँ मन-प्राण कतएसँ गाएब सुख केर गान दुखसँ नाता अछि‍ आब हमर जुड़ि‍ गेल यौ हम नै......। हमरा लेल जगह नै खाली व्‍यंग्‍यसँ बजबैत अछि‍ सभ ताली असली-नकली करि‍ते-करि‍ते हमहीं बनि‍ गेलौं पूरा जाली हमरा सँगे चलि‍ रहल ई कोन उनटा खेल यौ हम नै......। अहाँ कहै छी- “धरू आस करू बारम्‍बार प्रयास एक दि‍न करै पड़तै अहूँसँ ओहि‍ना मेल यौ नै रहब अहाँ बकलेल यौ।” हम नै......। रूचि‍गर केहेन चीज अहाँक लगत नीक हमरा भेटत ओहीसँ सीख दौगैत रहैत अछि‍ तन अन्वेषण करैत मन वि‍चरण करैत धरासँ गगन पैघ पहाड़ आ कण-कण कतेक बहैत अछि‍ नोर राति‍-दि‍न आ साँझ-भोर डुमैत रहै छी अपने भूख तब देखबै छी अहाँक दुख कल्पनामे देखैत छी भऽ कऽ मूक परोसैत छी अहाँ लग सुख तैयो भऽ जाइत अछि‍ चूक कहाँ बदलैत अछि‍ अहाँक रूख आब देखेबाक अछि‍ मृत्यु-चि‍त्र ओ हएत केहेन वि‍चि‍त्र ऐ देहकेँ छोड़ए पड़त यौ मि‍त्र तब बना सकब ओ चि‍त्र घेरने अछि‍ मोहक कड़ी बि‍तल जाइत घड़ी-पर-घड़ी अहीं छी असल प्रहरी तोड़ू कड़ी तोड़ू कड़ी। बजैत एकान्‍त बजैत अछि‍ सुन-मसान कि‍यो ने दैत अछि‍ कान गबैत रहैत अछि‍ अनवरत गान जुग-जुगसँ संचि‍त ज्ञान चारू भर स्‍वरक घमासान सुनहट ठाढ़ अपनहि‍ शान हरक्षण दैत अनुपम दान बि‍नु शब्‍दक बजैत ज्ञान स्‍वर सुनैत छी कि‍न्‍तु अछि‍ चुप केहेन हएत स्‍वरूप वाणी अछि‍ एतेक मधुर तँ रूप हेतै केहेन अनूप बैसल छी एकान्‍तक कोड़मे भऽ रहल सर्जना मनक पोर-पोरमे यादि‍ अबैत अछि‍ करम टूटि‍ रहल बहुतो भरम सुनि‍ रहल अछि‍ हमर कान शान्‍ति‍क गुन-गुन गान बरि‍स रहल सुन-मसान कऽ रहल छी पावन स्‍नान। स्‍वरक चेन्‍ह स्‍वर आबि‍ रहल आकाशक कोनो छोरसँ दरद उठि‍ रहल देहक पोरे-पोरसँ अहाँक सोर पाड़ब हम सुनि‍ रहल छी असंख्‍यमे सँ अहाँक स्‍वर चुनि‍ रहल छी टपब खेत-खरि‍हान देश-कोस मनमे अछि‍ मि‍लन केर जोश बि‍यावान झाड़-पहाड़ नदी-नालाकेँ करैत पार पहुँचब एक दि‍न अहाँक पास लगौने छी मनमे आस स्‍वरक चेन्‍ह अछि‍ ठामे-ठाम नै बि‍सरब आब अहाँक गाम कि‍एक भऽ रहल छी अधीर मनमे उठैए रहि-रहि‍ पीर हएत शुभ मि‍लन रहू थीर बरसत एक दि‍न शान्‍ति‍क नीर।‍ सुखक भाय तोड़ि‍ रहल छी फूल गड़ि‍ गेल हाथमे शूल भऽ रहल केहेन स्‍पर्शक सुख हाथमे गड़ल काँटक दुख नै छोड़ि‍ सकैत छी आ ने तोड़ि‍ सकैत छी चलैत जि‍नगीकेँ नै मोड़ि‍ सकैत छी वि‍चारक क्रमकेँ जोड़ि‍ सकैत छी फड़तै अलग-अलग फल कि‍न्‍तु एकेटा उद्गम स्‍थल सुख आ दुख दुनू छी भाय रहत सँगे नै छै उपाय। हएत अगारी सभ खेलै छलै अपन-अपन खेल नै छलै केकरो आपसी मेल सभ चलैत छल अपन-अपन चाल अपने समांगपर फूटै छलै गाल लोकक सिखऔलपर तोड़ैत छल गाल सबहक भेल छलै हाल-बेहाल कतेक प्रयास कतेक नोकसान तब देलक हमरा गप्‍पपर धि‍यान बनल एकता कतेक छान-बान्‍ह बालुक बान्‍ह कोन ठेकान खुश भऽ सभ ठोकए लगल ताल चुप्‍प नेता भऽ गेल वाचाल ओझरा कऽ फँसल ओ लोभक जाल ठाढ़ भऽ गेल कठि‍न सवाल फेर बनलौं एकबेर बकलेल जखैन नेते स्‍वार्थी भऽ गेल पुन: ताकबै खेल रहतै जारी जे नै भेलै से हेतै अगारी। मनुखदेवा सभ मनहि‍-मन पूजि‍ रहल अछि‍ एक-दोसराक गप्‍प बूझि‍ रहल अछि‍ मनक केना बूझत सभ बात कहए चहैत अछि‍ छूबि‍ कऽ गात पकड़लक पएर भऽ कऽ कात हमरो दुख सुनि‍ लि‍अ तात जखैने देवक देहमे भि‍रल ठामहि‍ ओ ओंघरा कऽ गि‍रल जेकरा कहै छलौं महान से अपनहि‍ अछि‍ बेजान आब के देत सुन्नर काया सम्‍पति‍, यश, सम्मान खूजि‍ गेल सभटा राज तैयो भीतरसँ नि‍कलए आवाज- “छलै जे पावन बना देलि‍ऐ अपावन भऽ गेलै नि‍ष्‍प्राण छुबलासँ घटि‍ गेलै मान पहि‍ने बनल छल देवा आब भेल मनुखदेवा देह चढ़ि‍ करत सेवा भेट सभकेँ मनक मेवा नै डेराउ सभ कि‍छो देत मानत नै पूजा अखनो लेत।” अप्‍पन हारि‍ गाम-घरसँ मंत्री दरबार कि‍यो नै पाबि‍ सकैत छल पार के बजत सोझा फोड़ि‍ देति‍ऐ कपार डरे कनैत कते जार-बेजार जीतने छलौं सकल समाज उठि‍ते आवाज गि‍रबै छलौं गाज बड़का-बड़का केलौं काज बजि‍तो होइत अछि‍ लाज सभ दुसमनकेँ मारि‍ देलौं कतेकेँ माटि‍ तर गाड़ि‍ देलौं घर-परि‍वारकेँ तारि‍ देलौं तैयो अपनासँ हारि‍ गेलौं। अपन उजाड़ि‍ काटए बपहारि‍ के बजैत अछि‍ अप्पन हारि‍? दगध सुर कलीकेँ स्‍वर सुनि‍ पि‍क भेल पागल अन्‍तरमे कि‍छु जागल लेलक कान मुनि‍ मनमे गप्‍पकेँ गुनि‍ कली बजैत अछि‍ अपनहि‍ धुनि‍- “मधुमासक आगमन भेल अहाँ फँसि‍ गेलौं कोन खेल हृदय केना बि‍सरि‍ गेल के बनौलक एहेन जेल जतए चलैत अछि‍ फरेबी खेल हमरा बना देलौं बकलेल आकि‍ अहाँ बनि‍ गेलौं सन्‍त वि‍योगक दाहसँ दग्‍ध छी कन्‍त साँचे अनन्‍त अछि‍ वसन्‍त कि‍न्‍तु हमर नै देखब अन्‍त।” इजोतक वस्‍त्र घर-दुआरि‍केँ नीप हाथमे लेने जरैत दीप अन्‍हारसँ लड़बाक इच्‍छा कऽ रहल समैक प्रतीक्षा हवाक झाेंका कऽ रहल खेल दीया अपनाकेँ बचेबाक लेल आँचर तर ढुकि‍ गेल जेना इजोत वस्‍त्र बनि‍ गेल आँखि‍केँ असंख्‍य दीप सुझाएल जे छल मुझाएल बाट अछि‍ असीम, अपार अड़ल चारूभर अन्‍हार एक दीप अछि‍ ज्‍वलि‍त तँ करत अनेकोकेँ प्रज्‍वलि‍त नेसि‍ रहल धेने इहए आस ठामहि‍-ठाम खेलत उजास। बाबा केर लाठी ठरल हवामे टौआ रहल छी टोले-टोले बौआ रहल छी बाबाक देल घण्‍टी गलामे टाँगने छी गामक मुँहपुरखी हम नै कोनो माँगने छी घण्‍टी टनटनाइते भूकए कुकुड़ लुच्‍चा छौड़ा सभ तकए भुकुर-भुकुर हुनके देल छलै तेल पि‍आओल लाठी दूध-भात खेबाक लेल फूलही बाटी छुच्‍छे बाटी भटकि‍ रहल अछि‍ सूखले भात अटँकि‍ रहल अछि‍ लाठी हाथमे देखते लोक करए सन-सन इशारा करैत बजैत अछि‍ मने-मन “देखि‍यौ देह हाथ सूत सन लगै छै हाथमे बन्‍दूक सन।” मि‍त्र कहैत अछि‍- “नै करू फर-फर तामसे कि‍अए कँपै छी थर-थर छै सभकेँ समानताक अधि‍कार लड़बै तँ उजरि‍ जाएत घर-दुआर नै चलत आब पुरना लाट ओ भऽ गेल कुबाट एकर अछि‍ एकटा काट चलए पड़त आब नवका बाट।” गीतक पूर्व संगीत नै भेल दरस तँ केना हएत परस कहाँ जनलौं अहाँक प्रीत पूर्वमे नै सुनलौं पद्य ध्‍वनि‍ संगीत हे यौ मीत दूरसँ सुनलौं गीत बुझलौं गीतक पूर्व बजै छै संगीत अहि‍ना होइत हेतै नि‍त आब तँ अवधि‍ गेल बि‍त कहाँ भेल हमर जीत पहि‍ने जँ जानि‍तौं एना नै कानि‍तौं आदरसँ अरि‍आइत अानि‍तौं छतीसो व्‍यंजन छानि‍तौं कतए चलि‍ गेलौं भऽ कऽ अनेर नै पाबि‍ रहल छी अहाँक टेर जेना टूटि‍ गेल पुरना घेर फेर जनम भेल एकबेर। शि‍शुक स्‍वर बन्न परसौति‍ घर चि‍चि‍आइत शि‍शुक स्‍वर नि‍कलैत सुगन्‍ध मन्‍द–मन्‍द शान्‍ति‍मे स्‍पन्‍द मधुर आवाज सजौने साज कनैत बारम्‍बार खोलत अनन्‍त संभावनाक दुआर बनत नि‍त-नूतन सि‍रजनहार ऐ हेतु होए एहेन आधार बढ़ै बुधि‍, वि‍वेक, वि‍चार तत्काल चाही सुरक्षाक ढाल देखू पाछू नचै छै काल लेने छै वएह पुरना जाल क्रन्‍दन स्‍वर पुछै सवाल “की हरण कऽ सकब अहाँ हमर दुख देख रहल छी घातीक रूख ताकि‍ सकब अहाँ चि‍न्‍हल मुख हएत कोनो मनुखे सन मनुख?” बोलती बन्न अभि‍भावककेँ सीख कानकेँ सुनाइत हवामे चारू-भर गुनगुनाइत “सम्‍हारि‍ कऽ चलि‍हेँ अपन चाल नै तँ बाटेमे धऽ लेतौ काल।” देश-दुनि‍याँ आगू बढ़ल हम रहब ओझरा कऽ पड़ल तैयो पैसल रहैत छल डर काँपैत रहैत छलौं थर-थर सुरक्षाक एतेक अछि‍ समान तँए ने देलि‍ऐ गपपर धि‍यान आइ जाएत बे-वजह जान राह भेल अछि‍ सुन्न-मसान आगू ठाढ़ भेल जमदूत समान कर्कश स्‍वर सुनि‍ ठाढ़ भेल कान “मुँहसँ जे नि‍कलतौ अावाज कि‍यो ने देतौ अखन काज।” हमर की गलती कि‍अए भेल नाराज “आइ गि‍रत हमरेपर गाज नजरि‍ उठा देखलौं जी उड़ल सन्न हमर भऽ गेल बोलती बन्न।” दि‍लक आवाज अन्‍तरमे रहैत अछि‍ अमृत बाहर बीख भरल अनघोल प्रेमक नै कोनो मोल भीतर शान्‍ति‍क खजाना अनमोल दि‍लक बोलकेँ जारि‍-मारि‍ बजै छी हम दोसर बोल शब्‍द दैत अछि‍ दि‍लकेँ धोखा खोजैत अछि‍ बारम्‍बार मौका कखनो शब्‍द दि‍लपर होइत अछि‍ नाराज कखनो दि‍लक बात कहैत शब्‍दकेँ होइत लाज शब्‍द होइत जे दि‍लक आवाज सभठाम होइत सत्‍यक राज अन्‍तरमे बहुत सजबए पड़त साज तखैन बनत शब्‍द दि‍लक आवाज। नेंगरा मजदूर कि‍एक फटकारै छी यौ दरबान हम नै छी कि‍यो आन नै करू एना परेशान नै छी भि‍खमंगा, चाेर, बेइमान बरख भरि‍ पहि‍ले हमरो रहै अहीं सन शान हमहीं बनौने रही ई सतमहला मकान कतेक लगा कऽ लगन काज केने रही भऽ कऽ मगन अपन दुख कि‍छु कहल ने जाइ ऊपरसँ खसल रही दुनू भाँइ टाँग कटा कऽ हमर बचल जान सहोदराकेँ उड़ि‍ गेल प्राण नै छी दुखि‍त केलौं िनरमान एहेन काजमे होइतै छै बलि‍दान हमर तँ कर्तव्‍य अछि‍ काजसँ लड़ब कि‍छु भऽ जेतै काज तैयो करब देखबाक लीलसा छल एकबेर आँखि‍ जुरा जाएत रहब कनेक देर। “भागि‍ जो ऐठामसँ रे बकलेल ई जगह अछि‍ वि‍शि‍ष्‍ट लोकक लेल मालि‍क एतौ तँ देख लेबही खेल तुरन्‍तेमे चलि‍ जेबही जेल।” आँखि‍ लगै छै केहेन क्रूर जेना देहमे कऽ देतै भूर चोटहि‍ं घूमि‍ गेल नेंगरा मजदूर अछि‍ चुप्‍पे आवाज नि‍कलै दूर-दूर। मनक दुआर अन्‍हार घरमे बैसल लोग कऽ रहल अछि‍ जेना कोनो नै देखि‍ रहल एक देासराक मुख कतए सँ भेटत दरशनक सुख औना रहल सभ ठामहि‍ं-ठाम बि‍नु मकसद जि‍नगी बेकाम अन्‍हार करै अन्‍हारसँ बात अन्‍हारेसँ झँपने रहू सबहक गात अनठेकानी हथोड़ि‍या मारैत हाथ नै जानि‍ के करतै केकरापर आघात शंकामे डूमल सभ काते-कात डर नाचि‍ रहल अछि‍ माथे-माथ कतबो करब छूच्‍छे जाप अन्‍हार घरमे साँपे-साँप खोलए पड़त ि‍खड़की-दुआर अन्‍तर मनक सभ केबाड़ अन्‍हार भऽ जाएत तार-तार पहुँचत प्रकाश आर-पार एक देासरसँ जान-पहचान बढ़त आपसी मान-सम्‍माण। छाँहक रूप हम छी अभागल जा रहल छी भागल नि‍न्नमे डूमल या जागल हरपल पाछाँ लागल केहेन ई छाँह बि‍नु परबाह लगैत अछि‍ अथाह अशोथकि‍त भऽ गेलौं भगैत-भागैत घूमि‍-घूमि‍ पाछू तकैत-तकैत मुँहसँ नि‍कलैत अछि‍ आह केहेन अछि‍ जि‍दि‍याह जखैन तक अछि‍ ई काया सँगे लगल रहत ई छाया बेसी भागब तँ थकि‍त हएत तन ओझराएल रहत हरक्षण मन अड़ि‍ कऽ परखब हम ओकर रूप चाहे चढ़ि‍ ऊपर चाहे खसि‍ कूप रूप हो कुरूप वा हो अनूप ओकरे सँगे देखब हम अपन सरूप। राम वि‍लास साफी पढ़ल-लि‍खल तनि‍ गौर करि‍यो बबूआ पढ़ल-लि‍खल तनि‍ गौर करि‍यो बबूआ कैसन-कैसन ढोंगी रचए उपाए कत्‍थरकेँ टुकरि‍या जखन पहाड़ पर रहलै तब टुकरि‍या पत्‍थले कहाय। वहए रे टुकरि‍या जखन पंडि‍त घर अइलै ठाकुरजी हो हुनकर नाम कहाय। जब ई ठाकुरजी पंडि‍त घरे रहि‍येँ महि‍नो-महि‍नों रहि‍ये खुंटीमे टंगाय। जखने ओ न्‍योता जजमान घरे एलाह खुटि‍योसँ ठाकुरजी झोड़ामे धड़ाय। पढ़ल-लि‍खल तनि‍ गौर करि‍यो बबूआ। जखने पंडि‍त जजमान घरे पहुँचलाह तुरन्‍त देलकनि‍ ओडर हो सुनाय गइयाकेँ दुघवामे कुलकुलि‍या हो जाय पढ़ल-लि‍खल तनि‍ गौर करि‍यो बबूआ। एम.ए, बी.ए बि‍टबासँ गोबर पुजेथुन। ऊपरसँ लेथुन एकावन टका मंगाय। ठाकुरजीकेँ झपे खाति‍र सवा गज कपड़ा लेथुन सि‍याइ लेथुन पंडि‍ताइनक आंगी। पढ़ल-लि‍खल तनि‍ गौर करि‍यो बबूआ। जखने ओ सत् नारायणक कथा सुनौता बनि‍याँ नामक कथा ओ सुनोतुहुन बनि‍याँ जखन पूजा कऽ प्रसाद नै खेलकै लादल जहाज जँ हुनकर डुमि‍ जाय। पढ़ल-लि‍खल तनि‍ गौर करि‍यो बबूआ। लकड़हारा जखने पूजा कऽ प्रसाद नै खैलकै खेलैत बेटा वहीं जाय। जखन ओ पंडि‍त अछुत घर पूजा ओ कराबे तखने पंडि‍त अछुत घरक प्रसाद नै खेलकै पंडि‍तक बेटा ि‍कअए नै परि‍ जाइ। पढ़ल-लि‍खल तनि‍ गौर करि‍यो बबूआ। सन्तोष कुमार मिश्र, काठमाण्डू, नेपाल गुलामी डे अवाद छलहुँ बरवाद भेलहुँ स्वाद लेलहुँ तरकारीके नोकरी तँ निके छल मुदा नहि छल सरकारीके ।

अवाद छलहुँ बरवाद भलहुँ स्वाद लेलहुँ तरकारीके नोकरी तँ निके छल तैयो, इडियट अन्तरवार्ता लऽकऽ देलनि छाप गुलामीके नोकरी तँ निके छल मुदा नहि छल सरकारीके ।

अवाद छलहुँ बरबाद भेलहुँ स्वाद लेलहुँ तरकारीके खर्च बढ़ल चर्च बढ़ल खालियो जेब केर सर्च बढ़ल मुदा, नइ बढ़ल बाट आमदनीके नोकरी तँ निके छल मुदा नहि छल सरकारीके ।

अवाद छलहुँ बरवाद भेलहुँ लाज कम समाज कम बाल बच्चा दर्जनमे छल देख–भाल करैत–करैत बितल दिन गुलामीमे नोकरी तँ निके छल मुदा नहि छल सरकारीके ।

कजन सभ दर्जनमे छल गर्जन करैत दिन आ राति अपन सेहो थप–थाप भऽकऽ गनती चलि गेल सोरहीमे चैन परिणत भऽ गेल बेचैनी मे नोकरी तँ निके छल मुदा नहि छल सरकारीके ।

जनम दिन किनको, मरन दिन किनको पावनि–तिहारक लाइन चलैत अपनो एक बेर बरबादी डे नोकरी छोड़ि धुमधामसँ मना रहल छी बरबादी डे आशीर्वाद देनिहार सबहे लोक कहलनि आइ–काल्हि आ नित दिन, सबहे महिना, सबहे शाल आ सबहे जुगमे मनैबैत रहू गुलामी डे नोकरी तँ निके छल मुदा नहि छल सरकारीके । जितेन्द्र ‘जितु’ गरीबीक जाड़ आरिपर ठाढ़ बुचकुन बाबू देख रहल छथि ननुवाकेँ नुनुवा हुनक हरवाह काज कऽ रहल अछि अपन कनिया आ बालबच्चाक संग पुसक कुहेसा आ बिसबिस्सीक बिच फाटल चेथराक बलपर खटैत ओकर परिवार

अनायास अपना दिन ताकै छथि ओ मोट–मोट ऊनी कपड़ा, कोट गुलबन्द आ टोपी तइपर ओसबालक ऊनी चादर मुदा तैयो हवाक प्रत्येक वेगसँ शरीरमे उत्पन्न भऽ रहल कम्पन हुनका सोचबाक लेल बाध्य करैत अछि जे कोना चेथराक बलपर खटि रहल अछि नुनुवा आ ओकर नेना सभ

स्तब्ध नजरिसँ ओ देखै छथि पुनः नुनुवा दिस आ नुनुवा सेहो नजर उठा देखैत अछि हुनका दिस नुनुवाक हँसमुख मुखार बृन्द आ सन्तुष्ट नजरि जेना कहि रहल हौ मालिक ई तँ गरिबीक जाड़ थिकै अहिना आबैत छै, अहिना कटैत छै अहिना आबैत छै, अहिना कटैत छै कथी लए...?

औ किएक ई बन्दूक...? ई लाठी कथी लए...? किएक मशाल...? ई आन्दोलन कथी लए...?

अहाँकेँ मधेश आ थरुहट अहँाक? अहाँक चुरेभावर आ खम्बु लिम्बु अहाँक? आखिर किए ई मारि? आ ई आन्दोलन कथी लए...?

अस्तित्वक लेल संघीयता मुदा ओतहु विभाजन अधिकारक नामपर किएक ई द्वन्द्व...? ई द्वन्द्वपूर्ण आन्दोलन कथी लए...?

औ ई तँ कुर्सीक खेल थिकै, सत्ताक लेल थिकै राजनेताक दाव थिकै राजनीतिक घाव थिकै ओ तँ लड़ेबे करताह ओ तँ भिड़ेबे करताह हुनकर तँ बाते छोड़ू ओ तँ ओझरेबे करताह मुदा अहूँ स्वविवेकी छी अपन विवेक कथी लए...? कथी लए बन्दुक...? किए मशाल...? हे हौ विखण्डन कथी लए...?

हम मैथिल छी, नै पहिने नेपाली हम थारु छी, नै पहिने नेपाली हम पहाड़ी, नै पहिने नेपाली हम मधेशी, नै पहिने नेपाली हमहूँ नेपाली, अहूँ नेपाली  तखन विभेद कथी लए...? कथी लए बन्दुक...? किएक मशाल...? हे हौ विखण्डन कथी लए...?

ध्वस्त भेल अफगानकेँ देखू उजडि गेल इराक ओतए मिटा रहल ओइ पाककेँ देखू भातृद्वन्द्वक बिज तर अपन राष्ट्र थिक, अपन धरोहर तखन ई झगड़ा कथी लए...? कथी लए बन्दुक...? किए मशाल...? हे हौ विखण्डन कथी लए...?

भागलै राजा गणतन्त्र एलै हौ जाग जाग परतन्त्र गेलै हौ छऽ कि तोरा...? बाटबऽ तोँ की...? कि अरजलहा...? फाटबऽ तोँ की...? जेहने ओ अछि, तेहने हमहूँ तखन ई रगड़ा कथी लए...? कथी लए बन्दुक...? किए मशाल...? हे हौ विखण्डन कथी लए...?

ओकर बपौती नेपाल नै छिऐ वएह टा कोनो नेपाली नै छिऐ हमर नेपाल छी हमहूँ नेपाली तखन विभाजन कथी लए...? कथी लए बन्दुक...? किएक मशाल...? हे हौ विखण्डन कथी लए...?

मिलि सम्वृद्ध नेपाल बनाबी अपन नवीन इतिहास रचाबी उठू जागू बन्हा जाउ एक सूत्रमे एकताक संस्कार जगाबी नब नेपालमे सभ नेपाली जेहने मधेशी, ओहिने पहाड़ी ककरो बिच नै रहत विखण्डन विभेद, विभाजन कथी लए...? कथी लए बन्दुक...? किए मशाल...? हे हौ विखण्डन कथी लए...? यथार्थ शर्मा जी चलि गेलाह घर, परिवार समाजसेवा राजनीति धर्म सभ छोड़िकऽ शून्य अछि घर परिवार स्तब्ध सहकर्मी, सहपाठी आ समाज शुन्यता आ स्तब्धताक बिच पञ्चतत्वमे विलीन विलीन भऽ गेला शर्माजी बड़का आलीसान कोठा चमचमौआ कार नोकर चाकर राजसी ठाठबाठ सभ आइ भतोभंग ई सब अरजबाक लेल की नै केने छल मुनचुन बाबु मुदा किछु नहि अपन दु हाथक चेथराक साग विलीन विलीन भऽ गेलाह पञ्चतत्वमे ओहो ‘सभ जाएत, सभ चलि जाएत एक दिन’ मंगली एतबै रटैत छली आ लोक ओकरा बताहि कहैत छल बतैहिया, सेहो नहि रहलीह सभ मिलि ओकरो दऽ एलै कोसी कात आ विलीन विलीन भऽ गेलि पञ्चतत्वमे ओहो राजेश कुमार झा जों अहाँ नै छी जों अहाँ नै छी, दिलमे धरकन नै यऽ मरल समान लागै छी, शरीरमे जाने नै यऽ निठला बैसल रहै छी, किछु करइक जोशे नै यऽ

जों अहाँ नै छी, फूलो मे महक नै यऽ दिन बजर समान लगैए, रातियोमे नींद नै यऽ मौसम ठहरि सन गेल, बहार मे ख़ुशी नै यऽ

जों अहाँ नै छी, आँखिमे ओ चमक नै यऽ मुस्कुराइक कोशिश करै छी, ठोर पर हँसी नै यऽ अहाँ सँ दूर रहैक, जीबैक चाहत नै यऽ

जों अहाँ नै छी, घर मे ओ दमक  नै यऽ कान तरसि गेलह, ओ पायलक आवाज नै यऽ हर पल विरान लगैए, कतौ विरहक उदासी तँ नै यऽ

जों अहाँ नै छी, ई जिन्दगी- जिन्दगी नै यऽ शान्ति लक्ष्मी चौधरी मतिभ्रम

की अपना मोन मे तोरा छौ ई मतिभ्रम जे तोरा देह मे बसै छौ अस्सल मर्द? त’ सुन सत्य, तोहर गुणतर छौ नामर्दो सँ कम रे पतीत! मतिभ्रमी नराधम जँ तोरा अस्थि मध्य बहैत छौ शुक्राणु/स्पर्म अपने सन संतति केँ जँ द’ सकैत छै तुँ जन्म नहि हौऊ गर्व स एना उत्स दुष्ट पाँच बरिखक गौरी, ’गुड़िया’केँ क’ बलत्कार नहि बुझ अपनाकेँ असल मर्दक अवतार स्त्रीगण आक् थूह क’ देतौ खखार मुँह पर थुकि तोहर एहि मतिभ्रम पर कुकुरो देतौ टाँग उठा मूति पशुओ मे बचल होइत छै किछ अंतर्ज्ञान नीक बेजायक ध्यान तोहर कुकर्म सँ कियै हेतै कोनो मर्दक मूरीक अवनती जुनि बुझ तू मिसीयो अपनाकेँ मर्द जातिक प्रतिनीधी मर्दमेँ होइत छै मर्यादा, संयम आओर शील चिन्हैत छथि ओ की छी विभत्स आ की अस्लील नहिये भ सकैत छै तूँ कोनो रूपेँ नामर्द जकरा छातीमे टहकै छै नीक-बेजायक दर्द प्रकृति केनय होइन्ह कोनो अंगसँ भल्हु हुनका क्षीण मुदा हुनकोमे रहैत उपस्थित पाप-निष्पापक चिन्ह नहिये भ’ सकैत छै तू मर्द-नामर्दक बीचक बिरूप अपन कामाग्निक आगिमे जरल तू बनल एहेन कुरूप तोरा ल’ नारीदेह अछि बस यौन अंगक समुच्च भोगवासनाक सरस बोस्तु छुछ्छ कामेभोगक मतिभ्रम होइत रहै छौ तोरा सदिखन निर्जीव बोस्तु, वनस्पती, प्राणी-जीवन बील, पील, घुच्ची मातृयोनी मे अवशेष छोड़ल खाली सीसी वा फुच्ची भोगेक मतिभ्रम होइत छौ तोरा नेबो-आम-बेलक बाती सर्वत्र तकैत रहैत छै तू स्त्रीयेक थाथी गदही, घोड़ी, भैंस, बकरी, कुत्ती, बिलाय सद्यह जन्म देय वाली अपन माय तोरा लेँ त’ तुच्छ छियौ बहिन बेटीक संबंध जेँ कामाग्निक आगिमे आँखि फुटि भ’ गेलौ अन्ध ओना कवियित्रीगण ईसभ बात कहैत एखनो छथि धखाइ मुदा जँ कंठमे हाथ दय छै तँ सत्य गप्प सुनि ले आइ शेफालिका वर्मा अहाँक गाम कतऽ अछि? अहाँक गाम कतऽ अछि प्रश्न सुनिते अकचका गेलौं हम कनिक काल सोचैत --- हमर गाम ?? वएह ने जइ ठाम अपन घर होइ छै? हँ हँ वएह घर ,वएह गाम ! हमरा तेँ दू टा गाम अछि .. एकटा जतऽ सँ हम आएल छी दोसर हम जतऽ एलौं अछि मुदा, ऐमे हमर कोन अछि हम नै बूझै छी जतऽ सँ हम एलौं ओतऽ सँ सनेस-बारी दऽ हमरा विदा कऽ देल गेल “जाह अपन घर बेटी” जइ ठाम आएल छी ओइठाम सभ सनेस-बारी बिल्हल गेल “कनियाक गामसँ आएल छै” हम की जानऽ गेलौं हमर गाम कोन थीक हमरा नाम पर तँ कत्तौ किछु नै भरल-पुरल घरमे हमर अस्तित्व किछु नै बस “फलना गामवाली” बनि रहि गेलौं जइ ठामसँ आएल छलौं ओइ गामक ठप्पा बनल रहि गेलौं............ पाहन अप्पन प्राण भेल ! झहरि रहल नोर नीरव विधिक अमिट विधान भेल कोन गीत गाबि गेलौं पाहन अप्पन प्राण भेल !

खंड खंड जीवन जिबैत क्षण क्षण तान भेल पात पात हास हम्मर पाहन अप्पन प्राण भेल

मलय पवन वेग सन सिहरैत कंपैत चान भेल चपल मुस्कानक तरीमे पाहन अप्पन प्राण भेल

भग्नतारक सुर साजि व्यथा विगलित गान भेल स्नेह नोरसँ पाटल पाहन अप्पन प्राण भेल… बिनीता झा वरदान भोर भेल हे सखी उठू लोढी आनी फूल आउ सजाबी माँ जानकीकँ  आउ करि हिनक श्रृंगार आउ शीश झुका पूजा करी  आउ सब मिल मनाबी जानकी जन्मदिवसक त्यौहार  आउ करी हम सब प्रार्थना  आउ नीक आचरणसँ  करियैन हुनक सम्मान जाइत पाँइत कए दूर भावनासँ  उठए ऊँच अहि माटिक संतान विद्याक होइक बास दिमाग मे कलम पर होइक सबकँ दियमान अनपूर्णा रहैथ भंडार मे लक्ष्मी बसैत आंगन द्वार मे बनल रहै खेत खलियान सभक चित होइक ख़ुशी  नै क्यौ होइक उदास दुखी  करनी सभक हुए उत्कृष्ट बोली मिठगर मिश्री सन द्वेष कलेशक भावनासँ  उपर होइत हिनक सभ संतान हे जानकी हम माँगए छी  अपना मिथिला लेल अहाँसँ बस यैह वरदान तम्बाकू दिवस पर

जुनि खाउ गुटका यौ बाबू धिया पुता की सीखत आगू

खैनीसं झटदनि मुँह फेरू तम्बाकूक अहाँ सेवन छोरू

धुआँ संग जौँ नित कैल फूटानी बिगरत अहाँक जिनगीक पिहानी

नेसा कौखन की देलक ककरो किये भरम मे छी सभ सगरो

बनल किएक छी ओकर गुलाम जे बिलटा देत बस ठामहि ठाम चैन जखन गेलौं चैन लग बैसय, ओ मुँह बिचका कऽ पड़ा गेल।  पहिने घुमय छल अंगना मे, ने कहि कतऽ आब बिला गेल। जखन गेलौं ओकरा दुनियाँ मे ताकय,  बिच्चे मे बाट हमर अपने हेरा गेल।  कहियो भरमा कऽ सपना देखौने छल,  आइ काज पड़ल तँ आंगन मे बैसल छोड़ि गेल।  ओ जे गेल तँ चलिये गेल,  दिन-राति बाट सभ ताकैत रहि गेल। अही देशक बेटी हम

अही देशक बेटी हम ने होमए देबै ककरो अपमान

किए क्षमा करिऐ ओकरा जे नै कए सकैत अछि नारीक सम्मान? किए भरोस करिऐ ओकरा पर जे नै भऽ सकल मनुखक संतान?

नै होइतथि नारी  तँ जन्म कोना लैतौं, नै होइतथि नारी  तँ बहिन के होइतथि नै होइतथि नारी  तँ कनियाँ कतएसँ तकितौं  नै होइतथि नारी तँ बेटी ककरा कहितिऐ नै होइतथि नारी तँ सृष्टि कि चलैत?

जागू, सोचू, विचारू  सभ नर, नारी  की होमए देबै अहाँ नारीक अपमान?

अही देशक बेटी हम  नै चुप बैसि कानब, करब ओकर प्रतिकार  जे करत हमरा संग अतिचार  ऐ लड़ाइमे हम एकसरे ने  संगे छथि हमर सखी, सखा  जे करै छथि  नारीक सम्मान l देखू आइ एफबी परक खेल

देखू आइ एफबी परक खेल भेष बदलि लोक अपन भेल  देखू खेलैत छथि कतेक खेल बढबैत छथि अंजानसँ मेल  नाना तरहक छायाचित्र नुकबैत अपन कायाचित्र फँसला जे क्यो ऐ जालमे नाश हुनक छन्हि ऐ कालमे सतर्क भए आजुक पीढ़ीकेँ बुझबाक चाही सभ चालिकेँ राखैत डेग सम्हारि कए निश्चित कल्याण हुनक तखनहिं टा अपेक्षित l कामिनी कामायनी ई केक्कर शोणित ? माझ आँगन मे / बइसल/ सिलबट्टा पर /पिसा रहल छल भांग / हाँकी रहल छलथि गाछी पप्प क/दलान पर/ तापि रहल छथि पतौह जरा क /जुटल नीफिकिर लोग । उमहर /नहू नहू /करिक /समुच्चा खेत खरिहान / कनैत रहल हकन्न /पड़ाईत रहल नवतुरिया / जिल्ला के जिल्ला पा र /समुद्र क पार / नेने माथ पर अपन /स्वप्नक पोटरी/ आ पेट मे /संग्राम करैत /बयालीस हाथ क’ अंतड़ी । टमाटरक चटनी संग /गिड़इत सोहारी / करैत रहले करेज शीतल / भ जाए कीछु पाय /नई रहब परदेश तखन / सपना के महल बनबए ले/ पठबइत रहल /मनियाडर/कटैत रहले  दिवस / बग्गे बानी  /हुलिया /बिगाड़ि /सर्कस क जोकर बनि / करैत रहल/ मनोरंजन सबहक /मुदा असगर मे / बहैत रहलै नॉर के कात करि/शोणित सदिखन / मोंन  पड़े जखन जख़न गाम । ओ हेराइल /भोथियाइल लोक के निर्दोख आंखि स  / झकेत सपना पर /लागि गेल रहैक/ड्कूबा सब हक नजरि/ ओहि पान /मखानक  / जनक/जानकी / गौतम /याज्ञवल्यक / गंडक /बागमती स’ सिंचित /तपोमय /यज्ञ भूमि पर / लागय लागले / कलंकक कारी टीका   / वीभत्स आरोपक /लिखाए लागले /करिया सियाही स/ मिथिला के आजम गढ़ / तखन चित्कार कयने छल मों न / सियासत क शतरंजी चालि/ के बली चढि गेले /ओ सुतल / बिरहा  /नचारी  गबईत/संतोषी मनुख क भूखेल ,पिछड़ल प्रदेश । नब त’ आकाश कुसुम /पुरनको बंद पड़ल/ कल कारख़ाना /मिल /फैक्ट्री / अनेकों आश्वाशनक बादो खुजले नहिं जखन / तखन परदेश मे चिचियाति अरमान / कोन कोन राकस् क /हाथि लागि / बोकरए लागले शोणित / अपराधी ओ युवा / वा हमर घिनौन राजनीति / खेलईत रहल गोटरस/नुकेने मुंह बाउल मे / शूतरमुरगक जका/संकीर्ण /गर्हित जातिवाद्क अड़ मे / जरेत रहलै कुसियारक मधुर खेत । कलपति छथि महाकाल / ने जनम लेबे दिओ / वेद, सांख्यक भूमि पर आतंक्क ज्वालामुखी / हमहू छी गवाह  अप्पन भूमि के / लाल ;पियर धोती / पा ग आ टोपी /दिवाली आ दाहा/ लोटा आ’ बदना /कीर्तन आ अजान / बला माटि पा नि मे / पिछला कतेक दशक स/ विदेशी  आसुरी  शक्ति / किएक बारूद सानि रहल छै/ कराबिओ जांच शीघ्र एकर / दूर फेंकू पोखरी स/सड़ल माछ / महकइत  पानिओ  के सफाई के समय आबि गेलै / जागु सरकार /जागु /बड्ड कष्टकर छै / आतंकवाद के पट्टी माथ पर/ बान्ही क /जीनाए / समय के तकाजा अछि / एहु क्षेत्र के इंसाफ चाहि आब । खिड़की दिन मे तीन बेर / भिनसर ,दुपहरिआ’ सांझ / खोलि क खिड़की / हेरय छी हमहू दुनिया जहांन के / के कत्त स’ आबि रहल अछि/ के किमहर जा रहल अछि / ओकरा हाथ मे ओ की ? एकरा माथ पर’ ई की ? सूंघय छी हमहू हवा के / पाथने रहेत छी कान / अहि बदलति समय के / बड्ड लग स देखबा के उत्कंठा मे / चाहेत छी जाई /बाहर दूर धरि/ छूबी/ दसो आंगुर स / महसूस करि अहि बदलाव के / मुदा समय एकर अनुमति नहीं दैतै/ बुझल अछि खूब हमारा / मात्र एक गवाह क ‘रूप मे / ठाढ़ छी पल्ला पकड़ने / समय के संग हम / समय के कैद मे । भरोस बेकल /विह्वल  भरोस / अपना स हारल /समय स मारल / लज्जित /संकुचित /निराशा के गर्त मे धसल / पाबि नहि रहल अछि /जिबा के कोनो ठेकान । केकरा कहतै/आ पतियेते त के / की कहिओ ओकरो पुरखा के जमींदारी छल/ बिन लिखा पढ़ी /कलम दवात् क /बही खाता के / चलैत छलई/कारोबार /खेत स खरिहान  / आ गाछी स बथान धरि के /सोन ,चानी,रूपा / स ऊपर बइसल ईमान /एकरे अग्रज / धेने  अपन पिता  धर्मक ध्वजा दुनु हाथे / क ल जोड़ने लोक चा रहु दिस / निर्बल आ सबल् क मध्य एक गोट मजगुत कड़ी / मुदा हे लॉर्ड मेकाले /ई संताप अहि के देल / हमरा सन मंद बुद्धि वला /दोषी अहीके मानैत छी/ तेहेन शिक्षा के चलन / तार तार भेल हमर आवरण / जे नहीं लिखल गेल बही मे / हेतय कोना सही ? रोमन लिपि मे दस्तखत करे लेल / फड़केत आंगुर / गुरेर क ताकने छल ईमान के जाही दिन / पेटकुनिया देने कोठी के दोग मे धर्म अपन / ध्वजा समेटने /ओसारा पर/बइसल /कल्पैत कुहरेत / भरोस के देखि /शोक स आंखि सदा के लेल बन्न / करि/नब भविष्य के /नब मुहावरा गढ़वा लेल छोड़ि देने छल। पुष्पांजलि पुष्पांजलि । आजुर मे भरने / लाल /पीयर/हरियर / नारंगी /बैंगनी /भांति भांति के / रंग /गंध /रूप /आकार / स सज्जित /पुष्प दल / स्वास मे भरने /मलयानिल मादक / मद्धिम मद्धिम आंच प/ नहु नहु गर्माबईत हवा मे / नब नब तरु पल्लव के अड़ स/ झाकैत धरा सुन्नरी / करि रहल अछि / उन्मादित प्रेमी सन / भावविभोर भ’/ऋतु राज क/ आराधना मे/ अवरूद्ध गरा आ’ मूंद्ल आंखि से / पुष्पांजलि / रूपसी के सौन्दर्य स चकित / अनंग सेहो शंख नाद करि देल/ सजी रहल अछि रंगमंच / प्रेमोत्सव के /मुट्ठी मे आबि गेले / सभ हक /उड़बए लेल  अबीर /गुलाल उतरि गेला नर नारी मे/फेर स/नवल भेस मे / खेलय लेल फागुन के / कृष्ण आ’ राधा । आस्थाक पूर्ण कलश पोखरिक माटि सँ पितड़िया फुल्डालि माँजैत/ बाबी ओइ दिन बड़ उदास भऽ गेल छलीह/ जखन घासक छिट्टा ,माथ सँ उतारि/ घुटनक आंगनवाली /आँचर मे बान्हल / गंगा मैयाक परसाद देलकन्हि / हरिद्वार सँ आएल छल/ कुम्भ नहा कऽ / माथ  पर बोझ छल ,कतेक रास खिस्साक / सह सह करैत लोक / मुंडे मूँड चारु दिस / तिल रखबाक जग्गह नहि / उपरका स्वास उपरे / निचुलका नीचे / मुदा सहस्त्र बाहु सन बेटा / माय बाबू दुनु केँ पजिया कऽ भीड़केँ धकियाबैत / आबि गेला घाट पर / ओ निर्मल, ओ कन कन जल / डुबकी पर डुबकी / उतरि गेल सभ पाप / वएह तँ स्वर्ग / आँखिसँ देखल / ओ घंटी आ शंख सँ गुंजैत ,/ इन्द्रक दरबार सन सजल / मैयाक आरती । ओइ दिन तँ शुरुआते छलै पोथीक / बाँचैत रहली कतेको दिन / मास / सुध बुध बिसरल / बाबी संग कतेको मइया सभ लइत रहली उसास / देती की माते , हुनको ई पुण्य लाभ / बा  अहिना कोन मे पड़ल पड़ल / जिनगी होइत रहत खाक। माल जाल / पशु /पाखी / मृतककेँ उद्धार करए वाली / पतितपाविनी /सुनौथ हमरो सबहक विलाप । आ दलान पर/ आंगन मे/ ओसारा पर/ गोहाली मे / पोखरिक महाड़ पर/ बनैत रहलै बिसबासक पुल/ कुजरनी अपन तरकारी बेच कऽ/ मलाहीन माछ /तेलिन तेल / कुम्हइन अपन माटिक बासन बेचि / पुरहिताइन लोटा /हसूली / बन्हकी राखि करैत रहली बाटक ओरियान नहि जाति / नहि कुल गौरवक गुमान / कतेक दिन सँ एतबे लागल धियान / जे गंगा असननीया जेबै / आ ओहो माघ आबि गेलै /लागि  गेलै संगम मे कुम्भ / बिन कोनो पुरुख पातकेँ नेहोरा  पाती केने / मोटरी चोटरी बान्हने/ अधरतिए / टीसन पर/ पहुँच गेल रहै/नहा धो कऽ/ नब नब वस्त्र मे / सम्पूर्ण गामक आधा सँ बेसीए स्त्रीगण सभ / स्कूल /कॉलेज मे / पढ़य /पढ़बए वाली बेटी /पुतौह / अस्पताल मे काज करैत सिस्टर / डिग्री धारी नवतुरिया संग / गामक मुखिया सहजों पीसी सेहो / बुझैत अपना केँ महान / बहरायल छल / सबहक संग / करबक लेल अपन कल्याण / साध हेतै पूर्ण आब / करबाक गंगा अस्नान । खिलैत पलास वन खिलैत पलास वन । धरती सँ उनचास हाथ ऊपर/ उठल जे /प्रदीप्त मशाल/ भक, भुक, करैत/ मिझा गेल हुअए/ तँ ऐ मे बसातक कोन  दोष ? ओकर तँ अप्पन प्रवृत्ति/ ओ, समर्थ/ ओ शक्तिमान। मुदा, मिझैल मशाल/ ठाढ़ तँ ओहिना/ अप्पन, दुर्गतिक खिस्सा कहैत/ खसा रहल अछि/ दुनु आँखि सँ झर-झर नोर/ ई केहेन इजोर/ नै राति/ नै भोर/ चारू दिस / बिछल/ बर्फक सफेद चादरि/ छोट छोट/मोमक बाती/ आ कत्तेक पैघ उदासी/ ई कोन व्रत/ ई कोन उपास/ मुदा तैयो/ मोनमे जमल जा रहल  छै आस/ कि जे देवता/ पितर केँ /अप्पन निष्ठा आ प्रेम सँ/ गोहराबैत /आस्था केँ जीवित राखल / मानवीय संबंध केँ /मन प्राण मे सइतने / जुग जुग सँ ओकर कुशल भाखैत/ आइ फेर ओ जागि उठल अछि/ मनबै ले ब्रम्हा केँ/ चाही ओ रक्षा कवच/ लिखल ताड़ पत्र पर/ जे दनुज, दैत्य ,राकस केँ  दंड हुअए निश्चित/ नारीक चीर हरण/ करै नै दुष्ट जन/ रूप दिअ दुर्गा केँ / शक्ति दिअ काली केँ / काँपि उठैक सोचि कऽ धृष्टता  असुर जन / कतबो अनहर हुअए/ विश्वास आब संग छै/ पात पात  झड़ल /डाढ़ि पर/ खिलतै पलास वन/ एतबे मे/ आबए बाला ऋतु / कहि गेलै कान मे/ पाछाँ करू  नै आब अपन वाण/ तैयार दधीचि ओ  छथि/ देबए फेर सँ/ अपन  अस्थि दानमे। आधुनिक   स्त्रीगण १ एसगरि ओ चलैत/ निहारैत खेत, पथार, मचान  / आँकैत अपन बल/ झुकौने नहि धड़ / तकैत सीधा / चौकन्ना आँखि स्थिर मुखमंडल/ जाइत अछि स्कूल / खेलाइत अछि  / डोला पाती / गोटरस/ कबड्डी/ खो-खो / टेनिस / बैडमिंटन / आबै छै जोड़ऽ हिसाब / पढ़ै छै विज्ञान / आब नै  ओ छै अज्ञान। २ दलान पर राखल लालटेम / नै छै खाली बौआ  भाय सभक लेल / जाँत/ चक्की /, गोबर /, गोइठा,/ चूल्ही /, बासन /,छौड़ ,/ नहि डराबे छै आब /करबाक ओकरो छै होम वर्क / जनबाक छै प्रकाश वर्ष / समय आ दूरी पर / बनेबाक छै ढेर रास सवाल । पोखरि सँ भरैत काल डोल, मन करैत छै किल्लोल, की छै आर्कमिडीजक सिद्धांत। आनै छै पेठियासँ बेसाहि कऽ नून/ तेल/ तरकारी/ घरक समान/ करै छै होम वर्क, माएक काज आसान। बेलै छै चकलापर, उनटाबै छै  ताबा परका सोहारी, रटै छै एच टू एस ओ फोर। लगबै छै मइयाक फाटल बेमायमे / मरहम । देखै छथि दादी ,/ पिंजरासँ बहराएल सुगनीकेँ/ ऊपर पसरल ,/  उड़बा लेल /नील आसमान / धिया ने बोझ  /जुड़ाइत  छनि छाती आब । ३ पिकी पाड़ैत छौड़ाकेँ / नोचलक  टीक जखन/ किओ ने दूर छी कहलकै ,/ सब धैलकै  ओकर मान / आबै छै ओकरा मचबए सोर/ देखिकऽ चोर । करै छै निधोक भऽ भाय ,बाबूसँ गप्प / देखै छै टीवी / बुझै छै / कानून /दंड संहिता  / छेड़छाड़ ,बलात्कारी केँ / ताड़ै छै दस लग्गी फराके सँ/ चलै छै झुण्डमे / जेना मृग ,गज / धुक धुकी करेजक ,भगबे छै स्वासक जोरसँ / नाचै मजूर बनि , मुदा ओहिने चौकन्ना। नइ  सुनबै छै किओ आब / फकड़ा सभ ,सोन बराबरि हेबाक/ देखैत छै  सपना ओहो / जीवन सुधारबाक/ सोचै छै वैज्ञानिक, समाजशास्त्रीक धारपर संघर्ष जीवनकेँ आगाँ बढ़ेबाक नाम छै/ तखन ओ किए नै निहारe पूर्ण चान केँ । नव संविधानक प्रस्तावना लए जे बेकल / ओ समाज आइ ओकर भूमिका गढ़ि रहल । साम सँ नै दाम सँ दंड सँ नै भेद सँ/ दीपदान करि रहल बाटकेँ प्रकाशमान। पीठ पर ओकर अछि गार्गी /,मैत्रेयी/,सीताक अतीत / नब जुगक कथा जागृतिक सूर्य भेल / हाथमे रुमाल छै/ तँ दोसरमे मशाल सेहो/ आँखिमे आँखि देने / समयसँ ओ पूछि रहल/ कोन एहेन  विषम  मार्ग / जइ पर हम नै चलि सकब ? ४ संपत्ति ओ नै आब संपत्ति / ओकरो चाहि संपत्ति । खेत मे /पथार मे / मकान मे /दोकान मे / ज्ञात  आ अज्ञात मे / देथिन पिता हिस्सा ओकर / ओहो तँ हुनके तनज़ बुढ़ापेक लाठी ओहो / सेवाक ओहो हकदार / पठौतन्हि नै हुनका/ भयौन ओल्ड होम मे। ५ आदेस लऽ /विदेशमे/ पतिक गृह प्रदेशमे/ आएल अछि देबएले सुख / चाही ओकरो डगरा भरि सुख। प्रताड़णा वा लांछना / कटु /तिक्त वेदना /केँ ताप मे भस्म करि/ तखन ई कोन जिंदगी ? सिनेहकेँ सिनेहसँ/ कर्तव्यकेँ कर्तव्यसँ/ प्रेमकेँ प्रेमसँ/ सींचब तँ बाजत बाँसुरी / कुरुक्षेत्र ने बनए /छत /देवाल सँ घेरल जगह / प्रयास  इहै रहै / सभ ठाम हो रोशनी । नहि वीभत्स रूप हो / वसन्ते वसंत हो सदा / कर्तव्यक अधिकारक  /सूली पर / नहि चढ़ए पड़ैक। संकुचित विचार पर/ पद  प्रहार करि रहल / नब जुगक, नब कुसुम, नब चेतनासँ भरल। बातरसक दर्दसँ/ लोथ बनल सौस लेल/ बेकल बनल ओ ताकि रहल/ बातरसक दबाइ/ ससुरक मोतियाबिंद/ जोहि रहल बाट ओकर/ देखाबक छै सम्पूर्ण खेत खरिहान/ समस्याक जा नहि समाधान/ ताधरि नै ओकरा विराम/ सम्पन्न करब छै  होमवर्क/ एतबै ओकरा भान छै। कॉलेजक प्रांगण हो/ वा  घरसँ फराक कतौ/ चिंतन विशाल छै/ हटेबाक अंधकार छै/ धरती स्वर्ग बनै/ बूनै छै सपना जे/ आधुनिक समाजक रचनामे लागल ओ/ ओकरा कत्तऽ पलखति छै/ सुनबा के आलोचना । अनिल मल्लिक गजल आब नहि छै केओ गुलाम से के ने कहै छै मुदा जतै भेटै छै मौका गर्दैन के ने रेटै छै

मजदूर दिवसके अछि बधाई अपने लोकनिके भूखक आगिमे जरैत नेनपनके के जे देखै छै

सभा भाषण सेमीनार आ सांझमे हेतै पार्टी रस्ता घाट खटैत एहन बच्चाके के जे देखै छै

जाहि हाथ मे चाही कापी किताब आ कलम ठेला ठेलैत परै छै हाथक ठेला के जे देखै छै

जोश भरल बातेटा लिअने हजार के हजार दूनू सांझ नहि जरै छै चूल्हा के जे देखै छै...! बिन्देश्वर ठाकुर "नेपाली", धनुषा- नेपाल, हाल- कतार भक्ति गजल 

अहीं छी हमर भवानी मैया हम अहाँकेँ मानै छी  करब सभ दिन पूजा पाठ मनसँ हम ई ठानै छी

उजड़ल घर बसाबू माँ एना किए फटकारै छी  राति भरि निन्द नै आबे सदिखन अहाँ लऽ कानै छी

क्षमा करु या सजा दिअ हम तँ अहिंक सन्तान छी अज्ञानी हम पुत्र अहाँके बिधान ने किछु जानै छी 

चिनी लैताह,दूध लैताह कही ने माइ गै बाबूकेँ लड्डु आ पेड़ा हमहुँ बनेबै तै तँ चिक्कस सानै छी 

अहीं जननी, दुख हरनी करु हमर उद्धार हे  शक्ति स्वरुपा जगदम्बे हम अहाँकेँ पहचानै छी

सरल बार्णिक आखर:१९ गजल

सब खुशी भेटत बस मन होबाक चाही  सरकारी नोकरी लेल धन होबाक चाही 

जङ्गल उजड़लासँ रोग सभ बढ़लै स्वस्थ रहबाक लेल वन होबाक चाही 

दानव चपेटामे पिसा रहल लोक एतऽ  रावन ला रामक आगमन होबाक चाही

बात बनौलासँ केवल काम कोना चलतै घर सुद्धी करब तँ हवन होबाक चाही

जनताक खुन चुसने नेता जी कहै छथि चुनावमे उपरका सदन होबाक चाही 

सरल बार्णिक  आखर:१६ गजल

पानसन पातर ई ठोर अहाँके  अहाँ छी चान्द हम चकोर अहाँके 

जुनि घबराउ सभ नीक भऽ जेतै  अहाँ छी राति हम भोर अहाँके 

संसारक गति बदलि जाए मुदा  अमर रहए प्रेमक डोर अहाँके 

समय पैघ बलवान छै अपने  नै चलत ओइ आगू जोर अहाँके 

नै बहाउ नयनसँ आँसू कनियो  मोती सन मोल अछि नोर अहाँके 

सरल बार्णिक  आखर=१३ प्रवासक वेदना

हमर जिनगीक कोनो हिसाब नै रहल  पढ़बाक लेल कोनो किताब नै रहल  बैसल छी एखनो असगरे एकान्तमे  किन्तु पीबाक लेल कोनो शराब नै रहल ।। 

सपनामे ओहे चेहरा अबैए  अबैत अछि वएह ठाम आ गाम  कतबो बिसरऽ चाही दिलसँ  नै बिसरि पाबी जनकपुर धाम।। 

छी मैथिल हम मिथिलाक बासी  दूर छी तैयो अपन प्रदेशसँ  विवशताक मारल,परताड़ल  पत्र लिखै छी अलग देशसँ।। 

माए बाबूकेँ चरण वन्दना  दोस्तकेँ हमर सलाम रहल  अनजान-सुनजानपर ध्यान नै देबै माफ करब सभ कहल सुनल।।

मन लगाबी कतबो एतऽ  जिउ टाङ्गल अछि दुरापर  दिन कटै छी राति यै भारी  सदखैन जान अस्तुरापर।।  प्रेमक मल्हम फोन बनल अछि जीबाक माध्यम दु बात अछि थाकल ठेहयाएल आबी जौँ कखनो  लागै नै केओ साथ अछि।। 

कते कहू प्रवासक वेदना  लिखैत सेहो शरम लगैए  नोर आँखिसँ टपटप चुबए  कलम पकड़ैत हाथ कपैए।। 

बस ईएह विनती नीकसँ रहब  नीकसँ राखब गाँउ समाज  एक दिन हमहूँ लौट कऽ आएब  जगमग करतै मिथिला राज।। सुनि लिअ दू बात हमर

भला करब तँ भला मिलत  बुरा करब तँ बुरा मिलत  ई छै जगत जननीक धरती  कर्मक फल अवश्य मिलत।। 

हे मानव नीक कर्म करु  करै छी किएक खिसिआएल सन  चोरीक धन नै रहत सभ दिन  करै छी किएक धधियाएल सन ।। 

ऐठाम सभ किछु नाशवान छै  जाए पड़त ई जग छोड़ि कऽ  बिनु भक्तिक सुख नै भेटत  रहब कते मुँह मोड़ि कऽ।। 

सुनै छी जानकी मन्दिरमे  गिट्टी बालु गिरबै छी  अपन स्वार्थ पुरा हेतु  जनताकेँ घिसियबै छी।। 

एखनो ज्ञानक ताला खोलू  आबि जाउ नीक पथपर  दुर्दशासँ बचौथिन मैया  आसन हएत स्वर्ग रथपर।। 

हम सभ मैथिल एक रही  एकजुट भऽ साथ चली  पहिचान बनाबी अपन मिथिलाक  इतिहासक पन्नापर चमकैत रही।।

अन्हार जिनगी चिड़ै चुनमुन चिरबिर कएलकै  चारु दिस भोर भेलै प्रकाशक किरण पृथवीपर उतरलै घर-आङ्गन इजोर भेलै मुदा हुनका चेहरापर कारी पर्दा लगलै कोनो बन्दी जकाँ कोनो चोर जकाँ अथबा,कोनो निरीह बस्तु जकाँ  जकर महत्व किछु नै। 

सड़कपर अपन कमर हिलबैत  फिलिपिनी परीकेँ देखि ओकर मन धुजा-धुजा भऽ गेलै तन सिहैर गेलै आ  सपना चकनाचुर भऽ गेलै मुदा विवशता छै  बाध्यता छै  अपन सुन्दर आ लचकदार शरीरकेँ  देखएबाक स्वतन्त्रता नै छै हुनका  सुन्दरताक बयान सुनब  अधिकारसँ वंचित छै ओ  जेना कोनो जेलमे रहल प्राणी होइ  वा,कोनो पिजड़ामे बान्हल सुगा। 

बाहरक रङ्गीचङ्गी वातावरणमे  अपनाकेँ तिरस्कृत भेल महशुस करैत  जखन अबै छथि ओ अपन घरमे आ  देखै छथि टि.भी पर सनीलियोनकेँ हट सिन प्रियङ्का चोपड़ाकेँ अर्धनग्न वस्त्रमे ठीक ओहने निहारै छथि अपना शरीरकेँ कतेक मिलल कतेक सुन्दर शरीर ! मुदा नै कियो तारीफ करऽ बला  ऐ फूलकेँ नै कियो सुगन्ध लेबऽ बला  ऐ वासनाकेँ  मन खिन्न भऽ जाइ छै  खाड़ीकेँ रानी सभकेँ  मन बेपिरीत भऽ जाइ छै  एहन समाज आ संस्कारसँ  जकर सीमा  बस पर्दाक भीतर  एकटा कैद जिनगी जकाँ  केवल अन्हार... अन्हार.... हिसाब जिनगीक मार्च महिनाक उत्तरार्द्धमे आइ हम मृत्युकेँ देखलौं सुनने छलौं/ सोचने छलौं मृत्यु अत्यन्त सुन्दर होइ छै सरल होइ छै मुदा यथार्थ बिल्कुल फरक बिल्कुल अलग पैलौं। भयानक आ बिकराल रुप देखि हम डरसँ पानि-पानि भऽ गेलौं। आब ऐठाम- मृत्युक कटघेरामे हम अपन भूत, वर्तमान आ भविष्य स्पष्ट देख रहल छी । एखन धरि अनुमानित हम ५ लाखक दारु पीने हएब २ लाख ५० हजार ७०० क माउस खेने हएब कतौ अपने लुटैलौं/ कतौ दोसरकेँ लुटलौं एनामे बर्बाद भेल हएत हमर जम्मा ३ लाख ७५ हजार। आइ हम सोचैत छी- ऐ रकममे सँ किछु पढ़ाइमे लगैने रहितौं तँ आइ हमरा पास कोनो बिषयक डिग्री रहितए किछु पैसा स्वास्थ्यमे खर्चने रहितौं तँ हमर शरीर कोनो बीमारीक घर नै रहितए अथवा ओ रुपैया बचल रहितए तँ अपन देशक कोनो नीक शहरमे आलीशान महल बनल रहितए मुदा दुर्भाग्यक गप्प, एहन किछु नै भेल फलत: हम नर्कक चक्कर काटि रहल छी आ एखनो राति-राति भरि सादा पन्नापर कलमक नोखसँ जिनगीक हिसाब करैत छी बस हिसाब करैत छी। खूनक ढेला संग नव पुस्तक पतन 

सुन सुन हौ भैया सभ  आगिक चिन्गारीसँ पसाही लागि देश भरि तबाही मचि गेलौ।  जन्मदाता सभ पृथ्वीपर अवतरण  कराबऽ सँ पहिनहि अपन-अपन कोखिकेँ सुडाह करऽ लगलौ।

भविष्यक कर्णधार छै बच्चा  काल्हि धरि उपमा देनिहार सभ दाम्पत्यक सुखमे लिप्त भऽ  अधर्मी, राक्षस आ नरपिशाच भऽ गेलौ।

सृष्टिक फूल बनि सुन्दर जिनगी लऽ  अनुपम ब्रह्माण्डक अवलोकन करब,  एहन पुनीत आ परम उद्देश्य खूनक ढेला संग बेकार भऽ गेलौ।

के दोषी, ककर अछि दोष  ककरा अछि होस, के अछि बेहोस लोभी, लालची, महत्वाकांक्षी सन  मात-पितासँ मनो घबराए लगलौ।

दोसर दिस रोगी लेल भगवान कहेनिहार  समाजसेवी नामसँ प्रख्यात भेनिहार  आ स्वार्थक विषपान केनिहार आला-सिरिन्जबला सभ  भौतिकवादक चपेटामे पड़ि पथभ्रष्ट भऽ गेलौ। मच्छर आ खन्चुवा जकाँ रस चुसऽ लगलौ। 

पता नै ई रावणराज कहिया धरि चलत  लैङ्गिक असमानतामे गर्भ कहिया धरि उजड़त  भगवान सबुद्धि दैथि ऐ दुरात्मा सभकेँ  कारण पिताक आगू माइयो लाचार भऽ गेलौ माने खूनक ढेला संग जिनगी बेकार भऽ गेलौ। प्रेमक फल 

शीसा फुटल दिल टुटल सकनाचुर भऽ छिड़िया गेल  डोलीमे ओ गेली पिया घर  हाथमे दारु थमा गेल। 

दारुए हमर साथी-संगी  बिनु ओकर सहारा नै  कखनो ठर्रा कखनो प्याक  बिनु ओकर गुजारा नै। 

जिनगी अपन नरक बनेलौं  ओइ लजबिज्जीक प्यारमे  मरणासनमे सास अछि लटकल  ओ मजा करए ससुरालमे। 

प्यार करब पैघ बात नै  निभाएब बड़का बात छै  प्रेमसँ ककरो जीवन सबरल  ककरो जीवनमे घात छै ।

पिया अहाँक यादमे 

मेघसन कारी केशपर  गोर गोर गाल यौ  आमक रस सन लाल ओठपर  पिया अहाँके नाम यौ।। 

हम दु जोड़ी संग-संग जियब  गायब प्रेमक गुणगान यौ  मरऽ सँ पहिने आ मरलाक बाद  बस रहब अहाँक गुलाम यौ।। 

हे प्राणेश्वर लौटब कहिया  करब कखन आराम यौ  घाइल दिलके मल्हम अहाँ  दिल अछि अहाँक मकाम यौ।। 

राति-राति भरि निन्द नै आबए  बड जोर झकझोरए याद यौ  बिन अहाँके जिनगी बीतल  अहाँ दिल्ली, अरब, असाम यौ।।

नोर बहैए नयनसँ हमर  राह देखैत सौ बार यौ  अपने भेलहुँ परदेशी बाबु  हम छी एतऽ बेकार यौ।। 

बिनु पानिक मछली बुझु  फुटल अल्मुनियम थाली यौ  बिनु रोहितके जिन्दा लाश  भेल यऽ अहाँक रुपाली यौ।। हमर समाज बौरा गेल एखनुक सभसँ पैघ सबाल अछि सगरो बलत्कारे बलत्कार  गाँउमे बलत्कार, शहरमे बलत्कार  देशमे बलत्कार, विदेशमे बलत्कार  बुझू जे घोर कलयुग छा गेल  माने हमर समाज बौरा गेल ।। 

अत्याचार, आतंक, महिला हिंसा  निस्तब्ध भऽ सभ केऊ देखैत अछि  जनता तँ आपसमे फुटले देखब  लुटेराक त्राससँ सरकारो डगमगा गेल माने हमर समाज बौरा गेल।। 

सुरक्षाकर्मी पथभ्रष्ट भऽ जुआ खेलै  शान्तिसेना हिनताबोधमे दारु पेलै  अशान्तिक भूमरिमे धरती खौझा गेल  माने हमर समाज बौरा गेल।। 

कतौ फेसबुकसँ बलत्कार  ककरो स्काइपमे बलत्कार  कखनो निम्बुजसँ बलत्कार  तँ कतौ ट्वीटरमे बलत्कार  एहन अपराध सर्वत्र छा गेल  माने हमर समाज बौरा गेल।। 

सहनशीलताक प्रतिमूर्ति नारी  मर्यादाक पराकाष्ठा होइ छै  माया-प्रेमसँ जगत फुलाबै  स्वप्न दर्शनक द्रष्टा होइ छै  मुदा दुर्भाग्य दानवक उदय भेल  सकुनी मामा संग कंसक आगमन भेल  द्रौपदीक चीरहरण, सीताक रुपहरण  निन्दनीय घटना आइ फेर दोहरा गेल  माने हमर समाज बौरा गेल।। 

की कहु देखलौं घोर अनैतिक बात जइठाम देखू बलत्कारे बलत्कार  बेटीक बलत्कार, दीदीक बलत्कार  मौसीक बलत्कार,पिउसीक बलत्कार बुझु जे घोर कलयुग छा गेल  माने हमर समाज बौरा गेल।। अब्दुल रजाक, हरिपुर ४, धनुषा (नेपाल), हाल : कतार गणतान्त्रिक देश

राणा शासनक बाद राजा शासन भेलै निर्दलसँ फेर बहुदल भेलै जब-जब लोकक बुद्धि फैलैत गेलै बहुदलसँ देश गणतन्त्र भेलै।। 

गणतन्त्रक गन्ध जब खतम नै भेलै नेताक स्वार्थमे तब बेमेल भेलै जनता जनार्दनक हालत देखियौ  गरीबी, रोजगारी सबकेँ सन्देश भेलै।। 

विज्ञानक बिदद्वारा गतिमान भऽ  जब जब कपड़ा बनएबाक बिस्तार भेलै कपड़ा बड़का की पहिरथिन कन्या लोकनि चट्टी सजा अत्याधुनिक भऽ गेलै ।।

शिक्षा संगे सभ्यताक बिकास भऽ  लोग कहै छथि समाज होशियार भेलै मुदा मर्द बिना के परिवार छै केहन  अपङ्ग समाजक एक उपहार भेलै।। 

चौक चौराहाक हानि भेलै तास जुआक अखाड़ा भेलै भला कहू तँ बुरिबक छी  बुरिबक काज कएनिहार भला आदमी भेलै।। 

परिवार डुबल तँ की डुबल ? समाज डुबल तँ किछु भेलै देशक चिन्ता कएनिहारकेँ चिन्ता केहन परदेश आबि देशक चिन्ता भेलै।। जगदानन्द झा ‘मनु’ ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी रुबाइ कर्जा कए कऽ हम जीवन जीव रहल छी फाटल अपनकेँ कहुना सीब रहल छी सभ किछु गवा कए ‘मनु’अपन जीवनकेँ निर्लज भए हम ताड़ी पीब रहल छी रुबाइ नैन्हेटा हाथमे केहन लकीड़ छै नै माय बाप ई केहन तकदीर छै धो धो कऽ ऐँठ कप लकीड़ो खीएलै नै सुनै कियो ई दुनियाँ बहीर छै रुबाइ गोड़ी तोर मुस्कीमे छौ जहर भरल नै एना मुँह खोल कते घायल परल जँ निकैल गएलौ फूलझड़ी सन हँसी बाटपर भेटत कतेको छौंड़ा मरल रुबाइ साँवरिया पिया अहाँ ई की कएलहुँ साउन चढ़ल छोड़ि चलि कोना गएलहुँ बहए हवा शितल सिहरैए हमर तन कोना रहब बिनु अहाँ बुझि नै पएलहुँ रुबाइ

सिस्टम आइकेँ किए बबाल बनल अछि  नेता सभ तँ  एकटा जपाल बनल अछि  बड़का बड़का बागर सभ राज चलबैए जनताक प्राणेपर सबाल बनल अछि रुबाइ

गामक अधिकारी भेला सैयाँ हमर  कोना क पकड़तै कियोक बैयाँ हमर  सभक पेटीक माल आब हमरे छैक  सैयाँ लएथिन सभटा बलैयाँ हमर रुबाइ

मैथिली साहित्यक आँच सुनगैत अछि  सगरो नव विधाक ज्वला पजरैत अछि  कोटी नमन जिनकर बिछल जारैन अछि  विदेहक बारल आगि 'मनु' लहकैत अछि रुबाइ बाबूजीक करेजमे  सदिखन रहलहुँ नै अपन मोनमे हुनका हम रखलहुँ   छाहैर रौद पानिसँ सदिखन बचेलन्हि सेबाक बेड़मे हम बहाना रचलहुँ रुबाइ 

देह प्राण सबटा बाबूजी देलन्हि  जे किछु छी एखन बाबूजी केलन्हि अपने रहि भूखे हमर पेट भरलन्हि सुधि अपन बिसरि हमरा मनुख बनेलन्हि रुबाइ जे जन्म देलन्हि  ओ कहलन्हि गदहा  जे पोसलन्हि ओ  मानलन्हि गदहा  गदहा जँका जीन्दगी अपन बितेलहुँ जिनका बियाहलहुँ ओ बुझलन्हि गदहा रुबाइ घाट-घाट पर सूतल कतेक गोहि अछि  साउध लोककेँ सबतरि लेने मोहि अछि  धर्मक नाम पर खूजल कतेक दुकान  टाका लs कs छनमे सभटा पाप धोहि अछि रुबाइ कोन बिधि मरि कs हम रुपैया कमेलहुँ सुख चेन निन्न रातिकेँ अपन हरेलहुँ जन्मक अपन सभ सम्बन्ध तियागि बिन कसुरे बाहर    वनवास बितेलहुँ बाल गजल तिला संक्रातिकेँ खिच्चैर खाले रौ हमर बौआ ल’जेतौ नै तँ कनिए कालमे ओ आबिते कौआ चलै बुच्ची सखी सभ लाइ मुरही किन कऽ  आनी अपन माएसँ झटपट माँगि नेने आबि जो ढौआ बलानक घाट मेलामे कते घुमि घुमि मजा केलक किए घर अबिते मातर बुढ़ीया गेल भय थौआ कियो खुश भेल गुर तिल पाबि मुरही खुब कियो फाँकेँ ललन बाबा किए झूमैत एना पी कए पौआ सगर कमलाक धारक बाटमे बड़ रमणगर मेला सभ कियो ओतए गेलै कि भेलै ‘मनु’ कुनो हौआ (बहरे रमल, मात्रा क्रम १२२२-१२२२-१२२२-१२२२) भक्ति गजल चलि अहाँ कतए किए गेलहुँ मुरारी एहि दुखियाकेँ हरत के कष्ट भारी   तान ओ मुरलीक फेरसँ आबि टारू बिकल भेलहुँ एतए एसगर नारी   द्रोपतीकेँ लाज बचबै लेल एलहुँ नित्य सय सय बहिनकेँ कोना बिसारी

बनि कऽ फेरसँ सारथी भारत बचाबू सभक रक्षक हे मधुसुदन चक्रधारी  

वचन जे रक्षाक देलहुँ ओ निभाबू कहत कोना ‘मनु’ अहाँकेँ हे बिहारी

(बहरे रमल, वज्न – २१२२-२१२२-२१२२)   

  भक्ति गजल हे राम बसु मनमे हमर ई प्राण धरि तनमे हमर

सदिखन अहीँक ध्यानमे नै मन बसै धनमे हमर

प्रभु दरसकेँ आशासँ ई भटकैट मन बनमे हमर

एतेक मन चंचल किए प्रभु रहथि कण कणमे हमर

हे राम ‘मनु’पर करु दया नै मन बहै छनमे हमर

(बहरे रजज, मात्रा क्रम २२१२-२२१२)     

भक्ति गजल अहाँ तँ सभटा बुझैत छी हे माता सुमरि अहाँकेँ कनैत छी हे माता 

दीन हीन हम नेना बड़ अज्ञानी आँखि किए अहाँ मुनैत छी हे माता

अहाँ तँ  जगत जननी छी भवानी तैयो नहि किछु सुनैत  छी हे माता 

श्रधाभाव किछु देलौं अहीँ  हमरा अर्पित ओकरे करैत छी हे माता

नहि हम जानी किछु पूजा-अर्चना जप तप नहि  जनैत छी हे माता

जगमे आबि    ओझरेलहुँ एहेन अहाँकेँ नहि सुमरैत छी हे माता

छी मैया हमर हम पुत्र अहीँकेँ एतबे तँ हम बजैत छी हे माता

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३)

भक्ति गजल धूप आरती हम अनलहुँ नहि  जप-तप करब सिखलहुँ नहि 

सदिखन कर्तव्यक बोझ उठोने अहाँक ध्यान किछु धरलहुँ नहि 

की होइत अछि माए पुत्रक नाता एखन तक हम बुझलहुँ नहि

हम बिसरलहुँ अहाँकेँ जननी  अहुँ एखन तक सुनलहुँ नहि

अपन शरणमे लऽ लिअ हे माता ममता अहाँक तँ जनलहुँ नहि

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३ ) भक्ति गजल निर्धन जानि कऽ छोरि गेलहुँ  माँ      कोन अपराध हम केलहुँ माँ

केहनो छी तँ हम पुत्र अहींकेँ सभ सनेश अहींसँ पेलहुँ माँ  

मूल्यक तराजुमे नै एना जोखू  ममताकेँ  पियासल भेलहुँ माँ

दर-दर भटकि खाक छनै छी दर्शन अपन नै दखेलहुँ माँ

‘मनु’केँ अपन सिनेह नै देलहुँ सोंझाँ सँ दूर आब भगेलहुँ माँ

  (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१२) . गजल घोड़ा जखन कोनो भऽ नाँगड़ जाइ छै कहि ओकरा मालिक झटसँ दै बाइ छै   माए बनल फसरी तँ बाबू बोझ छथि नव लोक सभकेँ लेल सभटा पाइ छै

घर सेबने बैसल मरदबा छै किए   चिन्हैत सभ कनियाँक नामसँ आइ छै

कानूनकेँ रखने बुझू ताकपर जे   बाजार भरिमे ओ कहाइत भाइ छै   खाए कए मौसी हजारो मूषरी बनि बैसलै कोना कऽ बड़की दाइ छै

पोसाकमे नेताक जिनगी भरि रहल जीतैत मातर देशकेँ ‘मनु’ खाइ छै

बहरे रजज, मात्रा क्रम २२१२ तीन तीन बेर गजल

आइ सगरो गाममे हाहाकार छै मचल एना ई किए अत्याचार छै

आँखि मुनने बोगला बैसल भगत बनि खून पीबै लेल कोना तैयार छै

देखतै के केकरा आजुक समयमे देशकेँ सिस्टम तँ अपने बेमार छै

देखते मुँह पाइकेँ कोना मुँह मोरलक मांगि नै लेए खगल सभ बेकार छै

भरल भिरमे एखनो धरि एसगर छी केकरो मनपर ‘मनु’क नै अधिकार छै

  बहरे जदीद, मात्रा क्रम – २१२२-२१२२-२२१२ गजल

अहाँ पिआर करु हमरा हमर बसन्ती पिया अपन बाबूक नहि हम  आब रहलहुँ  धिया

बहुत जतनसँ  सोलह बसन्त सम्हारलहुँ आब नहि सहल जाइए हमर टूटेए  हिया

नेह रखने छी नुका कए कोंढ़ तर अहाँ लए रुकि नहि जुलूम करु हमर तरसेए जिया

आब आँकुर फूटल पिआरक अछि चारू दिस  अहाँ जे रोपलौं  करेजामे हमर प्रेमक बिया

आउ हमरा सम्हाइर लिअ हमर सिनेहिया अहाँकेँ सप्पत दै छी करियौ नै ‘मनु’ एना छिया

सरल वार्णिक बहर,  वर्ण-१८ .गजल

खाल रंगेल गीदड़ बड्ड फरि  गेलै एहने आइ सभतरि ढंग परि  गेलै

घुरि कऽ इसकूल जे नै गेल जिनगीमे   नांघिते तीनबटिया सगर  तरि  गेलै

देखलक भरल पूरल घर जँ कनखी भरि आँखि फटलै दुनू डाहेसँ मरि गेलै

सभ अपन अपनमे बहटरल कोना अछि मनुखकेँ मनुख बास्ते मोन जरि   गेलै  

बीछतै ‘मनु’ करेजाकेँ दरद कोना जहरकेँ घूंट सगरो  पी कऽ भरि  गेलै

बहरे मुशाकिल, मात्रा क्रम २१२२-१२२२-१२२२ गजल

लुटेए गाम गाबेए कियो लगनी किए लागल इना सभकेँ शहर भगनी

कियो नै सोचलक परदेश ओगरलक भऽ गेलै गामपर माए किए जगनी

उठेलहुँ बोझ हम आनेक भरि जिनगी अपन घरमे रहल सदिखन बसल खगनी

बिसरलहुँ सुधि सगर कोना कऽ हम हुनकर बनेलहुँ अपन जिनका हम घरक दगनी

अपन जननी जनमकेँ भूमि नै बिसरल भरल बाँकी तँ अछि सभठाम ‘मनु’ ठगनी   (बहरे हजज, मात्रा क्रम १२२२ तीन तीन बेर सभ पांतिमे गजल रहब आब नै दास बनि हम  अपन नीक इतिहास जनि हम 

जखन ठानलहुँ हम अपनपर  समुद्रो लएलहुँ तँ सनि हम 

उठा मांथ जतएसँ तकलहुँ  दएलहुँ  तँ नक्षत्र गनि हम 

हलाहल दुनीयाँक पीने चलै छी अपन मोन तनि हम 

जमल खून मारलक धधरा  लएलहुँ विजय विश्व ठनि  हम (बहरे मुतकारिब, मात्राक्रम-१२२) गजल हकन नोर माए कनै छै  तकर पुत्र मुखिया बनै छै 

कते आब बैमान बढ़लै गरीबक टका के गनै छै 

पतित बनल नेता तँ देशक  दुनू हाथ ओ मल सनै छै 

पएलक कियो जतय मोका  अपन बनि कs ओहे टनै छै 

बनल  भोकना जेठरैअति मुदा 'मनु' तँ सभटा जनै छै 

(बहरे मुतकारिब, मात्राक्रम-१२२) गजल मनुखक एहि दुनियाँमे कोनो मोल नहि रहल हमरा लेल केकरो लग  दूटा बोल नहि रहल बजाएब  कतए ककरा  सभटा साज टूटिगेल छल एकटा फूटल ओहो आब ढोल नहि रहल सभतरि घुमैत अछि   मनुखक भेषमे हुडार नुकाबै लेल ओकरा लग कोनो खोल नहि रहल रातिक भोजन ओरिआनमे माएक मोन अधीर छल हमर बाड़ीमे एकटा से ओल नहि रहल हँसैत आ मुस्काइत रहए   जतएकेँ लोकसभ मिथिलाक गाममे 'मनु' आब ओ टोल नहि रहल (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१९) गजल होए मोन हरखीत ढोलो सोहाइ नै बिनु कारने मीठ बोलो सोहाइ प्रियगर भेट नवकी कनियाँ गेलै जँ हाथक हुनकर नोनगर ओलो सोहाइ जेबीमे जखन भरल रुपैया होइ तहने महग सस्ताक मोलो  सोहाइ सिम्बर तूरकेँ नीक गदगर मसलंग सुन्नर ओहिपर आब खोलो सोहाइ भरि सन्दूक घर जाहिमे भेटै सोन एहन घरक महकैत झोलो सोहाइ (बहरे हमीद, २२२१-२२१२-२२२१) गजल भूतलेलहुँ किए एना मित बना लिअ छोड़ि सगरो बहानाकेँ  प्रित लगा लिअ वचन नै देब हम नै किछु मोल एकर आउ चलि संगमे  हमरो अप्पना लिअ काँट पसरल बिछ्ब कहु एतेक कोना फूलकेँ लय कs मोनक संसय हटा लिअ जुनि बुझू आन जगमे सपनोसँ कखनो बूझि अप्पन कनी छू ठोरसँ सटा लिअ रूप सुन्नर अहाँकेँ ई ओहिपर बदरा जीब कोना करेजामे "मनु" बसा लिअ (बहरे - असम, मात्रा क्रम - २१२२-१२२२-२१२२ ) गजल जीवन कखन तक छैक नै बुझलक कियो कखनो करेजक गप्प   नै जनलक कियो भेटल तँ जीवनमे सुखक संगी बहुत देखैत दुखमे आँखि नै तकलक कियो दुखकेँ अपन बेसी बुझै किछु लोक सभ भेलै जँ दोसरकेँ तँ नै सुनलक कियो सदिखन रहल भागैत सभ काजे अपन आनक नोर घुइरो कs नै बिछ्लक कियो जीवन तँ अछि जीवैत 'मनु' सभ एतए मइरो कs जे जीवैत नै बनलक कियो (बहरे- रजज, २२१२ तीन-तीन बेर सभ पांतिमे) गजल जखन खगता सभसँ बेसी तखन ओ मुँह मोड़ि लेलनि जानि आफत छोरि हमरा सुखसँ नाता जोड़ि लेलनि देखि चकमक रंग सभतरि ओहिमे बहि ओ तँ गेली जानि खखड़ी ओ हमर हँसिते करेजा कोड़ि लेलनि बन्द केने हम मनोरथ अप्पन सदिखन चूप रहलहुँ पाञ्च बरखे आबि देख फेर सपना तोड़ि लेलनि दुखसँ अप्पन अधिक दोसरकेँ सुखक चिन्ता कएने आँखि जे फूटै दुनू तैँ एक अप्पन फोड़ि लेलनि चलक सप्पत संग लेलहुँ जीवनक जतराक पथपर मेघ दुखकेँ देखते ओ संग 'मनु'केँ छोड़ि लेलनि (बहरे - रमल, मात्राक्रम- २१२२ चारि-चारि बेर सभ पांतिमे) गजल किए तीर नजरिसँ अहाँकेँ चलैए  हँसी ई तँ घाएल हमरा करैए 

मधुर बाजि खन-खन पएरक पजनियाँ  हमर मोन रहि रहि कए डोलबैए   

छ्लकए हबामे अहाँकेँ खुजल लट  कतेको तँ  दाँतेसँ   आङुर कटैए ससरि जे जए जखन आँचर अहाँकेँ जिला भरि  करेजाक धड़कन रुकैए अहीँकेँ तँ मुँह देखि जीबैत 'मनु' अछि बिना संग नै साँस मिसियो चलैए (बहरे - मुतकारिब, मात्राक्रम -१२२-१२२-१२२-१२२) गजल

माँ शारदे वरदान दिअ हमरो हृदयमे ज्ञान दिअ

हरि ली सभक अन्हार हम एहन इजोतक दान दिअ

सुनि दोख हम कखनो अपन दुख नै हुए ओ कान दिअ

गाबी अहीँकेँ  सगर गुण सुर कन्ठ एहन तान दिअ बुझि पुत्र ‘मनु’केँ माँ अपन कनिको हृदयमे स्थान दिअ (बहरे रजज, मात्रा क्रम - २२१२-२२१२) बाल कविता- होएत जँ हाथक मुरली हमर खुरपी बनल गोबरधन बनल अछि ढाकी, प्रजा हमर सभ हराए गेल माए बनल अछि बूढ़ीया काकी | गाए एखनो हम चरबै छी प्रिय नहि लम्पट कहबै छी, इस्कूलक फीस दए नहि सकलहुँ तैँ हम चरवाहा कहबै छी | हमर गीतक स्वर महीसे बुझैत अछि, वा खेतक हरियर मज्जर सुनि झुमैत अछि | हमर बालिंग नै कियो देखने अछि गाछीक एक एक आमक मुँहपर लिखल अछि, चौक्का छक्काक नाम नहि सुनलहुँ हमर पुल्लीसँ गाम भरिक बासन टूटल अछि | के लऽ गेल यमुनाकेँ एतेक दूर जँ कनिको नाम हुनक जनितहुँ हम, हाथ जोड़ि दुनू विनती करितहुँ यमुनाकेँ हुनकासँ माँगितहुँ हम | हमरो गाममे जँ यमुना बहैत विषधर कलियाकेँ नथितहुँ हम, मुरली बजा कए गैया चरबितहुँ यमुना कातमे नचितहुँ हम | होएत जँ  हमरो माए यशोदा सभक प्रिय बनितहुँ हम, होएत जँ दाऊ भाइ हमर कतेक बलशाली रहितहुँ हम | शिव कुमार यादव गजल कथिक उसार छै लोकक बैसार छै

जिनगी हमरे छै बोनक उजार छै

लोकक करनी छै तेकरे अचार छै

घरक उठान छै लोकक बिचार छै

धधरा उठल छै आगिक पजार छै

हमरे जड़ान छै राखक पसार छै

"शिकुया" मरल छै तेकरे हेंजार छै गजल भइया मोने हम बड नीक भौजीक मोने हम बड तीत

भइया सोझाँ हमहीं काबिल भौजीक मोने हम बड बीख

भइया हमर बात मानए भौजीक मोने हम बड हीठ

भइया सँ अछि सबकेँ रीत भौजीकेँ नै सोहाइ बड प्रीत

एक दिन घर सँ भागि गेलौँ भौजीकेँ लगलनि बड नीक गजल सब अछि बनल हीत अहाँके छी हम एकेटा तीत अहाँके

हमरा सँ ऐना किएक बजै छी छी नए हम की मीत अहाँके

पजरामे रहए छी हम तैयो छी नइ घरक भीत अहाँके

किएक कचोटै छी मोन हमर नीक नइ छी ई पीत अहाँके

सर-समाज सँ कात भेलौँ हम तैयो नइ अछि प्रीत अहाँके

एना किएक भसियाइ छी अहाँ "शिकुया" कनए पतीत अहाँके गजल भइया हमर छथि बड कहबैका यौ गामक सभ केओक काज करबैका यौ

गाम-गमाइत खूब नाम चलैत अछि भोजमे चूड़ा-दही केँ बड सुड़बैका यौ थाना-ब्लौकमे सभ केओ जानैत अछि कोट-कचहरी सेहो बड जनबैका यौ मीठ बाजिकऽ सभकेँ हीत बनाबए छै लोक समाजमे संगे-संग रहबैका यौ "शिकुया"क भइया छै बड हितलग्गु सभ केओकेँ नीमन बाट सुझबैका यौ गजल कतऽ नुकेलहीं गे दिलतोड़िया कतऽ भसेलहीं गे मनतोड़िया

तोहीं तँ हमर मनमीत गे कतऽ हरेलहीं गे संगतोड़िया

चान सन तोँ हमर सजनी गे कतऽ बिलेलहीं गे नैनतोड़िया

तोँ तँ हमर भगजोगिनी गे कतऽ पड़ेलहीं गे पगतोड़िया

"शिकुया" हेरान तोड़ा लेल गे कतऽ भसेलहीं गे मनतोड़िया

(आशीष अनचिन्हार जीक पाँति "कहाँ नुकेलही गे दिलतोड़िया गे मनतोड़िया" के देखि कऽ तुरत्तेमे कहल गेल ई गजल।- शिकुया "मैथिल") रामवि‍लास साहु सुखल खेत आ भूखल पेट सुखल खेत जरैत जजाति‍ खेतक दाररि‍ देख-देख दरकि‍ करेजा जरैत रहलै पानि‍ बि‍नु खेत बज्‍जर भेलै कि‍सानक तकदीर जरलै की खाए बचैते परान महगीयो तेतबे छै पंूजी पतीक हाथे सरकार वि‍कल छै छि‍यासठि‍ बर्ख अजादीक भेल देशक कि‍सान कंगाले अछि‍ भरल नदी पानि‍ बहति‍ रहलै नै बनलै बान्‍ह सुलीस गेट केना जेतै खेतमे पानि‍ नै बनलै अखनि‍ धरि‍ नहर केना उपजतै खेतमे धान झुट्ठे वयान सरकार करै छै नै भेलै खेत-वि‍कासक काम देशक लेल सभ दि‍न दैत रहलै कि‍सान अपन खून-परान मुदा आइ धरि‍ नै सरकार कहि‍यो देलकै धि‍यान केना हेतै देशक कल्याण सुखल खेत भूखल पेट केना बँचतै गरीबक परान। मि‍थि‍लाक पि‍यास मि‍थि‍लाक पि‍यास नै मुझा सकल कोइ जे मुझबैक प्रयासो केलन्‍हि‍ ओ सभ दि‍न ठकि‍ते रहलै मि‍थि‍लाक पि‍यास बढ़ैत गेलै अपन अश्रुकेँ पीबैत गेलै पि‍याससँ मन व्‍याकुल भेलै मि‍थि‍ला तँ मैथि‍ली लेल पि‍यासल मैथि‍ली-रस पीबए चहै छलै से रस कड़ुआएले छलै पि‍यासल मि‍थि‍ला तड़ैप-तड़ैप मैथि‍ली लेल मड़ैत रहलै कहैले मैथि‍ली भाषा सभ जनक भाषा छी मुदा सभ दि‍न अपनेमे झगड़ैत रहलै एक दोसरसँ छुबाइत रहलै तँए मैथि‍लीक वि‍कास नै भेलै मकड़जालमे फँसल रहलै तॅए आइ धरि‍ नै मि‍थि‍लाक पि‍यास मुझलै जाधरि‍ मि‍थि‍लामे मैथि‍ली सभ जनक भाषा नै बनतै ताधरि‍ नै मि‍थि‍लाक पि‍यास मुझतै। कि‍अए छुबाइ छी छुबैसँ जखन छुबाइ छी तँए कि‍ परि‍वर्त्तन देखै छी काज जखन नै छुबाइए देहक लहू पानि‍ नै बनैए नै कि‍नको लकबा मारैए तँ केना छुबाइ छी? पानि‍ छुबाइए मुदा दूध नै पान-मखनसँ मान बढ़ैए चुड़ा-दहीक भोग लगैए भात देखि‍ मुदा मन ओकि‍ऐ भेद-भावक जाल बना मनुक्‍खकेँ मनुक्‍ख नै बुझै छी समाजकेँ कमजोर केना छी एतेक धि‍नौना कुकर्म करै छी तैयो अपनाकेँ पैघ बुझै छी गंगा नहाए पूजा करै छी उन्‍टे कहै छी छुबाइ छी। पुसक राति‍ पुसक राति‍ जाड़क मारल थरथराइत देह केना बचाएब प्राण। फुइसक घर खोपड़ी सन केना िबताएब पुसक राति‍ घरक टाट-ठाठ झलफाँफी कनकनी हवा छुबैए प्राण घुराड़ी जरा-जरा बचबै छी कहुना प्राण मुदा धि‍या-पुताक केना बचतै प्राण। नार-पुआरक बि‍छौना गोनरि‍क छै ओढ़ना पजरेमे सटि‍ बि‍लाइ दुबकल छै अबगरहमे छै ओकरो जान सबहक मुँहेँ सुनै छी पुसक राति‍केँ फूसि‍ नै बुझि‍यौ कतेकोकेँ लइ छै प्राण माघो मास अगुआएले छै सुनि‍ कऽ करेजा दरकैए केना भेटत ऐसँ त्राण आब लगैए नै बचत प्राण के करत गरीबक कल्‍याण। केना कहब भारत महान जे देशक लेल ति‍याग करैए ओकरे जि‍नगी नरक सन बनल-ए गरीबक दुख कोइ नै बुझैए हाथ रहि‍तो नै छै कोनो काम सुखल खेत नै भेलै धान जि‍नगी बि‍तै छै बैसल मचान तौनी कोपीन पहि‍र जे रहलै गाम-समाजकेँ पकड़ि‍ चललै आफतमे मि‍ल देशकेँ बचैलकै गोली खा देलकै बलि‍दान देश अजाद भैलै मुदा दि‍न-दुखि‍याक दुख कि‍यो ने बटलकै गरीब बनल छै अखनो गुलाम सभ धन सरकारे लेल छै गरीब जनताक हक छि‍नलकै आइ धरि‍ नै भेलै गरीबक उत्‍थान भुखले पेट तेजै छै प्राण जे लहू पसि‍ना सभ दि‍न बहबै छै आगू बढ़ि‍ सीना तानि‍ ओकरे दुख नै सरकार बुझलकै ठेल देलकै नरकमे जानि‍ मरलकेँ मारैत रहलै जानि‍ बूझि‍ बि‍नु लाभ-हानि‍ देशक समस्‍या बढ़ैत जाइए सरकार ओकरा दबबैत जाइए समस्‍या बनल अछि‍ ज्‍वालामुखी समान केना कहब भारत महान। रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ झारू झारू बि‍नु ने घरक शोभा, ने हमरा बि‍नु हएत हवन हमरा बि‍नु ने मंदि‍र-मस्‍जि‍द, और ने देशक संसद भवन। झारू सुति‍ उठि‍ लागू भोरे बाबू माए-बाबूकेँ गोड़ यौ। एकड़ा सन जगमे नै कि‍यो सेवापर दि‍औ जोर यौ। गीत माए गइ बोल तोहर छौ, बाइबि‍ल वेद कुरान गइ। शान्‍ति‍केँ बरदान गइ ना-2 तूँ तँ जगमे अनुपम, केकर उपमा देबै हम। सौंसे दुनि‍याँमे नै, कि‍यो तोरा समान गइ। शान्‍ति‍...। आगू तूँ पाछू भगवान, जगमे तुहीं एक महान। तोरे नाओंसँ पुज्जि‍त मंदि‍रक भगवान गइ। शान्‍ति‍...। तूँ तँ ममता केर अकास। पहि‍ल गुरु केर प्रकाश। तुहीं जगमे देखेलही, जीबै केर समान गइ। शान्‍ति‍...। तूँ तँ अल्ला, ईषू, महेश, कार्तिक गणपति‍ और गणेश। माए गइ चरण तोहर छौ, गंगामे स्‍नान गइ। शान्‍ति‍...। गीत झारूसँ नै घृणा करू ई तँ अनुचि‍त बात छी मि‍लै छै जइसँ जगमे शान्‍ति‍ तेकर हम सुरूआत छी। जइ घर नै छै हम्मर आदर तइ घर घुसतै दुक्‍खक बादल पएर पसारत रोग बेमारी ओ घर भूतक जमात छी मि‍लै छै जइ......। की हमरा बि‍नु तनक शोभा फुटतै कि‍ मोन ऐ बि‍नु आभा के कहौत हमरा बि‍नु मानव केकर ई ओकात छी मि‍लै छै जइ......। के नै लइ छै हम्‍मर सेवा राजा-रंक-दानव और देवा के गि‍न सकतै रूप-रंग हमर सौचैबला बात छै जइसँ मि‍लै छै......। शि‍व कुमार झा “टि‍ल्‍लू” पुरीक यात्रा जीवन यात्रा थि‍क जैव पथि‍क अजैव दर्शक शरीर शाश्वत नै ई क्षणभंगुर-नाश्वर आत्‍मा मौलि‍क तत्व जइपर पंच रचि‍त- शरीरक कोनो ि‍नयंत्रण नै ऐ अधम शरीरक एक्को क्षणक कोनो गारंटी वा वारंटी नै तँए सदि‍खन अपन पथपर चलैत रहू- चलैत रहू जतेक क्षणक जीवन जतेक दि‍न उगैत सुरुजक दर्शन आनंद उठबैत रहू सभ भगवत कृपा थि‍क बूढ़-बुढ़ानुसक मुखसँ सुनैत छलौं आब देख रहल छी मोबाइल खरीदैत काल एक बरखक वारंटी कार्ड भेटल सोचए लगलौं भगवान हमरा जनमैकाल कि‍अए ने मायकेँ हमरा संग मि‍नटो भरि‍क वारंटी कार्ड देलनि‍...? एकर उत्तर देनि‍हारि‍ माय हमर बौद्धि‍क वि‍काससँ पूर्वहि “अरुप” भऽ गेली मर्त्‍य भुवनमे पठबैबला पर ब्रह्म तँ सहजे ि‍नरंकार छथि‍ केकरासँ पूछब...? ‍अंत कालमे बाबाकेँ खोआ खएबाक सख लगलन्‍हि‍.. जेना दुरगमनि‍याँ कनि‍याँ होथु आश्चर्य... कफ, पि‍त्त आ वायुक त्रि‍वेणी कंठकेँ घेर नेने छल तैयो मुइलाक कोनो जि‍ज्ञासा नै कोनो इच्‍छा नै- केना हएत- कतए जाएब? गरुड़ पुराण आ श्राद्ध समाज स्‍वीकार कऽ रहल मृतात्माकेँ स्‍वर्ग पठा रहल मुदा मरनि‍हार- अचंभि‍त ओकरा केना पता लागए जे ओ कतए जाएत...? सभ अन्‍हारेमे वाण चलबैछ- तँए बेटा-पुतोहुक गारि‍-मारि‍ खाइयो कऽ बाबा जीबए चाहैत छला हुनक यात्रासँ आजुक यात्राक- कोनो तुलना नै बाबाक अंति‍म यात्रासँ पथि‍क सभ जतरा बनौने छल- आजुक यात्रा केकरो पसि‍झा देत प्रस्‍तुत अछि‍ “पुरीक यात्रा”क गाथा कोनो जगन्नाथ परी वा द्वारि‍का पुरी नै हमर सहकर्मी सहधर्मी पुरी पहि‍ने सरुप छल आब अनूपसँ अरूप भऽ गेल अछि‍ की मनुक्ख... एतेक आनंदि‍त रहि‍ सकैत अछि‍...? युवावस्‍थामे ि‍नर्वाणक लगि‍च आबि‍ कऽ जीवन पथक शि‍खर लग नै-नै अधगेरसँ पूर्वहि‍ “स्‍थाय वि‍श्राम अवश्‍य हएत” ई जनैत एतेक शांत मंद मुस्‍कान आब! भ्रम दूर भऽ गेल “आनंद” सि‍नेमा देखैत काल बाबूजी सँ पुछने छलि‍यनि‍ “की ऐ तरहक घटना संभव छैक...?” हम तँ नै देखने छी भऽ सकैछ अहाँ देख लेब! साहि‍त्‍येसँ सि‍नेमा बनल भलहिं ई व्‍यवसायि‍क साहि‍त्‍य अछि‍ परंच साहि‍त्‍यकारक परि‍कल्‍पना सेहो ईह लौकि‍के होइत अछि‍ एकटा साहि‍त्‍यकारक तर्ककेँ तखन तँ काटि‍ देने छलौं... मुदा! आब तँ भ्रम अवश्‍य दूर भऽ गेल तीन-तीन अवोधक पि‍ता “अनूप” अरूप हएत जनैत छल केकरो नै कहलक जीबाक भुभुक्षामे व्‍याधि‍सँ मुक्ति‍क आशमे अपन अर्जित सभटा धन पि‍तृ धर्म आ कंत धर्मक रक्षा हेतु नष्‍ट कऽ देलक जीवाक पि‍आसकेँ बढ़बैत गेल मृत्‍युसँ लड़ैत गेल अपनहि‍मे सि‍मटि‍ दोसर लग हँसैत चलि‍ देलक अंति‍म यात्रामे केकरोसँ यात्रामे केकरोसँ नै कहलक अपन अंर्तव्‍यथा अपन अंत:करणक पथराएल पि‍पासा वा उच्‍छवास अंति‍म आश्चर्य... जेकरासँ अन्नय सि‍नेह करैत छल ओइ अर्द्धांगि‍नीसँ केना नुका लेलक...? हमरो जीवनक तमाम सत्‍यकेँ ओइ सबला- जे आब अवला!! कहि‍ नुका सकल ओकरासँ ओकरे अधि‍कार केना छीन लेलक...? बि‍नु कि‍छु कहने छोड़ि‍ चलि‍ देलक कनैत कोनो गप्‍पकेँ हुनकासँ नै छल नुकबैत अथाह व्‍यथाक इनारमे कनि‍याँकेँ कनैत... की ओ पाथर छल एतेक कठोर तँ पाथरो नै सद्य: ओ छल-हीरा कठोर टीससँ भरल हीरा ऊपरसँ चमकैत रहल कि‍रणक संग हँसैत रहल हारि‍ गेल तँ चलि‍ देलक हँसि‍ते चलि‍ देलक एक बून नोर जौं खसबो कएल तँ अपन जेठकी अबोध कन्‍याकेँ देख वाह रौ साहसी तोहर जबाव नै ऐ अदम्‍य साहसकेँ कोटि‍-कोटि‍ नमन!!! गृहस्‍थ धर्मक एहेन पालन देख “धर्मराज” जौं हएत तँ अवश्‍य लजा गेल हएत ऊपर जा कऽ ओकरा संग-संग आन दैवा सभसँ पूछि‍ तँ लि‍हैं आब तीन-तीन अबोधक संग-संग ऐ अवलाक झाँझ बनल नाह केना ऐ कुटि‍ल अथाह भव सागरमे वि‍चरण करतै...? एहेन अन्‍यायकेँ दैवि‍क चक्र लोक केना कहतै...? सुमित मिश्र, करियन ,समस्तीपुर भक्ति गजल

हम निर्बुद्धि-पापी बैसल कानै छी पुत्र अहीँके जननी क्षमा माँगै छी

तोहर दुआरि बड भीड़ हे मैया कखन देब दर्शन आब हारै छी

अष्टभुजा नवरुप जगदम्बिके दशो दिशा विभूषित अहाँ साजै छी

ममतामयी झट दया-दृष्टि करु नाव भँवरसँ दुःखियाके उबारै छी

अरहुल फूल आ ललका चुनरी असुर विनासिनी जगके तारै छी

"सुमित" बालक जुनि ज्ञान हे दुर्गे चरण बैसिकऽ गीत अहीँके गाबै छी वर्ण-12 भक्ति गजल

हम निर्बुद्धि-पापी बैसल कानै छी पुत्र अहीँके जननी क्षमा माँगै छी

तोहर दुआरि बड भीड़ हे मैया कखन देब दर्शन आब हारै छी

अष्टभुजा नवरुप जगदम्बिके दशो दिशा विभूषित अहाँ साजै छी

ममतामयी झट दया-दृष्टि करु नाव भँवरसँ दुःखियाके उबारै छी

अरहुल फूल आ ललका चुनरी असुर विनासिनी जगके तारै छी

"सुमित" बालक जुनि ज्ञान हे दुर्गे चरण बैसिकऽ गीत अहीँके गाबै छी

वर्ण-12 गजल

पहाड़ संग टकरेबाक लेल अटल विश्वास चाही नै मिझा सकै एहन ज्वालामुखीके प्रकाश चाही

पिँजराक बंधन में बन्न पंछी कोना कऽ उड़ि सकत कोनो सपना पूरा करबाक लेल मुक्त आकाश चाही

करेज पर चोट करैत भविष्य केर किछु सवाल शीप वा मोती पाबऽ लेल सागर पिबाक पियास चाही

अन्हारेमे आयल दिनकर सँ संसार रोशन छै अज्ञानता सँ जीतबाक लेल निरंतर प्रयास चाही

ई चलायमान दुनिया अनवरत चलैत रहत मुदा अचल नाम लेल पहचान किछु खास चाही

माटि पर गिरल फूल सँ भी घर-आँगन गमकत मुदा ओझरायल बाटमेँ सही राहके तलाश चाही

कृपा करब माँ शारदे आब नाव फँसल मँझधार हरेक खेल जीत सकी "सुमित" के एतबे आश चाही

वर्ण-20

गजल

सबटा मोनक बात हुनक आँखि बता गेल बहल एहन बसात हमर होश उड़ा गेल

नदीकेँ धारकेँ विपरीत चलबाक कोशिश भासैत जा रहल स्वप्न सब किछु हेरा गेल

पाथरपर फूल उगायब जुनि छै कठिन डेगहिँ-डेग मिलल निराशा आश जगा गेल

स्वार्थक बदरी मानवतापर मँडरायल भाइ-भाइमे दुश्मनी गामक-गाम जरा गेल

संस्कृतिकेँ झकझोरैत नव जमानाकेँ दौड़ लोक-लाज गुम अपन उपस्थिति देखा गेल

गरीबी केर लत्ती चहुँ ओर लतरल अछि गमकैत फुलबाड़ी "सुमित" पल भरिमे सुखा गेल

वर्ण-17 गजल प्रेमक पवन बहै दर्द हेबे करत शीतक समीर तँ सर्द हेबे करत

बाटक दिक नै भुतिया गेलौं संसारमे कि श्वप्नक खजाना गर्द हेबे करत

जखन भाग्यक ठोकर लागत मनुख केँ कर्तव्य-कर्मक पथ फर्द हेबे करत

जँ बीच बजार लुटतै केकरो इज्जत आगू बढ़ि जनानियों मर्द हेबे करत

तोड़ि देलौँ करेजक नस एक झूठ सँ आब अपनो समांग बेदर्द हेबे करत

गामक लोक बसि रहल शहर जाकऽ निज संबंध सुमित फर्द हेबे करत गजल चंचल चलै बसंत बहि आयल हर्षित मोन चिहुँक कहि जागल

हुनकर रूप देख मोन व्याकुल जेना चिड़ैयाँ वाण सहि कऽ घायल

दुख केर देख मनुख किए कानै मयूर घटा कारियो देखि नाचल

अनकर पीड़ देखि खुश होइ छी निज दुख मे मनुख किए कानल

चाँदनी कें संग चान बहरायल "सुमित" प्रेमक छटा देखि पागल

वर्ण-13 गजल बीतल समय नै घुरि कऽ आबै छै सबटा लोक बैस एतबे गाबै छै

समय सँ बड़का नै कोनो खजाना जिनगी मे जीतल जीत हराबै छै

मोल एकर जे बूझि नै सकलनि तँ किए नहुँ-नहुँ नोर बहाबै छै

कपट द्वेष सँ मोन आन्हर अछि आँखि मुनि भाग्य ठोकर पाबै छै

झुलसि दुपहरिया बाट चलै छै थम्हि कऽ मीठगर राग सुनाबै छै

समय संगहि सब दौड़ लगाबै "सुमित"कर्मक फल फरियाबै छै

वर्ण-13 सुरेन्द्र शैल मुदा करबै की?

चारू कात अन्हार कोनो वाट नहिँ सूझय नैहर-सासुर  कियो हाल नहिँ पूछय अपने पंजाब मे वैसल अछि  हमरा घर मे दरिद्रा पैसल अछि चेफरी साटल नूआ ठाम-ठाम मस्कलआंगी चूड़ीक नाम पर दू टा वन सेहो चनकल नैहरक पायल सेहो वन्हकी लागल तइपर जरलाहा ई चतरल धूआ घर सँ निकलितो कोँढ कँपैत अछि ओहिना कलरा ककाक नरहेर बेटा एम्हर- ओम्हर तकैत भौजी-भौजी करैत अंगना आवि जाइत अछि सरधुआ ठेलने ने ठेलाइत अछि हम सभ बुझैत छी मुदा करवैक की? पैँच- उधार-बोनि मांगय गिरहथक ओतय जाइत छी हुनकर वेटा संटू बाबूक नजरि पड़िते जेना लागय कियो सौँसे देह मे बबूरक काँट गड़ा रहल अछि टहटहाइत गूड़क कातेकात बिढ़नी अपन सूंघ गड़ा रहल अछि पीज भरल घाव पर पिलुआ सहसहा रहल अछि माथ मे किछु हहाइत अछि जी ओकिआय लगैत अछि मुदा करवैक की? आई तँ हद भय गेल बोनि दैत काल  संटू बाबूक हाथ किछु आगू बढ़ि गेल लागल जे विजलीक तार कोनो अंग सटि गेल भेल जे झारु सँ झाटि दी ने तँ दविया सँ काटि दी परिस्थितिक मारलि ठाढ़ि ठकुआयल छी मुदा करवैक की? बटोही

सुधि विसरि वटोही निन्न पड़ल, ठहियाय, थाकि अछि भूमि पड़ल। नहिँ जानि कतेको कोस चलल, वैसल तरुतर झट नैन मुनल। रौदा सँ झामर देह मगर, उन्नत ललाट मुख तेज प्रखर। अछि रूप एकर कन्दर्प सनक, लटकल कुन्तल सखि सर्प सनक। अछि नलिन नयन मुख चान सनक, ऋतुराज मुखक मुस्कान सनक। वनराजक ग्रीव, भरल छाती,  कटि पुष्ट, जाँघ दुलकल हाथी। चाकर कन्हा,भुज युग्म सवल, चुम्बक सन खीँचय नेह नवल। छवि वसल वटोही नैन हमर, हरि लेलक वटोही चैन हमर। मन मे हहाय विररो उदंड, तन मे धधाय पावक प्रचंड। धकधक करेज तन काँपि रहल, लाजो नयनक पल झाँपि रहल। उठ जाग वटोही तेज अलस, उमड़ल अषाढ़ घटि गेल उमस। सभ गीत आई मल्हार बनत। वरिसत सिनेह रसधार वहत। नवका महेशवाणी

भोला भुच्च पहाड़ी यौ। नवका युग मे भोला छोड़ू, ई पुरना ढाठी॥भोला॥ बाघम्बर के भोला छोड़ू, जीन्स-पैन्ट पहिरू। सगर वस्त्र भोला स्प्रे करु, हे डमरूधारी॥भोला॥ सहसह सर्प सघन वन छोड़ू, भस्म-रुद्र त्यागू। सोनक चेन गरा मे पहिरू, हे गंगाधारी॥भोला॥ बूढ़ बरद कैलाशहिँ छोड़ू, "क्वालिस" असवारी। जटा कटा जेन्टलमैन बनियौ, टाई -सूटधारी॥भोला॥ भांगक गोला भोला छोड़ू, ह्विस्की हाथ धरू। सुरा माति त्रिशूल के छोड़ू, हे पिस्टलधारी॥भोला॥ एहिले धन के चिन्ता छोड़ू, तिलकक मांग करू। गौरी बाप-दशा जुनि देखू, हे शिव त्रिपुरारी॥भोला॥ भैरव-भूत-गणादि के छोड़ू, हे शिव भयहारी। छौड़ा सभ नंगटे नाचै अछि, अतेकरे संग धरू॥भोला॥ डीजे पर डामरु के फोड़ू, चक्कर-फुलझारी। विना बैँड गौरी ने वियाहव, हे शिव शशिधारी॥भोला॥ तांडव नृत्य मसान मे छोअड़ू, डिस्को-डांस करू। शैल कुमति मिथिला मति मोड़ू, हे विपदाहारी॥भोला॥ चुहाड़

अछि कोनटा मे ठाढ़ चुहाड़, काटि सेन्ह लुटि लेत भराड़। कय वेरि लुटि पुनि गेल पड़ाय, घुरि-घुरि आवय विनु सकुचाय। जखन सिकन्दर वनि के आयल, राजा पुरु के रणहिँ हरायल। गोरी वनि धाओल गुजरात, लूटल कच्छ,भरुच,भुज सात। सोमनाथ मंदिर घुसि गेल, तोड़ि महादेव सभ लुटि लेल। पृथ्वीराजक फोड़लक नैन, नहिँ भेटल एकरा मन चैन। बाबर बनि के आवि समायल, हति हेमू सत्ता हथियायल। पुनि धेलक वनिया केर भेष, टूटल निन्न ने चौँकल देश।  मायक पयर मे जकरल वेरि, जे गिरहथनी से भेलि चेरि। गोरका मालिक, देश गुलाम, पुरखा चाकर ,देथि सलाम। घुरि आयल वनि निगम घराना, लूटि रहल अछि हमर खजाना। ई बहुरुपिया अछि लुटिहारा, परम चंठ बड़का फँसियारा। धन लूटत धर्महुँ सभ लूटत, इज्जति संग धरोहरि लूटत। पान,मखान,मधुर सभ लूटत, अपना धारक भाकुर लूटत।  जे जन गावय एकर गीत, से परचट्टा परम पतीत। उठू यौ बौआ उठू यौ भैया, फेर घुरि आयल कंस कसैया। एकरा मुँह मे ऊक लगाउ, कूर खेत चुगला झड़काउ। बाल मुकुन्द पाठक गजल  रौद आ बिहाड़िसँ जे लड़ल अछि एहि ठाम ओतबे गाछ पैघ भऽ बचल अछि एहि ठाम

भूखल छैथ राति दिन जाहि लेल गरीब यौ किनको खरिहानमे सड़ल अछि एहि ठाम

एहि टेक्निकल युगमे बी ए केने हाएत की एम ए कऽ गाम गाम पड़ल अछि एहि ठाम

जे विपत्तिमे धैर्य राखि लागल अछि काजमे ओ नभमे चान बनि सजल अछि एहि ठाम

भ्रष्टाचारी शासनमेँ बीकल सरकारी सीट चुप्पी मारि लोक घरे सूतल अछि एहि ठाम

गेल युग श्रवणकेँ माँ बापक कोनो मोले नै बूढ़ पूराण पूतसँ डरल अछि एहि ठाम  सरल वार्णिक बहर ,आखर 17 गजल मिललौँ अपन चानसँ भेल पुलकित मोन बीतल पहर विरहक भेल हर्षित मोन

छल आँखि सागर ताहिसँ सुनामी उठल बहलौँ तकर वेगसँ भेल विचलित मोन

बाजल तँ जेना बुझु फूल झहरल मुखसँ ठोरक मधुर गानसँ भेल शोभित मोन

ओकर बढ़ल डेगसँ दर्द हरिया उठल पायलक सुनिते स्वर भेल जीबित मोन

प्रीतक तराजू पर तौललौँ धन अपन विरहक दिया जड़िते भेल पीड़ित मोन

बहरे सलीम ,मात्राक्रम २२१२  २२२१  २२२१ .गजल

पिया बिन ऐहि घर रहिये कऽ की करबै विरह सन आगिमे जड़िये कऽ की करबै

अपन कनियाँ जखन कहि नै सकब हमरा पिया करमे अपन धरिये कऽ की करबै

निवाला जखन नै भेटत तँ बुझबै दुख गरीबक दुख अहाँ सुनिये कऽ की करबै

उड़ाबै देखि खिल्ली लोक हमरा यौ समाजक बनि हँसी रहिये कऽ की करबै

जखन दर्दक इलाजेँ नै अहाँ लग यौ तखन बेथा हमर सुनिये कऽ की करबै

बहरे हजज ,मात्रा क्रम १२२२ तीन बेर गजल

आँखि सूतल छै मोन जागल कियै छै गाछ सूखल छै पात लागल कियै छै

भटकि रहलौँ हम नौकरी लेल जुग मेँ भाग भूटल छै आस लागल कियै छै

प्रेम मेँ हुनकर टूटि गेलै करेजा शांत मन तैयोँ आगि लागल कियै छै

गाम रहि रहि केँ याद आबैत रहतै मोन विचलित छै फेर भागल कियै छै

अपन पीड़ा बेसी बुझाएत तैयोँ शीश काटल छै देह लागल कियै छै

राति दिन ई सोचैत बाजै मुकुन्दा नाम ई ओकर आब पागल कियै छै

बहरे - खफीफ ,मात्रा क्रम २१२२-२२१२-२१२२ गजल

साहीक कांट घटैत गेलै रुप सोहागक बरहैत गेलै तेल आ बाती सठैत गेलै भूख प्रकाशक बरहैत गेलै

लूट काट दंगा फसादसँ समाज एतोँऽ बनल कुलषित लोक जतै कटैत गेलै समाज सुधारक बरहैत गेलै

धर्मक व्यापार करै लोक एतोँऽ ठगै निज भेष बदलि कऽ लोकक आस्था घटैत गेलै काज पंडितक बरहैत गेलै

छैन मातृभूमिक नै कोनो चिँता धन लेल ई नेता बनथि आ मुद्रास्थिति खसैत गेलै गरीबी देशक बरहैत गेलै

लोक एतोँऽ अछि बनल हत्यारा बेटी जानि भूर्ण हत्या करै स्त्रीक संख्या घटैत गेलै आ राशि दहेजक बरहैत गेलै

देखि सिनेमा बढ़ल फैसन देखूँ मिथिला यूरोप बनल संस्कार कियै घटैत गेलै नग्नता देहक बरहैत गेलै

सरल वार्णिक बहर ,वर्ण 22 गजल

हमरासँ जौँ दूर जाएब अहाँ रहि रहि इयादि आएब अहाँ

सिनेह लेल अहीँके बेकल छी छोड़ि कऽ हमरा कि पाएब अहाँ

खोजि खोजि के तँ पागल बनलौँ बताउ कि कतऽ भेँटाएब अहाँ

किएक लेल एहन प्रेम केलौँ जौँ ई बुझलौँ नै निभाएब अहाँ

बदलि गेलियै अहाँ कोना कऽ यै हमरासँ नै बिसराएब अहाँ

हमरा छोड़ि गेलौँ मुकुन्द संग आब कतेक के फसाँएब अहाँ

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण12 गजल 

सुनु अहाँ कियै हमरा सँ दूर गेलौँ यै अहीँक चलतै हम तँ नाको कटेलौँ यै

रुप अहाँक देखिकऽ हम तँ मुग्ध भेलौँ ओहि परसँ कियै ई कनखी चलेलौँ यै

मगन छलौँ अहाँ मेँ काज धाज छोड़िकऽ प्रेम मेँ तँ हे प्रेयसी जग बिसरेलौँ यै

पढ़बाक उमरि छल छलौँ इक्कीस के काँलेज के छोड़िकऽ अहाँमेँ ओझरेलौँ यै

मुकुन्द अछि प्रेमी अहाँकँ सभ जानैये जानसँ बेसी चाहे जे तकरा गंवेलौँ यै

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 15 गजल

बिना दागक हमर छल ई चान सन मुँह कुकर्मी नोचि लेलक मिल राण सन मुँह

कि सपना देखलौँ आ लुटि गेल जिनगी घटल एहन बनल देखूँ आन सन मुँह

रमल रहियै अपन धुनमेँ आ कि एलै चिबा गेलै हमर सुन्नर पान सन मुँह

बनल नै स्त्री समाजक उपभोग चलते किए तैयो मनुख नोचै चान सन मुँह

हमर सभ लूटि गेलै ईज्जत व चामोँ कि करबै जी कऽ लेने छुछुआन सन मुँह

बहरे-करीब मने  "मफाईलुन - मफाईलुन-फाइलातुन" मात्रा क्रम-1222 - 1222 – 2122 मूल तेलुगु कविता:पसुपुलेटि गीता; तेलुगुसँ हिंदी अनुवाद:  आर.शांता सुंदरी; हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद:विनीत उत्पल (दिल्लीक बलात्कारक घटनापर) दुमर्जा देह भऽ गेल अछि एकटा इतिहास-दोख दूटा ठोढ़, दूटा गाल दूटा स्तन, दूटा जांघ जोड़ा चुहचुही दुइए युगमे एहन जेना जिनगी भऽ गेल खतम जिनगी एत्ते संकीर्ण भऽ गेल जे कनियो टा डोलू तँ उघड़ए लागैत अछि भीतक रहस्य बिनु खुजनहिये ग्राफिती भटरंग हुअए लागैत अछि काल्हि नै जानि केकर बेर अछि? खराप नै मानब, लागए लागल अछि लगमे ठाढ़ सभटा पुरुख जेना जांघक बीच अप्पन भाला लऽ कऽ चलि रहल अछि समुद्र आ अकासकेँ मिला कऽ बुनलापर सेहो ऐ अदौक पाथर-युगक उघारकेँ झपबा लेल हाथ भरि लत्ता नै भेटैत अछि आँखि खुजलेपर तँ बुझाएत जे भोर भऽ गेल जइ अंगमे आँखिये नै ओकरा लेल आन्हरक-अन्हारे आनंद अछि अँतड़ीये टा नै हृदएकेँ सेहो उधेसैत देहमे अन्हार सोझे खन्ती बनैए धँसि जाइए खराप नै मानब, कीड़ीसँ कीड़ीक नाशक आशा करैत मृत्युसँ अमृत मांगैत मालजाल भऽ मालजालक बहिष्कार के करैत अछि? मानवताक भ्रमजालमे सिग्नल सभक बीच बड़का सड़क जखैन बनि जाइत अछि आक्रंदनक गुमकी कान फाड़ैबला प्रश्नक गोली जनमि रहल अछि तँ की भेल? विवेकपर लाठी बजरि रहल अछि फुसियाहींक भरोस, बिकट्ठ गारि नोर पोछि रहल अछि। प्रहरी-दलक पसार नोरबला गैसक मेघ बनि विश्वासपर आच्छादित भऽ रहल अछि। नग्र एकटा मृत्युक ओजार बनि गेल अछि अप्पन आ आस-पड़ोसक घर नव घा बनि औनाए लगैत अछि हमरा दूनू गोटेक अस्तित्व काएम रहबाक हुअए तँ अहाँकेँ हमरामे मनुष्यता बनि झहरऽ पड़त हमरा अहाँमे पैसि मातृत्व बनि बहए पड़त देहक दोखी भेलाक बाद प्राणक हिलकोर मिझा गेलाक बाद चण्ठमे अनूदित भेलाक बाद बालुक पानिक झिल्हरिक बाँझ स्थितिमे प्रवासी भऽ प्रवेश केलाक बाद... माँ सेहो अहाँ लेल एकटा गलत सम्बन्ध बनि कऽ रहि जाएत... खराप नै मानब, आब एतए मुर्दाघरक अलाबे सौरी-घरक कोनो खगता नै! हेम नारायण साहु हम छी मैथि‍ल हम छी मैथि‍ल हमर छी मि‍थि‍ला मि‍थि‍ला हमर गाम छी। हमर अप्‍पन धाम छी। कि‍एक एकरा ि‍बसरि‍ रहल छी ऐ माटि‍-पानि‍केँ छोड़ि‍ पड़ाए रहल छी। ऐ भूमि‍केँ समुच्‍चा जगमे नाम जपैए संसारक लोक जय-जय गान करैए। मि‍थि‍लाक सभ्‍यता-संस्‍कृति‍केँ कि‍एक बि‍सरि‍ रहल छी? ऐठामक लोक-गाथा ठोहि‍ पाड़ि‍ कानि‍ रहल छै। कतए गेल जट-जटीन ओ झड़नी गीत...। गामक गल्ली-कुच्‍ची गबैत छल कहि‍यो कतए गेल अल्हा-रूदल ओ लोरि‍कक नाच जे ठेहुनि‍या दऽ मंचपर ललकारैत छल? बि‍ला गेल महराइ केर खि‍स्‍सा धर्मराज सन धर्मात्‍माक भक्‍त हरि‍या डोम सन भक्‍त कहबैत छल? बि‍नु कोनो भेद-भावक भक्‍त केर घर भोजन करै छल! बि‍सरि‍ गेल सभ दि‍ना-भदरीक गाथा बि‍सरि‍ गेल सभ चुहरमलक गाथा कतेक गि‍नाबी मि‍थि‍लाक संस्‍कृति‍क गाथा मन पड़ैए तँ दुखाइए माथा। ऐ मातृभूमि‍क संतान भऽ माएकेँ छोड़ि‍ कि‍अए पड़ाइ छी। हम छी मैथि‍ल हमर छी मि‍थि‍ला कि‍अए एकरा बि‍सरि‍ रहल छी। डॉ. शि‍व कुमार प्रसाद, सम्‍पर्क-सहायक प्राध्‍यापक (सेलेक्‍सन ग्रेड), हि‍न्‍दी वि‍भाग, ह. प्र. साह महावि‍द्यालय, (ि‍नर्मली काॅलेज ि‍नर्मली) ि‍नर्मली- सुपौल। खेबैया सबहक नाॅकेँ भेटल खेबैया बि‍नु खेबैया हमरे नाॅ अछि देखू पार आब केना लगैत अछि‍ बि‍नु खेबैया हमरे नाॅ अछि। कि‍नको टाका पार लगौतन्‍हि‍ कि‍नको नेता पार लगौतन्‍हि‍ अपन-अपन बाँस भि‍रौने बहुतो पार उतरलौ जाइ छथि‍ बि‍नु खेबैया हमरे नाॅ अछि‍। दूर-दूर धरि‍ नजरि‍ खि‍रौने ताकि‍ रहल छी आँकि‍ रहल छी कि‍नका पछुऔने पार लगत नाॅ कि‍यो संगी नै भेटि‍ रहल अछि‍ बि‍नु खेबैया हमरे नाॅ अछि‍। कि‍नको बड़का पैघ हबेली कि‍नको बड़का पागक डौड़ही कि‍नको सार कि‍नको मामा धोती जि‍नक अकास सुखाइत अछि‍ बि‍नु खेबैया हमरे नाॅ अछि‍। माय हमर नव कुम्‍भ नहेली माय हमर नव कुम्‍भ नहेली नै हुनका मन पापक गेठरी नै हुनका मन बाँझक धोकरी नैना-भुटुकाक साँस हास सन जि‍नगी भरि‍ ओ खूब नहेली माय हमर नव कुम्‍भ नहेली। नै कहि‍यो ओ चानन केली नै कहि‍यो संन्‍यासि‍न भेली गि‍रहस्‍थीकेँ स्‍वर्ग बूझि‍ ओ कर्मक संग प्रभु गुण गेली माय हमर नव कुम्‍भ नहेली। नै ओ ि‍वदुषी नै ओ सुन्नरि‍ नै आडम्‍वरी नै कनसोही बाट-बटोही सभ जन हि‍नका मनुक्‍ख रूपमे भेटल सि‍नेही माय हमर नव कुम्‍भ नहेली। मन प्रयागमे त्रि‍वि‍ध तापकेँ कर्मक हूलासमे अपन गर्वकेँ अपन मनोरथ परक दुखमे आजीवन ओ डुमौने रहली माय हमर नव कुम्‍भ नहेली। देख एलौ हम पटना हलसल-फुलसल बसमे बैस कऽ पहुँचि‍ गेलौं हम पटना देख एलौं हम पटना। भरि‍ रस्‍ता हम उड़ि‍ते गेलौं राति‍क नीन भेल सपना केतबो गुहारि‍ देव-गोसाओनकेँ मन पड़ैत छल फेकना देख एलौं हम पटना। बाप जनम नै देखने छलौं एहेन मनुक्‍ख जंगल भोजे बेरमे पहुँचि‍ गेल ओ पपि‍आहा घर-घुसना देख एलौं हम पटना। चोर-उच्चका डेग-डेगपर भीड़ देखि‍ कऽ जी उड़ैत छल बाहर-भीतर जाएब कठीन छल बेथाक नाओं अछि‍ पटना देख एलौं हम पटना। हुनकर बात काटि‍ हम एलौं बाल-बोधकेँ छोड़ि‍ कऽ एलौं नेताजी कि‍ बात बनौता मोन रहत ई घटना देख एलौं हम पटना। मन होइत अछि‍ उड़ि‍ कऽ पहुँचि‍ जाइ अपन सोहागक अंगना। मेटा रहल अछि‍ झँपा रहल अछि‍ अपन परि‍चि‍ति‍ देख एलौं हम पटना। शहर ओ गेल...... शहर ओ गेल मनुक्‍ख बनै लेल गाममे रहि‍ बन-मानुख छल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। गाममे सभ छल भाए-बहि‍न सभ कि‍यो बाबू कि‍यो काका छल भैया-भौजी बेटी-भतीजी नै कि‍यो बि‍नु नाता छल। शहरमे जाइते रि‍श्‍ता-नाता सभटा मटि‍या-मेट भऽ गेल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। पथराएल शहरी पाथरमे कन्नि‍को मानवता नै बाँचल चारि‍ बरखसँ चालीस बर्ख केर नेना-युवती बलि‍ चढ़ि‍ गेल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। बाट-बटोही देखतो आन्‍हर सनि‍तो रूदन बहि‍र भऽ गेल पशुतो एहेन कुकर्म सुनि‍-सुनि‍ चुड़ुक पानि‍मे डूमि‍ मरि‍ गेल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। बौआ केर उबटन कजरौटी केर काजर संगे बौआ केर उबटन बि‍ला गेल। सोइरी केर अशौचक संगे भारतीय संस्‍कार हरा गेल। बौआ केर......। नव युगक नव संस्‍कारमे जॉनसन बेबीक पाउडर मि‍लि‍ गेल माइक स्‍तन छोड़ि‍ कऽ नेना बोतल संगे माए भुला गेल। बौआ केर......। सि‍नेहक डोरि‍ तोड़ि‍ कऽ ममता सुन्‍दरता केर मोल बि‍का गेल दाइ नौरि‍नक संग पाबि‍ कऽ नेना माइक शोक भुला गेल बौआ केर......। अपन आन सभ पाइपर बि‍क गेल सम्‍बन्‍धक सभ आँच बुता गेल धन लक्ष्‍मीक चकाचौंधमे तन मन रागक रंग मेटा गेल कजरौटी केर काजर संगे बौआ केर......। सोहर जन्‍म बधैया संगे मूड़न उपनैनक महत मेटा गेल लकदक गाड़ी वस्‍त्राभूषणमे बरूआ केर आचार्य भुला गेल कजरौटी केर काजर संगे बौआ केर......। बेचन ठाकुर स्‍वागत गीत - प्रि‍य पाहुन...... प्रि‍य पाहुन, स्‍वागत स्‍वीकार करू स्‍वीकार करू, यौ साकार करू प्रि‍य पाहुन......। (कथीसँ स्‍वागत करब, नै वि‍ध-वि‍धान अछि‍ पूजाक कि‍छु, नै आेरि‍यान अछि‍) अबोध केर, पि‍यार करू यौ पि‍यार करू, हे यौ पि‍यार करू। प्रि‍य पाहुन......। (साहि‍त्‍य संगीत, कला वि‍हीन सभ्‍यता, संस्‍कृति‍ दीन) रक्षकगण, तैयार करू यौ तैयार करू, हे यौ तैयार करू। ्प्रि‍य पाहुन......। (दर्शन ले, पि‍आसल छेलौं प्रेम श्रद्धाक, रकटल छेलौं) अभि‍मत, बहार भरू यौ बहार भरू, हे यौ बहार भरू प्रि‍य पाहुन......। स्‍वागत गीत - अति‍थि‍गण स्‍वागतम्...... अति‍थि‍गण स्‍वागतम्, ति‍थि‍गण स्‍वागतम्। दर्शन पाबि‍ गदगद, पाहुन स्‍वागतम् अति‍थि‍गण......। (नै पान प्रसाद, नै चाहक बेवस्‍था। बैसक नै बेवहार, कलामे पूर्ण आस्‍था।) सभ्‍यता संस्‍कृति‍केँ, हार्दिक स्‍वागतम्। पाहुन स्‍वागम। अति‍थि‍गण......। (नै संगीत साहि‍त्‍य, नै कला शि‍ष्‍टाचार। शुभ असीरवादसँ, हटत सभ अन्‍हार।) राम रहीम कृष्‍ण कबीर, टेरेसा शरमणम् पाहुन स्‍वागतम् अति‍थि‍गण......। (धन्‍य भल कोचिंग, धन्‍य पूजा समि‍ति‍। धन्‍य वि‍देह परि‍वार, चनौरागंज बस्‍ती) गुरुजन वि‍द्वतगण, सज्‍जन बुद्धम। पाहुन स्‍वागत् अति‍थि‍गण......। रामचन्‍द्र प्रसाद, सम्‍पर्क सुपुत्र स्‍व. मि‍श्री लाल साह, गाम- उढ़वा (बड़ा), पोस्‍ट- खुटौना, थाना- लौकहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) प्रदूषण सुनह हौ भैया सुनू हे बहि‍नी आब केना कऽ बचतै प्राण हे। प्रदूषणक समस्‍या एलै लऽ लेतै जान हे। गाछ काटि‍ जंगल उजाड़ि‍ अपन बढ़बै छी शान हे। अगि‍ला पीढ़ीले कि‍छु ने सोचै छी एकर समस्‍या महान हे। वायुमण्‍डलक सन्‍तुलन बि‍गड़ि‍ गेल मानुष करैए त्राहि‍माम हे। कखनो ठंढी कखनो गरमी बाढ़ि‍क ताण्‍डव महान हे। गन्‍दीक जाला नदीमे खसैत अछि‍ जलमे भरल वि‍षाणु हे। नव-नव बेमारी उमड़ल अछि‍ जीवनक काेनो ने ठेकान हे। बम बारूद मि‍साइल बनबैत अछि‍ शानेमे होइत अछि‍ हानि‍ हे। खुला मैदानमे शौच करैत अछि‍ शौचालयपर नै अछि‍ धि‍यान हे। प्रदूषण ि‍नयंत्रण कानून बना कऽ मानव केर करि‍यो कल्‍याण हे। कवि‍ करजोरि‍ कहैए सभ कि‍यो रखि‍यो धि‍यान हे। सुनह हौ भैया सुनू हे बहि‍नी केना कऽ बँचतै प्राण हे। कि‍सानक हाल कि‍सानक छाती वि‍हुँसि‍ रहल अछि‍ बेटा बेटी नै पढ़ि‍ रहल अछि‍। अकालक गालमे कि‍सान समाएल हि‍नकापर संकट छन्‍हि‍ आएल। महगाइ चरम सीमा छुबैत अछि‍ चौका छक्का मजदूर मारैत अछि‍। कि‍सानक हाल भेल बेहाल बि‍ना जमीन बेचने नै होइत अछि‍ बेटी बि‍आह। खाद-बीजमे महगाइ भरल अछि‍ कि‍सानक दि‍लमे लहरि‍ उठल अछि‍ अन्नदाता कि‍सान कहबैत अछि‍ अन्नक मूल्‍य बेपारी रखैत अछि‍ यएह वि‍डम्‍बनाक तर पड़ल कि‍सान अहाँ समानक दाम रखैए आन। खाद बि‍ज फैक्‍ट्रीसँ अबैत अछि‍ ओकर मूल्‍य ओहए रखैत अछि‍ एक दि‍न पृथ्‍वीपर मचत हाहाकार अन्न देवता अन्न दइसँ लचार खेती लागतमे बढ़ल तूफान आब कि‍नको नै बचतै प्राण। बि‍नु घूस अफसर नै सुनैत अछि‍ एलेक्‍शनक खर्चा फैक्‍ट्री-मालि‍क उठबैत अछि‍। मनमाना वस्‍तुपर दाम एकर मारि‍ झेलैए कि‍सान। नेताजी सभ मोछ पि‍जबै अछि‍ कि‍सानक हाल कि‍यो नै पुछैत अछि‍। भगवानोकेँ ने रहलनि‍ धि‍यान ऐ धरतीपर कि‍एक बनौलनि‍ कि‍सान। क्रान्ति कुमार सुदर्शन प्रेम शब्द नोरक धार अछि गालपर दिलक वार अछि हालपर की हाल कहू हृदयात्म केर दोलन करैत अछि ठामपर! ठुठायल कपकप करैत हार हड्डी गलने बिनु बजैल जाड़ की कहू आब विचार मोन केर छिछिआइत छी बड्ड ओइ पार फाटल बेमाय घिनाएल पएर बनल जाइत छी काल्हि राड़ की आबो सुनब व्यथा स्नेह केर छी पागल जाए बीयर आ बार नवीन कुमार ‘आशा’ हनीमून स्वामी पाओल पुरुषोत्तम राम हुनक हृदये मे बसैत अछि प्राण । विवाहक रातिये सँ हुनक अछि संग ओ छथि कृष्ण आ हम राधा । प्रियतम कहलथि नहि गढ़ेलौंह गलाक हार नहि बढ़ेलौंह अहाँक श्रृंगार नैना-भुटका मे उलझि कय रहलौंह नहि अहाँकेँ विदेश घुमेलौंह हे प्रियतमा--- बाजि उठलाह अनचौके प्रियतम कनी भऽ आबी कहलथि हमरा सँ विआहक पुरे पचासम साल हनीमून पर चलब गोवा ऐ साल किछु तँ बाजु यै प्राण एक बेर तँ खोलू अपन जुआन । तड़प हुनक हृदयक कचोट करि गेल नहि चाहैत आँखि मे नोर भरि गेल । अजबारि देलक ई जीवन जग सँ मोन करैए बाँहि मे समेटी लड़खड़ाइत पग सँ क्षण-क्षण मृत्यु नजदीक देखै छी तइयो ने जानि मोह मे फँसे छी पड़ल छी मृत्यु सज्जा पर हम तखनो नै जानि कविता गढ़ै छी । बृृषेश चन्द्र लाल कहिआधरि ढुनैत रहब !

छोडू कमला आ कोशी कतेक बाढ़िक कथा कहैत रहब, कटान, ढ़हैत मकान आ वएह बलानक कथा  कहिआधरि ढ़ुनैत रहब ?! बनल नहि बरक्कत एतेक दिनसँ प्रकोप आ प्रताड़नाक बादो बाढ़िमे कहुना जीअलहुँ  बहलहुँ , बढ़लहुँ नहि ! उप्लाकए उढ़रैत माछ खएलहुँ बाढ़ि बान्हि , पकड़लहुँ नहि !! चुप्पे टोलाइत देखैत रहलहुँ बहतैक कखनधरि ,  मुदा, सम्हरलहुँ नहि !!! माथपर हाथ धए  कथा रचलहुँ कटानपर श्लोकपर श्लोक  दहाएल माछक तरानपर लए कोदारि आ बेल्चा  कोशी–कमलासँ न्यायहेतु लड़ए निकलहुँ नहि !!!!

हम महान छी कथामे अपने जगतमे  जनकमे जानकीमे मण्डन आ विद्यापतिमे शंकर आ गंग बजबैत छी बेसाहल पीडाकेँ तप कहि चौपेटि सैंतिकए खूब सजबैत छी नव त्वरित गतिक बदला इतिहासक गतिसँ  हाट–बजार चौक चौबटियामे चिचिआ–चिचिआकए अपनाकेँ भजबैत छी ! लोककेँ मसल्ला भेटि जाइत छैक भुजिभाजिकए खाऽ लैत अछि हमरेसभकेँ आ हमसभ, तैयो ढोल फेर वएह बजबैत छी !!

छोडू कमला आ कोशी कतेक बाढ़िक कथा कहैत रहब, कटान, ढहैत मकान आ वएह बलानक कथा  कहिआधरि ढुनैत रहब ?! ओम प्रकाश झा गजल तीतल हमर मोन हुनकर सिनेहसँ भेलौं हम सदेह देखू विदेहसँ के छै अपन, आन के, बूझलौं नै लडिते रहल मोन मोनक उछेहसँ नाचै छी सदिखन आनक इशारे करतै आर की बडद बन्हिकऽ मेहसँ छोडत संग एक दिन हमर काया तखनो प्रेम बड्ड अछि अपन देहसँ काजक बेर मोन सबकेँ पडै छी "ओम"क भरल घर सभक एहि नेहसँ मफऊलातु-फाइलातुन-फऊलुन (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर) गजल अहाँ हमरासँ एना नै रूसल करू कनी प्रेमक सनेसाकेँ बूझल करू हमर जिनगीक बाटक छी संगी अहीं करेजक बाट कखनो नै छोडल करू बहन्ना फुरसतिक करिते रहलौं अहाँ अहाँ कखनो तँ हमरो लग बैसल करू बहुत मारूक अछि नैनक भाषा प्रिये अपन नैनक कटारी नै भोंकल करू करेजा हमर फुलवारी प्रेमक बनल सिनेहक फूल ई सदिखन लोढल करू अहीं जिनगी, अहीं साँसक डोरी हमर करेजक आस नै "ओम"क तोडल करू (मफाईलुन-मफाईलुन-मुस्तफइलुन)- प्रत्येक पाँतिमे एक बेर मिहिर झा भक्ति गजल जटाधारी मनोहारी रमाजोगी  लगैए ई शक्तीधारी गंगाधारी महादेवा  लगैए ई

वरोदाता विषोधाता नटोराजा लगैए ई ब्रिखारूढ़ा गणोराजा भस्माभूता लगैए ई

सदोध्याना हिमोवासा कलाधारी लगैए ई हतोकामा नितोयोगी सदाचारी लगैए ई

महाबाधा महापीडा महातृष्णा हरैए ई मनोलोका अधोलोका नभोलोका लगैए ई

रक्षपूज्या मोक्षदाता गौरीप्रिया लगैए ई दंभविघ्ना शांतकारा ध्यानमग्ना लगैए ई प्रदीप पुष्प गजल

दोसरक गीत उगबै अछि चान मीता  हमर गजलो गबै भूखक गान मीता

आब रूदल ब'नब ने हम ग'छब कहियो जरल पेटसँ उठै ने सुर तान मीता

भेल बटुआसँ तगमाकें नीक दोस्ती बिन टका छी सभा मध्यें आन मीता

जैह देबै अहाँ हम रखबै हुलसिकेँ  गाय बूढो खपै विप्र दान मीता

पाँतमे हम अछोपक छी भोज खाइत 'पुष्प'कें नइ फिकर आ ने मान मीता 2122 1222 2122 सब पाँतिमे इरा मल्लिक भक्ति गजल राखु लाज हमर जगजननी शरण मेँ एलौँ माँ जगतारिणी कानि व्यथा किनका सौँ कहबय दुख हरहु माँ दुखनिवारिणी दृग सौँ झहरै नीर दर्श बिन सुधि लीजै हे माँशोकनिवारिणी नित पूजा नहिँ ध्यान धरय छी चित्त नै थिर हे माँ सुखकारिणी बीच भँवर मेँ डूबि रहल छी धरू पतवार माँ भवतारिणी वर्ण- 12 भक्ति गजल अहाँ प्रभू केखनो मोहिनी बनलियै तँ केखनो नारद जीकेँ श्राप देलियै अहाँके महिमा अछि अगम अपार केहेन रचना जगत के रचलियै जग के कण-कण मेँ व्यापित अहीँ छी केहन अनुपम इ सृष्टि गढ़लियै गँध मादक मनोरम वन सँपदा तृण सँ सुरभित धरा के सजलियै ऊँच पर्वत नदियाँ समुद्र झरना सत्य शिव रूप सुँदर कहलियै बाल वृध्द जवानी सँ गृहस्थी बसल ममता प्यार सँग करुणा जगलियै आखर-14 भक्ति गजल माटि तोहर हम लगायब माँ आ टहल-टिकोरा उठायब माँ सुँदर सबरँग फूल तोड़बै ग्रीमहार गूँथि पहिरायब माँ अर्हुल कमल फूल सँ अगबे अहाँक वेणीसाज सजायब माँ चुनि गेँदा चँपा बेलि भरि डालि अँचरी मेँ मुनरी टँकायब माँ जूही गुलाबक मुकुट बनेबै जगजननी दर्शन पायब माँ माँ के अनुपम रूप निहारब रचि गीत मधुर सुनायब माँ आखर- 12 भक्ति गजल हम किछु नै अहीँ अधार हमर छी अहीँ तँ माए मार-सम्हार हमर छी थिकौँ हम नीच पतित पातकी सुत यै जननी अहीँ रखबार हमर छी अहि दुनियाँक मायाजाल मेँ फसलौँ जानि गेलौँ अहीँ माँ उबार हमर छी बीतल वयस नाम सुमिरन बिन हे करुणामयी माँ पुकार हमर छी मझधार मेँ डूबि रहल मोर नैया उबार करहु पतवार हमर छी तन थाकल मन थाकि रहल अछि तमस भरल मोनक उजियार हमर छी जखन शरण हम अहाँके धेलहुँ सबसे पैघ माँ सरकार हमर छी आखर-14 गजल गमाउ नै गोरी ई छन बाते बेबातमे हमर हृदयसँ फूल पराग झरैए। देखू लाजसँ गालक गुलाब खिल गेल लोगक नैनाक काँट बेहिसाब गरैए। नैना चितवन अल्हड़पन देखैत छी कोना मुस्की मिसरियापर जान जरैए। अधर कोमलकली छै रस सँ भरल मन भँवरा बौरायल से जानि पड़ैए। मोन फागुनी बयार बनि मस्त मगन सिनुर लाजसँ मुखरा गुलाल भरैए। रूप चर्चा पसरि गेल गामहि गाममे कोना चलतै लोग दिनेमे बाट हेरैए। आखर-15 कविता लऽ चलू नदीक पार सखी, ओइ पार हमर प्रियतम छथि। हम केश सजेलौँ गजरासँ, नयन लगेलौँ कजरा तँ, लै अधरकली कऽ लाली सँ, भेल लाजसँ गाल गुलाबी तँ, अहाँ धरू एखन पतवार सखी, लऽ चलू प्रियतमक गाम सखी। सजि-धजि कऽ नयन बिछौने छलहुँ, नयनन मे सपन सजौने छलहुँ, तड़पैत अछि आकुल व्याकुल मन, इहो पीर नै सहत हमर तन मन, अहाँ करु किछु जतन उपाय सखी, लऽ चलू प्रियतमक ठाम सखी। प्रियतम जोहै छथि बाट हमर, बैरिन भेल रैन, नदीक लहर, तरिणी तट नौका बन्हल पड़ल, नाविक सुतल निसभेर बनल। अहाँ करु नै एको छन देर सखी, नाविककेँ तुरत जगाउ सखी। लऽ चलू नदीक पार सखी, ओइ पार हमर प्रियतम छथि। होलीक एक दूटा पाँति रंगक हुड़दंग मचल पिया बसंती होरीमे, सबहक मोनमे उमंग भरल पिया बसंती होरीमे। छै भंगक तरंग मचल पिया बसंती होरीमे, बुढ़बो दिअर लागै पिया बसंती होरीमे! राधा छथि जीवन आ मेहनति छथि श्याम यौ, सभ हाथकेँ काज दियौ हएत जीवन आसान यौ। हिंसा आ द्वेष दंभक होलिका जरा दियौ, कटुताकेँ छोड़ि रंग दोस्तीमे रंगाउ यौ। नारी नारायणी थिकी, हुनका मान सम्मान दियौ, जिनकासँ ई सृष्टि छै, हुनक शक्ति जगाउ यौ। रमा कान्त झा, सौराठ होलीक हुरदंग थाक गे हमर मन नाचए भौजीक बहीन हमरा संग। बजए पायल छमा छम छोड़ाक मन पनियाइ छै रसगुल्ला सन! पहिरने चश्मा ठोढ़ रंगने जमुनी छौड़ा सभकेँ देखाबए दुनियाँ! की कमाल केली हमर नवकी कनियाँ!! थाक गे हमर मन ओढ़नी लहरा कए ठोढ़ पटपटा कए! मारैए कनखी मटकी हाय रे केहेन कनियाँ लटकी।। थाक गे हमर मन बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। 374 || विदेह सदेह:१४ विदेह सदेह:१४ || 375

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a oat, जन रे: Aa? AS ee LO” & ठग जग मे =

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