SADEHA — 15

Publication: SADEHA · Issue: 15
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ISSN 2229-547X विदेह सदेह -१५ (विदेह-सदेह १४, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक १३३-१४४) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००-अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html, http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००-अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि,'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. १०००/- संस्‍करण : २०१३, २०२२ Videha Sadeha 14 : A Collection of Maithili Prose and Verse (source:Videha e-journal issues 133-144 at www.videha.co.in). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-१४४) गजेन्द्र ठाकुर- मैथिलीक वर्तमान-गजल, माँझ आंगनमे कतिआएल छी (पृ. २-७) धीरेन्द्र प्रेमर्षि- मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना (पृ. ८-१०) मुन्नाजी- बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा (प्. ११-११) कामिनी कामायनी- सोर, कोन डारि पर केकर खोता (प्. १२-२१) कुमार पृथु- नापल तौलल पसरल पथार (परमेश्वर कापड़िक पथार) (प्. २२-२२) डॉ अरूण कुमार सिंह- अभिकलनात्मक/संगनणात्मक (Computational) मैथिली व्याकरण (प्. २३-३१) अनामिका राज- सीमा (प्. ३२-३२) आशीष अनचिन्हार- पहरा-अधपहरा, प्रिंट पत्रिकाक संपादक आ गजलकारसँ अपील, अज्ञानी संपादकक फेरमे मरैत गजल, मैथिली गजलमे लोथ गजलकारक भूमिका, लघु-गुरू निर्णय (दूनू भाग एक ठाम), मैथिलीमे बाल गजल, भक्ति गजल, गजलक साक्ष्य, सूर्योदयसँ पहिने सूर्यास्त, मैथिली गजलक वर्तमान, विहनि कथा- खाए बला पार्टी (प्. ३३-७१) बाल मुकुन्द पाठक- प्रेम : वरदान वा अभिशाप (प्. ७२-७४) पूनम मण्डल- प्राज्ञ कापड़ि केशवलाल बाखं शिरपा सम्मानसँ सम्मानित, ’सगर राति‍ दीप जरय’क ७९ म आयोजन ‘कथा कोसी’ उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे औरहामे सम्पन्न/ ८० म सगर राति‍ दीप जरय सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे उमेश मण्‍डलक संयोजकत्वमे (प्. ७५-७८) रवि भूषण पाठक- ओइ साल, घर, बाबूक चट्टी (पृ. ७९-८१) सन्दीप कुमार साफी- राजा अओर परजा (पृ. ८२-८३) नवेन्दु कुमार झा- टाकाक आभाव मे ठप्प अछि कोसी महासेतूक काज सहरसा-फारबिसगंज अमान परिवर्तनक काज मद, ललितक बहन्ने मैथिलीक कथाक दशा-दिशा पर भेल चर्चा संपन्न भेल, मलेसं क छठम अधिवेशन, उनसठम वर्ष मे प्रवेश कयलक चेतना समिति नीक गप आ योजनाक पर भेल चर्चा (पृ. ८४-८७) शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्लू’- बड़का साहेव : परम्परागत संस्कार केर पराभवक वृति चि‍त्र (पृ. ८८-८९) मो. असरफ- शहरीया घरवाली (पृ. ९०-९०) बिन्देश्वर ठाकुर- पश्चताप, उपकारके चुपकार,प्रतिशोध, जेहन करणी तेहन भरणी, न्याय, आत्मग्लानि, अभिशाप (पृ. ९१-९४) परमेश्वर कापड़ि- लक्ष्मी आ गोधन (पृ. ९५-९६) राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’- चिन्तन- मैथिलीक भविष्यक प्रसंग (पृ. ९७-९८) कुमार अभिनन्दन- दुर्गास्तुतिक लोकपरम्परा: झिझिया (पृ. ९९-१०२) जगदानन्द झा ‘मनु’- गजलक लहास, सेल्समेन, उपहार,नीक, पिआर, कनियाँ दाइ, मौसी,हारि, डिबिया, पिआस, प्रेम दीवानी, खापरि धिपा कए (पृ. १०३-१११) अखिलेश कुमार मण्‍डल- पँचवेदी (पृ. ११२-११२) उमेश मण्‍डल- जीवि‍ते नर्क (पृ. ११३-११५) राम वि‍लास साहु- शि‍क्षाक महत (पृ. ११६-११७) जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल, अरविन्दजीक आजाद गजल (पृ. ११८-१२१) ओम प्रकाश झा- बहुरूपिया रचनामे, घोघ उठबैत गजल, समीक्षा- प्रेमचन्द्र पंकजजीक दू टा गजल, मैथिली बाल गजलक अवधारणा, भोथ हथियार, गजलक लेल (पृ. १२२-१३१) अमित मिश्र- कतिआएल आखर, गजल आ गीत मे अंतर की छै? (पृ. १३२-१३६) चंदन कुमार झा- बहुत किछु बुझबैए : कियो बूझि नहि सकल हमरा (पृ. १३७-१४४) पद्य- खण्ड (पृ. १४५-३०५ ) जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- किछु गजल (पृ. १४६-१५२) मुन्नी कामत- जट-जटिन, दर्दक टिस, रोकू कोय ऐ सैलाबकेँ (पृ. १५३-१५८) शान्तिलक्ष्मी चौधरी- लेस्बियन कॉन्टिन्युअम, मातृत्व, नेताजी (पृ. १५९-१७२) जगदानन्द झा ‘मनु’- गजल, के पतियाएत (पृ. १७३-१७४) मनोज कुमार मण्डल- देशी कौआ (प्. १७५-१७५) कुन्दन कुमार कर्ण- किछु गजल, अंगनामे कुचरल कौआ (पृ. १७६-१७८) राजदेव मण्‍डल- डायरीक पन्ना १-९, डोलनी डाइन- (काव्‍य कथा) १-७, केतए छी हम, अजगर, अकासमे ठाढ़ पंछी, बीआ केर पता, कटैत गाछ, नमन, स्‍वरमे बास, अकाल, घरक आँखि, अभ्यास, महफा आ अरथी, काटैत बीआ, कानैत हँसी, कनहेपर भालबा,कुहेस, जानवरक बोली, मोँछक लड़ाइ, दूटा धारा, चोरि, परि‍स्‍थि‍ति, उलहन, आपसी, द्वन्द्व, छीपपर दीप, इमानदारी, बीआ , बलात् , झूठक गि‍यान, जेहने अहाँ तेहने हम, चि‍र प्रतीक्षा, हाथ, ठक, उपयोग (पृ. १७९-२४२) सत्य नारायण झा- लहकैत समाज (२४३-२४४) राम वि‍लास साहु- किछु टनका, मोह-माया...... , के बँचेतौ तोहर जान (पृ. २४५-२५१) सुरेन्द्र 'शैल'- अभिसारिका, सासुर, वियाह (पृ. २५२-२५६) राजीव रंजन मिश्र- किछु गजल (पृ. २५७-२५८) मुन्नाजी- बाल हाइकू (पृ. २५९-२६१) रामदेव प्रसाद मण्‍डल “झारूदार”- अभि‍नन्‍दन (पृ. २६२-२६२) इरा मल्लिक- किछु बाल गजल, शृंगार गजल (पृ. २६३-२६६) बिन्देश्वर ठाकुर- गजल, पुन: चमकतै मिथिला राज (पृ. २६७-२६९) अनिल मल्लिक- गजल (पृ. २७०-२७०) आशीष अनचिन्हार- विहनि गजल (प्. २७१-२७१) रवि भूषण पाठक- फसली पद्य १-७ (पृ. २७२-२८०) बाल मुकुन्द पाठक- किछु गजल (पृ. २८१-२८२) अनामिका राज- क्षमतावान (पृ. २८३-२८४) सन्दीप कुमार साफी- कविता १-३ (पृ. २८५-२८९) भालचन्द्र झा- आजुक बेटी (पृ. २९०-२९१) अमित मिश्र- हाथी गेलै भोज खाए (पृ. २९२-२९२) कामिनी कामायनी- संग दिअ सदिखन अहिना (पृ. २९३-२९४) दुखन प्रसाद यादव- छीनाझपटी, अजादी सबहक जान छै, बि‍हार अछि सि‍रमौर धरा केर (पृ. २९५-२९९) सुबोध कुमार ठाकुर- केकरा सँ कहबै (पृ. ३००-३०१) ओम प्रकाश झा- किछु गजल (पृ. ३०२-३०३) गंगेश गुंजन- नेता जी बकवास करै छथि (पृ. ३०४-३०५) 2

गद्य खण्ड गजेन्द्र ठाकुर मैथिलीक वर्तमान-गजल "हमरा मानसपटलपर मैथिलीक सम्मानित आलोचक श्री रमानन्द झा “रमणक” ओ वाक्य औखन ओहिना अंकित अछि जाहिमे ओ मैथिलीक वर्तमान गीत-गजलकेँ मंचीय यश एवं अर्थलाभक औजार कहिकऽ एकर महत्वकेँ एकदम्मे नकारि देने रहथि (सन्दर्भ- मिथिला मिहिर, फरबरी-१९८३); ...कोनो आलोचककेँ एहेन गैर जिम्मेदारीवला वक्तव्य देबाक की अधिकार? भारतीय संविधानमे भाषणक स्वतंत्रता एकटा मौलिक अधिकार छैक तेँ?” (सियाराम झा “सरस”, दीपोत्सव, १८/१०/९०; आमुख, लोकवेद आ लालकिला) वियोगी लोकवेद आ लालकिलाक एकटा दोसर आमुखमे लिखै छथि- “छन्दशास्त्रक नियमपर आधारित होयबाक उपरान्तो एहिमे गजलकारकेँ गणना-नियमक स्वातन्त्र्यक अधिकार रहैत छैक।” (!) गजल कतेको ढंगसँ कतेको बहरमे कतेको छन्दमे लिखल जा सकैए, ई सत्य अछि, मुदा गणना नियमक स्वातन्त्र्यक अधिकार ने मात्रिक गणनामे छैक आ ने वार्णिक गणनामे। देवशंकर नवीन लिखै छथि –“...पुनः डॉ. रामदेव झाक आलेख आएल। एहि निबन्धमे दूटा अनर्गल बात ई भेल, जे गजलक पंक्ति लेल, छन्द जकाँ मात्रा निर्धारण करए लगलाह..”। लोकवेद आ लालकिलामे गजल शुरू हेबासँ पहिने कएकटा आलेख अछि, मैथिली गजलपर कोनो सकारात्मक टिप्पणी तँ नै अछि ऐ सभमे, हँ मुदा समीक्षककेँ लाठी हाथे “ई सभ मैथिली गजल थिक, गजले टा थिक” कहबापर विवश करैत प्रहार सभ अवश्य अछि। हाइकूमे सिलेबल आ वर्णक मिलानी अंग्रेजी हाइकूक आरम्भिक लेखनमे नै भऽ सकल, देखल गेल जे ५/७/५ सिलेबलमे बहुतरास अल्फाबेट आबि गेल, जापानीमे ओतेक अल्फाबेट ५/७/५ सिलेबलमे नै छल। हम सलाह देलहुँ जे मैथिली हाइकू सरल वार्णिक छन्दक आधारपर लिखल जाए जइमे ह्रस्व-दीर्घक विचार नै हुअए। संस्कृतमे १७ सिलेबलबला वार्णिक छन्दमे नोकमे नोक मिला कऽ १७ टा वर्ण होइ छै- जेना शिखरिणी, वंशपत्र पतितम्, मन्दाक्रान्ता, हरिणी, हारिणी, नरदत्तकम्, कोकिलकम् आ भाराक्रान्ता। से ५/७/५ मे १७ सिलेबल लेल १७ टा वर्ण हाइकू लेल गेल, से आब हम सेहो लऽ रहल छी आ मिहिर झा, इरा मल्लिक, उमेश मंडल, रामविलास साहु, सुनील कुमार झा सेहो लऽ रहल छथि। रुबाइमे हमर सलाह छल जे एतए सरल वार्णिक छन्दक प्रयोग सम्भव नै अछि, कारण एकर प्रारम्भ दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ वा दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व सँ होइत अछि से चाहे तँ ह्रस्व-दीर्घक मिलानी खाइत वर्णिक छन्दक प्रयोग करू वा मात्रिक छ्न्दक। रुबाइक चतुष्पदीमे पहिल दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि; आ मात्रा वा वार्णिकमे वर्ण२० वा २१ हेबाक चाही। कारण चारू पाँती चारि तरहक बहर -छन्दमे लिखल जा सकैए से निअमकेँ आगाँ नमरेबाक आवश्यकता नै छै, हँ ई निर्णय करैए पड़त जे चारू पाँतीमे वार्णिक वा मात्रिक गणना पद्धति जे ली, से एक्के हेबाक चाही। गजलमे मुदा अहाँ वार्णिक, सरल वार्णिक वा मात्रिक छन्दक प्रयोग कऽ सकै छी, मुदा एक गजलमे दूटा बौस्तु मिज्झर नै करू। बिन छन्द वा बहरक गजल अहाँ कहि सकै छी, समीक्षककेँ लुलुआ कऽ आ लाठी हाथे; मुदा ओ गजल नै हएत, उर्दू/ फारसीमे तँ मुशायरामे अहाँकेँ ढुकैये नै देत। आ आब जखन रोशन झा, प्रवीण चौधरी प्रतीक, आशीष अनचिन्हार, सुनील कुमार झा सन युवा गजलकार अन्तर्जालपर एकटा टिप्पणीक बाद सरल वार्णिक छन्दमे गजलकेँ संशोधित कऽ सकै छथि तँ लालकिलावादी गजलकार लोकनि किए नै कऽ सकै छी? मायानन्द मिश्र “गीतल” कहि आ गंगेश गुंजन “गजल सन किछु मैथिलीमे” कहि जे गलत परम्पराकेँ जारी रखबाक निर्णय लेने छथि तकरा बाद मुन्ना जी आ आशीष अनचिन्हार जँ बिना छन्द/ बहरक गजल लिखै छथि तँ एकरा हम मायानन्द मिश्र, गंगेश गुंजन आ लालकिलावादी अ-गजलकार लोकनिक दुष्प्रभावे बुझै छी। लोकवेद आ लालकिला: आत्ममुग्ध आमुख सभक बाद ऐ संग्रह मे कलानन्द भट्ट, तारानन्द वियोगी, डॉ. देवशंकर नवीन, नरेन्द्र, डॉ. महेन्द्र, रमेश, रामचैतन्य “धीरज”, रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, विभूति आनन्द, सियाराम झा “सरस” आ सोमदेवक गजल देल गेल अछि। कलानन्द भट्ट भोर आनब हम दोसर उगायब सुरुज करब नूतन निर्माण हम बनायब सुरुज सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१७ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२१ मात्रा, दोसर पाँती- २१ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। पहिल पाँती दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व (एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब। दोसर पाँती- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व। मुदा एतए गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रमटूटि गेल। तारानन्द वियोगी दर्द जँ हद केँ टपल जाए तँ आगि जनमै अछि बर्फ अंगार बनल जाए तँ आगि जनमै अछि

सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१९ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२५ मात्रा, दोसर पाँती- २५ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। दीर्घ संयुक्ताक्षरकेँ पहिने)-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्र्अस्व-ह्रस्व। एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब। दोसर पाँती- दीर्घ (संयुक्ताक्षरकेँ पहिने)-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ एतए क्रमभंग भऽ गेल।

देवशंकर नवीन अँटा लेब समय-चक्र, सहजहि एहि आँखि बीच नबका प्रभात लेल, क्रान्ति कोनो ठानि लेब सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१९ वर्ण दोसर पाँती- १६ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२५ मात्रा, दोसर पाँती- २५ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व (एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब। दोसर पाँती- ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- मुदा एतए गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रमटूटि गेल।

नरेन्द्र निकलू तँ सजिकऽ सजाकेँ बासन ली ठोकि बजाकेँ सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१० वर्ण दोसर पाँती- ९ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-१३ मात्रा, दोसर पाँती-१४, मात्रा गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल। डॉ महेन्द्र चलैछ आदमी सदिखन चलैत रहबा लए जीबैछ आदमी सदिखन कलेस सहबा लए सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१८ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण। मुदा तेसर शेरमे दोसर पाँतीमे १६ वर्ण आबि गेल अछि। मात्रिकमे सेहो उपरका दुनू पाँतीमे क्रमसँ २४ आ २५ वर्ण अछि। रमेश जखन-जखन साओनक ओहास पड़ैए हमर छाती मे गजलक लहास बरैए सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१६ वर्ण दोसर पाँती- १६ वर्ण। मुदा दोसर शेरक पहिल पाँतीमे १५ वर्ण। मात्रिक मे सेहो उपरका दुनू पाँतीमे २२ वर्ण अछि। मुदा ह्रस्व-दीर्घ गणनामे दोसरे शब्दमे ई मारि खा जाइए। ई दोष शेष गजलकारमे सेहो देखबामे अबैए।

एकर अतिरिक्त सुरेन्द्रनाथक “गजल हमर हथियार थिक” , सियाराम झा “सरस”क “थोड़े आगि थोड़े पानि”, रमेशक “नागफेनी” आ तारानन्द वियोगीक “अपन युद्धक साक्ष्य”मेसँ किछु किताब लाठी हाथे मैथिली साहित्यमे गजल संग्रहक रूपमे साहित्य अकादेमीक सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचरक उत्तर जयकान्त मिश्र संस्करणमे आबि गेल अछि, किछु ऐ सहित्यक इतिहासक अगिला संस्करणमे आबि जाएत ! अरविन्द ठाकुरक गजल सेहो पत्र-पत्रिकामे गजल कहि छपि रहल अछि जे अही परम्पराकेँ आगाँ बढ़बैत अछि। जँ ई सभ गजल नै छी तँ पद्य तँ छी आ तइ रूपमे एकर विवेचन तँ हेबाके चाही। ऐ क्रममे रवीन्द्रनाथ ठाकुरक “लेखनी एक रंग अनेक” देखू। मैथिली गजल संग्रहक रूपमे ई पोथी आइसँ २५ बर्ख पूर्व आएल। सोमदेव आ भ्रमरक संग हिनको गजल लालकिलावादक परिभाषामे नै अबैत अछि। गजल नै मुदा पद्यक रूपमे एकर स्थान मैथिली साहित्यमे सुरक्षित छै, मुदा ई आन वर्णित गजलक तथाकथित संकलनक विषयमे नै कहल जा सकैए। एक छन्द, एक बाँसुरी, एक धुन सुनयबालेऽ लियौ ई एक गजल, आई गुनगुनयबालेऽ (रवीन्द्रनाथ ठाकुर “लेखनी एक रंग अनेक”)

माँझ आंगनमे कतिआएल छी “माँझ आंगनमे कतिआएल छी” मुन्नाजीक रुबाइ आ गजल संग्रहक नाम अछि। कतिआएल आ सेहो माँझ आंगनमे! की कबीरक उलटबासीक प्रभाव अछि ई आकि गजलक स्वभाव अछि ई? नहिये ई कबीरक उलटबासीक प्रभाव अछि नहिये ई गजलक स्वभाव अछि, ई एकटा यथार्थ अछि। मुन्नाजी सन कतेको लोक कतिआएल छथि, प्रतिभा अछैत हेराएल छथि। मुदा गजलकार सभटा दोख अपनेपर लऽ लै छथि।

आब तँ माँझ आँगनमे कतिआएल छी अपने चालिसँ आब बेरा गेलहुँ हम आ सएह कारण अछि जे ओ नोरक सुख भोगऽ लागै छथि। नोर तँ खसैए मुदा मजा सन लगैए केहन नीक प्रेमक दुख लेलहुँ हम

बड़का खाधिमे खसै छथि आ तहू लेल अपनेकेँ दोखी मानै छथि: छोटको ठेससँ नै सबक लेलहुँ हम तँए बड़का खाधिमे खसि गेलहुँ हम

तँ की गजलकार प्रेमक महत्व बिसरि गेल छथि, नै प्रेम तँ सभकेँ चाही। सभ उमेर वर्गकेँ प्रेम चाही मरितो धरि कुशल-छेम चाही

आ हिनका जँ कोस दू-कोस मात्र चलबाक रहितन्हि तखन ने, हिनका तँ बहुत आगाँ बढ़बाक छन्हि तेँ प्रेम चाही। डाहसँ पहुँचब कोस-दू कोस आगू बढ़बा लेल तँ प्रेम चाही

आ से सभ ठाम। एकटा हमर संगी छल, एकटा परीक्षामे टॉप केलक तँ बाजल- नै कम्पीट करै छी तँ नै करै छी, आ करै छी तँ टॉप करै छी। ओ गजलकार नै छल जँ रहिते तँ अहिना लिखितए: बदरी लादल रहै कोनो बात नै जदि बरसी तँ बरिसात बनि कऽ

आ नजरि-नजरिक फेर आ हाफ ग्लास फुल ई दुनूटा अवधारणा ऐ रूपमे ओ राखै छथि: नजरि उठा कऽ देखबै तँ खाली बुझाएत ई दुनियाँ नजरि गरा कऽ देखबै तँ सभ देखाएत ई दुनियाँ

समालोचना आ विरोध दुनूकेँ गजलकार नीक मानै छथि। पक्षधरसँ राखू अपनाकेँ बचा कऽ विपक्षीक सभ बातकेँ नै तीत बुझू

महगाइसँ लोक बेकल अछि मुदा तकरा लेल झुमैत मचानक बिम्ब देखू: महगाइसँ खूने नै हड्डियो सुखाइए आब झुलैत मचान सन लगैए लोक

आ ई उलटबासी देखू, बिम्ब नव, भावना शाश्वत: हम तँ घूर जड़ेलौ गर्मी मासमे मिझाएल आगिसँ पसाही कहियो

ई कोन गोष्ठी छी जे अछि कोन पत्रिकाक प्रायोजित चिट्ठी छपबाक राजनीति सन, ई रुबाइ देखू: मोन भए उठल दुखित होहकारीसँ उठि दर्शक भागल मारामरीसँ प्रायोजक तँ पथने रहल कान अपन कर्ता देखार भेला जतियारीसँ

मुदा बाढ़िक विषय जँ मैथिली गजलक अंग नै बनए तँ बुझू जे गजलकार समाजसँ कतिआएल छथि। मुदा से नै अछि। धार एखन धरि तँ उफानपर अछि लोक ताका-ताकी करैत बान्हपर अछि

आब पड़ाइन घटल अछि, मिथिलासँ पड़ाइन। बाहरी लोक बिहारीकेँ मजदूर आ श्रमिकक पर्यायवाची मानि लेने छथि। तहूपर गजलकारक कलम चलल अछि। बिहारक सिरखारी बदलि गेल सन लगैए आब श्रमिक घटलासँ कंपनी-मालिक लगै बिहारी जकाँ

मुन्नाजीक गजल आ रुबाइ स्वच्छन्द रूपसँ बमकोला जेकाँ बहल अछि। शेरक स्वभाव होइ छै जे जँ ओकरा नेकासँ कहल जाए तँ आह-बाह लोक करिते अछि। मैथिलीमे गजल-रुबाइ जइ तरहेँ प्रसारित भऽ रहल अछि से देखि कऽ यएह लागि रहल अछि जे जतेक ई विधा अपनाकेँ पसारि रहल अछि तइसँ बेशी मैथिली लाभान्वित भऽ पसरि रहल अछि। (-गजेन्द्र ठाकुर १९ मइ २०१२) धीरेन्द्र प्रेमर्षि प्रेमर्षि जीक ई आलेख विदेहक अंक २१मे छल। वर्तमान समयमे ई आलेख पढ़एसँ पहिने प्रेमर्षि जीक ई विचार देखू जे अनचिन्हार आखरपर देबा लेल माँगल गेल सहमति केर बाद आएल छल— “आशिषजी, ओ कोनो गम्भीर आलेख नइ छै। हमरा जनैत ओ आलेख हम तहिया लिखने रही जहिया गजलपर बेसी काज नइ होइत छलै। एखनुक सन्दर्भमे ओ आलेख बहुत हल्लुक भऽ सकै छै। आ वर्तमानमे कने मेहनति कऽकऽ लिखबाक अवस्थामे सेहो हम नइ छी- समयाभावक कारणेँ। तेँ हम नइ राखू से तँ नइ कहब, मुदा कमसँ कम हमर ई स्वीकार्यता उल्लेख कऽकऽ राखि देबै तँ भऽ सकैछ जे छपलाक बादहु हम दोषक भागी कने कम बनी। धन्यवाद”

मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना

रूप-रङ्ग एवं चालि-प्रकृति देखलापर गीत आ गजल दुनू सहोदरे बुझाइत छैक। मुदा मैथिलीमे गीत अति प्राचीन काव्यशैलीक रूपमे चलैत आएल अछि, जखन कि गजल अपेक्षाकृत अत्यन्त नवीन रूपमे। एखन दुनूकेँ एकठाम देखलापर एना लगैत छैक जेना गीत-गजल कोनो कुम्भक मेलामे एक-दोसरासँ बिछुड़ि गेल छल। मेलामे भोतिआइत-भासैत गजल अरबदिस पहुँचि गेल। गजल ओम्हरे पलल-बढ़ल आ जखन बेस जुआन भऽ गेल तँ अपन बिछुड़ल सहोदरकेँ तकैत गीतक गाम मिथिलाधरि सेहो पहुँचि गेल। जखन दुनूक भेट भेलैक तँ किछु समय दुनूमे अपरिचयक अवस्था बनल रहलैक। मिथिलाक माटिमे पोसाएल गीत एकरा अपन जगह कब्जा करऽ आएल प्रतिद्वन्दीक रूपमे सेहो देखलक। मुदा जखन दुनू एक-दोसराकेँ लगसँ हियाकऽ देखलक तखन बुझबामे अएलैक-आहि रे बा, हमरासभमे एना बैर किएक, हम दुनू तँ सहोदरे छी! तकरा बाद मिथिलाक धरतीपर डेगसँ डेग मिला दुनू पूर्ण भ्रातृत्व भावेँ निरन्तर आगाँ बढ़ैत रहल अछि। गीत आ गजलक स्वरूप देखलापर दुनूक स्वभावमे अपन पोसुआ जगहक स्थानीयताक असरि पूरापूर देखबामे अबैत अछि। गीत एना लगैत छैक जेना रङ्गबिरङ्गी फूलकेँ सैँतिकऽ सजाओल सेजौट हो। मिथिलाक गीतमे काँटोसन बात जँ कहल जाइछ तँ फूलेसन मोलायम भावमे। एकरा हम एहू तरहेँ कहि सकैत छी जे गीत फूलक लतमारापर चलबैत लोककेँ भावक ऊँचाइधरि पहुँचबैत अछि। एहिमे मिथिलाक लोकव्यवहार एवं मानवीय भाव प्रमुख भूमिका निर्वाह करैत आएल अछि। जाहि भाषाक गारियोमे रिदम आ मधुरता होइत छैक, ओहि भूमिपर पोसाएल गीतक स्वरूप कटाह-धराह भइए नहि सकैत अछि। कही जे गीतमे तँ लालीगुराँसक फूलजकाँ ओ ताकत विद्यमान छैक जे माछ खाइत काल जँ गऽरमे काँट अटकि गेल तँ तकरो गलाकऽ समाप्त कऽ दैत छैक। गजलक बगय-बानि देखबामे भलहि गीतेजकाँ सुरेबगर लगैक, एहिमे गीतसन नरमाहटि नहि होइत छैक। उसराह मरुभूमिमे पोसाएल भेलाक कारणे गजलक स्वभाव किछु उस्सठ होइत छैक। ई कट्टर इस्लामीसभक सङ्गतिमे बेसी रहल अछि, तेँ एकर स्वभावमे “जब कुछ न चलेगी तो ये तलवार चलेगा” सन तेज तेवरबेसी देखबामे अबैत छैक। यद्यपि गजलकेँ प्रेमक अभिव्यक्तिक सशक्त माध्यम मानल जाइत छैक। गजल कहितहिँदेरी लोकक मन-मस्तिष्कमे प्रेममय माहौल नाचि उठैत छैक, एहि बातसँ हम कतहु असहमत नहि छी। मुदा गजलमे प्रेमक बात सेहो बेस धरगर अन्दाजमे कहल जाइत छैक। कहबाक तात्पर्य जे गजल तरुआरिजकाँ सीधे बेध दैत छैक लक्ष्यकेँ। लाइलपटमे बेसी नहि रहैत छैक गजल। मिथिलाक सन्दर्भमे गीत आ गजलक एक्कहि तरहेँ जँ अन्तर देखबऽ चाही तँ ई कहल जा सकैत अछि जे गजल फूलक प्रक्षेपणपर्यन्त तरुआरिजकाँ करैत अछि, जखन कि गीत तरुआरि सेहो फूलजकाँ भँजैत अछि। मैथिलीमे संख्यात्मक रूपेँ गजल आनहि विधाजकाँ भलहि कम लिखल जाइत रहल हो, मुदा गुणवत्ताक दृष्टिएँ ई हिन्दी वा नेपाली गजलसँ कतहु कनेको झूस नहि देखबामे अबैत अछि। एकर कारण इहो भऽ सकैत छैक जे हिन्दी, नेपाली आ मैथिली तीनू भाषामे गजलक प्रवेश एक्कहि मुहूर्त्तमे भेल छैक। गजलक श्रीगणेश करौनिहार हिन्दीक भारतेन्दु, नेपालीक मोतीराम भट्ट आ मैथिलीक पं. जीवन झा एक्कहि कालखण्डक स्रष्टासभ छथि। मैथिलीयोमे गजल आब एतबा लिखल जा चुकल अछि जे एकर संरचनाक मादे किछु कहनाइ दिनहिमे डिबिया बारबजकाँ लगैत अछि। एहनोमे यदाकदा गजलक नामपर किछु एहनो पाँतिसभ पत्रपत्रिकामे अभरि जाइत अछि, जकरा देखलापर मोन किछु झुझुआन भइए जाइत छैक। कतेकोगोटेक रचना देखलापर एहनो बुझाइत अछि, जेना ओलोकनि दू-दू पाँतिवला तुकबन्दीक एकटा समूहकेँ गजल बूझैत छथि। हमरा जनैत ओलोकनि गजलकेँ दूरेसँ देखिकऽ ओहिमे अपन पाण्डित्य छाँटब शुरू कऽ दैत छथि। जँ मैथिली साहित्यक गुणधर्मकेँ आत्मसात कऽ चलैत कोनो व्यक्ति एकबेर दू-चारिटा गजल ढङ्गसँ देखि लिअए, तँ हमरा जनैत ओकरामे गजलक संरचनाप्रति कोनो तरहक द्विविधा नहि रहि जएतैक। तेँ सामान्यतः गजलक सम्बन्धमे नव जिज्ञासुक लेल जँ किछु कहल जाए तँ विना कोनो पारिभाषिक शब्दक प्रयोग कएने हम एहि तरहेँ अपन विचार राखऽ चाहैत छी- गजलक पहिल दू पाँतिक अन्त्यानुप्रास मिलल रहैत छैक। अन्तिम एक, दू वा अधिक शब्द सभ पाँतिमे सझिया रहलहुपर साझी शब्दसँ पहिनुक शब्दमेअनुप्रास वा कही तुकबन्दी मिलल रहबाक चाही। अन्य दू-दू पाँतिमे पहिल पाँति अनुप्रासक दृष्टिएँ स्वच्छन्द रहैत अछि। मुदा दोसर पाँति वा कही जे पछिला पाँति स्थायीवला अनुप्रासकेँ पछुअबैत चलैत छैक। ई तँ भेल गजलक मुह-कानक संरचनासम्बन्धी बात। मुदा खालि मुहे-कानपर ध्यान देल जाए आ ओकर कथ्य जँ गोङिआइत वा बौआइत रहि जाए तँ देखबामे गजल लगितो यथार्थमे ओ गीजल भऽ जाइत अछि। तेँ प्रस्तुतिकरणमे किछु रहस्य, किछु रोमाञ्चक सङ्ग समधानल चोटजकाँ गजलक शब्दसभ ताल-मात्राक प्रवाहमय साँचमे खचाखच बैसैत चलि जएबाक चाही। गजलक पाँतिकेँ अर्थवत्ताक हिसाबेँ जँ देखल जाए तँ कहि सकैत छी जे हऽरक सिराउरजकाँ ई चलैत चलि जाइत छैक। हऽरक पहिल सिराउर जाहि तरहेँ धरतीक छाती चीरिकऽ ओहिमे कोनो चीज जनमाओल जा सकबाक आधार प्रदान करैत छैक, तहिना गजलक पहिल पाँति कल्पना वा विषयवस्तुक उठान करैत अछि, दोसर पाँति हऽरक दोसर सिराउरक कार्यशैलीक अनुकरण करैत पहिलमे खसाओल बीजकेँ आवश्यक मात्रमे तोपन दऽकऽ पुनः आगू बढ़बाक मार्ग प्रशस्त्र करैत अछि। गजलक प्रत्येक दू-पाँति अपनहुमे स्वतन्त्र रहैत अछि आ एक-दोसराक सङ्ग तादात्म्य स्थापित करैत समग्रमे सेहो एकटा विशिष्ट अर्थ दैत अछि। एकरा दोसर तरहेँ एहुना कहल जा सकैत अछि जे गजलक पहिल पाँति कनसारसँ निकालल लालोलाल लोह रहैत अछि, दोसर पाँति ओकरा निर्दिष्ट आकारदिस बढ़एबाक लेल पड़ऽ वला घनक समधानल चोट भेल करैत अछि। गीतक सृजनमे सिद्धहस्त मैथिलसभ थोड़े बगय-बानि बुझितहिँ आसानीसँ गजलक सृजन करऽ लगैत छथि। सम्भवतः तेँ आरसीप्रसाद सिंह, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, डॉ महेन्द्र, मार्कण्डेय प्रवासी, डॉ. गङ्गेश गुञ्जन, डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र आदि मूलतः गीत क्षेत्रक व्यक्तित्व रहितहु गजलमे सेहो कलम चलौलनि। ओहन सिद्धहस्त व्यक्तिसभक लेल हमर ई गजल लिखबाक तौर-तरिकाक मादे किछु कहब हास्यास्पद भऽ सकैत अछि, मुदा नवसिखुआसभकेँ भरिसक ई किछु सहज बुझाइक। मैथिलीमेकलम चलौनिहारसभमध्य प्रायः सभ एक-आध हाथ गजलोमे अजमबैत पाओल गेलाह अछि। जनकवि वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” सेहो “भगवान हमर ई मिथिला” शीर्षक कविता पूर्णतः गजलक संरचनामे लिखने छथि। मुदा सियाराम झा “सरस”, स्व. कलानन्द भट्ट, डॉ.राजेन्द्र विमल सन किछु साहित्यकार खाँटी गजलकारक रूपमे चिन्हल जाइत छथि। ओना सोमदेव, डॉ.केदारनाथ लाभ, डॉ.तारानन्द वियोगी, डॉ.रामचैतन्य धीरज, बाबा वैद्यनाथ, डॉ. विभूति आनन्द, डा.धीरेन्द्र धीर, फजलुर्रहमान हाशमी, रमेश, बैकुण्ठ विदेह, डा.रामदेव झा, रोशन जनकपुरी, पं. नित्यानन्द मिश्र, देवशङ्कर नवीन, श्यामसुन्दर शशि, जनार्दन ललन, जियाउर्ररहमान जाफरी, अजितकुमार आजाद, अशोक दत्त आदिसमेत कतेको स्रष्टाक गजल मैथिली गजल-संसारकेँ विस्तृति दैत आएल अछि। गजलमे महिला हस्ताक्षर बहुत कम देखल जाइत अछि। मैथिली विकास मञ्चद्वारा बहराइत पल्लवक पूर्णाङ्क १५, २०५१ चैतक अङ्क गजल अङ्कक रूपमे बहराएल अछि। सम्भवतः ३४ गोट अलग-अलग गजलकारक एकठाम भेल समायोजनक ई पहिल वानगी हएत। एहि अङ्कमे डा. शेफालिका वर्मा एक मात्र महिला हस्ताक्षरक रूपमे गजलक सङ्ग प्रस्तुत भेलीह अछि। एही अङ्कक आधारपर नेपालीमे मैथिली गजल सम्बन्धी दूगोट समालोचनात्मक आलेख सेहो लिखाएल अछि। पहिल मनु ब्राजाकीद्वारा कान्तिपुर २०५२ जेठ २७ गतेक अङ्कमे आ दोसर डा. रामदयाल राकेशद्वारा गोरखापत्र २०५२ फागुन २६ गतेक अङ्कमे। छिटफुट आनहु गजल सङ्कलन बहराएल होएत, मुदा तकर जानकारी एहि लेखककेँ नहि छैक। हँ, सियाराम झा “सरस”क सम्पादनमे बहराएल “लोकवेद आ लालकिला” मैथिली गजलक गन्तव्य आ स्वरूप दऽ बहुत किछु फरिछाकऽ कहैत पाओल गेल अछि। एहिमे सरससहित तारानन्द वियोगी आ देवशङ्कर नवीनद्वारा प्रस्तुत गजलसम्बन्धी आलेख सेहो मैथिली गजलक तत्कालीन अवस्थाधरिक साङ्गोपाङ्ग चित्र प्रस्तुत करबामे सफल भेल अछि। समग्रमे मैथिली गजलक विषयमे ई कहि सकैत छी जे मैथिली गीतक खेतसँ प्राप्त हलगर माटिमे गुणवत्ताक दृष्टिएँ मैथिली गजल निरन्तर बढ़िरहल अछि, बढ़िएरहल अछि। मुन्नाजी बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा

घड़ीक पेण्डुलम सन झुलैत जिनगीमे स्थिरता भागल फिरैए। ने देह स्थिर आ ने चित्त। केखनो क' तँ अपनो ठर-ठेकान हेराएल सन लगैए लोककेँ। जँ चिन्तनशील भ' ताकब तँ ठकाएल सन अनुभव हएत। एहन स्थितिमे कोनो नव सोच वा नव अवधारणाकेँ घीचा-तीरीमे फँसि जेबाक आशंका घेरि लैए। मुदा रक्षात्मको भ' वएह नव अवधारणा, नव प्रयोग, नव रचना साहित्यकेँ जिया क' रखबाक क्षमता देखबैए। पद्य विधाक एकटा रूप गजल अपन आ समाजक सौन्दर्यबोध करबैए। हासिक, रसिक भ' प्रेममे ओझरा उब-डुब करैत अपन बाट पर ससरल जाइत देखाइए। गजलक बढ़ैत लोकप्रियता आब अपन विस्तार तकैए। आब गजल सभ भावमे चतरल-पसरल जा रहल अछि। ऐ बीच चर्चित युवा गजलकार आशीष अनचिन्हार जी गजलक क्षेत्रमे एकटा नव अवधारणा रखलन्हि। साहित्य अकादेमी आ मैलोरंगक संयुक्त तत्वावधानमे भेल कथा गोष्ठी २४ मार्च २०१२केँ अनचिन्हार जी बाल गजलक अवधारणाकेँ स्पष्ट करैत कहलन्हि " जेना गद्य विधा वा अन्य विधामे बाल साहित्य लिखल जाइत अछि तहिना गजलमे सेहो बाल मनोविज्ञान पर आधारित बाल गजल लिखल जाए"।२४ मार्च २०१२ के प्रस्तुत कएल गेल बाल गजलक परिकल्पनाक विधिवत् घोषणा अनचिन्हार आखर आ विदेहक फेसबुक वर्सन पर २७ मार्च २०१२केँ होइते बहुत रास परिपक्व बाल गजल सभ सोंझा आएल। घोषणा होइते ऐ विधाक पहिल रचनाकार भेलाह आशुतोष मिश्रा जे की नेपालसँ छथि मुदा यदा-कदा लिखैत छथि। दोसर स्थान पर भेलाह जगदानंद झा मनु आ तकरा बाद तँ अमित मिश्रा, रुबी झा, नवल श्री पंकज, चंदन झा, मिहिर झा, मुन्ना जी आ आन गजलकार सभहँक बाल गजलक प्रकाशनक क्रम बनि गेल। आ ऐँ तरहेँ ऐ अवधारणाक प्रथमे चरण ठोस भ' सोंझा आएल , जाहिसँ एकर मजगूत भविष्यक आकलन कएल जा सकैए। संगे एकर पूर्ण संभावना सेहो जागल देखाइए। अनचिन्हार आखर द्वारा बाल गजलक महत्वकेँ देखैत " गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" अलगसँ देबाक घोषणा सेहो कएल गेल। आ ई मार्च माससँ प्रभावी मानल गेल। आ श्रीमती प्रीति ठाकुर जीकेँ मुख्यचयनकर्ती बनाएल गेल। एखन धरि जून मास धरिक प्रारंभिक चरणक चयन भेल अछि जे एना अछि---- १) मार्च लेल श्री मती रूबी झा जीकेँ चूनल गेल। २) अप्रैल लेल नवलश्री पंकज जीकेँ चूनल गेल। ३) मइ लेल अमित मिश्रा जीकेँ चूनल गेल। ४) जून लेल चंदन झा जीकेँ चूनल गेल। संप्रति विदेह द्वारा प्रस्तुत बाल गजल विशेषांक एकर आधारकेँ मजगूत करबाक दिशामे एकटा सशक्त प्रयास अछि जाहिसँ एकर विकासक संभावना अक्षुण्ण रहए। कामिनी कामायनी सोर सबटा सतरंगी चादरि अपन अतृप्त काया पर लपेटि,इंद्रधनुष बनि सम्पूर्ण आसमान पर पसरि ज़ेबा के लालसा ओकर मन मे औचक नै प्रस्फुटित भेल रहै,ई त कतेक बरखक मुईल मीझैल लुत्ती छल हेतै जे समय आ अनुकूल वसंती झोंका के कोमल ,शीतल स्पर्श पाबि दावानल बनि धधकि उठल ,नै जंगलक लाज ,नै काल वा समयक। आ एक बेर जे भयौन धाह उठलै, त स्वाभाविक छल ,अपना  कात करौट के सम्पूर्ण  जीव जन्तु संग ,विशाल ,दैत्य सन बिकराल गाछ बिरीछ के सेहो भस्मीभूत करि देलके।ओहि झरकल खड़ पत्बार, कीट फतिंगा ,पशु पाखी के मध्य कारि स्याह भेल हरियरीके निहारि क आंखि स नॉर बहाबय बाला ,धरती आ आकाश ,एकदम स्तब्ध ।अपन हृदय के असीम पीड़ा नेने किछू पाखी चें चें करैत,अपन प्राण बचाबय लेल  दोसर वन प्रांत मे बौवा ढहना क शरणस्थली के आस मे निरास –निरास उडी चलल छल । कतेक चेंन स ओ सब अपन पुरान बास स्थल मे ,चहकैत,महकैत,गबैत ,चुगैत दिन काटि रहल छल ,मुदा हाय रे दावानल ,कोन आगि जठराग्नि के टपैत,मानसिक विचार के क्षत विक्षत करैत ,लक्षमनरेखा नांघय लेल बाध्य करि देल ,जे अकस्मात ओकर सबहक खोंता उजड़ि गेलय,ओकर सबहक ओ डारि अनकर भ चुकल छल । स्याह राति मे खिड़की स हेरैत आकास संग, स्वाति के मोन विचारक बाध बोन मे बुलैत बुलैत घृणा आ आत्मग्लानि स भरि ओकरा भाव विह्वल करि देलके, रहि रहि क कुहेस फूटे,संसार त्यागक विचार मों के आंदोलित करय लागै। कोन मुंह ल क  केकरा लग जेते ,सम्पूर्ण मुख मण्डल त खापड़िक पेंदी बनि गेल आब ,केहन परिहासक दृष्टि स छलनी छलनी करय लेल,वाणी स फुइसक सहानुभूति स, आत्महत्या धरि करबाक लेल प्रेरित करबा लेल  बेकल समाज ओकर प्रतीक्षा मे बाहरि ठाढ़ छैक  ।ओछोन प राखल मोबाइल फेर बफारि तोड़य लागले मुदा ओ ओहिना पथरालि सन ठाढ़। कनी कालक बाद  फोन उठा कॉल बौक्स प नजरि फेरलक उन्नीस टा मिस कॉल ,कतेक अपन लोक सब ।सुतल हाथ के कहुना घींच घांचि क टेबुल लैंप जरा क पैथोलॉजी के मोटका पोथी खोललक ,काल्हि परीक्षा छै,पेपर के नाम स दिमाग जखन किछू रक्त संचार भेलै त ओत्तय किछू दोसरे प्रकारक खलबल्ली होमय लगले।फेल करबाक हदस सेहो  हृदय मे  पइसय लागल छल,ओहि टौपर विद्यार्थी के ,जे फराके डिप्रेशनक विषय बनितेक। कालेज स आबिते अपन फ्लैट क सोझा सिडही प बैसल बड़ी माँ ,जिनक मंथरावादी दृष्टिकोण स के नहिं आहत भेल छल ,आ हुनक पूत  रिंकू के देखि ओकर  हाथ पएर सुन्न आ होश हवास गुम होमय लागले,  ‘ हे दैव ई दोसरपूतना के  किएक पठौलहू हमर बद्ध करबाक लेल कतेक हमर पाप अछि ओहि जनमक”।  मन मौन क्रंदन कयने छल,मुदा गरा लगिक  बुझि पडले कतेक बरख स ग्रीष्मक प्रचंड रौद मे भटकि रहल छल, आय जेना औचक हिमालय स्वयम लग आबि क अपन स्नेह पाश स तिरपित करी देल। अपन जन्म स्थान स अतेक दूर अहि नगर  मे धियापुत्ता सब के पढ़बे लेल ओ सब पहिनहि मकान किन नेने छलथी ,स्वाती के पपा त हुनके देखसी केलन्ही, मुदा निष्ठुर विधाता के कलम स ओ दुनु भाई बहिनी क भाग्य मे ग्रहण लागि गेले ,तखन मम्मी,  आ पप्पा के अरजल, लक्ष्मी ,जीवन के गाड़ी अहि महानगर मे सेहो निधोक घींचैत रहल छल । स्कूल पास करि उच्च शिक्षा लेल दुनु इंजीनियरिंग आ मेडीकल कालेज मे दाखिला ल चुकल छल । किन्स्यात इहों एक गोट कारण बनि गेल होय , अहि बंधन स नीफिकिर भेला के । घोर असगरुवा आ नैराश्य पूर्ण जीवन स त्राण पाबय लेल ईएह दुनु हुनका कम्प्युटर आ इन्टरनेट के दुनिया स परिचय पाती करौलक त ओसब स्वप्नों मे अहि महाविनाश क गप्प नहीं सोचल ।मुदा जीवनक सातो रंग जखन  मस्तिष्क क दरवाजा खोलि क बहरे लागले ,तखन जुग जुग के दग्ध हिय प पावसक मधुर मधुर बुन काया के जुड्बेत सूखैल जड़ि मे खादि पानि देनाय सुरू केलकै त ठूंठ सेहो अपन रंग देखबे लेल माथ उठौने हेतै । डारिक पोर पोर मे नांहि नांहि टा आंखि लागले आ देखिते देखिते लौजा लौजा पात स भरल झमट्गर गाछ फेर स बनबा मे कनिओ बिलंब नहिं भेल ।  ओहि हरियायल ठूंठ प हेजक हेज पखेरूगन किल्लोल करबा लेल उताहुल भ गेल । आ ओकर खोहड़ि मे इच्छाधारी नाग के बास हेबा मे सेहो मे कनिओ विलंब नहिं भेल  छल। समान्य लोक बुझि नहिं पाओल की प्रचंड रौदी मे  ई असमान्य हरियरी आब विषाक्त भ चुकल छैक। वा ई गाछ आब देबे भरोसे जीवित रहे त रहै,परिजनक आंखि मे त भुतहा बनिए गेल छल । पहिनुका चिड़े चुनमुन के सेहो पर्यावनक अहि खेल स मर्मांतक कष्ट भेल रहै ,सुखैले छल मुदा डारि प ओकर अपन खोंता त छल, जतय राति दिन ,मौसमक मारि स बचबा लेल तीनों अपन अपन पांखि पसारि क लोल मे लोल ध दाना चुगे छल ,ची चपड़ करैत छल, अपन अपन पांखि के बलगर बनेब् क नित दिन सपना देखैत छल । कखनों कखनों पैघ लोक क जिद सेहो धिया पुता के कोमल  परिवेश के,ओकर दुनिया के , मटियामेट करिक राखि दैत छैक । आ ओहो एहेन वीभत्स ,जे जन्म जन्मांतर धरि प्रेतक परछाही बनल  ओकर पछौड़ धेने रहि जाए छै। जखन ओ वृक्ष भुतहा कहाबय लेल बाध्य भ गेल त ओकर फड़ आ फूल के  तुलसी आ बेलपत्र जका त नहिं पूजल जेतै । अत्यंत उचगर स्थान प ,निधोक भ,  साँय  साँय, उदण्ड बहैत बसात ;एहेन मे त विशाल झमटगर गाछ सेहो क्षण मात्र मे भूमिशाई भ जाय छैक,ओसब त मात्र नान्ही टा के एक गोट कोमल तरुवर ।  तहन सब विचार मुंह भरे खसय लागल छल। दूर दूर धरि बियाबान,  चारहु  कात घनघोर तिमिर ,कोनो बाट कत्तहु नहि सुझै। चलबा के त छलैहे। जिंदगी त आगा बढ़ब के नाम छै । छुच्छ बासन मे सेहो हवा भरल रहे छैक , कत्तों कोनो वस्तु के प्रकृति खाली नहि रहय दईत छैक । तखन विचार शून्य मस्तिष्क कतेक दिन निष्क्रिय सुतल रहितैक । बड़ी मम्मी कहिया धरि  अपन घर गिरहस्थी तजि ओकरा ओगरने पड़ल रहितथि। स्वाति के माथ प ओकर जीवनक बोझ राखि,ताला कुंजी सुनझा क ,बोल भरोस दइत ,फेर फेर आबए के गप्प करैत अपन घर जाय लागली त ओकरा बुझा गेल रहे जे एके सहरि मे रहिओ क आब हुनक बाट अहि घर स बड़ दूर चलि गेल छल।  बाहर हुक्का लोली खेलाईत समय खिड़की दरवज्जा स ओहि घर मे हुलकी मारैत रहले , मुदा भीतर प्रवेश करबाक साहस नहि केलकै । काल्हिके स्वाति आय एकदम बदलि क पकठोस भ चुकल छल ।कखनों बाढ़ेन हाथ मे,त कखनों चकला बेलना ,आब ओकरा घरक़ सबटा काज करनाय कनिओ नहि अखरे । ई एकांत ओकरा लेल परम आवश्यक बनि गेल छल ।व्यर्थ मे कोनो काजवाली आबि क ओकरा और फिरिशन करे से एखन ओ कदापि नहि चाहैत छल । लोकल भेला के कारणे हॉस्टल लेल अपलाई नहि कैने छल पहिने  ,मुदा आब ,बीच सेशन मे त कोनो सवाल ए नहि छल भेटयके ,तखन अगिला बरिस क बाट जोहू  । उमहर हरियालि गाछ सेहो अपन पुरान मोह नहि छोड़ि पाबि रहल छल ,ओकर बाजब सुनब ,हसब ,पढब ,लिखब ओकरा असंख्य आंखि स सम्पूर्ण स्पर्श करबा लेल बेकल भ बेर बेर फोन करे त स्वाति के मनक संताप आओर बढि जाय । घृणा स ओकर माथ पैन बिजली के पंखा सन घुमय लगे । सम्पूर्ण आकास ,धरती ,पाताल क ,असहज दारुणसोर ओकर मस्तिष्क के धारीदार आरी स चिरय लागल छल ।छाती पीटेत, विलाप करैत, बताहि समुद्री धारा सब  आब एके स्वर स चिकरय लागल , एतेक तीव्र स्वर  'ईयह छै ओ' "ईएह छै ओ  जेकर  ,," चारहु दिस स ओकरा प उठल आंगुर' ,ओह ,कोन पताल मे नुकाय ,कोनअग्नि मे भस्म भ जाए ,किछू फ़ुरै नै छल तखन अपन आंखि संगे दुनु कान सेहो घबड़ा क बन्न करी नेने छल । दू तीन  सप्ताह  स  स्वाति चकोर   दिस नजरिओ उठा क  नहि देख सकल छल। अपने मे  गुमसुम ,आंखि क सोझा कारी ,जेना कजरौटा  के सब टा काजर निकालि क किओ ओकर सुंदर आंखि के नीचा मलि देने होय । एक दु बेर ओ  ओकरा सोझा ठाढ़ होबाक प्रयास कयबो कैल ,मुदा अपने मे ओझराएल स्वाति मेला मे हेड़ाएल नेना सन डराएल डराएल  इमहार उमहर तकेत चुप चाप चलल जाइत  रहल छल । चकोर की सोचते ,इहों संताप रहि रहि क ओकर मानसिक अवस्था के आओर व्यग्र करि दैक। काल्हि धरि जे ओकर व्याख्यान  सुनि आंखिक पपनी झपकेनाय बिसरी जायत छल,जे महान प्रचेता ,ऋषि ,मुनि के खिसा सुनि,अपन महती धरोहरि के कथा सुनि ,मिथिला दर्शन लेल उताहुल भ गेल छल ,आय ओकरा कोना कहते जे ,मिथिला के वर्तमान  मे  सेहो आब माहुर घोरा गेल अछि । राति राति भर गेरुआ के अपन करेज स सटौने,पलंग प पेटकुनिया देने ,टुकुर टुकुर तकेत ओकर दृष्टि सोझा पड़ल टेबुलक पाया स बहरा क कतेक कतेक जुगक पार स बौवा ढहनाक आपस आबय त लगे ,दरवाजा के कुंडी किओ खटखटा रहल अछि ,किंसयात ओ आपस आबि गेल होयथ,मुदा ओ त निष्ठुर हवा निकलै छल ,जखनओ धडफड़ा क उठे ,खुजल केवाड़ स दूर दूर धरि सड़क्क नियोन लाइट मे किओ कत्तों नै देखाय पडै। कखनों खिड़की के परदा हिलै, मुदा ओ कत्त झांकि रहल छली,। आंखि बहे “गै सुगनी हमर कत्थी लेल कनै छै’ ओकर माथ प हाथ राखि  बाजल ओ स्वर त वक्ता समेत आब बिला गेल । “पापा यौ पापा ,एहेन पहाड़ किए भ गेले हमर सबहक जीवन यओ पापा,विधाता किएक हमरे सब स बाम भ गेलखींन’। जखन ओकर कोढ़ फटे त जेना लगे कत्तों कोनो पहाड़ प बादल फाटल होय । सोफा प बई सल मुसकैत पापा अपन  सुगवा ,सुगनी के करेज स सटौने ओकरा दुनिया के सबस शक्तिशाली लोक  बनबए के सपना देखेत ,देखेत स्वयम स्वप्न भ गेला ,तखन माँ के आचरि,छतरी बनी दुनु के माथ झपने रहे ,आब ओ आचरि सेहो   पछिमक बड़का आंधड़ि मे उधिया गेलै। आब ,, ।दिमाग मे उधम मचबईत  अहि भयानक सोर केबलजोरी शांत करैत सोचल , शक्तिशाली त बनैए पड़तेआब  ,पापा कहैथ छलखिन,कमजोर गाछ  के सब मोचाड़ि क राखि दैत छै ,बलगर तर छाहरि  लैल ,अप्पन त अप्पन , दूर दूर स अंचिन्हार  सेहो हेंज क हेंज आबै छै आ ओ गाछ सहर्ष ओकरा स्वीकार सेहो  करैत छै”। एतेक दिन के बाद स्वाति के अपन स्वाभाविक गति स ,अपना दिस आबैत देखि चकोर जतय छल ओहि ठाम अजंता के मुरुत जका ठाढ़ भ गेल ।स्वाति ओकर हाथ घीचने केंटीन दिस बढि चुकल छल । आय ओकर मुख मण्डल प उदासी के कनिओ कोनो चेंह नहि छले,।  क्लास ,डिसेक्सन ,सेमिनार प्रोफेसर सब प ओहिना यथावत हाथ हिला हिला क गप्प करैत काफी पिबेत, सेंडविच खाइत,बाजैत रहल छल  । बेसी सनि रईब क घरक़ भोजन करबा लेल चकोर के जिद करी क स्वाति अपन घर आने छल ,। इमहर चारि पाँच मास भ गेलै त चकोर स्वयम अपन मुंह खोलइत बाजल छल “आब अहा घरक़ खेनाय लेल नहि बजबे छी,आंटी मना करैत छथी की’। “आंटी’ ,कनी काल लेल ओकर आंखि मे फेर स बिर्रो उठबा के कोसिस कयने छल ,मुदा बलगर बनवा के विचार ओकर ठोर प चौकीदार जका ठाढ़ भ गेलै मन मे उठले “फेस द फिअर ,फिअर विल डिसेपियर’ ।माथ झुलबैत कहलक , “माँ त आब  चलि गेलखीं’। “कत्त ,गाम ,कहिया औति’।ओ कनी अवाक सन भेल ।    “ नै नै ,आस्ट्रेलिया , ओ आब दोसर विवाह करी लेलखींन”। ई एतेक पैघ आ मर्मांतक कष्ट क गप्प ओ एना बाजि देलके जेना ओ ककरो आन स संबन्धित होय । चकोर के माथ नहि जानि की सोचि क  झुकि गेल छले,स्वाति ओकर मुह प खसल केस के अपन आंगुर स सइतेत ओकर हाथ मे हाथ धेने केंटीन स निकसि क बाहर लौन मे आयल  आ बेफिकिर ,बिन हारल खिलाड़ी जका जेकर की खेल खराप मौसमक कारणे अस्थगित भ गेल होय ,जय पराजय स मुक्त दुनू मेक्डौनाल्ड मे खाय लेल सीपी चलि गेल छल । लघुकथा- कोन डारि पर केकर खोता “यै बहिन ,कनी थमि जौथ ,तिलकौड क तरुवा तैर रहल छिएन्ह,तखन खइहथि’। बहिन ओसारा प राखल पीढ़ी प बईस गेल छलिह,सोझा परसल थारी राखल छल, दिनक एगारह बाजि रहल छल,कदंबक गाछ के ऊपर स  सुरूज़ महाराज दुनिया भरिक गाम घरक हिसाब किताब लेबा लेल मुस्तैद भेल अपन ताप स चहु दिस के खड़ पात धरि झरका रहल छलथि।  ,आय बटेदार सब स खेत पथारक हाब डीब लईत लईत बड़ बेर भ चुकल छल ,क्षुधा तीव्र भ गेल छलेंह,बजली “आब रहय दिऔ एखन ,राति क बना लेब ,एखन अहू आबि जाऊ खेबा लेल ,अहू के भूख लागल हैत’। मुदा ताबेत त पहिनहि स  धधकल चूल्ही प चढ़ल लोहिया मे कडूक तेल  पड्पड़ाय लगलै त केराव क घाठि मे पात लटपटा क  हब्बर हब्बर लोहिया मे खसा चुकल छलिह। हुनक ई तत्परता आ अनुराग देखि क ,ओ कनी काल लेल हाथ बारि नेने रहथि । कनी विलंब स दुनू गोटे सोझा सोझी बइस क मौन भ अपन भोजन ग्रहण करय लागल छलिह । नबका ड़िजेंन के लोहा लक्कड़ सीमेंट स  बनल घर जे साबिकक खरिहान मे बनल छल,ओ त बहिनक छलेंह,कनिया के बख़रा मे त पुरना खपड़ैल घड़ाडी, मुदा आब कोन,दुहु घर त अपने सन  । ओत्ते टा चास बास मुदा रहनीहरि ,जेना बडका पोखरि मे दु टा पोठी माछ । अन्न पानि कोठी,तोठी मे रखनाय,उसीनिया कुटिया आब पूरने आँगन मे होय :एक्का दुग्गी जे सर कुटुम आबेन त हुनक रहब के बेबस्था नबका घर मे होय । ओहुना मन बहटारय लेल ओ दुनु कखनों अहि घर त कखनों ओई घर मे दिन व राति काटि लईथ । ओना त चोर चहारक हदस लोकके पहिनहु पईसल रहे ,मुदा आब कत्तेकों घर जिनक मुखिया बा कुलदीपक परदेस कमाई करय गेल छलेथ,ओत त बिसेख रुपे रतिजगा भ जाय ।  आ हिनको दुनु के परान सदिखन सिथुवा मे बन्न तड़पइत रहेंह । कहबों करथि ‘धन संपत्ति लुटबा के डर नहिं, सुने छिये जे मौगी सब के हाथ पएर काटि क ,की बुढ़ ,की बच्चा ,सबहक इज्जतों सेहो लुईट लईतछैक’। आ अहि डरे टोलक नबतुरिया धिया पुत्ता सब के  बाड़ी मे फड़ल लताम ,नेबों ,त कखनों केरा, आम ,कटहर ,लीची , बाटि क मोने मों न अपन फौज तैयार केने रहैथ जे बेर कुबेर गद्दह केला प आन कियो आबै वा नहिं आबे अहि मे स किछू नै किछू त अबस्से आयत । आ ओ सब कहबों करेन ‘एक बेर हाक देबै त केहनों नींद मे रहबे ,दौगल चलि आयब‘। ओ दुनु घरक बीचोबीच  कनि पछवाड़ी दिस घसकिक तेसर घर सेहो  टुकुर टुकुर ,माय टुग्गर सन ताकैत ठाढ़ छल,मुदा  तैयों ईर स भरल ओ घर हिनका सब के स्वीकार नहिं केल्केन्ह  ताही लेल उमहरक रस्ता टाट फट्टा लगा क बड़ पहिनहि बन्न करी देल गेल छल । ओहो घर अहि दुनु घर प’ अपन वक्र दृष्टि रखने छल फराके स । जेठ बैसाख क  उसिनति गरमी , कतबों पंखा ,कूलर लागल रहै ,मोटका मोटका पर्दा खिड़की प रहै ,मुदा नबका घर त राकसक मुंह बनि आगि उगलै , ईट के भट्ठी बनल । तखन कनिया के माटिक ओसारा बाला दच्छिनबरिया घर ,आहाहा ,एकदम शीतल ,जेना स्वर्ग , बाड़ी झाड़ी स सीहकेत बसात । त बेसी काल गरमी मे बहिन ओहि ओसारा वाला घर मे नीचा  बिछाओल पटिया प ,भात तीमन जे बना बथि कनिया प्रेम स ,खा क , ओंघडायल रहैत छली । पहाड़ सन दिन काटय लेल लच्छा के लच्छा ओझराल गप्प के पेटार खोलल जाय । आ पुरखा ,सर् कुटुम ,बाध बोन ,अड़ोसीया  पड़ोसिया केकर कहाँ ,सबहक कर्म कुकर्मक कतेको बेर पुनर्मूल्यांकन केल जाए । अहि एतिहासिक गप्प गोष्टी  मे,दुपहरिया मे बेसी  काल टोलक स्त्रीगन सेहो सब जुटथि,आ गामक ज्ञात इतिहास के रूपक आ क्षेपक सहित  ओहि महान घड़ारीके सौजन्य स नवीन दृष्टि स जनैथ। “भूपिंदर कका के पेलवार त बिलाइए गेलै नै । देखियौ ,केहेन उजाड़ लागै छेंह हुनकर डीह । पहिने जखन हम दुरागमन करि आयल रहिए,काकी के भागक चर्च घरे घर ,सात टा पूत ,दु टा छोटका भरिसक कुमार छलेंह,भरि घर पोता पोती ,काकीए के हुकुमति चलय छल घर मे । कनिया देखय त तीन चारिबेर आबैथ, “कनी टा मुंह हमहु देखबै’ तीन बरखक पोथी के जिद ,आ म्या कोहबर मे आबि क हमर घोघ उघारि क देखा दईथ। चुहचुही स भरल ,बड़का नाम गाम बाला कुटुम सब के आवाजाही ,,देखिते देखिते आब केहेन उजाड़ भ गेलै । बदलि त सौसे गामे गेलै ,भइयारी मे बाट बख़रा होइत गेलै ,किओ बाड़ी त,कियो ,गोहाली ,त कियो खरिहान मे चास बास बना लेलके ,मुदा हुनक पेलबार त उपटिए गेलै जेना एतय स”। “से की कहै छथिन्ह,महाबा के डीह देखथुन ,बड़का बड़का पाग बाला बेटा सब ,ओहेन सुंदर घड़ारी तोड़ि क नबका ड़िजेंन के घर त बनबा लेलथि , केहेन इल्टल बिल्टल सन लगे छैक आब,कियो इमहर स खिड़की  नोचलकेन्ह,किओ उमहर स दरवज्जा,बाड़ी के चहरदेवारी ढाहि पजेबा पर्यंत सब उघि ‘ ल गेलय। लोक के लोक कहे छै जे बिन पूत के डीह बिलटि जाए छै ,हुनक त पूत रहिते उजाड़ भ गेलन। खेत पथार त अपन अपन बेचि लेलथि ,मुदा सझिया के मकान , ओहिना संझा बाती धरि लेल मुंह तकेत ,नॉर बहबेत ,के ताकय एलै घुईरक दसो बरख स’। ओत्ते टा के दुपहरिया ,बुढ़ पुरान , की जुवानों सब पुरखा के गप्प ,दुरखा के गप्प ,संपत्ति बटबारा के गप्प ,बुढ़  नब के रास लीला  के गप्प ,ढेर रास गप्प क सिडही प चढ़ैत उतरेत दिवस काटि रहल छली। ओना आब ओहु ठाम टीवी आबि गेल छले,मुदा बेसी काल बिजली कटले रहैक,आ रहबों करे तईओ एहेन गोष्ठी के आनंद बुढ़ पुरान  के लेल भगवती के बरदाने बुझु । पुरान दिन के पागुर करैत हुनका सब के आंखि मे दोसरे चमक उठि जाए । जोजो बाबू के खिस्सा प कनिया त हसेत हसेत बेहाल ‘कोना हुनका लोक सब बकलेल कहेंह  ओ बताह नै घताह छलेथ,आबैथ अपन भाऊज स भेंट करय आ भरि टोल मे आंगने आँगन घुसि क जनी जाति स ठठा करैथ,किओ कहेंह ,कनी एक टा गीत सुनाऊ ,आ ओ ओहि ठाम धुस्स स बेसि जायथ,घेंट हिला हिला क ,आंगुर नचा नचा क नचारी,कजरी ,त झुम्मरी गीत सुरू करि देथ। सुन्नरों केहेन,पाँच हाथ के धूवा,दप दप गोर ,भाल प लाल सिंदूरक ठोप’। कालक प्रवाह के ग्रास बनल कतबों लोक गाम स उपटि क सहर दिस भागौ,गाम मे त लोकबेद रहबे करते न । आब कीछु सहरि क  भीड़ भाड़ स ,समस्या स ,बेरोजगारी स , गराकाट कंपीटीशन स , मशीनी जिनगी स उबि क गाम सेहो आबि रहल छथि । विवाहदान ,मुड़न उपनेंन ,एकादशी के जग ,पूजा हवन ,सब किछ त यथावत चलेत आबि रहल छल,नब लोक उत्साह स जीब रहल छल ,पुरना लोक सब हाफ़ैत,खीझैत,भोथरायल , भसियायाल बुद्धि ,कमजोर ,झलफल,झलफल दृष्टि स देखि रहल छल ,नब जुग के ,आ अपन मनोव्यथा के, कुंठा के ,अचटी ,कुचटी बाजि क निकालि लेत छल । कोनो एक खिस्सा प हुनका सब के हजार खिस्सा मोंन  पड़े । आ पचासों बरख पहिलुका  बटखरा स  आजुकसमाज के तराजू प तौलेत,केहन छुच्छ, केहन हीन,कतेक गर्हित लगेंह ,से हुनके सबहक आत्मा जनेक । ‘देखियो बिरेन के बेटी के ,चतुरथी स पहिनहि बर संग  ,  पदुवा के रिकसा प सिनेमा देखय मधबन्नी जा रहल छल,त बापे बजलखिन “रिकसा स जेमए त फिल्म छूटि जेतो ,चल, हम अपन मोटरसायकिल स छोड़ि दैत छिओ,हमरो कोर्ट ज़ेबा के अछिए’। आ बाजि क  भरि पोख हसली मनोजक माय । “ये बहिन ई कोन अजगुत गप्प कहलखिन , देखलखिन्ह नै चुनुलाल के बेटी के ,बापक विवाह कराओल बर के छोड़ि क अपन मन माफिक मनसा स दोसर विवाह करि लेलकै ,म्या ओकर सेहो आब सीना चाकर करि क बजेत छै “ह त कोन जुलुम केलकै ,पियक्कड़  छले, ओध बाध करि क मारे छले ,त ककरो दरेग ने उठले हमर बेटी लेल आ ओ जौ ओकरा स पिंड छोड़ा क पडायल त ,लोक् क करेज मे किएक धाह उठैत छैक’ । आब कहथुन’। कनिया के पुबरिया ओसारा दिस स आम रास्ता छल,त ओ सब ओहि ओसारा प नहिं बैस क ओहि स सटल कोठरी मे बैसारी करेत छली। कोठरी मे दू टा खिड़की ,एकटा पूब दिस ,एक टा दछिन दिस । दुनु प आधा आधा  पतरकी ,छाप बालानूआ के  परदा लागल,ओकरो मोड़ि क किम्हरों घुस्का दइथ,तखन ओहि बाट स जाए बला लोक सब प नजरि सेहो रखथि,ई मनसा कोन गामक छै ,किनको कुटुम त नहिं छैन,आ जौ कोनो टोलक एहेन लोग  नजरि पड़ि जाथिजिनका स आना माना रहेंह  ,त हुनक जतरा भंगटाबे लेल   कागद ,वा आचरिक खूंट के बाती सन बाटि क ,नाक मे घुसा क जबरदस्ती छीकल जाए ,कत्तेक बेर त अहि अपसकुन स लोक सब आपस घुईर जायथ,। आ अहि स स्त्र्रीगन सब के बड़ प्रसन्नता होय । हुनक सबहक निक जका मोन बहटि जाए । भोरुका तारा के देखि क दुनू गोटे उठि जायथ अपनअपन ओछोन प स ,नहा धो क ,भगवती नीप क ,पूजा पाठ के काज स जाबेत निवृत होथि,ताबेत सुरुज् क चक्का एक बीत ऊपर क्षितिज मे टंगा   सब  ठाम हुलकी मारेत रहेत छल । नबका घरक उपरका मंजिल के ग्रील मे बैसि दुनु गोटे स्टील के गिलास मे चाह पीबैत काल टोल भरि के अवलोकन करैत छली। बहिन त अपन ऊमीर के बड़का हिस्सा सहरे मे काटने छलिह,आब न ग्राम वासिनी भेलिह,मुदा आदति सब दिन स काक बजबा स पहिनहि उठबा के रही गेल छल। तहिया त आध छिध पूजा करि क घिया पूता लेल जलखई ,पनपियाइ बनाब मे जुटि जायथ,ओसब खा पीबी क स्कूल जाय त कनिकाल मे घरबला के ऑफिस ज़ेबा के समय भ जाए ,हुनका गेला के बाद घरक झाड़ू पोछा,बाल्टी भरि कपड़ा धोबैत नीत दिन बारह एक बाजि जाय । कहिओ ओ एक टा नौकर वा काजबाली नहीं रखली ,देहो भगवती के कीरपा स तंदुरुस्त छल,आ हाथो के बड़ सक्कत,जखन दू पाय ककरो दैतथिन नहिं ,तखन कियो हुनका ओत अपन मुंह बांहि क त नहिं काज करितेंह। मुदा वएह बहिन जखन सासु के सोझा गाम आबैथ त अपन पुबरिया घरक पलंग प चित्त पडल रहेत छली ,काजबाली सब काम करबै करैक,हुनका जाँतय पिचय लेल एक नौड़ी फराक स राखल जाय ,जे हुनका नहाबए सोनाबय, नुआ फट्टा सेहो धोबय। सहर ज़ेबा काल कनी कष्ट त मोंन मे अवस्से होएन ,मुदा ओहि सहरक नाम प त ई राजसी ठाठभेटल  छल ,ई सोचि अपन दियादिनी सब प उपेक्षा के दृष्टि फेरैत तांगा प बेसी क गाड़ी पकड़बा के लेल मधबन्नी जाय छलिह । कातिकी  पूर्णिमा के  दिन दोसर गाम के देवी मंदिर प भागवत कथा के भव्य आयोजन छल।जगननाथजी स विद्वान  पंडित सब आयल छलेथ, कतेक दिन पहिनहि स प्रचार भ रहल  छल, लोक के उत्सुकता हिय मे हिलकोर मारय लागले  । कहिया स नियारति नियारति गामक ढेर रास स्त्रीगण,पुरुखक संग ओहो दुनु रिकसा प बैसि क  नहा सुना क भोरे भोर विदा भेल रहथि । संजोग देखियो जे  ओ सब उमहर गेलथि,आ इमहर बहिनक कुटुम आबि गेलखिन, दुनु घरक कुंडी मे लटकल ताला देखि क तेसर घरक दुरखा लग ठाढ़ कुटुम के हुलसि क सुआगत करबा लेल ओ  दरबज्जा स्वतह खुजि गेल रहे । भोजन भात करि क पाहून कनी काल विश्राम करय लगला त हुनक स्त्री घरक और भीतर पइस तेसरा घर स अनुराग बढ़बय लेलअकुलाय लगली । भाई भौज छलखींन ,इमहरे समधियौन मे आयल छलाह ,त बहिनो मोंन पड़ी गेल छलेनह । मुदा भौज के त नीक मौका हाथ लगले,ननदि के अतीतक उद्यान मे भ्रमण करबके । हुनको ओ कहिओ कनिओ मोजर नै देने छलखिन ,ततेक गुमान छलेंह। आ तेसरो घर के आय अपन पीर  उगिलबा के परसर भेटले । आ खिस्सा के दोसरि छोर कुम्हारक चाक प गढ़ेबा लेल उन्मत्त भ  फर फर क बहरायत गेल । तीनो फरीक मे ,बाँट बख़रा त कहिया कत्त नै भ चुकल छल,कहे लेल त आब दुइए फरिक बचला  बड़का आ छोटका,मुदा तेसर संसार स प्रस्थान करबा स पूर्व  अपन स्त्री संग एक टा कंटिरबी सेहो  छोड़ि गेल छलथि। ओहि गुडकुनिया दईत धिया के कपार देखि पित्ती अपना ओत्त ल गेलथि, अपन बेटी त नहिं देलथी भगवती,एकरे पालब पोसब, पढायब लिखायब, कन्यादान करब ,आब माय के कत्तबों मोंन छटपटेलन्हि,सौस सेहो खुट्टा जका ठाढ़ भ गेलथि ‘ओ आहाँ के बेटी के  इंद्रासनक परी बनबय चाहेतछथी,आ आहाँ छुच्छ के विलाप कय रहल छी”। तखन सबहक बिचारे माय धी दुनू सहर चलि गेल छलिह।बरस दिन प माय त आबि गेली ,खिस्सा के पेटार नेने मुदा बेटी के त स्कूल मे नाम लिखा देल गेल रहे । माय के मोंन जखन  बड़ छटपटाय ,त पोस्ट ऑफिस स पोस्टकार्ड मंगबा क जोड़ी जाड़ि क लिखनाय सुरू करैथ त कनैत कनैत कतेक पहर बीत जाय । अबल दुबल प सिथुया चोख ,त मोसिबत के मारल के ,अपन रक्षा करय लेल बेसि काल जिह्वा प दुर्वासा के बास ,कराबइए पडेत  छल । ढोढ़िया साप के रूप सेहो अख़्तियार करय लेल लोकवेद बाध्य करि दैक।  पान सन जीबन पहाड़ सन दिन काटे लेल गाम घर मे लोक बेद के अकाल नै रहैत छैक।पहिनुका जुग मे त गप्प सप्प संग भांति भांति के काज धंधा सेहो चलेक,कुमारि बेटी के विवाहक लेल सिकी के मौनी बने ,गेरुआ के खोल प जोड़ा सुग्गा ,गुलाबक फूल काढ़ल जाए ,जनेऊ काटल जाए चरखा काटल जाय ,मुदा ताहिया बाजार घरे घर नहिं घुसल चल ,आ ने चीनक सुंदर सुंदर समान एना लोकके मोहने छल , ‘एँ ,के आंखि फोड़त अप्पन, बाजार मे एक स एक निक चीज भेटे छै’बाला प्रलयंकारी बाढि मे सब किछू भासियाएल जा रहल अछि । आब त विशुद्ध गप्प ,नबका शिक्षा के भूत ,गाम घरक लोक के कोढ़ि बना रहल अछि ,तखन अहिना कतेको खिस्सा के जन्म होईत छैक आ सोईरीए स पांखि लगा ,बंद खिड़की ,दरवज्जा के अछैत खुजल आकास मे उड़य  लागेत छल । ओहि खिस्सा सब मे कनिया के नॉर स सानल  जिनगी के कतेक रास दुख रहे ,से कतेको लोक ले करेज मे बरछी सन गड़ैत रहलै।  उपजा बाड़ी त हुनकर ,जिनकर,समांग , खेत खरिहान छल ,हिनका  त मात्र घड़ाड़ि, आ ओहो साबिकक घर ,बड़का विशाल जे रहल होय ,मुदा भदबारि मे जानक आफत ,कखनों इमहर स चूबे,कखनों उमहर स देवाल खसै,आ एकर मरम्मति करबय लेल कनिया के कतेको मास बरस दिन धरि बहिन के चिट्ठी प चिट्ठी पठाबए पड़े तीन चारि बरख मे किओ सहरि स आबै,आ जाबेत ओकरा दुरुस्त करै,ताबेत कोनो और समस्या ठाढ़ भ जाए ।एक बेर त बहिन गाम आबि क सबहक सोझा मे हुनका बड़ फज्झति केलकिन ‘अहा त अहिठाम आराम स बईसल खाय छी,आहाँ की बुझबै सहर मे पैलवार ल क रहे बला के कतेक फिरीशनी स दु चारि होमए पड़े छैक। अहाँ के बेटियो के जिम्मेबारी हमी सब उठेने छी ,तईओ अहाँ चैन स हमरा सब के नहि जीब’ देबय चहेत छी ।हिनकर ब्लडप्रेसर बढिगेल छन्हि। हम त हुनका कोनो काज कहिते नहिं छिएन्ह, गिरे पड़े छै घर त गिरय दियौ ,बारह टा कोठरी छै ,जखन सब खसि पड़ते ,तखन देखल जेतै’।  ओहि बेर स ओ कतबों कष्ट होयन्हि, हुनका चिट्ठी नैई लिखलखींह ,’ ‘बुझल जे हमारा किओ नहिं अछि अहि संसार  मे’। आ चारो कात स घर खसि क भुतहा हवेली सन लागै, सांझे लालटेम जराक’ दरवज्जा प राखि देथ,जे खसल पजेबा स बाट बटोहिया के ठेस ने लागि जाय । खेबा पिबा लेल साल भरि के अन्न हुनके दिस स देल जाए ,आ बाड़ी झाड़ी मे तीमन तरकारी त उपजिए जाए । मुदा कनियो के अपनघरबाला स बेसि कोढ़ बापक देल गहना गुरिया फाड़े ,चंद्रहार ,नथिया ,टीका ,कर्णफूल ,बाला,अनंत ,डढ़कस,पाजेब , सबटा त बहिन बैंक मे रखबाबय के नाम उतरबा नेने रहथि।बाद मे कखनों ओकर चर्च करैथ, त बहिन के कबौछ सन बोल स सम्पूर्ण देह मे आगि लेस दै “आब गहना ल क की करब ,लग मे राखब त ओहो डकूबा लुइट क ल जायत,भने बैंक मे रखल छैक’। अगहन मे वा माघ मे ,किंसयातओ कोनो जाड़े मास छल ,जखन बहिन सपैलवार सहरि स गाम बेटा सबहक उपनेन् करबा लेल गाम आयल छलिह। तहिया त गाम गामे छल आ टोल सेहो समस्त ऊर्जा स सम्पन्न ,जन धन स सब डीह भरल । एके दुग्गी लोक गाम स बहराएल छल ,मुदा गामक मजगुत डोर ओकरा खीचने रहै। मईया त बरख दिन पहिनहि स अहि शुभ दिन के ओरिओनमे  कोलहुक बरद सन राति दिन बिसरल लागल रहल छली। आँगन मे ओसारा सब प ओछाओल पटिया सब प पतियानी स राखल राहड़ि,ऊडेद केराव ,तीसी ,मड़ुआ ,मकई ,धान , सरिसब,आने की जतेक अन्न उपजा क बटेदार द जाईत छल,मईया ओकरा अपना हिसबे सइतने जा रहल छलिह,दालि दड़रबाक भूसा सहित छोड़ने छलिह ,आ ओकरा फटकबा झटकबा क पैघ छोट कोठी सब मे रखबय छलिह । तखन एक दिन कनिया के मोंन मे अयलंहि,  उपनेंन हेतैक,एतेक लोकवेद ,सर-कुटुम सब औताह,तखन ओ मड़बा प चढ़ि क बरुआ सब के की भीख देतीह,हुनकर हाथ त ठन ठन गोपाल । आ बड़ सोचि विचारि क मरतिया बाली पेटे दस सेर राहड़ी,दस सेर मकई ,पाँच सेर खेरही ,पाँच सेर केराव ,थोड़े गहूम ,थोड़े धान बेचि लेलथी । कीछु पाय हाथ मे आबी गेलन्ह त छौओ बरुआ लेल गामे के सोनरबा स सोनक औंठी गढ़बा लेलथि,ओहो मैना दीदी के नेहोरा पाती करी क । ई सब कारोबार त  ततेक गुप्त भेल रहै, जे घरक कोनो चार प कोनो कार कौआ सेहो नहिं बैसल छल,नहिं कोनो कोन सानि मे नढिया,गीदड़ बा बिलड़िए नुकाएल छल,मुदा तैयों ई गप्प जखन उजिएले,ओही घर मे  बड़का भुईकंप त आबिए गेल  छल । जखन बहिनक स्वामी बाध बोन दिस गेला अपन खेत पथार देखय सुनै,त  कुसियारक चोरि के दाग स मुक्ति पाबय लेल बीसेसर हुनका कान मे हुनके आंगनक करनी फुइकी देलकेंह। आंगन मे पाहुन पड़कक आगमन प्रारम्भ भ चुकल छले,कनिया अपन कोठरी के पट बन्न करि के कनेत रहली। हुनकर छुदरपन,हीनता,आ पापक पोथी नेने बहिनक घरबाला ज़ोर ज़ोर स आँगन मे बाचि रहल छलेथ ‘अही घर मे आब की उत्थान होयत ,जखन घरे मे मूस लागल अछि”।आ दुनु परानी हुनक हाथ के छूल पाईन धरि नहिं पिबाक सप्पथ खेलाह ,जखन कि तहिया सबटा खेत पथार सझिए रहेक। ‘दसरथ के अंगनमा मे शुभे हो शुभे’ बड़ ज़ोर ज़ोर स होमय लागल,मुदा काकी शुभे कोना कहितथ ,। उपनेन् के दिन सब कुटुमक  उपहास पूर्ण नजरि स बचबा के लेल ओ अपन कोठरी स नहिं निकसल छलिह, तीन दिनक भुखल पीयासल, चारीम दिन झलफल साँझ मे ,छौओ बरुआ लेल बनाओल औठी अपन सौसक हाथ मे राखि पट फेर बन्न क लेने रहथी। हिनको जिनगी स मोह कौन बाचल रहैक,बेटी के पार घाट लगबय लेल भगवती छलिह । तखन सुतली राति मे छुच्छ के लाज लिहाज के तिलांजलि दइत निकलि गेली नबकी पोखरि मे भसियाबय लेल ।कनीए दूर प बुढ़बा कोतबाल उधो टोकि देलकेन्ह’ ‘ कतय जाय छी मलकानि?’ ओ की चीन्हने हेतेक ओकर आंखि मे त रतौनी रहे ,मुदा उज्जर नुआ देखि भेलय कोनो दाय काकी हेतिह ,आ जौ  चुड़ैल हेते त तकरो काट छल ओकरा लग । तही लेल कनी उचगर स्वर मे ओ बाजल छल, आ ओहि स्वर प लगे के दालान प सुतल दिनेशक आंखि खुजि गेल छल ,माझ बाट प आबि ओहो ठाढ़ भ गेला ।किओ किछू ने बाजल आ ओ स्वेत वस्त्र धारिणी आगा पोखरि आ गाछी दिस बढ़ैत रहल छली। नब शोणित दिनेश पहिल बेर कोनो भूत वा चुड़ैल के पछोड़ धेलक ,संग मे उधो मन बढेलके । पोखरिक महाड़ प आबि ओ पलटि क ताकली,दोसर पहरि राति  मे आधा चान आकास मे चमेकि रहल छल ,ई त कमतौल बाली काकी छथीन ,दिनेश चौंकल,टोलक झंझट फसाद स पुरुखों सब परिचिते रहैत छलाह। छपाक के स्वर स ओकरा सब मे चेतना आएल,आ हुनक पीठे प दिनेश पानी मे छलांग लगा देने रहैक ।पोड़ीक हुनका बाहर आनल ,ओ त अचेत भेल । पहिल बेर गामक इतिहास मे एहेन खिसा भेल रहैजे निसाराति मे भगवति पानि मे डुबल प्राणी के बचा लेलथ। मुदा किओ इहों बाजल छल‘अक्खज ने मरै ,छुतहर नै फूटे’। बहिन के डरो पहिनहि बेर भेलन। प्राण परबा जेका पुक पुक करय लागल छल ,आय जौं किछ अधलाह भ जयते ,टोलक लोक जिनगी भरि हुनके उपराग दितेन्ह। दालान प बैसल झक झक उज्जर कुरता,सांची धोती आ बंडी पहिरने रोआबी मालिक के एक टा अदृस्ट भय सेहो पईस गेल छल । तहन  निर्बलक पछ मे उठल लोक् क दया माया देखि दुनु बेकती कनिया के हाथ पएरजोड़ी क शांत केने छलथी । बेटी के विवाह मे त एक टा दमड़ी नै देबए पडलेन्ह,मुदा मुईला प आगि त जौते देतन्ही,आ कन्याक  विवाह कतबों आदर्स हॉक, घरबैयाके त बर ताक’ मे ,दौड़ बरहा करेइए पड़े छैक, जेना गीध के धियान मुइल जानबरक मौस प रहे छै तहिना  कोनो कोनो लाथे हुनक बख़रा के जमीन जथा ओ  अपन नाम प लिखबा लेने रहैथ,आ हुनका अहि सब झंझट स मुक्त करि देने छलेथ ।   कतेको बरख बीतले, बहिनक सबटा बेटा के विवाह दान भेलन्हि ,सब अपन पेलवार  बढाबेत आन आन सहरि मे जे गेला ,से आपस मुड़ि क बहिनक अहंकार के बरक्कैत नहिं होमय देलखिन, कोनो पुतौह हुनका अपन नरेटी प हाथ नैराखय देलकेन  ।घर वाला के रिटायर भेलोपरांत गाम मे अपन नब मकान बना क रहय लागल छलिह,मुदा तखनो हुनक दोसरे धाह छलेंह । कनिया के खसल घर के मरम्मति करबा देल गेल छल ,मुदा ओकर मालिकाना हक  बहिने सब के हाथ मे छल । कतेको बरख बीमार पड़ी क मालिक जखन गोलोकवासी भेला ,बहिन नितांत एसगरुवा ।कनिया के बेटी  बरस दु बरस लेल माय के घुमाबए फिराबय ले ल जायन्ह,सबटा तीर्थ सेहो करबा देलकैन्ह। देखि देखि क हुनक कोढ़ फाड़ेन्ह,आय धरि त ओ दुनिए दारी मे रही गेल छलथी,आब त कोनो बेटो ने हुलकि मारे आबें ,ह कहिओ काल फोन फान करि लेई त सझिले मुदा ओहो आबे ने खाली बजबे तोही आबी जॉ ,जखन अपन कोखिक जनमल आन भ गेल त आन क जनमल के किए गारि सराप दइतथी, कहबीओ छै जे जहन बौह लगतौ कान तखन माय हेतों आन । पोसने त वेह ओहि बेटी के रहथी,मुदा कतेक सिनेह स से हुनक आत्मा जनैत रहेंह। जखन बहिन विह्वल भ क कनैथ,  हिम्मत जूटा क कनिया हुनका लग एनाय सुरू करी देलथी,आ नहुं नहुं बहिनक खेनाय पिनाय के भार हुनका बिन पूछने कनिया अपना माथ प राखि लेलथी । आब त  खूनक रिस्ता सेहो एहेन ने हेतै ,आध आध मिल क एक भ जाय छै ,नदी आ नाव ,आन्हर आ लाठी ,डॉल आ रस्सी ,तहिना बहिन आ कनिया,एक दोसरक जिबाक सहारा बनी गेल छलथि। कुमार पृथु नापल तौलल पसरल पथार (परमेश्वर कापड़िक पथार) सामाजिक सांस्कृतिक भावभूमिक निमन उजहल साहित्यिक उपजा थिक, ई पथार कथा–संग्रह । सुपुक लोकजीवन आ निस्सन सामाजिक परम्पराक रग आ तहमे निछुन रुपस’ घड़ेर कएल लोकयथार्थ आ युगसत्यक सहज संवेगीत स्पन्दनक गेंठ आ पुरौंतसनके ई बुझाइछ । सहज सुथर लोकभाषामे सामाजिक–सांस्कृतिक परम्पराक तत्व–दर्शन सङे लोक जीवनयथार्थ आ लौकिक युगसत्य एहिमे एहन भ’ क’ ने सज्झर–मिज्झर अछि, जे बहुत अंशमे ई मैथिली ब्लतजचयउययिनथ क नीक स्वरुपक आह्लादक भाववोध करबैछ । चतरल पसरल मैथिली कथासाहित्य मध्य ई एकटा निजगुत धस आ संवेगीत पहुँचक खुरपैरिया रहबट लगैछ । पथारक कथाकारक रचनाधर्मी सहजता, सुक्ष्म अवलोकनक अलबेला क्षमता तथा सृजनात्मक सिद्घि, बहुत उजहल आ सरि–सुत्थर लगैछ । कथाकारके जे रेहल–खेलल लेखकीय पकड़ आ परिकल पकठोस रचनाधर्मी ऊर्जा क्षमता अछि, ओ मैथिलीक हक आ पक्षमे शुभ सगुनियाँ लगैछ । पथार संग्रहस’ रचनाकारक परम ऐतिहासिक आयतन–आकारक नाप तौलक संगहि सम्मानित लेखकीय विस्तृतिक अगाध परिधि एवं उत्कृष्ट पहुँचक वोध सेहो होइछ । पथारमे गुँड़–चाउर फँकैत आस–मोरथ अछि, हँथोरिया मारैत ककुलता बेगरता अछि, घै–कटैत ललसा आ मचकी झुलैत सपनासभ अमार लागल अछि । एहिमे ओङहरिया मारैत रोदना–घेओना अछि, त’ घुसकुनियाँ कटैत सीमा आ चिका–दरबर खेलैत अनन्त आकाश सेहो अछि । सबस बढ़का बात जे एतए अछि, ओ अछि— अप्पन लोकक जीवन अनुभवक विस्तृत लेखा–जोखा से अपरुप आ अपार अछि । किएक त’ एहिमे हमरे–अहाँक घर–अङना, ओलती–धुरखुर, दुरा–दलान, खेत–खढिहान, कमाइ–खटाइक प्रतिविम्वन अछि । निछुन निमनस’ ईसब हमरे अहाँक अछि । से एहि दुआर,े जे एहिमे परम्परा आ जिनगी अछि, संघर्षस’ भरल आशा–विश्वासक अनन्त उपक्रम अछि । नीक–बेजाय सब तरहक चेहरा चित्रित करएबला अनुभूति आ अभिव्यक्तिक जे वैशिष्ट अछि, कथ्य, शिल्प आ तकनीकी स्तरक जे वैविध्य अछि, ओ मनभावन अछि । एहिमे मानवीय संवेदनाक घनीभूत एवं सार्वभौमिक स्वर सेहो अछि, मुदा विष्फोटक, नव संरचनावादी आ परिवत्र्तनकारी अछि । भौतिक भोगवादी युगक समकालीन सन्दर्भ आ वैश्वीकरणक उजहिया परिप्रेक्ष्यमे बिलटल अफसियांत जिनगी, उहापोह एवं दौडधूपस’ बिकठाह, एक–रसाह भ’ गेल अछि । जीवनक सबटा राग–रंग भटरंग भ’ क’ दुइर भेबा के भेबे कएल अछि, हास्य विनोद युक्त अपन अनुपम आनन्दक अनमोल परम्परा सेहो अलोपित भ’ रहल अछि । चौल–मजाकक जे विशुद्घ, सरस परम्परा छल, सेहो हेरा–ढेराक’ बेबाइल भेल जा’ रहल अवस्थामे, चिकन चुनमुन लोक राग–भासमे व्यंग्य परम्पराके जे ई आगू बढएलन्हि अछि, हमर प्रकाशकिय नजरिमे ओकर स्वीकृति आ मूल्यांकन लोकप्रिय आ सोकाजक अछि । डॉ०अरूण कुमार सिंह, जे० आर० पी०- मैथिली भारतीय भाषाओँ का भाषावैज्ञानिक सांख्यिकी संकाय, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर (कर्नाटक) अभिकलनात्मक/संगनणात्मक (Computational) मैथिली व्याकरण प्राचीन कालहिसँ भाषाक सोद्देश्‍यता पर चिन्तकक नजरि रहल अछि। आइ भाषा-अध्ययनक एहि परम्परापरक स्वरूपमे परिवर्त्तन आएल अछि। एकर अनुसारेँ भाषामे सोद्देश्‍यता एवं प्रयोजनमूलकताक भाव पूर्वनियोजित रूपेँ पैदा कएल जाए रहल अछि। भाषाक इएह बदलैत भूमिकाक कारणेँ व्याकरणक स्वरूप एवं उद्देश्‍यमे परिवर्त्तन होएब स्वाभाविके अछि। किछु चुनल शब्द, प्रयोग आओर वाक्यकेँ सूचीबद्ध करबासँ लए कए भाषाक साँगोपाँग गंभीर विवेचन धरि व्याकरणक विस्तार मानल जाए सकैत अछि। कोनो भाषाक प्रयोग-क्षेत्र भनहि सीमीत रहल हुए परंच ओकर उपयोगिताकेँ लए कए कहियो विवाद नहि रहल अछि। आब प्रश्‍न उठैत अछि जे व्याकरणक उपयोगिता का अछि ? छोट-छोट नेना नान्हिटामे अपन घर-परिवारमे बाजए बला भाषा सीख लैत अछि। जाबत धरि कोनो नेनाकेँ ओकर मातृभाषाक व्याकरणिक औपचारिक जानकारी देल जाएत अछि, ताबत धरि ओ नेना ओहि भाषाक व्यवहारमे दक्ष भए चुकल रहैछ। एहना स्थितिमे ई प्रश्‍न उठब स्वभाविके अछि जे व्याकरणक आवश्यकता की अछि ? एहि प्रश्नक प्रत्युत्तरमे महर्षि पतंजलि महाभाष्यमे व्याकरणक प्रयोजन बतबैत कहैत छथि- ‘‘ कानि पुनः शबदानुशासनस्य प्रयोजनानि? रक्षोहागमलध्वसंदेहा: प्रयोजनम् ’’ अर्थात् रक्षा, ऊह, आगम, लघु एवं असंदेह यैह पाँचटा व्याकरणक प्रयोजन अछि। रक्षासँ तात्पर्य अछि- वेदक रक्षा, यथा – ‘‘रक्षार्थ वेदनां – मध्येय व्याकरणं। लोपागमवर्णविकारज्ञो हि सम्यग् वेदान् परिपालिष्यतीति।’’ अर्थात् लोप, आगम, आदेशक व्याकरणिक प्रक्रियाक जिनका ज्ञान रहैत छन्हि सैह वेदक शुद्ध रूपसँ रक्षा कए सकैत छथि। संदर्भक अनुसार समुचित शब्दक कल्पना करब एंव तद्‍नुरूप ओकर व्यवहार करब ऊहक कोटिमे राखल गेल अछि। आगमक अनुसारेँ मानल गेल अछि जे व्याकरण पद आ पदार्थक ज्ञानक उपरान्त वाक्य आओर पदार्थक ज्ञान प्राप्त करएमे सहायक होइछ। नव-नव वाक्यक उत्पादन एवं प्रयोग आगमक कारणेँ संभव होइत अछि। लघुसँ तात्पर्य अछि जे किछु सीमित नियमक सहयोगसँ सम्पूर्ण भाषाक ज्ञान प्राप्त कएल जा सकैत अछि। किएकतँ कोनो भाषाक विपुल शब्द-भण्डारकेँ कंटस्थ नहि कएल जाय सकैत अछि। एनामे ई भाषा शिक्षणमे उपयोगी होइछ। असंदेहसँ तात्पर्य अछि जे भाषाक संरचनागत संदिग्धताक स्थितिमे व्याकरणक ज्ञान ओकर निवारण करैत अछि। व्याकरणक एहि प्रयोजनकेँ देखल जायतँ एहिमे व्याकरणकेँ एकटा साधनक रूपमे देखल गेल अछि। एकटा तथ्य इहो स्वीकारब आवश्यक अछि जे महाभाष्यमे वर्णित स्थित सँ आजुक भाषिक परिवेश बड्ड बेसी भिन्न भए गेल अछि। एकरे परिणाम अछि जे वर्त्तमान समयमे अभिकलानात्मक व्याकरणक संकल्पना प्रासांगिक अछि। जँ भाषाकेँ एकगोट व्यवस्थाक रूपमे अभिहित कएल गेल अछि तँ निश्‍चित रूपसँ व्याकरणे ओहि भाषिक व्यवस्थाक तार्किक आधार गढ़ैत अछि। कोनो भाषा अपन विकाश-क्रममे निरन्तर परिवर्त्तनशील रहैत अछि। संभव अछि जे एहि परिवर्तनक गति कम हो, परंच भाषामे आएल आंशिक बदलाव स्वयं भाषाक सजीवता लेल अपरिहार्य होइछ। भाषामे व्याप्त एहि विकासक गतिशीलताक स्वभावक बादो एक आदर्श व्याकरणसँ अपेक्षा कएल जाइत अछि जे ओ ओहि भाषाकेँ समग्र रूपेँ विश्‍लेषित एवं निरूपित कए सकय। अभिकलानात्मक व्याकरणक लेल मानवक भाषाई अनुप्रयोगक स्वरूप, भाषिक समाजक विकासक गत्यात्मक रूप तथा भाषाक प्रायोगिक स्तरक मूल स्थिति पर नव रूपेँ विचार करब प्रासांगिक भए जाइत अछि। आजुक सामाजिक परिवेश औद्योगिक-क्रांति एवं सूचनाक्रांतिक बीचक स्थितिक साक्षी बनल अछि। एहि स्थितिक दबाबस्वरूप जे भाषा मानव एवं मानवक बीच संवादक माध्यम अछि वैह भाषा आइ मानव एवं कम्प्यूटरक बीच संवाद स्थापित करबाक लेल तत्पर अछि। दरअसल यैह ओ स्थिति अछि जाहिमे अभिकलनात्मक व्याकरणक पृष्ठभूमि तैयार कए रहल अछि। अभिकलानात्मक व्याकरणक आशय ओहि व्याकरणसँ अछि जकरा माध्यमे प्राकृतिक भाषाकेँ कम्प्यूटरक माध्यमसँ बुझल जा सकैछ। एकरा संगहि व्याकरण होएबाक कारणेँ एकरासँ इहो अपेक्षा कएल जाइत अछि जे ई एतबा वैज्ञानिक एवं परिपूर्ण हो जे एकर नियमक द्वारा कम्प्यूटरक माध्यमसँ प्राकृतिक भाषाक नव-नव वाक्यक सृजन कएल जाए सकय। फलस्वरूप ई व्याकरण मानव-मशीन अंतरापृष्ठक समय अपन भूमिकाक निर्वहन कए सकय। भाषा-कम्प्यूटिंगक लेल ई आदर्श स्थिति होएत जे एहन अभिकलानात्मक व्याकरणक विकास कएल जाए सकय जे प्राकृतिक भाषाक सभ संरचनाक तार्किक विश्‍लेषण प्रस्तुत कए सकय। एकर तात्कालिक लाभ ई होएत जे भाषा-प्रौद्योगिकीक विभिन्न अनुप्रयोग जेना- मशीनी अनुवाद, सूचना-प्रत्यानयन, सूचना- संचयन, व्याकरण जाँचक, पाठ-विश्‍लेषण आदिक विकासमे दीर्घकालिक समाधान उपलब्ध भए सकय। एहि क्षेत्रमे भए रहल शोधक लक्ष्य सेहो यैह अछि ; मुदा वर्त्तमान समयमे भाषाक छोट-छोट संरचने पर शोधार्थीसभक ध्यान केन्द्रित अछि। एहि कारणेँ रूप-विश्‍लेषण (Morph Analysis), टैगिंग (Tagging), आ पदानिरूपण (Parsing)क स्तरे धरि ध्यान केन्द्रित भए सकल अछि आओर एहिमे सफलता सेहो भेटल अछि। आवश्‍यकता एहि बातक अछि जे प्राकृतिक भाषाकेँ आधार बना कए एहन नियम विकसित कएल जाय जे नहि तँ मात्र कम्प्यूटरमे सहज स्वीकार्य हो, बल्कि प्राकृतिक भाषा पर केन्द्रित भाषा-प्रौद्योगिकीय लक्ष्यकेँ सेहो प्राप्त कएल जा सकय। ई सर्वविदित तथ्य अछि जे कम्प्यूटरक प्रचालन-व्यवस्था मूलतः द्वयंक प्रणाली (Binary System : 0 & 1) पर निर्भर अछि आ ठीक एकर विपरीत मानवीय भाषामे असंख्य शब्द-संपदा एवं अनेक तरहक वाक्य संरचना अछि। आब प्रश्‍न उठैछ जे मानव-कम्प्यूटरमे संवाद कोना संभव होएत? इएह महत्वाकांक्षा मानवकेँ कृत्रिम मेधा (Artificial Intelligence)क क्षेत्रक अंतर्गत शोधक लेल प्रेरित करैत अछि। एहिमे मूल समस्या ई अछि जे मानव-मशीन अंतरापृष्ठ (Interface)मे एक दिस मानव होइछ जे अपन असीम शब्द-संपदा एवं भावना, चेतना सदृश अनेक मानवीय गुणसँ भरल होइछ तँ ओहिठाम दोसर दिस मशीन होइछ जे एकटा स्थल उपकरण मात्र अछि। एहन स्थितिमे मानवीय भाषासँ संवाद बैसा पायब कठिन बुझन’ जा रहल अछि। तथापि वर्त्तमानमे भए रहल शोध भविष्यमे की रंग लायत एहि पर आशातीत दृष्टि राखब सैह ठीक रहत। बरहाल यैह ओ स्थिति अछि, जकर कारण अभिकलानात्मक व्याकरणक आवश्यकता महसूस कएल जाए रहल अछि। अभिकलानात्मक व्याकरणक संकल्पना नव अछि एवं अखन धरि कोनो सटीक अभिकलानात्मक व्याकरणक विकास नहि कएल जाए सकल अछि। मुदा सामान्य व्याकरण एवं अभिकलानात्मक व्याकरणमे व्याप्त अंतरकेँ संकल्पनात्मक रूपसँ एतय उद्‍घाटित कएल जाए रहल अछि। यथा- सामान्य व्याकरण मानवीय व्यवहारक लेल होइत अछि। अभिकलानात्मक व्याकरण कम्प्यूटरक माध्यमसँ मानवीय व्यवहारक लेल होइत अछि। सामान्य व्याकरण प्राकृतिक भाषा की अछि? कियैक अछि? सदृश प्रश्‍नक पड़ताल करैत अछि। अभिकलानात्मक व्याकरण प्राकृतिक भाषा कोना काज करैत अछि? सदृश प्रश्‍नक जाँच-पड़ताल करैत अछि। सामान्य व्याकरण सहज एवं मौलिक होइत अछि। अभिकलानात्मक व्याकरण ‘सामान्य व्याकरण’ सँ उर्जा ग्रहण करैत नितांत कृत्रिम होएत। सामान्य व्याकरण अपन स्वरूपमे व्यापक भए सकैछ। अभिकलानात्मक व्याकरण स्पष्ट, एकनिष्ट एवं लक्ष्य केन्द्रित होएत। सामान्य व्याकरणक उद्‍देश्‍य मूल रूपसँ मानवकेँ लाभ पहुँचाएब होइत अछि। अभिकलानात्मक व्याकरणक उद्‍देश्य अपन विभिन्न उत्पादक माध्यमसँ मानवकेँ लाभ पहुँचाएब होइत अछि। सामान्य व्याकरण प्रस्तुतीकरणमे ई सहज होइत अछि। अभिकलानात्मक व्याकरणक प्रस्तुतीकरणमे गणितीय होइत अछि, जकरा कम्प्यूटर स्वीकार कए सकए। चामस्की व्याकरणकेँ ‘भाषाक तर्कशास्त्र’ कहलन्हि अछि। व्याकरणक उद्‍देश्‍यकेँ स्पष्ट करैत चामस्की कहलनि अछि जे ‘व्याकरण ओएह होएबाक चाही जकरा द्वारा भाषाक सभ वाक्यक वर्णन आओर सृजन कएल जाए सकय।’ आब एतय अभिकलानात्मक व्याकरणमे जे नव प्रसंग जुड़ैत अछि ओ एकर कम्प्यूटरापेक्षी होएब अछि। अभिकलानात्मक व्याकरणक उद्‍देश्य मूलतः ‘प्राकृतिक भाषासंसाधन’क संकल्पनाकेँ सार्थक एवं सफल बनाएब अछि आओर एहिमे अभिकलानात्मक व्याकरण साधनक रूपमे प्रयुक्त होइछ। जखनकि एकर साध्यतँ परोक्ष रूपसँ ‘प्राकृतिक भाषा संसाधने’ अछि। एहने स्वरूपमे अभिकलानात्मक व्याकरणसँ अपेक्षा कएल जाइत अछि जे ओ भाषाकेँ वैज्ञानिक ढ़ंगसँ विश्‍लेषित एवं सर्जित कए सकय, जे कम्प्यूटरापेक्षी हो। आब विचारणीय ई अछि जे ‘प्राकृतिक भाषा संसाधन’क संकल्पना स्वयंमे एक व्यापक संकल्पना अछि आओर दोसर जे एहिमे प्रयुक्त व्याकरण सेहो अपन स्वरूपमे व्यापके होएत। कियैक तँ आइ कोष निर्माणसँ लए कए पाठ-निर्माण धरि सबमे प्राकृतिक भाषाक कोडीकरणक आवश्यकता पड़ैत अछि। एहि सबकेँ कम्प्युटेशनल व्याकरण कहब सैह उचित होएत। एहि स्थितिमे अभिकलानात्मक व्याकरणक मूल उद्‍देश्य तँ प्राकृतिक भाषाकेँ एहि तरहेँ सूत्रबद्ध (Formulized) करबाक अछि जाहिसँ कम्प्यूटर एकरा स्वीकार कए सकय। एकर परिणामस्वरूप ‘प्राकृतिक भाषा संसाधन’क क्षेत्रक विभिन्न लक्ष्य मशीनी अनुवाद ( Machine Translation), सूचना प्रत्यानयन (Information RetrievalInformationRetrie) वाक्-संश्लेषण (Speech Synthesis), शब्द-संसाधन (Word Processing), दृश्य-संसाधन (Visual Processing) तथा ज्ञान-निरूपण (Knowledge Representation) आदि मुख्य बिन्दु अध्ययनक लेल सोझमे आबि रहल अछि जकर मुख्य उद्‍देश्य कम्प्यूटरक सापेक्ष भाषा-प्रजनन करब तथा मानव-मस्तिष्कक सापेक्ष भाषा-बोध कराएब  अछि। एहि व्याकरणमे इहो पायल गेल अछि जे भिन्न-भिन्न उपकरणसभमे एके तथ्यकेँ अलग-अलग ढंगसँ केन्द्रीकृत कएल जाइत अछि। जेना- मशीनी अनुवाद प्रणालीमे लक्ष्य-भाषा पदनिरूपण (Parsing) तथा श्रोत-भाषाकेँ सर्जित(Generation) कएल जाइत अछि। एहिमे एकेटा नियम- ‘वाक्य= संज्ञापदबंध+ क्रियापदबंध’क उद्‍देश्य लक्ष्य भाषाकेँ विश्‍लेषित करब होइत अछि। जखनकि श्रोत भाषाक एकर समतुल्य निर्माण करब होइत अछि। एहि सूचना-प्रत्यानयनमे पदनिरूपणक आधार ‘मूल पद’ होइत अछि। एकर आधार पर प्रणालीकेँ सूचीकृति सूचनाक सटीक मिलान करब होइत अछि। एकर व्याकरणक स्वरूप मशीनी अनुवादमे पदनिरूपणक नियमसँ भिन्न होएत। एहि तरहेँ अन्य उपकरण सभमे अलग-अलग प्रक्रियाक तहत एकर उद्‍देश्य भिन्न वा एकरा कोडीकृत करबाक तरीका भिन्न भए सकैत अछि। अभिकलानात्मक व्याकरणक स्थिति एवं महत्त्वकेँ देखैत जँ गंभीरतासँ विचार कएल जाय तँ स्पष्ट होइत जे संदर्भक अनुसार छोट-छोट नियमसँ काज निकालल जा रहल अछि। जाहिमे सर्वप्रथम रूपकेँ चिन्हब आओर एकर विश्‍लेषण कएल जाइत अछि। एहि क्रममे पदक व्याकरणिक कोटिक निर्धारण कएल जाइत अछि, जकरा टैगिंग (Tagging) कहल जाइत अछि। एकरा लेल आवश्यक होइत अछि जे व्याकरणक कोटि एवं ओकर गुण (Attributes)क आधार पर एकटा पहिनहिसँ तैयार टैग-सेट (Tag-Set) हो। मैथिलीक लेल एतय एकटा टैग-सेट (Tag-Set) देल जा रहल अछि जकर स्रोत LDC-IL, CIIL, Mysoreमे हमरा द्वारा कएल जाए रहल काजक अछि। Sl. No Category Label Examples Remarks Main Category Sub Category 1 Noun N 1.1 Common NN पोथी, कलम, पंडित, खवास 1.2 Proper NNP रंजन, दिनेश, अतुल 1.3 Nloc NST आगू, पीछू, ऊपर, नीचा 2 Pronoun PR 2.1 Personal PRP तोँ, हम, ई, ओ 2.2 Reflexive PRF अपना, अपने, स्वयं 2.3 Relative PRL जे, जिनका, जिनकर, जकरा 2.4 Reciprocal PRC एक-दोसरकेँ, आपस, परस्पर 2.5 Wh-word PRQ के,की, कथी ककर 2.6 Indefinite PRI केओ, किछु/ किउछ 3 Demonstrative DM 3.1 Deictic DMD ई,ओ,अहाँ,हम 3.2 Relative DMR जे, जाहि 3.3 Wh-word DMQ के,की,कोन 3.4 Indefinite DMI केओ, किछु/ किउछ, कोनो 4 Verb VM 4.1 Main VM देख, पढ़, पी, गा, ले, उठ, खा 4.2 Auxiliary VAUX अछि,छी,छल,छथि,छलाह,रहत,होएब,थिक 4.3 Gerund VGN धोएब, पीटब, दौरब, नहाएब 4.4 Causative Verb VCT मरबाएब, छरबाएब, लदबाएब, लिखबाएब, दुहबाएब 4.5 Compound Verb CVP मारब-पीटब, काट-छाँट, कानब-खीजब, धर-पकर 5 Adjective Adj नीक, मोटका, ललकी, 6 Adverb Adv भने, अनायास, क्रमश:, एकाएक, एहन 7 Postposition PSP सँ, केँ, लेल 8 Conjunction CC 8.1 Co-ordinator CCD आओर, परंच, मुदा, वा, आ 8.2 Subordinator CCS जँ, तँ, जे 9 Particles RP 9.1 Default RPD भरि, यौ, हौ, रौ 9.2 Classifier CL टा, गोट, गो, ठो 9.3 Interjection INJ ओह-ओ, अहा, वाह, हा 9.4 Intensifier INTF बहुत, बेसी, सबसँ 9.5 Negation NEG नहि, ऊहुँ, न 10 Quantifiers QT 10.1 General QTF कनेक, बहुत, किछु 10.2 Cardinals QTC एक, एकटा, दुई, बीसगोट, तीन, चारि 10.3 Ordinals QTO पहिल, दोसर, तेसर, चारिम 11 Residuals RD 11.1 Foreign word RDF A word written in script other than the script of the original text 11.2 Symbol SYM $, , *, (, ) For symbols such as $, & etc 11.3 Punctuation PUNC ., : ; Only for punctuations 11.4 Unknown UNK A word written in script other than the script of the original text 11.5 Echo words ECH जलखे- (तलखे), मोंट-(सोंट) This POS tag set for Maithili Prepared by: Dr. Arun Kumar Singh,JRP,Maithili, LDC-IL,CIIL अपन योजनाक अनुरूप टैग-सेटक निर्माण कएल जाइत अछि। टैग-सेटक लेल प्राथमिकता होइत अछि जे ई वैज्ञानिक, विस्तृत, योजना-केन्द्रितक संग-संग अनुप्रयोग विशेषक तैयारीक अनुकूल सेहो हो। रूपक आधार पर टैगिंग सर्वाधिक लोकप्रिय प्रक्रिया अछि, मुदा योजनाक अनुरूप पदबंध एवं वाक्यक सेहो आब टैगिंग होइत अछि। एकरा संग-संग प्रोक्तिक सेहो आब टैगिंग होमए लागल अछि। अभिकलनात्मक व्याकरणक निर्माणक चरणमे पदनिरूपण(Parsing) एकगोट महत्वपूर्ण पड़ाव होइत अछि। एहिमे पदक अंतिम व्यवहार्यताक अनुसार वाक्यक विश्लेषण होइत अछि। प्राय: एकर बादक विश्लेषणकेँ वृक्षारेखक दृष्टिसँ निर्धारित कए देल जाइत अछि। एकरा नियमबद्ध करबाक लेल कोनो रूपवादक आधार लेल जाइत अछि किएकतँ विश्लेषण चरणबद्ध एवं वैज्ञानिक भए सकए। पदनिरूपण अनेक स्तर पर शुरु होइत अछि आ एकरे अनुरूप एकर वर्गीकरण कएल जाइत अछि। ई कखनो बामसँ शुरू भए कए दहिन दिस तँ कखनो दहिनसँ बाम दिस जाइत अछि। एकरे समानान्तर ई उपरसँ नीचा एवं नीचासँ उपर दिस काज करैत अछि। ई बहुत किछु भाषाक प्रकृति पर निर्भर होइत अछि। मैथिली सदृश क्रिया केन्द्रित भाषामे पदनिरूपणक प्रक्रिया प्राय: क्रियेसँ शुरु होइत अछि। ई सुविधाजनक अछि किएकतँ क्रियापदमे अधिकतम व्याकरणिक सूचना भेटि जाइत अछि, जकर आधार पर एक सक्षम पदनिरुपण प्रणालीक विकास कएल जाए सकैत अछि। अभिकलनात्मक व्याकरणमे पूर्वनिर्धारित टैगसँ पदकें चिह्नित कएल जाइत अछि, तत्पश्चात ओकर भाषा-संरचनाक अनुरूप प्राय: वाक्य केन्द्रित विश्लेषण कएल जाइत अछि। एहि आधार पर प्रयास कएल जाइत अछि जे एहन व्याकरणिक नियम तैयार कएल जाय जाहिसँ सम्पूर्ण संरचनाक विश्लेषण भए सकय। व्यवहारमे पदनिरूपणक प्रक्रिया एक एहन चरणक रूपमे अबैत अछि जतए एहि नियमक परीक्षण होइत जाइत अछि। जँ बनल नियमसँ वाक्यक पदनिरूपण सही भेल अछि तँ ई एहि बातक द्योतक अछि जे एहि स्तर धरिक नियम तैयार भए गेल अछि। एही प्रकारें सम्पूर्ण भाषाक विश्लेषण आओर ओकर अनुरुप नियमक गुच्छ बनैबाक प्रक्रिये अभिकलनात्मक व्याकरणमक निर्माणक प्रक्रिया होएत। *************** संदर्भिका मैथिली 1.     ग्रियर्सन,जी.ए.,भारतक भाषा सर्वेक्षण(मैथिली), मैथिली अकादमी, पटना,1978 2.     मिश्र, डा. धीरेन्द्र नाथ, मैथिली भाषा शास्त्र, भवानी प्रकाशन, मुसल्लहपुर, पटना,1986 3.     ग्रियर्सन,जी.ए., मैथिली व्याकरण, सम्पादक, डा. रमानंद झा ‘रमण’, अनुवादक, पं. गोविन्द झा, चेतना समिति, पटना, 2011 4.     झा, पं. गोविन्द, मैथिली परिशीलन, मैथिली अकादमी, पटना, 2007 5.     झा, दीनबन्धु, मिथिला भाषा विद्योतन, मैथिली साहित्य परिषद, दरभंगा, 1946 6.     मिश्र, नवोनाथ, मैथिली भाषा विज्ञान, मिथिला पुस्तक केन्द्र, दरभंगा, 1984 हिंदी 1.     झा, पं. गोविन्द, मैथिली भाषा का विकास, बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, पटना,1974 2.     कुमार, सुरेश, शब्द अध्ययन और समस्याएँ, केन्द्रिय हिंदी संस्थान, आगरा, 1990 3.     गुप्ता, मनोरमा, भाषा अधिगम, केन्द्रिय हिंदी संस्थान, आगरा, 1995 4.     जैन, वृषभ प्रसाद, अनुवाद और मशीनी अनुवाद, सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 1995 5.     तिवारी, भोलानाथ, आधुनिक भाषा विज्ञान, लिपि प्रकाशन, नई दिल्ली, 1985 6.     मलहोत्रा,विजय कुमार, कम्प्यूटर के भाषिक अनुप्रयोग, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2002 7.     सिंह, सूरजभान, अमग्रेजी-हिंदी अनुवाद व्याकरण, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003 8.     त्रिपाठी, अरिमर्दन कुमार, भाषा के समकालीन संदर्भ, साहित्य संगम, इलाहावाद,2012 अग्रेजी 1.     Allen, James, Natural Language Understandings, Second Edition, Pearson Education, Singapore, 2005 2.     Atkins, B. 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Ltd., Post Box 571554 Rani Jhansi Road, New Delhi, 1997 अनामिका राज विहनि कथा- सीमा बहुतो दिनक जिज्ञासा शान्त नै भेल छल, तही क्रममे सुनलौं- बेटीकेँ हमर सम्पत्तिसँ की मतलब, ओ तँ पराया धन अछि। हमर माँ पापा हमरा सभ भाइ-बहिनकेँ एके रंग पढेलथि, जे ई सभ भविष्यमे सुखसँ जिअए। ओ दहेज विरोधी छथि। मुदा बिआहमे बहुतो चीज उपहारमे दऽ कऽ अपन उदार हृदएक प्रिचय देलनि, भाइ सभ सेहो बड्ड पियार देलक। अहीं सभ कहू एहेन भरल-पुरल संपत्ति आ बुइधबला परिवारमे सेहो बेटीक सम्बन्धकेँ एगो सीमामे बान्हिकेँ देखल जाइ छै! की बेटीक बिआहक बाद कोनो भविष्य नै होइ छै, की ओकर बाद ओकरा जीवन जीबा लेल सम्पत्ति आ सहयोग नै चाही? बिआहक बाद नैहरक सीमा बन्द भऽ जाइ छै। आशीष अनचिन्हार पहरा-अधपहरा

आइ हम पढ़लहुँ बाबा बैद्यनाथ कृत " पहरा इमानपर " जे की 1989मे प्रकाशित भेल आ ऐमे कुल मिला तीस टा गजल अछि। धेआन देबै विभक्ति शब्दमे सटल अछि आ ई गजलकारे द्वारा कएल गेल अछि आ हमरा लोकनि सेहो ऐ परम्पराक अनुयायी छी। तीसटा गजलकेँ छोड़ि ऐ संग्रहमे आरसी प्रसाद सिंह, गोपाल जी झा गोपेश, सोमदेव, मार्कण्डेय प्रवासी, जीवकान्त, रमानंद झा रमण, छात्रानंद सिंह झा ओ विभूति आनंद जीक संक्षिप्त टिप्पणी सेहो अछि। ई गजल संग्रह मात्र 32 पन्नाक अछि। आश्चर्य ऐ गप्पक जे 1989मे प्रकाशित भेलाक बाबजूदो ओहि समयक आन गजलकार ( जे की एखनो जीवित आ रचनारत छथि ) ऐ गजल संग्रह कोनो चर्चा नै केने छथि। जँ गौरसँ अहाँ 1989-2008 बला कालखण्ड देखब तँ बहुत कम्मे ठाम हिनक वा हिनकर पोथीक चर्च भेटत आ ओहूमे अधिकांश चर्च अ-गजलकार ( मुदा अपना विधामे प्रतिष्ठित ) रचनाकार द्वारा भेल अछि। की कारण छै जे एकटा गजलकार दोसर गजलकारक चर्चा नै करए चाहैत अछि। खराप वा नीक बादक विषय भेल मुदा चर्चा तँ हेबाक चाही। हमर गजल एहन, हमर गजल ओहन ऐ तरहँक चर्चा बहुत भेटत मुदा एकटा गजलकार दोसर गजलकारक चर्चा नै करत। आखिर किए ? वा एना कहू जे गजलकारक चर्चा के करत कथाकार की नाटककार  आ की आन। जँ ई सभ करबो करता तँ ओहन समयमे जखन की गजल पूर्णरूपेण विकसित भ' क' देखार भ' जाएत तखन। मुदा प्रारम्भिक कालमे तँ स्वयं एक गजलकारकेँ दोसर गजलकारक चर्चा कर' पड़तन्हि, आलोचना आ समीक्षा कर' पड़तन्हि तखने आनो आलोचक सभ गजलपर लिखबाक प्रयास करता। जँ प्रारम्भिके कालमे अहाँ सोचि लेबै मात्र हमरे गजल चर्चा योग्य दोसरक नै तखन अहाँ गजल लीखू की आन कोनो विधा ओकर विकास नै हएत।  मात्र पुरने गजलकार सभमे एहन बेमारी छै से नै नव गजलकार सभ सेहो ऐ बेमारीकेँ पोसने छथि। नवमे देखी तँ चंदन झा, राजीव रंजन मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री,जगदानंद झा मनु, अमित मिश्र आदिमे आलोचना-समालोचना-समीक्षा लिखबाक प्रतिभा छनि मुदा ओकरा उपयोग नै करै छथि। आब हमरा लग ई प्रश्न अछि जे जँ ई सभ केकरो चर्च नै करथिन्ह तँ हिनका लोकनिक चर्च के करत। आब ई सभ जरूर कहता जे हम सभ स्वानतः सुखाय रचना करै छी तँए हमर  समीक्षाक कोनो जरूरति नै मुदा हमरो बूझल अछि, हुनको बूझल छन्हि आ सभकेँ बूझल छै जे साहित्यकार केखनो स्वानतः सुखाय रचना नै करै छै। केकरो ने केकरो लेल ओ रचना जरूर रचै छै.................खास क' एहन समयमे जखन की हरेक रचनाकार अपना आपकेँ प्रगतिशील आ जनवादी घोषित करै अछि। हमरा बुझने कथित स्वानतः सुखाय बला रचना जनवादी आ प्रगतिशील भैए नै सकैए। कारण प्रगतिशील आ जनवादी रचना जनता लेल लिखल जाइ छै स्वानतः सुखाय लेल नै। हमरा बुझने आने विधाकार जकाँ प्रारम्भिक दौरमे गजलकारकेँ गजलक दिशा बनाब' पडतै। हँ बादमे बहुत सम्भव जे आनो विधाकार सभ गजल आलोचनापर हाथ चलाबथि मुदा शुरू तँ गजलकारेकेँ कर' पड़तै।  सभ नव-पुरान गजलकारकेँ ऐ दिशामे सोचबाक चाही। हरेक पोथीमे नीक वा खराप रहै छै मुदा जँ चर्चे नै करबै तँ ओ सोंझा कोना आएत। हमरा जनैत एक गजलकार द्वारा दोसर गजलकारक आलोचना नै करबाक परंपरा जे सियाराम झा सरस जी द्वारा शुरू कएल गेल तकरा चंदन झा, राजीव रंजन मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री, अमित मिश्र आदि नीक जकाँ बढ़ा रहल छथि। आ अंततः ई भविष्य लेल खतरनाक साबित हएत। मुदा ओमप्रकाश जी हमर कथनक अपवाद छथि। ओ जतबा मनोयोगसँ अपन गजल लीखै छथि ततबा मनोयोगसँ ओ दोसरक गजल पढ़ि ओकर आलोचना समीक्षा करै छथि। हमरा जनैत ओमप्रकाश जी मैथिली गजलक पहिल आलोचक-समालोचक-समीक्षक छथि (बहरयुक्त कालखण्ड बला )। चंदन झा, राजीव रंजन मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री,जगदानंद झा मनु, अमित मिश्र आदि ओमप्रकाश जीसँ प्रेरणा ल' क' कमसँ कम बर्खमे एकटा गजल पोथीक आलोचना लिखथि तँ मैथिली गजल नीक दिशामे आबि जाएत। नव गजलकारकेँ बहुत बेसी दायित्व लेब' पड़तन्हि तखने गजलक दिशा सही हेतै। आ जँ गजलक दिशा सही भेलै तँ बूझू जे गजलकारक दिशा सेहो सही भ' गेलै। ओना हम ई जरूर कह' चाहब जे हरा लोकनि ऐ बहसमे समय नै बरबाद करी जे के आलोचना केलाह आ के नै केला। जे भेलै से भेलै मुदा आबसँ शुरू भ' जेबाक चाही। आब हमरा लोकनि आबी बाबा बैद्यनाथ जीक कृतिपर। कृति थिक गजल आ तँए हम एकरा तीन भागमे बाँटब-- १) व्याकरण पक्ष २) भाषा पक्ष, आ ३) भाव पक्ष तँ पहिले देखी व्याकरण पक्ष। ऐ संग्रहक कोनो गजलमे वर्णवृत नै अछि। मने पूरा-पूरी ई संग्रह बेबहर गजल संग्रह थिक। किछु उदहारण देखू। पहिने ऐ संग्रहक पहिल गजलक मतला आ तकर बाद ओकर दोसर शेर देखू---- एक बेर फेरु नजरि शरण हम आयल छी २१२-१२२-१२-१२२२२२ वा २१२-१२-२२१२-१२२२२२ सौंसे संसारसँ हम सदति सताएल छी २२२२२२-१२-१२२२ वा २२२२११-२२१-१२२२

ई छल मतला आ एकर दूनू तरहें होमए बला मात्रा क्रम अहाँ सभहँक सामनेमे अछि। कहबाक मतलब जे मतलामे वर्णवृत नै अछि। आब कने एही गजलक दोसर शेर देखी--- सभ दिन हम मोह निशामे सूतल रहलौं २२२११-२२२२२२२ व्यर्थ-जंजालमे हम जन्म गमायल छी २१२२-१२२२-११२२२ वा २१-२२१२२१२-१२२२ तँ हरा लोकनि ई देखि रहल छी जे गजलमे वर्णवृत नै अछि मने गजल बहर युक्त नै अछि। आ ई हालति प्रायः तीसो गजलमे अछि। कोनो गजलक कोनो शेरक दुन्नू पाँतिमे तँ वर्णवृत आबि जाइए मुदा ओकर आगू-पाछू बलामे नै। जेना एकटा उदाहरण देखू। ई उनतीसम गजलक मतला थिक-- भोर भागल जेना दूपहर देखि कs २१२२-२२२-१२२-११ गाम गामो ने रहलै शहर देखि कs २१२२-२२२-१२२-११ तँ हमरा लोकनि ई देखलहुँ जे ऐ मतलामे तँ वर्णवृत अछि। मुदा एही गजलक आगूक शेर देखू--- आयत गरमी जखन नहि पानियें पड़त २२२२-१२२२-१२-१२ हेतै खेती ने छुच्छे नहर देखि कs २२२२२२२-१२२-१२ आब अहाँ सभ अपने बूझि सकै छिऐ जे गड़बड़ी कत' छै। संग्रहक तीसो गजलमे ई बेमारी छै। किछु लोक कहि सकै छथि जे भ' सकैए जे शाइर ओहि समयमे हिन्दी गजलमे प्रचलित मात्रिक छन्दमे लिखने हेता। तँ हमर कहब जे मात्रिक छन्द गजलक छन्द होइते नै छै आ दोसर गप्प जे ओ उदाहरणमे देल शेरक मात्राकेँ जोड़ि ईहो देखि लेथु जे मात्रिक छै की नै। व्याकरणमे मात्र बहरे ( वर्णवृते ) नै होइ छै काफिया आ रदीफ सेहो होइत छै। ऐ संग्रहक रदीफ ठीक अछि ( कारण रदीफ अपरिवर्तित होइ छै तँए --) । ऐ संग्रहक अधिकांश काफिया ठीक अछि मात्र किछुए काफिया गलत अछि। आ हमरा बुझैत ओइ समय ( १९८९क ) केर हिसाबसँ ई बहुत बड़का उपल्बधि अछि। जखन की आइ २०१३मे एहन स्थिति अछि जे गजलपर एतेक चर्चाक बादों महान गजलकार सभ काफिया एहन सरल वस्तुमे गलती करै छथि। हमरा हिसाबें बाबा बैद्यनाथ जी ऐ लेल बधाइ केर पात्र छथि। आब देखी किछु गलत काफियाक सूची जे ऐ संग्रहमे अछि--- दोसर गजलक मतला--- झगड़ा कियै बझल छै गामक सिमानपर पहरा कोना लगयबै लोकक इमानपर ऐ मतलामे काफिया शास्त्रक हिसाबें  काफिया भेल--- " इ " स्वरक संग "मानपर"। मुदा एकर बाद आन-आन शेर सभमे क्रमशः " गुमानपर ", " जानपर", "पुरानपर " ," दलानपर " , " कुरानपर ", " नादान पर", " तूफानपर" आ "कृपाणपर" अछि। (जँ ऐ गजलमे पर विभक्ति नै रहतै तँ काफिया ऐ मतलामे काफिया शास्त्रक हिसाबें  काफिया होइतै--- " इ " स्वरक संग "मान" संगे-संग जँ मतलामे "सिमानपर" केर बाद जँ " जानपर" आबि जइतै तखन ऐ गजलक सभ काफिया एकदम्म सही भ' जइतै। आब हमरा विश्वास अछि जे गजलक जानकारक संग पाठक सभ सेहो बुझि गेल हेता जे गड़बड़ी कत' छै )| ठीक इएह गड़बड़ी ऐ संग्रहक गजल संख्या 16,13,19 आ 27मे सेहो अछि। तहिना गजल संख्या दसकेँ देखू। ई गजल बिना रदीफक अछि ( बिना रदीफकेँ तँ गजल भ' सकैए मुदा बिना काफियाक नै )---

पहिल शेर अछि-- क्यो एकरा दयौक नहि टोक ई अछि बहिरा ओ अछि बौक आन शेरक काफिया अछि--झोंक, थोक, नोक, आलोक आदि। काफिया शास्त्रक हिसाबें टोक केर काफिया, थोक, नोक, आलोक , आदि। मुदा ऐ शेरमे टोक केर काफिया अछि बौक जे की गलत अछि। आब आबी कने ऐ संग्रहक भाषा पक्षपर। भाषा तँ ऐ संग्रहक मैथिली थिक मुदा गजल संख्या ६मे काफिया बैसाब' के चक्करमे एहनो काफिया ल' लेलथि जे की हिन्दीक क्रिया अछि आ मैथिलीमे मान्य नै अछि। गजल संख्या ६ केर मतला देखू---

बन्धुवर कोन बाट दुनियाँ  जा रहल छै सत्य कानय झूठ कीर्तन गा रहल छै ऐ गजलक आन शेरक काफिया सभ अछि-- पा, खा, छा, बा ( मूँह बा ), आ .... आब ई देखू जे एतेक हिन्दी क्रियामेसँ मात्र टूइएटा क्रिया मैथिलीमे मान्य छै-- जा एवं खा। बाद बाँकी एखन धरि मान्य नै छै। हमरा हिसाबें अग्राह्य हिन्दी क्रियाकेँ प्रयोग करब भाषाकेँ दूषित करबाक चेष्टा अछि। तथाकथित प्रगतिशील गजलकार नरेन्द्र एही प्रकारक भाषाक प्रयोग करै छथि आ ऐ लेल हम ने बाबा बैद्यनाथ जीक समर्थन करै छी आ ने नरेन्द्र जीक। हँ, एतबा कहबामे हमरा कोनो संकोच नै जे नरेन्द्र जी अपन १००मेसँ ९५टा गजलमे एहन भाषा प्रयोग करै छथि तँ बाबा बैद्यनाथ १००मेसँ १टामे। ओना ऐ ठाम ई जानब रोचक हएत जे एहन काफियाक प्रयोग करब अनुचित नै छै बशर्ते की भाषा बदलि जेबाक चाही। जँ नरेन्द्र जी वा बाबा बैद्यनाथ जी ऐ काफिया सभहँक प्रयोग अपन गामक वा पड़ोसी गामक मैथिलीक जोलहा रूपमे गजल लीखि करथि तँ ई काफिया सभ बिल्कुल सही होइत। हम बाबा बैद्यनाथ जीक उपरमे लेल गेल गजल संख्या ६क मतलाकेँ ऐ रूपमे देखा रहल छी--- भाइ केन्ने दुनियाँ जा रहलइय' साँच कानै झुट्ठा गा रहलइय' (आन शेर पाठकक कल्पनापर छोड़ल जाइए) आब अहाँ अपने अनुभव क' सकै छिऐ जे काफिया तँ वएह हिन्दीक छै मुदा फिट एवं प्रवाहपूर्ण भ' गेल छै। शाइरकेँ मात्र बस एतबा देखबाक छै। नै तँ भाषाकेँ दूषित होइत देरी नै लागत। जँ ऐ काफिया सभहँक प्रयोग मैथिली क जोलहा रूपमे वा चंपारण, मुज्जफरपुर, सीतामढ़ी, बेगूसराय, वैशाली एँ झारखंड बाल मिथिला क्षेत्रक भाषाक संग करबै तँ गजलक कल्याण सेहो हेतै आ मैथिलीक सेहो। भाषाक सम्बन्धमे एकटा आर गप्प ऐ संग्रहक अधिकांश गजलमे मैथिलीक चलंत रूप (मने गाम-घरमे बाज' बला रूप ) प्रयोग भेल अछि जे की मैथिली गजल लेल शुभ अछि। हँ, एतेक अपेक्षा हम बाबा बैद्यनाथ जीसँ जरूर केने छलहुँ जे ओ पूर्णियाक छथि तँ हुनक रचनामे पूर्णियामे बाजल जाइत मैथिलीक स्वरूप रहत । जँ ऐ अधारपर देखी ई संग्रह कने हमरा निराश केलक ( ई हमर व्यतिगत आलोचना अछि, गजलक व्याकरणसँ फराक देखल जाए एकरा )। जेना की उपरे इंगित क' चुकल छी जे गजलकार स्वयं शब्दमे विभक्ति सटेबाक पक्षमे छथि आ हमरा हिसाबें ई मैथिलीक लेल नीक। आ अन्तमे आउ ऐ संग्रहक भाव पक्षपर। मैथिली साहित्यमे " भाव " सभसँ सस्ता छै। जकरा देखू से भाव केर नाङरि पकड़ि साहित्यिक वैतरणी पार करै छथि। तँए ऐ संग्रहक सभ गजलक भाव पक्ष उन्नत अछि। आ ऐ पक्षपर हमर कोनो कथन नै रहत। कारण जखन सभ पक्ष हमहीं कहि देब तखन तँ पाठकक रूचि खत्म भ' जेबाक डर रहत तँए पाठक संग आन सभ गोटासँ अनुरोध जे बाबा बैद्यनाथ कृत "पहरा इमानपर " नामक गजल संग्रह पठथि आ अपन-अपन विचार देथि। जिनका ई पोथी कोनो कारणवश नै उपल्बध भ' रहल छनि से ऐ लिंकपर जा क' एकर पी.डी.एफ फाइल डाउनलोड क' एकरा पठथि https://dbb13891-a-96a2f0ab-s-sites.googlegroups.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Pahra_Iman_Par.pdf?attachauth=ANoY7cqrLAai8QAw-5s2DKPbDbL7tkHkNm21JzW7JHpvcnMWa4eUTBj1upJeipTdGs5Ktg9FNASU7n1e23fURUkX_RGJ71_vvSGXUY_jCYzAoJL4WNpIi5YRY-krxar5gRQH8bbqGR7PJznA3E4jjZ3p_n8mZob_0_evLolQsqCFMQFI0tK9CAQplBo3fiCIwMurjrvuSmUoaMS3fj98oxyqnZnnb65L3iOIQwe3rykiAnOw3nyPYQA%3D&attredirects=0। ई डाउनलोड बिल्कुल फ्री अछि मने साहित्यमे प्रयोग होमए बला " भाव "सँ बहुत बेसी सस्ता। कने रुकू, जे गोटा भाव लेल तरसैत हेता तिनका लेल मात्र किछु शेर हम देखाबए चाहब ( उनतीसम गजलक आठम शेर ) राति-दिन बउआ खाली कमेन्ट्री सुनए कियैक पढ़तै क्रिकेटक लहर देखि कs ऐ शेरकेँ पढ़ू आ तखनुक संग एखुनका समयकेँ देखू। कोनो फर्क नै भेलैए। पहिने रेडियोमे बैट्री नै देल जाइ छलै क्रिकेटक समयमे आब केबल लाइन कटबा देल जाइ छै। पढ़ाइपर क्रिकेटक की असर छै से एकै शेरमे देखा गेल छथि शाइर। पढ़ाइए किए ई क्रिकेट तँ आन छोट-छोट खेलकेँ सेहो नाश क' देलक। शाइर ऐ शेरक माध्यमे सेहो धेआन दिअबैत छथि। एही प्रकारक ज्वलंत मुद्दा सभकेँ बाबा बैद्यनाथ अपन गजलमे लेने छथि जे की आन शाइरक गजलमे दुलर्भ अछि। भाव केर ऐ चर्चामे ११म गजलक अंतिम शेर कहने बिना पूरा नै हएत--- कहियो जँ मोन पड़य अप्पन अतीत जीवन बस आँखि मूनि दूनू कनियें लजा लिय ऐ शेरकेँ पढ़ू आ एकर मतलब निकालू। झटहा फेकेलै कहीं आ लगलै कहीं। इएह भेलै गजलत्व जकरा बारेमे कहल जाइ छै जे गजलक शेर सीधा करेजमे लगै छै। जँ एकैसम गजलकेँ देखी तँ निश्चित रूपसँ ई बाल गजल अछि ( बाल गजल रहितों व्यस्क लेल ओतेबे प्रासंगिक अछि ) आ ओजपूर्ण सेहो अछि- छोड़ू अपन कपटकेँ आ उदार बनू भैया गाँधी सुभाष नेहरुक अवतार बनू भैया अइ संग्रहमे श्रृंगार रसक गजल सेहो अछि जे की पाठकक लेल छोड़ल जाइए। तँ आसा अछि जे आब अहाँ सभ जरूर एकरा पढ़बै।

प्रिंट पत्रिकाक संपादक आ गजलकारसँ अपील

पहिने गजलकार सभसँ----

कोनो पत्रिकाकेँ अपन गजल पठएबासँ पहिने ई देखू जे अहाँक गजल कोन बहरमे अछि। आ से देखि लेलापर तकर नाम लीखू आ संगे-संग ओहि बहरक मात्रा क्रम लिखबे टा करु। कारण अलग-अलग पत्रिकाक अलग-अलग वर्तनी आ ओहि हिसाबें प्रकाशित केने अहाँक गजलक बहर टूटि जाएत। एकरा हम एकटा उदाहरणसँ देखाएब। मानू जे अहाँ कोनो बहरक हिसाबसँ " कए " शब्दक प्रयोग केलहुँ जकर मात्रा क्रम छै UI "ह्रस्व-दीर्घ" मुदा कतेको पत्रिका एकरा " कय" बना देताह जकर मात्रा क्रम छै UU "ह्रस्व-ह्रस्व" वा I "दीर्घ" ( दूटा लघु मिला एकटा दीर्घ )। तँ कतेको पत्रिका एकरा खाली " क' " वा " क " लीखि देताह जकर मात्रा क्रम छै U "ह्रस्व"। आब अहाँ अपने बुझि सकैत छी जे वर्तनी बदलने मत्रा क्रम टूटि जाएत। मने बहर टूटि जाएत आ गजल बेबहर भए जाएत। ऐठाम हम खाली एकटा शब्दक उदाहरण देलहुँ अछि मुदा अनेको शब्दपर ई लागू हएत। तँए गजलक संगे-संग बहरक नाम आ ओकर मात्रा क्रम जरूर लीखी। संगहि-संग गजल वा शेरो-शाइरीक अन्य विधा कोनो पत्रिकाकेँ पठबैत काल संपादक जीसँ ई आग्रह करू जे जँ हुनका अपन वर्तनीक हिसाबें गजल नै बुझान्हि तँ गजल नै छापथि। कारण जखन बहर टूटिए जेतै तँ ओ गजल बेकार।छपियो जाएत तँ कोनो कर्मक नै। जँ गजल सरल वार्णिक बहरमे अछि तैओ ई समस्या आएत। उदाहरण लेल मानू जे अहाँ "नहि " शब्दकेँ प्रयोग करैत एकटा गजल सरल वार्णिक बहरमे लीखि संपादक जीकेँ देलिअन्हि मुदा ओ संपादक जी अपन वर्तनीक हिसाबें ओकरा " नै " लीखि देलखिन्हि। मतलब जे सरल वार्णिक बहर सेहो टूटि गेल। तँए गजलकार सभसँ विशेष आग्रह जे ओ प्रिंट पत्रिकाक संपादककेँ अनिवार्य रूपें लिखथि जे जाहि स्वरूपमे गजल छै ताही स्वरुपमे गजल प्रकाशित हेबाक चाही नै तँ प्रकाशित नै करु।

आब प्रिंट पत्रिकाक संपादक सभसँ-------

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गजल कखनो किछु बात बुझल करू मोनक धरकन दिन राति बनल करू मोनक

ई जे सिसकल त' लता पता सुनलक आहाँ फरियाद सुनल करू मोनक

छोहक मारल त' घड़ी घड़ी तड़पल मरहम बनि घाव भरल करू मोनक

कहबो ककरो जँ करब त' के बूझत संगे बस मीत रहल करू मोनक

गाबी राजीव सदति गजल नेहक ततबा धरि चाह सुफल करू मोनक

2222 112 1222

शीर्षक द' क' गजल छापब बेकार कारण गजलक शीर्षक नै होइ छै। चूँकि एकटा गजलमे जतेक शेर होइ छै ओतेक विषय रहैत छै गजलमे तँए शीर्षक देबाक परंपरा नै छै। हम अपन एकटा गजल दए रहल छी जाहिसँ ई स्पष्ट हएत जे ऐ तरीकासँ गजल नै प्रकाशित हेबाक चाही-------

गजल ओकर हाथसँ छूल अछि देह सदिखन गम गम फूल अछि देह प्रेमक उच्चासन मिलन छैक दू टा घाटक पूल अछि देह कोना चलि सकतै गुजर आब देहक तँ प्रतिकूल अछि देह गेन्दा सिंगरहार छै मोन चम्पा ओ अड़हूल अछि देह ऐठाँ अनचिन्हार चिन्हार सभ देहक समतूल अछि देह मात्रा क्रम-222-2212-21 हरेक पाँतिमे

ऐ तरीकासँ छापब गलत थिक। एहन रूपसँ गजल प्रकाशित करब परम्परा विरुद्ध अछि।गजलमे सदिखन दूटा शेरक बीचमे जगह हेबाक चाही। ओना हिन्दीमे सेहो कविता जकाँ पाँति सटा क' गजल प्रकाशित कएल जाइत छै मुदा एकर मतलब नै जे दोसर इनारमे खसत तँ हमहूँ सभ खसि पड़ब।

अज्ञानी संपादकक फेरमे मरैत गजल

किछु मास पहिने हम प्रिंट पत्रिकाक संपादक आ गजलकार सभसँ एकटा अपील केने रही। ई अपील मैथिलीक वर्तनी आ आ बहरक संबंधमे छल। ऐ अपीलक डिस्कशनमे गुंजन श्री नामक व्यक्ति कहलाह जे ठीके कहै छी, एना कए क' बहुत संपादक गजलक प्राण घीचि लै छथि। ताहि पर हम कहलिऐ जे " विदेह"क संपादककेँ छोड़ि किनको बहरक ज्ञान नै छन्हि । ताहि पर कुंदनक कुमार मल्लिक नामक एकटा पाठक कहलाह जे बुझायत अछि जे …”” .”....Ashish Anchinhar जी सभ मैथिली पत्रिकाक सम्पादक लोकनिक ज्ञान केँ परीक्षा लय चुकल छथि. मैथिली गजल मे अपनेक योगदान अतुलनीय आ मीलक पाथर जेकां अछि. जहिया कहियो वा जतय कतओ मैथिली गजलक चर्चा हेतय ओतय अपनेक नाम निसंदेह सभ सँ पहिने आ आदरक संग लेल जायत। मुदा एना निन्दा केनाय कतेक उचित? आलोचन करी संगे संग निन्दा स' सेहो बची.मुदा फेर वैह गप कहब जे गजलक बारे मे हमरा ओतबे बुझल अछि जतेक कोनो गजल के बुझल हेतैक. किछु बेसी कहा गेल हुयै त' एहि टिप्पणी केँ मिटा देबैक” .” तकरा बाद हम कुंदन जीकेँ संबोधित करैत लिखलहुँ जे..." हमर नाम लेल जाए की नै लेल जाए से विषय नै छै। बहस एहि बातकेँ छै जे गजलक आ मैथिली वर्तनीक व्यवहारिक समस्याक फरिछौट। से उपर पढ़ि कए बुझा गेल हएत अहाँकेँ। जहाँ धरि निन्दाकेँ गप्प छै। ओ आदमी उपर निर्भर छै। हम गजलक निखरल आ स्थिर स्वरूप चाहै छी आ ओहि लेल हमरा जँ किनको प्रसंशा वा खिद्दांसो करए पड़त तँ हम करबै।.” ... आ तकरा बाद कुंदन जी लिखला जे...... " हमर टिप्पणी अहाँक आलेखक लेल नञि अपितु अपनेक टिप्पणीक संदर्भ मे छल।" ताहि पर हम फेरो लिखलहुँ जे...." हमहूँ ओही संदर्भमे कहलहुँ अछि आ फेर कहब जे...जहाँ धरि निन्दाकेँ गप्प छै। ओ आदमी उपर निर्भर छै। हम गजलक निखरल आ स्थिर स्वरूप चाहै छी आ ओहि लेल हमरा जँ किनको प्रसंशा वा खिद्दांसो करए पड़त तँ हम करबै।” .......आ फेर हम कुंदन जीकेँ संबोधित करैत लिकलहुँ जे....--" आ जे सही गप्प छै तकरा कहबामे हर्जे की। जँ अहाँकेँ कोनो एहन संपादकक नाम बुझल हो जे विदेहक नै होथि आ ओ बहर बुझैत होथि तनिकर नाम प्रमाण सहित देल जाए।:” ताहि पर कुंदन जी लिखला जे.........." एहि बात के निर्णय करय बला हम के जे कोन सम्पादक के कतेक ज्ञान छन्हि जखन हम पहिने स्पष्ट कय देने छी जे एहि विषय मे हमरा कोनो ज्ञान नञि. हमरा जे बुझायल से कहलहुँ।"...... आब कने आबी पात्र सभ पर। गुंजन श्री कमलमोहन चुन्नू जीक बालक छथि आ एखन कमल मोहन चुन्नू... पटनासँ प्रकाशित " घर-बाहर" नाम पत्रिकाक संपादक मंडलमे छथि आ पत्रिकाक लेल सामग्री पर हिनके निर्णय मान्य होइत अछि। आ कुंदन जी पाठक मात्र छथि। आब आबी कने " घर-बाहर"क नव अंक पर मने अप्रैल-जून 2012 बला अंक पर। ऐ अंकमे जे संपादक महदोय अपन जे कृत्य देखला से वर्णन करबा योग्य नै। सभसँ पहिने तँ देखू जे सुरेन्द्रनाथ आ अरविन्द ठाकुर जीक बिना बहर बला 6-6टा गजल प्रकाशित केला। ई बारहो गजल ईर घाट-बीर घाट बला बानगी अछि। सुरेन्द्र नाथ जीक गजलमे एखनो काफिया गड़बाड़ाएल अछि तँ अरविन्द जी बहरक नाम पर कुहरि रहल छथि। एही अंकमे योगानंद हीरा जीक " गीत " शीर्षकसँ दूटा रचना छपल अछि। ई आश्चर्य बला बात छै जे योगानंद हीरा जीक ई दूनू रचना गजल छै मुदा संपादक ओकरा गीत कहि रहल छथिन्ह। ई कोन प्रकारक संपादकीय दायित्व छै। हमरा बुझने घर-बाहरक संपादक अज्ञानी तँ छथिहे संगे-संग हीन भावनासँ सेहो भरल छथि। कारण योगानंद हीरा जीक ई उपरोक्त गजल पूरा-पूरा अरबी बहरक पालन करैत अछि। संगे संग संपादक अपन मूर्खताकेँ चलते दोसर गजलक मएकटा पाँति गाएब क' देने छथिन्ह। आ हमरा बुझने संपादक ई काज जानि-बूझि क' केने छथि। कारण हुनका ई बरदास्त नै छन्हि जे केओ बहर युक्त गजल लिखए। ई दूनू गजलक स्कैन दए रहल छी आ देखू जे संपादक कोना बदमाशी केने छथि। पहिल गजलक मतलाक पहिल पाँत अछि----

" किसलय पर घूमै अछि भमरा" देखू जे ऐमे आठ टा दीर्घकेर प्रयोग अछि आ ई शेरक हरेक पाँतिमे निमाहल गेल छै। आब जखन अहाँ दोसर गजल पार आएब तँ माथ घुमि जाएत। संपादक महोदय एहीठाम बदमाशी केने छथिन्ह। कने गौरसँ स्कैन देखू----पता लागत जे " छी हुलसल" रदीफ छै आ " मोर", भोर, "कोर" आदि काफिया छै। संपादक महोदय ऐ गजलक एकटा पाँति छोड़ि देने छथिन्ह। जाहि कारण ई 11पाँतिक गजल बनि गेल अछि आ किछु नै पता लागि रहल छै। जँ संपादक महोदयकेँ गजलक संबंधमे ज्ञान रहितन्हि तँ एहन प्रकारक गलतीसँ बाँचल जा सकै छल। जँ अंतसँ ऐ गजलकेँ देखी तँ एकर बहर एना छै-दीर्घ-हर्स्व-दीर्घ-दीर्घ+दीर्घ-हर्स्व-दीर्घ-दीर्घ+दीर्घ आ हरेक पाँतिमे ई क्रम पालन कएल गेल छै। आ हमरा बुझने संपादक ऐ तरहँक अज्ञानतासँ मैथिली गजलक भविष्य गर्तमे जा रहल छै। आखिर जिनका मेहनति नै करबाक छन्हि से गजल लिखबाक लौल किएक करै छथि। साहित्य केर बहुत रास विधा छै मेहनति नै करए बला सभ दोसरे विधामे हाथ अजमाबथि तँ नीक।

मैथिली गजलमे लोथ गजलकारक भूमिका तँ कने आब देखी व्याकरणहीन गजलक परम्पराकेँ। चूँकि मैथिली विश्वक एकमात्र भाषा अछि जे की हिन्दीक नकल करैए। जँ हिन्दी मैथिली रचनाकार सभकेँ दिन रहितो राति कहतै तँ मैथिली रचनाकार सेहो दिनक बदला राति केहतै कारण मैथिलीक रचनाकार विशुद्ध रूपें मानसिक गुलाम छथि हिन्दीक। प. जीवन झा, आनन्द झा न्यायाचार्य, कविवर सीताराम झा, मधुप जी जाहि मैथिली गजल के नीक जकाँ विस्तृत केलथि तकरा मात्र हिन्दी नकलक कारणे ७०के दशकमे स्व. मायानन्द मिश्र जी अप्रत्यक्ष रूपसँ कहि देला जे मैथिलीमे गजल लिखब सम्भव नै। ठीक ओहिसँ एक-दू बर्ख पहिने हिन्दीमे नीरज द्वारा ई कथन देल गेल छल जे हिन्दीमे गजल सम्भव नै अछि। नीरज जी हिन्दीमे गजलक नाम गीतिका देलखिन्ह आ गीतिका केर तर्जपर मैथिलीमे गीतल नाम भेल। ऐठाम हम कह' चाहब जे  भ' सकैए हिन्दीमे नीरज जीसँ पहिने गजल नै छल हेतै तँए ओ एहन कथन प्रस्तुत केने हेता मुदा मैथिलीमे तँ १९०५सँ गजल लिखल जाइ छल आ ओहो पूर्ण रूपेण व्याकरण सम्मत। तखन मायानन्द जीक ऐ कथन केर मतलब की ?  आर किछु चर्च करबासँ पहिने मायानंद जीक पोथी " अवान्तर" भूमिकाक किछु अंश पढ़ू (ई पोथी १९८८मे मैथिली चेतना परिषद्, सहरसा द्वारा प्रकाशित भेल)। पृष्ठ ६ पर मायानंदजी लिखै छथि --" अवान्तरक आरम्भ अछि गीतलसँ। 'गीतं लातीति गीतलम्' अर्थात गीत केँ आन' बला भेल गीतल। किन्तु गीतल परम्परागत गीत नहि थिक, एहिमे एकटा सुर गजल केर सेहो लगैत अछि। गीतल गजल केर सब बंधन (सर्त) केँ स्वीकार नहि करैत अछि। कइयो नहि सकैत अछि। भाषाक अपन-अपन विशेषता होइत अछि जे ओकर संस्कृतिक अनुरूपें निर्मित होइत अछि। हमर उद्येश्य अछि मिश्रणसँ एकटा नवीन प्रयोग। तैं गीतल ने गीते थिक, ने गजले थिक, गीतो थिक आ गजलो थिक। किन्तु गीतितत्वक प्रधानता अभीष्ट, तैं गीतल।" उपरका उद्घोषणामे अहाँ सभ देखि सकै छिऐ जे कतेक दोखाह स्थापना अछि। प्रयोग हएब नीक गप्प मुदा अपन कमजोरीकेँ भाषाक कमजोरी बना देब कतहुँसँ उचित नै आ हमरा जनैत मायानंद जीक ई बड़का अपराध छनि। जँ ओ अपन कमजोरीकेँ आँकैत गीतल केर आरम्भ करतथि तँ कोनो बेजाए गप्प नै मुदा हुनका अपन कमजोरी नै मैथिलीक कमजोरी सुझा गेलन्हि। एकरे कहै छै आँखि रहैत आन्हर। ई मोन राखब बेसी जरूरी जे २०११मे प्रकाशित कथित गजल संग्रह " बहुरुपिया प्रदेश मे " जे की अरविन्द ठाकुर द्वारा लिखित अछि ताहूमे ठीक इएह गप्पकेँ दोहराओल गेलैए।

मायानंद जी अपन कमजोरीकेँ झाँपैत जै गीतल केर आरम्भ केला तै पाँछा हमरा बुझने तीन टा कारण भ' सकैए--- १) स्व.मायानन्द मिश्र जी हिन्दीक अन्ध भक्त छलाह। २) स्व. मायानन्द जी मैथिली गजलक सम्बन्धमे अज्ञानी छलाह। ३) स्व. मायानन्द चतुराइसँ अपना-आप के मैथिली गजलमे स्थापित करबाक योजना बनेलाह। कह' बला कहै छै आ प्रभाव छोड़ै छै। कथनक विरोध भेनाइ शुरू भेल ऐ आ विरोधक सङ्ग शुरू भेल बड़का मजाक। मजाक ई जे विरोध कर' बला सभ सेहो व्याकरणहीन गजल लिखै छलाह वा एखनो लिखै छथि। ओहि समयक बिना व्याकरणमे गजल लिख' बला सभ ( मुदा अपना-आपकेँ गजलकार मान' बला सभ ) दू भागमे बँटि गेल। गीतल भागमे, मायानन्द, तारानन्द झा तरुण, विलट पासवान विहंगम,  आदि एला वा छथि (ऐ सूचीमे आर नाम सभ छथि मुदा अगुआ इएह सभ छलाह छथि)  तँ कथित गजल बला भागमे सियाराम झा सरस, रमेश, तारानन्द वियोगी, विभूति आनन्द, कलानन्द भट्ट, डा. महेन्द्र, सोमदेव, राम भरोस कापड़ि भ्रमर, देवशंकर नवीन, राम चैतन्य धीरज, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, राजेन्द्र विमल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, अरविन्द टाकुर आदि-आदि सभ रहला वा छथि ।ऐ सूचीमे आर नाम सभ छथि मुदा अगुआ इएह सभ छलाह छथि। मुदा ऐठाँ हम ई स्पष्ट कर' चाहब जे नाम भने जे होइ मायानन्द जी बला गुट वा सरस जी बला गुट दूनू गुटमेसँ कोनो गोटा गजल नै लिखै छलाह कारण ओ व्याकरण हीन छल। आ व्याकरण हीन कथित गजलकेँ गजल नै गीतले टा कहल जा सकैए। सरस जी मायानन्द जीक सभसँ बेसी विरोध केलखिन्ह हुनकर कथनक कारणे मुदा सरस जी स्वंय व्याकरणहीन गजल लिखला आ लिखै छथि तखन मात्र कथनीपर केकरो विरोध करबाक की मतलब जखन की करनी दूनू गोटाक एकै छन्हि। सरस जीक सङ्ग बहुत कथित गजलकार सभ होहकारी दैत एलाह मुदा ओहो सभ व्याकरणहीन गजल लिखला आ लिखैत छथि। आब हमर प्रश्न जे जखन व्याकरण छैहे नै तखन गीतल आ ओइ कथित गजलमे अन्तर की ? हमरा बुझने कोनो अन्तर नै । हम मायानन्द जी गीतल आ सरस जीक कथित गजल दूनूकेँ एकै समान मानै छी। ऐ ठाम ई बेसी मोन राखब जरूरी जे सरस गुट केर महानायक धीरेन्द्र प्रेमर्षि जी गीत आ गजलकेँ सहोदर भाए माननै छथि। तखन सरस जीक नजरिमे मायानंद जी अपराधी भेला आ धीरेन्द्र प्रेमर्षि जी महानायक। हमरा जनैत ई सरस जीक पक्षपात थिक आ ऐ पक्षपात केर विरोध हेबाक चाही। सियाराम झा सरस जीक संपादनमे बर्ख 1990मे " लालकिला आ लोकवेद " नामक एकटा साझी गजल संग्रह आएल। एहि संग्रहमे गजलसँ पहिने तीनटा भाष्यकारक आमुख अछि। पहिल आमुख संपादक जीकेँ छन्हि आ ओ तकर शुरुआत एना करै छथि----" समालोचना आ साहित्यिक इतिहास लेखनक क्षेत्रमे तकरे कलम भँजबाक चाही जकरा ओहि साहित्यिक प्रत्येक सुक्ष्तम स्पंदनक अनुभूति होइ......."। अर्थात सरसजीकेँ हिसाबें कोनो साहित्यिक विधाक आलोचना, समीक्षा, वा ओकर इतिहास लेखन वएह कए सकैए जे की ओहि विधामे रचनारत छथि। जँ हम एकर व्याख्या करी तँ ई नतीजा निकलैए जे गजल विधाक आलोचना वा समीक्षा वा ओकर इतिहास वएह लीखि सकै छथि जे की गजलकार होथि। मुदा हमरा आश्चर्य लगैए जे ने 1990सँ पहिले सरस जी ई काज केलाह आ ने 1990सँ 2008 धरि ई काज कए सकलाह। 2008केँ एहि दुआरे हम मानक बर्ख लेलहुँ जे कारण 2008मे हिनकर मने सरस जीक एखन धरिक अंतिम कथित गजल संग्रह "थोड़े आगि-थोड़े पानि" एलन्हि मुदा ओहूमे ओ एहन काज नै कए सकलाह। आ बर्ख 2008मे गजल विधा पर केन्द्रित ब्लाग " अनचिन्हार आखर " आएल जाहिमे गजलक व्याकरण आ आलोचना पर पर्याप्त काज भेल। आ गजल विधाकेँ सरस आ हुनक टीमसँ छुटकारा प्राप्त भेल। आ जे काज 100 साल मे नहि भेल से मात्र एक साल पाँच मासमे गजेन्द्र ठाकुर कए देखेलाह आ मैथिली गजलकेँ पहिल गजल शास्त्र देलाह।ई हमरा हिसाबें कोनो गजलकारक सीमा भए सकैत छलै मुदा सरस जीक दोहरा चरित्र ओही आमुख के तेसर आ चारिम पृष्ठमे भए जाइत अछि जतए सरस जी लिखै छथि-------" मैथिली साहित्यमे तँ बंगला जकाँ गीति-साहित्यिक एकटा सुदीर्घ परंपरा रहलैक अछि। गजल अही परंपराक नव्यतम विकास थिक, कोनो प्रतिब्द्ध आलोचककेँ से बुझ' पड़तैक। हँ ई एकटा दीगर आ महत्वपूर्ण बात भए सकैछ जे मैथिलीक समकालीन आलोचकक पास एहि नव्यतम विधाक आलोचना हेतु कोनो मापदंडिके नहि छन्हि। नहि छन्हि तँ तकर जोगार करथु.........."आब ई देखल जाए जे एकै आलेखमे कोना दोहरापन देखा रहल छथि। आलेखक शुरुआतमे हुनक भावना छन्हि जे " जे आदमी गजल नै लीखै छथि से एकर समीक्षा वा इतिहास लेखन लेल अयोग्य छथि मुदा फेर ओही आलेखमे ओहन आलोचकसँ गजल लेल मापदंड चाहै छथि जे कहियो गजल नहि लिखला।भए सकैए जे सरस जी ई आरोप सरस जी अपन पूर्ववर्ती विवादास्पद गजलकार मायानंद मिश्र पर लगबथि होथि। जे की सरस जीक हरेक आलेखसँ स्पष्ट होइत अछि। मुदा ऐठाम हमरा सरस जीसँ एकटा प्रश्न जे जँ कोनो कारणवश माया जी ओ काज नै कए सकलाह वा जँ मायानंद जी ई कहिए देलखिन्ह मैथिलीमे गजल नै लिखल जा सकैए तँ ओकरा गलत करबा लेल ओ अपने ( सरस जी ) की केलखिन्ह। 2008धरि मैथिलीमे १०-१२टा कथित गजल संग्रह आबि चुकल छल। मुदा अपने सरस जी कहाँ एकौटा कथित गजल संग्रह समीक्षा वा आलोचना केलखिन्ह। गजलक व्याकरण वा इतिहास लेखन तँ बहुत दूरक बात भए गेल। ऐ आलेखसँ दोसर बात इहो स्पष्ट अछि जे सरस जी कोनो समकालीन आलोचककेँ गजलक समीक्षा लेल मापदंड देबा लेल तैयार नै छथि। जँ कदाचित् कनेकबो सरस जी आलोचक सभकेँ मापदंड दितथिन्ह तँ संभवतः २००८ धरि गजल क्षेत्रमे एहन अकाल नै रहितै। आब हम आबी विदेहक अंक 96 पर जाहिमे श्री मुन्ना जी द्वारा गजल पर परिचर्चा करबाओल गेल छल। आन-आन प्रतिभागीक संग-संग प्रेमचंद पंकज नामक एकटा प्रतिभागी सेहो छथि। पंकज जी अपन आलेखमे आन बात संग इहो लिखैत छथि-----“ कतिपय व्यक्ति एकटा राग अलापि रहल छथि जे मैथिलीमे गजलक सुदीर्घ परम्परा रहितहु एकरा मान्यता नै भेटि रहल छैक। एहन बात प्रायः एहि कारणे उठैत अछि जे मैथिली गजलकेँ कोनो मान्य समीक्षक-समालोचक एखन धरि अछूत मानिक' एम्हर ताकब सेहो अपन मर्यादाक प्रतिकूल बूझैत छथि। एहि सम्बन्धमे हमर व्यतिगत विचार ई अछि, जे एकरा ओहने समालोचक-समीक्षक अछूत बुझैत छथि जिनकामे गजलक सूक्ष्मताकेँ बुझबाक अवगतिक सर्वथा अभाव छनि। गजलक संरचना, मिजाज आदिकेँ बुझबाक लेल हुनका लोकनिकेँ स्वयं प्रयास कर' पड़तनि, कोनो गजलकार बैसि क' भट्ठा नहि धरओतनि। हँ, एतबा निश्चय जे गजल धुड़झाड़ लिखल जा रहल अछि आ पसरि रहल अछि आ अपन सामर्थयक बल पर समीक्षक-समालोचकलोकनिकेँ अपना दिस आकर्षित कइए क' छोड़त------ “ अर्थात प्रेमचंद जी सरसे जी जकाँ भट्ठा नै धरेबाक पक्षमे छथि। सरस जी १९९०मे कहै छथि मुदा पंकज जी २०११केर अंतमे मतलब २२साल बाद। मतलब बर्ख बदलैत गेलै मुदा मानसिकता नै बदललै।ओना ऐठाम हम ई जरुर कहए चाहब जे भट्ठा धराबए लेल जे ज्ञान आ इच्छा शक्ति होइ छै से बजारमे नै बिकाइत छै। मुदा आब ऐठाम हम ई जरूर कहए चाहब जे मायानंद मिश्रजीक बयान आ अज्ञानतासँ मैथिली गजलकेँ जतेक अहित भेलै ताहिसँ बेसी अहित सरस जी वा पंकज जी सन अभट्ठाकारी लोकनिसँ भेलै। लिखित रूपकेँ छोड़ि मैथिलीमे गयबाक लेल सेहो गायक सभ गजलक नामपर अत्याचार केलाह। किछु लीखि देबै आ गलामे सुर रहत तँ ओकरा गाबि सकै छी तँए की ओकरा गजल मानल जेतै ? गायनक ऐ धुऱखेलमे बहुत रास गायक छलाह वा छथि जेना चंद्रमणि झा, रामसेवक ठाकुर, कुञ्ज बिहारी मिश्र आदि-आदि। जेना लिख' बला सभ मैथिली गजलकेँ भट्ठा बैसेलक तेनाहिते गायक सभ सेहो। गायक सभ गजलमे मात्रा क्रम सप्तक (सा,रे,गा,मा,पा,धा,नि,सा) केर हिसाबसँ बैसाबए लागै छथि जे की अवैज्ञानिक तँ अछिए सङ्गे-सङ्ग अनर्थकारी सेहो अछि। काव्यमे रागक हिसाबसँ छन्द नै बनै छै। तँए कोनो एकटा छन्दमे बनल रचनाकेँ बहुतों गायक बहुतों रागमे गाबै छथि गाबि सकै छथि। राग-रागिनीक मात्राक्रम सङ्गीत लेल छै साहित्य लेल नै। तेनाहिते छन्दक मात्राक्रम काव्य लेल छै सङ्गीत लेल नै। सुधांशु शेखर चौधरी आ बाबा बैद्यनाथ जी गजलमे किछु तत्व तँ अछि। खास क' बाबा बैद्यनाथ जीक गजलमे सभ तत्व अछि मुदा वर्णवृत नै अछि। आ तँए हिनको लोकनिकेँ हम कथित गजलकारक श्रणीमे रखैत छी मुदा हमरा ई कहबामे कोनो संकोच नै जे ई दूनू बाद-बाँकी कथित गजलकार सभसँ बेसी बोधगर छथि। आब हम पाठकक उपर छोड़ै छी जे ओ अपने निर्णय लेथु जे मैथिली गजलक ऐ पोखरिमे के कते योगदान देला। आब ऐठाम एकटा प्रश्न ठाढ़ होइत अछि जे एना अनधुन हिनका सभकेँ (माया गुट एवं सरस गुट) खारिज किएक कएल जा रहल अछि ? जँ हिनकर सभहँक रचना गजल नै अछि तँ की अछि? एना खारिज करब कतेक उचित? हिनका सभमे प्रतिभा छनि की नै ? आदि...................................निश्चित रूपसँ हमरो नै नीक लागि रहल अछि हिनका सभकेँ खारिज करैत मुदा हिनकर सभहँक शैलिए तेहन छनि जे खारिज करहे पड़त। हमहीं मात्र गजलकार छी आ हमरे गजल मात्र गजल थिक ई शैली हिनकर सभहँक पहिचान अछि जखन की लोक आब बुझि रहल अछि जे हिनकर सभहँक गजल गजल नै छल आ ने अछि। ई लोकनि ने अपने गजलपर काज केलाह आ ने दोसरकेँ कर' देलखिन्ह। आ जकर परिणाम गजल भोगि रहल अछि। खास क' अहाँ सरस जीक गजल पोथीक भूमिका पढ़ू ने गजलपर चर्चा भेटत आ ने गजलक व्याकरणपर मुदा ओइमे ई चर्चा जरूर भेटत जे सभकेँ साहित्य अकादेमी भेटि गेलै हमरा किएक नै भेटि रहल अछि। सरस जीक गजले नै हरेक पोथीक भूमिका ओ लेखमे ई भेटत। तारानंद वियोगी, देवशंकर नवीन, गंगेश गुंजन, रमेश, आ ओइ समयक कथित गजलकार सभ एना एला जेना ओ गजलपर उपकार क' रहल होथिन्ह। आ ऐ हेंजमे योगानंद हीरा, विजयनाथ झा सभ दबि क' रहि गेला। हिनका सभमे प्रतिभा छनि कारण बिना प्रतिभा रहने केओ साहित्य दिस आबिए नै सकैए (बादमे अध्ययनक जरूरति पड़ै छै) तँए हम ई मानि रहल छी जे ई सभ प्रतिभाशाली छलाह। हँ, इहो मानि रहल छी जे केओ खुरपीक आगूसँ दूभि छीलैए आ ई कथित गजलकार सभ खुरपीक मूठसँ दूभि छिलबाक प्रयास केला। एकर परिणाम ई भेल जे हिनका सभकेँ मेहनति तँ कर' पड़लनि, पसेना सेहो बहलनि मुदा दूभि छीलि क' ई सभ गजल रूपी गाएकेँ भोजन नै द' सकलाह। आब ऐ प्रश्नपर आबी जे हिनक सभहँक रचना गजल नै अछि तँ की अछि? निश्चित रूपसँ हिनकर सभहँक रचनामे सरसता, पद-लालित्य ओ गेयता अछि मुदा व्याकरण नै अछि। तँए हम हिनकर सभहँक कथित गजलकेँ हम पद्यक रूपमे मानै छी। आब पद्यमे केहन पद्य से तँ आन आलोचक सभ फड़िछा क' कहता मुदा जहाँ धरि हमर अपन विचार अछि तँ ई सभ नीक पद्य अछि आ आन पद्ये जकाँ साहित्यमे समादृत अछि। ऐ ठाम ई गप्प सार्वजनिक करब अनिवार्य अछि जे अनन्त बिहारी लाल दास" इन्दु " जीक जे टूटा गजल संग्रह छनि (सरसजी द्वारा देल गेल सूचना) तैमेसँ हम एकौटा पोथी नै पढ़ि सकलहुँ अछि। तँए इन्दुजीक गजलपर हम कोनो टिप्पणी नै करब। हँ एतेक हम जरूर कहब जे कर्णामृतक किछु अंकमे हमरा हुनक गजल पढ़बाक अवसर भेटल मुदा तैमे बहरक अभाव अछि। बहुत रास गजलकार लेल ई टिप्पणी हम सुरक्षित राखए चाहब। संगे-संग हम ईहो कह' चाहब जे ई एकेडमिक शोध नै थिक तँए बहुत रास गजलकारक पोथी भेटबामे हमरा दिक्कत भेल तथापि हमरा लग १००मेसँ ९९टा मैथिली गजल संग्रह वा मैथिली गजलपरहँक लेख सभ अछि।

लघु-गुरू निर्णय (दूनू भाग एक ठाम)

(हमर ऐ लेखमे मात्र पं. गोविन्द झा जीक चर्च अछि तकरा अन्यथा नै लेल जाए से हमर आग्रह। पं. गोविन्द झा जीकेँ हम मैथिली व्याकरणक धूरी मानैत ई लिखल अछि। निश्चित रुपें पं. जी अपन अग्रजसँ नियम ग्रहण केने छथि आ अपन अनुज सभकेँ बेसी प्रभावित केने छथि तँए हम मात्र पं. जीक उपर ई लेख केन्द्रित केलहुँ जाहिसँ हुनक अग्रज आ हुनक अनुज सभ ऐ लेखक माँझमे आबि सकथि।) तँ आउ कने चली मात्रा केना गानल जाइत छै ताहिपर। मात्रा गनबाक लेल  मोन राखू जाहि अक्षरमे "अ", "इ", "उ", "ऋ" एवं "लृ" नुकाएल हो तकरा लघु मानू आ तकरा बाद सभकेँ दीर्घ। संगहि संग अनुस्वार तँ दीर्घ अछि मुदा चन्द्रबिन्दु लघु। चन्द्रबिन्दु जँ लघु अक्षरपर रहतै तँ लघु मानल जेतै आ जँ दीर्घ अक्षरपर रहतै तँ दीर्घ मानल जाएत। संगहि-संग जँ कोनो शब्दमे संयुक्ताक्षर हुअए तँ ताहिसँ पहिलेक अक्षर दीर्घ भए जाइत छैक चाहे ओ लघु किएक ने हुअए। उदाहरण लेल--प्रत्यक्ष शब्दमे दूटा संयुक्ताक्षर अछि पहिल त्य एवं क्ष। आब एहिमे देखू "त्य" सँ पहिने "प्र" अछि तँए ई दीर्घ भेल आ "क्ष" सँ पहिने "त्य" अछि तँए इहो दीर्घ भेल। ई नियम जँ दू टा अलग-अलग शब्द हो तैयो लागू हएत जेना उदाहरण लेल--- हमर प्रेम छी अहाँ... ऐमे "प्रे" संयुक्ताक्षर भेल आ ताहिसँ पहिने बला शब्द " र" दीर्घ भए जाएत। मतलब जे "हमर" शब्दक अंतिम अक्षर "र" दीर्घ भए जाएत । सङ्गे-सङ्ग मोन राखू "न्ह" आ "म्ह" संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला शब्दमे लघु दीर्घ सेहो हएत। जेना की "कुम्हार" मे "म्ह" सँ पहिने "कु" दीर्घ भेल तेनाहिते "कन्हाइ" शब्दमे सेहो "न्ह"सँ पहिने "क" वर्ण दीर्घ भेल। क्ष, त्र आ ज्ञ संयुक्ताक्षर अछि। तेनाहिते.... प्र, र्व, आदि सेहो संयुक्ताक्षर अछि। मुदा "मृत" शब्दमे "मृ" संयुक्ताक्षर नै अछि। विसर्ग युक्त लघु वर्ण सेहो दीर्घ होइत अछि। हलन्तसँ पहिने बाल लघु दीर्घ होइत अछि आ हलन्तक मात्रा सुन्ना होइत अछि। गजलमे दूटा लघुकेँ एकटा दीर्घ सेहो मानल जाइत छै। बहुत गोटेंकेँ समस्या होइत छन्हि जे इ लघु-दीर्घ कोना होइत छै। प्रस्तुत अछि किछु उदाहरण--- बिगड़ि-----------एहि शब्दकेँ ह्रस्व-दीर्घ मानू वा दीर्घ-ह्रस्व मानू। बहरक जेहन जरूरति हो। अरबी बहरमे तीन टा लघु सँ कोनो बहर नै छै तँए लघु-लघु-लघु मानबाक कोनो जरूरति नै। हुनकर---------- एहि शब्दकेँ दीर्घ-दीर्घ मानू वा दीर्घ-लघु-लघु मानू वा लघु-लघु-दीर्घ दीर्घ मानू जेहन जरूरति हो। अरबी बहरमे चारिटा लघु सँ कोनो बहर नै छै तँए लघु-लघु-लघु-लघु मानबाक कोनो जरूरति नै। घर------- एहि शब्दकेँ दीर्घ मानू वा लघु-लघु बहरक जेहन जरूरति हो। चोर------ इ साफे तौर पर दीर्घ-लघु अछि।

जँ कोनो शेरमे एना पाँति छै--- बिगड़ि चलै । आब एहि दू शब्दकेँ बान्हू। या तँ अहाँ " बिग" मने एकटा दीर्घ मानू आ "ड़ि" मने एकटा लघु फेर "च" एकटा लघू भेल आ "लै" एकटा दीर्घ। एकर मतलब जे " बिगड़ि चलै" केर संभावित बहर भेल--दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ। एहि शब्दकेँ एकटा आर रूप दए सकैत छी जेना की---- "बि" के लघु मानू "गड़ि"केँ दीर्घ मानू आ फेर "च" एकटा लघू भेल आ "लै" एकटा दीर्घ। एकर मतलब जे " बिगड़ि चलै" केर संभावित बहर भेल--- लघु-दीर्घ-लघु-दीर्घ। आब एहि दू रूपकेँ अहाँ बहरक हिसाबें प्रयोग करू। कतेको आदमी " बिग" केँ दीर्घ मानताह फेर "ड़ि" "च" केँ मिला दीर्घ मानताह आ "लै" भेल दीर्घ मने दीर्घ-दीर्घ -दीर्घ मुदा इ रूप गलत भेल। मुदा ऐठाम एकटा गप्प मोन राखू जे किछु शब्दमे धेआन सेहो राखए पड़त जेना एकटा शब्द " कमल " लिअ। आब जँ अहाँ एकर उच्चारण क-मल ( मने लघु-दीर्घ) करबै ताहिसँ एकटा फूलक अर्थ निकलत मुदा जखन अहाँ एही शब्दकेँ कम-ल ( मने दीर्घ-लघु) करबै तखन एकर अर्थ घटनाइमे हेतै जेना - पानि कम'ल की नै इत्यादि। तँए हमर आग्रह जे पहिने कोनो शब्दकेँ उच्चारणक हिसाबेँ अर्थ देखू जाहिसँ उच्चारण अनर्थ नै हुअए। मैथिलीमे वर्तनीकेँ हिसाबेँ ई उदाहरण देखू---- लए---- ह्रस्व-दीर्घ लs------ह्रस्व ल'------ह्रस्व लय--- ह्रस्व-ह्रस्व वा दीर्घ इएह निअम कए, कs वा स', भए भs वा भ' लेल छै आन प्रारूप लेल एहने बात बूझल जाए। ऐठाम ईहो कही जे लघु लेल ह्रस्व शब्दक प्रयोग सेहो कएल जाइत छै तेनाहिते दीर्घ लेल गुरू शब्द छै। ऐठाम हम एकटा गप्प स्पष्ट कर' चाहब। संस्कृतक वार्णिक गणमे टूटा लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक परम्परा नै अछि। संगे-संग वार्णिक छन्दमे जतेक गण छै ततेक अक्षर भेनाइ अनिवार्य। एकटा उदाहरण लिअ-- मानू जे १२२-१२२-१२२-१२२ सँ बनल श्लोकक हरेक पाँतिमे मात्रा क्रम इएह रहतै संगे-संग हरेक पाँतिमे १२टा अक्षर रहतै। कम वा बेसी अक्षर मान्य नै छै। मुदा आधुनिक भारतीय भाषामे ई कठिन सन बुझाएल तँए दूटा लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक छूट भेटल।

ई तँ छल सूत्र रूपमे। कने एकरा फरिछा कए देखी------ 1) पं. गोविन्द झा अपन पोथी " मैथिली छंद शास्त्र" ( मिथिला पुस्तक केन्द्र दरभंगासँ प्रकाशित, द्वितीय संस्करण १९८७)मे पृष्ठ १३ मे लिखैत छथि जे " सँ, जँ, तँ, हँ आदि गुरू अछि" मने चंद्रबिंदुकेँ पं. गोविन्द झा जी दीर्घ मनने छथि (प. दीनबन्धु झा रचित मिथिला भाषा विद्योतनमे एहने लिखल अछि।) मुदा फेर पं. गोविन्द झा जी शेखर प्रकाशनसँ २००६मे प्रकाशित अपन पोथी " मैथिली परिचायिका" केर पृष्ठ २०पर लिखै छथि जे " अनुस्वार भारी होइत अछि आ चंद्रबिंदु भारहीन" मने ऐ पोथीमे पं. जी चंद्रबिंदुकेँ लघु मनने छथि आ एहने सन विचार ओ मैथिली अकादेमीसँ २००७मे प्रकाशित अपन पोथी "मैथिली परिशीलन"क पृष्ट ३५पर देने छथि। आब हमरा एहन पाठक लेल ई बड़का प्रश्न अछि जे चंद्रबिंदुकेँ लघु मानल जाए की दीर्घ, कारण एकै पं. गोविन्द झा जी अपन भिन्न-भिन्न पोथीमे भिन्न विचार देने छथि आ ई प्रचारित करबाक उपक्रम करै छथि जे जाहि पोथीमे हम जे लीखि देलहुँ से सही अछि। जँ पं. गोविन्द झा जी बाद बला पोथीमे लीखि देने रहितथिन्ह जे " मैथिली छंद शास्त्रमे चंद्रबिंदु केर सम्बन्धमे हम जे लिखने छी से गलत थिक आब आब हम ऐ पोथीमे एकरा सुधारि रहल छी" तखन हमरा जनैत भ्रम नै पसरितै आ ऐसँ हुनक महानता सेहो सिद्ध होइत। मुदा से नै भेल। कोनो भाषाक वैयाकरणक उपर ओहि भाषाक हरेक लोककेँ विश्वास होइत छै। मैथिल सेहो पं. जीपर विश्वास करैत छथि ( हमरा सहित) आ तँए बहुत मैथिल लोकनि चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि बैसल छथि। एकर सभसँ बड़का उदाहरण श्री रमण झा सन अलंकार शास्त्री अपन पोथी "भिन्न-अभिन्न"क पृष्ठ ६७-७३ मे देने छथि जतए श्री रमण जी पं. गोविन्द झा जीक संदर्भ दैत चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि लेने छथि। अस्तु ई गप्प फरिछाएल अछि जे चंद्रबिंदु लघु होइत अछि आ अनुस्वार दीर्घ। एही क्रममे एकटा आर गप्प भए सकैए जे पं. गोविन्द झा जी कविवर सीताराम झा जीक कविताकेँ देखि चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि लेने होथि तँ से गप्प फराक, कारण कविवर सीताराम जी अपन अधिकांश कवितामे चंद्रबिंदु युक्त लघु शब्दकेँ दीर्घ जकाँ प्रयोग केने छथि। मुदा ऐठाम ई मोन राखए पड़त जे छंदमे जरूरति पड़लापर (मात्र आवश्यक स्थितिमे) लघुकेँ दीर्घक बराबर वा तेनाहिते दीर्घकेँ लघु बराबर उच्चारण कएल जाइत रहलै। तँए जँ कविवर सीता राम जी जँ आवश्यकता पड़लापर जँ चंद्रबिंदु युक्त लघुकेँ दीर्घ जकाँ प्रयोग केने छथि ताहिसँ ओ नियम नै बनि जेतै वस्तुतः नियम तँ इएह छै जे चंद्रबिंदु लघु अछि। एकटा गप्प आर संस्कृतमे लघुकेँ दीर्घक बराबर वा तेनाहिते दीर्घकेँ लघु बराबर उच्चारण मात्र पाँतिक अन्तमे मान्य  छै। शब्दक अन्तमे दीर्घकेँ लघु मानबाक मैथिलीमे  परम्परा प्राकृत एवं अप्रभंश भाषासँ भेल अछि।    2)  मैथिली छन्द शास्त्रक पृष्ठ १४पर पं. गोविन्द झा जी लिखै छथि जे ----" न्ह आ म्ह संयुक्ताक्षरसँ पूर्व लघु वर्ण गुरू नै होइत अछि, कन्हाइ, कुम्हार, एहिठाम क ओ कु गुरू नहि थिक।" मुदा जँ अहाँ मैथिली उच्चारणकेँ अकानब तँ साफ-साफ सुनबामे कन् + हाइ ध्वनि आएत तेनाहिते कुम् + हार ध्वनि सुनबामे आएत। मैथिलीमे क + न्हाइ वा कु + म्हार ध्वनि कदाचिते भेटत आ जेना की गजल उच्चारणपर आधारित अछि तँए गजलमे कन्हाइ लेल दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत आ कुम्हार सेहो दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत। ओना गजलेमे किएक हरेक छन्द, हरेक पद्य उच्चारणपर अछि तँए हरेक छंदमे कुम्हार दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत। आब कने आर विस्तारसँ चली। उर्दू भाषामे न्ह, म्ह आ ल्ह सँ पहिनुक अक्षर दीर्घ नै होइत छै मने जे जाहि सङ्गे ल्ह, म्ह वा न्ह रहैत अछि तकरे उपर ओ प्रभाव दै छै जेना " तुम्हारा " ऐ शब्दक उच्चारण उर्दूमे "तु + म्हारा" होइत छै तँए उर्दूमे " तुम्हारा लेल लघु + दीर्घ + दीर्घ प्रयोग होइत छै। ओना ऐठाम ई कहब बेजाए नै जे उर्दूमे न्ह, म्ह, ल्ह केर ध्वनि संस्कृतसँ आएल मुदा उर्दूक सचेष्ट विद्वान सभ उच्चारण अपने हिसाबसँ रखलथि। उर्दूक ई उच्चारण हिन्दीमे आएल (बजबा कालमे उर्दू आ हिन्दी एक समान होइत अछि)। मुदा जँ मैथिली उच्चारणकेँ देखबै तँ साफे-साफ अंतर बुझना जाएत। आ एही अन्तरक कारणें मैथिल हरेक आन राज्यमे जल्दिये पहिचानमे आबि जाइत छथि। मैथिलीमे आने संयुक्ताक्षर जकाँ म्ह,न्ह आ ल्ह केर प्रभाव होइत छै तँए कुम्हार आ कन्हाइ लेल दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत। संस्कृतमे सेहो “ म्ह, ल्ह आ न्ह “सँ पहिने केर लघु दीर्घ मानल जाइत छै। आब देखू तुलसी दास जी द्वारा लिखल ई स्त्रोत------------- नमामी शमीशान निर्वाण रूपं विभू व्यापकम् ब्रम्ह वेदः स्वरूपं पहिल पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि---- ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घदोसरो पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि-----ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ | आब ऐ श्लोकक दोसर पाँतिक ब्रम्ह शब्दपर धेआन देबै सभ बुझबामे आबि जाएत।   3) पं. गोविन्द झा जी मैथिली छंद शास्त्रक पृष्ठ १३मे संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर दीर्घ हएत की लघु तकर व्यवस्था देखेने छथि। हुनका मतें जँ एकैटा शब्दमे संयुक्ताक्षर हो तखने टा संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ हएत। सङ्गे-सङ्ग ईहो कहने छथि जे प्रचलित समासमे जँ अलगो-अलग अक्षर छै तखन संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ हएत। सङ्गे-सङ्ग ओ एकर सभहँक अपवाद सेहो देने छथि। लगभग इएह नियम मैथिलीक सभ लेखक अपनेने छथि। सङ्गे हम ईहो कहि दी जे हिन्दीयोमे एहने सन नियम छै ( आन आधुनिक भारतीय भाषामे की छै से हमरा नै पता) मुदा ई नियम लौकिक संस्कृतमे नै छै। संस्कृतमे चाहे एकै शब्दमे संयुक्ताक्षर हो की अलग-अलग शब्दमे दूनू स्थितिमे संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ हएत। संस्कृत पद्यक किछु उदाहरण देखू------पहिने आदि शंकराचार्यक ई निर्वाण षट्कम देखू----------- मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे न च व्योम भूमिर् न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम्

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश: न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम्

न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव: न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम्

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा: न यज्ञा: अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम्

न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद: पिता नैव मे नैव माता न जन्म न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम्

अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् पहिल पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि---- ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ --------| दोसरो पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि-----ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ--------- । जँ अहाँ नीकसँ पढ़बै तँ पता लागत जे संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर जे अलग शब्दमे छै ओहो दीर्घ भए रहल छै। आब शंकराचार्योसँ पहिनुक रचना देखी। तँ पढ़ू रावण रचित ई शिवतांडव स्त्रोतम्। एहूमे संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ भेल अछि चाहे ओ एक शब्दमे अछि वा अलग शब्दमे। लघु-दीर्घक-लघु-दीर्घ-----ऐ रूपकेँ पालन 14 श्लोक धरि पालन कएल गेल अछि। जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् । डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥ 1 ॥

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- -विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि । धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥ 2 ॥

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे । कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥ 3 ॥

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे । मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥ 4 ॥

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः । भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥ 5 ॥

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- -निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् । सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥ 6 ॥

करालफालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- द्धनञ्जयाधरीकृतप्रचण्डपञ्चसायके । धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- -प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥ 7 ॥

नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्- कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबन्धुकन्धरः । निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥ 8 ॥

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा- -विलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् । स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥ 9 ॥

अगर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम् । स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥ 10 ॥

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस- -द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालफालहव्यवाट् । धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥ 11 ॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्- -गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः । तृष्णारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥ 12 ॥

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् । विमुक्तलोललोचनो ललाटफाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् सदा सुखी भवाम्यहम् ॥ 13 ॥

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम् । हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥ 14 ॥

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे । तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥ 15 ॥

ऐ के अलावे पूरा संस्कृत पद्ये एकर उदाहरण अछि। मुदा से देब ने हमरा अभीष्ट अछि आ ने उचित। मैथिलीमे ई नियम नै छै तकर कारण प्राकृत-अप्रभंश भाषाक प्रभाव छै। मैथिली सहित आन-आन आधुनिक उत्तर भारतीय भाषामे ई सेहो ई नियम नै मानल जाइत छै प्राकृत-अपभ्रंशक प्रभावें। आब ई देखू जे ई प्राकृत-अपभ्रंश कोन भाषा थिक। प्राकृतक सम्बन्धमे नाट्य शास्त्रक प्रणेता भरत मुनि कहै छथि जे------ एतदेव विपर्यस्तं संस्कार गुण वर्जितम् विज्ञेयं प्राकृतं पाठ्यं नाना वस्थान्तरात्मकम्। मने जे मूल शब्दक अक्षरकेँ आगू-पाछू कए वा सरलीकृत कए बाजब प्राकृत पाठ कहाइए। ऐठाम मूल शब्द मने संस्कृतक शब्द भेल, मुदा मूल शब्द कोनो भाषाक भए सकैए। तेनाहिते आचार्य भर्तृहरि जी प्राकृतक सम्बन्धमे कहै छथि जे -------- दैवीवाक् व्यवकीर्णेयम शकतैरभि धातृभिः मने जे दैवीवाक् ( संस्कृत ) अशक्त लोकक मूँहमे आबि भिन्न-भिन्न रूपमे आबि जाइ छै। मुदा महाभाष्यकार पतञ्जलि प्राकृतकेँ अपशब्दक रूपमे देखैत छथि आ हुनका मतें ऐ तरहक अपशब्दक प्रयोग चाहे ओ बाजल जाइ की सूनल जाइ दूनू रूपमे अधर्म थिक। प्रायः-प्रायः हरेक भाषाविज्ञानी प्राकृतक बाद बला रूपकेँ अपभ्रंशक नाम देने छथिन्ह। लगभग नवम आ दशम शताब्दी धरि प्राकृतक प्रयोग खत्म भए गेल छल आ अपभ्रंशक प्रयोग शुरू भए गेल छल। मुदा ऐ ठाम मोन राखू जे अधिकांश भाषाविज्ञानी अप्रभंशकेँ प्राकृतसँ अलग मनने छथि मुदा दूनूक प्रकृति एक समान हेबाक कारणें " प्राकृत-अपभ्रंश " नाम बेसी चलै छै। प्राकृतमे शब्दक निर्माण मुख्यतः लोक रूचिपर निर्धारित छै ने की व्याकरणपर। एकटा उदाहरण देखू-----चन्द्र शब्दसँ चन्दा प्राकृत शब्द भेल मुदा इन्द्र शब्दसँ इन्दा शब्द नै बनल ब्लकि इन्दर शब्द बनल। तेनाहिते वधू शब्दसँ बहु बनि तँ गेल मुदा साधु शब्दसँ साहु नै बनल। साहु अलग शब्द अछि। आ लगभग एहने हालति अपभ्रंशक अछि। ई बात जननाइ महत्वपूर्ण अछि जे जेनाहिते प्राकृत लेल मूल शब्द संस्कृत छै तेनाहिते अपभ्रंश लेल मूल शब्द प्राकृत छै। आ बादमे एही अपभ्रंशसँ मैथिली आ आन आधुनिक भारतीय भाषा सभहँक जन्म भेल। ओना प्राकृतक बहुत रूप छै। तेनाहिते अपभ्रंशक सेहो अनेको रूप छै। मैथिलीमे अपभ्रंशकेँ अपभ्रष्ट वा अवहट्ट सेहो कहल जाइत छै। मुदा ई प्राकृत रूप हरेक समयमे होइत रहलैए। वेदक नाराशंसी एकर उदाहरण अछि | आ ऋगवेदमे ओहि समयक सामानान्तर भाषाक बहुत रास शब्द भेटत। तेनाहिते अशोक वाटिकामे हनुमान जीक ई चिन्ता जे हम सीता जीसँ देवभाषामे गप्प करी की मानुषी भाषामे सेहो ऐ गप्पक प्रमाण अछि जे ओहू समयमे संस्कृतक समानान्तर भाषा छलै आब ओकर नाम मानुषी होइ की वा अन्य कोनो। महत्वपूर्ण तँ ई छै जे वेदसँ लए कए एखन धरि संस्कृतक समानान्तर धारा बहैत रहल आब भले ही ओकर नाम जे रहल होइ। संस्कृत शब्द जखन प्राकृत रूपमे आबए लगलै तखन संयुक्ताक्षर शब्दपर बहुत बेसी प्रभाव पड़लै। जँ गौरसँ देखबै तँ पता लागत जे प्राकृत बाजए बला सभ संयुक्ताक्षर शब्दकेँ अपन लक्ष्य बनेने छल ताहूमे एहन संयुक्ताक्षर बला शब्द जे शब्दक शुरूआतमे छल। एकर कारण छलै जे संयुक्ताक्षर बला शब्दकेँ बजबामे बहुत सावधानी आ शिक्षा चाही छल। संस्कृतक संयुक्ताक्षर बला शब्द प्राकृतमे दू रूपमे तोड़ल गेल--- १) जै संस्कृतक शब्दक शुरुआत संयुक्ताक्षरसँ भेल छै तकरा प्राकृतमे पूरा-पूरी लोप कए देल गेलै। केखनो-केखनो शुरूआतक संयुक्ताक्षरकेँ बादमे आनि देल गेलै जेना----- “ग्रह” संस्कृत छै मुदा एकर प्राकृत “गिरहो” छै। तेनाहिते स्कन्द लेल खन्दो, क्षमा लेल खमा वा छमा, स्तम्भ लेल खम्भ, स्खलितं लेल खलिअं, क्लेश लेल किलेसो इत्यादि। २) जँ शब्दक शुरुआत छोड़ि कतौ संयुक्ताक्षर छै तँ केखनो ओकर लोप भए गेल छै वा नव रूपमे संयुक्ताक्षर छै जेना ---- चतुर्थी लेल चउत्थी, चैत्र लेल चइत्ता, चन्द्रिमा लेल चन्दिमा, क्षेत्रम् लेल छेतम् आदि-आदि। कुल मिला कए प्राकृत-अपभ्रंशमे एहन स्थिति बनल जे दूनू भाषामे सँ कोनो भाषामे एहन शब्द नै छलै जकर शुरूआत संयुक्ताक्षर शब्दसँ होइत हो। एतेक विवेचनाक बाद हम अपन मूल उद्येश्य दिस चली। हमर मूल उद्येश्य छल जे मैथिलीमे संस्कृते जकाँ अलग-अलग शब्द रहितों संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर दीर्घ किएक नै होइए। आब जँ गौरसँ उपरका विवरण पढ़ने हएब आ जँ आर प्राकृत-अपभ्रंशक पोथी सभ पढ़ब तँ पता लागत जे प्राकृत-अप्रभंशमे तँ संयुक्ताक्षरसँ शुरूआत शब्द छैके नै। आ मैथिलीयो अपभ्रंशसँ निकलल अछि आ प्रारंभिक मैथिलीमे संयुक्ताक्षरसँ शुरूआत होइत कोनो शब्द नै अछि। आ तँए मैथिलीमे संस्कृतक ई नियम नै आएल। आ अहाँ अपने सोचियौ ने जे जै भाषामे संयुक्ताक्षरसँ शुरू होइत शब्द छैके नै से एहन तरहँक नियम किएक राखत। मुदा जँ नवीन मैथिली भाषाक किछु प्रतिष्ठित लेखकक रचनाकेँ देखी तँ ओ मात्र क्रियापदकेँ छोड़ि सभ संस्कृतक शब्द (तत्सम शब्द )केँ प्रयोग केने छथि। आन-आन कम प्रतिष्ठित लेखक अपन रचनामे तत्सम शब्दकेँ फिल्मी मसल्ला मानि जोरगर प्रयोग करै छथि। एतबा नै पं. गोविन्द झा जी अपन पोथी "मैथिली परिशीलन"क पृष्ठ २९-३० पर गौरव पूर्वक नवीन भारतीय भाषा (जै मे मैथिली सेहो अछि )केँ तत्सम निष्ठ हेबाक बहुत रास फायदा गनौने छथि। आब हमरा सन जिज्ञासु लग ई प्रश्न अपने-आप आबि जाइए जे जँ संस्कृतक शब्द लेलासँ बहुत रास फायदा भेलै ( वा भए सकैत छै ) तखन तँ संस्कृतक सम्बन्धित नियम लेलासँ सेहो फायदा भेल रहितै ( वा भए सकैत छै )। ओनाहुतो मैथिलीमे वा अन्य कोनो आधुनिक भारतीय भाषाक पद्यमे संस्कृत शब्दक प्रयोग होइ छै तखन ओ नियम स्वतः पालन भए जाइत छै। अहाँ अपने मैथिली महँक एहन कोनो पद्य गाउ जाहिमे संयुक्ताक्षरसँ शुरू होइत कोनो संस्कृत शब्द हो स्वतः अहाँकेँ बुझा जाएत जे अलग शब्द रहितों संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर दीर्घ होमए लगैत छै। ऐठाँ फेर मोन राखू जे प्राकृत-अपभ्रंश भाषामे एहन शब्द छलैहे नै जकर शुरूआत संयुक्ताक्षरसँ होइ तँए ओहि भाषामे ई नियम नै पालित भेल। आब एतेक विवेचनक बाद अहाँ सभकेँ मामिला बुझबामे आएल हएत। तँए हमर आग्रह जे जँ ऐ नियमसँ बचबाक हो तँ संयुक्ताक्षरसँ शुरू होइत शब्दक तद्भव रूप प्रयोग करू जेना " प्रकाश " लेल परकाश, " प्रयोग " लेल परियोग इत्यादि। हमर कहबाक मतलब जे जेना पुरना कालमे प्राकृत संयुक्ताक्षरकेँ हटा देलकै वा आधुनिक कालमे बंगला भाषामे संयुक्ताक्षर हटि गेलै तेनाहिते मैथिलीमेसँ संयुक्ताक्षर सेहो हटा दिऔ। आ जँ अहाँ संस्कृते शब्द लेब तखन पूरा नियम सहित लिअ। आब अहाँ जँ सकांक्ष पाठक हएब तँ हमरासँ पूछब जे जँ केओ संस्कृत छोड़ि आन भाषाक शब्द लेत तखन की ओहि भाषाक नियमक पालन करत ? ऐ लेल हमर उत्तर रहत जे नै। कारण संस्कृत हमर मूल भाषा थिक तँए ओकरा दिस ताकब हमर मजबूरी नै बल्कि कर्तव्य सेहो अछि। मुदा ओकरा छोड़ि जँ आन भाषाक शब्द लै छै तखन ओकरा मैथिलीक नियम हिसाबें प्रयोग करू। जेना की अरबी-फारसी-उर्दू भाषामे " ग़ज़ल " लिखल जाइत छै मने ग आ ज केर निच्चा नुक्ता लगाएल जाइत छै मुदा मैथिलीमे नुक्ता नै छै तँए मैथिलीमे " गजल " लीखू। नुक्ता लगा कए लिखब बेकार । कोनो संस्कृतक शब्दकेँ वा अन्यदेशीय शब्दकेँ मैथिलीकरण कोना करी आ कोना नव शब्द बनाबी तकर विवेचना आगू हएत। ई छल हमर पहिल तर्क। आब कने दोसर तर्क दिस चली--- संस्कृत पद्यमे एकटा पाँतिकेँ इकाइ मानल जाइत छै। आ जँ हम शब्दकेँ भिन्न-भिन्न करै छिऐ मने अलग-अलग शब्दक संयुक्ताक्षरसँ भेल दीर्घ नै मानै छिऐ तँ एकर मतलब जे हम पाँतिकेँ नै बल्कि शब्दकेँ इकाइ मानि रहल छिऐ आ हमरा जनैत पद्यमे शब्दकेँ इकाइ मानब उचित नै। पद्यमे इकाइ सदिखन पाँति होइ छै। एकटा विडंबना देखू जे मैथिलीक सभ व्याकरण शास्त्री आ कवि लोकनि शब्दकेँ इकाइ तँ मानै छथि मुदा जखन जगण-मगण केर गिनती करै छथि तखन पाँतिकेँ इकाइ मानि लै छथि। एकटा उदाहरण लिअ जे की वसन्त तिलका छन्दक अछि। ऐ छन्दक व्यवस्था एना अछि---- तगण+ मगण+जगण +जगण + गा + गा मने की ----दीर्घ-दर्घ-लघु +दीर्घ-लघु-लघु +लघु-दीर्घ-लघु +लघु-दीर्घ-लघु +दीर्घ+ दीर्घ आब एकर पद्य उदाहरण देखू---- " ई ने अहाँक सन वीरक काज थीकs" ( कविवर सीताराम झा, मैथिली छन्द शास्त्र, पृष्ठ-४५)। ऐ एकटा पाँतिमे देखू जे " ई " आ "ने " दूटा अलग-अलग शब्द अछि सङ्गे-सङ्ग तेसर शब्द " अहाँक" केर पहिल अक्षर " अ " लए कए मात्र एकटा " तगण "बनल अछि। आब हमर कहब अछि जे जँ अहाँ पद्यमे शब्देकेँ इकाइ मानै छिऐ तखन दू-तीनटा अलग-अलग शब्दकेँ सानि एकटा जगण-मगण किएक बनबै छी। जँ केओ शब्देकेँ इकाइ मानै छथि तकर मतलब ई भेल जे ओ अपन पद्यमे एहन शब्दकेँ प्रयोग करथि जे हरेक जगण-मगण मने कोनो दशाक्षरी खण्ड लेल समान रूपसँ रहए। तँए हमर मानब जे संस्कृतक पद्ये जकाँ जँ अलग-अलग शब्द होइ तैयो संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक बला अक्षर दीर्घ हएत। ऐठाँ ई मोन राखू जे एकटा पाँति खत्म भेलै तँ ओ इकाइ खत्म भेलै। आब जँ दोसर पाँतिक शुरूआत संयुक्ताक्षरसँ भए रहल छै तकर प्रभाव पहिल पाँतिक अन्तिम शब्दक अन्तिम अक्षरपर नै पड़त। पं. गोविन्द झा जी अपन पोथी " मैथिली छन्द शास्त्र "क पृष्ठ १४पर लिखै छथि जे ---- ए,ऐ,ओ,औ कतहु लघु होइत अछि आ कतहु दीर्घ आ तकर बाद ओ समान्य नियम देखेने छथि। मुदा उदाहरणमे देल गेल जे-जे शब्द सभ लेने छथि से प्रयाः-प्रायः आइसँ १५० बर्ख पहिनुक अछि सेहो सोति नामक ब्राम्हणमे बाजल जाइत छल ओहो मात्र पुरूष वर्गमे। हमर कहबाक मतलब जे स्त्री (चाहे कोनो जातिक किएक ने हो) एवं गैर-ब्राम्हण ओहि शब्दावलीक अभ्यस्त नै छल आ ने अछि। तँए हम ओइ नियम सभहँक विवेचन नै करब सोंझ स्वरे कहब जे ए,ऐ,ओ,औ जतए रहए ततए दीर्घ रहत।  हँ, दूटा गप्प धेआन राखू पहिल जे बहुत काल ए,ऐ,ओ,औ आदिक उच्चारण कोमल भ' जाइत छै मुदा कोमल उच्चारणक कारणें ओ लघु नै मानल जाएत। आ दोसर गप्प जे प्राकृत-कालमे संस्कृतक विरोध स्वरूप लोक सभ अपना सुविधाक हिसाबसँ ए,ऐ,ओ,औ आदिकेँ कतौ लघु आ कतौ दीर्घ मानि लेला। शुरुआती प्राकृत कालमे उच्चारण मुख-सुखपर आधारित अछि मने एहन उच्चारण जकरा बाजएमे बेसी कठनाइ नै हो। मुदा जखन इएह प्राकृत संस्कारयुक्त बनि गेल तखन संस्कृते जकाँ एकरो विरोध भेलै आ अप्रभंश भाषा आएल। मुदा आइकेँ जुगमे जखन की मैथिली संस्कारयु्क्त बनि गेल अछि तखन प्राकृत-अप्रभंश नियमक कोन काज (आब अहाँ सभ ई डर नै देखाएब जे संस्कारयुक्त भेलासँ मैथिली मरि जाएत। जँ एतबे डर अछि तखन मैथिलीकेँ १००० बर्ख पाछू ल' जाउ आ तखन प्राकृत-अप्रभंश नियम लिअ। वस्तुतः भाषाकेँ मरब आ जन्मब प्रकिया मनुक्खे जकाँ छै जे की रोकल नै जा सकैए। हँ, किछु स्थान राखल जा सकैए जैसँ मूल भाषाक विशेषता नव भाषामे रहि जाए ) तँए हमर ई स्पष्ट रूपें मानब अछि जे ए,ऐ,ओ, औ आदि जतए रहै ओकरा दीर्घ मानू (ओना छन्दमे केखनो काल अपवाद स्वरूप काज चलेबा लेल ए,ऐ,ओ, औ आदिकेँ लघु मानल जाएत रहलैए मुदा ई छूट जकाँ भेल नियम जकाँ नै ) | पं. जी एही पोथीक पन्ना १४हेपर एकटा नियम देलाह जे --- तद्भव शब्दमे अन्तसँ तेसर ओ चारिम स्थानपर पड़निहार ए,ऐ,ओ,औ सभ लघु थिक जेना --- तेल ( २१)------- तेलाह ( १२१) फैल ( २१)----फैलगर ( ११११) मुदा पं. जी ई नै स्पष्ट केलाह जे अन्तसँ तेसर ओ चारिम स्थानपर पड़निहार ए,ऐ,ओ,औ सभ लघु किएक होइत अछि। आब आउ चली प. गोविन्द झा जी द्वारा लिखित आ १९८७मे प्रकाशित पोथी "मैथिली उद्गम ओ विकास " (पहिल संस्करण १९६८मे मैथिली प्रकाशन समीतिसँ आ दोसर परिवर्धित संस्करण मैथिली अकादेमीसँ)क १९एम पन्नापर---- " ११ (१)  वैदिक कालहिसँ ई नियम चल अबैत अछि जे एके पदमे एके स्वर उदात रहए, आन सभ अनुदात भए जाए। ई नियम शेष निघात कहबैत अछि। एहि प्राचीन नियमक परिणामस्वरूप मैथिलीमे एक बड़े महत्वपूर्ण नियम ई अछि जे अन्तसँ प्रथम ओ द्वितीय स्थानकेँ छोड़ि शेष जतेक ध्वनि अछि से लघु भए जाइत अछि। एहि नियमकेँ पण्डित ग्रिअर्सन साहेब Rule of short antepenultimate कहल अछि।मैथिलीमे एहि नियमक अनुसारें एक शब्दमे अधिकसँ अधिक दुइ गुरू रहि सकैत अछि, आ सेहो अन्तसँ प्रथम वा द्वितीय स्थानमे ,ताहिसँ पूर्व सकल स्वर नियमतः लघु रहत, तथा प्रत्यादि जोड़लासँ जखनहि कोनो गुरू ध्वनि तृतीय वा ताहिसँ पूर्व पड़ि जाएत तखनहि ओ लघु भए जाएत। एकर उदाहरण ग्रंथमे वारंवार भेटत, एतए दुइ-चारि उदाहरण देखबैत छी--- पानि,पनिगर,काँट,कटाँह, बात, बताह, बतहा, बतहबा। टि० एहि नियमकेँ कने आर परिष्कृत करब आवश्यक। ग्रिअर्सन साहेबक कथानुसार यदि तृतीय वर्ण नियमतः लघु होइत अछि तँ " पाओल ", " आबए " इत्यादिमे "आ "लघु किएक नहि भेल? एकर समाधान ग्रिअर्सन साहेब ई देल अछि जे अन्तिम लघु स्वर वा लघुत्तम स्वरक लेखा नहि होइत अछि। परन्तु छन्दमे शतशः उदाहरणसँ आ उच्चारण-पर्यवेक्षणसँ ई स्पष्ट अछि जे अन्तिम लघुत्तम स्वरो एक वर्ण एक syliable गनल जाइत छल। तें उक्त नियमक स्वरूपएहन राखब समुचितः मैथिलीमे गुरू ध्वनि अन्तसँ चारि मात्राक भित्तरे रहि सकैत अछि, ताहिसँ पूर्व नहि। फलतः मैथिली शब्दक अवसान २२,११२,२११,१२१ एही चारि प्रकारक भए सकैत अछि ओ ताहिसँ पूर्व सकल ध्वनि बिनु अपवादेँ लघु रहत यथा-स० आकाश, मै० अकास इत्यादि।“ फेर पं. जी १९९२मे प्रकाशित पोथी " उच्चतर मैथिली व्याकरण " द्वितीय संस्करणक पृष्ठ १९पर,  २००६मे प्रकाशित पोथी " मैथिली परिचायिका " केर पृष्ठ ११पर आ २००७मे प्रकाशित पोथी " मैथिली परिशीलन " केर पृष्ठ ५६-५७पर इएह गप्प एकसामान रूपसँ कहने-लिखने छथि। तँ पं. जीक करीब पाँचटा पोथीमे ऐ विषय-वस्तुकेँ पढ़लाक पछाति हम अपन किछु विचार राखए चाहब--- वैदिक कालमे छन्द निर्माण लेल लघु-गुरू प्रकिया नै छल। मात्र अक्षरकेँ गानि क' छन्द बनै छल जकरा गेबा लेल उदात, अनुदात एवं स्वरित रूपक सहायता लेल जाइत छलै। उदात मने कोनो अक्षरक स्वरकेँ उठा क' गाएब, अनुदात मने कोनो अक्षरक स्वरकेँ निच्चा खसा क' गाएब तथा स्वरित मने कोनो अक्षरक स्वरकेँ तुरंत उपर उठा क' तुरंत निच्चा खसा क' गाएब। वैदिक साहित्यमे जे अक्षर लघु अछि तकर उच्चारण उदात भ' सकैए तेनाहिते जे अक्षर दीर्घ अछि तकर उच्चारण अनुदात भ' सकै छल। सोंझ रूपसँ कही तँ उदात,अनुदात-स्वरित कोनो अक्षरक मात्रापर निर्भर नै छल। २) वैदिक साहित्य केर बाद लौकिक संस्कृतसँ ल' क'  प्राकृत-अप्रभंश भाषा रूपमे मैथिली साहित्यमे वैदिक छन्द नै रहल मने या तँ लौकिक संस्कृतक वर्णवृत रहल या मात्रिक छन्द। ३) पं. जी लघु-गुरू नियम आ उदात-अनुदात-स्वरित प्रकियाकेँ एकै मानि लेने छथि। ४) पं. जीक हिसाबें ग्रिअर्सन साहेब द्वारा देल गेल Rule of short antepenultimate बेसी ठीक नै अछि तँए पं. जी ओहिमे संशोधन केलाह। आब हमर प्रश्न ई अछि जे जँ उपरका नियम मैथिली लेल अनिवार्य अछि तखन ओहिमे संशोधन किएक ? संशोधित होमए बला नियम अनिवार्य भैए ने सकैए। ५) पं. जीक पोथी सभ पढ़ि हमरा बहुत बेर ई अनुभव होइए जे पं. जी व्याकरण शास्त्र, छन्द शास्त्र आ ध्वनि विज्ञान तीनूक नियम एकैमे सानि देने छथिन्ह। हरेक भाषामे लघुतर आ अति-लघुतर ध्वनि होइ छै मुदा ओकर विवेचन व्याकरण आ छन्द शास्त्रमे नै भ' ध्वनि शास्त्रमे होइत छै। जँ लेखककेँ एकै पोथीमे ध्वनि विज्ञान देबाक रहै छै तँ ओकर खण्ड अलग क' देल जाइत छै। ऐ ल' क' पं. जीक पोथीमे बहुत ठाम संदेहात्मक स्थिति बनि जाइत छै। हम उपरमे जे विचार रखलहुँ ताहि अधारपर अपन निष्कर्श द' रहल छी---- ई नियम अनिवार्य नियम नै अछि कारण पं. जी स्वयं ऐ नियमक बहुत रास अपवाद देखेने छथि। कोनो अनिवार्य नियममे जँ एतेक अपवाद हो तँ निश्चित रूपसँ ओकर अनिवार्यतापर प्रश्नचिन्ह लागै छै।  ई नियम व्याकरणक ओ छन्दशास्त्रक नै ब्लकि शब्दकोषीय अछि। मने ऐ नियमक सहायतासँ अहाँ संस्कृत वा अन्य भाषाक शब्दकेँ मैथिलीकरण क' सकै छी। मोन पाड़ू प्राकृत भाषा संस्कृतक शब्द सभकेँ (मने शब्दक शुरूसँ पहिल,दोसर वा तेसर दीर्घक उच्चारण गाएब क' देलक। आब आगू ऐ गाएब कएल दीर्घ लेल हम मात्र कोमल शब्दक प्रयोग करब) कोमलीकृत केलक जेना--आकाश केर बदला अकास, आत्मा केर बदला अत्मा आदि। बादमे एही नियमक अधारपर अंग्रेजी शब्दक इएह हाल भेलै जेना ड्राइवर केर बदला डरेबर, स्टेशन केर बदला टीसन, आदि-आदि। मुदा ई नियम ओहने शब्दमे लागल जै शब्दमे विराम लेबाक सुविधा नै छलै। "परिशीलन" ई एकटा शब्द अछि मुदा एकर उच्चारण -- "परि-शी-लन" होइत अछि मने एकै शब्दमे दू ठाम विराम अछि तँए ऐ शब्दकेँ कोमल करबाक जरूरति नै भेल। अरबी-फारसीक हजारों शब्द मूल रूपसँ मैथिलीमे चलि रहल अछि (मने बिना कोमल केने) कारण ओ शब्द सभमे विराम छै वा रहल हेतै। जँ अहाँ " मैथिली " शब्दक उच्चारण करबै तँ " मै-थिली " उच्चारित हएत।  मुदा विरामक ई सुविधा आकाश, आत्मा, ड्राइवर आदि शब्दमे नै छलै तँए ओकरा कोमल बना प्रयोगमे लेल गेलै। स्वयं पं. जी अपवाद स्वरूप जै शब्दक उदाहरण देने छथि तकरा देखू---बासन—केर उच्चारण बा-सन भेल। मानल--केर उच्चारण मा-नल भेल। अनलहुँ--केर उच्चारण अन-लहुँ भेल। मने एहू शब्द सभमे विराम छै तँए एहू शब्द सभकेँ कोमल करबाक जरूरति नै बुझाएल। जँ ऐ नियमक अधारपर देखी तँ आधुनिक मैथिली भाषाक कतेको शब्दकेँ ठीक करबाक जरूरति बुझाएत। हालेमे दरभंगासँ प्रकाशित मैथिली दैनिक " मिथिला आवाज " ऐ नियमक अधारपर गलत अछि। सही नाम हेतै " मिथिला अवाज" मुदा मैथिलीक जे राहु-शनि-केतु सभ छथि से ऐ नियमक पालन नै क' क' मैथिली भाषाक निजताकेँ तोड़बापर लागल छथि। तँ आब अहाँ सभ बूझि सकै छिऐ जे पं. जी जै नियमकेँ अनिवार्य मानै छथि से मात्र अन्य भाषाक शब्दकेँ मैथिलीकरण करबाक औजार थिक। उच्चारणक आग्रहसँ औजारक जरूरति भैयो सकैत छै आ नहियो भ' सकै छै। ई शब्दकोषीय नियम आजुक कालमे ओतबे महत्वपूर्ण अछि जतेक की पहिने छल। लेखक सभसँ आग्रह जे ऐ नियमसँ अन्य भाषाक शब्दकेँ मैथिलीकरण करथि आ मैथिलीक निजताकेँ सुरक्षित राखथि।ऐ के विपरीत केखनो काल भाषाक निजता रखबाक लेल शब्दकेँ दीर्घ सेहो कएल जाइत छै जेना उर्दूमे उस्ताद मुदा मैथिलीमे ओस्ताद। वकील केर बदलामे ओकील आदि-आदि। तँ एतेक धरि एलाक पछाति हम कहि सकै छी जे ए,ऐ,ओ,औ आदि जै ठाम रहत दीर्घे रूपमे रहत। अकारण रूपसँ वा अपना मोने लघु मानि लेबासँ नीक जे मैथिली भाषामेसँ लघु-गुरू हटा वैदिक छन्दक फेरसँ प्रचलन कएल जाए। ऐसँ अनावश्यक रूपसँ खर्च होइत उर्जा बच'त आ भाषाक विकास सुनिश्चित हएत।

मैथिलीमे बाल गजल

की थिक बाल गजलः किछु लोक "बाल गजल"क नामसँ तेनाहिते चौंकि उठल छथि जेना केओ हुनका अनचोकेमे हुड़पेटि देने हो। जँ एहन बात मात्र मैथिलिए टामे रहितै तँ कोनो बात नै, मुदा ई चौंकब हिन्दी आ उर्दूमे सेहो भए रहल छै। कारण ई अवधारणा मात्र मैथिलिए टामे छै आर कोनो भारतीय भाषामे नै। जँ हम कोनो हिन्दी-उर्दू भाषी गजलकार मित्रसँ"बाल गजल"क चर्च करैत छी तँ चोट्टे कहैत छथि जे उर्दूक बहुत गजलकार सभ बहुत शेरमे बाल मनोविज्ञानक वर्णन केने छथि खास कए ओ सुदर्शन फाकिर द्वारा कहल आ जगजीत सिंह द्वारा गाओल गजल----- "ये कागज की कश्ती वो बारिस का पानी" बला संदर्भ दै छथि आ ई बात ओना सत्य छै मुदा " बाल गजल"केँ फुटका कए ओकरा लेल अलग स्थान मात्र मैथिलिए टामे देल गेलैए। आ ई मैथिलीक सौभाग्य थिक जे ओ "बाल गजल"क अगुआ बनि गेल अछि भारतीय भाषा मध्य।

जहाँ धरि बाल गजलक विषय चयन केर बात थिक तँ नामेसँ बुझा जाइत अछि ऐ गजलमे बाल मनोविज्ञान केर वर्णन रहैत छै। तथापि एकटा परिभाषा हमरा दिससँ ----" एकटा एहन गजल जाहि महँक हरेक शेर बाल मनोविज्ञानसँ बनल हो आ गजलक हरेक नियमकेँ पूर्ववत् पालन करैत हो ओ बाल गजल कहेबाक अधिकारी अछि"। जँ एकरा दोसर शब्दमे कही तँ ई कहि सकैत छी जे बाल गजल लेल नियम सभ वएह रहतै जे गजल लेल होइत छै बस खाली विषय बदलि जेतै। आब आबी बाल गजलक अस्तित्व पर। किछु लोक कहता जे गजल दार्शानिकतासँ भरल रहै छै तँए बाल गजल भैए ने सकैए। मुदा ओहन-ओहन लोक विदेहक अंक-111जे बाल गजल विशेषांक अछि तकर हरेक बाल गजल पढ़थि हुनका उत्तर भेटि जेतन्हि। ओना दोसर बात ई जे कविता-कथा आदि सभ सेहो पहिने गंभीर होइत छल मुदा जखन ओहिमे बाल साहित्य भए सकैए तँ बाल गजल किएक नै ? ओनाहुतो मैथिलीमे गजल विधाकेँ बहुत दिन धरि सायास (खास कए गजलकारे सभ द्वारा) अवडेरि देल गेल छलै तँए बहुत लोककेँ बाल गजलसँ कष्ट भेनाइ स्वाभाविक छै। की बाल गजल लेल नियम बदलि जेतैः जेना की उपरमे कहल गेल अछि जे बाल गजल लेल सभ नियम गजले बला रहतै बस खाली एकटा नियमसँ समझौता करए पड़त। माने जे बहर-काफिया-रदीफ आ आर-आर नियम सभ तँ गजले जकाँ रहतै मुदा गजलमे जेना हरेक शेर अलग-अलग भावकेँ रहैत अछि तेना बाल गजलमे कठिन बुझाइए। तँए हमरा हिसाबेँ ऐठाम ई नियम टूटत मुदा तैओ कोनो दिक्कत नै कारण मुस्लसल गजल तँ होइते छै। अर्थात बाल गजल एक तरहेँ "मुस्लसल गजल " भेल। बाल गजलक पूर्व भूमिकाः तारीखक हिसाबें 24/3/2012केँ बाल गजलक उत्पति  मानल जाएत (एहि पाँतिक लेखक द्वारा 24/3/2012केँ दिल्लीमे साहित्य अकादेमी आ मैलोरंग द्वारा आयोजित कथा गोष्ठीमे ऐ बाल गजल नामक विधाक प्रयोग कएल गेल) मुदा ओकर स्वरूप मैथिलीमे पहिनेहें फड़िच्छ भए चुकल छल। 09 Dec. 2011केँ अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com पर प्रकाशित श्रीमती शांति लक्ष्मी चौधरी जीक ई गजल देखल जाए (बादमे ई गजल मिथिला दर्शनक अंक मइ-जून २०१२मे सेहो प्रकाशित भेलै) आ सोचल जाए जे बिना कोनो घोषणाकेँ एतेक नीक बाल गजल कोना लिखल गेलै------------ शिशु सिया उपमा उपमान छियै हमर आयुष्मति बेटी मैत्रेयी गार्गीक कोमल प्राण छियै हमर आयुष्मति बेटी

टिमकैत कमलनयन, धव-धव माखन सन कपोल पुर्णमासीक चमकैत चान छियै हमर आयुष्मति बेटी

बिहुसैत ठोर मे अमृतधारा बिलखैत ठोर सोमरस शिशु स्वरुपक श्रीभगवान छियै हमर आयुष्मति बेटी

नौनिहाल किहकारी सरस मिश्रीघोरल मनोहर पोथी दा-दा-ना-ना-माँ सारेगामा गान छियै हमर आयुष्मति बेटी

सकल पलिवारक अलखतारा जन्मपत्रीक सरस्वती अपन मैया-पिताश्रीक जान छियै हमर आयुष्मति बेटी

ज्ञानपीठक बेटी छियै सुभविष्णु मिथिलाक दीप्त नक्षत्र मातृ पितृ कुलक अरमान छियै हमर आयुष्मति बेटी

"शांतिलक्ष्मी" विदेहक घर-घर देखय इयह शिशुलक्ष्मी बेटीजातिक भविष्णु गुमान छियै हमर आयुष्मति बेटी

..................वर्ण 22................

तेनाहिते एकटा हमर बिना छंद बहरक गजल अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com आ विदेहक फेसबुक वर्सन http://www.facebook.com/groups/videha/पर 6/6/2011केँ आएल छल से देखू--------------

होइत छैक बरखा आ रे बौआ कागतक नाह बना रे बौआ

देखिहें घुसौ ने चोरबा घर मे हाथमे ठेंगा उठा रे बौआ

तोरे पर सभटा मान-गुमान माएक मान बढ़ा रे बौआ

छैक गड़ल काँट घृणाक करेजमे प्रेमसँ ओकरा हटा रे बौआ

नहि झुकौ माथ तोहर दुशमन लग देशक लेल माथ कटा रे बौआ

तेनाहिते 4 अक्टूबर 2010केँ अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com पर प्रकाशित गजेन्द्र ठाकुर जीक ऐ गजलकेँ देखल जाए----- जे शब्दावलीक आधार पर बाल गजल अछि मुदा अर्थ विस्तारक कारणें बाल आ बूढ़ दूनू लेल अछि-----

बानर पट लैले अछि तैयार बिरनल सभ करू ने उद्धार

गाएक अर्र-बों सुनि अनठेने दुहै समऐँ जनताक कपार

पुल बनेबाक समचा छैक नै अर्थशास्त्र-पोथीक छलै भण्डार

कोरो बाती उबही देबाक लेल आउ बजाउ बुढ़ानुस - भजार

डरक घाट नहाएल छी हम से सहब दहोदिश अत्याचार

ऐरावत अछि देखा - देखा कए सभटा देखैत अछि ओ व्यापार

कविवर सीताराम झा जीक करीब १९४०मे लिखल बाल गजल सेहो छनि। ऐ तीनटा गजलक आधार पर ई कहब बेसी उचित जे बाल गजलक भूमिका बहुत पहिने बनि गेल छल मुदा विस्फोट 24/3/2012केँ भेलै। आ ऐ विस्फोटमे जतेक हमर भूमिका अछि ततबए हिनका सभकेँ सेहो छन्हि। ऐठाम ई कहब कनो बेजाए नै जे विदेहक अंक बाल गजलक पहिल विशेषांक अछि। विदेहक अंक-111 जे की बाल गजल विशेषांक अछि जाहिमे कुल 16 टा गजलकारक कुल 93टा बाल गजल आएल। संक्षिप्त विवरण एना अछि----------- रूबी झा जीक 13टा बाल गजल, इरा मल्लिक जीक 2टा, मुन्ना जीक 3टा, प्रशांत मैथिल जीक 1टा, पंकज चौधरी ( नवल श्री) जीक 8टा, जवाहर लाल काश्यप जीक 1टा, क्रांति कुमार सुदर्शन जीक 1टा, जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल जीक 1टा, अमित मिश्रा जीक 30टा, ओमप्रकाश जीक 1टा, शिव कुमार यादव जीक 1टा, चंदन झा जीक 14टा, जगदानंद झा मनु जीक 6टा, राजीव रंजन मिश्रा जीक 4टा, मिहिर झा जीक 4टा, गजेन्द्र ठाकुर जीक 1टा आ ताहि संगे आशीष अनचिन्हारक 2टा बाल गजल आएल। बाल गजलक आलावे 7टा बाल गजल पर आलेख आएल। आलेख कार सँ छथि---- मुन्ना जी, ओमप्रकाश, चंदन झा, जगदानंद झा मनु, अमित मिश्र आ आशीष अनचिन्हार आ मिहिर झा। आ तारीख 15 अक्टूबर 2012 धरि अनचिन्हार आखरपर कुल 133 टा बाल गजल आ 35टा बाल रुबाइ आबि चुकल अछि संगे संग करीब 10टा बाल गजलपर आलेख उपल्बध अछि। एखन धरिक मुख्य बाल-गजलकारमे श्रीमती शांतिलक्ष्मी चौधरी, जगदानंद झा मनु, अमित मिश्रा, चंदन झा, पंकज चौधरी (नवल श्री) , शिव कुमार यादव, श्रीमती इरा मल्लिक, ओमप्रकाश, मिहिर झा, राजीव रंजन मिश्रा, क्रांति कुमार सुदर्शन, जवाहर लाल कश्यप, श्री मती रूबी झा (ई सभ गोटें अनचिन्हार आखरक http://anchinharakharkolkata.blogspot.comखोज छथि गजलक मामलेमे ),प्रशांत मैथिल,  श्री जगदीश चंद्र ठाकुर " अनिल ", विनीत उत्पल, मुन्ना जी, गजेन्द्र ठाकुर आ हम स्वंय। आब हमरा ई पूर्ण विश्वास अछि जे बाल गजल मैथिलीमे पसरत आ नेना- भुटका केर जीहपर चढ़त।

भक्ति गजल

जखन विदेह द्वारा बाल गजल विशेषांक निकलल रहए तखन केओ नै सोचने रहए जे एतेक जल्दिए गजलक नव प्रारूप " भक्ति गजल " विकिसित भए जाएत। मुदा से भेल आ ताहि लेल सभसँ बेसी धन्यवादक पात्र छथि ओ लोक सभ जे की गजलक निंदा करैत छथि। कारण जँ ओ सभ नै रहितथि तँ आइ गजले नै रहितै.. बाल आ भक्ति गजलक तँ बाते छोड़ू। की थिक भक्ति गजल-- जहाँ धरि भक्ति गजलक विषय चयन केर बात थिक तँ नामेसँ बुझा जाइत अछि ऐ गजलमे भक्ति केर वर्णन रहैत छै। तथापि एकटा परिभाषा हमरा दिससँ ----" एकटा एहन गजल जाहि महँक हरेक शेर भक्ति मनोविज्ञानसँ बनल हो आ गजलक हरेक नियमकेँ पूर्ववत् पालन करैत हो ओ भक्ति  गजल कहेबाक अधिकारी अछि"। जँ एकरा दोसर शब्दमे कही तँ ई कहि सकैत छी जे भक्ति गजल लेल नियम सभ वएह रहतै जे गजल लेल होइत छै बस खाली विषय बदलि जेतै। मे भक्ति गजल बाल गजले जकाँ छै। की भक्ति गजल लेल नियम बदलि जेतैः जेना की उपरमे कहल गेल अछि जे भक्ति गजल लेल सभ नियम गजले बला रहतै बस खाली एकटा नियमसँ समझौता करए पड़त। माने जे बहर-काफिया-रदीफ आ आर-आर नियम सभ तँ गजले जकाँ रहतै मुदा गजलमे जेना हरेक शेर अलग-अलग भावकेँ रहैत अछि तेना भक्ति गजलमे कठिन बुझाइए। तँए हमरा हिसाबेँ ऐठाम ई नियम टूटत मुदा तैओ कोनो दिक्कत नै कारण मुस्लसल गजल तँ होइते छै। अर्थात भक्ति गजल एक तरहेँ " मुस्लसल गजल " भेल। किछु लोक आपत्ति कए सकै छथि जे गजल तँ दार्शनिक रहिते छै तखन ई भक्ति गजल किएक ? उचित प्रश्न मुदा हम कहब जे दर्शन आ भक्ति दूनूमे बहुत अंतर छै जकर चर्चा विद्वान सभ करिते रहै छथि तँए ई भक्ति गजल दर्शन बलासँ अलग भेल। तारीखक हिसाबें भक्ति गजलक उत्पति केँ मानल जाएत जनवरी 2012केँ मानल जाएत जाहिमे जगदानंद झा मनु जीक भक्ति गजल आएल। मुदा ओहूसँ पहिने मिहिर झा द्वारा एकटा आएल जे ताहि समयकेँ हिसाबसँ ठीक छल मुदा बढ़ैत ज्ञानक सङ्ग ओहिमे काफिया आदिक दोष बुझना गेल। मुदा  भक्ति गजल  स्वरूप मैथिलीमे पहिनेहें फड़िच्छ भए चुकल छल।  मैथिलीक प्रारंभिके दौरमे भक्ति गजल शुरुआत भए चुल छल कविवर सीताराम झा आ मधुप जीक गजलसँ सेहो शुद्ध अरबी बहरमे। मने 1928 धरि भक्ति गजल पूर्ण रूपेण स्थापित भए गेल छल मैथिलीमे। तँ एतेक देखलाक पछाति आउ देखी कविवर सीता राम झा आ ओहि समयक किछु भक्ति गजल---तँ आउ देखी 1928मे प्रकाशित कविवर सीताराम झा जीक " सूक्ति सुधा (प्रथम बिंदु )मे संग्रहीत एकटा गजलकेँ जे की वस्तुतः " भक्ति गजल " अछि--- जगत मे थाकि जगदम्बे अहिंक पथ आबि बैसल छी हमर क्यौ ने सुनैये हम सभक गुन गाबि बैसल छी

न कैलों धर्म सेवा वा न देवाराधने कौखन कुटेबा में छलौं लागल तकर फल पाबि बैसल छी

दया स्वातीक घनमाला जकाँ अपनेक भूतल में लगौने आस हम चातक जकां मुँह बाबि बैसल छी

कहू की अम्ब अपने सँ फुरैये बात ने किछुओ अपन अपराध सँ चुपकी लगा जी दाबि बैसल छी

करै यदि दोष बालक तँ न हो मन रोख माता कैं अहीं विश्वास कैँ केवल हृदय में लाबि बैसल छी

एकर बहर अछि-1222-1222-1222-122 मने बहरे हजज

नोट--१) कविक मूल वर्तनीकेँ राखल गेल गेल अछि। विभक्ति सभ अलग-अलग अछि जे की गलत अछि। २) कवि द्वारा चंद्र बिंदु युक्त सेहो दीर्घ मानल गेल अछि जे की गलत अछि। प्रसंग वश ईहो कहब बेजाए नै जे कविवर अपन गजल समेत सभ कवितामे चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि लेने छथि। शायद तँए पं गोविन्द झा जी सेहो चंद्र बिंदुकेँ दीर्घ मानै छलाह आ जकर खंडन भए चुकल अछि। ऐकेँ अलावे मधुप जीक भक्ति गजल अछि। विजय नाथ झा जीक भक्ति गजल अछि। कहबाक मतलब जे अनचिन्हार आखरक आगमनसँ पहिनेहे भक्ति गजल छल मुदा ओकर नामाकरण (पहिल रूपमे जगदानंद झा मनु) अनचिन्हार आखरक पछाति भेल। वर्तमान समयमे हमरा छोड़ि लगभग सभ गजलकार भक्ति गजल लीखि रहल छथि जेना, जगदानंद झा मनु, चंदन झा, अमित मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री, बिंदेश्वर नेपाली, सुमित मिश्र, श्रीमती शांति लक्ष्मी चौधरी, श्रीमती इरा मल्लिक, ओम प्रकाश, बाल मुकुन्द पाठक, जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल, मिहिर झा, प्रदीप पुष्प, अनिल मल्लिक, राजीव रंजन मिश्र इत्यादि-इत्यादि। ऐ विषयमे आर अनुसंधानक जरूरति अछि ऐ छोट आलेख आ हमर छोट बुद्धिमे भक्ति गजल एहन विस्तृत वस्तु ओतेक नै आएल जतेक एबाक चाही। ओना हम फेर विदेहकेँ ऐ विशेषांक लेल धन्यवाद नै देबै कारण हमहूँ विदेह छी आ लोक अपना आपकेँ धन्यवाद कोना देत।

गजलक साक्ष्य

हमरा आगूमे पसरल अछि “अपन युद्धक साक्ष्य” तारानंद वियोगीक गजल संग्रह। चालीस गोट गजलकेँ समेटने। लोककेँ छगुन्ता लागि सकैत छैक जे मैथिलीमे गजलक आलोचना कहिआसँ शुरू भए गेलैक। ऐ छगुन्ताक कारण मुख्यत: हम दू रूपेँ देखैत छी पहिल तँ ई जे गजल कहिओ मैथिली साहित्यक मुख्यधारामे नै आएल दोसर-मैथिल-जन एखनो गजलक समान्य निअम आ ओकर बनोत्तरीसँ परिचित नै छथि। समान्ये किएक अपने-आपकेँ गजल बुझनिहारक सेहो हाल एहने छन्हि। बेसी दूर नै जाए पड़त। “घर-बाहर” जुलाइ-सितम्बर 2008ई.मे प्रकाशित अजित आजादक लेल “कलानंद भट्टक बहन्ने मैथिली गजलपर चर्च” पढ़ि लिअ मामिला बुझबामे आबि जाएत। जँ विष्यान्तर नै बुझाए तँ थोड़ेक देरले तारानंद वियोगीक पोथीसँ हटि अजाद जीक लेखक चर्च करी। ऐ लेखक पहिले पाँति थिक- मैथिलीमे गजल लिखबाक सुदीर्घ परम्परा रहल अछि.....। मुदा कतेक सुदीर्घ तकर कोनो ठेकाना अजादजी नै देने छथिन्ह। फेर एही लेखक दोसर पैरामे अजित जी दूमरजामे फँसल छथि। ओ मैथिल द्वारा समान्य गप-सप्पमे गजलक पाँति नै जोड़बाक प्रथम कारण मानैत छथि। जे मैथिलीमे शेर एकदम्मे नै लिखल गेल। आब पाठकगण कने धेआन देल जाए। लेखक पहिल पाँति तँ अपनेकेँ धेआन हेबोटा करत जे मैथिलीमे गजलक सुदीर्घ....।” सभसँ पहिल गप्प जे गजल किछु शेरक संग्रह होइत छैक आ दोसर गप्प ई जे जँ अजाद जीक मोताबिक शेर लिखले नै गेलैक तँ फेर कोन प्रकारक सुदीर्घ परंपराकेँ मोन पाड़ि रहल छथि अजादजी। ऐठाम गलती अजाद जीक नै मैथिलीक ओहि गजलकार सभक छन्हि जे गजल तँ लिखैत छथि मुदा पाठककेँ ओकर परिचए, गठन, निअम आदि देबासँ परहेज करैत छथि। ओना प्रसंगवश ई कहबामे कोनो संकोच नै जे गजल कखनो लिखल नै जाइत छैक। मुदा मैथिलीक धुरंधर सभ गजल लिखैत छथि। मूल रूपसँ अरबी-फारसी-उर्दूमे गजल कहल जाइत छैक लिखल नै। पाठकगण गजलक ई निअम भेल। आब फेरो अजित जीक लेखकेँ आगू पठू आ अपन कपार पीट अपनाकेँ खुने-खूनामे कए लिअ। अजित जी अपन संपूर्ण लेखमे जै शेर सभ मक्ता कहलखिन्ह अछि वस्तुत: ओ मक्ता छैके नै। पाठकगण मोन राखू, मक्ता गजलक ओहि अंतिम शेरकेँ कहल जाइत छैक जैमे गजलकार (एकरा बाद हम शाइर शब्द प्रयुक्त करब, अहूठाम मोन राखू शायर गलत उच्चारण थिक।) अपन नाम वा उपनामक प्रयोग करैत छथि। (अहूठाम मोन राखू हरेक गजलमे नाम वा उपनामक समान प्रयोग होएबाक चाही ई नै जे एकरा गजलक मक्ता तारानंदसँ होअए आ दोसर गजलक मक्ता वियोगीक नामसँ नामसँ।) मुदा आश्चर्य रूपेण अजादजी जै शेर सभकेँ मक्ता कहलखिन्ह अछि ओइमे कोनो शाइरक नाम- उपनाम नै भेटत। ओना अजितजी हिन्दीक सुप्रसिद्ध शाइर छथि तकर प्रमाण ओ लेखक प्रारंभेमे दए देने छथि। हँ तँ ऐ लेखक संक्षिप्त अवलोकनक पछाति फेरसँ वियोगी जीक गजल संग्रहपर चली। तँ शुरूआत करी स्पष्टीकरणसँ, हमर नै वियोगी जीक। सभसँ पहिने ई जे अन्य मैथिली शाइर जकाँ वियोगीओ जी मानैत छथि जे गजल लिखल जाइत छैक। दोसर गप्प जे वियोगीजी द्वारा देल अपन भाषा संबंधी विचारसँ लगैत अछि जे भनहि वियोगीजी उर्दू सीख उर्दूक पोथी पढ़ैत हेताह मुदा गजल तँ किन्नहुँ नै लिखैत हेताह,कारण, पाठकगण धेआन देल जाए। अरबी-फारसी-उर्दू तीनू भाषाक छंद शास्त्र एकमतसँ कहैए जे दोसर भाषाकेँ तँ छोड़ू अपनो भाषाक कठिन शब्दक प्रयोग गजलमे नै हेबाक चाही। ठीक उपरोक्त भाषाक निअम जकाँ मैथिलीओ मे निअम छैक। तँए महाकवि विद्यापति अपन कोनहुँ गीतमे कृष्ण, विष्णु आदिक प्रयोग नै केने छथि। मुदा वियोगी जी अपन पोथीक नाम रखने छथि “अपन युद्धक साक्ष्य”। जनसमान्य युद्ध तँ कहुना बुझि जेतैक मुदा साक्ष्य....। ऐठाम प्रसंगवश ई कहब बेजाए नै जे वियोगीजी अपनाकेँ अनअभिजात शब्दक प्रयोग मानैत छथि। आब हमरा लोकनि ऐ पोथीमे प्रस्तुत चालीसो गजलक चर्च करी। पहिले भाषाकेँ देखी। ओना वियोगीजी भाषा संबंधी गलती जानि बूझि कए लौल-वश ततेक ने कएल गेल छैक जकरा अनठा कए आँगा बढ़ब संभब नै। एकर किछु उदाहरण प्रस्तुत अछि- दोसर गजलक मतलाक दोसर पाँतिमे दुखक बदला यातना। अही गजलक दोसर शेरक पहिल पाँतिमे नाराक बदला जुमला। तेसर गजलक दोसर गजलक दोसर शेरक दोसर पाँति धधराक बदला ज्वलन। अही गजलक अंतिम शेरमे प्रयुक्त तन्वंग, आब एकर अर्थ जनताकेँ बुझबिऔ। फेर आगू गजलक दोसर शेरमे नजरि केर बदला दृष्टि, दसम गजलक दोसर शेरमे उन्यक जगह विपरीत। एगारहम गजलक मतलामे दुबिधाक जगह द्धैध। तेरहम गजलक तेसर शेरमे नेकदिली आ बदीक प्रयोग। तइसम गजलक अंतिम शेरमे भटरंगक बदला बदरंग। पचीसम गजलक तेसर शेरमे इजोरिआक बदला ज्योतसना। चौतीसम गजलक मतलामे दुख केर बदलामे पीड़-इत्यादि। ओना ऐ उदाहरणक अतिरिक्त हरेक गजलमे हिन्दी, उर्दू, संस्कृत आदि भाषाक तत्सम बहुल शब्दक ततेक ने प्रयोग भेल छैक जे गजलक मूल स्वर, भाव-भंगिमा, रसकेँ भरिगर बना देने छैक। तैपर वियोगीजी गर्व पूर्वक घोषणा केने छथि जे ओ ओइ परिवारक नै छथि जिनका संस्कारमे अभिजात शब्द भेटल हो। बिडंबना छोड़ि एकरा किछु नै कहल जा सकैए। जँ चालीसो गजलक भाषाकेँ धेआनसँ देखल जाए तँ हमरा हिसाबें वियोगीजी ऐ गजल सबहक मैथिली अनुवाद कए देथिन्ह तँ बेसी नीक हेतैक। भाषासँ उतरि आब गजलक विचारपर आएल जाए। बेसी दूर नै जाए पड़त-तेसर गजलक अंतिम शेरसँ मामिला बुझबामे आबि जाएत। सोझे-सोझ ई शेर कहैए जे- लोककेँ अपन जयघोष करबामे देरी नै करबाक चाही आ काज केहनो करी चान-सुरूजक पाँतिमे अएबाक जोगाड़ बैसाबी। ओना हम एतए अवश्य कहब जे ई कोनो राजनीतिक विचार नै छैक जकर स्पष्टीकरण दए-वियोगीजी अपन पतिआ छोड़ा लेताह। ई विशुद्ध रूपे समाजिक विचार छैक आ ऐ विचारसँ समाजपर की नकारात्मक प्रभाव पड़लैक वा पड़तैक तकर अध्ययन अवश्य कएल जेबाक चाही। मुदा एहन नकारत्मक विचार ऐ संग्रहमे कम्मे अछि। संग्रहक किछु सकारात्मक विचार प्रस्तुत अछि। दसम गजल केर अवलोकन कएल जाउ। निश्चित रूपसँ वियाेगीजी एकरा परिर्वतनीय विचार रखलाह अछि ई कहि जे- देस हमर जागत अच्रक एना चलि ने सकत हारि लिखब झण्डा के आदमीक जीत लिखब। पाठकगण आजुक समएमे झण्डाक विपरीत गेनाइ सहज गप्प नै। तहिना चारिम गजलक तेसर शेरक पहिल पाँति- राम राज्यक स्थापना लेल भरत-लक्ष्मण झगड़ि रहला। कतेक सटीक व्यंग अछि से सभ गोटे बुझैत हेबैक। ओतै आजुक भ्रमोत्पादक सरकारपर तै दिनमे लिखल अड़तीसम गजलक मतलाक पहिल पाँति देखू- राजनीति भटकल तँ डूबल मझधार जकाँ। विचार संबंधी प्रस्तुत उदाहरणसँ स्पष्ट अछि जे सकारात्मक विचार बेसी अछि। मुदा कहबी तँ सुननहि हेबैक अपने जे एकैटा सड़ल माछ.....। अस्तु आब ऐ गजल संग्रहक व्याकरण पक्षकेँ देखल जाए। ऐठाम ई स्पष्ट करब आवश्यक जे मैथिली गजल अखनो फरिच्छ भए कए नै आएल अछि जैसँ हम बहर (छंद) आदिपर विचार करब। तँए ऐठाम हम मात्र रदीफ आ काफियाक प्रयोगपर विचार करब। पाठकगण गजलमे रदीफ ओइ शब्द अथवा शब्द समूहकेँ कहल जाइ छैक जे गजलक मतलाक (गजलक पहिल शेरकेँ मतला कहल जाइत छैक।) दुनू पाँतिमे समान रूपसँ आबए आ तकरा बाद हरेक शेरक अंतिम पाँतिमे सेहो समान यपे रहए। तहिना काफिया ओइ वर्ण अथवा मात्राकेँ कहल जाइत जे रदीफसँ तुरंत पहिने आबैत हो जेना एकटा उदाहरण देखू- दूटा शब्द लिअ, पहिल भेल अनचिन्हार ओ दोसरमे अन्हार। आब मानि लिअ जे ई दुनू शब्द कोनो गजलक मतलामे रदीफक तुरंत बादमे अछि। आब जँ गौरसँ देखबै तँ भेटत जे दुनू शब्दक तुकान्त “र” छैक। तँ एकर मतलब जे “र” भेल काफिया (काफिया मतलब तुकान्त बूझू) तेनाहिते मात्राक काफिया सेहो होइतैक जेनाकि- राधा आ बाधा दुनू शब्द आ'क मात्रासँ खत्म होइत अछि तँए ऐमे आ'क मात्रा काफिया अछि। “एहि” आ “रहि” दुनूमे इ'क मात्राक काफिया अछि। अन्य मात्राक हाल एहने सन बूझू। तँ फेर चली ऐ संग्रहक व्याकरण पक्षपर- ऐ संग्रहक किछु गजलमे काफियाक गलत प्रयोग भेल छैक- उदाहरण लेल सातम गजलकेँ देखू। मतलाक शेरमे काफिया अछि “न” (भगवान आ सन्तान)। मुदा वियोगीजी आगू देासर शेरमे काफिया “म” (गुमनाम) केँ लेलखिन्ह अछि जे सर्वथा अनुचित। तेनाहिते सताइसम गजलक उपरोक्त “म” काफिया बदलामे “न” काफियाक प्रयोग। कुल मिला कए ई गजल संग्रह ओतेक प्रभावी नै अछि जतेक की शाइर कहैत छथि। हँ एतेक स्वीकार करबामे हमरा कोनो संकोच नै जे ई गजल संग्रह ओइ समएमे आएल जै समएमे गजलक मात्रा कम्मे छल। आ शाइर आ गजल संग्रह सेहो कम्मे जकाँ छल।

सूर्योदयसँ पहिने सूर्यास्त "सूर्यास्तसँ पहिने" ई नाम छन्हि राजेन्द्र विमल जीक गजल संग्रहक। ऐ संग्रहक भूमिका केर अंतिम भागमे विमल जी लिखै छथि जे ई मैथिलीक पहिल संग्रह अछि जाहिमे 100 ( एक सए ) गजल प्रस्तुत कएल गेल अछि। मुदा हमरा जनैत 1985मे प्रकाशित गजल संग्रह " लेखनी एक रंग अनेक " जे की रवीन्द्र नाथ ठाकुरकेँ छन्हि ताहिमे कुल 109टा गजल देल गेल छै आ संगे-संग कता सेहो छै। तखन विमल जीक ऐ पहिल सन घोषणाकेँ की मतलब ? ई भए सकैए जे विमल जी एकरा नेपालीय मैथिलीकेँ संदर्भमे लिखने होथि मुदा तखन तँ आर गड़बड़ ............ कारण विमल जीक ऐ संग्रहमे कुल 4 (चारि) टा गजल एहन अछि जे की दोहराएक गेल छै। मतलब जे जँ शुद्ध रूपसँ देखी तँ ऐ संग्रहमे कुल ९६टा गजल अछि। हमरा विमल जी एहन लोकसँ ई उम्मेद नै छल जे ओ " पहिल "केँ फेरमे पड़ि एहन काज करताह। इतिहासकेँ अपना फायदा लेल गलत करताह। आब नेपालक सुधि समीक्षक सभ कहताह जे की बात छै। हमर ई टिप्पणी मात्र इतिहास शुद्धता लेल छै। गजल संख्या 19 आ 20 एकै गजल अछि। 29 आ 30 एकै गजल अछि। 31 आ 33 एकै गजल अछि। तेनाहिते 56 आ 61 एकै गजल अछि।... जँ गंभीरता पूर्वक पढ़ल जाए तँ राजेन्द्र विमल जीक कथित गजल संग्रह " सूर्यास्तसँ पहिने " मे बहुत रास एहन रचना भेटत जे की मात्र गीत अछि गजल नै। पता नहि चलि रहल अछि जे गीतकेँ गजल संग्रहमे कोन काज छै।....................... राजेन्द्र विमल जीक कथित गजल संग्रहमे बहुत रास गीत सभ सेहो अछि। तँ देखल जाए कोन-कोन गीत अछि---पृष्ठ संख्या--1,2,3,14,19,20,23,27,34,42,आ 47क दोसर कथित गजल गीत अछि। तेनाहिते पृष्ठ संख्या--4,7,8,9,10,11,16,18,29,31,32,36,39 पर कथित रचना बिना बहरक गजल भए सकैत छल मुदा लेखक ओकरा कविता बला ढ़ाँचामे देने छथि। आन कथित गजल सभ गजलक ढ़ाँचामे अछि तँए हम ई मानबा लेल बाध्य भए जाइत छी जे कविताक ढ़ाँचा बला सभ कविता अछि। कारण विमल जीकेँ कविताक ढ़ाँचा आ गजलक ढ़ाँचामे नीक जकाँ अंतर बूझल छन्हि। आ एकर प्रमाण ओ अपन कथित संग्रहमे सेहो देने छथि। चूँकि ऐ आलोचनाक प्रारम्भिक भाग २०१२क मध्यमे फेसबुकपर देने रही आ तइ क्रममे एहमर एही आलोचनापर किछु टिप्पणी आएल। ऐ टिप्पणीमे प्रेमर्षि जी एकरा प्रेसक गड़बड़ी कहलन्हि। चलू ओतए धरि ई बात मानल जा सकै छै............. मुदा गीत आ कविताकेँ गजल कहि पाठककेँ बेकूफ बनेबाक आ रेकार्ड बनेबाक सेहन्ता किनका रहल हेतन्हि। आचार्य राजेन्द्र विमल जीकेँ वा प्रेस बलाकेँ................ तँए जँ कदाचित संख्या बला गड़बड़ी प्रेससँ भेल छै तैयो गीत आ कविता बला गड़बड़ी तँ विमले जीक छन्हि। दोसर गप्प जे मानि लिअ ई प्रेसक गड़बड़ी छै आ ऐ संग्रहक सभ रचना गजल अछि तैयो संदेहक घेरामे विमल जी छथि मात्र विमल जी नै मैथिली गजल (कथिते बला) संबंधी ज्ञान सेहो संदेहक घेरामे अछि कारण जखन १९८५एमे १०९ बला गजल संग्रह प्रकाशित भेलै... तखन विमल जीक घोषणा मात्र पहिल बला बेमारीक लक्षण अछि। तँ आब चलू कने फेसबुक परहँक ओइ बहस दिस जे की ऐ आलोचनापर जे की हमरा आ धीरेन्द्र प्रेमर्षि जीक भेल छल---( हलाँकि ई बहस ऐ ठाम हम ऐ द्वारे दए रहल छी जैसँ पाठक ई बुझथि जे मैथिलीमे आलोचना नै सहबाक जड़ि कते गँहीरमे गेल अछि)---- Dhirendra Premarshi अइ बातपर एम्हर बहस भऽ चुकल छै। प्रकाशकक गलतीक कारणे किछु गजलक पुनरावृत्ति भेल छै। मैथिलीमे ई बड भारी समस्या छै जे लेखनमे जतेक ध्यान देल जाइ छै तते प्रकाशनक क्रममे होबऽ वला काजमे नइ। जहाँतक इतिहासक जे बात अछि ताहि सन्दर्भमे शायद अहाँ जनैत हएब जे रवीन्द्रनाथ ठाकुरजीक पोथीमे गजल कत आ शायरी सेहो सम्मिलित छनि। नेपालक सन्दर्भमे पहिल सम्पूर्ण मैथिली गजल सङ्ग्रह अवश्य कहल जा सकैए। ओना मिश्रित संग्रहक रूपमे रामभरोस कापडि आ राजविराजक एक कोनो माझी सेहो गजलक पोथी बाहर कऽ चुकल छथि। Ashish Anchinhar कता आ शायरी छोड़ि कुल 109टा गजल देने छथिन्ह रवीन्द्रनाथ ठाकुर। प्रकाशक केर गलती भए सकै छै मुदा भूमिका तँ विमले जीक छन्हि।... Ashish Anchinhar शायद अहाँ ईहो जनैत हएबै जे कता, रुबाइ आ अन्य शायरी विधा ( खाली नज्म छोड़ि) गजलक अंतर्गत अबै छै।... Dhirendra Premarshi-  आशिषजी, अहाँ ओइ माध्यमसँ काज कऽ रहल छी जकर सम्पूर्ण नाथ, पगहा अहाँक हाथमे रहैए। मुदा छापा माध्यम एहन होइ छै जइमे अहाँक सभ कएल धएल पानि भऽ सकैत अछि जँ प्रेसमे काज कएनिहार किछु गडबड कऽ देलक तँ। भूमिका बाँकी सभ चीज छपि गेलाक बाद नइ भऽ सामान्यतया आरम्भेमे लिखल जाइ छै। विमल सर सएटा गजल आ तदनुरूप भूमिका लीखिकऽ छापऽ लेल देने रहखिन। प्रकाशनमे संलग्न व्यक्तिसभ मेहीँ आँखिएँ नहि देखि सकल हेथिन आ किछु गजलक पुनरावृत्ति भऽ गेल हेतै। अहाँक जानकारीक लेल कहि दी जे ई गलती सभसँ पहिने हमरा विमले सर देखौलनि। आब अहाँक कहब ई जे जखन अइ तरहेँ गलती भऽकऽ आबि गेलै तँ की विमल सर सभ किताबके जरा दितथिन? क्यो व्यक्ति जँ तकनिकी आ शारीरिक रूपेँ सभ कार्य स्वयं करबामे सक्षम नहि अछि तँ एकर मतलब ई नइ होइ छै जे ओकर कोनो एक बातकेँ लऽकऽ ओकरा लुलुआ देल जाए। अहाँक जानकारीक लेल इहो कहि दी जे विमल सरक दू सयसँ बेसी गजल जहिँतहिँ छिडिआएल पडल हेतनि। हँ, जँ अहाँके किछु कहबाके छल तँ ओइ पोथीक भूमिकाक सन्दर्भमे कहि सकैत छलियैक जे बहुत विद्वतापूर्णसन देखल जाइतहुँ पोथीमहक गजलसभसँ तादात्म्य स्थापित नहि कऽ पबैत अछि। Ashish Anchinhar अहाँ एकरा गलत संदर्भमे लए रहल छिऐ। ई मात्र इतिहास शुद्धता लेल छै। व्यतिगत रूपसँ ऐमे हम किछु नै कहि सकैत छी।.. Dhirendra Premarshi अहाँके पल्लवक गजल अंक भेटल? Dhirendra Premarshi जखन अहाँ 'प्रकाशक केर गलती भए सकै छै मुदा भूमिका तँ विमले जीक छन्हि।' लिखबै तँ ओकर आशय गलते लगै छै। अभियानीसभकेँ बहुतो बातक अन्तर्वस्तुकेँ सेहो बूझैत इतिहासक शुद्धिकरण करैत चलबाक चाही। ऐ वार्तालापसँ एकटा गप्प ईहो निकलैए जे प्रेमर्षिजीकेँ गजल परम्पराक कोनो जानकारी नै छन्हि। अरबी-फारसी-उर्दूमे " दीवान " शब्दक प्रयोग कएल जाइत छै जैमे गजल, कता, रुबाइ, नज्म आदि सभ रहै छै। जेना दिवाने गालिब (मने गालिब केर एहन संग्रह जैमे गजल, कता, रुबाइ, नज्म आदि संग्रहीत छै, तेनाहिते दीवाने मीर, दीवाने नासिख, आदि भेल। हँ, आधुनिक युगमे किछु उर्दूक गजलकार सभहँक एहनो दीवान अछि जैमे खाली गजल छै। मुदा तँए अहाँ ई कहि देबै जे नै खाली पोथीमे गजले रहबाक चाही तँ से कतौसँ उचित नै.......... एकटा गप्प आर प्रेमर्षिजी विमलजीक समर्थनमे एते धरि कहै छथि जे.." क्यो व्यक्ति जँ तकनिकी आ शारीरिक रूपेँ सभ कार्य स्वयं करबामे सक्षम नहि अछि तँ एकर मतलब ई नइ होइ छै जे ओकर कोनो एक बातकेँ लऽकऽ ओकरा लुलुआ देल जाए।" आब ई देखू जे जँ ऐ अधारपर हम विमलजीकेँ जँ लुलुआ (आलोचनाकेँ हम लुलुएनाइ नै बूझै छी ई प्रेमर्षिजीक विचार छन्हि) नै सकै छी तँ फेर मात्र एकटा अधारपर प्रेमर्षिजी रवीन्द्रनाथ ठाकुरकेँ इतिहाससँ बाहर किएक क' देलखिन्ह? ऐ प्रश्नक उत्तर हम मात्र भविष्यसँ चाहै छी। ऐ वार्तालापकेँ कात करैत हमरा लोकनि फेर चली विमल जी पोथीपर। विमलजी अपन पोथीमे गजलक परिभाषा, तत्व, बहर आदिक वर्णन केने छथि (मुदा अपूर्ण रूपसँ खास क' बहरक लेल)। ओना ई विवरण अनचिन्हार आखरपर २००९सँ प्रकाशित छै आ विमल जीक ई पोथी २०११मे आएल छन्हि। विमलजी स्वयं इंटरनेट ओ फेसबुकपर छथि। मुदा विमलजी द्वारा देल गेल विवरण पढ़लापर ई प्रश्न अबैत अछि जे पोथीक भित्तर देल गेल गजल सभमे ई बहर, तत्व आदि किएक नै अछि ? एकर बहुत रास कारण भ' सकैए मुदा हमरा बुझने सभसँ प्रमुख कारण छै जे मात्र विद्वता देखब' लेल ई विवरण कतौसँ सायास लेल गेल छै (मने ईंटा किनको, सीमेन्ट किनको आ घर बनल विधायक जीक)। तँए भूमिकामे देल गेल विवरण आ भित्तरक गजल सभमे दूर-दूर धरि ताल-मेल नै बैसैए। ऐ पाँति धरि अबैत-अबैत अहाँ सभ बूझि गेल हेबै जे ऐ गजल संग्रहमे बहुत झोल-झाल छै। मात्र व्याकरणक दृष्टिएँ नै नैतिक दृष्टिकोणसँ सेहो। ओना जँ भावना आ व्याकरण ठीक रहैत तँ ऐ संग्रहक किछु गजल नीक बनि पड़ैत जेना की ५३म गजल, ८३म गजल आदि। किछु गजल नीक जकाँ नेपालक राजनीतिकेँ घेरने अछि तँ किछु गजल पूरा मैथिली समाजकेँ । भाव आ बिंब तँ प्रायः मैथिलीक हरेक लेखकक नीक रहैत छनि तँ हिनकर किए खराप हेतन्हि। हिनको भाव पक्ष नीक छन्हि।

मैथिली गजलक वर्तमान अनचिन्हार आखरक जन्मसँ पहिने (इंटरनेट पर) किछु गजलकार, समालोचक सभपर आरोप लगबैत छथि जे ओ गजलकेँ बुझि नै सकलाह। मुदा हमरा बुझने आलोचक सही छथि आ गजलकार गलत। कारण मैथिलीक किछु तथाकथित गजलकार सभ अपने गजलकेँ नै बूझि सकलाह। जकर परिणति अबूझ शेर सबहक रूपमे भेल। आ स्वाभाविक छै जे एहन-एहन गजलकेँ आलोचक नकारबे करतथि। वर्तमान गजल-- अ.आ. (अनचिन्हार आखर) क बाद गजल अबूझ नै रहल। से हम किछु शेरक उदाहरणसँ देब। 1) कोनो राजनीतिक पार्टी हो सभहँक स्थितिकेँ परखैत मिहिर झा कहैत छथि--- छोड़ि दिऔ हाथ देखिऔ केम्हर जाइ छै जेतै तँ ओ उम्हरे सब जेम्हर खाइ छै

कुन्दन कुमार कर्णजी कहै छथि--

नेताक भेषमें सभ कामचोर छैक तामससँ लोक देशक तेँ अघोर छैक

मुदा एकर परिणाम की भेलै सेहो कहै छथि कुन्दन जी-- चुल्हा गरीबके दिन राति छैक बन्द जे छैक भ्रष्ट घर ओकर इजोर छैक

ककरा करत भरोसा आम लोक आब निच्चा अकान उप्पर घूसखोर छैक

आ जखन सभ मसिऔते छै तइकेँ कुन्दन जी एना कहै छथि--

आलोचना करत 'कुन्दन' कतेक आर जे चोर ओकरे मुँह एत जोर छैक

ओमप्रकाश जी राजनीतिकेँ एना देखै छथि--

टाल लागल लहासक खरिहानमे गाम ककरो उजडलै फेरसँ किए

बहुत मेहीं रूपसँ ओमप्रकाश जी आजुक राजनीति केर वास्तिविकता आ परिणामकेँ एकै शेरमे देखा गेल छथि। खेल भ' रहल छै मुदा सभ अकान बनल अछि आ ओमप्रकाश जी टाहि द' रहल छथि--- निर्जीव भेल बस्ती सगर सूतल सुतनाइ यैह सबहक जान लेतै

आ टाहिए देब असल गजलकारक धर्म थिक। मुदा जँ टाहिए देबए बला चोर हो त? त एहन परिस्थिति बेसी दिन बरदास्त नै कएल जा सकैए आ तँए ओम प्रकाश जी कहैत छथि--- मान-अपमान दुनू भेटै छै, ई मायाक थीक लीला, अन्याय केँ सदिखन दी मोचाड़ि, यैह थीक जिनगी।

श्रीमती इरा मल्लिक जी अइ स्थितिकेँ एना क' देखै छथि-- बाट जाम होय कि मगज विकास रुकबे करत बेइमान हो नेता ते, देश के नैया डूबबे करत

एही स्थितिपर स्वाती लाल जीक विचार देखू--

समाज केना सहि रहल छै तालिबानी पाएर पसारैत देखलौं निर्दोष सब के खून स ओकरा अपन पियास बुझाबैत देखलौं

आन'क घर के "भगत" शहीद होय देश राग हम गाबैत देखलौं शहीद सब के लास पर चढि क’ ओकरा कुर्सी पाबैत देखलौं

फेर स्वाती जी ऐ स्वरकेँ अकानै छथि--

सीता के गुण गान करै छि केलहुँ हुनके कात किनार चिर हरण देखैत रहलौं बैसल रहलौं भs लाचार

बाट चौबटिया जत्तै देखू आदर्श के छि प्रतिरुप अहां स्त्री जाती सँ धर्म अपेक्षित कर्म करै त होय प्रहार 2) विस्थापित भ' क' जीब कठिन। विस्थापित लोकक दुख जगदानंद झा मनु जीक स्थायी दुख छनि— सोन सनक घर-आँगन, स्वर्ग सन हमर परिवार छोड़ि एलहुँ देस अपन दू-चारि टकाक बेपार पर xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx कोना अहाँकेँ घुरि कहब आबै लेल बड़ दूर गेलहुँ टाका कमाबै लेल

3) एही समाजक एकटा आर पहलू पर उमेश मंडल कहैत छथि--- कि‍यो ककरो नहि‍ देखैए ऐ समाजमे मोने मन झगड़ाइए चलू घुरि‍ चली 4) आधुनिक मीडिआपर क्रूरतम प्रहार करैत मैथिलीक दोसर मुदा सक्षम महिला गजलकार श्रीमती शांतिलक्ष्मी चौधरी कहैत छथि--- पापक पराकाष्ठामे जन्मै श्रीकृष्ण मीडिआ छथि जागल कंसक भेषमे आ एतबहि पर नै रुकैत छथि। आ फेरो कहैत छथि---

सोसल साइट पर करैत छै सेंसर के दाबी रे भाय अभिव्यक्तिक स्वच्छंद साँढ़ मुँह बन्हबै की जाबी रे भाय 5) प्रेम आ प्रेम जनित वेदना गजलक प्रमुख अंग थिक। बिना एकरा गजल झुझुआन लागत। वर्तमान गजलमे इहो भेटत। राजीव रंजन मिश्रजी कहै छथि— चान राति सन सजल मुस्कान हुनक मारुक जान प्राण हति रहल मुस्कान हुनक मारुक

आ इएह प्रेम जँ परिपक्व भऽ जाए तखन त्रिपुरारी कुमार शर्मा जीक शेर जन्मैए--- आँखि मिला कऽ हमरा सँ राह पकड़ लेलि अहाँS कोना कटै अछि दिन आब रचना गवाह अछि हमर मिहिर झा जीकेँ बूझल छन्हि जे ई वेदना किएक छै तँए ओ कहैत छथि— हमरा अहाँ तोड़लहुँ सपना बुझि कऽ हमरा अहाँ छोडलहुँ अपना बुझि कऽ मुदा एतबो भेलाक बादो मैथिली ओ भाषा थिक जाहिमे विद्यापति सन कवि भेलाह। विद्यापति आशावादक सभसँ बड़का कवि छथि। आ हमर ओम प्रकाश जी एही आशाकेँ पकड़ि कहैत छथि--- झाँपै लेल भसियैल जिनगीक टूटल धरातल, सपनाक नबका टाट भरि दिन बुनैत रहै छी। अमित मिश्रा जी कहै छथि-- तरेगण लाख छै तैयौ नगर अन्हार रहिते छै बरू छै भीड़ दुनियाँमे मनुख एसगर चलिते छै आशा आ संघर्ष एक दोसराक पूरक छै--- तँए कुन्दन कुमार कर्ण कहै छथि-- बुझि संघर्ष जियबै जखन जिनगी शान अभिमान छी दार्शनिकता गजल स्थायी भाव छै--- हम ऐ पक्षकेँ राजीव रंजन मिश्र जीक शेरसँ देखाएब-- ऐ उदास मोनक हाल के बुझत ओलि सभकँ सभ सभतरि सधा रहल चंदन झा बिल्कुल नव भावमे ऐ दार्शनिकताकेँ अकानै छथि-- नैनक काजर पर मोहित छै सगरो जगत जड़ैत डिबियाकेर मोनक मरम के बुझत ?

जँ अहाँ मैथिल छी ताहूमे साहित्यकार आ जँ बाढ़िक दर्द नै भेल तँ अहाँक मोजर सुन्ना। मुदा गजल ऐ दर्द के नीक जकाव देखर केलक आ राजीव रंजन मिश्रजीक अवाजमे बाजि उठल---

पूजल देवी सरिस मानि लोक धरि कपार कहियो कोशी त' कहियो बलान मारि गेल साम्प्रदायिकता लेल राजीव रंजन मिश्र जीक बयान छनि-- नै राम रहीमक झोक रहय नै वेद कुरानक टोक चलय

जँ गप्प मिथिला आंदोलन हुअए तँ गजल ओहूमे पाछू नै हटल। आगू बढ़ि पंकज चौधरी नवल श्री कहै छथि- मैथिली भाषा अपन अछि मैथिलक बड़ पैघ तागत

एकता मैथिल जँ राखब सुतल मिथिला फेर जागत Xxxxxxxxxxxxxxxxxx पकडू रेल चलू दिल्ली भरबै जेल चलू दिल्ली

धरना देब करब अनशन मिथिला लेल चलू दिल्ली

क्रांतिक धार "नवल" बहलै लड़बा लेल चलू दिल्ली कुल मिला मैथिली गजल पूरा-पूरी विकसित भ' गेल अछि आ ई कोनो भावकेँ व्यक्त करबामे समर्थ अछि (ऐ लेखमे मात्र हम गजलक उदाहरण देलहुँ अछि। बाल गजल आ भक्ति गजल बाँकिए अछि।)। जकर बानगी उपरक उदाहरण सभमे देखल जा सकैए। मैथिली गजलक भविष्य पर हमर कोनो टिप्पणी नै रहत कारण हम कोनो ज्योतिषी नै छी। आ अतीतो पर नै कहब कारण ई सभकेँ बूझल छैक। ओना मंजर सुलेमानक आलेखक बाद मैथिली गजल निश्चित रूपे पाछाँ गेल (जीवन झासँ पाछाँ) जे स्वागत योग्य अछि।

विहनि कथा- खाए बला पार्टी आइ साँझमे बड्ड दिनक पछाति भोजन बनेबाक अवसर भेटल। पिता श्री आ माँझिल भाएकेँ पुछलिअन्हि जे की खेबै ?  अरे भाइ तों जे आगूमे देबही से खा लेबै। हम सभ तँ खाए बला पार्टी छी ... आ ओही रातिमे हम सपना देखलहुँ जे हमर पिता श्री आ माँझिल भाए नेता बनि क' मंचपर छथि आ राजनीतिक पार्टी बनेबाक घोषणा क' रहल छथि। बाल मुकुन्द पाठक, ग्राम + पोस्ट- करियन,  थाना - रोसड़ा ,जिला- समस्तीपूर प्रेम : वरदान वा अभिशाप

गर्मीक दिन छल ,साँझक समय ।ऐहन समयमे डूबैत सूरूजक दृश्ये किछु अजीब होएत अछि ,जेना किछु व्याकुल , किछु उदास-सन , किछु कहैत मुदा चुपे - चाप सूरूज डूबि रहल छल ।साउनक मासमे गंगाक कातसँ अथाह पानिक पाछाँ सूरूज डूबबाक चित्रे मोनमे कए तरहक प्रश्न प्रकट कऽ दैत अछि । ॰ ॰ ॰ कि एका- एक राजीव फोन देखैत अछि , ककरो फोन नै आएल रहैक । ओ अपन शर्टक जेबमे हाथ दैत अछि आ सिगरेटक डिब्बा निकालि लैत अछि , डिब्बा खोलि ओहिमेसँ एकटा सिगरेट निकालि लैत अछि , सिगरेट सुलगा डिब्बा पानिमे फेँक दैत अछि , शायद एक्केटा सिगरेट ओहिमे बचल रहैक । ओ सिगरेटक कश खीचैत गंगाक धारमे हिलैत - डोलैत सिगरेटक डिब्बाक आगू जाएत देख रहल छैक आ ता धरि देखैत रहल जा धरि उ डिब्बा विलुप्त नै भेलै , ओ किछु उदास भऽ गेल जेना ओकर किछु अपन छूटि दूर चलि गेल होए । ॰ ॰ आ कि जेना ओकरा किछु फुरायल होए ओ अपन मोबाईल देखैत अछि कोनो फोन नै आएल रहैक । ओ अपन मुख पश्चिम दिस करैत अछि , सूरूज आधा डूबल छल आ आधा ऊपर । ओ सिगरेटक अंतिम कश खीँचैत सूरूजके डूबैत देखैत रहल , आ फेरसँ एक बेर मोबाईल दिस देखैत अछि , कोनो फोन नै आएल रहैक ,ओकर मोन व्याकुल भऽ गेल आ ओ उठि डेरा दिस चलि दैत अछि । डेरा गंगा कातसँ किछुए दूरी पर छल ।ओ बराबर साँझके गंगा कातमे स्थित कृष्णा घाट पर आबि बैस जाएत छल , ओकर मोनके ऐहि ठाम किछु शांति भेटैत छल । ॰ ॰ डेरा पहुँचि , गेट खोलि ओ अंदर कमरामे गेल पहिले बल्ब फेर पंखाके चालू कऽ दैत अछि , आ एक बेर अपन मोबाईल देखैत अछि कोनो फोन नै आएल रहैक । फेर ओ कपड़ा खोलि , डाँढ़मे गमछा लपटि बाथरुम जाएत अछि , बाथरुमसँ आबि फेरसँ मोबाईल देखैत अछि , फोन नै आएल रहैक ।बल्बके बंद कऽ ओझैन पर पसरि जाएत अछि ॰ ॰ किछु देर मोनमे अस्थिर कऽ सुतबाक प्रयास करैत अछि ॰ ॰ नीन्न आँखिसँ कोसो दूर ॰ ॰ मोबाईल देखैत अछि , फोनो नै आएल रहैक । कियै , आखिर कियै ॰ ॰ ॰ नीतू ओकरा फोन नै कऽ रहल छैक ॰ ॰ ॰ शायद ओकरा बिसरि गेलै , नै ई नै भऽ सकैत अछि ओ ओकरा नै बिसरि सकैत अछि आ ओकरा दिमागमे सभटा पुरना बात सीडी प्लेयर जकाँ घूमऽ लागलै ।जेना ई कोल्हके बात होए ओकरा मोबाईल पर एकटा नंबरसँ फोन एलै -

- हैलो ( कोनो लड़कीक स्वर रहैक) - हाँ , हैलो , के -हम अंजलि , आ अहाँ - राजीव , हम राजीव छी ॰ ॰ अहाँ कतोऽ सँ बाजैत छी - दरभंगा , आ अपने -रौंग नंबर अछि ,ई पटना छैक (आ राजीव फोन काटि दैत छैक )

किछुए देर बाद फेरसँ फोन आबैत छैक राजीव जा धरि फोन उठेताह , फोन कटि जाएत छैक ॰ ॰ ओ मिसकाँल रहैक । ईम्हरसँ फोन करैत अछि , फेरसँ ओहे लड़कीक स्वर - ! आ अहिना धीरे-धीरे फोनक सिलसिला शुरु भऽ जाएत छैक आ बात होबऽ लागैत छैक ।बादमे ओ लड़की राजीवसँ कहैत छैक ओकर नाम अंजलि नै नीतू छैक । किछुए दिनमे बात बेसी होबऽ लागल आ गप्पक अवधि बढ़ैत गेल आ एक दोसरासँ प्रेम भऽ गेलैक । धीरे-धीरे बात एते होबऽ लागल कि राजीवक काँलेज - कोचिंग ,पढ़ाइ - लिखाइ सभ छूटि गेलैक आ जौँ कहियो ओ काँलेज जेबाले सेहो चाहै नीतू ओकरा मना करैत रहैक । बातक दरमियान दूनू भविष्यमे विवाह करब आ मिलबके प्रोगाम बनाबैत रहैक । आइ राजीव बहुत प्रसन्न छैक ओ नीतूसँ मिलऽ लेल दरभंगा जा रहल छैक । साँझके 7 बजे दरभंगा पहुँचैत छैक आ भोजन कऽ होटलमे एकटा कमरा लऽ लैत छैक । भोरे नीतू दरभंगा जाइत छैक आ हजमा चौराहा पर राजीवके मिलनक लेल बजबैत छैक । राजीव हजमा चौराहा जाइत छैक आ दूनूक मिलन होएत छैक ।राजीव देखबामे ठीक ठाक रहैक नीतू सेहो सामान्ये छलीह । बाटमे चलिते चलिते नीतू राजीवक हाथ पकड़ि लैत छैक , राजीवके एकटा विशेष प्रकारक अनुभूति होएत छैक ,आखिर पहिल बेर कोनो युवती ओकर हाथ पकड़ने छैक ।दूनू होटलक कमरा धरि हाथ पकड़ि जाएत छैक , कमरामे जा गेट अंदरसँ बंद कऽ लैत छैक ।नीतू राजीवक हाथ पकड़ि चूमि लैत छैक आ राजीव ओकर ठोर पर आ दूनू एक दोसरामे ओझरा जाएत छैक । मिलनक उपरांत बातचीतमे कोनो प्रकारक अंतर नै भेलैक आ दोबारा मिलनक प्रोगाम बनैत रहलै , संगे संग विवाहक प्रोगाम सेहो बनैत रहलै । आ कि एक दिन नीतू , राजीवसँ अपन विवाह कोनो आन ठाम तय होबाक समाद सुनाबैत छैक , राजीवक देहपर तऽ जेना बिजली खसि पड़ल होए । दुनु बहुत कानैत खीजैत छैक आ नीतू पहिले चुप भऽ राजीवके बुझाबैत छैक - "अहाँ नै कानू , हम्मर सप्पत । हम अहाँसँ बाते ने करैत छलौ ।हम विवाहक बादो बात करब आ अहाँसँ मिलब । हयौ जान ॰ ॰ हमर देहे टा ने ओकरा लग रहतैक बाँकि मोनमे अहीँ छी आ अहीँ रहब ।हम अहीँ टा सँ प्रेम करैत छी आ अहीँ टा सँ करैत रहब ।अहाँके हमर सप्पत चुप भऽ जाउ नै कानू । " राजीव कहुना सप्पत मानि चुप भऽ जाएत छैक । लगभग दू मासक बाद नीतूक विवाह होएत छैक , विवाह दिन धरि बात ओहिना होएत रहल जेना होएत छल । विवाहत परात राजीव ,नीतूक फोन करैत छैक मुदा फोन बंद छैक ,एक दिन ,दू दिन आ कि तेसर दिन ओकरा एकटा दोसर अनजान नंबंरसँ मिसकाँल आबैत छैक ओ फोन करैत छैक , दोसर दिससँ नीतूक स्वर आबैत छैक ।बात होएत छैक , राजीव बहुत कानैत छैक ,नीतू चुप कराबैत छैक , बुझाबैत छैक ।फोन राखबाक कालमे नीतू कहैत छैक अहाँके जखन मिसकाँल करब तखने टा फोन करब ।किछु दिन तक अहिना चलैत छैक । राजीवके बहुते दिक्कत होएत छैक , ओकरा मोन नै लागि रहल छैक ।दिन तऽ कहुना कटियो जाएत छैक राति काटब मुश्किल होएत छैक . . नीन्न सेहो नै होएत छैक । नै भूख छैक , नै प्यास ।

चारि दिनसँ फोन आएल बंद भेल छैक , तखन एक दिन राजीव फोन करैत छैक , नीतू फोन नै उठाबैत छैक । दोसर दिन राजीव फेरसँ फोन करैत छैक , नीतू उठबैत छैक आ कहैत छैक - हमरा कियै फोन करैत छी , हमरा फोन नै करु , हमर जिनगी कियै बरबाद करऽ चाहैत छी , हमरा कियै घरसँ बाहर करऽ चाहैत छी , विनय (ओकर पति)हमरा छोड़ि देत , हम कतौऽ कऽ नै रहब । जौँ अहाँके हमरासँ प्रेम अछि तऽ फोन करल छोड़ि दियौ ,अहाँके हम्मर सप्पत फोन नै करु । ई बात सुनिते मानू जेना राजीवक देहमे आगि लागि गेल होए । जेना ओकरा करेज पर कियौ पाथर मारि देने होए ।ओकर मोन टूटि जाएत छैक उ भोकारि पाड़ि कऽ कानै छैक ।आ ओहि दिन ओ प्रण करैत छैक चाहे प्राण कियेक नै निकलि जाय लेकिन नीतूक फोन नै करतै ।आ दर्दमे ओ डूबल रहऽ लागल , असगर कमरा बंद कऽ रहऽ लागल ।धीरे धीरे ओकरा शराब सिगरेट गुटखाक हिस्सक सेहो पड़ि गेलै ।

किछु दिन उपरांत ओकरा पता चलैत छैक जे ओकर परीक्षा होबऽ बला छैक ओ काँलेज पहुँचैत छैक ।तखन नोटिस बोर्ड पर परीक्षाक सूचना देखैत छैक ।फार्म भरबाक लेल किरानी बाबू लग जाएत छैक , तखन किरानी बाबू एतेक दिनसँ अनुपस्थित रहबाक कारण पुछैत छैथ ,ओकर पिताक फोन नंबंर लैत छैथ आ फार्म भरवाके अनुमति नै दैत छथि ।ओकरा किछु नै फुरायत अछि कि की करी , आ की नै ? ओ बहुत प्रयास करैत छैक मुदा फार्म नै भरि पाबैत छैक ।ओकर पराते ओकरा घरसँ फोन आबैत छैक , फोन पर ओकर पिता छलखिन्ह आ बहुते क्रोधित सेहो छलखिन्ह ।ओकर पिता राजीवसँ कहलखिन्ह- " हम दुनु प्राणी अपन पेट काटि तोरा पाइ भेजैत छलौँ आ तू नै काँलेज जाएत छलैए आ नइ पढैत छलैए ।काल्हि तोहर काँलेजक किरानी बाबू फोन पर कहलाह जे तू छ माहसँ काँलेज नै जाएत छलैए आ देरसँ जेबाक कारण बार्षिक परीक्षाक फार्म नै भरि सकलेए , से आइसँ तू अलग हम अलग ।आब हम तोरा एक नया पाइ नै देबौ " । एतेक सुनि राजीवक जेना पैर तोरसँ धरती खिसकि जाएत छैक , ओकर कंठ सूखऽ लागैत छैक , देह टूटि रहल छैक ।मोन कानि रहल छैक , आँखिमे नोर नै छैक , मुँह पीयर लागैत छैक ।उ मोबाईलमे समय देखैत छैक रातिक तीन बाजि रहल छैक , एक आठ बजे साँझसँ उ सुतबाक प्रयास कऽ रहल छैक मुदा नीन्न कोसो दूर छैक ।आ कि एक बेर फेरसँ मोबाईल देखैत छैक , कोनो फोन नै आएल रहैँ । ओकरा विश्वास छैक नीतू फोन जरुर करतीह आ जा धरि ओकर जिनगी छैक उ नीतूक फोनक बाट जोहैत रहत मुदा फोन आएल आइ मास भरिसँ बेसी भेल छैक । पूनम मण्डल प्राज्ञ कापड़ि केशवलाल बाखं शिरपा सम्मानसँ सम्मानित नेपाल भाषा परिषद मैथिली भाषाक चर्चित साहित्यकार एवं प्राज्ञ राम भरोस कापडि भ्रमरकेँ केशवलाल बाखं शिरपा सम्मान(पुरस्कार)सँ सम्मानित कएलक अछि । राष्टिूय भाषामेसँ एक मैथिली भाषामे उत्कृष्ट साहित्यिक रचनासभ कऽ मैथिली भाषा साहित्यक श्रीवृद्धिकेँ लेल कएने योगदानक कदर करैत परिषद प्रसिद्ध कथाकार केशवलाल कर्माचार्यक नाममे स्थापित ( केशवलाल बाखं शिरपा ) सम्मानसँ हुनका सम्मानित कएने अछि । ओहि अवसर पर प्राज्ञ कापडिकेँ दश हजार नगद एवं सम्मानपत्र प्रदान कएल गेल छल । कविकेशरी चित्तधर हृदयक १ सय ७म जन्म जयन्तिक अवसरपर नेपाल भाषा परिषदक अध्यक्ष फनिन्द्र रत्न ब्रजाचार्यक सभापतित्वमे मंगल दिन सम्पन्न समारोहमे प्राज्ञ भ्रमर उक्त सम्मानसँ सम्मानित भेल छथि । सम्मान ग्रहण करैत प्राज्ञ भ्रमर मैथिली आ नेपाल भाषाक सम्बन्ध मध्यकालेसँ निरन्तर रहल आ मैथिली भाषा साहित्यक अनेको प्राचिन अभिलेखसभ नेवारी लिपीक विभिन्न संग्रहमे संग्रहित रहल बतौलनि । राज्य पक्षसँ अन्यायमे परल अन्य भाषा संगहि ई दुनू भाषासभ अपन अस्तित्वक रक्षाकेँ लेल निरन्तर संघर्षरत रहल सेहो बतौलनि । विक्रम सम्बत २००७ सालमे स्थापित नेवारी भाषा साहित्यक अग्रणी संस्था नेपाल भाषा परिषदसँ मैथिली भाषाक साहित्यकारकेँ प्रदान कएल गेल ई सम्मान पहिल बेर अछि । ओहि अवसर पर नेपाल सम्बत ११३२क भाषाथुवा पुरस्कार प्रा. प्रेम शान्ति तुलाधर, २५ हजार राशीक चित्तधर सिरपा पुरस्कार गायक भृगुराम श्रेष्ठ, १५ हजार राशीक ठाकुर लाल सिरपा पुरस्कार निवन्धकार सुरेन्द्रमान श्रेष्ठ आ मोतीलाल सिरपा पुरस्कारसँ अन्तराष्ट्रिय भिक्षु संघकेँ सेहो सम्मान कएल गेल छल । ओहि समारोहमे परिषदक उपाध्यक्ष प्रा. शुवर्ण शाक्य, महासचिव नवीन्द्रराज जोशी, परिषदका सदस्य नरेशविर शाक्य सहितक वक्तासभ मातृभाषाक साहित्यमे योगदान देनिहार संघ संस्थाकेँ राज्य वेवास्ता करबाक क्रम गणतन्त्र अएलाकबादो नहि रुकल प्रति चिन्ता व्यक्त कएने छलथि । ’सगर राति‍ दीप जरय’क ७९ म आयोजन ‘कथा कोसी’  उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे औरहामे  सम्पन्न/ ८० म सगर राति‍ दीप जरय  सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे  उमेश मण्‍डलक संयोजकत्वमे सगर राति‍ दीप जरय’क 79म आयोजन ‘कथा कोसी’ नामक वैनरक नीचाँ दि‍नांक 15 जून संध्‍या 6.30 बजेसँ शुरू भऽ 16 जूनक भि‍नसर 6 बजे धरि‍ लौकही थाना अन्‍तर्गत औरहा गामक मध्‍य वि‍द्यालयक नव नि‍र्मित भवनमे श्री उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे गोष्‍ठी सुसम्‍पन्न भेल। अगि‍ला ८०म गोष्‍ठी सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे हेबाक लेल उमेश मण्‍डल प्रस्‍ताव आएल जे सर्वसम्मति‍सँ मान्‍य भऽ घोषित भेल। श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल एवं श्री रामचन्‍द्र पासवान जीक संयुक्‍त  अध्‍यक्षतामे तथा श्री वीरेन्‍द्र कुमार यादव आ श्री दुर्गागान्‍द मण्‍डलक संयुक्‍त  संचालनमे ऐ कथा गोष्‍ठीक भरि‍ राति‍क यात्रा भेल। गोष्‍ठीक  शुभारम्‍भ श्री लक्ष्‍मी नारायण सिंह एवं श्री रामचन्‍द्र पासवानजी संयुक्‍त रूपे दीप प्रज्‍वलि‍त कऽ  उद्घाटन केलनि‍। वि‍देह-सदेह-5 वि‍देह मैथि‍ली वि‍हनि‍ कथा, वि‍देह सदेह-6 वि‍देह मैथि‍ली लघुकथा, वि‍देह-सदेह-7 वि‍देह मैथि‍ली पद्य, वि‍देह-सदेह-8 वि‍देह मैथि‍ली नाट्य उत्‍सव, वि‍देह-सदेह-9 वि‍देह मैथि‍ली शि‍शु उत्‍सव तथा वि‍देह-सदेह-10 वि‍देह मैथि‍ली प्रबन्‍ध-नि‍बन्‍ध-समालोचना नामक पोथीक लोकार्पण स्‍थानीय वि‍द्वतजन श्री संजय कुमार सिंह, श्री रामचन्‍द्र पासवान, श्री मि‍थि‍लेश सिंह, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री लक्ष्‍मी नारायण यादव तथा श्री वीरेन्‍द्र प्रसाद सिंह द्वारा भेल हाथे भेल। लोकार्पण सत्रक पछाति‍ दू-शब्‍दक एकटा महत्‍वपूर्ण सत्रक सेहो आयोजन भेल जइमे श्री रामचन्‍द्र पासवान, श्री बेचन ठाकुर, श्री कपि‍लेश्वर राउत, श्री कमलेश झा, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री राम वि‍लास साहु, श्री उमेश नारायण कर्ण, श्री रामानन्‍द झा ‘रमण’, श्री शंभु सौरभ, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, डॉ शि‍वकुमार प्रसाद,हेम नारायण साहु, श्री अरूणाभ सौरभ तथा श्री उमेश मण्‍डल तथा संयोजक श्री उमेश पासवान द्वारा ‘सगर राति‍ दीप जरय’ कथा गोष्‍ठीक दीर्घ यात्रा तथा उदेसपर सभागारमे उपस्‍थि‍त दूर-दूरसँ आएल कथाकार, समीक्षक-आलोचक एवं स्‍थानीय साहि‍त्‍य प्रेमीक मध्‍य मंचसँ अपन-अपन मनतव्‍य  रखलनि‍। जइमे सगर राति‍क 75म आयोजनक पश्चात 76म आयोजन जे श्री देवशंकर नवीन दि‍ल्‍लीमे करेबाक घोषना तँ केने रहथि‍ मुदा से नै करा साहि‍त्‍य  अकादेमी द्वारा आयोजि‍त कथा गोष्‍ठीकेँ गनि नेने रहथि‍ जहू गि‍नतीकेँ सोझरौल गेल आ तँए ऐ गोष्‍ठीकेँ श्री उमेश पासवान अपन इमानक परि‍चए दैत ७९ म गोष्‍ठीक आयोजन केलनि‍। ओ कहलनि‍ जे हम सभ अर्थात् वि‍देह मैथि‍ली साहि‍त्‍य  आन्‍दोलनसँ जूड़ल मैथि‍ली वि‍कास प्रेमी छी। हम सभ ७७म, ७८ म आयोजनक आयोजन कर्ताकेँ स्‍पष्‍ट रूपे कहैत एलि‍यनि‍ जे मुदा हमरा सबहक बात नहियेँ वि‍भारानी मानलनि‍ आ नहि‍येँ कमलेश झा मानलनि‍। मुदा से हमहूँ नै मानब आ सही-सही गि‍नती करब। आ तही दुआरे ऐ गोष्‍ठीक आयोजन ७९मे आयोजन तँइ भेल, आयोजि‍त भेल। हलाँकि‍ दरभंगासँ आएल कथाकार श्री हीरेन्‍द्र कुमार झाक उकसेला पर रहुआसँ आएल श्री वि‍नय मोहन झा जगदीश, श्री दुखमोचन झा आ दरभंगेसँ आएल श्री अशोक कुमार मेहता हीरेन्‍द्र  झाक संग गोष्‍ठीक आरम्‍भक घंटा भरि‍क पछाति‍ चलि‍ जाइ गेला। जीवि‍ते नर्क (उमेश मण्‍डल), शि‍क्षाक महत (राम वि‍लास साहु), बि‍आहक पहि‍ल गि‍रह (दुर्गानन्‍द मण्‍डल), बौका डाँड़ (लक्ष्‍मी दास), बंश (कपि‍लेश्वर राउत), टाटीक बाँस (राम देव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’), सगतोरनी (शि‍वकुमार मि‍श्र), पाथर, पि‍यक्कर, जोगार आ अंग्रेज नैना (अमीत मि‍श्र), संत आकि‍ चंठ (बेचन ठाकुर), अछोपक छाप (शम्‍भु सौरभ), नमोनाइटिस (उमेश नारायण कर्ण), द्वादशा (सुभाष चन्‍द्र ‘सि‍नेही’), राँड़ि‍न (रोशन कुमार ‘मैथि‍ल’), पँचवेदी (अखि‍लेश कुमार मण्‍डल), मुइलो बि‍सेबनि (जगदीश प्रसाद मण्‍डल) इत्‍यादि‍ महत्‍वपूर्ण लघु कथा/वि‍हन‍ कथाक पाठ भेल आ सत्रे-सत्र मौखि‍क टि‍प्‍पणी आ समीक्षा भेल। अछोपक छाप (शम्‍भु सौरभ) क समीक्षाक क्रममे श्री रमानन्द झा "रमण" कथावस्तुसँ अपन असहमति देखेलनि आ कहलनि- " नै आब ई गप नै अछि, एकटा गप एतै देखियौ, हम  रमानन्द झा "रमण" श्रोत्रिय उच्च कुलक, आ कतऽ आएल छी! उमेश पासवानक दरबज्जापर!" श्री बेचन ठाकुर  श्री रमानन्द झा "रमण"क नव-ब्राह्मणवादी सोचक  विरोध करैत कहलनि- " लोकक मगजमे अखनो जाति-पाति भरल छै, मैलोरंगक प्रकाश झा तेँ ने कहै छथि जे बेचन ठाकुर भरि दिन तँ केश काटैत रहैए, ई रंगमंच की करत!! श्रीधरमकेँ सेहो ई गप बुझल छन्हि। माने मैथिली साहित्यकार, समीक्षक आ रंगमंचसँ जुड़ल ब्राह्मणवादी आ नव-ब्राह्म्णवादी सोचक लोककेँ देखैत  ई कहल जा सकैए। २१म शताब्दीमे श्री रमानन्द झा "रमण"क बयान ई देखबैत अछि जे  कोना ओ उमेश पासवानक दरबज्जापर आबि उपकृत करबाक भावनासँ ग्रसित छथि। ऐ अवसर पर २७ म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी  सेहो आयोजित भेल। अगि‍ला ८०म गोष्‍ठी सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे हेबाक लेल उमेश मण्‍डल प्रस्‍ताव आएल जे सर्वसम्मति‍सँ मान्‍य भऽ घोषित भेल। रवि‍ भूषण पाठक ओइ साल ओइ साल जे भेलै से कमाले-कमाल ।मार्च-अप्रील मे एते आलू उपजलै ,जे पूरा खेत-खरिहान आ घर सब महक' लागलै ।घर मे चौकी क' नीच्‍चा ,कोठी लग ,भनसा घर ,सौंसे बूझू जे आलूए-आलू ।एतबे नइ भानसक मेंजने बदलल ।भूजिये आ रसदारे नइ पापड़ ,तिलौरी सेहो आलूए क' आ एक दिन व्रत केलौं त' आलू मे दूध गूडि़ के भेटल ,रातियो मे आलू आ दहीक मिलल-जुलल भोजन । बाप रौ बाप गरमी पड़लै ,गजबे गरमी ।आदमी गाछ त'र ,दुरूखा आ पोखरि-गाछी जाए बूझू जे गंजी-अंगा घामे सँ भीजि जाए ।ईनार-कल सेहो पस्‍त आ पोखरि-नद्दी तक सुक्‍खल ,बगलक गाम मे एकटा ईनार रहै आ मनबोधन बाबू क' दिलदारी कि एक-एक डोल पानि सबकें दैत रहलखिन । आ बस महीना दिन बाद ओमहर बागमती आ ईमहर करेह तोडि़ देलकै ।हमर पीढ़ी त' बाढि़ देखबे नइ केने छलै ,से बड्ड व्‍याकुल भ' के पानि के स्‍वागत करबाक लेल शिवाजीनगर दिस विदा भ' गेल ।आ पानि रसे-रसे खत्‍ता,नाला सब कें भरैत रहै ,आवाजो मद्धिम ।एमहर गामक बूढ़-पुराण सब सड़सठ ईसवीक बाढि़क निशान ढ़ुरहैत र‍हथिन ,केओ कहथिन जे पानि एत' तक आयत ,त'केओ कहथिन जे पानि एत' तक ।केओ ई कहथिन जे पानि दस दिन त' केओ पनरह दिन तक रहबाक बात करथिन ।किछु गोटा त' घरे मे माछ मारबाक सपना देख' लागला ।मुदा पानि जखन एलै त' अपन गति अपन मात्रा संग आ पूरा गाम डूबि गेलै ,गाम मे एकेटा दूमहला आ डाक्‍टर साहेब अपन ईज्‍जत दूमहलाक छत पर बैसि बचेला ।रानीपरती ,सबहा ,बनडीहा आ जोगिया सन कतेको छोट टोल डीहटोलक पुरनका धीमका पर शरण लेलक ।आ पानि रहि गेलै दू महीना ।ई पानि नीक जमाए नइ छलै कि ससुरक जेबी आ चिनुआरक रंग पर रंग धरै ,ई रहै लंठ जमाए जे बेईज्‍जत करबै पर आतुर रहै ।पुरनका आ नबका सब स्‍टॉक विदा भ' गेलै ,गाम मे पैंच उधार बंद ।ने हरियरका तरकारी ने बजार वला कोनेा समान ।एत' तक कि नूनक अभाव सेहो भ' गेलै ।कि आदमी आ कि माल-जाल सबहक अहार अकाश मे ।जे सस्‍ता रहै ओ बस दूध किएक त' सब माल-जाल कनिकबे टा के ओइ डीह पर रहै आ दूध बाहर जेबाक कोनो रस्‍ता नइ । आ ओहिए साल हाकिम बाबूक पोती भागि गेलै ।भागबो केलै त' दोसर जातिक छौड़ा क' संग ।आ भागियो क' कुकरी जल्दिए सासुर आबि गेलै ,ई ने जे भागि के दिल्‍ली-पंजाब पड़ा जाए आ आबि गेलै आ अप्‍पन जाति आ गामक नाम हँसाब' लागै आ लागलै जे ओक्‍करे हँसीक संग आलू आ बागमतीक हँसी एक भ' गेलै ।ओ पहिल छौड़ी रहै जे अप्‍पन जाति के तियागि केकरो संग भागलै छल ,एकरा बाद त' बूझू लाईन लागि गेलै ,बोहिनी नीक भेल छलै । घर अजीबे घर रहै ,खाए त' सब खाइते रहै ,आ हकडक्‍कल जँका करै त' लाईन लगा के सब हकडक्‍कले जँका करै ।बेरा-बेरी नइ एके संग । प्रसन्‍न रहै त' सब प्रसन्‍ने रहै ,नइ कुनो बात तैयो प्रसन्‍न ।बिना मतलबे के बरसा-बुन्‍नी ,रौद-अकाश ,पानि-बिहाडि़ किछो ल' के प्रसन्‍न ।अहां घरक बतीसी अलगे सँ देखि सकैत छियै ।प्रसन्‍न रहैक मून होए त' पड़ोसीक घरक चोरी ,बगल वलाक बेटी भागनै ,पंडीजीक बेटा के कैंसर भेनए ,राम अवतारक मैट्रिक परीक्षा मे फेल भेनए ,ई सब खुशिएक कारण रहै । लड़ाई करबाक मून होए त' टी0वी0 क' रिमोटे लेल झगड़ा भ' जाए ।बापक अलग चैनल ,माएक अलग रहै आ तीनू बच्‍चो के अलग रहै ।कुनो समझौता त' भेल नइ रहै ,तें जेकरा जखन मून होए ,टी0वी0 खोलि दए ,जेकरा जखन मून होए ,चैनल बदल' लागए । आ आमदनी त' सीमिते रहै ,कमाए वला मात्र बापे ।मुदा खरचाक मद केओ निर्धारित क' सकै छलै ।आ वरीयता क्रमक लेल डेली झगड़ा-फसाद ।बाप कहए ई जरूरी ,बेटा कहै ई आ माए कहै पहिले ई किएक नइ। आ घर मे सबके दुख रहै ।फलनमा के चिलनमा से आ चिलनमा के फलनमा से ।सब केर उपेक्षा छलै आ सबक प्‍लान रहै घर छोड़़बा लेल ।सब ताकैत रहै एकटा नीक दिन ।साईतक खोज डेली चलैत रहै ,मुदा केकरो लेल एखन बेहतरक खोज संपन्‍न नइ भेल छलै । घर मे कपड़ा-लत्‍ता रहै ,रमायन-महाभारत रहै ,देवी-देवताक फोटो रहै ,संगहि-संग बहुत रास उपदेश आ कर्तव्‍यक शिक्षा रहै ।गृहवासी एक-दोसर कें बेरा-बेरी सँ दैत छलखिन आ सब गोटे समै साल पर सुनै के आ नइ सुनबाक बहन्‍ना ताकैत छला । ईहो घरे छलै आ एकर एकटा नंबर छलै जे सरकारक कार्ड आ वोटक रजिस्‍टर मे दर्ज छलै ।पता नइ घर मे कुन प्रकारक एकता छलै जे घर घर रहै ,आ सिमेंटक ,कर्तव्‍यक आ बाढि़ मे रक्षाक सरकारी विज्ञापन फराक-फराक बैनर मे फराक-फराक जग्‍गह पर विराजमान रहै । बाबूक चट्टी

ऐ बेर गाम मे एकटा आयोजन छल ,आ आयोजने बीच केओ चप्‍पल चोरा लेलक ।संभव छैक केकरो सँ बदला गेल होए ,मुदा एकाध घंटाक प्रयासोक बीच भेटल नइ ।गाम पर आबिते झोरा तैयार छल आ शहर जेबाक जल्‍दी ,तें बिना कुनो ना-नुकुरि केने माए द्वारा देल बाबूक पुरनका चप्‍पल पहिर बाहर आबि गेलौं ।चप्‍पल मे कतेको जगह सीयल जेबाक निशान रहै ,तैयो चप्‍पल मजगूत रहै ,आ गाम सँ चारि सौ किलोमीटर तक कुनो प्रकारक दिक्‍कत नइ भेल । ऐठाम एलाक बाद कनियां कनि जे मुंह -नाक बनेलथि ,चप्‍पल ऐठामक चप्‍पल सब मे मिलि गेलै ।ने चप्‍पल देखै सुनै मे खराप रहै ने तुरत्‍ते कुनो टुटबाक डर ,तें हम मौका-बेमौका पहिरैत रहलौं ,हां कहियो-काल कनियां के कहला पर जरूर बदलि दैत रहियै ।आ चप्‍पलो बिना कोना दाना पानि के हमरा दुआरि पर रह' लागल ।बस कनियां ओकरा स्‍थान बदलैत काल ,या बाढ़नि लगबै काल कने जोर सँ धक्‍का दैत छलखिन आ फेर ई बात कि 'बाप रे बाप ई चप्‍पल पहिरै वला छैक ' । एकदिन भोर मे घूमैत काल चप्‍पल टूटि गेल ।कुनो पुराने जोड़ पर टूटल रहै ,आ हम नंगराबैत-नंगराबैत कहुना गामपर पहुंचलौ ।हमरा नंगराबैत देखि कनियां कुनो अज्ञात संभावना सँ चिकडि़ उठली ।हम आश्‍वस्‍त केलिएन ,जे एहन कुनो बात नइ ,हम स्‍वस्‍थ छी ,बस चप्‍पल कनि डिस्‍टर्ब क' देलक ।आ हमरा बिनु पूछने ओ चप्‍पल उठा सामने वला मैदान मे फेकि देलखिन ।हम रोकबाक प्रयास केलियइ ,मुदा ओ किछु नइ सुनलखिन ।चप्‍पल फेका गेल छलै ,मुदा बेसी दूर नइ रहै ।ऐ ठाम सँ ओकर फीता ,डंटी आ पूरा देह देखाइत रहै ।अगिला दिन आर लोक सब मैदान मे कूड़ा फेक' लागलखिन आ चप्‍पल कनेक एकात मे भ' गेलै ,मुदा एखनो तक ओ ओहिना देखाइत रहै ।एक बेर मून भेल जे कनियां सँ चोरा के ओकरा घर ल' आनी ।कनियां सूतल रहथिन ,मुदा जें कि उठलौं ओ फेर उठि गेली आ पूछ' लागलखिन 'चाय त' नइ पीयब '। भोरका समै छलै आ कनियां नहेलाक बाद पूजाक तैयारी मे रहथिन ,हम एकाएक उ‍ठलियै आ मैदान दिसि विदा भ' गेलियै ।औखन केओ जागल नइ रहै ,बस एगो-दूगो कुकुर सब एमहर-ओमहर ताकैत रहै ।हमरा मैदान मे घूसिते बगल वला गोला कुकुर हमरा दिसि ताक' लागल ।एकबेर त' डर भेल ,फेर साहस क' के दूनू चप्‍पल उठा लेलौं ।चप्‍पल पर बहुत रास पन्‍नी आ पाकल आमक सड़लका छिल्‍का रहै ।जल्‍दी सँ ओकरा झटकैत सांस के बारने रोड पर वापस एलौं ।आब आबि के फेर एकबेर जोर सँ सांस लेलौं आ कूड़ाक ढ़ेर दिसि फेर सँ धियान गेल ।ऐ चप्‍पल के की कएल जाए । ऐ चप्‍पल के घर मे राखनै ठीक नइ ।कनियां त' जे बखेरा करती ओ करबे करती ।ई चप्‍पल एकटा बीतल युगक कैलिडोस्‍कोप नेने घर मे घूसि गेल रहै ,मुदा एकर ऑरिजनल जग्‍घ' त' कतै आर छलै ।ई चप्‍पल हमर पिताक प्रमुख अस्‍त्र छल ।जखन जखन ओ क्रोध मे आबै छलखिन ,थापड़ आ मुक्‍काक प्रहार नइ करै छलखिन ,बस निकालि के चप्‍पल हमरा आ हमरा सब भाई-बहिन के्............. ।तें ई बीतल युगक एकटा अस्‍त्र छलै ,जेकरा लेल जगहक गुंजाइश ऐ घर मे नइ रहै ।ई चप्‍पल आब बस सम्‍हारि के देखै-देखबै लेल जोगा के राखै क चीज रहै ।अफसोस हमरा पास एत्‍ते जगह नइ कि हम संग्रहालय बनाबी। सन्दीप कुमार साफी विचार-बिन्दु- राजा अओर परजा एगो समए छेलै जहिया लोक लोकपर विश्वास करै छल, अपन समाजमे कोनो तरहक बातचीत होइत छल तँ गाममे जे राजा रहै छल तिनका ऐठाम सभ निपटारा भऽ जाइ छल, अओर ओही ठाम न्याय अओर अन्यायक फैसला होइ छल, किएक तँ सभ लोक राजाकेँ सम्मान अओर आदर सदाचारसँ नाम लैत छल किएक तँ राज्यमे कोनो तरहक सुखार या आपदा-बिपत्ति होइत छल तँ राजा परजाक संग दैत छल, ओइ परजाक मदत सहायता करैत छल मुदा अखन एहन समए आबि गेल जे राजा अओर परजामे कोनो अंतरे नै रहि गेल, किएक तँ आब ने ओते अन्न उपजै छै आ ने राजा परजाक मदति सहायता करै अछि। पहिने लोक सभ राजासँ अप्पन बेटीक बियाहक बातचीत लऽ कऽ जखन राजदरबारमे जाइ छल तखन ओही व्यक्तिकेँ महराज आश्वासन दैत छल जे तूँ या तोहर बेटीक खर्चाक व्यवस्था भऽ जेतऽ तखन परजो अप्पन राजामे लीन रहै छल। मुदा ने ओ सस्ता जमाना रहलै अओर ने ओ राजा रहलै, किएक तँ पहिनुकहा लोक सबहक कहब छेलै जे ओ लोक सभ जे छेलै, एगो लोहाबला व्यक्ति मानल जाइ छेलै, ओ सभ जे बाजै छेलै से करै छेलै, अप्पन नाम हँसाए नै दै छेलै, कोइ दोसर गामबला यदि नाम सुनै तँ कहै जे फलाँ गामक राजा अप्पन परजाक सुख-दुख देखै छै, कतेक नीक छै ओ गाम, चल ओही गाममे, घर बनाएब , ओही राजाक राज्यमे रहब। देखही जे दुआरिपर कतेक-कतेकटा ढक छै, कतेक अन्न छै, कएगो हाथी बान्हल छै, कतेकटा हुनकर दरबज्जा छै, चल ओही राजमे रहब, कोनो चीजक दिक्कत नै हएत। सभ प्राणी ओही ठाम जीवन बिताएब। ई सभ परजा राजाक नव परजा बनैत छल। आब तँ देखल जाए तँ राजा परजाकेँ सुपै बोइले नै दइ पर तैयार होइत अछि। पहिने एक सेर मरुआ नै तँ एक सेर जऽ दैत छल। भरि दिन हर जोइत कऽ आबै छल तँ ओ मालिक अप्पन जऽनकेँ मरुआ अओर जऽ बोइन दैत छेलै। मुदा देखैत महगाइ कऽ चलैत राजाक मनमे अविकार आबि गेल जे एतेक अन्न जे ओकरा देबै से ओही अन्न बेच कऽ हमरा अओर दु कट्ठा खेत भऽ जाएत अओर अपन बढ़ैत परिवार देख कऽ सोचऽ लागल जे ई संसार अहिना रहत मुदा अप्पन सान गुमान सभ राजा बिसरि गेल, के देखैए परजाकेँ अओर के देखैए अप्पन सान सौकत। बदलैत दुनियाँ देख परजा सभ गामसँ शहरमे काज करैक लेल प्रस्थान केलक जे आब गाममे राजा अप्पन घर-परिवारकेँ देखत आकि हमरा सभक मदति करता। सभ परजा अपन गाम छोड़ि शहरमे कमाए लागल, अओर जे राजाक हरोड़ीमे काज करैत छल से ओ जमीन जजाति सभ राजासँ लिखबा कऽ परजा अपन नाम कऽ लेलक। आबने राजा ओइठाम कियो परजा हरोऊरी खटैत अछि। किएक तँ दोकानमे एक टका सलाइ दै छै आ राजा ओइठाम भरि दिन धान-दाउन करलापर पाँच किलो धान बोइन दै छै, से नै तँ आब गाम छोड़ि शहरेमे काज करब, बड़ बढ़ियाँ मन भेल तँ काज केलक, नै भेल तँ अप्पन चारि दिन बैठल छी, दोसर किछु करै अछि, ई सभ सोचि राजा अओर परजामे कोनो महत्व कनीक-कनीक सभ हटल जाइत अछि, लोकक मनमे आलस्यक प्रवेश भऽ गेल, केकरो नै केकरो से मतल रहि गेल। मिथिलांचलक राजा छल राजा जनक जे अप्पन राज्यमे खेतसँ खलिहान तक परजाकेँ कखनो दुखी नै देख सकै छल। जे कोनो मनमे कल्पना करैत छल परजा तँ ओकरा सबहक राजा जनक पूरा करैत छल, केकरो कोनो तरहक असुविधा नै होइ, तेकर लेल तत्पर रहै छल। एक बेर राज्यमे भीषण सुखार भऽ गेल जे दू की पाँच साल तक बर्खा नै भेल, धरती फाटि-फाटि गेल तँ महराज जनक यज्ञ कऽ कए अपन परजाक हितक लेल भगवान इन्द्रदेवसँ प्रार्थना केलनि जे हमरा बचाउ, हमरा परजापर दया करू, हमर परजा मरि रहल अछि, आइ कतेक मास भऽ गेल हमर परजा सभकें अन्न खेला, हे भगवान, हमरा अओर हमर परजापर दया करू। अओर एतेक सभ बात सुनै छेलै, भगवान अओर भक्तमे यएह व्यवहार होइक चाही अओर यएह सत्यता अपनेबाक चाही, ओहीसँ प्रकृति सेहो गवाही दैत अछि जे मनुषमे भगवानसँ केहन भेदभाव हेबाक चाही। सभ गदगद तँ भगवान अओर संसार सुखदमय रहत मुदा अखन सभ अपन तँ सभ अपन पेट भरि गेल तँ दोसरक पेट भरलै कि नै तेकर चिन्ता के करैत अछि। पहिने ने एतेक बी.पी.एल. छेलै, अओर ने एतेक ए.पी.एल. सबहक गुजर समान होइ छेलै, सभ जऽ अओर जनेरक खिचरी खाइत छेलै, भऽ गेल कहियो तँ केकरो एहने नीक घर रहैत छल जे भातक मुँह देखैत छल, अखन देखू जे गरीब अमीर एक समान खाइ-पिबैत अछि। दालि भात अओर तरकारी प्रेमसँ खाइत अछि। नवेन्दु कुमार झा टाकाक आभाव मे ठप्प अछि कोसी महासेतूक काज सहरसा-फारबिसगंज अमान परिवर्तनक काज मद

मिथिलांचल आ कोसी के एक करबाक हत्ववला सरायगढ़ निर्मली रेल परियोजना टाकाक अभाव मे बंद अछि। 324 करोड़ टाकाक वर्ष परियोजना समुचित टाकाक अभाव मे लअकि गेल अछि। एहि रेल महासेतुक निर्माण पूरा भऽ गेल अछि मुदा सेतूक दुनू किनारा पर छोट-छोट पुल-पुलिया, रेलक पटरी आ मिट्टीकरवाक काज रेलवे द्वारा आवश्यक टाका आवंटित नहि करबाक कारण ठप्प अछि। सरायगढ़-निर्मली रेल लाइनक काज बाध्ति भेला सॅ मिथिलांचलक जनताक उम्मीद पर ग्रहण लगि गेल अछि। मिथिलांचलक जनताक उम्मीद पर ग्रहण लगि गेल अछि। पड़ोसी देश नेपालक सीमा सॅ सटल रहबाक कारण एहि रेलखंडक विशेष महत्व अछि।  एहि मेगा रेल परियोजनाक शिलान्यास 6 जून 2003 के तत्कालिक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कयने छलाह। अटल सरकारक कार्यकाल पूरा भेलाक बाद एहि परियोजनाक काजक गति कम भऽ गेल छल। बाद मे वर्ष 2005 मे तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद वर्ष 2005 मे सरायगढ़ मे भूमि पूजनक काज प्रारंभ कयलनि आ एकरा जल्दीए पूरा होयबाक घोषणा कयलनि। मुदा टाकाक आभाव मे ई मात्र घोषणा साबित भेल। नव रेल बजट मे एहि परियोजनाक लेल फराक सॅ टाका आवंटित नहि भ्ेला सॅ स्थिति आओर चिंताजनक भऽ गेल अछि। एहि रेल परियोजनाक काज प्रारंभ भेला सॅ आशा जगल छल जे 79 वर्षक बाद कोसी क्षेत्रक शेष मिथिलांचल सॅ सीधा सम्पर्क भऽ जायत आ सुपौल, अररिया, सहरसा, मधेपुरा आ पूर्णिया आदि जिलाक लोकक दरभंगा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर आ समस्तीपुर आदि जिला सॅ बेटी-रोटीक संबंध स्थापित भऽ सकत।  एहि परियोजनाक निर्माण मे लागल कुमार कंस्ट्रक्शन आ घनश्याम लाल प्राइवेट लिमिटेड रेलवे के कार्य स्थगन प्रस्ताव पठा देला सॅ स्थिति विकट भऽ गेल अछि ओतहि निर्माण कम्पनी जीटी इन्फ्रा प्राइवेट लिमिटेड के गोटेक 90 करोड़ टाकाक काज निविदिाक माध्यम सॅ भेटल छल मुदा टाकाक समुचित भुगतान नहि भेलाक कारण एहि कम्पनीक काज सेहो प्रायः बंद अछि। कम्पनी सूत्रक अनुसार कोसी रेल महासेतू बनिकऽ तैयार अछि। वर्तमान वार्षिक योजना मे एहि परियोजनाक लेल मात्र तीन करोड़ टाका आवंटित कमल गेल छल जे एहि वर्ष अप्रील मास मे समाप्त भऽ गेल। टाकाक आभाव मे काज बाधित अछि। रेलवेक अधिकारी सभक संग एहि विषय मे भेल बैसार मे सेहो कोनो परिणाम नहि निकलल अछि।  दोसर दिस, मिथिलांचलक एकटा आओर महत्वपूर्ण रेल लाइनक अमान परिवर्तनक गति मंद पड़ल अछि। रेल मंत्रालय द्वारा वर्ष 1996 मे सहरसा-फारबिसगंज छोटी रेल लाइन के बड़ी लाइन मे अमान परिवर्तनक स्वीकृति देने छल। मुदा एखनो एहि क्षेत्रक जनता अंग्रेजरक जमानाक छोटी रेल लाइन पर यात्रा करऽ पर विवश छथि। पछिला वर्ष 20 जनवरी 2012 के अमान परिवर्तनक लेल राघोपुर सॅ फारबिसगंजक मध्य मेगा ब्लॉक कयल गेल छल। एहि काजक लेल 356 करोड़ टाकाका आवंटित भेलाक बादो ई काज एखन धरि पूरा नहि भऽ सकल अछि एहि तरहें उŸार बिहार के राजधानी पटना सॅ जोड़बाक लेल गंगा नदी पर प्रस्तावित दीघा-परमानंदपुर रेल सह सड़क पूलक काज मंद गति से चलि रहल अछि। हालांकि रेलवे द्वारा एक बेर फेर वर्ष 2015 धरि एकरा पूरा करबाक घोषणा कयल गेल अछि। हालांकि एहि रेलखंड पर नव बनल पाटलिपुत्र स्टेशन सॅ रेलक आबाजाही प्रारंभ होयबाक घोषणाक कयल गेल अछि। 6 सितम्बर के एहि स्टेशन सॅ रेल राज्य मंत्री अधीर रंजन चौधरी पटना यशवंतपुर ट्रेन के हरियर झंडी देखा विदा कऽ एहि रेल खंड पर आंशिक रूप सॅ आवाजाही आरंभ करताह। ललितक बहन्ने मैथिलीक कथाक दशा-दिशा पर भेल चर्चा संपन्न भेल, मलेसं क छठम अधिवेशन

मैथिली लेखक संघक छठम वार्षिक सम्मेलन पटना मे संपन्न भेला एहि सम्मेलन क अवसर पर मैथिली भाषाक साहित्यकार आ विद्धान सभ वरिष्ठ आ चर्चित कथाकार ललितेश मिश्र ललित के याद क मैथिली भाषा साहित्य पर चर्चा कयलनि। ई सम्मेलन विशेष रूपे ललित पर केन्द्रित छल। एहि बहन्ने विद्वान लोकनि मेेेेैथिली कथा साहित्यक एक सय वर्षक मात्रा पर सेहो सार्थक बहस कयलनि। वक्ता लोकनि आम जन सरोकार सॅं जुड़ल कथा आ उपन्यास लिखबा पर जोर देलनि। सम्मेलन क अध्यक्षता संधक अध्यक्ष नरेन्द्र झा आ संचालन अजीत आजाद कयलनि। एहि अवसर पर डाक्टर किरण कुमारी लिखित पोथी ‘‘मैथिली साहित्यक विकास मे मैथिली अकादमीक योगदान‘‘ क लोकार्पण आ डाक्टर इन्द्रकांत झाक अध्यक्षता मे कवि सम्मेलन सेहो सम्पन्न भेल। एहि अवसर पर अपन विचार व्यक्त करैत वरिष्ठ साहित्यकार आ पत्रकार अरविन्द ठाकुर आक्रोश व्यक्त करैत कहलनि जे मैथिली साहित्यक वर्तमान दुदर्शाक लेल हम सब साहित्यकार जिम्मेवार छी। नीक विचारक आदान प्रदान तऽ होइत अछि मुदा जमीन पर कोनो ठोस परिणाम सोझा नहि आयल अछि। ललितक योगदानक चर्चा करैत ओ कहलनि जे मैथिली साहित्यक क्षेत्र मे ललितक योगदान महत्वपूर्ण अछि आ जतय सॅ ललितक प्रवेश होइत अछि ओतहि सॅ मैथिलजी साहित्यक मुख्यधारा प्रारंभ होइत अछि। ओ कहलनि जे मैथिली भाषाक साहित्यकार अर्थाभाव झेलि कऽ पोथी प्रकाशित करबैत छथि आ बाद मे ओकरा मंगनि करैत छथि। ज्यो इ लेखक आ साहित्यकार पर गंभीर संकट अथवा जीवन-मृत्युक प्रश्न अबैत अछि तऽ मैथिली भाषाक नाम पर दोकानदारी करवला सभ के हुनक सुधि लेबाक फुर्सत नहि रहैत अछि। श्री ठाकुर नव साहित्यकार सभ के एहि पर ध्यान देब आ एहि सॅ बचबाक सलाह देलनि। ललितक उपलब्धि पर रोशनी दैत कथाकार अशोक हुनक अमर कृतिख् रमजानी, कंचनिया आ पृथ्वीपुत्र आदिक चर्चा कहलनि जे ओ मैथिली कथा के पारंपरिक सांचा सॅ बाहर निकाललनि। वरिष्ठ साहित्यकार पन्ना झा कहलनि जे ललितक कथा साहित्य उच्च स्तरक छल मुदा। एहि सॅ पहिलुका साहित्यकार के कम नहि मानबाक चाही। ओ कहलनि जे हुनक कथा रमजानी मैथिली कथाक मात्राक लेल टर्निंग प्वाइंट कहल जा सकैत अछि। सम्मेलनक मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार सुकांत सोम ललितक साहित्यिक अवदानक चर्चा करैत कहलनि जे हुनक साहित्य मे गरीबी आ पाखंड सॅ मुक्ति भेटैत अछि। हुनक उपन्यास आ कथा मुक्तिक अछि। ओ कहलनि जे वर्तमान दौर मे आम जन सरोकार सॅ जुड़ल कथा आ उपन्यास लिखबाक आवश्यकता अछि। संगहि मैथिली कथा के अपन पारम्परिक लीक सॅ हटि वर्तमान दशा दिशा पर विषय के केन्द्रित करबाक आवश्यकता अछि। ओ कहलनि जे ओना तऽ मैथिलीक कथा साहित्य पहिनहु मजगूत छल मुदा ओ अपन पारम्परिक लीक पर चलैत अपन स्थित मजगूत कएने छल। मैथिली साहित्य ललितक आगमन सॅ विषय वस्तुक स्तर पर सेहो मैथिली कथा मजगूत भेल। ओ कहलनि जे ललितक सम्पूर्ण रचना के समग्र रूपे प्रकाशित करबाक आवश्यकता अछि जाहि सॅ हुनक नीक तरहे पुनर्मूल्यांकन कयल जा सकय। सम्मेलनक अध्यक्षता करैत वरिष्ठ साहित्यकार नरेन्द्र झा कहलनि जे मैथिली मे ललितक योगदान के बिसरल नहि जा सकैत अछि। ओ आबऽ वला पीढ़ीक लेल मार्गदर्शक छथि। ओ मैथिली साहित्य के देश आ विश्व साहित्यक समकक्ष अनबाक लेल सदैव छट पटाइत छलाह। एहि सॅ पहिने मैथिली लेखक संघक महासचिव विनोद कुमार झा प्रबुद्ध जनक स्वागत करैत संघक गतिविधि पर रोशनी देलनि आ संघक योजना सभक सोझा रखलनि। सम्मेलनक दोसर सत्र मे कवि सम्मेलन सम्पन्न भेल जकर अध्यक्षता डॉक्टर इन्द्रकांत झा कयलनि। कवि सम्मेलन मे कमलकांत झा, कमल मोहन चुन्नू, अजीत आजाद, सुरेन्द्र नाथ, अरविंद ठाकुर, जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ गंगानाथ गंगेश, विजय नाथ झा कविता पाठ कयलनि। एहि अवसर पर डॉक्टर वीणा कर्ण, विवेकानंद ठाकुर, प्रमीला झा, अग्निपुष्प, अरूणा चौधरी, डॉ0 रमण कुमार झा मैथिली भाषाक आन कतेको साहित्यकार उपस्थित छलाह। उनसठम वर्ष मे प्रवेश कयलक चेतना समिति नीक गप आ योजनाक पर भेल चर्चा मिथिलाक प्रतिनिधि संस्था चेतना समिति पटनाक उनसठम स्थापना दिवस मिथिला भवन मे समारोहक संग मनाओल गेल। एकर अध्यक्षता चेतना समितिक नव निर्वाचित अध्यक्ष विजय कुमार मिश्रक कयलनि योजना विभागक प्रधान सचिव विजय प्रकाश मुख्य अतिथि छलाह। एहि अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम सेहो सम्पन्न भेल। कार्यक्रमक प्रारंभ प्रणव प्रवीण झाक गोसाउनकि गीत सॅ भेल। समारोह मे उपस्थित लोक सभक स्वागत करैत नव निर्वाचित सदस्य बासुकीनाथ झा समितिक काजक चर्चा करैत नवतुरिया सभ के अपन भाषा आ संस्कृतिक संरक्षणक लेल आगा आबय लेल कहलनि। आ भने मंचस्थ भऽ नवतुरियाक आह्वान करैत छलाह मुदा कार्यक्रमक दरमियान कतहु सॅ कोनो नवतुरियाक अवसर नहि देल गेेल आ समितिक जे नव कार्यकारिणी बनल अछि ओहि मे नव किछु अछिए नहि तऽ नवतुरिया कऽ सॅ आओत। एहि अवसर पर विजय प्रकाश मैथिली भाषाक आ संस्कृतिक संरक्षणक बदला संवर्द्धन पर जोर दैत कहलनि जे एकरा बचा कऽ रखबाक लेल अपनहि घर स ॅप्रयास करबाक चाही। ओ कहलनि जे मात्रा नीक गप आ भाषण सॅ मिथिला आ मैथिलीक विकास नहि होयत एहि लेल हमरा सभ के जमीनक स्तर पर प्रयास करबाक चाही। हमरा सभ के भाषा के संवैधानिक अधिकार भेटल अछि मुदा एकर लाभ मैथिली भाषी के नहि भेटि रहल अछि। एहि लेल प्रबुद्ध मैथिल जन जिम्मेवार छथि। आम मैथिली भाषी के अपन भाषाक महत्व आ अधिकारक जनतब देबाक लेल अभियान चलैबाक आवश्यकता अछि। ओ कहलनि जे सभ के अपन मातृभाषा मे शिक्षा देबाक चाही। मातृभाषा मे शिक्षा देला सॅ नेना सभ मे भाषाक ज्ञानक संगहि तकनीकि शब्दक ज्ञान मे बढ़ोतरि होइत अछि। वरिष्ठ मैथिल रंगकर्मी प्रेमलता मिश्र प्रेम कहलनि जे ई चिन्ताक विषय अछि जे पबुद्ध मैथिल समाज आइ अपन भाषा मे बजबाक प्रति उदासीन अछि। ओकरा मैथिली भाषा मे गप करब अपना के पिछड़ल बुझि पड़ैत अछि। जखनकि आन भाषा भाषी के आपस मे अपन भाषा मे गप करबा मे गर्व होइत छनि। ओ मैथिल समाज सॅ अपन भाषाक प्रति सम्मान रखबाक आह्वान करैत कहलनि जे ओ कतेको पैघ पद पर होथि अपन घरक भाषा मैथिली राखथि। ज्यों अपना घर मे अपन भाषा आ संस्कृति के सम्मान नहि भेटत कऽ आन ठाम सॅ सम्मान भेटबाक आश लगाएब बेकार अछि। एहि अवसर पर अपन विचार व्यक्त करैत मैथिल समाज सेविका आ शिक्षाविद् मृदुला प्रकाश मैथिली भाषी सभ सॅ अपन भाषाक प्रति स्नेह बढ़ैबाक पर जोर देलनि। ओ कहलनि जे समृद्ध मिथिला संस्कृति आ मैथिली भाषाक संकट पर हम सभ चर्च करब एकर शायद कल्पना हमरा सभक पूर्वज नहि कयने हेताह। इ स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण अछि। अविकसित भाषा आ संस्कृति विकसित भऽ रहल अछि आ हमरा सभ दिन पर दिन पछुआ रहल अछि। हमरा अवसर भेटि रहल अछि एकर लाभ उठैबाक अवसर हमरा सभ के नहि अछि। अपन भाषा सार्वजनिक रूपे बजबा मे हिन भावना ग्रसित कऽ रहल अछि जे नीक स्थिति नहि अछि। कार्यक्रमक अध्यक्षता करैत समितिक अध्यक्ष विजय कुमार मिश्र मिथिलांचल मे प्राथमिक स्तर सॅ नेना सभ के मैथिली भाषा मे शिक्षा देयैबाक लेल सरकार सॅ मांग कयल जायत। संविधानक अष्टम् अनुसूची मे मैथिली के सम्मिलित कयलाक बाद सरकार ई दायित्व अछि जे ओ स्वयं एहि दिस पहल करय जे प्रदेश मे जतय केओ एहि भाषा मे पढ़ए चाहैत अछि। ओकर व्यवस्था करय। कार्यक्रमक संचालन समितिक संयुक्त सचिव उमेश मिश्र कयलनि। एहि अवसर पर विधायक विनोद नारायण झा उपाध्यक्ष गणेश शंकर स्वर्गा, योगेन्द्र नारायण मल्लिक, घर, बाहर पत्रिकाक सहायक संपादक कमल मोहन चुन्नू, अजीत आजाद, रघुवीर मोची, प्रो0 निरंजन झा, प्रेमकांत झा, डॉ0 इन्द्रकांत झा, डॉ0 अरूणा चौधरी आन कतेको गणमान्य लोक उपस्थित छलाह। शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्लू‍’ बड़का साहेव : परम्परागत संस्कार केर पराभवक वृति‍ चि‍त्र मैथि‍ली नाट्य साहि‍त्यिमे लल्ल‍न प्रसाद ठाकुरक प्रवेश आधुनि‍क मैथि‍ली नाटकक लेल क्रांति‍काल मानल जा सकैत अछि‍। लौंगि‍या मि‍रचाइ आ मि‍. नीलो काका सन चर्चित नाटकक कृति‍कार लल्ललन जीक नाटक “बड़का साहेव” सन् 1985 ई.मे प्रकाशि‍त भेल। प्रकाशनसँ पूर्वे 20 नवम्वआर सन् 1983 ई.मे एकर पहि‍ल मंचन रवीन्द्रा भवन जमशेदपुरमे लोकप्रि‍यताक नूतन आयाम स्थापि‍त केलक। लल्ल नजी टाटा स्टी लमे अधि‍कारी संवर्गमे नि‍युक्ते छला। बेस्तय दैनन्दिथ‍नीमे रहि‍तो अपन अभि‍नय आ साहि‍त्यम प्रेममे लि‍पि‍त ऐ मैथि‍ली भक्त केँ साहि‍त्यि ‍क मानस पटलपर ओ नाओं आ ठाओं नै भेटल जेकर ई अधि‍कारी छल। मैथि‍ली नाटककेँ “मंच नि‍र्देश” आ परम्पआरावादी संस्काभरकेँ आधुनि‍कतासँ तारतम्यि स्थामपि‍त कऽ अपन मौलि‍कताकेँ बचा कऽ राखब हि‍नक रचनाक वास्तकवि‍क उदेस मानल जाए। ऐ क्रममे महान कलाकार कथाकथि‍त भलमानुष समाजक स्वीथकृति‍क परवाहि‍ नै कऽ कऽ मात्र अपन उदेसक दि‍स धि‍यान दैत एकटा सरल आ सौम्य  भाषामे 45 पृष्ठंक नाटकक लि‍खि‍ मैथि‍ली समाजक आगाँ 30 वर्ष पूर्वे एहेन प्रश्नचि‍न्हक ठाढ़ कऽ देलक जेकर नि‍दान अखन धरि‍ नै भेटल। कलाकारक अभि‍यानक मौलि‍क उदेस होइत अछि‍ जनप्रि‍यताकेँ धि‍यानमे राखि‍ मंचन करबाक चेष्टा । नाटककार स्व यं ि‍नर्देशक छला। ऐ उदेससँ बाहर नि‍कसि‍ कऽ पूर्ण साहि‍त्यिे‍क रूप देब हि‍नको लेल असंभव छल। मुदा एकरा साहि‍त्यिम‍क भाषामे सरल वि‍षयकर “मौलि‍क संस्कादर पराभव” चयन आ ओकरा बहुत हद धरि‍ सफल प्रति‍बि‍म्बिमे समाहि‍त करब नि‍श्चि‍त समालोचककेँ स्त‍ब्ध  कऽ देलक। इहए कारण थि‍क जे सुधांशु शेखर सन चर्चित साहि‍त्यककार सेहो ऐ पोथीक आमुख लि‍खबाक क्रममे कहुना कऽ पि‍ण्डा छोड़ा लेलनि‍। वि‍षय बि‍म्बरमे ऐ नाटकक कोनो वि‍शेष योगदान नै, मुदा आकर्षक अछि‍ तँ उदेसक दूरदर्शिता पूर्ण वि‍वेचन। तेकर परि‍णाम भेल जे “बड़का साहेव” अर्न्तआराष्ट्री य मैथि‍ली नाटक प्रति‍योगि‍तामे पहि‍ल स्थाकन प्राप्तत केलक। “मि‍थि‍लाक्षर” नाट्य संस्था“ जमशेदपुरक प्रणेता लल्ल नजी मैथि‍ली नाट्य मंचनक पहि‍लुक सम्पू्र्ण हस्तााक्षर छथि‍ जे प्रकासमे ओ लोकप्रियता प्राप्तथ केलनि‍। जे देसि‍ल परि‍धि‍मे रहनि‍हार नाटकार लोकनि‍केँ ताधरि‍ तँ प्रात्रत नि‍श्चि‍त नै भेल छल। महि‍ला पात्रक अभि‍नय महि‍लेसँ करौल गेल। ऐ नाटकक पहि‍लुक पात्र छथि‍ छेदी झा जे वृद्ध ग्रामीण मैथि‍लक भूमि‍कामे छथि‍। छेदी झाक भागनि‍ चूड़ामणि‍ झा गामसँ शि‍क्षा ग्रहण कऽ कऽ नौकरी लेल प्रवेश परीक्षा देबाक उदेससँ अपन माम संग जमशेदपुर अबै छथि‍। ग्रामीण जीवनमे सहज अर्थ पीड़ाक दंशसँ मर्माहि‍त प्रति‍भाक उद्वेलन एकर पहि‍ल दृश्याक मूल उद्बोधन मानल जाए। माम आ भागि‍न दुनू साधन वि‍हि‍न तँए जमशेदपुरमे आबि‍ क्षणि‍क प्रवासक छाँह तकैत बी.सी. झा सन अभि‍यन्ता्क ओइठाम आबि‍ गेल छथि‍। बी.सी. झा कहि‍यो छेदी कक्काक “बालो” छला। समए आ कालक प्रभावसँ आब ऑफि‍सर बनि‍ अपन मौलि‍क संस्काारकेँ बि‍सरि‍ जेबाक नाटक कऽ रहल छथि‍। ऐ नाटकक मूल कारण थि‍क अपन गरीब समाजसँ स्वतयंकेँ दूर रखि‍ पाश्चात्यआ शैलीक जीवन जीबाक चेष्टाय द्वारा अपनाकेँ भलमानुष देखेबाक प्रयास। गामक लोक बंगलापर आबि‍ खूब खएत आ गाममे जा कऽ बेर्थ गोलौसी करत। वालचन्दे झाक स्त्री  आब “एडभान्से” पलायनवादी नटकि‍याक अर्द्धांगि‍नी तँ छथि‍ मुदा अपन मौलि‍कताकेँ छोड़ए नै चाहै छथि‍। ऐमे हि‍नको स्वामर्थे छन्‍हि‍। जौं अपन घर आएल गमैया मैथि‍लकेँ अपमानि‍त कएल जाएत तँ लोक गाममे खि‍स्सा‍ करतनि‍ जे बी.सी. झा जि‍नका -अंग्रेजी नै जनबाक कारणें छेदी कक्का बेसी झा बूझि‍ गेलखनि‍।-क स्त्री  नीक वि‍चारक नै छथि‍न। ऐ स्वााथि‍क संग-संग बेवहारि‍कता नाटकक दोसर कारण छन्हिं‍। मीना जीक अपन तनया मि‍क्कीक लेल चूड़ामणि‍मे संभावना देखब। छेदी कक्काक अनुसारे चूड़ामणि‍क पि‍ता बी.सी.झामे कहि‍यो “समाधि‍” बनबाक वि‍चार पनकल छल। चूड़ामणि‍क पि‍ता आब नै छथि‍। चूड़ा स्व।यं मसुआ गेल छथि‍। बी.सी.झा आ हुनक पुत्री मीनाक दृष्टिम‍मे हि‍नक स्थाोन “टीकधारी” पुरोहि‍तसँ बेसी नै जमशेदपुर सन छोट-छीन बम्बडईमे टाटा स्टीुलक माटि‍-पानि‍सँ पोरगर भेलि‍ मीना तँ कन्वेोन्टरक छात्रा छथि‍। चूड़ामणि‍क सन “टीकमोहन” केना ऐ शहरी रम्भाोकेँ रमतनि‍? ओ तँ अपन मैथि‍लीकेँ बि‍सरि‍ जेबाक टाटकमे लागल छथि‍। बापक रचनात्मिक सहयोग मैथि‍ल संस्कृकति‍क दोहन मात्र मानल जाए। नाटककार उद्वि‍ग्नी छथि‍। मो. असरफ, धनुषा /नेपाल, हाल : कतार बिहनि कथा-शहरीया घरवाली

मोहना जवान भ गेल । ओकरा मनमे उत्साह जागल कि आब हमहु सादी विवाह क क अपन घर बसाबी । मुदा मोहनाके मनमे सबदिनस रहे कि शहरीया घरअबाली करी । इ बात मोहना अपना माएके कहलक कि हम गाउके लडकी नै बल्की शहरीया लडकीस सादी कर चाहैत छी आ हम तोरालेल शहरीया पुतौह लाब चाहैत छी । तोहर कि बिचार छौ ? मोहनाके माए बजलिह -तोरा जे पसन्द छौ हम ओहिमे राजी छी । इ बात सुनिक मोहनाके मुहमे लड्डु फुट लागल । ओ आब लडकी खोजबाक प्रयास क र लागल । किछु दिनक बाद जनकपुरक थापाचौकके जोगीबाबुक बेटी बन्दना भेटलीह । ओकरा टि-सर्ट आ जिन्स लगौने देखि मोहनाके पसन्द आबिगेल । आ ओ सादी करबाक लेल त्यार भ गेल । गाउघरक २/४ भलादमीके बजा अपन सादिक दिन पक्का कयलक । विवाहो बड धुमधामस भेल । किछु दिनक बाद बन्दना घरमे ककरो नै टेर लागल । नित्य दिन आठ बजे पलङ्गे छोडे । सबदिन चाह मोहनेस मङ्गबाबे । बन्दना रोज खाना खाइत आ बेग लटकबैत बजारदिस चैल दैत । सबदिन नव नव सखिके सँग रङ्गरलिय मनबथि । गाउमे ककरोस माथो नै झापथि । मोहना कतेक दिन कहबो कयलक कि अहा गामक पुतौह छी सरम लेहाज करु । एना जिन्स लगा उदन्ड भ चलब त लोक कि कहत ? तखन नाक खुम्चबैत कन्या बाजल - अहाके पता नै अछि जे हम शहरीया लडकी छी ? अहा कहैत छी हमरा मुह झापै लेल मुदा हमर त दम फुलैत अछि । हम अहाक ईशारापर नै नाचब । शहरीया छि त एहने सबदिन रहब । आब एहन चरित्र देखि मोहना सोचमे पडि गेल कि करु कि नै ? तखन माथ पिटैत अपन साथीसभके सल्लाह देलक कि गाउके लुल्हे नाङ्गरस सादी करी मुदा शहरीया घरबाली नै करी .... बिन्देश्वर ठाकुर पश्चताप 

- जुगल भाई रे एना किय मुह बिझकौने छे ? बुझाइछौ जेना चेहरापर १२ बाजि गेलौ ।  - हौ भैया कि कहियो हमर सब मेहेनेतपर पानि फेटागेलो । अपन पेट काटि-काटि बेटाके पढौलीयो । जते जते ढौवा मङ्गलकै सब देलीयै । मुदा आइ S.L.C के परिणाम देखि मन बिक्षिप्त भ गेल ।  - से किय रौ पास नै कयलकौ छौडा से ? - हौ कि पास करतै । ७ गोटे बिषयमे लगालेलकै । पढ कहैत छलियै त मनुसगैन्ह लगैत छलै । स्कूल जएबाक बहाना बनाक घरक कोनो काज नै करैत छल । मुदा पढ कि जेतै ओ त स्कूल समयधरि अपन साथी-सङ्गीसँगमे रङ्गरसीया मनबैत छलैक । आब ओकरे साथ साथ पढबला छौडासभके अपन सफलतापर नचैत देखैत छैक ओकर करेज कटैछै । एखन भोरेस पलङ्गपर ओङहरिया देने छै । बफाडि टोडिरहल छै सबेरेस । मोहनाक बेटीसँग मुठ्ठाके मुठ्ठा रुपैया ल क जे सिनेमा देख जाइत छलैक सेहो घट्ना ओकरा काट छुटै छै आ अपन करणीपर बेर बेर पश्चताप करैत छैक । मुदा आब पश्चतैने होएत कि ? समय त गुजैर गेल अछि । आ बितल समय कहु घुरिक फेर एलैय ? उपकारके चुपकार

हम जयनगरस अबैत छलौ । रस्तामे देखलौ एकटा महिला अपन ६ महिनाक बच्चाके गोदीमे ल क कनैत छल । लगमे जा जखन देखलीयै त ओ हमरे पडोसी मनोजके भन्सीया रहैक । माने हमर गामक भौजी । घर एकेठाम होएबाक कारण हमसब एकदोसरके बड निकजका जनैत छलौ । हमरा देखि ओ आओर जोड जोडस हिचैक हिचैक कानअ लगलीह । कि भेल भौजी छोट बच्चाक लेने एना किय भागल जाइत छी ? प्रश्नके उतरमे ओ बजलीह - "हमरा एहि दुनियाँमे कियो नै अछि । जत ततस हम ठोकरे खाइत छी ते हम मरि जाए चाहैत छी । हमरा छोडि दिअ । ।जत मन होएत तत चैल जाएब । ने त जहर माहुर खा मरि जाएब ।"  एहन पिडाएल बात सुनि हम नम्रस पुछलीयै - भौजी एना किय बजैत छी ? घरमे फेर झगडा भेल से ? तब ओ अपन दु:ख भरल कहानी बताब लगलीह - बच्चा कानअ लगबाक चल्ते खाना समयपर नै बैन सकल ताहिस हुन्कर ससुर सासु आ पतिदेव सेहो पिटलकनि आ घरस भगादेलकनि ।  पितखीसमे ओहिना बाजल हेताह ओसभ चलु अहा । घर छोडि नै जाउ कतौ । कतेक सम्झौलाक बाद ओ आब लेल राजी भेलनि । जखन हम अपनासँगे मोटरसाइकिलपर लाबि ओकरा दूरापर उतारलौ त उनकर ससुर,सासु आ हुन्कर पती हमरा उपर उल्टे लाल्छना लगौलक । तोरे कारण इ मौगीया अतेक बहसल छै । तोरे सिखाएलपर एके टाङ्गपर नचैत छै । आदि आदि .... तखन हम महशुस कयलौ जे दोसरके इज्जत बचाएब आ अपना बेज्जत होएब । दोसरके भलाई करब अपन चरित्र हत्या कराएब । उपकारके चुपकार एकरे कहैत छैक । 

प्रतिशोध 

नव विवाहित सुभासके आइ सुहागरात छनि । खानपिन समाप्त भेलाक बाद हजारौ सपना तथा प्रेमपूर्ण आशा बोकि प्रियसी इन्तजार क रहल घरदिस बढल । एगोट पैर असोरापर आ एगोट आङ्गनेमे छलै कि भितरस कन्या बाजल -"कनिक हमर पैरक चप्पल नेने आऊ,हम बिसैर गेलौ ।" नवपत्नीक एहन सन्सकारहीन बात सुनि सुभासके करेजपर ठन्का खस्लै मुदा दाम्पत्य जीवनके पहिल दिन आ प्रियसीके प्रथम राति सोचि जखन ओ चप्पल ल क गेलाह त घोघ उठबैत सिना तानिक कन्या बजलीह -"अहाके हम चप्पल लाबलेल अह्रेबाक प्रयोजन बुझलियै ? अहाक बाबुजी मुहमाङ्गी रकम ल अहाके बेचलक अछि आ हमर बाबुजी एक-एक धुर जमिन बेचि हमरा लेल अहाके किनलक अछि । एहि हिसाबे पैसास खरिदल दास भेलहु अहा जे आवश्यकता पडलापर खरिदार किछु करासकैय ।" इ गप्प सुनि सुभासक गर्दन लाजस झुकि गेलैक आ ओ निरुतर भ गेलाह । तखन कन्या फेर नम्र भ कहलनि - इ हम बस अहाके महशुस करएबाक हेतु एकटा अभिनय कयलौ । आजुक बाद एहन किछु नै करब । एखन लेल क्षमाप्रार्थी छी।"  कन्याक आखिमे अपन बाबुजीस लेलगेल पैसाक ज्वाला छल । टकापर बिकाएबला एहन दानवरुपी पतिप्रतिके प्रतिशोधक भावना छल। जेहन करणी तेहन भरणी 

साझक समयमे बुढिया अपन नभकी पुतौहके ल क पोखरिझाखरि जाइत छल । तखने ओम्हरस रामगन्जबाली अबैत छलीह । बिचे बाटमे दुनुके भेटघाट भेल आ रामगन्जबाली पुछलक बुढीयास - यै काकी एकटा बात फेर सुनलियैय केनादन साच्चे ? - गे कि सुनलहीय से ? - ए बुढीया धनगढीबालीदिया नै सुनलियैय से, कहादन दोसरो घरबला छोडि देलकै ? - ह गे सुनलियय हमहु । दूर बररुपियाके कोन बात । बुढारीमे घिढारी क र गेलै त अहिना हेतै ने ।  - ह यै काकी हे घरमे ककरो नै गुदानै छलै । अपने मनस जे जे मन होइछलै से से करै छलै । घरबला बिचरा परदेशीया २ साल ३ सालमे एकबेर अबै छलै आ फेर चैल जाइत छलै । मुदा ढौवा रुपैया सब एकरे नामपर पठबैत छलै ।कोनो चुइजके दुखो तक्लिप नै । से रन्डिया दुनु बच्चोके छोडिक सब ढौवा ल क ओइ चमरबा मरदबासँगे कोना उढैर गेलै ? आ आब जखन ढौवा चुसल भ गेलैय त लात मारिक भगा देलकैय । निके भेलै कुकर्मीके जेहने करणी तेहने भरणी । आब छिछ्याइत रहो जिनगीभरि । न्याय

स्कूल जाइत काल एकटा लड़कीकेँ ओहे गामक मुखियाक बेटा अपना हबसक शिकार बना लेलक। ई घटना सुनलाक बाद स्कुलिया छौड़ा सभ ओकरा बड पिटलकै। ऐ घटनासँ हुनकर बाबूजीकेँ अपन पगरी खसबाक भान भेलै आ अपन बेटाक करतूतपर पर्दा देबाक लेल पञ्चायत नै करबाक घोषणा केलक। मुखियाक एहन पक्षपात देखि पूरा समाज मिलि कऽ एक निर्णय केलक जे न्याय आखिर न्याय होइ छै। आ सभक साथ उचित न्याय हएब आवश्यक छै, चाहे ओ राजा हुअए या प्रजा। तेँ पञ्चायत हेबाक चाही तथा दोषीकेँ कर्म अनुसार उचित सजाय भेटबाक चाही । समाजक आगू मुखियाक कोनो बस नै चललै। ओ पञ्चायत करबाक लेल विवश भऽ गेल। दोसर दिन भोरे पञ्चायत बैसल आ उचित न्याय भेल।

  आत्मग्लानि  काल्हि दिवाली पावनि। सभ गोटे दिवालीक तैयारीमे जुटल। हरीयाक हाथ कटा गेल छै तेँ हुनकर पत्नी आवश्यक समान लेल बजार दिस टहलल। पाछु-पाछु हुनकर बेटा सेहो। हरीयाक परिवार बड गरीब छै। दुकानमे पूजा, आरती आ प्रसादी लेबाक क्षमता नै छनि हुनका सभ लग। मुदा समाजमे नाक बचेबाक हेतु एकटा अगरबत्ती, अबीर, चन्दन आ पाभरि लड्डु खरिदलक मुश्किलसँ। तइपर सँ हुनकर बचबा हुकालोली आ फटका लेल बफाड़ि तोड़ऽ लागल। पैसा तँ नै रहए ओकरा लग से झट्ट द किन देतै। दुकनदारसँ विनती केलक तँ ओ कहलक -" पैछला लक्ष्मीपूजाक पैसा सभ बाकिए छौ आ फेर कतेक खाली उधारिए दैत रहियौ। "दुकनदारक बात सुनि कऽ छपराबाली तँ लजैनी जकाँ लाजसँ घोकैच गेल। ओम्हर दोसर लोक सभकेँ सामाग्री किननाइ आ बाल-बच्चा लेल फटका किननाइ देखि कऽ छपराबालीक आँखिसँ श्रवन नोर बहऽ लगलै आ अपन गरीबीपर बड आत्मग्लानी भेलै।

अभिशाप  चौकिएपर सँ काकी कहै छथिन, "बौवा एम्हरे आउ।"  काकीक पिड़ाएल स्वर सुनि रमलोचना चौकी दिस बढ़ल मुदा आङ्गन सुन्न। चारु दिस बस कन्नारोहट। ओ समझि नै पबलथि ऐ परिवेशकेँ। आ काकी सहजेसँ बताबऽ लेल राजी नै होएथिन।। तखन ओ कहलथिन- "काकी, की भेल सत्त-सत्त बताबू, अहाँकेँ हमर सपत भेल।" काकी आँचरसँ अपन नोर पोछैत सम्वेदनशील भऽ बजलनि- "की कहू बौवा, अनर्थ भऽ गेलै। बुच्चीकेँ विवाहक ६ महिना नै भेल छलै मुदा नरपिशाच सभ उनका ऊपर अन्याय कऽ देलकै। दहेजक किछु टका बाँकी रहि गेल छलै, से तइसँ ओकरा मट्टी-तेल धऽ जिन्दे जरा देलकै ओकर सासुर सभ। कतेको बेर ऐ टका लेल तछाड़-मछाड़ भेल रहै मुदा हम सभ जल्दिए ब्यबस्था कऽ दऽ देब, से आश्वासन देलाक बाबजुदो ओ दानव सभ हमरा बेटीक साथ एहन कुकर्म केलक। बजरखसुवा पुलिसकेँ थानामे रिपोर्ट लिखाबऽ गेलौ तँ मचरुवा ओकरो सभकेँ शायद पैसेपर मिला लेलकै। एखन धरि किछु निराकरण नै भेलैए।" काकी बैजते-बैजते बेहोस भऽ गेलीह। रमलोचना काकीकेँ सम्हारैत सोचै छै, समाजक एहन अभिशाप आ कुसंस्कारक बारेमे। जकरा चपेटामे कतेको धिया-बर्सेनी बलिदान होइ छै। परमेश्वर कापड़ि लक्ष्मी आ गोधन दिन बेराग आ पतरा पूजा मिथिलाक दैनन्दिजनीमे अछि आ बड़–बड़ पावनि तिहार एहि लोकके संस्कार आ संस्कृतिमे रहल अछि । अन–धन लक्ष्मीक सङे अखण्ड सुखानन्द प्रदान करएबला सुखराति÷दियाबाती पावनिपर लोकक समर्पित आस्था आ अटूट निष्ठा अछि । एकर अपन खास विधि–विधान आ पूजा–पद्यति आ आस्था विश्वास अछि, मूल्य–मान्यता अछि । ई पुनित प्रकाश पावनि धार्मिक सांस्कृतिक रागरंगस’ महिमा मण्डित अछि आ लोकतत्व, लोकदर्शन आ लोक पूजा–पद्यति एकर केन्द्रमे विराजित अछि । मिथिलाक एहि सांस्कृतिक पर्वपर वैदिक आ तान्त्रिक पद्यतिक व्यापक प्रभाव सेहो सेहो अछि । अरिपन लोकचित्र सबहकसङे एहिमे प्रयुक्त हुक्कालोली आ सुपबजना लोकमन्त्रक अपन खास दर्शन आ मूल्यमान्यता अछि— — हुकालोली दियावाती । दियावाती हुक्कालोली । — सुख सुखराति दियावाती । हुकालोली दियावाती । — घरक अलक्ष्मी÷दरिद्रा बाहर जाउ ! बाहरके लक्ष्मी घर आउ ! जहिना मिथिलाक संस्कृति सनातन अछि, महान अछि, लोक महिमा मण्डित अछि तहिना एकर पूजा–अर्चाक रीति–नीति, मूल्यमान्यता अपूर्व आ लोकायित अछि । पावनि–तिहार आ पूजा–उत्सव लोकक जीवनमे अभ्यन्तरि उर्जा आन्दक संङहि सांस्कृतिक रागरंग सेहो भरिपोक प्रदान करैछ । तएँ सब घर, सब लोकक जीवनके जगमगएने गमगम महमह हरख आनन्द प्रदान करबाक हिसाबस’ एकरा परम्परागत ढंगस’ अटूट क्रमक रुपमे मनबैत आएल अछि । लोक परम्परा आ पद्यति अदने–पदने, छाहीए–फुंहिए बात ला, ओहिना नै बनैछ, एकाधे दिनमे सेहो नै बनैछ । अपनासबके जीवन–धर्म आ लोक परम्परा जे अछि से परम तत्व, पुनित दर्शन, सम्पूज्य आस्था आ अटूट लोकविश्वासस’ सम्पोसित अछि । सब जनैछ जे अपनासबके सुखरातिमे बहुत उद्यम, अनेको जतन आ तप पूजनस’ लोक लक्ष्मीके जहिना घर करैए, तहिना अलक्ष्मी÷दरिद्राके बाहर करैए । एहि घर बाहरके कर्म–धर्ममे जतए लक्ष्मी घर आनल जाइछ आ अलक्ष्मी जे बहराएल जाइछ, सेहो देवी, धी–बेटी जकाँ । दुखाक’ नै सोहरदे मने, नेमे निष्ठे । लक्ष्मीपूजा दिन सकले सुमंगली बुढ़िया पुरैनिया अन्हरौखेमे, सुप बजाक’, मन्त्रौआ विदा गीत गाबिक’— घरके दरिद्रा÷अलक्ष्मी बाहर जाउ ! बाहरके लक्ष्मी घर आउ !! हे लक्ष्मीमाइ सुख–पुन लहदह करु ।हरख–आनन्दके बाढ़ि बरकैत दिअ’ । अहाँ उद्यमके, व्यपारके, सुकर्मके, सुधर्मके बोइन प्राप्तिके रुपमे बिराजू!  सुख–दुख, जीवन–मृत्यु, दुख–दारिद्र, नीक–बेजाय सब कर्म–धर्मक भोग–पारस अछि । संध्या, छाया, मृत्युदेव आदिदेव दिनकर दीनानाथक अपन घर–परिवारक छथिन । तैं सबटा बातके गहि अबधारि ई लोक दरिद्रोके दुरदुराए, गरिआए नै, नीके नाहित बेटी बहिन माफिक विदा करैत छथि, गोधन दिन । आ ई विदाइके मिथिला परम्परा आ पद्यति अलबत्ते अछि । गोधन, गोवरधन पूजा दिनमे, मालक घरमे, अलक्ष्मीके मुरुत गोबरस’ बनाओल जाइछ । ओकरा कुफुल चढ़ाआmे जाइछ । कुअन्नक पौती–पेटारी, सङ सांठके रुपमे बनाओल जाइछ । ओहो पौती पेटारी गोबरेके रहैछ । जेहने देवता तेहने पूजा । तेहने वर विदाइ । पूजा भाव अहू दुआरे जे के हिनका दुखाक’ अरारि मोल लिअए। ओना कहूँ घर घूरि आएल त’ सब सुख–शान्ति लाहेब !  गोधन, गोवद्र्घन बनब’, मनब’के पाछू एकटा आओर खिस्सा कहल सुनल जाइछ । धरतीए माइ जिका गौ सेहो मते छथिन । हिनकास’ ऐ लोकके, देवताके बड–बड उपकार । एहिना एक दिन लक्ष्मी महारानी गौमातास’ प्रसन्न भ’क’, उनटे निहोरे विनती कए कहलथिन्ह जे अहाँ अपना पवित्र तनमे हमारे बास दिअ’ ! सब देवताके अहाँमे भल बास अइ । ऐ बातस’ खुसी हुअके बदलामे गौमाता आतंक, भयस’ सिहरि गेलथि आ हरकले दगधले बजलीह— नै–नै, एहन किन्नौ नै भ’ सकैए । हम हरगिज नै ई बात मानि सकैछी । अहाँके पाब’ला लोक कोन–कोन पाप, छलछुधरम नै करैए ? हमरामे जखैनते अहाँक बास होएत त’ सब हमरा छिनाझपटी करत । हमर सबटा सुखचैन हरन भछन क’ देत । घात कुघातमे, नाहकमे हमरा काटि मारि देत, से हटले । एमहर लगारी लक्ष्मी लघोबलाए हठपिठ क’ देलखिन— हम नै मानब । जाबे अहाँ हमरा अपना तनमे बास नै देब, हम ठोस ठौर ठेकान नै पाएब, अहाँके कल नै पड़’ देब । ओमहर अदकल छिलमिलाए गौ तिलोभरि तलविचल नै ओथि आ नै हुनक र’ मानथि— ई भइए नै सकैए । अहाँके अनरगल उपरचौढ़ बात हम मानिए नै सकैछी । भने अहाँ अपन अन्नमे विराजै छी । नीके नाहित बोइनमे बरकैत बनू । द्रव्यमे साक्षात् रहू । धरि एना बयबन्ही नै करु । हमरा निछुन उगरासे रह’ दिअ’ । बड़ महजरो, धरम धकेलके बाद, गौए हारि मानि लेलनि— आब अहाँ जखैन एतेक धरखन करैछी त’ जाउ, अहाँ हमर गोबर गौंतमे बिराजुग’ ! सेहे भेलै । ओकरे चलते आइ चरणमृतमे, औषधिमे, खेतक खाद्यमे, पवित्र ठाँव आ निपिया–पोर्तयामे बड उपयोगी आ महत्वपूर्ण मानल जाइछ । गोधन पूजा अहू बाते, एकरो दुखारे ने !  कृष्ण काव्यमे गोवद्र्घनक अलग महत्व आ वर्णसब छै, तेकर खेरहा एखन एत्त’ नै करी । कथिला त’— हरि अनन्त हरि कथा अनन्ताक चौपट चपेटमे एत’ नहि पड़बाक अछि । राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’ चिन्तन- मैथिलीक भविष्यक प्रसंग

‘मिथिला आवाज’ दैनिक अखबार रंगीन आठ पृष्टमे दरभंगा सँ बहार होइत अछि । दरभंगा अथवा विहार आन मैथिल बहुल क्षेत्र किंवा ६ करोडक भाषा भाषी ओत्त ओकर की अबिगत होइत छैक पत्ता नहि , जनकपुरमे नियमित दू गोट ग्राहक छोडि आन केओ छुव नहि चाहैत अछि । करोडो टकाक लगानीमे सी एम झा दैनिक अखबार निकाललनि । एहि आशमे जे मिथिला राज्यक बढैत मांग आ मैथिली, मिथिलाक रट लगौनिहार बिच जँ एकटा ब्रोडसिटक अखबार देबैक त ओ चलत , निक ग्राहक पाओत , विज्ञापन पाओत । से सभ आशापर तुषारापात भऽ गेल छन्हि , ने अखबार चलि रहल छन्हि आ ने विज्ञापन भेटि रहल छन्हि ।  अवस्था ई छैक जेँ ‘तीन तिरहुतिया तेरह पाक’क कहबी चरितार्थ करैत एतबे दिनमे कतेको पुरान स्टाफ परिवर्तन भऽ गेल छैक आ लगैया अखबार कतौ, कोनो विचारधारा, गिरोह अथवा मैथिली भाषाक संग जे पूर्वो सँ जूडैत कारणक चलिते अस्तव्यस्त भऽ रहल अछि । अखबारक शुरुक सम्वाददाता लोकनि परिचय पत्र पावि नहि सकला अछि , पारिश्रमिक आ कदरक गप्पे करब बेकार । कहबाक जरुरति नहि ई अखबारक अवस्थाक कारणे भेल हएत आ एहिमे समस्त समस्त मैथिल दोषी छी । मिथिला राज्य तँ चाही छल मसदा एकटा रंगीन मैथिली अखबारक हेतु दैनिक दू टका खर्च नहि करब । बीसटा मिन मेष निकालि हिन्दी अखबार सँ सटब । एहि तरहक दूरीकेँ जा धरि नहि मेटाओल जाएत ता धरि मैथिली आ मिथिलाक भविष्यक प्रति संसय तऽ बनले रहत ।  एक दिश अंगिका (पूर्वी तराई दिस) , मगही, बज्जिका भाषाक मारि सुनियोजित ढंग सँ आगा बढि रहल अछि तँ दोसर दिश एहि भाषाकेँ मान्यता देल समूहक लोक जँ मैथिलीमे अछि, आबय चाहैत अछि तँ ओकरा प्रति दुर्भावना, अवमानना , गुटबन्दीद्वारा कात करबाक , उत्तेजित करबाक काज ओहने वर्ग सँ भऽ रहल अछि । जकरा चलिते एहि भाषा सभक उदय भेल अछि आ से जोड पकडने जा रहल अछि ।  मुठि भरि साहित्यिक संघ, संस्थासभस होइक आकि तेहन गनल चुनल साहित्य क्षेत्रमे लागल लोक, अनेरे ककरो विरुद्धमे आमील पिने बदहवास भेल गोल निर्माण किंवा दुरभिकेँ संरचना करैत अवन उर्जा खर्च करैत देखि पडैत अछि तँ भितर सँ दुःख होइत अछि , एहि दुआरे नहि जे ओ संरचना कोनो व्यक्ति विशेषकेँ कमजोर करबाक हेतु कएल जा रहल होइछ , एहि दुआरे जे व्यथृमे ओ अपन सामथ्र्य आ प्रतिभाकेँ अनका रोकबामे अनेरे खर्च कऽ रहल होइछ । काज तँ बढिते छैक , कहाँ कोनो प्रतिवाद किंवा अवरोध अबैत छैक । तखन ककरो निचां देखएबाक आत्मरतिमे लागल लोक दू टकाक ‘मिथिला आवाज’ बीस टकाक ‘मिथिला दर्शन’ , किंवा स्थानीय मैथिली अखबार सभ कीनि कऽ मैथिली क्षेत्रमे लाग सभक हौसला बुलन्द करितथि तँ कतेक नीक होइतैक । मैथिलीपर जाहि तरहे चौतर्फी हमला भऽ रहल छैक , एहिमे ककरो कात लगा कऽ नहि, जोडि कऽ आगा बढय पडत । टिटही जकाँ सौंस आकास अपने टांगपर उडौने रहबाक भ्रमके पोसब सर्वथा पीडादायी परिणती दिश लऽ जा सकैछ , मैथिली भाषा एतेक समृद्ध आ प्रभावी रहितो पछुअएबा सँ नहि रोक जा सकैछ ।  मैथिली साहित्यक बारेमे गलत सूचना प्रवाह भऽ रहलैक अछि , जकरा रोकबाक अभियान चाही । नेपाली भाषीकेँ कानमे मैथिली साहित्यक गलत चित्र उझलल जाइछ । काठमाण्डूक कएकटा कार्यक्रममे कितु नेपाली भाषी अथवा किछु धुर्त मैथिलीसभ सेहो इतिहास एवं यथार्थकेँ तोडि मडोरि कऽ प्रस्तुत करैत देखल गेलाह अछि । इन्टरनेटमे राखल एक अंग्रेजी लेखमे नेपालक कथापर टिप्पणी छपल अछि , जाहिमे दू तीनटा कथाकारक चर्च मात्र छैक , एक गोट पाण्डे थरक लोक छथि, ओहो एहने दुष्टतापूर्ण तथ्य लऽ कऽ बौआ रहल छथि । एहि सँ मैथिली लेखनमे लागल लोककेँ निराशा होइत छैक । क्षोभ होइत छैक । सतर्कता जरुरी छैक –हमसभ ओकरा सभकेँ तथ्य परक सूचना दिऐक । एखन विश्वविद्यालयमे निपाली विषयमे एमए, पीएचडी, करैत विद्यार्थी सभकेँ मैथिली साहित्यक विभिन्न विधापर काज करबाक अवसर देल जा रहल छैक , ओसभ सम्पर्कमे अबैत छथि , बुझि पडैए, कतेक गलत सूचना देल गेल छन्हि वा ओ प्राप्त कएने छथि ।  मैथिली विद्यापति , सलशेस ,दीनाभद्री हो अथवा नौका बनिजारा, दुलरा दयाल, कोनो साहित्यकेँ समृद्ध आ विकसित प्रमाणित करबाक हेतु प्रयाप्त अछि । मुदा तकरा लेल समन्वय, समर्पण आ उदारभावक जरुरति अछि । मात्र एक दोसराक काटक फिराकमे रहब तँ भविष्यमे ककरा कटैत रहब , अपने कटाइत चलि जाएब । खतरा साफ अछि –अंगिका, मगही , किछु मात्रामे बज्जिका सेहो । एखने सविचानी राखू । राज्यक परिकल्पना कएनिहारकेँ हृदय आ सोच दूनु पैघ हएबाक चाही । मैथिल तँ एकटा राज्यक हकदार अछिए ने ! कुमार अभिनन्दन दुर्गास्तुतिक लोकपरम्परा ः झिझिया

पृष्ठभूमि एहि परिवर्तनशील दुनियाँमे. सभ किछु बदलि रहलैक अछि । लोक आनक सभ्यताक नकलकऽ अपनाकेँ धन्य बूझऽ लागल अछि । एहि विकट परिस्थितिमे एखनो गाम–घरक हमरा सभक अपन मौलिक संस्कृति ओहिना अविच्छिन्न रूपमे देखबामे अबैत अछि । विभिन्न लोककथा, लोकगाथा, लोकगीत सदृशे लोकनाट्य आ लोकनृत्य सेहो ग्रामीण ललनाक संरक्षणमे जीवित अछि– प्रस्फुटित अछि । एहि जीवित परम्परामे एकटा सशक्त अध्याय अछि लोकनृत्य– झिझियाक ।  झिझिया मिथिलाक अधिकांश क्षेत्रमे बड़ उल्लसक संग विजयादशमीक शुभ उपलक्ष्यमे कलश–स्थापनासँ लऽ दशमी धरि मनाओल जाइछ । झिझिया पाँचसँ लऽ बीस धरि युवती सभक (अधवयसुओ रहैछ !) एकटा टोली होइछ, जाहिमे कोनो दू वा बेसियो गोटेक माथपर कलश राखल रहैछ जाहिमे अलगनित भूर कयल गेल रहैत छै । कलशक मँुहपर राखल ढ़कनामे गोइठाक आगि रहैछ जाहिमे कनेक–कनेक कालक बाद मटिया तेल राखल जाइत छैक जकर प्रकाश बेस ऊँच धरि लहरा उठैछ । ओहि छौंड़ी सभमहक किछु गोटे माथपर कलश राखि गाओल जाइत गीतक तालपर अपन हाथसँ थपड़ी पाड़ि एकटा विशेष ढ़ंगसँ नाचल करैछ। एहि तरहेँ विभिन्न सम्पन्न लोक सभक दरबज्जापर नाचिकऽ झिझियाक पूर्णाहुतिक लेल अन्न–पाइ मांगल करैछ । एहि माङल पाइक अनुसार अन्तिम दिन अर्थात् दशमी दिन बड़ धुमधामक संग भोज–भात ओ प्रसाद वितरण होइछ। आ विभिन्न तरहक नाच–गानक संग झिझिआक विसर्जन होइछ । गाममे एहि तरहक कैक गोट टोली होइत छैक । सभ एक दोसरासँ नीक होयबाक लेल प्रयत्नशील रहल करैत अछि ।  झिझिआक कलशमे असंख्य भूर जे बनाओल रहैछ तकरा नाचऽवाली सदैव ड़ोलबैत रहैत छैक, जाहिसँ केओ ओहि भूरकेँ गनि ने लेअय । कहल जाइछ जे केओ ओकरा गनि लैत छैक तँ नचनिहारक मृत्यु भऽ जाइछ। तेँ जँ स्थिर रहबो करैत अछि तँ नचनिहार कलशाकेँ अनेरे घुमबैत रहैत छैक ।  भिझिया कहियासँ प्रारम्भ भेल तकर ठोस प्रमाण नहि भेटल अछि । ओना ई परम्परा तान्त्रिक विधिसँ पूर्ण होयबाक कारणेँ अन्दाज ई लगाओल जा सकैछ जे मिथिलामे जखन तन्त्र–मन्त्रक नीक प्रभाव छल होयतैक तखने ई प्रारम्भ कयल गेल हायतैक । एकर प्रारम्भ आठम् शताब्दीक पहिनेसँ भेल होइत से अनुमान कयल जा सकैछ । 

झिझियाक परम्परा एकर प्राचीन रूप आ एखनुका रूपमे कोनो खास अन्तर नहि भेल बुझाइछ । पहिने तान्त्रिक विधिक ज्ञाता माली आ मालिन भेल करैछत छल तेँ देवी–देवताक पूजा–अर्चा एहि वर्गसँ सम्पन्न होइक । आइयो धरि देवी–देवताक लेल आवश्यक पूmलमाला तथा विभिन्न उपादान मालिएक द्वारा प्राप्त कयल जाइछ । तेँ झिझिया, जे पूर्ण रूपसँ देवीक आराधना थिक, माली द्वारा संरक्षण पौलक । मालिनी सभक द्वारा भगवती दुर्गाक अराधना स्वरूप प्रस्थापित झिझिआ नृत्य क्रमशः आइ समाजक अन्यान्य वर्गमे सेहो प्रचलित तथा संरक्षित होबऽ लागल अछि ।  तान्त्रिक ‘कल्ट’ सँ प्रभावित ई झिझियाक बनावटि सेहो एकटा विशेष अर्थ रखैछ । कलशक ऊपर राखल ढ़कना आत्माक प्रतीक थिक आ ओतहिसँ निकलैत ज्वाला, आत्मासँ ज्योति निकलबाक बोध करबैछ । संगे ई झिझिया ड़ाइन, जोगिनकेँ प्रभावहीन बनयवा ले’ बनाओल गेलाक कारणेँ आत्मासँ निःसरित प्रकाशक इजोतमे ड़ाइन–जोगिन रूपी अन्हार किछु नहि बिगाड़ि सकत तकर ज्ञान सेहो करबैछ । ई काज पूर्ण रूपसँ हमरा सभक उपनिषद्सँ प्रभावित अछि– “तमसोमा ज्योतिर्गमय” अर्थात भगवतीसँ अराधना कऽ ई झिझिया टोली “अन्धकारसँ प्रकाशमे लऽ जाउ” क भावना व्यक्त करैत अछि । आ साँच कही त’ यैह एहि लोकनृत्यक मूल उद्देश्य थिक ।  झिझियाक संरक्षण मिथिला क्षेत्रमे मोरङ, सप्तरी, सिरहा, धनुषा, महोत्तरी, सर्लाही तथा बिहारक उत्तराखण्ड़क किछु भाग पद्या, बेनीपट्टी, मधुबनी आदि क्षेत्रमे देखल जाइत अछि । किछु साल बीचमे ई किछु गुम जकाँ भऽ गेल छल, मुदा फेर एम्हर आबि जोर शोरसँ प्रारम्भ भेल अछि ।  एकर प्रदर्शनसँ पूर्व स्वच्छ घैला आनि ओहिमे असंख्य छेद कऽ तैयार कयल जाइछ आ ओकरा धामीसँ बन्हा देल जाइछ । धामी अपन मन्त्रसँ झिझियाकेँ बन्हैक– “सभ्य गुरुक बन्दे पाँउ । बजर, बजर, बजर केबाड़ी बजर बान्हों दशो दुआरी । मटिआ बान्हो । मसान बान्हो, टोना बान्हो, टामर बान्हे...।” मंत्रयलाक बाद झिझिया टोली सभ ब्रह्मस्थान लग जा सर्वप्रथम अराधना करैछ । आ तखन ओहि ठामसँ विभिन्न गोटेक ओतऽ जाइछ । आब मंत्रयबाक क्रिया नहि कएल जाइछ । 

झिझियाक गीतमे सामाजिक चेतना झिझिया टोलीसँ गाओल गीत मुख्य दू प्रकारक होइछ । एकटा’ भगवती सम्बन्धी आ दोसर ड़ाइन  सम्बन्धी । ओना झिझियाक मुख्य लक्ष्य ड़ाइनकेँ गारि देब होइछ तेँ बेसी ओही तरहक गीत गाओल जाइत अछि ।  झिझिआक गीत सभ विभिन्न ढ़ंगसँ गाओल जाइछ, मुदा लय आ छन्द वैह होइछ– शब्दमे मात्र फरक  रहैछ ।  देवीक अराधना क्रममे हुनक कामरूप (कामख्या–असाम) देश जयबाक वर्णन बड़ सजीव होइत अछि । प्रचलित गीत– “कोन बने बोले मैयागे, कारी कोइलियागे– ।” मे देवीक विदाइक बड़ रोचक वर्णन भेटैछ । ओ साड़ी पहिरैत छथि । जूड़ा बन्हबैत छथि । आँखिमे काजर लगबैत छथि... । आ अपन गन्तव्य दिस विदा होइबा ले’ तैयार भऽ जाइत छथि– “केकरा अगनमा मैयागे जुरबा बन्हौले गे, केकरा अगनमा मैयागे कजरा पेन्हलेगे।” जिज्ञासाक शान्ति गीतमे भेटैछ “बा” आ ‘भैया’ गामक प्रमुख देवता ब्रह्मा आ भैरवक लेल प्रयोग भेल अछि । अपन कन्या वा बहिनकेँ बिदा करब एकटा सांस्कृतिक परंपराक अनुरूप आइ भगवती विदा भऽ रहलीह अछि ‘कमरूआ (कामरूप–कामख्या) देशकए...। सभ तैयार । ड़ोली भव्य रूपसँ सजाओल छनि । लील ड़ोली छनि। लाल ओहार लागल अछि । विभिन्न कलात्मक ढ़ंगसँ सजाओल ड़ोलीकेँ बत्तीस गोट कहार उठबैछ– आ भगवतीकेँ अश्रुपुरित नेत्रसँ विदा करैत छथि ब्रह्मबाबा...।’ लील रंग ड़ोलिया, सबुजेरंग ओहरिया, मैयागे भीड़ि गेलाह बतिसो कहार, कमरूआ देश मैया कब जइहेँ गे ।  दोसर तरहक गीतमे डाइनकेँ गारि पढ़ल गेल छैक । एहिमे सभ गीतगाइनि सभ गाइनकेँ खूब जोशमे आबि गारि पढ़ल करैत छैक । एहिमे विभिन्न किसिमक गारि होइत छैक । जे आवश्यकतानुसार गीतगाइनि सभ द्वारा थपघट कयल जाइत रहैत छैक ।  देखल जाय तँ ई स्पष्ट भेल जे गारि सभमे ड़ाइनक व्यवहारक पूर्ण चित्रण ओहिमे कयल गेल रहैछ । एकटा आमधारण छैक जे ड़ाइनसभ दशमीक बीचमे गामसँ बाहर जा ओहिना नङटे नाचल करैछ । एहि नाचक क्रममे ओ अपने द्वारा मारल कोनो बच्चाकेँ जियाकऽ आगाँमे राखि लैछ–ईहो कथन छैक । एहि कथनक सजीव–चित्रण एहि गीतमे भेटैछ– “बरहमेक पछुआरीये ड़ैनियाँ, मत करिहेँ सिंगार ।” वामे लेल आरती, दहिने तरुआरि गे, नचैत–नचैत गेलै ड़ैनियाँ, सीमा ओइपारगे, संगे–संगे गेलै ड़ैनियाँ, राजकोतबाल गे, देख लेलकौ आगे गैनियाँ, नङटे–उघार गे ।”  एहिसँ अतिरिक्त गाबऽवाला विभिन्न तरहक गीतसभ ड़ाइनक कयल गेल क्रियाकलापक चित्र उपस्थित करैछ । एहिसँ ओकरा सभक कृत्य स्पष्ट भऽ जाइछ । “कोठाके उपरी ड़ैनियाँ खीड़की लगैने ना, खीड़की ओत्त ड़ैनियाँ गुणवा चलैले ना । आगे किछु होएतो ड़ैनियाँ, गदहापर चढ़ेबौ’ गदहा चढ़ाए ड़ैनियाँ नमुआँ हसैबौना–” साधारणतया ड़ाइनक कृत्यसँ लोककेँ जानकारी होइत छलैक तँ ओकरा गदहापर बैसा गाम भरिमे घुमाओल जाइत छलैक सैह वस्तु ऊपरो कहल गेल अछि । से ओहि गीत सभमे एतुक्का सांस्कृतिक परम्पराक स्पष्ट चित्र देखबामे अबैछ जकर प्रतिपालन एखन धरि भऽ रहल अछि ।  ड़ाइन समाजमे कोना तिरस्कृत कयल जाइछ तकरो वर्णन गीत सभमे प्राप्त भऽ जाइत अछि । “ड़ैनियाँक बेटा मरल पड़ल है, अन्हार घर झिझिड़ी (झिझिया), कोई नै बाँस कटबैया हे,  अन्हार राति झिझिड़ी–’ । एहि तरहेँ बहुत रास गीत अछि जाहिमे ड़ाइनकेँ समाजक शत्रु तथा विनाशक कहल गेल अछि आ तकर भत्र्सना कयल गेल अछि ।  झिझियाक विसर्जन समारोहक लेल किछु मङ्गबाक परंपरा छैक । एहि क्रममे विभिन्न गोटेक ओहि ठाम जा कटाक्षपूर्ण गीत गाओल जाइछ । उद्देश्य होइछ घर–धनीसँ किछु नगद वा अन्न प्राप्त करब ।  “जाबे भैया सुनलनि झिझियाके अबैया, ताबे भैया ठोकलनि केबार–’ । आ, लोक किछु ने किछु देबे करैत छैक ।  कलशक ऊपर राखल ढ़कनामे आगि प्रज्वलित करबा लेल मटिया तेल देबाक सेहो अनुरोध कयल जाइछ–सोहो गीतमे । जाहि ठाम जतेक तेल भेटैछ–जतेक देखरगर लहास चमकैछ–ओतय ओ सभ ओतेक मोनसँ गबैछ तथा नचैछ । तेल माँगक क्रममे– “एक ड़िबिया तेल ला झिझिया रुसल जाइ छै–’ दूमहिला के कोन सिंगार– ।”  एहिमे घरक बनौटपर निर्भर करैछ जे ओ ककर कोन सिंगार कहओ ।  संरक्षण आ सम्बद्र्धन जरुरी  एहि तरहे देखैत छी, परिपाटीक–रूपसँ झिझिया एखन धरि हमरा सभकेँ अपन अतीतक सांस्कृतिक उपलब्धि दिस मोड़ि अनैत अछि । एकरा आर बेसी नीक जकाँ परिमार्जित करबा ले’ पुरुष–वर्गक भूमिकाक आवश्यकता छै । मुदा, से भेटै नहि छै । तकर संरक्षण जरुरी...। सांस्कृतिक परम्परे तँ आब अपन रहि गेलैक अछि–खालिस अप्पन...। एहन अवस्थामे समाजसं रसे–रसे विलुप्त होइत जाइत झिझियाकें संरक्षण–संबद्र्धन जरुरी अछि । पहिने जत्त प्रत्येक गाममे समाजक विभिन्न वर्गक महिलाद्वारा परम्परागत गीतद्वारा झिझियाक प्रदर्शन होइत छल से आब ई शहरमे आ हाट–बजारमे सिमित भेल जा रहल अछि । एकरा मनोरंजन संग आयक माध्यम बनाओल जा रहल छैक । ने झिझियामे मौलिकता आने ओ श्रद्धा आ विश्वास । वास्तवमे बालबच्चाकें ड़ाइन जोगिनसं बचएबाक लेल भगवती दुर्गाक अराधना आ तेहन ड़ाइन–जोगिनकें गरिपढ़ि सचेत करबाक परम्परागत लोक व्यवहारक रूपें समाजमे स्थापित झिझिया अपन स्वरूपसं मात्रे नहि विचार आ चिंतन सं सेहो विस्थापित भेल जा रहल अछि। एकरा फेरसं समाजमे लौटाब’ पड़त– मौलिक रूपमे । तकरा लेल प्रयास हएबाक चाही ।  नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठान, संस्कृति विभाग गत वर्ष एकटा झिझिया महोत्सव कऽ एकर संरक्षण–संबद्र्धनक हेतु प्रयास सुरू कऽ चुकल अछि । मुदा ई त प्रारंभ छलै । एकरा आगां बढ़एबाक चाहीँ । उचित प्रोत्साहन दऽ एहि नृत्यकें पुनःस्थापित कऽ मिथिला क्षेत्रक विशिष्ट नृत्यक रूपमे राष्ट्रिय–अन्तर्राष्ट्रिय क्षेत्रमे देखाओल जा सकैछ।  सदस्य, नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठान जगदानन्द झा ‘मनु’, ग्राम पोस्ट – हरिपुर डीहटोल, मधुबनी गजलक लहास

हमरा पढ़क सौभाग्य भेटल कलानंद भट्ट कृत गजल संग्रह “कान्हपर लहास हमर” जे की १९८३मे प्रकाशित भेल अछि। एहि गजल संग्रहमे कलानंद भट्ट जीक गजल प्रति सम्बोधन ‘गजलक मादे’क अलाबा कुल ४८टा गजल वा गजल सन किछु अछि। भट्टजी अप्पन संबोधन ‘गजलक मादे’मे तँ विभक्ति सटा कए लिखने छथि मुदा बाद बांकी गजल सभमे विभक्ति शब्दसँ हटा कए लिखल अछि। ई संकेत अछि हुनक वा हुनक समकालीन मैथिली लेखकक द्वारा गद्य आ पद्यमे मैथिली प्रति कएल गेल अन्तर। एहि संग्रहक मादे, गजलक व्याकरण पक्षपर अबैत छी। एक गोट गजल लेल सभसँ आवश्यक अछि काफिया आ रदीफक पालन मुदा एहि संग्रहक किछु गिनतीक गजल बाय लक छोरि कए बाद बांकी गजलमे काफिया आ रदीफक दोख अछि। जेना एहि संग्रहक पहिले गजलक मतला देखू – “घर घरेक आगि सँ अछि जरल जा रहल भाइ  सँ  भाइ   द्वेषे   भरल जा रहल ” आब एहि मतलाक हिसाबे काफिया भेल ‘रल’, मुदा एहि गजलकेँ आँगाक शेर सबहक काफिया अछि – ‘बनल’, ‘बनल’, ‘चलल’, ‘कयल’। गजल तीन केर मतला देखू – “कहू की कथा कहुना जीबि  रहल छी फाटल गुदरी अपन हम सीबि रहल छी” आब एहि मतलाक काफिया भेल ‘ीबि’,  मुदा गजलक आन-आन  शेरक काफिया अछि, ‘लीबि’,’पीबि’, ‘खीचि’, ‘पीति’। एहिठाम ‘लीबि’ आ ‘पीबि’ तँ ठीक मुदा ‘खीचि’ आ ‘पीति’ ? गजल ६ केर मतला – “बाट बाधित पहाड़े छै पाटल जखन सीयत दरजी के आकासे फाटल जखन” एहिठाम काफिया भेल ‘ाटल’ जेना की काटल, चाटल, साटल, मुदा एहि गजलक आन आन काफिया अछि ‘साटल’, ‘फाटल’, ‘जागल’, ‘लागल’। एहिठाम ‘साटल’ तँ ठीक अछि, ‘फाटल’ ठीक मुदा एकर पुनः प्रयोग आ ‘जागल’ आ ‘लागल’ ? गजल संख्या १२ केर मतला – “अहाँ जीबिते मनुक्ख केँ जरा रहल छी घेरि गामे केँ स्वाहा करा रहल छी” मतलाक काफिया भेल ‘रा’ मुदा एहि गजलक आगाँक शेरक काफिया प्रयोगमे अछि, ‘दनदना’,’खड़ा’, ’चला’, ‘बना’, ‘रचा’, ऐ गजल तेसर शेरक काफिया ’खड़ा’ ठीक अछि बांकी सभ गल्ती। एहि तरहे १८,१९,२०,२१,२२,३३,४८म गजलक काफिया ठीक नहि अछि। अंतिम गजलक मतला आओर देखू – “शहर केर सागर मे आइ गाम डूमि रहल कामांध कामिनी केँ पकड़ि जेना चूमि रहल” आब उपरकेँ मतलामे काफिया भेल ‘ूमी’ (दीर्घ ऊ कार आ मी) मुदा एहि गजलक आन शेरक काफिया राखल गेल अछि, ‘घूमि’, ‘चूसि’, ‘रेड़ि’, ‘बूकि’, आब घूमि ठीक बाद बांकी ‘चूसि’, ‘रेड़ि’, ‘बूकि’, कोन मादे ठीक भऽ सकैत अछि। उपरका उदाहरन सभसँ एक डेग आगू बैढ़ बहुत रास गजल तँ एहनो अछि जाहिठाम काफिया केर कोनो स्थाने नहि राखल गेल अछि। आउ देखी किछु एहनो गजल- गजल संख्या सातक मतला अछि – “मरि मरि क’ जे जीबय से आदमी चाही राखय बिहाड़ि हाथ मे से आदमी चाही” आब एहि मतलामे देखी तँ दुनू पाँतिमे कोमन अछि ‘से आदमी चाही’ अर्थात ई भेल रदीफ। आब रदीफसँ पहिने एहि शेरक दुनू पाँतिमे कोनो काफिया अछि ? नहि ने। एहि तरहे एहि गजलक सभ शेर बिना काफियाक अछि। एहिठाम गजलकार जानि अनजानि नहि जानि किएक ने धियान देलन्हि, मतलाक निच्चाक पाँतिकेँ कनिक बदैल कए काफिया ठीक कएल जा सकैत छल, देखू – मरि मरि क’ जे जीबय से आदमी चाही बिहाड़ि हाथमे राखय से आदमी चाही एहिठाम एकटा गप्प धियान देबए बला अछि जे गजल शास्त्र अनुसार बिना रदीफक गजल तँ कहल जा सकैए परन्च बिन काफियाक गजल, जेना बिन कनियाँ ब्याहक कल्पना। एहि तरहे, एहि संग्रहमे बहुत रास गजल बिन काफियाकेँ कहल गेल अछि जेना गजल संख्या ११,२३,३०,३८,३९,४१,४४,आ ४६। एक बेर फेरसँ गजल संख्या ४६ केर मतला देखी – “ठेंगा जकाँ ठाढ़ भेल नागे देखैत छी हम बाट-घाट सभठाम नागे देखैत छी” आब एहि मतलाक दुनू पाँतिमे कोमन अछि ‘नागे देखैत छी’ जे की रदीफ भेल आ रदीफसँ पहिने काफिया नदारत। कतौ कतौ बाय लक काफिया ठीको अछि  तँ काफियामे एक्के शव्दक प्रयोग बेर-बेर अछि। जेना गजल संख्या २९ क मतला देखी तँ- “जनम व्यर्थ बेटीकेँ देलौं विधाता कर्म अपकर्म हम कोन केलौं विधाता” ऐ शेरमे रदीफ भेल ‘विधाता’ आ काफिया भेल ‘ेलौं’। आब एहि गजलक आन-आन शेरक काफिया अछि, ‘बनेलौं’, ‘चढ़ेलौं’, ‘सिरजेलौं’, ‘बनेलौं’, ‘चढ़ेलौं’। मतलाक शेरक हिसाबे काफिया दुरुस्त अछि मुदा ‘बनेलौं’ आ ‘चढ़ेलौं’ शव्दक आवृति काफियामे एकसँ बेसी बेर अछि। एहि तरहे गजल संख्या १५ आ ४५ मे सेहो काफियामे एक शव्दक आवृति एक बेरसँ बेसी बेर भेल अछि। बहुत रास गजलमे तँ काफिया आ रदीफ दुनू असमंजसकेँ अबस्थामे अछि अथबा कहू तँ दुनूकेँ दुनू गल्ती अछि। जेना गजल संख्या ३५केँ मतला देखी – “बानरक हेँज जकाँ बौख रहल लोग रंगल सियार जकाँ लौक रहल लोक” एहि मतलामे देखी तँ रदीफ भेल ‘रहल लोक’ आ काफिया ‘ौऽ‘, मुदा एहि गजलक आन-आन शेर सबहक काफिया आ रदीफ दुनू संगे अछि, ‘दौड़ रहल लोक’, ‘सिरमौर बनल लोक’, ‘पछोड़ पड़ल लोक’, ‘सिलौट रहत लोक’। एहि शेर सभमे, ‘दौड़ रहल लोक’मे मतलानुसार काफिया आ रदीफ दुनू दुरुस्त अछि मुदा तेसर आ पाँचम शेरमे रदीफ गल्ती अछि आ चारिम शेरमे तँ काफिया आ रदीफ दुनू गरबड़ागेल अछि। कहि तँ एहि गजलकेँ पाँचो शेरधरि गजलकार ई नहि निर्धारित कए सकल छथि जे कोन काफिया अछि आ कोन रदीफ, एहि असमंजसमे खिच्चैर बनि सम्पूर्ण गजल लहास बनि गेल अछि। बिल्कुल एहने तरहक बीमारीसँ ग्रस्त गजल ४३ सेहो अछि। एहिठाम हम कही तँ गजलकारकेँ सामर्थपर नहि हुनक गजल व्याकरण प्रति अज्ञानताकेँ दोखी मानि सकैत छी। किएक तँ सामर्थक गप्प करी तँ एहि संग्रहक १७ म गजलमे दोहरा काफियाक सफल पालन कएल गेल अछि एकरा हुनक सामर्थ अथवा बाय लक कहि सकैत छी। जिनका काफिया आ रदीफ केर ज्ञान हेतनि ओ अतेक बेसी गल्तीक गुंजाइस नहि छोरता। एहि सन्दर्भमे २४ सम गजलक मतला देखू – “सरिपहुँ अहाँ भैया कमाल करै छी अछि भ्रष्ट आचरण मुदा गाल करै छी” अर्थक मादे कहू तँ एहि शेरक दोसर पाँतिमे “करै”केँ जगह ‘बजै’ हेबा चाही मुदा गजलकार “करै छी”केँ रदीफ मानि “ाल”केँ काफिया बनोलनि। एहि तरहे मतलाक काफिया आ रदीफ ठीक अछि मुदा गजलक आन-आन शेरक काफिया आ रदीफ संगे अछि, “ताल करै छी”, “नेहाल करै छी”, “जाल करै छी”, एतए धरि सभ ठीक मुदा अंतिम शेरमे अछि “टाल रखै छी” रदीफ ‘करै छी’केँ जगह रखै छी अर्थात रदीफ गल्ती एकरे कहै छैक सौँसे खीरा खाए कऽ पेनी तीत। आब आबी काफिया आ रदीफकेँ बाद गजल व्याकरण केर महत्वपूर्ण पक्ष बहरपर, तँ ई कहैमे कोनो संकोच नहि जे संग्रहक पूरा पूरी गजल बेबहर अछि। सरल वार्णिक बहरक साइद ओहि समयमे जनमे नहि भेल छल आ नहि एहि रूपमे संग्रहक कोनो गजल उतरि रहल अछि। वर्णवृत सेहो कोनो गजलमे नहि अछि, कतौ कोनो गजलक एक आधटा शेरमे वर्णवृत्त अबितो अछि तँ गजलक बांकी शेरमे नहि अछि। एकटा उदाहरन देखू संग्रहक १४हम गजलमे गजलकार वर्णवृत करैक प्रयासमे छथि –गजलक मतला अछि – “भेल ई की कहाँ सँ लहरि गेल अछि  २१२  -२१२ -   ११२  - २१२ प्रश्नवाचक धरा पर पसरि गेल अछि” २१२ – २१२ -  २१२ -   २१२ एहि मतलामे २१२-२१२-२१२-२१२केँ वर्णवृत बनैत-बनैत बिगैर गेल अछि। एहिठाम या तँ गजलकार वर्णवृतसँ अज्ञात छथि अथवा चानबिंदुकेँ दीर्घ मानै छथि। गजलक आगू केर तीनटा शेरमे २१२x४केँ सटीक वर्णवृतक प्रयोग अछि। गजलक दोसर शेर देखू – “आदमी आदमी केर बैरी बनल  २१२ – २१२ – २१२ -२१२ कोन नभसँ घृणा ई उतरि गेल अछि” २१२  – २१२ – २१२ - २१२ मुदा गजलक पाँचम शेरमे अबैत अबैत वर्णवृत टूटि गेल अछि। पाँचम शेर – “उर काँपैछ धरतीक भालरि जकाँ  २२२-   १२      -२१२   -२१२ युग आदम कोना फेर पलटि गेल अछि” २२२-२२२- १ १२- २१२ जँ कनिक धियान देने रहितथि तँ एतेक लअग एला बाद वर्णवृत पूरा ने होबाक कोनो कारण नहि। कहब ई जे इहो गजल बेबहर भेल। कतौ कतौ बुझाइत अछि जेना भट्टजी समकालीन हिंदी गजलकार सभसँ प्रेरणा लऽ कऽ मात्रिक छंदक प्रयोगक फिराकमे छथि। हलाँकी मात्रिक छंद गजलक हिस्सा नहि अछि तथापि एहि संग्रहक गजल एहनो सिस्टममे पूर्ण फिट नहि भए रहल अछि। पहिले गजलक मतला देखू – “घर घरेक आगिसँ अछि जरल जा रहल २१२१ -२११२-१२२१२ भाइ सँ भाइ द्वेषे भरल जा रहल” २११२-२२२१-२२१२ वर्णवृत तँ नहिए अछि मुदा मतलाक दुनू पाँतिमे २०-२० टा मात्रा अछि। ऐ तरहे गजलक तेसर चारिम आ पाँचम शेरमे २०-२० टा मात्रा अछि मुदा दोसर शेरक मात्रा गनियो कए कम बेसी अछि। गजलक दोसर शेर – “कोन आयल जमाना जुआरी एतय २१ मात्रा  भवना अविवेकी बनल जा रहल” १९ मात्रा एहिना सम्पूर्ण संग्रहमे नहि कोनो गजल मात्रिक गणनामे पूर्ण अछि आ नहि वर्णवृतमे। मने ई संग्रह पूरा-पूरी बेबहर गजल संग्रह अछि। काफिया आ रदीफक अशुध्यताक कारणे एहि तरह केर रचनाक संग्रहकेँ अजादो गजल केर श्रेणीमे रखनाइ उचित नहि। गजल व्याकरणक एकटा आओर महत्वपूर्ण हिस्सा अछि मकता, अर्थात गजलक अंतिम शेर जाहिमे शाइर अपन नाम अथवा उपनामक देने होथि। एहि संग्रहक कोनो गजलमे मकताक प्रयोग नहि अछि। आब आबी भाषा पक्षपर। गजलक भाषा एहन होबा चाही जे सुनिते माँतर मुँहसँ निकलै वाह ! वाह ! आ ई की सुनलहुँ आइ आ बुझै लेल दू दिन बादो शव्दकोश ताकैत रहू। एहि पोथीमे एकर सदत अभाब अछि। बहुत उपरकेँ भाषा, माटि थालमे ओँघरे वलाकेँ लेल जेना सुन्दर चौपाइ जकाँ नीक तँ बड्ड छै मुदा किछु बुझलौं नहि। किछु कठीन शव्द, ऐ संग्रहक पहिले गजलक एकटा शेर – “क्षुब्ध धरती गगन नयन मूनल अपन अछि वसाती बलाती बनल जा रहल” आब ऐ शेरक की अर्थ बूझल जेए ? आ जँ बुझबो करब तँ कतेक काल बाद आ ओहो के ? एकटा आओर शेर ३७ सम गजलसँ – “घर छोट-छोट भीत चूना सँ ढेउरल चित्र ओहि पर राधा कृष्णक ललाम” चूना, चित्र हिंदीक बेसाहल शव्द ओहूपर अर्थ की? ई ललाम की ? के बुझत ? कठीन भारी भरकम शव्दकेँ अलाबो एहि संग्रहक भाषा मैथिली अवश्य अछि मुदा एहने एहने पोधी पढ़ला बाद हिंदीक दलाल सभ कहैत छै जे मैथिली हिंदीक अंग अछि अथवा हिंदीक उपभाषा अछि। ऐ संग्रहक बहुत कम एहेन गजल अछि जाहिमे हिंदी शव्दक प्रयोग नहि हुए। देखी किछु हिन्दीक शव्द – गजल १ मे – चमन गजल 2 मे – श्रम, विवशता कनीक आगू आबि गजल १० मे – विकृति, रक्त गजल ११ मे – आदेश, वैशाखी, आतंकित गजल १२ मे – विकट, मनुष्यता, क्रूरता गजल १४ मे – कहाँ, प्रश्नवाचक, धरा, संशकित, आभास गजल १६ मे – निष्क्रिय, शिथिल, सदृश्य, विस्मय गजल १८ मे – अम्बर, मुरझायल गजल १९ मे – कहर, अग्रसर कनी आओर आगू बढ़ी, गजल ३८ मे – घटा, उषम, विषम, जल बांकीओ गजलमे एनाहिते हिंदी शव्दक भरमार अछि। कतौ-कतौ तँ एकछाहा हिंदीए अछि। १५हम गजलकेँ ई दुनू शेर देखू – “घरमे फूटल क्रिया गर्म सीमांत अछि भावना संकुचित विषमयकारी ने भेल

मंत्र मधुमय कहाँ ओ विश्व वन्धुत्व केर कोन उतरल ई युग दुराचारी ने भेल” उपरकेँ दुनू शेरमे कतेक शव्द मैथिलीक अछि ? ३९ म गजल केर ई शेर देखू – “उर बसा द्वेष इर्ष्या घृणा केर लहरि रक्त तर्पण करैछ ने कोनो जानवर” जँ ई मैथिली तँ हिंदी की ? आब आबी भाव पक्षपर, तँ एहि संग्रहक सभ गजलक भाव पक्ष जबरदस्त अछि। समाजक कोनो एहन कोण नहि जाहिपर शाइर ऐ संग्रहमे वर्णन नहि केने होथि। चापलूसीसँ शुरू कए आम लोकक जीवनक विषमता, भ्रस्टाचार, महगाइ, अपहरण, लूटि-पाट, राजनीति सभ विषयपर अपन  कलम चलबैत एक एक भावकेँ उजागर करैमे सफल छथि।

सेल्समेन गामक दलानपर नून तेलक दुकान चलेनाहर, साहजी अपन मुस्काइत मुँह आ शांत स्वभावकेँ कारण गाम भरिमे सभक सिनेहगर बनल मुदा किछु गोटे हुनकर एहि स्वभाबकेँ कारणे हुनका हँसीक पात्र बनोने। आइ साहजी अपने किछु काजसँ बाध दिस गेल। दुकानपर हुनकर १४ बर्खक बेटा समान दैत-लैत। एकटा बिस्कुट चकलेटक सेल्समेन साइकिल ठार करैत साहजीक बेटासँ, “की रौ बौआ तोहर पगला बाबू कतए गेलखुन्ह।” साहजीक बेटा सेल्समेनक मुँह दिस कनी काल देखला बाद, “किएक, की बात ?” “बात की समान देबैकेँ अछि, पुरनका पाइ लेबैक अछि।” “किछु नहि लेबैकेँ अछि (भीतरसँ समान सभ उठा कए दैत) ई अपन पहिलका समान सभ नेने जाऊ।” “किएक ! पहिलका तँ रखने रहु।” “नहि अहाँसँ किछु नहि चाही आ हाँ आगूसँ कहियो हमर दुकानपर नहि आएब।” सेल्समेन मुँह बोनेए बकर-बकर ओइ नेना दिस देखैत अपन पुरनका समान सभ समटैमे लागल। ताबतमे साहजी सेहो आबि गेलाह। सहजी सेल्समेनसँ, “कि यौ मालिक एना सभटा समान किएक समटने जाइ छी।” “हम कहाँ समटने जाइ छी अहाँक नेनकीरबा सभटा समान उठा कए दैत कहलथि एहिठाम कहियो नहि आएब।” “किएक अहाँ की कहि देलिऐ ?” “हम तँ किछु नहि कहलिएन्हि।” “नहि किछु तँ कहने हेबे।” “हाँ अबैत माँतर पूछने रहिएन्हि, की रौ बौआ तोहर पगला बाबू कतए गेलखुन्ह।” साहजी हँसैत, “हा हा हा, हमरा संगे जे हँसी ठठ्ठा करै छी से ठीक मुदा केकरो सामने ओकर बापकेँ पागल कहबै तँ ओ कोना सहत, जेकरा की ओ अपन भगवान बुझै छै। एखन भोरे भोर दिमाग शांत रहै तेँ चूपेचाप समानेटा आपस कए कऽ रहि गेल नहि तँ एहन तरहक गप्पपर बेटखारा उठा कए मारि दैतेए।” उपहार “अहाँ हमरा सनेसमे की देब ?” “हम दऐ की सकै छी ? हमरा लग अछिए की ? मात्र सिनेह अछि, प्रेम अछि अहाँक लेल शुभकामना अछि। पाइ तँ नहि अछि मुदा पिआर दए सकै छी सम्मान दए सकै छी।” “वस ! वस ! हमरा अओर किछु नहि चाही। अहाँक ई पिआर अहाँक सिनेह अहाँक शुभकामना एकर कोनो मोल नहि अछि ई तँ अनमोल अछि। अहाँ भेट गेलहुँ हमरा दुनियाँक सभ खुशी भेट गेल।” नीक “अहाँसँ भेट कए कऽ हमरा एतेक नीक किएक लगैए।” “किएक तँ अहाँसँ भेट कए कऽ हमरो बड्ड नीक लगैए।” पिआर “जे हमरासँ पिआर करत ओ हमर मोन मे दर्पण जकाँ देख सकैत अछि आ हम ओकर आँखिमे हरा कए अपनाकेँ बिसैर सकैत छी।” कनियाँ दाइ अपन दियादनीमे सभसँ छोट रहला कारणे कनियाँ आ एखन सभक दाइ तेँ दुनू मिल कए कनियाँ दाइ। अपन अवस्थाकेँ अपनासँ पाछू छोरैत एखन साठि बर्खक अवस्थोमे चंचलता आ हाजिर जवाबीमे कोनो अंतर नहि। केशवक पाँचो भाइक उपनैन। आगू आगू पाँचो बरुआ पाछू ढोल पिपही बजैत रमनगर दृश्य। कनियाँ दाइ एहि अबसरपर कतौ अपन व्यस्तताकेँ कारणे  देरी भए गेली। हरबराइत दौरैत अँगना पहुँचक चेष्टामे डौढ़ीपर बरुआ केशवसँ आमने सामने टकरा गेली। अपनाकेँ सम्हारैत झटसँ, “बुढ़ीयासँ टकरा कए की भेटतौ कोनो छौंड़ीसँ टकराअ तँ किछु भेटबो करतौ।” हुनक गप्प सुनि सभक मुँहसँ हँसीक ठहाका छुटि गेल। मौसी पहिल सखी, “गे दैया ! ई तँ बाँस जकाँ पातर छथि।” दोसर सखी, “यौ ओझाजी ई केहन देह बनोने छी।” तेसर सखी, “लगैए माए दूध नहि पीएलकनि।” चारीम सखी, “हाँ यौ ओझाजी, माए बिशुकि गेल रहथि की।” पाञ्चम सखी, “नै गै हिनकर माए दूध बेचै छलखिन।” सभ एक्के संगे, “हा हा हा ......” नबका ओझाजी, रातिमे व्याह भेलन्हि आ आइ बेरुपहर कनियाँक सखीसभ चारू कातसँ घेर कए हँसी ठिठोली करति। ओझाजी बौक जकाँ सबटा सुनैत। एकटा सखी फेरसँ, “लगैए हिनकर माए बजहो नहि सिखेलखिन।” ओझाजी कनीक मुँह उठा कए, “आब एतेक रास मौसी लग कोना बाजू।” सभ सखी एक्के संगे, “मौसी ! मौसी कोना।” ओझाजी, “अहाँ सभकेँ हमर माएक सभ गप्प बुझल अछि अर्थात हमर माएक संगी सभ छी तेँ एहि हिसाबे अपने सभ भेलहुँ ने हमर मौसी।” हारि

साँझु पहर फोनक घंटी बाजल । “ट्रिन न न ट्रिन न न न ट्रिन न न न न... “ बिना अप्पन नाम बतोने रिसीवर उठेलहुँ । कोनो जवाब नहि । दोसर कातसँ शांत । मुश्किलसँ पन्द्रह मिनट बाद फेर फोनक घंटी बाजल । दोसर दिससँ फेरो कोनो आवाज नहि । शाइद हमर स्वर पशंद नहि हेतै अथवा कएकरो आओरसँ गप्प करैक हेतै । रातिक एगारह बजे फेर फोन आएल, फोन उठेलहुँ, “हेलो ।“ कनिक कालक चूप्पीकेँ बाद उम्हरसँ, “हम मालकी बजै छी, बहुत दिनक बाद फोन कए रहल छी, ठीक तँ छी ने ? साँझेसँ ट्राइ कए रहल छलहुँ मुदा हिम्मत नहि भए रहल छल । ई कहै लेल एतेक राति कए फोन केलहुँ जे हमर ब्याह भए गेल ।“ “हमरा बुझल अछि ।“ “कोना ।“ “दुबईसँ एला बाद हम अहाँक गाम गेल रही ओहिठाम कएकरोसँ बुझलहुँ जे दू महिना पाहिले अहाँक ब्याह दुरागमन दुनू संगे भऽ गेल मुदा ई की महर इंतजार नहि कए पएलहुँ ।“ “हम बेबस रही..... अहाँक बच्चाकेँ पाँच महिनासँ अपना पेटमे रखने-रखने, आगू दुनियाँक नजरिसँ बचेनाइ असम्भब छल ।“ “हम कहि कए तँ गेल रहि जे छह महिनासँ पहिले पहिले आबि जाएब कि हमरापर बिश्वास नहि रहल ।“ “एहन गप्प नहि छै, हमर तन एहिठाम अछि मुदा मोन एखनो अहीँ लग अछि परञ्च ई समाज, गाम आ परिवारक सामने हम हारि गेलहुँ ।“ “की अहाँक पतिकेँ ई गप्प सभ बुझल छनि ।“ “ हाँ ! अहाँक दऽ नहि मुदा बच्चा दऽ बुझल छनि । ओ देवतुल्य लोक छथि, होइ बला हमर बच्चाकेँ सेहो अप्पन नाम दै लेल तैयार छथि ... (कनिकाल दुनू कातसँ चुप्पीकेँ बाद)  हम एखन एहि द्वारे फोन कएलहुँ जे हमरा आब ताकैक वा फोन करैक चेष्टा नहि करब ओहि सभकेँ बितल गप्प जानि बिसरि जाएब...हुँऽऽ हुँऽऽऽ !” कानेक स्वर संगे रिसीवर राखैक खटखटाहट, फोन बंद ।            डिबिया “गे दाइ अहाँक सभक धिया-पुता कतेक गोर होइए ? राति कए डिबिया बाइर कए सुतै जाइ छीयै की ? हमर मरदाबा तँ डिबिया बुता दै छै ।”              पिआस

“की यौ ललनजी एना टुकुर टुकुर की तकै छी ?” अप्पन गामक मुँहलागल भाउजक मुँहसँ ई सुनि ललन एकदमसँ सकपका गेला, जिनका कि बहुत कालसँ घुरि रहल छल । “नहि किछु नहि ।“ “धूर जाऊ ! इनार लग पिआसल जाइ छै की पिआसल लग इनार । अहाँ एहन पहिल मरद छी जकरा लग इनार चलि कए एलैए आ एना टुकुर टुकुर तकने कोनो पिआस मिझाइ छैक की ? पिआस मिझाबैक लेल इनारमे कूदए परैक छै ।“

            प्रेम दीवानी “अरे ! अरे ! रुक ई की भऽ रहल छै ! तूँ सभ एक संगे एतेक रास सामूहिक आत्मदाह !” “हम सभ प्रेम दीवानी, प्रेमकेँ अंतिम छोर पावै लेल जा रहल छी मुदा अहाँ अपस्वार्थी मनुख एहि प्रेमकेँ नहि बुझब अहाँ सभ तँ प्रेमोमे नफा नुकशान तकै छी ।“ डिबियाक लोऽपर भन्नाइत फतिन्गाक झुण्डमे सँ एकटा धीरेसँ हमर कानमे भनभना कए कहि डिबियाक आँचपर जा जरि गेल ।

             खापरि धिपा कए

“यै छोटकी कनियाँ, सुनै छीयै ललिताक वर एलखीन्हेँ जाउ हुनकासँ कनीक नीक मुँहें हँसि बाजि लियौन, खुश भए जेता तँ टिकुली सेनुर लेल किछु दएओ कए जेता ।“ “एहन हँसै बजै बला आ खुश होएबला मरदाबाकेँ हम खापरि धिपा कए चेन नहि फोरि देबैन, अप्पन जमएक बड़ चिंता छनि तँ अपने जा कए किएक नहि खुश कऽ लै छथि ।” अखिलेश कुमार मण्‍डल, बेरमा, मधुबनी। पँचवेदी जेकरा लेल चोरि‍ करै सएह कहै चोरा, भोरेसँ मनमे बेर-बेर उठए लगल। केतबो ठेल कऽ बहटाबए चाही से बहटबे ने करए। तखनि‍ मन भेल जे जहिना केकरो दुखनामा सुनने दुख कमे छै तहिना जँ समाजोक बातकेँ सुनि आ अपनो बात कहिऐ। उठिे कऽ लालकाका लग गेलौं। देखते पुछलनि‍- “बौआ मन बड़ झूकल देखै छिअह?” कहलियनि- “काका, तेहने रगड़ा मनकेँ रगड़ि‍ रहल अछि जे कि‍ कहौं। तँए झुकौने छी।” लालकाका पुछलनि- “से कि?” कहलियनि- “काका, ओना ऐ बातकेँ समाजक पँचवेदीमे उठाएब, मुदा अहाँ घरक गारजन छी तँए पहिने अहीं बुझा दिअ।” अपन बढ़ैत मान देखि‍ लालकाका बजला- “बेस बात मनमे एलह। तेहेन जुग-जमाना भऽ गेल अछि जे लोक झुठो बातकेँ तेना बढ़ा-चढ़ा कऽ बजैए जे जेना ओकरे राज होइ।” “असथिरसँ बुझा कऽ कहअ” कहलियनि- “काका, अहीं कहू जे ई उचित होइ, जइ समाजक पाग अकासमे टेकने छी तइ समाजक लोककेँ कियो खाधुर तँ कियो भोजनभट्ट कहै?” नीक जकाँ लालकाका नै बुझला। दोहरौलनि- “कनी फरि‍छा कऽ बाजह ने? काकाक आशा पाबि‍ अपनो आशा जगल। कहलियनि- “काका अखूनका जे बि‍आहक बरियाती भऽ गेल अछि तेकरा गामक सभ दुि‍र कऽ देलक हेन, ओकरे देखा-देखी हमहूँ दुि‍र कऽ दिऐ से नीक हएत?” बिनु बात बुझने टोकारा दैत लालकाका कहलनि‍- “से तँ नहियेँ हएत। मुदा बात कि भेलह से ने बाजह?” कहलियनि- “काका, देखते छिऐ जे अखुनका बरियातीमे बेसी गोटे ओहने रहैए जे चूड़ा भूजा तड़ल माछ आ दूटा बोतल घरवारी दिसि‍सँ पबिते छाती उघारि कऽ जश दऽ दइ छै, किछु गोरे सए-दु-सए रसगुल्ला खा पुरा जश दऽ दइ छै, मुदा हम तँ तइसँ भिन्न छी। भोजनक मुख्य अंग गोरस छी। एक तँ ओहुना घरवारी पाँच किलोसँ बेसी दहीक ओरियान नहियेँ करै छथि, तेकरा जँ छुच्‍छ कऽ दइ दि‍ऐ तँ हम खाधुर भेलौं कि समाजक इज्जति‍ रखै छिऐ। तइले लोक एना किअए बजैए। उमेश मण्‍डल, ि‍नर्मली, सुपौल। लघुकथा जीवि‍ते नर्क सोन-रूप जहिना आगिक ताउ पाबि गलए लगैए तहिना आत्म ग्लानिसँ गलैत राधामोहन ब्रहमस्थान पहुँचल। तेसरि‍ साँझक समए रहै। पहिल साँझसँ जे गामक माए-बहि‍न सभ आबि-आबि काँच माटिक दिआरी नेसि‍ साँझ दैत आएल छेली ओ दोसरि‍ साँझ टपैत-टपैत पतरा गेल छेली। यएह सोचि राधामोहन तेसर साँझकमे पहुँचल छल जइसँ कियो देखए नै। किछु मानेमे मुहूर्तो नीक छलै। एक तँ एकान्त, दोसर अन्हार आ तेसरि‍ देखिनिहारो-सुनिनिहार नै। ब्रहमस्थानक मुहथरि लग आबि राधामोहन अँटकि गेल। अँटकि कि गेल जे पएर ठमकि गेलै। चारूकात आँखि उठा तकलक तँ अन्हारमे ने बेसी दूर देखलक आ ने अन्हार छोड़ि किछु आन देखेलै। मन मानि गेलै जे ने कियो देखिनिहार अछि आ ने सुनिनिहार। बाहर अन्हारमे स्थानक चारूकात कुकुर सभ अपन-अपन सीमानक चौकसी‍ नीनभेर भऽ करैत रहए। नीनो केना नै अबि‍ते, भिनसुरका दुधक ढार तँ वएह सभ ने पीबो करैए आ पटका-पटकी करैत नेहबो-थकबो करैए। खेतिहर जहिना नीक उपजैत खेतक आड़ियो धकिया खेते बनबए चाहैए आ अधला उपजा भेने नीको खेतकेँ परता-परता परतीए बना दइए जइसँ बाट-बटोही बीचे खेत देने रस्तो बना बीचे-बीच चलए लगैए तहिना राधामोहन अपन कएल काजक ग्लानिसँ धकियाइत-धकि‍याइत देवालय पहुँच गेल। हीयकेँ हारैत आगुमे ठाढ़ केलक। जेना-जेना भीतर प्रवेश करैत गेल तेना-तेना मनो पसि‍झैत गेलै। अंतमे एहेन भेलै जे धुँआ बनि अकास उड़त आकि पाथर बनि पानिक पहाड़ बनत तइ गुनधुनमे पड़ि‍ गेल। दुनू हाथ जोड़ि बाजल- “हे बरहमबाबा, अपने यमराजकेँ कहियनु जे जीवि‍ते नरक पठा दथि। जहिना अपन मित्र संग तहिना संकल्पोक हत्यारा छी; हत्यारा छी।” कहि राधामोहन महादेव जकाँ ताण्डव नाच-नाचए लगल। राधामोहन आ वि‍समोहन बच्चेसँ लंगोटिया संगी। एक्केठाम दुनूक घरो छै। बाध-बोनसँ लऽ कऽ घर-आंगन धरि संगे रहै छल। महाविद्यालयक अभावमे दुनू गोरे मैट्रीक पास कऽ रहि गेल। आन-आन विषए जे जहिना पढलक से तहिना ससरि‍ गेलै मुदा समाज अध्ययनक टिकाउ विषय, टिकल रहलै। जइसँ दुनू मिलि‍ अपन पहि‍चान आ संक्लपकेँ मजगूत बनबैमे गारि‍-गरौबलिसँ लऽ कऽ मारि मरौबलि धरि करबो केलक आ कएक बेर जहलो गेल आएल अछि‍। जहिना लड़ाइ लड़ि जहल गेनिहार जेल जेनाइकेँ अराम करब बुझैए, सएह अखैन धरि ईहो दुनू गोरे बुझैत आएल छल। एक्के जातिक राधामोहनो आ विसमोहनो मुदा दुनूक बीच दू दि‍यादी। ओना दुनू दियादीक बीच पुस्तैनी झगड़ा चलि अबै छलै मुदा दुनूक दोस्ती तेकरा मेटा जकाँ‍ देने छलै। जे पछाति‍ आबि‍ कऽ खेनाइ-पीनाइ, बर-बरियाती सभ चलए लगलै। ओना, नवका तूरकेँ पछि‍ला बात ने कियो कहनिहार आ ने कियो बुझबो करैत। मुदा जहिना गहींरगर खादिकेँ ऊपरका खर-पात छि‍ल-छालि‍ कऽ भरलापर ऊपरसँ भरल बुझाइए‍, मुदा हाथीकेँ के कहए जे धि‍यो-पुताक पएर चपि‍ जाइ छै तहिना राधामोहन-वि‍समोहनक दियादीक बीचक खादि ऊपरसँ तँ चिक्कन बनि गेल छेलै मुदा भीतरसँ भि‍‍तराएले छल। विसमोहनक पितियौत भाए मनमोहन मुम्‍बइमे बीस बरखसँ नोकरी करैत आएल अछि‍। एक परिवार रहने घराड़ीक बँटवारा भागे भाग भेल छलै, जइमे दुनूक घरो आ बाड़़ीओ-झाड़ी छेलै। ओना दुनू परिवारक घराड़ी रोड पकड़ैए मुदा विसमोहनक घराड़ीक बगलमे तीन-बटिया, जैपर दसटा दोकान-दौरी बैसि चौक जकाँ बनि‍ गेल। चौक भेने बजारक मुँह खुगल। एक्के खेत रहितो एक भाग मुहथरि बनि गेल आ दोसर गोरथारी। जइसँ दुनूक महतमे घटी-बढ़ी भऽ गेलै। मुम्‍बइमे रहने मनमोहनक विचारमे सेहो बदलाउ एलै। जइसँ नोकरी करैसँ नीक अपन धंधा मनमे एलै। स्वाभाविको छेलै, औद्योगि‍क शहर मुम्‍बइ आ तेतए मनमोहन बीस बरख बि‍तेने अछि‍। मुदा अपन जिनगी तँ तेना ओझरा गेल छै जे साठि बरखसँ पहिने छोड़त तँ पेन्शनकेँ के कहए जे आनो-आनो जमा-जुमी डूमि‍ जेतै। तँए मनमोहन अपन विचारकेँ बेटा ऊपर केन्‍द्रि‍त केलक। निर्णए कऽ लेलक जे बेटाकेँ औद्योगि‍क शिक्षा दियाएब। ओना उद्योग तँ रंग-बि‍रंगक दुनियाँमे पसरल अछि मुदा अपन मनोनुकूल उद्योग बेसी नीक हौइ छै। सएह केलक। बेटाक पढ़ाइ छोड़लापर मनमोहन सभतूर गाम-आएल। जइबेर गेल रहए तइबेर एक्कोटा दोकान नै बनल छेलै। अखन प्रधानमंत्री योजनाक सड़क, तीनटा तीनू कोनपर चापाकल आ एक-आध घंटा बैसैक जोगार सेहो बनि गेल जेकरा देखि‍ मुम्‍बइक चौराहा मनमोहनक मनमे नाचि उठलै। मनमे उठि‍ते अनैतिक बाट ताकए लगल। मनमे एक्केटा  मंशा जे विसमोहन हमरा दिस चलि जाए आ हम चौक साइड चलि आबी। तीन कट्ठा चौकक जमीन। लाखकेँ के कहए जे करोड़ोक हएत। करोड़क कारोबार लेल दु-चारि लाख छिटैए पड़ै छै। जाबे से नै हेतै, ताबे चिड़ै-चुनमुनी पछौर केना केना लगल। गाम तँ अखनो वएह गाम छी जे चुड़ा-दहीक संग चीनी मिला तीत-मीठ गिरैत आएल अछि। फील्डपर दस गोटेकेँ कोनो भाँजे अपना दि‍स केनाइ, यएह अखुनका पनचैती छी। ई बात मनमे अबि‍ते मनमोहन गामक खौकार पंचकेँ पटिया घराड़ी उनटबैक योजना मनमोहन बनेलक। सँझुका नढ़ि‍या जहि‍ना‍ पू सुनिते सभ पुपुआए लगैए तहि‍ना एक स्वरमे सभ पंचैति‍या ग्राउण्‍ड बना लेलक जे जखनि‍ कानूनी बँटवारा नै छि‍ऐ तखनि‍ ओ बँटबरे ने भेल। मौखिक बँटबाराक कोनो मानि‍ नै! भलहिं वेद-शास्‍त्रक अधार-बात किअए ने हुअए। पाँच परिवारक दियादी विसमोहनक। असगरे दुनू बापूत विसमोहन गाममे रहैए आ बाँकी सभ दि‍याद मुम्‍बइएमे। ओना दुनू बापूत मनमोहन बुफगरो। राधामोहन सेहो पनचैतीमे आएल। नढ़िया जेरमे अपनो नढ़ि‍या बनि वि‍समोहनक संकल्‍पि‍त मि‍त्र राधामोहन चुपे रहल। अपन स्थिति कमजोर हाेइत देखि वि‍‍समोहनक मन राधामोहनकेँ ओइ नजरीए देखलक जेहेन बलिदान होइत समए छागरक होइ छै। मुदा संकल्पित जिनगी। अपन हँसैत अंत देखैक जिज्ञासा करैत वि‍समोहन राधामोहनकेँ पुछलकै- “आन जे हुअए। मुदा तूँ तँ संकल्पित जिनगीक संगी छि‍अँह, मुँह किअए बन्न रखलँह?” वि‍‍समोहनक मनक बात बुझितो राधामोहन दियादी आड़ि‍ ठाढ़ कऽ ओही आड़ि‍मे अरिया गेल। भगैत-पड़ाइत संकल्पित संगीकेँ देखि‍ वि‍समोहनक मन संकल्पकेँ अगुअबैत धधकि गेल, बाजल- “जइ धरतीपर झूठ-फूसमे लोक अपन बलि चढा रहल अछि तैठाम अपनो जुल्‍म अपने नै रोकि पाबी! ई तँ जिनगीकेँ धाेखा देनाइ भेल। ई बात सत् जे बलिदान कतए होइ...। बमकि कऽ फेरि बाजल- “हम पनचैती नै मानब। ई धरती हमर बलि मंगैए।” चढ़ा-उतरी बजनिहारक बोन गाम। तेना ललकारा भरलक जे दुनू बापूत मनमोहन, दुनू बापूत विसमोहनकेँ मारि लठि‍यौलक। जे आठम दि‍न जाइत-जाइत विसमोहन खतम भऽ गेल। राम वि‍लास साहु शि‍क्षाक महत जीबछ घरजमैया छल। हुनकर पत्नी रधिया, माए-बापक एकलौती बेटी बड़ दुलारि‍ छलि। रधि‍याक पि‍ताकेँ चारि‍ बीघा चास-बास, कलम-बाँस आ गाए-बड़द छल। खेती-बाड़ीसँ जि‍नगी चलै छेलनि‍। सोझमति‍या रहने कोनो क्षल-कपट नै रहनि। पि‍तमरू छला। परि‍वारमे अक्षरक बोध केकरो नै रहनि‍ खाली जीबछ ट-ब कए कऽ साक्षर छल। रधि‍याक पि‍ता जरूरति‍ पड़लापर जखनि‍ समाजमे कोनो लेन-देन करै छला तँ औंठेक नि‍शान दइ छला। एक साल एहेन समए भेलै जे इलाकाक इलाका बाढ़ि‍-पानि‍सँ दहि‍ गेलै। ने नेवान करैले अन्न आ ने दाँत खोदहैले नार-पुआर भेलै। दोसर साल रौदी भऽ गेलै। एक तँ बाढ़ि‍क मारल, दोसर रौदीक जरल। गरीब-गुरबाकेँ गुजर कटनाइ पहाड़ भऽ गेलै। केतेको परि‍वार तँ आन-आन गाम अपन-अपन कुटुमैती जा कि‍छु दि‍न समए कटकल। मुदा ई सुवि‍धा सबहक नशीव नै छेलै। गामक नम्‍हर जमीनदार, मालि‍क-गुमस्‍ता जे छला हुनका तँ पहुलके सालक पुरना अन्न बखारीक-बखारी भरल छेलनि। हुनका सभकेँ कोनो चि‍न्‍ता नै छेलनि‍। रधियाक माए-बाप बूढ़ रहने आन गाम जा केना काज करत। ओ दुनू गामेमे मालि‍कसँ कहि‍यो मरूआ तँ कहि‍यो धान तँ कहि‍यो छाँटी चाउर कर्जा लऽ समए काटै छल। कर्जा देनि‍हार मालि‍क सभ वि‍पति‍क समैमे गरीबक शोषण सेहो करैत। एक मन अन्नक बदला दू मन आ दोसर साल चुकेलापर तीन मनक करारीपर कर्जा लगबैत। तेकर बादो औंठाक नि‍शान एकटाकेँ के कहए जे तीन-तीनटा छाप कागतपर लइ छेलखि‍न। गरीब अपन परान बँचाएत आकि‍ छापक परबाह करत। कर्जा खेनि‍हार थोड़े बुझै छल कि‍ छाप देबै कागतपर आ हमर जमीन जत्‍था चलि‍ जेतै तक्खापर। एक दू साल समए बि‍तलै। जीबछ अपन सौसुराइरिएमे सासु-ससुरक सेवा आ खेती-बाड़ी कऽ गुजर-बसर करै छल। कि‍छु समए पछाति‍ सासु-ससुर मरि‍ गेलखि‍न। श्राद्ध-कर्मसँ नि‍वृत भेलै छल आकि‍ गामक मालि‍क-गुमस्‍ता लोकनि‍ अपन-अपन कागत लऽ जीबछ ऐठाम पहुँचए लगला। कर्जा तँ करारीपर देने रहनि‍। ओ अवधि‍ बीति‍ गेल छल। कर्जा खेनि‍हार पहि‍ले कागतपर छाप देने रहनि‍। ओइ कागतपर मालि‍क-जमीनदार लोकनि‍ जमीनक खाता-खेसरा रकबा लि‍खि‍ कऽ अपन नाओं कऽ लेलनि‍। गरीब सबहक जमीन मालि‍क-गुमस्‍ता हरपि‍ लेलकनि‍। जइमे रधि‍याक जमीन सेहो चलि‍ गेल। आब जीबछ-रधि‍याकेँ दूटा बेटी, एकटा बेटा आ परि‍वारक भरन-पोषण करनाइ कठि‍न भऽ गेल। जीबछ कमाइ खातीर बाहर चलि‍ गेल। बाहरमे पढ़ल-लि‍खल आदमीकेँ नोकरी जल्‍दीए होइ छेलै आ बेसी दरमाहा सेहो भेटै छेलै। जीबछ बेसी पढ़ल तँ नै मुदा साक्षर छल। जइसँ शि‍क्षाक महत जि‍नगीमे केतेक होइ छै से मोने-मन महशूस करै छल। जीबछ ट-ब-ट काए कहुना कऽ चि‍ट्ठी लि‍खि‍ घर पठेलक। ओइमे बेटा-बेटीकेँ पढ़बैले रधि‍याकेँ प्रेरि‍त करैत कहै छल जे पढ़ाइमे जेते खरच लगत, हम कमाए कऽ पठाएब मुदा अहाँ धि‍या-पुताकेँ पढ़बैमे कोनो कोताही नै करब। रधि‍यो मोने-मन सोचै छेली जे नीक लोक बनबाक लेल शि‍क्षाक बड़ महत छै। जे हम आ हमर माए-बाप जँए नै पढ़ल छेलौं तँए ने सभटा जमीन मालि‍क-गुमस्‍ता हरपि‍ लेलनि‍। जखनि‍ पढ़ल रहि‍तौं तँ ई मुसि‍बत नै अबि‍ताए। हम सभ जे केलौं से केलौं मुदा धि‍या-पुताकेँ जरूर पढ़ाएब। अइले हमरा जे परि‍श्रम आ ति‍याग करए पड़त ओ करब। ओ सभ दि‍न अपन धि‍या-पुताकेँ समैपर संगे जा स्‍कूल पहुँचाबए लगली। रधि‍याक टोलेमे बुच्‍ची बाबू छला। बुच्‍ची बाबू अंचलमे बाड़ाबाबू छथि‍। छुट्टीमे घर आएल छथि‍। हुनका काल्हि‍ भोरे ट्रेन पकड़ि‍ ड्यूटीपर जेबाक छेलनि‍ से रधि‍याकेँ कहलखि‍न- “रधि‍या, कि‍छु सामान अधि‍क अछि‍। गाममे कएक गोटेकेँ कहलि‍ऐ जे काल्हि‍ भोरके ट्रेन पकड़ब से कनी सामान स्‍टेशनपर पहुँचा दि‍अ, मुदा कि‍यो तैयार नै भेल। तूँ कनी पहुँचा दइ। हम तोहर बड़ उपकार मानबो।” रधि‍या बाजलि‍- “ठीक छै, कअए बजै चलब। कहि‍ दि‍अ हम समान पहुँचा देब।” बुच्‍ची बाबू बजला- “सात बजे भाेरेमे चलब। कि‍एक तँ आठ बजेमे ट्रेन छै। तीन-चारि‍ कि‍लो मि‍टर स्‍टेशन दूरो छै।” रधि‍या भोरे उठि‍ सभ काज कऽ जलखै बना धि‍या-पुताकेँ खाइले दऽ बजली- “तँू सभ जल्‍दीसँ खो, आइ कनी पहि‍नहिए तोरा सभकेँ स्‍कूल पहुँचा दइ छि‍यौ, तखनि‍ बुच्‍ची बाबूक समान पहुँचबैले टीशन जाएब।” एम्‍हर बुच्‍ची बाबू तैयार भऽ रधि‍याक बाट तकै छला। पाँच मि‍नट पछाति‍ रधि‍या पहुँचली। बुच्‍ची बाबू तमसाइत बजला- “रधि‍या, तोरा कहने छेलि‍ओ साते बजै चलैले, देरी भऽ गेल। ट्रेन छूटि‍ जाएत। तोरा कोनो चि‍न्‍ता नै।” रधि‍या बजली- “अपने तमसाउ नै। धीरे-धीरे बढ़ू हम समान लेने लफरल पि‍ट्ठेपर आबि‍ रहल छी। कनी धि‍या-पुताकेँ स्‍कूल पहुँचबैमे देरी लागि‍ गेल।” बुच्‍ची बाबू- “पहि‍ले सामान पहुँचा दइतैं, हमरा ट्रेन छूटि‍ जाइत। एक दि‍न तोहर बेटा-बेटी स्‍कूल नै जेतौ तँ की हेतै। एक्के दि‍न कोनो पढ़ि‍ कऽ कलक्‍टर बनि‍ जेतौ?” रधि‍या मोने-मन सोचए लगली, कहै छि‍यनि‍ आगू बढ़ैले से उठि‍ए ने होइ छन्‍हि‍। हम तँ लफरल हि‍नकासँ पहि‍नहि‍ पहुँच जाएब। ट्रेन थोड़े छुटतनि‍। अपने बेगरते आन्‍हर छथि‍। अनेरे गछलौं। जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल ‘थोडे आगि थोडे पानि’2008 मे प्रकाशित प्रसिद्ध गीतकार भाइ सियाराम झा ‘सरस’क 80 टा गजल संकलन थीक।सरसजी गजलक पोथीक भूमिकामे कविता,कथा,निबन्ध आदि विधामे आबि रहल रचना सभक स्तरपर सवाल उठौलनि अछि। लेखक,कवि,नाटककार कें की की पढबाक चाही,से सलाह देल गेल अछि.लेखक लोकनिमे प्रतिबद्धताक अभाव पर आक्रोश व्यक्त कएल गेल अछि। अपन समाज,अपन भाषाक प्रति अपन लेखकीय प्रतिबद्धताक वर्णन सरसजी जाहि तरहें केलनि अछि से बेर-बेर पढबाक आ मोनहि मोन हुनक चरण स्पर्श करबाक लेल बाध्य क’ देत। मुदा जँ अहाँ ताकब जे गजलकारकें की की पढबाक अथवा कथीक अभ्यास करबाक चाही से एहिमे नहि भेटत। गजलकार स्वयं गजलक सम्बन्धमे की-की पढने छथि तकर उल्लेख नहि कएल गेल अछि। गजलक व्याकरणक कतहु चर्च नहि अछि.गजलकारकें मोन पडैत छनि दक्षिण अफ्रीकाक कवि मोलाइशक क्रान्तिगीत आ फिलीस्तीनी कविक कविता,कोनो शायरक कोनो महत्वपूर्ण शेरक उल्लेख नहि केलनि अछि। एहिसँ गजल लेखनक लेल आवश्यक प्रतिबद्धताक आभास नहि होइत अछि। पोथीक 80 टा गजलमे 62 टा गजलमे रदीफ आ काफियाक प्रयोग कएल गेल अछि जाहिमे 5 टा गजलमे रदीफ अथवा काफिया अथवा दूनूक निर्वाह सभ शेरमे नहि भ’ सकल अछि।16 टा गजलमे काफिया अछि, रदीफ नहि। 2टामे रदीफ अछि,काफिया नहि। अहूमे एकटामे सभ शेरमे रदीफक निर्वाह नहि भ’ सकल अछि। कोनो गजल एहन नहि अछि जकर सभ शेरमे वर्ण अथवा मात्राक एकरूपता हो।तें बहरमे त्रुटि साफ दृष्टिगोचर होइत अछि। एहि दिस गजलकारक ध्यान किएक नहि गेलनि से नहि जानि। सरसजीसँ लोककें बहुत अपेक्षा रहैत छैक, मुदा एहि सम्बन्धमे हुनक कोनहु स्पष्टीकरण सेहो कतहु नहि अछि। आशा अछि गजलकारक अगिला गजल-संग्रहमे आवश्यक औपचारिकताक निर्वाह होयत। ई पढि क’ नीक लगैत अछि जे ‘.....धीरू भाइ तं एते धरि कहने रहथि जे खैयाम कें मैथिलीमे सुनबाक हो तं सरस कें सूनल जा सकैछ...’ तें सरसजीसँ अपेक्षा आर बढि जाइत अछि। सरसजी कहैत छथि,‘एहि संकलनक गजल सभ तं सहजहिं अपन लोकवेदक,माटि-पानिक,भाशा-साहित्यक आ संस्कार-संस्कृतिक प्रतिबिम्ब तं थिके,संगहि अनेक ठाम अनेक तरहें तकरा नब सं परिभाषित आ व्याख्यायित सेहो करैछ । नब-नब संस्कारक स्थापना सेहो करैछ ।.......’ सरसजीक उक्तिकें तकैत विभिन्न गजलक एहि शेर सभ पर विचार करू-

जै पाइने पैनछूआ कैरतै ने लोक, छीः छीः छीः सेहो पाइन घटर-घटर घटघटा रहल,ई मैथिल छौ

जौं-जौं अहंक खसैए पिपनी,धप-धप तेना खसै छी हम रसे-रसे उठबी तं सरिपहुं, होइए देव-उठान हमर

थप्पा समधिन देल समधि केर अंगा मे उजरो मोंछ पिजाएल,फागुनक दिन आयल

अइ समुद्रक किन्हेरमे बड चक्रवातक जोर रहलै बालु पर तैयो अपन हम नाम तकने जा रहल छी

बिज्झो कराओल बैसले रहि गेल नोथारी गलियाक’ कियो खाइत आ उगलि रहल छलै

हम मरब,बेटा लडत,बेटा मरत-पोता लडत कटब-काटब,जे बुझी-सदभावना-दुर्भावना

हवा-पानिक बिना एमहर भेलैए दूभि सब पीयर ओम्हर बोडामे कसि-कसि,स्विस खातामे ढुकाबै छै

व्याकरण पक्षकें जँ उपेक्षित क’ देल जाए तँ कएटा गजलमे किछु शेर महत्वपूर्ण अछि जे पाठकक ध्यान आकृष्ट करैत अछि किछु शेर जे पढबामे नीक नहि लगैत अछि, भ’ सकैए जे हुनका स्वरमे सुनबामे नीक लागय. मैथिली गजलक भण्डारकें भरबामे सरसजीक योगदानकें महत्वपूर्ण मानैत हम गीतकार सरसजीक प्रशंसक, मैथिलीक सुधी पाठक आ नव-पुरान गजलकार सभसँ अनुरोध करबनि जे कम-सँ-कम तीन बेर अवश्य पढि जाथि सरसजीक ‘थोडे आगि थोडे पानि’। नीक लगतनि।

अरविन्दजीक आजाद गजल

मैथिलीयोमे गजल पर खूब काज भेल अछि आ एखनो भ’ रहल अछि। गजेन्द्र ठाकुर गजलक व्याकरण  विस्तार सँ प्रस्तुत केलनि आ अपनो बहुत गजल लिखलनि. आशीष अनचिन्हार मैथिली गजल ले’ स्वतंत्र साइट बनाक’ व्याकरण कें स्थापित करबामे अपनो योगदान करैत अपनो बहुत गजल लिखलनि आ आओर बहुत गोटे सँ गजल लिखबौलनि आ से काज एखनो क’ रहल छथि हिनका दूनू गोटेक अतिरिक्त आर बहुत गोटे मैथिली गजलकें समृद्ध करबामे योगदान क’ रहल छथि।ई प्रसन्नताक बात थिक। हमरा जनैत गजलकारक  मुख्य तीनटा वर्ग अछि। एक वर्ग ओ अछि जाहिमे रचनाकार पहिने गजलक व्याकरण पढलनि आ तकरा बाद ओही अनुसारे गजल लिख’ लगलाह. दोसर वर्गमे ओ गजलकार सभ छथि जे पहिने गजल लिख’ लगलाह , बादमे गजलक व्याकरण दिस घ्यान गेलनि आ ओहि अनुसारे लिखबाक प्रयास कर’ लगलाह. तेसर वर्गमे ओ लोकनि छथि जे गजल सूनि क’, पढि क’ लीख’ लगलाह आ लीखैत चल गेलाह, पाछां उनटि क’ नहि तकलनि.ओ मात्रा अथवा वर्ण गनि क’ षेर लिखबाक-कहबाक चक्करमे नहि पडि अपन बातकें केंन्द्रमे राखि धडाधड लिखैत चल गेलाह आ लिखैत जा रहल छथि। ‘बहुरूपिया प्रदेशमे’ मात्र 24 दिनमे लीखल गेल 66टा गजलक संग्रह थीक जाहिमे गजलकार अरविन्द ठाकुरजीक कथन पर ध्यान देल जाए: ‘हम जे कहय चाहैत छी से महत्वपूर्ण छैक,ताहि लेल व्याकरण टूटय कि विधा विशेषक मापदंड,तकर हमरा परवाहि नहि अछि। ओकरा भल चाही त’हमर सहायक हुअए,बाधा ठाढ नहि करए ।’ गजलकारक एहि कथनकें ध्यानमे राखि जँ हिनक गजल पढब त नीक लागत। 66 टा गजलमे 10टा गजल एहेन अछि जाहिमे रदीफ अछि,काफिया नहि. 16 टा एहेन अछि जाहिमे काफिया अछि,रदीफ नहि. 40 टा गजलमे रदीफ आ काफिया दूनू अछि. किछुए गजल एहेन हएत जाहिमे बहरसँ सम्बन्धित दोष नहि हो.मुदा,बहुत रास शेर सभमे जे बात कहल गेल अछि से व्याकरणक त्रुटिकें झांपन देबामे बहुत समर्थ लगैत अछि.सभ गजलक अंतिम शेरमे गजलकारक  नामक प्रयोगक प्राचीन परंपराक निर्वाह नीक जकाँ कएल गेल अछि जे बहुत गजलकार नहि क’ पबैत छथि. गजलकारक  समक्ष सामाजिक,राजनीतिक आ सांस्कृतिक चेतनाक अवमूल्यनक विषाल क्षेत्रक अनुभवक संपदा छनि जे जहां-तहां विभिन्न गजलक विभिन्न शेर सभमे प्रगट भेल छनि।एकर बानगीक रूपमे प्रस्तुत अछि निम्नलिखित  किछु  शेर: दूध लेल नेना आ रोगी हाकरोस करत नै जखन गाममे मालक बथान रहत

एहि समाजक रूढि भेल अछि घोडनक ओछाओन सन प्रेममे भीजल बतहबा ताहिपर ओंघरा रहल अछि

गाममे डिबिया जरल अछि रातिसं लडबाक लेल मेट्रोपॉलिटन टाउनमे अछि राति दुपहरिया बनल

पात बिछैबाक बेर लोकक करमान छल यार सभ अलोपित भेल ऐंठ उठेबाक बेर

रातिक जे एकबाल बढल दुर्लभ सगर इजोरिया भेल

संसद केर फोटोमे किछुओ नहि हेर-फेर सांपनाथ, नागनाथ,इएह दुनू बेर-बेर

कार खोजै छै एम्हर फूटपाथ पर सूतल षिकार यम अबै छथि एहि नगर विभिन्न वाहन पर सवार

संसदमे घुसिआयल जे सात जनम लेल केलक जोगार

गजलकारक  भयंकर आत्मविष्वास एहि षेर सभमे देखू:

धन्य ‘अरबिन’तों एलह गजलक जगतमे फेर केओ ‘खुसरो’की तोहर बाद हेताह

नै पाठक के चिन्ता अरबिन नीक गजल के पढबे करतै

एहने आर बहुत रास नीक-नीक शेर वला  गजल पढबाक लेल देखू  श्री अरविन्द ठाकुरक रचल आ ‘नवारंभ’ द्वारा 2011 मे प्रकाशित  आ  बहुत सुंदर कागतपर ‘प्रोग्रेसिव प्रिंटर्स’, नई दिल्ली द्वारा बहुत सुंदर मुद्रित गजल संग्रह ‘बहुरूपिया प्रदेशमे’। अन्तमे हम गजलकारक उक्तिक उल्लेख कर’ चाहब: ‘.......हाथक जेना सभ बान्ह टूटि गेल । एहन धारा-प्रवाह जे गजलकमिसरा,शेर,रदीफ,काफिया,बहर,गिरह सभकें सम्हारब कठिन....’ भरिसक, इएह कारण थीक जे गजेन्द्र ठाकुरजी द्वारा हिनक गजल सभकें आजाद गजल कहल गेल अछि। हम एहि विचारसँ सहमत छी। ओम प्रकाश झा बहुरूपिया रचनामे

गजलमे हम रूचि राखैत छी। संगहि मैथिली मे थोड बहुत गजल सेहो लिखै छी आ गजलक पोथी सब पढबाक इच्छा रहै ए। मैथिलीमे बहुत कम गजल संग्रह अछि  आ ओहो सुलभ नै होइत रहै ए। एहन परिस्थितिमे हमरा श्री अरविन्द ठाकुरजीक सद्यः प्रकाशित मैथिली गजल संग्रह "बहुरूपिया प्रदेशमे" पढबाक अवसर भेंटल आ हम एहि पोथीकेँ आद्योपान्त पढलहुँ। सबसे पहिने हम श्री अरविन्द ठाकुरजीकेँ मैथिली गजलक पोथी लिखबाक लेल बधाई दैत छियैन्हि। मैथिली गजलक उत्थान लेल प्रत्येक डेग हमरा महत्वपूर्ण लागै ए। पोथीक गेट अप बड्ड सुन्नर अछि। टाईप आ कागतक कोटि सेहो उत्तम अछि। पोथीक भूमिका गजलकार अपने लिखने छथि आ ओहि मे गजल आ एहि संग्रहक सम्बन्ध मे बहुत रास गप सब कहने छथि। जेना पृष्ठ संख्या सातक दोसर पारा मे गजलकार कहैत छथि जे "मैथिलीक मिजाजक सीमा (इ मैथिलीक नहि, हमर अपन सीमा भऽ सकैत अछि) केँ देखैत गजलक व्याकरण (रदीफ, काफिया, मिसरा, मतला, मकता आदिक स्थापित मापदंडक कसबट्टी पर हमर सभ गजल खरा उतरत तकर दाबी तऽ नहिए टा अछि बल्कि हम तँ इ सकारय चाहै छी जे----हमर सीमाक कारणेँ प्रस्तुत गजल मे कएक जगह सुधि पाठक लोकनि केँ त्रुटि भेटि सकैत छनि।" एहि पाराक अन्त मे ओ कहै छथि जे बहरक दोख किछु शेर मे भेटि सकैत अछि। हम गजलकारक सराहना करैत छी जे ओ भूमिका मे अपने कएक ठाम बहरक आ आन दोख हएब स्वीकार कएने छथि। पोथी केँ आद्योपान्त पढला पर हमरा इ नै बुझाएल जे एहि संग्रहक गजल सब कोन-कोन बहर मे लिखल गेल अछि। अरबीक कोनो टा बहर मे कोनो गजल नहिए अछि, मैथिली मे आइ-काल्हि प्रयुक्त होइ बला सरल वार्णिक बहर मे सेहो कोनो गजल नै अछि। गजलकार केँ प्रत्येक गजल मे इ लिखबाक चाही छल जे कोन बहर मे गजल लिखल गेल अछि। जँ  "आजाद-गजल"क संग्रह थीक, तँ हुनका एहि बातक उल्लेख करबाक चाही छल। भूमिकाक उपरोक्त पाराक शुरू मे गजलकार कहै छथि जे मैथिलीक मिजाज केँ देखैत एहि मे उर्दू-हिन्दी गजलक मिजाजक नकल करबाक प्रयास कएल जाइत तँ एकरा बुधियारी नहिए टा कहल जायत आओर सफलता सेहो नहि भेंटत। हम हुनकर गप सँ सहमत छी जे नकल करब उचित नहि। मुदा एकटा गप हम कहऽ चाहैत छी जे प्रत्येक विधाक एकटा नियम होइत छै आओर जाहि क्षेत्र मे ओहि विधाक उदय भेल रहैत छै ओहि क्षेत्र मे स्थापित भेल नियमक पालन केने बिना कोनो रचना मूल विधा मे कोना भऽ सकैत अछि। जेना मैथिली मे समदाउन आ सोहरक परम्परा छैक आ जँ पंजाबी मे वा गुजराती मे वा की कोनो आन भाषा मे समदाउन आ सोहर गाबऽ चाही तँ नियम कोना बदलि जेतैक। जँ नियम बदलतै तँ ओ दोसर चीज भऽ जेतैक। तहिना गजल अरब क्षेत्र मे जन्म लेलक आ इ स्वाभाविक छै जे एकर नियम (व्याकरण) ओहि क्षेत्रक स्थापित मानदण्डक आधार पर बनल। स्थापित मानदण्डक पालन करब नकल नहि कहल जा सकैत अछि। आ जे नकलक गप करी तँ 'गजल' कहब अरबी-हिन्दीक नकल थीक। एक दिस गजलकार 'गजल' कहबाक लोभ नै छोडि रहल छथि आ दोसर दिस गजलक व्याकरणक नियम पालन केँ नकल कहै छथि, इ उचित नै बुझाएल। गजल स्थापित मानदण्ड पर जँ नै कहल गेल तँ रचना केँ गजलक स्थान पर दोसर नाम देल जा सकैत अछि। पृष्ठ संख्या दस पर दोसर पारा मे गजलकार कहै छथि जे ओ जीवन सँ सिदहा लैत छथि। इ स्वागत योग्य गप भेल। जीवनक सिदहा सँ तैयार व्यंजन सोअदगर हेबे करतै। मुदा भोजन बनबै काल चाउरक सिदहा पानि मे सोझे फुला कऽ परसि देला सँ भात नहि कहाइत अछि। चाउरक सिदहा केँ अदहन मे देल जाइ छै तखन भात तैयार होइ छै। तहिना जीवनक सिदहा जँ व्याकरण, नियम आ चिन्तन-मननक अदहन मे पकाओल जाइत अछि तँ सोअदगर रचना भेटैत अछि। विधा विशेषक मापदण्ड तोडबाक क्रांतिकारी घोषणा कएला टा सँ किछु विशेष फायदा वा उमेद तँ नहिए जगै ए। जँ कियो मापदण्ड तोडै छथि, तँ मापदण्ड पर चलै बला केँ नकलची आ बाजीगर कहब उचित नहि। गजल आ फकरा आ दोहा मे थोडेक अन्तर तँ छै जे रहबे करतै। अस्तु, इ गजलकारक अपन विचार छैन्हि आ आब प्रकाशित सेहो छन्हि। गजल संग्रहक सब गजल पढलौं। विषय वस्तु सब नीके लागल। गजलक व्याकरणक आधारपर कहि सकैत छी जे बहरक दोख तँ प्रत्येक गजल मे छैक आ जँ इ आजाद-गजलक संग्रह थीक तँ गजलकार इ गप कतौ नै कहने छथि। गजलकार केँ स्पष्ट करबाक चाही छल जे कोन कोन बहर मे गजल सब लिखल गेल अछि। हमरा बुझने गजलक कोनो शीर्षक नै होइत अछि, मुदा प्रत्येक गजल केँ एकटा शीर्षक देल गेल अछि। बहरक अतिरिक्त रदीफ आ काफियाक नियमक सेहो कएक ठाम पालन नै भेल अछि आ इ गप गजलकार भूमिका मे सेहो स्वीकार कएने छथि। जेना पृष्ठ बाईस मे मतलाक दुनू पाँति, दोसर शेर आ पाँचम शेर मे काफिया मे 'आयब' प्रयोग भेल अछि, तँ दोसर आ चारिम शेर मे 'अब' क प्रयोग अछि। पृष्ठ चौबीस मे मतलाक पहिल पाँति मे काफिया मे 'अ' आयल अछि आ दोसर पाँति आ अन्य शेर मे 'आत' आयल अछि। पृष्ठ पच्चीस मे काफिया की छै, से नै बुझाएल। पृष्ठ तिरपन मे प्रत्येक पाँति मे काफिया एकदम फराक फराक अछि। पृष्ठ अनठाबन मे मतला, दोसर शेर आ चारिम शेर मे काफिया मे 'अल' प्रयुक्त अछि आ आन सब शेर मे काफिया मे 'अ' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ उनसठि मे सेहो रदीफ आ काफियाक स्पष्टता नै अछि। पृष्ठ छियासठि मे काफिया मे कतौ 'अल' आ कतौ 'आओल' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ सडसठि आ तिहत्तरि मे सेहो काफियाक नियमक उल्लंघन भेल अछि। तहिना संयुक्ताक्षर बला काफियाक नियम सेहो एक दू ठाम हमरा हिसाबेँ ठीक नै अछि। एकर अतिरिक्त आओर कएक ठाम काफियाक नियमक पालन नै भेल अछि। हम उदाहरण स्वरूप किछु पृष्ठक उल्लेख कएलहुँ। हमर इ उद्देश्य नै अछि जे खाली दोख ताकल जाय, मुदा जँ गजल कहै छियै तँ गजलक नियमक पालन हेबाक चाही। सब गोटे केँ जानकारी लेल इ बता दी की बिना रदीफक गजल तँ भऽ सकैत अछि, मुदा बिना दुरूस्त काफिया भेने गजल नै भऽ सकैत अछि। भूमिका सँ एकटा बात आर स्पष्ट होइ ए जे गजलकार मई २००८ सँ मैथिली मे गजल लिखब शुरू केलथि, ओना ओ हिन्दी मे पहिनहुँ गजल लिखैत छलाह। एकर मतलब इ भेल जे गजलकार "अनचिन्हार आखर" (मैथिली गजल केँ समर्पित ब्लाग) सँ बहुत बाद मे मैथिली गजल लिखब शुरू कएने छथि आ मैथिली गजलक वरीयता मे बहुत बाद मे आयल छथि। "अनचिन्हार आखर" ब्लाग देखला सँ पता चलै छै जे गजलकार एहि ब्लाग पर सेहो अपन कएक टा गजल २००९ सँ एखन धरि देने छथि। ओ "अनचिन्हार आखर" ब्लाग सँ चिन्हार छथि, तैँ इ उमेद अछि जे एहि ब्लाग पर प्रकाशित मैथिली गजलक विस्तृत व्याकरण केँ जरूर देखने हेताह। इ उमेद छल जे प्रस्तुत गजल संग्रह मैथिली गजलक नब पीढी लेल एकटा उदाहरण बनत। मुदा एहि संग्रह मे गजलक व्याकरणक जे उपेक्षा भेल अछि, जे गजलकार भूमिका मे स्वयं स्वीकार कएने छथि, निराशा उत्पन्न करैत अछि। मुदा इ संग्रह गजलकारक पहिलुक मैथिली गजल संग्रह अछि, तैँ गजलक व्याकरणक गलती भेनाई स्वभाविक अछि। आशा व्यक्त करै छी जे हुनकर आगामी गजल संग्रह मैथिली गजल मे अपन अलग स्थान राखत।

घोघ उठबैत गजल

मैथिली गजलक पहिलुक प्रकाशित पोथी "उठा रहल घोघ तिमिर" पढबाक सौभाग्य भेंटल। ऐ गजल संग्रहक गजलकार श्री विभूति आनन्द छथि। एहि पोथी मे कुल चौंतीस गोट गजल अछि। पूरा पोथी केँ एकहि बैसार मे पढि गेलहुँ आ बेर-बेर पढलहुँ। सबसे पहिने हम श्री विभूति आनन्दजी केँ मैथिली गजलक पहिलुक संग्रह प्रकाशित करबा लेल धन्यवाद दैत छियैन्हि। एहि पोथीक भूमिका मे गजलकार कहै छथि जे "मैथिलीक गजल सोझे-सोझ हिन्दी सँ प्रभावित अछि मुदा हिन्दी जकाँ जमल नञि अछि एखनो धरि।" आगू हुनकर कहनाई छैन्हि- "पारम्परिक व्याकरण सम्बन्धित अगणित त्रुटि सभ ठाम लक्षित होएत। ओना हम दुस्साहसपूर्वक साहस करैत रहलहुँ अछि जे कथ्य-सामंजस्य लए व्याकरण दिस सँ यदि मूँहो घूमा लेल जाए तँ कोनो हर्ज नञि। किए तँ हम मानैत छी जे ई पाठ्यक्रमक वस्तु नञि अछि। विद्यार्थी मूर्ख नञि बनत। तैं की ---- व्याकरण सँ भयभीत भऽ नञि लिखल जाए।" गजलकारक पहिलुक कथनक सम्बन्ध मे हमर निवेदन अछि जे गजलक परम्परा अरबी-फारसी सँ शुरू भेल अछि आ ओतहि सँ आन भारतीय भाषा मे पसरल अछि। हिन्दी-उर्दू मे गजल कहबाक परम्परा मैथिली सँ पहिने शुरू भेल, तैं बहुसंख्य लोक दिग्भ्रमित भऽ जाइत छथि जे मैथिलीक गजल हिन्दी गजलक नकल छी वा ओइ सँ प्रभावित भेल अछि। गजलकार सेहो एहि मिथ्या धारणा सँ प्रभावित छथि। आब गजलक व्याकरण थोड-बहुत समन्जनक संग सब भाषा मे तँ एक्के रहत। ऐ स्थिति केँ हमरा हिसाबेँ "प्रभावित भेनाई" कहबाक कोनो औचित्य नै अछि। गजलकारक दोसर कथन देखि हम निराश भेल छी। पता नै किया एखन धरि जे दुनू गजल संग्रह (सबसँ पहिलुक आसबसँ अंतिम प्रकाशित) पढलहुँ, एहि दुनू मे गजलकार कथ्य-सामंजस्यक आगू व्याकरण केँ कोनो मोजर नै देबऽ चाहैत छथि। एकटा गप मोन रखबाक चाही जे साहित्यक निर्माण वैयाकरणिक अनुशासनक बादे सफल भेल अछि। इ फराक गप अछि जे समय-काल आ स्थानक हिसाबेँ सर्वमान्य परिवर्तन व्याकरण मे होइत रहल छैक। बिना वैयाकरणिक अनुशासनक भाषा पढबा, लिखबा आ बाजबा जोग रहत? जिनका मे साहित्य निर्माणक माद्दा छैन्हि, हुनका मे व्याकरण केँ पालनक साहस अबस्स हेबाक चाही। आब हम एहि संग्रहक गजलक सम्बन्ध मे किछु गप कहऽ चाहब। इ गजल संग्रह ओहि समय मे लिखल गेल अछि जखन मैथिली गजलक व्याकरण आ बहरक सम्बन्ध मे बहुत बेसी जनतब सार्वजनिक नै छल। हम एकरा एना कहऽ चाहब जे इ गजल संग्रह "अनचिन्हार आखर" जुग सँ पूर्वक गजल अछि जखन बहर, रदीफ आ काफियाक नियमक पालनक विषय मे बहुत रास गप सर्वजन सुलभ नै छल। एहि हिसाबेँ जँ ऐ संग्रहक गजल सभ मे बहरक दोख छैक तँ इ स्वभाविक बुझाईत अछि। एहि संग्रहक कोनो टा गजल कोनो बहर मे नै अछि। तैं ऐ संग्रहक वैध गजल (जाहि मे काफियाक नियमक पालन भेल हुए) सभ केँ "आजाद-गजल"क श्रेणी मे राखल जा सकैए। आब गजलक काफिया आ रदीफक सम्बन्ध मे किछु गप। एहि संग्रहक बहुत रास गजल मे काफिया आ रदीफक नियमक पालन भेल अछि। मुदा कएक गजल मे रदीफ आ काफियाक गलती अछि। जेना पृष्ठ चौदह पर मतला देखला पर बुझाईत अछि जे "इ मौसम" रदीफ अछि आ "लागैए" आओर "उलाबैए" काफियायुक्त शब्द अछि। मुदा दोसर शेर आ आगूक आन शेर मे एकर पालन नै भेल अछि आओर शेर सभ बिना रदीफक "अ" काफियायुक्त अछि। पृष्ठ पन्द्रह पर सेहो यैह दोख अछि, जाहि मे मतला मे रदीफ "कहाँ रहल"क प्रयोग अछि आ आन शेर सभ बिना रदीफक "अल" काफियायुक्त अछि। एहने दोख पृष्ठ सोलह मे देखल जा सकैत अछि, जतय मतला मे "करै छह" रदीफ मानल जयबाक चाही। ओना ऐ गजलक आन शेर सभ मे दू टा काफियाक सुन्नर प्रयोग अछि, जे नीक लागैए। हमरा हिसाबेँ काफियाक दोख पृष्ठ बीस, बाईस, चौबीस, पचीस, अट्ठाईस, उनतीस(संयुक्ताक्षर काफियाक नियमक दोख बत्तीस आ सैंतीस मे सेहो अछि। एकर सबहक विस्तृत वर्णन देब हम अपेक्षित नै बूझि रहल छी, कियाक तँ इ हमर उद्देश्य कथमपि नै अछि। गजल संग्रहक सब गजलक विषय-वस्तु नीक अछि आ गजलकार अपन भावना नीक जकाँ प्रकट केने छथि। किछु गजलक काफिया आ रदीफक दोख जँ कात कऽ कऽ देखी, तँ इ गजल-संग्रह एकटा नीक गजल-संग्रह अछि। गजलकारक गजल कहबाक क्षमता सेहो नीक बुझाईत अछि। हमरा ई अचरज लागि रहल अछि जे ऐ संग्रहक बाद गजलकारक दोसर गजल-संग्रह किया नै आएल अछि। एकर कारण तँ गजलकारे केँ पता हेतैन्हि, मुदा अपन अनुभवक आधार पर हम कहऽ चाहै छी जे श्री विभूति आनन्द नीक गजल लिख सकैत छथि। जँ बहरक विचार नै करी, तँ २०१२ मे आएल श्री अरविन्द ठाकुरजीक गजल-संग्रह सँ करीब एकतीस बर्ख पहिने १९८१ मे लिखल गेल एहि संग्रहक गजल सब उम्दा कहल जा सकैत अछि। एकर कारण इ जे एहि संग्रहक गजल सब मे काफियाक नियम-पालनक प्रतिशत वर्तमान समयक संग्रह सब सँ बेसी अछि। कथ्यक मजबूती सेहो नीक कोटिक अछि। खाली कुहरल तुकमिलानी केने गजल नै कहल जा सकैत अछि, इ गप एहि संग्रह केँ पढलाक बाद एखुनका गजलकार सभ केँ सेहो बुझेतन्हि, इ आशा अछि। इहो एकटा अचरजक विषय अछि जे जखन मैथिली मे नीक गजल एतेक साल पहिनो कहल गेल छल, तखन एकर बाद गजलक विकास-यात्रा पचीस-तीस बर्ख धरि कतऽ आ किया ठमकि गेल। बीचक अवधि मे मैथिली गजलक विकासक धार मे बान्ह किया बनि गेल छल, इ विचारणीय गप अछि। ओना आब इ बान्ह टूटि रहल अछि आ आशाक नब जोति मे मैथिली गजलक घोघ उठि रहल अछि।

समीक्षा- प्रेमचन्द्र पंकजजीक दू टा गजल विदेह ई-पत्रिकाक १ अप्रैल २०१२ केर नब अंक मे प्रकाशित श्री प्रेमचन्द्र पंकजजीक दू टा गजल पढलौं। एहि दूनू गजल केँ हम गजलक व्याकरणक आधार पर देखबाक प्रयास कएलौं। हम दूनू गजल पर आ प्रत्येक पाँति पर अपन विचार राखि रहल छी। गजल १ हम बात अहीं केर मीत कहब, नहि गजल कहब बरु कहब मीठ नहि, तीत कहब, नहि गजल कहब

चाङुर अपन पसारि रहल अछि माथापर सम्बन्धक बाज कोन विधि बाँचत प्रीत कहब, नहि गजल कहब

कतबो माँटि सुँघाएब तैओ नहि मानब हम अप्पन हारि चारु नाल पछाड़ि अपन हम जीत करब नहि गजल कहब

गगनक मुँहकेँ चूमए कतबो ठाढ़ अहाँ केर शीसमहल बस कखनहुँ बालुक भीत करब नहि गजल कहब

हाथ पसारब रहत पसरले, मुँहे टेढ़ करब तँ की कनि दूसि मुँह विपरीत चलब, नहि गजल कहब

पहिल गजलक मतला पढला पर बुझाइए जे रदीफ "कहब, नहि गजल कहब" अछि आ काफिया मे "ईत" प्रयोग भेल अछि। दोसर शेर मे यैह रदीफ आ काफिया लेल गेल अछि। मुदा तेसर आ चारिम शेर मे आबि कऽ रदीफक "कहब"क बदला मे "करब" उपयोग कएल गेल अछि। पाँचम शेर मे एकरा बदलि कऽ "चलब" कऽ देल गेल अछि। ऐ सँ इ बुझा लगैए जे रदीफ "नहि गजल कहब" अछि आ दू टा काफिया "ईत" युक्त शब्द आ "अब" युक्त शब्द अछि। जँ गजलकार यैह रदीफ आ काफिया मानि कऽ चलल छथि तँ हुनका प्रत्येक शेर मे एकरे प्रयोग करबाक चाही। तखन रदीफ आ काफियाक दोख नै रहितै। रदीफक नियमक मोताबिक प्रत्येक गजलक एकेटा रदीफ होइत अछि आ एकर पालन ओहि गजलक प्रत्येक शेर मे होयबाक चाही। तहिना काफियाक नियमक मोताबिक प्रत्येक शेर मे काफिया एके हेबाक चाही। आब कनी बहर पर चर्च करी। ई गजल सरल वार्णिक बहर वा वार्णिक बहर पर नै लिखल गेल अछि। अरबी बहर मे अछि की नै ई जनबा लेल हम सब एक एक टा पाँतिक विश्लेषण करी। जँ ह्रस्व केँ १ आ दीर्घ केँ २ मानी तँ पहिल शेर मे देखल जाओः- हम बात अहीं केर मीत कहब, नहि गजल कहब ११ २१ १२ २१ २१ १११ ११ १११ १११ आब दोसर पाँति बरु कहब मीठ नहि, तीत कहब, नहि गजल कहब १२ १११ २१ ११ २१ १११ ११ १११ १११ ऊपर दूनू पाँति मे देखि सकै छी जे ह्रस्वक नीचा ह्रस्व आ दीर्घक नीचा दीर्घ नै आएल अछि आ तैं इ शेर कोनो बहर मे नै अछि। जखन मतले कोन बहर मे नै अछि, तखन आन शेर सब पर विचार करबाक कोनो प्रयोजन नै अछि। निष्कर्ष यैह जे गजल कोनो बहर मे नै अछि। आन शेरक विश्लेषण पाठक अपने ऐ आधार पर कऽ सकैत छथि।

आब दोसर गजल देखल जाओः- गजलक बहन्ने हम आंगन- घर- दुआरि लिखब बाध-बन- कलमबाग-बेख –बसबारि लिखब

साँढ़ छैक छुट्टा आ पाड़ा मरखाह कतैक बाँचल फसिलकेर सुरजाक रखबारि लिखब

थानामे नाङट भेलि रमियाक हाकरोस- सुननिहार केओ नहि तकरे पुछारि लिखब

बारल खेलौनासँ, पोथीसँ दूर कएल जिनगीक बोझ उघैत नेनाक भोकारि लिखब

नाचि रहल लोक आइ असली नचनिञा सभ नचा रहल परदासँ केओ परतारि लिखब

फाटल अकास छै सीअत के-कते कोना लिखब जे “पंकज” बेर-बेर विचारि लिखब एहि गजल मे काफिया "आरि" युक्त अछि आ रदीफ "लिखब" अछि। ऐ हिसाबेँ रदीफ आ काफिया ठीक अछि। सरल वार्णिक बाहर वा वार्णिक बहर वा अरबी बहर मे इहो गजल नै अछि। ह्रस्व केँ १ आ दीर्घ केँ २ मानि कऽ मतला केँ देखल जाओः- गजलक बहन्ने हम आंगन- घर- दुआरि लिखब ११११ १२२ ११ २११ ११ १२१ १११ बाध-बन- कलमबाग-बेख –बसबारि लिखब २१ ११ १११२१ २१ ११२१ १११ इहो गजलक मतला मे ह्रस्वक नीचा ह्रस्व आ दीर्घक नीचा दीर्घ नै आएल अछि आ इ कोनो बहर मे नै अछि। इहो गजल मे जखन मतले बहर मे नै अछि तखन आन शेर सब पर विचार करबाक कोनो प्रयोजन नै अछि। एहि आधार पर इ निष्कर्ष निकलैए जे इहो गजल कोनो बहर मे नै अछि। एहि तरहेँ देखल जा सकैए जे दूनू गजलक बहर दुरूस्त नै छै। ऐठाँ ई बता दी की संयुक्ताक्षर सँ पूर्वक वर्ण दीर्घ मानल जाइए आ अनुस्वार बला वर्ण सेहो दीर्घ मानल जाइए। गजलक विषयवस्तु नीक अछि। दोसर गजल "आजाद गजलक"क श्रेणी मे अछि आ पहिलुक गजल काफिया दोखक कारण गजल नै अछि। सादर।

मैथिली बाल गजलक अवधारणा

जेना कि नाम सँ स्पष्ट अछि, बाल गजल माने भेल नेना-भुटकाक लेल गजल। बाल गजलक अवधारणा मैथिली मे एकदम नब अछि आ पहिल बेर २४ मार्च २०१२ केँ श्री आशीष अनचिन्हार ऐ अवधारणा केँ सामने आनलथि। बहुत अल्प समय मे बाल गजल बहुत प्रसिद्धि पओलक आ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभक एकटा विशाल पाँति ठाढ भऽ गेल। ऐ मे सर्वश्री गजेन्द्र ठाकुर आ आशीष अनचिन्हार जकाँ स्थापित गजलकार तँ छथि, एकर अलावे नब गजलकार सब सेहो बाल गजल कहबा मे विशेष अभिरूचि देखौलन्हि। बाल गजल कहनिहार नब गजलकार सभ मे सर्वश्री मिहिर झा, मुन्ना जी, इरा मल्लिक, अमित मिश्रा, चन्दन झा, पंकज चौधरी 'नवलश्री', राजीव रंजन झा, जगदानंद झा 'मनु', रूबी झा, प्रशांत मैथिल आदि अनेको गजलकार छथि। "अनचिन्हार आखर", जे मैथिली गजलक एकमात्र ब्लाग अछि, देखला पर पता लागैत अछि जे बाल गजलक अवधारणा अयलाक बाद सँ एखन धरि(ई आलेख लिखबा तक) ७३(तिहत्तरि) टा बाल गजल ऐ ब्लाग पर पोस्ट भऽ चुकल अछि, जे अपने आप मे एकटा कीर्तिमान अछि। खास कऽ एतेक कम समय मे एतेक पोस्ट आएब बाल गजलक लोकप्रियताक खिस्सा कहि रहल अछि। बाल गजलक विधा एकटा स्वतन्त्र विधा बनबाक बाट मे अग्रसर अछि, जे एतेक कम समय मे एतेक संख्या मे बाल गजल कहनिहार गजलकार आ बाल गजलक संख्या सँ स्पष्ट अछि। संगहि किछु लोक केँ मिरचाई सेहो लागब शुरू अछि आ ओ लोकनि बाल गजलक सम्पूर्ण अवधारणा केँ नकारबाक कुत्सित असफल प्रयास मे जत्र कुत्र अंट शंट पोस्ट देबऽ लागलाह। ई गप आर स्पष्ट करैत अछि जे बाल गजलक विधा मजबूती सँ स्थापित भऽ रहल अछि। कियाक तँ सफल व्यक्ति आ विधा सभक आकर्षणक केन्द्र बनैत अछि आ बाल गजल सेहो सभक आकर्षणक केन्द्र बनि चुकल अछि, चाहे ओ गजलकार होईथि, पाठक होईथि, आलोचक होईथि वा जरनिहार लोक सभ होईथि। जखन मैथिली गजलक चर्च भऽ रहल अछि, तखन श्री आशीष अनचिन्हारक चर्चा स्वभाविक अछि। मैथिली गजलक विकास मे हुनकर योगदान हुनकर धुर विरोधी लोकनि सेहो मानैत छथिन्ह। मैथिली बाल गजलक अवधारणा लेल श्री आशीष अनचिन्हार मैथिली साहित्य मे अपन अनुपम स्थान बना चुकल छथि। बाल गजलक अवधारणा सेहो हुनके छैन्हि, जे बहुत सफल भेल अछि। आब किछु गप करी मैथिली बाल गजलक रचना सभक संबंध मे। हमरा विचार सँ बाल गजल नेना भुटकाक लेल रूचिगर तँ हेबाके चाही, संगहि ऐ मे कोनो स्पष्ट सामाजिक सनेस होइ तँ ई सोन मे सोहाग जकाँ हएत। ओना तँ सभ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभ ऐ मे सक्षम छथि आ नीक सँ नीक बाल गजल लिख रहल छथि, मुदा ऐ सन्दर्भ मे हम श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक बाल गजलक उल्लेख करब उचित बूझि रहल छी। हुनकर एकटा बाल गजलक मतला अछिः-

कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी जँ रंग गुलाबी छै तँ जानू बार्बी

ऐ गजल केँ पूरा पढि कऽ कने देखियौ। ई गजल कनिया पुतराक उल्लेख करैत नेना-भुटकाक मनोरंजन तँ करिते अछि, संगहि अजुका बाजारवादक बलिवेदी पर कुर्बान भेल मनुक्खक मार्मिक विवेचना सेहो करैत अछि। एहन आरो कतेको बाल गजल सभ "अनचिन्हार आखर" पर भेंटैत अछि, जकरा ऐ ब्लाग पर पढल जा सकैत अछि। ई गजलकार सभक सामाजिक संवेदना केँ प्रकट करैत अछि आ हम ऐ लेल सभ गजलकार केँ साधुवाद दैत छियैन्हि। हम एहने बाल गजलक आस गजलकार सभ सँ लगओने छी। कियाक तँ गजलकारक सामाजिक दायित्व सेहो छै, जे पूरा हेबाक चाही। आधुनिक मैथिली गजलकार सब मे ई क्षमता अछि आ ओ दिन दूर नै अछि जखन एक सँ एक सुन्नर आ बालोपयोगीक संगे सामाजिक समस्या पर बाल गजलक भरमार हएत। व्याकरणक हिसाबेँ मैथिली बाल गजल नीक बाट धएने अछि। अनचिन्हार आखरक टीमक परिश्रमक कारणेँ मैथिली मे बहरयुक्त गजलक काल शुरू भऽ चुकल अछि आ सरल वार्णिक बहर(जकर अवधारणा श्री गजेन्द्र ठाकुरजी देलखिन्ह) केर अलावे आब अरबी बहर मे गजल कहनिहार गजलकारक कमी नै छै। बाल गजल अपन शुरूआते सँ बहरयुक्त अछि, जे बाल गजलक लेल शुभ संकेत अछि। शुरूआतिए समय मे जे आ जतबा बाल गजल लिखल गेल अछि, ओ सभ बहर मे अछि, चाहे सरल वार्णिक बहर होइ वा अरबी बहर। बहरक अलावे रदीफ आ काफियाक नियमक पालन सेहो पूरा पूरा भऽ रहल अछि। व्याकरण पालनक ई प्रतिबद्धता निश्चित रूपे बाल गजलक सफलताक गाथा लिखबा मे सहायक हएत। मैथिली गजलक बढैत डेग संग आब मैथिली बाल गजलक डेग सेहो उठि गेल अछि। मैथिली बाल गजल जाहि द्रुत गति सँ अपन डेग उठओलक अछि, ऐ सँ तँ यैह लागैत अछि जे अगिला साल आबैत आबैत मैथिली बाल गजलक पोथी प्रकाशित भऽ सकैत अछि। संगहि इसकूलक पाठ्यक्रम मे बाल गजल सम्मिलित हेबाक संभावना सेहो साकार रूप लऽ सकत। पाठ्यक्रम मे सम्मिलित हेबाक बाद मैथिली बाल गजल सभ पढनिहार-पढौनिहारक संज्ञान मे नीक जकाँ आओत आ सामाजिक विकासक संरचना मे अपन महत्वपूर्ण योगदान, जे अपेक्षित अछि, सेहो दऽ सकत।

भोथ हथियार

श्री सुरेन्द्र नाथक कहल मैथिली गजलक संग्रह अछि "गजल हमर हथियार थिक"। ऐ पोथी मे हुनकर अडसठि टा गजल प्रकाशित भेल अछि। ई संग्रह २००८ मे आएल अछि जकर आमुख श्री अजीत आजाद जी लिखने छथि। ऐ पोथी केँ आदि सँ अन्त धरि पढबाक बाद हमर यैह अभिमत अछि जे गजलक व्याकरणक दृष्टिसँ ऐ संग्रह मे अनेको कमी अछि, जाहि सँ बचल जा सकैत छल। पृष्ठ संख्या १३, ६७ आ ७० परहक गजल मे चारिये टा शेर छै, जखन की कोनो गजल मे कम सँ कम पाँच टा शेर हेबाक चाही। संग्रहक कोनो गजल बहर मे नै अछि। हमर ई स्पष्ट मनतब अछि जे गजलकार केँ प्रत्येक गजल मे बहरक उल्लेख करबाक चाही आ जँ आजाद गजल कहने छथि तँ इहो स्पष्ट रूपेँ लिखबाक चाही। ऐ पोथी मे काफियाक गलती भरमार अछि। कतौ कतौ तँ ई बूझना जाइ छै जे गजलकार बिना काफिया आ रदीफक मतलब बूझने गजल कहबा लेल बैस गेल छथि। एकर उदाहरण पृष्ठ १५ परहक गजल पढबा पर भेंट जाइ छै। ई तँ हम एकटा उदाहरण कहि रहल छी। आरो गजल ऐ दोख सँ प्रभावित छै, जतय काफियाक नियमक धज्जी उडा देल गेल अछि। जेना पृष्ठ १८, १९, २०, २१, २७, २९, ३१, ३४, ३५, ३६, ३९, ४०, ४१, ४३, ४४, ४५, ४६, ४७, ५२, ५३, ५६, ५७, ५८, ६६, ६७, ६८,७०, ७१, ७२, ७४, ७५,७७, ७९ आदिमे काफिया तकलासँ नै भेंटैत अछि आ ऐ खोजमे मोन अकच्छ भऽ जाइत छै। ओना आनो पृष्ठ काफिया दोखसँ ग्रसित अछि, मुदा ई उदाहरण हम ओइ पृष्ठ सभक देने छी, जतय काफियाक झलकियो तक नै भेंटै छै। मैथिली गजल आइ जाहि सोपान पर चढि चुकल अछि, ओइ हिसाबेँ ऐ तरहक रचना गजलक नामसँ स्वीकृत होइ बला नै अछि। कियाक तँ बिना दुरूस्त काफियाक गजल नै भऽ सकैत अछि। ई संग्रह "अनचिन्हार आखर" युगक शुरूआत भेलाक बाद लिखल गेल अछि, तैँ हमरा ई आस छल जे गजलकार कमसँ कम काफिया आ रदीफक नियमक पालन ठीकसँ केने हेताह, कियाक तँ "अनचिन्हार आखर" जुग मे आब गजलक व्याकरणक सभ नियम चिन्हार भऽ चुकल अछि। मुदा गजलकार काफिया आ रदीफक नियम पालन करबामे पूरा असफल रहलथि। ओना ऐ संग्रहक काफिया दोखकेँ पोथीक आमुख लेखक श्री अजीत आजाद पोथीक आमुखमे दाबल आवाजमे स्वीकार करैत कहै छथि जे कतेको ठाम काफिया "गडबडायल सन" बुझना जाइत अछि। ओना ई अलग गप थिक जे काफिया "गडबडायल सन" नै अपितु पूरा पूरी गडबडायल अछि। फेर श्री आजाद ऐ गलतीकेँ झाँपबा लेल इहो कहैत छथि जे "रचनाकारकेँ अपन सीमासँ बाहर आबि शब्द-व्यापार करबाक चाही"। मुदा गजलक अपन व्याकरण छै, जकर पालन केने बिना रचना गजल नै भऽ कऽ पद्य मात्र रहि जाइत छै। गजल आ कविताक बीचक अंतर जे अंतर छै, से ऐ तरहक तर्कसँ समाप्त नै भऽ जाइ छै। काफिया, रदीफ आ गजलक व्याकरणक अनुपालन नै हेबाक कारणेँ श्री सुरेन्द्र नाथक ई संग्रह गजल संग्रह नै भऽ कऽ एकटा पद्यक संग्रह भऽ कऽ रहि गेल अछि। संवेदनाक स्तर पर किछु रचना नीक अछि आ जँ गजलकार गजलक व्याकरण पर धेआन देने रहतथिन्ह, तँ नीक गजल लिखि सकैत छलाह। गजलकारक ई पहिलुक मैथिली गजल संग्रह बहुत आस तँ नै जगबैत अछि, मुदा हुनकर संवेदनात्मक प्रतिभा देखैत हम ई आस जरूर करै छी जे ओ गजलक व्याकरणक पालन करैत आगू नीक गजल कहताह आ "गजल हमर हथियार थिक" केँ चरितार्थ करताह। गजल तँ हथियार होइते अछि, मुदा बिनु काफिया, रदीफ आ बहरक नियमक पालन केने रचना गजल नै होइत अछि आ भोथ हथियार भऽ जाइत अछि। पद्यक हथियार पर काफिया आ बहरक सान चढल हुनकर नब गजल-हथियारक प्रतीक्षा रहत।

गजलक लेल

श्री विजय नाथ झाजीक गीत-गजल संग्रहक पोथीक नाम अछि "अहींक लेल"। ऐ पोथीमे गीत आ गजलक फराक-फराक दूटा प्रभाग छै। हम ऐ पोथीक गजल प्रभागक संबंधमे ऐठाँ किछु चर्चा करऽ चाहब। ऐ पोथीमे गजलकार श्री विजय नाथ झाजीक अठहतरिटा गजल प्रकाशित भेल अछि। पोथीक गजल पढलासँ ई पता चलैत अछि जे किछु गजल केँ छोडिकऽ बेसी ठाँ काफिया आ रदीफक निअमक पालन कएल गेल अछि। पृष्ठ संख्या ४७, ५०, ५४, ५५, ५६, ६७, ७१, ७४, ७५, ८२, ९४, १०१, ११०, ११४ पर छपल गजलमे काफिया गडबडाएल अछि। ऐठाँ ई धेआनमे राखबाक चाही जे बिना दुरुस्त काफियाक रचना गजल नै भऽ सकैए। तखनो अधिकांश गजलक काफिया दुरुस्त अछि, जे गजलक विकास यात्राक हिसाबेँ एकटा नीक लक्षण अछि। काफिया, रदीफ आ गजलक व्याकरणक निअम पालन करबाक हिसाबेँ गजलकार ओहि गजलकार सभसँ फराक श्रेणीमे छथि जे गजलक व्याकरणकेँ नै मानबाक सप्पत खएने छथि। ऐ गजल संग्रहक गजल सब कोन बहरमे लीखल गेल अछि, ऐ पर गजलकार मौन छथि। गजलक नीचाँमे बहरक नाम जरूर लीखल जएबाक चाही। बहरक ज्ञान नब पीढीक गजलकार सभमे बढेबामे ई महत्वपूर्ण डेग हएत। ओना तँ गजलकार कोनो गजलक नीचाँमे बहरक नाम नै लीखने छथि, मुदा गजल सभकेँ पढलासँ ई पता चलैत छै जे ऐ संग्रहक ढेरी गजल एहन अछि जाहिमे अरबी बहरक निअमक पालन करबाक नीक प्रयास कएल गेल अछि। ई स्वागत योग्य गप अछि। ऐसँ इहो पता चलैत अछि जे गजलकार अरबी बहरसँ नीक जकाँ परिचित छथि आ जँ ई बात अछि तँ हुनका बहरक नाम गजलक नीचाँमे फरिछाकेँ लीखबाक चाही। ऐ संदर्भमे हम पोथीक सबसँ पहिलुक गजलक पृष्ठ संख्या ४५ मतलाकेँ उद्धृत करऽ चाहै छी- हमर पूजा, हमर परिचय, हमर शृंगार छी अपने सकल सौभाग्य, मन, काया, रुधिर-संचार छी अपने आब एकर मात्रा संरचना पर धेआन दिऔ, तँ पता चलै छै जे ऐमे मूल ध्वनि मफाईलुन माने "ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ" सब पाँतिमे चारि बेर प्रयोग कएल गेल अछि। माने ई शेर बहरे-हजजमे कहल गेल छै। ऐ गजलक आनो शेरमे मोटामोटी किछु गलतीकेँ छोडि बहरे-हजजक प्रयोग अछि आ किछुठाँ वर्ण दुरुस्त कऽ देला पर ई गजल अरबी बहर बहरे-हजजमे अछि। ई एकटा उदाहरण अछि, एहन आरो गजल ऐ संग्रहमे छै जे वर्ण आ मात्रामे किछु परिवर्तन भेला पर अरबी बहरमे कहल मानल जाएत। हमरा ई आस अछि जे गजलकार अपन अगिला गजल संग्रहमे ऐ बातक धेआन राखताह आ अरबी बहर युक्त गजल कहिकऽ मैथिली गजलकेँ समृद्ध करताह। शेरक पाँतिक अंतमे पूर्ण विराम वा कोनो विराम चिन्ह नै लगेबाक निअम अछि, मुदा पोथीक गजलक शेर सभक पाँतिक अंतमे पूर्ण विराम लगाओल गेल अछि, जे निअमानुकूल नै अछि आ एकर धेआन राखल जएबाक चाही छल। संवेदनाक स्तरपर ई गजल संग्रह बड्ड नीक अछि आ गजलकारक विद्वताकेँ प्रकट करैत अछि। मुदा कएकठाँ भारी भरकम तत्सम आ संस्कृतक शब्दक प्रयोग गजलकेँ बूझबामे भारी बनबैत छै, जाहिसँ बचल जा सकैत छल। गजलमे क्लासिकल भाषाक प्रयोग नहिए हेबाक चाही, अपितु आम प्रयोगक भाषाक प्रयोग गजलक लेल बेसी नीक होइत छै। शेरमे एहन शब्दक प्रयोग जे आम बेबहारमे नै छै, गजलकारक शब्द सामर्थ्यकेँ तँ जरूर देखाबैत छै, मुदा शेरकेँ आम जनसँ दूर सेहो करैत छै। तैं शेर कहबाक काल हमरा हिसाबेँ बेसी क्लिष्ट भाषाक प्रयोगसँ बचबाक चाही। अंतमे ई कहल जा सकैए जे "अहींक लेल" पोथीक गजल प्रभाग मैथिली गजलक विकसित होइत रूपकेँ अस्पष्टे रूपेँ, मुदा देखबैत जरूर अछि। ई पोथी गजलक व्याकरणक हिसाबेँ किछु गलतीकेँ छोडिकऽ नीक प्रयास अछि। ऐ संग्रहक कएकटा शेरमे अरबी बहरक पालनक प्रयास महत्वपूर्ण आ नोटिस करबाक जोग अछि। कएकठाँ क्लिष्ट आ संस्कृतनिष्ठ शब्दक प्रयोगकेँ जँ कात कए कऽ देखल जाइ तँ संवेदनात्मक स्तरपर सेहो ई संग्रह नीक अछि। मैथिली गजलक विकास यात्रामे ई पोथी गजलक भविष्यक लेल नीक डेग अछि। अमित मिश्र कतिआएल आखर

बात चारि बर्ष पहिलुक अछि हमरा संगे एकटा संगी हमरे रूम मे रहैत छल । पढ़ैमे कने कमजोर छलै मुदा कंपटीसनमे हमरासँ 2-3 घंटा बेसीए राति कऽ जागै छल आ एकर फलस्वरूप 10 टा मे 4 टा सबाल जरूर हल कऽ लै छलै ।ओना तऽ हमरासँ बेशी बात नै करैत छल मुदा भोर होइते बाँकी बचल सबालक लेल हमरा लऽग जरूर आबि जाइत छल आ एखन ओ मित्र बी .टेक कऽ रहल अछि ।इ घटना चारि सालक बाद मोन पड़ल मुन्ना जीक एकटा शेर पढ़िकऽ डाहसँ पहुँचब कोस-दू कोस आगू बढ़बा लेल तँ प्रेम चाही

पिछला डेढ़ महिनासँ मुन्नाजीक गजल संग्रह "माँझ आँगनमे कतिआएल छी " थोड़े-थोड़े पढ़ै छलौँह मुदा काल्हि भरि राति एकर गहन अध्ययन केलौँ ।कुल 50 टा गजल आ 10 टा रूबाइ के संग्रह अछि "माँझ आँगन मे कतिआएल छी" ।पोथीक नाम पढ़ि मोनमे किदन-कहाँदन बात सब उठऽ लागल ।कतिआएल उहो माँझ आँगनमे बिचित्र सन लागल मुदा पढ़लाक बाद हमरा लागैत अछि जे शाइर एहि समाजके आँगन आ एहि समाज रुपि आँगनक माँझ मे अपन बैसार बनेने छथि ।इ भऽ सकैए जे समाजक किछु भागसँ इ कतिआएल हेताह मुदा पूरा समाजसँ किन्नौह कतिआएल नै लागै छथि । हमर इ कथनक सत्यता एहि संग्रह के पढ़लाक बाद बुझा जाएत । इ तऽ प्रेमो केलनि तऽ समाजके ध्यान मे राकि तेँए तँ कहै छथि सब उमरि वर्ग के प्रेम चाही मरितो दम धरि कुशल छेम चाही आशा आ निराशाके फरिछाबैत कहलनि

निराशा संग आशापर टिकल छै दुनियाँ जँ देखलँहुँ भगजोगनी तँ दिबाली बुझू

बिहारक ताकत आ कमजोरी के समेटने इ शेर

बिहारक सिरखारी बदलि गेल सन लगैए आब श्रमिक घटलासँ कंपनी मालिक लगै बिहारी जकाँ एहन-एहन कतेको दमदार शेर सबसँ सजल इ गजल संग्रह अपना-आप मे अलग पहचान बनबैत अछि । पहिले गजल के देखलापर एकटा बात हमरा खटकल जे छल मात्र चारि टा शेर । गजलमे कमसँ-कम पाँच टा शेर रहबाक चाही मुदा एहि संग्रहक गजल संख्याँ 1,2,7,10,11,19,22,23,24,25,27,28,32,34,35,37,39,42,43,44,47,48 मे मात्र चारिए टा शेर अछि जे की गलत अछि ।ओना शाइर आमुखक अंतीममे इ गलती स्वीकार करै छथि आ एकर जिम्मेदार अपना के मानैत भविष्यमे एकर सुधारक वादा करैत छथि मुदा हुनक शब्दक पकड़ आ भावक अध्ययन केला के बाद हमरा लागैत अछि जे शाइरक लेल उपरोक्त गजलमे एक-एक टा शेर बढ़ेनाइ कोनो भारी बात नै छलै तेँए हम एकरा आलस मानै छी । आब चलु काफियापर । एहि संग्रहक किछु गजलमे एकै काफियाक प्रयोग भेल अछि जेना 26म गजल मे तीन ठाम काफिया "चाहैए" अछि ।29मे पाँच ठाम "एखनो" 31मे पाँच ठाम "उघारू" 46म मे पाँच ठाम"केकरो-केकरो" अछि ।किछु और गजलमे इ बात अछि ।ओना काफियाक दोहरेलासँ गजल गलत नै होइ छै । तेसर गजलमे मतला नै अछि किएक तँ इ गजलक पहिल शेर अछि फाटैत छल जतए मेघ आ जमीन पहुँचल पहिने ओतहि अभागल

बचल चारिटा शेरमे "अभागल" के काफिया मानि क्रमश: "राँगल ,भाँजल , माँजल आ साधल लिखल अछि ।4म गजलक मतलामे "करैए" आ राखैए" "ऐए" तुकान्त संग अछि मुदा पाँचम शेर मे काफिया "होइए" अछि । छठम गजलक अंतीम शेरमे"कहाइ" के बदला गलत काफिया "कहाइत" लिखा गेल । 32म गजलक मतला अछि हमरा तँ सुख भेटैए गजलक गाँतीमे ओहिना जेना जाड़ मे गर्मी भेटैए गाँतीमे

एहिठाम "गाँतीमे" रदीफ भेल आ काफियाक अता-पता- नै अछि ।ओना आन शेरमे काफिया "आतीमे" तुकान्त संग अछि । 41म गजलक मतलामे काफिया "झमका आ चमका " तुकान्त "मका" संग अछि मुदा दोसर शेरमे काफिया "उठा" अछि । 44म गजल मे काफियाक तुकान्त "एल" अछि मुदा दोसर शेरमे काफिया "रखैल" "ऐल" तुकान्त अछि । 17म गजलमे अंग्रेजी शब्दक काफिया "गेम" आ "ब्लेम" लिखल अछि । एहि संग्रहक सबटा गजल सरल वार्णिक बहरमे अछि ।ओना तँ इ बहर गजलक सबसँ हल्लुक बहर अछि मुदा शाइर इहो बहरमे बहुते बेर धोखा खाइत छथि । हमरा जानैत 26टा गजल गजलक कोनो शेरमे एक-दू टा वर्ण बढ़ा देलनि तँ कोनो मे घटा देलनि ।जेना दोसर गजलक अंतीम शेरमे 15 के बदले 16 वर्ण अछि ।7म गजलक तेसर शेरमे 18 के बदले 19 वर्ण अछि । 9म मे दोसर शेरमे 11 के बदले 10 वर्ण अछि । 11म गजलक अंतीम शेरक अंतीम पाँतिमे 18 के बदले 17 वर्ण अछि ।एहन गजती गजल संख्याँ 12,14,15,18,19,20,22,24,26,28,29,30,31,32,34,35,38,42,43,46,47आ 48 मे सोहो भेल अछि । ओना जँ भावक बात करी तँ एहि गजल संग्रहके ऊँचाइ पर पहुँचा देने अछि एकर भाव । सबटा गजल हृदय के छू लैत अछि आ सोचबाक लेल मजबूर करैत अछि तेँए इ आन संग्रह सबसँ बिल्कुल अलग अछि आ एकर आखर आन संग्रहक आखरसँ कतिआएल अछि । भावक कारणे इ संग्रहक "कतिआएल आखर" पढ़बाक योग्य अछि ।हमर सलाह अछि जे एकबेर एकरा अजमा कऽ जरूर देखू । बेस तँ अहूँ सब पढ़ू आ हम जाइ छी दोसर गजलक खोजमे . . .

गजल आ गीत मे अंतर की छै?

गजल आ गीत मे अंतर की छै? मात्र एक अक्षर के । गीत आ गजल दूनू गाओल जाइ छै । जँ ध्वनीक तुक {राइम्स } सभ पाँति मे मिलैत रहत त' गीत वा गजल दूनू सुनै मेँ बेशी नीक लागै छै । मुदा गीत मे राइम्स नहियो हेतै त' चलतै मुदा गजल मेँ प्राय: पाँति संख्याँ 1 ,2,आ तकरा वाद 4 ,6 , 8 , 10 . . . मे हेवाक चाही । गीत मे कतेको पाँति के बाद फेर सँ मुखरा दोहराओल जाइ छै मुदा गजल मे प्राय: तुकान्त वाला पाँति बाद कहल जाइ छै । गजल कम सँ कम 10 टा पाँतिक होइ छै जकरा 2-2 पाँति के रूप मे बाँटि क शेर कहल जाइ छै । । जहिना गीतक शास्त्र व्याकरण होइ छै{सा रे ग . . .} तहिना गजलक व्याकरण होइ छै । जहिना शास्त्रीय गायण मे राग होइ छै तहिना गजल मे बहर होइ छै । जहिना गीत कोनो ने कोनो ताल . राग . मे होइ छै तहिना गजल कोनो ने कोनो बहर मे होइ छै । । आब कहू गीत आ गजल मे अंतर की? नवका गायक त' गीतक टाँग -हाथ तोड़ि क' गाबै छथि । दू तीन टा शब्द के एकै साथ जोड़ि क' गाबैत छथि बूझू जे फेविकाँल सँ साटि देने होइ । जहिना गीत मे कोनो तरहक चिन्हक {कोमा ,फूल स्टाँप , आदि} के मोजरे नै दै छथि । ओहिना गजल मे कोना पाँति मे कोनो चिन्ह{. , ? आदि} नै देल जाइ छै ।मात्र अपन नामक आगू पिछू {" "} चिन्ह लगा सकै छी । आब एना किए कैएल जाइ छै से नै पूछू ? अपने सोचू ने गीते जकाँ गजलो के त' गाओल जाइ छै । आ आब कहू गीत आ गजल मे अंतर की? हमर एकटा मित्र गजलक बारेमे पुछलनि तँ कहलिअन्हि---- गजलक मे आबै वला किछु शब्द के देखू । 1} शेर- शेर दू पाँतिक होइत अछि आ अपना आप मे सदिखन पूर्ण भाव दै अछि आ आन पाँति सँ स्वतंत्र रहैत अछि । 2} गजल- कम सँ कम पाँच टा शेरके जँ किछु तुकान्तक सँग एक ठाम राखल जाए त' ओ गजल बनै छै । एकटा गजल मे एकै रंग तुकान्त हेवाक चाही । 3} रदीफ- गजल पहिल शेर के अंतीम सँ देखू जँ कोनो एहन शब्द जे शेरक दूनु पाँति मे काँमन होइ त' ओकरा गजलक रदीफ कहबै । आइ चलू संगे प्रेम गीत गेबै प्रिय एकटा प्रेमक महल बनेबै प्रिय एहि शेर मे "प्रिय "दुनू पाँति मे अछि तेँए एकर रदीफ भेल" प्रिय" । आब गजलक सब शेरक दोसर पाँति मे इ रदीफ रहबाक चाही इ अनिवार्य अछि । 4} काफिया - काफिया मने मोटा मोटी तुकान्त{राइम्स} बूझू । जँ बाजै मे एकै रंग ध्वनी बूझना जाइ यै त' ओ भेल काफिया । काफियाक तुक ओहि शब्दक अंतीम सँ पता लागै छै । जे तुकान्त गजलक पहिल पाँति मे अछि सेह आन सब पाँति मे हेवाक चाही । मतलब जे गजलक पहिल शेरक दुनू पाँति मे आ आन शेरक दोसर पाँति मे । काफिया- जेना - जेबै . खेबै . नहेबै { ऐ मे "एबै" तुकान्त भेल गमला . राधा . चेरा . केरा {एहि मे तुकान्त "आ" भेल} हेतै , खेबै . झेलै {ऐ मे तुकान्त"ऐ" भेल} रोटी , हाथी . रेती{ऐ मे "ई" भेल} झोरी . बोरी {ऐ मे"ओरी" भेल} एनाहिते और सब मे काफिया {तुकान्त }बनत । गजल पहिल शेर मे रदीफ आ काफिया क्रमश: पाँतिक अंतीम सँ अनिवार्य रूप सँ हेबाक चाही । आ आन शेरक दोस पाँति मे सेहो रदीफ आ काफिया क्रमश: अंतीम सँ हेएत । 5} मतला- गजल पहिल शेर जेकर दूनू पाँति मे रदीफ आ काफिया क्रमश: अंतीम सँ होइ एकरा मतला कहल जेतै । चाँद देखलौ त' सितारा की देखब अन्हारक रूप दोबारा की देखब

प्रेमक सागर मे बड नीक लागै डुब' चाहै छी त' किनारा की देखब

एहि मे पहिल शेरक दुनू पाँति मे काँमन "की देखब" अछि तेँए इ एहि गजलक रदीफ भेल आ रदीफक पहिले देखू , दूनू पाँति मे "सितारा "आ "दोबारा " छै एकर तुकान्त भेल "आरा" तेँए इ भेल काफिया । आब दोसर शेरक दोसर पाँति मे देखू । रदीफ "की देखब" आ तुकान्त "आरा " के संग शब्द "किनारा " अछि । । आब एहि गजलक सब शेरक दोसर पाँति मे अंत सँ रदीफ "की देखब " आ काफिया "आरा” तुकान्तक संग हेबाक चाही । तुकान्तक पाता शब्दक अंत सँ चलै छै । 6} मकता-- गजल अंतीम शेर जै मे शाइर अपन नामक प्रयोग करै छथि ओहि गजलक मकता कहल जाइ छै। मेघक डरे चान नै बहरायल नै औता "अमित" नजारा की देखब इ भेल मकता । शाइर अपन सब शेर मे अपन एकै टा नामक प्रयोग करैथ । जेना हम पहिल गजल सँ"अमित" लिखै छी त' आब कतौ "मिश्र " नै लिख सकै छी । वेश त' एते देखू आ लिखू । और कनेटा बात छुटल अछि जे अहाँ सब जानैत छी । वर्ण वला बात । त ' आब लिखू किछ नीक गजल किछु दिन पूर्व हमरे सन एकटा बिन पढ़ल लिखल गीतकार सँ भेट भेल ।हमरे जकाँ हुनको रचना लोकक माँथ पर द निकैल जाइ छलै । खैर ओ हमरा बतेलनि जे गीत लिखैत बेर जँ वर्ण गानि क लिखब त' गाबै मे सुविधा हेतै । आ ओ वर्ण गानब सिखेलनि । तै पर हम कहलयनि जे एना वर्ण गानि क' हम सब "गजल "लिखै छी आ तेकर नाम दै छी "सरल वार्णिक बहर" आ एकर वर्ण एना गानल जाइत अछि । हिन्दी वर्णमाला के जतेक वर्ण अछि{अ .आ सँ ल' क' य , र . . . धरि} के एकटा वर्ण मानै छी । जतेक हलन्त रहै अछि तकरा मोजर नै दै छी अर्थात शुन्य{0} मानै छी । संयुक्ताक्षरमे संयुक्त अक्षर के एक {1} मानै छी । जेना की " भक्त" एहि मे 2 टा वर्ण भेल । एकटा "भ"आ एकटा "क्त" । एकर बाद एकटा शेर कहलौँ ।

भाग्य मे जे लिखल अछि तेँ विरह मे मरै छी आशा केने छी कहियो त' मान नोरक धरबै

एहि शेरक दुनू पाँति मे 17 वर्ण अछि । एहि बहर मे जँ गजल लिखब त' सब पाँति मे पहिल पाँति एते वर्ण हेबाक चाही । ओ गीतकार कहलनि जे अहाँके वर्ण गान' आबै यै तेँए अहाँ नीक गीतकार बनब आ हमहूँ आब गजल लिखब । । गीत आ गजल मे एते समानता अछि त' आब कहू गीत आ गजल मे अंतर की ? चंदन कुमार झा बहुत किछु बुझबैए : कियो बूझि नहि सकल हमरा एकैसम शताब्दीक पहिल दशककेँ, मैथिली गजलक इतिहासमे, जँ नवजागरण काल कहल जाए तऽ कोनो अतिशयोक्ति नहि होयत । एहि दशकमे मैथिली गजल अपन नवस्वरूप ओ नवीन छटा'क संग साहित्य-प्रेमी लोकनिक सोझाँ उपस्थित भेल अछि । एहि समयावधिमे मैथिली गजलकेँ अपन फराक गजलशास्त्र भेटलैक जे खाली गजले नहि अपितु रुबाइ, कता, नात आदिक रचना हेतु सेहो व्याकरणिक पृष्ठभूमि तैयार केलक । ई गजलशास्त्र मैथिली गजलकेँ अरबी, फारसी ओ उर्दू गजलक समकक्ष पहुँचेबामे सहायक सिद्ध भऽ रहल अछि । मैथिली गजल-लोक'क परिधिकेँ विस्तृत ओ सुदृढ़ बना रहल अछि । एहिसँ गजल कहबाक (लिखबाक) व्याकरण सम्मत मानक तैयार भेल अछि जाहिसँ सचेष्ट लोक, गजल कहबाक शैली ओ शिल्पक ज्ञान सहजतापूर्वक अर्जित कऽ सकैत छथि। एहि सूचनाक्रांतिक युगमे “इंटरनेट” मैथिली गजल ओ गजलशास्त्रकेँ मैथिली-साहित्यप्रेमी धरि पहुँचेबामे महत्वपूर्ण माध्यम साबित भऽ रहल अछि । संगहि एकर  विभिन्न पक्षपर चर्चा-परिचर्चाक अत्यंत सुभितगर मंच उपलब्ध करा रहल अछि । "अनचिन्हार आखर" नाम्ना ब्लाग मैथिली गजलक विकास ओ विस्तारक हेतु पूर्णतः समर्पित अछि । नेपालमे सेहो मैथिली गजलक एहि नवस्वरूप केर विकासक हेतु किछु एहने सन प्रयास भऽ रहल अछि । कुल मिलाकऽ कही जे पछिला दसेक बरखसँ किछु सजग नवतुरिया मैथिल साहित्यकार लोकनि, गजल प्रेमी लोकनि , मैथिली गजल'क भाषायी ओ शिल्पगत विकासक मादेँ अभियान चलौने छथि । ई अभियान एकटा ऐतिहासिक प्रयास थिक। वर्तमान समयमे मैथिलीक नवतूरक साहित्यकार लोकनि मैथिली गजलक सर्वांगीण विकास हेतु प्रतिबद्ध छथि । एकदिस जतय ई सभ नव-नव गजलकार लोकनिकेँ प्रशिक्षित-प्रतिष्ठित करबामे लागल भेटैत छथि ततहि दोसर दिस पूर्ववर्ती गजलकार सभक रचना संसारक जोत-कोड़क तकतान सेहो हिनका सभकेँ रहैत छनि । पूर्वक एहि रचना सभसँ उपयोगी-अनुपयोगी तत्वकेँ बेरा रहल छथि । प्रतिफलस्वरूप मैथिली गजलक विभिन्न ऐतिहासिक पक्षसँ मैथिली साहित्यप्रेमी लोकनि अवगत भऽ रहल छथि आ नवतुरिया साहित्यकार वर्गकेँ एहिसँ भविष्यक दिशा-निर्देश सेहो भेटिए जाइत छनि । तखन एहि नवतुरिया अभियानी लोकनिकेँ अपन पूर्ववर्तीक कृतिक ( गजल / गजलेसन किछु ) समीक्षा करैत काल एतबा अवश्य ध्यान राखय पड़तनि जे हुनकर सभक व्यक्तित्वक मादेँ कोनो तरहक कठोर कि अपमानजनक शब्दावलीक प्रयोगसँ बाँचथि । कोनो तरहक पूर्वाग्रहसँ बाँचथि । संगहि हिनकर सभक रचनामे जे-जतबा सकारात्मक पक्ष अछि तकर बेसी चर्चा-परिचर्चा करथि । एहिसँ एकटा सकारात्मक वातावरण बनत । गजल आर लोकप्रिय होयत । गजलकार आर बेसी सम्मानित हेताह । गजलक परंपरा आर सुदृढ़ हेतैक । एतय एहि पूर्ववर्ती साहित्यकार वा एहि पिढ़ीक साहित्य प्रेमी लोकनिकेँ सेहो कनेक उदारता देखबय पड़तनि । कदाचित जँ कोनो कटुवचन ई नवतूर अपन पूर्ववर्ती'क प्रतिएँ कहैत अछि  तऽ तकर पाछाँ सेहो गजलक विकासक प्रति हिनकर सभक मोनक निष्ठेक प्रबलता रहैत अछि । अतः सकारात्मक वातावरणक निर्माण हेतु सभ पक्षकेँ संयमित हेबय पड़तनि । लक्ष्य साधब तखने संभव होयत। बीसम शताब्दीक प्रारंभहिमे पं.जीवन झा अपन “सुन्दर संयोग” (“रचना”मे छपल डॉ. रामदेवझा'क आलेख "मैथिलीमे गजल"क अनुसार १९०४ ई. मे) नाटकमे मैथिली गजल'क इतिहासक श्रीगणेश कएलनि । तदुत्तर मुंशी रघुनंदन दास,यदुनाथझा 'यदुवर', कविवर सीताराम झा, कविचूडामणि “मधुप” , आदि एहि परंपराकेँ आगाँ बढौलनि । एहि प्रारंभिक गजल सभमे जे सभसँ विशिष्ट तत्व अछि से थिक जे  प्रायः अधिकांश  आरंभिक गजल बहर, काफिया आ रदीफ संबंधी नियमक अनुपालनमे  अरबी बहर (छंद) –विधानक अत्यंत लगीच बुझना जाइत अछि । खासकऽ हिनकर सभक गजल केर प्रत्यके चरणमे (शेरमे) अनुप्रास-योजना (काफिया आ रदीफ) केर विलक्षण प्रयोग भेटैत अछि ।उदाहरणस्वरूप १९३२मे मैथिली साहित्य समिति, द्वारा काशीसँ प्रकाशित "मैथिली-संदेश"मे मधुप जीक गजल देखल जा सकैए :- मिथिलाक पूर्व गौरव नहि ध्यान टा धरै छी सुनि मैथिली सुभाषा बिनु आगियें जड़ै छी सूगो जहाँक दर्शन-सुनबैत छल तहीँ ठाँ हा आइ "आइ गो" टा पढ़ि उच्चता करै छी हम कालिदास विद्या-पति-नामछाड़ि मुँहमे बाड़ीक तीत पटुआ सभ बंकिमे धरै छी भाषा तथा विभूषा अछि ठीक अन्यदेशी देशीक गेल ठेसी की पाँकमे पड़ै छी? औ यत्र-तत्र देखू अछि पत्र सैकड़ो टा अछि पत्र मैथिलीमे एको न तैं डरै छी (2212-122-2212-122) कहबाक प्रयोजन नहि जे मैथिली गजल अपन बाल्यकालमे बेस सुरेबगर ओ आकर्षक छल । तकर एकटा इहो कारण भऽ सकैत अछि जे मैथिली गजलक जखन बाल्यावस्था छलैक तखन मिथिलामे फारसी एकटा महत्पूर्ण ओ रोजगारपरक भाषा छल आ संभवतः तकरे प्रभावसँ मैथिलीमे गजलक उत्पति भेल । फारसी कचहरीक दस्ताबेजक भाषा, हिसाब-किताबक भाषाक रूपमे प्रचलित छल । महाकवि लालदास आ उपन्यासकार जीवछ मिश्र फारसी'क शिक्षा ग्रहण कएने रहथि । एहिना मिथिलाक एकटा नमहर वर्ग फारसी पढ़ैत-लिखैत होयत ताहिमे कोनो दू-मत नहि हेबाक चाही । तखन पं. जीवन झा कि कविवर सीताराम झा वा मधुप जी आ'कि आन-आन विद्वान लोकनि जे गजल लिखबाक प्रयोग केलनि, फारसीसँ विधिवत शिक्षित छलाह वा नहि से नहि जानि मुदा, जँ नहियो शिक्षित हेताह तैयो विद्वानक बिच रहैत-रहैत एहि भाषा'क शिल्प ओ विधानसँ परिचित भेल हेताह, तकर प्रयोग अपन-अपन गजलमे कएने हेताह, तकरा अस्वभाविको नहि मानल जा सकैछ ।  एहि संबंधमे प्रायः जुन १९८४ ई.मे "रचना"मे छपल डॉ.रामदेवझा अपन आलेख "मैथिलीमे गजल"मे लिखैत छथि- " गजलक मार्मिकता ओ लयात्मकता कवि हृदयकेँ सहजे आकृष्ट करैत अछि । मैथिलीयो कवि लोकनि गजल दिश आकृष्ट भेलाह......अठारहम ओ उनैसम शताब्दीमे गजलक रचना ओ गानक केन्द्र लखनउ,बनारस, इलाहाबाद, दिल्ली, इत्यादि बनि गेल छल । उनैसम शताब्दीक उत्तरार्द्ध ओ बीसम शताब्दीक प्रारम्भिक चरणमे पारसी थियेटरक जे प्रवाह चलल, ओही संग गजल सेहो सामान्य लोककेँ श्रुतिगोचर भेल । एहन मैथिली कवि जे कोनहु रूपमे फारसी उर्दूसँ संपृक्त छलाह अथवा उपर्युक्त परिगणित केन्द्रमे प्रवासमे रहबाक अवसर प्राप्त एलनि, से सब मैथिलीमे गजल-रचनाक प्रयोग करबाक चेष्टा कयलनि ।" किंतु, मैथिली गजलक बाल्यकाल केर शब्द, शिल्प ओ स्वरूप'क मर्यादासँ बान्हल सुसंस्कारी स्वभाव एकर किशोरावस्था अबैत-अबैत जेना अल्हड़पनमे बदलि गेल । जतय एकर भाषायी ओ व्याकरणक स्वरुपक निर्धारण हेबाक चाही छलैक ततय घोषित भेल जे मैथिलीमे गजल कहब (लिखब) संभवे नहि । वैकल्पिक रूपेँ गीतल कहि एकटा नव काव्य संरचना प्रतिपादित कएल गेल । दुर्भाग्यवश एहि घोषणा'क समर्थनमे सेहो मैथिली साहित्यकार लोकनिक पाँत ठाढ़ भेल । तखन एहि मान्यताक विरुद्ध सेहो किछु प्रगतिशील साहित्यकार लोकनि ठाढ़ भेलाह । मुदा, इहो लोकनि अरबी बहर-विधान आ मैथिलीक पारंपरिक छंदशास्त्रक अनुशीलन कए एहि दुनूक मध्य कोनो तरहक सामंजस्य स्थापित नहि कए सकलाह । फलतः मैथिली गजल व्याकरणहीन रहल आ हिनकर सभक गजल काफिया मिलानी धरि सीमित भऽ गेल । एहि संबंधमे उक्त आलेखमे डॉ. रामदेव झाक उक्ति देखू- "हालक विगत किछु वर्षमे गजल-रचनाक प्रवृतिक पुनर्जन्म भेल अछि आ से एकटा प्रवाह अथवा फैसनक रूपमे परिवर्तित भऽ गेल अछि । एहि क्षेत्रमे किछु प्रौढ़ ओ विशेषतः युवा पीढ़ीक कवि गजल रचना करैत जा रहल छथि.........हिनका लोकनि गजलमेसँ किछुमे अवश्ये गजलत्व अछि । परन्तु अधिकांशकेँ गजल-शैलीमे रचित गीत-मात्र कहल जाय तँ अनुपयुक्त नहि होयत । " उत्तम भावाभिव्यक्तिक अछैतो ई गजल सभ वर्तमान गजलशास्त्रक आधारपर निंघेस साबित होइत अछि आ एहीठामसँ मैथिली गजलक दू पिढ़ी'क बीच वैमनस्यता सेहो उपजैत अछि । ओना एहिमे किछु गजलकार एहनो छथि जे स्वयं स्वीकार करैत छथि जे उचित छंदशास्त्रक अभावमे हुनकर सभक रचनामे एहन त्रुटि रहि गेल । मुदा, किछु एहनो व्यक्ति छथि जे एखनो जिद्द अरोपने छथि आ गजलक नव-विधानकेँ स्वीकार करबा लेल तैयार नहि छथि । एहिठाम एहि पिढ़ी'क गजलकार'क कृतित्वक आलोचनाक मादेँ नवतूरक समालोचककेँ इहो ध्यान रखबाक चाही जे एहि समयमे मैथिलीमे गजल संबंधित व्याकरण उपलब्ध नहि छल । संभव जे किछु साहित्यकार वर्ग जीवन झा, सीताराम झा आदिक गजलकेँ प्रेरक स्रोततऽ मानैत रहलाह मुदा, अरबी बहरक प्रयोगसँ मात्र एहि हेतु परहेज कएने रहलाह जे ओ सिद्धांत आन भाषासँ आयातित होयत । कारण जे कोनो होउ मुदा परिणाम एतबे अछि जे उत्कृष्ट विषय-वस्तुक अछैतो मैथिली गजल विश्वक आन-आन भाषा'क गजलक समकक्षी नहि बनि सकल । एक सय बरखक इतिहासक अछैतो मैथिली'क अंगनामे अपरिचिते जकाँ जिबैत रहल । तखन एहि पूर्ववर्ती (गजलक पक्षधर) सभक एतबा योगदान त' नहि नकारल जा सकैत अछि जे ई सभ मैथिली-गजलकेँ जियौने रहलाह । मैथिलीमे गजलक संभावना बचल रहल । एक सय बरखक इतिहासक बलपर मैथिलीमे गजल कहबाक इएह बाँचल संभावना आ "अनचिन्हार युग"क अभियानी प्रयासक एकटा सुंदर प्रतिफल थिक ओमप्रकाश जीक पहिल गजल-संग्रह-"कियो बूझि नहि सकल हमरा" । एहि शताब्दी'क आरंभहिसँ गजलक विकासक मादेँ जे विरार लगाओल गेल, ई पोथी तकरे उपजा थिक । नेनपनहिसँ साहित्यक प्रति रूचि रखनिहार गजलकार ओमप्रकाशजी एहि पोथीक भूमिकामे स्वयं गछैत छथि जे मैथिली गजल'क विकासे हिनक साहित्य-कर्मक प्राथमिकता छनि । हिनक साहित्य-साधनाक मूल साध्य गजले थिकनि । गजलक प्रति हिनकर इएह लगावक परिणाम थिक जे ई अपन एहि संग्रहक माध्यमे मैथिली गजलकेँ उच्चतर स्थानधरि पहुँचेबाक हेतु प्रयासरत बुझना जाइत छथि । हिनकर एहि संग्रहमे एक्कहि संग अनेक विषय-वस्तु यथा-सिनेह,संवेदना,श्रृंगार-सौंदर्य,सामाजिक सरोकार, चिंतन, संघर्षक स्वर, आदि समेटल गेल  अछि । देश, काल ओ परिवेशजन्य स्थिती-परिस्थितिक सहज अटावेश एहि संग्रहक हरेक मिसरा (पाँति ), हरेक शेर (चरण) मे भेटैत अछि । परिवर्तन सांसारिक नियम थिक । समयक परिवर्तनशील स्वभावकेँ जे नहि पकड़ि पबैत अछि सएह समयक संग नहि चलि पबैत अछि । पछड़ि जाइत अछि । आम जनमानस भलेँ समय एहि गतिकेँ नहि पढ़ि पबैत हो मुदा एकटा संवेदनशील हृदय,  एकटा सूक्ष्मदृष्टि, एकटा साकांक्ष मानव, एकटा मसिजीवीसँ ई परिवर्तन-धर्मिता छपित नहि रहि सकैत अछि । एकटा साहित्यकारक सोझाँ ओकर असली रूप देखार भइए जाइत छैक । ओमप्रकाश जीक कलम समयक चरित्रकेँ उघार करबामे सक्षम छनि । वर्तमान समयक चालिकेँ अकानति ओ कहैत छथि जे ई युग मात्र संघर्षक युग नहि थिक बल्कि ई युग संघर्षक बलपर अधिकार प्राप्तिक युग थिक । हुनकर मानब छनि जे आब लोक-चेतना बढ़ि रहल अछि तेँ व्यवस्थाकेँ सेहो सचेत रहय पड़तैक । ई युग जनता'क थिक । आब जनते जनार्दन अछि । लोककेँ आब खैरात नहि चाही । ओकरा अपन कर्मक प्रतिफल चाही । प्रतिफलो एहन जाहिमे ओकर स्वाभिमान, ओकर सम्मान नुकाएल होइ । ओकरा बोनिमे आत्मीयतासँ भरल उपहार चाही । ओमप्रकाश जी एही युगीन जनभावनाकेँ स्वर दैत कहैत छथि- भीख नहि हमरा अपन अधिकार चाही हमर कर्मसँ जे बनै उपहार चाही कान खोलिकऽ राखने रहऽ पड़त हरदम सुनि सकै जे सभक से सरकार चाही व्यवस्था लग बल होइत छैक । मुदा ओकरा ई बल जनते-जनार्दनसँ भेटैत छैक । व्यवस्था कतबो बलगर होउ मुदा जनबलसँ बलिष्ठ नहि भऽ सकैत अछि । कोनो सरकारी मिसाइलमे एतबा ताकति नहि होइत छैक जे भूखक ज्वालाक सामना कऽ सकत तेँ शाइर ओमप्रकाश एहि बदलल युगमे व्यवस्थाकेँ चेतबैत छथि - धरले रहत सभ हथियार शस्त्रागार बनलै मिसाइल भूखे झमारल लोक लोकतंत्रमे लोकेक बलक प्रताप थिक जे कियो राजभवन पहुँचि जाइत अछि तऽ कियो सड़कपर बौआइत रहैत अछि । सत्ता-परिवर्तन एही "लोक"क हाथमे रहैत छैक । व्यवस्था परिवर्तन एहि "लोक"क हथियार थिक । तेँ अबोध लोककेँ भने किछु काल राजभवन'क परिधिसँ बाहर राखल जा सकैत अछि मुदा, जखन इएह लोक जागि जाइत अछि तखन स्थिती बदलि जाइत छैक । लोकक तागतिकेँ बिसरबाक नहि थिक । ओमप्रकाश एहिमादेँ राजभवनमे बैसल अकर्मण्य सभकेँ स्मरण करबैत छथि- लोकक बलेँ राजभवन इ गेलौ बिसरि खाली करू आबैए खिहारल लोक व्यवस्थाक अकर्मण्यताक चलतेँ सगरो अराजकता व्याप्त अछि । भौतिकताक आगाँ नैतिकता नतमस्तक भेल अछि । भ्रष्टाचार, महगी, बेरोजगारीक समस्यासँ बेहाल जनताक लेल मृत्यु सभसँ सुलभ उपाय बनि गेल अछि आ जीवन कठिन । विपन्नताक मारल, हकन्न कनैत, श्रमजीवी'क पसेनाक मोल आब दालि-रोटीक दामसँ कमि गेलैए । आम जन-जीवनक एहि मनोभावकेँ अपन दू गोट मिसरामे स्वर दैत छथि ओमप्रकाश जी- जीनाइ भेलै महँग एतय मरब सस्त छै महँगीक चाँगुर गड़ल जेबी सभक पस्त छै महगीक मारिसँ पाबनि-तिहारक, उत्सव-उल्लासक, हँसी-हहारो, निपत्ता भऽ गेल अछि । कोनो सामाजिक, आर्थिक कि राजनीतिक समस्यासँ किछु खास जाति-वर्गेक लोक प्रभावित नहि होइत अछि बल्कि एकर मारि समाजक, सभ वर्गक लोकपर परैत छैक । एहनामे जाति-पाति, गोत्र-मूल, अगड़ा-पिछड़ाक जोर-घटाओ, पंचग्रासक ओरियान केर गणितसँ गतानल मनुक्ख लेल कोन काजक, कोन महत्वक ? ओकर त’ कोनो धर्मगुरू कि महाज्ञानी लोकनिक ज्ञानसँ सेहो पेट नहिए भरतैक  । तेँ ओमप्रकाश जी कहैत छथि- भूखल पेटक गणितमे ओझरायल लेल ज्ञान की गरीबक सभदिन एक्के मोहर्रम की रमजान की गरीबी'क बात करयबला, अपनाकेँ गरीब-गुरबाक शुभचिंतक कहयबला जखन सत्ता-सिंहासन धरि पहुँचि जाइत छथि तऽ हुनकर अभिष्ट गरीबी उन्मूलन कि गरीबक कल्याण नहि रहि जाइत छनि । जनताकेँ जनार्दन कहि सत्ताधरि पहुँचिते स्वयं जनार्दन बनि जाइत छथि आ जनकल्याण माने अपन आ सर-कुटुम्बक कल्याण बूझैत छथि । जनताक कोष लुटबामे लागि जाइत छथि । व्यवस्थाक गत्र-गत्रमे भ्रष्टाचारी घून पैसल भेटैए । भ्रष्टाचारक नित नव-नव रेकार्ड बनैए आ जनता बाध्य भऽ कहैए- कर जोड़ै छी सरकार आब रहऽ दिऔ कते करब भ्रष्टाचार आब रहऽ दिऔ भूखक ज्वाला, अभावक तापक प्रताप थिक जे शोषित समाज अभिजात्यक मोकाबिला ठाढ़ भऽ जाइत अछि । कहबीयो छैक-मरता, क्या नहि करता ? समाजक दू वर्गक मध्य जे दूरी बनि गेल छैक तकरे परिणाम थिक वर्ग-संघर्ष । भूख आ अर्थाभाव जनित एहि समस्या दिस इशारा करैत अछि ओमप्रकाश जीक ई दू टा मिसरा- मिझबै लेल पेटक आगि देखू पजरि रहल छै आदमी जीबाक आस धेने सदिखन कोना मरि रहल छै आदमी जाहि भूमिपर सिया सन धिया भेलीह आइ ताहि भूमिपर दहेज रूपी दानव "मैथिली"क प्राण हरण कए रहल अछि । मैथिली मूकदर्शक बनल छथि । जनक कानि रहल छथि । हुनका चिंता पैसल छनि जे हुनकर बेटीक विवाह कोना हेतनि- बिना दाम नै वर केर बाप हिलैत अछि धरमे गरीबक सदिखन अतिचार रहैत छैक मात्र भूख, बेरोजगारी, महगी कि भ्रष्टाचारे जीवनक बाटपर समस्या नहि अछि बल्कि एकरा अलावे कतेको कूरीति सेहो अछि जे लोककेँ विकास-पथपर बढ़बामे बाधक बनल अछि । हम सभ जाहि भू-भागक छी ताहि मिथिलाक गौरवशाली अतीत रहल अछि । एहि धरतीपर सामाजिक सद्भाव आ नारीक सम्मानकेँ सभदिन प्राथमिकता देल गेल । मुदा,वर्तमान समयमे हम सभ जाति-पातिमे अपनाकेँ बँटने खण्ड-खण्ड भेल छी । आपसी प्रतिस्पर्धामे अपने समांगसँ ईर्ष्या होइत अछि । अपनहि भाइ-बन्धुक अनिष्ट सोचयमे श्रम-संसाधन उत्सर्ग करय लगैत छी आ परिणाम भेल अछि जे हम सभ असक्त भेल दहो-दिस छिछिया रहल छी । जनक नगरीक बाग उजरि गेल अछि । ओमप्रकाशजीकेँ सेहो ई बात अज्ञात नहि छनि तेँ ओ कहैत छथि- हक बढ़ै केर छै सबहक इ नै छीनू बढ़त सभ गाछ तखने बाग निखरै छै लोक अपन-आनक द्वंदमे फँसल अछि । ओ आधुनिकताक नामपर पसरल भौतिकताक चकचौन्हमे लोक तेनाने आन्हर भऽ गेल अछि जे आब मोनक मर्मकेँ बूझबाक सामर्थ्य ओकर दृष्टिमे नहि बाँचल छैक । ओकरा मात्र बाहरी रंग-रोगन धरि सूझैत छथि । मानवीय मूल्यक ह्रास ओ संबंधक जड़ताक टीस गजलकार ओमप्रकाश जीक करेजासँ सेहो बहराइए जाइत छनि - कहू की कियो बूझि नै सकल हमरा हँसी सभक लागल बहुत ठरल हमरा मुदा, एतेक दुख-दरिद्रा, संकट, समस्या आ संघर्षक अछैतो ओमप्रकाश जी जिनगीक डेन नहि छोड़ैत छथि । बल्कि निरंतर लक्ष्य दिस बढ़ैत रहबाक, सकारात्मक सोच रखबाक आह्वान करैत छथि- जिनगीक गीत अहाँ सदिखन गाबैत रहू एहिना ई राग अहाँ अपन सुनाबैत रहू जीवनमे जिवंतता आ मानवताक डेन धऽ चलैत काल गजलकार गजलक शास्वत मर्म माने प्रेमक तन्नुक तागकेँ सेहो पकड़ने छथि । करेजक इएह प्रेमक भावसँ श्रृंगार छिटकैत अछि जे हिनकर एकटा सूच्चा गजलकार हेबाक परिचिति गढ़ैत अछि - चमकल मुँह अहाँक इजोर भऽ गेलै अधरतिएमे लागल जेना भोर भऽ गेलै ओमप्रकाश जी एहि पोथीक भूमिकामे लिखने छथि जे हिनकर पिता समाजवादी विचारधाराक समर्थक छलखिन तऽ माता उदारवादी सोच रखनिहारि । हिनकर एहि संग्रहक रचना सभमे एहि दुनू विचारधाराक सम्मिश्रण भेटैत अछि जे स्वाभाविके अछि । संगहि सामाजिक सरोकारसँ संबंधित हिनकर अपन चिंता-चिंतन सेहो भेटैत अछि । गजलकार ठिक्के कहैत छथि जे संवेदनहीन हृदयसँ गजल नहि बहरा सकैत अछि । हमतऽ कनि बढ़िकऽ कहब जे संवेदनहीन हृदयसँ साहित्ये नहि बहरा सकैत अछि । संवेदनहीन हृदयकेँ साहित्य बुझबाक क्षमतो नहि रहैत छैक तेँ ओ गजल सेहो नहि बुझि सकैत अछि । प्रायः एहने सन किछु भाव गजलकारक मोनमे सेहो रहल हेतनि आ तेँ ई अपन एहि पोथीकेँ नाओं देलनि-“कियो बूझि नहि सकल हमरा " । मुदा, एकटा संवेदनशील करेजा राखयबलाक हेतु एहि पोथीमे बुझबाक हेतु बहुत रास सामग्री अछि । गजलक विशेषताक मादेँ ओमप्रकाश जीक इहो कहब उचिते छनि जे -व्याकरण ओ मानवीय संवेदना दुनू एकर दू गोट पहिया थिक । तेँ गजलक रचना काल नहि एकर व्याकरण पक्षकेँ नकारल जा सकैत अछि आ नहिए एकर भाव पक्षकेँ । गजलक परिप्रेक्ष्यमे व्याकरणक जे महत्ता ओमप्रकाश जी बुझैत छथि तकर छाप हिनक एहि संग्रहमे सेहो भेटैत अछि । एहि संग्रहमे संकलित कुल सतासी गोट गजलमे चौबीस टा गजल अरबी बहर आधारित अछि एवं शेष तिरसठि टा गजल सरल वार्णिक बहरक अनुसार लिखल गेल अछि । एकर अलावे आठ टा रूबाइ आ दू टा कता संग्रहित अछि । हरेक गजलक निच्चामे तकर बहरक विवरण सेहो देल गेल अछि जाहिसँ पाठककेँ बहरक संरचनाक भाँज सहजहिँ लागि जेतनि । परोक्ष रूपेँ बहरक ई नामोल्लेख ओहि गजलकार सभकेँ एना देखा रहल अछि जिनकर सभक मान्यता छलनि जे मैथिलीमे गजल भइए नहि सकैत अछि, संगहि एहि बातकेँ स्थापित कए रहल अछि जे मैथिलीमे गजल आ सेहो अरबी बहर-विधान आधारित गजल बड़े शानसँ कहल जा सकैत अछि । एहिठाम डॉ. रामदेवझा'क पूर्वोल्लेखित आलेख'क अंतिम अंश जाहिमे ओ कहैत छथि- " जहिना समदाउनिक रचना हिन्दी-उर्दूमे असाध्य वा कष्ट साध्य अछि तहिना मैथिलीयोमे गजल-रचनाक स्थिती मानल जा सकैछ । मुदा एकरा 'इत्यलम्' नहि मानल जा सकैछ । कोनो प्रतिभाशाली कवि मैथिलीमे उपर्युक्त मान्यताकेँ अन्यथा सिद्ध कए सकैत अछि ।" केँ ओमप्रकाश जी शत-प्रतिशत प्रमाणित करैत छथि आ अपन प्रतिभासँ सिद्ध कएलनि अछि जे मैथिलीयोमे उर्दू-फारसीए जकाँ गजल कहल (लिखल) जा सकैत अछि । चूँकि एहि पोथीक सदेह रूप एखनो उपलब्ध नहि भऽ सकल अछि तेँ एकर व्याकरण पक्षक गहन अध्ययन नहि कए सकलहुँ । तखन अपेक्षा करैत छी जे कियो ने कियो गोटे, गजलक व्याकरण गूढ़ जानकार लोकनि, एकर व्याकरण पक्षपर सेहो विस्तृत चर्चा करबे करताह । ओना ओमप्रकाश जीक गजल ओ गलक व्याकरणक अनुसरण करबाक जे अनुराग छनि ताहिसँ जँ कदाचित एहिमे कोनो त्रुटि हेबो करत तऽ से नगण्यप्राये, तेहन विसबास अछि । अपन सिमित ज्ञानक आधारपर एहि पोथीक व्याकरणक पक्षपर जे विहंगम दृष्टिपात कए सकलहुँ ताहि आधारपर हमरा कोनो त्रुटि नहि देखायल अछि । तखन कतहु-कतहु बहरक आखर कि मात्रा पुरेबाक दृष्टिकोणसँ मिसरा सभमे जे वर्ण कि मात्राक जोड़-तोड़ कएल गेल अछि ताहिसँ भावक प्रवाह खण्डित होइत बुझना गेल । संगहि कतेको ठाम वर्तनीक अशुद्धता सेहो एहि पोथीमे एखन देखल जा सकैत अछि । मुदा, इहो संभव जे जखन एकर सदेह रूप हमरा सभक हाथमे आओत तखन एहन बहुत रासेक त्रुटि नहि रहत । पोथीक स्वरूप आ दामक संबंधमे एखन उचित-अनुचित किछुओ नहि कहल जा सकैत अछि मुदा, एतबा तऽ अबश्य लगैत अछि जे एहि पोथीकेँ पाठकक सिनेह भेटतैक । संगहि निकट भविष्यमे ओमप्रकाश जीक गजल मैथिली साहित्यकेँ नव दिशा ओ दृष्टि देत । पद्य खण्ड जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ गजल युद्ध करू जुनि शोक करू हे अर्जुन जुनि सोच करू । धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्रमे  छी पापक अहां विरोध  करू । जीतू भोगू धरती के सुख अथवा स्वर्गक भोग करू । अहां आतमा अविनाशी छी तन-मनके संयोग करू । मित्र शत्रुमे, शत्रु मित्रमे देखियौ आ उपयोग करू । सत्य और शान्तिक जय हो नूतन नित्य प्रयोग करू । ऐठां निर्भय हो मानवता चलू आइ उदघोष करू । ;सरल वार्णिक बहर, वर्ण-10 गजल अहां जं हंसबै, हंसतै दुनिया अहां जं कनबै, कनतै दुनिया । अपनहि कर्मक फल भोगै छी अहां जं बुझबै, बुझतै दुनिया । आलसमे सभतरि इ आतमा अहां जं जगबै, जगतै दुनिया । अर्थ मोक्षके मोहक क्षय थिक अहां जं गुनबै, गुनतै दुनिया । यात्रा पर अछि सभक आतमा अहां  जं सुनबै, सुनतै दुनिया । धन छी साधन, साघ्य शान्ति अछि अहां जं कहबै, कहतै दुनिया । शान्त आओर आनन्दित रहियौ अहां जं करबै, करतै दुनिया । ;सरल वार्णिक बहर, वर्ण-12 गजल हम कनै छी, हंसैए लोक पता ने की की बजैए लोक । कन्यादान अहांक घ’रमे लेकिन बर्ख गनैए लोक । पोने प’र बजाबी तबला खूब अहूंकें चिन्हैए लोक । सयमे नब्बे फूसि बजैए हरिश्चन्द्र कहबैए  लोक । व’र एकटा सै वरियाती भांग पीबि क’ नचैए लोक । गुम्मे ह’म देखि रहल छी जिबिते कोना मरैए लोक । ;सरल वार्णिक बहर, वर्ण-10 गजल कविता गीत गजल राखू मनमे नैतिक बल   राखू । अहां स्वयं सामर्थ्यवान  छी बस विश्वास अटल राखू । मा कैकेइ भ’ सकैत छथि अहां भरत निश्छल राखू । चारूधाम  रहत ल’गेमे नयनमे गंगाजल राखू । शान्तिक सागर हो भीतर बाहर जे हलचल राखू । संतोषक  संपत्ति अचल आओर  सभटा चल राखू । स’भ तमाशा आंखि कानके दुनू अंग सकुशल राखू । सरल वार्णिक बहर, वर्ण-10 गजल एते बाझल किए रहै छी अपनामे अहां अबै छी बडी-बडी राति क’सपनामे अहां ।

चलि जाउ दिल्लीए कि मुंबई कि बंगलोर रहब एसगर कोना क’ पटनामे अहां ।

होइए साल भरि पर भेंट दूनू गोटेकें जखन कटनीमे छी हम, सतनामे अहां ।

भेट जेता शकुनी, दुर्योधन आ धृतराष्ट्र मिला क’देखबै आब कोनो घटनामे अहां ।

ओकरा किए मारै छिऐ मुक्कासं अहां भाइ जेहने छी तेहने देखब अयनामे अहां ।

गरमीमे जल तं भइए जाइए अमृत चाहे लोटामे राखि पीबू कि बधनामे अहां ।

विवाहकें विवाहक गरिमा करू प्रदान किए फंसल छी कपडा आ गहनामे अहां ।

सरल वार्णिक बहर, वर्ण-16 गजल जंगल आओर पहाड देखलौं जीवनमे गुजगुज राति अन्हार देखलौं जीवनमे ।

मोनक नीलगगनमे छिटकै बिजलोका ममता आ स्नेह- दुलार देखलौं जीवनमे ।

मन आंगनमे चारूधामक दर्शन भेल मूल्यक हाट आ बजार देखलौं जीवनमे ।

नृत्य, गीत,संगीत,चौल और हंसी-ठहक्का नोरक कतेक टघार देखलौं जीवनमे ।

मारि-पीट,दंगा आ फसाद, छीना आ झपटी आदर आओर सत्कार देखलौं जीवनमे ।

देखलौं गंगा बहै छली अपने अन्तरमे पोखरि आ धार- इनार देखलौं जीवनमे ।

सरल वार्णिक बहर, वर्ण-16 गजल अपन कहैए, सुनैए हमरा किछुए लोक चिन्हैए हमरा ।

सूप जं हम त चालनि अछि ओ तैयो मूंह दुसैए हमरा ।

जकरे खातिर चोरि केलौं सेहो चोर कहैए हमरा ।

एसगरमे तं पएर छुबैए लेाक ल’ग गरियबैए हमरा । कांट छीटि क’ गेल बाट पर आब हाल पूछैए हमरा ।

चोर चिकडि क’ बाजय जखने तामस तखन उठैए हमरा ।

हम मूससं बाघ बनेलियै उनटो करब अबैए हमरा । मात्रा-15 प्रत्येक पांतीमे

गजल थिक युद्धक मैदान ई जीवन,कोना बढू हम अपने मित्रक मृत्युक कारण, कोना बनू हम

सोझांमे तं छथि दादा-दादी,कक्का-काकी,भैया-भैाजी सभसं खेत-पथारक खातिर कोना लडू हम

राज-पाट की करब जखन लोके नहि रहतै भीषण नर-संहारक पर्वत कोना चढू हम । भीख मांगि बरू खाएब,लडब नहि भैयारीमे हे मधुसूदन गाण्डीव हाथमे कोना धरू हम

हे केशव, कृपया हमरा दुविधासं मुक्त करू हमर बुद्धि नै काज करय, की कोना करू हम

सरल वार्णिक बहर, वर्ण-18 मुन्नी कामत जट-जटिन जटिन- छोड़ि‍ मिथिला नगरिया बांधि‍ अपन ई पोटरिया तूँ कतए जाइ छँह रे..........! जटबा कतए जाइ छँह रे...........! छोड़ि‍ अपन सजनियाँ ति‍याग कऽ सभ खुशियाँ तूँ कतए जाइ छँह रे जटबा कतए जाइ छँह रे...........! जट-  जाइ छि‍यौ गे जटिन देश-गे-विदेश जटिन देश-गे-विदेश भऽ गेलैए गैर आब अपन प्रदेश! साड़ी अनबौ गे जटिन गहना अनबौ गे.................. साड़ी अनबौ गे जटिन गहना अनबौ गे बौआ-बुच्ची ले सेहो नव अंगा अनबौ गे! जटिन- नै लेबो रे जटबा विदेशक सनेस नै लेबो रे जटबा विदेशक सनेस हमरा तँ चाही जटबा तोेहर संग आ सि‍नेह! जाट-   नै रोक गे जटिन हमर तँू डेग कमेबै नै तँ केना भरब सबहक पेट! बौआ कनतौ गे जटिन बुच्ची ललेतौ गे बौआ कनतौ गे जटिन बुच्‍च्‍ी ललेतौ गे जरतौ जे पेट जटिन कोइ नै सोहेतौ गे। जटिन- घुर-घुर रे जटा सुन-सुन रे जटा जिद्य छोड़ रे जटा कोइ नै ललेतौ रे जटा हरे जटबाऽऽऽऽऽऽऽ रे मेहनति‍ करि‍ नुन रोटी खेबै मुदा संगे मिथि‍लेमे रहबै रे जटा..............! चल-चल रे जटा अपन देश रे जटा अपन खेत रे जटा मरूआ रोटी रे जटा नुन रोटी रे जटा हे रे जटबाऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ तूँ धान रोपीहेँ हम जलखै लऽ कऽ एबौ रे जटा.................! जटा-   सुन-सुन गे जटिन हमर सजनी तूँ जटिन घरक लक्ष्मी तूँ जटिन हमर जि‍नगीक गाड़ी तूँ जटिन हमर ज्ञानक खान तूँ जटिन हे गे जटनी ई ई ई...। तूँ जीतलँह हम हारलौं गे जटिन छोड़ि‍ अपन देश नै केतौ जाएब गे  जटिन रहतै मिथि‍लेमे सदैव अपन बास गे जटि‍न हे गे जटनी ई ई ई...। गै दुनू गोरा मिलि‍ मेहनति‍ करबै तँ जि‍नगी स्वर्ग हेतैय गे जटिन। जटिन-  हमर साजन तूँ जटा तोहर सजनी हम जटा हे रे जटबाऽऽऽ...। दुनू गोरा हँसैत अहिना जि‍नगी काटब रे जटा....................। दर्दक टिस पहाड़ जकाँ दु:ख देलक पहाड़ एहेन एबकी आएल अखाड़ सगरे मचल हाहाकार। केतए गेल सभ देव केतए नुकाएल दुःख हरता कुहरा कऽ जन-जनक धि‍यान मग्न भेल दाता महादेव। माएक सुन भेल आंचर केतौं हराएल नुनुक बोल असगर छोड़ि‍ बूढ़ बापकेँ बिछुरि गेल बेटा अनमोल। बाबा-बाबा करैत गेल कतेक प्राण किअए ने बचेलौं हे बाबा अपन भक्तक अहाँ जान। रोकू कोय ऐ सैलाबकेँ और केतेक जानक बलि‍ देबै यो इनसान, किया बनैले चाहै छी भगवान देखियो अहींक करनीसँ समसान बनल उत्तराखण्ड प्रान्त। पहाड़क छाती चिर कऽ ओकरा घाइल अहीं केलि‍ऐ नदीकँ हाथ-पएर काटि‍ कऽ ओकरा अपाहिज सेहो बनेलीऐ गाछ-बि‍रि‍छ काटि‍ कऽ छत हिन माए धरतीकेँ केलिऐ शुरू केलिऐ अहाँ विनासक लिला सभ ताण्डव ठाढ़ अहीं केलिऐ। आब प्रकृतिसँ खेलवारि‍ करैक सजा देखियो नदीक हुहंकार सुनियो बून्न-बून्न लऽ केतौ तरसैत धरती तँ केतौ वएह बून्नमे डुमैत जान देखियो। ऐ असंतुलिताक कारण अहाँ छी किअए अहाँ बनैले चाहैए महान छी आबो खोलू अपन कपाट कहि पुरा दुनियाँ ने बनि‍ जाए श्‍मशान-घाट। शान्तिलक्ष्मी चौधरी लेस्बियन कॉन्टिन्युअम

...

ओही दुनू ’सिस्टर’केँ देखलहु लट फलकेनै

उत्फुल्ल मुँह विहुँसेनै

मटकल चलि आवैत

देहमे उपजल एकटा अजबे तरहक आवेश

मोनकेँ नहि देखने छलहु एना कहियो खिसियावैत

किछु कहबा हेतु जहिना मुँह चुनियेलीह

मुसकेलीह

तामससँ हमर भृकुटि तन्तु गेल तरारि

ओकरा देखलहु नखशिख आँखिगुड़ारि

कहलियन्हि अहाँलोकनि बुझाय तँ छी अभिजाति

मुदा ऐँये, संस्कार कियै भ’ गेल अपचालि

इहो छियैक एकतरहक व्यभिचार

अहाँलोकनि समाजकेँ जुनि करू एना खराप

कहु महिलाकेँ महिला संग सहवास

सिनेहक ई कोनरूप केलकै नवविकास?

...

पहिनेतँ ओ सकपकेलीह

हठदै लाजे कठुऐलीह

तखन मोन जँ भेलन्हि कनी स्थिर

हमरा बुझेलीह

अहाँ सुनने छियैक एंड्रीन रिचक विचार?

हुनक कहल "लेस्बियन कॉन्टिन्युअम" शब्दक सार?

जकर अर्थ भेलय- ’सखि-बहिनपा भावक परिविस्तार’

एहिमे बुझाओल गेल अछि दैहिक-संसर्गसँ बेशी आत्माक तालबंध

दूई आत्माक तादात्मीय मिलन संबंध

दूई देह जखन सुनैत छै परस्पर अंरतात्माक दु:ख-सुख

तखने होइत छै कोमल आत्मीयस्पर्श, स्पंदन, आत्मशांति

तत्पश्चात देहोजँ भ’ जाइत छै एक दोसरकेँ अर्पित

ओही संसर्गसँ भेटैत छै मोनक तृप्ति

एक देह तहन नै बुझैत छै दोसर देहक लिंगभेदी रूप

खाहे एकरा अपन मापदण्डमे प्रेम बुझियोक वा प्रेमक विरूप

एंड्रीन रिचक "लेस्बियन कॉन्टिन्युअम"क इयह बीजभाव

स्त्रीमोनमे देखल गेल अस्सल स्वभाव

...

दुनियाँक सभ नारी नहि अछि भागक बली

जकरा अपन नर संग मिलैत होइक अंतरमोनक नली

बेसी पुरूख बुझै छथि स्त्रीकेँ केलीक्रियाक निष्क्रिय-साझीदार

कोखि बढ़ावैक धारियित्री, गर्भ धारणक सुगढ़ औजार

बेसी पुरूख रहैत छथि हरदम उग्रसंसर्गक अगुतायल

नहि देखैत अछि ओकर दैहिकमित्र सहमति छथि वा डेरायल

स्त्रीगणक केलितंत्रिकाक ओ मानिते नै छथि स्वतंत्र अस्तित्व

कोनो नै प्रयास बुझैक जे की छी वस्तुतः स्त्रीत्व

जानैत छियै वा नहि हुअय एहि अनुभुतिसँ अहाँक संबंध

स्त्रीदेहक संगीत होइत छै शास्त्रीय रचनाबंध

पहिने ध्रुपद धमार आ आलाप तखन खयाल आओर तान तराना

मुदा जँ अहाँ छी पॉप संगीतक ररधुस धुम-धड़ाकक दिवाना

तँ एकर विद्रुपताकेँ देल जेतय सहजहि हरैरि

तोड़िमरोरि

ओही सँ कहियो नै उठतै तखन कोनो राग

भ’ जेतैक घोर विराग

मनक एकात्मकता साधने बिना देह पर भ’ जायब हावी

कहु एहि बातकेँ कोना बुझाबी

सत कही तँ ई छियैक एकटा भियावह अपराध

बलत्कारेक सदियह दायभाग

परस्पर सुक्ष्मतम दुःख-सुखसँ एकाकार भेनय बिना

एक-दोसरक मोनमे गहनतम सम्मान जगौने बिना

सीधे दैहिक स्पर्श पर भ’ जेबैक उतारू

तँ अहीँ बुझाबु-

नहि छियैक ई स्त्रीमोन संग क्रुरतम खेल

आइयो दुनियाँक बहुतो स्त्री एहने जीवन रहलै झेल

पुरूखक एहि क्रुरतम खेलक प्रतिक्रिया तीक्ष्ण

जनम लेलकै हेँ आजुक लेस्बियनिज्म

...

अहाँ सुननै होए वा नहि "रैडिकल फेमिनिनिज्म"क नाम

ई छियैक पछमी नारीवादी आन्दोलनक विद्रोही शाखाक उपनाम

देलन्हि नारीजीवनक मारते रास उत्पीड़न-विषयगत वितर्क

ईलोकनि जे दैत छथि एकटा तर्क--

प्रोनोग्राफी, वेश्यावृति, बलत्कार, घरेलुहिंसा, दहेजादिक आधार छै नारीदेह

स्त्री हेतु तेँ आब महाक जरूरी जे ओ भ’ जाउथ विदेह

पुरूखगणक मोन तखने हेतै आब हेंठ आ स्त्रीकेँ भेटतैक मोल

जखन नारी तोड़ि देती परिणय, परिणयपुर्व-कौमार्य, पतिव्रताक अधिमोल

टेस्ट-ट्युबसँ बच्चा जनती आ कुमारीमाताकेँ जँ बनेती अपन जीवनढ़ंग

स्त्रीगणक जीवनधारामे तखने भरतन्हि शृंगाररस-सरसछंद

आदमीक महत्व ओहीदिन औरतक जीवनमे भ’ जेतय हे औंउठा-आँगूर

लेस्बियनिज्म जहिया स्त्रीगणक हितमे बनि जेतैक समाजिक कानून

सत गप कही जँ खराप नै मानी

स्त्रीगण अर्थगत, समाजिक, राजनीतिक आत्मनिर्भरताकेँ केलन्हि आइ प्राप्त

हिनकालोकनिकेँ दैहिको आत्मनिर्भरता भेटि जेतन्हि

लेस्बियनिज्म जीवनढ़ंग संग जहिया ईलोकनि क’ लेतीह आत्मसात

...

अपना सबहक ओहिठां रहै सखी-बहिनपा लगबैक रीत

औंढ़नी बदलि, ऐंठ पानसुपारी खुआ

वा कँगुरिया आँगुर थुकथुका...

कहु नेनपनमे कहियो जोड़ने छलहु एहन पीरीत

बान्हल जाइत छलैक सखी-बहिनपाक एहने बन्हन मजगूत

जे वियाहे बन्हन सनक होइत छलैक सुपवित्र अजगूत

कतैक कठिन छल एक-दोसरक गुप्तराजकेँ ताजीवन सहेजनाय

जीनगीक डेग डेग पर तनमनधनसँ सखीक काज एनाय

सखी-बहिनपाय ओकरेसँ जुड़य जकरासँ बढ़य आत्मीय मनबंध

की पहिने रीतरेवाजक सक्कत बनहन तखन हुअय सुपीरीत-संबंध?

लेस्बियनिज्म संबंधक परिविस्तारक इयह छियैक मर्म

आत्माविलय, सह जीवन-मरन, सह संरक्षक-संरक्षिताक सैद्धांतिक धर्म

रैडिकल फेमिनिनिस्टक नारा छैक "सिस्टरहूड इज पावरफूल"

मतलब ’बहिनपायमे छैक बहुत बलबूत’

आओर देलियेहेँ एकटा बात दिस ध्यान-

सखी-बहिनपायमे नहि लेल जाइछ एक-दोसरक असल नाम

कहै जाइत छथि एक दोसरकेँ लौंग, पान, सुपारी, जरदा

वा फूलक नामपर जुही, गुलाब, बेली, चंपा, गेंदा

कहि सकैत छी एकर पाछु की रहै मनोविज्ञान?

परणीतोतँ अपन ससूर, भैंसूर, वरक नहि लैत छथि नाम?

...

सभ गप सुनि हम मोने मोन भ’ गेलहु अवाक

प्रत्योत्पन्नमतिमे सहजहि नहि फुरल की हेतै एकर बौद्धिक जवाव

पुरूख-स्त्रीक बदलैत संबंधक आगु राखल एहन भारी प्रश्न

विश्वक चन्द्रधवल संस्कृतिक गालपर लेभरल हमरा अखरल दागकृष्ण मातृत्व

श्रीमान आ श्रीमति मृदुला वर्मा सन

कतेक पितामह-पितामहीकेँ लागल हेतय खुदबुदी

विचारक ढ़ुलमुली

की मातृत्वक नयका सभ्यरूप इयह थिकै?

जे हुनकर बेटा-पुतौह अमेरीका मे जिबै

एकतँ नवयुगक डाक्टर आ पतिदेवकेँ समयक अभाव

परसौतीयोकेँ सेहो प्रसव-पीड़ा सहैक नइँ रहलै तेहन सुभाव

सब हरबरायले,

महाक जल्दी मे, कुत्ता नाहैत दलफैत हँफसियाले

बच्चाकेँ जनमय दैतय अपन सहज जनम

तखने नै भगवान लिखथिन हुनकर सुभाग्यलेख-करम

जँ अहाँ अपने रहबै धरफरायल

तखन तँ किछ लिखायत अंटबंट, किछ सुकरमो छुटायत

पंडित होय वा पाखण्डी, जोतखीसँ दिन तका राखू शल्यक समय

भाग्यतँ तखन अपना हिसाबेँ जोतखीये जी नै लिखताह

एहिमे बरह्माजीक की छन्हि दोख, हुनका की लेनाय-देनाय

दुई-चारि घंटाक प्रसवो-पीड़ा सुख जखन माताश्री नहिये बुझबय

मातृत्वक करेज कोनाकेँ हैत सहजहि सिरजित

छातिमे उतरत कतयसँ वात्सल्यमयी दुधक धार

पाउडरदुधेक खून निचौरि नै हैत संतानक हार-मौंस, मोन-मगज निरमित

पितामह पितामही बड़ सेहन्तासँ गेल छलीह विदेश

मोनमे सहेजनै मारैत रास उन्मेष

पुनरस्मरणक’ रटने बालगीत, फकरा, नजैर-गुजैरक यंत्र

छुप्पाछुप्पी अभ्यास कलन्हि पोता संग मखरै, गाबय, सुतेबाक तंत

दादाकेँ तँ रहि-रहि करेजमे उठैन्हि छुलनोंचनी

पोताकेँ कोर-कान्ह पाँज लेब, घुघुआ की घोघरी?

बदमसवा तँ मल-मुत्र त्यागि हँसत मुँहमे ल’ अँगुरी

दादी तेँ समेटि लेलनि नव-पुरान एत्तेकटा नूआक मोटरी

मुदा हाय रे भगवान, एहन अनहेर

छौंड़ाकेँ ’क्रेच’मे छोड़ि दुनु बेकैत पहुँचल अगुवानीमे मुँह बिचकेनै अनेर

दादाक करेज फाटलन्हितँ भादवक बिजलत्ता-मेघ सन उठलन्हि ढ़न्कार

मुदा दादी साहोर साहोर साहोर क’ बातकेँ कयलन्हि कहुना सम्हार

बुढ़ाक तखने हवाई-अड्डेसँ हरेलन्हि जे मुँहसँ बकार

फेर नहि अयलन्हि एक्को मिसिया मुसकी टुटलाहा दाँतद’ ठोरपर बहार

घर पहुँचि हिनका सभकेँ देल गेलन्हि विश्राम लेल कक्ष

सुभिता तँ सभ किछुक, मुदा हे लोकवेदक अभावे सभ तुच्छ

मुन्हारि साँझधरि गपशप करिते रहैथ कि ता

दोसर घरसँ आओल बच्चा कानयक बेकल राग

दादी हरखियाल मोनय धरफरायले चललि पछोर धेनय अबाज

ता पुतहु पाछुसँ टोकलकैन मम्मी बौआक सुत’ के भ’ गेलय समय

तेँ छोड़ि देथुन औखन ओकरा, देथुन अपन मोन सँ जी भरि कानय

कानैत कानैत थाकि जखन जेतन्हि सुति तखन लिहैथ देखि पोताक मुँह

दादी मोने मोन बड़बड़ेलीह- हाय गे निशोख चिल्कौरमौगी बनरमुँह

मुदा ठमकि गेलन्हि पारि, हरखियायल मोन भ’ गेलन्हि क्षणेमे हेंठ

नवतूरसँ मुँह की लगायब, बढ़ियाँ बौआसँ सुतलेमे क’ लेब भेंट

चारि शयनकक्षक घरमे एकटामे रहन्हि बेटा-पुतौहुक दामपत्य-बास

कोनमे राखल चानिक पलंग, सुशिल्प ठोकल पत्तरसँ घेरल चारूकात

उपरसँ रहय खुजल मुदा लागय जेना होय बच्चा पोसयक सद्यह पिंजरा

डेढ़ बरखक एहि छौंड़ाक तँ गप छोड़िये दिओ

एकरा की कुदि सकैत छलै पाँचो सालक नमहर बेदरा!

नहायल नील नीलकंठक पाँखिसन चमकैत बिछान तैपर तकिया मलमल

छौड़ाक नोर खरकट्टल आँखि, छल पेटकुनिया दनय निबिकार पड़ल

दादीकेँ इयादि पड़ि गेलनि अपन छाति सटल बेटाक नेनपन

राति रातिभरि जागि कोना करैत छलीह नोरपन

बदलैत रहैत छली गुंह-मूतसँ सानल पैजामा केथरी

भरि दिन तहन कोना सुखाबैत छलीह गेन्हरा भोथरी

एक्के चिचियाएब पर जागि जाइत छलै भरि अंगनाक लोक

कियो चुचकारैत, कियो पुचकारैत, कियो पलथी सुतेने क’ देत छलै भोर

कोना सासु, दियादिन, ननद, जयधी, घरक पुरूखोक रहैत छलै सहयोग

तखन नै बच्चाक करेजमे जनमय अपन दीदी, दादी, काकी, दादा, चाचाक अवबोध

ता दिन बजरूआ लखेरा सभ पसारनै छलै बड़का घटंग

पाउडरक दुध बेचि पैसा हसोथय केर गढ़नै सिटियारी-ढ़ंग

प्रचार क’ देलकै जे धीयापुताकेँ दुध पियेनै मायक सुनरताय भ’ जाइत छै क्षीण

हाय रे विज्ञापनक ओ दिन

डकटरबो सभ मोफतक पैसा खाय मिल गेल लखेरबेक संग

कहु बच्चा सबहक शरीर आ मनक विकृतिये बेचय की पढ़लक रहै अबंड

पाउडर-दुधक लिखय लागल मारिते रास प्रशंसाक पुल

सभटा बुझु जे फुसिये, उले-जूलूल

कलजुगक कुमाता बच्चाकेँ दुध पियाबैसँ लागलीह कतराय

सबकेँ रहन्हि अपन देहेक चमतकारि, मातृत्वक भाव गेलाह बकदै सुखाय

बच्चा सभमे बढ़य लागलै डायरिया, निमोनिया, प्रतिरोधक्षमता-क्षीणक रोग

देस-विदेसक शिशु मृत्युदरक देखलक आँकड़ा तँ सरकारोकेँ भ’ गेलय क्षोभ

विश्वक चिकित्सक, विशेषज्ञक हुअय लागल तखन सभा सेमिनार

अन्तर्राष्ट्रीय शिशु खाद्य संघिता फलमे भ’ गेलय तैयार

आब तँ गाम-गाम आंगनबाड़ियो केन्द्र पर टांगल देखबै मायक दुधक लाभ

बोतलदुधक हानि

मुदा एखनो कतेक मौगी अपन धीयापुताकेँ नहिये पियाबैक लेनय छथि ठानि

एहन चमतकारि मौगी छथि माय कि पिशैंच

अपने जनमल अंशकेँ काँचे चिबाबय बाली बुढ़ियादादीक खिस्साक डायन नेताजी बाप रे बाप!... करैत छै कोना फड़फड़ उड़ैत फतींगा जकाँ फोड़ि देतय कखन ककर आँखि खोखरि लेतय कखन ककर मुँह काटि लेतय कखन ककर ससरी मारि देतय तरछेब्बा लटकल तरकुल्ला गाछ चढ़ल पसीबा जकाँ रहो वा भाँड़मे जाओक कुलतूर बंशतरू अपन लबनी भरैक चाही बरू बाजय के छेबता कटाह बपुतगर लाठीक जोर तेँ मोन छन्हि टर्रबताह पंचायत खेलकै, बिलौक खेलकै, बैंको खेलकै थानो संग गिटपिटक तँ छैक सैह हाल जतय धौइधेक जुआइल व्यवस्था फँचैंइरे नै बजेतै फच-फच गाल! ओह, ललकारामे ओज की?... जेना स्वयं होइथ लाल-बाल-पाल, सुभाषचन्द्र बोस कतय की बाजथि तकर छैक कोन होस धनिकायमे शोभय नेहरू सन शुभ्रवस्त्र ठोढ़य पर साजल फुसि-फास संविधान, विधेयक, अध्यादेश, योजना, परियोजना, पंचायतीराज, लोकतंत्र आदिक अस्त्र गिरगिट तँ धरतै शाखेक नै रंग कखनो सुनटा, कखनो उनटे बहै गंग जेहने समय-परिस्थिती तेहने दर्शन खन लोहिया, मार्क्स, लेलीनवादी खनेमे स्वधर्म, संस्कृति, राष्ट्रवादी, दरैप गेलय मोन तँ लिअ कतैक लेब गाँधियेक मंडन कुमारबार बेटाकेँ परिवार द’ गरीबीरेखामे नौवेक स्कोरिंग अपन खेत आ बाड़ी पटबै सातटा बिलौकिया पंपिंगसेट-बोरिंग इंदिरा-आवास, वृधापेंसन, फसल-क्षतिपुर्तिक बँटवारामे पिछुवारक घाम टघरि जाइन्हि एंड़ी जेना चिल्हौरे-गिद्धक सुभागे खसल हो मरी नेताजी छथि ओखन भाजपाक महामंत्री दसे दिन पहिने रहथि जनु लोकजनशक्तिक अधिसंतरी कियो कहैत छलाह एम्हर भेलन्हि भितरिया जद-यूसँ साँठगाँठ ओहिदिन लोलियाबैत काँग्रेसिया-पेनियाँकेँ करैत छलाह बाँस राजद केर मित्रभाई संग छैन्हि सेहो उठक-बैठकी राजनीतिक जोकरलोकनिक संगहि फाटय पानपराग-चुटकी पार्टीधर्म, सिद्धांत, ककरो सरकारसँ कथीक सरोकार ओतहि जयकारा जतय बिलहैय एक्कोठोप पंचमकार मुँह परिछ बाजताह तँ बुझेता, अहा! कतेक ज्ञानीलोक टोकि दिओ मध्यकाल, तँ लागि जाइन्हि क्षणहिमे टोक की करबै, आइकाल्हि रहलै कतेक गोटेक बातेक ठर-ठीक मुदा विसबास दियाबए रहि-रहि छुवत माथक टीक भेटत एहने ठोपधारी हिनू जे फुसि बाजत गटगट मियाँ नमाजी हजारबेर दाढ़ी छुबि खाइत सप्पत नेताजीतँ कहैत छथि अपनाकेँ राजनीतिक चाणक मुदा भरिगामक लोक कहन्हि हिनका लाइत खाइत बानर जगदानन्द झा ‘मनु’, ग्राम पोस्ट - हरिपुर डीहटोल, मधुबनी गजल हम जँ पीलहुँ शराबी कहलक जमाना टीस नै दुख करेजक बुझलक जमाना भटकलहुँ बड्ड    भेटेए नेह  मोनक देख मुँह नै करेजक सुनलक जमाना लिखल कोना कहब की की अछि कपारक छल तँ बहुतो मुदा सभ छिनलक जमाना दोख नै हमर नै ककरो आर कहियौ देख हारैत हमरा हँसलक जमाना दर्द जे भेटलै     नै ‘मनु’ कनी बूझब आन अनकर कखन दुख जनलक जमाना (बहरे असम, मात्रा क्रम : २१२२-१२२२-२१२२) के पतियाएत के पतियाएत ई कएकरा कहु सभक आँखिमे पसि कए कोना रहु सदिखन आँगुर हमरेपर उठल कतेक परीक्षा आबो सहु जतए ततए हमहीँ लूटल गेलहुँ घर बाहर सभतरि हमहीँ ठकेलहुँ हम नारी नहि नरकेँ भोग्या सबदिन हमहीँ जितल गेलहुँ झूठ्ठे घर-घर पूजल जाइ छी मुड़ी मचौरि हम भोगल जाइ छी आबू रावण बनि भाइ हमर रामसँ पाछू छुटल जाइ छी | मनोज कुमार मण्डल देशी कौआ मन परि रहल अछि ओ दिन जहिया माएक हम छोट नेना रही माएक आँचर तर खेलैत-धुपैत रही माएक बोल हमर धि‍यान एक रहै छेलए जखने बजै अँगनामे कौआ बुढ़िया दादी बाजि उठै छेली पाहुन एता एना लगि रहल अछि सुनिते मन गद-गद भऽ जाइ छेलए आब तड़ुआ-तरकारी के पुछैए दही-चीनी सेहो भेटत दिन भरिमे कएक बेर पुछिऐ माए आइ कखनि‍ पाहुन औता आब ओइ दिनक यादेटा रहि गेल देशी कौआ मरि-मरि गेल कारकौआ गिरीहबासु भऽ गेल आइक कौआ बाजब ई भऽ गेल अमंगलक  सनेस दऽ गेल कौआ बजि‍ते कनियाँ कहै छथि ढेप लऽ एकरा भगाउ हम पुछलियनि‍ कि‍ कहै छी बिनु भगौने देशी कौआ भागि गेल की कारो कौआकेँ बिदाहे  कऽ देब कौआ देखब सपना कऽ देब। कुन्दन कुमार कर्ण गजल

नजरिमे नजरि तऽ मिलाक देखू दीप नेहके तऽ जराक देखू

दिल अखन कली अछि प्रिय अहाँकें ओ कली अहाँ तऽ खिलाक देखू

चेहरा अहाँक चमैक जेतै आँखिमें अहाँ तऽ बसाक देखू

दोहराक भेटत नहि जवानी मोनमें उमंग जगाक देखू

बरसि पडत सावन जीनगीमें हमर लेल रूप सजाक देखू

२१२-१२११२-१२२ गजल

२१२ ११२१२ १२२२

दर्द हियक अहांसँ कहब हम कोना चोट नेहसँ भरल सहब हम कोना

छोडि असगर जखन दूर रहबै प्रिय भावमें बिन मिलन बहब हम कोना

ठोरपर चमकैत नव हँसिक मोती दूर रहिक अहांसँ गहब हम कोना

संग जे नहि देबए अहाँ हमरा आगु जीवनमें बरहब हम कोना

कहि रहल अछि गजलमें हियसँ 'कुन्दन' बिन अहाँ प्रिय आब रहब हम कोना गजल जीनगी एक वरदान छी र्इश्वरक देलहा दान छी

सोच राखू नम्हर मोनमें जीनगी सुनर सम्मान छी

हटिक नै, डटिक जियबै जखन जीनगी तखन गूमान छी

खेल बूझब जखन एकरा जीनगी तखन आसान छी

कर्म पथपर चलू नित समय कर्म मानवक पहिचान छी

बाट बाटपर बूझी चलू जीनगी एकटा ज्ञान छी

कथन 'कुन्दन' कहैछै अपन जीनगी दू दिनक चान छी

२१२-२१२-२१२ बहरे-मुतदारिक अंगनामे कुचरल कौआ (र्इ हम आठ बरिस पहिने लिखने छलौं । विशेष कs कs जे केयो अपन देश छोडि विदेश गेल छथि हुनका सभहँक लेल परसि रहल छी...)

अंगनामे कुचरल कौआ जागि उठल हमर बौवा हावासँ आयल कोनो सनेश यौ पियाकें यादमें भेलौं हम विभोर रहि-रहि नैनसँ टपकै नोर

बितगेल होली दीवाली मोन रहैत अछि सदिखन खाली एक पल सौ साल लगैछै सूखि रहल अछि ठोरक लाली किया छोडि चलिगेलौं विदेश यौ कहिया आयत खुशीक भोर रहि-रहि नैनसँ टपकै नोर

साँझ भोर बाट तकैछी भितरे-भितर हम मरैछी दर्द नै बुझबै अहाँ हमर महिनामें एकबेर फोन करैछी आयब कहिया अहां घूरि घर यौ थर-थर करैछै हमर ठोर रहि-रहि नैनसँ टपकै नोर राजदेव मण्‍डल डायरीक पन्ना डायरीक पन्ना-१ बनेलौं एकटा महल जइमे छुच्‍छे पैसा गहल। खन-खन पैसाक खनक शान्‍ति‍ उड़ि‍ गेल सुनि‍ते झनक परेम कि‍अए दुख सहत ओ कि‍एक असगरे रहत दुनू भागि‍ गेल हमर सुतल आँखि‍ जागि‍ गेल मात्र पैसा खन-खना रहल अछि‍ हमरा पाछू गनगना रहल अछि‍। राति‍-दि‍न केने परेशान अकच्‍छ भऽ गेल हमर कान सुतलोमे सुनैत छी वएह तान जगलोमे ि‍नकलए जान तँए हम भागि‍ रहल छी कि‍न्‍तु, कहाँ जागि‍ रहल छी? डायरीक पन्ना-२ एकर की होएत जाँच ई तँ पूरा-पूरी छै साँच तँए ने भेल बेपरवाह नै चाही कोनो गवाह। यौ सुनि‍ लि‍अ राज ऐसँ नै चलत काज केहनो अछि‍ बात अहाँक चाही संग-साथ लगा देत कोनो लाथ कि‍न्‍तु, नै बनत बात केतबो होएत साँच लगि‍ जाएत नाच जनबाक लेल करबे करत जाँच केतबो चि‍चि‍याएब नि‍कलैत रहत आह साँचोक लेल दि‍अ पड़त गवाह। डायरीक पन्ना-३ हमर इति‍हास अछि‍ हमरे पास जइमे देखि‍ सकै छी हम अपन धरती आ अपन अकास अपन सि‍रजन आ अपन नाश। पूर्वजक कएल काज छीनल आ छि‍नाएल ताज राखब गि‍न-गि‍न बरख, मास आ दि‍न नीक अधलाह जे केने छी काम से नै अछि‍ दोसरठाम सभटा हमर भूत बनि‍-बनि‍ दूत अछि‍ हमरे पास हमर इति‍हास। डायरीक पन्ना-४ केतेक गोट केलक सुधारैक प्रयास अन्‍तमे टूटि‍ गेल सबहक आस केते उपाए लगबैत रहल पल-पल सभ भऽ गेल अन्‍तमे असफल हारि‍ कऽ हमरा छोड़ि‍ देलक ऐ काजसँ मुँह मोड़ि‍ लेलक हुअए लगल चारूभरसँ आघात ठोकरसँ भऽ गेलौं कात बि‍लटि‍ गेल सभ राज-काज हँसैत अछि‍ आब सकल समाज। आबो जँ नै करब सुधार डूमि‍ जाएत घर-पलि‍बार सोचैले भेलौं नाचार समए कहैए आब करू वि‍चार सोचै छी जँ ऐ दि‍स लाजसँ झूकि‍ जाइत अछि‍ शीश नै छै दोसर कोनो आधार स्‍वयं कऽ सकै छी अपन सुधार। डायरीक पन्ना-५ जेतए केतौ गेलौं कोनो नि‍मि‍त्त होइत रहल हमरे जीत केलौं चढ़ाइ देर-सवेर जीतते रहलौं बेर-बेर हमरा सोझा सभ गेल हारि‍ संबन्‍धी सभकेँ देलौं तारि‍ सबहक गाड़ल खुट्टाकेँ देलि‍ऐ उखाड़ि‍ हमर धक्का के लेत सम्‍हारि‍ नामक डंका बजए लगल हमरे बातपर सभ चलए लगल ठमकि‍ गेलौं अपने लग आबि‍ कोनो थाह नै रहल छी पाबि‍ हमरा सामने सभ गले हारि‍ हम गेलौं अपनेसँ हारि‍। डायरीक पन्ना-६ कुरसीक पौआ पीठमे गड़ल हम छी बेकूफ जकाँ पड़ल कहि‍या ई पीठपर सँ हटत कहि‍या ई भार घटत अपन दुख केकरा कहब आब केते कष्‍ट सहब जानवर सन कुरसीक खुर केने जाइत अछि‍ पीठमे भूर हटा दि‍अ नि‍साँस लेब आबो नै खड़ा हुअए देब उठि‍ आब हम ठाढ़ हएब समैकेँ एना नै गमाएब ठाढ़ होइते कुरसी टुटत भऽ सकैए माथो फूटत भीतरसँ उठि‍ रहल रोष हमरा नै देब पाछू दोष आब नै हम सुतले रहब नै एना झुकल रहब। डायरीक पन्ना-७ केतेक खोजलौं श्रेष्‍ट मीत जे करत हरपल हि‍त पुरान छुटैत रहल नव-नव भेटैत रहल नि‍त। सभ अपने स्‍वार्थे परेशान गबैत रहैए अपने गान अपनेमे जँ एतेक डुमत केतएसँ रखते प्रीतक मान। कि‍न्‍तु, आइ भेटल हमर श्रेष्‍ट मीत जे हमरे भीतर गबै छल गीत। डायरीक पन्ना-८ रहै छल जे संग-साथ करै छेलौं ओकरासँ बात। “चोटाह छै ई राह ई गाछी छै बड़ भुताह।” पूरा डरा गेल छल लोक बाट चढ़ि‍ते धऽ लइ छेलै शोग हम छेलौं पूरा नि‍डर लोककेँ भऽ गेल छेलै डर अन्‍हार होइते काँपै थर-थर सबेरे भागि‍ जाइत छल घर। भऽ गेल छै आइ अबेर अन्‍हरि‍या लेने छै रस्‍ता घेर भरल मेनमे वि‍कार बनि‍ नव-नव अकार आगू शब्‍द गन-गन राति‍ भेल सन-सन लोककेँ डरबैत छेलौं आइ हमहूँ डरा गेलौं बीच बाटमे भुतही गाछी आइ हमहूँ घेरा गेलौं। डायरीक पन्ना-९ हि‍ल-मि‍ल फेर फुलवाड़ी लगा दि‍यौ यौ रंग-रंग बि‍रंगक पुष्‍प सजा दि‍यौ यौ एक-एक गाछक अपन इति‍हास छै एक-एक फूलक अपन सुवास छै सुगंधसँ चारूभर गमका दि‍यौ यौ हि‍ल-मि‍ल......। सभमे एक जान छै एक तान छै सभमे एक मान छै सभमे एक गान छै सूखलकेँ जलसँ पटा दि‍यौ यौ हि‍ल-मि‍ल......। सभमे एक उल्लास छै सभमे रस छै आ रसाभास छै मौलाइलकेँ फेरसँ हरि‍आ दि‍यौ यौ पवन संगे पुष्‍पकेँ नचा दि‍यौ यौ हि‍ल-मि‍ल......। डोलनी डाइन- (काव्‍य कथा) डोलनी डाइन- १ चारि‍-पाँचटा घसबाहि‍नी छीटा भरने घास छि‍ल-छि‍ल फुस-फुसा कऽ गप करैत नजरि‍ मि‍लि‍ते हँसै खि‍ल-खि‍ल। एक गोटे घास राखि‍ बजल गाम दि‍स ताकि‍- “गै, जल्‍दी चल ऐठामसँ बात ले हमर मानि‍ आबि‍ रहल छौ गाम दि‍ससँ डोलैत डोलनी डाइन नचैत दुपहरि‍या रौद बाधमे नै छै एकोटा लोक एहने सुनहटमे होइ छै जंतर-मंतर जाप-जोग एम्‍हरे आबै छौ चट दऽ उठा ले घास नि‍कल ऐठामसँ पट दऽ नै तँ चलि‍ एतौ पास।” सबहक मुँहपर डर लगल नाचए डाइन-जोगि‍नक कथा मन जेना बाचए। एकटा घसबाहि‍न उठल देह तानि‍ हाथमे हँसुआ लेने, बजए लगल फाि‍न-फाि‍न- “केते देवे सेवे भेल छेलै एगो संतान तेकरो छूटि‍ गेलै परसूखन परान लहासकेँ गाड़ने छै धारक कोरपर हमरे बड़का कि‍त्ताक अन्‍ति‍म छोरपर आइ उखारतौ ओही लहासकेँ तब भेटतौ एकरा चैन दुपहरि‍यामे आबि‍ रहल छौ तँइ झुलैत ई डोलनी डाइन सभ गोटे नुका रहब धारक कातमे डा नै हँसुआ रखने रहब हाथमे आइ भइखौकीकेँ देखबै सभटा कुकरम दस लोकमे कहबै तब हेतै एकरा लाज-शरम नै छोड़बै एना करेबै पंचसँ जरि‍माना।” सबहक भऽ गेलै एक वि‍चार तुरत्ते सभ भऽ गेलै तैयार। डोलनी डाइन- २ घसबाहि‍नी सभ कऽ देलकै अनघोल सुनै सभ अचरज भरल बोल। “जेकरा नै छै बि‍सवास उ कऽ लि‍अ जाँच अपनेसँ देखि‍ लि‍अ ई गप छै साँच डोलनी डाइन करै छै नँगटे नाच चढ़ि‍ कऽ हाँकै जीते गाछ लहासक साथ धारक कात।” डर नाचै सबहक माथपर मुड़ी डोलाबै एक-दोसराक बातपर गामक फरेबी और उचक्का करए लगल सभ घोल-फचक्का औरति‍या सबहक अलगे ताल आँखि‍ नचाबैत बनल वाचाल। “अनकर जा बच्‍चाकेँ खाइत नै होइ छै डर अपना-अपना धि‍या-पुताकेँ सबेरे घर कर।” गामक पंच आब की करतै बढ़ि‍ गेलै बात तँ बजै पड़तै। “हौ, देखबा-सुनबामे छेलै बड़ नीक तरे-तर की छै तेकर कोन ठीक एना छोड़ि‍ देलासँ समाज भऽ जेतै उदंड एकरा भेटबाक चाही ओहने कठोर डंड जइसँ टूटि‍ जाइ एकर घमंड थर-थरा जाए सभ देखि‍ कऽ डंड।” सौंसे गाम भऽ गेलै बि‍ढ़नी बान खबरि‍ पसरि‍ गेलै काने-कान पंचैती बैसतै डि‍हबारक थान साँझेमे देखि‍ लि‍हक पंचक तान। डोलनी डाइन- ३ दू परानी मि‍लि‍ केते करतै काम जखनि‍ करमे भेलै बाम सासु-ससुरकेँ पहि‍ने लेलकै छीनि‍ तब भेलै भीन दि‍याद बनि‍ गेलै दुसमन झगड़ा लेल करै फन-फन छीनि‍-झपट शुरू केलक की अपन की आन समैक फेरी लगि‍ते सभ भऽ गेलै बेइमान ऊपरसँ पति‍ भऽ गेलै बेमार के करतै घर-बाहरक कारबार करैत-करैत डोलनी परेशान अदहा बँचल छै माथा अदहा तनमे जान असगरोमे गप करै सोर पाड़ने बने अकान लोक कहै- गुणघि‍च्‍चू डाइनक इएह सभ छी पहि‍चान। डोलनी डाइन- ४ नै छेलै एक्कोरत्ती बि‍सवास पाँच बरि‍सपर पूरा भेलै आस जनमलै एकटा पूत लगै छेलै जेना मुरुत कि‍न्‍तु बात भेलै अजगुत सुतलेमे छूटि‍ गेलै ओकर परान डोलनी फेर भऽ गेलै नि‍संतान लोक कहै- “हमर गप ले मानि‍ बेटा दऽ कऽ सि‍खलकै डाइन।” बपराहड़ि‍ काटैत डोलनीकेँ बन्न केलक घरमे पाँच गोटे लहास उठौलक कान्‍हपर धड़फड़मे। चि‍चि‍आइत बजल डोलनी घरसँ कलेजा फाटल जाइ छेलै तरसँ- “हौ बाप लेने जाइ छहक हमर घन एक्कोबेर मुँह देखब भरि‍ मन काजक पाछू रहलौं बेहाल तब ने भेल हमर एहेन हाल कहि‍यो भरि‍ नैन देखि‍यौ ने भेल। आब तँ सुगना उड़ि‍यो गेल।” कि‍यो ने बुझलकै दि‍लक दरद गाड़ैले चलि‍ पड़ल सभटा मरद फाड़ि‍ कऽ देखल जा सकैछ खीरा मुदा के जानतै परसौतीक पीड़ा कि‍यो नै केलक ओकर कहल टुटल खि‍ड़कीसँ ओ देखैत रहल सभ मि‍लि‍ लऽ गेलै लहासकेँ धारक कातमे ओकर पति‍ मनधत्ता रहै संग साथमे। डोलनी डाइन- ५ उ साँझ केतेक कारी बुझाइ छेलै सबहक मन भारी बुझाइ छेलै बााध-बोनसँ लोक सबेरे गेल छेलै भागि‍ पंनचैतीमे बैस गेल छल दोग-दोगसँ आबि‍। तखनि‍ घटि‍ गेलै फेर एगो घटना मरि‍ गेलै फनकाक बेटा नाम रहै मटना छौड़ा छेलै पहि‍नौंसँ कसरि‍ दबाइओक नै पड़ै छेलै असरि‍ नै छेलै बेमारी गप छेलै आन डागदर बुत्ते कतएसँ बँचि‍तै परान आबि‍ते फनका फनकए लगल- “हौ बाप हमहीं छी अभागल मनधतो छै ओकरे साथ कहलौं ई बात तामसे बजल भऽ कऽ कात- ‘बात बाजी सोचि‍ नै तँ मुँह लेबौ नोचि‍।’ डोलनी आबै छेलै हरदम अँगना-घर हमरा बेटाकेँ खा गेलै बनि‍ चरफर कहि‍ दि‍यौ हमरा बेटाक घुमा देतै परान नै तँ लाठीसँ पीट कऽ खैंचि‍ लेबै जान हमरो नाम छी फनका नै छी कि‍यो आन जे कहब से कऽ देबै स्‍थानमे दान नै तँ संग दि‍अ ओकरा मारि‍ देबै जीतै आगि‍मे जारि‍ देबै।” दोसर-तेसरकेँ नीक लगल चारि‍म फट्ट दऽ बजल- “एना अनचि‍त केना होइ छै करल सबहक अँगनामे छै बेदरा भरल केकर लेतै जान तेकर कोन ठेकान।” सुनि‍-सुनि‍ सबहक बातपर तामस चढ़ि‍ गेलै पंचक माथपर “कहाँ छौ मनधता ऐठाम बजा आइ देबै ओकरा कठोर सजा कि‍अए कुड़ि‍एतै जौं नै रहतै फोंसरी नै रहतै बाँस नै बजतै बौसरी।” अन्‍हरि‍या भरल चारूकात सुनि‍ते पंचक बात थर-थरा गेलै गात पाछू ठाढ़ छेलै मनधता ओहीठामसँ भऽ गेलै नि‍पत्ता। डोलनी डाइन- ६ दौगते अँगना आएल मनधता थर-थर काँपैत पोर-पोर लगमे सोर पाड़लक डोलनीकेँ मन छेलै भेल अघोर। “पहि‍ने तँ सभ कहै छेलौ तोहर बड़-बढ़ि‍या छौ बानि‍ की केलही टोलक लोक संग जे सभ कहै छौ ई छै डाइन साँचे उखाड़ने रही बेटाक लहास नँगटे नचैत रही ओकरा पास ठीके डाइन सि‍खौलकौ तँ देलही बेटाक जान मटनाक तोहीं खैंच लेलही परान? नुकाएल छीही घरमे मुइन कऽ कान पंच सभ कऽ रहल छौ घमासान मटनाक बाप लऽ लेतौ परान आइ जि‍ते झड़का देतौ गरम तेलमे कड़का देतौ।” गप सुनि‍ डोलनी भेल अधीर बजए लगल, मन केलक थि‍र। “हे, हमर बात सुनू धि‍यानसँ आइ तँ जेबै करबै जानसँ बात लि‍अ मानि‍ हम नै छी डाइन घसबहि‍नी सभ उड़ौलक अफवाह बौआकेँ देखबाक मनमे रहै चाह बन्न घरमे कटैत रहि‍ गेलौं काह कि‍यो ने केलक परवाह छेलै ई बड़का सेहन्ता साइत पूरा नै करि‍तौं तँ घुन जकाँ खाइत बि‍त जाइत जि‍नगी छूटि‍ जाइत परान आन तँ होइ छै आन नै देखि‍तौं मुँह अप्‍पन सन्‍तान। साड़ी खोलि‍ कऽ राखि‍ देने रही कात कि‍छु लगि‍ जाएत तँ भऽ जाएत बेबात उखाड़लौं बौआक हलास कि‍यो ने रहए आसपास तेल-काजर लगा देखलौं भरि‍ नैन भेटल मनमे पूरा चैन फेर मनकेँ साधि‍ गाड़ि‍‍ देलौं ओही खाधि‍ जखनि‍ अहाँसँ टुटत आस हम भऽ जाएब जि‍नगीसँ नि‍रास गै माए, आब जीबै कोन आस अहूँकेँ नै हमरापर बि‍सवास!” बजल मनधता बहबैत नोर- “हमरो बात सुनि‍ ले थोर कहाँ छौ मोटरी-चोटरी कहाँ छौ गहनाक पोटरी थम लाठी लि‍अ दे पानि‍योँ एकघोंट पि‍अ दे गि‍रेतौ पाग गै भाग-भाग आबि‍ रहल छौ फोंफि‍याइत नाग।” डोलनी बजल- “हमरो होइए पूरा शक दुआरि‍ दि‍स लगौने हएत टक पछुआर दि‍स भागब नीक हमरा बुझाइए यएह ठीक।” दुनू परानी साथे-साथे भागल जाइत अन्‍हरि‍या माथे दुखि‍त भेल छै मन डरे थर-थरा रहल तन बाटक नै कोनो ठेकान मुट्ठीमे लेने छै जान पाछूसँ अबैत हिंसक लोक भागि‍ रहल अछि‍ दोगे-दोग। डोलनी डाइन- ७ टपैत बाध-बोन, ऊँच गहींर गड़ल काँट-कुश होइ छै पीड़ भागले जाए रहल बनल बहीर पाछू नै ताकै मन भेल अधीर टाँग कटल आ ठेहुन फूटल अपन गाम घर सेहो छूटल बनि‍ गेल अछि‍ अभागल अन्‍हारे संग जाए रहल भागल। “के छी ठाढ़ रह ओहीठाम आगू बढ़मए तँ कि‍यो ने देतौ काम।” दुनू चमकि‍ गेल पएर ठमकि‍ गेल। “आब की करब लड़ब वा मरब ई केकर छी अवाज केनएसँ आबि‍ रहल छै गाज चोर-डाकू छै आगूसँ घेरने आबि‍ रहल आगाँसँ रेड़ने आब नै कोनो बँचलौं बाट आगूमे लगि‍ गेलौ बड़का टाट इज्जत, जान दुनू चलि‍ जेतौ ऐठाम आब कि‍यो ने बँचेतौ तोरे खातीर आइ हमरो जेतौ परान तोहर चलि‍ जेतौ इज्जत-मान।” डोलनीक हाथक हँसुआ चमकल हँसुए जकाँ आँखि‍ओ दमकल “अहाँक देहमे कि‍यो भि‍र तँ लौ देखि‍ ओकर नै बँचए देबै एक्कोरत्ती रेख। यएह छी पुरुखक समाज केना कऽ बँचतै स्‍त्रीक लाज ऐ पंच-समाजसँ होइ छै बड़को-समाज एक दि‍न खुलि‍ जेतै सभटा राज।” दुनू अछि‍ पूरा तैयार मारि‍ देबौ आकि‍ मार नै तर्क वि‍तर्क दुनू भेल सतर्क हवाकेँ गि‍न रहल अछि‍ समैकेँ चीन्‍ह रहल अछि‍ भारी भऽ गेल संगी-साथ लाठी कसि‍ पकड़लक हाथ। देखलक मनधता आइ चललै असली पता बाघि‍न गरजि‍ रहल अछि‍ नव कथा सि‍रजि‍ रहल अछि‍ खुगल आँखि‍ आ खुगल कान दुनूक अलग-अलग पहचान हरहरा रहल हवा कान ऊपर उगि‍ रहल अछि‍ चान। केतए छी हम सैकड़ा नहि‍ हजारक हजार भरल छै भूतसँ बजार कीनैत-बेचैत मनुखक मासु-हाड़ कि‍छु चि‍चि‍आइत कि‍छु खसौने घाड़ कि‍छु अछि‍ शान्‍त कि‍छु करए तकरार कि‍छु हँसैत आ कि‍छु कनैत जार-जार दाँत-मुँह चमकाबैत तुरंते भऽ जाइत अछि‍ पार। हम नुकाएल छी ओहीठाम जेतए सभ कि‍छुक लगि‍ रहल दाम नोंचि नेने अछि‍ ओ सभ हमरा देहक मासु-हाड़ अंग-अंग छोड़ा कऽ कऽ देने अछि‍ तार-तार नेने हाथमे हाड़ हँसैत अछि‍ बेसम्‍हार हम देखै सभ कि‍च्‍छो कानै छी जार-जार। अजगर ससरैत अछि‍ सर-सर हमरे दि‍स ई अजगर नेने हमरे देहक नाप मुँह बौने अजगर साँप भुखाएल छै तन कामनासँ भरल मन एकरा के रोकि‍ सकत के बीचमे टोकि‍ सकत तीव्र छै गति‍ चढ़ल छै कुमति बँचैले चलए पड़त चाल नै तँ नि‍श्चय धऽ लेत ई काल करए पड़त कोनो उपचार नै तँ हमरा घोंटि मारत ढेकार मुँहसँ नै फुटए बकार बढ़ा लेलौं अपन देहक अकार गि‍रत हमरा तँ फटतै पेट मुइल बापसँ हेतै भेँट। अकासमे ठाढ़ पंछी अकासमे उड़ैत पंछी अँटकि गेल अछि जेना मतिभ्रम भेलासँ ओ भटकि गेल अछि‍ चला रहल अछि पाँखि एकटक तकैत आँखि जोर लगौने बढ़बाक लेल मंजि‍लपर चढ़बाक लेल ने आगू बढ़ैत अछि‍ ने पाछू भऽ गेल अछि‍ थीर बन्‍हा गेल सभ शक्‍ति‍ लगि गेल केहेन पीर कहि रहल ओकर मति जे हम बढ़ि‍ रहल छी अपने गति‍। एकटक तकैत आँखि आ मन आकि‍ हमहूँ बनि गेलौं ओकरे सन? बीआ केर पता सोचैत-सोचैत फाटए हीया केतए भेटत ऐ गाछक बीआ। ई अनचि‍न्ह गाछ हमरा सोझहा करए नाच देखि कऽ मन करए जाँच नै भेटत बीआ तँ नस्‍ल भऽ जाएत नास टूटि‍ जाएत मनक आस तकैत-तकैत भेल छी नि‍राश बि‍तल जाइत बरख आ मास ओकरे भऽ सकैत अछि‍ पता जेकरासँ छै असली नाता वएह कहि‍ सकैत अछि‍ असली अता-पता। कटैत गाछ हड़हड़ाइत कटि‍ कऽ गि‍रैत गाछ चि‍चि‍याइत बजल जे छल साँच। “हम तँ करैत रहलौं सुकरम कहि‍यो नै केलौं कुकरम करैत रहलौं उपकार जइसँ अहाँक सपना हुअए सकार अहाँ करैत रहलौं उपभोग हम करैत रहलौं फल-फूल आदि‍सँ सहयोग हम केलौं न्‍याय अहाँ केलौं अन्‍याय हम केलौं पोषण अहाँ केलौं शोषण टुटैत कटैत सहैत अति‍याचार चुपचाप अहींक लेल तैयार सतत कर्मरत रहलौं हम कहि‍यो नै केलौं घमण्‍ड तैयो अहाँ सभ मि‍लजुलि‍ कऽ देलौं हमरा प्राणदण्‍ड हम केहेन छी उदण्‍ड दोखी नै छी तैयो दण्‍ड।” नमन हे बसुन्‍धरे शत् शत् नमन अहाँक आँगन उपजै सुमन जइसँ उड़ैत सुगन्‍ध भऽ ि‍नर्बन्‍ध गमकि‍ रहल दि‍ग-दि‍गन्‍त हे बसुन्‍धरे शत् शत् नमन। अहींक चमनक छी हम कण अहींक कृपासँ बनल अछि‍ तन धीरज, शक्‍ति‍ दि‍अ हमरा मन अहींक समरपि‍त अछि‍ ई तन हे बसुन्‍धरे शत् शत् नमन। स्‍वरमे बास एक दि‍न आएल रही अपने काम सुनने रही अहाँक नाम कल्‍पि‍त छल जे मनमे रूप दरस भेल छल अधि‍क अनूप मनमे उठैत रहल आह परबशताक बेड़ीमे कटैत काह जाए पड़ल दूर संग रहल छाह पुन: एलौं, नै छेलौं बेपरबाह केतौ ने चलि‍ रहल पता अहाँ केतए भऽ गेलौं नि‍पत्ता। लोक कहैत अछि‍- अहाँ उड़ि‍ गेलौं आसमानमे डूमि‍ गेलौं शून्‍यक महागाणमे खोजि‍ रहल छी बेर-बेर आबि‍ बेचैन छी दरस नै पाबि‍ ताकि‍ रहल छी मेघ बनि‍ अकासमे अहाँ नि‍श्चय हएब अहीठाम आस-पासमे जे स्‍वर हएत लग-पास ओहीमे हएत अहाँक बास अहाँ नै भेटब कि‍न्‍तु भेटत अवाज जे खोलि‍ देत अहाँ सभटा राज। अकाल परसाल तँ बचलौं बाल-बाल ऐबेर धऽ लेलक असुर अकाल खाली पेट नै फुटतै गाल सबहक भेल अछि‍ हाल-बेहाल। हर-हर पुरबा बहि‍ रहल अछि‍ कानि‍-कानि‍ काका कहि‍ रहल अछि‍- झर-झर आगि‍ बरि‍स रहल अछि‍ धानक बीआ झड़कि‍ रहल अछि। पियाससँ धरती फाटि‍ रहल अछि‍ मवेशी दूबि‍केँ चाटि‍ रहल अछि‍ कतेको माससँ नै खसल एको बून पानि‍ की भेलै केना भेलै से नै जानि‍ अपनहि‍ उजारलहक अपन सुख-चैन गाछ कटौलहक फानि‍-फानि। ‍ जलक महत बुझए पड़त नै तँ ई दुख सहए पड़त काल चढ़ए तँ बि‍गड़ए बानि‍ घुन सँगे सतुआ देलहक सानि‍ चारूभर पसरल घुसखोरबा पापी खसल पड़ल अछि‍ पूरा चापी टक-टक तकैत अछि‍ अफारे खेत पानि‍ बि‍नु उड़ैत अछि‍ सूखल रेत पछि‍ला करजासँ हाल-बेहाल ऐबेर बि‍का जाएत देहक खाल नै रोपल जाएत एको कट्ठा धान केना कऽ बचत सालभरि‍ प्राण ऊपर अछि‍ धूरा भरल आसमान नीचा अछि‍ परि‍वारक मान-सम्मान लोक कहैत अछि‍- धीरज धरह सरकार देतह हम कहैत छी- तेजगर लोक सभटा खेतह रहब छूच्‍छे केर छूच्‍छे आमजनकेँ कतौ ने कि‍यो पूछए बाहर कतए जाएब यौ भाय बेंगू परदेशमे धऽ लेत डेंगू ने खेबाक नीक आ ने सुतबाक ठीक जेबीसँ पाइ लेत उचक्का झपटि‍-झींंक कि‍यो लेत बेचि‍ कि‍यो लेत कीनि‍ ठामहि‍ रहि‍ जाएत कपार परक ऋृण कतए बेचब कतएसँ आनब पाइ नै रहत तँ कथी लऽ कऽ फानब। आब अछि‍ आशा अगि‍ला जेठ यौ अन्नदाता घटा दि‍यौ अन्नक रेट सभ काटि‍ रहल एक-दोसरकेँ घेंट केना कऽ भरतै सबहक पेट। मनमे छल चाह धि‍याकेँ करब बि‍अाह धऽ लेलक अकालक ग्राह आब केना कऽ करब नि‍रवाह केना कऽ पढ़तै धि‍या-पुता फाटल वस्‍त्र आ टुटल जूत्ता देहमे नै बचल आब तागत-बुत्ता दुआरि‍पर कनैत अछि‍ भूखल कुत्ता। सभमे परि‍वर्त्तन सभमे उत्थान ठामहि‍पर अछि‍ हमर गहुम-धान धन्‍य हे ज्ञान धन्‍य वि‍ज्ञान हमरो दि‍स दि‍यौ एकबेर धि‍यान वएह खेत-पथार, वएह खरि‍हान घरो छै टुटले कतए देखबै मकान कतए बेचबै कतए रखबै धान नै छै बजार नै छै गोदाम वएह खाद-बीआ ओहि‍ना पानि‍क दाम वएह हड़-बड़द ओहि‍ना बथान। यौ सरकार करू जलक प्रबन्‍ध फेर उठतै धरासँ धानक गन्‍ध दमकल, नलकूपक करू उपाए चन्‍द धार-नदीपर करू तटबन्‍ध। हम छी ऐ अंचलक कि‍सान देशक बढ़ेबाक अछि‍ मान-सम्मान बचेबाक अछि‍ सबहक प्राण भूखसँ दि‍एबाक अछि‍ त्राण हम करब संघर्ष नै छी बेजान फेरसँ गाएब कजरी गान। घरक आँखि‍ रहै छलौं केतबो व्‍यस्‍त देखबाक अभ्‍यस्‍त ठमकि‍ जाइत छल पएर ठीक ओही स्‍थलपर सम्‍हारि‍ एकबेर झाँकि‍ घरक आँखि‍ मध्‍य ओ मोहक रूप ठाढ़ भेल गुप-चुप चि‍त्र आँखि‍मे चमकि‍ उठैत छल मनक कण-कण गमकि‍ उठैत छल कि‍छु दि‍नसँ भेल ि‍नपत्ता बिनु देने अता-पत्ता तैयो आदति‍सँ लचार भऽ ठाढ़ भऽ गेलौं शून्‍यमे ओहि‍ना जहि‍ना पहि‍ने छल तहि‍ना ओ नै अछि‍ ई छी मनक खेल ठमकि‍ ठाढ़ भेल तकै छी ई हमरा की भेल की हमरा आँखि‍मे हुनक बास भऽ गेल आकि‍ हमर आँखि‍ ओ रूप मि‍लि‍ एकेटा अकास भऽ गेल। अभ्‍यास नै ऐपार नै ओइपार खसल छी मँझधार पानि‍ अछि‍ अगम-अथाह मनमे नि‍कलबाक चाह डुमैत भसि‍आइत सम्‍हारि‍ रहल छी उनटा धाराकेँ झमारि‍ रहल छी छूटि‍ जाएत घर-पलि‍बार टूटि‍ रहल अछि‍ मोह केर तार जरूरी छलै धीरजसँ सीखब बूझि‍ समझि‍ मनमे लि‍खब कछेरमे केने रहि‍तौं हेलबाक अभ्‍यास एना नै टुटैत हमर आस पछताबासँ नीक सेाचब आगू की हएत ठीक। महफा आ अरथी कारी आ उज्जर वस्‍त्र अछि‍ पसरल नापैत-जोखैत जा रहल छी ससरल पैघ भेल जा रहल अछि‍ दूरी धेने कड़ी आ गोंतने मुड़ी ऊँच-गहींर आ समतल नव-नव दृश्‍य बनए पल-पल काठ-कठोर बनल हरपल छन मात्र होइत अछि‍ चंचल टपैत देस-कोस बनैत दुसमन-दोस दुखमे होश सुखमे बेहोश काल जीत रहल अछि‍ उमेर बीत रहल अछि‍ तैयो जोड़ैत घटी-बढ़ती आगू शेष ऊसर-परती कतबो नापब नै होएत नापल धरती महफा शुरू केलक अन्‍त करत अरथी। काटैत बीआ छुटैत नि‍साँस जेना नि‍कलए जान ऊपर ताकए खाली आसमान नीचा डहि‍ रहल पोसल बीआ देखि‍-देखि‍ फाटै छै हीया हँसुआसँ काटि‍ रहल फसल केर सीना देह भीजल अछि‍ घाम-पसीना करए पड़त आगूक आस अपनहि‍ काटैत लगाओल चास थरथराइत हाथ जानैत अछि‍ बीआ रहि‍-रहि‍ केना कानैत अछि‍ हँसुआ कहै आ सुनै कान फुलकी फुला गेल बहि‍ गेल नि‍शान आब कि‍ रोपबह हे कि‍सान जेतबे बोझ बीआ ततबे धान। कानैत हँसी घटि‍ गेल बीचक दूरी गप्‍पसँ बेसी डोलैत मुड़ी कि‍छु नै जानै छी तैयो अपन मानै छी एककेँ सुख दोसराक सुख दूनू मि‍लि‍ भऽ जाइत अछि‍ दुख एक गोटेक आँखि‍क नोर दोसरकेँ दुखक नै ओर भीज रहल अछि‍ अन्‍तरक पोरे-पोर ई नै रूकत कतबो लगाएब जोर संचय कएल एक-एकटा कण कतेक भरि‍गर भेल छल तन नि‍कलि‍ गेलासँ आब केहेन हल्‍लुक लगैत अछि‍ मन माए एकदि‍न कहने रहए साइत सभटा सहने रहए बाटसँ भऽ कऽ कात वएह भोगल बात कहैत नीक अधला फाटि‍ कलेजा नि‍कलै दाह दू बून सूखल हँसी नोर जल अथाह कहलौं-सुनलौं भऽ गेल गप्‍प एहेनठाम की करि‍ते रहब तप हे, रहै छी कतए कहाँ गप्‍प कतौ नै बजबै अहाँ बि‍सरि‍ थाल-कादोमे धँसल कानैत-कानैत खि‍खि‍या कऽ हँसल लवका शक्‍ति‍ जागि‍ गेल हँसलासँ दुख भागि‍ गेल। कनहेपर भाेलबा हड़बि‍र्ड़ो मचल अछि‍ मेलामे धि‍या-पुता हरा गेल ठेमल-ठेलामे दूनू पच्‍छ अछि‍ पूरा तगड़ा शुरू भऽ गेलै मेलेपर झगड़ा कोइ एँठ-कुठपर खसल चि‍चि‍याइत कोइ भीड़मे फँसल मँुहपर डर नाचि‍ रहल अछि‍ सभ अपने दुख बाँचि‍ रहल अछि‍ के कोनए भऽ गेल नि‍पत्ता केकरो नै चलि‍ रहल पत्ता “हे रौ सुन-ढोलबा हरा गेल भोलबा गाँजा पीबैत छन छलै सँगे की कहबो, छौड़ा छै अधनंगे तकैत-तकैत करए लगल दरद कानि‍-कानि‍ ओ करैत हेतै गरद।” गाँजाक चि‍लम जेबीमे रखलक आँखि‍ उनटबैत ढोलबा कहलक- “छौड़ा छह पाछू कान्‍हपर चढ़ल तूँ जाइ छह आगू बढ़ल नि‍शाँमे अहि‍ना हरेबह काका चि‍नाय कन्हेपर भोलबा आ भोलबे नै।” “बुधि‍ हरा गेल हमर साइत कन्‍हेपर भोलबा ओकरे ले औनाइत कन्‍हेपर छौड़ा बैसल बि‍सरि‍ गेलौं डर छल पैसल।” बजल बुढ़बा- छौड़ाकेँ दैत चमेटा- “तूँ बेटा छेँ की टेटा हमर मन भऽ गेल अधीर कान्‍हपर बैसल छेँ भऽ कऽ बहीर।” थप्‍पर लगि‍ते उपजल आनि‍ छौड़ा बजल कानि‍-कानि‍- “आँखि‍ रहि‍तो कि‍छु नै सुझै छह अपनाकेँ बड़ काबि‍ल बुझै छह।” कुहेस कतौ नै कि‍छु बचल अछि‍ शेष चारूभर पसरल कुहेस कठुआ गेल देह भीजल अछि‍ केश अधभि‍ज्‍जू सन भेल सभटा भेष घुरि‍या रहल छी ठामहि‍-ठाम कि‍यो नै देत अछि‍ समैपर काम टुटल जा रहल सभ आस ऊपरसँ लगि‍ गेल दि‍शाँस कुहेस और भऽ गेल सघन इजोत लगैत अछि‍ टीका सन। खेत-खरि‍हान, घर, जंगल-झार सभटाकेँ गि‍ंर गेल अन्‍हार उनटि‍ गेल अछि‍ जेना माथ छूटि‍ गेल सभ संग-साथ।

नै भेटैत अछि‍ बाट नै अपन घाट लगे-लग औनाइत मन भेल उचाट सभ गोटे धऽ लेने छी खाट देखा दि‍अ जाएब कोन बाट। कहि‍या फटत ई कुहेस भेटत अपन घर परि‍वेश हे सुरूज कि‍रि‍णकेँ जगाउ आबो तँ ऐ कुहेसकेँ भगाउ। जानवरक बोली सुनहट बाट अन्‍हार भरल अछि‍ कि‍छो गोंगि‍या रहल देह थरथराइत मन डरल भूत जकाँ के अछि‍ अड़ल सुनमसान अछि‍ चारूभर ने लोग आ ने अछि‍ घर जानवर ठाढ़ अछि‍ आरि‍ ऊपर बाजि‍ रहल अछि‍ भऽ चरफर- “हे यौ, जल्‍दी लग आउ बोली सूनि‍ नै घबराउ कहब आब रहस्‍यक गप बोलीक लेल बड्ड केलौं तप अहाँ देलौं अपन बोली हमर पूरा भेल आसा नै घबराउ हम देब आब अपन भेस-भाषा।” जानवरक मुँहसँ मनुक्‍खक बोली सूनि‍ रहल छी अचरजमे डुमल अपने माथ घूनि‍ रहल छी। नै सुनब तँए कान मुनि‍ रहल छी वि‍कासक क्रमकेँ गुनि‍ रहल छी। मोँछक लड़ाइ छोटका मोँछ मोटका मोँछ सोझका मोँछ टेढ़का मोँछ पकल मोँछ अधपकल मोँछ बघबा मोँछ बि‍लरबा मोँछ कारी-कारी ऐंठल मोँछ ति‍तली सन बैसल मोँछ झबरा मोँछ लबरा मोँछ पुरनका मोँछ लबका मोँछ भड़कल मोँछ फड़कल मोँछ मोँछक शान गामक गुमान तोड़ै तान फाटै कान जेतेक रंगक मोँछ तेतेक रंगक झगड़ा झगड़ा ताकै घूमि‍-घूमि‍ रगड़ा मोँछ गाबए बेवहारक गान अपने जि‍नगी अपने जुबान “हम नै लड़ब लड़त के आन हमरेपर अछि‍ गामक शान हमहीं बँचाएब सबहक जान सबहक दोकान सबहक माकन सबहक आन सबहक गि‍यान छूटत जखनि‍ हमर बान कि‍यो ने करत कल्‍यान हमरा सोझहा आनक बड़ाइ तँ चलि‍ते रहत मोँछक लड़ाइ।” मोँछ-सँ-मोँछ लड़ए कि‍यो जीतै कि‍यो मरै केते घर जरए तब केते तरए। “की यौ भाय करि‍ते रहबै मोँछक लड़ाइ सभ कि‍छु भऽ गेल नाश कि‍छु ने रहि‍ गेल पास लटपटा गेलै सभ लगे-पास केकरो ने बढ़बाक आस ओझरा कऽ छी पड़ल अदहा छी मरल आब तँ मोँछो अछि‍ झड़ल आगू बढ़बाक नै अछि‍ उपाए की यौ भाय, करि‍ते रहब मोँछक लड़ाइ आबो ने करब कोनो उपाए?” दूटा धारा अपनो ने पाबि‍ रहल छी पार अंतरंग नदीमे दूटा धार बि‍नु एकाकार केना करब पार केना कऽ पकड़ब असल आधार केतेक पैघ अछि‍ अवरोध कि‍अए ने भऽ रहल अछि‍ बोध केना कऽ धारा हएत तेज बाधाक ने बँचत कोनो रेख अपन दोख अनका माथपर राखि‍ टकटक चारूभर रहल छी ताकि‍ भेटि‍ ने रहल अछि‍ कोनो उपाइ जि‍नगीओ ने कहीं अकारथ जाइ झूठे धेने छी अनकार आस अनकर आस रही उपास अप्‍पन आस तब बि‍सवास करए पड़त अपने प्रयास। चोरि‍ बेइमानीसँ नाता जोड़ि‍ भरि‍गर अवरोधकेँ तोड़ि‍ असली मनुखक लक्षण छोड़ि‍ हमहूँ केलौं एकबेर चोरि‍ देखलक हमरा लग धन सबहक बदलि‍ गेल मन शुरू भेल मालक कमाल बदलि‍ गेल सभटा चाल कि‍छुक आँखि‍मे देखै छी रि‍श मनमे उठए लगैए टीस मूनि‍ लइ छी चटदनि‍ कान तोड़ए लगै छी अपन तान बढ़ि‍ गेल आब हमरो शान लोक कहए लगल महान अंतरसँ जखनि‍ उठए अवाज खुगए लगैए सभटा राज आँखि‍क भीज जाइत अछि‍ कोर भीतर शोर चोर-चोर। परि‍स्‍थि‍ति‍ केतेक अबैत जाइत लोक सबहक मुँहपर नचैत शोग पि‍ताक अंति‍म दर्शन लेल चलि‍ रहल समाजि‍क खेल केतेको मुँहपर असली दु:ख केतोकोकेँ छुच्‍छे बजबाक भूख। “लेधुरि‍या छै धि‍या-पुता अपना देहमे नै छै बुत्ता पड़ल छेलै बेमार खसौने रहै छै घाड़ समए काटब भऽ जेतै पहाड़ केना कऽ लगतै पार केहेन भऽ गेलै अधला स्‍थि‍ति‍ घेरि‍ लेलकै चारूभरसँ परि‍स्‍थि‍ति‍।” आ हम छी ठाढ़ परि‍स्‍थि‍ति‍सँ भऽ कात जेतए ने कोइ छूबि‍ सकए आ ने रहए साथ नै छी एकोरती खि‍न्न हम छी परि‍स्‍थि‍ति‍सँ भि‍न्न ने जागल छी आ ने सूतल छी सपनामे छी लीन। उलहन “सभ तँ रहै छै अहींक लग-पास हम तँ अबै छी चासे-मास पड़ि‍ गेल वि‍पति‍ भेलौं नि‍राश अकालक कारणे डहि‍ गेल चास दि‍न अदहा पेट राति‍ उपास मनमे छेलए जे पूरा हएत आस भौजीक ताना सुनि‍ आँखि‍ भरल नोर बेथासँ भरल मनक पोर-पोर एक मुट्ठी देलासँ की भऽ जाएत थोर आँखि‍सँ बहि‍ रहल अछि‍ दहो-बहो नोर हमर नोर नै बनि‍ जाए अँगोर यौ भैया, एकदि‍न हमरो हेतै भोर चुप्‍पी साधने खसौने छी धाड़ ऐ सम्‍पति‍पर छै हमरो अधि‍कार आगूमे ठाढ़ बालपनक पि‍यार नाता तोड़ि‍ केना करब तकरार कनैत जा रहल छी जार-जार माए रहैत तँ करैत दुलार अपने चास-बासपर करए पड़त आस बाबाक बखारी आ धीयाक उपास।” आपसी “जि‍नगी भरि‍ दैत रहलौं फूल आपस भेटि‍ रहल अछि‍ शूल मन भऽ गेल बि‍याकुल कि‍अए भेटल ई डण्‍ड कहाँ केलौं कोनो भूल देहलो चीज नै देब हम देने रही फूल काँ केना लेब?” “हमरा लग वएह अछि‍ तँ दोसर की देब जबरदस्‍तीओ करब तँ आरो की लेब।” “खुगि‍ रहल अछि‍ मनक राज सुआरथसँ भरल छल हमर काज।” द्वन्द्व अधरति‍या भऽ गेल छै साइत अखने पहुँचलौं बौआइत सुनहट बाड़ीमे कोयलीक तान श्वेत शि‍लापर बैसल अछि‍ चान आधा मुखपर केश-पाश आधापर अछि‍ नोर, नि‍राश तैयो आस-पास छि‍टकि‍ रहल प्रकाश बि‍आहक बन्‍धन तोड़ि‍-ताड़ि‍ घर-पलि‍वारकेँ छोड़ि‍-छाड़ि‍ आएल अपने इच्‍छा कऽ रहल हमर प्रतीक्षा चि‍र प्रति‍क्षि‍त पि‍यासल मन कछ-मछा रहल तन छन-छन केना कऽ राखब मनकेँ सम्‍हारि‍ अन्‍तरमे उठल आन्‍ही-बि‍हाड़ि‍। बढ़ाएब हाथ अहाँ दि‍स लोककेँ उठतै रि‍श खुशीसँ भरत हमर मन दुसमन सभ करत सन-सन आपस घींच लेब हाथ तँ समाज रहत साथ अपने मनसँ हएत लड़ाइ लोक करैत रहत बड़ाइ। बाँहि‍ पसारि‍ बढ़ेलौं हाथ तरेतर घुमि‍ रहल अछि‍ माथ वि‍मूढ भऽ अड़ल छी द्वन्‍दमे पड़ल छी। छीपपर दीप नमगर बाँसक छीप पर नाचैत दीप अपने देहकेँ जारि‍-जारि‍ तैयो टेमीकेँ सम्‍हारि‍ अन्‍हारकेँ ललकारि‍ हवासँ करैत मारि‍ एक्के धूनमे चलि‍ रहल समताक लेल गलि‍ रहल जेतबे क्षमता छै तेतबे दोग-दागमे फैलि‍ रहल बटोहीकेँ देखबैत बाट हरा ने जाइ कहीं कुबाट। देत प्रकाश सभकेँ लड़ैत अन्‍हारसँ भरि‍ राति‍ कि‍न्नौं नै देखतै केकरो रंग, रूप आ जाति‍। इमानदारी इमानदारी बि‍कैत छै बेनाम लाख, करोड़ आ टका-छेदाम सभ रंग दाम सभ रंग नाम जेहने इमानदारी तेहने दाम देहाती दाम शहरी नाम जेहने टका तेहने काम इमान कहै सुनू हमर बोल हमर के लगा सकैत अछि‍ मोल टूटि‍ रहल अछि‍ पुरना खोल सहजहि‍ं फूटत नवका बोल। बेइमानी कठहँसी हँसैत अछि‍ ऊँच आसनपर वएह बसैत अछि‍ ओकरे भेटै आदर सम्‍मान इमानदारी पाबैत अपमान हमहँू नै बचल छी पूरा लगल अछि‍ बेमानीक धूरा खोजलौं ऐ पार-सँ-ओइ पार नै भेटल पूरा इमानदार बजलौं अहाँ बारम्‍बार कहू के अछि‍ इमानदार? बीआ बीआ नै अछि‍ खाली बीआ माटि, पानि‍, हवा प्रकाश सँ मि‍लतै आस छूबि‍ देत अकास आँखि‍ देख रहल अछि‍ साँच बीआ मध्‍य आँकुरक नाच कालकेँ कऽ रहल जाँच अन्‍तरमे बैसल गाछ एक-सँ-अनेक पसरल छेकने जाइत आगाँ ससरल दैत अछि‍ प्राण वायु बढ़ैत अछि‍ सबहक आयु। कि‍छु अछि बेसी कि‍छु अछि‍ कम अहीमे मि‍लल अछि‍ सत-रज-तम। एकरा अन्‍तरमे शक्‍ति‍ अपार जाएत एक दि‍न धरतीक पार बीजक प्रस्‍फोटन अछि‍ सार हरक्षण बनैत नव अाकार। ‍ बलात् घटना भेलै राति‍ अखने हेतै साइत चौबटि‍यापर पंचायत दोषीपर खसतै जूता-लाति‍ ऊपसँ हेतै जुरमाना लोक मारबे करतै ताना बात बढ़तै तँ जेतै थाना केहेन भऽ गेलै जमाना असगर केना कऽ नि‍कलत लोक राक्षस बैसल दोगे-दोग जेकरा संगे भेलै बलात् कानि‍ रहल अछि‍ भऽ कऽ कात- “एकबेर असगरमे नोचलक गात-गात सबहक सोझा कहए पड़तै वएह बात केना की सभ भेलै हमरा साथ लाज भरल बात केहेन अघात फेर वएह पीड़ा सहए पड़तै खोलि‍-खोलि‍ कहए पड़तै आँखि‍ ने देखै भरल नोर यौ आब कहि‍या हेतै भोर?” झूठक गि‍यान हमहीं देने रही झूठक गि‍यान बालपनमे धऽ लेलक कान हमरे देल अछि‍ ई सीख कखनो झूठ होइ छै ठीक झूठ बाजि‍ बचा लि‍अ जान बढ़ा लि‍अ मान-सम्‍मान घटि‍ गेलै सत्‍यक मान झूठकेँ धऽ लेलक कान करए लगलै झूठक बेपार बदलि‍ गेलै काज बेवहार धऽ लेलकै ओही दि‍न लीख आब केना कहबे ई नै नीक झूठक गबैत यशोगान भऽ गेलै आब ओ जुआन हाथमे लेने तीर कमान खींच लेत आब हमरे जान ओ नै छी कि‍यो आन सोझा ठाढ़ अपने संतान। जेहने अहाँ तेहने हम संगे-संग घुमलौं देश-कोस कतेक वि‍चारि‍ लगेलौं दोस दुनू गोटेमे भरल परेमक जोश खुशी रहत पल छल पूरा भरोस सभ कि‍छु छल एक्के समान दूटा देह एकेटा जान दोस बनबैत कात एतेक वि‍चार दुसमन बनबैत बखत भेलौं लचार नै सोचने छलौं अपना मन जे बनए पड़त आब दुसमन सन वि‍चार कऽ बनाबि‍तौं दुसमन नै जरैत आइ तन-मन दुसमनसँ कहाँ रहलौं कम जेहने ओ तेहने हम केकरोसँ कहाँ कि‍यो कम। चि‍र प्रतीक्षा नीपलौं-पोतलौं घर-दुआर कतेक बेर केलौं झार-बहार अपनो केलौं सोलहो ि‍संगार कऽ रहल छी इंतजार उताहुल भेल मन पि‍आसल अछि‍ तन बि‍तल जाइत क्षण कखन हएत मि‍लन मनमे फुलाइत सुमन नमरले जाइत प्रतीक्षाक क्षण असोथकि‍त भऽ गेल नयन शंि‍कत छी बि‍फल हएत जतन नि‍न्नसँ बन्न भेल आँखि‍क कोर दुखाइत देहक पोरे-पोर मन घेराएल सपनाक शोर अहाँक झलक बुझाएल थोड़बे-थोड़ चौंकि‍ उठलौं नि‍न्न छल घोर नै भेल छल भि‍नसर-भोर पएरक चेन्‍हसँ हम मानि‍ रहल छी अहाँ अाएल छलौं से जानि‍ रहल छी पुन: एकबेर देहकेँ तानि‍ रहल छी बाधाक नि‍न्नकेँ तोड़ि‍-ताड़ि‍ बौआइत सपनाकेँ डाहि‍-जारि‍ खोलि‍ अपन सभ घर-दुआरि‍ चि‍र-प्रतीक्षा तन-मन सम्‍हारि‍। हाथ हाथ ि‍सर्फ नै अछि‍ हाथ अन्‍हारमे जनमि‍ गेल एेमे नाक, कान, आँखि‍, दाँत इजोतेटा मे नै अन्‍हारोमे रहैत अछि‍ साथ सूँघैत अछि‍ सभ कात जानैत टेब-टेब‍ सभ बात हाथकेँ नै देखैत हाथ देखैत अछि‍ हाथक करामात कतए सँ कते धरि‍ पहुँचल हाथ हाथसँ मि‍लैत हाथ सि‍रजनक साथ भऽ जाइत अछि‍ वि‍ध्‍वंसक बात हाथ तँ अछि‍ हमरे साथ फेर कि‍एक हेतै अधला बात। ठक हम छी ठक नै कोनो शक झूठ गप भख साँचक नै परख शुरूमे ठकलौं घर-परि‍वार आगाँ ठकैत दुनि‍याँ-संसार टका-पैसा हजारक-हजार लगा देलौं सम्‍पति‍क अमार ठकैक आदति‍सँ नचार कतेको कनैत जार-बेजार आइ छूटल पूरा भक जखनि‍ हमर लगल ठक एहेन जीत पार भऽ गेल जि‍नगी बूझू बेमार भऽ गेल सभकेँ एहि‍ना उठैत हेतै दरद आइ हमहूँ करैत छी गरद साँच कतए सँ आब हम पाएब ठकबे करब वा ठका जाएब सोचब कोनो एहेन उपाए ऐ जालसँ केना बचल जाए। उपयोग हे यौ श्रीमान्, अहाँ छी अदभुत लोग अहीं सँगे पौलौं हमहूँ सुख-भोग भरल-पूरल रहल हमरो घोघ भागल रहल दुखि‍या सोग देखलौं एहेन-एहेन दोग जे हमहूँ भऽ गेलौं बड़का लोग जतए तक पहुँचलौं ठीके नै छलौं ओइ जोग कि‍न्तु आइयो हम वएह छी कहाँ भेलौं नि‍रोग जे छल अपन तेकरो लग बनि‍ गेलौं आब कुलोग। काज पड़ल तँ ला ताकि‍ कऽ नुकाएल छौ कोन दोग भऽ गेल काज तँ हटा तुरत इहए छि‍औ संक्रामक रोग। आइ जनलौं कारण की छलै असली रोग अहाँ करैत रहलौं हरपल हमर उपयोग। (ई कवि‍ता “उपयाेग” श्री गजेन्‍द्र ठाकुरकेँ समर्पित, राजदेव मण्‍डल...) सत्य नारायण झा लहकैत समाज केखनो क’ मोन भटकि जाइए  केखनो मोन अटकि जाइए  आ केखनो मोन भरकि जाइए  मुदा की करू ,किछु ने सोहाइत अछि  लोकक विद्रुप चेहरा ओहिना देखाइत अछि  कियो ने भेटैत अछि ,ककरा कहबैक  के सुनत केकरा पलखैत छैक  समाज वदरूप ओझरायल छै  लूटेरा लुटैत छै ,समाज देखैत छै  के बाजत केकर मजाल छै  सभ त’ लुटय मे अपने बेहाल छै  जे टुकुर टुकुर देखैत छै ,ओ त’ लाचार छै  ओ की बजतै ओ त’ बेदम छै  साँस लैत छै बोल निष्पंद छै  कतौ अकाल छै , कतौ दुर्भिक्ष छै  कतौ ठनका ठनकैत छै ,कतौ वज्र खसैत छै  मुदा जे निष्ठुर छै ,शैतान छै  ओकरा ल’ वज्रो आसान छै  ओहन लोक कहियो नहि सुधरत  बैमानी , शैतानी कहियो नहि बिसरत राम वि‍लास साहु किछु टनका हँसैत फूल देखि‍ भौंरा कहए नि‍त्‍य रहब दु:ख-सुखक संग सूतब अहीं अंक बात सुनि‍ते फूल भेल प्रसन्न झूला झूलब पवन संगे-संग रहब उपवन रहब वन पीअब मकरन्‍द मधुर रस डुमल अंग-अंग सुख-दु:खक संग स्‍वर्ग मि‍थि‍ला जेहने माटि‍-पानि‍ तेहने गाम खेत-खड़ि‍हाँनमे भरल धान-पान अनपढ़केँ दी अक्षरक वोध पोथी पढ़ि‍ कऽ ज्ञानी बनि‍ ज्ञानकेँ घर-घर बाँटतै अज्ञानीकेँ दी काज करैक ज्ञान भूखलकेँ दी दू रोटी भोर-साँझ बनू नेक इंसान आँखि‍ मि‍ला कऽ सभ हाथ मि‍लबै दि‍ल मि‍लबै नै कोइ, जौं मि‍लबै दि‍लमे जग प्रेम सभ जाि‍तमे छोट-छीन झगड़ा अखनि‍ धरि‍ जाति‍-सम्‍प्रदायमे बँटल बौआइए जन कल्‍याण समाजक ि‍नर्माण शि‍क्षाक दान देशक उत्‍थानमे सभक जरूरी छै धन लगाबी समाज कल्‍याणमे होइत रहै आगूओ हि‍त काज बँटैत रहू ज्ञान दहेज रूपी दानव पहि‍ने नै आइ सबल बेकार चक्करमे बेचि‍ कऽ लूटाइ छी गीत मोह-माया...... सगरो माया पसरल-ए मायाक बजार सजल-ए ठगि‍नि‍याँ माया-जाल पसारि‍ सभकेँ बान्‍हि‍ फँसा रहल-ए ठामे-ठाम ठगि‍नि‍याँ बैसि‍ सभकेँ ठकि‍-ठकि‍ खाए रहल-ए सभकेँ......। सभ सज्जन दुर्जन ने कोइ साधु-संत महंथ कहबैए सज्जन साधु-संत महंथ लोभ फँसि‍ घुरि‍आए रहल-ए ठामे-ठाम ठगि‍नि‍याँ बैसि‍ सभकेँ ठकि‍-ठकि‍ खाए रहल-ए सभकेँ......। लोभी सभ नि‍रलोभी नै कोइ इमान बेचि‍ इंसान कहबैए कुकर्मकेँ धरम-करम बुझैए मोह-मायामे सभ घेराएल-ए ठामे-ठाम ठगि‍नि‍याँ बैसि‍ सभकेँ ठकि‍-ठकि‍ खाए रहल-ए सभकेँ......। ई जगत केना कऽ चलतै के नेकी इंसान कहेतै केना सभकेँ भेटतै त्राण माया देखि‍ कवि‍ बहबैए नोर ठामे-ठाम ठगि‍नि‍याँ बैस सभकेँ ठकि‍-ठकि‍ खाए रहल-ए सभकेँ......। के बँचेतौ तोहर जान चि‍ल्का कनैए दूध पीबैले देखि‍ दुखि‍त माए कनैत बाजलि‍- “सुक्खल देह हड्डीए देखाए लहूक कतरा दु:खे लेल अछि‍ स्‍तनसँ दूधक फेनगीओ ने चलैए जे तोरा चटा जीएबो लहू पीब पेट भरतो तँ पीब ले सभटा हमरा देहसँ।” चि‍ल्का नोर बहबैत लगले सूरमे कनैत रहल अस्‍सी बर्खक बुढ़ि‍या दादी ठेंगासँ ठेंगहति‍ लग आबि‍ पोतासँ बाजली- “अपना ने तँ गाए-महिंसक दूध अछि‍ जे पानि‍ फेंटि‍ पीआ दैति‍ओ जीवि‍तँए तँ हमरो कमा खि‍ऐबि‍तँए एक हाथ सेवा सभ दि‍न करि‍तँए सबहक असि‍रवाद पबि‍तँए भगवानो तँ बेमूख बनल छौ माए तोहर रोगही-टेटही छौ।” मुदा, चि‍ल्‍का फकसीहारि‍ कटैत रहल माए ममता भावपूर्ण पुन: बाजलि‍- “आन दूध बौआ नयनसँ नै देखलौं ने जीसँ कहि‍यो सुआद लेलौं के देतौ दूध जान बँचबैले नै बँचल छै धरतीपर इंसान कथी पीआ कऽ तोरा जीएबो से नइए कोनो इंजाम माए-बेटा आ बुढ़ि‍या दादी छी तीनू तीन जान तीनू मरि‍ संगे जाएब श्‍मशान एहेन स्‍वार्थी दुनि‍याँकेँ की देखब जैठाम गरीव जीबै छै कुकुर समान।” उन्‍टा साँस छोड़ैत चि‍ल्‍का जेना कि‍छु बाजि‍ रहल अछि‍ भूखक आगि‍मे छूटि‍ रहल प्राण नै कोइ अछि‍ दयावान ऐठाम चहुदि‍श देखै छी बदलल इंसान रावण-कंशसँ पैघ शैतान। सुरेन्द्र 'शैल' अभिसारिका

रवि रश्मि पावक दमकि कुंदन, अंग गमकय सुरभि चंदन। दृष्टि कज्जल चपल खंजन,  नटति रंभा इन्द्र नन्दन।  चमकि हीरक जड़ित कंगन, खचित मणि गर हार कंचन। आभरण श्रुति पटल सज्जित  नासिका नग कनक शोभित। मोहिनी पद चूड़ मोहय,  पीन कटि कुच शिखर सोहय गहन कुंतल रंग श्यामल, विटप चंदन भुजग लटकल। दसन दाड़िम छिटकि दामिनि, लचति कटि मुख मृदु सुहासिनि। लाल अम्बर वदन झलकय, उदित रवि क्षिति रक्त पसरय। हास सखि मन आस जगवय, पिय मिलन उर तार झनकय धड़कि हिय फल- विल्व डोलय, निहुरि मुनि पुनि नयन खोलय। चलत नहुँ महि फूल विछवय, वारि नीरद कलश छिलकय। इन्दु कुमदिन मुख निहारय, अधर अम्बु धनु-शक्र भासय मेनका-रति दर्प खंडित, चूक तप विधि कयल दंडित। व्योम खग उड़ि मुदित कुंजन, सुमन भम भुमि भमर गुंजन। नयन मुग्धित रूप निरखत,  'शैल' उर आनन्द बरसत। सुरेन्द्र शैल,भदहर,दरभंगा। सासुर

केकरो सासुर रसगर हेतै, हमर तित्त कसाय। जँ वियाह सँ पहिने जनितहुँ, जैतहुँ कतहु पड़ाय- वियाह एहि गाम ने करितहुँ,  भले कुमारे रहितहुँ। पहिलवेर जे सासुर गेलहुँ, सकरी मे नहिं टिकट कटेलहुँ। उगने मे टीटी छल ठाढ़, करिया भुच्च लगै यमराज। हम बुद्धू ओ छल बुधियार, सोझे ठकलक एक हजार। एखनो से जे मोन पड़ैयै, भितरे-भीतर कूह उठैयै। कहू एनामे सासुर जाई, सासुर भेल बलाय॥वियाह॥ रहै सेहन्ता एहि फगुआ मे, सासुर मे जा रंग खेलाई। सरहोजिक हाथक पूआमे, भेटत रस-रंग भरल मलाई। रंग-विरंगक सारि भरल छथि, कियो 'सरही' कियो 'कलमी' आम। कियो 'सिनुरिया' 'काँचभोग' छथि, बम्बई-सिपिया-केरवी नाम। किनको बोल ओल सन कब-कब, कियो लौँगिया मिरचाई। कियो कवछुआ लागथि भक-भक, कियो छथि ऐंठिलाहि वियाह फगुआ दिनक कहू की हाल, हमरा जी के भेल जंजाल। भोरे उठि मड़वा पर ऐलहुँ, नहिँ जनलहुँ जे केना धरैलहुँ। धमधुसरि सरहोजि पकड़लनि, जेठकी-छोटकी चित्त खसौलनि। मोबिल लेपलनि मझिला सार, सारि देलनि गोबर के ढार। सासुर छाती पर बैसल छल,  नीचा हम कोकियाय ॥वियाह॥ रहै मोन जँ सासुर जैवनि, दर्जन भरि पूआ हम खैवनि। माउअसक वेरि ने मूड़ी उठैवनि,  दही सोझ मटकूड़ी खैवनि। मधुर पचासे दैवनि उड़ाय, दहिवाड़ा सभ देत पचाय। मुदा कपाड़ ने एतहु छोड़लक, सभ आशा पर पाथर फोड़लक। मोनक आस मोने रहि गेल, सारक कैल उकठ लहि गेल। जाय माय के फुकलनि कान, संकट मे छथि पाहुन,जान। भोरे उठि ओ भांग छनौलनि, चिलम चारि दुपहरे चढ़ौलनि। तइपर पीलनि खूब शराब, तैँ भय गैलनि पेट खराब। सूनि सासु गेली पतियाय ॥वियाह॥ सारक फूसि सँ भय गेल रोग, प्रतिफल, व्यंजन भेल अभोग। हुनका आगू सजल सचार,  मरसटका छल हमर कपार। देखि आँखि सँ टघरल नोर, मुँह दुसै छल केराक झोर। राति अहुछिया काटि वितैलहुँ, भिनसरवे मे गाम पड़ैलहुँ। मारी मूँह एहेन सासुर केँ, अमृत घंट भरल माहुर केँ। कहू कोन हम फूसि बजै छी, अपना मोनक व्यथा कहै छी। करी कामना सभ युवजन केँ, हमरे सासुर होनि वियाह। ओल-कवछुआ-लौँगिया मन मे, 'शैल' सरित रस-रंग प्रवाह। राजीव रंजन मिश्र गजल

भेटत नै किछु ठहरिकँ जिनगीक बाटमे  ताकब नै किछु लचरिकँ जिनगीक बाटमे

जीते बा हार हाथ खेलब जँ खेल ई हासिल नै किछु खहरिकँ जिनगीक बाटमे 

किछु चक्र थिक दैव केर जे डेग डेग पर बाँचब टा नित रगऱिकँ जिनगीक बाटमे

कानब सदिखन दहो बहो नीक गप्प नै हारब नै हिय हदरिकँ जिनगीक बाटमे

राखब "राजीव" सोझ मोनक विचार टा चमकत चन्ना पसरिकँ जिनगीक बाटमे

2222 121 221 212 गजल भेटत नै किछु ठहरि क' जिनगीक बाटमे ताकब नै किछु लचरि क' जिनगीक बाटमे जीते बा हारि हाथ खेलब जँ खेल ई हासिल नै किछु खहरि क' जिनगीक बाटमे किछु चक्र थिक दैव केर जे डेग डेग पर बाँचब टा नित रगड़ी  क' जिनगीक बाटमे कानब सदिखन दहो बहो नीक गप्प नै हारब नै हिय हदरि क' जिनगीक बाटमे राखब "राजीव" सोझ मोनक विचार टा चमकत चन्ना पसरि क' जिनगीक बाटमे 2222 121 221 212 मुन्नाजी बाल हाइकू (हाइकूमे बाल रचनाक पहिल प्रस्तुति) १ पानिमे माछ छप-छप करैए हमरे जकाँ २ छोड़ि खेलौना बन्नुक पकड़लौं ताकू भविष्य ३ निश्छल मोन कँटएल जाइछ बाँचत कोना ४ हथिनी रानी शेरक शासनमे कहू राजाकेँ ५ सोरहा भेलै नेना छै होशगर पैघे बताह ६ चोर सिपाही खेल बिसराएल विडियो गेम ७ राजा आ रानी मोन बहटारए ज्ञान नै दैए ८ चलैए रेल छुक-छुक करैत पटरीपर ९ फुलवाड़ीमे दुखी राजकुमारी राजा बैंसैए १० राग रागिनी संस्कृत केर श्लोक मोनमे राखू ११ शीतल पाटी आब चैन नै दैए नेना सभकेँ १२ लाल चटनी चाटि-चाटि कनैए मोन बुझाउ रामदेव प्रसाद मण्‍डल “झारूदार” अभि‍नन्‍दन ऐ आवाज सुननि‍हार सभ गोटा सुभ सि‍नेह, प्यार आ नमस्‍कार। प्रफुल्‍लि‍त छी हम बरि‍यारती समा रहल नै हृदए फूल। चीर स्‍मरणीय स्‍वागत पाबि‍ कऽ रहल याद नै राहक शूल। जगमग करैत जनकपुर नगरी श्रद्धामय नर-नारी कूल। की वर्णी ऐठामक शोभा बुझा रहल सभ मंगलक मूल। मंगलमय ऐ शुभ धड़ीमे वर-वधु केलनि‍ कबुल सुख-दु:ख दुनू बाँटि‍ बरबरि‍ रोपब नव बगि‍या केर मूल। चीर जीवी होउ दुल्हा-दुल्हीन रहत आवाद नव श्रृजि‍त भवन। दऽ रहलौं आशि‍ष हम जगवासी गम नै देत कोनो झोंका पवन। इरा मल्लिक बाल गजल

भरि रस्ता कादो कीचड़ पसरल बाहर कोन्ना जेबै हम  कन्हा चढ़ि इसकूल जायलेल बाबू के कोना मनेबै हम।

मुसलाधार बरसै छै बदरा  एक्कोपल लेल थमतै नै इसकुल पहुँचै मेँ देरी हेतै निश्तुक्की छै मारि खेबै हम।

गल्ली कुच्ची अँगना डबरापोखैर भरि गेलै खेतक आरि पानिये चानी पीटल छै सबतरि नाव कोना चलेबै हम।

लकड़ी काठी जारैन चुल्हा सब तीतलै बड्ड मोशकिल छै सेहोदेखि माथठोकि कहैछै माँजी भातो कोना पकेबै हम।

सँगी साथी सबघर मेँ घुसरल कियो नहिँ बहराबै छै इन्दरराजा ढोल बजाबै ढम्म सँ के नचतै जे गेबै हम। वर्ण- 22 बाल गजल

अछि बड्ड जिद्दी बरसात कहल नै मानै एको बात।  कहल-----

घटाटोप बादल आवारा ठुमकि के नाचै चारु कात। कहल-----

कखनोटिप-टिप कखनोझम-झम भिजलै धरती गाछे पात। कहल -----

भैया के भिजलै कापी बस्ता जे नै कराबै मेघ बसात। कहल-----

सब मौसम छै आनी जानी बरसातक फरके बात। कहल------

सँग कजरी झूला साजल इन्द्रधनुष के रँगे सात। कहल------

वर्ण-10 शृंगार गजल ( श्रृँगार.मल्हार ) बरखा बरसै छै दिन राति अहाँके इयाद सताबै ओहिपर कारि अन्हरिया राति अहाँ बिन चैन न आबै। अहाँ----

घिरलै कारी घटा घनघोर वन मेँ नाचै मोरनी मोर एसगर सून्न भवन छै मोर बिजुरिया देखि डराबै। अहाँ----

बरसैत कजरा के धार हमरा इहो दैत उपराग प्रीतम द्वारजोहै छी बाट अहाँके मोरा हिय हहराबै। अहाँ -----

पिया अहाँ बसु दूरदेश मेघ सँ भेजू अपन सँदेश करोट फेरैत कटै छै मोरा रतिया नैना नीर बहाबै। अहाँ-----

बून्ने मोती सजल सब पात देखि सिहरै छै मोरा गात भिजै कजरा गजरा बिंदिया कोयलियो के बोली सताबै। अहाँ----

विलमनै करियौमहाराज अबियौ छोड़ि काम आ काज हमर कँगना पायल के झँकार रहि-रहि अहीँके बजाबै। अहाँ---

वर्ण -21 बिन्देश्वर ठाकुर, धनुषा/ नेपाल गजल 

अही छी हमर भवानी मैया हम अहाके मानै छी करब सबदिन पूजा पाठ मनस हम इ ठानै छी 

उजडल घर बसाबु मा एना किय फटकारै छी  रातिभरि निन्द नै आबे सद्खन अहा ल कानै छी 

क्षमा करु या सजा दिअ हम त अहिक सन्तान छी  अज्ञानी हम पुत्र अहाके बिधान नै किछु जानै छी 

चिनी लैताह दूध लैताह कही न माइ गे बाबुके  लड्डु आ पेडा हमहु बनेबै तै त चिकस सानै छी 

अही जननी दु:ख हरणी करु हमर उद्धार हे  शक्तिस्वरुपा जगदम्बे हम अहाके पहचानै छी 

सरल बार्णिक बहर  मात्रा = १९ पुन: चमकतै मिथिला राज [कविता] जय मैथिल जय मिथिला बासी  करु सब मिलिक जयकार  बन्द हेतै कुशासन सबके  पुन: चमक्तै मिथिला राज ।। 

सब ढेलफोरबा नेता तेहने  लैय टिकट,कुर्सी, भत्ता पार्टी अते जे नाम याद नै  जन्मल जेना गोबरछता ।। 

के रावण के अछि कुम्भकरण  ककरा बुझी न्यायक भगवान  झोरा भरब रणनीति सबके  बस रामलीलामे बने राम ।। 

हाथीसन दुमुहा दात छै  एक देखाबे दोसरस खाए  पीठ पछाडी छुरा मारत  मुहपर बाजत भाए यौ भाए ।। 

आइ पद छै घुमिलेब दि  बढका बढका गाडीमे  छिनब जखने छुछुनर बनतै  छिछ्यैतै बारी-झारीमे ।। 

माङ्गल भीख नै भेटतै ककरो  सभ जनता ज मिलबै आब  बन्द हेतै कुशासन सबके  पुन: चमक्तै मिथिला राज ।। 

आबु किय नै मिलि बाटिक  एहि दानवसभके स्राद्ध करी  हक छिनब ज पाप थिक त  किय ने एक अपराध करी ।। 

गरीबो दुखिया चैनस जियत  हेतै गाउ समाज उद्धार  बन्द हेतै कुशासन सबके  पुन: चमक्तै मिथिला राज ।। अनिल मल्लिक गजल

जिनगी भरि'क साथ बीचेमे किए छोड़ि देलियै हमर ओ सपना सतरँगी किए तोड़ि देलियै 

कहियै केकरासँ सुनतै के सिकाइतो हमर दोख कहाँ कहलौं नया रस्ता किए खोजि लेलियै

रहि रहि आब भीजैत रहै छै जे आँखि हमर ई सागर छै नोरक अहिमे किए बोरि देलियै

पहिल भेंटक फूल सुखि गेल तैयो रखने छी मोनक फूलबारी कहू अहाँ किए नोंचि लेलियै

सहलो ने जाइया केहन जरै छै मोन हमर बिरहक आगि मे जे हमरा किए झोंकि देलियै….! (आखर-१८) आशीष अनचिन्हार विहनि गजल ओकर हाथसँ छूल अछि देह सदिखन गम गम फूल अछि देह प्रेमक उच्चासन मिलन छैक दू टा घाटक पूल अछि देह कोना चलि सकतै गुजर आब देहक तँ प्रतिकूल अछि देह गेन्दा सिंगरहार छै मोन चम्पा ओ अड़हूल अछि देह ऐठाँ अनचिन्हार चिन्हार सभ देहक समतूल अछि देह मात्रा क्रम-222-2212-21 हरेक पाँतिमे रवि‍ भूषण पाठक फसली पद्य १-७ १.मकइ जिंदाबाद मकइक गाछक सभसँ ऊपर नाम-नाम फूल जेना सिपाहीक कनटोप आ देहपर पसरल हाथ भरिक पात जेना सिपाहीक डाँरपर राखल अस्‍त्र आ बीति‍-डेढ़-बीतक बाइल जेना गस्‍सल-गस्‍सल कारतूस खेतमे सजल लाइनमे गाछ जेना युद्धसँ पहिलेक सिपाही आ हे मिथिले ई सिपाही मिथिलाक दारिद्रय दुख क लेलिऐ के मानत आ यादि करू पूसा यादि राखू मसीना ई थिक मिथिलाक नया खजाना जतए जनमि रहल मिथिलाक नवपूत-सपूत जतए बागु भऽ रहल पलटनक पलटन सेना जे एकदम कटिबद्ध दुर्भिक्ष सबहक विरूद्ध आब देखिऐ ने केते जान कोसीमे रौदी, दाही झौंसीमे जय मिथिला, जय मसीना, जय मकइ आ मेंहि‍क्का चाउरकेँ मुर्दाबाद नै कहितौं जिंदाबाद केना कहिऐ जखनि‍ कि ई हरदम जीएने रहलै बस एक आना मिथिलाकेँ। २. खेसारी नहितन खेसारीक खेती बस सरकारे रोकलकए गाम-समाजमे अखनो बागु-रोपनी खेत-पथारमे अखनो कमौनी आ अखनो छीम्‍मीमे अहिना दाना भरौनी तहिना कटनी आ तहिना दौनी ई निखिद्ध ओहिना थारीमे ओहिना हमर देह आ खूनमे हमर भाषामे ‘बूरि खेसारी नहितन' आ जे असलमे खेसारी रहै सएह दोसरकेँ खेसारी कहए आ असली खेसारी राहड़ि‍क छिलका पहिरि‍ बनल रहए तीमनराज आ करैत संक्रमण पसारैत रोगक प्रोटीन। ३.  भगवान मरूआ आ मिथिला आ भगवानोकेँ पता रहनि‍ जे ऐ देशकेँ मरूए बचा सकत एहेन फसिल जे रौदी आ बरखाकेँ किछु नै गुदानै एहेन जे भेलिऐ बरखा तैयो नीक आ नै भेलिऐ तैयो तहिना एहेन सक्‍कत कि गिरियो कऽ तहिना एहेन चिक्‍कन कि जत्तोकेँ पकड़ि‍मे नै आबै ने लाल ने कारी आ मरूओ विदा भऽ गेलै मिथिलासँ जेना कि बहुतो चीज निपत्‍ता भऽ गेलै जेकर नाम रेड डाटा बुकोमे नै। ४. अल्हुआ कऽ सप्‍पत

अल्हुओ खेने रहै सप्‍पत जा तक बरहब नै बाहर नै निकलब जमीनक बाहर पसारने लाल-‍हरिअर लत्‍ती लोककेँ भरमाबैत रहै आ नि‍च्‍चाँमे जमा करैत खूब रास कार्बोहाइड्रेट एत्ते मिठास कि कुसियारोकेँ ईर्ष्‍या होए कखनो-कखनो कीड़ा-मकोड़ा सेहो सटि कऽ चाटनाइ शुरू करए आ धरतीपर आबिते रूपआमे पसेरी भूक्‍खल, अधभूक्‍खल, जोगाड़ी व्रती साधु, सन्‍यासी कांच, उसनल, पकाएल दूध, दही, तीमन संग अल्हुआ तिरपित करए लगै बिना पुछने गाम टोल जाति आ फल्लाँ गामवाली फेर घूमि रहल छथिन नेने दौरी-चंगेरा नेने उधारक आस रूपआमे पसेरी अल्हुआ निराश नै करतै।

५. महि‍क्का धान महिक्का धान घेरि लए भरि बिगहा आ दाना दए मोन भरि तँ एकर सुगंध लऽ कऽ की की करी केत्ते बान्‍ही आ केत्ते जोगा कऽ राखी आ ई उपजए हमरा खेतमे चलि जाए बाबू भैयाक कोठीमे तँ एहेन बुलनहारकेँ केना मनाबी आ हरि‍दम पैंचक फेरा अलग वौकाक माए वौकाक भौजी आबथिन लऽ लऽ कऽ अप्पन गिलास आ कहथिन जे हमरो उपजत तँ घुमा देब आ केना कऽ बि‍सबास दियाबी के हमरा घरमे एक्को कनमा महि‍क्का चाउर नै ई महि‍क्का धान देलक बदनामी सुआदोसँ आ समाजोसँ।

६. कविता आ धान हम बेरि-बेरि चाहलिऐ जे ई महि‍क्का धान हमर कवितामे आबि कऽ गमकए मुदा हम रोपिऐ तुलसीफूल आ दाना बनै खोरा केर हम चाहिऐ जे तुलसीएफूल जकाँ बस एके-दू कविता लिखी हम मुदा लिखए लागिऐ तँ कुम्‍भी अप्‍पन जाल फैलाबए लागै हम सोचिऐ जे एक-दू पाँतिकेँ डेली जोड़ी मुदा कागत-कलम लिऐ तँ ढैचा जकाँ किच्‍छो सम्‍हारेमे नै रहए हम अखनो आश्‍वस्‍त छी जे एकदिन हमरो खेतमे तुलसीफूल उपजत।

७. कनियाँ आ कविता जँए कि मकइ आ खेसारीपर लिखल देखलखिन हुनका पक्का बि‍सवास भऽ गेलनि‍ जे हम धान आ मरूओपर जरूरे लिखब तँए चेतावनी दैत कहलखिन जे पगलाउ जुनि जे ई आलतू-फालतू अगर-मगर सभ लिखै छी जखनि‍ देखी कागत-कलम नेने मुसकिया रहल छी ई पगलपनी केत्ते दिन भोजन बनबी हम कपड़ा-लत्ता साफ करी हम आ अहाँ बस बैसल बौराइत रहब हे देखू हम बिगड़ि‍ कऽ नै कहै छी एक-ने-एक दिन अहाँक दिमाग ब्रष्‍ट कए कऽ रहत जेना कि हम कविते नै सुनलिऐ आ ओ सुनबए लगलखिन दिनकरजी आ आरसी बाबूक कविता जेना कि हम किछु बुझिते नै छी हे यौ हम बैसबै तँ आहूँसँ नीक लिखब आ ई नै बूझियौ जे नीक लोक सभ अहाँक प्रशंसा करैत अछि आ यदि आहीं सन पागल हेतै ऐ धरतीपर तँ आर की कए सकै छै। बाल मुकुन्द पाठक गजल

हम हाल की कहौँ आब बेहाल अछि बड्ड कठिनसँ बीतल ई साल अछि

जानि नै मृत्यु हाएत केहन हमर जीबैत जिनगी बनल जंजाल अछि

भ्रष्ट्राचारक गप्प जुनि करु भाइ यौ नेता अफसर घूसलऽ नेहाल अछि

खूब मजा करु जा धरि अछि जिनगी काल्हि लऽ जेबाले बैसल उ काल अछि

साँच बाजनिहार नै अछि कोनो ठाम यौ फूसिक व्यापारमे बड्ड माल अछि

कलपै कानै भीतरे भीतर 'मुकुन्द' प्रेममे सभक होएत ई हाल अछि

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 14 गजल

जहियासँ अपन घर नाहि अछि तहियासँ केकरो डर नाहि अछि

मोनक बात केकरा कहब आब ऐहि ठाम कियौ हमर नाहि अछि

वियोगे हमतऽ कलपौँ असगर अहाँ पर कोनो असर नाहि अछि

सास-पूतोहमे कलह मचल छै बाँकी ऐहिसँ कोनो घर नाहि अछि

माँग बढ़ल दहेजक चहुँ दिस आदर्श वियाहक वर नाहि अछि

सभ ठाम दंगा पसरल 'मुकुन्द' शीश सहित कोनो धड़ नाहि अछि 

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 13 अनामिका राज कविता- क्षमतावान झूठ आ साँचक जँत्तामे पिसाइए स्त्री। जे स्त्री सभ अलग-अलग रूपमे पुरुषक सेवक बनि कऽ रहैत अछि, से पुरुष ओइ सेवाक फाएदा बुझि कऽ ओकरा अपन पएरक धुरा-माटि बुझैत छथि। स्त्री संसार रचैए, स्त्री पालन करैए, बसबैए सभ दिन नव-नव संसार। करैए नन्हकिरबामे नव बुइध आ ज्ञानक संचार सभ डगमगाइत डेगपर पुरुषक सहचर बनैए जगाकेँ, बचाकेँ रखैए सदिखन पुरुषक रंग-बिरंगा संसार। अपनाकेँ कखनो सटि कऽ, तँ कखनो कात कऽ कए। ओ स्त्री सतेलापर संहारिणी सेहो भऽ सकैए। सन्दीप कुमार साफी कविता १-३ १ बैशाखमे दलानपर आउ यौ यार, खेलाइ छी तास बैस कऽ अखन करब की चलू करै छी टेम पास बेर झुकतै तँ जाएब करैले घास चण्डाल सन रौद लगैए चारि बाजऽ जा रहल अछि लगैए अखन एक बाजल अछि महींस खोलब ओइ बेरमे पोखरि लऽ जाएब नहाबैले सुतलोमे गरमसँ नीक नै लागए खाटोमे उड़ीस करैए कछर-मछरसँ नीन्द नै अबैए पुरबा हवा सेहो पेट फुलाबए घामसँ देखू गंजी भीज गेल कौआ डाढ़िपर लोल बबैए मेना जामुनपर झगड़ा करैए बगड़ा दलानपर ची-चू-ची-चू गीत सुनाबए एहन गरम नै देखलौं कहियो रातिकेँ मच्छड़ दिनकेँ माँछी तंग करैए आउ यौ यार खेलाइ छी तास २ सेवा मन होइए करितौं बेटाक बियाह पुतहु लेल हिक गरल अछि काज करैत काल आब देह थाकि गेल भानस करैक शक्ति नै अछि बेटी भेली, अप्पन सासुर गेली असगर अंगनामे नीक नै लगैए होइत पुतहु तँ एक हाथ सेवा करितए मुदा एगो बातक डर लगैए पुतहुक चर्चा देख टोलमे अही सेवासँ चित्त हराइए पढ़ल-लिखल कनियाँ सभ गेल आदर सत्कार सभ बिसरि गेल आठ बजेमे, सुति कऽ उठए चुल्हा अंगना सभ, अहिना पड़ल-ए के करए ससुर-भैंसुरक परदा रीत-रेवाजक उड़ाबए गरदा एकर देखसी करए, सभ कनियाँ ई नै लागए ननदि, साउसकेँ बढ़ियाँ ऐ पढ़ल लिखलसँ घास-छिलनी नीक मन होइए करितौं बेटाक बिआह पुतहु लेल हिक गरल अछि। ३ वर बिकाय लगनमे वरक रेट नै पुछू यौ बाबू मारा माँछक जेना दाम बढ़ैए कनीको पढ़ल-लिखल रहल तँ बेटाबला अप्पन मोँछ सीटैए लड़कीबलाक खेत बिकाइए देखू जमाना ताल ठोकैए दुल्हाक डिमाण्ड अछि, पाइ सन करीजमा लिखल-पढ़लमे सभसँ तेज पँचमामे पाँच बेर अठमामे आठ बेर दसमामे दस बेर लड़का फेल एहनो लड़का लगनमे बिक गेल वरक रेट नै पुछू यौ बाबू मारा माँछ जेना दाम बढ़ैए। भालचन्द्र झा आजुक बेटी कराटेक किलासमे ओ एखने-एखने किछु नब गुर सिखलक अछि साइत। अकास दिस पएर उठा कऽ जखन ओ किक् मारैत छैक, तँ करेज मुँहमे आबि जाइत अछि। जे कहीं अकासमे भूर ने भऽ जाइ। परम्पराकेँ गोदड़ी बना कऽ सनातन धर्मक रक्षा करएबला ई अकास, आब जर्जर भऽ गेल छैक। नब जमानाक कराटेसँ- मजगूत बनल पएरक छोटछिनो अगातसँ, कऽ सकैत अछि ओकर नोकसान। भने जर्जरे… मुदा आइयो ओ तनल अछि कतेको लोकनिक छप्पर बनि कऽ। ऐ आश्रित सभक क्रोधसँ- आबि सकैत छैक बुइकम्प। मौला सकैत अछि हुनका लोकनिक क्रोधसँ, नव अंकुरक डिम्भी। सेकल जा सकैत अछि कतेको राजनैतिक रोटी- महिला सशक्तिकरणक नामपर। बेटा-बेटीक सनातनवाद- हिला सकैत अछि तथाकथित समाजिक अवधारणाकेँ। तैओ- ओकर ऐ तरहक आबेसकेँ देखि कऽ आश्वस्त होइत छी हम, मोनक कुनू कोन्हमे। जे आब ऐ नपुंसक फुफकारसँ, छोटकारा पाबक गुर सीखि लेलक अछि ओ। कराटेक किलासमे… (भालचन्द्र झा, २००८) अमित मिश्र हाथी गेलै भोज खाए

एक जंगलमे पण्डीत हाथी खाली सदिखन पेटक भाथी एक बेर बकरी केलकै व्रत भोजनमे एलै हाथी मस्त भोजनमे आलूक परौठा खा रहलै चाटि-चाटि औंठा आँटा खतम आलू निंघटल पेट एखन आधो नै भरल घामे-पसीने बकरी कानै खाली पेट तँ भोजन जानै अन्तमे बकरी केलक प्रणाम धन्य प्रभु !आब दियौ विराम हाथी बाजल "हम नै मानबौ" और खेबौ, घरो लऽ जेबौ कानै बकरी, हाथी बजा कऽ खाइ छै हाथी सूँढ़ नचा कऽ कामिनी कामायनी संग दिअ सदिखन अहिना संग दिअ सदिखन अहिना ॥ आहाँ कहैत छी जी लेबै त / बिसरि जायब ओही गड़ैत क्षण के । अगिन ,पहाड़ ,खोह ,खधिया,/ बड़,पीपर ,ताड़ , आ पिच्छड़ी/ चढ़ल जतय स ,पिछड़ि गेलहू फेर / नित दिवसक अपमान भेटल बस / भरि पायल संसार स मन त / पड़ा रहल छल स्वास अगाड़ी/ तड़फ़ैत खसल जल बिन मच्छरी/ जरैत रौद /सुलगैत धरती / खलिए पएर,होश से गुम छल/ करी ने सकल विश्राम कनिकबो / चलबा लेल उध्यत सदिखन / चलईत जिमहर नेने मोसाफ़ीर / कठपुतरी छल ,जानै कक्कर/ मूक, बधिर सन ,बढ़ैत चलै छल / तजि रहल छल ,संग जे तन के / बांधी रहल ओकरा मन बलजोरी / किन्तु एक क्षण एहेनो आयल / लागल डेग बढ़त नहि एको / चट्टान लग खसल पड़ल त / दूर ठाढ़ दरिया मुसकायल / गरा सुखि अवरुद्ध पडल छल / अयलहू अहा सनेस नेने कीछु/ कहलहू अमृत रस अछि पी लू /बिसरि जाऊ पाछा के बाट सब / आगा के क्षण हसी का जीबू/ संग देब हम क्षण क्षण अहा के / तखन हमर हिम्मत छल घूरल/ देव दूत संग सुख सब पाओल / अहिना चलै चलाबू नैया/ गाबी हम झुमरि जी भरि के ।। दुखन प्रसाद यादव छीनाझपटी मारि‍-काटि‍ बढ़ि‍ रहल दि‍न-दि‍न छीनाझपटी जारी बुढ़ि‍या-जुअनकीकेँ की कहूँ बुच्‍चीओक दि‍न छै भारी। की कहि‍यौ दाइ मन होइए नै जीबी मरि‍ जाइ कि‍यो ने बँचतै आइ टोल-पड़ोसीया सभ भुताह छै आइ। बरहम देवक कठघारा टुटल दबाइ-उबाइ भेल चाेरी मोहम्मदोक कठघारा टुटल लूटल मशीन-ति‍जोरी। मोटर साइकि‍ल घरसँ उठै छै शि‍क्षक पि‍टाइ खाइए बैंक-ति‍जोरी माल-खजाना थाना आइ लूटाइए। सरकारोक हाल छै खसता केकरा के देखैए ओसामा बीन लाखो-हजारो बन्‍दुक छतियबैए। रक्षक-भक्षक आइ लगैए केना कऽ जीबै दइया अन्ना-केजरीवाल की करता सभसँ पैघ रूपैआ। नेता-मंत्री सभ भ्रष्‍ट छै सभ भऽ गेलै चोरे सुपर बौस तँ सुपर चोर अछि‍ जेकर सभठाॅ सोरे। चौदह-चौबीस नौजवान सभ दि‍शाहीन भऽ गेल अछि‍ बकरी-पठरू खा खा सभ कोइ साँढ़ भऽ ढेकरैत अछि‍। शि‍क्षि‍काक अपहरण होइत अछि‍ रेप सरेआम भारी बुच्‍चि‍या-बुचनी लूटल जाइत अछि‍ देखत के लचारी। पुलि‍स-आॅफि‍सर सभ देखैए छै वि‍डम्‍बना भारी। सभकेँ अपन लि‍अए पड़त अपन जि‍म्‍मेदारी की कहि‍यौ भाय चन्‍द्रशेखर लक्ष्‍मीवाइ बनही आइ। अजादी सबहक जान छै जन्‍मसि‍द्ध अधि‍कार हमर अजादी सबहक जान छै लोकतंत्रक धरोहरि‍ छै ति‍लकक पैगाम छै। सोनाक चि‍ड़ि‍याँ छल भारत वि‍देशोक नजरि‍ गड़ल फूटा-फूटा कऽ हमरा लूटलक गुप्‍तक बगि‍या उजड़ल। पाँच सए बरख यवनक शासनसँ सभठाम कोहराम मचल दू सए बरख फिंरगी हमरा लूटि‍-लूटि‍ बरबाद केलक। सोना-चानी कच्‍चा मालसँ भरल खजाना खाली छै ओकरा पाटैमे अखनि‍ धरि‍ देखि‍यौ तँ तंगहाली छै। अठारह सए संतावनमे सि‍पाही वि‍द्रोह भेलै बेरहम अंग्रेज कहूँ की कनेको ऐसँ झुकलै। गाँधीबाबा आन्‍दोलन सत्‍याग्रह देशमे जब पजरल शहर-गाम आ चौराहा सभठाम सबहक भृकुटी तनल। भीतर आन्‍दोलन बाहर नेता जीक फौजक तान छै ‘अंग्रेज भारत छोड़ू’ नेहरूचाचाक पैगाम छै। चन्‍द्रशेखर, खुद्दीराम बोस, पीर अली शहीद भेलै जालि‍याबाला बागमे शहीद खूनक नदी बहि‍ गेलै। मजरूल हक जय प्रकाश, लोहि‍या जीक योगदान छै राजेन्‍द्र बाबू, मोतीलाल, बाबा साहैबक प्रति‍दान छै। पनरह अगस्‍त उन्नैस सए सैतालीस भारत अजाद भेलै लालकि‍लासँ नेहरू चाचाक शांति‍क संदेश भेलै। जाति‍-पाति‍-मजहबसँ उठि‍ कऽ हमरा सभ एकजूट रही फूट-टूटसँ देश बँचा कऽ भारतकेँ मजगूत करी। डाक्‍टर कलाम, जगदीश चन्‍द्र, भाभाक तँ बस काम छै बढ़ू खूब आ देश बँचाबू महा शक्‍ति‍ए हमर मुकाम छै। बि‍हार अछि‍ सि‍रमौर धरा केर बि‍हार अछि‍ सि‍रमौर धरा केर महि‍मा एकर महान छै गौतम वर्द्धमान महावीर वि‍देहक जे धाम छै। लोकतंत्रक जन्‍मभूमि‍ लि‍च्‍छवीकेँ हम सभ मानै छी जनप्रि‍य सि‍रमौर कवि‍ वि‍द्यापति‍केँ हम जानै छी। नालन्‍दा केरि‍ वर्णनमे यात्रीक फहि‍यानक नाम छै गौतम वर्द्धमान महावीर वि‍देहक जे धाम छै। मण्‍डन मि‍श्र भारती जीकेँ देश-वि‍देशमे चर्चा छै प्रथम राष्‍ट्रपति‍ राजेन्‍द्र बाबू कहू केकर नै अर्चा छै। स्‍वतंत्रताक आन्‍दोलनमे बि‍हारक बड़ जोगदान छै गौतम वर्द्धमान महावीर वि‍देहक जे धाम छै। अंग्रेजक सि‍रदर्द वीर कुंमरक नै केतौ जोड़ा अछि‍ योगेन्‍द्र शुक्‍ल बटुकेश्वर दत्त माए भारतीक तोड़ा अछि‍। खुद्दी राम बोस शदीह पीर अली वीर सपूतक गाम छै गौतम वर्द्धमान महावीर वि‍देहक जे धाम छै। राजकुमार लोकनायक जेपी लालू नि‍ति‍शक गाम छै अनुग्रक श्रीकृष्‍ण कर्पूरी बाबू जगजीवन राम छै। अब्‍दूल बारी मजरूल हक वि‍धान चन्‍द्रक पैगाम छै गौतम वर्द्धमान महावीर वि‍देहक जे धाम छै। सच्‍चि‍द्दा नन्‍द चन्‍दा झा ललि‍त बाबूक बि‍हार अछि‍ बी.पी.मण्‍डल सूरज बाबू भोगेन्‍द्र बाबू प्रयाग अछि‍। यात्री दि‍नकर रेणुजीकेँ हम सभ दि‍नसँ जानै छी हरि‍मोहन मणि‍पद्म जगदीश मण्‍डलकेँ पहचानै छी प्रभाकार डी.पी.यादव जुगनु जकाँ करैत प्रचार छै गौतम वर्द्धमान महावीर वि‍देहक जे धाम छै। दुखन प्रसाद यादव, गाम-पोस्‍ट, धबही, भाया- नरहि‍या, थाना- लोकही, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७१०८ (बि‍हार) सुबोध कुमार ठाकुर, चाकरी- सी.ए., हैंठा-बाली (मधुबनी) केकरा सँ कहबै केकरा सँ कहबै रससँ भरल मन, पानिसँ भरल मेघ भेल कारी रंग, बरसत कहिया, हमरो मनक आस पुरत कहिया? नै प्यासले रहल, आ नै प्यासे मरल, अर्द्ध-फुलाएल रहल मनक बगिया, हमर प्यास मिझाएत कहिया? रंग-बिरंगक सपनासँ अछि सजल नैना, केकरासँ कहबै एतेक बियाना, के पढ़त हमर मनक सेहन्ता भरल पतिया, केकरासँ कहबै एतेक बतिया ओम प्रकाश झा गजल आइ किछु मोन पडलै फेरसँ किए भाव मोनक ससरलै फेरसँ किए टाल लागल लहासक खरिहानमे गाम ककरो उजडलै फेरसँ किए आँखि खोलू, किए छी आन्हर बनल नोर देशक झहरलै फेरसँ किए चान शोभा बनै छै गगनक सदति चान नीचा उतरलै फेरसँ किए "ओम" जिनगी अन्हारक जीबै छलै प्राण-बाती पजरलै फेरसँ किए (दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)-(दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ) (फाइलातुन-फऊलुन-मुस्तफइलुन) - १ बेर प्रत्येक पाँतिमे गजल कहियो तँ हमर घरमे चान एतै नेनाक ठोर बिसरल गान गेतै निर्जीव भेल बस्ती सगर सूतल सुतनाइ यैह सबहक जान लेतै मानक गुमान धरले रहत एतय नोरक लपटिसँ झरकिकऽ मान जेतै सुर ताल मिलत जखने सभक ऐठाँ क्रान्तिक बिगुलसँ गुंजित तान हेतै हक अपन "ओम" छीनत ताल ठोकिकऽ छोडब किया, कियो की दान देतै (दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ) (मुस्तफइलुन-मफाईलुन-फऊलुन)- प्रत्येक पाँतिमे एक बेर गंगेश गुंजन नेता जी बकवास करै छथि जीहे टा ओ पेटक पाछू यथा जमीनो नाश करै छथि

कहता हरदम काज बहुत छनि किछुओ टा ने खास करै छथि

जेहने नेता तेहने जनता पाँच बर्ख अवकाश करै छथि

भोटजोगाडू राजनीति में सब कर्मक अभ्यास करै छथि 

अज्ञानी पब्लिक सुनि रहले नेता जी बकवास करै छथि 

लोक ठकयला जाही ठक सँ तकरे फेर विश्वास करै छथि

झरकल जनजीवन अकाल मे नेताजी मधुमास करै छथि

लोकक हृदयक हरियर धरती सपना सँ आकाश करै छथि

नव गुलामीक बेधल गुंजन मुक्तिक फेर प्रयास करै छथि विदेह सदेह:१५ || 210 304 || विदेह सदेह:१५ विदेह सदेह:१५|| 305 305 211 || विदेह सदेह:१५

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