SADEHA — 16

Publication: SADEHA · Issue: 16
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ISSN 2229-547X विदेह सदेह -१६ (विदेह-सदेह १६, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक १४५-१६८) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००-अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html, http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००-अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि,'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. २०००/- संस्‍करण : २०१४, २०२२ Videha Sadeha 16 : A Collection of Maithili Prose and Verse (source:Videha e-journal issues 145-168 at www.videha.co.in). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-४५०) गजेन्द्र ठाकुर- मचण्ड, कियो बूझि नै सकल हमरा-(गजलकार श्री ओम प्रकाश झा), रेस, संपादकीय (पृ. २-५५) अक्षय कुमार झा- प्रेमक अधिकार (पृ. ५६-५७) जगदीश प्रसाद मण्‍डल- पलभरि, रिजल्‍ट (पृ. ५८-७५) उमेश पासवान-अजोह (पृ. ७६-८१) लक्ष्‍मी दास- दुष्‍टपना (पृ. ८२-८४) योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’- खजाना, विजय (पृ. ८५-९९) जे.पी.गुप्‍ता प्रसिद्ध मोनूजी- बेटी रूपी बोझ (पृ. १००-१०२) शारदा नन्‍द सिंह- की करब से अहीं कहू (पृ. १०३-१०३) कपि‍लेश्वर राउत- बड़का खीरा, अधला (पृ. १०४-११५) दुर्गानन्‍द मण्‍डल- बुधि, छुतहरि (पृ. ११६-१२३) राजदेव मण्‍डल- रूसल बौआ, दोख केकर, जाल (पृ. १२४-१६०) जितेन्द्र झा -गतिविधि, सांस्कृतिक सम्मानसँ मजबुत हएत राष्ट्रियताः बिमल, सभासद् साह फरार, सद्भावना कहलक निर्दोष- की भेटत जनकपुर बमकाण्ड पीडितके न्याय? (पृ. १६१-१६७) जगदानन्द झा ‘मनु’- अनमोल झा जीक पोथी “टेकनोलजी”क समीक्षा, मैथिलीमे एकरूपताक अभाब, मनुखक जीवन, बाबीक पिआर (पृ. १६८-१७८) सत्य नारायण झा- अरण्य देश, जनक, निशीथ, बेचारा लोक-,स्मृति (पृ. १७९-१८६) लक्ष्‍मी दास- गंगाजलक धोल (पृ. १८७-१८८) गौरी शंकर साह- छोटकी (पृ. १८९-१९५) डा. शि‍वकुमार प्रसाद- सखारी-पेटारी केर तानी-भरनी, अदि‍या झमकी (पृ. १९६-२१०) ओम प्रकाश झा- कुलच्छनी, बेटीक बिआह (पृ. २११-२१७) डॉ. कीर्तिनाथ झा- शेफाली, फुलपरासवाली आ हम (पृ. २१८-२२३) आशीष अनचिन्हार- निरपेक्ष-गुट-निरपेक्ष, लास्ट टाइम सजेशन, मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग, चिकनी माटिमे उपजल नागफेनी,मायानंद मिश्रक "मैथिली साहित्यिक इतिहास",मैथिली काव्यशास्त्रमे झारू छंदक अवधारणा : स्वरूप आ तत्व निर्धारण,नेपालक नोर मरूभूमिमे, कलंकित चान, तीन टा बिंदु (भाषा केर मनोविज्ञान) (पृ. २२४-२७७) डॉ अरुण कुमार सिंह-सतसठि साला कौशिकी (मिथिला)क लेखा-जोखा (पृ. २७८-२९०) शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’- बड़का साहेव: परम्‍परागत संस्‍कार केर पराभवक वृति चि‍त्र- भाग २, दुःखक दुपहरिया :संसारी संवेदनाक तीख अनुभूति, देवीजी : बालमनोविज्ञानक सहज स्पर्शन , सहज प्रवृतिक गुणात्मक प्रयोगधर्मिता : गुम्म भेल ठाढ़ छी, घृष्ट शिरोमणि महामहोपाध्याय गोनू झा : मैथिल संस्कृतिक द्विरागमन, मैथिली बाल साहित्य उद्भव ओ विकास, "आब ओ नहि एथुन" (लघु कथा), पेटक मारि (बाल विहनि कथा) (पृ. २९१-३३५) अमर कान्त अमर- सुजीतक गन्ध सुगन्ध छोड़ि रहल (पृ.३३६-३३९) उमेश मण्डल- दूध, 81म सगर राति दीप जरए-देवघर, मैथि‍ली : सरकार आ हम सभ, 80म सगर राति‍ दीप जरय'' निर्मलीमे 45 गोट पोथीक लोकार्पण- २८म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी, वि‍देह द्वारा मैथि‍ली पोथी प्रदर्शनी (पृ. ३४०-३६६) नन्‍द वि‍लास राय- मदन-अमर (पृ. ३६७-३८१) पूनम मण्डल-"सगर राति‍ दीप जरय"क ७९ म आयोजन ‘कथा कोसी’ उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे औरहामे सम्पन्न/ ८० म सगर राति‍ दीप जरय सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे उमेश मण्‍डलक संयोजकत्वमे (पृ. ३८२-३८५) राम वि‍लास साहु- बाल-बोध (पृ. ३८६-३९३) सुरेन्द्र शैल- धनुष यज्ञ-सीता स्वयंवर आ जयमाल (पृ. ३९४-३९७) अमित मिश्र- बस एकटा गर्लफ्रेन्ड (पृ. ३९८-३९८) डॉ. बचेश्वर झा- सासुरक साइकि‍लक कथा-बेथा (पृ. ३९९-४०४) जवाहर लाल कश्यप- स्ट्रेश बस्टर (पृ. ४०५-४०८) फागुलाल साहु- माइक डाँट (पृ. ४०९-४१०) अखि‍लेश मण्‍डल- ललि‍याएल मुँह (पृ. ४११-४१३) बि‍पि‍न कुमार कर्ण ‘करण’- सरकारीए नौकरी कि‍ए? (पृ. ४१४-४२१) बेचन ठाकुर- हरि‍या इन्‍सपेक्‍टर (पृ. ४२२-४२२) संजय कुमार मण्‍डल- एकन्‍त (पृ. ४२३-४२९) ललन कुमार कामत- स्‍कूलक फीस, सफरनामा, बेटी (पृ. ४३०-४५०) पद्य- खण्ड (पृ. ४५१-७२८) कामिनी कामायनी- जहिया ओ इतिहास सुनौलक (पृ. ४५२-४५३) मो. गुल हसन- गीत-छोटका कि‍सान (पृ. ४५४-४५५) ओम प्रकाश झा- किछु गजल (पृ. ४५६-४५९) शारदानन्द दास परिमल- पूर्णेन्दु नभांगनमे, फागुनक गीत (पृ. ४६०-४६२) योगानंद हीरा- किछु गजल (पृ. ४६३-४६६) मिहिर झा- किछु बाल गजल, शेर, कता (पृ. ४६७-४६८) बृषेश चन्द्र लाल- चारुभर पसरल अछि, किछु बालगीत्, होरीक गीत (पृ. ४६९-४७२) शिव कुमार झा टिल्लू- किछु हाइकू / शेनर्यू, किछु टनका, शोक सभा, काल-चक्र,हमर अपन कविता, सिनेह, नमन, उधेरबुन, बाबाक कंठी, रीतिक-मारल, बरखा रानी , शैव्याक विलाप, संताप (पृ. ४७३-५१५) पम्मी प्रिया झा- रौ ललटुनमा (पृ. ५१६-५१६) झा हेमन्त बापी- दानव (पृ. ५१७-५१८) राजदेव मंडल- हेलवार (पृ. ५१९-५१९) सुनील मोहन ठाकुर- अहि बेर देखल फागु (पृ. ५२०-५२०) नन्दिनी पाठक- ई कोन हाथ? ई तऽ छाप भऽ गेल (पृ. ५२१-५२२) अब्दुर रज्जाक- घोरमठा राजनैतिक (पृ. ५२३-५२३) प्रदीप पुष्प- शेर,किछु रुबाइ,किछु गजल, गजलक गजल, तूँ,कठपुतरीकें नाच, यै अहाँ, गीत (पृ. ५२४-५३५) मो. असरफ राईन-रुबाइ, किछु कता, किछु आजाद गजल, गीत, पियाकेँ समझना, हमर देश (पृ. ५३६-५४१) किशन कारीगर- बीर जबान, बारूद के ढ़ेड़ी पर बैसल, गजल सन किछु मैथिलीमे (पृ. ५४२-५४५) आशीष अनचिन्हार- मुट्ठी महँक बालु (आर.अनुराधा जीक मूल हिंदी कविता केर मैथिली अनुवाद),निमूह- (कविता), कविता, मुदा किछु तँ करू, किछु बाल कविता,किछु बाल गजल, किछु गजल, दू गजला, हजल,किछु भक्ति गजल (पृ. ५४६-५९५) जगदानंद झा मनु- छुट्टी भऽ गेलै, प्रकृति (बाल कविता), किछु गजल, भक्ति गजल (पृ. ५९६-६०७) नीतीश कर्ण- प्रेमक बुन्नी, कोना सुनाबु (पृ. ६०८-६०९) बिनीता झा- जिनगी, किछु पाँति राधाकृष्ण सरकार लेल (पृ. ६१०-६११) विन्देश्वर ठाकुर- पैसा एतऽ कमा रहल छी, एना मनाएब एहिबेरक दशै, गजल,गजल सन, गीत ,भेटब दोसर दिवालीमे, छठिक शुभकामना, रक्षाबन्धन, अहा किये कनलौ ?, ललकार, फुसिक शान (पृ. ६१२-६३१) पंकज झा- हम बुरबकहा (पृ. ६३२-६३३) बेचन महतो- खुशीके नोर,आउ हमसब एक हउ, सपनाके बिज (पृ. ६३४-६३९) कुन्दन कुमार कर्ण- हजल, किछु बाल गजल, किछु गजल (पृ. ६४०-६५७) बिनीत ठाकुर- जलवायु परिवर्तन (पृ. ६५८-६५८) राम कुमार मिश्र- किछु रुबाइ, किछु गजल (पृ. ६५९-६६३) सत्य नारायण झा- प्रियतम, ब्यथित मोन, मोनक बात (पृ. ६६४-६६६) श्याम शेखर झा- साजन (पृ. ६६७-६६८) पंकज चौधरी “नवलश्री”- जुनि बिसरू (पृ. ६६९-६७०) अमित मिश्र- किछु गजल (पृ. ६७१-६७४) कंचन कुमारी झा- मंजिल (पृ. ६७५-६७५) संजय झा- हे माय तोरा प्रणाम (पृ. ६७६-६७७) शारदा नन्‍द सिंह- नमरीक भाउ तेहेन ने दरकल, अयोग्‍य शासक, चि‍रकि जाएब, भूमि‍जा भैया (पृ. ६७८-६८४) अरुण चन्द्र राय- अर्थशास्त्र (पृ. ६८५-६८६) इरा मल्लिक- संग अहाँक पाबि, किछु गजल, गीत (श्रृन्गार), सूर्जक पहिल किरण (पृ. ६८७-६९६) सुरेन्द्र शैल- पोसुआ कुकुर (पृ. ६९७-६९८) रसिक लाल सदाय-दीनक दुर्दशा, अनुभव,स्‍कूल गीत (पृ. ६९९-७०२) महेश झा 'डखरामी'- सपना, उनटा बसात, अनुराग,राधे श्याम, बेटी, मनोद्गार, क्रोध, छैइठ मैय्या, नारी (पृ. ७०३-७१२) शेफालिका वर्मा- दीयाबाती मनेलौं आली (पृ. ७१३-७१४) कैलाश-जहिना करब ओहिना पाएब (पृ. ७१५-७१७) संतोष कुमार राय 'चंदू'- गिरवी, प्रधानमंत्री के छथि? (पृ. ७१८-७२०) डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- ओजोन, प्रदूषण (पृ. ७२१-७२६) राजीव रंजन मिश्र- गजल (पृ. ७२७-७२७) स्व. कविवर सीताराम झा- गजल (पृ. ७२८-७२८) 2

गद्य खण्ड गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक टटका नाटक मचण्ड पात्र मुतालिफ: पैघ-पैघ आंखि बला एकटा युवा भाषा अनुवादक (बा अनुवादिका) हबीबुल्ला: तस्करक सरदार एकटा खुफिया अधिकारी खुफिया अधिकारीक अधिकारी किछु सिपाही आतंकी लीडर अंक १ (मुतालिफक पैघ-पैघ आँखि... जेल जाइत कोर्टक हाजतमे, दौगि कऽ जा रहल अछि। ओतए सिपाहीकेँ खुफिया अधिकारी खेनाइक पैकेट दैत अछि। पुलिस खेनाइक पैकेट मुतालिफकेँ देलकै।ओकरा लग एकटा भाषा अनुवादक (बा अनुवादिका) अछि।) मुतालिफ: (चौंकैत इशारामे पुछैत अछि, जकरा भाषा अनुवादक (बा अनुवादिका) बाजि कहैत अछि)। भाषा अनुवादक (बा अनुवादिका): ऐ नग्रमे क्यो ओकर नै.. भाषा सेहो नै ओ बुझैए ककरो; आ नहिये ओकर भाषा कियो आन बुझै छै। तमिल अछि। तखन ई भोजनक पैकेट ओकरा के देलक अछि से पुछि रहल अछि। सिपाही: (खुफिया अधिकारी दिस इशारा करैत) ओ देलखिन्ह। रतुका भोजन छिऐ। रातिमे जेल बला खाइले नै देतै, तैं। दिल्लीक तिहार जेलमे राखल जेतै ओकरा, ओतए तमिलनाडु पुलिसक एकटा टुकड़ी छै, चार्ल्स शोभराजक जेलसँ भगलापर ऐ टुकड़ीकेँ बजाओल गेल छलै, ऐ दुआरे जे ओ सभ स्थानीय भाषा नै बुझै छलै से कोनो अपराधीसँ मेल-पेँच नै कऽ सकतै। मुदा फेर ई हाल भेलै जे दू मासमे ओ सभ सभ गोटे स्थानीय भाषा सीख जाइ गेलै। मुदा ई ओकरा सभसँ गप कए सकत। भाषा अनुवादक (बा अनुवादिका): (दर्शक दिस तकैत) तिहारमे मुतालिफ किछु बाजि सकत, ओकरा सभक संग। अपना लेल वकील रखबाक लेल ब्योंत धरा सकत। मुतालिफ: (ऐ बेर बेसी जोरसँ चौंकल, पलटि केँ खुफिया अधिकारी दिस तकलक, इशारामे बजैत अछि, जकरा भाषा अनुवादक (बा अनुवादिका) बाजि कहैत अछि)। भाषा अनुवादक (बा अनुवादिका): (खुफिया अधिकारी दिस तकैत): पूछि रहल अछि जे अहाँ देने छिऐ? खुफिया अधिकारी (हाथसँ इशारामे- राखि लिअ।) मुतालिफ: (दुनू हाथ जोड़ि कऽ खुफिया अधिकारीकेँ प्रणाम केलक। आ भाव विह्वल भऽ कानऽ लागल, हिचुकि-हिचुकि, जोर-जोरसँ)। (पर्दाक पाछाँसँ ओकीलक स्वर सुनाइ दऽ रहल अछि। जे जोरसँ बाजि रहल अछि।) ओकील: मिलॉर्ड! असली अपराधी अछि ई मुतालिफ! फूसि अछि एकर खिस्सा। समुद्रक बीचपर दिनमे क्रिकेट खेलेनाइ एकर अकर्मण्यता अछि। ई, मुतालिफ, कहैए, बेरोजगार छल तैं दिनमे क्रिकेट खेलाइ छल। आ फेर एकर खिस्सा आगाँ बढ़ैए। एकरा हबीबुल्ला भेटै छै, एकरा पूछै छै… बेरोजगार छी? आ एकरा ओ काज दै छै, एकटा बैगमे प्रेशर कुकर आ ओइमे मर-मसल्ला!! कुकरक परदाक बीचमे नशाक पाउडर भरि उघै छल ई!!! हवाइ जहाजसँ एनाइ-गेनाइ, आ तै परसँ एक बेर गेल-आएल पर दस हजार टाका बैसले-बैसल भेटै छलै। आ तखन ई कहैए जे एकरा किछु बुझले नै छै, बुझले नै छै जे प्रेशर कुकरमे की लऽ जाइ छल। आ मुख्य अपराधी तखन तँ भेलै हबीबुल्लाह..) (मंचपर सभ सकदम भऽ जाइए, मुतालिफ बौक सन ठाढ़ अछि। खुफिया अधिकारीकेँ छोड़ि सभ प्रस्थान करैत अछि।) खुफिया अधिकारी: ओकील साहैब, मुतालिफ कोनो वकील नै केने अछि। मुख्य अपराधी ई नै अछि, कोनो तमिल वकीलकेँ पकड़ू आ ओकरा कहियौ जे अगिला जमानतक सुनबाइमे एकर जमानत करबेतै। (ओकील प्रवेश करैत अछि।) ओकील: हम तमिले छी, ऐ तरहक बहुत मुकदमा लड़ने छी। खास कऽ ओइ तमिल सभक, जे दिल्लीमे फँसि जाइ छथि, जिनका भाषाक संकट होइ छन्हि। हम तँ सरकारी ओकील छी, हम तँ एकर पक्षमे नै बाजि सकै छी, मुदा हमर असिसटेण्ट ओकील हमर ऑफिसे ऑफिस घुमैत रहैत अछि। ओ एकर मदति जरूर कऽ देतै। (ओकीलकक प्रस्थान। खुफिया अधिकारीक अधिकारीक प्रवेश।) खुफिया अधिकारीक अधिकारी: कतऽ फँसि गेल छी? खुफिया अधिकारी: ई मुतालिफ अपराधी अछिये नै, कोनो मादक पदार्थक माफिया फँसा लेने छलै एकरा। खुफिया अधिकारीक अधिकारी: हबीबुल्ला। सूचनाक आधारपर ओकरा घरमे चेन्नैमे छापा पड़लै, किछु नै भेटलै। खुफिया अधिकारी: बरामदी तँ मुतालिफसँ भेलै। मुदा ई तँ शतरंजक गोटी अछि, पाँव-पैदल सिपाही। पाँव-पैदल। खुफिया अधिकारीक अधिकारी: हमरा गामक लुल्हा पाँव-पैदल सभ साल बाबाधाम जाइए। हमरे गामक पीअर बच्चा हवागाड़ीसँ सभ साल बाबाधाम जाइ छथि। दुनू गोटे बीसो सालसँ लगातार बाबाधाम जा रहल छथि। लुल्हा बीससालसँ महीसे चरा रहल अछि आ पीअर बच्चाक घरारीपर ऐ बीस सालमे कोठा-कोठामे भेले जा रहल छन्हि। खुफिया अधिकारी: मुदा असल फल कोना भेटै छै। खुफिया अधिकारीक अधिकारी: मुदा असल फल तँ पाँव-पैदल गेलेसँ होइ छै। तैँ ने लुल्हा बीस सालसँ महीसे चरा रहल अछि। परुकेँ साल तँ हम गेल रही बाबा धाम। प्रफुल्ल भाइ गामक बोलबम पार्टीक जमादार छथि। सभ साल पाँव-पैदल जाइ छथि। हुनकर बाबू सेहो जमादार छलखिन्ह। भोला भाइ डाकबम छथि, तीन दिनमे सुल्तानपुरसँ पानि भरि भोलाबाबाकेँ चढ़ा दै छथि। प्रफुल्ल भाइ सभकेँ संग लऽ चलै छथि, जे निअम भंग करैए तकरा दण्ड लगबै छथि। पीअर बच्चा तँ तते नै मोटाएल छै जे ओकरासँ पाँव-पैदल जाएल हेतै? मुदा तखन प्रफुल्ल भाइ की कोनो कम मोटाएल छथि। मुदा बाबू, लोक की अपने चलैए, ओकरा तँ बाबा चलबै छथिन्ह। खुफिया अधिकारी: अहूँ गपकेँ बड्ड नमारै छी। अहीं कहै छी जे पीअर बच्चाक घरारीपर ऐ बीस सालमे कोठा-कोठामे भेले जा रहल छन्हि आ लुल्हा बीस सालमे महीसे चरा रहल अछि तइपर अहाँक कहनाम छल जे असल फल पाँव-पैदल गेलेसँ होइ छै। पीअर बच्चा जँ कहियो पाँव-पैदल बाबाधाम गेले नै छथि, तखन किए ओ कोठा-कोठामे केने जा रहल छथि आ लुल्हा तँ सभ साल पाँव-पैदल जा रहल अछि तखन किए ओ महीसे चरा रहल अछि। खुफिया अधिकारीक अधिकारी: यौ, आँखिक देखल कहै छी। कोठा कियो बान्हि ने लिऐ, बाबू भोला बाबा मानै छथिन्ह लुल्हेकेँ। खुफिया अधिकारी: से केना? खुफिया अधिकारीक अधिकारी: लुल्हा रस्तामे पाछाँ छुटि गेल। प्रफुल्ल भाइ चिन्तित छलथि जे अजश हएत। सौँसे धर्मशाला ताकि लेलन्हि। लुल्हा कोना पहिनहिये धर्मशाला आबि जाएत? ओ तँ पछुआ जाइ छल। कोना गाम घुरलापर लोककेँ मुँह देखेता। मुदा भोरमे देखै छथि जे लुल्हा धर्मशालाक कोठलीमे फोँफ काटि रहल अछि। आ जगलापर लुल्हा खिस्सा सुनबै छन्हि, चारू कात बोन रहै, हम हबोढेकार भऽ कानि रहल छलौं। तखने एकटा दाढ़ीबला बुढ़ा आएल आ चुप करेलक। पूछा-पूछी केलक आ माथपर हाथ रखलक। आ लगैए निन्न आबि गेल। निन्न खुजैए तँ देखै छी जे गौंआ सभक संग धर्मशालामे पड़ल छी। खुफिया अधिकारी: अही पाँव-पैदलक लोक सभक ताकिमे बोने-बोन फिरबाक ड्यूटी हमरा भेटल अछि। मीठ-मीठ बाजू आ पाँव-पैदल चलैबला लोक सभकेँ, मुतालिफकेँ, लुल्हाकेँ अपन मीठ गपसँ बझाबी। ओकरा बुझाबी जे सरकार देश नै छिऐ। ओ छी ई देश। पाँव-पैदल बा शतरंजक सिपाही। राजा-रानी नै छी देश। हबीबुल्ला नै छी देश। देश छी मुतालिफ। देश छी लुल्हा। खुफिया अधिकारीक अधिकारी: कतऽ सँ आएल छी? दिल्लीसँ तँ नै। खुफिया अधिकारी: नै, हम भारतक सिमानसँ आएल छी। खुफिया अधिकारीक अधिकारी: चीन, तिब्बत, पाकिस्तान, बांग्लादेश बा म्यांमारक सिमानसँ। खुफिया अधिकारी: नै, नेपालक सिमानसँ। सीताक देशसँ। खुफिया अधिकारीक अधिकारी: मिथिकल खिस्साबला, फूसिबला देशसँ। खुफिया अधिकारी: नै, ई मिथिकल नै ऐतिहासिक भऽ सकैए। किछु खिस्सामे तोड़-मरोड़ कएल गेल हएत, मुदा इतिहास प्राचीन अछि। तेँ जिनकर इतिहास ओतेक प्राचीन नै तिनका नै अरघैत हेतन्हि। खुफिया अधिकारीक अधिकारी: बहस, बहस। हथियारक ट्रेनिंङ ओकरा सभकेँ भेटल छै तँ अहाँकेँ सेहो भेटल अछि, रिवॉल्वर, पिस्टलसँ स्टेनगन धरिक ट्रेनिङ। बहसस ट्रेनिंग सेहो अहाँकेँ भेटल अछि आ से खाली हमरासँ नै ओकरो सभसँ करू। एकटा आतंकी लीडर पकड़ाएल छै, बिनु ड्रगक पाइ भेने आतंकी काज नै चलि सकत। खुफिया अधिकारी: मुदा हबीबुल्ला तँ छुटि जाइए, मुतालिफ पकड़ेने ड्रगक पाइक ओर नै भेटत। खुफिया अधिकारीक अधिकारी: हबीबुल्लाक घरपर किछु नै भेटल। खुफिया अधिकारी: अपनो बीच ओकर लोक हेतै जेना ओकरा बीचमे अपन लोक अछि। खुफिया अधिकारीक अधिकारी: पता करू। कैदी आतंकी लीडरसँ पुछि कऽ देखू। समए ससरल जाइए, ससरल जाइए……..। अंक २ (टेबुल कुर्सीक एक कात खुफिया अधिकारी आ दोसर कात आतंकी लीडर अछि, दुनूक बीच बहस चलि रहल छै।) खुफिया अधिकारी: केना हमरा सभक काजक सूचना अहाँकेँ भेटैए, हबीबुल्लाक सहयोगी के सभ अछि? ड्रगक पाइ कोना आ ककरा लग जाइ छै। मुतालिफक सरदार हबीबुल्ला छी तँ हबीबुल्लाक सरदार के छी? आतंकी लीडर: अहींक कार्यालयसँ सूचना भेटैए। कोनो सूचनाक अधिकारक अन्तर्गत नै, अहाँक सभ काजक सूचना हमरा सभ लग आबि जाइए। हमरो बीच अहाँक लोक छथि तँ अहूँक बीचमे हमर लोक छथि। खुफिया अधिकारी: ई तँ बुझले गप अछि। मुदा ओ अछि के? आतंकी लीडर: अहाँ तैयो हथियार लऽ कऽ नै चलै छी। मिजोरमक लालडेंगा तँ हथियार लऽ कऽ चलै छला आ असामक परेश बरुआ मुदा कखनो हथियार लऽ कऽ नै चलै छथि। अहाँक देश दुनूसँ समझौता केलक। हथियारबला सँ बिन हथियारबला केना कम खतरनाक भेल? अहूँ हमरा सभ लेल बेशी खतरनाक छी। खुफिया अधिकारी: देखू, एकटा मिजोरमक छात्र मुजफ्फरपुरमे इन्जीनियरिंगमे पढ़ैत छल। ओ हमरा कहने छल जे लालडेंगा महान नेता छथि। ओइ काल लालडेंगा भूमिगत रहथि। देश हुनका आतंकी मानै छल। मुदा ओ एला, देशक सरकारसँ समझौता केलन्हि। सभ हथियार जमा कऽ देलन्हि। दुनू पक्ष समझौताक इमानदारीसँ पालन केलक आ आइ मिजोरम उत्तरपूर्वी भागक एकमात्र एहेन समझौता अछि जे पूर्ण रूपसँ सफल अछि। मृत्युक पहिने लालडेंगा अपन राज्यकेँ शान्तिक पथपर छोड़ि गेला। ओ इन्जीनियरिङक छात्र ठीके कहै छल, लालडेंगा महान नेता छथि। महान नेता अपन जनताकेँ बीच मझधारमे नै छोड़ै छै। डुबैत जहाजक कप्तान जेकाँ ओ अन्तिम समए धरि जहाजपर रहैत अछि। जखन जहाजसँ सभ बहरा जाइए तखन ओ जहाजक मस्तूल संगे समुद्रमे डुबि जाइए, जहाज छोड़ि नै भागैए। जँ लालडेंगा समझौता केलन्हि तँ ओ ओइ जनताक भावनाक अनुरूप छल, जे हुनका महान बुझैए। जँ ओ मृत्युसँ पूर्व शान्ति समझौता नै करितथि तँ भऽ सकैए ओ इन्जीनियरिङक छात्र हुनकापर ओतेक गर्व नै कऽ सकितए। ओ जखन अखनो भेटैए, हमरासँ कहैए- देखलौं, हम कहै छलौं ने, लालडेंगा इज अ ग्रेट लीडर। आतंकी लीडर: हमरा ग्रेट लीडर बनबाक सेहन्ता नै अछि। हम सभ हथियार समर्पण कऽ दी आ तखन जँ सरकार हमरा संग धोखा करए? खुफिया अधिकारी: जँ लालडेंगा ई सोचितथि तँ की शान्ति सम्भव छल? आ सरकार अछि की? जे टेलीविजनपर अहाँ सभ देखै छी, से अछि सरकार? नै, ओइमे सँ बहुतोकेँ बुझलो नै छै जे देश लेल के के, की की कऽ रहल अछि। सभ विभागमे देशभक्त सभ भरल छै, दसे प्रतिशत किए नै होउ, आ ओकरे भरोसे ई देश छै। जे टेलीविजनपर अछि, मंत्री-संत्री, ओइमेसँ ककरा की बुझल छै? अहाँ बदलि सकै छी, ई मंत्री-संत्री बदलि सकै छथि मुदा देश नै बदलत, सरकार नै बदलत। ओ समझौताक पालन करत। आतंकी लीडर: अहाँ हमरे सभ जेकाँ सोचै छी, मुदा गलत पक्षमे छी। खुफिया अधिकारी: हम नै अहाँ गलत पक्षमे छी। हथियार उठेने छी। हथियार कीनैले ड्रग बेचै छी, बेचबाबै छी। कतेक बच्चाक भविष्य खतम कऽ देलिऐ अहाँ सभ। आतंकी लीडर: कोन भविष्यक गप कऽ रहल छी अहाँ? अहाँ फैक्ट्री खोलि देबै तँ ओ दरबान बनि जाएत। अहाँ रोड बना देबै तँ ओकरा ओइपर बाढ़नि बहारबाक नोकरी लागि जेतै! खुफिया अधिकारी: अहाँक लोक बेरोजगार युवाक ताकिमे रहैत अछि, समुद्रक किनारपर, जंगलमे, रेगिस्तानमे, जेकरा काज नै छै, रोजगार नै छै ओकरा अहाँ ठकि कऽ ड्रगक धंधामे लगा दै छिऐ। मुतालिफ २० सालक बाद जेलसँ बहराएत, से रोजगार देलिऐ ओकरा अहाँ सभ। मचण्ड छी अहाँ सभ। आतंकी लीडर: ओकरा कतेक दिन अहाँक सरकार राखत जेलमे? खुफिया अधिकारी: माने.. माने.. (तमसा कऽ टेबुलपर हाथ पटकैत अछि।) आतंकी लीडर: (हँसऽ लहैए) अहूँकेँ तामस उठैए? अहाँक सिस्टममे निर्बलक सुनवाइ नै छै। मुदा तैयो ओइ सिस्टम लेल अहाँ जान अरोपने छी। की देलक अहाँक सिस्टम अहाँकेँ। अहाँक सिस्टममे जे हमरा सभले काज करैए से शहरसँ हिलबो नै करैए, आ अहाँकेँ बोनक पोस्टिंग दऽ देने अछि। अहाँ संगे अन्याय भेल अछि। आ जखन अहाँ अपना संग भेल अन्याय नै रोकि सकै छी तँ हमरा सभकेँ कोना न्याय दिया सकब? खुफिया अधिकारी: ई अहाँक मोनक भ्रम अछि, कोनो अन्याय नै भेल अछि हमरा संग। हमरा ऐ काज लेल चुनल गेल अछि। आतंकी लीडर: अहाँक दुरुपयोग कऽ रहल अछि अहाँक सिस्टम। आबि जाउ हमरा सभक संग, नोकरी ओतै करू मुदा ओतऽ रहियो कऽ हमरा सभक संग रहू। सोचू, समय लिअ… खुफिया अधिकारी: (तमसाइत) अहाँक दिमाग तँ नै खराप भऽ गेल अछि? हम एक माससँ सभ दिन अहाँकेँ बुझेबामे लागल छी मुदा अहाँक अलगे खेरहा अछि। अहाँकेँ हँसी बुझा रहल अछि? आतंकी लीडर: अहाँ हमरा एक माससँ बुझा रहल छी आ हमहूँ एक माससँ अहाँकेँ बुझाबऽमे लागल छी। मुतालिफ छूटि गेल अछि आ तइ लेल अहाँकेँ धन्यवाद। खुफिया अधिकारी: हमरा किए धन्यवाद? आतंकी लीडर: हमरा सभ गप बुझल अछि। आ ओइ काजक पुरस्कार स्वरूप अहाँकेँ संगठनमे उच्च पद देल जाएत। खुफिया अधिकारी: हमर विभागमे किछु लोक भयसँ अहाँले काज करैत हेता, तइसँ अहाँक मोन बढ़ि गेल अछि। आतंकी लीडर: ओ सभ भय बा पाइसँ कीनल जा सकैत छथि, मुदा तैयो ओ सभदेल काज करबे करता, से विश्वास हमरा नै अछि। मुदा अहाँक हृदए हमरा सभक संग अछि, मुतालिफक लेल अहाँक प्रेम तकर प्रमाण अछि आ तँइ अहाँकेँ अपन संगठनक कोर ग्रुपमे लेबाक निर्णय लेल गेल अछि। खुफिया अधिकारी: (तामसे सबिख होइत) निर्णय लेल गेल अछि? (आतंकी लीडरक ठोंठ पकड़ैत अछि।) नि….र्ण….य….. लेल गेल अछि? हम असथिरसँ गप कऽ रहल छी तँ…. आतंकी लीडर: अहूँ मचण्ड छी, सरकारी मचण्ड। (खोंखी करैत आ खुफिया अधिकारीक हाथसँ अपन कण्ठ छोड़बैत।) मुदा सिद्धान्तबला… (निसाँस छोड़ैत)… हमरे सभ जेकाँ… (हाँफी लैत) .. जकरा मचण्ड बनऽ पड़ैत अछि… आ तेँ ई निर्णय लेल गेल अछि… (कुर्सीसँ नीचाँ खसि पड़ैत अछि।) अंक ३ (खुफिया अधिकारीक माथपर एकटा भारी डण्टा बजरैए आ ओ बेहोश भऽ जाइए। किछु लोक जे ओकरा मारने छल से ओकरा उठा कऽ मंचक दोसर दिशामे लऽ जाइए। ओकरा होश अबै छै। मुतालिफ पाछाँसँ अबैत अछि। संगमे भाषा अनुवादक(बा अनुवादिका) छै।) मुतालिफ: (इशारामे बजैए) भाषा अनुवादक(बा अनुवादिका): (खुफिया अधिकारीकेँ सम्बोधित करैत) कोर्ट मुतालिफकेँ बेल दऽ देलकै। मुतालिफ कहैत अछि जे बिना ड्रगक धंधाक आतंकवाद सम्भव नै छै, ऐ लेल जतेक पाइ चाही से ड्रगक धंधेसँ अबै छै। मुतालिफ कहै छथि जे ओ जेलसँ एलाक बाद अहाँ जकाँ बनऽ चाहलक मुदा पुलिस थाना, पत्रकार ओकरा से नै करऽ देलकै। मुतालिफ कहै छथि जे सिस्टम ठीक करबाक आवश्यकता अछि, नै तँ …. खुफिया अधिकारी: (मुतालिफकेँ सम्बोधित करैत) तँ की अहाँ मुख्य खिलाड़ी छी? हमरा तँ लगै छल जे अहाँकेँ फँसाएल गेल अछि। मुतालिफ: (इशारामे बजैए) भाषा अनुवादक(बा अनुवादिका): (खुफिया अधिकारीकेँ सम्बोधित करैत) की फर्क पड़ै छै। फँसाएल गेल खिलाड़ी बा मुख्य खिलाड़ीमे की फर्क छै। ओना देखबै तँ ऐ तरहक संगठनमे अस्सी प्रतिशत फँसाएल लोक छै, मुदा तेना फँसाएल छै जे मुख्य खिलाड़ीसँ बेशी खतरनाक वएह छै। आब अहाँकेँ वएह करबाक अछि जे मुतालिफ कहता। (खुफिया अधिकारीक माथपर एकटा भारी डण्टा बजरैए आ ओ बेहोश भऽ जाइए। ओकरा छोड़ि कऽ सभक प्रस्थान। ओकरा फेरसँ होश आएल छै। मंचक दोसर कात ओ जाइए। पुलिसक प्रवेश। स्थानीय थानामे पुलिसक मोबाइलसँ खुफिया अधिकारी फोन करैए, अपन पहचान कोड बतबै लेल। फेर किछु कालक बाद ओकर हाकिमक फोन ओकरा लग अबै छै। ओ ओकरा लऽ कऽ पर्दाक पाँछा चलि जाइए। पर्दा खसैए।) अंक ४ (खुफिया अधिकारी आ ओकर अधिकारी गप कऽ रहल छथि।) खुफिया अधिकारी: हमर पहिल यात्रा निरर्थक सिद्ध भेल अछि। खुफिया अधिकारीक अधिकारी: मुतालिफ अहाँकेँ हरा देलक, अहाँक जान बकसि कऽ ओ अहाँकेँ हरा देलक। बिन हथियारबला सैनिकक हारि, ई बिध सभ सिखने जा रहल अछि। खुफिया अधिकारी: किछु मोन पड़ि रहल अछि। दुभाषियाकेँ मुतालिफ कहि रहल छल आ ओ हमरा कहि रहल छल। लगैए जेना मुतालिफ कहि रहल छल जे ई यात्रा व्यर्थ नै गेल अछि, जे हम कथा लिखै छी, से बुझू ऐ यात्रामे एकटा कथाक प्लॉटे भेट गेल। मुतालिफ जेना कहि रहल छल जे ओइ कथाक नायक मुतालिफ रहत। (पर्दा खसैए) कियो बूझि नै सकल हमरा-(गजलकार श्री ओम प्रकाश झा) भदवारिमे मेघ लाधल रहै छै, विदागरी-तिदागरी नै होइ छै मुदा पनिऔरा फड़ै छै। भदवरिया लाधल छै, बितरोचारक कोनो खगता नै। गोलैसी नीक गप नै। मुदा जँ कोनो बहर दिस झोंकान भऽ जाए तँ कोनो हर्ज नै। जँ मैथिली साहित्यमे बहरमे कहल गजल सभक संकलन हुअए तँ तकर सर्वश्रेष्ठ  कहबैका हेता ओम प्रकाश जी। “करेजासँ शोणित बहाबैत रहलौं करेजामे प्रेम बसै छै आ ओइसँ शोणित बहि रहल छन्हि, तँ कियो चक्कू भोकने हेतन्हि तखने ने। के अछि एहेन चण्ठ! मुदा शेरक दोसर मिसरा कहैए.. विरह-नोर कखनो कहाँ खसल हमरा” इतिहास बनैत-बनैत रहि गेल कारण? एकटा खिस्सा बनि जइते अहाँ संकेत जौं बुझितहुँ हमही छलहुँ अहाँक मोनमे कखनो तँ कहितहुँ से ने हिनके दोष ने हुनके। से हिनकर इच्छा छन्हि जे जड़ैत करेज आगिमे जड़िते रहए: पता नै कोन आगिमे जरैत रहल करेज हमर पानि नै खाली घीए टा चाहैत रहल करेज हमर तँ कोनो प्रेमीक प्रेमक आघात सहने छथि गजलकार, आ ओइ प्रेमीसँ एतेक लग छथि जे विरह-नोर बहेने ओकर बदनामी भऽ जेतै तेँ विरह नोर नै बहबैछथि। चाहै छथि जे करेज आगिमे जड़िते रहए, आ आगिमे पानि नै घी ढारल जाइत रहए। आ लोककेँ होइ छै जे हुनकर हृदय आ मोन कठोर छन्हि! आ तेँ ओ कहै छथि.. कहू की कियो बूझि नै सकल हमरा हँसी सभक लागल बहुत ठरल हमरा आ संगमे ईहो: एतेक मारि खेलक झूठ प्रेमक खेलमे जमानासँ कियो देखलक नै कुहरैत रहल करेज हमर मुदा लोकक बुझब नै बूझब, किदन साती ले! ओ बहरे मुतकारिबमे कहल एकटा दोसर गजलमे कहै छथि.. भिड़त आबि हमरासँ औकाति ककरो कहाँ छै जखन-जखन लडलौं हरदम अपनेसँ लडलौं हम तँ की गजलकार घमण्डी छथि, नै सेहो नै, ओ बहरे हजजमे कहै छथि: कटऽ दियौ "ओम"क मुड़ी आब दुनियाँ ले जँ गाम बचै झुकैसँ तँ पाग निखरै छै तँ की मैथिलीक गजलकार अखनो प्रेमे-विरहमे ओझराएल छथि? नव विषय नै पकड़ि रहल छथि? मुदा से नै छै, बहरे-सलीममे लिखल गजलक ई शेर सुनू: धरले रहत सभ हथियार शस्त्रागार बनलै मिसाइल भूखे झमारल लोक आ ई बाल-गजल सुनू। बाल-कविता/ गजल सुनिते लोककेँ उल्लासक स्वर सुना पड़ै छै, मुदा बाल-मजदूरक  जिनगीमे से कतऽ पाबी, मुदा आस तँ छै, तेँ:- चारू कात पसरल दुखक अन्हरिया छै कटतै ई अन्हरिया आ बढ़बै हमहूँ आ ई आस आनो गजलमे अछि: सागरक कात सीप बिछैत रहब हम कोनो सीपमे कखनो मोती भेटेबे करतै ओम प्रकाश जीकेँ जहिया मोती भेटतन्हि तहिया, मुदा मैथिली साहित्यकेँ हुनका रूपमे एकटा मोती भेटि गेल छै, ओ चीन्हि लेल गेल छथि, बूझि लेल गेलछथि। रेस (बाल विहनि आ लघु कथा पर केन्द्रित "कथा बौद्ध सि‍द्ध मेहथपा" -८२म सगर राति दीप जरय- गोष्ठीमे पठि‍त)

भोरेमे मास्टर साहेब कहि देलखिन्ह जे सर्वसीमा जा कऽ दौगैमे, हिसाब बनबैमे, फांगैमे, नेङरा रेसमे जीतत ओकरा ओतऽ पुरस्कार जे भेटतै से तँ भेटबे करतै, सङमे स्कूल दिससँ सर्टिफिकेट सेहो भेटतै। शोभित दौगैमे बड्ड तेजगर। सङी सभ ओकरा लुक्खी कहै छलै। छाती तानि कऽ दौगै छलै। जेना धनुष गोल होइ छै तहिना ओकर छाती घुमि जाइ छलै। मास्टर साहेब कहैत-कहैत मरि गेलखिन्ह जे दौगै कालमे छाती टेढ़ किए करै छेँ। मुदा ओ बुझबे नै करै जे केना छाती टेढ़ भऽ जाइ छै। अपने मोने भऽ जाइ छै। ओ तँ खाली दौगै छै, केना छाती मुड़ि जाइ छै से ओकरा पते नै चलै छै।  ओना स्कूलमे दौगैमे ओ फर्स्ट करै छलै। मुदा मास्टर साहेब कहलखिन्ह- गामक स्कूलक रेस आ सर्वसीमाक रेसमे अन्तर छै। ओतऽ भरि जिलासँ लोक सभ एतै। ओतऽ दौगबाक टेकनिकमे परिवर्तन करऽ पड़त। ओतऽ सभ तैयारी संग अबै जाएत, ओतऽ सेकेण्डक अन्तरसँ जीत-हारिक निर्णय हएत। शोभित भोरे उठि कऽ तैयारी करऽ लागल। पोखरि दिस जाए तँ दौगैते। स्कूल जाए तँ दौगैत, माए दोकान पठबै तँ ओतौ जाइ छल दौगिते। सभ लुक्खी कहै छलै, केहेन तेजगर छै हौ, लुक्खी सन दौगै छै। ओ सभसँ पुछै- की हम दौगै काल धनुष सन तनि जाइ छिऐ। उत्तर भेटै छलै- हँ हौ। एतेक तेज तँए ने दौगल होइ छह। ई सुनिते शोभितक मोन छोट भऽ जाइ छलै। मास्टर साहेब ओकरा कहलखिन्ह- पाछू मुँहे जे शरीर उनार होइ छौ से आगाँ मुँहे उनार करऽ तखन जा कऽ चालि सोझ हेतौ। आब शोभित सदिखन आगाँ झुकि कऽ चलऽ आ दौगऽ लागल। कखनो पएरमे ठेस लागि जाइ छलै तँ कखनो मुँहे भरे खसि पड़ै छल। जेना-तेना आगाँ मुँहे झुकि कऽ दौगनाइ ओ शुरू केलक। मुदा स्कूलक प्रैक्टिस रेस भेलै।जइ ठाम सभ बेर शोभित फर्स्ट करै छल ओतऽ ऐबेर ओ तेसर स्थानपर आएल। मुदा मास्टर साहेब ओकरा प्रोत्साहित करैत रहला। कहैत रहलखिन्ह जे शोभित, आब तोहर टेकनिक ठीक भेलौ, नव टेकनिकमे गति शुरूमे कने घटि जाइ छै, मुदा फेर जखन गति बढ़नाइ शुरू हेतौ तँ पहिनेसँ बड्ड बेशी गति भऽ जेतौ। पुरनका टेकनिकमे अधिकतम गति तूँ पाबि लेने छेँ, मुदा से जिला स्तर लेल पर्याप्त नै छौ। मुदा नव टेकनिकमे अधिकतम गति तोरा जिला स्तरपर सभसँ बेशी गति देतौ। शोभितक संगी सभ किचकिचाबै। ई नवका टेकनिक तँ तोरा स्कूलोक रेसमे पाछाँ कऽ देलकौ। आब आशमे जिबैत रह जे आब गति बढ़त तब बढ़त। मुदा शोभितकेँ अपन मास्टर साहेबपर विश्वास रहै। पहिने तँ ऐ नव टेकनिकमे चललो नै होइ छल। मुँहे भरे खसि पड़ै छलौं। आब दौगऽ लागल छी। स्कूलमे तेसर स्थान आएल। माने प्रगति अछि। देखै छी आगाँ की होइए। शोभित अभ्यास करैत रहल। नव टेकनिकमे ओकरा आब बेशी आराम लागै छलै। पहिने लुक्खी सन दौगैमे जतेक घाम बहराइ छलै, ओइसँ बेशी आसानीसँ आब ओ दौगै छल। लागै छलै जे पएरमे स्प्रिंग लागि गेल होइ। असगरे दौगैमे ओकरा अन्दाज नै होइ छलै जे ओ कतेक गतिसँ दौगि रहल अछि। मुदा अभ्यास ओकरा आब भीर नै लागै छलै। मास्टर साहेब स्कूलमे प्रैक्टिस मैच करेलन्हि। शोभित पछिला बेरक हारिक बाद आशंकित छल। से ओ कोनो तरहक ढिलाइ नै देलक। जावत दोसर छौड़ा सभ अदहे मैदान दौगल छल शोभित पूरा मैदान पार कऽ गेल। मास्टर साहेब प्रसन्न रहथि। हँ शोभित, आब तूँ जिला स्तरक रेस लेल तैयार छेँ। शोभितक संगी सभक मुँह बन्न भऽ गेलै। आब शोभित मास्टर साहेबक संग सर्वसीमाक अन्तिम रेसक लेल तैयारी शुरू कऽ देलक। संपादकीय मैथिली विकीपीडिया http://esamaad.blogspot.in/2012/01/blog-post_08.html http://ultimategerardm.blogspot.in/2011/05/bihari-wikipedia-is-actually-written-in.html http://ultimategerardm.blogspot.in/2008/01/maithili-language-and-mithilakshar.html http://ultimategerardm.blogspot.com/2014/11/wikipedia-now-in-maithili.html Words and what not Monday, May 09, 2011 The #Bihari #Wikipedia is actually written in #Bhojpuri This is the kind of article that has many people's eyes glaze over. It is about standards, scientific documents and it is about languages most of my readers have never heard about. For the people that do speak one of the languages that are considered Bihari it is extremely relevant and it has implications for Wikipedia. This is information provided by Umesh Mandal that explains about the "Bihari group of languages" in relation to the Maithili language: Kellogg (1876/1893) and Hoernle (1880) regarded Maithili as a dialect of Eastern Hindi; Beames (1872/reprint 1966: 84-85), regarded Maithili as a dialect of Bengali, Grierson has done a great service to Maithili language, however, he erred when he gave a false notional term of "Bihari" language, after that western linguists started categorizing Maithili as a dialect of "Bihari" language; although there is nothing known as "Bihari Language" and both Maithili and Bhojpuri are spoken in Bihar (of India) as well as in Nepal. Umesh is working on the localisation of MediaWiki for the Maithili language and as this language is currently in the Incubator, the language committee does its due diligence and tries to understand if Maithili can have a place in the Bihari Wikipedia. The information provided by Umesh makes it quite clear: "no". This still leaves us with the misnomer that is the Bihari Wikipedia. Apparently the language used for the localisation and the articles is Bhojpuri. Bhojpuri has the ISO-639-3 code "bho". Are you still following all this? Ok, there is one question I am not asking: How about the Kaithi script? Thanks, GerardM Posted by Gerard Meijssen at 4:17 pm Words and what not Sunday, January 27, 2008 The Maithili language and the Mithilakshar script Maithili is a language spoken in India and Nepal by some 24.797.582 people. It is an official language in the Indian state of Bihar and it may be used in education. A request was made for a Wikipedia for Maithili, it conforms to the requirements so that is not a problem. What IS a problem is that Mithilakshar, the script used to write the Maithili language, is not yet part of Unicode. The script has not even been recognised in the ISO-15924 yet. This is the second request for a Wikipedia where the script that is used to write a language presents a problem. For modern Maithili there is the option to write in the Devangari script. Thanks, GerardM Posted by Gerard Meijssen at 10:32 am Words and what not Thursday, November 06, 2014 #Wikipedia - Now in #Maithili It is a happy occasion when a new Wikipedia is created. Today we may welcome the Maithili Wikipedia. The website has been created and all the content that is currently still in the Incubator needs to be migrated. I wish the Maithili community well; I hope they will share with us in the sum of all available knowledge. Thanks, GerardM Posted by Gerard Meijssen at 8:22 am विदेहक तेसर अंक (१ फरबरी २००८)मे हम सूचित केने रही- “विकीपीडियापर मैथिलीपर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाकेँ स्वीकृति नहि भेटल छल। हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही आ सूचित करैत हर्षित छी जे २७.०१.२००८ केँ (मैथिली) भाषाकेँ विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक, मुदा एहि हेतु कमसँ कम पाँच गोटे, विभिन्न जगहसँ एकर एडिटरक रूपमे नियमित रूपेँ कार्य करथि तखने योजनाकेँ पूर्ण स्वीकृति भेटतैक।” आ आब जखन तीन सालसँ बेशी बीति गेल अछि आ मैथिली विकीपीडिया लेल प्रारम्भिक सभटा आवश्यकता पूर्ण कऽ लेल गेल अछि विकीपीडियाक “लैंगुएज कमेटी” आब बुझि गेल अछि जे मैथिली “बिहारी नामसँ बुझल जाएबला” भाषा नै अछि आ ऐ लेल अलग विकीपीडियाक जरूरत अछि। विकीपीडियाक गेरार्ड एम. लिखै छथि ( http://ultimategerardm.blogspot.com/…/bihari-wikipedia-is-a… ) -“ई सूचना मैथिली आ मैथिलीक बिहारी भाषासमूहसँ सम्बन्धक विषयमे उमेश मंडल द्वारा देल गेल अछि- उमेश विकीपीडियापर मैथिलीक स्थानीयकरणक परियोजनामे काज कऽ रहल छथि, ...लैंगुएज कमेटी ई बुझबाक प्रयास कऽ रहल अछि जे की मैथिलीक स्थान बिहारी भाषा समूहक अन्तर्गत राखल जा सकैए ?..मुदा आब उमेश जीक उत्तरसँ पूर्ण स्पष्ट भऽ गेल अछि जे “नै”। ” रामविलास शर्माक लेख (मैथिली और हिन्दी, हिन्दी मासिक पाटल, सम्पादक रामदयाल पांडेय) जइमे मैथिलीकेँ हिन्दीक बोली बनेबाक प्रयास भेल छलै तकर विरोध यात्रीजी अपन हिन्दी लेख द्वारा केने छलाह , जखन हुनकर उमेर ४३ बर्ख छलन्हि (आर्यावर्त १४/ २१ फरबरी १९५४), जकर राजमोहन झा द्वारा कएल मैथिली अनुवाद आरम्भक दोसर अंकमे छपल छल। उमेश मंडलक ई सफल प्रयास ऐ अर्थेँ आर विशिष्टता प्राप्त केने अछि कारण हुनकर उमेर अखन मात्र ३० बर्ख छन्हि। जखन मैथिल सभ हैदराबाद, बंगलोर आ सिएटल धरि कम्प्यूटर साइंसक क्षेत्रमे रहि काज कऽ रहल छथि, ई विरोध वा करेक्शन हुनका लोकनि द्वारा नै वरन मिथिलाक सुदूर क्षेत्रमे रहनिहार ऐ मैथिली प्रेमी युवा द्वारा भेल से की देखबैत अछि? उमेश मंडल मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक लोकक कण्ठक गीतकेँ फील्डवर्क द्वारा ऑडियो आ वीडियोमे डिजिटलाइज सेहो कएने छथि जे विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। ** मिथिला यूनिवर्सिटी आकाशवाणी दरभंगा आ साहित्य अकादेमी मे जे भऽ रहल अछि सएह "मैथिल ब्राह्मण मात्र लेल मिथिला राज्य" मांगैबलाक मिथिला राज्यमे हएत, से जे शंका लोककेँ छै से असत्य नै छै। साहित्य अकादेमी मैथिलीक पतन लेल जे काज केलक अछि आ कऽ रहल अछि तकरा मौन आ मुखर सम्बोधन केनिहारक संख्या आंगुर पर गानल जा सकैत अछि। "सगर राति दीप जरए" समानान्तर परम्पराक बौस्तु रहए तकर प्रयास हेबाक चाही, साहित्य अकादेमी पोषित मुख्यधारा लग ने लेखक छै आ ने पाठक आ ने प्रतिभा। ओकर इतिहास लेखन मे एहेन एहेन लोक आ पोथीक वर्णन भेटत जकर अस्तित्व नै छलै, से मूल धारा अपन इतिहास लेखनमे कोनो गनती करबा लेल स्वतंत्र अछि । राधाकृष्ण चौधरी आ सुभाष चन्द्र यादवक संग कएल छ्लक विरोध ओइ धारामे नै भेलै, कारण ओ "स्टेटस को" समर्थित लोकक संगठन छिऐ। साहित्य अकादेमीक गोष्ठी मूल धाराक लेल सगर रातिक गोष्ठी भऽ सकैए समानान्तर धाराक लेल नै। ** शिव कुमार झा "टिल्लू"क "अंशु" आ बेचन ठाकुर जी क नाटक "ऊंच-नीच" ८१म सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीक आयोजन देवघरमे लोकार्पित हएत जे ब्राह्मणवादी समीक्षा आ रंगमंचपर अन्तिम मारक प्रहार हएत। मैथिली आ मिथिलासँ प्रेम करैबला अधिसंख्यक समानान्तर परम्परा सम्बन्धी वर्ग "गरिखर" मुख्यधाराक डरे साहित्य अकादेमी गोष्ठीकेँ "सगर राति दीप जरए" केर मान्यता नै दऽ सकत। ** मैथिलीक मूल "गरिखर" परम्परा मे २० टा लेखक छै आ पाठक एक्कोटा नै, ई बीस गोटा बीस ग्रुपमे विभक्त अछिो, सभ आपसमे कुकुड़ कटाउझ करैत रहैत अछि, मुदा विदेहक विरोधमे एक भऽ जाइत अछि आ साहित्य अकादेमीक पक्षमे भऽ जाइत अछि। "सगर राति दीप जरय" यएह एकटा संस्था छै जतऽ नन्दविलास राय सेहो जा सकै छथि आ जगदीश प्रसाद मण्डल सेहो। गुआहाटीक विद्यापति पर्व मे "मैथिल ब्राह्मण मात्र लेल मिथिला राज्य आ मैथिली भाषा" मांगैबला ब्राह्म्णवादी सभ जइ तरहें जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ मुख्य अतिथि बनेबा पर निर्लज्जतापूर्ण हंगामा केने रहथि, वा दरभंगाक विद्यापति पर्व मे "नन्द विलास राय"केँ कवि सम्मेलनमे भाग नै लेबऽ देल गेल रहन्हि ई कहि कऽ जे के अहाँकेँ पोस्टकार्ड लिखि कऽ बजेने रहए!!! जँ समानान्तर परम्परा साहित्य अकादेमी गोष्ठीकेँ मान्यता नै दऽ रहल अछि तँ ऐ सँ मिथिलापर ई कलंक तँ दूर भेबे कएल जे हम सभ "स्टेटस कोइस्ट " छी, आब अधिसंख्यक वर्ग ओइ कुकृत्यसँ अपनाकेँ दूर राखऽ चाहैए। मैथिली साहित्य आ इतिहास दू खण्डमे बँटि गेल अछि। लोक जेना गांधीजीक विरोध कऽ महान बनऽ चाहैए तहिना विदेहक विरोध कऽ कए सेहो। साहित्य अकादेमीक गोष्ठीकेँ "सगर राति दीप जरए" केर मान्यता भेटै ओइ लेल कमलेश झा सन "कम्यूनिस्ट" आ ढेर रास "मैथिल ब्राह्मण मात्र लेल मिथिला राज्य आ मैथिली भाषा" मांगैबला ब्राह्म्णवादी (कम्यूनिस्ट ब्राह्मणवादी सेहो) अपस्यांत छथि। मुदा समानान्तर धाराक इतिहास लेखन मे साहित्य अकादेमीक गोष्ठीकेँ "सगर राति दीप जरए" केर मान्यता नै देल जा सकत। मूल धाराक इतिहास लेखन मे ओ साहित्य अकादेमीक गोष्ठी लेल संख्यामे "एक" नै "अनेक" संख्याक वृद्धि कऽ सकै छथि| ** सुभाष चन्द्र यादवक "बनैत-बिगड़ैत", साहित्य अकादेमी आ ओकर पुरस्कार: साहित्य अकादेमीकेँ सुभाष चन्द्र यादवसँ भतबड़ी छै। मनुक्खक मनुक्खसँ भतबड़ी होइ छै, मुदा जखन कोनो संस्थाक मैथिली विभाग कोनो मनुक्खक खास संकीर्ण वर्गक कब्जामे चलि जाइ छै तखन ओ संस्था सेहो मनुक्खे संग व्यवहार करऽ लगै छै। पछिला बेर नचिकेताक "नो एण्ट्री: मा प्रविश" क अन्तिम बेर छलै आ ऐ बेर सुभाष चन्द्र यादवक "बनैत-बिगड़ैत"क अन्तिम बेर। ऐ पोथीकेँ आब साहित्य अकादेमी पुरस्कार नै देल जा सकतै। कारण एकटा संस्थाकेँ एकटा पोथीसँ भतबड़ी भेल छै। मूल परम्परा सुखाएल इनारक बेंग छी जकर मृत्यु आसन्न छै। ने ऐसँ "नो एण्ट्री: मा प्रविश" क आ नहिये "बनैत-बिगड़ैत"क महत्व साहित्यिक रूपसँ कम हेतै। मिथिला राज्यक ढोंगी आडम्बरी नेता सभक लेल ओना ई खुशीक विषय थिक मुदा समानान्तर परम्परा लेल ई एकटा चेतौनी छी। की मिथिला राज्य सेहो समानान्तर परम्परासँ भतबड़ी करतै? की ओकरो स्वरूप साहित्ये अकादेमी सन रहतै? मिथिला राज्यक आडम्बरी सभकेँ ई उत्तर देबऽ पड़तै आ नै तँ ओकरो स्थिति सुखाएल इनारक बेंग सन हेतै!!! ** मिथिला राज्यक लेल जँ अहाँकेँ क्यो धरणा दैत, सभा करैत देखाथि तँ हुनकासँ ई अवश्य पूछू जे "मिथिला यूनिवर्सिटी" "आकाशवाणी दरभंगा" आ "साहित्य अकादेमी" मे जे भऽ रहल अछि सएह "मैथिल ब्राह्मण मात्र लेल मिथिला राज्य" मांगैबलाक मिथिला राज्यमे हएत, से जे शंका सभकेँ छै से की असत्य नै छै, आ ऐ ल्रेल मिथिला राज्य आन्दोलन कर्मी कहियासँ साहित्य अकादेमीक संयोजिका आ मेम्बर सभक घरक सोझाँमे आमरण अनशन करबाक घोषणा कऽ अपन प्रतिबद्धताक प्रमाण उपलब्ध करेता। ** पटना,दिल्ली आ दरभंगा मे प्राथमिक शिक्षा मे आ दूरस्थ रूपेँ मैथिलीक पाठन लेल अनशन केनिहार सभ एकटा पैघ षडयंत्रक हिस्सा भ' सकै छथि, मैथिलीक सिलेबस मे भ' रहल अन्यायक प्रति हिनकर सभक चुप्पी सएह सिद्ध करैए। मैथिलीक सिलेबसमे वएह जमीन्दारक जीवनी आ चारिटा परिवारक स्तरहीन ब्राह्मणवादी कथा-कविता-नाटक देल जाइत रहतै, ओइ भूपसभ लेल अनशन केलासँ मैथिलीकेँ भऽ रहल हर्जा आर बढ़बे करतै। मैथिलीक जातिवादी सिलेबसक खिलाफ अनशन मात्रसँ मिथिला राज्यक ब्राह्मणवादी आन्दोलनी सभक कलंक मेटा सकै छन्हि। पटना, दिल्ली आ दरभंगा मे प्राथमिक शिक्षा मे आ दूरस्थ रूपेँ मैथिलीक पाठन लेल अनशन केनिहार सभक कार्यकलाप जाधरि स्प्ष्ट नै भ' जाए, ओ सभ मूल धाराक एजेण्ट छथि सएह बुझबाक चाही,आ हुनका सभक प्रति ओही तरहक व्यवहार हेबाक चाही। हकार ८१म सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीक आयोजन देवघरमे २२ मार्च २०१४ शनि दिन भऽ रहल अछि। ई आयोजन देवघरमे बमपास टाउन स्थित "बिजली कोठी" नम्बर ३ मे संध्या ५ बजे सँ २२ मार्च २०१४ केँ शुरू भऽ कऽ २३ मार्चक भोर धरि हएत। अहाँ सभ कथाकार लोकनि सादर आमंत्रित छी- अायोजक-अोम प्रकाश झा पहिल सगर राति जकरा सगर विश्वमे लाइव प्रसारित कएल जाएत। लिंक अछि: https://new.livestream.com/accounts/7191650/events/2827795 आयातित शब्दावलीबला साहित्य कोना मैथिली पाठक घटेलकै; आ खाँटी शब्दावली कोना मैथिली साहित्यक स्तर ऊँच केलकै, आ पाठक बढ़ेलकै, ई आब ककरोसँ नुकाएल नै अछि। उपन्यास लेल दू-दू बेर बूकर पुरस्कार आ साहित्यक लेल नोबल पुरस्कारसँ सम्मानित जॉन मैक्सवेल कुट्सी भाषाक सन्दर्भमे कहने रहथि जे अफ्रीकान्स आ अंग्रेजी भाषाक द्विभाषिया माहौलमे हुनकर अंग्रेजी लेखन हुनका लेल बहुत रास संप्रेषण सम्बन्धी समस्या सोझाँ अनैत छल। ओ अफ्रीकान्ससँ अंग्रेजीमे तकर प्रतिकार स्वरूप ढेर रास अनुवाद केलन्हि। मुदा मैथिलीक साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता (आ किछु ऐ पुरस्कार लेल ललाइत आकांक्षी लोकनि), जे तथाकथित साहित्यकार लोकनि छथि, से जइ प्रकारेँ मैथिली आ हिन्दी दुनूक डोरी पकड़ि माहौल खराप करबामे लागल छथि, से जॉन मैक्सवेल कुट्सीसँ किछु शिक्षा ग्रहण करता, से मात्र आशा कऽ सकै छी। अमेरिकामे ३५० शब्दक अंग्रेजीक "हाइ प्रेक्वेन्सी" आ ३५०० "बेसिक वर्ड लिस्ट" हाइ स्कूलक छात्र लेल छै जे क्रमशः कॉलेज आ ग्रेजुएट स्कूल (ओतए पोस्ट ग्रेजुएटकेँ ग्रेजुएट स्कूल कहल जाइ छै) धरि पहुँचलापर दुगुना (गएर भाषा फेकल्टीक छात्र लेल) भऽ जाइ छै। साहित्यक विद्यार्थी/ साहित्यकार लेल ऐ सँ दस गुणा अपेक्षित होइत अछि। हिन्दीमे -अपवाद स्वरूप आंचलिक पोथी छोड़ि- हिन्दीक कवि आ उपन्यासकार अठमा वर्गक २००० शब्दक शब्दावलीसँ साहित्य (पद्य, उपन्यास) रचै छथि आ मैथिलीक किछु साहित्यकार ऐ बेसिक २००० शब्दक वर्ड लिस्टकेँ मैथिलीमे आयात करऽ चाहै छथि, आ ओतबे धरि सीमित रहऽ चाहै छथि, जखन जापानी अल्फाबेटक चेन्ह ५०० धरि पहुँचि जाइत अछि। तारानन्द वियोगीजीक जातिवाद दोसरे तरहक छन्हि- ओ लिखै छथि- "एतए तं मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। ठीके तं छै। पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी।" ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ पर मिथिलाक विभिन्न जातिक ऑडियो आ ऐ लिंकhttps://sites.google.com/a/videha.com/videha-video/  पर  वीडियो रेकॉर्डिंग ऑनलाइन उपलब्ध अछि जइमे डोम-मल्लिक (जकरा वियोगीजी मेहतर कहै छथि आ ओकरा आ ओकर भाषासँ घृणा करै छथि)क रेकॉर्डिंग सेहो श्री उमेश मंडल जीक सौजन्यसँ अछि। महेन्द्र मलंगियाक काठक लोक आ ओकर आंगनक बारहमासा जइ तरहेँ दलितक भाषाक कथित मैथिली (मलंगियाजीक सृजित कएल)क प्रति घृणा आ कुप्रचारक प्रारम्भ केलक तारानन्द वियोगी ओकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। ई ऑडियो आ वीडियो रेकार्डिंग अन्तिम रूपसँ ऐ घृणा आ कुप्रचारकेँ खतम कऽ देने अछि आ विश्व ई सुनि आ देख रहल अछि जे जातिगत आधारपर मैथिली कोनो तरहेँ भिन्न नै अछि। वियोगीजी अपन ऊर्जा ऋणात्मक दिशामे लगबै छथि आ तकर कारण अछि हुनक दृष्टि आ आइडियोलोजीक फरिच्छ नै हएब आ तेँ दोसराक समालोचना ओ बर्दास्त नै कऽ सकै छथि। विदेहक सम्पादकीयपर हुनकर ओ टिप्पणी आएल छल जकर जवाब ओ अविनाश (आब अविनाश दास)क फेसबुक वॉलपर देने रहथिन्ह। ** सगर राति दीप जरयक इतिहास- कथाक कथा सगर राति दीप जरयक इतिहास जे रमानन्द झा रमण द्वारा परसल जा रहल अछि, ओइमे एकर प्रारम्भ केना भेलसँ लऽ कऽ अखन धरिक इतिहास मे बहुत रास विसंगति अछि। एकर प्रारम्भ केना भेलसँ लऽ कऽ अखन धरिक इतिहासमे बहुत गोटेक योगदान बढ़ा कऽ, बहुत गोटेक घटा कऽ,  बहुत गोटेक परिवर्तित कऽ कऽ प्रस्तुत कएल गेल तँ बहुत गोटे निपत्ता कऽ देल गेला। कहल गेल जे ई स्वायत्त संस्था अछि मुदा चेतना समितिक दिससँ रमण आ अजित आजाद सम्मिलित होइत रहला आ जतऽ  कियो माला नै उठेलक ओतऽ ई लोकनि चेतना समिति दिससँ माला उठेलन्हि आ संयोजकमे चेतना समितिक नाम नै आन नाम इतिहास बनबै लेल देल गेल। चेतना समिति (गौरीनाथक सूचनाक अनुसार) जखन गौरीनाथ, अग्निपुष्प आ प्रदीप बिहारी पर लिखित प्रतिबन्ध लगेलक तकरा बाद बिहारी द्वारा लिखित माफी ऐ मैरेज हॅाल ( चेतना समिति) सँ मांगल गेल, फेर हुनका रचना लेल नै, वरन ऐ कृत्य लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल गेल आ ओ सेहो ऐ मैरेज हॅालक प्रतिनिधि भऽ गेला। ई मैरेज हॉल साहित्य अकादेमीसँ मान्यताप्राप्त संस्था अछि! फेर ई तिकड़ी श्याम दरिहरे- प्रदीप बिहारी आ रमानन्द झा रमण- संग मिलि कऽ सगर रातिमे की सभ केलक से रमणक जातिवादी इतिहासमे नै भेटत। की छल ओइ सगर रातिक रजिस्टरमे जकरा रमण कहि रहल छथि जे विभारानी हेरा देलन्हि। की ई रजिस्टर हेरा गेल बा हेरा जाइ देल गेल। मुदा किछु गप जे नै रमणकेँ बुझल छन्हि ने विभा रानीकेँ से अछि जे आरती कुमारी अपन मृत्युसँ २-३ दिन पहिने ओकर फोटो स्टेट उमेश मण्डलकेँ पठा देलखिन्ह। ओ चाहितथि तँ कोने झारे झाकेँ सेहो पठा सकैत रहथि,  मुदा हुनका झारेझा सभपर विश्वास नै छलन्हि, किए नै छलन्हि? कहल गेल छै जे शोनित अपन निशान छोड़िते अछि। दरभंगा बला गोष्ठी , जे ३१ मइ २०१४ केँ दरिहरे- रमण- बिहारी द्वारा साहित्य अकादेमी आ ओकरा द्वारा मान्यता प्राप्त फर्जी मैथिली संस्था सभक संग रमण-दरिहरे-बिहारी सन-सन जातिवादी ब्राहमणवादी-कायस्थवादी तथाकथित साहित्यकार सभ द्वारा प्रायोजित रहत,  आ अो एे तरहक (दिल्लीक बाद) दोसर गोष्ठी रहत जकरा रमण-दरिहरे-बिहारी ८३म गोष्ठी सेहो कहता। अोतऽ "राडक़ सुख बलाय" आदि कथाक वाचन हएत। मेहथ बला गोष्ठी मे रमण-दरिहरे-बिहारी सन जातिवादी ब्राहमणवादी-कायस्थवादी प्रतिबन्धित छथि। कहल जाइ छै जे सगर राति दीप जरय नव कथाकारक लेल ट्रेनिंग सदृश अछि। नव कथाकार कलमाएल जाइ छथि! मुदा सत्य की अछि? की एकर प्रवृत्ति साहित्य अकादेमीसँ भिन्न अछि? की ऐपर कब्जा लेल साहित्ये अकादमी सन छल प्रपंच नै होइ छल! आ ७९म सगर रातिक हीरन्द्र झा आदि द्वारा बहिष्कार आ रमणक ओतै जातिवादी उद्घोष उमेश पासवानक नै, मैथिलीक विरोध छल, कब्जाक राजनीतिक प्रारम्भ ७९म सगर रातिसँ पहिनहियो छल। ७४म सगर राति -हज़ारीबागमे प्रदीप बिहारी माला उठेबाक प्रस्ताव केलन्हि आ से छल मात्र दोसराक प्रस्ताव खसेबा लेल। अपन ग्रुपक क़ब्जा लेल मात्र ई प्रस्ताव छल। ओ अपन प्रस्ताव अपन ग्रुपक पक्षमे आपिस लऽ लेलन्हि। ओ ई नाटक ७५म सगर रातिमे सेहो केलन्हि। तँ की ऐ ब्लैकमेलिंगक धंधामे हुनकर उपयोग कएल जा रहल छन्हि आकि ओ ऐ ब्लैकमेलिंगक धंधाक मुख्य कलाकार छथि? हुनकर रचनामे जान नै छन्हि मुदा घृणित राजनीतिमे जान छन्हि। आ साहित्य अकादेमी पुरस्कार एहने गुणपर देल जाइ छै, से चेतना समितिसँ माफी मांगि पएर पकड़ि ओ निर्लज्जतापूर्वक लेलन्हि। से ओ ऐ ब्लैकमेलिंग धंधाक मुख्य कलाकार छथि जकरा बुझल छै जे नीक रचना लिखबापर ध्यान देनाइ मूर्खता छै, ओइसँ प्राइज नै भेटै छै, साहित्य अकादेमी लेल जोड़-तोड़ चाही आ ओइमे ओ मास्टर छथि, मैथिली गेल तेलहण्डामे। आ ऐ परिस्थिति मे नव कथाकारक ट्रेनिंग नै भेलै, जतेक लोक सगर रातिसँ जुड़ला ओइसँ बेसी हतोत्साहित कऽ मैथिली साहित्यसँ दूर कऽ देल गेला, नेट रिजल्ट माइनसमे रहल! बहिष्कारक राजनीतिसँ सुपौल, देवघर आ नरहनक गोष्ठी प्रभावित रहल तँ कब्जाक राजनीतिक अन्तर्गत काठमाण्डूक सगर रातिमे कोनो स्थानीय साहित्यकारकेँ धीरेन्द्र प्रेमर्षि हवा नै लागऽ देलखिन्ह जे एहन कोनो गोष्ठी हुअएबला अछि, मनोज मुक्ति ई सूचित करै छथि। कबिलपुरक गोष्ठीमे सोमदेव आ रमानन्द रेणुकेँ नै बजाएल गेलन्हि। राजनन्दन लालदास कहै छथि जे सएह कारण छल जे आयोजक योगानन्द झा ऐ गोष्ठीक रिपोर्ट “कर्णामृत” लेल नै पठेलन्हि, जखन कि दोसरा द्वारा आयोजित गोष्ठी सभक रिपोर्ट ओ पठबै छलखिन्ह। योगानन्द झापर कबिलपुरक कोन ग्रुपक प्रेसर छल? ओही ग्रुपक जे “विद्यापति टाइम्स” नाम्नाअपने छापू अपने पढ़ू पत्रमे ई न्यूज हुनका माध्यमे छपबेलक- “घरदेखियासँ आगाँ नै बढ़ि सकला बनैत बिगड़ैतक लेखक सुभाष चन्द्र यादव”- मोहन भारद्वाजमैथिली लेखक संघक बनैत बिगड़ैतपर भेल गोष्ठीमे बजला। जखन कि नवेन्दु कुमार झा सूचित देलन्हि जे ओइ गोष्ठीमे बनैत बिगड़ैतपर मात्र अशोक आ तारानन्द वियोगीक आलेख आएल। ओना मोहन भारद्वाज आ योगानन्द झा ओइ गोष्ठीमे उपस्थित रहथि, आ आपसी गपशप-लूज टॉक भेल हेतन्हि जे गोष्ठीक कार्यक्रमक अन्तर्गत नै छल। २०१३ दिसम्बरमे साहित्य अकादेमी पुरस्कारक घोषणा भेल, योगानन्द झाकेँ कबिलपुर ग्रुप जूरी बनेलकन्हि आ बनैत बिगड़ैतक लेखक सुभाष चन्द्र यादवकेँ ई पुरस्कार कोना देल जइतन्हि! सुभाष चन्द्र यादवक "बनैत-बिगड़ैत", साहित्य अकादेमी आ ओकर पुरस्कार: साहित्य अकादेमीकेँ सुभाष चन्द्र यादवसँ भतबड़ी छै। मनुक्खक मनुक्खसँ भतबड़ी होइ छै, मुदा जखन कोनो संस्थाक मैथिली विभाग कोनो मनुक्खक खास संकीर्ण वर्गक कब्जामे चलि जाइ छै तखन ओ संस्था सेहो मनुक्खे संग व्यवहार करऽ लगै छै। पछिला बेर नचिकेताक "नो एण्ट्री: मा प्रविश" क अन्तिम बेर छलै आ ऐ बेर सुभाष चन्द्र यादवक "बनैत-बिगड़ैत"क अन्तिम बेर। ऐ पोथीकेँ आब साहित्य अकादेमी पुरस्कार नै देल जा सकतै। कारण एकटा संस्थाकेँ एकटा पोथीसँ भतबड़ी भेल छै। मूल परम्परा सुखाएल इनारक बेंग छी जकर मृत्यु आसन्न छै। ने ऐसँ "नो एण्ट्री: मा प्रविश" क आ नहिये "बनैत-बिगड़ैत"क महत्व साहित्यिक रूपसँ कम हेतै। मिथिला राज्यक ढोंगी आडम्बरी नेता सभक लेल ओना ई खुशीक विषय थिक मुदा समानान्तर परम्परा लेल ई एकटा चेतौनी छी। की मिथिला राज्य सेहो समानान्तर परम्परासँ भतबड़ी करतै? की ओकरो स्वरूप साहित्ये अकादेमी सन रहतै? मिथिला राज्यक आडम्बरी सभकेँ ई उत्तर देबऽ पड़तै आ नै तँ ओकरो स्थिति सुखाएल इनारक बेंग सन हेतै!!! मिथिला राज्यक लेल जँ अहाँकेँ क्यो धरणा दैत, सभा करैत देखाथि तँ हुनकासँ ई अवश्य पूछू जे "मिथिला यूनिवर्सिटी" "आकाशवाणी दरभंगा" आ "साहित्य अकादेमी" मे जे भऽ रहल अछि सएह "मैथिल ब्राह्मण मात्र लेल मिथिला राज्य" मांगैबलाक मिथिला राज्यमे हएत, से जे शंका सभकेँ छै से की असत्य नै छै,आ ऐ लेल मिथिला राज्य आन्दोलन कर्मी घोषणा करथु जे कहियासँ साहित्य अकादेमीक संयोजिका आ मेम्बर सभक घरक सोझाँमे आमरण अनशन करबाक घोषणा कऽ अपन प्रतिबद्धताक प्रमाण उपलब्ध करेता। पटना, दिल्ली आ दरभंगामे प्राथमिक शिक्षामे आ दूरस्थ रूपेँ मैथिलीक पाठन लेल अनशन केनिहार सभ एकटा पैघ षडयंत्रक हिस्सा भऽ सकै छथि, मैथिलीक सिलेबसमे भऽ रहल अन्यायक प्रति हिनकर सभक चुप्पी सएह सिद्ध करैए। मैथिलीक सिलेबसमे वएह जमीन्दारक जीवनी आ चारिटा परिवारक स्तरहीन ब्राह्मणवादी कथा-कविता-नाटक देल जाइत रहतै, ओइ भूप सभ लेल अनशन केलासँ मैथिलीकेँ भऽ रहल हर्जा आर बढ़बे करतै। मैथिलीक जातिवादी सिलेबसक खिलाफ अनशन मात्रसँ मिथिला राज्यक ब्राह्मणवादी आन्दोलनी सभक कलंक मेटा सकै छन्हि। पटना, दिल्ली आ दरभंगामे प्राथमिक शिक्षामे आ दूरस्थ रूपेँ मैथिलीक पाठन लेल अनशन केनिहार सभक कार्यकलाप जाधरि स्प्ष्ट नै भऽ जाए, ओ सभ मूल धाराक एजेण्ट छथि सएह बुझबाक चाही, आ हुनका सभक प्रति ओही तरहक व्यवहार हेबाक चाही। अशोक अविचल,  श्याम दरिहरे,  रमण आदि देवघरक आयोजक ओमप्रकाश झापर साहित्य अकादेमीक गोष्ठी केँ सगर रातिक मान्यता देबा लेल ब्लैकमेलिंगक कऽ ई शर्त रखलन्हि जे तखने ओ सभ ऐमे सम्मिलित हेता आ नै तँ बहिष्कार करता। मुदा आरती कुमारीक हत्याक बाद ई पहिल मौका छल बलैकमेलर सभकेँ हरदा बजेबाक, आ समीक्षा-प्रतिसमीक्षासँ बढ़ैत ई गोष्ठी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त केलक, बलैकमेलर सभक बहिष्कार ओकरा आर सबल बनेलकै। दरिहरे आयोजककेँ कहलन्हि जे साहित्य अकादेमीक गोष्ठी केँ मान्यता सगर रातिक रूपये भेटए, तइ लेल मैथिली लेखक संघ, पटनाक बैसकीमे रमणक कहलासँ ओ ऐलेल फोन केलखिन्ह। अविचल सेहो आयोजककेँ सएह कहलखिन्ह। देवघर गोष्ठी ट्रेनिंग स्कूल सिद्ध भेल, रमण, दरिहरे आ बिहारी अबितथि तँ सिखितथि जे केना रचनामे ओ क्वालिटी आनि सकै छथि, मुदा ओ सभ प्रैकटिकल छथि, बुझल छन्हि प्राइज टा लेल लिखल जाइ छै आ से जोड़-तोड़सँ भेटै छै, क्वालिटीसँ नै, अविचलमे प्रतिभा लेशो मात्र नै छन्हि, हुनका कोनो ट्रेनिंग किछु नै दऽ सकतन्हि, से ओ नै आबि अपन टाइम बचेलथि आ से नीके केलथि। सगर राति दीप जरयमे क्वालिटी आबि जाएत तँ बिहारी-दरिहरे-रमण सन मेडियोकरकेँ के पूछत, से ओ सभ राड़केँ सुख बलायक लेखक (!) क संग दोसर साहित्य अकादेमी गोष्ठी करता जतऽ ब्राह्मण युवा सभकेँ राड़केँ सुख बलाय सन नीक कथा केना लिखल जाए तकर ट्रेनिंग रमण-बिहारी-दरिहरे द्वारा देल जाएत। नीके अछि, मूर्ख सभक प्रवेश सगर रातिमे थम्हत। आ परोक्ष रूपेँ ऐ लेल मैथिली साहित्य रमण-बिहारी-दरिहरेक आभारी रहत। दरिहरे-बिहारी-रमणक बहिष्कारक रणनीति द्वारा सगर रातिपर कब्जाक राजनीति आरती कुमारीक संग भागलपुरमे चलि सकल मुदा वएह राजनीति २ सालक बाद देवघरमे तेनाकेँ फेल भेल जे ओ सभ पहिने सगर रातिसँ पड़ाइन केलन्हि आ फेर निकालि देल गेला। ब्राहम्णवादी भाषाक रूपमे विश्वमे ख्यात ऐ साहित्यमे कोन प्रक्रिया चलि रहल अछि जे ई संभव केलक? सगर राति दीप जरयक ब्राहम्णवादी अनुष्ठानकेँ एकर स्वयंभू पुरोहित सभ द्वारा आरती कुमारीक बलि देल जा चुकल छल। भयक ऐ वातावरणमे ई परिवर्तन केना भेल जे रमण-बिहारी-दरिहरे नै बूझि सकला? मैथिली भाषाक ब्राह्मणवादी चरित्रमे भाषाक संग ख़ूब खेल खेलाएल गेल छै। राड़क मतलब एतऽ छै (ब्राहम्णक नजरिमे) भुमिहार, राजपूत, कायस्थ सहित सभ आन जाति। अपन बच्चाकेँ यौ आ राड़क बुढ़बाकेँ हौ! कहबी मे सेहो बेइमानी, जेना- दस ब्राहम्ण दस पेट, दस राड़ एक पेट! मुदा हमर माँ कहै छथि जे ई कहबी मात्र ब्राहम्णमे छै, आन सभ कहै छथि- दस राड़ दस पेट, दस ब्राह्मण एक पेट। मुदा बिहारी सन मेडियोकर साहित्यकारकेँ ई सभ गप नै बुझल छन्हि- ओ बुझै छथि जे राड़केँ सुख बलाय तँ जगदीश प्रसाद मण्डलपर रमण-बिहारी-दरिहरे लिखबेने छथि। रमण आ दरिहरे तँ ठीक सोचै छथि मुदा बिहारी तँ कायस्थ छथि आ दरिहरे-रमणक परिभाषा अनुसार राड़केँ सुख बलाय जगदीश प्रसाद मण्डलक अतिरिक्त हुनके टा पर नै वरण समस्त मिथिलाक गएर ब्राहम्णकेँ देल गारि अछि। विदेह घरे-घरे घुसि चुकल अछि, से ३१ मइ २०१४ केँ रमण-दरिहरे-बिहारीक "राड़केँ सुख बलाय" कथा गोष्ठीमे शामिल सभ ब्राहम्ण-छद्म कथाकारक लिस्ट हमरा ०१ जून २०१४ क भोरमे पठाउ। आब आउ सगर रातिकेँ खतम करबाक साहित्य अकादेमीक मैथिली शाखा आ ओकरा द्वारा मान्यताप्राप्त फ़र्ज़ी संस्था सभक पर। रमण साहित्य अकादेमीक मैथिली शाखासँ लाखक लाख असाइनमेण्ट क़ताक सालसँ लऽ रहल छथि, से हुनका ई भार देल गेलन्हि जे सगर रातिपर विदेहक प्रभावकेँ ओ ओहिना ख़त्म करथु जेना आरती कुमारीकेँ ओ बिहारी-दरिहरे संग मिलि कऽ ख़त्म केने रहथि। मुदा हुनकर एस्टीमेट ऐबेर गड़बड़ा गेलन्हि, मैथिली लग आब पाठक छलै, शक्ति छलै, स्तर छलै, से मेडियोकर रमण-बिहारी-दरिहरे नै बुझि सकला। ख़ून रंग आनै छै, चेन्हासी छोड़ै छै .....ख़ून खूनीकेँ ताकि लै छै़़़। मिथिलामे दुर्गापूजामे मोटामोटी चन्दा ओसूलि कऽ पूजा होइ छै। बस रोकि कऽ चन्दा ओसूली सरस्वती पूजा लेल आब शुरू भऽ गेल छै, पहिने नै होइ छलै, कारण ई पर्व व्यक्तिगत निष्ठासँ सम्बन्धित छल। ओ निष्ठा यज्ञोपवीत करबा कऽ मूर्खतापूर्वक मोछैल आ क्लीन शेव (संगे पाग पहिरने!) विद्यापतिक कोनो तत्कालीन वेशभूषाक अध्ययनसँ रहित जातिवादी कलाकार द्वारा बनाओल फोटोपर माल्यार्पणक विद्यापति पर्वमे सेहो नै भेटत। ई विद्यापति पर्व सभ , जातिवादी रंगमंच, साहित्य अकादेमीक मैथिली शाखा, प्रज्ञा संस्थान, साझा प्रकाशन आ सगर राति दीप जरय मैथिलीमे कट्टरता बढ़ेलक आकि घटेलक? विश्वकर्मा पूजा, दुर्गापूजा आदि ई दाबा नै करैए जे ओ सभ मैथिली लेल काज करै छथि। मुदा ई सभ समाजमे मिलि काज केना करी से सिखबैए। एकर विपरीत विद्यापतिकेँ यज्ञोपवीत करबाकऽ जे सांस्कृतिक संस्थापर कब्जाक राजनीति सिखाएल गेल से जातिवादी रंगमंचमे पैसल, कोलकाताक कुर्मी-क्षत्रिय समाज मैथिलीसँ अलग कऽ देल गेल। छिट्टाक छिट्टा पोथी आ सम्मान मैथिल ब्राहम्ण आ कर्ण कायस्थ लेल रिज़र्व भऽ गेल। दोसर जँ हिम्मत केलक तँ बूढ़ा सभ लफुआ युवाकेँ साहित्यकार बना कऽ हुलकाबऽ लगला। "राड़कँ सुख बलाय"क लेखक केँ श्याम दरिहरे, प्रदीप बिहारी आ रमानन्द झा रमण द्वारा हुलकाएब ऐ प्रक्रियाक टटका उदाहरण अछि। मुदा ई प्रक्रिया जे ५० सालसँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद आ कायस्थवादक संजीवनी बूटी छल कोना धराशायी भऽ गेल। मैथिली साहित्यमे एहन की भऽ रहल अछि, कोन ऐतिहासिक क्रिया- प्रतिक्रिया चलि रहल अछि जे ई संभव केलक, आ जे रमण-बिहारी- दरिहरे आ हुनकर सभक आका साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग आ जातिवादी रंगमंच नै बूझि सकल? सगर राति दीप जरय द्वारा ब्राहम्ण युवामे जे कट्टरता ढुकाओल जा रहल छल से जखन तोड़ल गेल तँ बिहारी- रमण- दरिहरे आ आका सभ बूझि नै सकल जे की भऽ रहल अछि आ अन्ततः ओ सभ अपन पेशेन्स खतम कऽ लेलन्हि। मुदा ऐबेर तँ दुनियेँ उनटल छल। रहुआ संग्रामक कथा गोष्ठीमे रमणजी सहित सभ निर्णय लेलन्हि जे राति भरि कियो नै सुतता, मुदा भोजनसँ पहिने जखन सभ नामी(!!) कथाकारक पाठ कऽ सुति रहला तँ भोरहरबामे जे युवा सभ नामी कथाकार लोकनिक कथा सुनने रहथि, तिनकर नम्बर एलन्हि। आशीष अनचिन्हार जखन कथा पढ़ैले एला तँ संचालक ओंघा रहल छला आ मात्र अध्यक्ष शिवशंकर श्रीनिवास जागल रहथि, नै सुतबाक निर्णय लेनहार रमणजी फोंफ काटि रहल रहथि, जकर विरोधमे अध्यक्षक कहलाक उपरान्तो आशीष अनचिन्हार कथा पाठ करबा सँ मना कऽ देलन्हि, ओ पोस्ट माडर्न कथा बादमे "विदेह लघु कथा" मे प्रिन्टमे छपल। मुदा ब्राह्मणवादी सेंसर प्रक्रिया एतेक जब्बर छै जे ने आयोजक, ने रमण आ ने अध्यक्ष-संचालकक फर्जी सगर रातिक इतिहासमे एकर वर्णन भेटत। अरुचिकर गपकेँ झँापि देबाक ब्राह्मणवादी प्रवृत्ति एकर कारण अछि। ८१ टा सगर राति भेबो कएल आकि नै, लोक हमरासँ पुछै छथि। पहिने डाकसँ रचना आबै आ से नामी (!!) कथा सभ पढ़ल जाइ छलै, जे युवा सभ सदेह आबथि तिनकर नम्बर एबे नै करन्हि, एबो करन्हि तँ सुतलाहा बेरमे, मुन्नाजी जखन एकर विरोध केलन्हि तँ वएह कहल गेल, गप झाँपू, रजिस्टरमे ओइ नै एनिहार सभक सेहो उपस्थिति दर्ज भेल तेँ। बहुत कथा गोष्ठीमे दसो टा कथाकार नै एला, मुदा उपस्थिति रजिस्टरमे बहुत रास उपस्थित भेटता, किछु एबे नै केला, किछु डाकसँ एला(!!) आ किछु हाजरी बना कऽ निपत्ता भऽ गेला सेहो। जेना युद्धमे ३००० सँ कम मुइने ओकरा युद्ध नै कहल जाइए, तहिना दस टा सँ कम उपस्थितिकेँ सगर राति केना कहल जा सकत? ८१ क संख्या बड्ड कम भऽ जाएत, ८१ बड्ड बेशी होइ छै, एतेमे तँ शान्त क्रान्ति भऽ जइतए, से किए नै भेल तकर कारण ऊपर देल अछि। ऐ समानान्तर आन्दोलनमे हमरा सहयोग चाही बा विरोध, धनाकर ठाकुर आ गंगेश गुंजनक "आइडियोजिकल न्यूट्रेलिटी"क मतलब सेहो एकेटा छै, आ से छै समानान्तर धाराक विरोध। आ इतिहास हमरो मूल्याँकन करत आ हुनको (विरोधी आ न्यूट्रल फिफ्थ कालमनिस्टक) । विदेहक सम्बन्धमे धीरेन्द्र प्रेमर्षिकेँ एकटा फकड़ा मोन पड़ल छलन्हि- "खस्सी-बकरी एक्कहि धोकरी"। राजा सलहेसक गाथामे जतऽ सलहेस राजा रहै छथि चूहड़मल चोर भऽ जाइ छथि आ जतऽ चूहड़मल राजा रहै छथि सलहेस चोर भऽ जाइ छथि। साहित्यक ब्राह्मणवाद जातिक आधारपर समीक्षा करैए, समानान्तर परम्पराक उदारवाद कट्टरता विरोधी अछि। समानान्तर परम्परा मिथिला आ मैथिलीक उदार परम्पराकेँ रेखांकित करैए तँ ब्राह्मणवादी समीक्षाकेँ मिथिलाक कट्टर तत्व प्रभावित करै छै। समानान्तर परम्पराक घोड़ा ब्राह्मणवादी समीक्षामे गधा बनि जाइए, आ ब्राह्मणवादी साहित्यमे तँ गधा छैहे नै, सभ घोड़ाक खोल ओढ़ने छै। आ सएह कारण रहल जे मैथिलीक सुखाएल मुख्य धाराक साहित्य दब अछि। आ सएह कारण रहल जे अतुकान्त कविता हुअए बा तुकान्त, बहरयुक्त गजल हुअए बा आजाद गजल; रोला, दोहा, कुण्डलिया, रुबाइ, कसीदा, नात, हजल, हाइकू, हैबून बा टनका-वाका सभ ठाम समानान्तर परम्परा कतऽ सँ कतऽ बढ़ि गेल; नाटक-उपन्यास-समीक्षा, विहनि-लघु-दीर्घ कथा सभ क्षेत्रमे अद्भुत साहित्य मैथिलीक समानान्तर परम्परामे लिखल गेल मुदा ब्राह्मणवादी सुखाएल मुख्यधारा आ जातिवादी रंगमंच छल-प्रपंच आ सरकारी संस्थापर नियंत्रणक अछैत मरनासन्न अछि। बहुत लोक ऐ तरहक कमेण्ट पछिला ६ सालसँ दऽ रहल छथि जे आब विदेह बदलि गेलै, ओकरा सभ सन भऽ गेलै। विदेहक उद्देश्य ने बदलल छै आ ने बदलतै। कोन व्याख्या ककर तुष्टीकरण छै से स्पष्ट बिनु केने ऐ तरहक कमेण्ट कएल जाइत अछि। हुनकर आशा जँ ई रहैए जे मैथिली साहित्य केँ युवाक उत्साह विदेहक माध्यमसँ नव दिशा प्राप्त करत आ से आब लागि रहल अछि जे से आब व्यक्तिगत कुण्ठाक मंचक रूपमे दुरुपयोगी भऽ गेल अछि तँ ऐ सम्बन्धमे हमर यएह कहब अछि जे सत्यक कियो उपयोग कऽ सकैए आ कियो दुरुपयोग, जे हुनका दुरुपयोग आ व्यक्तिगत कुण्ठाक तुष्टीकरण आब लागि रहल छन्हि से बहुत गोटेकेँ ६ साल पहिनहियेसँ लागि रहल छन्हि, आ तकर व्याख्या हमरा लग यएह अछि जे ओ सभ मात्र विदेहसँ सिम्बोलिक विरोधक आशा करैत रहथि, असली परिवर्तन नै चाहनहारकेँ यएह असली ब्राह्मणवाद बुझेतन्हि, कारण बदलल पात्रसँ ब्राहम्णवादी मानसिकता उद्वेलित भऽ गेल छै, ओ गेल तँ हम अबितौं मुदा ई सभ के आबि गेल? अहाँकेँ बुझबाक चाही जे मैथिली आगाँ एलै, जकरा जतेक प्रतिभा छलै ओ विदेहक माध्यमसँ ततेक सिखलकै आ ततेक आगाँ बढ़लै आ बढ़तै। किछु लोक जँ स्वार्थक लेल विदेहसँ जुड़ला मुदा आनुवंशिक जाति श्रेष्ठता हुनकासँ विदेहक निश्छल प्रयासोक बावजूद नै गेलन्हि, आ जइ विदेहकेँ ओ साहित्य आन्दोलन बुझै छला (हृदयसँ नै) आ विदेहकेँ इमोशनल ब्लैकमेल, धमकी , हमरा आ हमरा परिवारकेँ ईमेल- फोनसँ गारि, छोड़ि कऽ जेबाक धमकी (छोड़ि कऽ जेबाक धमकी देनिहारमे संयोगसँ अखन धरि मात्र ब्राहमणे छथि जिनका लगै छन्हि जे सिमबोलिक प्रोटेस्ट धरि मात्र विदेह सीमित रहितए), जे आब अहँू वएह (!!), बुझलौं प्राइज़ लेल, फलनाकेँ दिआबए चाहै छिऐ, अपने लिअ चाहै छी, व्यक्तिगत राजनीति, विदेहक भला नै हएत, ई सभ ६ सालसँ सुनि- सुनि हमर कान पाकि गेल अछि। रामदेव झा आ अमर पहिनेँ कहैत रहथि, हम अपन कनियाँकेँ पुरस्कार दिआबऽ चाहै छिऐ, अपने लिअ चाहै छी, सभ हँसि देलकन्हि जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग निर्वस्त्र अछि, दोसराकेँ की सम्मानित करत तँ आब कहि रहल छथि जे उमेश मण्डल ,राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुरकेँ हम पुरस्कार दिआबऽ चाहै छिऐ। मोहन भारद्वाज देवशंकर नवीनक सोझाँ कहै छथि जे गजेन्द्र ठाकुर पागले ने छै जेना लखन झा छलै। दरिहरे सेहो लाल बुझक्कर छथि, हुनका आब बुझबामे आबि गेलन्हि जे हमरा साहित्य अकादमी सँ झगड़ा अछि तेँ, व्यक्तिगत राजनीति तेँ। बिहारी मुन्नाजीकेँ फ़ोन करै छथि आ कहै छथि मात्र जगदीशे मण्डलकेँ किए आगाँ बढ़ाओल जा रहल अछि (!!) ब्राहम्णवादी मानसिकता ई छिऐ, जे जगदीश मण्डल मेरिटसँ नै, बढ़ेलासँ आगाँ बढल छथि जेना मैथिली साहित्यमे पहिने होइ छलै। प्रदीप बिहारी मुन्नाजीकेँ कहै छथि जे विदेह किए जातिवादी रंगमंचक विरोध करैए, किए समानान्तर परम्परा भऽ कऽ मूल परम्पराक गुणवत्ताक समीक्षा करैए, समानान्तर तँ मूलसँ मिलिते नै छै तँ किए हमर सभक नाम लै छी, अलग रहू, यएह छिऐ असल ब्राहम्णवाद- कायस्थवाद। चर्चे नै कर, काने बात नै दे!! आ ईहो संयोगे अछि जे जइ २-४ टा लोककेँ दिक्कत छन्हि से ब्राहम्णवादी प्रवृत्तक छथि, अनका ई दिक्कत किए नै छन्हि। पछिला ६ सालसँ विदेह जहिना छल ओहने रहत, अगिला कमसँ कम ३० साल धरि मैथिली साहित्य आब अहिना चलत। विदेहमे जकरा जे मेरिट छै ओ ओतेक बढ़त, चाहे ओ कोनो जाति, धर्म, क्षेत्रक होथि। विदेह जिनका बदलल लागि रहल छन्हि ओ स्वयंकेँ देखथु जे ओ तँ नै बदलि गेल छथि? सगर राति दीप जरयमे अलिखित संविधानक नामपर बहुत रास खेल भेलै। ई मुख्य रूपेँ कथावाचनक गोष्ठी छिऐ मुदा एतऽ आलोचनात्मक आलेख पढ़बाक सेहो अनुमति छै आ से जँ अहाँक नाम रमण अछि तखने टा, से जखन कबिलपुर गोष्ठीमे मुन्नाजी विहनि कथा पर आलेख पढ़बाक अनुमति मांगलन्हि तँ से अनुमति नै भेटलन्हि, आ एतऽ अलिखित संविधानक सोंगर लेल गेल, आ तकर दूटा कारण, एक तँ मुन्नाजीक नाम रमण नै छियन्हि, दोसर विहनि कथाक कनसेप्ट विदेह द्वारा आगाँ बढ़ाओल जा रहल अछि से तकर विरोध, किए ने ओ कनसेप्ट कतबो वैज्ञानिक होइ। झंझारपुर गोष्ठी मे जे एला तिनकर कथाक पाठ नै भेलन्हि मुदा डाकसँ आएल कथाक पाठ भेल, आ जँ अहाँ अविनाश छी सुमन-अमरकेँ गारि लिखै छी यात्रीक नामपर , तँ अहूँ कथाकार, कवि सभ , नै रहितो , छी, देवघर गोष्ठीक संयोजकत्व सेहो बोनसमे अहाँकेँ भेटत। से घोंघरडीहा गोष्ठीमे जिनका सभकेँ कथा नै पढ़ऽ देल गेलन्हि, ओ सभ युवा एकर विरोध केलन्हि, किछुकेँ कथा पढ़ऽ देल गेलन्हि आ जिनका नै पढ़ऽ देल गेलन्हि से अगिला कथा गोष्ठीसँ एनाइ बन्द कऽ देलन्हि। जे सभ मैथिली फिल्म आ डोक्यूमेण्टरीक नामपर लोकसँ पाइ ठकलन्हि से रमण-दरिहरे-बिहारीक विदेहक विरोधमे संगी छथि, जे युवा प्राइज लेल मैथिलीयोमे लिखलन्हि, जातिवादी सभसँ मिलि साहित्य अकादेमीक युवा पुरस्कार लेलन्हि ओ तँ स्वाभाविक रूपे हुनकर संगी हेता। विदेह उमेश मण्डल आ जगदीश प्रसाद मण्डलक कान्हपर बंदूक राखने अछि, यूज़ कऽ रहल अछि, आ जँ हुनकर सभक रचना नै छपऽ देल जाइत, "तिल बहब ने" छपबासँ पहिने, सकरबाबल जाइत, तखन सभ ठीक छल। ब्राहम्णवादी सभ जकाँ विदेह कोनो काज केलासँ पहिने "तिल बहब ने" क शर्त-क़रार नै करबैए आ सएह कारण अछि , नव ब्राह्मणवादी ई नै बूझि सकला, धू, एहनो क़तौ भेलैए। बिनु जान-पहिचान, भेंट- घाँटक मात्र मैथिलीक नामपर सभ एकत्रित भऽ गेल से हुनका अजगुत लगलन्हि। प्रदीप बिहारी मुन्नाजीकेँ कहै छथि आ ई विचार रामदेव झाक सेहो छन्हि जे जखन विदेह, साहित्य अकादेमीक समानान्तर पुरस्कार शुरू कैए देलक तखन साहित्य अकादेमी लेल शोर किए? माने ओकरा बकसि देल जाए! अशोक अविचल शिवकुमार जीकेँ कहै छथि जे मायानाथ झा, आनन्द कुमार झा ( ऐमे गुणनाथ झा जोड़ि लिअ) आदि जिनका सभक चर्चा विदेह केलक, सभकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटलै, तँ हुनका उत्तर भेटल छलन्हि, जँ हुनकर सभक नाममे झा नै मण्डल रहितन्हि तँ की ई संभव छल? आ साहित्य अकादेमी कोनो मनुक्ख नै छिऐ जकरा संग भतबरी कएल जाएत आ ने ककरो पैतृक संपत्ति जकर उपयोग ब्राहम्ण कायस्थक तथाकथित साहित्यकारकेँ ख़ैरात बँटबा लेल आब कएल जा सकत। आ हमरा विषयमे जखन सभकेँ बुझबामे आबि गेलन्हि जे नै रौ, ई अपना सभ सन नै अछि, विदेह अपना सभ सन नै छौ, तँ हुनका सभ केँ आर चिन्ता लागि गेलन्हि! रौ कहीन जे, ईहो सभ हमरे सभ सन, कहीं ई, ई जे अपने प्राइज़ लेब' चाहैए बा दोसराकेँ दिआबऽ चाहैए.... ब्राह्मणवाद मैथिलीकेँ गीरि गेलै, आ सभकेँ बुझल छै जे दूटा सहोदरो एक रंग नै होइए, से पूरा जाति नीक बा अधला हेतै ई कनसेप्ट विदेहक नै छै, ओ तँ ब्राह्मणवादी कनसेप्ट छिऐ। अतुलेश्वर झा छथि ओना तँ ब्राहम्णवाादक विरोधमे रहथि मुदा पाग आ विद्यापतिक हमर लेख क बाद कष्ट भऽ गेलन्हि, हुनकर मानब रहन्हि जे पागेपरसँ मौरओढ़ाएल रहै छै आ मौर जे गएर ब्राह्मणक विवाहमे प्रयुक्त छिऐ से पागे छिऐ। मुदा जखन हुनका हम कहलियन्हि जे मौर कोढ़िलासँ बनै छै आ पूर्णियाँक ब्राह्मणमेबरसातिमे सेहो मौर विवाहिता महिला द्वारा पहिरल जाइ छै, तँ मिथिलाक  संस्कृतिसँ अपन अपरिचय सिद्ध भेलाक बादो ओ पागक साहित्यिक आ राजनैतिकसभामे प्रयोगक पक्षमे रहला। आ एहेन बहुत रास लोक छथि, प्रेम चन्द्र पंकज आ अभय दासकेँ कोनो ने कोनो बात लऽ कऽ विदेहसँ घृणा भऽ गेलन्हि, आ ई गप ओ सभ मुन्नाजीकेँ सूचित केलन्हि जे ओ लोकनि विदेह पढ़नाइ आब छोड़ि देलन्हि, प्राय: आब ओ सभ चोरा नुका कऽ विदेह पढ़ै छथि,कारण सभ गतिविधिक जानकारी हुनका सभकेँ रहै छन्हि। सगर रातिमे यात्री दिससँ सुमन-अमर केँ गारि देनहार आ अमर- सुमन दिससँ यात्रीकेँ गारि देनहार, मैथिली साहित्यमे ब्राहम्णवाद बचेबाक लेल विदेहक विरुद्ध दरिहरे- रमण- बिहारीक संग आबि गेल छथि अंतिम लड़ाइ लड़बा लेल। ** रमण, बिहारी आ दरिहरेक कथा गोष्ठीक तिथि ८२ म सगर राति दीप जरयक तिथि ३१ मइ २०१४ घोषित भेलाक बाद भेल। ऐ तीनू लग मौलिकताक सर्वथा अभाव अछि। कोनो नव चीज ई लोकनि सोचि नै सकै छथि, हँ प्रतिक्रियावादी, धुरफंदी चीज करबामे ई लोकनि सभसँ आगाँ छथि। से रमण ७९ म कथा गोष्ठी ओरहामे विदेह साहित्य आन्दोलनक खिलाफ गोलैसी करबाक प्रयास केलन्हि, गोष्ठी प्रारम्भ हेबासँ पहिने सायास अही काज लेल पहुँचला, आ बजैत फिरला जे विदेह साहित्य आन्दोलन-तान्दोलन नै छिऐ, खाली गजेन्द्र ठाकुर आ जगदीश प्रसाद मण्डल अपन नाम करऽ चाहै छथि, जे उत्तर भेटलन्हि तकर बाद ओ परदाक पाछाँ चलि गेला, जातिवादी बयान देलन्हि, हीरेन्द्र झाक उसकेलासँ अशोक मेहता सेहो ओइ गोष्ठीक बहिष्कार केलन्हि, इच्छा तँ रमणोक रहन्हि बहिष्कार करबाक मुदा हुनकर गाड़ी ड्राइवर समधियौर लऽ कऽ चलि गेलन्हि, से कारण ओ मुन्नाजीकेँ कहलखिन्ह। शंकरदेव झा बहुत पहिने सूचित केने रहथि जे, जे रमण प्रबोध नारायण सिंहकेँ प्रबोध नारायण सिंह एण्ड कम्पनी कहै छला आ सएह आब नचिकेताक बडीगार्ड बनल छथि। ई अवसरवादिता रमणक चरित्रमे छन्हि से जखन ओ दरिहरे आ बिहारीक संग अपन साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग आ ओकरा द्वारा मान्यता प्राप्त फ़र्ज़ी संस्था द्वारा संपोषित कथा गोष्ठीक घोषणा केलन्हि तँ ओ सभ ३१ मइ २०१४ क तिथिये सोचि सकला, तकर दू टा कारण छलै, हुनका सभमे मौलिकताक अभाव जे हिनकर सभक रचनामे सेहो दृष्टिगोचर होइत अछि, दोसर घृणित अवसरवादिता आ जातिवादी सोच। दरिहरे कहै छथि जे सगर राति हुनकर दलान अछि, ओइमे सर्वहाराक प्रवेश हुनका लेल कष्टकर छन्हि, बिहारीक कष्ट अही बात लऽ कऽ छन्हि जे पहिने एक दू टा कम्पटीटर छल तँ अस्तित्व जोड़-तोड़सँ बनबै छला, आब तँ मामिले खत्म, रमण कतेक छल-प्रपंचसँ मोहन भारद्वाजकेँ सगर रातिसँ बाहर केलन्हि, मुदा आब नव समीक्षक सभ आबि गेला। से यात्री दिससँ अमर-सुमनकेँ गारि पढ़ऽ बला आ अमर- सुमन दिससँ यात्रीकेँ गारि पढ़ैबला, ई दुनू ब्राहम्णवादी ग्रुप मैथिली साहित्यक विदेह साहित्य आन्दोलनक विरुद्ध मैथिली साहित्यमे जातिवादितापर ऐ घोर संकटक कालमे एक होथि, ई इच्छा राखैत "रमण- बिहारी- दरिहरे" कथा गोष्ठीक घोषणा केलन्हि,मुदा गजेन्द्र ठाकुर, विदेह आदि हुनका सपनामे डरबै छलन्हि से ओ एकटा चोरि केलन्हि, तिथिक चोरि, से किछु गोटे तँ कम हेतै जे सगर रातिमे ३१ मइ २०१४ केँ "रमण- दरिहरे- बिहारी" द्वारा घृणा कएल जाएबला गजेन्द्र ठाकुरक गाममे ओइ राति नै जा सकता। बड़ा आएल छथि आन्दोलनी, ब्राह्मणवादी घुरछीमे तेनाने फँसेबनि जे रमण- बिहारी- दरिहरेकेँ मोन रखता। हौ बाबू यएह छी असली विलेन, एकरा ख़त्म करू, विदेह आन्दोलन खतम आ मैथिली साहित्यपरसँ ब्राह्मणवादक पकड़ खतम हेबाक ख़तरा खतम, मैथिली जिबियेकेँ की फ़ायदा जँ अपना सभक वर्चस्व रहबे नै करए, अखन यात्री ग्रुप, अमर-सुमन ग्रुप नै करू,सभ ऐ संकटमे मिलि जाउ, बादमे झगड़ा करब, नै तँ गजेन्द्र ठाकुर खोप सहित कबूतराय नम: कऽ देत। मुदा की गजेन्द्र ठाकुरकेँ खतम केने मैथिली साहित्य आन्दोलन खतम भऽ जाएत? की परिवर्तनक धारा जे भयंकर रूपेँ विदेह द्वारा छोड़ि देल गेल छै ओकर अस्तित्व गजेन्द्र ठाकुरसँ अलग नै भऽ गेल छै, गजेन्द्र ठाकुरकेँ खतम केलासँ की ओकरा रोकल जा सकत? साहित्य अकादेमीसँ फ़ोन आएल जे ओकर मैथिली विभागमे जे गड़बड़ी भऽ रहल छै ओइले साहित्य अकादेमी कोना ज़िम्मेवार अछि? किछु गोटेक फ़ोन आएल जे ओ सभ सगर रातिक अतिरिक्त रमण-दरिहरे-बिहारीक साहित्य अकादेमी संपोषित गोष्ठीमे सेहो जाए चाहै छथि कारण ओ पब्लिक फंडसँ आयोजित होइ छै, आ जँ सगर रातिक तिथि हम बदलि दी रमण-दरिहरे-बिहारी नाम्ना तिथि चोर की करता? आरती कुमारी संग कएल टॅार्चरक बाद रमण-बिहारी-दरिहरेक मोन जे बहसल से किए नै बूझि सकल ऐ परिवर्तनकेँ?मेडियोक्रिटी नै जानि कतऽ लऽ जेतनि तीनूकेँ। मिथिला यूनिवर्सिटी आकाशवाणी दरभंगा आ साहित्य अकादेमी मे जे भऽ रहल अछि सएह "मैथिल ब्राह्मण मात्र लेल मिथिला राज्य" मांगैबलाक मिथिला राज्यमे हएत, से जे शंका लोककेँ छै से असत्य नै छै। साहित्य अकादेमी मैथिलीक पतन लेल जे काज केलक अछि आ कऽ रहल अछि तकरा मौन आ मुखर सम्बोधन केनिहारक संख्या आंगुर पर गानल जा सकैत अछि। "सगर राति दीप जरए" समानान्तर परम्पराक बौस्तु रहए तकर प्रयास हेबाक चाही, साहित्य अकादेमी पोषित मुख्यधारा लग ने लेखक छै आ ने पाठक आ ने प्रतिभा। ओकर इतिहास लेखनमे एहेन एहेन लोक आ पोथीक वर्णन भेटत जकर अस्तित्व नै छलै, से मूल धारा अपन इतिहास लेखनमे कोनो गनती करबा लेल स्वतंत्र अछि । राधाकृष्ण चौधरी आ सुभाष चन्द्र यादवक संग कएल छलक विरोध ओइ धारामे नै भेलै, कारण ओ "स्टेटस को" समर्थित लोकक संगठन छिऐ। साहित्य अकादेमीक गोष्ठी मूल धाराक लेल सगर रातिक गोष्ठी भऽ सकैए समानान्तर धाराक लेल नै। मैथिली आ मिथिलासँ प्रेम करैबला अधिसंख्यक समानान्तर परम्परा सम्बन्धी वर्ग "गरिखर" मुख्यधाराक डरे साहित्य अकादेमी गोष्ठीकेँ "सगर राति दीप जरए" केर मान्यता नै दऽ सकत। मैथिलीक मूल "गरिखर" परम्परा मे २० टा लेखक छै आ पाठक एक्कोटा नै, ई बीस गोटा बीस ग्रुपमे विभक्त अछि, सभ आपसमे कुकुड़-कटाउझ करैत रहैत अछि, मुदा विदेहक विरोधमे एक भऽ जाइत अछि आ साहित्य अकादेमीक पक्षमे भऽ जाइत अछि। "सगर राति दीप जरय" यएह एकटा संस्था छै जतऽ नन्दविलास राय सेहो जा सकै छथि आ जगदीश प्रसाद मण्डल सेहो। मूल धारा युवा ब्राह्मण साहित्यकार सभमे जातिवादिताक विष घोरि रहल अछि, आ ऐ सँ ओइ युवा सभकेँ अपने नोकसान भऽ रहल छन्हि। जइ लेखकमे प्रतिबद्धताक कमी अछि, जेना अमलेन्दु शेखर पाठक, अरुणाभ झा सौरभ आ दिलीप झा लूटन से ओइ जालमे फँसि गेला। अरुणाभ झा सौरभ आ दिलीप झा लूटन केँ युवा पुरस्कार भेट गेलन्हि। मैथिलीकेँ आब की घाटा हेतै, स्वाहा तँ कइये देने रहै, सुधारक सेहो गुंजाइश नै छै, तेँ ओ सभ कोनो सॉफ्टनेस डिजर्व नै करैए। मुदा ई चमचागिरी समानांतर धाराक युवा (ब्राह्मण वा गएर ब्राह्मण) मे भेटब असम्भव (जँ ब्लैक शीपकेँ छोड़े दी), ई युवा  तुर्क मंच सापेक्षीय चरित्रक निर्वाह नै करै छथि। अमलेन्दु शेखर पाठक आ दिलीप कुमार झा लूटन क कविता संग्रह साहित्य अकादेमी प्रकाशित केलक, ई बात फराक जे ओइ समयमे ब्राह्मण आ गएर ब्राह्मण वर्गमे बहुत युवा रहथि जे बेशी प्रतिभाशाली रहथि मुदा प्रकाशन लेल हिनके दुनूकेँ साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग चुनलक। तथापि ई दुनू गोटे किछु कवितामे आशा जगेलथि, मुदा लेखकीय प्रतिबद्धताक अभावक कारण ओ आशा धूमिल भऽ गेल। जखन जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ गुआहाटीमे मुख्य अतिथि बनाओल गेलन्हि तँ बैजू आदिक विरोध आयोजककेँ सहऽ पड़लन्हि आ ओइ वीडियो रेकॉर्डिंगमे ब्लैकआउटक मादे जखन हम आयोजककेँ पुछलियन्हि तँ ई जानकारी भेटल, आ जखन ब्लैक आउट खतम भेल तँ अमलेन्दु शेखर पाठक निर्लज्जतापूर्वक कहैत सुनल गेला "सपनोमे नै सोचने हेतै.." इत्यादि.." आ बैजू आदि दस गोटे ओइपर निर्लज्जतापूर्वक ठहाका लगेलन्हि, ई वीडियो विदेह वीडियोमे उपलब्ध अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल क स्टेचरक अमलेन्दु शेखरक मेण्टर सभ सेहो नै बनि सकता आ विद्यापति पर्वक मुख्य अतिथि भेनाइ जगदीश जीक नै ओइ विद्यापति पर्वक लेल सम्मान छल। खएर .. मुदा तकर बाद दरभंगाक विद्यापति पर्वपर (बैजूक विद्यापति सेवासंस्थानक विद्यापति पर्व) जखन नन्द विलास राय पहुँचला तँ अमलेन्दु हुनका अपमानित करैत मंचे पर कहलखिन्ह " अमलेन्दु अहाँकेँ पोस्टकार्ड लिखि कऽ बजेने  रहथि!!!" आ ऐ गपक चर्चा नन्द विलास राय कमलेश झाक संस्थाक सम्मान समारोहमे केलन्हि जतए भीमनाथ झा आदि सभ उपस्थित रहथि। अखनो अमलेन्दु आकाशवाणी दरभंगाक मैथिली विभाग मे जे जातिवादी स्वरक प्रचार कऽ रहल छथि से लेखकीय प्रतिबद्धताक विरुद्ध अछि। जँ समानान्तर परम्परा साहित्य अकादेमी गोष्ठीकेँ मान्यता नै दऽ रहल अछि तँ ऐ सँ मिथिलापर ई कलंक तँ दूर भेबे कएल जे हम सभ "स्टेटस कोइस्ट" छी, आब अधिसंख्यक वर्ग ओइ कुकृत्यसँ अपनाकेँ दूर राखऽ चाहैए। मैथिली साहित्य आ इतिहास दू खण्डमे बँटि गेल अछि। लोक जेना गांधीजीक विरोध कऽ महान बनऽ चाहैए तहिना विदेहक विरोध कऽ कए सेहो। साहित्य अकादेमीक गोष्ठीकेँ "सगर राति दीप जरए" केर मान्यता भेटै ओइ लेल कमलेश झा सन "कम्यूनिस्ट" आ ढेर रास "मैथिल ब्राह्मण मात्र लेल मिथिला राज्य आ मैथिली भाषा" मांगैबला ब्राह्म्णवादी (कम्यूनिस्ट ब्राह्मणवादी सेहो) अपस्यांत छथि। मुदा समानान्तर धाराक इतिहास लेखन मे साहित्य अकादेमीक गोष्ठीकेँ "सगर राति दीप जरए" केर मान्यता नै देल जा सकत। मूल धाराक इतिहास लेखन मे ओ साहित्य अकादेमीक गोष्ठी लेल संख्यामे "एक" नै "अनेक" संख्याक वृद्धि कऽ सकै छथि| ** कथा वाचन- लेखन पाठशाला (बाल कथाक विशेष संदर्भमे) ** मैथिलीमे कथा वाचन, विशेष कऽ नेना भुटका लेल बाल कथा वाचनक परम्परा बड्ड पुरान रहल अछि। लोक गाथाक रातिक राति, दिनक दिन प्रदर्शन, बाल सुलभ मोन लेल ओकर छोट वर्जनक गद्य-पद्य मिश्रित एक आ बेशी राति चलैबला दादी-नानीक कथा, दादी-नानी आ बाबा-बाबूक सुनाएल आन लोककथा एकर विभिन्न रूप अछि जे मिथिलाक बालक-बालिकाक मोन मोहने अछि। ऐसँ विपरीत सप्ता डोरासँ लऽ कऽ मधुश्रावणी आ बिहुलाक कथाक जानकारी मात्र बालिके धरि सीमित अछि, एक्के घरमे रहितो किछुए बालक मौगियाहा संज्ञा भेटबाक डरक संग ऐ कथापाठमे सम्मिलित हेबाक साहस करै छथि। कथाक बीच गीत, कहबी, खेल सेहो होइए। खेल कथाक बालक- बालिका सभ द्वारा वाचन-गायन होइत अछि, आ खेला सेहो चलिते रहैत अछि, कोनो दादी-नानीक प्रवेश नै, कोनो बाबू-बाबा, बेदराक खेलमे घुसि नै सकै छथि। ** कथापाठक एतेक सुन्दर परम्पराक अछैत मैथिली बालकथा किए असफल भऽ गेल, बा अखन धरि असफल अछि। जँ लिली रे केँ छोड़ि दी तँ ई कहैत कनियो संकोच नै जे साहित्य अकादेमी पोषित, से ओ छपाई हुअए बा पुरस्कार, मैथिली बाल कथा साहित्य , बाल साहित्य अछिये नै। आ जँ अहाँमे प्रतिभा नै अछि तँ अनुवाद करू, मुदा प्रायोजित अनुवादक स्तर एहन जे बच्चाक बापक दिन नै छिऐ जे एक्को पैराग्राफ़ पढ़ि लिअए, तते ने मुँह कोचिआबए पड़ै छै। ** साहित्य अकादेमीसँ २४ भाषासँ संकलित बाल कथा निकालल गेल। मैथिलीयोक कोटा छै आ रामदेव झा दुनू बापुतक बालकथा कोना नै रहत, नाटक संग्रह एतै तँ फट नाटक तैयार, तही तर्जपर। लिली रे क कथा मुदा सुन्नर अछि। मैथिलीक ऐसँ बदनामी होइ छै, दुनियाँ बुझैए जे मैथिलीक कथाकार बाल कथाक माने बुझबे नै करै छथि। ८२ म सगर राति दीप जरय बालकथा केन्द्रित रहत। ओइ संदर्भमे बाल कथा वाचन-लेखन पाठशालाक आरम्भ कएल जा रहल अछि। ** विदेह शिशु उत्सवमे जगदानन्द झा मनु क चोनहा आएल छलन्हि। बाल मनोविज्ञानपर आधारित ई उपन्यास बाल कथा लिखनहार लेल पाठ्यक्रमक समान अछि, केना कथा आगाँ बढ़ाओल जाए, आ समाप्त कएल जाए, कथा वस्तुक नवीनता एकरा विशिष्ट बनबैए। विदेह शिशु उत्सव ऐ लिंकपर उपलब्ध अछि:- https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ ** से बालकथाक लेखन एना हुअए जे ओ पढ़ै आ सुनै, दुनूमे नीक लागए। ई क्लोजेट नाटक सन हेबाक चाही, जे मंचन लेल नै, असगरे पढ़बाले बा किछु गोटे संग ज़ोर-जोरसँ सुनबा-सुनेबा लेल लिखल जाइए। सरल विचार, सरल शब्दावली आ सरल भाषा श्रेष्ठ बाल कथा लेखनक चाभी अछि। जेना ऋगवेदक जल प्रलय, मनु आ महामत्स्यक कथा, सरस्वती नदी, अरायुक्त रथक विवरण, ई सभ आरम्भिक बाल कथाक आकृति देखबैत अछि तहिना अवेस्ताक गिलगमेशक कथा सेहो। ऋगवेदोसँ पहिने गाथा, नाराशंसी आदिक मौखिक साहित्य छल आ ओइ लेल ऋगवेदमे गाथापति, गाथिन आदिक प्रयोग अछि। "पंचतंत्र" आ ओकर किछु कथाक पुनर्लेखन "हितोपदेश" सँ बहुत पहिने जातक कथा बाल कथा कहलक आ सेहो चिड़ै चुनमुनीक संग मालजाल आ जानवरक माध्यमसँ, ओना जातकक उद्देश्य बौद्ध धर्मक प्रचार सेहो रहै। अही तरहेँ पंचतंत्र बाल कथा कहैत कहैत स्त्री-शूद्रक प्रति पूर्वाग्रह कथामे पैसेलक, आ तेँ ओकर पुनर्लेखनक आवश्यकता अनुभूत भेल। ऋगवेदक आख्यान संवादकेँ जन्म दै छल, जे पौराणिक कथा ख़त्म कऽ देलक आ तेँ ओइ पौराणिक कथा सभक पुनर्लेखन अखुनका हिसाबे हेबाक चाही। ** आधुनिक बाल कथा केहुन हुअए? ओइमे आधुनिक विज्ञान द्वारा पसारल नीक तत्वक संग पर्यावरण चेतना सेहो हेबाक चाही। माने कथा बुद्धिपरक नै व्यवहारपरक हेबाक चाही। बालकथामे मनोरंजन आ ज्ञानक समावेश लेल विज्ञान, समाज विज्ञान परक कथा लिखबाक आवश्यकता अछि। बच्चा अपन धरोहरिकेँ बुझए, तेँ लोक कथा, परीकथा, जादू कथा कहल जा सकैए मुदा ई अंधविश्वास नै बढ़बए तइ तरहेँ ओकर लेखन पुनर्लेखन हेबाक चाही। (विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ अखन धरि (अंक १४९ धरि) ११९ देशक १,६२६ ठामसँ ८५,६२२ गोटे द्वारा ४३,६३१ विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,७४,६०६ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।) अक्षय कुमार झा प्रेमक अधिकार अपन माँ आ पिताक हम आज्ञाकारी पुत्र छी, मुदा जहियासँ बिआह भेल, हुनका नजरि‍मे संदिग्ध भऽ गेल छी। हमर सोभाव, आचरण, आ हृदैक भावना पहिने जकाँ स्थिर आ तटस्थ अछि, मुदा हुनका नजरि‍मे अपन कनियाँक गुलाम छी। हमरा बुझने आनो घरमे हमरा सनक आज्ञाकारी बेटा ई मनोवैज्ञानिक दबाबमे अपन जि‍नगी बिता रहल छथि। कनियाँ घर कि एली, जेना नांगरि‍ हमरा लगि गेल। आब ई आरोप सहनाइ कठिन लागैत अछि कि हमरा कियो कनियाँक आदेशपाल कहए। जेना लगैत अछि, बिआहे केनाइ हमर अपराध छल। जहिना एकटा बेटाक अपन माए-बापक प्रति दायित्व अछि तहिना अनकर घरक ओ बेटी जे अपन घर-दुआर छोड़ि कऽ हमरापर आश्रित छथि‍। हुनका प्रति जिम्मेवारीक निर्वहन केनाइ हमर फर्जे नै अपितु धर्म अछि। डरैत-डरैत एकबेर माएकेँ कहलियनि- “माए, रूकमणिक माइक मोन सप्ताह दिनसँ खराप छन्हि भोरे फोन आएल छल कि ओझा दुइए दिनक लेल आबए देथुन बुच्चीकेँ देखला बड़ दिन भऽ गेल।” हमर गप अधुरे अखनि छल, माए झटसँ कहली- “तोरा दुनूक पेट मिलले छौ। कनियाँकेँ नैहरेमे कहुन रहैले। दू आदमीक भोजन कि बनबै छथि, जेना लगैए बड़का उपकारे हमरा सबहक करै छथि।” ई कहैत मुँह चमकबैत आ पटपटबैत अपना कोठलीमे माँ चलि गेली। दू दिनक बाद रूकमणिक तबीयत बेसी बिगड़ि गेलनि। संयोगवश हम दरभंगामे छेलौं। सुलेखा हमर छोट बहि‍न फोन केली, भैया, भौजीक तबीयत खराप छन्हि। साँझ तक घर आबि हुनका अस्पतालमे डाक्टरसँ देखा दबाइ लऽ घर एलौं। डाक्‍टर साहैब दस दिनक बेडरेस्ट पूर्जापर लिखि देलखिन। गामपर आपस एलापर उमेद छल माए पुछती कनियाँक केहेन तबीयत अछि? डाक्‍टर साहैब की कहलनि? मुदा हमर सोचक उन्‍टा माए पुछै लगली- “दबाइमे पाइ केतेक लगलो?” जहाँ हजार टकाक नाओं कहलियनि, आकि‍ तुरन्ते ताना मारए लगली- “छह माससँ बिजली बि‍ल बकाया छै ओ तोरा नै सुझाइ छौ। हमर बातरसक दबाइ अखनि तक अबि‍ते अछि‍। ओ तोरा नजरि‍पर किए रहतौ? अपन नौटंकीबाज कनियाँक बहानापर हजार टका फटसँ बुकि देलहिन। ई सभ हुनकर अराम करैक बहाना छियनि।” एक दिन रातिमे सूतल छेलौं, घड़ी दिस देखलौं, दू बजैत छल, नीन नै होइत छल। सोचैत रही बिआहसँ पहिने माए केतेक हमरा मानै छेली। मुदा आइ एहेन कोन अपराध हमरासँ भेल, जे ठीकसँ बातो ने करै छथि? आँखि डबडबा गेल। बहुत सोचलापर एकटा निष्कर्षपर पहुँचलौं कि जे बेटाकेँ माए जनम दइ छथि, एते कठीनसँ पालै-पोसै छथि। बिआहक बाद प्रेमक एकटा हिस्सेदार कनियाँ भेलासँ माइक अन्तर आत्मामे एकटा नाकारात्मक भावनाक जनम होइ छै। कि‍ जे हमर हिस्साक प्रेम कियो बाँटि तँ नै रहल अछि। ई सोच हमरा जनैत गलत अछि। प्रेम तँ सागर सनक अथाह आ अनंत अछि। जेकरा अनन्त तक बढ़ौने आ बंटनै अपन हाथमे अछि। ईहो सोच हमर अहाँक हेबाक चाही जे अलग-अलग तरहक सम्‍बन्‍धक लेल, अलग-अलग तरहक प्रेमक रंग आ रूप छै। जेकरा उचित रूपमे देनाइ आ लेनाइ हमर अधिकार क्षेत्रमे अछि। जगदीश प्रसाद मण्‍डल पलभरि‍ ति‍रसैठि‍म बरख गमौला पछाति‍ शि‍वजी बाबूक मन गरानि‍सँ गड़ि‍‍ रहल छन्‍हि‍। जि‍नगीक सङ दुनि‍योँ अन्‍हार जकाँ लगि‍ रहल छन्‍हि‍। केकरा कहथि‍न आ कहलो पछाति‍ के बि‍सवास करतनि‍ जे उवाह-उवाहमे जि‍नगीक ति‍रसैठ‍ बरख बोहि‍ गेल। समाजक केते लोक ऐ बातकेँ बूझि‍ रहल छथि‍ जे जइ आशामे अखनि‍ धरि‍ आस लगौने छेलौं ओ सोलहन्नी नि‍आस बनि‍ नि‍कलि‍ गेल! ओना बेसी लोक तँ यएह ने बूझि‍ रहल छथि‍ जे कौलेजक प्रोफेसर छथि‍, नीक दरमाहाक नोकरी करै छथि‍, आ नोकरी छुटलो पछाति‍ तेते पेन्‍शन भेटतनि‍ जे जि‍नगीमे कहि‍यो कोनो अभाव नै हेतनि‍, मुदा भेल की? असकरे अपन कोठरीमे बैस पोथीक अलमारीपर आँखि‍ गरौने मने-मन अपन हूसल जि‍नगीपर नजरि‍ दौगा रहल छथि‍। जेते नजरि‍ दौग रहल छन्‍हि‍ तेते मन वि‍षादसँ बि‍सबि‍‍सा रहल छन्‍हि‍। बि‍सबि‍सेबो केना नै करतनि‍, नीक नोकरी नीक दरमाहा केतए गेल? सौनक घट जकाँ दुनू आँखि‍ नोरसँ बोझि‍ल भऽ जि‍नगीक बि‍तल दि‍न देखि‍ रहल छन्‍हि‍। अनायास बकार फुटलनि‍- “धारक पानि‍ जहि‍ना धारे-धार बहैत समुद्रमे समा जाइए, तहि‍ना ने अपनो जि‍नगीक धारक भेल!” असकर कोठरीमे रहने िकयो दोसर तँ नै सुनि‍ पौलक मुदा अपन मनक सोग जे मुँह होइत नि‍कलल, ओ दुनू कान तँ सुनबे केलक‍नि‍। फेर मन घुमलनि‍। भने कि‍यो आन नै सुनलक। जँ सुनबो करैत तँ लाभे कथी होइतै। यएह ने जे जहि‍ना अपन जि‍नगी फुर्र-फाँइमे गेल तहि‍ना ओकरो जैतै। तैतालि‍स बरख पहि‍ने शि‍वजी सी.एम. कौलेजसँ एम.ए. पास केलनि‍। औनर्सोमे नीक अंक आ एम.ए.मे सेहो नीक अंक भेटल छेलनि‍। शुरूहेसँ माने हाइए स्‍कूलसँ मनमे बैस गेल छेलनि‍ जे एम.ए. केला पछाति‍ प्रोफेसर बनब। परि‍वारक स्‍तर- शि‍क्षा सङ अर्थ- केँ उठाएब। मुदा भेल की? गामक सम्‍पन्न परि‍वारमे शि‍वजीक जनम भेल। पि‍ता- राधा गोवि‍न्‍द- नीक खेति‍हर, पनरह बीघा खेतो छेलनि‍। पढ़ल-लि‍खल तँ बेसी नहि‍येँ छला मुदा खेतीक सभ लूरि‍सँ सम्‍पन्न छलाहे। समटल परि‍वार तँए बेटाक वि‍चारक वि‍परीत वि‍चार कहि‍यो बेटाक सोझ नै रखलनि‍। मनक धरणो छेलनि‍ जे बच्‍चाकेँ माने बेटा-बेटीकेँ जेते स्‍वतंत्र रूपे जि‍नगी ठाढ़ करैक समए देल जाएत ओ ओते नीक बनत। तहूमे कहि‍यो बेटाकेँ ने स्‍कूल-कौलेजमे फेल होइत देखलनि‍ आ ने कहि‍यो ताड़ी-दारू पीबैत देखलनि‍ आकि‍ सुनलनि‍। जइसँ मनमे आरो बेसी बि‍सवास बनले रहलनि‍। एम.ए. केलाक साले भरि‍ पछाति‍ गामक बगले गाम सोनपुरमे कौलेज खुजल। कौलेज बनौलनि‍ सोनपुरक एकटा सुभ्‍यस्‍त परि‍वारक वि‍ष्‍णुदेव। तीन भाँइक भैयारीमे वि‍ष्‍णुदेव सभसँ जेठ छथि‍। अस्‍सी बीघा जमीन छन्‍हि‍। दोसर भाए छेलखि‍न, जे नि:सन्‍ताने मरि‍ गेला। तेसर भाए कृष्‍णदेव छन्‍हि‍। मुदा दोसर भाएक नि‍:सन्‍तान वि‍धवा सेहो जीवि‍ते छथि‍न। हुनके मन बुझबैले रामदेवक नाओंसँ कौलेज बनौलनि‍। कौलेजक शुरूक समैमे, बि‍नु दरमेहेक बाहरक प्रोफेसर केना रहि‍ सकि‍तथि‍ तँए गामोक आ अगल-बगलक गामक सेहो शि‍क्षक सबहक बहाली भेल। अगि‍ला आशापर सभ- चपरासी, कि‍रानीक सङ प्रोफेसर- ऑफि‍सक काजसँ पढ़ै-लि‍खै धरि‍क काज सम्‍हारए लगला। ओना गाम-घरमे कम पढ़ैबला तँए वि‍द्यार्थीक संख्‍या ओते नै जइसँ कौलेजक काज नीक जकाँ चलैत। नीक जकाँक अर्थ ई जे प्राइवेटो कौलेज नीक वि‍द्यार्थी- संख्‍याक हि‍साबसँ- रहने नीक जकाँ चलि‍ते अछि‍ मुदा से ऐ कौलेजक नै। कम वि‍द्यार्थी रहने, आमदनी कम, जइसँ दरमाहोक तँ काटौती भेल मुदा आॅफि‍सक काज चलैत रहल। बीस बर्खक पछाति‍ कौलेजक भाग जगल। भाग ई जगल जे वि‍द्यार्थीक संख्‍या बढ़ने आ नीक रि‍जल्‍ट भेने सरकारी हेबाक संभावना बढ़ल। जइसँ चपरासी, कि‍रानीक सङ शि‍क्षकोक बीच सुखद भवि‍सक आशा जगल। मुदा तइसँ पहि‍ने ति‍करम शुरू भेल। सचीवक परि‍वार आ जाति‍-कुटुमक तँ कौलेजमे रहल मुदा शि‍वजीक सङ तीन गोटेकेँ हटा देल गेलनि‍। कौजेलसँ हटला पछाति‍ शि‍वजी अनुभवी शि‍क्षकक रूपमे रहि‍तो नोकरीसँ वि‍मुक्‍त रहला। मुदा साले भरि‍ पछाति‍ दोसर कौलेज शि‍वजीक घरसँ पाँच कोस हटि‍ खुजल, ओ खुजल जन-सहयोगसँ। मुदा कौलेजक अदीनता रहल जे संचालन समि‍ति‍क सदस्‍यक बीच वैचारि‍क भेद- मन-भेद- सभ दि‍न चलि‍ते रहल, जइसँ कौलेजक बेवस्‍था आगू नै ससरि‍ पाछूए हड़कैत रहल। मुदा तैयो ठाढ़ तँ रहबे कएल। ओही कौलेजमे समए बि‍तबैत शि‍वजीक ति‍रसैठि‍म बरख बीत गेलनि‍। सोनपुर कौलेजमे जखनि‍ तीन साल शि‍वजीकेँ भेलनि‍ तखनि‍ पि‍ता मरि‍ गेलखि‍न। परि‍वारमे दोसर करताइत नै, मुदा तैयो शि‍वजी जन-बोनि‍हारक हाथे खेती सम्‍हारैत रहला। ओना पि‍ता- राधा गोवि‍न्‍द- अपने हाथे तेते काज करै छला जे ओते काज करबैमे तीनटा जन लगैत। मतलब ई जे तीन जनक काज असकरे राधा गोवि‍न्‍द करै छला। राधा गोवि‍न्‍दकेँ मुइने परि‍वारक काजो घटल, मुदा तैयो परि‍वार तँ चलि‍ते रहल। शि‍वजीकेँ तीन सन्‍तान, दूटा बेटा एकटा बेटी। तीनू छँटगर भऽ गेल। जेठ बेटा- कुशेसर- खेलौड़ि‍या बेसी, तँए हाइ स्‍कूलक पढ़ाइसँ आगू नै बढ़ि‍ सकल। नै बढ़ैक पाछू पि‍तोक ओते तनदेही नै रहलनि‍ जेतेसँ बेटा-बेटी सुधरैए। सोलह बर्खक अवस्‍थामे कुशेसर दि‍ल्‍ली चलि‍ गेल। गरो नीक बैसि‍लै, एकटा फैक्‍ट्रीक आॅफि‍समे नोकरी भेट गेलै। दरमाहासँ बेसी बाइली हुअ लगलै। जे अपन खर्च चलबैत बैंकमे नि‍अमि‍त रखबो करैत आ पाँच हजार रूपैआ शि‍वजीओकेँ माने पि‍तोकेँ मासे-मास पठबैत रहल। बहि‍नक बि‍आह सेहो नीक जकाँ केलक। छोटका भाएकेँ बंगलोर पठा डाक्‍टरी पढ़बैए। समए आगू बढ़ल। शि‍वजी जि‍नगीक अंति‍म अवस्‍थामे पहुँच गेला। परि‍वारक सङ कुशेसर परसू गाम आएल। चारू धि‍या-पुता प्राइवेट कोचिंगमे पढ़ै छै। कोठरीमे दुनू परानी शि‍वजी बैसल अपनो जि‍नगीकेँ आ बेटो- कुशेसरो-क जि‍नगीकेँ भजारि‍ रहल छथि‍। अपन पढ़ल-लि‍खल जि‍नगी देखि‍ शि‍वजी बजला- “ओना ईश्वरक दयासँ परि‍वारक पछि‍लो आ अगि‍लो गति‍ नीक अछि‍ मुदा...?” ‘मुदा’पर शि‍वजीकेँ रूकि‍ते पत्नी टोकि‍ देलखि‍न- “मुदा की?” ओना अखनि‍ धरि‍ पत्नीओ नीक जकाँ शि‍वजीक जि‍नगीकेँ नै जनैत, मुदा शि‍वजी तँ स्‍वयं कर्ता-धर्ता छथि‍ए। संयोग नीक रहल जे पत्नीकेँ उत्तर दइसँ पहि‍ने पोता- कुशेसरक जेठ बेटा- जे हाइ स्‍कूलमे पढ़ैए, कोठरी पहुँच गेल। पोताक रूप-रङ देखि‍ शि‍वजी सहमि‍ गेला। सहमि‍ ई गेला जे अपना आगू कुशेसर केते पढ़ने अछि‍। मुदा कमेबा आ जि‍नगी जीबाक जे लूरि‍ ओकरा छै ओ अपना कहाँ भेल! खाली-खाली जि‍नगी खलि‍याइत सोलहन्नी खलि‍आ गेल! कोन मुहेँ केतौ बाजब जे जि‍नगीक ई लीला अपन छी! कोठरी अबि‍ते पोता- नन्‍दन- पुछलकनि‍- “दादाजी, अपन जि‍नगीक अनुभवक कि‍छु बात हमरो सुना दि‍अ।” पोताक प्रश्न सुनि‍ शि‍वजी ठकुआ गेला। ठकुआ ई गेला जे सत्-सत् कहि‍ देबै तँ हो-ने-हो ओकरो मन पढ़ै दि‍ससँ हटकि‍ जाइ, ओना कोन रूपे दि‍ल्‍लीमे रहैए, हमरा बातक केते असरि‍ हेतै, ई परि‍खब तँ कठि‍न अछि‍। मुदा झाँपि‍-तोपि‍ अपन कहि‍ देने तँ उत्तर भाइए जेतै। मुदा अधखि‍जू कहने थोड़े नीक नहाँति‍ बूझि‍ पौत। सभ रोग-वि‍याधि‍, सोग-संतापकेँ मनमे तहि‍यबैत शि‍वजी कहलखि‍न- “बाउ, समए सभसँ बलवान होइ छै, श्रमवाने ओकरा पकड़ि‍ सङे चलि‍ सकैए, तँए...?” ‘तँए’ सुनि‍ नन्‍दन पुन: पुछलकनि‍- “की बलवान?” पोताक दोहरबैत प्रश्न सुनि‍ शि‍वजी बजला- “बाउ, जे मनुख पल-पल जि‍नगीक महत बूझि‍ पग-पग बढ़ैत ओकर जि‍नगी आ पल-पलकेँ पलपलाएल रस पीब बढ़ैत तेकर जि‍नगीमे अकास-पतालक अंतर होइ छै। कि‍एक तँ नीको आ अधलोमे पलपली होइते छै।” नन्‍दन- “अकास-पतालक ई अन्‍तर मेटाएत केना?” शि‍वजी- “प्रकृति‍केँ अनेको रूप छै मुदा अखनि‍ दुइए रूप देखहक। धरती-अकास तँ देखै छहक, पताल नुकाएल अछि‍। मुदा मनुखोक प्रकृति‍ होइ छै, जे मनराजमे बास करै छै। वएह रूपान्‍तरण एक रूपता आनि‍ एकबट करैत बाट पकड़ैए।” बाबा- शि‍वजी-क वि‍चार सुनि‍ नन्‍दनो आ पत्नीओ उठि‍ कऽ ठाढ़ भेल। दुनूकेँ ठाढ़ होइत देखि‍ नमहर साँस छोड़ैत शि‍वजी अपन मनकेँ बुझबैत घुनघुनेला- “दि‍नक हेराएल जँ साँझमे घूमि‍ आबए तँ ओ हेराएब नै भेल। मुदा जे हेराएल से हेराएल जे बाँकी अछि‍ ओकरा पलो भरि‍ हाथसँ छोड़ब जि‍नगीकेँ धोखाड़ब हएत।” २४ मई २०१४ रिजल्‍ट पहिल जनवरीकेँ रवि दिन रहने दोसर दिन स्‍कूलो खुजत आ बड़ा दिनक छुट्टीसँ पहिने भेल परीछाक रिजल्‍टो नि‍कलत। ओना शि‍क्षक अभिभावक आ वि‍द्यार्थीक बीच नव बर्खक उपहारक समए रहने खुशीक वातावरण पसरले अछि‍। केना नै पसरौ! दुर्गापूजा अबैसँ पहि‍ने जे खुशी मनमे उमकैत ओ तँ सप्‍तमी पूजा धरि रहबे करैत। ठाँउ करब, फूल-पातसँ पूजा करब, काँच माटिक दि‍यारीसँ साँझ देब, स्‍तुति करब, मुदा आँखि (डिम्‍हा) पड़ला पछाति‍ जे उत्‍सवक मेला शुरू होइए तेकर पछातिए ने खगल-भरल हाथक वोध होइए। गामेक हाइ स्‍कूलक नअम कक्षामे गोबर गणेश सेहो पढ़ैत। ओकरो रि‍जल्‍ट नि‍कलत। जहि‍ना आन-आन वि‍द्यार्थीमे खुशी तहि‍ना ओकरो। एक तँ परीछा देला पछाति‍ बड़ा दि‍नक छुट्टीक उछाही तैपर आगू बढ़ैक अवसरि कि‍ए ने रहतै। ओना छुट्टीक उछाही सभ छुट्टीमे होइ छै मुदा से बड़ा दि‍नक छुट्टीमे नहियेँ रहै, मुदा कि‍छुओ तँ जरूर रहए। सालमे केतेको छुट्टी वि‍द्यालयमे होइए, जइमे कि‍छु स्‍थाइओ आ अस्‍थाइओ। ओना बाबन-ति‍रपनटा रवि‍ अपन अठबारे हि‍स्‍सा लइये लेने अछि, मुदा तँए आन-आनक कोनो सीमा-सरहद नै छै? छइहे। कि‍छु पावनि‍-ति‍हारक नामे अछि, कि‍छु मौसमक नामे अछि तँ कि‍छु समैक नामे। खैर जे होउ, मुदा जहि‍ना घटनकेँ बढ़न कहल जाइ छै तहि‍ना छोट दि‍नकेँ पैघ दि‍न अर्थात् बड़ा दि‍न कहि‍ अराम करैक अवसरि‍ देल जाइए! केतबो धड़फड़ केलक गोबर गणेश तैयो साढ़े दस बजि‍ये गेलै। एक तँ इस्‍कूलो जेबामे कि‍छु बि‍लम भाइए गेल रहै मुदा रि‍जल्‍टक खुशीक हकार बँटबे ने केने रहए। तँए वि‍द्यालय जाइसँ पहिने हकार सेहो बँटैक छइहे। वि‍दा होइसँ पहिने बाबा लग जा बाजल- “बाबा, आइ रि‍जल्‍ट नि‍कलत।” पोताक खुशीक हकार पाबि‍ श्‍यामचरणक मनमे खुशी उपकलनि‍ मुदा बजला कि‍छु ने। केना खुशनामाक असीरवाद देथि‍न? ओ बरहबट्टू थोड़े छथि जे दीक्षा पहि‍ने आ शि‍क्षा पछाति‍ देथि‍न। गोबरो गणेशकेँ वि‍द्यालयक फलक आशा तँए बाबाक असीरवादक प्रति‍क्षा छोड़ि‍ वि‍दा भऽ गेल। माथक सुरूज पछि‍म लटकि गेल, अखनि धरि‍ गोबर गणेश किए ने आएल। पढ़ौनी दि‍न थोड़े छिऐ जे बेसी समए लागत, रि‍जल्‍टक दि‍न छी। जे पास करत हँसैत घूमत आ जे फेल करत ओ अपनो कानत आ परि‍वारोकेँ कनौत। समटल मन बाबाक आरो समटा गेलनि। जेबेकाल पोता कहि गेल रिजल्‍ट नि‍कलत। चौकीपर सँ उठि रस्‍तापर जा वि‍द्यालय दि‍स हि‍या कऽ तकलनि‍। जेत्ते दूर नजरि‍ गेलनि‍ तैबीच केतौ पोताकेँ अबैत नै देखलनि। घूमि‍ कऽ दरबज्‍जापर आबि‍ वि‍चारए लगला। केना फल पौल पोताक अगवानी छोड़ि‍ अपने दोसर काजमे लागब। औझुके अगवानी ने वागवानी बनौत। अपना आँखिए पोताकेँ देखब आ अपना काने ओकर फलोकेँ सुनब छोड़ि कऽ जाएब नीक नै। बैसिते मनमे नीकक आशा नाचए लगलनि। जहि‍ना गाम-घरक बीच नव-नव अवि‍ष्‍कार सुनि‍ लोकक मन नचबो करैत आ गीतो गबैत जे आब की जनक जीक तीन बि‍तीया हरक काज हएत, बड़का-बड़का हरजोता सभ आबि‍ रहल अछि‍। एके दि‍नमे साठि बर्खक जि‍नगीकेँ तीस बरख बना देत। दू दि‍न तँ सौंसे जि‍नगीक भेल। गोबर गणेशपर नजरि पड़िते मनमे जेना शुभे-शुभक सपना उठए लगलनि‍। बि‍सरि‍ गेला चारि‍ सालसँ फेल होइत आएल गोबर गणेशकेँ। मुदा बि‍सरैक पाछू काजक फलो होइ छै। कि‍यो काजक फल गनि‍ फल बुझैए आ कि‍यो फलेकेँ फल बुझैए। श्‍यामचरणक मनकेँ गोबर गणेशक काज अधला वि‍चारक बाटपर ठाढ़ भऽ आगू अबै ने दनि, जइसँ बाबाक मनमे सौनक हरिअरीए बूझि पड़नि। आेना पछि‍ला सालक हरिअरी बाढ़िमे तेना कऽ धुआएल जे लोक सौन-भादो बि‍सरि‍ जुलाइ-अगस्‍त बुझए लगल, सेहो मनमे रहबे करनि‍। मुदा लगले मन बि‍नबि‍नेलनि‍। बि‍नबि‍नाइते चौकीपर सँ उठि‍ रस्‍तापर पहुँच स्‍कूलक बाट हि‍या कऽ तकलनि‍। पोताकेँ केतौ नै देखि मन ठमकि‍ गेलनि‍। मुदा लगले उठलनि‍ जे कि‍छु दूर आगू बढ़ि‍ देखि‍ऐ, जँ कहीं सङी-साथी सङ रि‍जल्‍टक खुशीमे बौड़ा गेल हुअए। मनो गवाही देलकनि‍। सएह भेल, भरि‍सक केतौ बौड़ा गेल अछि‍। जँ से नै रहि‍तै तँ कोन बेटा-बेटी लाखो बेर सप्‍पत खा कऽ नै बाजल हएत जे माए-बापक सेवा हमर धर्मे नै कर्तव्‍यो छी। एकटा झूठ बजने लोक कोट-कचहरीक खूनी केससँ बँचि‍ जाइए आ जैठाम हजारो-लाखोक बात छै। मुदा बेसी काल मन ऐठाम नै अँटकलनि‍। आगू बढ़ि‍ते मन पड़लनि‍ यएह जखनि‍ गोबरधन गि‍रि‍धारी गोबरधन पहाड़ उठा इन्‍द्रक धारकेँ रोकि‍ देलक तखनि‍ हमर गोबर गणेश ने कि‍ए करत। मनमे उठि‍ते जेना सौनक कजरारीक छटा छट-छटा गेलनि‍। डेगे-डेग कि‍छु डेग जखनि‍ आगू बढ़ि‍ नजरि‍ उठौलनि‍ तखनि बूझि‍ पड़लनि‍ जे पोता आबि‍ रहल अछि। नजरि पड़िते बाबा हाँइ-हाँइ पाछू घूमि‍, आपसी घर दिस वि‍दा भेला। अपन सिंहदुआरिमे पोताक अगवानी करनाइक खुशी मनकेँ भरि‍ देलकनि‍। मुदा जहिना प्रति‍क्षाक घड़ी असथिरसँ नै चलि‍ उकड़ू चालि‍ चलए लगैए। श्‍यामचरणोक मनमे तहि‍ना उठलनि। चारि बर्खसँ गोबर गणेश फेल करैत आएल अछि मुदा अपन मन कहै छै जेना जि‍नगीमे एकोबेर ने फेल केलौं हेन। जँ से रहि‍तै तँ कोढ़ि‍या बरद जकाँ पालो देखि‍ते कान झाँकि‍ दइत। सेहो तँ नहियेँ बूझि पड़ैए। मुदा से भेल केना अछि ई तँ ओकरेसँ भाँज लगत। कि‍यो रचनाकार मरि‍ कऽ नै मृत्‍युक चर्च करै छथि‍, मृत्‍युपराए जि‍नगी देखि‍ मृत्‍युक चरचा करै छथि‍। फेर कनगुरि‍या आँगुरपर हि‍साब जोड़ए लगला। टटका पढ़लाहा ने टटका प्रश्नक उत्तर टटके लि‍खि‍ देत मुदा से तँ गोबर गणेशमे नै अछि‍। रि‍आएल-खि‍आएल पाइ थोड़े कारोबारमे औत। जँ कनियोँ-कनियोँ बिसरैत गेल हएत तैयो एक सालक पढ़ाइ तीन सालमे बि‍सरिए गेल हएत। जँ बेसियाएल होइतै तँ चारि गुणा बेसीआ जाइत। तखनि तँ दोसरे सालमे बेसी पबिते पास केने रहैत, सेहो तँ नहि‍येँ भेल अछि। मन घोड़मट्ठा हुअ लगलनि‍। गोबर गणेश अबि‍ते श्‍यामचरणकेँ गोड़ लागि बाजल- “बाबा, रि‍जल्‍ट नि‍कलल।” गोबर गणेशक बात सुनि श्‍यामचरणक मनमे उठलनि‍, की नि‍कलल। पास केलक आकि‍ फेल केलक से कहाँ बूझि‍ पेलिऐ। नजरि‍ उठा हि‍या कऽ गोबर गणेशक मुँहपर देलनि‍। मुँहक रूखि‍ मलि‍न नै। मुदा केना कऽ पुछबै जे बौआ पास केलेँ आकि‍ फेल। पास-फेल तँ लोक जि‍नगीक क्रि‍यामे करैए। जे बच्‍चेसँ प्रवाहि‍त हुअ लगै छै आ हंसवाहि‍नी मतियो चलए लगै छै। आँखि‍पर आँखि चढ़ल देखि गोबर गणेश बूझि‍ गेल जे बाबाक मनमे कि‍छु प्रश्न छन्‍हि। हलसैत बाजल- “अहूबेर नमेमे रहब।” पोताक बात सुनि‍ श्‍यामचरणक मनमे उठलनि‍, चारि‍ सालसँ फेल करैत आएल अछि‍ मुदा मनमे मि‍सिओ भरि‍ गम नै छै! सि‍याहीक कोनो रेख नै देखि‍ पबै छी। असमंजसमे बाबाकेँ पड़ल देखि‍ गोबर गणेश बूझि‍ गेल जे भरि‍सक बाबा बि‍सरि‍ गेला। सएह मन पाड़ैले कहि‍ रहला अछि‍। कि‍छु ठेकना कऽ मन पाड़ि‍ बाजल- “पहि‍ले साल जे फेल केने रही से बि‍सरि‍ गेलि‍ऐ जे कि‍ए केने रही?” पोताक प्रश्न सुनि‍ श्‍यामचरण असमंजसमे पड़ि‍ गेला जे केना हँ कहबै आ केना नै कहबै। हँ जँ कहबै तखनि‍ जँ कहीं आगूक बात पूछि दि‍अए आ जँ नै कहबै तँ बुझलो बात नै बूझब कहि‍ झुट्ठा भऽ जाएब। चुपे रहला। परि‍वार की कोनो कोट-कचहरी छि‍ऐ जे बाता-बाती हएत, परि‍वार तँ परि‍वार छि‍ऐ। जहि‍ना बाबाकेँ बि‍नु पुछनौं कि‍छु कहैक अधि‍कार पोतापर होइत तहि‍ना ने पोतोकेँ बाबापर। अपने फुड़ने गोबर गणेश बाजल- “पहि‍ल साल जे शि‍क्षक पढ़ौने रहथि‍, हुनकर बदलीओ भऽ गेलनि‍ आ विषयो बदलि‍ गेल।” पढ़ौनी आ पढ़ौनि‍हार सुनि‍ कि‍छु पुछैक मन श्‍यामचरणकेँ भेलनि‍, मुदा अपने फुड़ने गोबर गणेश फेर बाजल- “पहि‍ल साल जे शि‍क्षक जे वि‍षय पढ़ौलनि‍ ओ जेना तर पड़ि‍ गेल।” गोबर गणेशक बात सुनि‍ श्‍यामचरण ओझरा गेला। डोराक पोलि‍या जकाँ ओर-छोर नै बूझि‍ पाबि‍ जेना बिच्‍चेमे ओझरी लगि‍ गेलनि‍। ओझरी लगि‍ते एकटा ओर देखथि‍ तँ दोसर हरा जान्‍हि‍ आ बीहयबैत जखनि दोसर भेटनि‍ तँ भेटलाहा हरा जान्‍हि‍। टीकमे लागल चि‍ड़चि‍ड़ी जकाँ भऽ गेलनि‍। एक तँ आँखि‍क पछुऐतमे टीक रहने सोझहा-सोझही नै देखि पबैत दोसर दुनू हाथक आँगुर ओझरी छोड़ाइए ने पबैत। मनमे उठलनि, गोबर गणेश कि‍यो आन छी जे कोनो बात पुछैमे संकोच हएत। पुछलखिन- “बौआ, नै बूझि‍ पेलौं जे केना पढ़ौनीओ आ पढ़ौनिहारो बदलि‍ गेल। जँ पहि‍ल साल बदलिये गेल तैयो दोसर-तेसर-चारि‍म साल तँ बँचल...?” बाबाक प्रश्न सुनि, साँपक बीख झाड़निहार मनतरि‍या जकाँ गोबर गणेश धुरझाड़ बाजल- “जहिना पहिल साल बदलल तहि‍ना दोसरो साल बदलल।” दोसर साल सुनिते बिच्‍चेमे श्‍यामचरण टोकि देलखिन- “एना नै बाजह जे जहिना पहिल बदलल तहि‍ना दोसरो-तेसरो-चारिमो साल बदलल। फुटा-फुटा कहऽ जे पहि‍ल साल की बदललह आ दोसर-तेसर-चारिम की?” बाबाक प्रश्न सुनि, जहिना कि‍यो इन्‍टरभ्‍यू देमए जाइकाल रस्‍ताक पढ़ल-बूझल बात सुनि प्रश्नक पुछड़ी पकड़ि धड़-धड़ा कऽ उत्तर दि‍अ लगैए तहि‍ना गोबर गणेश बाजल- “पहिलुक साल पढ़लौं जे केना कि‍यो गाछपर चढ़ि आम तोड़ैए आ केना माटि‍क पहियाक गाड़ी बना माटि‍ उघैए।” ओना श्‍यामचरणकेँ पोताक उत्तर सुनल बूझि‍ पड़लनि‍, मुदा कि‍छु बेसी दि‍नक सुनल बूझि बेसी बि‍सराइए गेल रहनि। कि‍छु अपनो मनपर भार दथि आ कि‍छु खोधि-खाधि गोबरो गणेशक मुहसँ सुनए चाहथि। गोबर गणेश बूझि‍ गेल जे बाबाकेँ रस भेटि रहल छन्हि‍। मनमे उठलै जे परिवारमे बूढ़-बच्‍चाक बीच सम्‍बन्‍ध बनत तँ बीचला अनेरे सोझराएल रहत। एक दि‍स टीकासनक बाबा तँ दोसर दि‍स गंगा पार करैक नाव पोता। मुस्‍की दैत गोबर गणेश बाजल- “दलानक खुट्टीपर जे ललका कपड़ामे रामायण बान्‍हि‍ कऽ रखने छी ओ पुरना गेल। पहि‍ल बर्खक कोर्समे रहए।” गोबर गणेशक अजगुत जवाब सुनि‍ श्‍यामचरणक मनमे भेलनि‍ जे बुधिए ने घुसुकि गेलैए। मुदा लगले फेर भेलनि‍ जे केमहर घूसकल से केना बूझब। एहेन प्रश्न पुछबो केना करबै। जँ कहीं आगू मुहेँ घुसुकि‍ गेल हेतै तखनि अगियाएल बात बाजत। जँ कहीं अगवानीक चालि‍ धेलक तँ अनेरे अनसोहाँत लागत। से नै तँ चुचिकारी दऽ अपने मुहसँ बजाएब नीक हएत। पुछलखिन- “बौआ, तँू झब-झब बाजि‍ जाइ छह, कनी असथि‍रसँ बाजह। आब कि‍ अपन ओ आँखि-कान रहल जे श्रवणकुमारक पानि‍क अवाज सुनि‍ तीर चलाएब।” बाबाक प्रश्न सुनि गोबर गणेशक मन मघैया खेतक खेसारी, सेरसो जकाँ गद-गदा गेल। बाजल- “बाबा, रस्‍ता-पेरा एहेन सवाल-जवाबक जगह नै छी। कखनो कुत्ता-बि‍लाइ धि‍यान तोड़त तँ कखनो बान्‍हपर खेलाइत धि‍या-पुता। ओकरा मनाहिओं तँ नै करबै। जेकरा तीनिए बीतक घर-घराड़ी छै ओकर धि‍या-पुता रस्‍ता-बाटपर नै खेलतै तँ खेलत केतए। से नै तँ चलू दरबज्‍जापर, असथि‍रसँ कहब।” पोताक बात सुनि श्‍यामचरण बजला- “जेतए बसी वएह सुन्‍दर देश भेल। जे पैतपाल करए वएह राजा भेल। ईहो जगह कि‍ अधला अछि‍, दुआरे-दरबज्‍जाक ने मुहथरि‍ छी। अपन घर-दुआर छी, अकासमे चि‍ड़ै-चुनमुनी उड़बे करत, कुत्ता-बि‍लाइ, माल-जाल चलबे-एबे-जेबे करत तइसँ कि‍ गप-सप्‍पमे बाधा पड़त।” बाबाक वि‍चार गोबर गणेशकेँ नीक लगलै। मनमे एलै गाए-गोरूक मि‍लान ठेहुनो पानि‍ दुहान। बाजल- “बाबा, रखलाहा पोथीमे कथी राखल अछि से बि‍सरि‍ गेलि‍ऐ।” पोताक बात सुनि‍ कनी पाछू घुसकैत श्‍यामचरण बजला- “सोलहन्नी केना बि‍सरि‍ जाएब, मुदा कि‍छु झल जकाँ तँ भइये गेल अछि।” ‘झल’ सुनि झलझलाइत गोबर गणेश बाजए लगल- “चारू जुगक चर्चा अछि।” ‘चारू जुग’ सुनि श्‍यामचरणक मन सकपकेलनि। सकपकाइते बजला- “बौआ, चारि‍ जुगक चर्चा ने पोथी-पुराणमे अछि, जुग तँ केतेको आएल-गेल आ अबैत-जाइत रहत। जुगोक कि‍ ठेकान अछि, जखनि दूटा चि‍न्‍हारकेँ भेँट होइ छै तखनो कहै छै जुगो पछाति भेँट भेलौं। आब तोहीं कहऽ जे एक जुगकेँ के कहए जे केते भऽ जाइए!” बाबाक वि‍चार गोबर गणेशकेँ जँचल। बाजल कि‍छु ने मुदा डोरीमे बान्‍हल कोनो वस्‍तु जकाँ मुड़ी डोलबए लगल। बाबा बूझि गेला जे भरि‍सक आरो बात सुनए चाहैए। बजला- “जहिना चि‍न्हारक बात कहलियऽ तहि‍ना बारह बर्खकेँ सेहो जुग कहल जाइ छै।” बाबाक विचारकेँ उड़ैत देखि गोबर गणेश बाजल- “बाबा, कोन जुग-जमानाक बात उठा देलि‍ऐ। आब ने ओ जुग रहल आ ने जमाना। अखनुक जे जुग अछि‍ तहीसँ ने अपना सबहक जि‍नगी चलत। अनेरे मगजमारी केने मनो छिड़िआएत।” जे बूझि गोबर गणेश बाजल हुअए मुदा श्‍यामचरणकेँ भेलनि जे भरिसक जे कहलिऐ ओ हृदैकेँ बेधलकै हेन। नीक हएत जे आरो कि‍छु कहि‍ वि‍चारक रस्‍ता बदलब। बजला- “बौआ, जखनि एते बाजिये गेलौं तखनि कनीए आरो रहल अछि‍, ओकराे सठाइए लेब नीक हएत। चारि जुग जे भेल सतयुग, त्रेता, द्वापर आ कलयुग से कि‍ कोनो एक्के रङ भेल। जेकरा जेते फबलै से तेते दफानि लेलक।” गोबर गणेश दफानैक माने नै बुझलक। बाजल- “की दफानि लेलक?” पोताक जि‍ज्ञासा सुनि श्‍यामचरण बजला- “देखहक जँ चारू जुगमे समैक बँटबारा भेल तँ एक रङक ने होइत, से कहाँ अछि। चारू चारि रङ अछि। खैर जे होउ मुदा एकटा आरो बात कहि दइ छिअ। सतयुगक हरि‍श्चन्‍द्र बड़ दानी छला। राजा छला, मुदा दान देबाकाल बि‍सरि‍ गेला जे हम राजा छी, राजक भार ऊपरमे अछि, अपना फुड़ने जँ एक्के गोटेकेँ सभटा दऽ देबै तँ करोड़क-करोड़ लोकले कथी रहतै।” दि‍न भरि‍क जुड़ाएल मन गोबर गणेशक, पेटक बात उफनि-उफनि बहराए चाहै, मुदा बाबाक विरामक पाछुए ने कि‍छु बाजत। रोकलो तँ नै जा सकैए। मनमे उठलै, जहि‍ना कोनो फुलक गाछ आकि‍ कोनो लत्ती गि‍रहे-गिरह मुड़ीओ-फुलो आ बतीओ दइए तहि‍ना जखने बजता आकि बिच्‍चेमे टोकि मुड़ि‍यारी देबनि। अनेरे अक्‍छा कऽ चुप भऽ जेता। बाजल- “बाबा, अहाँ चारि‍ जुगक चर्चा करै छि‍ऐ, मास्‍टर साहैब कहलनि जे पाँचम जुग छी। एकटा केतए हेरा गेल।” हेराएल सुनि श्‍यामचरण ठमकला। ठमकि‍ते गोबर गणेश बूझि गेल जे भरि‍सक बजैले कि‍छु कहै छथि। सुनैक प्रतिझु जकाँ मुँह लगै छन्‍हि। बाजल- “बाबा, जहि‍ना अदौमे आमक फड़ खाइ छल तहि‍ना अखनो खाइ छी। नीक भोज्‍य पदार्थ छिऐहे। मुदा प्रश्न तँ एकटा उठबे करत कि‍ने जे नमहर गाछक फल छी, जँ अपने टूटि कऽ खसैक बात सोचबै तँ छोटका-बड़बड़िया भलहिं खसलोपर दरहे रहैए मुदा नमहर, कोमल केना रहत। तखनि ओकरा केना उपयोग कएल जाएत।” गोबर गणेशक बात श्‍यामचरणकेँ जँचलनि। बजला- “एकर उपए तँ यएह ने हएत जे जँ छोट गाछ रहत तँ नि‍च्‍चोसँ ठाढ़ भऽ हाथसँ तोड़ि लेब, मुदा नमहरमे तँ लग्‍गी-बत्तीसँ तोड़ल जाएत या गोला-ढेपासँ तोड़ल जाएत। मुदा ई तँ तर्क भेल। आजुक समैमे भलहिं गमलोमे आम फड़ए, मुदा नमहर गाछक फल छी, एकरो तँ नकारल नहियेँ जा सकैए। जल्‍दी-जल्‍दी अपन बात कहऽ। चाहो पीबैक मन होइए।” चाहक नाओं सुनिते जेना गोबर गणेशक पशे बदलि‍ गेल। बाजल- “बाबा, गप-सप्‍प केतौ पड़ाएल जाइ छै, ओ तँ सदि‍काल उड़िते रहैए आ उड़िते रहत। मुदा ओकरा (बातकेँ) जखनि वि‍चार बना वि‍चारि कऽ नै विचरण करबै तखनि‍ धारक मुँह केना बनतै। अखनि एतबे रहए दि‍यौ। रि‍जल्‍टक दि‍न छी, अहाँ अँटका लेलौं। दादी-माए सभ अङनामे टाटक भुरकी दने तकैए। भने चाहो बनबा लेब आ कुशलो-छेम सुना देबै।” गोबर गणेशक वि‍चार श्‍यामचरणकेँ जँचलनि। मनमे उठलनि जे भरिसक हमहूँ सभ (पुरुष पात्र) अति‍क्रमण करै छी। से नै तँ दुनू गोटेक (पति-पत्नी) दि‍शा दू किए भऽ जाइए। परि‍वारक भीतर जँ वैचारिक समरूपता रहत तँ मतभेद किए हएत। सभ तँ बालो-बच्‍चा आ परि‍वारोकेँ नीक्के चाहै छिऐ। अाङगन पहुँच दादीकेँ गोड़ लागि‍ गोबर गणेश पाशा बदलैत बाजल- “दादी, पास केलिऐ। तेते ने बैटरीबला पंखा, बत्ती, छोटका बड़का कम्‍प्‍यूटर, आरो कि कहाँ आबि‍ गेल अछि जे घरे बैसल इंजीनियर-डाक्‍टर बनि जेबौ।” पोताक वि‍चार सुनि दादी एते अह्लादित भऽ गेली जे लाख सम्‍हारला पछातिओ मुहसँ खसिये पड़लनि- “रौ गोबरा, सभ दि‍न तूँ गोबरे रहमेँ।” दादीक बात गोबर गणेश नै बूझि पौलक। अपनापर सुनैक शंका भेलै। सुनैक शंका ई जे गोबराएल कहलक आकि गोबर गणेश। सभ तँ गोबर गणेश कहैए। भऽ सकै छै बि‍नु दाँतक बूढ़ मुँह कि‍छु बजाइए गेल होइ। केहेन-केहेन बीखधरक तँ बीख बि‍नु दाँते नि‍कलि‍ते ने छै, दादी तँ सहजे बूढ़ दादीए भेली। बाजल किछु ने चाहक गि‍लास नेने बाबा लग पहुँचल। हाथमे चाहक गि‍लास पकड़बैत बाजल- “बाबा, अहाँ खुशी भेलौं कि‍ने?” “बौआ, जँ तूँ खुशी तँ हमहूँ खुशी।” ‍ १६ जनवरी २०१४ उमेश पासवान अजोह स्‍कूलक पढ़ाइ, खेल-कूद, दस मि‍नट छुट्टी लेल बि‍नु कि‍छु बजने सर जीक आगू दुनू हाथक दसो आँगूर देखानाइ, बड़की पोखरि‍क महारपर जा गप-सप्‍प लड़ेनाइ, सवक नै बनल रहने बैजू कान्‍त सर तथा रायजी सरक घंट्टी छोड़नाइ इत्‍यादि‍ मन पड़ैए। मुदा तइ दि‍नमे कि‍छु आर छल। कि‍छु एहनो प्रसग अछि‍ जेकरा तइ दि‍नमे ठीकसँ नै बुझै छेलौं जे आइ बूझि‍ रहल छी। कि‍छु ओहनो प्रसंग रहल जइमे अपने दोखी नै रही मुदा दोखीक सजा पबैत रही। अधलाकेँ अधला नै बूझि‍ नीक्के बुझैत रही। वास्‍तवमे ओ नीक नै छल, खराप छल, जे आइ बुझै छी। खैर! नीक-खरापक पनचैती नै करेबाक अछि‍। सुनेबाक अछि‍ अपन बचपनक खि‍स्‍सा। तीसरा-चौथामे पढ़ैत रही। पाठकजी, यादवजी, रायजी, मोलबी साहैब आ बैजू कान्‍त सर छला हमरा सबहक शि‍क्षक। रमण, वीर कुमार, मनोज, मुरारी आ हम रही एक-दोसराक पार्टनर। पाठक सर पढ़बैत रहथि‍न जोड़-घटाउ, रायजी एबीसीडी, यादवजी लि‍खना चेक करै छेलखि‍न आ जे समए बँचल तइमे यादि‍ केलहा कवि‍ता सुनै छला। मोलबी साहैब समाज वि‍ज्ञान पढ़बैत रहथि‍न। सभसँ आफत छल हमरा सभ लेल संस्‍कृत। बैजू कान्‍त सर पढ़बथि‍न संस्‍कृत। पाँच-सात दि‍नपर अबैत रहथि‍न स्‍कूल। बेसी काल कार्यालयी कार्यमे लगल रहैत रहथि‍न। तँए ई समस्‍या सभ दि‍नक नै कहि‍यो कालक छल। सभसँ नीक सरजी रहथिन मोलबी साहैब। कि‍एक तँ ओ मारै नै छेलखि‍न कोनो वि‍द्यार्थीकेँ। मारैमे नामी रहथि‍न बैजू कान्‍त सर। हम सभ डरसँ हुनकर कि‍लास छोड़ैक गड़ लगबैत रहै छेलौं। हुनकर घंटी अबैसँ पहि‍ने दस मि‍नटक छुट्टी लऽ नि‍कलि‍ जाइत रही। कि‍एक तँ ओ अपने जल्‍दी छुट्टी नै दैत रहथि‍न। कए दि‍न तँ पोखरि‍ महारपर सँ पजन्‍त टँगबा अनै छेलखि‍न वि‍द्यार्थीकेँ‍। आ लग्‍गे छौंकी! मुदा कए दि‍न असानीसँ बँचि‍ओ जाइत छल। खास कऽ ओइ दि‍न जइ दि‍न बैजू कान्‍त सर उपस्‍थि‍ति‍ होइत रहथि‍न आ हाथमे कागतक झोरा रहै छेलनि‍। झोरे देखि‍ हम सभ बूिझ जाइत रही जे आइ ठीक रहत। कि‍एक तँ हि‍साब-बाड़ी चलतै ऑफि‍समे। सभ कि‍यो आॅफि‍समे बैस हि‍साब-वाड़ी करता, हम सभ मुक्‍त रहब। खुश भऽ जाइत रही। मुदा भऽ जाए कि‍छु आैर। खुशी कहीं दबाएल रहै छै। कि‍लासमे हल्‍ला हुअ लगै। आकि‍ यादवजी आबि‍ तरतरबऽ लगैत रहथि‍न। यादव जीक तइ घड़ीक तामस दोसर रहैत रहनि‍। ओ ई जे लेखा-जोखा करैत घड़ी हि‍नकर इच्‍छा रहैत रहनि‍ जे हमहूँ ऑफि‍सेमे रही मुदा हल्‍ला जे हुअ लगै छल आकि‍ सभ कि‍यो यादवेजी सरकेँ कि‍लास पठा दन्‍हि‍। ओ आबि‍ सभटा बि‍ख हमरे सभपर उतारि‍ लइ छला। हलाँकि‍ हम चारू मि‍त्र ऐ सभ समस्‍याकेँ रसे-रसे बूझि‍ गेल रही। आ ऐ सभसँ बँचैले दस मि‍नट छुट्टी लऽ पोखरि‍ दि‍स चल जाइत रही। छुट्टीओ अरामसँ मि‍ल जाइत रहए। कहि‍यो काल बैजू कान्‍त सर बड़ तमसाएल अबैत रहथि‍न। हाथमे झोरा नै रहने हम सभ बुझि‍ओ जाइत रही जे आइ तमसाएल हेता। आइ मारि‍ लगले अछि‍। बैजू कान्‍त सर छुट्टीओ जल्‍दी नै दइ छथि‍न। संस्‍कृत वि‍षयमे आफदे-आफद। सभटा यादे करए पड़ैत छल। हमरा सबहक हि‍साबे बैजू कान्‍त सरमे एकटा गुण रहनि‍। ओ ई जे नेबोक शर्बत बड़ पसि‍न रहनि‍। नेबो औत केतएसँ। जहि‍ना पि‍यास लगलापर हमरा सभकेँ पानि‍ पीआबए इशारामे कहथि‍न आ हम सभ पानि‍ आनि‍ पीअबैत रहि‍यनि‍ तहि‍ना मनक गप बूझि‍ नेबोओक जोगाड़ हम सभ लगा आनी। मुदा तइमे दि‍न-तारीखक मेल नै खाइत रहए। तैयो खुश भऽ जाथि‍न। एक दि‍न नेबोक चर्च करैत कि‍लासमे पुछलखि‍न- “केकरा नेबो फड़ल छौ?” रौदाएल आएल रहथि‍न। हाथमे झोरा नै देखने रहि‍यनि‍। आठम दि‍नन देलहा सवक यादो नै भेल छल। हम आ हमर मि‍त्र मुरारी एक्केबेर हाथ उठबैत बजलौं- “हमरा। हमरा।” मुदा एकटा आफत भेल दुनू गोरेकेँ कहीं नै जाए देलनि‍ तखनि‍ तँ फँसलौं। हम कहलि‍यनि‍- “सर, नेबो आनए हम जाएब।” यएह डर मुरारीकेँ सेहो रहै, प्रति‍वाद करैत ऊहो बाजल- “नै सर, हम जाएब, हमरा गाछमे कागजीबला नेबो छै।” हम ठाढ़े रहलौं। मुरारी हमरा दि‍स ताकए लगल। केना-ने-केना सरजी दुनू आदमीकेँ कहि‍ देलनि‍- “अच्‍छा जो दुनू गोरे, जल्‍दी अबि‍हेँ।” दुनू गोटे वि‍दा भेलौं। स्‍कूलक हाता धरि‍ तँ संचमंच भऽ टपलौं, जे काजे जा रहल छी। मुदा हातासँ टपि‍ते इठलाइत बढ़ए लगलौं। दुनू गोटे एक्के समस्‍यासँ घेरल रही। सवक नै बनल रहए। ई बात तँ तखने स्‍पष्‍ट भऽ गेल छल। जइसँ कोनो धरानी त्राण पेने रही। मुदा आब एकटा दोसर समस्‍या ठाढ़ भेल। नेबो गाछमे अखनि‍ सभटा थुल्‍लीए छै। ई नै बुझैत रही जे हमरो गाछमे अजोहे हेतै। आब तँ भेल आफत! आब की करब। मन औनाए लगल। समए सेहो बि‍त रहल छै। कहने छेलखि‍न जल्‍दी अबि‍हेँ। देरी हएत तँ वीरकुमरा ने कहीं सवक दुआरे दुनूटा नि‍कलल से सरजीकेँ कहि‍ दन्‍हि‍। सेहो मनमे आबए लगल। अन्‍तमे वि‍चार केलौं। पाँच-सातटा अजोहे नेबो तोड़ि‍ कऽ लऽ जा सरजीकेँ नै देखए देबनि‍ आ शर्बत बना गि‍लास पकड़ा देबनि‍। सएह करए वि‍दा भेलौं। नेबो तोड़ि‍ लऽ जाइत रही तँ राजे काका देखि‍ लेलनि‍। हमरा तँ नै कि‍छु कहलनि‍ मुदा मुरारीकेँ कहलखि‍न- “आइ आबए दहुन मनेजर साहैबकेँ। नेबो सुररनाइ की छि‍ऐ से पता चलतौ।” मुरारीक बाबूकेँ सभ मनेजर साहैब कहै छन्‍हि‍। बड़ तमसाह छथि‍न। मुरारी डरि‍ गेल। डर हमरो भऽ गेल। दुनू गोरे ठमकि‍ गेलौं। हमरा सभकेँ ठमकल देखि‍ राजे काका पुन:‍ पुछलनि‍- “केतए लऽ जाइ छेँ ई थुल्‍ली नेबो?” अपन दोख छोड़बैत दुनू गोटे एक्केबेर बजलौं- “सरजी, कहने छथि‍न। हुनकर मन खराप छन्‍हि‍। शर्बत बनतै।” राजे काका मुड़ी डोलबैत कि‍छु ने बजला। हम सभ बढ़ि‍ गेलौं। दुनू पार्टनरकेँ बुझाएल जे पार लगि‍ गेल। स्‍कूलपर पहुँचि‍ते देखलौं बैजू कान्‍त सर ओङहा रहल छथि‍। फबल। हाँइ-हाँइ कऽ शर्बत बना सरजीकेँ उठबैत गि‍लास हाथमे देलि‍यनि‍। पीब तँ गेला मुदा केना-ने-केना बूझि‍ गेलखि‍न जे नेबो रसाएल नै छेलै। मुदा कि‍छु हाँट-दबाड़ नै केलनि‍। घंटी बदलि‍ गेल छल। समस्‍या टड़ि‍ गेल। दुनू पार्टनर खुशी भऽ गेल रही। मुदा ई खुशी दुखमे बदलि‍ गेल। डर तँ रहबे करए जे राजे काका ने कहीं बाबूजीकेँ कहि‍ दन्‍हि‍। सएह भेल। बेरू पहर, करीब साढ़े पाँच बजेमे मनेजर साहैबक सङ मुरारीकेँ अबैत देखि‍ हम सर्द भऽ गेलौं। दलानपर एला। ताबत हम अङना चलि‍ गेलौं। टाटक अढ़मे ठाढ़ भऽ डरे थरथराइत रही। आब की हएत की नै। बाबूजी दलानेपर बैसल छला। वाड़ीसँ काज करि‍ कऽ तुरन्‍ते आएले रहथि‍। मनेजर साहैबकेँ देखि‍ते हमरा सोर पाड़लनि‍- “रमेश?” हमर तँ बुझू समुच्‍चा देह सर्द भऽ गेल रहए। कि‍छु ने प्रति‍उत्तर पाबि‍ पुन: सोर पाड़ैत बजला- “एक लोटा पानि‍ नेने आ आ माएकेँ कहुन दू गि‍लास चाह बनबए।” ई बात सुनि‍ थोड़ेक जान-मे-जान आएल। लोटामे पानि‍ लऽ दलानपर पहुँचलौं। लगले आबि‍ माएकेँ चाह बनबए कहलि‍यनि‍। चाहपत्ती घरमे नै रहने दोकानसँ आनए गेलौं। चाह बनल। दुनू गि‍लास चाह छि‍पलीमे लऽ माए हाथमे पकड़ा देलनि‍। छि‍पली लऽ कऽ दलानपर पहुँचलौं। मुरारीक चेहराक उदासी देखि‍ बूझि‍ पड़ल समस्‍या अछिए। दू-चारि‍ घोंट चाह पीला पछाति‍। मनेजर काका हमरा पुछलनि‍- “रमेश, सरजी कहने रहथुन नेबो तोड़ि‍ अनैले आकि‍ तूँ सभ अपने मोने तोड़ने छेलँह?” अपन जान बँचबैत सहीए बात बजलौं- “सरजीए कहने छेलखि‍न, हुनकर मन खराप छेलनि‍।” ताबए बाबूजी पूछि देलनि‍- “पुछलुहुन नै जे अखनि‍ नेबो तोड़ेबला हेतै।” ई गप सुनि‍ मुरारी हमरा मुँह दि‍स तकलक। हम चुपे रहलौं। मनेजर साहैब बि‍च्‍चेमे दुनू गोटेकेँ कहलनि‍- “जाइ जो, नीकसँ पढ़ै जइहेँ।” मुरारी आ हम दुनू गोटे ओतएसँ ससरलौं। ओ दुनू गोटे अपनामे गप करैत रहला। हमरा दुनू पार्टनरक मन खुशी भऽ गेल, वि‍चारि‍ लेलौं आब थुल्‍ली नेबो कहि‍यो नै तोड़ब। लक्ष्‍मी दास दुष्‍टपना एते उमेर बि‍तलो पछाति‍ दुश्‍मनीसँ आगू नै बुझै छेलि‍ऐ जे ऐबेर बुझलि‍ऐ। बुझलि‍ऐ ई जे दुश्‍मनीसँ आगू दुष्‍टपना होइ छै। पौन दर्जन धि‍या-पुता रहि‍तो, कम आँट-पेटक कि‍सान रहि‍तो, गामेमे रहै छी तँए, मि‍थि‍वासी कि‍यो अछि‍ तँ हमहूँ छी। मि‍थि‍वासी होइक नाते अपनापर गर्व अछि‍। तीन कट्ठा बैशाखा सजमनि‍क खेती केने छेलौं, शुरूक तीन हाटमे सोलह सए रूपैआक बि‍काएल छल। ओना आइ धरि‍क जि‍नगीमे सभसँ नीक सम्‍हरल खेती छल। बीस बर्खसँ ऊपरेसँ तरकारी खेती करै छी। गामक कि‍छु नवतुरि‍या सौंसे खेतक लत्तीओ काटि‍ देलक आ फड़ सभकेँ जेना देवालयमे कुमहरक बलि‍ पड़ै छै तहि‍ना सौंसे खेतक फड़केँ हँसुआसँ काटि‍-काटि‍ ओंघरा देने छल। आने दि‍न जकाँ भोरे जखनि‍ खेत पहुँचलौं तँ जजाति‍क दशा देखि‍ ठढ़भस लगि‍ गेल। ने आगू डेग उठए आ ने पाछू, बोल हेरा गेल वकार बन्न भऽ गेल। मुदा सौनक बून जकाँ आँखि‍सँ नोर ठोपे-ठोप खसैत रहए। दुनू हाथे छातीकेँ दाबि‍ करेजकेँ थीर करैत सौंसे खेत घुमलौं। देखला पछाति‍ मन मानि‍ गेल जे दुष्‍ट सभ बाल-बच्‍चाक मुँहमे जाबी लगौलक। आने-आन जकाँ हमरो श्रमबल चोरि‍ कऽ नष्‍ट केलक। मोबाइलसँ जेठका बेटा- जे शि‍क्षक अछि‍,केँ फोन करैत कहलि‍ऐ- “बौआ, सजमनि‍क खेती चलि‍ गेलह!” ओकर माए सेहो सुनैत। सभ बात तँ वेचारी नै सुनि‍ पेली मुदा ‘सजमनि’‍ जरूर सुनलनि‍। धड़फड़ाइते साइकि‍ल पकड़ि‍ बेटा वि‍दा भेल। बेटाक धड़फड़ी देखि‍ चौथाइ दर्जन धि‍या-पुता सङ पत्नीओ पएरे वि‍दा भेली। खेत देखि‍ बेटा पुछलक- “बाबू, केकरोसँ दुसमनी नै अछि‍। तखनि‍ एना कि‍ए केलक?” हमरा लग कोनो जवाब नै छल जे बेटाकेँ दैति‍ऐ, चुपे रहलौं। तही बीच पत्नीओ खेत पहुँच गेली, देखि‍ते छाती पीट-पीट घैना करए लगली- “हौ डकूबा भगवान, सभ कुछ राति‍मे हेर लेलह!” बोल-भरोस दैत परि‍वारक सभकेँ कहलि‍ऐ- “अपन हाथ-पएरक आशा रखै जाह। चोर चोरे रहतै, साउध साउधे रहतै। जँ लौका चोरौने साधुओ चोर भऽ जइतै तँ साधुक बीआ उपटि‍ गेल रहि‍तै।” गाममे चौक अछि‍। दस रंगक दोकानो छै, जइसँ दसटा दस रंगक लोको रहि‍ते अछि‍। चौकपर अबैसँ पहि‍ने अगुरबारे समाचार पहुँच गेल। कि‍छु गोटे खेतो जा-जा देखलक। मुदा चौकक मुँह चौबगली बूझि‍‍ पड़ल। थाहे ने लागल जे चौकक असल मुँह केमहर छै। कि‍यो बजैत- “सजमनि‍ तोड़ि‍ लैत तँ तोड़ि‍ लैत, लत्ती कि‍ए कटलकै?” कि‍यो बजैत- “फड़ कटलकै तँ कटलकै, कुमहर जकाँ टुकड़ी-टुकड़ी कि‍ए केलकै?” सुनि‍-सुनि‍ छगुन्‍ता लागए जे जे चोरि‍क सङ गरदनि‍कट्टी सेहो केलक। ओ सोलहन्नी चोर नै भेल। फेर दोसर दि‍ससँ हवा झोंकलक- “दुसमनीसँ केने हएत।” मुदा टटका दुश्‍मनी केकरो सङ नै भेल अछि‍। तखनि‍ एहेन कि‍ए केलक। की सतयुगे त्रेतामे दुष्‍टो फड़ै छेलै आ दुष्‍टपनो होइ छेलै। आ कलयुगमे ओकर बीए सूखि‍ गेलै। मुदा भाँजपर चोर चढ़बे ने कएल नै तँ आचार संहि‍ताक शक्‍ति‍ देखै दैति‍ऐ। योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ खजाना गामक धीया पूता मे हल्ला छलैक जे चैतू बाबूक अमेरिकन पोता एलखिन्ह अछि। अमेरिकन पोता कें आङन मे सब गोटे पैडी कहि कए बजबै छलैक। सुनबा मे एलैक जे पैडी अपना पापा मम्मी सँ अंगरेजिये मे गप करैत छलैक मुदा दादा दादी सँ कने मने मैथिली बाजि लैत छलैक। पैडी जखन पाँच बरखक छल तखने ओकर पापा मम्मी अमेरिका चल गेल छलैक। दूनू कम्प्यूटर इंजीनियर। अमेरिका जेबा सँ पहिने ओ दूनू बंगलोर मे नोकरी करैत छलथि। तखन पैडी दू तीन बेर गाम आएल छल। अमेरिका गेलाक बाद पहिल बेर चारि साल पर पैडी गाम आएल। पैडी माने प्रद्युम्न। पैडी नाम तऽ अमेरिका मे परलैक। बच्चा मे जखन प्रद्युम्न गाम आबए तऽ बंटी आ सोनूक संग खेला धुपा लैत छल। सोनू ओकर नाम राखि देलकै पद्दू। बजबै मे हल्लुक नाम छलैक। ई नाम सुनि कए प्रद्युम्न कें अपना तऽ किछु नीक बेजाए बूझै मे नहि आएल छलै मुदा बंटी खूब हँसल छलैक। बंटीक हँसला पर ओ किछु आश्चर्य सँ पुछने छलैक जे कोन बात पर ओ सब हँसलक मुदा ओ सब अनठा देने छलैक। एहि बीच पैडी बहुत बदलि गेल छल। ओ हरदम अपन कम्प्यूटर मे व्यस्त रहैत छल। सोनू आ बंटी कें बहुत इच्छा छलैक ओकरा संग खेलेबाक आ अमेरिकाक बारे मे किछु बुझबा सुझबाक, मुदा चैतू बाबूक दलान पर जा कए घूरि आबए, पैडी कें अंग्रेजी मे बजाओत कोना से बुझले नहि छलैक। ओकरा सबकें ईहो नहि बूझल छलैक जे पैडी कें चारि साल पुरान संगी आ ओकरा सबहक गप मोनो हेतैक की नहि। आ फेर ओ एतुका गमारू बच्चा सबहक संग मेल जोल करब ठीक बूझत की नहि। ओना साफ सुथरा तऽ दूनू गोटे छल आ कपड़ो लत्ता ठीके ठाक छलैक मुदा एकटा अमेरिकन लग जेबा मे धाख होइते छलैक। एही गुनधुन मे जखन सोनू आ बंटी दलानक चक्कर लगबैत छल तखन एक बेर चैतू बाबू बजा लेलखिन्ह। दूनू डेराइते लग गेल। चैतू बाबूक पुछला पर अपन अभिप्राय कहलकन्हि जे ओकरा पैडी सँ अमेरिकाक बारे मे किछु गप करबाक छलैक। ई बात चैतू बाबू कें नीक लगलन्हि कारण ई गौरवक बात छलैक जे हुनकर पौत्र अमेरिका सँ एलखिन्ह आ आन बच्चा सब ओकरा सँ किछु सीखए चाहैत छल। ओ पैडी कें बजाए सोनू आ बंटी सँ परिचय करा देलखिन्ह। तखन पैडी कें अपनहि पुरान बात सब मोन परए लगलैक आ ओहि दूनू गमारू बच्चा कें अपन मित्र स्वीकार करबा मे कोनो हर्ज नहि बुझेलैक। दलाने पर पैडी बैसि गेल दूनूक संग। कम्प्यूटर तऽ संग मे छलैके। ओतुका स्कूलक बारे मे ओ बंटी आ सोनू कें बता रहल छल। कम्प्यूटर मे स्टोर कएल स्कूलक फोटो, क्लास रूमक फोटो, लाइब्रेरीक फोटो आदि देखा सेहो रहल छल। सोनू आ बंटी ध्यानमग्न भऽ कए सुनि रहल छल, लगैत छलैक एक एक टा शब्द पीबि जेबाक चेष्टा कऽ रहल हो। ओकरा दूनूक लेल ई सपनाक दुनियाँ सँ कनियो कम नहि छलैक। एतबे मे चैतू बाबू टॉर्चक दूटा खराप बैटरी लेने एलखिन्ह आ जुमा कए दलानक बाहर फेक देलखिन्ह। मुदा ओ खसलै हत्ताक भीतरे आ पैडीक नजरि ओहि पर चल गेलैक। ओ आश्चर्य सँ जेना चिचिया उठल “दादाजी, बैटरी एना किएक फेकि देलिऐक ?” चैतू बाबू हरान जे ई बच्चा टोकलक कोन कारणें। सोनू आ बंटी सेहो हरान। बैटरी फेकब ओकरा सबहक लेल कोनो अजगुत बात नहि छलैक। बंटी पैडी कें बुझबए लागल “गाम घर मे लोक खराप बैटरी तऽ एहिना यत्र कुत्र फेकि दैत छैक। ओतबे नहि आब तऽ लोक खराप मोबाइलो एहिना कतहु फेकि दैत छैक। यदि चौक दिश चलब तऽ हम फेकलाहा मोबाइल देखा देब”। आब पैडीक आश्चर्यक ठेकाने नहि। ओ सोचए कोना अमेरिका मे ओकरा सब कें बैटरी, मोबाइल फोन अथवा अन्य कोनो इलेक्ट्रॉनिक कचरा कें फेकबाक तरीका बुझाओल जाइत छलैक आ कतए ई लोक सब जिनका लेल एहेन वस्तु फेकबाक कोनो ठेकाने नहि। दादाजी कें तऽ ओ नहि किछु कहलक मुदा सोनू आ बंटी कें बुझबए लागल अपना स्कूल मे कराओल गेल “सेलफोन रीसाइक्लिंग अभियान” के बारे मे। एहि प्रोग्राम मे बच्चा सब घरे घरे जा कए खराप मोबाइल फोन, आइपॉड आदि माँगि कए स्कूल मे जमा केने छल। ओहि मे करीब एक तिहाइ तऽ टीचर सबहक सहयोग सँ मामूली मरम्मति केला पर काज करए लागल छलैक आ बाकी कें एकटा कम्पनी कें बेचि देल गेल छलैक। एहि अभियान मे स्कूल कें करीब दू हजार डॉलरक आय भेल छलैक। पैडीक कम्प्यूटर मे एहू अभियानक फोटो छलैक जे ओ सोनू आ बंटी कें देखा देलकै। सोनू आ बंटी तऽ किछु बुझिए नहि रहल छल जे खराप मोबाइल कियो किएक किनतैक आ ओकर की करतैक। पैडीक कम्प्यूटर मे इंटरनेट तऽ छलैके, ओ “स्टोरी ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स” आ “ईक्को वर्ल्ड” नामक दूटा विडियो दूनू कें देखा देलकै। एमहर चैतू बाबू सेहो कने चिन्तित भेलाह। गाम घर मे खराप बैटरी तऽ एहिना लोक फेकि दैत छलैक। ई काज एना नहि करबाक चाही तकर ध्यान ककरो ने छलैक। ने हुनका बूझल छलन्हि आ ने ओ अपना बेटा बेटी कें कहियो बुझेलखिन्ह। आ अमेरिका मे रहि कए हिनकर पोता तऽ सत्ते मे ज्ञानी भऽ गेलन्हि। ओ आङन जा कए अपन बेटा मनोज कें बैटरी फेकबाक आ पैडीक प्रतिकार करबाक बात सुना देलखिन्ह। मनोज हुनका बुझेलकन्हि जे पैडी ठीके कहैत छल। आब तऽ बंगलोर पर्यन्त मे एहि तरहक नियम लागू भऽ गेलैक अछि। विभिन्न प्रकारक कचरा लोक कें घरे मे छाँटि कए दू अथवा तीन तरहक पैकेट मे राखि देबए पड़ैत छैक। भनसा घरक कचरा अलग, कागज प्लास्टिक अलग, इलेक्ट्रॉनिक कचरा अलग। से नहि केला पर कचरा उठेनिहार अहाँक घरक कचरा लेबे नहि करत। सब कॉलोनी मे एहि तरहक व्यवस्था लागू भऽ गेलैक अछि, विभिन्न प्रकारक कचराक लेल पैकेट बना कए घरे घरे पठा देल गेलैक अछि। तकर बाद सबकें चाँकि जगलैक। पैडी जतए सोनू आ बंटी कें इलेक्ट्रॉनिक कचराक महत्व बुझा रहल छल ओतए दादा दादी सेहो आबि कए बैसि गेलखिन्ह। पैडी लजा गेल आ अपन बात बन्द कऽ देलक। तै पर चैतू बाबू ओकरा प्रोत्साहित करैत कहलखिन्ह जे आइ पहिल बेर हुनका ज्ञान भेलन्हि आ सबटा बात सुनबा लेल बैसलाह अछि। तखन पैडी कें कने धाख छुटलैक। ओ सब कें बुझबए लागल। बैटरी आ इलेक्ट्रॉनिक कचरा मे लेड, कैडमियम, मरकरी आदि हानिकारक तत्व रहैत छैक। यत्र कुत्र फेकि देला पर ओ तत्व सब माटि मे आ जलक स्रोत मे मिलि जाइत छैक। ओतए सँ फेर माटि मे उपजल अनाज अथवा तरकारी आदि मे पहुँचि जाइत छैक आ फेर भोजन द्वारा लोकक शरीर मे। इलेक्ट्रॉनिक कचरा मे आनो एहेन विषाक्त पदार्थ सब रहैत छैक जे पर्यावरणक लेल हानिकारक छैक। ई तऽ भेल एकटा बात। दोसर आ बेसी महत्वपूर्ण बात अछि इलेक्ट्रॉनिक कचरा मे बहुमूल्य धातुक उपस्थिति। कोनो इलेक्ट्रॉनिक सामान, जेना मोबाइल फोन, आइपॉड, कम्प्यूटर, टीवी, सीडी प्लेयर आदि मे पर्याप्त मात्रा मे सोना, चानी आ ताम रहैत छैक जकरा उचित प्रक्रिया द्वारा फेर प्राप्त कएल जा सकैत छैक। एहेन बहुत रास कम्पनी आब काज करए लगलैक अछि जे लोक सँ इलेक्ट्रॉनिक कचरा कीन लैत अछि आ ओकरा रसायनिक विधि द्वारा परिस्कृत कऽ कए ओकर सोना, चानी आ ताम बहार कऽ लैत अछि। पैडी इंटरनेट सँ ताकि कए दिल्ली, पूना आ बंगलोर मे काज करैत एहेन कम्पनीक नामो हुनका सब कें बता देलक। पैडीक दादा, दादी आ सोनू, बंटीक आश्चर्यक ठेकाने नहि। विश्वासे नहि भऽ रहल छलैक मोबाइल फोन मे सोना चानी भरल रहैत छैक। बंटी तखने दौड़ि गेल आ रस्ता कात मे फेकल मोबाइल उठा अनलक। पैडी कें कहलकै कने देखा दै लेल। पैडी अपन बैग उठा अनलक आ ओहि मे सँ छोटका स्क्रू ड्राइवर निकालि मोबाइल फोनक अंग प्रत्यंग खोलि देलक। एतेक होशियारी सँ ई काज केलक जे दादा दादी कें तऽ छगुन्ता लागि गेलन्हि। हुनका विश्वासे नहि भऽ रहल छलन्हि जे हुनकर पोता एतेक बुधियार आ होशियार भऽ गेलन्हि। सोनू आ बंटीक सामने छलैक मोबाइल फोनक पार्ट पुरजाक टुकड़ी सब छिड़िआएल जाहि मे कतेको ठाम सोना ओहिना चमकैत छलैक। पैडी सबकें सुनेलक जे ई सोना देखबा मे बहुत थोड़ लगैत छैक मुदा ओ इंटरनेट मे एक ठाम पढ़लक जे एक लाख एहेन मोबाइल फोन मे छैक करीब अढ़ाइ किलो सोना, 25 किलो चानी आ 900 किलो ताम। सोनू आ बंटीक आँखि जेना पसरले रहि गेलैक। एतेक पैघ खजाना ! आ तकरा अबूझ लोक बाट घाट खेत पथार मे फेकि दैत अछि। लगैत छलैक जेना अलीबाबा कें चोर सबहक खजानाक कुंजी भेटलैक तहिना बंटी आ सोनू कें पैडीक संग गप केला पर ई नव खजाना भेटलैक। सोनूक मोन ललचा गेलैक। ओ पुछलक “पैडी, तोरा एतेक बात बूझल छौक। यदि हमसब अपनहिं मोबाइल कि आनो कोनो इलेक्ट्रॉनिक कचरा सँ सोना चानी बहार कऽ सकी तऽ फेर एकरा अनका बेचबाक काजे नहि। आमदनी सेहो नीक होएत”। पैडी किछु सोचि कए जबाब देलकै “बेसी विस्तार तऽ हमरा नहि बूझल अछि, मुदा टीचर सब बजैत छलखिन्ह जे ई काज सब नै कऽ सकैत अछि कारण एहि मे पर्यावरण पर प्रभाव पड़ैत छैक। अमेरिक मे इ-स्टेवार्ड नामक संस्था सब ई काज करैत छैक”। ई विचार चैतू बाबू कें नीक लगलन्हि। ओ सोनू कें कहलखिन्ह जे इ-स्टेवार्डक काज करबाक तरीका ओ सीखताह आ बैंक सँ लोन लऽ कए एकर कारखाना गामे मे लगेताह। ई विचार सब कें नीक लगलैक। पैडीक खिस्सा सुनि कए बंटी आ सोनू कें सेहो ज्ञान भऽ गेलैक। ओ दूनू तखने निर्णय लेलक जे एहि बातक प्रचार अपना स्कूल मे तऽ करबे करत आ गाम मे सेहो सब कें बुझेतैक। चैतू बाबू एहि काज मे ओ दूनू बच्चाक सहयोग करबा लेल तैयार भऽ गेलखिन्ह। आब गाम मे इलेक्ट्रॉनिक कचराक संग्रह कएल जाएत। जाबत कारखाना नहि लगलैक अछि ताबत ई सामान दिल्ली पूना बंगलोरक कोनो कम्पनी कें बेचल जाएत। जे टाका भेटतैक से गामक बाल कल्याण कोष मे जमा कऽ देल जेतैक। पैडी एके सप्ताह गाम मे रहल मुदा अपना बुद्धि सँ गाम कें बदलि देलक आ लोक कें भेटि गेलैक एकटा खजाना। विजय विजय-१ झुमकी हृष्ट-पुष्ट शरीर बाली युवती छलि। लूरि‍गर आ होशियार, खूब काज करैत। छोट परिवार, घरवाला कुसमाक अतिरिक्त मात्र दूटा बेटा, आठ आ छओ बरखक। दुनू बेकती कमाइत छल आ गुजर बसर करै छल। मुदा ओकरा एकेटा चिन्ता रहैक सभ दिन साँझकेँ घरवाला ताड़ी पीबैक आ घर आबि झुमकीकें अनेरे डेंगा दैत। झुमकी गम खा लइ छलि। एहिना ओ देखने छलि माए आ पितिआइनकेँ सेहो बाबू ओ काकासँ मारि खाति आ सहि लैति। ओकरो सिखाएले गेल छेलै जे घरवाला अपन पौरुष देखबै लेल मौगीकेँ कने मने मारबे पीटबे करतै, से सहि लेबाक चाही। झुमकी जतेक सहैत जाइ छल, कुसमाक डेंगाएब ओतबे बढ़ि जाइ। एक दिन तँ सभ सीमा पार कऽ देलक। ओइ राति झुमकीक देहपर कुसमा अपन हरवाही पेना तोड़िए कए छोड़लक। कारण एतबे जे झुमकी टोकि देलकै एतेक ताड़ी किएक पीबैत अछि ओ। सौंसे पीठपर चेन्ह भऽ गेलै आ केतेक ठामसँ खून सेहो निकलि गेलै। चोट तँ झुमकी अंगेजि लेने छल मुदा पीठ फुटि गेलासँ छनछनाए सेहो लगलै आ दर्द बहुत बेसी बढ़ि गेलै। झुमकीकेँ लगलै आब बर्दास्तसँ बहार भऽ गेल ई। ओ राति भरि सोचैत रहल एना किएक होइ छै। की ओकर शारीरिक ताकति कुसमासँ कम छैक? खोराक एके रंग छैक। काजो ओ बेसिए करैत अछि। कुसमा हरबाहि करैत अछि तँ ओहो जाँत ढेकीसँ लऽ कए जाड़नि तक फाड़िए लैत अछि। धनरोपनी रहौ कि धनकटनी, कोनो पुरुखसँ ओ कम नै रहैत अछि। धानक बोझ रहौक की नारक बोझ, जतेकटा बोझ कुसमा उठबैत अछि ततबेटा तँ ओहो उठबैत अछि। ओकरा जनानी बुझि कोनो छोट बोझ तँ बान्हल नै जाइ छै। खेत पथारसँ घर आँगन तक के कोनो काजमे एहेन ओकरा नै बुझेलै जे ओकर मात्र जनानी भेलासँ किछु न्यून भेल होइक। ओतबे नै, पुरुखकेँ जँ बच्चा बिअए पड़ितै तँ सभ आत्महत्ये कऽ लितए। एक बेर अपना बाँहिकेँ पहलमान जकाँ उठा कए देखलक, ओकरा विश्वास भऽ गेलै जे यदि कुसमाक संग ओकरा कुश्ती लड़ए पड़ै तँ ओकरा पछारि सकत। तखनि‍ फेर एना किएक? किएक पुस्त दर पुस्त मौगी सभ अपन घरवालासँ देह पिटबैत रहल अछि आ अपन बेटी सभकेँ बर्दास्त करए लेल सिखबैत रहल अछि? की पुरुख सभ पेना बजारिए कए अपन पुरुषार्थ देखबैत रहतै? ओकरा एकटा विचार एलै दिमागमे। अगिला दिन कुसमाकेँ नबका पेना बनबए पड़लै हरबाही करै लेल। दिन ओहिना बीतल। साँझखन कुसमा अपन कोटाक ताड़ी पीब कए आँगन आएल आ गेल पेना ताकए जेना ई एकटा रुटीन होइक। पेना ओकरा नै भेटलै। ताबत पाछूसँ झुमकी आबि ओही पेनासँ कुसमाकेँ तरतरबै लागल। कुसमा अवाक। जाबत ओ सम्हरए सम्हरए ताबत झुमकी ओकरा खसा कए ओकरा देहपर चढ़ि गेल छल आ एकदम दुर्गा भवानीबला रौद्र रूपमे कुसमाकेँ कहलक जे आइ रातिसँ नित्य प्रति ओकरा झुमकी ओहिना डेंगेतै जहिना एतेक दिन ओ झुमकीकेँ डेंगबैत रहलै अछि। ई कहि ओकरा देहपरसँ ओ उठि गेल, पेना कात कए रखलक आ गेल अपन भानस भातक काजमे। कुसमाक दिमाग चक्कर काटए लगलै। किछु बुझिएमे नै अबैक जे ई परिवर्तन कोना भेलै। बात एहेन छेलै जे केकरो कहियो नै सकै छल। अपन हारल आ बहुक मारल कियो नै बजैत अछि। ओकरा मोनो नै छैक जे कहिया मारि खेने छल। धि‍या-पुतामे एक दू चाट माए की बाबू मारने हेथिन्ह सएह टा। जहियासँ ज्ञान भेलै आ मालिक ओतए महींसक चरबाह बनल तहियासँ अखनि‍ तक, जखनि‍ ओ चरबाहसँ हरबाह भऽ गेल, ओकरा कहियो केकरो कथो सुनबाक अवसर नै भेटल छेलै। अपना तुरियाक छौंड़ा सभकेँ देखने छैक चरबाहीमे मालिक सभसँ मारि खाइत आ हरबाहीमे फज्जति सुनैत मुदा ओकर काजसँ ओकर मालिक सभ दिन खुशीए नै रहलखिन्ह, ओकर प्रशंसो करै छेलखिन्ह। अजुका चोट ओकरा सोचबापर बाध्य कऽ देलकै जे ओ झुमकीकेँ किएक मारै छल। झुमकीसँ ओकरा कोनो तेहन शिकाएत नहियेँ छेलै। ओ कोनो अलूरि अबूझ मौगी नहियेँ छल, अपितु होशियार मौगी छल। मुदा पसीखानामे सबहक मुहसँ सुनै ओ जे सभ अपना मौगीकेँ पीटै छै से ओकरो अनेरे लत लागि गेलै। आ झुमकीओ कहाँ कहियो प्रतिवाद केलकै? चोट खाइओ कए ओ अपन काजमे लागल रहै छल से आइ तक ओकरा बुझबेमे नै एलै जे ओ कोनो गलती काज कऽ रहल अछि। ओकरा आश्चर्य लगलै झुमकीक ताकतिपर। कोना ओकरा बजारि कए छातीपर चढ़ि गेलै। ओकरा पहिल बेर भान भेलै जे सत्ते यदि ओकरा झुमकीसँ कुश्ती लड़ए पड़ैक तँ ओ हारियो सकैत अछि। अही गुनधुनमे जखनि झुमकी खाए लेल कहलकै तँ ओ मना नै कऽ सकलै। एकदम आज्ञाकारी बच्चा जकाँ खा लेलक आ गोठुल्लामे जा कए पड़ि रहल। पहिल बेर भरि पोख ताड़ी पीबिओ कए ओकर निन्न निपत्ता भऽ गेल छेलै। सोचिते सोचिते ओ पड़ल छल कि देखलक झुमकी आबि कए ओकर पीठपर तेल मालिस कऽ रहल छैक। कुसमा साहस कऽ कए झुमकीकेँ पुछलक- “सत्ते तों कालि फेर हमरा मारबें।” झुमकीकेँ अपना पुरुखपर दया तँ एलै आ अपना केलहापर कने लज्जित सेहो भेल मुदा अपन दुर्गतिकेँ ध्यान करैत  ओ फेर कठोर भऽ गेल। कुसमाकेँ ओ एतबे कहलक- “दूटा शर्त करतै तखनि‍ हम किछु नै करबैक पहिल जे ताड़ी पीनाइ बन्द करतै आ दोसर हमरापर फेर कहियो हाथ नै उठेतै।” कुसमाकेँ मारिक चोट मोन पड़लै। ओ झुमकीक दुनू शर्त मानि लेलक। झुमकी अपना विजयपर हर्षित होइत ओही गोठुल्लाक अन्हारमे कुसमासँ लिपटि गेल। विजय-२ प्रिया अपन परिवारक बहुत विरोध सहैत सोमेशसँ बियाह केलक। दुनू इंजीनियरिंग कौलेजमे सहपाठी छल। प्रियाक मम्मी पापाक कहब छेलन्हि जे सोमेश पढ़बा लिखबामे प्रियासँ सभ दिन कमजोर रहलै अछि आ आगुओक जीवनमे ओ ढीले ढाल रहत। मुदा प्रिया की कोनो चुनि कए आ रिजल्ट देखि कए प्रेम केने छल? प्रेम एना केतौ कएल गेलै अछि? प्रेम तँ भऽ जाइ छै, बस एतबे। अन्तर देखेलै करीब दू सालक बाद जखनि दुनू पहिल प्लेसमेंट छोड़ि दोसर जॉब पकड़लक। प्रियाकेँ भेटलै पचीस लाख के पैकेज आ सोमेशकेँ बीस के। मुदा ऐ अन्तरसँ दुनूक बीच प्रेममे कहियो कोनो खटास नै एलै। अपितु अपना संगी साथी लोकनिक बीच ई जोड़ी आदर्शे मानल जाइत रहल। तेकर किछु दिनक बाद सोमेश एक दिन प्रियाकेँ कहलकै जे हमरा सभकेँ आब बच्चाक प्लानिंग करबाक चाही आ ओइले प्रिया किछु दिनक लेल जॉबसँ ब्रेक लऽ लिअए। प्रियाकेँ पहिल बेर सोमेशक कोनो बात अनसोहाँत लगलकै। ओ बच्चा तँ चाहै छलि मुदा ऐ लेल ओकरे किएक जॉबसँ ब्रेक लेबए पड़तै? ओ सोमेशकेँ पुछलक- “सोमेश, अहाँकेँ नोकरीक पैकेज अछि बीस लाखक, ठीक।” सोमेश सपाट उत्तर देलक- “ठीक।” “आ हमर जॉबक पैकेज अछि पचीस लाखक, ठीक?” फेर सोमेश ओहने उत्तर देलक- “ठीक।” फेर प्रिया ओकरा मोन पारि देलिऐ- “यद्यपि हम दुनू गोटे अलग अलग कम्पनीमे काज करैत छी, अहाँक पोजीशनसँ हमर पोजीशन इंडस्ट्री हिसाबें सीनियर सेहो अछि आ वर्कलोड बेसी सेहो, ठीक।” ऐपर ओ कने लजाइते कहलक- “ठीक मुदा ऐ बातक की माने अखनि‍?” प्रिया स्पष्ट ओकरा कहलकै- “तँ अहीं किएक ने जॉब छोड़ि दइ छिऐ?” ऐ बातपर ओ हँसय लागल- “लेकिन हमरा जॉब छोड़लासँ बच्चा केना आबि जेतै?” प्रिया ओकरा शान्त भावें बुझा देलक- “बच्चा हम जन्मा देब, ओइले हरेक कम्पनी मैटर्निटी लीव दइते छै। तेकर बाद ओकरा सम्हारैक काज अहाँ करू आ जॉब छोड़ि दियौ। अमेरिकामे आब बहुत पुरुष एना कऽ रहल छैक।” सोमेश एकरा हॅंसीमे टारि देलक। मुदा प्रियाकेँ लगलै जे ओ कोनो अनुचित प्रस्ताव नै देलकै। समय बीतैत गेलै। अगिला साल सोमेशकेँ दश प्रतिशत इन्क्रीमेंट भेटलै, प्रियाक कम्पनीमे ओकरा बीस प्रतिशत भेटलै। सोमेशक पैकेज रहलै बाइस लाखक, प्रिया पहुँचि गेल तीसपर। तेकर छओ मासक भीतरे प्रिया फेर जॉब चेन्ज केलक जतए नबका पैकेज छल चालीस के। नवका पोजीसनमे ओ सीधे वी.पी.केँ रिपोर्ट करै छल। ओ फेर सोमेशकेँ पुछलक- “की विचार केलौं? यदि परिवारमे बच्चा चाहैत छी तँ हमर प्रस्ताव मानि लिअ।” सोमेश किछु उत्तर नै देलकै, ओकर पुरुषबला अहं जागि जाइ छेलै। अखनि‍ तक ओ पूरा बंगलोरमे एहेन नै सुनने छल जे बच्चा पोसैक लेल पतिए जॉबसँ ब्रेक लेलकै आ पत्नी काज करिते रहलै। अमेरिकन सभ सनकी होइत अछि, ओकर नकल करबाक कोन काज? दिन बीतैत गेलै, प्रिया आ सोमेशक पोजीसन आ पैकेजमे अन्तर बढ़िते रहलै। बच्चाक लेल प्रिया अपना दिससँ कोनो हड़बड़ी नै देखा रहल छल। मुदा सोमेशकेँ ई जरूरी बुझाइत छेलै। ओ जखनि‍ प्रियाकेँ ऐ बातक कोनो हिन्ट दैत, ओ अपन प्रस्ताव दोहरा दैत। एक बेर तँ सोमेश सोचए लगल जे प्रिया जिद्दी अछि आ आब ओकरा संग बेसी दिन नै रहि सकत। ई एहेन समस्या छेलै जकरा ओ कोनो कलीग अथवा पुरना संगी साथीक बीच सेहो डिस्कस नै कऽ सकै छल। प्रियासँ अलग भेने ओकरा की भेटतै? फेर नव तरीकासँ जीवन साथी चुनबा लेल प्रयास करू। आ की गारंटी जे ओहो लड़की बादमे कोनो दोसरे बखेरा ने ठाढ़ करए? प्रियाक संग ओ आठ नौ साल बिता लेलक अछि, एकटा अही जिद्दक अतिरिक्त प्रियासँ ओकरा कोनो शिकाएत नै छेलै। संगी साथीक बीच अपना दुनूक प्रशंसा आ ‘आइडियल कपुल’क उदाहरण आ प्रियाक तेज बढ़ैत कैरियर ग्राफ ओकरा सोचबाक लेल बाध्य केलकै। ओ सोचए लगल पहिलुका कथन जे ‘हरेक सफल व्यक्तिक पाछू एकटा स्त्रीक हाथ रहै छै।’ की एकरा उनटाैल नै जा सकै छै? यदि ओ मददि करैक तँ प्रियाक सफलताक ओहने श्रेय ओकरो भेटि सकै छै। फेर जॉब तँ घर बैसल सेहो कएल जा सकै छै। बहुत रास कम्पनीमे लोककेँ एहेन विकल्प भेटि रहलै अछि। रहल बात बेबी सिटिंग के। से तँ जेहने ओ अनाड़ी अछि तेहने प्रिया सेहो अनाड़ी। आइ कालि बंगलोरमे काज केनिहार सभ कपुल अनाड़ी रहैत अछि। तखनि‍ फेर लोक किताब पढ़ि आ इंटरनेटसँ सीखि किछु दिन काज चलबैत अछि। बहुत कमे लोककेँ मम्मी पापा सम्हारि दइ छथिन्ह। ओ फ्लिपकार्टसँ बेबी सिटिंग सम्बन्धी एकटा अमेरिकन किताब आर्डर केलक आ प्रियासँ नुका कए पूरा पढ़ि गेल। ओकरामे किछु क्न्फिडेन्स जगलै जे ओ बच्चाकेँ सम्हारि सकत। आ फेर कोनो इमर्जेन्सी भेलापर बहुत रास्ता छैक, प्रिया अपना बच्चाकेँ छोड़ि थोड़बे देतै? ओ तँ  मात्र ई आश्वासन चाहैत अछि जे ओकरा जॉब छोड़ए नै पड़ैक। अही सोच विचारमे आ जॉब फ्रोम होम तकबामे आर छओ मास लागि गेलै। तेकर बाद एक दिन सोमेश बेड रूम पहुँचैत घोषणा केलक- “प्रिया, हम अहाँक प्रस्ताव मानि लेल अछि। ओतबे नै हम दुनूक लेल एकटा एग्रीमेंटो बना लेलौं अछि।” आ ई कहैत ओ कागज प्रियाक सामने बढ़ा देलक जाहिमे ओ अपन सिग्नेचर पहिनहि कऽ देने छल। प्रियाकेँ तँ विश्वासे नै भेलै। ऐ विजयक खुशीमे ओ कागजकेँ फाड़ि देलक, घरक सभटा कन्डोमक पैकेट उठा कए फेकि देलक आ सोमेशसँ लिपटि गेल। जे.पी.गुप्‍ता प्रसिद्ध मोनूजी- निर्मली, सुपौल (बिहार) (मोनूजी'क ई पहि‍ल कथा छि‍यनि‍) बेटी रूपी बोझ रातिक दू बजैत रहै, चारू दिश अन्हार छल। सुमित्राक आँखिसँ जेना नीन उड़ि गेल रहनि‍। तखने एकाएक पतिक कराहब सुनि नीन टुटलनि। नीन टुटि‍ते पति- श्याम-सँ पुछलखिन- “की होइए?” श्याम किछु ने बजला। हाथ छूलापर बूझि‍ पड़लनि‍ जे बड़ जोर बोखार छन्हि‍। छोटकी बेटी- गीता-केँ हड़बड़ाइत उठबैत, मुँह पटपटबैत बजली- “हमर तँ कपारे जरल अछि। भगवानो सभटा दुख हमरे देने छथि!” दू कट्ठा जमीनक अलाबे एकटा छोट-छीन फूसिक घर। जइमे सुमित्रा पति आ छोटकी बेटी-गीता-क संग जि‍नगी गुजरि‍ रहल छथि‍। पतिक तबियत सेहो बरबरि‍ खरापे रहै छन्‍हि‍। बेटा नै छन्‍हि‍। भगवतीकेँ केतेक कबुला-पातीक पछाति‍ओ बेटा नै भेलनि। बड़की बेटी गिरजा, जेकर बिआह बि‍नु लेन-देनक भेल छेलनि‍। बि‍नु लेन-देनक बि‍आह ऐ खातिर भेल रहनि‍ जे गिरजा देखै-सुनैमे बड़ सुन्नरि‍‍ संगे गुणशील आ कर्मशील सेहो। मुदा सुमित्राक जमाए आ समधि बड़ लालची। बिआहक साल भरिक‍ पछतिओ कोनो-ने-कोनो बहानासँ गिरजाकेँ पड़तारि‍त करैत रहथि‍न। गिरजाक सासु बिजनेसक नाओंपर बेटाकेँ ससुरारिसँ पाइ अँइठऽ सेहो कहैत रहथिन‍। बेटो एहेन जे महिने-महिने सासु-ससुरकेँ रूपैआक समाद पठबैत। मुदा कोनो असरि‍ नै देखि‍ एक दि‍न गिरजाक सासु समधिन लग स्‍वयं पहुचि‍ कहलखिन- “जमाए तँ शराबी भऽ गेल, किएक तँ कोनाे रोजगार नै छै, भरि दिन एनए-ओनए बौआइत रहैए। अहाँ लाख-सबा-लाख मदति‍ करि दियौ, जइसँ कोनो काज-धंधा शुरू करत। काज-रोजगार भेने अहाँक बेटीओ सुखी रहत।” एते कहैत ओ बड़बड़ाइत ओतएसँ वि‍दा भऽ गेली। मनमे दू कठ्ठा जमीन आ गि‍रजाक नामे बीमाबला पाइ नाचैत रहनि‍। एक दिन थाकि-हारि कऽ गिरजाक सासु-ससुर गिरजाकेँ नैहर भेज देलक। पति सेहो पाछू लगल गि‍रि‍जा संग एला मुदा दुआरिपर रूकि गेला। गिरजा कानि-कानि कऽ अपन सभटा बेथा माएकेँ कहलखि‍न। बेटीक बात सुनि‍ माए द्वन्‍द्वमे पड़ि‍ गेली। बीमाबला पाइसँ गीताक बिआह करब आकि गिरजाक अशान्त जिनगीकेँ बँचाएब! आन कोनो अवलम्‍ब नै। सोचैत-सोचैत चाह-बिस्कुट आ पानि लऽ कऽ दरबज्जापर पहुँचली। जमाइओ हुनकर गोड़ कि लगि‍तनि‍, ओ तँ अपने बेगरते आन्‍हर! गुस्साइले चाह पटकैत बजला- “ई सभ आदर-सत्कारक ढंग रहए दथुन। हमरा लग समए कम अछि। पुरनि‍मा दिन साइकिन दोकान खोलब। हमरा बीमाबला पाइ चाही। ओनाहितो बिना दान-दहेजक हि‍नका बेटी संग बि‍आह कऽ बहुते दिन घरमे बैसा कऽ खुएलि‍यनि‍।” सुमित्रा गिड़गिड़ाइत बजली- “पाहुन, ई तँ घरक पैघ जमाए छथि‍, गीताक बि‍आहक भार जेतेक हमरा सभकेँ अछि तेते हिनको छन्‍हि‍ ने।” कनीकाल जमाए बाबू कि‍छु ने जवाब देलखिल मुदा किछुकालक पछाति गिरजाकेँ बजा कातमे लऽ गेलखि‍न आ कहलखिन- “आब, अहाँ अपन जिनगी एतै काटू। जाधरि पाइ नै मिलत ताधरि अहाँ घुरि कऽ हमरा लग नै आएब।” ई कहि‍ जमाए बाबू तमतमाएल मोटर साइकिलपर बैस आँखिसँ ओझल भऽ गेला। गीता बहनोइक सभटा बात सुनि‍ लेलक। बहनोइक रूखि‍ देखि‍ गीता बहुत दुखी भऽ गेल। मुदा माए-बाबूक लाख पुछलाक पछातिओ दुनू बहिनमे सँ कि‍यो ई बात नै कहनि‍। कारण छल जे ओनाहि‍तो माए-बाबू गरीबीक चलैत दम्‍माक इलाजो ने करा पबथि‍। ऊपरसँ ई सभटा झंझ-मंझ सुनि‍ आरो दुखे बढ़ि‍तनि‍।  एकान्तमे बैस दुनू बहिन अपन फूटल किस्मतपर कनैत रहए। दुनू बहि‍नक मनमे उठैत रहै, दहेजक कारण माए-बापक माथपर बाेझ बनल छी। शारदा नन्‍द सिंह विहनि कथा- की करब से अहीं कहू रामा कहलकै- “ऐ सुनै नइ छै। अँगनामे नै छै की? केतए चलि‍ जाइ छै, से नै जाइन।” देखि‍यौ ने एतबे कालमे कए गोट महाजन दुआरि‍ लागि‍ गेला। अखनि‍ तँ भोरे भेलैए, दि‍न तँ बाँकी छै। आ कि‍छु पटौनीओं बलामे रहि‍ए गेलै। पहि‍लुका महाजन कहि‍ते रहै आकि‍ धरदनि‍ दोसरो महाजन हुनक मँुहक बात ऊपरे लोकि‍ लेल की जे वरू खाद तरेचा जे नेने छेलै ओहूमे अदहा देने रहै आर बाँकी रहि‍ गेलै। कहने छेलखि‍न जे यूरि‍याक बोरा लेबै ने तँ ओहीमे मि‍झर करादेब। से तँ आब फसि‍लो नवको होइतै। आइ बि‍नु नेने कि‍ हम टसकि‍ नै सकै छी। एनामे तँ हमर भट्ठीए जाम भऽ जाएत। एहेन महाजनीसँ बाद अबै छी। कहू एहनो भेलैए। एतै कहल गेलै जे पैंच खि‍आइ ऋृणे बि‍आइ। ई उतारा चौरी भऽ रहल छेलै की। एकटा गाड़ी एम्‍हरे हौरन दैत हुरहुराइत आबि‍ रहले ओहीपर लि‍खल छेलै उतरी बि‍अार ग्रामीण क्षेत्रि‍य बैंक गोड़ा-वौराम दुआरि‍ लागि‍ गेल अछि‍। मुहथरि‍पर अमला सभ ठाढ़ भऽ कऽ पूछि‍ बैसला- “यही रामा का घर है?” कपि‍लेश्वर राउत बड़का खीरा कहबी अछि‍, पुरुखक भाग आ स्‍त्रीकगणक चरि‍त्र कखनि‍ बदलि‍ जाएत तेकर कोन ठेकान। सएह भेलै जुगुत लालक जि‍नगीमे। करि‍याकाकाकेँ तीनटा बेटीपर सँ एकटा बेटा भेलनि‍। पहि‍ल पुत्र भेने परि‍वारमे खुशीक माहौल बनि‍ गेल। छठि‍आरे दि‍न पमरि‍या तीन गोटेसँ आबि‍ ढोलकी-कठझालि‍ आ मजि‍रा लऽ अँगनामे नाचए लगल। केना ने पमरि‍या अबैत ओहो तँ गामक चमनि‍ आ अड़ोसी-पड़ोसीसँ सूर-पता लगबैत रहैए। से भनक लगि‍त पहुँच गेल। कखनो बधैया गीत तँ कखनो सोहर, कखनो समदौन गाबए लगल। अँगनामे लोकक भीड़ लगि‍ गेलै। करि‍याकाका कोनो तरहेँ एक सए रूपैआ आ सबा कि‍लो अरबा चाउर नि‍छौरमे दऽ पमरि‍याकेँ वि‍दा केलनि‍। कि‍यो पड़ासी टीप देलकनि‍- “भाय साहैब पत्‍थरपर दुभि‍ जनमल हेन तँए दसटा साधु-संतकेँ तथा अड़ोसी-पड़ोसीकेँ नोत दऽ भोज-भात खुऔत जइसँ बच्‍चाकेँ असि‍रवाद देत तँ बच्‍चाकेँ नीक हेतै।” करि‍याकाका बजला‍- “ठीक छै।” छठि‍यारक राति‍मे दसटा साधु-संतकेँ आ दसटा अड़ोसीओकेँ नोत दऽ भंडाराक इंजाम केलनि‍। छठि‍आरक वि‍धि‍-बेवहार भेला बाद दादी-दादी बच्‍चाक नाओं रखलनि‍ जुगुत लाल। वि‍हान भेने लौअनि‍याँकेँ साड़ी-साया-ब्‍लौज आ एक सए टाका दऽ वि‍दा केलनि‍। करि‍याकाकाकेँ मात्र एक बीघा खेत। चारि‍ कट्ठा चौमास बँकि‍ए धनहर। कोनो दू-फसि‍ला तँ कोनो एक-फसि‍ला। खेतीक नव-नव तरि‍का एलाक बादो करि‍याकाका पुरने ढंगसँ खेती करथि‍। छह-सात गोटेक परि‍वार लेल बीघा भरि‍ खेत कम नै भेल। जँ खेती करैक ओजार आ पानि‍क साधन रहए। वैज्ञानि‍क तरि‍कासँ खेती करैक लूरि‍क अभाव छेलनि‍ करि‍याकाकाकेँ। तैपर सँ प्रकृति‍क प्रकोप सेहो। कोनो साल दाही तँ कोनो साल रौदी अलगे तबाह केने। तथापि‍ परि‍वारकेँ कोनो तरहेँ खिंचैत चलै छला। गामोक लोक सभ पुरने ढंगसँ खेती करैत रहए। परि‍वार मात्र सात गोटेक। अपने दुनू प्राणी, पि‍ता रामधन आ माता-सुमि‍त्रा, आ तीनटा धि‍या-पुता। एकटा बेटी सासुरे बसैत। करि‍याकक्काक मन छेलनि‍ जे बेटा पढ़ि‍-लि‍खि‍ कऽ ज्ञानवान बनए, मुदा अपना सोचलासँ की हएत। जेकरा प्रति‍ हम जे सोचै छी तेकरो मन आ लगन ओहेन तखनि‍ ने। जहि‍ना जेठुआ हाल भेने कि‍सान तँ धानक वि‍हनि‍ खेतमे खसा लैत अछि‍ आ रौदी भेलापर ओहो वि‍हनि‍केँ काटए पड़ै छै। सएह हाल करि‍याकाकाकेँ भेलनि‍। बेटा जुगुत लालकेँ पढ़ैले स्‍कूल पठबैत छेलखि‍न। मुदा जुगुत लाल स्‍कूल जाइक बदला रस्‍तेमे कहि‍यो कबड्डी तँ कहि‍यो तास-तास तँ कहि‍यो गोली-गोली खेलए लगैत। अवण्‍ड जकाँ करैत रहए। चालि‍-चलनि‍ केहेन तँ केहनो फुनगीपर पाकल आम कि‍ए ने होइ जुगुत लालक लेल तोड़नाइ बामा हाथक खेल छल। केकरो वाड़ी-झाड़ीमे लतामक गाछसँ कहुना तोड़ि‍ संगी-साथीकेँ खि‍आ दैत। कोनो चि‍ड़ै-चुनमुनीक खोंता उजारि‍ अण्‍डाकेँ छूबि‍ सरा दैत। कि‍यो गाए वा भैंसकेँ पाल खुअबैले वि‍दा हुअए आ जुगुत लाल जे देखैत तँ ओकरे संग लागि‍ इहैत-इहैत करैत घुरए। गैवार-भैंसवारसँ कहबो करैत नीक साँढ़-पारासँ पाल खुआउ जइसँ बाछा हुअए आकि‍ बाछी, पारा हुअए आकि‍ पारी नीक नश्‍लक हएत, दुधगर माल हएत नै तँ पुष्‍टगर बाछा वा भैंस हएत। एवं तरहेँ कोनो ने कोनो उपराग, उलहन माए-बापकेँ सभ दि‍न सुनए पड़ै। तंग भऽ गेल माए-बाप। जुगुत लालक उमेर आब बारह-चौदह बर्खक भऽ गेल छल। जहि‍ना पहि‍ल सीख केकरो माए-बापसँ भेटै छै, दोसर सीख समाजसँ आ तेसर स्‍कूल आ देश-वि‍देशसँ भेटै छै, तइमे जेकर बुधि‍, वि‍वेक, ज्ञान जेहेन रहै छै से अपनाकेँ ओइ रूपमे ढालि‍ लइए। मुदा जुगुत लालले धनि‍सन। ठेलि‍-ठुलि‍ कऽ सतमा तक पढ़लक। कि‍एक तँ सरकारो दि‍ससँ मास्‍टर सभकेँ आदेश भेटल छै जे ‘केकरो फेल नै कएल जाए।’ समए बीतैत गेेल, जखनि‍ जुगुत लाल सोलह-सतरह बर्खक भेल तँ माए-बाप सरस्‍वती कुमारी नामक लड़कीसँ बि‍आह करा देलकै। करि‍याकक्काक मनमे रहनि‍ जे बि‍आह करा देबै तँ कहीं पत्नी एलासँ सुधरि‍ जाएत। बि‍आहक बाद जुगुत लाल मोबाइल लऽ हरि‍दम गीते-नादक पााछू अपसि‍याँत रहए लगल। माए-बाप सोचथि‍ जे उझट बात आकि‍ एक थप्‍पर मारि‍ देबै आकि‍ हाँट-दबार करबै तँ कहीं केतौ भाग ने जाए। मन मसोसि‍ कऽ रहि‍ जाए। संयोग भेलै एक दि‍न रमेश- जुगुत लालक पि‍त्ती- एकटा बि‍जू आमक गाछक थल्‍ला काटि‍ रहल छला। जुगुत लाल देखैत छल। देखलक जे बि‍जू आमक थल्‍लाकेँ कलकति‍या आमक गाछ लग गाड़ि‍ देलकै आ कलकति‍या आमक नीचला डारि‍केँ चक्कूसँ कनीयेँ छीलि‍ कऽ सरहीकेँ सेहो छीि‍ल दुनूकेँ सटा कऽ बान्‍हि‍ देलकै। कनी दि‍नक पछाति‍ मुड़ीकेँ बन्‍हलाहासँ कनी ऊपर काटि‍ देलकै। आब भऽ गेल सरहीसँ कलमी। जुगुत लालक माथामे जेना चोट पड़लै। जहि‍ना माघक शि‍तलहरीमे कड़गड़ रौद उगि‍ते सभ रौद ताप दौगैत अछि‍, तहि‍ना जुगुत लालकेँ भेलै। वाड़ीमे चारि‍टा सजमनि‍क गाछ तीन-चारि‍ हाथक भेल छेलै कनि‍येँ हटि‍ कऽ तीन गो खीराक लत्ती छेलै ऊहो दू तीन हाथक भेल छेलै। सजमनि‍ आ खीरा, दुनू लत्तीकेँ सुतरीसँ बान्‍हि‍ देलकै। जड़ि‍क बगलमे सड़लाहा गोबर दऽ माटि‍ चढ़ा देलकै। पि‍ता तँ पहि‍नै खेतकेँ एकसलि‍या गोबर सड़ा कऽ छीटने छला आ खेत तैयार केने छला। कीड़ाक प्रकोप द्वारे पहि‍ने नीक पत्ताकेँ सड़ा, तमाकुलक डाँटकेँ डाहि‍, गाइयक गोंतक संग मि‍ला कऽ खेतमे छीटने छला। सजमनि‍ आ खीरा दुनूक लत्ती भोगगर भेलै। बरसातक बुढ़ापाक समए छल। पानि‍क जरूरत कमे पड़लै। जाबे अपन मन कोनो काजक दि‍स आगू नै बढ़त, ताबे अनका जोरे-जबरदस्‍तीसँ बुधि‍क गठरी नै ने खुलै छै। बीस-पचीस दि‍नक बाद सजमनि‍क मुड़ीक बन्‍हलाहाक एक ठुट्ठी ऊपरसँ काटि‍ देलकै आ खीराक मुड़ीकेँ रहऽ देलकै। नीक जकाँ जखनि‍ गाछ लागि‍ गेलै तखनि‍ खीराक जड़ि‍ हटा देलकै। नीक जकाँ जखनि‍ गाछ लागि‍ गेलै आ फूल-बति‍याक समए एलै, तखनि‍ गाछक जड़ि‍मे डेढ़ बीत हटा कऽ डी.ए.पी खाद लगभग सए ग्राम सेहो छीटि‍ देलकै आ थोड़ेक पानि‍ देलकै। एक हाथसँ ऊपरे खीरा फड़लै। अड़ोसी-पड़ोसी मचानसँ लटकल खीरा फड़ल देखै तँ बि‍सवासे ने होइ जे खीरा छि‍ऐ आकि‍ कैता आकि‍ सजमनि‍क बतीया। मुदा जखनि‍ लग जा कऽ देखै तँ छगुन्‍ता लगि‍ जाइ। पि‍ताकेँ फुट्टे छाती जुरै जे आब बूझि‍ पड़ैए जुगुत लाल सुधरत। सरकार दि‍ससँ ओही साल मधुबनी स्‍टेडि‍यममे फल-फूल, तरकारी-फड़कारीक प्रति‍योगि‍ता, जि‍ला स्‍तरपर आयोजन कएल गेल छल। सरकारक उदेस छल हरि‍त क्रान्‍ति‍ दि‍स कि‍सानकेँ प्रोत्‍साहि‍त कऽ देशकेँ आगू बढ़ेबाक। जि‍ला भरि‍क कि‍सान अपन-अपन जे नीक कदीमा, सजनि‍, मुरै, ओल, मि‍रचाइ इत्‍यादि‍ सभ तरहक तरकारीक मेला लगल छल। सभ कि‍यो अपना-अपना आगूमे जेकर जे सामान छेलै से लऽ कऽ बैसल छल। मुरैए छेलै तँ दू-दू हाथक, सजमनि‍ए छेलै तँ दू-दू हाथक, कदीमे छेलै तँ तीस-तीस-चालि‍स-चालि‍स कि‍लोक, ओले तँ पनरहसँ बीस-बीस कि‍लोक। मि‍रचाइओक गाछ छेलै तँ एक हाथक गाछ आ लुबधी लगल मि‍रचाय फड़ल, फूले रहै तँ रंग-बि‍रंगक। रंग-बि‍रंगक दोकान जकाँ फल, फूल सजौल छल। जुगुत लाल सेहो अपन तीनटा खीराकेँ लटकौने छल, बाँकी पथि‍यामे रखने छल। खीरा देखि‍-देखि‍ एके-दुइए देखि‍नि‍हारक भीड़ लगि‍ गेल। पूसा फार्मक कृषि‍ वैज्ञानि‍क सभ सेहो छला। ऊहो लोकनि‍ जुगुत लालक खीरा देखलनि‍। हुनको सभकेँ छगुन्‍ता लगि‍ गेलनि‍। जुगुत लालक संग राय-मसबि‍रा केलनि‍। स-वि‍स्‍तार जुगुत लाल खीराक उपजाक बारेमे कहलकनि‍। अन्‍तमे पुरस्‍कारक बेर जि‍लाधि‍श महोदय घोषणा केलनि‍ जे खीराक उपजामे प्रथम पुरस्‍कार जुगुत लालकेँ देल जाइए। अही तरहेँ केकरो अल्‍लू, तँ केकरो कदीमा, तँ केकरा सजमनि‍मे, जेकर जेहेन बौस रहै तेहेन पुरस्‍कारक संग प्रशस्‍ती-पत्र देल गेलै। पूजाक वैज्ञानि‍क जुगुत लालकेँ संग लऽ पूसा फार्म लऽ गेलखि‍न। आ फार्ममे उन्नति‍ खोज वि‍भागमे कोनो पदपर पदस्‍थापि‍त कऽ देलकनि‍। शनि‍-रवि‍केँ अठबारे जुगुत लाल गाम आबए, फार्ममे नीक-नीक तरकारी आ फल-फूल, धानक बीज इत्‍यादि‍केँ उन्नति‍ कि‍सि‍मक सभ बनबऽ लागल। आइ वएह जुगुत लाल दस कट्ठा भीठबला जमीन खरीद रंग-बि‍रंगक कलमी आम गुलाब खास आम्रपाली, सि‍कूल, सि‍पि‍या, गुलाब भोग आदि‍ तैसंग गुल जामुन, बेल, धात्रीम, लताम, अनार, शरीफा इत्‍याि‍द रंग-बि‍रंगक फल सभ लगौने अछि‍। अपन चारि‍ कट्ठा चौमासमे शोध केलहा कोबी, सजमनि‍, खीरा, मुरै ओल सबहक खेती करैत अछि‍। समाजोमे क्रान्‍ति‍ जगलै, देखौंस केलक तँ समाजक रंगे बदलि‍ गेलै। करि‍याकेँ जुगुतक खेती देखि छाती तँ जुड़ाइए गेलै जे केतौ-केतौ बजबौ करथि‍न- “देखू ठहलेलहा जुगुत लालकेँ, की करैत की भऽ गेलै।” लोको कहै- “तँ ठीके, केलासँ की नै होइ छै।” आब तँ जुगुत लाल बाबू जुगुत लाल भऽ गेल। भगवानोक लीला अजीव अछि‍, तइमे कर्मेक प्रधानता देल गेल अछि‍। कर्म करबै तँ फल नि‍श्चि‍त भेटत। भाग भरोसे केतेक दि‍न जीब। अधला सुलोचना दादी जेहने कमासुत तेहने खिसक्करि‍, खिसक्करे नै गीतो गबैमे सेहो माहि‍र रस्ते-पेरे आकि पोखरि‍क घाटपर बिना कोनो समैमे जहाँ कि‍ महिला जमा भेली आ दादी जँ छथि तँ कोनो ने कोनो खिस्सा हेबेटा करत। छठि पावनिमे तँ घाटपर छठि मैयाक खिस्सा सुनैले भीड़ लाि‍ग जाइत। सुलोचना दादीक उमेर पच्चपन-साइठ बर्खक। दूटा लड़का एकटा लड़की छेलनि लड़की सासुर बसैत रहनि‍। बेटा सभकेँ सेहो धिया-पुता भऽ गेल छेलनि पोता-पोतीसँ घर भड़ल-पुरल। परिवारमे ततेक मिलान बाँसक ओइद जकाँ आ गाछक डाइर पात जकाँ जे एक दोसरसँ जोड़ल। बिआह उपनायन वा कोनो मांगलिक काजमे बिना सुलोचना दादीक गीते नै पुड़ा होइए। गामक बूढ़-जवान धिया-पुता बेटी पुतोहु सभ दादी कहि‍ कऽ संबोधित करैत। परिवार किसानी जीवन जीबैत। एक दिन साँझक समए छल सुलोचना दादी गाए-बरदक गोबर करसी उठा, थरि‍ खड़ैर‍ माल-जालकेँ कुट्टी-सानी लगा, घूर कऽ, पैर हाथ धो बीच अाङनमे मोथीक पटिया बिछा पड़ल छेली। पुतोहु सभ रौतुका भानसक जोगाड़मे छेली तखने धिया-पुता सभ (नैत-पोता-पोती) खेल धुप कऽ कऽ आएल छल। सभ तूर दादी लग बैस गेल आ कहए लागल दादी एकटा खिस्सा कहि ने। दादी बजली- “ई देह जरूआ जनि‍पिट्टा बोंगमरौना सभ कखनो चैनसँ अराम नै करए देत।” जहिना माइक थप्परमे प्रेम होइ छै तहिना धिया-पुता हँसि‍ कऽ गप्पेकेँ उड़ा देलक। दादी फेर बजली- “पढ़बीही लिखबिही से नै जे खिस्सा-पिहानी सुनबीही। पढ़-लिख गऽ। छुट्टी दिन खिस्सा कहबौ।” एक सुड़े धिया-पुता बाजल- “नै दादी, आइ रबि दिन छिऐ छुट्टीओ छै। तँए खिस्सा कहै पड़तौ, कहि ने।” “रौ रविन्दर, बिरेन्दर आइ थाकल-ठेहियाल छियौ देह-हाथ दुखाइत अछि, पड़ल रहए दे।” एतेक बात सुनिते धिया-पुता सौंसे देह लुधकि‍ गेल आ जाँतए-पीचए लगल। दादीसँ पुछलक- “दादी बुढ़मे किए गोबर-करसी आकि काज उदम करै छँह। बैस कऽ खेमे से नै। बाबू-कक्का, माए-काकी तँ कमाइते छौ?” दादी बजली- “रौ बौआ, जँ कियो कमाइ-खटाइबला नै रहए, अथबल भऽ जाए तइसँ नीक मरनाइए। तँए जाबत जीबै छी ताबत जे पैरूख अछि ततेक काज करैत रहै छी। जइसँ देहक खुन चलैत रहत। तँए तंदरूस्त रहै छी आ मनो खुशी रहैत अछि। तेकरा तूँ अधला बुझै छिही?” कनीकालक बाद पोता-पोती कहलकनि- “आब तँ ठीक छँह ने। कही ने खिस्सा?” पुतोहु सभ फूट्टे हँसैत छेली। सुलोचना दादी पुछलखिन- “कोन खिस्सा सुनबिहिन?” जेटका पोता रविन्दर बाजल- “दादी कोनो खिस्सा कही नीकहा।” दादी बजली- “बौआ, पहिने लोक बाजए जे उत्तम खेती मध्यम बैनि‍‍ निषिध चाकरी भीख निदान। मुदा आब एकर उनटा बुझैत अछि। उत्तम भीख मध्यम चाकरी निषिध बैनि खेती निदान। सुवि‍धा भोगी लोक भऽ गेल अछि। कामसँ देह चोरबैत अछि तँए देखबहक जे सभ एक दोसराक खिधाँसे करैत रहैत अछि। तँए नीक बेजए फुटेनाइ कठिन अछि। रौ रवीन्दर, अखुनका जुग वैज्ञानिक जुग छै अधलासँ अधला वस्तुक शोध करि‍ कऽ उपयोगी बना दइ छै। तँ सुन एकटा पुरना खिस्सा कहै छियौ अकबर-वीरबलक।” “...अकबर-वीरबलसँ कहलक सभसँ अधला कोन बस्तु छै। खोइज कऽ कहू। वीरबल खोजैले बिदा भेल खोजमे देखलक जेकरा हम खराब बुझै छी सएह वस्तु केकरो लेल नीक छै। कोनो वस्तु वीरबलकेँ खराब भेटबे नै करैत‍। हारि-थाकि कऽ देहातक एकटा चाहक दोकानपर बैस गेल आ वि‍चार-वि‍मर्श करए लगल। कच्ची रस्ता छल देखलक रस्ता पैखानासँ घिनौल अछि‍ जे कियो ओइ रस्ता धऽ कऽ चलैत सभ नाक मुँहपर गमछा दबने झटैक कऽ चलैत। वीरबल सोचलक ऐसँ अधला कोनो वस्तु नै अछि। सभ घृणे करैत अछि। वीरबल एकटा कुटक डिब्बा लऽ पैखाना उठबैले पहुँचल...।” “...पैखाना हँसिकेँ बाजल- “हौ बुड़ी, सभसँ अधला हमहीं बुझेलियह? हम कि सभ खा कऽ सिठ्ठी बनल छी से बुझैत छहक? हे सुनह भात-दालिसँ लऽ कऽ रसगुल्ला-लालमोहन, कलाकंद, किसमिस, छहोड़ा, सेब, संतरा, साग-पात तकसँ बनल सिठ्ठी छी। तेकरा तूँ अधला बुझै छहक? हमरे से खाद बनैए, हमरेसँ बिजली बनैए। केकरो लेल हम सभसँ नीक भोजन छिऐ।” तखने सुगरक हेँज अबैत रहए। इशारा करैत वीरबलकेँ कहलक- “हे दैखैत रहक हम केतेक नीक छी।” जहिना दुरेसँ माछकेँ देखि‍ बौगुला झपटै छै तहिना सुगर एक दोसराकेँ पछारैत पैखानापर टुटि पड़ल। वीरबलकेँ आत्म ज्ञान भेलै। दरबारमे जाऽ अकबरसँ कहलक- “हजुर, सभ से अधला हम आ अहाँ छी। दुनियाँमे कोनो वस्तु अधला नै अछि‍। कोनो वस्तुकेँ आँले आँखि चाही, ज्ञान चाही, हमरा अहाँक मनक सोच जे हिनतासँ ग्रसित अछि तँए कोनो वस्तु खराब आ नीक बुझै छिऐ।” “...वीरबल सोचए लागल।” दादी धिया-पुतासँ पुछलखि‍न- “केहेन लगलौ खिस्सा? धिया-पुता बाजल- “बड़ नीक, बड़ नीक।” दादी कहखि‍न- “सुनू, खुब पढ़ू-लिखू ज्ञानवान बनू। कोनो वस्तुकेँ अधला नै बुझू, किचरेमे कमल फुलाइ छै, गुलाबक फूलक गाछमे सौंसे देह काँटे रहै छै रक्षा लेल। खोजू खोइज कऽ दुनियाँमे महान बनू। महकारी फड़ जकाँ ऊपरसँ नीक भीतर कोनो काजक नै। तेहेन नै बनू बाहर-भीतर एक रंग रहक चाही ठीक छै ने?” धिया-पुता बाजल- “ठीक छै। दादी, ठीक छै।” समए साल बितैत गेल। दादी अस्सीकेँ पार केलनि एक दिन खाइकाल गाड़ा लगलनि आ स्वर्गबास सिधारि गेली। एमहर रविन्दर दादीक खिस्साकेँ गीरह बान्हि लेने छल। बी.ए. पास केला पछाति‍ मनमे ठानि लेलक हम खेतीए-वाड़ी करब सहए केलन। बाप-दादा वा दादीसँ विरासतमे भेटल ज्ञानकेँ वैज्ञानिकक शोध केलहा सोचकेँ धारातलपर उतारए लगल। जइ गोबर-करसीकेँ रविन्दर दादीकेँ कहने छेलनि‍ जे ई काज छोड़ि देही ने। वहए गोबर-करसीकेँ सभसँ उत्तम खाध बूझि जैविक खाध बना खेती करए लगल। आइ रविन्दरक दरबज्जापर कामधेनु गाए जरसी, बरदक बदला ट्रेक्टर, रोटाबेटर, धान रोपैबला मशीन, दौनीक मशीन, कमठानक मशीन, फसल काटैबला मशीन छन्‍हि‍। श्रीविधिसँ खेती करै छाथि। मधुबनी जिला भरिमे देखा देलक उन्नत खेती करि‍ कऽ। उपजामे तीन गुणा बढ़ोतरी भेलै। परोपट्टाक लोक सभ रविन्दरक खेतक उपजा देखैले खेतक आड़िपर ठाढ़ भेल, आ ठकमुड़ी लागि‍ जाइ गेलनि‍। रविन्दरकेँ गेहुम आ धानक उपजामे जि‍ला भरि‍क सर्वक्षेष्‍ठ किसानक प्रथम पुरस्कारसँ कलक्टर साहैब सम्‍मानि‍त केलखिन। सम्‍मानि‍त कालमे रविन्दरकेँ आँखि सँ नोर ढब-ढबा गेलै। आ मनमे सोचलनि जँ आइ दादी जीवैत रहि‍तथि‍ तँ ई पुरस्कार हम दादीएकेँ चरणमे समर्पित करिताैं। जइ खेतीकेँ लोक अधला बूझि पंजाब, भदोही, हरियाना भागै छल, खेतीकेँ घाटाक सौदा बुझै छल से आब रवि‍न्‍द्रक खेतीकेँ देखि‍ नफ्फाक सौदा बुझए लगल। नीक-खरापक प्रति‍ वि‍चार बदलि‍ गेलै। बि‍सवास बढ़ि‍ गेलै। दुर्गानन्‍द मण्‍डल बुधि‍ गामक बूढ़, पीपरावाली काकी, माथक केस सोन सन उज्‍जर धप-धप। आँखि‍ भुमकमक दराड़ि‍ जकाँ धँसल। बत्तीसीसँ हाँसील गोल। गि‍नती लेल दूगो दाँत देखार छल। मुदा चेतना पूर्णरूपेण। पेशाब-पैखानक ज्ञान पुरा-पुरी छन्‍हि‍। लाठी हाथे ति‍कोण भऽ चलै छथि‍। मुदा गप एक्कोटा ने लटपटाइ छन्‍हि‍। गाम-घरक आ टोला-पड़ोसाक लोक सभ पीपरावाली काकीकेँ नीक खि‍स्‍सकरि‍, गीतगायन आ वि‍धकरीक रूपमे जनै छन्‍हि‍। मि‍थि‍लाक माटि‍-पानि‍सँ जूड़ल सभ वि‍ध-बेवहारसँ लऽ कऽ टोना-टापर आ अरि‍पन-पीढ़ी आदि‍ देबमे सि‍द्धस्‍त मानल जाइ छथि‍। पैरुख घटने पीपरावाली काकी माय-सँ-दाय भऽ गेली। आनो-आनो समैमे धि‍या-पुता सभ पीपरावाली काकी लग खि‍स्‍सा सुनैले घूर लगौने रहैए। गरमी-गुमारमे तँ अरबधि कऽ। एक दि‍नक गप छी। काकी अपना जौत-भुटबा जे वर्ग आठमे गामेक स्‍कूलमे पढ़ैए काकीकेँ खि‍स्‍सा सुनबैले जि‍द्द पकड़ि‍ लेलक- “काकी गइ, एकटा नीक खि‍स्‍सा सुना। काल्हि‍ जे स्‍कूल जेबै तँ मास्‍सैब सुनतै। काल्हि‍ शनि‍ छि‍ऐ। मास्‍सैब कहने छथि‍न जे भुटबा काल्हि‍ एकटा खि‍स्‍सा सुनबए पड़तौ। से काकी एकटा खि‍स्‍सा कही ने।” काकी कहलखि‍न- “केहेन खि‍स्‍सा सुनमेँ से तँ कह।” भुटबा बाजल- “काकी, नीक खि‍स्‍सा कही बुधि‍-ज्ञानबला जे स्‍कूलमे सुनाबए पड़तै। कोनो राजा-महराजाबला नै तँ सोनपड़ीबला कही।” काकी शुरू केलनि‍ खि‍स्‍सा- “एक नगरमे एकटा राजा रहै छला। राजाक राजमे कथुक कमी नै। सगतरि‍ सुख-शांति‍ बनल रहै छेलए। राज भरि‍मे ने केकरोसँ कोनो दुश्‍मनी आ ने बाड़ि‍। सभ एक-दोसराक सहयोगी। केकरो कोनो चीजक दुख-तकलीफ नै। सौंसे राजमे अमन-चैन छल...।” काकी कनी रूकैत आगू कहए लगलखि‍न- “एक दि‍नक गप छी। राजाक छोटकी बेटी असलान करैले राज-महलसँ बाहर ढयोढ़ीमे खुनाएल पोखरि‍ जेकर चारूकात फुलवाड़ी छल तइमे अपन नौरी-खबासीनीक सङ गेल। असलान करैकाल अपन सभ कपड़ा उतारि‍ नि‍च्‍चाँ जमीनपर रखलक आ गरदनि‍क हि‍राक हार एकटा फूलक डारि‍पर लटका देलक। राजाक बेटी असलान-धि‍यान कऽ कपड़ा पहि‍रि‍ नौरी-खबासीनीक सङ राज दरबारमे चलि‍ गेल। मुदा गरदनि‍क हीराक हार बि‍सरि‍ गेल। ओ हार ओही फूलक डारि‍पर लटकल रहि‍ गेल। दि‍न बीति‍ गेलै। लूकझूक साँझक बेरमे घोड़सारक नोकरक नजरि‍ ओइ हारपर पड़ल। कि‍एक तँ दि‍न भरि‍क काज-उदमक बाद ओ नौकर हाथ-पएर घोइले ओही पोखरि‍मे गेल। नोकरबा ओ हार लऽ नुका कऽ रखि‍ लेलक। परात भने ओकर खोज-खबरि‍ शुरू भेल। मुदा कि‍यो गछबे ने करै जे हम लेलौं। राज भरि‍मे ढोलहो पड़ल। मुदा कोनो लाभ नै। राजक बेटी ओइ हार लेल सोगा गेल। दि‍न एक बि‍तल, दोसर बि‍तल। मुदा कोनो थाह-पता नै। एमहर राजाक बेटी सोगाएल बि‍छौन पकड़ने। राजा मंत्रीकेँ बजौलनि‍। सभा लागल। दबारक सभ सभासद् एकठाम बैसला। राजाकेँ कि‍छु ने फुड़नि‍। अंतमे मंत्रीजी बुधि‍ बतबैत कहलखि‍न जे राजा साहैब चि‍न्‍ता जुनि‍ करू। राजकुमारीक हार चौबीस घंटाक पेसतर भेट जाएत। काल्हि‍ पुन: दरबारक सभ कर्मचारीक सङ प्रजाकेँ सेहो बजौल जाए। सएह भेल। राजाक आदेशानुसार राज दरबारक सभ कर्मचारी आ प्रजागण उपस्‍थि‍त भेल। राजा फेर एकबेर सभकेँ पुछलखि‍न। मुदा हारक चोरि‍क वि‍षएमे कि‍यो ने बाजल...।” भुटबा बि‍च्‍चेमे पुछलक- “तब की भेलै?” काकी आगू कहए लगलखि‍न- “पश्चात मंत्रीजी बजला जे ठीक छै कोनो बात नै राजा साहैब। से नै तँ उपस्‍थि‍त कर्मचारी-दरबारीक सङ प्रजागण अपने सभ ऐ ढेरीमे सँ एक-हकटा लाठी लि‍अ। आ धि‍यान राखब जे जे कि‍यो राजकुमारीक हार लेलि‍ऐ बा चोरौलि‍ऐ तेकर लाठी राति‍मे एकहाथ नमहर भऽ जाएत। सभ कि‍यो एक-हकटा लाठी लेलक। घोड़सारक नोकर सेहो एकटा लेलक। हार तँ ओ घोड़सारक नोकरबे लेने रहए। से नै तँ ओकरा भेलै जे हम तँ काल्हि‍ चोरीमे पकड़ाइए जाएब। तइ खातीर ओ अपन लाठीकेँ ऊपरसँ एक हाथ नापि‍ कऽ काटि‍ देलक। परात भेने पुन: दरबार लगल। सभ अपन-अपन लाठी लऽ दरबारमे पहुँचल। सबहक लाठी भजारल गेल। घोड़सारक नोकरक लाठी आन सभ लाठीसँ एक हाथ छोट छल। ऐ तरहेँ ओकर चाेरि‍ पकड़ा गेलै। राजा ओकरा आर्थिक जुरबानाक सङ छह मासक जहलक सजा दऽ देलखि‍न। एे तरहेँ राजकुमारीक हार भेट गेलै। राजा आ प्रजा सभ खुश। राजा खुश भऽ कऽ मंत्रीकेँ इनाम देलखि‍न। राजाक सङ रानी आ राजकुमारी खुश। सङे सभ सभासद् सेहो। से बुझि‍लीही रौ भुटबा जे कोन तरहेँ मंत्री चोरकेँ पकड़लक? एकरे कहै छै बुधि‍!” भुटबा छल चूप। कि‍एक तँ ओ खि‍स्‍सा सुनैत-सुनैत ओङहा गेल छल। छुतहरि सि‍मराक शि‍वनन्‍दन बाबूक दोसर बालक राजाबाबू, नाओंक अनुरूप राजकुमारे सन लगै छल। बेस पाँच हाथ नमहर, गोर-नार, भरल-पूरल देह, पहि‍रन-ओढ़न सेहो राजकुमारे सन। वि‍धाताक कृपासँ हुनक पत्नी देखए-सुनएमे सुन्‍दरि‍। मध्‍यम वर्गीए परि‍वारमे जनम। नैहर सेहो भरल- पूरल। राजाबाबूक बि‍आह नीक घरमे भेल। कोनो तरहक कमी नै। जेते जे बरि‍याती गेल रहथि‍, सभ कि‍यो खान-पानसँ प्रसन्न रहथि‍। बड़-बढ़ि‍याँ घर-परि‍वार छल। राजाबाबू बि‍आहक पछाति‍ओ अध्‍ययन जाड़ीए रखलनि‍। नीक-नहाँति‍ पढ़ैले पटनामे नाओं लि‍खा डेरा रखलनि‍। छुट्टी भेलापर गामो चलि‍ अबै छला। गाड़ी-सवारी भेने गाम आबए-जाएब कठीन नै छल। अहीक्रममे राजाबाबूकेँ पहि‍ल सन्‍तानक रूपमे एकटा बालक- अनील आ एकटा कन्‍या सुधाक जनम भेल। माए-बापक अनुरूप दुनू बच्‍चो तेतबए सुन्‍दर छल। क्रमश: दुनू बच्‍चाक टेल्हुक भेलापर ज्ञानोदय झंझारपुरमे नाओं लि‍खा देलखि‍न। बच्‍चा सभ ओतै रहि‍ पढ़ए-ि‍लखए लगल। एमहर पटनामे रहैत राजाबाबूक संगति‍ खराप हुअ लगलनि‍। जइसँ ओ दोस्‍ती-यारीमे पीबए लगला। एक दि‍नक गप छी, गाम एलाक बाद अधरति‍यामे जोरसँ हल्‍ला भेल जे राजाबाबू पेटक दर्दे चि‍चि‍या रहल छथि‍। राति‍क मौसम देखि‍ गामक डाक्‍टर बजौल गेला। सुइया-दवाइ दऽ आगू बढ़ैक सलाह देलखि‍न। बि‍मारी उपकले रहनि‍। पत्नी वि‍शेष जतनसँ पथ-परहेजसँ राखि‍ दुइए मासमे दुखकेँ कन्‍ट्रोल कऽ लेलनि‍। एमहर राजाबाबूक मन ठीक होइते फेर जि‍द्द कऽ पटना चलि‍ गेला। परि‍कल जीह केतौ मानल जाए, पुन: वएह रामा-कठोला। गाम आबथि‍ आ भैया जे पाइ दन्‍हि‍ आकि‍ नै दन्‍हि‍ तँ पत्नीएक गहना-जेबर बन्हकी लगा-लगा पीबए लगला। कहबीओ छै चालि‍-प्रकृत-बेमए ई तीनू संगे जाए। छओ मास ने तँ बि‍तलै आकि‍ वएह पुरने दुख राजाबाबूकेँ उखड़लनि‍। मुदा ऐबेरक दर्द बड़ तीव्र छल। सुतली राति‍मे राजाबाबू अपना बि‍छौनपर छटपटए लगला। पेट पकड़ने जोड़-जोड़सँ चि‍चि‍यए लगला। नि‍सि‍भाग राति‍ रहने हो-हल्‍ला सुनि‍ लोक सभ जागल। लोकक लेल अँगनामे करमान लगि‍ गेल। दर्दक मारे राजाबाबू पलंगपर छटपटा रहल छला। एकबेर बड़ी जोड़सँ दर्दक बेग एलै आ राजाबाबू खूनक उन्‍टी करैत सदा-सदाक लेल शान्‍त भऽ गेला। अँगनामे कन्ना-रोहट उठि‍ गेल। टोल भरि‍क लोक सभ जागि‍ गेल। मुदा राजाबाबू तँ सभसँ रि‍स्‍ता–नाता तोड़ि‍ परमधाम चलि‍ गेल छला। परात भेने बि‍ना बजौने सभ आदमी मि‍लि‍ बाँस काटि‍, तौला-कराही, सरर-धूमन आ गोइठापर आगि‍ दऽ राजाबाबूक पहि‍ल सन्‍तान अनील हाथमे दऽ अपने आमक गाछीमे राजाबाबूकेँ डाहि‍-जारि‍ सभ कि‍यो घर घुमला। कौल्हुका राजाबाबू आइ अपन महलकेँ सुन्न कऽ पत्नीकेँ कोइली जकाँ कुहकैले छोड़ि‍ चलि‍ गेला। पत्नीक वएस मात्र पचीसेक आस-पास, सन्‍तानो तँ मात्र दुइएटा। मुदा अपन कर्मक अनुसार आइ कोइली बनि‍ कुहैक रहल छथि‍। काल्हि‍ तक जे सोल्हो सिंगार आ बत्तीसो आवरण केने साक्षात् राधाक प्रति‍मूर्ति मेनका आ उर्वशी सुन्नरि‍ छेली ओ आइ उज्जर दप-दप साड़ी पहि‍रि कुहैक रहल छलि‍। केतए गेलनि‍ भरि‍ हाथ चुड़ी, केतए गेलनि‍ भरि‍ माङ सेनुर...। सभटा धूआ-पोछा गेल। केकरो साहसे ने होइ जे सामने जा बोल-भरोस हुनका दैत। समुच्‍चा टोल सुनसान-डेरौन लगैत। तही बीच छह मास धरि‍ ओकर कुहकब केकरा हृदैकेँ ने बेधि‍ दैत। केना ने बेधि‍ दैत! आखि‍र वेचारीक वएसे की भेलै। मुदा छओ मास तँ भेले ने रहै आकि‍ ओ घरसँ बाहर, आँगनसँ डेढ़ीआ आ डेढ़ीआसँ टोला-पड़ोसामे डेग बढ़बए लगली। जे कहि‍यो हुनक पएरो ने देखने रहनि‍ ओ आब मुहोँ देखि‍ रहल अछि‍। हुनक हेल-मेल सभसँ पढ़ल जा रहल छन्‍हि‍। आब तँ ओ अपना घरमे कम आनका आँगनमे बेसी समए बि‍तबए लगली। सासु-ि‍दयादि‍नीक गपकेँ छोड़ि‍ अनकर गपपर बेसी धि‍यान दि‍अ लगली। नीक आ अधला तँ सभ समाजमे ने लोक रहै छै। से आब कि‍छु लोक हुनका गुरु मन्‍तर दि‍अ लगलखि‍न। आ ओहो नीक जकाँ धि‍यान-बात दि‍अ लगली। जहि‍ना कहबी छै जे खेत बि‍गड़ि‍‍ गेल खढ़ बथुआ सन ति‍रि‍या बि‍गड़ए जँ जाइ हाट-बजार...। जे काल्हि‍ तक ओकर उकासीओ ने कि‍यो सुनने छल से आइ तँ ओ उड़ाँत भऽ गेलि‍। बि‍ना कोनो धड़ी-धोखाक गामक मुखि‍या-सरपंचक संग हँसि‍-हँसि‍ बजै-भुकए लगली। गामक राजनीति‍मे हाथ बँटबए लगल। गामक उचक्का छौड़ा सभ संगे हाट-बजार करए लगल। एतबे नै, ओ अपन जीवन-यापनक बहाना बना ब्‍यूटीपार्लर सेहो जाए लगली। सत्संगे गुणा दोषा रंगीन दुनि‍याँ आ वातावरणक प्रभाव ओकरापर पड़ल लगल। ओकर अपन वैधव्‍य जि‍नगी पहाड़ सन लागए लगलै। आब ओ चाहए जे ई उजरा धूआ-साड़ीकेँ फेकि‍ रंगीन दुनि‍याँमे चलि‍ आबी। ओ रसे रसे-रसे उजड़ा साड़ी छोड़ि‍ हल्का छि‍टबला साड़ी पहि‍रए लगल। मन जे एते एकरंगाह रहै से आब सभरंगाह हुअ लगलै। रूप-गुण लछन-करम सभ बुझू जे बदलए लगल। आब ओकर मौलाएल गाछक फूल खि‍लए लगल। एक दि‍न मुखि‍याकेँ कहि‍-सुनि‍ इन्‍दि‍रा अवास स्‍वीकृति‍ करौलक आ बि‍च्‍चे आँगनमे घर बना लेलक। आब जे कि‍यो छौड़ा-माड़रि‍ भेँट-घाँट करए आबए तँ ओ ओही घरमे बैसा चाह-पान करए लगल। चाहो-पान होइ आ हँसी चौल सेहो। एते दि‍न जेकरा भाफो नै नि‍कलै तेकर आब हँसीक ठहाका दरबज्‍जोपर लोक सुनए लगल। गामक आ टोलक बि‍स्‍कुटी लोकक चक्कर-चाि‍लमे पड़ि‍ ओ भैंसुरसँ अरारि‍ कऽ अपन हक-हि‍स्‍सा लेल लड़ए लगली। लड़ि‍-झगड़ि‍ सर-समाजकेँ बैसा पर-पंचायत कऽ ओ बाध-बोनसँ लऽ चर-चाँचर, वाड़ी-झारी एतबे नै डीह तक बाँटबा लेलक। आब तँ कहबी परि‍ भऽ गेल जे अपने मनक मौजी आ बहुकेँ कहलक भौजी। जखनि‍ जे मन फुड़ै तखनि‍ सएह करए। कि‍यो हाँट-दबार करैबला नै। कारणो छेलै, जँ कि‍यो कि‍छु कहैक साहसो करए तँ अपन इज्‍जत अपने गमा बैसए। आब तँ ओ चर्चेआम भऽ गेलि‍। अही बीच ओ एकटा छौड़ाक संग बम्‍बै पड़ा गेल। आहि‍ रे बा! परात होइते घोल-फच्‍चका शुरू भेल ‘कनि‍याँ केतए गेली केतए गेेली’ आकि‍ दू दि‍नक बाद मोबाइल आएल जे ओ तँ बम्‍बैमे अछि‍ फलल्‍मा छौड़ाक संग। ओना गामोसँ मोबाइल कएल गेल जे कनि‍याँ गाम घूमि‍ आबथि‍। मुदा ओ तँ अपने सखमे आन्‍हर। कि‍छु दि‍नक बाद जेना-तेना पकड़ि‍-धकड़ि‍ ओइ छौड़ाक संग गाम आनल गेल। मुदा ओ तखनो सबहक आँखि‍मे गर्दा झोंकि‍ कोट मैरेज कऽ लेलक तेकर बादे गाम आएल। एतेक भेला बादो गामक समाज बजौल गेला। सभ तरहेँ सभ कि‍यो समझबैक परि‍यास केलनि‍। मनबोध बाबा जे गामक मुँहपुरुख छथि‍ ओ ओकरा बुझबैत कहलखि‍न- “सुनू कनि‍याँ, अखनो कि‍छु ने बि‍गड़लै हेन, आबो ओइ छौड़ाक संग-साथ छोड़ि‍ गंगा असलान कऽ समाजक पएर पकड़ि‍ लि‍औ। जे भेलै से भेलै। सभ अहाँकेँ जाति‍मे मि‍ला लेत। जाति‍ नाम गंगा होइ छै।” मुदा मनबोध बाबाक बातक कोनो असरि‍ ओकरापर नै पड़लै। ओइ छौड़ाक संग-साथ छौड़ैले तैयार नै भेल। अन्‍तमे गौआँ-घरूआक संग मनबोध बाबा ओकरा जाति‍सँ बाड़ि‍ आँगनासँ ई कहैत‍- “एकरा आँगनमे राखब उचि‍त नै ई कनि‍याँ कनि‍याँ नै छुतहरि‍ छी छुतहरि‍...।” हम ओत्तै ठाढ़ भेल कि‍छु ने बाजि‍ सकलौं, कि‍छु ने कऽ सकलौं। की नीक की अधला से तखनि‍ नै बूझि‍ पेलौं जे आइ बूझि‍ रहल छी अखनो समाजकेँ समाढ़ गहि‍आ कऽ पकड़ने अछि‍। राजदेव मण्‍डल- मुसहरनियाँ, पोस्ट- रतनसारा (निर्मली), जिला- मधुबनी। रूसल बौआ (बाल विहनि आ लघु कथा पर केन्द्रित "कथा बौद्ध सि‍द्ध मेहथपा" -८२म सगर राति दीप जरय- गोष्ठीमे पठि‍त) दुर्गापूजाक मेला शुरू भऽ गेल छै। अष्टमी बीत गेलै, आबो नै हेतै मेला। मेलामे तँ होइते छै, खुशी, उत्साह, मनोरथ, मिलन। घर-घर बनि रहल छै मेवा-मिष्टान, तरुआ-भुजुआ आर कते चीज-बोस। रंग-बिरंगक नुआ-बस्तर पहिरने धीया-पुताक मुँहपर खुशी नाचि रहल अछि। सभ मेला देखबाक लेल तैयार भऽ रहल अछि। फेकन हड़बड़ाइत अंगना आएल आ पत्नीसँ पुछलक- “बेचू बौआ कहाँ अछि? खेलक आकि भुखले अछि?” पत्नीक मोनमे तामस औनाइते छलै। एकबेर तामससँ भरल आँखिए ताकलक आ बजल किछो नै। ओकरा दिश बिनु देखनहि फेकन फेर बजल- “एकोटा रुपैया तँ घरमे छलै नै। सोचलौं- छौड़ा मेला देखैले जाए लगितै तँ मांगबे करतै। एक गोड़ेसँ हथपैंच लेलौं। आ बौआकेँ देखबे नै करै छी। कते गेल अछि?” “जेतै कते, कानै छलै। दुआरिपर रुसल बैसल छै।” “की भेलै से?” “हेतै की, लवका पेण्ट-शर्ट लेतै।“ “ओह, अखनी तँ पैसाक बड्ड अभाव छै। ओकरा समझा-बुझा दैतिऐ से नै।“ “अहाँक धीया-पुताकेँ के समझाइत। कहै छलै जे अमितकेँ लवका पेण्ट-शर्ट ओकर बाबू आनि देलकै। ओ भोरेसँ देखा-देखा कऽ हमरा बुड़बक बनबैत अछि। औंठा देखा कऽ इहू-इहू कहैत अछि।“ “अहाँकेँ कहबाक चाही ने जे अमितक बाप धीरेन्द्र बाबू बड़का लोक छथि। पलिबारमे सरकारी नौकरीयो छै। जमीनो हमरासँ बहुत बेशी छै। हुनकर बराबड़ि हम केना करबै?” “से गप्प हम कहलिऐ। रौ बौआ, अमित बड़का लोक छिऐ। उनटे तमसाकेँ बजल- अमितवा कद-काठीमे हमरासँ छोट अछि। परीक्षामे हमरासँ कम नम्बर लाबैत अछि। खेलो-कूदमे हमरासँ हारले रहैत अछि। ऊ हमरासँ नम्हर केना भेलै।– आब अहीं कहू जे केना बुझेबै? की कहबै?” बझल कंठे फेकन बजल- “आ हमहीं की करबै? एक साल रौदी तँ एक साल दाही। जी-जान लगा कऽ काज करै छी, तइयो उपजा ओतने होइत अछि। देह रोगाएल रहैत अछि। बाहरो कमेबाक लेल केना जाएब। हमरा सन छोट गिरहतकेँ देखनिहार कियो नै। अहाँ तँ देखबे करै छी। घरक खर्चा नै जुमैत अछि, तइयो धीया-पुताकेँ पढ़बै छी।” पत्नीक सुरमे तामस भरल छल- “हमर सऽख-सेहन्ता तँ डहि-जरि गेल। आब धीयो-पुतोक वएह गति भऽ रहल अछि। अहाँ कोनो करमक लोक नै छी। अहाँ बुत्ते नै किछो भेल आ नै हएत।” अहाँ कोनो करमक लोक नै छी, ई वाक्य जेना फेकनक कलेजामे बरछी बनि गड़ि गेलै। तन-मनसँ समर्पित भावे काज केनिहारकेँ जँ फलक रूपमे दुत्कार भेटै तँ एकर प्रतिकार की? फेकनक मोन औना रहल छै। बेवश, लचार। ओकरा आँखिसँ भरभरा कऽ लोर खसि पड़लै। आसमे जेना आगि लागि गेल होइ। ओकर बेचू बेटा अढ़मे ठाढ़ भऽ कऽ सब किछो सुनै छलै। बापकेँ कानैत देखि नै रहल गेलै तँ लगमे जा कऽ बाजल- “बाबू अहाँ नै कानू। कोनो कि अंगे-पेण्टसँ लोक मेला देखै छै। ऊ लवका पेण्ट-शर्ट देखा कऽ हमरा बुड़बक बनबै छै। हम परीक्षामे ओकरासँ बेसी नम्बर लाबि कऽ ओकरा बुड़बक बनेबै।” सपना सन….। क्षण भरिक लेल जेना नम्हर-छोट, ऊँच-नीच एके रंग बुझेलै। फेकन बेटाकेँ भरि पाँज पकड़ि लेलक। बाप-बेटा मिलैत देखि पत्नी मुस्की मारलक जे बाप-बेटा दुनूक लेल प्रश्न बनि ठाढ़ भऽ गेल। दोख केकर इजोरि‍या रहै मुदा मेघक कारणे कनी अन्‍हार सन लगै छेलै। नि‍शि‍भाग राति‍। सभ सूतल। कि‍न्‍तु दि‍नेश दुनू परानीकेँ नि‍न्ने ने होइ। जेना नि‍न्ने रूसि‍ रहल। नै रहल गेलै तँ पत्नीकेँ कहलकै- “केतेकाल भूखल रहब? उठू खा लि‍अ।” पत्नी चुप्‍पे करोट फेड़ि‍ लेलक। पति‍ बाँहि‍ पकड़ि‍ हि‍लबैत पुछलकै- “की भेल? बजबै तब ने बुझबै।” “बूझि‍ कऽ की करबै? अहाँ बुते कि‍छो ने हएत। अहाँ तँ उनटे...।” “बुझबै तब ने। हमर दोख हेतै तँ हमरे दण्‍ड देब।” “कोनो बुझने नै छि‍ऐ। दोख अहाँ माएकेँ रहै आ गारि‍-बात हमरा देलौं। अहाँ हमरा बजा नै सकै छी।” पति‍- “तँ कहू जे रूसलासँ दि‍न-गुजर चलतै?” तमसाइत पत्नी बाजलि‍- “केतबो गल्‍ती अहाँक माए करै छै, तँ अहाँ एकोबेर बजै छि‍ऐ आ हमरापर डाँग लऽ कऽ हुड़कै छी। कहै छी, हमरा बजाउ नै। हम अहि‍ना भूखले मरि‍ जाएब।” समझाबैत पति‍ बाजल- “अच्‍छा एकटा खि‍स्‍सा सुनि‍ लि‍अ। फेर नै बजब। सुनि‍यौ। ई कथा चौबीस-पचीस बरख पहुलका छी। एकटा औरतक कथा। सुखक लीलशामे दुखक कथा। ओ बड्ड सुन्दर आ सुशील रहए। तँए शुरूमे पति‍क आँखि‍मे ओकरा लेल परेम भरल रहै। मुदा एक-आधटा एहेन घटना घटले जे ओइ औरतकेँ ससुर आ पति‍ दुनू दुख दि‍अ लगलै। ससुरकेँ मोनमाफि‍त दहेजो नै भेटल रहै आर बहुतो कारणेँ तमसाएल रहै छेलै। ओइपर सँ ओहने समए आ अवसर सेहो भेट गेल रहै। एहेन समैमे केतबो डाँट-डपट करतै तँ उनटा कऽ जवाबो केना देत। दू बेरसँ पँचमसु चि‍ल्‍का नोकसान भऽ जाइ छेलै। पाँचम मास चढ़ि‍ते दरद करै आ गरभपात भऽ जाइ। तँए ओकरा पति‍ओकेँ हरि‍दम नाकेपर तामस रहै। जे सभ सोचने रहए ओ सभ पूरा नै होइत देखि‍ मोन हरि‍दम बि‍धुआएले रहै छेलै। देखैत सपना टूटि‍ गेलासँ कठ तँ हेबे करै छै। ...सासु नै रहै। औरति‍या केकरा कहि‍तै। आ के ओकर दुख बाँटि‍तै। जेमहरे जाए तेमहरे डाँट-डपट आ ठोकर। कि‍यो अपन नै, सभ आन। काज-उदेममे लगल समए कटबाक परि‍यास करए आ असगरमे बैसि‍ भरि‍ मन कानि‍ मनकेँ हल्‍लुक करए। समए बि‍तैत रहै छै। बि‍तैत रहल।” अहूबेर ओरति‍या तीन महि‍नासँ गरभवती रहए। कानसँ स्‍वर टकरा जाइ- “फेर ओहि‍ना हेतै। ऐबेर भगा बेटाकेँ चुमौन करा देबै।” फेर दोसर काने पति‍क स्‍वर सुनै- “कोन-कोन डागदर-बैद आ ओझहा-गुणीसँ देखेलौं। कोनो फेदा नै। हेतै केतएसँ? पपि‍याही अछि‍ ई।” भातक दुख नै बातक दुख। जेना सान्‍हि‍ मरै। कलेजामे भूर करै। मोन आ शरीर दुनू संगी। एककेँ दुखि‍त भेने दोसर केना ठीक रहि‍ सकत। औरत बि‍मार रहए लगल। माए-बापकेँ पता लगलै। समाद गेलै आ एलै। ओ नैहर आबि‍ गेल। जेना बैशखा रौदमे गाछतर। नैहराक छाँह। सभ गप्‍प सुनि‍-बूझि‍ माए-बाप उपचारमे लगि‍ गेलै। की-की नै केलक। केतए-केतए ने गेल। अही क्रममे एकटा साधु बाबा उपदेश देलखि‍न- “एकरा छह महि‍ना वोनबास करबए पड़तौ।” “औरत तँ अहुना बोनवासेमे रहैत अछि‍। फेर कोन वोनबास?” “घर-अँगनासँ अलग। राति‍ओमे नै आबि‍ सकैत अछि‍। अपने हाथसँ बनौल खाएत-पीअत। आर सभ गप्‍प बुझए पड़तौ।” माए-बापकेँ मोन उड़ल रहै। सन्‍तानक सुखक लीलशा। वोनबास शुरू भऽ गेल। घर-अँगनासँ अलग। आमक गाछीमे। बास करए लगल। टोलक लगेमे रहै मुदा गप्‍प तँ केकरोसँ नै कऽ सकैत अछि‍। इशारासँ काम चलाउ। आन लोक हटले रहै। दि‍न तँ कटि‍ जाइ मुदा राति‍ पहाड़। कुशक ओछाइनपर गुदरी बि‍छौना। माटि‍एपर खाना आ माटि‍एपर सोना। मूजक डोरासँ डाँड़मे जखम भऽ गेलै। जाड़ा-गरमी-बरखा। अन्‍हरि‍या राति‍। साँप-कीड़ा, बि‍लाय-कुत्ता नढ़ि‍या-खि‍खि‍र। एकान्‍त बास। भरि‍ दि‍न तँ जे कि‍छु मुदा राति‍मे माएकेँ नै रहल जाइ। बारहो बजे राति‍मे आबि‍ बनवासी बेटीकेँ भरि‍ पाँज पकड़ि‍ सुति‍ रहए। नि‍न्न टुटि‍ते ओइठामसँ चलि‍ आबए। जे फेर कोनो दोख ने भऽ जाए। आ आबैबला संतानपर कोनो वि‍पति‍ ने पड़ि‍ जाए। केहनो कठि‍न समए रहै छै। कटि‍ तँ जेबे करै छै। लोको कोनो कम लगराह होइ छै। वोनबासक समए बीतल। गरभकाल पूरा भेलापर औरति‍याकेँ बेटा जनमलै। फेरसँ ओकर सुखक दि‍न घुरि‍ एलै। सभ दिससँ सि‍नेहक बरखा हुअ लगलै।” कि‍छुकाल  चुप रहला पछाति‍ दि‍नेश अपना पत्नीकेँ पुछलकै- “आब कहू जे ओइ माएकेँ जँ बेटा गारि‍-बात देतै तँ ओकर की दशा हेतै?” पत्नी गुम्‍मी साधने। कि‍छो बजले ने जाइ। फेर दि‍नेशे बाजल- “ओ औरत हमर माए छि‍ऐ आ ओ बेटा हमहीं छि‍ऐ।” दुनू परानी चुप। राति‍क चि‍ड़ै केतौ-केतौ बजै छेलै। आर सभ कि‍छु नि‍शब्‍द भेल। दुनू परानीक बीचसँ शब्‍द हेरा गेल छेलै। कि‍न्‍तु  हाथ-पएरक क्रि‍यासँ गप्‍प शुरू भऽ गेल छेलै। साँस-प्रश्‍वाँस गवाही दइ छेलै। मुस्‍कीकेँ अन्‍हार झँपने छेलै। आ दुनू परानीक बीच दोख बि‍ला गेल छेलै। जाल (पटकथा) दू शब्‍द- मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे पटकथाक अभावकेँ देखैत ऐ वि‍षयमे अज्ञ रहि‍तो, एकटा लघु परि‍यास केलौं। सफल भेलौं आकि‍ असफल, निर्णए तँ समाजे करता। -राजदेव मण्‍डल, मुसहरनि‍याँ, पोस्‍ट- रतनसारा, भाया- नि‍र्मली, जि‍ला- मधुबनी। बिहार- ८४७४५२ शि‍क्षा : एम.ए. द्वय (मैथि‍ली, हि‍न्‍दी, एल.एल.बी) पात्र परि‍चए- जाल (पटकथा) १. वि‍क्रम- नायक २. बरसा- नायि‍का ३. श्‍यामबाबू- बरसाक पि‍ता ४. मनदेव- बरसाक मामा ५. रखि‍या- बरसाक मामी ६. हरि‍या- खलनायक ७. सुइदचन- खलनायकक पि‍ता ८. मुंशी- सुइदचनक मुंशी ९. चनकी- हरि‍याक प्रेमि‍का १०. फुलि‍या- चनकीक माए ११. डोलना- चनकीक पि‍ता १२. भकोलबा- चनकीक भाए १३. वि‍क्रमक माए- नायकक माए १४. रघुआ- वि‍क्रमक संगी १५. टहलू- गामक एक बेकती (दोकनदार, सि‍पाहीक दल, हरि‍याक संगी बदमाश तथा कि‍छु ग्रामीण आ पंचगण।) पहि‍ल दृश्‍य- समए- भोर। स्‍थान- नदीक कि‍नार। नदीक आस-पड़ोसक दृश्‍य उभड़ैत अछि‍। सुरुज उगि‍ रहल अछि‍। कि‍नारपर गाम-घरक लोक, चारूभर पसरल हरि‍अरी, गाए, भैंस, बकरी सभ चरैत। गरदा आ थाल-कादोमे खेलाइत धि‍या-पुता। दूर-दूर धरि‍ देखाइत अछि‍। कट टू। धारमे नाह चलि‍ रहल अछि‍। जैपर चढ़ि‍ कऽ गामक लोक शहर जाइत अछि‍, जरूरी चीज-बौस कीनै आ बेचैले। धारक ऐ पार गाम आ ओइ पार देखा पड़ै अछि‍- कौलेज, स्‍कूल, रेलबे टीसन, चलैत आ ठाढ़ बस। केते गोटे नाहसँ उतरि‍ कऽ गाम दि‍स आबि‍ रहल अछि‍। नदी आ ओइठामक जि‍नगीसँ सम्‍बन्‍धि‍त गीत नवरि‍या गाबि‍ रहल अछि‍। कट टू। दोसर दृश्‍य- समए- भोर। नायक- वि‍क्रम, वि‍क्रमक माए। स्‍थान- वि‍क्रमक घरक बाहरी भाग। (घरक बाहर दुआरि‍पर गाए आ बरद बान्‍हल अछि‍। वि‍क्रमक माए गाए दूहि‍ रहल अछि‍। दूधसँ भरल बाल्‍टीन दुआरि‍क कोनपर रखैत अछि‍। आ बड़बड़ाइत अँगना दि‍स बढ़ैत अछि‍। वि‍क्रमक माए- वि‍क्रम अखनी तक सुतले छै शाइत। की करतै छौड़ा, परेशान रहै छै। पढ़नाइक संगे घरेाक काज करए पड़ै छै। (जोरसँ) हे रौ बौआऽऽऽ वि‍क्रम बेटाऽऽ, उठ जल्‍दी भोर भऽ गेलौ। कट टू। तेसर दृश्‍य- स्‍थान- वि‍क्रमक घरक भीतरी भाग। समए- दि‍न पात्र- वि‍क्रम (वि‍क्रम घरमे सूतल अछि‍। चौकीक बगलमे टेबुलपर पोथी आ काैपीक ढेरी अछि‍। ओइपर एकटा टेबुल घड़ीओ अछि‍। माएक स्‍वर सुनि‍ देहपर सँ चद्दरि‍ हटबैत अछि‍। अँगैठी करैत घड़ीपर नजरि‍ दैत अछि‍। घड़ी दिस देखि‍ते फुड़फुड़ा कऽ उठैत अछि‍।) वि‍क्रम- भोर भऽ गेलै। जुलुमक गप्‍प! आइ घड़ीओ नै बजलै। दूध कखनि‍ शहर पहुँचैबै? (जोरसँ) अबै छि‍यौ माएऽऽऽ। कटू टू। चारम दृश्‍य- स्‍थान- वि‍क्रमक दुआरि‍। समए- दि‍न। पात्र- वि‍क्रमक माए आ वि‍क्रम। वि‍क्रमक माए एकटा बड़का कनस्‍तरमे दूध भरि‍ रहल अछि‍। दूध भरि‍ कऽ आँगन दि‍स तकैत अछि‍। तखने वि‍क्रम शर्टक बटम लगबैत अँगनासँ नि‍कलैत अछि‍। दुआरि‍क कातसँ साइकि‍ल लाबि‍ ओइपर दूधक वर्तन लटकबैत अछि‍। आगू-पाछू देखैत, घंटी टुनटुनबैत आगू बढ़ैत अछि‍।) वि‍क्रमक माए- आइ दूधो कमे भेलौ। (साइकि‍लपर चढ़ि‍ चलि‍ पड़ैत अछि‍। ओकर माए पाछूसँ सोर पाड़ैत अछि‍।) ि‍वक्रमक माए- वि‍क्रमऽऽऽ। तूँ कि‍छो बि‍सरबो केलही? वि‍क्रम- नै...। कहाँ कि‍छो। वि‍क्रमक माए- मन पड़लौं? वि‍क्रम- हँ-हँ। ऊ वेकेन्‍सीबला फार्म पोस्‍ट ऑफि‍समे रजि‍ष्‍ट्री करबाक छै। मन नै परि‍तौ तँ डेटे बि‍त जइतै। (माए लेटर लाबि‍ कऽ दैत अछि‍ आ जेबीमे रखैत वि‍क्रमक साइकि‍ल चलि‍ पड़ैत अछि‍।) वि‍क्रमक माए- भुलक्कड़ भऽ गेलै। (रस्‍ता दि‍स तकि‍ते रहि‍ जाइत अछि‍।) कट टू। पाँचम दृश्‍य- स्‍थान- गामक एक भाग। समए- दि‍न। पात्र- रघुआ, वि‍क्रम। दुआरि‍क चबुतरापर रघु नहा रहल अछि‍। कपारपर पानि‍ ढरैत काल जोर-जोरसँ ‘राम-राम’क जाप कऽ रहल अछि‍। बगलसँ गुजरैत डगरपर साइकि‍लसँ वि‍क्रम जा रहल अछि‍। रघुआक नजरि‍ ओकरापर पड़ैत अछि‍। रघुआ- यौ दरोगा भाय। कनी सुस्‍ता लि‍अ। बस एक मि‍नि‍ट। हमहूँ अहींक संगे चलबै। तैयारे छी। बस धोतीक ढेका खाेंसए दि‍अ। वि‍क्रम- नै रघु काका। हमरा देरी भऽ गेल अछि‍। रघुआ- रौ भतीजबा। तुरत्तेमे दुनि‍याँ आछन भऽ जेतै। हे रौ ठाढ़ रह। हे हे ढेका खोसए दे। (वि‍क्रम साइकि‍ल आगू बढ़ा लैत अछि‍। पाछूसँ रघुआ डाँड़मे धोती लटपटबैत रहि‍ जाइत अछि‍।) कट टू। साइकि‍लक दुनू पहि‍या तेज गति‍सँ चलि‍ रहल अछि‍। ओहीपर चढ़ल आ जोर-जोरसँ नि‍साँस खि‍ंचैत वि‍क्रम देखा पड़ैत अछि‍। असगरेमे बड़बड़ाइत अछि‍। वि‍क्रम- बेदरामे चोर-सि‍पाहीक खेल खेलाइत काल-सि‍पाही बेसी हमरे बनए पड़ै छल। तहि‍एसँ सभ हमरा दरोगा कहए लगल। आब कहैत अछि‍ तँ तामस लहरैत अछि‍। करबै की? आब हमरा दरोगा बनैक उपए करए पड़तै। जे होइ ऐ परीछामे पूरा जोर लगबए पड़तै। (पाछू मुहेँ घुमि‍ कऽ तकैत अछि‍। रघुआ धोती सम्‍हारैत दौगल आबि‍ रहल अछि‍।) रघुआ- (हाथ उठा कऽ हल्‍ला करैत) रे भतीजबा, ठाढ़ रह। एतेक दूरसँ दौगल अबै छि‍यौ, आबो तँ चढ़ा कऽ नेने चल। (वि‍क्रम फेंर तेजीसँ साइकि‍ल आगू बढ़ा लैत अछि‍।) कट टू। छअम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- नदीक तट्क बाहरी भाग। पात्र- बरसा (नायि‍का) नदीक काते-कात घास-फूसक बीचमे बाट देखा पड़ैत अछि‍। ओइ बाटपर हाथमे पोथी नेने बरसा तेजीसँ आबि‍ रहल अछि‍। कट टू। नदीक कछेरमे नाह ठाढ़ भेल देखा पड़ैत अछि‍। लोक सभ नाहपर चढ़ि‍ रहल अछि‍, कि‍छु गोटे चढ़ेक प्रयासमे अछि‍। कट टू। देखा पड़ैत अछि‍- एक तरफ तेजीसँ साइकि‍लपर चढ़ल वि‍क्रम आबि‍ रहल अछि‍ आ दोसर दि‍ससँ बरसा दौगैत आबि‍ रहल अछि‍। कट टू। (नाह खुगैले तैयार अछि‍। तखैने बरसा पहुँच जाइत अछि‍। कैएक स्‍त्री-पुरुख एके संग कहैत अछि‍।) स्‍त्री-पुरुख- हौ नवरि‍या, कनी रूकि‍ जाहक। स्‍त्री- हाथ बढ़ाउ दाय। खैंच कऽ चढ़ा लइ छी। बरसा- कोनो बात नै हम अपने चढ़ि‍ जाएब। (कहैत नाहपर चढ़ि‍ जाइत अछि‍।) (तखैने वि‍क्रम साइकि‍लक घंटी बजबैत आ हल्‍ला करैत नाह लग पहुँच जाइत अछि‍। साइकि‍लक ब्रेक लगबैत फानि‍ कऽ उतरैत अछि‍।) वि‍क्रम- हे रौ भाय। हमरो चढ़ा ले। आइ अहुना हमरा लेट भऽ गेल छौ। (साइकि‍लकेँ नाहपर लादैत अछि‍। आ चढ़ि‍ जाइत अछि‍। नाह खुगि‍ जाइत अछि‍।) कट टू। (देखा पड़ैत अछि‍ जे वि‍क्रमकेँ पएरसँ बरसाक पएर चि‍पा रहल अछि‍। बरसा पएर खि‍ंचैक कोशि‍श कऽ रहल अछि‍। ताबे वि‍क्रमक नजरि नि‍च्‍चाँ पड़ैत अछि‍। ओ चट दनि‍ अपन पएर हटा लैत अछि‍।) वि‍क्रम- ओह...। हड़बड़ीमे पएर पड़ि‍ गेल। चि‍पा गेल की? धकम-धुक्कीमे एना भऽ जाइ छै। (बरसा कि‍छो नै बजैत अछि‍।) बरसा- (टाँग दि‍स तकैत) एँह...। (वि‍क्रम ओकरा दि‍स देखैत अछि‍। बरसा नजरि‍ झुका लैत अछि‍। वि‍क्रम टकटकी लगा कऽ ओकरा दि‍स देखते रहि‍ जाइत अछि‍।) (फ्लैश बैक- दुनू सपनामे प्रेम गीत गाबि‍ रहल अछि‍।) (फ्लैश बैक समाप्‍त) (वि‍क्रम बरसाक हाथ पकड़ने ठाढ़ अछि‍।) बरसा- (तामसमे) हाथ छोड़ू। दि‍माग ठीक अछि‍ की नै। वि‍क्रम- गल्‍ती भऽ गेल। हे हम जानि‍ कऽ एना नै केलौं। लेकि‍न अहाँ बड्ड तमसाह छी। (बरसा तामसमे ओकरा दि‍स आँखि‍ गुड़ारि‍ कऽ देखैत अछि‍। लोक सभ हल्‍ला-गुल्‍ल करैत नाहसँ उतरि‍ रहल अछि‍। वि‍क्रम ओकरा क्रोधसँ बँचबाक लेल आसमान दि‍स ताकए लगैत अछि‍।) वि‍क्रम- समए केते सुन्‍दर छै। ई बादलक टुकड़ी सभ केते रेशमे दौगल जा रहल छै। लगै छै केकरोसँ भेँट करबाक लेल हड़बड़ीमे हुअए। कट टू। (नाहसँ सभ उतरि‍ गेल छै। लोक सभ दू-चारि‍ डेग आगू बढ़ि‍ गेल छै। असगरे वि‍क्रम नाहपर अछि‍।) नवरि‍या- हे यौ भाय। आसमानक तारा गि‍नै छी की? यौ अखनि‍ दि‍न छै राति‍ नै। झट दऽ नाहसँ उतरू। अखनि‍ तारा नै भेटत। वि‍क्रम- हँ...। हैया उतरै छी। लोको केते हड़बड़ीमे छै। (चट दऽ साइकि‍ल उतारि‍ आगू बढ़ैत अछि‍।) कट टू। सातम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- छोटका शहर। (मि‍ष्‍टान आ चाहक दोकान) (दोकनदार एकटा बड़का कराहमे दूध ओंट रहल अछि‍। ओकरा बगलमे टेबुल-बेंच लगल अछि‍। ओइपर बैस कऽ दूटा मोंछबला चूड़ा-दही सुड़ैक रहल अछि‍। तखैने वि‍क्रम सायकि‍लक घंटी टुनटुनबैत पहुँचैत अछि‍।) दोकदार- यौ वि‍क्रम भाय। हमरा तँ लगै छेलए जे आइ अहाँक दरशने नै हेतै। हे... हे... सम्‍हारि‍ कऽ। (वि‍क्रमक सायकि‍ल खलि‍या दूधक वर्तनसँ टकरा जाइत अछि‍।) यौ भाय, बसन्‍तीकेँ लगाम नै अछि‍ की? वि‍क्रम- यौ, हमरा बसन्‍तीकेँ नजरि‍ नै लगाउ। (सायकि‍लसँ हड़बड़ा कऽ वि‍क्रम उतरैत अछि‍। दूध नापि‍ कऽ कराहमे दैत अछि‍। मोंछबला तेजीसँ दही सुड़ैक रहल अछि‍।) आइ जँ दूध नै आनि‍तौं तँ चाहक दोकान केना चलैत? जँ दोसरासँ दूध लैतौं तँ हमर रोजगार मारल जाइत। दोकानदार- हँ से तँ ठीके। वि‍क्रम- खेत नै उपजैत अछि‍ तँ ई दूधक रोजगार पैदा केलौं। तहूमे अपने टाँगमे कुड़हैर मारि‍ लेब। (सायकि‍ल आगू बढ़बैत अछि‍।) कट टू। आठम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- पोस्‍ट आँफि‍स। (वि‍क्रम पोस्‍ट आँफि‍सक काउन्‍टरपर लेटर दऽ रहल अछि‍। आँफि‍सक कि‍रानी स्‍प्‍ीडपोस्‍टक मोहर लगा कऽ रसीद वि‍क्रमकेँ हाथमे दैत अछि‍।) कट टू। स्‍थान- पोस्‍ट ऑफि‍सक बाहरी भाग समए- दि‍न (एक दि‍ससँ लेटरवाँक्‍समे लेटर गि‍रा कऽ बरसा नि‍कलैत अछि‍। दोसर दि‍ससँ रसीदकेँ देखैत वि‍क्रम अबैत अछि‍। दुनू एक-दोसरासँ टकरा जाइत अछि‍। बरसाकेँ हाथसँ पुस्‍तक गि‍र पड़ैत अछि‍। वि‍क्रम पुस्‍तक उठेबैले झुकैत अछि‍। ओकरासँ पहि‍ने तमसाइत बरसा पुस्‍तक उठा कऽ चलि‍ जाइत अछि‍। वि‍क्रम- (ऊपर देखैत) हे भगवान एकरासँ रक्षा करू। कट टू। नअम दृश्‍य- समए- राति‍। स्‍थान- वि‍क्रमक घर। (घरमे लालटेनक मद्धि‍म इजोत। वि‍क्रम चद्दरि‍ ओढ़ने बारम्‍बार कर फेरि‍ रहल अछि‍। ओकरा सपनामे बारम्‍बार बरसा चलि‍ अबैत अछि‍। जइ कारणे ओकरा नि‍न्न नै होइत अछि‍। लालटेनक इजोतकेँ कम करैत अछि‍ आ चद्दरि‍ तानि‍ सुतैक परि‍यास करैत अछि‍।) कट टू। (फलैश बैक- बरसा आ वि‍क्रम सपनामे प्रेम-गीत गाबि‍ रहल अछि‍।) (फ्लैश बैक समाप्‍त।) कट टू। (मालक घर दि‍ससँ मवेशी खढ़क टाटमे धक्का मारि‍ रहल अछि‍। स्‍वर सुनि‍ वि‍क्रम चट दनि‍ उठैत अछि‍ आ लालटेनक इजोत बढ़बैत अछि‍। टाटक भूरसँ हुलकी मारैत अछि‍। खुगल बड़द देखा पड़ैत अछि‍। फेर लालटेनक इजोत कम करि‍ दैत अछि‍। अन्‍हार ससरि‍ कऽ लगमे चलि‍ अबैत अछि‍।) कट टू। दसम दृश्‍य- समए- भोर। स्‍थान- नदीक कि‍नार। (दूरमे मंदि‍र आ मस्‍जि‍द देखा पड़ैत अछि‍। मंदि‍रक घंटाक स्‍वर। मुर्गाक अबाज। गाए, बकरी, बड़द हाँकने जाइत लोक सभ। सायकि‍लपर चढ़ल वि‍क्रम जा रहल अछि‍।) कट टू। समए- दि‍न। स्‍थान- नदीक कि‍नार। (वि‍क्रम नदीक कि‍नारपर बैसल बरसाक प्रतीक्षा कऽ रहल अछि‍। नाह ऐपार-सँ-ओइपार अबैत अछि‍, जाइत अछि‍। कि‍न्‍तु बरसा नै अबैत अछि‍। मि‍लैले वि‍क्रम छटपटा रहल अछि‍।) डि‍जॉल्‍व। कट टू। एगारहम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- सुइदचनक घर। (सुइदचन आ ओकर मुंशी कुरसी-टेबुल लगा कऽ बैसल अछि‍। सुइदचन कि‍छु सोचि‍ रहल अछि‍, ओकरा बगलमे मुंशीजी बही-खाता उनटा-पुनटा रहल अछि‍।) मुंशी- मालि‍क! अहाँ श्‍याम बाबूकेँ कि‍ए नै कहै छि‍ऐ। ओकरापर तेतेक सुइद बढ़ि‍ गेलै जे सभटा खेत लि‍खि‍ देत तैयो नै सधतै। सुइदचन- हमहूँ तँ सहए सोचि‍ रहल छी। मुंशी- गामक धि‍या-पुताकेँ टीसन पढ़बै छै। एनए खेती नै उपजै छै। की हेतै। सुनै छी जे बेटीकेँ पढ़ा रहल छै। आमदनी अठन्नी आ खरचा रूपैआ। सुइदचन- बस नै वएह बेबस हेतै। हम नै तँ हमर बेटा बेबस कऽ देतै। करजा सधबैमे देरी हेतै तब ने खेत-पथार आ गहना-जेवर देइले बेबस हेतै। मुंशी- जँ अगि‍ला सालक फसल नीक हेतै तँ बेचि‍ कऽ चुकता कऽ देत। तब? सुइदचन- समैपर खाद-पानि‍ भेटबे नै करतै तँ उपजा नीक केना कऽ हेतै। हमर जाल केतेक दूर धरि‍ पसरल छै। अहाँ तँ बुझि‍ते छी। बैंको समैपर टका नै देतै। (दुनूकेँ आँखि‍ मि‍लैत अछि‍ आ दुनू हँसए लगैत अछि‍।) कट टू। बारहम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- नदीक कछेर। (वि‍क्रम ओतए प्रतीक्षा करैत रहैत अछि‍। जेतए बरसासँ मि‍लबाक संभावना रहैत अछि‍। ऐ क्रममे आइ सुनहट बाधमे ठाढ़ अछि‍। तखैने बरसाकेँ चि‍चि‍याइत सुनैत अछि‍। वि‍क्रम दौग कऽ ओतए पहुँचैत अछि‍ तँ देखैए जे तीन-चारि‍टा बदमाश बरसाकेँ घि‍सि‍यबैत नेने जा रहल अछि‍। बरसा ओकरा सभसँ छुटबाक परि‍यास कऽ रहल अछि‍। वि‍क्रम ओइ दृश्‍यकेँ देखि‍ते चि‍चि‍या लगैत अछि‍।) वि‍क्रम- हे रौ, ओकरा छोड़ि‍ देबही की देखबीही। बदमाश- ई केतएसँ आबि‍ गेलौ रौ। मार सारकेँ। (बदमाश आ वि‍क्रमक बीच झगड़ा शुरू भऽ जाइत अछि‍। हल्‍ला-गुल्‍ला सुनि‍ खेतमे काज करैत जन-मजूर सभ हँसुआ आ लाठी लऽ कऽ दौगैत अछि‍। लोकक संख्‍या देखि‍ कऽ बदमाश सभ भागि‍ जाइत अछि‍। वि‍क्रमक संगे बरसा घर दि‍स वि‍दा भऽ जाइत अछि‍।) कट टू। तेहरहम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- वि‍क्रमक घर। (डेढ़ि‍यापर ठाढ़ भऽ कऽ टहलू हल्‍ला करैत अछि‍।) टहलू- (चकोना होइत) केकरो नै देखै छि‍ऐ। अँगनामे कि‍यो छी कि‍ नै यौ? वि‍क्रमक माए- (अँगनासँ हुलकी दैत) टहलू बौआ छी। अँगना चलि‍ आउ। बहुत दि‍नक बाद देखलौं। टहलू- हँ, हम तँ टहलैते रहै छी। से आइ टहैलते काल बड्ड अजगुत देखलौं। वि‍क्रमक माए- की देखलि‍ऐ? टहलू- देखलौं, अहाँक बेटा गुण्‍डा–बदमाश सभसँ लड़ैत छल। सेहो एकटा लड़की लेल। वि‍क्रमक माए- (आश्चर्यसँ) आँए...! टहलू- झूठ छि‍ऐ की साँच। अपना बेटेसँ पूछि‍ लेबै। हम जाइ छी। (वि‍दा होइत अछि‍।) कट टू। पनरहम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- वि‍क्रमक घर। (वि‍क्रमक माए अँगना बहारि‍ रहल अछि‍। वि‍क्रम अँगना पहुँचि‍ते माएसँ कहैत अछि‍।) वि‍क्रम- आइ कनी बेसी देरी भऽ गेलौ माए। वि‍क्रमक माए- राह-बाटमे गुण्‍डा-अवारासँ झगड़ा करबीही तँ देरी लगतौ ने। खाइक लेल अन्नक जोगाड़ नै छौ। जि‍नगी केना सुधरतौ तइले सोचबें आकि‍ हीरो बनल घुमै छेँ। वि‍क्रम- हमरो गप्‍प सुनबीही तब ने माए। वि‍क्रमक माए- सुनबै की। उ सभ बड़का खुनि‍याँ छि‍ऐ। ओकरासँ झगड़बें तँ जि‍नगी बेरवाद कऽ देतौ। केते गोटेकेँ मारि‍ कऽ धारमे भँसा देने छै। वि‍क्रम- माए, तोहीं तँ कहने रही जे केकरोपर अति‍याचार होइत रहै तँ चुप नै रहबाक चाही। एकटा लड़कीकेँ संगे उ सभ जबरदस्‍ती करै छेलै तँ हम चुप भऽ कऽ देखैत रहि‍तौं। से तोरा नीक लगि‍तौ? (वि‍क्रमक माए सोचमे डुमि‍‍ जाइत अछि‍।) वि‍क्रमक माए- नीक तँ नै लगि‍तए। मुदा ओ सभ पैसाबला लोक छै। पुलि‍स आ कानून ओकरा मुट्ठीमे छै। ओकरासँ के लड़तै? वि‍क्रम- हम लड़बै माए हम। हम अपने बनबै पुलि‍सबला। सभकेँ सोझ कऽ देबै। रस्‍तापर लबैले चाहे जे करए पड़ए। कट टू। सोलहम दृश्‍य-– समए- दि‍न। स्‍थान- सुइदचनक घर। सुइदचन- मुंशीजी, सुनै छी, कि‍रपलबाक बेटा कहै छल जे हम करजा आपस नै करबै। मुंशी- उ कहै छै जे हमरापर बेसी सुइद जोड़ि‍ देने छी। सुइदचन- तेकर मतलब, हमरा बेइमान बनबए चाहै छै। मुंशी- एना करतै तँ देखा-देखी समाजक आनो लोक...। सुइदचन- केकरा समाजमे हि‍म्‍मत छै जे हमरासँ टकरा जाएत। हरि‍याकेँ कहि‍ दि‍यौ ि‍करपलबा बेटाकेँ चारि‍ सटका लगा देतै। ओकर लबरपनी बन्न भऽ जेतै। आ नै सुधरतै तँ राफ-साफ। (हाथसँ इशारा करैत अछि‍।) कट टू। सतरहम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- श्‍यामबाबूक घर। (बरसा चुप्‍पी साधने बैसल अछि‍। श्‍यामबाबू गहींर नजरि‍सँ बेटी दि‍स देखि‍ रहल अछि‍।) श्‍यामबाबू- बरसा, तोरा कि‍छो होइ छौ, आकि‍ कोइ कि‍छु कहलकौ?  (बरसा कि‍छु ने बजैत अछि‍।) श्‍यामबाबू- तोहर माए तँ बचपनेमे मरि‍ गेलौ। केकरा कहबीही। कि‍छु बात छै तँ हमरे कहए पड़तौ। (बरसाक आँखि‍सँ दहो-बहो नोर खसए लगैत अछि‍।) श्‍यामबाबू- की भेलौ तोरा? बजबीही तब ने। (बरसा आँखि‍ पोछैत अछि‍।) बरसा- पढ़ि‍ कऽ अबैकाल बाधमे गुण्‍डा–छौड़ा सभ घेर नेने छल। घि‍सि‍या कऽ नेने जाइत छल। खेतसँ जन सभ आ ओ दौगल, नै तँ...। (फेर कानए लगैत अछि‍।) श्‍यामबाबू- तब तँ केते गोटेक बुझने हेतै। चि‍न्‍हने हेतै। आइ हम ओकरा बापसँ भेँट करा देबै। (तमसा कऽ चलि‍ पड़ैत अछि‍।) बरसा- (पाछूसँ हल्‍ला करैत अछि‍।) बाबूजीऽऽऽ  कट टू। अठारहम दृश्‍य-– समए- दि‍न। स्‍थान- गामक डगर। (श्‍यामबाबू जा रहल अछि‍। आगूसँ अबैत सुइदचन ओकरा टोकै छै।) सुइदचन- यौ श्‍यामबाबू, उदास छी। की बात? कि‍छु भेल की? श्‍यामबाबू- की कहब। आ केना कहब? सुइदचन- हम तँ अहाँक हि‍त छी। हमरा लग नै बाजब तँ फेर...। श्‍यामबाबू- हमर बेटी पढ़ि‍ कऽ अबैत रहए से बाटमे...। (श्‍यामबाबू नजदीक आबि‍ कानमे सुइदचनकेँ सभटा गप कहैत अछि‍।) सुइदचन- ई गप दोसरठाम नै बजब। ऐसँ अहींक इज्‍जत उघार हएत। बुझलौं कि‍ने। श्‍यामबाबू- तब एकर नि‍दान केना हेतै? सुइदचन- धुर। तेकर चि‍न्‍ता नै करू। अइले तँ हमर बेटा हरि‍या काफी छै। फोनसँ सभ गप कहि‍ दइ छि‍ऐ। अहाँ जाउ। (सुइदचन फोनसँ गप करए लगैत अछि‍। श्‍यामबाबू चलि‍ पड़ैत अछि‍।) कट टू। उन्नैसम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- नदीक कि‍नार। (घोड़सवार तेजीसँ आबि‍ रहल अछि‍। ओकर फोनक घंटी बजैत अछि‍। एकाएक घोड़ा रोकैक परि‍यास करैत अछि‍। गति‍क कारणे घोड़ा नचैत अँइठ कऽ ठाढ़ भऽ जाइत अछि‍। फोनपर गप करैत-करैत ओ फ्लैश बैकमे चलि‍ जाइत अछि‍।) कट टू। दृश्‍य परि‍वर्तन फ्लैश बैक स्‍थान- सड़क समए दि‍न। (श्‍यामबाबू अपना बेटीक संगे शहरसँ आपस आबि‍ रहल अछि‍। बजारसँ कीनल वस्‍तु सभ हाथमे लटकौने अछि‍। आगूमे हरि‍याकेँ देखि‍ ठाढ़ होइत अछि‍। हरि‍यो ठाढ़ भऽ जाइत अछि‍।) श्‍यामबाबू- की यौ बौआ, अहाँक बाबूजी कुशल छथि‍ ने? हरि‍या- हँ-हँ ठीके छथि‍। (हरि‍याक नजरि‍ बरसापर पड़ैत अछि‍। बरसा नजरि‍ झुका कऽ आगू बढ़ि‍ जाइत अछि‍।) श्‍यामबाबू- अच्‍छा-अच्‍छा, परसू अबै छी तँ भेँट करबनि‍। (कहैत चलि‍ पड़ैत अछि‍।) कट टू। फ्लैश बैक समाप्‍त। दृश्‍य परि‍वर्तन। हरि‍या- चि‍न्‍ह गेलौं, वएह लड़की छी। (हरि‍या फोन जीबीमे रखैत अछि‍। सि‍रकेँ झटकैत अछि‍ आ तेजीसँ घोड़ाकेँ आगू बढ़ा दैत अछि‍।) कट टू। बीसम दृश्‍य- समए- राति‍। स्‍थान- निर्जन। (हरि‍या अपना संगी बदमाश लग पहुँचैत अछि‍। बदमाश सभ आपसमे फुसराहटि‍ करए लगैत अछि‍।) हरि‍या- हे रौ, तूँ सभ आइ कोनो लड़कीकेँ घेरने रही। (सभ चुप्‍पी साधि‍ लैत अछि‍।) बजै छी कि‍ए नै रौ। हमर तामस नै देखने छी। साँच बज नै तँ कान-कपार ढाहि‍ देबौ। बदमाश एक- हजूर, अहाँ तामसकेँ रोकू। अहाँ बि‍नु पुछने ई गलती भऽ गेल। हरि‍या- हँ-हँ बाज ने। की गलती? (बदमाश एक लगमे आबि‍ कानमे सभटा बात कहैत अछि‍।) बदमाश दू- हजूर, आगूक लेल आदेश ि‍दयौ। हरि‍या- ओइ लड़कीक संग दोबारा गलत बेवहार नै हेबाक चाही। ओ लड़की अपने जाति‍क अछि‍। ओकरा बापक संगे हमरा पि‍ताजीक पुरान सम्‍बन्‍ध छै। मुड़ी डोलबैत) हँ एकटा बातक पता लगा जे ओइ लड़कीक संगे लड़का के छेलै। (हरि‍या तेजीसँ प्रस्‍थान करैत अछि‍।) कट टू। एकैसम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- श्‍यामबाबूक घर। (श्‍यामबाबू अपना दुआरि‍पर बैसल छथि‍। हरि‍या पहुँचैत अछि‍।) श्‍यमाबाबू- आऊ बौआ, कहू महाजनक समाचार? ठीक छथि‍ ने? हरि‍या- हँ-हँ ठीके छथि‍। श्‍यामबाबू- बरसा बेटीऽऽऽ। बरसा- (भीतरसँ बजैत अछि‍।) हँ, बाबूजी। श्‍यामबाबू- चाह नेने अबि‍हेँ। हरि‍या- हमरा बाबूजी भेजने छथि‍। श्‍यामबाबू- हँ-हँ कहू की बात? हरि‍या- वएह, करजाक सम्‍बन्‍धमे। अहाँसँ भेँट करए चाहै छथि‍। श्‍यामबाबू- देखि‍यौ ने, धि‍या-पुता सभकेँ पढ़बै छी। ओहो सभ रूपैआ नै देने अछि‍। सभटा असूल कऽ नेने अबै छी। आ भेँटो हेतै। (श्‍यामबाबू आँगन दि‍स जाइ छथि‍ ताबत बरसा चाह नेने आबि‍ जाइत अछि‍।) हरि‍या- एकटक बरसा दि‍स ताकि‍ रहल अछि‍। बरसा नजरि‍ झुकौने चाह हरि‍या दि‍स बढ़बैत अछि‍। हरि‍या चाहक कप तेना कऽ पकड़ैत अछि‍ जे चाह हरा जाइत अछि‍। तखैने श्‍यामबाबू पुन: आपस आबि‍ जाइ छथि‍। बरसा तमसा कऽ आँगन चलि‍ जाइत अछि‍।) कट टू। बाइसम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- निर्जन बाट। (बरसा लोकक नजरि‍सँ नुकाइत जा रहल अछि‍। हरि‍याकेँ नजरि‍ ओकरापर चल जाइत अछि‍। कि‍न्‍तु बरसाकेँ ऐ बातक पता नै चलैत अछि‍। हरि‍या चोरा कऽ ओकरा पाछू-पाछू जा रहल अछि‍।) कट टू। दृश्‍य परि‍वर्तन- समए- साँझ। स्‍थान- बाध। (बरसाकेँ ओतए पहुँचि‍ते वि‍क्रम खेतसँ नि‍कलैत अछि‍।) वि‍क्रम- अहाँ, बहुत काल धरि‍ प्रति‍क्षा करबौलौं। बरसा- की करबै। लोक तँ तकि‍ते रहै छै। कहुना नुकाइत-छि‍पाइत एलौं। वि‍क्रम- ऐठाम रस्‍ता छै। चलू नदीक कछेरपर। नि‍धोख भऽ कऽ गप करब। (दुनू गोटे चलि‍ पड़ैत अछि‍।) कट टू। दृश्‍य परि‍वर्तन- दुनू एक-दोसराक हाथ पकड़ने खुशीक गीत गाबि‍ रहल अछि‍। झोंझमे छि‍पल हरि‍या देखि‍ रहल अछि‍।) कट टू। तइसम दृश्‍य- समए- साँझ। स्‍थान- निर्जन। (हरि‍याक मुँहपर घृणाक भाव अछि‍। दारूक बोतल मुँहसँ लगबैत अछि‍। फेर जोरसँ फेक दैत अछि‍।) हरि‍या- (क्रोधमे) सार, हीरोपनी करैत अछि‍। हमरा सोझहामे। हमरा चि‍न्‍हने नै अछि‍। जाति‍क लड़कीक संगे...। आइए तोरा मुइलहा बापसँ भेँट करा देबौ। (बोतलकेँ टाँगसँ ठोकर मारैत अछि‍ आ तेजीसँ घोड़ापर चढ़ि‍ चलि‍ दैत अछि‍।) कट टू। चौबीसम दृश्‍य- समए- साँझ। स्‍थान- वि‍क्रमक घर। (वि‍क्रमक माए घर-अँगनाक काज कऽ रहल अछि‍। हरि‍या अपना तीन-चाारि‍ साथीक संगे पहुँचैत अछि‍। घोड़सवार सभकेँ देखि‍ते बुढ़ि‍या भ्‍यभीत भऽ जाइत अछि‍।) हरि‍या- गे बुढ़ि‍याऽऽऽऽ। तोहर बेटा बि‍करमा कहाँ छौ? वि‍क्रमक माए- हौ बाबू। हमरा नै बूझल अछि‍। की भेलै से? हरि‍या- साँपकेँ पोसने छी आ पुछै छी की भेलै। नि‍काल अँगनासँ आइ हड्डी तोड़ि‍ देबौ सारकेँ। वि‍क्रमक माए- यौ बाबू मुँह सम्‍हारि‍ कऽ गप करू हमर बेटा पढ़ै छै। कोनो लुच्‍चा-लोफर नै अछि‍। हरि‍या- लोफर नै छौ तँ छौड़ीक संगे रसलीला कि‍ए केने घुरै छौ। वि‍क्रमक माए- हमरा बेटापर झूठ-मूठक दोख नै लगाउ। नै तँ ठीक नै हएत। हरि‍या- (कोड़ा देखबैत) देखै छीही कोड़ा। हरामजादी पीठ परहक खाल खींच लेबौ। नै तँ बेटाकेँ सम्‍हारि‍ ले। (हरि‍याक एकटा संगी अँगनासँ ताकि‍ कऽ बहार ि‍नकलैत अछि‍।) संगी- अँगनामे नै छै बि‍करमा। हरि‍या- सुनि‍ ले बुढ़ि‍या। बेटा जँ रस्‍तापर नै एतौ तँ काटि‍ कऽ धारमे भँसा देबौ। (घोड़ापर चढ़ि‍ सभ तीव्र गति‍सँ चलि‍ पड़ैत अछि‍।) पचीसम दृश्‍य- स्‍थान- सुइदचनक घर। (हरि‍या शराब पी रहल अछि‍। सुइदचन आ मुंशी जीकेँ अबैत देखि‍ बोतल फेंक कऽ चलि‍ पड़ैए।) सुइदचन- मुंशीजी, हरि‍या कि‍एक तमसाएल छै? गाँजाक बि‍जनीशमे घाटा लगलै की? मुंशी- नै बुझलि‍ऐ मालि‍क। श्‍यामबाबूक बेटी छै ने बरसा। ओकरा अपन हरीबाबू पसि‍न कऽ लेलकै। ओकरेसँ बि‍आह करबाक मन बना लेने छै। सुइदचन- वाह। काबि‍ल अछि‍। असलमे बेटा तँ हमरे छि‍ऐ। पैघ हाथ मारलक। सोचै छेलौं ओकर जमीन करजा तरमे लि‍खेबै। आब तँ दहेजेमे सभटा आबि‍ जेतै। मुंशी- से तँ श्‍यामबाबूकेँ सन्‍तानक नामपर वएह बेटी मात्र छै। कि‍न्‍तु...। सुइदचन- दि‍क्कत की छै जे कि‍न्‍तु लगौने छी? मुंशी- मालि‍क! एकटा पढ़ुआ छौड़ा छै बि‍करमा। सुनै छी जे ओइ लड़कीसँ मेल-जोल छै। देरी करबै तँ हाथसँ सब कुछौ नि‍कलि‍ जाएत। सुइदचन- मुंशीजी। हमरा जालसँ नि‍कलनाइ एते असान छै की। चलू अखने देखै छि‍ऐ। (दुनू चलि‍ पड़ैत अछि‍।) कट टू। छबीसम दृश्‍य- स्‍थान- श्‍यामबाबूक घर। समए- दि‍न। (श्‍यामबाबू, सुइदचन आ मुंशीक संगे बैसल अछि‍।) सुइदचन- अहीं कहू श्‍यामजी, जे ओइ दि‍नसँ अहाँ बेटी दि‍स कोनो गुण्‍डा-बदमाश तकबो करैए? श्‍यामबाबू- से तँ अहीं सबहक छत्र-छायामे ने हमरा सभ सुरक्षि‍त छी। सुइदचन- धि‍यानसँ सुनि‍ लि‍अ। अहां बेटीकेँ हम अपन पुतोहु मानि‍ लेने छी। आ हम बुझि‍ते छी जे अहाँ हमरा गप्‍पकेँ सहर्ष स्‍वीकार करबे करब। श्‍यामबाबू- कनी बेटीसँ...। (सुइदचन चुप रहबाक इशारा करैत अछि‍।) सुइदचन- अहाँ चुप रहू। अहांपर करजो ततँ बहुत भऽ गेल छै। सभटा खेत बि‍का जाएत, तैयो नै सठत। मुंशी- मालि‍क अहाँ कथी बजै छी। आब तँ हि‍नक खेत-पथार बेटीए-जमाएक हेतै। सुइदचन- से तँ हम बुझि‍ते छी। हम तँ ई कहैले एलौं, जे कोइ हमरा पुतोहु दि‍स अधला नजरि‍सँ तकतै तँ हम ओकर आँखि‍ फोड़ि‍ देबै। बुझलौं। चलू मुंशीजी। (सुइदचन, मुंशी चलि‍ पड़ैत अछि‍।) कट टू। सत्ताइसम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- श्‍यामबाबूक घर। (श्‍यामबाबू बैसल अछि‍। बरसा ठाढ़ अछि‍।) श्‍यामबाबू- (तमसाइत) ओइ टोलक वि‍क्रमक संग एतेक मेल-जोल कि‍एक रखने छी? तोरा पता छौ- लोक सभ केहेन-केहेन अफवाह उड़ा रहल छै। बरसा- (मुड़ी गोंतने) बाबूजी ओ नीक लोक छै। ओइ दि‍न ओकरे कारणे हमर इज्‍जत आ जान बँचल। श्‍यामबाबू- तँू भ्रममे छेँ। सभ सुइदचन बाबूक कृपा छेलै। बरसा- तखनि‍ तँ वएह मारि‍ओ खा कऽ हमरा बँचौलक। समैपर आन लोक सोझहा कहाँ आएल। श्‍यामबाबू- मुँह लगल नै बाज। ऊ लड़ि‍का हमरा जाति‍ओ-बेरादरीक तँ नै छी‍। आ एने तोरा बि‍आहक सभ गप्‍प तँइ-तसफि‍या भऽ गेल छौ। (बरसा तमसा कऽ जा रहल अछि‍।) सुनि‍ ले, आब तँू घर-अँगनासँ बाहर नै नि‍कलि‍ सकै छेँ। (झटकि‍ कऽ वि‍दा भऽ जाइए बरसा।) कट टू। अट्ठाइसम दृश्‍य- स्‍थान- वि‍क्रमक घर। समए- दि‍न। (वि‍क्रमक माए घाड़ खसौने बैसल अछि‍। वि‍क्रम प्रसन्न मुद्रामे पहुँचैत अछि‍।) वि‍क्रम- माए, तँू कथीक चि‍न्‍तामे डुमल छेँ? वि‍क्रमक माए- हमर चि‍न्‍ता बुझै नै छीही। सोचै छी जे तोरा नोकरी भेट जाउ तँ हमरो जि‍नगी सुफल भऽ जाएत। वि‍क्रम- आइसँ तोहर चि‍न्‍ता खतम। (लेटर देखबैत) लेटर भेटि‍ गेल छै। आइ सौझुका गाड़ीसँ हम जा रहल छि‍यौ। सभ कि‍छो सैंति‍ कऽ झोरामे दऽ दही। वि‍क्रमम माए- अँए...। ठीके...। (अचरजक भाव) कट टू। उनतीसम दृश्‍य- समए- साँझ। स्‍थान- सड़क। (वि‍क्रम टीसन दि‍स बढ़ल जा रहल अछि‍। वि‍चारमे डुमल अछि‍। आगूमे रघुआकेँ देखि‍ बजैत अछि‍।) वि‍क्रम- (स्‍वत:) बरसाकेँ सभ गप्‍पक जानकारी दऽ देबाक चाही। (रघुआकेँ रोकैत अछि‍) यौ रघुजी, कनी रूकि‍ जाउ। एगो हमर चि‍ट्ठी नेने जाउ। रघुआ- (रूकि‍ कऽ) की यौ दरोगाजी, बनियेँ गलि‍ऐ अहाँ दरोगा। अच्‍छा जाउ, जाउ आ लाउ केकरा देबाक छै चि‍ट्ठी? वि‍क्रम- हे लि‍अ। कोइ बुझहए नै। चुपेचाप बरसाकेँ हाथमे दऽ देबै। रघुआ- अहाँ नि‍चेन रहू। कोइ नै बुझतै। मुदा घूस दि‍अ पड़त। (दुनू हँसैत अछि‍।) कट टू। तीसम दृश्‍य- समए- साँझ। स्‍थान- श्‍यामबाबूक घर। (आस-पड़ोसक औरति‍या सभ अँगनामे जमा अछि‍। बि‍आहसँ पूर्वक वि‍ध-बेवहार भऽ रहल अछि‍। पुरुख सभ बरि‍यातीक प्रति‍क्षा कऽ रहल अछि‍। रघुआ कोनटा लगसँ बरसाकेँ इशारा करैत अछि‍। बरसाकेँ लगमे पहुँचि‍ते चि‍ट्ठी ओकरा हाथमे पकड़ा दैत अछि‍।) कट टू। एकतीसम दृश्‍य- (वि‍क्रम ट्रेनपर चढ़ैत अछि‍। आ गाड़ी खुगि‍ जाइत अछि‍। चलैत गाड़ीक पाछूमे बरसा दौग रहल अछि‍। बरसाक पाछूसँ एकटा घोड़ सवार रेबाड़ने जा रहल अछि‍।) कट टू। बत्तीसम दृश्‍य- समए- राति‍। स्‍थान- श्‍यामबाबूक घर। (श्‍यामबाबू उदास भऽ बैसल छथि‍। घरक समान सभ अस्‍त-बेस्‍त अछि‍। एकटा घोड़ सवार अबैत अछि‍। श्‍यामबाबू मुड़ी उठा कऽ ओकरा दि‍स तकै छथि‍।) श्‍यामबाबू- हमरा बेटीक कोनो पता लगल? घोड़ सवार- टीशनक चारूभर आ दूर-दूर धरि‍ तकलौं, पता नै, गाड़ीपर चढ़ि‍ गेल आकि‍‍ केनौ नुका रहल, अन्‍हारमे। मुदा ि‍चन्‍ता नै करू। हमर संगी सभ ताकि‍ए रहल अछि‍। जेतै केतए।) (घोड़ सवार चलि‍ दैत अछि‍।) कट टू। तैंतीसम दृश्‍य- समए- भोर। स्‍थान- श्‍यामबाबूक घर। (श्‍यामबाबू स्‍नानक उपरान्‍त सुरूजकेँ नमस्‍कार करै छथि‍।) श्‍यामबाबू- (सुरूज दि‍स तकैत) हे सुरूज महराज! पता नै, दोख हमर अछि‍ आकि‍ हमरा बेटीक। केतए हेतै आ केहेन हालमे हेतै। हम ओकर बाप छि‍ऐ। चि‍न्‍ता तँ हमरे हेतै। समाज तँ हँसि‍ रहल छै। आइ ओकर माए रहि‍तै तँ ई दशा नै होइतै। पता नै, बापकेँ जे करबाक चाही से हम करि‍ रहल छी आकि‍ नै। हे सुरूज महराज, ओकर रक्षा करब। ओह...। (आँखि‍मे नोर भरि‍ जाइ छै।) कट टू। चौंतीसम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- सुइदचनक घर। (सुइदचन आ मुंशीजी बैसल अछि‍।) मुंशीजी- माि‍लक! केतेक दि‍न बीति‍ गेल। मुदा अखनी तक श्‍यामक बेटीक कोनो पता नै लगल। लगै छल- जे छुच्‍छे फैदा हएत लेकि‍न...। सुइदचन- लेकि‍न की लगबै छी। सुइदखोरकेँ कहि‍यो घाटा लगै छै। हमर बेटा कच्‍चा खेलाड़ी नै छै। लड़की केतौ नुकाएल हेतै ओ खोजि‍ कऽ नि‍कालि‍ लेतै। फेर हम जे चाहबै सएह हेतै। कट टू। पैंतीसम दृश्‍य- समए- दि‍न। (हरि‍या अपना कोठलीमे दारू पीब रहल अछि‍। बोतल खाली कऽ झुमैत-झामैत बाहर नि‍कलैत अछि‍। आ घोड़ापर चढ़ि‍ चलि‍ दैत अछि‍।) कट टू। छत्तीसम दृश्‍य- स्‍थान- बाधक निर्जन भाग। समए- दि‍न। (हरि‍या घोड़ापर सँ उतरैत अछि‍। कातक गाछ तरमे ओकर प्रेमि‍का फुलि‍या ठाढ़ अछि‍। दुनूक बीच प्रेमसँ भीजल गप-सप्‍प्‍ होइत अछि‍, दुनूमे प्रेमालाप।) फुलि‍या- एकटा गप्‍प तँ अहाँकेँ नै कहलौं। हरि‍या- कोन गप्‍प? फुलि‍या- हम तँ अहाँ बच्‍चाक माए बनैवाली छी। हरि‍या- धुर, ऐ झंझटकेँ हटाउ। खसा लि‍अ। फुलि‍या- एना कहीं होइ छै। अहाँ बाप बनैबला छी। (पेट दि‍स इशारा करैत) ई अहींक बच्‍चा छी। हरि‍या- एनामे तँ हम केतेक धि‍या-पुताक बाप बनि‍ जेबै, आ केतेक लड़कीक पति‍। फुलि‍या- तेकर मतलब...। हरि‍या- (क्रोधमे) मतलब कि‍छो नै। गर्भपात करबा लि‍अ। खरच हम देबै। फुलि‍या- हम से नै करब। हरि‍या- (क्रोधमे) केतौ कि‍छो बजबेँ वा हमरा लग एबही तँ परान खैंचि‍ लेबौ। तोरा हमरा बीच सभ बात खतम। (घोडापर चढ़ि‍ सक्रोध प्रस्‍थान।) कट टू। सैंतीसम दृश्‍य-–

समए- दि‍न। स्‍थान- फुलि‍याक घर।

(फुलि‍याक माए चनकी अपना धि‍या-पुतका खाएक परैस रहली अछि‍। धि‍या-पुता भात मंगैत अछि‍।) 

चनकी- (करछुल थारीमे पटकैत) ले, थारीओ बरतन खा ले। (तखैने फुलि‍याक बाप डोलना नि‍शाँमे झुमैत पहुँचैत अछि‍।)

डोलना- फुलि‍याक माएऽऽऽ। एको लवनीक दाम लाबह। कंठ सुखा गेल। हे तोरा नीक नै हेतह। एको चुरूक दाम नि‍कालह। (चनकी पैसा राखएबला गुल्‍लककेँ फोड़ैत अछि‍, आ सभटा पैसा तामसे छि‍ड़ि‍या दैत अछि‍।)

चनकी- ले सभटा पैसा ले। नै होइ छौ तँ धि‍यो-पुताकेँ रकत पी ले। (तामसे चनकी धि‍या-पुताकेँ थोपराबए लगैत अछि‍। तखैने फुलि‍या पहुँचैए आ कोनमे बैस कऽ कानए लगैए।)

चनकी- तोरा की भेलौ गइ?

फुलि‍या- माए गइ माए, तोहर इज्‍जत...। (कानए लगैए)

चनकी- हमरा इज्‍जतकेँ की भेलै गइ?

फुलि‍या- सुइदखोरबाक बेेटा इज्‍जत खराप कऽ देलकौ गइ। हमरा पेटमे ओकर...। (कानए लगैत अछि‍।)

चनकी- हमर इज्‍जत खराप करत अनजनुआ जनमल ओकरा तँ हम...।

फुलि‍या- कहने रहै जे बि‍आह करबो, तोरा संगे।

चनकी- ओइ कोंढ़ि‍फुट्टाकेँ बि‍आह करए पड़तै। चल देखै छि‍ऐ केना नै बि‍आह करतै ऊ। नै करतै तँ सौंसे समाजमे ढोल पीट देबै। कारि‍ख-चुन लगा देबै। घि‍ना कऽ रखि‍ देबै- आइ। सभ गोरे चल। कहि‍ दही सभकेँ। (एके संग सभ चलि‍ दैत अछि‍।)

कट टू। अरतीसम दृश्‍य-

समए- दि‍न। स्‍थान- सुइदचनक घर।

(सुइदचन आ मुंशी दलानपर बैसल अछि‍। एक हेंज लोक अबैत अछि‍। ओइमे फुलि‍या ओकर माए-बाप आ ओइ टोलक आनो-आन लोक सभ अछि‍। सभ तामसे गाि‍र-बात दऽ रहल अछि‍, मंुशी पुछै छै।)

मुंशी- की बात छि‍ऐ? अहाँ सभ केकरा गरि‍या रहल छि‍ऐ?

सुइदचन- सार सभ नि‍शाँ पीने अछि‍। बताह भऽ गेल छै सभटा। पता छौ जे केकरा दुआर पर छी।

मुंशीजी- हे रौ भाग जो तोरा सभ। तमसेतौ तँ मालि‍क गोली मारि‍ देतौ। (फुलि‍याक माए चनकी करि‍या खापड़ि‍ नेने आगू अबैत अछि‍।)

चनकी- देखै छी खापड़ि‍। माएक दूध पीने छी तँ सामनेमे चलि‍ आ। आइ चानि‍ ठोकि‍ देबौ।

सुइदचन- रे सोर पार तँ खलीफाकेँ। ला लाठी, चुतर तोड़ि‍ देबै। (लाठी हाथमे लेने आगू बढ़ैत अछि‍। चनकी खापड़ि‍ फेकैत अछि‍। सुइदचनक कपारपर खापड़ि‍ लगैत अछि‍ अछि‍ फूटि‍ जाइत अछि‍। कपार पकड़ि‍ बैस जाइत अछि‍।)

मुंशीजी- मालि‍क जान बँचाउ।

सुइदचन- रे बहींचो, कोनेसँ बजर खसलौ रे।

मुंशी- सुइदबला छी।

चनकी- (गरजैत) घरढुक्काक बाप। असली बजर तँ आब गि‍रतौ। कहाँ छौ बेटा? करा बि‍आह।

सुइदचन- बि‍आह? हमरासँ?

मुंशीजी- मािलक! अहासँ नै। अहाँक बेटासँ बि‍आह करौत। (भीड़मे श्‍यामबाबू ठाढ़ भऽ कऽ सभ कि‍छु देखि‍ सुनि‍ रहल अछि‍।)

सुइदचन- की बात भेलै रौ?  (एक गोटे आगू बढ़ि‍ सभ गप्‍प सुइदचनक कानमे कहैत अछि‍। माथापर चोट मारैत श्‍यामबू प्रस्‍थान करैत अछि‍। कि‍छु लोक हल्‍ला केनि‍हारकेँ शान्‍त कऽ रहल अछि‍।)

कट टू। जितेन्द्र झा -गतिविधि

सांस्कृतिक सम्मानसँ मजबुत हएत राष्ट्रियता ः बिमल  साहित्यकार डा. राजेन्द्रप्रसाद विमल नेपालमे सभ जाति, भाषा संस्कृति आ सभ्यताक सम्मान भेलाक बादे राष्ट्रियता मजबुत हएत से कहलनि अछि । नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालक सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्रद्वारा राजधानीमे २१ मार्चकऽ आयोजित प्रवचनमाला कार्यक्रममे बजैत ओ सांस्कृतिक एकतापर जोड देलनि । नेपाली संस्कृति, मिथिला गौरव आ राष्ट्रियत विषयमे प्राध्यापक राजेन्द्र विमल प्रवचन देने रहथि । ओ नेपालक सांस्कृतिक विविधताके संरक्षण कएलाक बादमात्रे नेपालक समृद्ध सांस्कृतिक पहिचान बनत से कहलनि । हुनक कार्यपत्रमे मिथिलाक प्राचीन इतिहास, सभ्यता आ संस्कृतिक विशिष्ट पक्षसभके व्याख्या कएल गेल अछि । मिथिला संस्कृति विश्वमे अद्वितीय संस्कृति होइतो नेपालमे ई राष्ट्रिय सम्मान नहि पाबि सकल हुनक कहब छलनि। सभासद् साह फरार, सद्भावना कहलक निर्दोष  की भेटत जनकपुर बमकाण्ड पीडितके न्याय ?  पकराउ पुर्जी कटलाक दू सप्ताह बादो नेपाल प्रहरी जनकपुर बम काण्डक आरोपी सभासद् सञ्जय साहके नहि पकडि सकल अछि । जनकपुर बम काण्डमे संलग्न रहल प्रमाण्ँ भेटलाक बाद प्रहरी सभासद् साहके“ पकडबालेल दू बेर पक्राउ पुर्जी जारी कएलाक बादो पकड़मे असफल रहल अछि ।  जनकपुरक रामानन्द चौकमे २०६९ साल वैशाख १८ गते मिथिला राज्यक मांग करैत आयोजित धर्नामे विष्फोट करओनिहार प्रमुख योजनाकार सभासद् सञ्जय साह रहल प्रहरी आरोप लगओने अछि । प्रहरीक अनुसार विष्फोटके जिम्मा लेनिहार तराई लिबरेशन फ्रन्टक अर्जुन सिंह नामस“ चिन्हल जायबला मुकेश चौधरी धनुषा प्रहरीके बयान दैत सभासद् सञ्जय साहकेँ निर्देशनमे बम विष्फोट कराओल गेल बतओने अछि । चौधरी सुरुमे साहक संलग्नता विषयमे झुठ बजने छल, जाहिके बाद प्रहरीले पोलोग्राफ टेस्ट कऽ कऽ बयान लेने छल । साहक पूर्व सहयोगी ओम यादवके बयानस“ सेहो साहके संलग्नता पुष्टि भेल धनुषाक प्रहरी उपरीक्षक उत्तमराज सुवेदी कहलनि।  धर्नामे बम विष्फोट करओनिहार कोनो आवरणमे हुअए प्रहरी ओकरा नहि छोड़त उपरीक्षक सुवेदीक कहब छन्हि । विष्फोटके बाद प्राप्त अडियो टेपसहितके विषयमे सेहो चौधरी आ यादवस“ पुछलाक बाद साहक संलग्नता पुष्टि भेल उपरीक्षक सुवेदी जनतब देलनि ।  विष्फोटस“ सम्बन्ध रहल एकटा अडियो टेप सार्वजनिक भेल छल । जाहिमे विष्फोटक योजना बनाओल गेल बातचीतके रेकर्ड छल । अडियो टेप तत्कालीन समयमे क्षणिक तरंग त अनने छल मुदा ओकर छानबिन नहि भेलाक बाद अहिना सेरा गेल । प्रहरीले सो अडियोक आधिकारिकताक विषयमे सेहो मुकेश चौधरीस“ पडताल कएलक अछि।  के अछि संजय सञ्जय साह ?  धनुषा जिलाक लोहना–७ मूल घर रहल सञ्जय साह जनकपुरमे कोनो समयमे कवाड़ीका ठेकेदार छल । एमाले नेता रामचरित्र साहक राजनीतिक संरक्षण आ धनुषा तत्कालीन एसपी विश्व जबराक प्रोत्साहनस“ साहके दायरा बढैत गेल । ओ जबराक मुखबिरीक काज कऽ प्रहरी प्रशासनस“ लग भऽ गेल छल । कहियो कांग्रेसी त कहियो एमालेक नेताक आशिर्वादस“ ठेकेदारीमे आधिपत्य स्थापित करैत आएल साह मधेश आन्दोलनके बाद अपने राजनीतिमे कुदि गेल।  ई पहिल बेर नहि जे प्रहरी साहके खोजि रहल अछि । ओ बेर बेर विवादमे आबि चुकल अछि । धनुषा प्रहरीक रेकर्ड ज“ देखी त बुझाइत अछि जे साहके परिचय ठेकेदारक रुपमे मात्र सिमित नहि रहल । हत्या, अपहरण जेहन कतेको घटनामे बेर बेर साहके संलग्नता रहल निवेदन प्रहरीमे पड़ल मुदा राजनीतिक आ आर्थिक हैसियत दुनू भेलाक कारणे साह कारवाहीक दायरामे नहि आबि सकल। प्रहरी कोना कारवाही करैत, प्रहरीके राशन खुअएबाक ठेका साहके भेट गेलाक बाद साहपर कारवाही करबाक हिम्मति कियो नहि कऽ सकल । सभासद्क हैसियत मात्रे नहि गृहमन्त्रीक रुपमे विजयकुमार गच्छदारक संंरक्षणक कारण सेहो साहपर प्रहरी, प्रशासन कारवाही करबाक हिम्मति नहि जुटा सकल । अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोगस“ लऽकऽ राष्ट्रिय सतर्कता केन्द्रधरि साहपर भ्रष्टाचारक कतेको निवेदन पडल, मुदा ओहि सभपर कोनो कारवाही नहि भऽ सकल अछि ।  मधेश आन्दोलनक लगले बाद २०६४ सालमे संविधान सभाक पहिल चुनावमे साह उपेन्द्र यादव नेतृत्वक मधेशी जनअधिकार फोरम नेपालस“ धनुषा ४ स“ प्रत्यक्ष चुनाव जितने छल । बादमे फोरम नेपालस“ फुटिकऽ बनल विजयकुमार गच्छदार नेतृत्वक फोरम लोकतान्त्रिकमे साह गेल छल । फोरम लोकतान्त्रिकस“ भौतिक योजना तथा निर्माण राज्यमन्त्री सेहो भेल साहपर पार्टीद्वारा कारवाही भेलाक बाद ओ मधेश क्रान्ति फोरम नेपाल नामक समूहमे सकृय भेल।  मुदा गतवर्ष नाटकीय रुपस“ साह फेरो फोरम लोकतान्त्रिकमे प्रवेश कएलनि । एकदिश जनकपुर बम काण्डमे संलग्नतक आरोपमे साहपर छानबिन हुअए से मांग भऽ रहल छल दोसर दिश तत्कालीन गृहमन्त्री आ फोरम लोकतान्त्रिकके अध्यक्ष गच्छदार साहके २०६९ फागुन ९ गते पार्टी प्रवेश करौलनि । मुदा साह ओत्तऽ किछुए महिना टिकि सकल । दोसर संविधानसभा चुनावस“ ठिक पहिने राजेन्द्र महतो नेतृत्वक सद्भावनामे प्रवेश कएलनि । संविधानसभा चुनावमे राजेन्द्र महतो नेतृत्वके सद्भावना पार्टीस“ प्रत्यक्ष निर्वाचनमे जितनिहार एकगोटे साह मात्र अछि । एखन साह सद्भावना पार्टीक वरिष्ठ उपाध्यक्ष अछि।  साहके पकड़बालेल पुलिस पक्राउ पुर्जी जारी कएने समाचार सार्वजनिक होइते सद्भावना पार्टी साह निर्दोष रहल कहैत बचएबालेल आगु आएल अछि । पार्टी संसदमे आवाज त उठेबे कएलक प्रधानमन्त्रीके ज्ञापन दऽकऽ निष्पक्ष छानबिके मांग सेहो कएलक । चैत ६ गते सद्भावना अध्यक्ष राजेन्द्र महतो नेतृत्वके टोली प्रधानमन्त्री सुशील कोइरालाके ज्ञापन पत्र बुझओलक जाहिमे जनकपुर विष्फोटमे साहके कानो संलग्नता नहि रहल दाबी कएल गेल अछि । न्यायिक छानबिन आयोग गठन कऽ घटनामे दोषीपर कारवाही कएल जाय सद्भावना अध्यक्ष राजेन्द्र महतो कहलनि । बालुवाटारमे प्रधानमन्त्रीके ज्ञापन देलाक बाद पत्रकारसँ बातचीत करैत महतो कहलनि होरीक बाद सभासद् साहसँ कोनो सम्पर्क नहि भेल अछि । 

साह निर्दोष, न्यायिक छानबि हुअए – लक्ष्मणलाल कर्ण, सभासद् सदभावना पार्टी सभामुख महोदय, एहि सम्मानित सदनक एकगोटे सदस्य सञ्जयकुमार साहकेँ सम्बन्धमे समाचारपत्रसभ जनकपुर बम काण्डकँे अभियुक्त कहिकऽ लिखिरहल अछि । एहि सम्बन्धमे हमसभ खोजबिन कएलहु“, एहिमे सरकारके लापरवाही देखल गेलाक बाद ई संसदके विषयवस्तु बनल, तेँ हम ई विषय संसदमे राखऽ चाहैत छी। २०६९ साल वैशाख १८ गते जनकपुरमे बम विष्फोट भेलाक बाद घटनास्थलसँ जयप्रकाश चौधरी नामक व्यक्तिके पकड़िकऽ स्थानीयवासी पुुलिसके बुझओने छल । पुलिस अनुसन्धान कएलक आ अन्य चारिगोटेके पकड़लक । पुलिस घटनामे संलग्न व्यक्तिउपर धनुषा जिला अदालतमे मुद्दा दायर कएलक । ताहिके बाद जनतान्त्रिकके अध्यक्ष घटनाके जिम्मा लेलक । आ पुलिस हुनको पर अदालतमे मुद्दा चलारहल अछि ।  सम्मानित सभाके ई हम याद दिआबऽ चाहैत छी जे ताहिकेबाद पुलिस एहि घटनाके कारवाही बन्द कएलक । घटनामे मृतक विमल शरण वैष्णवक बेटा जहन प्रहरी कार्यालयमे जाहेरी देबऽ गेल तहन पुलिस कहने छल घटनामे दोषी सभपर मुद्दा चलि रहल अछि आब किनको पर मुद्दा नहि चलि सकैत अछि । पीडित जाहेरी दर्ताक लेल पुनरावेदन अदालत धनुषामे परमादेशके लेल गेल । ओत्तऽ प्रहरी जवाब दैत कहलक जे ई मुद्दाके विषयमे कारवाही भऽ चुकल अछि तेँ आब जाहेरी नहि लेल जा सकैत अछि । एखन करिब दू वर्षक बाद प्रहरीे ओमप्रकाश यादवके बजाकऽ अनैत अछि आ कहैत अछि जे सञ्जय साहके संलग्नता अछि । जहन कि ओ मुद्दामे ओमप्रकाश यादवके कोनो संलग्नता नहि अछि। संलग्नता नहि रहल व्यक्तिके बयानके आधारपर प्रहरी सभासद् सञ्जय साहपर वारेण्ट जारी कएने अछि । सञ्जय साह यदि दोषी छथि त कारवाही नहि हुअए, से नहि कहए चाहैत छी । जहन पुलिस अदालतमे आन कोनो व्यक्ति दोषी नहि अछि से कहने छल तहन दू वर्षक बाद कोनाकऽ नयाँ प्रतिवादी आबि गेल ? प्रहरी ककरो दोषी नहि बनाबए । एहि सम्मानित सभाके एकटा सदस्यपर झुठ मुद्दा लगाओल गेल अछि । एहि तरहेँ जहन दोष लगाओल जाय त कोनो व्यक्ति, सभासद् निर्दोष नहि रहि सकैत अछि । ककरोपर वारेन्ट जारी कएल जा सकैत अछि, मुद्दा चलाओल जा सकैत अछि ।  तेँ सरकार सञ्जय साह दोषी अछि वा निर्दोष, तकर वास्तविकता पत्ता लगाबए । एहिबास्ते सरकारके तत्काल न्यायायिक छानबिन आयोगके गठन करबाक चाही । एकटा सभासद्के चरित्र हत्या सम्बन्धमे सरकार मौन अछि, कोनो कारवाही नहि कएलक अछि ।  (चैत ६ गते , २० मार्चकऽ सद्भावनाक सह–अध्यक्षसेहो रहल कर्णद्वारा व्यवस्थापिका संसदमे देल गेल मन्तव्य । जगदानन्द झा ‘मनु’- ग्राम पोस्ट – हरिपुर डीहटोल, मधुबनी अनमोल झा जीक पोथी “टेकनोलजी”क समीक्षा मिथिला संस्कृतिक परिषद, कोलकत्ता द्वारा प्रकाशित श्री अनमोल झा जीक लघुकथा संग्रह “टेकनोलजी” एखन हमरा हाथेमे अछि। पाँछाक तीन दिनसँ लगातार एकरा पढ़ि रहल छी। सुन्नर कवर पेंजसँ सजल तेहने भीतरक कथा सभ एकसँ एक उपरा उपरी। सबसँ पहिने अनमोल जीकेँ एहि --- कथा संग्रह हेतु बहुत बहुत बधाइ आ संगे संग मंगल कामना जे मैथिली साहित्यमे दिनो दिन ओ शुक्ल पक्षक चाँन जकाँ उदयमान होइत रहथि। मिथिलांचल टुडे टीमक तरफसँ हमरा एहि पोथीक समीक्षा केर दायित्व भेटल। हमरा लेल ई कठिन काज आ ओहूसँ बेसी कष्टकर छसत्यल बिना कोनो पक्ष बिपक्षमे गेने तटस्थ एहि पुस्तककेँ समीक्षा केनाइ। हमरामे कौशल आ शहास दुनूक अभाब मुदा माँ सरोस्वती आ गुरुदेवकेँ सुमिरैत अपन आँखिकेँ पोथीक पन्नापर आ कलमकेँ कागदपर चलबए लगलहुँ। अनमोल जीक समर्पण देख मोन गदगद भए गेल। जतए आजुक नव पीढ़ी अपन माए बाबूकेँ बोझ बुझि रहल अछि ओहिठाम अनमोल जीक ई पोथी हुनक पूज्य बाबूजीक श्रीचरण कमलमे समर्पित अछि। नवका पीढ़ी लेल ई एकटा नव रस्ता काएम करत। आगू पोथी पढ़ैसँ पहिने एकटा बात मोनकेँ कचोटलक, जे अनमोल जीक एहिसँ पहिने दूटा विहनि कथा संग्रह प्रकाशित भए चुकल अछि। हुनक नाम मैथिली साहित्यमे एकटा स्थापित विहनि कथाकारकेँ रूपमें लेल जा रहल अछि तकर बादो ओ अपन एहि नव विहनि कथा संग्रहकेँ, विहनि कथा संग्रह नहि कहि लघु कथा संग्रह कहि रहल छथि। जखन की आइ विहनि कथा एकटा स्थापित विधाकेँ रूपमे मैथिली साहित्यमे स्थापित भए चुकल अछि। विहनि कथा आब कोनो तरहक परिचय लेल मोहताज नहि अछि। श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी अपन विहनि कथा संग्रहपर टैगौर पुरस्कार जीत कए दुनियाँक बड़का-बड़का भाषाकेँ एहि दिस सोचै लेल बिबस कए देलखिन्ह। अंग्रेजी एकरा seedseedseed”सीड स्टोरी” कहि सम्बोधित केलक। हिंदी अंग्रेजीमे जकर कोनो स्थान नहि ओहेन एकटा नव बिधाक अग्रज मैथिली साहित्य आ ओ बिधा, “विहनि कथा”। विहनि कथा आ लघु कथामे बहुत फराक अछि। विहनि अर्थात बिया। बिया वटवृक्षकेँ सेहो भऽ सकैए आ सागक सेहो। तेनाहिते मोनक बिचारक बिया जे कोनो आकारमे फूटि सकैए, विहनि कथा। विहनि, बिया, सीडमे सँ केहन गाछ पुट्टै कोनो आकारक सीमा नहि। लघु कथा मने एकटा छोट कथा जेकर आरम्भ आ अन्त दुनू छैक। अनमोल झा जीक एहि संग्रहक एक एकटा कथा जबरदस्त विहनि कथा अछि। तहन लघु कथाक जामा किएक ? हाँ, किछु गोट लघु कथाक श्रेणीक कथा सेहो अछि मुदा अल्प मात्रामे, जेना पृष्ट संख्या ७६ पर “बढ़ैत चलू”, ७९ पर “समाज”, ८० पर “मर्माहत”, ८२ पर “सपूत सब”, ८३ पर “शोध”, ८५ पर “प्रायश्चित”, ९० पर “बड़का लोक”, ९५ पर “समय समय केर बात” आ पृष्ट संख्या १०१ पर “अप्पन जकाँ"। पृष्ट संख्या ८८ पर “मिथिला राज्यक” तँ नहि विहनि कथा अछि आ नहि लघु कथा, एहिपर जँ कनीक आओर मेहनत कएल गेल रहथि तँ एकटा नीक आलेख अवश्य भए सकैत छल। प्रकाशक, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकत्ता केर मन्त्री श्री गंगाधर झाजी अपन प्रकाशकीयमे “लघु कथा"केँ एकटा नवीन विधा कहि सम्बोधित कए रहल छथि, एहिठाम जँ ओ विहनि कथा कहितथि तँ साइद उचितो रहितए मुदा लघु कथा आ नवीन विधा हास्यपद। हम एहि कथा संग्रहक कथाकेँ आँगाक  उल्लेखमे विहनि कथा कहि सम्बोधित करब। “टेकनोलजी” विहनि कथा संग्रह रूपी मालामे कुल १५५ गोट विहनि कथा गाँथल गेल अछि। संग्रहक पहिले विहनि कथा “टेकनोलजी” एकरे नामपर संग्रहक नामकरण भेल अछि। अनुपम विहनि कथा, विहनि कथाक सबटा गुण कुटि-कुटि कए भरल अछि। जतेक प्रसंशा करी कम। एहि विहनिमे, कोना एकटा परदेशीया पुतहु अपन ससुरकेँ मात्र एहि द्वारे पाइ पठाबैक इक्षा रखैत छथि, जाहिसँ समाजमे हुनक नाम होइन। एहि द्वारे ओ नव टेकनोलजी बैंकिंगकेँ छोरि मनीआडर द्वारा पाइ पठबै छथि। “टेकनोलजी” नाम धरी ई विहनि कथा संग्रह नामक भ्रम उत्पन्य कए रहल अछि। पहिल नजरिमे टेकनोलजी नामसँ एना बुझा रहल अछि जे विज्ञान, टेकनोलजी आदिसँ सम्बंधित विषय बस्तु होएत मुदा एहन कोनो गप्प नहि। समस्त पोथीमे एकसँ एक नीक, रुचिगर विहनि कथा अछि मुदा टेकनोलजी, विज्ञान, तकनीकीसँ सम्बंधित एकौटा नहि। विहनि कथाक मुख्य अंग संबाद अछि आ अनमोल जीक विहनि कथा संबादसँ डूबल अछि, जबरदस्त ! मुदा संबाद “--------“ इनवरटेड कोमामे बन्द कए कऽ नहि लिखल अछि, एकर अभाब सम्पूर्ण पोथीमे अछि। दोसर कमी जे हमरा सम्पूर्ण पोथीमे, कथासँ प्रकाशकीय तक लागल, विभक्ति। विभक्ति अप्पन पहिलुका आखरसँ हटा कए लिखल अछि जाहि कारण कतौ कतौ अर्थकेँ फरिछौंतमे असमंजसकेँ स्थिति उत्पन्न भऽ रहल अछि। पृष्ट १३ पर लिखल विहनि कथा “टेकनोलजी” आ २७ पर लिखल “लोक बुझाउन” दुनू एक्के सन कथा थिक मात्र नामेटा बदलल अछि। एहि संग्रहमे कोनो एहन पक्ष नहि जाहिपर अनमोल जीक कलम नहि चलल होइन। मनक भावसँ समाजकेँ बिडम्बना धरि, अन्तरंग अम्बन्धसँ हँसी ठठा धरि सभ पक्षक उचित स्थान देल गेल अछि। पृष्ट ३३ पर “ड्यूटी”, ३८ पर “चिन्ता (एक)”, ३९ पर “बेटा बेटी”, ४३ पर “दुख”, ४५ पर “खोराकी”, ४६ पर “गोहारि”, ५८ पर “भीख”, ६० पर “मोनमे”, ९८पर “अन्हरजाली”, १०१ पर “अप्पन जकाँ”, १०३पर “मनुक्ख के कुकुर के”, मनकेँ छुबैत करेजाकेँ मोम जकाँ गला कए आँखिक रस्तासँ  बाहर आबैक पर मजबूर कए कऽ मोनक कोनो कोनामे एकटा टीस छोरि दै छैक। ओतए पृष्ट संख्या ३२ पर “एकदम ठीक” आ ३७ पर “टास्क”  समाजक कुप्रथाकेँ देखार कए रहल अछि। पृष्ट ३४ पर “सुरक्षित (एक)”, ४० पर “मन्त्र”, ७७ पर “आन्हर”, आ ८७ पर “व्यवस्था”, आजुक राजनीति आ व्यवस्थापर प्रहार करैत उत्तम विहनि कथा अछि। तँ दोसर दिस पृष्ट ३५ पर “जागरण”, ४२ पर “चेतना(एक)”, ४६ पर “विज्ञान”, आजुक जागरूक लोकक सत्य विहनि थिक। बाल मोनकेँ कागदपर उतारैत अनमोल जी एहि पोथीक पृष्ट ६५ पर “प्रश्न (दू)”, आ ६९ पर “चिन्तित”, वास्तबमे मोनकेँ चिन्तामे झोँकैक लेल प्रयाप्त अछि। ओतए ६३ पर “उत्तर” आ ७१ पर “भरम”केँ सवाल जबाव एहन अछि जेना शेरपर सबा शेर। सम्बन्धकेँ उजागर करैत पृष्ट ४८ पर “बुद्धू”, ६७ पर “महक”, आ ८१ पर “श्रधा” अछि तँ ३६ पर “सअख” आ ६० पर लिखल “युद्ध” पढ़ि हँसीसँ मुँह मुनेबे नहि करत। कनीक साहित्यक पक्षकेँ छोरिदि तँ कुल मिला कऽ नीक विहनि कथा संग्रह। पाठकक मोनमे शिक्षा संगे संग जिज्ञासा आ रूचि जगबैमे पूर्ण सफल। एक बेर किनको हाथमे ई पोथी आइब गेल तँ बिना पूरा पढ़ने चेन नहि| मैथिलीमे एकरूपताक अभाब “कोस-कोसपर बदले पानी, तीन कोसपर बदले वाणी।” ई कथ्य किनकर अछि, हम नहि जानि मुदा अछि जग जाहिर। कोनो एहन सुधी मनुख नहि जे एहि पाँति सँ अनभिक होथि। आ ई कथ्य सोलह आना सत्य अछि। एक गामसँ दोसर गामक इनार पोखरिक पानिमे अन्तर आबि जाइ छैक। ओना आब इनारक जमाना तँ रहल नहि। गामक घरे-घर चापा कऽल चलि गेलै आ शहरक घरे-घर टंकी। टंकीक पानिमे तँ कनिक समानता देखलो जा सकैत अछि मुदा एक आँगनक चापा कऽलक पानिक स्वाद दोसर आँगनक चापा कऽलसँ भिन्न होएत। परञ्च हम एहिठाम पानिक संदर्भमे गप्प नहि कहि कऽ भाषाक पक्षक मादे कहै चाहैत छी। पानि जकाँ भाषाक मिजाद सेहो सगरो तीन चारि कोसपर बदलल देखाइत छैक। ई असमानता मिथिले-मैथिलीमे नहि भऽ कँ कमबेसी सम्पूर्ण भारतीय वा अभारतीय भाषामे देखार भऽ चुकल अछि आ ओ गुण कोनो भाषाक विकास आ ओकर उन्नतिक पक्षक धियान राखि ठीके अछि। पानिक मादे जेना कोनो नदी हेतु ओहिमे बहाब भेनाइ स्वभाविक छैक नहि तँ ओ नदीसँ डबरा भऽ जेतैक। तेनाहिते कोनो भाषाक चहुमुखी विकास लेल ओहिमे निरन्तर बहाब, अर्थात नव-नव शव्दक वृद्धि, आन-आन भाषाक सटीक आ प्रचलित शव्दकेँ स्वीकार केनाइ आवश्यक छैक। आ दुनियाँक ओ कोनो भाषा जे अपना आपके एकटा बहुत पैघ रुपे स्थापित केलक, ओकर विकासक इहे अबधारना वा गुणक कारने संभब भेल अछि। हमरा इआद अछि जखन अंग्रेगीक प्रथम शव्दकोष बनल रहैक तँ ओहिमे मात्र एक हजार शव्दकेँ जगह भेटल रहैक आ आइ..... ? मुदा मैथिलीक संगे, ई गुण किछु बेसीए अछि। किएक तँ मैथिल किछु बेसीए बुद्धिजीवी, शिक्षित आ चलएमान छथि। जतए-जतए गेला अपना भाषाकेँ अपना संगे नेने गेला आ ओतुका भाषाक शव्दकेँ अपना संगे जोड़ने गेला। ओनाहितो अपन मिथिलांचलक प्रतेक दू तीन कोसक बादक भाषामे भिन्नता अछि। पछिमाहा मैथिली पुरबाहा मैथिली, दछिनाहा मैथिली उत्तर भरक मैथिली, कमला कातक मैथिली, कोसी कातक मैथिली। एक्के गाममे बड्डकाक मैथिली, छोटकाक मैथिली। नीक गामक मैथिली तँ बेजए गामक मैथिली। शिक्षित मैथिली तँ अशिक्षित मैथिली। आमिरक मैथिली तँ गरीबक मैथिली। एक्के बेर एतेक बेसी असमानता भऽ गेल अछि जे कतेक ठाम तँ मैथिली नहि कहि कऽ दोसर नामसँ संबोधन भँ रहल अछि। अपन जाहि गुणक कारण दुनियाँक कोनो दोसर भाषा विकासक रस्तापर चलि रहल अछि, ओतए हमर सबहक मैथिली एहि क्रममे पछुआ रहल अछि। एकर की कारण ? तँ उत्तरमे हमरा मैथिलीक एकटा लोकोक्ति इआद आबि रहल अछि। “जे बड्ड होशियार से तीन ठाम गूँह मखे।” एहि लोकोक्तिकेँ कनी फरिछादी; एकटा पढ़ल लिखल विद्वान् गूँह मँखि गेला, आब ओ एहि गप्पक खोजमे लागि गेला जे, जे मखलौं से गूँहे अछि वा किछु आरो। एहि क्रममे ओ पएरक गूँहकेँ अपन हाथक आंगुरसँ छुला बाद नाकसँ सुंघला। लगलनि ने तीन ठाम, पएरमे, हाथक आंगुरमे, अन्तोगत्बा नाकमे। ओतए एकटा दोसर व्यक्ति बेसी खोज बिन नहि पैर कऽ मखला बाद पानिसँ धो लेलक। “अति सर्वत्र वर्जिते,” इहे रोग मैथिली भाषाक विकासमे लागि गेल अछि। जाहि गुणक कारणे हम आगू बढ़ि सकैत छलहुँ, अपन ओहि गुणकेँ कारण ठमैक गेल छी। एहि गुण, अतिसय गुण वा कही तँ अबगुनकेँ हम समान्य लोककेँ लेल जेनाकेँ तेना छोरिदी, विकास क्रममे समयक संगमे मानिली जे ओ अपने ठीक भए जेतैक। मुदा जे अपनाकेँ बुद्धिजीवी कहैत छथि, शिक्षित आ मैथिली विकासक ठेकेदार अपनाकेँ मानैत छथि तिनका सभकेँ तँ कदापि नहि छोरल जए आ हुनके सबहक एकरूपताक अभाबे मैथिलीक गति अबरुद्ध भेल अछि। एकटा समान्य लोक ककरा देखत, पढ़त ? एकगोट बुद्धिजीवीकेँ, साहित्यकारकेँ, पत्र-पत्रिकाकेँ, ऑडियो-विडिओ मिडियाकेँ मुदा एखुनका समयमे मैथिली भाषाक एकरूपतामे कतौ समानता नहि अछि। एहिठाम हम समान्य लोकक गप्प नै कहि रहल छी, पढ़ल-लिखल, मैथिलीमे ऑनर्स, एमए०, पिएचडी करै बलाक गप्प कए रहल छी। जिनक सबहक कतेको मैथिली पोथी छपा कऽ समान्य लोकक हाथमे आबि गेल अछि, मैथिलीक पत्र-पत्रिकाक सम्पादक आ सम्पादक मण्डलीक गप्प कए रहल छी। कतेको मैथिलीक पुस्तक छापि चुकल प्रकाशकक गप्प कए रहल छी। ऑडियो-विडिओ बेच कऽ अपन कमाइ करै बला चैनल आ म्यूजिक विडिओज कम्पनीक गप्प कए रहल छी। सदति भाषाक एकरुपताक अभाब अछि। कनिक काल लेल किनको अज्ञान मानि कए क्षमा कएल जा सकैत अछि मुदा ओहि खन कि कएल जे जखन कियो गोटा अपनाकेँ मुख्य सम्पादक, सम्पादक, मैथिलीक ऑनर्स, एमए पिएचडीक चश्मा पहिरने, ओहि घोड़ा जकाँ लगैत अछि, जेकरा आँखिपर हरियर पट्टी बान्हल छैक आ ओकरा सगरो दुनियाँमे हरियरे-हरियर नजरि अबैत छैक। ई बिडम्बना मैथिलीए संगे किएक ? जीवन भरि अपन घर-परिवारमे मैथिली नहि बजै बला मैथिलीक ठीकेदार बनि जाइत छैक किएक ? एहिठाम हम विदेह ग्रुपक प्रसंशा करैत छी जे ओ अन्तर्जाल आ प्रिन्ट दुनू रूपे मैथिली भाषाक समृधि आ एकरूपता लेल भागीरथी प्रयासमे लागल छथि। कतेको प्रकाशकक पोथी, कतेको लेखक आ साहित्यकारक कृति, कतेको पत्र-पत्रिका, फलाँ फलाँ मैथिली एकादमीक पोथी आ पत्रिका हमरा लग अछि जाहिमे विभक्ति केर प्रयोग हिन्दीक तर्जपर कएल गेल अछि। कतेक मैथिलीक महान-महान विभूतिसँ हम व्यक्तिगत रुपे संपर्क कए हुनका सभसँ निवेदन केलहुँ जे, मैथिलीमे विभक्तिकेँ सटा कए लिखबा चाही मुदा नहि, ओहे आँखिपर पट्टी बान्हल घोड़ा बला हिसाब। एकटा मुख्य-सम्पादक, सम्पादक, ऑनर्स, एमए, पिएचडी, केनहार अपनाकेँ मैथिलीक ठीकेदार बुझनाहर, दोसर लोकक गप्प कोना मानि लेता। लागल छथि सभकेँ सभ मैथिलीकेँ हिंदी टच देबैमे। जीवन होए वा साहित्य ई गप्प मानै बला छैक जे लोक गल्तीए कए कऽ आगू बढ़ैत छैक। मुदा ओइ लोक आ संस्थाक कि जे गल्तीओ करत, गल्तीकेँ मानबो नहि करत, आ बाजु तँ लड़बो करत, ई तँ ओहे गप्प भेल जकर लाठी तकरे भैंस मुदा एहिठाम गप्प भैंसक नहि छैक, एहिठाम गप्प एकटा प्राचीन, समृद्ध आ श्रेष्ठ भाषाक भविष्य आ एकरूपताक छैक। दुनियाँक सभ समृद्ध भाषामे एना देखल गेलैए जे आम बोलचाल आ साहित्य, शिक्षा वा सार्वजनिक भाषामे भेद पाएल जाइत छैक। आम बोलचाल आ प्रचलनमे बहुत सगरो छूट छैक वा बन्हँन केर आभाव छैक मुदा साहित्य, शिक्षा आ सार्वजानिक मंच हेतु ओहि भाषाक एकटा मानक रूपक प्रयोग कएल जाइत छैक। एहि तरहक अभाब मैथिलीक संगे किएक ? मैथिली साहित्यकार, सम्पादक, प्रकाशक मैथिलीक मानक रूपक प्रयोग किएक नहि करैत छथि। कतेको जन्मान्हर(ज्ञान रुपे) तँ सिखैक डरे एक्के बेर कहता, “चलू चलू अहाँ फलाँ-फलाँ ग्रुपसँ जुड़ल छी ई ओकर सबहक चर्च छै।“ यौ महराज ई चर्च अहाँ लगकेँ अनलक ई नहि देखि, ई देखू जे की अनलक। कनिक देखैक अपन नजरि बदलि लिअ तँ अहूँक विकास आ संगे संग भाषाक विकासक सेहो सम्भावना मुदा नहि हमर एकटा आँखि फूटेए तँ फूटेए तोहर दुनू फोरबौ। आ एहि फोरा फोरीमे ई किनको चिंता नहि जे ओहि माए बाबूक कि हाल जिनक करेजाक टुकरा अपन दुनू छी। मैथिलीमे एकरूपताक अभाब, इस्थीति, कारण आ निदानपर चर्चा करी तँ एकटा बेस मोटगर किताब बनि जाएत मुदा मैथिलीक अबरुद्ध विकास हेतु हमरा सभकेँ अपन अपन आँखि नै मुनि एहि चर्चाकेँ आगू बढ़ाबए परत। आ अति शीर्घ मैथिलीक वर्तमान पत्र-पत्रिकाक सम्पादक, प्रकाशक, साहित्यकार, लेखक आर कोनो सार्वजानिक मंचकेँ देखनिहार लोकनि सभकेँ मानक मैथिलीकेँ स्वीकार कए ओकरा आगू आनए परत नहि तँ ओ दिन दूर नहि जहिया हमर सबहक धिया पूरा एकरा इतिहासक पोथीमे पढ़त। मनुखक जीवन “बौआ पैघ भए कऽ अहाँ की बनब ?” “मनुख।” नेनाक एहि उत्तरपर चारूकात ठहाका पसरि गेल। मनुख ! मनुख तँ हम सभ छीहे, मनुख बनक बेगरता की ? मुदा नेनाक आखर ‘मनुख’हमर हृदयमे तऽर धरि धसि गेल। की आइ काल्हि हम मनुख, मनुख रहि गेलहुँ ? हमर सभक भीतर मनुखताक कोनो अवशेष एखनो बचल अछि ? मनुख की ? खाली मनुखक कोखिसँ जन्म लेने भऽ गेलहुँ ? जन्म लेलहुँ, नम्हर भेलहुँ, ब्याहदान भेल, दू चारिटा बच्चा जनमेलहुँ, ओकर लालन-पालन केलहुँ, बुढ़ भेलहुँ, मरि गेलहुँ, इहो जीवन कोनो मनुखक जीवन भेलै। आइ मरलहुँ काल्हि दुनियाँ तँ दुनियाँ १३ दिन बाद अप्पनो बिसरि गेल। मनुख जीवन तँ ओ भेल जेकर मृत्यु नहि हुए। मृत्यु देहक होइ छैक, कमसँ कम नामक मृत्यु तँ नहि होइ, नाम जीबैत रहै, ओ भेल मनुखक जीवन। बाबीक पिआर बेरुपहरकेँ चारि बाजि रहल छल। ओ दुनू भोरेसँ एहि गप्पपर चर्चा कए रहल छल कि हमर जनम दिनपर हमरा की उपहार देल जेए। नी० कोनो डिपार्टमेंट स्टोरसँ एकटा रिस्ट वाच देख कए आएल छल जेकर दाम अठारह सए रुपैया छल। मुदा ओकरा दुनू लग मात्र बारह सए रुपैया छलै। ओ दुनू हमरा नहि कहलक जे ओ हमरा ओहे रिस्ट वाच देबअ चाहैत अछि। बस हमरा एतबे कहलक जे ओकरा छह सए रुपैया चाही। “किएक।” “ई सरपराईज छैक, बस ई बुझि लिअ जे अहाँक जनमदिनक उपहार आनैक अछि।” “की आनब।” “इहे तँ सरपराईज छै, ओ तँ अहाँ देखे कऽ बुझब।” “अच्छा ! की लेबैक अछि ई छोरु, ई कहुँ अहाँ दुनू अप्पन-अप्पन जनम दिनक की उपहार लेब।” “किछु नहि।” “तहन तँ हमहूँ अहाँ सभसँ किछु नहि लेब, नहि तँ पहिले ई कहू जे अहाँ दुनूकेँ अप्पन-अप्पन जनम दिनपर की लेबैक मोन होइए।” “माए बाबूक संगे बाबीक पिआर।” “मने।” “मने बाबीकेँ गामसँ एहिठाम नेने आबू अओर हमरा सभकेँ किछु नहि चाही।” सत्य नारायण झा अरण्य देश अरण्य अर्थात वन देसक राजा सिंह एकटा गुफा मे परल अछि । गुफा अन्हार गुफ़ छैक ।एकेटा मुँह छैक ।अंदर बर डेरौन छैक ।हाथ हाथ नहि सुझैत छैक ।बेचारे सिंह के पैघ दुःख परलैक ।हजारों बरख सँ ओकर राज रहैक ।ओकर बाप –पुरखा अरण्य देसक राजा होयत आयल छलैक ।एखनो ओ ओहिना बलशाली अछि मुदा समय कतेक बदलि गेलैक जे ओकरा गुफा मे नुकाय परलैक आ छोटका पशु पक्षी अरण्य मे विचरण कय रहल छैक । आब ई दुःख वर्दास्त नहि होयत छैक ? एकबेर वन देसक सभ जीव बैसार केलक जे आब जमाना कतय सँ कतय पहुच गेलैक आ हमसभ एहि बाघ सिंह कए डरे परायल फिरैत छी ।सभ मिलि जौ आंदोलन करी तए ई मुट्ठी भरि हिंसक जीव हमरा सभ कए किछु नहि बिगारि सकैत अछि ।एकरा सबहक जनसंख्ये कतेक छैक ?बाघ ,सिंह ,चिता ,गैंडा,बनैयासूअर ,हाथी घोड़ा ,गीध ,चिल आदि बहुत कम संख्या मे अछि आ एम्हर विशाल जनसंख्या छैक । सिंह राजा कए घेर लेल जाय आ गद्दी पर सँ हटा देल जाय ।चुनाव मे जे जीते ओकर राज हेतैक ।आंदोलन प्रारम्भ भेल आ सिंह कए हटा देल गेलैक । चुनाव मे सिंह आ बाघ कए जमानत जब्त भ गेलैक । आब सिंहक डर केकरो नहि होयक।जवरदस्त मतदान भेलैक ।राजाक पार्टीक पैघ हारि भेलैक।सिंह सोचलक कनेके दिन मे मारि काटि क’ भगा देबैक मुदा से नहि भेलैक । नव मंत्री परिषदक गठन भेलैक । बादुर प्रधान मंत्री बनल आ बेंग राष्ट्रपति । विढ़नी रक्षा मंत्री आ कुकुर वित् मंत्री । मधुमखी गृह मंत्री आ गिदर सुचना –प्रसारण मंत्री । एहिना मंत्री परिषदक गठन भ’ गेलैक ।राज काज चलय लगलैक ।बाघ सिंह जहाँ झपटबाक कोशिश करैक कि एके बेर लाखो विढ़नी ,पचहिया आ मधुमाछी नाक ,मुँह आ कथीदनि मे ——लुधिक जाय आ सभ बाप बाप करैत भागे। बाघ –सिंह ततेक डेरा गेलैक जे केकरो दिस तकबो नहि करैक । बाघ –सिंह प्रधान मंत्री बादुर आओर राष्ट्रपति बेंग क’ चमचागिरी करय लगलैक । एक छत्र राज भ’ गेलैक । बाघ –सिंह ,चिता ,गेंडा,हाथी घोड़ा आदिक सभ सुबिधा हटा देल गेलैक । सिंह –बाघ भोरे उठि बादुर आ बेंग क’ चरण स्पर्श करैत छलैक ।बादुर आ बेंग अपन सुरक्षा मे कमांडो पचाहिया क’ रखने छल । बाघ –सिंह जखने भेट करय अबैक , लाखो कमांडो पचहिया बाघ –सिंहक उपर उड्य लगैत छलैक । निष्कंटक राज भ’ गेल छलैक । कतेको साल तक राज केलाक बाद जखन बरका जानवर –पक्षी सँ निश्चिन्त भ’ गेल तखन आब एकरा सभ क’ अपना मे झगड़ा होमय लगलैक ।कतेक जानवर पक्षी एक दोसर कए अपन ताकत देखबय लगलैक । मुस –छुछुन्दर ,कौआ ,बाज लोमरी ,भालू ,गधा आदि अपन अपन दाबा करय लगलैक । जाहि सँ बादुर आ बेंग कए बुझा गेलैक जे बेसी दिन राज नहि चलत । पुरा मंत्री परिषद सशंकित रहैत छल । सभ अपना अपना तरीका सँ खजाना लूटय लागल । एम्हर गिदर अपने त्रस्त रहैत छल । ओ सोचय ओकरा सँ बेसी शास्त्र के पढ़ने अछि ,ओ त’ कतेको बेर सिंहक महामंत्री रहि चुकल अछि । यैह ने केखनो क’ बाघ –सिंह ओकरो पर आक्रमण क’ दैत छलैक ,तै तए एहि दल मे ज्वाइनिंग देलियैक । मुदा एहिठाम तए ओहू सँ बिकराल स्थिति भए गेल छैक । हमर बेमातरे भाई कुकुर हरदम हर समय गुड़रि कए हमरा तकैत रहैत अछि । ओकरा डरे हम कैबिनेट मे ठीक सँ बाजि नहि पबैत छी । गिदर सभटा बात सिंह लग सूचित करय लगलैक । एम्हर सेहो सभ के सभ मे लड़बय लगलैक । आब अपने मे सभ लड़य लागल । एकदिन राष्ट्रपति बेंग बहुत हीरा जवाहरात लए पताल भागि गेलैक । बादुर खजाना लए राति मे भागि गेलैक । खजाना छोडि आर जे बचलै वित् मंत्री कुकुर चाटि गेलैक । पुरा अरण्य देस मे अराजकता पसरि गेलैक । लूट पाट मचि गेलैक । यैह मौकाक तलास मे हिंसक पशु छल । एके बेर चढाई क’ देलकै आ हजारों कए चिबा कए खा गेलैक । केकरो कियो मददि नहि केलकै । पुनः एक छत्र राज स्थापित भए गेलैक आ छोटका बहुत पशु पक्षी कए देस द्रोही घोषित कए प्रतिदिन हजारों कए मारि देल गेलैक |आब पुनः सिंह निष्कंटक राज क’ रहल अछि । विहनि कथा- जनक जनक मालिकक खेत मे हर जोतैत रहय |एक चास क’ नेने रहय|आब समरबाक रहैक |थाकि गेल छल |सुरुज भगवान सेहो माथ पर आबि गेल छलखिन |पहिने जलखइ क’ लैत छी तहन खेत क’ समारि देबैक |गहुँमक चिकसक रोटी ,नून आ मिरचाइ छलैक |जलखै करय लागल | जनक पल भरि लेल अतीत मे चलि गेल |जनक क’ एकटा बेटा भेल रहैक |मालिक बर प्रसन्न भेल रहथिन |छौड़ाक नाम मालिके शंकर रखलखिन |शंकर नमहर भेलैक त’ मालिक ओकरा पढ़ेबाक लेल गामक स्कूल मे नाम लिखा देलखिन |मालिक अपनो पढ़बै छलखिन |शंकर पढ़ैत गेलैक |मालिक ओकरा पढ़बै मे कनेको कोताही नहि केलखिन |बहुत खर्चा केलखिन |अंत मे शंकर कलक्टर भ’ गेलैक |ओ जतेक आगा पढ़ैत गेलैक ,जनक सँ दुर होयत गेलैक|एक दिन जनक सुनलकै जे शंकर कतौ बरके लोकक बेटी सं ब्याह क’ लेलकै | एक दिन मालिक कहलखिन ,जनक ,शंकर त’ कतौ ब्याह क’ लेलकौ आ तोरा नहि बजेलकौ |की करबिहिक बेटा छौक |जाकय आशीर्बाद द’ दहीन |जनक गेल मुदा दरबान अंदर नहि जाय देलकै |शंकर बाप क’ वरंडा पर सं देखलकै मुदा मुँह घुमा लेलकै | हँ, कनेक कालक बाद एकटा चपरासी अयलैक आ कहलकै ,तोरा साहेब बीस हजार टाका देलखुन अछि आ कहलखुन अछि जे एतय आव नहि आबय लेल |जनक बुझि गेलैक जे हमर बेटा आब पैघ लोक भ’ गेल अछि |कियैक त’ बाप क’ नहि चिन्ह्लकै|ओ बिना टाका क’ घूमि गेल |आब त’ १० -१५ बरख भ’ गेलैक |शंकर सं कोनो संपर्क नहि |बाप जिबै छै कि मरि गेलैक सेहो खोज करय नहि एलैक |मालिक सेहो मरि गेलखिन |जनक क’ फेर किछु याद परलैक |हँसी लागि गेलैक |शंकर जखन बच्चा मे पढ़ैत रहैक त’ पत्नी एक बेर कहने रहैक जे शंकर क’ पढाबह नहि ,बिगरि जेतय |मुदा ओकर बात नहि मानलियैक आ आइ एहन दिन देख’ परलैक| एकटा निःश्वास छोड़ि आकाश दिस देखलक आ उठि आधा रोटी दुनू बरद क’ खुआ आ लागनि पकरि हर जोत’ लागल | विहनि कथा- निशीथ अन्हार गुफ़ !हाथ हाथ नहि सुझैत छलैक |विजली कड़कैत छलैक |मेघ घटाटोप बन्हने छलैक \रातिक बारह बजैत रहैक |निशीथ घर सं बाहर भेलाह |घर बंद क’ ओ बिदा भ’ गेलाह |आब डरे कथीक ?जन्म भेलनि त’ माय मरि गेलखिन |कनेक पैघ भेलाह त’ बाप सेहो दुनिया छोरि चलि गेलखिन |कतेक संघर्ष क’ एम० ए० केलनि |तखने हुनका जीबन में निशा अयलखिन |कतेक स्नेह निशा सं भ’ गेलनि |एको पल हुनका बिना नहि रहि होयत छलनि |प्रेमक दुनिया मे ओ बिचरैत रहलाह |मुदा एके बेर जेना बज्रपात भ’ गेलनि |निशाक ब्याह हुनकर पिताजी कतौ ठीक क’ देलखिन |निशा सं भेट बंद भ’ गेलनि |फेर निशा नहि भेटलखिन |निशा लेल बताह जकाँ रहय लगलाह |मोन ब्यग्र रहय लगलनि |निशाक चलते ओ बर्बाद भ’ गेलाह |जीवनक सभ लक्ष्य खतम भ’ गेलनि |आइ० ए० एस० क’ सभ चांस लूज केलनि |की सोचैत छलौ आ की भ’ गेल ?आब एहि दुनिया में जीबि क’ की करब ?निशाक याद बिसरबाक लेल शराब सेहो पीबय लगलाह |मुदा दुःख बढ़ले जानि |एहि सं नीक जीबन लीला समाप्त क’ ली |एहन बिकाल समय मे पहुच गेलाह गंगा सेतु पर | आँखि मूनि सेतु पर सं कुदि परैत छथि मुदा ई की ?कोनों कोमल हाथक स्पर्श कुदबा सं रोकि देलकनि |विजली चमकलै |प्रकाश मे देखैत छथि निशा हुनकर हाथ पकरने ठाढ़ छथिन| बेचारा लोक --- पुरा देस शान्त अछि ।युद्धक बाद जेना शान्ति पसरि जाइत छैक तहिना एखन देस मे बुझा रहल छैक ।काल्हि ब्रह्मस्थान दिस जाइत रही त बाट पर मथा हाथ देने यार भेटल ,कहलियैक एना माथ पर हाथ देने की सोचैत छैं ?आब कथीक चिन्ता ? कमल छाप पर भोट देलही ,तू सभ जितबो केलें ।सरकारो बनि गेलौ ।महिस पर सँ सीधे बुलेट टेन पर चढ़बें ।आब त पौ बारह छौक ।कने काल चुप रहल ,फेर बाजल ,रौ तोरा सँ की छिपायब ।कमल छापक हम समर्थन त दैते आयल छियैक मुदा अटल, अडवाणी,जोशी सदृश नेता के ।हम कहियो मोदी ,जेटली आ नितिन एहन नेताक सपनो मे नहि सोचने रहियैक ।कांग्रेसिया सभ तेहन तेहन ने कुकर्म केलकै आ ततेक ने महगाइ बढ़ि गेलै जे एकेटा संकल्प केलौ जे एहि कांग्रेसिया सँ बरू कुकुर बानर के जिता दी ।सैह भेलै ।मुदा ई त कुकरो बानर के टपि गेल ।कहै छें तू जे बुलेट टेन !कहावत छैक पेट मे अन्न नहि आ मुँह मे पान ।सुनै काल्हि महराजी पोखरि मे मछहर रहैक ,हमहूँ दु किलो कए रोहु माछ अनलौ ।घर मे फरमाइस भेटल जे बजार सँ आधा किलो टमाटर ,एक किलो प्याजु आ बढियाँ चाउर एक किलो नेने आबय । कोनो तेहन फरमाइस नहि छल ।बजार गेलौ ,बर मुश्किल मे परि गेलौ ।एक सौ टका छल संग मे ।जखन भाव सुनलियैक त चकरी गुम भए गेल ।100 रु0 किलो टमाटर .60 रु0 प्याजु ,30-40 सँ कम कोनो तरकरी नहि बिकायत रहैक ।आधा किलो टमाचर पचास रु0 मे ,आधा किलो प्याजु तीस मे .आब बाचल 20 रु0 ।गेलौ किराना दूकान मे ,कोनो नीक चाउर 80 रु0 किलो सँ कम नहि ।आब कि करू से फुरेबे नहि करए ।ओना भए के कहलनि, नीक चाउर नेने आएब से नहि भए रहल अछि ।की कहती जे आहाँ केहन मनुख छी ।अन्त मे गेलौ मुन्नी लाल लग ,कहलियैक जे हमरा कोनो उपाय सँ 150 रु0 दैह ।हम दु दिन मे दए देबह ।ओहो जान पहचानक कोनो परबाहि नहि कय ओ कहलक जे पैसा त हम देब मुदा हर दिनक 20 रु0 सुदि देबए परत ।तेना कय समान सभ अनलौ ।बुलेट टेन पर के चढ़तै ,जे टमाटर नहि किन सकै छै से बुलेट टेन पर चढ़तै ।पुरा देस कए नीक नीक बात कहि ठकि लेलकै ।पुरा देस शान्त कोना नहि रहतैक ,अपन हारल आ बहुक मारल कियो कतौ बजै छै ?एहि राज मे धनीक आओर धनीक भए जेतै आ गरीब आओर गरीब ।यार चुप भए गेल ।यार के चुप देखि हमहूँ चुपे मे अपन भलाइ देखलौ । विहनि कथा- स्मृति स्निग्ध चाँदनी ।मधुमय चान।घटाटोप मेघ ।सितल बसात ,मेघ चान कए घेरबाक प्रयास मे मुदा सितल बायु मेघक सभ प्रयास कए निष्फल करैत मुदा अपने चान कए स्पर्श करबाक ताक मे । विद्यापतिक नख –शिखक वर्णनवाली नायिका सामनेक वर्थ पर आत्ममुग्ध मुदा टुकुर- टुकुर तकैत ।चोरनी चितवन सँ मोन कए आन्दोलित करैत ,ओहि चितवनक आक्रमण सँ चित मदान्ध भेल जाइत।ज्वार भाटा उठैत समुद्रक लहरि जकाँ पुरा देह मे हिलकोर मारैत । मद्रास एक्सप्रेस अपन पुरा रफ्तार सँ वातावरण कए चिरैत ,साँय साँय करैत जा रहल छल ।चान कए देखि मोन मे कतेक तरंग उत्पन होयब स्वभाविक ।खिड़की खोलि बाहरी चाँद दिस तकैत छी मुदा ओहि मे ओ स्निग्धता कतए ?मद्धिम चाँदनी आ मुरझाएल चान ।एकदम फीका ।तावे प्राकृतिक पवनक प्रवेश ,तै आँचर विलोपित आ उनमुक्त मदन हुलकी मारैत ।कटि प्रदेश दिगम्बर ।कर कमल सँ चिकुर कए आवेशित करैत मुदा हिरणी जकाँ चितवन घुमबैत जे बरू केकरो दृष्टिगोचर त ने भेलैक ? मुदा केकरो माने की ? भुवनेश्वर,वाल्टियर ,विजयवारा आ मद्रास सेन्ट्रल स्टेशन, गाड़ी धुकुर धुकुर करैत ठाढ़ भेल ।हमरो नीन्द टुटल ।ने आगु नाथ ने पाछु पाघा,ने ओ नगरी ने ओ ठाँव ।झमान भए खसलौ ।धत् तोरी के ? गाड़ी सँ मुँह विधुओने उतरि गेलौ । लक्ष्‍मी दास गंगाजलक धोल सहदेव काकाकेँ गामे कि‍छु गोरे सहदेवकाका कहै छन्‍हि‍ तँ कि‍छु गोरे फटहाकाका सेहो कहै छन्‍हि‍। कि‍छु गोरे सहदेव भैया कहै छन्‍हि‍ तँ कि‍छु गोरे फटहाभैया सेहो कहै छन्‍हि‍। मुदा हमर ने कि‍छु कहि‍यो बि‍गाड़लनि‍ आ ने नीके केलनि‍ तँए हम सहदेव कके कहै छि‍यनि‍। अहाँ कहब जे लोकक एकहरी नाओं होइ छै हुनकर कि‍ए दोहरी छन्‍हि‍? दोहरीक कारण अछि‍ जे जे घटि‍या काज सहदेव काका अपने करै छथि‍ ओही काजले दोसरकेँ रेड़बो करै छथि‍न आ आँखि‍क पानि‍योँ उतारि‍ दइ छथि‍न। ओना केते गोरे एहनो छथि‍ जे अपनो सहदेव कक्काक केलहा काज लोके लग उगलि‍ दुसबो करै छन्‍हि‍ आ फटहो कहै छन्‍हि‍। मुदा जहि‍ना गर्दखोर अपन गरदा झाड़ि‍ फ्रेश भऽ जाइए तहि‍ना अपन गरदा झाड़ि‍ सहदेवो काका फ्रेश भऽ जाइ छथि‍। आइ सहदेव काका केकर मुँह देखि‍ ओछाइन छोड़ने छला केकर नै, भोरे-भोर दुनू परानीमे झगड़ा बझि‍ गेलनि‍। खि‍सि‍या कऽ अलोधनी काकी आगूमे थूक फेकि‍ कहलकनि‍- “अहाँ पुरुख छी आकि‍ पुरुखक झड़ छी?” पत्नीक समुचि‍त उत्तर दऽ सहदेव काका भरि‍ दि‍नका जतरा दुइर नै करए चाहै छला, मुदा झगड़ा बेर चुपो रहब हारि‍ मानब बूझि‍ बजला- “अहाँ कहने जँ हम पुरुखक झड़ छी तँ अहूँ तँ झड़क झरनि‍येँ ने भेलौं।” सहदेव कक्काक बात जेना अलोधनी काकीकेँ रब-रबा कऽ छूबि‍ लेलकनि‍। जहि‍ना कुकुर कटौजमे दाँतसँ पकड़ा-पकड़ी करैत घीचा-तीरी करए लगैए तहि‍ना काकी बजली- “गामक लोक जे फटका कहैए, से कोनो झूठ कहैए। अहाँकेँ ने कोनो काजक ठेकान अछि‍ आ ने कोनो बातक ठेकान अछि‍।” जेना लंकामे अग्‍नि‍वाणकेँ रोकल गेल, तहि‍ना सहदेव काका अलोधनी काकीक अगि‍याएल बोलकेँ रोकेत बजला-  “कथी ले अनेरे अपने मुहेँ दोखी बनै छी, एतबो ने बुझै छि‍ऐ जे हमरा फटहा कहैए ओ कि‍ अहाँकेँ फटही नै कहत।” अपन हूसैत वाणकेँ देखि‍ काकी पाशा बदलि‍ बजली- “लोक दुसैए, तेकर लाज नै होइए?” जेना ठोरक बरी पकै छै तहि‍ना काका पकबैत बजला- “जे दुसत से पहि‍ने अपन घरवालीकेँ पुइछ‍ लि‍अ जे अपने केते गंगाजलक धोल छी।” गौरी शंकर साह- गाम+पोस्‍ट- तुलापत गंज, थाना- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, (बि‍हार), पि‍न- 847109 छोटकी छोटकी दलानपर कबड्डी-कबड्डी खेलि‍ रहल छेली, छोटकी जइ दि‍शा रहै छेली ओकर पक्का जीतबाक गारंटी रहै छल, एतेक चुस्‍त, दुरुस्‍त आ फुर्ति कोनो लड़कीकेँ नै छल। अखनि‍ धरि‍ चारि‍टा केँ माइर देने छेली आ जीतैबला छेली, जहि‍ना छोटकी खेलैमे नम्‍बर एक तहि‍ना पढ़ैमे सेहो एक नम्‍बर छेली, समैसँ दस मि‍नट पहि‍ने स्‍कूल चलि‍ जाइ छेली, स्‍कूलमे सभसँ आगाँक ब्रेंचपर बैसै छेली, जँ कोनो दि‍न कि‍यो लड़की ओकरा जगहपर बैसि‍ रहैत तँ बि‍ना उठौने नै मानैत, हुनका माथामे रहनि‍ जे पाछूमे भूसकोल बैसैत अछि‍ आ हम कोनो भूसकोल छी, तखनि‍ पाछूमे कि‍ए बैसब, बड़ नीक सोच छेलनि‍ छोटकीक। अपनासँ बड़का-बड़काकेँ समस्‍यासँ केतेको बेर छोड़ौने रहथि‍।  छोटकीकेँ नीक जकाँ बूझल छेलनि‍ जे सभ आदमीकेँ कपारमे मासु आ हड्डी रहै छै मुदा लोक अपन सोचक कारण डाक्‍टर बनि‍ जाइ छै आ अपना सोचेक कारण चपरासीओ नै बनि‍ पबै छै, छोटकी तँए हरि‍दम अपन सोच नीक बनबैले स्‍कूलक पुस्‍तकालयसँ महान-महान आदमीक कि‍ताब लऽ टि‍फि‍नमे पढ़ि‍ आपस कऽ दइ छेली। हुनक बेवहार सेहो बड़ नीक रहनि‍, जइ कारणेँ स्‍कूलक सर, मैडम सेहो बड़ मानैत रहथि‍न। ईहो एकटा ओकरा लेल रामवाणक काज करै छल। जखनि‍ छोटकी कबड्डी-कबड्डी खेलैत रहथि‍ तखने छोटकीक बहि‍न रूबी स्‍कूलसँ गामपर एली, रूबीक मन उदास देखि‍ छोटकी सेहो उदास भऽ गेली। छोटकी आ रूबी सहोदर बहि‍न। दुनूमे बड़ मि‍लान, एतेक मि‍लान शाइते आइ धरि‍ कि‍यो एक दोसरमे झगड़ैत देखने हेतै। घरक सभ काज दुनू बहि‍न मि‍लि-जुलि‍ कऽ करि‍ लैत छेली। रूबी भोरे-भोरे घर बहारैत तँ छोटकी बरतन माँजि‍ लैत छेली। भारीसँ भारी काज चुटकीमे कऽ लैत छेली। दुनू बहि‍न, छोटकी आठमामे पढ़ै छल, आ रूबी इण्‍टरमे छल, छोटकी एतेक चन्‍सगर छल तँ ओइमे रूबीक सेहो सहयोग छेलै। रूबी छोटकीकेँ सभ सबाल बता दइ छल। की सबाल की अछि‍ आ एकरा केना बनौल जेतै, एतेक नीक जकाँ तँ छोटकीकेँ स्‍कूलोक सर नै बता दइ छेलनि‍। छोटकी रूबीकेँ उदास देखि‍ पुछलक- “दीदी, अहाँ उदास कि‍ए छी। बड़ फि‍रि‍सान लगै छी। की भऽ गेल अहाँकेँ, बाजू। नै बाजब तँ हम बुझबै केना।” रूबीकेँ छोटकीक जि‍ज्ञासा देखल नै गेलै, रूबी बाजल- “आइ फेरो ने जाति‍, ने अवासीय आ ने आय प्रमाण पत्र भेटल, पता नै की हेतै, जँ काल्हि‍ तक नै भेटत तखनि‍ तँ हम छात्रवृत्ति‍ लेल आवेदन नै कऽ सकै छी। आ नहि‍येँ हमर बैंकमे खाता खुगि‍ सकत।” छोटकी बि‍च्‍चेमे रूबीक बात कटैत बाजलि‍- “दीपाक बहि‍न तँ तोरा बाद जाति‍, अवासीय, आय प्रमाण पत्रक लेल आवेदन जमा केने छेलै, ओकर सबहक तँ बनि‍ गेलै, तखनि‍ अहाँकेँ कि‍ए ने बनल दीदी?” रूबी बाजलि‍- “छोटकी अखनि‍ बड़ छोट छी, दुनि‍याँदारी तों नै बुझबीही, केना दुनि‍याँ जलैत अछि‍। दीपाकेँ समैसँ पहि‍ने ऐ दुआरे भेट गेलै, कि‍एक तँ ओकर भाए जे ई कागज-पत्तर सभ बनबै छै तेकरा दू सए टाका देने छेलै, आ टाकाबलाकेँ तँ पहि‍ने काज होइ छै। कहबी कोनो बेजए नै अछि‍ जे बाप बड़ा ने भैया सबसँ बड़ा रूपैआ।” कहि‍ रूबी चुप भऽ गेल। छोटकी कि‍छु सोचए लगल। आ फेर बाजल- “सरकार तँ कहै छै जे घूस लेनाइ कानूनन अपराध छै, तखनि‍ ई सभ एना कि‍ए करै छै, कहबा लेल कहै छै की ई लोक सेवाक अधि‍कार छै मुदा हमरा लगि‍ रहल अछि‍ जे ई लोभ सेवाक अधि‍कार छै। टाकाक कारणेँ आदमी कि‍छु कऽ सकैए। मुदा दीदी हमरा एगो बात कहू तँ प्रमाण पत्र बनबैबला सभ केना बूझि‍ जाइ छै जे के टाका देने अछि‍ आ के नै देने अछि‍?” रूबी बाजलि‍-  “कि‍यो कहैत छेलए जे जखनि‍ कि‍यो आवेदक आवेदन करै छै तँ ओ अपना जेबीमे रखल पुर्जीमे ओकर नाओं आ आेवदन क्रमांक नोट कऽ लइ छै आ सभसँ पहि‍ने ओकरे प्रमाण पत्र बना छै।” छोटकी बाजलि‍- “आ जे पैसा नै दइ छै तेकर की होइ छै।” रूबी- “तेकर की होइ छै, तेकर आवेदनक कोनो माए-बाप नै होइ छै, केतौ फेकि‍ दइ छै, ओइपर कोनो धि‍यान नै दइ छै आ एमहर आवेदक दौगैत-दौगैत तबाह भऽ जाइ छै तखनो नै कोनो असर पड़ै छै, केतबो लोक कहै छै तेकर कोनो परभाब नै पड़ै छै। आवेदककेँ कुकुर बूझि‍ लैत छै आ बीस दि‍न दौगबबैत रहै छै जेना हम दस दि‍नसँ दौग रहल छी।” छोटकीकेँ सुनि‍ बड़ तामस उठलै, छोटकी रूबीकेँ कहलक- “तोहर कागज काल्हि‍ बनि‍ जेतौ, कोनो हालमे चाहे काल्हि‍ सुरूज उगै आकि‍ नै उगै, हवा बहै आकि‍ नै बहै, काल्हि‍ अहाँकेँ कागज हर हालति‍मे बनबाक छै चाहै कि‍छु भऽ जाइ।” “से केना हेतै।” रूबी बाजलि‍। तैपर छोटकी बाजल- “से हम काल्हि‍ कहब, अखनि‍ चलू मुँह-हाथ धोइ कऽ कि‍छु खा लि‍अ फेर भि‍नसर ऐपर बात हेतै।” छोटकी ऐ स्‍टाइलमे कहलक जे रूबीकेँ हँसी आबि‍ गेलै आ छोटकी हँसए लगल। दुनू बहि‍न अँगना गेल आ एके थारीमे बैस दुनू खए लगल। भि‍नसर भेल दुनू बहि‍न प्रखण्‍डपर पहुँचल। छोटकी रूबीकेँ बाहरे ठाढ़ कऽ अन्‍दर गेल। फेर पाँच मि‍नटक पछाति‍ बाहर आएल आ रूबीकेँ कहलक- “दीदी, अहाँ अहीठाम बैसू हम चट्टे अबै छी।” रूबी कि‍छु ने बाजल। ओतइ बैस गेल। अदहा घंटा भेल, तखने एकाएक तीन-चारि‍टा गाड़ी प्रखण्‍डक मैदानमे आबि‍ लागि‍ गेल। गाड़ी देखि‍ कऽ सभ कर्मचारी सभकेँ होश उड़ि‍ गेलै, सभ अपन-अपन काजमे दनदुरुस्‍तीसँ लगि‍ गेल। गाड़ी एस.डी.ओ.क छेलै। एस.डी.ओ. सीधे ओही कार्यालयमे गेला जैठाम जाति, आय, आवासीय कागज सभ बनैत अछि‍। एस.डी.ओ. घूमि‍-घूमि‍ कऽ सभटा देखए लगला, जेना कि‍छु हराएल चीज ताकि‍ रहल छथि‍। ओइठाम जेतेक कर्मचारी छेलै, सबहक होश उड़ल छल। तखने एस.डी.ओ. साहैब पुछलखि‍न- “रमण के छी?” ओहीठाम ठाढ़ एकटा कर्मचारी बाजल- “हम छी सर।” कर्मचारी हाकि‍म लग आबि‍ कऽ ठाढ़ भेल, हाकि‍म ओकर जेबीक तलासी लेलक। ओकरा जेबीसँ दू सए रूपैआ नि‍कलल, हाकि‍म अपन जेबसँ पुर्जी नि‍कालि‍, रूपैआक नम्‍बर अपना पुर्जीपर उतारलक। नम्‍बरसँ मि‍लौलक, सभटा नम्‍बर मि‍लि‍ गेलै। हाकि‍म एक झापड़ कर्मचारीकेँ लगौलक। झापड़ कसबर छल, लगि‍ते कर्मचारी नि‍च्‍चाँमे खसि‍ पड़ल। एस.डी.ओ. बजला- “ई पैसा कहाँ से आया?” कर्मचारी डरसँ बाजल- “सर घरसँ लाए थे।” एस.डी.ओ.केँ तामस उठि‍ गेलनि‍ फेर एक झापड़ कर्मचारीकेँ लगा देलखि‍न। तखनि‍ कर्मचारी मुँह खोललक आ सभटा खि‍स्‍सा कहलक। एस.डी.ओ. तुरंत छोटकीकेँ बजौजलक आ कर्मचारीकेँ कहलखि‍न- “आइ बारह बजे तक रूबी का प्रमाण पत्र बना कर देना।” कहि‍ एस.डी.ओ. साहैब चलि‍ गेला। एमहर छोटकी तीनो प्रमाण पत्र लेबाक लेल बैसि‍ रहल। तखने एकटा कर्मचारी रूबी कुमारी, रूबी कुमारी कहैत अबाज लगेलक। छोटकी तुरंते रूबीकेँ लऽ ओतए पहुँचल आ रजि‍ष्‍टरपर शाइन कऽ कागज लऽ वि‍दा भेल। रूबीकेँ कि‍छु नै फुड़ाइ छेलै। हम दस दि‍नसँ दौगै छेलौं मुदा हमरा नै भेटल आ छोटकी केना एके दि‍नमे काज सलटि‍आ लेलक। रूबीकेँ रहल नै गेलै। छोटकीसँ पुछलक- “आँइ गे तों केना एक्के दि‍नमे कागज बनबा देलँह। तोरा लग कोन एहेन जादूक छड़ी छौ।” रूबीक गप सुनि‍ छोटकीकेँ हँसी लगि‍ गेलै। ओ फरि‍छा कऽ रूबीकेँ कहए लगलै- “देखू, काल्हि‍ जखनि‍ अहाँ कहलौं जे टाका देलासँ काज भऽ जाइ छै तखनि‍ हम अपना डायरीमे दू सए टाका जाइ समए नि‍कालि‍ लेलि‍ऐ आ जेते कोनो नम्‍बर छेलै तेकरा एकटा कागजपर उतारि‍ लेलि‍ऐ, जखनि‍ हम अहाँकेँ ठाढ़ कऽ कर्मचारी लग गेलौं तँ हम ओकरा अहाँक आवेदनक क्रमांक देलि‍ऐ आ दू सए टाका सेहो देलि‍ऐ। ओ एको बेर आँइओं ने केलक हम ओकर नाओं सेहो ओकरासँ पुछि‍ लेिलऐ, तेकर बाद हम अहाँकेँ चट्टे अबै छी कहैत सीधे एस.डी.ओ. लग गेलौं आ हुनका सभटा बात कहि‍ देलयनि‍। हुनका बि‍सवासे ने भेलनि‍ हमर गपक। कि‍एक तँ हम देखैमे धि‍या-पुता लगैत लगलि‍यनि‍‍। तखनि‍ हम नोटक नम्‍बर जे नोट केने रहि‍ऐ से पुर्जा देलि‍यनि‍ आ हुनका कहलि‍यनि‍ जे अगर हमर आरोप गलत होइ तँ हमरा जेल अहाँ सेहो पठा सकै छी, हमर गप सुनि‍ हुनका हमरापर पूर्ण बि‍सवास भऽ गेलनि‍ आ तुरंते उठि‍ कऽ तीन-चारि‍टा हाकि‍मकेँ बजा संगमे लऽ प्रखण्‍ड कार्यालयपर पहुँचला। आ छापा मारलखि‍न। हमर गप सत् भेलनि‍ बाँत अहाँक आगूऐमे घटल।” रूबी बाजलि‍- “छोटकी तों एतेक तेज छेँ से हम नै बुझैत रही।” छोटकी बाजलि‍- “सभटा अहींक असि‍रवाद अछि‍ दीदी।” दुनू बहि‍न हँसए लगल। भोरे-भोर सबेर भने पेपरमे आएल छल जे घूसखोर रमणकेँ एस.डी.ओ. द्वारा नि‍लंम्‍बि‍त कऽ देल गेल। आ स्‍वतंत्रता दि‍वसक अवसरि‍पर म.वि‍.खड़ौआमे पढ़ैत छोटकीकेँ एस.डी.ओ. द्वारा घूसखोरकेँ पकड़ेबा लेल सम्‍मानि‍त कएल जाएत। भरि‍ खड़ौआक लोक छोटकीक गुणगान करए लगला। डॉ. शिव कुमार प्रसाद- सखारी-पेटारी केर तानी-भरनी आधुनिक मैथिली कथा साहित्‍यमे नब-नब कथाकार नब-नब कथाक रचनामे संलग्‍न छथि। हुनक प्रयास निश्चित रूपे मैथिली कथाक संख्‍यात्‍म  विस्‍तार हेतु सराहनीय छन्‍हि। मुदा मात्र संख्‍यात्‍मक विस्‍तारसँ साहित्‍यक सागरक गहराइकेँ विस्‍तार नै भऽ सकैत अछि। जहिना बाढ़िक पानिसँ धारक दुनू कात दूर-दूर तक धारक विस्‍तार बुझना जाइत रहै छै, मुदा बाढ़ि सटकिते धारक सत्‍यप्रकट भऽ जाइ छै तहिना साहित्‍योमे होइ छै। कथा एहेन हेबा चाही जाहिमे भाषा-भावक ताल-मेलक संगे-संग कथामे जीवंतता आ दीर्घजीवी होइक तथ्‍य समाहित होइ। मात्र आधुनिकताक चोला पहिरा देला मात्रसँ कोनो कथा जीवित नै रहि सकैत अछि। शब्‍दाडम्‍बर कथा नै होइ छै। नीक आ दीर्घजीवन हेतु कथामे विविध तत्‍वक समावेशकसंगे-संग मानव जीवनक जीजिविषाक प्रखरबिम्‍ब आ प्रतीक आवश्‍यक होइ छै। कथामे जौं जीव-जगतक गहनतम गहराइ नै रहै छै तँ ओ कथा बहुत समए धरि जीवित नै रहि सकैए। मैथिलीमे आइ कथाक अनेक नाआें देल जा रहल अछि- दीर्घ कथा, लघु कथा, विहनि कथा इत्‍यादि। मात्र नाआें रखि देलासँ कथा जीवित नै रहि सकैत अछि। अदौसँ आइ धरि वएह कथा जीवित अछि जइमे धार छै। जइमे गति छै। जइमे जिनगीक उहापोह छै। जइमे यथार्थ छै आ कल्‍पनाक एहेन गठन छै जेकरा पाठक छोड़ितो छोड़ि नै पबैत अछि। ऐ दृष्‍टिए हम नन्‍द विलास रायक “सखारी-पेटारी”क तानी-भरनीपर विचार करबाक प्रयास करब। ‘सखारी-पेटारी’ िहनक पहिल कथा कृति छियनि। पहिल-पहिल कोनो काज करैमे कोनो ने कोनो त्रुटि हएब आश्चर्य नै। तैयो साहित्‍य  सृजनक सरोकारकेँ देखैत हमर प्रयास रहत जे ऐ संग्रहक नीक-नीक कथाक समीक्षा नीक होइ आ सामान्‍य भावक कथाक फराक कऽ आगूसँ लेखक अपन कथामे आवश्‍यकतानुसार सुधारक प्रयास करबा हेतु धियान रखथि। आब हम श्री नन्‍द विलास राय जीक कथा ‘सखारी-पेटारी’केँ सोझामे रखि खोलबाक कोशिश करब। ‘सखारी-पेटारी’केँ खोलैक काज तँ जनीजातिक छेलनि। साँठब सेहो हुनके सबहक काज छेलनि। आइओ साँठ-उसार करब हुनके अधीन छन्‍हि। मुदा पुरुख आब बुझू तँ अदहा जनानीए भऽ गेला। साँठ-उसारमे आब हुनक भूमिका अहम भऽ गेलनि अछि। की कहू! सभटा समैक खेल छिऐ। आब देखू ने, श्री नन्‍द विलास राय पुरुख छथि मुदा ‘सखारी-पेटारी’ साँठि कऽ हमरा पकड़ा देला। हमहूँ पुरुखे। केते दिन धरि सोचैत रहलौं जे ऐ पेटारीकेँ कोनो जनानीएसँ खोलबएब मुदा ओहेन जनाना ताकब केतए। सखारी-पेटारीमे साँठल बौसक सनोमानो तँ कोनो बूढ़े-पुरान ने बुझै छै। थाकि-हारि कऽ पुरुखक साँठल सखारी-पेटारीकेँ अपनेसँ खोलैले तैयार भऽ गेलौं। आब एकटा दिक्कत भऽ गेल। सखारी आ पेटारी जौं अलग-अलग रहितए तब ने बेरा-बेरी खोिलतिऐ। दुनू एक्केमे अछि। चलू सखारी-पेटारीक जगह तँ आब ट्रंक लऽ लेलक। आब ओइमे सँ हम एक सभ समान अलग-अलग करबाक कोशिश करै छी। अपने मने गिरथानि बनैक कोशिशमे आब जे हएत से देखल जेतै। सखारी खुलल। देखू केतेक नीक बौस छै अइमे। समस्‍त  मिथिलावासी एवं मैथिली भाषा-भाषीकेँ समरपित। ठीक बात। यौ, सखारीमे जे समान अबै छै, ओ मात्र घरवारीए सभ समान नै ने रखि लइ छथिन। चाउर, दालि, तरकारी, अदौड़ी, दनौड़ी, करुतेल इत्‍यादिसँ कनियाँक अबैक खुशीमे भोज-भात होइ छै। सौंसे गौआँ मिलि कऽ बर-कनियाँकेँ आशीष दैत खाइ छै। मुदा ओइ महक काजर, तेल, डोरि, फित्ता आ ककही इत्‍यादिक बड़ काज। कनियाँ देखए बूढ़-पुरानसँ लऽ कऽ नेना-भुटका तक जे अबैए, सभकेँ कनियाँ अपने हाथे केशमे तेल दऽ ओकरा झाड़ि कऽ ककहै छथिन। ककहि कऽ डोरि वा फित्तासँ बान्‍हि  काजर-सिनुर लगबै छथिन। अगर पेटारीवाली कनियाँ से नै करथिन तँ हुनका भरदुलाहि कहतनि। राय जीक सखारी-पेटारीक समर्पण हमरा मोहि लेलक। हमरा लगैत अछि जे सभ मैथिलकेँ ई पाँति जरूर मोहत। चलू, आब चलै छी जे सखारी-पेटारीमे कोन-कोन तरहक वस्‍तु-जात अछि। यौ, ‘अप्‍पन-बात’मे तँ सखारी-पेटारीक वस्‍तु-जातक कोनो चर्चे ने छै। खाली आत्‍मेकथा आ समर्पण भरल अछि। यौ रायजी, आब बिआहे संग दुरागमन होइ छै। अहाँ तैयो पछुआ गेलौं। लगैए अहाँक बिआह-दुरागमन दू बेर भेल अछि। चलू- दरब-जात संग हम सर-समान तँ खोलए लेब। मुदा सखारीक दोसर झँपना खोलए पड़त। खुलि गेल। एकसत्तरि। वाह...। आब तँ एके संग दरबजात-वस्‍तुजात आ सिनुर-टिकुली सभटा चमकए लगल। चलू, देरीसँ एलौं मुदा दुरूश एलौं। सोइरी छछारब, निपुतराहा, जाति-पाति, वाड़ीक पटुआ आ बाबाधाम- ऐ संग्रहक उत्तम श्रेणीक कथा अछि। आब हम सोइरी छछारैत बाबा धामक यात्रापर चलै छी। बीचमे निपुतराहा, जाति-पाति आ वाड़ीक पटुआ सन कथापर अँटकैत ऐ यात्राकेँ विश्राम देब। ई पाँचो कथा सखारी-पेटारीक विशेष लक्षणसँ युक्‍त अछि। लक्षणा आ व्‍यंजना शब्‍द शक्‍तिसँ युक्‍त पाँचो कथा पाठककेँ कल्‍पना लोकसँ उतारि कऽ यथार्थक धरतीपर उतारैमे सक्षम अछि। मैथिल समाजक पारिवारिक-परिवेश आ तइमे धनक पाछू दौड़ैवाली नारी समाजक सोचपर सोइरी छछारब कथा करारा प्रहार करैत अछि। मालती आ ललिताक जन्‍मासौचक पश्चात सोइरी छछारैले जे परिस्‍थिति बनल अछि ओ मिथिलाक मध्‍यवर्गीय परिवारक यर्थाथ अछि। ऐ कथामे रीनाकेँ उपस्‍थित कऽ कथाकार बहुत होशियारीसँ कथाकेँ अन्‍तिम लक्ष्‍य तक पहुँचा देला अछि। जइ घरमे रीनानै रहै छै तैठाम विवश भऽ कऽ ललिता सन बेटीक सोइरी माइएकेँ छछारैले बाध्‍य हुअए पड़ै छै। मैथिल परिवारमे ललिता ऐ परिस्‍थितिकेँ भोगैत अखनौं जीबए लेल मजबूर अछि। ऐ कथाक व्‍यंग्‍य निश्चित रूपसँ पाठकक संग-संग भौजाइ लोकनिकेँ झमारबामे सक्षम अछि। सोइरी छछारबसँ निकलि हम जाति-पाति कथाक यथार्थपर अबै छी। मैथिल समाजक पतनक एकटा सभसँ महतपूर्ण कारण जाति-पातिक भेद-भाव सेहो अछि। तथाकथित बुधिजीवी समाजसँ लऽ कऽ श्रवजीवी समाज धरि जाति-पातिक रोग ऐ प्रकार पसरल अछि जे एकर निदान कैंसर आ एड्स विमारीक इलाजसँ अधिक कठिन अछि। कथाकार नुनुबाबूक चरित्रक मादे स्‍पष्‍ट कऽ देलनि जे जे समाजमे कोनो जातिक बेकती नुनुबाबूक उपकारसँ बाँचल नै अछि। ग्राम-पंचायतक प्रमुखक जे काज होइ छै तहूसँ अधिक नुनुबाबू समाज लेल कऽ रहल छथि। मुदा गामक जातिवादक समक्ष नुनुबाबू सन बेकती ताबत धरि नै चुनल जेता ताबे तक मैथिल समाजक माथमे जे जातिक कुण्‍ठाक भुस भरल रहल। आ जाधरि ओकरा बुधिकेँ आड़ीसँ चीरि कऽ विवेकक चुट्टासँ निकालि कऽ फेकल नै जाएत। ‘वाड़ीक-पटुआ’ ठीके बड़ तीत होइ छै। डाक्‍टर प्रमोद सन पटुआ तीत नै हेतै तँ फेर ई कहाबत किए बनतै। मंगनूबाबू असगरे एहेन बेकती नै छथि। जे सहज सुलभ होइत छै ओ निश्चित रूपे लोककेँ तीत लगै छै बरू ओ मिश्रीओसँ मीठ किएक ने होउ। लेखक निश्चित रूपे ऐ कथाक माध्‍यमसँ मंगनूबाबू सन लोकक मुँहक संग मनकेँ तीत करबामे सक्षम अछि। अटकैत-फटकैत बाबाधाम लग आबिए गेलौं। माए-बापक सेवा केने की हेतै। माल पोसने दूटा टका आ मनुख पोसने दूटा कथा ओहिना नै कहल गेल अछि। आन समाजक संगे-संग मैिथल समाजक स्‍थिति दारूण भेल जाइत अछि। ‘जिन मातु पिता की सेवा की’ (जे माए-बापक सेवा केला) केर भावना आइ मरल जा रहल अछि। आइ मैथिल समाजमे बाबाधाम जेबाक होड़ लागल रहैत अछि। बानरक देखा-देखीबला भावसँ भरल हेंजक-हेंज स्‍त्री-पुखख नब-नब वस्‍त्र आ तेहने आँखिक भावसँ भरल जखनि गामसँ विदा होइत अछि तँ हमरा सन मुरूख देखिते रहि जाइत छी। माए-बाप आ सासु-ससुरसँ भीन भऽ वृद्ध जनकेँ उपेक्षा करैत आजुक पीढ़ी नीचताक रस्‍तापर ऐ तरहेँ बढ़ि रहल अछि जे सुकनाक बाबू आ माए सन हजारो माता-पिता आइ पछताइत बाजि रहल अछि- जतने जतेक हम पाप बटोरल मिलि-मिलि परिजन खाय मरनक बेर हरि क्‍यो नहि पूछलि एक करम संग जाय। उपर्युक्‍त पाँचो कथा अपन स्‍वरूप विस्‍तारक संगे-संग संवाद, पात्र योजना, परिवेश, भाषा शैली एवं उदेसक कसौटीपर कसल बुझना जाइत अछि। पाँचो कथाक शीर्षक सेहो आकर्षक एवं विषय-वस्‍तुक अनुरूप अछि। मैथिल समाजक विविध विडम्‍बनाक उपर्युक्‍त पाँचो कथा साक्षी अछि। आधुनिक व्‍यंग्‍य विधाक कथामे उपर्युक्‍त कथा जगह पबैक अधिकारी अछि। ‘सखारी-पेटारी’क छह गोट कथा आधुनिक समाजक पतनोन्‍मुख भाव-धाराकेँ रेखांकित करबाक प्रयास बुझना जाइत अछि। ‘डाक्‍टर बेटा’, ‘प्रोफेसर बेटा’,‘डिब्‍बाबला दूध, ‘सोच, ‘भोँट, आ ‘ऐना’ कथामे एक कात माता-पिताक प्रति उपेक्षा अछि तँ दोसर कात सन्‍तानक प्रति उपेक्षा। ‘सोच’, ‘भोँट’ आ ‘ऐना’मे एक कात विकास हेतु छटपटाहटि, तँ दोसर दिस समाजमे व्‍याप्‍त संकुचित मानसिकता। मध्‍यवर्गीय समाजमे डाक्‍टर आ प्रोफेसर बनल बेक्‍तीकेँ परिवारक प्रति उपेक्षा पारिवारिक सिनेह आ समरसताकेँ क्षिण्‍ण-भिन्न करैबला मानसिकतसँ मानवता मरत। आधुनिक नारी शारीरिक सौन्‍दर्य बँचबैले सन्‍तानकेँ स्‍तनपान करैसँ कटब मातृत्‍वक प्रति उपेक्षाकेँ प्रदर्शित करैत अछि। ‘सोच’ कथामे प्राद्योगिकी शिक्षाक प्रति युवाकेँ बढ़ेबाक प्रयास छै। ‘भोँट’ आ ‘ऐना’ मनुखक आँखि खोलैक प्रयास अछि। ऐ छबो कहानीमे छोट अकारमे अनेक विषयकेँ उठौल गेल अछि। मुदा ऐ कथा सभमे ऊपरका कहानी सन भाषामे धार नै बुझना जाइत अछि। कथाक शीर्षक आकर्षक एवं विषय-वस्‍तुक अनुकूल हेबाक चाही। ‘ऐना’आ ‘सोच’ शीर्षक तँ आकर्षक एवं विषयानुकूल अछि। शेष चारि गोट कथाक शीर्षक हमरा बुझने कमजोर अछि। नन्‍द विलास रायक सखारी-पेटारीमे दू गोट कथा जनता आ सरकारी तंत्रक आँखि मुनौबलिपर आधारित अछि। लेखक दुनू कथाक माध्‍यमसँ सरकारी क्रिया-कलाप आ गाम-गाममे सरकारी सहायताकेँ बन्‍दर-बाँटक आद्यान्‍त वर्णन करबाक प्रयास केला अछि। प्रयासमे लगभग सफलो भेला अछि। पोषाहारक अनाजक विरोधमे जेना प्रमुख मामिलाकेँ खतम करेलक से ‘निवास प्रमाण पत्र’ मे लगभग विरोधा भास लगैत अछि। जखनि मुखिया आ प्रमुख लेल एकटा प्रमाण-पत्र बनबबैमे संग नै दइ छै ओ गहुमकेँ बन्‍दर-बाँट कऽ सत्‍यताकेँ सिद्ध कऽ शिक्षककेँ गहुम कीनि कऽ बाँटैले केना कहि सकै छै? एतबे नै, ओइ शिक्षिकाक पति गामक दबंग अछि। पोषाहारक गहुम बेचि तँ अखनि साधारण बात छी। तँए दुनू कथाक प्रमुखक चरित्रमे विश्वसनीयतासँ अलग काल्‍पनिकता आबि गेल अछि। ‘गोबरबिछनी’, ‘असल बेटा’, ‘ननदि-भौजाइ’, ‘विवेकक विवेक’, ‘सभसँ पैघ पूजी’, ‘चौरचनक दही’क संग ‘महाजन’ शीर्षकक कथाकेँ हम आदर्शवादी कथाक रूपमे देखि सकै छी। अही कोटिक कथामे भावक सुन्‍दर समन्‍वय देखना जाइत अछि। कथा रचना, ओकर विस्‍तारक मध्‍य  आ अन्‍तक सुन्‍दर परिपाक अछि। रायजी कथा गढ़ैमे माहिर छथि। कथाक ताना-बानामे बान्‍हब पुन:ओकरा अन्‍तिम परिणति धरि लऽ जाएबमे रूकै नै छथि। ऐ कोटिक कथाक भाषा आ भाव-भंगिमा सरस आ प्रवाहगामी छन्‍हि। “महान कथी? धनीक छी तँए महान? नै, जे हृदए महान हुअए। जेकर आत्‍मा महान हुअए। ...वएह महान आदमी हएत आ महाजन कहौत।” (महाजन) भाषाक एकटा आरो बानगी- “एक परनहिया तँ शोकेमे डुमल रहली। बेटी बुचनीक मुँह देखि फेरसँ काज-राज करए लगली।” (गोबर बिछनी) राय जीक भाषा परिवेश जनित भावकेँ समाहित करबामे पूर्णरूपेण सक्षम छन्‍हि। “जखनि नेना लाल पीसा साइकिलपर मीना बहिनकेँ बैसा मदना विदा भेला तँ ओ बौम फाड़ि कऽ कानए लगला।” (विवेकक विवेक) एे ‘कानब’मे एक्के संग अनेक भावक विस्‍तार अछि। समग्र कथा संग्रहकेँ पढ़ला पछाति केतौ-केतौ हिन्‍दी अथबा उर्दू शब्‍दक अनपच बेवहार भेल छै। ओ हमरा अनसोहाँत लागल। जेना- जे ‘दिल’ महान होअए। हमरा सभ बात ‘मालूम’ भेल। ‘लाइन, कौलेज, प्रोफेसरक, इंजीनियर, बी.ए, डी.एम.सी.एच, चौठियाकेँ अपन गलती ‘महसूस’भेल अछि। अन्‍तिम खानामे, विवेच्‍य कथाक शैली आ शीर्षक प्राय: अभिधामूलक छन्‍हि। लक्षणा आ व्‍यंजनाक माध्‍यमसँ ऐ कथा सभमे आरो आकर्षण बढ़ि सकैत छेलै। संगे-संग भावक अभिनय रूप सेहो। अन्‍तत: हम कहि सकै छी जे ‘सखारी-पेटारी’ मैथिली कथा साहित्‍यक विकासक एकटा नीक कड़ी सिद्ध होएत। लेखकसँ आग्रह जे भाषा विचारक माध्‍यमे टा नै वाहको होइ छै। तँए भाषा-भावक संतुलित बेवहारसँ साहित्‍यमे रमणीयता अथवा भावक प्रवाह तीव्रगामी होइत छै। कथामे विषयक संग-संग नब-नब प्रतीक बिम्‍ब आ बात उठा कऽ पाठककेँ सहजे कथाकार बान्‍हि सकै छथि। तँए कथामे उतरोत्तर विकास परिलक्षित हएब आवश्‍यक छै। तथास्‍तु। अदि‍या एकटा गाममे छोट-छि‍न परि‍वार छल। ओइ परि‍वारमे एकटा नेनाक जनम भेल। माए-बापक आँखि‍क तरेगन। शरीरसँ लक-लक। ओकर सौंसे देहक हाड़ गनल जा सकैत छल। मुदा आँखि‍मे तेज दप-दप करैत रहै। धीरे-धीरे ओ पैघ भेल। नेनाक माथमे केतेक बात सन्‍हि‍याएल छल तेकर हि‍साब करब असान नै छल। नेनाक माए-बाप कुटौन-पि‍सौन आ मजूरी कऽ कहुना गुजर करैत छल। अपन एक मात्र नेना लेल दुनू परानी दि‍न-राति‍ सौचैत रहैत छल। आब नेना वि‍द्यालय जेबाक योग भऽ गेल। माए-बाप ओकरा पढ़बैले गुन-धुनमे लागल छल। संयोगसँ गामेमे एकटा चि‍मनी-भट्ठा खुगलै। नेनाक बाप गामक आन मजूरक सङ भट्ठापर गेल। भट्ठाक मुंशी ईटा बनबैले मजूर सभकेँ नाओं लि‍खैत छल आ कि‍छु-कि‍छु टका दऽ एकटा आदमीक सङ जमीन देखबैले भेजने जाइत छल। नेनाक बाप मुंशीसँ पुछलकै- “हमरा लेल कोनो काज नै छै मालि‍क?” मुंशी पुछलकै- “तों की करबह। ईटा पाथल नै तेतह।” ओ बाजल- “नै मालि‍क हम तँ मजूरी करै छेलौं। मजूरीबला कोनो काज...।” मुंशी बाजल- “माथपर ईटा ऊघल हेतह?” “हँ मालि‍क, ई तँ भऽ जेतै।” मुंशी बाजल- “ठीक छह, तों काल्हि‍ आबह। मालि‍क सेहो काल्हि‍ एतहि‍न। अखनि‍ चि‍मनी बनतै। भट्ठा बनतै। मजदूरक जरूरी तँ छइहे।” नेनाक भागसँ ओकर बापकेँ भट्ठापर मालि‍क महि‍नवारीपर रखि‍ लेलखि‍न। अपन ओकाति‍सँ ओइ नेनाकेँ माए-बाप एकटा छोट-छि‍न वि‍द्यालयमे नाओं लि‍खबा देलकै। टीनबला रि‍क्‍शापर बैस नेना वि‍द्यालय जाए लगल। गाम-घरक आनो-आनो घरक बच्‍चा ओही स्‍कूलमे पढ़ैत छेलै। सभसँ कातमे दुबकल ओइ बच्‍चाकेँ देखि‍ कऽ कोइ सोचि‍ओ नै सकैत छल कि‍ ओइ बकुटा भरि‍क बच्‍चामे खाली बुधि‍एटा भरल छै। वि‍द्यालयमे एक बरख पुड़ैत-पुड़ैत ओ नेना देखार होमए लगल। माए-बाप, दादा-दादीक सङे-सङ सर-समाजक जेतेक लोक छल, ओइ बच्‍चाक बात सुनि‍-सुनि‍ ओकर मुहोँ तकैत रहि‍ जाइत छल। केकरो-केकरो तँ बि‍सवासे ने होइ जे अखनि‍ ओ जे बाजल से ओकरे मुहसँ बात नि‍कललै वा कोनो आन मुहसँ। आब जखनि‍ ओइ नेनाकेँ वि‍द्यालयमे नाओं लि‍खा गेलैक तँ कोनो नामो तँ हेबक चाही। ओकर नाओं राखल गेल आदि‍त्‍य। मुदा ओ कोनो बड़का बापक बेटा थोड़े छेलै। गामसँ वि‍द्यालय धरि‍ ओ भऽ गेल ‘अदि‍या’। अदि‍या माने आदी वा आरम्‍भ। अपने सभ जे अनुमान करी। हमरा तँ लगैत छल जेना ओ सच्‍चोमे आदी होमए। ऊपरसँ सुखल-पुखल भीतरसँ रसगर। मुदा रस केतए तँ आदीए सन कठगर रेसादार गीरहक समग्र भागमे सन्‍हि‍याएल। आब सुनू ओकर आगूक खि‍स्‍सा। वि‍द्यालयक सभ गुरुजीकेँ ओकरापर सए प्रति‍शत बि‍सवास। कोनो वि‍षयक गुरुजीकेँ सेहन्‍ते लागल रहलनि‍ जे ओकरा कहि‍यो दबारि‍तथि‍। बेंचपर ठाढ़ करब तँ बहुत दूरक बात छल। सभटा बड़-बढ़ि‍याँ। परीक्षा होइत गेल। मासि‍क, त्रेमासि‍क, छमाही आदि‍। आब वार्षिक परीक्षा हएत। अदि‍या चिंतामे फँसल। “गुरुजी, हमरा सभ परीक्षामे कम नम्‍बर कि‍एक अबैत अछि‍।” ई बात अपन गुरुजी सभसँ ओ पुछैत रहल मुदा कोनो गुरुजी ओकरा सही उत्तर नै दइ छेलखि‍न। अदि‍या मन मारि‍ कऽ माए लग आबि‍ पुछलकै- “माए गइ, हम फस्‍ट नै कऽ सकै छी की?” माए बुझबैत कहलखि‍न- “बाउ, खूम मन लगा कऽ पढ़ू। फस्‍ट करि‍ कऽ की हेतै अगर ज्ञाने ने हएत।” अदि‍या कहैत छल- “माए गइ, हमरा वर्गमे जे फस्‍ट करैत अछि‍ अेकरा तँ हमरो एतेक नै अबै छै। सर सभ तँ सब दि‍न ओकरा बेंचेपर ठाढ़ केने रहै छन्‍हि‍। फेर नम्‍बर केना पबैत अछि‍?” वि‍द्यालयमे वार्षिक परीक्षा भेल। अदि‍या वर्गमे फस्‍ट नै केलक। ओ तेसर स्‍थानपर आएल। फेर वएह सरलहबा फस्‍ट कऽ गेलैक। अदि‍या जखनि‍ परीक्षाक रि‍जल्‍ट सुनलक तँ हँसए लगल। ओकरा सङे आनो साथी हँसैत रहल। ओ जखनि‍ गामपर आएल तँ माएसँ कहलक- “माए गे, अहूबेर वएह सरलहबा छौड़ा फस्‍ट कए गेल। जाए दही, मास्‍टर सभकेँ लाजो ने होइ छै। ओकरा केना फस्‍ट करा दइ छै। हमरसँ तँ ओकरा अदहो वि‍षय नै बूझल छै।” गुरुजीक खि‍धांस सुनि‍ माए दुखी भऽ गेली। ओ अदि‍याकेँ बुझबैत कहलखि‍न- “बाउ, मास्‍टरक वि‍षयमे एहेन बात नै बाजी। मास्‍टरसँ ऊपर संसारमे कि‍यो नै होइ छै। हुनक आदर करी। तखने अहाँकेँ वि‍द्या औत।” अदि‍याकेँ अपन गल्‍तीक भान तुरंत भेलै। बाजल- “हँ गइ माए, हमरासँ गल्‍त्‍ी भऽ गेल। हम काल्हि‍ सभ सरसँ माफी मंगबनि‍।” अदि‍या बढ़ैत गेल। आब पैघ सेहो भऽ रहल अछि‍। टि‍नही रि‍क्‍शासँ साइकि‍लपर सवार भऽ वि‍द्यालय जाइत अछि‍। वर्गमे तेसर-चारि‍म स्‍थान अनि‍तौं ओ खुश अछि‍। एकटा गुरुजी अदि‍याकेँ एकान्‍तमे बजा कऽ बता कहलखि‍न- “बाउ, अहाँ वि‍द्यालयक रि‍जल्‍टकेँ चिंता जुनि‍ करू। बोर्डक परीक्षामे अहीं फस्‍ट करब। ऐ बातक गि‍रह बान्‍हि‍ लि‍अ।” दशमी परीक्षाक तैयारीमे सभ वि‍द्यार्थी लागल अछि‍। अदि‍या सेहो यथासाध्‍य अपने अथवा सङी-साथीक मददि‍सँ तैयारीमे लागल अछि‍। अदि‍याकेँ दि‍न-राति‍क होश नै। बोर्डक परीक्षा जि‍ला मुख्‍यालयमे छै। अदि‍या एगो सङी सङे एकटा डेरा ठीक केलक। माएक जी हराएल छै। बाप साइकि‍लसँ पहुँचा गेल। अदि‍या बापकेँ प्रणाम कऽ असि‍रवाद लेलक आ बाबू गामपर घूमि‍ एला। अदि‍याक परीक्षा शुरू भेल। अदि‍या सभ दि‍न परीक्षा दऽ खुशी-खुशी डेरापर अबैत छल। आइ परीक्षाक अन्‍ति‍म दि‍न अछि‍। अदि‍या परीक्षा दऽ अपन गर्वसँ नि‍कलल। वि‍द्यालयक ओसारि‍पर वर्गमे प्रथम स्‍थान आनए बला लड़का ठाढ़ छल। ओ अदि‍याक हाथ पकड़ि‍ परीक्षा केन्‍द्रक गेटसँ बाहर भेल। गेटसँ बहराइते ओकर आँखि‍ डबडबा गेलै। अदि‍या ओकरासँ पुछलकै- “परीक्षा खराब भऽ गेलौ की?” ओ वि‍द्यार्थी बाजल- “हमर परीक्षा तँ ओही दि‍न खराप भऽ गेल जइ दि‍न हम वि‍द्यालयक परीक्षामे फस्‍ट केलौं। ऐ परीक्षामे अहाँ प्रथम आएब। हम अखने अहाँकेँ वधाई दइ छी। ऐ जि‍नगीमे ने हम अहाँक बरबरि‍ छेलौं ने आब भऽ सकब।” आदि‍त्‍य कि‍छु कहि‍तै तइसँ पहि‍ने ओ वि‍द्यार्थी दाबि‍ फफकैत वि‍द्यार्थीक भीड़मे सन्‍हि‍या गेल। झमकी एकटा गाममे एकटा गरीब परि‍वार रहै छल। परि‍वारक मुखि‍याक रूप-रंग, गुण-सोभाव, दह-दशा गामे सन छेलै। नाओं छेलै खखना। भरि‍-दि‍न मर-मजूरीसँ जे बोइन भेटै छेलै, खखना घरवालीकेँ सुमझा दइ छेलै। घरमे अपने तीनटा बेटा-बेटी आ कनि‍याँ। पाँच जनक परि‍वार। माए कि‍छुए दि‍नक पछाति‍ सरग सि‍धारि‍ गेलै। जावत् माए जीबै छेलै ताबत् हुनका कि‍यो पुछैबला छेलै। काजपर सँ लौटला उत्तर एक लोटा पानि‍, एकटा सूखल रोटी वा फुटहो दऽ हि‍या जुड़बै छेलै। माइक मुइने ठीके बेटा टुगर भऽ जाइ छै। घरवाली मुँहक जोर। एतबे नै, वि‍धाता घरवाली चम-चि‍कनी दऽ देलखि‍न। नाओं छेलै ‘झमकी’। नाउँए गुण सौंसे टोल झमकेत रहैत छल। बाल-बच्‍चा फुटलीओ आँखि‍ नै सोहाइत रहै। जाबत् सासु छेलै बाल-बच्‍चाकेँ थथमारने रहै छल। आब तँ धि‍यो-पुतो छि‍छि‍आइत रहै छै। खखना बरद जकाँ खटैत अछि‍। ति‍रया चरि‍त्तरकेँ ओकरा कि‍छु पता नै। झमकीकेँ एसनो-पोडर, कनफुल-नकफुल चाही। सेहो नव-नव डि‍जाइनक। खखना सन भकुआ, भकुआएले रहि‍ गेल। आब सुनू आगूक खि‍स्‍सा। खखना काजे अपसि‍याँत। घरवाली आँचे अपसि‍याँत। टोलसँ अलग एकटा दोसर जाति‍क घर छल। ओइ घरक अगल-बगलमे कएटा मालि‍कक कलम छेलै। जारनि‍ बीछऽ झमकी केतए जेतै? कलमेमे ने! झमकीकेँ संगी-बहि‍नपाक कोन कमी। सबहक संगे कलमे-कलमे, गाछीए-गाछी जारनि‍ बीछैत छल। केना-ने-केना दोसर जाति‍क एकटा नवतुरि‍यासँ झमकीकेँ आँखि‍ लड़ि‍ गेलै। धीरे-धीरे ओही कलममे जारन-बि‍छनी सबहक पंचैती सेहो बैसए लगल। ओ छौंड़ा सेहो गामक भौजाइक नाते कखनो बैसल कखनो ठाढ़हे-ठाढ़ गोष्‍ठीक हि‍स्‍सा बनि‍ गेल। ओइ छौंड़ाकेँ देखि‍ते झमकीक चमकी दुगुन्ना भऽ जाइत छेलै। आब बुझू खि‍स्‍सा खतम। झमकी झपटा मारलक। झपटा तेहेन छेलै जे छौंड़ा घरक खुट्टा तोड़ि‍ जे भागल से आइ धरि‍ गाम नै घुरल। धि‍या-पुता फकरा बनेलक- “झमकी झमैक‍ गेल, छौड़ा लऽ कऽ उड़ि‍ गेल...।” खखना बाल-बच्‍चाक संग ताकि‍ रहल अछि‍ जे कही फेर...।¦¦¦ ओम प्रकाश झा कुलच्छनी ऐबेर फेरसँ श्रीधरक कनिञाँकेँ बेटीए भेलै, ई समाचार पूरा टोलमे पसरि गेल छल। भोज खेबाक आस रखनिहार सज्जन लोकनिक मँुह बिधुआ गेल। किएक तँ आब भोज नहियेँ हेतै। श्रीधरक बाबू गदाधर पोताक आसमे पछिला तीन बरखसँ की की नै करबौलथि। यज्ञ भेलै, हवन भेलै, दान आ पुन्न तँ पूछू नै। एकबेर बुड़हा आ बुड़ही कामर लऽ कऽ बाबाधामसँ सेहो भऽ एला। मुदा एतेक उपय आ जतनक कोनोे प्रतिफल नै। सबहक मुँह लटकल छल, जेना घरमे कोनो मरनी-हरनी भऽ गेल होइ। गदाधर दलान परहक कोठलीमे चुपचाप बैसल छला आ अपन भाग्य आ विधाताक ऊपर प्रलाप केने जाइत छला। हुनकर कनिञाँ आँगनमे कोनटा धेने उपासपर छेली, जे सभ जतन आ प्रयोजन विफल भऽ गेल। ‘पोताक मुँह देखनाइ भाग्यमे नै लिखल अछि’ ई बाजि-बाजि अपन पुतोहुकेँ कोसै छेली। श्रीधर अपनो मुँह लटकेने दलानसँ आँगन एला आ मुड़ी झुकौने सोइरी घर तक एला आ दरबज्जासँ हुलकी मारलथि। कनिञाँ बिछौनपर चुपचाप निश्‍चेश्‍ट पड़ल छेलै आ बड़की बेटी सुनैना जे तीन बर्खक छेलै, ओही चौकीपर बैसि माएसँ नवका बच्चा दियए किछु-सँ-किछु सवाल करै छेलै। कनिञाँ ऐ सोचमे छल जे घरक सभ लोक फेरसँ बेटी होइक कारणेँ हुनके दोख लगाैत। बड़की बच्चियाक जन्मक समए सेहो ओकरा सभसँ यएह सुनऽ पड़ल छेलै। नब बच्चा पूरा दुनियाँ आ दुनियाँक सोचसँ बेखबर भऽ अपन क्रन्दनमे तल्लीन भऽ सभकेँ अपना दिस आकर्शित करै छल। बापकेँ देखैत देरी सुनैना बिछौनपर सँ उतरि कऽ लपकल आ श्रीधरक जांघमे लटपटाइत बाजल- “बाबू, हमरा भूख लगल अछि। कियो हमरा खाइले नै दइए।” श्रीधर ओकरा धकलैत कहलक- “चल कुलच्छनी, के देतौ खाइले। पहिनेसँ तूँ की कम बोझ छेलेँ हमर माथपर जे पाछूसँ एकटा आर बहि‍न लऽ आनलेँ।” सुनैना ऐ सभ बातसँ अनभिज्ञ छल। ओ हठ करैत कहलक- “बाबू हमरा बिस्कुट आ दालमोट आनि दियऽ बड्ड भूख लगल अछि।” ऐबेर श्रीधर तमसा गेल आ सुनैनाकेँ जोरसँ धकेलि‍ देलक। सुनैना नि‍च्‍चाँ खसि पड़ल, खसि‍ते कानए लगल आ श्रीधरक मुँह दिस टुकुर-टुकुर ताकए लगल। ओकर माथमे चौकीक कोणसँ चोट लगि गेल छेलै। ओकर माए चौकीपर सँ उठैक कोशि‍श केलक मुदा नै उठि सकल तँ श्रीधरकेँ कहलक जे ऐमे ऐ बचियाक कोन दोख छै जे अहाँ ओकरापर तमसा गेलिऐ। देखियौ तँ केना हिचकि-हिचकि कऽ कानि रहल छै। कनी ओकरा उठा लियौ ने। ताबत सुनैना अपने उठि गेल आ फेरसँ श्रीधर दिस बढ़ए लगल कानैत आँखि‍सँ टुकुर-टुकुर तकैत रहए। श्रीधरक आँखि ओकर आँखिसँ टकड़ाएल तँ श्रीधरकेँ ई आभास भेलै जे ओइ निर्दोख आँखिसँ अवाज आबि रहल छेलै जे ‘बाबू हमर कोन गलती। हम तँ अहींक अंश छी, अहींक सन्‍तान।’ श्रीधर ओइ निर्दोख आँखिक सवालसँ सन्न भऽ गेल। ओकर करेज फाटऽ लगलै। ओ सोझहे सुनैनाकेँ उठौलक आ कोरामे लऽ कऽ चुम्मा लेबए लगल आ ओकर माथ हँसौथऽ लगल। ओ अपने मोने बाजए लगल- “तूँ हमर सन्‍तान छेँ। तूँ हमर अंश छेँ। तोहर छोटकी बहि‍न सेहो हमर सन्‍तान आ हमर अंश अछि। तूँ कुलच्छनी नै हमर कुलक सिंगार छेँ। हमर नाओं तोरेसँ हएत। तूँ नै कान बेटी। चल की खेबही हम तोरा अखने कीनि दैत छियौ।” कहैत श्रीधर सुनैनाकेँ कोरामे लऽ कऽ दोकान दिस विदा भऽ गेल। बेटीक बिआह आँगनमे बिआहक गीत चालू छल। दरबज्जापर पाहुनक मेला लागल छल। आइ देवकांतक बेटीक बिआह छै। देवकांत एकटा किसान छथि। हुनकर दू गोट सन्‍तानमे सुलेखा जेठ छन्हि आ शरत छोट। ओ बेटा-बेटीमे कहियो कोनो अन्‍तर नै बूझलखिन्ह आ दुनूकेँ समान रूपेँ पढ़ाइ-लिखाइ करबौलखिन्ह। एकर नतीजा सेहो नीक रहल जे सुलेखा नीक संस्थानसँ एम.बी.ए.क डिग्री लऽ कऽ एकटा प्राइभेट कंपनीमे नीक नौकरी प्राप्त केलन्हि। बेटा शरत सेहो इंजीनि‍यरिंगक पढ़ाइ कऽ रहल अछि। बेटीक शि‍क्षा-दीक्षा पूर्ण भेलापर आ नौकरी भेटलापर देवकांत ओकर बिआहक तैयारी शुरू केलथि। सर-कुटुम आ मित्र-मण्‍डलीसँ एकटा नीक बर ताकबाक अनुरोध केलथि। पढ़ल-लिखल नौकरिहारा बेटी लेल सुयोग्य वरक खोजमे जहाँ-तहाँ अपने सेहो गेला। मुदा सभठाम बेवस्थाक नाओंपर मुद्राक माँग एते भयावह छल जे ओ मुँह लटकौने गाम आबि जाइ छला। सुलेखाकेँ जखनि‍ ऐ तरहक फि‍रि‍शानीक पता चलल तँ ओ अपन माएकेँ कहलक- “बाबूकेँ कहुन जे हम अपन सहकर्मी हेमंतसँ बिआह करऽ चाहै छी।” हेमंत सुलेखा संगे काज करै छथि‍ आ ओकर नीक संगी सेहो छथि‍। मुदा ऐ प्रस्तावपर देवकांत तैयार नै भऽ तमसाइत बाजला- “हेमंत अपन जातिक बर नै छै आ अनजातिमे अपन बेटी बियाहि कऽ हम समाजसँ भतबड़ी नै कराएब।” देवकांतक ई रूप देखि सुलेखा सहमि गेली आ सकदम भऽ पिताक गप मानबाक सहमति दऽ देली। पुरजोर ताक-हेरक पछाति‍ देवकांतकेँ एकटा वर सुलेखा लेल भेटलन्हि। बरक पिता नंदलाल अपन आई.आई.टी. इंजीनियर, उच्च पदपर सेवारत बेटा शैलेश लेल सुलेखाक प्रस्तावपर मंजूरी देलन्हि। मुदा बिआह रातिक खर्चक माँग सेहो केलन्हि। देवकांत पुछलखिन्ह- “बिआह रातिक खर्च केतेक हेतै।” नंदलाल कहलखि‍न्‍ह- “ई अहाँ अपनेसँ विचार कऽ लिअ आ हमर सबहक हैसियत आ लड़काक योग्यता देखैत खर्च बिआहसँ पूर्व हमरा लग पठा दिअ।” देवकांत अपन जमा-पूजी तोड़ि पाँच लाख टाका अपन पुत्र- शरत-क मार्फत बिआहसँ दू दिन पूर्व पठा देलखिन्ह। पाँचे लाख टका देखि नंदलालक पारा चढ़ि गेलन्‍हि‍ आ ओ शरतक फजहति करैत बजला- “हम पच्चीस लाख आ बीस लाखक कथा छोड़ि अहाँ ओइठाम सम्‍बन्‍ध कऽ रहल छी से की ऐ भीखमङ्गीए लेल!” शरत बाजला- “ई अहाँ हमर बाबूसँ कहियनु, हम की कऽ सकै छी।” खैर बिआहक दिन आएल आ नंदलाल वर-बरियाती साजि देवकांतक दरबज्जापर एला। बरियाती दुआरि लगि गेल छल आ नश्‍ता-पानि इत्र-फुलेलसँ हुनकर सबहक सुआगत होमए लगल छल। नंदलाल अपन होइबला समधि- देवकांत-केँ बजा कऽ कहलखिन्ह- “बिआह रातिक समुच्‍चा बेवस्था अहाँ नै पठेलौं, मुदा तखनो हम आएल छी किएक तँ हम सभ भलामानुस छी। अहाँ आर पाँच लाख टका अबिलम दिअ तँ वर वेदीपर जाएत।” देवकांत अकाससँ खसला आ नंदलालक निहोरा करैत बाजला- “अखनि‍ पाँच लाख केतएसँ आनब। बच्चा सबहक पढ़ाइ-लिखइमे सभ जमा पूजी पहिनहि खरच भऽ गेल अछि। अहाँ अखनि‍ बिआह हुअ दियौ। हम गछै छी जे शनैः शनैः हम अहाँक पाँच लाख टका आर दऽ देब।” मुदा नंदलालपर ऐ नि‍होराक कोनो प्रभाव नै पड़लन्‍हि‍ आ ओ जिद्द ठानि बैसि गेला जे पाइ एखने चाही। कनी कालमे ई बात आँगनधरि पहुँच गेल जे जावत नंदलालकेँ पाँच लाख टका आर नै भेटतै तावत बिआह नै हेतै। सुलेखा अपन बापक दुर्दशा आ समाजक बेवहारसँ बेथित भऽ गेल छेली। हुनकर माए हुनका लग बैसि कऽ कानए लगली जे आब की हेतै। ओ बाजली- “हुनका कहैत रहियनि‍ जे बेटी-बिआह लेल पाइ जमा करू मुदा ओ हमर नै सुनलनि‍ आ सबटा पाइ बच्चा सबहक पढ़ाइ-लिखाइपर खर्च कऽ लेलनि‍। ई बेइज्जती लऽ कऽ केना जीअब हम, सभटा हुनके किरदानीसँ भऽ रहल अछि।” बापक दुर्दशा आ बेइज्जती सुनि सुलेखाक आँखिमे पानि भरि आएल। कनीकाल तँ ओ माइयक विलाप सुनैत रहलि‍। फेर ओ ठाढ़ भऽ गेल आ अपन नोर पोछि दलान दिस बढ़ि गेलि‍। दलानपर पाहुन-परक आ दोस्त-महि‍मक बीचमे ओकर सहकर्मी हेमंत सेहो बैसल छल। ओ सोझहे हेमंत लग गेलि‍ आ ओकर हाथ पकड़ि पुछलक जे अहाँ अखनि‍ हमरासँ बिआह कऽ सकै छी। हेमंत कहलक किएक नै, ई तँ हमर सौभाग्य हएत जे अहाँ सन पढ़ल लिखल सुन्नरि‍ कनिञाँसँ हमर बिआह हएत। सुलेखा हेमंतकेँ लेने वेदीपर पहुँचली आ पंडितजी केँ कहलखिन्ह जे हमर आ हेमंतक बिआह संपन्न कराैल जाए। ई समाद दलानपर पहुँचल आ सौंसे अनघोल भऽ गेल। नंदलाल आ देवकांत आँगन दिस दौड़ला। देवकांत बेटीकेँ कहलखिन्ह- “ई की कऽ रहल छी अहाँ? हमर पगड़ी किएक खसा रहल छी!” सुलेखा बाजली- “एकटा नीक आ सुलझल वरसँ हमर बिआह भेलासँ अहाँक पगड़ी खसि रहल अछि बाबूजी? आ ई दहेजक राक्षस जे अहाँकेँ नोचि रहल अछि ऐसँ अहाँक सम्मान बढ़ि रहल अछि की? अहाँ पहिने पाँच लाख टका दऽ चुकल छिऐ आ ऊपरसँ आर पाँच लाख? किएक बाबू किएक? हम स्त्री छी, की ई एकर प्रायश्चि‍तमे ई टाका अहाँ दऽ रहल छिऐ? कर्जा लऽ कऽ जँ अहाँ ई टका ऐ दहेज-दानवकेँ दैयौ देबै तँ की ई हमर सुखमय जीवनक गारंटी देता? अहाँ ओइ कर्जाक भारसँ दाबल कुहरैत रहब तँ की हम सुखी रहब? नै बाबू नै हम आब किन्नौं ऐ दहेज-दानवक बेटासँ बिआह नै करब आ हम हेमंतसँ बिआह करब।” हेमंत आगू बढ़ि देवकांतक पएर छूबि बजला- “बाबूजी, अहाँ हमरापर बि‍सवास करू। सुलेखा ठीक कहै छथि। अहाँ अपन बेटीकेँ पढ़ा लिखा सुयोग्य बनेलौं। तेकर बादो बेटी हेबाक प्रायश्चि‍तमे अपन देह बेचबाक तैयारी किएक केने छी? अहाँ स्वीकृति दियौ तँ हम सभ बिआह करी।” देवकांतक मोनमे समाजक डर छेलनि‍ जे परजातिमे बिआहसँ भतबड़ी भऽ जाइत। मुदा दोसर दिस नंदलाल जकाँ राक्षसक डर सेहो छेलन्हि। कनीकाल विचार केला उपरान्त बजला- “हाँ सुलेखा, अहाँ ठीक कहै छी। विआहक उपरान्त ई दहेज-दानव अहाँसँ की बेवहार करत, एकर कोनो गारंटी नै। आ समाज की कोनो हमरा मदति केलक अहाँकेँ पढ़ेबा-लिखेबामे आकि‍ बेवस्थाक टाका गानैमे। हम समाजसँ किए डरू? हम अहाँकेँ सुयोग्य बनेलौं आ आगू अहाँक जिनगी जाइसँ सुखमय रहए, तेहने काज हेबाक चाही। जाउ हम अहाँकेँ असि‍रवाद दइ छी। अहाँ हेमंत संगे बिआह करू आ नंदलालजी बरियाती लऽ कऽ अपन गाम जाथु।” बाजा-गाजा फेरसँ बाजए लगल। बेदीपर हेमंत आ सुलेखा बैसल आ मंत्रोच्चार शुरू भऽ गेल। डॉ. कीर्तिनाथ झा शेफाली, फुलपरासवाली आ हम जहि‍आ ओ लोकनि‍ जीबै छला तहिआ तँ ने एहेन प्रसि‍द्ध रहथि‍ आ ने कि‍छु सुनबाक पढ़बाक तेना भऽ कऽ साधन रहै। आब सुनै छि‍ऐ एक गोटे ‘मुक्ति‍’ लि‍खने छला तँ केकरो पढ़ि‍ कऽ ठकमुड़ी लागि‍ गेलनि‍ आ दोसर गोटे ‘फुलपरासवाली’ लि‍खलनि‍ तँ कहाँ दन ‘मुक्‍ती’बला नोटि‍स नै लेलखि‍न। माने दूध-भात। जे कि‍छु। आब कि‍ताब आ पोथी सेहो खूब छपै छै आ लोक कि‍नि‍तो अछि‍। मुदा हमरा लोकनि‍ रामायण-महाभारत पढ़ब आकि‍ नव-नव कि‍ताब। मुदा ओइ दि‍न संयोगेसँ टी.भी खूजल छेलै आ दू गोट गोट भऽ सकैए परफेसर छल हेता- बड़ीकाल धरि‍ एक दोसरासँ बहस करैत रहथि‍ माने ‘शेफाली’ नीक केलनि‍ आकि‍ ‘फुलपरासवाली’। धुर, एहन गप-सप्‍प केतौ एतेक खूजि‍ कऽ होउ। धि‍या-पुता तँ अबधारि‍ कऽ आरो रस लेत। बीचमे एक गोटे आैर छला जे बीचमे एकबेर टि‍पलखि‍न ि‍क तँ, कि‍यो कहने छेलखि‍न, जे “हि‍नका लोकनि‍क खीसा मर्यादाक बाहरक गप थि‍क।” मुदा नै जानि‍ ओ बुढ़ी लोकनि‍ आइ जीबैत रहि‍तथि‍ तँ की कहितथि‍न। मोने अछि‍, मैयाँकेँ पुछने रहि‍यनि‍, “मैआँ अहाँ कहि‍आ वि‍धवा भेलि‍ऐ?” तेतबे वयस रहए जे ई नै बुझि‍ऐ जे एहेन गप पुछबाक नै छि‍ऐ। आ जेहने हम तेहने मैयाँक जवाब- “जहि‍ए बि‍आह भेल तहि‍ए राँड़ भऽ गेलि‍ऐ।” दूरस्‍थेसँ माए ई गप-सप्‍प सुनलनि‍ तँ दबाड़ि‍ कऽ भगा देलनि‍। मुदा हमरा ले धनि‍ सन। हम तँ मैयाँसँ बस कि‍छु गप करैले कि‍छु फुछने रहि‍यनि‍। देखि‍यनि‍ उज्‍जर धोती, काटल केश, चुड़ी-सि‍नुर-ठोप-ठीका कि‍छु ने। तैपर हम आवेशसँ कखनौं आलताक ठोप करबाक लौल करि‍यनि‍। कहि‍यो चुड़ी पहि‍रबाक। गरमी मासक दुपहरि‍यामे जखनि‍ मैयाँ अपन टेकुरी लऽ कऽ जनौ कटैले बैसै छेली तँ हम सहटि‍ कऽ लग जाइ।  कि‍छु-कि‍छु छोट काज कऽ दि‍यनि‍। ओहो कखनो मि‍सरी, कखनो एकटा छोहाड़ा तरहथ्‍थीपर रखि‍ देथि‍। नाति‍न आ मैयाँक अही संग बहि‍नाक आपक्‍तामे तँ ओ बुझा कऽ कहने रहथि‍- “है चुड़ी सि‍नुर वि‍धवा नै करै छै।” नेना तँ रहबे करी। पुछलि‍यनि‍- “अहाँ वि‍धवा छि‍ऐ।” ओ कहलनि‍- “हँ।” हम पुछलि‍यनि‍- “कहि‍आसँ?” बस हुनकर जवाब देल छेलनि‍ आकि‍ माँ सुनि‍ते छेली गप-सप्‍प, दबाड़ि‍ कऽ वि‍दा केलनि‍। मुदा बि‍आहो दि‍न लोक वि‍धवा भऽ सकै छै से पछाति‍ बुझलि‍ऐ। हमरो सरकार तँ हालहि‍मे गेलाहे मुदा हम? जे कि‍छु सुनि‍ऐ, तइसँ एतबे मोन अछि‍ जे घर डेरा बड़ ऊँच रहनि‍, आ जाति‍ बड्ड पैघ। कि‍दुन सुनि‍ऐ बाबू कहथि‍न- “शुद्ध गहुमनक पोआ छला, सरकार।” ठीके छल हेता। मुदा जहि‍या हुनकर पाला पड़ल रही दाढ़क डाँस बुझबाक वयए नै छल। मुदा आब जखनि‍ बीख भरि‍ देह नि‍जाएल अछि‍ तँ बुझै छि‍ऐ। ओ साँप तँ नै छला मुदा हुनकर बीखक असरि‍सँ की कहि‍यो उबरि‍ सकलौं। अपना तँ बोध एतबे रहनि‍ जे साबुन आ बर्फीक अन्‍तर नै बुझथि‍न। झोंक एलापर कथीमे दाँत काटि‍ देता तेकर कोन ठेकान। कखनो बाटीक दालि‍केँ बड़की पोखरि‍ कहथि‍न आ फोड़नक मरचाइकेँ पोखरि‍क माँछ। बि‍आह भेलापर लोककेँ तँ खूब मोन लगै। हम आब बुझै छि‍ऐ, लोक, देखि‍ कऽ माँछी केना गि‍ड़ै छल तहि‍या। मुदा सोचै छी हम के छी? ‘शेफाली’ कि‍ फुलपरासवाली? एक गोटे उड़हरि‍ कऽ मुक्त भेली। दोसर अपन मोनक सक्कसँ इज्‍जति‍ बँचौलनि‍। मुदा इज्‍जति‍? रसि‍आरीवाली काकी जीवन भरि‍ इज्‍जति‍ बँचौने रहली मुदा मगज तँ फि‍रि‍ए गेलनि‍। केतए-केतए ने गोहरि‍आ बनि‍ कऽ गेली। केतेक ने इलाज करौलनि‍। कि‍छु भेलनि‍ नै। पछाति‍ जखनि‍ सभ कि‍छु समन भऽ गेलनि‍ तँ लगलनि‍ जे अनकर आगि‍ बाँचए नै देत आ आखि‍री आबि‍ कऽ अपनेसँ अगि‍ लगा कऽ मरि‍ गेली। मुदा हम? हमरा सरकारक सरकारीक वंशकेँ जे ऊक देखौलकनि‍ तेकर मरला उत्तर मुखबत्ती लगा कऽ शरीर वलानमे भँसौल गेलै। यएह बलान तँ थि‍की। अपने नोत पुरैले गेल रहथि‍। आ हम एसकरि‍ए रही। मड़रटा मनेजर-हरवाह-कमति‍आ-ओगरवाह सभ छला। बड़ जोर बाढ़ि‍ आएल रहै। आ हमरा मथदुखीक राेग धऽ नेने छल। सभ राति‍ पहि‍ने दहि‍ना कात कपारसँ शुरू हुअए। फेर कनपट्टी होइत माथक पाछूसँ गरदनि‍ धरि‍ जाए। गरदनि‍ तर केत्ताबेर गेड़ुआ दहि‍ना-बामा करी। चैन नै हुअए। शंकर बाम-कृष्‍णधारा- वि‍क्‍स सभ लगाबी। रसे-रसे हुअए माथ दुखाएब दोसरो दि‍स ने पसरि‍ जाए। तखनि‍ भरि‍ देहमे खौंत, पसेना। मोन आऊल। छट-पटी लगि‍ जाए। बाबूक लि‍खौल- “सर्व बाधा प्रशमन....।” केर श्‍लोक पढ़ि‍ अपने हाथ अपने माथपर ली। मुदा भरि‍ राति‍ पहाड़ भऽ जाइत छल। आ दि‍नमे जे नि‍न्न हुअए से आँखि‍ नै खुजए। तहि‍या डाक्‍टर बुझी कि‍ वैद गोनर मि‍सरटा छला। नाड़ी देखथि‍ मथाहाथ दथि‍। एक दि‍न एकटा जड़ी सेहो लत्तामे बान्‍हि‍ कऽ देलनि‍ जे गाड़ामे बान्‍हि‍ लेथु। मुदा कोन भूत छल छूटए नै। एक दि‍न आजि‍ज भऽ ओहो मथाहाथ देब मना करि‍ देलनि‍। कहलखि‍न- “कि‍ तँ नवटोल भगवती स्‍थानमे भगतासँ भाउ कराबथु।” तहि‍या कि‍ से सनस्‍था रहै। जैतौं अपने मोने। दर-देआदक हवेली डौढ़ी सेहो कि‍ लग-लग रहै। एक दि‍न राति‍मे फेर असाद्ध मथदुक्‍खी धेने छल। कोठलीमे कुहरैत छेलौं। कहबो केकरा कहि‍ति‍ऐ? गोनर झा सेहो जवाब दऽ देने छला। सासु छेली नै। हमरा भेल जेना कि‍यो आस्‍तेसँ कहलकैए- “बौआसीन!” अकानलि‍ऐ। तँ ठीके जेना कि‍यो हाक दैत हो। रोइआँ भुलकि‍ गेल। हनुमान जीक नाम लेलौं। दमसि‍ कऽ कहलि‍ऐ- “के छी?” - “हम, बौआसीन, लोटना!” - “की छि‍अनि‍?” - “बड़ कुहरै छथि‍न! गोनर मि‍सरकेँ हाक दि‍अनि‍?” - “नै।” - “एना कोना रहथि‍न। बड़ तरद्दुत् होइए।” - “मरए देथु हमरा।” - “बलानक पानि‍सँ ओसरा धरि‍ छइहे। मरि‍ जाएब तँ कहि‍हथि‍न फेक दइ जेता।” लोटना, लागल जेना गुम्‍म भऽ गेल छला। मुदा गोंगि‍आइत बाजल रहथि‍, से मोने अछि‍- “डोमा जे भाव खेलाइ छेलै, से हम देखने छि‍ऐ। हमरो तँ मथाहाथ देब सि‍खौने छल। लाजे कहलि‍यनि‍ नै। टोलपर सभ जनी-जाति तँ हमरेसँ माथा-हाथ दि‍अबै छै, जखनि‍ डोमा-भैया गाम-गमाइत जाइ छै।‍” मोन आउल-बाउल छल। प्राण अवग्रह छल। सोचए लगलौं जेकर सोझा पएर नै उघार भेले तेकरा सोझा माथपर सँ नूआ केना उतारब। आ केना मथा हाथ देत। मुदा प्राण अवग्रहमे छल। की करि‍तौं? कहलि‍ऐ- “केकरो कहि‍हथि‍न नै।” ‘जानथि‍ भगवान। बौआसि‍न, एक चुरुक नारि‍केरि‍क तेल देथु। आ हम बाहरक कोठलीक लाथे हमर कोठलीक जे केबाड़ रहै, खोलि‍ देने रहि‍ऐ। मुदा बि‍छौनसँ उठबाक हूबा नै छल। लगमे नारि‍केरक तेलक बोतल राखि‍ देने रहि‍ऐ। डि‍बि‍आक इजोतमे हम आँखि‍ मुननहि‍ आँगुरसँ इशारा कऽ देने रहि‍ऐ। हमरा एतबे मोन अछि‍, लोटना एक चुरुक तेल कपारपर ढारि‍ कऽ मलए लागल छला। फुसुर-फुसुर कि‍छु पढ़ि‍तो छला। तेतबे मोन अछि‍। ओकर पछाति‍ कखनि‍ नि‍न्न भऽ गेल आ ओ कखनि‍ कोठलीसँ बहार गेला से मोन नै अछि‍। मुदा एतबा मोन अछि‍ जे ने हमर मथदुक्‍खी छूटल छल आ ने फेर कहि‍यो गोनर झा हमरा मथाहाथ देबए हमर अँगना पएर देलनि‍। ईहो सत्ते जे ने ओइ बलानक बाढ़ि‍मे हमर देहे भँसि‍आएल। आ ने कहि‍यो हमरा लोटनाक मथाहाथ देबाक गुणपर संदेहे भेल। हम की छेलौं? की छी? मोने जनैए। लोटना नि‍:संतान नै छला तैयो मुखबत्ती लगा कऽ बलानमे भँसौल गेला। सरकार नि‍:संतान छला मुदा संतति‍क हाथे वृषोत्‍सर्ग श्राद्ध भेलनि‍। मुदा हम? हम ‘शेफाली’ छी, की फुलपरासवाली? आशीष अनचिन्हार व्यंग निबंध निरपेक्ष-गुट-निरपेक्ष सभकेँ सभ तरहँक निसाँ होइत छै हमरो अछि। बहुत लोकक निसाँ देखार होइत छै मुदा हमर भितरिया अछि। किनको पाइकेँ निसाँ छनि तँ किनको जमीनकतँ किनको नौकरीक तँ किनको किछु मुदा हमरा सभ समय यूनिक चीज रखबाक आदति अछि तँए हमर निसाँ सेहो यूनिक अछि। हमरा गुट-निरपेक्ष बनबाकनिसाँ अछि। हम सदिखन निरपेक्ष-गुट-निरपेक्ष बनबाक प्रयासमे रहैत छी। सभ तरहँक निसाँ सुलभ छै मुदा हमर निसाँ बड़ कष्ट साध्य। बड़-बड़ करतब करऽ पड़ै छै ऐमे। मोनकेँ अनेको तरहसँ असफल रूपें मनबऽ पड़ै छै।असफल रूपेम ऐ दुआरे जे संसारक तँ नियमे छै जे जँ हम अपना आपकेँ "निष्पक्ष" कहै छिऐ ताहिसँ स्पष्ट भऽ जाइत छै जे हम "केकरो" पक्षमे छिऐ।वस्तुतः बिनु केकरो पक्ष लेने हम "निष्पक्ष" भैए ने सकै छी। ओना संसारमे बड़का-बड़का भूप सभ छथि। मानि लिअ जे हम कहलहुँ जे "हम सत्यक संगमेछी" आब एहीसँ स्पष्ट भऽ जाइत छै जे हम "सत्यक पक्षमे छी" तखन फेर हम निष्पक्ष कोना भेलहुँ ? तँए कहलहुँ जे ई निसाँ बड़ कष्ट साध्य छै। बड़ करतब करऽ पड़ै छै। नील-टिनोपाल देल धोती पहीरि कऽ मंचपर बैसि कऽ हम "निष्पक्ष" बनि जाइत छीआ अपना आपकेँ भरममे राखि लैत छी। उदाहरण देब हमरा अभीष्ट नै मुदा ई जग-जाहिर अछि जे कोनो महापुरूष वा क्रांतिकारी वा युग-प्रणेता अपना आपकेँनिरपेक्ष नै कहला अछि। महात्मा गाँधी की सुभाष चंद्र बोस की नेहरू की भगत सिंह। ओ लोकनि सभ दिन अपन पक्ष प्रस्तुत कऽ ओइपर अड़ल रहला।गप्प चाहे नेल्सन मंडेलाक हो की मार्टिन लूथर किंग केर ईहो सभ कहियो अपनाकेँ निरपेक्ष नै कहला। जँ मध्यगुगमे चली तँ ने भगवान महावीर आ नेभगवान बुद्धे अपनाकेँ निरपेक्ष कहला आ ने हुनक विरोधी। तइसँ पाछू चली तँ भगवान कृष्ण तँ साफे-साफ अपनाकेँ "निरपेक्ष" मानबासँ मना कऽ देने छथि।जँ गीता केर निचोड़ देखी तँ ई साफे बुझाएत जे " निरपेक्ष" आ "नपुंसक" एकै थिक। राम की परशुराम की आन सभ अपन-अपन पक्ष संसारक सामनेरखला। एतऽ धरि जे रावण, कौरव, बुद्ध-महावीर युगीन कर्मकांडी आ अंग्रेजसँ गोडसे धरि सभहँक अपन पक्ष छलै। मुदा ई सभ देखितो हम अपनाकेँ"निरपेक्ष" कहि रहल छी तकर कारण छै आ ओकरा ऐठाँ देब जरूरी नै। ओना हम ई कहि दी जे हम अपना मोने ई निसाँ नै चुनलहुँ। हमरा संसारक बड़ अनुभव अछि आ हम देखलहुँ जे विरोध करबै तँ किछु नै भेटत आ चमचइकरबै तखन सभ दूसत तँए बहुत मंथन केर बाद हम निरपेक्षताक चद्दरि ओढ़ि लेलहुँ। मने दुन्नू हाथमे लड्डू। विरोधो नै करबै आ ने चमचइ करबै से मोनमेअछि। भने हमर नाम महापुरूष वा क्रांतिकारी वा युग-प्रणेताक रूपमे नै आबए तात्काल तँ हम राजा-महराजा सन छी हमरा लेल सएह बहुत अछि। हमआशीष अनचिन्हार, पिता श्री कृष्ण चंद्र मिश्र, गाम भटरा-घाट, थाना बिस्फी, जिला मधुबनी, प्रांत-बिहार, गोत्र-शांडिल्य,मूल सोदरपुरिये-सरिसब,एखन धरिअविवाहित पूरा होशो-हवासमे घोषणा करै छी जे हम "निरपेक्ष-गुट-निरपेक्ष" छी। हमरा कोनो वस्तुसँ जोड़ि कऽ नै देखल जाए। आब हम विआह किए नै कऽरहल छी से नै पूछू। हमरा डर अछि जे लोक कहीं ई नै पूछए जे सरकार बाल बच्चाक समयमे "निरपेक्ष" रहलिऐ की नै? ओना ऐमे डरेबाक कोनो प्रेश्ने नैछै। जमीन पलटि जाइ छै. अकास पलटि जाइ छै बसातो पुरबा-पछबाक बदला उतरा-दछिना भऽ जाइ छै तखन बाल-बच्चाक समय जँ निरपेक्षता छोड़ि हम"पक्षी" बनब तँ कोन अपराध। लोक किताबमे प्रगतिशील बनि अपन बेटीक प्रेम-विआहक विरोध करैए। पुरस्कार प्रतिनिधिक विचारक विरोध कऽ फेर ओकरेहाथसँ पुरस्कार लैए आ जखन ई सभ अपराध नै छै तखन हमहीं जँ पलटि जाएब तँ कोन अपराध। ओना पलटि गेनाइ अपराध तँ नै छै मुदा हम ईहो बूझैछी जे भने मिनट-दू मिनट लेल हम कूदि-फानि ली मुदा ई निसाँ पूरा जीवन नै चलत। रंगल सियारक रंग सेहो एक दिन उतरल रहै आ हमहूँ तँ रंगलेमनुख छी ने? मुदा जा धरि चलै छै चलऽ दियौ। जहिया निसाँ उतरतै देखल जेतै। व्यंग्य निबंध लास्ट टाइम सजेशन हम कोनो नौकरीमे सफल नै भऽ सकलहुँ। कारण ई नै छल जे हम काज नै करिऐ तैमे बस आठ घंटाक सुतबाक आदति छल तँए। बिजनेसो नै कऽ सकलिऐ कारण हेड़ा-फेरीमे हम माँजल लोक आ हम ओहूमे हेड़ा-फेड़ी करऽ लगलहुँ तँए ओहो असफल भेल। अंतमे हारि कऽ हम कुंजी लिखऽ बला बनि गेलहुँ। ने पूँजी लागल आ ने किछु सोलहो आना हेडा-फेरी। मोन बड़ लागल हमर ऐमे। हमर दिनानुदिन तरक्की भेल ऐ क्षेत्रमे जकर फलस्वरूप हम महान कंजीकार बनि गेलहुँ। प्रस्तुत अछि हमर एकटा कुंजी--- प्रिय विद्यार्थी गण, हम अपने लोकनिक समक्ष ई लास्ट टाइम सजेशन राखि रहल छी। आशा अछि जे ऐसँ अहाँ सभकेँ लाभे-लाभ भेटत। ओना हम पाठ्यपुस्तक सेहो लीखि सकैत छलहुँ मुदा नै लिखलहुँ कारण जे बिकाइत नै अछि किएक तँ अहाँ सभ खाली सजेशने केर माँग करैत छिऐ। तँइ हम अपने लोकनिक सामने ई प्रस्तुत कएल। बंधुगण ऐ सजेशनमे मात्र बीस गोट प्रश्न उत्तर सहित अछि। एकर अध्ययन केलासँ पास करबे टा करब से हमर गारंटी अछि। डीवीजन एनाइ कोनो आवश्यक नै संगहि संग हम ईहो कहब जे ई सजेशन कोर्से नै व्यावहारिक जीवनमे सेहो काज देत। तँ आउ अध्ययन करी ऐ लास्ट टाइम सजेशन केर। इति शुभम 1) नेताक परिभाषा दिअ- नेता ओहन लोककेँ कहल जाइत छै जे लेबा बेरमे सभसँ आगू आ देबा बेरमे सभसँ पाछू रहैत अछि। 2) नेता आ जनताक बीच केहन संबंध छै- जेना पानिमे तेल घोरल हो। दूनू एकैठाँ देखाएत मुदा दूनूक अलग-अलग अस्तित्व। 3) ठेकेदारपर संक्षिप्त टिप्पणी दिअ- कोनो बनैत चीजक नेओं कमजोर कऽ जे अपन नेओं मजगूत करथि से ठेकेदार कहाबथि छथि। 4) डाक्टर के छथि- डाक्टर ओ लोक छथि जे बेमारीकेँ तेना ने हटाबथि जे आदमी संसारिक आवागमनसँ मुक्त भऽ जाए। वस्तुतः डाक्टर महान योगी होइत छथि जे की साधारण साधककेँ सोझें मोक्षक बाट बतबैत छथि। 5) उच्च अधिकारीक दू काजक वर्ण करू- a) ओ घूस लै छथि, b) स्वंय नियम बना तोड़ै छथि। 6) पुलिसक दू काजक वर्णन करू- a) ओ अपराधी आ दुष्टक रक्षा करै छथि, b) फुसिक सबूतसँ निर्दोषकेँ फँसबै छथि। 7) बेसबाक परिभाषा प्रस्तुत करू- बेसबा ओ नै जे पेटक भूख लेल देह बेचैत हो। बेसबा तँ ओ अछि जे बेसी पाइ लेल देह बेचैत अछि। 8) जनताक संक्षिप्त काजक वर्णन करू- a) ओ पाइ लऽ कऽ भोट खसबैत छथि, b) अपन अधिकारक प्रति निष्चेष्ट रहि आनक अधिकारक उपभोग करै छथि। 9) हीरो किनका कहि सकैत छिअनि- हीरो ओ छथि जे की फिल्ममे दुष्टक संहार करै छथि मुदा असल जीवनमे ओकरा संग दोस्ती रखने रहै छथि। 10) मनुख आ कूकूरमे की अंतर- अंतर अतबए जे मनुख स्वर्थक पूर्ति लेल अपन माए सेहो बेचि सकैए मुदा कूकूरसँ से संभव नै। 11) सज्जनक दू टा लक्षण प्रस्तुत करू- a) ओ एकौट होथि, b) समाज हुनका बताह कहैत होइन। 12) पुजारी किनका कहि सकैत छिअनि- पुजारी ओ छथि जे मंत्रक सस्वर पाठ करैत स्वार्थक मानसिक पाठ करैत होथि। 13) संन्यासीक दू टा लक्षण प्रस्तुत करू- a) संन्यासी मठ आ कामिनी लेल बंदूको निकालि सकै छथि, b) अपने ज्ञान होइन की नै होइन मुदा अपना नामक आगू जगतगुरू लगबैत छथि। 14) साहित्यकार के छथि- साहित्यकार ओहन लोककेँ कहल जाइत छै जे की टका ओ पुरस्कारक लेल वाग्विलास करै छथि। जे खाली अपने लिखलकेँ पढ़ि-पढ़ि कऽ अनका सुनाबथि आ अनकर लिखलकेँ पढ़बे नै करथि तिनको साहित्यकार कहल जाइत छै। ओना संसारमे किछु एहनो साहित्यकारक प्रजाति अछि जे अपने आगू बढ़बाक लेल अपस्याँत रहत मुदा सदिखन दोसरकेँ छिटकी मारि कऽ। 15) जनपथ आ राजपथमे की अंतर छै- जै बाटपर गरीब चलै छै तकरा जनपथ आ पाइ बला लोकक बटाकेँ राजपथ कहल जाइत छै। 16) ओकील के छथि- ओकील हुनका मानल जाए जे टका लऽ कऽ एक आदमीक माध्यमें दोसर आदमीक छातीमे कील ठोकै छथि। 17) न्यायाधीश हेबाक मापदंड की अछि- जे न्यायपर आधीश भऽ ओकरा अपना इच्छे मोड़ि सकए से न्यायधीश भऽ सकै छथि। 18) की बेपारीके बेपार विशेषज्ञ बूझल जाए- बुझि सकै छी कारण हुनकर पार पेनाइ सभसँ संभव नै। 19) गुरू आ शिक्षकमे की अंतर थिक- गुरू ज्ञान दऽ कऽ बौआ दै छथि आ शिक्षक बिना ज्ञान देने। 20) विद्यार्थी के थिकाह- ओ बालक जे अनर्थसँ अर्थ आनि धर्म, काम ओ मोक्षक प्राप्ति करै छथि से विद्यार्थी भेला। मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग (आलोचना) कोनो साहित्यिक विधा अपना आपमे ता धरि स्वतंत्र नै मानल जा सकैए जा धरि ओकर हरेक समयमे कमसँ कम आठ-दस टा पूर्णकालिक रचनाकार नै भेटै। मुदा ई तथ्य मैथिली साहित्यक कोनो विधापर लागू नै होइत अछि। कहबाक मतलब जे जिनका जते मोन भेलनि से तते विधाक संग बलात्कार केलथि। ई मैथिली भाषा थिक जैमे कोनो लेखक जँ नीक कविता लिखै छथि तँ हुनका नीक कथाकार ओ अन्य विधाक मास्टर सेहो मानि लेल जाइत अछि। आ ऐ तरहँक सर्टिफिकेट बँटबामे मानसिक रूपसँ लोथ विश्वविद्यालीय आलोचक सभहँक भूमिका बेसी रहैत छनि। ऐ ठाम हम स्पष्ट कही जे हरेक विधामे लीखब आ हरेक विधामे अपना-आपके मास्टर कहब वा कहेबाक लेल येन-केन-प्रकारेण छद्म करब दूनू अलग -अलग वस्तु अछि। ऐ ठाम हम जिनकर गप्प करए जा रहल छी से हमरा नजरिमे मूलतः गवेषक ओ कोशकार छथि मुदा ओ गजल, हाइकू, कविता, लघुकथा, विहनि कथा, आलोचना सहित आन विधामे सेहो रचनारत छथि (मुदा ई उल्लेखनीय अछि जे रचना करैत-करैत ई सभ विधाक लेल एकटा मानक आलोचना कहू वा विधागत नियक कही की व्याकरण कहू से मैथिली भाषाक अनुकूल बनेलाह) आ पाठक ई कहबामे धुकचुका जाइ छथि जे कोन विधाक कोन रचना नीक छै। ऐ ठाम ईहो हम कही जे कोनो लेखक केर सभ रचना उत्कृष्ट नै होइ छै। कोनो दब, तँ कोनो नीक तँ कोनो मध्यम। ईएह चक्र सभ लेखक संग छै। केओ ऐ चक्रक वास्तविकाकेँ मानै छथि तँ बहुत रास लेखक ओकरा घमंडमे आबि नकार दै छथि। मुदा हमर आलोच्य लेखक ऐ वस्तुकेँ मानै छथि आ ओ तर्क दै छथि जे ई हरेक लेखककेँ मानबाक चाही। ओना साहित्यिक विधाकेँ छोड़ि ई नव लेखककेँ बढ़ावा देबऽमे सभसँ आगू छथि आ हिनक ई विधा आन सभ विधापर भारी अछि। आब ऐठाम अहाँ सभ चकित होमए लागब तँए हम हिनक आन विधाकेँ छोड़ि मात्र गजलपर केंद्रित कऽ रहल छी। जँ मैथिली गजलकेँ देखी तँ भने ई 103 बर्खसँ लिखाइत रहल हो मुदा गजलक व्याकरण बनल 2009मे। आब एकर कारण जे हो । "अनचिन्हार आखर " ब्लागपर श्री गजेन्द्र ठाकुरजी बर्ख 2009सँ "मैथिली गजल शास्त्र " केर शुरूआत केलाह जे 14 खंडमे पूरा भेल। आब ई आलेख हुक गजल संग्रह "धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ"मे आएल अछि।प्रस्तुत गजल शास्त्रमे मैथिली गजल अनेक मौलिक अवधारणाक जन्म भेल। आगू बढ़बासँ पहिने ऐ गजल शास्त्रक किछु मुख्य विशेषता देखल जाए--- 1) सरल वार्णिक बहर-- ई ऐ गजल शास्त्रक सभसँ बड़का विशेषता अछि। चूँकि मैथिलीक बहुसंख्यक शाइर बहरक अभावसँ ग्रसित छलाह तँए हुनका सभकेँ एक सूत्रमे अनबाक लेल वैदिक छंदक प्रयोग भेल जकर नाम पड़ल " सरल वार्णिक बहर" ऐ बहरक मोताबिक मतलाक पहिल पाँतिमे जतेक वर्ण हो ओतेक बर्ख गजलक हरेक पाँतिमे भेनाइ आवश्यक। ई बहर ततेक ने लोकप्रिय भेल जे सभ शाइर एक प्रचुर प्रयोग केलथि संगे-सग ई बहर सभ शाइरकेँ वर्णवृत प्रयोग करबाक लेल एकटा नीक बाट देलक तँए हमरा नजरिमे ई बहर आधुनिक मैथिली गजलमे वर्णवृतक प्रयोगक पहिल सीढ़ी अछि। 2) वैदिक छन्दक पुनर्जागरण-- ऐ गजल शास्त्रसँ विलुप्त होइत वैदिक छन्दक पुर्नजागरण भेल। सभ वैदिक छन्द सरल वार्णिक छन्द अछि। वर्तमानमे श्री गजेन्द्र ठाकुर जी  एकरा विवेचित कए मात्र किछुए समयमे आ सेहो सरल रूपें  वेद-विज्ञानक परिचय करबौलथि। एखन जे गजल लिखै छथि वा जे गजेन्द्र ठाकुर जीक पोथी वा अनचिन्हार आखर पढ़ताह हुनका स्वतः ई बुझा जेतन्हि जे गायत्री छन्द की छै आ अनुष्टुप छन्द की। गायत्री छंद ओ गायत्री मंत्रक बीच की संबंध छै से ऐ लेखक सहायतासँ आब सभ बूझऽ लगलाह अछि। 3) बहरक निर्धारण--- ओना तँ वर्णवृत वा बहर गजल विश्वस्तरपर मान्य अछि मुदा भारतमे अबिते ओ विखंडित भेल। केओ हिंदीक अनुकरण करैत मात्रिक लेलाह तँ केओ किछु  " मुदा श्री ठाकुरजी बिना कोनो दबाब बनेने शाइर लेल सीमा बना देलखिन। श्री ठाकुरजी कहैत छथि "कोनो गजलक पाँती(मिसरा)क वज्न/ वा शब्दक वज्न तीन तरहेँ निकालि सकै छी, सरल वार्णिक छन्दमे वर्ण गानि कऽ; वार्णिक छन्दमे वर्णक संग ह्रस्व-दीर्घ (मात्रा) क क्रम देखि कऽ; आ मात्रिक छन्दमे ह्रस्व-दीर्घ (मात्रा) क क्रम देखि कऽ। जिनका गायनक कनिकबो ज्ञान छन्हि ओ बुझि सकै छथि जे गजलक एक पाँतीमे शब्दक संख्या दोसर पाँतीक संख्यासँ असमान रहि सकैए, मुदा जँ ऊपर तीन तरहमे सँ कोनो तरहेँ गणना कएल जाए तँ वज्न समान हएत। मुदा आजाद गजल  बे-बहर होइत अछि तेँ ओतऽ सभ पाँती वा शब्दमे वज्न समान हेबाक तँ प्रश्ने नै अछि। ऐ तीनू विधिसँ लिखल गजलमे मिसरामे समान वज्न एबे टा करत। ओना ई गजलकार आ गायक दुनूक सामर्थ्यपर निर्भर करैत अछि; गजलकार लेल वार्णिक छन्द सभसँ कठिन, मात्रिक ओइसँ हल्लुक आ सरल वार्णिक सभसँ हल्लुक अछि, मुदा गायक लेल वार्णिक छन्द सभसँ हल्लुक, मात्रिक ओइसँ कठिन, सरल वार्णिक ओहूसँ कठिन आ आजाद गजल (बिनु बहरक) सभसँ कठिन अछि।" आब ई शाइरपर निर्भर अछि ओ लिखबाक लेल कोन बहर प्रयोग करै छथि मुदा जेना की ठाकुर जी कहै छथि गेबाक लेल वार्णिक छंद सभसँ हल्लुक छै तैसँ अरबी-फारसी-उर्दू गजलक व्याकरणक प्रमाणिकता भेटैत अछि आ हिंदीक नकलवादी शाइर सभहँक धज्जी उड़ि जाइत अछि आ ऐ तरहें मैथिली गजलमे वर्णवृतक प्रयोग सुनिश्चित होइत अछि। 4) गजल, बहर आ संगीत-- ऐ गजल शास्त्रमे गजल, बहर आ संगीतक मध्य समता ओ विषमताक नीक चर्च अछि। जिनका संगीतक जानकारी नै अछि तकरा लेल ई पोथी अमृतक समान काज करत। मूल तथ्य सभ नीक जकाँ फड़िछाएल अछि जेना--- "जेना वार्णिक छन्द/ वृत्त वेदमे व्यवहार कएल गेल अछि तहिना स्वरक पूर्ण रूपसँ विचार सेहो ओइ युग सँ भेटैत अछि। स्थूल रीतिसँ ई विभक्त अछि:- 1.उदात्त 2. उदात्ततर 3. अनुदात्त 4. अनुदात्ततर 5. स्वरित 6. अनुदात्तानुरक्तस्वरित, 7. प्रचय (एकटा श्रुति-अनहत नाद जे बिना कोनो चीजक उत्पन्न होइत अछि, शेष सभटा अछि आहत नाद जे कोनो वस्तुसँ टकरओलापर उत्पन्न होइत अछि)। 1. उदात्त- जे अकारादि स्वर कण्ठादि स्थानमे ऊर्ध्व भागमे बाजल जाइत अछि। एकरा लेल कोनो चेन्ह नै अछि। 2. उदातात्तर- कण्ठादि अति ऊर्ध्व स्थानसँ बाजल जाइत अछि। ----ऊहगान- सोमयाग एवं विशेष धार्मिक अवसर पर। पूर्वार्चिकसँ संबंधित ग्रामगेयगान ऐ विधिसँ। ऊह्यगान आकि रहस्यगान- वन आ पवित्र स्थानपर गाओल जाइत अछि। पूर्वार्चिकक आरण्यक गानसँ संबंध। नारदीय शिक्षामे सामगानक संबंधमे निर्देश:- 1.स्वर-7 ग्राम-3 मूर्छना-21तान-49 सात टा स्वर सा, रे, ग, म, प, ध ,नि, आ तीन टा ग्राम- मध्य, मन्द, तीव्र। 7*3=21 मूर्छना। सात स्वरक परस्पर मिश्रण 7*7=49 तान। ऋगवेदक प्रत्येक मंत्र गौतमक 2 सामगान (पर्कक) आ काश्यपक 1 सामगान (पर्कक) कारण तीन मंत्रक बराबर भऽ जाइत अछि। मैकडॉवेल इन्द्राग्नि,मित्रावरुणौ, इन्द्राविष्णु, अग्निषोमौ ऐ सभकेँ युगलदेवता मानलन्हि अछि। मुदा युगलदेव अछि –विशेषण-विपर्यय। वेदपाठ- 1. संहिता पाठ अछि शुद्ध रूपमे पाठ। अ॒ग्निमी॑ळे पुरोहि॑त य॒घ्यस्य॑दे॒वम्त्विज॑म।होतार॑रत्न॒ धातमम्। 2. पद पाठ- ऐमे प्रत्येक पदकें पृथक कऽ पढ़ल जाइत अछि। 3. क्रमपाठ- एतऽ एकक बाद दोसर, फेर दोसर तखन तेसर, फेर तेसर तखन चतुर्थ। एना कऽ पाठ कएल जाइत अछि। 4. जटापाठ- ऐमे जँ तीन टा पद क, ख, आ ग अछि तखन पढ़बाक क्रम ऐ रूपमे हएत। कख, खक, कख, खग, गख, खग। 5. घनपाठ- ऐ मे उपरका उदाहरणक अनुसार निम्न रूप हएत- कख, खक, कखग, गखक, कखग। 6. माला, 7. शिखा, 8. रेखा, 9. ध्वज, 10. दण्ड, 11. रथ। अंतिम आठकेँ अष्टविकृति कहल जाइत अछि। साम विकार सेहो 6 टा अछि, जे गानकेँ ध्यानमे रखैत घटाओल, बढ़ाओल जा सकैत अछि। 1. विकार-अग्नेकेँ ओग्नाय। 2. विश्लेषण- शब्द/पदकेँ तोड़नाइ 3.विकर्षण-स्वरकेँ खिंचनाइ/अधिक मात्राक बराबर बजेनाइ। 4. अभ्यास- बेर-बेर बजनाइ।5. विराम- शब्दकेँ तोड़ि कऽ पदक मध्यमे ‘यति’। 6. स्तोभ-आलाप योग्य पदकेँ जोड़ि लेब। कौथुमीय शाखा ‘हाउ’ ‘राइ’ जोड़ैत छथि। राणानीय शाखा ‘हावु’, ‘रायि’ जोड़ैत छथि।" ई तँ छल वैदिक संगीतक जानकारी । लौकिक संगीतक चर्च श्री ठाकुर जीन एना करै छथि--- संगीतक वर्ण अछि सा, रे, ग, म, प, ध, नि, सां एकरा मिथिलाक्षर/ देवनागरीक वर्ण बुझबाक गलती नै करब। आरोह आ अवरोहमे स्वर कतेक नीच-ऊँच हुअए तकरे टा ई बोध करबैत अछि। जेना कोनो आन ध्वनि जेना “क” केँ लिअ आ की-बोर्डपर निकलल सा, रे... केर ध्वनिक अनुसार “क” ध्वनिक आरोह आ अवरोहक अभ्यास करू। ऐ सातू स्वरमे षडज आ पंचम मने सा आ प अचल अछि, एकर सस्वर पाठमे ऊपर नीचाँ हेबाक गुंजाइश नै छै। सा अछि आश्रय आकि विश्राम आ प अछि उल्लासक भाव। शेष जे पाँचटा स्वर सभटा चल अछि, मने ऊपर नीचाँक अर्थात् विकृतिक गुंजाइश अछि ऐमे। सा आ प मात्र शुद्ध होइत अछि, आ विकृति भऽ सकैत अछि दू तरहेँ, शुद्धसँ स्वर ऊपर जाएत आकि नीचाँ। यदि ऊपर रहत स्वर तँ कहब ओकरा तीव्र आ नीचाँ रहत तँ ओ कोमल कहाएत। म कँ छोड़ि कऽ सभ अचल स्वरक विकृति होइत अछि नीचाँ, तखन बुझू जे “रे, ग, ध, नि” ई चारि टा स्वरक दू टा रूप भेल कोमल आ शुद्ध। म केर रूप सेहो दू तरहक अछि, शुद्ध आ तीव्र। रे दैत अछि उत्साह, ग दैत अछि शांति, म सँ होइत अछि भय, ध सँ दुःख आ नि सँ होइत अछि आदेशक भान। शुद्ध स्वर तखन होइत अछि, जखन सातो स्वर अपन निश्चित स्थानपर रहैत अछि। ऐ सातोपर कोनो चेन्ह नै होइत अछि। जखन शुद्ध स्वर अपन स्थानसँ नीचाँ रहैत अछि तँ कोमल कहल जाइत अछि आ ई चारिटा होइत अछि, ऐमे नीचाँ क्षैतिज चेन्ह देल जाइत अछि, यथा- रे॒, ग॒,  ध॒,  नि॒। शुद्ध आ मध्यम स्वर जखन अपन स्थानसँ ऊपर जाइत अछि, तखन ई तीव्र स्वर कहाइत अछि, ऐमे ऊपर उर्ध्वाधर चेन्ह देल जाइत अछि। ई एकेटा अछि-म॑। एवम प्रकारे सात टा शुद्ध यथा- सा, रे, ग, म, प, ध, नि, चारिटा कोमल यथा- रे॒,  ग॒,  ध॒,  नि॒ आ एकटा तीव्र यथा म॑ सभ मिला कऽ 12 टा स्वर भेल। ऐमे स्पष्ट अछि जे सा आ प अचल अछि, शेष चल वा विकृत।" ऐ विवरणसँ स्पष्ट अछि जे श्री ठाकुर जी गजल, बहर आ संगीतक प्रमाणिक जानकारी पाठकक आगू रखलाह अछि। 5) मैथिली भाषा संपादन--- बहुत रास विशेषतामेसँ ई एकटा यूनिक विशेषता अछि। एकर अध्ययन केलासँ अधिकत्तम शुद्ध मैथिली लीखब आबि सकैए (कोनो भाषा पूर्ण रूपेण शुद्ध नै होइ छै)। किछु उदाहरण देखल जाए-- उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम, मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ, षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइए आ बाजलो जेबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) मने ऐ लेखकेँ पढ़लासँ लिखित आ उच्चरित दूनू रूपक दर्शन भेटत आ पाठक एकै ठाम ई व्याख्या देखि सकै छथि। वर्तमान समयमे ई आलेख मैथिली भाषाक मानकीकरण लेल मीलक पाथर जकाँ अछि संगे संग ई मिथिलाक सभ जातिक उच्चारणपर अधारित अछि तँए पुरान व्याकरणशास्त्री सभहँक व्याख्यासँ बेसी प्रमाणिक ओ लोकप्रिय अछि। 6) मैथिलीक बहर विहीन गजलक संदर्भ-- श्री ठाकुर प्रमाणिकता पूर्वक बहर विहीन गजल सभहँक खंडन केलाह कर विस्तृत विवरण ऐ शास्त्रमे भेटैए-- लोकवेद आ लालकिला: आत्ममुग्ध आमुख सभक बाद ऐ संग्रह मे कलानन्द भट्ट, तारानन्द वियोगी, डॉ. देवशंकर नवीन, नरेन्द्र, डॉ. महेन्द्र, रमेश, रामचैतन्य “धीरज”, रामभरोस कापड़ि“भ्रमर”, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, विभूति आनन्द, सियाराम झा “सरस” आ सोमदेवक  गजल  देल गेल अछि। कलानन्द भट्ट भोर आनब हम दोसर उगायब सुरुज करब नूतन निर्माण हम बनायब सुरुज सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-17 वर्ण दोसर पाँती- 18 वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जेबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-21 मात्रा, दोसर पाँती- 21 मात्रा, मात्रा मिल गेलासँ आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। पहिल पाँती दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व (एतऽ दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व। मुदा एतऽ गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रम टूटि गेल। --------------- आ एनाहिते सभ बहर विहीन गजलक तक्ती कएल गेल अछि। ऐ पद्धितसँ समान्य पाठक सेहो बहरक निर्धारण कऽ सकै छथि। 7) मैथिली गजलक इतिहासकेँ दू भागमे बाँटब--- श्री ठाकुरजी मैथिली गजलक प्रवृति, काल ओ प्रमाणिकताकेँ हिसाबसँ दू खंडमे बटलाह 1) 1905सँ लऽ कऽ 2008 धरि "जीवन युग" आ 2008कक बाद बला कालखंडकेँ ओ "अनचिन्हार आखर"क नामपर "अनचिन्हार युग"। संगीतकार आ संगीतविद भेनाइ अलग-अलग गप्प छै। संगीतकार संगीतक रचना करै छै तँ संगीतविद संगीतक फार्म के। तेनाहिते शाइर आ अरूजी भेनाइ अलग-अलग गप्प छै। शाइर शाइरी केर रचना करै छै तँ अरूजी ओकर फार्म के। केखनो काल बहुमुखी प्रतिभा बला रचयिता दूनू काज करै छै। मुदा काजमे अंतर रहितों दूनू एक दोसरापर टिकल छै। केखनो काल शाइर वा संगीतकार भावमे आबि कऽ फार्मकेँ तोड़ि नव फार्म बना दै छै। आब ऐठाम अरूजी वा संगीतविद ओकरा अपन भाषा वा स्वरक अनूकूल बनेबाक ले प्रयत्न भऽ जाइ छथि आ एही ठाम शुरू भऽ जाइत छै संगीतकार आ संगीतविद वा शाइर आ अरूजी के झगड़ा। मुदा ई झगड़ा शुद्ध रूपसँ वैचारिक होइत छै। केखनो काल कऽ व्यक्तिगत सेहो बनि जाइत छै। मुदा सभ पक्षकेँ बुझबाक चाही जे केहनो नीक फार्म वा भाव किएक ने हो अपन भाषा वा अपन लय केर हिसाबसँ हेबाक चाही। जँ हम भारतीय शास्त्रीय संगीतमे वेस्टर्न सुर लऽ रहल छिऐ तँ ई धेआन राखऽ पड़त जे ओकर लय पूर्ण रूपेण भारतीय हो। जँ सुर भारतीय नै हएत तँ ओ गीत किछुए दिनमे बिला जाएत। हमरा हिसाबें भारतमे फ्यूजन संगीत किछु दिन लेल लोकप्रिय तँ भेल मुदा जल्दिए बिला गेल कारण संगीतकार सभ वेस्टर्न तत्व तँ लऽ लेलाह मुदा ओकर भारतीयकरण करबामे असफल भऽ गेलथि। मैथिलीक शाइर सभ वैचारिक युद्ध करबाक बदला घर-घराड़ीक गप्प आनि दै छथि। हुनका बुझाइन छनि जे हमरा लग पाइ अछि तँ हमर बात किएक ने उपर रहत। ओहन शाइर ईहो कहै छथि जे अमुक लोक वा अमुक संस्था जोनो हमर रोजी-रोटी चलबै छथि जे हम हुनकर गप्प मानब। श्री गजेन्द्रजी द्वारा लिखल गजलशास्त्रक दोसरे खंडसँ मैथिलीक किछु नकली शाइर सभ क्रोधित भऽ गेलाह कारण ई शास्त्र हुनकापर प्रश्नचिन्ह लगा देलक। तँए ओ नानाप्रकारक  आरोप-प्रत्यारोपपर आबि गेलथि मुदा सच सदिखन सच होइ छै आ ओकर कोनो विकल्प नै छै। ऐ मुख्य विशेषता सभकेँ अलावे आर बहुत रास विशेषता छै जेना मैथिली-उर्दू गणना, विकारी प्रयोग आदि जकरा ऐ छोट आलेखमे समटल नै जा सकैए। पाठकसँ आग्रह जे पूर्ण रसास्वादन लेल मूल पाठ पढ़थि। आब आबी ऐ पोथीमे संकलित गजल सभपर। गजल दिस चलबासँ पहिने हम किछु निवेदन करब। जेना की पहिनहें हम कहने छी जे गजेन्द्र ठाकुरजी रचैत-रचैत गजल ओ गजल शास्त्रकेँ मजगूत केलाह तँए ऐ संग्रहमे ओहनो गजल सभ अछि जैमे काफिया नै अछि (ओना पोथीक अंतमे शुद्धि पत्र देल गेल अछि अजुक हिसाबसँ)।, तेनाहिते कोनो गजलमे बिनु काफियाक रदीफ भेटत। हँ, सभ गजल अरबी बहर ओ सरल वार्णिकमे अछि। जँ बिना शुद्धिपत्रकेँ देखी तँ आलोचक ऐ गजल सभकेँ खारिज कऽ सकै छथि आ तैमे किनको आपत्ति नै। मुदा ऐ ठाम ई धेआन राखब बेसी जरूरी जे ई गजल सभ प्रयोगिक स्तरपर लिखल गेल अछि चाहे ओ संस्कृतक तुकांत विहीनि काय्यक प्रयोग कहियौ की मैथिली गीतक पारंपरिक गीतक तुकांतक प्रयोग आ ऐ प्रयोग सभसँ गुजरलाक बादें श्री ठाकुजी गजलशास्त्र दिस गेलाह। जँ ऐ संग्रहक गजल सभकेँ नीक जकाँ पढ़बै तँ तीनटा प्रयोग नीक जकाँ लक्षित हएत--- 1) जँ गजल बिना कफियाक हेतै ( संस्कृत जकाँ ) तखन केहन हेतै 2) जँ काफिया नै मुदा खाली रदीफ होइक तखन केहन हेतै आ 3) जँ अरबी बहरमे होइक तखन ओकर गायन केहन हेतै। ऐ लेल श्री ठाकुरजी दीक्षा ठाकुरसँ अपन किछु सलेक्टिव गजल गबा कऽ प्रयोग कऽ लेने छथि जे की ऐ लिंकपर अछि-- आब आलोचक सभ ऐ ठाम ई कहि सकै छथि जे प्रकाशित होमएसँ पहिने एकरा सही कएल जा सकै छलै आ से गप्प सही अछि मुदा से केलासँ कोन प्रयोग कोना भेलै से हटि जाइत तँए संग्रहमे गजल मूल प्रारूपमे अछि आ अंतमे शुद्धिपत्र देल गेल अछि। तँ आब ऐ संग्रहक किछु गजलक मूल प्रारूपकेँ देखी--- ऐ संग्रहक पहिल गजलक मतला अछि-- बझाओल गेलैए चिड़ैया एना रे कहैए हितैषी ई शिकारी बड़ा रे अजुके नै सभ दिनसँ सभ दिनसँ शिकारी अपना आपकेँ चिड़ैयाक हितैषी कहैए आ तकर परिणाम की होइ छै से सभकेँ बूझल छै............... दोसर गजलक दोसर शेर देखल जाए--- क्रूर स्वप्न आ सुन्दर जीवन देखलौं निन्नसँ जगलापर कोना हम मानब जँ कियो ई कहलक किछु नै बदलैए सपना आ यथार्थपर बहुत तर्क वितर्क छै मुदा एकरा काव्यत्मक रूपमे देखू जे की मजा छै। कहबी छै जे मिथिलामे आगि लागि गेल रहै मुदा तैयो जनक अविचलित रहि गेल छला। दोसर कहबी छै जे रोम जरैत छल आ नीरो बंसी बजा रहल छल। दूनू घटना दुनियाँक दू छोड़पर भेल छल मुदा कतेक साम्यता छै से देखू। एही घटनाकेँ श्री ठाकुरजी ऐ शेरमे बान्हि देला-- मनुख जरैए गाम कनैए हमरा की चद्दरि तनने फोंफ कटैए हमरा की तेरहम गजल देखू-- अकत तीत प्रेमक जे पथिक अदौकालसँ धतालबूढ़ प्रेमकेँ बोहेलक दुनू हाथसँ निर्मल आंगुरसँ छूबै जे ओकर पुठपुरी फरफैसी पसारै निदरदी अगिलकण्ठ जँ निमरजना प्रेम जे छलै धपोधप निश्छल बिदोरै लेल प्रेमीकेँ छलै ओ कड़ेकमान तँ अकरतब कर्तव्यमे भेद नै बुझलकै जे जराउ प्रेमक गप्प नै कहियो नुकेलकै जँ खञ्जखूहर ऐरावत नै बाटक छेँ बाटमे धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ ऐ गजलमे शाइर संस्कृतक अनुकरणपर काफिया मात्र चंद्रबिंदुकेँ लेने छथि ( मात्र प्रयोगक खातिर)। ऐ गजल सभहँक अलावे ऐ संग्रहमे अजाद गजल ओ बाल गजल सेहो अछि मुदा हम अपन विचारकेँ विराम दऽ रहल छी आ आग्रह करै छी जे मैथिली गजलक प्रयोगसँ गुजरबाक लेल ऐ संग्रहकेँ जरूर पढ़ी। चिकनी माटिमे उपजल नागफेनी- (आलोचना) अपन समीक्षाक श्रृंखला लेल आइ हम रमेश कृत कथित गजल संग्रह " नागफेनी " अनने छी। चूँकि ऐ संग्रहक सभ गजल बेबहर अछि तँए ऐ गजल सभपर हमर कोनो टिप्पणी नै रहत। कारण सभ समीक्षामे वएह तर्क, वएह घोंघाउज बेर-बेर आएत। एक बेर फेर हम कही जे हमर समीक्षा वा आलोचना-समालोचनाक अधार सदिखन व्याकरण रहैत अछि कारण हरेक लेखक रचनामे भाव (भावना) तँ रहिते छै संगे-संग सभ लेखक भावना अलग-अलग होइत छै तँए हम भावक अधारकेँ स्थायी नै मानै छी। ऐ पोथीमे लेखकक छोड़ि शिवशंकर श्रीनिवासजी भूमिका अछि मने कुल दू टा भूमिका। आ हम अपन समीक्षा लेल इएह दूनू भूमिकाकेँ चुनलहुँ अछि। एही दूनू भूमिकाक अधारपर हम तात्कालीन गजल आ ओकर रचियताक मनोवृतिकेँ उजागर करबाक प्रयास केलहुँ अछि। पहिने शिवशंकरजीक भूमिका अछि तकर बाद शाइरक मुदा हम पहिने शाइरक भूमिकाकेँ विवेचित करब तकर बादें शिवशंकरजीक भूमिकापर आएब। शाइरक भूमिकामे कुल 13टा बिंदु अछि ऐमेसँ मात्र हम पहिल,दोसर, चारिम आ पाँचम बिंदुकेँ विवेचित करब। बाद बाँकी बिंदु सभ हुनक व्यक्तिगत छनि। बिंदु-1) "गजलक ई कृति ओहि समालोचक लोकनिकेँ समर्पित छनि, जिनका लोकनिक घोंकचि जाइत छनि नाक, गजलक नामें सुनि।“ ऐ पहिल बिंदुसँ ई नीक जकाँ बुझाइत अछि जे रमेशजी सेहो आलोचक सभकेँ बिना मापदंड देने बिना आलोचनाक उम्मेद केने छथि। मुदा हमर स्पष्ट मानब अछि जे ओइ समयक आलोचक सभ गजलक आलोचना नै कऽ कऽ गजलपर बड़का उपकार केने छथि कारण ओहि समयक 99 प्रतिशत अयोग्य अछल आ अछि एवं बचल 1 प्रतिशत गजल विजयनाथ झा ओ जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल जीक अछि जिनका ई सभ गजलकार मानिते नै छथि। बिंदु-2) "गजलक स्थापना हेतु ओकरा पक्षमे तर्ककेँ ओतबे मथल गेल जतबा ओकरा विपक्षमे कुतर्ककेँ। तँए आब हम कए टा तथ्यकेँ नहिं दोहराबए-तेहराबए चाहैत छी जे गजल आब ओ नहिं अछि जे अपन शास्त्रीय रूपमे छल, एकरामे नवकविता बला क्लिष्टता, दुरूहता आ अ-संप्रषेणीयता आदि नकारात्मक नहि छैक, एकरामे भाव आ अभिव्यक्ति दुनू आसान आ सकारत्मक छैक, आधुनिकताक कोनो कमी नहि छैक,आब ई माशूकाक आँचर नहि अछि आ ने शाकी. शराब, जाम आदिक बंधनमे जकड़ल अछि, ई नवकविता आ पुरान कविताक बीचक रस्ता थिक, एकरा गेयधर्मिताक पैमानापर नापब पुरान कट्टरता थिक,एकर शास्त्रीय चरित्रकेँ दँतिया कऽ एकर आलोचना करब मात्र गेंग रोपब थिक,दुष्यंत कुमार, फैजसँ लऽ कऽ अदम गोंडवी धरि जे एकर नव कलेवर तरासलनि तकरा स्वीकार करबाक आब कोनो टा अधारे नहिं छेक,आदि-आदि----------|” ऐ दोसर बिंदुसँ ई गप्प स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे आने आन कथित प्रगतिशील गजलकार जकाँ रमेशजी सेहो गजलक संबंधमे भ्रमित छथि। वस्तुतः माशूका एहन नकली शब्द (जे की हिंदीसँ उधार लेल गेल अछि) केँ गजलसँ जोड़ि कऽ ओ अपन भ्रमकेँ प्रदर्शित केलाह अछि। ऐ बिंदुमे सभसँ आपत्तिजनक गप्प दुष्यंत कुमार, फैज अहमद फैज ओ अदम गोंडवीक संबंधमे अछि। ई तीनू गजलकार पूर्ण रूपेण शास्त्रीय गजल लिखने छथि खाली ओ सभ विषय वस्तुकेँ परिवर्तन कऽ देलखिन्ह व्याकरण ओहिना के ओहिना रहलै। मुदा मैथिलीक ई कथित प्रगतिशील सभ बिना बुझने-सुझने हिका सभकेँ प्रसंगमे आनि दै छथि जे की हिनकर सभहँक ज्ञानक सीमाकेँ देखार करैत अछि। ऐ ठाम हम किछु गजलकारक तक्ती कऽ कऽ देखा रहल छी जे कोना हिनकर सभहँक गजल व्याकरण ओ बहरमे अछि--- पहिने कबीर दासक एकट गजलकेँ तक्ती कऽ कऽ देखा रहल छी- बहर—ए—हजज केर ई गजल जकर लयखंड (अर्कान) (1222×4) अछि-- ह1 मन2 हैं2 इश्2, क़1 मस्2ता2ना2, ह1 मन2 को 2 हो 2, शि1 या2 री2 क्या2 हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ? रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ? जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते, हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ? खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकता है, हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ? न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से, उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ? कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से, जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ? तेनाहिते आजुक प्रसिद्ध शाइर मुनव्वर राना केर ऐ गजलक तक्ती देखू-- बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे यही मौसम है अब सीने में सर्दी बैठ जाती है नकाब उलटे हुए जब भी चमन से वह गुज़रता है समझ कर फ़ूल उसके लब पे तितली बैठ जाती है मुनव्वर राना (घर अकेला हो गया, पृष्ठ - 37) तक्तीअ बहुत पानी / बरसता है / तो मिट्टी बै / ठ जाती है 1222 / 1222 / 1222 / 1222 न रोया कर / बहुत रोने / से छाती बै / ठ जाती है 1222 / 1222 / 1222 / 1222 यही मौसम / था जब नंगे / बदन छत पर / टहलते थे 1222 / 1222 / 1222 / 1222 यही मौसम / है अब सीने / में सर्दी बै / ठ जाती है 1222 / 1222 / 1222 / 1222 नकाब उलटे / हुए जब भी / चमन से वह / गुज़रता है 1222 / 1222 / 1222 / 1222 (नकाब उलटे के अलिफ़ वस्ल द्वारा न/का/बुल/टे 1222 मानल गेल अछि) समझ कर फ़ू / ल उसके लब / पे तितली बै / ठ जाती है 1222 / 1222 / 1222 / 1222 आब राहत इन्दौरी जीक ऐ गजलकेँ देखू-- ग़ज़ल (1222 / 1222 / 122) (बहर-ए-हजज की मुज़ाहिफ सूरत) चरागों को उछाला जा रहा है हवा पर रौब डाला जा रहा है न हार अपनी न अपनी जीत होगी मगर सिक्का उछाला जा रहा है जनाजे पर मेरे लिख देना यारों मुहब्बत करने वाला जा रहा है राहत इन्दौरी (चाँद पागल है, पृष्ठ - 2४) तक्तीअ = चरागों को / उछाला जा / रहा है 1222 / 1222 / 122 हवा पर रौ / ब डाला जा / रहा है 1222 / 1222 / 122 न हार अपनी / न अपनी जी / त होगी 1222 / 1222 / 122 (हार अपनी को अलिफ़ वस्ल द्वारा हा/रप/नी 222 गिना गया है) मगर सिक्का / उछाला जा / रहा है 1222 / 1222 / 122 जनाजे पर / मेरे लिख दे / ना यारों 1222 / 1222 / 122 मुहब्बत कर / ने वाला जा / रहा है 1222 / 1222 / 122 फेरसँ मुनव्वर रानाजीक एकटा आर गजलकेँ देखू-- हमारी ज़िंदगी का इस तरह हर साल कटता है कभी गाड़ी पलटती है कभी तिरपाल कटता है सियासी वार भी तलवार से कुछ कम नहीं होता कभी कश्मीर कटता है कभी बंगाल कटता है (मुनव्वर राना) 1222 / 1222 / 1222 / 1222 (मुफाईलुन / मुफाईलुन / मुफाईलुन / मुफाईलुन) हमारी ज़िं / दगी का इस / तरह हर सा / ल कटता है कभी गाड़ी / पलटती है / कभी तिरपा / ल कटता है सियासी वा/ र भी तलवा/ र से कुछ कम / नहीं होता कभी कश्मी/ र कटता है / कभी बंगा / ल कटता है आब दुष्यंत कुमारक ऐ गजलक तक्ती देखू-- 2122 / 2122 / 2122 / 212 हो गई है / पीर पर्वत /-सी पिघलनी / चाहिए, इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए। आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ अंत धरि जा सकै छी। पूरा गजल हम दऽ रहल छी-- हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। आब कने अदम गोंडवी जीक दू टा गजलक तक्ती देखू— 1222 / 1222 / 1222 / 1222 ग़ज़ल को ले / चलो अब गाँ / व के दिलकश /नज़ारों में मुसल्‍सल फ़न / का दम घुटता / है इन अदबी / इदारों में आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ अंत धरि जा सकै छी। पूरा गजल हम दऽ रहल छी-- ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में मुसल्‍सल फ़न का दम घुटता है इन अदबी इदारों में न इनमें वो कशिश होगी, न बू होगी, न रानाई खिलेंगे फूल बेशक लॉन की लम्‍बी क़तारों में अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ मुलम्‍मे के सिवा क्‍या है फ़लक़ के चाँद-तारों में र‍हे मुफ़लिस गुज़रते बे-यक़ीनी के तज़रबे से बदल देंगे ये इन महलों की रंगीनी मज़ारों में कहीं पर भुखमरी की धूप तीखी हो गई शायद जो है संगीन के साये की चर्चा इश्‍तहारों में. फेर गोंडवीजीक दोसर गजल लिअ— 2122 / 2122 / 2122 / 212 भूख के एह / सास को शे / रो-सुख़न तक /ले चलो या अदब को / मुफ़लिसों की / अंजुमन तक /ले चलो आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ अंत धरि जा सकै छी। पूरा गजल हम दऽ रहल छी-- भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो जो ग़ज़ल माशूक के जल्‍वों से वाक़िफ़ हो गयी उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो मुझको नज़्मो-ज़ब्‍त की तालीम देना बाद में पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो गंगा जल अब बुर्जुआ तहज़ीब की पहचान है तिश्नगी को वोदका के आचरन तक ले चलो ख़ुद को ज़ख्मी कर रहे हैं ग़ैर के धोखे में लोग इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो. ऐ गजल सभमे छंदानुसार छूट सेहो लेल गेल छै मुदा रमेशजीक वा अन्य कोनो मैथिली गजलकार जे भ्रमवश कहै छथि जे उर्दू-हिंदीक गजलमे बहर नै छै से हुनक बेसी ज्ञानक (??????????) परिचायक अछि। चाहितों हम फैज अहमद फैज केर गजलक तक्ती नै देखा रहल छी कारण समझदार आदमी कम्मे तथ्यसँ बेसी बात बूझै छथि। बिंदु-4) मुदा शास्त्रीयतासँ दूर भैयो कऽ गजलत्व आ गजलजन्य अनुशासन समान्यतः गजलमे कायम रहय से प्रायः जरूरी छै। फैशनपर उकड़-गजल लीखि गजलक इतिहासमे नाम घोंसियायब एकटा कुत्सित प्रयास थिक, एहन लोक नवकविते अथवा आने कोनो विधामे डंड-बैसकी करथि से प्रायः उचित। किछु तुकबंदी मिला कऽ लीखि लेब गजलक संग अ-चेतनमे कयल गेल बलात्कार थिक। एहन लोक ओना सभ विधामे थोड़ेक दिन कुथैत छथि आ पुनः अपने आप साहित्यसँ पोछा जाइत छथि। तँए एहन गजलकारक कोनो तेहन चिन्ता आलोचक नहि करथि।“ ऐ चारिम बिंदुमे रमेशजी अपन भ्रमक सीमापर पहुँचि गेल छथि। बंधु गजलजन्य अनुशासने के तँ गजलक शास्त्रीय रूप वा गजलक व्याकरण कहल जाइत छै। ऐ बिंदुक हिसाबें देखल जाए तँ रमेशजी अपने फैशनक नामपर गजल लिखला आ गजलक संग बलात्कार केलथि। बिंदु-5) "गजलमे निहित सौंदर्य-बोधकेँ चीन्हब आवश्यक छैक।“ ई पाँचम बिंदु पूरा-पूरी गलत आ भ्रमयुक्त अछि। रमेशजीक हिसाबसँ "सौंदर्य-बोधकेँ चीन्हब आवश्यक छैक" मुदा हमर कहब जे जखन एकबेर "सौंदर्य-बोध" भइये गेलै तखन फेरसँ चिन्हबाक बेगरता की? सही कथन एना हेतै---“गजलमे निहित सौंदर्यकेँ चीन्हब आवश्यक छैक।“ओनहुतो ई वाक्य हिंदीक नकल अछि। आब बहुतों भक्त लोकनि एकरा प्रेसक गड़बड़ी कहता...................... कुल मिला कऽ देखल जाए तँ रमेशजी अपने गजलक संबंधमे ततेक ने भ्रमित छथि जे वास्तवमे ई पोथी "नागफेनी" बनि गेल अछि आ वास्तविक गजलकेँ लहुलुहान केने अछि। शिवशंकरजीक आलेख अपेक्षाकृत नीक अछि ( ओहि समयक अन्य आलेखक मुकाबले) मुदा शिवशंकरोजी बहुत रास तथ्यपर भ्रमित छथि। प्रथमतः ओहो आन कथित प्रगतिशील गजलकार जकाँ गजलकेँ दरबारी मानै छथि जखन की गजलमे प्रयुक्त शराब, माशूक, हुस्न, इश्क आदिक परलौकिक अर्थ सेहो होइत छै आ सभ शाइर ऐ शब्द सभकेँ प्रतीकक रूपमे प्रयोग करै छथि। दोसर जे श्रीनिवासजी कहै छथि----"गजलक अपन अनुशासन छैक, बंदिश आ सीमा छैक। ओकरा रखैत रमेशजी गजल कहबामे सफल भेला हे जे हिनक विशेषता आ सफलता दुनू थिक"......... मुदा गजलक अनुशासन की छै आ बंदिश की छै तकर जानकारी श्रीनिवासजी पाठककेँ नै दऽ रहल छथि आ ने रमेशजीक गजलकेँ तक्ती कऽ कऽ कहि रहल छथि जे ऐ कारणें रमेश जीक गजलमे अनुशासन अछि। कुल मिला कऽ ई दुन्नू आलेख भ्रमयुक्त अछि आ मैथिली गजलक वास्तविक साक्ष्यसँ बहुत दूर अछि। ओना हमरा ई मानबामे कोनो दुविधा नै जे ऐ संग्रहक सभ रचना नीक तुकांत कविता अछि ( उपरमे साबित भऽ चुकल अछि जे ई सभ गजल नै थिक )। खास कऽ ओहि समय आन गजलकार ( तारानंद वियोगी, देवशंकर नवीन,) आदिक अपेक्षा अपन रचनामे बेसी मैथिली शब्दक प्रयोग केलह अछि जे की ऐ पोथी विशेषता अछि ऐ विशेषता दिस शिवशंकरजी इशारा सेहो केने छथि। तँ चली ऐ संग्रहक किछु रचना दिस जे की हम पाँतिक उदाहरण दऽ कऽ देखाएब-- नवम रचनाक ई पाँति नीक अछि-- लाख लाख कोस सागर के अगम अगम जल देख हेलवाक छौ तँ तुरंत जूटि जो एगारहम रचनाक ई पाँति देखल जाए-- कियो केकरो पुछारि क' क' की करतै सभ अपन-अपन दर्द के पिबैत अछि जँ अप्रस्तुत योजना विधान देखबाक हो तँ सोलहम रचनापर आउ-- जामु आ गम्हारि केर छाह तर मे बाँस केर कोपर सुखैल जा रहल मानल जाइत अछि जे बाँसक छाहरि तर कोनो गाछ नमहर नै भ' सकैए कारण बाँसक प्रकृति गरम होइत छै मुदा रचनाकार एतऽ उन्टा गप्प कहि अप्रस्तुतकेँ प्रस्तुत केलाह अछि। सैतीसम रचनाक ई पाँति देखू- की सोचय अइ देसक जनता एक्कहि खिच्चड़ि एक्कहि हंडा जँ 58 टा रचनामेसँ हमरा कोनो एकटा रचना चूनबाक जरूरति पड़त तँ हम 12हम रचनाकेँ ऐ संग्रहक श्रेष्ठ रचना कहब। तँ लिअ ऐ बारहम रचनाक टूटा पाँति-- सौंथ जए टा चाही तए टा छूबि लिअ टीस मुदा ताजिन्दगी रहैत छै मायानंद मिश्रक "मैथिली साहित्यिक इतिहास" स्व. मायानंद मिश्रजीक लिखल पोथी "मैथिली साहित्यिक इतिहास" जे की 2014मे प्रकाशित भेल अछि तकर पृष्ठ 243पर लिखल अछि--" अभिव्यंजनावादी काव्यक उत्तरार्धमे एकटा नवीन गीत प्रवृतिक जन्म भेल अछि जे अछि गीतलक परम्परा जकरा भ्रमे गजल कहल जाइछ जकर जन्मदाता मैथिलीमे जीवन झा छथि-----। एहि धाराक मुख्य कवि गीतकार छथि मायानंद मिश्र, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, कलानंद भट्ट, डा. महेन्द्र, सरस आदि"। हमरा जनैत एहि पाँतिक लेखक मायानंद मिश्रजी नै छथि कारण पृष्ठ संख्या 206पर माया बाबू जीवन झाजीक प्रसंगे लिखने छथि " ई महेशवाणी ओ भास गीतक संगहि प्रथम-प्रथम गजल रचना कयल"। प्रश्न छै जे पृष्ठ 206पर जे गजल कहा सकैए से पृष्ठ243पर किएक नै ? ई भ्रमक उल्लेख पृष्ठ 206पर हेबाक चाही छल। ओना बहुत आदमी कहि सकै छथि जे माया बाबू अपन पूर्वमतक खंडन केलाह अछि। कहब बहुत सोंझ होइत छै कारण भारतमे लोकतंत्र छै मुदा साबित केनाइ बहुत कठिन कारण ओइमे मेहनति लागै छै। ओनाहुतो जे गजल ओ कथित गजलक अध्येता छथि से जानै छथि जे ऐ पोथीसँ पूर्व माया बाबू एहन कोनो लिस्ट वा चर्चा नै केने छथि। ई लिस्ट पहिले पहिल ऐ पोथीमे आएल अछि हमरा जनैत (जँ हम गलत छी लेख अवश्य उद्धृत कएल जाए)। आब कने 9 फरवरी 2014मे दरभंगासँ प्रकाशित दैनिक मिथिला अवाजमे आशीष अनचिन्हारक गजल संबंधी आलेख " मैथिली गजलमे लोथ गजलकारक भूमिका देखल"जाए। ओहि आलेखमे स्पष्ट रूपें साबित कएल गेल छै जे माया गुट ओ सरस गुट केर कथित रचना गजल नै गीतल श्रणीमे अबैए। ऐ लेखसँ पहिने सरस गुट केर सभ कथित गजलकारक रचनाकेँ गजल मानल गेल अछि। मुदा प्रथमतः 9 फरवरी 2014मे ऐ भ्रमकेँ तोड़ल गेल। आब कने ऐ पोथीमे देल गेल भूमिकाकेँ देखू जे की भीमनाथजी द्वारा लिखल गेल अछि आ 23 फरवरी 2014केँ लिखल गेल अछि। आब ईप्रश्न उठैत अछि जे जँ पृष्ठ संख्या 243परहँक अंश माया बाबूक लिखल नै छनि तँ किनकर लिखल छनि। उत्तर अनिर्णीत अछि मुदा जँ 9फरवरी 2014मे प्रकाशित आशीष अनचिन्हारक लेख ओ माया बबू किताबक उक्त पोथीमे देल तथ्यकेँ मिला कऽ अनुमान कएल जाए तँ कहल जा सकैए जे भीमनाथ झा जी ओइ अंशकेँ लिखने छथि संगे-संग ऐ पोथीक आर बहुत रास तथ्यमे संशोधन केने छथि। जखन कोनो अपराधी अपराध करै छै तखन ओ सबूत मेटेबाक प्रयास करै छै जैमे ओ मात्र 99 प्रतिशत सफल होइ छै। भीमनाथ जी संशोधन केलाक बाद अपन भूमिकामे पृष्ठ 6-7पर लिखै छथि जे--" लेखक ऐहि ग्रंथकेँ सम्पन्न कयलनि 1990 ई.मे।------- ठाम ठीम परिशोधनक सेहो इच्छा रहल होनि। मुदा ओहि लेल पलखति नहि भेटलनि।--------- तें ई ग्रंथ ठीक ताही रूपमे आयल अछि जाहि रूपमे प्रथम लेखन कऽ  लेखक राखि देने रहथिन"।---- एकर मतलब जे ई पोथी 1990मे सम्पन्न भेल आ बिना कोनो संशोधनकेँ 2014मे प्रकाशित भेल। मुदा आदरणीय भीमनाथजीक उपरक मंतव्यक खंडन ऐ पोथीमे जत्र-कुत्र छिड़िआएल अछि। विशेष नै कहि पृष्ठ 286पर चली जतऽ 1991मे डा. रामदेव झाजीकेँ साहित्य पुरस्कार भेटबाक वर्णन अछि। जँ 1990 आ 1991केँ सम मानी तैयो ओही पृष्ठपर रामदेवजीकेँ सेवानिवृति घोषित कएल गेल अछि जे 1990 के बहुत बादक घटना अछि विशेषतः 1996-1998 लगीचक। तेनाहिते पृष्ठ 287पर प्रभाष कुमार चौधरीजीक मृत्युक सूचना अछि। आब ई कहू जे 1990मे प्रभाषजी कोना मरि गेलाह। हुनक मृत्यु तँ 1998मे भेल छनि। उपरक ऐ बहुत रास महत्वपूर्ण संशोधन सभसँ ई साबित भऽ जाइए जे माया बाबूक मृत्युक बाद आ ऐ पोथीक प्रकाशित हेबासँ पहिने बहुत रास मन इच्छित संशोधन कएल गेल छै आ से संभवतः भीमनाथजी केने छथि। आब दू टा प्रश्न उठैए पहिल जे भीमनाथजी ई संशोधन किएक केलाह आ दोसर जे हुनकासँ ई गलती कोना छुटलनि। पहिल प्रश्नक उत्तर सद्यः अछि जे ई संशोधन माया बाबूक गजल संबंधी अक्षमताकेँ झपबाक लेल कएल गेल अछि। चूँकि वर्तमान समयमे गजल संबंधी सभ निष्कर्ष सभकेँ बूझल छनि तद्अनुरूप माया बाबूक नीक छवि बनेबाक लेल ई काज कएल गेल। एकर सबूत पोथीक पाछू बला कवरमे मायाबाबूक परिचयसँ भेटत। उक्त परिचयमे "अवान्तर"केँ कविता संग्रह घोषित कएल गेल छै जखन की माया बाबू अपने एकरा गीतल बाहुल्यक कारणें "गीतल संग्रह" कहने छथिन्ह। हमरा बुझने सायास आ सुनियोजित ढ़ंगे ऐ पोथीमे संशोधन कएल गलै जकर उद्येश्य छल माया बाबूक गजल संबंधी अक्षमताकेँ झाँपब जे की अंततः सफल नै भेल। आब दोसर प्रश्नपर चली मूलतः ई भीमनाथजी जानि बूझि कऽ कएल गेल गलती नै अछि बल्कि ई तँ हुनक बिनु पढ़ने किछु लीखि देबाक हिस्सक बुझाइत अछि। हमर देल गेल तथ्यसँ ई स्पष्ट होइत अछि जे माया बाबू ऐ पोथीकेँ 1998-99सँ शुरू कऽ मृत्यु धरि लिखला मुदा भीमनाथजी अपन हिस्सकक अनुसार ऐ पोथीकेँ नै पढ़ला जकर परिणाम भूमिकामे स्पष्ट अछि। माया बाबूक ऐ पोथीक बहन्ने भीमनाथजी द्वारा लिखल सभ भूमिका, आलोचना, समालोचना,समीक्षा केर अध्य्यन हेबाक चाही आ देखबाक चाही जे कहीं ईहो सभ बिनु पढ़ने तँ नै लिखल गेल अछि। मैथिली काव्यशास्त्रमे झारू छंदक अवधारणा : स्वरूप आ तत्व निर्धारण (आलोचना) भारतीय भाषा मध्य छंदक अवधारणा संस्कृतसँ आएल अछि। वैदिक संस्कृतमे सरल वार्णिक छंद छल, मने एहन छंद जे की पादमे कतेक वर्ण छैसे गानि बनै छलै जेना गायत्री, अनुष्टुप, जगती आदि। लौकिक संस्कृतक शुरूआतमे वर्णवृतक प्रधानता भेल। मने काव्यक हरेक पाँतिक लघु-गुरू क्रम एक समान होमए लागल। लौकिक संस्कृतक अंतमे मात्रिक छंदक विधान चलल जैमे सभ पाँतिक मात्राक जोड़ एक समान होइत छलै। मुदा ई सभ शास्त्रक परिधिमे छल जे की मात्र शिक्षित लोक बुझैत छला। मुदा एकर ई मतलब नै जे अशिक्षित लोक सभ अपन लिखनाइ छोड़ि देने छला। अशिक्षित समाजक लोक ( चाहे ओ दलित होथि की सवर्ण) अपन रचना लेल उपरक तीनू छंदसँ अलग तालवृत छंदक उपयोग केला। आब ई तालवृत छंद की भेल से कने आगू जा क' हम सभ देखब। ऐ छंदसँ पहिने संगीतक प्रारंभिक जानकारी ली। संगीतमे दू टा तत्व प्रमुख छै पहिल स्वर आ दोसर ताल। स्वर संगीत मुख्यतः आरोह-अवरोहपर अधारित रहै छै। संस्कृतक शिक्षित वर्ग स्वरकेँ प्रमुखता देलक तँ जन समान्य तालकेँ । स्वर निर्धारण लेल नाना प्रकारक छंद बनल जैमे सरल वार्णिक आ वार्णिक दूनू अबैए। तालवृत छंद लेल मात्र ताल बराबर भेनाइ अनिवार्य अछि। मने हरेक पाँतिमे चाहे अक्षर बराबर हो की नै हो, लघु-गुरू हरेक पाँतिक बराबर हो की नै मुदा हरेक पाँतिक ताल बराबर भेनाइ जरूरी अछि। तालवृत छंदमे कोनो शब्दक कोनो वर्णक उच्चारण नहियो भ' सकैए। तालवृत छंदमे विराम आ प्लुत केर महत्व अछि। ऐमे शब्दककेँ विशुद्ध उच्चारण अनिवार्य नै अछि। तालवृतमे दीर्घक उच्चारण लघु भ' सकैए आ लघु केर उच्चारण दीर्घ भ' सकैए। जेना तालवृतक हरेक पाँतिक तालगण समान रहनाइ जरूरी छै तेनाहिते वैदिक छंदक हरेक पाँतिमे समान अक्षर हेबाक चाही तेनहिते वार्णिक छंदक हरेक पाँतिमे मात्राक्रम समान भेनाइ जरूरी छै। मैथिलीक सभ प्राचीन लोकगीत तालवृत छंदपर अधारित अछि। तालवृत छंदमे हरेक पाँतिक लय मिलबाके टा चाही तँए तालवृतमे तुक कहियौ, तुकान्त कहियौ, अन्यानुप्रास कहियौ की काफिया कहियौ एकर भेनाइ अनिवार्य अछि। एही तुकान्त निर्वाहक कारणे तालवृत बहुत बेसी लोकप्रिय भेल आ ई परवर्ती संस्कृत धरिकेँ बदलि देलक। बादमे आदि शंकराचार्य अपन सभ स्त्रोत सभमे तुकान्तक प्रयोग केला। आ जेना-जेना समय बितैत गेल संस्कृत काव्य तुकान्त होइत गेल। व्याकरणमे अंत्यानुप्रास सन अलंकारक जन्म भेल आ जयदेव रचित गीत गोविन्दम् सन काव्यकेँ जे मात्र सुमधुर ललित शैली आ अंत्यानुप्रासक कारणे संस्कृतमे विश्वविख्यात भेल। तालवृत छंदक ईहो एकटा बड़का विशेषता अछि जे ई गायकपर निर्भर अछि मने जँ एकटा गायक कोनो दू टा पाँतिकेँ अष्टमात्रिक तालमे बान्हि गेला तँ दोसर गायक ओकरा सप्तमात्रिक तालमे सेहो बान्हि सकै छथि। तँए लौकिक संस्कृतक अन्तमे आ प्राकृतक जन्मसँ तुकान्त केर काव्यमे बहुत महत्व अछि आ जेना-जेना समय आगू बढ़ल तुकान्त बिनु काव्यक परिकल्पना असंभव भ' गेल। पाठक ओ जनता तुकान्तयुक्त काव्यकेँ बेसी मान देलक कारण तुकान्तयुक्त काव्य कर्णप्रिय होइत अछि। प्राकृतक ई गुण अनायास रूपें अप्रभंशमे आएल आ चूँकि अप्रभंश सँ मैथिली सहित आन आधुनिक भारतीय भाषा बनल अछि तँ एहू सभमे तुकान्त अनिवार्य भेल।गएबा कालमे तालवृत छंद हरेक छंद ( वैदिक, वार्णिक आ मात्रिक छंदपर ) लागू भ'सकैए। ओना वैदिक छंद ओ वर्णवृत लेल स्वर-संगीत अनिवार्य अछि। तथापि कोनो गायक ओकरा तालवृतमे सेहो गाबि सकै छथि। तालवृतकेँ मैथिलीमे भास कहल जाइत छै हमरा ज्ञानक हिसाबसँ। बूढ़-पुरान गितगाइन सभ एखनो कहै छथि जे ऐ गीतक भासे नै चढ़ि रहल अछि, एकर मतलबे भेलै जे उक्त गीतक तालवृत बराबर नै बैसि रहल छै। तालवृत छंदक किछु उदाहरण देखू--- भादब हे सखी रैनि भेयाओन दोसरे अन्हरिया के राति यौ राति दुख सुख संगहि खेपब लेसब दीप अकास यौ ऐ बरहमासाक चारि पाँतिक अध्य्यन केलासँ ई पता चलत जे पहिल पाँतिमे 19 मात्रा ( जँ न्ह बला नियम नै मानी तँ 18)टा मात्रा अछि। दोसर पँतिमे 18 मात्रा, तेसर पाँतिमे 15 आ चारिम पाँतिमे 13टा मात्रा अछि। चूँकि गायनमे न्हसँ पहिने बला स्वतः दीर्घ होमए लगैत अछि तँए हम पहिल पाँतिमे 19 मात्रा मानि रहल छी। आब आउ देखू एकर तालवृत--- भादब हे सखी रैनि भेयाओन दोसरे अन्हरियाx के राति यौ राति दुxxख सुxxख संगहि खेपब लेसब दीxxxप अxxxकास यौ दोसर उदाहरण देखू-- काली के देखलहुँ सपनमा से ठाड़े अँगनमा केओ नीपे अगुआर माँ के केओ नीपे पछुआर माँ के केओ नीपे काली के भवनमा.... पहिल पाँतिमे 16, दोसरमे 11, तेसर आ चारिममे 17-17 एवं पाँचम ओ अंतिम पाँतिमे 19 मात्रा अछि। आब आउ देखू एकर तालवृत--- काली के देखलहुँ सपनमा सेxx ठाड़ेx अँगनमाxx केओ नीपे अगुआर माँ के केओ नीपे पछुआर माँ के केओ नीपे काली के भवनमा... तेसर पाँतिक अगुआर शब्दक आपर विराम अछि तेनाहिते चारिम पाँतिक पछुआर शब्दक आपर विराम अछि। अंतिम पाँतिक केओ शब्दक ओ, नीपे शब्दक पे, एवं काली शब्दक लीपर विराम अछि। फलस्वरूप हरेक पाँति 16 तालमात्रिक रचना बनि गेल अछि। प्रस्तुत ऐ गीत सभहँक गायन सुनबा लेल विदह आडियो केर ऐ लिंकपर जाउ-- https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ संगीतमे x चिन्ह ताल लेल प्रयोग कएल जाइत छै। तँ ऐ उदाहरण देखि रहल छी जे चारू पाँतिमे ने तँ मात्रिक छंद छै ने वार्णिक आ ने वैदिक मुदा पाँतिक बीच-बीचमे रेघा क' वा ताल द' क' वा विराम ल' क' सभ पाँतिके पूरा कएल गेल छै। इएह तालवृत कहबै छै। गीत मुख्यतः तालवृतक अनुगामिनी अछि ताहूमे मैथिलीक सभ प्राचीन गीत आ लोकगाथा सभ तालवृत छंदक सुदंर उदाहरण अछि। जँ कोनो-कोनो गीतमे आन छंदक लक्षण अबैए तँ ओकरा मात्र संयोग बुझू। ओना हम पहिने कहि चुकल छी जे सभ छंदोबद्ध रचना गेय होइत अछि। तालवृत छंद आ वैदिक छंदमे मात्र एकैटा अन्तर छै बादबाँकी दूनू एकै अछि आ एही एक अंतरक कारणे एकटा स्वर संचालित भेल तँ दोसर ताल संचालित। आब हम पाठक सभसँ अनुरोध करब जे ओ सभ हिसाबसँ तालवृतक आन-आन उदाहरण ताकथि। तालवृतक प्रसंगमे किछु महत्वपूर्ण जानकरी मोन राखू--- १) तालवृत तालगणपर पड़ैत नियमित बलाघातक आवृति अछि। स्वर संगीतक आरोह-अवरोह ऐमे नै अछि। २) तालवृत वैदिक संस्कृतोसँ प्रचीन अछि। आदिवासी समजाक संगीत अध्ययनसँ एकरा देखि सकै छी। ३) तालवृतमे एक पाँतिमे अनेको तालगण भ' सकैए आ एकटा तालगणमे कतेको वर्ण वा मात्रा भ' सकैए। ४) तालावृतमे मात्रा मने कालमात्रा होइत छै। ५) तालवृतमे कालमात्राक संख्या निश्चित होइत छै। ६) तालगणमे सभ वर्णक वा सभ मात्राक उच्चारण हो से जरूरी नै छै। ७) तालवृतमे शब्दक रूढ़ स्वरूपकेँ बदलल जा सकैए। ८) तालवृत मुख्यतः गायनसँ जुड़ल अछि तँए सरल वार्णिक वा वर्णवृत वा मात्रिक छंदक कोनो रचनाकेँ तालवृतम,े प्रस्तुत क' सकै छी। उदाहरण लेल तुलसीदास जी रचित ई दोहा देखू-० राम नाम मणि दीप धरु, जीह देहरी द्वार तुलसी भीतर बाहिरहु, जो चाहसि उजियार ई थिक दोहा जे की मात्रिक छंदसँ संचालित अछि। आब एकर तालवृत विश्लेष्ण देखू-- राम नाम मणि दीप धरुxxx , जीह देहरी द्वा xxxxx र तुलसी भीतर बाहिरहुxxx जो चाहसि उजिया xxxxx र आब अहाँ सभ देखि सकै छिऐ जे १४-१४ मात्राक दू पाँति बला छंद कोना ८-८ तालवृत छंदक ४ पाँतिमे बदलि गेलै। इएह छै तालवृत। खाली प्राचीने कालमे ई तालवृत छल से गप्प नै आधुनिक कालक मैथिलीक पहिल जनकवि श्री रामदेव प्रसाद मंडल झारूदार एकटा नव छंदक जन्म द' ओकरा विकसित केलाह जकर नाम थिक " झारू छंद "। ई झारू छंद हमरा जनैत तालवृतपर अधारित अछि। ओना ऐठाम ई जानब उचित जे राजनीतिक पार्टी "आआप" केर चुनाव चिन्हसँ बहुत पहिने ई झारू छंद मैथिलीमे आबि चुकल छल। किछु उदाहरण देखू-- भागि गेला अंग्रेज अकेला, छोरि कऽ पाछू ढेरो जाति कर रंगदारी वसुल रहल अछि , मारि मारि कऽ सभकेँ लाति पहिल पाँतिमे 32 मात्रा आ दोसर पाँतिमे 31 मात्रा अछि एकरा तालवृतमे एना देखल जा सकैए-- भागि गेला अंग्रेज अकेला, छोरि कऽ पाछू ढेरो जाति कर रंगदारी वसुल रहल अछि , मारि मारि कऽ सभकेँx लाति जीवन-मरण पालन केर रचना, प्रकृति केर गजब विधान ऐ रचनाकेँ भेदि-भेदि कऽ, जानि गेल अछि ई विज्ञान ऐ झारूक पहिल पाँतिमे ३१ मात्रा अछि ( जँ अलग-अलग संयुक्ताक्षर बला नियम छोड़ल जाए तँ) आ दोसर पाँतिमे ३० मात्रा अछि। तालवृतमे एकर उदाहरण देखू-- जीवन-मरण पालन केर रचना, प्रकृति केर गजब विधान ऐ रचनाकेँ भेदि-भेदि कऽ, जानिx गेल अछि ई विज्ञान आब तालवृतसँ संचालित भ' दूनू पाँतिमे 31-31 तालमात्रा भ' गेल। आर एकटा उदाहरण लिअ-- हे भूमि क' भाग्य विधाता, जगक अदाता भगवान। कहाँ पता तोरा सिबा छै केकरो, छूपल कतए छै खेतमे धान। पहिल पाँतिमे 27 आ दोसर पाँतिमे 38 मात्रा। आब एकर तालवृत देखू--- हे भूxxxमि क' भाग्य विधाताxxx, जगक अदाxxता भगवाxxxन। कहाँ पता तोरा सिबा छै केकरो, छूपल कतए छै खेतमे धान। आब तालवृतसँ संचालित भ' दूनू पाँतिमे 38-38 तालमात्रा भ' गेल। हुनक प्रकाशित पोथी "हमरा बिनु जगत सुन्ना छै " अनेको झारू छंद अछि जकरा पाठक सभ ऐ लिंपर देखि सकै छथि------ https://dbb13891-a-96a2f0ab-s-sites.googlegroups.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/RamdeoPrasadMandalJharudar.pdf?attachauth=ANoY7cpwFD3AyNPFZn-bFA8rz2L55cs_LB8frjO_GGszrOG4x9MhScXFXBtCNC2Pid0KCYbBPXm_9UQlKdzNBy3QFA4ldAIrbUHkweRLr0Msi6F0oe2mytUfuZVlcNfK0KsOLD6XEmtfdZ5-zyx8KPfmmG-bIzZdNBmW2flPN5ilfYPfWYID4HvXJ_Bi_3sl0BhQa7tibwQzbRkejjTKerlsO6AWQhd0uupSAr83Ktk2RYBmzMo40yo%3D&attredirects=1 । झारूदार जी मात्र एकटा लेखक नै छथि बल्कि हमरा सभकेँ सिद्ध सरहपासँ ल' क' आधुनिक कालक जे धार बनल अछि तकर दूनू घाटकेँ मिलेबाक लेल पूल सेहो छथि। झारू छंद स्वरूप निर्धारण--- तालवृतक अधिकांश रचना दूँ पाँति, चारि पाँतिक वा छह पाँतिक समूहसँ बनैत अछि। श्री झारूदार जी अपन पोथीमे दू पाँतिक स्वरूप बला रचना उपयोगमे केला अछि। एकर बाहरी संरचना दोहा सनक होइत छै। आब हमरा विश्वास अछि जे सुधी पाठक ओ आलोचक सभ ऐ लेखकेँ देखैत श्री झारूदारजीकेँ नव रूपसँ परिभाषित करबाक प्रयास करता। नेपालक नोर मरूभूमिमे

"नेपालक नोर मरूभूमिमे" जँ ई कोनो पोथीक नाम हो तँ नेपालक किछु राष्ट्रवादी सभ जरूर भड़कि जेता ताहूमे जँ ई पता लागै जे जँ ऐ पोथीक प्रकाशक भारतक छै तखन तँ जरूर आरोप लगेता जे "काठमांडू आब दिल्लीसँ संचालित भ' रहल अछि"। नाना रकमक हाय-तौबा मचि जेतै से हमरा विश्वास अछि। किछु लोक भाला लाठी ल' क' दौड़ता तँ किछु शब्दक माध्यमें एता। ताहूमे जँ ई पता लागै जे लेखक नेपालक छथि तखन बुझू जे हुनकर घरकेँ उजाड़ि देल जाएत आ बैला देल जाएत भारतमे। आ ई सभ काज लेखक वर्ग करत राष्ट्रवादक नामपर।

मुदा ऐ ठाम कने ई सोचबाक छै जे "मरूभूमि" मने की ? हमरा जनैत एहन जगह जत' खाली बालुए-बालु होइ। फेर नोर शब्दपर आउ, सभकेँ बुझल हएत। जँ केकरो नोर मरूभूमिमे खसतै तँ की हेतै ? बस खसिते देरी सुखा जेतै, बिला जेतै आ नोरक नामोनिशान नै बचतै। मने शास्त्रीय भाषामे कही तँ अरण्यरोदन। आ ई अरण्यरोदन की नेपालेकेँ लोक करै छथि? कने काल लेल सोचिऔ जे जँ नेपाल हटा भारत वा पाकिस्तान वा भूटान वा ... अन्य देशक नाम द' देल जाइक तँ की हेतै। बस लोक वा ओकर भाषा बदलि जेतै मुदा रहतै तँ वएह अरण्यरोदन। भारत सहित तमाम विकाशशील ओ अविकसित देशक निम्न मध्यमवर्ग (आर्थिक हिसाबसँ) खाड़ी देशक दिस पलायन करै छथि रोजी-रोटी लेल। ई जतबे नेपाल लेल सत्य छै ततबे भारतक लेल सेहो। प्रवासक वेदना जतबे नेपालक प्रवासीमे छै। ततबे भारतक प्रवासी वा पाकिस्तानक प्रवासीमे। एहनो नै होइ छै जे नेपालक लोकक नोर तुरंते सुखा जाइ छै आ भारतक प्रवासी केर नोर एक घंटा बाद। मरूभूमि आखिर मरूभूमि छै कोनो वेदनासँ ओकरा कोनो सरोकार नै ओ सभहँक नोरकेँ एकसमान समयमे सोखै छै। जँ ऐसँ हटि क' आबी तँ ईहो कहल जा सकैए जे बालु जखन आँखिमे पड़ि जाइत छै तखन दर्दसँ नोर बह' लागै छै मुदा बालु कथिक? प्रवासक ने….

काव्य केखनो बपौती नै होइ छै आ ने धनवादी होइ छै। काव्य वस्तुतः जनवादी होइ छै (काव्य मने पूरा साहित्य)। आब ऐठाम किछु संभ्रांत लोक एता आ प्रवचन देता। मुदा हमरा बस एतबे कहबाक अछि जे फ्रेंच कट दाढ़ी बला ओ कुर्ता पैजामा बलाक जनवादीसँ अलग जनवादी मतलब अछि हमर। हमरा नजरिमे फ्रेंच कट दाढ़ी बला ओ कुर्ता पैजामा बलाक जनवादी सदिखन पूँजीवादक दलाल रहल अछि। मुदा एत' हम जै जनवादी काव्यक परिचय देब तकरा देखि क' ई फ्रेंच कट दाढ़ी बला ओ कुर्ता पैजामा बलाक जनवादी भागत से विश्वास अछि। समान्यतः मैथिलीमे जनवादी मतलब ओहन लोक भेल जे मात्र गरीबक लेल भाषण करैत रहैए (मुदा वास्तविक रूपमे नै) मुदा लेखक ओइ प्रकियासँ आगू बढ़ि जै सरोकारकेँ बात करै छथि से दुर्लभ अछि। तँ लिअ ई पहिल उदाहरण-- मैथिलीमे सभ किछु भेटत मुदा पर्यावरणक चिंता नै भेटत मुदा लेखक एकटा शेरमे पूरा विचार निचोड़ि कहै छथि--

जङ्गल उजड़लासँ रोग सभ बढलै स्वस्थ रहबाक लेल वन होबाक चाही

ऐ तरहँक पाँतिक कतेक खगता छलै मैथिलीमे से पाठक बूझि सकै छथि।

ओना ई पूराक पूरा पोथी प्रवासी लोकक दुख समेटने अछि। मुदा मात्र दुखी भेलासँ तँ काज नै चलै छै। एहन राजनीतिक कारण जकर चलते लोकेँ प्रवासी बन' पड़ै छै तकरा निशाना बनबैत लेखक कहै छथि--

हम बूड़ि छी तैं बिदेशमे आएल छी अहाँ ज्ञानी छी तैं घरमे नुकाएल छी ऐ दू पाँतिमे जे व्यंग छै से हमरा जनैत मैथिली साहित्यमे कहियो एबे नै केलै। ऐ सभकेँ अलावे लेखक मैथिली राज्यक नामपर चलैत धुरखेलसँ सेहो परिचित छथि आ कहै छथि--

मिथिला राज् लेल धरना करै छी बात-बातपर झगड़ा करै छी बेइमाने आ भ्रष्टाचारे करब तँ नाहकमे कियक धरना करै छी

चारि पाँतिमे तथाकथित राज्य नेता सभहँक पोस्टमार्टम भ' गेल अछि। ई पोस्टमार्टम जतबे नेपालक लेल महत्वपूर्ण अछि ततबे भारतक लेल सेहो।

लेखक मात्र राजनेताक सभकेँ नै देखै छथि बल्कि ओकर भित्तरक बात सेहो जानै छथि--

की कहू कते कहू बड़ बड़ लीला छै मोछबला नेता सभकेँ नङ्गौटी ढीला छै

कोनो साहित्यमे साहित्यिक चोरी होइते छै। मैथिलीमे सेहो किछु वर्ष पहिने पंकज पराशर नामक सुखाएल मुख्यधाराक साहित्यिक चोर अछि जे एखनो अपन सरदारक सभहँक कृपासँ ऐ क्षेत्रमे आगू बढ़ि रहल अछि। मुदा लेखक एकरो नै छोड़ने छथि---

भौतिकवादकेँ शिकार भेनिहार सभ सुपनेखा सजा क' सीता बना देलक साहित्यमे फुर्ती देखेनिहार सभ गजल चोरा क कबिता बना लेलक

समान्यतः ई मानल जाइए जे " जै लोकमे जतेक प्रेम रहै छै तै लोकमे मृत्यु भय बहुत कम रहै छै"। प्रस्तुत लेखक अपन रचना सभसँ ऐ तथ्यकेँ पुष्टि केलाह अछि--

दुश्मन कतबो दुवारपर होइतो लाख कोसके बीच होइछै प्रीतम दूर पहाडपर होइतो घर-आङ्ग्नके बीच होइछै ई छल प्रेमक रूप आब कने मृत्युपर आउ देखू जे लेखक कोना मृत्युकेँ सुंदर मानै छथि भने वास्तविका जे हो--

मार्च महिनाकेँ उतरार्द्धमे आइ हम मृत्युकेँ देखलौं सुनने छलौं /सोचने छलौं मृत्यु अत्यन्त सुन्दर होइ छै सरल होइ छै......

ई लेखकक उत्कट प्रेमक परिणाम अछि जे ओ बेर-बेर मृत्यसँ टकराइ छथि अपना रचना माध्यमें। ईहो एकटा सत्य अछि जे हिंदू धर्मक उपनिषद् सभ अनार्य दर्शनसँ प्रेरित अछि। प्रस्तुत लेखक अपन कविता सभमे उपनिषद्क पुनर्रचना केलाह अछि--

हम मानव छी एक दिन जन्मलौं संसारमे माय/बापक इच्छा सँगे एलौं संसारमे नाना तरहँक क्रियाकलाप कयलौं किए की,................

..........पृथ्वी नाशवान छै नाशवान रहतै सब दिन नै कियो अमर रहलैय आ नै कियो रहतै प्रकृतिक यथार्थ/दुनियाँक सत्यता इएह छै आ इएह रहतै

लेखक एतबेपर नै रूकै छथि आ कहै छथि--

हमर मृत्यु पश्चात हवा ओहने बहतै जेहन छलैय पहिने दुनियाँ ओहने रहतै जेहन रहै पहिने...... ....एतै पुन: कोनो नयाँ आयाम बिसरि जेतै सभ हमर नाम सबकेँ मनसँ हेरा जाएब हम सदा-सदा लेल बिसरा जाएब हम

आब अहाँ सभ लेखकक परिचय लेल उत्सुक हएब। ई लेखक छथि श्री विन्देश्वर ठाकुर आ हिनक पोथी छनि " नेपालक नोर मरूभूमिमे"। श्री ठाकुर गाम:-गा. वि. स. गिद्धा 7 योगियारा, धनुषा नेपालक छथि आ एखन कतारमे रहि रहल छथि आ ई पोथी श्रुति प्रकाशन भारतसँ प्रकाशित अछि। ऐ पोथीक विमोचन अधिकारिक रूपें 82म सगर राति दीप जरए (31 मइ 2014केँ मेंहथ गाम)मे हएत। प्रस्तुत पोथी गजल खंड, शेरो-शाइरी खंड, कथा खंड, विहनि कथा खंड ओ कविता खंडमे बाँटल अछि। ऐ पोथीक सभ गजल सरल वार्णिक बहरमे अछि जे की नेपालक तथाकथित गजलकार सभ लेल एना केर काज करत। वर्तमान समयक नेपालमे मात्र दू टा नव गजलकार मैथिली गजलक आश छथि पहिल कुंदन कुमार कर्ण आ दोसर प्रस्तुत पोथीक लेखक। प्रस्तुत पोथीक सभ विधा अपन नव रूपमे अछि। भिन्न-भिन्न विषयपर अछि। मुदा हमरा मान'मे ई कोनो दिक्कत नै जे लेखकक सभ रचना प्रवासक दुखमे भीजल अछि जे की स्वाभाविक अछि। प्रस्तुत पोथीक भाषिक संरचना पूर्णतः नेपालक गामक अछि आ लेखक अपन निज अछि। हमरा जनैत ई प्रवृति मैथिलीक लेल शुभ अछि कारण एक सीमा धरि भाषाकेँ मानक हेबाक चाही मुदा तै लेल जरूरी नै छै जे दलित साहित्यकार धोती-धारी बला लेखक सभहँक शब्द लेथि। प्रस्तुत पोथीमे ऐसँ बाँचल गेल अछि। जँ राजनीतिक स्तरपर देखल जाए तँ ई पोथी भारत ओ नेपालक संबंधक परिप्रेक्ष्यमे सेहो देखाएत आ भारत नेपाल साझी लेखक वर्गकेँ तैयार करबामे मदति करत। ओना ऐ पोथीमे व्यक्त राजनीतिक विचारक नेपालक स्थितिकेँजग-जाहिर करैए।तँ स्वागत करू नेपालक ऐ युवा लेखक श्री बिंदेश्वर ठाकुरजीकेँ आ कामना करू जे भविष्यमे हिनक लिखल आ पोथी सभ हमरा सामनेमे आएत। कलंकित चान-(आलोचना)     "जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठान" द्वारा बर्ख 2013 (दिस.मे) श्री राम भरोस कापड़ि "भ्रमर"जीक कथितजल संग्रह- "अन्हरियाक चान" प्रकाशित भेल अछि। पोथीक भूमिकामे भ्रमरजी स्वीकार करै छथि जे गजलक व्याकरणपर ओ गजल नै लिखने छथि संगे-संग ओ समीक्षककेँ सेहो हिदायत देने छथिन्ह जे ओ व्याकरणक तराजूपर ऐ गजल सभकेँ नै तौलतथि। एकर मने ई भेल जे भ्रमरजी अपने मानै छथि जे हुनक गजल "अजाद गजल " आ समीक्षक तँ अजाद गजलक समीक्षा करबाक लेल स्वतंत्र छथि। संगे-संग भ्रमरजी भूमिकाक समीक्षा करबाक लेल कोनो प्रतिबंध नै लगेने छथि तँए समीक्षक भूमिकाक समीक्षा करबाक लेल सेहो स्वतंत्र छथि।ओना भ्रमरजी गजलमे व्याकरणक मजूगत स्थितिसँ परिचित छथि आ तँए ओ अपन सीमाकेँ देखार केलाह जे की स्वागत योग्य गप्प अछि। तँ चलू शुरू करी भ्रमरजीक अजाद गजलक समीक्षा आ तकर बाद हिनकर भूमिकापर।   अजाद गजलक कान्सेप्ट--- जखन कोनो भाषामे कोनो खास विधाकेँ करीब 500-600 बर्ख भ' जाइत छै तखन ओइमे परिवर्तन जरूरी भ' जाइत छै। उर्दू गजलकेँ (जँ भारतीय फारसी गजलकेँ जोड़ि देखी तँ) करीब 500-600 बर्ख भेल छै तँए 1960-70केँ दशकमे उर्दूमे अजाद गजल आएल। एकर मतलब कहल गेलै जे गजलमे बहर कोनो जरूरी नै हँ काफिया भेनाइ आवश्यक अछि ( बिना रदीफकेँ सेहो गजल होइ छै से देआन राखब जरूरी)। ओनाहुतो बिना काफियाकेँ गजल नै होइत छै से सभ जनै छथि। जँ ऐ अधारपर देखी तँ भ्रमरजी बहुत रास कथित गजल फेल भ' जाइत अछि मने भ्रमरजीक कथित अजाद गजल सेहो अजाद गजल कहबा योग्य नै अछि। किछु उदाहरण देखू--   पोथीक पहिल कथित अजाद गजलक पहिल दू पाँति एना अछि---   ई जनक केर नगरी अपन गाम थिक ई मिथिला बैदेहीक अपन गाम थिक मने काफिया गायब। जँ काफिया गाएब तँ तँ गजल नाम्ना विधे गाएब। खएर एहन-एहन दोष ऐ पोथीक गजल संख्या -4,5,6,9,12,14,20,22,23,24,28,29,32,33,34,35,36,39,41 मे भेटत। ओना आन गजलमे किछु ढ़ग तँ छै जकरा काफिया नै बल्कि तुकांत कहब बेसी समीचीन। ईहो मोन राखब जरूरी जे ऐ पोथीमे कुल 44टा गजल अछि। जँ हम नेपालीय परिसरक हिसाबसँ ऐ पोथीकेँ देखी तँ हमरा ई कहबामे कोनो संकोच नै जे राजेन्द्र विमल जीक गजलकेँ अजाद गजलक श्रेणीमे तँ राखल जा सकैए मुदा भ्रमरजीक गजल तँ अजादो गजलमे स्थान पेबाक योग्य नै अछि। सोंझ तरहें कही तँ भ्रमरजीक ऐ पोथीमे संकलित सभ रचना आन विधा तँ भ' सकैए मुदा गजल, कथित गजल वा अजाद गजल केखनो नै भ' सकैए।   मुदा जत' भ्रमरजी अपन गजल महँक दोष स्वीकार करबाक हिम्मति राखै छथि ओतए विमलजी अपन गलतीकेँ स्वीकार करबासँ हिचकै छथि।ई चारित्रिक अंतर दूनू गोटमे छनि से जिनगी भरि रहतनि तकर कोनो गारंटी हमरा लग नै अछि।   तँ आउ आब पोथीक भूमिकापर— चूँकि व्याकरणपर हमरा नै जेबाक अछि तँ देखू भ्रमरजीक किछु बिंदु-  1) भ्रमरजी अपन भूमिकामे लिखै छथि जे " हमरा एखनो धरि पना नै अछि, हम कतेक गजल लिखने छी। साढ़े चारि दशकक साहित्यिक यात्रामे कतेको गजल लिखाएल हएत...." यौजी सरकार, जखन अहाँकेँ अपने गजलक संख्याक बारेमे नै बूझल अछि तखन घर-आँगन, स'र-समाज, देश-विदेशक आँकड़ाक संबंधमे अहाँकेँ की बूझल हएत। भ्रमरजीक उपरोक्त कथन मात्र दंभ भरबाक लेल अछि। मनुख मात्र सभ चीजक हिसाब-किताब रखैए। भ्रमरजी सेहो रखने हेता मुदा हिनका तँ अपना-आपकेँ सुपरमैन कहेबाक छनि तँ लगा देलखिन अज्ञात संख्याकेँ जोर जे हमरा अपन गजल संख्या तँ पते नै अछि मने एते लिखलहुँ जे.......................   मोन पाड़ू आइसँ 30 बर्ख पहिने धरि जड़ल जुन्ना सन ऐंठल दू-चारि बिग्घा खेत बला सभ सेहो कहै छलै जे हमरा तँ अपन खेतो ठीकसँ नै देखल अछि। मिला लिअ भ्रमरजीक विचार।   2) भ्रमर जी फेर ओहीमे लिखै छथि जे " एहि बीच हमरा मोनमे आएल जे गजल जे काव्यविधामे बेछप रूपें रहेत अछि.............." यौजी सरकार की ब्रम्ह बाबा रातिमे अहाँकेँ सपना देला जे उठ बच्चा काव्य गगनमे गजले टा बेछप विधा छै। आ जँ सत्ते सपना आएल तँ पहिने किएक ने आएल।   ऐ पोथीमे सभसँ आपत्तिजनक बात ई अछि जे प्रस्तुत पोथीमे "बाल-गजल" तँ संकलित अछि मुदा बाल गजलक संदर्भमे कोनो चर्चा नै बेटैत अछि। ज्ञात हो कि मात्र 2012सँ मैथिली बाल गजल शब्दावली प्रचलित अछि। अनचिन्हार आखर ओ विदेहक संयुक्त प्रयासक प्रतिफलन अछि ई बाल गजल मुदा भ्रमर जी बाल गजलक संबंधमे कोनो चरचा नै केने छथि। जेना चरचा केलासँ छोट भ' जेता तेना। ओनाहुतो हम ऐ प्रसंगकेँ अनचिन्हार आखर ओ विदेहक लोकप्रियतासँ जोड़ि क' देखैत छी। ओना भ्रमरजी प्रस्तुत पोथीक बाल गजलकेँ तेना सेट केने छथि भूमिकाक संदर्भमे जेना बुझाइत हो जे ओ मिथिला-मिहिरेक जमानासँ बाल गजल लिखैत होथि। इतिहासकेँ भ्रमित करैत ई पोथी केक सफल हएत से कहब मोश्किल। हँ एतेक कहब कोनो मोश्किल नै जे ई पोथी मात्र राजेन्द्र विमलजीक प्रतिद्वंदितामे निकलल अछि। आ मात्र ऐ दुआरे जे नेपालमे विमल जीक बाद हमरे नाम हुअए। ओना हमरा ई कहबामे कोनो दिक्कत नै जे विमलजीक पोथी नीक छनि भ्रमरजीक अपेक्षामे। जे पाठककेँ ई पोथी पढ़बाक इच्छा हो से ऐ लिंकपर आबि क' पढ़ि सकैत छथि-- https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Bhramar_Gajal.pdf?attredirects=0&d=1 तकरा बाद भ्रमरजीकेँ साहसकेँ धन्यवाद दिऔन कारण ओ स्वयं ऐ पोथीक पी.डी.एफ उपल्बध करेने छथि। तीन टा बिंदु (भाषा केर मनोविज्ञान) भाषा केर मनोविज्ञान भाग-1 जखन केओ कहै छै जे "मैथिली मधुर भाषा थिक" तखन हमरा ओहिसँ बेसी बड़का गारि किछु नै बुझाइत अछि। कोनो भाषा मधुर वा खटगर वा नुनगर की तेलगर होइते नै छै। आ जँ मधुर होइ छै तँ किएक? ऐ प्रश्नपर एबाक लेल बड़ साहस चाही। मध्यकालीन मिथिला सामंती छल। सामंत बैसल की चमचा सभ घेरि अपन समस्या सुनबए लागैत छलाह। आ जखन केकरो अहाँ अपन समस्या सुनेबै वा की केकरो चमचइ करबै तखन भाषा तँ मधुर राखहे पड़त। हमरा जनैत मैथिली अहीठाम मधुर भाषा थिक। कारण मैथिल चमचइ कर'मे बहादुर होइ छथि। मधुर बोल तँ राखहे पड़तन्हि। ठीक विपरीत मिथिलाक दलित ओ गैर-सवर्णक भाषामे चमचइ नै छै तँए ओहिमे टाँस बेसी बुझि पड़ै छै आ ब्राम्हण-कायस्थ सभ ओकरा रड़बोली कहै छथि।मुदा हमरा जनैत ई मात्र दृष्टिगत भेद अछि। जकरा अपन बाँहिपर विश्वास छै ओकर बोली ओ भाषामे टाँस रहबे करतै--जेना मिथिलाक दलित वर्गक मैथिली।आ जे चमचइमे लागल रहत तकर बोली ओ भाषामे मधुरता रहबे करतै--जेना मिथिलाक ब्राम्हण ओ कायस्थ वर्गक मैथिली। भाषा केर मनोविज्ञान भाग-2 ई हम दू मिनट लेल मानि लै छी जे ब्राम्हण-कायस्थ महातेजस्वी होइ छथि तँ हुनके टा पुरस्कार भेटबाक चाही। मुदा की ब्राम्हण-कायस्थ दरभंगे-मधुबनी-सहरसामे छै वा मिथिला मने की दरभंगे-मधुबनी-सहरसा छै। ऐ समस्यापर जखन हम दृष्टिपात करै छी एना बुझाइए---- १) जेना-जेना दरभंगा-मधुबनी-सहरसाक क्षेत्र खत्म होइत जाइए तेना-तेना ब्राम्हण-कायस्थ ओ आन छोट जातिक भाषाक बीच अंतर खत्म होइत जाइए (१००मे ९७टा केसमे)। चाहे ओ सीतामढ़ी हो की मुज्फफरपुर हो की पूर्णिया हो की भागलपुर हो की समस्तीपुर हो की बेगूसराय हो की चंपारणक किछु क्षेत्र (झारखंडक क्षेत्र बला लेल एहने बुझू, राजनैतिक बाध्यताकेँ देखैत नेपालीय मैथिलीक उल्लेख नै क' रहल छी)। २) जेना-जेना ब्राम्हण-कायस्थओ छोट जातिक भाषाक बीच अंतर खत्म होइत गेलै ब्राम्हणवादी सभ ओकरा मैथिली मानबासँ अस्वीकार क' देलक। ऐ कट्टर ब्राम्हणवादी सभहँक नजरिमे ई छलै जे भाषाक भेदसँ ब्राम्हण वा छोट जातिमे भेद छै। आजुक समयमे अंगिका ओ बज्जिका भाषाक जन्म ब्राम्हणवादक एही प्रवृतिसँ भेल अछि। किछु दिन पहिने नरेन्द्र मोदी द्वारा मुज्फफरपुरमे भोजपुरीमे भाषण देब एही ब्राम्हणवादक विरोध अछि आ हम एकर स्वागत करै छी तथा ओहि दिनक बाट जोहि रहल छी जहिया ओ दरभंगा-मधुबनीमे भोजपुरी बजता। जँ ठोस विचारक रूपमे आबी तँ निश्चित रूपें कहि सकै छी जे मैथिलीकेँ तोड़बामे ई ब्राम्हणवादी सभ १०० प्रतिशत भूमिका निमाहला। जँ कदाचित् ई ब्राम्हणवादी सभ दरभंगा-मधुबनी-सहरसासँ हटि क' सीतामढ़ी, मुज्जफपरपुर, पूर्णिया,भागलपुरक,चंपारण आदिक ब्राम्हण-कायस्थकेँ पुरस्कार देने रहितथि तँ कमसँ कम मैथिली टुटबासँ बचि गेल रहैत। ई अकारण नै अछि जे रामदेव झा,चंद्रनाथ मिश्र अमर, सुरेश्वर झा आदि एहन महान ब्राम्हणवादीक कारणे दरभंगा रेडियो स्टेशनसँ बज्जिकामे कार्यक्रम शुरू भेल। ३) आ जँ मैथिली टुटबासँ बचि गेल रहितै तखन मिथिला राज्य लेल एतेक मेहनति नै कर' पड़ितै। कारण चंपारणसँ गोड्डा धरि सभ अपन भाषाकेँ मैथिली बुझितै। ऐ ठाम हम ई जोर द' क' कहब चाहब जे पुरान होथि की नव राज्य आंदोलनी सभ सेहो ब्राम्हणवादी छथि। अन्यथा ओ सभ सेहो रामदेव झा. चंद्रनाथ मिश्र अमर, सुरेश्वर झा आकी आन-आन मैथिली विघटनकारी सभहँक विरोध करतथि। आखिर की कारण छै जे धनाकुर ठाकुर अपन मानचित्रमे चंपारण वा गोड्डाकेँ तँ लै छथि मुदा ओहि क्षेत्रक साहित्यकार लेल पुरस्कारक माँग नै करै छथि। ई प्रश्न मात्र धनाकुरे ठाकुरसँ नै आन सभ राज्य आंदोलनीसँ अछि। ऐठाम ई बिसरि जाउ जे पुरस्कार कोनो छोट जातिकेँ देबाक छै। जँ ब्राम्हणे-कायस्थकेँ देबाक छल तखन फेर सीतामढ़ी, मुज्जफपरपुर, पूर्णिया,भागलपुरक,चंपारण आदिक ब्राम्हण-कायस्थकेँ किएक नै ? तँ आब ई देखबाक अछि जे के-के मिथिला राज्य आंदोलनी ब्राम्हणवादी छथि आ के-के साँच मोनसँ मिथिला राज्यकेँ चाहै छथि। भाषा केर मनोविज्ञान भाग-3 लोक जखने ब्राम्हणवादक नाम सुनै छथि हुनका बुझाइत छनि जे सभ ब्राम्हणकेँ कहल जाइत छै। मुदा हमरा लोकनि बहुत पहिनेसँ कहैत आबि रहल छी जे ब्राम्हण आ ब्राम्हणवादक कोनो सम्बन्ध नै। कोनो चमार सेहो ब्राम्हणवादी भ' सकै छथि। ब्राम्हणवाद जाति विशेष नै भेल ई मात्र मानसिकता भेल जे कोनो जातिमे भ' सकैए। ब्राम्हणवादक प्रमुख तत्व वा लक्षण एना अछि--- १) केकरो आगू नै बढ़' देब------ एकटा छलाह स्व. रमानाथ मिश्र "मिहिर"। ई नीक हास्य-व्यंग केर कविता लीखै छलाह। मुदा ई मैथिली साहित्यमे आगू नै बढ़ि सकला। कारण? कारण हिनक दोख छलनि जे ई चंद्रनाथ मिश्र " अमर" जीक भातिज छलखिन्ह। दालि आ देयाद जते गलत तते नीक। साहित्यक स्तरसँ ल' क' पारिवारिक स्तरपर रमानाथ मिश्रजीकेँ पददलित होम' पड़लनि। ब्राम्हणवाद मात्र दलिते लेल नै छै। बहुत रास ब्राम्हण अपनो जाति केर लोककेँ आगू नै बढ़' दैत छै। २) मात्र अपने टाकेँ नीक बुझब--- जँ साहित्य अकादेमीक लिस्ट बला झा-झा सभ प्रतिभावान छथि तँ फेर मैथिली साहित्य विश्वक छोड़ू भारतीय साहित्य केर समकक्ष किएक नै अछि। आ जँ प्रतिभे छै तखन तँ श्री विलट पासवान "विहंगम" भारतीय राजनीतिसँ ल' क' मैथिली साहित्य धरि योगदान देने छथि। की विहंगम जी प्रतिभाहीन छथि। विहंगम जी सन-सन आर बहुत बेसी नाम अछि। ३) परिवारवाद---- रामदेव झा जखन रिटायर भेलाह तँ साहित्य अकादेमीमे ओ अपन ससुर चंद्रनाथ मिश्र अमरकेँ बैसा देलाह। तकर बाद अमर जी अपन समधि विद्यानाथ झा विदितकेँ बैसेलाह। आब विदितजीक निकट संबंधी (चेलाइन) छथि। कारण-- ब्राम्हणवादक एकमात्र कारण हीन भावना अछि। डॉ. अरुण कुमार सिंह, एल. डी. सी. आई. एल., भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6, जन्म स्थान- अर्राहा, पो.- अर्राहा, भाया- मठाही, थाना- घैलाढ़, जिला- मधेपुरा, बिहार, पिन-852121 सतसठि साला कौशिकी (मिथिला)क लेखा-जोखा आइ जखन विश्व-मानव इक्कैसम सदीक दोआरि पर ठाढ़ अछि, भारतीय गणतंत्र अपन सतसठिम वर्ष गाँठ मना चुकल अछि, खासकए एहन हालतिमे गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक, जे मिथिलाक एकटा भूभाग अछि, भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक स्थितिक अवलोकन, विश्लेषण आओर ओकर पुनर्निर्माणक आवश्यकता बहुतो दिनसँ अनुभव कएल जाए रहल अछि। एहि क्रममे साक्षात् होइछ किछु विषय, जेना- गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीमे आजादीक सतसठि वर्ष कोना बीतल? भारतीय गणतंत्रक एगारहम (11) पंचवर्षीय योजनाक एहि क्षेत्रमे की परिणाम निकलल? एहि क्षेत्रक वर्त्तमान स्थिति केहन अछि? एकर अध्ययन एक गोट आकर्षक विषय अछि; कारण जे आब हमरासबकेँ एकटा स्वतंत्र मिथिला राज्य चाही। सर्वप्रथम गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक भौगोलिक परिवेश, पर्यावरण आ परिस्थितिसँ परिचित भेल जाए। ई अछि बिहारक उत्तर पूर्वांचल क्षेत्र- नदी संस्कृतिक परिशिष्ट भूमि, मैथिली भाषायी प्रदेश....  एहि क्षेत्रक शीर्ष पर अछि नेपालक सप्तरी आओर मोरंग राज धन-धान्यबला प्रांगण... गांजाक खेती तथा ओकर तस्करी.... एकर नीचाँक भाग अछि- दक्षिण गंगाक कछेर ...झरवेर, पटेर, झौआ, बांस तथा अनकठ-गाछक जंगल- कछेरसँ कछेर धरि कतोक कोसक बीहड़! जतए चोर-डकैतक आतंकसँ भयंकर राति लग-पासक लोकक नीन हराम करैत रहैत अछि। कज्जलबन नामधारी एतुका खोपड़ीवला गाम, जे बासाक रुपमे बसैत आ उजड़ैते रहैत अछि, जकर कतहु कोनो स्थायी अस्तित्व नहि- आइ एतएतँ काल्हि ओतए। आखिर कछेर पर बसल लोकक अस्तित्वे की? कखनहुँ प्राकृतिक आपदासँ राति-दिनु सामना तँ कखनो भूखमरीक समस्या, ई तँ साधारण व्यक्तिक दैनन्दिनी, एहीमे किछु एहनो जे अपन लूटि-खसोटिसँ अर्जित सम्पत्तिक भंडाफोड़ भए जएबाक डरसँ प्रशासनकेँ रोकबाक लेल कृतसंकल्पित, मुदा स्थिति दुहूक एकहि अर्थात् सुतलोमे सदिखन जगले रहबाक हेतु विवश। एकर दोसर भाग अछि कोशीक उपत्यका.... कास एवं मोथा वला घाससँ आच्छादित मैदान। एहि भू-भागक पूरबमे पश्चिम बंगाल एवं बंगला देशक सीमा तँ पश्चिममे अछि सारन तथा चम्पारनक भोजपुरी भाषी गाम! एही सीमा-रेखासँ बान्हल ई छोटसन द्वीप खण्ड जकर गाम, शहर तथा कसबाक अपन इतिहास छैक जे कखनहुँ कोशीक ताण्डवक बीच भसिआइत रहल, तँ कखनहुँ ओकर कछेरक लोककेँ बीतल संस्कृतिक बोध करबैत रहैत अछि। एहि कोशीक भौगोलिक पृष्ठभूमि एकहि सङ्ग अत्यन्त मनोहारी ओ कुख्यात रहल अछि। एतुका पुरबा बयारमे भोर-साँझ एक दिस जतए कृषि कार्यक सुगन्धि व्याप्त रहैत अछि तँ दोसर दिस विभिन्न जीव जन्तुकेर अवसानक दुर्गन्ध, हँ बीच-बीचमे भिन्न-भिन्न माछक सुकठिक गन्ध-सुगन्धि सेहो....भने हम किछु गोटए ओकर गन्धसँ नाक सिकोड़ि ली, मुदा पड़ोसी बंगाली मोसाएसभक निन्नतँ एकरहि सुगन्धिसँ खुजैत छनि। एकर पच्छिम कुशगामा गाम अछि- कुश आ काससँ आच्छादित भूखंड, उत्तर नेपालसँ सटल कुनौली आ दक्षिण बुढ़िया कोसीक कछेर, जतए नदी समय-समय पर कालबद्ध भए अपन बाट बदलैत रहल छथि.... कखनहुँ पाँच-सात कोसक लपेटमे बालु आ परती-पराँत भू-भाग तँ कखनहुँ धरतीक हरिअरीकेँ सज्जित-सुसज्जित करैत शस्य श्यामला। बिहारसँ बहएवाली गंगाक उत्तरी कछेरक विस्तार- तिरहुत, दरभंगा, कोशी तथा पूर्णियाँ प्रमण्डल एवं नवगछिया अनुमंडलक लगभग 56,980 वर्ग किलो मीटर क्षेत्रमे अछि। हिमालयक गिरिपादमे बसल गंगाक ई उत्तरी मैदान कौशिकी अपन सर्वाधिक उर्वर-भूमि एवं उन्नत संस्कृतिक लेल आदिकालहिसँ मानव समुदायक आकर्षणक केन्द्र रहल अछि। किएक नहि हो भला? हिमालयसँ निकलि कए गंगा मिलन करएवाली- घाघरा, गंडक, बूढ़ी गंडक, कमला, बलान, बागमति, कोसी तथा महानंदा सदृश सालो भरि पानि भरल नदीसँ अभिसिंचित ई भूमि भला ककरा ने नीक लगतैक? नदी-चओर, बाड़ी-फुलबाडी, खेत-खरिहान, गाछ-बिरिछ, पशु-पक्षी, अन्न-फल, तीमन-तरकारी आर माछ-दूधसँ सम्पन्न ई चौरस मैदान अपन कोरामे मैथिल संस्कृतिकेँ पोषण दए रहल अछि। एतबे नहि शस्य-श्यामल, हरित-पीत वसन पहिरने एहि कौशिकीक गौरव-गाथा गुनगुनएबाक इच्छा हो तँ मनन करू मैथिली, हिन्दी आर बंगलाक भाषा- साहित्य। सर्वविदित अछि जे गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक जलवायु, मौसम एवं भौगोलिक स्थिति अत्यन्त मनमोहक, रुचि पूर्ण आ अनुकूल अछि। समतल मैदानमे प्रकृति अपन समस्त सम्यकताक संग उपस्थित भेल छथि। ई ओ क्षेत्र थिक जतए जीवन नहि तँ अतिशय गर्मीक कारण झुलसैछ आ नहि अत्यधिक जाड़सँ ठिठुरैछ। बन आ कृषि संसाधनसँ सम्पन्न समशीतोष्ण वातावरणक ई समतल भूमि अकूत प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधन रहितो सोचबाक हेतु बाध्य करैछ जे हमसभ प्रतियोगिताक एहि विश्व-बाजारमे किएक पिछड़ैत रहल छी? अदौसँ कृषि मानव-जीवनक अनिवार्य आ आधारभूत उद्योग अछि। एतए एक बेर फेर किंकर्त्तव्यविमूढ़क स्थितिमे अपनाकेँ पबैत छी जे मूलतः कृषि आ तद्जनित उद्योग पर आधारित जीवन-यापन करएवला गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक जन समुदाय इक्कैसम सदीक स्वागत कोन अक्षत-चंदन आ फर-फूलक भोग लगाकेँ करए? कौशिकी भारतीय गणतंत्रक ओ हिस्सा थिक, जतए आजादीक सतसठि साल बादो 85.5% लोक कृषि पर आधारित जीवन-यापन करैत छथि, जाहिमे 70%सँ बेसी भूमिहीन मजदूर, 20%सँ बेसी छोट किसान आ 5%सँ कमे पैघ काश्तकार छथि। फलतः आजादीक एहि सतसठि वर्षमे एहि क्षेत्रमे भूमि-विवाद विकराल रूप धारण कए सामूहिक नर-संहारकेँ जन्म दैत रहल अछि। एहि भूमि-विवादकेँ नहि तँ बिनोबाक भूदान आन्दोलन शान्त कए सकल आ नहि तँ कम्युनिष्टक कोनो लड़ाइ वा  सरकारेक कोनो नीति। आइयो एहि क्षेत्रसँ नहि तँ सामंतशाही टूटल अछि आर नहि तँ हदबन्दी-चकबन्दी योजना सफल भेल अछि। मुदा नारा फेर वैह लगाओल जाए रहल अछि--‘इन्कलाब जिन्दाबाद’, ‘हमरा हमर धरती दियऽ।’ आखिर फेरसँ ई नारा किएक?..... ककर धरती आ ककर देश? हमरा तँ हमर देश भेटि गेल, हमर धरती भेटि गेल। तँ फेर?....नहि-नहि, धरतीक मालिककेँ धरती नहि भेटल। ....  धरती ओकरे होइछ, जे धड़सँ धार बहाबैत अछि; कन्हा पर जे हर-फार उठबैत अछि.... तखन एहि धरतीक असली मालिक अछि के?....??? नहि, नहि, नहि। नाना प्रकारक विसंगतीसँ जूझैत एहि देशक आ एहि प्रश्नक एकेटा उत्तर अछि- हजारक हजार, लाखक लाख लोक जे पुआरमे सिकुड़ि, फाटल-चीटल कपड़ामे जाड़क पैघ राति गुजारि लैत अछि। भारतीय गणतंत्रक आरम्भिक कालमे पंचवर्षीय योजनाक अन्तर्गत हरित-क्रांतिक लप्पो-चप्पोक संग गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीमे सेहो विभिन्न नदी योजना (सन् 1955 मे कोसी नदी योजना आदि) एवं कृषि आधारित उद्योग धंधाक विकास कार्य आरम्भ भेल;मुदा शीघ्रहि एहि क्षेत्रक एक-एक कए चीनी, चाउर आ जूट मिल बन्न भए गेल अर्थात् नदी-योजना टाँइ-टाँइ फिस्स। नहि तँ पनबिजली (20 मेगावाट, कटैया) उत्पादन भेल आर नहि तँ नहर-योजनाक पटौनी व्यवस्था किछुओ चमत्कार देखा सकल। अनेक बाढ़-नियंत्रक योजना सभक लूट होइत रहल आ बाढ़ि अपन तबाही मचबैत रहल। पटौनीक पर्याप्त व्यवस्थाक नाम पर लूट चलैत रहल आर सुखाड़मे ई क्षेत्र जरैत रहल। आश्चर्यक विषय थिक कि नहि, जे आजादीक सतसठि वर्ष बितलाक आ एगारहम पंचवर्षीय योजनाक समाप्तिक बादो बिहार सरकार अखन धरि मात्र 14.83 लाख हेक्टेयर भूमिमे वास्तविक पटौनीक सुविधा उपलब्ध करा सकल अछि; जखन कि बिहारक अधिकतम 122.89 लाख हेक्टेयर जमीनक पटौनी सुविधाक आवश्यकता अछि। एहिमे तँ कोनो शक नहि जे बिहारक सिंचाई विभाग लूटक एकटा पैघ केन्द्र रहल अछि। तेँ तँ जाहि परियोजनाक पूर्ण होएबामे महज 8 करोड़ रूपैयाक खर्च अबिते, ओकरा बिहार सरकार 30 वर्षसँ लगभग 66 करोड़ रूपैया खर्च कएकेँ पूरा नहि कए सकल अछि। फलतः ओहि परियोजनाकेँ एगारहम पंचवर्षीय योजनामे सेहो सम्मिलित कए लेल गेल। ई कोनो उलटबासी नहि अछि-- सत्ता आ राजनीतिक खेलमे सब किछु जायज अछि? पटौनीक व्यवस्था गंगाक उत्तरी मैदान कौशिकीक कृषि-संस्कृतिक लेल कतबा अहम्, अनिवार्य आ अपेक्षित अछि? किऐकतँ समुचित पटौनी-योजनाक विकास आ सफल क्रियान्वयनसँ एहि क्षेत्रकेँ नहि तँ केवल सुखाड़सँ बचाओल जाए सकैत अछि, अपितु जल-वितरणक समुचित व्यवस्था कए बाढ़िसँ सेहो एहि क्षेत्रक रक्षा कएल जाए सकैछ। बाढ़ि आ सुखाड़ सदृश प्राकृतिक आपदासँ बचाव होइते एहि क्षेत्रक आधि-व्याधि, दुःख-संताप सभ किछु दूर भए जाएत। मुदा ओएह गप्प, बिलाइकेर गरदनिमे घण्टी के बान्हत? जखन दुनियाक सबसँ उपजाऊ जमीनमे सँ एक गंगाक उत्तरी मैदान पर बसए वला जन-समुदायक एहि औद्योगिक-पूंजीवादी वैज्ञानिक युगमे एतबा खास्ता हाल भए जाए तँ आश्चर्य होइत अछि अपन पूर्वजक सोच पर जे अपन संततिक रक्षार्थ एहि नदीक कछेर, समतल मैदानमे अपन सभ्यता आ संस्कृति विकसित नहि कए सकलाह। ध्यान देबाक छैक जे बीसम सदीक उत्तरार्द्धमे भारतक कोन रंग विकास-यात्राक अग्रिम सोपान मानल जाइत छल? लोक पहाड़ी आ पठारी भागक तुलनामे समतल मैदानमे बसब बेसी पसंद करैत छलाह;किएक तँ ई सामान्य धारणा छल जे पहाड़ी प्रदेशमे जीवन कने कठिन होइत अछि, जखन की समतल मैदानक जिनगी सरल। गंगाक उत्तरी किनार विशाल समतल मैदान अछि। जाहिमे बिहारक 60% आवादी निवास करैत छथि; जखन की ई क्षेत्र बिहारक कुल क्षेत्रफलक 40% अंश थिक। ई भारतक सर्वाधिक आबादी घनत्व (885 व्यक्ति प्रति हेक्टेयर) वला क्षेत्र अछि। विचारणीय अछि जे आजादीक सतसठि वर्षसँ भारतीय गणतंत्रमे ओ केहन शतरंजी राजनीति चलैत रहल जे आइ गंगाक उत्तरी मैदान कौशिकीक लोक सबसँ बेसी चिंतित छथि? चिंता स्वाभाविक छैक। इक्कैसम सदीक भारतीय गणतंत्रक एहि पछुआएल क्षेत्रमे नहि तँ उर्जा-स्रोत अछि, नहि तँ कोनो सफल उद्योग; नहि तँ वैज्ञानिक कृषि-तकनीकि अछि आ नहि तँ उन्नत यातायात। इक्कैसम सदीक भारतीय गणतंत्रक ई समतल इलाका आइयो लालटेन युगमे जीवन बसर कए रहल अछि। बिहारक एहि क्षेत्रमे गामक परिकल्पना करैत लालटेन युगक बात के कहय, एतएतँ शहरोमे अन्हारे पसरल अछि। कारण स्पष्ट छैक- एहि क्षेत्रमे पनबिजली आ ताप विद्युत उत्पादनक विकासक दिशामे आइ धरि सरकारक डेगे नहि बढ़ल अछि। सन् 1971-72 मे गंगाक उत्तरी मैदानी भागक प्रति व्यक्तिक बिजली-खपत क्षमता मात्र 10.10 किलोवाट प्रतिघंटा छल जखन कि एही वर्ष गंगाक दक्षिणी मैदान आ छोटानागपुरमे उर्जाक खपतक क्षमता क्रमशः 41.5 किलोवाट एवं 201.9 किलोवाट प्रतिव्यक्ति प्रतिघंटा छल। मानल तँ इएह जाइछ जे उर्जा-खपतक क्षमता जीवन-स्तरक सूचक होइत अछि। उर्जा-स्रोत सदृश यातायातक विकास सेहो कोनो क्षेत्रक सर्वांगीण विकासक कारण आओर परिणाम होइत रहल अछि। किएकतँ यातायात ओहि ठामक जनजीवनकेँ मात्र आवागमनक सुविधे नहि प्रदान करैत अछि, अपितु उत्पादनक आयात-निर्यात एवं वितरण-उपभोग द्वारा ओहि ठामक जीवन-स्तरकेँ सेहो प्रभावित करैछ। एहि वैज्ञानिक युगमे मनुक्ख जल, थल आओर नभ सदृश तीनू मार्ग पर विजय प्राप्त कए लेने अछि। मुदा दुर्भाग्य छैक जे गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीमे हवाई अड्डाक संख्या ईकाई अंककेँ पार नहि कए पओलक अछि। आइयो एहि क्षेत्रमे एहन मैथिल भेटि जएताह जे हवाई जहाज नहि देखने छथि; किएकतँ कहियो-काल कोनो सरकारी कार्यक्रमक अवसरे पर कोनो हवाई जहाज एहि क्षेत्रमे उतरैत अछि। हवाई-मार्गक विकास नहि भेलासँ एहि क्षेत्रक लोककेँ कोनो मलाल नहि छनि; किएकतँ एहन खर्चावला यात्राक हेतु क्षमतो तँ होएबाक चाही? मुदा दुख अछि तँ एहि बातक जे कमे खर्चमे सुगम यात्रावला जल मार्ग, जकर विकासक अकूत सम्भावना एहि क्षेत्रमे बनैत छैक, किएकतँ एतुका सभ नदीमे सालो भरि पानि रहैत अछि, तकरो हाल तँ ओएह छैक। रहल-सहल एक मात्र थल मार्गक विकासमे सरकार सतसठि वर्षसँ प्रयासरत अछि, मुदा नतीजा ढाकक तीन पातक बराबरिओ नहि निकलैत अछि। एक दिस भारत सरकार मैट्रो रेलवेक विकासमे लागल अछि; आ दोसर दिस ई क्षेत्र बड़ी रेल लाइन मधेपुरा-कटिहार एवं सहरसा-फारबिसगंज शाखाक लेल संघर्षरत अछि। आइ जखन विश्व-बैंक सम्पूर्ण दुनियामे सड़कक जाल बिछैबाक लेल प्रयासरत अछि, तखनो एहि क्षेत्रक कतेको अनुमंडल जिला मुख्यालयक सड़क मार्गसँ जुड़बाक लेल लालायित अछि। एहनो नहि छैक जे सड़क योजना-मदमे कम खर्च भेल अछि। मुदा ओ तँ भारतीय नौकरशाहीक लूटक कमाल अछि जे बहुत रास देशी-विदेशी योजनाक बादो एतुका खाधि सबमे सड़क आ कि सड़कमे खाधि से ताकब मुश्किल अछि। योजना-कार्यालयसँ ठीकेदार धरिकेर पसरल लूट तंत्रक परिणाम भुगतैत सड़क आइ गिट्टी आ अलकतराक लेल तरसि रहल अछि। जा धरि सड़ककेँ‘भूमि क्षरण’आ पानिक बहावसँ बचाओल नहि जाओत-- ता धरि मजबूत सड़क सेहो टिकाऊ नहि भए सकैत छैक, मुदा लूटक शिकार बनल ई सड़क एहिना कहिआ धरि टिटिआइत रहत? सर्वाधिक सघन आवादीकेँ पालन-पोषण देबाक एकमात्र साधन अछि-- पारम्परिक कृषि। एम्हर भारत सरकारक कृषि-नीतिक हाल ई अछि जे पंचवर्षीय योजनामे कृषि एवं सम्बन्धित क्षेत्रक विकासक लक्ष्य दिनानुदिन घटबैत जाए रहल अछि। पंचवर्षीय योजनाक माध्यमसँ भारत सरकार भनहि पंजाब एवं हरियाणामे हरित-क्रांति आनि लेने होअए-- मुदा गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकी आइयो अपन बदहाली आ बदकिस्मतीक गीत गाबि रहल अछि। आइयो ई क्षेत्र भारत एवं बिहार सरकारक कृपा-दृष्टिक लेल लालायित अछि। आजादीक एहि सतसठि वर्षमे एहि क्षेत्रक उत्पादन-क्षमतामे 100% क वृद्धि भेल ; जखन कि एतबहि दिनमे एहि क्षेत्रक जनसंख्यामे 125% क वृद्धि भेल अछि। आब एहि क्षेत्रमे आओरो कृषि-भूमिक विस्तार सम्भव नहि अछि। हँ, कृषि-विज्ञानमे वैज्ञानिक तकनीकी विकास कए एहि क्षेत्रक उत्पादन-क्षमताक विकास कएल जाए सकैत अछि; परंच प्राकृतिक संसाधनक वैज्ञानिक विकासक अभाव आ अनियंत्रित जनसंख्या विस्फोट एहि क्षेत्रक सामाजिक-आर्थिक हालतिकेँ बदतरि बना देलक अछि। फलस्वरूप एतए बेरोजगारीक एहन भयानक विस्फोट छैक जे जनसेवा, गरीबरथ, महानंदा, नार्थ-ईस्ट एवं दिल्ली तथा पंजाब जाइबला सभ ट्रेन एहि क्षेत्रसँ पलायन कएनिहार मजदूरकेँ ढोएबाक कीर्त्तिमान स्थापित कएल अछि। मजदूर सभक पलायनसँ दिल्ली सरकार चिंतित भए रहल अछि। की, ई भारतीय गणतंत्रक असमान विकास गतिक प्रमाण नहि थिक? की, भारत सरकारक श्रम एवं कल्याण मंत्रालयकेँ एकर चिंता नहि करबाक चाही? मजदूरक बहुसंख्य पलायन एहि क्षेत्रक अनियंत्रित आबादी आ श्रम-नियोजनक अभावक परिणाम एवं प्रमाण थिक। आइ आजादीक सतसठि वर्ष बाद भारतक संसदीय राजनीतिमे क्षेत्रीय दलक बढ़ैत दबाव स्पष्ट देखा रहल अछि। मुदा आइ धरि गंगाक उत्तरी मैदानी भाग अर्थात मिथिलाक समस्याकेँ केन्द्रमे राखि राजनीति जन्म नहि लए सकल अछि। अतः आवश्यकता छैक गंगाक उत्तरी मैदान अर्थात मिथिलाक सांस्कृतिक समुदायक सामूहिक राजनीतिक हस्तक्षेपक, जे भारतीय गणतंत्रमे एहि क्षेत्रक समस्याकेँ केन्द्रमे राखिकए एकर अधिकारक लेल संघर्ष करए। कोनो क्षेत्रक पर्यावरण ओतुका जन जीवनक प्राण होइत अछि। गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकी समशीतोष्ण वातावरण, अपार जल, बन आ कृषि संसाधनसँ सम्पन्न अछि। कहल जाइत अछि जे अकबरक जमानामे जखन भूमि बंदोबस्त करए टोडरमल जी एहि क्षेत्रमे आएल छलाह तँ ई क्षेत्र एक गोट घनघोर जंगल छल। नतीजतन भूमिक बंदोबस्ती नहि भए सकल। मुदा अकूत प्राकृतिक संसाधन एवं अनुकूल पर्यावरणक कारण एहि क्षेत्रक जनसंख्या तीव्र गतिसँ बढ़ैत गेल। बढ़ैत आवादीकेँ पोषण देबाक हेतु जंगल काटिकए खेती योग्य जमीन बनाओल गेल। तखन पारिस्थितिक संतुलन बिगड़बाक डर किनका छलनि? परंच आइ एहि क्षेत्रक साठि वर्षीय सभ व्यक्ति बेबाकीसँ कहि सकैत अछि जे एहि क्षेत्रक सभ नदी कृशकाय भए गेल अछि। सामान्यतः गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक मूल भौगोलिक समस्या अछि-- बाढ़ि, सूखार, अनियंत्रित वन विनाश, मृदाक्षरण, नदीसँ पानिक सूखब शुभ संकेत नहि अछि। ई दुबर-पातर होइत नदी रहि-रहिकए बरसा मासमे अपन तामसकेँ जगजाहिर करैत सम्पूर्ण क्षेत्रकेँ बाढ़िक चपेटमे लए लैत अछि। एहि नदी सभक तामसकेँ बुझए पड़त। ई बान्हल नदी जाहि रफ्तारसँ एहि क्षेत्रकेँ बालूक ढेरमे बदलैत जाए रहल अछि, जाहि गतिसँ एहि जमीनसँ पैघ गाछसभ समाप्त भए रहल अछि-- ओ एहि क्षेत्रकेँ रेगिस्तानमे बदलि जएबाक संकेत दैछ। ओहुना हिमालयक ग्लेशियर फटबाक आतंक पूर्वेसँ एहि क्षेत्र पर मौजूद अछि। पर्यावरण केँ लएकए हाय-तौबा मचाबैवला लोकक नजरिसँ किऐक ओझल अछि ई क्षेत्र कौशिकी। पृथ्वीक ई सुन्दरतम अंश गंगाक उत्तरी समतल मैदान कौशिकी आइ पारिस्थितिक असंतुलनक भंवर जालमे फँसि गेल अछि। आजादीक आरम्भिक सालमे नहरक काते कात वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाओल गेल, मुदा रख-रखावक अभावमे ओ हरियर हरियर गाछो सुखिकए रक्षकक भक्षण भए रहल अछि। खासकए सुपौल, सहरसा, अररिया आ मधेपुरा जिलाक नहर-शाखाक काते कात लगाओल शीशोक गाछ पानिक बिना सुखिकए जारन भए गेल। बेचारा नहरे की करत? ओ तँ अपने पिआसल अछि, तखन खेत आ गाछकेँ कतएसँ पानि पिआओत? उत्तम नस्लक पशु एवं चरागाहक अभाव, कृषि-भूमि पर जनसंख्याक बेस दबाव, स्थिर आ असंतुलित औद्योगिक प्रगति, शक्ति स्रोतक अल्प विकास तथा जनसंख्या एवं संसाधनक बीच असंतुलनक वृद्धि, तेँ आवश्यक अछि-- भूमि-संरक्षण, वृक्षारोपण एवं जलाशयक सुरक्षा कए एहि क्षेत्रक पर्यावरणकेँ बचाएब। एहि क्षेत्रक नदी सभकेँ बान्हसँ बान्हब बान्हक काते-कात वृक्षारोपण द्वारा जंगल उगाएब, यातायातक लेल सड़क मार्ग विकसित करब, नहर योजना द्वारा सिंचाई आ उर्जाक व्यवस्था करबाक चिर आकांक्षित सपनाकेँ साँच करबाक आवश्यकता अछि जे आब मिथिला राज्य बननहि सम्भव अछि। मिथिला राज्य आब हमरासभक हेतु प्राण-वायु सदृश् आवश्यकता बनि गेल अछि, जकर अभावमे एहि क्षेत्रक विकासकेर सपनो देखब असम्भव सन बुझबामे आबि रहल अछि। यद्यपि दोष अनका पर मढ़ब अति साधारण छैक, अपन दोष-अपन कर्मच्युतताकेँ जँ देखबाक सामर्थ्य हमसभ मिथिलावासी प्राप्त कए ली तँ ककर सामर्थ्य छैक जे हमरासभकेँ अपन अधिकारसँ वंचित करत। मुदा, की हमसभ अपन-अपन छाती पर हाथ राखि एहि विषयक गॉरन्टी दए सकैत छी जे हमसभ सबतरि अपन कर्मपथ पर सजग-सतर्क भए प्रयासरत छी? हमरा जनैत जँ केओ एकर गॉरन्टी देबाक असफल प्रयास करबो करताह तँ कमसँकम ओहि राति तँ हुनका निन्न निश्चये नहि होएतनि। कतेक सोचनीय विषय अछि जे मिथिला क्षेत्रक तथाकथित पब्लिक विद्यालयमे बंगलाक सङ्ग-सङ्ग आनो क्षेत्रीय भाषा पढ़ाओल जाए रहल अछि, मुदा मैथिली नहि। मैथिलीकेँ संवैधानिक मान्यता भेटबासँ पूर्व ओहि विद्यालयक संचालक महोदयलोकनिक कहब छलनि जे मैथिली पढ़ि की होएत? मुदा आब? आब तँ मैथिली पढ़ि भारतक सबसँ पैघ परीक्षा यूपीएससी पास कएल जाए सकैछ, तखन आब कोन समस्या? हँ समस्या अछि मानसिक हीनताक, जाहिसँ एखनहुँ धरि हमसभ निकलि नहि सकलहुँ अछि। ई तथाकथित विद्यालय चलौनिहार केओ कि मिथिलासँ बाहरक छथि, तखन फेर एना किएक? तेँ आवश्यकता अछि जे हमसभ सबसँ पहिने निचुला स्तरसँ एहि दिसमे आगाँ बढ़ी तँ परिणाम सार्थक भए सकैछ। जँ मिथिलावासी निश्चय कए लेथि जे सम्पूर्ण मिथिलाक पढ़ाइ ओकर मातृभाषाक माध्यमे होएत, तँ के रोकि सकैछ मिथिलाकेँ बढ़बासँ? जँ मिथिलावासी अपन आवेदन मात्र मैथिलीमे लिखब प्रारम्भ कए देथि, तँ के रोकि सकैछ मिथिलाकेँ बढ़बासँ? जँ हमसभ अपन पावनि-तिहारमे अपन संस्कृतिकेँ बढ़एबाक निश्चय कए ली तँ फेर के रोकि सकैछ मिथिलाकेँ बढ़बासँ? मुदा, ई तँ होएत नहि, कारण जे हमसभ तँ “तीन तिरहुतिआ तेरह पाक”मे विश्वास करैत आएल छी आ तकरे फल उठाए हमर-अहाँक संस्कृतिकेर दुश्मन लोकनि मैथिलीकेँ जाति-विशेषसँ बान्हि अपन मनोवांछित फल प्राप्त करबाक प्रयासमे लागल छथि। यद्यपि आशा नहि पूर्ण विश्वास जे ओ दुश्मनलोकनि कहिओ अपन एहन नीच कर्ममे सफलता प्राप्त नहि कए सकताह, मुदा हमर प्रयासकेँ शिथिलतँ कइए सकैत छथि। तेँ आवश्यक अछि जे हमसभ एकजूट भए एहि दिशामे सोची आ अपन पीठ थपथपएबासँ पूर्व दोसराक पीठ थपथपएबाक कार्य करी। ई दृढ़ विश्वास रखबाक आवश्यकता छैक जे ककरहु नीक कार्यक फल आइ-ने-काल्हि भेटबे करतैक, ओकर कार्य जनसाधारण द्वारा चिन्हले जएतैक। तेँ शुद्ध मनसँ मिथिला-मैथिल-मैथिलीक विकास दिशामे सोचनिहारकेँ आगाँ आबि नेतृत्व सम्हारबाक आवश्यकता अछि जे अदौसँ आबि रहल मिथिलाक मांगकेँ पूरा करबाक सामर्थ्य प्राप्त करताह। शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ बड़का साहेव : परम्‍परागत संस्‍कार केर पराभवक वृति‍ चि‍त्र- भाग २ (ऐ आलेखक पहिल भाग लेल देखू विदेह-सदेह-१५) नाटककार उद्वि‍ग्‍न छथि‍। सम्‍पूर्ण सहरसासँ मधुबनीकेँ प्रवासमे बसेबाक हि‍नक स्‍वपन्न ढहि‍ रहल अछि‍। एतेक पूर्वे सम्‍भ्रान्‍त मैथि‍लमे अपन संस्‍कृति‍क साँचल शि‍ल्‍पकेँ ध्‍वस्‍त करबाक संकेतन वर्त्तमान समैले एकटा रक्त स्‍तम्‍भ ठाढ़ कऽ देलक। स्‍वयंकेँ कुलीन मानैबला लोक सभसँ बेसी अपन मातृकेँ मर्दन कऽ देने अछि‍। वालचन्‍दक प्रकोपसँ ति‍लमि‍लायल छेदी आ चूड़ा हि‍नका डेरासँ पड़ा जाइ छथि‍। मीनाजी एकटा नीक काज करैत छथि‍न जे अपन मि‍त्र रानीक माध्‍यमसँ चूड़ाक नौकरी लेल पैरवी कऽ कऽ चूड़ाक दृष्‍टि‍मे अपन प्रति‍ श्रद्धा उत्पन्न कऽ लेलीह। रानीक पति‍ वर्माजी द्वारा ई गप्‍प जे पहि‍ने पोल छल आ फूजि‍ गेल। वालचन्‍द झाक उपहारसँ द्रवि‍त भऽ चूड़ामणि‍क पुरुषार्थ जागि‍ गेल। ओ योगदान पत्र फाड़ि‍ देलनि‍। कालक चक्र उनटि‍ गेल। चूड़ामणि‍ आब आइ.ए.एस. भऽ गेल छथि‍। वालचन्‍द झा अा हुनक पुत्री मीनाक दृष्‍टि‍मे आब चूड़ामणि‍ टीक मोहन झासँ“चूड़ामणि‍जी” बनि‍ गेल छथि‍। कुलीनक स्‍वार्थक आगू कुकुरो असफल भऽ गेल। कालान्‍तरमे हाथ-पएर जोड़ि‍ मीनाक सि‍नेहकेँ हथि‍यार बना कऽ बी.सी. झा चूड़ामणि‍केँ अपन जमाए बना लेलनि‍। ऐ नाटकमे हास्‍य समागम लेल “भोला” सन पात्रकेँ सम्‍मि‍लि‍त कएल गेल अछि‍। ऐठाम नाटकमे वास्‍तवि‍कता सेहो देखैमे आएल। भोला, बाबूजी आ माए सन सासुरक उपहार पाबि‍ वालचन्‍द झा गदगद छथि‍। एहेन सासुर भक्‍ति‍मे शक्‍ति‍सँ बेसी अपन गि‍रगि‍टि‍या रूपान्‍तरणक नाटक बेसी अछि‍। कालान्‍तरमे बी.सी.झाक जमाए चूड़ामणि‍ जी आब बी.सी.झा (आइ.ए.एस.) भऽ गेल छथि‍। परि‍वर्त्तन तँ प्रकृति‍क नि‍अम छी। मैथि‍ल ऐसँ केना बाँचथि‍...? हमरा सबहक-शि‍क्षि‍त समाजक, सभसँ पैघ वि‍डम्‍बना (जे भलमानुषक मौलि‍क गुण छन्‍हि‍) छी “नकल करबाक पीपासा।” बी.सी.झासँ दस डेग आगू बढ़ि‍ अपन मौलि‍कताकेँ ति‍यागि‍ चूड़ामणि‍जी वि‍देशी शराब पि‍बएबला पलायनवादी बनि‍ गेल छथि‍। कोनो अर्थमे हि‍नका आब मैथि‍ल नै मानल जान्‍हि‍ आ ने ओइले हि‍नका कोनो जि‍ज्ञासा वा तृष्‍णा छन्‍हि‍। मंचनक हेतु उपयुक्‍त बनेबाक क्रममे नाटककार ऐ गंभीर चि‍न्‍तनयुक्‍त वि‍षएकेँ कनीक झुझुआन बना देलनि‍ आ नाटक छोट भऽ गेल। जौं लल्‍लन बाबू कनीक आरो चि‍न्‍तन करि‍तथि‍ वा अपन प्रकृति‍केँ गंभरी बनेबाक प्रयास करि‍तथि‍ तँ नाटक बहुत उपयुक्‍त साहि‍त्‍यि‍क कृति‍ मानल जाइतए। ओना लोक अपन प्रकृति‍ आ प्रवृति‍सँ बि‍मुख नै भऽ सकैत छल। समग्र मूल्‍यांकन केलासँ ई तँ नि‍श्चि‍त प्रमाणि‍त हएत जे लल्‍लनजी एकटा अद्भुत व्‍यक्‍ति‍त्‍वक नाटककार छथि‍। ऐ नाटकक सभसँ उत्‍कृष्‍ठ सबल पक्ष अछि‍ मौलि‍क संस्‍कारक अद्योगति‍क वास्‍तवि‍क कारण केर तात्वि‍क वि‍वेचन। ऐ क्रममे संवादक रूपेँ जे शि‍ल्‍प सोझहा आएल ओ बड़ पोखगर मानल जाए। समाजक आगूक आसनपर बैसल लोक संस्‍कृति‍क उत्‍थानक लेल स्‍वयंकेँ उत्तरदायी मानैत छथि‍। ई सर्वथा सत्‍य जे मि‍थि‍ला मौथि‍लीक वि‍कासक प्रारंभि‍क दायि‍त्‍व ऐ वर्गपर छेलनि‍। स्‍वाभावि‍क अछि‍ तंत्र जेकरा हाथमे रहै छै सारथी वएह बनि‍ सकैए। लल्‍लनजी ऐ वर्गसँ संबद्ध रहि‍तो रचनामे सभठाम ईमानदारीक अनुपालन केलनि‍। मि‍थि‍ला मैथि‍लीक अधोगति‍ लेल सबल समाज जि‍म्‍मेवार छथि‍। शि‍क्षा-दीक्षा गामे ग्रहण कऽ कऽ चमकैत दुनि‍याँमे प्रवेश करैत काल अपन संस्‍कारकेँ गामेमे छोड़ि‍ देलनि‍। पलायन तँ कोनो वर्गमे भऽ सकै छै। अर्थनीति‍ भौति‍कतावादी सोचक आगू मलीन भऽ गेल अछि‍। ऐ पलायनसँ सम्‍पूर्ण भारतवर्ष प्रभावि‍त अछि‍। मुदा आन वर्ग अपन संस्‍कृति‍केँ कोंचामे बान्‍हि‍ पलायन केलनि‍। वि‍डम्‍बना अछि‍ तँ मि‍थि‍लाक भलमानुष वर्गक लेल भस्‍मासुर बनि‍ अपन मौलि‍क संस्‍कारक श्राद्ध मि‍थि‍लाक गहबरक सोझहा करैत पलायनकेँ आत्‍मि‍क स्‍वीकृति‍ दऽ देलनि‍। यएह ने नाटकक दूरदर्शी दृष्‍टि‍कोण मानल जाए। दुःखक दुपहरिया :संसारी संवेदनाक तीख अनुभूति 

दुःखक दुपहरिया मैथिली साहित्यक सिद्धहस्त साहित्यकार श्री गंगेश गुंजन जीक सन १९९९ मे प्रकाशित काव्यकृति छन्हि .कोनो कविक काव्य- संवेदना पर ताधरि सार्थक दृष्टिकोण स्थापित करब कोनो टिप्पणीकार लेल संभव नहि जाधरि कवि स्वयं अपन काव्य मे उपस्थित नहि भ' जाए.एहि ठाम कवि अपन दृष्टिकोणक संग आएल छथि तें काव्य- भावक उद्बोधन मे बेसी खगता आ भाँगठ नहि.

गुंजन जीक अनुसारें एहि रचनाक मूल अनुभव -संसार बनल अछि-जीवन प्रचंड रौदकेर दुःख भरल दुपहरिया ,तकर सघन तीख भरल अनुभूति , भरि संसारी संवेदना , माटि-पानि-बरसात मे अथक मनुष्योचित आस्था आ अंततः एकर आशावादि परिणति अपन विश्वासक निष्कम्प रचना-दृष्टि -भागी जे जीवन-विमुख होयबा सँ बचबैत अछि .तें एकर नाम - दुःखक दुपहरिया.

एहि परिपेक्ष्य मे कवि " गीत-ग़ज़ल सन संकलन " मानि एकरा लिखने छथि. ओना त' गुंजनजी साहित्यक आन विधा -उपन्यास , नाटक ,कथा आदि लेखन मे सेहो पारंगत आ प्रवीण छथि , उचितवक्ता " कथा-संग्रह लेल " साहित्य-अकादेमी" पुरस्कार सँ सम्मानित भेल छथि , मुदा जौं -"आपकता" कोनो साहित्यकारक गवेषणाक मूलांकुर मानल जाय त' निस्संदेह गुंजनजी " उन्मुक्त छन्दक उत्कृष्ट " कवि " छथि.

आकाशवाणीक प्रधिकारी संवर्गक एहि कवि केँ स्वर-भंगिमाक भान छन्हि , तें ने अपन गलती केँ " अश्वस्थामा हतो नरो वा कुंजरो" जकाँ स्वीकार क' सहजहि पाठक केँ दिग्भ्रमित क' दैत छथि . " गीत-ग़ज़ल सन संकलन " कविक एहि तरहक उद्बोधनक पाछाँ इएह सोचल जा सकैछ जे जौं ग़ज़लक विरमित व्याकरण केँ पाठक पकड़ि लेत त' तैयो कविक आलोचना संभव नहि किएक त 'पहिनहि कहने छथि जे " ग़ज़ल सन अछि" अर्थात ओ जनैत छथि जे ग़ज़लक मानदंड मे एहि कृतिक कथाकथित ग़ज़ल कदापि नहि उतरत .ओना एहि तरहक गलती मैथिली साहित्यक बहुत रास कवि कयने छथि मुदा ओ सभ ग़ज़लक व्याकरण सँ पूर्णतः अनभिज्ञ छलाह तें ओ सभ स्वयं केँ ग़ज़लकार मानि नेने छथि.भ' सकैत अछि जे ग़ज़लक व्याकरण सँ कवि परिचित पूर्णतः नहि होथि, मुदा एहि रूपेँ गुंजन जी जे चूकि कयने छथि ओकरा अलोपित नहि कयल जा सकैछ , किएक त' एहि विधाक व्याकरण केँ कोनो ने कोनो अर्थ में ओ अवश्य जनैत छथि . 

वर्त्तमान ग़ज़ल केँ मैथिली में मानक स्वरुप देबाक लेल क्रान्ति-विज्ञान जकाँ प्रमाणित भ' रहल अनचिन्हार आखर " केँ आधार मानि जौं एहि संकलन मे देल गेल कथाकथित ग़ज़लक, मानकता केँ देखल जाए त' समाविष्ट ग़ज़ल बहर, रदीफ़ , काफ़िया आदिक खगता वा असंतुलन सँ भरल अछि तें एहि ग़ज़ल- सन- काव्य केँ मात्र " आज़ाद -ग़ज़ल " मानि भावक आधार पर मूल्यांकन कयल जाए त' कदाचित मूल्यांकन भ' सकैत अछि . 

मार्कण्डेय प्रवासी अपन "सरस्वती -वंदना " शीर्षक काव्य मे वाक-देवी सँ प्रगीत-काव्यक रचनाक शक्ति एहि रूपेँ मँगैत छथि :  " भावना दे कल्पना दे  शब्द पर अधिकार दे  राग लय गति यति नियति दे  रसक पैघ पथार दे ....

अर्थात काव्यक गुण-दोख विवेचन मे कृतिकार सँ राग, लय , गति, यति, नियति, सरसता आदिक आश होइत अछि तखने सुर-साध्य भ' सकैछ .कवि स्वयं केँ उन्मुक्त छन्दक कवि कहैत छथि तें गीत मे हिनक भावक विजय स्वाभाविक किएक त' प्रगीत काव्य नहि लिखने छथि , मुदा " ग़ज़ल -सन " जे काव्य छन्हि ओहि मे त' प्रवासीक खींचल लकीर पर जौं ध्यान देल जाए त' ई प्रतीत होइछ जे कवि " अंशतः गेय काव्यक लोच " केँ स्पर्श त' क' लैत छथि , मुदा कतहु- कतहु भाव केँ बचयबा मे रागक क्षय भ' जाइछ त' कतहु गतिक प्रवाह मंद बुझाइछ .

गंधहीन फूलक मधुमास कविता मधुमय मास मे एकांत परल कविक मनोदशाक भाव पूर्ण चित्रण अछि .एहि ठाम आत्माक स्वर स्पष्ट निकसित भ' रहल . एहि लोक सँ अलोपित अपन सभ सँ पियरगरक वियोग मे कवि आकुल भ' रहल छथि. एकरा प्रिये देशान्तर त' नहि कहल जाए किएक त' ओहि मे अपन स्नेेहीक पुनि घुरि अयबाक आस होइत अछि. एहि ठाम कवि केँ जीवन पर्यन्त पियासले रहि जयबाक भान छन्हि ..किएक त' इहलौकिक सिनेह आब परलौकिक भ' गेल छन्हि 

किछु बूझल छल अहूँक मन मे किछु स्वादल छल सिनेहक धार  दुनू गोटेक सपना दहा रहल  अनचिन्हार गामे गामे ..

श्रृंगारिक जीवन सँ एहि जहानक क्षणभंगुरताक द्योतक वैराग्य मे प्रवेश करैत एहि काव्यक नायक अपन जीवनक गति केँ काव्य लक्षणा ओ व्यंजना बना क' जीवनक आदि-अंतक मध्य झाँपल दर्शन सँ मानवीय गुणक दिशा निर्देशन क' रहल छथि , जे चिंतलशील लगैछ.

जीवनक सुख़-दुःखक अनुभूति, नियति आ प्रवृति पर निर्भर करैछ , अर्थात " मोन उदगार त' गाबी गीत " ...खुशीक अर्णव मे तरंगित मोनक कोनो छद्म क्लेश किछु नहि बुझाइछ, ठीक ओहिना जखन मोन अशांत हुअए त' चाम सँ उपटल छोट फुसरी सेहो भोकन्नर जकाँ लगैछ .

" बिन कहल गीत अमूर्त्त" काव्य मे कविक मोनक क्लेश पूर्ण रूपेँ बाहर आबि गेलनि . जीवनक गाड़ीक एकटा पहिया जखन संग छोड़ि दैत अछि त' दोसर पहियाक व्यथा आ वृथा केँ गाड़ीक कोनो आन पुर्जा कम नहि क' सकैछ ." बिन कहल गीत अमूर्त्त " कविताक नायक जीवनक ओहि अवस्था मे प्रवेश क' गेल छथि जाहि ठाम सँ मात्र सिनेहक एक्के गोट रूप देखाइत छन्हि ... सभ यात्रा कयलक काते काते हमरा काँट-कटैया बनि क'  घेरने रहल किछु बात  बंद रहल हमरा लेखें दरबज्जा आ दलान अपने तं मृतप्राय , देलक ने हुलकी क्यों आन .....

एहि अवस्था मे प्रवेशक ड'र सभ केँ होइत अछि मुदा एहि ठाम औनाइत लोकक व्यथा दिशि ककरो ध्यान नहि .एकांत दर्शन पर केंद्रित जीवन- दशाक ई काव्य युग -धर्मक  गीत जकाँ लगैछ  . लेभरल अरिपन सन सबहक नजरि शीर्षक काव्य प्रीति मे रीतिक अनुखन काव्य थिक जाहि मे स्मृतिक संग मधुरता केँ जीवनक क्षणिक आयाम सँ झाँपि जीवाक प्रयास कयल गेल अछि .जखन हिया मे मक़बरा निविष्ट भ' गेल हुअए त' एहि तरहक जीवन अनुकरणीय कोनो अर्थ मे नहि ... एहि काव्यक शाश्वत दृष्टिकोण मे प्रवृति भाँगठ उत्पन्न क' रहल अछि .मुदा कवि त' दुःखक गीत -अगीत कहि लिखने छथि तें हुनक संस्मरण मात्र मानि एहि तरहक किछु काव्य केँ आत्मसात करबाक चाही.

सागर - पथ, आ असकर चुनमुन्नी सन समय नीक अभ्व्यंजना भरल पद्य अछि ..

हिन्दीक चर्चित कवि अज्ञेय अपन कविता " प्राण तुम्हारी पदरज फूली "शीर्षक काव्य मे कहैत छथि .. वाक्य अर्थ का हो प्रत्याशी , गीत शब्द का कब अभिलाषी ? अंतर मे पराग सी छाई  है स्मृतियों की आशा धूली प्राण तुम्हारी पदरज फूली !  मैथिली साहित्य मे एहि तरहक भव्य-अभव्य रीति काव्यक जे खगता बुझना जाइत अछि , ओकर खगता केँ " एकटा पारिजात अहाँक नाम " सन काव्य बिनु प्रगीतात्मकता  बोरल प्रांजल रूपेँ अंशतः त' अवश्य पूर्ण करैत अछि .... अहाँ प्रेम- आँखिक अमर भाषा  हम कंठ मोकल सन अभिलाषा  अन्हरिया डोरा सँ प्राण हमर गाँथल अछि ..

दुनूक शब्द विन्यास विलग मुदा भावक समंजन एकरसता भरल अछि 

गुंजन जीक काव्य साधनाक अहिवात मे किछुए मुदा कोमल अर्चिस सँ भरल " मुक्तकः " सेहो छन्हि ...सभ किछु छोड़ि अलोपित सिनेहक पाँछा कवि भाग' त' चाहैत छथि मुदा एकर भान सेहो छन्हि जे लोक आब हुनका " बहकल" कहतनि, माने गद्य गीत सँ जखन मुक्तक मे प्रवेश करैत छथि तखन कवि केँ जीवनक वास्तविकताक भान होइत छन्हि.... अहुँक जीवन हमरे जकाँ पहाड़ रहत  हमर ई मन सेहो राति -दिन अन्हार रहत  जे क्यों सुनत कहियो ककरो सँ ई खिस्सा  दुनू गोटे केँ से एक रंग बताह कहत .....

एहि प्रकारेँ कवि आब औनायत घर सँ बाहर भ' ग़ज़लक दुनिया मे प्रवेश करैत छथि .जाहि मे अनिवार्य अनुशासन सँ उन्मुक्त भ' " ग़ज़ल सन गीत" लिखल गेल जाहि गीत सभमे भावक खगता नहि.. सुनू अहुँ ई हमर मनक उदगार सुनू  अही मे लोक वेद सौंसे संसार बुझू .. रुसल कमला केर धार पिलखवार जतय एतक लोक सबहक जिनगी कहार बुझू ..

जौं भावक आधार पर मूल्यांकन कयल जाए त' कुशल कवित्वक परिचय मुदा भासल सुर मे आबद्ध रहला सौं ई सभ सेहो गीत नहि "गीत जकाँ " मात्र मानल जाए .हमरा मतेँ प्रवीण कवित्वक धनी गुंजन जी जौं " अतुकांत काव्य संग्रह " बना क' अपन दुःखक दुपहरिया मे मैथिलक कान्ह तकतथि त' आर नीक काव्य संकलन बनितय किएक त ' कवि प्रखर काव्य प्रतिभा सँ भरल छथि , मुदा प्रवाहक आशुत्व नहि छन्हि तें सुर-समंजन कांचे लगैछ अतुकांत काव्य " आज़ाद ' होइत अछि ओहि रूपेँ अवश्य आर उत्कृष्ट होइतनि,आ भावक आलोक-पुंज बेसी उपटि क' सोझाँ अबतनि,ओना अधिकाँश ग़ज़ल सन पद्य भाव सँ परिपूर्ण अछि ,

एकटा पद्यक अंतिम छंद विचारमूलनक पराकाष्ठा केँ पूर्णतः स्पर्श क' लैत अछि .. प्रत्याशा मे पजरल  मोनक परिताप बंधु अर्पित अन्हरिया केँ  कथा राफ़-साफ़ बधु  जीवन-खेला मे बेश  गुंजनक निसाफ बंधु .

काव्यक शास्त्रीय व्याख्याक आधार पर एहि ग़ज़ल सबहक विषय मे त्रुटि त' संभव मुदा जौं मात्र प्रगीत-काव्यक आधार पर देखल जाए तँ' किछु पद्यक भाव  अनमोल रूपेँ रीतिक व्याख्या करैछ आ परिणामस्वरूप संसारक यथार्थ चित्रण सोझाँ में अबैछ. हम बुझै छी झूठ दुनियाक  वचन सँ बहला रहल छथि  नेह सँ समझा बुझा क'  जे अपन घर जा रहल छथि .

ग़ज़लक बाद देशकालक दशाक गद्य गीत सेहो एहि काव्य में देल गेल अछि तें जौं एकरा मात्र कविक अपन व्यक्तिगत दुःखक दुपहरिया बूझल जायत त' एहि संकलनक संग न्याय नहि .कवि अपन दुःखक अभ्यान्तर मे देश कालक दैनन्दिनी सँ ल' क' चिरकालिक व्याधि सँ क्षुब्ध छथि .. चढ़ैत आकाश पर अन्न सबहक दाम  सभटा दोकान अनचिन्हार लगै - ए ताकू मटिया तं ढन -ढन बजे-ए टीन तें आब बेसी घर अन्हार लगै-ए 

आदर्शवादक पाठ सभ ठाम भेंटैत अछि मुदा स्वयं मे उतारब संभव नै तें कवि कथाकथित आदर्शवादक नाओं सुनितें बिदकि जाइत छथि  आदर्शक बाना छोड़ू ,  मात्र शब्द धरि ल' ओढू मन पसिन्न सुविधा लोढ़ू विद्यापतिक नोर, राजनीति केर दाव् मे मारू धोबिया पाट सन देशकालक दशाक चित्रण सँ ल' क' विष- बंधन , चेतना गीत , मन कथा सन युगांतकारी नवचेतनावादी काव्य सँ संकलन पाटल अछि सभ सँ प्रतिवादक स्वर भरल पद्य अंत मे भेंटैछ : अरहूल फूलक गीत ..

आब ससरफानी किछु हटलए अन्हरियाक  आब रक्त टुह-टुह रंग , आर कनी गाढ़ भेल  हमरा दरबज्जा पर लाल सुरूज ठाढ़ भेल

निष्कर्षतः ई कहल जा सकैछ जे " आत्मिक आपक्ता सँ भरल कविक " ई संग्रह मैथिली साहित्य लेल बेछप्प काव्य संग्रह थिक ..

पोथीक नाओं : दुःखक दुपहरिया  रचनाकार : श्री गंगेश गुंजन  विधा : काव्य संकलन  प्रकाशक : क्रांतिपीठ प्रकाशन , पटना  प्रकाशन वर्ष : सन १९९९  मूल्य : ५० टका मात्र देवीजी : बालमनोविज्ञानक सहज स्पर्शन देवीजी वर्तमान मैथिलीक चर्चित साहित्यकार श्रीमती ज्योति झा चौधरी क लिखल निबंधात्मक बाल साहित्य अछि, जे श्रुति प्रकाशनक सानिध्य सँ सन २०१२ मे बहरायल .गहन चिन्तनक  संग लिखल एहि प्रयोगवादी पोथीक आलोचना सेहो एकटा  चिन्तनक विषय भ' रहल अछि .जौं टी एस. इलियड क आलोचना सिद्धांत केँ मूल्यांकनक आधार मानल जाए त' मैथिली भाषा साहित्य मे " बाल साहित्य " विधा पर तीन गोट नव -प्रयोगवाद भेल अछि आ जकर कृतिकार क्रमशः  छथि श्रीमती प्रीति ठाकुर , श्री सियाराम झा सरस आ श्रीमती ज्योति झा चौधरी . आलोचना सिद्धांत इएह कहैछ जे कोनो जीवित वा मृत साहित्यकारक कोनो कृतिक  सहज  मूल्यांकन तखने भ' सकैत अछि जखन ओहि सँ पूर्व ओहि विधा पर कोनो  कृतिकार  एहि तरहक प्रयोग कएने होथि.एहि संदर्भ मे ह'म मात्र एतवे कहि सकैत छी सरस जी आ प्रीति जी जे नूतन प्रयोग कएने छथि ओहि सँ उन्मुक्त नवल साध्यक रूपेँ ज्योति जी" देवीजी' क संग मैथिली मे पदार्पण केलीह . हिनक जन्म मिथिला ( बेल्हवार , मधुबनी ) मे भेलनि , छात्रजीवन जमशेदपुर ( प्रवास मे मिथिलाम )आ कर्म क्षेत्र अमेरिका आ इंग्लैंड रहलनि .एहि बहुरंगी दुनियाक इंद्रधनुषी रंग छटा केँ कृतिकार अपन बालमोन सँ जोड़ि एहि  नवरूपक वोल्फिया ( जहानक सभ सँ छोट फूल ) ल' क' आएल छथि. कोनो कृतिकार केँ विशेष विधाक सृजन करबा सँ पहिने ओहि रूप मे प्रवेश कर' पड़ैत छैक तखने रचना शाश्वत भ' सकैत अछि .गुरुदेव कवीन्द्र रवीन्द्र एकटा साक्षात्कार मे प्रतिउत्तर देने छथिन्ह  जे " गीतांजलि लिखबा सँ पहिने ओ कर्मयोगी अपना केँ प्रीति-भरल-रीतियोगी बना नेने छलाह , परिणाम समक्ष अछि . कहबाक तात्पर्य जे एहि पोथीक रचना सँ पहिने ज्योतिजी की सोचने छलीह ओ त' लिखब सहज नहि मुदा लिखैत काल ओ अवश्य अपन नेनपन मे प्रवेश क' गेल हेतीह आब सुधि पाठकक संग-संग आलोचक जाधरि "अयाचीक -गोविन्द " बनि देवीजीक चिंतन पर ध्यान नहि देथि सहज मूल्यांकन कदापि संभव नहि .बाल साहित्य पर एहि तरहक दृष्टिकोणक अपेक्षा बेरि-बेरि उठयबाक कारण अछि जे  मैथिली साहित्य मे सम्बलयुक्त साहित्यकारक दृष्टि सँ ई विधा उदासीन जकाँ रहल . बाल साहित्यक भाव " बाल मनोविज्ञान केँ सहज स्पर्श कर' बला होयबाक चाही  , जौं एहि रूप सँ एहि पोथीक मूल्यांकन करी त' ज्योतिजीक परिश्रम वृथा नहि गेलनि . देवीजी एकटा बाल  विद्यालयक शिक्षिका छथि  एहि विद्यालयक संस्कृति ग्रामीण अछि . एहि तरहक विचार सहज एहि दुआरे किएक त' शहर मे कान्वेंट कल्चर हाबी अछि . एहि विद्यालय मे प्राचार्य पुरुख छथि , आर शिक्षकक बेसी चर्च नहि . देवीजी चंचल  बाल नेना सभ केँ विविध ३७ गोट नीति आ सामाजिक अवधारणा सँ भरल शिक्षात्मक उपदेशक  रूपेँ पाठ पढ़ा रहल छथि . एहि प्रकारक मनोविज्ञान मे सभ सँ नीक लागल जे कोनो छात्र जखन कोनो उत्पात करैत अछि त' आर अध्यापक दंड देबाक लेल उद्दत मुदा " देवीजी " ओहि तरहक उत्पात सँ एकटा नवल नीतिशाश्त्रक निर्माण करैत छथि आ उत्पाती छात्र अवरोही सँ आरोही बनि जाइछ , अर्थात जे ओकर नकारात्मक क्रियाशीलता सँ सहज रूपेँ एकटा सकारात्मक दृष्टिकोणक जन्म भ' जाइत अछि . आब प्रश्न उठैत अछि जे प्रयोगात्मक रूप सँ की ई संभव छैक ? त' एहि लेल वर्त्तमान समस्तीपुर जिलाक चर्चित " रघुनन्दन उच्च विद्यालय समर्था पोस्ट कल्याणपुर अंचल विभूतिपुर " क भ्रमण कयल जा सकैत अछि, जाहि ठाम एहि देवीजी सदृश प्राचार्य राष्ष्ट्रपति सम्मान प्राप्त शिक्षक स्वर्गीय रामनंदन सिंहक प्रयोगवाद पूर्णतः सफल भेल छलन्हि .भारत सरकारक नव शिक्षा नीति मे सेहो छात्र-छात्रा केँ शारीरिक -मानसिक यातना पर प्रतिबन्ध लगाओल गेल अछि .छात्रक चंचल मोन मे पनकैत "बहेरपन" केँ थाम्हबाक लेल "शिक्षक अभिरुचि मानदंड " मे नीति शिक्षाक माध्यम सँ मानसिक उद्विग्न्ताकेँ रोकबाक क्रियान्वन पर ब'ल देल गेल अछि . नेनाक पहिलुक आ सभ सँ पियरगर गुरु माय होइछ, माय अर्थात नारी . प्राथमिक  शिक्षा नीति मे महिला शिक्षिकाक नियुक्ति पर विशेष जोर आ देवीजीक " देवीजी " मे नीतिक क्रियाशीलता मे कतहु ने कतहु संधि अवश्य अछि . जाहि ठाम एहि पोथीक कोनो -कोनो लेख मे अध्यापक छात्र केँ दण्डित क' क' बाल मोन मे अपराधक पुनरावृति रोक'  चाहैत छथि ओही ठाम देवीजी उपदेश आ उदाहरण सँ ओहि बहकैत नेनपन मे नव-चेतना जगबैत छथि . एहि तरहक कृत्य मे देवीजीक सफलता देखाक' लेखिका ई प्रमाणित कर' चाहैत छथि जे दंड द' क' नेनपनक अपराध नहि रोकल   जा सकैछ . " पिंजराक पंछी "नामक कथा मे उल्लेखित ई शब्द " देवीजी सँ  विद्यार्थी डेराइतो छल हुनक सम्मान सेहो करैत छल " बोधगम्य किएक त'  बिनु दण्डक  डरें सम्मान मे ड'र शिक्षाक शाश्वत रूप थिक, पिंजराक  पंछी कोनो विशेष कथा नहि , एकटा छात्र देवीजी केँ पिंजरा मे बन्न सुग्गा देलकनि जे देवीजी बजैत छल.आब अगिला दिन देवीजी किछु अन्नक कण ल' उन्मुक्त गगनक पंछी केँ आमंत्रित करैत छथि .ओहि हँसैत पंछी सँ पिंजराक बन्न   पंछीक तुलना करैत  छथि ..ओहि छात्र केँ अपराधबोध होइत अछि आ पंछी " आज़ाद"क' देल जाइत छैक . आब एहि कथाक मूल्यांकन मे जौं एहि साहित्य केँ  प्रसाहित्यिक सृजन  मानि सोचल जाए त' किछु नहि भेंटत . तें विश्लेषक केँ एहि ठाम नेना बनि सोचबाक  जरुरति छन्हि वा नेना लग पोथी द' ओकरा सँ मूल्यांकन कराओल जाए , किएक त' देवीजी " सोलह प्रकारक सचार नहि नेनाक " गोलगप्पा " थिक एकर स्वाद वेअह कहत जे नेना हुअए वा  नेनपनक सहज आनंद उठौने हुअए,  कतिपय  परिपक्व भेलाक बादो अपना केँ " प्रवीण नहि मनैत हुअए . अर्थात  निश्च्छल बाल मोन  पर ज्योतिजीक प्रांजल प्रयास केँ मैथिली मे सफल प्रयोगवाद बूझल जा सकैछ. कोलम्बस दिवस पर  देवीजी कोलम्बसक विषय में नेना सभ केँ किछु " अपूर्व ' जानकारी दैत छथि . बिहारक सिलेबस मे सेहो नेनाक कोनो कक्षा मे कोलम्बसक चर्च अछि मुदा  देवीजीक पाठ मे कोलंबसक जहाज सभक नाओं , सभ यात्रा वृत्तांत  द्वीपक चर्च आ १२ अक्टूबर " केँ अमेरिका मे कोलंबस दिवस मनयबा सन तथ्य  मैथिल नेनाक लेल नव  विषय उत्सुकता भरल मानल जाए. सभ पाठ मे किछु ने किछु नेनाक लेल ओहि पाठ सँ सम्बंधित नूतन विषय देख'में अबैछ जे अपन समाजक नेना सभक लेल जिज्ञासाक कारण प्रमाणित होयत. सहज अछि आत्मिक साहित्यकार बहुत दिन प्रवास मे रहलीह .ओहू ठाम पढ़ैत रहलीह लिखैत रहलीह . तें एहि तरहक सहजता छन्हि आ  ओहि ठामक संस्कृतिक आदान -प्रदान एहि पोथीक मादे नेना मे त'अवश्य होयत. मैथिली साहित्यक बहुत रास प्रबुद्ध जन केँ एखन धरि ई नहि बूझल हेतनि जे आन किछु  देश मे " पिता-दिवस " मनाओल जाइत अछि . देवीजी जीवन मे मायक संग-संग " पिताक दायित्व केँ देखइत " अपनहुँ देश मे पिता -दिवस मनयबा पर जोर दैत छथि. एहि कथा मे लेखिका कनेक हुसकि गेल छथि ..किएक त' ई उल्लेख नहि कयल गेल जे पिता दिवस कोन-कोन देश मे कोन दिन  मनाओल जाइत अछि. एहि प्रयोगवादी पोथी मे सभ सँ नीक लागल कथाक कथ्यक आधार पर चित्रांकित श्रृंखला .सहज अछि ज्योति जी चर्चित चित्रकार छथि त'एहि तरहक प्रयोग प्रासंगिक छलनि. एवं प्रकारेँ कहल जा सकैछ जे ज्योतिजीक ई बाल साहित्य सहज प्रयोगवादी साहित्य अछि जाहि मे कोनो ठाम कृतिमताक भान नहि होइछ आ मातृभाषा बूझ' आ बाज' बला मैथिल नेनाक लेल कौतुहलक विषय होयत  . पोथीक नाओं :देवीजी विधा            :निबंधात्मक चित्रांकन युक्त बाल साहित्य प्रकाशक       : श्रुति प्रकाशन प्रकाशन बर्ष  : सन २०१२ रचनाकार    : श्रीमती ज्योति झा  चौधरी मूल्य          : २०० टका सहज प्रवृतिक गुणात्मक प्रयोगधर्मिता : गुम्म भेल ठाढ़ छी अनुभूति आ अभिव्यक्तिक कवि गोपाल जी झा  गोपेश युगधर्म ओ आंचलिकताक रंग कें   अनुलोम-विलोम मिश्रण सँ बोरि एकटा झुझुआन परंच आशुत्वक रस सँ डबडब काव्य संकलन सन १९६६  मे प्रस्तुत केलनि" गुम्म  भेल ठाढ़ छी " मात्र २३ गोट मुक्तक काव्यक ई संग्रह ठुट्ठा प्रकाशन सँ प्रकाशित अछि. एहि सँ पूर्व गोपेशजीक " सोनदाइक चिट्ठी "बहुत  लोकप्रिय भेल छलनि. एहि सँ उत्साहित भ' कवि अपन नव रचना पाठक धरि परसबाक साहस केलनि . अन्तर्मुख मे झाँपल बहिर्मुखी काव्य प्रतिभाक कविक " गुम्म भ' ठाढ़ अछि " - एहि पर चिंतन करब आवश्यक छैक आ इएह दृष्टिकोणक कारणे ई छोट-छीन काव्य अपन प्रासंगिकताक अर्धशतक दिश प्रवेश क' रहल आ एखन त' चिरस्थायी मानल जाए. जाहि ठाम रचनाकारक लेखनी गुम्म भ' जाइछ ओहि ठाम सँ जे शब्द -शब्द उदित होइछ ओकरे साहित्य-पांडित्य लोकनि समालोचना कहने छथि. एहि तथ्यक आधार पर  प्रांजल प्रयास मे एहि काव्य मे कोनोविशेष चूकि नहि भेंटल , अर्थात " देखन मे  छोटन लगे घाव करे गंभीर " एहि पातर पोथीक काव्य-प्राण कातर नहि .शेषांशक गणना ततेक कम छैक जे आलोचक केँ ओकरा पुनि भाजकक रूप देबा मे सोचय परतनि .एकर  सभ सँ पैघ कारण जे कवि उत्थान -पतनक आवर्तनक मध्य झाँपल प्रत्यावर्तन केँ बुझैत छथि. कवि कखनहुँ मौलिकताक दाबी नहि केलक आ ने संख्या -बल मे ओझराक' अनाप सनाप रचना करैत गेल. जतबे  लिखलक आत्मा सँ लिखलक  आ परिणामक निर्णय स्वयं नहि केलक ओ सभ किछु पाठक पर छोड़ि देने अछि . पहिलुक काव्य " मिथिलाक प्रतिनिधि " सरल छन्दात्मक कविता अछि  जाहि मे चर-अचर आ जीव-अजीवक सौंदर्य बोधक संग संस्कृति मे माटिक सुवास सोहनगर लगैछ. "जाहि ठाम पाओल जाइछ डोका सन सुन्नर आँखि फ़रफ़रबए  खग मात्र जाहि ठाम सूरतालहि सँ पाँखि.... जाहि ठामक थिक पैघ धरोहरि मिरजइ साठा पाग कोकटिक धोती गाम -गाम मे रुचिगर पटुआ साग जाहि देश मे गाओल जाइछ तिरहुति  ओ समदौन जाहि देशमे नव विवाहिता करबथि बहुत मनौन एहि मे सरल पाठकक नजरि मे यथार्थ मुदा  आलोचकक दृष्टि मे मिथिलामक गदगदीक  परिचर्चा मात्र भेंटत किएक त' जाहि मिथिलाक  चर्च कएल  जा रहल ओ सम्पूर्णताक  परिचायक नहि,विशेष संबल आ आगाँक पाँतिक बोध करबैछ . एहि मे कवि अपन दायित्वक निर्वहन नहि क' सकलथि ,  कवि परम्परावाद सँ बेसी बाझल लगैछ . पावनि-तिहार , आचार- विचार , विद्या-वैभव आ रहन -सहन मे सम्पूर्णता नहि देखाओल गेल. जौं कोजगराक संग-संग  घड़ी पावनि आ वाचस्पति-मण्डनक संग-संग राजा सलहेस सन महामानवक चर्च सेहो कएल  गेल रहितए  त' एहि पद्य कें मिथिलाक अनुगामी आ उत्कृष्ट " संस्कृति-गान " क संज्ञा सँ विभूषित करब अनुचित नहि होइतए     किएक त' यथार्थ कें सेहो अनुखन रूपेण प्रस्तुत कएल गेल ...... .. जाहि देश मे नैहर केर कौओ लगैत अछि नीक होइत छथि नेनहि सँ लुडिगरि जाहि देश केर नारि प्रियगर   लगैछ जनमानस कें जिनकर डहकन गारि एहि तरहक श्रव्य  सम्बल गाथा क संग संग अपन समाजक विकृति कें सेहो आभा-गान जकाँ प्रस्तुत क' ऊँच-नीचक अनुगामी बोधक दर्शन कविता मे आलोचक लेल किछु विशेष नहि छोरलक कविक इएह सत्य प्रहार  काव्य-मंडली मे ओ स्थान नहि लिअ' देलक जकर ई अधिकारी छल. तैयो कोनो परवाहि नहि कवि यथार्थ लिखबे कयलक .. जाहि देश मे अहिपन सुन्नर ओ सीकीक चंगेरी जाहि देश मे बटुकों होइछ  बड़का गोट भंगेड़ी "हम आ हमर युग" कविता युगधर्मिताक  संग  उपादेय कर्मक गाथा थिक जाहि ठाम शील सौंदर्यक कोनो सुमारी नहि, एहि काव्य मे  सभ्यता , आस्था , चेतना  आ संभावनाक विजय केर आश देखाओल गेल अछि .. हम थिकहुँ घोर बुद्धिवादी आस्था कें तर्कक कसौटी पर कसनिहार.... मुदा एहि तरहक कसौटीक एहि ठाम प्रयोजन आ उपादान स्पष्ट नहि भ' सकल , कवि कें एहि छायावादी दर्शनक प्रयोजनक कारण स्पष्ट करबाक चाही छल. सन १९३१ मे जनमल कवि जखन युवावस्था मे प्रवेश केलक ओहि काल हमर देश स्वतंत्रता मे प्रवेश  क'  रहल छल. समाज मे व्याप्त भौतिक विषमता सम्यक बौद्धिक कवि  कें ग्राह्य नहि भ' सकल आ आगाँ चलि  " एक-व्यक्तित्व दुइ चित्र " लिखि देलक .अनुचित रूपेँ धनोपार्जन क' अनर्गल ताम झामक जीवन जीब'बला व्यापारी पकौरीमल झुझुनियां आ आदर्श व्यक्तित्वक लोक   सेवक जीक जीवन शैलीक तुलना भलहिं वर्तमानकाल मे सामान्य गप्प मानल जाए परंच ताधरि ई कविता प्रासंगिक रहत जाधरि समाज पर  अर्थनीतिक आड़ि  मे भ्रष्टाचार भारी रहत. "फ्रीलांसर" पद्य मे भारतीय आध्यात्मक स्वरूपक तुलना जीवन-शैली  सँ करैत आस्थाक अनुचित रूप पर कविक वांछित प्रहार एहि पद्यकेँ विचारमूलक बना देलक .. बाबा फ्रीलांसर छथि तें नहि छन्हि मंदिर आ' नियमित रूपेँ सइर भ' कए भोगो नहि लगइत छन्हि ... मात्र मूरति स्थापित क' लेला मात्र सँ पूजा नहि , आस्थाक आडंबर पर नीक प्रहार कएल  गेल . सन्तुष्टीकरण मानवीय प्रवृति रहल अछि एहि सँ ऊपर भ' कवि सोचलक तें उचित मोजर नहि भेंटल युगधर्मी कवि " युगधर्म' क बल्तोरि कें गहिया क' उखाड़ि देलक . हास्यक  रूप मे विषयक अंतर कतेक द्वैध-जीबि कें कटाह लागल हेतनि , मुदा एहि मे  एकटा नकारात्मक तत्व इहो जे गंभीर आ समाजक लेल व्याधि बनल चुनौतीपूर्ण विषय कें व्यंग्यात्मक रूप सँ बोरि क'  प्रदर्शित करबा मे एकर  विचारमूलन कमजोर पड़ि गेल  .  एहि मे सत्व आ ताम रसक प्रयोग अपेक्षित छल सभ सँ कठिन होईछ-  अपन आ अपन वृतिक आलोचना , ताहू मे जौं ओहि  वृतिक उद्देश्य भौतिकवादी नहि हुअए. काव्य सृंजन जनकल्याणकारी उद्येश्यक होऊ आ बरु नहि होऊ ,मुदा! एतेक त' निश्चित अछि जे एहि वृति सँ संधिस्थ मनुक्ख एकरा भौतिक  रूपेँ नहि देखैछ ओहु मे मैथिली साहित्यकार कविक स्थिति त' पाठक सँ झाँपल  नहि अछि . अपने कवि रहितहुँ कविकाठीक आलोचना गोपेश जी खुलि क' करैत छथि ..एहि आलोचना मे आशा अछि , निराशा अछि ,व्यथा अछि , संत्राश अछि आ कतिपय अनर्गल आत्मप्रशंसा पर प्रहार सेहो अछि ..लेखक सँ कविक तुलना करैत गोपेशजी लेखकक  अन्तर्द्वन्द्व आ व्यथा दुनू मे संतुलन रखबाक प्रयास करैत छथि . हिनक अन्तर्मोनक इएह उचित उदगार आन कवि सँ हिनका अलग करैत छन्हि आ एहि ठाम त' निश्चित रूपेँ हिनक काव्य मे  तंत्रनाथ झा आ भुवनेश्वर सिंह भुवन  श्रेणीक कवित्व झलकैत छन्हि .. हे कविकोकिल आजुक युग मे अहाँ जौं  होइतहुँ प्रयोगवादी रचना करितहुँ अपनहि लिखतहुँ अपनहि बुझितहुँ रीन  काढ़ि  पोथी छपयबितहुँ आलोचक कें देखितहि भगितहुँ.... लेखक सँ तुलनाक बाद कविक तुलना गीतकार, ठीकेदार, इंजीनियर , प्रोफेसर , डॉक्टर वकील आ अफसर सँ कएल गेल जे बड्ड रोचक लागल मुदा नेताक संग तुलना करैत काल कवि आशुत्वक पूर्ण प्रवाह मे उबडुब क' रहल छथि...... मिरजइ दोपटा पाग छाड़ि नेता केर सभटा ड्रेस बनिबतहुँ पीड़ा पानक खिल्ली खइतहुँ सदिखन पटना दिल्ली जइतहुँ सभ विषय पर भाषण करितहुँ बहुतो टा उदघाटन करितहुँ . यथार्थवादी कवि "कल्पना "मे सेहो प्रवेश क' जाएत अछि आ पुनि यथार्थक अनुभूति ओकरा  सत्यक दिग्दर्शन करबैछ आ कवि फेर सँ यथार्थ मे" प्रवेश" क' जाइत अछि  .कल्पना आ यथार्थ दुनू कविता भव्य विचार आ भावना सँ भरल अछि . कविक आँजुर मे बिजुलिक दिमाग आ यंत्रक जाँत, भारतक माटि सँ सन आशु कविता सेहो  छन्हि . सोनदाइक नव चिट्ठी कविता सँ साहित्य केँ की भेटल एहि सँ बेसी महत्वपूर्ण अछि जे  " सोनदाइक चिट्ठी" क लोकप्रियता सँ प्रभावित भ' कवि एहि काव्यक  रचना केलनि. ओहुना साहित्यक उद्देश्य शाश्वतक संग-संग कखनहुँ-कखनहुँ मनोरंजन सेहो हेबाक चाही मुदा सोनदाइक चिट्ठी मनोरंजनक संग-संग इतिहासक गर्त मे शिक्षाप्रद सेहो अछि जे चीनी आक्रमणक काल मे लिखल गेल छल . उपलब्धि कविता कोनो ख़ास उद्देश्यक पूर्ति नहि करैत अछि , मनुक्खक अस्तित्व , टहाटही इजोरिया मे, शौर्य  मे ककरो सँ उनैस नहि , प्रयोगवादी गमछा  आदि मात्र पृष्ठ टा केँ बढ़बै लेल काज केलक एहि सभ  मे  विशेष किछु नहि . "जवान केँ सम्बोधित गृहिणीक दू आखर " भारत-पाकिस्तान युद्धकाल मे लिखल गेल प्रेरणादायी गद्य-गीत अछि . एहि मे एकटा  ग्रामीण नारी अपन पति केँ राजधर्मक निर्वाह  करबाक अद्भुत उत्साह दैत छथि... तनने रहब बन्नुक बँटाएब नहि ध्यान अमर रहत हमर सोहाग जौं चलिओ जैत अहाँक जान माइओ दै छथि सप्पत तें रखबनि दूधक लाज देश रक्षा सँ बढ़ि क' दुनिओं  मे नहि दोसर काज प्रयोगबादी गमछा , हिलकोर बारह बरख बाद सासुर यात्रा,  जय जवान जय किसान आदि आकर्षक प्रांजल पद्य अछि . युगबोध युगधर्मी कविक तात्विक दर्शन सँ भरल जीवाक कला  थिक जे कर्मधर्मिता केँ काव्यक धरातल पर उतारवाक नूतन प्रयोग मानल जा सकैछ . एहिपद्य संकलनक सभ सँ आतुर होम' बला विषय इएह जे कवि अंत मे गुम्म भ' क' ठाढ़ भ' जाइत छथि. बहिर्मुखी प्रतिभाक धनी कविक ई गुमकी साहित्य केँ हिल्कोरि देलक जे सभ ऋतु मे आशुत्व गुम्म भ' रहल अछि . मैथिली साहित्यक लेल ई चिन्तनयुक्त  प्रश्न   अपन भविष्य पर प्रश्नचिन्ह ठाढ़ क' देलक' ..... ठुट्ठा पिपरक झोंझ मे दबकल अछि नीलकंठ कोइलाक सभ्यतामे चारूकात लंठे लंठ . कविक अनुसार सभ्यताक शिला पर इतिहासों घसा क' विलुप्त भ' जाइछ , मुदा गोपेशक ई काव्य चिरकालिक ज्योति प्रदान करत एहि विश्वाशक संग आशु-कवि गोपाल जी झा गोपेश कें शतशः पुष्पांजलि घृष्ट शिरोमणि महामहोपाध्याय गोनू झा : मैथिल संस्कृतिक द्विरागमन आर्यमूलक भाषा सहित्य मे नाट्य परम्पराक आरम्भ गीतनाटिका सँ भेल  एकर मूल कारण  प्रांजल पाठकक मध्य एहि विधाक प्रति  आपकता भरल आकर्षण जगायब रहल अछि. शनैः-शनैः  नाटकक मौलिक संवाद क स्थान गद्य ल' लेलक .जेना सभ तरहक सचारक बिनु ऊर्जावान चिष्टान्न सेहो अधीर लगैछ , ठीक ओहिना गीतक बिनु दीर्घकालिक दृश्य साहित्यिक रूप घृतक सुवास सँ विमुख भोजन जकाँ अनसोहाँत लाग'  लागल . तें बीच मे  गीत राखब नाटक क आकर्षण लेल प्रासंगिक आवश्यकता लाग' लागल  .कालक्रम मे मैथिली साहित्य सेहो एहि परिवर्तन सँ विमुख नहि रहि सकल .जौं कोनो  नाटकक  कृतिकार ओहि मे गीत संयोजन नहिक' सकलथि त' दिग्दर्शक अपना तरहेँ एहि प्रकारक प्रयोग कयलक . ओना किछु नाटककार एहेन भेल छथि जनिक लिखल मौलिक नाटक मे किछु गीत समंजन हुनके  द्वारा कएल गेल  एहि तरहक प्रयोग केँ निरन्तर रखैत एकटा नव नाटक पाठक आ श्रोता-दर्शक लेल प्रस्तुत अछि :-  "घृष्ट शिरोमणि महामहोपाध्याय गोनू झा : एहि नाटकक कृतिकार  श्री बैकुंठ झा अर्थशास्त्रक शिक्षक छथि. विविध पत्र पत्रिकाक मे प्रकाशित  अपन रचनाक सुकवि रास चर्चित नहि रहलाहें , मुदा पहिलुक नाटकक मादे  साहित्य मण्डली मे चिन्तनक नाओं अवश्य भ' रहल छथि. गोनू झा कोनो अदना वा नव चरित्र नहि . वाकपटु आ हास्यक कालनृप केँ अपन नाटकक नायक बना क' जनभाषाक मंच पर आनब सहज कार्य नहि .एहि चर्चित व्यक्तित्व केँ सहेजवाक क्रम मे नाटककारक एकटा नव गवेषण सँ पाठक परिचित भ' रहल छथि  जे  महाकवि विद्यापति आ गोनू झा समकालिक छलाह .एहि मे सत्यता की अछि ओहि सँ बेसी ई  ध्यान देब उपयुक्त जे एहि नाटक मे की विशेष  भेंटल ? चारि अंक आ प्रत्येक अंक केँ चारि दृश्य मे विभक्त क' नाटकक दर्शन प्रणाली क पूर्णतः पालन कएल गेल किएक त' विडंबना जे एखन धरि बहुत प्रतिभाशाली दृश्य -कृतिकार केँ एकांकी आ नाटकक दृश्य परम्पराक संयोजन-बोध नहि छन्हि. समवेत गीत सँ नाटकक आरम्भ होइत अछि , एहि गीतक छंद आ लय सभ गोट पद मे अनुखन आ नाटकक अनुकूल बजैछ  अर्थात वाचक , दिकदर्शक आ द्रष्टा तीनूक लेल उत्सुकता सँ  भरल लागल........ मुकुट जकर चमकैत हिमालय , पयर पखारथि गंगा गंडक कोशी बान्हि जकर थीक फहड़ा रहल तिरंगा ... विद्यापति सन कवि कोकिल जे छथि लोकक ठोरे पर गोनू झा सँ सीखि चतुरता , पौलनि ख्याति वीरवर ... रुचिगर भोजन चूड़ा-दही तरुआ मे तिलकोरक पात सांठथि चतुरी नारि भाई हेतु खूब सैंति थारी मे भात ... प्रगीत काव्यक प्रणेता स्वरक संग नाटकक अंक मे प्रवेश करैत छथि. गोनू झा आ काली जीक मध्यक संवाद सँ पहिलुक दृश्यक समापन होईछ. दोसर दृश्य मे गोनू झाक सासुरक शालीन हास्य समागम जाहि मे हुनक सारि " गम्हीरा"क  संग विनोदी दृश्य मे सहज आकर्षण लगैछ... गम्हीरा : ओझा जी ! कोन लेरक चर्च करैत छलहुँ अहाँ ! ठाढ़ भय हम सभ सुनैत छलहुँ ! तें  त अहाँ केँ बराबर लेर छुबैत अछि  ! गोनू झा : ऐ ! लेरक नहि लारक चर्च करैत छलहुँ ! आ' लेर - हमरा त अहुूँ केँ देखि लेर चुबैत अछि ... एहि तरहक संवाद त' मिथिला समाजक सहज वृति चित्र होईछ कोनो नवल प्रयोग देख' मे नहि आएल ओना ई सहजो छैक किएक त' नाटककार आठ सय बरख पूर्व मे प्रवेश क' गेल छथि. गोनू झा आ हुनक सार  मंगनूक दृश्य मे दर्शन भरल मिथिलामक तरंग किएक त' सारक अर्थ होइत छैक तत्व आ तत्व विखंडित नहि भ' सकैछ .इएह कारण होईछ जे  मैथिल पुरुख अपन सभ सँ प्रिय पात्र केँ  "सार" कहल . गोनू झा हास्य सम्राटक संग-संग कर्मठ स्वामी सेहो बन' चाहैत छथि , मुदा हुनक अर्धांगिनी त' एखन कालीदासक ध्रुवस्वामिनी छथि. एहि सिनेही संवाद मे रीति-प्रीतिक विलोमी साक्षात्कार मे नाटककार " कवि" लागि रहल छथि. एहि तरहेँ नाटक मध्य सँ इति धरि परम्परावादी लागल , कोनो नूतन लोच नहि . गोनू झाक  पुत्र यशस्पति झा आ हुनकर नेनपनक नाओं " मोनू " आधुनिक धरि अवश्य लगैछ यथार्थ जे होइछ मुदा एहि ठाम नाटककार परम्परा मे ओझरायल लगैत छथि.ओ आधुनिक उपनाम बला नेना क रचना त' कयलनि मुदा सामंतवादी " मालिक " शब्द परम्परा केँ जीवंत रखने छथि. ओना  एहि ऐतिहासिक विषय मे बेसी क्रांति संभव सेहो नहि छल , मुदा जौं  किछु सधल प्रयोग कएल जेतै छल त' नाटक क संग-संग कृतिकार सेहो आर अपेक्षित होइतथि. विषय -वस्तुक आवरणक केंद्र मे ई देख' मे आएल जे एकटा प्रतिभाशाली कवि ओहिना काज कयलनि जेना एकटा शिल्पी पाथरक मुरूत बनेनाइ छोड़िओहि पाथर सँ वाहन बना देलक जे वैज्ञानिक युगक द्रुतगामी वाहनक सोझाँ स्थिर नहि सकल . निष्कर्षतः बैकुंठ जी लयात्मक आ प्रतिभाशाली साहित्यकार छथि , आवश्यकता छैक त' मात्र अपन आभा केँ अनुकूल आ युगांतकारी विधा मे साँचब .समय सँ बहुत आगाँ साहित्यकार वा किओ जौं जायत त' अनुचित मुदा बहुत पाँछा गेनाइ सेहो मात्र नव बाटक तात्विक दर्शन लेल अनिवार्य होइछ , ओहि पुरने बात मे जौं मनुक्ख ओझरायत रहत त' नव अनुसंधान संभव नहि छैक . विज्ञानक संग संग साहित्य कला लेल सेहो एहि आदर्श पर ध्यान देब अपेक्षित होईछ . ओना नवका पिरही केँ अपन पुरान संस्कार सँ बान्हबाक जे प्रयास कयलनि ओहि मे सफल सेहो भेल छथि तें एहि पर नकारात्मक स्वरुपक दृष्टिपात उचित नहि होयत . एतेक ध्रुवसत्य जे नाटकार पूर्ण तल्लीन आ सोचि-विचारि क' " नाट्य-सृजन" कयलनि , एहि लेल धन्यवादक पात्र छथि.नाटक मंचनक लेल पूर्णतः उपयक्त अछि कतहु दर्शक पर अनेरेक बोझ नहि देल गेल .सामा ,चकेबा , चुगला  कजरौटी सँ अलोपित होईत नाटकक मौलिक लवण सँ नवका पिरही अवलोकित भेल ई नीक विषय वस्तु मानल जाए . परंच पूर्णाहूति रूपेँ इहो   ध्यान दिअ' परत जे जाहि चान पर सँ लोक घूमि-फिरि आबि जायत अछि ओहि चान केँ चौठक संग-संग सभ दिनक लेल भगवान बूझब चातुर्य नहि बैकुंठ जी सन प्रतिभाशाली केँ परम्परावादी सँ बेसी प्रयोगवादी बनवाक चाहिअनि. कृतिकार सँ इएह  आश जे   बरु नाटक, काव्य वा कोनो विधा पर लिखथि हिनका सन प्रवीण साहित्यकारक एहि भाषा केँ जरुरति अछि  , आवश्यकताक छैक त' समयानुकूल शिल्पक क्रम -व्यति क्रम देखैत शिल्पी बनबाक निर्णय कएल जाए आकर्षण सँ भरल नीक नाटक लिखबाक लेल शेष-अशेष साभार. नाटकक नाओं : घृष्ट शिरोमणि महामहोपाध्याय गोनू झा : नाटककार      : श्री बैकुंठ झा प्रकाशक        : मिनार पब्लिकेशन पटना प्रकाशन वर्ष   : सन  २०१२ मूल्य           : ६० टका . मैथिली बाल  साहित्य उद्भव ओ विकास "एहि आलेखक पाठ ह'म साहित्य अकादेमीक " बाल साहित्य दशा ओ दिशा विषयक सेमिनार मे जमशेदपुर मे कएने छलहुँ " कोनो भाषा साहित्य ताधरि विकासक लेल बाट जोहैत रहत अर्थात अपूर्र्ण मानल जाएत  जाधरि ओहि मे  वर्तमान आ भविष्यक लेल कोनो सुनियोजित व्यवस्था  नहि हुअए. एहि क्रम मे जीवनक पहिलुक पाठशालाक छात्र-छात्रा अर्थात नेना वर्ग मे  मातृभाषाक प्रति चेतना ओहि साहित्यक विकासक लेल अनिवार्य व्यवस्था मानल जा सकैछ. स्वाभाविक छैक, भोर मे उगैत सुरुजक सोझाँ जौं करिया मेघ नहि लागल  हुअए त' लोक सहज अनुमान करैत छथि जे दिन साफ़ रहत . तें भोर अर्थात नेना वर्ग मे ओहेन रचनाक प्रति संवेदनशीलता जगाओल जाए जाहि सँ हिनका मे भाषा साहित्यक प्रति मनोवैज्ञानिक चेतना जागय. आब प्रश्न उठैत अछि जे बाल साहित्य ककरा कही .? एहि लेल सभ पहिने निर्धारित करय पड़त जे बाल वर्ग मे किनका  राखल जाय .. साहित्यकार गजेन्द्र ठाकुरक मतेँ बाल वर्गक तीन रूप होइछ... शिशु अर्थात नेना वर्ग   :  ( ०-५ बर्ख ) बाल वर्ग                   :  ( ०५-१२ बर्ख ) किशोर वर्ग                :( १२- १८ बर्ख ) नेना वर्गक लेल सरस लोरी गीत आ चित्रकथा ( ३-५ बर्खक नेना लेल )उपयुक्त मानल जाय. बाल वर्गक लेल मांटिक सोहनगर लघुकथा गीत आदि रचना संग देशकालक क्रान्तिगीत , चुटुक्का हास्यकथा आदि आवश्यक अछि किशोर वर्गक लेल बालपद्य, चुटुक्का , बाल कथा सँ ल' क' विचारमूलक साहित्यक  संग संग बाल ग़ज़ल ( बाल ग़ज़ल किछु दिन पूर्वहिं मैथिली साहित्य मे अस्तित्व मे आयल ) अनिवार्य आ प्रासांगिक अछि मैथिली बाल साहित्यक उद्भव एहि जनभाषाक उद्भव कालहिं मे भ' गेल एना मानल जाएत  अछि  . एहि तरहक मान्यता आ वास्तविकता सेहो जे एहि विधा कें ओहि काल मे फराक रूप नहि देल गेल. एहि भाषा मे  बाल साहित्यक पहिलुक छाँह महाकवि विद्यापतिक पदावली आ मनबोधक कृष्ण जन्म मे भेंटैत छैक ओना एहि दुनू काव्य मे नेनाक लेल किछु विशेष नहि मुदा एकर किछु भक्ति पद शिक्षाक आँचर मे पएर पसारय बला किशोर मे जीवनक त्रिपद..नीति , श्रृंगार ओ वैराग्य सम्बन्धी ज्ञानक लेल किछु हद धरि उपयोगी प्रमाणित भेल .कहबाक लेल त' बाल साहित्य पर बहुत रास प्राचीन रचनाकार लिखने छथि मुदा प्रथमतः तत्सम रूपेण बिम्बक विश्लेषण ..तें बाल मोन पर ओहि रचना सभक कोनो प्रभाव नहि .बाल साहित्यक लेल साहित्य रस सँ बोरल   बिम्बक कोनो प्रयोजन नहि ..एहि तरहक रचना मे नेना -मोनक श्रृंगार होयबाक चाही..जेना, आम छू अमरौरा छू बाबा गाछीक औरा छू नेनपन बीति गेलै केकरा कान मे कहबै कू.. नीति सम्बन्धी बाल साहित्यक अन्तर्गत सीताराम झा क शिक्षा सुधा , जनसीदन क नीति पदावली , वेदानन्द झा क रत्नबटुआ प्रमुख  अछि  शिक्षा सम्बन्धी बाल साहित्य मे श्री गोविंदक पाकल आम  आ श्री किरण जीक प्रभात कविता प्रमुख अछि .मैथिली साहित्य मे कांची नाथ झा  किरण क " वीर प्रसून पहिलुक बाल कथा संग्रह थिक. डॉ ब्रज किशोर वर्मा मणिपद्म क भारतीक बिलाड़ि ( सन १९७८ ) पहिलुक मैथिली बाल उपन्यास थिक. सुमनजीक बाल पद्य तत्सम मिश्रित होइत छलनि मुदा शिशु मासिक पत्रिकाक ओ संपादक छलाह जाहि मे तंत्रनाथ झाक  बानर आ ईशनाथ झा वंदना बाल पद्य छपल छल. ओहि कालक चर्चित कवि मधुपक गीत बाल साहित्य सँ भरल नहि रहितहुँ बालकंठक गीत बनि गेल छल  .पत्र  पत्रिका मे बटुक आ धीआ -पूता सन पत्र पत्रिका बाल साहित्य कें पणिकबैत रहल  जाहि मे सरस कवि ईशनाथ , सुमन , किरण , यात्री , अमर , आरसी आ धीरेन्द्र सन कविक बाल पद्य  छपैत छल . मिथिला मिहिरक बाल स्तम्भ मे डॉ श्रीकृष्ण मिश्रक अग्रदूत उल्लेखनीय बाल साहित्य रहल .हरिमोहन झा , राजकमल , सुभाष चन्द्र यादव , मंत्रेश्वर झा आ रामदेव झा सन रचनाकारक किछु कथा बाल साहित्यक तत्व सँ विमुख रहितहुँ बाल वर्गक मध्य प्रिय रहल. आधुनिक कालक रचनाकार मे जीवकांत जीक तीन गोट बाल पद्य संग्रह छन्हि ..गाछ झूल झूल , छाँह सोहाओनि , आ खिखिरक बिअरि   . सियाराम झा  सरस केर "फूल तितली आ तुलबुल  " श्रेष्ठ बाल साहित्यक श्रेणी मे राखल जा सकैछ. गजेन्द्र ठाकुर क विविधा  संकलन कुरुक्षेत्रम अन्तर्मनक क सातम खंड बाल मंडली आ किशोर जगत नेना भुटकाक लेल लिखल गेल विविधा थिक जाहि मे साहित्यक समग्र विधा मे बाल आत्मा केँ छूबाक प्रयास कएल  गेल अछि. गजेन्द्र ठाकुर रचित बाल  नाटक  जलोदीप आ बाल कथा संग्रह अक्षरमुष्टिका सेहो  बाल साहित्यक अमूल्य निधि थिक. मैथिलीक पहिलुक महिला नाटककार विभारानी जीक नाटक बलचन्दा सेहो बाल मोन केँ प्रेरित करय बाला नाटक मानल जाए . रामदेव झाक   दू गोट  नीतिपरक बाल उपन्यास अछि ..इजोति रानी आ हँसनी  पान वजंता सुपारी . चित्रकथा मे प्रीति ठाकुरक मैथिली चित्रकथा , मिथिलाक लोकदेवता आ गोनू झा आ आन मैथिली चित्र कथा, नीतू कुमारीक मैथिली चित्र कथा लोकप्रिय बाल चित्रात्मक रूप थिक.मुक्तक मैथिली बाल ललित कला मे श्वेता झा  चौधरी , ज्योति चौधरी , कैलास कामत , इरा मल्लिक आदि चर्चित छथि. बाल चित्र श्रृंखला मे देवांशु वत्सक " नताशा " लोकप्रिय भेल अछि . युवा साहित्यकार ऋषि वशिष्ठ क कोढ़िया घर स्वाहा , जे हारय से नाक कटाबय , आ झूठपकड़ा मशीन ( तीनू उपन्यास ) आ माँटि परक लोक  , सुफाँटि जतरा आ नित नित नूतन होय ( तीनू बाल कथा संग्रह ) एहि विधा केँ नवल ज्योति देलक . युवा गीतकार आ ग़ज़लकार अमित मिश्रक " नव अंशु " सम्पूर्ण रूपेण नेनाक  लेल नहि लिखल गेल मुदा एहि महक बहुत रास  पद्य बाल मोन केँ छुबैत अछि , हिनक दोसर प्रकाशन हेतु तैयार पद्य संकलन " अंशु बनि पसरि जायब " बाल मोनक युगांतकारी काव्य प्रमाणित होयत. महिला साहित्यकार मे डॉ नीता झाक " बिलाइ मौसी " उल्लेखनीय बाल कथा संग्रह थिक जाहि मे चित्रात्मक लयक संग खांटी मैथिली मे बाल कथा लिखल गेल अछि .दोसर महिला साहित्यकार ज्योति झा चौधरी क देवीजी ( बालकथा संग्रह  ) सर्वकालीन बाल साहित्य मे अपन विशेष स्थान  राखत. शोधात्मक साहित्य मे बाल विषयक निबंध हेतु  साहित्यकार डॉ दमन कुमार झा क नाम सेहो उल्लेखनीय अछि .युवा साहित्यकार जगता नन्द झा मनु क " चोनहाँ ' एकटा बाल लघु उपन्यास अछि. भारतीय भाषा साहित्य मे बाल साहित्य केँ प्रोत्साहन आ विकासक लेल साहित्य अकादेमी " बाल साहित्य पुरस्कार " आरम्भ कयलक . तारानन्द वियोगी क " ई भेंटल त' की भेंटल " कर्नल मायानाथ झा क "जकर नारी चतुर होय " मुरलीधर झाक  "पिलपिलहा गाछ " आ धीरेन्द्र कुमार झाक " हमरा बिच विज्ञान  " उल्लेखनीय पोथी जे बाल साहित्य अकादेमी पुरस्कार सँ सम्मानित भेल अछि . जगदीश प्रसाद मंडल केर " तरेगन " ज्ञानवर्धक बहुद्देशीय, नीतिपरक कृति मानल जा सकैछ , ओना एकरा नेना लेल त'  पूर्णतः  त' उपयुक्त नहि मानल जाए  मुदा किशोर वर्गक लेल श्रेष्ठ प्रेरक प्रसंग सँ  भरल ई पोथी वतर्मान दशकक चर्चित नीतिकला थिक . विदेह शिशु उत्सव बाल साहित्यक समग्र विधाक अमूल्य कृति थिक जाहि मे डॉ रमण झा , डॉ शेफालिका वर्मा , डॉ नरेश कुमार विकल , रमा कान्त राय रमा , सदरे आलम गौहर , जगदीश प्रसाद मंडल , गंगेश गुंजन आ दमन कुमार झा सन स्थापित रचनाकारक संग-संग  बालिका-कवयित्री संस्कृति वर्मा क रचना प्रकाशित भेल छन्हि . मैथिली बाल साहित्य मे मुक्तक काव्यक अपन विशेष महत्व अछि . आरसी प्रसाद सिंह रचित अधिकार आ बाजि गेल रणडंक , चन्द्रभानु सिंहक कोइली , इलारानी सिंहक शिशु कलकत्ता , फजलुर रहमान हासमी कृत हे भाय , मनबोधक कृष्ण जन्मक एकगोट प्रसंग शिशु , सीताराम झाक परिचय पुंज , गोपाल जी झा गोपेशक नीतिकाव्य समय रूपी दर्पण मे , मायानन्द मिश्रक नवका पीढ़ीक विद्रोह , विद्यानाथ झा विदित क वन्दना , कालीकान्त झा बूच क नेना गीत, पोताक अट्ठहास , दीनक नेना,  गय खुशबू गय नानी , मुन्ना कक्का सासुर चलला, रविन्द्र नाथ ठाकुरक खाट आ अर्र बकरी घास खो , क संग संग कवि मैथिली पुत्रप्रदीप  क देवी वन्दना नेना क लेल प्रियगर  गीति-काव्य रहल अछि जकरा  सर्वकालिक साहित्यिक मान्यता  देल जा सकैछ . वर्तमान पिरहीक क्रियाशील कवि आ कवयित्री गण मे राजदेव मंडल क मुनियाँ क चिंता आ कथीक गाछ , गजेन्द्र ठाकुरक वरद करैए दाओंन ने यौ , मिथिलेश कुमार झाक बापक रोपल गाछ सिनुरिया,  महाकांत ठाकुरक खगता भगत सिंहक , जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिलक बाल गीत डॉ अशोक अविचल रचित नेना , आमक गाछ आ लेलही तोरय चलल साग , डॉ शंकर देव झा क धरती आ अकाश बिच  संवाद आ कोइली , पंकज कुमार झाक माय गे माय , ज्योति झा चौधरी क बचपन , दलमा  आ एकटा भीजल बगरा, जगदीश प्रसाद मंडल क सुनू बौआ यौ सुनू नूनू औ आ पिता पुत्र संवाद , डॉ नरेश कुमार विकल रचित बाल गीत आ सुनू बौआ मोर , रमा कान्त राय रमाक उल्लूक शिकारी , चंद्रशेखर कामतिक भात छै नाम-नाम , शांतिलक्ष्मी चौधरी , राजीव रंजन मिश्र , आशीष अनचिन्हार , जगता नन्द   झा मनु , अमित मिश्र , कुंदन कुमार कर्ण आदि वर्तमान पीढ़ीक ग़ज़लकारक बाल ग़ज़ल , शांति लक्ष्मी चौधरी क वरखा रानी आ कुम्हर, डॉ जया वर्माक बेटी , शंभूनाथ झा क न्यूटनक सिद्धांत आ पाकल आम , राजेश मोहन झा गुंजन क साओन कुमार आ चुट्टी, अमित मिश्रक बाल रुबाई , मुन्नी कामतक जरैत इजोत,  इरा मल्लिक रचित छम -छम बरखा आ माँ, डॉ शशिधर कुमार विदेह रचित हम फूल बनब हम काँट बनब , अनमोल झाक अपन गाम आ मामाक गाम , नवीन कुमार आशाक हिंगलू भाय यौ टिंगलू भाय , मनोज कुमार मण्डलक खेल , दुर्गा नन्द मण्डलक हम हिन्दुस्तानी छी , चन्दन कुमार झा रचित हमहूँ पढ़बै आब उल्लेखनीय बाल मुक्तक काव्य मानल जा सकैछ. बाल मुक्तक कथा मे अनमोल झाक भंडाफोड़ , शेफालिका वर्माक आनक बड़ाई, सावरमती आश्रम , मूर्ख राजा आ ओकर बेटा , अनिल मल्लिक दादीक गीत , वृखेश चन्द्र लाल रचित गोलबा जगदीश चन्द्र मंडल रचित बुढ़िया दादी , गजेन्द्र ठाकुर रचित तरहरि मे परलोक , दमन कुमार झा रचित हीरा मोती आ काली कांत झा बूच रचित धर्म- शास्त्राचार्य आदि उल्लेखनीय अछि. वर्तमान समय मे सभ्यताक भूमंडलीकरण सँ किछु भाषाक अस्तित्व संकट संकट मे पड़ि गेल अछि. हमरा सभ केँ एहि दिशा मे ध्यान देब' परत .नवका पीढ़ी मे मातृभाषाक प्रति संवेदनशीलता जगाब' लेल बाल साहित्य मे बीजगणितीय वृद्धि आवश्यक अछि हमारा सभक भाषाक संग ई विडम्बना रहल जे प्रत्यक्ष रूपेण बाल साहित्य केँ ओछ विषय मानल जाएत  अछि , एहि तरहक मानसिकता राख' बला  लोकक लेल संकेतन जे अंगरेजी साहित्य मे सभ सँ जनप्रिय कविता रहल ट्विंकल ट्विंकल लिट्ल स्टार बाल पद्य रहल ओहि तरहेँ मैथिली मे  सभ सँ बेसी  लोकप्रिय गीत  बाल गीते रहल. . आब प्रश्न उठैत अछि जे बाल साहित्यक रचना करैत काल कोन बालकक रूप मष्तिष्क मे केंद्रित कएल  जाए  ? गामक अशिक्षित परिवारक नेना सँ ल' क' प्रवासी मैथिल नेनाक मध्य तारतम्य स्थापित करबाक लेल सभ तरहक बाल साहित्य प्रासंगिक अछि ..ओना एहि दिशा मे सक्रियता पहिनहि सँ अछि .. "माय गे माय  तोँ हमरा बंदूक मंगा दे तलवार मँगा दे की हम त' माँ सिपाही हेबौ .".. देशकालक गीतक संग संग सामाजिक विषमताक गीत सेहो अनिवार्य होईछ.  डॉ ब्रज किशोर वर्मा मणिपद्म बहुत बरख पूर्वहिं नेना मे काटरक प्रति सहज आ सजग लक्ष्मण रखा खींचबाक प्रयास कएने छथि... राम छू  रहमान छू गीता आर कुरान छू मोल बिकेबें नहि बजार मे पहिने बौआ कान  छू   .. एहि प्रकारक पद एहि भ्रम केँ दूर करैत अछि जे बाल साहित्य मे बिम्बक प्रधानता नहि होइछ ..ओना बिम्ब एहेन होयबाक चाही जे सहज हुअए जेना युवा कवि चन्दन कुमार झाक कविताक किछु पाँति ,,,,, झमझम बरसै छै बून्नी छै नाचि रहल गरचून्नी सुनिक बेंगक टिटकारी फँसलीह कबई कुमारी बगुला टकध्यान लगौने बैसल छल आस धरौने बुझू भेलै जबारी ओकरा भरि पोखे पेलकै टेंगरा एक दिश चन्दन गामक नेनाक ध्यान राखि कविता लिखैत छथि त' दोसर दिश शहरी   जीवन मे रमल बालक मनोदशा   : कंप्यूटर बैसल टेबुलपर सोचि रहल छै जोड़-घटाओ , गुणा-भाग केर माथा-पच्ची झटपटमे कोना सोझराओ .. अमित मिश्र अपन कविता मे नेनपन सं मनुक्खक अलख जगयबाक उद्घोष करैत छथि तूँ मनुख बन डर नै तोरा पछारि सकौ हिया नै तोहर हारि सकौ जीत होउ, ने होउ पतन तूँ मनुख बन, तूँ मनुख बन सामाजिक विषमताक हिल्कोरि दिशि मैथिली बाल साहित्य पहिनहि सँ सजग अछि  एकर एकटा रूप  कवि काली कांत झा बूच क  काव्य " दीनक नेना  शीर्षक काव्यमे भेंटैछ कोरा  मे  तोरा सुताबय छौ बिनिया जल्दी सँ अबहीं रौ नुनूक निनिया तोहर उपास हमरो लजबै छौ देखहीं रौ बौआ ई कौआ बजै छौ सुनही रौ तोरे कुचरि सुनबै छौ      ... एहि स्थापित पुरान आ नव चर्चित रचनाकारक संग-संग किछु क्षणिक  रचनाकार सेहो भेल छथि जे कहियो-कहियो उगैत छथि मुदा तीव्र इजोतक संग: ठोहि पारि क'   चिन्नी कानय हा  हमरा कुकुरो नहि मानय खाजा मूंगबा नोर चुआबै लै छै किओ नहि हम्मर नाम पाकल आम पाकल आम खो रौ बौआ पाकल आम ......( शम्भुनाथ झा ) विज्ञानक शिक्षक शम्भुनाथ झा आमक महिमाक संग न्यूटन क गतिक नियम मैथिली गीत जकाँ  गबैत छथि... क्रिया प्रतिक्रिया संग-संग आबय अपन प्रभाव विपरीत जमाबय एहि सँ चलय अछि वायुयान ई भेल न्यूटन केर तीजै सिद्धांत . चंद्रशेखर कामति सन  आशु गीतकार दुर्गापूजा मे मेला देख' लेल टकाक आश धेने गरीबक  नेना सभक साधन विहीन पिताक व्यथा कें गीत बना क' गबैत छथि .. टुन्ना गैंग पसारै यै मुन्ना दांत चियारै यै गुड्डू टिंकू बबलू सब्लू मुइलो मोंछ उखारै यै. आब की कहब भाय हुरपेट्टे लगैए बाजय छी कोना ? एहि प्रकारक बाल साहित्यक  मैथिली मे खगता नहि,  आवश्यकता अछि जे एकर व्यापक प्रचार प्रसार रचना सँ बेसी मायक भाषाक संग आपकता राखि कएल जाए. निश्चित रूपेँ एहि विधा केँ सोनक समान इजोत भेंटत . महाकवि विद्यापति , अयाची , उगना , गोनू झा , डाक , राजा सलहेस,बहुरा गोढ़िन -नटुआ दलाल सन मैथिलक जनगाथा जनभाषा मे बाल वर्ग केँ अपन माटिक सुगंध प्रदान करत. वर्त्तमान वैज्ञानिक युगक नवल शोध मैथिली मे उपलब्ध हुअए एहि लेल एहि लेल बाल मोन पर मातृभाषाक राज आवश्यक अछि..... "आब ओ नहि एथुन" (लघु कथा) बनेश्वर भैयाक दलानक आगाँ थपड़ी पड़ैत बाल-मंडली, महिनामवाली भौजीक मुख सँ गाड़ि सुनबाक लेल हुनका उकसा रहल छल .... "बानो बन-बन  देह करय ढनमन अपने लकलक ब'हु चतरिया  दुन्नू परानी बक्खो पमरिया ...." अलच्छ , सरधुआ , कपरजरू सन मिथिलामक गारिक बिच नेनाक टोलीक ठहक्का सुनि रघुपति बाबू अनचोके रुकि गेलनि. सभ उकट्ठी नेना -भुटकाक संग मोहित केँ देखि मास्टर साहेब आगि भ' कहलनि, ." ..चल भाय साहेब लग "- तोँहू एहेन छेँ हमरा विश्वास नहि छल. मोहितक बाबूजी आ रघुपति बाबू मे सिनेह गाम मे चर्चित छल , तें मोहित मास्टर साहेब नाओं सँ चर्चित रघुपति बाबूक डरें हुनका सँ क्षमा-याचना  क' अपन घ'र दिश विदा भ' गेल आ मास्टर साहेब भगवती थान दिश चलि गेलाह . हुनका दूर जाइते देरी छौंड़ा सभ फेर फेर मोहित केँ बजब' चलि आयल मुदा ओ एहेन काज आब कोना करत ? आन छौंड़ा सभक लेल रघुपति बाबू  कोनो विशेष महत्व नहि रखैत छथि , किएक त' ओ उच्च विद्यालयक शिक्षक छथि ." एखन हम सभ पंचमें मे छी जखन नम्मा मे जाएब त' देखल जेतै , एखने  सँ रघु मास्टर सँ किए डेरायब " ई कहि जितबा फेर सभ छौंड़ा केँ बानो भैयाक दलानक ओलती लग ल' गेल ,मुदा मोहित नहि आयल किएक त' मास्टर साहेब  क प्रति श्रद्धा रखैत अछि. जखन मोहर्रिर साहेब अर्थात मोहितक बाबूजी गाम मे रहैत छथि त' मरसायब कोनो दिन हुनका सँ बिनु भेंट कएने नहि रहैत छथि. सम्पूर्ण गामक आचार-विचार नीक- अधलाह सभ पर टीका -टिप्पणी दुनू गोटेक फुरसति कालक दिनचर्या जकाँ भ' गेल छन्हि . "समय " --- एकटा एहेन भाववाचक संज्ञा थिक जकरा लग परिवर्तनक चाभुक सदिखन ओरिआयल रहैछ . आइ मुहर्रिर साहेबक मुइला चारि दिन भ' गेल अछि. दलान पर श्राद्धकर्मक लेल बैसार लागल .स्वाभाविक छैक इएह एकटा एहेन यज्ञ होइछ जाहि लेल लोक पहिनहि सँ ओरिआओन क' क' नहि रखने रहैछ .तें समाजक जाति- परजातिक लोकक भीड़ लागल अछि .मोहर्रिर साहेब जतेक ब्राह्मण मे प्रिय ततबे आन जातिक लोकक  बिच श्रद्धेय किएक त' ओ सभ लोक केँ " समान मनुक्ख " मानि देखइत छलाह. सभ जातिक दाबल लोक बेसी व्यथित छल. "ओ महापुरुख छलथि तें आडम्बर आ भोज -भात पर बेसी जोर नहि देल जाए, प्रेत त' ओ बनैछ जकर जीवन समाज केँ अशांत कएने हुअए, मोहर्रिर साहेब त' सीधे स्वर्ग गेल हेताह .. जीवन भरि अभाव मे रहलनि भ' सकैत अछि एहि लेल पुरुब जन्मक दोख होनि." चौधरी जीक एहि गप्प केँ सभ मूक समर्थन देलथि . रघुपति मास्टर साहेब पंडित जी केँ मात्र वैदिक कर्मक चिट्ठा बनयबाक सलाह दैत बजलनि --- " बाँकी भोज-भातक तैयारी मोहित पर छोड़ि देल जाए. हमर आग्रह जे भावना मे नहि बहि क' अपन साध्य केँ देखैत मोहित कोनो निर्णय करथि..हमरा सभ सँ जतेक सहयोगक अपेक्षा हुअनि खुलि क' कहि सकैत छथि . मोहित त' किछु आर सोचि रहल छल .एक बरख पहिने मोहर्रिर साहेब बहुत बीमार छलाह . मोहित सेहो सूचना भेंटैत देरी ड्यूटी सँ गाम आएल रहथि तीन दिन मे मोहर्रिर साहेब कनेक नीक भ' गेल छलाह . ओहि साँझ मे चौकी पर पड़ल छलथि आ डाक्टर साहेब ल'ग मे बैसल छलाह .दुरुक्खाक बाहर सँ रघुपति बाबू.." डाक्टर साहेब ..डाक्टर साहेब हाक लगेलनि. सुनैत देरी डाक्टर साहेब बाहर निकलि गेलाह .मोहित अपन पिता सँ कहलक " बाबूजी , रघुपति बाबू बाहर मे छथि हुनका बजा दिअ' की ?  जीर्ण बीमार मोहर्रिरक मुख सँ निकसल - नहि बाउ - "आब ओ नहि एथुन" ओ त' पैघ लोक भ' गेल छथि , बेटा सभ अधिकारी भ' गेल छन्हि , हम गरीब आब हुनक मित्र कोना कहायब .एतवे मे रघुपति बाबू मोहितक तंद्रा भंग करैत कान मे कलथिन्ह " जतेक कैंचाक काज हुअए , अवश्य कहब "मोहित मंद-मुस्की दैत, मात्र! मूक सहमति धरि सीमित रहि गेल. जे बौद्धिक साध्यक आगाँ मित्र केँ बिसरि गेल छथि हुनका पर कोन विश्वाश आ हुनका सँ केहेन आश? पेटक मारि (बाल विहनि कथा) आगाँ -आगाँ कल्लो भगता पड़ाइत ....त' पाछाँ सँ नेना सभ खेहैत सगुन ब्रह्मक उपासक जकाँ गीतक स्वर मे...... " हाथ पएर मैल भेल " " पेट फूटल घैल भेल " वयसक कोनो सीमा नहि. चारि  पांच वरखक इचना पोठी सँ  ल' क' दस -पंद्रह वरखक गड़ै -गैंची सदृश नेनाक टोल. बहिनक सासुर गेल छलहुँ . हमहुँ नेना तें सरिपहुँ जिज्ञासा भेल जे एहि हास्यक कारण की ? तुलो कक्का अर्थात  तुलानन्द झा गामक मुरूख जमींदार छथि .एकटा विवाहिता बहिन नहिरे  मे रहि गेली नाओं -" जहान दाइ" तुलो कक्का बहिन केँ बड्ड मनैत छथि . माय -बापक मृत्युक बाद छोट बहिन जहान केँ बेटी मानि कक्का ,पालन -पोषण कयलथि . ततेक मानैत छलाह जे एक दिन जखन इस्कुल मे जहान केँ मास्टर साहेब मारलखिन त' ओहि मास्टर केँ तुलो कक्का हाड़-पाँजर तोड़ि देलथिन .फेर जहान कहियो इस्कुल नहि गेली .बिआहक बाद सासुर मे जहान केँ  सासु सँ झगड़ा भ'  गेलनि .बालिका वधू जहान दाइ अपन भैया केँ समाद पठौलथि .बहिनक सिनेह मे माहुर भेल तुलानन्द जी सासुर जा क' जहान क सासुक देह पर एक बोझ करची तोड़ि कहलनि " चल जहानी नैहरें मे रहिहें" आब पति अछैत साध्वी बनल जहानी नैहरें मे छथि आ तुलो कक्का बिनु बिआह कएने जहान केँ अपन बेटी मानि शान सँ जमींदारी चला रहल छथिन्ह . एकादशीक व्रत छलनि, जहानी बिनु ब्राह्मण खुऔने कोना पारण करतीह , तें गामक एकटा दरिद्र ब्राह्मण कलानंद झा अर्थात कल्लो भगता  केँ नोत देल गेल . "कतेक सेर दही लगतौ कलबा " ..तुलो कक्का क मुख एक दिन पहिनहि ई सुनि कल्लो भगता उगल' लागल" तुलो कक्का बेसी नहि चारि सेर दही , सेर भरि चूड़ा आ सेर भरिक गूड़क भेलीक जोगार क' देबै " आठ सेर दूध पौरल गेल .द्वादशीक सूर्योदयक उपरान्त हाँय -हाँय जहान दाइ पूजा अर्चना क' कल्लो भगता केँ नोतक बिजो पठा देलनि . एक याम बीति गेल .तुलो कक्का स्नान क' क' आँगन मे चौका लगा जहान दाइ केँ भोजनक लेल हाक लगौलनि ." भात भ' गेलै , दालि उधिया रहल छै ..बस कएक काल आर सरिसबक साग पसाक' छौंकि दैत छी " जहानक  गप्प सुनितें तुलो कक्का आगि भ' गेलथि ..दही सभ की भेलै ? 'सभटा कल्लो भगता खा गेल ' जहानक उत्तर पर कोनो प्रत्युत्तर नहि द' तुलो कक्का कहलनि ..." फरुसा ला  , आइ भगता केँ बपरहरि छोरा देबै .ओकर पेट फूटल घैल छै त' सार पहिने कहिते मोन भरि दही जमा दितियै. चारि सेर  कहलक  ..हम आठ सेर पौरलहुँ तखन हमर हिस्सा किए खा गेल ?खोपड़ी मे सूतल कल्लो भगता पर' फरुसा सँ प्रहार नहि भेल , मुदा तुलो कक्काक मुक्का सँ ओकर बाँचल दांत धरि भरकुस्सा भ' गेल.गाम मे कथीक थाना -पुलिस ..मारियो खेलक आ जुर्माना सेहो देलक कल्लो भगता .बरहर जकाँ फूलल घुघना देखि जखन छौंड़ा सभ पुछलकै जे के मारल क' ?कल्लो भगता कहलक मारत के,  ई त पेटक मारि  छै? ओहि दिन सँ कल्लो नेनाक झुंझुना भ' गेल. अमर कान्त अमर सुजीतक गन्ध सुगन्ध छोड़ि रहल (पुस्तक समीक्षा)

साहित्य क्षेत्रमे पत्रकार सुजीत कुमार झा एकटा सशक्त कथाकारक रुपमे उभरि कऽ अएलाह अछि । दू अढाई वर्षमे हिनक पाँचम कृति सार्वजनिक भऽ चुकल अछि । जाहिमे चारिटा कथा संग्रह अछि ।  हम पाँचो किताब पढने छी । मुदा गन्ध तऽ गन्धे अछि । एहि पुस्तकमे संग्रहित सभ कथा एकसँ एक अछि । मानव मोनक सुक्ष्मतम सम्बेदनाकेँ छुने अछि । कोनहुँ सामान्यहुँ घटनाकेँ विलक्षण कथाक रुपमे सुजीत प्रस्तुत कएने छथि ।  हिनका कल्पनाशीलता अदभूत अछि एकर उदाहरण हिनक पाँचो पुस्तक पढलासँ लगैत अछि । फेर गन्धक तऽ जोड़ा नहि ।  नेपाली मैथिली साहित्यमे ओहँुना बहुत कथाकार नहि छथि जे छथिओ से पुस्तक निकालए पर ओतेक ध्यान नहि दैत छथि । मुदा सुजीत जाहि गतिसँ पुस्तक निकालि रहल छथि आ गुणवत्ताक सिढी चढि रहल छथि ओ लाजबाब अछि ।  बारहो कथामे चेचक दागबला, गन्ध, मीना कुमारी, दर्दक कथा, अनार वा ई कही कोन बढिया अछि वा खराप छुटिआएब कठीन लगैत अछि। कथा पढलापर अन्तमे तेहन अदभूत घटना वा परिवर्तन देखा दैत छथि जे हृदय आ मोनमस्तिष्ककेँ हिला दैत अछि ।  चेचक दागबलामे रेखा नामक एकटा चर्चित कलाकारक जीवनमे एकटा दर्शक अबैत अछि आ ओ दर्शक आ कलाकार बीचक उहापोह स्थितिक वर्णन एहिमे देखएमे अबैत अछि । जखन चेचक दागबला दर्शक अबैत छथि तऽ रेखा डेरा जाइत छथि आ नहि अएलापर प्रतीक्षा करैत रहैत छथि ।  आश्चर्य सन हालत रेखाकेँ रहैत अछि जकरा ओ पसिन नहि करैत छथि जकर बात हुनका आकर्षित नहि करैत जे पति सन सुन्दर चेहरा आ शरीरक मालिक नहि अछि ओ ओकर विषयमे किए सोचि रहल छथि । ओ गलत तऽ नहि छथि? ओ टुटल भावनात्मक सम्बन्धक शिकार तऽ नहि छथि ? हुनका कोनो परेशानी आ दुःख सेहो नहि, फेर रातिमे जखन चारु दिस अन्हार पसरि जाइत अछि तऽ कोनो छोटका सन भगजोगनी हुनकर बन्द खिड़की आ गेटक भीतर रुपमे कोना आबि भुकभुकाए लगैत अछि ई बात रेखा सन प्रगतिशील आ बुधिआरि महिलाक बुझबसँ बाहर अछि । गन्ध कथामे मनोहर बाबू एकटा नाम चलल राजनीतिज्ञ छथि । ओ आजिवन कुमारे रहि पार्टी चलाबएकेँ सपथ लेने छथि । हुनकर जीवनमे पार्टीक कार्यकर्तासँग भेटघाटसँ लऽ कऽ संगठन विस्तार आ विकासक काज बढाएबमे लागल रहैत छथि। ४५ वर्षक उमेरमे एका एक हुनका विवाह करबाक इच्छा जगैत छन्हि । एकरे सुजीत बहुत बेजोड़ ढंगसँ कथा बनौने छथि । नव स्वाद एहि कथामे भेटैत अछि। मीना कुमारी गन्ध कथा संग्रहक तेसर कथा अछि । एकटा कलाकारकेँ जीवन पर आधारित कथा अछि । एकटा सामान्य व्यक्ति फेकनसँ चर्चित कलकार मीना कुमारी धरिक यात्राक बृतान्त एहि कथामे उल्लेख रहल अछि । डा. राजेन्द्र विमल तऽ नेपालक श्रेष्ठ कथामेसँ एक मीना कुमारीकेँ मानैत छथि । सुलेखा दीदी कथामे एकटा वच्चाक कल्पना पर आधारितसँ बेसी वच्चाकेँ सँग टोलक पिसीक काजक अनुभव एहिमे देखाओल गेल अछि ।  कोना सुलेखाकेँ एकटा लाइट म्यानसँ प्रेम होइत अछि, फेर लाइट म्यानकेँ हत्या। एकरबाद सुलेखाकेँ विवाह आ फेर दहेज उत्पीडनक नाम पर सुलेखाक हत्या। दर्दक कथा एहि संग्रहक पाँचम कथा अछि । जहिना नामसँ दर्द अछि पढलाक बाद आँखिसँ नोर खसा दैत अछि । प्रेमक उत्कृष्ट जादुगरी एहि कथामे देखल जाइत अछि ।  काठमाण्डूमे काज करएकेँ क्रममे एकटा मैथिल युवककेँ एकटा गुरुङ्ग महिलासँ भेट होइत अछि आ फेर प्रेम एकर बाद विछोड़ फेर ओ युवककेँ वेलायतमे एक महिला संग विवाह । फेर वर्षो बाद जखन सुमित नामक ओ युवक काठमाण्डू घुरैत छथि तऽ फेरसँ नगिना नामक महिलाक खोजी करैत छथि जकरासँग विचोड़ भऽ बेलायत चलि गेल छलथि ।  कथाक अन्तमे लिखल अछि म्यानेजर बुझए चाहैत छल नगिना केँ अछि ? आ सुमितकेँ हुनका सँग की सम्बन्ध छल ? भड़ल आँखि सँ म्यानेजरकेँ विदा लैत सुमित कहलन्हि,‘ की करब ई बुझि कऽ ई हमर दर्दक कथा अछि जे हमरे सँग जाएत ।’ अन्तिम साँझ कथा एक परिवारक कथा अछि । जाहिमे एक पति पत्नी छथि, हुनका एकटा लड़का आ लड़की अछि । माय सेहो अछि। एकटा परिवारकेँ जीवनमे आएब जटिलताक विषयमे बहुत सुन्दर सन प्रस्तुती एहिमे भेटैत अछि ।  पोष्टमार्टम कथामे एकटा पत्रकार महिलाक उच्च आकंक्षा आ एकर परिणामकेँ पोष्टमार्टम कएल गेल अछि ।  वर्तमान समयमे एहन घटना बराबर देखएमे अबैत अछि । कथ्यक दृष्टिसँ कोनो नव नहि मुदा प्रस्तुती दोसर कथाकारसँ एकरा फरक बना देने अछि ।  अनार कथा लाजबाब बनल अछि । एकटा महिलाक पीड़ा एहिमे देखाएल अछि। एकटा गरीबिकेँ बढिया जेकाँ अनुभव एकरा माध्यमसँ कहल गेल अछि ।  इम्हर गाछ बढि रहल अछि उम्हर गर्वमे कोनो आकार लऽ रहल अछि। दुलरी सतर्कता अपनारहल छथि । शिशु सकुशल अपन गर्वकाल पूरा करए आ अनार खुब फल लगए । एहि कथाक अन्तमे एकटा बात उल्लेख अछि जे देहकेँ सिहरा दैत अछि । जखन दुलरीकेँ अनार मालिकक बेटा तोड़ि दैत अछि तऽ फुसलाबए लेल मलिकानि दोसर अनार दैत छथि मुदा दुलरी लेब स्वकार नहि करैत छथि। हुनका मोनमे अबैत अछि कुरुपे सही, अपन वच्चा कोनो माय अन्य सुन्दर वच्चासँ नहि बदलैत अछि । सर्वनाशक दर्द लऽ दुलरी अपन घरमे चलि अबैत छथि ।  बोझ कथामे वृद्धावस्थामे माय बाप कोना बोझ होइत अछि एकर बहुत मार्मिक ढंगसँ चित्रण कएने छथि । अपन सिन्धुली कथा माओवादी जनयुद्धकालक अवस्था मोन पाड़ि दैत अछि । जनकपुरसँ सटले रहल जिल्ला सिन्धुली माओवादी जनयुद्धकालमे केहन बनि गेल छल तकर बहुत सुन्दर वर्णन अछि।  एगारहम कथा परिवर्तन अछि । महिलाक आगा बढएमे आबएबला अड़चनसभकेँ एहिमे देखाओल गेल अछि । एहि कथाक अन्त संयोगान्त भेल अछि । हरेक समय बाधक बनल डाक्टर शिव नारायण अन्तमे पत्नीक आगु हारि मानि लैत छथि।  ओ सुष्मा दिस एना तकलथि जेना आब पुरान राग द्वेषसभ धोआ गेल हुए । शायद सुषमो इहे चाहैत छलथि । संग्रहक अन्तिम कथा बादल अछि । इहो परिवारक स्थितिक वा ई कही समस्याक रेखांकित करैत अछि । उमेश मण्डल दूध पपुआ हमर स्‍कूलसँ गामपर तकक दोस छी। ओना ओ दोसर टोलक छी मुदा स्‍कूलसँ दमकलक कारोबार एक रहने गंजक सङी सेहो छी। डीजल आनए आ सम्‍बन्‍धि‍त आनो-आन काजे गंजपर सङे जाइ-अबै छी। तँए घुमा-फि‍रा कऽ अदहासँ बेसी समए दुनू गोरे सङे रहै छी। दुनू गोरे झंझारपुर हाइ स्‍कूलक एके कि‍लासमे पढ़ि‍तो छी, आ गामो परहक काज एकरंगाहे अछि‍। ओकरो हौन्‍डा-दमकल छै आ हमरो अछि‍। तँए दुनू गोरे अदहा-अदही रि‍न्‍चसँ सोलहन्नी काज सम्‍हारि‍ लइ छी। सङे रहने गपो-सप्‍प बेसी होइए। जइसँ दोस्‍ती बेसी सक्कत अछि‍। पाइक लेन-देन सेहो दुनू गोरेक बीच चलि‍ते अछि‍। एते तँ पढ़ैओमे सुवि‍धा अछि‍ए जे अदहे-अदही दुनू गोरे पोथी कीनने छी आ सभ पोथीक काज अपना जकाँ होइए। तेतबे कि‍ए, स्‍कूलमे जे पढ़ाइ भेल तैपर गंजक रस्‍तामे चर्च करै छी जइसँ दुनू गोरेक वि‍चार एकरंगाह बनि‍ जाइए। तहूमे मुख्‍यमंत्री योजनासँ तेहेन मजगूत साइकि‍ल भेटल जे हवाइए जहाज जकाँ उड़बैत चलै छी। पौकेट खर्च दुआरे साइकि‍लक मरम्‍मति‍क समान सेहो रखने छी, जेते जरूरति‍ बूझि‍ पड़ल, कमा लेलौं। ओना असल काज हमर दू घंटा दमकल चलेनाइ अछि‍। मनुखक आठ घंटा मशीनक दू घंटाक बरबरि‍ होइ छै। कलम सठि‍ गेल छल तँए आन दि‍नसँ अदहा घंटा पहि‍ने झंझारपुर वि‍दा भेलौं। पहि‍ने पेन कीनब तखनि‍ ने स्‍कूलमे काज करब। तइ खि‍यालसँ। हमरा टोहि‍यबैत पपुओ पनरह मि‍नट पहि‍ने घरपर सँ स्‍कूल वि‍दा भऽ गेल। दमकल जे चलौने रहए से पाइ सङेमे रहै। रस्‍तेमे ताड़ी पीब लेलक। एक तँ चढ़ंत बेर तैपर रौद! मुदा गुण छल जे सम्‍हरि‍ कऽ पीने रहए, तँए कोनो गड़बड़ नहि‍येँ रहै, मुदा चुल्हि‍याएल रौदक ताड़ी तँ रहबे करै। पपुआकेँ कि‍लासमे बैसि‍ते तड़ि‍आइन महक पसरल! पकड़ाइत-पकड़ाइत पपुआ पकड़ा गेल। मास्‍टर साहैब कुरसीपर बैसला। पपुआ टेबुलक बगलमे ठाढ़ भेल। मास्‍टर साहैब पपुआकेँ पुछलखि‍न- “पप्‍पू, ताड़ी पीलह अछि‍?” मुजरि‍म जकाँ पप्‍पू बीचमे ठाढ़, एक दि‍स शि‍क्षक दोसर दि‍स वि‍द्यार्थी। ताड़ीक रमकी पपुआक मनकेँ रमकबैत रहै, तँए अभय जकाँ रहए। जहि‍ना शि‍क्षक नरम बोलीमे पुछलखि‍न तहि‍ना पपुओ असथि‍रसँ बाजल- “सर, ताड़ी नै दूध पीने छी। अहीं ने चारि‍ सए ग्राम दूध प्रति‍दि‍नक हि‍सावसँ कहने छि‍ऐ। तेतबे पीलौं।” सोझहा-सोझही झूठ सुनि‍ मास्‍टर साहैब बि‍गड़लखि‍न नै। सुधारि‍ कऽ सोचए लगला जे ताड़ी तँ जरूर पीने अछि‍, तैपर सँ ताड़ीकेँ दूध कहैए! एही गुनधुनमे सरजी रहथि‍। ताबे बि‍च्‍चेमे वि‍द्यार्थी दि‍ससँ एक गोटे बाजल- “मुँह महकै छै?” मुदा वि‍द्यार्थीक झुण्‍ड एक दि‍स देखि‍ पपुआक मनमे उठलै, एका-दूकी जवाबसँ काज नै चलत। पचास मुँह झपटि‍ लेत। मुदा तइसँ पहि‍ने जवाब दैत पपुआ बाजल- “बूड़ि‍ कहींकए! फोकड़ाइन नै गमकै छै तँ तड़ि‍याइन महकै छै!” आँखि‍क इशारासँ शि‍क्षक वि‍द्यार्थीकेँ शान्‍त करैत पप्‍पूकेँ पुछलखि‍न- “बौआ पप्‍पू, दूध केकरा कहै छै?” पपुआक मन हल्‍लुक रहबे करै, ठोरेपर बरी पकबए लगल- “सर, ताड़ी दोकान सेहो स्‍कूल छि‍ऐ, ओइ स्‍कूलमे ताड़क दूध कहल जाइ छै।” ओझरीमे ओझराइसँ बँचैत शि‍क्षक कहलखि‍न- “अच्‍छा, जो पहि‍ने ठीकसँ लघी कऽ आबि‍ असथि‍रसँ बैस।” 81म सगर राति‍ दीप जरए-देवघर  स्‍व. मायानन्‍द मि‍श्र तथा जीवकान्‍तक स्‍मृतकेँ समरपि‍त 81म सगर राति‍ दीप जरए केर आयोजन दि‍नांक 22 मार्च 2014केँ श्री ओम प्रकाश झाक संयोजकत्‍वमे संध्‍या 6 बजेसँ देवघरक बम्‍पास टॉनक बि‍जली कोठी-3 मे आयोजि‍त भेल। ओयोजनक उद्घाटन दीप प्रज्‍वलि‍त करि‍ कऽ श्री ओ.पी. मि‍श्राजी केलनि‍। मि‍थि‍लाक गाम-गामसँ आ भारतक शहर-शहरसँ आएल कथाकार, साहि‍त्‍यकार, समालोचक तथा साहि‍त्‍य प्रेमीक कसगर जुटान छल। साँझक पाँचे बजेसँ जुटान हुअ लगल। मि‍डि‍याकर्मीक थहाथही शुरू भऽ गेल। शुभारम्‍भ मंगला चरणसँ श्री एस.के. मि‍श्राजी केलनि‍। झारूदारजी अपन सृजि‍त अनुपम गीत “हम नै छी अहाँ योग यौ पाहुन/ अहाँ छी बड़ा महान/ स्‍वागत स्‍वीकार करू श्रीमान्/ अहाँ छी गंगा अहाँ छी यमुना/ पग धुलसँ पावण भेल अँगना...।” गाबि उपस्‍थि‍त साहि‍त्‍यप्रेमी आ साहि‍त्‍यकारकेँ स्‍वागत केलनि‍। पोथीक लोकार्पण शुरू भेल। गजेन्‍द्र ठाकुरक संग सम्‍पादनमे सम्‍पादि‍त मि‍थि‍लाक पंजी प्रबन्‍ध “जीनाेम मैपिंग भाग- 2” आ “जि‍नीयोलोजि‍कल मैपिंग” 950 एडीसँ 2009 एडी धरि‍क पंजीक लोकार्पण श्री ओम प्रकाश झा, डॉ. योगानन्‍द झा आ श्री राजीव रंजन मि‍श्रा जीक हाथे भेल। शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’जी रचि‍त समालोचनाक पोथी “अंशु” केर लोकार्पण श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री राजदेव मण्‍डल आ श्री बेचन ठाकुरजी केलनि‍। अंग्रेजी-मैथि‍ली शब्‍द कोष भाग-2, “मैथि‍ली-अंग्रेजी कम्‍प्‍यूटर शब्‍दकोष” तथा बेचन ठाकुरक “ऊँच-नीच” नाटकक लोकार्पण सेहो भेल। दू शब्‍दक कड़ीमे प्रवेश केलौं। ओ.पी.मि‍श्रा, दि‍लीप दास, ओम प्रकाश झा, दैनि‍क समाचार पत्र प्रभात खबर केर सम्‍पादक श्री सशील भारती मैथि‍लीक दशा दि‍सापर अपन वि‍चार प्रकट केलनि‍। ओ कहलनि-‍ “अही तरहक आयोजन मैथि‍लीक सम्‍पूर्ण वि‍कासक मार्ग सहज बनौत।” आयोजककेँ धन्‍यवाद ज्ञापन करैत एक-सँ-एक साहि‍त्‍यकार अपन मनक खुलता बात मैथि‍ली वि‍कास लेल स्‍वतंत्रा पूर्वक मंचपर रखलनि‍। मुख्‍य अति‍थि‍ ओ.पी. मि‍श्राजी सेहो एकटा सुन्‍दर गीत गाबि‍ स्‍वागतक भाव प्रकट केलनि‍। राजीव रंजनजी स्‍वलि‍खि‍त गजल गाबि‍ अपन भाव प्रकट केलनि‍। सगर राति‍ दीप जरए (सभ अज्ञानीमे ज्ञानक दीप जरौ) कथायात्राक मादे श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक वि‍चार बकतनक संग लि‍खतनमे सेहो वि‍स्‍तारपूर्वक आएल। दू पि‍ट्ठा कागत हाथे-हाथ बाँटल गेल। जे ऐ लिंकपर उपलब्‍ध अछि‍- http://maithili-samalochna.blogspot.in/…/…/blog-post_24.html 34 गोट लघुकथा/वि‍हनि‍ कथाक पाठ भेल। सात पालीमे बाँटि‍ सभ कथाक पाठ करौल गेल। अंति‍म पाली छोड़ि‍ छबो पालीमे पठि‍त कथापर तीन गोट समीक्षकक समीक्षा अबैत रहल आ समीक्षाक समीक्षा सेहो होइत रहल। समीक्षाक समीक्षा केनि‍हार सभ छला राजदेव मण्‍डल, नन्‍द वि‍लास राय, भाष्‍कर झा, उमेश मण्‍डल, चन्‍दन झा, डॉ. धनाकर ठाकुर, बि‍पीन कुमार कर्ण इत्‍यादि‍। प्रति‍समीक्षाक क्रममे एक गोट वि‍चारणीय टि‍प्पणी आएल। ओ छल, युवा समीक्षकक। अपन वि‍चार व्‍यक्‍त करैत कहलखि‍न- “समसामयि‍क कथाक गहराइकेँ आधुनि‍क पाठक स्‍वागत नै करए चाहैए। से ई कथाक दोष भेल। फलस्‍वरूप पाठकक अभाव अछि‍।” संचालक गजेन्‍द्र ठाकुरजी ऐ वि‍चारपर असहमति‍ जँतौलनि‍। कहलखि‍न- “ई तँ भाषाक वि‍शेषता छि‍ऐ जे कथानककेँ गहराइ प्रदान करै छै। जेकर अभाव मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ पाठक वि‍हि‍न केने रहल।” ऐ तथ्‍यकेँ सत्‍यापि‍त करैत ठाकुरजी आइसलैण्‍डक भाषाक जि‍कि‍र केलनि‍। दू सत्रक पछाति‍ भोजनावकाश भेल। मि‍थि‍लाक खान-पानक आधुनि‍क रूप अकति‍यार केने छला आयोजक। करीब 125 गोटे एक पाँति‍मे बैस भोजन केलनि‍। ऐ तरहक समायोजनसँ हुनका मुँहक रोहानी फुलाएल गुलाबक फूल सन देखबामे आएल। बारीक सभ फुदैक-फुदैक अपन-अपन जि‍म्‍माकेँ जीतैत खेलाड़ी जकाँ निर्वहन करैत देखल गेला। भोजनक घंटा भरि‍ पछाति पुन: अगि‍ला सत्रक यात्रा शुरू भेल। पठि‍त कथापर समीक्षा हेतु वि‍शेष सुि‍वधा प्रदान कएल गेल छल। ओइ ई जे जँ समीक्षक पठि‍त कथाकेँ कोनो कारणे धि‍यानसँ नै सुनि‍ पबथि‍ तँ हुनका लेल कथाक पाण्‍डुलि‍पि‍ उपलब्‍ध करौल जाइ छल। संचालकक कहब रहनि‍ जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे समीक्षाक स्‍थि‍ति‍ उमदा नै अछि‍। ऐपर श्री अरवि‍न्‍द ठाकुर असहमति‍ व्‍यक्‍त केलनि‍। ओ कहलनि‍- “सगर राि‍तक अलि‍खि‍त नि‍अम रहल अछि‍ जे समीक्षापर समीक्षासँ गोष्‍ठीमे वि‍वाद बढ़ि‍ सकैए तँए एहेन कार्यसँ बँचक चाही।”  सम्‍पूर्ण कार्यक्रमक लाइव प्रसारण कएल गेल। सगर राति‍क इति‍हासक पन्नामे ई एक गोट अनुपम कार्य सि‍द्ध हएत। सम्‍पूर्ण कार्यक्रमक वि‍डिओ यू-ट्यूबपर उपलब्‍ध करौल जाएत तेकरो बेवस्‍था आयोजक केने छला। मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ पूर्णत: इलेक्‍ट्रॉनि‍क स्‍पोर्ट भेटौ ऐ हेतु आयोजक प्रति‍वद्ध छला। अगि‍ला गोष्‍ठी हेतु दू गोट प्रस्‍ताव आएल। बहुसंख्‍यक साहि‍त्‍यकारक वि‍चारकेँ आगू बढ़बैत अध्‍यक्ष श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल भावी संयोजककेँ दीप आ उपस्‍थि‍ति‍ पुस्‍ति‍का हश्‍तगत करौलनि‍। 31 मई 2014केँ मधुबनी जि‍लाक मेंहथ गाममे 82म कथा गोष्‍ठी हेतु भावी संयोजक श्री गजेन्‍द्र ठाकुर समगर्दा हकार दऽ सभकेँ आमंत्रि‍त करैत कहलखि‍न- बालकथापर केन्‍द्रि‍त अगि‍ला गोष्‍ठी आयोजि‍त हएत।” अंतमे संयोजक श्री ओम प्रकाश झा आयोजक धन्‍यवाद ज्ञापन केलनि‍। 81म सगर राति‍ दीप जरए- देवघरमे सुसम्‍पन्न भेल 82म कथा गोष्‍ठी मेंहथमे होएत मायानन्‍द मि‍श्र जीवकान्‍त स्‍मृति‍-सगर राति‍ दीप जरए केर 81म कथा गोष्‍ठी– देवघर (झारखण्‍ड) संयोजक- ओम प्रकाश झा उद्घाटन सत्र- दीप प्रज्‍वलन- श्री ओ.पी. मि‍श्रा एवं समस्‍त कथाकार  संचालन- ओम प्रकाश झा लोकार्पण सत्र- अध्‍यक्ष- जगदीश प्रसाद मण्‍डल मुख्‍य अति‍थि‍- श्री ओ.पी. झा आ श्री गजेन्‍द्र ठाकुर संचालक- उमेश मण्‍डल दू शब्‍द- 1. ओ.पी. झा, अवकाश प्राप्‍त अभि‍यंता- झारखण्‍ड सरकार  2. सुशील भारती, संपादक, प्रभात खबर हि‍न्‍दी दैनि‍क। 3. दि‍लीप दास 4. ओम प्रकाश झा 5. मिथि‍लेश कुमार  6. जगदीश प्रसाद मण्‍डल कथा सत्र- अध्‍यक्ष- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, वरि‍ष्‍ठ साहि‍त्‍यकार मंच संचालक- श्री गजेन्‍द्र ठाकुर, संपादक, ‘वि‍देह’ इण्‍टरनेशनल ई-जनरल पहि‍ल सत्रमे पठि‍त कथा एवं कथाकार- असली हीरा- श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल (निर्मली) रि‍क्‍शाक भाड़ा आ बुधि‍ए बताह- श्रभ्‍ फागुलाल साहु (सखुआ) बुढ़ि‍या मैया- ओम प्रकाश झा (भागलपुर) केते बेर- उमेश मण्‍डल (निर्मली) समीक्षक- योगानन्‍द झा राजदेव मण्‍डल अरवि‍न्‍द ठाकुर प्रमोद कुमार झा समीक्षाक समीक्षक नन्‍द वि‍लास राय चन्‍दन झा धनाकर ठाकुर दोसर सत्र- सभसँ बड़का भी.आई.पी. गेष्‍ट- श्री नन्‍द वि‍लास राय (भपटि‍याही) डरक डंका- श्री राजदेव मण्‍डल (मुसहरनि‍याँ) ई छी हमर मजबूरी आ इमानदारीक पाठ- श्री राम वि‍लास साहु (लक्ष्‍मि‍नि‍याँ) अप्‍पन माए-बाप- श्री ललन कुमार कामत (ललमनि‍याँ) तेसर सत्र- छि‍न्ना-झपटी- श्री शि‍व कुमार मि‍श्र (बेरमा) बड़का मोछ- श्री कपि‍लेश्वर राउत (बेरमा) उतेढ़क श्राद्ध- श्री शम्‍भू सौरभ (बैका) जाति‍क भोज- श्री उमेश पासवान (औरहा) चारि‍म सत्र- गुरुदक्षि‍णा- डाॅ. योगानन्‍द झा (कबि‍लपुर) अपराध- श्री पंकज सत्‍यम् (मधुबनी लगक) ककर चरवाही आ चुनावधर्मी लोक- डॉ. उमेश नारायण कर्ण कबाउछ- डॉ. धनाकर ठाकुर पाँचम सत्र- आन्‍हर- श्री अखि‍लेश कुमार मण्‍डल (बेरमा) सरकारीए नौकरी कि‍एक- बि‍पीन कुमार कर्ण (रेवाड़ी) बनमानुष आ मनुष- डाॅ. शि‍वकुमार प्रसाद (सि‍मरा) वृधापेंसन आ मजबुरी- श्री शारदानन्‍द सि‍ंह पानि‍- श्री बेचन ठाकुर छअम सत्र- सत्ता-चरि‍त- श्री अरवि‍न्‍द ठाकुर (सुपौल) बापक प्राण- श्री भाष्‍करानन्‍द झा भाष्‍कर (कोलकाता)  संबोधन- श्री चन्‍दन कुमार झा (कोलकाता) ठीका- श्री आमोद कुमार झा चौठि‍या- श्री अच्‍छेलाल शास्‍त्री (सोनवर्षा) सातम सत्र- तखन, जखन- श्री गजेन्‍द्र ठाकुर (दि‍ल्‍ली) चैन-बेचैन- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल (बेरमा) ऐ तरहेँ देवघरक गोष्‍ठीमे कुल कथाकारक संख्‍या 29 छल। 34 गोट कथाक पाठ भेल। मैथि‍ली : सरकार आ हम सभ मि‍थि‍लांचल वि‍कास परि‍षद्क अध्‍यक्ष, डॉ. वि‍द्यानाथ झा, कार्यकारी अध्‍यक्ष, डाॅ. गोपाल प्रसाद सिंहजी। साक्षर दरभंगाक अध्‍यक्ष, श्री राम नरेश साहु ‘निर्मोही’ एवं महासचि‍व, श्री अशोक कुमार चौधरीजी। मि‍थि‍ला संघर्ष समि‍तिक कार्यकारी अध्‍यक्ष, श्री शि‍वली नोमानी एवं महासचि‍व, श्री शंकार यादवजी। संयोजक- आदरणीय श्री कमलेश झाजी। मंचासीन वि‍द्वतजन। अखि‍ल भारतीय साहि‍त्‍य परि‍षद् प्रांगणमे उपस्‍थि‍त‍ चि‍न्‍तक श्रोता, मि‍थि‍ला-मैथि‍ली वि‍कास प्रेमी। माए-बहि‍न। भाय-बन्‍धु तथा मि‍डि‍याकर्मी। आइ ऐ शुभ पहरमे “मैथि‍ली : सरकार आ हमसभ” सन वि‍षयपर अपने लोकनि‍क बीच दू शब्‍द वि‍चार करबाक अवसरि‍ पाबि‍ हम अपनाकेँ सौभाग्‍यशाली बुझै छी। मैथि‍ली- मैथि‍ली एक ओहन भाषाक नाओं छी जइ भाषाक अपन जमीन कोनो आन भारतीय भाषा साहि‍त्‍यक जमीनसँ कम नै। ईहो बात अछि‍ए‍ जे बहुतो भाषासँ मैथि‍लीकेँ तुलनो योग्‍य बूझब, उचि‍त नै बुझना जाइत अछि। तहि‍ना ईहो बात अछि‍ए जे दुनि‍याँक साहि‍त्‍यक चि‍न्‍तनक बीच मि‍थि‍लाक आध्‍यात्‍मि‍क चि‍न्‍तन अग्रि‍म पाँति‍मे अछि‍ जे दुनि‍याँक नजरि‍मे आइओ अछि‍। ई बात अलग जे डि‍बि‍याक पेनमे अपना सभ सभ दि‍नसँ रहलौं। ईजोतमे जे कि‍यो रहबो केला आकि‍ छथि‍ओ आे कखनो इजोतक मतलब इजोत आ कखनो इजोतक मतलब ज्ञान कहि‍ भकमोड़मे फँसबैत अपनो फँसल छथि‍। सरकार- अपनासँ उगारे नै...बला स्‍थि‍ति‍मे अपन सद्य: परि‍चए आइए नै सभ दि‍नसँ दैत रहल। खएर जे कि‍छु...। हमसभ- संघर्ष छोड़ि‍ हाथ-पएर मोड़ि‍ थुसकुनि‍याँ मारि‍ बैसल रही सेहो बात नै। अपन मैथि‍ली साहि‍त्‍य माने मि‍थि‍लाक सामुहि‍क वि‍कास लेल हमसभ सतत् संघर्षशील रही तइ आग्रहक संग हम स्‍वयंकेँ वचनवद्ध करै छी। तखनि‍ तँ बात ओतए आबि‍ जाइत अछि‍ अपना-अपनी, देहा-देही। तइले हम सभ पहि‍ने अपनाकेँ वचनवद्ध करी जे आपसीसँ लऽ कऽ सामुहि‍क स्‍थल धरिक भाषाक माध्‍यम‍ मैथि‍लीमे करी। तैकाल हम सभ अपनाकेँ थोड़े कात करैत वि‍भि‍न्न तरहक परि‍चए दैत पबै छी। सरकारो अपने खेल खेलाइत रहल अछि‍। हमहूँ सभ कम खेलाड़ नै जे अष्‍टम अनुसूचि‍मे मैथि‍लीक स्‍थान लेल संघर्षरत् लोक सबहक जे कइएक बेर जहलक हाबा खेलक तेकरा बि‍सरि‍ सुवि‍धा अनुसार गपक मि‍लानी करैत रहै छी। जरूरति‍ अछि‍, संघर्ष सतति‍ बनल रहए तइले तेकर वैज्ञानि‍क अध्‍ययन करब आवश्‍यक अछि‍। ओइपर अपनाकेँ चलाएब। जेतबो सुवि‍धा भेटल अछि‍ तेकर उपयोग करब। तैकालमे हम सभ भातेपर भात करए लगै छी। भुखाएलकेँ भुखाएल नै बूझि‍ दान-पून करए लगै छी। जइ कारण, आध्‍यात्‍मि‍क चि‍न्‍तन खाली गप्‍पे बनि‍ कऽ रहि‍ जाइए। एक तँ ओहुना मनुख-मनुखकेँ बाँटि‍ सरकार अपन रोटी सकै पाछू बेहाल अछि‍। तैपर हमहूँ सभ रंग-बि‍रंगक तराजू बना एक्के चीजकेँ एक आदमी अदहा सेर तँ एक आदमी सबा सेर कहैत एकटा अलगे बखेरा ठाढ़ केने छी। जे सरकारो देखैए। सरकार मानै कथी? एक-एक आदमी। आम आदमी। आम आदमी माने अपना नै? अपने सभ! जरूरति‍ अछि‍ हमरा लोकनि‍केँ पहि‍ने अपनामे सम्‍बन्‍ध मजगूत बनए आ तेकर वास्‍तवि‍क रूप केहेन अछि‍ आ से केहेन तन्नुक अछि‍ आकि‍ सक्कत से अनुभव भाइए रहल अछि‍। एक तँ अहुना एक आदमीक आठ घंटाक मेहनति‍ दोसर आदमीक बैसारीसँ कम पड़ि‍ रहल अछि।‍ तैठाम केतेक सहचेतीक खगता अछि‍ ओ स्‍वयं सोचल जा सकैए। औहुना हम सभ अपनो गामक पुल-पुलि‍या बनबैमे दू-नम्‍बर सि‍मेंट तकै पाछू लगल रही छी। तहि‍ना भाषा-साहि‍त्‍य, पत्र-पत्रि‍काक स्‍थि‍ति‍ अछि‍। जि‍नके हाथ जएह पड़ैए तहीमे अपन-अपन परि‍चए दऽ दऽ ठाढ़ छी। अगि‍ला यात्रा लेल सुन्‍दर-सुन्‍दर बात कहि‍ नम्‍हर प्‍लान लऽ लऽ चि‍चि‍या रहल छी। जरूरति‍ अछि‍ आपसी बि‍सवास केना बनत तैपर सोचैक। अपना पहि‍ने चि‍नी खेनाइ छोड़ि‍ जखनि‍ दोसरकेँ मनाही करब तखने कारगर हएत...। ऐ बातपर धि‍यान हमरा सभकेँ दि‍अ पड़त। सुनि‍हार आ कहनि‍हार दुनूक बीच जे एकटा तेसर यथार्थ काज करैत रहल अछि‍। तेकरा चि‍न्हब जरूरी अछि‍। आजुक ऐ मंचसँ जे सम्‍मान समारोह रहल ओ जरूर तइ दि‍शामे वि‍चारणीय-वि‍श्वनीय रहल। मुदा जरूरति‍ अछि‍ अहूसँ आगू बढ़बाक आ तइले सभसँ पहि‍ने हम सभ ओहन उदेस बनाबी जे सर्वकल्‍याणकारी हुअए। सर्व कल्‍याणक माने ई जे सबहक आवश्‍यकताकेँ धि‍यानमे रखि‍ काज करब। तखने सभकेँ बि‍सवासमे लेल जा सकैत अछि‍। जाधरि‍ हम सभ एकठीम नै हएब, ताधरि‍ शक्‍ति‍ केना औत?एकठीम भेनाइमे सेहो केतेक रंगक समस्‍या  अछि‍। जेतबे भारी अछि‍ ओतबे हल्‍लूक सेहो अछि‍। हल्‍लूक ई अछि‍ जे एक वि‍चार करब। बजैले तँ सभ बजि‍ते छी जे मि‍थि‍ला-मैथि‍लीक वि‍कास चाहै छी। तँए हल्‍लूको अछि‍ए। मुदा मूसो तँ हराएले अछि! कोइ काहू मगन तँ कोइ काहू मगन। मुदा अपनो अपनो तँ भार अछि‍ए। से अपन-अपन भारक इमनदारीसँ संपादन करी, तेकर जरूरति‍ अछि‍। सेवा तँ सेवे होइए। मुदा की पछुआएलक सेवा आ अगुआएलक सेवाकेँ एक्के कहल जाए? की आवश्‍यक्‍ता आ आवश्‍यक आवश्‍यक्‍ताकेँ एक्के कहल जाए। फर्क एतए आबि‍ कऽ भऽ जाइए। एक-दोसरमे एतेक खाधि‍ कि‍एक बनल अछि‍। एक-दोसराक बीच सम्‍बन्‍ध कि‍एक एतेक कमजोर अछि‍। कि‍एक एक-दोसरपर भरोष कमि‍ रहल अछि‍। बि‍सवास नै कि‍एक भऽ रहलै हेन। तेकरो कारण अछि‍। कारण ई अछि‍ जे सभ सभकेँ ठकै पाछू लगल रहै छी। नै तँ अपनापनक भावमे कमी कि‍एक?नि‍श्चि‍त रूपे सार्वजनि‍क संस्‍था सभ सार्वजनि‍क रहि‍तो सार्वजनि‍क नै बुझना जाइए। माने ओहन-ओहन काज करैत रहल अछि‍ जे तइसँ अलग परि‍चए बना हमरा सबहक बीच अछि‍। कखनोकाल लोक स्‍वयं गलती करै छथि‍ आ बेसीकाल ओहन गलती भऽ जाइए जे बेवस्‍था करबैपर मजबूर सेहो करै छै। तेकरा सभकेँ चि‍न्‍हि‍त करब जरूरी अछि‍। तखने हम सभ हमसभ दि‍स बढ़ि‍ पएब। हमसभ आ बि‍हार सरकार। सरकार तँ पटनामे अछि‍। समस्‍या दरभंगो आ आनो-आनो जगहमे अछि‍। बहुत एहेन समस्‍या अछि‍ जेकरा हम सभ उठबै बैसबै छी। दोसर बात, दरभंगा अकासवाणी आकि‍ पत्र-पत्रि‍काक जे बेवहार अछि‍ ओकरा हमरे सभकेँ देखए पड़त। आइएक ऐ कार्यक्रमक समाचार अकासवाणी दरभंगा द्वारा दू दि‍न पहि‍ने प्रसारि‍त कएल गेल जइमे इत्‍यादि‍ कवि‍क रूपमे झारूदार जीकेँ कहल गेलनि‍। झारूदारजी उपस्‍थि‍त छथि‍। कहि‍यो ई स्‍वयं अपन रचना लऽ सम्‍बन्‍धि‍ जगहपर पहुँचल छला। हलाँकी झारूदारजी रचना कार्यक्रम नै लेल गेलनि‍। हि‍नका टाड़ि‍ देलकनि‍। तइ पाछू आनो-आनो कारण भेल होएत जे यथोचि‍त सेहो भऽ सकैए। मुदा ईहो तँ भेबे कएल जे आेइमे ई अपनाकेँ अपन नहि‍योँ बूझि‍ सकल हेता। झारूदारजी स्‍वयं बाजल छला- “मन तँ भेल रहए जे चारि‍-पाँचटा झारू लि‍खि‍ दरभंगा अकासवाणीक देबालपर साटि‍ दि‍ऐ!” साइत गोवि‍न्‍दे झा कहने छथि‍न जे भोजपुरीकेँ वि‍द्यापति‍ आ मैथि‍लीकेँ भि‍खारी ठाकुर जनु नै भेट पेतै। भोजपुरीकेँ वि‍द्यापति‍ भेटौ आकि‍ नै मुदा मैथि‍लीकेँ भि‍खारी ठाकुर भेट गेल अछि‍, श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल “झारूदार”। दरभंगा अकासवाणीसँ तँ हमरा सभकेँ कोनो आश नहि‍येँ अछि‍। तइले भुरुकबा एफ-एम अछि‍। मुदा तैयो जौं “हमसभ” काज करैले डेग उठा रहल छी‍ तँ से सचमुच प्रशंस्‍णीय अछि‍। जहि‍ना कोनो बच्‍चाकेँ एकटा पेन मंगला पछाति‍ जौं ओकरा खाली संतोख बन्‍हैले कहल जाए से, आ परि‍स्‍थि‍ति‍वश करचीओक बनौल लेखनीक प्रवन्‍ध कऽ देलापर परहक संतोखक चाह करने नीक खाली संतोषसँ नीक करचीक पेन नीक भऽ जाइए, तहि‍ना हमसभ गपक बाट छोड़ि‍ काजक रस्‍ता पकड़ि‍ चली तँ से कल्‍याणकारी बुझाइए। साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा प्रसारि‍त कार्यक्रम मात्र मैथि‍लीए साहि‍त्‍य लेल नै अछि‍, आनो-आन जनू 24 भाषा-साहि‍त्‍यक वि‍कासक लेल अछि‍। कनी कम आकि‍ कनी बेसी खर्च तँ होइते अछि‍। मुदा से मैथि‍ली वि‍कासक लेल साहि‍त्‍य अकादेमीक केते सदुपयोग होइत आबि‍ रहल अछि‍? हमसभ तैपर केतेक वि‍चार करह छी जे हमरे सभ द्वारा संचालि‍त भऽ रहल अछि‍। अपना हाथक काज अछि‍। तैकाल हम-हम आ तूँ-तूँ भऽ जाइए। जाधरि‍ “हमलोग-तुमलोग”बला मानसि‍ता हमरा सभमे रहत ताधरि‍ सभ कल्‍पना लोक रहबे करत। मुदा जीवनमे ईहो समए तँ एबे करैए जखनि‍ लोकक मुँहसँ स्‍वत: नि‍कलए लगै छै- “थाकल पाव पलान भेल भारी आब की लादबो हौ वेपारी।” 80म सगर राति‍ दीप जरय'' निर्मलीमे 45 गोट पोथीक लोकार्पण- २८म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी

45 गोट पोथीक लोकार्पण बाल निबंध-

1. देवीजी (ज्योती झा चौधरी) कवि‍ राजदेव मण्डल

वि‍वि‍धा-

1. कुरुक्षेत्रम अन्तर्मनक- (गजेन्द्र ठाकुर) डॉ. बचेश्वर झा

शब्द.कोष-

1. अंग्रजी-मैथि‍ली शब्दकोष- (गजेन्द्र ठाकुर) डॉ. रामाशीष सिंह 2. मैथि‍ली-अंग्रेजी शब्दकोष भाग-१- (गजेन्द्र ठाकुर) डॉ. अशोक अवि‍चल वि‍हनि‍ कथा संग्रह- 1. बजन्ता-बुझन्ता (जगदीश प्रसाद मण्डाल) अनुमण्‍डलाधि‍कारी अरूण कुमार सिंह 2. तरेगन- दोसर संस्करण (जगदीश प्रसाद मण्डल)- वि‍धायक सतीश साह

लघु कथा संग्रह- 1. सखारी-पेटारी (नन्द वि‍लास राय) डॉ. शि‍वकुमार प्रसाद 2. उलबा चाउर (जगदीश प्रसाद मण्डल) वि‍नोद कुमार ‘वि‍कल’ 3. अर्द्धांगि‍नी (जगदीश प्रसाद मण्डल) दुर्गानन्द मण्डल 4. सतभैंया पोखरि‍ (जगदीश प्रसाद मण्डल) प्रो. जयप्रकाश साह 5. भकमोड़ (जगदीश प्रसाद मण्डल) फागुलाल साहु

दीर्घ कथा संग्रह-

1. शंभुदास (जगदीश प्रसाद मण्डल) सदरे आलम गौहर

कवि‍ता संग्रह-

1. बसुन्धरा (राजदेव मण्‍डल) गजलकार ओम प्रकाश झा 2. राति‍-दि‍न (जगदीश प्रसाद मण्डल) रामजी प्रसाद मण्डल 3. रथक चक्का उलटि‍ चलै बाट (रामवि‍लास साहु) नाटककार बेचन ठाकुर 4. नि‍श्तुकी दोसर संस्‍करण (उमेश मण्डल) जनकवि‍ रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ 5. इन्द्र्धनुषी अकास (जगदीश प्रसाद मण्डल) पत्रकार राम लखन यादव 6. प्रतीक (मनोज कुमार कर्ण मुन्नाजी) अधि‍वक्‍ता वीरेन्द्र कुमार यादव

गजल संग्रह-

1. कियो बूझि‍ नै सकल हमरा (ओम प्रकाश झा) साहि‍त्‍यकार जगदीश प्रसाद मण्डल 2. माँझ आंगनमे कति‍याएल छी (मनोज कुमार कर्ण मुन्नाजी) गायक रामवि‍लास यादव 3. मोनक बात (चन्दन कुमार झा) डॉ. शि‍वकुमार प्रसाद 4. अंशु (अमि‍त मि‍श्र) कथाकार कपि‍लेश्वर राउत

गीत संग्रह-

1. गीतांजलि‍ (जगदीश प्रसाद मण्डल) अमीत मि‍श्र 2. तीन जेठ एगारहम माघ (जगदीश प्रसाद मण्डल) चन्दन कुमार झा 3. सरि‍ता (जगदीश प्रसाद मण्डल) बालमुकुन्द 4. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ (जगदीश प्रसाद मण्डल) बि‍पीन कुमार कर्ण 5. हमरा बि‍नु जगत सुन्ना छै (रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’) अधि‍वक्‍ता मनोज कुमार बि‍हारी 6. क्षणप्रभा- (शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्लू‘’) राजाराम यादव

अनुवाद साहि‍त्य-

1. पाखलो (उपन्यास (कोंकणीसँ हि‍न्दी सेवी फर्णांडि‍स एवं शंभु कुमार सिंह तथा हि‍न्दी‍सँ मैथि‍ली शंभु कुमार सिंह- कवि‍ शंभु सौरभ

नाटक-

1. रि‍हर्सल (रवि‍ भूषण पाठक) कवि‍ राम वि‍लास साफी 2. बि‍सवासघात (बेचन ठाकुर) बाल गोवि‍न्द यादव ‘गोवि‍न्दाचार्य’ 3. बाप भेल पि‍त्ती आ अधि‍कार (बेचन ठाकुर) कवि‍ रामवि‍लास साहु 4. रत्नाकार डकैत (जगदीश प्रसाद मण्डल) कि‍शलय कृष्ण 5. स्वयंवर (जगदीश प्रसाद मण्डल) कवि‍ शंभु सौरभ 6. पंचवटी एकांकी संचयन- (जगदीश प्रसाद मण्डल) उपन्‍यासकार राजदेव मण्डल 7. कम्‍प्रोमाइज- (जगदीश प्रसाद मण्डल) कथाकार राम प्रवेश मण्डल 8. झमेलि‍या बि‍आह (जगदीश प्रसाद मण्डल) अधि‍वक्‍ता वीरेन्द्र् कुमार यादव

उपन्यास

1. हमर टोल (राजदेव मण्डल) कवि‍ हेम नारायण साहु 2. जीवन संघर्ष (दोसर संस्करण) जगदीश प्रसाद मण्डाल) नारायण यादव 3. बड़की बहि‍न (जगदीश प्रसाद मण्डल) कवि‍ शारदा नन्द सिंह 4. जीवन-मरण (दोसर संस्करण) (जगदीश प्रसाद मण्डल) डाकबाबू छजना 5. नै धाड़ैए (बाल उपन्यास, जगदीश प्रसाद मण्डल) गुरुदयाल भ्रमर 6.सहस्रबाढ़नि‍ (ब्रेल लि‍पि‍) गजेन्द्र ठाकुर- शि‍क्षक मनोज कुमार राम

बायोग्राफी-

1. जगदीश प्रसाद मण्डल एकटा वायोग्राफी- (गजेन्द्र ठाकुर) कवि‍ उमेश पासवान बाल साहि‍त्‍य (संस्‍मरण)- 1.मध्य प्रदेश यात्रा (ज्योति‍ झा चौधरी) कथाकार नन्द वि‍लास राय 80म कथा गोष्ठी “कथा मि‍लन सदाय-सगर राति‍ दीप जरय” निर्मलीमे पठि‍त कथा एवं कथाकारक नाओं- 1. जीवपर दया करी- पल्लवी कुमारी 2. स्पेशल परमीट- ओम प्रकश झा 3. ढेपमारा गोसाँइ- ओम प्रकाश झा 4. ओ स्त्री - सदरे आलम गौहर 5. बाल अधि‍कार- नारायण झा 6. मांग- अमि‍त मि‍श्र 7. नवतुरि‍या- अमि‍त मि‍श्र 8. जनता लेल- अमि‍त मि‍श्र 9. थ्रीजी- मुकुन्द मयंक 10. पढ़ाइ आ खेती- बि‍पीन कुमार कर्ण 11. बदरि‍या मूसक घर- उमेश पासवान 12. अपन घर- लक्ष्मी दास 13. मि‍त्र- नारायण यादव 14. प्रेम एगो अचम्भा - बाल मुकुन्द पाठक 15. भगवानक पूजा- संजय कुमार मण्डल 16. वि‍पन्नता- पंकज सत्‍यम 17. गौतमक अहि‍ल्या-- दुखन प्रसाद यादव 18. तरकारीक चोर- ललन कुमार कामत 19. व्यंग्य- मि‍थि‍लेश कुमार व्यास 20. खेनि‍हारक लेखा- चंदन कुमार झा 21. चाहबला- कपि‍लेश्वर राउत 22. बि‍लाइ रस्ता काटि‍ देलक- राम वि‍लास साहु 23. भैरवी- रौशन कुमार झा 24. संदेह- शारदा नन्द सिंह 25. अंधवि‍श्वास- शम्भू सौरभ 26. डीजे ट्रोली- बेचन ठाकुर 27. मुखि‍याजी सँ मंत्री धरि‍ एक्के रंग- दुर्गा नन्द ठाकुर 28. कारागार- कि‍शलय कृष्ण 29. पैघ लोक के?- नन्द वि‍लास राय 30. पेंच-पाँच- शि‍व कुमार मि‍श्र 31. महेशबाबूक चौकपर एकदि‍न- गौड़ी शंकर साह 32. परि‍वर्त्तन- राजदेव मण्डल 33. एकघाप जमीन- जगदीश प्रसाद मण्डल 34. गइ बुढ़ि‍या हम बड़ बि‍हर छी- डॉ. शि‍व कुमार प्रसाद 35. भीखमंगा- डॉ. अशोक अवि‍चल

मिथिलांचलक प्रसिद्ध साहित्यिक मंच “सगर राति‍ दीप जरय” केर 80म आयोजन जे निर्मली (सुपौल)मे स्थानीय कलाकार स्व. मि‍लन सदाय केर नाओंपर आयोजित छल तइ कथा गोष्ठीमे जे समीक्षक-आलोचक सभ पठि‍त कथापर समीक्षा केने रहथि‍, आलोचना केने रहथि‍ से सूची निम्न अछि‍- डॉ. शिव कुमार प्रसाद ओम प्रकाश झा राजदेव मण्डल जगदीश प्रसाद मण्डल डॉ. अशोक अवि‍चल डॉ. रामाशीष सिंह उमेश पासवान चन्दन कुमार झा राम वि‍लास साहु फागुलाल साहु पंकज सत्यम् किशलय कृष्ण शंभु सौरभ कपिलेश्वर राउत बाल गोवि‍न्द यादव गोवि‍न्दा‍चार्य वीरेन्द्र कुमार यादव राम वि‍लास साफी शि‍व कुमार मि‍श्र दुर्गानन्द मण्डल नारायण यादव संजय कुमार मण्‍डल राम प्रवेश मण्डल नारायण यादव बालमुकुन्द पाठक बेचन ठाकुर दुर्गानन्द ठाकुर शारदा नन्द सिंह २८ म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी दि‍नांक ३० नवम्बर २०१३ संध्‍या 6.30 बजेसँ शुरू भऽ ०१ दिसम्बर २०१३ भि‍नसर 6 बजे धरि‍ ८०म म सगर राति दीप जरय"क (उमेश मण्डलक संयोजकत्‍वमे निर्मली (जिला सुपौल) अवसरपर सम्पन्न। वि‍देह द्वारा मैथि‍ली पोथी प्रदर्शनी 1. ‘वि‍देह’क पहि‍ल मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 27/09/2009 स्‍थान- नई दि‍ल्‍ली स्‍थि‍त श्रीराम सेन्‍टरक प्रेक्षागृहमे। अवसर- ‘जल डमरू बाजे’ नाटक-मंचन। 2. ‘वि‍देह’क दोसर मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 03/04/2011 स्‍थान- रामानन्‍द युवा कलव, जनकपुरधाम, नेपाल। अवसर- ‘सगर राति‍ दीप जरय’क 69म कथा गोष्‍ठी। 3. ‘वि‍देह’क तेसर मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 12/06/2010 स्‍थान- कवि‍लपुर लहेरि‍यासराय, दरभंगा। अवसर- ‘सगर राति‍ दीप जरय’ 70म कथा गोष्‍ठी। 4. ‘वि‍देह’क 4म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 02/10/2010 स्‍थान- बेरमा (तमुि‍रया) जि‍ला- मधुबनी। अवसर- सगर राति‍ दीप जरय’क 71म कथा गोष्‍ठी। 5. ‘वि‍देह’क 5म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- दुर्गापूजा-2010 स्‍थान- बेरमा (तमुि‍रया) जि‍ला- मधुबनी। 4 दि‍वसीय प्रदर्शनी। 6. ‘वि‍देह’क 6म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- दुर्गापूजा-2010 स्‍थान- घोघरडीहा (मधुबनी) दुर्गापूजाक मेला परि‍सर। अवसर- दुर्गापूजा-2010 7. ‘वि‍देह’क 7म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- दुर्गापूजा-2010 स्‍थान- हटनी (मधुबनी) दुर्गापूजाक मेला परि‍सर। 8. ‘वि‍देह’क 8म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 04/12/2010 स्‍थान- व्‍यपार संघ भवन, सुपौल। अवसर- सगर राति‍ दीप जरय’क 72म कथा गोष्‍ठी। 9. ‘वि‍देह’क 9म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 05/12/2010 स्‍थान- महि‍षी (सहरसा) अवसर- सगर राति‍ दीप जरय’क 73म कथा गोष्‍ठी। 10. ‘वि‍देह’क 10म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 09/07/2011 स्‍थान- अशर्फीदास साहु समाज महि‍ला इंटर महावि‍द्यालय परि‍सर- नि‍र्मली (सुपौल), अवसर- सामानांतर साहि‍त्‍य अकादमी मैथि‍ली कवि‍ सम्‍मेलन-2011 11. ‘वि‍देह’क 11म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 02 नभम्‍बर 2010 स्‍थान- एस.एम. पब्‍ि‍लक स्‍कूल परि‍सर झि‍टकी-वनगामा (मधुबनी), अवसर- स्‍कूल वार्षिकोत्‍सव। 12. ‘वि‍देह’क 12म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- सरस्‍वतीपूजा- 2011 स्‍थान- चनौरागंज (मधुबनी) अवसर- सरस्‍वतीपूजा नाट्य उत्‍सव- 2011 13. ‘वि‍देह’क 13म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 10/09/2011 स्‍थान- हजारीबाग (झारखण्‍ड), अवसर- सगर राति‍ दीप जरय’क 74म कथा गोष्‍ठी। 14. ‘वि‍देह’क 14म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- दुर्गापूजा-2011 स्‍थान- बेरमा (मधुबनी) 4 दि‍वसीय प्रदर्शनी। 15. ‘वि‍देह’क 15म मैथि‍ली पोथी-प्रदर्शनी, दि‍नांक- 02/11/2011 स्‍थान- उच्‍च वि‍द्यालय परि‍सर- खरौआ जि‍ला- मधुबनी। अवसर- महाकवि ‍लालदासक 155म जयन्‍ती समारोह।

16.विदेहक १६म मैथिली पोथी प्रदर्शनी १०-११ दिसम्बर २०११ केँ ७५म सगर राति दीप जरएक अवसरपर ,१० दिसम्बर २०११ केँ साँझ ६ बजेसँ शुरू भेल, स्थान-कॉपरेटिव फेडेरेशन हॉल, निकट म्यूजियम, पटनामे शुरू भेल आ ११ दिसम्बर २०११क भोर ८ बजे धरि चलल। 17.१७म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी:- २२-२४ दिसम्बर २०११ केँ गुवाहाटीमे। २२-२३ दिसम्बर २०११ केँ प्राग्ज्योतिष आइ.टी.ए. सेन्टर, माछखोवा, गुवाहाटी- ७८१००९ (२२ दिसम्बर २०११ केँ ४ बजे अप्राह्णसँ ९ बजे राति धरि आ २३ दिसम्बर २०११ केँ ११ बजे पूर्वाह्णसँ ३ बजे अपराह्ण धरि आ २३ दिसम्बर २०११ केँ फेर ५ बजे अपराह्णसँ देर राति धरि) आ २४ दिसम्बर २०११ केँ भोरसँ राति धरि स्थान- रूम संख्या २१७, होटल ऋतुराज, माछखोवा, गुवाहाटीमे। अवसर मि‍थि‍ला सांस्‍कृति‍क समन्‍वय समि‍ति‍क आयोजि‍त "अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन" आ "आठम मिथिला रत्न सम्मान समारोह" ( २२ दि‍सम्‍बर २०११) आ "वि‍द्यापति स्‍मृति‍ पर्व समारोह" (२३ दि‍सम्‍बर २०११) । १७म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी ग्राहकक आग्रहपर एक दिन लेल (२४ दिसम्बर २०११ केँ ) बढ़ाओल गेल।

18..१८म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी-तिथि १४ जनवरी २०१२ स्‍थान- अशर्फीदास साहु समाज महि‍ला इंटर महावि‍द्यालय परि‍सर- नि‍र्मली (सुपौल), अवसर- समानांतर साहि‍त्‍य अकादमी मैथि‍ली साहित्य उत्सव- सह विदेह सम्मान समारोह (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार) 19.१९म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी- 27 जनवरी 2012 (शुक्र दि‍न), अवसर स्‍थानीय कवि‍ परि‍षद (सलहेसबाबा परि‍सर- औरहा, प्रखण्‍ड- लौकही)क चारि‍म वार्षिकोत्‍सव- 2012 20.२०म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी- जे.एम.एस. कोचिंग सेन्टर , चनौरागंज,झंझारपुर, जिला-मधुबनी, अवसर विदेह नाट्य उत्सव २०१२ दू दिन दिनांक २८.०१.२०१२ आ २९.०१.२०१२ 21. २१म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी (अवसर बीसम नव दिल्ली विश्व पुस्तक मेला २०१२ जखन भारतीय सिनेमाक सए बर्ख, दिल्लीक राजधानी रूपमे सए बर्ख आ रवीन्द्रनाथ टैगोरक १५०म जयन्ती संगे पड़ि रहल अछि, एकर आयोजक रहैत अछि नेशनल बुक ट्रस्ट, भारत, सौजन्य अंतिका प्रकाशन) २५ फरबरी २०१२ सँ ०४ मार्च २०१२,प्रतिदिन भोर ११ बजेसँ ८ बजे राति धरि, स्थान- अंतिका प्रकाशन , स्टाल 80-81, हॉल 11, प्रगति मैदान,२०म नव दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2012 नव दिल्ली। ई विश्व पुस्तक मेला दू सालमे एक बेर होइत अछि आ ४० साल पहिने १९७२ ई. मे एकर पहिल आयोजन भेल छल। 22.२२म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी, वेस्टर्न रेलवे हेडक्वार्टर्स ऑडिटोरियम, मुम्बइ, दिनांक १४ सितम्बर २०१२, अवसर श्रुति प्रकाशनक कार्यक्रम 23.२३म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी २२ अक्टूबर २०१२- २४ अक्टूबर २०१२- बेरमा (भाया तमुरिया), झंझारपुरमे, दुर्गापूजा मेलामे। 24. २४म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी २८ अक्टूबर २०१२ केँ इण्डिया इण्टरनेशनल सेन्टर, लोदी रोड नई दिल्लीमे सायं ६ बजेसँ ०८.३० बजे धरि 25.25 म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी 20 नवम्बर 2012 केँ खरौआ जि‍ला- मधुबनी। अवसर- महाकवि ‍लालदासक 156म जयन्‍ती समारोह। अपराह्न 2 बजेसँ 9 बजे राति धरि 26.26 म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी 01-02 दिसम्बर 2012 केँ दोसर चरणक पहिल "सगर राति दीप जरय"क अवसरपर 01 दिसम्बर 2012 केँ साँझ ६ बजेसँ शुरू भेल, स्थान-दरभंगाक कटहलवाड़ी स्‍थि‍त एम.एम.टी.एम महावि‍द्यालयक प्रेक्षागार-मे शुरू भेल आ 02 दिसम्बर 2012 क भोर ६ बजे धरि चलल। 27. २७ म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी दि‍नांक 15 जून संध्‍या 6.30 बजेसँ शुरू भऽ 16 जूनक भि‍नसर 6 बजे धरि‍79" ७९म सगर राति दीप जरय"क (उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे गाम औरहा (जिला मधुबनी) मे सम्पन्न) अवसरपर। 28.२८ म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी दि‍नांक ३० नवम्बर २०१३ संध्‍या 6.30 बजेसँ शुरू भऽ ०१ दिसम्बर २०१३ भि‍नसर 6 बजे धरि‍ ८०म म सगर राति दीप जरय"क (उमेश मण्डलक संयोजकत्‍वमे निर्मली (जिला सुपौल) मे सम्पन्न) अवसरपर। नन्‍द वि‍लास राय मदन-अमर रमणजी इलाहावाद वि‍श्ववि‍द्यालयमे प्रोफेसर छथि‍। हुनका एक बेटा आ एकटा बेटी छन्‍हि‍। बेटाक नाओं मदन आ बेटीक मीरा रखने छथि‍। मीरा आ मदन इलहेवादक एकटा कॉनवेन्‍टमे पढ़ैए। मदन स्‍टैन्‍डर्ड पाँच आ मीरा स्‍टैन्‍डर्ड चारि‍मे पढ़ैए। रमणजीक सासुर मि‍थि‍लांचलक कोयलख गाममे अछि‍। रमणजीक ससुर महराज रमणजी सँ गर्मी छुट्टीमे आम खाइले कोयलख आबए आग्रह केलखि‍न। रमणजी सपरि‍वार कोयलख एला। नानी गाममे मीरा आ मदन दुइए-चारि‍ दि‍नमे गामक धि‍या-पुता सङ तेना ने मि‍लि‍ गेल जेना पानि‍मे चीनी मि‍लैए। मदन नानी गामक धि‍या-पुता सङे कबड्डी आ हाथी-चुक्का खेल खेलाइत रहए। मदन तँ इलाहावादमे बैडमि‍न्‍टन आ क्रि‍केट देखैत रहए। कखनो-काल क्रि‍केट खेलबो करए। ओकरा लेल कबड्डी आ हाथी-चुक्का खेल नव छेलै, मुदा ओकरा नीक लगैत रहै। नानी गाममे मदनकेँ अमर नामक एकटा बालकसँ दोस्‍ती भऽ गेल। एक दि‍न अमर मदनकेँ अपना अङना लऽ गेल। अमरक घर फूसक रहए। ओकर बाबूजी दि‍ल्‍लीमे दालि‍ मीलमे काज करै छथि‍न। अमरक माए एकटा गाए पोसने छथि‍न। आइ-काल्हि‍ गाए लगबो करै छन्‍हि‍। खेत-पथारक नाओंपर अमरकेँ बाधमे दस कट्ठा खेत, दू कट्ठा गाछी आ दू कट्ठा घराड़ी। अङनामे दूटा घर। अमरक माए नीकहा-नीकहा आम मदनकेँ खइले देलखि‍न। मदन अमरकेँ माएसँ बड्ड प्रभावि‍त भेल रहए। मदनक नानाकेँ पक्काक घर। चारू भागसँ पोखरा-पाटन। ऊपरोमे चारि‍ कोठरी। गामक लोक मदनक नानाक घरकेँ हवेली कहैत अछि‍। मदनक नाना गोकूलबाबू पुरान जमीन्‍दारक बेटा, तइमे रि‍टारयर डि‍प्‍टी कलक्टर। गामक गरीब-गुरबा हुनका हािकम मालि‍क कहैत छेलनि‍। एक दि‍न मदन अपना सङ अमरकेँ अपना नानीक घर लऽ जाइत छल। मैल-कुचैल कपड़ामे अमर। ऐसँ पहि‍ने ओ कहि‍यो हवेली नै गेल रहए। ओ धखाइते-धखाइत मदनक सङे हवेलीक सीढ़ीपर चढ़ल। आगू बढ़ल। देखि‍ते मदनक नानी मदनकेँ पुछलखि‍न- “ई छौड़ा के छी। तोँ एकरा भीतर कि‍ए अनै छेँ?” तैपर मदन बाजल- “नानी ई अमर छी। हम एकरा सङे खेलाइ छी। एकरासँ हमरा दोस्‍ती भऽ गेल अछि‍।” मदनक बात सुनि‍ नानी मदनकेँ डँटैत कहलखि‍न- “समूचा कोयलखमे तोरा यएह छौड़ा दोस्‍ती करैले भेटलौ। छोट लोकसँ दोस्‍ती करै छेँ!” तैपर मदन बाजल- “नानी ई छोट कहाँ अछि‍। ई तँ हमरे अतेटा अछि‍।” “तोँ नै बुझलेँ। ई सभ छोट जाति‍ छी। एकरा सभकेँ हम सभ अपना हवेलीक भीतर नै आबए दइ छि‍ऐ।” अमर दि‍स देखैत नानी फेर बजली- “रे छौड़ा, केकर बेटा छीही?” अमर बाजल- “भोला चौपालक।” “कह तँ खतबे जाति‍क छौड़ाकेँ हवेलीक भीतर अनै छेँ। हवेलीओ छुआ जाइत। रे छौड़ा भोलबा बेटा, जो भाग एतएसँ।” अमर ओतएसँ चलि‍ देलक। मदन कि‍छु बूझि‍ नै पौलक। बकर-बकर नानीक मुँह दि‍स तकैत रहल। नानी ओकर हाथ पकड़ि‍ हवेलीक भीतर लऽ गेली। अमर अपना अाङन जा माएकेँ सभ गप कहलक। माए पुछलखि‍न- “तूँ हवेली गेलही कि‍ए?” तैपर अमर बाजल- “माए, हमरा तँ मदन लऽ जाइत रहए। हम कहि‍यो कहाँ हवेली दि‍स जाइ छी।” माए- “बाउ रौ, उ सभ पैघ लोक छथि‍न। हम पनरह बर्खसँ कोयलखमे छी मुदा आइ धरि‍ हवेलीक भीतर नै गेलौं। कहि‍यो काल खेरही तोड़ए हाकि‍म मालि‍कक खेतमे जाइ छी तँ हेवलीक ओसारक नि‍च्‍चेसँ खेरही राखि‍ आ बोइन लऽ घूमि‍ जाइ छी।” अमर माएक बात नै बूझि‍ सकल। पुछलक- “पैघ लोक केकरा कहै छै?” माए जवाब देलखि‍न- “पैघ लोक माने बड़का आदमी। धनीक आदमी। पढ़ल-लि‍खल हाकि‍म-हुकूम।” अमर- “हमहूँ पैघ लोक बनब।” माए- “पढ़बीही तब ने पैघ लोक बनमेँ। देखै छीही ने जीतनीक मामा पढ़ि‍-लि‍ख कऽ हाकि‍म बनलखि‍न। ओ अबै छथि‍न तँ हाकि‍मो मालि‍क हुनका चाह-पान करबै छथि‍न। तहूँ मनसँ पढ़-लि‍ख आ हाकि‍म बन।” माएक बात सुनि‍ अमर बाजल- “तूँ तँ हमरा कि‍ताबो-काैपी ने आनि‍ दइ छीही। टी‍शनो ने धरा दइ छीही। कहैत रहै छीही गाए चरा आन।” तैपर माए बजली- “तूँ मोनसँ पढ़। तोरा कि‍ताप-कौपी सभ आनि‍ देबौ। गाइओ चरबए नै कहबो। टीशनो धरा देबौ।” अमर बाजल- “हम मोनसँ पढ़ब आ हाकि‍म बनब।” अमर पढ़ए लगल। ओ अपना कि‍लासमे फस्‍ट करए। मैट्रि‍क आ इण्‍टरमे अपना जि‍लामे पहि‍ल स्‍थान लौलक। चटि‍या सभकेँ टीशन पढ़ा कऽ बी.ए. आनर्स फस्‍ट क्‍लाससँ पास भेल। जीतनीक मामा हरि‍यरीबला बीडीओ साहैबसँ भेँट केलक। ओ कहलखि‍न- “कोनो भी कम्‍पीटीशनक तैयारी लेल पटनामे बैसए परतह। तइले ढौआ चाही।” ई सभ गप्‍प अमर अपना माए-बाबूसँ कहलक। अमरक बाबू दस कट्ठा जमीनमे सँ पाँच कट्ठा जमीन बेच देलक। अमर पटनामे रहि‍ बी.पी.एस.सी.क तैयारी करए लगल। गाममे कुट्टी-चालि‍ चलए लगलै। जे जमीन बेच कऽ सभटा बेरबाद करैए फल्लमा। मुदा तेकर परवाह नै केलक अमरक पि‍ता। पहि‍ले खेपमे अमर सफल भऽ गेल, बी.डी.ओ.क पदपर चयन भऽ गेलै। प्रशि‍क्षणक बाद अमरक पदस्‍थापना निर्मली अनुमण्‍डलमे भेल। योगदानक दोसरे दि‍न हुनका चैम्‍बरमे हुनकर सहायक संचि‍का लऽ कऽ आएल। बी.डी.ओ. साहैबकेँ ओ चेहरा जानल-पहचानल लगलनि‍। ओ गौर करि‍ कऽ सहायक दि‍स ताकए लगलखि‍न। आ दि‍मागपर जोर देलखि‍न जे हि‍नका तँ केतौ देखने छि‍यनि‍। मुदा केतए से मोने ने पड़नि‍। सहायकसँ पुछलखि‍न- “अहाँक नाओं की छी?” सहायक जवाब देलखि‍न- “मदन कुमार ठाकुर।” मदन नाओं सुनि‍ते बी.डी.ओ साहैबकेँ बचपनक सभ घटा मोन पड़ि‍ गेलनि‍। हुनका भेलनि‍ शाइत ओ वएह मदन छी जे हमरा हवेली लऽ जाइत छल, मुदा ओकर नानी हमरा डपैट कऽ भगा देने रहए। मुदा शंका समाधान दुआरे पुछलखि‍न- “अहाँक मामा गाम केतए अछि‍?” सहायक जवाब देलखि‍न- “जी, हमर मामा गाम कोयलख भेल। आ नाना स्‍व. गोकूल प्रसाद ठाकुर।” आब तँ बी.डी.ओ साहैबकेँ कोनो शंके ने रहलनि‍। ओ सभ संचि‍का पढ़ि‍ कऽ ओइपर दसखत करैत कहलखि‍न- “साँझमे हमरा डेरापर आएब।” तैपर सहायक मदन पुछलकनि‍- “सर, कोनो खास गप्‍प छै की?” बी.डी.ओ. साहैब कहलखि‍न- “अहाँ आएब तँ ओतए आम आ खास मालूम भऽ जाएत।” सहायककेँ छातीक धड़कन बढ़ि‍ गेलनि‍। ओ सोचए लगला की बात छि‍ऐ। कि‍एक साहैब डेरापर बजौलनि‍। कि‍यो चुगली तँ ने कऽ देलक। साँझमे मदन बी.डी.ओ साहैबक डेरापर पहुँचला। बी.डी.ओ. साहैब हुनका बड़ प्रेमसँ भीतर लऽ गेलखि‍न। एकटा कुरसीपर अपना बैसला आ दोसरपर इशारा करैत मदनकेँ बैसैले कहलखि‍न। दुनू गोटे कुरसीपर बैसला। बी.डी.ओ. साहैब पत्नीकेँ सोर पाड़ैत कहलखि‍न- “चाह-जलखैक ओरि‍यान करू। मदन एला।” मदनकेँ कि‍छु बुझेबे ने करए। ओ बाजल- “सर, कथी लऽ बजेलौं। की आदेश छै।” तैपर बी.डी.ओ. साहैब कहलखि‍न- “सर नै अमर बाजू अमर। हम वएह अमर छी जेकरा सङे अहाँ मामा गाममे कबड्डी, हाथी चुक्का खेलैत रही। एक दि‍न अहाँ अपना नीनीक हवेली लऽ जाइत रही तँ अहाँक नानी अहाँपर बि‍गड़ैत हमरो डँटने रहथि‍। की अहाँकेँ ओ घटना मोन अछि‍?” मदनकेँ ममहरक सभ गप मोन पड़ि‍ गेल। ओ ठाढ़ भऽ कऽ हाथ जोड़ैत बाजल- “सर, हमरा माफ कऽ दि‍अ। हम बड्ड लज्‍जि‍त छी।” तैपर बी.डी.ओ. साहैब कहलखि‍न- “फेर सर! अमर बाजू। अमर।” कहि‍ बी.डी.ओ. साहैब ठाढ़ होइत पुन: बजला- “आउ मदन, गला मि‍लू।” कहि‍ दुनू बाँहि‍ फैला देलखि‍न। मदन झि‍झकैत अमरसँ गला मि‍लल। मदनक दुनू आँखि‍सँ दहो-बहो नोर जाए लगलै। दि‍व्‍या निर्मली टीशनक पाछू, रेलबे परि‍सरेमे गुरु-चेलाक खेल भऽ रहल छल। गुरू लूंगी आ झोलंगा जकाँ कुरता पहि‍रि‍ हाथमे डमरू नेने छला। लगभग दस बर्खक बालक चेला छल। ओकर समुच्‍चा देह कपड़ासँ झाँपल छल। चारू दि‍ससँ लोक ठाढ़ भऽ खेलक मजा लेबए लेल तैयार छल। गुरु डमरू बजा चेलासँ पुछलखि‍न- “बोल चेला की हाल-चाल छौ?” चेला जवाब देलक- “गुरुजी, हमर हाल-चाल एकदम टनाटन अछि‍। अहाँ अपन कहू।” गुरु कहलखि‍न- “हमहूँ ठीक छी। अच्‍छा ई बता अखनि‍ तों छेँ केतए।” चेला बाजल- “अखनि‍ हम बरही गाममे छी।” गुरु- “ई बरही गाम केतए छै?” चेला- “बरही गाम नेपाल अधि‍राज्‍यक सप्‍तरी जि‍लामे पड़ै छै। राजवि‍राजसँ लगधग तीन कि‍लोमीटर दछि‍न। बरही गामसँ उत्तर पछि‍मी कोसी नहर‍ छै।” गुरु- “अच्‍छा ई बता ओतए की कऽ रहल छेँ।” चेला- “वि‍देह इन्‍टरनेट पत्रि‍कामे खबरि‍ जुटाबक समदि‍याक काज करए लगलौं हेन। नेपालक दौरापर छी।” गुरु- “तँ बरही गाममे एहेन काेन घटना भेलै जे तों बरही गाममे छेँ।” चेला- “घटना अथवा दुघर्टना तँ नै भेलै मुदा एकटा नव चीज जरूर भेलै।” गुरु- “काेन नव चीज भेलै हेन, कनी फरि‍छा कऽ बाज।” चेला- “बरही गाम सप्‍तरी जि‍लाक सदरमुकाम राजवि‍राज बजारक लग रहि‍तो मुख्‍य रूपसँ कि‍सानक गाम छी। पश्चि‍मी कोसी नहरि‍सँ दछि‍न छै। सि‍चाईक भरपुर साधन रहैक कारण गरमा धान आ अगहनी धानक उपज बड़ नीक होइ छै।” गुरु- “कोन खेती गि‍रहस्‍तीक गप शुरू कऽ देलँह। नव बात जे भेलै से बाज ने।” चेला- “हम सभ गप फरि‍छा कऽ कहै छी। अहाँ धैर्यसँ सुनू। बरही गाममे रूपलाल नामक एकटा कि‍सान छथि‍। हुनका एकटा बेटा आ एकटा बेटी छन्‍हि‍। बेटाक नाओं वि‍वेक अछि‍। आे वि‍राटनगर अस्‍पतालमे पेथोलौजि‍ष्‍ट छथि‍। अपन प्राइवेट जाँच-घर सेहो रखने छथि‍। रूपलालक बेटी दि‍व्‍या बी.ए. पास कऽ राजेवि‍राजमे बी.एड. कऽ रहली हेन।” गुरु- “कोन आहे-माहेक कथा पसारि‍ देलँह से नै जानि‍। हम कहै छि‍यौ नव बात बता।” चेला- “एतएसँ शुरू होइत अछि‍ नव बात। अखनि‍ हम नव बात जे भेल तेकर पृष्‍ठभूमि‍मे चलि‍ रहल छी। अहाँ कनी धैर्यसँ सुनि‍यौ।” गुरु- “अच्‍छा बता। आब हम बीचमे नै टोकबौ।” चेला- “हँ तँ हम कहैत रही जे रूपलालक बेटी जेकर नाओं दि‍व्‍या  छी, राजेवि‍राजमे बी.एड. कऽ रहली हेन। साल भरि‍ पहि‍ने दि‍व्‍याक बि‍आहक बात-चीज ठील्‍ला गामक रामअवतारक बेटाक संग चलल। रामअवतारक बेटा अनि‍ल भोपालमे इंजीनि‍यरिंग कऽ पढ़ाइ कऽ रहल छला। दस लाख नेपाली टकामे बात पक्का भऽ गेल छल। दुनू दि‍ससँ छेका-छुकी सेहो भऽ गेलै। छह महि‍ना पहि‍ने अनि‍ल इंजीनि‍यरिंगक डि‍ग्री लऽ भोपालसँ नेपाल आएल। दूर संचार वि‍भागमे भैकेन्‍सी भेल। ओहो आवेदन देलक। अनि‍लक पि‍ताजी रामअवतार तेज आदमी अछि‍। ओ दौग-धूप केलक। चारि‍ लाख टका घूस मांगलकै। रामअवतार दौगल बरही आएल। रूपलालकेँ कहलखि‍न- अहाँ जमाएकेँ नौकरी भऽ रहल अछि‍। चारि‍ लाख टका घूस लगै छै। अहाँ दस लाख टका जे बि‍आहमे देब तइमे सँ चारि‍ लाख टका अखनि‍ दऽ दि‍अ। बाँकी छह लाख टका बि‍आहसँ दस दि‍न पहि‍ने दऽ देब। जमाएकेँ नोकरी भऽ जाएत तँ बेटी रानी भऽ कऽ रहत। रूपलाल वि‍वेककेँ फोनपर सभ बात बतौलखि‍न। वि‍वेक कहलकनि‍, ठीक छै, अहाँ रामअवतार बाबूकेँ वि‍राटनगर भेज दि‍यौ। हम चारि‍ लाख टका दऽ देबनि‍। रामअवतार वि‍राटनगर जा वि‍वेकसँ चालि‍ लाख टका आनि‍ बेटाकेँ संग कऽ काठमाडू गेला। घूस दऽ बेटाकेँ नोकरी लगौलनि‍। गुरु बजला- “अच्‍छा, ई बता दि‍व्‍याक बि‍आह रामअवतारक बेटा अनि‍लसँ भऽ गेल ने।” चेला- “असलका गप तँ आब सुनाबै छी। कनी धि‍यानसँ सुनि‍यौ ने। आइसँ दस दि‍न पहि‍ने रूपलाल अपना भातीजकेँ संग कऽ ठील्‍ला पहुँचला। रामअवतारकेँ बि‍आहक दि‍न पक्का करैले कहलखि‍न। ओ तीनटा दि‍नक प्रस्‍ताव रामअवतार लग रखलनि‍। आ कहलखि‍न अही तीनू दि‍नमे जे दि‍न अहाँकेँ सहुलि‍यत हुअए से दि‍न तँइ करि‍ लि‍अ। ढौआ जे बाँकी अछि‍ ओ नगद लेब आकि‍ चेक, सेहो कहि‍ दि‍अ।” रामअवतार कहलखि‍न- “यौ रूपलाल बाबू, हमरा बेटाक भठि‍यन गामबला पनरह लाख टका नगद, एकटा पल्‍शर मोटर साइकि‍ल आ पाँच भरि‍ सुन दऽ रहल अछि‍। अहाँक बेटीसँ हमरा बेटाक बि‍आहक गप पक्का अछि‍। अहाँ अनि‍लक नोकरी लेल चािर टका देने छी। तँए अहाँसँ मात्र पनरह लाख टकेटा लेब। गाड़ी आ सुन छोड़ि‍ देब। जँ अहाँ पनरह लाख टकापर बि‍आह करैले तैयार छी, तँ फागुन दस गतेक दि‍न पक्का भेल। हमरा नगद टका दी अथवा चेक दी, हम सभमे तैयार छी। अहांकेँ जइमे सुवि‍धा हुअए से करब।” तैपर रूपलाल बजला- “अहाँसँ तँ हमरा दसे लाखपर बात भेल अछि‍‍। आब अहाँ मन नै बढ़ाउ। हम बँकि‍यौता छह लाख टकाक चेक भातीज मार्फत भेज देब।” रूपलालक गप सुनि‍ रामअवतार तैशमे बजला- “जँ हमरा बेटाक संग अहाँकेँ अपना बेटीक बि‍आह करबाक अछि‍ तँ मोल-मोलाइ छोड़ू आ पनरह लाख टकामे बात पक्का करि‍ तीन दि‍नक भीतर बाँकी एबारह लाख टका पहुँचाउ। नै तँ कुटुमैती नै हएत। अहाँ चारि‍ लाख टका हम अगि‍ला महि‍नामे आपस कऽ देब।” आब तँ रूपलाल झमा गेला। आँखि‍क आगू अन्‍हार पसरि‍ गेलनि‍। कि‍छु फुड़बे ने करनि‍। गुरु फेर टोकलखि‍न- “अँइ रौ चेला, ई रामअवतार तँ बड़ नीच आदमी बुझाइत अछि‍।” चेला बाजल- “आगू सुनि‍यौ ने।” गुरु- “अच्‍छा कह, आगू की भेलै।” चेला कहए लगल- “कनीकालक बाद रूपलाल अपनाकेँ सम्‍हारैत बजला, ठीक छै हम गाम जाइ छी। बेटासँ वि‍चार करब। ओ जे कहत सएह करब।” रूपलाल आपस गाम आबि‍ गेला। मुँहक उदासी देखि‍ हुनकर पत्नी बूझि‍ गेली जे शाइत दि‍न पक्का नै भेल। कोनो झंझट लगि‍ गेल। दि‍व्‍या  राजवि‍राजसँ पढ़ि‍ कऽ आपस नै आएल छेली। रूपलाल सभ बात पत्नीकेँ बतौलखि‍न। पत्नी कहलकनि‍, वि‍वेकसँ फोनपर गप करू। तैपर रूपलाल बजला, अखनि‍ तँ ओ क्‍लि‍नि‍कपर हएत राति‍मे नि‍चेनसँ गप करब। रूपलाल दुनू परानी राति‍मे खेबो ने केलनि‍। राति‍मे रूपलाल मोबाइलपर वि‍वेकसँ गप करए लगला। गप करि‍ते-करि‍ते ओ कानए लगला। जखनि‍ ओ बेटासँ मोबाइलपर गप करै छला, तखनि‍ दि‍व्‍या अपना कोठरीमे पढ़ै छेली। कोनो गपक पता नै छेलनि‍। जखनि‍ पि‍ताजीकेँ कानब सुनली तखि‍न कान पाथि‍ कऽ सभ गप सुनए लगली। सभ गपक थाह लगि गेलनि‍ जे पि‍ताजी फोनपर कि‍ए कनै छथि‍। दि‍व्‍याकेँ भरि‍ राति‍ नीन नै भेलै। ओ भरि‍ राति‍ सोचि‍ते रहली। रामअवतार केते नीच आ कमीना अछि‍। चारि‍ लाख टका हमरे बाबूजी सँ लऽ घूस दऽ बेटाकेँ नोकरी दि‍यौलक। आइ बेटा नौकरी करए लगलनि‍ तँ मन बढ़ि‍ गेलनि‍। पाँच लाख टका बेसी कऽ हमरा बाबूजी सँ मंगै छथि‍न। एहेन नीच आ लोभी मनुखक बेटासँ हम अपन बि‍आह कि‍न्नौं ने करब, चाहे जि‍नगी भरि‍ कुमारि‍ए कि‍ए ने रहि‍ जाइ। गुरु फेर बजला- “वाह! वाह! दि‍व्‍या बड़ नीक बात सोचलक।” चेला बाजल- “आगू सुनि‍यौ ने।” गुरु- “अच्‍छा सुना।” चेला कहए लगल- “वि‍वेक फोनपर पि‍ताजीकेँ कहलकनि‍, बाबू अहाँ जुनि‍ कानू। हमरा एकेटा बहि‍न अछि‍ दि‍व्‍या। अहाँक पएरक कृपासँ हम चारि‍-पाँच हजार टका डेली कमाइ छी। की करबै रामअवतार बाबूकेँ लोभ भऽ गेलनि‍। हम पाँच लाख टका आरो देबै। अहाँ शुक्र दि‍न रामअवतार बाबूकेँ बरही बजा लि‍यौ। हम नगद एगारह लाख गि‍न देबै। चारि‍ लाख तँ देनैहि‍ए छि‍यनि‍। शुक्र दि‍न साँझ धरि‍ हमहूँ गाम पहुँच जाएब।” शुक्र दि‍न साँझमे रामअवतार बरही पहुँचला। सोचने रहथि‍ जे नगद ढौआ देता तँ राजेवि‍राज नेपाल बैंक लि‍मि‍टेडमे ड्राफ्ट बनबा लेब। नगद ढौआ लऽ जाइमे खतरा अछि‍। साँझमे वि‍वेको गाम पहुँचला। खेनाइमे रामअवतारकेँ खूब सुआगत भेलनि‍। तरूआ, भुजुआक अलाबे खस्‍सीक मासु सेहो रहए। मुदा दि‍व्‍या एकदम गुमशुम। शनि‍ दि‍न दस बजे रामअवतारकेँ पराठा आ अल्‍लुक भुजि‍या, हलुआ, सेबैक खीर आ रसगुल्‍लाक जलखै खुआएल गेल। जलखै करा एकटा कोठरीमे वि‍वेक, रामअवतार आ रूपलाल बैसला। वि‍वेक पुछलकनि‍- “ढौआ केना लऽ जेबै?” तैपर रामअवतार कहलखि‍न- “ढौआ दऽ दि‍अ आ अहाँ चलू राजवि‍राज, नेपाल बैंकमे ड्राफ बनबा देब।” तैपर वि‍वेक बजला- “आइ तँ शनि‍ छी। छुट्टीक दि‍न छी। बैंक बन्न हएत।” रामअवतार बजला- “अच्‍छा अहाँ टका गि‍न कऽ दि‍अ। हम समधीकेँ संग कऽ ठील्‍ला चल जाएब। दू गोटे रहब तँ डर कम रहत।” वि‍वेक आलमारी खोलि‍ रूपैआ नि‍कालि‍ गि‍न कऽ रामअवतारकेँ देबए लगला आकि‍ हहाएल-फुहाएल दि‍व्‍या पहुँच कऽ बजली- “रूकू भैया, रूकू। रूपैआ राखू। हम एहेन लोभी आ कमीना आदमीक बेटासँ अपन बि‍आह कि‍न्नौं नै करब। चाहे जि‍नगी भरि‍ कुमारि‍ कि‍एक ने रहि‍ जाइ।” दि‍व्‍याक गप सुनि‍, सभ कि‍यो अवाक् भऽ गेल। वि‍वेक आ रूपलाल समझाबैक परि‍यास केलनि‍ तँ दि‍व्‍या अपना हाथमे एकटा शीशी देखबैत कहलकनि‍- “ऐ शीशीमे जहर छी। जँ अहाँ सभ जि‍द्द करब तँ हम जहर पीब लेब।” रामअवतार बाबू दि‍स घूमि‍ बजली- “सुनू रामअवतार बाबू, अहाँ हमरा बाबूजीसँ चारि‍ लाख टका लऽ गेल छी। जाबे धरि‍ चारि‍ लाख टका आपस नै करब अहाँ बरहीसँ आपस ठील्‍ला नै जा सकै छी।” गुरु डमरू बजबैत नाचए लगला। थोड़े काल नाचि‍ बजला- “बड़ नीक बड़ सुन्नर। दि‍व्‍याकेँ बहुत-बहुत धैनवाद।” पूनम मण्डल "सगर राति‍ दीप जरय"क ७९ म आयोजन ‘कथा कोसी’ उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे औरहामे सम्पन्न/ ८० म सगर राति‍ दीप जरय सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे उमेश मण्‍डलक संयोजकत्वमे सगर राति‍ दीप जरय’क 79म आयोजन ‘कथा कोसी’ नामक वैनरक नीचाँ दि‍नांक 15 जून संध्‍या 6.30 बजेसँ शुरू भऽ 16 जूनक भि‍नसर 6 बजे धरि‍ लौकही थाना अन्‍तर्गत औरहा गामक मध्‍य वि‍द्यालयक नव नि‍र्मित भवनमे श्री उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे गोष्‍ठी सुसम्‍पन्न भेल। अगि‍ला ८०म गोष्‍ठी सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे हेबाक लेल उमेश मण्‍डल प्रस्‍ताव आएल जे सर्वसम्मति‍सँ मान्‍य भऽ घोषित भेल। श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल एवं श्री रामचन्‍द्र पासवान जीक संयुक्‍त अध्‍यक्षतामे तथा श्री वीरेन्‍द्र कुमार यादव आ श्री दुर्गागान्‍द मण्‍डलक संयुक्‍त संचालनमे ऐ कथा गोष्‍ठीक भरि‍ राति‍क यात्रा भेल। गोष्‍ठीक शुभारम्‍भ श्री लक्ष्‍मी नारायण सिंह एवं श्री रामचन्‍द्र पासवानजी संयुक्‍त रूपे दीप प्रज्‍वलि‍त कऽ उद्घाटन केलनि‍। वि‍देह-सदेह-5 वि‍देह मैथि‍ली वि‍हनि‍ कथा, वि‍देह सदेह-6 वि‍देह मैथि‍ली लघुकथा, वि‍देह-सदेह-7 वि‍देह मैथि‍ली पद्य, वि‍देह-सदेह-8 वि‍देह मैथि‍ली नाट्य उत्‍सव, वि‍देह-सदेह-9 वि‍देह मैथि‍ली शि‍शु उत्‍सव तथा वि‍देह-सदेह-10 वि‍देह मैथि‍ली प्रबन्‍ध-नि‍बन्‍ध-समालोचना नामक पोथीक लोकार्पण स्‍थानीय वि‍द्वतजन श्री संजय कुमार सिंह, श्री रामचन्‍द्र पासवान, श्री मि‍थि‍लेश सिंह, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री लक्ष्‍मी नारायण यादव तथा श्री वीरेन्‍द्र प्रसाद सिंह द्वारा भेल हाथे भेल। लोकार्पण सत्रक पछाति‍ दू-शब्‍दक एकटा महत्‍वपूर्ण सत्रक सेहो आयोजन भेल जइमे श्री रामचन्‍द्र पासवान, श्री बेचन ठाकुर, श्री कपि‍लेश्वर राउत, श्री कमलेश झा, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री राम वि‍लास साहु, श्री उमेश नारायण कर्ण, श्री रामानन्‍द झा ‘रमण’, श्री शंभु सौरभ, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, डॉ शि‍वकुमार प्रसाद, श्री अरूणाभ सौरभ तथा श्री उमेश मण्‍डल तथा संयोजक श्री उमेश पासवान द्वारा ‘सगर राति‍ दीप जरय’ कथा गोष्‍ठीक दीर्घ यात्रा तथा उदेसपर सभागारमे उपस्‍थि‍त दूर-दूरसँ आएल कथाकार, समीक्षक-आलोचक एवं स्‍थानीय साहि‍त्‍य प्रेमीक मध्‍य मंचसँ अपन-अपन मनतव्‍य रखलनि‍। जइमे सगर राति‍क 75म आयोजनक पश्चात 76म आयोजन जे श्री देवशंकर नवीन दि‍ल्‍लीमे करेबाक घोषना तँ केने रहथि‍ मुदा से नै करा साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा आयोजि‍त कथा गोष्‍ठीकेँ गनि नेने रहथि‍ जहू गि‍नतीकेँ सोझरौल गेल आ तँए ऐ गोष्‍ठीकेँ श्री उमेश पासवान अपन इमानक परि‍चए दैत ७९ म गोष्‍ठीक आयोजन केलनि‍। ओ कहलनि‍ जे हम सभ अर्थात् वि‍देह मैथि‍ली साहि‍त्‍य आन्‍दोलनसँ जूड़ल मैथि‍ली वि‍कास प्रेमी छी। हम सभ ७७म, ७८ म आयोजनक आयोजन कर्ताकेँ स्‍पष्‍ट रूपे कहैत एलि‍यनि‍ जे मुदा हमरा सबहक बात नहियेँ वि‍भारानी मानलनि‍ आ नहि‍येँ कमलेश झा मानलनि‍। मुदा से हमहूँ नै मानब आ सही-सही गि‍नती करब। आ तही दुआरे ऐ गोष्‍ठीक आयोजन ७९मे आयोजन तँइ भेल, आयोजि‍त भेल। हलाँकि‍ दरभंगासँ आएल कथाकार श्री हीरेन्‍द्र कुमार झाक उकसेला पर रहुआसँ आएल श्री वि‍नय मोहन झा जगदीश, श्री दुखमोचन झा आ दरभंगेसँ आएल श्री अशोक कुमार मेहता हीरेन्‍द्र झाक संग गोष्‍ठीक आरम्‍भक घंटा भरि‍क पछाति‍ चलि‍ जाइ गेला।

जीवि‍ते नर्क (उमेश मण्‍डल), शि‍क्षाक महत (राम वि‍लास साहु), बि‍आहक पहि‍ल गि‍रह (दुर्गानन्‍द मण्‍डल), बौका डाँड़ (लक्ष्‍मी दास), बंश (कपि‍लेश्वर राउत), टाटीक बाँस (राम देव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’), सगतोरनी (शि‍वकुमार मि‍श्र), पाथर, पि‍यक्कर, जोगार आ अंग्रेज नैना (अमीत मि‍श्र), संत आकि‍ चंठ (बेचन ठाकुर), अछोपक छाप (शम्‍भु सौरभ), नमोनाइटिस (उमेश नारायण कर्ण), द्वादशा (सुभाष चन्‍द्र ‘सि‍नेही’), राँड़ि‍न (रोशन कुमार ‘मैथि‍ल’), पँचवेदी (अखि‍लेश कुमार मण्‍डल), मुइलो बि‍सेबनि (जगदीश प्रसाद मण्‍डल) इत्‍यादि‍ महत्‍वपूर्ण लघु कथा/वि‍हन‍ कथाक पाठ भेल आ सत्रे-सत्र मौखि‍क टि‍प्‍पणी आ समीक्षा भेल। अछोपक छाप (शम्‍भु सौरभ) क समीक्षाक क्रममे श्री रमानन्द झा "रमण" कथावस्तुसँ अपन असहमति देखेलनि आ कहलनि- " नै आब ई गप नै अछि, एकटा गप एतै देखियौ, हम रमानन्द झा "रमण" श्रोत्रिय उच्च कुलक, आ कतऽ आएल छी! उमेश पासवानक दरबज्जापर!" श्री बेचन ठाकुर श्री रमानन्द झा "रमण"क नव-ब्राह्मणवादी सोचक विरोध करैत कहलनि- " लोकक मगजमे अखनो जाति-पाति भरल छै, मैलोरंगक प्रकाश झा तेँ ने कहै छथि जे बेचन ठाकुर भरि दिन तँ केश काटैत रहैए, ई रंगमंच की करत!! श्रीधरमकेँ सेहो ई गप बुझल छन्हि। माने मैथिली साहित्यकार, समीक्षक आ रंगमंचसँ जुड़ल ब्राह्मणवादी आ नव-ब्राह्म्णवादी सोचक लोककेँ देखैत ई कहल जा सकैए। २१म शताब्दीमे श्री रमानन्द झा "रमण"क बयान ई देखबैत अछि जे कोना ओ उमेश पासवानक दरबज्जापर आबि उपकृत करबाक भावनासँ ग्रसित छथि। अगि‍ला ८०म गोष्‍ठी सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे हेबाक लेल उमेश मण्‍डल प्रस्‍ताव आएल जे सर्वसम्मति‍सँ मान्‍य भऽ घोषित भेल। राम वि‍लास साहु बाल-बोध दुखीलालकेँ दुखक पहाड़ माथसँ कहि‍यो नि‍च्‍चाँ नै भेल। बूढ़ माए-बापक सेवा टहल, तैपर सँ दूटा भलढ़ेरबा बेटी, छोट-छोट दूटा बेटा, पत्नी आ अपने कुल आठ बेक्‍तीक परि‍वार। पत्नी- फुलि‍या- परि‍वारक काजमे पि‍साइत छेली। सासु-ससुरक टहल-टि‍कोरा आ सेवासँ पलखति‍ए नै। ऊपरसँ एकटा पोसि‍या गाए, एकटा भजैति‍या बरद। मुदा दुनू बेटी चठेलगरि‍ आ हुनरगरि‍ छन्‍हि‍। घरक कमौआ दुखीलाल असकरे दि‍न-राति‍ फि‍रि‍शान रहैए। घरक खर्चा पुग्‍बे ने करैए जे पलखति‍ मारत। खेतीओ-पथारी कम्मे भेने जने-बुत्तापर घरक खर्चा चलैत अछि‍। जखनि‍ खेनाइओ-पीनाइओमे ढनसने तखनि‍ बेटा-बेटी पढ़त केना? बर्खक पेसतरे दुखीक माए लकबा रोगसँ मरि‍ गेली। पछाति‍ बूढ़ बाप सेहो रोगसँ रोगा-सोगा दम तोड़ि‍ देलकनि‍। श्राध-कर्म आ भोज-भात कर्जे हाथे भेल। दुखीलालकेँ एक-सबा कट्ठा डीह, तीन कट्ठा चौमास आ छह-सात कट्ठा तीन-फसि‍ला खेत छन्‍हि‍। जइसँ छह मास परि‍वारक गुजर चलै छन्‍हि‍। जन-मजदूरी कऽ शेष छह मास बि‍तबैत अछि‍। मुदा अखनि‍ तँ चौमास आ तीन-फसि‍ला खेत दस हजारमे डेढ़ा सूदि‍पर भरना लगि‍ गेल अछि‍। तैपर सँ दूटा बेटीक बि‍आहक अलगे। दुनू बेटा अखनि‍ बाल-बोध! समस्‍या-पर-समस्‍या लदल जा रहल अछि‍। जँ चारि‍-पाँच साल खेत-भरना रूपैआक सूदि‍ नै भरब तँ खेतो सूदि‍ए तरे चलि‍ जाएत। गाए बि‍कल चरबाहि‍येमे कहबी सन हएत। एक दि‍न दुखीलाल बैसारीए छल। कि‍छु सोचैत छल आकि‍ मनमे उपकलै खेतक भरना। जइ खेतसँ हमर बाप-दादा परि‍वार चलबै छला वएह खेत हमरो जीवि‍का अछि‍। मुदा आब बूझि‍ पड़ैए ओ खेत बि‍लटि‍ जाएत। ऐ क्रममे सोचैत दुखीलाल टहलि‍ मालि‍क प्रभूनाथ जीक दरबज्जापर पहुँचल। प्रभूनाथजी दुखीकेँ देखि‍ते कहलखि‍न- “आबह दुखी, एमकी बहू दि‍नपर भेँट करए एलह।” दुखीलाल- “मालि‍क, अहाँसँ कथी छुपल अछि‍। एतेक दि‍नसँ माए-बापक कहुना रीन उतारलौं मुदा अपनेक रीन केना चुकाएब से फुड़ेबे ने करैए।” प्रभूनाथजी- “केना चुकेबऽ से तँ तोहर काज छि‍अ। तइले हम कि‍ए मगजमारी करब। साले-साले हमरा रूपैआक डौरहा सूदि‍ बढ़ैत जेतह। पाँच सालक कराड़ी छह, नै चुकेबहक तँ खेत छोड़ह पड़तऽ।” दुखीलाल- “माि‍लक, एना नै ने बाजू। खेतक नाओं सुनि‍ हमर करेजा फाटि‍ जाइए। ई खेत हमर खनदानक पूजी आ इज्जति‍ छी। अपना जीबैत हम केना बि‍लटए देब।” प्रभूनाथजी- “से तँ तूँ ठीके कहै छह। रूपैआक सूदि‍ जोड़ि‍ चुकता कऽ दहक आ अपन खेत छोड़ा लैह।” दुखीलाल- “मालि‍क, अहींक दरबारमे जन-मजुरी कऽ जीब लेब। रहल अहाँक रूपैआक सूदि‍, तइ एबजमे हम अपन दुनू बेटाकेँ अहीं ऐठाम नोकरी राखि‍ दइ छी। बँचलोहो बासि‍-बेरहट खा जीब लेत आ अहूँक काज चलत। जाधरि‍ अहाँक रूपैआक सूद-मूर‍ नै सधत ताधरि‍ अहींक दरबारमे नोकर बनि‍ खटि‍ देत। रूपैओक चुकता भऽ जाएत आ हमरो खेत छुटि‍ जाएत।” प्रभूनाथजी- “कहलह तँ बड़ नीक। युक्‍ति‍ओ तोहर नीमन छह मुदा...।” दुखीलाल- “माि‍लक ‘मुदा’ कि‍ए कहलौं?” प्रभूनाथजी- “मुदा ऐ दुआरे बजलौं कि‍ तोहर बेटा दुनूकेँ तँ देखने नै छी। अबोध अछि‍ आकि‍ बाल-बोध ” दुखीलाल- “बल-बोध अछि‍। ठेकनगरि‍, एकबेर सेरि‍या कऽ बता देबै तँ दोसर बेर अढ़बए नै पड़त। देखि‍ते-देखि‍ते फुर्र-फुर्र काज कऽ देत। एक्को मि‍सि‍या असकति‍या नै अछि‍।” प्रभूनाथजी- “बेस काल्हि‍ए दुनूकेँ बजौने आबह। नैनसँ देखि‍यो लेब आ काज करै जोकर अछि‍ कि‍ नै सेहो ठेकानि‍ लेब।” दुखीलाल- “बेस मालि‍क, जाइ छी काल्हि‍ए दुनूकेँ सङे नेने अबै छी।” दुखीलाल अपन कर्तव्‍यकेँ हीन बूझि‍ चि‍न्‍तामे डूमि‍ गेल। हम केहेन बाप छी जे बाल-बोध बेटाकेँ भोजन-बस्‍त्र-शि‍क्षा इत्‍यादि‍ पूर नै कऽ अपने बेगरते नोकरी लगबै छी। बेटा-बेटी राजाक हुअए आकि‍ गरीबक सभकेँ अपन सन्‍तान दुलरूआ होइ छै। जखनि‍ नमहर-बुधि‍गर-ठकनगर हएत तँ की कहत! हमर बाप केहेन नि‍ष्‍ठुर छथि‍ जे हमरा सङे एहेन अन्‍याय केलनि‍। मुदा हमरा लग रस्‍ते कोन अछि‍। दोसर कोन उपए लगा सकब। मोनक बात मोनमे रखैत हृदैकेँ सक्कत कऽ बि‍हाने भने पनि‍पि‍आइ करा सङे नेने प्रभूनाथ जीक दरबार पहुँचल। दुनू बाल-बोध भाए गांगी-जमुनी, देखैओमे बड़ नुनुआगर, उमेरो आठ-दस बर्खक। प्रभूनाथ जीकेँ मनमे भेलनि‍ बड़ नीमन टहलू हएत। मुदा अनठबैत बजला- “दुखी दुनू बौआ तँ अखनि‍ लेधुरि‍ए अछि‍। हमरा ऐठाम कोन काज करत। ऐठाम तँ भीड़गर काज अछि‍।” दुखीलाल बूझि‍ गेल जे मालि‍क हमरा टाड़ि‍ रहल अछि‍। बाजल- “मालि‍क, छोट देखि झुझुआउ नै। घरक छोट-छोट सभ काज करत। गाए-बरदक कुट्टी-सानी, दरबज्जा, माल-जालक बथान आ गोहाल घरक झार-बहार करत। गोबर-करसी ढुल-ढालकेँ हटाएत। अहूँकेँ कि‍यो टहल-टि‍कोरा करैबला नै अछि‍ सेहो अपन समझि‍ करत। अहूँ अपने पोता सन बेवहार करबै। घरे ने बदलि‍ जेतै मुदा रहतै तँ गामेमे। अहाँ लग रहत तँ हम नि‍फि‍कि‍र रहब। ओना हमहूँ तँ अबि‍ते-जाइते रहब।” प्रभूनाथजी- “दुखी, तँू ने गाम-घरक बात करै छह। लोक तँ शहर जाइले गाम गमौने अछि‍।” दुखीलाल- “मालि‍क की कहब, लोक तँ चि‍ड़ै भऽ गेल अछि‍। जेतै पेट भरै छै ओतै खोंता बना रहैत अछि‍।” प्रभूनाथजी- “से ठीके। हमरे बेटाकेँ नै देखै छहक। गाम-समाज छोड़ि‍ हैदराबादमे रहैए। पावनि‍-ति‍हार तँ हम जाबै जीबै छी ताबे कहुना कऽ दइ छि‍ऐ, नै तँ घरक देवताकेँ एक चुरुक पानि‍ओ के देत।” दुखीलाल- “माि‍लक, छोड़ू दुनि‍याँ-दारीक गप-सप्‍प। हमरो काजपर जाइक अछि‍। और गप-सप्‍प दोसरो दि‍न हेतै। दुनू बाल-बोधकेँ सम्‍हारू।” प्रभूनाथजी- “दुखी, कनी आर बैसह। ई दुनू बौआ अनचि‍न्‍हार अछि‍। कनी बति‍या लइ छी। नाओं बूझल रहत तँ समैपर समझा-बुझा देबै। नै तँ पोसो नै मानत। तँू तँ बुझबे करै छहक जे हमरासँ दुनू बौआकेँ खटपट तँ नै हएत मुदा हमर बुढ़ि‍याक सोभाव आ बेवहारकेँ तँ तूँ नीकसँ जनै छह, ओ मक्कै लाबा जकाँ दि‍न भरि‍ फटफटाइते रहै छथि‍। तेहेन झनकाहि‍ अछि‍ जे केकरोसँ पटरीए ने खाइ छै। दि‍न-भरि‍ पूजे-पाठमे लगल रहैए, दि‍नक भोजन राति‍ आ रतुका भोरमे पाड़न करैए। जँ कि‍यो लागि‍ओ-भीड़ीओ देतै तँ कहत जे हमर सभ कि‍छु छुबा गेल। एकबेर के कहए जे तीन-तीन बेर नहाएत आ गंगाजलसँ शुद्ध करत। बेटो-पुतोहु आ पोता-पोती जखनि‍ अबैए तँ देखि‍ते बनरनी जकाँ लड़ि‍ते रहैए। तखनि‍ हमर जि‍नगी केहेन अछि‍ से बि‍नु कहने बूझि‍ गेल हेबह।” दुखीलाल- “मालि‍क, ई तँ घरक बात छी। ओइमे हम कि‍ए दखल देब। मनुखो कोनो एक्के रंगक होइए। लोक अपन सुख-दुखक सृजन अपने करैए। अपजश दोसरकेँ लगबैए।” बात समटैत दुखी दुनू बाल-बोधक दि‍स इशारा केलक। प्रभूनाथजी पुछलखि‍न- “बौआ, नाओं की छि‍अ?” दुनू भाँइ एक्के स्‍वरमे अपन-अपन नाओं बाजल- “बुधन-बेचन।” प्रभूनाथ- “मुँह सूखल छह। कि‍छु खेबह?” दुनू भाँइ बाजल- “नै, पनि‍पि‍आइ कऽ लेने छी।” प्रभूनाथजी- “तोहर बापक कहब अछि‍ जे दुनू भाँइ अहीठाम काज करत से करबहक ने?” बुधन- “हँ।” प्रभूनाथजी- “अपन काज कहुना सभ करैए मुदा बीरानक काज कि‍यो करैए आ कि‍यो नै करए चाहैए।” बुधन- “हम अपन आ बीरानमे नै बुझै छी। काज करब।” दुखीलाल बूझि‍ गेल जे बात बढ़ि‍ जाएत। बातकेँ सम्‍हारैत बाजल- “मालि‍क गरीबक बेटाकेँ कथी परीक्षा लइ छि‍ऐ। जे कहबै से करत।अबेर भऽ गेल काजपर जाइ छी।” प्रभूनाथजी- “कनी दरमाहा फरि‍आ लैह जे पछाति‍ कोनो मुहाँ-ठुठी ने हुअए।” दुखीलाल- “मालि‍क, दरमाहा की हेतै। अहाँसँ रूपैआ दस हजार नेने छी। सालमे पनरह हजार हएत। पँच-पँच सए रूपैआ महि‍नाक हि‍साबसँ दुनू भाँइक एक हजार भेल। पनरह महि‍नामे अहाँक रूपैआ फरि‍या जाएत, नै मानब तँ एक मास बेसीए खटि‍ देत। हमरो खेत छूटि‍ जाएत। ने अहाँकेँ दि‍अ पड़त आ ने हमरा। दुनू भाँइ अहींक दरबारमे खाएत-पीअत काज अहाँक अनुकूल करत।” प्रभूनाथजी- “ठीक छै मानि‍ लेलि‍अ। तँू तँ हमरोसँ तेज नि‍कललह। हम तँ बाल-बोधक फेरमे अबोध बनि‍ गेलौं।” सुरेन्द्र शैल- भदहर(दरभंगा) धनुष यज्ञ-सीता स्वयंवर आ जयमाल हमर जिज्ञासा-की सीता स्वयंवरक आयोजन कैल गेल छल? हमरा जनैत नहिं। सीता वियाहक प्रयोजन सँ विभिन्न देशक राजा-महाराजा-राजकुमार आमंत्रित कैल गेल छलाह। सभामध्य पिनाक नामक अति विशाल शिव धनुष हजारों आदमी गाड़ी पर लादि आ खींचि आनि स्थापित कैलक। शिवक ई धनुष जनकक पूर्वज राजा निमिक ज्येष्ठ भ्राता देवरात कैं देवाधिपति इन्द्र सँ भेटल छलनि। सभामध्य अपन ज्येष्ठ भाई एवं सखी सभक संग सीता एलीह।राजाक ज्येष्ठ पुत्र सभामध्य जनकक संकल्पक"जे शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढौताह तिनके संग सीताक वियाह हैत"उदघोषणा कैलनि। जनकक संकल्प संज्ञान मे एला पर रावण सहित अनेकों राजा ओहि शिव धनु पर प्रत्यंचा चढेवाक चेष्टा कैलनि मुदा समर्थ नहिं भेलाह। जनकजी ई देखि अत्यंत चिंतित भय बाजि उठलाह की वसुंधरा वीर विहीन भय गेल वा "लिखा न विधि वैदेही विवाहू"।एहन विकट परिस्थितियो मे जनक निराश तँ छथि मुदा अपन प्रतिज्ञा सँ आबद्ध राजा सीता कै अपना योग्य पतिक वरन करवाक अनुमति नहिं दैत छथिन। सीताक वियाह हुनक पिताक प्रतिज्ञाक मर्यादाक रक्षा पर निर्भर(conditional marriage)छल।जखन सीता अपन पतिक वरन करवाक हेतु स्वतंत्र नहिं छलीह तँ ओहि आयोजनके स्वयंवरक संज्ञा देवाक औचित्य प्रतीत नहिं होइछ। वियाहक निमित्त आयोजित सभ समारोह स्वयंवर नहिं भय सकैछ। िमिथलाक िववाह पद्धित, परम्परा वा िविध वयवहार मे किहयो जयमाल क स्थान निहं छल। आन समाज आ प्रान्तक एिह परम्परा कैं िसनेमा आ दूरदर्शन मे देखि हमरा लोकिन िवनु कोनो मर्म बुझने एिह िविध के स्वीकारे निहं अंगीकार कय लेलहुँ। खासकय ब्राह्मण आ कायस्थ पिरवार जे अपनाकैं बुिद्धजीवी आ ज्ञानवान कहैत छी एकरा मान्यता प्रदान करवा लेल कुतर्क पर उतिर एलहुँ। भगवान राम आ सीताक िवयाह मे जयमाल भेलिन तँ हमरा बेटा वा बेटीक िवयाह मे िकयैक निहं हैत? एिह िनर्णय मे जनीजाित जे भगवान आ सन्तानक प्रित स्वाभािवकरूपें कने वेशी संवेदनशील होइत छिथ, केर प्रभावी भूमिका सँ इंकार निहं कैल जा सकैछ। हमर तेसर िजगयासा -की सीताराम िवयाह मे वरमाल(जयमाल) भेल छल? हमरा जनैत निहं। आऊ कने एिह पर िवचार कैल जाय... जयमाल शब्द स्वयं िचकिर-िचकिर के अपन अर्थ किह रहल अिछ। ओना राजतंत्री व्यवस्था मे राजा जखन युद्ध मे िवजयी भय वापस अवैत छलाह तँ हुनक िंसंहद्वार पर रानीसभ अपन अिरजन-पिरजनक संग राजाक आरती उतािर मधुर खोआय जे माला राजाक गरा मे पिहरवैत छलीह तेकरा जयमाल कहल जाइत छल। एिहमे एकतरफा माल्यार्पण होइत छल। िवयाहक क्रममे जािह मालाक आदान -प्रदान होइत छल तेकरा वरमाल कहल जाइत छल। वर शब्दक अर्थ भेल िवछनाइ।एिहतरहक िवयाहमे लड़का आ लड़की अपना लेल वर/किनयाँ िवछवाक(selection)लेल स्वतंत्र रहिथ। जाितक कोनो बन्धन निहं छल। एकरा प्राचीन युगमे गन्धर्व वियाह आ आधुिनक युगमे प्रेम-िवयाह(love marriage) कहल जाइछ।एिहमे कोनो युवक कोनो युववतीक प्रित आकर्िषत भय अपन प्रेमक अिभव्यिकत आ ओकर स्वीकारोपरान्त सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी,, वृक्ष, देवता, गन्धर्वािद कैं साक्षी रािख एक दोसराक गरा मे माला पिहराय िवयाहक बंधन मे बनिह जाइत छलाह। कन्यादान आ िसन्दूरदान निहं होइत छल। कोनो आन िविध-व्यवहारक आवश्यकता निहं।कथा-पात्र नल दम्यंती आ दुष्यंत-शकुन्तलाक िवयाहक उदाहरण समक्ष अिछ। एिह िविध कैं तत्कालीन समाज द्वारा मान्यता प्राप्त छल। दोसर राजा अपन पुत्रीक वयसक ध्यान रािख स्वयंवरक आयोजन करैत छलाह। आमंत्रण पािव आन आन राजक राजकुमार लोकिन एिह आयोजन मे भाग लैत छलाह। राजकुमारी हाथमे माला नेने सभामध्य घुरैत छलीह। राजकुमार सभक संग आयल मागध-बन्दी-सूत लोकिन अपन-अपन राजकुमारक गुणक वर्णन करैत छलाह। जािह राजकुमारक रूप-गुण सँ राजकुमारी प्रभािवत भय हुनका गरा मे माला पिहरा दैत छलीह से हुनक पित भय जाइत छलाह। एिह तरहक स्वयंवर मे राजा वा राजकुमार भेनाइ एक शर्त छल। स्वयंवर मे राजकुमारी एकतरफा माल्यार्पण करैत छलीह। इहो माल वरमाल कहाइत छल। ओना तँ अपहरणो कय िवयाहक परम्परा छल मुदा एिह तरहक िवयाह मे मालाक आदान-प्रदानक उदाहरण हमरा समक्ष निहं आयल अिछ। महाभारत मे भीष्म अपन छोट भाए िचत्रांगद आ िविचत्रवीर्यक िवयाहक उद्देश्य सँ अम्बा,अमिबका आ अम्बािलकाक अपहरण कय लैत छिथ। रुक्िमन आ सुभद्राक अपहरण एवं पराकाल मे पृथ्वीराज द्वारा संयोिगताक अपहरण होइत अिछ। अस्तु! उपरोक्त िवयाहक कोनो पद्धित सीताराम िवयाहक उदाहरण बनवा योग्य निह अिछ।धनुष भंग भेला परे सीताक िवयाह राम सँ होएब सुिनश्िचत भय गेल।जनकजी अयोध्या संवाद दैत छिथ। दशरथ बिरयाती सािज के अवैत छिथ। भगवान, गुरुजन आ समाजक बीच िविधपूर्वक जनकजी कन्यादान करैत छिथ। तैं वरमाल कैं जयमाल कहब वा सीताराम िवयाह मे जयमाल भेल, ई कतय धिर उिचत से सुधीजनक िचंतन पर छोडैत छी। ओना मैिथली मे एक कहावत छैक"अपना मोनक मौजी आ बहु के कहब भौजी"एकर उत्तर हमरा संग निहं अिछ। िवयाहक एिह आयाितत रीितक संग ओकर सखी बिहनपो सभ एलीह। ढोल, िपपही,िसंघा,रसनचौकी आ मशक बाजा सनक मधुर -कर्णिप्रय साज कैं ठेिल पिहने बैंड पार्टी आ एखन डीजे सनक असह्य कानफाडू साज स्थान ग्हण कय लेलक। ओिहैंपर छौडा-छौडीक संग बुढवा-बुिढयाक अशोभनीय नाच। भाभौ-भैंसुरक िवचार निहं।लाल-िपयर धोतीक स्थान शेरवानी आ टोपी लय लेलक। बीच पंडाल मे तथाकिथत जयमाल घोघट कैं महत्वहीन कय देलक।आब घोडी आ डाँड़ मे तरूआिर बािन्ह के िवयाहक हेत आयलु वरक पिरछन करव बाँकी अिछ।ओना घोडी पै होके सवार चला है दुल्हा यार कमिरया मे बान्धे तलवार त गािवये रहल छी। महेशवानी, स्वयंवर(समर),, डहकन आ जेवनार पर लुंगी डांस भारी पिड रहल अिछ। हा मैिथल!हा िमिथला!! अमित मिश्र बस एकटा गर्लफ्रेन्ड बाप-बेटामे गरमागरम बहस भऽ रहल छलै ।उचक्का, आवारा सन पदवी प्राप्त बेटाक लेल बापक चिन्ता जायज छलै, मुदा बेटा बुझै बला होइ तखन ने ! बाप बुझा-बुझा कऽ कहि रहल छल "बौआ पढ़ि ले ।किछु आखरक ज्ञान भऽ जेतौ तँ नीक जकाँ कमा-खटा लेबें ।" मुदा जानि नै कोन मुहछी मारने छलै जे बेटा पढ़ैक लेल तैयारे नै छलै ।बड बुझेलाक बाद जखन बात नै बनलै तँ बापकेँ तामस चढ़ि गेलै ।बाप तमसाइत बाजल "जँ नै पढ़बे तँ एखने हम घरसँ निकालि देबौ ।जखन रने-वने बौआए पड़तौ, अँतरी कुलबुलेतौ तँ पता चलतौ ।" बेटा ई सब सुनि हँसऽ लागल "हा . . .हा. . .हा . . .एतेक छोट सजा !आइ-काल्हि टाका आ भोजनकेँ के पुछै छै !हमरा एहन दिमाग बला तँ बैसल सोहारी तोड़तै ।बस एकटा गाय सन सुध गर्लफ्रेन्ड आ मीठ बाजबाक कला चाही ।से अछिए ।आइ-काल्हि गरम माँउसक किरायेदार बड भेटै छै बाबू ।चिन्ता जुनि करू ।" बापक अंग-अंग लोथ भऽ गेल छलै । डॉ. बचेश्वर झा, निर्मली (सुपौल)  कथा- ''सासुरक साइकि‍लक कथा-बेथा'' बैशाख मासक साँझ नहु-नहु हवा बहि‍ रहल छेलै। दि‍न भरि‍क तपाएल वातावरण संग मन्‍द पवनक सि‍हकलासँ सुखद प्रतीत भेल छल। डेरासँ फराक जा मोन बहटारैले चलि‍ देने छेलौं। उष्‍म ऋृतुक साँझक सौन्‍दर्यक सन्‍दर्भ एक कवि‍क स्‍मरण भऽ आएल। “उषम-वि‍षम अब आयल सजनी गे, सुखद भेल बन वात। ककर ने मोन हरण कर सजनी गे,  गृष्‍मक साँझ-परात।।”  वस्‍तुत: गृष्‍मक साँझ आ प्रात: काल अति‍ मनोहर होइत। ऐ लऽ कऽ हमहूँ सम्‍प्रति‍ आनन्‍दक अवलोकनोपरान्‍त डेरा घूमि‍ कऽ अाबि‍ गेलौं। तरकारी वाड़ीमे पानि‍ पटौल गेल कि‍ नै से देखि‍ रहल छेलौं। हठात् साइकि‍लक घंटीक टन-टन सुनबामे आएल। चौंकि‍ कऽ देखल तँ हमर मि‍त्र वएह छला जे वि‍द्यालयसँ महा वि‍द्यालय धरि‍ संग पूरने छला। धड़फराएल दलानक ओलतीमे साइकि‍ल लगा कऽ खाटपर धब्ब दऽ लेटि‍ गेला। हम लग आबि‍ यथोचि‍त अभि‍वादन केलि‍यनि‍। मि‍त्र महोदय गुम्म-सुम्म पड़ल रहला। हुनकासँ एहेन अवस्‍थामे कि‍छु पूछब उचि‍त नै छल। तँए आँगन दि‍स बढ़लौं। संकेत भेटल जे मि‍ताकेँ चाह दऽ दि‍यनु। गृहि‍णीक आग्रहकेँ हम हुनका तक पहुँचेबाक प्रयास कएल। आग्रहकेँ ओ दुराग्रह बूझि‍ अनठा देलनि‍, तथापि‍ हम बलजोरीए चाहक कप हाथमे धड़ा देलि‍यनि‍। शनै: शनै: चाहक चुस्‍की लैत गेला। तइ बीच पान सेहो खि‍ल्‍ली मोड़ल आबि‍ गेलनि‍। पानक खि‍ल्‍ली मुँहमे दाबि‍ कि‍छु स्‍वस्‍थ भेला तखनि‍ हम कुशल क्षेम पूछबाक साहस कएल। ओ उखरल-उखरल जवाब देथि‍ मुदा हम बि‍कछा कऽ पुछैत गेलि‍यनि‍। अन्‍तमे ओ अपन बेथा-कथा कहए लगला- “की पुछै छी! हमरा केहेन तरहक घटनाक शि‍कार होमए पड़ल अछि‍?” उत्‍सुकता बढ़ि‍ गेल जे कोन एहेन घटनाक शि‍कार भेला जइ कारण वगए-वानि‍ वि‍कृत केने छथि‍। सरस लोकसँ एहेन चुप्‍पी सधने छला। खैर! हमर मुद्रा देखि‍ ओ नि‍:संकोच भऽ खि‍स्‍सा सुनबैत गेला आ हम सुनैत गेलौं।  हुनक बि‍आह वर्ष दि‍नक भीतरे भेल रहनि‍। सासुर मनोनुकूल भेल छेलनि‍। ससुर कलकत्ता महानगरीमे नीक पाइ कमाइत रहथि‍न। पहि‍ल जमाए यएह भेल छेलखि‍न तँए हि‍नक सम्‍मान सभ तरहेँ होइत रहनि‍। पत्नी अल्‍प शि‍क्षि‍त मुदा रूप गुण सम्‍पन्ना रहथि‍न। सासु पूर्ण मनोहरथी तँए ई हमर मि‍त्र वि‍वाहोपरान्‍त अधि‍कांश समए सासुरेमे बि‍तबैत रहथि‍। गोरलग्‍गीमे सासु सए-पचासक नोट दऽ हि‍नका मनोबलकेँ बढ़ा देने रहथि‍न। छात्रावासक जीवन-कालक मि‍त्र आब आशमान छुनि‍हार भऽ गेल छला। सदि‍खन सासुरेक प्रशंसा करैत हि‍नक समए बि‍तैत रहनि‍। भाग्‍यक भूत संग छेलनि‍। बी.ए. पास केला पछाति‍ कि‍रानीगि‍रीक नौकरी सेहो भऽ गेल रहनि‍ तँए गर्वोक्त्ती होएब सोभावि‍क रहनि‍। हमरा तँ ओ झूस बुझथि‍, कि‍एक तँ हम वि‍द्यार्थी बनले छेलौं। पंचम वर्षक छात्र संगहि‍ नि‍रस सासुर ओ धाेंछ ससुर-सासु तँए हि‍नक एे तरहक सुसंयोगसँ कखनो काल डाहो उत्पन्न होइत छल। खैर! अपन-अपन भाग्‍य तँए ऐ तरहक डाही भावनाक परित्‍याग तत्‍क्षणे कऽ दैत छेलौं। आइ मि‍त्रक बेथा-कथा ओही मुँहसँ सूनब से आश्चर्य लगैत छल तथापि‍ श्रोता बनि‍ गेलौं। मि‍त्र महोदय कहलनि‍ जे “सासुक आकंक्षा रहनि‍ जे जमाए साइकि‍लपर चढ़ल घंटी टन-टनबैत जे अबै छै से बड़ नीक लगैत अछि‍। ओझहा ईहो साइकि‍लपर चढ़ल घंटी टनटनबैत आबथि‍, कि‍एक तँ हि‍नको नव रेले साइकि‍ल ससुर देथि‍न हम कहि‍ देने छि‍यनि‍...।” “संयोगवश पाँचम दि‍न साइकि‍ल पार्सलसँ रेलबे द्वारा आबि‍ गेल। साइकि‍ल रेलबेसँ छोड़ा कऽ आनल आ जान-बेजान चलौनाइ सि‍खए लगलौं। ऐ तरहेँ शरीरक जे दुर्गति‍ भेल से की कहब? केतेक बेर खसलौं आ चोट जे लागल से तँ देहेमे भीजैत अछि‍। ठेहुनक घाव अखनो वि‍द्यमान अछि‍। कहुना चलबए आबि‍ गेल मुदा ब्रेकपर काबू पाएब आ डाँड़क स्‍थि‍रता नै आएल छल कि‍ सासुक समाद लऽ छोट सार आबि‍ गेला। ऐ तरहक समाद पाबि‍ सासुरक हेतु साइकि‍लसँ यात्र कएल। नवका जोश बेछोह पैडि‍ल दैत चललौं। सासुरसँ कोस भरि‍ पहि‍ले एकटा टोल पड़ैत अछि‍ जेकर नाओं बहुअरबा छि‍ऐ...।” हमरा हँसी लागि‍ गेल तथापि‍ मुँह दाबि‍ कऽ हुनक कथा सुनैत आगू पुछलि‍यनि‍- “हँ तखनि‍ की भेल?” कहए लगला- “टोल परहक रस्‍ता संकीर्ण रहैक आ बगलमे खूब गहींर पोखरि‍ पड़ैत छल। हम साइकि‍ल बढ़ौने जाइत रही आकि‍ एकटा भीमकाय साँढ़ फूफू करैत बि‍च्‍चे बाटपर ठाढ़ छल। हैडि‍ल ति‍रछा केलौं ताकि‍ नि‍कलि‍ जाएब से ब्रेकक खि‍याल नै रहल परि‍णाम ई भेल जे साइकि‍ल समेत भरि‍ छाती पानि‍मे चल गेलौं। कहुना साइकि‍ल समेत ऊपर एलौं। तीतले वस्‍त्र पुनश्‍य आगू बढ़लौं। बादमे ई शंका हुअए जे कि‍यो चि‍न्‍हार लोक ने देखि‍ लि‍अए। गुणक भेल जे झल-अन्‍हारीमे कि‍यो चि‍न्‍ह नै सकल। सासुरक लगीचमे एकटा गाछी छै, जेतए ब्रीफकेशकेँ कैरि‍यरसँ उतारि‍ कपड़ा बदलबाक हेतु सोचल। ब्रीफकेश खोललापर रंगमे भंग पड़ि‍ गेल! कि‍एक तँ पानि‍ भीतर पहुँचि‍ गेल छल। लाल दंत मंजन पानि‍मे घोरा कऽ क्रीच कएल कपड़ाकेँ रंगि‍ देलक, संगे बि‍स्‍कुट पानि‍क संयोग पाबि‍ कपड़ाक तहमे दही जकां जमि‍ गेल छल। सासुरक सामग्री सभ एकदम धि‍नाैन भऽ गेल छल जे देखि‍ आन्‍तरि‍क बेथा उत्‍पन्न भऽ गेल। घूमि‍ जाएब सोचल, मुदा घुमि‍ओ ने सकै छेलौं। ई बात हास्‍यास्‍पद होइत तँए ककरा कहि‍ति‍ऐक, तँए गुरक मारि‍ धोकरा खाइक स्‍थि‍ति‍ भऽ गेल। आखि‍र साहस बटोरि‍ कऽ लथ-पथ कपड़ा नेने साइकि‍लक हैण्‍डि‍ल पकड़ने वि‍दा भेलौं। बाटमे ि‍कयो पूछए नै जे एना कि‍एक? चि‍न्‍हार लोककेँ तँ सत्‍यपर परदा दैत कहुना ससुरक दलान तक एलौं। घंटीक शब्‍द कएल। कि‍छु क्षणक पश्चात छोट सार आ सारि‍ सभ दौगल आएल। सासु खि‍रकी लगसँ देखि‍ रहल छलीह। हमर हतप्रभ अवस्‍था देखि‍ पि‍ति‍या ससुर बाजि‍ उठला- ‘ओझहा भीजल छथि‍ आ रूग्‍न देखाइत छथि‍ की कारण?’ हुनको संग फूसि‍ बाजि‍ तँ खेपलौं। भीतरे-भीतर कपड़ा बदलबाक व्‍याकुलता बढ़ल जाइत छल। आँगनमे पत्नीकेँ हमर अएबाक सूचना जखने देलकनि‍ आकि‍ ओ धड़फड़ा कऽ आँगन अबैत छली कि‍ एकाएक ओल्‍तीक टघारमे पएर पड़ि‍ गेलासँ मोंच पड़ि‍ गेलनि‍। हुनक चि‍त्‍कार सूनि‍ सासु, सरहोजि‍ प्रभृति‍ नारी गणक भीड़ लागि‍ गेल। आब‍ हमरापर के धि‍यान देत! सभ हुनके परि‍चरजामे लागि‍ गेल। हम तीतल वस्‍त्र पहि‍रने बधलग्‍गू जकाँ मूक दर्शक भेल रही। कि‍छु कालक पछाति‍ आंगन जेबाक हेतु अनुमति‍ भेटल। पत्नीक कहरबाक शब्‍द हृदैकेँ वि‍दीर्ण केने जाइत रहए। सरहोजि‍ आ सारि‍क ऊपरसँ व्‍यंगवाणक प्रहार होइत रहए। आखि‍र कपड़ा बदलि‍ स्‍वस्‍थ भऽ बसि‍‍ गेलौं। जलपानक पश्चात यएह सुनबामे आएल जे कोन कुयात्रासँ चलल छेलौं जे अबि‍ते-अबि‍ते ललीक टाँगमे मोंच पड़ि‍ गेलै। आखि‍र हमर बेथाक थाह केकरा छेलै जे सुनितए? मोने-मोन पचबैत छेलौं...।” “...रात्रि‍ वि‍श्राम शय्यापर जखनि‍ पड़ल रही तखनि‍ पत्नीक आक्रोशपूर्ण स्‍वर औरो बेचैन कऽ देलक। आखि‍र जखनि‍ हम अपन कथा-बेथा कहि‍ सुनौल तँ हुनको अश्रुपात् हुअए लगलनि‍, ऐ तरहेँ गेरूआक सम्‍पूर्ण भाग नोरक टघारसँ भीजि‍ गेल आ कखनि‍ नीन्न आएल से नै जानि‍। प्रात: कालक हुनक पएर फीलपाॅवक बि‍मारी जकाँ प्रतीत भेल। आखि‍र देहाती उपचारक संग कि‍छु दबाइ-महलहमक ओरि‍यौन करौल। तत्‍पश्चात् प्रस्‍थान करबाक नेआर केलौं। मुदा सरहोजि‍क प्रबल आग्रहपर रूकि‍ गेलौं। हुनका लोकनि‍क कठचौल होइत- ‘हँ! दाइक पएरक दर्द तँ अहींक ससारलासँ ठीक हेतनि‍ इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍।’ आखि‍र दि‍नक भोजन काल जेठ सरहोजि‍ कहलनि‍- ‘ओझहा जेठक पटुआ सागक अलौकि‍क सुआद होइ छै जँ आमक टि‍कुला देल हो तँ...। हम बड़ यत्नसँ बनौल अछि‍। जमाएकेँ सागक ति‍मन देब नि‍षेध होइत तथापि‍ हमर आग्रह जे कनी ईहो खा लीअ।’ कहलि‍यनि‍- ‘बेस लाउ।’ खा लेलौं। छोट सरहोजि‍ दही-चीनी देलोपरान्‍त पाकल केरा सोहि‍ कऽ चारि‍ गोट छि‍मरि‍ धऽ देलनि‍। अगत्‍या ऊहो आग्रह मानि‍ खा लेलौं। हम इसनोफि‍लि‍याक पेसेन्‍ट रहबे करी साइकि‍ल सवारी ई सभ‍ बि‍मारीक हेतु बनि‍ गेल आ डेरापर अबैत-अबैत दम फूलए लगल। तीन दि‍न धरि‍ रोगशय्याक सेवन केलौं। सूइया-दवाइक बलपर त्राण तँ भेल, मुदा शरीर अखनो अति‍ कमजोर बुझना जाइत रहए। वेतनमे कटौती हेबाक संभावना अछि‍ तँए अहाँ जँ सहयोग करी तँ मेडि‍कल सर्टिफि‍केट बना दि‍अ। अहाँकेँ डाक्‍टर सभसँ हेम-क्षेम नीक अछि‍। हम कहलि‍यनि‍- पाँच गोट टाका फीस देबनि‍ तँ कि‍एक ने बना देता। ओ तमकि‍ गेला आ कहए लगला- तखनि‍ अहाँक कोन प्रयोजन फीस देलासँ तँ डाक्‍टरसँ जे मोन हएत से लि‍खबा लेब। हमहूँ जीवनमे सीखलौं जे मोनक बात केकरो नै कहबै। जरलपर नोन नै छीटू। एक तँ साइकि‍लक बेथा आ तैपरसँ अहाँक कठ हँसीपूर्ण बात दुनू हमर हृदैकेँ वि‍दीर्ण करैत अछि‍। खैर, यात्राक फेर छल आ सासुक सि‍नेह-संकटक संकेत।” हुनक बात सुनि‍ अन्‍तमे मुफ्तमे काज करा देबाक आश्वासन देलि‍यनि‍। पुनश्‍च ओ अपन सासुरक पोटरी खोलए लगला, मुदा कार्यरत लोक की सुनत तँए संक्षेपणक सलाह दऽ हुनकासँ मुक्‍त भेलौं। मुदा आइयो सासुरक साइकि‍लक कथा-बेथा हास्‍यहास्‍पद रूपमे चर्चित अछि‍। जवाहर लाल कश्यप स्ट्रेश बस्टर "रागिनी जल्दी चलु 6.13 के ट्रेन भेट जायत तखन समय पर घर पहुँचब आ घरक काज जल्दी भ जायत" सुशीला ऑफिश स निकलैत रागिनी के हाथ ध क बजलीह / "नहि आई हम संगे नहि जायब /" "ओकर फोन आयल छल कि ?"w "हॉ ओकरे फोने आयल छल कहलक जुहु मे भेट करु" रागिनी के मुँह पर लज्जा मिश्रित मुस्कान आबि गेल / ओकर बाद दुनु अलग अलग दिशा मे मुम्बई के भीड के हिस्सा भ गेलीह /मुम्बई के भीड, भागैत भीड, एक दोसर स आगा बढबा के होर लैत भीड, धकियाबैत मुकियाबैत भीड, पता नहि ई होर कहिया खतम होयत / ओहि भीड के अंग बनि सुशीला अन्धेरी स्टेशन पर आबि गेलीह / ट्रेन पहिले आबि गेल छल आ लगभग भरि गेल छल /ओ ओहि मे चढि गेलीह / बैसबाक नहि मुदा सोझ स ठाढ होबाक जगह भेट गेल छल / समय बीति रहल छल आओर् लोक ट्रेन मे चढल जा रहल छल / तिल रखबाक जगह नहि छल मुदा आदमी तैयो सन्हियायल जा रहल छल / मुम्बई के ट्रेन मे भारतक छवि देखल जा सकैत अछि / कोना नाना धर्म, नाना जाति , भिन्न-भिन्न प्रकार के वेश धेने सब एक संग समाहित भेल अछि आ अपस्यॉत भेल जिन्दगी जीबय लेल आ देश चलनिहार के गारि पढबाके लेल विवश भेल छथि /  ट्रेन चालु भेल आ सब कियौ भगवानक जयकारा लगेलक / सुशीला रागिनी के लेल सोचय लगलीह हमरा त अप्पन काज स फुरसति नहि होईत अछि, आखिर कोना ओ सब काज करैत हेती /अप्पन आफिसक काज , घर मे दुनू बच्चा के काज , पति के काज तखन बॉयफ्रेंडक नखरा से अलग / पता नहि भारतक पतन आ पाश्चात्यक नकल कतय जा रुकत /  * * * "आई पहिले आबि गेलहुँ" सुशीला घर मे घुसैत आँफिस स आयल अप्पन पति के देखि बजलीह / खुशी बड्ड भेलन्हि मुदा भरि दिनक झमारल मुँह पर ओ खुशी नहि आबि सकल आ मोनक ओहि खुशी के राहुल (पति) नहि देख सकलाह / राहुल व्यंग केलथि ,"चलु आई गलती भेल आब हम जल्दी नहि आयब /" "हाँ जल्दी आबि क हम्मर उपकार केलहुँ . . ." सुशीला खिसिया गेलीह "तखन स टी व्ही देख रहल छी / एक कप चाह नहि पिने होयब ? रवि (बेटा) के स्कुल स आनि लाबितहुँ, सेहो नहि केने छी…."  राहुल बीच मे खिसिया क बजलाह "एक दिन हम सबेरे आबि जाउ तकर मतलब जे सब काज हमहीं करु /"  "नहिं , आबि क टीव्ही देखैत रहु " सुशीला बैग राखैत, जबाब डेल्खिन्ह् / हन हन करैत , घरक दरबज्जा जोर स बन्द करैत, रवि के लावय लेल स्कूल विदा भ गेलीह /भरि रस्ता अप्पन क्रोध के शांत करबाक प्रयास करैत रहली मुदा क्रोध छल जे शांत हेबाक नाम नहि ल रहल छल / पता नहिं पुरुख जाति कहिया स्त्री के अपन सम्तुलय मानत / जतेक काज ऑफ़िश मे ओ करैत अछि ततेक त हमहुँ करैत छी, तखन कथीक घमंड / रवि के स्कूल मे छुट्टी होमय बला छल गार्जियनक लाईन लागल छलै, सुशीला मोने-मोन खिसियाईत पता नहिं ई लाईन स कहिया छुट्टी होयत जतय जाउ ओतय लाईन, बस मे लाईन, ट्रेनक टिकट मे लाईन, रोड पर गाडी के लाईन/तखने छुट्टी के घंटी बाजल / बच्चा सब अप्पन-अप्पन गार्जियन सब लग आबय लागल/ रवि के कुम्हलायल फुल सन सुखायल मुँह के देखिते सुशीलाक क्रोध ममत्व मे बदलि गेल / अप्पन जमाना याद आबय लागल / एकटा स्लेट ल क स्कूल गेनाई ,जतय पढाई कम,मौज-मस्ती ज्यादा /पढाबय के जगह पर कुर्सी पर बैस क सुतय बला मास्टर साहेब पासवान जी /खिस्सा सुना क पढाबय बला चन्द्रकांत बाबु /आब अपना स ज्यादा भाडी बैग /डिसिप्लिन के नाम पर बच्चा के टार्चर करैत सर / अहि चक्कर मे हरा गेल बचपना / सुशीला अहि बात के सोचैत अप्पन घर आबि गेल आ आबिते क्रोध अप्पन चरम पर पहुँच गेल / रवि घर मे नहि छल, घर मे ताला लागल छलै आ घर के दोसर चाभी सुशील के बैग मे रहै / रवि के मोबाईल स्विच आँफ छलै आब एकटा उपाय छल जे पडोसी के घर मे बैस इंतजार कैल जाय आ सुशीला वैह करय लगलीह /ज्यों-ज्यों समय बितैत छल हुनकर क्रोध चरम पर जा रहल छल / ओ आ रवि दोसर के घर मे बैसल परेसान भ गेल मुदा राहुल के कोनो पता नहिं / रातिके 9.35 मे राहुल घर आयल आ अप्पन गलती पर सफाई देनाई सुरु केलक, सुशीला ओकरा बिना सुनने अंदर आबि गेलीह / राहुल -" साँरी हमरा ई अंदाज न......... सुशीला- "चुप भ जाउ हमरा कोनो बात नहि सुनय के अछि /" सुशीला के क्रोध देखि रवि त सहमि गेल मुदा राहुल और खिसिया गेलाह / ओहि राति दुनु प्राणी मे खुब झगरा भेल / राहुल सुशीला पर पहिल दिन हाथ छोडि अप्पन पुरुषत्व सेहो प्रदर्शित केलाह /तीनु प्राणी भुखले सुतलाह /  रातिक घटनाक प्रभाव भोर मे सेहो देखल गेल / राहुल बिना खाना खेने चलि गेलाह /सुशीला रवि के खाना खुआ स्कूल भेजि अपने बिना खेने चलि गेलीह / फ़ेर सुरु भेल ट्रेनक वैह भीड / अंधेरी मे ट्रेन स उतरि ऑफिस के लेल बिदा भेलीह तखने रागिनी के फोन आयल कहाँ छी हमहुँ अंधेरी आबि गेल छी / सुशीला ओकर इंतजार करय लगलीह /किछु देर मे खुशी मोन रागिनी आयल आ दुनु आँफिस के लेल बिदा भेल /सुशीला -" कि बात छै आई बहुत खुश छी /" "हम त अहिना खुश रहैत छी" रागिनी के जवाव छल "जिंदगी के एकटा मकसद अछि जे खुश ऱहु /"  सुशीला -"एकटा बात पुछु खराप नहि ने मानब ?" पुछु.... "अहाँ जे दोसर लडका स भेंट करय जाईत छी से के अछि ?अहाँक बियाह भ गेल अछि, दू टा बच्चा अछि तखन ओकर की महत्व ? ओ अहाँक के अछि ?"  रागिनी के मुँह पर मुस्कान आबि गेल -"ओ हम्मर कियौ नहि अछि आँफिस मे सर स परेशान आ घर मे पति के पुरुषत्व स / बस ओ स्ट्रेश बस्टर छै ,स्ट्रेश बस्टर ......... फागुलाल साहु माइक डाँट बात बचपनक छी। हमर माए सदि‍खन हमरा नजरि‍ चढ़ौने रहै छेली। पढ़ाइ खाति‍र सदि‍खन समझबैत रहै छेली, स्‍कूलक समैमे खि‍या-पि‍या कऽ सहि‍यारैत-पुचकारैत वि‍द्यालय पठबैत छेली। मुदा हम तँ बेसी दि‍न अदहे बाटमे सङतुरि‍याक सङ खेलैत रहि‍ जाइत रही। जखनि‍ वि‍द्यालयक छुट्टीक समए होइ छल तखनि‍ झटदनि‍ घर आपस आबि‍ जाइ छेलौं। हमर माए नीक-नि‍कुत खाइले दऽ दइ छेली। मुदा हम तँ वि‍द्यालयक चौकैठो तक ने जाइ छेलौं। तँए, मन तँ गुदगुदाइत रहै छल। माए जखनि‍ आन छात्र सभसँ पुछै छेलखि‍न हमर हाल-चाल तँ सभटा पोल खुलि‍ जाइ छल। नै पढ़बा खाति‍र बहुतो टाँट-फटकार करैत लुलुआबैत छेली। हम मुँह लटकौने चुप्‍पी साधने सज्‍जनक स्‍वरूप बनौने लि‍बि‍र-लि‍बि‍र तकैत माइक ममता जगबैत अप्‍पन दोख छुपबैत सफाइ वचन बजैत रहै छेलौं। तेतबे नै! पीटाइओ तँ खाइए पड़ै छल। पि‍ताजीक सेहो आ गुरुजीक तँ अलगे। मुदा हमरा तँ माइक डाँट बड़ अधला जकाँ लगै छल। हमरा ऐ बातक भान थोड़े छल जे माए पढ़ाइक महत जनै छथि‍न तँए डँटै छथि‍न। जेना-तेना मैट्रि‍क धरि‍ तँ आबि‍ गेलौं मुदा पढ़ाइमे हम केहेन छेलौं से तँ बुझि‍ए गेल हएब। पि‍ताजी सेहो हमर पढ़ाइ-लि‍खाइ खाति‍र चि‍न्‍ति‍ते रहै छला। पि‍ताजी सदि‍खन चि‍न्‍तामे डुमल रहै छला। एक दि‍न दि‍लक दौड़ा पड़ि‍ गेलासँ स्‍वर्गधाम चलि‍ बसला। आब हमरा वि‍द्यालय जेबाक सङ घर परहक पढ़ाइ सेहो बन्न भऽ गेल। चूकि‍ घरोक काज-भार हमरेपर पड़ि‍ गेल। बोर्ड परीक्षामे सेहो फेल भऽ गेलौं। मैट्रि‍क परीक्षामे फेल भेने लागल कि‍ सम्‍पूर्ण जीवन दुखे-दुखमे बि‍तल। सङी-साथीक सेझहा लज्‍जि‍त सेहो रहए पड़त, ई सोचैत मन पड़ल माइक डाँट-फटकार। जखनि‍ ओ हमरा पढ़ाइ खाति‍र डँटै छेली तखनि‍ हमर अन्‍तर आत्‍मासँ अवाज आएल- “अखनि‍ बेर नै भेल अछि‍, समए बँचल अछि‍ शेष।” आब हमरा पढ़ाइक जुनुन सवार भऽ गेल। हम पुन: मैट्रि‍कक फार्म दुबारा भरैत पढ़ाइ शुरू केलौं। मैट्रि‍क परीक्षामे प्रथम स्‍थान केलौं। प्रथम स्‍थान पाबि‍ आगूक पढ़ाइ जारी रखलौं। माइक कृपा भेल, सङे असि‍रवाद भेटए लगल। आजूक दि‍न सरकारी सेवामे पदाधि‍कारीक पदपर रहि‍ सेवा दऽ रहल छी। माइक डाँट, असि‍रवादमे बदलि‍ गेल। हमर कामयावीक सभटा श्रेय माइक छी। सङे हमरा ई अनुभव भेल जे माता-पि‍ताक डाँट-फटकार बेजा नै होइत अछि‍। कि‍एक तँ माइक डाँटमे बच्‍चाक भलाइक कामना नुकाएल रहैत अछि‍। अखि‍लेश मण्‍डल ललि‍याएल मुँह डमहाएल गुलाब खास आम जकाँ राम सरूपक ललि‍याएल मुँह देखि‍ सुशीलक मनमे भेल जे कि‍छु पौलक अछि‍। ओना पबै-पबैक अपन-अपन खुशी होइ छै, मुदा मुँहक जेहेन लाली देखै छि‍ऐ ओइसँ कि‍छु खास पबैक बूझि‍ पड़लै। राम सरूप स्‍कूलक सङी छि‍ऐ, हाइ स्‍कूलमे दुनू गोटे एके कि‍लास दसमामे पढ़ि‍तो अछि‍। पुछलकै- “सरूप भाय, कथी पेलौं हेन मन बड़ ललि‍याएल बूझि‍ पड़ैए, ओइमे हमरा सबहक हि‍स्‍सा नै हेतै?” ‘हि‍स्‍सा‘ सुनि‍ राम सरूप ठमकि‍ गेल। मुदा ओहेन ठमकान नै ठमकल जे पाछू ससरैत। रोग उतरि‍ते जहि‍ना कोनो रोगीक मुँहक रोहानी घूमि‍ जाइ छै, तहि‍ना राम सरूपोक घूमल। मनमे जेना लबालब उल्‍लास भरल होइ तहि‍ना भरल बूझि‍ पड़लै। दोहरबैत सुशील बाजल- “सरूप भाय, की बात छि‍ऐ जे करि‍याएल मुँह एना ललि‍आ गेल अछि‍?” ‘करि‍याएल मुँह’ सुनि‍ राम सरूप अपन पहुलका वि‍वशता देखबैत बाजल- “सुशील भाय, समए करोट फेड़लक। अहाँकेँ देखि‍ते मन लजा जाइ छल जे की कहि‍ पच्‍चीस रूपैआ पैंच नेने रही आ अखनि‍ तक नै दऽ सकलौं!” राम सरूपक बेवसाएल बात सुनि‍ मन सहमि‍ गेलै। सहमि‍ ई गेलै जे अनेरे वेचाराकेँ एहेन बात कहलि‍ऐ। पचीस रूपैआक जे मोल एकरा लेल छै से हमरा लेल थोड़े अछि‍। अपने ऊपर गरानि‍ हुअ लगलै। मुदा जे बात मुहसँ नि‍कलि‍ गेल ओ दोहरा कऽ आपसो तँ नहि‍येँ आबि‍ सकैए। अपनाकेँ सम्‍हारैक कोशि‍श करैत सुशील बाजल- “राम सरूप भाय, अहाँपर हम व्‍यंग्‍य–वाण नै चलेने छेलौं, जँ अहाँ से बुझैत होइ तँ गलती भेल माफी मंगै छी।” ‘माफी’ सुनि‍ जेना राम सरूपोक वि‍चार थकथकाएल। बाजल- “सुशील भाय, समए घूमल। दि‍न बदलल।” राम सरूपक अधकट्टी पाँति‍ सुनि‍ जइ ढंगे बुझक चाही से नै बूझि‍, सुशील पुछलक- “की समए घूमल आ दि‍न बदलल?” राम सरूपक करि‍याएल मुँह जेना पाकल डोमा बम्‍बै आम जकाँ भीतरेसँ ललि‍आ गेल होइ तहि‍ना बाजल- “सुशील भाय, मामा गाममे एक कट्ठा खेत हमरो भेल। पि‍ति‍यौत मामा कहलनि‍, बौआ एक कट्ठा खेतसँ गुजर नै चलतह से हमरा दऽ दैह। बदलामे तोरा पाँच एच.पी.क इंजन कीन दइ छि‍अ। तत्‍-खनात पटौनीक काज करि‍हऽ, जेना-जेना कमाइ होइत जेतह, तेना-तेना काजक जोड़-जाड़ करैत आगू बढ़ि‍हऽ।” राम सरूपक मन वि‍राम नै लि‍अ चाहै छल, जेना कि‍छु आरो बजला पछाति‍ लइतै, मुदा सुशीलेक मन सुनि‍ औगता गेलै। बाजल- “तखनि‍ तँ जि‍नगीक रंगे बदलि‍ जाएत।” असि‍या आस लगबैत राम सरूप बाजल- “पहि‍ल दि‍न, दुइए घंटा आइ चलेलौं। दमकलक हि‍साब अखनि‍ तँ नै बुझै छि‍ऐ। ओ इंजीनेबला आकि‍ इन्‍जीनि‍यरे बुझैत हेता। जे नव मशीनक पहि‍ल साल दोसर साल आ तेसर साल केहेन होइ छै। मुदा एते आशा तँ भाइए गेल अछि‍ जे जँ दू घंटा सभ दि‍न चलाएब तँ गुजरो कऽ लेब आ पढ़ि‍ओ लेब। सोलहो आना आशा भऽ गेल अछि‍ जे जँ अपनो भरोसे जीबए चाहब तँ जीबो लेब आ पढ़ि‍ओ-लि‍खि‍ लेब।” बि‍पि‍न कुमार कर्ण ‘करण’ सरकारीए नौकरी कि‍ए? गामक मानल झगरौआ चौबटि‍या, केतेक रास इति‍हास ऐ चौबटि‍यासँ जुड़ल अछि‍, सौंसे गामक लोक नीक-बेजए अपन-अपन भरास ऐ चौबटियेपर आबि‍ नि‍कालैत अछि‍। ओना गाममे आरो बहुत रास चौराहा सभ अछि‍, मुदा ऐठाम आबि‍ अपन शान बघारब गामक लोककेँ बड्ड रास अबै छन्‍हि‍। गामक सभटा झगड़ा-झंझटि‍, पंचैती, गप-सर्ड़का, खास कऽ संझुका पहर पीला पछाति‍ अपन लठैती देखाएब ऐ चौबटि‍याक सोभाव बनि‍ गेल अछि‍। खैर! संयोगसँ हमरो घर ऐ चौबटि‍याक नाकेपर अछि‍। नहि‍योँ चाहैत अङनासँ नि‍कलि‍ते पहि‍ने चौबटि‍येक दर्शन होइत अछि‍। कनी अबेरेसँ सुति‍ कऽ उठल रही। भि‍नसुरका क्रि‍यासँ नि‍पटि‍ अङनासँ बहरैलौं आकि‍ सुन्‍दर काकापर नजरि‍ पड़ल। काका पड़ोसीए छथि‍। सभ दि‍न परदेशे खटलथि‍। केतेक दि‍नक बाद कक्काक दर्शन भेल। कहलि‍यनि‍- “गोड़ लगै छी सुन्‍दरकाका।” “खूब नीक रहू बाबू, नीके ना छी ने सभ कि‍यो?” कहलि‍यनि‍- “हँ, प्रभूक दया छन्‍हि‍, सभ कि‍यो नीके छी। मुदा अपने तँ ऐबेर बड़ दि‍नपर एलौं हेँ काका? काकी सेहो एलखि‍न हेन?” “हँ यौ, सभ कि‍यो एलौं अछि‍। बड़ दि‍न भऽ गेल छल गाम एला। होली पावनि‍ छले, तँ सोचलौं जे गाम भऽ आबी।” हम कहलि‍यनि‍- “तहन तँ बड़ नीक समैपर एलौंहेँ काका, भोज सेहो परि‍ लागि‍ जाएत।” “कथीक भोज यौ, हमरा तँ गामक भोज कहि‍यो खेलौं से मनो ने अछि‍। जहि‍यासँ मद्रास पकड़लौं आ ट्रान्‍सपोर्टक नोकरी धेलौं तहि‍यासँ बुझू सभटा बि‍सरि‍ए गेलौं। अच्‍छा छोड़ू ई सभ बात। ई कहू जे भोज छी केतए?” “नै बुझलि‍ऐ काका, इन्‍दू भाइक परसू बि‍आह छि‍यनि‍। काल्हि‍ कुमरनक भोज हएत टोलमे आ परसू बरि‍याती जाएत। अहीठाम लगेमे इमादपट्टी।” “ई इन्‍दू कि‍नकर लड़का छि‍ऐ। नबल भाइक छि‍यनि की?‍” “हँ। नवल कक्काक चारि‍म लड़का छथि‍न। हमरासँ तीन सालक जेठे हेता। आब तँ हमरो तैंतीसम चलि‍ए रहल अछि‍ कि‍ने।” चनौरागंज एन.एच.क उत्तरमे बसल ई छोट-छि‍न गामक ऐ चर्चित चौबटि‍यापर एकटा ने एकटा लोक अबि‍ते-जाइत रहैए। चौबटि‍याक दछि‍नवरि‍या बाटसँ जेना मुसना सुनि‍ते आएल आ बि‍च्‍चेमे टपकि‍ गेल- “गोड़ लगै छी बाबा।” सुन्‍दर काका दि‍स लपकैत पुन:- “नै बुझलि‍ऐ, कएथक बि‍आह तँ अदहा उमेर बि‍तला पछाि‍तए ने होइ छै। देखि‍यौ इन्‍दू भाइकेँ, की चालि‍स बरखसँ कम होइत हेतनि‍। हमरासँ दू बर्खक जेठे हेता। ताबत हमर धि‍यो-पुतो जमान भऽ गेल।” सुन्‍दर काका गौरसँ चि‍न्‍हैत कहलखि‍न- “अँए रौ, एना लम्‍पट जकाँ कि‍ए बजै छेँ। महन्‍थु दुसाध तँ बड़ भलमानुस छेलौ। सभ कएथक की तीस बर्खक बादे बि‍आह होइ छै। हमरा तँ बाबू मैट्रि‍कमे पढ़ि‍ते रही तहि‍ए कथा ठीक कऽ लेलनि‍ आ परीक्षाक बाद बि‍आहो भऽ गेल।” मुसना बाजल- “नै बुझलि‍ऐ बाबा, आखि‍र बि‍आहो तँ उमेरेपर ने नीक होइ छै।” “हँ-हँ ठीके कहलि‍ऐ मुसन भाय, जहि‍यासँ अहाँ वार्डमेम्‍बर बनलि‍ऐ हेन तहि‍यासँ खूब उपदेश दइ छि‍ऐ अपने।” “हमर गप की नै नीक लागल प्रवीण भाय? लि‍अ माफ करब। जाइ छी, आइ इन्‍दि‍रा अवासबला कि‍छु पेमेन्‍ट सभ अछि‍।” कहि‍ मुसना पछि‍म दि‍शामे चलि‍ दैत अछि‍। “अच्‍छा तँ अपन कहू प्रवीण, काज-धंधा केहेन चलैए?” सुन्‍दरकाका गपकेँ नव मोड़ देलनि‍। “नीके चलैए काका। इमानदारीसँ जे कमाइ छी तइमे नून-रोटी नीके जकाँ खाइ छी। दि‍ल्‍ली-बम्‍बई जा नोकरी करब तँ हमरा कहि‍यो नीक नै लगल। हँ एलआइसीक काजसँ एक-आध महि‍ना लेल मद्रास जाइ छी तँ बुझू जे मन औना जाइत अछि‍। जनि‍ते छी काका जे अहू लाइनमे भेड़ि‍या-धसाँन छै। पेटक खाति‍र बाहर जए पड़ैत अछि‍, मुदा सच्‍च कही काका गाम तँ गाम छी, बुझू स्‍वर्ग छी। शहरक धुआँ-धुकुरमे दम घूटि‍ कऽ रहि‍ जाइत अछि‍।” “हँ से तँ सखे लोक बाहर जाइए, अपना ऐठाम रोजगारक अभाव अछि‍। बेरोजगारीक समस्‍या दि‍न-व-दि‍न बढ़ले जा रहल अछि‍।” “ई आब पुरान गप भेल सुन्‍दरकाका। कृषि‍ कार्यक अलादो बहुत रास रोजगारक संभावना जगेलक अछि‍ सरकार, आब ऐ सुचना क्रान्‍ति‍क जुगमे बहुतो क्षेत्रमे रोजगारक सृजन सभ भऽ रहल अछि‍, हँ पहि‍ने ई समस्‍या सभ जरूर छल। कहि‍यो बाढ़ि‍ तँ कहि‍यो सुखार, सुतरल तँ भरि‍ कोठी धान नै तँ ठन-ठन गोपाल।” काका पलटी मारलनि‍। आखि‍र हुनको तँ सुख-दुखक बहुत रास अनुभव छन्‍हि‍। बजला- “रोजगारक संभावना तँ सभ दि‍नसँ अछि‍ गामो-घरमे, जरूरति‍ अछि‍ सृजन करबाक। अपना ऐठामक माटि‍-पानि‍मे सुस्‍ती अछि‍। आन-आन शहर जा कऽ लोक खून-पसीना एक कऽ दैत अछि‍ मुदा अपना घरमे अलि‍साएल पड़ल रहैत अछि‍। कहबीओ छै, ‘भुखले रहब तँ सुतले रहब आ सुति‍ कऽ उठब तँ अँइठ कऽ चलब।’ खैर छोड़ू हम आनकेँ की कहबै, हम तँ अपने देशक छोड़पर जा कऽ गुजर-बसर करै छी।” दुनू गोटे गप-सप्‍प करि‍ते रही आकि‍ ताबत चन्‍द्रकान्‍त भैया सेहो आबि‍ गेला। चौबटि‍या तँ ओना मुख्‍य रूपसँ कएथटोलीक नाकेपर अछि‍, मुदा पासमान टोलक धमगीजरीए सभ दि‍न हाबी रहल की मजाल जे कोनो कएथ भाय कि‍छु बजता। गारि‍-गलौज सुनैत रहै छथि‍ आ नीके ना पचबैत रहै छथि‍। चन्‍द्रकान्‍त भैया बजला- “की यौ काका जेना बुझाइए जे भोजक चर्चा भऽ रहल अछि‍।” हम कहलि‍यनि‍- “हँ भैया, काकाकेँ बहुत दि‍नपर भोज परि‍ लगतनि‍ तँ कि‍ए ने सुआदक चर्च पहि‍नेसँ करी।” चन्‍द्रकान्‍तजी बड़ सुलझल एम.ए.पास बुधि‍जीवि‍ बेकती छथि‍। सौंसे गाममे हुनकेटा मे ईष्‍या आ भेदभावक कोनो चैन्‍ह नै छन्‍हि‍, बजला- “कि‍एक ने टोलमे भोज हुअए आ चर्च नै हुअए तँ फेर भोजक मजे की।” सुन्‍दर काका कोनो गंभीर सोचसँ फराक भऽ बजला- “मुदा चन्‍द्रकान्‍त, इन्‍दूजी एतेक उमेरपर बि‍आह कि‍ए केलनि‍?” “नै बुझलि‍ऐ काका, अपना सबहक ऐठाम जाबत लड़ि‍का पएरपर नै ठाढ़ भऽ जाइए ताबत बि‍आह केना करत। इन्‍दू सेहो अखनि‍ धरि‍ नीक सरकारी नोकरीक खोजमे पढ़ि‍ते रहि‍ गेला। अदहा उमेर बीति‍ गेलनि‍ तखनि‍ जा कऽ एकटा कि‍रानीक नोकरी भेलनि‍।” “अँए हौ चन्‍द्रकान्‍त, तँए की जँ सरकारी नोकरी नै हुअए तँ लोक बि‍आह नै करत।” “करत कि‍एक नै काका। मुदा जौं सरकारी नोकरी नै होइत तँ इन्‍दूकेँ दस लाख टाका केना भेटि‍तनि‍ दहेजमे। ई तँ भाग मनाउ जे एतेक मेहनति‍ आ तपस्‍याक बादो बेचारा कि‍रानीए भेला। जँ कोनो ओफि‍सर होइतथि‍ तँ तीस लाखसँ कम दहेज मांग नै करि‍तथि‍। खैर चलू, जे होइ छै से हुअ दि‍औ। माइओ-बाप तँ हुनके ने अन्न आ दबाइ बि‍ना तड़ैप-तड़ैप कऽ मरलनि‍।” “अपना सबहक ऐठाम एकटा बड़ पैघ ओझरी अछि‍ काका, नइ कि‍ ई अपन जाति‍मे बल्‍की सौंसे बि‍हारक ई समस्‍या छि‍ऐ। ऐ राज्‍यक, खास कऽ मि‍थि‍लाक सभ कि‍यो सरकारीए नोकरी कि‍ए चाहैए। आखि‍र सरकारे केतेक लोककेँ नोकरी देत। मनुखक संख्‍या तँ मच्‍छरे जकाँ बढ़ल जा रहल अछि‍- अकासे फाटि‍ जाएत तँ दरजीक बापक दि‍न छी जे सीब लेत। सरकारो अपन संसाधने मोताबि‍क ने नोकरी देत। मुदा बि‍हारक लोक तँ सरकारी नोकरीकेँ अपन प्रति‍ष्‍ठे बना लैत अछि‍, तँए कि‍ अपन रोजगार करएबलाकेँ समाजमे कम प्रति‍ष्‍ठा छै।” हम कहलि‍यनि‍ तैपर काका बजला- “ठीके कहलि‍ऐ अहाँ। दोसर प्रदेशमे जा कऽ देखि‍यौ सरकारी नोकरीक पाछू कहाँ एतेक लोक भागैए, जेकरा जेतेक ज्ञान आ कुब्‍बत छै तइ अनुकूल लोक अपन जीवन-यापन करैए। तँए कि‍ कोनो राज्‍य बि‍हारसँ पाछू अछि‍?” धाँइदनि‍ चन्‍द्रकान्‍त भैया बजला- “से तँ जुनि‍ पूछू काका, एकटा शि‍क्षामि‍त्रबला मास्‍टरी लेल तीन-तीन लाख घूस दऽ कऽ मास्‍टर बनल अछि‍। तँए कि‍ ओ तीन लाखसँ बेपार करि‍ अपन जीवन नै चला सकै छल?” हम कहलि‍यनि‍- “की करबै भैया, लोकक नैति‍क पतन भऽ गेल अछि‍। अराम आ मंगनीक जीवन सभ जीबए चाहैए। कोनो तरहेँ एकबेर सरकारी नोकरी भऽ गेल तँ मानू गंगा नहा लेलौं, दरमाहा बँचले रहत आ काते-कातक आमदनीसँ गुजारा चलि‍ जाएत। एहने मानसि‍कताबला लोकक भरमार भऽ गेल अछि‍। जि‍नगीक दू ति‍हाइ उमेर तँ सरकारीए नोकरीक आशमे बि‍ता लैत अछि‍। पछाति‍ हारि‍-थाकि‍ कऽ दि‍ल्‍ली-कलकत्ताक रूखि‍ लैत अछि‍। केहेन दुरभाग अछि‍ ऐठामक लोकक।” सुन्‍दर काका विचलि‍त होइत बजला- “सएह देखि‍यौ, देश-दुनि‍याँ चान-तारापर पहुँच गेल मुदा बि‍हारक लोक आइओ पूर्ण नि‍ठल्‍ला भऽ सरकारीए नोकरीक आशमे जीवन बि‍ता दैत अछि‍। आखि‍र वि‍कासक मार्ग केना सुदृढ़ हएत। तँए कि‍ संसारमे रोजगारक कमी अछि‍। हजारो सार्वजीनि‍क क्षेत्रमे लाखो-कड़ोरो रोजगारक अवसरि‍ बाट जोहि‍ रहल अछि‍। पैसो नीक आ प्रति‍ष्‍ठो नीक, मुदा थप्‍पा लेल जे आतूर छथि‍ तेकर पूर्ति केना हएत।” काकाकेँ चि‍न्‍तनक सागरमे उगैत-डुमैत देखि‍ कहलि‍यनि‍- “चि‍न्‍ता जुनि‍ करू काका, परि‍वर्तन जरूर हएत। जे संसारक नि‍अम अछि‍। आशक वंधन जुि‍न तोड़ू, हमरे देखू पढ़बामे बड़ तेज तँ नै मुदा भुसकोलो तँ नहि‍येँ रही। स्‍कूलसँ लऽ कौलेज धरि‍ सभ दि‍न फस्‍टे केलौं, मुदा सरकारी नोकरी तँ नै भेल। जँ हमहूँ इन्‍दूए भाय जकाँ माए-बापक घोर गरीबीक दशाकेँ अनठाबैत बीस बरख धरि‍ सरकारीए नोकरीक तैयारी करि‍तौं तँ की नोकरी नै होइत। मुदा ताबत माए-बाप पुत्रक कमाइक आशमे दम तोड़ि‍ दैत।” बि‍च्‍चेमे चन्‍द्रकान्‍त बलजा- “तँए कि‍ इन्‍दू सन-सन नोकरि‍यासँ प्रवीणक मान-सम्‍मान समाजमे कम अछि‍। इन्‍दूकेँ तँ नीकसँ समाजमे कि‍यो चि‍न्‍हतो नै छन्‍हि‍। समाजक सुख-दुखमे तँ पहि‍ने हमहीं-अहाँ पहुँचब कि‍ने। आखि‍र एहेन सरकारी नोकरीसँ समाजक कोन भलाइ हएत।” काकाकेँ माथपर संतोखक रेखा उभरि‍ एलनि‍। माथक पसीना पोछैत बजला- “आखि‍र, सरकारीए नोकरी कि‍ए?” बेचन ठाकुर हरि‍या इन्‍सपेक्‍टर दूटा दोस मोहन आ सोहन मैट्रि‍कक छात्र। दुनू स्‍कूलसँ पढ़ि‍ कऽ घर अबैकाल रस्‍तामे अपन जीवनक उदेसक सम्‍बन्‍धमे गप-सप्‍प करैत छल। मोहन- “दोस, तोहर की उदेस छौ?” सोहन- “हम इंजीनि‍यर पक्का बनबौ। आ तोहर उदेस?” मोहन- “हम बि‍नु पेनीक लोटा छि‍यौ। हमर कोनो उदेस नै। मुदा एगो कह तँू इंजीनि‍यर केना बनबीही?” “पढ़ि‍ कऽ हेतै तँ हेतै नै तँ मालपर कमाल हेतै।” सोहन जवाब देलक। तैपर मोहन गंभीर साँस लऽ बाजल- “दोस, तोहर बाबू डाक्‍टर छथुन। हुनकर आमदनी अथाह छन्‍हि‍। हुनका लेल पर्वत राय छन्‍हि‍‍। मुदा हमर बाबू गरीब कि‍सान छथि‍। अगि‍ला पढ़ाइमे बेसी खर्चकेँ देखैत ओ लाल झण्‍डी देखबै छथि‍ खाली हमरे हि‍म्‍मतसँ वि‍शेष पढ़ाइ केना हएत? आजुक समान्‍य पढ़ाइ कागतक नाव छी। स्‍कूल कौलेजमे पढ़ाइ कागतेपर बनल सड़क छै। तइसँ हम हरीए इन्‍सपेक्‍टर नै बनि‍ सकै छी तँ और की।” संजय कुमार मण्‍डल एकन्‍त कारी झामड़ि‍, बेस नमगर, पातरे-पातरे, डेन हाथ, मुदा पेट कोहा सन आ कपार सेहो बड़कीटा हंडी सन, टमाटर सन नाक, डोका सन-सन आँखि‍ छल ओकर। पलि‍वारक नाओंपर घरवाली एकटा बारह बर्खक बेटा तेतरा आ बेटी अभेलि‍या। अभेलि‍या पैघ आ तेतरा छोट छल सम्‍पति‍ आ घर-घराड़ीक नाओंपर तीन धुरमे बनल एकटा फूसक घर आ कनीटा अँगना जे सभ दि‍न करची आ खजूरक छाजासँ बनल टाटसँ घेरल रहैत छल जैपर सभ दि‍न पोरो सागक लत्ती लतरल आ लुब्‍धल रहैत छल जाइसँ एकन्‍तकेँ तीमन-तरकारीक अभाव कहि‍यो नै रहैत छल। जहि‍या रूचि‍ नै चढ़ै छेलै तँ अन्‍हरी पोखरि‍ जा मछरदानीसँ कि‍न्‍छरि‍मे दू-चारि‍ बेर अड़ा लइ छल, माछ तँ एक-आध पाव ुहोइ मुदा घोङही बेस रास भऽ जाइ छेलै। माछ कम भेल तँ हरि‍अर मि‍रचाइ आ पीआजु दऽ चटनी बना दू-तीनटा मरूआ रोटी दाबि‍ दैत छल। जौं माछ बेसी भेल तँ तीमन बना लइ छल। आ घोङहीक तीमन तँ तीमन नै तँ सुरका सेहो अपूर्व बनबैत छल। आ नै तँ मलि‍दा चाउरक भात आ माड़ देल पोड़ोक रसगर साग एकन्‍त आ गंजपरवालीकेँ जि‍नगीमे अभावो रहैत प्रेम आ सि‍नेहक डोरीमे कसि‍या कऽ बन्‍हने छल। नगदा पूजीक नाओंपर एकटा बुढ़ि‍या बकरी छल ओकरा, जइसँ जोड़ा छागर सालमे बेचै छल। लूरि‍क मामलामे एकन्‍त जरूर धनि‍क छल। हर-फाड़, चलेनाइ, घर छारनाइ, टाट-फड़क बि‍ननाइसँ लऽ कऽ ढकि‍या, पथि‍या, छि‍ट्टा, कोनि‍याँ इत्‍यादि‍ बनेनाइ माने गाम घरक सभ लूरि‍ छेलै। जइ कारणसँ ओ कहि‍यो बेरोजगार नै बैसै छल। तँए ओकरा कहि‍यो परदेश जाइक जरूरति‍ नै बुझना गेलै। आ बि‍ना दि‍क्कते-सि‍क्कते ओकर जि‍नगीक गाड़ी सतत चलि‍ रहल छल। तेतरा दि‍न भरि‍ बकरीक डोरी पकड़ि‍ चरबैत रहै छल। एक दि‍न तेतरा बकरीकेँ खुट्टीमे ठोकि‍ खेलाए लगल। कि‍छु काल पछाति‍ केम्‍हरोसँ दूटा कुकुर आएल, बकरीक जे दूटा बच्‍चा बगलमे कूदि‍-फानि‍ रहल छल ओकर गरदनि‍ चाभि‍ देलकै। ई देखि‍ बकरीक दोसर बच्‍चा मेमि‍ऐ लगल। बुढ़ि‍या बकरी भरि‍ दम कुकुरसँ लड़ल, पछि‍ला दुनू टाँगपर ठाढ़ भऽ अगि‍ला दुनू टाँग उठा सींगसँ केतेक बेर कुकुरकेँ ढाही मारलक मुदा कुकुरक आगूमे बकरीकेँ की ओकाति‍। कुकुरो दूटा छल, एकटा कुकुर बकरीकेँ थनमे हबकि‍ लेलक, बकरी बेदम भऽ गेल। बकरीक मेमि‍एनाइ सुनि‍ कऽ तेतराक खेलेनाइ भंग भेल, दौगल जा क‍ऽ तेतरा ढेपा-चेपा उठा-उठा कुकुरपर बरसाबऽ लगल। आ धाड़-धाड़ करए लगल। पछाति‍ कुकुर बकरीकेँ छोड़ि‍ पड़ा गेल। कुकुरक आगूमे बकरी बच्‍चाकेँ की बस चलि‍तै। तेतरा हाँइ-हाँइ कऽ रूसल बकरी बच्‍चाकेँ उठौलक, झारलक, देखलक तँ एकटा दोसर बच्‍चाकेँ ठाढ़े ने भेल होइ। ओकरा गरदनि‍सँ छर-छर लेहु बोहि‍ रहल छेलै। तेतराकेँ कि‍छु फुरेबे ने करए। जे की करी नै करी। थाकि‍-हारि‍ कऽ तेतरा दुनू बच्‍चाकेँ काँखमे दाबि‍ बकरीक खुट्टी उखारि‍, रस्‍सी पकड़ि‍ घर दि‍स बि‍दा भेल। अबि‍ते माएकेँ कहलक- “माए गइ, दुनू बच्‍चाकेँ चमरटोलीबला करि‍या कुत्ता हबैक लेलकौ।” तुरंत गंजपरवाली हरदी गि‍रह पीस कऽ लगेलक आ आगि‍ पजारि‍ बकरी बच्‍चाकेँ सेदलक। आ छि‍टटा तरमे झाँपि‍ देलक। ऐ घटनाक असरि‍ एकन्‍तक मनपर बड़ बेसी पड़लै। सोचै छल जे पूजीक नाओंपर तँ बकरीएटा छल कहीं मरि‍ गेल तँ की करब। अगि‍ला दि‍न भोरे उठि‍ कऽ तेतरा छि‍ट्टा उघारि‍ बकरीकेँ देखलक, एकटा बच्‍चा लटपटाएल जकाँ छेलै मुदा दोसरोक स्‍थि‍ति‍ नीक नै रहै। बकरीक स्‍थति‍ देखि‍ तेतरा उदास भऽ गेल, दि‍नमे चि‍ंतासँ खेनाइ नै खेलक। साँझु पहर एकन्‍त केतौसँ घर छाड़ि‍ कऽ आएल तँ देखलक ओकर दुलरूआ बेटा तेतरा भुखले छल। एकन्‍त तेतराकेँ मनबैत कहलक- “बौआ, खा न ले। बकरी ठीक भऽ जेतै।” “नै बाबू, हम नै खाएब। हमर बकरी मरि‍ जाएत। दुनू बच्‍चाकेँ चमरटोलीबला कुत्ता गरदनि‍मे हबैक लेने छै। आ बकरीकेँ थनमे सेहो। हम नै खाएब। जाबे हमर बकरी ठीक नै भऽ जाएत।” एकन्‍तकेँ कि‍छु फुड़ेबे ने करैत। बेटाकेँ केना मनाएल जाए। अंतमे एकटा जुक्‍ति‍ फुड़लै, बाजल- “बौआ, चल तँ अन्‍हरी पोखरि‍, माछ मारि‍ कऽ अनैले। माछ भेल तँ बड़ बढ़ि‍याँ नै तँ घोङही तीमन तँ हेबे करत। चल मछरदानी लऽ कऽ।” माछक नाओंपर तेतरा जेना-तेना तैयार भेल। दुनू बापूत पोखरि‍क ि‍कन्‍छरि‍मे मछरदानी अड़ाबऽ लगल। तीन चारि‍ बेर अड़ेलक तँ लगभग एक सेर घोङही आ अदहा सेर इचना, डेढ़बा आ पोठी, मारा मि‍ला कऽ भेल। दुनू बापूत घर आएल। एकन्‍त हाक दऽ बाजल- “केतए गेलौ यौ गंजपरवाली, माछ मारि‍ कऽ अनलौं आ घोङही सेहो अछि‍। अखनि‍ खूब कड़ू-झड़ू कऽ माछक तीमन बनाउ आ काल्हि‍ दि‍नमे घोङहीक तीमन बना लेब।” गंजपरवाली बड़ी जतनसँ माछ बनेलक। ओकरा सदि‍खन मन रहै जे बकरी सोगे दि‍नमे तेतरा खेनाइ नै खेलक तँए बेस अधि‍क रास कऽ मि‍रचाइ, रैंची, लहसुन दऽ कऽ माछ रन्‍हलक। पूरा टोल बुझू जे गमैक उठल। तेतराकेँ हाक दऽ बाजल- “बौआ, रौ तोंहू हाथ-मुँह धो ले, आ बाबूकेँ बजेने आही। हम खेनाइ काढ़ै छी।” हाथ-मुँह धो दुनू-बापूत खाइले बैसल। मुदा तेतराक धि‍यान बकरीए आ पठरूएपर छेलै। तेतरा बाजल- “बाबू हौ, तूँ खा हम कनी बकरी बच्‍चाकेँ देखने अबै छी।” “धूर बुड़बक खो ने, बकरीकेँ कि‍‍च्‍छो नै हेतै।” ताधरि‍ तेतरा उठि‍ कऽ बकरी बच्‍चाकेँ देखि‍ आएल। दुनू जीवि‍त रहै मुदा स्‍थि‍ति‍ ठीक नै। स्‍थि‍ति‍ देखि‍ तेतराक मन खाइक नै भेलै। मुदा बापक डर आ माछक झसगर गंधपर बेचारा खेनाइ शुरू केलक, नीक लगलै, भरि‍ इच्‍छा खेलक दुनू बापूत। भोजनक गदपर नीन जल्‍दीए दाबि‍ देलकै तेतरा सुति‍ रहल आ एकन्‍त खैनी चुना कऽ खेला बाद पड़ि‍ रहल। राति‍मे लगभग दू बाजि‍ रहल छल, एकन्‍तक पेट जेना फूलल जा रहल छेलै। कछ-मछ करै छल मुदा नीन नै होइ छेलै। थोड़ेकाल बाद पेट एकबेर जोरसँ हड़बड़ेलै आ पैखाना करैक इच्‍छा भेलै। लोटा लऽ कऽ बान्‍हपर गेल। मुदा बेसी दूर नै जा सकल। चटदनि‍ बान्‍हऽ कातमे बैस गेल। कसगर झार भेलै। मुदा पेट शान्‍त नै भेलै। आबि‍ कऽ पड़ि‍ रहल। बुझना जाइ जेना पेटमे कि‍छु गड़ै छेलै। कछ-मछ करै छल थोड़े काल पछाति‍ फेर पैखाना लगलै, वि‍दा भेल, कि‍छु मन हल्‍लुक भेलै। पानि‍ लऽ हाथ मटि‍या उठि‍ वि‍दा भेल आकि‍ फेर मन हदमदए लगलै। बैस रहल फेर दूटा उन्‍टी भेलै देह पसीना-पसीना भऽ गेलै। उठैक साहसे ने होइ। जखनि‍ मन अस्‍थि‍र भेलै तखनि‍ वि‍दा भेल, बुझना गेलै जे ठाढ़ नै भेल होएत। कमजोरी बुझना जाइ छेलै। कहुना हि‍म्‍मत कऽ डेग बढ़ेलक, मुदा घर तक नै आबि‍ सकल रस्‍तेपर खसि‍ पड़ल आ अचेत भऽ गेल। भोरे तेतराकेँ नीन खुजलै तँ बापकेँ बगलमे नै देखल, उठि‍ कऽ बकरी बच्‍चाकेँ देखए गेल तँ दुनू बकरी बच्‍चा मरल, पड़ल छेलै। तेतराकेँ बुकौर लगि‍ गेलै, हबोढकार भऽ कानए लगल। तेतराक कानब सुनि‍ गंजपरवाली सेहो दौग कऽ आएल, जेना-तेना बेटाकेँ चुप केलक। ताधरि‍ मुनेसर बाहरसँ अवाज देलक- “गंजपरवाली छी यै, तेतरा छेँ रौ, देखही तँ बापकेँ की भऽ गेलौ, बान्‍हपर ओंघराएल छौ।” ताधरि‍ अगल-बगलक लोक सभ सेहो जमा भऽ गेल। आ एकन्‍तकेँ उठा-पुठा कऽ घरमे देलक। कि‍यो तेलसँ मालि‍श तँ कि‍यो नून-पानि‍-चीनीक घोल बना कऽ पि‍आबए लगल। जइसँ एकन्‍तक तबीयतमे थोड़े सुधार भेलै। बकरी बच्‍चा मरि‍ए गेल छेलै, बुढ़ि‍या बकरी खढ़ खेबे ने करै, दू-तीन-दि‍न पछाति‍ बुढि‍ओ बकरी टग हानि‍ देलकै। गरीबक पूजी छेलै ई बकरी आ पठरू। सोचै छल दुर्गा पूजामे छागर बेचि‍ कऽ तेतरा आ अभेलि‍याकेँ कपड़ा कीनि‍ देबै, मुदा सेहो आश टूटि‍ गेलै। एकन्‍तकेँ आगूक जि‍नगी अन्‍हार बुझना जा रहल छेलै। कारण पूजीक नाओंपर बकरी आ छागर मात्र ओकर जमा नगद पूजी छेलै। चि‍न्‍ता आ शोकसँ एकन्‍त आरो अधि‍क बि‍मार पड़ि‍ गेल। दस्‍त रूकबे ने करै। पाइक अभावमे डाक्‍टर लग जा नै सकैत छल, आ घरेलू उपचारसँ ठीक नै भऽ रहल छेलै। आब ओकरा दस्‍तसँ सुलबाइ धऽ लेलकै। भरि‍-भरि‍ दि‍न लोटे हाथे रहै छल आ बान्‍हेकातमे बैसल रहै छल। खूने पैखाना होइ छेलै। धीरे-धीरे शरीरमे लौह तत्वक कमी भऽ गेलै। एक दि‍न पैखानापर बैसल-बैसल अचेत भऽ ओंघरा गेल एक-दू बेर हि‍चकी उठलै, मन धुमै छेलै, सगरे अन्‍हारे-अन्‍हार बूझि‍ पड़ैत रहै। उन्‍टीक इच्‍छा होइत रहै, मुदा उन्‍टी होइ नै छेलै। जोरसँ खौंखी उठलै आ खोंखी करि‍ते-करि‍ते दम टूटि‍ गेलै। तेतरा जेना-तेना उधार पैंच कऽ काजसँ नि‍वृत भेल मुदा बकरी आ बापक सोग तेहने भेलै जे ओहो अन्न-पानि‍ ति‍यागि‍ देने छल। भरि‍-भरि‍ दुपहरि‍या बाधमे असकरे बैसल रहै छल आ पता नै कि‍दनि‍ कहाँ बति‍याति‍ रहै छल। एक-दू दि‍न बीतलै, मुदा पेटक आगि‍ केते दि‍न बरदास होइतै। तेतरा बाधेमे बैसल-बैसल कौंकरहरि‍बला माटि‍ खाए लगल। धीरे-धीरे ओकरो शरीर गलि‍ गेलै, पाण्‍डु पकड़ि‍ लेलकै, अन्न खेबाक प्रयासो केलक, मुदा घोंटेबे ने करै। डेढ़-दू मास घि‍सि‍यौर कटैत ओकरो यएह लीला भेलै। समाप्‍त भऽ गेल। अभेलि‍याकेँ बादमे टी.बी पकड़ि‍ लेलकै ओहो दि‍न राति‍ खोंखी आ खूनक उन्‍टी करैत रहै छल। इलाज बेतरे मरनासन्न भऽ गेल। जे दि‍न जइ पहर छै, मरबे करत। गंजपरवाली सेहो लटपटाएले जकाँ। ओहो बि‍मार रहए लागलि‍। जेना-तेना लोक सबहक बरतन-बासन कऽ जीवन-यापन करैत अछि‍। भरि‍ दि‍न भगवानकेँ कहैत रहैए- “सभकेँ छीनि‍ए लेलह हमरा कि‍ए छोड़ि‍ देलह, अभेलि‍योकेँ उठा लहक हे महादेव, कृपा करह हे भोला दानी ऐ कष्‍टसँ फूरसत दैह।” गंजपरवाली भरि‍ दि‍न यएह रटैत रहैए जे हमर अंत कहि‍या हएत हे बाबा हमर अंत कहि‍या हएत। ललन कुमार कामत- ललमनियाँ, मरौना, सुपौल। गोल इंग्लिश गार्डेन निर्मली। स्‍कूलक फीस मानस तीन सालक छल तहि‍ये माएक देहावसान भऽ गेलनि‍। पि‍ताजी गामक मुखि‍या छथि‍न। समाजक कहलापर दोसर बि‍आह केलनि‍। लबकी कनि‍याँ थोड़-बहुत पढ़ल-लि‍खल, सोभावशील, वि‍चारू आ सुन्‍दर भेलनि‍। तीन सालमे मुखि‍या जीकेँ दूटा सन्‍तान और भेलनि‍। चन्‍दन आ नन्‍दन। नन्‍दनक जन्‍मक छह मासक पछाति‍ मुखि‍याजी स्‍वयं भगवानक प्रि‍य भ‍ऽ गेला। एकबेर फेर परि‍वारसँ लऽ कऽ गाम भरि‍मे शोकक लहरि‍ पसरि‍ गेल। मुदा मुखि‍यानि‍ शोकक सागरसँ बाहर आबि‍ तीनू बच्‍चाकेँ लालन-पालनक लेल फेरसँ अपन दि‍न-दुनि‍याँमे लीन भऽ गेली। अपना सुइध-बुइधसँ बच्‍चा सबहक बरबरि‍ लार-प्‍यारसँ पोसैमे कोनो कसरि‍ नै छोड़ै छथि‍न। मानस आब दस सालक भऽ गेल। प्राइवेट स्‍कूलक चारि‍म कक्षामे पढ़ैए। महि‍नाक पाँच तारीख तक सभ बच्‍चा अपन-अपन फीस जमा करैए। लेट-सेट छह तारीख धरि‍ वि‍लम शुल्‍कक सङ जमा करब आवश्‍यक अछि‍। नै देने नाओं काटि‍ देल जाइ छै। मानस प्रत्‍येक महि‍ना अति‍रि‍क्‍त शुल्‍कक सङ जमा करैत छल। मुदा ऐ मास सेहो नै भेलै। पीठपर पोथीक बैग टाँगि‍, अनजान चालि‍मे डेल उठबैत, एमहर-ओम्‍हर तकैत स्‍कूल दि‍स वि‍दा भेल। घरसँ लगभग एक कि‍लो मीटर भरि पूब स्‍कूल छै। बाटेमे मानसक मन फीपर गेलै। आइ तँ छह तारीख छी। मुदा फीस तँ अछि‍ नै। सरजी की कहता की नै। असमंजसमे पड़ल मानस स्‍कूलक हाता धरि‍ पहुँच गेल। हातासँ आगू नै बढ़ि‍ बाहरेमे ठाढ़ रहल। कि‍छु काल पछाति‍ आपस घूमि‍ गेल। अगल-बगलमे डबरा-डुबरीमे पहि‍ल मानसुनक बर्खासँ पानि‍क जमाव सभकेँ देखैत, बेंगक टरटरेनाइ आदि‍केँ देखैत-सुनैत लीन भऽ गेल। ओमहर स्‍कूलमे सरजी हाजली मि‍लौला पछाति‍ मानसक अनुपस्‍थि‍ति‍पर बजला- “मानस आइ नै एलौं?” एकटा बालक कहलकनि‍- “आएल तँ छल मानस, साइत बाहरमे हएत।” सरजी- “आइ फेर फीस नै अनने होएत।” फेर वएह बालक बाजल- “सरजी, अहाँ कहब तँ हम मानसकेँ बजा आनब।” सरजीक धि‍यान मुद्रापर गेल। बजला- “जो, आ कहि‍ दि‍हनि‍ जे आइ जँ फीस नै लऽ कऽ आएत तँ दोबर फीस लगतै।” बालकक नाओं सौरभ अछि‍। सौरभ स्‍थानीय बेपारीक बेटा छी। सौरभ केर घर स्‍कूलक बगलेमे छै। मानससँ मि‍त्रता छै। मानस केर प्रति‍ सहायताक भाव सेहो रहै छै। सौरभ वि‍दा भेल मानसकेँ तकैले। बाहर जा एमहर-ओम्‍हर नजरि‍ दौड़ौलक। मानसपर केतौ नजरि‍ नै पड़लै। कनी और आगू बढ़ल। देखलक एकटा गाछक छाँहमे ठाढ़ कि‍छु देखि‍ रहल अछि‍। देखि‍ते चि‍करि‍ कऽ सोर पाड़लक- “मानस, की करै छी। एमहर आ।” मानस अवाज सुनि‍-ताकि‍ लग आबि‍ बाजल- “आइ हम स्‍कूल नै जेबौ। सरजीकेँ नै कहि‍हनि‍ जे मानस गाछ तर अछि‍।” सौरभ- “जौं तूँ स्‍कूल नै जेमेँ तँ एतए की करै छीही। घरेपर रहि‍तेँ।” मानस- “तूँ नै बुझै छीही। घरपर जँ रहब तँ माइक सैकड़ो प्रश्नक उत्तर दि‍अ पड़त। घरमे पाइ-कौड़ी नै छै। माए कहलक जे दू-चारि‍ दि‍नमे पाइ देबौ।” सौरभ स्‍कूलक नि‍अमसँ अवगत अछि‍। जौं छह तारीख तक फीस जमा नै हेतै तँ स्‍कूलसँ नि‍कालि‍ देल जाइ छै। ई सभ सोचि‍ मानसकेँ कहलकै- “स्‍कूलक नि‍अम नै बूझल छौ जे केते कड़ा छै। माएकेँ नै कहने छीही?” मानस कि‍छु बाजल नै, आ ने कि‍छु फुरेलै। चुप रहल। सौरभ घूमि‍ कऽ स्‍कूल चलि‍ गेल। सफरनामा जन्मसँ हम मैथिल जरूर छी मुदा मैथिली भषा-साहि‍त्‍यमे हमर जनम ८०म सगर राति दीप जरय, निर्मली (सुपौल) तिथि ३०.११. २०१३मे भेल, जे श्री उमेश मण्डल जीक संयोजकत्‍वमे आयोजि‍त छल। अहसास भेल, वास्तवमे जे मिथिलाक लोक मैथिली नै बजै छथि‍, ओ ओहने उदासीन प्राणी छथि‍ जेना माए बापसँ रूसल बेटा आकि‍ बेटी होइए। ओइसँ पहिले हमरा भीतरक सृजनात्मक शक्‍ति‍ पनपति‍ तँ रहए मुदा सिंचाइ ऐ गोष्ठीमे भेल। हम अंग्रेजीसँ एम.ए., पी.एच-डी. छी, जे हमरा कार्यक्षेत्रकेँ सुदृढ़ केलक, फलस्वरूप, एकटा साधारण पेन्टरसँ लऽ कऽ अंग्रेजी शि‍क्षकक रूपमे अध्‍यापनक कार्यक सफर तय करैत रहलौं अछि‍। आय हम इंटरमीडिएट आ ग्रेजुएशन स्तरक अंग्रेजी पाठ्यक्रमक अध्यापनक कार्य, अपन निजी कोचिंग संस्थानमे करै छी। मुदा हमरा अपन भाषापर गर्व होइए आ गुमानसँ कहै छी जे हमर मातृभाषा हमरा बेक्तिगत-बेवहारिक जीवनकेँ अत्यधिक प्रभावित केलक आ कऽ रहल अछि‍। हमर आपसी सद्भाव आ प्रेममे चारि-चांद लगि‍ गेल। जे काज हमरासँ असम्भव बुझना जाइत रहए तइ काजक योग्य हम भऽ रहल छी। एकर श्रेय हम श्री उमेश मण्डल जीकेँ (डा. साहैबकेँ) दइ छी। हम केना हुनकर अभिवादन करी? ८०म सगर राति दीप जरय, निर्मली, ८१म देवघर, संयोजक श्री ओम प्रकाश झाजी, तिथि २२. ०३. २०१४, ८२म मेंहथ, संयोजक श्री गजेन्द्र ठाकुरजी, तिथि ३१.०५. २०१४, आ ८३म भपटियाही, संयोजक श्री नन्दविलास रायजी, तिथि ३०. ०८. २०१४., लगातार ऐ सभ गोष्ठीमे उत्सुकता पूर्वक हम भाग लैत रहलौं आ आगूओ लैत रहब जइसँ विद्वान कथाकार लोकनिकेँ बीच हमहूँ अपन नूतन कथाक पाठ करै छी आ करैत रहब। ई वि‍शेष आलेख ८३म सगर राति दीप जरय’पर केन्द्रि‍त अछि। ऐ गोष्ठीक बीजारोपन मेंहथमे आयोजित ८२म गोष्ठीमे श्री गजेन्द्र ठाकुरकेँ हाथसँ नन्द विलास राय जीकेँ हाथमे दीप तथा पंजीक समर्पणसँ शुरूआत भेल रहए जइमे हमहूँ प्रत्यक्ष सहभागी रही। पहिलुक तीनटा गोष्ठीमे भाग लेला पछाति हमर उत्‍सुकता आरो बढ़ि‍ गेल, एतदर्थ हम उत्सुकता पूर्वक भपटि‍याही गोष्‍ठी लेल नारी केन्‍द्रि‍त कथा हेतु कार्यमे जुटि‍ गेलौं। “बेटी” नामक कथा लि‍खि‍ ओइ गोष्‍ठीमे पाठ केलौं। ऐ क्रममे बरबरि‍ हम श्री उमेश मण्‍डलक सम्पर्कमे रहलौं। हिनकासँ सहयोग आ प्रोत्साहन भेटल। कथा आ गोष्ठी केर संदर्भमे अनेक तरहक वार्तालाप होइत रहल। अही क्रममे हमरा हुनकर (डा. साहैबक) मातृभाषाक प्रति समर्पण काफी आकृष्‍ट केलक। जे कएक दिन निर्मली स्थित नीज आवासपर हम विभिन्न तरहक काजसँ जाइत रहै छी, तँ देखै छि‍यनि‍ जे हिनका अनेको तरहक कथा, नाटक, उपन्यास इत्यादि वि‍भि‍न्न तरहक लेखकक साहित्यिक काजमे ओझराएल रहै छथि। एतबे नै, घरसँ लऽ कऽ क्लिनिक धरि‍, जे मि‍लान चौक स्‍थि‍ति‍ सेहो अछि‍- जेतए संध्‍या चारि‍ बजेसँ साढ़े सात बजे धरि‍ बैसै छथि‍- पर मरीजक देख-रेखसँ बँचल समैकेँ साहित्येक कार्यमे समर्पित करैत रहै छथि‍। सँझुका हिनक क्लिनिकपर सभ दि‍न विद्वान लोकनिकेँ सम्मेलन बुझू होइत रहैए जइमे मुख्यरूपसँ रामविलास सरजी, हेमनारायण भाइजी, वकील साहैब- वीरेन्‍द्र यादवजी, राजदेव मण्‍डल तथा राम प्रवेश मण्‍डल आ कहि‍यो-कहि‍यो उमेश पासवान तथा दुर्गा नन्‍द मण्‍डल निअमित रूपे भाग लइ छथि। ऐ बीचसँ हमहूँ केता दि‍न समए नि‍कालि‍ जाए-आबए लगलौं अछि‍। ८३म सगर राति दीप जरय, मैथिली कथा गोष्ठी, एकर इन्तजार वेसब्रीसँ रहए। जेना-जेना समए लगि‍चाइत गेल, हमर धीरज रूपी बान्‍ह ढहल जाइत रहए। दस दिन पहिले मोबाइलपर आ फेसबुकपर निमंत्रणक समाद आएल। संगे विदेह मैथिली लघु कथाक बेवसाइटपर सेहो वि‍ज्ञापन देखि‍ आरो मोन गद्-गद् होइत रहए। उत्सुक्ता जेना भीतरे-भीतर बिस्फोट होइत रहए। एकर चर्चा हम अपन कोचिंगक कि‍लासक अलाबे आनो-आन जगहपर करैत रही। मुदा दिन लगि‍चा गेल आ दू दिन पूर्व, २८ अगस्त, २०१४केँ, करीब साढ़े एगारह बजे, कोचिंगसँ आएले रही, जोरसँ झारा लागल रहए, पेन्ट उतारलौं आ गमछा डाँरमे लटपटा पैखाना घर दौगल गेलौं। मुदा संयोसँ शर्टक जेबीमे मोबाइल रहि गेल रहए। बैसबे केलौं आकि अननोन नम्बरसँ फोन बाजि उठल। हम यथोचि‍त अवस्थामे नै रही, डिसकनेक्ट केलौं। मुदा फेर फोन आएल। पुन डिसकनेक्ट केलौं। कनि‍येँ कालक पछाति बाहर आबि घरमे बैसलौं आकि ओही नम्बरसँ फेर फोन बाजल। रीसिभ करैत हम बाजलौं- “हेल्लो?” ओम्हरसँ- “अहाँ ललनजी छी ने?” कहलि‍यनि‍- “हँ, बाजू अपने के?” “हम नन्द विलास राय बजै छी, भपटियाहीसँ।” “हँ श्रीमान्, नमस्कार, कहल जाए।” “नमस्कार! नमस्कार! कहलौं ललनजी, एकटा बैनर बनबेबाक अछि, केना हेतै?” हम बेहिचक बजलौं- “भऽ जेतै, हम डा. साहेबसँ लिखैक मेटर लऽ कऽ लिखि‍ कऽ नेने आएब। अहाँ ओकर चिन्ता नै करू।” “ठीक छै। तँ राखै छी?” कहलि‍यनि‍- “ठीक छै।” हमरा जीवनमे पेन्टींग एकटा विस्मरणीय समए-अवधि‍ रहल अछि। एकर योगदान बेदरासँ लऽ कऽ अखनि धरि हमर बेक्तित्वकेँ निखारैमे तथा नव जि‍नगी प्रदान करैमे, अहम अछि। आइ हम पेन्टींग काज जरूर छोड़ि देने छी, मुदा ऐ शरीरक एक-एकटा रूइआँ ऐ रंगमे सराबोर भेल अछि। नन्द विलास राय जीक आग्रहसँ हम अति प्रसन्न भेलौं मुदा पश्चाताप सेहो हुअ लगल किए तँ पछिला सात बर्खसँ रंग-ब्रश सोल्हन्नी छोड़ि देने छी। जहियासँ अध्‍यापन काजमे प्रवेश केलौं। दिन भरि चटि‍या सबहक बीच आ बँचल-खुचल समैमे अपन अध्ययन आ आनो काजमे लगल रहै छी। जहियासँ मैथिलीक प्रति आकर्षण बढ़ल, तहि‍येसँ हमरो लेल समैक महत बढ़ि‍ गेल। कहि‍यो-कहि‍यो कोनो पेन्टींग आकि चित्र बनेबाक उत्कण्ठा तीव्र भऽ जाइत अछि‍ मुदा रोशनाइ-ब्रुशक अभावमे, कारण जे ओ कार्य आब हम करीब-करीब छोड़ि‍ए जकाँ देने छी। मुदा अखनो हमर ऐ कार्यक प्रति‍ बहुतो गोटेकेँ इच्‍छा रहै छन्‍हि‍ जे स्‍वयं हमहीं अपना हाथे करि‍ऐ। मुदा किछु नै करि‍ सकै छी, तखनि‍ दर्दसँ जेना छटपटा उठै छी। ई बेचैनी तत्कालीन हुअए, जखने कोनो काजमे लगै छी ई सुरता बिसरि जाइ छी। अफसोस! ओही सुराएल समैपर ओजार भेट जाएत तँ सुन्दरोसँ सुन्दर पेन्टींग बनबितौं! अगिला दिन चौरचन पावनि तेकर बिहाने ३० अगस्त, ८३म गोष्ठी। सबेरे सकाल डा. साहेबक आवासपर जा लिखैक मेटर प्राप्त कऽ बजारसँ दू मीटर कपड़ा कीनलौं। सुभाष चौकक नजदीक हमर पुरान पेन्टींगक दोकान अछि‍ जे अखनि भागिन- वि‍जय- चलबै छथि‍, ओतए गेलौं। पता चलल वि‍जय दू माससँ दोकानपर नै अबैए। फोन लगेलौं मुदा गप नै भेल। तखैने बगलक दोकानदार एला आ पुछलथि‍- “सर, बिजेसँ केहेन काज अछि?” हम कहलि‍यनि‍- “यौ, रंग-ब्रुशक काज छल, वएह लेबाक अछि। किनब तँ मुल्किक पाइ लगत, वि‍जय नै आएत की?” दोकानक चाभी हुनके लग रहनि‍, जेबीसँ निकालि हमरा हाथमे देलनि‍। सभ समान मिलल मुदा किछु रंग बजारसँ कीनए पड़ल। घरपर आबि, जलखै केलौं आ बैनरक कपड़ा देबालपर टाँगि लिखैमे जुटि‍ गेलौं। अभ्यास तँ छूटल रहए। बीच-बीचमे मौका मिललापर कहि‍यो-काल हाथ साफ करैत रही मुदा ऐ तीन बरीखसँ सोल्हन्नी जेना बिसरल जाइत रही। मनमे शंका उठैत रहए कि केहेन लि‍खि‍ पएब, केहेन नै? मुदा अनुभव रहए आ दोसर, गोष्ठीमे शामिल हेबाक उमंग अद्भूत उर्जाक संचार करि‍ते रहए। गर्मी जेना आइ छोड़ि काल्हि नै रहत? हवा सोल्हन्नी रूकि गेल छल। आ एम्हर कलाकारीक सुनामी सेहो उफनाइत रहए। लिखनाइ शुरू केलौं। तीन घंटाक मेहनति‍क पछाति एकटा सुन्दर बैनर लिखि‍ अपन कार्य-भारमे सफल भेलौं। तीन बजि‍ गेल छल, आइए चारि बजे भपटि‍याही गोष्ठीमे भाग लेबए लेल बिदा भेनाइ अछि‍। हड़बड़ाएले नहेलौं आ रहि-रहि कऽ घड़ी दिश तकैत रही जे आब, आब बिदा हएब! तखने डा. साहैबक फोन आएल- “ललनजी, तैयार छिऐ? बिदा भेलिएे कि नै?” कहलि‍यनि‍- “हँ सर! चलैएबला छी।” कहलनि‍- “हएत तँ अहाँ अपन लैप-टाॅप सेहो नेने आएब, कि‍छु काज, गोष्‍ठीए सम्‍बन्‍धी बजड़ि‍ गेल अछि‍।” हमर इन्तजारक घड़ी खतम भऽ गेल छल। कपड़ा पहिरि‍ लैप-टॉपक बैग पीठपर लेलौं आ बाइकसँ बिदा भऽ गेलौं। निर्मली स्थित डा. साहैबक अवासपर आशुतोषो भाइजी पहिनेसँ पहुँचल छला। डा. साहैबकेँ गोष्ठीसँ सम्बन्धित प्रयाप्त मात्रामे सी.डी. कैसेट तैयार करबाक रहनि‍। एकर अलाबे किछु पोथीकेँ सेहो पैकिंग करबाक रहनि‍। हमर इच्छा रहए जे किछु हिनकर संग दऽ सकि‍यनि‍! हम बजारसँ रंगीन कागत लाबि कऽ पोथीक पैकैट बनबैमे जुटि‍ गेलौं। तही बीचमे श्री ओमप्रकाश झा (देवघर-भागलपुर) सँ आगमन भेलनि। ई हमर संयोग छल जे ओम प्रकाश बाबूक अनायास दर्शन आ भेँट भेल। हम अति प्रसन्न भेलौं। हम हाँइ-हाँइ पोथी पैकिंग करैत रही जइमे डा साहैबक दुनू बेटी, पल्‍लवी आ तुलसीक मदति‍ सराहनीय रहल। सभटा काजके निपटबैत साढ़े पाँच बजि गेल। हमसभ अपन-अपन सुविधानुसार भपटियाही बिदा भेलौं। हमरा संगे अक्षय कुमार झा आ जे.पी. गुप्ताजी सेहो रहथि‍। हिनका सभकेँ नेने हम करीब सबा छह बजे भपटियाही मध्य विद्यालय परि‍सर, आयोजन स्थलपर पहुँचलौं। जखनि‍ हम सभ पहुँचलौं तइ समए दुर्गानन्द मण्‍डल जी मैकपर कार्यक्रमक श्री गणेशक उद्घोषण करैत रहथि‍। बर्खाक मोसि‍मक कारणेँ विद्यालय प्रांगणमे पानिक जमाउ छल। सम्‍भवत: तँए एकटा गोलाकार कमरामे कार्यक्रमक आयोजन छल। नमहर हॉल रहि‍तो जगहक कमी बुझना जाइत रहए मुदा बेवस्था ठीक-ठाक छल। हमरा बुझना गेल, जेना कथाकारो लोकनिक संख्या पहिनेसँ ऐ गोष्‍ठीमे बेसी छल। तहूसँ रूम भरल रहए। मुदा गर्मीसँ जेना सबहक मन औल-बौल करैत रहनि‍। दूटा स्टेण्ड फेन गेँट लग छल जे भीषण गर्मीक आगू बौना पड़ैत छल। ऐ गोष्ठीकेँ एकटा आर खास बिशेषता ई रहल जे गाम समाजक विशि‍ष्ट बुजुर्ग लोकक संग जुअन-जहान तथा माएओ-बहिन सभ बढ़ि‍-चढ़ि कऽ भाग लेने रहथि‍।  एे सबहक बीच गोष्ठीक आरम्भ विधिवत् दीप प्रज्वलित कऽ बुजुर्ग साहित्यकार लोकनीक द्वारा करौल गेल। तत्पश्चात् अध्यक्ष मण्‍डलक चयन भेल जइमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री कमलेश झा, डा. बिमल कुमार राय, डा. योगेन्द्र पाठक वियोगी, आ डा. शि‍व कुमार प्रसाद रहथि। संगे संचालन समितिक सदस्यक नाओं उद्घोषित कएल गेल जइमे मुख्य रूपे श्री ओमप्रकाश झाजीक संग श्री दुर्गानन्द मण्डल तथा श्री राजदेव मण्डल रहथि। लोकार्पण सत्र शुरू भेल जइमे विभिन्न तरहक पोथीक लोकार्पण भेल। तत्पश्चात् नूतन विहनि आ लघु कथाक पाठ संग समीक्षक मण्‍डलक द्वारा समीक्षा सेहो शुरू भेल। ई गोष्ठी मुख्य रूपे नारी केन्द्रि‍त रहए, सभ कथाकार लोकनि एकसँ एक नारी विमर्शपर आधारित कथा गढ़ने रहथि‍। शाइत! मोसमक ठीक अनुमान आयोजक महोदयकेँ नै रहनि‍ तँए कार्यक्रमक मध्‍य बि‍जली-पंखाक बिशेष बेवस्थामे नरहिया जाइले आदमी ताकए लगला। आदमी तँ मुलके छल मुदा एकटा मोटर साइकिलो चाही। शाइत अही सबहक गुनधुनमे ललितजी खिड़कीसँ हमरा अवाज देलनि‍। हम बाहर आबि पुछलि‍यनि‍- “की बात?” कहलनि‍- “ललनजी, कनी अहाँ अपना गाड़ीकेँ चाभी दि‍यनु?” हमरा गाड़ीक हेड लाइटक स्वूच खराप रहए, आ राति-वाली बात। हम सोचलौं, किए ने हमहीं जा कऽ ई काज करि‍ दी? हम पुछलि‍यनि‍- “केहन काज अछि बाजू ने हमहीं करि‍ दइ छी।” “कनी हिनका संगे नरहिया जा दूटा सिलिंग पंखा लाबि दियौ।” हमरा संगे एकटा श्रीमान्, लागल जे बहुत होशगर छथि,‍ नरहिया पहुँचलौं। रातिक दस बजैत छल मुदा सुधि-बुधिक परिचए दैत ओ श्रीमान् टेन्ट हाउससँ दूटा पंखा प्राप्त केलनि आ हमसभ कार्यक्रम स्थलपर लऽ कऽ पहुँचलौं। पंखा लगि‍ते गर्मी जेना छू-मंतर भऽ गेल। जइसँ कथाकार सभकेँ ऊर्जा भेटि‍ गेलनि‍। कार्यक्रममे गति पकड़लक। नव-नव कथाकार लोकनि पहुँचल रहथि‍ जइमे हमरा संगे अक्षय कुमार झाजी आ जे.पी.गुप्ताजी सेहो पहुँचल रहथि। आसपासक ग्रामीण लोकनि आ किछु माता-बहिन सेहो श्रोता रूपमे उपस्थित रहथि‍। दोसर सत्रमे हम अपन नवसृजित कथा “बेटी”क पाठ केलौं। अधरति‍यामे भोजनावकाश भेल। भोजनमे गाम घरक खाँटी सुआद भेटल। दस मिनटक विश्रामक पछाति पुन: तेसर सत्रक संग राति भरिक कथा-यात्रा आगू प्रारम्‍भ भेल जे भि‍नसर छह बजे करीब कार्यक्रम शेष भेल। अन्‍तमे संयोजक श्री नन्‍द वि‍लास राय धैनवाद ज्ञानक केलनि‍। अगि‍ला गोष्‍ठी हेतु श्री शि‍व कुमार मि‍श्रजी दीप तथा पंजी लेलनि‍। जे लखनौर प्रखण्‍डक अन्‍तर्गत बेरमा गाममे प्राय: २० दि‍सम्‍बर २०१४केँ करौता। बेटी सोमनाथजी म्युनसीपल आँफि‍समे पैंतीस बरख नोकरी केला पछाति रिटायर भेला। जीवनमे एक्को पाइ नजायज नै ग्रहन केलनि। सोनमनाथजी हृदैसँ पवित्र, शालि‍न, विनम्र आ दयाक भाव हिनका मुख-मण्डलसँ हरि‍दम झलकैत रहैए तँए हिनकर बिशेषता बेक्तीगत संज्ञा (उपनाम) मे बदलि‍ गेलनि आ घरसँ लऽ कऽ आँफिस धरि‍ लोक सभ हिनका सोनाजी कहि बोलबए लगलनि। सोनाजीकेँ तीनटा सन्‍तान, बड़ दुइटा लड़का, जेठ बबलू तैपर सँ डबलू आ सभसँ छोटकी बेटी उषा छन्‍हि‍। उषाक बि‍आह नीक घरमे, इंजीनि‍यर बड़सँ कऽ सम्पन्न केलखिन। जमाइबाबू मुजफरपुरमे नोकरी करै छथिन ओतै सरकारी अवास भेटल छन्‍हि‍, तइमे उषा सङ्गे रहै छथिन। जेठका बेटा बबलूक किरदानीसँ दुनू परानी सोनाजीक मन बेथित छन्‍हि‍। बबलू इंजीनि‍यरिंग करैले दिल्ली गेला मुदा हरियानाक एकटा लड़िकीक प्रेममे फँसि अपन जीवनक नैयाकेँ किनार कऽ लेलनि आ ओतै प्रेम-बि‍आह करि बसि गेला। डबलू नागपुरमे बैंक मनेजर छथिन। हिनकरो बि‍आह भेला पछाति पत्नी सङ्गे आतै रहै छनि‍न। सालमे एक-आध बेर कभी-कभार घर अबै छथिन। सोनाजी अपन जीवनसंगि‍नी ममताक सङ्ग बुढ़ाड़ीक पहिया जेना-तेना खिंचै छथि‍। बेटा-पुतोहुक सुख हिनका नसीब नै होइ छन्‍हि‍ मुदा उषा, बेटी रहैतो, बेटा जकाँ देखभाल करैए। सप्ताहमे एकबेर आबि कऽ जरूरे देखि‍ जाइत अछि। उषाक सोभाव पिताजीसँ बिरासतमे प्राप्त भेल छन्‍हि‍ तँए मधुरो आ एक दोसरसँ अनुकूलो छन्‍हि‍। सोनाजीक ई पैंसैठम बरख चलि रहल छन्‍हि‍। नोकरीसँ रि‍टायर भेल रहथि‍ तँ शरीरसँ स्वस्थ छला आ भरोसा छेलनि जे आगुओ नीके रहता, मुदा मनुख तँ मात्र इच्छा करैए, होइ तँ अछि वएह जे ऊपरबलाक मरजी रहै छन्हि। उषाक बि‍आहक पछाति दुनू बेटा दू जगह अपन-अपन घर बसा लेलकनि। सोनाजी दुनू परानीकेँ चिन्ता-फिकि‍र घरेड़ देलकनि। जीवन-शक्ति शि‍थि‍ल भऽ गेलनि। हाथ-पएर धीमा पड़ि‍ गेलनि। आँखिक रोशनी कमि गेलनि। कानोसँ कम सुनाइ दिअ लगलनि‍। पाचनतंत्र गड़बड़ा गेलनि आ दिल-दिमाग सेहो दुरूस नै रहलनि। मतलब बुढ़ापा हिनकर समस्या बनि गेलनि। बेटा सभ कभी-कभार फोन घुमा हालचाल करैत रहै छन्‍हि‍। दोस्त-यारकेँ- दबाइ दोकनदार आ मोहल्लाक डाक्टर- सभकेँ फोन घुमा कहैत रहैए जे माए-बाबूकेँ देखैत रहबै। सोनाजी दुनू गोटेकेँ ई परिपक्व अवस्था अछि जइमे ज्ञान, स्थिरता आ अनुभव छन्‍हि‍ आ तहिक सहारे दुनू बेकती जीवन रूपी नैयाकेँ आगू खिंच रहल छथि‍। ओना तँ बुढ़ापा भार नै होइत अछि मुदा जब खाएल-पीअल काया जड़जड़ भऽ जाइए आ परि‍वारक सदस्‍यक संग तालमेल नै रहैए तँ परीवारमे अपन उपयोगितापर विराम लगि जाइत अछि। वृद्ध लोकनिकेँ ऐ अवस्थामे सहायता आ सहयोगक जरूरत पड़ि‍तै छै। जे बेटा-पुतोहु अपन वृद्ध माए-बापकेँ सेवा करैए वएह जीवनक उत्तम कर्म करैए। एहेन पूत जे माए-बापकेँ जीबि‍ते छोड़ि दइए आ अपनेमे मगन रहैए ओ ओहने काज करैए जेना धिया-पुता सभ बालुक रेतसँ महल बना लइए आ तैपर गाछक डारि-पात गाड़ि‍ कऽ बगीचा बना लइए आ खुशी मनबैत रहैए मुदा जेकरा ज्ञान अछि ओ अपन जीवनक उत्तम कर्म करैसँ पाछू नै हटैए। आजुक समाजमे बेकती अपन बाल-बच्चा संग परि‍वारमे रीझल रहैए। माए-बाप, बूढ़-पुरानक मान-मर्यादा, तेकर सेवा सत्कारकेँ साफे बिसरि जाइए। ओहेन मनुख हरिदम पाबैक पाछू बेहाल रहैए मुदा जे हिनका लग प्राप्त वस्तु अछि ओकर उपयोग करनाइ नै जानैए। बूढ़-पुरान अनुभवी होइ छथि‍ तँए हिनका समाजमे विशिष्ट स्थान भेटबाक चाही। जे बेकती वृद्धक सेवा नै करैए, ओ कायर होइए आ कायर लोग काल्पनिक विचारक धनवान आ महा गप्पी होइत अछि। जाबे धरि वृद्धजनक आ जुबकक समाजमे तालमेल आ समानता नै बैसत ताबे धरि‍ समाजिक आ सांस्कृतिक काजमे स्थइरूपसँ बिकास सम्‍भव नै भऽ सकत। सोनाजी शरीरसँ कमजोर होइत गेला आ बेटा पुतोहुक सहायता आ सहानुभूति घटैत गेलनि‍। आब हिनका याद आबै छन्‍हि‍ ओ दिन, जइ दि‍न बेदरूकिया सभकेँ ठेहुनापर लऽ घौआ-छु मल्ले-छु करैत पढ़ैत रहथि‍ ‘लब घर उठे आ पुरान घर खसे...। खैर जे ऐ हाथसँ करैए ओकरा ओइ हाथसँ भोगए पड़ैए। अहु अवस्थामे सोनाजीकेँ रोज-मर्ड़ाक समान कीनए बास्ते हाट-बजार जाइए पड़ै छन्‍हि‍। आइ सोनाजी सुति ऊठि कऽ शौचालय गेलखिन। होनीकेँ किछु भेनाइ रहनि‍, बाहर निकलि‍तै चक्कर आबि गेलनि‍ आ शौचालयक दरबाजासँ टकरा कऽ खसि‍ पड़ला। ममताकेँ गिरैक अभास भेलनि, भिरकाएल फाटककेँ ठेल देखलखि‍न सोनाजी ढनमनाएल असहाय अवस्थामे ओङ्गराएल आ कहरि रहल छथि। ममता धबरा गेली आ उठबैक परि‍यास केलखिन, हिला-डोला कऽ पुछै छथिन- “बबलूक पपा! की भेल! केना खसलिऐ! बाजू ने?” मुदा कोनो जवाब नै भेटलनि। सोनाजीकेँ मुहसँ छर-छर लेहू बहै छेलनि। ई देखि‍ ममता हाय-बाप करए लगली, असगरि‍ हिनकासँ उठि नै सकल, दौगल-दौगल दरबज्‍जापर जा हरेरामकेँ सोर पाड़लक, हरेराम दुनू परानी दौगल आएल, सोनाजीक ई दशा देखि‍ हाँइ-हाँइ कऽ उठा-पुठा कऽ ओसार परहक खाटपर सुतेलकनि। सोनाजीक ई हलात देखि‍ ममताक देह जेना केराक भालरि जकाँ काँपए लगलनि‍। की करब! आ केना हएत! किछु नै फुड़ै छेलनि‍। हरेराम हड़बराइत बाजल- “काकी! डागडरकेँ फोन करू!” मुदा फोनक डायरी सोनेजी रखने छेलखिन। ममताकेँ भेटि‍ते ने रहनि‍। हरेरामक पत्नी मंजू बुझि गेलखि‍न जे बेगरतापर एहेन छोटसन चीज नै भेटैत छन्‍हि‍, डाक्टरकेँ बजबैले दौगल-दौगल गेली। मोहल्लेमे डाक्‍टर इकबालक घर छन्‍हि‍, एलखिन। सोनाजीक मुँहक ऊपरका दूटा दाँत नीचला ठोरमे भोंका गेल रहनि‍ तइसँ मुहसँ लेहूक टघार चलै छेलनि।़ उपचार शुरू भेल, कनीएकाल पछाति सोनाजीकेँ होश एलनि। ममतोकेँ जानमे जान एलनि। डाक्‍टर इकबाल ढाढ़स दैत कहलखि‍न- “अखनि‍ कोनो चिन्ता करैक बात नै छै, सोनाजीक ब्लडपेसर आ सूगर बढ़ि‍ गेल छन्‍हि‍ तइसँ, चक्कर एलनि मुदा समैसँ जाँच आ इलाज हेबाक चाही नै तँ हार्टएटेकक सम्भावना बाढ़ि‍ सकैए।” डाक्‍टर इकबाल पूर्जी लीखि‍ हरेरामकेँ हाथमे दैत कहलखि‍न- “ई दबाइ जल्दीए लऽ कऽ आउ, सोनाजीकेँ ठोरमे टाँका लगबए पड़त।” तत्कालीन उपचार भेल। सोनाजीक मन पहि‍नेसँ नीक भेल। ममताक जीक मन हल्‍लुक हुअ लगल आ बेटा सभकेँ फोन लगबए लगली। जेठका बेटा बबलुकेँ पहिने फोन लगा घटनाक जानकारी देलखि‍न मुदा बबलू ऐ बातकेँ गंभीरतासँ नै लैत कहलकनि‍- “केना खसि गेलौ? बाबूजी दबाइ खाइत रहौ की नै? तों केतए रही? दिन राति टेन्‍शन दइमे तूँ सब लगल रहै छँह।” ऐ घड़ीमे बेटासँ एहेन तरहक जवाब सुनि ममताक मोह भंग भऽ गेलनि‍। फेर छोटका बेटा डबलूकेँ फोन लगा स्थितिक जानकारी देलखि‍न। डबलू पिताक हाल सूनि अस्वासन दैत बाजल- “चिन्ता नै कर। डाक्टर साहेबसँ हम बात करै छी। दीपू दोस्तकेँ घरपर भेजै छियौ डाक्टरसँ देखा कऽ दबाइओ-दारू सभ लाबि देतौ। तूँ कान-खीज नै कर।” ममताकेँ बँचल-खोंचल आस नीरास भऽ गेलनि‍। खैर हिनका सभसँ ओते आसो नै लगेने छेलखि‍न। आब बेटी उषाकेँ फोन लगेलनि‍। आन दिन उषा माए-बाबूकेँ फोन करि‍ हालचाल जनैत रहए मुदा, आइ माइक फोन देखि‍ चौंकली आ उत्सुकता पूर्वक बाजलि‍- “हँ माय! हम सब नीके छी, मुदा बाबूजी केना छथिन?” ममता जनैत छेली जे साँच बात बतेलासँ उषा बेसी घबरा जाएत तँए बातकेँ छोट करैत बजली- “बाबूजीक तबीयत गड़बड़ा गेलौ आबि कऽ देखि जाही।” मुदा भारी मन आ अवाजक थड़-थड़ाहटि‍सँ उषा भाँपि गेली जे साइत बाबूजीकेँ तबीयत बेसी खराब भऽ गेल अछि। घबराहटि‍ तँ भेबे केलनि मुदा संयमसँ फोन रखि सोचए लगली जे की करी! फेर उठि कऽ बैग झारि, कपड़ा-लत्ता चोपतए लगली आ तुरंत नैहर अबैक ओरयान करए लगली। उषाकेँ एक सालक बेटी छेलनि तेकरो मँुह-कान पोछि तैयार कऽ एक काँखमे बच्चा आ दोसर हाथमे बैग उठा ओसारपर रखि घर दरबज्जामे ताला लगबए लगली। घरक चाभी बिसवासी पड़ोसीकेँ दैत पति‍ इंजीनि‍यर साहेबकेँ फोन लगेलकनि जे घंटे भरि पहिले ड्यूटीपर नीकलले छेलखि‍न, इंजीनि‍यर साहैब फोन रीसीभ करैत बजला- “हँ बाजू, की बात अछि?” उषाक मन तँ हड़बड़ाएले रहनि‍ मुदा तैयो सम्हरि‍ कऽ बजली- “हम बाबूजीकेँ देखैले गाम जा रहल छी, माइक फोन आएल जे बाबूजी सि‍रि‍यस छथिन। अहूँ साँझ धरि बाबूजीकेँ देखैले आबि जाएब।” ई बात सुनि इंजीनि‍यर साहैब चौंकि‍ गेला। पुछलखि‍न- “अखनि! अचानक! किए गाम वि‍दा भेलौं?” ताबे धरि उषा रिक्सापर बैसि बस स्टैण्ड दिस बिदा भऽ गेल छेली। हड़बड़ाइत बजली- “अखनि ओते गप हम नै करब, बूझि लियनु जे बाबूजीक हालत ठीक नै अछि।” उषाकेँ हड़बड़ाएल अवाजसँ इंजीनि‍यर साहैब बूझि गेला जे आब हिनका कोइ नै रोकि सकैए। भरोस दैत बजला- “जाएब तँ जाउ, मुदा मनके अस्थीर केने जाउ, आ बाजू जे पाइ-कौड़ी किछु संगमे अछि कि‍ने?” उषा- “अहाँ पाइक चिन्ता नै करू, हमरा संगमे ओते पाइ अछि जइसँ, हम गाम जा सकै छी।” इंजीनि‍यर साहैब बात टोहियबैत पूछि देलकखि‍न- “पाइ केतएसँ लाबलौं अहाँ? बजैत रहै छिऐ जे हमरा हाथमे एकोटा छिद्दीओ ने रहैए।” उषा सकपका गेली। सकपकेबो केना ने करि‍तथि‍? पति‍क जेबीसँ बँचल-खूचल पाइ रोजे निकालि‍ते रहै छेली। तैपर सँ ऊपरौसँ किछु ने किछु मांगि‍ जरूरति‍क समान कीनैबि‍ते रहै छेली आ सभसँ जरूरी काज माए-बाबूकेँ देखै बास्ते जाए पड़ै तइमे खर्चा-बर्चा तँ होइते रहै। ई बात इंजीनि‍यरो साहैब जनि‍ते रहथि‍ तँए उषा बातकेँ खोलैत बजली- “अहाँक जेबी, जे रोज साफ होइत रहैए, वएह कोशलि‍या कऽ हम रखने रही, वि‍शेष पाइक ओरीयान अहाँ साँझ धरि केने आउ।” बेटा सभकेँ नै एलासँ ममता दुखी तँ छेली। मुदा ऊषाकेँ एलासँ निरासाक बादल छँटि‍ गेलनि‍। साँझ होइत-होइत उषाक पति इंजीनि‍यरो साहैब ऑफिससँ छुट्टी लऽ पहुँच गलखिन। वि‍हाने भने एम्बुलेन्ससँ सोनाजीकेँ दरभंगा लऽ गेलनि‍ आ डाक्‍टर यू.के बिश्वाससँ इलाज चलए लगलनि‍। तत्काल किछु दबाइ शुरू काएल गेल, ऑक्सिजनक खगता सेहो पड़लनि आ दिनमे तीन बेर एकर परयोग हुअ लगल। वि‍भिन्न तरहक जाँच कराैल गेल। जाँचक किछु रि‍पोट तीन दिनक पछाति आएल आ किछु रि‍पोट हप्ता भरिक बाद आएत। जे रि‍पोर्ट आएल ओइमे बी.पी हाइ, सूगर बढ़ल आ संगे-संग हार्ट अटेकक सम्‍भावना बताएल गेल। सप्ताह भरि इलाज चलैत रहल, तबीयतमे उतार-चढ़ाव होइत रहल, कखनो नीक जकाँ गप-सप्‍प करैत रहथि‍ तँ कखनो आँखि पथरा जान्‍हि‍, दम फुलए लगनि‍ आ बेहोस भऽ जाथि‍। कखनो बेसुधि अवस्थामे अपने-आपसँ बड़बड़ए लगथि‍- “बबलू! कखनि‍ एलँह आ आ बैठ! कनि‍याँ! घर जा। अहाँ पोती छी हमर? आब! आब! बिस्कूट एकटा हमरो दिए ने! एे डबलू चाह लाबह! माएकेँ कहक चाह देत! ईह छिनरीक साँए! जेते खाएत नै तेते छिड़याएत!” दुनू पजरामे बैसि‍ उषा आ उषाक माए- ममता- बेना होंकि रहल छन्‍हि‍। सोनाजीक ई बड़बड़ेनाइ रोकैक बास्ते उषा सोनाजीकेँ छातीपर हाथ रखि हिला-डोला कऽ कहैए- “बाबूजी! बाबूजी! केकरासँ गप करै छि‍ऐ?” सोनाजी चौंकैत बजला- “ऊँह! नै नै गप करै छी। तोहर माए केतए छौ?” सोनाजी किछुकाल ऊपर एकटकी नजरिसँ तकैत रहला। फेरि जेना कोनो आहटि चौंकैए तहि‍ना चौंकैत बजला- “डबलू गाड़ीसँ उतरि गेल जा अगुआ कऽ लाबि लहक! काल्हिए कहै छी तोहर माए किछु बुझि‍ते नै छँह।” सोनाजीक स्‍मरण शक्‍ति‍ छीन्न भऽ गेल रहनि‍। आँखिक रोशनी चलि गेल रहनि‍। रहि-रहि कऽ बिछाैन होंथड़ए लगै छला। ई बेचैनीक अवस्था देखि उषा आ ममताकेँ जी-मन उड़ैत रहनि‍। मुदा उषा साहसी, कखनो अपन घबड़ाहटिकेँ दृष्टिगोचर नै हुअ दैत रहनि‍। मनकेँ थि‍र करैत उषा बाजलि‍- “बाबूजी! बाबूजी? एम्हर ताकू ने! हमरा चिन्है छि‍ऐ? हम के छी कहू ते?” सोनाजी आब देखि‍ नै पबथि‍। मुदा जखनि स्‍मरण लौटैत रहनि‍ तखनि अवाज परेखि नजरि घुमा-घुमा एम्हर-ओम्हर ताकि देखैक परि‍यास करैत रहथि‍। कहलखि‍न- “हँ, चिन्है छी! उषा दाइ छी ने अहाँ? केतए छहक आगु आबह ने।” आइ अस्पतालमे नअ दिन भऽ गेल रहनि‍। एकटा जाँचक रिपोट आइ आएत। दस बजे डाक्‍टर बजौने छथिन। उषाक पति आ उषा रिपोटक जानकारीले क्लिनीकपर पहुँचला। कनीए कालक पछाति कम्पाउण्डर अवाज देलकनि- “सोनाजीक गारजियन डाक्‍टर साहैब से मिलिए।” उषा दुनू परानी वेटिंग हाॅलमे बैसल रहथि‍, बोलाहटि‍ सुनि‍ते डाक्‍टरक चेम्बरमे पहुँचला, सोफा-कुरसी लागल रहए, बैसैक संकेतक पछाति दुनू गोटे बैस गेला। डाक्‍टर दुनू गोटेसँ सोनाजीक संग जे सम्‍बन्‍ध छेलनि तेकर परिचए लऽ कहलखि‍न- “मरीजक हालत गम्‍भीर अछि, रीकौभरक सम्‍भावना नै बँचल, जाबै धरि छथि‍, सेवा सत्कार करैत रहि‍यनु।” डाक्‍टरक ई बात सुनि, उषा बौक जकाँ भऽ गेल। मुँहपर रूमाल रखि सिसैक-सिसैक कानए लगली। उषाक पति सेहो अवाक् रहि गेला! तैयो जिज्ञासु भऽ डाक्‍टर साहैबसँ पुछलखि‍न- “डाक्‍टर साहैब! केना एना भऽ गेलनि‍?” डाक्‍टर कहलखि‍न- “फेंफड़ा हिनकर बिल्कुल खतम भऽ गेल छन्‍हि‍। ब्रेन ट्युमर सेहो बढ़ि‍ गेलनि‍ आ शरीरक आनो-आनो अंग सबहक कार्यक्षमता शि‍थि‍ल भऽ रहल छन्‍हि‍।” वि‍भिन्न तरहक वि‍मारी आ समस्याक वि‍षयमे वार्तालापक पछाति निष्‍कर्ष यएह भेलनि जे सोनाजीक बि‍मारी ठीक हेबाक कोनो गुंजाइश नै छन्‍हि‍। दुनू बेकती नीराश भऽ चेम्बरसँ बाहर एला, उषा बाहर निकलिते भोकारि पाड़ि-पाड़ि कानए लगली। पति साहस बढ़बैत कहलखि‍न- “अहाँ जौं एना कनब तँ माएकेँ की हएत? शान्‍त रहू, मनकेँ बुझाउ! जे हेबक छै से तँ भाइए कऽ रहत। सुझि-बुधि‍सँ काम लि‍अ! माएकेँ ऐ बातक जानकारी नै चलक चाही। हुनको सम्हारि कऽ आब अहींकेँ राखए पड़त ने। नै कानू। चूप रहू।” उषो सोचलनि‍ जे अखनि हमरा कानबसँ नोकसान छोड़ि आर कि‍छु नै हएत। कहुना मनकेँ बुझबैत चुप भेली। सोनाजी कमरामे बेडपर पड़ल रहथि‍, बगलमे ममता पंखा हौंकैत रहनि‍, तइ बगलमे पजरा लागि उषा बैस गेली आ सोनाजीकेँ मँुह निहारए लगली। बेटा सभ टाल-मटोल करैत पि‍ताक पराण छुटैकाल गाम आएल जखनि‍ सोनाजी केकरो ने चिन्ह सकै छेलनि आ ने केकराे देखिए सकै छला। पद्य खण्ड कामिनी कामायनी जहिया ओ इतिहास सुनौलक जहिया ओ इतिहास सुनौलक रोम रोम बरछी बनि मारल / केहेन आगि मे जरि रहल छी / कोन मूह स कथा कहु आब? तपत बौल मे तड़ैप रहल छी अपन  परती खेत पड़ल छल मुदा बाध अनकर लहरायल अपन सपना बेच रहल ओ  / हम्मर किम्हरो  मूह नुकायल/ भांति भांतिक भइज लगाकऽ / सब तर छल दाना छिड़ियौने / मुसुकि मुसुकि कऽ नमरि नमरि कऽ चान देखा कऽ जिह ललचौने / बान्हि देल गरदनि पर टाइ / गरा मिलल छल बनिक भाइ / पड़ा रहल छल तैयो मुड़ि कऽ / भाखा केँ मोटका जौरसँ बान्हल / चिचिया कऽ /घिसिया कऽ कहलक / अहि सँ केना आब तोँ बचमे / अहि जौर केँ काटि ने सकबेँ / परचम हमर सदा लहरायत अपन आब बचल कतय किछु / सबटा पच्छिम हड़पि रहल अछि मो. गुल हसन गीत-छोटका कि‍सान कन्‍हापर हर लऽ चलल जाइ कि‍सान चलल जाइ कि‍सान...। कि‍साने छै हम्‍मर देशक अभि‍मान कि‍साने छै हम्‍मर भाय देशक शान कि‍साने छै हम्‍मर भाय देशक शान। भोरे उठै छै खेतपर जाइ छै सरदी-गरमीकेँ कि‍छु ने बुझै छै नसीबो ने होइ छै समैपर चाहो-पान।। कि‍साने छै देशक अभि‍मान...। कखनि‍ दि‍न होइ छै कखनि‍ होइ छै राति‍ ओगरैत रहै छै भैया अपन जजाति‍ खेतेमे होइ छै भाय खएक-जलपान। कि‍साने छै हम्‍मर देशक अभि‍मान कि‍साने छै हम्‍मर देशक शान...। नि‍पौनी-पटौनीमे लगल रहै छै कान्‍हपर कोदारि‍ ओकरा हरि‍दम रहै छै पार्टी-पोलटीससँ कोनो नै मतलब हरि‍दम रहै छै फसीलेपर धि‍यान। कि‍साने छै हम्‍मर देशक अभि‍मान। गुल हसन कहैए सरकार अहाँ सुनि‍यौ कि‍सानक समस्‍याकेँ पहि‍ले बुझि‍यो खाद-बि‍आकेँ करि‍यो नि‍दान। कि‍साने छै हम्‍मर देशक अभि‍मान कि‍साने छै हम्‍मर देशक शान। ओम प्रकाश झा गजल अपन मोनक कहल मारि बैसल छी छलै खिस्सा लिखल फाडि बैसल छी हँसी हुनकर हमर मोनमे गाडल करेजा अपन हम हारि बैसल छी पढू भाषा नजरि बाजि रहलै जे किए हमरा अहाँ बारि बैसल छी सिनेहक बूझलौं मोल नै कहियो अहाँ गर्दा जकाँ झारि बैसल छी जमाना कहल मानैत छी सदिखन कहल "ओम"क अहाँ टारि बैसल छी मफाईलुन-फऊलुन-मफाईलुन (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर) गजल कानैत आँखिक आगिमे जरल आकाशक शान छै बेथा करेजक लहकि गेलै, सभक झरकल मान छै बैसल रहै छी प्रभुक दरबारमे न्यायक आसमे हम बूझलौं नै बात, भगवान ऐ नगरक आन छै सदिखन रहैए मगन अपने बुनल ऐ संसारमे चमकैत मोनक गगनमे जे विचारक ई चान छै आसक दुआरिक माटि कोडैत रहलौं आठो पहर सुनगैत मोनक साज पर नेहमे गुंजित गान छै सूखल मुँहक खेती सगर की कहू धरती मौन छै मुस्की सभक ठोरक रहै यैह "ओम"क अभिमान छै

दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, मुस्तफइलुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर) गजल राम जपैत छी रहम करू कृष्ण सुमरि अहाँ करम करू कष्ट अनकर बूझिकऽ सदिखन धन्य कनी अपन जनम करू कानि रहल बहिन-माय अपन अंतरमे कनी शरम करू पजरत आगि ठंढा हियमे अपन विचारकेँ गरम करू "ओम"क बात राजा सिनि लिअ राजक आब किछु धरम करू दीर्घ, ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ(मुतफाइलुन), दीर्घ, ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ २-११२१२-२-११२ (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर) गजल हेतै खतम गुटबाज बेबस्था बनतै सभक आवाज बेबस्था भेलै बहुत चीरहरणक खेला राखत निर्बलक लाज बेबस्था देसक आँखिमे नोर नै रहतै सजतै माथ बनि ताज बेबस्था मिलतै सभक सुर ताल यौ ऐठाँ एहन बनत ई साज बेबस्था "ओम"क मोन कहि रहल छै सबकेँ करतै आब किछु काज बेबस्था दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-लघु, दीर्घ-दीर्घ-लघु-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ प्रत्येक पाँतिमे एक बेर। २२२१-२२१२-२२ शारदानन्द दास परिमल पूर्णेन्दु नभांगनमे

उतरल पूर्णेन्दु नभांगन मे ज्योत्सना  मंगल-घट  छिलकौने । उत्त्तुंग द्रुमदलक परसि माथ आशीष मुकुट अछि पहिरौने । पबितहिं स्पर्श सिहकल बसात शेफालिकाक दृग बन्न फुजल, उछ्वासक नेने हर्ष विपुल सुर-सौरभ पसरल छन्द भरल । अणु-अणु,कण-कण मे सम्बोधन ममता सँ भरल सुधि सरसौने । धुरियाएल तन सँ शिशुक जेना रज पोंछि लैछ माइक आँचर , तहिना हरि तिमिरक छाँह, नभक आनन कें कएल ज्योत्सना भास्वर। सौन्दर्य निसर्गक धरती पर आनल इंगिति सँ परिछौने ।। शीतल स्पर्श सँ ज्योत्सनाक सहजहिं स्फूर्तित भेल धरा , अम्बर सँ अवनी तक पसरल आनन्दक छन्द अमित अपरा । तृण-तरु-वन-उपवन शैल उदधि सभ मस्त अपन हक़ अछि पौने । अछि मानव लेकिन निरानन्द अनुबन्धित कृत्रिम जीवन सँ, संसृतिक बघारल ऐश्वर्यक अप्रतिम गौरवक प्लावन सँ,-- रहि दूर चलि रहल अपन लाश अपनहिं कनहा पर घिसियौने ।। घुरि आओत कहिया पूत जे कि भसिया क गेल चलि बहुत दूर, ममता माईक पथ मे पसरल करि पबइछ नहिं अभिलाष पूर । पथ-पाँतर नजरि बहारि रहल आशा सँ मनोरथ भरियौने ।। उतरल पूर्णेन्दु नभांगन मे ज्योत्सना मंगल-घट छिलकौने ।।

फागुनक गीत फगुनहटिक लए रहल  लहरि छी। मस्त उमंगक उमरल धार सँ लैत अंश हमहूं उपकरिछी। फगुनहटिक-

मधुमासक उल्लास रास मे, परिरंभित रहि प्रणय-पाश मे, मांगपूरक हितउचित अवसरक उडंति अवनि सँ अम्बर धरि छी। फगुनहटिक--

सुरक मधुर उर्मिल वितान मे  , वरवस उधियाइत उडंान मे भै विभोर सहजहि हिलोर सँ हेरा जाइत हम सम्हरि - सम्हरिछी।फगुनहटिक लए

स्फू्रतित गमकैछ दश दिशा, अधिक बढाबति अछि जिजीविषा नैसर्गिक ऐश्वर्यक मह-मह बा ढि बीच स्फुरित लहरि   छी।।फगुनहटिक---

एहन मधुरितुक गुण सुर-रंजन, बहति समीरण अछि दुखभंजन जीवन मे सौन्दर्य  यौवनक लैत अपन सुख अंजलि भरि  छी।।.                   

कण-कण मे आकर्षण पवनक हठपूऱवक मधुवरषन मधुमासक एहि रास-भास केर थाह लैत हम ठहरि - ठहरि   छी। फगुनहटिक लए रहल--

रहलआब नहिं  जाड़क ठिठुड़न ढीठ तुषारक निरलस अड़चन, अकड़न वातावरणक दुर्बह   दूर हटल  हमगेल पसरि छी।। फगुनहटिक---

इहलौकिक सीमा क पार बहि, रितुक प्रसादित स््वनक संग रहि, उतरि अनन्त नभक प्रांगण मे आनन्दक सुर गहि सुरसरि छी।।फगुनहटिक.. योगानंद हीरा गजल मोनमे अछि सवाल बाजू की छल कपट केर हाल बाजू की दुख सुखक गप्प आब सूनत के सभ बजा रहल गाल बाजू की छोट सन चीज कीनि ने पाबी बाल बोधक सवाल बाजू की माँग सभहँक तँ ओहिना बड़का आँखि सभहँक बिड़ाल बाजू की भाग लिखलक ललाट ई मँहगी हाथ लेलक भुजाल बाजू की सभ पाँतिमे 2122.12.1222 मात्राक्रम अछि गजल हमरहुँ घरमे आयल पाहुन घर आँगनमे छायल पाहुन जिनकर खातिर आँखिक पुतरी छल पथरायल आयल पाहुन अँगना गमकल कंगना खनकल घर आयल चोटायल पाहुन मेना बाजल सुगना नाचल दीदीकेँ भरमायल पाहुन कनखी मारै पोसा पिल्ला देशी मुरगी खायल पाहुन हीरा जे छल दुबकल घरमे तरहथपर चमकायल पाहुन सभ पाँतिमे आठटा दीर्घक प्रयोग अछि। गजल रहू कमल सन सदा सुवासित बनू मनोहर हवा सुवासित उड़ै भमर चहुँ दिशा सुनाबै हमर हुनक ई कथा सुवासित दुखक झमारल हँसी लुटाबै अलख जगाबै धरा सुवासित किनक कने घोघ उठि रहल अछि हवा करै अंगना सुवासित चढ़ल गुलाबी निसा कमल सन भरम हमर कंगना सुवासित चलू बढ़ू सबजना निमंत्रण बनी कुसुम हम मुदा सुवासित सभ पाँतिमे 12+122+12+122मात्राक्रम अछि गजल देखू बौआ आयल कौआ छतपर बैसल माँगय खोआ कुचरय आनय पाहुन कौआ विरही पीड़ा जानय कौआ कानय बौआ पकड़य कौआ एके आँखिन देखय कौआ सभ पाँतिमे 2222 मात्राक्रम। मिहिर झा बाल गजल

माय तरेगन तोडि दे  भानस बासन छोडि दे  खिस्सा राजा भोज के कहिके घूरो कोडि दे खेबौ दाना फोँक नै मूँगफली तूँ फोडि दे छूछे चूडा पात पर दहियो कनिये पोडि दे टूटल घोडा टाँग गै माटि लगा के जोडि दे

२२२२ २१२ बाल गजल पूड़ी बनलै गोल गै बाजू मिठगर बोल गै  पूड़ी गेलै पेट मे  नाचब सौंसे टोल गै  होली एलै दोग से बजतै तासा ढोल गै ममता तोहर चान सन कोना लगतै मोल गै

२२२२ २१२ शेर बहु विध भोजन आगू पसरल मुह पर लागल जुन्ना अछि  जीवन भरि कयल कठिन संयम भेटल तैय्यो सुन्ना अछि कता टोपी पहिर मियाँ बनलहु तिलक लगाय पंडित दिल कहियो मिलल नहि देश के केलों खंडित भाषा बासा रहन बसन अलग रंग छे फूलक सबके सानि भटरन्ग केलहु सन्गहि भेलहुँ दन्डित बृषेश चन्द्र लाल चारुभर पसरल अछि नभक स्नेह श्वेत पुष्प-रेणु लजाएलि धरती  ओढ़ि लेलकि निर्मल चादरि । स्पर्श शीत  तैयो गरमा दैत छैक बसन्त अछि लग से बता दैत छैक ! जिनगीमे पहिल बेर हिमपात देखल, छुअल आ' भोगल । बालगीत फुर्र-फुर्र बगड़ा, उड़ि-उड़ि बैसए; कीरा-फटिंगा, बिछ-बिछ खाए । घिर्र-घिर्र घुमि, चहुँओर देखिकए; सुर्र- फुर्र, खोंता चलि जाए । चीं-चीं लोल, चिआरने भुटका: बगड़ा उगलि, खुअओने जाए । याहले-वाहले, मोटाएल भुटका: जोड़ी बना, फुर्र भ’ जाए ।। फेर वएह दिन, जिनगी ओहिना; फुर्र-फुर्र, भरि अकाश रमाए । फुर्र-फुर्र बगड़ा, उड़ि-उड़ि बैसए; कीरा-फटिंगा, बिछ-बिछ खाए ।। बालगीत चौरचन चौरचन उगल चान झट दए पूरी दही आन मरड़ भाङि खूब खाएब पूरी सभ भाई सभओ आङन घूरी मीठ पिरुकिआ आ अछि खीर लाबह जल्दी छूटल धीर तोड़ब तरुआ आह तिलकोर भैया जो तोँ नरिअल फोर तैपर देबै मीठगर पान बौआ कुदए देखबति शान ! होरीक गीत

युवा - गोरकी नाचए पहिर चुनरिया जियरा झुमल जाय रे ! युवती -धिन धिन ता ता बाजे रे लहरी हियरा जुमल जाय रे !!

१ युवा- फुलल गुलाब गमकलि चम्पा महकि उठल बन जोर  रग-रग राग रागकेर गाबए मांगए नेहक कोर शीतल पवन ई मारए अगनमा मदेँ सहल ने जाए रे ! गोरकी नाचए पहिर चुनरिया जियरा झुमल जाय रे !!

२ युवती- आएल बसन्त छाएल फगुनी कुहकए कोइली चहुँओर टनकए तन झनकए झन-झन गाढ नीन्न पहुँमोर खोलू नयन ओ नेही सजनमा भानु उगल अब जाए रे ! धिन धिन ता ता बाजे रे लहरी हियरा जुमल जाय रे !!

३ युवा – लाल रंग सब अंग लाल छै लाले के छै जोर लाल गाल तैपर गुलाल छै लाले गोरीके ठोर लाले लगओलक लाली लगनमा लाले लाल देखाए रे ! गोरकी नाचए पहिर चुनरिया जियरा झुमल जाय रे !!

४  युवती- लाल कहै छै लालेके संग लालीक भेलै शोर लाले दिन राति छै ई लाले सुखद लालिमा भोर लाल निशासँ घुमए गगनमा लाले पिय देखाए रे ! धिन धिन ता ता बाजे रे लहरी हियरा जुमल जाय रे !! शिव कुमार झा टिल्लू - ग्राम पोस्ट करियन, जिला समस्तीपुर, वर्त्तमान पता : जमशेदपुर हाइकू / शेनर्यू आँखिक नोर /सिनेहक संगोर / नहि झंपैछ नदीक धार /वीर मनु कपार /आगाँ देखैछ बाझल ताग/बिनु लयक  राग  /धैर्य परीक्षा गोंगक मोन /गदराइल बोन/पटु बुझैछ हाथीक दल /मिथिलाक संवल/एकहि रंग भावक नाह /कर्मक पतवारि /धयने रहू कोढ़िया मोन/परातक आशमे/आँखि मुनने हमहीं लेब/पसाही लगाएब/कि‍छु भेटत कोसीक मोनि‍/चारि‍ हाथक बोनि‍/ बड़ गहींर हम वि‍देह/अहाँ सभ सदेह/बड़ अंतर भावक नाह /कर्मक पतवारि/‍ धएने रहू नीति‍क संग/सिनेहक उमंग/चल जीवन अथाह धार/मुदा जीवाक आश/कात लागब आनक आँखि/शोणि‍तसँ भरल/क्षीर लगाऊ अपन मान/नि‍रीहक पराण/रक्षाक लेल दैहिक गुण/किओ नहि छिनय/ कर्मठ बनू चेतनशील / धोखा नहि खाइछ /सुरूज जकाँ काबू मे राखू /मोन बड़ चंचल /क्षणे उड़य प्राण कातर/कथी लेल घमंड / सभ नश्वर सभ सँ पापी / मोनक मैल छैक / निर्मल राखू माँछ बैसय / बेमार भेला पर /चलैत रहू टनका बिहाड़ि  काल गाछक नीचा ठाढ़ नहि रहब ठाढ़ि खसि  सकैछ चोट लागि जाएत पोखरि कात ककरो संग जाय एकसरि मे पिछरवाक डर टांग टूटि जाएत हाथ बैसाउ गोल मटोल लिखू सभ पढ़त चिरचिरी पारब किओ नहि बूझत मधुर बाजू सभ किओ मानत सकाले उठू देह नीक रहत सभ काज उत्तम मायक गप बाबाक उपदेश सुनबा जोग पैघ लोकक बात प्रेरणा दैत छैक सुनू औ बौआ वाम कात चलब नियम छैक एकरा नहि तोरू माय बाट तकैत गुरुक बात धियान द' सुनब ज्ञान बढ़त नित आगाँ रहब बुद्धि सेहो होयत नहि डेराउ भूत नहि होइछ साहसी बनू मुइल मने अंत तकर कोन डर आसन धरु देह सोझ रहत कबड्डी खेलू खूब भूख लागत भरि पोख खाएब बगुला ध्यान कोनो काजक घड़ी जरूरी छैक काज पूर्ण होइछ अपनहुँ संतोख अगिल कंठ उपहासक पात्र आचारी बनू उचित बात बाजू अधलाह सं दूर रहसबौरा लोेकक काज नहि कालक मान जे किओ करताह काल संग देतनि चऽहक गाछ टूटि‍ जाएत मुदा झुकत  नहि‍ जीव कोनो धरनि‍ कालक संग चलू कठकोकांड़ि‍ छोट पोखरि‍ जकाॅँ क्षणेमे मत्त सर्वगुणी अर्णव अथाह मुदा शांत सगरो डर चारूकात राकस डि‍रि‍याइछ वनि‍ताक जीवन नरक बनि‍ गेल असमंजस बाटक कांट जकाँ बि‍छैत चलू वक सन धि‍यान आगाँ बढ़ैत चलू पाकल बाँस चार नहि‍ लहय सोझ बड़ेरी साङ्गः सनगर यएह घरहट अंर्तजालमे ओझरा गेल अछि‍ नेनाक मोन नैति‍कताक लोप आचरण बेहाल बेटीक हंता एकटा बेटा लेल उकि‍याएत पानि‍ बि‍नु कानब तैयो कचोट नहि‍ चहटगर रसायन भरल नहि‍ चि‍बाउ देह हएत नाश सभ कि‍छु चौपट सभ बेरंग कहि‍यो अधलाह नहि‍ देखल आँखि‍ बि‍नु जीवन अंशुक अंत भेल केहेन दंड एकरा दैव कृपा केना कहब कोन कालक डांग वि‍लोचन निर्मूल बौआ कमाल घुघना लाले लाल भोरे कानय दि‍नमे रंगताल फुलल दुनू गाल इडली डोसा सदिखन खाएत दूध देखि कऽ मुँह विचकाएत बहसल चि‍लका कमौआ पूत बनि कऽ देखबिहेँ सभसँ आगाँ विज्ञक समूहमे कुलक हेतौ नाओं माँछक झोर रसगर परोर देखिते दैया कानथि बलजोर माँगथि ति‍लकोर दि‍न सूतथि राति भोकरथि मुनि‍या बेटी परम सुकुमारि बैशााखक विहाड़ि तोहर बेटा बूढ़ सूढ़ देखिते गाल बजाबै एहेन बहसल केकरो पूत नै सुनू भजार चलू आम तोड़ए चोरिक आम बड़ सुअदगर रखबारो सूतल कैंचाक मोल कनेक बुझू बाउ लेमनचूस बेसी नै चिबाउ दाँत सड़ि जाएत दू दुनी चारि पेटकेँ अजबारि‍ रखने रहू भानस भऽ रहलै धंगरि कऽ खाएब कारी बकरी टाँग दुनू पकड़ी छानि कऽ दूध पीबि पीबि  ढ़करी नहि जेबै सकरी काँच लताम नहि चि‍बाउ दाइ पेट बहत मारि सेहो लागत दवाइ नै देब पाकल फल वि‍टामि‍न भरल चिबा कऽ खाउ रोग नै धरत पनिगर रहब पापक घाव अपरूप अर्बुद फाटय नहि बिखक संवाहक करेज जराबय विकासलीला मूल कोरि रहल रीतिक अंत मात्र आगाँक सोच अंतक बाट सेहो कासक फूल शारदीय प्रसून गुलाब रोपू शाश्वत सहचरी डेग-डेग छाँह चल जीवन परंच स्थिर मन दुनूक  योग अलि प्रसून जकाँ तारतम्यक आश ड्राम बजौता अझुका नेना सभ ढोल मृदंग नहि नीक लागनि बाह पछबरिआ नेह सँ  दूर आजुक धीया पूता हिनक माय बोतल दूध देथि तकरे परिणाम मैथिली छथि मात्र गाम घ'र मे सेहो कनैत भरमि गेली माय धियान दियौ भाय गुणी वनिता पापी पूत सँ नीक तखन भेद करब अनुचित बेटियो केँ बचाउ गाछक पात टूटि घुरैत नहि वाक संयम मनुजक लक्षण सोचि विचारि बाजी पुरैन पात पानि मे उपजैछ गुण विलग संग मुदा अनंग विद्वान जकाँ शांत करैत साँप पिछुआरे काटय कुटिल जकाँ पाछाँ प्रहार नहि ककरो सोझाँ बाजी मोनक दुःख सभ केँ नहि कही लोक हँसैछ परोपकारी लोक कलियुग मे नहि खाधिक बेंग जहान खत्ता बुझै सगरो देखू अहाँ सर्वज्ञ नहि विज्ञ सँ ज्ञान लिअ डाकक बोल अमृत अनमोल कहने छल गुरू करी जानि क' पानि पीबि छानि क' जड़ि कोरब अधलाहक  काज एहि सँ बचू कुपात्र कहाएब गड़ाइन हएत वाम करोट पयर पसारि क' बिनु गेरुआ नित सुतू औ बाउ रोग नहि धरत परक नारी अपने माय जकाँ चरित्रवान धोखा नहि खाइछ सगरो यशक भागी धरती अंडा अहाँ सेहो अंडे सँ तखन घृणा सटलो छुआबय वाह पण्डितारय आँखि सँ देखू वेअह बात बाजू आनक सुनि परक उपहास अमानुषिक वृति दंड क्षमा मे क्षमा पैघ होइछ मुदा कखनो अनुशासन लेल दंड सेहो जरूरी पैरक नीचाँ लटकलें त' गेलैं लिखल छल मनुज चेताबय मात्र विधान लेल छल प्रपंच गुण बनि रहल राजनीति मे इएह हथियार गणतन्त्रक लेल इंटरनेट आँखि चिबा रहल एहि मे  बाझि गेल आजुक लोक सभ विकसित जहान सुनू औ वैद्य आब मोंछ पिजाऊ डंकल दाना पोटरी भरि लिअ' बेमारीक जोड़ सभ विद्वान एक पर सँ एक छोट पैघक कोनो मर्यादा नहि कत' रहब आब की ल' जायब सभ ठामे रहत गीता कुरान सभ पढ़ैत छथि सिकंदर समान शोक सभा आँखि मे नोर दांत निपोर नेना मे जिद्द पूर्ण होयबाक उपरान्त सुनल फकरा ---- बुढ़िया मायक मुख सं' मुदा! एकटा अधबयसूक अंतिम यात्राक सभा मे प्रिय सहकर्मी लोक सभ विनु नोरक दाँत निपोरल वाह रॉ! मानवीय मूल्य बेचि लेंले अजातशत्रुक अंतिम सभा मे एहेन धृष्टता .. देव कहियो क्षमा नहि करतौ हमर माय असमय गेली द'र दिआद जाति पजातिक संग " नेंगरा " कुकुर सेहो कानल छल वेदनाक अभिव्यक्तिक लेल शब्द कोनो अनिवार्य नहि परंच!जैविक परम्परा थिक सभ जीव , काग गीदड़ सेहो संगी हुए वा परिजन " अंतिम सभा" अवश्य बजबैछ हमहीं अंतिम सभा ' शोक-सभा बजयलहुँ अपन प्रिय मित्रक अंतिम सभा ..... ई हिम्मतिक गप्प थिक हमरा त' अंतिम सभा ..अंतिम स्नानक .. हिस्सक परि गेल अछि एहेन पाथरक करेज ककर हएत ? सरिपहुं अजातशत्रु सभ सं प्रिय छल !! तीन-तीन अबोध नेनाक बाप एकटा अवलाक पतवारि सहज व्यक्तित्व सबल दृष्टिकोण ककरो अधलाह नहि सोचलक.. बूढ " गुजराती" बॉस सेहो कानल परशुरामक आखर-आखर सम्वेंदना सं भरल झकझोरि देलक एहि भीड़ मे किछु अंटेटल अभागल सेहो छल एक दोसरक पाँजरि मे गुदगुदी लगा क' हँसैत वाह रॉ ! टाटा नगरक लाल किओ सत्य कहने छल एहि स्टील नगरी केँ आत्मसात केनिहार मे आत्मा हारमाउसक नहि " स्टेनलेस होइछ " संतोष एतवे जे तीनू " मैथिल नहि छल " सरिपहुं मैथिल कदापि ? एहेन नहि भ' सकैत अछि अपना में लरत एक दोसरक टांग खींचत मुदा! भाव! आह ! कम सं कम अंतर नहि त' उपरिक मोने अवश्य तीनू कुपात्र केँ बधाई रउ तोरो घर अन्हार हेतौ काल-चक्र चोरक गाल तर पान पचीश कर्मठ भाग जनेरक शीश पारि चिरचिरी चेक भजाबै कारी आखर बुझै महीष तकर छाँह तर बुद्धि विशारद फुदकि -फुदकि गठरी पंजिआबै गणक तंत्र नहि "काल-चक्र " ई संत एहि ठाम नोर चुआबै आना -छिद्दी झरल पल्ला सं परम पिचाश प्रतिशत चाही कोंचा सं ढेंका बढ़ि रहलै बहकल लूटा रहल बाहबाही शोणित सुखा अन्न उपजाबय तकरा लेल खुद्दी बड़ भारी अंचल मे जे दलाली करतै ओकरा पात भरल तरकारी ककरा' ककरा' दोख दिऔ औ जकरा चुनलहुँ सेअह गहीर बिनु कानक से संगम सुनतै चिंतनशील आब भेल बहीर बूढ़-पुरान बकलेल कहाबै सहसह कपूत हुरदंग मंचाबै बेसुराह छालही बनि पसरल पंचम सुर केँ नांच नचाबै अर्थनीति केर प्रबल पाश मे स'भ बुझै अपना केँ बीस मर्यादा केँ चोन्ह अबै छन्हि भरल ईमान केँ उठलैन्हि टीस जाति-धर्मक धार मे भसि क' सम्बल सबल समाज बनौलक जकरा  जतेक पूंजी केर धाही वैह स्वार्थक लेल सत्य जरौलक आर्य भूमि मे देव बसै छथि कोना एखन धरि बाँचल देश ? जकर चरण रज माँथ लगाबी वैह धेने बहुरुपिया वेश हमर अपन कविता नहि ककरो सं आग्रह नहि कोनो पूर्वाग्रह नहि वाद नहि प्रतिवाद एक मात्र समन्वयवाद एक मिथिला एक जनक एक माय ; कौशल्या बुझू वा कैकेयी सबरी बुझू वा यशोदा जाति त' रहबे  करत किएक त' एहि सं होइछ जहानक सृजन मुदा ! नहि ब्राह्मण नहि सोलकन जाति मात्र पुरुष - स्त्री की एहेन मिथिलाक निर्माण संभव नहि अवश्य होयत आशावादी बनू प्रतिवादी नहि समताक आश करू नहि उपहास नहि उंच -नीचक आरि नहि दिऔ ककरो गारि जकरा मे   जतेक छल शक्ति सभ कयलक मातृभक्ति आगाँ बढ़ि क' सोचू सभक शोणित पोंछू हमर पुरखा कयलनि गलती बुझू ओ छलाह निस्सर हुनका बुझियौन अस्सर जेना पिसौनक  जरती कहि सकैत छियनि परती मुदा मृतात्मा केँ सीनियर सिटीजन केँ नहि दिऔन गारि !!!!! किएक दैत छियनि पुरखा केँ तारि ? अपन बाट त' सोझ राखू अरिया सुधरल पमरिया सुधरल पमरिया मने जाति नहि जाहि बोलीक एक्को धुर जमीन नहि ओ कहरिया वेअह बक्खो सएह पमरिया केहेन अपन भाग्य केहेन दुर्भाग्य ओ फूहड़ बोलीक ललना सभ हमरा सं पहिने साहित्यक महँफा उठा पूरा आर्यावर्त दौरा देलक हमर वैदेही गामे मे' काहि काटि रहल छथि हमर संस्कार  अविरल कांता जकाँ ..... आब एक्के मात्र आश पकरने रहू समताक पतवारि जेठक दुपहरिया हुए वा रैन भदवारि इतिहास देखू हमर बाट मधमार्ग एहि ठाम  सभक सर्ग नहि कोनो अपवर्ग की औ भाय की बेसी कहि देलहुँ  आय ? नहि कहब आत्मा सं जे अहाँ कहब हम ओकरे सुनब जौं नहि सुनि सकब त' त' हारि माँ मैथिली केँ अंतिम प्रणाम करैत उछ्ह्वासक सीरक तानि लेब ई मात्र हमर मोनक बात नहि कोनो विशेष गाछक पात कोनो धारक नहि सविता मात्र " हमर अपन कविता " नहि नीक लागय त' करैत छी अर्धना आब  अंतिम प्रार्थना नहि देब गारि नीक नहि लागय त' लिऔ मोन सं उजारि त्रिपथगाक ज'ल   सं पखारि बाढनि सं बहारि ...... सिनेह छात्रवृतिक अंतिम खेपक परीक्षा लेल हमर नाओं आयल क्षत्रधारी विद्यालय दलसिंहसराय बड्ड नीक लागल रोसड़ा में  जौ सेंटर परितय त' गामक तांगा सं आयब जायब नीक नहि लगितय आब त'.... रोसड़ा सं ट्रेन पकड़ि समस्तीपुर फेर बड़ी लाइनक गाड़ी सं मोन गुदगुदा गेल बेसी नहि खाउ आगाँ नीक मिठाइ खुआ देब बाबूजीक बात सुनितहि थारी उनटा  देलहुँ मायक करेज फाटि गेलनि छौंड़ा कें हमरा पर कनेको  दरेग़ नहीं सिनेह कोना बूझय जखन  बापे नहि कहियो मोजर देलक त' एकर कोन आश साग भातक थारी उनटा क' रसमलाइक आश में रोसड़ा नहि रसबड़ा मुँहक लेर पोछैत विदा भ' गेलहुँ श्याम केबिन में अपन आनन्दक अनुभूति में मायक मोन कें दुखबैत रसमलाई संग कचरी कचरैत आनंद आबि गेल परमानंद वा अभयानंद बाल मोन ..... छमकैत विदा भ' गेलहुँ रोसड़ा घाट टीशन पर ट्रेनक प्रतीक्षा हमहू करैत छी संगहि करैत अछि दू गोट आर नेना "सहोदर" अवरोही क्रमक प्रतीक्षा में हम जायब पश्चिम ओ जायत पूब भुखायल मुँह अपरतीभ हमरा जकाँ रसमलाई नहि खेने छल पोटरी सं तीन गोट टटायल सुक्खल सोहारी बाहर कयलक देखिते छोटकाक आँखि सं झहरय लागल स्वातिक बून क्षणहि में नोर बिला गेल सोहारी टटायल छै नहि खायब बरका  गंभीर उमेर बेसी नहि , मुदा ! गरीबक संतति  नेनपन सं सोझे वृद्धावस्था में प्रवेश क' जाइछ ताहु पर गप्प सं बुझना गेल पितृछाया सं विमुख छल बरका कें पिताक अभिनय करवाक अछि ...अवश्य करत!!! छोटकाक माँथ हँसोथि बाजल - चल ने गौहाटी काल्हि सं घी मलीदा खुएबौ मुदा एकटा गप्प सेहो सुनि ले कतबो मलगर पूआ खेबें " काल्हि सं मायक हाथक ई टटायल सिनेह नहि भेंटतौ दुनू एक दोसर कें पकड़ि क ' बिलखि रहल अछि ,,,,, छोटका हांय हांय एकटा सोहारी कें मोरि पोटरी में बान्हि लेलक " जाधरि गौहाटी में रहब एहि सोहारी कें जोगा क राखब " एहि में जोहैत रहब मायक "सिनेह" आगाँ में राखल शेष - दुनू सोहारी , दुनू नेनाक अश्रुकण सं मायक सिनेहक स्मरण सं नीर बनि खसल आ भिजा देलक सुखल सोहारी नोर सं कोमल भ' गेल घी दालि तीमनक कोनो काज नहि दुन्नु  नेना तिरपित भ' गेल हम स्तब्ध छी !! बाबूजी हमरा  दिशि ताकि हँसि रहल छथि हम पढ़ि रहल छी ओ दुनू मुरूख हमर प्रतिभाक कोनो काज नहि हम मायक सिनेह कें तार तार क'  देलहुँ ओ दुनू मायक सिनेह कें बोरि बोरि क' काठ बनल सोहारी कें सहज बना देलक ओ मुरूख बाल बंधु हमरा सं बेसी बुद्धिमान हम साधनशील पिताक छी - संतान मुदा मनुज नहि जौं ओ हमरा जकाँ शिक्षित ओ साध्य परिवार में जनम नेने रहितय तं हमरा छात्रवृति .... कथमपि नहीं भेटल रहितए कतेको एहेन दीन- सुत ऋतुक पुष्प जकाँ बिनु पूर्णता नेने मुरझा जाइत अछि ओ दुनू भाय वाह !!!!! कतेक सिनेही ओ चिंतनशील हम सरिपहु लजा गेल छी  ! मुदा नमन करैत छियनि ओहि माय कें जनिक कोखि सं एहेन मातृभक्त जन्म लेलक .... हमरा छात्रवृति तं भेंटल ...... कचोट सेहो एखनो धरि विद्वान हएब सहज कठिन होइछ  तं  मनुक्ख हैब ...... नमन आमक गाछ फ'ड़  सँ लदल अछि देखिते ठुट्ठ पाकड़ि  तान देलक उपहासक तान सुड्डाह क' लेलें अपन स्वाभिमान एकरा नम्रता कोना कहबौ हमरा देखें हम गरीब छी फ'ड़विहीन छी मुदा किओ नहि बूझत जे दुखित  छी. ककरो  लग नांगड़ि  नहि डोलबैत छी.. शान सँ जीबैत छी भूखल रहैत  छी मुदा  छी धरि स्वाभिमानी !!!!! राणा प्रताप जकाँ आमक गाछ हंसल ... यौ  बाउ  एतेक नहि अगुताउ किए' करय छी राणा सँ तुलना ओ त' मातृ सिनेही छलाह मायक अस्तित्वक रक्षार्थ दृढ रहथि अहँक ई दृढ़ता नहि व्यर्थ अहंकार  थिक जकरा किछु नहि रहैछ ओ एहिना उताहुल रहैछ ह'म नांगड़ि  डोलाउन नहि राणा जकाँ मातृभक्त छी अपन ठाढ़ि पात झुका क' वसुंधराक प्रति कृतज्ञता देखबैत छियनि "हे माय अहाँ अपन करेज फाड़ि हमरा जन्म देलहुँ कतेक व्यथा सहने होयब लिअ' आब हम संतति बनि अपनेक आँचर मे अहँक लगायल .. फल द' रहल छी पाकत त' खसा देब मनुक्ख सँ ल' क' गीदड़ चिरैं चुनमुन्नी  केँ खुआ देब अहाँ माय छी ... अपन करेज केँ कोरि . वायु , ज'ल , भोजन संचारी छी हमरो त' किछु कर्त्तव्य ? तें हम झुकि क' समर्पण क' रहलहुँ नमन क' रहलहुँ दुष्ट पाकड़ि उद्विग्न  भ' गेल जखन एकटा दुष्ट लोक कर्म सँ, विचार सँ रीति सँ व्यवहार सँ पराजित भ' जाइछ तखन ओकरा मे गराइन स्वाभाविक आ लाक्षणिक पाकड़ि  सेहो दुष्ट मानवक संग रहल संसर्गे सँ दोख -गुण होइछ करय लागल बिहाड़िक कामना पवन सँ  प्रार्थना वातक झकझोरि बहाउ हमरा उजाड़ि.. जड़ि सँ उखाड़ि " ओहि अहंकारी आम पर खसाउ" हम आब मरय चाहैत छी मुदा ! ओकरो जीबय नहि देब.. वाह ! कलियुगी मानव  की क' देलें अपना संग संग जीवनदायी गाछ-वृछ केँ सेहो दुष्ट बना देलें वात बहल बसात बहल झांट बरखा संग बिहाड़ि देलक पाकड़ि केँ जड़ि सँ उखाड़ि पाकड़ि खसल मुदा उनटा आम पूब दिश  छल पाकड़ि  पच्छिम भ'र खसल दुष्टक क्षय भेल नमन क जय भेल उधेरबुन जीवाक अनुपम क्षण छल भेंटल आपकता सँ जीबि  नहि सकलहुँ आश मे पिआसल  रहि गेलहुँ मुदा- मधुर सत्व रस  पीबि नहि सकलहुँ सुखल आँखि में आब धार नहि हिआ मे आब वसंत -उदगार  नहि सदिखन बालु पर रगरैत  रहलहुँ  मुदा- चकचक भेल एखनहुँ कटार नहि ठाढ़ निरीह कालक गति देखैत फाटल मोन केँ सीबि नहि सकलहुँ उधेरबुनक अनंत निलय केर कर्मक दुआरि पट बन्न भेटल सभ झट्टा केँ झारि क' देखलहुँ कतहु  ने  अस्सर अन्न भेटल सभ फुल्ली मे कारी बुनका फ'र फ'र मुरहन्न भेटल नीति सँ पहिने श्रृंगार छोह केँ एहि ठाम कोनो मोल नहि जीवनक  गति यति  आ नियति मे भौतिकताक किल्लोल नहि सोझ बाट पर चलू पथिक औ कतहु ने कतहु भोर  हेतै कर्म एकमात्र शाश्वत होइछ बूझब त' इजोतक जोर हेतै समयक महत्त केँ बूझि लिअ' औ सजल शांतिक तान भेटत ":उधेरबुन" क  महँफा मे बैसब त' क्षणे -क्षण विप्लव गान भेटत बाबाक कंठी ब्रह्मवेला सँ गदहवेर धरि चलिते रहैत ... जन कल्याणक लेल गामक लोक एहि मे बाबाक स्वार्थ देखैत छल कोनो परवाहि नहि एतेक बुड़िबक थोड़े छी मुझौना बाली कनियाँ कहलनि अपन बहिन सँ बियाह करा देबनि साठि बरख बीति गेल आब बुढ़ारी मे घीढ़ारी नहि रिफाइन ढारी.. संभव छैक.???? बेटा लेल बाघोपुर सँ स्कूल बैग  मंगेबाक छलनि ने लोक बुझलक " मनोहर बाबा " काज करैत छथि बियाहक लोभें. गामक  लोक केँ एतेक बरिस मे चिन्हब नहि  की ? ताहू मे मुजौना बाली हुनकर सासुओ अपन बहिन सँ.. गछने छलीह ! रौ! घ'र मे एकसरि मोन नहि लगैत अछि तें ने लोकक डलबाही करैत छी उपहासक पात्र बनैत छी आब शहरक कुटिचालि गाम धिना रहल .. मुरूख लोक ! सभ बुझैत छी मुदा की करब.???? आदति सँ लाचार जकरा अपन संतान नहि ओ दोसरक नेना केँ बड्ड मानैत अछि ... कलाम साहेब केँ टेलीविज़न मे देखने छलियैक बच्चाक स्कूल मे अपने नेना  जकाँ भ' गेल छलाह इएह सिनेहक रूप आ तकरे अपमान परंच ! आइ कहि दैत छियौक आब फेर कंठी पहिर लेब ... हमरा हंसी लागि गेल... बाबाक कंठी भोर मे ग'र साँझ मे लतिमर्दन ई कोनो वैष्णवक कंठी नहि " आब ककरो कोनो काज नहि करब - इएह कंठीक भीष्म-प्रतिज्ञा रूप " पचास बेर उतारैत त' ह'म देखने छलियनि कोनो भौजी अपन नेना केँ पठा क' बाबाक केँ पुनि मना लैत छलीह सरिपहुँ..सहज आ आत्मिक बाबा सेहो बौंसेबाक आग्रह लेल प्रतीक्षा मे  रहैत  छलाह दुखद !कचोट भरल किएक त' आइ ई कंठी बाबाक संग जरि जायत बाबा एहि लोक सँ जा रहल छथि सभ गमैया स्वार्थ मे कानल मात्र ! नेना -भुटकाक आँखि मे सिनेहक नोर  .... इएह नोर  बाबा केँ स्वर्गक द्वारि धरि ल'  जयबाक लेल वाहनक प्रणोदक बनत रीतिक-मारल सगरो वैभव - विज्ञान नवल विहान विकासक शान मुदा ! हमर घर मे - शताधिक बरख सँ एक्के तान मात्र प्रीतिक बखान रीतिक गुणगान राजतन्त्रक अंत भेल कतेक युग बीति गेल पिछरल सँ विकासशील फेर विकसितक श्रेणी मे प्रवेश करैत सकल आर्यावर्त मुदा अंग -मगध-मिथिला एतवे नहि प्रवासक नृपि भोजक भूमि सेहो औना रहल अछि नेना मूल साधन लेल चिचिया रहल अछि अधिरथ  गाम-घ'र मे भार्या केँ एकसरि छोड़ि र'न बोन बिनु रथक बौआ रहल अछि ..... कंत नहि सदेह संत ! ने त' पूर्ण पलायन आ ने पूर्ण आंचलिक त्रिशंकु जकाँ वाह रे व्यवस्था तें ने सब गबैछ ... मात्र रीतिक मन्त्र ठकाइते रहलाहें कतेको विद्यापति -मधुप प्रगीते टा मे औनाइत रहलाहें अमर-भानु मूक भेल आरसी- यात्री चलि गेल.. विवशताक तान दैत सगरो वाहवाही मुदा ! के रहल सुनैत जे बुझलक ओहो किछु नहि सिखलक क्रांतिक कोनो आश नहि प्रीति पौरुख केँ  उपहास भेंटल विश्वाश नहि ..... भिखारी भीक्षा मंगिते विदा भेल जाहि लुत्ती जरयबाक लेल नेपाली नाओं बदलि लेलक वैह लुत्ती आगि बनला पर की गोपाल दिश तकलक ? लेखनी त' समाजक सम-विषम चित्र विवशताक अंश जौं सोझाँ रहत कंश की मारत नहि दंश तें ने प्रेमक बरोबरि केनिहार रेणु आंचलिक मात्र रहि गेल शेषांश आडम्बर बहारल हम सभ रहि गेलहुँ ... रीतिक मारल .. उपहासक जारल तंत्रक पजारल रीतिक अर्थ बेपर्द सिनेह नहि व्यवस्थाक कुयोग संबलक हठयोग सभ करय उपभोग हमरे घर वियोग ? गाम -गाम घबाह भेल बाजब सुड्डाह भेल ... गंगा-कोशी-बलान कमला पुनपुन-फल्गु  के कहय विहारक सोतियो तंत्रक लेल अगम अथाह भेल ... बरखा रानी रवि शीतल शशि तनमन कलकल बीतल उष्णादिक ग्रीष्मक चरखा गदरल बहकल झहरल पावस आबि गेली मधुयामिनी बरखा सूतल वितान हरियर खहखह नव कोमल कोंपर पुनि महमह सुक्खल धरिणी भेली चहचह सोती कछेर चाली सहसह बेंगक स्वर सुनि नेना सूतल विरहिणी जुआरि वासर बहसल खेतक सीता बिच विहनि जुआन जड़-चेतन घुरि शील प्राण मरुओ नव रज सँ भेल उत्तान कर्म ह'र कान्ह ल' चलल किसान ई संभव त' तखने हेतै सुरनृप जखने सम बरसेतै जहिया इन्द्राणी जेती नैहर देवराज निलय कोपक गहवर बुझू ओहि बरख अकाल परत जलमास जीव नीर बिनु मरत जौं रहसत पूर्वा त' अतिवृष्टिक ड'र कोशिकान्हा लोक करय थरथर करेह-गण्डकीक की हाल कहब कागतक रिलीफ मे बहैत रहब करू नमन सिनेही सभ परानी नहि विंहुसथि पुनि वरखा रानी वसंतो त' तखने हरियर पावसी सकाल झहरथि झरझर व्याघ्र-कमलाक हाल जुनि करब बेहाल गुनि- धुनि जल छोड़ब यौ नेपाल शैव्याक विलाप हा  हंत आशक एहेन अंत ! तेसर कोखिक पाँचम मास अहीं केँ  छल पुत्रक आश हम त' दुइ बेटीक संग छलहुँ पुलकित शिक्षा आ दीक्षा दुनू विलोकित तखन आर संतानक कोन प्रयोजन छल.... ताहू पर जातिक जांच फेर बेटिए होयत ... सुनिते अहाँक करेज मे लागल आंच हमरा तनया-हन्ता बना देलहुँ फेर सँ रोहिताश्वक आश वाह रे हरि जकर कोखि सँ निकसल छलहुँ ओकरे जाति केँ मारि देलहुँ आश्चर्य त' ई जे .. कलंकित माय भेलीह ... .अहाँ  केँ  शांति भेंटल .. एक बेर पुनि प्रयास अहाँ सफल भेलहुँ बेटा आयल..वंश बाँचल सगरो कलरव मुदा हमर हरिवासल भंग भ' गेल नैहर मे चुट्टियों नहि मारने छलहुँ एतय संतान हन्ता मात्र बेटाक लेल ओहि बेटाक लेल जे जेहल मे परल अछि एकटा अवलाक शीलहरणक पाप मे आब तेसर नारीक शाप सँ की अहाँ बचि सकब...... अहींक आग्रह पर ओहि कुकर्मी सँ भेंट करय जेहल गेलहुँ कुपात्र सँ निपुत्र नीक मुदा! ओकरा क्षोह नहि ओ त' दुइ बेटी परक बेटा थिक ने तोरा किए जन्म देलहुँ .... प्रत्युत्तर ..विस्मित क' देलक कोनो हम कहने छलियौ .... बेटाक माय कहयबाक स'ख छलौ फल त' भोगय परतौ ... संताप पांच बरख में जे किछु देलहुँ , गोटे क्षण में ओ सभ लेलहुँ ह'म आसिनक तीरा बनि झरलहुँ, अहाँ चैती मोदक बनि परलहुँ आत्म उत्ताप  " संताप " भ' पसरल देल अनर्गल अधोलांछन सं विश्वाशक तुलसी विहुँसि गेली हे भागि पड़एली सिनेहक प्रांगण सं सुखल माँटि में केहेन पाँक ई सबल मनोरथ केहेन फांक ई गुद्दा संग आँठी फुटि गेलै चहचह फ'र उपटल कानन सं सिनेह नहि पसाही छल प्रियतम दुर्गंधक लुत्ती हुरळक गमगम बिनु वात बसातक ताग टुटल ई ओझरायल बाँचल सभ लमसम शेष भादवक प्रसून सेहन्तित कतेक बरिस अहोरात्रि गमेलहुँ एतेक लचलच नेह कतहु की ? भसकल गदरल देह कतहु की ? प्राण सेहो निकस' सं पहिने हिचकी दैछ " छोड़ू माया " कहि-कहि सकल मनोरथ झांझ बनलि हे हिया  केँ तप्पत तेल पकयलहुँ टीस उठय अछि  किए अनेरे गुमानक कील सं मर्दित कयलहुँ कहियो जे छल आत्म सुवासी तकरा श्मसानक छाउर बनेलहुँ आबहुँ तं  संतोख करू हे हम नीरक लेल नहि आहि मचेलहुँ आब प्राण कंठ में क्षण-क्षण विकल सिनेही स्वाती कण-कण सात जनम धरि करब प्रतीक्षा "संताप" फोरि क' जोरब हिअ मन बिदकल बहुरल स्मृतिक संग कोमल तरबा में फ़ार गरयलहुँ पम्मी प्रिया झा- द्वारा श्री विजय चन्द्र झा, गोलपहाड़ी टाटा नगर रौ ललटुनमा रौ ललटुनमा टका बचौलें चाउर मे फेंटलें मंगरैल , दिव्य सिया सन सुन्नरि धिआ केँ ग'र मे बन्हलें घैल ... बेटा खातिर घ'र दुमहला बेटीक चार प'र उपटल मरुआ नाति नोरक संग खुददी फँकै छौ पोता चिब्बौ छुच्छे तरुआ आर्य भूमिक लक्ष्मी अक्षोप छथि पठार कहू की शैल ..... ? जीवित पानि नहि देलकौ कहियो अंत काल मे आगि लगेतौ अरजल जमीन केँ बेचि बेचि क' सौंसे गाम केँ दही खुएतौ सभ दिन पानि पिलें तौला मे मुइला पर तमघैल ....... झा हेमन्त बापी दानव जगदम्बा सॅ उपजल धरती बनल निठुर आ भऽ गेल परती फाईट रहल मिथिला के करेज जनमल एहि ठाम असुर दहेज घरे घर पैस गेल इ दानव हैवान बनल मिथिला केर मानव घरे सॅ धूआँ उड़ा रहल छी बेटी सन पुतोहु के जरा रहल छी नित बहिन बेटी के बलि मंगैया कते के खा गेल मुदा एकर पेट नै भरैया हाम सब एकरा खुआ रहल छी घरे मे राछस पाईल रहल छी अनका स कहै छी एकरा त्यागू अपना बेर मे सभ सॅ आगू पहिर लेलौ निर्लज्जक भेश बेटा के बुझै छी नगदी कैश काईन रहल मिथिला केर धीया ई धरती पर जनमलौ कीया बैन गेलौ घऽरक अभिशाप परल सोइच मे भाई,माँ, बाप एकरा जे सभ बढ़ा रहल छैथ मिथिला के ओ सभ जरा रहल छैथ कैऽह दै छी ई नै आब परायत एक दिन अहुँक घर जरायत दिने दिन ई बढ़ले जाइ ऐ सुरसा जेना मुहँ फारने जाइ ऐ आकार एकर भै गेल अनन्त मिथिला सन्स्कारऽक कऽ देलक अन्त किरिया ऐ एकरा सॅ सब जूझू अनकर वैदेही के अप्पन बूझू सभ गोटे करु एकरा सॅ परहेज भगवती सप्पत नै लेब आ नै देब दहेज "बापी" आबो सब चेत जाउ आउ सब मिल इ दानव के बैलाउ फेर घरे घर अएती माँ सीया धन्य बुझब जे घर अएती धीया राजदेव मंडल हेलवार घुच्‍ची भरि‍ पानि‍मे कऽ रहल छी खेलवार कखनो ऐपार कखनो ओइपार बनए चाहै छी असली हेलवार संकटमे करए पड़त धारपार धारक पेट हो अगम-अपार जखनि‍ छुरी फनकै रहि-रहि‍ धारा सनकै देख कऽ डरे मन झनकै ठमकल बटोहीक माथ ठनकै तखनि‍ जँ करब पार तब ने बनब हम असली हेलवार। सुनील मोहन ठाकुर अहि बेर देखल फागु

फागु हम देखल अहि बेर घटा में चारू दिस पसरल प्रेम अथाह राग भरल प्रकृति छटा में जन-जन बनि गेल छल बताह नाचै सब मोर-मोरनी बनि पोर-पोर रस प्रेम सँ हर्षायल रोम-रोम हरखित छल सभक जन-जन बनि गेल छल बताह यौ रंग सतरंगी धरती पर देखल घटा में देखल सौतिनियाँ डाह कारी-झामैर मेघ बनल छल जन-जन बनि गेल छल बताह गगन बदलि धरती के रंग देखि ओहो टपकेलक रस बूंद टपाक प्रकृति सुन्दरी मन-मस्त भय-नाचे जन-जन बनि गेल छल बताह ........जय हो ! नन्दिनी पाठक ई कोन हाथ? ई तऽ छाप भऽ गेल ई कोन हाथ? ई तऽ छाप भऽ गेल जीवन कंग्रेसिया भऽ गेल ! भूखक सड़क अछि ठामहि , गली-गली आ गाम मे भूख मेटाबय से नेता चुन ! हेगे लत्ती सुन,हमर मोनक धुन! बन संगिनी दू टा दे झिंगनी। चल-चल कने, नीक तीमन बनो लेल मचल कने ! नीक नहि लागल दळझिंगनी।  मिक्सभेज सरकार पर स्वाद उधार !! इज्जैत सस्ता, महग कोबी बड ! मन सोचि बेकल, कोना कीनब फल , कही होम कर जोरि कने  पानि छोड कने ! नीक लागल नहि सुकखल झिंगनी।  अनसोहांत ई दळझिंगनी !!! आब कतो से आओत आन झिंगनी ? तागत बढ़ा बात मान झिंगनी।  सामाधान अकान झिंगनी ! थाकलहुँ हेरि जल थल झिंगनी  चल थालहिं मे हेरी कमल झिंगनी  चल थालहिं में हेरी कमल झिंगनी अब्दुर रज्जाक , हरिपुर ४, (उमप्रेम्पुर ४ धनुषा) धनुषा नेपाल, हाल : कतार घोरमठा राजनैतिक घोरमठा राजनैतिक बात बतंगर औटाएल अछि संबिधान सभा बौराइले अछि जब जब सभामे बमकै नेता दाल मे काला रखने अछि ।। चौल मजाक बौराइल राजनैतिक देश मे ई अधकपाइड़ जब रहबे करत छिन्ना झपटा निन्दा करैत बोली के ठोली पर संबिधान रहबे करत ।। कुकुर कटाउस आ उपर्चौर जे पार्टीके हाल रहै हौर भौर कऽ कानुनी रुप सँ जनताके बेहाल रहै दु मास पर सरकार बदलता ऊ सब अपने पिटत कपार  कल्ला नै अलगौथिन जनता रह्त अपन सँ लचार ।। हुल्लुक बुलुक्क पुर्ब राजा करथिन  धुर्खुन नोची आउर नोची दुआर घुटैक घुटैक कऽ जनता केँ कहथिन  बपौटी हिनकर बुड़ल बेकार।।  प्रदीप पुष्प शेर युग-युगसँ कैद छी हम तोहर इयादमे, भरिसक हमरा जिनगीमे कोनो 15 अगस्त नहि..। रुबाइ हम भास रखने छी, तों गीत दऽ दिहें। हम करेज द' देबौ, तों प्रीत दऽ दिहें। चतुर्थीक राति खाय पड़य माहूर,तँ की? हम सेनूर जोगौने छी,तों सीथ दऽ दिहें। गुदगुदौने जे रहियौ, कि नहिं मोन छौ? हम हँसौने जे रहियौ, कि नहिं मोन छौ? सत्ते,सुखक क्षण रहय बेसी दिन याद नहिं.. तें हम कनौने जे रहियौ, कि नहिं मोन छौ? हम भास रखने छी, तों गीत द' दिहें। हम करेज द' देबौ, तों प्रीत द' दिहें।  चतुर्थीक राति खाय पड़य माहूर,त' की? हम सेनूर जोगौने छी,तों सीथ द' दिहें। अभावक भीड़ मे हेरा गेल जिनगी। महगीक कोल्हू मे पेड़ा गेल जिनगी। गरीबीक कुहेस, बैसारीक कनकन्नी सँ मोनक प्याली मे सेरा गेल जिनगी। पाखड़ि तरक मचान मोन पड़ि गेल, खपड़ा बला दलान मोन पड़ि गेल, तोहर हमर पिरीत भेल अनघोल, पीठक पड़ल निशान मोन पड़ि गेल, (2212 1212 1221) गजल जहिया अहाँ आन हेबै परिबा बला चान हेबै बनतै हमर प्रीत खखरी अनकर अहाँ धान हेबै जौं आन सेनूर देलक यै हम त'निष्प्राण हेबै हेतै लिखल भोगबै हम एक संग बदनाम हेबै प्रेम त' अमर करबे करत हम 'पुष्प' बलिदान हेबै (2212 2122 सब पाँतिमे) गजल बीतलाहा बाटमे हेरा रहल छी कल्हुका छी चाह हम सेरा रहल छी पेरलक दैबा भ' तेना ने कसैया मेहमे ब'रदे जकाँ पेरा रहल छी देह भेलै आब अनमन टाँट सनठी आगि लागल ऊक सन फेरा रहल छी मीत मुसकी बीच कननी हैत अलगे नोर सुख दुखकेर हम बेरा रहल छी मोन भेलै भोज करितौं गाम भरिकें 'पुष्प' जातिक बान्हमे घेरा रहल छी 2122 2122 2122 सब पाँतिमे गजल दोसरक गीत उगबै अछि चान मीता  हमर गजलो गबै भूखक गान मीता आब रूदल ब'नब ने हम ग'छब कहियो जरल पेटसँ उठै ने सुर तान मीता भेल बटुआसँ तगमाकें नीक दोस्ती बिन टका छी सभा मध्ये आन मीता जैह देबै अहाँ हम रखबै हुलसिकेँ  गाय बूढो खपै विप्र दान मीता पाँतमे हम अछोपक छी भोज खाइत 'पुष्प'कें नइ फिकर आ ने मान मीता 2122 1222 2122 सब पाँतिमे गजल कियै दू सालमे रधिया सुखा गेलै रहै गेना कथी अमती बना गेलै लगै बापे सनक अनमन मरद ओकर दहेजक पेट सेहन्ता बिला गेलै अजोहेमे कमौआ पूतकें पदबी मुदा नेनपन कौड़ीमे बिका गेलै बचाकें बाप देलक क'लम आ गाछी नशाखोरीसँ ओ सबटा लुटा गेलै ल' जाऊ शिव अपन पुरना धनुष जल्दी सिया लछुमनक संगेमे पड़ा गेलै द' ने सकलै कमीशन घूस मुखियाकें त' लिस्टसँ 'पुष्प'कें नामे छँटा गेलै 1222 तीनबेर सब पाँतिमे बहरे हजज गजल पढल पंडित मुदा रोटीक मारल छी बजै छी सत्य हम थोंथीक हारल छी बुझू कोना सबसँ काते रहै छी हम उचितवक्ता बनै छी तें त टारल छी दियादेकें घरक घटना मुदा धनि सन कटेबै केश कियै हम जँ बारल छी मधुर बनबाक छल भेलौं जँ अधखिज्जू सत्ते नोनगर लाड़ैनेंसँ लाड़ल छी लगै छल नीक नाथूरामकेँ पोथी मुदा गाँधीक साड़ा संग गाड़ल छी किओ ने पूजि रहलै कोन गलती यौ बिना सेनूर अरिपन 'पुष्प' पाड़ल छी 1222 1222 1222 सब पाँतिमे बहरे हजज गजल रातिकें सपना बनल छें चान तों नव तालमे लय बनि मिलल छें गान तों नव पूर अंकक छें कि तों अधपूर अंकक दस दशमलवमे लिखल छें मान तों नव मौध मिसरी माँछकें जयबार भेलें सोमरसकें प्रिय तरल छें पान तों नव भैरवी मल्हारकें समवेत गायन  मालकोशक गजलमे छें तान तों नव छें पराती आरती आ नामधुन तों गामकें गहबर बनल छें थान तों नव नव उमेरक भार छौ 'पुष्प'क नजरिमे ओसमे कतकी फसिल छें धान तों नव 2122 2122 2122सब पाँति मे बहरे रमल गजल हम भास रखने छी तों गीत द' दे हम प्राण द' देबौ आ तों प्रीत द' दे ल' आमिल मिरचाइ आब की हेतै हम मीठ द' देबौ त' तों तीत द' दे गामसँ दूर ब'नत बाधमे घ'र हम टाट बीनब गे तों भीत द' दे बरोबरिकें बाँटब सुख वा दु:ख हम प्रथा द' देबौ आ तों रीत द' दे हैत हमर चालि तोहर हाथसँ हम कौड़ी भाँजि देबौ तों जीत द' दे चतुर्थीक राति खेबै माहूर मुदा हम सेनूर द' देबौ तों सीथ द' दे सरल वार्णिक बहर, तेरह वर्ण गजलक गजल दर्दक दबाइमे भावक उपचार भेल प्रेमक पीड़ तें गजल भ' बहार भेल जतै दीर्घ लघु केर गाड़ी रूकल ओतै रूक्णक चौक आ बहरक बजार भेल अंत नीक स'ब नीक नीक इ आदर्श तें मतलाक अंतमे रदीफ संस्कार भेल रूचिगर सुआद होइ शेरक भोजमे छंदक सँचारमे काफिया अँचार भेल पन्नाक भीड़मे के कतय हेरा जायत तें मोन पाड़ैले मकता अवतार भेल अदब आँगनमे नव घ'र ठाढ होऊ गजलक गजल तें 'पुष्प' विचार भेल सरल वार्णिक बहर,15 वर्ण सब पाँतिमे तूँ .. तूँ त' बिसरि गेल हेबें, मुदा बिसरल नइ हैत हमरा तोहर पछुआरक बाट, धातरिक गाछ आ  आमक नबगछुली, बसबिट्टीक अन्हार, मधुमाछीक खोंता, ओलती लग गाड़ल ढेकी, आ बन्हन देल झाँझनिक टाट.. .. इ सब नइ बिसरल हैत हमरा। तूँ.. हँ हँ तूँ.. तूँ बदलि गेल हेबें.. मुदा बददल नइ हैत भादोक राति, जेठक दुपहरिया, अषाढक ओस आ कतकी बोखार, नवान्नक चूड़ा आ दही अँचार, ओढनीमे मूरही  आ घुट्ठीमे जाड़, ठीके, ई सभ नइ बदलल! तूँ.. सुनने तोरे कहै छियौ, तूँ, तूँही नुका लेने हेबें अपनाकें, मुदा नुकायल नइ आइयो .. तोहर हमर नाओं. तोहर हाथक डाँरि, ओइमे हमर मूँह, तोहर आँखि आ गामक कान, बैसल पंच आ भरल दलान, तैयो मेलामे भेटब नुकाक', चोराक' खुआयब मिट्टा पान, पँचटकिया झुमका लेल  घूमब दोकाने दोकान, अपस्याँत सन हम  आ तोहर दूधिया गाल पर मुसकी ललाम, सत्ते, ई आइयो नइ नुकायल हेतौ। कठपुतरीकें नाच कठपुतरीकें नाच ई जीवन बिधना जे रचि देल रे। समय नचाबैए दिन राति सबकें के जानए की खेल रे। 1.क्षण संतुष्टा क्षणहिमे रूष्टा मतिकें गति अद्भूत रे। कखनो कनाबए कखनो हँसाबए खनहि बिलग खन मेल रे। कठपुतरी.. 2.जतबा घड़ी लेल जोत जेकर होउ ततबे घड़ी लेल दीप रे। बहैए बसाती बुझि जाइ बाती कतबो भरल होऊ तेल रे। कठपुतरी.. 3.यश-अपयशकें भय नइ जेकरा तकर जीवन की मोल रे। वीर प्रबल होउ,शास्त्र रटल होऊ तैयो बनल बकलेल रे। कठपुतरी.. गीत/संगीत-प्रदीप पुष्प(c)फिल्म -जय श्यामा माइसँ यै अहाँ यै अहाँ, भोर छी, इजोर छी, मोनक चूल्हीमे तलमलाइत पजोर छी, बास छी,चास छी, सोन्हगर हुलास छी, अहाँ माघक कुहेसमे स्नेहिल इनहोर छी, यै अहाँ, सुरूज छी,चान छी, कामनाक वितान छी, मेंहदीक सिंगारमे,यौवनक पथारमे, बियौहतीक मुसकी संग कयल मटकोर छी, यै अहाँ, धार छी,वार छी, खंजर छी,औजार छी, कनडेरिए ताकैत काजरक कोर छी, यै अहाँ, हास छी,परिहास छी, चाननक सुवास छी, निष्ठाक पीरीपर बिराजैत विश्वास छी, बिनु रंगने ठोर अहाँ रक्तिम पलास छी, मोनकें भुतियाबैवला कामनाक हिलकोर छी, यै अहाँ, दिन छी,राति छी, अगता छी,पछाति छी, रूपक पूर्णिमा आ पिरीतक संक्रांति छी, गोल मोल भाव संग सिनेहक डोर छी, यै अहाँ, अक्षत छी,धूप छी, अद्भूत छी,अनूप छी, आत्माक अर्घ्य लेल बेसाहल सूप छी, स्पर्शक तूरसँ बूनल दुरगमनिआ पटोर छी, यै अहाँ, यै अहाँ, चान छी,इजोर छी... गीत जतय चान हँसैये, मुस्की दथि दिनकर भगवान,  ओहि मिथिला कें हम छी बेटा,मैथिल हम्मर नाम, माँ मैथिली प्रणाम, माँ मैथिली प्रणाम 1.ख'र सँ छाड़ल घ'र हमर अछि ,नीपल अँगना दलान, हमरा बाड़ीक साग खाय लेल, अयलाह स्वयं भगवान, मर्यादा पुरुषोत्तोम आबथि, वैदेही केर गाम, ओहि मिथिला केँ.... 2.हम गोसाउनिक करी वंदना, शक्ति केँ गुणगान, विद्यापति कें गीत नचारी, गाबि क' भेलहूं महान,  उगना जेकर करय चाकरी ,जे शिव केँ मालिकान, ओहि मिथिला कें.... 3.माँछ मखान आ पान अछि नामी, चूड़ा दही जलपान, कोरा मे दुलराबय सदिखन, कमला कोशी बलान, 'पुष्प'क माला सँ शोभित ,जे तिरहुत स्वर्ग समान, ओहि मिथिला कें हम छी बेटा, मैथिल हम्मर नाम, माँ मैथिली प्रणाम , माँ मैथिली प्रणाम मो. अशरफ राईन , सिनुरजोडा ,धनुषा , नेपाल, हाल :कतार (मो. अशरफ खान) रुबाइ ई प्रेम सँ भरल संसार मे अकेले बौवा रहल छी कभियो खैनी तँ कभियो चुना चबा रहल छी दोसरक मित्रता आ प्रेमक रङ देख कऽ अप्ना नैन सँ टप टप नोर खसा रहल छी । । कता मायासँ दूर प्रेमसँ दूर प्रेमिकासँ दूर जेना लगै अपन जिन्दगीसँ दूर छी याद आबै जखन अपन पहिल प्रेम तब लगै जेना दुनियासँ दूर छी कता हमरा लग मोह्बतक हुनर नै छल  तइसँ प्रेमक बाजी हारि गेलौं  हमरासँ बेसी पैसासँ प्रेम छलै ताइसँ जिते जिन्दगी मारि गेलौं कता रुप अहाँक देख दिल पकड़ि कूदि रहल छलौं  अहाँक खुशी सङ हमहूँ झुमि रहल छलौं सपनामे रखैत छलौं सटा कऽ करेजसँ बिपनामे अहाँक फोटोकेँ चुमि रहल छलौं आजाद गजल छी हम लचार कपार हमर छै फुटल  जबानी भेल जियान जीवन बिदेश मे लुटल पैसा ओर धियान देने मुसीबत सँ लडैत  सपना देखल सब चुर -चुर भऽ कऽ टुटल सपना छल स्वर्ग नियन अपन देश सजायब  मुदा जनता सब छल चित भऽ कऽ सुतल आस छल बनत ऐ बेर नया सम्बिधान  चोर नेता देश फोड़ऽ लेल कुता नियन छल भुखल अपन देश मे रहि कऽ चलत नै जीवनक गुजारा तइसँ बिबश भऽ कऽ छी हम बिदेश मे रुकल आजाद गजल मरुभूमिक पीड़ा कहिया तक सहब  जिबन नर्क बनौने कहिया तक रहब अपन देशक कोसी कमला छोडिकऽ  बिदेशक समुन्द्र मे कहिया तक बहब गामक हरयाली आ माटिक सुगन्ध बिसरि कऽ रेगिस्तानकेँ हरा भरा कहिया तक करब गाउ घरक साथी-सङ मोज्-मस्ती छोडिकऽ  खाडी देशक रिङ्ग रोड मे कहिया तक चलब मनमे स्नेह अछि मुदा देहो अछि थाकल  देश प्रेममे ऐ ठाम कहिया तक मरब आजाद गजल छोड़ि कऽ अपन देश एतेक दुर एलौं माइ-बाबूक मायासँ मुँह मोड़ि लेलौं रहिकऽ दु चाइर साल अपन देश सँ दूर  केहन अभागल अपन मातृभाषा बिसरि गेलौं सपना सकार होबाक पछाडी दौडैत दौडैत  प्रीतमक प्रेम भुला कऽ केहन कठोर भेलौं की छै सुख दुख जीवनमे अबिते रहै छै तैयो दिन राति परिश्रम कऽ के भोर केलौं गीत सपना सपने रहि गेल चमकैत चेहरा चान्द सन देख  मन मे उठल तुफान  बना कऽ दुल्हिन सजा कऽ लैतौं घर  बनैतौं उनका जान । इन्तजार छल हमरा ओइ घड़ी के  घुङ्हट हटा कऽ देखतौं मनक परी के  बहल पुरबा संग हमर मित बहि गेल  देखल सपना हमर सपने रहि गेल।। हृदय मे उनका छुपा क रखितौं  मनक बगैचामे सजा कऽ रखितौं  कोइ तोड़ि नै लऽ जाए ओइ फूल केँ  तही लऽकऽ बगैचाक माली बनितौं। मिला कऽ हाथ रहितौं सङ्गे साथ  करितौं मीठ-मीठ प्रेमक बात  बिधिक बिधान केहन रहल  दू जान एक बनल खार भेल दू बाट । । पियाकेँ समझना राति बीतल साथ छुटल सपना चकनाचूर भऽ गेल अकेले भेली हम आब पिया हमर परदेसी भेल असगर आङ्गन सुना लगैए बिन अहाँक ठाम ठाम भेल जिन्दगी हमर आनहर नैहरसँ जब एलौं पियाक गाम दिन बितैत पहाड़ लगैए राति कटैत जाड़ लगैए बिन पिया जिन्दगी जिअल आब हमरा जंजाल लगैए हमर देश जब हमर आखि निदाइय सुतल अपन देश देखैछी जब हम जगैछी त सुतल अपन देश देखैछी ककरास बर्णन करी अपन बात जब अपने देशमे एक- दोसरमे रुठल देखैछी ।। चारोदिस खुन खराबा देखि मन उबियाइय कतौ नै जखन बिकास देखैछी सब जनता लुटाइत पिटाइत बस नेतासभमे बकबास देखैछी ।। अपन स्वर्ग जेहन देश नर्क बनौने देखैछी जाहिके कोनो मोल नै ओहिके अर्थ लगौने देखैछी पृथ्वीनारायणक बनाओल देश आइ हजार टुक्रा भेल देखैछी ।। नै ककरोस मेल मोहब्बत सबके अपनेमे लडैत देखैछी मन होइय हमहु दुनियाँ छोडिदी जब अपने नेपाली माइके मरैत देखैछी ।। किशन कारीगर बीर जबान मातृभूमीक रक्षा लेल शहीद भऽ जाइत छथि बीर जबान समहारने छथि ओ देशक सीमान नमन करैत छी हम, अहॉ छी बीर जबान। मरब की जीयब तेकर नहि रहैत छनि हुनका धियान मुदा, देशक रक्षा लेल ओ सदखनि न्योछाबर करैत छथि अपन जान। सैनिक छथि ओ इन्सान देशक दुशमन पर रखैत छथि धियान आतंकवादीक छक्का छोड़ा दैत छैक परमवीर छथि, हिन्दुस्तानक बीर जबान। महान छथि ओ बीर जबान, देशक खातिर जे हॅंसैत-हॅंसैत देलथिहिन अपन बलिदान भारतवासी गर्व करैत अछि अहॉ पर नहि बिसरत कहियो अहॉक त्याग आओर बलिदान। सीमा पार सॅं, केलक आतंकी हमला कऽ देलियै आतंक के मटियामेट अहॉं भऽ गेलहु अपने लहु-लुहान मुदा आतंक सॅं बचेलहु सभहक जान कारगील सॅ कूपवाड़ा तक आतंकवादी सॅं लैत छी अहॉं टक्कर अहॉंक बीरता देखी कऽ अबैत छैक ओकरा चक्कर। बीर जबान यौ बीर जबान समहारने छी अहॉं देशक सीमान कोना कऽ हेतै देशक रक्षा सदखनि अहॉ रहैत छी हरान। बारूद के ढ़ेड़ी पर बैसल बारूद के ढ़ेड़ी पर बैसल हम  अट्टहास क हंसी रहल छी  मिसायल हमला स उड़ा देब  हम अहाँ के नेस्तनाबूद क देब. हमरा लक एतेक परमाणु शक्ति अछि हम अप्पन शक्ति प्रदर्शन केलौहं  हमरा सिमान में उड़ल जहाज के  अपनेमन ड्रोन हमला स उड़ा देब त्रादसि मचल, निर्दोष मारल गेल एहि स केकरो की? सभ अपना परमाणु प्रदर्शन में बेहाल  मानवताक विनाश करै में लागल छि. हाहाकार मचल, लोक अधमरू भेल  कोन दिसि जाउ सगतरि विनाश  बारूदी अगिलग्गि में लोक उजड़ी गेल  मुदा तइयो हवाई हमला रोकल नहि गेल. संघर्ष विरामक सप्पत खा के  फेर किएक? गोला बारूद बरसबै छि  अहाँ साम्राज्यवादी पसार दुआरे सगतरि  मानवताक विनाश पर, उतारू भेल छि. पहिल आ दोसर विश्वयुद्धक भीषण  दुष्परिणाम भोगि चुकल समूचा विश्व आबो मानवताक रक्षा लेल सचेत भ' जाउ  कहीं ई तेसर विश्वयुद्धक संकेत, नहि त छि? कोनौहं विवादक फरिछौठ सभ देश मिली  शांति समझौता सँ कएल करू  गोला बारूद स विनाश टा होएत किएक नहि एक बेर ई गप सोचैत छि. गजल सन किछु मैथिलीमे हे यै बाजू ने किएक? हमरा स’ अहाँ जे रूसल छी। अहाँ छी तामसे अघोर लाजे कठुआएल जेना हम भीजल छी। आई बाजब नहि अहाँ स’ हम किएक नहि हमरा कतबो मनाएब। कि करू हम किछु नहि फुराए गप करै लेल हमर मोन सुगबुगाए। कहने रही अहाँ त‘ जे एक संगे मेला घूमै लेल जाएब। हम बुझबे नहि केलियै जे अहाँ एतेक बहन्ना बनाएब। सख मनोरथ सभटा रहिए गेल किनि देलहुँ ने अहाँ झुमका-कंगना। आबो भरि मुँह बाजि लियअ यै देखू त’ की कहैत अछि हमर नैना। आशीष अनचिन्हार आर.अनुराधा जीक मूल हिंदी कविता " मुट्ठी में रेत " केर मैथिली अनुवाद (अनुवादक आशीष अनचिन्हार) मुट्ठी महँक बालु बालु बड़ तेजीसँ खसि रहल छै मुट्ठी महँक मुट्ठी कसि कऽ जँ पकड़बै तँ कने-मने सटल तँ रहतै पसेनाक कारणें खाली मुट्ठीसँ तँ लाख नीक ई किछु बालु भरल बला मुट्ठी निमूह- (कविता) पहिने तँ कहलक निमूह धन आ तकर बाद लगा देलक जाबी............. कविता ? डारि + पात= की हेतै लोक – लोक= की हेतै जानवर x मनुख=की हेतै सुख / दुख=की हेतै हँसी < हँसी=की हेतै नोर > आँखि=की हेतै मुदा किछु तँ करू मुदा किछु तँ करू बरू फुटले डाबामे पानि भरू मुदा किछु तँ करू ई मोन थिक रखबाक जे नै थिक केखनो रुकबाक नै शेर तँ सियारेसँ लड़ू मुदा किछु तँ करू बाट पाटल होइक रूइसँ की सूइसँ फूलसँ की शूलसँ सदिखन अपन धुनिमे बढ़ू मुदा किछु तँ करू पाँछा पलटि ताकू मुदा जरूरति भरि थाकि रुकबो करू मुदा जरूरति भरि नै केखनो कोनो फेरमे पड़ू मुदा किछु तँ करू बाल कविता माछी मच्छर दू गो दोस दूनू खच्चर बड़ पकठोस माछी मच्छर दू गो दोस कही पानि तँ लाबै पानि कही खेत तँ जाइ बथान ने धोबै मूँह ने दिसा मैदान लीखै कौआ पढ़ै खरगोश माछी मच्छर दू गो दोस रहै दुन्नू बड़ नीक उक्ठ्ठी सभ दिन होइ कान कनैठी दिनमे खेलै दुन्नू खूब निनिया घेरै रातमे खूब खाइयो के नै रहै होश माछी मच्छर दू गो दोस मारि भेलै एक दिन दुन्नूमे बजरलै लाठी दुन्नूमे चिकरा-चिकरी पटका पटकी लत्तम जुत्तम दुन्नूमे दुन्नू दिस एलै जोश माछी मच्छर दू गो दोस माछी कहै हम रतिचर बनबै मच्छर कहै हम दिनगर रहबै मचलै दरबज्जा गर्दमिसान दुन्नू दिस छै बड़का रोस माछी मच्छर दू गो दोस सरपंच बनि एलै सनकिरबा केलकै दुन्नूपर बड़ किरपा देलकै दिन माछी राति मछरबाकेँ भलै समाधान सुंदर ठोस माछी मच्छर दू गो दोस बाल कविता पहिने कहि दै छियौ घुमबे करबौ गाछी गाछी करबे करबौ मारी मारी आ घरो एबौ घुमि घुमि कऽ पहिने कहि दै छियौ पेट खराप हेतै तँ हेतै पेंट खराप हेतै तँ हेतै भुज्जा खेबौ भुजि भुजि कऽ पहिने कहि दै छियौ केकरो हेतै की नै हेतै भैया खेतै की नै खेतै तरुआ खेबौ तरि तरि कऽ पहिने कहि दै छियौ चाहे किताब दे नै दे चाहे पैसा दे नै दे बड़का बनबौ पढ़ि पढ़ि कऽ बाल गजल दिवाली एलै धम धम धम फटक्का फूटै बम बम बम जरै डिबिया सभहँक आँगन करै दरबज्जा चम चम चम खतम भेलै फुलझरियो से बहन्ना करही कम कम कम किनेबै चकरी जेबी भरि जरेबै खाली हम हम हम सभ पाँतिे 1222-2222 मात्राक्रम अछि बाल गजल जाइंग द गाछीमे चुप्पे चुप्पे नाचिंग द गाछीमे चुप्पे चुप्पे खोलिंग द बरतन लेइंग द चिन्नी खाइंग द गाछीमे चुप्पे चुप्पे मारिंग द लाठी फोरिंग द माथा भागिंग द गाछीमे चुप्पे चुप्पे हगनी मुतनी आ छेछरिया कटनी  पादिंग द गाछीमे चुप्पे चुप्पे बात घरैया सभ हो की छौंड़ीकेँ बाजिंग द गाछीमे चुप्पे चुप्पे सभ पाँतिमे 22222+22222 मात्राक्रम अछि अधिकांश पाँतिमे दूटा अलग-अलग लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। बाल गजल गेलै उक्पाती बुढ़िया बाड़ीमे लगले रहलै तेल हुनक लाठीमे हमरा लोकनि फैलसँ कड़ुगर झँसगर बड़ सनगर भक्का खेलहुँ गाछीमे चोरक हल्ला सुनलहुँ सभहँक मूँहे ताला आनि लगा देलहुँ काँपीमे बथुआ खुब्बे नीक लगैए तैयो धेआन हमर बसिया खेसारीमे हमरा हेलब चुभकब नीक लगैए पोखरिमे नालामे की नालीमे सभ पाँतिमे 222+222+222+2 मात्राक्रम अछि दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। बाल गजल इस्कूल बंद हतै बाह रे बाह मास्टर उदास भेलै बाह रे बाह माए हमर पसारै खूब मुस्की बस्ता हमर छिनेतै बाह रे बाह किरकेट खेलबै हम खेतमे आब डबरामे गेंद जेतै बाह रे बाह फूटल मुदा ई निगर बोइयामेसँ खटगर अचार खेबै बाह रे बाह बाबा डरा कऽ हमरा नै घुमेता तँ हमहीं घुमा कऽ एबै बाह रे बाह सभ पाँतिमे 2212+ 1222+1221 मात्राक्रम अछि। दोसर, तेसर आ चारिम शेरमे दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। बाल गजल छोट्टे सनकेँ हम्मर बौआ नमहर नमहर ता ता थैया उज्जर बगुला हरियर सुग्गा ललका मैना कारी कौआ थारी बाटी भरले सनकेँ खत्मे छै तिलकोरक तरुआ दूधक पौडर तोरे लेल चिन्नी खेतै पौआ पौआ हम्मर बौआ बेली सनकेँ सुंदर सुंदर गेंदा गेंदा सभ पाँतिमे आठ टा दीर्घ मात्राक्रम अछि, चारिम शेरक पाहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृत काव्यशास्त्रानुसार दीर्घ मानल गेल अछि। गजल दुनियाँ अन्हार तोरा बिनु सभटा बेकार तोरा बिनु हेड़ा गेलै हँसी हम्मर छै नोरक धार तोरा बिनु आँचर काजर पिआसल छै नै छै उद्धार तोरा बिनु तोहर छोड़ल इयादे टा करतै उपकार तोरा बिनु चीन्हल जानल मुदा तैयो छी अनचिन्हार तोरा बिनु सभ पाँतिमे 2222-1222 मात्राक्रम अछि गजल चिक्कन चुनमुन पात छलै सुंदर सन अहिबात छलै कनिते बीतल सभहँक साँझ केहन खुनिया प्रात छलै मिड डे मीलक झगड़ा सन फेकल फाकल भात छलै सुग्गा मैना पंच बनल बगड़ा बगड़ी कात छलै दिल्ली पटना आ पंजाब छूटल बोनि बुतात छलै दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। दोसर आ पाचँम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त छूट अछि। गजल गेलहुँ हम हुनका लग एलथि ओ हमरा लग चोट छलै पैघ मुदा बजबै हम ककरा लग रंगक धुरखेलामे करिया छै उजरा लग हुनकर देह हमर देह धधरा छै धधरा लग बनि गेलै जोग हमर अपने छथि पतरा लग सभ पाँतिमे 22+22+22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग शब्दक लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त छूट अछि। गजल दिनगर मुदा तैयो तँ अन्हार बड़ ऐ ठाम छै उल्लूक जैकार बड़ जै देशमे खाली बलत्कार छै तै देशमे धर्मक चमत्कार बड़ ई साँइ छै ई राम छै ई खुदा ऐ लेल उठि गेलैक हथियार बड़ छै लक्ष्य बौआएल आ बेकहल देखू मुदा हुनकर तँ सिंगार बड़ आँगन उदासल छै पिआसल दुआरि चुपचाप ताकै हमरा ई चार बड़ सभ पाँतिमे 2212-2212-212 मात्राक्रम अछि चारिम आ पाँचम शेरमे एकटा-एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। पाँचम शेरक पहिल पाँतिक अंतमे एकटा लघु अतिरिक्त अछि गजल सगरो सुनलहुँ ठोरे ठोर हो रामा एलै महँगी भोरे भोर हो रामा सरकारक संगे हमरा लगैए जे भगवानो छै चोरे चोर हो रामा हँसि रहलै बइमानक संग दल बदलू भलै जनता नोरे नोर हो रामा चुनि चुनि खेलक माउस आब जनता लेल बचलै खाली झोरे झोर हो रामा अठपहरा छै मजदूरक मुदा तैयो हमरे टूटै पोरे पोर हो रामा सभ पाँतिमे 222+2222+1222 मात्राक्रम अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त अछि। गजल कागजपर विकास लिखल छै बस औंठा निशान बचल छै एबे करतै कहियो ने कहियो आसेपर अकास टिकल छै हेतै बाँट फाँट आ बखरा भैयारी तँ खूब जुटल छै भुज्जा सन बनल छै ई सपना फूटल खा कऽ काँच छुटल छै ओ जे खून छै से तँ ऐठाँ नोरे सन निकलि कऽ खसल छै सभ पाँतिमे 2221+21122 मात्रकाक्रम अछि। दोसर, तेसर, चारिम आ पाँचम शेरमे शब्दक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल सीताक बनबास छी हम बौआ रहल आस छी हम दाहीक संगे तँ रौदी उपटल सनक चास छी हम हमरा बुझाएल एना जेना हुनक खास छी हम भुखले तँ मरि गेल जै ठाँ तै ठाँक मधुमास छी हम सुर ताल छी राग सेहो नोरसँ सजल भास छी हम 2212+2122 मात्राक्रम सभ पाँतिमे गजल किछु नै बाँचल तोरा लेल नोरे साँठल तोरा लेल गम-गम गमकै तोहर देह छै सभ मातल तोरा लेल हम पेटो काटल रहि रहि क' जीहो जाँतल तोरा लेल पंडित मुल्ला पासी संग ताड़ी चाखल तोरा लेल सरदी गरमी अन्हड़ बाढ़ि ई अवधारल तोरा लेल सभ पाँतिमे 222-222-21 मात्राक्रम। गजल एम्हर नोरक टघार आँगनमे ओम्हर सुखके पथार आँगनमे ई तोहर ई हमर रहत बुझि ले भेलै एहन विचार आँगनमे की लेबै आ कतेक लेबै दाइ देखू पसरल बजार आँगनमे नगदी भेलै जखन कने बेसी दौगल एलै उधार आँगनमे सगरो दुनियाँसँ बचि कऽ एलहुँ हम लागल कसगर लथार आँगनमे सभ पाँतिमे 22+2212+1222 मात्राक्रम अछि गजल कमसँ कम एकौटा फूल दे गे मलिनियाँ नीक नै अपने समतूल दे गे मलिनियाँ राखि ले गेंदा बेली चमेली गुलाबो बस हमर कोंढ़ी अड़हूल दे गे मलिनियाँ घाटपर बैसल हम बाट जोहै छी तोहर थरथराइत देहक पूल दे गे मलिनियाँ राहु शनि मंगल बुध केतु वशमे मुदा तों प्रेम सनकेँ ग्रह अनुकूल दे गे मलिनियाँ आम संगे महुआ महुआ संग आमे टा झूलै एहने सन झूलाझूल दे गे मलिनियाँ सभ पाँतिमे 2122+222+122+122 मात्राक्रम अछि। गजल दुनियाँ अन्हार तोरा बिनु सभटा बेकार तोरा बिनु हेड़ा गेलै हँसी हम्मर छै नोरक धार तोरा बिनु आँचर काजर पिआसल छै नै छै उद्धार तोरा बिनु तोहर छोड़ल इयादे टा करतै उपकार तोरा बिनु चीन्हल जानल मुदा तैयो छी अनचिन्हार तोरा बिनु सभ पाँतिमे 2222-122 मात्राक्रम अछि गजल गेलहुँ हम हुनका लग एलथि ओ हमरा लग चोट छलै पैघ मुदा बजबै हम ककरा लग रंगक धुरखेलामे करिया छै उजरा लग हुनकर देह हमर देह धधरा छै धधरा लग बनि गेलै जोग हमर अपने छथि पतरा लग सभ पाँतिमे 22+22+22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग शब्दक लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त छूट अछि गजल बितलै राति भेलै भोर गे बहिना रहि गेलै पियासल ठोर गे बहिना आसक नामपर खेपल अपन जीबन के पोछत हमर दुख नोर गे बहिना रहलहुँ राति भरि उसनैत अपनाकेँ साँचे दुखमे छै बड़ जोर गे बहिना गुड्डी बनि छलहुँ उपरे उपर सदिखन के तोड़लकै नेहक डोर गे बहिना अनचिन्हार देलक किछु निशानी आ दुनियाँ लागै बस अंगोर गे बहिना सभ पाँतिमे 2221+2221+222 मात्राक्रम अछि,  तेसर, चारिम आ मक्तामे १-१टा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल ब्रम्हसँ बेसी छागर उताहुल हाथसँ बेसी आँचर उताहुल मोन बहकि गेलै कोहबरमे ठोरसँ बेसी आखर उताहुल प्रेम मिलनमे नै छोट नमहर धारसँ बेसी सागर उताहुल घोघ कहैए एना सजू जे दोगसँ बेसी बाहर उताहुल रूप हुनक अनचिन्हारे सनकेँ  आँखिसँ बेसी काजर उताहुल सभपाँतिमे 21+1222+2122 मात्राक्रम अछि। मक्तामे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल बड़का बड़का दाबी छै हम पंडित ओ पापी छै हपसै सभ निकगर भोजन हमरे लागल जाबी छै हम्मर नूआ सस्ता सन हुनकर नूआ दामी छै खुलबे करतै ताला ई हमरा लग ओ चाभी छै अन्हारक संगे डिबिया असगर बैसल बाती छै सभ पाँतिमे 222+222+2 मात्राक्रम अछि। गजल नै हेतौ तोहर निबाह गे कनियाँ दुनियाँ छै बड़का कटाह गे कनियाँ जेबीकेँ गर्मी रहै नै दुनियामे नै हो एते गौरबाह गे कनियाँ भेलौ तोरा रोगबस धनौंधीके संबंधो सभ लेभराह गे कनियाँ खाली साढ़े तीन हाथके धरती अनचिन्हारे छौ गबाह गे कनियाँ निरगुण अनचिन्हार गाबि रहलै बड़ छै चलती बेरक उछाह गे कनियाँ सभपाँतिमे 22+2221+2122+2मात्राक्रम अछि दोसर शेरक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल जाल झटपट खसैए पानिमे माछ छटपट करैए पानिमे हाथमे हाथ लागै नीक बड़ हाथ लटपट लगैए पानिमे माटिपर जे सिनेगक धार छै तकरे खटपट कहैए पानिमे आम छै काँच पाकल डम्हरस टूटि भटभट खसैए पानिमे बोल जक्कर बिकेलै घाटपर आब पटपट बजैए पानिमे सभपाँतिमे 2122+122+212 मात्राक्रम अछि तेसर शेरक दोसर पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानल गेल अछि। गजल उधारक बेर हमहीं रहबै हिसाबक बेर हमहीं रहबै रहै जजमान कतबो किनको प्रसादक बेर हमहीं रहबै सबूतक ढेरपर नाचत सभ फसादक बेर हमहीं रहबै पिया देतै भने अमरित ओ पियासक बेर हमहीं रहबै कियो बनबे करत सिंदूर पिठारक बेर हमहीं रहबै सभ पाँतिमे 1222+122+22 मात्राक्रम अछि। अंतिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृत हिसाबें दीर्घ मानल गेल अछि। गजल हमरा शराब चाही मुदा आँखिसँ कनियें हिसाब चाही मुदा आँखिसँ गेंदा बहुत चमेली बहुत हमरा लग तैयो गुलाब चाही मुदा आँखिसँ बाजल बिला कऽ चलि जाइ छै अन्तह तँइ सभ जबाब चाही मुदा आँखिसँ मानल गजल पसरि गेल छै तैयो गजलक किताब चाही मुदा आँखिसँ हारल छलहुँ तँए मानि लेबै सभ हमरा हियाब चाही मुदा आँखिसँ सभ पाँतिमे 2212+122+1222मात्राक्रम अछि। गजल "ग"सँ गंगा "ग"सँ गजल छै  आखर आखर विमल छै "ग"सँ गीता "ग"सँ गजल छै वेदक संगे रचल छै "ग"सँ गाए "ग"सँ गजल छै पाथर पाथर महल छै "ग"सँ गायत्री रटल हम अनका धरिकेँ बुझल छै "ग"सँ गामा संग गाँधी दुष्टक गर्वो टुटल छै सभ पाँतिमे 2222+122 मात्राक्रम अछि। गजल ने बेटा ने पोता ने बेटी बुढ़ौतीमे देखै छी खाली उकटा पैंची बुढ़ौतीमे लोटा लाठी टूटल दरबज्जा चुनौटी आ करिया कुक्कुर संगे छै दोस्ती बुढ़ौतीमे डबरा डुबरी पोखरि झाँखरि खेत गाछी संग चलि गेलै हम्मर सोहक पौती बुढ़ौतीमे घुरि घुरि एना हमरा देखैए समाजक लोक जेना फेरो हेतै घटकैती बुढ़ौतीमे की खेबाके इच्छा अछि से कहि दिऔ झटपट झड़कल सन संतानक अपनैती बुढ़ौतीमे सभ पाँतिमे 222+222+222+1222 मात्राक्रम अछि तेसर आ चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि। गजल भोरक काग बनि कऽ कुचरल छी हम हुनकर ठोरपर तँ बिहुँसल छी हम ओ छथि ठाढ़ गाछ सन आँगनमे लत्ती फत्ती सन तँ पसरल छी हम ई जे देखलहुँ पिआसक रेघा कनियें रुकि कऽ खूब बरसल छी हम भिन्ने भिन्न मत मतांतर जय हो टूटल हड्डी सन तँ छिटकल छी हम असगर देखि आउ नै हमरा लग अनचिन्हार लेल निहुँछल छी हम सभ पाँतिमे 2221+2122+22मात्राक्रम अछि। दोसर आ चारिम शेरक दोसर पाँतिमे दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल ओम्हर लव जेहाद छलै एम्हर लव संवाद छलै बिहुँसल ठोर हमर तोहर आ पसरल उन्माद छलै गड़िए गेलै अनचोक्कहि काँटे सन तँ इयाद छलै पसरल जे सौंसे दुनियाँ छोट्टे सनक फसाद छलै खुब्बे बढ़लै प्रेम हमर हुनकर नेहक खाद छलै सभ पाँतिमे 22+22+22+2 मात्राक्रम अछि। दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल तुलसी चौरा के सीत हम शंकर गौरा के गीत हम भ्रष्टाचारक छै लागि भागि अफसर दौरा के जीत हम माखन मिसरी लेलहुँ अहाँ कुक्कुर कौरा के हीत हम चौपेतल नूआ बियहुती सैंतल मौरा के प्रीत हम ई बंसी छै हमरे मुदा  पोठी सौरा के मीत हम सभ पाँतिमे 2222+2212 मात्राक्रम अछि। दोसर शेरक पहिल पाँतिमे एकटा लघु अतिरिक्त अछि। मौरा = मौर गजल गहूमो नै भेलै धानक पछाति उदासल खेतो खरिहानक पछाति गबैए माए समदाउन उदासी बहुत कानै सेनुरदानक पछाति अकासक कोना कोना टेबि हम पहुँचबै सूरज धरि चानक पछाति बचा रखिहें कनियों अमरित गे बहिना नै देतौ बेटा विषपानक पछाति बिसरि जेबै जकरा तकरा तँ हम इयादो करबै शमसानक पछाति सभ पाँतिमे 1222+2222+12 मात्राक्रम अछि। मतला सहित आन पाँति सभक अंतमे एकटा अतिरिक्त लघु लेबाक छूट लेल गेल अछि गजल हाथमे वेद रहै जीहमे छेद रहै घेंटमे घेंट फँसल मोनमे भेद रहै ठोर बस हँसि रहल मोन निर्वेद रहै खून सभ चूसि रहत से तँ उम्मेद रहै साँप सभ एक समान मात्र विष भेद रहै सभ पाँतिमे 212+2112 मात्राक्रम अछि। अंतिम शेरक पहिल पाँतिमे अंतमे अतिरिक्त लघु लेबाक छूट लेल गेल अछि गजल करेज बेचै छी राति भरि पिआर देखै छी राति भरि मिटा कऽ चलि गेलै रंग रूप निशान हेरै छी राति भरि इयाद हुनकर बस सोन सन करोट फेरै छी राति भरि बसात पसरल चारू दिसा सुगंध घेरै छी राति भरि सिनेह हुनकर भेटल जते तते उकेरै छी राति भरि सभ पाँतिमे 12-122-2212 मात्रक्रम अछि दोसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त छूटक तौरपर अछि। गजल छूटल हाथ फूटल माथ अपने संग करबै लाथ बहसल मोन आबू नाथ पेटक लेल गोबर पाथ छथि बकलेल भूपतिनाथ सभ पाँतिमे 2 221 मात्राक्रम अछि। दू गजला कुरता सौंसे पसरल छै झगड़ा सौंसे पसरल छै गाछक पातक आ फूलक चरचा सौंसे पसरल छै जीबछ कोशी बागमती कमला सौंसे पसरल छै मंदिर मस्जिद गिरजा हो भगता सौंसे पसरल छै दिल्ली भेटत बाटेपर पटना सौंसे पसरल छै खादी भागल काते कात चरखा सौंसे पसरल छै बेंगक टर टर सुनि सुनि कऽ बरखा सौंसे पसरल छै पानिसँ बेसी मटिया तेल धधरा सौंसे पसरल छै मंझा चाहै गुड्डी तँइ धागा सौंसे पसरल छै ताड़ी लबनी पासी भाइ चिखना सौंसे पसरल छै सीता जनमै एकै गो रामा सौंसे पसरल छै पाचक भागै दूरे दूर कर्ता सौंसे पसरल छै चोरी लूट डकैतीके खतरा सौंसे पसरल छै छिटलहुँ खाद मुदा तैयो खखरा सौंसे पसरल छै लोटा थारी बाटी चुप्प तसला सौंसे पसरल छै सूदिक सुख मूरे जानै कर्जा सौंसे पसरल छै अनचिन्हारक संगे संग फकड़ा सौंसे पसरल छै सभ पाँतिमे 222+222+2 मात्राक्रम अछि दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल छै। किछु शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु सेहो छूटक तौरपर अछि। किछु शेरक पहिल पाँतिक अंतिमलघुकेँ संस्कृत व्याकरणानुसार दीर्घ मानल गेल अछि। हजल हमरो कहने जे हम तोरे संग छियौ हुनको कहने जे हम तोरे संग छियौ हुनका दमपर जे केलक किछु से बुझलक सगरो कहने जे हम तोरे संग छियौ देखि रहल छी हुनक बदलब भोरे भोर साँझो कहने जे हम तोरे संग छियौ छथि एहन परतापी जे घर एलनि चोर तकरो कहने जे हम तोरे संग छियौ ठकलक अनका संगे अपनो अत्माकेँ अपनो कहने जे हम तोरे संग छियौ सभ पाँतिमे एगारह टा दीर्घ अछि। तेसर आ चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त छूटक अधारपर अछि। भक्ति गजल जय दुर्गा जय काली जय भगवति जय जय अबियौ हाली हाली जय भगवति जय जय अड़हूलक कोंढ़ी लेने जगता भगता मालिन संगे माली जय भगवति जय जय सोभै लहठी नथिया टीका सेनूर तैपर बड़का बाली जय भगवति जय जय रुनझुन बाजल पायल हुनकर साँझहिमे  पसरल भोरक लाली जय भगवति जय जय खनमे ब्रम्हाणी रुद्राणी खनमे  संहारी कंकाली जय भगवति जय जय सभ पाँतिमे मात्राक्रम अछि तेसर शेरक अंतिम अक्षरकेँ संस्कृत छंद शास्त्रानुसार दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि भक्ति गजल बितलै खरना एलै साँझक बेरा उठलै ढ़ाकी गे माथे सोभै सूपक संगे सुंदर पथिया मौनी गे पबनैतिन सभ चलली घाटक दिस नहुँ नहुँ सम्हर सम्हरि साँझक बेरा झलफल कनकन हहरै सभहँक छाती गे हाथे हाथ सजल अरघक नरियर तैपर राखल दीपो घाटे घाट सजल केरा भुसबा संगे तरकारी गे कोशी साजल हाथी मातल छै तैपर ठकुआ राखल सभ घूमै चारू दिस गीतो गाबथि बहिना काकी गे भेलै भिनसरबा सिहकै पछबा बड़ सोचथि पबनैतिन  नै देलथि दरशनमा राना मैया हम बड़ पापी गे आबो तँ उगह हो आदित भेलै बड़ देर अबेर कुबेर नाम उचारथि अरघी हाथ अरघ लेने सभ साँती गे करिते गोहारि किरिन फुटलै उठलै लाली पुरुबक दिस माँगै पबनैतिन सुख नैहर सासुर बेटा बेटी गे भेलै परना गेलै सभ घाटो लागै सून उदासल घाटक दूभि कहै अबिअह परुकाँ रहतौ खुशहाली गे सभ पाँतिमे 222+222+222+222+222 अछि दूटा अलग-अलग लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। छठम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु फाजिल लेबाक छूट लेल गेल अछि। भक्ति गजल वसुदेवक भागसँ एलथि कन्हैया जसुदाकेँ जागसँ एलथि कन्हैया जै ठामक लोके छल राक्षस सनकेँ तै ठाँ बचि नागसँ एलथि कन्हैया गाए गोपी बँसुरी बिरदाबन आ  राधाकेँ तागसँ एलथि कन्हैया टूटल आसक डोरी सभहँक तखने  कनियें उपरागसँ एलथि कन्हैया वेदक नामे उपनिषदक बाटे आ गीता बैरागसँ एलथि कन्हैया सभ पाँतिमे 22-22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ओना मैथिलीमे भक्ति गजल तँ बड़ दिनसँ अछि मुदा नामाकरण जगदानंद झा मनुक कएल छनि। ई भक्ति गजल हुनके लेल। भक्ति गजल कत' के कनियाँ कोने महफा हो राम कत' के समधी कोने दुल्हा हो राम देहक कनियाँ कर्मक महफा हो राम सत समधी दुल्हा परमात्मा हो राम किनकर हाथें सोहागिन बनलहुँ हम तँ कोने सेनुरबा छै सोभा हो राम हम जम हाथें सोहागिन भेलहुँ आइ नोरक सेनुरबा छै शोभा हो राम सभकेँ भेटै कर्मक फल अपने मोने गाबै निरगुण अनचिन्हरबा हो राम सभ पाँतिमे 222+222+222+21मात्राक्रम अछि। भक्ति गजल से एलै केहन दिनमा ए राम की फुटलै माटिक बसना ए राम नै रहलै कोनो काजक धन बीत किनलहुँ जे दिल्ली पटना ए राम धधरामे सोना सन पोसल देह जरि जरि भेलै से मटिया ए राम छुटलै बेटा बेटी दुनियाँ संग भेलै जखने पचकठिया ए राम ईहो निरगुण जे गाबै तकरा तँ भेटै ओ अनचिन्हरबा ए राम सभ पाँतिमे 222-222-2221 मात्राक्रम अछि जगदानंद झा मनु- ग्राम पोस्ट – हरिपुर डीहटोल, मधुबनी छुट्टी भऽ गेलै टन टन टन टन घंटी बजलै धिया पुताकेँ मनमा दोललै मौलाएल मुँह झट हँसि गेलै हजारो कमल संग फूलि गेलै हाथमे झोड़ा लए कऽ दौड़ल खुशीसँ मोनमे दही पौड़ल नै छै चिंता काल्हि की हेतै नै छै चिंता आइ की हेतै सबहक मोनमे खुशी छै ऐकेँ छुट्टी भऽ गेलै आइ इस्कूलकेँ छुट्टी भऽ गेलै छुट्टी भऽ गेलै आइ इस्कूलकेँ छुट्टी भऽ गेलै। काल छोरु गौरवमय गाथा भूतकाल केर  आब जीवू वर्तमानमे जरल जुन्ना जकाँ ऐँठल  देखैएमे खाली  छुबैत मातर जे छाउर बनि जए जितैक लेल मान दान आ प्रतिस्था  पाछू जुनि,  देखू आगूक  ओहो तँ कियो छैक  जे चानकेँ छुलक  तँ हमहीँ कहिया धरि  चानक पूजा करब  ओहो तँ कियो छैक  जे मंगलपर पेएर रखलक  तँ हमहीँ कहिया धरि  मंगलकेँ अमंगल मानि  काज नहि करब  ओहो तँ कियो छैक  जे पाँतिक आगू चलैत छैक  तँ हमहीँ कहिया धरि  झंडा लऽ कऽ पाँतिक पाछू चलब मानलहुँ हमर भूत  बड़ नीक आ उत्तम छल  मुदा वर्तमान किएक एहेन अछि  आबू देखू, बैस कए सोचू  कि सनेस हम अपन भविष्यकेँ देब ? जँ रहलहुँ चूप  हाथपर हाथ धेने  तँ ओकरा लग  कोनो नीक भूतो नहि रहत  आ जाकरा लग  वर्तमान आ भूत दुनू शून्य  ओहि लोकक  ओहि संस्कृतिक  आ ओहि समाजक लुप्त भेनाइ  अवस्यसम्भाविक छैक  आब अहीँ कहू  कि हम सभ  हमर सबहक संस्कृति  हमर समाज, कि लुप्त भए जाएत ?  कि लुप्त भए जाएत ? कि लुप्त भए ....... प्रकृति (बाल कविता) प्रकृति अहाँक कोरामे की-की नुकाएल अछि नै जानि देखी नजरि उठा कए जतए नव-नव रंग-विरंगकेँ पानि नुकाएल अनन्त ब्रम्हान्ड अहाँमे कोटी-कोटी ग्रह नक्षत्र धेने छी हमर मोनकेँ अछि जे हरखैत एहन जीव चौरासी लाख धेने छी श्यामल सुन्नर साँझक रूप रौद्ररूप धारण अधपहरमे कएने नव यौवन केर सभटा सुन्नरता भोरक छविमे अहाँकेँ पएने जाड़ गर्मी बरखा वसन्त चारि अवश्था वरखक अहाँकेँ माए जकाँ हमरा लोड़ी सुनबैत अछि अन्न-धन दैत सभकेँ ई रूप अहाँकेँ गजल एमरीक पूजा जोड़ पकरने छै  गाम गाम मैयाकेँ पसारने छै एक दोसरामे होड़ छैक लागल  सभक बुद्धिकेँ के आबि जकरने छै पाठ माइकसँ छकरैत आँखि मुनि सभ  अपन घरक माएकेँ तँ बिसरने छै एक कोणमे छथि चूप मूर्त मैया  लोक नाच गाजा भाँग दकरने छै 'मनु' किछो बाजल आँखि खोलि कनिको  लोक ओकरेपर गाल छकरने छै (मात्रा क्रम : २१-२१-२२/२१-२१-२२) गजल  करेजामे हमर साजन आबि गेलै मनक सभ तार बटगबनी गाबि गेलै हुनक मुस्कीसँ सगरो दुनियाक सम्पति  करेजा जानि नै कोना पाबि गेलै बलमकेँ दर्द जानि कए मोन कनिको  कतेक दुख अपन चट्टे दाबि गेलै बनेलहुँ अपन जखनसँ संगी बलमकेँ  जिला भरि केर लोकक मुँह बाबि गेलै बसने छलहुँ मन मंदिरमे जिनक छबि  दया भगवानकेँ ‘मनु’ ओ पाबि गेलै (बहरे करीब, मात्रा क्रम : १२२२-१२२२-२१२२) गजल करेजा धधकैत अधि हमर आबासन मनक भीतर माटिक प्रेम काबासन दियावाती भेल नै चौरचन भेलै  मनोरथ भसि गेल ताड़ीक डाबासन अपन अँगने छोरि एलहुँ सगर हित हम फरल दुश्मन एतए बड्ड झाबासन करेजामे दर्द गामक बसल एना बिलोका बनि ओ तँ चमकैत लाबासन हमर पीया दूर परदेशमे 'मनु' छथि विरहमे हम छी हुनक बनल बाबासन (मात्रा क्रम : १२२२-२१२२-१२२२) गजल वेदरदी नै बुझलक हमरो जखन  जीबू कोना जीवन झहरल तखन घर घर अछि रावण रामक भेषमे  कतए रहती आजुक सीता अखन दुश्मन बनि गेलै भाइक भाइ अछि  टाकामे भसिएलै कतए लखन सुखि गेलै ममता मायक कोइखक  भदबरिया पोखरि सन भेलै भखन सगरो पसरल ‘मनु’ सहसह दू मुँहा  काइट नै लेए के कतए कखन (मात्रा क्रम – २२२-२२२-२२१२) गजल  एहि ठाम साट हेराए गेलै रामा  फेर आइ बलम बौराए गेलै रामा चढ़ल साइठक जबानी केहन बुढ़बापर  चुलहाक नार चोराए गेलै रामा गाममे बसल घरे घर छै कंठी धारी  साँझ परल माँछ झोराए गेलै रामा देख ढंग पुतक करनी आजुक आँगनमे  बाप केर आँखि नोराए गेलै रामा ‘मनु’ समाजमे सगर मोदी जीकेँ अबिते  माल संग चोर पकराए गेलै रामा (मात्रा क्रम : २१२१२१-२२२२-२२२) गजल 

देखलौं जखनसँ अहाँकेँ होस गेलौं बिसरि हम आगि ख’र बिनु लेसने सौँसेसँ गेलौं पजरि हम

एकटा मुस्की अहाँकेँ प्राण लेलक लय हमर खा क’ मोने मोन मुँगबा चट्ट गेलौं पसरि हम

अछि निसा चानक अहाँमे भ्रमित केने रातिमे मुँह अहाँकेँ मोरिते बिनु पानि गेलौं पिछरि हम

स्वर्ग पेलौं बिनु अहाँ ओ स्वर्ग भेलै नर्क सन छोरि छारि स्वर्गकेँ पाछूसँ गेलौं ससरि हम

खुजल आँखिक ‘मनु’क सपना प्रगट भेलौं जगतमे       देख निरमल नेह   बिनु बरखाक गेलौं झहरि हम             (मात्रा क्रम- २१२२-२१२२-२१२२-२१२) गजल

किए तीर नजरिसँ अहाँकेँ चलैए हँसी ई तँ घाएल हमरा करैए मधुर बाजि खन-खन पएरक पजनियाँ हमर मोन रहि रहि कए डोलबैए छ्मकए हबामे अहाँकेँ खुजल लट कतेको तँ  दाँतेसँ   आङुर कटैए ससरि जे जए जखन आँचर अहाँकेँ

जिला भरि  करेजाक धड़कन रुकैए

  अहीँकेँ तँ मुँह देखि जीबैत 'मनु' अछि

बिना संग नै साँस मिसियो चलैए (बहरे - मुतकारिब, मात्राक्रम -१२२-१२२-१२२-१२२) भक्ति गजल नै अहाँ केर बिसरी नाम हे भगवन  होइ कखनो अहाँ नै बाम हे भगवन सुख कि भेटे दुखे जीवनक रस्तापर  संगमे रहथि सदिखन राम हे भगवन हम बनेलौं सिया मंदिर अपन मनकेँ  आब कतए अहाँकेँ ठाम हे भगवन आन नै आश कोनो बचल जीवनकेँ  अपन दर्शनकटा दिअ दाम हे भगवन ‘मनु’ अहाँकेँ करैए जोड़ि कल विनती  तोड़ि फेरसँ तँ अबियौ खाम हे भगवन (बहरे मुशाकिल, मात्रा कर्म – २१२२-१२२२-१२२२) नीतीश कर्ण प्रेमक बुन्नी प्रेमक बुन्नी उमरि- उमरि, आई हमरा पर बरसल हमर करेज के परती बारी में, प्रेमक गाछ आई उपजल की जाने औ कौन मौसम छल, की जाने औ कौन नक्षत्र हमर मनक अन्हार कोठरी में, भेल कोना इज़ोर सर्वत्र आई धरि नई सोचलउं सपनों में, हमरो पर ई बरखा बरखत मिलते देरी नैन नैन स’, हमरो पर ई बिजुरि करकत नैन झुकेने ओ बैसल छल, मिलते नैन की जादू केलक किछु कहितहुं किछु बाजि नई सकलहुं, की जाने कोन मन्त्र ओ पढ़लक जानि प्रेमक मौसम छल ओ, किछु हमहुं अंदाज लगेलउं  कोना भिजलउं से बुझि नई सकलउं, तै बरसातक लाथ लगेलउं कोना सुनाबु कोना सुनाबु हाल बिरह के नोर आँखि में आबईये करेज मे एकटा हुक उठल आ प्राण ठोर तक आबईये जानि कोन अपराध केलहु हम, जेकर सजा देलहु आहां हमरा जिनगी हमर ओई फूल जाकाँ भेल, जेकर रस चुसलक कोनो भंवरा निश्चहि घोर अपराध हमर छल, जे हम नेह लगेलहुँ आब अहु सs बइढ कs सजा देब कि, जिबैत जान लs लेलहुँ आबि गेल फेर आमक महिना, जखने गाछी में महुआ गमकल हरियर भेल बेमाय करेजक, सुनबा सs कोयली के कु-कल नैन बिछेने आइयो बाट पर, पैरा अहिं के तकैत छी मन पता नै कतs लटकल अछि, नै सुतई छी नै जागई छी ओहि अतीत मे तकबा के, हम अखनेहु इच्छा रखने छी मुदा देह हमर सिहरी उठइये, जखन गप्प आहा के करैत छी किछु बुईझ नै आबि पडेयै एहन कोन जुलुम हम केलहुँ सभहे किछु गेल हराए, किया हम प्रीत लगेलहुँ बिनीता झा जिनगी जिनगीकेँ खेलक अलगे मिठास  कखनो देत आस आ कखनो निराश जे क्यो बुझि गेल ई छोट छिन बात जिनगी नै करतै तकरा हदास बात धेने नै भेटत ककरो किछू बेस बढ़ने निकहो टा हैत नाश आगा पाछा के बारे मे की सोचै छि कर्म करू आर राखु अपना पर विश्वास दुःख सुख संगी ऐ जीवनक करनीकेँ राखू अपन टा ख़ास किछु पाँति राधाकृष्ण सरकार लेल रथ चढि ऐला सरकार, भक्त जन गाबै झूमै सजल सभक घर द्वार भक्त जन गाबै झूमै श्वेत,ललित,हरित,पीयर श्रृंगार  भक्त जन गाबै झूमै सुन्नर सजल भोजनिक थार भक्त जन गाबै झूमै करैथ आदर आ सत्कार भक्त जन गाबै झूमै रथ जतराकेँ त्यौहार भक्त जन गाबै झूमै राधाकृष्ण सभक पालनहार  भक्त जन गाबै झूमै विन्देश्वर ठाकुर, धनुषा/ नेपाल, हाल : कतार पैसा एतऽ कमा रहल छी पैसा एतऽ कमा रहल छी जिनगी सबटा गमा रहल छी एना मनाएब एहिबेरक दशै बिगत बहुते दिनस  चलिआबिरहल परम्परा  मनबैत आएल सन्स्कार  बर्षा रितुक समाप्ती तथा  सरद रितुक आगमनसङ्ग  ल क आएल अछी नया उल्लास आ  नया उमङ्ग्सभ  नव नव प्रकारक दशै मनाब बला तरिकासभ । किनको लेल फूलसन फैलाईल अछी इ दशै किनको लेल लहरासन लतरल अछी इ दशै घट्स्थापनास ल टिका लगाब धरि किनको लेल चाट्टानसन टकराएल अछी इ दशै घटस्थापना करैत अछि जैती छिटैत अछि धुप आरतिसङ्ग दुर्गाक पूजा करैत अछी  भजन करैत अछी  किर्तन करैत अछि टिका लगाबिक् आशिर्बाद लैत अछि माने एना मनबैत अछी हमर कुटुम्ब सभ  हमर देशमे दशै मुदा हमसब  प्रवासमे मनारहल एहिबेरक दशै अवश्य किछु फरक होएत  अवशे किछु अलग होएत  कखनो परिवारस दूर रहबाक पिडामे  सम्झनास्वरुप मनाएब एहिबेरक दशै त कतौ यादक तरङ्ग्सङ्ग  मनक प्यास मेटाएबाक हेतु  मनाएब एहिबेरक दशै  देशमे दूर्गा माताक पूजा होइत काल  हमसब मोदिरके मालिस क  मनाएब एहि बेरक दशै तहिना घरमे जैती चढबैत काल  हमसब सुख्खा खबस चिबबैत मनाएब  एहिबेरक दशै  अतबे नै  दशमीके अन्तिम दिन  माने टिका लगाब बला दिन  ओ म्हर घरमे  टिका आ जैतिसङ्ग मनाओत  एहिबेरक दशै  एम्हर हमसब  काम क्षेत्रमे अपने निधारसा चुबिरहल पसिनासङ्ग  मनाएब एहिबेरक दशै गजल (हमर प्राणप्रिय सुपुत्र प्रिन्स ठाकुर जी  यिनकापर समर्पित ई गजल .......) धिरे-धिरे स्नेह बढाएब हम  करेजस भले सटाएब हम बिनु अहाके जियब नै कखनो  जिनगी अहिपर लुटाएब हम आखिक तारा छी अहा यै बउवा छोडिक कहियो नै जाएब हम अहालाS सदिखनि हसि मरब  कहियो नै नोर बहाएब हम प्रेम अहाके पवित्र अछि प्रिय ताहिस नै गंगा नहाएब हम सरल बार्णिक बहर  आखर:- १२ गजल सन ने देखलौ अै मुखरा इजोर सजना  मन होइय हमर झकझोर सजना चलै कोनो काज तकैछी  मेहनतमे बड शक्ति होइछै अहाक कोनो बातके जबाब नै  मुसिक देखाओल दातके जबाब नै गीत १ बियाह बियाह घोसैत रहलौं  सेहो ने भेल हमर नवकी भौजी ...........२ दियौ न अहू बेर कराइ  ए हमर नवकी भौजी ..........२ भैयासँ कहियौ अहाँ बाबुके मनैयौ  हमर नवकी भौजी  दियौन लगन जगाइ हमर नवकी भौजी बड़कीसँ कहलौं भौजी छोटकीसँ कहलौं हे तब गेलौं मायोके दुवार हमर नवकी भौजी ए हमर नवकी भौजी  भेलै ने तैयो कोनो जोगार  हमर नवकी भौजी अहिपर लागल भौजी आब मोर आस हे  तोड़ू ने भौजी अहाँ हमर बिश्वास हे  दियौ न जल्दी मौर चढाइ  हमर नवकी भौजी दियौं न बियाह कराइ हमर नवकी भौजी .... २ जनकपुरमे अलु बेचै छे तीनकौरियामे कोबी गे ....... 2 सब छौडाके गै गै गै गै गै गै  सब छौडाके पागल बनेलकौ  छौडी तोहर ढोढी गे ......... 2 ढोढी तोहर इनार लगै छौ देह तोहर कचनार बुझाइ छौ  केश तोहर जे मेघोसँ कारी  कपडा आरपार देखाइ छौ एहन सुन्दर फिगर देखि कS कोना ने मरतौ धोबी गे सब छौडाके गै गै गै गै गै गै  सब छौडाके पागल बनेलकौ  छौडी तोहर ढोढी गे ........ सुटुर छौडाके पागल बनेलकौ  छौडी तोहर ढोढी गे चन्दे बनियाके पागल बनेलकौ छौडी तोहर ढोढी गे..... आबो कनी सुधरि जो गे छौडी  कौडी फसाएब बिसरि जो गे छौडी  ठैक ठेठा कऽ सब मुन्साके लुटि कऽ लाएब बिसरि जो गे छौडी  इकराहीमे कचरी बेचै छे  जोगियारामे फोफी गे .........2 सब छौडाके  गै गै गै गै गै गै सब छौडाके पागल बनेलकौ  छौडी तोहर ढोढी गे .........2 बुढ्बो सबके पागल ...... तोहर ढोढी गे  जुअनको सबके पागल ....... तोहर ढोढी गे  सब छौडाके पागल बनेलकौ  छौडी तोहर ढोढी गे ......... ३ कऽ कऽ देखू प्यार सजनी  जिनगी लुटा देब ..........२  दैबो ने देत ओते जते दुलार देब हाथेसँ हम दूध पिलाएब खुवाएब मलाइ महँगा भिटामिन खुब खुवाइ  अहाकेँ मोटाएब  सेउ, सुन्तला, केरा भोरे उठिते अनार देब  कऽ कऽ देखू प्यार सजनी ...... लुटा देब  दैबो ने देत जते ..........  दुलार देब मोनक हम रानी बनाएब दिलमे छुपाएब  चान्द तारा लाबि अहाकें  चेहरा सजाएब  टिका, नथिया, बिचिया आरो  हिराके हार देब कऽ कऽ देखू .......... लुटा देब  दैबो ने देत .......... दुलार देब ४ राजा जी हमरा सँ करै नै छै प्यार हे नै जानि कोना अते भेलनि गजदार हे हम त केने रहूँ उनके ला शृङ्गार  जबानी जियान भऽ गेलै ......२ हम उनका संगे रही  ओ हमरा संगे रहे मुदा ने कहियो किछो अपना बारेमे कहे .......२  एक दिन अएलनि सैंया बिजुली गिरा कऽ करिया मुझौसी एकटा सौतीन उठा कऽ हमर उड़ि गेल होस हबास  जबानी जियान भऽ गेलै हम त केने रँहू .....शृङ्गार  जवानी जियान ......भऽ गेलै लागे भाग हमर अछि फुटल तखने स्नेहक डोरी टुटल  जिनका जानसँ बेसी चाहूँ  ओहे बिच बाटमे रुसल ........२  लगैय देहमे ने कनियो प्राण छै सारा संसार जेना एक समसान छै आब बुझु हमर जियब बेकार  जवानी जियान भऽ गेलै हम तँ केने रहूँ .......शृङ्गार जवानी जियान .......भऽ गेलै ५ सेब सनके लाल छियै देखऽमे कमाल  बड बबाल छियै यै ....2 अहाँके ने कोनो जबाब लाजबाब छियै यै .....2 मुँह लगैयऽ जेना दूधोसँ उज्जर  चलि जेतै अहाँ सङ्गे रानी यै गुज्जर  पाबी अहाँकेँ भेलौ हम मलेमाल  बड बबाल छियै यै ......2 अहाँकेँ ने कोनो जबाब  लाजबाब छियै यै .....2 अहाँके सङ्ग रानी जिनगी बितेबै मरलोके बाद धनी अहींकेँ कहेबै जुटल ई नेह अहाँसँ हमर सालो साल  बड बबाल छियै यै ......2 अहाँकेँ ने कोनो जबाब लाजबाब छियै यै .....2 भेटब दोसर दिवालीमे भेटब दोसर दिवालीमे हम एहि साल नहि आबि सकलौ  मुदा आएब दोसर दिवालीमे  पूजा करब सँगे लक्ष्मीके  प्रसाद चढाएब थालीमे ।। रावन बद्ध क राम अएलाह  तखने भेल दिवालीक शुरुवात  दिप जलाएब आरती करब  खुशी बाटब अछि पैघ बात ।। अपने झुमु सबकेऊ झुम्ताह  खुशी मनाउ परिवारमे  बिसरि सबकिछु मन लगाबु  फटका छोडु दरबारमे ।। असत्यपर सत्यके पताका  तै अछि ई चाड महान् आगामी दिनमे टुटे अहिना  दुस्ट दलके इ अभियान ।। सत् संगत सदमार्ग देखाबथि  मासँग बस एह प्रार्थना करु  गरिबी भागे सम्रिद्धी आबे  बस इहे अर्चना करु ।। अन्त्यमे हम कि कहु अहाके  ध्यान राखब एहिपालीमे  हम एहि साल नहि आबि सकलौ  मुदा आएब दोसर दिवालीमे ।। छठिक शुभकामना छठि पावनि धुमधामसँ  हएत पोखरिपर जाइके  शीर नमा कोटि नमन  करै छी हम छठि माइके ।। सु-स्वास्थ दीर्घायु जीवन  पुरबथि सबके कामना  सम्पूर्ण श्रद्धालु भक्तजनमे  यैह अछि शुभकामना ।। रक्षाबन्धन [कविता] भाई-बहिनक प्रेम भरल छै  लिय ने एकरा अर्थ अनेक  एक दिनलाS सालमे आबे  ते त छै ई पर्व बिशेष । थाल सजल छै लड्डु रखल छै  लाल चन्दनस माथ रङ्गल छै  हर्श-बिस्मातक बाढि आबिगेल  हाथमे स्नेहक डोर बन्हल छै । चारुदिस गुन्जैय गीत  भाए-बहिनक रीत आ प्रीत  मा अम्बेस करैत प्रार्थना  होए भैयाके जीते जीत । नीक पथ रोजु यौ भैया  बढतै हमरो आत्मविश्वास  रक्षा करब देश,समाजक  रखनेछी बस एहे आस । अहा हमर आखिक तारा  छी हम बहिन अहाक दुलार  शत्रुके चङ्गुलस करब  सद्खनि अपन भूमि उद्धार । बाट जोहब हम एहि दिनके  रहत जाधरि ठोठमे प्राण  रक्षाबन्धन जगमग करतै  भैया जियत सालो साल । अहा किये कनलौ ? अहा अतेs छोट बातपर  अतेs बेसी आशु बहाएब  हम सोचने नै छलौ !  अहा किये कनलौ ? हमरा कहु ने  कि अहाक नैनस खसल नोर अहाक मात्र अछि ? एहिपर हमर कोनो हक नै ? एकटा गप सुनि लिअ, ओ आशु अहाक लेल  केवल पानि मात्र टा  भs सकैय मुदा  हमरा लेल त ओ कोनो मोतिके दानास कम नै अछि  अहाके हिर्दयमे लागल टिस  हमरा लेल कोनो पैघ सदमासs कम नै अछि ललकार [कविता] घरमे चाउर नै फुटानी करैछे नठा बरदस जोतानी करैछे गाउमे घर ने चौरीमे खेत  बिच्चे सडकपs खर्ह्यानी करैछे । तोरा बापके के नै चिन्हैछौ  तिनकौरिया बजारपर कोबी बेचैछौ  तेकरे बेटा जोल्हा छौडा  आइ हमरासँग दिलग्गी करैछे । कि छौ तोहर अपन शान  कि बनौने छे पहिचान  देखि करैछौ दूर छिया सब  किय एना तो आगि मुतैछे । सुन रौ बौवा आबो किछु सिख  एना नै तो बनै ढीठ बियाह नै करतौ कोनो छौडी  बरद सन जे भेस रखैछे । घसनठहा नै बनै आब  फुर्तीस किछु करै काज  बाप कतेs दिन गुज्जर चलेतौ  किय ने हमर बात बुझैछे । जीवन तोहर निक भs जेतौ  चलै कोनो काज तकैछी  मेहनतमे बड शक्ति होइछै किय अनेरे नेप ढारैछे । फुसिक शान स्वार्थी नेता स्वार्थी सेबक सब देखाबे फुसिक शान  एहन बिडम्बना सबठा पसरल कहु कोना बनत सबिधान  लोगस लोग परेशान छै एत बती के बाते नै करी  सत्ता लिप्सा पत्ता चट्टास कोना हेतै नव देश निर्माण पंकज झा हम बुरबकहा हम बुरबकहा बात की बुझब, एक स एक पढुवा आहि ठाम, ककरो कियो मोजर नई करइ, बदैल रहल अइछ मिथिला धाम। हम अधलाहा कान थोपी कS, सुनी रहल छी भजन अजान, मुदा मोजर बस ओकरे छई जे, गप सँ हरी लेत दोषरक प्राण। नई बाजू यो गोरका कक्का, बाप पित्ती के नई कोनो मान, किछु कहबई तँ झट स थुकि देत, देहे पर ओ खा का पान। धीया-पुता की बरका-जेठका, एकहि ढठा एकहि शान, खखइश दियउ त प्राण अवग्रह, क देत सबटा बजा समांग। की ई ओ मिथिला छई जक्कर, करइ छलौ हम सब गुमान, बरको भइया के देखिते सब, परा जाइत छल छोइर दलान। बेचन महतो-हथमुण्डा ४ खुशीके नोर सुबह समुन्दर किनारक शेर आँइख करहल छल ओमहरसँ असमानि रङगक क्षितिजसं आइल समुन्दरी छालस खुसीकेबुलबुल।  सबमाला बनारहल छेलै चाँद सर्यसं ज्योतिलाइब मनि जराअ रहल छेल समुन्दरक आँखक नोर सीपसं निकलल मोती ओखरा  अपने छल किनारमे समतल  आकृति ईटाजका ओइमे पथर  और झारसबहक बिचमे एगटा सबस बडका उचपथरपर हिऊ जका लेउ दाँतजेहन चम्कैत  माथके समानक माला अर्पन  करहल छेलै हमेशा मालामेके छतिस फूलबाईरक फूल  शोभा अपारसं हर्षित होईत मुस्कुराइत मुस्कि मारैत छेलै अपन अमरपुत्र आदिकबि भानुभक्तके जन्मदिनक सम्मान कार्यक्रम देखलेल उमरल भिरके हृदयसं आसिर्बाद दैत आसमानक चांदिके टुक्राबादलसं पाइनक फोहरा शीतक बुंद बैन गिरहल दुईभक पातपर टिलपिल टिलपिल करहल छल सुर्यकिरणके दिलमे समायलेल परतिक्षा करहल छल  बर्षसं प्रदेश गेल प्रितमक इनतजारमे बाटजोहैत बैसल  प्रियसी जका बिदेशमे समपतिये कमा जम्मा क क कि करब  ई अपनकहियो नै होयत यै ठामक एक सूचना , निर्णय, आ घोषना जीवनभैरक परिश्रमके सोहा कदेत अपन माईट अपने होइछै बाचौकेलेल अन्तमे अपने देशक माईट चाहि साहाराके लेल अपने बैसाखि कामदैय । आउ हमसब एक हउ- कबिता आऊ सबगोटे मिलु सबकुछ  अपने आप ठिक भजेतै छोट बर सबकामकरि मिलक  सब निक भजेतै । जेना हमसब मिलैछि गल्फमे कतेक आन्नद कतेक ठिक लगैहै मिलु सबगोटे अपने आप  समस्या सब फिट भजेतै । दुनियामे अपनासबके मिलन देख अच्मभित भजेतै  हमरा आहाके लालसा बौवा बुच्ची  सबहक शिषभजेतै । सब अपनलोक अपन मित भजेतै शान्तिके सोहार्दयसं देखते दुस्मनक सबकाँटा बिष भजेतै भैयाके भौजीसंगे प्रित भजेतै । अपन अपन चाइल होइछै  अ - अपने गानामे फरक होइछै  खुसीके श्रोत हृदयके तानामे एकै देशमे अच्छ घृणाप्रेमकेएकैसिमानामे । यी सब चीज नुका जाय यैठाम यी हमर अपनके बहानामे अपने लोक लान्छना लगबैबला प्रशंसाके कितो वायह अच्छि । चिनजाइनक दुख दैहै सुख बाटहुला वायह तयार अच्छि मनके यबय्था कियाक येहन प्रेम आ घृणा जग्बै बाला । फेरु सबके मनके राजा बैनक राजकरैला मनमे जगह वायह मङैय आऊ सबगोटे मिलु सब ठिक भजेतै भैयासंगे भौजीके प्रित भजेतै । सपनाके बिज ( कबिता ) श्रावन महिनाके कारी कारी बादलके चारोतर्फ चाँदीसं मेरहल छल  बेर बेर बिजली चमैक चमैक आकासक क्यमरासं हमर परिचय संसारके  देखाबलेल ल रहल फोटो ल  कर्कस अवाजसं सचेत करैत  थरकबैक त टन्का ठन्कैत छल । हम डरस एक दुसरके बाहुपासमे लुटु पुट भरहल छलि युगल जोरी सपनाके बीज जन्मे लेल तयार छल  झरिके संगे संगे गिररछल पाइनक  बुँदसंगे सपनाके बीज उर्बक माइटमे । अपन पहचान हराक केना अपने  आप बिलिन भ क अंर्कुन भय  गाछमे परिवर्तन भजाइछै  मगरयोइमे कतस केना हरियर पता निलैहै  गाछमे बदलस पहिने बिज  अपने लिलामीके जुवा  खेल खेलने रहैहै । गाछमे बदैलतेमात्र ओइमे  जादु होबलगैछै स्वतंत्रखोजबला डाइरसब स्वतन्त्र खोजैत कतस  अबै है उ सुन्दर कोढी, फूल,वोइमे सुगंध आ  रङ कहाँस अबैछैओइमे खोंताबनबैबला चिरैसब कतस । अबैछै भुन भुन करैबाला भम्रा,पुतलीसब कतस बस हमर सपनासब हु बहु  बिजके जेहन छै  ओकरा रोपपरैछै धर्तीपर  बढाउनाइ फूलनाइ फलौनाइ धर्तीके कामछैय ओईके लेल अपने आपके  अपनेस अपनेसंगे बाजी राखपरतै जीवनमे कियाक कि  एक सपनाके लिलामिस दोस्र सपनाके जन्म दैछै  वो फूलैछै, सकार होइछै सुभाष फैलैछै आ  सब लोकके कल्याण होइछै । कुन्दन कुमार कर्ण हजल एक दिन कनियांसँ भेलै झगडा मारलनि ठुनका कहब हम ककरा ओ पकडलनि कान आ हम झोंट्टा युद्ध चललै कारगिल सन खतरा मारि लागल बेलनाकेँ एहन फेक देलक आइ आँखिसँ धधरा बाघ छी हम एखनो बाहरमे की कहू ? घरमे बनल छी मकरा एसगर कुन्दन सकत कोना यौ ओ हजलकेँ बुझि लए छै फकरा मात्राक्रम: 2122-2122-22 बाल गजल फूल पर बैस खेलै छै तितली डारि पर खूब कूदै छै तितली भोर आ साँझ नित दिन बारीमे गीत गाबैत आबै छै तितली लाल हरिअर अनेको रंगक सभ देखमे नीक लागै छै तितली पाँखि फहराक देखू जे उडि-उडि दूर हमरासँ भागै छै तितली नाचबै हमहुँ यौ कुन्दन भैया आब जेनाक नाचै छै तितली मात्रक्रम : 212-2122-222 बाल गजल पढबै लिखबै चलबै नीक बाटसँ आगू बढबै अपने ठोस आंटसँ संस्कृति अप्पन कहियो छोडब नै अलगे रहबै कूसंगत कऽ लाटसँ फुलिते रहबै सदिखन फूल बनि नित डेरेबै नै कोनो चोख कांटसँ हिम्मत जिनगीमे हेतैक नै कम चलबै आगू बाधा केर टाटसँ बच्चा बुझि मानू कमजोर नै यौ चमकेबै मिथिलाकेँ नाम ठाटसँ मात्राक्रम: 2222-2221-22 गजल दुख केर मारल छी ककरा कहू केहन अभागल छी ककरा कहू हम आन आ अप्पनकेँ बीचमे सगरो उजारल छी ककरा कहू नै जीत सकलहुँ आगू नियतिकेँ जिनगीसँ हारल छी ककरा कहू बनि पैघ किछु नव करऽकेँ चाहमे दुनियाँसँ बारल छी ककरा कहू कुन्दन पुछू संघर्षक बात नै दिन राति जागल छी ककरा कहू मात्राक्रम : 221-222-2212 गजल की जिनगीमे आउ की दूर जाउ बिनु मतलबकेँ राति दिन नै सताउ बोली मिठगर सन अहाँ बाजि फेर हमरा प्रेमक जालमे नै फँसाउ आगूमे देखाक मुस्की अपार पाछूमे सदिखन छुरा नै चलाउ सुच्चा अछि जँ प्रेम साँचे अहाँक सब किछु बुझि हमरे हियामे सजाउ राखू नित कुन्दन जँका शुद्ध मोन बस झूठक कखनो हँसी नै हँसाउ मात्राक्रम : 2222-21-221-21 गजल ओकरा देखिते देह अपने सिहरि जाइ छै आगि नेहक हियामे तखन यौ पजरि जाइ छै मारि कनखी दए छै जखन ताकि अनचोकमे डेग अपने हमर ओकरा दिस ससरि जाइ छै ओ हँसै छै त एना बुझाइत रहल बागमे फूल जेना गुलाबक लजाइत झहरि जाइ छै चानकेँ देखिते रातिमे चेहरा ओकरे झिलमिलाइत हमर आँखिमे सजि उतरि जाइ छै लाख लड़की करै छै हमर आब पाछू मुदा छोडि सभकेँ बहकि ओकरेपर नजरि जाइ छै प्रेम कुन्दन हए छै भरम से बुझा जे रहल एहने जालमे मोन सुधि बुधि बिसरि जाइ छै बहरे-मुतदारिक गजल अहाँ गोर हम कारी छी मुदा एक टा प्राणी छी सजत रूप नै हमरा बिनु अहाँ देह हम सारी छी रहब नै अलग कखनो जुनि अहाँ ठोर हम लाली छी चलत साँस नै एको छन अहाँ माँछ हम पानी छी कहू आर की यौ कुन्दन अहाँ फूल हम माली छी मात्राक्रम : 1221-2222 गजल मोन एखनो पारै छी अहीँकेँ बाट एखनो ताकै छी अहीँकेँ भावमे बहकि हम संगी सभक लग बात एखनो बाजै छी अहीँकेँ आब नै रहल कोनो हक अहाँपर जानितो गजल गाबै छी अहीँकेँ दीप जे जरा गेलहुँ नेहकेँ से नित इयादमे बारै छी अहीँकेँ प्रेम भेल नै कहियो बूढ कुन्दन साँस साँसमे चाहै छी अहीँकेँ मात्राक्रम : 212-1222-2122 गजल हियामे उमंगक अगबे लहर छै बुझा गेल ई त प्रेमक असर छै धरकि अछि रहल धरकन बड्ड जोरसँ रहल आब किछु नै बाँकी कसर छै मजा एहि जादूकेँ खूब अनुपम सजा मीठ सनकेँ जेना जहर छै गजल पर गजल कहलहुँ ओकरापर मुदा बादमे बुझलहुँ बेबहर छै पहिल बेर कुन्दन ई बात जानल किए प्रेम सुच्चा जगमे अमर छै मात्राक्रम : 122-122-22-122 गजल एहि हारल आदमीकेँ हालचाल नै पुछू दर्द सुनिते जाइ बढि तेहन सवाल नै पुछू मारि किस्मत गेल कखनो खेल खेलमे लटा घर घरायल नित बिपतिमे कोन काल नै पुछू संग अपनो नै जरूरतिकेँ समय कतहुँ रहल केलकै कोना कखन के आल टाल नै पुछू बाट जिनगीकेँ रहल जे डेग डेगपर दुखद बीत कोना गेल ई पच्चीस साल नै पुछू के मरै छै एत यौ कुन्दन ककर इयादमे लोक लोकक खीच रहलै आब खाल नै पुछू मात्राक्रम: 2122-2122-2121-212 गजल हमरासँ प्रिय नै रूसल करू बेगरता मोनक बूझल करू बनि नेहक सुन्नर सन फूल नित मोनक बगियामे फूलल करू जखने देखै छी हमरा कतहुँ तखने हँसि लगमे रूकल करू जीवन संगी हमरे मानि जुनि आत्मामे बैसा पूजल करू काइल की हेतै मालूम नै  एखन कुन्दनमे डूबल करू मात्राक्रम : 2222-22212 गजल दीयावातीकेँ हम दए छी विशेष शुभकामना स्वीकारू सभ केओ हमर ई सनेश शुभकामना माए बाबू संगी बहिन भाइ जे कतहुँ रहल अछि चाहे केओ परदेश या दूर देश शुभकामना घरमे लक्ष्मीकेँ आगमन होइ सुखसँ जिनगी सजै प्रेमक सौगातसँ जन समर्पित अशेष शुभकामना वैभवमे नित होइत रहै वृद्धि शान्ति घर-घर रहै मठ मन्दिरमे हम दैत छी दीप लेश शुभकामना पावन अवसरपर आइ कुन्दन हृदयसँ दैत सभकेँ शुभ संध्यामे पूजैत लक्ष्मी गणेश शुभकामना मात्राक्रम:22222-2122-121-2212 गजल बीतल दिन जखन मोन पडै छै आँखिसँ बस तखन नोर झरै छै छोडब नै कहै संग अहाँकेँ लग नै आउ से आब कहै छै ओकर देलहा चोटसँ छाती एखन धरि हमर दर्द करै छै जिनगीमे लगा गेल पसाही धधरामे हिया कानि जरै छै के बूझत दुखक बात हियाकेँ कुन्दन आब कोना कँ रहै छै मात्राक्रम : 222-1221-122 गजल दुख अपने लग राखै छी सुख सभमे हम बाँटै छी सभकेँ बुझि अप्पन सदिखन हँसि-हँसि जिनगी काटै छी पापसँ रहि अलगे बलगे धर्मक गीतल गाबै छी मैथिल छी सज्जन छी हम मिठगर बोली बाजै छी कुन्दन सन गुण अछि हमरा मिथिलाकेँ चमकाबै छी मात्राक्रम : 2222-222 गजल देह जखने पुरान बनल यौ स्थान तखने दलान बनल यौ आङ घटलै उमेर जँ बढलै देश दुनियाँ विरान बनल यौ सोह सुरता रहल कखनो नै आब नाजुक परान बनल यौ अस्त होइत सुरूज जकाँ बुझि राज सेहो अकान बनल यौ रीत छी याह जीवनकेँ सत सोचि कुन्दन हरान बनल यौ 2122-121-122 गजल अप्पन हियसँ आइ हटा देलक ओ शोणित केर नोर कना देलक ओ हमरा बिनु रहल कखनो नै कहियो देखू आइ लगसँ भगा देलक ओ सपना जे सजैत रहै जिनगीकेँ सभटा पानिमे कऽ बहा देलक ओ हम बुझलौं गुलाब जँका जकरा नित से हमरे बताह बना देलक ओ भेटल नै इलाज कतौ कुन्दनकेँ एहन पैघ दर्द जगा देलक ओ मात्राक्रम: 2221-21-12222 गजल प्रिय चलू संग एकातमे डुबि रहब नेहगर बातमे अनसहज नै बुझू लग हमर आउ बैसू हमर कातमे अछि बरसि जे रहल मेघ झुमि भीज जायब ग' बरिसातमे गुन गुना लिअ गजल आइ जुनि संग मिलि केर सुर सातमे फेर एहन मिलत नै समय लिअ मजा प्रेमकेँ मातमे बहरे - मुतदारिक गजल जिनगी एक टा खेल छी सुख दुख केर ई मेल छी कहियो जे सुलझि नै सकत तेहन ई अगम झेल छी संयमतासँ जे नै रहत तकरा लेल ई जेल छी रूकत नै निरन्तर चलत ई अविराम सन रेल छी होइत अछि जखन दुख तखन दैवक बुझि चलू ठेल छी बहरे-मुक्तजिब बिनीत ठाकुर जलवायु परिवर्तन जे बुझे अपनाकेँ वलशाली देश । काज किछु एमकी करे विशेष । जलवायु परिवर्तन पर राखे ध्यान । पृथ्वीकेँ कम करे तापमाण । राम कुमार मिश्र- गाम: रमौली, बहेड़ा, दरिभंगा रुबाइ धनवानक धूनल तूर छी चिनवारक नीपल नूर छी अजवारल कष्टक नोर पी सभहक सूखक मजदूर छी रोटीक जोगार मऽ सांझ परि गेलै नेन्नाक कननाइ सऽ भूख मरि गेलै बचतैक कोनाक इ जान हम्मर यौ छातीक जबकल सभ दूध जरि गेलै गप्पक मारल चनकल छाती साटब हम कोना अमती कांटक बेधल जिनगी काटब हम कोना सत्तक पथपर चललहुँ फूइस पूजित दुनिया में फूसिक जिनगी थूकल फेरो चाटब हम कोना तोरल गप्प तोरै जिनगी मिठगर गप्प जोरै जिनगी क्रोधक लहरि फोरै जिनगी कामुक मोन कोरै जिनगी गजल सहसह लोकक भीड़ देखल हम  सुच्चा लोकक लेल बेकल हम कटुता क्रोधक उमर बढ़लै टा नेहक देखल लाश जेकल हम माहुर मीझर गप्प गीजै छथि माहुर गप्पक टीस सेकल हम बलगर शोणित पीबि मोटेलै अबला श्राद्धक पात फेकल हम जीयब निकहा दिनक आशामें आशक सिम्मर फ़ूल सेबल हम सभ पाँतिमे मात्राक्रम –2222-21-222 गजल खेती अगता आइ बुझलियै करमक झटहा आइ बुझलियै असगर जिनगी मगन रही धरि लोकक खगता आइ बुझलियै अनकर तीमन नीक लगै छल बारिक पटुआ आइ बुझलियै बापक टाका खूब उरेलहुँ अप्पन बटुआ आइ बुझलियै शहरी जिनगी मीठ लगै छल गामक कुटिया आइ बुझलियै सभ पाँतिमे मात्राक्रम –2222 21 122 गजल जौं बूझी तऽ जहरी जर्दा जड़ा रहल अछि लोकक जिनगी  सिगरेट चीलम गांजा गला रहल अछि लोकक जिनगी चौक-चौबट्टी दारु केर भट्टी बनल बिनाशक बीखशाला  चिखना कटिया तारी में लुटा रहल अछि लोकक जिनगी रंग-बिरही पुरिया पाकिट धऽ नवतुरियाक रंग देखू  चिबा-चिबा बिख गुटका चिबा रहल अछि लोकक जिनगी नोतल केंसर आबि रहल छै फोंक करै लेल जिनगी कऽ धन-संम्पति लुटा लुटा कना रहल अछि लोकक जिनगी नशाखोरक जिनगी देखियौ भरल जुआनी बूढ बनल दांत टूटि आ डांड़ लीबि लिबा रहल अछि लोकक जिनगी फेर न भेटत जिनगी बाबू जौं एकरा बरबाद करब तोरियौ नशाक जाल जे फंसा रहल अछि लोकक जिनगी लय संकल्प करू दृढ़ निश्चय फेकी सभटा दुर्गुन ‘रामऽ देखू सोचू बूझू कोनाकऽ हरा रहल अछि लोकक जिनगी (सरल वार्णिक बहर) वर्ण – २२ गजल मूड हमर किछु गरबर अछि बोल हुनक बड करगर अछि सूनि हुनक बोली बुझलौ बाप बऽरक बड धरगर अछि दाँत टुटल मूँहक सभटा पाइ बेर धरि दतगर अछि रीति कोन बेटा बेचब गप्प हमर धरि खरगर अछि ‘राम’ कतय बेटी ब्याहब गाम-गाम में अजगर अछि सभ पाँतिमे मात्राक्रम – 2121+2222 सत्य नारायण झा प्रियतम--- डुबल मझधार मे प्रियतम  अहाँक हम वाट जोहै छी परल छै घाट पर नैया  संग पतवार नेने छी । रहल अछि मोन मे उलझन कहू केकरा सँ जाकय हम हमर त भाग फुटल अछि हृदय मे डाह नेने छी ।  आहाँ त प्राण छी प्रियतम  मगर हम चैन सँ बैसल  हृदय मे स्नेह लपटल अछि मुदा हम नीन्द धेने छी । अहाँक आश मे बैसल  मदन कें मारि सहै छी  करू कल्याण जल्दी सँ  कोना हम दिन बिताबै छी । ब्यथित मोन सहब कतेक अपमान सुनू आब लोक हँसैया हुनकर रुपक जाल कतेक जंजाल लगैया । कतेक सिनेह छल हुनका सँ ,से वैह बुझै छथि हमरा मोनक बात मुदा ओ खुब जनै छथि । भोरे उगलै सूर्य कतेक ओ लाल लगै छै , रातिक उगल चान कतेक परिहास करै छैक । फरल गाछ मे आम कतेक झुकल लगै छै  पसरल चतरल डारि कतेक सितल करै छै । मिथ्या ई संसार करै छै मिथ्या रचना  माहुर बनल समाज देखत की सुन्दर सपना । एहि संसारक रीति कतेक आब स्याह लगै छै भेटत कतौ ने लोक जेतय कियो सत बजै छै । केलक कतेक उपहास हमर आब,हम की बाजब हुनका आँखिक नोर सदा हम मोनहि राखब । छलय जतेक उल्लास आब से ककरा कहबै  हुनका मोनक बात सदा हम मोनहि रखबै । बतहा ई संसार ने किछु आब मोन लगैए आँखिक आगा देखि हमर आब देह जरैए । मोनक बात----- मोनक उद्वेग मोने मे समा जाइत अछि , लिखबाक मोन अछि मुदा मोने मे लिखा जाइत अछि , कतेक मोन अछि मुदा मोन मोने मे उधिया जाइत अछि, जिनगीक सुखद पल जिनगिये मे हेरा जाइत अछि | की सोचैत छलौ , से करैत छलौ मुदा भेटल की हाथ,  सांसारिक खेल मे सभ छोरि देलक हमर साथ , हम असगर कुहरैत छी ,बेदम छी, मरैत छी , असहाय भेल लोकक मुँह तकैत छी | जेकरा लेल असीम प्यार छल ,असीम स्नेह छल , ओकर मुरझायल चेहरा देखि नहि पबैत छी , मोनक बात मोने मे सहेजि क’ राखि लेत छी | कियो केकरो दुःख नहि बुझैत छैक  सभ अपन स्वार्थ मे लिप्त रहैत छैक , आन मर’ जर’ भ’ जाथु राख , नीक लोक लेल कियैक बनत ओ ख़ाक | कतेक निरीह ,निर्वल ,वेपर्द भ’गेल छी, फाटल करेज, बीमार भ’ गेल छी , मोन मे उठल तरंग मोने मे रखैत छी  वीरान जिनगीक संग श्मशान मे रहैत छी , मुर्दा क’ जरैत बर् ध्यान सं देखैत छी  मोनक बात मोने मे बर समेट क’ रखैत छी | श्याम शेखर झा साजन साजन लागय नै नीक मनभावन सावन  सजनी अहँ बिनु सून मनभावन सावन . तेज पवनसं, हमरा तँनसं , ससरी ससरीक उरि उरि आन्चरि जाइय . ठन्का ठनकय, बिजुरी चमकय , देखि घटा घनघोर, मन घबराइय .  साजन लागय नै नीक मधुमासक पावन  सजनी अहँ बिनु सून मनभावन सावन . बर्सैत देखिक , गर्जैत सुनिकय , नोर आँखीसं अविरल बहल जाइय .  टर टर बेङ्ग, खेलाए रेङ्ग, दृश्य मनोहर देखि मन अकुलाईय . बुन्द बुन्द मे चित्र अहँ के ई सावन . साजन लागय नै नीक मनभावन सावन . सजनी अहँ बिनु सून मनभावन सावन . भेल व्यथा कि ? रुसल प्रिया कि ? पुछे सखी सब ,उत्तर किछु नै फुराइय . कुररिक काग, टरिइय राग , जोहि क बाट , थकित ई नैंन नै जुराइय . कष्ट विषम सरि भेल मनभावन सावन .  साजन लागय नै नीक मनभावन सावन . सजनी अहँ बिनु सून मनभावन सावन . मन अधीरसं, दग्ध शरीरसं , काँपे थरथर धर दुख आब नै सहाईय . कतय गेल चईन, कटय नै रेइनी, इजोरिया राति, चानि ई सुख नै बुझाइय . झहरय आँखीसं नोर बनिकय ई सावन . सजनी अहँ बिनु सून मनभावन सावन . साजन लागय नै नीक मनभावन सावन . पंकज चौधरी “नवलश्री” कविता : जुनि बिसरू त्याग बिना जे ग्रहण करै छी सभकिछु जे संयोगि रहल छी जुनि बिसरू जे अहूँ ई सभटा ककरो त्यागल भोगि रहल छी आङ्गुर पकड़ि चलल जे संगे कष्टक खत्ता पार लगओलक जुनि बिसरू ओ मीत अपन छल जकरा आब नै टोकि रहल छी अनकर गप पतिएलहुँ सहजहिं रहल भरोस ने भाय-मीतपर जुनि बिसरू अपनहि छातीमे अनकर चक्कू भोंकि रहल छी शहरक च'रमे पेटकुनिया द' बिसरि गेलहुँ जे गामक रस्ता जुनि बिसरू अर्थक तरजू पर माएक ममता जोखि रहल छी गंगा - कमला अकछि पड़ेली उघैत-उघैत पापक सभ-मोटरी जुनि बिसरू ई अछिञ्जल गामक शहरक कादोसँ घोंकि रहल छी भाषा भूमि दुनु अवहेलित निजतरंगमे मातल मैथिल जुनि बिसरू जे बिसरि क' सभ किछु फूसिए सीना ठोकि रहल छी अमित मिश्र गजल किछु गीत एहन रचि दी मीता इतिहास बनय जे अगिला बेर किछु बात एहन कहि दी जगमे सब याद रखय जे अगिला बेर दिन राति सदिखन जीवन पर्दापर किछु नव-पुरान सन अभिनय होइ नाटक कने एहन खेली सगरो खेल करय जे अगिला बेर नै प्रीत बेसी नै बेसी झगड़ा रह सदति बराबर सब लेल नित कर्म एहन राखी मीता अनुकरण करय जे अगिला बेर छै दोष ककरो आ भेटै ककरो सजाय, ई घटलै युगसँ कहियोक ई गलती मारुक, आतंकी बनबय जे अगिला बेर निज गाम तजि एलहुँ बाहर पर सुख-चैन कतहु नै भेटय "अमित" निज देशमे परदेशी बनि कुहरी, टीस उठय जे अगिला बेर 2212-2222-2221-2122-221 गजल जतेक छल भाव हमरा लग आइ पसारि देने छी अपन करेजासँ जनमल सब परत उघारि देने छी गलत-सही केर झगड़ा सब ठाम पड़ल अधूरे अछि जतेक छल फूसि लफड़ा सब आगि पजारि देने छी खुशीक मैडल सिनेहक ओलम्पिकमे कमे भेटय इएह कारण अपन नस-नस दुखसँ गछारि देने छी हमर लिखल गीत हमरे काटैत रहैत अछि मीता अपनहि घरमे अपन जीवनकेँ दुतकारि देने छी अहाँक नैनक नशा बड बेहोश कऽ राखि देने अछि अहाँ तँ पाथर हियाकेँ पलमे चुचकारि देने छी गजल हम बाढ़िक मारल-झमारल छी परजातंत्रक सुखसँ बारल छी जुनि कोड़ब सखि भावना कहियो स्मृतिमे पुरना लाश गाड़ल छी ई जग हारय आबि हमरा लऽग अपने मोनक तर्कसँ हारल छी किछु नै हमरा लऽग किओ बाजय सत्यवादक अवगुणसँ छारल छी हम नै छी कवि ने गजल वक्ता बस शब्दक धधरा पजारल छी गजल कने मीठ कने तीत छी अहाँ हमर अपन मीत छी किओ तोड़ि सकत नै सखा अहाँ आँङुर हम बीत छी हमर ठोर परक भाव बनि गुनगुनाइत नव गीत छी अहाँ रहब जतय, रहब हम अहाँ धाह तँ हम शीत छी अहाँ तजि हमरा जीब नै अहाँ हारि तँ हम जीत छी कंचन कुमारी झा मंजिल जौ दिख परल गगन, होई मंजिल ओहि ठमन, होई रस्ता अनचिनार, होई रस्ता में नई केउ आर| रस्ता में काट बिछल अछि, हर कदम पर हर जगह, ओई मुश्किल पर कदम बढ़उ, उ मुश्किल अहा पर नई चला|| मुश्किल सै टुट क$ टुटई छई सब कैउ, उ मुश्किल के तैईर क$ जुझ के अहि आब अहाक| मुश्किल सै जुझईत अहा गिर परलउ तै कि भेल, अपना पर राखु भरोसा करू पहल फैर सै नया|| मुश्किल के दियैउ बताई अहुउ में उ जान अछि, इ होसला के गिरनाई आब नई आसान अछि| होसला सै मुश्किल आब सहज भजात, गगन भी साफ दैखात और मंजिल भी ऩजर एत|| मन में राखु आब भरोसा आशा के भी दियऔ जगह, होई गगन आहाके कदम में, मंजिल अछि ओहि ठमन|| संजय झा हे माय तोरा प्रणाम

उठ रौ बौआ , उठ रौ बेटा भ' गेलै आब भोर  कतेक करबै आब तू देरी  सूर्यो भेलथि इन्होर जाउ नहाउ आ जल्दी सं आउ जलखै भ' गेल ठंढा  झटपट आहाँ पहिर लिअ  पेंट, जुटा ओ अंगा उठाऊ झोड़ा जाउ पाठशाला  नै त' लागत डंडा मुँहक बोल छै कड़गर ओकर  ह्रदय बहाई छै गंगा बोली बचन के बात नै पुछु - कखनो रसगुल्ला सन मिठगर  कखनो , तितगर नीमक पात सन  एक रति जौं कष्ट जे देखलेत छड़पटाय लागत - बिन पाइनक ओ माछ सन उम्र हमर आब भेल बहुत  भ, गेलहुँ हम जवान  तैयो ओकरा एहने लागय इ अछि एखनो अज्ञान  आब बुझाइया किया बुझैया इ हमरा अज्ञान  ठेंसो जखन हमर पुत्र के लागय  निकलि जाइत अछि प्राण हे माय तोरा प्रणाम !! हे माँ तोरा प्रणाम !! शारदा नन्‍द सिंह नमरीक भाउ तेहेन ने दरकल नमरीक भाउ तेहेन ने दरकल सीधे-सीध दशटकहीपर अरकल धान-गहुम गोदाम सड़ैए आल्‍लू-पि‍औजक भाउ सुनि‍ थारी-बाटी झुझुआन लगैए श्रोतस्‍वि‍नी भेल प्रदुषि‍त जलपर लागल मोहर वि‍देश तेतेक आराजकता बढ़ल जा रहल अर्णव उफनि‍ डोलि‍ रहले शेष तेहेन वि‍धेयक पास भेलै अलंकारो गेलै श्‍लेष ढारि‍ कि‍रोशीन हि‍न्‍दपर देल माचि‍स लेश जनसाधारण एको ने बाँचत बाँचत जन वि‍शेष खद्दर-खाकी रमनामा रंच मात्र ने मानवताक लेश भारत माता ढनमना रहलि‍ जनशक्‍ति‍पर लागल ठेँस। अयोग्‍य शासक बि‍नु पढ़ने वि‍द्या जँ होइतै बि‍ना पढ़ने कि‍सान हमरो भारत होइतै साक्षर नै मरि‍तै भूखै कि‍सान छेलै केहेन ई देश जे बाँटै अनुपम अपन संदेश न्‍याय-दर्शन दरसाबए छेलै ने बाँचल कोनो देश गार्गि‍-मैत्रीय सन वि‍दुषी अछैते देह वि‍देह ति‍नक सन्‍तानकेँ अपनोसँ ने पाबै नेह जँए प्रजातंत्र छै मुर्खक तँए चुनै शासक अयोग्‍य एहेन दि‍न सुनबाक ऐतै भारत ललना हबसक होइ उपयोग राज छूपल छै बड़का बदलाक भाव बरकि‍ रहल छोभ कल-छल-छल बारि‍ बहए बान्‍ध बनाबलि‍ डोभ। केतेको क्रान्‍ति‍ उठल भारतमे उद्योग क्रान्‍ति‍सँ रहलै वाज जेतेक वि‍देशी टांग पसारल हम भारतीय छी बनल मोहताज कि‍एक तँ प्राइमरीसँ युनि‍भरसि‍टी तक सभतरि‍ एक्के हाल छै शि‍क्षा मि‍त्र होउ आकि‍ चाँन्‍सलर शारदाक घेँट करै हलाल छै। चि‍रकि‍ जाएब ई जीवन हमर सुखाएल डारि‍ सन जँ बहै कड़गड़ वसात चि‍रकि‍ जाएब वा‍ की हएब? आकि‍ टूटि‍ जाएब कि‍एक तँ अन्‍त:स्‍त्रोत अछि‍ सुखा रहल स्‍त्रोत पयश्वनीक प्रवाह अवि‍रल बहि‍ रहल छल से ठमकि‍ रहल नै सिंचि‍त द्रुमलता वि‍टप भऽ रहल जड़ि‍ जेकर हरि‍त-पल्‍लवि‍त-पुष्‍पि‍त भऽ सकत फलि‍त जरि‍ रहल जीगर अछि‍ हाल यएह कथा-कवि‍ताक हमर छन्‍द ने अलंकार आ ने हृदैदारक तरू डारि‍ सुखाएल सनि‍ चि‍रकि‍ जाएत ई जीवन हमर अछि‍ जे देश हमर जनतांत्रि‍क जनता जेकर जड़ि‍ केहेन विश्व मानकपर खाँका खींचल केहेन कसगर जन-गन तक अमरलत्ती लतरल-चतरल हर जन-जनपर ताधरि‍ रहे रसगर जँ बहए वसात कड़गड़ चि‍रकि‍ जाएत सुखाएल डारि‍ सन जीवन हमर। भूमि‍जा भैया हे भूमि‍जे जनमि‍ते एतेक कि‍ए हमरासँ माँख ने कोरा आ ने काँख अबि‍ते एलौं की हम केलौं देखि‍ते कि‍ए हमरा एना बि‍सरलौं की मन अछि‍ से नै जानि‍ छेलौं केहेन सन डुमैत कि‍ए अनलौं हमरा छानि। भल ने केलेँ तूँ गे दैया सभ कहे दुर जो जँए भेलौं भूमि‍जाक भैया तँए ने होइए हमरा एते ऐसँ नीक तँू मारि‍ए दइतेँ एहेन भाएसँ तँ भैटुरे रहि‍तेँ चट आबि‍ झारि‍-पोछि‍ मुँह लेलेँ चुमि‍‍ कहलेँ भैया सभटा सत्ते। की कहबो हम तोरा भैया केने अछि‍ तेतेक मुँहचुरू जेतेक नि‍पट नि‍टटू अखनि‍ कहबैए सुरखुरू जे देखै छै राखल जएह सभटा करै चट अपन सुतारै अगबे गोटी डाँड़ खोंसि‍ जे बँचै छै धऽ लइ छै मुँह फट‍ के भरतै ई पेट अगस्‍ती सुगम मार्ग अपनौने नाम बेचि‍ हमर सगरो छै घि‍नौने सुच्‍चा मैथि‍ल बुझै अपनाकेँ असलीकेँ कि‍यो ने जानै दाँत बत्तीसी बाबि‍ कऽ नै मानै तँ लागए फानए लगबै माने-पर-माने की कहबो हम तोरा भैया केने अछि‍ मुँहचुरू की छेलौं आ की भेलौं तँए कहाबै सुरखुरू। अरुण चन्द्र राय अर्थशास्त्र कहल जाइत अछि जे  अर्थशास्त्र  थीक एक टा विज्ञान जाहि सॅ कएल जाइत अछि  उत्पादन, वितरण व  खपत केर प्रबंधन संसाधनक इष्टतम उपयोग लाभक संग  अछि एकर अंतिम उद्देश्य  हटि गेल छथि  आमजन  अर्थशास्त्र के केंद्र स' नबका परिभाषा में मांग आ' आपूर्ति कए बीच  संतुलन बैसेबाक कला सेहो थीक  अर्थशास्त्र  जखन कि नाना प्रकारक  प्रलोभन दय कए  सृजित कएल जा रहल अछि मांग  आ' आपूर्ति भए रहल अछि  बाजारक शर्त पर इरा मल्लिक कविता- संग अहाँक पाबि जिनगीक राहमे, धूप छाँह बहुत छैक| संग अहाँक पाबि, मोनमे ई अहसास जागल, धूप हो कि छाँह हो, अहाँक स्नेहक तपीसक सन्मुख, धूप की? छाँह की? किनको किछु सामर्थ्य की! सब भऽ जाइत अछि, सामर्थ्ययहीन! शक्तिहीन! रौद तँ रौद अछि, दहकैत! भकाभक तेज! लाल-लाल! आगि उगलैत गर्म गर्म!  कतहु त्राण नै! किंतु!! अहाँक स्नेह पाबि, ई तीख रौद, बदलि जाइत अछि ! गंध पुष्प मे!! हमर जिनगीक राहमे सुख  फूल जकाँ बिछ जाइत अछि! चानन शीतल छाँह बनि, सुरभित सुवासित बाट, गन्ध मादक नगर , बनि जाइत अछि! अहाँक स्नेह-डोरि पकड़ि हम, ओइ नगरमे घुमैत छी, बनि बावरि ! मतवारि! अइ गली! ओइ गली! हमरा नीक लगैत अछि, धूप छाँह भरल , जिनगीक ई रंग! अइमे! अहाँक प्रीतक समर्पण, सामीप्य पाबि, सिमटि जाइत छी, ओइ गेह मे! जतय अहाँक ,मजगूत दुनू, बाँहिक घेरा अछि! मजगूत दुनू बाँहिक घेरा अछि!! ओइ बहुपाशक घेरमे, हमर एक सुंदर संसार बसल अछि! ओइ मजबूत परिधिमे, हमर सुख ,चैनक बसेरा अछि! हमर सुख ! चैनक बसेरा अछि!!! गजल प्रीतके मीठे होय छै बोल सेहो हम जानि गेलौं प्रीतके बोल बड़ा अन्मोल सेहो हम मानि गेलौं | इन्द्रधनुष के सातों रंग सँ प्रीत सजल अछि मनमा करै मोर किलोल सेहो हम जानि गेलौं| प्रीतक नहिं छै भाषा कोनो एकर कोनो नै बोली अनहद बाजै प्रीतक ढोल सेहो हम जानि गेलौं| पोथी पढि बनलौं हम ज्ञानी बहुत अभिमानी प्रीतके ढाई आखर बोल सेहो नहिं जानि पेलौं| प्रीतक रीत विरह के पीड़ा दारुण दुखदायी करेजा सालै छै अनघोल चुप्पे हम कानि लेलौं| तरसि गेल दरस बिन नैना प्रीत निरमोही मौन छै व्याकुल नैना बोल सेहो हम मानि गेलौं| सरल वार्णिक(वर्ण-१८) गजल जिनगी जहिना तहिना कटैत रहलौं सुख दुख के जउँर ( रस्सी ) सँग बटैत रहलौं | कान्ह पर छलै घर जिम्मेदारी क बोझ हँसि हँसिके ओ बोझ सब उघैत ( ढोऐत )रहलौं | दुख एलै हम कहियो निराश नहिं भेलौं सुख के मोती हम पानि सँ छटैत रहलौं | रैन अन्हरिया छलैक तहियो की भेलय सवर्णिम भोर के आस लए खटैत रहलौं | बड़ अजगुत दुनियाँ के चलन की कहू तकै नीको में बेजाय सब सहैत रहलौं | पिघलैत रहल रसेरस दुख के घड़ी मेहनैतिये के मोजर छै जनैत रहलौं | दुनु हाथक भरोस छै मेहनैति के जोर जीवन में सुख के संगीत गबैत रहलौं | सरल वार्णिक- ( वर्ण -१६ ) गजल गमाउ नै गोरी छन मधुराग भरैये हमर हृदय सँ फूल पराग झरैये। देखु लाज सँ गालक गुलाब खिल गेल लोगक नैनाक काँट बेहिसाब गरैये। नैना चितवन अल्हड़पन देखैत छी कोना मुस्की मिसरिया पर जान जरैये। अधर कोमलकली छै रस सँ भरल मन भँवरा बौरायल से जानि परैये। मोन फागुनी बयार बनि मस्त मगन सिनुर लाज सँ मुखरा गुलाल भरैये। रूप चर्चा पसैरि गेल गामहि गाम मेँ कोना चलतै लोग दिने मेँ बाट हेरैये। सरल वार्णिक (आखर-१५) गजल जमाना देलकै दरद बहुत किनका कहबै करेजक भेल कत्तेक टुकड़ी किनका कहबै | किछ बात एहेन जहि सँ हम अनजान छलौं बड़ी भेद भरल बेदर्द लोग किनका कहबै | उप्कार में अप्कार तकै जग के रीत पुरान छै हवन करैत जौं हाथ जरल किनका कहबै | मुँह आगू जैह मीठ बनै पीठ पाछू उपहासी मुखौटा लगेने लोक छै फरेबी किनका कहबै | जे जेतबे नम्हर चोर बात हुनके लम्बा चौड़ा साधु बनल मुँहचोर रक्षक किनका कहबै | सज्जन के नै ठौर कतौ दुनियाँ चोर ठकैत के झूट्ठा बनै पवित्र एतै धर्मात्मा किनका कहबै | सरल वार्णिक( वर्ण- १८) गजल हुनक नैन झरैत नोर हम देखने छी भरल आँखिक लाल कोर हम देखने छी | नैन चुपचाप रहय बोल किछ नै फुटै हुनकर बिजुकैत ठोर हम देखने छी | उठैत करेजक दरद कहु के बुझतै सालैत अो टीस पोरे पोर हम देखने छी | नेहमहल ओ सजेने छलैथ जतन सँ बिखरै महल खंड थोर हम देखने छी | हुनका के बुझाबै इयैह जिनगी थिकैक कानबै कनैत चहुँ ओर हम देखने छी | (वर्ण - 16) गीत (श्रृन्गार) ओहि राति! ओहि राति ! सपन में अयला सजना ! बिहुँसैत अधर भीजल नयना! ओहि राति! सपन में अयला सजना! नहुँ नहुँ दीप जरय ओहि प्रीतमहल, हम बाती मधुर बनल सजना! ओहि राति ! सपन में अयला सजना! पिपासित छल मन! तन थिरकि रहल ! तकय चानक दिस चकोर नयना ! ओहि राति! सपन में अयला सजना ! वन कानन मन विरहिन पपीहा ! पीउ पुकारि रहल काँपय गगना ! ओहि राति! सपन में अयला सजना ! प्रीतकुँज जखन कुहकल कोयली! आधे राति बिखरि गेल भोर जेना ! साँस उसाँस सुरभित सुरभित ! महुआ मादक बौरायल मना ! ओहि राति ! सपन में अयला सजना ! ओह!! ओहि राति सपन में अयला सजना !! कविता ............ दर्द दर्द में फर्क बहुत अछि हँसी हँसी केर अर्थ अलग अछि | पीर गहनतम शान्त दर्द अछि टीस पीर के मर्म बुझल अछि | पीर सत्य थिक सुख क्षणिक अछि नुका सकब दृग नोर भरल अछि | घोंटि सकब नीलकंठ बनि विष शिवरूप धरब कहु कहाँ सरल अछि | सूर्जक पहिल किरण सूर्जक पहिल किरण  प्रात: काल पृथ्वीपर उतरल आ  सन्देश देलक अहाँक प्रेमक  अहाँक स्नेहक देखिते हम  मन्त्रमुग्ध भs गेलौं  कारण ओइ किरणमे  स्वयम् अहाँ प्रतिबिम्बित छलौं । सुरेन्द्र शैल- भदहर(दरभंगा) पोसुआ कुकुर

पोसुआ कुकुर खाय मलीदा, अइंठ कूठ अमला के भोग। नेता काढ़य नित्य कसीदा, भूख बनल जनता के रोग॥ पाँच बरख पर गिरगिट बदलय, मौसम के अनुरूपे रंग। झरकल मुँह पर रहि- रहि चढ़वय, पियर-हरियर-उज्जर रंग॥ समर भूमि मे मंच सजल अछि, अभिनेता-योद्धा बहुरंग। क्रीड़ा-कौतुक-दंभ भरल अछि, प्रजातंत्र आनन भटरंग॥ महिसवार बनि चढ़ल मंच  पर, केकरो केतली चाहक हाथ। तीर-तुणीर धयल दसकंधर, सनकल हाथी चढ़ल सवार॥ विपटा-लवड़ा ताल देखावय, गीता और कुरान सिखावय। ठक गाँधी के रूप बनावय, आई शहीदक जाति गनावय॥ नटुआ और बजनियाँ देखल, ठोकैत ताल-ठेहुनियाँ देखल। जोड़ल हाथ-केहुनियाँ देखल॥ निर्लज्जक गुड़कुनियाँ देखल॥ इन्द्र घटावय महगाई अरु देव मंगावय कारी धन। लाख दुखक बस एक दवाई, फेर कहै छी साँच बचन॥ पछिला लूटल कोखि धरा के, ई बेचत पक्का पुनि देश। अपन पिया सँ नयन लड़ा के, घुरि आयत धरि जोगिन भेष॥ विवश बेचारी जनता  निरखल, विना टिकट के वाइस्कोप। शैल मूक कखनो नहिं परखल, काल्हि हैत सुख शांतिक लोप॥ रसिक लाल सदाय (अवकाश प्राप्‍त शिक्षक) गाम- परमानन्‍दपुर, पोस्‍ट- नवानी भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) निवासी छथि। हिनक जनम तिथि- ०८/०७/१९५२ अछि। लालदास जयंती समारोह, खड़ौआ-मे आयोजित कवि आयोजित गोष्‍ठीमे अपन कविताक पाठो केलनि, सभ कियो सराहबो केलकनि मुदा मात्र एक गोट कविताक पाठ करबाक अवसरि देल गेलनि। अनुनय तीनू लेल केने रहथिन, समैक टान दुआरे सम्‍भवत: अवसरि नै भेटलनि, मुदा एतए तीनू प्रकाशित कएल जा रहल अछि। दीनक दुर्दशा जे अति दीन तेकर दुर्दिन, दिनानुदिन ओ धन बल हीन कृष गात कृषक मलीन से करत की सामंत युगमे मन मारि-हारि बैसल विचारि की कऽ सकैछ, नै दऽ सकैत की किछु लऽ सकैत, कड़ पसारि हक मारल अछि सभठाम जेकर मेहनत-मजदूरी चारूठाम जेकर मुँह ताकि बिधुआएल ठाढ़ कियो अछि जे सुधि लेत एकर। स्‍वार्थी अर्थी नेता नायक, अपने पेट कुरियबैत किन्‍तु गरीब मौन भऽ बैसल, किछुओ ने बूझि पबैत सरकारो अछि भोंमा शंख, जे ढोल पीटि परचार करैत मुरखाहा संग पढ़लोहोकेँ, धोखा दऽ चटकारैत हमर बनौल हमरे हक खा कऽ, हमरे ओ परतारैत मंगलापर फटकारैत,आशा दऽ कऽ टारैत भीतरे-भीतरे मारैत अछि, अपन दाउ सुतारैत अछि  की कहबऽ हौ भाय, सभ गहुमन सन फुफकारैत अछि। अनुभव लिखलौं-पढ़लौं किछु बचपनमे आब की लिखू, की पढ़ू की सीखू सुधि बुधि सभ हेराएल करम-जालमे सभ बिसराएल दू-चारि बाल-गोपाल भेल जखनि कर्तव्‍यक भार माथ पड़ल तखनि परि गेलौं हम बड़का उलझनमे लिखलौं-पढ़लौं...। की करू नै करू, मन कछमछ करैए नीन नै नयन मनमे चिन्‍ता रहैए उठि-उठि बैसै छी, टुक-टुक तकै छी मनै छी नै जीबै छी, कहुना दिन कटै छी मुदा तैयो नै शान्‍ति पबै छी एको क्षण पाँच-दस-पनरह-बीस, केना बितल उमर पचीस खेती-पथारी दुनियाँ-दारी, केना भरत पेनकट्टा बखारी जे किछु केलौं वा नै केलौं, बहुत कमेलौं बहुत गमेलौं आब की करब उमर पचपनमे लिखलौं-पढ़लौं...। स्‍कूल गीत चल-चल चल बौआ स्‍कूल पढ़ैले चल-चल चल बुच्‍च्‍ाी स्‍कूल पढ़ैले पढ़ै-लिखैले साक्षर बनैले अ, आ, क ख स, ह सीखैले- चल बौआ गिनती सौ तक गिनबैले, अक्षर-अक्षरकेँ मिलबैले देखि-देखि कऽ नकल करैले चल-चल चल...। पढ़मेँ-लिखमेँ साक्षर बनमेँ, नै पढ़मेँ तँ मुरूख कहेमेँ अखनि नै, पाछू पछतेमेँ, अनपढ़ जीवन गाम हँसेमेँ चल-चल चल...। डाक्‍टर आैर इन्‍जीनियर बन, पढ़मेँ-लिखमेँ जँ सदिखन चल बौआ हाकीम बनैले...। चल-चल चल...। स्‍कूलमे सरजी भरपुर, मैडम दीदी सेहो खूब भोजन किताब मंगनीए भेटै छै, पोशाक पैसा सेहो भेटै छै चल बौआ तूँ गीत गबैले...। चल-चल चल...। महेश झा 'डखरामी' सपना सोड़हो श्रृंगार नाचय दलबल, नैन देखाबय पलपल छलबल ; चलै नै जोड़ कलबल भुजबल , डोलय आब अप्पन सम्बल | कनिए अप्पन नाम बताबू , संगहि गाम ठाम बताबू ; मोनक बेग आब नै काबू , किए विवेकक मूँह जाबू | मिठगर पाइन अहाँके घाटक , सब पथिक ओहिए बाटक; हटाबू , दर्पण रूप समर्पण , रीति प्रीति आकर्षण अर्पण | दैव नै जानय अहाँक मतिगति , बिनु प्रसाद ककरा सद्गति ; सबहक दाता विमुख विधाता , मन मारुख ई नेहक नाता | दर्शन सदिखन सजल धजल , रूप कँवल सन नवल धवल ; चंचल चितवन चित्त चपल , मदहोशे देखू खसल पड़ल | भेल परात फूजल आँखि, उड़ल चिड़ैय्या लगाकऽ पाँखि; सपना सुन्दर चोट्टहि टूटल , सोड़हो तार हाथ सँ छूटल | केहेन जौउर सँ प्रीति बान्हल, मधुर बोल सँ बाती लेसल  कयल जतन बहुविधि , नहि जाय खुटेसल आब मोन नहि एना बिसनाऊ, दैबा आबू, परान बचाऊ | ------------------------------ [२७,अक्तूबर २०१४,रवि दिन नयी दिल्ली] उनटा बसात पढ़ल लिखल बौक बनलिऐ , मुर्खाहा छाती तानि चलैए ; सब ओकरे साहब लाट बनाबय , देखू, अन्हरा बाट देखाबय | बिनु ढौआ ज्ञानी मूर्ख बनलिऐ, उल्लू सगरे सद्पुरुख बनलिऐ ; विधनो ओकरे ठाठ बढ़ाबय , देखू , अन्हरा बाट देखाबय | भ'रल गेठी दाबिकेँ च'लय , छुच्छा भजोखा खूब बजाबय ; खाली घइला 'माट' चिढ़ाबय , देखू, अन्हरा बाट देखाबय | निरधन जन सुशील गुणखान , धनिकक देखू मोन उत्तान ; सज्जन लेल किए टाट लगाबय देखू , अन्हरा बाट देखाबय। सरिता सूर्य चान वृक्ष मान, फल जल शीतल सदिखन दान; किए केओ सुविधा ढाठ लगाबय, देखू , अन्हरा बाट देखाबय | अनुराग चिंतन जिनकर सतत मन मे , बनि साँस बहय प्राण पण मे ; देखू, विधनाक वेधन शक्ति , ओत्तहि बेसी भाव विरक्ति | चेतन चिंतन रंग रुधिर मे, स्नेह सिंचन संग सुधिर मे; देखू, भागक भेदन शक्ति , ओत्तहि बेसी आश आशक्ति | सरलक सउँसे लज्जित लाज, विरल पाबथि सज्जित साज ; देखू,प्रकृतिक विपरीत शक्ति, ओत्तहि शापित प्रेम प्रतप्ति | भद्रक भाव पथ पर लथ पथ , रुधिर रेणु रक्ताभ रथ पथ ; विधिक कृपा चित्तक सम्मति  शून्य पुण्य प्रीतिक सद्गति | हुनिकर आगाँ कक्कर जोर , वशमे जिनकर साँझ भोर ; आब नहि हो कोनो आपत्ति , ईश दया सभ विलीन विपत्ति | राधे श्याम मुरली मनोहर आँचर थाम्हल , हियक अनुराग खूँट सँ बान्हल | मधुर बोल मन मोह जागल , आनन चानन प्रीति पायल | काटय करेज, काजर कोर , मेह मध्य मुस्की मन भोर | अद्भुत पुरुष , प्रकृतिक खेल , निज निज भाव अनुपम मेल |। जीभ निःशब्द नैन अनघोल , अन्दर बाजय अनहद ढोल | सेवा अविरल धेनु धाम , एकहि सम्बल राधा नाम | बिनु भजन नहि पल विश्राम , पुनि पुनि दर्शन राधे श्याम | बेटी जहि घर भेटै', मान धिया केँ , ओहि घर बास, राम-सिया केँ। बसथि सिया, घर -घरक धिया मे , सहयोग, सम्मान जगाउ जिआ मे कन्याकेँ नै बुझू सामान, ताकू आबो, एकर निदान। दहेज निषेधक बनय विधान , आगाँ बढ़ि राखू प्रमाण ; तखने अछि पुत्रीक कल्याण। आब नहि जाय, बेटीक जान , जाहि घर पुत्री वएह दुर्गाथान। पुत्री पाबथि मान जाहि गाम , वएह गाम जनकपुर धाम। मनोद्गार साओन सलिला सिंचित शरीर , रभसय सारंग ,सीप,समीर। पुष्पित पल्लब , पुहुप पलाश , प्रियतम हेरथि,प्रेम प्रकाश। कोकिल कुहिकय कानन कानन , ह्रदय विदीर्ण करय मन आँगन। सौरभ सौम्य ,सुन्दर सुषमा , पुरुष प्रकृतिक प्रदीप्त उपमा। पृथवी पाटल , पीयर पात , मदन मन करय आघात। कोठा चढ़ि चढ़ि कागा कूजय , संभव सुन्दर पहुंक उदय। नयन भरि भरि पाहुन हेरब , बहुरि विदेशक बाट घेरब। साजन सुनैथ सुन्दर सन्देश , तरुणी तजि जुनि जाथि विदेश। क्रोध त्रुटि प्रपन्च प्रदत्त दण्ड , पुरजन मध्य स्वमान खण्ड | मन विक्षोभ धारण दण्ड, आवेस वेग सब खण्ड खण्ड | क्रोध काल दुर्भाव प्रचण्ड , भाषा भ्रष्ट नहि अंडबंड | भाव नियंत्रण नहि शब्द उदंड, क्रोध आवेश चिन्ह अबंड | समन शोक संताप पाखण्ड , मस्तक मानिक मान मार्तंड | छैइठ मैय्या आरूढ़ अश्व सत श्वेत रथ , प्रदीप्त जगतीक सत पथ | पूजा नैवेद्य पान मखान , धूप दीप आरती गुणगाण । स्वीकारू व्रतीक अर्घ्य जल , हो सबहीक मनोरथ सफल | जयति छैइठ मातु परमेश्वरी, नमामि सूर्येश्वरी विघ्नेश्वरी | नारी भगिनी भार्या पुत्री अरु माता , जाकी महिमा भजहि विधाता | निज ईच्छा तजि सुख बरसाबहि, परम सुभाग 'शक्ति' गृह आबाहि | सन्तति सुख जतन दिन राती , हरसि विलोकहि , शीतल छाती | बाजेऊ साँचे सुरनर मुनि ज्ञानी , भेटहि मान तहाँ बसहि भवानी | बहु विधि आदर विनय गुण बरना , तीनहु लोक सुख सब तुम्हरे चरना | नहि स्वर्ग अरु बैकुण्ठ को आशा , करहु सदा मम उर पुर बासा | भगिनी = बहिन शेफालिका वर्मा दीयाबाती मनेलौं आली दीयाबाती मनेलौं आली नेसलोँ दीप निसा कारी के कारी  ताराक चुनरि पसरल अकास में  धरा पर दीपक पाती  मुदा  ह्रदय बीच डहि रहल  सभ आकांक्षाक होली आली ! शत कामना शत दीप  काँपि रहल नेने विरह गीत  अन्हार सागर में डूबल निष्पन्द 'रजनी ' चकित भीत  विकल हृदय में जरि रहल करुण  तूफानक राग  मृदुल हंसी अधर पर सिसकल आँखि में  अविरल उच्छ्वास  खिलखिला उठल दीपक पाँति  खिलल जेना अनगिन संझा फूल  कम्पित आलोक बनल अमाक अधरक लाली  नेसलहुँ दीप निसा कारी के कारी-------- दीयाबाती केर अशेष शुभकामना  जतेक दीया धरती पर जरय  ओहि से बेसी ख़ुशी अहाँके भेटय कैलाश जहिना करब ओहिना पाएब

प्रचण्ड धूम मे साठी वर्षक दुःखीआ जखन खेत सँ काम कऽ घर आएल अक बके रहि गेल ......२

बेटा ‘सोभिता’ खाइत छल पुतहुँ खुब गनगनाइत छल । ई बुढवा एकटा काल छै जखन कोई खाइत, तखने आबि जाइत

थाकल पिडाएल दुःखीआ भुकुर भुकुर कानए लागल तखने पोता ‘राहुल’ चिहुक बाजल अहाँ किया कनैत छी बाबा एक दिन ओहो सभ बुढ हएत ...२

ओहि पर सोभिता बोमकि उठल पुतहुँ बाढनि लऽ कऽ दौडल हम सोचने छली पढा लिखा के डाक्टर बनाएब बुढवा लग रहि के भऽ गेल अभागल...२

दुःखीआ अतित मे डुबि गेल जहिया सोभिता बौआ रहय बाबु हमरा ई चाही तुरुन्त फरमाईस पुरा होबाक चाही....२

कनिको हम खिसिआइत छली कनियाँ हमर लोहैछ बजैत छल ऐना किया करैछी इहे ते बुढपा के सहारा छै अखन बौआ के खिअबै बुढपा में बौआ खिआएत...२

आई ओ दुनयिाँ छोडि चली गेल ऐह देखबाक लेल हम रहिगेली हे भगवान ! उठा लिए हमरो । सोचि सोचि ओ कानए लागल

तखने पोता भात लाबि कऽ बाबा के गोदी में बैसि गेल बाबा ! खाउँ न भात, किया कनैत छी । हम बडका होएब, खुब कमाएब सबटा ढौवा अहिके देव.....२

इएह बोलि सुनिक दुःखीआ केँ दूनू आँखि के नोर रौदी जेकाँ सुखि गेल जखन देह पकडि हिलबैअ पौता ओ ओहि ठाम लुढैक गेल....२

३० वर्षक बाद सोभिता सेहो बुढ भऽ गेल बेटा आ बापक बीच दुरी बढि गेल गाम में पञ्चायत बैसल पञ्च सब बाजल, बाप अब थलि गेलौ अब तोरे खिआबए पडतौ...२

बेटा राहुल कडैक कऽ बाजल बाबा हमरो बड बुढ छल तहिया अहाँ सभ कता छली जेना बाबा बेटा के छोड़ि परलोक गेलन्हि आई हमहुँ बाप के छोड़ि चलि जाइब....२

नहि हमरा सम्पति चाही नहि चाही ऐहन बाप ई त दुनियाँ के रित छैक जहिना करब ओहिना पाएब....२

संतोष कुमार राय 'चंदू'- जामिया मिल्लिया इस्लामिया,नव दिल्ली-११००२५. सँ एम.ए.,बी.एड,बी.ए., ग्राम-मंगरौना,डाकघर-गोनौली, थाना-अंधराठाढ़ी,जिला-मधुबनी, बिहार,पीन-847401 गिरवी

हमर जिनगी दोसरक हाथ मे अछि, हमर सून्न देह काठ जँका लोथ परल अछि जेना माँसक लोथरा, ई समयक फेरि अछि.

जकरा हाथ मे दम नहि से हाथी कहावति अछि मजबूरी सभहक द्वारि खटकवैत छै, आई हमर तँ काल्हि अहाँक.

टकाक खेल मे बड़ि दाव-पेंच छै, गाड़िक ड्राइवर जँका ध्यान राख' पड़ैत छै, कनिको चूक थाल मे पैर बुझियौ, किएक तँ  मनुक्ख मनुक्ख नहि रहि गेलै.

कारिख सँ दूरि कते दिन भागि सकैत छी, जखन घरे कारिखक यदि बनौल गेल अछि, आत्मा केर कैद करनै नीक नहि, किएक तँ गिरवी देह अछि.

ई हमर अप्रकाशित आओर स्वरचित रचना अछि. कोनहु विवादक स्थिति मे जिम्मेदार हम रहब.

प्रधानमंत्री के छथि?

निक दिन आएत, इ मोनक वहम अछि, सत्ता केर खेल मे , सभहक पाएर मे थाल छन्हि.

बजटक हो- हल्ला, आओर संसद मे बानर नाच, गरीबक पेट पर डाका छियैय, जनता सँ फेर दगाबाजी भएल.

रैला-पर-रैला, जनता सँ  वोट लेबाक रणनीति छियैय, सत्ता-परिवर्तन केर नाम पर ठगि, झूठ केर खेती छियैय...

जनता पिसा रहल छथि, थारी सँ रोटी दूर भ' रहल छै, माय हमरा सँ पुछैत छथि- प्रधानमंत्री के छथि-मोदी वा मनमोहन?

ई हमर मौलिक आओर अप्रकाशित रचना अछि. कोनहु विवादक स्थिति मे एकर जिम्मेदारी हम लैत छी. डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”, ग्राम – रुचौल (दुलारपुर – रुचौल), पो॰- मकरमपुर, जि॰ – दरभंगा पिन - ८४७२३४ ओजोन ओजोन – ओजोन बड्ड सुनै छी, की थिक कने बताउ । सुनलहुँ बहुते किछु नञि बुझलहुँ, हमरो किछु समझाउ ।। एक तत्त्व थिक गैस रूपमे, नाँव जकर ऑक्सीजन । दू परमाणुक युतिक अणु जे, से परिचित ऑक्सीजन । गाछ-बिरिछ सभ जन्तु मनुक्खो, इएह  साँसमे  लैत’छि । गाछ बिरिछ पुनि आन क्रियामे, ऑक्सीजन  छोड़ैत’छि । ऑक्सीजन केर त्रिपरमाणुक, युतिसँ बनल  ओजोन । साँस लेबा केर ऑक्सीजनसँ, बिल्कुल अलग ओजोन । जँ एतबा धरि समझि गेलहुँ, तँऽ  आगू  बात   बढ़ाउ । नञि बुझलहुँ - तँऽ सेहो बाजू, की दिक्कत कतऽ बताउ ।। तापक्रमक घट-बढ़ अनुसारेँ, चारि पड़त वायुमण्डल केर । आन विशिष्ट गुणक आधारेँ, उपविभाग पुनि हर मण्डल केर । पहिल क्षोभ, समताप फेर, आ  मध्य-ताप तेसर-चारिम । समतापक  उपरी सीमा  पर, घटना  एक  घटय  बंकिम । सूर्यकिरण केर एक घटक जे, पराबैगनी  किरण  कहाबय । तकरा अवशोषित कऽ एहि ठाँ, ऑक्सीजन ओजोन बनाबय । ओजोनक  ई  जन्म - प्रक्रिया, सुनि  कऽ ने अनठाउ । ई घटना  नञि थिक  मामूली, मुँहकेँ जुनि  बिचकाउ ।। ई ओजोन रहय ओहि ठाँ, ने  ऊपर – नीचाँ   जाय । पातड़ सन स्तर बनबय, से ओजोन   पड़त   कहाय । छत्ता सन धरती पर तानल, ओ जीवन रक्षक बनइछ । दुष्ट पराबैगनी किरण केर, ई सद्यः  भक्षक बनइछ । टूटय – बनय – पुनः टूटय, ओजोनक अणु  निरन्तर । सन्तुलित निर्माण – ध्वंश, तेँ बुझि ने पड़इछ अन्तर । पराबैगनी  अछि   गुनधुनमे, भीतर  कोना कऽ जाउ । ओजोनक   अभेद्य   दुर्गमे, कोना कऽ सेन्ह लगाउ ।। एतबामे मानव विकाश केर, शंखनाद    सौंसे   भेलै । औद्योगिक विकाशक परचम, ओजोनहु   पर   फहरेलै । सी॰एफ॰सी॰ छल सेनापति, ओ ओजोनक संहार केलक। भूर बना ओजोन पड़तमे, दुष्ट किरणकेँ बाट देलक । पराबैगनी जा धरती पर, डी॰एन॰ए॰ पर घात करय । डी॰एन॰ए॰ गुणसूत्र जीवनक, तकरे संग  उत्पात करय । कर्करोग  त्वक् सँ  सम्बन्धित, बाढ़त  से बुझि जाउ । जल-थल-नभ-ऋतुचक्र एखनुका, बदलत एकदम बाउ ।। जँ भविष्यमे नञि चाही, एहेन सन किछु बदलाव । बन्न करू हर एक घटक,जनि सी॰एफ॰सी॰  सन  भाव । प्रशीतक ए॰सी॰ आ फ्रीज केर, तत्क्षण  बदलल   जाए । प्रणोदक-रॉकेट ईन्धन केर, हो   उपयुक्त   उपाय । एखनहु चेतब तँऽ बर्षो धरि, क्षतिपुर्तिमे     लागत । जँ विलम्ब कनिञो होएत तँऽ, हमसभ होएब अभागल । विकसित राष्ट्र सक्षम अधिभारक, तेँ  अधिभार  उठाउ । अन्य राष्ट्र बिनु मुँह बिचकओने, निज दायित्व निभाउ ।। प्रदूषण प्रकर्षेण दूषित सभ किछु थिक,  अनारोग्य केर जननी । ई दैवक नञि छी प्रकोप, छी मनुक्खक अपनहि करनी ।। कोनहु बस्तु जञो गन्दा भऽ गेल, दूषित ओ कहबैत’छि । प्रकर्षेण मतलब अतिशय अछि, सीमा – हद जनबैत’छि ।। सीमासँ  बेसी  अबाज  जञो,  कहबै  ध्वनिक प्रदूषण । ऊँच सुनब, अनुनाद – नाद, बाधिर्य एकर अछि लक्षण ।। दुषित हवा जञो साँस लेल तँऽ,  साँसक होएत  बेमारी । दमा – एलर्जी  आओर पता  नञि, की – की महामारी ।। दुषित पानि पिउबा सँ जेसब, होइत’छि से बुझले अछि । पेट खड़ाब आ हैजा पेचिश,  सभटा देखले–सुनले अछि ।। मृदा – भूमि  सेहो दूषित भऽ,  बहुते  करैछ  समस्या । कऽलक पानि आ खेतक उपजा, माहुर सनक अभक्ष्या ।। रेडियोधर्मी  अछि पदार्थ जञो, विकिरण करय प्रदूषण । धरा – पानि तँऽ दूषित अछिए, सीधे  मारक  लक्षण ।। एखनहुँ जँ संसार ने चेतत,  बदलत नञि निज करनी । हाथ ने किछु बाँचत भविष्यमे, अपन दशा पर कननी ।। राजीव रंजन मिश्र गजल अपना चरजाकेँ हमरा हिसाब द' दिअ  जतबे पूछय छी ततबे जवाब द' दिअ

सीखू हम्मर वा हमरे सिखा कँ कहू  कोनो कहलौँ जे हमरे खिताब द' दिअ

अपने बूझय छी पढ़ि पढ़ि किताबक गप  फेर हमरा नै फाटल किताब द' दिअ

सुखमय सभदिन ई जीवन अहाँक रहै हमरा भन्ने हे सभटा खराब द' दिअ

नेहक डाहल छी राजीव तैँ तँ कही  राखू सभटा आ अगबे अदाब द' दिअ

२२२२ २२२ १२१ १२ स्व. कविवर सीताराम झाजीक ई गजल जगत मे थाकि जगदम्बे अहिंक पथ आबि बैसल छी हमर क्यौ ने सुनैये हम सभक गुन गाबि बैसल छी न कैलों धर्म सेवा वा न देवाराधने कौखन कुटेबा में छलौं लागल तकर फल पाबि बैसल छी दया स्वातीक घनमाला जकाँ अपनेक भूतल में लगौने आस हम चातक जकां मुँह बाबि बैसल छी कहू की अम्ब अपने सँ फुरैये बात ने किछुओ अपन अपराध सँ चुपकी लगा जी दाबि बैसल छी करै यदि दोष बालक तँ न हो मन रोख माता कैं अहीं विश्वास कैँ केवल हृदय में लाबि बैसल छी एकर बहर अछि-1222-1222-1222-1222 मने बहरे हजज  1928मे प्रकाशित कविवर सीताराम झा जीक " सूक्ति सुधा ( प्रथम बिंदु )मे संग्रहीत गजल जे की वस्तुतः " भक्ति गजल " अछि। विदेह सदेह:१६|| 727 726 || विदेह सदेह:१६

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