ISSN 2229-547X विदेह सदेह -१७ (विदेह-सदेह १७, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक १६९-१९०) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रतिएवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html, http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि,'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्य : भा. रू. २५००/- संस्करण: २०१५, २०२२ Videha Sadeha 17: A Collection of Maithili Prose and Verse (source:Videha e-journal issues 169-190 at www.videha.co.in). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-९८९) गजेन्द्र ठाकुर- अन्हारक विरोध मे: अरविन्द ठाकुर, संपादकीय (पृ. २-२०) ओम प्रकाश झा- काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ आ मैथिली गजल, बहुरूपिया रचनामे (पृ. २१-२९) आशीष चमन- अन्हारक विरोध मे अरविन्द ठाकुर (पृ. ३०-४१) डा योगानन्द झा- अन्हारक विरोधमे: एक दृष्टि (पृ. ४२-५१) जगदीश चंद्र ठाकुर"अनिल"- अरविन्दजीक आजाद गजल (पृ. ५२-५५) योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’- अन्हारक रखवार, एकैसम शताब्दी मे घसल अठन्नीक प्रासंगिकता, जमाना जमानाक स्टाइल, उचित जगह (पृ. ५६-६५) चंद्र मोहन झा पड़वा- अरविन्द ठाकुर आ मिथिला आवाज (पृ. ६६-६८) अरविन्द मिश्र नीरज- अरविन्द ठाकुर: व्यक्तित्व आ कृतित्व (पृ. ६९-७५) अरविंद श्रीवास्तव- सामंती सभहँक विरुद्ध तैयार कवि (पृ. ७६-७८) परमानन्द प्रभाकर- स्खलनक प्रतिरोधमे -अन्हारक विरोधमे (पृ. ७९-८४) राम चैतन्य धीरज- बहुरुपिया प्रदेश मे: एक दृष्टि (पृ. ८५-९१) डॉ. शंभु कुमार सिंह- घसल अठन्नी: एकटा विमर्श (पृ. ९२-९७) विनीत उत्पल- मैथिलीक विद्रोही कवि: काशीकांत मिश्र मधुप, मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल, मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल), “रेहनपर रग्घू”- श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद श्री विनीत उत्पल) (पृ. ९८-५४३) केदार कानन- मधुपक रचना-व्यक्तित्व (पृ. ५४४-५४८) कर्नल (डाक्टर ) कीर्तिनाथ झा- मधुपजी हमरा किएक मन पडैत छथि (पृ. ५४९- ५५०) जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- मधुपक गीत अमर,मिथिलामे (प्. ५५१-५५७) डॉ. अरुण कुमार सिंह- मधुपजीक ‘घसल अठन्नी’मे दलित चेतना (पृ. ५५८-५६३) आशीष अनचिन्हार- नियंत्रित पूँजी आ मधुपजीक मार्क्सवाद, मेक इन मिथिला, फर्क, लिटरेचर फेस्टीभल,- “प्र.म” (पृ. ५६४-५८७) डॉ. अजीत मिश्र- अर्पण-तर्पण-समर्पण (पृ. ५८८-५८९) फागुलाल साहु- मानव जीवनमे नारी स्वरूपक गरिमा, माइक डाँट, मर्दानी नारी, आत्म निर्भरता लेल कोनो उमेर नै, चतुर बालक (पृ. ५९०-६०८) राम विलास साहु- स्कूलक खिचड़ी, इमानदारीक पाठ, बौआ बाजल, घूसहा घर, जातिक भोज, ई छी हमर मजबूरी, अबिसवास, गंगा नहाएब, डोमक आगि, स्वर्गक सुख, मिथिलाक माटिमे पसरल कहबी (संकलनकर्ता- राम विलास साहु) (पृ. ६०९-६३७) ललन कुमार कामत- भगवाने भरोसे, दहेजक मारि, भोला, अप्पन माए-बाप, दस हजरिया नोट (लोक कथाक पुनर्लेखन), लगन (पृ. ६३८-६७३) डॉ. श्रीमोहन झा- मिथिलाक इतिहास (६७४-६८५) डा. शिव कुमार प्रसाद- बनमानुष, जमीला (६८६-७०४) प्रणव झा- अंबर, तेसर प्रण, अपन अपन धर्म (संस्मरण) (पृ. ७०५-७१५) नन्द विलास राय- दिव्या, सभसँ बड़का भीआइपी गेस्ट (पृ. ७१६-७३७) अब्दुर रज्जाक- गामक चौबटिया पर, रौदी परल अछि (पृ. ७३८-७४१) विन्देश्वर ठाकुर- बेलहाबालीके जितिया, आसे आसमे जिनगी (पृ. ७४२-७४४) राजदेव मण्डल- डरक नदी, पंचैती- (लघु पटकथा), लाज (एकांकी) (पृ. ७४५-७८२) डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- गामक शकल सूरत – पोथी समीक्षा (पृ. ७८३-७८९) राजदेव मण्डल ‘रमण’- दियादी डाह (पृ. ७९०-७९६) राजेन्द्र कुमार प्रधान- जगदीश प्रसाद मण्डलक उपन्यासमे समकालीन चेतना,२१म शताब्दीक पहिल दशकक मैथिली उपन्यासमे राजनीतिक चेतना (प्. ७९७-८०७) पंकज कुमार प्रभाकर- समकालीन चेतनाक सम्वाहक :: अर्द्धांगिनी (पृ. ८०८-८१३) पल्लवी- चोरविद्या, फ्रेण्ड (पृ. ८१४-८१५) पूनम मण्डल- रिपोर्ट-- सगर राति दीप जरल (पृ. ८१६-८२५) मुन्नाजी- जन-चेतनाक स्वर वाहक मधुप, परती टूटि गेलै, अरविन्द ठाकुरजी संग साक्षात्कार आन-लाइन (पृ. ८२६-८५८) अरविन्द ठाकुरजीक नामसँ किछु पत्र (चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’, नारायण जी, प्रमोद कुमार झा) (पृ. ८५९-८६१) शैलेन्द्र आनंद- हाली-हाली बहथु कोसी (पृ. ८६२-८६७) मिथिलेश कुमार राय- अरविन्द ठाकुरः अन्हारक विरोधी व्यक्तित्व (प्. ८६८-८७०) अजित आजाद- अरविंद ठाकुरः हमरामे अहाँ, अहाँमे हम (पृ. ८७१-८७७) लक्ष्मण झा सागर- जेहने खोजलऽ हौ कुटुम्ब (पृ. ८७८-८८१) रजनीश कुमार तिवारी (मुन्ना)- अद्वितीय छथि हमर अरविन्द बाबा (पृ. ८८२-८९०) अरविन्द ठाकुर- बुल्लियाँ की जाणां मैं कौन (अपनाकें खोजैत किछु अप्पन बात), बात निकलल, कुठाम तक पहुँचल- एकटा बहु-अर्थी निरर्थक चलभाष–वार्ता सुकांत सोमजीक संग, संस्मरण- बाबा सँ पहिल आ अंतिम भेंट:बाबाक विराट स्मृति-पटल, जीवकान्त : किछु स्मृति, किछु टिप्पणी, मिथिलाक संस्कृति:किछु अप्रिय बिन्दु, मिथिला मे सांस्कृतिक आन्दोलनक भविष्य, लक्ष्मीनाथ गोसांई: परम्परा, भाषा आ निर्गुण भाव, एकटा खिच्चा सपनाक डिभिआएब (सन्दर्भ: हीरेन्द्र कुमार झाक कथा-संग्रह “ ट्रान्सफर्मर “),किछु विहनि कथा (सत्ता-चरित, स्वयंभू , दुर्गन्ध, यूटोपिया, आदान-प्रदान, अहिंसा) (पृ. ८९१-९८९) पद्य- खण्ड (पृ. ९९०-१२२०) मधुप- किछु कविता, गजल, गीत आ दोहा... (प्. ९९१-१०२५) आशीष अनचिन्हार- किछु बाल गजल, भक्ति गजल, किछु गजल (पृ. १०२६०१०३७) जगदानन्द झा 'मनु'- बाल गजल, गजल (पृ. १०३८-१०३९) उमेश मण्डल- अछि मुदा सबहक एक, भारत हमर पहिचान छी (पृ. १०४०-१०४३) बिनीत कुमार ठाकुर- कवि बनाम नेता, पार लगाउ, कखन ई ठंडी जाय, अपनेमे किए लड़ै छी़? (पृ. १०४४-१०५०) गौरीशंकर साह- क्षणिका (पृ. १०५१-१०५२) डॉ॰ शशिधर कुमर“विदेह”- मैथिली वर्णमाला, भेटत मजूर कतऽ - मिथिलाकेर बच्चा, हम आ मैथिली, खैनी, लेखन कमजोर नञि जँ मैथिली लिखैत छी, समाज आ विरोधाभास, हे दैव ! किछु तोँहीं कहह,बनल मधेश मसान छै, उठाऊ लेखनी लीखू अहाँ,ओ अहाँ लिखू जे नञि लिखलन्हि, माघ, फागुनक पानि, ओ कहलन्हि, मैट्रिकक तैय्यारी, चन्दाक धन्धा, ककरा नीक लागए की, पूछू ओकरा सँ, नटवरलाल (पृ. १०५३-११०६) विजयनाथ झा- नव वर्षक एहि मधुर पहरमे, हमर नाम परिचय सादर सुरत हम, चेतना केर नव सृजनमे (पृ. ११०७-१११०) रमेश- महा-विस्फोटक महा-प्रयोग- (दीर्घ गद्य कविता) (पृ. ११११-११२२) सुकोसुत शिशिर- मोन विकल, पड़िकल जम (पृ. ११२३-११२६) प्रणव झा- हे 'मिथिलानी' आब जागु अहूँ, अकांड तांडव, बोर्ड परीक्षा (बाल कविता) (पृ. ११२७-११३२) राजदेव मण्डल ‘रमण’- जुरमाना करैए... (पृ. ११३३-११३४) किशन कारीगर- गजल सन किछु (पृ. ११३५-११३६) अशरफ राईन- गजल (पृ. ११३७-११३७) डॉ. उमा शंकर चौधरी- दू आखर (पृ. ११३८-११३८) चित्रा अंशु- अस्तित्वकेँ चिन्हू (पृ. ११३९-११३९) बीणा प्रसाद- निर्मलीक गीत (पृ. ११४०-११४०) राम विलास साहु- किछु टनका (पृ. ११४१-११५८) राजदेव मण्डल- व्यथित तरू, हेरा गेल (पृ. ११५९-११६२) डा. शिव कुमार प्रसाद- निर्मलीक निर्मलतामे , तैं किछु ने किछु लिखैत जाउ, बौआ केर उबटन, शहर ओ गेल...... , खेबैया, माय हमर नव कुम्भ नहेली ,देख एलौं हम पटना (पृ. ११६३-११७२) संजय कुमार झा "नागदह"- खैर, छोड़ू, भेटल?, छी कोन अपने जाति विशेष ? (प्. ११७३-११८१) ओम प्रकाश झा- किछु गजल (पृ. ११८२-११८४) महेश डखरामी- कोनादइन, महेश मञ्जरी (पृ. ११८५-११८७) गणेश मैथिल- हे ! हे!! हे!!! (पृ. ११८८-११८८) संतोष कुमार झा- सिक्की शिल्प-कला (पृ. ११८९-११९१) अरविन्द ठाकुर- सुनू जयद्रथ ! , दू मित्र, हम हत्या करए चाहए छी,हलफनामा, स्मृति मित्र अछि, किछु आजाद गजल, टिमटिम (पृ. ११९२-१२२०) 2
गद्य खण्ड गजेन्द्र ठाकुर अन्हारक विरोध मे: अरविन्द ठाकुर अरविन्द ठाकुर -अन्हारक विरोध मे -क समर्पण काल- अपन कुलदेवी काली बन्नीक स्मरण करै छथि। गोरैया बहिन बन्दी (बन्नी) क पूजा केने रहथि, बन्नी वाकदेवी छथि, सुवर्णमय छथि, पुरुषोचित खड़ाम पहिरै छथि, छड़ी राखै छथि (खड़ाम आ छड़ी दुनू सोनाक)। हिनकर जनम रविकेँ भेल छलनि, तेँ छठिहारी शुक्रकेँ भेलन्हि। ओ काली जकाँ कखनो काल रक्त स्नान सेहो करै छथि तेँ हुनका काली बन्नी सेहो कहल जाइ छन्हि। अरविन्द ठाकुर ऐ लघुकथा संग्रहक आरम्भमे जाँ जेने [Jean Genet (1910–1986)] आ अंतोन चेखव [Anton Chekhov (1860-1904)] क एक-एकटा उद्धरण रखै छथि। जाँ जेने एकटा वैश्याक पुत्र रहथि, एक सालक जखन ओ रहथि तँ एकटा काष्ठकार परिवार हुनका गोद लऽ लेलकन्हि। शुरूमे ओ घरसँ भागि गेल करथि आ छोट-मोट चोरि करथि, फेर ओ लिखनाइ शुरू केलन्हि आ निबन्ध, कविता, उपन्यास, नाटक आदि लिखलन्हि। ओ अपन उपन्यासमे समलैंगिक सम्बन्धक संग, कुरूपतामे सौन्दर्य, अपराधीक चरित्रगत विशेषताक चर्च करै छथि, संगे ओ अपन नाटकमे सभ तरहक बहिष्कृत वर्ग आ ओकर शोषकक विश्लेषण करै छथि। जाँ जेनेक रचनाक जाँ पौल सार्त्र अस्तित्ववादी समीक्षा आ जेक्स देरीदा विखण्डनात्मक विधिसँ समीक्षा केलन्हि। अंतोन चेखवक लेखनी हुनका मरलाक बाद अभूतपूर्व रूपमे प्रसिद्ध भेल, तकर ओ जिबैत जी अनुमान नै लगा सकला। हुनका लागै छलन्हि जे हुनकर रचना हुनका मरलाक एकाध बर्खे धरि पढ़ल जाएत। जाँ जेनेक अरविन्द ठाकुर द्वारा उद्घृत कथन- “हम अपन भाषामे एतेक विविध रूपाकारक सृजन ऐ लेल कऽ सकलौं जे हमरा अपन भाषासँ घृणा छल।” -एकटा यायावरक उक्ति अछि। हुनकर अपराधक क्षमा याचना, जे फ्रेंच राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत भेल, पाब्लो पिकासो आ सार्त्र सहित बहुत गोटे द्वारा देल गेल छल। जाँ जेने अपन आत्म चरित्रमे अपन नेनपनक दुखद स्थितिक चर्च करै छथि, मुदा ई ओ अपन अपराधी चरित्रक रक्षार्थ करै छथि, ओ रक्षात्मक ढाल हुनकर ऐ कथनमे सेहो अबै छन्हि। अत्यधिक घृणा प्रेमक दोसर रूप तँ नै अछि जे धैन सन सँ विपरीत अछि, आ अरविन्द ठाकुर अन्हारक विरोध मे क विरोध ओइ अतिशय घृणा जे प्रेमक दोसर रूप अछि आ धैन सन सँ विपरीत अछि, क प्रतीक तँ नै अछि!- से आगाँ देखब। अंतोन चेखवक अरविन्द ठाकुर द्वारा उद्घृत कथन- “हमरा ओइ सगर लोकसभसँ बेसी भय लगैत अछि जे हमर कथा सभकेँ लोकप्रिय आ प्रचलित मान्यताक कसबट्टीपर परखबाक प्रयास करै छथि वा ओइमे कोनो प्रकारक सैद्धान्तिकता खोजबाक प्रयास करै छथि। ने तँ हम रुढ़िवादी छी, ने उदारवादी आ ने विकासवादी। हम कोनो पादरी, उपदेशक वा निरपेक्ष व्यक्ति हेबाक स्वांग सेहो नै भरि सकै छी। हम एकटा स्वतंत्र लेखक छी आ स्वतंत्र लेखक बनल रहब टा हमर अभिलाषा अछि। हमरा लेल मनुष्यक देह, ओकर बुद्धि, ओकर ज्ञान, ओकर आशा-निराशा, ओकर प्रेम, सभ किछु पवित्र अछि मुदा ऐ सभसँ बेशी आदरणीय अछि ओकर स्वतंत्रता, जे झूठ, अहंकार, ढोंग आ क्रूरतासँ मुक्त अछि।” -आ तेँ ओ अपन भाए द्वारा अपन पत्नी संग कएल क्रूरताक विरोध करै छथि कारण से हुनका अपन पिता द्वारा (जे एकटा किरानाक दोकान चलबै छला) अपन माता (जे भरि रूस घूमि कऽ कपड़ा बेचैबला व्यापारीक पुत्री छली आ बड़का खिस्सा कहबैका छली) पर कएल क्रूरताक स्मरण करबै छल। से अरविन्द ठाकुर अपन लघुकथा सभकेँ लोकप्रिय आ प्रचलित मान्यताक कसबट्टीपर नै कसल जेबाक पक्षमे छथि। जाँ जेने आ अंतोन चेखव ऐ तरहेँ परस्पर विरोधी मान्यताक अनुगामी छथि! आ अरविन्द ठाकुर ऐ दुनू प्रतिगामी मान्यताक अनुगामी बनि लघुकथा रचै छथि। खिस्सा सियार यार क समर्थक, विरोधी आ मनबढ़ू शब्दावली लोकतांत्रिक राजनीतिक यथार्थक विवरण दैत अछि, एक्के व्यक्ति कोना क्रमसँ पूजित, घृणित आ हास्यरसिक भऽ जाइ छथि। प्लेटो लिखने छथि जे पढ़ल लिखल लोक राजनीतिसँ दूर रहै छथि, एकर सजा हुनका यएह छन्हि जे ओ मूर्ख द्वारा शासित होथि। नीक, अधलाक बीच रामसोगारथ मण्डलक आदर्श अडिग अछि। पियासल पानि: नारायणपुरवाली क्षणिक आवेशमे सूत्रधारक चुम्बन करै छथि। कथामे ट्विस्ट छै, लगैए ओकरे दोख छै, ओकर पति लखनाक नै। ओकरा बच्चा नै होइ छै, भगतैक बाद ओ भागि जाइ छै। मुदा लखनाक दोसर बियाह ओकर बाप रामचरण करा दै छै, ओकरा होनिहारी छै, लखना बाहर गेल छै, घुरतै तँ बताह भऽ जेतै। मुदा घुरलै तँ ओ सत्ते बताह भऽ गेलै, ओ कहै छै जे ओकर ई बच्चा नै छिऐ। तँ नारायणपुरवाली… सूत्रधार आ रामचरन दुनूकेँ आब बुझेलै जे ओ बेकसूर छलै। भाव, प्रेम आ चरित्रक मान्य शब्दावलीकेँ तोड़ैत अछि ई कथा। चारित्रिक अवधारणा कखनो काल सापेक्ष भऽ जाइ छै, खास कऽ तखन जखन चरित्र महिलाक हुअए। अन्हारक विरोध मे : टाइटल कथा। अलीमुद्दीन अपन टोलमे अपन हिन्दू यारक भाइकेँ मारल जेबापर लज्जित अछि, हबोढकार भऽ कानऽ लगैत अछि। शाहबाज हुसैन, जे सुपौलसँ छथि आ आइ काल्हि भागलपुरसँ सांसद छथि, क एकटा भाषण सुनने रही, ओ कहैत रहथि जे सुपौले एकटा एहेन शहर अछि जतऽ गाइ केर वध नै कएल जाइ छै कारण मुस्लिम समुदाय ओतऽ कहियो कसाइखाना नै खुगऽ देलकै। अरविन्द ठाकुरक ई लघुकथा पढ़ि अनायास ओ गप मोन पड़ि गेल जे ऐ लघुकथाक सफलता सिद्ध करैए। ढाँचा-१९९२- पत्र-शैलीमे लिखल ई लघुकथा। अग्निपुष्पक पत्रिकामे गुजरात दंगापर लिखबापर वर्माजीकेँ कबिलपुरक (जे आब साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य छथि) जातिवादी लेखकक गारियुक्त पत्र प्राप्त भेलन्हि, ऐ वातावरणमे अरविन्द ठाकुर, समधानि कऽ, ई लघुकथा लिखने छथि। ढेर रास एम्हर-ओम्हरक गपक बाद क्लाइमेक्समे ढाँचा-१९९२ खसबाक खबरि टी.वी.सँ बहराइत अछि। मूस: मूस मारबाक दवाइ भरि महाराष्ट्रमे अहाँकेँ नै भेटत, जखन प्लेग आएल रहै तहियो नै भेटैत रहै। ओतऽ गणपति बप्पाक ई वाहन पूजनीय अछि। मुदा ऐ कथाक “ओ” महाराष्ट्रमे नै रहैए। आइ साँझमे ओ मूस मारबाक दवाइ आनत। मूसक बहन्ने मनोविश्लेषण करैत ई कथा आगाँ बढ़ैए। प्रजातंत्र परिकथा: एकटा हत्या भेलै। ई छपलै। ओ डॉक्टर छलै, ओकर हत्या भेलै, ओ डॉक्टर बड्ड मामूली फीस लै छलै, गरीबक डॉक्टर नामसँ ओ ख्यात छलै, से किए नै छपलै? ओइ पत्रकारक असली रूप बुझल छै कमलकेँ। फणीश्वर नाथ रेणुक परती परिकथा क तर्जपर प्रजातंत्र परिकथा बहुत रास प्रजातांत्रिक (!!) कथाक कथा सोझाँ अनैए। ई ऐ संग्रहक सभसँ पैघ लघुकथा अछि, जइमे कोनो घटनाक राजनैतिक लाभ उठेबाक मानसिकताक सूक्ष्म विवरण भेल अछि। तइयो बात खतम नै भेलै, शुरुहो नै भेलै। अथ गिरगिट कथा: गिरगिट रङ बदलबा लेल ख्यात अछि, मुदा जखन मनुक्ख रङ बदलैए तँ गिरगिटो लजा जाइए। पोद्दारजी आ जयसवाल जीक गैंग वार कोना एक दोसराक कम्यूनिटीक वोट बैंक राजनीति बनि गेल, तकर कथा अछि ई, एक गोटे चेयरमैन आ दोसर वाइस चेयरमैन बनि गेला आ नग्रमे पूर्ण शान्ति अछि। कारण अशान्ति हिनके दुनुक कारण छल!! अय्यासी: सूत्रधार “ओ” छथि, ओ घर घुरला, पत्रिका, सिकरेटमे पाइ खर्च केलन्हि मुदा घरक लेल तरकारी आ बेटाक किताब कॉपी नै कीनि सकला। अय्यासीक अनुभव आ परिभाषा ताकि रहल अछि ई कथा। बैकबा-फोड़बा: बैकवर्ड आ फॉर्वर्डक राजनीतिक कथा अछि ई। जखन एकटा बभना उधारी ओसूलीले जाइए तँ से स्वार्थवश बैकवर्ड आ फॉर्वर्डक राजनीति बनि जाइए। मूल समाचार, घटना आ झलकी (दृश्य एक-चारि) मे बँटल ई लघुकथा मैथिली लघुकथाक शिल्प आ कथाक संघर्ष सेहो देखबैत अछि। झलकी दृश्य चारिमे बाल नाटकक बहन्ने कथाकार पूर्ण घटनाक दऽ दै छथि, ई बच्चा सभक बैकबा-फोड़बा खेला बनि गेल अछि। विष-पान: कचहरीक विवरण आ न्यायपालिकाक क्रिया-प्रक्रियाक विश्लेषण अछि ई कथा। तारीख, मेडिकल एक्स-रे गाएब हएब, मोकदमाक सुनबाइ, दोसर कोर्टमे केसक ट्रांसफर… आ सभ किछु। अन्हारक विरोध मे लघु कथा संग्रह अपन विषय-वस्तु, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण आ शिल्पगत प्रयोग लेल मोन राखल जाएत। चाहे ई खिस्सा सियार यारक तीन तरहक शब्दावली हुअए बा बैकबा-फोड़बाक तीन भागमे कथाकेँ बाँटब आ तेसर भागकेँ चारि भागमे बाँटब, आ चारिम भागकेँ लोक सभटा बुझैए, ऐ तरहेँ बुझेबाले बाल नाटक-खेलामे परिवर्तित करब। चाहे ई ढाँचा-१९९२ क पत्रात्मक शैली हुअए बा मूसक मनोविश्लेषणात्मक पद्धति। आकि प्रजातंत्र परिकथाक एकटा न्यूजपेपर रिपोर्ट आधारित कथा। शिल्प आ कथ्यक मेलक ई प्रयोग, नव विषय-वस्तु आन लघुकथा लेखककेँ सेहो प्रयोग करबाक चाही। अन्हारक विरोधमे अरविन्द ठाकुर अरविन्द ठाकुर(१९५४- ) एहन कथाकार छथि जे कनियाँ काकी आ बुच्ची दाइसँ हटि कऽ मैथिलीमे लघुकथा लिखै छथि। अरविन्द ठाकुरक सशक्त पक्ष छन्हि राजनैतिक-आर्थिक लघुकथा सभ। मैथिली कथाक जड़ता कम होइत अछि। सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक कथा तत्वकेँ जोड़ि कऽ लिखल ई मैथिली लघुकथा सभ ढेर रास रिक्तताक पूर्ति करैत अछि। समाज-राजनीति, ब्यूरोक्रेसी-जूडिसियरी सभक साङोपाङ विवेचन भेल अछि। अन्हारक विरोधमे खिस्सा सियार-यार- रामनारायण महराज-एक्स एम.एल.ए. आ भूतपूर्व चेयरमैन सरकारी प्रकाशन कमिटी, तहिया कोनो घोटालामे मुख्यमंत्रीक भाइ रामाधार पांडे, एम.एल.ए. हिनका बचेने रहथिन्ह। गरीबदास आजाद जिला कमिटीक महामंत्री, अनेक बर्ख धरि सोशलिस्ट आ आब महासभा पार्टीमे, बेटा सेहो ट्रेनमे डकैती धरि करऽ लागल छन्हि। शालिगराम राय आ लखन यादव- मनबढ़ू सभ। मीटिंग। राजनाथ झा आ जीबछ मंडलक मुँहे राजनीतिपर किछु पैराग्राफ अबैत अछि। सदानन्द विद्रोही महासभापार्टीक विरोधी दलक स्वयंभू नेता तोफान सिंहक शागिर्द आ हुनका संग एकटा बम विस्फोटमे दहिना हाथ गमेने एकटा जुआन। हुनकर अफसोच करब, रघुबंश मंडलक जिला कमिटीक भाइस प्रेसिडेन्ट बनबामे पांडेजीक दाँव- बैकवार्डकेँ जगह भेटबाक चाही, आ चौधरीजीक प्रतिष्ठाकेँ देखि हुनकर चुप भऽ जाएब! राजमंगल श्रीवास्तव आ सतीश सिंह परमार (छत्तीस बाबू छत्री- मनबढ़ू शब्दावली)। एकावन गोट मेम्बरबला संस्था धेला कमिटीक सर्वेसर्वा परमारजी। श्रीवास्तव आ परमारक जोड़ी कुख्यात- अलग-अलग रहलापर दुनू गोटे एक दोसराकेँ गारि पढ़ै छथि मुदा रहै छथि संगे। पूर्व प्रखण्ड अध्यक्ष शनिचर “शनि” गाजा आदिक अनवरत सेवी आ वर्तमान युवा अध्यक्ष गणेश गुरमैता पेटीशनबाज। चटर्जी दा- पटनासँ फोनपर रहै छथि- चौधरीजी आ पांडेजीक विरोधमे चौबेजीक संगे फ्रंटक नियार छन्हि। शनि-गुरमैताकेँ परमार गपमे ओझरा लै छन्हि तँ क्यो गोटे दुनू गोटेकेँ फुसियाहीं कऽ सोर करै छन्हि आ त्राण दियाबै छन्हि। जटाशंकर मलिक प्रसिद्ध माखन बाबू (सभ नट वोल्टपर फिट हुअएबला सलाइ-रिंच- मनबढ़ू शब्दावली)। अपनापर ध्यान आकर्षित करबा लेल पारसमणि चौधरीकेँ सोर करै छथि आ हुनकर प्रणामक उत्तर तीन प्रणामसँ दै छथि। हुनकर कार बेटा बौका बाबू (सम्प्रदायवादी पार्टीक मेम्बर) लऽ गेल छन्हि आ जीप खराप छन्हि, दुसधटोली बलाक पंचैती करबाक छलन्हि से रिक्शा मँगबाबऽ पड़लन्हि। च्यवनप्राश खाइते रहै छथि- राघोपुरसँ होमियोपैथिक इलाज करेने छथि। सीता बाबू महासभा पार्टीक प्रखण्ड अध्यक्ष (माखन बाबूक बहु- मनबढ़ू शब्दावली)।सुबोधनारायण सिंह प्रसिद्ध सुबोधजी। एक्स.एम.एल.ए. आ एक्स अध्यक्ष जिला महासभा पार्टी (समर्थक शब्दावली- जिलाक गाँधी, विरोधी शब्दावली- नटवरलाल आ मनबढ़ू शब्दावली- मुँहदुबरा)। सादगी रहन-सहन, विनम्र। रामाधार पांडेजीक भाए मुख्यमंत्री शिवाधार पांडेक प्रति समर्पित। मुदा चौधरीजीसँ बेसी सटबाक सजा शिवाधारजी हिनका पार्टीक उम्मीदबारी वापस लेबा लेल कहि कऽ देलखिन्ह। राजीव शर्मा-गलतफहमीक शिकार- जे छल-प्रपंच, फूसि आ विश्वासघातक बिना सेहो राजनीति कएल जा सकैत अछि। ठाँइ-पठाँइ बजै छथि आ से मनबढ़ू सभ कटाह कहै छन्हि। सुबोधजीक कहलापर जे शिवाधार बाबूक फोन एलन्हि तेँ हुनका नाम आपिस करऽ पड़लन्हि, ओ कहै छथि जे ऐ लुच्चा-लफंगा सभक सरदरबाक गोल्हड़ी झाड़ि देबनि हमरा सभ। ओतै रामसोगारथ मंडल सेहो छथि, स्वतंत्रता सेनानी मुदा सम्मान-पेंशन अस्वीकार कऽ चुकल छथि। कियो कहै छन्हि तँ कहै छथिन्ह जे जाउ बाउ जाउ, ई गप सुन्नर ठाकुरकेँ सिखेबन्हि जे मुनिस्टर सभक केश-दाढ़ी बनबैत सुराजी पेंशन हथिआ नेने-ए। आ तखने अनघोल, फेर बाजी मारि लेलन्हि चमोक्कनि! आ माखन बाबू बड़का गाड़ीसँ उतरैत रामाधार पांडेक गरामे माला पहिरा दै छथि। फेर एकाएकी माला पहिरेबाक चलन आ फेर एकाएकी भाषण-भाख। आ ओम्हर रामसोगारथ मंडलक सपनामे कारी-कारी भयावह आकृति सोनहुला सपनाकेँ चारू कातसँ घेरि लै छन्हि। पियासल पानि- रामचरनक खेती करब, आब हरबाही मुदा ओकर बेटा लखनाक माथपर छै आ तखने ओकर गौना होइ छै आ अबैए नारायणपुरवाली। लेखक वा कथाक सूत्रधार कनियाँक मुँहदेखाइ लेल जाइ छथि आ देखै छथि ओकर अपार रूप-राशि। लखनाक काकी बेरियाबाली ठट्ठा करै छन्हि आ ओ बहार भऽ जाइ छथि। नारायणपुरबाली एक दिन सूत्रधारक पएर जाँतऽ लगै छथि। रोपनी, डोभनी, कटनी आ कमौनी, कोनो काजमे नारायणपुरवालीक जोड़ नै। एक दिन अन्हरगरे सूत्रधार खेतमे कटनी करबऽ बिदा होइ छथि तँ आमक कलम लग नारायणपुरवालीक आतुर ठोर हुनकर गाल, माथ आ कंठपर निशान छोड़ि दै छन्हि। मुदा तखने घरैया नोकर सरजुगबाक अबाज अन्हारसँ अबै अछि आ बज्जर खसाबथुन भगवान ऐ दुसमनमापर- कहैत निराशा, लालसा आ घृणासँ कुंडाबोर नारायणपुरबाली आगाँ बढ़ि जाइ छथि। ओम्हर नारायणपुरवालीपर डाकनी सवार छै से घोल होइए, देहपरक कपड़ा-बस्तर ओ फेकि लैए। मोतिया दुसाध दारू पिबैए, बरहम बाबाक परसादी आ फेर भगता बनि सात टा काँच करची नारायणपुरवालीक देहपर तोड़ि दैत अछि। आ डाकनीकेँ हरदुआरक श्मशान पीपर गाछपर भगा दैत अछि! भागि जाइए नारायणपुरवाली। दोसर बेर लखनाक बियाह होइ छै मुदा ऐबेर सूत्रधार एगारह गो टका अनका दिया पठा दै छथि। कनियाँक होनहारिक खबरि सुनि रामचरन प्रसन्न भेल मुदा लखना अपन कपार फोड़ि लैत अछि, कारण ओ नामरद अछि। नारायणपुरवाली... लछमी छलै, बेकसूर, बेचारी, अभागलि। अन्हारक विरोधमे- हो हल्ला। कथाकार वा सूत्रधार बहराइ छथि आ पहुँचै छथि अलाउद्दीन लग। कहै छन्हि अलाउद्दीन, मुसलमान कुजड़ा। जनारदन चौधरी ओकर यार। ओकरे टोलमे बिकुआ ओकर ऐ यारक भाइकेँ गारि पढ़लकै। ओकर बेहुदपनीक शिकाइत लऽ कऽ जनारदनक भाइक आएब, भैया कहि सोर पारब, मुदा तखने बिकुआक मारब आ तखने ओकर घरक मौगी सभक ओकरा गारि पढ़ब शुरू भेलै। आ उनटे हिन्दू-मुसलमानक शगूफा सेहो छोड़ै रहै। कोन इज्जति रहि गेलै ऐ टोलक। आकि तखने, चारू दिस अपन डराओन छाँह पसारने अन्हारक छातीकेँ चीरैत बिजलीक जगमग इजोत दूर-दूर धरि पसरि गेल। ढाँचा-१९९२- कथाक सूत्रधारक चिट्ठी। स्वीकारोक्ति जे, जे किछु लिखा गेल छन्हि से वातावरणक दवाबमे। हालेमे जॉन्डिस भेल छलन्हि, जीहकेँ रास लगा कऽ पड़ल छला। रौद, गरदा आ धुँआसँ अकच्छ छथि। एकटा आर विचित्र बेमारी, देहमे तेज हउहटि आ चमरापर नहुँ-नहुँ चकत्ता उभरऽ लगै छन्हि। एक दिन सहरसासँ घुरै छला आकि स्कूटर खराप भऽ गेलन्हि। मिस्त्री आधा घंटामे स्कूटर ठीक करबाक गप कहलकन्हि मुदा पाट-पुरजा खोलि कऽ छिड़िया देलकन्हि आ चारि घंटा लगलन्हि। सुपौल घुरि डॉ. दासक क्लिनिक गेला, होमियोपैथिक दवाइक बुन्न असरि केलकन्हि मुदा घंटा लागि गेलन्हि। एक बेर सासुरसँ घुरै काल सेहो एहिना भेलन्हि। एक तँ पत्नीसँ बिछोह आ दोसर हाड़ कंपकपाबय बला ठार आ सिहकैत हबा! गोष्ठी, प्रो. राजेन्द्र, डॉ मुखर्जी आ के.के.इन्स्टीट्यूट ऑफ मैडोलॉजीक प्रिंसिपल झा। प्रो. राजेन्द्रक डॉ मुखर्जीसँ कहलापर जे इलाजक फीस पाँच टका तँ दऽ देब मुदा दबाइ देबऽ पड़त मुफ्तिया, फिजिशियन सैम्पल। तइपर मुखर्जीक कहब जे मेडिकल रिप्रेसेन्टेटिव सभ हुनका घासो नै दै छन्हि आ ऐ लेल तँ डॉ. दास लग जाए पड़त। फेर अयोध्यामे बाबरी मस्जिदक ढाँचाक ध्वस्त हएब। सूत्रधारक देहक कँपकँपी, हउहटि, चकता आ सूजन फेरसँ। कोनो प्रत्यक्ष कारण नै रहए एकर, मुदा तैयो हुनकर देह एकरा भोगने छलन्हि। मूस- ओ आ ओकर दवाइक दोकान। नवका ड्रग इंस्पेक्टर ऐ दुर्गा पूजामे पाँच सए टाका सलामी लऽ गेलै। दोकान थसे जकाँ लेने छै। अनुज बैसै छै दोकानपर। भुमिहार पेंच भिड़ाओत आकि दोकान करत! बैंकक पुरना लोन, घरक पाँच सालक बिजलीक बिल।.. जेठका सार नागपुरमे एकाउन्टेन्ट छै, सनगर नोकरी आ सेहन्तगर कनियाँ छै। जे ओ जादूगर रहैत आ तखन गिली-गिली फू आ अलाउद्दीनक चिराग जे रहितै ओकरा हाथमे तखन! मुसबा तँ परेशान केने छै, खाइतो काल, मुदा एखन ओकरा एक्को रत्ती तामस नै उठै छै। ई शहर अनुमण्डलसँ जिला मुख्यालय भऽ गेल छै, जमीनक दाम बढ़ि गेल छै। जमीन बेचि सभटा कर्जा-बर्जा सधा देत। निन्नक बदलामे पारदर्शी बुनबुना आ विभिन्न आकृतिक आ रूपक मूस, कुतरैत, लड़ैत, नचैत, प्रेम करैत, पोथी पढ़ैत आ रम्मी खेलाइत मूस। दोसर बेर बड़का टा बुनबुन्ना, मूसक कारणसँ प्लेग। मेहनतकश मूस बिहरि बनबैत अछि मुदा साँप ओइमे रहैत अछि। अचकचा कऽ ओ उठि गेल। स्वर्गीय पिताक चित्र देखैत अछि। पूर्वजक अर्जित सम्पत्तिक उपयोग साँपे जकाँ करत? केआरीमे अनेरुआ घास-पात खुरपीसँ साफ करऽ लागल। प्रजातंत्र परिकथा- एकटा हत्या आ दू टा घरमे डकैती। कमल कुमार शर्मा ऐ खबरिकेँ देखैत अछि, सेन्सर्ड सन खबरि। ऐ गपक चर्चा नै जे ओ डॉक्टर के.पी.भगत सेवानिवृत्त छल आ मामूली फीस लै छल। ओकर घरमे डकैत सभ गरीब मरीज आ ओकर परिजन बनि पैसल छल। ओइ पत्रकारपर कालाबाजारी आ मिलावटक केस अखनो लटकल अछि से ओ कोना लिखितए जे ओइ घरसँ पुलिस थाना अगबे एक सए डेगपर आ आरक्षी महोदयक निवास अगबे साठि-सत्तरि डेगक दूरीपर छलै। फेर डॉक्टर ओइठामसँ ओ सभ, राष्ट्रपति पदक प्राप्त हालेमे रिटायर भेल शिक्षक विक्रम प्रसाद वर्माक घर पहुँचि गेल, डकैती सेहो केलक आ खेनाइ बनबाकऽ सेहो खेलक। विक्रम बाबूक भाइ गजानन बाबू आरक्षी अधीक्षकक ओइठाम नजरि बचा कऽ पहुँचि गेला। मुदा तैयो किछु नै भेल। अस्पतालक हाताक मुख्यद्वारपर लोक सभ जुटि गेल। मधुरेश किशोर द्विवेदीक केमिस्ट आ ड्रगिस्ट एसोसियेशन एकरा नेतृत्व दऽ रहल छलै। स्कूलसँ घुरैत बेदरा सभकेँ किछु भऽ जाए..। वक्ता सभ शुरू- दलाल ईश्वर चौधरी, भड़ुआ मुरलीधर अग्रवाल, मटिया तेल फेंटि कऽ पेट्रोल बेचनिहार पत्रकार, चोरिक माल खरीद-बिक्री केनिहार नगरपालिका चेयरमैन बुचनू बाबू, मुनीमक कृपासँ चारिटा संतानक बाप पचीस वर्षीय सेठानीक साठि वर्षीय पति कालाबजरिया सेठ कनकधारीमल- ध्वनि विस्तारक यंत्रपर ओकर हँफसबाक स्वर छोट-मोट अन्हड़क भ्रम दै छल। बार एशोसिएशनक अध्यक्ष ज्ञाननाथ सिंह जे खूनी आ डकैत सभक पैरवी करै छथि, बाढ़ि प्रभावित इलाकाकेँ डिजनीलैण्डमे परिवर्तित करबाक मुफ्त योजना प्रस्तुत करएबला गंजेड़ी छुटभैया कृष्णानन्द तिवारी.. गोरका डाक्टर धरमचन्द सहाय जकरा बुझनुक लोक सभ डी.सी.एस. माने दारू, छौड़ी, सार-बहानचो कहै छथि.. ओकर धीपल-तबधल शब्द सभ। फेर भीड़क नेतृत्वहीन हएब, प्रतिनिधिमंडल नै जन-समूह द्वारा डाइरेक्ट वार्ता करबाक गप, आ एनामे टैरेसपर ओल्ड फॉक्सक अन्तर्राष्ट्रिय समस्या सभपर बकथोथी। तखने मोटरसाइकिलक एकटा सवार भीड़केँ नियंत्रणमे लेमऽ चाहैत अछि, ओ बंदा एकटा संप्रदायवादी दलक नव्यतम रंगरूट छल। मधुरेशजी सावधानी बरतै छथि। एकटा धग्गर आ टटका जनमल नारा कमल आ अनकर ध्यान आकृष्ट करै छन्हि। फेर अबै छथि प्रदीप क्रान्तिकारी जे समाजसेवाक वशीभूत अभियन्त्रणक पढ़ाइ छोड़ने छथि वा निशाबाजी आ बलात्कारक कारण निष्कासित कएल गेल छथि। अनुमंडलाधिकारीक जीपपर आक्रमण होइत अछि। प्रदीप क्रांतिकारी कहैत अछि- कोयला लाइसेंसमे सात हजार टका चाही हरामजदाकेँ। देखलहक तूफान। मधुरेशजी किछु आर गोटेकेँ संगमे लऽ लेने छला जेना गजेन्द्रजी- स्थानीय कॉलेजक व्याख्याता आ व्यापारी संगठनक माधवजी आ कृष्णमोहनजी। बिना अप्रिय घटनाक भीड़ गाँधी चौक आ जयप्रकाश चौक पहुँचल। तखने मिठाइ दोकानपर बैसऽबला गोल्डिया जे क्रिकेट सेहो खेलाइ छल आ तहूमे बॉलक सुविधाक ध्यान रखै छल- बैटपर आबि गेलै तँ छक्का आ नै तँ क्लीन बोल्ड- से सरकारी गाड़ीकेँ देखि मार..आगि लगा दे.. बाजि उठल। किछु लोक गाड़ी दिस दरबर मारलक, मुदा गाड़ीक चालक गाड़ी भगौलक। न्याय चौक वा नबाब चौक पर विश्व हिन्दू सेनाक सेनानी सभ बजरंगबलीक स्थापना कऽ देने छल कारण तराजू आ आँखिपर पट्टी बला मूर्ति नै लागि सकल रहए। बजरंग चौकक बोर्ड लागि गेल रहए। प्रशासनमे ओइ समए दलित अधिकारी सभक बाहुल्य छलै आ ओ सभ चौकक नाम अम्बेदकर चौक करऽ चाहै छला से ओ सभ बजरंगबलीकेँ गिरफ्तार कऽ थाना लऽ गेला जतऽ सुनै छिऐ आइयो हुनकर पूजा कएल जाइ छन्हि। से ई चौक नगरपालिकाक पार्श्वमे रहलासँ आब नगरपालिका चौक कहाइत अछि। अनुमंडलाधिकारी फोर्स लऽ कऽ एतऽ आबि गेल आ सभ मिलि लाठी भाँजऽ लागल। पुलिसबला सभ दूर धरि दरबर मारि रहल छल। मुदा फेर लोक सभ गर धऽ कऽ रोड़ा फेकब प्रारम्भ केलक। पुलिस असबार भऽ भागल.. एकटा हिटलर कट मोँछबला इंस्पेक्टर आएल.. बरगाँही सभ ओकर गाड़ी लऽ भागल रहै! अनुमंडलाधिकारी आ दोसर सभ हाँइ-हाँइ जीपमे बैसि कऽ पतनुकान लऽ लेने छल। कमल नजरि खिरओने छल। गोल्डी ओकरासँ बहस केलकै तँ अमजद अली कमलक बाँहि गसिअयने ... क्रुद्ध चीता आ कूढ़मगज महिषक बीच दर्जन भरि लोक..। राजनैतिक आ सामाजिक गुटबन्दीसँ बाहरक लोक ठकुरसोहाती नै जनै छला। ने छल.. कथी लेल एकर सभक मुँह लागै छी। दू गोट गिरफ्तार संगीक रिहा करबाक माँग.. मुदा अधिकारी सभ अपन रक्षार्थ तइ लेल तैयार नै छला। लोफरकट डी.एस.पी.क मबालीकट अशिष्ट बोली..। मधुरेशजी बजला- अहाँ सभकेँ निखत्तर जेबाक सिहन्ता हुअए आकि निछक्क जयपंथीए घेरने हुअए तँ..। बन्हककेँ छोड़बापर सहमति भेल। मनुक्खक कोन कथा कोनो कागपंछी नै देखाइ छलै.. महाभारत समाप्त भेलापर की कुरुक्षेत्रो एहिना निसबध भेल हेतै। बेदरा सभक एकटा गोल क्रिकेट खेलेबाक लेल मैदानमे प्रवेश कऽ रहल छल। अथ गिरगिट कथा- मुक्कन बाबू माने मुकुन्द जायसवाल- जनवितरण प्रणालीक दोकानक एकटा डीलर। ऐ नामक एकटा दरोगा सेहो आएल छल आ खूब हँसोथि कऽ गेल छल। रामलखन पोद्दार, बी.एस.सी. ऑनर्स, वल्द किशन पोद्दार, चाह-पान बेचऽबला, टॉपर मुदा नोकरी लेल जुत्ता खिआ गेलै। नगर-हबाक नापबाक यंत्र- कायराना भद्रताक पचहत्तरि प्रतिशत, स्वार्थाना यारीक बीस प्रतिशत आर मिसलेनियस वाइरस पाँच प्रतिशत अनुपातमे उपस्थित रहत। एकटा गोदाम सन मकानमे अछि पुलिस फाँड़ी आ तकरे सटल दारूक भट्ठी! एक दिन अनायासे दुनूक अहं सोझाँ-सोझी होइ छन्हि जखन मुकुन्द पुलिस फाँड़ीसँ फराकैत भऽ निकलै छथि आ रामलखन भट्ठीसँ। झगड़ाक बाद पुलिसबला सभक सहानुभूति मुकुन्दक प्रति रहए आ भट्ठासँ बहराइबला सभक पोद्दारक पक्षमे। रामलखन पोद्दार गिरफ्तार भऽ गेल आ भोरमे ओकर बाप पुलिसबलाकेँ फूल-पत्ती चढ़ा कऽ ओकरा छोड़ओलक। फेर मुक्कन बाबू एक सोड़ह लोक लऽ नशा विरोधी नागरिक मंच बनेलन्हि आ भट्ठीपर धरना देलन्हि। ई सोलह गोटे छला सात गोट पितिऔत-ममिऔत-पिसिऔत-मसिऔत, दू टा हरबाहा, धनकुट्टा मशीनक आपरेटर, तीन कुख्यात मित्र आ कुलपुरोहितक दू टा लफंगा पुत्र। मुदा एम्हर पोद्दारजी अधिकार सुरक्षा हेतु ३६ गोटेक संगे आबि गेला। नशा विरोधी नागरिक मंचक सेनापति लंक लऽ पड़ेला तँ शेषकेँ धरपटांग उठा देलकन्हि। फेर मारि-पीटक क्रम शुरू भेल। रंगबाजी स्पेशलिस्ट सुब्रत मुखर्जी एकरा गैंगवार कहै छथि। मुदा तखने नगरपालिकाक चुनावक घोषणा भेल। स्वार्थाना यारीक वाइरस शीवाज रीगलक सोझाँ रंग धेलक। मुक्कन बाबू चेयरमैन छथि, पोद्दारजी वाइस-चेयरमैन। नगरमे शान्ति अछि। अय्यासी- दोसराक संग बैसलमे मौज मुदा पत्नीक बोल- तरकारी लेल दसटकही.. किराना समान काल्हियो-परसू जे आबि जाए। दोसक ओतऽ बिदा भेल, बेटाक गप नै सुनऽ चाहलक। पटेल चौक.... महात्मा गाँधी चौक पहुँचल। संगमे बिसटकही। रिक्शाबला अपन टोपर तानि कऽ सुस्ताइत रहए। रिक्शापर बैसल, रस्तामे दोस लेल दू टाकाक सिकरेट लेलक, अपन फेवरिट पत्रिका मोर बारह टाकामे, आ चारि टाका रिक्शाबलाकेँ देलक। दोसक घरमे पंखाक हबासँ किछु आफियत अनुभव भेलै। बचल दू टाका ओकरा मुँह दुसलकै, घरक तरकारी आ बेटाक किताब-कापी.. घर घुरल देह घामसँ कुंडाबोर। पत्नीक फुलल-लाल आँखि देखि लगलै जे अय्यासी कऽ घुरल हुअए। बैकबा-फोड़बा- मूल समाचार- मतायल हवाक पेट्रोलकेँ स्वार्थक सलाइ देखौने छल। घटना- प्रकाश अगरवालक फर्म “वृद्धिचन्द भँवरलाल वस्त्र भंडार”- उधारीक रकम लाख ठेकि गेलै तँ स्वरगीय रघुनाथ झाक पुत्र अठमा फेल मातृविहीन अबंड सिकन्दर झाकेँ वसूली लेल राखलक। ऐ क्रममे ओ पहुँचल एक दिन रामचन्द मड़र लग, ओकर बेटा कालेश्वर मड़र जे आब नाममे यादव लिखै छल चारि बरख पहिने तीन हजारक थ्री-पीस सूट बनबेने छल। मुदा बाप ओकर ऋणक मादेँ मना कऽ देलकै। रस्तेमे पान खेबाक क्रममे मुन्ना ठाकुरक दोकानपर कालेश्वर यादवसँ ओकरा भेँट भेलै, कालेश्वर संगे परिवारक लोक आ कुटुम्ब सेहो छलै। पहिने सिकन्दर जे फिरंटगिरी करै छल सएह आइ काल्हि कालेश्वर करै छल से तगेदापर मारि बजड़ि गेल। सिकन्दर ओकरा छातीपर चढ़ि गेल। सिकन्दरक पुरनका संगी सभ जुटि गेल आ कालेश्वरक कुटुम्ब सभकेँ धोपलक। फेर दोसर दिन पिछड़ा एकताक जुलुस निकलल आ वस्त्र भंडारक शीसा फोड़लक। मुदा लठैत सभ आबि लाठी बरसाबऽ लागल। जकर जेने सिंग अंटलै, ओम्हरे पड़ाएल। लूट, अराजकता..पसरि गेल। झलकी- दृश्य एक: जिलाध्यक्ष पुऋषोत्तम मंडलक स्वर, अठारह कोठली आ दू टा बड़का-बड़का हॉलबला राजनीतिक दलक कार्यालयमे। सद्भावना जुलुस निकलत.. शिष्य चिरंजीव सिंह, पार्टीक युवा मंचक अध्यक्ष आ मंडलजीक घोर समर्थक। मुदा ओ तामसे घोर भऽ जाइत अछि- अहाँ सेहो छोट जातिक छी से ओकरा सभक पक्ष लेबे करबै। बहरा जाइत अछि। दृश्य दू: फूसक घर। धनीलाल, रामनारायण। बैकबा-फोड़बा की होइ छै। मटरू की जानय। किछु काल चुप रहलाक बाद आल्हा टेर देने अछि। दृश्य तीन: कामरेड रामसेवक साहुक चाह-नाश्ताक दोकान। बहस.. विद्यानिवासजीक भाषण, जाति नामक कोनो वस्तु नै। हुनका पागल कहि क्यो छौड़ा बहरा जाइत अछि। दृश्य चारि: टिफिनमे बच्चा सभक खेल: घास-फूस बला घर हमर आ हम बनब जादब। दोकान बिरजूक आ ओ बनत बाभन। दुनूमे झगड़ा हएत आ लल्लू, मोहन, नरेन आ बबलू आएत आ हमर घरमे आगि लगा देत। तखन सुरेश बनत नेता आ विनोद बनत दरोगा। सुरेश दरोगाकेँ कहत जे एकरा दुनूक घर-दोकान बनबा दियौ आ पकड़ि कऽ लाउ। सुरेश दुनुक हाथ मिलबाकऽ दोस्ती कराएत। बैकबा-फोड़बा खेल भरि टिफिन चलैत रहल। विष-पान- वकालतखानाक कुर्सीपर बैसल गोपालजी कछमछाइ छथि। कचहरीक द्वारपर सुग्गाबला जोतखी बैसल छथि। ओतै एकटा बैनर सेहो अछि, आँखिक रोशनी बढ़बऽ बला ममीरा सुरमा। अदालतिक बरंडापरसँ अर्दली रामेसर मंडल वल्द जागेसर मंडलकेँ चिकड़ैत अछि, मोकील वकीलकेँ अगिला तारीखपर बाँकी-बकियौता देबाक गप कहै छन्हि मुदा ओ कलमक उनटा छोरसँ कान खोदैत रहै छथि। गोपाल सुनै छथि। गोपाल, एक दिन पानबला दोकानपर चतुरानन लाठी लेने आएल आ बरसाबऽ लागल। ओ खसि पड़ला। बाबूजीक पुरान नोकर नेनिया आबि चतुराननकेँ बजाड़ि दैत अछि मुदा ओ मौका देखि भागि जाइत अछि। रामप्रसादक साठि वर्षीय माय मरौनावाली सभसँ पहिने गोपालक सुधि लेलक। फेर गोपाल अस्पताल आनल गेल। चतुरानन सेहो ओतऽ आएल रहए इलाज आ इन्जरी रिपोर्ट लेल, मुदा क्यो चीन्हि गेलै आ जरनाक चेरासँ ओकरा मारि कऽ भगा देलकै। चतुराननकेँ सभ आदि अपराधी कहै छल मुदा गोपाल ओकरा सुधारै लेल प्रयासरत छला। से आब ओ भस्मासुर बनि गेल। पुलिस चतुराननसँ पाइ असूललक आ ओ घरेमे रहै छल। प्रगतिक तारीख केसमे पड़ैत रहलन्हि आ हुनकर एक्स-रे प्लेट सेहो अस्पतालसँ निपत्ता भऽ गेल। तीन बर्खक बाद गबाही शुरू भेल आ फेर शुरू भेल जिरह, ओइ दिन भरि बाँहुक कमीज पहिरने छला, कालर आ जेबी रहै वा नै, रंग..। जे लाठी बजरलन्हि तकर लम्बाइ, बनावटि..। वकील मित्र.. मुदा एक दिन स्वरक तुर्शी नुकाएल नै रहलै, देखै छिऐ मोकील सभकेँ आखिर पाइ देने अछि तँ ओकर सभक काजकेँ प्राथमिकता तँ देबहि पड़त। आ ओइ दिन गवाही नै गुजरि सकल.. फाइलपर हाकिम विपरीत टिप्पणी कऽ देलन्हि। चतुरानन तीन हजारमे गप फिट केलक जे ओइसँ बेशी अहाँ दऽ सकी तँ..। एंटी-पार्टीक वकीलक मार्फत वकील-मित्र लग ऑफर सेहो आएल छलन्हि। मुदा गोपालक कहलापर कोर्ट ट्रांसफर करेबाक प्रक्रिया शुरू भेल। मुदा कोर्ट ट्रांसफर भेल शीलभद्र झाक कुटमैतीमे जे गोपालजीक राजनैतिक प्रतिद्वन्दी छला आ चतुरानन आइ-काल्हि हुनके छत्र-छायामे छल। मेल पेटीशनपर गोपाल दसखत कऽ दै छथि, आत्मसमर्पण जेना भारत-पाक युद्धमे एक लाख सेनाक संग जनरल नियाजी कएने छल। संपादकीय काशीकान्त मिश्र "मधुप" (1906-1987)-"राधाविरह" (महाकाव्य) पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त मैथिलीक प्रशस्त कवि आ मैथिलीक प्रचार-प्रसारक समर्पित कार्यकर्ता "झंकार" कवितासँ क्रान्ति गीतक आह्वान कएलनि । प्रकृति प्रेमक विलक्षण कवि ।"’घसल अठन्नी" कविताक लेल कथ्य आ शिल्प-संवेदना—दुहू स्तर पर चरम लोकप्रियता भेटलनि। मधुप जीक कवितामय चिट्ठी (अप्रकाशित पद्य-डॉ.पालन झाक सौजन्यसँ) चि. श्री चन्द्रकान्त मिश्र शुभाशीर्वाद पाबि अहाँकेँ कुशल थिकहुँ सह्लाद गामहुमे परिवार अपन आनन्द अहींक हेतु छल चिन्तित चित्त अनन्त। घेंट-पेट ओ तैठ पेटसँ हीन उदय रहए अछि मनहि मन किछु खिन्न। मंगलमय श्री मंगल झा सूरधाम काशीवासी ’तजि वनता’ आराम। अहूँ हुनक सेवामे मेवा छी चखैत छी तहिठाम जतए केओ नहि अछि झखैत। (चन्द्रकान्त मिश्र-मधुप जीक छोट भाइ उदय- चन्द्रकान्त मिश्रक बालक चन्द्रकान्त मिश्रक विवाह मंगलदत्त झा, गाम हरौलीक कन्यासँ। मंगल झाक काशी प्रवासमे लिखल पत्र, सूर्यक उत्तरायणमे गेलापर मृत्युक वरण, संगमे उदय आ मंगल झाक पौत्र श्री प्रद्युम्न कुमार झा सेहो संगमे रहथि।) ** हैदराबादक मिथिला सांस्कृतिक परिषद् द्वारा श्री योगेन्द्र पाठक 'वियोगी' जी केँ हुनक पोथी 'विज्ञानक बतकही'क लेल पहिल तिरहुत साहित्य सम्मान देल गेल। २०७१ सालक गंकी धुस्वाँ बसुन्धरा पुरस्कार ऐबेर श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमरकेँ देल जाएत। नेवारी, नेपाली आ हिन्दी भाषाक साहित्यकार धुस्वाँ सायमी आ हुनकर पत्नी श्रीमति बसुन्धराक स्मृतिमे स्थापित गंकी धुस्वाँ बसुन्धरा पुरस्कार २०३९ साल सँ देल जा रहल अछि आ दू सालपर देल जाएबला ई पुरस्कार मैथिलीमे सर्वप्रथम देल गेल अछि। ** ओम प्रकाश झा काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ आ मैथिली गजल काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ जीक नाओं मैथिली साहित्यमे एकटा उच्च स्थान रखैत अछि। मधुपजी मैथिलीमे अनेको रचना केने छथि। हिनकर अटुट मैथिली-प्रेम के नै जनैत अछि। एकसँ एक काव्य रचना हिनका मैथिली साहित्यमे ‘अमर’ बनौने अछि। की मधुपजी मैथिलीमे गजल सेहो कहने छथि, ई जनबाक उत्कण्ठा गजलक सिनेही हेबाक कारणेँ हमरा छल। “अनचिन्हार आखर” जलवृत्तसँ पता चलल जे मधुपजी मैथिलीमे एकटा गजल रचने छथि जे १९३२ ई.मे मैथिली साहित्य समिति द्वारा काशीसँ प्रकाशित पत्रिका- “मैथिली-संदेश”मे छपल छल। ई गजल हम नीचाँ उद्धृत कऽ रहल छी- “मिथिलाक पर्व गौरव नहि ध्यान टा धरै छी सुनि मैथिली सुभाषा बिनु आगियेँ जड़ै छी सूगो जहाँक दर्शन-सुनबैत छल तही ठाँ हा आइ ‘आइ गो’ टा पढ़ि उच्चता करै छी हम कालिदास विद्या-पति- नाम छोड़ि मुँहमे बाड़क तीत पटुआ सभ बंकिमे धरै छी भाषा तथा विभूषा अछि ठीक अन्यदेशी देशीक गोल ठेसी की पाँक पड़ै छी औयत्र-तत्र देखू अछि पत्र सेकड़ो टा अछि पत्र मैथिलीमे एको ने तैं डरै छी” ऐठाँ ई देखबाक चीज अछि जे ई गजल पूरा-पूरी अरबी बहरपर आधारित अछि। ऐ गजलक प्रत्येक पाँतिमे मुस्तफइलुन (दीर्घ-दीर्घ-ह्स्व–दीर्घ) आ फऊलुन (ह्स्व-दीर्घ-दीर्घ)क प्रयोग २ बेर कएल गेल अछि। कहबाक मतलब जे ई गजल बहरमे कहल गेल अछि। ई अचरजक विषय अछि जे मधुपजी अरबी बहरमे गजल कहबाक योग्यता रखितो मात्र एकेटा मैथिली गजल किए कहलनि? आब एतेक दिनक पछाति ऐ विषयपर अनुमानेटा लगौल जा सकैत अछि। तथापि ई उत्कण्ठाक विषय छै, तँए विषयपर विमर्श आवश्यक बुझना जाइए। ई गौरवक बात अछि जे मैथिलीमे पछिला सए बरख पहिनेसँ गजल कहल जा रहल अछि। मुदा ई चिंतनीय आ सोचनीय बात अछि जे घनेरो साहित्यकार सभ एकटा वा दूटा गजल कहला बाद फेरसँ आगू गजल एकदमे नै कहलथि। एकर की कारण भऽ सकैत अछि? ई बात सर्वविदित अछि जे मैथिली साहित्यकारक एकटा वर्ग हरदम ई मानैत रहल जे मैथिलीमे बहरयुक्त गजल नै कहल जा सकैए। अपितु किछु गोटे एतए तक मानैत रहला जे मैथिलीमे गजल लिखले नै जा सकैत अछि! ओना ऐ बातक प्रतिवाद स्वरूप बीच-बीचमे मैथिलीमे गजल कहल जाइत रहल, जेकर उदाहरण ‘मधुप’जीक ई एकमात्र गजल सेहो अछि। फेर ई सवाल जे जखनि मधुपजी बहरमे एकटा गजल कहने छथि तखनि फेर दोसर गजल किए ने कहने हेता? एकर जवाब तकैले जखनि आधुनीक मैथिली साहित्यक पूरा इतिहासकेँ देखै छी, तखनि बहुत किछु स्पष्ट भऽ जाइए। आधुनिक मैथिली साहित्यक इतिहास सामंतवाद आ दादागीरीक इतिहासक एकटा सर्वश्रेष्ठ उदाहरण रहल अछि। सदिखन एकटा खास ग्रुप वा वर्ग मैथिली साहित्यकेँ अपन जागीर बुझैत मैथिली साहित्यकेँ बन्हकी लगौने रहल अछि। ओना ई प्रक्रिया आइयो धरि रहल अछि, मुदा पहिनेसँ यएह परिवर्तन भेल अछि जे आब प्रतिवादक स्वर सेहो मुखर भेल जा रहल अछि। एकर सुगबुगाहटि आब बुझाए लगल अछि। अस्तु, हमर कहबाक तात्पर्य ई अछि जे मैथिली साहित्यक मठाधीश आ सामंत लोकनि ई घोषणा केलन्हि जे मैथिलीमे गजल नै भऽ सकैत अछि। प्रयोगधर्मी साहित्यकार जँ किछु नव करबाक दुस्साहस केलनि तँ हुनका नाना प्रकारसँ समझा-बुझा वा त्रास देखा मठाधीश सभ अपन बात मानबा लेल मजबूर करैत रहलखिन। ऐ क्रममे विषयसँ इतर ईहो चर्चा करए चाहै छी जे मैथिली साहित्यमे पुरस्कारक राजनीतिकेँ के नै जनै छथि। कोनो पोथीकेँ पढ़ैबला होइ वा नै, जँ मठाधीश प्रसन्न छथि तँ पुरस्कार निश्चित अछि पता नै किएक ई बात काल-क्रमे अनेको साहित्यकारक बलि ऐ रूपमे लैत रहल अछि जे ओ सभ अपन मेधा मैथिली साहित्यकेँ समृद्ध करबामे नै लगा मठाधीश सभकेँ प्रसन्न करैमे लगबए लगै छथि। केतेको बेर ईहो होइत अछि जे अपन पहिचान हेरेबाक डरसँ मेधावी साहित्यकार मठाधीश आ सामंत सबहक पैदा कएल अवधारणाक अनुरूपेँ चलए लगै छथि। अस्तु पहिचान हेरा जाइक डर होइ वा पुरस्कार नै भेटबाक डर वा साहित्य समाजमे अछूत हेबाक डर, कोनो ने कोनो कारणेँ केतेको साहित्यकार अपन मेधा स्वान्त: सुखाय लेखनसँ हटा मठाधीश सुखाय लेखन दिस बढ़ि जाइ छथि! ऐ दुष्चक्रक शिकार मैथिली होइत रहली अछि। आब फेरसँ मूल विषयपर आबि ऐ बातक परताल जाए जे आखिर मधुपजी एक्के गोट गजल किए रचलनि? जखनि कि ओ अरबी बहरमे गजल कहैमे सक्षम आ समर्थ छला? ई बात अबस्स छै जे मधुपजी मैथिली साहित्यक एकटा मजगूत खाम्ह रहला आ पूरा मनोयोग पूर्वक मैथिलीक सेवा केलनि। हिनका द्वारा कहल गेल एकमात्र गजल विशेष क्षमताक परिचए सेहो करबैए। तइ दिनमे[1] मधुपजीक उमेर २५-२६ बर्खक छेलनि। ओइ समए मधुपजी एकटा युवा,उदीयमान आ ऊर्जावान रचनाकार छला आ प्रयोग धर्मितामे बिसवास रखै छला। ऐ बातक सम्भावना अछि जे युवा मधुपजी तत्कालीन मठाधीश सबहक प्रभावमे आबि आगू गजल नै कहने हेता। किएक तँ मठाधीश सबहक मान्यता रहल छन्हि जे मैथिलीमे गजल भाइए ने सकैए!! ...आ तँए मधुपजीक गजलकेँ मठाधीश सबहक समर्थन नहियेँटा भेटल हेतनि। एकर परिणाम स्वरूप मधुपजी आगू गजल लिखैक दुस्साहस नै केने हेता। दोसर सम्भावित कारण ईहो भऽ सकैए जे रचनाकारक मन अा रूचिक अनुरूप रचना-विधा सेहो होइ छै। खास कऽ आधुनिक मैथिली साहित्य लेखनमे रचनाकार स्वतंत्र रूपेँ अपन मन आ रूचिक अनुसार रचना करैत रहला अछि। तँए ईहो बातक सम्भावना भऽ सकैत अछि जे मधुपजीक रूचि आ मन गजल दिस नै भऽ कऽ आन विधा दिस बेसी रहल हेतनि। ओना अन्यान्य विधामे अनेको रचना केनौं छथि। उपरोक्त कारण सभमे कारण चाहेजे रहल होइ, ई बात तँ अबस्से अछि जे मैथिली साहित्य आ मैथिली साहित्यक विद्यार्थी सभकेँ मधुपजी सँ बहरयुक्त गजलक जे उपहार भेटबाक चाही छल से नै भेटल। बहुरूपिया रचनामे गजलमे हम रूचि राखैत छी। संगहि मैथिली मे थोड बहुत गजल सेहो लिखै छी आ गजलक पोथी सब पढबाक इच्छा रहै ए। मैथिलीमे बहुत कम गजल संग्रह अछि आ ओहो सुलभ नै होइत रहै ए। एहन परिस्थितिमे हमरा श्री अरविन्द ठाकुरजीक सद्यः प्रकाशित मैथिली गजल संग्रह "बहुरूपिया प्रदेशमे" पढबाक अवसर भेंटल आ हम एहि पोथीकेँ आद्योपान्त पढलहुँ। सबसे पहिने हम श्री अरविन्द ठाकुरजीकेँ मैथिली गजलक पोथी लिखबाक लेल बधाई दैत छियैन्हि। मैथिली गजलक उत्थान लेल प्रत्येक डेग हमरा महत्वपूर्ण लागै ए। पोथीक गेट अप बड्ड सुन्नर अछि। टाईप आ कागतक कोटि सेहो उत्तम अछि। पोथीक भूमिका गजलकार अपने लिखने छथि आ ओहि मे गजल आ एहि संग्रहक सम्बन्ध मे बहुत रास गप सब कहने छथि। जेना पृष्ठ संख्या सातक दोसर पारा मे गजलकार कहैत छथि जे "मैथिलीक मिजाजक सीमा (इ मैथिलीक नहि, हमर अपन सीमा भऽ सकैत अछि) केँ देखैत गजलक व्याकरण (रदीफ, काफिया, मिसरा, मतला, मकता आदि)क स्थापित मापदंडक कसबट्टी पर हमर सभ गजल खरा उतरत तकर दाबी तऽ नहिए टा अछि बल्कि हम तँ इ सकारय चाहै छी जे--------------------------------- हमर सीमाक कारणेँ प्रस्तुत गजल मे कएक जगह सुधि पाठक लोकनि केँ त्रुटि भेटि सकैत छनि।" एहि पाराक अन्त मे ओ कहै छथि जे बहरक दोख किछु शेर मे भेटि सकैत अछि। हम गजलकारक सराहना करैत छी जे ओ भूमिका मे अपने कएक ठाम बहरक आ आन दोख हएब स्वीकार कएने छथि। पोथी केँ आद्योपान्त पढला पर हमरा इ नै बुझाएल जे एहि संग्रहक गजल सब कोन-कोन बहर मे लिखल गेल अछि। अरबीक कोनो टा बहर मे कोनो गजल नहिए अछि, मैथिली मे आइ-काल्हि प्रयुक्त होइ बला सरल वार्णिक बहर मे सेहो कोनो गजल नै अछि। गजलकार केँ प्रत्येक गजल मे इ लिखबाक चाही छल जे कोन बहर मे गजल लिखल गेल अछि। जँ इ "आजाद-गजल"क संग्रह थीक, तँ हुनका एहि बातक उल्लेख करबाक चाही छल। भूमिकाक उपरोक्त पाराक शुरू मे गजलकार कहै छथि जे मैथिलीक मिजाज केँ देखैत एहि मे उर्दू-हिन्दी गजलक मिजाजक नकल करबाक प्रयास कएल जाइत तँ एकरा बुधियारी नहिए टा कहल जायत आओर सफलता सेहो नहि भेंटत। हम हुनकर गप सँ सहमत छी जे नकल करब उचित नहि। मुदा एकटा गप हम कहऽ चाहैत छी जे प्रत्येक विधाक एकटा नियम होइत छै आओर जाहि क्षेत्र मे ओहि विधाक उदय भेल रहैत छै ओहि क्षेत्र मे स्थापित भेल नियमक पालन केने बिना कोनो रचना मूल विधा मे कोना भऽ सकैत अछि। जेना मैथिली मे समदाउन आ सोहरक परम्परा छैक आ जँ पंजाबी मे वा गुजराती मे वा की कोनो आन भाषा मे समदाउन आ सोहर गाबऽ चाही तँ नियम कोना बदलि जेतैक। जँ नियम बदलतै तँ ओ दोसर चीज भऽ जेतैक। तहिना गजल अरब क्षेत्र मे जन्म लेलक आ इ स्वाभाविक छै जे एकर नियम (व्याकरण) ओहि क्षेत्रक स्थापित मानदण्डक आधार पर बनल। स्थापित मानदण्डक पालन करब नकल नहि कहल जा सकैत अछि। आ जे नकलक गप करी तँ 'गजल' कहब अरबी-हिन्दीक नकल थीक। एक दिस गजलकार 'गजल' कहबाक लोभ नै छोडि रहल छथि आ दोसर दिस गजलक व्याकरणक नियम पालन केँ नकल कहै छथि, इ उचित नै बुझाएल। गजल स्थापित मानदण्ड पर जँ नै कहल गेल तँ रचना केँ गजलक स्थान पर दोसर नाम देल जा सकैत अछि। पृष्ठ संख्या दस पर दोसर पारा मे गजलकार कहै छथि जे ओ जीवन सँ सिदहा लैत छथि। इ स्वागत योग्य गप भेल। जीवनक सिदहा सँ तैयार व्यंजन सोअदगर हेबे करतै। मुदा भोजन बनबै काल चाउरक सिदहा पानि मे सोझे फुला कऽ परसि देला सँ भात नहि कहाइत अछि। चाउरक सिदहा केँ अदहन मे देल जाइ छै तखन भात तैयार होइ छै। तहिना जीवनक सिदहा जँ व्याकरण, नियम आ चिन्तन-मननक अदहन मे पकाओल जाइत अछि तँ सोअदगर रचना भेटैत अछि। विधा विशेषक मापदण्ड तोडबाक क्रांतिकारी घोषणा कएला टा सँ किछु विशेष फायदा वा उमेद तँ नहिए जगै ए। जँ कियो मापदण्ड तोडै छथि, तँ मापदण्ड पर चलै बला केँ नकलची आ बाजीगर कहब उचित नहि। गजल आ फकरा आ दोहा मे थोडेक अन्तर तँ छै जे रहबे करतै। अस्तु, इ गजलकारक अपन विचार छैन्हि आ आब प्रकाशित सेहो छैन्हि। गजल संग्रहक सब गजल पढलौं। विषय वस्तु सब नीके लागल। गजलक व्याकरणक आधार पर कहि सकैत छी जे बहरक दोख तँ प्रत्येक गजल मे छैक आ जँ इ आजाद-गजलक संग्रह थीक तँ गजलकार इ गप कतौ नै कहने छथि। गजलकार केँ स्पष्ट करबाक चाही छल जे कोन कोन बहर मे गजल सब लिखल गेल अछि। हमरा बुझने गजलक कोनो शीर्षक नै होइत अछि, मुदा प्रत्येक गजल केँ एकटा शीर्षक देल गेल अछि। बहरक अतिरिक्त रदीफ आ काफियाक नियमक सेहो कएक ठाम पालन नै भेल अछि आ इ गप गजलकार भूमिका मे सेहो स्वीकार कएने छथि। जेना पृष्ठ बाईस मे मतलाक दुनू पाँति, दोसर शेर आ पाँचम शेर मे काफिया मे 'आयब' प्रयोग भेल अछि, तँ दोसर आ चारिम शेर मे 'अब' क प्रयोग अछि। पृष्ठ चौबीस मे मतलाक पहिल पाँति मे काफिया मे 'अ' आयल अछि आ दोसर पाँति आ अन्य शेर मे 'आत' आयल अछि। पृष्ठ पच्चीस मे काफिया की छै, से नै बुझाएल। पृष्ठ तिरपन मे प्रत्येक पाँति मे काफिया एकदम फराक फराक अछि। पृष्ठ अनठाबन मे मतला, दोसर शेर आ चारिम शेर मे काफिया मे 'अल' प्रयुक्त अछि आ आन सब शेर मे काफिया मे 'अ' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ उनसठि मे सेहो रदीफ आ काफियाक स्पष्टता नै अछि। पृष्ठ छियासठि मे काफिया मे कतौ 'अल' आ कतौ 'आओल' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ सडसठि आ तिहत्तरि मे सेहो काफियाक नियमक उल्लंघन भेल अछि। तहिना संयुक्ताक्षर बला काफियाक नियम सेहो एक दू ठाम हमरा हिसाबेँ ठीक नै अछि। एकर अतिरिक्त आओर कएक ठाम काफियाक नियमक पालन नै भेल अछि। हम उदाहरण स्वरूप किछु पृष्ठक उल्लेख कएलहुँ। हमर इ उद्देश्य नै अछि जे खाली दोख ताकल जाय, मुदा जँ गजल कहै छियै तँ गजलक नियमक पालन हेबाक चाही। सब गोटे केँ जानकारी लेल इ बता दी की बिना रदीफक गजल तँ भऽ सकैत अछि, मुदा बिना दुरूस्त काफिया भेने गजल नै भऽ सकैत अछि। भूमिका सँ एकटा बात आर स्पष्ट होइ ए जे गजलकार मई २००८ सँ मैथिली मे गजल लिखब शुरू केलथि, ओना ओ हिन्दी मे पहिनहुँ गजल लिखैत छलाह। एकर मतलब इ भेल जे गजलकार "अनचिन्हार आखर" (मैथिली गजल केँ समर्पित ब्लाग) सँ बहुत बाद मे मैथिली गजल लिखब शुरू कएने छथि आ मैथिली गजलक वरीयता मे बहुत बाद मे आयल छथि। "अनचिन्हार आखर" ब्लाग देखला सँ पता चलै छै जे गजलकार एहि ब्लाग पर सेहो अपन कएक टा गजल २००९ सँ एखन धरि देने छथि। ओ "अनचिन्हार आखर" ब्लाग सँ चिन्हार छथि, तैँ इ उमेद अछि जे एहि ब्लाग पर प्रकाशित मैथिली गजलक विस्तृत व्याकरण केँ जरूर देखने हेताह। इ उमेद छल जे प्रस्तुत गजल संग्रह मैथिली गजलक नब पीढी लेल एकटा उदाहरण बनत। मुदा एहि संग्रह मे गजलक व्याकरणक जे उपेक्षा भेल अछि, जे गजलकार भूमिका मे स्वयं स्वीकार कएने छथि, निराशा उत्पन्न करैत अछि। मुदा इ संग्रह गजलकारक पहिलुक मैथिली गजल संग्रह अछि, तैँ गजलक व्याकरणक गलती भेनाई स्वभाविक अछि। आशा व्यक्त करै छी जे हुनकर आगामी गजल संग्रह मैथिली गजल मे अपन अलग स्थान राखत। आशीष चमन अन्हारक विरोध मे अरविन्द ठाकुर यदि अपन प्रथम काव्य संग्रह ‘परती टूटि रहल अछि प्रकाशन वर्ष - 1993 के बाद श्री अरविन्द ठाकुर एतेक बरख धरि चुप रहलाह त हुनका प्रति हमर धरणा यैह बनैत छल जे ओ बहुत दिन घरि मोह भंगक स्थिति मे रहल होयताह मैथिली साहित्यक प्रति, जे जेबीक पाइ अकारथ गेल...। मुदा परमात्माक लीला देखल जाउ, ओ पुनः अवतरित भेलाह खूब चमकैत दमकैत संग्रह ‘अन्हारक विरोध् मे’ ल क...। हम स्पष्टीकरण दऽ दी जे हमर धरणा भौतिक उपलब्धिकेँ शून्यता पर छल मुदा जखनि आदरणीय भाइ श्री अजित कुमार आजादक ओहि लिपिबद्ध टिप्पणी पर नजरि गेल जाहि मे ओ लिखित गारन्टी सन देने छथि जे एक बेरि अहाँ मात्र एकटा कथा पढि़ क त देखू, अहाँक पाछाँ पोथी आ पोथीक पाछाँ अहाँ फेभीकोल जेकाँ खरकटि जाएब त सहज उत्सुकता जागि गेल...। जागि गेल ओहि व्यक्तिक प्रति जे सदति हमर नजरि के सोझाँ रहल छथि। जे किसान, दोकानदार आ परिवारिक कर्ता पुरूष रूपें अपन जय-पराजय दुनु के देखैत भोगैत रहल छथि आ चाबस्सी त देखियौक ओहि मर्दे के जे अपन समस्त कार्य व्यापार ओ व्यवहार केँ कोठीक ताक पर राखि अपना केँ खेतिहर कहबाक सामर्थ रखैत छथि जाहि में केवल पराजयक पीड़ा, जीवनक वर्तमान ओ भविष्य अन्ध्कारमय रहैत छैक...। हम बिना आओर बेशी भूमिकाक कहि सकैत छी जे अजित आजाद गँहिकी नजरिबला छथि तेँ ओ एहि कथा संग्रहक एहन तीव्र प्रशंसा कयलनि अछि। एहि संग्रहक पहिल कथा अछि ‘खिस्सा सियार यार। ई कथा, बिहार मे आइ सँ किछु दिन पूर्व धरि जे लालटेन युग छलैक ओहि स्थितिक अयबाक पूर्व सँध्या केँ इंगित क रहल अछि...। व्यंग्यात्मक शैली में लिखल ई कथा मूलतः हमर लोकतांत्रिक परम्परा केँ मरणासन्न अवस्था मे दर्शाबैत अछि, जाहि मे नेतृत्वशून्यताक स्थिति छैक..., सत्ता, संगठन मे गुटबाजी छैक, भ्रष्टाचार केँ आम सहमति भेटल छैक..., पुरान नीति सिद्धान्त केँ माननिहार आइ परिदृश्य मे नहि छथि त सिद्धान्तहीन व्यक्ति सेहो कारूणिक स्थिति में रहि रहि क अबैत अछि...। एहि दुनू प्रकारक व्यक्तिक चरित्र चित्रण करबा मे रचनाकार तखनि सफल भेलाह जखनि नबका छओड़ा रामसोगारथ मंडल केँ कहैत अछि जे ‘नबका जमानाक नारा लगाबू...।’ माने सत्ता प्रतिष्ठानक अध्ष्ठिाताक जयकार करू त बूढ़ असोथकित मंडलजी उपेक्षा सँ प्रतिकार करैत छथि। आइ लुच्चा लफाँडि़ अपराधी तत्व सभ निर्णायक आ नियन्ता बनल अछि आ सुच्चा जनसेवक सभ करोट लागल छथि...। एहि कथाक मूल तत्व यैह अछि, कथावस्तु प्रायः नवीन नहि अछि..., ई समस्या समान्यतः सभ केओ अवधारि नेने छथि तथापि प्रायः एक्कहि साँस में ई कथा लिखल गेल अछि एकदम निस्पृह ओ असम्पृक्त भ’ क’ तेँ कथा बहु रूचिगर। कथाकार अपन क्षमता आ अनुभव संग न्याय क लेलनि अछि। ‘‘पिआसल पानि’’ कथाकारक ओ रचना अछि जाहि मे हम अपन परिवेश, जाहि में रचल-बसल छी तकरा प्रति एकटा हीनता बोध होअए लगैत अछि...। एहि कथा मे कुल जमा तीन गोट पात्र छैक, प्रधानतः जाहि मे ‘‘नारायणपुरवाली’ ’ केन्द्रीय अछि...। कथा मुख्यतः नारायणपुरवालीक चारूकात घुमैत अछि आ अपना सभक सामाजिक पाखण्ड पर सेहो फोकश दैत अछि...। हमर समाज स्त्रीक मामिला में बड्ड कोनादन रहलैक अछि, एकसरि पयला पर चीड़-फाडि़ क काँचे खा जयबा लेल उताहुल...। एहिठाम स्त्रीक दुइये गति होइत अछि, ओकरा संग बलात्कार करू जेना किछु मास पूर्वहि आ एखनि किछु दिन पहिने एक गोट स्त्री ससुर पर्यन्त सँ बलत्कृत भेलैक अछि, आ नहि त ओकरा विभिन्न कारण सँ व्याभिचारिणी घोषित क दिऔक...। नारायणपुरवाली बलत्कृत त नहि भेलि मुदा ओ हत्भागिनी छलि जे ओकर स्वामी ओकरा भरि पेट अन्न नहि द सकल त ओ गिरहथ ओतऽ कमाब जा लागलि ओ संगहि अपन पति सँ दैहिक सुखो सँ वंचित छलि। विडम्बना त देखू जे प्रारम्भिक अवस्था में नारायणपुरवालीक प्रति एकटा वितृष्णाक भाव जगैत छनि गिरहथ राजा बाबू केँ, जे ई स्त्री की थिक त चरित्राहीना..., पाठकगणपर्यन्त नहि बूझि पबैत छथि आ अन्त में ओ स्त्री निराश भ पड़ा जाइत अछि, त ओकर स्वामी लखना दोसर बिआह करैत अछि। ओकर दोसरकी स्त्री केँ बच्चा होनहारी छैक ई सूनि लखना अपन कप्पाड़ पफोडि़ लैत अछि जे ई हमर जनमल नहि अछि। आ प्रथमतः पर्दापफाश होइत अछि जे लखना नपुंसक अछि त अचानक नारायणपुरवालीक प्रति सभक करूणा जागि जाइत छैक जे ओ बेकसूर छलि...। ओकरा प्रति समाजक ई बदलल धरणा रामचरण केँ प्रवक्ता बना स्थापित कयल गेल छैक...। एहिठाम कतेको प्रश्न उठैत अछि जे हमर सामाजिक मान्यता सेँ ढ़ाही लैत अछि जे एहि स्थितिक जिम्मेदार के ? स्वभाविक रूप सेँ पुरूष प्रधन ई समाज। जे पुरूष अपन पत्नी केँ कमा क खुआ नहि सकैत अछि, ओकर दैहिक आवश्यकता केँ पूरा नहि क सकैत अछि, तकर पत्नी केँ चरित्राहीन घोषित करू आ पुनः ओहि व्यक्ति केँ पाग, दोपटा, मौर पहिरा दोसर स्त्रीक वध करू वा कराबू...। मुदा हमरा नारायणपुरवाली कायर लगैत अछि..., ओ कियैक पड़ाइलि ? गिरहथ नहि त, आन दोसरे केकरो पकडि़त भागैत नहि, वरन् ओहिठाम स्थापित भ रहैत आ साँयक कमजोरी क ओकर पाखण्ड क जगजियार करैत जे लखनाक दोसर बहु क सकबा में सफल भेलि...। त ई कथा नीक सुतरलनि अछि रचनाकार केँ आ सत्तहि अन्हारक विरोध मे ठाढ़ छथि ओ पेट्रोमैक्स ल ‘क’....। कथा पाठ केरि क्रम मे जखनि हम कथा ‘अन्हारक विरोध मे’ क देखैत छी त हमरा स्वाभाविक रूपे ई भान होइत अछि जे कथा कखनहु काल क बनाओल सेहो जा सकैत अछि...। कथाक केन्द्रीय पात्रा सूत्रधारक रूप में स्वयम् रचनाकार छथि...। ओ जे घटनाक भूगोल केँ दर्शोलनि अछि ताहि सँ ज्ञात होइछ जे ओ कुजड़टोलीक कातहि मे बसल छथि, संगहि इहो ओ देखबैत छथि जे ओहि समाजक जनानी सभ भरि दिनुक मामिला क नून तेल सानि क देर राति मे घुरैत अपन-अपन साँय क सुनबैत अछि...। तकर बाद कचका ताड़ी पीने कुजड़ा सभ अपना मे गारि-गंजन, मारि-पीट करैत रहैत अछि आ रातिक नीरवता भंग होइत रहैत अछि प्रायः। मुदा हमरा जनैत कथा लिखबाक हड़बड़ी में रचनाकार कतहु-कतहु चुकि गेलाह अछि कियैक त ओ कहैत छथि ‘सभ राति स्त्री पुरूष सभ मारि-पीट करैत झौहरि करैत रहैत अछि आ तकरा ओ सामान्य रोजनमचा सन मानने छथि, माने अपन स्वीकृति द देने छथि मुदा ओहि राति ओ कियैक बहरेलथि ? जखनि की ओ हंगामा सभ केँ सामान्य सन मानैत छथि...। पुरूषवर्ग लड़ैत छैक अपना मे त जनानी सभ ओहिना चिकरैत छैक- ‘हौ बचाब..., मारि देलकैक..., लूटि लेलकै...।’ ई कथाक मादे सामान्य सन गप्प भेल मुदा एकर दोसरो पक्ष अछि जे एकर उपादेयता केँ रखैत अछि। लेखक एहि कथाक माध्यमे सामाजिक भाइचारा जाहि मे सभ एक दोसराक भाइ बहिन, माम, पित्ती अछि, धर्मिक, आर्थिक देवाल केँ तोडि़ क , तकरा दर्शोलनि अछि आ ताहि मे कमोबेश सफल रहलाह अछि...। ई कथा प्रायः हुनक उन्मेषकाल केँ दर्शाबैत अछि...। अध्ययन यात्राक क्रम मे हमरा जाहि चीज सभ स बेसी अखरल ओ अछि तारतम्यताक अभाव... एहि संग्रह मे ‘‘मूस’’ पहिने आयल अछि ‘‘अय्यासी’’ बाद मे....। हमरा विचार सँ ‘‘अय्यासी’’ के ‘‘मूस’’ स पहिने राखल जयतैक त दुनू कथा अपन अनिवार्यता केँ आओर बेसी सुसंगत बना सकैत छल...। कथा आब उद्देश्यपरक ओ उपदेशपरक भ गेल अछि तेँ...। चूँकि हमर अप्पन मान्यता अछि त हम ‘‘अय्यासी’’ के ‘‘मूस’’ स आ ‘‘मूस’’ के ‘‘अय्यासी’’ संग गेठजोड़बा क रहल छी...। अय्यासीक प्रधानपात्र अपन घरक कर्ता-धर्ता छथि, पत्नी छनि, पुत्र छनि, स्वयं अपने छथि, घरक खर्च छनि..., पत्नी केँ आवश्यकता छनि गैस चुल्हा के, पुत्र के चाही काँपी, पढ़ब लेल, अपनो मनोरथ छनि, मैगजीन पढ़ताह, दोस्तक संग सिकरेट पीताह..., घर मे तीमन तरकारीक खगता छनि ताहि पर ओ तेना ने लहोछि के बजताह जे श्रीमतीजी अपरतीव भ जाइत छनि, बच्चा सेहो आतंकित छनि हुनक मुख मुद्रा सँ...। मुदा अपना टाका ल’ क’ पत्रिका कीनैत छथि, सिकरेट कीनैत छथि, रिक्शा यात्रा करैत छथि...। वस्तुतः हम सभ एखनहुँ अपन आदिम भावना केँ प्रायः प्रकट करैत रहैत छी... जाहि मे हम अपना सँ दुर्बल मातहत केँ दबोचि क रखैत छी..., मुदा रचनाकार संवेदनशील छथि तेँ ओ मुख्यपात्र केँ अन्ततः विगलित देखबैत छथि...। ओ केन्द्रीय पात्रा के अन्ततः ई भान करबा देबा मे पूर्णतः सपफल होइत छथि जे ई समस्त कार्य-कलाप जाहि मे ओ अपना आप केँ खर्च कयलक अछि अन्ततः अर्थहीन अछि ओ हितगर नहि, सर्वथा गैर जिम्मेदार छथि...। एहि कथा अय्यासीक पूर्णता हमर दृष्टि मे ‘‘मूस’’ पर जा क होइत अछि...। दुनू कथा मादे पता नहि कियैक हमरा लगैत अछि जे दुनू केन्द्रीय पात्रा आ ओकर परिवेश दुनू परस्पर मिज्झड़ सन छैक...., एक पढ़ू आ दोसर केँ पढ़बैक त लागत जे - ‘अरे! इ मूस कथा त अय्यासीक उत्तर कथा अछि..., ठीक ‘‘गतांक से आगे’’ के स्टाइल मे...। देखल जाइ त अय्यासीक मुख्य पात्रा मूसो मे ओहिना ‘‘वर्कलेस’’ छथि, हाँ आब ओ सोझ हुड़दंगी नहि अछि... ई जरूर जे ओ जमीन बेचि क स्कूटर लेलक अछि मुदा पेट्रोल खर्चक चिन्ता जरूर ओकरा मे छैक, ओकरा रोजी रोजगार के चिन्ता छैक, व्यवसाय कर्ज ल’ क’ कयने छलैक से मूलधन आब सूदि जोडि़ क पँचगुन्ना भ गेलैक अछि, लोक हँसैत छैक अलग, भाइ जे छैक सेहो एकदम्म गैर जिम्मेदार.... ओ पफटोपफट्ट मे अछि कोना जीवन जीअत ? खन ओ मार्केटिंग काँम्प्लेक्स, खन सिनेमाहाल त खन हालसेल दबाइ विक्रेता बनबाक लेल विचारमग्न अछि...। कुल्लम ई जे आब अय्यास व्यक्ति सद्गृहस्थ बनबाक प्रक्रिया मे अछि..., मुदा बाट नहि भेट रहल छैक...। कथा अपन ऊँचाइ पर तखनि सांकेतिक दृष्टि सँ अबैत अछि जखनि ओ अपन बुनल काल्पनिक संसार मे देखैत अछि कर्मठ मूस सभक बनाओल बिहरि मे एकटा अजोध विषधर अबैत अछि आ बलात् ओहि मे पैसि जेबाक यत्न क रहल अछि...। ओ विषधर अछि, ओकरा विशालकाया छैक, ताकतवर अछि, मुदा ओ की नहि अछि त पुरूषार्थी..। ओकर तुलना मे वएह हीन, स्वेदकणयुक्त मूस बेसी आकर्षक छैक, कियैक त ओकर जीवन बेश जीवन्त छैक... आ नायक के नजरि अपन पिताक फोटो पर जाइत छैक त ओकरा होइत छैक जे ओहो वएह मूस छलाह जे अपन अध्यवसाय सँ धनार्जन कयलनि हमरा लेल..., एकटा हम छी जे साँप जेकाँ सभ साधन सँ युक्त भेलाक बादहु रचनात्मकता सँ हीन छी, एना कियैक ? हम कियैक एहन छी जे पिताक सम्पत्ति केँ बेचि क गाड़ी लैत छी, त बैंक कर्ज अदाए करैत छी..., दोकान नहि चला पबैत छी, हम कर्महीन छी कर्महीन....। एकटा ग्लानि ओकरा आब चोट द रहलैक अछि आ ओ आब उठैत अछि संकल्पक संग आ केवाड़ फोलैत अछि, अपन खुरपी लैत अछि, तखनि जे नव आ टटका हवा छैक से बन्न कोठली केँ ऊर्जा स भरैत छैक...। वस्तुतः ओ हवा अछि कर्मशक्ति सँ भरल जे एकटा कर्महीन केँ कर्मठ बना दैत अछि...। ई कथा मनुक्खक स्वभाव केँ चित्रित करैत अछि। ई कथा मनुक्खक नैसर्गिकता केँ अद्वितीय रूप सँ चित्रित करैत अछि जे मानव दर्शन मे अछि चरैवेति - चरैवेति...। ई कथा सवोत्कृष्ट अछि आ रचनाकार केरि प्रखर अनुभूति, प्रतिभाक संगहि जीवनक प्रति हुनक प्रचण्ड आस केँ इंगित करैत अछि...। संकलन यात्राक मध्य मे दुइटा कथा आगाँ अबैत अछि-प्रथम ‘‘ढ़ाँचा 1992’’ आ दोसर अछि ‘‘प्रजातन्त्र परिकथा’’। दुनू दुइ अलग-अलग कलेवर सेँ युक्त...। एकर विस्तार पर चर्चा बाद मे, पहिने एहि कथा संकलनक एक गोट मोहक आकर्षण पर हमर संक्षिप्त टिप्पणी ई जे ई संग्रह ‘‘आल इन वन’’ सन लगैत छैक...। प्रथम कथा ‘‘खिस्सा सियार यार’’ शुद्धतम रूप सेँ व्यंग्य मिश्रित हास्यक श्रेणी मे अवैछ, स्मरणीय अछि जे एहि विधा मे मैथिली मे बहुत कम रचना भेल अछि, कथा पढ़बैक त बहुतो काल धरि बिसबिस्सी सन लागत। आगाँ बढ़ू, त ‘‘पिआसलि पानि’’ सन विचारोत्तेजक रचना सेँ भेंट होइत अछि। पुनः आगाँ बढ़ला पर ‘‘मूस’’ आ ‘‘अय्यासी’’ सँ भेंट होइत अछि। एकर विषय मे आर विशेष की कहू, हमरा लगैत छल जे कथाकार संकलन मे श्रेष्ठ द‘ चुकल छथि मुदा हुनक झोरा मे बहुतो रास माल छनि...। ‘‘ढाँचा 1992’’ शिल्पक दृष्टि सँ आकर्षक अछि। पत्र लेखनक एकटा विद्या छैक जेकरा मैथिली मे बहुत कम्म स्थान भेटलैक। मुदा हम तीनटा पत्रक शैली मे लिखल रचना देखि चुकल छी आ सेहो मैथिलीक दुइ जाज्वल्यमान नक्षत्रा डा. हरिमोहन झा ओ स्व0 मणीन्द्र नारायण चौधरी उर्फ राजकमल द्वारा रचित...। जतऽ डा0 झा ‘‘पाँच पत्र’’ ओ ‘‘रसमयीक ग्राहक’’ मे अपन बात केँ विनोदक शैली मे लिखलनि अछि ओतहि राजकमल अपन ‘‘पाँच पत्र’’ मे ममता, दारिद्रय, अभाव बिछोह केँ चित्रित कयलनि अछि। भ सकैत अछि जे आनो रचना एहि शैली मे आओल होइक मुदा से हमर सोझाँ नहि आबि सकल अछि, मुदा ई दुनू रचनाकार अपन रचना बलेँ माइल स्टोन छथि...। एहि शैली मे ‘ढ़ाँचा 1992’ लिखल गेल अछि जाहि मे समष्टि रूपेँ एकटा राष्ट्र, एक राष्ट्रीय उपराष्ट्रवादक पीड़ा, ओकर जय, पराजय, ओकर इतिहास केँ अपन-अपन दृष्टि सेँ देखबाक प्रयत्न कयल गेल अछि। एहि कथा मे राष्ट्रीय पीड़ा केँ व्यक्तिगत पीड़ाक रूप मे अभिव्यक्त कयल गेल अछि...। अफसोच एहि बात के अछि जे स्व0 गणेश शंकर विद्यार्थी आ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधीक बाद केओ एहि समष्टि पीड़ा केँ वैयक्तिक पीड़ा मे बदलि सकबाक सामरथ नहि प्रदर्शित कयलनि....। एहि राष्ट्ररूपी शरीर जाहि मे अनेकानेक व्याधि ; अबैत रहैत छैक, मारिते रास चाक-चौबन्द सुरक्षाक बादो तकरा हल करबा लेल कोनहुटा सर्वमान्य ओ सर्वग्राह्य उपचार नहि निकलि सकल अछि आ हमर सामाजिक ढाँचा भीतरे-भीतर घुनाइत अन्ततः माटि मे मीलि जाइत अछि आ हम सभ मात्रा ओहि विडम्बना पर अपन कप्पार पीटि क रहि जाइत छी....। मुदा कने विलमि जाउ। लेखक केर वैचारिक श्रृंखला भंग नहि भेलनि अछि। जतय ‘‘ढाँचा 1992’’ मे लेखक सामाजिक चेतना केँ लुप्तप्राय देखौलनि अछि ओतहि एहि भकोभन्न अन्हार मे एकटा छोट छीन डिबिया ल’ क’ ठाढ़ छथि ‘‘प्रजातंत्र परिकथा’’ मे। स्थिति प्रायः समाने छैक दुनू कथा मे, मुदा ओकर अन्वेषण ओकर हल करबाक शैली अलग-अलग अछि...। जतय ‘ढाँचा’ कथा मे उन्मादी भीड़ कुटिल नेतृत्व द्वारा संचालित भ आदमखोर बनल अछि, जत राजसत्ता तूर तेल ल’ क’ सूतल अछि आ एक गोट सांस्कृतिक ऐतिहासिक प्रतीक चिन्ह मेटाओल जा रहल अछि, ओकर ठीक विपरीत ‘प्रजातंत्र परिकथा’’ मे एकटा संवेदनशील प्राणी द्वारा भीड़ संचालित भ रहल अछि...। एहू कथा मे उन्मत राजसत्ता छैक, कुटिल नेतृत्व वर्ग छैक, मुदा एकर विरोध मे ठाढ़ अछि एकटा सजग प्रहरी जे ओहि समस्त वर्ग पर भारी आ हावी रहैत छैक। ई व्यक्ति ‘‘ढाँचा 1992’’ मे निपत्ता अछि...। ‘‘ढाँचा 1992’’ के संवेदना, आत्मचिन्तन, आमोद-प्रमोद मे लीन आत्मरतिक शिकार एक निवीर्य बौद्धिकक हाथ मे छैक त ढाँचा खसि जाइत अछि, मुदा जखनि ओ व्यक्ति उठि जाइत अछि त हमर प्रजातांत्रिक मूल्यक संरक्षणे टा नहि ओकर विकास सेहो होइत अछि...। दुनू कथा बहुत सशक्त बनल अछि अपना आप मे....। कथा संग्रह अपना आप मे लगैत अछि जे ई कथा एवं उपकथा मे विभाजित अछि...। आदरणीय स्व0 प्रभाष कुमार चैध्री ‘‘अप्पन लोक’’ मे लिखैत छथि जे हम आ बैजू भैया परस्पर अभिन्न छलहुँ। आगाँ ओ अप्पन आ भाइक तुलना क्रमशः इंजन आ डिब्बा सेँ करैत छथि...। तहिना लगैत अछि जे एहि कथा-संग्रहक लेखक जे गप्प कह चाहैत छथि से ओ दृष्टिपफलक केर व्यापकता ओ संवेदनशीलताक कारणे एक गोट कथा मे नहि कहि पबैत छथि...। हुनक कथा यात्रा बहुत इत्मीनान संग आगाँ बढ़ैत अछि। ओ अप्पन बात केँ एक कथा ‘‘अथ गिरगिट गाथा’ सँ शुरू करैत छथि आ तकर समापन ‘‘बैकबा फोड़बा’’ मे करैत छथि, एकदम अलिपफ लैला सन...। ‘‘अथ गिरगिट गाथा’’ मे हमर महान ओ पुरान गणतांत्रिक व्यवस्था के कुरूप आनन केँ सार्वजनिक करबाक चेष्टा कयल गेल अछि। ओ व्यवस्था जेकर स्थापना नीक उद्देश्य सँ कयल गेल छलैक से आब पटरी पर सेँ हँटि गेल अछि...। त्याग तपस्याक क्षेत्रा मानल जाइबला राजनीति, शासन ओ समाज नीतिक नियन्ता पहिने नीचा खसल त अपराधी आ गुण्डावर्गक हाथ मे आइलि...। एकरा कमोबेश बर्दाश्त कयल जा सकैत छलैक मुदा आब त एहि बदनाम वर्गक बीच मे ‘स्पाइल्ड जीनियस’ सेहो सभ आबि गेल अछि। वएह ‘स्पाइल्ड जीनियस’ रामलखन पोद्दार दरोगा सँ ल’ क’ दारूबाज, रंगबाज रामलखन पोद्दार अछि। मुक्कन बाबू छथि पुरान आउटडेटेड, आ अपन अस्तित्वक लेल संघर्षरत सुब्रत मुखर्जी सेहो अछि...। इ लोक प्रकटतः सैद्धान्तिक रूपेँ एक दोसराक विरोधी छथि किन्तु तरे तर एक दोसराक हितचिंतक सेहो छथि...। हिनका सभक कुचक्र मे पडि़ नीक नारा हास्यास्पद भ जाइत अछि, लोक सभ मरैत कटैत रहैत अछि। वस्तुतः ई मात्रा एक नगरक टा नहि वरन् सम्पूर्ण देशक गाथा अछि...। कथाकार आगाँ बढ़ैत छथि आ ‘‘बैकबा पफोड़वा’’ नामक कथाक लाथेँ सार्वजनिन चिन्ता केँ व्यक्त करैत छथि। एतहु वएह ‘स्पाइल्ड जीनियस’ सिकन्दर अछि त रामचन्दर मड़रक बेटा कालेश्वर छथि...। एत जत सिकन्दर अपन अतीत सेँ भागि श्रमसाध्य काज कर’ लेल उताहुल छथि ओतहि ओकरा बिनु जानकारी देने ओकर बाहुबल केँ अपन लाभ लेल दोहन करयबला ‘‘भंवरलाल वस्त्र भंडार’’ के मालिक प्रकाश अगरवाल छथि। नतीजा कालेश्वर आ सिकंदर के बीच पाइ असूलीक तगादा दुइगोट रंगबाजक लपफड़ा मे तब्दील होइत-होइत अगड़ा-पिछड़ाक लड़ाइ मे बदलि सम्पूर्ण नगर मे लूटपाट मचा दैत छैक...। ई दंगा वैचारिक समानता केँ सेहो झमाडै़त अछि जखनि पिछड़ा वर्ग सेँ आएल सर्वमान्य सर्वप्रतिष्ठित एक राजनैतिक दलक जिलाध्यक्ष पुरूषोत्तम मंडल मात्रा एहि आकस्मिक घटनाक चलैत अपनहि दलक अगड़ावर्ग सँ आइल कार्यकत्र्ता चिरंजीव सिंह स अपमानित होइत छथि...। लेखक केर चिन्ता आगाँ बढ़ैत अछि आ ओ देखबैत छथि जे वैचारिक दृष्टि सँ दृढ़ व्यक्ति एहि तात्कालिक उन्माद मे तहिना अप्रासंगिक होइत छथि जेना बिहाड़ि मे बगुला.। एहि सभसँ लेखक तीव्र वेदनाक अनुभव करैत छथि, मुदा ओ पुनः आशाक एक किरण देखबैत छथि जे समाजक पैघ वर्ग एखनहुँ एहि वितंडा सेँ दूर अछि आ उत्साहक गप्प ई जे एकर संख्या बेसी छैक...। ई अछि एकटा विशाल श्रमिक वर्ग जेकरा लेल भरि दिनुक मेहनतिक बाद केवल ‘‘नून रोटी आ तानि कमरिया’’ सुतबाक अभिलाषा रहैत छैक। एहि वितण्डा केँ मनोरंजन ओ खेलक रूप देनिहार नव मुकुलित सभ जाति ओ वर्ग सँ आइल बच्चा सभ सेहो अछि...। एहि प्रकार सँ एहि दुनू कथा समेत सम्पूर्ण कथा-संग्रहक विषय मे यैह कहल जा सकैत अछि जे ई नीक ओ बेजाएक परीधिसँ बहुत दूर भ गेल अछि। अनन्य!!! अतुलनीय !!! अद्भुत !!! अद्वितीय !!! डा योगानन्द झा अन्हारक विरोधमे: एक दृष्टि श्री अरविन्द ठाकुर आधुनिक मैथिली साहित्यमे निविष्ट रचनाकारक रूपमे परिचिति बनौने छथि। हिनक एक गोट कविता संग्रह ‘परती टूटि रहल अछि’, एक गोट कथा संग्रह ‘अन्हारक विरोधमे’ आ एक गोट गज़ल संग्रह ‘बहुरुपिया प्रदेशमे’ प्रकाशित छनि। राजनीतिक चेतनासँ ओतप्रोत हिनक लेखन रचनाकारक ओहि प्रतिबद्धताकें इंगित करैत देखि पड़ैत अछि जकर निर्वाह कोनो रचनाकारकें मानव जीवन, समाज, राष्ट्र ओ सम्पुर्णतामे मानवताक हितैषी, मानवीय गरिमाक उन्नायकक रूपमे प्रतिनिधित्व प्रदान करैत अछि। ‘अन्हारक विरोधमे’ कथा संग्रह हिनक दस गोट कथाक संग्रह थिक। कथा सभक शीर्षक थिक क्रमश: खिस्सा सियार यार, पियासल पानि, अन्हारक विरोध मे, ढाँचा-1992, मूस, प्रजातंत्र परिकथा, अथ गिरगिट गाथा, अय्यासी, बैकबा-फोड़बा आ विष-पान। एहि कथा सभक माध्यमे कथाकार आधुनिक परिवेश मे व्याप्त राजनीतिक, सामाजिक ओ प्रशासनिक विद्रुपताक खण्ड चित्र प्रस्तुत कऽ ओकरा प्रति असन्तोष, विरोध ओ विद्रोहक चित्रण मनोवैज्ञानिक विश्लेषणपुर्वक कयलनि अछि। ‘पियासल पानि’ नारी जीवनक करुण कथा थिक। पुरुष प्रधान समाजमे नारी-शोषणक अविशृंखल परम्परा रहल अछि। अन्धविश्वास सँ जकड़ल समाज नारीक मनोभाव केँ कहियो विशेष प्रश्रय नहि दैत रहल अछि आ अपन संस्कारक कारणे नारी निरन्तर उत्पीड़नक शिकार होइत अयलीह अछि। एहि कथाक नायिका नारायणपुरवाली सेहो उत्पीड़नक शिकार छथि। ओ अपन क्लीव पतिक कारणे अपन कामवासनाक परितृप्ति नहि कऽ पबैत छथि आ ओकर आलम्बनक दिस उन्मुख होइत देखि पड़ैत छथि। तथापि सामाजिक व्यवस्थाक कारणे ओ सीदित जीवन जीवैत छथि आ मानसिक रूपें रुग्ण भऽ जाइत छथि। हुनक एहि रुग्णता कें हुनका पर डाकनी सवार होयब बुझल जाइछ आ हुनक झाड़-फूक शुरु कयल जाइछ। भगैत हुनका झोंटा पकड़ि लिरयअबैत अछि, मरचाइक झोंक दैत अछि आ सौंसे पीठक चाम काँच करची सँ पीटि उधेसि दैत अछि। परिणामत: ओ घर छोड़ि पड़ा जाइत छथि आ कुलकलंकिनीक उपाधिसँ विभुषित होइत छथि, अपवाद मे पड़ि जाइत छथि। मुदा हुनक पति लखना कें केओ क्लीव कहि प्रताड़ित नहि करैत अछि। बात तखन फुजैत अछि जखन लखना दोसर विवाह करैत अछि आ एहि दोसर विवाहसँ ओकरा पुत्ररत्नक प्राप्ति होइत छैक। क्लीव लखना ओहि पुत्र कें अनजनुञा जानि अपन दोसर पत्नीक चरित्र पर आक्षेप करैत ओकरा जान सँ मारि देबाक प्रयास करैत अछि। एहि तरहें कथाकार पुरुष प्रधान समाज मे नारी मात्र कें दोषी मानबाक रूढ विचारक प्रतिरोध कय समाज मे नारी-स्वातंत्र्यक स्थापनाक आग्रही देखि पड़ैत छथि। नारी मनोविज्ञानक क्रमिक विकासक दृष्टिञे ई कथा कथाकारक सिद्धहस्तताक परिचय दैत अछि। पोथीक शीर्षक रूप मे व्यवहृत कथा ‘अन्हारक विरोध मे’ स्वातंत्र्योत्तर भारत मे विकासमान सम्प्रदायवाद सँ सम्बद्ध अछि। अनेकता मे एकता भारतीय जीवन-पद्धतिक अन्यतम विशिष्टता थिक। एहि ठाम अनेक धर्म-सम्प्रदायक लोककें आन सम्प्रदायक लोकक संग अपने सम्प्रदायक लोक जकाँ सम्बन्ध रहैत अछि। विभिन्न सम्प्रदायक लोक एक दोसराक दु:ख-सुख, हानि-लाभ, जीवन-मरण मे संग देखि पड़ैत छथि। यैह भावनात्मक समन्वय एहिठामक राष्ट्रीय समन्वयक कारक तत्व थिक। मुदा आधुनिक राजनीति जे वोटक राजनीति थिक, संख्याबलक राजनीति थिक क्रमश: सामाजिक समरसता मे विष घोरि देलक अछि। ई समाज कें छिन्न-भिन्न कऽ रहल अछि। हिन्दू आ मुसलमान कें दू खीमा मे बाँटि देलक अछि। परिणामत: राष्ट्रीय ओ सामाजिक एकता नष्ट भऽ रहल अछि। कथाकार एहि राजनीतिक विद्रुपताक प्रतिरोध करैत छथि। अन्हारक विरोध मे कथाक नायक रंजनक हिन्दू होइतो मुसलमानक बस्तीमे निशाभाग राति मे जायब, ओहिठामक लोक सभक ओकरा प्रति सम्बन्धिक जकाँ व्यवहार तथा अलीमुद्दीनक उक्ति ‘कक्का ! ओहि हरमजादाक खूने गरम भेल रहै त` हमरा मारितय, हम सहि लेतौं। खुदा कसम, हम सहि लेतौं मगर अप्पन टोल मे हमर यारक भाइ…… हमर भाइ कें………आ सभ सँ बढि एक गोट हिन्दू केँ ओ मारलक। बाप-दादाक देल मोहब्बतक तालीम कें माती मे मिला देलक ई हरमजादा। कोन इज्जत रहि गेलै एहि टोलक आ हमरा सभक……।‘मे सामाजिक समरसताक आह्लादकारी आस्वाद भेटैत अछि। दोसर दिस खलनायक बिकुआक कृत्य जे हिन्दू कें नहि केवल मारैत अछि अपितु हिन्दू-मुसलमानक शगुफा छोड़ि दंगा करबय चाहैत अछि, सम्प्रदायवादी घृणाक अभिव्यक्ति थिक। एहि कथाक माध्यमे लेखक ओही सम्प्रदायवादी घृणाक प्रतिकारक संदेश देलनि अछि जे हुनक राष्ट्रवादिताक प्रतीक थिक आ सम्प्रदायवादी राजनीतिक विद्रुपताक प्रति विद्रोही प्रवृतिक निदर्शन सेहो। श्री अरविन्द ठाकुर लोकजगतक अत्यन्त गंभीर पारखी छथि। हिनक कथा ‘विष-पान’ हिनक एहि प्रवृति कें जगजियार कयन्र अछि। साम्प्रतिक न्याय-व्यवस्था कोना अर्थबलक वशीभूत भऽ गेल अछि आ अर्थहीनक हेतु अर्थहीन भऽ गेल अछि तकरा ई एहि कथा मे अभिव्यक्ति प्रदान कयलनि अछि। समाज मे जे गुण्डा तत्व अछि से खुलेआम अपराध करैत अछि आ न्यायप्रणाली ओकर किछु बिगाड़ि नहि पबैत छैक। दोसर दिस पीड़ित व्यक्ति अर्थाभाव मे न्यायालयक प्रक्रिया मे झुरझमान होइत अपन अर्जितो सम्पत्ति बोहाबैत रहैत अछि आ सीदित भेल रहैत अछि। अन्तत: विजय गुंडे तत्वक होइत छैक जे अर्थबल सँ प्रशासन ओ न्यायतंत्रहु कें किनबा मे समर्थ रहैत अछि। ‘विष-पान’क गोपाल जी चतुरानन द्वारा पिटलो जाइत छथि, न्यायालय मे जयबाक कारणे अपन व्यक्तित्वक अवमुल्यन सेहो अनुभव करैत छथि, वकीलक फज्झति सेहो सुनैत छथि मुदा न्याय हुनका सँ दूरे रहैत छनि। जखन कि चतुरानन पाइक बलें ने तं पुलिसक द्वारा पकड़ले जाइत अछि, ने ओकरा विरुद्ध गवाहिये भऽ पबैत छैक आ अन्तत: विभिन्न छल-छद्म द्वारा ओ गोपाल जी कें सुलहनामाक हेतु बाध्यो कऽ दैत छनि। एतावता कथाकार न्यायपालिकाक विद्रुपता पर एहि कथाक माध्यमे कशाघात कयने छथि। ‘अय्यासी’ कथा मे निम्नमध्यवर्गीय जीवनक मनोविश्लेषण कयल गेल अछि। ई कथा समकालीन आर्थिक परिवेश मे जीबैत मानवक संक्रान्त मन:स्थिति कें उजागर करैत अछि। व्यक्ति सापेक्ष ई कथा निम्नमध्यवर्गीय मनुष्यक आर्थिक विडम्बनाक यथार्थ सँ अवगत करबैत अछि। एक दिस ओकरा घर मे दैनन्दिन आवश्यकतोक वस्तुक अभाव छैक तं दोसर दिस बच्चाक शिक्षा हेतु किताब-कापी सेहो ने जुटि पाबि रहल छैक। तथापि ओ अपन शौकक वस्तु सिकरेट, पत्रिका कीनब ओ रिक्शाक सवारी करब नहि छोड़ि पबैत अछि आ आत्मवंचना सँ प्रतारित होइत रहैत अछि। ‘मूस’ कथा सेहो यथार्थक अन्वेषण थिक। एकर पात्र खने पेट्रोलक बढैत दाम सँ खिन्न अछि तँ खने पत्नीक हेतु गैस चुल्हा नहि कीनि सकबाक कारणे चिन्तित। खनहि ओ ड्रग इन्सपेक्टरक भ्रष्टाचारी प्रवृति पर विचार करैत अछि तँ खनहि अपन आर्थिक दु:स्थिति पर जकर कारणे ओकर कतोक मनोरथ पूर होयबा सँ रहि जाइत छैक। अन्तत: ओ अपन सकल दैन्य सँ पार होयबाक एकमात्र उपाय अपन पुरखाक अरजल जमीन कें बेचि पाइ एकट्ठा करबा मे तकैत अछि। मुदा जेँ लऽ कऽ ई ओकर अकर्मण्यताक प्रतीक होइतैक, ओ ओहि जमीन कें जोत-कोड़ कऽ उत्पादन करबाक विचार करैत अछि। एहि तरहें ई कथा वर्तमान कालक युवा लोकनि मे कर्मयोगक प्रति निष्ठाक सिद्धान्त कें प्रतिपादित करैत अछि। एहि कथा मे मूस कर्मशील मानव समुदायक प्रतीक थिक जे सर्वहारा वर्ग जकाँ निरन्तर कर्मठतापुर्वक श्रम कय बीहरि बनबैत अछि आ साप सुविधाभोगी वर्गक प्रतीक थिक जे सर्वहाराक श्रम सँ अर्जित सम्पदा पर छल-बल द्वारा कब्जा कऽ लैत अछि आ ओकर श्रमक शोषण करैत अछि। कथाकार श्रमजीवी मानव समुदायक प्रति एतय संवेदनशील छथि। ‘ढाँचा-1992’ कथा ओहि त्रासद घटना सँ सम्बद्ध अछि जे भारतीय हिन्दू आ मुसलमानक भावनात्मक एकता पर एकटा प्रहार सदृश छल। ई घटना छल बाबरी मस्जिदक विध्वंशक घटना जाहि सँ समस्त भारतीय समुदाय जेना मानसिक रूपें बीमार ओ स्तब्ध रहि गेल छल। एहि कथा मे कथानक सँ बेसी सामयिक यथार्थ कें नूतन शैली मे प्रकट कयल गेल अछि जे पाठककें सहजहिं प्रभावित कऽ दैत अछि। राजनीति व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्रक प्रगति एवं चतुर्दिक विकासक हेतु अत्यावश्यक तत्व थिक्। मुदा वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य अत्यन्त विकृत देखि पड़ैत अछि। जे राजनीतिक चिन्तन सामुहिकता ओ एकताक प्रतीक होइत छल से सामाजिक वैमनस्य, अलगाव ओ पारस्परिक संघर्षकें प्राथमिकता दैत देखि पड़ैत अछि। विभिन्न सामाजिक असमानता कें आधार बना कऽ व्यक्ति-व्यक्ति ओ जातिगत समूहक बीच राजनीति द्वारा जे रेखा खींचल जा रहल अछि से ततेक गहींर भऽ गेल अछि जे परस्पर दुर्भावना, विद्वेष ओ विनाशक प्रवृतिक कारक भऽ गेल अछि। जाति, धर्म ओ सम्प्रदायक नाम पर समाज कें खण्डित कऽ वोटक संख्या स्थिर ओ पर्याप्त करब आधुनिक राजनीतिक धर्म भऽ गेल अछि। जाहि राजनेता कें शासन, सत्ता ओ अधिकारक उपयोग जनताक भलाइ आ कल्याणक हेतु करबाक चाहियनि से अपन क्षुद्र स्वार्थ ओ अहंकारक हेतु व्यक्तिक भावना कें भड़का कऽ सामाजिक ढाँचा कें क्षतिग्रस्त करबापर तुलल छथि। कथाकारक ‘बैकबा-फोड़बा’, ‘खिस्सा सियार यार’, ‘प्रजातंत्र परिकथा’ आ ‘अथ गिरगिट गाथा’ मे आधुनिक राजनीतिक यैह यथार्थ अंकित-टंकित भेल अछि। ‘बैकबा-फोड़बा’ मे सिकन्दर अगड़ा जातिक अछि आ कालेश्वर पिछड़ा जातिक। कालेश्वर एकटा कपड़ाक दोकान सँ उधारी लेने छैक आ सिकन्दर ओहि दोकानक उधारी ओसुलबाक काज करैत अछि। मुदा सिकन्दर जखन कालेश्वर सँ तगादा करैत छैक तँ ओ एकरा अगड़ा जाति द्वारा पिछड़ा जाति कें अवमानित करबाक हवा दैत छैक। परिणामत: कालेश्वर ओ सिकन्दरक बक-झक दुनू जातिक बीच वैमनस्यक कारण भऽ जाइत छैक आ दुनू समूह ओझरा जाइत अछि। वर्तमान राजनीति कोन तरहें जातीय विभेद कें प्रश्रय दऽ समाज कें तोड़ने जा रहल अछि तकर यथार्थपरक दृश्य उपस्थापित करब एहि कथाक उद्देश्य अछि। एहिना ‘खिस्सा सियार यार’ मे निजी स्वार्थक हेतु निरन्तर विभिन्न क्रियाकलाप मे लागल आधुनिक राजनेता सभक चरित्र कें उद्घाटित कयल गेल अछि। एकर पात्र गरीबदास एकटा एहन राजनेताक चरित्रक प्रतिनिधि अछि जे पार्टीक कोनो पैघ नेताक चमचागिरी कऽ कऽ नीक पद प्राप्त कऽ लेने अछि आ चुनावी टिकट प्राप्त करबामे सफल होइत अछि। ओ लायसेंस, परमिट आ चंदा-कमीशनक धंधा कऽ कऽ येन-केन-प्रकारेण जनप्रतिनिधि बनबाक लेल उताहुल अछि। दोसर पात्र राजनाथ झा निरन्तर पार्टीक काजमे लागल रहलोपर अपन पुत्रक हेतु नोंकरी प्राप्त करबामे पार्टी-नेताक अभिरुचि नहि देखि मोहभंग कें अङेजि लैत छथि। तेसर पात्र सदानन्द विद्रोही पार्टीक वाइस प्रेसिडेन्ट बनबाक लेल छात्र संगठन ओ युवा मंच कें हथकण्डा बनौने छथि। चारिम ओ पाँचम पात्र क्रमश: राजमंगल श्रीवास्तव ओ सतीश सिंह परमार अपन स्वार्थसाधन करबाक हेतु फुसिक सहारा लैत छथि। छठम ओ सातम पात्र क्रमश: शनिचर ‘शनि’ आ गणेश गुरमैता आत्मप्रशंसी छथि आ अपन कद बढयबाक हेतु विभिन्न उच्चपदस्थ राजनेता सँ अपन सम्पर्क होयबाक फुसि कथन द्वारा लोक कें मुड़बाक व्यापारमे लागल रहैत छथि। आठम पात्र माखन बाबू एम एल सी बनबाक सपना पोसने छथि आ अपन पुत्रो कें नेता बनयबाक हेतु प्रयत्नशील छथि। एहि तरहें कथाकार अनेकानेक स्वार्थी राजनेता सभक चरित्र प्रस्तुत कयलनि अछि जे सभ पार्टी कार्यालयक कार्यक्रममे समुपस्थित भेल छथि। हिनका लोकनिक चरित्रक अंकन कऽ कथाकार आधुनिक राजनीतिक विद्रूप चेहरा कें समक्ष अनबाक प्रयास कयलनि अछि। स्वार्थपुर्ण राजनीतिक ई यथार्थ व्यक्ति, समाज ओ राष्ट्रक उन्नति, समृद्धि ओ विकासक हेतु उपयुक्त नहि भऽ सकैछ। मुदा कथाकार एकटा एहनो राजनेताक उपस्थापन कयलनि अछि जे स्वतंत्रता सेनानीक रूपमे राष्ट्रक हेतु बलेदान देलाक बादो पेंशन एहि आधारपर अस्वीकार कऽ चुकल छथि जे ओ स्वतंत्रताक युद्ध सम्मानक हेतु नहि अपितु राष्ट्रसेवाक भावना सँ लड़ने छलाह। एतावता कथाकार साम्प्रतिक स्वार्थपुर्ण राजनीति ओ स्वतंत्रता सँ पूर्वक राष्ट्रहितक हेतु राजनीतिक वर्णन कऽ हेय ओ प्रेय दिस पाठकक ध्यान आकृष्ट कयलनि अछि। हेय राजनीतिज्ञ लोकनिक समूहक तुलना ई सियारक समूह सँ कयलनि अछि जे अपन स्वार्थ मात्र मे तल्लीन अछि आ समाज, राष्ट्र कें खखोरि कऽ चिबा जयबाक हेतु यत्नशील अछि। ‘ प्रजातंत्र परिकथा ‘ सेहो राजनीतिक कथा थिक। एहिमे प्रजातंत्रक दुरुपयोगक चित्रांकन भेल अछि। शहरमे अपराधी लोकनि दू टा परिवारक सम्पत्ति लूटि लैत छथि आ एकटा गृहस्वामीक हत्या कऽ दैत छथि। जनिक हत्या कयल जाइत छनि से डाक्टर छलाह आ गरीब सभ कें मुफ्त आ सस्त इलाज करबाक कारणें डाक्टरी व्यवसायमे लागल एहन लोकक हेतु बाधा छलाह जे रोगीक अधिकाधिक शोषण करबाक हेतु कुख्यात छलाह। दोसर गृहस्वामी जनिका ओहिठाम केवल लूटपाट भेल छलनि से राष्ट्रपति पदक प्राप्त सम्मान्य शिक्षक छलाह। एहि हत्या ओ लूटकाण्डक सूचना पाबि पुलिस प्रशासन अपन खानापुर्ति कऽ चुकल छल्। तत:पर केमिस्ट एण्ड ड्रगिस्ट एसोशिएसन एहि हत्याक विरुद्ध जुलूस निकालैत अछि जाहिमे शहरक अधिकांश भ्रष्टेलोकनि सम्मिलित होइत छथि। परिणामत: जुलूसक लोकसभ अनुमंडलाधिकारीक जीप कें क्षतिग्रस्त कऽ दैत अछि आ अनुमंडलाधिकारी कें सेहो कूहि दैत अछि। क्रमश: अनुमंडलाधिकारीक आदेश सँ जुलूसपर लाठी चार्ज होइत छैक आ अनेक एहने लोक प्रताडित होइत अछि जे कानूनकें अपना हाथमे लेबाक दुस्साहस नहि कऽ सकैत छल। पछाति गुंडा तत्व सभक द्वारा पुलिस पर सेहो रोड़ाबाजी होइत छैक। किछु गोटे गिरफ्तार होइत छथि। ओहि गिरफ्तार लोकसभ कें छोड़यबाक हेतु प्रशासनक संग वार्ता कयल जाइत छैक आ प्रशासन ओकरा सभ कें छोड़ि कऽ जुलूस आ नारेबाजी सँ त्राण पबैत अछि। एहि तरहें ई कथा प्रजातांत्रिक व्यवस्थामे सामाजिक-सार्वजनिक हितक हेतु कयल गेल प्रयास कें नेतागिरीक धंधा किंवा निजी उद्देश्यक हेतु कयल गेल अनुशासनहीनताजन्य अराजकता ओ भटकावक चित्र प्रस्तुत करैत अछि जे साम्प्रतिक राजनीतिक यथार्थ थिक। ‘ अथ गिरगिट गाथा ‘ सेहो राजनेतालोकनिक अपन स्वार्थपुर्तिक हेतु भ्रष्टाचरणक अतिरेक कें उद्घाटित करैत अछि। एहि कथाक पात्र मुकुन्द जायसवाल आ रामलखन पोद्दार परस्पर विरोधी छथि आ हिनका दुनूक समूहक बीच निरन्तर मारि-पीट होइत रहैत छनि जाहि सँ शहर अशांत रहैत छैक। मुदा जखन नगरपालिकाक चुनावक अवसर अबैत छैक तँ ई दुनू परस्पर यारी कऽ लैत छथि आ जाहि वार्डमे जनिक समर्थकक संख्या अल्प रहैत छनि ताहि वार्डमे अपन प्रतिद्वन्दीक समर्थन कऽ दैत छथि आ दुनू गोटे नगरपालिकाक क्रमश: चेयरमैन आ वाइसचेयरमैन बनि जाइत छथि। एतावता संकलनक कथा सभकें पढला उत्तर ई स्पष्ट होइत अछि जे श्री अरविन्द ठाकुर कथालेखन मे वस्तुवादी ओ वास्तविकतावादी छथि। ई यथार्थकें यथावत प्रस्तुत कऽ ओकर विरूपताकें पाठकीय संवेदना सँ जोड़ि लोकजगत मे व्याप्त विसंगति सभ पर कशाघात करैत छथि। वस्तु, पात्र, परिवेश ओ घटनाक निर्माण मे अपन कुशलता द्वारा ई कथाक मूल कथ्य कें सहृदयजनसंवेद्य बना दैत छथि आ सामाजिक- राजनीतिक जगत मे व्याप्त विसंगति सभहिक पोल खोलि ओहिमे सुधारक हेतु सुझाव किंवा चिन्तन प्रस्तुत करैत छथि। जगदीश चंद्र ठाकुर"अनिल" अरविन्दजीक आजाद गजल मैथिलीयोमे गजल पर खूब काज भेल अछि आ एखनो भ’ रहल अछि। गजेन्द्र ठाकुर गजलक व्याकरण विस्तार सँ प्रस्तुत केलनि आ अपनो बहुत गजल लिखलनि. आशीष अनचिन्हार मैथिली गजल ले’ स्वतंत्र साइट बनाक’ व्याकरण कें स्थापित करबामे अपनो योगदान करैत अपनो बहुत गजल लिखलनि आ आओर बहुत गोटे सँ गजल लिखबौलनि आ से काज एखनो क’ रहल छथि हिनका दूनू गोटेक अतिरिक्त आर बहुत गोटे मैथिली गजलकें समृद्ध करबामे योगदान क’ रहल छथि।ई प्रसन्नताक बात थिक। हमरा जनैत गजलकारक मुख्य तीनटा वर्ग अछि। एक वर्ग ओ अछि जाहिमे रचनाकार पहिने गजलक व्याकरण पढलनि आ तकरा बाद ओही अनुसारे गजल लिख’ लगलाह. दोसर वर्गमे ओ गजलकार सभ छथि जे पहिने गजल लिख’ लगलाह , बादमे गजलक व्याकरण दिस घ्यान गेलनि आ ओहि अनुसारे लिखबाक प्रयास कर’ लगलाह. तेसर वर्गमे ओ लोकनि छथि जे गजल सूनि क’, पढि क’ लीख’ लगलाह आ लीखैत चल गेलाह, पाछां उनटि क’ नहि तकलनि.ओ मात्रा अथवा वर्ण गनि क’ षेर लिखबाक-कहबाक चक्करमे नहि पडि अपन बातकें केंन्द्रमे राखि धडाधड लिखैत चल गेलाह आ लिखैत जा रहल छथि। ‘बहुरूपिया प्रदेशमे’ मात्र 24 दिनमे लीखल गेल 66टा गजलक संग्रह थीक जाहिमे गजलकार अरविन्द ठाकुरजीक कथन पर ध्यान देल जाए: ‘हम जे कहय चाहैत छी से महत्वपूर्ण छैक,ताहि लेल व्याकरण टूटय कि विधा विशेषक मापदंड,तकर हमरा परवाहि नहि अछि। ओकरा भल चाही त’हमर सहायक हुअए,बाधा ठाढ नहि करए ।’ गजलकारक एहि कथनकें ध्यानमे राखि जँ हिनक गजल पढब त नीक लागत। 66 टा गजलमे 10टा गजल एहेन अछि जाहिमे रदीफ अछि,काफिया नहि. 16 टा एहेन अछि जाहिमे काफिया अछि,रदीफ नहि. 40 टा गजलमे रदीफ आ काफिया दूनू अछि. किछुए गजल एहेन हएत जाहिमे बहरसँ सम्बन्धित दोष नहि हो.मुदा,बहुत रास शेर सभमे जे बात कहल गेल अछि से व्याकरणक त्रुटिकें झांपन देबामे बहुत समर्थ लगैत अछि.सभ गजलक अंतिम शेरमे गजलकारक नामक प्रयोगक प्राचीन परंपराक निर्वाह नीक जकाँ कएल गेल अछि जे बहुत गजलकार नहि क’ पबैत छथि. गजलकारक समक्ष सामाजिक,राजनीतिक आ सांस्कृतिक चेतनाक अवमूल्यनक विषाल क्षेत्रक अनुभवक संपदा छनि जे जहां-तहां विभिन्न गजलक विभिन्न शेर सभमे प्रगट भेल छनि।एकर बानगीक रूपमे प्रस्तुत अछि निम्नलिखित किछु शेर: दूध लेल नेना आ रोगी हाकरोस करत नै जखन गाममे मालक बथान रहत एहि समाजक रूढि भेल अछि घोडनक ओछाओन सन प्रेममे भीजल बतहबा ताहिपर ओंघरा रहल अछि गाममे डिबिया जरल अछि रातिसं लडबाक लेल मेट्रोपॉलिटन टाउनमे अछि राति दुपहरिया बनल पात बिछैबाक बेर लोकक करमान छल यार सभ अलोपित भेल ऐंठ उठेबाक बेर रातिक जे एकबाल बढल दुर्लभ सगर इजोरिया भेल संसद केर फोटोमे किछुओ नहि हेर-फेर सांपनाथ, नागनाथ,इएह दुनू बेर-बेर कार खोजै छै एम्हर फूटपाथ पर सूतल षिकार यम अबै छथि एहि नगर विभिन्न वाहन पर सवार संसदमे घुसिआयल जे सात जनम लेल केलक जोगार गजलकारक भयंकर आत्मविष्वास एहि षेर सभमे देखू: धन्य ‘अरबिन’तों एलह गजलक जगतमे फेर केओ ‘खुसरो’की तोहर बाद हेताह नै पाठक के चिन्ता अरबिन नीक गजल के पढबे करतै एहने आर बहुत रास नीक-नीक शेर वला गजल पढबाक लेल देखू श्री अरविन्द ठाकुरक रचल आ ‘नवारंभ’ द्वारा 2011 मे प्रकाशित आ बहुत सुंदर कागतपर ‘प्रोग्रेसिव प्रिंटर्स’, नई दिल्ली द्वारा बहुत सुंदर मुद्रित गजल संग्रह ‘बहुरूपिया प्रदेशमे’। अन्तमे हम गजलकारक उक्तिक उल्लेख कर’ चाहब: ‘.......हाथक जेना सभ बान्ह टूटि गेल । एहन धारा-प्रवाह जे गजलक मिसरा,शेर,रदीफ,काफिया,बहर,गिरह सभकें सम्हारब कठिन....’ भरिसक, इएह कारण थीक जे गजेन्द्र ठाकुरजी द्वारा हिनक गजल सभकें आजाद गजल कहल गेल अछि। हम एहि विचारसँ सहमत छी। योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ अन्हारक रखवार प्राकृतिक नियम छैक अन्हार स्थायी नहि होइत छैक। अन्हार आ इजोतक चक्र चलैत रहैत छैक। मुदा समाज मे पसरल अन्हार लगैत अछि प्रकृतिक एहि नियम कें नहि मानैत अछि। अन्हार मात्र रातिए टा कें नहि होइत छैक। जखन प्रशासन तंत्र कानून व्यवस्थाक प्रति उदासीन भs जाइत छैक अथवा पक्षपातपूर्ण आचरण मे लागि जाइत छैक तखन दिन देखार अन्हार पसरि जाइत छैक। तखन लगैत छैक जे प्रशासन तंत्र समाजक अबांछित तत्वक संग मिल कए अन्हारक रखवार भs गेल। आ तें अरविन्द ठाकुरजी अन्हारक विरोध करबा लेल फाँड़ कसलनि। अन्हारक एहि विरोध मे हुनका भेटैत छनि नायक अलीमुद्दीन “…कक्का, ओहि हरामजादाक खूने गरम भेल रहै तs हमरा मारितए, हम सहि लैतौं। खुदा कसम, हम सहि लैतौं मगर अप्पन टोल मे हम्र यार भाइ कें …. हम्मर यार भाइ कें … आ सब सॅं बढ़ि कए एक गोट हिन्दू कें ओ मारलक। बाप दादाक देल मोहब्बतक तालीम कें माटि मे मिला देलक ई हरामजादा। कोन इज्जति रहि गेलै एहि टोलक आ हमरा सबहक ?” नायक अलीमुद्दीन ताड़ी दाड़ू पीबि मारि पीट झगड़ा झाँटी केनिहार एकटा हाड़ मांसक मनुक्ख नहि अपितु एकटा संस्कार, एकटा विचारधाराक द्योतक भेल अछि। समाज मे अलीमुद्दीन बहुत छैक, गाम गाम मे छैक जतए हिन्दू मुसलमान सैकड़ो साल सॅं एक ठाम रहि रहल अछि। कोनो हिन्दू किसानक हरवाह आ कि जन मजदूर मुसलमान भेनाइ कहियो ककरो अखरलै नहि, आ ने मुसलमाने नबाबक राज मे हिन्दू रैयत कें सुख सॅं रहबा मे बाधा एलैक। मुदा जकरा फूटक दोकान चलेबाक छैक आ ओही मे राजनीतिक रोटी पकेबाक छैक तकरा लेल अलीमुद्दीन नहि, बिकुआ सॅं काज छैक। ओहने लोक बिकुआ कें आगाँ बढ़ेबा लेल सहायता सेहो करैत छैक। एही सम्बन्ध मे एकटा घटना मोन परैत अछि। हमरा गाम मे पैघ मुसलमान टोल छैक जाहि मे गरीब धनीक सब तरहक लोक छैक। ओही मे कियो जेठरैयत सेहो कहबै बला भेलाह, मुखिया सरपंचक पद सेहो सुशोभित केलनि। एहने टोलक एकटा गरीब नवयुवक कें देखल हाट पर लोक कें ‘जय रामजी’ कहि अभिवादन करैत। शहर मे बहुत दिन रहलहुँ से गामक लोकक बीचक आपसी सौहार्दक बात बहुत किछु बिसरिये गेल छलियैक। कने कालक लेल हम अकचका गेलहुँ – रहमतबा बताह तs ने भs गेलैक ? जय रामजी बाजि रहल छैक। सुनलियै ओकरा मसजिद मे एक दिन अजानक बेर मुल्ला टोकि देलकै जे ई ठीक नहि करैत अछि। ओ एकदम मुहँफट जकाँ जबाब देलकै “हौ तों अपन अजान सॅं मतलब राखs, हमरा नहि पढ़ाबs जे हम कोना बाजी। जय रामजी बजला सॅं मुँह मे घाव भs जेतै की ओतबे सॅं हमर धरम चलि गेलै की ?” आ से रहितै तs की बाबा अमरनाथक सेवक कोनो मुसलमान होइतए ? छोट बात मुदा गम्भीर विचारक मसाला। बहुत बेसी तीरब एहि लेख कें तs साम्प्रदायिकताक आरोप लागि जाएत। मुदा सत्य ई जे दूनू पक्षक जनसाधारण्क लेल नित्यक्रिया मे धर्मक देवाल कहाँ ठाढ़ होइत छैक ? अन्हार पसारनिहार आ देवाल ठाढ़ केनिहार तेहल्ले होइत छैक। अन्हारक स्वरूप किछुओ भs सकैत छैक। गोपालजी कें आशा छनि “…ई साँच अछि जे भ्रष्टाचारक अन्हार बेस तेजी सॅं पसरल अछि मुदा एहि घटाटोप अन्हार मे न्यायपालिकाक प्रज्ज्वलित दीप भ्रष्टाचार लेल चुनौतीक रूप मे मौजूद अछि आ देखबै अहाँ सब जे एक दिन ई प्रज्ज्वलित दीप भ्रष्टाचारक पसरल गुज्ज अन्हार कें समूल नष्ट कs कए छोड़त।” मुदा गोपालजीक आशा टुटि जाइत छनि। कारण न्यापालिकाक हाथ पैर फेर प्रशासन तंत्रे होइत छैक आ कि बदनाम वकील समुदाय। जज की करतैक यदि दरोगा ठीक सॅं केस एन्ट्री नहि केने रहतैक अथवा गवाह कें रस्ता सॅं हटा देल गेलैक? अनेको उदाहरण छैक जे साक्ष्यक अभाव मे पैघ पैघ अपराध मे सजा नहि भs पबैत छैक। अन्हार सॅं मुक्तिक शपथ लैयो कए बेचारा जज असहाय भs जाइत अछि। अन्हारक रखवारक रूप मे अरविन्दजी कें ओ पत्रकारो भेटैत छथिन जे समाचार कें मोड़ि तोरि कए पस्तुत करैत छथि। जतए लोक पत्रकारिताक चोला ओढ़त मात्र अपना कें बचबैक लेल ओतए अन्हार कें पसरैत रहबा सॅं के रोकतैक ? इएह कारण छैक जे सब प्रमुख राजनीतिक दलक अपन अखबार रहैत छैक, जाहि मे ओहने खबरि छापल जाइत छैक जे ओहि दलक मुखिया कें सूट करतैक। फल छैक अन्हारे अन्हार। “प्रजातंत्र परिकथा” अन्हारक रखवार सब सॅं भरल अछि आ ओकर विभिन्न खेला देखबैत अछि। अन्हारक रखवार सब अपना मे एकटा मजगूत किन्तु अदृश्य सूत्र सॅं जोड़ल अछि। ओहि सूत्र कें चिन्हिओ कए हम सब ओकरा काटि नहि सकैत छी। ओ एकटा जेलीफिस जकाँ अथवा सहस्र मुँह बला राक्षस जकाँ अछि। ओकरा पर कोना प्रहार करबैक से बूझल नहि अछि। जेना कमल कुमार शर्मा कें बूझि पड़ैत छैक “…शहरक डगर सब पर एकाध घंटाक अन्तराल पर गुजरैत पुलिसक जीप सब वातावरण मे पसरल भकोभन्न आ लोक सबहक मनोमस्तिष्क मे गतानल अन्हार कें कने काल लेल चिरीचोंत करैत निकलि जाइत छलै आ फेर फेर ओएह अन्हार आ भकोभन्न अपन अतिक्रमित ठाम पर घुरि अबैत छलै।” अन्हार कें भगेबा लेल प्रयास होइत रहलैक अछि, मुदा असंगठित समाजक बीच फेर रखवारे सबहक तत्व हमरा सबहक बीच घुसिया कए सब प्रयास विफल कs दैत अछि। तैयो किछु होइत छैक जरूर। अन्त मे लेखकक आशा “ई तs चलैत रहैत अछि, चलिते रहत, अनवरत”। हारि नहि मानबाक अछि। बेर बेर अन्हारक विरोध मे स्वर उठबाक चाही। साहित्यकारक काज इएह ने। एहि मे जरूर अरविन्द ठाकुरजी किछु सफल भेलाह अछि। एकैसम शताब्दी मे घसल अठन्नीक प्रासंगिकता घसल अठन्नी कविताक रचना कें प्रायः सात-आठ दशक बीत गेलैक। ओहि समय अठन्नीक मोल बहुत बेसी छलैक। आठ आना मे चारि पाँच सेर चाउर कीनल जा सकैत छल। घसल अठन्नी हमहू देखल अछि, ओ दू तरहें प्रचलित छल - एक तS वास्तविक अठन्नी जे बहुत पुरान भS गेला सॅं ओकर छपलाहा किछु अंश मेटा जाइत छलैक आ दोसर जे सही मे नकली छल से अठन्नीक आकारक कोनो अन्य धातुक टुकड़ा जाहि मे किछु छपले नहि रहैत छलैक। नेतघट्टू लोक एहेन सिक्का साधारणतः रातिक अन्हार मे चला लैत छल। पहिल प्रकारक सिक्का चलेबा मे ओतेक कष्ट नहि होइत छलैक कारण किछु छाप तS रहितहि छलैक मुदा दोसर तS सोर फोर ठकी छलैक। ओ सिक्का रहितहिं नहि छलैक। कविता मे समाजक एकटा चित्रण अछि। ओहि समयक समाज मे भुटकुन बाबू छलाह जिनका लेल हत्या केनाइ मामूली बात छलन्हि कारण हुनका दरोगाक बरदहस्त प्राप्त छलन्हि - “कै खून पचौलनि ई बंडा रोइयों न भंग युग युग दरोगाजी जीबथु”। भुटकुन बाबू दरोगा कें खुआ पिया कए अपना पक्ष मे रखैत छलाह। कियो दरोगा आबथु, भुटकुन बाबूक ओतए सॅं डाली हुनका पहिनहिं पठा देल जाइत छलन्हि। मधुपजीक समयक भुटकुन बाबू जमीन जथा बला सामंत छथि। हुनकर अपन अहंकार छनि - “बनिहारक दS कए उचित बोनि, कुल मे लगाएब की हमहिं दाग?” आइ एकैसम शताब्दीक दोसर दशक मे यदि समाज पर दृष्टिपात करी तS स्पष्ट भए जाएत जे कतहु किछु नहि बदललैक अछि। ढंग ओएह छैक, हॅं कने रंग बदलि गेलैक अछि। गामक भुटकुन बाबू कें आब मखना खबास नहि रहल होन्हि मुदा बाहुबली लोक अपना संग हॅंसेरी रखितहिं छथि, जे देखबा मे “कुलिशहुँ सॅं कर्कश भीमकाय” रहितहिं अछि आ जकर आतंक जनसाधारणक लेल मखनाक चाट सॅं बेसिये घातक होइत छैक। भुटकुन बाबूक चोला बदलि गेलन्हि अछि। जमीन जथा बला सामंत सॅं बदलि आब ओ नेता आ ठीकेदारक रूप धs लेलन्हि अछि। ओ नेता-ठीकेदार, जे बात बात पर दरोगा कें बदली करबा देबाक धमकी दैत अछि, तकरा दरोगा कोना नहि मददि करतै? ओकर अपन हित साधन सेहो ओही नेता-ठीकेदारक संग देला मे होइत छैक। अठन्नीक मोल आब नहि रहलैक। परिवर्तित रूप मे पचास पैसाक सिक्का सेहो बन्ने भS गेल। मात्र सरकारी खाता पर चालू छैक। यदि क्रेय मूल्यक बराबरी करी तs साठि सत्तरि साल पहिलुक अठन्नी एखनुक दू सौ टाकाक समतुल्य भs जाएत। एखन समाज मे जन बोनिहारक न्यूनतम बोनि सेहो दू सौ सॅं कम नहिए छैक। एहेन स्थिति मे पाँच सौ टाकाक नकली नोट मधुप जीक घसल अठन्नीक तुलना मे राखल जा सकैत अछि। आब कल्पना करियौ जे गाम घरक कियो बाहुबली (आ कि कियो आने नेतघट्टू लोक, नेताक चमचा आ कि ठीकेदार) साँझू पहर दूटा जन कें बोनिक रूप मे पाँच सौ टाकाक नोट देलखिन्ह ई कहि जे चौक पर भजा कए दूनू बाँटि लिहें। चौक पर ओ नोट नहि भजलैक कारण ओ नकली छलैक। एहन स्थिति मे यदि ओ नोट घुरेने हुनका लग आओत तs की ओ स्वीकार कs लेथिन्ह जे सम्भवतः हुनके देबा मे भूल भेल हेतन्हि आ नोट बदलि देथिन्ह ? के स्वीकार करत अपन ई गलती ? आ गलती भेलैक कोना जखन जानिये कए कएल गेलैक ? मधुपजीक बुचनी अन्यायक प्रतीकार करैत अछि - “मालिक, हम कर्ज न छी मॅंगैत, अथवा नहि एलहुँ भीख हेतु, उपजले बोनि टा देल जाए…” मुदा फल की भेटैत छैक ? मखनाक लात घूसा आ बेहोस भs कए खसि पड़ला पर फेर भुटकुन बाबूक बेंतक प्रहार। बुचनी भागमन्त छल, कष्ट सॅं मुक्ति भेटि गेलैक। सोचियौक यदि ओहि दिन ओ मरैत नहि आ अपंग भs जाइत तखन ओकर जिनगी केहन बोझ भs जइतैक ? अथवा यदि अपने ओ मरि जाइत आ बच्चा टुअर भs कए जीबैत रहि जइतैक ? मधुपजी अपन नायिका कें ओहि कष्ट सॅं बचा लेलखिन्ह - “बस एक बेर अस्फुट क्रन्दन शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि” मुदा कतेको एहन “घसल जिनकर अदृष्टि” बुचनी सन भाग्यशाली नहियो भs सकैत अछि। आजुक जन बोनिहार कतए जा कए नालिस करत ? एखनहु समाज ओहिना छैक जे दरोगा तs पैघ बात, सिपाहिए ओकरा थाना पर टपए नहि देतैक। उनटे झूठक कोनो अपराध बना कए दश लाठी मारबो करतै आ बेसी टेंटें करत तs ओकरा हाजतक भीतर बन्न सेहो कs देतैक। आ तकरा छोड़बै लेल फेर ओएह नेता जीक सहारा। भुटकुन बाबूक घमंड आ बेइमानी पोषित छलन्हि भ्रष्ट प्रशासनक कारण। आ प्रशासनक भ्रष्टाचार बढ़बे केलै अछि, बहुत बेसी बढ़लैक अछि। नकली नोटक व्यवसाय जे फरि आ फुलाए रहलैक अछि से किएक ? नवका भुटकुन बाबू अर्थात् ठीकेदार साहेब यदि पूरा बोनि दs देथिन्ह तs बूझू जमाना उनटिए गेलैक। सब जनैत छी मनरेगा मे कतेक पर औंठा छापल जाइत छैक आ कतेक हाथ पर देल जाइत छैक। बोनिहारक उचित बोनि एकटा साधारण किसान भले दs दैत होइक, ठीकेदार तs कतहु नहिए दैत छैक। घसल अठन्नी कें एखनहु ठौर नहि भेटलैक अछि। ओ एखनहु ओहिना बौआ बौआ कए गाबि रहल अछि “हम कतए जाउ, अबलम्ब पाउ ?” आ बुचनीक बेटा बेटी नाती पोता खटि रहलैक अछि आ हाथ मे पाँच सौक नकली नोट लेने दोकाने दोकान बौआ रहलैक अछि। जेना समय ठाढ़ भs गेल होए। मधुपजीक ई रचना काल निरपेक्ष भs गेल। काल बीतैत रहल मुदा रचना सदिखन अपन प्रासंगिकता बनौने रहल। जमाना जमानाक स्टाइल मोहन बाबू अपना जमाना मे ओवर्सियर छलाह। खूब पाइ कमेलनि। गाम मे जमीन जाल कीनबे केलनि, पटना आदरभंगा मे सेहो नीक टुकड़ी सब कीनलनि। गाम मे पोखरा पाटन घर तs छलनिहे, दरभंगो मे बढ़ियाँ तीन मंजिलाघर बनौलनि जाहि मे नीचा आ उपर भाड़ा रहैत छलनि आ बीचक तल्ला पर अपने रहैत छलाह। मोहन बाबू भागमन्त लोक आ नियोजित परिवार। जेठ पुत्र आ छोट पुत्री। दूनू कें नीक शिक्षा दियौलनि। समय परपुत्री सासुर बसलखिन। पुत्र नेतरहाट सॅं पढ़ि आइआइटी कानपुर सॅं इंजीनयर भेलाह आ दश साल अमेरिका मेविभिन्न कम्पनी मे नौकरी करैत स्वदेश एलाह। हुनकर विचार जे अपनहि व्यवसाय करी आ सेहो दरभंगे मे। एकहिसाबें ई क्रान्तिकारी विचार छलैक जकरा सब स्वागत केलक। मोहन बाबू बेटा कें सलाह देलखिन दरभंगा मे तीन तल्ला मकान अछिए, खाली करबा लिअs आ कोनो दू तल्ला मेऑफिस भैए जाएत। बाकी एक तल्ला मे अपने रहब। हम सब तs आब गामहिं रहब। बेटा छलखिन तs आज्ञाकारी आ बात कटनिहार नहि। तथापि जमाना बदलि गेल छलैक। पुरना डेरा मे जेबा लेलरस्ता बेसी चाकर नहि जे आजुक पैघ कार जा सकए। बात बुझबैत बेटा कहलखिन जे चालीस साल पुरान घरअपने लेल ठीक छल आ अछियो। मुदा हमरा आधुनिक तरीका सॅं रहबाक अछि आ बिजनेस करबाक अछि। हमरविचार अछि जे एहि जमीन कें घर समेत बेचि दियौक, पटना बला जमीन सेहो बेच दियौक आ एनएचक बगल मेएक बीघा जमीन कीन लिअs, से कने हटियो कए हेतैक तs कोनो बात नहि। ओहि एक बीघा मे कोना मकानरहतैक कोना सड़क आ पार्किंग आ कोन तरहक बाग बगीचा लगाएल जेतैक तकर ब्लूप्रिंट हम तैयार केने आएलछी। आ एकटा पैघ नक्शा बापक आगू ओ पसारि देलक। ओवर्सियर मोहन बाबू नक्शा तs बुझिते छलखिन मुदा ओकर विस्तृत विवरण जानि कने कालक लेल चकचोन्हीजरूर लागि गेलनि। दरभंगा मे एहि स्टाइलक घरक कल्पना कियो नहिए केने छल। मोहन बाबू कें ओ तीनतल्लाघर बनेबा मे जे पसेना बहल छलनि तकर स्मरण एला पर ओकरा बेचब की तोरब कोनो तरहें उचित नहि लागिरहल छलनि। बेटा मधुर स्वरें बुझेलखिन “पापा, नवका जमानाक नवका व्यवसायक लेल नव घर चाहबे करी ने।अहीं ने सिखेने रही पुरान घर खसे तखन ने नव घर उठे”। मोहन बाबू निरुत्तर भs गेलाह। उचित जगह नन्दू भाइ साधारण गृहस्थ। गाम मे किछु घर जजमनिका। आब सब जजमान दिल्ली पंजाब चल गेलनि तs ओहो जेमास मे गोटेक दिन कतहु पूजा आदि भs जाइत छलैक सेहो बन्द भs गेलनि। सोचलनि आमदनी बढ़बै लेल किछुदोसर काज करी। ब्रह्मस्थान लग एक टुकड़ी गैरमजरुआ जमीन मे एकटा खोपड़ी ठाढ़ केलनि। साँझ कए ओहि मे प्याजू आ तरुआबना कए मुरहीक संग बेचs लगला। चाह सेहो बनाबथि। खोपड़ी रस्ताक कात मे छलैक जाहि बाटें हाट दिन आनोगामक लोकक अबरजात रहैत छलैक। ओहि दिन नीक बिक्री भs जाइत छलनि। बाकी दिन मामूली। मिलाजुलाकए हप्ता मे सौ सवा सौ कमा लैत छलाह। किछु दिनक बाद हुनक सार गाम एलखिन। ओ एकटा आइडिया देलखिन। नन्दू भाइ दोकान उठा कए गामकदोसर कात बैसा लेलनि। हम जखन गाम गेलहुँ तखन ब्रह्मस्थान बला जगह खाली देखि नन्दू भाइ कें पुछलिअनि “दोकान करब छोड़ि देलियैकी?” ओ हमरा बुझेलनि जे जगह बदलि देलियैक। आब नीक बिक्री होइत अछि। उसनल अंडा आ तरल माछसेहो रखैत छी। ओहि जगह पर पाँच सौ रुपैया महिना भाड़ा लगैत अछि मुदा तैयो हप्ता मे हजार बारह सौ कमालैत छी। हमरा बड़ आश्चर्य लागल। हमरा जिज्ञासा कें शान्त करैत ओ बुझा देलनि जे दोकान पसीखानाक बगल मे छैक। आब हम बुझलियैक जेउचित जगह पकड़ा गेलनि। चंद्र मोहन झा पड़वा अरविन्द ठाकुर आ मिथिला आवाज गौर वर्ण नमगर धुआ, चौड़गर छाती आ पैघ-पैघ आँखि लेने मौजूद छला, अरविन्द ठाकुर। हम ठाकुरजीसँ परिचित नै छलहुँ। मानस पटलपर ई नाम नाँचि रहल छल। डा. दीलीप कुमार झा "गौतम होटल", तात्कालीन समयमे आगत अतिथिक लेल विश्रामालय निर्धारित छल। दरभंगा सन शहरमे एकटा पैघ अखवारी प्रेसक स्थापना लेल अहर्निस कार्यरत छला अजित अजाद। उत्पादनक लेल संपूर्ण आवश्यक तत्वक क्रय केर भार दऽ चुकल छला डा. सी.एम. झा, जिनका मिथिला निर्माता "निमि" केर कोटिमे राखल जा सकैछ। जहिना निमि महराजपर इंद्रक कुचक्र प्रभावी बेल तहिना सी.एम.झाक मिथिला आवाजपर सेहो। मिथिला आवाजक प्रमुख पदाधिकारीगणमे "अ" वर्ण प्रभावी छला- अजित, अरविन्द, अशोक, अमरनाथ, अमलेन्दु आ अमिताभ। हमरा अरविन्द ठाकुरजीसँ पहिल भेंट गौतम होटलमे भेल से एकटा संपादकक रूपमे। अग्रज-पूर्वजक मिथिला-मैथिलीक आंदोलनकारीक सपना साकार भऽ रहल छल, अपन माटि-पानिक भाषामे रंगीन अखवार। ठाकुरजीक पहिल दर्शनमे तीनू गुण ओज, माधुर्य आ प्रसादसँ अवगत भेलहुँ। हुनक पैघ-पैघ आँखिमे ओज छल तँ वाणीमे माधुर्य आ साहित्यमे प्रसाद। हम हुनकासँ प्रश्न कएने रही -अपने अरविन्द ठाकुर?" ओ कहलनि हँ आ अपने?, हम- चंद्रमोहन झा पड़वा। अच्छा, अच्छा, आएल जाउ। अपनेक नामसँ परिचित छी। ठाकुरजीक विहंगम दृष्टि देखबामे आएल। हम कंप्यूटरक की-बोर्डपर कहियो आँगुर तक नै देने रही आरो बात तँ दूर। तँइ हमर नियुक्ति आनुवादकक रूपमे भेल छल। ओना स्वयं डा.सी.एम.झा बादमे विचार करबाक भावना स्वयं तत्क्षण व्यक्त केने रहथि। तहिया ठाकुरजीक दरभंगा आगमन नै भेल छलनि। हमरा कोनो स्थान नै भेटि रहल छल। सूपक भाँटा जकाँ गुरकैत रही। मुदा अजित आजादक "दुत्कार" आ माँ जानकी जीक कृपासँ की-बोर्डपर दसो आँगुर काज करब शुरू कऽ देने छल।कंप्यूटरपर पेज बनब शुरू भऽ गेल छलै मुदा हमर काजक कोनो उपयोग नै। ठाकुरजीक कंप्यूटरक विशेषता छलनि, ओ केकरो कंप्यूटरपर कएल गेल विषय-वस्तुकेँ देखि सकैत छला। एक राति ओ भरल हाउसमे घोषणा केलनि- हमरा लोकनि पड़वा जीक उचित उपयोग नै कऽ रहल छी।ठाकुरजी हमरा स्वतंत्र कंप्यूटरपर स्थापित केलनि आ हम कुमार शैलेन्द्रजी जेनरल डेस्कसँ जोड़ल गेलहुँ। अरविन्द ठाकुरजी गंभीरताक संगे हास्य विनोदक प्रेमी रहाल। ओ केकरो काजसँ उबय नै देथि। जखन हुनका बुझबामे आबि जानि जे सहयोगीगण उबि गेल छथि तँ कोनो चुटुक्का की केकरोपर व्यंग कऽ हास्य रसक धार बहा देथि आ सभ हँसि कऽ अपन थकान दूर कऽ लैत छल। एक दिन हम एकटा पत्रिका "श्यामा सन्देश" देलियनि। ओहिमे एकटा भगवती गीत छल- हे अम्बे हम अहिंक शरणमे आयल छी। ठाकुरजी कहल करथि- हे पड़वे हम अँहिंक शरणमे आयल छी, एहिठाम अहाँकेँ कोटि-कोटि प्रणाम।अरविन्द ठाकुरक मात्र धुए टा जमीन्दारक नै छलनि, अपितु हुनक क्रिया-कलाप सेहो जमीन्दारक स्वरूपकेँ देखार करैत रहल। एहन कोनो स्पताह नै जाहिमे पैघ वा छोट पार्टीक आयोजन नै होइत रहल। जाहिमे सभ विभागक सहयोगी सहभागी होइत रहला। एक बेर कोनो कारणवश कर्मचारी लोकनिक वेतन काटल जेबाक विचार आएल। तकर कारण ठाकुरजीक उपर देल गेलनि। अरविन्द ठाकुर एहि बातपर सहमति नै देलनि। ओ अपन खातासँ बीस हजार टाका कर्मचारी लोकनिक वेतन लेल दऽ देलनि। अरविन्द ठाकुरजी अनुशासन प्रिय रहथि, स्वयं अनुशासित रहथि आ अपन अधीनस्थ सहयोगीकेँ तकर शिक्षा देबाकमे नै चुकथि। हुनका समयमे ओ कहावत चरितार्थ होइत छल- बाघ आ बकरी एक घाटपर पानि पिबैए। ओ व्यर्थक गलथोथीमे समय नै बर्बाद करथि मुदा हुनक वाग्पटुता कोनो विशेष अवसरपर सुनबा योग्य होइत छल। साम-दाम-दंड-भेदक प्रयोग समयानुकूल करबामे मिसियो भरि पाछू नै रहैत छला।मुदा कहल गेल छै -सीता जन्म वियोगे गेल, दुख छोड़ि सुख कहियो ने भेल। सीताकेँ मैथिली सेहो कहल गेल अछि तँइ हुनक भाषा मैथिलीक संग वएह स्थिति रहल। नान्हिटा रही तँ माए एकटा खिस्सा कहथि-"आधा चान गढ़ि कऽ घर आएल, सातो भाँइ विदेश चलि गेल, आँजुरकेँ दुख दइये गेल। इएह स्थिति मिथिला आवाजक संग रहल।सत्य बात तँ कटु होइते छै। अरविन्द ठाकुर मैथिलीक नामपर समझौता केलनि से निश्चय रूपें हुनक गलती साबित भेलनि। गौलौसीक अभियोगकेँ जनितहुँ, हम रही की नै रही "आवाज" रहै तकर आकांक्षामे भीष्म पितामह बनल रहल। "आवाजकेँ केंसर रोग धऽ लेलक। प्राण ताधरि नहि छुटैत छैक जा धरि माया ग्रसित केने रहैत छै। जखन अपन लोकक मूँह टेढ़ होबऽ लगैत छै, हृद्य आ ठोरक स्वरमे भिन्नता आबि जाइत छै तँ प्रतिष्ठताक रक्षार्थ प्रस्थान कऽ दैछ अपन धरा धामसँ।हमरा जनैत अरविन्द ठाकुरकेँ सेहो एहने मार्गसँ गुजरऽ पड़लनि आ अंततः कऽ लेलनि अंतिम प्रयाण। अरविन्द मिश्र नीरज अरविन्द ठाकुर : व्यक्तित्व आ कृतित्व व्यक्ति-व्यक्तिक अपन व्यक्तित्व होइत छैक आ एहि मे कोनो व्यक्ति अपन कृतित्व ल` क` व्यक्तिक जेर मे पंक्ति सँ फराक अपन पहिचान बना लैत छथि। जेहन व्यक्तित्व आ तेहने हुनक कृतित्व। ओ सभ संस्कारजन्य संस्कृति केँ अपना लैत छथि। सहजा, जेकर दोसर नाम संस्कार थिक, ओ जन्म-जन्मान्तर सँ संचित होइत अछि। संस्कृति होइत अछि ओहि सहजा प्रतिभाजन्य व्यक्तिक वंश, परिवार, पितृत्व प्रभाव आदि। समाज, संगी आ अध्ययन आदिक सहयोग जकरा उत्पाध्या कहल जाइत अछि आ जकर दोसर नाम थिक अभ्यास, तँ सहजा आ उत्पाध्या दुनू परस्पर मिलि व्यक्ति केँ एक सृजनकर्ता बना दैत अछि आ हुनका द्वारा ‘क्रिएशन’ यथार्थ होइत अछि – वर्तमान मे प्रशंसनीय जे भविष्य मे कालजयी भ` जाइत अछि। एतेक बात कहबाक अभिप्राय ई जे हमर जे एखन आलोच्य थिक से एक एहने काव्य-प्रतिभा सँ प्रभावी रचनाधर्मक पालन मे प्रतिबद्ध एवं प्रसिद्ध व्यक्तित्व एवं कृतित्व। हम कह` चाहब जे मात्राक दृष्टिकोण सँ ओ कतेक लिखने छथि आ ओ किताबक रुप मे छपि क` पाठकक सोझाँ कतेक आयल अछि, से तँ बुझल नहि अछि। मुदा जे दू-चारि पोथी हमरा कोनो ने कोनो रुप मे प्राप्त भेल अछि तकर आधार लैत स्थालीपुलाक न्याय सँ रचनाकारकक व्यक्तित्व पर पहिने दृष्टिपात होइत अछि। रचना पढैत-पढैत जखन आगू बढैत छी तँ रचनाकारकक व्यक्तित्वक परिचय मानसपटल पर सिनेमाक रील जकाँ उभर` लगैत अछि आ कोनो कविक पांति मनहि मन गुनगुना उठैत छी – “ जिनकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा ”। तेँ रचनाक आधार पर व्यक्तित्वक परिचय सुनिश्चित भ` जाइत अछि। आगू बढैत छी तँ बरबस पता लगैत अछि कि कोना नहि ! कोसी अंचलक एक कस्वानुमा गाम सुपौलक चकला निर्मली नामक एक टोल जे आइ नगर परिषदक वार्ड मे अछि, ताहि टोल परक एक रचनाधर्मिताक पालन करैत बहुआयामी व्यक्तित्वक धनी महान समाजसेवी, प्रगतिक नव-नव बाटक अन्वेषी कोसीक शलाका-पुरुष स्वनामधन्य महनीय बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ जीक जिनक आत्मज इएह अरविन्द ठाकुर थिकाह तँ अरविन्द जीक यथार्थक पता लागि जाइत अछि। विप्लव जी केँ जनैत छलहुँ। हुनकर लेखनी मे समाजवाद की राष्ट्रवाद आ जे से मुदा अरविन्द हुनक रचनाक स्वरुप थिकाह से नहि बुझल छल। विप्लव जीक एक परिचय हुनक “ उद्बोधन गीत “ शीर्षक सँ – साथियो, तुम रो रहे क्यों ? कौन है उसका सहारा कर्म को जिसने बिसारा सत्य है संसार ही यह तुम अकर्मठ हो रहे क्यों ? साथियो, तुम रो रहे क्यों ? हम विषयान्तर नहि छी। हम रचनाक कारण पर चलि गेल छलहुँ। आउ, कनी अरविन्द जीक व्यक्तित्व केँ देखी, स्वरुप आ स्वभाव केँ परखी। गौर वर्ण, प्रसन्न मुद्रा पर चश्माक तर मे गंभीर आँखि, प्रत्यक्षहु मे परोक्ष होइत, अत: केर भाव, लगहु रहैत किछु क्षणक लेल दूर चलि जाइत स्वभाव। आ जाहिठाम छथि ताहिठाम ठेकानल वस्तुजात। चारू कात रैक पर सैंतल पुस्तकक बीच मे कुर्सी आ टेबुल। टेबुल पर पिताक परम्परा केँ प्रतिष्ठित करैत अरविन्द जी। परिष्कृत परिसर, कण-कण मे आकर्षण आ ओहि सँ टपकैत सहितस्य केर भावना मे साहित्य साधना अरविन्द जीक व्यक्तित्व केँ आकर्षित करैत अछि। बेटा-पुतहु आ अंगना मे डेगा-डेगी दैत पोता-पोती केँ देखि हिनक सहज मन साहित्य साधना दिस खिंचा जाइत अछि। अपन साधना कक्ष ( स्टडीरुम ) मे आसन जमा लैत छथि साधक जकाँ आ बिसरि जाइत छथि अपन संसार केँ। बरबस लेखनी सँ नि:सरित होम` लागैत अछि – “ बहुरुपिया प्रदेश मे”। आ तेँ ने भुमिका मे कहि उठैत छथि अपन पौत्री आर्या, क्षिति आ पौत्र दिव्यांशु केँ शुभकामना दैत जे ओ सभ एहि बहुरुपिया प्रदेश केँ नीक जकाँ चिन्हथु आ चिन्हि केँ अपना लेल सुन्दर आ सुगम मार्ग प्रशस्त करथु। आ इएह भाव मे आगू बढैत गजल संग्रह केर एक एक गजल कि शेर यथार्थहि वर्तमान मे भविष्यक द्रष्टा बनि आब`बला स्थिति सँ चेतैबाक प्रयास करैत छथि – नइ पूजीक आन-बान नहि ओकर शान बचत नइ जखन खेतिहरक ठोर परहक गान बचत हरदी नइ, हर्रे नइ, बनियाँ सरकार मे ‘अरबिन’ पेटेन्ट सँ की बासमती धान बचत कहू, कतेक चेतनायुक्त संकेत देलनि कवि। एहिठाम कविक/शायरक दृष्टि भारतक भविष्यक हेतु कतेक चिन्तित अछि। किताबक पहिले गजल मे गजलक परिभाषा परिपुर्ण होइत अछि। गजल मे दर्द होइत अछि, वर्तमान मे भविष्यक चिन्ता होइत अछि। यथार्थ समवाद होइत अछि। जाहिठाम किछु कल्पने टा नहि, किछु आधार होइत अछि। पुन: देखू एकटा एहि गजलक पांति मे कविक उक्ति-वैचित्र्य जकरा काकोक्ति कहल जाइत अछि, प्रकारान्तर सँ यथार्थक भाव – छोड़िक` सत्यक डगर बइमान बनबह हओ कोना केँ आब तों बलमान बनबह पुन:- आब अयोध्या मे पुजाबय छथि दशानन जान नहि बचतह जँ तों हनुमान बनबह केहन कटगर लोकोक्ति सन गजल भेल अछि ! कवि अरविन्द जीक गजल मे सहज शब्दक संगति एकर सुन्दरता केँ कोना बढा रहल अछि, बानगीक रुप मे देखू – कलयुग असवार अछि ‘अरबिन’ कपार पर जे हमर ठोंठ धरत, तकरे भगवान कहब दोसर उदाहरण देखू – दिन मे पाकेट मारै छै राति मे जे छै पहरेदार बेचिक` घोड़ा सुतल बुड़ि सिरहौना सँ तकिया पार केहन सहज शब्दक सहज यथार्थ ! कियो-कियो कहैत रहलाह अछि जे मैथिली मे गजल की, ओ तँ अरबी, तुर्की, उर्दूक आ कनी-कनी हिन्दीक थिकै। मुदा अरविन्द जी एहि अनरगल प्रलाप केँ निराधार क` गजल केर जे यथार्थ परिभाषा थिक तकरा अक्षरश: समेटैत एहि चुनौती केँ स्वीकार केने छथि, से देखू – चान पर बस्ती बसाओल जा सकै छै मैथिली मे गजल लिखल जा सकै छै असीमित विस्तारक आकास छल सपना हमर आसक ताग मे ओ बान्हल जा सकै छै आ तखने ई गजल संग्रह “ बहुरुपिया प्रदेश मे “ पोथीक रुप मे प्रकट भ` सकल। एहि गजल संग्रह “ बहुरुपिया प्रदेश मे “ सँ पहिने कथाकारक रुप मे अरविन्द जीक परिचय भेटैत अछि। हुनक कथा संग्रहक नाम अछि – “ अन्हारक विरोध मे “। ‘खिस्सा सियार यार’ शीर्षक सँ ‘विष-पान’ शीर्षक धरि दस गोट कथा एहि पोथी मे गुथल गेल अछि। कथा मे कथानकक भाषा मे प्रांजल्यता शीर्षकक अनुकूले अछि। कथा मे जिज्ञासा कथाक महत्ता बढा दैत अछि। सभ सँ बढि क` बात ई जे कथाक पहिल पांति बिना थकानक कथाक अंतिम पांति तक यात्रा करा दैत अछि। कथाकार केँ अपन माटि-पानि संग, आत्मीयताक संग समाजक हर वर्गक गतिविधि सँ परिचय कथाक विशेषता प्रकट करैत अछि। अभिजात वर्गक संग रचल-पचल लेखकक सर्वहारा समाजक प्रति संवेदना कोना साकार भ` उठल अछि, कथासभमे तेकर यथार्थ परिचय अछि। “ अन्हारक विरोध मे “ कथा-संग्रह नामक पोथी सँ पहिने लेखक कविक रुप मे प्रस्तुत भेला – “ परती टूटि रहल अछि “ नामक कविता संग्रह ल` क`, जाहि पोथी मे कविक आध शतक सँ उपर ‘यात्रा’ शीर्षक सँ प्रारम्भ होइत ‘बुलबुल’ शीर्षक सँ अंत होइत कविता सभ अछि। मुक्त रचना मे उन्मुक्त भावधारा कविताक विशेषता मे कविक सहज स्वभावक परिचय होइत अछि। जतय धरि हम एहि संग्रहक कविता पढि सकलहुँ ताहि मे कोनो वादक प्रभाव नहि, कविक व्यापक यथार्थभाव परिलक्षित होइत अछि। एतबा धरि अवश्य जे यथास्थिति बनल नहि रहय, ओ टूटय। तखने जड़ता सँ त्राण होयत, गति प्राप्त करैत दुर्गति सँ दूर करत, तेँ परती टुटबाक चाही। ‘यात्रा’ कविताक ‘मा’ शब्दक संबोधन मे कवि आत्मभावक यथार्थता देखै चाहै छथि। ओ कहैत छथि – ‘हम’ केर रुप मे के ‘हम’, सांसारिक मकड़जाल मे ओझराओल हमर आचरण आकि आचरण मे आत्मबोध? ‘सुखि गेल गाछ’ कविता मे पुरखा द्वारा लगाओल गाछ पर कविक झुलैत नेन्हपन आ ओ गाछ सुखैलाक बाद घरक बनल उपकरण मे कविक संवेदना, जखन ओ उपकरणक रुप मे सुखाओल गाछ सँ बनल चौकी पर कविक जुआनीक थकान केँ मेटाबैत अछि, पुरखाक लगाओल आ पुन: सुखाओल गाछक बनल उपकरणक उपभोग करैत कविक संवेदना देखू – ‘कहियो नेन्हपन मे एहि ठारि सभ पर झुलैत हँसैत-गबैत चिबौने छलहुँ टिकुला लाल-पीअर-सनहुला फलमे गड़ौने छलहुँ दांत पओने छलहुँ अमृत-रस तृप्त भऽ गेल छल मोन-प्राण…………’ आ ओ गाछ जखन सुखा जाइत अछि तखन कविक ओहि गाछ सँ आत्मिक भाव आत्मसंतुष्टि प्रदान क` रहल अछि। यथा – ‘……… दिन भरिक भागमभागसँ थाकल आ निस्तेज पड़ैत छी अपन चौकी पर आ जखन अबैत नहि अछि निन्न तखन थपकी दैत आ लोरी सुनबैत अछि पुरखाक ममत्वसँ लबालब ओ सुखि गेल गाछ’ अन्तत: इएह जे कवि-कथाकार श्री अरविन्द ठाकुरक साहित्य-साधना सहितस्यक भावना केँ पल्लवित आ पुष्पित करैत अछि। जखन पल्लवित आ पुष्पित होइत अछि ओ साहित्य-साधना रुपी वृक्ष, तखन तकर जे फल अबैत अछि, ओ अमरत्व प्रदान करैत अछि अर्थात कालजयी होइत अछि। एहन कालजयी रचनाकार अरविन्द ठाकुरक प्रति हमर शतश: साधुवाद। बदला मे समर्पित हमर अभावक भाव। अरविंद श्रीवास्तव सामंती सभहँक विरुद्ध तैयार कवि लगतार तेज होइत संगीतक कारणें लोक बहीर भऽ रहल अछि मुदा ओ सभ बहीर छथि तँइ आर बेसी जोरसँ संगीत बजाबऽ पड़ि रहल छै- मिलान कुंदेरा अरविंद ठाकुरक रचनात्मक धमक साहित्यिक क्षेत्रमे एहानिते सुनाइ पड़ि रहल अछि। अरविंद अपन रचनाकालमे संवेदनहीन उत्तर आधुनिकता संगे-संग साम्यवादी सत्ता के खंडित होइत देखने अछि। ई साम्यवादी सत्ता जे पूरा संसारमे अपन बात छाती ठोकि कहबाक तागति राखै छल। ई साम्यवादी सत्ता जे धरतीपर सह-अस्तित्व केर भावना आ ओकर पक्षमे ठाढ़ छल। ई साम्यवादी सत्ता जे जनताक संग ठाढ़ छल सएह साम्यवादी सत्ता आइ अपन घर तोड़ि लेलक।आ आब जखन की केबाड़ खोलिते हाट-बजार चौअनियाँ मुस्कानक संग वेलकम करैए हमरा ई कहबामे कोनो संकोच नै जे अरविंद ठाकुरक रचनात्मक दुनियाँ एही परिस्थिति सभहँक उपजा अछि। हम ऐ उपजा के नव नै कहि सकै छिऐ किएक तँ ई रचनाक्रम कोनो एक काल खंडमे नै अबैए आ ने ई रचनाक्रम कोनो एकटा सत्ता, विधा वा विचारधारापर अछि। अरविंदक बहुरंगी लेखनक सभसँ बड़का विशेषता अछि -सच लिखबाक साहस। अरविंद ठाकुरकेँ पहिल बेर हम करीब पचीस बर्ख पहिने पूर्णियासँ प्रकाशित "कला" पत्रिकामे पढ़ने छलहुँ। आ ओही दिनक आस-पास ओ हमर साहित्यिक परिचयमे एला। मधेपुरामे पुलिस कप्तान मनमोहन सिंहक पोथी "मेरे में चांदनी" केर लोकार्पण आ कवि सम्मेलन आयोजित करबाक क्रममे अरविंदकेँ आमंत्रित करबाक अवसर भेटल छल। ऐ सम्मेलनमे पटनासँ गीतकार गोपीवल्लभ सहाय, सिद्धेश्वर आ पंजाब किछु शाइर सहित कोसी इलाकाक अधिकांश कवि-रचनाकारक भागीदारी छल। अरविंदसँ एही आयोजनमे पहिल भेंट भेल आ अपन पत्रिका "सिलसिला"मे हुनक गजल प्रमुखतासँ प्रकाशित केलहुँ। अरविंदक संग विरासतक गहींर संबंधक चर्चा हम अपन पिता हरिशंकर श्रीवास्त "शलभ"सँ कतेको बेर सुनैत रहलहुँ। अरविंदक पिता बलेन्द्र नारायण ठाकुर "विप्लव"जीक कतेको खिस्सामे हुनक समाजवादी विचारधारा, समाजिक समरसता, नैतिकता आ आत्मसम्मानक विचार भरल छल। अरविंद अपन लेखनमे एही विरासतकेँ बचा कऽ रखलक अछि। परती टूटि रहल अछि नामक पोथीसँ --- "मान्यवर हम अहाँक नै दोसर पार्टीक कूकुर छी" ऐ अढ़ाइ पाँतिमे कतेक दर्द कतेक आत्मसम्मान छै तकरा शब्दमे कहनाइ मोश्किल छै। अरविंद अपन कवितासँ समाजिक बदलावक जरूरतिकेँ सोझाँ-सोझी जोड़ैए। ओकर कविता सामंती मोहफिलसँ निकलि जनताक पक्षमे ठाढ़ होइत अछि आ ओकरा संघर्षक हिस्सा बनबासँ आपत्ति नै छै।अरविंदक लेखकीय सक्रियता साहित्यिक आ समाजिक सरोकारसँ प्रेरित रहल अछि इएह कारण अछि जे साहित्यिक सृजनक संग-संग ओ समाजिक प्रतिबद्धताकेँ सेहो अपन सजगताक हिस्सा मानलक। अरविंद पटनासँ प्रकाशित "प्रवक्ता"मे "ठाकुर का ठाँव" नामक शीर्षकसँ समसामयिक राजनीतिक घटनाक्रमकेँ बहुत बेबाकी आ बेखौफ भऽ कऽ पाठक सामने आनैत रहल। दरभंगासँ प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र "मिथिला आवाज" मे बतौर संपादक अरविंद साहित्य आ समाजक प्रति अपन दायित्वक निर्वाहमे कनिको पाछू नै हटल। बिहार प्रगतिशील लेखक संघक प्रति ओकर समर्पण देखैत ओकरा उपाध्यक्ष पदक जिम्मेवारी देल गेलै। मूलतः कवि अरविंद ठाकुरक व्यक्तित्व हिंदीक कवि राजेश जोशीक एक पाँतिमे समेटल जा सकैए-- "हम कविक ब्रहमांडक एकटा नुकाएल अकासगंगा छी"। परमानन्द प्रभाकर, द्वारा - संत पॉल्स हाई स्कूल, बंगाली टोला, समस्तीपुर, पिन - 848101 स्खलनक प्रतिरोधमे -अन्हारक विरोधमे आधुनिक मैथिली कथा-साहित्यमे जाहि कथाकार सभपर गर्वसँ निघोख माथ उठाओल जा सकैछ ताही पाँतिमे मन्द-मन्द मुस्कैत उन्नत ग्रीव ठाढ़ छथि श्री अरविन्द ठाकुर । मनुखक सभ्यताक विकास कालहि सँ अन्हारक विरोध होइत आयल अछि । वेद मे अही बातकेँ किछु दोसर तरहेँ कहल गेल छै जे द्रष्टव्य अछि - ‘‘असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय ।’’ सभ्यताक विकास काल सँ पूर्व प्रकृतिमे पसरल अन्हारकेँ दूर करबाक लेल, ओहि सँ सुरक्षाक लेल मशालक आविष्कार भेल छल । हिन्दी साहित्यक कथाकार बेनीपुरी जीक एहि माँदे कहब छनि - ‘‘जिस दिन मशाल बनी, दुनिया की सबसे बड़ी क्रांति उसी दिन हुई’’ मशाल भौतिको छै आ आत्मिको । आत्मिक मशाल ज्ञानक प्रतीक छै, जकरा माध्यमे अज्ञानताक अन्हारकेँ मिटाओल जा सकैत अछि । आजुक वर्त्तमान परिस्थिति मे प्रकृतिक सभटा अन्हार मनुखक चेतना मे समाहित भ’ गेल छै आ तैं चारूकात उत्पीड़न, मारि-काट, खून-खराबी, झूठ-पफरेब, छटपटाहटि, शोषणक त्रासद स्थिति पसरल छै । मनुख एहि स्थिति सँ अपना केँ उबारि सकत तकर ज्ञान सेहो ओकरा मे छै। ओ सभ किछु जनैत अछि, तखने त राष्ट्रकवि दिनकर कहै छथि ‘कुरूक्षेत्राक’ षष्ठम् सर्ग मे - ‘‘यह मनुज विज्ञान मे निष्णात ज्ञान का, विज्ञान का, आलोक का आगार ।’’ तथापि मनुख छटपटा रहल अछि आ उपर्युक्त त्रासदक स्थिति सँ त्राणक दिशि ओकर प्रवृति नइँ भ’ रहल छै। दुर्योधनक उक्ति छै - ‘‘धर्म को जानता हूँ प्रवृत्ति नहीं है। अधर्म को जानता हूँ निवृत्ति नहीं है।’’ एहि मानसिकताक कारणें मनुखक दशा ओ दिशा दिनानुदिन खरापे भेल जा रहल छै । मनुख सभ्यताक विकास काल सँ पूर्व जतेक आतंकित नइँ छल ओहि सँ बेसी आतंकित एखन अछि । तै त हिन्दी साहित्य मे ‘कलम के जादूगर’ नाम ख्यात बेनीपुरी जी कहै छथि । ‘‘अब जहाँ अन्ध्कार है, वहाँ पहले से भी ज्यादा भयानक और वीभत्स है ।’’ बेनीपुरी जीक इशारा मनुखक हृदय मे व्याप्त अज्ञानता रूपी अन्हारेक दिशि छनि। समाज मे पसरल बहुत रास जे चारित्रिक स्खलन, सामाजिक विद्रुपता रूपी अन्हार छै तकरे विरोध मे श्री अरविन्द ठाकुर ठाढ़ छथि, अपन पोथी ‘अन्हारक विरोधमे’ हाथ मे नेने । मुदा ओ जे बाट पकडि़ क’ चलि रहल छथि आ जाहि क्राँतिकारी तेवर मे बढि़ चुकल छथि, ताहि लेल त हम एतबे कहबनि- ‘‘शीशे का महल आपने बनवा तो लिया है पत्थर का जमाना है मगर ये नहीं सोचा’’ सम्पूर्ण पोथी केँ पढ़ला सन्ताँ ज्ञात भेल जे ठाकुरजी एकटा कुशल शब्द शिल्पीए नहि अपितु एक गोट मसिजीवी क्रांतिकारी व्यक्ति छथि । हम एहि बातक लेल पूर्ण आश्वस्तो छी जे जै अरविन्द ठाकुर जी कलम सँ क्रांति करबाक लेल निकलि चुकल छथि त’ क्रांति हेतै आ खूब नीक जकाँ हेतै । किऐक त कलम मे बड्ड तागति छै । तखने त हिन्दी साहित्य मे ‘नेपाली’ नाम सँ प्रख्यात कवि कहै छथि - ‘‘हम धरती क्या आकाश बदलने वाले हैं हम तो कवि हैं, इतिहास बदलने वाले हैं हर क्राँति कलम से शुरू हुई सम्पूर्ण हुई चट्टान जुल्म की, कलम चली, तो चुर्ण हुई’’ प्रस्तुत पोथी मे दसटा कथा संकलित अछि । एहि कथा सभ मे कथाकार समाज मे परिव्याप्त सभतरहक समस्याकेँ उठौलनि अछि । जिनगीक सभटा पक्ष अभरिक’ आयल अछि । हम एतय उदाहरणक लेल खिस्सा-सियार यार, पियासल पानि, अन्हारक विरोध् मे, ‘मूस’, विषपान कथाक किछु प्रसंगक मादे समाजक वर्त्तमान दशाक दिग्दर्शन करा सकैत छी । पोथीक पहिल कथा ‘खिस्सा-सियार यार’ वर्त्तमान राजनीति सँ जुड़ल अछि । एहि मे जनता आ राजनेताक बीच उपजल नवका संस्कृतिकेँपफरिछाक’ राखल गेल अछि । राजनाथक ई कथन ‘‘हमर अहाँक महत्व ओकरा सभक नेता लेल तखने घरि अछि जा घरि हमरा सभक नसमे खून अछि । खून खतम-सम्बन्ध खतम’’ राजनेताक सौंसे चरित्रा उघारि क’ राखि दैत अछि । एहि ठाम हमरा मोन पड़ैत अछि एक गोठ ढ़ीठ नेताक उक्ति जे उपर्युक्त बातक पूष्टिए करैत बुझि पड़ैत अछि - ‘‘रूसवा करो जलील करो, सब कबूल है। बन्दा तो उम्मीदवार है, चरणों की धूल है। लेकिन रहे यह याद कि चुनाव जीतकर, मुड़कर न देखना मेरा पहला वसूल है।। ’’ अही कथा मे सदानन्दक चरित्रा ठाढ़ क’ क’ लेखक महोदय ई कहबा मे सार्थकता प्राप्त केलनि अछि जे प्रजातान्त्रिाक व्यवस्था मात्रा कहबाक लेल छै, ओना ई व्यवस्था छै शक्ति तंत्राक । अथवा एकरा अहुना कहि सकैत छी जे ‘‘जक्कर लाठी तकरे भैंस ।’’ ई कथा राजनीति मे पसरल भाइ-भतीजा वादक नीति केँ सेहो उघार करैत अछि । कथा कृतिक दोसर कथा ‘पियासल पानि’ नारी शोषण पर आधरित अछि । एहि मे नारायण पुरवालीकेँजाहि रूप मे प्रस्तुत कैल गेल छै ओहि सँ नारीक दशा-दिशा ओ पुरूष वर्गक किरदानी जगजियार भेल अछि । एतबे नइँ ई कथा अन्ध्विश्वास सँ जकड़ल सामाजिक सोचकेँनाघ्ट करैत अछि । तेसर कथा अछि ‘अन्हारक विरोध् मे’ । ई कथा हिन्दु-मुस्लिमक टकराहटिक समस्या केँ जगजिआर करैत अछि । सामाजिक एकता केँ खण्डित कर’ वाली प्रवृति पर ई कथा सोझे प्रहार करैत अछि। हमरा लगैत अछि जे ई कथा जिनगीक सान्ध्य बेला मे लेखक महोदय सँ किछु आओर चिन्तन आ समयक लेल लेखक दिश टुकुर-टुकुर ताकि रहल अछि । ‘मूस’ नामक कथा वंश परम्परा पर आधरित रहितो प्रकारान्तर सँ राजनीति मे उपजल वंश परम्पराक नबका संस्कृति पर चोट करैत अछि । गहन चिन्तन केला पर स्पष्ट होइत अछि जे एखनो राजतंत्रा व्याप्त अछि । तखने त’ बहिनोई, सार, बाप-बेटा, बेटी-पुतोहु सभक जमावरा छैक राजनीति मे । अहिना ‘विषपान’ नामक कथा न्यायालय मे पसरल भ्रष्टाचारकेँनाँगट करैत अछि । ओकीलक छुद्रता केँ उघार करैत अछि । एहि तरहेँ एहि कथा संग्रह मे सामाजिक सभ तरहक समस्याकेँ उठाक’ लेखक महोदय अपन खोजी प्रवृतिक तथा क्रांतिकारी व्यक्तित्वकेँ जगजिआर केलनि अछि । एहि ठाम बच्चन जीक पाँती लेखक महोदय पर सटीक बैसैत अछि ‘‘बूँद के उच्छ्वास का भी अनसुनी करता नही वह’’ अर्थात् लेखक कोनो वर्गक छोट आ पैघ सामाजिक समस्या सँ मुँह पेफरि क’ नइँ चलैत छथि। आ ने एहि कथाकृतिक कथाकार चलला अछि । एक गोट मैथिलीक अध्येता हेबाक कारणे हम एहि कथाकृतिक स्वागत अभिनन्दन करै छी आ लेखक महोदयक लेल किछु अपन शुभकामना हम अपन एहि पाँती मे दैत विराम लैत छी - ‘‘ सृजन-शीलता राति-दिन अहिना चलै अमन्द कहियो पड़ै बेराम नइँ कविता जीवन छन्द तन-मन पौरूष मे रहै ऊर्जस्वित नव हर्ष रचना मे सभदिन रहै भरल सौम्य उत्कर्ष ।।’’ राम चैतन्य धीरज, मानस नगर, हटियागाछी, सहरसा, बिहार बहुरुपिया प्रदेश मे : एक दृष्टि ‘एकोऽहं बहुस्याम‘ क अवधारणा ई अछि जे आत्मा एकहिटा होइत अछि, मुदा प्रवृतिभेदक कारणेँ ओ बहुतो रूप मे देखार पड़ैत अछि। वस्तुत: जे भिन्नता अछि ओ भिन्नता प्रकृति वा प्रवृतिक थिकै, आत्मा वा चेतनाक नहि। प्राय: प्रवृतिए भोग आ युद्ध मे लिप्त होइत अछि मुदा जखन प्रवृति आत्मस्थ होइत अछि तँ ओ निर्द्वन्द्व अवस्था केँ प्राप्त क` लैत अछि। वर्गहीन भ` जाइछ। अर्थात प्रवृति अपन अज्ञानता सँ मुक्त भ` जाइत अछि ; तखने व्यक्ति केँ वास्तविक मुक्ति वा स्वाधीनता भेटैत छैक। संयोग सँ एम्हर तीन-चारिटा मैथिली कार्यक्रम मे भाग लेबाक अवसर भेटल। प्राय: देखबा मे आएल जे हमर उपस्थिति नगण्य अछि। जहिना राजनीति मे विचार आ व्यवहारक द्वैधता छैक, तहिना प्राय: साहित्यकारो मे विचार आ व्यवहारक द्वैधता छैक। जहिना राजनेताक लेल जनताक भूख, गरीबी आ ओकर रोजगार समस्या राजनीतिक लेल गरमागरम मुद्दा होइत अछि, तहिना प्राय: साहित्यकारोक लेल यैह सभ कथ्य वस्तु होइत छैक। कोनो वैचारिक क्रांति नहि, कोनो व्यवहारिक आन्दोलन नहि। लगैत अछि सभ किछु थम्हि जकाँ गेल अछि। टोली-टोली आ व्यक्ति-व्यक्ति मे बँटल साहित्यकारक लेल अपन-अपन मथनियाँ छनि, जाहि मथनियाँ सँ ओ साहित्यिक सृजन आ क्रिया-प्रतिक्रिया करैत छथि। सुन`बला, पढ`बला आ बूझ`बलाक सर्वथा अभाव। लगैए जे साहित्य साहित्यकारेक लेल रहि गेल अछि। हमर उपस्थिति नगण्य अछि माने – दर्शन-दृष्टि सँ सृजन करैबला साहित्यकार नगण्य छथि। दर्शनक एकहिटा दिशा छैक, जे विश्वशांतिक ताना-बाना बुनैत अछि आ प्रेम तथा संघर्षक भाव मे सहयोग आ सहानुभूतिक विवेक प्रस्तुत करैत अछि – ओ थिक वेदांत। वेदांत चेतनाक अखण्डता मे ‘ सर्वे भवन्तु सुखिन:। सर्वे सन्तु निरामया’क आकाश सजबैत अछि आ ओहि आकाश मे सभक सुखक कामना ओहिना करैत अछि, जेना तारा अपन प्रकाश सँ प्रकाशित हो। कविता हो, गीत वा गजल जे हो सगरे उत्साह आ उत्सवक अभाव बुझना जाइत अछि। सगरे प्रभाहीन तारा देखार दैत अछि। मुदा प्रतिरोध आ यथास्थितिक वर्णन, चित्रन सगरे देखार दैत अछि। की कविता वा साहित्य कलात्मक रेचन मात्र थिक, जे बिना व्यवहारिक सोच-विचारक अभिव्यक्त होइत अछि ? एखनो साहित्यकारक लग संस्कृति चुनौती बनल अछि आ साहित्यकार सहित अन्य सभ वर्गक लोक हजारो-हजार वर्ष पूर्वक संस्कार मे बन्हाएल छथि – ई प्रश्न गंभीर बनल अछि। एक मात्र सर्वहाराक पक्षधरता मे लिखब साहित्यक उद्देश्य नहि होएबाक चाही, अपितु एकरा संगहि व्यवहार मे ओहि रुढिवादी जड़ता केँ तोड़ब सेहो उद्देश्य होएबाक चाही, जे आत्मोत्कर्ष मे बाधा बनल अछि। तेँ आत्म खोज आवश्यक अछि, जकर सर्वथा अभाव सन लगैत अछि। एही सँ भोगवाद आ अंधविश्वासक परिधि नष्ट होएत, जाहि मे लोक सभ घेराएल अछि। मित्र अरविन्द ठाकुरक गजल सेहो सर्वहारे प्रेमक अभिव्यक्ति थिक, जे हमरा समाजक अंतिम आदमी आ ओकर आर्थिक मुक्ति तक ल` जाइत अछि। ई बात सत्य छैक जे आत्मवत भाव मे वर्गभेद नहि होइत छैक, मुदा प्रवृतिगत भाव मे वर्गभेद छैक। उपभोग आ संतुष्टिक बाजार गर्म छैक, एहि स्थिति मे वैचारिक दृष्टिक उपयोगिता प्रश्नांकित अछि। अधिकाधिक उपभोग आ अधिकाधिक संतुष्टि क्रय-शक्ति, बाजार आ वस्तु पर निर्भर होइछ। वैचारिक दृष्टि मे तँ आवश्यकता निर्धारित अछि, मुदा अधिकाधिक उपभोग आ अधिकाधिक संतुष्टि जीवनक मापदण्ड भ` जाइक तँ नैतिक पाठ पढाबएबला साहित्य क्षणभंगूर आ मनोरंजनक दृष्टि बनि जाएत आ कि नहि ? भोग आ युद्ध मे सभक मन स्थिर भ` गेल अछि, ओहि स्थिति मे दर्शन आ विचारक की हेतैक? मनुष्य केँ की चाही – बाजार, वस्तु आ क्रयशक्ति – तखन विचार ल` क` की हेतैक? यैह कारण छैक जे राजनीतिक दृष्टि असफल भ` रहल अछि। क्रयशक्तिक वृद्धि होअए तेँ राजनीति मे अनीति आ पाप बढि रहल अछि। अपराध प्रवृति वा हिंसात्मक मनोभावक पाछू एकमात्र कारण क्रयशक्तिक होड़ अछि ; प्रतिस्पर्धा अछि आ अन्तत: अनैतिकता अछि – जे कोनो वर्ग केँ छोड़ि नहि रहल अछि। तेँ ओ साहित्यकार आइ प्रभावी छथि जे साहित्यक व्यवसाय करै छथि। यैह अज्ञानता थिकै, तेँ दर्शन-दृष्टिक आवश्यकता स्पष्ट भ` गेल अछि ; जाहि सँ प्रवृति आत्मस्थ भ` सकय। वस्तुत: एहि अज्ञानता केँ भेदरहित ज्ञाने समाप्त क` सकैत अछि। जाधरि मानव मे ज्ञानक संबर्द्धन नहि होएत, बौद्धिक निष्ठा नहि होएत आ निश्चयात्मक चेतनाक व्यवहार नहि होएत, ता धरि मुक्ति संभव छै की? मित्र अरविन्द ठाकुरक गजल संग्रह ‘ बहुरुपिया प्रदेश मे’ जे कह` लेल चाहैत अछि, ओकर चित्र एहि गजल-संग्रहक नामकरणेँ सँ स्पष्ट भ` जाइछ जे कोनो एहन ज्ञान नहि छैक, जे मानव मे एकात्मकता आनि सकय। एकहि राजनेता बहुरुपियाक भूमिका मे स्वयं केँ प्रदर्शित करै छथि आ एकर प्रभाव मे जनसामान्यक बाध्यता सेहो छैक। तेँ ओ सर्वहारा हो वा अन्य वर्ग सभ मे क्रयशक्तिक होड़ मचल अछि। बौद्धिक रुप सँ जे पिछड़ि रहल छथि, आजुक परिवेश मे वैहटा पछुआएल छथि, नहि तँ प्रतिस्पर्धा मे सभ लागल अछि। श्री ठाकुर स्वयं साहित्य मे द्वैध चरित्रक स्थिति केँ स्वीकार करैत एहि पोथीक भूमिका ( अर्ज करक अछि जे………) मे लिखलनि अछि जे –“ बहुत रास रचनाकार कलाक अनेकानेक आवरण मे स्वयं केँ प्रस्तुत क` अपन रचना मे अपन वास्तविक जीवन सँ भिन्न जकाँ व्यक्त होएबाक बाजीगरी करैत छथि।“ विचार आ व्यवहारक सामंजस्य जखन टुटि जाइत छैक तँ एहीठाम सँ वैचारिक स्खलन प्रारंभ होइत अछि आ संवेदनशीलताक समस्या उत्पन्न होएत छैक। हमर ई अनुभव अछि जे कविता मे, गीत वा गजल मे जे भाव व्यक्त होइत अछि ओहि मे प्रतिरोध तँ अवश्य होइत छैक, मुदा व्यवहार मे ओहो क्रयशक्तिक बढोतरीक लेल अपस्याँत होइत छथि। चारित्रिक द्वैधता मे वैचारिक समस्याक जन्म होएब स्वाभाविक अछि। जे विचार व्यक्त करै छथि वैह जखन प्रोफेशनल छथि तँ फेर हुनक विचारक प्रभाव जनसामान्यपर जतेक होइ। तेँ साहित्य नहि तँ अंधविश्वास सँ लड़ि सकैत अछि आ नहि भोगवाद वा अधिकाधिक संतुष्टिवाद सँ। विज्ञानक कारणेँ जे परिवर्तन भ` रहल अछि आ ओकर प्रभाव जे समाज पर पड़ि रहल छैक आ ओहि सँ जे खतरा उत्पन्न हेतैक तकर भविष्यवाणी करैत श्री ठाकुर अपन गजलक पाँति केँ सजबैत छथि, देखबाक थिक – नइ पूजीक आन-बान, नहि ओकर शान बचत नइ जखन खेतिहरक ठोर परहक गान बचत दूध लेल नेना आ रोगी हाकरोश करत नइ जखन गाम मे मालक बथान बचत यूरो आ डालर सँ पेट भरैक भांज करू जँ खेतक आरि नइ आ ने मचान बचत आयातित बीया आ पटौनी अकास सँ दैव आ विदेश बलेँ कोना किसान बचत हरदी नइ हर्रे नइ बनियाँ सरकार मे ‘अरबिन’ पेटेन्ट सँ की बासमती धान बचत समाजक अंतिम आदमी कथी लए अंतिम आदमी अछि? वस्तुत: शारीरिक सेवा लए अंतिम आदमी होइत अछि। जाहि ठाम बौद्धिक चालाकी छैक वा तकनीकी ज्ञान छैक, ओहि ठाम पूंजीवादी क्रयशक्ति होइत छैक आ जाहि ठाम नहि छैक, ओहि ठाम शारीरिक सेवा होइत छैक। आइयो समाज मे शारीरिक श्रम करयबलाक विपन्नता छैक, किएक तँ ओ तकनीकी ज्ञान नहि राखैत अछि। एहि वर्गक क्रयशक्ति सभ सँ कमजोर होइत छैक। ई सत्य छैक जे पूंजीपति वा मालिक वर्गक शान खेतिहर मजदूर होइत अछि, मुदा ओकर महत्व सामाजिको दृष्टि सँ कमजोर अछि – श्री ठाकुर एकर पक्षधरता मे अधिकाधिक गजलक भाव केँ प्रस्तुत कयलनि अछि। हिनक चिन्ता भारतक ओहि अवस्था सँ अछि, जाहि अवस्था मे भारत साम्राज्यवादी शक्तिक उपनिवेश बनल जा रहल अछि। देश आ गामक चिन्ता हिनक गजल मे प्रमुखता सँ आयल अछि आ सभ सँ बेसी प्रभाव ओहि चिन्ता मे अछि जाहि मे भारतीयता नष्ट भ` रहल अछि। व्यक्तिक इच्छा आ ओकर संतुष्टिक प्रश्न पर हिनक लेखनी बहुत किछु कहैत अछि, मुदा अज्ञानता सँ मुक्तिक बाट नहि देखा पबैत अछि। तेँ सामाजिक यथार्थक चित्रन आ वर्णन होइतो कुण्ठा, संत्रास, निराशा आ प्रतिरोधक स्वर हिनक गजलक मूल राग बनल अछि। संगहि वर्तमान समाजक बदलैत चित्र आ पूंजीवादी मानसिकता मे उबडुब करैत व्यक्ति-व्यक्तिक इच्छा आ ओकर कार्यरुप तथा प्राचीन उत्पादन-व्यवस्थाक टूटैत स्थिति हिनक अभिव्यक्तिक प्रतिमान बनल अछि, संगहि हथियारक होड़ आ विश्वस्तर पर शान्तिक समस्या सेहो हिनका प्रभावित करैत छनि। तथापि हिनक चेतना अन्तत: साम्राज्यवादी खतरे सँ आहत होइत अछि। वस्तुत: ई प्रभावन ओहि वर्गक प्रति वैचारिक प्रेमक आख्यान थिक, जे मानवीय रुप सँ उपेक्षित अछि। परमात्माक इच्छा थिकै संसार, तेँ द्वन्द्वक स्थिति बनिते अछि। मुदा सत्यक प्रत्यक्षणक संगहि द्वन्द्व निवृत भ` जाइत अछि – तेँ सत्यक अनुभव मे परमात्माक अस्तित्व इच्छा रहित भ` जाइत अछि, कामना रहित भ` जाइत अछि। अर्थात इच्छा आ कामना सँ मुक्ति। वास्तविक मुक्ति यैह थिकै, एहि मे क्रयशक्तिक चाहना आवश्यकतानुकूल उपभोग आ क्षमतानुसार कार्य मे सीमित भ` जाइत अछि। तेँ राग-द्वेषक प्रवृत्यात्मक परिधिक बन्हन टूटि जाइत छैक आ लोक परम्परागत कर्मकाण्डो सँ मुक्त भ` जाइत अछि। ई बात सत्य छैक जे वेदांत आत्माक अस्तित्व सँ अभेद केँ स्वीकार करैत अछि ; मुदा लोक ई नहि बुझैत अछि जे आत्मा प्रवृति कारण सँ भेदात्मक जगत मे होइत अछि। तेँ आत्माक अभेद होइतो प्रवृतिक भेद भ` जाइत अछि आ एही लेल प्रवृतिक दोष सँ उतपन्न आक्रामकता आ अराजकताक प्रतिकार वा प्रतिवाद अवश्य भ` जाइत अछि। अस्तु, ई नहि मानबाक चाही जे आत्मोत्कर्ष मे शांतिक लेल प्रयत्न एवं मानव मात्र मे समान भावक चेतना वेदांतेक थिक। यैह चेतना विश्व मानवताक स्थापना करैत अछि। गजलकार श्री ठाकुर वस्तुत: वेदांत केँ एहि विचार सँ नहि देखलनि अछि, तेँ लिखैत छथि – निगमागम-पुराण सम्मत छै- जीव अंश परमात्मा के मच्छर लेल कछुआ सुनगाबी, ई केहन दन गप लगैए ओना वेदांत सभहक रक्षक अछि आ विवेक सम्मत विचारक प्रधानता दैत अछि, तेँ दोसरा केँ उत्पीड़ित करबा एहन प्रवृतिक विरोध करैत अछि। आजुक रिश्ता-नाता वस्तुत: विवेक वा ज्ञान सँ नहि अछि, अपितु अर्थप्राप्ति आ भूख सँ अछि। एहि अर्थ मे मनुष्य सेहो वस्तुए मानल जाइछ, तेँ भेद-भाव सामान्य गप थिक। जा धरि इच्छा वा भूख ज्ञान वा विवेक सँ नियंत्रित नहि होएत ता धरि की वर्गहीन आत्मा वा चेतनाक समाज भ` सकैछ ; ई प्रश्न हमरा सभक समक्ष मुँह बौने ठाढ अछि। श्री ठाकुर वर्तमानक बास्तुक-विद्रुपता केँ रेखांकित करैत लिखैत छथि – मारू, मारू, मारि भगाबू – सगर टोल मे एक्के बोल तखन करी रक्षक के दाबी, ई केहन दन गप लगैए पेट बनाबैछ अपन ढंग सँ सभटा रिश्ता-नाता, तेँ हम बिहारी, तू पनिजाबी, ई केहन दन गप लगैए वस्तुत: ठाकुर जी अपन गजल मे सामाजिक यथार्थ केँ आ व्यवसायिक विद्रुपता केँ सूक्ष्म रुप सँ रेखांकित कयलनि अछि। महत्वपुर्ण तथ्य ई अछि जे गजलक व्याकरण केँ ई ओतेक स्थान नहि देलनि जतेक शब्द आ भावात्मकता केँ। तेँ भावक क्षोभ हिनकर गजल मे नहि अछि। प्रतीक, बिम्ब आ नव उपमानक सृजनशीलता एवं कलात्मकता हिनक गजल मे महत्वपुर्ण रुपेँ व्यक्त भेल अछि, जाहि सँ व्यंजनाक मार्मिकता सिद्ध भ` जाइत अछि। अस्तु, मित्र श्री ठाकुरक दृष्टिक पैनापन मे वेदांतक समीचीन बोध अयबाक चाही, एही विश्वासक संग हिनक सारगर्भित भावक प्रति संवेदनशील छी – एही बातक संग हिनका बहुत-बहुत साधुवाद ! डॉ. शंभु कुमार सिंह, राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, भा.भा.सं., मैसूर घसल अठन्नी : एकटा विमर्श साहित्य अथवा काव्य समय-सापेक्ष होइत अछि; एहि कारणेँ समयक संग-संग काव्यक सेहो स्वरूप बदलैत रहैत अछि। काव्य कखनो काल ईश-महिमाक बखान करैत अछि तँ कखनो वीरगाथाक, कखनो कामिनीक देहयष्टिक सांगोपांग वर्णन करैत अछि तँ कखनो सामान्य मानव जीवनक पीड़ा, ईर्ष्या, द्वेष, राग आदिक। कहबाक तात्पर्य जे साहित्यक यात्रामे काल आ स्थितिक कारणेँ काव्यक उद्देश्य बेर-बेर बदलैत रहैत छैक। अतः मूल रूपमे जँ विचार कएल जाए तँ साहित्य अथवा काव्य रचनाक मुख्य उद्देश्य भेल प्रकृति (सजीव/निर्जीव)क प्रकृतिसँ तारतम्यता स्थापित कए मनुखमे मनुखताक अर्थ ताकब। एहि दृष्टिएँ कविताक सार्वभौमिकता आ सर्वकालिकता एहि शर्त पर निर्भर करैत अछि जे ओहिमे मनुखक संवेदनाक अभिव्यक्ति कतेक प्रभावी रूपेँ भेल छैक। ई संवेदना देश-कालकेँ समान रूपेँ प्रभावित करैत अछि। कविचूड़ामणि काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ मैथिली काव्य काननक एकटा एहन नक्षत्र छथि जे अपन कविकर्मक हेतु युग-युगान्तर धरि मैथिली साहित्यमे पूजित रहताह। हम एतए “राधाविरह” सन उच्चकोटिक काव्य रचयिता मधुपक चर्चा नहि करए जा रहल छी। हम चर्चा करए जा रहल छी ‘घसल अठन्नी’क रचयिता मधुपजीक। एतए प्रश्न उठैत छैक जे कोन एहन परिस्थिति रहैत छैक जकरा कारणेँ ‘घसल अठन्नी’ सन काव्य रचना करबा लेल काव्यकार बाध्य होइत छथि अथवा प्रेरित होइत छथि। हमरा बुझने जखन लेखकक समक्ष ओहि कालखण्डक कोनो विस्मयकारी यथार्थ (जे कि घसल अठन्नीमे चित्रित कएल गेल अछि) उपस्थित भ’ जाइत छैक तँ ओहि यथार्थसँ कवि मन सेहो अपना आपकेँ मर्माहत महसूस करैत छथि आ तखने एहि पीड़ाकेँ जनमानसक सोझा आनबाक लेल ओ आतुर भ’ जाइत छथि। बुचनी सन शोषित, पीड़ितक पीड़ाकेँ एहन मार्मिक रूपेँ प्रस्तुत करबाक हिम्मत संभवतः मधुपेजीसँ संभव रहनि किएक तँ समकालीन व्यवस्था किन्नहुँ हुनका पक्षमे नहि छलनि। घसल अठन्नी कविताक अध्ययन केलाक पश्चात् निम्न बिन्दु सभ पर विचार कएल जा सकैछ: शब्द-चित्रक माध्यमे प्रकृतिक चित्रण, भुटकुन बाबू (शोषक वर्ग)क अत्याचार, मखना सन भटकल प्रजावर्ग, बुचनी (शोषित)क रेखाचित्र, घसल व्यवस्थासँ घसाएल अठन्नीक आर्तनाद। घसल अठन्नी कविताक सभसँ पैघ विशेषता थिक एकर व्यावहारिक भाषा, जकर पाठ कएलाक उपरान्त पाठकक मोनमे वैह भाव, वैह चित्र सोझा नाचए लागैत अछि। शब्द-चित्रक एहन जादूगरी कि गरमीक वर्णन पढैत काल पाठकक सोझा ओ दृश्य चलचित्र जकाँ चलए लागैत छैक आ पाठक ओहि स्थितिसँ अपन तादात्म्य स्थापित कए लैत अछि, जेना निम्न पाँति पढ़बा काल अंतिम पाँति पर अएलाक पश्चात् एहन अनुभूति होएत जे जँ आँखिकेँ झाँपि नहि लेब तँ ई तापत धूरा कतहुँ आँखिमे नहि पड़ि जाए; पछबा प्रचण्ड/बिरड़ो उदण्ड/सन सन सन सन/छन छन छन छन/आगिक कण सन/सन्तप्त धूलि अछि उड़ा रहल। अथवा इनहोर बनल पोखरिक पानि...। वा ई अग्निवृष्टि!/ संहार करत की प्रकृति सृष्टि! आदि कहैत-कहैत जखन ओ कहैत छथि- छाहरियो अभिलाष करए भेटए छाहरि...तँ बुझाइत अछि जे एहिसँ आगू कविक कल्पना जाइए नहि सकैए। कल्पनाक एहन सजीव चित्रण! एहन विलक्षण पराकाष्ठा! कवि मधुपेसँ संभव छनि। वस्तुतः कविताक पहिल भागमे कवि प्रकृतिक वर्णन करबाक लाथे एकटा भूमिका तैयार केलनि अछि जाहिसँ प्रकृतिक एहि रौद्र रूपकेँ भुटकुन बाबूक सामन्ती प्रवृति पर आरोपित कएल जा सकए। मार्क्सवादी विचारधारामे सम्पूर्ण समाजकेँ दुइए वर्गमे विभाजित कएल गेल अछि-एकटा शोषक वर्ग आ दोसर शोषित वर्ग। एतए भुटकुन बाबू शोषक वर्गक प्रतिनिधित्व करैत छथि आ बुचनी शोषित वर्गक। गै छौक ने डर?/कै खून पचैलनि ई बण्डा/रोइयों न भंग/युग-युग दारोगाजी जीबथु/क’ देबौ खून। पहिने मखनाक अत्याचार- चट-चट-चट-चट/कुलिशहुँसँ कर्कश भीमकाय/मखनाक चाटसँ निस्सहाय/भू-लुण्ठित दुनू माइ-पूत/भ’ गेलि बेहोश। आ ताहूपर मोन नहि भरलनि तँ- दन-दन-दन-दन/मूर्छितो देह पर बेंत वृष्टि/बस एक बेर अस्फुट क्रन्दन/शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि! एतए मखनाक चरित्र ओहि भटकल युवावर्गक सदृश अछि जे अपनहि हाथेँ अपन आ अपन समाजक सर्वनाश करबा लेल आतुर अछि। आखिर मखना सन नोकरकेँ भुटकुन बाबू सन मालिकसँ की सभ सुविधा भेटैत हेतैक? मालिकक पहिरलाहा पुरनका धोती-तौनी, खएबा लेल नीक-नुकुत भोजन आ कोनहुँ जग-जाजन पर खर्च करबाक लेल कर्ज, सैह ने? मुदा मखना सन नोकर एहि भ्रमकेँ नहि तोड़ि पबैत अछि जे यैह कर्ज ओकरा पुश्त-दर-पुश्त भुटकुन बाबूक चाकरी करबाक ले बाध्य करैत रहैत छैक आ करैत रहतैक। मालिकक सह पाबि ओ जाहि प्रकारेँ बुचनी पर प्रहार करैत अछि ताहिसँ सिद्ध भ’ जाइत अछि जे जाधरि मखना सन मूर्ख एहि समाजमे अछि ताधरि भुटकुन बाबू सन शोषकक अत्याचार निर्बाध रूपेँ चलिते रहत। रौ, की तकैत छें मूँह हमर/छोटका लोकक एते ठेसी? जहिया मखना सन लोक एहि ‘छोटका लोक’ आ ‘बड़का लोक’मे भेद जानि जाएत तहिए सँ समाजक कायाकल्प होएब प्रारंभ भ’ जाएत। कहल जा चुकल अछि जे प्रस्तुत कवितामे कवि जे किछु कहने छथि, जाहि कोनो परिस्थितिक वर्णन केने छथि ओ प्रस्तुतिक पराकाष्ठा थिक। बुचनीक दुर्दैन्य दशाक वर्णन करैत काल कवि द्वारा बुचनीक खीचल गेल रेखाचित्र- कुट्टी-कुट्टी परिधान मलिन/हड्डी जागल/सौन्दर्य गरीबीसँ दागल...। आभूखक ज्वालासँ जरक डरें/तारुण्य जकर अबितहिं भागल/पाकल पानहुँसँ बढ़ल-चढ़ल/पीयर ओ दूबर-पातर तन/फाटल ओ फुफड़ी पड़ल ठोर/आमक फाड़ा सन नयन/खाधिमे धएल जकर दुर्दैव चोर। एहन देहक परिणति की भ’ सकैछ? शोणितोक आब नहि छैक शेष/पुनि दूधक होएब कोना सम्भव? एहनो स्थितिमे बुचनी अपन आ अपन बच्चाक जीवनक रक्षार्थ एहन भीषण समयमे खेतमे काज करैत अछि। घसल अठन्नी कोनहुँ दोकानमे नहि चललाक स्थितिमे ओ पुनः मालिकसँ गोहारि करैत अछि- ओ घसल अठन्नी चलि न सकल/हम सब दोकानसँ घूमि-फीरि/छी आबि रहलि/करु कृपा अठन्नी द’ दोसर/एसकरुआ हम/भ’ गेल राति/गिरहत, न आब देरी लगाउ/भूखें-प्यासें हम छी मरैत/लेबै बेसाह/कूटब-पीसब/बच्चा भोरेसँ कानि-कानि/छट-पट करैत अछि जान लैत। मुदा भुटकुन बाबू पर एहि गोहारिक कोनो असर नहि पड़ैत छैक। एतए बुचनीक भूख तँ नहि मेटा सकल, हँ ओकरा अपन शिशुक संगहि एहि इहलोकसँ मुक्ति अवश्य भेटि गेलैक-शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि! एतए बुचनिक मुक्त सृष्टि! क संगहि कविताक अंत नहि भ’ जाइत अछि। हम कत’ जाउ/अवलम्ब पाउ/के शरण?/घसल जनिकर अदृष्टि! कहि कवि समाजक सोझा एकटा बड़का टा प्रश्नचिह्न छोड़ि देने छथि। एतए घसल अठन्नीकेँ समाजक शोषित वर्गक प्रतीकक रूपमे कवि प्रस्तुत केने छथि। अठन्नी अथवा पाइ माने की? अठन्नीक माने मौद्रिक व्यवस्थाक एकटा छोट किन्तु महत्वपूर्ण घटक, अर्थव्यवस्थाक रीढ़। आ गरीब-गुरबा वा मजदूर माने की?सामाजिक व्यवस्थाक एकटा छोट किन्तु महत्वपूर्ण घटक, समाजक निर्माण, कल्याणक सभसँ पैघ संसाधन। समाजक भौतिक सुख-साधन सँ ल’ कए सभ्यता, संस्कृतिक विकासक लेल दुनूक दोहन आवश्यक। मुदा दोहनक दृष्टिकोण की हेबाक चाही, यैह सभसँ महत्वपूर्ण प्रश्न अछि। भुटकुन बाबू सन सामंती प्रवृतिक लोक दोहनक माने बुझैत छथि ‘खून चोसब’ आ जखन बुचनी सन पीड़ित, शोषितक देहमे शोणितक अंश मात्र रहि जाइत अछि तखन ओकर अस्तित्व मेटा देबाक ई प्रवृति निश्चये दानवी प्रवृतिक द्योतक अछि। तहिना जखन हम घसल अठन्नीक अर्थविस्तारमे जाइत छी तँ ओहिमे समाजमे व्याप्त ओ सभटा कुरीति समा जाइत अछि जे जकरा कारणेँ मनुख जातिक मूल्यक तीव्र गतिएँ ह्रास भेल जा रहल छैक। घसल अठन्नीक एहि आर्तनादक रूपमे वस्तुतः कवि अपन आर्तनादसँ जनमानसक ध्यान आकृष्ट करबाक प्रयास केने छथि। आखिर ई व्यवस्था कहिया धरि चलैत रहत? एकरा सँ त्राण कोना हो? कि एहि व्यवस्थासँ त्राण दिआएब कोनो एक व्यक्ति/संस्था सँ संभव छैक? निश्चिते रूपसँ नहि। एकरा लेल हमरा सभकेँ सामूहिक प्रयास करए पड़त। विनीत उत्पल मैथिलीक विद्रोही कवि: काशीकांत मिश्र मधुप 'मैथिलीक नवलेखन एक 'जनावर' जकाँ जीव बुझल जाइत छल, जाहिसँ परम्परावादी साहित्यकार लोकनि भयाक्रांत भs उठल छलाह. असलमे ने नवलेखन कोनो अजुगत वस्तु छल आ ने कोनो 'अजूबा' वस्तु छल. साहित्यक परिवर्तित रूपक एक 'तेबर' छल. नबतावादी लोकनि नवलेखनक आरम्भ राजकमल सं मानैत छथि, मुदा हमरा जनैक तकर उत्स यात्रीजीये में छनि. यात्रीजी अंततः सुमन व मधुप सं जे भिन्न छलाह से ने केवल मार्क्सवादीसं प्रभावित होयबाक कारण अपितु हुनक साहित्यिक अभिव्यक्ति, भंगिमा, ओहि दुनू गोट सं भिन्न छल आ तकरे गहिकs सं राजकमल आगां बढ़ल छलाह।' ई बात सुधांशु शेखर चौधरी १९८३ में चेतना समिति द्वारा आयोजित विद्यापति पर्वक अवसर पर आयोजित विचार गोष्ठीक विषय 'आधुनिक साहित्य में परिवर्तनक स्वर' में कहने छल. अहि विचार गोष्ठी कs लs कs छपल 'आधुनिक साहित्य मे परिवर्तनक स्वर किताब मे रामनुग्रह झा लिखैत छैथ, 'आधुनिकतम काव्य प्रवृति पर विहंगम दृष्टि सं विचार करैत तीन वर्ग केल जा सकैत छथि. यथा,संस्कृत साहित्यपेक्षी (सुमनजी, जीवनाथ झा प्रभृति), उदार दृष्टिवादी (भुवनजी, मधुपजी, किरणजी, तंत्रनाथ झा, गोविन्द झा प्रवृति) तथा वाममार्गी (यात्रीजी, राजकमल, सोमदेवजी, किसुनजी, मायानन्द जी प्रवृति). 'आधुनिक गीत में परिवर्तनक स्वर' मे भीमनाथ झा लिखैत छैथ जे एके कवि गीतक स्वर आ शिल्प दुहू में व्यापक परिवर्तन अनबाक काज कयलनि, से थिकाह कवि चूड़ामणि श्री मधुप. आधुनिक काल मे गीत कें सभसँ लोकप्रिय बनयबाक श्रेय हिनके छनि. ई मैथिलीक अपन छंद में शताधिक गीतक रचना तं करबे कयलनि, संगहि हिंदी आ हिंदीतर भाषाक लोकगीत आ फिल्म संगीतक अनेक सुर पर अपन शब्द कें सजौलनि। सुधांशु शेखर चौधरी, रामनुग्रह झा आ भीमनाथ झाक तथ्य केर सोचैत आ मधुपजीक कविता आ गीत पढ़ैत ई बात सुदृढ़ भेल जे मधुपजी एकटा विद्रोही कवि छैथ आ उपर लिखल तीनू गोटेक लिखल बात मे विरोधाभाष अछि. जखन राजकमल चौधरी स्वरगंधाक भूमिका मे लिखैत छैथ, 'कविता अनुभव, ज्ञान, आवेग आ अभिव्यक्तिक एकटा सशक्त प्रक्रिया होइत अछि. एहि प्रक्रिया मे शब्द,ध्वनि, छन्द आ लय, एकटा विशिष्ट सत्यक अनुभूति बनि जाइत अछि. तखन साहित्यिक अभिव्यक्ति आ भंगिमाक अंतर कोन धरातल पर केल जा सकैत अछि. जहि काल जेहन सामाजिक, राजनीतिक आ आर्थिक वातावरण रहल, तहिने कवि आ लेखक अपन रचना केलखिन. कोनो भी रचनाकारक रचना हुनकर जीवनानुभव पर आधारित होयत अछि. ओना मानल जायत अछि जे विद्यापतिक बाद जतेक कवि आ गीतकार भेल, ओहि मे मधुपजीक गीत सर्वाधिक मुखर भेल छथि. मोहन भारद्वाज 'गीत, नवगीत,गजल' नामक एकटा लेख मे लिखहि छैथ जे देश-दशा आ मातृभाषा कें पृष्ठभूमि में राखिकेर गीत लिख- निहार मे हिनका नाम सबसे बेसी महत्वपूण अछि. चारिम दशकक रचनाकार मधुपजी केर गीतक आठटा पोथी प्रकाशित भेल अछि. एखन धरि हुनकर रचनाक समीक्षा अहि बात पर भेल अछि जे हुनकर गीत आ कविता फिल्म संगीत पर आधारित छल. मुदा अध्ययन मे ई बात आगू आब रहल अछि जे मधुपजी जे विषय पर कविता आ गीत लिखने छथिन, ओ विषय अाजुक युग मे, आजुक कविता मे हासियो से बाहर अछि. आजुक कोनो मैथिलीक कवि अपन कविताक आधार रसगुल्ला, छुतहर, पतित पीक, टटका जिलेबी केर नहि बनाबैत अछि. एखन हम सब ओहि काल खंड सँ गुजरि रहल छी जखन दुनियाक सबसँ पैघ लोकतंत्र भारतक राजधानी मे निर्भया कांड होयत अछि. अहि कालक दुनियाक सबसें तागतवर देश अमेरिकाक राष्ट्रपति क्लिंटनक सेक्स स्कैंडल वा रूस राष्ट्रपति पुतिनक प्रेम प्रसंग अखबार सुर्खी बनैत अछि. महिला सशक्तिकरण गप अहि कालखंड मे सबसें बेसी भेल, तखन आजु सँ सत्तर- अस्सी बरख पिहन नारी समाजक विद्रूपता आ सुतल अंतरात्माक आवाज गीतक माध्यम सँ बाहर आनैक काज केर विद्रोह ने कहल जाय ते की कहल जाय. ओहि कालक कतेक रास रचना मिथिलाक स्त्री समाजक गप आगू आनलक, एकर गिनती केल जा सकैत अछि. कतेक रास समीक्षक हुनका श्रृंगारक कविता गीत लिखहि बलाक रूप मे प्रस्तुक करैत अछि,मुदा हुनकर कविता आ गीत विद्रोह कविक गीत अछि. 'पतित पीक' कविता मे मधुपजी कहैत अछि, 'स्वाथी संसारक केहन नियम, उपक्रतो उपद्रव करै न कम.' और ते और कहैत अछि, 'नहि पतन एक दिन ककर हैत, पृथ्वीक कोर मे के न जाइत.' मधुपजी ब्राह्मण वर्ण मे भेला के बादो 'छुतहर' गीत मे लिखैत अछि, 'हो सदिखन संसारक सुधार, पतितौक बनथि क्यो कर्णधार. उद्धार सुधारक सँ न हमर, ई सभ्य समाजक छिक प्रताप.' कविताक ई सभटा शब्द आ भाव केर श्रृंगार कहल जाय या एकटा विद्रोही कविक शब्द. ई कविता औहि काल मे लिखल गेल छल जहिया ने ते ओतेक संचारक साधन छल आ ने ओतेक सामाजिक विकास. हुनकर कविता "झंकार" आ "घसल अठन्नी" मे सेहो यहि भाव अछि. एकटा गीत मे ओ लिखैत अछि, "करू भेदभाव दूरे, संसार केर सूरे, करनीक किंतु काया, इँगित करय न छू रे." ओहि कालक कोनो कविता मे एहन धार नहि देखा पड़ैत अछि. भीमनाथ झा एक ठाम लिखैत अछि जे 'हल्लुक' कविता मे ओ नायिका समाजक कुप्रथाक प्रतिकार करबाक साहस जुटबैत अछि, 'मन हवैद्य डाक देल जे तनिका केँ दी तलाक, घुमबी नवीन सृष्टि हेतु एक नवचाक, भै जाइ आर छोड़ि से समाजकेँ फराक.' हुनकर ख्याति प्राप्त गीत 'हम जेबै कुशेश्वर भोर, रंगि कै ठोर, पहिरि कै काड़ा, झनकाय झनाझन धारा' क माधयम सँ ओ स्त्री चेतनाक जे रूप राखने छथि, ओ दुलभ छथि. भले ही कतेक रास कवि कं हुनकर समकक्ष राखल जायत अछि, मुदा मधुपजी पूर्णरूपेण विद्रोही कवि छल, जकर पहचान करब अा समीक्षा करब आवश्यक अछि. मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ" “मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग” मैथिलीमे पहिल बेर विदेह ई-पत्रिका www.videha.co.in मे धारावाहिक रूपमे ई-प्रकाशित भेल छल। श्री हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ जन्म: 1 जनवरी, 1934, एम.ए. (हिन्दी), बी.एल., विद्यावाचस्पति, प्रकाशित कृति: अर्चना (गीत काव्य), आनंद (खंड काव्य), एक बनजारा विजन में (काव्य), मधेपुरा में स्वाधीनता आन्दोलन का इतिहास, शैव अवधारणा और सिंहेश्वर स्थान आदि विनीत उत्पल जन्म : 7 अप्रैल, 1978. मधेपुरा, बिहार. एक दशकसें बेसी अवधि धरि राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्तान जेहन अखबारमे पत्रकारिताक बाद आय काल्हि अध्यापन. सम्प्रति जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीक मे शोधरत. अहाँक प्रकाशित कृति सभमे हम पुछैत छी (मैथिली काव्य-संग्रह), नए समय में मीडिया (संपादन), साहित्य अकादेमी सं पुरस्कृत हिन्दीक वरिष्ठ कथाकार उदय प्रकाशक कथा ‘मोहनदास’क मैथिली अनुवाद. हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग लेखक हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ" संपादक श्रीगोपाल पंडित हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल समर्पण ऋष्यश्रृङ्ग आश्रमक महान साधक आ श्रृङ्गेश्वर (सिंहेश्वर नाथ) मंदिरक एकनिष्ठ आराधक गोलोकवासी हमर नानाश्री बेनी प्रसाद, हमर मामाश्री सहदेव प्रसाद, लक्ष्मी प्रसाद आ रामचंद्र प्रसादक पावन स्मृतिमे तर्पण तरहे श्रद्धाश्रु निवेदित- तृप्यन्ताम! तृप्यन्ताम! तृप्यन्ताम!!! -हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ श्रृङ्गेश्वर (सिंहेश्वर नाथ) महादेवजीक पौराणिक कामना लिंगक मधेपुरा (बिहार) केँ स्मरण करैत. परमपुरीवासीने परमगुरु परमात्मने नमः सम्पादकीय भारतक अइ पूब क्षेत्र, एखुनका कोशी अंचलमे भारतीय सांस्कृतिक उदय प्रागैतिहासिक कालमे भेल छल आ ऐतिहासिक प्रक्रियाक सामानांतर एकर विकास भेल. इतिहाससँ संबद्ध भेलाक बादो ई अंचल अप्पन इतिहास केँ आवश्यक नै बुझलक. तकर बादो ई अप्पन पुरना धरोहरकेँ महाकाव्य आ पुराणमे मणि मुक्ता सन सम्हारि क’ राखलक. एतौका संस्कृति नै तँ राजा, महाराजा आ उच्चवर्गक अछि, मुदा ई संस्कृति विश्वामित्र आ ऋष्यश्रृंग सन वैज्ञानिक तपस्वी ऋषि सबहक देन अछि जकरा उत्तर वैदिक कालसँ ल’ क’ आइ धरि अइ ठामक लोक आत्मसात केने अछि. तइसँ ई सामान्य लोकक संस्कृति अछि, विशुद्ध जनवादी संस्कृति. कतेक जातिक परस्पर संघर्ष, संपर्क आ संतुलनसँ एकटा दीपसँ असंख्य दीप श्रृंखला जोड़ैत आ ओकर अधिग्रहण आ अस्वीकार करैक परंपराकेँ विकसित करैक संस्कृति. कतेक रास अलग-अलग जातिक संस्कारक, उत्तर वैदिक कालसँ आइ धरि, अप्पन सर्वोच्चताकेँ सुरक्षित राखने अछि. कोशी अंचलक सभसँ महान सांस्कृतिक पीठ श्रृंगेश्वर स्थान (सिंहेश्वर स्थान) क स्मरण करैत एतौका तपः पूत ऋष्यश्रृंग अप्पन समग्रतासँ उपस्थित भ’ जाइ छथिन. हुनकर सम्पूर्ण जीवन एकटा आदर्श अछि. बाल्यावस्थामे ब्रहमचर्य पूर्वक अध्ययन, गृहस्थ आश्रममे निःस्वार्थ समाजसेवा, यज्ञानुष्ठान, अनार्य संस्कृतिक आर्य संस्कृतिमे समन्वित करब आ ओकर राष्ट्रक मुख्य धारामे प्रबल टकरावक बादो जोड़ैमे सक्रिय हएब, ई अइ ऋषिराजक महान उपलब्धि छल. ऋष्यश्रृंगक जीवनवृत बाल्मीकीय रामायण, महाभारत, भागवत आ अन्यान्य पुराण आ भवभूतिकृत ‘उत्तररामचरित’ मे कनीटा संकलित अछि. हुनकर सम्पूर्ण जीवनक वृत्तात्मक अध्ययन अखैन धरि नै भेटैत अछि. कोशी अंचलक वरिष्ठ साहित्यकार आ क्षेत्रीय इतिहासकार श्री हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ बड निष्ठा आ परिश्रमसँ अइ अभावकेँ दूर करैत ऋष्यश्रृंगसँ संबंधित ऐ प्रामाणिक, वैज्ञानिक आ गवेषणात्मक पोथी लिख क’ आबएबला पीढी आ शोधार्थी लेल मार्ग प्रशस्त केने अछि. जखन सम्पूर्ण भारत युद्धक आगिमे झुलसि रहल छल, देवासुर संग्रामक नाम पर लाशसँ धरती पाटल जा रहल छल आ ऋष्याश्रममे शताघ्नी तैयार होइत छल, तखन कोशी कातक ऋष्यश्रृंग आश्रम एक दीपसँ दोसर दीप केँ बारि उत्तर भारतसँ दक्खिन भारत मे शांति–मंत्र बिछाबैत छल. ई तहियोका इतिहासक एकटा महत्वपूर्ण इतिहास अछि. व्रात्यक क्षेत्रमे व्रात्यक स्वामी भगवान शिवक इष्ट लिंगकेँ पुनर्जागृत क’ ई महान तपस्वी वेदविरुद्ध आ वेदविहित मतकेँ समन्वित करैबला काज केलक जे देश, जाति आ समाजक समन्वयवादी ऋषिराजक सुकृत्यसँ प्रभावित भ’ भगवान राम, सागरक कात शिवलिंगक स्थापना केने छल जे ठाम तहियोका रक्ष-संस्कृतिक केंद्र छल आ भगवान शिव अइ संस्कृतिक संपोषक रावणक आराध्य देव छल. अइमे मत-भिन्नता हेबाक बादो प्रमाण तथ्य ई अछि जे अइ महान ऋषिक जन्म कोशीक कात अखुनका सिंहेश्वर स्थानमे भेल छल. ई ठाम महर्षि विश्वामित्रक तपस्याक ठाम सेहो रहल छल. हुनकर नामपर अखनो कोशीक कातमे ‘कुसहा’ नामक कतेक रास गाम बसल अछि जे कौशिक ऋषि विश्वामित्रक स्मृति केँ अप्पन नाममे संजोगने अछि. ऋष्यश्रृंगक आश्रम अइ देशमे कतेक ठाम अछि. हम लगभग सभटा आश्रमक परिभ्रमण केने छी. मुंगेरसँ 30 किलोमीटर नैऋत्य कोणमे आ भीम बांधसँ पंद्रह किलोमीटर वायव्य कोणमे दुर्गम पर्वत शिखरपर जनशून्य आ प्रकृति अप्पन चमत्कारी हाथसँ सजल एकटा दर्शनीय ऋष्यश्रृंग आश्रम अछि. एतौका गोपालक सँ हम पुछलौं जे ऋष्यश्रृंगक मूर्ति कतए अछि? ओ सहज भावसँ बाजल, ई पैघ पहाड़, गाछ-वृक्ष, पाथरक टुकड़ा यएह तँ ऋष्यश्रृंग छथिन. कतेक रास रस्तासँ बहि क’ आएल निर्झरिणीक जल एतेक शीतल छल जे हम नहाबैक लोभ छोड़ि नै सकलौं. गोपालक अप्पन गमछा देलक आ हम नहेलौं. हमरा बताएल गेल जे अइ निर्झरिणीक जल अखैन गर्मीमे जतेक शीतल अछि, ठार मे ओतबे गरम. मुंगेरसँ दक्खिन ऋष्यश्रृंगक तप्त कुंड अछि आ सीताकुंडसँ दस किलोमीटरपर हिनकर आश्रम अछि. ऋष्यश्रृंग आश्रमक आस-पास कतेक रास वैष्णव आ बौद्ध मूर्ति भग्न स्थितिमे भेटल अछि. ई निश्चते सनातन हिन्दू आ बौद्धक पारस्परिक संघर्षक परिणाम रहल हएत. अइ मनोरम ठामक ‘एशियाटिक रिसर्च’ क अंक सातक पृष्ठ 376 पर उल्लेख अछि. किंवदन्ती अछि जे राजा दशरथ एतए अप्पन चारू बेटाक मुड़न करेने छल. वएह पर्वतमाला पश्चिम दक्खिन दिस बढ़ैत गेल अछि. अखुनका भागलपुरसँ 42 किलोमीटर दूर पश्चिम आ बरियारपुरसँ छह किलोमीटर दक्षिण-पश्चिममे सेहो ऋष्यश्रृंगक आश्रम अछि. ऊ मैरा पहाड़ीसँ बनल एकटा गोल सन घाटीमे अछि. ऐ आश्रम लग ऋषिकुंड नामक एकटा पोखैर अछि, जे ठार आ गरम जल स्रोतक एकटा समन्वित जलराशि अछि. अइ पोखैरक उत्तर दिस ऋष्यश्रृंग आ हुनकर पिता विभांडक साधनामे रत रहै छल. कजरा रेलवे स्टेशनक दक्खिन 12 किलोमीटर दूर ऋष्यश्रृंग पहाड़ क ऋषिराजक तपोवन हेबाक सम्मान अछि. ‘प्राचीन भारतक ऐतिहासिक भूगोल’ नामक पोथी मे डा. विमल चरण लाहा एकरा ल’ क’ पृष्ठ 429 मे लिखने अछि. एहन लगैत अछि जे अइ ऋष्यश्रृंग पर्वतमालाकेँ ऋष्यश्रृंगक ससुर राजा रोमपाद हुनका कन्या-दानमे देने छल. अइ पर्वत श्रृंग पर तपस्या क’ ऋष्यश्रृंग एकरा आ सम्पूर्ण क्षेत्र केँ महिमा मंडित क’ देलक. अइ ऋषि केँ धारक कात आ वन्य पर्वत श्रृंगक कोरा बेसी प्रिय छल. ओ प्रकृति पूजक छल आ हुनकर आराध्य प्रकृति जगतक रूप-रूपान्तर अछि. जाज्वल्यमान रश्मिवंत सूर्य, रातिमे मधु वर्षा करैत शीतल चंद्रमा, यज्ञवेदी बा पाकशाला मे धधकैत आगि, मेघक तूणीरसँ तीर सन निकलैत विद्युत्माला, दिनक स्वच्छ आ रातिक नक्षत्रमंडित आकाश, धारमे बहएबाली वेगमयी जलधारा, प्रकृतिक अचिन्त्य शक्तिक प्रतीक अइ चेतन रूपमे ऋषिराजक स्पष्ट आ रचनात्मक कल्पना हुनका देवत्वक दर्शन देलक. वेदमंत्रमे कतेक देवता सभकेँ प्राकृतिक जगत अधिष्ठाता मानि, हुनकर आवाहन आ स्तवन कएल गेल अछि, जेना आकाशक देवता द्यौ, वरुण, सौर मंडलक देवता सूर्य, मित्र, सवृत, पृषण, आ विष्णु, प्रभातक देवता अश्विनी आ उषा, अन्तरिक्षक देवता इंद्र, अपानापात, रूद्र, गरुड़, वायु, पर्जन्य आ आपः, धरातलक देवता पृथ्वी, अग्नि आ सोम आ सिन्धु, विपाशा, शतद्रु आ सरस्वतीक धार. ऋष्यश्रृंगक आरंभिक जीवन प्रकृतिमे एतेक रमल, रचल आ बसल छल जे महाकवि वाल्मीकि हुनकर ‘स वने नित्य सम्वृद्धो मुनिर्वनचरः सदा’ वन्य प्रकृति मे एकाकार भ’ जाइक कल्पना केने अछि. एहन ऋषि गूढ़ रहस्यक जानकार, तथ्यक अन्वेषक, शोधकर्ता आ गवेषणात्मक चिंतन आ विचारसँ पूर्ण समलंकृत होइत अछि आ निष्णात वैज्ञानिक सेहो. कौशिकीसँ ल’ क’ तुंगभद्राक तीर आ हिमालय सँ ल’ क’ नीलगिरिक उपत्यका आ वनखंड हुनका बेसी प्रिय छल. ओ कतेक रास यज्ञक आचार्य छल. हुनकर सम्पादित वृष्टि यज्ञ, पुत्रेष्टि यज्ञ, द्वादश वर्षीय यज्ञादिक अनुष्ठान तहियोका भरतखंडक इतिहासमे कतेक रास स्वर्णिम अध्याय जोड़लक. हुनका तँ जलप्रबंधनमे सेहो विशेषज्ञता छल. एखौनका चम्पानगरक चम्पानालाक निर्माण, महानदीक उद्भव आ ओकर मार्गक निर्धारणकेँ ओकरा खेती जोगर बनाएब, हुनकर वैज्ञानिक सूझबूझक जवलंत प्रमाण अछि. कोशी अंचलक एहन महान सपूत ऋष्यश्रृंगपर पूर्ण पोथी लिखि क’ ई विद्वान लेखक बड़ पैघ काज केने अछि. अइ विषयपर आगू जे कोनो गवेषणात्मक काज हएत, ओकर आधार यएह पोथी हएत. हमर एहन विशवास अछि. एतदर्थ ऋष्यश्रृंगक जन्मभूमि सिंहेश्वर स्थानमे ऋष्यश्रृंग शोध संस्थानक स्थापना अइ विद्यान लेखकक संजोकत्वमे कएल गेल अछि. सिंहेश्वर मंदिर न्यासक प्राथमिकता मे ई उल्लिखित अछि- क्रमांक 3 : न्यासक दिससँ धार्मिक पोथी, वार्षिक पंचांग, धार्मिक फोटो, कलेंडर, पत्र-पत्रिका आदि लागत मूल्य पर विक्रय आ प्रकाशन. क्रमांक 4 : सार्वजनिक वाचनालयक निर्माण. क्रमांक 6 : सिंहेश्वर मंदिरक ऐतिहासिक, पुरातात्विक, धार्मिक वृतांत आ लोक कथा सबहक संकलन अ शोध. क्रमांक 8 : युग आ संस्कृत शिक्षणक व्यस्था. जतए धरि क्रमांक 3 आ 6 क प्रश्न अछि, अइ ग्रंथक विद्वान लेखक श्री हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ सिंहेश्वर स्थानपर पहिलुक शोधात्मक पोथी ‘शैव अवधारणा और सिंहेश्वर स्थान’ लिखि क’, ऋष्यश्रृंगक पुनर्जागृत सिंहेश्वर स्थानक पावन इष्ट लिंगक पहिलुक सारस्वत अर्चना केने अछि. अइ पोथीक पाँच सौ प्रति मंदिर न्यास दिससँ कीन क’ न्यासक विद्यानुरागी आ उदार सचिव श्री राम नारायण मंडल, अनुमंडल पदाधिकारी, मधेपुरा लेखकक उत्साह बढ़ेलक अछि. तइसँ ऋष्यश्रृंग शोध संस्थान दिससँ अइ पुनीत काज लेल हम न्यासक अध्यक्ष श्री ज्योतींद्र नाथ पाण्डेय, अपर समाहर्ता, मधेपुरा आ श्री राम नारायण मंडल, अनुमंडल पदाधिकारी, मधेपुरा केँ हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित करै छी. न्यासक प्राथमिकताक कंडिका 3 आ 6 क मोताबिक, न्यास द्वारा भूमि आ भवन केँ आवंटित करै लेल लेखक द्वारा अनुरोध कएल गेल अछि, जइसँ ऋष्यश्रृंग शोध संस्थान सिंहेश्वर स्थानमे कार्यरत भ’ सकए. जाधरि भूमि आ भवनक आवंटन नै भ’ जाएत, ताधरि एकर मुख्यालय कला कुटीर, अशेष मार्ग, लक्ष्मीपुर मुहल्ला, मधेपुरामे रहत. हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे न्यासक माननीय विद्वान पदाधिकारीगण जल्दिये अइ शोध-संस्थान लेल भूमि, भवनक व्यवस्था करत. हमर ममतामयी मामीजी स्वर्गीय सावित्री देवी सिखवाल आ अनंत श्री विभूषित, पूर्व अध्यक्ष अखिल भारतीय सिखवाल महासभा, हमर पूज्य मामा श्री स्वर्गीय कन्हैया लालजी पंडित अप्पन अध्यक्ष पदसँ मुक्त होइ क’ बाद राजस्थान गेस्ट हॉउस, कलकत्ता मे अप्पन कार्यकालमे कएल गेल काजमे सँ एक केँ पूरा नै होइसँ दुखी छल. ऋष्यश्रृंगक पावन चित्रक संग-संग हुनका सँ संबंधित एकटा प्रामाणिक आ गवेषणात्मक पोथीक रचना नै भेल. हुनकर इच्छा अइ पोथी रचनाक संग पूरा भ’ रहल अछि. आह, आइ जौं ओ दुनू जीवित रहतिऐ तँ कतेक प्रसन्न हेतिऐ. ऋष्यश्रृंगक भव्य संगमरमरक मूर्ति सिंहेश्वर मंदिरमे हमर माताश्री पार्वती देवीक आदेशानुसार हमर पूज्य पिताश्री (स्वर्गीय) मोहनलाल जी पाण्डेयक स्मृतिमे हमरा द्वारे स्थापित कएल गेल अछि. दिनांक 20.06.2002 क गंगा दशहराक दिन वैदिक मंत्रोच्चारणक संग एकर प्राण प्रतिष्ठा कएल गेल. अइ तरहे ऋष्यश्रृंग महाराज सेहो एतए स्थापित भ’ चुकल छथिन. हुनकर संबंध मे ई गवेषणात्मक पोथी प्रकाशित भ’ चुकल अछि. आब दोसर शोध कार्य, अध्ययन आदि चलैत रहए, ऐ लेल भूमि, भवन आ वित्तक आवश्यकता अछि, जेकरा पूरा करै लेल मंदिर न्यास सँ अनुरोध कएल जा चुकल अछि. ऋष्यश्रृंगः महाप्राज्ञः शान्तः शान्ताधिनायकः प्रज्ञानिमानी मूर्वाणि सफलानि कुरिस्वंगे. ऋष्यश्रृंगाय मुनये, विभाण्डक सुते वै नमः शान्ताधिपतयेसद्यः सद वृष्टि हेतये. पर्जन्य सूक्तक उपरका चारि लाइनक संग हम अप्पन पूर्वज ऋष्यश्रृंग केँ सादर प्रणाम करैत छी. विद्यान लेखक केँ साधुवाद दै छी आ सिया राम मय सब जग जानी करहु प्रणाम जोरि युग पानी. श्री गोपाल पंडित फाइव-236, सेक्टर-12, नोएडा-201301 लेखकीय ऋष्यश्रृंगक विराट व्यक्तित्वकेँ आंकब हमरा सन मंत्रहीन, क्रियाहीन आ तुच्छ प्राणी लेल कतेक संभव अछि, एकरा हम स्वयं बुझैत छी. मुदा संतोषक गप ई अछि जे अप्पन युगक अइ महान वेदपुरुषक जन्म जइ कौशिकीक तटपर भेल छल, ओइ तटक वासी हमहूँ छी. हमरो जनम ओइ कौशिकीक तटपर भेल अछि. हम सभ एक्के ठामक वासी छी. वन्ध्यानां पुत्रकर्ता त्वं सद्यो वृष्टि प्रदायिने. श्री विभांडकक पुत्राय कौशिकी तीर वासिने. अइ तरहेँ ऋष्यश्रृंगक संबंधमे किछु कहैक दायित्व हमरो अछि. हम अइ दायित्वक निर्वाह कतए धरि केलौं, ई विद्वान पाठक अइ ग्रंथक अनुशीलन क’ हमरा सूचित करैक कृपा करब. हमर ऋषिराज कोशी क्षेत्रक सांस्कृतिक संवाहक छल, मुदा सहिष्णु. उत्तर वैदिक कालमे विरोधी सभकेँ पराजित करै लेल ऋषिगण शास्त्र, शस्त्र आ शापक सहारा लैत छल. प्रायः सभटा ऋषि एहन केने अछि. मुदा ऋष्यश्रृंग एकर अपवाद छल. ओ कहियो शस्त्र नै उठैलक आ नै केकरो शाप देलक. ओ शास्त्रक अध्ययन, अध्यापन, अनुशीलन, कतेक रास यज्ञक संपादन, लोक कल्याण आ लोक मंगलमे अप्पन सम्पूर्ण जीवन लगा देलक. ई अछि कोशी अंचलक विभूति ऋष्यश्रृंगक गौरवोज्ज्वल वृतांत आ हुनकर द्वारा पुनर्जाग्रत श्रृंगेश्वर (सिंहेश्वर) क संक्षिप्त परिचय. ऋष्यश्रृंग वंशोद्भव फारबिसगंज, अररिया निवासी, सम्प्रति नोएडामे व्यवसायरत श्री गोपाल पंडितक ऋणी छी, जे तगादा पर तगादा भेज हमरासँ पोथीक रचना करेलक आ एकर संपादन केलक. हुनकर ममतामयी माता पार्वती देवीक सेहो आशीर्वाद हमरा भेटैत रहल. मधेपुराक वरिष्ठ अधिवक्ता आ साहित्यकार श्री शिवनेश्वरी प्रसादसँ अनवरत प्रेरणा भेटैत रहल आ सदिखन हुनकर देल गेल परामर्श अमूल्य सिद्ध भेल. कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मलेन, मधेपुराक सचिव आ कवि लेखक डा. भूपेंद्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’ पोथीक पाण्डुलिपि अप्पन देख-रेखमे तैयार करेलक. ओ हम्मर भारकेँ हल्लुक क’ देलक. मित्रवर श्री भोला प्रसाद सिन्हा आ श्रीमती विमला सिन्हाक विदुषी आत्मजा डा. लीना सिन्हा, हमर विद्वान आत्मज डा. अरविन्द कुमार श्रीवास्तव आ हमर धर्मपुत्र श्री संजीव कुमार सिन्हा, अधिवक्ता, पटना उच्च न्यायालय आ ऋष्यश्रृंगक वंशज श्री एस.एन.त्रिपाठी. डी.सी.पी. राजस्थान पुलिस, जयपुर सेहो कतेक रास सामग्री द’ क’ अइ पोथीक विषय वस्तु विश्लेषण क’ बेसी गन्वेषणात्मक बना देलक. हम हुनका प्रति प्रेम आ स्नेह व्यक्त करै छी. ई सभ लोक अप्पन सारस्वत साधना सँ अइ कोशी अंचल केँ पल्लवित, पुष्पित आ हरित करैत रहए, यएह कामना अछि. ऋष्यश्रृंगक ससुर चम्पानगर, नाथनगर, भागलपुरक निवासी हम्मर सम्मानित समधि श्री चाँद बिहारी लाल आ हुनकर जमाता हमर जेष्ठ आत्मज आनंद कुमार श्रीवास्तव सँ बड रास महत्वपूर्ण तथ्यक जानकारी भेटल. हुनका प्रति हमर असीम स्नेह अछि. अइ पोथीमे जे दुर्लभ चित्र संलग्न कएल गेल अछि, ओ श्रीमती राजरानी पंडित आ हुनकर कनिष्ठ आत्मज श्री कामेश्वर सिखवाल आ ओइ फोटो सबहक फिनिशिंग आ कवर पृष्ठ हुनकर दोसर आत्मज श्री संजय सिखवाल, नोएडा तैयार केने अछि. एकर संगे अहि पोथीक मुद्रणक सबटा काज श्रीमती संगीता राजेश शर्मा (सिखवाल), शाहदरा, दिल्ली अप्पन देखरेखमे सम्पन्न करेने छथिन. हुनका प्रति हम हार्दिक आभार व्यक्त करै छी. सर्वोपरि हम परमपुरी पीठाधीश्वर स्वामी श्री केशवानन्द पुरीजी महाराज महामंडलेश्वर (निरंजनी) क आभारी छी जे अइ पोथीकेँ मुद्रण पूर्व पढ़ि क’ एकर तथ्य प्रमाणिकतापर अप्पन मोहर लगाक’ हमर अप्पन स्नेहाशीष प्रदान केलक. हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ कला कुटीर, अशेष मार्ग, मधेपुरा, बिहार-852111 विषय-सूची क्रम सं. विषय वस्तु सम्पादकीय लेखकीय प्रथम परिच्छेद अंग महिमा, प्राचीन निवासी, कौशिकी महिमा, पुण्याश्रम दोसर परिच्छेद ऋष्यश्रृंगक जन्म वृतांत, ब्रहमचर्य आ अध्ययन, अंग नरेश रोमपाद वृतांत, ऋष्यश्रृंगक मालिनी प्रस्थान, मालिनीमे वृष्टि आ पुत्रेष्ठी यज्ञ. तेसर परिच्छेद अयोध्या मे अश्वमेघ यज्ञ आ पुत्रेष्ठी यज्ञ चारिम परिच्छेद ऋष्यश्रृंग आश्रमक स्थापना, वेदक मंत्रदृष्टा ऋष्यश्रृंग, यजुर्वेदक विभाजन, माध्यन्दिन शाखा, आश्रम व्यवस्था, यज्ञ, सभ्यताक समन्वय, दक्षिणात्यमे तपस्या, श्रृंगवेरपुर वृतांत, पुण्याश्रममे द्वादश यज्ञ, महानदीक प्रगट होयब, वंश-विस्तार पांचम परिच्छेद ऋष्यश्रृंगक समकालीन दोसर चर्चित ऋष्याश्रम, सिद्धाश्रम, राजा जनकक आश्रम, भारद्वाज आश्रम, अगस्त्याश्रम, महर्षि अत्रिकक आश्रम, बाल्मीकि, वशिष्ठ, शौनक, सुतीक्ष्ण आदिक आश्रम. छठम परिच्छेद ऋष्यश्रृंगक श्रृंगेश्वर (सिंहेश्वर स्थान) पौराणिक आ परवर्ती साक्ष् किरातक भूमि कुषाण वंशीय राजभर निषादक धरती मूर्ति स्थापना सिंहेश्वर मेला. सातम परिच्छेद उपसंहार परिशिष्ट पुत्रेष्ठी यज्ञ ऋष्यश्रृंगक सासुर मालिनी (इतिहासक आइनामे चम्पानगर) शंकराचार्य आ सिंहेश्वर (जगत प्रसिद्द शंकर मंडन मिश्र शास्त्रार्थ सिंहेश्वरमे) सहायक आ सन्दर्भ ग्रंथक सूची ऋष्यश्रृंग आ हुनकर आश्रमक स्मरण करैत पहिलुक परिच्छेद अंग महिमा प्राचीन अंगक निर्माणकेँ लऽ कऽ कतेक रास कथा प्रचलित अछि। वाल्मीकि रामायणक मुताबिक, जतए शोभाशाली कामदेव अप्पन अंग छोड़ने छल, ओ अंग देशक नामसँ विख्यात भेल। अयोध्यासँ सिद्धाश्रम जाए कऽ बाटमे राम-लक्ष्मणक संग विश्वामित्र एक राति गंगा आ सरयूक कातमे बितौने छल। ओतए शुद्ध अंत:करणबला महर्षि सबहक पवित्र आश्रमक परिचय दैत विश्वामित्र बाजल छल जे कहियो एतए भगवान शिव चित्तकेँ एकाग्र कऽ तपस्या करैत छल। ओइ काल कामदेव मूर्तिमान छल। ओ अप्पन देह धारण कऽ विचरण करैत छल। एक दिन भगवान शिव समाधिसँ उठि कऽ मरुद्गणक संग कत्तौ जा रहल छल। ओइ काल ओ दुर्बुद्धि हुनकापर आक्रमण कऽ देलक। भगवान शिव हुंकार कऽ हुनका रोकलक आ अवहेलनापूर्वक ओकरा दिस ताकलक। फेर तँ कामदेवक सभटा अंग हुनकर देहसँ जीर्ण-शीर्ण हुअए लागल। कठिन तापसँ दग्ध भेल कामदेव ओतएसँ भागि गेल। जइ ठाम पर कन्दर्पक देह पूरा तरहे नष्ट भेल, वएह प्रदेश अंग देशक नामसँ विख्यात भेल। अंग देशक नामकरण ओतुक्का एकटा राजा अंगक नामपर भेल छल। आनव राज्य, जकर धूरी अंग छल, पाँच टा राज्यमे विभक्त छल, जकर नामकरण राजा बलिक पाँचटा पुत्रक नामपर भेल छल। आनवक अधिकारमे संपूर्ण पूर्वी बिहार, बंगाल आ उड़ीसा छल, जइमे अंग, बंग, पुण्ड्र, सुहा आ कलिंङ्क राज्य छल। अइ मे अंग एकटा बड़ शक्तिशाली जनपद छल। वाल्मीकि रामायणक मुताबिक सुग्रीव सीताकेँ ताकै लेल अप्पन वानर सैनिककेँ पूरबक देशमे भेजने छल,जइमे अंग सेहो एकटा छल। तइ कालमे अंगक विस्तार असीम छल। किएकि बलि पुत्र अंगक बाकी चारि भायक राज्यक सत्ताक केंद्र अंग राज्य छल। ई तथ्य सेहो विचारणीय अछि जे महाभारतक (शांतिपर्व, 296) मुताबिक, आदिकालमे चारि टा गोत्र छल, भृगु, अंगिरा, वशिष्ट आ कश्यप। ऋग्वेदक दोसर, तेसर, चारिम, छअम आ आठम मंडलमे जइ ऋषि सभकेँ मंत्र प्राप्त होइत अछि ओ अछि, गृत्समद, गौतम, भारद्वाज आ कण्व। आचार्य अश्वलायन अष्टम मंडलक वंशकेँ गोत्र द्योतक मानैत अछि, संग-संग अइ मंडलक ऋषिक प्रगाथा सेहो कहल जाइत अछि। हुनका अनुसार, अइ मंडलक पहिलुक सूक्तक ऋषि प्रगाथ छल जे स्वयं कण्व वंशी छल। अइ मंडलक एगारह वालखिल्य मिल कऽ कुल १०३ सूक्त कण्वक अछि। गौतम आ भारद्वाज अंगिरा वंशक मानल जाइत अछि आ कण्व सेहो अंगिरसेक अछि। अइ तरहेँ अइ पाँच मंडलमे अंगिरसक प्रधानता स्वयं सिद्ध अछि। अइ मंडलक ऋषि कुल अंगिरस, अंग द्वीपक ऋषि छल। स्वयं इंद्रक ऐरावत हाथी पदमर्दन कऽ देने छल, अइसँ तमसाएल दुर्वासा इंद्रकेँ शाप दऽ कऽ हुनका सत्ताच्युत कऽ देलखिन। इंद्र राजा बलिसँ सहायता मांगलक। राजा बलि इंद्रक संकेतपर देवलोकेपर अधिकार कऽ लेलक। बलि अंगद्वीपक राजा छल। ओ अप्पन पाँच शक्तिशाली पुत्रमे अंगक जनपद बाँटि हुनका सभकेँ ओइ ठामक राजा बना देलक। एकर बादो अंग असुर-सुर संस्कृतिक मुख्य केंद्र छल। ऋग्वेदसँ स्पष्ट ज्ञात होइत अछि जे अंगिरस आ हुनकरे वंशज यज्ञ कर्मक जनक छल। ओ अइ रहस्यक पहिलुक ज्ञाता छल जे यज्ञाग्नि काष्ठमे निहित छल। अइ तरहेँ अंगिरिस सभ अग्निक प्रयोगसँ सभसँ पहिलुक यज्ञोत्सवक नींव देने छल। प्राचीन भारतमे जे सोलह महाजनपदक चर्चा अछि, ओइमे अंग प्रमुख छल। शेष महाजनपद छल,मगध, काशी, कौशल, बज्जि, मल्ल, वत्स, चेदि, पांचाल, कुरु, मत्स्य, शूरसेन, अश्मक, अवन्ति,गान्धार आ कम्बोज। अंग आ मगधमे निरंतर संघर्ष चलैत रहैत छल। बुद्ध कालमे मगधक राजा बिम्बसार अंगकेँ जीत कऽ मगधमे मिला लेने छल। अंग वा अइ पूर्वी प्रदेशक लोग आ राजतंत्र ब्रााह्मण ग्रंथमे व्रात्य नामसँ जानल जाइत अछि। व्रात्यक शाब्दिक अर्थ अछि व्रतकऽ धारण करैबला मुदा एतए एकर प्रयोग बड़ गर्हित अर्थमे भेल अछि। एकर तात्पर्य अछि अनार्य, वैदिक कर्मकांड विरोधी आ वर्णसंकर। सावित्री आ उपनयनसँ भ्रष्ट द्विजातिकेँ मनुस्मृतिमे ब्राात्य कहल गेल अछि। द्विजात्य: सवर्णास्त जनयन्तवुतास्तयान। तान सावित्री परिभ्रष्टान व्रात्यानिति विनिर्दिशेत।। मनुस्मृति 10/20 महाभारतमे व्रात्यकेँ पातकी कहल गेल अछि। एकरा मुताबिक, व्रात्यकेँ आग लगाबैबला, विष दैबला,मदिरा बेचैबला, कुसीद भक्षण करैबला, मित्र द्रोही, भ्रूण हत्यारा, व्यभिचारी आ ब्रह्मघाती कहल गेल अछि। अइ तरहेँ व्रात्यकेँ ब्रााह्मण ग्रंथमे पतित कहल गेल अछि। वेदमे सेहो अइ ठामकेँ बड़ हेय दृष्टिसँ देखल गेल अछि। ऋग्वेदक प्रमगन्द शब्द अंग भंग आ मागध लेल प्रयुक्त भेल अछि। मागधकेँ वेदमे कीकट कहल गेल अछि। एहन लागैत छै जे संपूर्ण पूर्वी प्रदेश कोनो सांस्कृतिक अभिशापक आगिमे झुलसि रहल अछि आ वैदिक राजनीतिक शिकार बनि गेल अछि। अइ ठामक लोकक लेल चुनल-चुनल खराब शब्दक प्रयोग करैमे नै तँ वेद मंत्रकार पाछाँ रहल आ नहिये महामुनि व्यासे। ऋग्वेदमे एकटा ऋषि इंद्रसँ प्रार्थना करैत अछि, मगधक गाय कोन काजक अछि जकर दूध यज्ञमे अहाँक काज नै आबैत अछि। (यानि कीकटक गायक दूध सेहो अपवित्र अछि आ ओकरासँ यज्ञ कर्म करैक लेल वर्जना अछि) सोमरसक संग मिल कए ओ दूध यज्ञपात्रकेँ गर्म नै करैत छै। तइसँ हे इंद्र! ओइ नैचाशाख प्रमगन्दक (निचला शाखाक अंग बंग आ मागध) ओ धन हमरा दिअ। अथर्ववेद तँ एक डेग अओर आगू अछि। अथर्ववेदक एकटा ऋषि कहैत अछि, जेना मनुख आ उपभोगक अन्य सामान एक ठामसँ दोसर ठाम भेजल जाइत अछि, ओइ तरहेँ ज्वरकेँ गन्धार भूजवान,अंग, मगध प्रदेशमे भेजि देल जाइत अछि। आखिर वेद ब्रााह्मण ग्रंथकेँ अइ प्रदेशपर एतेक कोप किए अछि? आउ, विचार करी। ब्रााह्मण द्वारा विनिर्मित जइ यज्ञ-योगादि क्रियाक उदय सप्त सिंधुक घाटीमे भेल, बड़ जोर मारलाक बादो ई विधि-क्रिया भारतक अइ पूब क्षेत्रमे अप्पन जड़ नै जमा सकल आ ने ब्रााह्मणवाद आ ब्राह्मण विचारधारा अइ भागमे अप्पन सत्ता काएम कऽ सकल। किएकि व्रात्य आर्य भेलाक बादो वैदिक कर्मकाण्ड, पशु हिंसाबला यज्ञ आ बड़ खर्चबला विधि कर्मक विरोधी छल। ब्रााह्मण अपनो अइ धरतीपर बसै लेल नै चाहैत छल। एतुक्का निवासी स्वतंत्र विचारक, ज्ञानी आ तपस्वी छल। ओ अपन आचरण, व्यवसाय आ संस्कृतिपर ब्रााह्मणक छाया धरि सहन करै लेल तैयार नै छल। जे कोनो ब्रााह्मण तपस्वी तपस्याक लेल अइ क्षेत्रमे छल, सेहो कमलक तरहेँ जलसँ ऊपर छल। हुनका एतुक्का व्रात्यसँ कोनो संपर्क नै छल। स्वयं ऋष्यश्रृंङ्ग लऽ कऽ रामायणकार वाल्मीकि कहैत अछि- सदिखन पिताक संग रहैसँ विप्रवर ऋष्यश्रृंङ कोनो दोसराकेँ नै जानैत छल।" अइसँ स्पष्ट अछि जे ब्राह्मण ऋषि जन-सामान्यक संपर्कसँ अपनाकेँ अलग राखैत अछि। कौशिकी महिमा, पुण्याश्रम विश्वामित्र सेहो तपस्याक लेल अइ पूर्वी इलाकाकेँ चुनने छल। कोशीक कातपर ओ बड़ कठिन तपस्या केने छल जइसँ सृष्टिक मूलचक्रे हिल गेल छल। एहन भूभागमे कतेक तत्वज्ञानी क्षत्रिय-ब्रााह्मण केर चलाएल गेल विधि क्रियाकेँ त्यागब प्रतिष्ठित करैपर जोर देलक। अइ भागक पिछड़ल आ गरीब जनताक लेल ई नब आ क्रांतिकारी मार्ग-पद्धति अनुकूल सिद्ध भेल। चारू दिस नदीसँ आच्छादित अंगक ई उत्तरबरिया हिस्सा, घना जंगलसँ परिपूर्ण छल। एकर रमणीयता सेहो अद्वितीय छल। तइसँ महर्षि कश्यपक पुत्र विभाण्डक नामक ऋषि अप्पन तपश्चर्याक लेल अइ भूभागकेँ नीक बुझने छल। ब्रााह्मण ग्रंथक मुताबिक, राजा बलि अंगक शासक छल। हुनका कोनो संतान नै छल। हुनकर स्त्री सुदेक्षणा दीर्घतमा नामक ऋषिसँ पाँचटा पुत्रकेँ जन्म देलक। ई ऋषि आन्हर छल। महाभारतक मुताबिक, ई ऋषि सभ लोकक सोझाँमे स्त्री संभोग करैत छल। हुनकर पिता छल उत्तथ,जिनकर स्त्रीकेँ वरुण भगा कऽ लऽ गेल आ हुनका संग संभोग करलक। बादमे वरुणकेँ दंडित कऽ उत्तथ अप्पन स्त्रीकेँ वापस आनि सुखपूर्वक रहए लागल। गर्हित पौराणिक मिथकीय कथा जाल आ ओकर टीकाकार, भाष्यकार, रचनाकारसँ बचैत ई कहएमे कोनो संकोच नै अछि जे पूरा अंगक वासी आ राजतंत्र आर्य आ अनार्य संस्कृतिक संगमपर फल-फूलि रहल छल। विभिन्न जाति, विचार आ संस्कृतिसँ समन्वित ई इलाका प्राचीन षोडश महाजनपदमे प्रमुख छल। वैदिक ग्रंथमे जलाशय, जल आ धारक प्रशस्ति अछि। ऋग्वेदमे तँ कतेको ऋचामे ई अछि। जलक पवित्रता प्राकवैदिक अछि यानी आर्यकेँ आबएसँ पहिनेसँ अछि। एकर जीवात्मा आ उर्वरतासँ गहींर संबंध अछि। तइसँ महर्षि कश्यपक तेजस्वी पुत्र विभाण्डक ऋषि अप्पन तपश्चर्याक लेल अइ कोशिकाच्छादित भूभागकेँ सभसँ उपयुक्त बुझलक। तीर्थ तपस्याक लेल नै होइत अछि। तीर्थक प्रथा तँ अनार्य स्रोतसँ ग्रहीत भेल अछि। हिन्दूक सभटा तीर्थ आर्यक मूल स्थानसँ बाहरक अछि। आर्यक आगमनसँ पहिने एतुक्का धर्ममे तीर्थ छल। आर्यक सम्मिलन स्थल यज्ञ छल आ अनार्यक तीर्थ। ई तीर्थ शब्द सेहो वेदवाह्य अछि किएकि वेद विरोधी मतकेँ तैर्थिक मत कहल जाइत अछि। तइसँ तपस्याक लेल तीर्थ नै, अरण्य आ पवित्र धारक कात सभसँ उपयुक्त अछि। तइसँ व्रात्यक भूमि भेलाक बादो महर्षि विभाण्डक उत्तरबरिया अंगक सघन अरण्य क्षेत्रमे कौशिकीक धारक कातमे अप्पन आश्रम बनेने छल। कोशी एकटा पौराणिक धार अछि। एकर कातमे साक्षात भगवान शंकर बसै छै। इंद्र, विष्णु आ ब्रह्मा केँ भगवान शिवसँ भेंट करहि कऽ पूर्व, निर्दिष्ट आ निर्धारित ठाम ई कोशीक मनोरम तीर अछि। अप्पन बहिन कौशिकीक संबंधमे स्वयं विश्वामित्र कहैत अछि, दिव्य पुण्योदकारम्या हिमवन्तमुपाश्रिता। लोकस्य हित कार्यार्थो प्रवृत्ता भगिनी मम।। अप्पन बहिनक प्रति स्नेहक कारण अइ काजमे विश्वामित्र निअमसँ बड़ सुखसँ निवास करैत छल। ओ यज्ञसँ जुड़ल अप्पन निअमक सिद्धिक लेल अप्पन बहिन कौशिकीक सानिध्यकेँ छोड़ि सिद्धाश्रम आएल छल। अइ कौशिकीक कात विश्वामित्र सहस्र बरख धरि घनघोर आ अतिशय कठोर तपस्या केने छल जइसँ सभटा सृष्टि चक्र हिल गेल छल। कौशिकी तीर मसाध तपस्तेपे सुदारुणम तस्य वर्ष सहस्त्रणि घोरं तप उपासते। रामायण 1-34-25 वाल्मीकि रामायणमे कतेको बेर कौशिकी सरितां वरा (सभ धारमे श्रेष्ठ कौशिकी) बालकाण्ड श्लोक 11,कौशिकी सरितां श्रेष्ठा कुलो द्योतकारी इव (धारमे श्रेष्ठ कौशिकी सेहो अप्पन कुलक कीर्ति केँ प्रकाशित करैवाली छथिन। श्लोक 21) जेहन उक्ति आएल अछि, जइसँ पुण्य सलिला कोशीक महिमा रेखांकित होइत अछि। तइसँ कश्यप पुत्र महर्षि विभाण्डकक तपस्या लेल कोशीक कात सभसँ उपयुक्त छल,जतए विश्वामित्र कठोर तपस्या कऽ कतेक रास सिद्धि प्राप्त केने छल। धारक कात सुदूर धरि फैलल पैघ पाथरक अद्भुत श्रृंखला सेहो विद्यमान छल, जे कोशीक तीव्र धारकेँ नियंत्रित करैत छल। लगभग साढ़े सात हजार बरखक भौगोलिक परिवर्तनक परिणामस्वरूप ओ पाथरक (चट्टान) श्रृंखला जमीनक भीतर गहींरमे चलि गेल आ ओकर ऊपर माटिक मोटका परत जमैत गेल। वेगवती नदी, विशाल चट्टान, रमणीय प्रकृति, समिधा बाहुल्य, आैषधियुक्त वनस्पतिसँ आच्छादित अरण्य आ कुलांच भरैत मृगादि वन्य पशु, एहन शांत स्थानमे छल विभाण्डक ऋषिक आश्रम, कोशीक धारक कज्जल वनमे। कोशी आ ओकर छाड़न धारक कातपर अप्पन सघनताक लेल प्रसिद्ध कज्जल वन स्थित पुण्याश्रम पूरे आर्यावर्तमे प्रसिद्ध छल। ई क्षेत्र असुरक प्रभावसँ सेहो मुक्त छल। तइसँ एतए कऽ ऋषि आश्रम निरापद छल। एतए निर्विध्न वेद पाठ चलैत छल आ आश्रमवासीक समए समिधा संचय, अग्निहोत्र आ कृषि काजमे व्यतीत होइत छल। ई आश्रम ऋषि आ कृषि परंपराक अद्भुत संगम स्थल छल। भूमि बड़ उर्वरा छल। महर्षि विश्वामित्र अप्पन कालक महान कृषि वैज्ञानिक सेहो छल। हुनकर तपस्या आ प्रयोग स्थल कोशीक मनोहर तट सेहो छल। पूरा इलाका वन्य पशुक अभ्यारण्य छल। विश्वामित्र केर अप्पन कठोर तपस्यासँ ऊर्जावान बनाएल इलाका मुनि विभाण्डक लेल सर्वथा उपयुक्त छल। अप्पन वंश परंपराक अनुरूप ओ सेहो विपुल प्रतिभाक पुंज छल। महर्षि व्यास हुनकर वंश परिचय एना देने अछि:- मरीचि: मनसस्य जज्ञे तस्यापि कश्यप:। मश्यपात्कारश्यप: जात: तस्यसुतो विभाण्डक: ऋष्यश्रृङ तस्य पुत्रोस्ति।। ब्रह्माक मानस पुत्र मरीचक पौत्र विभाण्डक छल। उच्च वंशोद्भव ई ऋषि वेद विहित संस्कारसँ संपन्न छल। कोशीक कातक ई कज्जल वन हुनकर साधना तपस्याक लेल पूर्ण उपयुक्त आ निरापद छल। अति प्राचीन कालमे (महाभारत, पुराण, वराहमिहिर आ भास्काराचार्यक मतानुसार) भारत नौ खंडमे विभक्त छल। ई खण्ड छल, इंद्र, कसेरुमत, ताम्रवर्ण, गभस्तिमत, कुमारिक, नाग, सौम्य, वरुण आ गान्धर्व। पौराणित साक्ष्य आ एकर पहचानक जे संकेत भेटल अछि, ओकर मुताबिक पूर्वी भारतक ई क्षेत्र इंद्रखण्ड छल। अइ क्षेत्रपर इंद्रक विशेष कृपा छल। तइसँ ई सदिखन हरिअर फल-फूल आ धान्यसँ संपन्न क्षेत्र छल। धार सदानीरा छल। ऋग्वेदमे अंगक उल्लेख नै अछि। तइसँ एहन लागैत अछि जे उत्तर वैदिक कालमे अंग जनपदक उदय भेल अछि। ऋग्वेदमे कीकट शब्दक प्रयोग भेल अछि जेकरा मगध आ अंग क्षेत्रक लोक लेल प्रयोगमे आनल गेल हएत। मुदा कतेक रास आचार्य एकरा सप्त सिन्धुक पर्वतीय भाग लेल सेहो प्रयुक्त करैत अछि। जे भी भेल हुअए, रामायण युगक आर्य सभ्यता केर अइ क्षेत्रमे उदय भऽ चुकल छल। मुदा राक्षसी सभ्यता अओर आर्येतर वानरी सभ्यता एतए अप्पन जमीन नै बना सकल छल। अइ क्षेत्रमे स्थापित ऋषि आश्रम अध्ययन, अनुसंधान आ यज्ञादि क्रियाक संपादन लेल उपयुक्त छल। दोसर परिच्छेद ऋष्यश्रृङ्क जन्मक वृतान्त महाकाव्य, पुराण आ दोसर पुरना ग्रंथक निर्मल जलमे प्रक्षेपक शैवाल जाल कम नै अछि। प्रक्षेपमे संकलित पुराकथाक तात्विक नीर क्षीर विवेचन निष्पक्ष प्रबुद्ध वर्ग कऽ सकैत अछि। महाभारतक वनपर्वक 110 केर ई वृतांत विश्वसनीय भऽ सकैत अछि जे महर्षि विभाण्डक मृगिसँ संभोग केने छल। कतेक परवर्ती ऋषिकेँ लऽ कऽ एहेन चर्चा अछि। ऋषि दम सेहो मृगिक संग संभोग केने छल। मृगवेशमे अप्पन कनियाक संग रतिक्रीड़ा करैत एकटा ऋषि पांडुक द्वारा वध कऽ देल गेल छल, आदि। (आदि पर्व 118) मुदा, नहि तँ ई विश्वसनीय अछि आ नहिये कोनो चिकित्साशास्त्रक आधार पर तथ्यपरक अछि जे कोनो मृगिक पेटसँ मनुखक शिशु जन्म लेने अछि। ऋष्यश्रृंङ्ग केँ लऽ कऽ कतेक आधारहीन लोकोक्ति प्रचलित अछि। कतेक कथामे हुनका मृगिक पेटसँ जन्मल मनुखक नेनाक रूपमे देखाएल गेल अछि, जे पूरा तरहे भ्रामक अछि। महाभारत (शांतिपर्व 296) सँ ज्ञात होइत अछि जे वशिष्ठ, ऋष्यश्रृङ्ग, कश्यप, वेद, तांड, कृपाचार्य, कक्षिवत, कमठ, यवक्रीत, द्रोणाचार्य, आयु, मतंग, दत्त, द्रुमद, मात्स्य आदि ऋषि अशुद्ध योनीमे जन्म लऽ कऽ तपस्या कऽ मूल पिताक वर्णमे पहँुचल। ऐसँ ई स्पष्ट अछि जे ऐ सभ ऋषिक माय आर्येतर आ ब्रााह्णेतर स्त्री छली। तइसँ हुनका अशुद्ध योनि कहल गेल। मुदा कर्मक सिद्धांतक अनुसार, ओ ऋषि अप्पन कठोर तपस्या आ साधनाक बल पर अप्पन पिताक कोटिमे पहुँचल। ई स्मरण रहबाक चाही जे स्त्री योनीक बिना मनुखक संततिक उत्पति असंभव अछि। पुरना भारतक संस्कृतिमे आत्मसात आ समन्वयक प्रवृत्ति एत्ते प्रबल छल जे तहियौका दूटा आदिम समूह आर्य आ अनार्यक परवर्ती जुग मे ऐ तरहेँ परस्पर समन्वय भऽ गेल जे ओ अप्पन गुणक कर्मक अनुसार चारि वर्णमे बँटि गेल। पूर्व वैदिक कालमे आठ तरहक विवाह नै छल। ई उत्तरकालक देन अछि, जे सूत्रकाल धरि आबैत-आबैत पूरा तरहे संगठित भऽ गेल छल। तहियौका समाज विवाहक सभ रूप केर मान्यता देने छल। स्थापना उत्तर वैदिक कालमे बड़ प्रचलित छल आ ऐ समन्व्यवादी प्रवृत्तिक प्रवर्तक दूरदर्शी ऋषिगण छल। ई भारतीय समाजक उत्कर्षक द्योतक छल। महर्षि विभाण्डक उत्तर वैदिककालक ऋषि छल। कोनो संदेड नै जे हुनकर स्त्री आर्येत्तर नारी छल। हुनका गर्भसँ एकटा प्रखर शिशुक जन्म भेल जे ऋष्यश्रृङ्गक नामसँ विख्यात भेल अछि। “भागवत दर्शन"क मुताबिक, विभाण्डक त्यागी, तपस्वी, संयमी आ स्वाध्याय-परायण छल। एक दिन पोखरिमे ठाढ़ भऽ कऽ मुनि तप कऽ रहल छल। ओइ काल स्वर्गसँ उतरि कऽ उर्वशी ओतए नहाबै लेल आएल। हुनकर अनुपम रूप लावण्य देखि कऽ मुनिक मन विचलित भऽ गेल। ओ अपलक ओइ अप्सराक सौंदर्य देखैत रहल। अनजानमे हुनकर वीर्य स्खलित भऽ गेल। ओइ काल आश्रममे पलय बला एकटा हिरणी जल पीबय लेल आएल छल। ओ जलक संग ओइ अमोघ वीर्यकेँ सेहो पीब लेलक। ओ गर्भवती भऽ गेल। ओकर उदरसँ महामुनि ऋष्यश्रृङ्क जन्म भेल। कहल जाइत अछि जे ओ साधारण हिरणी नै छल। पूर्व कालमे ओ एकटा देवकन्या छल। कोनो पुण्यात्मा राजाकेँ देखि कऽ ओ हिरणी जकाँ अप्पन पैघ-पैघ आँखिसँ राजाक अनुराग पाबैक लेल हुनक विलोक कऽ रहल छल। ब्राह्माजी कन्याक ऐ अविनय व्यवहारकेँ देखि कऽ तमसा कऽ शाप दऽ कऽ मृत्य लोकक हिरणी बना देलक। शापमे आगू ई व्यवस्था देल गेल जे ओकर उदरसँ यशस्वी ऋषिक जन्म हएत, तखन ओ शापसँ मुक्त भऽ जाएत। वएह देवकन्या एतए हिरणी बनि कऽ रहए लागल। ओ अप्पन शापक खत्म हेबाक प्रतीक्षा करैत रहल। एक दिन उर्वशी ओम्हरसँ निकलल। जखन ओ अप्पन सखीकेँ हिरणीक रूपमे देखलक तँ ओइपर ओकरा बड़ रास दया आबि गेलै। ओ सोचए लागल जे कोन तरहेँ ओकर उदरमे ऋषिक शुक्राणु पहुँचए। ओइ काल पोखरिमे तपस्यारत विभाण्डक ऋषिपर उर्वशीक दृष्टि पड़ल। ओ लज्जा भरल भावकेँ देखाबैत पोखरिमे उतरल आ नहाबैक बहानासँ अप्पन समूचा अंगकेँ अनावृत करए लागल। विधिक विधान, मुनिक दृष्टि हुनकापर पड़ल। ओ कामातुर भऽ उठल आ हुनकर वीर्य स्खलित भऽ गेल। मृगी ओकरा पीब गेल आ एकटा पुत्रकेँ जन्म दऽ कऽ स्वर्ग सिधारि गेलि। मुनि विभाण्डक ओइ नेनाकेँ गो दूध पिया कऽ पालन-पोषण करए लागल। महाभारत आ श्रीमद्भागवतमे, विभाण्डक आश्रममे शापित देवकन्या मृगीक उदरसँ ऋष्यश्रृङ्गक जन्मक उल्लेख अछि। आजुक काल मे आदिवासी लोकमे पशुक नाम पर ओकर गोत्र जानल जाइत अछि, जेना डुंगडुंग (माछ), कच्छप (कछुआ), हांसदा (हंस) आदि। ओइ तरहेँ ऋष्यश्रृङ्गक मां मृग गोत्रीय आर्येतर कन्या छल। ओ एकटा रूपवती छल उर्वशी तरहे। तइसँ पुराणकार हुनका उर्वशीक सखिक तरहे उल्लेख केने छल। ऋष्यश्रृंगक मां केँ एकटा हिरण हेबाक एकटा मिथक अछि। ओ अयोनिज संस्कृतिमे जन्म लऽ कऽ ओकर नैसर्गिक गुण व रूप सौष्ठवक परिचायक छल। ओकर नाम मृगम्बदा छल। ओ रूपवती कन्या आषाढ़ पूर्णिमाक दिन एकटा महान शिशु केँ जन्म देलक जे संपूर्ण आर्यावर्तक तत्कालीन इतिहासकेँ एकटा नब धारा प्रदान कऽ गरिमा युक्त कऽ देलक। वाल्मीकि रामायणमे महर्षि कश्यपक पुत्र विभाण्डक आ महर्षि विभाण्डक पुत्र सुप्रसिद्ध मुनि ऋष्यश्रृङ्ग भेला। शास्त्रक गहन अनुशीलनसँ एहन लागैत अछि जे ऋष्यश्रृङ्ग अप्पन पिताक संग वनमे रहैत छल आ वनमे हुनकर लालन-पालन भेल छल। कोनो पुरनका महाकाव्य, काव्य वा पौराणिक ग्रंथमे हुनकर माँक उल्लेख नै भेटैत अछि। प्राचीन आख्यानमे योनिज आ अयोनिज, ऐ दू तरहक जातक उल्लेख भेटैत अछि। योनि शब्दक अर्थ मूलत: “घर" होइत अछि आ पुरान ग्रंथमे ऐ अर्थमे एकर प्रयोग भेटैत अछि। जिनकर जन्म घरमे नै भेल अछि, ओ अयोनिज संतान अछि। सीता, शकुंतला, द्रौपदी आदि अप्पन माता-पिताक अयोनिज संतान अछि। यज्ञभूमि मे 'वामदेव्यव्रत" केर उत्पन्न नेना सेहो ओइ कोटिमे आबैत अछि। जइ नेनाक जन्म अप्पन घरमे भेल ओ योनिज कहाबैत अछि। हम्मर विचारसँ ऋष्यश्रृंङ्ग अप्पन पिताक योनिज आैरस संतान छल। जन्मक पश्चात ऋषि अप्पन नेनाकेँ आर्येतर माँ सँ अलग कऽ विद्याध्ययन केर अप्पन तपोस्थलीमे राखलक। एकटा दोसर वृतान्तक मुताबिक, शिशुकेँ जन्म दऽ कऽ माँ स्वर्ग सिधार गेलि। तइसँ पिता विभाण्डक अपना लग राखि कऽ शिशुक लालन-पालन आ सभटा संस्कार देलक। महर्षि विभाण्डक ब्राह्माक मानस पुत्र मरीचिक वंश परंपरामे परम तेजस्वी आ वेद केर प्रकांड पंडित छल। महर्षि व्यास एकर वर्णन एना केने अछि, मरीचिॅ मानसस्य जज्ञे तस्यापि कश्यप:। मश्यपात्काश्यप: जात: तस्य सुतो विभाण्डक: ऋष्यश्रृङ्ग तस्य पुत्रास्ति।। महर्षि विभाण्डक पुत्र ऋष्यश्रृङ्गक छह बरखक आयुमे उपनयन संस्कार करा कऽ यज्ञोपवीत धारण करौलक आ वेद विधिसँ वेदारंभ संस्कार कऽ गायत्री मंत्र प्रदान केलक। ब्राह्मचर्य धारण करा कऽ ब्राह्मचारी कठिन व्रत, तप, स्वाध्याय, प्रात: सायं गायत्री जप आदि कराबैत वेदक अध्ययन करौलक। ब्रह्मचर्य एवं अध्ययन श्री भागवत दर्शक अनुसार, विभांडक सोचैत छला जे अप्सरा उर्वशीक देखलेसँ हुनकर तेज नष्ट भेल। तइसँ ओ अप्पन नेनाकेँ गलतीयोसँ कोनो स्त्रीक दर्शन नै कराएत। ओकरा विशुद्ध ब्रह्मचारी बनाएब, ई सोचि कऽ ओ अप्पन नेना ऋष्यश्रृंगकेँ आश्रमसँ बाहर नै जाइले दै छल। ओ हुनकासँ तप, अग्निहोत्र कराबैत छल, वेद पढ़ाबैत छल आ पैघ-पैघ ऋषिकेँ छोड़ि कऽ ओकरा केकरोसँ भेँटो नै करऽ दै छल। स्त्रीकेँ तँ ओ अप्पन आश्रमक परिधि धरिमे पएरो नै राखऽ लेल दै छल। कोनो बूढ़ ऋषिक स्त्री सेहो ओतए नै आबि सकैत छल। आबैक गप तँ दूर, ओ अपन नेनाक आगू कोनो स्त्रीक नाम धरि नै लैत छल। ऋष्यश्रृंग जानितो नै छल जे मुनिक अलाबे कोनो अओर स्त्री-पुरुख होइत अछि। ओ नै तँ कोनो नग्र देखने छल आ नहिये नग्रक कोनो वस्तुए। ऋष्यश्रृंगक समय अग्नि आ अप्पन तपस्वी पिताक सेवामे बितैत छलै। स्त्रीक अस्तित्वक तँ हुनका पतो नै छलनि। तकर बादो ओ वेदक परगामी विद्वान छल। रामायणकार हुनका शक्तिशाली महर्षि कहने छथि। हुनका विषय-सुखक कनियो टा ज्ञान नै छल। ओ अखंड ब्रह्मचारी छल। अप्पन समाजमे एहन मान्यता अछि जे बच्चा सभकेँ विषय-सुखक कनियो ज्ञान नै दियौ तखने ओ पक्का ब्रह्मचारी बनि सकैत अछि। ई विचार प्राकृतिक निअमक विपरीत अछि। ऐ ढोंगसँ जइ दुर्गक रक्षा कएल जाइत अछि, ओ बड़ आसानीसँ शत्रुक हाथ मे चलि जाइत अछि। ऋष्यश्रृंग वृतांत सेहो एहने अछि। हुनकामे काम चेतना सुप्त छल, ओकर संबंधमे रामायणकारक ई टिप्पणी द्रष्टव्य अछि।– “राजन! लोकमे ब्रह्मचर्यक दूटा रूप विख्यात अछि आ ब्रााह्मण सदा ओइ दुनू स्वरूपक वर्णन केने अछि। एक तँ अछि दंड, मेखला आदि धारण रूप बला मुख्य ब्राह्मचर्य आ दोसर अछि ऋतुकालमे स्त्री समागम रूप गौण ब्रह्मचर्य। ऋष्यश्रृंग जेहन महात्मा ऐ दुनू प्रकारक ब्रह्मचर्यक पालन केने हएत।" अप्पन विद्वान पिताक कठोर अनुशासन मे रहि कऽ ऋष्यश्रृंग कतेक रास व्यवहारिक ज्ञान सेहो प्राप्त केने छल। कौशिकीक तट पर निवास करबाक कारण एकर जलक समुचित उपयोग आ व्यवस्थामे हुनका विशेषज्ञता प्राप्त छल। आश्रमक चारू कात ओहिना नदीक जल-प्रवाहकेँ व्यवस्थित कऽ ओ रंग-बिरंगक फूल-मूल उपजाबै छल, सेहो पर्याप्त मात्रामे। वाल्मीकि रामायणक बालकांडक “चित्राण्यत्र बहूनिस्र्यमूलानि च फलानि" 10/27 मे उपयुक्त गप रेखांकित अछि। अंग नरेश रोमपाद वृत्तांत ओइ काल रोमपाद अंग प्रदेशक नरेश छल। ओ राजा दशरथक मित्र छल। हुनका कोनो संतान नै छल। हुनकर दुख देखि कऽ दशरथ अप्पन पहिलुक रानी कौशल्याक गर्भसँ उत्पन्न शान्ता नामक पुत्रीकेँ हुनकर पुत्रीक रूपमे दऽ देने छल। रोमपाद शान्ताकेँ पुत्रीक रूपमे पाबि नेहाल भऽ गेल छल। ओकर लालन-पालन महाशक्तिशाली अंग नरेशक राजकीय गरिमाक अनुरूप राज प्रासाद मे भेल। राजा रोमपाद ययाति वंशक क्षत्रिय छल। “वंशोमन्मन्तरानि च" कऽ मुताबिक, पुराणमे ऐ वंशक राजाक संबंधमे सूचना अछि। विष्णुपुराण 4/18 क मुताबिक, ययातिक चारिम पुत्र “अनु" केँ तीन पुत्र भेल, समानल, चक्षु आ परमेषु। ई वंश अनुवंश कहैलक। समानलक पुत्र कालानल भेल आ कालानलक सृंजय, संृजयक पुरंजय, पुरंजयक जनमेजय, जनमेजयक महाशाल, महाशालक महामना, महामनाक उशीनर आ तितिक्षु नामक दूटा पुत्र भेल। उशीनरक शिवि, नृग, नर, कृमि आ वर्म नामक पाँचटा पुत्र भेल। ऐ मे शिविक वृषदर्भ, सुवीर, केकय आ मद्रक नामक चारि टा पुत्र भेल। विविक्षुक पुत्र रूशद्रथ भेला। हुनकर हेम, हेमक सुतपा अओर सुतपाकेँ बलि नामक पुत्र भेल। ऐ राजा बलिक रानी सुदेक्षणासँ आन्हर ऋषि दीर्घतमा पाँच पुत्रकेँ जन्म देलक, जे अंग, बंग, कलिंग, पुण्ड्र आ सुहा भेल। राजा बलिमे पुत्र उत्पन्न करबाक क्षमता नै छल। हुनकर प्रथम पुत्र अंगसँ अनपान, अनपान सँ दिविरथ, दिविरथसँ धर्मरथ आ धर्मरथसँ चित्ररथक जन्म भेल। ऐ चित्ररथक दोसर नाम रोमपाद छल। श्रीमदभागवतक अनुसार, वस्तुत: शान्ता महाराज दशरथ आ कौशल्याक पुत्री छल आ अंग नरेश रोमपाद दशरथक सखा छल। “भवभूति" सेहो अप्पन “उत्तर रामचरित..." मे ऐ गपक उल्लेख केने अछि। कन्या दशरथो राजा शान्ता नाम व्यजीजनत। अपत्य कृतिका राज्ञे रोमपादाय या ददौ।। उत्तर रामचरित प्रथमांग अपत्य शब्द संतान लेल प्रयुक्त होइत अछि आ कृतक (स्त्रीलिंग कृतिका) केर अर्थ अछि कृत्रिमा। ऐसँ स्पष्ट अछि जे शान्ता राजा रोमपादक कृत्रिम (दत्तक) पुत्री छल। ऋष्यश्रृंगक मालिनी प्रस्थान रामायणमे रोमपादकेँ महाप्रतापी आ बलवान राजा कहल गेल अछि। एहन कहल गेल अछि जे ऐ राजाक धर्मक उल्लंघनक कारण हुनकर राज्य मे घोर अनावृष्टि भऽ गेल छल। ऐसँ जनता भयभीत भऽ गेल। मालिनी सेहो गंगा कात अवस्थित छल। अंगमे जल संसाधनक प्रचुरता छल। तकर बादो जलक समुचित उपयोग नै हेबाक कारणसँ अकालक स्थिति आबि गेल छल। राजा ऐ लऽ कऽ बड़ दुखी छल। ओ एकर निवारणक लेल वेदज्ञ पंडितसँ मंत्रणा केलक। सभटा पंडित, सर्वमतसँ अनुशंसा केलक जे महर्षि विभाण्डक पुत्र ऋष्यश्रृंग वेदक पारगामी विद्वान अछि। हुनका कोनो तरहे ऐ राज्यमे बजा कऽ नीकसँ सत्कार कएल जाए आ वैदिक विधिक अनुसार अप्पन कन्या शान्ताक ब्याह कऽ देल जाए। दूरदर्शी राजा रोमपाद सहर्ष ऐ प्रस्तावक अनुमोदन कऽ देलक। मुदा हुनका ऐ गपक चिंता छल जे ऐ शक्ति संपन्न ऋषिकुमारकेँ कोना ओतए आनल जाए? ओ अप्पन मंत्री आ पुरोहितकेँ पठा ऋष्यश्रृंगकेँ सत्कारपूर्वक मालिनी अनबाले चाहै छल। मुदा ऐ दबंग ऋषिक स्वभावकेँ ओ जानैत छला तइसँ ओ राजाकेँ स्पष्ट कहि देलनि जे ओ ऐ ऋषिसँ डरैत अछि, तइसँ हुनका ई कार्य नै देल जाए। तकर बादो मंत्रीगण सोचि-समझि राजाकेँ जे उपाय बतौलखिन, ओकरा करएमे कोनो दोष नै छल। संगे-संग ऐ कार्यमे कोनो विध्न-बाधा अएबाक कोनो संभावना सेहो नै छल। वनचर जीवन व्यतीत करऽ बला ऋषिकुमार श्रृंग कहियो कोनो स्त्री केँ नै देखने छल। ओ स्त्रीकेँ चिन्हितो नै छल आ विषय सुखसँ अनभिज्ञ छल। एहन कठोर चित्तकेँ मथि दैबला मनोवांछित विषयक प्रलोभन दऽ कऽ हुनका मालिनीमे अनबाक योजना बनए लागल। ऐ योजनाक सफलताक लेल तय कएल गेल जे सुंदर आभूषणसँ विभूषित मनोहर रूपवाली वेश्या ऋष्यश्रृंग कतय जा कऽ अनेकानेक उपायसँ हुनका लोभा कऽ मालिनी आनए। राजाज्ञासँ एहने व्यवस्था कएल गेल। कतेक रास नाओकेँ जोड़ि कऽ बेड़ा बनाओल गेल। ओकरा मनोरम पातसँ सजाओल गेल। नाओमे कतेक रास मिष्ठान आ मधुर फल राखल गेल। नगरक मुख्य-मुख्य रूपवती वेश्याकेँ सभ मंत्रणासँ अवगत करेलाक बाद जलमार्गसँ आश्रम दिस पठा देल गेल। आश्रमसँ कनी दूर ठाम कोशीक पावन कात बेड़ा रोकि देल गेल। वेश्या ओतएसँ ऋषिकुमारसँ मिलय कऽ उपाय करए लागल। अंतर्मुखी स्वभावबला ऋष्यश्रृंग बड़ धीर-गंभीर छल। हुनका अप्पन पिताक सानिध्य बेसी सुखकर लागैत छल। यएह कारण छल जे ओ आश्रमसँ बाहर नै कऽ बराबर निकलैत छल। ओ एत्ते एकांतशील व्यक्ति छल जे वन मे रहि कऽ अप्पन पिताक अलावा स्त्री सभक गप तँ छोड़ू, कोनो दोसर पुरुख धरि केँ नै देखने छल। तखैन भला ऐ ऋषिमे चेतना कोना आैतिऐ? कोनो अज्ञात प्रेरणासँ ऋषिकुमार घुमैत-फिरैत कोशीक ओइ धारक कात पहुँचल, जतए रूपवती वेश्याक बेड़ा ठाढ़ छल। मंद-सुगंध पवनक संग मीठ आवाजमे संगीत सुनाइ दऽ रहल छल। अगरू धूम आ दोसर सुगंधित द्रव्यसँ वातावरण बड़ रमणीय भऽ रहल छल। ऋषिकुमार सुन्नर वेश आ बड़ आकर्षक रूपवाली वनिता सभकेँ देखलक। ऋषिकुमारकेँ अप्पन एतए आएल देखि कऽ वनिता सभ हर्षोत्फुल भऽ गेल। ओ मंद मानक स्वरमे गाबैत ऋषिकुमार लग आएल। ऋषिकुमार सेहो हतप्रभ छल। वनिताक कल्पना तँ ओ केने नै छल। हुनका भान भेल जे ई ऋषिगणे अछि, जे कोनो दोसर लोकसँ आएल अछि। एखैन धरि ओ स्त्री केँ देखने नै छल तँ ओकरा संबंधमे ओ की सोचतिऐ? वनिता हुनकर सत्कार केलक आ स्नेह प्रदर्शित करैत कहलक, हे ब्रााह्मण! अहाँ के छी? की करैत छी? स्त्रीक कमनीयता देखि कऽ ऋषिकुमार मंत्रमुग्ध छल। हुनकर अंतर्मनसँ स्नेहक धारा फूटए लागल। ओ अप्पन पिताक आ अप्पन परिचय देलक। ऋष्यश्रृंग बाजल जे महर्षि कश्यप वंशक महर्षि विभाण्डक हमर पिता छथि। भूमंडलमे प्रसिद्ध छथि। ठामे हमर आश्रम अछि। अहाँक दर्शन हमरा लेल कतेक रास सुखक मूल अछि। अहाँ सभ देखयमे बड़ सुनर छी आ देह सँ आभा सेहो फूटि रहल अछि। अहाँ सभकेँ हम प्रणाम करैत छी। ऋषिकुमार वनिताकेँ अप्पन आश्रम लऽ कऽ आएल। संजोगवश हुनकर पिता आश्रममे नै छल। ऋषि हुनका ऋष्योचित सत्कार आ विधिवत पूजन कऽ कन्दमूल फल-फूल दऽ कऽ संतुष्ट केलक। वनिता सभकेँ ऋषिकुमारक पिता विभाण्डकक एबाक डर सेहो लागि रहल छल। तइसँ ओ तुरंत आश्रमसँ जाइ लेल उत्सुक छल। ऋषि कुमारक पूजा आ फलक उपहार स्वीकार कऽ वनिता हुनका पर्याप्त आत्मसंतुष्ट केलक। संगे-संग अप्पन संग आनल मिष्ठान आ फल सेहो ऋषिकुमारकेँ भेंट केलक। ओ जल्दीसँ ओकरा खाइ लेल अनुरोध केलक। ऋषि ऐ पदार्थ आ फलकेँ खा कऽ अपूर्व सुखक अनुभव केलक। किछु कालक लेल ओ स्वर्गिक आनंदमे डूमि गेल। वनिता सभ हर्षसँ भरि हुनकर आलिंगन केलक आ कतेक रास फल आ भांति-भांतिक मधुर देलक। ऋषि कुमार मधुरकेँ फल बुझि कऽ खा लेलक। किएकि ओ वनमे रहैत कहियो मधुर नै खेने छल, तइसँ ओ ओकर रसास्वादनसँ अनजान छल। भला सदिखन वनमे रहएबला लोककेँ एहन पदार्थक स्वाद लेबाक अवसर कतए अछि। एकर बाद महर्षि विभाण्डकेँ एबाक आशंकासँ डरल वनिता व्रत आ अनुष्ठानक बहाना बना कऽ अप्पन वेड्रापर घुरि गेल। मुदा ऋषि कुमारकेँ गाढ़ालिंगनमे भरि चतुर वनिता हुनका मनमे कामदेवक विजयी दुन्दुभिकेँ बजा देलक। चिरकालसँ सुप्त भावना एक-एक कऽ जागए लागल। ऋषि ओइ वनिता सभक जाइक पश्चात दुखमे डूमि गेल आ इम्हर-उम्हर टहलय लागल। नै नीन, नै चैन, ऋषि कुमार ओइ कमलमुखी वनिताक चिंतनमे डूमल रहल। दोसर दिन शक्तिसंपन्न ऋष्यश्रृंग बेर-बेर ओइ वनिताक संबंधमे सोचैत-विचारैत अपनेसँ ओइ बेड़ा लग पहुँचल जतए वेश्या हुनकर प्रतीक्षा कऽ रहल छल। ऋषि कुमार आकर्षक डोरमे बन्हि अपनेसँ उपस्थित भऽ गेल। वेश्या पहिनेसँ तैयार छल। ऋषिकुमार हुनकर रूपाकर्षणक जालमे फँसि चुकल छल। वनिता सभ अप्पन स्वरमे रस घोरैत बाजल- सौम्य! हमर आश्रमपर चलू। एतए कतेक रास फल-फूल अछि, मुदा ओतए सेहो ऐ पदार्थक कोनो अभाव नै अछि। ई कहि वनिता हुनका अप्पन बेड़ामे बैसा लेलक आ भरि बाट ऋषिकुमारक मनोविनोद करैत अंगक राजधानी मालिनी लऽ आनलक। जीवनमे पहिल बेर ऋष्यश्रृंग कोनो नगरकेँ देखलक। हुनक नगरमे प्रवेश करते इंद्र पूरा जगतकेँ प्रसन्न करैत पानि बरसाएब शुरू कऽ देलक। ऋष्यश्रृंग जेहन विद्वान ऋषि कुमारकेँ वेश्या मालिनी लऽ आनएमे सफल भऽ गेल। हुनका ई सफलता एक-दू दिनमे नै भेटल हएत। एकर एकटा दोसर वृत्तान्त स्वामी अद्वैतानन्दपुरी प्रवचन संग्रह सच्चिदानन्द प्रकाश (पृष्ठ सं. ३१८) मे भेटैत अछि। रोमपादक माँजल चतुर वनिता कोशीक धारक कात अप्पन शिविर लगा आ पुण्याश्रमसँ किछु दूर रहि ऋषिकुमारक दिनचर्याक सूक्ष्म निरीक्षण करए लागल। ऐ काजमे महीनो लागि गेल। वनिता सभ अप्पन गहन अध्ययनमे देखलक जे तपस्तयारत ऋषिकुमारकेँ जखन भूख लागैत अछि तँ ओ विशेष जातिक गाछक तनामे अप्पन मुँह सटाबैत अछि आ भरपेट ओकर रस चुसि कऽ वापस तपस्यामे बैसि जाइत अछि। वेश्या सभ एकांत पाबि ओइ विशेष गाछ आ रस चूसए कऽ ठाम पर चिन्ह लगा देलक। संगे-संग ओइपर मीठ तरल पदार्थ (संभवत: गुड़) लेप देलक। फेर दूर ठाम ठाढ़ भऽ कऽ ऋषिकुमारक गतिविधिकेँ देखैत रहल। ऋष्यश्रृंग गाछक रसमे किछु दोसरे स्वाद पेलक। ओ अतृप्त भावसँ ऐ तरल पदार्थकेँ चाटए लागल। ई क्रम चलैत रहल। वेश्या आब ऐ तरहक स्वादिष्ट मधुर ऋष्यश्रृंगकेँ खुआबए लागल। आब हुनका पूर्ण विश्वास भऽ गेल जे ऋषिकुमारकेँ स्वादिष्ट मधुरमे आनंद आबए लागल अछि, तखन ओ ऐ क्रमकेँ एकाएक रोकि देलक। ऋष्यश्रृंगकेँ पुछलापर वेश्या बाजल जे ऐ तरहक स्वादिष्ट भोजन बनाबैमे धन लागैत अछि आ ओ धन राजाकेँ एतएसँ आबैत अछि। राजा आब धन नै दऽ रहल अछि। जौं अहाँ राजा लग जाइ तँ धन भेटि सकैत अछि। अप्पन इच्छा पूर्तिक लेल ऋष्यश्रृंग वनिता सभक संग राजा एतए जाइ लेल तैयार भऽ गेल। राजा रोमपाद राजप्रसादसँ बाहर आबि कऽ ऐ महान तपस्वीक अगवान केलक आ पृथ्वीपर माथ टेक कऽ हुनका साष्टांग प्रणाम केलक। फेर एकाग्रचित भऽ ऋषिसँ वरदान मांगलक जे हुनका ऋष्यश्रृंग आ हुनकर पिताश्री महर्षि विभाण्डक असीम कृपाक प्रसाद भेटए। राजाकेँ शंका सताबए लागल जे कपटसँ ऋषिश्रृंगकेँ मालिनी आनए लेल जौं महर्षि विभाण्डक हुनकापर रूष्ट भऽ जाएत तँ राजाक कल्याण नै अछि। फेर ऋषिकुमारकेँ अप्पन अंत:पुरमे आनि कऽ अप्पन पालिता कन्या शान्तासँ हुनकर बियाह कऽ देलक। ऐ शुभ काजसँ राजपरिवार आ प्रजामे प्रसन्नता पसरि गेल। इम्हर जखन महर्षि विभाण्डक अप्पन आश्रम घुरल तँ अप्पन पुत्रकेँ ओतए नै देखि बेचैन भऽ गेल। हवन सामग्री इम्हर-उम्हर पसरल छल। आश्रममे बाढ़नि धरि नै लागल छल। लता आ गाछ टूटल छल आ पात सभ इम्हर-उम्हर बिखरल छल। आश्रमक मृग शावक आब उछलि नै रहल छल। ओ पूरा जंगल ताकि लेलक मुदा ऋषिकुमारक कोनो पता नै चलल। की कोनो राक्षसक माया छी। ओ तपस्यामे विघ्न-बाधा दैक ताकमे रहैत अछि। महर्षि दुख आ क्रोधसँ भरि उठल। ओ ध्यानस्थ भऽ बैसि गेल आ ध्यानमे सभटा चित्र आबैत गेल। अंग नरेशकेँ दंडित करै लेल ओ मालिनी दिस प्रस्थान केलक। ओ नदी आ गाम-घर पार करैत आगू बढ़ल जा रहल छल। उम्हर राजा रोमपाद सेहो शंकित छल जे पुत्रकेँ नै देखि महर्षि विभाण्डक क्रोधक अग्नि जौं धधकि उठल तँ अनर्थ भऽ जाएत। मंत्रीसँ सलाह कऽ राजा ई प्रबंध केलक जइसँ महर्षिक क्रोध शांत भऽ जाए। एकरा लेल राजा जंगलसँ लऽ कऽ राजधानी धरि सभटा बाटपर एक सएसँ बेसी दुधारू गायक संग ओकर ग्वालकेँ सेहो ठहरा देलक। ग्वालसँ कहल गेल जे महर्षि विभाण्डक ऐ बाट देने आबैबला अछि। हुनकर भरपूर स्वागत-सत्कार करब आ कहब जे ई खेत, ई गाय-बड़द सभटा अहाँक पुत्रक संपत्ति अछि। हम सभ अहाँक अनुचर छी, हमरा आदेश दियौ जे हम सभ अहाँक लेल की करी। एहन कहि-सुनि सभ तरहसँ मुनि विभाण्डक क्रोधकेँ शांत करबाक प्रयास कएल गेल। रोमपाद अप्पन योजनामे सफल रहल। क्रोधसँ मुनिक आँखि लाल भऽ रहल छल, एना लागैल छल जे ओ रोमपादकेँ जरा कऽ भस्म कऽ देथिन। मुदा बाट भरि ग्वाल सभ हुनका दूध आ दोसर दुग्ध पदार्थ (दही, घी, पायस, तक्र आदि) सँ खूब स्वागत केलक आ सभटा गोधन आ खेतकेँ हुनकर पुत्रक संपदा बता कऽ हुनकर क्रोधकेँ शांत कऽ देलक। रोमपादकेँ राजभवन पहुँचैत विभाण्डक ऋषिक क्रोधाग्नि ममता आ प्रेममे बढ़ि गेल छल। राजाक अपूर्व सत्कारसँ ओ धन्य भऽ चुकल छल। ओ देखलक जे हुनकर पुत्र ऋष्यश्रृंग राजभवनमे ओना विद्यमान अछि, जेना अमरावतीमे इंद्र। हुनका बगलमे राजा रोमपादक राजकुमारी शान्ता ऋष्यश्रृंगक स्त्री विराजल छल, जेना इंद्रक संग शची। ऐ शोभाकेँ देखि विभाण्डक रोम-रोम पुलकित भऽ उठल। ओ राजा रोमपादकेँ आशीर्वाद देलक आ राजाक इच्छाकेँ पूर्ण करबाक आदेश अप्पन पुत्रकेँ देलक। संग-संग इहो कहलक जे एकटा पुत्रक प्राप्तिक बाद वन घुरि आएब। ऋषिश्रृंगक ई कथा महाभारत वनपर्वमे लोमश ऋषि सुनौने छल। अप्पन पुत्र ऋष्यश्रृंग लग पहुँचि विभाण्डक बड़ प्रसन्न छल आ हुनकर उत्कर्ष देखि कऽ हर्षोत्फुल छल। राजा सेहो हुनकर सत्कारमे कमी नै केलक। मुदा महर्षि राजमहल परिसरमे रहबाकेँ उचित नै बुझलक। हुनका सघन वन आ गुफा चाही जतए ओ निर्विघ्न ध्यान, तप, व्रत, अनुष्ठान आदि कऽ सकए। राजा रोमपाद हुनकर इच्छाक सम्मान करैत मालिनसँ पश्चिम मेरूक पर्वतपर हुनकर आश्रम बना कऽ हुनकर रहैक व्यवस्था कऽ देलक। ई महर्षि विभाण्डक अस्थायी आश्रम छल। ई स्थल वर्तमान भागलपुरसँ ४२ किलोमीटर पश्चिम आ वरियारपुरसँ छह किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम कोनपर छल। ई ऋषिकुंड वा ऋष्यश्रृंग आश्रमक नामसँ प्रसिद्ध मरूक पर्वत या भैरा पहाड़ीसँ बनल गोलकार घाटीमे स्थित छल। ऐ आश्रमक लग एकटा पोखरि छल जे ठार आ धीपल रुाोतक एकटा समवाचित जलराशि छल। ओइ पोखरिक उत्तर दिस ध्यान स्थली अछि जतए ऋषि ध्यान लगाबैत छल। कजरा रेलवे स्टेशनसँ बारह कि.मी. दक्षिण स्थित ई पहाड़ ऋष्यश्रृंग पर्वतक नामसँ प्रसिद्ध अछि। एखन ई ठाम पर्यटकक लेल आकर्षणक केंद्र अछि। मालिनीमे वृष्टि यज्ञ आ पुत्रेष्ठि यज्ञ मालिनीमे रहि कऽ ऋष्यश्रृंग राजा रोमपाद आ हुनक विद्वान मंत्रीसँ अंग देशमे अनावृष्टि आ सूखासँ प्रजाकेँ बचाबैक लेल उपायपर विचार-विमर्श केलक। एकर संगे ऐ देशमे उपलब्ध जल-संसाधनक समुचित उपयोगक संबंधमे सेहो मंत्रणा केलक। ओ मालिनीमे वृष्टि यज्ञ केलक जइसँ राज्यमे दीर्घकाल धरि अकाल नै पड़ए। आजुक चम्पानाला ओइ ऋषिश्रृंगक गहन पर्यवेक्षणमे तैयार कएल गेल हएत जकर उपयोगिता साढ़े सात हजार बरख बादो सिद्ध अछि। काल बितैत गेल। राज्यमे वर्षा हुअए लागल। प्रजा धन-धान्यसँ संपन्न हुअए लागल। आब शान्ता एकटा सुनर आ स्वस्थ पुत्रक जन्म देलक, जकर नाम सारंग राखल गेल। संपूर्ण राज्यमे आनंदक लहरि छा गेल। एक दिन शान्ता अप्पन पतिदेव ऋष्यश्रृंगसँ सविनय अप्पन मनोरथ कहलक। ओ बाजल जे हुनका कोनो भाय नै अछि, तइसँ हुनकर माता-पिता बड़ दुखी रहैत छन्हि। हुनकर दुखसँ हम बेचैन रहैत छी। शान्ता साग्रह केलक जे अहाँ एहन कोनो उपाय करू जे हमरा एकटा भाय भऽ जाए। विद्वान ऋष्यश्रृंग चिंतन कऽ कहलक जे ओ विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य व्रतक पालन कऽ वेदक अध्ययन केने अछि। ओ पुत्रक निमित्त अप्पन ससुर महाराज रोमापादक पुत्रेष्ठि यज्ञ कराएत। ऐ यज्ञक प्रधान देवता इंद्र रहत। ओ महाराजकेँ यशस्वी पुत्र प्रदान करत। शान्ता हर्षोत्फुल भऽ उठल। ओ यज्ञ संपादनक सूचना अप्पन माता-पिताकेँ देलक। राजा रोमपाद कतेक रास वेदज्ञ पंडितकेँ बजा यज्ञक संपूर्ण तैयारी केलक। कतेक रास राजा-महाराजा आमंत्रित कएल गेल। ऐ मे राजा रोमपादक परम मित्र अयोध्या नरेश दशरथ सेहो हएत। बड़ धूमधामसँ यज्ञ संपन्न भेल। एकर तत्काल फल सेहो भेट गेल, इंद्र प्रसन्न भऽ राजाकेँ पुत्रवान हेबाक वरदान देलक। रानी गर्भवती भेल आ समय एलापर एकटा पुत्रकेँ जन्म देलक। माता-पिता ओइ शिशुक नाम चतुरंग राखलक। अंग देशक राजाक वंशावली, जे चतुरंगसँ शुरू भऽ महाभारत कालक कर्ण धरि जाइत अछि, ओ निम्नलिखित अछि- रोमपादक पुत्र चतुरंग, चतुरंगक पुत्र पृथुलाक्ष आ पृथुलाक्षक चम्पा नामक पुत्र भेल, जे चम्पानगरी बसौने छल। चम्पाकेँ हर्यंग नामक पुत्र आ हुनकर पुत्र भेल भद्ररथ, भद्ररथकेँ वृहद्रथ आ वृहद्रथकेँ वृहत्कर्मा नामक पुत्र भेल। वृहत्कर्माकेँ वृहदभानु, वृहदभानुकेँ वृहन्मना आ वृहन्मना संजयद्रथक जन्म भेल। जयद्रथकेँ ब्राह्मण आ त्रिय संयोगसँ उत्पन्न भेल स्त्रीक गर्भसँ विजय नामक पुत्रक जन्म भेल। विजयकेँ धृति, धृतिकेँ धृतव्रत, धृतव्रतकेँ सत्कर्मा आ सत्कर्माकेँ अधीरथ नामक पुत्र भेल। यएह अधीरथ नहाइ लेल गंगा तटपर गेल रहथि जिनका पिटारमे सुरक्षित राखल एकटा बालक भेटल छल। ऐ बालककेँ पृथा (कुंती) जन्म देलाक बाद गंगामे बहा देने छल, जेकरा अधीरथ पुत्रक रूपमे ग्रहण केने छल। ई बालक कर्ण भेल जे महाभारतक सुप्रसिद्ध महारथी छल। कर्णक पुत्र वृषसेन। अंग नरेशक एतबेटा वंशावली पुराणमे उपलब्ध अछि। तृतीय परिच्छेद अयोध्यामे अश्वमेध आ पुत्रेष्ठि यज्ञ अवध नरेश राजा दशरथक राजधानी अयोध्या छल। ई नगरी सरयू धारक कातमे बसल अछि। ई प्रचुर धन-धान्यसँ संपन्न, सुखी आ बड़ समृद्धशाली छल। अयोध्या सभ लोकमे विख्यात छल। एकरा महाराज वैवश्वत मनु बसौने छल। हुनके पुत्र छल इक्ष्वाकु, जिनकर तीन शक्तिशाली पुत्र (विकुक्षि, निमि आ दण्डक) मे विकुक्षिक वंशमे दशरथ एकटा चक्रवर्ती सम्राट छल। वाल्मीकीय रामायणक अनुसार, ई महापुरी बारह योजन नम्हर आ तीन योजन चौड़ा छल। अयोध्यासँ दोसर जनपदमे जाइ लेल जे बड़ प्रशस्त आ चौड़ा राजमार्ग छल, ओकर दूनू कात कतेक रास सघन गाछसँ आच्छादित हेबाक कारण ओइ कालक दोसर मार्गसँ अप्पन फराक पहचान बना रहल छल। अयोध्यामे कतेक रास बाजार छल। ई सभ तरहक यंत्र आ अस्त्र-शस्त्रसँ संचित छल। अप्पन नामक अनुसार ई युद्धमे पराजित होइबला नगरी नै छल। एतए ऊँच-नीच अट्टालिका छल, जकर ऊपर ध्वज लहरा रहल छल आ गुंबदपर शतध्नि (तोप) लागल छल। सुरक्षाक दृष्टिसँ अयोध्या अजेय छल। ओकर चारू कात गहींर खधाइ छल, जेकरा लांघब बा पार करब कठिन छल। नगरमे कतेक रास सांस्कृतिक कार्यक्रम लेल नाटक मंडल छल। ओकरामे स्त्रिये टा नृत्य आ अभिनय करैत छल। चारू कात आमक गाछ छल। नगरमे कतेक रास कूटागार (नुकायल घर आ स्त्री क्रीड़ा घर) छल। राजा दशरथ ऐ संपन्न नगरमे रहि कऽ अप्पन प्रजाक पालन करैत छल। रामायणमे अयोध्यापुरीक वर्णन आ राजा दशरथक शासनकालमे अयोध्या लोकक उत्तम स्थिति अवलोकन करैमे आदि कवि वाल्मीकि कोनो तरहे कृपणता नै कएने अछि। रामायणक अनुसार अयोध्यामे कत्तौ कामी, कृपण, क्रूर, मूर्ख आ नास्तिक मनुख देखबामे नै भेटैत अछि। सभ लोक धर्मशील, संयमी, प्रसन्न, शीलवान आ सदाचारी छल। सभ लोक कुंडल, मुकुट आ पुष्पहार धारण करैत छल आ हुनकर अंग चंदनक लेप आ सुगंधी संयुक्त छल। एतुक्का सभ लोक श्री संपन्न, रूपवान आ राजभक्त छल। इंद्रक अश्व उच्चैश्रवाक तरहे काम्वोज आ वाह्लीलक देशमे उत्पन्न भेल शक्तिशाली अश्व आ सिंधुनदमे पालल दरियाइ घोड़ा अयोध्यामे भरल छल। विन्ध आ हिमालय पर्वतमे जन्मल मत्त गजराज सेहो बड़ संख्यामे अयोध्याक शौर्यक अनवरत वृद्धि करैत छल। अयोध्या सभ तरहेँ सुरक्षित छल। एतए आबि कऽ केकरो लेल युद्ध करब असंभव छल, तइसँ ई पुरी अयोध्या सत्य आ सार्थक नामसँ प्रकाशित होइत छल। ऐ यशस्वी राजा दशरथक राजकीय काजक संपादन लेल मंत्री-परिषदमे आठ मंत्री छल, धृष्टि, जयंत, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल आ सुमन्त। सुमन्त अर्थशास्त्र उद्भट विद्वान छल। एकरा संगे महर्षि वशिष्ठ आ वामदेव, महाराज दशरथक दूटा विद्वान ऋत्विज (पुरोहित) छल। एकर अलावा, सुयश, जावलि, काश्यप, गौतम, दीघार्य, मार्कण्डेय आ कात्यायन जेहन तपायल ऋषिक दरबारमे मंत्रीपद प्राप्त छल। ऐ महर्षिक संग कौशल नरेशक पहिलुका परंपरागत ऋत्विज सेहो मंत्रीक कार्य करैत छल। सभ तरहेँ ताकत भेलाक बादो राजा पुत्र विहीन छल। हुनकर तीनटा रानी छल। मुदा, सूर्यवंशकेँ चलाबै बला कोनो पुत्र नै छल। राजा मंत्रसँ मंत्रणा कऽ पुत्र प्राप्तिक लेल अश्वमेघ यज्ञक अनुष्ठान करबाक विचार केलक। वेद विद्याक पारंगत विद्वान ऋषिमे श्रेष्ठ सुयश, वामदेव, जावलि, काश्यप, वशिष्ठ सभकेँ ससम्मान बजा कऽ नरेश अप्पन मंतव्य देलक। दशरथ अप्पन इच्छा व्यक्त केलक जे शास्त्रोक्त विधिसँ पुत्र प्राप्तिक लेल अश्वमेघ यज्ञसँ भगवानक भजन करब हुनका लेल एकमात्र उपाय अछि। वेदज्ञ पंडित एकर अनुमोदन केलक। राजा दशरथ व्याकुल भऽ कऽ महर्षि वशिष्ठसँ ऐ फलदायक पुत्रेष्ठि यज्ञ अपनेसँ कराबैक अनुरोध केलक। ओ कनमुँह भऽ अप्पन कुल पुरोहित वशिष्ठसँ बाजल जे हुनकामे तपस्याक एतेक विपुल शक्ति अछि जे हुनके लऽ कऽ ब्रह्मा युगमे परिवर्तन कऽ देने अछि। फेर एकटा साधारण पुत्रेष्ठि यज्ञ ओ किअए नै कऽ सकैत अछि? ऐपर गुरु वशिष्ठ गंभीर भऽ कऽ बाजल, -हे राजन! पुत्रेष्ठि यज्ञ कोनो साधारण यज्ञ नै अछि। ई यज्ञ वएह करा सकैत अछि जे ब्रह्मचर्य अवस्थामे शास्त्रमे कहल गेल आठ तरहक मिथुनक दृढ़तासँ त्याग केने हएत। स्त्रीक स्मरण, स्त्रीकेँ लऽ कऽ गप, स्त्रीक संग क्रीड़ा करब, स्त्रीकेँ देखब, स्त्रीसँ नुका कऽ गप करब, स्त्रीसँ भेँट करबाक निश्चय आ संकल्प करब आ स्त्री प्रसंगक गप करब। ऐ आठ तरहक अवगुणसँ जे पूर्णत: रहित हुअए, निष्ठावान ब्रह्मचारी हुअए, ओ अप्पन ब्रह्मचर्य कालमे कोनो गृहस्थक अन्न नै खेने हुअए, वएह ऐ पुत्रेष्ठि यज्ञ करबाबएमे सक्षम अछि। हम अहाँक वंशक राजाक कतेक तरहक अन्न खेने छी। तइसँ ऐ यज्ञक संपादन हम नै कऽ सकैत छी। महर्षि वशिष्ठ ध्यान लगौलक, फेर आँखि खोललक आ बाजल, पुण्याश्रममे महर्षि कश्यपक पुत्र विभाण्डक ऋषि अछि आ हुनकर पुत्र ऋष्यश्रृंग अप्पन पिताक संग रहि रहल अछि। ओ सभ तरहेँ पुत्रेष्ठि यज्ञ करबाबएमे सक्षम अछि। ओ उक्त शास्त्रोक्त कठोर ब्रह्मचर्यक पालन केने छल। ओ ब्रह्मचर्य कालमे ई जानबे नै केलक जे स्त्री की होइत अछि। ऐ यज्ञक संपादनार्थ अंग नरेश राजा रोमपादक जमाए ऋष्यश्रृंगकेँ सादर आमंत्रित करबाक निश्चय कएल गेल। रोमपाद राजा दशरथक अभिन्न मित्र छल। ओ नीक कालमे मंत्री आ रानीक संग अप्पन मित्र अंग नरेशक एतए प्रस्थान केलक, जतए ऋष्यश्रृंग अप्पन स्त्री शान्ताक संग निवास करैत छल। प्रज्ज्वलित अग्निक संग तेजस्वी ऋष्यश्रृंग राजा रोमपाद लग विराजमान छल। गहींर मित्रताक कारण रोमपाद अप्पन मित्रक विधिवत सत्कार केलक आ शास्त्रोक्त विधिक अनुसार पूजन केलक। संगे-संग अप्पन विद्वान जमाएसँ अप्पन अभिन्न मित्रक परिचय करेलक। ऋष्यश्रृंग सेहो राजा दशरथक बड़ सम्मान देलक। राजा दशरथ अंग नरेशक एतए सात-आठ दिन धरि मित्र पाहुन तरहेँ रहि गेल। एकर बाद राजा दशरथ राजा रोमपादकेँ अश्वमेध अनुष्ठान केँ लऽ कऽ अप्पन मनक इच्छा बतौलखिन आ एकर निअमसँ संपादनार्थ ऋष्यश्रृंग आ शान्ताकेँ अयोध्या लऽ जाए लेल अनुमति मांगलक। रोमपाद दुनू गोटेकेँ सहर्ष अयोध्या जेबाक अनुमति दऽ देलक। रामायणकारक अनुसार, रोमपादक अनुमति लऽ कऽ ऋष्यश्रृंग आ शान्ता महाराज दशरथक संग अयोध्याक लेल प्रस्थान केलक। राजा दशरथकेँ विदा करैत काल रोमपाद बड़ भावुक भऽ गेल। दुनू गोटे हाथ जोड़ि कऽ एक-दोसराकेँ छातीसँ लगा कऽ अभिनंदन केलक। दशरथ अप्पन द्रुतगामी दूतकेँ अप्पन नगरवासी सभकेँ समाद भेजि कऽ सूचित केलक जे विभाण्डक तनय ऋष्यश्रृंग अयोध्या आबि रहल अछि। नगरमे तोरण द्वार बनाओल जाए, एकरा सजाओल जाए। सभ ठाम अगरू धूमक सुवास हेबाक चाही। नगरक सभटा बाट बहारल जाए आ ओकरापर पाइन छींटल जाए, जइसँ ओकरापर कनियोटा गरदा नै रहै। पूरा नगरकेँ ध्वज पताकासँ अलंकृत कऽ देल जाए। राजाक आदेशक पालन भेल। नगरमे शंख, दुन्दुभि आ दोसर वाद्ययंत्र बाजए लागल। बाटक सभटा कठिनाइ केँ बिसुरि कऽ राजा स-दलबल प्रफुल्लित छल। राजा ऋष्यश्रृंगकेँ आगू कऽ नगरमे आएल। ऐ द्विजकुमारक दर्शन कऽ नगरक लोग, कृतार्थ भऽ उठल। सभ कियो पराक्रमी महाराज दशरथक संग ऋष्यश्रृंगकेँ अयोध्यामे आबैत पुष्पवृष्टिसँ स्वागत केलक। राजा अप्पन महान पाहुनकेँ अंत:पुरमे आनि कऽ शास्त्रोक्त विधिसँ पूजा-अर्चना केलक। ओतुक्का स्त्री सभ देवी शान्ताकेँ अप्पन बीच पाबि बड़ खुश छल। वाल्मीकीय रामायणक बालकांडक द्वादश सर्गक अनुसार, अंत:पुरमे ऋष्यश्रृंग सपत्नीक रहए लागल। बड़ काल बीत गेल। वसंत ऋतुक आगमन भेल। दशरथ एहन कालमे यज्ञ प्रारंभ करबाक लेल विचार केलक। एकर बाद देवता सन सुकान्ति बला ऋष्यश्रृंगकेँ आगू कर जोड़ि कऽ दशरथ प्रणाम केलक आ अप्पन विमल वंशक परंपराक रक्षाक लेल पुत्र पाबैक निमित्त यज्ञ करबाक लेल हुनका वरण केलक। ऋष्यश्रृंग तथास्तु कहि हुनकर प्रार्थना स्वीकार केलक। ऋषिक आदेशक मुताबिक, यज्ञ सामग्री जमा हुअए लागल, भूमंडलमे भ्रमण करबाक लेल महाराज दशरथक अश्वकेँ छोड़बाक व्यवस्था हुअए लागल, पारंगत आ ब्रह्मवादी ऋषि आ पंडितकेँ बजैलक। सुयज्ञ, वामदेव, जावलि, काश्यप आ वशिष्ठ संग दोसर पंडित सेहो आएल। दशरथ सभ लोकक विधिवत पूजन केलक। पुत्र प्राप्तिक लेल अश्वमेघ यज्ञक अनुष्ठानक गप दोहराएल गेल आ विश्वास व्यक्त कएल गेल जे ऋष्यश्रृंगक प्रभावसँ हुनकर सभटा कामना पूर्ण हएत। ऋषि सभ राजाक ऐ महान संकल्पक लेल साधुवाद देलक। ऋष्यश्रृंग आ दोसर ब्राह्मण भविष्यवाणी केलक जे ऐ यज्ञसँ चारिटा पराक्रमी पुत्र प्राप्त हएत। राजा प्रसन्न भेल। मंत्रीकेँ आदेश भेटल जे गुरुजनक आदेशानुसार यज्ञक सामग्री जुटाओल जाए आ शक्तिशाली वीरक संरक्षणमे यज्ञक अश्वकेँ छोड़ल जाए। अश्वक संग प्रधान ऋत्विज सेहो रहता। सरयूक उत्तर दिसक तटपर यज्ञशालाक निर्माण भेल आ शास्त्रोक्त विधिक अनुसार क्रमश: शांतिकर्म पुण्याह वाचन आदिक विस्तारपूर्वक अनुष्ठान कएल जाए, जइसँ विघ्नक निवारण हुअए। अहाँ सभ कियो एहन साधन प्रस्तुत करू जइसँ ई यज्ञ निर्विघ्न विधिपूर्वक संपन्न भऽ जाए। मंत्री सभ राजाक आदेशक पालन केलक आ ओइ मुताबिक व्यवस्था सेहो केलक। ऐ तरहेँ एक वर्ष बीत गेल। दोसर वर्ष वसन्तागमन भेल। अयोध्याक आमक गाछी कोइलीक कूँक सँ गूँजि उठल। राजा अश्वमेधक दीक्षा लै लेल गुरु वशिष्ठ कतए पहुँचल। ओ न्यायत: गुरुक अर्चना केलक आ अनुरोध केलक जे शास्त्रविधिसँ ओ ऐ यज्ञकेँ संपन्न कराबथि आ एहन व्यवस्था करथि जे कोनो ब्रह्म राक्षस ऐ मे विघ्न नै उत्पन्न कऽ सकए। दशरथ कहलखिन, -अहाँक बड़ स्नेह हमरापर अछि, अहाँ हमर सुहृदए, हितैषी, गुरु आ परम महान छी। ऐ महान यज्ञक भार अहीं वहन करू। पुलकित भऽ कऽ गुरु वशिष्ठ अप्पन स्वीकृति देलखिन आ कहलखिन, -हे नरोत्तम! हम वएह सभ काज करब जइ लेल अहाँ प्रार्थना केने छी। तकर बाद, गुरु वशिष्ठ यज्ञ काजमे निपुण आ यज्ञ विषयक शिल्प काजमे कुशल, परम धर्मात्मा, वृद्ध ब्राह्मण, यज्ञ काज खत्म हुअए धरि ओइमे सेवा करए बला सेवक, शिल्पकार, कमार, खधाइ खोदएबला, ज्योतिषी, कारीगर, नट, नचनियाँ, विशुद्ध शास्त्र वेत्ता आ बहुश्रुत पुरुख सभकेँ बजा कऽ हुनका सभसँ कहलक, -अहाँ सभ महाराजाक आज्ञासँ यज्ञकाजक लेल आवश्यक प्रबन्ध करु। जल्दीसँ हजार ईंटा मंगाबियौ। बजाओल गेल राजाक रहैक लेल, हुनका भोजन योग्य आ पीबए आदिक उपकरण युक्त कतेक रास महल बनाओल जाए। ब्राह्मणक लेल आन्हर-पाइनक निवारणमे समर्थ सैकड़ो आवास बनाओल जाए। ऐ तरहेँ पुरवासीक लेल घर आ दूर ठामसँ आएल भूपालक लेल सभ सुविधासँ युक्त महल तैयार कएल जाए। हाथीक लेल हथसाल आ घोड़ा लेल घुड़साल, सामान्य लोकक विश्राम करबाक लेल रैन बसेरा आ दोसर देशक सैनिक लेल छावनी बनाओल जाए। बड़ रास मेहनत करए बला सेवक आ शिल्पी केँ धन आ अन्न दऽ कऽ सम्मानित कएल जाए। सभ अप्पन-अप्पन काजमे लागि गेल। तकर बाद वशिष्ठ मंत्री सुमंतकेँ आदेश देलक जे ऐ धरतीक सभटा धार्मिक राजा आ चारू वर्णक सभटा लोककेँ ऐ यज्ञमे भाग लेबाक लेल आमंत्रित कएल जाए। मिथिलाक नरेश शूरवीर सत्यवादी जनक, देवता सन सुकांतिबला काशी नरेश, महाराज दशरथक ससुर वृद्ध केकेय नरेश, अंग देशक महाधनुर्धर राजा रोमपादक पुत्र सहित कौशल राज भानुमान, मगध राज प्राप्तिज्ञ आदि केँ अपनेसँ जा कऽ सादर सत्कारपूर्वक बजओने आएल। महाराजक आदेश लऽ कऽ पूब देशक नरेश, सिंधु सौवीर आ सुराष्ट्र देश व दक्षिणक नरेशक विशेष दूतसँ निमंत्रण भेजल जाए। निर्धारित दिन विभिन्न राज्यक नरेश महाराज दशरथक लेल बहुमूल्य रत्न भेंट लऽ कऽ अयोध्या जाए लागल। वांछनीय वस्तुक संग सरयूक उत्तरबरिया कातपर यज्ञशालाक तुरंत निर्माण भऽ गेल। लागल एना जे मनक संकल्पसँ ई बनि गेल। मुनिवर वशिष्ठ आ ऋष्यश्रृंगक आदेशसँ शुभ नक्षत्र बला दिन राजा दशरथ यज्ञक लेल राजम वनसँ निकलल। एकर बाद वशिष्ठ जेहन श्रेष्ठ द्विजवर ऋष्यश्रृंगक नेतृत्वमे यज्ञकार्य शुरू केलक आ तखने राजा दशरथ अप्पन स्त्रीक संग ऋष्यश्रृंगसँ यज्ञक दीक्षा लेलक। इम्हर वर्ष पूर्ण होइक संग अश्व भूमंडलक परिक्रमा कऽ वापस घुरि आएल। अश्वमेध यज्ञ शुरू भेल। ऋष्यश्रृंग आदि महर्षि अप्पन अभ्यास कालमे सीखल अक्षर संयुक्त स्वर अ वर्ण सँ संपन्न मंत्रसँ इंद्र आदि श्रेेष्ठ देवता सबहक आह्वान केलक। सभ हुनकर योग्य हविष्यक भाग समर्पित केलक। यज्ञशालामे तीन सए पशु बान्हल गेल छल आ दशरथक ओइ अश्वरत्न केँ सेहो ओतए बान्हल गेल छल। रानी कौशल्या ओइ अश्वक संस्कार कऽ ओकरा तलवारसँ तीन बेर स्पर्श केलक आ धर्म पालन करबाक इच्छासँ ओइ अश्व लग एक राति निवास केलक। सभटा वर्ण द्वारा अश्वक स्पर्शक पश्चात चतुर जितेंद्रिय ऋत्विक विधिसँ अश्वकंदक गूदा निकालि शास्त्रोक्त विधिसँ पकौलक। ओइ गूदाक आहुति सेहो देल गेल। राजा दशरथ अप्पन पापकेँ दूर करबाक लेल ओकर धुआँ सूंघलक। अश्वमेध यज्ञक अंगभूत जे हवनीय पदार्थ छल, ओइ सभक संग सोलह ऋत्विक अग्निमे विधिवत आहुति दिअए लागल। अश्वमेध यज्ञ पूर्ण भेल। ऋत्विककेँ जे धन दक्षिणामे भेटल, ओ सभटा ओ मुनिवर वशिष्ठ आ ऋष्यश्रृंगकेँ सौंपि देलक। ई दूनू महर्षि न्यायपूर्वक बँटवारा कऽ सभ ब्राह्मणकेँ संतुष्ट केलक। एम्हर दशरथ ऐ उत्तम यज्ञक पुण्यफल प्राप्त कऽ मने मन प्रसन्न भेल। ओ ऋष्यश्रृंगसँ बाजल, -उत्तम व्रतक पालन करएबला मुनीश्वर! आब जे कर्म हमर कुलक परंपराकेँ बढ़बै बला हुअए, ओकर संपादन कएल जाए। ऋष्यश्रृंग राजाक चारिटा यशस्वी पुत्र हेबाक भविष्यवाणी केलक। राजा प्रसन्न भेल आ ऋष्यश्रृंगसँ एकरा लेल पुत्रेष्ठि यज्ञ प्रारंभ करबाक लेल अनुरोध केलक। ऋष्यश्रृंग अतुलित मेधावी छलाह आ वेदक सेहो ज्ञाता. ओ कनी कालक लेल ध्यान लगा अप्पन भावी कर्तव्यक निश्चय केलक। फेर ध्यान भंग भेलापर दशरथसँ बाजल, -राजन! हम अहाँकेँ पुत्र प्राप्तिक लेल अर्थवेदक मंत्रसँ पुत्रेष्ठि यज्ञ करब। वेदोक्ति विधिक अनुसार, अनुष्ठान केलापर ई यज्ञ अवश्य सफल हएत। ऋष्यश्रृंग अप्पन जुगक महान चिकित्साशास्त्री छल आ शरीर विज्ञानमे हुनकर गहींर पइठ छल। ओ दीर्घकाल धरि आयुर्वेदक सेहो अध्ययन केने छल आ ओइमे अर्हत्व प्राप्त केने छल। ओ राजा दशरथ आ हुनकर तीनू रानीक चिकित्सा शास्त्रीय परीक्षण केलक। ओ ओकरे मुताबिक जड़ी-बूटी आ आयुर्वेदिक गुण संयुक्त समिधा सेहो इकट्ठा केलक। परम तेजस्वी ऋष्यश्रृंग पुत्र भेटबाक उद्देश्यसँ पुत्रेष्ठि यज्ञ प्रारंभ केलक। ओ श्रौत विधिक अनुसार, चिकित्सीय गुण युक्त समिधा सभक आहुति अग्निमे देब शुरू केलक। ऐ महान यज्ञमे देवता, सिद्ध, गंधर्व आ महर्षिगण अप्पन अप्पन भाग लै लेल पहुँचल। पापी सभक विनाश आ संतक कल्याणक लेल सभटा देवता यज्ञस्थल पर उपस्थित भेल आ अप्पन भाग प्राप्त कऽ यथेष्ट आशीर्वाद देलक। यज्ञकुंडक आैषधि तैयार भऽ गेल। ई खीरक रूपमे तैयार कएल गेल। प्रज्ज्वलित अग्निक समान ई दिव्यौषधि दैदीप्यमान भऽ रहल छल। ई जम्बूनद नामक सुवर्णसँ बनल बड़ पैघ रास परातमे चांदीक ढक्कनसँ झाँपल छल। आैषषि तैयार हेबाक संग एकर सुगंध सभ दिशामे पसरि गेल। ऋष्यश्रृंग अप्पन सफलतासँ प्रफुल्लित छल। ओ यज्ञाग्निसँ ओइ अमोघ आैषधिसँ भरल पात्रकेँ निकालि महाराज दशरथकेँ देलक आ कहलक, -राजन! अहाँ एकरा ग्रहण करू। राजाक अंत:पुरक स्त्री सभमे हर्षोल्लास भरि गेल, जेना निर्धनकेँ कुबेरक खजाना भेट गेल। राजा ओइ खीरक आधा हिस्सा महारानी कौशल्याकेँ देलक। फेर बचल आध हिस्सा रानी सुमित्राकेँ। फेर दुनूकेँ देलाक बाद जतेक खीर बचल छल ओकर आध हिस्सा रानी कैकेयीकेँ आ हुनका देलाक बाद जे खीरक अवशिष्ट भाग बचल, से चतुर नरेश किछु सोचि-समझ कऽ फेर सुमित्राकेँ दऽ देलक। रानी श्रद्धा आ विश्वासपूर्वक ऐ आैषधि युक्त खीरक सेवन केलक। जल्दीये ओ अलग-अलग गर्भधारण केलक। (देखू परिशिष्ट क) चारिम परिच्छेद ऋष्यश्रृंग आश्रमक स्थापना किछु दिन अयोध्याक रनिवास मे रहैक बाद ऋष्यश्रृंग अप्पन स्त्रीक संग मालिनी घुरल। मालिनी सं पश्चिम भाग स्थित अप्पन आश्रम कऽ सुव्यवस्थित केलक। ओहि आश्रम मे वेदक अध्ययनक व्यवस्था करल गेल, जे कतेक रास आचार्यक देख-रेख मे संचालित छल। एकर बाद ऋष्यश्रृंग शान्ताक संग कौशिकीक कातक कज्जल वन स्थित अप्पन पुण्याश्रम सेहो घुरल। ई वहि पुण्याश्रम छल, जतय सं गणिका हुनका अंगक राजधानी मालिनी लऽ गेल छल। अंतर्मुखी युवक ऋष्यश्रृंगक बिना ई आश्रम सून छल। मन सं वेदक सार्थक पाठ करय बला ऋष्यश्रृंग के आबैत लता हिल-हिलकऽ स्वागताभिवादनक मुद्रा मे आबि गेल। पिता विभाण्डक अप्पन पुत्रक अहि उपलब्धि पर हर्षोत्फुल छल। शान्ता जेहन पुत्रवधू कऽ पाकऽ ओ पुलकित भऽ उठल। अहि पुण्याश्रम मे ऋष्यश्रृंगाश्रमक स्थापना केल गेल, जाहि के पहिलुक कुलपति ऋष्यश्रृंग छल। उत्तर वैदिक काल मे विश्वविद्यालयक स्तरक मान्यता अहि आश्रमके प्राप्त छल। तहियौका आर्य जातिक शारीरिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक, भौतिक आ सांग्रामिक उन्नतिक कारण हुनकर शिक्षा प्रणाली छल। रामायण काल में ऋष्यश्रृंगाश्रम बड़ चर्चित छल। महाभारत मे सेहो एकर संक्षिप्त विवरण भेटैत अछि। पंडित रामदीन पांडेय लिखैत अछि जे ऋष्यश्रृंग अप्पन युगक महान आचार्य छल। चिकित्सा शास्त्र मे हुनकर अद्भुत प्रवेश छल। महाभारत युग मे ई आश्रम बड़ रास हरिहर छल। युधिष्ठिर वनवास काल मे लोमश ऋषिक संग अहि आश्रम मे आयल छल। आश्रम मे दस हजार छात्र सभोजन, सवस्त्र आ निशुल्क शिक्षा प्राप्त करैत छल। अहि आश्रमक ब्रह्मचारी मे भक्ति, शुद्धता आ पवित्रताक संग धार्मिक वृत्तिक उदात्त आ गरिमामय छल। ओ सभ दैनिक क्रिया, संध्योपासन, व्रतक अनुपालन आ धर्म समन्वित उत्सव से हुनक जीवन मे उन्नति, आत्मविश्वास, आत्मबल आ आत्मिक शक्ति प्रचुर रूप सं भेटैत छल। आचार्य कुल मे अग्नि-परिचर्याक सभ दिन पालन, ब्रह्मचारीक लेल एकटा धार्मिक व्रतक समान छल आ ई आश्रमक अनुशासनक महत्वपूर्ण अंग छल। आचार्य ऋष्यश्रृंगक कुशल कुलपतित्व मे ई आश्रम जम्बूद्वीप में चर्चित भऽ गेल। वेद आ ओकर सभटा अंगक संग चिकित्सा शास्त्रक गहन ज्ञान ब्रह्मचारी छात्र सभके देल जायत छल। समिधा आ मेखला सं अप्पन व्रतक नियम सं पालन करैत ब्रह्मचारी श्रम, तप आ गुरुसभक आशीर्वादक प्रभाव सं अध्ययन मे सफलता प्राप्त करैत छल। ऋष्यश्रृंग आश्रम मे तप ब्रह्मचर्य जीवनक आवश्यक अंग छल। तप सं हुनका मे आत्मसंयम, आत्मचिंतन, आत्मविश्वास, आत्मविश्लेषण, न्याय प्रवृत्ति, विवेक भावना अ आध्यात्मिक वृत्तिक उदय होयत छल। कुलपति ऋष्यश्रृंग अपने यज्ञ देवताक साकार रूप छल। कहल जायत अछि जे ओ जीवनभरि यज्ञ केलक आ करौलक। ओ एहन कतेक रास यज्ञक संपादन करैलक जकरा लेल मात्र वहि टा सक्षम छल। गृहस्थक लेल ओहि युग मे पांच महायज्ञक विधान छल। ओ यज्ञ छल, व्रह्म यज्ञ, पितृ यज्ञ, देव यज्ञ, भूत यज्ञ आ नृयज्ञ। पहिलुका विद्वान ऋषिक प्रति श्रद्धा व्यक्त करैत वेद मंत्रक पाठ कऽ अप्पन बौद्धिक उत्कर्ष करब आ याज्ञिक समारोहक अवसर पर स्वाध्यायक व्यवस्था करब ब्रह्मयज्ञक विधानक अंतर्गत छल। पितरक श्राद्ध तर्पण सभ पितृ यज्ञक अंतर्गत संपन्न होयत छल। देवताक लेल अग्निक आहुति आ इंद्र, अग्नि, प्रजापति, सोम, पृथ्वी अदि देवताक नाम अग्नि मे समिधा प्रदान करव देव यज्ञ छल। अनिष्टकारी प्रेतात्माक तुष्टिक लेल भूत यज्ञ आ अतिथि देवताक सत्कार नृयज्ञ छल। वेदक मंत्रद्रष्टा ऋष्यश्रृंग वेदक महत्ता सार्वदेशिक आ सार्वकालिक अछि। सभ्यताक उषाकाल सं वेद समादृत आ अपौरुषेय अछि। अहि देशक प्रज्ञा पर्वत सं निकलल पतित पावनी गंगाक संस्पर्श पात्र सं सभटा विश्व चमत्कृत आ आह्लादित भेल अछि। शुक्ल यजुर्वेदीय ब्राह्मण ग्रंथ शतपथ ब्राह्मणक स्पष्ट कथन अछि, 'यावन्तुं ह वै इमा पृथिविं वित्तेन पूर्ण ददत लोकं जयति त्रिभिस्तावनां जयति: भूयांसं च अक्षयं च य एवं विद्वान: अदृश्व: स्वाध्यायमधीते, तस्मात् स्वाध्याये अधेयतव्य:।' शतपथ व्राह्मण 11-5-6-11 (अर्थात धनसं परिपूर्ण पृथ्वीक दान करहि सं जतेक फल भेटैत अछि, वेदक अध्ययन से सेहो ओतेक फल भेटैत अछि। ओतबै टा नहि, ओकरो से वढि़ के मनुख अविनाशशाली अक्षय लोक कऽ प्राप्त करैत अछि। ताहि सं वेदक स्वाध्याय करब वड़ आवश्यक आ उपादेय अछि।) पुरान कालक ऋषि वड़ निष्ठावान आ तप:शील मनुख छल। समाधिस्थ अवस्था मे ओ अप्पन परिवेशक अतिक्रमण कऽ मंत्रक दर्शन केलक। ताहि सं ऋषि वेदमंत्रक रुाष्टा नै, द्रष्टा कहल जायत अछि। ऋग्वेदक प्रत्येक मंत्रक द्रष्टा कियो नै कियो ऋषि अछि। हुनकर संख्या लगभग तीन सौ टा अछि। अहि मे किछु ऋषिक नाम अछि. मधुच्छन्द, शुन:शेष, कण्व, गौतम, अगस्त्य, गुत्समद, विश्वामित्र, ऋषभ, देवश्रव, वामदेव, अत्रि, पृथु, कृष्ण, अपाला, देवल, भृगु, च्यवन, सुमित्र, अग्निपूर्य, वर्हिष, सुदास, श्रष्यश्रृंग, प्रचेता, उध्र्वग्रीवा, अधमर्षण, भारद्वाज, वीतहव्य, गर्ग, वशिष्ठ, मेधातिथि, वत्स, शशकर्ण, नारद, विश्वमना, नाभाग आदि। ई पुरुष सभक अलावा स्त्री सेहो मंत्रद्रष्टा छल। अहि मे लोपमुद्रा, गौरी, जुहू, शची, घोषा, लोमशा, विश्वधारा आदिक नाम उल्लेखनीय अछि। ई ऋषि सभ अप्पन मंत्रमे मूलत: ईश्वरक दिव्य विभूतिक प्रति अप्पन श्रद्धात्मक उद्गार व्यक्त केने अछि। यजुर्वेदक विभाजन चतुर्वेद मे यजुर्वेदक संबंध यज्ञानुष्ठान से अछि। अहि मे संकलित मंत्रक विषय यज्ञ विधिक संपादन करब अछि आ कोन यज्ञ मे कोन कांडक मंत्रक व्यवहार करबाक चाहि, ओकर विधि यजुर्वेद मे देल गेल अछि। ताहि सं वेद कर्मकांड प्रधान अछि। वर्षक गणना ते कठिन अछि, मुदा ऋष्यश्रृंग सं लगभग पांच पीढ़ी पहिने यजुर्वेदक विभाजन भऽ गेल छल, जे कृष्ण यजुर्वेद आ शुक्ल यजुर्वेदक नाम से जानल जायत अछि। अहि संबंध मे विष्णु पुराणक तृतीय अंशक अध्याय पांच मे एकटा कथा अछि। महर्षि वैशम्पायन यजुर्वेद जेहन वृक्षक सत्ताइस शाखाक रचना केने अछि। ओकरा अप्पन शिष्य के पढ़ौलक। हुनकर परम धार्मिक आ हुनकर सेवा मे तत्पर रहि बला शिष्य याज्ञवल्क्य छल। एकटा काल मे सभटा ऋषि सभ ई नियम बनौअलखिन जे कियो ऋषि महामेरु पर स्थित हमर अप्पन समाज मे शामिल नहि होयत ओकर सात राति के भीतर ब्रह्महत्याक पाप लागत। अहि तरह जाहि काल के ऋषि सभ नियत केने छल,ओकर वैशम्पायन अतिक्रमण कऽ देलक। एक बाद ओ प्रमादवश अप्पन भानजाक हत्या कऽ देलक। एकर बाद ओ अप्पन शिष्य सं बाजल, अहां सभ कोनो तरहक विचार नै कऽ हमरा लेल ब्रह्महत्याक पाप के दूर करहि बला व्रत करू। अहि पर याज्ञवल्क्य बाजल, 'भगवन! ई सभ ब्राह्मण बड़ निस्तेज अछि। हुनक कष्ट दैके कोन जरूरत अछि? हम असगरे अहि व्रत अनुष्ठान करब। अहि सं वैशम्पायन तमसा गेल। ओ बाजलखिन, अहां ई सभ ब्राह्मणक अपमान केने छी। अहां जे किछु हमरा सं पढ़ने छी,ओ छोडि़ दिओ। अहां अहि द्विज श्रेष्ठ के निस्तेज कहैत छी। हमरा अहां जेहन आज्ञा भंगकारी शिष्यक कोनो प्रयोजन नहि अछि। 'लिओ, हम जे किछु अहां से पढ़ने छी, ओकरा घुरा रहल छी'। ई कहि याज्ञवल्क्य रुधिर सं भरल मूर्तिमान यजुर्वेद वमन कऽ हुनका घुरा देलक आ स्वेच्छा सं चलि गेल। याज्ञवल्क्य के वमन करल यजुश्र्रुती के दोसर शिष्य तीतर बनिके ग्रहण कऽ लेलक। ताहि सं ई सभ तैत्तिरीय कहौलक। याज्ञवल्क्य यजुर्वेदक प्राप्तिक इच्छा सं संयम चित्त सं सूर्यनारायणक स्तुति करलक। भगवान सूर्य अश्व रूप मे प्रगट भऽ कऽ अभीष्ट वर मांगहि लेल कहलक। तखन याज्ञवल्क्य हुनका प्रणाम कऽ बाजल, अहां हमरा ओहि यजुश्र्रुतीक उपदेश दिये जे हमर गुरु नहि जानैत अछि। हुनकर एहन कहला पर सूर्य हुनका 'अयातयाम' नामक यजुश्र्रुतीक उपदेश देलक, जकरा हुनकर गुरु वैशम्पायन सेहो नहि जानैैत छल। माध्यन्दिन शाखा याज्ञवल्क्य ओहि वाज श्रुत के अप्पन कण्व आदि पंद्रह शिष्य के प्रदान करलक। ओहि मे मध्यन्दिन महर्षि द्वारा प्राप्त यजुर्वेदक विशेष शाखा के माध्यान्दिन कहल जा लागल। शुक्ल यजुर्वेदक माध्यान्दिन शाखाक मंत्र के महर्षि कात्यायन महर्षि कश्यप के, महर्षि कश्यप महर्षि विभाण्डक के आ महर्षि विभाण्डक ऋष्यश्रृंग के देलक। ऋष्यश्रृंग अहि मंत्रक प्रखर दृष्ट छल। अहि मंत्रक सं अे राजा रोमपादक एतय वृष्टि यज्ञ केने छल। ऋष्यश्रृंग अहि शाखाक मंत्रद्रष्टाक संग अहि शाखा स्वरूपक ओत-प्रोत ब्रह्मनिष्ठ छल, जाहि सं ओ जतय कत्तौ जायत छल, ते हुनकर पदार्पणक संग ओहि भूमि पर इंद्र देवता वर्षा कऽ दैत छल। वाजसेनी पुत्र याज्ञवल्क्य द्वारा नष्ट हय के कारण शुक्ल यजुर्वेदक अहि संहिताक नाम वाजसनेय संहिता पड़ल। अहि प्रकार यजुर्वेदक तैत्तरीय आ वाजसनेय अहि दोनों शाखाक निर्माण भेल। वाजसनेय संहिता मे राष्ट्रक उन्नति आ ओकर सुख-शांतिक लेल बड़ रास भावना सभ अभिव्यक्त केने अछि। 'हे पितृदेवो! नमस्कार! अहांक कृपा से वसंत ऋतु राष्ट्र के सुखी करय'। 'हे पितर नमस्कार! अहांक कृपा से देश मे ग्रीष्म अनुकूल रहय'। ऋतु सभके राष्ट्रक अनुकूल बनाबै आ जल प्रबंधन मे विशेषज्ञता प्राप्त करय बला ऋष्यश्रृंग अप्पन समय मे मंत्रक सिद्धता प्राप्त कऽ चुकल छल। बाल्मीकिक काल मे शुक्ल यजुर्वेदक बड़ प्रभाव छल। ऋष्याश्रम मे एकर गहन अध्ययन होयत छल। मुदा ओहि काल तैत्तिरीयक शिक्षालय सेहो कार्यरत छल। अयोध्यामे एहन एकटा शिक्षण संस्थानक उल्लेख वाल्मीकि केने अछि। अयोध्या काण्ड (32-15,16) मे राम लक्ष्मणक आदेश दैत अछि, लक्ष्मण! यजुर्वेदीय तैत्तरीय शाखाक अध्ययन करहि वला व्राह्मण के जे आचार्य आ संपूर्ण वेदक विद्वान अछि, संग ही जाहि मे दान प्राप्तिक योग्यता अछि आ जे माता कौशल्याक प्रति भक्तिभाव राखि प्रतिदिन हुनका लग आवि के हुनकर आशीर्वाद प्रदान करैत अछि, हुनका सवारी, दास, दासी, रेशमी वस्त्र आ जतेक धन सं व्राह्मण संतुष्ट हुयअ, ओतेक धन खजाना से दियाविओ। आश्रम व्यवस्था रामायण कालक विभिन्न ऋष्याश्रमक अध्ययन सं ई ज्ञात होयत अछि जे आश्रम मे गुरुक वाद आचार्य आ कुलपतिक गणना केल जायत छल। कुलपतिक अधीन दूर-दूर ठाम सं आयल सैकड़ों छात्र विद्याध्ययन करैत छल। श्रोत्रियक संज्ञा ओहि अध्यापक वर्ग कऽ देल जाय छल जिनकर तामसिक वृत्तिक परंपरागत वैदिक अध्ययन आ तपस्या सं शमन भऽ चुकल अछि। तापसगण तपोनिरत रहैत आ अपना लग आवहि वला के शिक्षा दैत छल। ओ वनवासी छल अ हुनकर उपदेश अरण्यक मे लिपिवद्ध अछि। उपाध्याय लोक शुल्क लऽ कऽ शास्त्र विशेष वढ़ावैत छल। ललित कलाक अध्यापक शिक्षक छल। तुंवरू अप्सराक गान-शिक्षक छल। एकर अलावा, आश्रम मे परिव्राजक सेहो रहैत छल। ओ निवृत्ति मार्गी होयत छल। ओ अवकाशक काल घूमि-घूमि कऽ निर्वेद आ वैराग्यक जीवनक सर्वोच्य ध्येयक तरहे प्रचार करैत छल। दोसर आश्रमक तरहे अहि ऋष्यश्रृंगक आश्रम मे अध्यापक के कोनो वान्हल आय नहि छल। शिष्य सं नियत शुल्क लै के प्रथाक प्रमाण नै भेटैत अछि। एतय गुरु पुरोहित सेहो होयत छल। अहि सं यज्ञ याज्ञादिकक अवसर पर दान दक्षिणा पर्याप्त भेट जायत छल। एकर अलावा, अतिरिक्त आश्रम के कृषि सं सेहो पर्याप्त आय होयत छल। आश्रमक छात्र मे तपस्वी जना त्याग आ सहिष्णुता अपेक्षित छल। स्नातक वनहि धरि हुनकर नैष्ठिक व्रह्मचर्य व्रतक पालन करव अनिवार्य छल। अहि आश्रम मे ज्ञान-विज्ञानक अजरुा धारा वहैत छल। विद्यार्थी पिता-पुत्रक परंपरा सं वरावर आवैत रहैत छल। अहि आश्रम मे कतेक रास परिवारक कतेक पीढ़ी शिक्षा प्राप्त कऽ चुकल छल। अहि आश्रम मे मुनि-शिक्षक अप्पन स्त्री (मुनि पत्नय:) आ संतान (मुनि दारका:) संग रहैत छल। प्राचीन भारतक इंद्र खंडक (पूर्वी भाग) दूटा आश्रम मिथिलाक सीरध्वज जनकाश्रम आ अंगक उत्तरवरिया भाग स्थित कज्जल वनक ऋष्यश्रृंग आश्रम तत्वक विवेचन, विश्लेषण, चिंतन, अनुसंधान आ निर्णयक लेल प्रसिद्ध छल। तहियौका भारतक सभ आश्रम मे संग्रामिकताक शिक्षा देल जायत छल। स्वयं राम वशिष्ठाश्रम सं दोसर विषयक संग संग्रामिकता मे स्नातक आ विश्वमित्रक सिद्धाश्रम से स्नातकोत्तरक शिा पायल छल। आश्रम मेे संग्रामिकताक शिक्षा शत्रु (असुर) के संहार शक्ति के चुनौती दैक लेल छात्र के देल जायत छल। जतय-जतय असुरक सैन्य छावनी छल ओतय स्थित आश्रम मे संग्रामिकताक उच्चा शिक्षा दैक व्यवस्था छल। ऋष्यश्रृंग आश्रम आसुरी गतिविधि सं दूर एकांत प्रदेश मे छल। ताहि सं अहि आश्रम मे संग्रामिकताक शिक्षाक कोनो महत्व नहि छल। यज्ञ ऋष्यश्रृंग अपने वृष्टि यज्ञक अद्वितीय आचार्य छल। अप्पन ससुर अंग नरेश रोमपादक राज्य मे कहियो अकाल नहि पड़य, एकरा लेल ओ शुक्ल यजुर्वेद संहिताक वाजसेनीय मध्यन्दिन शाखा सं कतेक रास ऋषि-मुनिकऽ साक्षी राखि सफल वृष्टि यज्ञ केने छल। वैदिक युग मे यज्ञक सवसे वेसी महत्ता छल। यज्ञ अग्नि संपन्न होयत छल। उत्तर वैदिक काल मे सेहो यज्ञक महत्व कम नहि छल। देवता आ मनुखक वीच संवंध स्थापना मे यज्ञक महत्वपूर्ण स्थान छल। उत्तर वैदिक काल धरि कतेक रास यज्ञ प्रचलित भऽ गेल छल जहि मे अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चतुर्मास्य, आग्रयण, निरूढ़, सौत्रामणी, पिण्डपितृ यज्ञ, सोम यज्ञ, षोडशी, अतिरात्र, पुरुषमेध आ पंचमहायज्ञक अलावा गवामयन, वाजपेय, राजसूय आ अश्वमेध जेहन यज्ञ तहियौका भारतीय समाज मे मान्य छल। यज्ञ आर्यक मिलन स्थल सेहो छल। ऋष्यश्रृंगाश्रम मे यज्ञक संपादनक विशेष पाठ¬क्रम छल। कज्जल वनक पुण्याश्रम वेद ध्वनि सं गुंजायमान छल। सभ्यताक समन्वय उत्तर वैदिक कल मे भगवान शिवक महत्ता वड़ वढ़ल छल। ओ युग आर्य आ आर्येतर जाइतक सम्मिलन, सम्मिश्रण आ समन्वयक युग छल। भगवान शिव आर्येतर जाइतक अराध्य देव छल। हुनका दरकिनार कऽ समन्वित आर्य सभ्यता आ संस्कृतिक गठन असंभव छल। एहन स्थिति मे युगद्रष्टा ऋषि केर भगवान शिव दिस आकृष्ट होयव स्वाभाविक छल। वैदिक रुद्र जे उपहन्तु (ध्वंसक) छल, ओ उत्तर वैदिक काल मे कल्याणकारी शिव वनि गेल। वेद मे रुद्र सं कतेक रास रुद्र के उद्भूत मानल गेल अछि, जे भगवान शिवक व्यापकता कऽ रेखांकित करैत अछि। ताहि सं अहि रुद्र के गणपति, कुम्भकार, कर्मकार, रथकार, वाजीगर आ निषाद जेहन दलित, उपेक्षित आर्येतर जाइतक स्वामीक तरहे स्वीकार करल गेल अछि। अहि तरहे भगवान शिव उपर्युक्त शोषित, दलित, उपेक्षित आ अनार्य जाइतक उपास्य आ आराध्य देव छल। तत्कालीन तत्वदर्शी ऋषि अहि आर्येतर जाइत के आर्य सभ्यता संस्कृतिक महासिन्धु मे विलीन कऽ दैक लेल संकल्पित छल। एकरा लेल ओ शिवक सामान्य देवक तरहे नहि मुदा महादेवक रूप मे पूजा करलक। अनार्यक परमपूज्य आराध्य देवता रहैत भगवान शिवक प्रतिष्ठा, महानता आ व्यापकताक कारण ई छल जे ओ अप्पन ऐश्वर्य सं देवता के, शक्ति सं असुर के आ योग सं प्राणि सभके पराभूत केने छल। ई निर्विवाद अछि जे भारतीय सभ्यता आ संस्कृतिक गठन मे भगवान शिवक विराट भूमिका अछि। जौं शिव के अहि सं अलग कऽ देल जाय ते अहि सभ्यता, संस्कृति के स्थित हेवाक लेल कोनो आधार नहि भेट सकत। ऋष्यश्रृंग आश्रमक समस्त क्षेत्र मे व्रात्यक निवास छल। अथर्ववेदक (11-2-7) अनुसार देवता सभ महादेव के विभिन्न दिशाक व्रात्यक स्वामी नियुक्त केने छल। संभवत: अहि प्रतीकक स्वरूप भगवान विष्णु एतय व्रह्मशिला पर शिवलिंगक स्थापना केने छल। वराहपुराणक उत्तराद्र्धक एकटा पुरा कथा मे अहि तथ्य कऽ रेखांकित करल गेल अछि। विष्णु द्वारा स्थापित शिवलिंग के ऋष्यश्रृंग फेर सं पुनर्जागृत करलक। एकर उल्लेख शिव पुराणक चतुर्थ रुद्र संहिताक सातम श्लोक मे भेल अछि। एकर अनुसार, कौशिकी कात स्थित शिव धाम मे दधीचिक रणभूमि मे श्रृंगेश्वर, वैद्यनाथेश्वर आ जपेश्वर नामक शिवलिंग प्रसिद्ध अछि। 'श्रृंगेश्वरश्च नाम्नावै वैद्यनाथ स्तथैव च। जप्याश्वरस्तथा ख्यातौ यो दधीचिरण स्थले।' चौवीस हजार श्लोक वाले वायु पुराणक एकटा अंश शिवपुराण अछि। ऋष्यश्रृंग द्वारा पुनर्जागृत केल जाय वला भगवान शिवक ई इष्टलिंग उत्तर वैदिक काल सं आय धरि मंत्रयुक्त, मंत्रहीन, क्रियायुक्त, क्रियाहीन, ज्ञानी, अज्ञानी सभक लेल दर्शनीय वा पूजनीय अछि। दूर ठाम धरि फैलल विशाल व्रह्मशिला सं ई इष्टलिंग जुड़ल अछि। एखुनका शिवलिंग सं तीन गुना वेसी मोट ओ दस फीट नीचा व्रह्मशिला धरि अछि। लिंगक आंतरिक स्वरूप भव्य आ अद्भुत अछि। शिव पार्वतीक असंख्य प्रतिमा ओहि पर उत्कीर्ण अछि। ऋष्यश्रृंग अहि शिवलिंग के पुनर्जागृत कऽ आर्य आ आर्येतर संस्कृति कऽ एकाकार कऽ देने छल। ऋष्यश्रृंग द्वारा एकरा पुनर्जागृत करहि के कारण ई इष्टलिंग श्रृंगेश्वरक (या सिंहेश्वर) नाम सं विख्यात भेल। दक्षिणात्यमे तपस्या उत्तर वैदिक काल धरि आर्य संपूर्ण उत्तर भारत मे पसैर चुकल छल। अे कतेक रास समृद्ध जनपदक सेहो स्थापना केलक। उत्तर भारत मे कतेक रास ऋष्यश्रृंग आश्रम स्थापित छल। कनि-कनि असुर दक्षिणापत्य दिस सिमटैत गेल। एतय मुख्यत: हुनकरे शासन छल। तकर वादो आर्य सभ्यता आ संस्कृति के दक्षिणात्य मे पसारैलक उद्देश्य सं कतेक रास ऋष्याश्रम मिशनरीक तरहे काज कऽ रहल छल। अहि ऋष्याश्रम के समय-समय पर निरीक्षण करैक दायित्व भगवान शिव पर छल। ओ अहि ठाम अवाध आवैत-जायत छल। क्याकि ओ असुर सभहक सेहो अराध्य देव छल। राम सवसे पहिलुक आर्य देवता छल जे दक्षिणात्व मे पइर राखलक। ओ एतय कार्यरत आर्य ऋष्याश्रम के असुर सं अभय कयलक। निशिचर हीन करौं मही भुज उठाय प्रण कीन्ह। उत्तर भारतक ऋषि सेहो दक्षिणात्य जा कऽ तप करैत छल। तपक लेल दक्षिणात्यक ठाम वड़ उपयुक्त चल। ऋष्यश्रृंग सेहो दक्षिणात्यक जे ठाम मे अखण्ड तपस्या केने छल ओ तप:पूत स्थल आय श्रृंगेरी क्षेत्रक नाम से चर्चित अछि। श्रृंगेरी ग्राम, श्रृंगेरी पर्वत आ श्रृंगेरी तालाव आययो ओहि महान तपस्वीक तपस्याक साक्षी अछि। हजार वरखक वाद आद्य शंकराचार्य अप्पन पहिलुक मठ श्रृंगेरी मे स्थापित केने छल आ ओतय सं दिग्विजयक लेल अप्पन अभियान शुरू केने छल। शंकराचार्य ओहि ठाम पर देखलक जे प्रकृति विरोध धर्म प्रेम, सेवा आ दयाक आगू प्राणी कोन तरह अप्पन स्वाभाविक धर्म के विसुरि के कल्याण काज मे निरत भऽ जायत छल। थाकल-मांदल योगी शंकर एकटा वटवृक्षक नीचा वैसल छल। वड़ गर्मी चल। आपसी द्वेष के विसुरि के एकटा नेवला आ सांप खेल रहल छल। ओतय सांप अप्पन आहर एकटा वेंग कपा मुंह सं पकडि़ पइन मे छोडि़ दैत छल। ओ विस्मित भऽ जायत अछि। ई ऋष्यश्रृंगक तपस्या स्थली छल, जकर महत्ता आय धरि दृष्टिगोचर होयत अछि। अे महान ऋष्यश्रृंगक प्रति श्रद्धावनत भऽ कऽ अप्पन शिष्य सं कहै छथिन, जतय व्रह्म मे अप्पन अंतकरण के लगा दै वला ऋष्यश्रृंग आय धरि तपस्या कऽ रहल अछि। आ जतय स्पर्श मात्र सं कल्याण दहि वला तुंगभद्रा सुशोभित होयत अछि, जतय अभ्यागत पुरुषक पूजा सं कल्पवृक्ष के सेहो लजावै वला, समस्त वेद कऽ पढ़य वला, सैकड़ों टा यज्ञ सं प्रसन्न हैय वला शान्तचित्त सज्जन लोक सभ निवास करैत अछि। शंकराचार्य अहि तपस्थलीक स्तुति करलक आ ओतय विद्याग्रहण मे समर्थ विद्वान शिष्य के अप्पन मुख्य भाष्यक अध्ययन सेहो करैलक। एतय सं वौद्ध के सेहो शास्त्र से पराजित कऽ सनातन धर्मक पुनस्र्थापनाक लेल दिग्विजयक लेल चलल छल शंकराचार्य। अभियानक पूर्व आचार्य शंकर श्रृंगेरी मे अप्पन पहिलुक मठ निर्माण कऽ वेदांत विद्यापीठक स्थापना कएलक। एत्ते सं सनातन धर्मक प्रचारार्थ मीमांसक व्रह्मचारीक समुदाय सन्यास सम्प्रदाय मे दीा ग्रह करैत छल। ऋष्यश्रृंग सेहो अप्पन कालक अद्वितीय मीमांसक छल। ओ ऋषि कुल आश्रम मे कतेक ऋषिक आत्मज आ मानस पुत्र के मीमांसाक अध्ययन करावैत रहल। श्रृंगवेरपुर वृतान्त ऋष्यश्रृंग अप्पन प्रताप सं उत्तर पश्चिम गंगाक वाम कात पर सेहो तपस्या करले छल। ई ठाम निषाद शासकक अधीन छल। आजुक काल मे ई ठाम इलाहावाद-उन्नाव राजमार्ग पर स्थित अछि। एतय गंगा कात पर एकटा वड़ पैग टील अछि जकर लगभग आधा हिस्सा गंगा मे कटि चुकल अछि। यहि ठाम अछि ऋष्यश्रृंगक तपोभूमि श्रृंगवेरपुर। एतय मंदिर मे ऋष्यश्रृंग आ मां शान्ताक भव्य मूर्ति स्थापित अछि। रामायण मे श्रृंगवेरपुरक वड़ महत्व अछि। अप्पन वनवासक काल श्रीराम अप्पन अनुज आ स्त्रीक संग एतय नाव सं गंगा पार केने छल। पुरवासी सभक संग भरत जखन राम मे मिलैक लेल चित्रकूट गेल छल, तखन ओ श्रृंगवेरपुर आयल छल। कालिदासक रघुवंश आ भवभूतिक उत्तर रामचरित मे अहि पुण्य स्थलक गौरवपूर्ण उल्लेख अछि। तुलसीदास एकर सिंगरौरक प्राचीन नाम सं उल्लेख केने अछि- 'केवट कीन्ह वहुत सेवकाई सो जामिनी सिंगरौर गंवाई।' ई ठाम ऋष्यश्रृंगक तपस्या भूमि अछि। ऋष्यश्रृंग मंदिर सं आध किमी दूर गंगा मे विभाण्डक कुण्डक नाम सं घाट सेहोवनल अछि। श्रृंगवेरपुर निवासी राजा रामदत्त सिंह (18वीं सदी) आध्यात्म-रामायणक टीक मे एतय ऋष्यश्रृंग आश्रम हेवाक संग अहि महर्षिक जीवनक अन्यान्य वृतान्त के अहि ठाम सं जोड़वाक यत्न केने अछि। हमर विचार सं अप्पन जन्मभूमिक प्रति मोह हेवाक कारण राजा एहन केने होयत। श्रृंगवेरपुर के ऋष्यश्रृंगक जन्मभूमि मानवाक एतिहासिक भूल अछि क्याकि महाभारत मे स्पष्ट लिखल अछि- 'एषा देवनदी पुण्या कौशिकी भरतर्षभ विश्वामित्राश्रमौ रम्य एश चात्र प्रकाशते। आश्रमश्चैव पुण्याख्य: काश्यपस्य महात्मन:। ऋष्यश्रृंग सुतौ तस्य तपस्वी संयतेन्द्रिय:।' कौशिकीक कात पर जतय विश्वामित्रक आश्रम छल, ओतय पुण्याश्रम मे महर्षि काश्यपक जितेन्द्रिय वंशज ऋष्यश्रृंगक आश्रम छल। एक ऋषिक अप्पन मुख्य आश्रमक अलावा कतेक ठाम हुनकर उपआश्रम होयत छल। पुण्याश्रम मे द्वादश वर्षीय यज्ञ ऋष्यश्रृंगक मुख्य आश्रम कौशिकीक कात पर पुण्याश्रम मे छल। ओ जतय-जतय तप करलक ओतय उपाश्रम वनौलक। ओ अप्पन जीवन मे कठिन तप आ योग साधनाक संग यज्ञ के मोक्ष प्राप्तिक साधना वनैलक। ओ समस्त भारतक पवित्र स्थलक सेहो भ्रमण केलक। ओ कतेक रास कठिनतम यज्ञ केलक, जाहि मे द्वादश वर्षीय यज्ञ सेहो छल। अहि यज्ञक वड़ पैग मार्मिक वर्णन भवभूति अप्पन उत्तर रामचरितक प्रथमांक मे केने अछि। अयोध्या मे सभ दिन कोनो नै कोने उत्सव हैत छल। अहि वीच एकटा विदेशी अयोध्या आवैत छल आ राजधानी मे उत्सव नै हैत देखि के एकर कारण जानैल चाहैत अछि। नट एकर उत्तर दैत अछि जे उत्सव नै हैक कारण अछि जे रामक माता महर्षि वशिष्ठक स्त्री अरुन्धतीक संग अप्पन दामाद ऋष्यश्रृंगक आश्रम मे यज्ञ देखहि लेल गेल छथिन। 'वशिष्ठाधिष्ठिता देव्यो गता रामस्य मातर:। अरुन्धती पुरस्कृष्य यज्ञे जामातुराश्रमम्।' ई सुनि के ओ विदेशीक प्रश्नाकुलता आरो वढि़ जायत अछि। ओ पूछि दैत अछि जे ई जमाता के अछि? नट उत्तर दैत अछि जे राजा दशरथक पुत्री शान्ताक पति अछि ऋष्यश्रृंग, हुनके कते हैवला यज्ञ मे भाग लैक लेल रामक माता सव गेल छथिन। 'विभाण्डक सुतास्ताम ऋष्यश्रृंग उपयेमे तेन च साम्प्रतं द्वादश वार्षिक सत्र माख्यं। तदपुरोधात कठोर गर्भापति वधूं जानकी विमुप्य गुरुजनस्तत्र: गत:।' ई स्पष्ट अछि जे रामक माता ऋष्यश्रृंग के अप्पन जमाता मानैत अछि। यहि कारण अछि जे गर्भवत सीता के छोडि़ के अप्पन पुत्री शान्ता आ जमाता ऋष्यश्रृंगक प्रति अकूत स्नेहक कारण माता ऋष्यश्रृंगक अश्रम मे पधारैत अछि। मुनि अष्टावक्र सेहो यज्ञ मे उपस्थित छल। ओ अहि महान यज्ञक समाचार लऽ कऽ पहिने अयोध्या घुरैत अछि। राम शान्ता के अप्पन पैग वहीन आ ऋष्यश्रृंग के अप्पन पैग वहनोई जेहन सम्मान दैत यज्ञ कऽ लऽ कऽ पूछैत अछि 'निर्विघ्न: सोमपीथी आवुंते मे भगवान ऋष्यश्रृंग आर्या च शान्ता।।' राम ऋष्यश्रृंग के आवुंत (वहनोई) आ भगवान (पैग) आ शान्ता के पैग वहीन (आर्या) जेहन सम्मान दैत अछि। सीता सेहो कुशल पूछैत अछि, ‘अवि कुशलं स जमातु अस्स।‘ एतवे टा नै सीता के ईहो जिज्ञासा अछि जे ऋष्यश्रृंग के हुनकर याद आवैत अछि की नै? ‘अहमेव सुमरेति?’ अष्टावक्र एकर उत्तर त्वरित दैत अछि. ‘अथ किम्? ‘(आओर की?) मुुनि अष्टावक्र सीताक लेल हुनकर ननद शान्ता के ई प्यार भरल संदेश सेहो राम के दैत अछि जे सीताक गर्भावस्थाक काल जहि वस्तुक इच्छा हुए, ओ हुनका उपलव्ध कराओल जाय। गर्भ दोधेअस्या भवति सोऽवस्यम चिरात सम्पादयित्व। एकर संगे अष्टावक्र सं संदेश भेजकऽ ऋष्यश्रृंग सलहज के यज्ञ मे नहि वजावैक कारण वुझावैक संग संवोधोचित परिहास सेहो कऽ लैत अछि वत्से! कठोर गर्भेति नानितासि। वत्सोऽपि रामभद्रस द्विनोदार्थमेव स्थापित:। तत्पुत्र पूर्णोत्संगामायुष्यति दक्ष्याम्। अर्थात वत्से! (वच्ची) गर्भवती हेवाक कारण अहां एतय नहि आवि सकलहुं आ वत्स राम ते अहांक मनोरंजनक लेल अयोध्यामे अछियै। हम ते अहां के पुत्र सं भरल गोदवाली देखव। ऋष्यश्रृंग द्वारा राम के वत्स आ सीता के वत्से कहिके पुरारव सं स्पष्ट अछि जे दूनूक प्रति ऋष्यश्रृंगक छोट साढ़ आ सलहजक प्रेम छल। ई द्वादश वर्षीय महायज्ञ कौशिकी तट स्थित ऋष्यश्रृंगक मूल आश्रम मे भेल छल। किछु विद्वान एकरा रेवा नदी (नर्मदा) आ समुद्रक संगम स्थल पर हय के गप करैत अछि। जे संदिग्ध अछि। ओहि साधन विहीन युग मे अप्पन मूल आश्रम सं हजार मील दूर एतेक वृहद दीर्घकालीन कठिन यज्ञक संपादन करव उपयुक्त नहि जानि पड़ैत अछि। ओहि ठाम पर अहि यज्ञक कोनो चिह्न सेहो नहि अछि। कोनो ठोस वहिर्साक्ष्य सेहो नहि अछि जे सिद्ध कृ सकय जे यज्ञ अमुक ठाम पर भेल छल। मुदा ऋष्यश्रृंगक कौशिकी तट स्थित मूल आश्रम अहि महान यज्ञक साक्षी अछि। आश्रमक लग कोशीक कात मे सतोखर गाम वसल अछि। एतय हजारों वरख पुरान सात विशाल यज्ञ कुण्ड तालावक रूप में एखनो अछि। दू टा कुंड ते कोशी के पेट मे चलि गेल मुदा पांच टा एखनो अछि। किछु दशक पहिने अहि कुंडक जीर्णोद्धार करय लेल खोदल गेल ते ओहि मे राखक वड़ मोट-मोट परत निकलल छल। परत एतेक मोट छल जे ओ कोनो एक दिन या एक माहक यज्ञक राख नहि भऽ सकैत अछि। ई निश्चित रूप सं वरख भरि चलल यज्ञक राख होयत। सात कुंड एक संग रहवाक कारण एकरा सप्त पुष्कर कहल जायत छल। कुंड पुष्करेक रूप छल। वहि सप्त पुष्कर आव सतोखर वनि गेल अछि। ऋष्यश्रृंग जेहन महान वैज्ञानिक द्वारा संपादित अहि तरहक यज्ञ कतेक अर्थ मे महत्वपूर्ण अछि। ई आैषधिक अनुसंधान, शोध आ परीक्षण सेहो अप्पन यज्ञशाला मे करैत छल। आयुर्वेदिक गुण सं युक्त समिधाक चयन आ प्रयोग, वनस्पतिक गुण-दोष विवेचन आ हुनकर व्यवहारक गवेषणात्मक अध्ययनक लेल अहि ठामक अतिरिक्त आैरो ठाम ओ एहि तरहक महान यज्ञ करने होयत ते ऋष्यश्रृंग जेहन महान याज्ञिकक लेल असंभव नै। मुदा सभी कोण सं परीक्षणक पश्चात ई निर्विवाद अछि जे ओ ऋष्यश्रृंग आश्रम (वर्तमान सिंहेश्वर) मे द्वादश वर्षीय यज्ञ केने छल, जाहि मे आर्यावर्तक सभ ऋषि-मुनि भाग लेने छल। संगेसंग अयोध्या सं रामक माता, वशिष्ठक स्त्री अरुन्धतीक संग यज्ञ मे भाग लैक लेल आयल छल। वारह वरख तक अनवरत ई क्षेत्र वेदमंत्रक समूह गान सं गूंजैत रहल छल। महानदीक प्रगट हेवाक प्राकृतिक जल रुाोत के सुव्यवस्थित कऽ ओहि सं सिचार्ईक व्यवस्था करहि मे ऋष्यश्रृंग सिद्धहस्त छल। एखुनका छत्तीसगढ़क सिहोवा मे महानदीक उद्गम अछि। ऋष्यश्रृंग सं पहिने अहि नदीक अस्तित्व नहि छल। विशाल पत्थर सं झांपल उद्गम के भगीरथक प्रयास सं ई ऋषि नदी मे अवतरित केने छल। परीक्षण सं हुनका ज्ञात भेल जे सिहोवाक शिला मे अगाध जल रुाोत अछि। जौ जल रुाोतक निकासी आ वहाव सुव्यवस्थित कऽ देल जाय, ते ई एकटा वड़ पैग नदीक रूप लऽ सकैत अछि। ऋष्यश्रृंग एहने करलक। ओ लोककल्याण, लोक रंजन आ लोक मंगलक लेल जनसहयोग सं अहि दुष्कर काजक संपादन करलक। अहि प्रकार महानदी प्रकट भेल। किंवदंति ते ई अछि जे हुनकर कमंडल मे पुत्रेष्ठि यज्ञक वचल मंत्रसिक्त जल छल। ओहि से ऋष्यश्रृंग महानदीके प्रगट केलक। कथा जे भी हिए, सिहोवा एखुनका रायपुर जिला मे अचि। ई दण्डकारण्य क्षेत्रक प्रमुख स्थान अछि। सिहोवा पर्वत शिखर पर ऋष्यश्रृंगक मंदिर अछि आ माता शान्ताक नाम पर एकटा गुफा सेहो अछि। प्राकृतिक वातावरण सं संपन्न ई एकटा दर्शनीय स्थल अछि। महानदीक उद्गमक रमणीयता ते अकथनीय अछि। मध्य प्रदेश मे चांदा (चन्दनपुर) मे सांदक या भाण्डक आश्रम अछि जे विभाण्डकक विगड़ल रूप अछि। सोयतकलां (शाजापुर) मे ऋष्यश्रृंगक मंदिर सेहो अछि। वेहट (जिला ग्वालियर) ऋष्यश्रृंग गुफा मे हुनकर मूर्ति स्थापित अछि। उज्जैन मे सेहो ऋष्यश्रृंगक आश्रम अछि, जतय वर्षाक लेल हुनकर मूर्ति वनाके अनुष्ठान केल जायत अछि। वंश विस्तार ऋष्यश्रृंगक वंश विस्तार सेहो भेल अछि। हुनकर पुत्र सारंग ऋषि छल। ओ वड़ तपोनिष्ठ छल। ओ वेदक गहन अध्ययन केने छल। हुनकर चारि टा पुत्र भेल। चारो पुत्र उग्र, वाम, भीम आ वामदेव आजन्म व्रह्मचर्य व्रत धारण कऽ योग साधनारत भऽ कऽ व्रह्म मे लीन भऽ गेल। शेष चारि पुत्र वत्स, धौम्यदेव, वेददृग आ वेदवाहु व्रह्मचर्य पूर्वक गृहस्थ आश्रम मे प्रवेश कयलक। हुनकर वंशज शिखवाल (श्रृंगीवाल) व्राह्म अछि, जे संपूर्ण देश मे पसरल अछि। ओ समृद्ध, विद्यानुरागी आ उत्कृष्ट समाजसेवी अछि। वेदवेत्ता सारंगक पुत्र वत्सक वंश मे मीमांस शास्त्रक रचयिता जैमिनी भेल। ओना ऋष्यश्रृंग वैदिक कर्मकाण्ड आ याज्ञकर्म मे विशेष दक्ष छल। मुदा अहि ऋषिराजक पश्चात व्राह्मण ग्रंथ आ उपनिषदक रचनाकाल मे ऋषि सभ द्वारा जीव व्रह्म संवंधी विशेष चिंतन मनन अन्वेषण करैत रहय सं वैदिक यज्ञादि परंपरा मे विकृति आ विभिन्नता आवि गेल। तखन महर्षि जैमिनी यज्ञ मे पूर्ववत एकरूपता आनय के उद्देश्य सं वेदक प्रमाणक मुताविक, यज्ञक निरूपण आ प्रतिपादन करैत यज्ञादि कर्मक सार्थक विवेचन करलक। अप्पन कामनाक पूर्तिक लेल विधिवत यज्ञ करव जैमिनीक अनुसार धर्म अछि। ताहि सं ओ मीमांसाक दर्शन आरंभ अथातो धर्म जिज्ञासा सूत्र सं केने अछि। ओना तै वैदिक कर्मकाण्डक विधान मे तहियौका विरोधक निवारण आ वैदिक उक्तिक अर्थक समुचित निरूपण दिस श्रुतिकाल मे ऋषि सभहक ध्यान गेल छल जकर प्रमाण वैदिक संहिता मे प्रयुक्त मीमांस आदि संज्ञा पद सं भेटैत अछि। ई दर्शन कर्म पर विशेष वल दैत अछि आ वेदक अपौरुषेय आ नित्य मानैत अछि। एकर साहित्य संपत्ति सेहो विशाल अछि। पाचम परिच्छेद ऋष्यश्रृंगक समकालीन दोसर चर्चित ऋष्याश्रम रामायणकालक शिखर पुरुख छल ऋष्यश्रृंग। हुनकर आश्रम विद्याक स्थायी केंद्र छल। एकर अलावा पूरे देश सेहो आश्रम सं भरल-पुरल छल। ओहि मे ज्ञान-विज्ञानक अजस्त्र मंदाकिनी प्रवाहित छल। रामायण काल आसुरी शक्ति पर आर्यक विजयक जुग छल। ई विजय अस्त्र-शस्त्र सं संभव नै छल। अहि काल मे आर्यावर्त छोट-छोट राज्य मे वंटल छल। सव राज्य स्वतंत्र छल आ सभहक अप्पन पृथक सेना छल। महर्षि वनहि सं पहिने विश्वामित्र लग सेहो चतुरंगिणी सेना छल। सेना मे हाथी, घोड़ा, रथ, पैदल सभ चल। चित्रकूट यात्राक काल भारतक अक्षौहिणी सेना मे नौ हजार हाथी, साठ हजार रथ, दोसर-दोसर आयुधधारी असंख्य धनुर्धर आ एक लाख अश्वारोही सैनिक छल। अहि तरहे रामायणकाल शस्त्र परिचालनक युग छल। अहि कारण देश मे पसरल प्राय: सभटा आश्रम मे सैन्य शिक्षा, आयुध परिचालन, शोध आ निर्मणक शिक्षा अनिवार्य छल। सिद्धाश्रम, भारद्वाजाश्रम, अगस्त्याश्रम, सुतीक्षण आश्रम, वाल्मीकि आश्रम, वशिष्ठ आश्रम आदि मे संग्रामिकताक शिक्षाक भरपूर प्रवंध छल। आर्य सभ्यता आ संस्कृतिक समूल नष्ट करहिक लेल रावण मलद, करुष आ जनस्थान मे अप्पन विशाल सैन्य छावनी वनैने छल। अहि स्थान मे आर्य ऋषि-महर्षिक वड़ पैग-पैग आश्रम छल जतय रहि के विद्यार्थी सव तरहक शिक्षा आ व्यावहारिक ज्ञान ग्रहण करैत छल। विश्वामित्रक सिद्धाश्रम आ अगस्त्याश्रम मे जखैन कहियो अध्ययन, चिंतन-मनन, अनुसंधान आ यज्ञादि क्रिया होयत छल, तखैन आसुरी छावनी मे तैनात सेना विघ्न उपस्थित करैत छल। ई राक्षस वलवान आ युद्ध कला मे निपुण छल। स्वयं विश्वामित्र एकरा दशरथक आगू स्वीकार केने छल- मारीचश्च सुवाहुश्च वीर्यवन्तौ सुशिक्षितौ रामायण वालकांड 20/5 एहन वलवान राक्षसक संहारक लेल सिद्धाश्रम मे गहन शोध कऽ निर्माण करल गेल दूटा विद्या उल्लेखनीय अछि। ई दूटा विद्या सभ तरहक ज्ञानक जननी छल। वला आ अतिवला, एकर प्रभाव सं भूख-प्यासक कष्ट नहि होयत छल। राम पहिने आचमन करि के अपना के पवित्र केलक आ फेर महर्षि विश्वामित्र सं अहि दूनू विद्या के ग्रहण करलक। अहि प्रकार कतेक रास रहस्यमई विद्या सेहो आश्रम मे सृजित केल जायत छल। आश्रमक वायुमंडल वैदिक मंत्रक घोष सं गुंजायमान रहैत छल। ई वैदिक मंत्रक पूर्ण फल प्राप्त करहि के लेल एकरा शास्त्रानुसार यथा स्वर पढ़हि के विधान छल। अर्जित ज्ञात कतो शिथिल या विस्मृत न भऽ जाय, एकरा लेल प्राचीन शिक्षाविद दैनिक स्वाध्याय आ अभ्यास प्रणाली निकाललक। स्वाध्याय के अपने मे स्वयं शिक्षण विधि करव वेसी उपयुक्त अछि। मुनि कुमार ऋष्यश्रृंग छात्र जीवन मे पितृ सेवा आ स्वाध्याय मे एत्ते निमग्न रहैत छल जे हुनक मे काम चेतनाक उदय नहि भेल। स्नातक मे सामाजिक कत्र्तव्यक पालन करावैक लेल तत्कालीन शिक्षाविद ऋणानि त्रीणि केर सिद्धांतक प्रतिपादन केलक, जकर समाज मे महत्वपूर्ण ठाम अछि। एकर मुताविक, संसार मे जन्म लय वला सभ लोक पर देव ऋण, ऋषि ऋण आ पितृ ऋणक भार आवि जायत अछि। यज्ञक अनुष्ठान, शास्त्रक स्वाध्याय आ संतानोत्पादन सं मनुख अहि सभ ऋण सं मुक्त भऽ सकैत अछि। स्नातक सभ मे पवित्र सामाजिक उत्तरदायित्वक भावना उत्पन्न करहि के लेल ई सिद्धांत वड़ उपादेय छल। ऋष्यश्रृंगक काल मे दोसर जे महत्वपूर्ण आश्रम आर्यायर्त मे संचालित छल, ओकर संक्षिप्त परिचय एना अछि- सिद्धाश्रम मलद प्रदेश मे आधुनिक वक्सर लग विश्वामित्रक ई चर्चित आश्रम छल। एकरा महाश्रम सेहो कहल जायत अछि। एतय छात्र सभके अलग-अलग तरहक अस्त्र-शस्त्रक शिक्षा देल जायत छल। एतय नव-नव अस्त्र-शस्त्रक अविष्कार आ ओकर परीक्षण सेहो करल जायत छल। आर्य सभ्यता-संस्कृतिक ई पूर्वी केंद्र छल। रावण जेहन महाप्रतापी सम्राट सेहो अहि महाश्रम सं सदिक्खन डरल रहैत छल। यहि कारण छल जे ओ एकटा सैनिक छावनी एतय वनैले छल जे मारीच, सुवाहु, ताड़का जेहन महाभट सं संचालित होयत छल। करुष मलदक स्त्री सेहो वड़ वहादुर आ साहसी होयत छल। विश्वामित्र भगवान राम के एतय सैनिक शिक्षा देने छल। संगेसंग ओ कतेक रास नव आ परंपरागत पचपन दुर्लभ अस्त्र देलक आ हुनकर प्रयोग करहि के विधि वतौलक। कोशी तट पर सेहो हुनकर तपस्या स्थल छल। एतय ओ एतेक कठिन तपस्या केने छल, जाहि सं सृष्टिक मूल चक्र धरि हिल उठल छल। ओ कोशी तट पर पइन माइट आ वातावरणक अनुसार चीना, मडुआ, खेरही जेहन अनाज आ भैंस जेहन पशुक विकास करलक। ओ अप्पन कालक प्रख्यात कृषि आ पशु वैज्ञानिक सेहो छल। उत्तर वैदिक काल मे आर्यक वीच ई विवाद भऽ गेल जे विजित दस्यु कऽ की करल जाय? जौ ओकर वध करल जाय ते आर्यक सेवा चाकरी के करत? जौं ओकर जीवित राखल जाय ते समाज मे ओकर की पद होयत आ दासी-पुत्रक कुटुम्व मे कोन स्थान होयत? ई विवाद युद्धक रूप लऽ लेलक। शास्त्रक अनुसार, वशिष्ठ आ विश्वामित्र मे अहि समस्याक लऽ कऽ विरोधभाव वढि़ गेल। वशिष्ठ रक्त शुद्धिक पक्षधर छल आ विश्वामित्र दस्यु सभ के आर्य वनावैल चाहैत छल। विश्वामित्रक अनुसार, आर्यत्व जन्म सं नै गायत्र मंत्रक जप सं शुद्ध भऽ कऽ सत्य आ ऋत सं प्रेरित भऽ कऽ यज्ञोपवीत धारण करहि सं ओकर शुद्धि होयत अछि। कोनो मनुख अहि प्रकार सं नया जन्म ग्रहण कऽ सकैत अछि। द्विज वनि के आर्य भऽ जायत अछि। तहियौका समाज मे ई उदारवादी रीति वहि सिखैने अछि। अहि तरहे तहियौक भारतीय समाज संरचना मे विश्वामित्रक वड़ पैग योगदान अछि। ई हुनकर कौशिकी तटक चिंतन-साधनक प्रतिफल अछि। राजा जनकक आश्रम महर्षि याज्ञवल्क्य अहि आश्रमक आचार्य छल। ई मिथिलाक विद्वान नरेश सीरध्वज जनकक देख-रेख मे संचालित होयत छल। एतय जागतिक रहस्य, जीवनक विभिन्न जटिल गुत्थी, जीवन-मरणक समस्याक समाधान आ ज्ञान-विज्ञानक तत्व के सार्थक अन्वेषण करल जायत छल। अहि आश्रमक नाम एतेक पसैर गेल छल जे मिथिलाक अमराई के संचालित गौतम आश्रम फीका छल। भारद्वाज आश्रम ई आश्रम प्रयाग मे छल। एकरा विश्वविद्यालयक मान्यता प्राप्त छल। ई सर्वशक्ति आ साधन संपन्न आश्रम छल। श्रीराम के मना कऽ भरत सदलवल फेर सं अयोध्या लऽ जाय के लेल चित्रकूटक वाट मे प्रयागक भारद्वाज आश्रम मे एक रात्रि निवास केने छल। वाल्मीकीय रामायणक अयोध्याकण्डक अध्याय 89-90 मे एकर वर्णन अछि। ई स्वागत वृतांत सं पत चलैत अछि जे ई आश्रम कतेक साधन संपन्न छल। भारद्वाज विश्वकर्मा, इंद्र, यम, वरुण, कुवेर, पृथ्वी, आकाश, नदी, देव, गंधर्व, अप्सरा, चित्ररथ वन (जेकर गाछ अलंकार सं लदल अछि), उत्तम अन्न, भक्ष्य, भोज्य, लेह्य आ चोष्यक प्रचुर मात्रा मे व्यवस्था करैत भगवान सोम आदि देवताक आह्वान कयलक आ देवता सभ हुनकर आदेशानुसार भरत केर स्वागतक सभ व्यवस्था कयलक। एतवे टा नै, हुनकर योगवल सं मलय अ दर्दुर नामक पर्वतक सुगंध युक्त शीतल हवा सभ लोकक थकान ह लेलक। आमंत्रित नदी मे मैरेय भरि गेल। सैनिक छक कए एकर रस पान केलक। पांच योजन धरि समतल धरती पर नीलम आ वैदुर्य मणिक समान कतेक तरहक कोमल घास उगि गेल। आश्रम मे वेल, कैथ, कटहल, आंवला, विजौरा आ आमक घना वृक्ष छल। चारि-चारि कोठली सं युक्त असंख्य चवूतरा छल। हाथी, घोड़ाक राखहिके लेल अलग शाला छल। राजपरिवारक लेल सुनर द्वार युक्त दिव्य भवन छल। एतय सव तरहक दिव्य रस, दिव्य भोजन आ दिव्य वस्त्र छल। भरतक लेल कतेक प्रकारक रत्न सं सज्जित महल छल। अतिथिक स्वागत लेल हजार दिव्यांगनाएं छल। एतय अप्सराक नृत्य आ गीत चलि रहल छल। सभ लोक भरपेट मन जोगर भोजन केलक आ छककय मैरेय केर पान केलक। अप्सराक संयोग पावि के भरतक सैनिक हम अयोध्या नहि घुरव, अहि दण्डकारण्य मे रहव, जेहन परस्पर गप करि रहल छल। मृग, मोर अ मुर्गाक मांसक संग मदिरापान कऽ सैनिक झूमि रहल छल। आजवाइन मिलाकऽ वनाओल गेल, वराही कंद सं तैयार करल गेल आ आम आदि फल के गरम करल रस मे पकाओल गेल उत्तमोत्तम व्यंजनक संग्रह, सुगंधमय रसवला दाल आ श्वेत रंगक भात सं भरल सहस्त्र स्वर्ण आदि केर पात्र ओतय सभ दिस राखल छल, जेकरा फूलक ध्वजा सं सजाओल गेल छल। भरतक संग आयल सभ लोक हुनका आश्चर्यचकित भऽ के देखलक। आश्रम मे सहस्त्र सोना के अन्न पात्र, लाख व्यंजन पात्र आ एक अरव थाली संग्रहित छल। सात-आठ तरुणी स्त्री मिलकऽ एक-एक पुरुख के नदीक मनोहर तट पर उवटन लग के नहावैत छल। पैग-पैग आंखि वाली रमणी अतिथि सभ के पैर दवावैक लेल आयल छल। ओ हुनकर भीजल अंग के सूखल वस्त्र सं पोछि के वस्त्र धारण कराकऽ हुनक स्वादिष्ट पेय पियावैत छल। महर्षि भारद्वाज द्वारा सेना सहित भरत के करल गेल ई अनिर्वचनीय आतिथ्य सत्कार अद्भुत आ स्वप्नक समान छल। अहि वृतांत सं ई पत चलैत अछि जे ई आश्रम कतेक समृद्ध आ साधन संपन्न छल। सैनिक शिक्षाक उद्देश्य सं ई आश्रम वनल छल, एहन प्रतीत होयत अछि। अगस्त्याश्रम नासिक सं 36 किलोमीटर दक्षिण पूर्व वर्तमान अगस्तिपुर मे ई आश्रम छल। एकर कुलपति महर्षि अगस्त्य छल। ई सैनिक शिक्षा, आयुध-अनुसंधान आ व्रह्म विद्याक केंद्र छल। ई क्षेत्र जनस्थान कहल जायत अछि। महर्षि अगस्तक आश्रम ते ओहि युग मे भय आ आदरक सम्मानित छल। अहि आश्रम मे एतेक विध्वंसक शस्त्र-अस्त्र तैयार होयत छल जहि सं राक्षसराज रावणक ह्मदय मे सदिक्खन आतंक वनल रहैत छल। रावण अहि डर सं ओतय अप्पन पैग सैनिक छावन कायम कऽ देने छल। राम रावणक वध पैतामह नामक अस्त्र सं केने छल। महर्षि अगस्त्य अप्पन आश्रम मे रावण-वधक लेल एकर अविष्कार केने छल। भगवान राम के ओ अहि उद्देश्य सं हुनका भेंट केने छल। पैतामह अस्त्र मे पहाड़ के वेधय के शक्ति छल। एकर अतिरिक्त अगस्त्य राम के हीरा आ सुवर्ण जड़ल दिव्य धनुष, सूर्यक समान देदीप्यमान अमोघ वाण, तीक्ष्ण आ प्रज्जवलित अग्निक समान वाण सं सदिक्खन भरल रहि वला अक्षय तरकस आ सोनाक म्यान आ सोनाक मूठ वला तलवार भेंट दऽ कऽ राक्षस केर संहारक लेल आह्वान केने छल। अगस्त्य आश्रम मे ज्ञानक विभिन्न विभाग छल। व्रह्म थान, अग्नि थान, विष्णु थान, महेंद्र थान, विवस्वान थान, वायु थान, वारुण थान प्रभृति। व्रह्म थान मे वेदक अध्ययन होयत छल। अग्नि थाम मे साम गान होयत छल। एतय मंत्रोच्चारणक संग समिधा आहूत होयत छल। विष्णु थान मे राजनीति, अर्थाशास्त्र, पशुपालन, आक्रमणकारी आ रक्षणशील आयुधक ज्ञान प्रदान करल जायत छल। विवस्थान थान मे ज्योतिषक पढ़ाय होयत छल। चिकित्सा विज्ञान सेहो एतय पढ़ौओल जायत छल। गरुड़ थान मे यातायात, यान आदि के ज्ञान उपलव्ध होयत छल। कार्तिकेय थान मे व्रह्मचारी गुल्म,पत्ति, वाहिनी आदिक संचालनक शिक्षा प्राप्त करैत छल। कौवेर थान मे जल संतरण, पोत संचालन आदि केर शिक्षा देल जायत छल। महर्षि अत्रि आश्रम ई आश्रम चित्रकूटक दक्षिण मे संचालित छल। ई तहियौका आर्य सभ्यताक मुख्य केंद्र छल। हस्तशिल्प कला मे ई अग्रणी छल। वनवास काल मे महर्षि अत्रिक स्त्री अनुसूइया सीताजी के एहन दिव्य वस्त्र आ आभूषण पहिनेने छल जे नित्य नवीन, निर्मल आ सुहावना वनल रहैत छल। संगेसंग ओ सीताजी के पतिव्रत धर्मक सेहो शिक्षा देने छल। वाल्मीकि आश्रमक संवंध मे इतिहासकार मे मत अलग-अलग अचि। ई तमसाक तट पर स्थित छल। ई विश्वविद्यालय अप्पन काल मे शिक्षाक महान केंद्र छल। महाकवि भवभूतिक अनुसार, एतय छात्रा सभ सेहो अध्ययन करैत छल। एतय अलग-अलग शास्त्रक संग शस्त्र/अस्त्रक सेहो शिक्षा देल जायत छल। एकर प्रमाण स्वयं रामक पुत्र लव-कुश छल। वशिष्ठ आश्रम अयोध्या मे स्थित छल, जतय भगवान राम शिक्षा पाओल। गुरु गृह गये पढ़न रघुराई, अल्पकल विद्या सव पाई। रामचरितमानस, वालकाण्ड महर्षि वशिष्ठक दोसर आश्रम हिमालयक तलहटी मे सेहो छल, जकर वर्णन रघुवंश नामक महाकाव्य मे कालिदास केने अछि। अहि आश्रम मे छात्र संघ सेहो छल, जकर वाल्मीकि मेखलीना महासंघा कहि के उल्लेख केने अछि। अहि संघक राजसभा मे सेहो प्रभाव छल। नैमिषारण्य मे महर्षि शौनक के सेहो चर्चित आश्रम छल। एतौका अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी सभ वड़ प्रसिद्ध छल। अहि मे धार्मिक, राजनीतिक आ वैज्ञानिक विचार पर संवाद होयत छल। एकर अलावा, महर्षि सुतीक्ष्ण, महर्षि शरभंग, महर्षि मतंग आ महर्षि जावालिक आश्रम शिक्षाक प्रमुख केंद्र छल। छठम परिच्छेद ऋष्यश्रृंगक श्रृंगेश्वर (सिंहेश्वर) विहार राज्यक जिला मुख्यालय मधेपुराक रेलवे स्टेशन दौरम मधेपुरा कहलावैत अछि। एतय सं आठ किलोमीटर उत्तर ऋष्यश्रृंगक श्रृंगेश्वर आव सिंघेश्वर या सिंहेश्वर थानक नाम सं प्रसिद्ध अछि। लगभग दू सौ वरख पहिने हरिचरण चौधरी नामक एकटा लकड़ीक व्यवसायी कोशीक जलमार्ग सं नेपाल सं लकड़ी आनि के व्यवसाय करैत छल। एक वेर हुनका व्यवसाय मे वेसी लाभ भेल। ओ शिवभक्त व्यवसायी श्रृंगेश्वर नाथ (सिंहेश्वर नाथ) केर एकटा भव्य मंदिर वनैलक। जखन भागलपुर केर जिला आ सत्र न्यायाधीश केर एतय क्षेत्रीय सनातन धर्मी वनाम पंडागण (जय नारायण ठाकुर आ 13 अन्य) वाद संख्या 3/1937 चलि रहल छल, ओहि सिलसिला मे हरिचरण चौधरी के पैंसठ वर्षीय प्रपौत्र दरवारी चौधरी अप्पन गवाही मे वाजल छल जे वर्तमान मंदिरक पूव भरि दीवाल पर स्वयं हरिचरण चौधरी, पश्चिम भरि दीवाल पर लालजी चौधरी आ उत्तर भरि दीवाल पर शिवू चौधरी के चित्र अंकित अछि। अहि तथ्यक पुष्टि ओ अप्पन साक्ष्य मे केने छल। ताहि सं कतिपय स्थानीय वुद्धिजीवी द्वारा मंदिर मे उत्कीर्ण अहि चित्र के वुद्ध आ दोसर वौद्ध भिक्षु केर मानव सरासर भूल अछि। ऋष्यश्रृंगक जन्मभूमि आ कर्मभूमि हेवाक कारण अहि क्षेत्रक प्राचीन महत्व अछि। एतय के कण-कण मे ऋष्यश्रृंग एखनो रमैत अछि। एतय के माटि अहि ऋषिराजक यज्ञाग्निक वुझल भस्म अछि। ताहि सं नदी सं आच्छादित ई क्षेत्र वड़ उर्वर अछि। एकर प्राचीनता के वुझैक लेल सवसं पहिने श्रृंगेश्वर नाथ (स्ंिाहेश्वर) केर नदी सभ (कोशी आ ओकर दोसर सभ धार) केर अध्ययन करव आवश्यक अछि। कोशीक कतेक रास छाड़न धार सूखि गेल अछि आ ओकर धार आव निस्तेज भऽ गेल अछि। मुदा भारत सरकारक कोशी नियंत्रण योजना सं पहिने चीन के ह्वांगहो नदी सं वढि़ के अप्पन विनाशकारी वाढ़ कोशी जग जाहिर छल। देखू जे भोलानाथक नगरी आ ऋष्यश्रृंगक तपस्थली मे कोशी आ ओकर छाड़न धारक स्थिति की छल? कोशी धार भगवान शिव के वड़ प्रिय अछि। महाकवि कालिदासक अनुसार, कोशीक तट पर साक्षात शंकर वसैत अछि। ताहि सं कोशी शंकरक तरहे तांडव करैत अछि। महाभारत मे कौशिकी तीर्थक वृहत चर्चा अछि, जे अहि देशक सांस्कृतिक भूगोल केर रेखांकित करैत अछि। एकरा जानैक लेल सिंहेश्वर मे प्रवाहित कोशीक विभिन्न धारक जानकारी आवश्यक अछि। मुख्य कोशी नदी भीमनगर सं दक्षिण चलिके शिवनगर गामक निकट दू भाग मे वंटि जायत अछि। ओतय पूव भरि वला धार से वैवाह (धसान) आ चिलौनी नामक धार वनैत अछि आ पश्चिम भरि वला धार सं परवाने, तिलावै, वड़हरी आ सोनेह नामक धार अपन स्वरूप ग्रहण करैत अचि। तिलावै नदी एखन सुपौल जिलाक थुमहा, वसहा, तुलापट्टी, रामनगर, रामपुर आदि गाम के स्पर्श करैत सिंहेश्वर स्थानक चर्चित गाम वभनी भेलवा आवैत अछि। ई गाम रामपुरक अग्निकोण मे आ तिलावै के पाश्र्व भाग मे अछि। कहल जायत अछि जे कहियो ई गाम भववावा थानक नाम सं प्रचलित छल। मुगल सम्राट शाहजहांक काल मे भववावा एकटा समाज सेवी छल, जिनकर जन्म अहि ठाम पर भेल छल। 350 ईपू अहि गाम मे हुनकर स्मारक छल। तिलावै वभनी भेलवा गाम सं कनि नैऋत्य कोण मे झुकि के सिंहेश्वर थानक मार्र्ग मे स्थित गम्हरिया नामक गाम आवैत अछि। अहि गाम मे सोनाय महाराज नामक एकटा धार्मिक आ समाज सेवी लोकदेवक स्मारक अछि, जिनका प्रणाम करि के तिलावै सं आगू वढि़ जायत अछि। सोनेह एकटा छोट धार अछि जे सिंहेश्वर थानक नैऋत्य कोण स्थित दलदली चौर सं प्रवाहित होयत अछि। ई परवाने धारक एकटा टूटल धार अछि। ई अप्पन उद्गम सं दक्षिण दिस चलि के लंवा दूर तय करि के वंशीरौता गाम मे तिलावै धार मे प्रवेश करि जायत अछि। परवाने धार रूपौली सं दक्षिण चलि के सिंहेश्वरक चर्चित गाम रामपट्टी मे प्रवेश करैत अछि, जतय धसान आ वरहरीक धार अहि मे मिलिकए एकर जलभंडारक वृद्धि करैत अछि। परवाने आ धसानक ई संगम सिंहेश्वर आ गौरीपुर सं कनि दूर ठाम अछि। धसानक अलग अस्तित्व अछि मुदा वरहरी परवानेक एकटा उपधार अछि, जे आव मृत भऽ गेल अछि। एक चौर सं चलि के वरहरीक धारा परवानेक समानांतर दक्षिण भरि चलैत अछि आ अप्पने वाम भाग सं डंडारी, चम्पानगर, वैरवन्ना आदि गामक स्पर्श करैत अछि। परवाने धार रामपट्टी सं चलिके सिंहेश्वर थान आवैत अछि, जतय ओ भगवान शंकरक चरण स्पर्श करैत अछि। कोशीक चिलौनी धार लालपुर सं दक्षिण चलिके दाहिना पाश्र्व मे सरोपट्टी गाम के स्पर्श करैत अछि। लालपुर गाम के लगभग दू सौ वरख पहिने भानुदास नामक कुशाग्र वंशीय राजभर सरदार वसैने छल। अहि गामक लग गौरीपुर अछि। सिंहेश्वर नाथ मंदिर लग चिलौनी दू भाग मे वंटिके समानांतर मधेपुरा आवैत अछि। गौरीपुर सं दक्षिण पूर्वी धारक कात रामपुर नामक गाम अछि, जतय दू सौ वरख पुरान एकटा व्रह्मस्थान अछि। चम्पारण्य तीर्थ महाभारत मे वर्णित कौशिकी तीर्थ मे एकटा तीर्थ अछि चम्पारण्य। ई क्षेत्र तत्कालीन अंग नरेशक अधीन छल। महाभारत सं पूव अंग देशक राजधानी मालिनी छल। वाद मे राजा रोमपादक प्रपौत्र चम्पा नामक एकटा राजाक नाम पर चम्पा या चम्पावती कऽ देल गेल। महाभारत काल मे ई चम्पा नगरी चम्पकक वाग सं परिवृत छल। ताहि सं अहि चम्पारण्य सं चम्पा राज्यक अरण्य भाग वुझवाक चाहि। एकरा एखुनका चम्पारण जिला वुझवाक भौगोलिक भूल अछि। छठम शताव्दीक रचना शक्ति संगम तंत्रक अनुसार विदेह भूमिक सीमा अहि तरहे देल गेल अछि, 'गण्डक तीरमारम्य चम्पारण्यान्तक शिवे विदेह भू समाख्याता तैरमुक्त भिवं सुत।' शक्ति संगम तंत्र 7/27 विदेह भूमि पश्चिम मे गण्डकी तीर आ पूव मे चम्पारण्य धरि पसरल अछि। विदेह भूमि मिथिलाक पूव ई क्षेत्र चम्पारण्य अछि। वर्तमान चम्पारण जिला मिथिलाक पश्चिम मे स्थित अछि। महाभारतकार जे चम्पारण्य तीर्थक वर्णक केने अछि, ओ तीर्थ वड़ पुण्य प्रदान करय वला अछि। महाभारतक अनुसार, ओतय एक रात्रि रहय सं सहरुा गाय केर दानक फल भेटैत अछि। ऋष्यश्रृंगक तपोभूमि कौशिकी तीर्थ मे वीराश्रम आ कुमारतीर्थ सेहो अछि, जे चम्पकारण्य तीर्थक उत्तर भरि के सीमा आ पूव सीमा पर स्थित क्रमश: वीरपुर आ कुमारखंड के रेखांकित करैत अछि। ई चम्पकारण्य तीर्थ सिंहेश्वर थान निर्दिष्ट होयत अछि। ई समस्त क्षेत्र चम्पा नरेशक अरण्य भाग छल। एतौका वेसी गाम मे चम्पा देवीक पूजा होयत अछि। शंकरपुर मे वरहगाडि़याक जमींदार वावू एकदेश्वर सिंह चम्पा देवीक मंदिर वनाय के ओतय चम्पाक मूर्ति स्थापित केलक आ एकटा पोखैर बनाके अहि ठामके रमणीय बनैलक. एकर अलावा, निशिहरपुरमे सेहो चम्पा देवीक मूर्ति स्थापित अछि, जतय प्रत्येक वर्ष मेला लागैत अछि। अन्य देवी-देवताक अलावा वांतर जाइतक मान्य कुल देव चम्पावती सेहो अछि। वांतरक अलाा दोसर कतेक रास जाइत चम्पादेवीक भगैत गावैत अछि। ताहि सं सिंहेश्वर थानक चम्पारण्य तीर्थ नै मानव एकटा एतिहासिक भूल अछि। परवाने नदी सिंहेश्वर सं दक्षिण दिस चलि के जोतनार गाम के स्पर्श करैत अछि। कौशिकी तीर्थ मे एकटा ज्योतिस्मर तीर्थ सेहो अछि, जतय ह्मद मे नहावय सं वड़ पुण्य भेटैत अछि। ई जोतनार गाम महाभारत कालीन ज्योतिस्मर तीर्थ अछि। तहयौका भौगोलिक साक्ष्यक आधार पर समूचा क्षेत्र चम्पा राजाक वनभाग छल। चम्पावतीक वनदेवी सेहो कहल गेल अछि। जो एकटरा पौराणिक मान्यता अछि। महाभारतक अनुसार ऋषि आ राजाक एकटा दल प्रभास तीर्थ सं यात्रा शुरू कऽ कौशिकी तीर्थ सेहो गेल छल। अहि दल मे भृगु, वशिष्ठ, गालव, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, यजदग्नि, अष्टक, भारद्वाज, अम्वरीष आ वालखिल्य ऋषि छल आ राजा मे शिवि, दिलीप, नहुष, अम्वरीष आदि छल। अहि यात्रा वृतांत अहि क्षेत्रक पौराणिकता आ दर्शनीयता के रेखांकित करैत अछि। पौराणिक सिंहेश्वर थान सिंहेश्वर स्थान भगवान शंकरक पावन तपस्थली अछि। षोड महाजनपद मे शीर्षस्थ जनपद अंग देशक ई महत्वपूर्ण तीर्थस्थल अछि। अंग देशक निर्माण मे सेहो भगवान शिवक उल्लेखनीय योगदान अछि। दक्षिण मे मन्दराचल पर्वत आ उत्तर मे मूजवान पर्वत धरि पसरल विशाल वन्य प्रदेश श्लेषात्मक वन छल, जतय कन्दर्प दहनक पश्चात भगवान शिव समाधिस्थ भेल छल। कोशी के कतेक धार वन मे वहैत छल। वाराह पुराणक उत्तरार्धक एकटा पुरा कथाक अनुसार, ओहि वन मे भगवान शिव के खोजैत देवराज इंद्रक संग विष्णु आ व्रह्मा पहुंुचल। भगवान शिव एकटा सुनर हरिणक रूप मे विचरण करैत छल। तीनों अंतयार्मी देवता अहि हरिण के देखहि के वुझि गेल जे ई भगवान शंकर अछि आ ओ हरिण के पकड़हि मे सफल भऽ गेल। इंद्र हरिणक सींगक अग्र भाग, व्रह्मा मध्य भाग आ विष्णु निम्न भाग पकड़लक। एकाएक सींग तीन भाग मे टूटिके विभाजित भऽ गेल। तीनो देवताक हाथ मे सींगक एक-एकटे भाग रहल आ हरिण लुप्त भऽ गेल। तखनै आकाशवाणी भेल कि आव शिव नहि भेटत। देवता सभ अप्पन-अप्पन हाथ मे आयल सिंहक भाग के पावि के संतोष कऽ लेलक। कहल जायत अछि जे विष्णु लोक कल्याणार्थ अप्पन भागक सींग के जहि ठाम पर स्थापित करलक, ओ वर्तमान सिंहेश्वर (श्रृंगेश्वर) अछि। अहि तरहे एकर सिंहेश्वर नाथ नाम सार्थक भेल। वाराह पुराणक अहि पुरा कथाक अनुसार तीनों देवता कोशीक तीर पर भगवान शिव से भेंट करय लेल पहुंचल छल। अहि तथ्य के कालिदास कृत कुमारसंभव मे स्पष्ट करल गेल अछि। ओकर अनुसार, कोशी के प्रपात लग भगवान शिवक निवास अछि आ देवता सं ओतय भेंट करयक स्थान निर्दिष्ट करल गेल अछि। अत: कोशीक तीर पर इंद्र, विष्णु आैर व्रह्मा का शंकर सं भेट करव पूर्व निर्दिष्ट आ निर्धारित ठाम दिस हुनकर आगमनक सूचक अछि। मुदा वाराह पुराणक अंतिम अध्यायक कथा जे प्रमाणक रूप मे प्रचलित अछि, ओ स्पष्ट नै अछि जे मृग रूप महादेवक श्रृंग मूल पावैक भगवान विष्णु ओकरा एतय स्थापित केने छल। ताहि सं अहि विषय पर प्रवुद्ध पाठक अपने सं विमर्श, विश्लेषण आ विवेचन करय, यहि उचित अछि। मिथिला तत्व विमर्श, पृष्ठ 80 मे विद्वान लेखक महामहोपाध्याय परमेश्वर झाक सेहो यै मत अछि। चौवीस हजार श्लोक वला वाराह पुराण एकटा सतोगुण पुराण अछि, जहि मे विष्णुक वराह अवतार वर्णित अछि। महाभारत आ पद्मपुराण ओहि वड़ क्षेत्रक उल्लेख तऽ नै अछि, मुदा अहि क्षेत्रक स्थान निर्देशक लेल अप्पन जानकारी केर वेस स्पष्ट करैत अछि। ओहि मे अतीतकालीन पुरा कथा अछि, जे जागतिक रहस्य केर उद्घाटन करैत अछि। एहन पुराणक निर्मल जल मे प्रक्षेपक शैवाल जाल सेहो कम नै अछि। प्रक्षेप मे संकलित पुराकथाक तात्विक नीर-क्षीर विवेचन निष्पक्ष-प्रवुद्ध वर्ग कऽ सकैत अछि। परवर्ती साक्ष्य कहल जायत अछि जे सिंहेश्वरक जंगल मे पर्याप्त गोचर भूमि छल। एतय दूर-दूर ठामक गोपाल अप्पन गाय कऽ चरावैक लेल आवैत छल। एहन मान्यता अछि जे एकटा विशेष ठाम पर कुंआरी गाय आवैत छल आ ओकर थन सं दूध टपकैत लागैत छल। ई सिलसिला अनवरत चलैत रहल। एक दिन गोपालक दूध टपकैत दृश्य अप्पन आंखि सं देखलक। ओकर वाद कतेक दिन धरि ओ ई देखैत रहल। ओहि निर्दिष्ट ठाम पर ओहि गाय के आविके आ ओकर थन सं दूध टपका केर ओहि ठाम के सिंचित करव एकटा कौतूहल छल। ओहि गोपालक जिज्ञासावश ओतय सं माटि हटाकऽ देखलक ते ओ विस्मित भऽ गेल। एकटा शिवलिंग माटिक नीचा झांपल छल, जतय गायक धन सं दूध टपकैत छल। ओ गोपालक सेहो नियमित अहि शिवलिंगक पूजा करय लागल। दोसर सव गोपालक सेहो ओतय भक्ति अर्चना करय लागल। वाद मे कोनो भक्त ओतय छोट-सन मंदिर वनैलक। कहल जायत अछि जे यहि ठाम ओ पूर्वकालक गोचारण स्थल अछि आ सिंहेश्वर मंदिरक शिवलिंग वहि अछि जेकरा कोनो अनाम गोपालक माटि सं हटा के दर्शन-पूजन केने छल। सिंहेश्वरक थानक अलावा देवघर आदि मंदिरक शिवलिंगक कथा किछु एहिने तरहे अछि। जे भी हुए सभ शिवलिंगक स्थापना आ ओकरा खोज निकलैक श्रेय गोपाल केर जायत अछि। मुदा एकर प्रत्यक्ष लाभ दोसर समुदायक लोक के भेटैत अछि। शिवलिंगक तीन रूप अछि, भावलिंग, प्राणलिंग आ इष्टलिंग। भाव कलाविहीन, सद्रूप काल आ दिक् सं अपरिच्छिन्न आ परस्पर अछि। एकर साक्षात श्रद्धा सं होयत अछि। प्राण लिंग कलाहीन आ कला युक्त दूनू अछि। वुद्धि सं एकर साक्षात संभव अछि। इष्ट लिंग कला युक्त होयत अछि ताहि सं नेत्र सं एकर दर्शन संभव अछि। अहि तीनो के क्रमश: सत, चित आ आनंद कहल गेल अछि। परम तत्व भाव लिंग अछि, सूक्ष्म प्राण लिंग अछि आ स्थूल इष्ट लिंग अछि। सिंहेवर थान मे स्थापित शिवलिंग इष्ट लिंग अछि, जे मंत्रयुक्त, मंत्रहीन, क्रियायुक्त, क्रियाहीन, ज्ञानी, अज्ञानी सभक लेल दर्शनीय आ पूजनीय अछि। कहल जायत अछि जे लगभग एक सौ वरख पहिने सिंहेश्वर मंदिर मे स्थापित शिवलिंगक सव तरफ जलढ़रीक निमित संगमरमर वैसावैक लेल खोदल गेल छल। मजदूर सभ करीव आठ फीट नीचा खोदलक। ओ किछु अद्भुत दृश्य देखलक। लिंगक आंतरिक स्वरूप भव्य आ अद्भुत छल। शिव पार्वतीक असंख्य प्रतिमा ओहि पर मुद्रित छल। वाह्य रूप सं तीन गुना मोटा आकार नीचा पसरल छल। एकर विशालता देखहि के ओ चकित रहि गेल। किछु मजदूर ते अप्पन संतुलन सेहो विसुरि गेल। एहन स्थिति मे खुदाईक काज स्थगित कऽ देल गेल। एकर सत्यापन किछु अभियंता केने अछि। ओ शिवलिंग सं अलग खुदाई केलक ते आठ-दस फीटक गहराई मे एकटा विशाल चट्टान देखलक जाहि सं शिवलिंग जुड़ल छल। एकटा विशाल चट्टानक कारण कोशीक उफनावैत धार अहि मंदिर के क्षति नहि पहुंचा सकल। अहि मंदिरक पौराणिकताक देखैत आय धरि एकर जाहिना के ताहिना वनरल रहैक श्रेय अहि चट्टानी आधारशिला के देल जा सकैत अछि। किरातक भूमि अहि मे कोनो मत भिन्नता नहि अछि जे प्राचीन काल मे एतय घनघोर जंगल आ नदीक संग पहाड़ सेहो छल जे कतिपय भौगोलिक कारण सं धरतीक संग धंसि गेल। एहने ठाम भगवान शिवक लेल उपयुक्त छल क्याकि उपनिषदकरक मुताविक भगवान शिव निर्जन जंगल आ पहाड़ मे निवास करैत छल। जंगल, गिरिगह्वर मे रहै वला किरात जेहन निवासी मे हुनकर लोकप्रियता वढ़ैत गेल। कालांतर मे ओ जगत्पति आ देवताक द्रष्टा मानल जा लागल आ ओ आर्य आ अनार्य दूनूक द्वारा पूजित हुए लागल। प्राचीन काल मे जहि कियो विदेशी जाइत भारत पर आक्रमण कऽ अप्पन विस्तार केलक आ अप्पन राज्य स्थापित केलक हुनकर वर्णन महाभारत, पातंजलिक महाभाष्य, मनुस्मृति आ अन्यान्य स्मृति ग्रंथ मे अछि। महाभारतक अनुसार, यवन, शक, पह्लव, किरात, चीन आदि जाइतक प्रवेश भारत मे भऽ चुकल छल। मनुक मुताविक, पौण्ड्रक, द्रविड़, कम्वोज, किरात, दरद, चीन, खश, यवन, शक, पारद आ पह्लव विदेशी जाइत छल। अहि विदेशी जाइत आर्य सभ्यता अा संस्कृति पर प्रभाव डालैत भारतीय धर्म आ संस्कृति मे अपना केर आत्मसात कऽ देलक। कलांतर मे ओ विदेशी नहि रहि गेल। हुनकर पूर्ण रूप सं भारतीयकरण भऽ गेल। एहने विदेशी जाइतक एकटा जइत किरात छल, जकरा प्राचीन वर्ण व्यवस्था मे मनु शुद्रक रूप मे मान्यता देलक। तहियौका हिन्दू समाज जहि समुदायक तिरस्कर केलक, ओ भगवान शिवक शरण मे गेल। क्याकि अमरकोश मे किरात के म्लेच्छक एकटा भेद मानल गेल अछि। कुमार संभव (8.29) केर मुताविक, ई जाइत हिमालयक परवर्ती प्रदेश मे रहैत छल। भगवान शिव हिमालयक कैलास शिखर पर रहैत छल ताहि सं ई जाइत के भगवान शिव के तादात्मक कथा जुड़ल अछि। वायु पुराण (47.48) आ व्रह्मांड पुराण मे हुनकर धारक कात मे रहय वला जाइतक तरहे उल्लेख करल गेल अछि। संगेसंग विष्णु पुराण (2.3.8) मे एकर निवास स्थान पूर्वी भारत मानल गेल अछि। भले ही भारतीय पुरा साहित्य मे अहि जाइत के विदेशी आ अनार्य मानल गेल अछि, मुदा एकर मूल पुरुष आर्य छल। एकर प्रमाण हरिवंश पुराणक महाराज सगरक चरित-वृतांत मे स्पष्ट अछि जे राज्य मे लोग सं विजयी क्षत्रिय देशांतर गेल छल, मुदा ओ अप्पन व्राह्मण पुरोहित के नहि पावि के अप्पन मूल आर्य धर्म सं भ्रष्ट भेल गेल जाहि सं कतेक रास जाइत निकलल. बड रास संभव अछि जे भारत घुरीके ई जाइत व्राह्मणक वर्चस्व के स्वीकार नै भेल ताहि सं म्लेच्छ कोटि मे दऽ देल गेल। भागवत पुराणक स्कन्द 9 के 23म अध्याय मे उल्लिखित अछि जे महाराज ययातिक पुत्र द्रुह्यक संतान उत्तर दिश जाइके म्लेच्छक राजा भऽ गेल। अहि तरहे गतायातक प्रक्रिया चंद्रगुप्तक काल धरि भेल गेल। एकर अलावा, अहि देशक लोग तहियौका सैन्य-वल मे नियुक्त भऽ कऽ म्लेच्छक देश मे जा के म्लेच्छ वनि गेल। मुद्राराक्षस नाटकक पंचम अंक मे एकर उल्लेख अछि। अहि देश मे वर्जन (जाइत-च्युत) कऽ प्रथा वड़ पुरान अचि। जौं केकरो सं ज्ञात आ अज्ञात, छोट या वड़ अपराध भेल अछि ते धर्मक ठेकेदार हुनक जाइत सं वहिष्कार कऽ देत छल आ ओकर एत्ता वेसी तिरस्कार करैत छल जे ओकर लाख अनुनय-विनय करहि के वादो ओकर जाइत मे नहि घुरावैत छल। नतीजा ई हैत छल जे हुनकर दोसर उदार समुदाय मे शामिल भऽ मूल सनातन धर्म सं विस्थापित भऽ तथाकथित म्लेच्छ मे शामिल हेवाक कारण हुनकर संख्या वढ़ैत गेल। हुनका फेर सं सनातन धर्म मे आनय केर प्रयास नहि भेल। हालांकि याज्ञवल्क्य आदि स्मृतिकार एहन तरहक अपराधक प्रायश्चितक व्यवस्था देने अछि मुदा ई स्मृति मे सिमटल रहि गेल। जेकर हाथ मे न्याय आ धर्मक व्यवस्था छल हुनकर हठधर्मिता आ सदा सर्वथा समाज मे वर्चस्व स्थापित राखवाक प्रवृति अहि समाज कऽ क्षीणकाय कऽ देलक। किरात आदि जाइत केर अहि धरती पर वहुलांश अहि रहस्य के रेखांकित करैत अछि। महाभारत काल मे अहि क्षेत्र पर किरातक वाहुल्य छल। गंगा सं उत्तर आ महानन्दा सं पूरव नेपाल धरि ई जाइत पसरल छल। अहि क्षेत्र मे हुनकर सशक्त संस्कृति फलफूल रहल छल। राजा विराटक दोसर स्त्री सभ मे एकटा किरात कन्या सेहो छल, जे मोरंग वा नेपालक तराई मे रहि वाली छल। किरात एक शक्तिशाली जाइत छल। तहियौका किरातार्जुन कीर्ति जेहन परवर्ती साहित्य मे एकर चर्चा आयल अछि। अहि क्षेत्र मे अन्यान्य जाइतक संग किरता के सेहो वड़ संघर्ष करय पड़ल। महाभारत मे अर्जुन पाशुपतास्त्र प्राप्त करहि हिमालय जाइत अछि। ओतय भगवान शिव अप्पन प्रिय भक्त किरातक वेश मे भेटैत अछि। शिव के नहि चिन्ह सकय के कारण अर्जुन ओहि किरात वेश शिव सं युद्ध करैत अछि, मुदा हुनका सं परास्त भऽ जायत अछि। फेर शिवक वास्तविकता के वुझि अ अहि अवढरदानी के प्रसन्न करहि के लेल अर्जुन माटिक वेदी वनाके हुनकर अराधना करैत अछि आ वेदी पर पुष्प अर्पण करैत अछि। ओ ई देखहि के आश्चर्यचकित रहि जाइत अछि जे जे फूल शिवक लेल ओ मृत्तिका वेदी पर चढ़ावैत अछि ओ ओहि किरात पर आवि जायत अछि। आव अर्जुन किरात वेश शिव के चिन्है मे विलम्व नै होयत अछि। विक्रमोर्वशीयम (1.11) मे कालिदास सेहो लिखने अछि जे पाशुपतास्त्र प्राप्त करहि के लेल अर्जुन कठिन तपस्या केने छल। भारत मे जखैन शिशुनाग वंश, नन्दवंश, मौर्यवंश, शुंग वंश, आंध्र वंश आदि केर राज्य छल। ओकर समानांतर नेपाल मे लगभग सात सौ वरख धरि किरातक राज्य छल। अशोकक धर्म चक्र विजय काल मे नेपाल मे किरात राज्य स्थ्यांकु छल। वौद्ध धर्मक अनुश्रुति मे सम्राट अशोक अप्पन कन्या चारुमति आ जामाता देवपालक संग नेपाल जाकऽ किरात शासकक सहायता सं कतेक रास विहार आ वौद्ध स्तूप वनैने छल। किरात दवंग आ स्वतंत्र विचार वला जाइत छल। सातम शतावद् मे व्राह्मणवादी व्यवस्था आ कर्मकाण्ड के सर्वथा नकारैक कारण एतौका किरातक नव नामांकरण वांतर करल गेल जकर अर्थ अछि कुपथ्य आ त्याज्य। तहियौका समाज व्यवस्थाकार एकरा संगठित हिन्दू समाजक लेल कुपथ्य मानलक। जहि जाइतक सभ्यता संस्कृति महाभारत सं लऽ कऽ गुप्त-स्वर्ण-युग धरि अप्पन यशोज्जवल गाथा कहय मे सक्षम हुए, जाहि जाइत हजार वरख धरि राज्य सत्ताक संचालन केने हुए, ओ म्लेच्छा आ शुद्रे टा नै, समाजक लेल कुपथ्य सेहो भऽ गेल। व्यस्थाकार वर्ण व्यवस्थाक वंधन एतेक मजवूत कऽ देलक आ शासक के सदण्ड एकर कार्यान्वयनक दायित्व सौंपलक जाहि सं सामाजिक कलस्विनीक प्रवाह स्थिर भऽ गेल। ई सच अछि जे मनु द्वारा संचालित वर्ण व्यवस्था मे ऊंच-नीचक भावना आ भेद-भावक दृष्टि छल, जे परवर्ती हिंदू समाज के जर्जरित करय के कारण वनि गेल। भगवान वुद्ध अहि व्यवस्था पर एतेक वेसी प्रहार करलक जे मरणासन्न अवस्था मे आनि के छोडि़ देलक। मुद शुंगक काल मे ई फेर जीवित भऽ गेल। अलवरुनी ग्यारहम शताव्दी मे भेल छल। हुनकर कथन अछि, प्राचीन काल मे कर्म परायण राजा जनता के कतेक रास श्रेणी आ कर्म मे विभक्त करहि मे जोड़ दैत छल। संगेसंग हुनक एक-दोसरा सं भेंट आ क्रम तोड़ैक सं रोकहि के यत्न करैत छल। ताहि सं ओ भिन्न-भिन्न श्रेणीक लेक के एक-दोसरा सं संवंध राखहि सं रोकि देलक आ प्रत्येक श्रेणीक लोग के विशेष प्रकारक काज आ शिल्प सौंप देलक। ओ कोनो लोक के अप्पन वर्गक अतिक्रमण करहि के लेल अनुज्ञा नै दैत छल। जे अप्पन श्रेणी सं संतुष्ट नहि छल, हुनका दंड देल जायत छल। एहने समाजक संवेदनशीलता मारल गेल आ एक-दोसरा सं नै मिलय आ पारस्परिक संपर्कक अभाव मे हुनकर गतिशीलत अवरुद्ध भेल। व्राह्मण सेहो व्यवस्थाक नाम पर अप्पन अधिकार के खुलि के दुरुपयोग केलक। विराट भारतीय समाज मे रहि के कतेक रास जाइत अहि सं विमुख भऽ कऽ अप्पन दायरा मे सिमटल चलि गेल। जे कहियो गतिशील जाइतक रूप मे चर्चित छल, ओ अंतर्मुखी वनैत गेल। ग्यारहम सदी मे निशिहरदेव किरात वंशी राजा भेल जिनकर राजधानी निशिहरपुर छल ई वर्तमान शंकरपुर अंचल अछि। हुनकर भवन आ दुर्गक अवशेष एकटा टीलाक रूप मे अवस्थित अछि आ जाहि पर एकटा मंदिर निर्मित अछि। मंदिर परिसर मे राखल गेल राजभवनक स्मृति चिह्न, नक्काशीदार प्रस्तर खण्ड, प्रस्तरक चौखट आदि पालयुगक प्रतीत होयत अछि। संभवत: ई किरातक अंतिम राजा छल। हुनकर अराध्य उगरी महाराज नामक एकटा सिद्ध पुरुष छल जे गुडि़या (त्रिवेणीगंज निवासी) कमार जाइत छल। हुनका लोक देव खेदन महाराज सं वैर छल। टेंगराहा चौर मे ओ मायाक वाघिन के भेजि के खेदन महाराजक वध करैने छल, जे खेदन महाराज के भगैत गीत सं ज्ञात होयत अछि। कर्नाट क्षेत्रीय नान्यदेव 1097 ई. मे अहि क्षेत्र पर अप्पन अधिकार जमा केर सत्तासीन भऽ चुकल छल। आहि काल सिंहेश्वर मे किरात आ कुषाण वंशक छोत्त-छोट राज्य छल जे वाद धरि कर्नाटक करद वनल रहल। कुषाण वंशी राजभर कुषाण चाइत चीनक गोवी प्रांत मे रहय वला यू-ची जाइतक एकटा शाखा छल। यू-ची जाइतक पांचटा शाखा छल, हिऊमी, चाउयांग-मी, ही-तुम, ताउ-मी आ कोई-चाउआंग। कोई-चाउआंग के कुषाण कहल जायत अछि। गोवी प्रांत मे हुं-ग-नू जाइत यू-चि जाइत पर आक्रमण कऽ हुनका सभ के गोवी प्रांत से निकालि कऽ वाहर कऽ देलक। ई सभ लोक भागि के सरदरिया आयल। मुदा ओतय सं सेहो हुनका सभ के भागय पड़ल। सरदरियाक यु-सुन नामक एकटा जाइत हूणक सहायता सं हुनका सभ पर आक्रमण कऽ देलक आ ओतय सं सेहो विस्थापित कऽ देलक। लगभग 140 ईपू ई सभ वैक्ट्रिया आयल। ओहि काल वैक्ट्रिया मे शकक शासन छल। एहि पर रहैत कुषाण अप्पन शेष चारि शाखा पर विजय प्राप्त कऽ वेसी शक्ति संपन्न भऽ गेल। ओकर प्रथम राजा कुजूल कैडफिसेस छल, जे शक्तिशाली आ महत्वाकांक्षी छल। ओ पह्लव शासक के परास्त कऽ गन्धार आ सीमाप्रांत केर अप्पन अधीन कऽ लेलक। ओ वाद मे वौद्ध धर्मावलम्वी भऽ गेल। ओ अस्सी वरख धरि युद्ध मे संलग्न छल। ओ कुषाण वंशक नीव के आओर मजवूत करलक। एकर वाद ओकर पुत्र विमकैडफिसेस सत्तासीन भेल। ओ अप्पन योग्य पिताक योग्य पुत्र सावित भेल। भारत विजयक सेहरा हुनके सिर वान्हल गेल। हुनकर मृत्युक वाद हुनकर पुत्र कनिष्क प्रथम आ ओकर वाद कनिष्क द्वितीय कुषाण वंशक शासक भेल। कनिष्क अप्पन राजधानी सीमा प्रांतक पुरुषपुर मे वनौअलक। ओ अप्पन प्रभुत्व पुरुषपुर से पाटलीपुत्र धरि स्थापित केलक। मान्यताक अनुसार, कनिष्क कठोर संघर्षक वाद पाटलीपुत्र के पराजित केलक आ वौद्ध विद्वान अश्वघोष के जमानतक रूप अपना संगे लऽ गेल। अश्वघोषक संपर्क मे आवि के ओ सेहो वौद्ध धर्मावलम्वी भऽ गेल। ओ पहिलुक शैव धर्मावलम्वी छल। संभावत: अश्वघोष जेहन वौद्ध विद्वान अप्पन अधिकार मे लहि के लेल ओ मगध पर चढ़ाय केलक। ओ पूर्वी भारत पर अप्पन अधिकार जमा के शांति स्थापित केलक। तिरहुत प्रमंडल मे कनिष्कक छिद्रांकित ताम्र-मुद्रा प्राप्त भेल अछि अहि क्षेत्र मे सेहो नवीन प्रशासनिक इकाईक रूप मे विभक्त कतेक रास राज प्रतिनिधिगण कुषाण शासक अधन क्षेत्र विशेषक सत्ताक संचालन करैत छल। कुषाणक पतन आ गुप्त साम्राज्यक उदय आ मध्यवर्ती युग मे दूटा प्रमुख राज्य सत्ता अस्तित्व मे आयल। पहिलुक नाग वंश आ द्वितीय वाकाटक वंश। अहि दूनू के अतिरिक्त भार शिव वंश कुषा साम्राज्यक भग्नावशेष पर सत्तासीन भेल, जकर प्रभुत्व अहि पूर्वी क्षेत्र मे वेसी छल। हिन्दू पालिटी (भाग-2 कलकत्ता, 1924) मे डॉ. काशी प्रसाद जायसवालक अभिमत अछि कि ई भार शिव नागा, अपने कंधे पर भगवान शिव के भार को ढोते थे। ई वहि जाइत अछि जे कुषाण वंशक पतनक वाद सेहो लगभग दू सौ वरख धरि अहि क्षेत्र मे सत्तासीन छल। कोशी आ दरभंगा प्रमंडल मे वहि लोक 15म शताव्दी धरि कतो-कतो शासक रूप मे अवस्थित छल। एहन मान्यता अछि जे कनिष्कक पाटलीपुत्र विजय अभियानक संग विहारक कुषाण वहुलांश मे प्रवेश केलक। ई उत्तर आ दक्षिण विहार दूनू दिस पसैर गेल। ई वहादुर आ कष्ट सहिष्णु छल। जा धरि राज्य सत्ता पर हिनकर अधिकार रहल ता धरि ई क्षत्रपक रूप मे सम्मलित होयत रहल। सिंहेश्वर थान मे ई वड़ संख्या मे छल। ओ शैवमत अपनैलक आ कालांतर मे शिवक भार ढोयै के कारण ई भार शिव नागा सेहो कहावय लागल। वड़ वाद शिवनागा शव्द गौण भऽ गेल आ ओ मात्र भार या राजभरक नाम पर चर्चित भऽ गेल। डॉ. के.पी. जायसवालक अनुसार उत्तर विहारक अधिकंश ठाम पर गुप्त युगक उदय सं पूर्व भार शिव नागा द्वारा राच्य करहि के संकेत अछि। सिंहेश्वर के रायभीर, वसंतपुर आदि गाम मे भर जाइतक निवास अछि। रायभीर सं ओ अप्पन राज्यक संचालन करैत छल। ओतय हुनकर दुर्ग सेहो छल जे कोशीक भीषण वाढ़ धो-पोंछकऽ खत्म कऽ देलक। एखुनका सिंहेश्वर मंदिर कुषाण वंशीय भर जाइतक छल। दीर्घकाल धरि अहि मंदिरक व्यवस्था करैत आ ओकर भाग खायत छल। पिछला सर्वे मे भानुदास नामक एकटा व्यक्तिक नाम खतियान मे दर्ज अछि, जे सिंहेश्वर थान मंदिरक भूमिक स्वामीत्व दीर्घकल धरि छल। भानुदास मंदिर मे सेवक आ अन्यान्य कार्यकर्ता सभहक नियुक्ति करैत छल आ मंदिरक आय प्राप्त करैत छल। अहि व्यवस्था मे किछु विकृति आवि गेल। भानुदास कुषाण वंशी राजभर जाइतक छल। अव राजभर (या भर) मंदिरक अधिकारी वनि गेल आ प्रत्यक्ष रूप सं दान-दक्षिणा आ चढ़ौआक राशि स्वयं ग्रहण करय लागल। अहि जाइत केर दान-दक्षिणा आ चढ़ौआ ग्रहण करहिक नै ते कोनो धार्मिक आधार छल आ न अधिकार। क्षेत्रीय लोक सभ एकर विरोध केलक आ संघर्ष छेड़ देलक। आखिर दीर्घकाल सं मंदिर मे स्थापित अप्पन स्वामीत्वक जनाक्रोशक कारण राजभर छोडि़ देलक। वाद मे परसरम निवासी वावू हरदत्त सिंह मंदिर पर स्वामीत्व ग्रहण केलक। मुदा हुनको भागय पड़ल। मंदिर परिसर मे रहय वला सन्यासीक दवंगताक आगू हुनको किछु नहि चलल। कहल जायत अछि जे वावू हरदत्त सिंह सं कतेक वेर सन्यासीक घोर संघर्ष भेल। मुदा अहि सन्यासीक प्रवलताक आगू ओ सेहो अप्पन हथियार डालि देलक। अहि सन्यासी मे रघुवरदास आ स्वामी वीर भारती वड़ चर्चित भेल। रघुवरदास मंदिर परिसर मे रामजानकी मंदिरक निर्माण करैले छल। ऊपर उल्लेख करल जा चुकल अछि जे कनिष्कक पाटलीपुत्र विजय अभियानक पश्चात कुषाण वहुलांश मे विहार मे प्रवेश करलक। ओ उत्तर विहारक संग दक्षिण दिस सेहो गेल। रांची जिलाक वेल्दाग आ कर्रा मे क्रमश: कुषाण राजा जुविष्कक एक स्वर्ण मुद्र आ कनिष्कक ताम्र मुद्रा भेटल अछि। जे दक्षिण विहार मे कुषाणक शासनक पुष्टि करैत अछि। राजा सीत आ वसंत कुषाण वंशीय छल। राजा सीतक गढ़ कोडरमा मे अछि। ओ टिकैत राजा छल। छोटा नागपुर मे कहावत अछि, घटले घटवाल वढ़ले टिकैत। यानी धन घट जाने से घटवाल आ धन वढि़ जाय सं ओ टिकैत भऽ जायत छै। छोटा नागपुर मे वड़ संख्या मे घटवाल वसैत अछि। ओ अपना के क्षत्रीय कहैत अछि। मुदा विहार सरकार हुनकर उत्तर विहार के राजभर य भर के तरहे हुनका सेहो पिछड़ी जाइतक सूची मे दर्ज कऽ देने अछि। घटवलक नाक-नक्श आ शारीरिक संरचना भर जइत से मिलैत-जुलैत अछि। दूनू के परंपरा आ धार्मिक कृत्य सेहो समान अछि। दूनू शिवक उपासक अछि। अहि सं ई मानय मे कोनो संकोच नहि अछि जे घटवाल सेहो कुषाण वंशीय अछि। छोटा नागपुरक प्राकृतिक परिवेश हुनका आओर वेसी श्यामवर्ण वना देने अछि जखैनकि हिमालयक पाश्र्वभूमि मे निवास करैक कारण भर या राजभर हुनका सं वेसी साफ अछि। घटवाल सेहो टिकैतक रूप मे कतेको रास राजवंश स्थापित केने अछि। एखनो अहि राजवंशक लोक क्षत्रीय सं अप्पन संवंध जोड़ैत अछि। राजा सीत केर छोट भाय राजा वसंतक गढ़क भग्नावशेष सिंहेश्वरक वसंतपुर गाम मे अछि। छोटानागपुरक घटवल सिंह या राय पदवी धारण करैत अछि। उत्तर विहार के भर या राजभरक उपाधि सेहो राय अछि। रायभीर अहि उपाधि केर द्योतक अछि आ राय उपाधि राजवंशी हेवाक प्रमाण अछि। राय का अर्थ होयत अछि राजा। वसंतपुरक वड़ भूभाग मे राजा वसंतक गढ़क अवशेष पसरल अछि, जाहि मे ओकर गौरवशाली अतीतक कथा जुड़ल अछि। कालांतर मे सिंहेश्वर सं तीन कुषाण वंशीय राजकुमार श्रीदेव, विजलदेव आ कांपदेव क्रमश; श्रीनगर (मधेपुरा), विजलपुर (पंचगछिया) आ कांप (सोनवर्षा) मे अलग-अलग अप्पन राजधानी वनैलक। श्रीनगर मे राजा श्रीदेव निर्मित विशाल गढक अवशेष अछि। अहि गाम मे एहन दूटा अवशेष अछि। दूनू पर मंदिर अछि जतय भगवान शिव स्थापित अछि। मुख्य अवशेषक ऊंचाई 12 सं 15 फीट धरि अछि। अहि अवशेषक उत्तर भागक मंदिर परिसर मे सैकड़ों प्रस्तर खंड पड़ल अछि जाहि पर कोनो अनाम मूर्तिकार वड़ कुशलत, निष्ठा आ शालीनता सं दुर्लभ नक्काशी केने अछि। अवशेष के एकटा प्रस्तर स्तंभ (शिलालेख) पर मकरध्वज जोगी 100 अंकित अछि। अहि पर गहन गवेषण आ पुरातात्विक सर्वेक्षणक आवश्यकता अछि। मधुवनी जिलाक अन्धराठाड़ गाम मे गंगासागर पोखरि पर स्थित मंदिरक एकटा प्रस्तर स्तंभ कर सेहो मकरध्वज जोगी 700 अंकित अछि। अहि मिथिला तत्व विमर्श मे कोनो वौद्ध भिक्षु सं संवंधित मानल जायत अछि। भऽ सकैत अछि जे मकरध्वज योगी नाथ पंथी आ सहजयान सम्प्रदायक कोनो योगी हुए। निषादक धरती अन्यान्य उपेक्षित समुदाय मे निषाद जाइत सेहो छल, जाहि पर भगवान शिवक विशेष कृपा छल। अथर्ववेद (6.39.3) मे भगवान रुद्र आदिम जाइतक संग निषादक स्वामीक रूप मे स्वीकार करल गेल छल। चर्म धारण करहि के कारण शिव के कृतिवासन कहल गेल अछि। संभवत: निषाद सं संवंध हेवाक कारण शिव के चर्म परिधान धारण करय वला मानल गेल अछि। तहियौका समाज मे चतुर्वणक अतिरिक्त अनुलोम प्रतिलोम जेहन अंतर्जातीय विवाहक कारण कतेक रास जाइत आ ओकरा सं कतेक रास उपजाइतक विकास भऽ चुकल छल। वोधायन एहने वर्णसंकर जाइत के व्रात्यक संज्ञा देने अछि। अहि सूत्र मे वोधायन निषाद जाइत चर्चा केने अछि, जेकरा मुताविक व्राह्मण पुरुख आ शूद्र स्त्री सं निषादक उत्पति भेल अछि। मुदा गौतम धर्म सूत्र (4.14) केर अनुसार निषाद व्राह्मण पिता आ क्षत्रिय माता से भेल अछि, जे उत्तम संकरताक परिचायक अछि। विष्णु पुराण मे ते एकर उद्भवक एकटा अद्भुत कथ कहल गेल अछि, जकर मुताविक ऋषि सभ पुत्रहीन मृत राजा वेनक जांघ केर पुत्रक लेल यत्नपूर्वक मंथन करलक। ओकर जांघ के मथय सं एकटा पुरुख उत्पन्न भेल, जे जलल ठूंठक समान कारि, वड़ नाट आ छोट मुह वला छल। ओ अति चतुर भऽ कऽ ओहि सभ व्राह्मण सं वाजल, हम की करी? व्राह्म कहलक, निषीद (वैठ)। ताहि सं ई निषाद कहलायल। ओहि सं उत्पन्न लोग विन्ध्याचल निवासी पापपरायरण निषाद गण भेल। अहि कथा लेखनक पांछा पुराणकारक मंशा जे रहल हुए मुदा रामायण मे निषादराज गुहक वृतांत अछि जे सानुज आ सपत्नीक भगवान राम के नदी पार करैने छल। हुनकर भक्तिक प्रशंसा वाल्मीकि आ तुलसीदास सेहो केने अछि। महाभारतक अनुसार, निषाद व्राह्मण पिता आ शूद्र माताक संयोग सं उत्पन्न भेल अछि। मनु निषाद के मत्स्य धातो निषादानां कहने अछि जे मछली मारय वला जाइत छल। मनुक मुताविक, निषाद नाव खेवैत अछि आ हुनकर निम्न जाइत मे गणना करल गेल अछि। जंगल, पहाड़ मे ई आखेटक रूप मे जानल जायत अछि। आखेट कर्मक कारण ई व्याध सेहो कहल जायत अछि। मिथुन-रत क्रौंच के एकटा निषाद द्वारा वध किए जाय सं दयाद्र्र भऽ कऽ महर्षि वाल्मीकि के एत्ते पैग शोक भेल आ वहि श्लोकक रूप मे परिणत भऽ गेल। निषादक कतेक रास उपजाइत वनल, एहन स्मृति मे उल्लेख अछि। तहियौक पुक्कस जाइत निषाद पुरुख आ शूद्र स्त्रीक संयोग सं उत्पन्न भेल अछि। अहि जाइतक काज विल मे रहय वला जीव के मारव छल। व्राह्मण पुरुख आ शूद्र स्त्री सं उत्पन्न पारशव जाइत के सेहो निषाद कहल जायत अछ। ओहि तरहे शूद्र पुरुष आ निषाद स्त्री से कुक्कुटक जाइतक उद्भव भेल। निषाद जाइतक पुरुख आ आयोगव जाइतक स्त्री सं जे संतान होयत अछि ओ मार्गव कहलायल जाइत अछि जे आर्यावर्त मे कैवर्त सेहो कहल जायत अछि। हुनकर कर्म नाव चलावैक छल। 'निषादं मार्गवं सूते दासं नौकर्म जीविनम् कैवर्त मिमियं प्राहुरार्यावर्त निवासिन:।1' तैत्तिरीय संहिता (10.34) निषाद पुरुष आ वैदेह स्त्री सं उत्पन्न प्राचीन काल मे चमड़ाक काज करहि वला कारावर जाइत उल्लेख अछि। निषाद स्त्री अ वैदेह पुरुख सं उद्भूत आंध्र जाइतक सेहो उल्लेख वायु पुराण (10.36) आ मत्स्य पुराण(50.76) मे अछि। मनु अप्पन स्मृति (10.37) मे निषाद पुरुख आ वैदेह स्त्री सं उत्पन्न अहिण्डक जाइतक चर्चा केने अछि, जे कारागारक देखभाल करैत छल। एहन कतेक रास निषाद प्रसूत जाइतक आपस मे मिश्रण भऽ जेवाक कारण समान कर्मा शक्तिशाली जाइतक विलयन भऽ गेल। उपयुक्त उपजाइत आव ते खोजै सं नहि भेटैत अछि। एहन कतेक रास उपजाइत समान व्यवसाय परक निषाद, धीवर, मल्लाह, कैवर्त आदि जाइत मे विलन भऽ गेल। ओहि छोट-छोट उपजाइतक अप्पन अस्तित्व रक्षाक लेल एहन भऽ जायव स्वभाविक छल। वैश्य पुरुष आ क्षत्रीय स्त्री सं उत्पन्न संतान कर्मा जाइत धीवर कहैलक। कौरव आ पांडवक दादा शान्तनु धीवर(मछुआरा) जरूथक पुत्री योजनगन्धा (सत्यवती) सं व्याह केने छल। अहि विवाहक पूर्व योजनगन्धा महर्षि वशिष्ठक पौत्र पराशरक संयोग सं कृष्ण द्वैपायन के जन्म देने छल, जे अप्पन कालक महाना आचार्य भेल आ महर्षि वेदव्यासक नाम सं विख्यात भेल। आदिकवि वाल्मीकि के किछु लोग व्याध (निषाद) मानैत अछि। मुदा दूनू व्राह्मण छल। रामायण आ महाभारत एकर साक्ष्य अछि। रामायण मे वाल्मीकि दू ठाम पर अप्पन परिचय स्वयं दैत अछि। राम द्वारा संपादित अश्वमेघ यज्ञक काल वाल्मीकि अहि यज्ञ मे सीता कऽ लऽ कऽ आवैत अछि आ राम के अप्पन परिचय दैत अछि प्रचेतसोअहं दशमपुत्रौ (उत्तरकांड 96/19) अर्थात हम प्रचेताक दसवां पुत्र छी। एक दोसर ठाम वाल्मीकि परोक्ष रूप सं अप्पन रामायण में अप्पन परिचय देने अछि। इति संदिश्य वहुशो मुनि प्राचेतसस्तदा वाल्मीकि परमोदारस्तष्णी मासीन्महा (उत्तरकांड 93/17) अर्थात अहि तरहे महायशस्वी प्रचेताक पुत्र वाल्मीकि दूनू शिष्यक शिक्षा दऽ कऽ चुप भऽ गेल छल। प्रचेता व्रह्मक पुत्र छल। मनुस्मृति (1.34.35) केर अनुसार व्रह्मा प्रजाक सृजनक कामना सं घोर तप द्वारा शुरू मे प्रजाक पति दस महर्षि के उत्पन्न केलक। ओ महर्षि मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वशिष्ठ, भृगु आ नारद अछि। वाल्मीकि अहि दस महर्षि मे एकटा प्रचेताक पुत्र छल। ताहि सं हुनकर व्राह्मण हेवाक मे कोनो संदेहक गुंजाइश नहि अछि। आध्यात्म रामायण (अयोध्या काण्ड, सर्ग6, श्लोक 65, 66) मे राम आ वाल्मीकिक वन मे मिलय केर प्रसंग अछि। वाल्मीकि राम के अप्पन विषय मे वतावय अछि, हम जन्म से द्विज छलहुं मुदा हमर आचरण शूद्र जेना छल। शूद्र स्त्री सं हमरा अजितेन्द्रिय द्वारा कतेक रास पुत्र उत्पन्न भेल। चोरक संग रहैक कारण हम सेहो चोर भऽ गेलहुं। स्कन्द पुराण मे सेहो उल्लेख अछि जे ओ व्राह्मण छल आ हुनकर नाम अग्नि शर्मा छल। मुदा शिकार (व्याघ्र कर्म) आ दस्युकर्म मे ओ लिप्त छल। वाद मे सप्तर्षिक कृपा सं ओ महर्षि वाल्मीकि वनि गेल छल। ओहि तरहे वेदव्यास सेहो व्राह्मण छल नै कि शूद्र। महाभारतक आदि पर्व मे हुनकर जन्मक कथा अछि। ओ महर्षि पराशरक पुत्र छल। हुनकर मां सत्यवती एकटा अप्सराक कन्या छल। राजा उपरिचर अहि कन्याक पालन-पोषणक भार मल्लाहक मुखिया जरूथ केर सौंपने छल। ओ नाव चलावैक लेल तट पर जायत छलि जतय हुनकर मिलन ऋषि पराशर सं भेल। संपूर्ण कथ महाभारत (आदिपर्व 63.70-86) मे अंकित अछि। पराशर महर्षि वशिष्ठक पौत्र छल। सत्यवती सं जन्म लऽ कऽ कृष्ण द्वैपायन (वेदव्यास) गुण, जाइत आ वर्णक दृष्टि सं महर्षि पराशरक वंश मे आवैत अछि। पराशरक पुत्र भला कोन आधार पर शूद्र कहल जायत अछि? समान व्यवसाय परक जाइत मे कतेक उपजाइतक तिरोहित भऽ जायके पश्चात निषादक वाइस उपजाइत एखनो अस्तित्व मे अछि. ई उपजाइत अछि, कोवट, कैवर्त, चौरा, तीवर, धीवर, वेलदार, विन्द, मल्लाह, सुरहिया, वनपर, गोढ़ी,खुलवट, कौल, जेठौत, परवतिया, चौदहा, राजवंशी, लहेरिया, महिषी, मुरियारी, केवट आ धोवी। निषादक अहि उपजाइत मे कैवर्त आ गोढ़ी सिंहेश्वरक कमरगामा, दुलार, , चम्पानगर, डंडारी, वभनी, गम्हरिया, टोका जीवछपुर, जलवार, महुली आदि गाम मे वहुलांश मे रहैत अछि। ई संपन्न कृषक अछि आ राजनीति मे हिनकर वर्चस्व अछि। ई एखनो भगवान शिवक उपासक अछि। मूर्ति स्थापना प्रत्येक वरख आषाढ़ पूर्णिमा केर कौशिकी मे नव जल उतरैत अछि। जलधारा तीव्र गति सं आगू वढ़ैत अछि। प्रत्येक वरख आषाढ़ पूर्णिमा के इतिहास क्षण भरि एतय रूकि के पद्म पलाश अर्पित कऽ जायत अछि। लागैत अछि, शून्य मे वेद ध्वनी गूंजि रहल अछि। नै जानय कहिया सं श्रृंगेश्वरक कौशिकीक जल पीयर भऽ गेल। तहिया सं कोशी पाण्ड, पडुआ या परवान धार वनि गेल। श्रृंगेश्वर थान मे ऋष्यश्रृंग एखनो जीवित अछि। श्रीमद्भागवत सुनावैत शुकदेवजी कहैत अछि 'गालवो दीप्तिमान रामो द्रोण पुत्र: कृपस्तथा। ऋष्यश्रृंग पितास्माकं भगवान वादरायण:।। इमे सप्तर्षयस्तत्र भविष्यन्ति स्वयोगत:। इदानि मासते राजव स्वे स्वे आश्रम मण्डले।।' (गालव, दीप्तिमान, राम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, ऋष्यश्रृंग, महर्षि वेदव्यास ई सातों ऋषि आठम सावर्णी मन्वन्तर मे सप्त ऋषि पद पर आरूढ़ होयत) अहि श्लोक सं ई सिद्ध भऽ गेल अछि जे ऋष्यश्रृंग आव आवय वला आठम सावर्णी मन्वन्तर मे सप्त ऋषि मेे से एकटा पद अवश्य ग्रह कऽ अहि कौशिकी अंचल के फेर सं महिम मंडित करत। ऋष्यश्रृंगक मूर्तिक स्थापना ऋष्यश्रृंगक तपोभूमि सिंहेश्वर थान मे अहि ऋषिराजक भव्य प्रतिमाक अभाव खटकैत छल। ऋष्यश्रृंग वंशोद्भव फारविसगंज (अररिया) निवासी गोलोकवासी मोहनलाल जी पाण्डेयक आत्मज श्री गोपाल पंडित (सिखवाल व्राह्मण) कुचामण सिटी जिला नागौर (राजस्थान) निवासी द्वारा संगमरमर निर्मित ऋष्यश्रृंगक भव्य प्रतिमा अप्पन माता श्रीमति पार्वती देवीक आदेशानुसार मंदिर परिसर मे स्थापित करैलक। अहि प्रतिमाक प्राण-प्रतिष्ठा-अनुष्ठान वैदिक मंत्रोच्चारणक संग दिनांक 20 जून, 2002 (गंगा दशहरा) के संपन्न भेल। मंदिरक विकास मे ई एकटा नव अध्याया जुडि़ गेल। सिंहेश्वर मेला एतय प्रत्येक वरख फाल्गुन शिवरात्रि मे वड़ मेला लागैत अछि। जखैन कोशीक विभीषिकाक कारण अहि क्षेत्र मे यातायातक घोर असुविधा छल, पूर्णिमा आ भागलपुर सं एकर संवंध टूटि जायत करैत छल तखैन अहि ऐतिहासिक मेलाक वड़ उपयोगिता छल। वैलगाड़ी पर सवार भऽ कऽ दूर-दराजक लोग अप्पन रसद-पइनक संग अहि मेला मे आवैत छल, अप्पन शिविर लगावैत छल, मेलाक आनंद लैत छल आ साल भरिक लेल अप्पन घरेलू उपयोगक वस्तु कीनैत छल। एतवेटा नै, पहिने ई मान्यता प्रचलित छल जे वावा (भगवान शिव) केर विवाह भऽ जाय केर वाद लोक अप्पन वाल-वच्चा सभहक विवाह तय करैत छल। एतदर्थ फाल्गुन महाशिवरात्रि के कन्य आ वरक देखा-देखी आ संवंध तय भऽ गेलाक संग व्याहक लेल उपयोगी समानक खरीद-फरोख्त सेहो अहि मेला मे होयत छल आ दहेज मे दैक लेल मवेशी सेहो मेला मे कीनन जायत छल। अप्पन दूरक कुटुम्व से भेंट-मुलाकात सेहो अहि मेलाक विशिष्ट ठाम छल। तहैयौका काल मे अहि मेलाक आर्थिक टा नै सांस्कृतिक महत्व सेहो वड़ छल। कोशीक वाढ़, मलेरिया आ दोसर प्राकृतिक आपदा सं जूझैत लोकक लेल ई एकट उल्लेखनीय विश्राम स्थल छल, जतय आवि के किछु दिनक लेल लोक अप्पन कष्ट कं विसुरि जायत छल, आगूक योजना वनावैत छल, आ अप्पन जिजीविषा के तरंगित कऽ जय भोलानाथ, जीयव के फेर आयव, जेहन प्रार्थना कऽ घुरैत छल। ई मेला सदी सं उल्लास आ आनंदक संगम रहल अछि। वावा भोलेनाथक पूजा-अर्चनाक वाद माटि खोदि केर वनायल चूल्हा पर अपने सं भोजन वनायव, दिन भरि मेल घूमव, टिकुली-सिनूर सं लऽ कऽ दोसर घरेलू सामान कीनव आ रात मे पन्ना लाल थियेटर कंपनीक नौटंकी देखव मेला दर्शनार्थी सभहक दिनचर्या छल। ई थियेटर कंपनी उत्तरप्रदेश सं प्राय: सभ वरख आवैत छल। एकर संस्थापक पन्ना लाल अपने एकटा कुशल कलाकार छल। लैला मजनूं, शीरी फरहाद, सुलताना डाकू, भक्त पूरन मल, माया मछन्दर, अमर सिंह राठौर आदि हुनकर श्रेष्ठ आ चर्चित नाटक छल जकर अहि मेला मे सफल मंचन होयत छल। नगारेक आवाज पर वहरेतवील मे सभ कलाकार अप्पन भूमिका के गावि के प्रस्तुत करैत छल। मंत्रमुग्ध दर्शक पात्र सं अप्पन साधारणीकृत कऽ अपूर्व आनंद, प्रेम, करुणा, राग-विराग, आक्रोश आदि भावक अनुभव करैत छल। अहि थियेटरक ई एकटा विशिष्ट गुण छल। गलढर सं चौठारी धरि चारि दिन धर मधेपुरा कचहरीक हाकिम-हुक्काम अहि मेलाक कैम्प करैत छल। सीरिज इंस्टीट्यूशनक चुनल गेल स्काउट कैलाश पति मंडल शिक्षक नेतृत्व मे मेला आ मंदिर परिसरक विधि व्यवस्थाक संचालन करैत छल। अनुमंडल मुख्यालय सं आरक्षी वल आ चौकीदारक ड¬ूटी सेहो मेला मे रहैत छल। कतेक वरख मेलाक अंत मे हैजा आ आगलग्गी सं जान आ सामान के क्षति सेहो भेल अछि। सभ रविवार आ वुधवार के हाट मे विक्र-वट्टाक अलावा अहि मेला मे भरपूर कमाई कऽ एतौका दुकानदार भगवान शिवक प्रसाद वुझि वरख वाद अगुलका मेलाक प्रतीक्षा करैत छल। मुदा, धीरे-धीरे समय वदलि गेल। यातायातक सुविधा सं लोकक पारस्परिक दूरी कम भऽ गेल। अहि क्षेत्रक कतेक गाम शहर वनि गेल जतय घरेलू उपयोगक सामान वहुलांश मे भेटय लागल। पहिने भगवान शिवक दरवार मे जतेक यज्ञ मुण्डन आ मनौतीक लेल ओयत छल आव वुद्धिवादक विस्तारक कारण ओहि मे गुणात्मक कमी आवि गेल। आव एतवै टा जरूर भेल अछि जे सभ साल हजार व्याह अहि मंदिर परिसर भे हुए लागल। सिनेम थियेटरक महत्व के किछु कम कऽ देने अछि, मुदा थियेटरक रंगीनी दिन-प्रतिदिन वढ़ैत गेल। पन्ना लालक मर्यादित थियेटर आव नै अछि। हुनकर स्थान रौता कम्पनी, शोभा थियेटर आदि लऽ लेने अछि। आव मर्यादित मनोरंजनक स्थान अश्लीलता ग्रहण कऽ लेने अछि। यै कारण अछि जे प्रशासन के विधि व्यवस्था आव आओर कड़ा करय पड़ैत अछि आ समय-समय पर असामाजिक तत्व सं मुकावला सेहो। अहि मेला मे सर्कस आ मौतक कुआं सेहो दर्शक के वड़ आकर्षित करैत अछि। सरकार द्वारा कृषि, उद्योग आ अन्यान्य नव-नव उपकरणक प्रदर्शनीक संग जनसंपर्क विभाग, खादी ग्रामोद्योग आदिक स्टाल मे दर्शकक भीड़ रहैत अछि। जीप, ट्रैक्टरक वाहुल्यक कारण आव हाथीक उपयोगिता कम भऽ गेल अछि मुदा मवेशी मे घोड़ा, बैल,भैंस आ वकरी सभहक खरीद-विक्री होवत अछि। सरकारी स्तर पर ई मेला पंद्रह दिन धरि, मुदा ओना एक माह धरि चलैत अछि। सातम परिच्छेद उपसंहार उत्तर वैदिक कालसं भारतीय संस्कृतिक जय यात्रा आरम्भ होयत अछि. अहि युगमे नै जानय कतेक संभावना साभ्यतिक यथार्थक विराट समुच्चयमे संग हेबाक लेल तैयार बैसल छल, जे बादमे महाकाव्यात्मक सम्पूर्णतामे अवतरित भेल. अप्पन वर्चस्वक लेल ब्राहमण, क्षत्रियमे भयंकर युद्ध सभ्यताक एहन यथार्थ छल जे अहि देशक सांस्कृतिक जीवनके बेसी क्रियाशील बना देलक. पुरुष सूक्तक ब्राहमणोस्य मुखमासीद वाहू राजन्यः कृतः, के मोताबिक सभ वर्णमे ब्राहमण श्रेष्ठ छल. अप्पन ज्ञान-विज्ञानक कारण समाजक सांस्कृतिक बागडोर हुनके हाथमे छल. ब्राहमण सत्व शक्ति सम्पन्न छल, ते छत्रिय रजः शक्ति सम्पन्न. उत्तर वैदिक कालमे ब्राहमणक विशिष्टता आ श्रेष्ठताके फेर सं प्रतिपादित करल गेल छल. अहि कालमे समाजक संगठन सेहो शुरू भ’ चुकल छ्ल. संगे वर्ण व्यवस्थाक स्वरूप सेहो निश्चित भ’ रहल छल आ सभ वर्णक श्रेणीक निर्धारण सेहो. उत्त्तर वैदिककालीन समाज व्यवस्था आ महाकाव्यकालीन समाज व्यवस्थामे कोनो अंतर नै छल. महाकाव्यमे वर्णित समाजक आधारशिला पूर्ववर्ती समाज व्यवस्था छल. अहि समाजमे अध्ययन, अध्यापन, यजन-याजन आ दान-प्रतिग्रह जेहन प्रमुख कार्य सं राज्य आ समाजक सभ क्षेत्रमे ब्राहमणक सर्वोच्च पद भेटल छल. शैक्षणिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक आ आर्थिक विशेषाधिकार हुनका प्राप्त छल. ब्राहमण सभ वेदक ज्ञाता आ सभ विद्यामे मर्मज्ञ होयत छल. विद्वता आ ज्ञानक कारण ओ भारतीय समाजमे सर्वश्रेष्ठ छल. अप्पन सक्रियता, दूरदर्शिता आ कर्तव्य परायणता सं ओ समाजक निर्माण करैत छल. धार्मिक क्रियाक उद्देश्य समाजमे एकजुटता आ अटूट संगठन स्थापित करब सेहो छल. अहि धार्मिक क्रियामे राज्य आ समाजक कल्याण निहित छल. ओ राजा आ समाजक कल्याणक निमित्त यज्ञ सम्पन्न करैत छल. ऋग्वेद (10.71.9) के मोताबिक, शत्रुक आक्रमणक काल ओ अप्पन राजाक संग युद्धभूमिमे जाइके सैनिकक उत्साह बढाबैत छल. ब्राहमण राजाके अप्पन प्रजा आ राष्ट्रक प्रति कर्तव्यबोध करबैत छल. शतपथ ब्राहमण (11.5.7.1) के मोताबिक राजाक राज्याभिषेकक काल ब्राहमण पुरोहित उपस्थित जनसमुदायके संबोधित करैत छल, ‘हे प्रजा, ई व्यक्ति अहाँक राजा अछि. ब्राहमणक राजा ते सोम अछि.’ अहि कथन सं स्पष्ट अछि जे ब्राहमण राजासं उपर बेसी आश्रित नै छल, मुदा राजा स्वयं ब्राहमणक मुखापेक्षी छल. क्याकि ब्राहमणक बिना राजाक अभिषेक हैय पायब कठिन काज छल. धार्मिक काजमे ब्राहमणक अनिवार्यता पुरोहितक पदक विकास केलक. संकटकालीन स्थितिमे ब्राह्मण शस्त्र सेहो ग्रहण क’ सकैत छ्ल. दोसरा दिस, क्षत्रिय सेहो ब्रह्मतेज के पाबय लेल अनवरत क्रियाशील छल. ओ अप्पन श्रेष्ठताक स्थापित करैक लेल कतेक रास प्रयास केलक. क्षत्रिय ब्राहमणक बौद्धिक चुनौती स्वीकार नै केलक, मुदा कतेक रास विद्वान, दार्शनिक आ तत्वज्ञानी क्षत्रिय शासक कतेक रास ब्राहमणके अप्पन शिष्य बनौलक. एहन क्षत्रिय शासकमे जनक, अश्वपति कैकेय, काशिराज अजातशत्रु, प्रावहण जैवलि आदि प्रमुख छल. छान्दोग्य उपनिषद (5.3.7) के मोताबिक पंचाग्नि-विधाक उद्भव आ उन्नयन क्षत्रिय सबहक कारण भेल छल, जेकर दर्शन तत्व छल आवागमनक सिद्धांतक प्रतिपादन. ई विद्या ब्राहमणक लग नै गेल छ्ल. ताहि सं सम्पूर्ण लोकमे अहि विद्या सं क्षत्रिय के शिष्यों क’ ल’ क’ अनुशासन हैत रहल छल. (दृष्टव्य प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास, डा. जयशंकर मिश्र, पृष्ठ 121-122) ब्राहमणक तरहे क्षत्रियक अध्ययन-अध्यापनक अधिकार छ्हल मुदा ओ यज्ञ नै करा सकैत छल. अहि तरहे समाजमे क्षत्रियक अधिकार ब्राहमणसं फरछायल छल. ज्ञानक आलोक भेटलासँ क्षत्रिय अपनाकेँ सात्विक दिस मोड़ैक प्रयास केलक. आ सांस्कृतिक क्षेत्रमे अप्पन वर्चस्व काएम करए चाहलक. ई स्मरणीय अछि जे अइ युगमे पौण्डरक, ओडू, द्रविड़, काम्बोज, यवन, शक, पारद, पह्लव, चीन, किरात, करद आ खश जेहन हस्ती सभ सेहो अइ देशमे आएल. जे अप्पन कुशलता आ सक्षमतासँ ब्राहमण द्वारा चतुर्वर्णमे विधिवत समाविष्ट कएल गेल. एहन संघर्षशील संगठनात्मक व रचनात्मक कालमे ब्राहमणक सूझबूझ, तत्परता आ याचिक कर्मकांड आ क्षत्रिय कर्तव्य कर्म आ तेजक प्रभाव छल जे तहियाक भारतीय समाज एतेक संवर्धित भेल. मुदा, जाइ ब्रह्म्बल आ बाहुबलक सामंजस्य ऐ देशक आ भारतीय समाजक अविस्मर्णीय विकास केलक आ राष्ट्रीय धाराकेँ गतिमान केलक ओही स्पर्धा आ ईर्ष्याक कारण ओ एक-दोसराकेँ रणक्षेत्रमे ललकारए लागल. वशिष्ठ आ विश्वामित्रक युद्ध (देखू पांचम अध्याय), परशुराम आ क्षत्रियक लोमहर्षक संग्राम (दृष्टव्य ब्रहमवैवर्त पुराण, गणपति खंड, अध्याय 40), दधीचि आ क्षुवधु नामक राजाक युद्ध (शिवपुराण, अध्याय 38, 39) आदि एहन वृतांत अछि, जे ब्राहमण-क्षत्रिय स्पर्धा जनित अछि. दधीचिक युद्धभूमि तँ अखुनका सिंहेश्वर स्थान अछि. श्रृंगश्वरश्च नाम्ना वै वैद्यनाथ स्तथैव च. जपेश्वर स्तथा ख्यातो यो दधीचि रण स्थले. शिवपुराण (रुद्रसंहिता) अ.2 अर्थात दधीचिक रणभूमिमे श्रृंगश्वर, वैद्य्नाथेश्वर आ जपेश्वर नामक लिंग प्रसिद्द अछि. अइ युद्धमे क्षत्रिय राजाक सहायता करै लेल स्वयं भगवान विष्णु आएल छल, जकरा दधीचिसँ हारए पड़ल छल. कतेक रास संघर्षक बादो समाजमे ब्राहमणक श्रेष्ठता बनल रहल. क्षत्रिय एकरा छीन नै सकल. विश्वामित्र क्षत्रिय छल. ओ ब्रह्मर्षि पदक प्राप्तिक लेल कठोर तप केलक. हुनका ब्रह्मर्षि बनि जेबाक प्रमाणपत्र वशिष्ठकेँ दिअए पड़लै. ब्रह्मा सेहो प्रगट भ’ क’ हुनका वर मांगैले कहलक. विश्वामित्र कहलखिन जे हम ब्रह्मर्षि हुअए चाहै छी. मुदा मात्र अहाँकेँ ब्रहर्षि कहलासँ हमरा संतोष नै हएत जाधरि स्वयं वशिष्ठ आबि क’ हमरा ब्रह्मर्षि नै मानि लेत. महर्षि भृगुक विष्णुकेँ लात मारब सेहो ब्राहमण-क्षत्रियक झगड़ाक वृतांतक एकटा कड़ी अछि. ओहि वृत्तांतसँ ई स्पष्ट अछि जे ब्राहमण क्षत्रिय सँ श्रेष्ठ अछि. ऋष्यशृंग ओइ युगमे उच्च कुलोद्भव ब्राहमण छल मुदा तहियोका ब्राहमणमे व्याप्त युद्धोन्माद सँ ओ दूर छल, बड दूर. ओ अप्पन कालक महान समन्वयवादी ऋषि छल. ओ क्षत्रियक विरोध नै केलक, मुदा हुनकर हितक काज, जाइसँ समाज उन्नति करए, तकरे संपादन केलक. हुनकर आगू जातीय स्वार्थ नै, राष्ट्रक कल्याण आ मंगलभावना छल. ओ क्षत्रिय राजा रोमपादकेँ अप्पन ससुर बनौलक. ई जानैत जे रोमपाद उच्च कोटिक क्षत्रिय नै अछि आ हुनकर वंश शाप भ्रष्ट अछि. ओ ओइ संबंधक सहर्ष स्वागत केलक. एकटा वृत्तांतक मुताबिक रोमपादक पूर्वज महाराज बलिक स्त्री महारानी सुदेक्षणासँ अंध दीर्घतमा अंग, बंग, कलिंग, पुंडर, सुहा आ आंध्र छहटा नेना जन्म लेलक. कतेक रास वृतांतमे आन्ध्रक उल्लेख नै अछि. पांचटा नेनाक उल्लेख अछि. कहल जाइत अछि जे गर्भाधानक काल किछु एहन घटना भ’ गेल छल जे दीर्घतमा अइ नेनाकेँ क्षत्रियत्व सँ भ्रष्ट क’ देलक. ई स्मरणीय अछि जे राजा बलि संतानोत्पत्तिक लेल अप्पन स्त्री सुदक्षणाकेँ आन्हर ऋषि दीर्घतमाक पास पठेने छल. रानी ‘हँ’ त’ कहि देलक मुदा ओइ दिस हुनकर रूचि नै छल. ओ सोचलखिन, एकटा त’ ऋषि अछि, दोसर आन्हर. संगे-संग हुनकर देह सेहो कार आ कुरूप छल. ताइसँ ओ अप्पन एकटा दासीकेँ लग भेज देलक. मुनि ओकरासँ कक्षीवान आदि कतेक रास पुत्र उत्पन्न केलक. जखन वस्तुस्थितिक जानकारी राजाकेँ भेटल तखैन राजा बड्ड बुझा-सुझा क’ रानी केँ तैयार केलक आ दीर्घतमा लग पठौलक. दीर्घतमा आन्हर होइक बादो बड रतिप्रिय छल. सुरभिक नेना वृषभसँ ओ गोधर्मक शिक्षा प्राप्त केने छल. आँखि नै रहबाक कारण ओकरा शील संकोच सेहो नै छल. कत’ मानव धर्मक मर्यादित परिवेशमे रहएवाली सुदेक्षणा आ कत’ गोधर्ममे निष्णात दीर्घतमाक उद्दाम रति व्यवहार. भला कोन मेल हुअए? ताइसँ ई तमसाएल ऋषि अप्पन नेनाकेँ क्षत्रियत्वसँ च्युत क’ देलक. ई सभटा पुत्र यशस्वी राजा जरूर भेल मुदा विशुद्ध क्षत्रिय नै भ’ क’ एकटा विशिष्ट जाति बला भेल. अइ वंशमे महाभारत कालमे ‘अधिरथ’ भेल जिनकर ‘सूत’ आ हुनकर पुत्र ‘कर्ण’ ‘सूतपुत्र’ कहल गेल. अइ क्षेत्रक निवासी आ राजवंश ब्राहमण ग्रन्थमे व्रात्य कहल जाए लागल. (देखू, व्रात्य, पहिलुक परिच्छेद) जेना राजा बलि क्षेत्रमे दीर्घतमा आ पुत्र उत्पन्न केलक, जे ब्राहमण भेल. (दृष्टव्य श्री भागवत दर्शन खंड 35, पृष्ठ : 39-46) ऋष्यशृंग अइ सभटा भेदभावसँ ऊपर छल. ओ अप्पन मनमे ई भाव आनबे नै केलक जे ओ उच्च कुलोद्भव ब्राह्मण आ महान आचार्य होइक बादो निम्न कोटिक क्षत्रिय कन्याक पाणिग्रहण क’ रहल अछि. संगे पहिनेसँ चलल आबि रहल क्षत्रियक प्रति ब्राहमणक द्वेषकेँ ओ समग्र रूपसँ निरस्त क’ देलक. अइ तरहेँ शान्ताक पाणिग्रहणक बाद क्षत्रिय आ ब्राहमणमे प्रसन्नताक लहर आबि गेल. ई स्वाभाविके छल. आब दुनू एक-दोसराक प्रति युद्धक कटुताकेँ बिसरि शांति, सद्भावना, समन्वय आ समरसताक स्थापनामे जुटि गेल. अइ परिवेशमे विकासक काज बेसी भेल. देशक सभ टा क्षत्रिय राजा ऋष्यश्रृंग केँ जमाय जेना सम्मान देलक. ब्राहमण आ क्षत्रिय शान्ति चाह’ लागल. ओ सभ कियो महासमर, दशराग्य युद्ध, वशिष्ठ-विश्वामित्र, परशुराम आ सहस्त्रार्जुन युद्ध आदि सबहक़ विभीषिका देखि चुकल छल. दशराग्य युद्धमे पचास हजार सँ बेसी ब्राहमणक वध भेल छल. राजा रोमपादक अइ वैवाहिक अनुष्ठानकेँ सम्पन्न कराबैक पश्चात ब्राहमण-क्षत्रिय एकता सभ दिन लेल स्थायित्व प्राप्त क’ गेल. ईहो एकटा कारण भ’ सकैत अछि जे भारतमे क्षत्रिय सभ ऋष्यशृंगक कतेक रास मंदिर बनबौने अछि. मुदा, कतिपय कट्टरपंथी केँ ब्राहमण-क्षत्रियक ई मेल आ आर्य-अनार्यक समन्वयक प्रयास नै सोहाएल. समाजमे एहनो लोक रहैत अछि जे स्नेह, सद्भावना आ समन्वयक वातावरण नै, अशांति आ विघटन पसिन्न करैत अछि. अहिने लोक सभ ऋष्यशृंगक प्रतिभा आ लोकप्रियतासँ ईर्ष्या सेहो कर’ लागल. ई गप सर्वविदित अछि जे ऋष्यशृंग सभसँ पहिने पुत्रेष्टि यज्ञ करेने छल आ एकर मंत्रदाता आ मंत्रोचित अनुष्ठानक मंत्रक पुरोधा छल. मुदा हरिवंश पुराणमे संकलित पुत्रेष्टि-यज्ञक सैकड़ासँ बेसी मंत्रक संग कत्तौ ऋष्यशृंगक नाम धरि नै अछि. ओतए मात्र ‘ऋषि उवाच’ टा अंकित अछि. कोनो ऋषिक नाम नै अछि. हमर विचारसँ ई उत्तर वैदिक कालमे सभसँ पैघ षड्यंत्र छल. तपोपुंच समन्वयवादी ऋष्यशृंगक छविकेँ मैल करैक लेल कट्टरपंथी सभ कतेक रास घृणित षड्यंत्र रचने छल. ओ कट्टरपंथी ऋष्यशृंगक उदारवादी नीतिसँ जरैत छल. ऋष्यशृंग आर्य टा मे नै, अनार्य मे सेहो अप्पन साधना तपस्याक पावन स्थल बनौलक. पूबमे वर्तमान अरुणाचल प्रदेशक सुनसरी नदीक तट पर ओ तपस्या केलक. हुनकर स्मृति चिह्न ई स्थल आइ धरि समेट क’ राखने छल. हुनकर ई तपस्थल ‘श्रृंग गुड़ी’ क नामसँ चर्चित रहल हएत, जे बाद मे ‘सिंगोड़ा’ बनि गेल. अइ क्षेत्रमे ‘गुड़ी’ शब्द ठामक लेल प्रयुक्त होइत अछि. वेगवती सुनसरीक धारक कात सिंगोड़ा घाट आ घाटपर स्थित विभंडक आश्रम एखनो ऋष्यशृंगक तपस्याक साक्षी अछि. एकर आगू वनाच्छादित पहाड़ी अछि. ओकर नीचा ऋष्यशृंग मंदिर. एत’ सभ बरख फाल्गुन कृष्ण पक्षपर शिवरात्रिक मेला लागैत अछि. एतौका मोपा, शर्दुकमेन, दिगारू, निशि, अपतनी, हिलमिरी, तगिन, खुम्परी, बाँचू, तंगसा, मिजि आदि भाषा-भाषी आदिवासी लोकसँ पूछू. ई अहाँकेँ ‘सिंगोमुनी’ केँ ल’ क’ बताएत, कलकल करैत सुनसरी धार आ पहाड़पर झुमैत खेती सभटा ‘सिंगोमुनी’ केर प्रसाद अछि. ईसाई धर्मक अइ इलाकामे प्रचार-प्रसारक बाद अइ ठामक महत्व किछु गौण भ’ गेल अछि. मुदा पुरना पीढीक आदिवासीक मनमे अइ ठामक चमत्कारिक वृत्तांत अखनो पुरान नै पड़ल अछि. किछु दिन बाद भ’ सकैत अछि जे ई स्मृति-चिह्न कालक प्रवाहमे बहि जाए. भारतक ई पूर्वी प्रदेश जत’ अस्पृश्य नरभक्षी अनार्य जाति निवास करैत छल, ओइ युगमे आर्य आ अनार्य दुनू फराक-फराक कोनपर अछि. मुदा शांति, तप आ समन्वयक पुरोधा ऋष्यश्रृंगक लेल आर्यावर्तक समुच्चा धरती हुनकर साधना स्थली छल. ओ अस्पृश्यताकेँक धर्मक कलंक आ एकटा दानवीय कृत्य मानैत छल. सनातन धर्ममे अस्थायी अस्पृश्यता कालांतरमे जन्मजात अस्पृश्यताक जे रूप ग्रहण केलक ओ अइ धर्मक विघटनक कारण भेल. ऋष्यश्रृंग दूरदर्शी रहथिन. ओ अप्पन कालमे देखि लेने छल जे रक्त-शुद्धि आ दस्यु व अनार्यकेँ आर्य धर्ममे संस्कारित करबाक प्रश्नपर महर्षि वशिष्ठकेँ अप्पन दृढ़ सिद्धांतक आकाशचारी आसनसँ नीचाँ उतरि वास्तविक आ जीवनगत यथार्थक सन्दर्भमे लाचार भ’ क’ अप्पन व्यवहार बदलए पड़ल किएकि दुनू जातिक समन्वयसँ राष्ट्रक मुख्यधारा तीव्रगतिसँ प्रवहमान छल. विश्वामित्रक बाद ऋष्यशृंग अइ धाराकेँ बेसी गति देलक. विश्वामित्र शस्त्रक सेहो प्रयोग केलक मुदा ऋष्यशृंग विपरीत सांस्कृतिक क्षेत्रमे भावनात्मक जनसंपर्क, शास्त्र ज्ञान, यज्ञ आ तपसँ हुनका सांस्कृतिक दृष्टि सँ पराभूतकेँ अप्पन धारामे जोड़ै लेल आजीवन क्रियाशील रहल. सुदूर पूबक मोपा, मिज, तंगसा जेहन अति दुर्गम क्षेत्र हुअए बा दक्षिणक तुंगभद्राक सघन वनाच्छादित द्रविड़ क्षेत्र, ऋष्यशृंग निर्भय आ निर्विकार भावसँ एत’ तप करैत छल, शास्त्रज्ञानसँ जनजीवनमे नव आलोक प्रदान करैत छल आ एक दीपसँ दोसर दीपकेँ प्रज्ज्वलित करैत छल. देशक पश्चिम आ उत्तरमे ऋष्यशृंगक ढेर रास मंदिर अछि, जे या तँ हुनकर तपस्या आ यज्ञस्थलीक स्मृतिक चिह्न अछि या हुनकर वंशक बनाओल स्मारक स्वरूप मंदिर आ समाधि. ओइ ऋष्यशृंग वंशज मे किछु ब्राहमण, किछु क्षत्रिय आ किछु दुनूक बीच एकटा दोसर जाति अछि जना श्रंग्वाल, श्रृंगी, शिखवाल, सिखवाल, श्रीन्ग्पुरी (महाराष्ट्र मे), नायक (मध्यप्रदेश मे), श्रृंगी ऋषि (कर्नाटक मे) ब्राहमण . दोसर दिस श्रिंगा (राजस्थान मे), विशेनवंशी, सेंगर वंशीय, शुंघ वंशीय जेहन कतेक रास क्षत्रिय समुदाय अछि जे अपनाकेँ ऋष्यशृंगक वंशज मानैत अछि. ताइसँ देशक विभिन्न भागमे हुनकर वंशजक बनाओल कतेक रास मंदिर, आश्रम आ समाधिक रूपमे अइ महान ऋषिक स्मृति चिह्न अछि. एकरामे कतेक रास एहन चर्चित स्थल अछि जे ऋष्यशृंगक जन्म आ मृत्युसँ हुनकर संबंध जोड़ैत अछि. पुराकाल मे ऋषि विशेषक मुख्य समाधिक अतिरिक्त आर ठाम पर कतेक रास समाधि होइत छल. एहन समाधिमे श्रद्धालु दिवंगत ऋषिक दांत, कमंडल, खड़ाम, चुट्टा आदि समाधिक भीतर राखि देल जाइ छल. यवनक आश्रमसँ कतेक मंदिर ध्वस्त भ’ गेल आ समाधिक धरतीकेँ गीरि गेल. कतेक स्मारक पुनर्निर्माण बादमे श्रद्धालुक वंशज करौलक. महाराष्ट्रमे भुसावलमे ऋष्यशृंगक एकटा मंदिर छल. ताप्ती धारमे बान्ह बनलासँ ई मंदिर धारक पानिमे समाधि ल’ लेलक. एत’ स्थापित ऋष्यशृंगक मूर्तिकेँ सरकारक सहयोगसँ श्रद्धालु फराक मंदिर रावेरमे फेर सँ स्थापित केलक. मन्दिरमे ऋष्यशृंगक पूजा होइत अछि मुदा समाधिमे नै. किएकि आर्य संस्कृतिमे समाधि पूजाक विधान नै अछि, एकरा श्मशान पूजन जेहन अशुद्ध कर्म मानल जाइत अछि. भारतवर्षक प्रायः सभ राज्यमे ऋष्यशृंगक मंदिर अछि. एहन गौरव कोनो दोसर ऋषिकेँ नै भेटल अछि. किछु मंदिरक विवरण नीचाँ देल जा रहल अछि. बिहार श्रृंगेश्वर स्थान (सिंहेश्वर स्थान) जिला मुख्यालय मधेपुरासँ आठ किलोमीटर उत्तर ई सुप्रसिद्ध शैव तीर्थ स्थल अछि. मुख्य शिव मंदिरमे ऋष्यशृंग अप्पन मंदिरमे स्थापित छथिन.(देखू परिच्छेद छठम) ऋषिकुंड (देखू सम्पादकीय) राजगीर पटनासँ 120 किलोमीटर दक्षिण ऋष्यशृंगक तपस्या स्थल. नीलगिरी पर्वतसँ जुड़ल सप्तकुंड. रत्नगिरि पर्वतक नीचाँ एक तप्त कुंड जेकरा ऋष्यशृंग कुंडक नामसँ जानल जाइत अछि. आइ-काल्हि ई मकदुम कुंडक नामसँ चर्चित अछि. उत्तरप्रदेश श्रृंगवेरपुर (देखू चारिम परिच्छेद) परीक्षितगढ़ मेरठ रेलवे स्टेशनसँ एक किलोमीटर दूर पर ऋष्यशृंग आश्रम. कन्नौज ऋष्यशृंग मंदिर. सिहीराम (श्रृंगीराम) फरुखाबाद भगीरथीक कात ऋष्यशृंग मंदिर. एत’ सभ बरख दशहरामे मेला लागैत अछि. अगस्त्य नगर (अगस्त्य मुनि, चमोली) उत्तरांचलक अलकनंदा पर्वतपर ऋष्यशृंग आश्रम. नेमिषारण्य (सीतापुर) लखनऊ सीतापुर रेलवे लाइनक कात भव्य मंदिर. मध्यप्रदेश आ छतीसगढ़ चांदा (चंदपुर) सादक (मांडक) नामक स्थानपर ऋष्यशृंगक पिता श्री महर्षि विभाण्डकक प्राचीन आश्रम (सादक आ मांडक विभाण्डक क बिगड़ल रूप अछि) झरबाबरवासागर झाँसी मांदेर रोड पर पुत्रेष्टि यज्ञ स्थल आ मंदिर. सिहोबा (देखू चारिम परिच्छेद: महानदीक प्रगट हएब) मंदसौर गीताभवनमे ऋष्यशृंग मंदिर आ धर्मशाला. गुजरात बिलोद (भड़ोच) नर्मदा धारक कात ऋष्यशृंग आ शान्ताक तपस्या स्थल आ अइ क्षेत्रक प्रमुख ऋष्यशृंग आश्रम. महाराष्ट्र कोपरगांव गोदावरी धारक कात ऋष्यशृंगक समाधि आ महर्षि विभाण्डक मंदिर. एत’ सभ बरख चैत्र मासमे मेला लागैत अछि. तापसवाडी (ल. राकेर, जिला. जलगाँव) ऋष्यशृंगक प्राचीन मंदिर, जे श्रीन्ग्य देवक नामसँ प्रसिद्द अछि. सींगत (पो. तांदुलवाडी, त. रावेर जिला. जलगाँव), तांदुलवाडी भुसावलसँ 14 किलोमीटर सुखल धारक कात ऋष्यशृंगक प्राचीन मंदिर. रिश्य्श्रीन्ग्य पदमासन मे. आष्टी (नांदेड़) ऋष्यशृंग आश्रम आ मंदिर. अनसिंग (जिला. वासिम, महाराष्ट्र) ऋष्यशृंग मंदिर. कारला (त. पुषद, जिला. यवतमाल) ऋष्यशृंग समाधि. राजस्थान ढ्सुक (जिला. अजमेर) मंदिर सरेडी (जिला भीलवाड़) मंदिर आ स्कूल. विजय स्तम्भ दोसर, चारिम आ छअम महल पर ऋष्यशृंग आ शान्ता माताक मूर्ति लागल अछि. (महाराणा कुम्भाक सम्मान शोधक विषय). मात्रिकुंदिया (जिला चित्तौड़गढ़) बनास धारक कातक मंदिर. बून्दी मंदिर आ धर्मशाला. संगावदा (जिला बूंदी) त्रिवेणीक कात मे. चंदेसरा (जिला उदयपुर) मंदिर. जैतारण (जिला पाली) मंदिर आ धर्मशाला. केशवराय पाटन (जिला बूंदी) मंदिर. जयपुर मंदिर आ ऋषि श्रीन्ग्यश्रम. केकड़ी (जिला अजमेर) मंदिर आया धर्मशाला. रवैरावाद (जिला कोटा) मंदिर. भ्रिभासनी (जिला नागौर) मंदिर. उदयपुर रिश्य्श्रीन्ग्य मंदिर. भीलवाड़ा ऋष्यशृंग संस्थान. रिश्य्श्रिंग आ माता शान्ताक मंदिर. 19 मई, 1996 केँ मूर्ति मे प्राण-प्रतिष्ठा भेल. विशाल परिसर, स्कूल, धर्मशाला आदि. पुष्कर. ऋष्यशृंगक मंदिर, अ. भा. सिखवाल ब्राहमण महासभाक कार्यालय. चित्तौड़गढ़ (बड़ामठ) ऋष्यशृंग आश्रम आ छात्रावास. कोलर (पाली) अरावली पर्वत श्रृंखलापर मंदिर. फुलाद रेलवे स्टेशनसँ 35 किलोमीटर. मूर्तिक प्राण-प्रतिष्ठा 4 मई, 1987 केँ भेल. वर्षा ऋतुमे प्राकृतिक छटा दर्शनीय. कर्नाटक शृंगेरी मठ (देखू चारिम परिच्छेद) श्रृंग गिरि (देखू चारिम परिच्छेद) आंध्रप्रदेश हैदराबाद ऋष्यशृंग मंदिर आ धर्मशाला. हिमाचल प्रदेश बागी (बनजार जिला कुल्लू) ऋष्यशृंग मंदिर संकीर्ण (त. वंजार, जिला. कुल्लू), जे नौ मास बर्फसँ झाँपल रहैत अछि. अति प्राचीन ऋष्यशृंग मंदिर आ लगमे हुनकर योगनी कुंड. धौंधी (वंजार) ऋष्यशृंग मंदिर (ई पांच सौ साल पुरना अछि) एकर अलावे दोसर-दोसर ठाम अज्ञात ठामपर सेहो ऋषिराजक स्मृति चिह्न हएत. ई ऋष्यशृंगक गौरवोज्ज्वल कीर्तिक साक्षी अछि. अइ ग्रन्थक समापनक पहिने हम श्रद्धापूर्वक यजुर्वेदक सर्व शक्तिमान परमेश्वरक विराट स्वरूपक स्मरण करैत छी. सहस्त्र शीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात. सह भूमिं सर्वतः स्प्रत्व त्यातिष्ठद्द्शालान्ग्लम. तस्माद्द्याग्यात्सर्वहुत ऋचः समानी जज्ञिरे. छंदासी जज्ञिरे तस्मात्यास्त्जुत्तास्माद्जायत. सृष्टिकक आरम्भ मे परम पूर्ण अत्यंत पूजनीय सर्वहुतः परमात्मा सँ (ऋचः) ऋग्वेद (सामानि) सामवेद (जज्ञिरे) उत्पन्न भेल. (तस्मात) ओइ परमेश्वरसँ (छन्दां॑सि) अथर्ववेद (जज्ञिरे) उत्पन्न भेल. (तस्मात्यजुः अजायत) ओइ प्रभुसँ यजुर्वेद उत्पन्न भेल. आ चराचर मे व्याप्त मंत्रदृष्टा ऋष्यशृंगक असीम अनुग्रहकेँ दुनू हाथ जोड़िक’ प्रणाम निवेदित करैत छी. ऊं ऋष्यशृंगे नमः परिशिष्ट (क) पुत्रेष्टि यज्ञ ब्रहमचारी कृष्णदत्त 30 बरखक युवक छल. ओ पढ़ल-लिखल नै छल. कोनो विद्यालयमे ओ प्रवेश नै लेने छल. ओ महान योगी छल. ओ योग निकेतन ऋषिकेषक श्री योगेश्वरानंदजी महाराजक शिष्य छल. जखन ब्रहमचारी कृष्णदत्तयोग समाधिमे लीन भ’ जाइ छल तखन हुनकामे दिव्य ज्ञानक धारा प्रवाहित हुअए लागैत छल. कहल जाइत अछि जे ऋषिक आत्मा हुनकापर उतरैत छल आ ओ अर्धचेतन आ अचेतनावस्थामे ओइ ऋषि सभसँ कतेक रास काज-धाज क’ आध्यात्मिक आ वैज्ञानिक व्याख्या करैत छल. एहन लागैत छल जे ओ सतयुग मे पहुँच गेल अछि जाइमे वैदिक संस्कृति देवत्व, सत्य, धार्मिक आ पवित्र आत्मा सर्वोपरि अछि. ब्रहमचारी कृष्णदत्तक अचेतावस्थामे एहन वैज्ञानिक आ आध्यात्मिक व्याख्या आ विश्लेषण विजडम ऑफ़ द एंसियेंट रिसीज (WISDOM OF THE ANCIENT RISHIES)मे संकलित अछि. एकर प्रकाशक अछि वैदिक अनुसंधान समिति III, E-31 लाजपतनगर, नई दिल्ली-24. अहि ग्रंथक मूल हिंदी मे आब नै भेटैत अछि. अंग्रेजी मे अनूदित ग्रंथ उपलब्ध अछि. पुत्रेष्टि यज्ञक संबंधमे अइ अमूल्य ग्रंथक एकटा उद्धरण प्रस्तुत अछि. अइ ग्रंथमे लेखकके ऋष्यशृंगक पुनरावतार कहल गेल अछि. Puttreshthi Yajna (Sacrificial ceremony for a son’s birth) and medicines. A herb- ‘Kathakuta’ growing on mountains, blooms with the white flower, keeps one thousand insects in the lower part of its root. Its body is white blue and leaves look like pun sagati. Sweet in its root and bitter in its top, this herbal medicine has to be mixed with another medicine known as ‘ShankhaAnuvat’. Its flower looks like the flower of an Almond plant. It has a bitter bark although its root is replete with ‘Baka’ a tasteless juice which is also known as Akrata. The three doses of its leaves, bark and root be mixed with the five of that of ‘Kirkir’ (an herb I have already mentioned) to make a perfect ‘Astanga’. A leaf like cake should be prepared of this substance and be kept in an earthen pot to absorb its poisonous properties. This refined medicine has a curative effect on all gynecological troubles of urethra, eyes, Anawat (a vein) and other physical deficiency, if administered of a period of forty days. The panchang and the trigat are other prepa rate on like Astang. I had studied all of them along with the other skills of Ayurveda for 84 years before I (Shrangi Rishi) conducted ‘Puttereshthi’ Yajna for the emperor Dashratha. This Yajna can be successful performed only by a master of Ayurvedic knowledge. Only a few crudité scholars of this science know this therapy by which ailing organs of human body viz. eyes, ears, tongue etc. can be cured. Diagnose of Dashratha Before setting up a yajnashala or the place for sacrifice of ‘Puttreshthi’, I examined the king Dashratha well and examined closely his ‘Akrata-Dwar’ one of the entrances in human body each haunted by a deity. The two eyes are consecrated by Jamdagni and Vishwamittra. The front of ear and that of nose is enshrined by Bharadwaj and Ashwani Kumar respectively. To purify them, one has to know these different medicines which are named after their name. Accordingly they are called Jamdagni medicine, Bharadwaj medicine and so on. These medicines have different therapeutic range. In Puttreshthi, in addition to other articles, the fuel (woodenslices) of aak, shami, Jatamansi, Trikata, Chandari (AnubhutaSamubhukta) Anikrata are required. The altar hasin in Yajnashala be shaped as virginal canal of womanand that too of the same size which the virginal canal of the woman desiring son, has held. The smoke and odor created by such a sacrifice can cure and make up all diseases and deficiencies of my barren daughters. This is a miracle of Ayurveda which can’t be mastered in a single span of human life. Diagnose of the Wives of Dashratha I, (Shrangi Rishi) had also availed the occasion of the examining perfectly all the three wives of Dashratha. On the basis of Ayurvedic Knowledge, I had to see the shape of their virgina-canals without which, I could have never set up the desired Yajnashala. Though a disgraceful act, yet MaharashiVashistha insisted upon showing their vital organs to me, in spite of the reluctance of Arundhati. In this way, I could set up three altars of three different shapes. Diagnose in one thousand pages I recordedmy experience of the so called puttreshthi in many articles. These commentaries, compiled in a book, concentrate on various types of diagnose, each covering one thousand pages, are missing. I doubt whether Mahanandji (An unborn soul wandering in space since thousands year and casually interpreting the Bramchachari with its expositions and prophesies) shall be able to find out this volume which made to realize the vastness of the subject, after I wrote it. परिशिष्ट (ख) ऋष्यशृंगक सासुर मालिनी (इतिहासक अएनामे चम्पानगर) पुराण आ महाकाव्यक अलावा उत्तरकालीन संस्कृति, साहित्य, बुद्ध आ बुद्धोत्तरकालीन संस्कृति, पालि साहित्य, मालिनी (चम्पापुरी) क पूर्ण ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत करै लेल बेसी महत्वपूर्ण अछि. जकर पूरक जैन आ ब्राहमण साहित्य सेहो पर्याप्त अछि. भगवान बुद्धक आविर्भावसँ पहिने आ बाद मालिनी (चम्पापुरी) क इतिहास आ भूगोलक सभसँ महत्वपूर्ण अध्याय षोडश महाजनपदक उत्कर्ष आ विपर्ययक इतिहास, भौगोलिक स्थिति आ दोसर विवरणक लेल जैन ग्रंथ आ महाभारतक कर्ण पर्वक अनुपूरित अन्यान्य पालिग्रंथ प्रमुख स्रोत अछि. आउ, ऐ स्रोतक आधारपर ऋषिराजक सासुर मालिनीक गौरवशाली इतिहासक अध्ययन कएल जाए. मालिनीक समृद्धि ऋष्यशृंगक मालिनी एबाक संग लखाह दिअए लागैत अछि. जे मालिनी बहुत काल धरि अकालक चपेटमे छल, ओ ऋषिराजक आबएसँ हरित-पल्लवित-पुष्पित आ अकूत धन-धान्य सँ परिपूर्ण भ’ गेल. संस्कृत कथाकार आ महाकवि दंडी विरचित दशकुमार चरितम (मदन मोहन तर्कालंकार संस्करण, पृष्ठ 59) क मुताबिक चंपामे गंगाक कात महर्षि मरीचि रहैत छल. ई ज्ञातव्य अछि जे महर्षि मरीचि ऋष्यशृंगक पूर्वज छल. ताइसँ जाइ इलाका सँ महर्षि मरीचि अप्पन साधना-तपस्याक लेल नीक बुझलक ओकरा हुनकर विद्वान आ तपोनिष्ठ प्रपौत्र ऋष्यशृंग अप्पन विपुल ज्ञान-विज्ञानसँ बड रास तपोज्ज्वल क’ देलक. अंगक अलावा आनव सभक राजनैतिक धुरि मालिनी छल. ई निर्विवाद अछि जे रामायण कालमे ऋष्यशृंगक महिमासँ ई नगर समृद्ध भेल छल. महाभारत कालमे अतुलित दानवीर आ शक्ति पुंज कर्णक कारण ई बेसी प्रसिद्द भेल. राजा रोमपादक प्रपौत्र पृथुलाक्षक पुत्र ‘चम्प’ मालिनीक नाम चंपा राखलक. तहिया सँ ई चम्पापुरी बनि गेल. चम्प बड शक्तिशाली राजा छल. मत्स्य पुराण 48/97 क मुताबिक:- ‘पृथुलाक्ष सुतश्चापी चम्प नामा वभूव वै. चम्पस्यतु पुरी चम्पा तीर्थ या मालिनी भवत. अइ श्लोकसँ स्पष्ट अछि जे चम्पा पहिने मालिनी छल. संगे-संग ओ चर्चित तीर्थ सेहो छल. राजा चम्पाक बारहम पीढ़ीमे अधिरथ भेल जे कर्णकेँ गंगामे प्रवाहसँ निकालि क’ पोष्यपुत्र बनौलक. संभवतः अधिरथक काल अंग कुरुक अधीन हुनकर करद राज्य छल. गंगाक उत्तर ‘कुरसेला’ अछि, जतए कोशी गंगासँ संगम करैत अछि. ओ प्राचीनकालमे ‘कुरुशिला’ छल, जे कुरु सबहक राज्य हेबाक प्रमाण अछि. पुर्णिया गजेटियर पृष्ट 737 क मुताबिक कुरुशिलासँ कुरु राजाक राज्यक पहाड़ी भागकेँ बुझबाक चाही. एखुनका कुरसेलासँ दखिन गंगा कातपर बटेश्वर पर्वत श्रृंखला अछि, जाइपर महादेवक बड रास पुरना मंदिर अछि. योद्धा कर्ण केँ ओकर मित्र दुर्योधन आ दोसर कौरव प्रमुखक आग्रहपर अंग राज्याभिषेक कराएल गेल छल. ‘प्रीत्या ददौ स कर्णाय मालिनी नगरी मय’ महाभारत (शांतिपर्व 5/6) पद्मपुराण (स्वर्ग खंड, 38/72) क मोताबिक भारतक चर्चित सनातन तीर्थमे चम्पापुरीक नाम श्रद्धापूर्वक लेल जाइत अछि. ततश्चम्पा समासाद्य भगीरथ्यांकृतोद्वः देंडापर्ण समासाद्य गों सहस्त्र फलं लभेत. पुराणकार भागीरथीक कात पर अइ चम्पापुरीमे ‘दंडापर्ण’ नामक एकटा तीर्थक उल्लेख केने अछि, जेकर दर्शनसँ सहस्त्र गोदानक पुण्य भेटैत अछि. ‘जिनप्रभसूरि’ अप्पन ग्रंथ ‘विविध तीर्थ कल्प’मे लिखने अछि जे कौशिक ऋषिक आर्य शिष्य ‘अंगर्षि’ आ ‘रुद्रक’ चम्पामे विधिसँ एकटा पैघ यज्ञ केने छल. (अस्यां कौशिकार्य शिश्यांगर्षि रुद्रकाभ्याख्यान संविधानकं सुजात प्रियंग्वादि संविधान कानि च जज्ञिरे). ओ आगू लिखने अछि जे मालिनी (चम्पा) मे नीक लोग बासित अछि. ओ मणि-मुक्ता सँ अलंकृत अछि, जे हुनकर समृद्धिक सूचक अछि. ‘उत्तमतम नरनारी मुक्तामणि घोरणिप्रस वसुवतः नगरी विविधादभुवस्तु शालिनी मालिनी जयति.’ विविध कल्प तीर्थ, पृष्ठ 69 चम्पा तहिया भारतक छहटा महानगरमे एकटा छल. ई महानगर छल साकेत, राजगृह, श्रावस्ती, चम्पा, कौशाम्बी आ वाराणसी. दीर्घनिकाय II-146 क मोताबिक मल्लक शालवनमे जखन भगववान बुद्ध परिनिर्वाण प्राप्त क’ रहल छल तखन हुनकर शिष्य धर्म भण्डागारिक ‘आनंद’ हुनकासँ कोनो महानगरमे परिनिर्वाण करैक लेल प्रार्थना करैत काल चम्पाक सेहो उल्लेख महानगरक रूपमे केने छल. चम्पा विश्वक पुरना नगर सभमे एक छल. ई उत्तरवैदिक कालमे बसाएल नगर अछि. ई पाटलीपुत्रोसँ पुरना अछि. रामायण आ महाभारत कालमे पाटलीपुत्रक कोनो उल्लेख नै अछि, मुदा मालिनी (चम्पा) ओइ युगमे सेहो चर्चित छल. बौद्ध साहित्यमे पाटलीपुत्रक उल्लेख अछि. ताइसँ चम्पा पाटलीपुत्रसँ बड पुरना नगर अछि. भारतक ई प्रमुख व्यावसायिक केंद्र सेहो छल. एतौका व्यापारी सुदूर ‘इंडोचीन’ मे जा क’ ‘चम्पा’ नामक नगर बसौने छल. ओइ काल समुद्रसँ व्यापार करएबला व्यापारीक दल अइ चम्पा नगरमे रहैत छल. जिनकर नौबेड़ा सदिखन गंगाक लहरपर चलैत रहैत छल आ चम्पाक गंगामे लंगर द’ क’ ठाढ़ रहैत छल. अइ तरहे कतेक कथा-कहानी आ इतिवृत्ति सँ भरल ई चम्पापुरी अछि जकर प्राचीर गर मे गंगाक लहरक भुजा सदिखन आवेष्टित रहैत छल. चम्पाक व्यापारी सिन्धु सौवीर देशक अनवरत यात्रा करैत छल. (दृष्टव्य विधार की नदी, पृष्ठ 91-93) चम्पा सनातन हिन्दू सबहक अलावा बौद्ध आ जैन सबहक सेहो महिमामंडित तीर्थ अछि. एकर सर्वाधिक चर्चा बौद्ध आ जैन साहित्यमे भेल अछि. चम्पाक रानी ‘गर्गरा’ अइ नगरक दक्खिन पच्छिम भागमे एकटा रमणीय पोखैर खुनौने छल. अश्वघोषक मोताबिक अइ पोखैरक कातमे पाँच तरहक चम्पाक फूल सँ युक्त उपवन छल. दीर्घनिकाय (शोणदंड सुत्त I/4) क मोताबिक भगवान बुद्ध अप्पन पाँच सौ भिक्षुक संग अइ उपवनमे रहल छल. चम्पामे भगवान बुद्धक दिनचर्याक विवरण विनय पिटक (1/7 312-315) सँ भेटैत अछि. गर्गरा पुष्करणी परिव्राजक, मुनि आ संन्यासीक विश्राम स्थलक रूपमे प्रसिद्धि प्राप्त क’ लेने छल. ई दार्शनिक परिसंवादक ध्वनिसँ अनवरत गुंजैत रहैत छल. चम्पामे बुद्धक यएह स्थान निवास लेल बेसी उपयुक्त छल. चम्पामे अप्पन प्रवासक क्रममे चम्पा राज्यक अस्सपुर नगरमे बुद्ध भिक्षुक प्रति ‘महा’ आ चुल्लअस्सपुर सुत्तांतक प्रवचन केने छल. चम्पाक लोक स्वादिष्ट आ शुद्ध भोजन करैत छल. जातक VI-256 क मोताबिक हिमालयक ऋषि पाकल स्वादिष्ट भोजनक रसास्वादन करैले चम्पा आबैत छल. दीर्घनिकायक शोणदंड सुत्तक मोताबिक चम्पापुरीमे पाँच सौ बहुश्रुत ब्राहमण निवास करैत छल. ओइ ब्राहमणक प्रमुख ‘शोणदंड’ छल, जे दोसर ब्राहमणक संग गर्गरा पुष्करणीक कातपर बुद्धसँ भेंट केने छल. बुद्धक प्रभापूर्ण आकृति देखि क’ ओ अभिभूत भ’ गेल. बुद्धसँ गपक काल हुनकर वचनक खंडन शोणदंड नै केलक. ब्राहमणक परिषद् जे शोणदंडक संग गेल छल, ओ मूक छल. बुद्ध हुनका शील प्रज्ञा आदि विषयमे बुझौलक. शोणदंड बुद्धक उपासक बनि गेल आ दोसर दिन हुनका खाइ लेल नोत देलक. मुदा ओ ब्राहमण परिषदक त्याग नै केलक. यएह कारण छल जे बुद्धक प्रति आस्थावान होइतो चम्पाक ओ दबंग लोक भगवान बुद्धकेँ कखनो झुकि क’ गोर नै लागलक. शोणदंड मगध सम्राट बिम्बिसारक स्थापित चम्पाक अधिपति छल. ओ हाथ उठाक’, रथ पर चढलापर चाबुक उठाक’ बा बुद्धसँ भेँट काल अप्पन मुरेठा उठाक’ संकेत सँ (मुदा, अप्पन माथकेँ उठा क’) बुद्ध केँ गोर लागैत छल. सम्राट अशोकक माँ ब्राहमण कन्या छलि, जे चम्पाक छलि. ओ संभवतः अइ ‘शोणदंड’ क वंशज छलि. आर.एल. मित्राक नेपालीज बुद्धिष्ट लिटरेचर, पृष्ठ 8 क ‘अशोकवदान’ क मोताबिक चम्पापुरीक एक ब्राहमण समुद्रांगी नामक अप्पन पुत्री राजा बिम्बिसारकेँ उपहारस्वरूप देने छल. पहिने बौद्ध भिक्षु लेल बिना पदत्राणक चलैक निअम छल. ओ ‘पनही’ धारण नै क’ सकैत छल. मुदा विनय पिटक 1/179 क अनुसार अप्पन चम्पा प्रवासमे बुद्ध अप्पन भिक्षुकेँ चप्पल आ खडामक प्रयोग करबाक आज्ञा देने छल. चम्पाक निवासी धन-धान्य सम्पन्न छल. एतुक्का कतेक श्रेष्ठि तँ करोड़पति छल. महाबग्गो (5/1) सँ जानकारी भेटैत अछि जे चम्पापुरीमे ‘शोणकोटिविन्श’ नामक एकटा श्रेष्ठि रहैत छल. हुनका लग बीस करोड़ स्वर्ण मुद्रा छल. संगे अइ श्रेष्ठिक निजी कोषागारमे अस्सी बैलगाड़ी हिरण्यमुद्रा छल आ हुनकर द्वारपर उनचास मत्त हाथी छल. एत’ जैन धर्मावलम्बी ‘कामपाल’ नामक श्रेष्ठि छल जे अठारह करोड़ स्वर्णमुद्रा आ दस करोड़ गायक स्वामी छल. कुमार नंदी नामक एकटा बड धनी स्वर्णकार चम्पापुरीमे महावीर स्वामीक गोशीर्ष चन्दनक प्रतिमा बनबाक’ ओकरा स्वर्णाभूषण सँ अलंकृत क’ स्थापित केने छल. जैन चम्पक श्रेष्ठि कथाक अनुसार चम्पा बड समृद्धशाली छल. एत’ गन्धी, मसाला आ मिश्रीक विक्रेता, जौहरी, चमार, मालाकार, कमार, सोनार आ बुनकरक संख्या बड छल. चम्पापुरी कल्प पृष्ठ 66 क मोताबिक धन, ऐश्वर्य, आंतरिक आनंद आ सुख सभसँ परिपूर्ण चम्पा नगर यथार्थतः धरतीक स्वर्ग छल. प्राचीन जैनागम औपपातिक सूत्रक मोताबिक महावीरक शिष्य सुधर्मणक कालमे ‘पुण्यभद्द’ नामक एकटा देवालय (चैत्य) चम्पाक गंगा कातपर छल, ओ बड महिमामंडित छल. जैनक बारहम तीर्थंकर ‘वासुपूज्य’ क जन्मभूमि चम्पा छल. एत’ ओ प्रव्रज्या, कैवल्य, ज्ञान आ निर्वाण प्राप्त केने छल. ‘विविध कल्प तीर्थ’ क ‘चम्पापुरी कल्प’ क मोताबिक वासुपूज्यक पुत्रक नाम ‘मधव’ छल, जे ओइ काल चम्पाक अधिपति छल. ओइ ग्रंथक मोताबिक तीर्थंकर वासुपूज्य अश्विनी नक्षत्रसँ युक्त फाल्गुन कृष्ण पंचमीक दिन अपराह्न कालमे छह सौ मुनिक संग परिनिर्वाण प्राप्त केने छल. गुणभ्रद्राचार्य क ‘उत्तर पुराण’ सँ ज्ञात होइत अछि जे हुनकर परिनिर्वाण ‘मंदार’ पर्वत पर भेल छल. मगधक राजकुमार चम्पाक उपराजा होइत छल. बिम्बिसार सेहो अप्पन पिताक जीवन कालमे चम्पाक उपराजा छल. बिम्बिसारक मरलाक बाद हुनकर पुत्र अजातशत्रु किछु दिनक लेल राजगृहकेँ छोड़ि चम्पा आबि गेल छल. महाभारतसँ ल’ क’ बुद्धकाल धरि चम्पा चम्पक बागसँ भरल छल. मझिझम निकाय (1/128) क मोताबिक बुद्धक काल चम्पामे कतेक रास महाशाला या स्नातक संस्था छल, जे मगधराज प्रसेनजित आ बिम्बिसारक देल अनुदान आ भूमिदानक माध्यमसँ संचालित छल. महागोविंद सुतांतक मोताबिक महागोविंद अइ तरहक सात स्कूलक स्थापना अपना कार्यकालमे केने छल, जाइमे चम्पा सेहो छल. ओ सभ धर्मशास्त्रीय स्कूल छल, जाइमे केवल ब्राहमण तरुण (माणवका) केँ प्रवेश भेटै छल. अइ स्कूलमे तीन सौ छात्र विद्याध्ययन करैत छल. कुलपतिक बड प्रसिद्धिक कारण कतेक रास ठामसँ छात्र एत’ पढ़ै लेल आबैत छल. ‘चंपेय जातक’ क मोताबिक अंग आ मगध दुनू पड़ोसी राज्यमे युद्धक वर्णन अछि. एक बेर हारलाक बाद अंगक सैनिककेँ पाछाँ करला पर मगध नरेश अंग आ मगधक बीचमे बहएवाली गंगामे कूदि क’ जान बचौने छल. बादमे ओ अंग नरेशक घनिष्ठ मित्र भ’ गेल. ओ सभ बरख चम्पा धारक कातपर एकटा समारोह करैत छल आ अर्घ्य दैत छल. संयुक्त निकाय (1/195-96) क मोताबिक चम्पाक बौद्धभिक्षुक आचरण विनयक निअमक प्रतिकूल भ’ गेल छल. अप्पन चम्पा प्रवासमे बुद्ध बंगीस नामक एकटा बौद्ध भिक्षुक अप्पन प्रशंसामे एकटा गाथा कहैत सुनने छल. बुद्धकेँ बोधि प्राप्त करबाक एक दशकक भीतर चम्पाक संग महत्वपूर्ण नगरमे बौद्धक प्रमुख वास स्थापित भ’ चुकल छल. ओइमे सँ सभ ठाम पर बुद्ध केँ कोनो ने कोनो प्रसिद्द शिष्यक नेतृत्व आ पथ-प्रदर्शनमे भिक्षुकक एकटा संप्रदाय विकसित भेल. जैन लेखक ‘जिनप्रभसुरि’ अप्पन ग्रंथ ‘विविध तीर्थ कल्प’ मे कत्तौ-कत्तौ चम्पाक नाम ‘लोमपाद्पू’ आ ‘कर्णपू’ सेहो लिखने छल. अइ ग्रंथक पृष्ठ संख्या 65 आ 69 क मोताबिक जैन ऋषि ‘प्रभव’ आ ‘स्वयंभव’ अप्पन चम्पा प्रवासमे केने छल. एकटा किंवदंतीक मोताबिक चम्पामे सुभद्रा नामक एकटा सती छलि जे चालैन सँ इनारसँ पानि भरै छली. चम्पामे पाथरसँ बनल चारिटा गोपुर द्वार छल, जे बड दिन सँ बन्न पड़ल छल. ई स्त्री चालैन सँ पानि भरि तीन द्वारकेँ भिजा क’ खोलि दै मे सफल भेल रहथि. कहल जाइत अछि जे चौदहम शताब्दी धरि ई द्वार बन्न छल. एकरा लखनौतीक सुलतान शमसुद्दीन विक्रम संवत 1360 मे उखाड़ि क’ शंकरपुर किलामे लगौने अछि. जिनप्रभसूरी अइ वृतांत केँ अप्पन ग्रंथ ‘विविध तीर्थ कल्प’ क पृष्ठ संख्या 65 मे लिखने अछि. अइ ग्रन्थमे दानवीर कर्णक कतेक रास ठाम केँ सेहो चिन्हित कएल गेल अछि. पांचम सदी मे चीनी यात्री फाहियान गंगाक कात-कात पाटलीपुत्र सँ अठारह योजन पैदल चलि चम्पा नगरी आएल छल. सातम शताब्दीमे ह्वेनसांग एत’ आएल छल. हुनकर मोताबिक चम्पा राज्यक परिधि 4000 ली सँ बेसी छल. एक ली छह मीलक बराबर होइत अछि. अइ नगरीमे दू सए सँ बेसी हीनयान बौद्ध भिक्षु रहैत छल. ओ किछु नष्टप्राय बौद्ध विहार सेहो देखने छल. ओइ काल चम्पामे सनातन हिन्दूक कतेक देव मंदिर छल. एतुक्का खेत समतल छल. जमीन उर्वरा छल. एतुक्का लोक सोझ-साझ होइत छल. ओ चम्पा केँ ‘चेन पो’ कहने अछि. ह्वेनसांगक कालमे चम्पा राज्यक परिधि सिमटि क’ सत्तर मील बचि गेल छल जइमे केवल नगरक परिधि सात मील विस्तृत छल. चम्पापुरीक देवार पजेबाक बनल छल. ई कत्तौ-कत्तौ तँ कतेक रास फीट ऊँच छल. केनिंघम ह्वेनसांगक वृतांतक आधार पर अंगक राजनैतिक सीमा लखीतराय (लखीसराय) सँ राजमहल धरि आ पारसनाथ पहाड़ी सँ भागीरथीक कात कलना धरि रेखांकित केने अछि. चम्पापुरी अप्पन राज्यमे कतेक रास राजनैतिक उतार-चढाव देखने छल. बौद्ध युग मे वत्स देशक शासक शतानिक परन्तप चम्पाक राजा दधिवाहनपर आक्रमण केने छल, मुदा अइ युद्धक परिणामक जानकरी नै अछि. एतेक तय अछि जे एकर बाद अंग शक्तिशाली होइत गेल. ओ मगध शासक भट्टिय केँ युद्धमे हरेने छल. मुदा अइ भट्टियक पुत्र बिम्बिसार (603 -551) अप्पन पिताक हारिक बदला अंगपर विजय प्राप्त क’ चुका देलक. अइ युद्धमे अंग नरेश ब्रहमदत्तक वध क’ देल गेल आ अंगपर मगधक शासन भ’ गेल. बिम्बिसारक मरलाक बाद अजातशत्रु (551-519 ई.पू.) चम्पा केँ अप्पन राजधानी बनेने छल. मुदा हुनकर पुत्र उदयन (519-503 ई.पू.) चम्पासँ अप्पन राजधानी पाटलीपुत्र ल’ आनलक. परतंत्र भेलाक बाद चम्पाक लोकमे आस्ते-आस्ते नैतिकताक ह्रास हुअए लागल आ अप्पन ख़राब चरित्रक कारण लोक उद्दंड हुअए लागल. दशकुमार चरितम अध्याय 1, पृष्ठ 3-6 आ अध्याय 2, पृष्ठ 7,11 आ 12 मे सेहो उल्लेख अछि जे चम्पा मे दुष्टक बाहुल्य छल. अंग शिशुनाग, नन्द, मौर्य, शुंग आ गुप्त युग सेहो देखलक. संगे कुषाणक आधिपत्य आ राजभरक सेहो शासन देखलक. गुप्त सम्राट माधव गुप्तक पुत्र आदित्य सेनक मंदर पर्वतपर भेटल शिलालेखक अनुसार अइ क्षेत्रक शासकक कीर्तिक बड रास साक्ष्य आगू आबैत अछि. आदित्य सेन आ हुनकर धर्मपत्नी कोणदेवी मंदार पर्वतपर विष्णुक नरसिंह मूर्तिक स्थापना केने छल आ ओत’ पापहरणी नामक पुष्करणी केँ खोदबेने छल. कहल जाइत अछि जे यएह शासक अश्वमेघ आ कतेक रास यज्ञ सेहो केने छल. अइ तरहेँ कर्ण सुवर्णक शासक शशांक आ ओकर बाद हर्षवर्धनक अधीन अंग आबि गेल छल. चीनी यात्री ह्वेनसांग अइ सम्राटक कालमे भारत आएल छल. हुनकर आगमन काल चम्पापर खातौरीक शासन छल. ई शक्तिशाली छल (दृष्टव्य भागलपुर गजेटियर 1962, पृष्ठ 41). पालवंशक अभ्युदय आ चम्पापर पालवंशक अधिकारक बाद एकर विकास भेल. विश्वचर्चित विक्रमशिला विश्वविद्यालयक स्थापना (वर्तमान अन्तीयक) भेल. तकर बाद सँ वंशक शासनमे चम्पा आएल. ई शासन लक्ष्मणसेन धरि शक्तिशाली रहल. मुदा अंतिम समय हुनकर शासन अवसाद सँ भरल रहल. मुसलमानक भीषण आक्रमण हुअए लागल. बख्तियार खिलजी बंगालपर विजय प्राप्त केने छल. ओ बिहारपर सेहो कब्ज़ा करै लेल बड रास संख्यामे सैनिकक संग चढ़ाइ केलक. एतुक्का सभटा विश्वविद्यालय केँ ओ दुर्दांत आगिमे झोंकि देलक. मास भरि आगि जरैत रहल जाइमे भारतीय ज्यां-विज्ञान, धर्म, साहित्य-संस्कृति जरैत रहल. अइ तरहे चम्पा मुसलमान आ फिरंगीक कालमे अप्पन सभ्यता-सांस्कृतिक चम्पक वन केँ नष्ट होइत देखने अछि. चम्पा राज्यक नदीमे चाननक विशिष्ठ ठाम अछि. एकर मूल स्रोत मुंगेर प्रमंडलक पठारी भाग अछि. अइ मूलक स्रोत लग दखिन पठार पर ‘बारो’ गाम आ वर्तमान बांका जिलाक कटोरिया थानाक ‘बाक’ गाम किउल-आसनसोल रेलमार्गक आरपार बसल अछि. अइ दुनू गाम सिमुलतल्ला आ ‘गढ़जोरा’ रेलवे स्टेशनक एक्के सामान दूरी अछि. एतएसँ चाननक मुख्यधारा बहैत मुंगेर प्रमंडलक ‘करपा’ आ ‘बारो’ गाम होइत भागलपुर जिलामे आबैत अछि आ ‘बांक’ गाम सँ होइत पूब दिश बढैत अछि. अइ पूब प्रवाहमे देवघरक उत्तर भागक किछु छोट पर्वतीय स्त्रोत चाननमे खसि ओकर जलभंडार केँ बढ़ाबैत अछि. ई ज्ञातव्य अछि जे दक्खिन पहाडीक बेसी जलभंडार चानन ग्रहण करैत अछि. भागलपुर गजेटियर 1962 (पृष्ठ 11)क मोताबिक, चाननक उद्गम देवघरक पहाडी सँ भेल अछि, ई सत्य नै अछि. अइमे कतेक रास छोट-छोट पर्वतीय जलधार आबि क’ सेहो मिलैत अछि. ई लगभग पांच सौ वर्गमीलमे पसरल अछि आ ऐ धारमे भरि बरख पानिक पर्याप्त मात्रा रहैत अछि. ई संथाल परगनाक पर्वतीय भाग सँ पर्याप्त पानि ग्रहण करैत अछि, मुदा चम्पा राज्यक दक्खिन वर्तमान बांका जिलाक समतल भूमिमे बहिक’ ई बड पैघ भूभाग केँ अप्पन विपुल जलराशि सँ पटबैत अछि. अप्पन गंगा संगम स्थल सँ लगभग 50 किलोमीटर दक्खिन एकर एकटा शाखा पूब दिस बढैत अछि आ दक्खिन दिस मुड़ि क’ घोघा लग ई गंगामे मिल जाइत अछि. चानन (चन्दन) क ऊपर बला जलग्रहण क्षेत्र पहाड़ आ वन सँ आच्छादित अछि. ई धार तीन सौ वर्गमील जंगल पहाड़पर विचरैत आ अलग-अलग जलस्रोत केँ अप्पन उदरमे लैत लगभग दू सौ वर्गमील मे कतेक रास स्रोत, नहर आ उपनहरसँ समतल भूमि केँ पटबैत गंगासँ संगम करैत अछि. चाननक धार लगभग 15 अलग-अलग स्रोतमे बहैत अछि, मुदा ओकर तीन टा स्रोत गंगासँ संगम करैत अछि. जगदीशपुर लग चानन छिन्न-भिन्न भ’ जाइत अछि. एकर दू टा पातर धार ‘नाढा’ आ ‘अन्हरी’ क नाम सँ पश्चिम उत्तर कोण दिस बढैत अछि. ई ‘बडुआ’ क बरसाती पानिकेँ समेटैत ‘जमुनिया’ क नामसँ गंगामे प्रवेश करैत अछि. प्राचीन अंगक अइ कटी प्रदेशक सुरक्षा लेल प्रकृति गंगाक दक्खिन कात धरि मुंगेरसँ ल’ क’ कहलगांव, लगभग एक सौ किलोमीटर धरि तीन किमी सँ बेसी चाकर, चून-पाथरक बड पैघ पट्टीक निर्माण क’ देने अछि. अइ अजेय पट्टीपर प्राचीन अंगक राजधानी चम्पापुरी हजार बरख पहिने सँ बसल अछि. अइ चून-पाथरक पट्टीक कारण गंगाक कटाव सँ ई नगर मुक्त अछि. अइ तरहेँ प्राकृतिक जलस्रोतसँ चम्पा परिपूर्ण अछि. एकर माथपर अक्षय जलराशि ल’ क’ स्वयं गंगा अछि आ गंगाक ओ भाग जाइमे कौशिकी सन सदानीरा धार अप्पन दर्जन भरि छाड़न धारक संग गंगासँ संगम करैत अछि आ पार्श्वमे मालिनी अछि जे महाकवि कालिदासक अगाध प्रेमक धार अछि. महाकवि कालिदास शाकुंतलमक तेसर अंकमे ऐ धारक उल्लेख केने छल, जकर पुलिनपर अप्पन सखी संग शकुंतला विहार करै लेल गेल छल. बिहारक नदी: ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक सर्वेक्षण पृष्ठ संख्या 91 क मोताबिक गंगा प्रवाह भागलपुर नग्र पहुँचैसँ पहिने चम्पा नगरक पश्चिम कात दिस जमुनिया धार गंगासँ संगम करैत अछि. ई कोनो कालमे बडुआक संगम छल. बादमे बडुआ आ जमुनिया मिल क’ एत’ संगम करए लागल. बडुआक पुरना नाम बहुला छल, जकर चर्चा महाभारत (भीष्म पर्व अध्याय 9 श्लोक 27) मे भेटैत अछि. भागलपुर जिलामे चाँद सौदागार आ हुनकर पुत्रवधू सती बिहुलाक पूजा होइत अछि आ हुनकर गाथा गाएल जाइत अछि. भ’ सकैत अछि जे वर्षा ऋतुमे मनाओल जाएबला बिहुला पर्व अइ बिहुला नदीक गाथा अछि. जे किछु हुअए, ई पर्व शिवपूजा, नागपूजा आ एकटा सतीक उच्चादर्शक गाथा अछि. ई बडुआ धार जमुई जिलाक चकाई सिमुलतल्ला मार्गक कात ‘कर्णगढ़’ आ ‘चरघरा’ गामक कातसँ बहैत अछि आ कतेक रास पहाडी स्रोतकेँ ल’ क’ ओ चम्पा राज्यक दक्खिन-पश्चिम भागमे हनुमनापर्वतक लग ‘सुइयाथान’ गाम लग समतल भूमिपर उतरैत अछि. (ई ज्ञातव्य अछि जे ई सभटा पर्वत ऋष्यशृंग पर्वतक पसरल श्रृंखला अछि). अइ ठाम धारमे पक्का बान्ह बना क’ एकटा भारी जलभंडारक निर्माण कएल गेल अछि, जतएसँ मुंगेर आ भागलपुर जिलाक बड पैघ भागमे पटाबै लेल नहर निकालल गेल अछि. निर्जन पहाडीक बीच एकटा पैघ झील बनि गेलासँ अइ बान्हक दृश्य बड नीक देखाइए. ई सुरम्य ठामसँ चलि क’ ‘बडुआ’ धार उत्तर दिस बढैत अछि आ साहेबगंज, मोहनपुर, सिलौटा आदि गाम लगसँ होइत तारापुरसँ पूब आबि जाइत अछि. एतए ई कतेक रास धारमे बँटि जाइत अछि आ ओ धार करहरिया, दीनदयालपुर, रतनपुर, दौलतपुर, बाथू सन ठामसँ होइत अन्हार, कटहरा, ऊँचा गाँवक तालमे हरा जाइत अछि. जहियासँ बडुआ धारपर हनुमना बान्ह बनाओल गेल अछि आ नहर निकालल गेल अछि, तहियासँ अइ धारक निचला भागमे पानिनक प्रवाह कम भ’ गेल अछि आ पानिक मात्रा कम आबैत अछि. ई बडुआ कोनो कालमे चम्पा नगरसँ सटि क’ पश्चिमसँ बहि क’ गंगामे प्रवेश करैत छल, जतए आब जमुनिया धार बहैत अछि. जमुनिया धार चानन धारक एकटा उपधारा अछि जे राजपुर आ खंजरपुरमे चाननक मुख्यधारासँ फराक होइत अछि. ई धारा मोहद्दीपुर, कनकैथी, बहादुरपुर आदि गामक लगसँ होइत नाथनगरसँ सटल पश्चिममे आबैत अछि आ उत्तर दिस मुड़िक’ गंगामे प्रवेश करैत अछि. जमुनियाक उपरी हिस्साक नाम ‘अन्हरी’ अछि. चम्पानगरक एकटा भाग नाथनगर अछि. कहल जाइत अछि जे प्राचीनकालमे ‘नाथमल’ नामक एकटा मैथिल ब्राहमण संत एतए रहैत छल आ कालांतरमे हुनकर नामसँ अइ गामक नाम ‘नाथनगर’ पड़ि गेल (देखू भागलपुर गजेटियर पृष्ठ 623). आब ई नगर बनि चुकल अछि आ ई 2.51 मीलमे पसरल अछि. चम्पानगरमे जैन धर्मक दिगंबर संप्रदायक एकटा मंदिर आ धर्मशाला अछि. अइ मंदिरमे पाँचटा वेदी अछि, जाइमे चारिटा तँ चारि कोनपर अछि आ एकटा वेदी मध्यमे अछि. अइपर जैन प्रतिमा चाँछल गेल अछि आ ओइपर तीर्थंकर वासुपूज्यक चरण चिह्न अंकित अछि. चरण चिन्हक आगू किछु पंक्ति अंकित अछि, जइसँ ज्ञात होइत अछि जे अइ ठाम वासुपूज्य जन्म ल’ क’ ध्यान आ ज्ञान प्राप्त केने छल. चम्पाक अइ पैघ जैन मंदिरमे वासुपूज्यक श्वेत प्रस्तर प्रतिमा अछि, जकर प्रतिष्ठा संवत 1932 क माघ शुक्ल दशमी तिथि केँ भेल अछि. एकर अलाबे, वासुपूज्यक दोसर प्रस्तर प्रतिमा, पार्श्वनाथ स्वामीक दूटा प्रस्तर प्रतिमा आ स्वामी ऋषभदेवक एकटा प्रतिमा सेहो स्थापित अछि. वेदीक मध्य धर्मचक्रक चिन्ह सेहो अंकित अछि, जकर दुनू कात दूटा हाथीक प्रतिमा उत्कीर्ण अछि। मध्य वेदीक ऊपर चांदीक सिंहासनपर साढ़े चारि फीट ऊँच पीतवर्णक पाषाणक प्रतिमा सेहो दर्शनीय अछि. अइ मंदिरक आगू एकटा 35 फीट ऊँच आ दोसर 55 फीट ऊँच दूटा पाषाण खुट्टा सेहो ठाढ़ अछि, जकर बगेबानी मुगलकालीन अछि. अइ पैघ जैन मंदिरसँ लगभग एक किमी दूर चम्पा नहर लग श्वेताम्बर सम्प्रदायक एकटा जैन मंदिर आ धर्मशाला अछि. अइ मंदिरमे आदिनाथ आदि कतेक रास जैन मुनिक प्रतिमा स्थापित अछि. अइ मंदिरक बड रास प्रतिष्ठित प्रतिमा एहन अछि जे पार्श्वमे बहएबला चम्पा नहर सँ भेटल अछि. ई विधर्मी सबहक कएल गेल धर्मस्थल आ शिक्षालयक विध्वंसक जीवंत साक्ष अछि. दिगंबर जैन सबहक पैघ मंदिरसँ श्वेताम्बर जैनक ई मंदिर बेसी पुरना अछि. अइ आलेखमे जे ‘पुण्यभद्द’ नामक देवालय आ चैत्यक उल्लेख अछि, ओ संभवतः ई जैन मंदिर भ’ सकैत अछि, किएकि औपपातिक सूत्रक मोताबिक, ‘पुण्यभद्द’ चैत्य गंगा कात स्थित छल. वर्तमान चम्पा नाला (चम्पा नहर) सेहो ऐतिहासिक घटनाक साक्ष्य रहल अछि. स्थानीय लोक आपसमे अंगिका भाषामे बजैत अछि, ‘चम्पा नाला छोटो-मोटो नहरो नै छै. एकरो कोनो आदमी नय बनैलो छय. ई रोमपाद के जमाय ऋष्यशृंग के दूतभूत के बनैलो छय. बहुत बड़ो अकाल पडलो छलय, तभिये ई नहरों के रूप में बनलो छय जथि में बहुते नदी के पानी मिलै छै.’ ऋष्यशृंग विश्वक पहिल वैज्ञानिक छल जे कतेक रास धार केँ परस्पर जोड़ि क’ ओइ क्षेत्र विशेष केँ बाढ़िसँ मुक्त आ अकालमुक्त क’ देने छल. लगभग बीस बरख पहिने नाथनगर स्थित अप्पन आवासपर वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी पुण्यश्लोक रास बिहारी लाल अइ लेखककेँ बतौने छल जे चम्पा नाला सामान्य नाला नहर नै अछि, मुदा चम्पा राज्यमे अकाल पड़लापर राजा रोमपाद नहरक रूपमे एकरा बनबौने छल जाइमे चम्पा, बडुआ आ जमुनियाक अक्षय जलस्रोत प्रवाहित होइ छल. ओ अप्पन ठेठ अंगिका भाषामे एकर संबंध मे कतेक रास कथा आ मिथकक सेहो उल्लेख केने छल. जातक IV पृष्ठ 454 क मोताबिक, चम्पा धार पूबमे अंग आ पश्चिममे मगधक सीमा अछि. डा. विमल चरण लाहाक मोताबिक, ई वएह धार अछि जे चम्पानगर नाथनगरक पश्चिम मे अछि, जेकरा पहिने मालिनी कहल जाइ छल (दृष्टव्य : प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल, पृष्ठ 360). पुर्णा अंगक सभटा धार एक-दोसर सँ कोनो नै कोनो तरहे जुड़ल अछि. एहन ठामपर बाढ़ि एबाक संभावना नै रहैत अछि. सम्प्रति चम्पा तसर उद्योग मे आगू अछि. ई छल ऋषिराज ऋष्यशृंगक ससुर मालिनी (चम्पा)क संक्षिप्त एतिहासिक आ सांस्कृतिक वृतान्त. परिशिष्ट ‘ग’ शंकराचार्य आ सिंहेश्वर (जगत प्रसिद्ध शंकर-मंडन मिश्र शास्त्रार्थ सिंहेश्वर मे नै) सिंहेश्वर मंदिर न्यास किछु बरख पहिने एकटा हस्तपत्रक छपने छल जइमे ई उल्लेख छल जे आदि शंकराचार्य आ मंडन मिश्रक शास्त्रार्थ सिंहेश्वर स्थानमे भेल छल. ई हस्तपत्रक जतेक विवादस्पद अछि, अइ विषयक अध्ययन ओतेक रोचक. पुण्यश्लोक मंडन मिश्र आ शंकराचार्य अप्पन कोनो ग्रंथमे आपसमे भेंट करैक, शास्त्रार्थ करैक बा परस्पर जीतब-हारबक संबंधमे एकोटा शब्द नै लिखने अछि. शंकराचार्यक विजय विषयक कतेक रास ग्रंथ अछि, जे हुनकर जीवनकालमे नै, मुदा लगभग छह सौ बरख बाद हुनकर धर्म-ध्वजधारी शिष्य लिखलक, हुनका महिमामंडित करैमे अप्पन विशेष योगदान द’ क’ गुरु-ऋण सँ मुक्त हेबाक उपक्रम केलक. अइ ग्रंथमे माधवाचार्य रचित ‘शंकर दिग्विजय’, सभसँ बेसी प्रसिद्द अछि. अइ ग्रंथक प्रामाणिकतापर तखने प्रश्नचिन्ह लागि जाइत अछि जखन अइमे शंकराचार्यक संग महाकवि बाणभट्ट, मयूर, दंडी, अभिनवगुप्त, श्रीहर्ष आदि केर शास्त्रार्थ वर्णित अछि, जे शंकरसँ पूर्ववर्ती बा परवर्ती छला. आठम शताब्दीक शंकराचार्य ग्यारहम शताब्दीमे जन्म लेल उदयनाचार्य आ श्रीहर्षकेँ शास्त्रार्थमे केना हरा सकैत अछि, ई अइ ग्रंथक लेखकक छल-छदम आ अनर्गल प्रतापक अलावा की भ’ सकैत अछि. शंकराचार्यसँ संबंधित दोसर विजय ग्रंथमे आनंदगिरी कृत ‘शंकर विजय’, राजचूड़ामणि कृत ‘शंकराभ्युदय’, चिलविलासेन्द्र कृत ‘शंकरविजय’, सदानंद कृत ‘शंकर जय’, कांचीपीठक अध्यक्ष रहल सर्वज्ञ सदाशिव बोध कृत ‘पुण्यश्लोक मंजरी’, महादेवेंद्र सरस्वतीक शिष्य आत्मबोध रचित ‘पुण्यश्लोक मंजरी परिशिष्ट’, कांची मठाधीश परम शिवेंद्र सरस्वतीक शिष्य सदाशिव ब्रह्मेन्द्र कृत ‘गुरुरत्नमाला’ आ काशीलक्ष्मण शास्त्रीकृत ‘गुरुवंश काव्य’ बेसी चर्चित अछि. एकर अलाबे, स्कंद्पुराणक नवमांश, मार्कंडेय संहिता, शिव रहस्य पुराण, श्री विर्धानव आ शक्ति-संगम तंत्रमे श्री शंकर चरित उपलब्ध अछि. ई सभटा वर्णन इतिहासकार आ शोधार्थी, अध्येता सबहक दृष्टिसँ अप्रमाणिक अछि. ऐ सभ रचनामे शंकरक चरित्रकेँ चमत्कारी बा लोकोत्तर बना केँ प्रस्तुत कएल गेल, जइसँ जनसाधारणमे हुनका प्रति श्रद्धा आ भक्ति बढ़ए. मंडन मिश्र आ शंकराचार्य दुनू समकालीन छल. दुनूकेँ एक-दोसराक सिद्धांतक सभटा जानकारी छल. दुनू अद्वैत वेदान्तक पृष्ठक पोषक छल. मुदा शंकरक अद्वैत वेदान्त संन्यासीक अछि जखन कि मंडन मिश्रक अद्वैत गृहस्थ आ कर्मयोगीक रहल अछि. ऐ तरहेँ दुनू एक-दोसरासँ असहमत अछि. ई दुनू विद्वान अपन-अपन ग्रंथ मे एक-दोसराक मतक खंडन केने अछि. विद्वान विचारक एलेन राइट थ्रेशर सेहो अइ बिन्दुपर विस्तारसँ विचार केने अछि. ओ अप्पन शोध ग्रंथ ‘द अद्वैत वेदांत ऑफ़ ब्रह्मसिद्धि’ मे मंडन मिश्र रचल ‘ब्रह्मसिद्धि’ आ शंकराचार्यक रचल ‘ब्रह्मसूत्र भाष्य’ क पंक्ति सेहो उद्धृत केले अछि, जइसँ ई तथ्य सत्यापित होइत अछि. अइ दुनू विद्वानक विचारक तुलनात्मक विवेचनक लेल पंडित सहदेव झा विरचित ‘मंडन मिश्र आ हुनकर अद्वैत वेदांत’ आ आचार्य धीरज रचित ‘विज्ञानमक्षरम’ (भूमिका हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’) अवलोकनीय अछि. अलग-अलग साक्ष्यक आधार पर मंडन मिश्रक जे काल निर्धारण कएल गेल अछि, ओ निम्नांकित अछि- पी.वी. काणे (धर्मशास्त्र का इतिहास) (690-710 ई.) कुप्पूस्वामी शास्त्री (ब्रह्मसिद्धि भूमिका) (615-690 ई.) एल. स्मिथसेन (विभ्रम विवेक टिप्पणी) (700 ई.) बी.ए.रामास्वामी शास्त्री आ के.ए. शिवरामकृष्णन (भावना विवेक टिप्पणी) (650 ई. क बाद) टी. बेट्टर (ब्रहमसिद्धि भूमिका)(700 ई.) टी.आर. चिन्तामणि (स्वतंत्र लेख मे) (650-70 ई.) पी. हेक्कर (विवर्त) (सातम शताब्दी) एस. एन. दास गुप्ता (भारतीय दर्शन का इतिहास) (800 ई.) के. कुन्जुनिराजा (मंडन एंड धर्मकीर्ति) (8-9वम सदी) मंडन मिश्रक जन्मभूमिक विषयमे माधवाचार्य अप्पन ‘शंकर दिग्विजय’ पोथी मे ‘महिष्मति’ आनाद्गिरी अप्पन पोथी ‘शंकर विजय’ मे ‘विजल विन्दु’ (संभवतः उत्तर प्रदेशक बिजनौर), चिद विलास यति अप्पन पोथी ‘शंकर विजय विलास’ मे कश्मीर आ काशी लक्ष्मण शास्त्री अप्पन पोथी मे ‘गुरुवंश काव्य’मे मगध मानल अछि. अइ संबंधमे हमर मान्यता अछि जे माधवाचार्यक ‘शंकर दिग्विजय’ भ्रामक आ अप्रमाणिक पोथी अछि. ‘विजल विन्दु’ लेल बिजनौर जिलाक कोनो गाम अप्पन दावेदारी प्रस्तुत नै केने अछि. यएह स्थिति कश्मीरक अछि. ओतए कोनो गाम आ नगर मंडन मिश्रक जन्मभूमि होइक दावा नै करैत अछि. माधवाचार्यकक आधारपर गोवर्धन पीठक शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ मंडन मिश्र केँ नर्मदा कातक वासी (उज्जैन, मध्य प्रदेश) बतौने अछि आ ओतुक्का मंडला नगरकेँ महिष्मती सिद्ध केने छल. मध्य प्रदेशक नर्मदा कात बसल ‘महेश्वर’ नामक उपनगर छल, ओकरा मान्धाता, मंडला या मंडलेश्वरक नामसँ उद्धृत कएल गेल अछि. ‘महेश्वर’ ‘महिष्मती’ अछि. ई तर्कसँ असंगत लागैत अछि. मत्स्य पुराणमे ‘महेश्वरपुर’ क उल्लेख एकटा तीर्थक रूपमे अछि. ओतए ‘स्वाहा’ नामक देवी सती स्थापित छल. अखैन ओतए जे देवी अछि, ओ ‘मंगला गौरी’ क नामसँ पूजित अछि. ब्रहमांड पुराणक मोताबिक ‘स्वाहा’ प्रसूतिक गर्भसँ उत्पन्न दक्षक पुत्री अछि, जिनकर पति अग्नि अछि. ((मंडन मिश्र और उनका अद्वैत वेदांत, पृष्ठ 16) महेश्वरक अप्पन अलग गरिमा अछि, ओकर पहिचान महिष्मतिक रूपमे क’ वितंडा ठाढ़ करैक अलावा की भ’ सकैत अछि? भाषा वैज्ञानिक सभ एकर परीक्षण करए जे महिष्मतिक ध्वनि साम्य महिषीसँ बेसी वैज्ञानिक बैसैत अछि जतए ‘म’, ‘ह’, ‘ष’ आ ‘ई’ क वर्ण आ मात्रा विद्यमान अछि, आ फेर माहेश्वर, मान्धाता, मंडला आ मंडलेश्वर सँ वाचस्पति मिश्र सेहो अप्पन पोथीमे महिष्मतिक उल्लेख पाटलीपुत्रक संग केने अछि (मंडन मिश्र और उनका अद्वैत वेदांत, पृष्ठ 22, विज्ञानक्षरम, पृष्ठ 51) पटनाक संग मिथिलाक महिषीक उल्लेख समीचीन अछि, स्वाभाविक अछि आ भूगोल सम्मत अछि. मिश्र उपाधि धारण करएबला महान दार्शनिक मिथिलामे भेल अछि, जइमे वाचस्पति मिश्र, सुचरित मिश्र, पक्षधर मिश्र, जीवनाथ मिश्र, भवनाथ मिश्र (अयाची मिश्र), शंकर मिश्रक संग जगत प्रसिद्द अद्वैत वेदांती मंडन मिश्र प्रसिद्द अछि. सभ कोणसँ परीक्षणक बाद लगैए जे मंडन मिश्र महिषी (कोशी प्रमंडल, बिहार) क रहएबला छल. मंडन मिश्र आ शंकराचार्यक बीच शास्त्रार्थ भेल छल बा नै, ओइ संबंधमे दुनूमे कियो अप्पन पोथीमे चर्चा नै केने अछि. हमर मत अछि जे पंडित वाचस्पति मिश्रक मंडन मिश्रक प्रति अकूत श्रद्धा देखैत शंकरक अनुयायी हुनकासँ तमसाएल रहए आ वाचस्पति मिश्रक प्रति असम्मानजनक विशेषण प्रयोग केने छल. ओकर बाद मंडन मिश्रक कद छोट करबा लेल माधवाचार्य आ दोसर लेखक शंकराचार्यक पक्षमे कतेक रास पोथी लिखने छल. ई लेखकक मात्र कल्पना कहल जा सकैत अछि. ई इतिहास सम्मत सेहो नै अछि. स्वामी अपूर्वानन्द अप्पन पोथी ‘आचार्य शंकर’ (प्रकाशक: रामकृष्ण मठ, नागपुर) मे भारती शंकराचार्य सँ शास्त्रार्थ करैत जे प्रश्न पुछने छल, ओकरा अइ तरहेँ लिखने अछि, कामक लक्षण की होइत अछि? काम कला कतेक तरहक होइत अछि? देहक कोन अंगमे काम रहैत अछि? कोन-कोन क्रियासँ ओकर अविर्भाव आ तिरोभव होइत अछि? शुक्ल पक्ष आ कृष्ण पक्षमे पुरुष आ नारीक शरीरमे कामक ह्रास-वृद्धि कोना होइत अछि आ नारी कोन तरहेँ पुरुषक ऊपर कामकलाक विस्तार करैत अछि? आब प्रश्न ई उठैत अछि जे कोनो संस्कार वाली विदुषी शास्त्रार्थमे कोनो बाल ब्रह्मचारीसँ कामशास्त्र संबंधित प्रश्न पूछत? शंकरमतक अनुयायी आ तलस्पर्शी विद्वान स्वामी सच्चिदानंद भारतीक कन्नड़ कृति ‘श्री शंकर भगवत्पाद वृतांत सार सर्वस्य’ केँ संदर्भित करैत श्री नारायण दत्त धर्मयुगक अप्रैल, 1996 मे प्रकाशित अप्पन लेख मे उपयुक्त विचार देने छल. स्वामी अपूर्वानंदक दृष्टिमे शंकर दिग्विजयमे वर्णित परकाया प्रवेशक मिथक शंकराचार्यक मूल व्यक्तित्वकेँ खंडित क’ दैत अछि. की हुनकर सन जितेन्द्रिय ब्रहमचारी महज शास्त्रार्थ जीतै लेल अप्पन अनमोल व्रत तोड़ि काम शास्त्रक व्यावहारिक ज्ञान सीखै लेल तैयार भ’ जाएत? स्वयं शंकर संप्रदायक अनुयायी ई स्वीकार करैत अछि जे अइ मिथक द्वारा हुनकर सभक परमगुरुक उज्जवल छविकेँ धूमिल कएल गेल अछि. स्वामी अपूर्वानन्द पोथी ‘आचार्य शंकर’ (पृष्ठ 95)मे आगू लिखैत अछि जे भारतीक संग शंकराचार्यक संग कोनो शास्त्रार्थ भेलैने नै. तइसँ शंकरक परकाया प्रवेशक कोनो प्रश्न नै उठैत अछि. माधवाचार्य ई लिख क’ शंकरकेँ अलौकिक शक्ति सम्पन्न प्रतिपादित केने अछि. मुदा अनजान वंशजक आचार्यक जितेन्द्रीय हेबापर प्रश्न चिन्ह लगाक’ ओकर महान चरित्रक संग खिलवाड़ क’ देने अछि. शंकराचार्यक सन्दर्भमे सिंहेश्वरपर विचार करैत काल ई कहल जा सकैत अछि जे वर्तमान कोशी अंचल रामायण काल मे ‘ऋष्यशृंग आश्रम’ आ महाभारत काल मे चम्पकारण्य (चम्पा राजक असंख्य भाग) छल. ई क्षेत्र बुद्धकाल मे ‘आपण निगम’ क नामसँ प्रसिद्द छल. गंगाक उत्तर विशाल क्षेत्रमे पसरल छल ‘आपण निगम’. हिंदी आ अंगिकाक प्रसिद्ध विद्वान डा. तेज नारायण कुशवाहा चिट्ठीसँ सूचित केने अछि जे कटिहार जिलाक सेमापुरकेँ ओ ‘आपण निगम’ क रूपमे चिन्हित केने छथिन. जखन कि श्री हवलदार त्रिपाठी सहृदय महिषी वनगाँवके ‘आपण निगम’ मानने छथिन. आपणक अर्थ बजार होइत अछि आ ‘निगम’ समितिक बोध करैत अछि. अर्थ विस्तारमे ई ‘कारपोरेशन’ क रूपमे लेल जा सकैत अछि. अइ तरहेँ ‘आपण निगम’ क क्षेत्र विस्तार ओइ कालमे सम्पूर्ण कोशी प्रमंडलमे छल, जइमे कतेक गाम समाहित छल. एकर मुख्यालय जन बहुल गाम एखौनका महिषी-बनगाँव छल. प्रशासनिक दृष्टिसँ ई व्यवस्था दीर्घकाल धरि चलल. भ’ सकैत अछि जे मंडन मिश्रक कालमे अइ क्षेत्रक यएह स्थिति रहल हएत. सिंहेश्वर शैव तीर्थ आ महिषी शक्तिपीठक रूपमे ख्याति प्राप्त छल आ दुनू एक्के निगमक अंतर्गत छल. जौं शास्त्रार्थ आ विचारक आदान-प्रदान करै लेल शंकराचार्य एखौनका महिषी (जिला सहरसा) आएल हेतिऐ तँ सिंहेश्वर सेहो आएल हएत. सभ कोनसँ परीक्षणक पश्चात ई पूर्णतः निर्विवाद अछि जे मंडन मिश्र, मैथिल ब्राहमण छल आ महिषी ग्रामक निवासी छल. ओ तहियोका भारतवर्षक सर्वाधिक प्रखर अद्वैतवादी वेदांती छल. एक ठामक तीर्थ हेबाक कारण महिषी आ सिंहेश्वरक संबंध अटूट रहल छल आ ओ आइयो अछि. सहायक आ सन्दर्भ पोथीक सूची ऋग्वेद, वैदिक संशोधन मंडल, पूना यजुर्वेद, संपादक श्रीपाद शर्मा, औंधनगर अथर्ववेद, संपादक श्रीपाद शर्मा, औंधनगर बाल्मीकीय रामायण, गीता प्रेस, गोरखपुर महाभारत, पारडी संस्करण (श्रीपाद दामोदर सातवलेकर) हरिवंश पूरण. चौखम्भा, वाराणसी श्रीमदभगवत पुराण, चौखम्भा, वाराणसी तैत्तिरीय अरण्यक, चौखम्भा, वाराणसी छान्दोग्योपनिषद, चौखम्भा, वाराणसी विष्णु पुराण, गीता प्रेस, गोरखपुर शतपथ ब्राहमण, अच्युत ग्रंथमाला, वाराणसी वायु पुराण, बैंकटेश्वर प्रेस, बम्बई गौतम धर्मसूत्र, आनन्दाश्रम संस्कृत सीरिज बोधायन धर्मसूत्र, आनन्दाश्रम संस्कृत सीरिज श्वेताश्वर उपनिषद, बैंकटेश्वर प्रेस, बम्बई मनुस्मृति, कुल्लकभट्ट टीका, बम्बई अमरकोश, भंडारकर रिसर्च इंस्टिट्यूट, पूना कुमारसंभव, चौखम्भा, वाराणसी मत्स्य पुराण,बैंकटेश्वर प्रेस, बम्बई दशकुमार चरितम, चौखम्भा, वाराणसी पदमपुराण, बैंकटेश्वर प्रेस, बम्बई विविध तीर्थ कल्प, हिंदी जैन पीठ, शांति निकेतन दीघनिकाय, नालंदा पालि प्रतिष्ठान विनय पिटक, नालंदा पालि प्रतिष्ठान महाबग्ग आर्य भूषण प्रेस, शिवनग रपूना मझिझम निकाय, नालंदा पालि प्रतिष्ठान संयुक्त निकाय, महाबोधि, सारनाथ औपपातिक सूत्र, जैन विद्यापीठ, भारतीय विद्या भवन, बम्बई पुर्णियाँ गजेटियर भागलपुर गजेटियर नेपालीज बुद्धिस्ट लिटरेचर, कोलकाता शैव अवधारणा आ सिंहेश्वर, हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’, मधेपुरा बौद्ध धर्म आ बिहार, हवलदार त्रिपाठी सह्रदय, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना बिहार की नदियाँ, वहि रामचरितमानस, गीता प्रेस, गोरखपुर प्राचीन भारत मे संग्रामिकता, पंडित रामदीन पाण्डेय, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना भागवत दर्शन, 35वां खंड, प्रभुदत्त ब्रहमचारी, झूंसी महाभारत कथा, चक्रवर्ती राजगोपालचारी, सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली भागवत कथा, सूरजमल मेहता, सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली रिश्य्श्रिंग स्मृति ग्रंथ, कुंवरलाल शर्मा, कोटा, जस्थान सिखवाल ब्राहमण परिशीलन, लेखक श्री बुद्धिप्रकाश देव उपाध्याय, ब्यावर, राजस्थान मिथिला लोक संस्कृति कोश, डा. लक्ष्मीप्रसाद श्रीवास्तव, दरभंगा रामायण कालीन संस्कृति, शांति कुमार नानुराम व्यास, सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली लोपमुद्रा, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, नवयुग प्रकाशन, दिल्ली मिथिला तत्व विमर्श, म.म. परमेश्वर झा, तरौनी, दरभंगा प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास, डा. जयशंकर मिश्र, बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, पटना प्राचीन भारत का एतिहासिक भूगोल, डा. विमल चरण लाहा, उत्तर प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, लखनऊ ग्यारहवीं सदी का भारत, डा. जयशंकर मिश्र, वाराणसी प्राचीन भारत का राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास, ए.के. मित्तल, आगरा कल्याण, मासिक, गोरखपुर अखंड ज्योति, मासिक, मथुरा कादम्बनी, मासिक, नई दिल्ली सहरसा, गजेटियर, 1965 जर्नल ऑफ़ रायल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल विजडम ऑफ़ द एंसियेंट रिसीज, ब्रहमचारी कृष्णदत्त, वैदिक अनुसंधान समिति, नई दिल्ली सच्चिदानंद प्रकाश, भाग एक, स्वामी अद्वैतानन्द पुरीजी महाराज स्मारिका राज. प्रदेश सिखवाल ब्राहमण सभा, जयपुर, प्रधान संपादक एस.एम. त्रिपाठी, जयपुर कैप्सन हिमाचल प्रदेशक कुल्लू अंचल मे सभ वाहन पर ऋषिराजक जयकारा लिखल भेटैत अछि. ऋषिराज एतौका पहिलुक देवता अछि. तइसँ एतए श्री गणेशजी महाराजसँ पहिने हिनकर पूजा होइत अछि. ऋष्यश्रृंग पहाड़ी (बंजार हिल रेंज, हिमाचल) क मनमोहक चित्र. सामनेबला पहाड़ीकेँ मारकण्डे पहाड़ी कहैत अछि, जतए देवी त्रिपुरबाला सुन्दरीजी प्रकट भेल छल आ एतए ओ दुर्गा सप्तसी आदि देवी-पोथीक रचना केले छथिन. हिमाचल प्रदेश पर्यटन विभाग श्री ऋषिराजक महानताकेँ मानैत अछि. ई चित्र एकर प्रमाण अछि. श्रृंगी ऋषि मार्ग जे जलोड़ी-पास मार्गसँ अलग भ’ क’ श्रृंगी ऋषि पहाड़ीक परिक्रमा मंदिरक पैदल मार्ग धरि जाइत अछि, क चित्र. हिमाचल प्रदेशमे ऋषिराजक मंदिर धरि 30 मीटर पैदल चढ़यके संकेत चिन्ह. हिमाचल प्रदेशमे पूजित ऋष्यश्रृंगजी महाराजक दिव्य मूर्ति जेकरा स्थानीय लोक श्रृंगाऋषिक नामसँ पूजा करैत अछि. बागी (हिमाचल प्रदेश) क लगभग छह सौ पुरना ऋष्यश्रृंगक महाराजक मंदिरक दृश्य, जे सालमे आठ मास बर्फसँ झापल रहैत अछि. ई मंदिर समुद्रतल सँ छह हजार फीटक ऊँचाईपर अछि. हिमाचल प्रदेशक श्रृंगा ऋषि (ऋष्यश्रृंग) क सोनाक पालकी केँ ल’ जाइत भक्तगण. अइ प्रदेशक मान्यता अछि जे ई देवता सभसँ बेसी ठामक भ्रमण करैत अछि. ऋषिराजक महानदीक प्रकट स्थल सिहोवा पहाडीसँ लेल गेल अइ धारक चित्र, जइमे दक्खिन दिससँ उत्तर वाहिनी बहैत ई धार. ऋषिराजक तपोभूमि महानदी उद्गम स्थल सिहोवा पहाड़ीपर तपस्यारत साधु-संन्यासी. ऋष्यश्रृंगक तपोभूमि ‘सिहोवा’ छतीसगढ़क पहाड़ी पर जाइत श्रद्धालु. श्री सिंहेश्वर मंदिरक मुख्य प्रवेश द्वार. श्री सिंहेश्वर मंदिरक मध्य प्रवेश द्वार. श्री सिंहेश्वर महादेवजीक मंदिर. श्रृंगेश्वर (सिंहेश्वर) मंदिर स्थित शिव-गंगा (पुरातन नाम श्रीविभांडकक कुंड) क दृश्य. श्री सिंहेश्वर मंदिर (बिहार) मे श्रद्धालुक भीड़. संगे विभांडक कुंडसँ नहाक’ दंड प्रणाम करैत (लेट-लेटा क’) मंदिरमे प्रवेश करैत श्रद्धालु. श्री सिंहेश्वर स्थापित मंदिरक प्रांगणमे ऋष्यश्रृंगक प्रतिमाक मनोहारी दृश्य. श्री सिंहेश्वर मेलामे कुटीर उद्योगक सामान बेचैत ग्रामीण स्त्रीगण. श्रृंगवेरपुरमे ऋष्यश्रृंग आ माता शान्ताक मुरुत. रावेर, जिला जलगाँव, महाराष्ट्र लग ‘श्रृंगार ऋषि’ क मंदिरक दृश्य. अनसिंग, जिला वासिम, महाराष्ट्र क ऋष्यश्रृंग मंदिरमे ऋष्यश्रृंग आ भगवान शिवक मुरुतक अलौकिक दृश्य. संगमे पुजारी श्रीसदाशिव पाटिलजी. कारला, यवतमाल, महाराष्ट्रमे ऋष्यश्रृंगक समाधि मंदिरक मुख्य द्वार. कारला, यवतमाल, महाराष्ट्र ऋष्यश्रृंग समाधि मंदिर जइ लेल भव्य सीढ़ीक दृश्य. सिंगत, तहसील रावेर, जिला जलगाँव मे ऋष्यश्रृंग जी महाराजक समाधि मंदिर जे नौ मास जलक भीतर रहैत अछि. ऋषिकुंड, मुंगेरक तेसर गरम जलक कुंडक दृश्य. भीमबांध, मुंगेर, बिहारक झरनासँ बहि क’ आबैत गरम पानिक जलधारा, जे भीमबाँधक नामसँ प्रसिद्द अछि. भीमबांध सँ आबएबला गरम जल धारक संग ठाढ़ पानिक दोसर धारक संगम. दृष्टव्य-अंगराज रोमपाद ऋष्यश्रृंगकेँ ई क्षेत्र कन्यादानमे देने छल आ ऋषिराज अइ गरम पानिक कुंड आ झरनाक निर्माण केलक. कालांतरमे द्वापर युगमे अइ विशाल जल प्रपातपर भीम बान्ह बनौने छल आ जाइ कारणसँ अइ गरम पानिक झरनाक नाम भीमबाँध पड़ि गेल जे खड़गपुर अनुमंडल, जिला मुंगेर, बिहारमे अछि. ऋषिकुंड (गरम पानिक कुंड), जे बरियारपुर, जिला मुंगेर, बिहारमे अछि, क दृश्य. संगमे संपादकक माँ श्रीमती पार्वती देवी. अइ तरहक तीन गरम पानिक कुण्ड अइ ठाम अछि. ऊपरका पहाड़ीपर श्री ऋष्यश्रृंगक मंदिर आ गुफा सेहो अछि. ऋषि कुंड, जिला मुंगेर, बिहारमे दोसर गरम पानिक कुंडक दृश्य. सिगंरीरिसी ऋषि स्थल, क्यूल, बिहारक दुर्गम बाटक मनोहारी दृश्य. सिंगरीरिसी, क्यूल, बिहारक पंचधाराक दृश्य. ऐ जलस्रोतक स्रोत कतए अछि केकरो आइ धरि जानकारी प्राप्त नै भेल अछि. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) उदय प्रकाश (१९५२- ) “मोहनदास”- हिन्दी दीर्घ कथाक लेखक उदय प्रकाशक जन्म १ जनवरी १९५२ ई. केँ भारतक मध्य प्रदेश राज्यक शहडोल संभागक अनूपपुर जिलाक गाम सीतापुरमे भेलन्हि। हुनकर हिन्दी पद्य-संग्रह सभ छन्हि: सुनो कारीगर, अबूतर कबूतर, रात में हारमोनियम, एक भाषा हुआ करती है। हिनकर हिन्दी गद्य-कथा सभ छन्हि: तिरिछ, और अन्त में प्रार्थना, पॉल गोमरा का स्कूटर, पीली छतरी वाली लड़की, दत्तात्रेय के दुख, अरेबा परेबा, मैंगोसिल, मोहनदास। मोहनदास- दीर्घकथा लेल हिनका साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०१० (हिन्दी लेल) देल गेल अछि। अनुवादक: विनीत उत्पल (१९७८- ) आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक। "हम पुछैत छी" मैथिली कविता संग्रह प्रकाशित। मोहनदास पोथीक आवरण-चित्र माकूर्स फोरनेलक चित्रक उदय प्रकाश द्वारा रूपान्तरण। मोहनदास : उदय प्रकाश (२०१२ मे साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित पोथी) ई उपन्यास मैथिलीमे पहिल बेर विदेह ई-पत्रिका www.videha.co.in मे धारावाहिक रूपमे ई-प्रकाशित भेल छल। मोहनदास डरक रंग केहन होइत अछि? भटरंग, खकस्याह, खुनाहनि सन , कारी-स्याह आकि फेर छाउर सन? एहन छाउर जकरामे आगि एखन धरि मिझाएल नै गेल अछि!... आ फेर कोनो एहन रंग, जकरा पाछाँसँ एकबैग कियो सून-मसान सन ताकए लागैत अछि आ ओकर फाटल ठाममे सँ कनेके दूरीपर कोनो कानैक गधमिसान थकमकाएल सन लखा दैत अछि। समुद्र आ धारक कोनो धारसँ अनचोक्के बालुपर तरपि कऽ पटकल माछक आँखि कहियो अहाँ देखने छिऐ? दम तोड़ैत, खुजल-फाटल आँखि...?...ओहिनो तरहक रंग...! फिल्मक नीकसँ नीक हीरो सेहो अप्पन आँखिक डिम्हा, तकर चारू कातक उजरका स्थल आ मुँहपर कतबैयो कोशिश केलाक बादो ओ रंग नै आनि सकैत अछि जे असल जिनगीमे कोनो बड़ डराएल जिबैत मनुखक आँखि आ मुँहपर देखा पड़ैत अछि। एहन मनुखक, जे कत्तौ बेरिया काल धरि काज कऽ थाकि-हारि कऽ घर घुरि रहल अछि। ओकर हाथमे एकटा झोरा अछि, ओइमे नेनाक लेल कम्मे दामबला टॉफी आ खिलौना छै आ कनियाँक खोंखीक गोली सेहो , मुदा एक्के कोनक आगू ओ दंगा करऽबला सभक बीचमे कोनो सुन-मसान ठामपर अनचोक्के लसकि जाइत अछि आ दुर्भाग्यसँ ओ ओइ संप्रदाय, नस्ल आ संगोरक नै अछि जे भीड़ ओकरा घेरने छै। तखने ओइ काल अप्पन हत्याक एकाध क्षण पहिने ओइ मरैबलाक आँखि, मुँह आ समूच्चे देहमे वएह रंग देखाइ पड़ैत छै, जेकर चर्चा हम केने छी आ जकरा ओइ दिन हम मोहनदासमे देखने रही। "शिंडलर्स लिस्ट' आ फेर ओहने कतेक सिलेमामे अहाँ ओइ जर्मन रेलगाड़ीक दृश्य देखने होएब, जकरा कतौ दूर ठाम पठाएल जा रहल छै। ओइ रेलगाड़ीक डिब्बाक खिड़कीसँ बाहर ताकैत नेना, मौगी आ बुढबाक मुँह अहाँक मोनमे होएत! आ एखन किछु दिन पहिने गुजरातक कतेक शहर-मोहल्लाक घरक छत, खिड़की आ छातमे सँ बाहर ताकैत मुँह। डरक रंग किछु-किछु ओहने रंगक होइत अछि। मोहनदास आगू ठाढ़ अछि आ अप्पन थरथराइत, दुब्बर अबाजमे कहैत अछि,-"कका, कोनो तरहेँ हमरा बचा लिअ! हम अहाँक आगू हाथ जोडै़त छी!...नेना-बेदरा सभ अछि हमरा! बूढ़ बाप मरि रहल अछि टी.बी.सँ!... अहाँ कही तँ हम अहाँक संग चलि कऽ कोर्टमे हलफनामा दै लेल तैयार छी जे हम मोहनदास नै छी। हम ऐ नामक कोनो मनुखकेँ नै चिन्हैत छी! कियो आर होएत मोहनदास! खाली कोनो तरहेँ हमरा बचा लिअ!' मोहनदाससँ जखन अहाँक भेंट होएत तँ पहिने तँ अहाँकेँ ओकरापर दया आएत मुदा अहाँ डरा जाएब। किएक तँ ई काल डरैएबला काल अछि आ ई आर डरैबला भेल जा रहल अछि। मोहनदास आ हुनकर परिवारक कएकटा पीढ़ीकेँ हम जानैत छी। गाम-घरमे तँ एहने होइत अछि। हुनका देखि कऽ अहाँ सोचियो ने सकैत छी जे ओ ऐ जिलाक सरकारी एम.जी. डिग्री कॉलेजसँ ग्रेजुएट छथि। फर्स्ट डिवीजनक संग! ...आ विश्वविद्यालयक टॉपर सूचीमे, आइसँ दस बरख पहिने हुनकर नाम दोसर नंबर पर छल। हुनकर आजुक देह-दशा हुनकर ओइ कालकेँ लऽ कऽ कोनो गप नै करैत अछि। एकटा फाटल, बेदरंग भेल, ठामे-ठाम चिप्पी लागल, कोनो काल नील रंगक डेनिमक फुलपैंट, सस्ता टेरिकॉटक आधा बाँहिक, दहिना कन्हा लग उघड़ल अंगा। एकरामे कोनो काल चौखाना बनल रहैत, जेकरासँ ओ डरीड़ मेटा रहल अछि, जेकर रंग कहियो हल्लुक रहल होएत। आ एकटा रबड़क सस्ता-बरसाती पनही, जकरा माटि, धूरा, दुख, पानि, काल आ रौद एत्ते चाटि गेल अछि जे आब ओ कखनो चमड़ा तँ कखनो माटिक बनल देखा पड़ैत अछि। मोहनदासक उमेर अखन पैंतीस-सैंतीस बर्खक होएत, मुदा देखबामे ओ हमरे बराबर आकि हमरासँ बेसी लागैत अछि। एक तरहेँ हकासल आ दौड़-भाग करैत ओकरा हम सदिखन देखलहुँ। गाममे कत्तौ बैसि कऽ गप करैत, ताश खेलाइत, हँसी-ठहक्का दैत आ टीवी देखैत नै देखलहुँ। कियो कतबो लचार आ डराएल वा जल्दीमे अछि; ई ओकरा कत्तौ ठाढ़ नै हुअए दैत अछि। मोहनदासकेँ लऽ कऽ लोक-बेद कहैत अछि जे ओ सदिखन कोनो-नै-कोनो काज पकड़िये कऽ राखैत अछि, किएक तँ ओकरा पानि पीबाक लेल सभ दिन एकटा नबका इनार कोड़ऽ पड़ैत छै आ सोहारी खेबाक लेल नित्तः नवका फसिल जनमाबऽ पड़ैत छै। ओकरा परिवारमे रोटी-पानिक लेल ओकर बाट जोहैबला एक गोटा नै पाँच गोटा छै। पाँचटा पेट आ पाँचटा मुँह। मोहनदासक बाप काबा दास, जकरा पछिला आठ बरखसँ टी.बी. छै। ओकर माए पुतलीबाइ, जकर आँखि कोनो मंगनीक नेत्र शिविरमे मोतियाबिंद आपरेशन भेलाक बाद आन्हर भऽ गेल छै आ चारू दिस अन्हारे-अन्हार लखा दै छै। ओकर कनियाँ कस्तूरी बाइ, जे किछु नै, अप्पन वरक छाह छिऐ। कस्तूरी बाइ मोहनदासक काजमे संग दैत छथिन आ घरक चूल्हा-चौका ओरियाबैत छथिन। गामक लोक कहैत अछि जे आइ धरि कहियो दुनूकेँ लड़ैत- झगड़ा करैत नै देखने छी। लागैत अछि ओ विपैत आ आफैत होइत अछि, जे स्त्री-पुरुखक संबंधक नीवकेँ कमजोर करैत अछि। बचल दूटा प्राणीमे एकटा अछि देवदास आ दोसर अछि शारदा। मोहनदास आ कस्तूरीक दुइटा संतान। उमेर आठ आ छह बरख। देवदास गामक प्राथमिक पाठशालामे पढैत अछि आ स्कूलक बाद गामसँ जाइबला सड़कपर खुजल "दुर्गा ऑटो वर्क्स' मे गाड़ीमे हवा भरैए, पंचर साटैए आ स्कूटर-मोटर साइकिलक छोट-मोट भङठी करबामे हेल्परक काज करैए। ऐ काजक लेल ओकरा मासमे सए टका भेटैत छै। तइमे सँ कहि सकैत छी जे मोहनदासक बेटा अप्पन पढ़बाक संग अप्पन दालि-भातक इंतजाम अप्पन मेहनतिसँ कऽ रहल अछि। तइपर सँ ओ अप्पन पएरपर ठाढ़ अछि। पाठशालाक मास्टर साहेबक कहब अछि जे चारिम क्लासमे देवदास पढबामे सभसँ नीक रहए। मुदा जखन ई गप ओकर पिता मोहनदासकेँ बतौलन्हि तँ ओकर आँखि कत्तौ टंगि गेलै। ओकरा जेना अकाशी लागि गेलै। ओकरा मुँह परक डरीड़ थरथराइत छै। आँखिक तेजी मिझाए लागैत छै। जेना कोनो गह्वरसँ ओकर कंठक अवाज बहराइत अछि, "हमहूँ तँ बी.ए. फर्स्ट क्लास छी। दिन-राति घोटैंत रही...! की भेल?" एकर बाद मोहनदासक आँखि चमकि जाइत अछि आ ओ पपड़ी पड़ल ठोरसँ हँसैत कहैत अछि, "आइ काल्हि हम कमप्यूटर सिखैत छी। बस स्टैंडपर जे "स्टार कमप्यूटर सेंटर' अछि, ओतए हम जाइत छी। इमारती समान आ हार्डवेयरक दोकान चलबैबला मोहम्मद इमरानक बेटा शकील ऐ कमप्यूटर सेंटरक मालिक अछि आ ओ कहैत अछि, "कका, टाइपिंग, कंपोजिंग आ प्रिंट निकालैबला काज बुझि गेलहुँ तँ छह सए टकासँ बेसी देब।' मोहनदास कहैत अछि जे, "टाइपिंगमे ऐ मास हम तीसक स्पीड निकालि लेलहुँ। छोट-मोट काज भेट जाइत अछि मुदा एखन बहुत रास गलतियो भऽ जाइत अछि आ बहुत रास काल ओइ गलतीकेँ ठीक करैमे लागि जाइत अछि।' मुदा ई सभटा गप बहुत काल पहिलुके अछि। मोहनदासकेँ भारी विपैत पड़ल छै आ ओ बेर-बेर कहैत अछि- "हमर नाम मोहनदास नै अछि।... हम अदालतमे हलफनामा दै लेल तैयार छी। जेकरा बनैक छै ओ बनि जाए मोहनदास। कोनो तरहेँ अहाँ सभ हमरा बचा लिअ!... हम अहाँ सभक कऽल जोड़ैत छी!' मोहनदासक दिक की अछि? ई बताबैक पहिने ओकर परिवारक पाँचम प्राणी माने मोहनदासक घरक छह बरखक शारदाक गप कऽ लेल जाए। छह बरखक शारदा गामक सरकारी प्राथमिक पाठशालामे दोसर कक्षामे पढ़ैत अछि आ स्कूलक बाद ओ अढाइ किलोमीटर दूर, दू पोखरि पार बसल गाम बिछिया टोला चलि जाइत अछि, जतएसँ ओ माँझ रातिकेँ करीब नौ-दस बजे घर घुसैत अछि। बिछिया टोलामे ओ बिसनाथ प्रसादक एक बरखक बेटाकेँ सम्हारैत अछि आ ओकर घरक काज-धाज हाथे-पाथे करैत अछि। बिछिया गामक पैघ किसान आ जीवन बीमा निगममे बाबूगिरी करैबला नगेंद्रनाथक कलेक्टरीसँ लऽ कऽ मंत्री धरि पहुँच आ धाख छै। दूइ बेर ग्राम पंचायतक सरपंच आ एक बेर जिला जनपदक उपाध्यक्ष रहल अछि। बिसनाथ प्रसाद, जिनकर एक बरखक बेटाकेँ शारदा सम्हारैत छन्हि, ऐ नगेन्द्रनाथक पाँच मे सँ एक बेटा छथिन्ह। हुनकर असली नाम विश्वनाथ प्रसाद अछि मुदा गामक लोक हुनका बिसनाथ कहि कऽ बजाबैत अछि आ पीठ पाछाँ कहैत अछि, "असूल करैत अछि बिसनाथ। गजबक बिखधारी। ककरो फूकि मारि दिअए तँ बूझू जे टें...। बाप नागनाथ तँ बेटा सांपनाथ...। ओ अहाँकेँ देखि कऽ मुस्किया रहल अछि आ गुड़क रसमे लपेटि कऽ कहि रहल अछि तँ अहाँ साकांक्ष भऽ जाऊ। डसबाक पूरा तैयारी अछि।' बिसनाथक लग एकटा चीज नै अछि, ओ अछि ईमान। कखनो शराब पी लेलाक बाद ओ अपने मुँहसँ कहैत अछि, "एकक टोपी दोसराक मुँहमे टांगैबला हेराफेरीमे जे आनंद छै भइया, तकर सोझाँ अनकर कनियाँकेँ जांघक नीचाँ दाबैबला मजा बड्ड छोट चीज छै...! हा...हा...हा...!' ओकर उठब-बैसब सेहो गामक आ एम्हर-ओम्हरक तेहन लोक सभक संग अछि, जेकरा लऽ कऽ कहियो कोनो नीक गप नै सुनल गेल। बिसनाथ ऊँच जातिक अछि मुदा मोहनदास नीच जातिक कबीरपंथी अछि। ओकर बिरादरीक कतेक लोक सभ आइयो सूप-चटाइ, दरी-कंबल बुनैत अछि। मोहनदास हमरे गाम नै, आसपासक कतेको गाममे अप्पन बिरादरीक पहिलुक लड़का हएत जे बी.ए. पास केने छल। आ ओहो फर्स्ट डिवीजनसँ आ मेरिटमे दोसर नंबरक संग। (एतए थम्हि जाऊ। सत्त बताऊ जे कतौ अहाँकेँ ई तँ नै लागैए जे हम अहाँकेँ कोनो प्रतीकवादी कूटकथा सुनाबै लेल बैसि गेलहुँ? एहि कथाक मुख्यपात्रक नाम मोहनदास, ओकर कनियाँक नाम कस्तूरीबाइ, माएक नाम पुतलीबाइ आ बेटाक नाम देवदास...? कस्तूरी बाइ नामसँ कस्तूरबाक मोन पड़ैत अछि, मोहनदास तँ साफे अछि। मुदा अहाँ महात्मा गांधीक "आत्मकथा' माने "दि स्टोरी ऑफ माइ एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रूथ' पढबै तँ पता लागत जे हुनकर पिता करमचंदक दोसर नाम काबा सेहो रहन्हि। आ माएक नाम सेहो पुतली बाइ... फेर हुनकर बेटा देवदासक खिस्सा केकरा नै बुझल छै? जे अहाँ मोहनदासक बगे-बानी आ देह-दशा देखबै तँ अहाँकेँ फेर ओ इतिहास घेर लेत। अंतर बस एतबे जे ओ एहन मोहनदास सन अछि जेकरा पोरबंदर, काठियावाड़, राजकोट, विलायत, दक्खिन अफ्रीका आ बजाज-बिड़ला भवनमे नै छत्तीसगढ़ आ विंध्यप्रदेशक बोन-झाँकुड़, खोह-तरहरि, खेत-पथारमे रौद-भूख, रोग-घाम आ अन्याय-अपमानक आँचमे पालल-पोसल गेल छै।... आरो सभ सभटा ओहने... ...मुदा ऐठाम हम, कथाक बीचेमे ठाढ़ भऽ ई कहि दैत छी, जे बगे-बानीक मिलान एकटा संजोगे अछि। जखन हम अहाँक लेल ई कथा लिखैले बैसलहुँ, ओइ काल हमरा अपने नै बुझल छल जे हमर गामक मोहनदास आ ओकर परिवारक लोकक लिस्टमे इतिहासक कोनो एहन अनुगूंज सेहो नुकाएल छै। विश्वास करू, एहन किछु नै अछि। ई कोनो प्रतीक कथा, रूपक आकि कूटाख्यान नै अछि। ई तँ एकटा साफे सरल खिस्सा छी। मुदा सत कही तँ ई कोनो खिस्सा नै अछि। किएक तँ हम सदिखन काल जना खिस्साक आड़िमे, अहाँकेँ फेरसँ अप्पन काल आ समाजक एकटा असल जिनगीक ब्यौरा दै लेल बैसल छी। मोहनदास वास्तवमे एकटा जीवैत असल मनुख अछि आ ओकर जिनगी एखन बड़ संकटमे छै। हँ, ई गप अवश्य अछि जे हम सत गपमे सदिखन जना ऐबेर फेरसँ कम-बेस हेरफेर केने छी। मुदा ई हेरफेर तेहने अछि, जेना कियो हाथीकेँ नुकेबा लेल ओकर बड़का देहक ऊपर डेढ़ हाथक गमछा ओछा दैत अछि। अहाँकेँ मानऽ पड़त जे सत गप एकटा हाथी होइत अछि आ जखन कोनो कवि आ कहानीकार ओकर ऊपर गमछा ओछा कऽ ओकरा नुका कऽ रोमि कऽ सभक आगू ठाढ़ करैत अछि, तँ तखन ओकर अपनक जिनगीक सभटा पुल टूटि जाइत छै आ ओकर सभटा नाह जरि कऽ छाउर भऽ जाइत छै। ...तँ... मोहनदास एकटा असल लोक अछि। एकर पुष्टि अहाँ चाही तँ हमर गामेक लोकसँ नै ऐ देशक कोनो गामक कोनो लोकसँ पूछि कऽ कऽ सकैत छी।) मोहनदास जखन बी.ए. पास केलक तँ बाप काबा आ माय पुतलीबाइकेँ आशा रहै जे आब ओकरा तुरत्ते नोकरी भेट जएतै। मोहनदासक बियाह चौदह-पंद्रह बरखमे कटकोना गामक विरंजुक सुन्नर सन बेटी कस्तूरी बाइक संग भऽ गेल छल। कस्तूरी बड़ काज करैवाली छल। सासुर आबैक संग ओ घरक सभटा काजे टा नै सम्हारलक मुदा एम्हर-ओम्हर छोट-मोट मजूरी कऽ किछु पाइयो कमाबै लागल, जइसँ मोहनदासक पढ़बाक खर्चा निकलि जाए। सभक आँखि मोहनदासेपर लागल रहै। बी.ए. करैबला ओ जाइत-समाजक पहिल बच्चा रहए। सेहो फस्ट डिवीजन। परीक्षाक रिजल्ट जखैन बहराएल तखन ओकर कएकटा फोटो सेहो अखबारमे छपल। कोचिंग चलाबैबला कंपनी सेहो ओकर फोटो छापलक। मोहनदास रोजगार कार्यालयमे अप्पन नाम लिखौलक आ "रोजगार समाचार' मे छपैबला विज्ञापनकेँ देख कऽ जत्तऽ–तत्तऽ दर्खास्त पठाबए लागल। लिखित परीक्षामे सभसँ ऊपर रहै छल मुदा जखन इंटरव्यू होइत रहै तँ ओकरा अनुत्तीर्ण कऽ देल जाइत छल। ओ देखैत छल जे ओकर ठाम आठम-दसम पास, थर्ड-सेकेंड डिवीजनसँ बी.ए. करैबला लड़काकेँ नोकरी भऽ जाइत अछि। ओइमे सभक लग कोनो-ने-कोनो पैरवी रहैत छलै। सभ कोनो-ने-कोनो अफसरक, नेताक आ पैघ लोकक जमाय, बेटा, भातिज, भागिन आ लल्लो-चप्पो करैबला आकि कर्मचारी रहैत छल। मोहनदास सभ बेर असफल भऽ कऽ घुरैत छल मुदा ओ अप्पन आस नै छोड़लक। ओ बुझैत छल जे हिन्दुस्तानमे भ्रष्टाचार बड्ड रास छै मुदा तखनो सैकड़ामे दस-बीसटा लोककेँ अप्पन मेरिट आ योग्यताक दमपर नोकरी भेट जाइत छै। आस्ते-आस्ते मोहनदासकेँ ईहो बुझऽमे आबि गेलै जे कतेक रास नौकरी लेल बोली लागै छै। ओकर बाप काबा दास लग जे लाख-पचास हजार रहितियै तँ दू-तीनटा एहन नौकरी हाथ जे ओकर हाथसँ छुटलै तइमे ओ घूस दऽ बहाल भऽ सकै छल। काल बितैत गेलै। ओकर उमेर सरकारी नोकरीक आयुरेखा पार करऽ लगलै। घरक लोक सभ असोथकित हुअए लागल। तैयो कस्तूरी बोल-भरोस दैत छल। कोनो गप नै, सरकारी नौकरी नै भेटत तँ प्राइवेटमे देखि ले। नै तँ कोनो धंधा कऽ ले। आइ-काल्हि पढ़ब-लिखब बेरोजगारक लेल सरकारक कएकटा योजना अछि। कुक्कट पालन कऽ ले। अंडाक धंधामे कतेक रास फाएदा अछि। मोमबत्ती, अगरबत्ती आ आटा-दलिया बनाबैक कारखाना खोलि ले। सरकार बैंकसँ लोन दैत छै। एक बेर साक्षरताक काज आएल छल। शिक्षाकर्मीक अस्थायी काज ओकरा भेट सकै छलै। मुदा बादमे पता चललै जे जाइ अफसरक नीचाँ ई काज छल ओ अप्पन जाति आकि एक-दू राजनीतिक पार्टीक लोककेँ ओइमे भरि रहल अछि। मोहनदास नीचाँक जातिक छल आ कोनो पार्टीक सदस्यो नै छल। मोहनदास बड़ सोझ, संकोची आ स्वाभिमानी छल। ऐ काजक लेल जतेक दौग-भाग करऽ पड़ितै, जतेक अफसर-हाकिमक हाथ-पएर जोड़ै पड़ितै , एतए-ओतए जे खुआबऽ–पियाबऽ पड़ितै ओ ओकरा सक्कमे नै रहै। ओइ संगे नौकरीक जकाँ एतए सेहो लड़ाइ-झगड़ा सेहो छलै। एहन नै छल जे मोहनदास प्रतिस्पर्धासँ डराइ छल, एहन रहितै तँ ओ बी.ए. क परीक्षाक मेरिटमे कोना अबितै? मुदा ओ जल्दीये बुझि गेल जे स्कूल-कॉलेजक बाहरक असल जिनगीक खेल एकटा एहन मैदान अछि, जतए ओ गोल बना सकैत अछि जकरा लग दोसराकेँ लंगड़ी मारबाक तागति छै। आ ई तागति पैरवी-पैगाम, जोड़-तोड़, घूस, चिन्हल-जानल, धुरफंदी एहन कतेक अवैध आ अनैतिक बौस्तुसँ बनैत अछि, जकरामे सँ एक्कोटा मोहनदासक बूताक गप नै छल। मोहनदासे टा नै, ओकर कनियाँ कस्तूरी, बाप काबा आ माय पुतलीबाइ सभक भीतर ओकर सरकारी-अफसर-हाकिम बनैक आस मिझा गेल, आब तँ लऽ दऽ कऽ सएह लागैत छल जे एहन किछु भेट जाए, जकरासँ बेरोजगारी आ असगर रहनाइसँ मोहनदासक पिंड छुटि जाए आ घरक दालि-रोटी कोनो तरहेँ चलए लागै। अही बीच काबा दासकेँ टी.बी. भऽ गेलै। ओ खाँसै लागल आ कफक संग खून बोकरऽ लागल। ठीक एकर बाद एकटा खैराती नेत्र चिकित्सा शिविरमे पुतलीबाइक आँखिक इजोत चलि गेलै। कस्तूरीपर घरक काज-धाज आ बाहरक मजूरीक संग सास-ससुरक सेवा-सुश्रुषाक भार सेहो आबि गेलै। सेहो एहन कालमे जखन ओकरा सुस्ताइक जरूरी छलै, किएकि ओ गढ़ुआरि छल। गर्भमे देवदास आबि गेल छलै। मोहनदासकेँ देखिये कऽ लागैत छल जे ओ कतेक दिनसँ बेमार अछि। गाममे ओ कम्मे लोकसँ भेंट करैत छल। गाम-घरक लोकक आगू आबैसँ ओ नुकायल रहैत छल। सभटा लोक लग एक्केटा प्रश्न होइ छलै- , "की कऽ रहल छी? कोनो जोगाड़ भेल?' गामक लग कठिना नामक एकटा धार बहैत छल। मोहनदास गर्मीमे गामक दोसर लोक जकाँ धारक बालूमे खीरा, ककड़ी, तरबूज, खरबूज रोपैक काज केलक। कनियाँ कस्तूरी टा नै, ओकर बाप-माय काबा आ पुतलीबाइ सेहो ओतए जाइत छल आ पलिया बना कऽ धारक पानिसँ छोट लत्तीकेँ पानि पटा कऽ खेती करैत छल। दुपहरिया आ रातिमे बेरा-बेरी पहरा दैत छल। बरख भरिमे आठ-दस हजार टाका अही तरहे भऽ जाइत छलै। मुदा कतेक रास बिन कालक पानि पड़ैसँ धारक पानि बढ़ि जाइत छल। मोहनदास संगे एहन दू बेर भेल छलै। कनी-कनी कऽ बड़का अवसाद आ निराशा ओकरा भीतर बैसए लगलै। जइ दिन कस्तूरी देवदासकेँ जन्म देलक, ओइ राति मोहनदास अप्पन घर नै घुरल। ओ कठिना धारक बालुपर निचाट पड़ल आकाशक सून-सपाटकेँ ताकि रहल छल। संजोगेसँ ओइ राति सेहो अमावशक राति छल, जै राति देवदासक जन्म भेल। प्रसवक काल एक बेर तँ एहन भऽ गेलै जे कस्तूरी मरत की जीत। नालक गड़मे फँसि गेलासँ बच्चा अधबीचेमे रहि गेल छल आ प्रसव करबै लेल आएल बिलसपुरहिन घबरा कऽ कष्टमे बेहोश कस्तूरीकेँ मुइल घोषित कऽ देलक। आन्हर भऽ गेल माय पुतलीबाइ आ टीबीसँ खोँखी करैत बाप काबा दास, दुनू अप्पन बेटा मोहनदासकेँ ताकैत रहल, मुदा ओ कतए भेटतियै? ओ तँ ओइ राति कठिना धारक रेतमे, अमावशक आकाशकेँ कोनो मुर्दा जना घूरि रहल छल, अप्पन भीतर जीवनक कोनो चिह्न ताकि रहल छल। हुनकर देहक नसमे ओइ राति खून नै, अमावशक कारि अन्हार बहि रहल छल। आ हुनकर सुन्न भेल मगजमे नीन नै, ओ डराएल सपना उमड़ि-घुमड़ि रहल छल, जे कोनो भ्रष्ट आ पतित भऽ गेल व्यवस्थाक कोखिसँ जन्म लैत अछि। मोहनदास ओइ राति धारक कातमे बेहोश छल, तइसँ ओकरा अप्पन बाप काबा आ माय पुतलीबाइक टेर सुना नै पड़लै आ नै कस्तूरीक कानब; आ नहिये भिनसरे चारि बजेक आसपास अप्पन नवजात बेटा देवदासक कानब। भोरक सुरुज ऊपर आबि गेल छल, जखैन रौदक आँच गामसँ एक किलोमीटर दूर कठिना धारक रेतमे सुतल मोहनदासक नीन आ मूर्च्छा तोड़लक। मोहनदास कतेक काल धरि धीपल रेतपर ओहिना पड़ल रहल। ओकर देह पाटल छलै आ स्मृति मिज्झड़ छलै। ओकरा ई बुझबामे कनेक काल लगलै जे ओ अप्पन घरक ओसार आ आंगनमे नै, कठिनाक ओइ रेतपर पड़ल अछि, जतए किछु दिवस पहिने ओ मतीरा, ककड़ी, खरबूज आ कुम्हर-टमाटर रोपने छल आ कालक पानिसँ उगडुम धारक पानि सभटा गीरि गेल छलै। मोहनदास जखन घर घुरल तँ ओतए गामक कतेक रास लोक ठाढ़ छल। स्त्रीगण सेहो छलै। लागैत छल जे सभ कियो ओकरे लऽ कऽ गप करैत छल। किएकि ओकरा देखिये कऽ सभ चुप भऽ गेल आ एकाएकी सभ कियो ओतएसँ चलि गेल। "पूत खाली दयऊक किरपासँ बचल। गामक लोक तँ तुलसी-गंगाजल लऽ कऽ आबि गेल छल।” माय पुतलीबाइ आँचरसँ नोर पोछैत कहलखिन। "जा कऽ देखि लियौ। देउता सन झलकैए।' मोहनदास ओइ सोइरी घर गेल, जाइमे कस्तूरी एखने किछु काल पहिने मृत्युक मुँहसँ बहार भऽ अप्पन नेनाक संग खाटपर सुतल छल। बोरसीमे गोइठाक संग नीम-अजवाइन जड़ैत छल आ कोठरीमे तकर धुआँ भड़ल छल। कस्तूरी थाकल आँखिसँ मोहनदासकेँ देखलक। ओकरा देखबेमे एतेक असहायता आ ग्लानि छलै जे मोहनदासक करेज धकसँ रहि गेलै। एकटा आर पेट आजुक दिन घरमे जन्म लऽ लेलक। आब कमसँ कम छह-आठ मास धरि सभ दिन आध सेर गायक दूधक इंतजाम करैए पड़त। कस्तूरीक लेल मास भरि देसी सोंठ, गुड़ आ घी आ हरदिक संग भात। छठ्ठी, बरहों आ पसनी (अन्नप्राशन) मे लोकक खुआबैक खर्चा सेहो। मुदा तखने मोहनदासक नजरि कस्तूरीक बगलमे सुतल बच्चापर पड़ल। मोट-सोंट, गोल-मटोल बच्चा निश्चिन्त भऽ माएसँ सटि कऽ सुतल छल। बड़ सुन्नर आ अबोध। सतमे कोनो देवताक बच्चा लागैत छल। मोहनदासक भीतर पहिलुक बेर एक बापक संवेदना जन्म लेलक। हुनकर आँखि बच्चापर सँ नै हटैत रहए। तखने बाहर ओसारेसँ काबाक चिकरैक अबाज सुनाइ पड़ल। "सीताराम डाकिया आएल छल। कोनो कारड देने छल।' मोहनदास देखलक, एहि जिलाक सभसँ पैघ कोलियरीसँ नोकरीक लेल इंटरव्यू लेटर आएल अछि। मोहनदास लग पछिला कतेक माससँ एहन तरहक कार्ड नै अबैत छल। तँ की रातिमे कठिना धारक रेतमे जे किछु ओ सोचैत छल, ओकरे कोनो भनक आकाशक कोनो ग्रह-नक्षत्रकेँ लागि गेल छलै? कोनो देवता हुनकर दुख आ आफत जानि गेल? की कस्तूरी तँ नै जे आइ भिनसरे बेटा जन्म देलक, वएह सतमे कोनो देवदूत अछि जे अप्पन जन्मक संग अप्पन परिवारक लेल एकटा नबका जीवनक केवाड़ खोलि रहल अछि। ओरियंटल कोल माइंसकेँ पठाओल गेल आ रोजगार कार्यालयक मार्फत ओकरा भेटल इंटरव्यू कार्डमे मोहनदासकेँ एकटा नबका भविष्यक भोर झिलमिलाइत लखा दैत छल। कतेक काल बाद ओकर हृदएमे फेरसँ आशाक एकटा हरियरका नरम दूबि उगै लागल। ओइ राति मोहनदास नीक जना नै सुति सकल। अप्पन जीवनक जै गाछकेँ ओ एकटा ठुट्ठ बुझऽ लागल छल, ओइमे कतौसँ फेर नबका पात बहरा रहल छल। ओरियंटल कोल माइंसमे ओइ दिन ओ साक्षात्कारक कालसँ एक घंटा पहिने पहुँचि गेल छल। अप्पन कुलदेवी मलइहा माय आ सतगुरु कबीरदासजीक नाम जपैत ओकर भीतर एहि बेर एकटा अलगे आत्मविश्वास छल। कोनो तरहेँ नोकरी भेटैक जोश। एक घंटाक लिखित परीक्षा छल, फेर एक घंटाक अंतरालक बाद शारीरिक परीक्षा। मोहनदास भरि मोनसँ आ जान लगा कऽ जुमि गेल। एक घंटाबला लिखित परीक्षा ओ आध घंटासँ कम्मे कालमे पूरा कऽ लेलक। प्रश्न बड़ आसान छलै आ ओकर जवाब तँ ओतए नीचामे लिखल छलै। बस सही उत्तरपर सहीक चेन्ह लगाबैक छलै। एकर बाद १५०० मीटरक दौड़, भागि कऽ चलब, मैदानक पाँच चक्कर लगाबैक, आँखिक परीक्षण, रंगकेँ चिन्हबाक आदिक शारीरिक परीक्षामे दू घंटा लगलै। मोहनदास एतए ककरोसँ उन्नैस नै छल। साँझ चारि बजे कोलियरीक भरतीक दफ्तर दरवाजासँ डेढ़ सए प्रतियोगीमे सँ चुनल गेल पाँचटा नाम पुकारल गेल, ओइमे पहिलुक नाम मोहनदासक छल। मोहनदासक हृदए धरधड़ कऽ रहल छलै। एकटा एहन गप भऽ रहल छल। आब कतेक जल्दी ओकर जीवनक अनिश्चितताक अंत होइबला छलै। सभ मास ओकरा दरमाहा भेटतै। घरमे सभ दिन चूल्हि जरतै। आ तरकारी बनतै। बाप आ मायक इलाज हेतै। देवदासक लालन-पालन आ पढ़ाइ नीकसँ हेतै। कस्तूरीकेँ मजूरीमे दोसरा जकाँ नै खटऽ पड़तै। कोलियरीक बाबू मोहनदाससँ हुनकर सभटा सर्टिफिकेट आ मार्कशीट जमा करेलक मुदा बी.ए. मार्कशीट देखैत ओ कहलक, "आंय हो, एखन धरि कोना नै अहाँ नोकरीक जोगाड़ कऽ सकलिऐ? एकरामे तँ अहाँकेँ थोड़-बेस लमरा-पहुँच कैलासँ कोनो नीक सन नोकरी भेट जैतियै।” "ज्वाइनिंग कहियासँ होएत?” जखन मोहनदास पुछलक तँ जवाबमे बाबू कहलखिन, "ज्वाइनिंगे बुझू। ऐ हफ्तामे भीतरे-भीतर कागजी काज पूरा भऽ जाएत आ अगिला हफ्ता धरि नियुक्ति पत्र अहाँक पतापर पठा देल जाएत।...बेसीसँ बेसी पंद्रह दिन लगा कऽ चलू।” मोहनदासक घरमे एकटा नब युग आबि गेलै। पोस्ट आफिसक खातामे जे दू हजार टका छल तइसँ मोहनदास नबका मसहरी, एक सेर देशी घी, चिन्नी, सोंठ, किछु नब बरतन आ कस्तूरी आ देवदासक लेल किछु कपड़ा किनलक। अपना लेल सेहो ओ नील रंगक जींसक पैंट, टेरिकॉटक चौखाना बनल अंगा, तीस टकाक पर्स आ पाँच-पाँच टकाक दू टा रूमाल किनलक। परसूकेँ कहि कऽ ओ रोज भिनसरे आध सेर दूधक सेहो व्यवस्था कऽ देलक। गाममे ई गप हुअए लागल जे मोहनदासकेँ आखिरीमे ओरियंटल कोल माइंसमे नीक सन नोकरी भेट गेल अछि। गाममे जे सभ ओकरासँ सोझ मुँह गप नै करैत छल, सेहो ओकरासँ मेल-जोल बढ़ाएब शुरू कऽ देलक। जे सभ ओकर मेहनति आ पढ़ैक हँसी करैत छल, सेहो नीकसँ बाजब शुरू कऽ देलक, "ई तँ हेबाके छलै। एहन डिग्री आ पढ़ाइक बाद मोहनदास कहिया धरि खाली बैसितियै।” किछु लोक सभ ईहो टिप्पणी केलक, "असलमे मोहनदास जै बंसहर-पलिहा जातिक अछि, ओकरा आब रिजर्वेशनमे राखि देल गेल छै। नौकरी ओकरा कोटासँ भेटल छै किएकि ऐ जातिक कोनो दोसर लड़का बी.ए. छेबे नै करै।” ओइ हफ्ता मोहनदासक घरमे एक बेर खीर सेहो बनल आ एक बेर आलू-मटरक मसल्हा सेहो। माय पुतलीबाइ अप्पन आँखिक अन्हारकेँ बिसरि गेली आ आंगुरसँ छूबि-हथोड़िया दऽ सूपमे पसरल दालि आ चाउरसँ कांकोड़ बिछै लागल। तोड़ीक तेल आ नून-अमचुरसँ लाल मिरचाइक चटनी सेहो बनौलक। बाप काबादास गणेश छाप मंगलूरी बीड़ीक पूरा कट्टा आ नबका जहाज छाप सलाइक डिबिया किनलक, जकर काठीकेँ रगड़पट्टीमे आस्तेसँ घिसलासँ फर्रसँ आगि जरि जाइत छल। घरक बाहर ओसारपर बैसल, सुट्टा मारैत काबा कतेक राति भोकारि पारि कऽ कबीरदासक भजन गओलक आ ओकरा नै तँ एक्को बेर खोँखी भेलै आ नहिये खूनक संग कफ बाहर निकललै। एक दिन भोरे-भोर आन्हर पुतलीबाइ आंगनमे खुशीसँ घूमि-घूमि कऽ नाचैत जोर-जोरसँ गाबऽ लागल, "टोरबा-पुतऊ की कोठरिया माझे अलोपी मइना खोंथा डारिस हबै। भाग आइस, कलेस गइस...!!! किसमत जागिस...' जै हो मलइहा माइ...! तोराले गोर लागी सतगुरू महराज...!!! जै हो...जै हो!' सभ कियो देखलक जे मोहनदासक आन्हर मायक आँखि अलोपी मैनाक जे खोता कस्तूरी-देवदासक कोठरीमे देखने छल, ओ सत छल। मोहनदास दोसर हफ्तासँ कोलियरीक चिट्ठीक बाट जोहै लागल। मुदा ओइ हफ्ता डाकिया नै आएल। एकर बादक हफ्ता सेहो बीति गेल। बीस-बाइस दिन भऽ गेल छलै। पता चललै जे कांसाकोड़ाक कंचलमल शर्माक बेटा संतोष कुमार शर्माकेँ चिट्ठी पहिने भेट गेलै आ ओ नोकरी सेहो ज्वाइन कऽ लेलक। मोहनदास बेचैन भऽ गेल। ओ राज्य परिवहनक बस पकड़लक आ कोलियरी पहुँचल। भर्ती दफ्तरमे ओ बाबू कहलक जे एखन लेटर पठाओल जा रहल अछि। पोस्ट तीन टा छल, चुनल गेल छल पाँच टा लोक। मुदा जगह नै बढ़ाओल गेल तँ दू कैंडिडेट कटत। मोहनदास डरि गेल। ओकर झाइ पड़ल चेहरा देखि कऽ बाबू भरोस देलकै, उम्मीद अछि जे दू टा पोस्ट बढ़ि जाएत आ नै बढ़त तँ मोहनदासक नाम नै कटत किएकि लिस्टमे हुनकर नाम पहिल अछि। मोहनदास घुरि गेल। बाबू ओकरा एकाध मास इंतजार करै लेल कहलक आ पूरा भरोसा देलक। मुदा मोहनदासक भीतर किछु मिझा गेलै। ओकरा चिन्ता हुअए लगलै जे परसू मास बितैत दिनक आधा सेरक दूधक पूरा हिसाब देबऽ पड़तै। जोशमे एतए-ओतए किछु उधारी सेहो भऽ गेल छलै। आब सभटा कोना चुकाओल जाएत? कस्तूरी ओकरा ढाढ़स राखऽ लेल कहलक। माय पुतलीबाइ मलइहा माइसँ गछलक। हँ, काबा दास किछु दिनसँ चुप रहऽ लागल। रातिमे भजन गाओल ओ छोड़ि देलक आ ओकरा खोँखी आबऽ लगलै। डेढ़ मासक बाद मोहनदास फेर ओरियंटल कोल माइंस गेल। कतेक प्रतीक्षा केलाक बाद बाबू ओकरा भरती दफ्तरक भीतर आबऽ देलक। ओ ओकरा आर इंतजार करैले कहलक। मुदा ऐ बेर ओ इंतजार लेल कोनो अंतिम समए नै बतेलक। ऐ बेर ओकर आवाजमे पहिने सन अपनापा सेहो नै छलै। मोहनदास चलैसँ पहिने जखन जोर दऽ कऽ पुछलक तँ अमनसँ ओ कहलक, "ओना पता करबाक जरूरत की अछि? चिट्ठी भेटत तँ अपने आप पता भऽ जाएत।' फेर ओे कहलक, "असलमे ओइ दिन कैंडीडेटकेँ सलेक्ट करै लेल बिहारसँ कोल इंडियाक जे अफसर आएल छल, ओ एकटा पोस्टपर अप्पन जमायकेँ फिट कऽ देलक। सभटा ऊपर बलाक खेल छी।' मोहनदासक आंखिक आगू अन्हार पसरऽ लगलै। अगिला मास मोहनदास फेर पता करै लेल गेल। कतौसँ किछु भऽ जाए। भोर दस बजेसँ लऽ कऽ दुपहरियाक साढ़े तीन बजे धरि ओकरा दफ्तरक बाहर बैसल रहऽ पड़लै। चपरासीक चिरौती-बिनतीक बाद जखन ओकरा भीतर आबऽ देल गेलै तँ पता चललै जे पहिलुक बाबू छुट्टीपर गेल अछि आ ओकरा ठाम जे दोसर मोट-सन बाबू ओकर काज देखि रहल अछि, ओकरा ओइ फाइलक कोनो जानकारी नै छै। मोहनदासकेँ अप्पन मार्कशीट आ सभटा ओरिजनल प्रमाणपत्र केँ लऽ कऽ चिन्ता हुअए लगलै। जखन ओ एकरा दिया पुछलक तँ नबका मोटका बाबू कहलकै जे अहाँक सर्टिफिकेटक हम की करब? नौकरी नै देल जाइत तँ रजिस्ट्रीसँ आपस घुरा देब, नै तँ अगिला बेर आबि कऽ अप्पन संगे लऽ जाएब। मोहनदास फेर घुरि गेल। ओकरा मोनक सभसँ भीतरी कोन सेहो नीकसँ बुझि गेल छल जे ओकर जिनगीक ठूठ गिरहसँ जै नबका कोंपरक कल्लै आश्चर्यसँ बहराइबला छलै, आकाशक देवता ओकर बिपतिकेँ जानि, ओकरा लेल दयाक जे बून खसेने छल, तकरा दुर्भाग्य आ भ्रष्टाचारक लू झरका देलक। आब कोनो आस कतौसँ नै बाँचल अछि। जौँ ओकरा संग कोनो नकदी जमा-पूँजी होइत तँ कोनो दलालसँ भेट कऽ टका ऊपर धरि पहुँचा कऽ ओ ऐ नोकरी केँ लऽ लितए। मोहनदासक हालत गामक धनीक लोक सभसँ पहिने बुझि गेल आ पहिने जकाँ ओ फेर ओकर पढ़ाइ आ प्रतिभाक हँसी करऽ लागै गेल। ओइ दिन मोहनदास अपमानक कड़ू घूँट पीब कऽ रहि गेल, जाइ दिन पंडित छत्रधारी तिवारीक बेटा विजय तिवारी, जे ओकरा संगे कॉलेजमे पढ़ैत छल आ थर्ड डिवीजनसँ बड़ मुश्किलसँ बी.ए. पास भऽ सकल छल मुदा अप्पन ससुरक तिकड़म आ पैरवीसँ पुलिसमे सब-इंस्पेक्टर भऽ गेल छल, ओकरापर गरैज कऽ बाजल आ कहलक, "मोहना, परसुए हम सरकारी योजनामे दस टा महीस किनने छी। डेयरी खोलि रहल छी। जौं ठीक बुझी तँ महीससक सानी-भुस्सा, गोठुल्लाक काज कस्तूरी भऊजीक संग सम्हारि लिअ। सभ मास पहिलुक तारीखकेँ दरमाहा तँ भेटबे करत, इंदिरा आवास योजनामे हम अहाँकेँ मकान पक्का सेहो करबा देब। भऊजीक मोन लागि जाएत हम्मर गोसारेमे।' "सोचि कऽ बताबैत छी।' मोहनदास जबाव देलक आ अप्पन भीतर उठैत अपमानक आगिकेँ मुँह घुमा कऽ नुका लेलक। विजय तिवारीक मुँहसँ कस्तूरीक नाम सुनि कऽ ओकरा भीतर कतौ अप्पन असहायता आ निर्बलताक अहसास गहींर भऽ गेलै आ एकटा डर सेहो दिमागक कोनो-कोनामे आबि गेलै। जल्दिये किछु करए पड़तै, नै तँ ओकर परिवार टूटि कऽ छिड़िया जाएत। कोनो एहन काज, जे ओकरा वशमे छै। जकरा लेल ककरो मदति आ तिकड़मक जरूरत नै छै। कस्तूरीक सुन्नर चेहरा आ विजय तिवारीक शातिर आँखि बेर-बेर ओकरा आगू घुमि जाइत छल। ओइ काल ओ सोचि लेलखिन जे ओ अप्पन प्रमाणपत्र, अंक-सूची आ दोसर कागचक पता करबा लेल ओरियंटल कोल माइंस नै जाएत, किएकि ओइ कागचक टुकड़ाक मूल्य कतौ किछु नै रहि गेल छलै। जइ आधारपर नोकरी भेटैत छल आ सरकारी योजनाक लाभ उठाओल जाइत छल, ओ आधार ओकरा सन लोक लग नै छलै। मोहनदास ओइ राति खेनाइ खेलाक बाद घरमे नै सुतल। कस्तूरीसँ भोरमे घुरैक गप कहि कऽ कन्हापर कोदारि राखि आ रोपा टांगि कऽ ओ कठिना धार दिस चलि गेल आ भरि राति कोनो बताह प्रेत सन मतीरा, खरबूज, कुम्हर, तरबूज, टमाटर, भट्टा, ककड़ी लगाबैक लेल पलिया बनाबैमे लागल रहल। भोर साढ़े चारि बजेक आसपास, जखन उत्तरबरिया कात ध्रुवतारा अप्पन पूर्ण आभामे दोसर ताराक एक्का-एक्की मिझैलाक बाद चमकि रहल छल, मोहनदास अप्पन माथ आ छातीक पसेनाकेँ पोछि आ कनी-कनी बुलैत कठिनाक धारमे ठाढ़ भऽ गेल। अंजुलिमे पानि भरि ओ अप्पन माथपर छींटा मारलक आ दुनू हाथ जोड़ि कऽ बाझल गड़सँ कहलक, "बस अहाँ टा आँखि नै मोरब कठिना माय। तोहरा मलइहा मायक किरिया। हमर बेटा देवदासक किरिया। हमर पसेनाक उपजिसँ अप्पन पेटक जठर आगि नहि बुझाएब कठिना माय...! नै तँ...दयऊ कसम, बीच असाढ़ तोहर धारमे बाल-बच्चा संग कूदि कऽ तोहर पेट हम भरि देब...।' मोहनदास जखन सतगुरु कबीरक नाम जपैत कठिना धारसँ बाहर आबि रहल छल, तखैन ओकर आँखिसँ बहैत नोर कठिना धारक पानिमे ढबकि कऽ बहि रहल छल, जतए छोट-छोट कोतरी माँछ ओकर नूनकेँ चीखै लेल एक-दोसरासँ उपरौंझ कऽ रहल छल। जखन मोहनदास घर पहुँचल तँ ओ देखलक जे कस्तूरी पूरा आंगैनकेँ गोबरसँ नीपि कऽ राखने छल, माय पुतलीबाइ सूपपर मतीरा, कद्दू, खरबूजक बिया पसारि कऽ अप्पन आंगुरसँ लजबिज्जीकेँ बीछ रहल छै, बाप काबादास परछीक कोनमे बाँसक कमची निकालैमे लागल छै आ मांझ आंगनमे ओकर डेढ़ बरखक बेटा देवदास खुरपीसँ घासकेँ छिलैक बुतरूबला खेल खेलाइमे मगन छै। ओकर बुलबाक आहट सुनि कऽ पुतलीबाइ अप्पन मूड़ीकेँ ऊपर केलक आ किछु नै लखा दैबला आँखिसँ अप्पन बेटाक आँखि मिला कऽ मुस्काइत कहलक, "जानैत छीहीं मोहना, आइ अलोपी मैनाक खोतामे मादा मैना दुइ टा बच्चाकेँ जन्म देलक।' पुतली बाइ बेसी खुश हेतियै जौं लखा दैतियै जे ओकर गप सुनि ओकर बेटा मोहनदासक चेहरापर खुशी कोन तरहेँ दिपदिपा रहल छै। ओइ दिन-रातिमे बियारीक बाद मोहनदास कस्तूरी आ देवदासकेँ सेहो अपना संग कठिना धार लऽ गेल। कस्तूरी अप्पन डाँड़क खोंइछ-ओटनीमे कतेक रास बीया राखने छल आ कान्हपर देवदासकेँ बैसैने छल। मोहनदासक कान्हपर रांपी, कोदारि आ बगइक डोरी छल। देवदास कनी कालमे धारक कातक ठाढ़ हवाक झोंकसँ भेटैबला सुखमे डूमि कऽ गहींर नीनमे सूति गेल छल। कस्तूरी आ मोहनदास बीया उगाबैक पलियामे गोबरक खाद दऽ कऽ अलगे-अलग फल आ तरकारीक पलहा बनाबैमे लागल रहल। दुइ घंटामे काज भऽ गेल। कस्तूरी जखन बासन-घैलासँ कठिनासँ पानि आनि कऽ बीयाकेँ पलियामे पटा रहल छल तँ आकाशमे टिमटिमाइत रहल ताराक इजोतमे मोहनदास ओकर सुंदरताकेँ देखि रहल छल। आकाशक नक्षत्रसँ झरैत सलेटी चानीक मद्धिम आभामे कस्तूरीक पिरसाम देह मलइहा मायक मढ़ियाक बाहर राखल ओइ पुरनका पाथरक मूर्ति जेहन देखा दऽ रहल छल, जे बन्हेरू पोखरिकेँ कोड़ै काल निकलल छल आ जेकरा आनि कऽ लोक सभ ओतए राखि देने छल। देह, डांड़, बांहि, छाती, जांघक ठीक ओहिने कटाव आ ओहने सुंदरता, जना कोनो कारीगर छेनी-हथौरी लऽ कऽ मन लगा कऽ बरखमे हुनका रकम-रकम गढ़ने छल। अधासँ बेसी राति बीत गेल छल। टिटहरी आ पनकुकरीक शोर कखनो-काल सुना जाइत छल। कठिना धारक भारी हवाक भारीपनमे कस्तूरीक देहसँ उठएबला पसेनाक गंध मोहनदासकेँ चारू दिससँ घेर लेलक। ई स्त्री ओकरासँ ब्याह करै काल कोन सपना देखने हेती आ ओकरा की भेटल? भोरसँ लऽ कऽ राति धरि, सभ दिन बिना नागाक, सभ सुख-दुख, हारी-बेमारी, भूख-प्यासमे ओ ओकरा संग ठाढ़ छल। मोहनदासक मनमे कस्तूरीक लेल बड़ सहानुभूति आ आत्मीयता आएल। ओ ओकरा एकटकसँ ताकि रहल छल। कस्तूरी बासनकेँ बालुपर टिकौलक आ ठाढ़ भऽ कऽ अप्पन जूड़ा बान्हऽ लागल। मोहनदास उठि कऽ ओकरा लग आएल। कस्तूरी चुप छल। "ऐ कस्तूरी, कबड्डी खेलब?' मोहनदास मुस्काइत कहलक, "हू...तू...तू...!' ओ कस्तूरीक बाँहिकेँ पकड़ि लेने छल आ ओकर बगली आ पेटमे गुदगुदी करऽ लागल छल। कस्तूरी ओकरासँ छूटऽ लेल छटपटा रहल छल, "ईह...ईह...! देवदास जागि गेल...! की करैत छी? छोड़ि... दिअ...हमरा छोड़ू ने!...छोड़ू...! ' कस्तूरी देखलक जे मोहनदास ओकरा छोड़ैबला नै अछि तँ ओ ओकरा धक्का दऽ देलक आ घुरि कऽ कठिना धार दिस भागि गेल। ओ कोनो उल्लसित स्वतंत्र हिरण जना तरपान मारि नक्षत्रक धुँआइत सिलेटीक फरीच्छमे नीचाँ दूर धरि पसरल धारक रेतपर दौगि रहल छल। "आ...आ...आ...! हमरा छुबौ....तँ जानियह....! आ...आ....!' ओकर आवाज सभ पल दूर भेल जाइत छल आ ओ प्रति पल छाह बनैत अन्हारमे बिलायल जा रहल छल। "हू...तु...तू...तू...तू...तु...तू...तू...! ' कहैत मोहनदास खूब जोरसँ ओकरा दिस दौगल। कस्तूरी आओर दम लगौलक। मोहनदास सभ पल ओकरा लग आबि रहल छल। ओ आर जोर लगेलक आ कठिना धारक काते-कात, पानिमे छप-छप करैत पूरा जी जानसँ भागैत चलि गेल। "आ...आ...! छूबौ हमरा...तँ हम मानब!' ओकर दम फुलऽ लगलै। ओ हाँफै लागल छल। मोहनदासक "हू...तु...तू...तू...' सभ क्षण ओकर कान लग आबि रहल छलै। कस्तूरी बुझै छल जे ओ आब मोहनदासकेँ आर छका नै सकत, तकर बादो ओ आखिरी जोर लगौलक। मुदा तखैन धरि एक्के तरपानमे मोहनदास ओकरा पकड़ि लेलक। दुनू कठिनाक धारमे छपाकसँ खसि गेल। "छोड़ू...! ऐ...छोडू!' ओ झगड़ा कऽ रहल छल आ मोहनदासक ऊपर पानि उपछि रहल छल मुदा मोहनदास ओकरा छोड़बाक बदला ओकरासँ आर सटल जा रहल छल। धारक भारी हवामे दुनूक साँस एक-दोसरामे पैसि रहल छल। ओ जेहन तरहे ओकर देहमे अप्पन आंगुरसँ गुदगुदी कऽ रहल छल, ओइसँ कस्तूरीक गरसँ निर्बन्ध किलकारी आ हँसी बहरा रहल छलै। ओकर छद्म प्रतिरोध शिथिल भऽ रहल छलै आ ओ सेहो मोहनदासकेँ दूर धकेलैबला दिखावाक संगे ओकर देहसँ सटल जा रहल छल। तहिना जना लोहाक कोनो टुकड़ा कोनो चुंबकसँ सटै छै। मोहनदास कठिनाक पानिमे ओकरा खसा देलक आ ऊपर ससरि कऽ कहलक, "अहाँ बड़ नीक छी आ कतेक सुंदर छी कस्तूरी...! देखू हमरा...!' आ ओकर चुम्मा लेलक। वैशाख ओ गरम रातिमे दूर आकाशमे टिमटिमाइत ताराक मद्धिम सलेटी इजोतमे, कठिना धारक शीतल पानिमे दूइटा जवान गोंछ वा पाढ़िन मांछ सन ओ दुनू उद्दाम आ निर्बंध छपाछप कऽ रहल छल। बीच-बीचमे कस्तूरीक कंठसँ उठैत हँसी आ किलकारीक संग मोहनदासक भारी साँससँ निकलैत "हू...तु...तू...तू' रातिक निस्तब्धताकेँ चिरैत जाइत छल। थाकल कस्तूरी धारसँ घुरि कऽ भीजल नुआमे देवदासक बगलमे सुति गेल छल मुदा मोहनदास नै जानि कतेक राति धरि कठिनाक कातक उथली धारमे पड़ल रहल, आकाशक देवताकेँ तकैत गाबि रहल छल, "पंछी-परौना बाजैत अछि, कतऽ गेल हे संगवारी, करउंदा फरत हे... करउंदा फरत हे... मोर बाली हे उमरिया करउंदा बता तोला के...' ओकर गरमे आइ एकटा एहन सुर उतरि गेल छल जे दूर धरि सुना दैत पुनकुकरी आओर टिटहरीक बोल सेहो ओकरा लग आबि कऽ संगत करऽ लागल। बादमे शारदा ओइ रातिक स्मृति बनल। ओइ बरख तँ ककड़ी-तरबूज आओर तरकारीक फसिल नीक भेल मुदा बाजारक भाव मंदा भऽ गेलासँ कमाइ कोनो खास नै भेलै। कस्तूरी गढ़ुआरि छल, तकर बादो ओकरा दोसरक मजूरी करहि पड़ैत छलै। मोहनदास सेहो जी-तोड़ मेहनति करैत छल। कठिना एक बेर तँ ओकर प्रार्थना सुनि नेने छल मुदा बादमे बेसी काल ओइमे पानि झझा जाइत छलै। काबा दासक खोँखी बढ़ऽ लागल छलै। मुदा छह किलोमीटर दूरक कस्बाक सरकारी अस्पतालमे एकटा खूब नीक डॉक्टर आबि गेल छलै, डॉक्टर वाकणकर, आ मोहनदासकेँ बुझेलै जे टी.बी.क लेल अस्पतालमे मुफ्त दबाइ भेटैत छै आ ओकर बापकेँ एकर पूरा कोर्स करबाक चाही। ओ हुनका एकटा पॉलिथिनक थैलीमे दू मासक दवाइक खुराक भरि कऽ देलक मुदा काबादास नै तँ समएपर खुराक लैत रहथिन आ नै परहेजे राखि सकैत छल। खाइ-पीबैक कोनो ठेकान नै छलै। माय पुतलीबाइ आँखिक लेल डॉक्टर वाकणकरकेँ कहलखिन जे आपरेशनसँ चालीस पैसा इजोत घुरि जाएत मुदा एकरामे आठ-दस हजार टकासँ कम खर्चा नै होएत। ओ मोहनदासकेँ भरोस देलक जे जौं जिलामे कोनो नीक आ ईमानदार कलेक्टर आओत तँ ओ ओकर ई काज करबा देत। मुदा बरखपर बरख बीतल गेल, एहन कलेक्टर नै आएल। बीचमे एक बेर एकटा स्वयंसेवी संस्था दिससँ एकटा लड़का आ एकटा लड़की बंसहर-कबीरपंथीक बस्तीमे आबऽ लागल छल। ओ कस्तूरी आ मोहनाकेँ कतेक रास आश्वासन देलक जे जल्दिये ओ एहन कोनो व्यवस्था कऽ देत जे ओकर परिवार अप्पन गुजर-बसर आरामसँ करऽ लगताह। ओ कतेक रास अर्जी सेहो लिखलक आ ओकरापर मोहनदाससँ दस्तखत सेहो करौलक। मुदा फेर ओकर आएब-जाएब बंद भऽ गेल। पता लागल जे दुनू लड़का-लड़की ब्याह कऽ लेलक आ ओ दिल्ली चलि गेल। ओ लड़की आब कोनो टी.बी. चैनलमे काज करैत अछि आ लड़का दिल्लीमे अप्पन आइ.ए.एस. फूफाक सहायतासँ झुग्गीमे रहैबला लोक लेल काज करैए बला संस्था खोलि लेल छल आ देश-विदेशक जत्रापर रहैत अछि। समए बितैत गेल। मोहनदास आ कस्तूरी अप्पन मेहनत-मजूरी आ मलइहा मायक कृपासँ कोनो तरहेँ दिन गुजरि रहल छल। शारदा दू बरखक भऽ गेल छल आ देवदास चारि बरखक। काबा आब बेसी-खाटेपर पड़ल रहैत छल। बगइक डोरी कखनो काल बना दैत छल वा बाँसक कमची निकालि दैत छल। मुदा ओकर खोँखी बढ़िते जा रहल छल। ओकर छातीक एक-एकटा पसली गानल जा सकैत छल। कतेक बेर ओ खांसैत छल तँ कफक संग खूने टा नहि, लागैत छल जना मौसक थक्का बाहर निकलि रहल छै। ओम्हर डॉक्टर वाकणकरक बदली नेता-अफसर कोनो दोसर जिलामे करा देलक। आब मोहनदासकेँ अस्पतालसँ टी.वी.क मुफ्त गोली दैबला कियो नै छल। जखन कखनो ओ जाइत छल, ओ अगिला हफ्ता आबैक लेल कहि देल जाइत छल। ओकर बाप काबा एतेक कमजोर भऽ गेल छल जे खोँखीकेँ थूकलाक बाद, खाटपर पटायल-पटायल चुपचाप धरतीकेँ देखैत रहैत छल। चिट्ठा आ माँछी धरि ओकर खोँखीक आवाज चिन्है छल, पता नै कतएसँ मटा आ चिट्टा ओकर कफ दिस झुंड बना कऽ दौगि पडै़त छल। एक दिन तँ काबा हदसि गेल, जखन ओ देखलक जे ओकर खोंखी करैत देरी गिद्धा माछी भिनभिन करैत ओकर चारू दिस मँडराबऽ लागल। काबाकेँ अप्पन अंत लग आएल बुझाए लागल छल। ओ पुतलीबाइकेँ शोर करऽ चाहलक मुदा जखैन धरि ओकर आवाज निकलितियै, तकर पहिने खोँखीक तेज दौरा ओकर गरकेँ फेरसँ अप्पन कब्जामे कऽ लेलकै आ आखिरमे ओतएसँ आँजुर भरि खून आ मांसक थक्का बाहर निकलल। मोहनदास आ कस्तूरी कठिनाक पलिया संभारै लेल जा चुकल छल, घरमे आन्हर पुतलीबाइ टा छल। ओ दौगि गेल, गिरैत-पड़ैत आएल आओर अप्पन वर काबाकेँ छुबि-छुबि कऽ कानऽ लागल। पौरुकासँ ओकर ठेहुनमे गठिया धऽ लेने छल। काबा बेहाल रहै। कनी देरीमे ओकर साँस स्थिर भेल आ पुतलीबाइकेँ बिगड़ि कऽ कहलक, "कानै किए छी अंधरी? हम एखन नै मरब। देवदासक बियाह आ शारदाक दुरागमन करा कऽ मरब। ...नै कानू।' काबा अप्पन कनियाँक माथपर हाथ फेरलक आ कहलक, "दिअ हमरा बाँस आ कुरहड़ि। हम बाँसक कमची छील दैत छी।' (एतए ठाढ़ भऽ जाउ एक मिनट। अहाँकेँ लागि रहल हएत जे हम हिन्दीक कथा सम्राट प्रेमचंदक सवा-सएम जयंतीक अवसरपर समकालीन कथाक बहन्ने अहाँकेँ कोनो सवा सए बरख पुरनका खिस्सा सुना रहल छी। मुदा सत तँ ई अछि जे एहन पुरनका आ पिछड़ल शैली, शिल्प आ भाषामे जे ब्यौरा अहाँक सोझाँ अछि ओ ओइ कालक अछि जखन ९/११ सितम्बर भऽ गेल छै आ न्यूयार्कक दूटा गगनचुंबी व्यापारिक इमारतकेँ खसबाक प्रतिक्रियामे एशियाक दूटा सार्वभौमिक, संप्रभुता-संपन्न राष्ट्रकेँ गर्दा आ कदबामे बदलल जा चुकल छै। जखन अमेरिका आ योरोपक भगवानक अलावा बाकी सभटा भगवानक आगू प्रार्थनामे ओ लिबल फासिस्ट, आतंकवादी आ सांप्रदायिक मानि लेल गेल। तेल, गैस, पानि, बजार, नफा आ लूटैक लेल सभ दिन कंपनी, सरकार आ सेना समुच्चा धरतीपर दिन-राति निर्दोषक हत्या कऽ रहल छै। एहन काल, जकरा नीक जना देखू तँ जे कोनो सत्तामे छै, ओइमे सभ कियो एक-दोसराक क्लोन अछि। सभ कियो एक सन ब्रांडक उपभोक्ता अछि। ओ एक्के जेहेन चीज पाबि रहल अछि, एक्के सन चीज खा रहल अछि। एक्के सन कंपनीक कारमे घुमि रहल अछि। सभक एकाउंट एक्के सन बैंकमे अछि। सभक जेबीमे एक्के सन ए.टी.एम. वा क्रेडिट कार्ड आ हाथमे एक्के सन मोबाइल अछि। एक्के सन ब्रांडक शराबक नशामे अखबारक पेज एकसँ लऽ कऽ पेज थ्री धरि वा टीवी क एकटासँ लऽ कऽ सत्तर चैनल धरि ओ एक्के जेहन धूर्त, निर्लज्ज आ नांगट अछि। नीकसँ देखू, हुनकर चमड़ीक रंग आ हुनकर भाषा एक्के अछि।) मोहनदासक नील रंगक जींसक पेंट आ चरिखाना बुश्शर्टक रंग उड़ि गेल छल आ ठामे-ठाम कस्तूरीक लगाएल चिप्पीसँ भरि गेल छल। काबा दास दिशा-मैदान करबे टा लेल खाटसँ उठैत छल मुदा जखन ओकर नैत-नातिन देवदास आ शारदा ओकरा लग रहतिऐ, ओकरा लागैत रहै जे ओकर देहक मरबठट्ठीमे प्राणे टा नै वरन ममता आ वात्सलताक रस लबालब भरल छै। देवदास अप्पन बब्बा काबाक खाटपर कूद-फान मचाबैत छल आ शारदा अप्पन आजी पुतलीक कोरामे छिड़ियाइत खेलाइत रहैत छल। ओइ दिन आंगनमे मोहनदास आ कस्तूरी बांस आ छींदीक पटिया, खोंभरी आ पथिया-पकउथी बनाबैमे लागल छल। बजारक मोहनलाल मारवाड़ीक दुकान "विंध्याचल हैंडीक्राफ्ट्स' सँ एतेक बड़का आर्डर भेटल छलै जे दू-तीन मास धरि मोहनदास आ कस्तूरीकेँ दम मारबाको फुरसति नै छलै। काबा आ पुतली बच्चा सभकेँ संम्हारने रहै। पचासटा पटिया, पचास टा खोंभरी आ तीसटा पकउथी बनाबैक रहै। काबा बीच-बीचमे अप्पन खाटसँ उतरि जाइत छल आ जखन धरि खोंखी ओकरा बेहाल नै कऽ दैत छलै, बाँस-कमची छीलहिमे ओ लागल रहैत छल। पुरान ईलम आ तर्जुबा छलै। कस्तूरी पटिया ओहिना बुनैत छल जेना ओकर आंगुरकेँ कोनो मशीन चला रहल होइ। साढ़े चारि बरखक देवदास खोंभरीकेँ माथपर लगा कऽ हाथमे बाँसक लाठी लऽ कऽ अढ़ाइ बरखक शारदाकेँ बकरी सन "अर्र अर्र...' करैत जा रहल छल आ छोट सन शारदा तरहत्थी आ ठेहुन भरे गुड़कैत बकरी बनल छल, आंगनक एक कोनसँ दोसर कोन धरि, खसैत-पड़ैत गुड़कि रहल छल। तखने दरवाजापर आहटि भेल। मोहनदासक साढू गोपाल दास अप्पन साइकिलकेँ देवालसँ अड़का कऽ भीतर आएल। ओ बजारक "नर्मदा टिंबर एंड फर्नीचर' मे आरा मशीन चलबैत छल आ मालिकक कहलापर ओसूली लेल साइकिलसँ एतए-ओतए जाइत रहैत छल। गोपालक आबैसँ कस्तूरी बड़ खुश भेल। कतेक दिन बाद ओकर नैहर लगक गामसँ कोनो पाहुन ओकर सासुर आएल छल। पानि-तमाखूक बाद गोपाल मोहनदासकेँ बतौलक जे एखन तीन दिन पहिने ओ ओरियंटल कोल माइंस कोनो काजसँ गेल छल। ओतए गेलापर ओकरा मालूम भेलै जे बिछिया टोलक बिसनाथ ओतए मोहनदासक नामसँ पछिला चारि बरखसँ डिपो सुपरवाइजरक नौकरी कऽ रहल अछि आ दस हजारसँ बेसी सभ मास दरमाहा लऽ रहल अछि। गोपालदास कहलक जे ओकरा पता लगलै जे बिसनाथक बाप नागेंद्रनाथ भर्ती दफ्तरक बाबूकेँ पटिया कऽ मोहनदासबला नोकरीक चिट्ठी अप्पन अवारा बेटा बिसनाथकेँ दऽ देलक। मोहनदास साक्षात्कारक दिन जे प्रमाणपत्र आ अंक-सूची जमा केने छल ओइमे मोहनदासक फोटो नै लागल छलै, एकर फाएदा उठा कऽ बिसनाथ अपनाकेँ मोहनदासक रूपमे प्रस्तुत कऽ देलक आ सभ ठाम अप्पन फोटो लगा कऽ अदालती हलफनामासँ लऽ कऽ गजेटेड अफसर धरि सँ ओकरा प्रमाणित करा लेलक। ऐ तरहे बिसनाथ ओरियंटल कोल माइंसमे मोहनदास बल्द काबा दास, जात कबीरपंथी विश्वकर्मा बनि कऽ निचेनसँ डिपो सुपरवाइजरक नोकरी करऽ लागल आ दस हजार मास दरमाहा लिअ लागल। गोपालदास कहलक जे ओ बिसनाथकेँ कोलियरी लग एकटा होटलमे चाह पिबैत देखने रहए, ओकर गरमे जे प्लास्टिकक आइ. कार्ड टांगल छलै ओइमे नाम तँ मोहनदासक छल मुदा फोटो बिसनाथक छल। एतबेटा नै ओकरा संग ओइ काल जतेक लोक छल ओ सभ ओकरा मोहनदासे कहि रहल छल। ओतए इहो पता लागल जे बिसनाथ अप्पन गाम बिछिया टोलामे रहब चारि सालसँ छोड़ि देने अछि आ आब ओरियंटल कोल माइंसक वर्कर्स कॉलोनी "लेनिन नगर' मे बाल-बच्चा संग रहि रहल अछि, जतए ओकर कनिया ब्याजपर टका देबाक धंधा करैत छै आ चिटफंड चलाबैत छै। मजाबला गप ई रहै जे लेनिन नगरमे रहैबला सभ गोटे बिसनाथकेँ मोहनदास आ ओकर कनिया अमिताकेँ कस्तूरी मैडम नामसँ जनैत छै। बिसनाथ मोहनदासे जना बी.ए. तँ छै नै, दसमा फेल छै, ताइसँ कोलियरीमे काज करबाक बदला अफसरक चापलूसी, कोयलाक तस्करी आ यूनियनबाजीमे लागल रहैत छै। अप्पन साढू गोपालदासक गप सुनि मोहनदासक माथ घुमि गेलै। एना कोना भऽ सकैत छै? कोनो लोक ओना कोना दोसर लोक बनि सकैत अछि? आ सेहो दिने-देखारे, सोझाँ-सोझी एना भऽ कऽ? एकाध दिनक लेल नै, पूरे चारि सालसँ? मुदा मोहनदास अप्पन गरीबी आ लचारीमे जेहन दिन देखले छल आ अप्पन बाप काबासँ ओ ओकर जिनगीक जे पुरान खिस्सा सुनने छल, ओइसँ ओकरा लागलै जे अफसर-हाकिम, धनीक-मनीक आ पार्टीबला लोक एतेक तागतिबला होइत अछि जे किछु नहि कऽ सकैत छी। ओ कुकुरकेँ बड़द, सुग्गरकेँ बाघ, खधाइकेँ पहाड़, चोरकेँ साहु- ककरो किछु बना सकैत अछि। मोहनदासँके अप्पन साँस रूकैत सन बुझाएल। हे सत् गुरु, केहन काल अछि जे चारि बरखमे एतए एक्को टा लोक एहन नै भेल जे कहि सकैत छल जे ओरियंटल कोल माइंसमे जे लोक मोहनदासक नामसँ सभ मास दस हजार दरमाहा लऽ रहल अछि ओ मोहनदास नै बिसनाथ अछि, जकर बापक नाम काबा नै नगेंद्रनाथ छिऐ, जकर कनियाँक नाम कस्तूरीबाइ नै अमिता भारद्वाज छिऐ आ जकर माए पुतलीबाइ नै, रेनुका देवी छिऐ?...जे पुरबनरा गामक नै बिछिया टोलक बसिन्दा अछि? जे बी.ए. पास नै दसमा फेल अछि...? ओइ दिन पटिया बुनैत-बुनैत मोहनदास बेर-बेर ठमकि जाइत छल। ओकर आँखि कतौ बिसरा जाइत छलै आ ओ किछु-किछु सोचैत गुम भऽ जाइत छल। बाँसक कमची बनबैत-बनबैत ओकर हाथ भसिया जाइत छल। एक बेर तँ कचियासँ ओकर हाथ कटैत-कटैत बचल। कस्तूरी सभ किछु देखि रहल छल आ अप्पन वरक भीतर चलि रहल उथल-पुथल आ बेचैनीकेँ नीकसँ बुझि रहल छल। ओ मोहनदासक हाथसँ कचिया लऽ लेलक आ कहलक, "आइ रौद किछु बेसिये छै। जाउ, अहाँ हाथ-मुँह धो कऽ कनी काल पटाय रहू।” अगिला भोर सात बजेबला बस पकड़ि मोहनदास ओरियंटल कोल माइंसक लेल बिदा भेल। राति भरि ओकरा नीकसँ नीन नै एलै। ठीक साढ़े दस बजे ओ कोलियरी पहुँचि गेल। दिक्कत ई छल जे ओ ओतए ककरासँ गप करितिऐय? केकरो तँ ओ जनैत नै छल? ऊपरसँ ओकर बगेबानी एहन छलै जे केकरो ई मानबामे दिक्कत होइतै जे असली मोहनदास वएह छी जे एम.जी. कॉलेजसँ बी.ए. फस्ट डिवीजन अछि आ आइसँ किछु बरख पहिने जकर फोटो अखबारमे छपल छल। दिक्कत ईहो छलै जे ओकरा लग ओ अखबार नै बचल छलै जइमे छपल अप्पन फोटो देखा कऽ ओ बता सकैत छल, "देखू, हमहीं छी मोहनदास, वल्द काबा दास, साकिन पुरबनरा, जिला अनूपपुर, मध्यप्रदेश जे एम.जी. शासकीय डिग्री कॉलेजसँ बी.ए.क परीक्षामे मात्र किछु बरख पहिने, फस्ट डिवीजनक संग मेरिटमे दोसर स्थान हासिल केने छल। चेहराक मिलान कऽ देखि लियौ। हमहीं छी असली मोहनदास।' बड़ मोश्किलसँ मोहनदासकेँ फाटकक भीतर आबऽ देल गेल। ओकर नील रंगक पैंट ठेहुन धरि फाटि गेल छल। पाछाँसँ घसा कऽ ओ जाफरी बनि गेल छल जतए कस्तूरी ओही रंगक चिप्पी साटि देने छलै, जे या तँ ओकर पुरना ब्लाउजमे सँ निकालल गेल छल या पुरना चद्दरिमे सँ। रौद, गुमार, ठंढी, कड़ाचूर मेहननि आ एतेक दिनुका भूख-पियास मोहनदासक चेहरा आ चामक रंगकेँ स्याह-पकिया बना देने छलै। दुख आ बिपति ओकर चेहरापर एतेक डड़ीर खेंचि देने छलै जे लागैत नै छल जे ओकर उमेर एखन चालीसकेँ पार नै केने अछि। जतेक बेर अप्पन अभावक बोझसँ ओ कुहरैत छल आकि अपमानक आगिमे चुपचाप लहकैत रहल, ओकर भौं आ हाथ-छातीक रोइयां उज्जर भेल गेल। तीस-पैंतीसक उमेरमे ओ पचास-पचपन सन लगैत छल। मोहनदास ओइ दफ्तरक आगू ठाढ़ छल जतए चारि बरख पहिने ओ अप्पन सभटा सर्टिफिकेट आ कागज जमा करै लेल गेल छल आ जतए काज करैबला बाबू भरोस देने रहैक जे अहाँक नाम तँ कहियो कटि नै सकैत अछि, किएकि लिखित आ शारीरिक परीक्षामे अहाँ सूचीमे सभसँ ऊपर छी। मोहनदास देखलक जे वएह बाबू ओइ कोठलीमे बैसल अछि, जकरासँ ओ पहिने भेँट करैत छल। ओकर कुर्सी पैघ भऽ गेल छलै आ आगूक टेबुल सेहो। ओकर पीठक पाछाँ ठाढ़ हवा फेकैबला ए.सी. लागल छलै। मोहनदास दरबज्जा लग ठाढ़ भऽ कऽ देखि रहल छल जे बाबू बिस्कुट खा आ चाह पीब रहल अछि आ ओकर आगूक कुर्सीपर दू गोटे बैसि कऽ आस्ते-आस्ते रकम-रकम गप कऽ रहल अछि। एकाएक बाबू ओकरा दिस देखलक तँ मोहनदास कल जोड़ि कऽ नमस्कार केलक आ पुरनका यादकेँ जगाबैक लेल ओकरा दिस देखि कऽ मुस्कुरायल। बाबूक माथपर जोर पड़ि गेलै। किंसाइत ओ ओकरा चीन्हि नै सकल। मोहनदास ओकरा दोबारा कल जोड़ि कऽ नमस्कार केलक आ बाजल, "साहब, हम मोहनदास...!' मुदा तखन धरि बाबू अप्पन मेजक नीचाँ लागल घंटीक स्विच दबा देलक। बड़ जोर कटाह सन खरखरायल अवाज भेल आ एकटा चपरासी दौगैत भीतर गेल। बाबू ओकरापर कनी बिगड़ल जे मोहनदास नै सुनि सकल। चपरासी आबि कऽ कोठलीक पर्दा खेंचि देलक आ मोहनदासकेँ माथसँ पएर धरि निङहारि कऽ कहलक, "की काज अछि? जाउ ओम्हर बैसू, ओसाराक ओइ ब्रेंचपर...! एम्हर कोना आएल छी?' मोहनदास ओकरा कहऽ चाहलक जे ओकर नाम मोहनदास छिऐ आ आइसँ चारि बरख पहिने ओ कोलियरीमे नोकरी लेल सलेक्ट भेल छल आ अप्पन सभटा कागज ओइ आफिसमे जमा केने छल मुदा ओकर ठाम कियो आर लोक ओकर नामसँ नोकरीपर लागि गेलै....। ओकर अवाज ततेक कमजोर छलै, ऊपरसँ चपरासी ओकरा जेना धकलैत ओसाराक कोनामे राखल बेंच दिस लऽ जा रहल छल, ओइसँ धरफड़ीमे बाजल गेल ओकर गपक लाइनमे कोनो तारतम्य नै रहि गेल छलै। गरमे किछु फँसि रहल छलै आ ओ तोतरा रहल छल। मोहनदासकेँ बकौर लागि गेलै मुदा ओ चपरासीसँ अप्पन बाँहि छोड़ाबैत बाजए लागल, "भाइ, एक बेर ओइ बाबूसँ भेँट करा दिअ। हमरा अप्पन प्रमाणपत्र आ मार्कशीट वापस लेबाक अछि।' चपरासी हुनका धकियाबैत देवालसँ सटल लकड़ीक बेंचपर बैसा देलक आ जाए लागल। मोहनदास बुझि गेल जे आब ओकरा दोबारा एतए धरि आएब मुश्किल हेतै। ई आखिरी बेर छै। ओ जोरसँ चपरासीपर गरजल जे भर्ती कार्यालयक दरवाजासँ भीतर पैसि कऽ नपत्ता होए बला छल। " हे...हे..! जा कऽ ओइ बाबूसँ कहियौ जे मोहनदास बी.ए. आएल अछि आ 18 अगस्त, 1997 केँ जमा कराएल अप्पन सभटा कागज आपस मांगैत अछि...। तमाशा बना कऽ राखि देने छै। कोठली आ कुर्सीमे बैसि गेल छै तँ कि अंधेर मचेतै? ...दिअ, पर्ची दिअ, हम अप्पन नाम लिख दैत छी...! बाबूकेँ दऽ देबै!' चपरासी एक बेर तँ सन्न रहि गेल। कोनो बूढ़ भिखमंगा सन चेथरीमे घोंसिलाएल एहि लोकक गरसँ बड़ नीक फरिछायल भाषा निकलि रहल छै। एहन भाषा आ लहजा जे पढ़ल-लिखल बाबू आ अफसरक होइत अछि। चपरासी दरवाजापर किछु काल ठमकल आ मोहनदासकेँ निङहारैत रहल। फाटल बेरंग भेल, ठामे-ठाम चिप्पी लागल पेंट, फाटल घिनायल चौखुटा बुश्शर्ट। चनेल भेल माथपर सुखल बिखरल खिच्चड़ि सन अधपक्कू केस। झुर्री आ भङतराह सन, टेढ़-टूढ़ झुर्रीसँ भरल पकिया रंगक अस्कताइत चेहरा। गहींर, धँसल, कनी-कनी मिझाइत सन अपनाकेँ देखैत, हताश कमजोर आँखि। नीचा पएरक आंगुरमे कोनो तरहे ओझराएल रबड़क कतेक पुरान, सस्त चप्पल, जकरा बेरोजगारी, अभाव, दुख आ हताश रबड़क रहैये नै देलक, माटि, काठ आ कागचक बना देल छल। "बुरबलेल...! सार बताह...! बहानचो... कोन पार्टी आ अफसर अहि ससुर भुक्खलक संग देत?' यएह ई फदरैत रहै जइसँ चपरासीक ठोढ़ तामसे हिलि रहल छलै। मोहनदासकेँ लागलै जे चपरासीकेँ ओकर गपपर विश्वास नै भऽ रहल छै मुदा भगवान जानै छल जे ओ सत बाजि रहल छल, ताइसँ ओ बेंचसँ उठि कऽ आत्मविश्वाससँ भरि सधल चालिसँ ओकरा दिस बढ़ल। ओकरा मनमे छल जे ओ जा कऽ ओकरा बुझाबैक प्रयत्न करत जे विसनाथ ओकरे संग टा नै वरन ओरियंटल कोल माइंसक संग जालसाजी आ धोखाधड़ी कऽ रहल अछि। मोहनदास जेहन व्यग्रता आ जल्दीसँ चपरासी दिस बढ़ि रहल रहै आ ओकर चेहरापर दिमागमे चलि रहल उठा-पटकक कारण टेढ़-टूढ़ डड़ीर बनि रहल छल, गहींर धसल आँखिमे जे एकटा खास कछमछीक चमक आबि गेल छलै आ अप्पन सभटा गप एक्के संग कहि दै लेल उग्र व्याकुलतामे ओकर सुखायल पपड़ी पड़ल ठोढ़ जेना थरथरा रहल छलै, ओइसँ चपरासी सत्ते डरा गेल छल। ओ मोहनदास दिस देखैत जोरसँ चिकरल: "हे...हे...! एक्को डेग आगू नै बढ़ाउ, बुझलिऐ! ठाढ़ भऽ जाउ ओइ ठाम बरगाही भाइ...! हम कहै छी, ठाढ़ भऽ जाउ...ओही ठाम...!' "हे...हे... भाय! ...हमर गप तँ सुनू...!' मोहनदास बिगड़ि गेल। गपकेँ सम्हारबा लेल किछु जोरसँ बाजल। मुदा ओकर गपमे विनम्रता कम आ किंसाइत बेचैनी बेसी छलै, जाइसँ गप आर बिगड़ि गेल। चपरासी तति कऽ ठाढ़ भऽ गेल आ जोरसँ चिकरल; "बहीर छी की? थम्हि जाउ ओइ ठाम, नै तँ खुइन कऽ गारि देब बरगाही भाइ! एक्को डेग आगू बढ़ेलियै तँ!' दरवाजा पर हो हल्ला सुनि कऽ दफ्तरक भीतरसँ चारि-पाँच गोटे बाहर बहरा कऽ आएल। ओ अफसर नीक कपड़ामे छल आ घुरि कऽ मोहनदासकेँ माथसँ पएर धरि देखि रहल छल। "के छी?...एतए भीतर धरि कोना आबि गेल?' "सिक्योरिटी ऑफिसर पांडेकेँ बजाबियौ?...ई गार्ड खैनी रगड़ि कऽ कुर्सीपर सुतल रहैए।' "आइ मेन गेटपर ड्यूटी केकर-केकर रहै? ड्यूटी रजिस्टर आनू?' "हे, भगाउ एकरा।' "ई तँ अकड़हर कऽ देलक...! कियो ऐ तरहे अंदर पैसि जाइत अछि, ककरो ठांय-ठांय गोली मारि देत...! हे, किछु नै तँ बमे फोड़ि दितियै...!' "पुलिसमे दऽ दियौ। शर्माजी, मिलाबू अप्पन मोबाइल...वएह सए नम्बर!' मोहनदासक गप कियो नै सुनि रहल छल। ओकरा धकियायल जा रहल छल। माथ, पीठ, कनहा आ मुँहपर थापर, मुक्का, आ कोहनी बरसि रहल छल। मोहनदास दुनू हाथसँ अप्पन चेहरा झांपि कऽ अप्पन आँखि बचा रहल छल। "हम्मर गप तँ सुनि लियौ!...हे...मारू नै! हे...हे...!' एतबैयेमे तीन-चारिटा गार्ड दौगैत आएल। ओइमे एकटा कऽ हाथमे बारह बोरक दुनाली छलै, जेहन बैंकक चौकीदार लग रहैत छै। आ सभक हाथमे डंटा छलै। मोहनदासक पीठ खलोदार भऽ गेलै। ओकर आँखिक आगू कठिना धारमे अमावशक रातिमे देखल सभटा नक्षत्र हहारो करैत, कुहरैत, उकापतंग सन टूटि-टूटि कऽ खसऽ लगलै। कोनो एहन वज्र चोट कतौ पड़लै जे ओकर गरसँ ठीक ओहने कुहरबाक अबाज निकललै, जेहन ओइ सुगरक गरसँ निकलैत छै, जकर टांगकेँ बान्हि कऽ ओकरा गरकेँ रेतल जाइत छै। ओ एहन जोरसँ कुहरल जे कोइला खदानक सभटा कामगार बाहर निकैल गेल आ घेरा बना कऽ ओइ तमाशाकेँ देखऽ लागल। (ध्याद दियौ, ई घटना ओइ कालक छी जखन हिंदूक जगदगुरु अप्पन मठमे बैसि एकटा स्त्रीक संग वएह सभ किछु कऽ रहल छल जे हजार किलोमीटर दूर, कतेक समुद्र पार, व्हाइट हाउसक कुर्सीपर बैसल अमेरिकाक राष्ट्रपति कऽ रहल छल। जखन दजला आ फरात धारक लग कोनो खधाइमे अप्पन जान बचाबैक लेल नुकायल गिलगमेशकेँ एकटा पुरान समुद्री डाकूक वंशज बाहर खींच कऽ ओकर दाँत गानि रहल छल। एहन काल जाइमे जकरा लग जतेक मात्रामे सत्ता छल ओ विलोमानुपात नियमसँ ओतेक बेसी निरंकुश, हेहर, खुनीमा, अनैतिक आ शैतान भऽ गेल छल।...आ ई गप राष्ट्र, राजनीतिक दल, जाति, धार्मिक समुदाय आ लोक धरि एक्के सन लागू होइत छै।) मोहनदास ओरियंटल कोल माइंसक मुख्य गेटक बाहर सड़कपर ठाढ़ छल। एकदम बीचोबीच। ओकर दिमाग किछुओ सोचब छोड़ि देने छलै। एकटा डरौन सन गुमकी छलै जे सौंसे वातावरणमे सांय-सांय करैत बाजि रहल छलै। ओकरा ईहो होश नै छलै जे ओ सड़कक ठीक मांझमे ठाढ़ अछि आ ओकर दुनू कातसँ ट्रक, मेटाडोर, टेंपो आ दोसर गाड़ी हॉर्न बजाबैत ओकरा कोनो तरहेँ थकुचेबासँ बचाबैत तेज गतिसँ लगातार जा रहल छलै। मोहनदासक जेबीमे ओ पर्स एखनो छल जे ओ नोकरी लागैक आसमे तीस टकामे किनने रहए। ओइमे अखनो एक सए सत्तरि टका छलै। ओकर मेहनति आ कमाइक टका। पैंसठि टका बसक किराया देलाक बादो ओकरा लग एत्ते टका बचल छलै। अप्पन जेबीक पर्स छुलासँ ओकर दिमाग शांत हुअए लागल। एत्ते काल बाद ओकरा एकाएक रौदक तेज हेबाक अनुभूति भेलै। ओ झटकारि कऽ सड़कक कात आबि गेल। ओकरा भूख लागल छलै। "मोटू वैष्णव शुद्ध शाकाहारी होटल” ढाबामे खाइत काल ओकरा पता लगलै जे साँझमे एतएसँ राज्य परिवहनक दूटा आर एकटा प्राइवेट बस सेहो ओकर गाम पुरबनरा दिस जाइ छै। एखन तँ खाली एक्के बजल छै। ओ निर्णय लेलक जे ओ एक चक्कर ओरियंटल कोल माइंसक कॉलोनी "लेनिन नगर' दिस घुमि आबए। ओतए किंसाइत चिन्हन-जानल कियो देखा जाए। स्कूल-कॉलेजक कोनो पुरनका सहपाठी आकि कियो आन। लेनिन नगरमे एतएसँ ओतए धरि ओ घुरिआइत रहल। दुपहरिया काल छलै। सभटा फ्लैट एक्के जेहन बनल छलै। लोक काज करबा लेल कोलयरी जाइ गेल छल। घरमे स्त्रीगण आ नेना सभ टा छल। स्कूलक एकटा बस ठामे-ठाम ठाढ़ होइत बच्चा सभकेँ उतारि कऽ आगू चलल जा रहल छल। लेनिन नगर बड़ पैघ कॉलोनी छल। जौँ हमरा संग धोखाधड़ी आ जालसाजी नै कएल गेल होइत तँ हमहूँ अप्पन परिवारक संग लेनिन नगरक एहने कोनो फ्लैटमे रहतौं, सभ मास दरमाहा भेटतिऐ, देवदास आ शारदा ऐ तरहेँ स्कूल ड्रेस आ जूता-पैताबा पहिरि कऽ ऐ बससँ उतरितिऐ। कूलर-पंखामे सुतितिऐ। मुदा केहन भाग्यक खेला छल जे मोहनदासकेँ बिसनाथक फ्लैटक पता पूछै लेल अप्पन नाम लिअ पड़ि रहल छलै। "मोहनदासक फ्लैट कोन छै, भाइ साहेब?' "कोन? ओ सुपरवाइजर साहब?' "हँ...!” "आगू चलि जाउ सोझे। तीन कट छोड़ि कऽ चारिममे बामा हाथ घुमि जाएब। तेसर मकान छै। ए बट्टा एगारह। डॉक्टर जनार्दन सिंहक बगलबला फ्लैट।' फ्लैटक दरबज्जा बंद छल। बाहरी देवालपर नेम प्लेट लटकि रहल छल, जाइपर लिखल छल- "मोहनदास विश्वकर्मा, कनिष्ठ आगार अधिकारी, ओरियंटल कोल माइंस”। मोहनदास कनी काल धरि गुम्म भऽ नेम प्लेट पढ़ैत रहल, फेर ओ कॉलबेलक स्विच दबौलक, जे ठामे नेम प्लेटक नीचाँ छल। मोहनदास एक बेर तँ डरि गेल किएक तँ जे आवाज भेल ओ ठीक वएह कटाह आवाज छल जे भर्ती दफ्तरक बाबूक टेबुलबला घंटीसँ भेल छलै आ तकर बाद ओकरा संग ई दुर्घटना भेल छलै। दरवज्जा एकटा चौदह-पंद्रह बरखक बच्चा खोललक। "साहब नै अछि! अखने निकलल अछि। आगूबला बजारमे लस्सी पिबैत हएत।' छौरा एक्के सूरमे बाजल। "पिबै लेल पानि भेटत की?”, मोहनदासक ठोंठ सुखा रहल छल। रौद बड़ तीख भऽ गेल छलै आ हवामे लू बहै छलै, से ओ झरका रहल छलै। कोलयरीमे जखन ओकरा धक्का मारि कऽ पिटैत बाहर निकालल गेल छल। ओकर कोहनी, गाल आ पीठपर एक-दू ठाम नोछार लागि गेल छलै। ओ नोछार घामक नूनसँ लहरि रहल छलै। "अहाँ एतए ठाढ़ रहू, दैत छी।' छौरा ओकरा माथसँ पएर धरि निङहारलाक बाद कहलक आ भीतर चलि गेल। मोहनदास तीन गिलास पानि सुरकि गेल। छौरा फ्रिजसँ ठरल बोतल निकालि कऽ आनने रहै। पानि पिलासँ ओकर देहमे जान एलै, आँखिमे रोशनी घुरलै आ मोन किछु शांत भेलै तँ ओ देखलक जे गिलास घुरा कऽ लऽ जाएबला छौरा ओकरा सहानुभूतिक संग देखि रहल अछि। "ओकर घरमे एखन के-के छै?', मोहनदास पुछलक। "कियो नै। कस्तूरी मैडम टा छै।...एखन सुतल छै। अहाँ पांच बजेक बाद आउ।' छौरा खाली बोतल आ गिलास लऽ कऽ अंदर जाय लागल तँ मोहनदास कहलक, "अहाँक साहब आबथि तँ हुनकासँ कहब जे पुरबनरा गामसँ मोहनदास आएल छल। साँझकेँ हम फेर आएब।' लड़का भीतर जाइत-जाइत ठाढ़ भऽ गेल। ओ मोहनदासकेँ निङहारि कऽ देखलक आ कहलक, "की कहलिऐ?...के आएल छल!” "मोहनदास!”, मोहनदास जोरसँ बाजल आ रकमे-रकमे मइ मासक आगिमे जरैत आ पसिझैत कोलतारक सड़कपर घुरि कऽ आबि गेल। लेनिन नगरक मार्केट बड़ पैघ नै छल। मुदा आधुनिक हेबा लेल ओ छटपटा रहल छल। तीन-चारि डिपार्टमेंटल स्टोर्स, किछु खुदरा सन किरानाक छोट सन दोकान। डोसा-इडली-बड़ा बला "कावेरी फास्ट फूड”। दू तंदूर, साल मखनी, कड़ाही पनीर, बटर चिकेन, आलू पराठा बला होटल। एकटा देशी आ अंग्रेजी शराबक दोकान, जइमे "एतए शीत बीयर सेहो भेटैत अछि' क बोर्ड लागल छल। पान-सिकरेटक दूटा गुमटी आ प्लास्टिक, इलेक्ट्रानिक्स आ इलेक्ट्रॉनिक्स सामानक, सीसा बला शो-विंडोजबला दूटा दोकान। एकटा कपड़ाक बड़ पैघ हालसन दोकान छल, जकर आगू गेटपर आ सीसाक भीतर सेहो, जालीदार ब्रोसरी आ जालीदार जंघिया पहिरने, अप्पन सभ किछु देखबैत, आदम-ईव सन उज्जर फाइबरक पुतुल ठाढ़ छल। मोहनदास देखलक जे लक्ष्मी वैष्णव भोजनालयक आगू पुलिसक टाटा सुमो ठाढ़ छल, जइमे दू-तीन टा सिपाहीक संग ओकर गामक पंडित छत्रधारी तिवारीक लड़का विजय तिवारी, जे अप्पन ससुरक घुरपेंचसँ दरोगा भऽ गेल छल, लस्सी पीबि रहल छल।...आ बिसनाथ सेहो ओतै छल। बिसनाथ कोनो गपपर ठठा कऽ हँसि रहल छल आ अप्पन लस्सी सठा कऽ टाटा सुमो दिस बढ़ि रहल छल, तखने ओकर नजरि मोहनदासपर पड़लै। ओ सतर्क भऽ गेल। एक क्षण लेल ओकर चेहराक रंग उड़ि गेलै। एखन धरि जे हँसी ओकर चेहरापर नाचि रहल छलै से तुरत्ते बिला गेलै। बिसनाथक चेहरापर आएल गड़बड़ीकेँ अकानि कऽ विजय तिवारी घुरि कऽ देखलक। ओ गाड़ीमे ड्राइवर सीटपर बैसल छल, वर्दीमे सजल-धजल। मोहनदास चेथड़ीमे, लू मे झरकैत, सड़कक कात, बिजलीक खाम्ह लग, लगभग पंद्रह गजक दूरीपर ठाढ़ छल। एकटा तनावसँ भरल गुमकी अनचोक्के ओइ दुपहरियाक रौदमे एतएसँ ओतए धरि पसरि गेल छलै। बिसनाथ गाड़ीपर चढ़ि गेल। विजय तिवारी चाभी घुमा कऽ इंजन स्टार्ट केलक आ एक्के धक्कामे ओकरा दौगबैत जोरसँ ओइ दिस आएल जेम्हर मोहनदास ठाढ़ छल। मोहनदास थकमका गेल आ डोलि कऽ बिजलीक खुट्टा दिस सहटल। विजय तिवारी जोरसँ ब्रेक मारलक आ गाड़ीकेँ मोहनदासक ठीक आगू ठाढ़ कऽ देलक। ब्रेक नै लगितियै तँ मोहनदास खुट्टा संग ओकर चपेटमे आबि जैतियै। मोहनदासकेँ अदंक लऽ लेलकै। "एम्हर आ!', विजय तिवारी ओकरा बजेलकै। आइसँ मोटामोटी सात-आठ बरख पहिने, यएह विजय तिवारी ओकरा संग एम.जी. डिग्री कॉलेजमे पढ़ैत छल। सभ दिन एक्के क्लासमे ओ बैसैत छल। पढ़ै-लिखैमे ओ लद्धढ़ छल। ओकर बाप पंडित छत्रधारी ओकरा मोहनदासक उदाहरण दैत छलै जे सभ बरख फर्स्ट आबैत छल। अखन वएह विजय तिवारी पुलिसक वर्दीमे बत्ती आ लाउडस्पीकर लागल टाटा सुमोमे बैसल ओकरा जइ तरहे निङहारि रहल छल, ओइमे अनचिन्हार बनबासँ बेसी हिंसा आ तामस साफ-साफ लखा दैत छल। एहन की भऽ रहल छल? की मोहनदास गरीब आ निचलका जातिक छल, ताइसँ? वा ताइसँ जे ओ बेरोजगार छल आ अप्पन मेहनतिसँ चुपचाप अप्पन परिवारक आजीविका चला रहल छल? वा ऐ लेल जे ई सभ लोक ओकरा ठकने छल। ओकर अहं मारि देने छल आ आब एतए ओकर सोझाँ ओकर आजादी आ मौज-मस्तीमे बाधा बनि रहल छल? "खुट्टा बचा लेलकै बरगाही भाइ, नै तँ अखन लोथ बनि गेल रहतिऐ!” विजय तिवारी रकमसँ फुसफुसा कऽ कहलक। "हौ छोड़ू! माछी मारि आर हाथ गंध करत!' बिसनाथ बाजल। "ओहिने हुड़कि दैत छिऐ! कखनो एम्हर दिस नै ताकत सार!' मोहनदास अखन धरि अप्पन ठामसँ हिलल नै छल। विजय तिवारी जोरसँ कतेक बेर हॉर्न बजेलक, आ तकर बाद एकाएक गाड़ीक ऊपर लागल स्पीकरमे ओकर आवाज चारू दिस गूंजै लागल, "हे हौ बिसनाथ! गाड़ीक आगू किए कुदलह हौ बिसनाथ? तोहर दिमाग सनकि गेल छह की बिसनाथ? बिसनाथ, बाजैत किए नै छह? बहीर भऽ गेल छह की हौ बिसनाथ! बिसनाथ, हे हौ बिसनाथ!” गाड़ीक भीतर जोरसँ ठहक्का उठऽ लागल छल। "भौजीकेँ एतए नै आनलौं बिसनाथ? असकरे मरै लेल आएल रहह...हे!” बिसनाथ गाड़ीसँ उतरल आ मोहनदास लग आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। ओ अप्पन जेबीसँ पाँच सएक एकटा नोट निकालि कऽ मोहनदासक शर्टक जेबीमे खोंसि देलक। "सुनू, आब अहाँ अप्पन पुरनका नाम बिसरि जाउ आ आब आइक बाद कहियो लेनिन नगर दिस पएर नै बढ़ाएब! बुझलिऐ! आइ तँ हम दारू नै लस्सी पीबि राखने रही, ऊपरसँ बिजलीक खाम्ह आबि गेल, नै तँ आइ चापि दैतौं। दोबारा कतौ आसपास देखा देलौं तँ कॉलयरीक भट्टीमे छाउर बना देब।” एकर बाद बिसनाथ घूमल आ मोटू वैष्णव ढाबा दिस देखैत जोरसँ गरजल, "हे हौ नंद किशोर, ऐ बिसनाथकेँ एक गिलास लस्सी पिया देबहीं ठंडा! बरफ दऽ कऽ! बरफ दऽ कऽ हौ! हम्मर पड़ोसी गामक अछि बिसनाथ...!” टाटा सुमोक भीतरसँ अनवरत ठहक्काक आवाज आबि रहल छल। बिसनाथ सेहो हँसऽ लागल छल। घुरि कऽ गाड़ीमे चढ़ैत-चढ़ैत ओ रकमसँ विजय तिवारीसँ कहलक, "ई नंद किशोर अछि तँ भखारक ढीमर मुदा एतए बाभन बनि कऽ वैष्णव शाकाहारी होटल चला रहल अछि। सजनपुरक चौबे घरेनक बहूकेँ बियाहि आनलक सार। "पंडीजी कहियौ तँ फूलि कऽ कुप्पा भऽ जाइत छै।” "नीके छै! समांग बढ़ैत छै।”, विजय तिवारी बाजल आ ठहक्का लगा कऽ ढाबा दिस मुँह कऽ बाजल, "बिसनाथकेँ कनेटा सम्हरि कऽ लस्सी पिआयब पंडितजी, उपरका पेंच कनी लूज भऽ गेल छै...! हाँ रूपा हम्मर खातामे चढ़ा लेब।” निफिकिर रहू! निफिकिर! घरक काज छिऐ! पेंच तँ हम सेट कऽ देबै!” मोहनदासक मुँहमे टाटा सुमोक धुरा-गर्दा आ धुँआ छोड़ैत ओ सभ चलि गेल। मोहनदास ओइ ठाम ठाढ़ रहल, बिजलीक खुट्टाकेँ अप्पन हाथसँ थाम्हने। की ई कोनो फिल्म छल जकर सीन एखने-एखन पूरा भेल आ जाइमे ओ सेहो एकटा पात्र छल? वा ई कोनो अजीबे सपना छल? मोटू वैष्णव शाकाहारी ढाबासँ गोर-नार, कारी-चमकैत आँखिक अधवयसू बड़का पेटबला हलुवाइ नंद किशोर लस्सीक गिलास हाथमे थम्हने गरजि रहल छल- "आबू भाइ बिसनाथ! लस्सी तँ पीबैत जाउ!” मोहनदास जखन लेनिन नगरक मार्केटसँ बस स्टैंड दिस जा रहल छल तँ ओकर रस्तामे एकटा परेशान-सन अबैत लोक देखाइ पड़ल। ओ लेनिन नगर दिस जा रहल छल। ओकर अंगाक रंग कहियो लाल छल हेतै जे आब मैल आ पुरान भऽ कऽ कत्थइ भऽ गेल छलै। मोहनदास लग आबि कऽ ओे रूकल आ पुछलक- "भाइ, लेनिन नगरमे सूर्यकांतक फ्लैट कोन छै?” मोहनदासक मोनमे एलै, जखन ओ बिसनाथक पता ताकि रहल छल, तखने ओ ई नेम-प्लेट देखने छल। ओ मन पाड़ैक कोशिश केलक। "आगूसँ दहिन हाथ घुमि जाएब आ सए गज आगू जा कऽ तिनमुहानी लग, मटियानी चौक लग ककरोसँ पूछि लेब। ओतै छै।” जखन ओ सभ जाए लागल तँ मोहनदास रकमसँ ओकरासँ पुछलक- "अहां केकर फ्लैट ताकि रहल छी?” "सूर्यकांतक! उन्नाव लगक गामक छै।” "ओकर गामक की नाम छिऐ?” "गढ़ाकोला...!” "आ अहाँक की नाम छी?” ओ लोक कनी काल चुप रहल। ओकर ठोढ़ थरथरेलै, गहींर धसल आँखिसँ पानि खसऽ लगलै। ओकर सुखाएल गरासँ एकटा क्षीण भरभराएल आवाज एलै- "सूर्यकांत! गढ़ाकोलाक सूर्यकांत।” ओ आदमी घुमल आ रकम-रकम थरथराइत लेनिन नगर दिस बढ़ि गेल। (ई खिस्सा ओइ कालक अछि जखन संसारक सभ देशक सभ सरकारक अर्थनीति आ राजनीति एक्कहि रंगक छल, जखन धनीकक आ गरीबक बीचक खधाइ एत्ते गहींर आ चाकर भऽ गेल छलै जे ओकर कोनो प्रायोजित विज्ञापन नुका नै सकै छल...ओइ काल जखन बीसम सदीक शुरूमे उत्पीड़ित आ शोषित मनुष्यताकेँ लऽ कऽ क्रांति करैबला तागति, साझा सरकार बनाबै लेल, पेट्रोलक दाम कम करबाक आ गरीबपर राज करबाक शतरंज खेला रहल छल...आ एहन समए जाइमे ऐ देशमे जे कियो ईमानदार छल आ अप्पन श्रम आ प्रतिभापर जिबैत छल, ओकरा मारबा वा थकुचबा लेल एकैसम सदीक उत्तर औद्योगिक लोकतंत्रमे एकटा अभूतपूर्व सर्वदलीय ऐतिहासिक सहमति छल...। राजनीतिक सभटा रूप सत्ताक एहन उपकरणमे बदलल गेल छल, जकर इस्तेमाल प्रजाक उत्पीड़न, दमन आ ओकरापर अन्याय लेल भऽ रहल छल।) रातिमे एगारह बजे मोहनदास अप्पन घर पहुँचल। सभ कियो ओकर बाट जोहि रहल छल। कस्तूरी भात-दालि आ रामझुमनीक खुशीमा बनेने रहथि। कनीटा काँच आमक चटनी सेहो ओ सिल्ला-लोरहीपर पिसने छली। देवदास आ शारदा सुति गेल छल। काबा ओसारपर खाटपर पड़ल-पड़ल खोंखी कऽ रहल छल। "आइ तीन बेर खोंखीक संग खून आ मौस खसल।” कस्तूरी बतेलकै। पुतलीबाइ ओतए काबाक खाटक नीचाँ शतरंजी ओछा कऽ सुति गेल छलि। कस्तूरी एखनि धरि नै खेने छलि। ओ थारीमे अप्पन आ मोहनदासक खेनाइ लगा कऽ झाँपि देने छल। हाथ-पएर धोलाक बाद जखन मोहनदास अप्पन कपड़ा उतारलक आ गमछा लपेटलक तँ ओकर उघार देहमे लागल चोट आ नोछारक चेन्ह कस्तूरीकेँ देखा पड़लै। ओ चिंतित भऽ गेलि। "की भऽ गेल? कत्तऽ खसि पड़लिऐ?”, कस्तूरी उठि कऽ ओकरा लग आयलि आ ध्यानसँ ओकर देहकेँ छूबि-छूबि कऽ देखऽ लागलि। "हे दाइ! ई तँ मारि-पीटक घाव छिऐ!”, मोहनदास चुपचाप हाथ-पएर धोइत रहल। ठार पानिक संग ओकर दिन भरिक थकान धुआ कऽ नालीमे बहैत जा रहल छलै। मंजनौटे लग बेलक एकटा पैघ सन गाछ लागल छलै जइमे कतेक रास फूल भेल छलै आ ओकर महक भरि आंगनमे भरल छलै। मोहनदास सांस घीचि कऽ अप्पन कलेजामे भरि लेलक आ कनी काल धरि आँखि मूनि कऽ सतगुरु कबीरक जाप करैत रहल। कस्तूरी खेबाक थारीक ऊपरसँ परात हटेलक तँ भरि आंगनमे भातक गमक भरि गेलै। लोहंदी चाउर छलै, पुरनका। गोठल्लाक कोनो कोनमे पुतलीबाइ नुका कऽ राखने छल आ बिसरि गेल छल। आइ ओकरा ओ जोगाएल चाउर मोन पड़लै जे छुबि-छुबि कऽ ओ पोटरी ताकि कऽ निकालने छल। मोहनदास हपसि कऽ खेलक। ओ आमक चटनी आंगुरमे लगा कऽ चाटि रहल छल तँ कस्तूरी कहलक- "बिसैंधी आमक गाछपर खूब फल आएल छल। बेचलापर कमसँ कम हजार-दू हजार तँ भेटबे करत। काल्हि बेचि दी की?” मोहनदास तिरपित भऽ कऽ बड़का ढेकार मारलक आ कहलक, "अहाँक हाथक पकाएल भोजनमे जादू अछि कस्तूरी। आमक चटनी, भात आ भूखक संग जौं अहाँक हाथसँ परसबाक संयोग भऽ जाए तँ स्वर्गे भेट जाइत अछि।” कस्तूरीक आँखि नोरा गेलै। ओ बुझैत छल जे आइ मोहनदासक संग कोनो अनहोनी भेल छै, जकरा ओ सभ दिन जकाँ ओकरासँ नुका रहल छै। ओइ राति कस्तूरीकेँ बड़ राति धरि जगरनाक बाद सुतल भेलै मुदा मोहनदासक आँखि एक्को क्षण लेल नै लगलै। ओ बेर-बेर उठैत छल आ गटागट पानि पिबैत छल। ओकर दिमागक भीतर कोनो धुरा-गर्दा आ कुहेससँ भरल तेज आन्ही चलि रहल छलै। आन्हिये नै, कोनो कतेक रास घुरमैत बिर्रो। मोहनदास दू-एक बेर फेर ओरियंटल कोल माइंस गेल मुदा ओतए जाएब व्यर्थ भेलै किएकि ओतए आर लेनिन नगरमे ई उक्का पसारि देल गेल छलै जे एकटा बताह हफ्ता-पंद्रह दिनपर एतए अबैत अछि आ अपनाकेँ माइंसक असली डिपो सुपरवाइजर आ असली मोहनदास बी.ए. कहैत अछि। जौं ओकरा बिसनाथ कहि कऽ गरजियौ तँ अंट-शंट बाजऽ लागैत अछि आ ओकरा बतहपनीक दौड़ा पड़ै छै। मोहनदास हारि गेल आ ओ कोलियरी जाएब छोड़ि देलक। ओ दिन-राति पजरैत रहल। कठिनाक रेतपर राति भरि जागि कऽ चुपचाप आकाशकेँ घुरैत रहैत छल। गाममे ओहिनो कबीरपंथी बंसहर-पलिहा निचला जातिक मानल जाइत छल। ओ अनुसूचित जातिक अछि वा आदिवासी वा आदिम जनजातिक, एखन धरि सरकारी गजेटमे ई फरिछाएल नै छल। दस बरख पहिने भेल जनगणनामे ओकर जातिक आगू "बंसोर” वा "पलिहा” टा लिखल छल। दोसर कागजमे धर्म "हिन्दू' आ राष्ट्रीयता "भारतीय”। ओकर सभक संख्या कम छलै। ओकर समांगक कोनो लोक पार्टी वा सरकारमे नै छल। ओइसँ मोहनदास एतए मजाक आ ठट्ठाक विषय बनि गेल छल। ऊँच जातिक धनीक लोक ओकरा देखैत आ पुछैत छल, "तोहर नोकरी कहिया लागि रहल छौ रे मोहना?” कियो ओकरा सलाह दैत छलै जे विजय तिवारीक महिसवारी सम्हारि ले। कमसँ कम खाइ-पिबैले तत्ता-सिहर तँ नै हेतौ। कस्तूरी सेहो मौज करतौ। साड़ी-सैंडिलक दिक्कत नै रहतौ।” कियो-कियो तँ ओकरा लेनिन नगर जा कऽ बिसनाथक पएर पकडि़ कऽ ओकर घरक चाकरी करबाक सुझाव दैत छल। मोहनदास गामक पैघ लोककेँ देखिये कऽ रस्ता बदलि लै छल। ओ ओकरा देखये कऽ दूरसँ घुमि जाइ छल। एहनो नै छल जे ओकरा लऽ कऽ गामक लोककेँ सहानुभू्त नै छलै। सत तँ ई छै जे बेसी लोक ओकरा लऽ कऽ चिंतित छल। कोनो-नै-कोनो तरहे ओकर मदति करऽ चाहै छल। मुदा ई ओ लोक छल जे अपने कतेको तरहक संकट आ विपदामे बाझल छल। एकरामे सँ ककरो कत्तौसँ ऊपर धरि पहुँच नै छलै। ओ सभ अप्पन घाम आ अप्पन-अप्पन नोरक संग ऐ कालमे चुपचाप जीबैबला लोक छल। घनश्याम एहने लोकमे एकटा रहए। जातिक कुर्मी रहै। मुदा ओ गरीब नै रहए। तीस बीघाक खेती छल। बैंकमे किस्तपर ओ ट्रैक्टर लेने छल। शाक-सब्जी आदि उगाबैक अलावा ओ अप्पन ट्रैक्टर किरायापर उठा रखने छल। तखनो सभ मास साढ़े सात हजारक किस्त कटायब ओकरा मुश्किल होइल छलै। खेतमे उपजैबला अनाज आ दोसर फसलक दाम बाजारमे नै रहि गेल छलै। लग-पासक गाम बलहराक बिसेसर जे ग्रामीण बैंकसँ कर्ज लऽ कऽ सोयाबीनक खेती केने छल, दू मास पहिने अप्पन खेतकेँ नीलामीसँ बचाबै लेल बिजलीक खुट्टापर चढ़ि नांगट तारसँ सटि कऽ मरि गेल छल। छोटका किसान आ जोन-मजदूर गाम छोड़ि-छोड़ि शहरक दिस भागि रहल छल। घनश्याम सेहो परेशान रहैत छल। ओइ दिन मोहनदासकेँ कनी जूड़ी चढ़ल छलै। दिन भरि सूप-टोकरी बुनाय आओर बड़ राति धरि पलियामे पानि पटाबैक बाद ओ एत्ते थाकि गेल छल जे बिना खाएल-पीएल सुति गेल छल। भिनसरे उठल तँ देह गरम छलै। परछीमे पटाएल छल तखने घनश्याम आबि गेलै। ओ अपना संगमे मोहनदासक साढू गोपालदासकेँ सेहो पकड़ि कऽ आनने छल। दुनू मोहनदाससँ कहलक जे ओकर चिन्हार एकटा लोक भेट गेल जे ओरियंटल कोल माइंसक जी.एम. (जनरल मैनेजर) ए.के. सिंहकेँ जानैत अछि। ओ मोहनदाससँ कहलक जे ओ एखन तुरत हाथ-मुंह धो कऽ तैयार भऽ जाए, अगला बससँ ओतए चलबाक छै। घनश्याम आ गोपालदास दुनू उत्साहमे छल। ओ सभ कहलकै जे आइए पहुँचब ऐ लेल जरूरी छै किएक तँ परसू सँ जी.एम. एक मासक छुट्टीमे बाहर जा रहल छै। गोपालदास अप्पन झोरासँ मोहनदासक पहिरबा लेल एकटा पैंट आ एकटा शर्ट सेहो कीन कऽ आनने छल। ओ हसैत कहलक, "लिअ, एकरा पहिर लिअ! बुढबा बड़दक पोथा सन मैनेजर लग चेहरा लटका कऽ नै जाउ।" मोहनदास जूड़ीमे हँसए लागल। ओरियंटल कोल माइंसक जनरल मैनेजर एस.के. सिंहसँ भेंट करबामे कोनो दिक्कत नै भेलै। गोपालदासक पैंट आ बुश्शर्ट मोहनदासक भीतर नव आत्मविश्वास भरि देने छलै। ओ जी.एम. केँ सभटा खिस्सा बतौलक जे कोना 18 अगस्त, 1997 केँभर्ती परीक्षामे ओ नोकरी लेल सलेक्ट भेल छल आ पाँच कैंडिडेटक लिस्टमे ओकर नाम सभसँ ऊपर छलै। ओइ दिन ओ अप्पन सभटा सर्टिफिकेट आ कागच दफ्तरमे जमा कऽ देने छल मुदा ओकरा लग कहियो नियुक्ति पत्र नै एलै आ आब कोना बिछिया टोलाक बिसनाथ ओकर नामसँ पिछला पाँच बरखसँ एतए नोकरी कऽ रहल छै आ डिपो सुपरवाइजर बनि दस हजारसँ ऊपर दरमाहा लऽ रहल छै। मोहनदासकेँ घनश्याम कहि कऽ राखने छल जे ओ जी.एम. केँ ओइ दिनुका घटना नै बताबै, जहिया ओ कोलियरी अप्पन कागज मांगै लेल आएल छल आ भरती दफ्तरक बाबू सभ ओकरा मारने छलै आ फेर बादमे लेनिन नगरमे पुलिसक दरोगा विजय तिवारी आ बिसनाथ ओकरा धमकी देने छलै। ऐ लेल मोहनदास एतबेपर रुकि गेल। ओकर गपक समर्थन ओतए बैसल घनश्याम आ गोपालदास सेहो केलक। जनरल मैनेजर एस.के. सिंह केँ लऽ कऽ ई प्रसिद्ध छल जे ओ बड़ सोझ अफसर अछि। धुरफंदीबला लोकक संग जौँ ओ रहितो अछि तँ ऐ लेल जे ओकरा महग दारूक हिस्सक छै। नै तँ ओ एत्ते सोझ छै जे ओ नै तँ केकरो अधलाह कऽ सकैत अछि, नहिये केकरो नीक। मुदा जी.एम. मोहनदासक सभटा गप सुनि कऽ ओरियंटल कोल माइंसक वेलफेयर ऑफिसर ए.के. श्रीवास्तवकेँ ऐ मामिलाकेँ जांचैक आदेश देलक आ कहलक जे अगला मास जखन ओ छुट्टीसँ घुरताह, तखन धरि हुनका जांच रिपोर्ट भेट जेबाक चाही। मोहनदास एस.के. सिंहक एहि रूखसँ एतेक भावुक भऽ गेल जे बेर-बेर ओकर आँखि नोरा जाइ छलै। ओ मोने मोन सतगुरू कबीर आ मलइहा माइक नाम जपि रहल छल। अगिला हफ्ता जांच भेल। वेलफेयर ऑफिसर ए.के. श्रीवास्तव लेनिन नगरक फ्लैट नंबर ए बटा एगारह पहुँचल। बिसनाथकेँ एक-एक गपक जानकारी पहिनेसँ छलै। ओकर तार सभ जगह फिट छलै। पछिला पाँच बरखसँ ओ लेनिन नगरमे मोहनदास नामसँ रहि रहल छल ताइसँ ओ लेनिन नगरमे मोहनदासक नामसँ जानल जाइत छल। ए.के. श्रीवास्तव जकरासँ पुछैत छल जे फ्लैट नंबर ए बटा एगारहमे रहैबला लोकक की नाम छै तँ सभ कियो एक्के जवाब दैत छल, "मोहनदास।” ओ सेहो पछिला चारि-पाँच बरखसँ जकरा मोहनदास नामसँ जानैत छल आ जकरा लेल ओ वर्कर्स वेलफेयर फंडसँ लोन सेहो सेंक्शन केने छल ओ "मोहनदास' माने बिसनाथ छल। फेर ओइ दिन जी.एम. क चैंबरमे जकरा ओ देखले छल जे अपनाकेँ मोहनदास कहि रहल छल, ओकरा देखि कऽ ओकर मोनमे कत्तौ-नै-कत्तौ संदेह भऽ रहल छलै जे एहन लखा दै बला लोक ग्रेजुएट कोना भऽ सकैत अछि? अप्पन साढू गोपालदासक कपड़ा पहिर लेलाक बादो एत्ते बरखक बेरोजगारी, मेहनत आ अभावसँ मोहनदासक चेहरा आ समुच्चा देहक हुलिया एहन बनि गेल छलै जे एक नजरिमे ओ बेमार, बताह आ अनपढ़ नजर आबैत छल। इंक्वायरी ऑफिसर श्रीवास्तवक मन बेर-बेर कहैत छल जे भऽ सकैत अछि जे मोहनदास बनल लोक डिपो सुपरवाइजर मोहनदास नै हुअए मुदा कियो आर हुअए मुदा ई जे अपनाकेँ मोहनदास हेबाक दाबी कऽ रहल अछि ओ सेहो कत्तौसँ मोहनदास नै लगैत अछि। बिसनाथ जबरदस्त व्यवस्था कऽ के राखने छल। अप्पन फ्लैटमे ओ श्रीवास्तवजीक खूब सत्कार केलक। अप्पन कनियाँ अमिताकेँ ओ लो कट ब्लाउज आ नीचाँ सारीमे शर्बतक ट्रे लऽ कऽ ड्राइंग रूममे आबै लेल कहि देने छल। लेनिन नगर मार्केटमे एम्हर खुजल शिल्पा ब्यूटी पार्लरमे जा कऽ अमिता अप्पन फेशियल करौने छल। ओ शर्बतक ट्रे टेबुलपर राखैत मुस्कुराइत छ्ल जखन श्रीवास्तवजीकेँ ओ नमस्ते केलक आ कहलक, "सरिता दीदीकेँ संगमे नै आनलिऐ सर?” तँ एकाएक ओतुक्का वातावरण आत्मीय, घरेलू आ ऐंद्रिक भऽ गेलै। इंक्वायरी ऑफिसरक नजरि बेर-बेर अमिताक खुजल ढोढ़ीपर जाइत छल। टीवीपर तखन दिल्ली-मुंबइ मे चलैबला फैशन शो कार्यक्रमक समाचार चैनल नर-बड़ देखल जाइत छल। मुदा एतए तँ एकदम्मे जिंदा मॉडल जेहन स्त्री आगू ठाढ़ छलै। ई समाचार नै मुदा एकटा सत छलै। "ई हमर कनिया अछि सर!” बिसनाथ नमकीन बिगजी श्रीवास्तवजी दिस बढ़बैत कहलक-"कस्तूरी!' "नाम कोनो पुरान स्टाइलक नै लगैत अछि?” इंक्वायरी ऑफिसर ठाम टेबुल पर नमकीनक राखल प्लेटसँ एकटा बिसकुट उठबैत मुस्कियाइत कहलक। अमिताकेँ हँसी लागि गेलै। "ई की अछि सर जे ज्योतिषी पिताजीसँ कहने छल जे मीन राशिवाली लड़कीकेँ अप्पन बाजैबला नाम सेहो राशि बला राखबाक चाही...! तखन फल होइत छै। तइसँ हमहूँ सेहो कहलिऐ...चलू कोनो गप नै! राखि लैत छी।” "ओह! तँ कस्तूरी अहाँक राशिबला नाम छी?” इंक्वायरी ऑफिसर आब अमितासँ गप्प कऽ रहल छल। "अच्छा तँ बाजैबला नाम की छी अहाँक?” ओकर हँसीमे आत्मीयताक घनत्व लगातार बढ़ि रहल छलै। अमिताक चेहरापर असमंजसक डरीड़ बनऽ लागलै। एक पल लेल ओ चुप रहि गेल। बिसनाथ ऐ गपकेँ तत्काले बुझि गेल। "खूब छी! आब नाम बताबैमे कथी लेल लजाइ छी कस्तूरी!" बिसनाथ ठहाका लगौलक-"चलू, हमहीं बता दैत छी!... सर हिनकर बाजैबला नाम छन्हि अमिता!... अमिता भारद्वाज। घरमे सभ यएह कहै छन्हि।” इंक्वायरी ऑफिसर श्रीवास्तव हंसै लागल। "लेडिज केँ लाज नै हुअए तँ नीक नै लागैत छै। कनीटा किछो तँ लेडिजपना बनल रहबाक चाही आकि नै!...चलू कस्तूरीजी हम अहाँकेँ अमिताजीए कहब! कोनो ऑब्जेक्शन तँ नै अहाँकेँ?” "नै सर! एक्को रत्ती नै!" अमिता फुदकि उठल। "मुदा सत गप तँ ई अछि जे जखन कियो हमरा अमिता कहैत अछि तँ लागैत अछि जे ओ हमरे घर दिसका अछि।” अमिता एकटा बड़का सांस भरलक, "ऐ इलाकामे अप्पन सन किछु लागिते नै छै! बैकवर्ड छी हम सभ! बोर भऽ जाइत छी हम सभ।” "एखन डेवलप हैमे टाइम लागत। ओना प्रोग्रेस तँ बड़ छै एम्हर। दू बरख पहिने की छल एतए?' श्रीवास्तवजी सहज भऽ रहल छल। "अहाँकेँ टाइम कोना पास होइत अछि एतए, लेनिन नगरमे?” "बस भऽ जाइत अछि कोनो तरहे। किट्टी पार्टी भऽ जाइत छै। एक-दू कमेटे डालि देने छी, गरीब मजदूरक भलाइ लेल। सोशल सर्विसमे मन लागि जाइत अछि।” "नीक अछि, नीक अछि। सरिताकेँ सेहो बड़ शौक छै सोशल सर्विसक। अहाँ आएल करू हमरा दिस। सरिताकेँ सेहो इनवाल्व करू अपना सँ।” श्रीवास्तवजी बिसरि गेल छल जे ओ एतए कोन काज लेल आएल छल। बिसनाथक बांहि फूलि गेलै। मौका सही छलै। ओ बाजल, "देखू सर, ई लेनिन नगर एहन कॉलोनी छै जतए पड़ोसिये पड़ोसीक दुश्मन अछि। कियो ककरो हंसी-खुशी आर बढ़ैत देखिये नै सकैए। आब यएह बिन-बातक बात। आर किछो नै भेटलै तँ पकड़ि आनलक ककरो दू-चारि दाना फेंक कऽ आ कऽ देलक शिकाइत। हम जानैत छी ककर कारस्तानी छिऐ ई। जातिवाद बेसी पसरि रहल छै आइ-काल्हि। ई सभ आब माथपर बैसत। हम बुझै छी जे ककर कराएल छै ई सभटा खेल मुदा जाए दियौ। साँचकेँ आँच की? अहाँ अपन इंक्वायरी निष्पक्ष भऽ कऽ करू।” इंक्वायरी ऑफिसर डायरी निकाललक आ पुछलक, "फादरक की नाम छी अहाँक?” "बाबूजी! ओ बाबूजी! कनी बैसकीमे आबि जाउ!” बिसनाथ जोरसँ चिकरल आ फेर मुस्कुरा कऽ कहलक, "देखू संजोगे छै जे माय-बाबूजी दुनू काल्हि एतए आएल छथि। अचार सभ बनल रहै। पहुँचाबैक बहन्ना चलि आएल, बेटा-बहुकेँ देखबा लेल! हमर बल्दियत अहाँ हमर फादर-मदरसँ पूछि लियौ।” "हम तँ जाइत छी।” अमिता कहलक, "ट्रेडिशनल फैमिली अछि हमर।” ओ उठि कऽ भीतर चलि गेलि। नगेंद्रनाथक पाछाँ ओकर कनियाँ रेणुका देवी सेहो ड्राइंग रूममे आबि गेलि। तिलक चंदन देखि कऽ इंक्वायरी ऑफिसर श्रीवास्तवजी अपन सोफासँ उठि कऽ हुनका नमस्कार करबासँ अपनाकेँ रोकि नै सकल। बड़ विनम्रताक संग ओ पुछलक, "अप्पन-अप्पन शुभ नाम बता दिअ अहाँ दुनू गोटे। असलमे कागजी कारवाइ छै। पूरा तँ करैए पड़ैत छै।” नगेंद्रनाथ एक्को पलक देरी नै केलक, "हम्मर नाम छी काबादास।” ओ कुरताकेँ गरमे सँ खींच कऽ माला निकालि बाजल- "ई तुलसीक माला जहियासँ धारण केने छी, तहियासँ तुलसीदासक चौपाइ हम्मर ओढ़ना-बिछौना अछि। "दास” नाम हम तहियेसँ जोड़ि राखने छी।...आ ई अछि हमर कनिया पुतलीबाइ। मोहनाक महतारी।" रेणुका देवी मूड़ी डोला कऽ हँ कहलक। ऐ तरहे इंक्वायरी पूरा भऽ गेल। ओरियंटल कोल माइंसक वेलफेयर ऑफिसर ए.के. श्रीवास्तव अप्पन जांचमे पेलक जे मोहनदास बल्द काबा दास, ग्राम पुरबनरा, थाना आ जिला अनूपनगर, मध्यप्रदेश केँ लऽ कऽ उठाओल गेल सभटा आपत्ति निराधार अछि। ओ पुष्टि लेल पुरबनराक सरपंच छत्रधारी तिवारी आ जिला जनपद सदस्य श्यामला प्रसादक कएल गेल तस्दीकक कागज सेहो रपटक संग नत्थी कऽ देलक जे ओकरा बिसनाथ देने रहै। बिसनाथ आ अमिता माने मोहनदास आ कस्तूरीक आग्रहपर श्रीवास्तवजी दुपहर धरि ओतए विश्राम केलन्हि, साँझमे बियर आ बादमे व्हिस्की सेहो ओतए पिलन्हि, सामिष आहारमे देशी मुर्गा आ जखन ओ राति एगारह बजे अप्पन नबका "मारुति जेन” सं ओतएसँ बिदा भऽ रहल छल, तखन बेर-बेर अमिताकेँ "कस्तूरीजी” संबोधित करैत अप्पन घर आबैक लेल आ अप्पन वाइफ सरिताकेँ समाज सेवामे इन्वाल्व करैक आग्रह कऽ रहल छल। मुदा नशाक बादो ओकर आँखि अमिताक ढोढ़ीपर टिकल छलै जे रातिक अन्हारमे पैघ भऽ कऽ ओकर समुच्चा चेतनापर आच्छादित भऽ गेल छलै। (ई सभटा गप ओइ कालक अछि जखन पंजाबमे लोक सेवा आयोगक चयन समितिक अध्यक्ष करोड़ो टका घूस खा कऽ, पूरा राज्यमे हजारो सरकारी अधिकारीक नियुक्ति कऽ देने छल आ सी.बी.आइ.क छापा मारल गेलापर फरार भऽ गेल छल। ...जखन पैघ-पैघ मंत्रीक आवासमे जेड सिक्योरिटीक भीतर सूटकेस आ नोटक बंडल पहुँचि रहल छल आ ओतए भारतक कोनो साधारण लोकक प्रवेश वर्जित छल।...जखन हरियाणाक एकटा आइ.जी. आओर उत्तरप्रदेशक एकटा कबीना मंत्री स्त्रीगणक संग अवैध संबंध आ हत्याक आरोपमे गिरफ्तार छल आ मुंबइमे एनकाउंटरसँ अंडरवर्ल्डक अपराधीकेँ मारैबला "सुपरकॉप” सेहो माफियाक "सुपारी किलर"छल।...एहन काल जखन ऐ उपमहाद्वीपक प्रजाक भाषा हिंदी आ उर्दू केँ "राजभाषा' बनेलाक बाद प्रेमचंद, नेरूदा, फैज आ नजरूल-निराला केँ "राज-लेखक” बनेबा लेल सत्ताधारी राजनीतिक दलक लोक लेखकक मुखौटा लगा कऽ कमेटी बना रहल छल। ...एहन काल जखन दिल्लीक एकटा बेमार आ कर्जदार दर्जी अप्पन दूटा संतान आ अप्पन कनियाकेँ माहुर खुआ कऽ मारि देलाक बाद अप्पन हत्याक प्रयास करैत पकड़ल गेल, किएक तँ ओकरा लग आजीविकाक कोनो विकल्प नै रहि गेल छल। आब ओकरा जेलमे दऽ कऽ इंडियन पीनल कोडक धारा 302 आओर 309 लगा कऽ हत्या आ आत्महत्याक कोशिशक मुकदमा चलाओल जा रहल छल। ...आ...) पाँचम आ अंतिम खेप ओरियंटल कोल माइंसक इंक्वायरी कमेटीक रिपोर्टक बाद मोहनदास टूटि गेल। घनश्याम आओर गोपालदास जनरल मैनेजर एस.के. सिंहसँ एक बेर आओर भेँट कऽ हुनकासँ दोबारा इंक्वायरी करबाक मांग केलक मुदा ओ कहि देलकन्हि जे बेर-बेर ई नै हएत। हमर सभसँ सक्षम आ ईमानदार अधिकारी एकर जाँच केलक, दोबारा इंक्वायरीक आदेश दऽ कऽ हम हुनकापर संदेह पैदा नै हेबऽ दै चाहै छी। बादमे पता चलल जे बिसनाथ आ अमिता जनरल मैनेजरकेँ सेहो लेनिन नगरक अप्पन घरपर बजा कऽ खुआयब-पिआयब शुरू कऽ देने छल आ ओकर कनियाकेँ सेहो "समाज सेवा' आ किटी पार्टीमे इनवाल्व कऽ देने छल। कोल माइंसमे अफवाह ईहो छल जे अमिता जनरल मैनेजर एस. के. सिंहकेँ फाँसि लेने छै आ आब रहरहाँ ओकर कार लेनिन नगरक फ्लैट नंबर ए बटा एगारहक बाहर मोहनदास, कनिष्ठ आगार अधिकारीक फाटकपर ठाड़ रहैत छ। खबर ईहो छल जे बिसनाथ सेहो हुनका पटा लेने अछि। सिंह साहेब ओहिनो मौज-मस्ती, खाइ-पीबैक शौकीन लोक छल। मोहनदास टूटि कऽ छिड़िया गेल। नै तँ ओ ठीकसँ खा सकैत छल, नै तँ सुति सकैत छल। कोनो काजमे ओकरा मोन नै लागै छलै। केहन-केहन प्रश्न आओर संदेह ओकर दिमागमे आबैत छल आ ओ बेचैन भऽ जाइत छल। ओकरा लागैत छल जे जत्ते लोक नौकरीमे छै वा ऊँच जगहपर बैसल छै, कारमे घूमि रहल छै आ जे नाम आ चेन्हसँ ओ सभ जानल जा रहल छै ओ असलमे कियो आर छै आ ओ जालसाजी कऽ कोनो आन मुखौटा लगा रखने छै। की लेनिन नगरमे कोनो असली लोक, अप्पन नाम, वल्दियत, पता-ठेकानक बचलो छै वा सभ बिसनाथे सन बहुरूपिया आ डुप्लीकेट छै? मोहनदासकेँ सेहो अपनापर संदेह हुअए लागल जे आखिर ओ के छी? मोहनदास वा बिसनाथ? आकि ओ एम.जी. डिग्री कॉलेजसँ बी.ए. क परीक्षामे जे डिग्री पौने छल ओ बिसनाथक लेल छल? की सभक संग अहिने होइत छै? ओ घरक भितरे कोनमे सरकारी रोजगार दफ्तरसँ पठाओल गेल पुरनका पोस्टकार्डकेँ तकैत रहतिऐ। नै भेटलापर कस्तूरीसँ लड़ितिऐ-झगड़ा करितिऐ। ओ किछु बरख पहिलुका एहन कतेक पोस्टकार्ड ताकि कऽ निकालने छल, जइमे ओकर नाम आ पता लिखल छलै। ओ गाममे अप्पन लोककेँ ओ सभ चीज देखाबै छल। लोक सभ या तँ चुप रहैत छल वा ओकरा कोनो अफसर आकि नेतासँ भेंट करबाक सलाह दैत छल। मोहनदास जेहन हालम ल, ओइमे एहन भऽ सकब संभव नै रहि गेल छल। पुरबनराक सरपंच पंडित छत्रधारी सेहो ई लिखित प्रमाणपत्र दऽ देने छल जे बिसनाथ पुरबनराक मोहनदास छी। ओकर बेटा विजय तिवारी तँ ओहिनो बिसनाथसँ मिलल छल। कस्तूरीपर ओकर नजरि सेहो छलै आ गिदरमारा जकाँ ओ अही इंतजारमे छल जे एक नै एक दिन टूटि कऽ मोहनदास ओकर पएरपर आबि खसत आ ओकर महिसवारीक काज सम्हारि लेत। मोहनदास देखैत छल जे सरकार दिससँ ग्राम पंचायतकेँ जे हैंडपंप स्वीकृत होइत रहै ओ पैघ लोकक घरक आगू लागि जाइ छलै। शिक्षाकर्मीक नियुक्ति होइत छल, स्त्रीगणक लेल आंगनबाड़ी आ शिक्षिकाक पद निकलैत छल, इंदिरा आवास योजनामे घर बनाबै लेल अनुदान भेटै छल, इनार आ खेतकेँ ठीक करबा लेल ग्रामीण विकास विभागसँ टका अबैत छल, नेहरू रोजगार योजनामे शिक्षित बेरोजगारक लेल कोनो परियोजना आबैत छल तँ ई सभ ओइ लोकक बीच बँटि जाइ छलै। शारदा आ देवदास कहैत छै जे स्कूलमे दुपहरियामे जे खेनाइ बँटै छै ओइमे भेदभाव होइत छै। ओइ दिन मोहनदास कतेक बरखक अप्पन नेनाक संगी बीरन बैगाक घर जा कऽ महुक दारू उतरबौलक आ सुगरक माउस बनबौलक। संगमे ओकर साढू गोपालदास सेहो छल। ओ चारि-पाँच लोक छल आ साँझ सात बजेसँ ओ सभ पिनाइ शुरू कऽ देलक। ढोल-मंजीरक इंतजाम करने रहय। ओइ दिन मोहनदासकेँ "विंध्यांचल हैंडीक्राफ्ट' बला सेठ बाँसक मालक भुगतान केने छल। बारह सए टका ओकरा भेटल छलै। गोपालदासक जेबी सेहो ओइ दिन भरल छल। घर तँ बीरन बैगाक छल मुदा दारू-माउसक सभटा खर्चा मोहनदास उठेने छल। बीरनक घरबाली आ ओकर बहिन महुक दारू एतेक नीक उतारै छल जे भीतपर जोरसँ रगड़ि दियौ तँ भक्कसँ आगि लागि जाइत छल। मोहनदास ओइ राति अप्पन दोस्तक संग रास-रंगमे किछु क्षण लेल अप्पन सभटा दुख बिसरि गेल छल। बिहारी ढोल बजा रहल छल, परमोदी मंजीरा। मोहनदास मस्ती आ नशामे गाबि रहल छल: "पता दइ जा रे, पता लइ जा रे...गाड़ीबला.... तोहर नामक, तोहरा गामक पता दइ जा... माया रे, मायाक ठाम बताबै मायाक आनथि खबरिया काया माया दुनू नाच नचाबै, मायाक सगर नगरिया पता दइ जा रे, पता लइ जा रे...गाड़ीबला...।' बीरनक घरवाली जखन खाना परसलक तँ रातिक दू बाजि गेल छलै। भूख सभकेँ लागल छलै। तोरीक तेलमे मसल्ला-लहसून-पियाजु दऽ कऽ सुअरक मौस बीरनक बहिन रान्हने छल। रसक गंध पूरा आंगनमे पसरल छल। सभ लोक हाथमे रोटी लऽ कऽ खाइपर टूटि पड़ल। टोकना भरि भात सेहो बनल छल। मुदा मोहनदास चुप छल। गीत गबैत-गबैत ओकरा भीतर कतौ कोनो एकटा फाँस, जना एकबैग गरि गेल छल। ओकर टीस बेर-बेर ओकर छातीक भीतर जागैत छल, जकरा दबाबै लेल आ बिसरैले ओ आर लोकसँ बेसी पी लेने छल। खाइत-खाइत एकाएक कौर हाथमे रोकि कऽ मोहनदास बेर-बेर सभकेँ देखलक फेर ओकर गरसँ हिचकी निकलऽ लगलै। ओ कूही भऽ कानऽ लागल। गोपालदास, बीरन, बिहारी, परमोदी सभ कियो एत्ते भूखाएल छल आ एत्ते दिनक बाद एत्ते नीक खेनाइ भेटि रहल छलै जे ओकरा सभकेँ मोहनदासक ऐ काल कानब नीक नै लागै छलै। सभ कियो अप्पन मुँहसँ भरि-भरि कौर चबा रहल छल आ पुछैत सेहो जा रहल छल जे की भेल! पहिने खेनाइ किए नै खा रहल छिऐ? "अहाँ के छी? अहाँक नाम की?' "हमर नाम छी बीरन। बीरन बइगा।” बीरनकेँ हंसी आबि गेलै। "आ अहाँक बल्दियत? अहाँक बाप के छथि?” मोहनदास फेर पुछलक। "हमर बापक नाम डिंडवा बैगा अछि।” बीरन हँसैत जवाब देलक। अहाँकेँ महुक दारू चढ़ि गेल अछि। सब हँसऽ लागल। मोहनदासक आँखि लाल भऽ गेल। ओ हाथक कौर छिपलीमे दऽ देलक आ गरजि कऽ बाजल: "हौ बीरन, हौ परमोदी...हम के छी? सत सत बाजू? हमरा बुरबक नै बनाउ। अहाँ सभकेँ मलइहा माइक किरिया!” "अहाँ छी मोहनदास! अहाँक बाप काबा दास आ माइ पुतलीबाइ!” बीरन अप्पन अइंठ हाथ मोहनदासक छातीपर गड़ाबैत जोरसँ जवाब देलक। सभ कियो हँसऽ लागल। मोहनदास कनी काल चुपचाप बीरनकेँ निङहारैत रहल, फेर बेरा-बेरी सभकेँ ताकऽ लागल। ओ अप्पन शंका मेटाबऽ चाहै छल जे ओ सभ असली लोक अछि वा कियो आर अछि? कनी-कनी ओकरा लागै छल जे ई सभ ओकरे सन ठकाएल गेल असली लोक अछि। एकरा सभकेँ धोखा देल गेल छै। अन्तर मात्र एतबे जे ओ ऐ रहस्यकेँ बुझि गेल अछि आ एकरा सभकेँ एखन धरि नै पता चलल छै। मोहनदास अप्पन नेनाक संगी-साथीकेँ बताबऽ चाहै छल जे अहाँ सभ कियो सरकारी दफ्तरमे, शहरक ऊँच-ऊँच बिल्डिंगमे आ पैघ-पैघ बंगला-कोठीमे, कोइला खदान-कारखानामे आ लेनि नगर, गांधीनगर, अंबेडकर नगर, शास्त्रीनगर जेहेन कॉलोनीमे जा कऽ पता करू जे कतौ ओतए अहाँक नाम, बल्दियत आ पता-ठेकानाक कियो दोसर फर्जी जालसाजी तँ नै बैसल अछि, जे अहाँक हक छीन लेने अइ। मुदा निशाँक बादो ओकरा लागि रहल छल जे एहन गप कहलापर ई सभ कियो ओकरासँ कहत जे अहाँपर ठर्रा निशाँ बेसी चढि़ गेल अछि। बीरन, परमोदी, गोपालदास, बिहारी सभ कियो खाइमे लागल छल। बीरनक घरवाली सितिया आ ओकर बहिन रमोली सेहो आबि गेल छल। ओ दुनू सेहो महु पीबि रहल छल आ चुहुलक जवाब चुहुलसँ दऽ रहल छल। सभ कियो हँसि-बाजि, खा-पी रहल छल। मुदा मोहनदास सभसँ फराक, भीतक कोनमे बोतल लऽ कऽ बैसि गेल छल आ हिचकीक बीच कबीरदासक पद गेबाक संग पीब सेहो रहल छल। भोरक चारि बाजि गेल छल जखन ओकर संगी ओकरा लादि-टांगि कऽ घर धरि पहुंचौलक। कसतूरी पहिल बेर अप्पन साँयक ई हालत देखले छल। ओ गोपालदास आ बीरनपर कबदय लागल। मुदा जखन गोपालदास ओकर तरहत्थीपर एक हजारसँ ऊपर टका राखलक आ दुखी भऽ कऽ कहलक, "हम कतेक रोकलहुँ जे मोहना नै पी...नै पी मुदा ई नै मानलक। ई टका राखि लिअ। एकर जेबीसँ बाहर खसि पड़ल छल।” तँ कस्तूरी चुप भऽ गेल। भोर सात बाजल छल जखन काबा दासकेँ खोंखीक दौरा पड़ल। कोनो आन्ही जना खोंखी भेल छल। थमैक नामे नै लऽ रहल छल। आन्हर पुतलीबाइ डोरी टूटल गाए सन चारू दिस खसैत-पड़ैत भसियाएल दौगि रहल छल। ओकर कानब पूरा बस्तीमे गूंजि रहल छलै। कस्तूरी सेहो जागि गेल आ मोहनदासकेँ हिला-हिला कऽ जगेबाक कोशिश कऽ रहल छल। मुदा ओ महुक नशामे धुत्त पड़ल छल आ उठबाक नाम नै लऽ रहल छल। कस्तूरी डोलमे पानि लऽ कऽ आएल आ ओकरा मोहनदासक ऊपर ढारि देलक। मोहनदासक आँखि खुजल। ओ एतेक लाल छल जे ओकरामे खून हेल रहल छल। ओकर नशा नै उतरल छलै। कस्तूरी चिकरि कऽ बाजल, "उठियौ...यौ! डॉक्टरकेँ लऽ कऽ अबियौ! बाबूकेँ खोंखी भऽ रहल छै!” गामसँ लोक-वेद आ स्त्रीगण-नेना सभ आबऽ लागल छल। देवदास आ शारदा डरायल अप्पन बाबा काबाक खाट लग ठाढ़ छल। काबाक गर जना फाटि गेल छलै आ ओइमे सँ खून आ मौसक थक्का सभ बेर खोंखीक संग बाहर निकलि रहल छल। धरतीपर चिट्टा-मट्ठाक धारी लागल छल। गिद्धा मांछीक झुंड ओकर चारू कात भिनभिनाइत घूमि रहल छल। लोक मोहनदासकेँ उलटा-पुलटा रहल छल आ ओकरा जगाबैमे लागल छल। बड़ मुश्किलसँ मोहनदास हाथ टेक कऽ कनी टा उटंगा भेल आ खून जेहन लाल आँखिसँ चारू दिस भकुआएल चोन्हराएल देखऽ लागल। ओ केकरो चिन्ह नै सकै छल। ओकर नजरि कतौ स्थिर नै भऽ रहल छल। एकाएक ओकर ठोढ़पर हँसी एलै। ओ अप्पन आँखिपर जोर लगा कऽ रमइ कक्काकेँ चिन्ह गेल। ओ गरसँ टूटल अवाज निकाललक, "कक्का, हम के छी? हमर नाम की अछि कक्का! हमरा कहू कक्का, हमरा बतबियौ?” आ ओ बेदम भऽ कऽ ओइ ठाम ओंघरा गेल। गामसँ आएल स्त्रीगणक कानब आ चिकरबाक हल्ला उठल। पुतलीबाइक चिकरब सभसँ ऊँच छल। कनी काल सभ स्त्रीगण जना कोनो लयमे कानै लागल। काबा दास मरि गेल। ओकर खाटक नीचाँ राखल बाँस आ कचियापर माँछी भिन-भिन करै लागल। काल्हि अदहा राति धरि ओ टोकरीक लेल कमची छीलैमे लागल छल। काल्हि दुपहरमे बजारक विन्ध्याचल हैंडीक्राफ्ट्ससँ तीस टोकरी आ पच्चीस सूप बनाबैक आर्डर भेटल छलै। ओइ भोर करीब साढ़े सात बजे कस्तूरीक कोठरीमे बिलैया झपट्टा मारलक आ अलोपी मैनाक जोड़ाकेँ खा गेल। मादा मैनाक पेटमे नब अंडा आएल छल। ओकर नोचल पाँखि आ खूनक दाग कोठरीक माटिक जमीनपर बचल रहि गेल छल। कस्तूरी एक्के दिन पहिने गोबरसँ ओकरा निपने छल। ओइ दिन मोहनदासकेँ किछु नै बुझल भेलै जे ओकर बाप काबा दासक दाह-क्रिया कोना भेलै, ओकरा ओसारपर नशामे बेहोश छोड़ि कऽ गाम-बिरादरीक लोक काबाक लाशकेँ श्मशान धरि लऽ गेल, ओकर माए पुतलीबाइ कोनो तरहेँ काबाक खाटपर माथ पटकैत रहल आ बाँस, पथिया, कमची, पटिया, लोटा आ कचियासँ ओकर खून धाबैत-धुआबैत कानि-कानि कऽ गाबैत रहए, छोट-सन देवदास कोना अप्पन बाप मोहनदासक बदला अपनेसँ अप्पन बबाक चितामे आगि देलक आ ओकर नेनाक संगी बीरन बैगा ओकर किरिया-करम केलक! मोहनदासकेँ किच्छो पता नै। गोसार्इं कस्तूरीसँ पाँच सए टका सुतारलक, पाँच सए जंगलक फारेस्टगार्ड लऽ लेलक। ओ पतेरासँ काबाक चिता लेल सुख्खल लकड़ी बिछै लेल नै दऽ रहल छल। कस्तूरी लग ओ सभटा टका खत्म भऽ गेल जे गोपालदास ओकरा देने छल। मोहनदासक गरसँ फोंफ कटबाक ध्वनि लगातार निकलि रहल छल। एकाध बेर ओ अप्पन आंखिकेँ खोलि, चारू कात एहन तरहेँ देखतियै, जना ओ कोनो नब आ अनचिन्हार ठामपर आबि गेल छै आ फेर ओ सुति जाइत छल। ओ नीन छल वा फेर महुक दारूमे यूरिया वा लैंटिनाक पात मिला कऽ उतारल शराब छल वा सुगरक मौसमे कोनो छूति लागल छल। मुदा एहन हैतियै तँ ओइ राति ओकरा संग खाइ-पीबैबला बीरन, परमोदी, बिहारी, सितिया, रमोलीक संगो एहने हेतियै। ओ सभ कियो तँ ठीक छल आ काबाक मरलापर लकड़ीक जोगाड़सँ लऽ कऽ खांड़ा गाम जा कऽ गोसाईंकेँ बजाबै आ सभटा कर्म निपटाबैमे तँ वएह सभ कियो लागल छल। मोहनदासक नशा साधारण नै छलै। "दारू दिमाग धरि चढ़ि गेल छै। दहीमे जीरा-जमैन धरिकेँ कंठक भीतर दियौ।” बीरन बैगा सलाह देलक। कस्तूरी बाटीमे जीरा-जमैनक घोर लऽ कऽ मोहनदास लग आएल आ गोपालदास ओकर माथकेँ अप्पन कोरामे राखि कऽ जखन ओकर मुँह खोलय लागल तँ मोहनदासक आँखि खुजलै। ओ कस्तूरी आ गोपालदासकेँ एना देखलक जना ओ ओकरा चिन्हैत नै छलै। ओ बड़ कमजोर आ खरखरायल अवाजसँ कस्तूरीसँ पुछलक- "अहाँ के छी बाइ? आ हम के छी? हमरा बताबियौ?' एकर बाद ओ कस्तूरी दिस ताकि-ताकि कऽ मुस्कियाइत नीक अवाजमे गाबऽ लागल- "अहाँ बिलसपुरहिन छी, हम छी रैगड़िया, हमर-अहाँक जोड़ी, सजल अछि बड़ बढ़िया....।" कस्तूरीसँ रहल नै गेलै। ओ कूही भऽ कानऽ लागल। शारदा सेहो अप्पन पिताक हाल देखि कऽ कानऽ लागल। गोपालदास अपनाकेँ संयमित करैत कस्तूरीक हाथसँ बाटी लऽ लेलक आ मोहनदाससँ कहलक, "लिअ, ई काढ़ा पीब लिअ।” मोहनदास कतेक रास गहीर आँखिसँ गोपालदासकेँ किछु काल धरि देखलक आ फेर कोनो बच्चा सन बाटी मुँह लगा कऽ सभटा काढ़ा गटागट पीब गेल। शाइत ओकर दिमागक कोनो कोनमे अपनाकेँ ठीक करबाक सेहन्ता एखनो दम मारि रहल छल। कस्तूरी आ गोपालदासकेँ आफियत भेलै। जौं दवाइ असर कऽ जाए तँ ठीक नै तँ डॉक्टरकेँ बजाबऽ पड़त। मोहनदास फेर सुति गेल। मोहनदास अप्पन घरक ओसारपर ओनाहिते पाँच दिन आ चारि राति लगातार सुतल रहल। गाममे ई गप पसरि गेल जे ओकर दिमाग सनकि गेल छै आ ओ केकरो चिन्हैत नै अछि, एतए धरि जे अप्पन कनियाँ कस्तूरी आ बच्चा धरिकेँ नहि। कियो कहतिऐ जे महुक दारूमे यूरियाक फेँटक कारण एहन भेल , कियो कहतिऐ जे ओ ओरियंटल कोल माइंसक कॉलोनी लेनिन नगरमे लू लागि गेलासँ खसि गेल छल, तखनेसँ ओकर स्मृति चलि गेल। विजय तिवारी ई गप पसारि देलक जे ओकर कबरा कुत्ता मोहनदासकेँ धोखासँ काटि लेलकै, आब देखैत रहब, जहिना पानि बरसत ओ कुकुर जना भूकत। जतेक मुँह छल ओतेक गप छल। मुश्किल देवदास आ शारदाक संग सेहो छल। ओ स्कूल जाइत छल तँ ओतए मास्टर आ बच्चा ओकरा सँ पुछैत छल, की अहाँक बाप बताह भऽ गेल अछि? अहाँक बाप अहाँकेँ चिन्हैत नै अछि की? की ओ सुतल रहैत अछि? तखन फेर ओकर दातमनि-सफाइ आ हगब-मूतब कोना होइत छै? एकटा अफवाह इहो पसरल जे एक राति मोहनदास एकाएक उठल आ अप्पन बाप काबा दासक कचिया लऽ कऽ घरक सभ लोककेँ काटै-मारै लेल दौगल। ओ तँ कस्तूरी ओकरासँ ओझरा गेल आ आन्हर पुतलीबाइ ओकरा रस्सीसँ बान्हि देलक, नै तँ पता नै की भऽ जैतिऐ। (ई सभ घटना ओइ कालक छी जखन "इंडिया शाइन' कऽ रहल छल आ वित्तमंत्री आ विश्वबैंकक दावा छल जे सन १९९० सँ शुरू भेल ५.८ प्रतिशतक आर्थिक विकासक अखुनका विकास दर जौं एतेक साल भरि आओर बनल रहल तँ इंडिया अमेरिका बनि जाएत किएकि ऐ सँ अदहा विकास दरपर पचास बरखक भीतर अमेरिका अमेरिका बनि गेल। ...वएह काल जखन हमरा अस्थि-यक्ष्मा भेल छल आ हमर रीढ़क हड्डी एल.आर-४ आ ५ गलि गेल छल। हम नौ मास ओछाओनपर रहि आ कांधारमे बमियानक पहाड़मे बुद्धक मुस्काइत मूड़ीकेँ फिरकापरस्त ोर लांचर-मिसाइलसँ तोड़ि रहल छलौं... ...वएह काल जखन दिल्लीमे गरीब मजदूरक चारि सालक घामसँ, १९ हजार टन लोहा आ ४ लाख ५७ हजार घन मीटर धरतीकेँ खोदि कऽ एशियाक सभसँ पैघ, दुनियाक सभसँ महग आ आधुनिक मेट्रो रेल बनाओल जा रहल छल...।...जखन साढ़े तीन हजार बान्हक लेल पाँच करोड़सँ बेसी आदिवासी आ दलितक घर-खेत-बाड़ी पानिमे डुमा देल गेल छल...। जखन देशक २० करोड़ लोक लग पिबाक लेल पानि धरि नै छलै...आ साठि करोड़ लोक लग हगै, नहाबैक आ मूतैक लेल जगह नै छलै.. ...जखन सरकारमे साझीदार वामपंथी पार्टी पेट्रोलक दाम नै बढ़बै लेल दिल्लीमे हल्ला मचा रहल छल, जखन हिन्दुस्तानक पूरा आबादीक ९० प्रतिशत माने लगभग ९२ करोड़ लोककेँ पेट्रोलसँ किछु लेनाइ-देनाइ नै छल... ...जखन राजस्थानक गंगानगर आ टोंकक एक दर्जन गरीब किसानकेँ पुलिस ऐ लेल गोली चला कऽ मारि देने छल किएकि ओ अप्पन सुखाइत फसिलकेँ पानि पटाबैक लेल पानि मांगैत पत्थरबाजीपर उतरि गेल छल... ...वएह काल जखन अब्दुल करीम तेलगी कतेक हजार करोड़ टकाक जाली टिकट बेचले छल आ ऐ घोटालामे देशक कतेक पैघ अफसर आ नेता मिलल छल!...वएह काल जखन हिन्दीक एकटा बूढ़ आलोचक एक अफसरकेँ मुक्तिबोध आ दोसर खुर्राट दोसर अफसर केँ प्रेमचंद आ फणीश्वरनाथ रेणु घोषित कऽ रहल छल...जखन पोखरणमे बम फूटि गेल छल आ कारगिलक बाद सद्भावना बस चलाओल ज रह छल... ...वएह काल जखन पुरबनराक कठिना धारक पानि एकटा कागजक कारखानाक लेल लकड़ी सड़ाबैक बान्हमे बदलल जा रहल छल आ ओ सभटा हिस्सा पानिमे डूमि गेल छल, जतए मोहनदास पलिया बना कऽ तरबूज, ककड़ी, खरबूज, सजमनि उगाबै छल... ...आ जतए एक राति "हु तु तू...तू तू..' करैत ओ कस्तूरीक छपाकसँ कठिनाक धारमे खसि कऽ प्रेम केने छल आ नक्षत्रक सलेटी आभामे कएल गेल ओइ उद्दाम सहवासक स्मृतिक रूपमे ठीक नौ मासक बाद शारदाक जन्म भेल छल...) मुदा असलमे मोहनदास नै तँ पागल भेल छल, नै ओकर स्मृतिमे कोनो खोट छल। ओकर चेतनामे जे घाव लागल छल ओ लगभग एक हफ्ताक अखंड नीन, मूर्छा वा नशा काल चुपचाप भरि गेल। जखैन ओ जागल तँ ओ फेर पहिलुके जेहन मोहनदास छल, जे नीक तरहेँ बुझैत छल जे असली मोहनदास वल्द काबा दास, साकिन पुरबनरा, थाना आ जिला अनूपपुर, मध्यप्रदेश वएह रहै, जे आठ-दस बरख पहिने शासकीय एम.जी. कॉलेजसँ बी.ए. कएने छल आ मेरिटमे दोसर ठाम हासिल कएने छल। असली मोहनदास वएह छल जकरा नौकरी ऐ द्वारे नै भेटल छल किएकि ओकरा लग कोनो पैरवी, चिन्हल-जानल तिकड़म आ घूसक लेल टका नै छलै। ओ कोनो गिरोह वा माफियाक सदस्य नै छल, किएकि ओ ओइ जातिक आ वर्गक नै छल, जै जाति-वर्गक लग तागति छल। ओकरा नीक जकाँ बूझल छलै जे ओकरा संग आ ओकरा जेहन असंख्य लोकक संग लगातार पिछला कतेक सालसँ धोखाधड़ी आ छल कएल जा रहल छल मुदा ओ किछु कऽ सकैमे असहाय छल। मोहनदासकेँ ई सेहो नीकसँ बुझल छलै जे बिछिया टोलाक बिसनाथ बल्द नगेंद्रनाथ, जे लेनिन नगरमे मोहनदास विश्वकर्मा बल्द काबा दास बनि कऽ ओरियंटल कोल माइंसमे कनिष्ठ आगार अधिकारीक नौकरी करैत दस हजारसँ बेसी दरमाहा लऽ रहल छल, ओ कत्तौसँ मोहनदास नै छल। ओ एकटा बदमाश, कट्टर जातिवादी जालसाज अछि, जकर तागति एतेक बेसी छलै जे मोहनदास ओकर आगू कोनो लाचार-बीमार मूस सन छल। मोहनदास बुझै छल जे ओकर बाप माने असली काबा दास, जे टी.बी.क रोगी छल आ जे खोंीक संग खूनक कै करैत बाँसक टोकरी, सूप आ पटिया बनाबै छल, ओ मरि गेल छल मुदा एकरा साबित कऽ सकब ओकर वशमे नै छलै, किएकि बिसनाथक बाप नागेंद्रनाथ काबा दासक रूपमे बिछिया टोल आ लेनिन नगरमे अखनो रहै छल आ ओकरा सभ लग एकर दस्तावेजी सबूत छलै। मोहनदास चुप रहब शुरू कऽ देने छल। ओ कम्मे बजैत छल। कठिनामे बान्ह बनि गेलासँ ओकर रोजी-रोटीक एकटा आसरा छिना गेल छलै तइसँ ओ बजारमे इमरानक "स्टार कंप्यूटर सेंटर' पर टाइपिंग, प्रिंट आउट आ जीरॉक्सक काज सीखब शुरू कऽ देलक। ओकर बेटा देवदास, सड़कक कात "दुर्गा ऑटो रिपेयरिंग वर्क्स” मे पंचर लगाबए आ पाना-पेचकसक लमरा-पहुँची करएबला हेल्परक काज करए लागल छल। मासमे सए-दू सए धरि ओ कमा लैत छल आ अप्पन पढ़बाक खर्चा अपनासँ उठाबऽ लागल छल। शारदा तँ दू बरखसँ बिछिया टोलमे बिसनाथक बच्चाकेँ सम्हारैक काज धेने छल आ घरक काज छोड़ि देने छल किएकि रेनुका देवी लेनिन नगर जाए अप्पन वर बिसनाथ लग रहए लागल छल। शारदाकेँ पछिला एक बरखसँ बजारमे "ऐश्वर्या ब्यूटी पार्लर” मे नोकरी भेट गेल छल। ओतुक्का शिखा मैडम ओकरासँ बड़ प्रेम करै छल आ ओकरा पढ़बामे मदति करैत छल। ओ कहैत छल- "शारदा हम अहाँकेँ एक दिन एहन मॉडल बनाएब जे अहाँ मिस वर्ल्ड बनि जाएब आ टी.वी. पर आच्छादित भऽ जाएब!” आठ बरखक शारदा सत्तेमे रातिमे एहन सपना देखऽ लागल छलि। कस्तूरी गाम-मोहल्ला मे खेत-मजूरी कऽ फसलक ओगरबाहीक काज कऽ लैत छल। हँ, मोहनदासक माँ पुतलीबाइक दुनू ठेहुन काबा दासक मरलाक बाद पाथर भऽ गेल छल आ ओ चलि-फिरि नै सकै छल। दिशा-फराकत लेल सेहो घिसियाइत-घिसियाइत पछवड़िया कातक बारी धरि जाइत छल आ फेर घुरि कऽ परछीक कोनमे ओछाओल पटियापर बैसि जाइत छल। ओकर आँखिमे अन्हार गहींर भऽ गेल छल। "स्टार कंप्यूटर सेंटर' मे हर्षवर्धन सोनीसँ मोहनदासक भेंट भेल। हर्षर्धन ओतए किछु अदालती कागजातक फोटोकॉपी आ किछु टाइपिंगक काज करबा लेल गेल छल। ताधरि मोहनदासक टाइपिंग स्पीड ठीक-ठाक भऽ गेल छलै आ ओ कम्मे गलती करैत छल। ओतए मोहनदास अपनेसँ हर्षवर्धनकेँ अप्पन सभटा खिस्सा बतौलक। बीसम सदीक उत्तरार्धमे जेहन विचारधारा बला पार्टीमे हम लगभग बीस बरख धरि काज कएने रही, हर्षवर्धन सोनी ओही पार्टीमे छल। ओकर जीवन कतेक तरहक दुख-संघर्षसँ आ उत्थान-पतनसँ भरल छल। माध्यमिक स्कूलक एकटा मास्टरक बेटा हर्षवर्धन शुरूहेसँ संवेदनशील आ स्वतंत्र विचारक छल। ओकर पैघ भाए श्रीवर्धन सोनी बी.इ.क परीक्षामे टॉप केने छल आ इंजीनियरिंगक डिग्रीक बादो, छह बरख धरि खींचल बेरोजगारीसँ हताश भऽ, पाँच बरख पहिने एक राति अप्पन कोठलीक सीलिंग फैनमे रस्सीक फंदा लगा कऽ आत्महत्या कऽ लेने छल। बजारमे छोट-सन दुकान चलाबैबला बूढ़ बाप आ मिडिल स्कूलक मास्टरी करएवाली माँक बेटा हर्षवर्धन सोनीक मोनमे अप्पन भाइक आत्महत्याक घटना एकटा एहन गहींर घा छल जे पढ़ै कालेसँ ओ छात्र आंदोलनमे भाग लिअए लागल छल। ओ दोसर जातिमे बियाह केने छल आ ओकर दंडमे ओकरा जातिसँ पैरछा देल गेल छल। हर्षवर्धन सोनी एल.एल.बी. कऽ लेने छल आ अप्पन पार्टीक संग स्थानीय अदालतमे ओकालतक काज करैत अप्पन आजीविका चला रहल छल। ओ ओइ दिन जखन "स्टार कंप्यूटर सेंटर” मे मोहनदाससँ ओकर खिस्सा सुनलक जे असलमे खिस्सा नै, एकटा असल जिनगीक सत्यक खेरहा छल, तँ ओ ऐ केसकेँ लऽ कऽ अदालतक शरणमे जएबाक फैसला केलक। "अहाँ लग ऐ लेल कतेक पाइ यए?', मोहनदासक बेरंग, फाटल-चीटल, पैबंद लागल, कोनो जमानामे नील रंग रहल डेनिम पेंटकेँ तकैत हर्षवर्धन बाजल, "हम अहाँक केस लड़ब आ अहाँकेँ न्याय दिआएब।” मोहनदासक आँखिमे चमक आबि गेल। ओकर दुब्बर-पातर देह एक-दू बेर थरथरायल। एक बेर तँ ओकरा विश्वास नै भेल जे कियो ऐ तरहेँ ओकर संग दऽ सकैत अछि, फेर ओ बाजल, "हमरा संग ऐ काल अस्सीटा टका अछि। दू-चारि दिनमे चालीसक जुगाड़ कऽ देब। इमरानसँ सए-दू सए पेशगी भेट जाएत।” हर्षवर्धन बुझि गेल जे मोहनदास बेसीसँ बेसी चारि-पांच सए टका जोगाड़ मास भरिमे कऽ सकैत अछि जखन कि अदालतमे केस दाखिल करबामे कुल खर्च करीब पाँच हजार टका छल। एकक बाद दोसर सरकारक ओ आर्थिक नीति, जे देसक महानगरकेँ अमेरिका बना रहल छल, ओही देशक गाम आ पिछड़ल इलाकाकेँ कंगाल बना कऽ ओतए असंख्य इथियोपिया, रवांडा आ घानाकेँ जन्मा रहल छल। दिल्ली-लखनऊ, मुंबई-भोपाल, कोलकाता-पटनामे जखन सभ राजनीतिक पार्टी आ विचारधाराक प्रोफेसर चालीस-पचास हजार वेतन लऽ रहल छल आ छोटसँ छोट फ्री-लांसर धरि दू पन्नाक रपटपर पाँच सएसँ हजार टका कमा रहल छल, तखन गाम आ छोट कस्बामे, मेहनति कऽ काज करएबला मोहनदास जेहन लोककेँ चारि सए टका जोगाड़ करबामे मास लागि जाइ छै। हर्षवर्धन बुझि गेल जे मोहनदासकेँ अदालतसँ न्याय दियाबैक लेल ओकरा अपनेसँ टका जमा करए पड़तै। ओ एक हजार टका अपना लगसँ लगेलक, दू हजार किछु दोस्तसँ मांगलक आ बाकी टका लायंस क्लबक चैरिटी फंडसँ डोनेशनमे लेलक, माने संक्षेपमे जे जोगाड़ भऽ गेल। तँ ऐ तरहेँ आखिरीमे मोहनदासक मामला गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंडाधिकारी (प्रथम श्रेणी), जे सिगरेट नै पीबै छल आ बड़ दुब्बर छल, जकर गालक हड्डी छुरी सन छल आ उभरल छल आ जकर माथपर असंख्य टेढ़-टूढ़ डड़ीर छलै, क अदालतमे दाखिल भऽ गेल। मोहनदास बल्द काबा दास जाति विश्वकर्मा, साकिन पुरबनरा, थाना आ जिला अनूपपुर, म.प्र. बनाम विश्वनाथ बल्द नगेंद्रनाथ, जाति ब्राह्मण साकिन बिछिया टोला, हाल-वाशिन्दा ए/11, लेनिन नगर, ओरियंटल कोल माइंस, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़। मामिलाक दाखिल हेबाक संगे अदालत ओरियंटल कोल माइंसक महा-प्रबंधक एस.के. सिंह आ वेलफेयर ऑफिसर ए.के. श्रीवास्तव संग कतेक आओर प्रबंधक श्रेणीक अधिकारीकेँ तलब केलक आ ओकरासँ अदालतक आगू ई साक्ष्य पेश करै लेल कहलक जे ओ प्रमाणित करए जे ओकर कंपनी ओरियंटल कोल माइंसमे जूनियर डिपा. ऑफिसरक पदपर पछिला कतेक बरखसँ काज करैबला मोहनदास विश्वकर्मा असल मे बिछिया टोलाक विश्वनाथ बल्द नगेंद्रनाथ कियो आन नै अछि? न्यायिक दंडाधिकारी गजानन माधव मुक्तिबोध अनूपनगर आ दुर्गक जिलाधीशकेँ आदेश देलक जे ओ ऐ मामिलाक शासकीय जाँच करए आ दू सप्ताहक भीतर अदालतक सोझाँ अप्पन जांचक रिपोर्ट पेश करए। बीड़ी पियैबला न्यायिक दंडाधिकारी जी.एम. मुक्तिबोधक ऐ आदेश आ अदालतक सम्मनसँ ओरियंटल कोल माइंसमे हड़कंप मचि गेल। स्थानीय अखबारमे एकर खबरि छपल- "असल'" मोहनदास के?” "एन.डी.टी.वी.” आ "आज तक” ैनलक स्थानीय संवाददाता क्रमश: अनिल ादव आ खालिद रशीद ऐ मामलाक बाइट दिल्ली आ भोपाल पठेलक मुदा समाचार "राष्ट्रीय स्तर” आ "अखिल भारतीय परिव्याप्ति” क नै भऽ सकल, कारण जे ऐ मे दिल्ली-भोपाल-लखनऊ क कोनो पैघ नेता वा अफसरक नाम शामिल नै छल, तइसँ ई प्रांतीय वा राष्ट्रीय "खबर” वा "सूचना'क रूपमे प्रसारित नै कएल गेल। (...ई ओइ कालक ब्यौरा अछि, जखन विधु विनोद चोपड़ाक फिल्म "मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस.”, बॉक्स ऑफिसपर सुपर हिट भऽ गेल छल। जॉर्ज बुश आ टोनी ब्लेयर, दुनू अप्पन-अप्पन देशमे दोबारा चुनाव जीति कऽ सत्तामे आबि गेल छल, अमेरिकाक जहलमे भिखमंगा फकीर जेहन दाढ़ी आ नाक, झाइसँ भरल चेहराबला सद्दाम हुसन अरबमे कविता लिखऽ लागल छल आ मंडल आयोगक सिफारिश लागू करैबला भारतक पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंहकेँ कैंसर भऽ गेल छल, किडनी खराब छल। ओ जे.पी. जकाँ डायलिसिसपर छल आ दिल्लीक एक कोनमे कैनवासपर चुपचाप चित्र बना रहल छल... ...वएह काल जखन पटनाक कलेक्टर बाढ़ राहतक करोड़ों टका मारि कऽ नपत्ता भऽ गेल छल आ नव सरकार फिल्म सेंसर बोर्डक पुरान अध्यक्षकेँ हटा कऽ जकरा नव अध्यक्ष बनौने छल, ओ बालीवुड फिल्मसँ बाहर लखाह दैत रहल ओइ दृश्यपर सेंसरक कैंची चलेबापर विचार कऽ रहल छल, जइमे एकटा खानदानी नवाबक जिप्सीसँ शिकारमे मारल गेल कालिया मृग, दूटा खरगोशक लाश, सर्च लाइट आ बंदूकक बरामदगीक शॉट छल। ...ई वएह काल छल जखैन लगातार पंद्रह बरखसँ हिंदी भाषाक संबंधित पदक चयन समितिक सभ सदस्य, खाली पदपर अप्पन जमाय, बेटा, बेटी, समैध, चापलूस, सेवककेँ निर्लज्जतासँ नियुक्ति कऽ दैत छल आ ओइपर नै कोनो सी.बी.आइ. इंक्वायरी होइल छल, नै राज्यसभा वा लोकसभामे कोनो सवाल उठैत छल... ...जखैन सभ सत्ताधारी पार्टी, मानव संसाधन मंत्रालय, पब्लिक सेक्टर भ्रष्ट कारखाना बनि गेल छल आ ई सभ विद्वान, शिक्षामित्र, समाजशास्त्री, साहित्यकार, बुद्धिजीवी, इतिहासकार, कलाकार, अध्यापकक उत्पादन कऽ रहल छल... आ बच्चाक दिमागपर कब्जा करै लेल शिक्षा-संस्थानमे इतिहास आ पाठ्य¬पुस्तककेँ दोबारा-तिबारा लिखबाक राजनीतिक जंग चलि रहल छल... ...तखन भारत भ्रष्ट देशक सूचीमे...संसारमे ८३म, परमाणु बम बनाबै बला देश मे ६अम, जनसंख्यामे दोसर आ भयावह गरीबीमे खाली बांग्लादेश टासँ ऊपर छल।) हर्षवर्धन सोनी आ मोहनदास दुनूकेँ मुदा उम्मीद छल जे न्यायिक दंडाधिकारी जी.एम. मुक्तिबोधक अदालतमे दूधक दूध आ पानिक पानि भऽ जाएत। ऐ विश्वासक पाछाँ दूटा मुख्य कारण छल। पहिल तँ ई जे दंडाधिकारी बीड़ी पिबैत छल आ ठेलाक कड़क चाय सेहो। आ हुनका कोनो तरहक घूस वा लालचसँ भ्रष्ट नै कएल जा सकैत छल... ...आओर दोसर ई जे सत मोहनदास दिस छल किए तँ असल मोहनदास बी.ए. वएह छल। "झूठक पएर-मूड़ी किच्छो नै होइत अछि! भिनसरेक इजोत सन सभ किछु साफ लखाह भऽ जाएत! जै हो मलइहा माइ! कृपा बनल रहए सतगुरू कबीर!” कस्तूरीक मौलाइल जिनगीमे आशाक एकटा खूब नव हरियर कोमल दूबि उगि रहल छल। पुतलीबाइक आँखिमे अन्हार तँ काबाक जेबाक बादेसँ बढ़ि गेल छल मुदा परछीक कोनमे चटाइपर कोनो बूढ़, पंखझरी चील सन बैसल ओ अप्पन कान लगातार कोनो भीतर कोठली दिस लगओने राखै छल। आ एक दिन भिनसरे जखन मोहनदास अदालतक पेशीमे जएबा लेल बासि भात आ अल्लूक तरकारी खा रहल छल, तखने एकाएक पुतलीक खुशीसँ भरल बोल आंगनमे गूंजि गेल। ओकरा गरसँ जेना कोनो प्रसन्न चिड़ै बाजि रहल छल: "हे...ऐ...कनियाँ! हे देवदास! कोठरीक भीतर ताकि कऽ देखियौ! लागैत अछि जे अलोपी मैना नबका घोंसला बनेने छै की? दौगू-दौगू...!” मोहनदास जल्दी-जल्दी खाइमे लागल छल, जइसँ बेरसँ पहिने अदालत पहुँचि जाए किए तँ लोक कहैत छल जे बीड़ीक सुट्टा मारैबला जज टाइमक बड़ पाबंद अछि। जौं पांच मिनटक बेर भेल तँ पिछला पेशीमे अगला तारीख दऽ कऽ अगला पेशी शुरू कऽ दैत छै। जखन मोहनदास दिन भरि लेल, भरि पेट भात-तरकारीक कलेवा खा कऽ घरसँ बाहर निकलि रहल छल तँ पाछाँ ओकर आन्हर-बूढ़ चिड़ै सन माँ पुतली जोर-जोरसँ पुलकित भेल गाबि रहल छल: "चोला तर जइ रामा...तन तर जइ रामा, सत गुरु साखी ला...चोला तर जइ... ...चोला तर जइ' अदालत मे ओरियंटल कोल माइंसक महाप्रबंधक एस.के. सिंह हाजिर नै भेल छल। हुनकर अर्जी वकील पेश कऽ देलक। कॉलयरीक वेलफेयर ऑफिसर ए.के. श्रीवास्तव अप्पन इनक्वायरीक सभटा फाइल आ संगमे लागल सभटा दस्तावेज न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणीक अवलोकनार्थ हुनकर टेबुलपर राखि देलक। हर्षवर्धन सोनीक चेहरा उड़ल छलै किए तँ बिछिया टोलासँ जै तीनटा गवाहकेँ अदालतमे आबि कऽ साक्ष्य देबाक छल, जे मोहनदास नामक जे क्यो ओरियंटल कोल माइंसमे पछिला कतेक बरखसँ कनिष्ठ आगार अधिकारीक नौकरी कऽ रहल छल, ओकरा ओ सभ नेनासँ नीकसँ चिन्हैत छल जे ओ मोहनदास नै बिश्वनाथ अछि। ओइ तीन गवाहमे सँ दूटा गवाह अदालतमे हाजिर नै भेल आ तेसर गवाह दिनेश कुमार साहू पलटी मारैत भरि अदालतमे तस्दीक कऽ देलक जे विश्वनाथ मोहनदास छी। ओ आंगुरसँ ह्षवर्धन सोनी आ मोहनदास दिस इशारा करैत ईहो कहलक जे ई दुनू गोटे मास भरि पहिने ओकर घर आएल छल आ ओकरासँ कहलक जे जौं अहाँ हमर सिखायल बयान कोर्टमे दऽ देब तँ हम अहाँकेँ पाँच हजार टका देब। न्यायिक दंडाधिकारी गजानन माधव मुक्तिबोध अगला सुनवाईक लेल एक मास बादक तारीख धऽ देलक। हर्षवर्धन आ मोहनदास दुनू स्तब्ध छलाह। आब सभटा आस जिलाधीशक जाँच रिपोर्टपर लागल छल। मोहनदासकेँ न्याय जौं भेंट सकैत छल, तँ तखन जखन सत आगू आबतिऐ। अगला पेशीमे दुर्ग आ अनूपपुर, दुनू जिलाक कलेक्टरक जाँच रिपोर्ट जखन अदालतमे पेश कएल गेल तँ हर्षवर्धन आ मोहनदास अवाक रहि गेल। ओइ जाँच रिपोर्टमे छल जे मोहनदास वल्द काबा दास, जूनियर डिपो ऑफिसर, ओरियंटल कोल माइंसक नाम आ शिनाख्तीकेँ लऽ कऽ उठाएल गेल सभटा आरोप निराधार अछि। दस्तावेज, आवश्यक साक्ष्य, परिस्थितिगत प्रमाण, कएकटा ग्रामीण आ पंचायत सदस्यसँ गपसपक बाद निर्विवाद रूपसँ ई सिद्ध होइत छल जे मोहनदास, मोहनदासे अछि, विश्वनाथ नै। बादमे पता चलल जे विश्वनाथ ऐ बेर दुर्ग आ अनूपपुर दूनू जिलाक संबंधित पटवारीकेँ दस-दस हजार टका घूस आ दारू-मुर्गा देने छल। विजय तिवारी सेहो पुलिस गाड़ीमे बिसनाथकेँ बैसा कऽ पटवारीकेँ घूस पहुँचाबऽ लेल गेल छल। असलमे जेहन प्रशासनिक परिपाटी छल, ओइमे कलेक्टर माने जिलाधीश माने डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेटक इंक्वायरीक असल मतलबे होइत छल संबंधित तहसील वा परगनाक पटवारीसँ जाँच। जौं कोनो अदालत कलेक्टरकेँ कोनो जाँचक आदेश दैत छल तँ कलेक्टर नोट लगा कऽ ओइ आदेशकेँ अप्पन मातहत, संबंधित इलाकाक एस.डी.एम. केँ पठा दैत छल। एस.डी.एम. ओकरा तहसीलदार आ तहसीलदार ओकरा नयब तहसीलदारकेँ दऽ दैत छल। ऐ तरहेँ रेवेन्यू इंस्पेक्टर माने आर.आर. माने कानूनगोसँ भेल आखिरमे ओ आदेश पटवारी लग पहुँचि जाइ छल। माने आखिरमे पटवारी कलेक्टरक आँखि-कान आ नाक बनि जाइ छल। ओइ राति जखन गाम बिछिया टोला आ पुरबनराक पटवारी कमल किशोरकेँ बिसनाथ आ विजय तिवारी दस हजार टकाक गड्डी देलक आ मैकडॉवल नंबर वन व्हिस्कीक संग बटर चिकेन आ मटन जींसक कबाब खुएलक तँ कमल किशोर पटवारी जमीनपर दुनूक पएरपर लोटपोट करए लागल। "यौ, अहाँ सभक हुकुम हम कहियो टारब यौ?...एत्ते एमाउंटमे तँ हम सार मूसकेँ हाथी, खेतकेँ सड़क आ बलगोविनाकेँ छह बच्चाक माए बना देब।” कमल किशोर पटवारी मगन भऽ कऽ नोटकेँ अप्पन झोरामे धऽ कऽ उड़ि रहल छल। ओ मैकडॉवल नंबर वनक पटियाला पैग एक घोंटमे गराक नीचाँ उतारलक आ ओतए ओकर सभका सोझेँ, बिना कत्तौ गेने, मामलाक सभटा तफ्तीश कऽ देलक आ पंद्रह मिनटमे मोहनदास बनाम विश्वनाथ मामिलामे जिलाधीश द्वारा पूर कएल गेल इंक्वायरीक पुख्ता रिपोर्ट सफेद कागजक एकटा पन्नापर तैयार भऽ गेल। अर्थात अंग्रेजक गुलाम भारतपर शासनक लेल तैयार कएल गेल नौकरशाहीक ऐ बीझ खाएल लौह ढाँचामे, जे आजादीक साठि बरखक बादक आधिकारिक सरकारी दस्तावेज धरि विश्वनाथ वल्द नगेंद्रनाथ छल, केँ मोहनदास वल्द काबा दास बना देलक। मोहनदास फेर टूटए लागल। ओ लगातार कबीरक जाप करैत छल। मलइहा माइक मढ़ियाक ड्योढ़ीपर ओ घंटो बैसल रहैत छल। मलइहा माइ मलाइ टाक भोग लगाबैत छल। सेहो बकरीटा दूधक मलाइक। ऊँच जातिक लोक ओकर मढ़ियामे नै जाइत छल। ठाकुर, बनिया, बाभन, लालाक देवी-देवता दोसर छल। मलइहा माइक पूजाक काज ब्राहमण नै गोसाईं करैत छल। कहैत छै जे दलित-आदिवासीक संग भात-रोटी, बेटा-बेटीक संबंध बनाबैक कारण, जाति-पातिसँ निकालल गेल ब्राह्मण गोसाईं कहबैत छल। मोहनदास खाड़ा गाम जा कऽ सिउनारायण गोसाईंकेँ बजौलक, ओकरा बीस टका आओर दालि-चाउर, नून, हरैद, चुदक, सीधा देलक। ओकरासँ ओ मलइहा माइक पूजा करौलक आ शुद्ध बकरीक दूधसँ निकालल गेल पाव भरि मलाइक भोज चढ़ेलक। ऐहि बीच एकटा घटना आर भऽ गेल। एक दिन भिनसर काल, जखैन कस्तूरी गामक दू-तीन टा मौगी संगे दिशा-फरकत करए लेल गेल, ओकरा सभकेँ जंगल-झाड़क पाछाँ कोनो हलचलक आभास भेलै। जेना कियो ओतए नुकाएल छै। कस्तूरी आइ-काल्हि अप्पन हिफाजत लेल हरदम कछनीमे कचिया खोँसि कऽ राखैत छल। ओकरा ऐ गपक नीकसँ आभास छलै जे दू बच्चाक माए बनि गेलाक बादो ओ एखन धरि गाममे सभसँ सुन्नर काठी आ चेहरा-मोहराक मौगी अछि। आओर कतेक दिनसँ गामक ठकुरान-बभान शोहादक नजरि गिद्ध जेहन ओकरापर गड़ल छै। कस्तूरी उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। ओ डाँरमे खोँसल कचिया निकालि कऽ हाथमे थाम्हि लेलक आ समधानल डेगसँ जंगल-झाड़ दिस बढ़ल। ओकर पाछाँ रमोली, सितिया, चंदना आ सावित्री छल। “की छी...केकर भीतर हबस पैसल छै! निकल तोहर गर्मी निकालि दैत छी टटीबे! मुँहझड़को।” कस्तूरी चिकरलक। बाँकी मौगी सभ सेहो बोन-झाँकुरकेँ घेरब शुरू कऽ देलक। सभक हाथमे एक-एक दिसा-फारकतबला लोटा छलै। झाँकुरसँ फटाकसँ निकलि कऽ छत्रधारीक लड़का विजय तिवारी भागल। गंजी-जंघियामे ओकर चर्बी चढ़ल थुलथुल देह भागैत काल गोलमटोल तरबूज जेहन लखाह दऽ रहल छल। कस्तूरी किछु दूर धरि हाँसू तानि कऽ ओकरा दिस दौगल। रमोली, सितिया आ सावित्री गरियाबैत पोखरि दिसक लोटा खेंचि-खेंचि कऽ मारलक। दरोगा विजय तिवारी खसैत-पड़ैत लंक लऽ भागि रहल छल। मौगी सभ पाछाँसँ चिकरि रहल छल: 'यौ, टी.वी. बलाकेँ बजाउ, सीन खीचू।' 'दौड़ऽ हे दौगऽ! दरोगा कछियामे हगि रहल छै...' ओइ दिन सच्चेमे विजय तिवारी डरि गेल छल जे कत्तौ मोहनदास अप्पन वकील हर्षवर्धन सोनी संग मिल कऽ टी.वी. आ अख़बारमे किछु अंट-शंट नै देखा-छपा दिऐ। (ई सभ किछु ओइ दिनक घटना छी जखन समुच्चा एशियाक राजनीतिक इतिहासमे पहिल बेर एकटा भारतीय स्त्री कम्युनिस्ट पार्टीक पोलित ब्यूरोक सदस्य बनल छलि, एकटा दोसर स्त्री प्रधानमंत्रीक कुर्सी ठुकरा देने छलि......आ स्त्री, संसारक ओइ सभसँ प्रतिष्ठित जूरीक सदस्य बनि गेल छलि, जइमे ऋत्विक घटकक सुवर्ण रेखा वा कोमल गांधार वा शैलेंद्रक तीसरी कसमक स्क्रीनिंग धरि नै भऽ सकल छल......आ ओही काल जखन बगदादक अबू गरीब जेलमे एकटा अमेरिकी स्त्री ईराकी पुरुषकेँ नांगर कऽ ओकरा एक-दोसराक ऊपर लादि कऽ एकटा पिरामिड जेहन बना देल छल आ अमेरिकी झंडा लऽ कऽ ओकर ऊपर चढ़ि गेल छलि......ओही काल जखन पावर सत्यमे जेंडरकेँ परिभाषित कऽ रहल छल!...ओइ काल जखन दिल्लीक धौलाकुआँ लग उत्तर-पूर्वक एकटा लड़कीकेँ कारक भीतर खींच कऽ राजधानीक सभ वी.आइ.पी. सड़कपर अढाइ घंटा धरि लगातार दिल्लीक पाँच पुरुष बलात्कार करैत रहल छल...आ इम्फालमे मनोरमाक बलात्कार आ हत्याक विरोधमे कृष्णक उपासना करएवाली कएक सए मैतेइ स्त्रीगण तामसमे आ हतास भऽ नांगट भऽ गेल छलि......ओइ काल जखन दूटा स्त्री सरदार सरोवरमे ४०.००० दलित आ आदिवासीक घर-जमीन-जायदादकेँ पानिमे डुमा दै बला योजनाक विरुद्ध लड़ाइ हारि गेल छल आ जलप्लावनमे वन्य प्राणी, वनस्पति, गाछ सभ किछु डूमि गेल छल......टी.वी.पर ओइ टटाएल स्त्रीगणक कानैत, हरल चेहरा लगातार लखाह भऽ रहल छल......वएह काल जखन हम दिल्ली छोडि कऽ वैशाली आबि गेल रही आ हमर छतसँ गाजियाबाद ओ झंडापुर साफ लखाह दैत छल, जतए ठीक पंद्रह बरख पहिने ओइ क्रांतिकारी कलाकार आ रंगकर्मीक हत्या भेल छल, जाकर नाम सफ़दर हाशमी छल...) गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंधाधिकारी (प्रथम श्रेणी) क अदालतमे सभ गवाह, सबूत, जाँच रिपोर्ट एतए धरि जे दू-दूटा जिलाधीशक इनक्वायरी ई सिद्ध कऽ देलक जे बिसनाथे मोहनदास अछि। तखन जे गरीब सन आदमी मोहनदास हेबाक दावा कऽ रहल छल ओ के अछि?- एकर अदालतमे चलि रहल मामलासँ कोनो सोझ कानूनी संबंध तँ नै छलै। ओ एकटा अलग केस भऽ सकैत छल, मुदा से तखन जखन ओकर दरख्वास्त अदालतमे कोनो वकील वादी दिससँ दाखिल करए। हर्षवर्धन सोनी तीन दिन, तीन राति धरि सुति नै सकल। ओ नीकसँ बुझै छल जे मोहनदास मोहनदास छी, मुदा एकरा प्रमाणित कऽ सकब लगातार कठिनेटा नै असंभव भऽ रहल छलै। ओ हमरा ई-मेल पठेलक: "ई तँ हद छै! नै हमरा किछु खाएल-पीएल भऽ रहल अछि, नै रातिमे नीन आबैत अछि। ओम्हर मोहनदासक सेहो यएह हालत छै। सभ कियो बुझैत अछि जे असली मोहनदास यएह छी मुदा एकरा साबित कऽ सकब मुमकिन नै रहि गेल छै। की करी किछु सुझैत नै अछि। मोहनदास आ हमरा दुनू गोटेकेँ धमकी देल जा रहल अछि जे चुप भऽ कऽ बैसि जाउ....ऐ बीच पता चलल जे बिसनाथ रासबिहारी रायकेँ अप्पन वकील बनौने अछि। हुनका तँ अहाँ जनैत छियन्हि, सत्ताधारी पार्टीक बड़ पैघ नेता छथिन। वहु नगर निगमक अध्यक्ष छनि आ कतेक सरकारी-गैर-सरकारी संगठनक प्रमुख छथिन। मोहनदासक पक्षमे आब चारि-पाँच लोक गवाही दै लेल तैयार भेल अछि- बीरन बैगा, गोपालदास, बिहारीदास, रमोली, सितिया...मुदा ओकर सभ बगे-बानी एहन छै जे लागैत छै जे एहन गवाह तँ पचीस-पचासमे कत्तौ भेट जाएत। भिखमंगा लागैत अछि सभ गोटे। ...सोचैत छी हम न्यायिक दंडाधिकारीसँ सोझे भेंट कऽ कए देखिऐ। ओ बीड़ी पीबैत छथि आ किछु अजीब सन लागितो छथि। जी.एम. मुक्तिबोध हुनकर नाम छन्हि। मराठी छथि मुदा हुनकर हिन्दी अद्भुत अछि। कोर्टक बाद सड़कक कात रामदीनक ठेलापर कड़क चाह पिबैत छथि। ...हम नोट केने रही जे ओ जखन अदालतमे मोहनदास दिस देखैत छथि तँ ओकर आँखिमे एकटा बेचैनी आबि जाइ छनि। हुनकर माथक एकटा नस उभरल छनि आ जखन ओ किछु सोचैत छथि तँ ओ फुलि जाइ छनि।....हमरा डर लागले रहैत अछि जे कत्तौ कोनो दिन ओ नस फाटि ने जाए। हुनकर आँखिमे किछु एहन तँ अछि जना ओ कोनो जासूस वा खुफियाक आँखि हुअए जे कानि कऽ चुपचाप केकरो आत्माक भीतर धँसि कऽ ओकर सभ किछु पखारि सकैत अछि। ...सभ कहैत अछि जे हुनकर घरमे कतेक रास किताब छन्हि आ ओ तीन बजे राति धरि पढै़त रहैत छथि। एकटा विचित्र सन गप हमरा ईहो पता लागल जे जी.एम. मुक्तिबोध छथि तँ प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी मुदा सरकार हुनकर पाछाँ सी.आइ.डी. लगा कऽ राखने छल...।' कोनो दोसर बात नै देखि हर्षवर्धन एक तरहेँ जुआ खेलेलक। कोनो विचाराधीन मामिलाक संबंधमे भेंट करब, सेहो एहन जजसँ जे किछु रहस्यपूर्ण देखबामे लगैत अछि, एकटा खतरासँ भरल निर्णय छल। जौं जी.एम. मुक्तिबोध तमसा जेतथि तँ ओकर कैरियर बर्बाद भऽ सकैत छल। हर्षवर्धन सोनीक अतीत ओहिनो बड़ कठिनाइ, संघर्ष आ दु:खसँ भरल छलै, बेरोजगारीमे भाइक हताश आत्महत्या ओकर मनसँ कखनो एक्को पल लेल नै जाइ छलै। वकालत तँ खाली नाम मात्र लेल छलै। ओकरा लग बेसी वएह सभ अबैत छल जकर जेबीमे महग वकील करबा लेल टका नै होइ छलै। मोहनदासक मोकदमामे ओकरा किछु नै भेट रहल छलै, ऊपरसँ ओकरा पाँच हजार टका अपनेसँ जोगाड़ करए पड़ल छल। तकर बादो ओ न्यायिक दंडाधिकारीसँ भेंट करबाक खतरा लेलक। हर्षवर्धनकेँ आश्वस्ति भेलै जखन अप्पन फ्लैटपर ओकरा देख कऽ गजानन माधव मुक्तिबोधक चेहरापर एहन भाव एलै जना ओकरा पहिनेसँ ओकर एबाक गप बुझल हुअए। जना हुनका पहिनेसँ पता छल जे हर्षवर्धन ओकरा लग अएबे करत। ओ एकरा लेल लकड़ीक एकटा पुरनका कुर्सी राखि देलक आ "बैसू! हम चाह बनाबैत छी!, कहि कऽ भीतर चलि गेल'। हर्षवर्धन कोठलीमे नजरि दौगेलक। ओतए सभटा चीज बेतरतीब छल। कतेक किताब एतए-ओतए पसरल छल आ ओकरामे सँ कतेक पन्ना खुजल छल, जकर बीचमे पेंसिल, कार्ड आ गाछक पात खोँसल गेल छल। भऽ सकैत अछि जे किताबक ओ पृष्ठ ओकरा बड्ड पसीन हेतै आ ओ बेर-बेर ओकरा पढ़ैत छल होएत। कोठलीक हालत देखि कऽ लागैत छल जे ओ एतए असगरे रहैत छथि। हर्षवर्धनकेँ पता लागल जे ओकर बदली अधिक काल ओइ आदिवासी आ पिछड़ल इलाकामे कऽ देल जाइत अछि, जतए एहन मुकदमा नै आबैत छै, जकरासँ कोनो पैघ लोक आ व्यापारीकेँ कोनो नुकसान भऽ जाए। हर्षवर्धनक आँखि ऊपर उठलै। भीतपर गाँधीजी आ मार्क्सक चित्र टांगल छल। एकटा कोनमे गणेशक प्रतिमा सेहो ाखल छल। वाम भागक भीतसँ लागल बुकसेल्फ छल, जइमे कानूनक कतेक किताब राखल छल, जना ओकरा कतेक बरखसँ खोलले नै गेल हुअए। जी.एम. मुक्तिबोध चाह लऽ कऽ आबि गेल छल। संगेमे एकटा छिपलीमे कनीटा बेसनक सेब छल। चाहकेँ मचियापर राखि कऽ मुक्तिबोध तख्तापर बैस गेलथि। चाह बड़ कड़गर आ महोर छल। खूब औंटल आ भफाएल। कतेक काल धरि कोठलीमे सुन-सन्नाटा रहल। हर्षवर्धनकेँ हिम्मत नै भऽ रहल छलै जे ओ ओकरासँ गप शुरू करितिऐ। सोझाँक भीतपर एकटा पुरान घड़ी छल जे चाभी भरलासँ चलैत होएत। मुदा लागैत छल जे कतेक कालसँ कियो ओकरामे चाभी भरनहिये नै अछि। ओ ठाढ़ छल। घरमे एकटा कलेंडर टांगल छल, जइमे माथपर मुरेठा बान्हल बाल गंगाधर तिलकक चित्र छपल छल। हर्षवर्धन देखलक जे ओ कलेंडर सन 1964 क अछि। -हम जानैत छी जे (एकटा बड़ पैघ कतेक दूरसँ जा कऽ घुरैत साँस).... मोहनदासे असली मोहनदास अछि। न्यायिक दंडाधिकारीक अवाज जना कोनो गहींर इनार वा तरहरिमे सँ आबि रहल छल। बड़ रकम, मद्धिम अवाज। ओ चाहक एकटा बड़का चुस्की भरलक। ओ घोंट आ स्वाद जेना ओकर माथक तनावकेँ कनी कम कऽ देलक। "...आ ओ दोसर लोक फ्रॉड अछि। ओ सरासर इमपर्सोनेट कऽ रहल अछि। हमरा बुझल यऽ ओ विसनाथ वल्द नगेंद्रनाथ, जूनियर डिपो ऑफिसर छी जे ए बटा एगारह, लेनिन नगरमे अवैध ढंगसँ मोहनदासक आइडेंटिटी, चोरा कऽ रहि रहल अछि। ही इज अ चीट, अ क्रिमिनल। अ स्काउंड्रल!' हुनकर बाजब बड़ पातर मुदा कोनो धातु जेहन धग्गड़ आ दृढ़ छल। ओ अप्पन जेबीसँ बीड़ीक बंडल निकालन्हि आ ओइमेसँ एकटा बीड़ी निकालि कऽ पहिने ओइमे उल्टा फूक मारलक, फेर सलाइक काठीसँ ओकरा पजारि कऽ एकटा गहींर सन सुट्टा मारलक। हर्षवर्धनकेँ लागल जेना ओ अप्पन कालसँ बाहर, कोनो टाइम मशीनपर बैसल, कोनो दोसर कालमे पहुँचि गेल अछि। ओ बाजल, "हम यएह तँ बताबैक लेल अहाँ लग आएल रही। मुदा अहाँ कोना जानि लेलिऐ जे असली मोहनदास के छिऐ।' "एकरा जानब तऽ बड़ हल्लुक अछि। जौं अहाँ लग कनियो संवेदना आ विवेक हुअए”, मुक्तिबोध बाजल आ ओ चिंतित भऽ कऽ किछु सोचऽ लागल। ओ बीड़ीक एकटा खूब गहींर सोंट लेलक। "हम तीन रातिसँ लगातार जागि रहल छी। आइ कांट स्लीप फॉर अ मोमेंट! ...इट इज अबसर्ड एंड अ वेरी टेंस एक्सपीरिएंस।’ हुनक आंगुरक बीचमे फँसल बीड़ी मिझाइबला छल। हुनकर आँखि जेना कत्तौ आर नै, अपनाकेँ देखऽ लागल छल। "दि होल सिस्टम हैज टोटली कोलैप्सड...! जस्ट लाइक ट्विन टॉवर्स इन न्यूयार्क...नाइन इलेवन!...नाउ व्हाट इज लेफ्ट फॉर दि सबजेक्ट्स एंड पुअर इज अनार्की एंड कैटॅस्ट्राफ!! (सभटा व्यवस्था ढहि गेल अछि, न्यूयार्कक जोड़ा मीनार सन...सितम्बर एगारह!...आब प्रजा आ गरीबक आगू अराजकता आ विनाश टा बचल छै।) हमरा लगैत अछि, पूँजी आ सत्ता...कैपिटल एंड पावरकेँ एकटा एकदम्मे नव रूपमे आगू अछि। मोहनदास इज बिइंग डिनाइड ऑफ अ सिंपल इसेंशियल लीगल जस्टिस, किए तँ ओ न्यायकेँ कीनि नै सकत! ओह!” गजानन माधव मुक्तिबोधक माथक नस फूलि रहल छल। ओकर आंगुर थरथरा रहल छल। ओ बेचैन भऽ कऽ ठाढ़ भऽ गेल छल। ओ मिझाएल बीड़ीकेँ देखलक आ जेबीसँ सलाइ निकालि कऽ ओकरा फेर सुनगाबै लागल। "सभटा सिद्धांत खत्म भऽ सकैत छै।...कहियो बड़ परिवर्तनकारी लागैबला बौद्धिक आ दार्शनिक संरचना बदलैत कालमे खाली वाग्जाल, अनर्गल बकवास आ ठकक प्रवचनमे बदलि सकैत छै। इतिहासमे एहन बेर-बेर भेल छै। मुदा...' ओ बीड़ीक एकटा गहीर सोंट भीतर खींच कऽ साँस कनी काल लेल रोकि लेलक। लगैत छल जे ओ अप्पन चढ़ैत बेचैन साँसकेँ निकोटीनक धुआँसँ शांत करबाक कोशिश करैत छल। ओकरा खोंखी भऽ गेलै। बामा हाथसँ ओ अप्पन छातीकेँ किछु काल धरि दबा कऽ राखलक, फेर खरखर अवाजमे बाजल, "मुदा मनुखक भीतर एकटा चीज एहन अछि जे कहियो कोनो जुगमे कोनो तरहेँ सत्तासँ मेटाएल नै जा सकैत अछि!...आ ओ अछि न्यायक आकांक्षा! डिजायर फॉर जस्टिस इज इनडिस्ट्रक्टबल...! इट इज आल्वेज इम्मोर्टल...! न्यायिक आकांक्षा कालातीत अछि!' ओ अप्पन मध्यमा आ तर्जनीक बीच फसल बीड़ीकेँ खिड़कीसँ बाहर फेकि देलक। ओ मिझा गेल छल। हर्षवर्धन सोनी मंत्रविद्ध छल। ई केहन लोक अछि। एहन लोककेँ न्यायिक दंडाधिकारीक तरहेँ आइक कालमे देखब कोनो असंभव स्वप्न छल। एकटा दुर्लभ फैंटेसी। ओ बेचैनीक संग कोठलीमे टहलि रहल छल। एकाएक ओ ठाढ़ भऽ गेल आ ओकर आँखिमे एकटा गहींर आत्मीय हँसी कोनो तरल द्रव्य सन झिलमिल करै लागल। "अहां जाउ, हर्षवर्धन!...डोंट वरी मच! हमरा पता अछि जे अहूँ पछिला कतेक रातिसँ सुतल नै छी। हमरे सन'! ओ बड़ जोरसँ एकटा ठहक्का लगेलक आ बाजल, "पार्टनर, बेफिकिर भऽ कऽ सुतू। स्लीप लाइक अ डेड हॉर्स। नाउ, आइ हैव गॉट विद समथिंग'। एकर बाद ओ हर्षवर्धन लग आएल। ओकर कान्हपर ओ हाथ राखलक। हर्षवर्धनकेँ लागल ओकर हाथमे कोनो भार नै छै। कागज, फूल, स्वप्न आ भाषासँ बनल हाथ। गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणी रकमसँ हर्षवर्धनक कान लग फुसफुस कऽ बाजल, "हमरा लग एकटा पावर अछि। बस एकटा पावर। दैट इज... सीक्रेट जूडीशियल इंक्वायरी। हम अपना सँ ई जाँच करब। गोपनीय न्यायिक जांच। जस्ट लीव इट टु मी'। हर्षवर्धन सोनी जखन मुक्तिबोधक फ्लैटसँ बाहर आएल तँ ओकरा लगलै जे ओ कोनो बड़ पैघ स्वप्नक बीहड़िसँ बाहर निकलि कऽ अप्पन काल आ यथार्थमे घुरि रहल रहए। ओतए जतए मोहनदास अछि, बिसनाथ अछि, ओ सेहो अछि आ आइक यथार्थ अछि। चारि दिन बादे विश्वनाथ आ ओकर बाप नागेंद्रनाथकेँ जी.एम. मुक्तिबोध न्यायिक दंडाधिकारी (प्रथम श्रेणी) क आदेशपर जालसाजी, धोखाधड़ी, फरेब, चोरी आ गबनक जुर्ममे इंडियन पीनल कोडक धारा 419/420/464/467/ आ 403 क तहत गिरफ्तार कऽ जेल पठा देल गेलै। अदालत ओरियंटल कोल माइंसक जनरल मैनेजर एस.के. सिंह केँ आदेश देलक जे ओ मोहनदास विश्वकर्मा उर्फ विश्वनाथ, जूनियर डिपो ऑफिसरक विरुद्ध तुरंते कार्रवाइ कऽ कार्रवाइक सूचना दू हफ्ताक भीतर अदालतमे पेश करए। एकर अलाबे ऐ पूरा प्रकरणमे प्रत्यक्ष आ परोक्ष रूपसँ सम्मिलित आ लिप्त अधिकारी आ कर्मचारीक विरूद्ध उपयुक्त विभागीय जाँच आ कार्रवाई शुरू कएल जाए। जौं ओरियंटल कोल माइंस ऐ सभक विरूद्ध न्यायिक आपराधिक प्रक्रियाक अंतर्गत अपराध काएम करए चाहैत अछि तँ ई न्यायालय एकर अनुशंसा करैत अछि। हरबिर्रो मचि गेल। अखबारमे नकली मोहनदासक गिरफ्तारीक खबर प्रमुखतासँ छपल। ओरियंटल कोल माइंसे टा नै मुद कतेक खदान आ सार्वजिनक उपक्रम अधिकारी, यूनियन नेता आ कर्मचारीक होश उड़ि गेलै। चारू दिस भागा-दौरी छल। लेनिन नगर, गाँधीनगर, अंबेडकर नगर, जवाहर नगर, शास्त्री, नेहरू आ तिलक नगर जेहेन सुव्यवस्थित कॉलोनीमे हजारो बिसनाथ जेहन लोक छल जे कोनो दोसर पहचान, अधिकार, योग्यता आ क्षमताकेँ चोरा कऽ कतेक बरखसँ बैसल छल आ कएक हजारमे दरमाहा लऽ रहल छल। बादमे मालूम भेल जे गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंडाधिकारी (प्रथम श्रेणी), अनूपपुर, (म.प्र.) अप्पन आपातकालीन सुरक्षित न्यायिक अधिकारक इस्तेमाल कऽ अपनेसँ ऐ मामिलाक गोपनीय जाँच कएले छल। ओइ राति बड़ी काल धरि ओ पढ़ैत रहल। भोरमे ओ नौ बजे ड्राइवरकेँ फोन कऽ अप्पन सरकारी गाड़ी मंगौलक, जकर इस्तेमाल ओ अदालतेटा जएबा आ ओतएसँ घुरबा लेल करैत छल। दोसर फोन ओ एच.एस. परसाई (हरिशंकर परसाई) केँ कएलक, जे पब्लिक प्रॉसिक्यूटर छल। तेसर फोन ओ एस.बी. सिंह (शमशेर बहादुर सिंह) केँ कएलक, जे अनूपपुरक एस.एस.पी छल। ई सभटा अधिकारी अप्पन-अप्पन कर्तव्यनिष्ठा आ ईमानदारीक लेल जानल जाइत छल। चारिम फोन ओ हर्षवर्धन सोनीकेँ कएलक आ ओकरासँ एतबेटा बाजल- "पार्टनर, स्टैंप पेपर लऽ कऽ तुरत आबि जाउ'! शमशेर बहादुर सिंह बतौलक जे न्यायिक दंडाधिकारीक गाड़ी सीधा लेनिन नगरमे मटियानी चौक लग, ए/11 नंबरक फ्लैटपर रूकल। बिसनाथ ओइ काल विजय तिवारीक संग कोनो नेताक सरोकारमे बाहर गेल छल। फ्लैटमे ओकर कनियाँ कस्तूरी माने रेनुका देवी टा छल, जे चिटफंड, सोशल सर्विस, किटी पार्टी आ फाइनेंसक धंधा करैत छल। न्यायिक दंडाधिकारी ओकरासँ सोझे ओकर बल्दियत आ ओकर नैहरक पता पुछलक। कस्तूरी मैडम माने रेनुका देवी सरकारी बत्तीनला गाड़ी आ एत्ते लोककेँ देखि कऽ घबड़ा गेल छल। एकर बाद न्यायिक दंडाधिकारीक गाड़ी लेनिन नगरसँ निकलि कऽ मिर्जापुर-बनारस जाए बला सड़कपर दौगय लागल। ठीक पैंसठि किलोमीटर बाद ई गाड़ी आवाजपुर गाम दिस जाएबला कच्ची सड़कपर उतरि गेल आ आध घंटा बाद लंकापुर नामक गाममे एकटा भव्य पक्काक मकानक आगू ठाढ़ भऽ गल। न्यायिक दंडाधिकारी ओतए ओइ मकानमे रहैबला लालू प्रसाद पांडे आ ओकर कनियाँ जय ललिता पांडेसँ दूटा सवाल केलक। पहिल ओकर आ ओकर बेटा-बेटीक की नाम छै। आ दोसर ओकर जमाय सबहक नाम आ पता। एकर बाद ओ पब्लिक प्रासिक्यूटर एच.एस.परसाईकेँ निर्देश देलक जे ओ हर्षवर्धन सोनीसँ स्टैंप पेपर लऽ कऽ ओकर हलफनामा तैयार कऽ लिअए। न्यायिक दंडाधिकारीक गाड़ी एकर बाद ग्राम पंचायतक सरपंचक घरपर रूकल, जतए सरपंच आ किछु गवाहक बयान दर्ज कएल गेल। एस.एस.पी. शमशेर बहादुर सिंह जोरसँ ठहक्का लगा कऽ बाजल, "जालसाज तँ एत्ते धरि सोचलो नै छल आ सभक सभ फँसि गेल। हम तँ लंकापुरसँ अनूपपुर थानाक एस.एच.ओ. केँ फोन कऽ देने रही जे बिछिया टोला आ लेनिन नगर जा कऽ नगेन्द्रनाथ आ बिसनाथकेँ थाना लेने आबू, नै तँ फरार भऽ गेल तँ मोसीबत भऽ जाएत। एकर बादक विवरण बड़ संक्षिप्त अछि। हर्षवर्धन सोनी आ मोहनदास दुनू ऐ जीतसँ बड़ खुश भेल। कस्तूरी सौंसे पुरबनरामे नचैत रहल। आन्हर पुतलीबाइ गठुल्लामे लजबिज्जीक बीच नुका कऽ राखल एकटा पोटरी फेर खोजि कऽ निकाललक, जइमे बिसुनभोग चाउर छल। मोहनदासक घरक सभटा कोन बिसुनभोग, खेसारी आ बकरीक दूधसँ बनैबला खीरक गमकसँ गमकि गेल। अलोपी मैनाक खोतामे अंडाक खोलकेँ अप्पन छोट-छोट लोलसँ भीतरसँ फोड़ि कऽ दूटा सुन्नर बच्चा बाहर निकलि आएल छल आ ओकर अबोध चिचियेनाइ कोठरी आ ओसारमे एकटा नव संगीत भरि देलक। पुतलीबाइक गठियाक दर्द कम भऽ गेल आ पहिलुक बेर ओ आंगन आ परछीमे अपनेसँ बाढ़नि लगेलक। ओ मगन भऽ कऽ चलल जा रहल छल मुदा ओइ गीतमे कोनो प्रसन्न चिड़ैक कंठक संग एकटा कोनो उदास-सन स्वर सेहो छल: "अहाँ बिन जग लागे सुन्न... जग लागे सुन्न... नै भावै हमरा सोना-चानी महल अटारी...' हर्षवर्धन सोनी मोहनदाससँ कहलक जे आब अगला केस ओरियंटल कोल माइंसमे तोरा तोहर नोकरी घुरा कऽ दियाबैक लेल दाखिल होएत। अदालत बिसनाथक सर्विस बुकसँ अहाँक सभटा सर्टिफिकेट, मार्कशीट आ टेस्टिमोनियल जब्त कऽ लेने अछि। ओ अहाँकेँ दऽ देल जाएत। मोहनदास हर्षवर्धनसँ लिपटि गेल। ओकर कमजोर-गरीब शरीर थरथरा रहल छलै। ओकर गर भारी छल आ आँखिसँ कृतज्ञता आ आह्लादक नोर लगातार बहि रहल छलै। जना अषाढ़- साओनक तोर लागल हुअए। बीरन बैगाक घरमे फेर रास रंग भेल। सितिया तोरीक तेल, रसून-प्याज आ गरम मस्सलामे रसदार सुअरक मौस रान्हलक। तीन मटकी महुक शराब उतारलक। ढोलक, मंजीराक संग ऐ बेर राम करन हारमोनिया सेहो लऽ कऽ आएल छल। गोपालदास, बीरन, बिहारी, परमोदी, मोहनदास सभ कियो पीलक। सितिया, रमोली, कस्तूरी, सावित्री सेहो ठर्रा पीब कऽ भेर भऽ गेल। ओ नाचि रहल छल आ गाबि रहल छल। मोहनदासकेँ पता नै कतए-कतएसँ एकक बाद एक गीत मोना पड़ि रहल छलै। सभ मस्त भऽ गेल छल। कस्तूरीकेँ आइ दारू किछु बेसी चढ़ि गेल छलै। ओ बेर-बेर मोहनदासक हाथ पकड़ि कऽ खींचऽ लागल। "हु तू तू ...तु...तु! हमरा संग कबड्डी खेलब? हु तू तू तू तु तु...!' ओ मोहनदासक देहमे गुदगुदी लगाबऽ लागल। " जो भाग ऐ ठामसँ! जो दरोगा तिवारीक महिसवारीकेँ सम्हार...!' मोहनदास ओकरासँ चुहुल कऽ रहल छल। सभ हँसैत-हँसैत लोटपोट भऽ रहल छल। जखन सावित्री एकाएक गरजि कऽ बाजल, "दौगऽ हौ...दौगऽ! तिवारी दरोगा धरियामे हगि रहल अछि!!' तँ हँसी आ ठहक्का एक्के बैग बम जना फूटल, जकर धमक्कासँ आध रातिमे पूरा पुरबनरा डोलि उठल। मोहनदास आ बीरन बैगा उठि कऽ आंगनक बीचोबीच ठाढ़ भऽ गेल छल। जना ओतए कोनो अदालत चलि रहल हुअए। दुनू डायलॉग मारि रहल छल। मोहनदास: ए...हे! अहाँ के छी? अहाँक नाम की? चलु कोरटक नाम बताउ! बीरन बैगा: हमर नाम छी बीरन बैगा। आ हमर बापक नाम अछि डिंडवा बइगा! डिंडवा बइगा!! मोहनदास: ए हे! आ हम के छी? हमर की नाम? बीरन बैगा: (आगू बढ़ि कऽ ओकर छातीपर आंगुर गड़ाबैत) हे साँढ़ भुक्खड़! तोहर नाम छियौ मोहनदास! मोहनदास!! (गरजि कऽ) मोहनदास कबीरपंथी बंसोर!!! मोहनदास: आ हमर बापक नाम की छी? बीरन बैगा: तोहर बाप तँ मरि गेलौ! तोहर बापक नाम रहौ काबा दास! मोहनदास: ए हे! हम मोहनदास एम्हर आ हमर बाप काबा दास ओम्हर ऊपर, सरगमे...तँ सार ओ ओम्हर अनूपपुरक जेलखानामे के बैसल अछि? बीरन दास: (कूदि कऽ हाथ नजाबैत गरजैत अछि)...ओ देहजरा बिसनाथ! चारि सौ बीस...! ओकर बाप डबल चारि सौ बीस! ओकर मौगी चारि सौ बीस...! कोइला खदानबला लेनिन नगरक अफसर नेता सभ कियो चारि सौ बीस! (परमोदी, सितिया, बिहारी, रामकरन, रमोली, सवित्री, गोपाल दास सभक मिलल ठहाकाक संग ढोलक, मंजीरा, हारमोनियमक संगीत) ऐ पूरा कथाक उदास, हताश धूसर रंगक बीचमे चटख प्रसन्न रंगक ई छिट्टा अहाँकेँ कोनो क्षेपक सन लागि रहल होएत। कि नै? अहाँक सोच एकदम्मे सत अछि। गरीब आ अन्यायक शिकार लोकक जिनगीक खरखर यथार्थमे एहन सुन्नर रंग कहियो-काल खाली एहने किछु पल लेल अबैत अछि। सत्ता आ पूंजीसँ जुड़ल तागति एकाएक कोनो बाज सन झपट्टा मारि कऽ अलोपी मैनाक खोताकेँ उजाड़ि दैत अछि आ बाहर लखाह दैत छै चिड़ैक छोट-छोट गेल्हक पंख आ खूनक किछु दाग। ई दाग कोनो पार्टीक सरकारक मानव संसाधन मंत्रालयसँ लिखाएल इतिहासक पाठ¬पुस्तकमे कहियो नै लखाह दैत अछि। किएकि इतिहासकारक पेशे अछि जे अपना कालक सत्ताक आँचरक दागकेँ नुकाएब। ओ मास कतेक रास अजगुत घटनासँ भरल छल। भारतक राजधानी दिल्लीसँ एक हजार पचास किलोमीटर दूर जे किछु भऽ रहल छल, ओकर सूचना आ खबरि ऐ खिस्साक अलाबे अहाँकेँ आर कत्तौसँ नै भेटत। अनूपपुरमे मोहनदासक जीवन जइ हलातसँ गुजरि रहल छलै, ओकर संक्षिप्त विवरण ई अछि: गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणीक बदली एकाएक राजनांदगांव भऽ गेल आ ओ अनूपपुर छोड़ि कऽ चलि गेल। बिसनाथक वकील रास बिहारी राय, जे सत्ताधारी पार्टीक पैघ नामवर- मातबर नेता छल आ जकर पुतोहू नगर निगमक अध्यक्ष छल ओ एक्के पेशीमे बिसनाथ आ ओकर बाप नगेंद्रनाथक जमानत करा देलक। रास बिहारी राय एखुनका राजनीतिक माँजल खिलाड़ी छल। विश्वनाथ माने मोहनदासकेँ जेलसँ रिहा करैत, पुलिससँ गठजोड़ कऽ ओ ई चलाकी केलक जे पुलिस रिकार्डमे मोहनदासे नाम दर्ज रहए देलक। किएकि जाधरि अदालत अंतिम फैसला नै सुनैबितिऐ ताधरि मोहनदास माने विश्वनाथ अपराधी नै कानूनी रूपमे खाली संदिग्ध भरि छल। माने पुलिसक दस्तावेज आ आधिकारिक कागजमे अनूपपुर जेलसँ जे दूटा कैदी जमानतपर रिहा कएल गेल छल ओ अप्पन पुरान नाम मोहनदास माने विश्वनाथ आ काबादास माने नगेंद्रनाथक नामसँ जेलसँ बाहर छल। ओइ दुनू टाक रिहाइबला दस्तावेजपर बादबला नाम एहन तरहे लेभरा कऽ लिखल गेल छल जे पढ़बामे नै अबै छल। ओम्हर एकाएक एक दिन खबर भेटल जे राजनांदगांवमे न्यायिक दंडाधिकारी जी.एम. मुक्तिबोधकेँ ब्रेन हेमरेज भेल अछि आ हुनका अचेतावस्थामे बिलासपुरक अपोलो अस्पतालमे भरती कएल गेल अछि। अपोलोमे कांग्रेस पार्टीक महामंत्री श्रीकांत वर्मा आ मुक्तिबोधक अभिन्न मित्र नेमिचंद जैन हुनका लग छल। मुदा 72 घंटा धरि जीवन-मृत्युक बीच चलल कठिन संग्रामक बाद गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणी अप्पन अंतिम साँस लेलक। ...ऐ अंतिम साँसमे ओ "हे राम!' कहलक। ओकर मृत्युक सूचना भेटलापर हर्षवर्धन सोनीक संग कूही भऽ कानैबला पुरबनरा गामक मोहनदास कबीरपंथी बंसोर सेहो छल। ओकर जिनगीक आशाक असगर इजोत मिझा गेल। अखुनका हाल ई अछि जे बिसनाथ अप्पन कनिया रेनुका संग मिलि कऽ कोलियरीक दलालीमे बड़ पाइ कमा लेने अछि। विजय तिवारीक संग ओकर बैसकी अखनो चलैत अछि। ओ अखन सोझाँ भऽ राजनीतिमे आबि गेल अछि आ जिला जनपदक अध्यक्ष पदक चुनाव लड़ि रहल अछि। ओकर जाति-बिरादरीक लोक तँ ओहिनो ऊँच जगहपर अछि। ओ सभ तरहेँ ओकर मदति करैत अछि। ओ कहैत अछि, "असली मोहनदास के अछि आ नकली के, एकर फैसला तँ हम करब। ओ सार दू कौड़ीक कल्लर बंसोर हमर इज्जतिपर बट्टा लगौलक, लागल-लगाएल नोकरी छिनलक, आब हम अपन तागति ओकरा देखा देबै। अखन पछिला हफ्ता जखन हम अप्पन गाम गेल रही तँ हर्षवर्धनक चेहरा उड़ल छलै ओकर आँखि लाल छलै। ओ बाजल, "पछिला तीन रातिसँ हम सुतल नै छी। बुझबामे नै अबैत अछि जे की करी। बिसनाथकेँ लऽ कऽ पुरबनराक लोग सत कहैत अछि। गज भरिक बिसधारी। असल करैत'। ओ बड़का साँस भरलक आ बाजल, "लेनिन नगरक इलाकामे बिसनाथ सभ दोसर-तेसर दिन कोनो-नै-कोनो क्रिमिनल अपराध करैत अछि। कखनो केकरो चेन खींच लैत अछि, कखनो ककरो संग मारिपीट करैत अछि। ओकर कनियाँ फाइनेंस आ चिटफंडक जइ धंधामे अछि, ओकर वसूलीमे ओ कर्जदारसँ मारिपीट करैत अछि आ घरमे पैसि कऽ समान उठा लैत अछि।...आब थानामे जे एफ.आइ.आर. दर्ज होइत अछि ओ तँ मोहनदासक नामसँ दर्ज होइत अछि किएकि ओतए बेसी लोक बिसनाथकेँ अखन धरि मोहनदासक नामसँ जनैत छल। आ ओम्हर पुलिस पुरबनरा जा कऽ ऐ बेचारा असली मोहनदासकेँ पकड़ि लैत अछि। हर्षवर्धनक आँखिमे असहायताक नोर छल। बिसनाथ पुलिस इंस्पेक्टर विजय तिवारीसँ भेंट कऽ थानाक सिपाहीकेँ खुआ-पिआ कऽ राखने अछि। ओ मोहनदासकेँ पीट-पीट कऽ ओकर हाथ-पएर तोड़ि देने छल। ओ चलि-फिरि नै सकै छल। ओकर माइ पुतलीबाइ सेहो चारि दिन पहिने इनारमे खसि कऽ मरि गेल छल। कस्तूरी हाड़-तोर मजूरी कऽ कोनो तरहेँ चूल्हाक आगि जरौने रखने छल। हमर आँखि ऊपर उठल। आगुएसँ मोहनदास नंगड़ाइत बुलल आबि रहल छल। ओकर देहपर पुरनका बेरंग, चिप्पी लागल पेंट आ चेथड़ी भेल चौखुट्टा अंगा नै, एकटा धरियाटा बचल छल। ओकर माथक केस खसि गेल छल आ आँखिमे गोल फ्रेमक सस्ता सन चश्मा लागल छल। ओ रकम-रकम डगमग करैत लाठीक संग कोनो बेमार बूढ जना बुलि रहल छल। "कका, राम राम'! ओ हमरा देखि कऽ हाथ जोड़लक। ओकर चेहरापर पीड़ा आ हारबाक गहींर डड़ीर आबि गेलै। हम देखलहुँ ओ बड़ बूढ लागि रहल छल। अस्सी-पचासी सालक आसपास। लाठी टेक कऽ ओ ओतए धरतीपर बैस गेल। ओकर गरसँ कुहरैक संग भारी अवाज निकलल, मुदा ओ अवाज जेहन भाषामे छल ओ छल राजभाषा हिन्दी। ओ बाजल: "हम अहाँ सभक हाथ जोडै़त छी। हमरा कोनो तरहेँ बचा लिअ। हम कोनो अदालतमे चलि कऽ हलफनामा दै लेल तैयार छी जे हम मोहनदास नै छी। हमर बाप काबा दास नै अछि आ ओ मरल नै अछि, अखनो जिबैत अछि। बड़ मारने अछि हमरा पुलिस, बिसनाथक कहलापर। सभटा हड्डी तोड़ि देने अछि। सांसो टा लेबामे छाती दुखाइत अछि।' हम देख रहल रही, मोहनदासक ठोढ़ कटल छल आ मुँह पोपटा गेल रहै। शाइद थानामे ओकर दाँत तोड़ि देल गेल छल। ओकर अवाज टूटि कऽ छितरा रहल रहै: "जकरा बनबाक छै बनि जाए मोहनदास। हम नै छी मोहनदास। हम कहियो कत्तौसँ बी.ए. नै केलहुँ। कहियो टॉप नै केलहुँ। हम कहियो कोनो नोकरीक काबिल नै रही। खाली हमरा चैनसँ जिबैत रहल देल जाए। आब हिंसा नै करू। जे लुटबाक अछि लुटि लिअ। अप्पन-अप्पन घर भरू। मुदा हमरा तँ अप्पन मेहनतिपर जियए दिअ। काका, अहाँ सभ हमर संग दिअ'। पता चलल मोहनदासक बारह बरखक बेटा देवदास दस दिनसँ घर नै घुरल अछि। कियो कहैत अछि जे बिसनाथ ओकरा गाएब करा देलक, कियो कहैत अछि जे ओ डरे मुंबई भागि गेल छै... ...आ कियो-कियो ईहो कहैत अछि जे ओकरा परसू बस्तरक जंगलमे देखल गेल अछि। (ई ओइ कालक गप अछि, जखन भरूच लगक एकटा ऊँच डिम्हापर राघव नामक एकटा तीस बरखक धनुहार ठाढ़ भेल छल। ओ राति भरि जागि कऽ बाँस चीर-चीर कऽ कतेक रास तीर बनेने छल। ओ धनुषक प्रत्यंचा चढ़ा कऽ आकाश दिस तीर चलबैत छल, फेर दौगि कऽ डिम्हाक नीचाँ खसल तीरकेँ बिछि कऽ आनैत छल। दोबारा, तिबारा...पता नै कते बेर ओ ऐ तरहे तीर अकाश दिस चलबैत रहल आ धरतीपर ओकरा बिछैत छल। मुदा कतेक रास तीर आब पानिमे डूमए लागल छल। ओकरा ताकब आ बीछब मुश्किल भेल जा रहल छल। किएकि पहाड़क बीच, दूर-दूर धरि पसरल मैदानमे पानि भरल जा रहल छल, गाछ डूमि रहल छल। दिशा आ स्मृति सभ किछु डूमि रहल छल। ...तीस बरखक राघव मुदा ओइ डिम्हाक ऊपरसँ अकाश दिस ताधरि तीर चलबैत रहल आ दौग-दौग कऽ ओकरा बिछैत रहल, जाधरि ओ सेहो डूमि नै गेल... राघव आब कत्तऽ अछि? जतए ओ छल, ओतए आब पानिये-पानि रहए। अजग अथाह जल।...ओतए बिजली पैदा होएत।...भरूचमे हिलसा माछ होइल छल। भारतक धारक सभसँ महान आ संसारक विलक्षण माँछ। हिलसा बहैत पानि टामे, धारक तेज धारे टामे जिबैत रहि सकैत अछि। ...हिलसा आब ठाढ़ बान्हक बेमार आ प्रदूषित पानिमे मरि गेल होएत। ...ई ओइ कालक गप अछि, जखन हम ई खिस्सा अहाँक लेल जइ भाषामे लिख रहल छी, ओइ भाषाक भीतर हम बगदादक अबु गरीब जेलमे इराकीक तरहे छी! वा 1943 क जर्मनीक कोनो गैस चेंबरमे यहूदी सन! वा कोनो बीमार प्रदूषित ठाढ़ पानिमे डूमल हिलसा माँछ जेहन!...वा अखनो संग्रामरत राघव धनुहार जेहेन! ...ई वएह काल अछि, जइमे मोहनदास अछि, अहाँ छिऐ, हम छी आ बिसनाथ अछि। आ आइक यथार्थ अछि। ...ओइ काल, जकरा एकैसम शताब्दीक पहिल दशकक रूपमे सभ कियो जनैत अछि आ जखन हम सभ हिन्दीक कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंदक सवा सएम जयंती सत्ताधारीकेँ मनाबैत देखि रहल छी... मुदा सत बताउ, मोहनदासक गाम पुरबनराक नाम की अहाँकेँ पोरबंदरक मोन नै पाड़ैत अछि?...) “रेहनपर रग्घू”- श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद श्री विनीत उत्पल) ***** कोलकातामे तेजस्वी पत्रकार बांग्ला-हिन्दी सेतु अपन छोट भाइ कृपाशंकर चौबे लेल ***** जँ “काशीक अस्सी” हमर नग्र छल तँ “रेहनपर रग्घू हमर घर अछि” आ किंशाइत अहाँक सेहो। -काशीनाथ ****** रेहनपर रग्घू (२०११ मे साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित पोथी) ई उपन्यास मैथिलीमे पहिल बेर विदेह ई-पत्रिका www.videha.co.in मे धारावाहिक रूपमे ई-प्रकाशित भेल छल। ** जनवरीक ओ साँझ कहियो नै बिसरब। साँझ तँ मौसम कऽ देने छल मुदा रहए दुपहरिया। कनी काल पहिने रौदे छल। ओ खेनाइ खेने छल आ खा कऽ अखन अप्पन कोठलीमे पटायले छल आकि एकबैग बिर्रो ऐल। घरक सभटा खुजल खिड़की-दरबज्जा धाँइ-धाँइ करैत अपनेसँ बन्द हुअए लागल आ खुजए लागल। किल्ली उड़ि कऽ कतौ खसल आ भट-भट की-की केना-केना खसऽ लागल, लागल जेना धरती थरथरा रहल अछि आ भीत हीलि रहल अछि। अकास कारी खटखट भऽ गेल छल आ चारू दिस अन्हार गुज्ज छल। ओ उठि कऽ बैसि रहल। अंगना आ दरबज्जा बड़का-बड़का ओला आ बरफक पाथरसँ छरा गेल, दलानक रेलिंग टूटि कऽ दू लग्गा दूर जा कऽ धड़ामसँ खसल। एकर बाद जे निराउ बर्खा बरिखब शुरू भेल तँ ओ पाइनक बुन्नी नै छल, लागए जेना पाइनक बड़हा छल, जकरा पकड़ि कऽ कियो चाहए तँ ओतऽ धरि चलि जाए जतऽ सँ ओ छोड़ल आकि खसाएल जा रहल छल। मेघ लगातार गरजि रहल छल, दूर नै, लगेमे माथक ऊपर जेना बिजलौका लौकि रहल छल, दूर नै, खिड़कीसँ भीतर आँखिमे।एकहत्तरि बर्खक बूढ़ रघुनाथ अवाक! ई एकाएक की भऽ गेल? की भऽ रहल छै? ओ मुँहपरसँ बनरटोपी हटेलक, देहपर पड़ल सीरक हटेलक आ खिड़की लग ठाढ़ भऽ गेल। खिड़कीक दुनू पल्ला अड़काक टेकसँ खुजल छल आ बाहर दिस देखि रहल छल। घरक आगुए कदम्बक बड़का गाछ छल मुदा ओकर पता नै चलि रहल छल, अन्हारक कारण, आ बर्खाक कारण जे धऽ कऽ तोपने छल, पथियाक पथिया उझील रहल छल। छातक डाउन-पाइपसँ पाइनक धार खसि रहल छल आ ओकर हहारो अलगेसँ सुना दऽ रहल छल। एहेन मौसम, एहेन पाइन आ एहेन हवा ओ कहिया देखने छल? दिमागपर जोर देलापर मोन पड़ल- साठि-बासठि बर्ख पहिने! ओ स्कूल जाए लागल छल, गामसँ दू माइल दूर। मौसम खराप देखि कऽ मास्टर समयसँ पहिने छुट्टी दऽ देने छल। ओ सभ नेना-भुटकाक संगे गाछी पहुँचले छल आकि आन्ही-बिर्रो-पाइन आबि गेल आ अन्हार पसरि गेल। सभ कियो आमक गाछक अढ़ लेबऽ चाहलक मुदा बिर्रो ओकरा सभकेँ जेना लऽ कऽ उड़ि गेलै आ गाछीसँ बाहर धानक बाधमे लऽ जा कऽ पटकलकै। ककरो झोराक आ किताब-पत्तरक कोनो पता नै छलै। पाइनक बुन्नी ओकर देहपर गोलीक छर्रा सन लागि रहल छलै आ ओ मारे चिचिया रहल छल। बिर्रो थम्हलाक बाद जखन पाइन-बुन्नी कनी कम भेल तँ गामक लोक लालटेन आ डिबिया लऽ कऽ बहार भेल छल ताकै लेल। ई एकटा अनहोनी छल आ अनहोनी जँ नै हुअए तँ जिनगी की? आ ईहो एकटा अनहोनीये छल जे बाहर एहेम मौसम छै आ ओ कोठलीमे अछि। कत्ते दिन भऽ गेल बर्खामे भिजना? कत्ते दिन भऽ गेल गरमी मासक दुपहरियाक बहैत लूमे घुमना? कत्ते दिन भऽ गेल जेठक गुमारमे झरकनाइ? कत्ते दिन भऽ गेल इजोरिया रातिमे बौएनाइ? कत्ते दिन भऽ गेल ठारमे ठिठुरि दाँत कटकटेनाइ? की ई अही लेल होइत अछि जे हम एकरासँ कोना बचि कऽ रही? बचि-बचि कऽ चली? आ अही लेल की एकरा भोगी, एकरा जीबी, एकरासँ दोस्तियारी करी, गप करी, माथपर बैसाबी? हम एकरासँ एना व्यवहार कऽ रहल छी जेना ई हमर शत्रु अछि। किए कऽ रहल छी एहेन? एम्हर कतेक दिनसँ रघुनाथकेँ लगैत छलन्हि जे ओ दिन दूर नै जखन ओ नै रहत आ ई धरती रहि जाएत। ओ चलि जाएत आ ऐ धरतीक वैभव, एकर ऐश्वर्य, एकर सौन्दर्य- ई मेघ, ई रौद, ई गाछ-बृच्छ, ई फसिल, ई धार, कछार, जंगल, पहाड़ आ ई सभ किछु एतऽ घुरि जाएत। ओ ई सभ किछु अप्पन आँखिमे बसा लैक चाहैत अछि जेना ओ जँ चलियो जाएत तँ ओकर आँखि अतै रहि जेतै। चमड़ीपर सभ चीजक थाप सोखि लै लऽ चाहैत अछि जेना चमड़ी केंचुल जकाँ एतऽ घुरि जाएत आ ओकर स्पर्श हुनका लग पहुँचैत रहत। हुनका लागैत छल जे बेसी दिन आब हुनका नै अछि जाइमे। भऽ सकैए जे ओ दिन काल्हि हुअए, जहिया हुनका लेल सुरुज नै उगै। उगत तँ अबस्से मुदा से दोसर लोक सभ देखत, ओ नै। की ई सम्भव नै अछि जे ओ सुरुजकेँ बान्हि कऽ अपना संग लेने जाए, ने ओ रहत, ने ओ उगत आ नहिये कियो आर ओकरा देखत! मुदा एकटा सुरुजे सौंसे धरती तँ नै, ओ कोन-कोनक बौस्तुकेँ बान्हत आ ककरा-ककरा देखबासँ रोकत? हुनकर हाथ एतेक नम्हर किए नै भऽ जाइ छन्हि जे ओइमे सभटा धरतीकेँ समेटि लिऐ आ मरै वा जिअए तँ सभक संग! मुदा एकटा मोन आर छल, रघुनाथक जे हुनका धिक्कारि रहल छल, काल्हि धरि कतऽ छल ई प्रेम? धरतीसँ प्रेमक ई आतुरताइ? ई अहलदिली? काल्हि सेहो ई धरती छल। यएह मेघ, अकास, तरेगण, सुरुज, चन्द्रमा छल। धार, निर्झर, सागर, जंगल, पहाड़ छल। यएह गली, मकान, चौबटिया छल। कतऽ छल ई अहलदिली? फुरसति छल हुनका ई सभ देखै कऽ? आइ जखन मृत्यु बिलाड़ि जकाँ आस्तेसँ कोठलीमे ढुकि रहल अछि तखन बाहरक जिनगीक अबाज सुनाइ दऽ रहल अछि? सत-सत बाजू रघुनाथ। अहाँकेँ जे भेटल अछि ओकरा लऽ कऽ कहियो सोचने रही? कहियो सोचने रही जे एकटा छोट सन गामसँ लऽ कऽ अमेरिका धरि पसरि जाएब? ओसारपर पिरहीपर बैसि कऽ रोटी-पियाजु-नून खाइबला अहाँ अशोक विहारमे बैसि कऽ लंच आ डिनर करब? मुदा रघुनाथ ई सभ नै सुनि रहल छल। ई अबाज बाहरक गड़गराहटि आ बर्खाक अबाजमे दबि गेल छल। ओ अप्पन सकमे नै छल। ओकर नजरि कोनमे राखल लाठी आ छत्तापर गेल। जाड़क ठंढ़ी ओहिने भयंकर छल आ ऊपरसँ ई ओला आ बर्खा। हिम्मत जवाब दऽ रहल छलै, तकर बादो ओ दरबज्जा खोललक। किल्ली खोलि कऽ ओ ठाढ़ भेल तँ दरबज्जा अपने खुजि गेल। सिहकैत बसात सनसना कऽ भीतर पैसि गेल आ ओ डरा कऽ पाछाँ हटि गेल। फेरसँ ओ साहस केलक आ बाहर जेबाक तैयारी शुरू कऽ देलक। पूरा बाँहिबला गरम गंजी पहिरलक, ओइपरसँ सूती अंगा, ओइपरसँ स्वीटर आ ऊपरसँ कोट। ऊनी पैंट ओ पहिनहिये पहीर लेने छल। यएह ओकर जाड़क मासमे भोरमे टहलबाक वस्त्र छल। मोफलर सेहो छलै मुदा ओइसँ बेसी जरूरी छलै गमछा। बर्खाकेँ देखैत जेना-जेना कपड़ा भिजैत जेतै ओ एकाएकी उतारैत जाएत आ फेकैत जाएत आ अन्तिममे रहि जेतै मात्र ई टा गमछा। ओ अप्पन पहिराबा-ओढ़ाबासँ आब सभ तरहेँ निश्चिन्त छल मुदा खाली माथकेँ लऽ कऽ ओ ततमतमे छल, कनटोप ठीक रहतै आकि माथमे गमछा बान्हि लए। ओला जतेक खसबाक रहै से खसि गेल छलै। आब ओकरा कोनो अन्दाज नै छलै। ओ गमछाकेँ गरदनिक चारू दिस लपेटि लेलक, खालिये माथ बहरा गेल। आब ने कियो रोकैबला छलै आ ने टोकैबला। ओ कहलक- “रौ मोन! घुरि कऽ आबि जेमेँ तँ वाह-वाह आ नै घुरि कऽ आबि सकमे तँ वाह-वाह।” बर्फ सन पाइनक अन्हार बीहरिमे उतरबासँ पहिने ओ ई नै सोचने छल जे भीजल कपड़ाक भार संग एक्को डेग बढ़ैब ओकरा लेल मोश्किल हेतै। ओ कोठलीसँ तँ बहरा गेल मुदा गेटसँ बाहर नै जा सकल। छत्ता खुजलासँ पहिने जे पहिलुक बुन्न ओकर बिन झाँपल केशहीन चानिपर पड़लै तँ ओ तुरत्ते बूझि नै सकल जे ई बिजलौका खसल छलै आकि लोहाक किल्ली खसल छलै जे माथमे भूर करैत भीतरे-भीतर तरबा धरि पहुँचि गेलै। ओकर सम्पूर्ण शरीर झनझना गेलै। ओ पानिक अछारसँ डरा कऽ बैसि गेल मुदा भिजबासँ नै बचि सकल। जाधरि छत्ता खुजितै ताधरि ओ पूरा भीजि गेल छल। आब ओ ओझरीमे पड़ि गेल छल, बर्फ सन बसात आ अछारक बीच। हबा टूटल दूभि सन हुनका उड़ा रहल छल आ अछार धरतीपर पटकि रहल छल। भीजल कपड़ाक भार हुनका उड़ऽ नै दै छल आ हबा हुनका घिसिया रहल छल। हुनका एतबेटा मोन छन्हि जे लोहाक गेटपर ओ कतेक बेर भहरा कऽ खसला आ ई बेर-बेर तखन धरि भेल जखन छत्ताक कमची टूटि गेल आ ओ उड़ैत गेटक बहार जा कऽ बिला गेल। आब ओकरा एना लगै छल जेना बसात ठामे-ठाम नोचि रहल होइक आ पाइन धीपल लोहसँ दागि रहल होइक। बेहोश भऽ कऽ खसबासँ पहिने ओकरा लग दिमागमे ज्ञानदत्त चौबे एलै। ओ दू बेर आत्महत्या करबाक विचार केने छल- पहिल बेर लोहता स्टेशनक रेलक पटरीपर गाम-घरसँ दूर निर्जनमे, जतऽ कियो आबै जाइ नै छल। तइ काल ओ सामान्य पैसेंजर वा मालगाड़ीकेँ नै, एक्सप्रेस वा मेलकेँ चुनने छल, किएक तँ जे हुअए से हुअए खट दऽ, एक्के निशाँसमे, जइसँ तकलीफ नै होइ। ओ पटरीपर सुतले छल आकि मेल अबैत देखा पड़लै। पता नै किए ओकरामे जीवनसँ मोह उत्पन्न भऽ गेलै आ ओ उठि कऽ भगबापर छल आकि ठेहुन लगक एकटा पएर खचाक। ई तँ मरैसँ बेसी खराप भेलै। बैशाखीक आश आ घरक लोकक गाइर आ धुत्कारी। एक बेर फेर आत्महत्या करबाक धुनि सवार भेलै ओकरापर। ऐबेर ओ चुनकक सिमानपरबला इनार। ओ अप्पन बैशाखी फेकि कऽ ओइमे फांगि गेल छपाकसँ आकि एकटा बरहा पकड़िमे आबि गेलै। तीन दिन बिन खेने पीने भूखल सोर पाड़ैत रहल ओ इनारमे आ निकलल तँ दोसर पएर तोड़बा कऽ। आइ वएह ज्ञानदत्त - बिन पएरक ज्ञानदत्त- चौबटियापर भीख मंगैत अछि। मरबाक ओकर इच्छा ओकरा कतौ कऽ नै छोड़लकै। मुदा ई हरमजदा ज्ञानदत्त ओकरा मोनमे एलै किए नै? ओ मरबाक लेल तँ नै निकलल छल? निकलल तँ छल ओ पाइनक ठोपक लेल, ओला सभक लेल, बसात लेल। ओ ऐ बातपर आबि गेल जे जीवनक अनुभवसँ पैघ अछि जीवन। जखन जीवने नै तँ अनुभव केकरा लेल। ** पहाड़पुरमे रघुनाथ एक्केटा छल। ओना कहैक लेल रामनाथ, शोभानाथ, छविनाथ, शामनाथ, प्रभुनाथ सेहो सभ छल मुदा ओ रघुनाथ नै छल। आ रघुनाथक ई भाग्य छल जे जतऽ कतौ ओ देखा पड़ै छल, गाम घरक लोक बिख-सबिख भऽ जाइ छल आ पैघ साँस लैत कहै छल- बाह! की भाग्य पेलक अछि ई बिरनल! रघुनाथ पहाड़पुर गाममे असगरे पढ़ल लिखल लोक छल। डिग्री कॉलेजक अध्यापक। दुब्बर-पातर नमगर-छरगर देहबला। शुरुहक दस बरख धरि साइकिलसँ अबैत जाइत छल, बादमे स्कूटरसँ। पछिला सीटपर पहिने बेटी बैसै छलै, बादमे बेटा बैसऽ लगलै। कहियो एकटा, कहियो दुनू। मोटा-मोटी पाँच-छह माइलक दूरी रहै। सभ सुखी आ सफल लोक सन रघुनाथ सेहो अपना जीबा लेल, आगाँ बढ़बा लेल आ अकास छूबा लेल किछु ईलम ताकि लेने छल। सत्य पूछू तँ ओ तकने नै छल, ओकरा प्रकृतिमे छलै। ओ खाली बूझि गेल छल आ ओकरा ओ नित्य व्यवहारक संग बनौने छल। ओ पातर आ नमगर छल आ तइसँ कने लीब कऽ चलै छल। कतौ अबैत-जाइत काल, केकरोसँ भेँट-घाँट करैत काल, बाजैत काल ओ कनी लीबल रहै छल। पहिल बेर ओ अप्पन बारेमे केकरो दोसरासँ गप्प करैत प्रिन्सिपल साहेबक मुँहसँ “विनम्रता” शब्द सुनलक। एहेन हुनकर प्रशंसामे कहल गेल छल। जइ लीबल रहैमे ओ लाजक अनुभव करै छल, ओकर वएह खूबी छल, ई नव बोध ओकरा भेलै। ऐमे ओ आगू जा कऽ दूटा खूबी आर जोड़ि देलक, मुस्कियेनाइ, आ सहमति देनाइ। कियो किछु कहितिऐ ओ मुस्कियाइत रहितिऐ आ समर्थनमे मूड़ी हिलाबैत रहितिऐ। ई तखने सम्भव छलै जखन अहाँ अपना दिससँ कम बाजी। ऐ तरहेँ रघुनाथ विनम्रता, कम बाजाभूकी आ मुस्की संगे जीवनक यात्राक प्रारम्भ केने छल। आ एकरा संयोगे कहियौ जे ओ कहियो असफल नै भेल। ऐ संयोगकेँ दोसर लोक सभ “भाग्य” कहैत छल। आ ऐपर रघुनाथ सेहो विश्वास कऽ लेने छल। भेल ई जे एक बेर ओ जखन कॉलेजसँ साइकिलसँ घर घुरि रहल छल तखन ओ देखलक जे ओकर साइकिलक चेन टूटि गेल छै। ओ साइकिलकेँ कॉलेजमे छोड़ि देलक आ बुलि कऽ आबऽ लागल। गर्मी मास, रौद खूब, हवा कतौ नै, देह घामसँ भीजल। बाटमे कतौ गाछो-पात नै। अकासमे मेघ छलै मुदा दुरस्तमे। हुनकर मोन बाजल- “ओह! ई मेघ जँ रहितए माथक ऊपर छत्ता सन।” आ देखू, एक फर्लांग एबे कएल रहए आकि मेघ सत्ते ओकर माथक ऊपर आबि गेलै। आ एतबेटा नै, ओ मेघ हुनका संगे छाह करैत गाम धरि आएल। अगिला दिन ई सिद्ध भऽ गेल जे ई मात्र भ्रम नै छल। ओ वर्गमे पढ़ेबा लेल जहिना बिदा भेल, तहिना ध्यान गेलै जे कलम नै छै। चाहे तँ ओ घरेमे छूटि गेलै आकि बाटमे खसि पड़लै। ओ एखन क्लासमे पहुँचलो नै छल आकि आगू हॉलमे ओकरा एकटा कलम खसल लखा देलकै, रौदमे चमकैत। एहेन गप आन लोकक संग सेहो होइत अछि मुदा नै जानि किए हुनका लगै छल जे दीनदयालु परमपिताक हुनकापर विशेष कृपा छन्हि। ओ हुनकर सभ सुविधा-असुविधाक ध्यान रखैत अछि। ऐसँ जे ओ चाहैत छथि ओ देर सबेर भऽ जाइत अछि।आ देखू जे ओ जखैन-जखैन चाहलक, जे जे चाहलक से भेल गेल। हुनका किछु करऽ नै पड़ल, अपने मोने भऽ गेल। पढ़ाइ खतम केलाक बाद ओ शोध कऽ रहल रहथि आ हुनकर मोन नै लागि रहल छलन्हि। आब कहिया धरि ओ करैत रहितिऐ शोध? कतौ नोकरी भेटि जेतिऐ तँ जान बचितिऐ। आ बेसी दिन नै बितलै आ हुनका नोकरी भेटि गेलन्हि। एकर श्रेय ओ हालेमे जन्मल अपन बेटीकेँ देलक। बेटी लक्ष्मी होइत अछि। वएह अप्पन संगे आ अपना लेल हुनकर नोकरी लऽ कऽ आएल छल। मुदा आब एकर बाद एकटा बेटा चाही। ई ओ नै, हुनकर हृदय बाजल। आ देखू, चारि बर्खक बाद बेटा सेहो आबि गेल। एकर बाद एकटा आर बेटा- बस! ऐ तरहेँ एकटा बेटी, दूटा बेटा, शीला आ रघुनाथ, सभ कियो मिला कऽ पाँच लोकक परिवार। छोट परिवार, सुखी परिवार। परिवार सुखी रहल हुअए वा नै, रघुनाथ सुखी नै छल। जिनगी हुनका लेल पहाड़पुरक धूल-धक्कर आ हँसी खेल नै छल। जन्मले छल तँ स्वयं कीड़ा-मकोड़ाक योनिमे किए नै जन्म लेलक? ओ ओतऽ जनमि सकै छल मुदा नै, भगवान जँ हुनका ऋषि-मुनिक लेल दुर्लभ योनिमे जनम देने अछि तँ एकर पाछाँ हुनकर कोनो उद्देश्य रहल हेतन्हि। जे जाउ, साठि-सत्तरि बरखक मौका दैत छी अहाँकेँ, जाउ धरतीकेँ सुन्नर आ सुखी बनाउ। धरती सुन्नर आ सुखी तखैन हएत जखैन अहाँक बाल-बच्चा सुखी, सुन्नर आ सम्पन्न हएत। अहाँकेँ जे बनबाक अछि ओ तँ अहाँ बनि गेलौं, आब बच्चा अछि जिनकर आगू पूरा जिनगी आ दुनियाँ राखल छै। यएह अहाँक भविष्य अछि। जीबू तँ हुनकर जिनगी, मरू तँ हुनकरे जिनगी। आ रघुनाथ से केलक। हुनकर सभटा शक्ति आ सभटा बुद्धि आ सभटा पूँजी हुनका सभकेँ बनबैमे लागल रहल। ओ चाहलक- सरला पढ़ि लिखि कऽ नोकरी करितिऐ। सरला पढ़ि लिखि कऽ नोकरी करऽ लागल। ओ चाहलक- संजय सॉफ्टवेअर इन्जीनियर बनितिऐ। संजय सॉफ्टवेअर इन्जीनियरटा नै बनल, अमेरिका तक पहुँचि गेल। ओ चाहलक- मैनेजर समधी हुअए। संजय ई नै चाहलक। ओ से केलक जे ओ चाहलक। रघुनाथक आस रहि गेल। दयानिधान किछु मदति नै कऽ सकल हुनकर। हुनका दुख ऐ गपक छल जे मैनेजर एकरा बाप-बेटाक मेलपेंच बुझलक। ओ बड़ मानसिक तनावमे चलि रहल छल, मुदा कॉलेजक हुनकर सहयोगी हुनका बधाइ दऽ कऽ भरोस देलक जे एकटा अन्हार खधाइमे खसबासँ ओ बचि गेला। ऐमे प्रिन्सपलक भूमिका आर नीक छल। ओ मोटामोटी तीस साल पहिने रघुनाथक संग कॉलेज पकड़ने छल। दुनुक दोस्तियारी छलै। जखैन भेटितिऐ हँसी मजाक, हाहा हूहू करितिऐ। ओ एक दिन आस्तेसँ कहलक- “यौ रघुनाथ, हमरा आश्चर्य लगैत अछि जे एतबेटा गप अहाँकेँ बुझैमे किए नै आएल? ओ अहाँक बेटीक बदलामे अहाँक बेटाकेँ खरीद रहल छल।” ऐ तरहेँ रघुनाथ सहज भऽ रहल छल जे एक दिन घरपर हुनका प्रिन्सपलक दसखतबला नोटिस भेटल। आरोप दूटा छल- “नेग्लिजेन्स ऑफ ड्यूटी”(काजमे ढिलाइ) आ “इनसबऑर्डिनेशन”(उच्च अधिकारीक गप नै मानब)। एहेन कोनो संकेत अपन गपमे नै देने छल ओ पहिने कहियो। ई दुनूटा आरोप छल निराधार। एकरा रघुनाथेटा नै, सहयोगी सभ सेहो जानैत छल आ प्रिन्सपल सेहो। सबहक सहानुभूति ओकरा संगे छलै, मुदा संग देबा लेल कियो तैयार नै छल। ओ उत्तर दऽ देलक मुदा ओ ई जानैत छल जे एकरासँ कोनो लाभ नै अछि। ओ फेंफियाइत एतऽ सँ ओतऽ दौगैत गेल। आजिज आबि कऽ प्रिन्सपलसँ भेँट केलक आ हुनकासँ सलाह मांगलक। ओ कहलक- “देखू रघुनाथ, अहाँ जतेको दौड़-धूप करू, निलम्बनक मोन बना लेने अछि मैनेजर। हुनकर शक्ति आ पहुँचकेँ अहाँ जनिते छी। एकर बाद अहाँ कचहरी जाएब, फौदारी लड़ब, ई कहिया धरि चलत, कियो नै जनैत अछि। भऽ सकैत अछि जे फैसला होइसँ पहिने अहाँ मरियो जाइ। हँ, जाधरि मुकदमा चलत, ताधरि पेंशन रुकल रहत। ई सभ देखि कऽ हमर तँ सलाह अछि जे अहाँ वी.आर.एस. (वॉलन्टरी रिटायरमेन्ट स्कीम, स्वेच्छासँ सेवानिवृत्ति सुविधा) लऽ लिअ। रघुनाथ बड़ी काल धरि चुप रहल। हुनकासँ किछु बाजल नै गेल। “ठीक अछि, मुदा एकटा अहाँ मदति करू।” “कहू, की कऽ सकैत छी हम?” “निलम्बनकेँ अहाँ ताधरि लटकेने राखू जाधरि बेटीक बियाह नै भऽ जाए। फेर हम सएह करब जे अहाँ कहने छी।” मनुष्यताक लेल ई करबाके छल। प्रिन्सपल चिन्तित भऽ कऽ बाजल- “जाउ, कोशिश करै छी, मुदा ई गप अहाँ कतौ नै बाजी, से।” आ प्रिन्सपल कहिया धरि बाट तकितिऐ। एहेन मुसीबतमे रघुनाथकेँ किओ आन नै हुनकर अप्पन बेटे धऽ देने छल। बेटोमे संजय! संजय टा! आ ई नम्हर खिस्सा अछि- राँचीसँ कैलिफोर्निया धरि पसरल। संजय प्रेम केने छल सोनलसँ! ई प्रेम कोनो चौौबटियापर घुमैत लफुआ छौड़ाक अनगढ़ प्रेम नै छलै, ऐमे गुणा-भाग सेहो रहै आ जोड़-घटा सेहो! जतेक गहींर छल ततबे व्यापक। संजयक सोनल प्रोफेसर सक्सेनाक बेटी छल। सदिखन प्रथम श्रेणी, व्याख्याताक योग्यता परीक्षा पास आ दर्शनशास्त्रसँ पी.एच.डी.। नौकरी तँ पक्का छल, बनारसक विश्वविद्यालयमे, जतय ओकर माय कुलपति छल, मुदा ओइमे अखन देरी छलै, तखनि धरि बियाहक बाट तकबाक छल! बियाहमे बाधा भऽ रहल छल, ओकर ठोढ़सँ बाहर आएल दाँत आ सटल नाक जकर क्षतिपूर्ति ओ अप्पन सर्टिफिकेटसँ करैत छल। छूटल-बढ़ल कसरि पूरा कऽ रहल छल सक्सेनाक पसारल ई फूस कि हुनका एकटा एहेन कलामी सॉफ्टवेअर अभियन्ताक आवश्यकता छन्हि जे अमेरिकाक एकटा बहुराष्ट्रीय कम्पनीक तीन बर्खक कान्ट्रेक्टपर कैलीफोर्निया जा सकए। ऐ आवश्यकताक अनुभव सम्पूर्ण इन्स्टीट्यूट बुझैत छल। संजय अन्तिम परीक्षा दऽ देने छल, रिजल्टक घोषणा बाकी छल! एम्हर कतेक बेर माँ-बापक संदेश आएल छल जे आबू, लड़कीकेँ देखि लियौ। लड़कीकेँ की देखब, ओ तँ देखले छल! रघुनाथ जइ कॉलेजमे पढ़बैत छल, पूर्व विधायकक बेटी तकर मैनेजर छल। गोर, नमछुरुक, सुन्नर आ आकर्षक। एम.ए.। नीक गृहणी। मैनेजर पुरान जमानाक जमीन्दार, अथाह सम्पत्तिक मालिक। रघुनाथक कोनो हैसियत नै छलै ओकर आगू। नहिये नीक सन घर दुआर, नहिये जमीन-जत्था। आठ बिगहा खेत आ हरक जोत। नेनपन आ युवावस्था बड्ड तंगीमे बितलै। बच्चा सभकेँ पढ़ेलक तँ खेतकेँ बन्हकी लगा कऽ आ कॉलेजसँ ऋण लऽ कऽ। स्पष्ट छल, मैनेजर “सॉफ्टवेअर अभियन्ता” केँ देखने छल, अप्पन कॉलेजक मास्टर रघुनाथकेँ नै। ई सम्बन्ध रघुनाथक लेल सपनासँ आगूक चीज छल । फाएदे-फाएदा छल ऐसँ! जिलामे पहिचान आ प्रतिष्ठा जे भेटतिऐ, से अलग। ओ कीसँ की भेल जा रहल छल। तँ गाम आबैसँ पहिने सक्सेना सर सँ बिदा लै लेल गेल छल संजय। एकरा अहिनो कहि सकैत छी जे ओकरा सक्सेना सर डिनरपर बजेने छल। गर्मीक साँझ। अप्पन लॉनमे सक्सेना बेंतक कुर्सीपर चुपचाप बैसल छल। माली गमलामे पाइन दऽ रहल छल। बंगलाक भीतरक बत्ती जड़ि रहल छल। कोनो कोठलीसँ संगीतक धुन आबि रहल छल। अवकाश प्राप्तिक करीब, हृदयक मरीज प्रो. सक्सेना संजयक एबासँ अनजान चुपचाप बैसल छला आ आगू देखि रहल छला। बड़ी कालक बाद ओ पुछलक, “कोन इन्स्ट्रूमेन्ट अछि”। संजय बिना बुझने माथ हिलेलक। “आ राग? कोन राग अछि?” संजय निरुत्तर, फेर माथ हिलेलक। ओ ससरि गेल आ ऊँच अबाजमे बजेलक- “सोनू”। जीन्सक पेंट आ टी-शर्टमे कूदैत सोनू आएल- “हँ पापा”। संजय ठाढ़ भऽ गेल। सक्सेना मुस्की देलक, पहिने संजयकेँ देखलक, फेर सोनलकेँ। सोनल सेहो मुस्की देलक। संजय सोनलसँ भेँट तँ कते बेर केने छल मुदा देखने पहिलुके बेर छल। ओकरा लगलै जे कोनो छौड़ीकेँ टुकड़ीमे नै “सम्पूर्णता”मे देखबाक चाही। कतेक फर्क पड़ि जाइत छै। संगे संग छौड़ी आ कनियाँकेँ एक तरहेँ नै देखबाक चाही। रूप-रंग, ढीब-ढाब, मान-मनौअलि छौड़ीमे देखल जाइत अछि, कनियाँमे नै! ई सभटा पुरान धारणा अछि, हमर पापा-मम्मीक जमानाक, हमर नै। सक्सेना गुम्मी तोड़लक- “ई अछि सोनम, जइमे हमर प्राण बसैत अछि। सितार, सरोद, संतूर माने सोनल। सोनल माने संगीत। चीपनेस एकरा पसिन्न नै। फिल्मी गीतकेँ ई गीत नै मानैत अछि। किएक तँ ई अपने कथक नृत्यांगना रहल अछि। तँ की खुआ रहल छी हमरा सभकेँ आइ?” “ओ तँ तखने पता लागत जखन खाएब।” सोनल लजा कऽ भागि गेल। “बैसू संजय।” ई कहैत सक्सेना सेहो मूड़ी झुका कऽ बैसि गेल। किछु सोचैत। टूटल स्वरमे बाजल- “कोना रहब एकर बिना, रहब कोना से नै बुझि पड़ैत अछि। ई चौदहे बर्खक छल जखन एकर माय गुजरि गेलै।” तकर बाद ओकर आँखिसँ नोर खसऽ लगलै- “तीन चारि बरखसँ लगातार आबैत रहल अछि लड़का। एकसँ एक। अहाँक सीनियर सेहो, क्लासफेलो सेहो। मुदा बेटा भारी संकटमे छी, अहीं उबारि सकै छी ऐ संकटसँ। पछिला बरख ई बाजल छल जे बियाह करब तँ संजयसँ, नै तँ नै करब बियाह। अपना भीतर नुकेने रहलौं ऐ गपकेँ। आइ बाजि रहल छी, सेहो ऐ दुआरे जे फैसलाक घड़ी आबि गेल अछि। तीन-चारि मास आर अछि कैलिफोर्निया जेबामे। ऐ बीच बियाह अछि, हवाइ टिकट अछि, पासपोर्ट अछि, वीजा अछि, सभटा तैयारी अछि। सोनल अमेरिका आ हनीमूनकेँ लऽ कऽ उत्साहित अछि।” ओ आँखि पोछलक आ संजयकेँ देखलक। “सभ बापक सपना होइ छै आ हमरो अछि। नै हेतिऐ तँ सेंट्रो कार किए लैतिऐ? अपना लेल फिएट तँ छेबे करल। नव घर गृहस्तीक समान किए जुटैबितिऐ? अहाँक नग्रमे एकटा कॉलोनी अछि अशोक विहार। ओइमे एकटा छोट सन बंगला बनबैले छी। सभ किछु कम्प्लीट अछि। बस फिनिशिंग टा बाकी अछि। सोचले रही जे एतऽसँ रिटायर करब तँ काशीवास करब। सभ लोक यएह चाहै छै। अहाँक पापा-मम्मी सेहो चहैत होएत। मुदा सोचैत छी जे काल्हि सोनल विश्वविद्यालयमे ज्वाइन करत तँ कतए रहत? हमर तँ सभटा जीवन राँचीमे बीतल, सभटा दोस्त-मित्र, सर-सम्बन्धी एतए अछि। ओतऽ जा कऽ की करब? तइसँ बंगला ओकरे नाम कऽ रहल छी।” संजय चिन्तित भेल। ओकर आँखिमे पापा-मम्मीक चेहरा घूमि रहल छलै। ओकरा लागि रहल छलै जे ओ हुनका हँ करैमे जल्दी कऽ देने छल। बाजल “बड देर कऽ देलौं सर सोनलक बात बताबैमे।” “देर सबेर किछु नै होइत अछि संजू, सभ चीजक बेर होइ छै। आब यएह देखू, हमर साढ़ू प्रोफेसर अस्थानाकेँ बनारस मे एहने घड़ीपर कुलपति किए हाँकि देने छल जखन सोनल थीसिस जमा कऽ रहल छलि?” ओ सिगरेट जरेलक- “ओना तँ सिगरेट मना अछि मुदा कहियो काल एकाध सोंटा लऽ लैत छी। तँ अहाँक पापा। हुनकर परेशानी बुझि सकैत छी। कहैत रहल छी हुनका लऽ कऽ। छोट भाइ अछि अहींक। पछिला तीन-चारि बर्खसँ कैट-मैट परीक्षा दऽ रहल अछि। लोक सेवा आयोगक परीक्षा दऽ रहल अछि। आ कोनोमे नै आबि रहल अछि- ओकर परेशानी। गप आएल बीचमे तैं, परेशान भऽ कऽ किछु कऽ नै लिअए तेँ ओइसँ पहिने कोनो मैनेजमेन्ट इन्स्टीट्यूटमे नामांकन करा दियौ। एना नै तँ डोनेशन दऽ कऽ। ऐं यौ, कत्ते लागत? डेढ़ लाख, दू लाख, आर की? अहाँ बतेने छलौं जे अहाँक पढ़ाइ लेल ऋण लेल गेल छल आ खेत सेहो भरनापर राखल अछि। ऐ सभ परेशानीसँ बहार होइले कतेक जरूरति हएत हुनका? हुनकासँ गप कऽ कए तँ देखू। की चाहैत छथिन ओ। देखू, बरियाती, धूम-धरक्का, गाजा-बाजा ई सभ फुसियाहींक बखेरा छी। कोनो जरूरति नै अछि देखावटी व्यवहार आ तमाशाक। बियाह लेल कोर्ट अछि आ दोस महीम लेल एकटा स्वागत समारोह राखि देबै। ई हम कऽ देब, फेर? ओना एकटा गप बता दै छी, जेहेन कम्पनी आ जेहेन शर्तपर अमेरिका जेबाक अछि ओइसँ तीन बरखमे कियो एते कमा लेत जे जौँ ओकर बाप चाहै तँ गामक गाम कीनि लेत। बुझलौं?” “प्रश्न ई नै अछि सर। पिताजी कने लोक-लाज आ जाति-पातिमे विश्वास करऽबला पुरान ढङक लोक छथिन।” सक्सेना गम्भीर भऽ गेला। कनी काल धरि चुप रहलखिन। ऐ बीच सोनल साड़ीमे आएल। खाइक लेल बजाबैक लेल। “देखू संजू। लॉ ऑफ ग्रेविटेशनक निअम गाछ आ फड़ धरि लेल मात्र लागू नै होइत अछि। मनुक्खक सम्बन्धपर सेहो लागू होइत अछि। सभ बेटा-बेटीक माँ-बाप पृथ्वी अछि। बेटा ऊपर जाइले चाहैत अछि आर ऊपर, कनिक आर ऊपर तँ माँ-बाप अपन आकर्षणसँ ओकरा घिचैत अछि। आकर्षण संस्कार भऽ सकैत अछि आ प्रेम सेहो, माया-मोह सेहो। मंशा गिराबैक नै होइत अछि। मुदा खसा दैत अछि। जँ हम अपन बापक सुनने हेतिऐ तँ हेतमपुरमे पटवारी बनि गेल हेतिऐ। तँ ई अछि। हमरा जे कहबाक रहए, से कहि देलौं। अहाँकेँ जे नीक लगैत अछि से करू। हँ, जाइसँ पहिने सोनलसँ गप कऽ लेब।” ** जुलाइमे बियाह भऽ गेल चिरंजीवी संजय आ सोनलक कोर्टमे। नहिये बरियाती आ नहिये बाजा-गाजा। प्रीतिभोजक लेल नोत आएल छल, रघुनाथक नामसँ सेहो। मुदा ओ नै गेला। एहेन चोट लागल छल रघुनाथ आ शीलाकेँ जे ओ दोसरकेँ नै देखा सकैत छल आ नहिये ककरोसँ नुका सकै छल। एहेन ठामपर जाएब ओ बन्द कऽ देने छल जतऽ दू-चारि गोटे जुमैत होथि। ओ मानि लेने छल जे दू बेटामे एकटा बेटा मरि गेल। जखन माए-बापक प्रतिष्ठाक ओकरा चिन्ते नै तँ मरले बुझू।सितम्बरमे ओ अमेरिका जाए आकि नर्क, ऐसँ ओकरा कोनो सरोकार नै। ऐ घड़ी लेल ओ ओकरा पालने-पोसने छल, पढ़ेने-लिखेने छल, गाछ कटने छल, कर्ज लेने छल, भरनापर खेत देने छल, आ दुनिया भरिक तगेदा सुनने छल? हुनकर लाख मना केलाक बादो राजू गेल छल, रामू माने संजयक भाए धनंजय, घुरल तँ ओकरा हाथमे एकटा ब्रीफकेश छल जे रघुनाथ लेल सक्सेना पठेने छल। रघुनाथ कॉलेजक तैयारी कऽ रहल छल। कुमोनसँ ब्रीफकेश दिश देखलक आ बाजल- “राखि दियौ।” “ऐं, एना कोना राखि दी। अप्पन संदूकमे राखू।” बाबा जमानाक सन्दूकमे की कहाँ राखै छल रघुनाथ आ ओकर चाभी ओ ककरो नै दै छल। बिना किछु बजने ओ चाभी ओकरा दिश फेकि देलक।राजू ब्रीफकेशकेँ संदूकमे राखि चाभी घुरा देलक आ बाजल, “आर किछु नै पुछब?” शीला उदास मोनसँ दरबज्जापर ठाढ़ि छल, भीतर चलि गेलि। “अहाँ सभ तँ एना गुम्म छी जेना कोनो बिपति आबि गेल”, राजू हँसैत माँक पाछाँ भीतर चलि गेल। “कनियाँ एहेन जे लाखमे एक। माँ अहाँ चिन्ता नै करू। सभ किछु करत ओ जे संजय बाजैत छल। हाथ-पएर जाँतत, मुँह दबाएत, बर्तन माँजत, बाढ़नि लगाएत, खेनाइ बनाएत, जे जे चाहत से सभ किछु करत। कनी अमेरिकासँ घुरिकऽ आबऽ तँ दियौ। अखन हनीमूनपर जा रहल अछि दार्जिलिंग, ओतएसँ दमदम हवाइ अड्डा, फेर ओतएसँ अमेरिका। बचि गेलौं अहाँ, जँ गेल रहितिऐ तँ मुँह देखाइ देबऽ पड़ितिऐ। ई लिअ, अहाँले फोटो पठेलक अछि स्वागत समारोहक…।” राजू नै जानि की-की बजैत रहल, ओ सुनितो रहल, नहियो सुनैत रहल। दुनू गोटेक फोटो ओतए पड़ल रहल जतऽ ओ बैसल छल। एकटा मन कहि रहल छल, “देखी”, दोसर कहि रहल छल, “छोड़ू, जाए दियौ”। सभटा सख धरले रहि गेल। राति भऽ गेल छल। गाममे सनाटा पसरि गेल छल। एक दिन पहिनहिये खूब बरखा बुन्नी भेल छल। हरियरी पसरि गेल छल। झिंगुरक अबाज गामकेँ गनगनेने छल। मेघ घटाटोप केने छल। दूर अकाशमे बिजलौका लौकै छल। ओम्हर कतौ पानि पड़ल हेतै, एम्हर नै भेल। रघुनाथक घर दुआर गामक बाहरी इलाकामे छल। घरक अगुलका हिस्सा दुआर पछुलका घर। दुआरक माने दलान आ बरण्डा। ऐ बरण्डामे सुतै छल रघुनाथ आ राजू। राजूक सुतलाक बाद रघुनाथ आध रातिमे नुका कऽ भीतर गेल, ढिबरी लेसलक आ सन्दूकसँ ब्रीफकेश निकाललक। जखन ओ ढिबरी आ ब्रीफकेश लऽ कऽ शीलाक बगलबला कोठली गेल तँ ओकरा मोन पड़लै जे ब्रीफकेशक चाभी तँ राजू देबे नै केलक। ओ रकमसँ राजूकेँ जगेलक। राजू बतेलक जे ब्रीफकेश चाभीसँ नै नम्बरसँ खुजत, ऐ नम्बरसँ। आ बड़-बड़ करैत ब्रीफकेश खुजि गेल। रघुनाथ ब्रीफकेशकेँ खोललक तँ भाव-विभोर। बेटा संजयकेँ लऽ कऽ जत्ते तामस रहै सभ टा बिला गेलै। टाकाक एतेक गड्डी अपन आँखिक सोझाँ एकटा ब्रीफकेशमे ओ पहिल बेर देखि रहल छल। आ ई कोनो सिनेमा नै वास्तविकता छलै। गामक लोक रघुनाथकेँ झगड़ा-झंझटिसँ दूर रहैबला मुदा कंजूसक श्रेणीमे गनती करै छल जे टाकामे अठन्नी भजबैत अछि। लोक ईहो कहै छल जे बड्ड लोभ नै केने रहितिऐ तँ ई दिन नै देखऽ पड़ितिऐ। रघुनाथ ब्रिन्चकेँ अपना दिस घिचलक। पहिने सए-सएक गड्डी गननाइ शुरू केलक। ओ एक-एक बण्डलक संख्या सेहो लिखि रहल छल। फेर ओ पाँच-पाँच सएक नोटक गड्डी उठा कऽ गनब आ लिखब शुरू केलक। गनैत-गनैत राति बेशी भऽ गेल आ सभटा रुपैयाक जोड़ भेल चारि लाख साठि हजार। हुनकर हअदय काँपल, जँ गनैयोमे गलती भेल हएत तँ एतेक टाका कोना? ओ उठि गेल आ सन्दूकमे झोंकि फेर आनि लेलक। घुरतीमे भंसाघरसँ कटोरामे पानि लऽ रहल छल तँ शीला जागि गेल। अंगुर भिजा-भिजा कऽ फेरसँ टका गनलक मुदा फेर वएह चारि आ साठि। ओ माथ पकड़ि बैसि गेल। “कोन गप अछि?”, शीला पुछलक। “पाँच लाखमे कम अछि चालीस हजार, कियो सन्दूक तँ नै खोलने छल?” “चाभी तँ अहीं लग छल, खोलत के?” “कियो आर तँ नै आएल छल घरमे?” “अहाँ आ राजू आएल छलौं, आर तँ कियो नै।” कनी कालक बाद ओ नै जानि की सोचि कऽ उठल आ राजूकेँ जगा कऽ लऽ अनलक। राजू आँखि मिड़ैत आएल। “ब्रीफकेश के देने छल अहाँकेँ, संजू आकि सक्सेना?” “किए? की गप अछि?” “बताउ, कम अछि पाँच लाखमे?” राजू हँसल, “मंगनीक बाछीक दाँत नै गानल जाइ छै। संतोष करू, जत्ते भेटि गेल से मंगनीमे, सएह बुझू।” ओ एकटक राजूकेँ देखैत रहल, “अहाँ तँ किछु एम्हर-ओम्हर नै केने छी?” “हम जनै छलौं जे यएह शक करब अहाँ, अहाँ स्वभावेसँ शक्की छी।” “चुप्प”, शीला बाजलि, “अहिना बापसँ गप्प कएल जाइ छै?” “बुझि गेलौं, यएह चोरेलक अछि। बतेलक नै।” “पहिने बुझि जेबाक चाही। चोरा कतौ बतबै छै जे चोरि वएह केने अछि”, राजू बाजल। रघुनाथ आश्चर्यसँ देखलक ओकरादिस, “की भऽ गेल छै ऐ छौड़ाकेँ। एकर भाए कम्प्यूटर अभियन्ता। ओ ऐ तरहेँ कहियो गप नै केने अछि बापसँ।” “गप्प नै केलक, तेँ अस्थिरेसँ चुपचाप बियाह कऽ लेलक आ बापकेँ खबरि धरि नै केलक।” झनझना उठल गुस्सा सं रघुनाथ। मन भेल-ओकरा घर सं निकलि जायैक कहियै मुदा नै जानि की सोचहि के ओतय सं उठल आ आंगन मे आबि गेल। कोना मे बंसखट पड़ल छल, ओहि पर बैसि गेल। ओ भगवानक लेल माथ उठैलक आसमान दिस। 'देखू मां, हम डेढ़ बरख सं कहि रहल छलहुं हिनका सं जे मोटरबाइक दऽ दियौ। घरानाक सभ छौड़ा लग अछि, एकटा हमहीं छी जकरा लग नै अछि। हिनकर कहब छल जे हाथ-पाइर तोड़बाक अछि की? माथ फोड़बाक अछि की? चोरी-चकारी आ लफंगई करबाक अछि की? डाका डलबाक अछि की? केकर हाथ-पइर टूटल अछि, कहू ते? ते संजू हमरा सं पुछलक-'अहां के की चाहि? जखैन हम ओतय सं घुरहि लागलहुं। हम कहलहुं-'हां, मोटरबाइक। ओ हमरा टका थमा देलक। ओ ब्राीफकेस मे सं देलक या कतय सं देलक हमरा नै पता।" 'सरासर झूठ। ई जानैत अछि जे संजय आब नै आबय बला अछि। हम नै पूछि सकब ओकरा सं।" रघुनाथ के ई झूठ बर्दाश्त नै भेल। शीला ठाढ़-ठाढ़ डिबरीक मद्धिम रोशनी मे कानि रहल छलि। ओ अप्पन बेटाक अहि रूप सं अनजान छलि। 'आैर कहू। हमर बापजानक दूटा बेटा-संजू आ हम। ई एक्को आंखि सं हमरा देखलक तक नै। सभटा मेहनत आ सभटा पाय ई ओकरे पर खर्च करलखिन। पढ़ैलक, लिखैलक, कंप्यूटर इंजीनियर बनैलक आ हमरा लेल। कामर्स पढ़ू। जकरा पढ़हि मे नै ते मदद कऽ सकैत छल, नै हमरा मन लागैत छल। कोनो तरहे बीकाम करलहुं ते कोचिंग करू, ई टेस्ट दियौ, ओ टेस्ट दियौ। हम थाकि गेल छी टेस्ट दैत-दैत। हिनका सं कहियौ, ई टका कत्तौ इमढ़-उमढ़ खर्च नै करैथ, डोनेशन लेल राख्ौथ। बिना डोनेशन कत्तौ एडमिशन नै हय बला छै। परछा के बता दैत छी।" 'जौं डोनेशनक टका नै देब तऽ?" 'ते कहियौ नै पूछब जे ई की कऽ रहल छी?"'कियअ कऽ रहल छी?" 'की करब? डाका डालब? तस्करी करब? गांजा हेरोइन बेचब? कत्ल करब?" की बक-बक कऽ रहल छी अहां? फालतू? झमाइर के शीला बाजल, 'आओर अहां चुप रहू। अनाप-शनाप कहि रहल छी बाप सें।" राजू कमरा सं बाहर निकलैत पिता सं बाजल, 'बस कहि देलहुं।" 'सुनू-सुनू। भागू नै। अपना लऽ कऽ सोचैत छी आ कहियौ अप्पन बहिन कऽ लऽ कऽ सोचने छी? जखैन होयत अछि तखन जाइत छी हजार पांच सौ मारि के आबि जायत छी ओकरा सं? ओकर ब्याह कऽ लऽ कऽ कखनो सोचैत छी?" 'देखि रहल छी हिनकर?" ओ मां दिस मुड़ल, 'जकरा सं कहबाक छल, ओकरा सं नै कहलल, कहि हमरा सं रहल अछि, जे एखन पढ़ि रहल अछि। डोनेशनक गप आयल ते दीदीक ख्याल आबि रहल अछि। पहिले हिनका सं कहियौक जे कंजूसी आ दरिद्रता छोड़ैक आब। हंसी उड़ाबैत अछि लोक। ई ढिबरी आ लालटेन छोड़य आ आन जना तार खींचवांके-कम से कम आंगन आ दरवाजा पर लट्टू ते लगवाय लियै। इजोत हुयै घर मे। एकर संगे फोन लगा रहल अछि लोक। घर मे फोन होयत ते संजू जखन चाहत, गप कऽ लेत। अहां सरला दीदी सं गप कऽ लेब। दीदी से टा किया भौजी सं सेहो।" माथा फोड़ैत फेर सं बैस गेल रघुनाथ-'यहि छी भाग्य। जकरा लेल कंजूसी करलहुं, ैओकरे मुंह से ई सुनबाक छल।" 'आओर एकटा गप कहि दैत छी अहां से आओर हिनको सं। फेर एहन बेवकूफी नै करैथ जेहन संजूक काल मे कइलय अछि। दीदी से परछा के गप कऽ लहुं चे ओ हिनकर तय करल सं ब्याह करत या नै। ई ते दौड़-भाग कऽ कत्तौ तय कऽ अइथिन आ ओ कहि दियै जे हमरा ब्याह नै करबाक अछि। फेर भद पिटत हिनकर।" 'ई अहां कोनो कहि सकैत छी।" 'कियैकि हम एकटा आदमी के अकसर हुनका संग देखनी छी। के छी ओ, नै जानैत छी।" 'देखलियै नै? एकरा शरम धरि टा नै अछि बहिन कऽ लऽ के अहि तरहे गप करैत?" रघुनाथ दांत पीसैत ओतय सं बाजल। ** सरला दुविधा मे छल-ब्याह करि आ नै करि? पक्का एतबेक टा छल जे ओकरा ओ ब्याह नै करबाक अछि जे पापा खोजि के आनत। कतेक रास लोचा छल ओकर दुविधा मे! आजुक सं कोनो सात-आठ बरख पहिने। ओ अपना भीतर किछु अजब-सन महसूस केने छळ-मन उखड़ल रहैत छल, कत्तौ हरायल-हरायल सन छल, बिना गप्पक हंसी आबैत छल, हरदम गुनगुनाबैक जी चाहैत छल, बाहर आबैत छल, ते दोस्तनी सब हंस के कहय लागल छल-देखू-देखू। पैरक चप्पल-दू डिजाइनक। क्लास कहानी के, किताब कविताक हाथ मे। ई वहि दिन छल जखन नगर मे आबि बला कोनो फिल्म ओकरा सं नै छूटहि छल। अहिना मे नै जानि कोना कौशिक सर नुका के आयल आ ओकर दिल मे आबि के बैसि गेल। कौशिक सर कविताक अध्यापक। बड़ गंभीर आ चुप रहि बला आ सिद्धांतवादी। पातर-दुबर, नमर गर आ देखहि मे आकर्षक। अधेड़ आ तीन नेना नै युवाक पिता? अद्भुत 'सेंस ऑफ ह्यूमर"क मालिक। हुनका सं प्रेम करहि मे कोनो खतरा नै छल। नै कोनो खतरा, नै कोनो तरहक संदेह। ओ बड़ बुधियारी आ विवेक सं काज लेने छल अप्पन 'ब्वायफ्रेंड" चुनहि मे। छौड़ा-छौड़ीक 'गॉसिप"क डर सेहो नै छल। कौशिक सर कृतज्ञ आ अभिभूत छल। मिज्झर होयत जिनगीक अंतिम प्यार। सेहो सरला जेहन सुनर छौड़ी सं। पचास-पचपनक उमर मे ते कियो सोचहि नै सकैत अछि, एहन भाग्यक लऽ कऽ। सरलाक मन बेचैन छल, देह सेहो। बस प्रेमक गप आ तड़प। आर किछु नै। सऽ ते ओकर सहेलीक संग भऽ रहल छल। किछु ्ते अलग हुयै-कौशिक सर कोनो विद्यार्थी थोड़े अछि। अहिने इच्छा कौशिक सर के सेहो छल मुदा नगर मे कत्तौ एहन ठाम नै छल, जतय हुनका कियो नै जानैत हुयै। निश्चित भेल जे कौशिक सर एक दिन टैक्सी सं 'अमुक ठाम" पहुंचत, ओतय सं सरला के 'पिकअप" करत आर दू-चारि घंटाक लेल सारनाथ। फेर सोचल जायत 'एकांत" आ 'निर्जन"क लऽ कऽ। प्रेम बंद आ सुरक्षित कोठलीक चीज नै अछि। खतरा सं खेलहिक नाम अछि प्रेम। लोकक भीड़ सं बचाबैत, हुनका धत्ता बताबैत, हुनकर नजरि के चकमा दैत जे करल जायत अछि-ओ अछि प्रेम। ब्याह से पहिने यहि चाहैत छल सरला। ब्याहक बाद ते ओ विश्वासघात होयत, व्याभिचार होयत, अनैतिक होयत। जे करबाक अछि, पहिने कऽ लियअ। अनुभव कऽ लिअ एक बेर। मर्दक स्वाद! एकटा एडवैंचर! जस्ट फॉर फन! सरला रोमांचित छल। नर्वस छल आ उत्तेजित सेहो। जहि दिन जैबाक छल ओकरा सं पहिलुक राति। ओ सुति नै सकल नीक सं। नींद नै आबि रहल छल। कतेक रास गप, कतेक रासक ख्याल, कतेक रासक गुदगुदी। अपने सं लजाबैत छल, अपने आप हंसैत छल। ओ सोच लेने छल जे अवसर भेटय पर एत्ते आगू नै बढ़हिक दैक अछि कौशिक सर के जे ओ ओकरा गलत बुझि लियअ। ई ते शुरुआत अछि... एखन नै जानि कतेक मुलाकात बाकी अछि। नै, आबि कतय मुलाकात? 'फेयरवेल" भऽ चुकल अछि। दू-चारि दिन आर चलि सकैत अछि क्लास, ओकर बाद ते इम्तहान! फेर कतय संभव अछि भेंट? कोन बहाना रहत भेंट करबाक लेल? कौशिक सर लोकप्रिय लोक छल! विश्वविद्यालयक नै, नगरक सेहो! जानहि बला बड़ छल। तरह-तरहक लोक! अहि बातक गर्व छल सरला के जे ओ जेकरा सं प्यार करैत छल, ओ कियो सीटी बजाबहि बला, लाइन मारहि बला सड़क छाप विद्यार्थी नै, विद्वान अछि। कौशिक सर बड़ सावधानी बरतलक-ओ छुट्टीक दिन नै हुयै, स्कूल-कॉलेज खुजल हुयै, कियैकि छौड़ा-छौड़ी पढ़हि मे आ अध्यापक पढ़ाबै मे व्यस्त हुयै, पिकनिक आ भ्रमणक कार्यक्रम नै बनाबै, सारनाथक मेला सेहो नै हुयै ओहि दिन! अहि सावधानीक संग कौशिक सर सरलाक संग टैक्सी सं पहंुचल चौखंडी स्तूप! सारनाथ से पहले! सड़कक कात पहाड़ीनुमा ढूडक ऊपर खंडहर जेहन टूटल-फूटल स्तूप! ठाड़ भऽ जाऊ ते पूरा सारनाथ ते नै, दूर-दूर धरि गाम गिरावं आर बाग-बगीचा नजर आयत। खाली पड़ल छल स्तूप! नीचा चौकीदार, सिपाही, माली अप्पन-अप्पन काज मे लागल छल। एकदम निर्जन असगर ठाढ़ छल स्तूप! 'हिमगिरि के उत्तुंग शिखर" के तरहे। कियो दर्शनार्थी नै! मनु श्रद्धा सं देखलक! श्रद्धा मनु के देखलक! दूनू टैक्सी सड़कक कात मे ठाढ़ करलक आ चलि पड़ल। घुमावदार बाट से चक्कर काटैत। आगा-पाछां नै, अगल-बगल। संगे-संग। हाथ मे हाथ लेल! सरला असगरे मे कौशिक सर के 'मीतू" कहैत छल। ओहि दिन ओ सत मे मीतू भऽ गेल छल। सरला-जे सदिखन समीज सलवार आ दुपट्टा मे रहैत छल-ओ सरला हरका बार्डरक बासंती साड़ी मे गजब ढ़ा रहल छल। बार्डरक रंगक साड़ी सं मैच करैत ब्लाउज आर माथ पर छोट-सन लाल बिन्दी! हवा उड़ायल जा रहल छल आंचल के, जकरा ओ बेर-बेर संभारि रहल छल। ओ चढ़ाय खत्म कऽ स्तूपक लग पहुंचल आ चारो दिस देखलक-दूनूक मुंह सं एक संग निकलल-'जेहन अछोर, अनंत, असीम हरियालीक समुद्र"। आर ओहि मे पीयर फुलल तोड़ीक जतय-ततय खेत--एहन लागि रहल छल जेहन पाल बाली हिलैत-डुलैत डोंगी! 'आ हम?" सरला पुछलक! कौशिक सर मुस्कुरायल! बाजल-'मस्तूल बला बड़ पैग जहाज के डेक पर।" स्तूप के अहि धरि छांह छल आ ओहि धरि कुनकुनी रौद! छांह नम्हर होयत ओतय धरि चलि गेल छल, जतय माली काज कऽ रहल छल। ओ ओहि कात गेल रौद मे, जिम्हर समुद्र छल आ हिलैत-डुलैत पीयर डोंगी! ओ स्तूप से सटल साफ-सुथर ठाम पर बैसि गेल-चुपचाप! ओ चुप छल मुदा हुनकर दिल बाजि रहल छल-अपने आप सं, आर एक-दोसर सं सेहो! हुनका लग की रहि गेल छल कहैक-सुनैक लेल? डेढ़ बरख सं यहि ते भऽ रहल छल-गप, गप आर गप्पे टा! गप सं ओ थाकि गेल छल आ मन सेहो ऊबि गेल छल। सरला बगल मे बैसल लगातार कौशिक सर दिस देखहि जा रहल छल आ ओ देखहि के देखैत दुबरी ने नोचि रहल छल। फेर एकाटक दिलीप कुमार स्टाइल मे मुस्कुरा के बाजल-ऊं! की कहलियै! हंसैत सरला अप्पन सिर हुनकर कान्हा पर राखि देलक-'बड़ रास गप? सुनहुं तखैन नै!" ओ दिल, जे आबि धरि खंडहरक पाछां गुटर गूं कऽ रहल छल, कुकड़ू कूं करहि लागल छल भरि दुपहरिया मे! कौशिक सर सरलाक पीठक पाछां सं हाथ बढ़ाके ओकर सुडौल गोलाई मसैल देलक! सरलाक पूरा बदन मे एकटा झुरझरी भेल आ ओ शरमाबैत हुनकर कोरा मे ढहि गेल। अबकी बेर कौशिक सर कनि जोर सं मसललक। चिहंुक कर सीत्कार कऽ उठल सरला आ आंखि बंद कऽ लेलक-'जंगलियै छियै की!" कौशिक सर माथ सं लिबा के ओकर आंखि के चूमि लेलक! 'ई की भऽ रहल अछि चचा?" अचानके एकटा कड़कड़ाती आवाज आ आगू सं ठाड़ ऐतिहासिक धरोहरक पहरेदार आ सिपाही खाकी बर्दी मे! * सरला चलि गेलि, मुदा रघुनाथक सुख-शान्ति लऽ गेलि। रघुनाथ कतेक राति सुति नै सकल। हुनका नीन नै आबि रहल छल। कोन जन्मक पाप छल जे ओ ऐ जन्ममे भोगि रहल छल। बच्चा सभकेँ एहन संस्कार कतऽसँ भेटल छलै जे ओ ऐ जन्ममे भोगि रहल छल। संजयकेँ कियो नै भेटलै- नहिये ठाकुर, नहिये बाभन, नहिये भूमिहार; भेटलै तँ लालाक लड़की। तकर बादो ओ ओइ लाएक छल जे मुँह देखा सकए, मुदा ई सरला। ओ ककरा मुँह देखाएत। कतऽ मुँह देखाएत। लड़कीक अप्पन तर्क छलै, जे ओ जाइत-जाइत सुना गेल छल। जे भी गलत काज करैए, ओ ओकर पक्षमे तर्क गढ़ि लैए। उहो ई तर्क गढ़ले छल- अहाँ दोसराक शर्तपर बियाह कऽ रहल छी, एतऽ हम बियाह करब मुदा अप्पन शर्तपर, अहाँ हमर स्वाधीनता दोसराक हाथमे बेचि रहल छी, एतऽ हमर स्वाधीनता सुरक्षित अछि, अहाँ अतीत आ वर्तमानसँ आगू नै देखि रहल छी, हँ, हम भविष्य देखि रहल छी, जतऽ स्पेसे-स्पेस अछि। स्पेसे-स्पेस, ऊहूँ। स्पेस माने की। आरक्षण आ कोटाक अलाबे एकर कोनो मतलब अछि? एतबे नै, आरक्षण नै हेतियै तऽ भारती केकरो ने केकरो दुआरि जाइत हेतियै आ पढ़य-लिखय कऽ बादो नग्रमे रिक्शा खींचैत हेतियै। अहीं कहैत रही जे एकदम गधा अछि, किछु नै बुझैत अछि। आइ पी.सी.एस. भऽ गेल तँ ओकरा जेहन कियो नै। ओ अप्पन मनक बोझ निकाललाक बाद हल्लुक अनुभव कऽ रहल छल कि पाछाँसँ कोनो हल्ला सुनाइ देलकै- यौ मास्टर साहेब। जमायक की हाल अछि? आ कनी-कनी हुनका लागै छल जे ई हल्ला पाछाँ टा सँ नै, आगूसँ सेहो- बाम-दहिनसँ सेहो, ऊपर-नीचाँसँ सेहो आबि रहल छलै। चारू दिससँ। गाम-घर, आस-पड़ोस, जान-पहिचानक सभ कियो हुनकर जमायकेँ लऽ कऽ चिंतित छलनि मुदा हुनकासँ हँसी कऽ रहल छलनि। ऐ बीच नै जानि किम्हरसँ कोनो बच्चाक किलकारी सुना पड़ल आ ओ हुमचैत हुनका दिस अप्पन नान्हि-नान्हि बाँहि पसारि देलक- नाना, ई देखू की अछि। ओ ओकर हाथसँ एकटा कागज लेलथि, जे हुनकर परोक्षमे चमटोलसँ झूरी देने गेल छल। ई निमंत्रण पत्र छल झूरीक पोतीक। तँ आब यएह हुनकर दियाद आ लगीचक अछि। नोत-हकार आ खानपीन आब हुनके संग हेबाक अछि, गेल अप्पन दियादबाद। रघुनाथ निश्चय केलक जे आब ओ वालण्टरी रिटायरमेंट लऽ लेत। ओ शीलासँ अप्पन ई इच्छा बतौलक जे आब ओकरा नोकरीक जरूरत नै छै। ई नै बतौलक जे ओकरा वी.आर.एस. आ सस्पेंशनमे सँ एकटा चुनबाक छै आ ऐमे यएह ठीक छै जे ओ करबाक लेल सोचि रहल अछि। चन्द्रमाक रोशनी पसरल छल, अगहनक। अकास साफ छल। आध आंगैन इजोरिया छल, आधमे छाह। चन्द्रमा सोझे रघुनाथक चेहरा देखि-देखि मुस्करा रहल छल। ओ ओकर जल्दीसँ हटबाक आसमे छल मुदा ओ अप्पन ठामसँ हटबाक नाम नै लऽ रहल छल। ओ हुनका नजरि गारि कऽ देखैत रहल आ हुनका लागऽ लगलनि-जेना चांद ऐना अछि आ ओकरामे लखाह पड़ऽ बला दाग हुनकर मुँहक झाइ। गामक सिमानक पारसँ शुरू भऽ जाइत अछि कुसियार आ राहरिक खेत, जतऽसँ नरहिया एक्के संग हुआँ-हुआँ शुरू केलक। गामसँ कुकुड़ सेहो ओही भावसँ उतारा देलक आ जना देलक जे ओ सभ सेहो सुतल नै अछि। शीलाक खाट रघुनाथक कातेमे छलै आ ओ सुतलि छलि। पछिला कतेक दिनसँ रातिमे यएह भऽ रहल छल। रघुनाथ रतजग्गा कऽ रहल छल आ शीला गप करैत सुति जाइत छलि। रघुनाथ उठि कऽ बैस गेल। इजोरियामे ओकर मुँह देखलक। भरल-भरल गोल गोर चेहरा आ नाकक लोलपर चमकैत चन्द्रमाक किरिण। एकरासँ पहिने ओ हुनका सदिखन पटायल देखने छल, सुतल नै। ओ एकटकसँ निहारैत रहल हुनका। ओ करौट लेने छल आ ओकर चेहरा रघुनाथे दिस छल। ओकरासँ सात बरख छोट, मुदा उमेर ओकरो नै छोड़ने छल। ओकरा भीतर प्रेम घुमरऽ लागल- हँ, आबो सुन्नरि छल हुनकर स्त्री। ओकरा लागल, ओ कहियो ठीकसँ प्रेम नै केलक हुनका। ओ हाथ बढ़ा कऽ हुनकर ब्लाउजक एकटा बटन खोलि देलक, चुप्पे दोसर, फेर तेसर। सुतल छाती जेहन नीनसँ जागि गेल, कुनमुनेलक आ फेर घुरऽ लागल। बिछौनपर झुकल-झुकल। ओइमे जान बाकी छल। ओ उठल आ हुनकर बगलमे पटा रहल। शीला ठाम बनौलक हुनका लेल आ आँखि बन्द केले-केले अपनाकेँ हुनकर आश्रित कऽ देलक। आँखिकेँ खोलबाक प्रयोजन नै छलै, हुनकर ओंगरी देहक सभटा कोन-अंतरासँ परिचित छल। ओ बड़ काल धरि एक-दोसराक देहक भीतर ओइ चीजकेँ ताकैत रहल, जे नै जानि कहिया अप्पन ठाम छोड़ि कऽ चलि गेल छल। रघुनाथकेँ लागि रहल छल- नै, कत्तौ नै अछि, कत्तौ ने कत्तौ ऐ बा ओइ देहमे अछि सत्ते मुदा जौँ सच्चे हेतिऐ तँ कतऽ जैतिऐ। परेशान भऽ थाकि-हारिे ओ अप्पन मुँह शीलाक छातीक बीचमे धँसा देलक आ शांत पड़ि गेल। मन नै कऽ रहल अछि, तँ छोड़ू।- शील आस्तेसँ बाजल। कनी काल धरि रघुनाथ किछु नै बाजल, फेर एक बेर हिचकी लेलक। शीलाकेँ लगलै जे ओकर छातीक बाम दिससँ जे गरम चीज बिछौनपर टघरि रहल अछि, ओ नोर थिक। रघुनाथक नोर। ओ हुनकर उघारल पीठ ससारलक- आस्तेसँ। मन तँ कऽ रहल अछि, देहे संग नै दऽ रहल अछि।- टूटल सांसे रघुनाथ बाजल। -तँ ऐमे दुखी हेबाक की गप अछि? होइत छै एना कखनो-कखनो। -नै, ई आब कखनो कालक गप नै लागि रहल अछि, शीला। -बड़ तनावमे रहि रहल रही ऐ बीच। तइसँ एना अछि। -नै, नै, फुसिये मोन नै बहटारू। हम ओइ लीखकेँ चीन्हि गेलौं, जइ बाटे चलि कऽ ई देहमे पैसैत अछि। -के ऊ। -बुढ़ापा। रघुनाथ बाजल आ कूही भऽ कानऽ लागल। शीला ओकरा पकड़िकेँ बैसौलक आ सांत्वना दैत बाजलि- एहन किछु नै अछि। दिमागी भूत खाली। बिना काजक सोचैत रहै छी, राति-दिन। हम कोनो शिकाइत केने छी कहियो? आर की चाहै छी। सदिखन जवाने रहब की? ओना, ई सभ बेटी-बेटा लेल छोड़ि दियौ। हमर-अहाँक उमेर थोड़े अछि ई सभ करबाक। अगला चारिम आ पाँचम दिन साँझमे जखन रघुनाथ कॉलेजसँ घुरल तँ शीला ओकरा खबरि केलक जे टेस्ट दऽ कऽ धनंजय आबि गेल अछि। ओना जौं ओ खबरि नै करितिऐ तखनो ओसारपर बाइकेँ ठाढ़ देखि कऽ ओ बुझि गेल छल। कपड़ा बदलि कऽ जखन ओ बाहर आएल तँ धनंजयकेँ देखलक। पुछलक- ऐबेर केहन भेल पर्चा। -बड़ नीक। निकालि लेब ऐबेर। -पाँच बरखसँ यएह गप सुनि रहल छी। सभ बेर निकालि लै छी। -एस.सी., एस.टी. कोटा आ घटल सीटपर हमर सक नै अछि। ओकरा लेल हम की करी? रघुनाथ ओकर कोना उतारा नै देलक। ऐ बीच शीला बाप-बेटा लेल चाह लऽ कऽ आएल। चुपचाप चाह पिबैत रहल। चुप्पी राजू तोड़लक- सुनने छी, अहाँ समएसँ पहिने रिटायरमेंट लैबला छी। -लैबला नै, लऽ लेने छी। आइ चिट्ठी देलौं। -एना किए केलौं अहाँ। -ई हमरासँ नै, अप्पन भाइ संजयसँ पुछू। शीला दिस देखैत रघुनाथ बाजल। -संजय तँ अछि नै, हम छी। कोनो निर्णय लेबासँ पहिने अहाँकेँ हमरा बताबैक तँ चाही छल। -बतैतिऐ तँ अहाँ की करतिऐ। हुनकर चेहरा कनी काललेल खिचा गेल, एक केर हँ देखलौं, दोसर केर नै, नै सुनऽ चाहैत रही। आ अखन ओ दिन नै आएल अछि जे हम अहाँ सलाह पर चली। धनंजय हुनका दैखैत रहल। फेर माँ दिस देखलक। शीला माथ झुकेने बैसल रहल, किछु नै बाजल। -अहाँकेँ निर्णय लैत काल हमरा लऽ कऽ सोचबाक चाही। अखन अनिश्चिते अछि हमर भविष्य। -ई सोचैत-सोचैत हम बूढ़ भऽ गेल छी। अहाँ बालिग छी आब। अप्पन अपने देखू।- रघुनाथ खिसियाइत बाजल। ऐ उत्तरसँ धनंजय मसोसि कऽ रहि गेल। ओ आससँ माँ दिस देखलक जे ओ किछु बाजए। -अहाँकेँ ई बुधि दीदी आ संजयक कालमे किए नै आएल छल, हमरे कालमे किए आबि रहल अछि। शीलाकेँ खराब लगलै। ओ टोकलक- चुप रह राजू, कखैन की बाजबाक चाही, बुझैत नै छिहीं की। -सभ बुझै छी माँ, एत्ते बुरबक नै छी। पता नै किए, हमरोसँ ईर्ष्या करै छथिन ई। अहाँ तँ बुझिते छी जे टेस्टक कोनो भरोस नै अछि, यएह सोचि हम नोएडाक एकटा मैनेजमेंट इंस्टीट्यूटक पता केने छी। इंस्टटीट्यूट तँ आरो छै, मुदा रेट बड्ड छै। यएह छै जे नीक अछि आ अप्पन सीमाक सेहो। दोसरासँ डोनेशन तीन लाख मुदा हमरासँ अढ़ाइ लाख लऽ रहल अछि। सभटा मिला कऽ एक बरखक खर्च छह लाख टका पड़ि रहल अछि। आ आब। जखन हमर बेर आएल तँ ई रिटायर भऽ कऽ घर बैसि गेल छथि। अपनाकेँ हमर ठामपर राखि कऽ सोचियौ ने। रघुनाथ सुनैत चुपचाप बैसल रहल। शीला हुनका देखलक आ ओ शीलाकेँ। कियो ककरोसँ नै बाजल। रघुनाथ उठि कऽ भीतर गेल आ कनी कालक बाद नोटक गड्डी संग आएल। -ई लिअ साढ़े चारि लाख। बाकी बचल छऽ मासमे लऽ जाएब। ओ गड्डी ओकर आगू फेक देलक आ ओतऽसँ हटि गेल। * बड़ समए लागि गेलै रघुनाथकेँ घरपर रहबाक आदति पकड़ैमे। ओ रहल तँ गाममे मुदा गामक नै रहल। गाममे ओ नै रहल तँ ओ गाममे की करितिऐ। पहाड़पुर जाए लऽ चाहैत छल, अप्पन गाछी, बसबिट्टी आ पाखैरक कारण- जतऽ चिड़ैक बोली आ गाय-महीसक डिरिएनाइ आ बड़दक घंटीक टनटनसँ गाम गनगनाइत छल, मुदा आब गाछ कटि गेल छल। बसबिट्टी साफ भऽ गेल छल आ पोखरि धानक खेत बनि गेल छल। गाछीक बीचसँ एकटा नहरि गेल छल, जकर कातमे प्राइमरी स्कूल खुजि गेल छल। ओकरे बगलमे दवाइक दोकानक लेल जमीन घेर लेल गेल छल। आम्बेडकरक गाम भेलाक बाद पहाड़पुर तेजीसँ बदलि रहल छल। गाममे बिजली आबि गेल। केबलक लाइन बिछा गेल छल। अखबार लऽ कऽ हॉकर आबऽ लागल छल। किछु घरमे टीवी, पंखा आ फोन लागि गेल छल। सड़कपर खडंजा बिछा गेल छल। खपरैलक किछु मकान रहि गेल छल, बाकी सभ पक्का छल। जे पक्का नै छल, तकर आगू ईंटा खसल नजरि आबि रहल छल। रघुनाथ अपनाकेँ टी.वी. आ अखबारमे व्यस्त राखऽ लागल। शौक तँ उपन्यास पढ़ैक छलै मुदा उपन्यास कॉलेजक पुस्तकालयमे छलै जतऽ जाएब ओ बंद कऽ देने छल। हँ, ओ वएह उपन्यास दोबारा पढ़ि रहल छल, जकरा कहियो ओ पढ़ि गेल छल। मासमे एकाध बेर नगरक पेंशन ऑफिसक चक्कर ओ जरूर लगा लै छल। गाममे ओ नहिये ककरो कतय जाइ छल, नहिये हुनका कतय कियो आबै छल। ओ लड़का-बच्चाक लिखाइ-पढ़ाइकेँ काज बुझै छल, बाकी काज तँ फालतुए। सम्मान सभ करै छलै, छोट-पैघ सभ, मुदा अगुआएल वर्गसँ बेसी पिछड़ल आ दलित। तइसँ रघुनाथ हुनकर किताब-कॉपीसँ लऽ कऽ नाम लिखेबाक फीस आ फीसक माफी लेल जे कऽ सकै छल, करै छल। ओ गामक प्रपंच आ राजनीतिसँ निर्लिप्त बड़ सोझ-सरल आ सज्जन लोकक रूपमे सबहक प्रिय छल। मुदा ओ सबहक प्रिय नै छल। ठकुरानक, जकरा ओ अप्पन दियाद-बाद कहै छल, ओकर लड़का ओकरा पसंद नै करै छल आ तकर कारण छलै एक तँ जखन मंडल आयोग लागू कएल गेल तँ तकर स्वागत करैबलामे कॉलेजमे असगरे अगुआएल वर्गक अध्यापक रघुनाथ छल। दोसर जखन-तखन चमटोलक हरवाह हड़तालक धमकी दै छल, ओ मानै छल जे से वाजिब अछि आ हुनकर सभक हक अछि। -उपाए की अछि, से तँ बताउ? -उपाए अछि। चाहे तँ हुनकर मांगपर सहानुभूति संग विचार करू बा फेर एकटा ट्रैक्टर कीनू। आ किएक तँ अपनामे सँ कियो ऐ औकातिक नै छी, जे असगरे कीन सकी, तइ दुआरे हरक पाछाँ दाम बान्हि दियौ, जे सभ लोक मिल कऽ कीनी। ई गप्प भेल छल बब्बन कक्काक दरवाजा पर जखन दियाद-बादक सभ बड़-छोट जुमल छल। चलाएत के? ड्राइवरक संग हेल्पर चाही, खलासी चाही। अप्पन ई छौड़ा सभ जे पछिला सात-आठ बरखसँ कंपीटिशनक नामपर गामसँ नग्र आ नग्रसँ गाम मोटरसाइकिलपर घूम-फीर कऽ रहल अछि, जखन नोकरीक कोनो आस नै तँ यएह करए। रघुनाथ बाजि तँ गेल मुदा ओकरा लगले लगलै जे गलती भऽ गेलै। छौड़ा सभ बिख-सबिख भऽ गेलै, आँखि लाल भऽ गेलै। मुदा आगू बुढ़-पुरान छलै, से मसोसि कऽ रहि जाइ गेल। ओइमे सँ किछु रिसर्च कऽ रहल छल, किछु कोचिंग कऽ रहल छल, किछु केर अंतिम चांस छलै कंपीटिशनक, किछु कंपीटिशनक इंटरव्यूक तैयारी करै जाइ छल आ ओइ बीचमे कोनो तरहक बाधा नै चाहै छल। एहन तरहक प्रस्ताव अपमानजनक छलै ओकरा लेल। ई तँ कियो नै जानै छल जे ककर भाग्यमे की लिखल छै? आ की कहतै लोक, यएह जे ट्रैक्टर चलाबैक लेल केने छल एम.ए., एम.एस.सी. आ पी.एच.डी.। ओकरा सभकेँ जे कहतै से तँ कहबे करतै- अहाँ की कहबै? अहाँ तँ बाप छी। सभटा लाज-धाख घोरि कऽ पी गेल छी की? मुदा ओकरामेसँ कियो बाजितिऐ, ओकरासँ पहिने आहत स्वरमे बब्बन कक्का बाजल- रग्घू। जाए दियौ। की कहियौ तोरासँ? तोहर बेटा एकर हालत मे हेतिऐ तँ आइ एना नै बाजितिऐ। रघुनाथ उठि कऽ घर घुरि आएल, चुपचाप। ओकरा दुख छलै जे ओ ओतऽ जे गप कहने छल, ओइ छौड़ा सबहक बाप ओकरा सभसँ कहै छल-कोढ़िया, अबारा। ई गप केकरोसँ नुकाएल नै अछि जे कोचिंग, फार्म, टेस्ट ओकरामे सँ कतेक लेल नग्रक दोस्तसँ मिलै-जुलैक बहन्ना छलै। ई रघुनाथे टा नै, ओकर सभक गार्जियन सेहो बुझै छलै जे ओकरा सभ लेल कोटा बा आरक्षण एकटा सहज कवच बनि गेल छै, जकर प्रयोग ओ सभ अप्पन असफलताकेँ नुकेबा लेल करैत अछि। मुदा ऐ समस्याक जे हल सुझौलक तइसँ बेटे सभ टा नै बाप सभ सेहो खराब मानि गेलै। एकर बादसँ नहिये कहियो कियो रघुनाथकेँ बजौलकै, नहिये ओकरासँ पुछलकै आ नहिये ओ कोनो सलाह देलक। हँ, ओकरा कतय एकमात्र आबऽ बला रहि गेल छलै छब्बू पहलवान। ओ किए आबै छलै आ सेहो शुरूहेसँ- तकर उत्तर नहिये छब्बू लग छलै, नहिये रघुनाथ लग। ककरो पुछलापर एतबे टा कहतिऐ- नीक लागैए। शांति भेटैए। ओ जखन आबै छल तँ गाँजा, भीजल साफी, चिलम, डोरक टुकड़ा आ सलाइ-काठी संग आबै छल। असगरे निश्चिंतीसँ दम लगैतिऐ। आ खाटपर पटा रहै छल। एम्हर किछु सधुआ गेल छल। जखन-तखन बाजि उठतिऐ- मास्टर कक्का, पता नै किए आब जीयैक मन नै करैए। एक बेर हुनका चुप आ उदास देखि कऽ रघुनाथ पुछलक- की गप अछि छब्बू। ऐ तरहे किए पटायल छी? छब्बू आँखिकेँ बंद कऽ बाजल- कक्का, आइ भोरमे बजरंग बलीक सपना आएल छल। बाजल, छब्बू। अहाँ जे पाप कऽ रहल छी, ओकर प्रायश्चित सेहो अहींकेँ करऽ पड़त, दोसराकेँ नै। -जखन अहाँ जानै छी जे पाप अछि, तँ किए करै छी? -हम देखिते बेबस भऽ जाइ छी मास्टर कक्का, की बताबी अहाँसँ? रघुनाथ दिसा-फरागत लेल जैबाक तैयारी कऽ रहल छल, बाजल- मुदा छब्बू, हम एकटा गप अहाँसँ कहि रहल छी, ख्याल राखब। जखैन धरि हुनकर हड़ताल चलि रहल अछि, ताधरि बिसैरियो कऽ चमटोल दिस पएर नै राखब। कोनो भरोस नै अछि ककरो। -गप तँ ठीके कहि रहल छी कक्का, मुदा एकटा हमर गप अहूँ सुनि लिअ। जौं ढोल बजाएत, तँ पाथर पड़ै बा बज्जर खसए, हम नै सुनब, नहिये देखब- चलि देब। जखन अहाँकेँ ककरो गप मानबाके नै अछि, तँ जे इच्छा अछि, से करू। रघुनाथ बड़बड़ाइत सिमान दिस चलि गेल, जिम्हर बब्बन सिंहक पंपिंग सेट छल। ई हड़तालक सातम दिन छल। अषाढ़ शुरू भऽ गेल छल आ ऐबेर पानि खूब बरिसल छल। हरवाहा एहन कालमे हड़ताल केने छल- खेतक जोत, बोनि आ केराकेँ लऽ कऽ। हरवाही आ खेतकेँ लऽ कऽ। बाबा आदमक जमानासँ चलि आबैत रेटपर काज करबासँ मना कऽ देने छल हरवाहा सभ। बीच-बीचमे हड़ताल केने छल ओ सभ, मुदा ठाकुर सभ बोनि कनी बेसी बढ़ा देने छलै आ ओकरा सभकेँ बुझा-सुझा कऽ ठीक कऽ देने छलै। मुदा ऐबेर आर-पारक लड़ाइ छल। ऐमे गोबर पाथैबाली ओकर छौंड़ी आ स्त्री सभ सेहो छलै। परिणाम ई भेलै जे खेतमे लागल पानि सुखाए लागल छल, चरनीपर बान्हल माल-जाल लगही-गोबरमे उठि-बैस रहल छल आ पूरा ठकुरपट्टी गंदगीसँ भरि गेल छल। ऐबेर हड़ताल बुझैमे ठाकुर सभ चूकि गेल छल। हरवाहा थाकि-हार कऽ नै आएल आ नहिये खेखनिया केलक, नहिये ओकर चूल्हि मिझेलै। जरूरी पड़लै तँ अहिरपट्टी गेल, एम्हर नै आएल। पूरा इलाकाक चमटोलीक भविष्य पहाड़पुरक हड़तालपर आश्रित छलै- ओ सभ से बुझि जाइ गेल छल। ठाकुर सभ राति भरि बब्बन सिंहक द्वारपर पंचायत करैत छल आ मुंसफ, जज, मजिस्ट्रेट, कलक्टर, एस.पी., इंजीनियर, डॉक्टर नै भऽ सकैबला हुनकर छौड़ा सभ हुनकर पंपिंग सेटपर बैसकी। ओ सभ दिन साँझ आठ बजे धरि ओतऽ जुमै छल, कहियो गाँजाक दम लगाबैत छल, कहियो दारूक बोतल खोलैत छल आ चमटोलीकेँ सदिखन सैंतबाक योजना बनाबैत छल। कोना सैंतल जाए, कखैन सैंतल जाए, सैंतबाक लेल तरीका की हुअए- ई सभटा समस्या छलै जइ लऽ कऽ ओ सभ गंभीरतासँ विचार करतिऐ आ तेसर गिलास धरि पहुँचैत ओ सभ कोरस गाबऽ लागै छल। गाबैत चलू, गाबैत चलू, एक दिन अहूँक जमाना आएत। जहिना ई खत्म हेतिऐ तहिना इंटरनेशनल लुक भऽ जाइ जाइत छलै- मनमे अछि विश्वास। हो हो मनमे अछि विश्वास हम हएब कामयाब, एक दिन। ओइ काल रामभरोस दुबे, जे पड़ोसी गामक छल आ भंगेड़ी छल आ ओकरा छोड़ि ऐ मंडलीक निअमित सदस्य बनि गेल छल- पतरा खोलि कऽ दिन देखैत रहतिऐ जे सैंतबाक तिथि कोन हुअए? ओ मुहुर्त तँ बता देने छल- कृष्णपक्षक अमावस्याक राति, मुदा कोन मासक अमावस्या हुअए, ऐ लऽ कऽ आश्वस्त नै भऽ पाबि रहल छल। ओम्हर हड़ताल खिचैत जा रहल छल आ गद्दरि फसिलक आस खतम भऽ रहल छलै। ओइ काल एक दिन नहरक रस्ते एकटा ट्रैक्टर धड़-धड़ करैत आएल छल आ अहिरपट्टीमे दशरथ राउतक दरबज्जापर ठाढ़ भऽ गेल। ओकरा लऽ कऽ आबऽबला आन कियो नै जसवंत छल- दशरथक बेटा। दशरथकेँ चारि टा बेटा छल- दूटा गाममे आ दूटा मध्यप्रदेशक कोरबामे। गामबला दूध आ खोआक व्यवसाय करैत छल आ कोरबाबला बलवंत कोलियरीमे ठेकापर लेबर सप्लाइ करैत छल। आ जसवंत देसी दारूक भट्टी चलाबैत छल। जसवंत जाधरि गामपर छल लुच्चा, लफंगा आ लतखोर मानल जाइ छल। भागलो छल तँ बापसँ मारापीटी केलाक बाद। शुरू-शुरूमे मध्यप्रदेशसँ पुलिस आएल छल, एक-दू बेर तकैत, मुदा बादमे सुधरि गेल कनी-मनी। एम्हर जखैन गाम आबै छल- भैया, बाबू, कक्कासँ नीचाँ ककरो नै कहै छल। कहै छल जे परदेसमे सभ किछु अछि, इज्जत नै अछि। चाही जतेक कमा लिअ, रहब दूइये नंबरक आदमी। दू नंबर माने दू कौड़ी। आब ओ सभ किछु छोड़ि-छाड़ि कऽ गाम-जबारक सेवा करऽ चाहै छल। संजोगे छलै जे ओ पछिला एक-दू बेर जखन-जखन गाम आएल, गाम हड़तालक चपेटमे छल। ओ नै एम्हर छल, नै ओम्हर। ओकर उठब-बैसब दुनू दिस छल-ठाकुर दिस सेहो, हरवाहा सभ दिस सेहो। ओ अप्पन दिससँ दुनूक बीच सुलह-समझौताक पूरा कोशिश केलक, मुदा नजदीक एबाक बदला दुनू एक-दोसराक आर विरुद्ध होइत गेल। जयवंत ओइ दुनूकेँ जवाब देलक ट्रैक्टर आनि कऽ, जे सभ किचकिचबैत रहैत छलै जे अहीरक बुधि ओकर ठेहुनमे होइत अछि (तइसँ कारण ओ सभ ठेहुनक बीच बाल्टी दबा कऽ गाय आ महीस दुहैत अछि)। ट्रैक्टर खेतमे ठाढ़ छल- ट्रॉली, कल्टिवेटर, हार्वेस्टर आ थ्रेशरक संग, गेंदाक माला पहिरने। ओकर कातमे खाट पर डंटा लऽ कऽ दशरथ बैसल छल। गामक नेना सभ ओकरा घेरने छल- कियो छू कऽ देखऽ चाहै छल, किछु ट्रॉलीपर चढ़ऽ चाहैत छल। दशरथ तमसा रहल छल आ डंटा पटकि कऽ ओकरा सभकेँ भगा रहल छल। जाधरि कथा आ हवन नै भऽ जाइ छल ताधरि लोकक नजरिसँ बचा कऽ राखैक छलै ओकरा। भगवंत उर्फ भग्गूक जिम्मा दोसर काज छलै। ओ कॉपी आ कलमक संग इम्हरसँ उम्हर भाग-दौड़ कऽ रहल छल। किसानक लेल सभसँ मुश्किल आ परेशानीक छल ई मास। अगहनक खेत तैयार छल, खेती पछता भऽ रहल छल, जल्दीसँ जल्दी जोताइ आ रोपनी करबाक छलै, तकर बाद रबीक नंबर छल। बड़ मौकापर आएल छलै ट्रैक्टर। तारीख लेल लूटि मचल छलै, भाड़ा चाहे जे लिअ, बीघाक हिसाबे। आर भाड़ा सेहो की लेबाक छलै-वएह जे रेट बान्हि देने छल, दू कोस दूरक इकबालपुरक काशी सिंह अप्पन ट्रैक्टरक। कथा लेल अखन तीन दिन बाकी छलै आ इम्हर अगिला तीन मासक सभटा तारीख बुक। दशरथ जकरा ककरो पुछै छल, तकर तँ बुझू भाग्ये। हुनका पुछैबला वएह छल जे नव घर-दुआर बनबा रहल छल, माटि आ खपरैलक घर खसा कऽ। जखन बिजली आबि गेल छल तँ ओइ स्टैंडरक घर चाही। दीया बाती आ लालटेन बला नै। एहन लोकसभ पहाड़पुरेटा मे नै, पास-पड़ोसमे सेहो छल। ककरो पजेबा चाही, ककरो सीमेंट, ककरो बालु, ककरो गिट्टी, ककरो लोहा-लक्कड़। केतारी सेहो तैयार भऽ रहल छल, सुगर मिलक लेल। जखन ट्रॉली छल, तखन सौ टा काज। दशरथ सबहक सुनतिऐ आ धैर्य राखैक लेल कहैत छल- सभ भऽ जाएत। कनी-कनी हएत। मुदा सबहक काज हएत। ठाकुर सभ सर्द छल। ओ सभ ओकरा सभकेँ सदिखन अपनासँ नीचाँ बुझैत छल मुदा आब हुनकर सभक चिरौरीक दिन आबि गेल। हुनका सभकेँ आब अफसोच भऽ रहल छलनि जे ई गप जखन रघुनाथ कहले छल तँ हुनकर किऐ नै सुनलौं। * राति भऽ गेल छलै। गाममे शान्ति पसरल छलै। कनी-कनी झिस्सी पड़ि रहल छलै। ढाबुस बेंगक टर्र-टर्र आ सनकिरबाक झन्न-झन्नसँ दिगंत गूंजि रहल छल। ट्रैक्टरक काज शुरू कऽ देलाक बादो ठाकुर हारल सन अनुभव कऽ रहल छल किएकि चमटोलमे कोनो तरहक बेचैनी नै छलै। अन्तर एतबे टा आएल छलै जे हरवाहा सभ आब गाममे आ गामक रस्तासँ आबऽ-जाए लागल छल- मूड़ी झुकैले, आरामसँ, बिना बाजले बा दुआ-सलाम केले। ठाकुर सभकेँ लागैत छलै जे ओ छाती उतानि कऽ हुनका सभपर हँसैत आबि रहल अछि- जा रहल अछि। रघुनाथ सुतएसँ पहिने बत्ती मिझाबैले जा रहल छल आकि माथपर बोरा राखने पानिमे भिजैत गनपत बरण्डापर आएल। गनपत हुनकर हरवाहा छल, हरवाहीक अलाबे घर-दुआरक काज सेहो देखैत छल। रघुनाथ ओकर बेटाकेँ अप्पन कॉलेजसँ बी.ए. करौने छल, ओकर बाद ओकरासँ एकटा फार्म भरबौने छल, जइ कारणसँ ओ बटिखरा-नाप इंस्पेक्टर बनल छल। ऐ अनुभवकेँ गनपत कहियो नै बिसरल। ऐ काल हुनकर ओ बेटा एम. राम मिर्जापुरमे पोस्टेड छल। -ऐँ गनपत, तूँ? कियो देखलकौ तँ नै? -नै मास्टर साहेब। ओ बोरा खाम लग राखि मचिया खिचलक। -एकटा गप बता दी। हम अहाँकेँ नै छोड़ब, भले अहाँ छोड़ि दियौ। हँ, ई काल कनी खराप अछि। -जानै छी। अइलौं कोना, से कहू। -गेल छलौं मगरूरक हिंया मिर्जापुर। सोमारू सेहो ओत्ते छै ने। मगरू ओकरा आटा-चक्कीपर ओतऽ काज पकड़ा देने छै आ ओ पक्का भऽ गेल अछि ओइ काज मे। -तँ? -तँ मगरू कहलक जे जाँत, ओखली, मूसरा, ढेकी, चक्की तँ कियो चलाबैत नै अछि आइ-काल्हि आ आटा पिसाबै लेल जाइ छै लोक एक-डेढ़ कोस दूर- डेढ़गावां बा कमालपुर। एनामे जौं गामपर आटा-चक्की बैसाइल जाए तँ केहन रहत? सोमारू सम्हारै लेल काफी अछि। -बैसेबै कतऽ? -सरकार, चमटोल आ गामक बीचमे जे ऊपर जमीन छै, ओइपर। आन कोनो काजक तँ ओ छै नै। रघुनाथ किछु काल धरि सोचैत रहल। -पुछबाक ईहो छल जे ठाकुरे लेल धुत्… रोटी आ भात छै, आटा आ चाउर तँ नै छै। रघुनाथ हँसल- ई सभ नै सोचू। शुरूमे भले अनसोहाँत सन करत, देर-सबेर सभ जाएत आ पिसाएत। एतबे टा नै, आस-पड़ोसक गामसँ सेहो आएत। जखन चक्की गाममे रहत तँ ओत्ते दूर के जाएत? बस देर नै करू। आर बताउ, कत्ते दिन रहलौं मिर्जापुरमे। -रहलिऐ दस दिन। एक दिन तँ पुछैत-पाछैत गुड़िया बेटीक इस्कूल चलि गेलिऐ। बड़ खुशी भेल। घर लऽ गेल। अप्पन हाथसँ खाना पकेलक, खुएलक, अहाँक आ मलकाइनक हाल-चाल पुछलक। चलऽ लागलौं तँ बीस टा टका जबर्दस्ती पकड़ा देलक। एक्को रत्ती नै बदलल छै। -ढेर दिन रहि गेलौं मगरू लग। -नै मास्टर साहेब, सभ दिन ओतऽ नै रहलौं। तीन दिन तँ पीसीक हियाँ रहलौं। पीसीक जँ सभसँ छोट बेटा अछि, ओ उहाँक डिप्टी मजिस्टे्रट छै- यसडीयम। बड़ पैघ कोठी छै, ओकर आगू कलम सेहो बड़ पैघ छै। जीप छै, पुलिस छै, ड्राइवर छै, नोकर-चाकर छै। ऊ साधारण लोक थोड़े छै। इजलास लागै छै। सभ कियो भेंट नै कऽ सकै छै। पीसीसँ कतेक-कतेक दिन भेंट नै होइ छै। हम तँ देखबे नै केने छलौं ओत्ते पैघ लोक। ओत्ते रहि गेलौं तीन दिन। पीसी रोकि लेलक। रघुनाथ कनी गंभीर भऽ गेल- नाम की छै ओकर। -हम सभ तँ सिद्धू-सिद्धू बाजै छी मुदा नाम छै सुदेश भारती। राम नै लिखैत अछि। रघुनाथकेँ काटू तँ खून नै। ई वएह सुदेश भारत छल जेकर जिक्र सरला केने छल। ओकरासँ ओ बियाहक गप केने छल। जौं ओ सच्चेमे कअ लेतिऐ तँ गनपत जे हर जोतैत छल आ ओकर आगू ठाढ़ रहैत छल आ मचियापर बैसैत छल, ओकर रिश्तेदार हेतिऐ। खरपत जे गनपतक बाप अछि, हुनकर समधी हेतिऐ आ गर मिलतिऐ। हुनकर संग खाटपर बैसतिऐ आ जमायक बापक हैसियतसँ ऊँच हेतिऐ हुनकासँ। हुनकर मन भेल जे शीलाकेँ अबाज दऽ कऽ बजाबै आ कहै जे सुनू, गनपत की कहि रहल अछि। -बाकी सबहक अप्पन दुख छै मास्टर साहेब। ओकर बियाह नेन्नेमे भऽ गेल छलै। ओ अप्पन मेहरकेँ छोड़ि देने अछि। ओकर झमेला चलि रहल छै आइ-काल्हि एकटा मास्टरनीसँ। ओ ऊँच जाइतक छै। कहियो कहै छै जे बियाह करब अहींसँ, कहियो कहै छै- नै करब। माँ-बाप नै चाहैए। ऐसँ ओकरा लटकेने चलि रहल छै। पीसा बड़ दुखमे रहै छै। -तूँ जो, देर भऽ रहल छौ। ऊ मास्टरनीक संग इहाँ-उहाँ जाइ छै, होटल सेहो जाइ छै, दोसर शहर सेहो घूमै छै, खूब मौज करै छै, मुदा पीसीसँ नै मिलाबै छै। पीसी बाजल जे हमरा देखा दे, एक बेर हम बतेबे ओकरा जे किए नै कऽ रहल छी बियाह। मुदा, भेँट कराएब तखैन ने। -कहलियौ ने, नीन आबि रहल अछि। ओ बत्ती बुझा दहीं। -अच्छा साहेब। गनपत ठाढ़ भऽ गेल। -मुदा साहेब, एक बेर बुझा देतिऐ जे मेहरकेँ छोड़ि कऽ किए एना कऽ रहल छी। मेहरिया तँ कत्तौ चलि जाएत आ ककरो ने ककरो राखि लेत, मुदा बदनामी ककर हएत। ओकरे ने। -तूँ जेमे कि नै, दिमाग नै चाट। -अहाँ नै जाएले चाहब तँ कहियो कोनो काजक बहाना कऽ हमहीं ओकरा आनि लेब। रघुनाथ तमसा कऽ थरथराए लागल। ओ उठि कऽ झमारि कऽ बत्ती मिझा देलक। ओ ओकरा ठेल कऽ बाहर कऽ देलक। गनपत माथपर बोरा राखि कऽ बाजल- साहेब, जे कहै लेल आएल रहि, से तँ बिसरिए गेलौं। एकबैग ओकर अबाज फुसफुसाहटिमे बदलि गेलै, देखिये रहल छी हवा खराब छै। नै, एकटा गप कहि रहल रही। एहन कोनो गप नै अछि मुदा पहलमानकेँ बुझा देबै जे जखन धरि हवा खराब छै, चमटोल दिस नै देखए। आ देखत की, उम्हर नै जाए। रघुनाथक ध्यान नै छल ओकर फुसफुसाहटि दिस। ओकर चिंता आ बेचैनीक कारण दोसर छल- कि कत्तौ एकरा सरला आ भारतीक संबंधक जानकारी नै हुअए। जखन संबंधी अछि तँ कहियो ने कहियो मगरू जरूर भेंट करैत हएत, भऽ सकैत अछि जे भारती सेहो चर्चा केने हएत। आ नै हुअए तँ मगरू दुनूकेँ कहियो संगमे देखने हएत। जखन एक्के नग्रमे अछि तँ कोना संभव अछि जे ओकरा पता नै चलल हेतै अखन धरि। -शीला। आखिर ओकरा रहल नै गेलै आ ओ दोसर बेर शोर पाड़लक- तामसेमे। * पहलमान माने छब्बू पहलमान। पहाड़पुरक दक्खिन हिस्सामे घर छल बजरंगी सिंहक। ओ इलाकामे छब्बू पहलवानक नामे जानल जाइ छल। गामक नाम दूर-दूर धरि पसारने छल। दंगलमे जतऽ–जतऽ गेल, जीत कऽ घुरल इनामक संग। टंगड़ी आ धोबियापाट ओकर प्रिय दांव छल। लंबाइ कम नै, जुलुम तागति आ फुर्ती छलै ओकरामे। ककरो पकड़ि लिअए तँ छोड़ाएब मुश्किल, दाबि दिअए तँ उठब मुश्किल, पट पड़ि कऽ माटि पकड़ि लिअए तँ चित्त करब मुश्किल। भैंसक केहुनीसँ मारि दिअए तँ पसरि जाए आ उठि नै सकए। मुदा हुनकर पैघ भाए- जकर चलिते ओ पहलवानी करै छल, जखन असमय एकाएक गुजरि गेल तँ ओ लंगोट खुट्टापर टांगि देलक आ घरक जिम्मेदारी संभालि लेलक। छब्बूक बियाह नै भेल छलै। जखन उमेर छलै तखन केलक नै अखाड़ाक जोशमे आ जखन करए चाहलक तँ उमेर नै रहलै। कियो अइबो नै केलै। ऐ तरहेँ परिवारक नामपर हुनकर दस बरखक भातिज छल आ मसोमात भौजी। भौजी दिन-राति पूजा-पाठ आ धरम-करममे लागल रहै छलि आ भातिज स्कूल जाइ छल। खेती-बारी छब्बू सम्हारै छल आ सम्हारत की- झूरी हरवाहाक जिम्मा छोड़ि कऽ निश्चिंत रहै छल। मुदा ई निश्चिन्ती ओकर भाग्यमे नै छलै। एक दिन ओकर नजरि पड़ि गेलै झूरीक स्त्री ठोलापर। दू बच्चाक माए मुदा कहैक लेल। ऊ कलवा लऽ कऽ आएल छली, अप्पन मरदक लेल। छब्बू ओकरा पहिनो देखले छल-नै जानि कतेक बेर। मुदा ऐबेर नजरि नै पड़लै, गड़ि गेलै। ओ ओकरा आबैत देखलक, बैसैत देखलक, चलैत देखलक- की छड़ी सन शरीर, की लचक, की गस्सल बाँहि। गड़ि गेल आँखिमे। कतऽ ई अक्खर झूरी आ कतऽ ई गांजाक कली। बस सुट्टा लगि जाए तँ उड़ि जाउ आसमानमे आ फेर उड़ैत रहू। जमीनपर घुरैक नौबति नै आबए। आर फेर तकर बाद शुरू भेल छब्बू पहलमानक सुट्टा मारैक खिस्सा। मुदा खिस्सा रफ्तार पकड़तिऐ एकरासँ पहिने भौजीकेँ अंदाजा भऽ गेलै। भातिज मुन्ना माँकेँ बतेलक जे ओ कक्का आ ठोलाक दलानमे ओकरा नुक्का-छुप्पी खेलैत देखने छल। भौजी कानए लागल। ओ छब्बूसँ बाजल- छब्बू, हमर एकटा विनती अछि। भैया तँ रोकै-टोकैक लेल नै अछि, अहाँ करब अप्पन मनक। मुदा चाहे जे करी, करू घरसँ बाहर। एकरा साफ-सुथरा रहऽ दियौ। इशारा बुझि गेल छब्बू। एकर बादसँ छब्बूक चमटोलीमे आवाजाही बढ़ल। हरवाहा लेल हुअए बा रोपनी-कटिया लेल बजेबाक लेल। चमटोलीमे जाएब ठाकुर अप्पन बेइज्जती बुझै छल। जरूरी काज भेल तँ ओ बच्चा सभकेँ पठबै छल। मुदा छब्बू एहन मान-सम्मानसँ दूरे छल। जँ ओ गाममे लखाह नै दैतिऐ, कलम बा नहरपर सेहो नै लखाह दैतिऐ, आरि-खेतपर सेहो नै लखाह दैतिऐ तँ लोक ई मानि लै छल जे ओ चमटोल गेल हएत, ठोलाक संग। ई चमटोल सेहो जानैत छल आ गाम सेहो। तमसाह एत्ते जे ओकरासँ सोझाँ-सोंझी कहैक हिम्मत ककरो नै छलै। सभ अगुएलहा बेर-बेर मिल कऽ घरेनक सभसँ प्रतिष्ठित बब्बन कक्कापर दवाब बनेलक जे ओ अप्पन सकसँ जे किछु कऽ सकए, करए। बुझाबियौ बा धमकाबियौ बा जातिसँ बाहर करू। एहन कहएबला अगल-बगलक गामक लोक सेहो छल। शिकाइतसँ तंग आबि कऽ कक्का छब्बूकेँ बजैले छल। छब्बू हुनकर गप बड़ ध्यानसँ सुनलक आ अंतमे बाजल- गप तँ ई ठीक अछि कक्का मुदा ककरा-ककरा जातिसँ बाड़ब। ककरो-ककरो झाँपल अछि आ ककरो-ककरो उघार। मुदा बचल तँ कियो नै अछि हमर नजरिमे। रहल गप हमर तँ अहाँसँ नै नुकाएब। हम सभ किछु करै छी मुदा मुँहसँ मुँह नै सटबै छी। अप्पन धरम आ जातिकेँ नै बिसरै छी। कक्का माथ झुका कऽ बैसल रहल, किछु नै बाजल। छब्बू कनी काल बाद उठि कऽ चलि गेल। लोक मजाकमे कहै छल जे चऽरमे झूरी पहलमानक खेत जोतैत अछि आ पहलमान चमटोलमे ओकर खेत। हिसाब बराबर। आ झूरीकेँ ई छलै जे जखन ओ खेत जोति कऽ घुरै छल तँ छब्बू घरमे रोपनी कऽ कए आबैत छल। जखन छब्बू घरमे बजारसँ घुरतिऐ तखन छब्बू घरमे। ओ ओकर हेबाक आहट भेटिते तुरत्ते आपस भऽ जाइ छल। ओ एक बेर हिम्मत केने छल। हाथ जोड़ि कऽ कहलक- मालिक, हमर नै तँ कमसँ कम अप्पन इज्जतक ख्याल करू। लोक की-की कहैत अछि अहाँकेँ लऽ कऽ। एकर नतीजा ई भेलै जे ओ चौदह दिन भरि देह हरैद-प्याज देहपर पाति कऽ घरमे पड़ल रहल। असहाय ठोला। जीअब कठिन भऽ गेलै। नरक भऽ गेलै ओकर जिनगी। राति भरि झूरीकेँ छातीसँ लगा कऽ कानैत रहल आ तामससँ फनफनाइत रहल। सभसँ पैघ गप ई छल जे ग्राम सेवक चमटोलक, ओकरे जाइतक, पहलमानक संग गांजाक सुट्टा लगाबैत छल आ जखन कहियो कहतिऐ- कलेजा कड़ा राखू, खाली कनी बाट ताकू। -कहिया धरि बाट ताकू। सावन शुरू भऽ गेलै। ऐ मासमे पचैयां (नागपंचमी) पड़ैत छल। पहाड़पुरमे पचैयां छब्बू पहलमानक पर्व छल। ओइ दिन तीनटा बाल्टीमे भीजल चना आनल जाइ छल, परात भरि मिठाइ आबैत छल, बताशा आबैत छल, बजरंग बलीक पूजा कएल जाइत छल, छब्बू पहलमान लंगोट पहिर कऽ अखाड़ाक मोहारपर बैसैत छल आ अप्पन चेलाक गट्टापर रक्षा बान्हैत छल। ओ सभ उस्तादक आशीर्वाद संगे अखाड़ामे उतरैत छल। ओकर सभक कतेक जोड़ी होइत छल आ दुपहरिया बाद धरि पट्ठा सभ अखाड़ामे जोर-आजमाइश करैत रहतिऐ। सभसँ आखिरीमे छब्बू उतरितिऐ- पैघक पएर छुबि कऽ आ छोट सबहक हाथ जोड़ि कऽ। ई प्रदर्शनी-कुश्ती होइ छल। ओ अप्पन दांव आ करतब देखाबै छल- पहलमानी छोड़ि देलाक बादो। ऐ काल चमटोलसँ डफली आ नगाड़ाबला सेहो आबै छल आ झूमि कऽ बजाबै छल। अहिरटोलीक बनेठीबला सेहो रहैत छल आ एक-दोसरासँ खेलाइत पसीना-पसीना भऽ जाइ छल। दोसर गाममे पचैंया पर्व रहि गेल मुदा पहाड़पुरमे ई अखनो चलि रहल छल- चलनिक रूपमे सएह। मुदा ई गप सभ जानैत छल जे ई तहिये धरि अछि जाधरि छब्बू अछि। कोनो ठाकुरक नव पीढ़ीक लेल देह बनाएब, कशरत आ अभ्यास करब, कुश्ती लड़ब फालतू चीज छल। एकदम मूर्खताइ। बन्दूकक आगू मजगूतसँ मजगूत शरीरक की मतलब? तइसँ ओकर चेलामे बंसी अहीर,कहार, लोहार, गड़ेरिया छल, ठाकुर बाभन नै। मुदा ऐबेर खराप छल पचैयांक। पानि भोरसँ पड़ि रहल छलै- कहियो मद्धिम, कहियो तेज। अखाड़ा एक दिन पहिने तैयार केने छल अपनेसँ छब्बू। ई काज चेलामे सँ ककरो नै करऽ देने छल। मुदा ऊ थालम थाल भऽ गेल छल- धानक खेत सन। मिठाइ आ बताशा आबि गेल छल। बदाम फुलि कऽ अँखुआ गेल छल। इंतजारी छल बरखा थम्हैक। छब्बू कहि गेल छल जे अहाँ सभ तैयारी राखब, जहिना मौसम ठीक हएत, हम आबि जाएब। मुदा नहिये मौसम ठीक भेल, नहिये छब्बू आएल। पानि तखने थमकल जखन साँझ झलफलाएल। अकास साफ भेल आ जतऽ–ततऽ एकाधटा तारा नजरि आबऽ लागल। ओइ काल पुलिसक जीप आएल गाममे आ पता चलल जे छब्बूक हत्या भऽ गेल अछि। जनपदक सभसँ करेजाबला आ दमगर लोकक हत्या। ई खबर नै, बिजली छल, जे बदरी छटलाक बाद तरतड़ा कऽ ठाकुर टोलपर आबि खसल छल। ओ चाहे जे छल, जेहन छल- ठाकुर छल। आ ओकरा रहिते ककरोमे ऐ टोल दिस आँखि उठा कऽ देखबाक तागति नै छलै। आ आब? आब, चमटोलक बाहरी हिस्सामे, एकटा झोपड़ीक आगू थालमे चितंग पड़ल छल। मरल। उघार अकासक नीचाँ। एकटा लालटेन ओकर माथ लग छल, दोसर पएर दिस, दुनू ईंटापर। जेना लाशपर नजरि राखल जा सकए। लाश सेहो थाल आ माटिमे लेभराएल पड़ल छल। पएर ऐ तरहेँ छितराएल पड़़ल छल जेना बीचसँ चीर देल गेल छल। जननांग काटि देल गेल छल आ ओइ ठाम खूनक थक्का छलै, जइपर माछी झबरल छलै, उड़ि आ भिनभिना रहल छल। पुलिस परेशान छल, ओइ जननांगक लेल। कटल तँ गेल कतए? ऐ लाश लग कत्तौ नै छल। ओ लालटेन आ टॉर्चक रोशनीमे ओकरा ताकि रहल छल। जमीन समरस नै छलै- खधाइ बहुते छलै आ सभमे पानि भरल छल। ओकरा जतऽ कत्तौ संदेह होइ छलै, लाठीसँ हूड़ि कऽ देखि लै छल, भले ओ माटिक ढेला हुअए। एक डर सेहो छल कत्तौ भीतर, जे एहन नै हुअए जे कुक्कुर आएल हुअए आ मांसक लोथ बुझि कोनो दोसर ठाम लऽ गेल हुअए बा खा गेल हुअए। ई खोज देर राति धरि चलैत रहल। पुलिस अप्पन दिससँ सभटा तैयारीक संग आएल छल मुदा जइ आशंकाक संग आएल छल, ओहेन किछु नै भेलै- नहिये कोनो दंगा भेलै, नहिये चमटोल फूकल गेल, नहिये बदलाक कार्रवाई भेल। झूरीक झोपड़ीक बाहर ताला लटकि रहल छलै आ चमटोलमे सुन-सन्नाटा छल। एक्कोटा मर्द नै। सभटा मर्द बस्ती छोड़ि कऽ नै जानि कतऽ चलि गेल छल। पुलिस एबासँ पहिलेसँ। मौगी आ नेना छल, ओ सभ अप्पन घरमे बंद छल। हत्या एकटा एहन लोकक भेल छलै जकर घरमे कियो एफ.आई.आर. दर्ज करैबला नै छलै। हत्या के करलक, कखैन करलक, कोना करलक, किऐ करलक- एकर कोनो गवाह नै छलै। अंदाज जरूर लगाएल जा रहल छल मुदा ओ अंदाजे भरि छल जे छब्बू भोरे-भोरे अप्पन देहक आगि मिझाबै लेल झूरीक घर पहुँचल। आहट लागिते झूरी दोसर कोठरीमे नुका गेल। दोसर ढोला चांचर खोलि कऽ ओकरा भीतर लऽ गेल। अनधैर्य छब्बू लुंगी खोलि कऽ जहिना ओकरा संग सुतै लेल भेल आकि ओ ओकर फोता पकड़िये कऽ झुलि गेल। ओ ओकरा मारैत-पीटैत चिचियाबैत बेहोश भऽ कऽ खसि पड़ल। ओइ काल झूरी हसुआ लऽ कऽ आएल आ ओकर जननांग काटि कऽ फेक देलक। दुनू बाहर आबि गेल कोठरी बंद कऽ कए आ ओकरा तड़पैत, छटपटाइत आ मरबाक इंतजार करैत छोड़ि कऽ। बादमे दुनू घिसिया कऽ ओकरा बाहर कऽ देलक। आकि ओ धानक बीआ छीटऽ बीअड़िमे गेल छल ओइ दुनूक संग। मारलक ओतहिये, मुदा बलात्कारक केस बनाबै लेल ओकरा दरबज्जाक आगू आनि कऽ पटकलक। आकि नि:शस्त्र भेलाक बादो पहलमान दू-चारि टा केँ तँ काँचे चबा जाइत। दू-चारि मनक नै छल ओ। चमटोलकेँ पता छलै जे ओ किम्हर दिसा-फरागत हैक लेल जाइत अछि। पूरा चमटोल उम्हरे घेर कऽ राहरिक खेतमे मारलक जेना ओ सुग्गरकेँ चारू दिससँ घेर कऽ मारैत अछि आ झूरीक घरक आगू आनि कऽ फेंकि देलक। चऽरमे कतबो चिचिऐब तइयो केकरा सुना पड़त मेघक गड़गड़ाहटिमे। ऐ तरहक चर्चा छल। अलग-अलग अंदाज, अलग-अलग लोकक। सच गप केकरो नै पता। लाश लग कियो एबे नै कएल तँ कोना पता लागितिऐ? पुलिस ककरो आबैए नै देलक। मुदा एकटा गप कनी-कनी साफ भेल जे, जे किछु भेल, अचानक आ संजोगे नै भेल छल। एकर पाछाँ मास भरिसँ तैयारी छल। ऐ तैयारीमे असगरे पहाड़पुर चमटोल नै, आस-पड़ोसक बीस-पच्चीस गामक चमटोल मिलल छल। पहिने आ बादमे खर्चे-खर्च छल- थानाक सीओकेँ चाही, मुंशीकेँ चाही, पोस्टमार्टम बला डॉक्टरकेँ चाही, पैरवीकारकेँ चाही, वकीलकेँ सभ तारीखपर चाही, गवाहकेँ चाही- ढेर रास खर्च। ई कतऽ सँ करत झूरी? तइसँ सभ चमटोलक हरवाहा चंदा जुटैलक। दोसर, हुनका सभकेँ इंतजार छल अप्पन जाइतक कोनो पुलिस अधिकारीक, जे धानापुर थाना सम्हारए आ से आबि गेल छल, दू मास पहिने। भगेलू माने बी.राम। संगे अक्टूबरमे चुनाव छल विधानसभाक आ कोनो एहन पार्टी नै जकरा अनुसूचित जातिक वोटक दरकार नै हुअए। तेसर, चमटोल जानै छल जे छब्बूक मामिलामे ठाकुर घरेन बँटि जाएत, कहियो एक नै हएत। आ जल्दिये ई साबित भऽ गेल। * छब्बूक मारल जेबाक आदंक जकरा सभसँ बेसी छल ओ रघुनाथ छल। नै जानि की छल जे छब्बू जहिया कहियो कलम दिस औतिऐ, नहर आ अखाड़ा दिस औतिऐ आ अप्पन महीसक संग उत्तर दिसक चऽरमे औतिऐ -रघुनाथक दुआरकेँ जरूर देखतिऐ- मास्टर साहेब अछि कि नै। अछि तँ खाली बैसल अछि बा काज कऽ रहल अछि। जौँ रघुनाथ खाली रहै छल तँ छब्बू आबि कऽ बैस जाइ छल। बाजैत किछु नै, बस बैसल रहतिऐ। पुछलेपर बाजै छल जे कोनो काज नै, बस अहाँ लग किछु काल रहब नीक लागैए हमरा। नीक लोकक संगति भेटैत कहाँ अछि। ओ जाइ छल सभ ठाम मुदा बैसै नै छल। ओ रघुनाथक कहले बिना हुनकर हित-अहितक अपने आप ध्यान राखै छल। ई हुनकर भावना छल जकर पाछाँ कोनो कारण नै छल। ई गप रघुनाथ दोसरासँ सुनै छल, छब्बूसँ नै। अखन साल भरि पहिलुक्का गप अछि- रघुनाथक पछुआरमे हुनकर पितयौत भाइक घर-दुआर अछि जकर आगू तीन बिगहाक करीब हुनकर जमीन अछि। हुनकर माने रघुनाथक। भाइ धरि तँ ठीक छल। ओ बाँट-बखराक सम्मान करै छल मुदा भातिज सबहक नेत खराब हुअए लागल। हुनकर घरक आगू दोसराक जमीन। ओ सभ चारि भाँय छल आ सभ समर्थ। पैघकेँ रघुनाथ पढ़ेने छल आ बिजली विभागमे नोकरी दिएने छल। ओ समए-समएपर कब्जा करैक तरकीब आ बहन्ना खोजैत रहै छल। ओ एक बेर राति भरिमे रघुनाथक पछुआरमे एकटा ईंटाक देवाल ठाढ़ कऽ देलक आ हुनकर बाट बंद कऽ देलक। रघुनाथकेँ तखैन पता चललै जखन हो-हल्ला सुना पड़लै। ओ पहुँचल तँ देखलक जे छब्बू लाठी लऽ कऽ देवाल खसा रहल छल आ धुरझाड़ गारि पढ़ैत नरेशकेँ ललकारा दऽ रहल छल- घरघुस्सा, बाहर निकल आ हिम्मत होउ तँ ठाढ़ कर देवाल। हमहूँ देखिऐ। मास्टरकेँ असगर बुझले छीहीं की? खसरा-खतौनी कोनो चीज अछि कि नै? नरेश आ ओकर भाइ घरमे घुसल रहल। ओकरामे सँ ककरो हिम्मत नै भेलै जे बाहर आबए आ छब्बूसँ भिड़ए। सत्य गप तँ ई छलै जे रघुनाथकेँ नोकरी जाइक जते दुख छलै, ओइसँ एक्कोरत्ती कम छब्बूक जाइक नै छलै। किएकि छब्बू छल तँ रघुनाथ सेहो छल आ हुनका लेल पहाड़पुर सेहो। आब ककरा बुत्ते ओ रहत। छब्बूक मारल जेबासँ पहिने गनपत रघुनाथकेँ इशारामे बता देने छल जे पहलमान जँ अहाँ कतऽ आबए तँ बुझा देबै- चमटोलसँ दूर रहए। ई हमरा दुनूक गप तेसराकेँ पता नै चलए। खाली दूर रहए। रघुनाथ एकटा बहन्ना ताकि कहलो छल जे छब्बू, आब बहुत भऽ गेल, जाए दिऔ। छब्बू बाजल छल- मास्टर साहेब। छोड़ि तँ दिऐ, मुदा जाउ कतऽ? गाममे तँ सभ बेटी अछि, पुतोहु अछि। आर कतऽ जाएब। रघुनाथ ओकरा तरह-तरहसँ बुझाबैक प्रयास केलक, मुदा सभ बेकार। ओनाहूँ ओ सोचले छल जे बेसीसँ बेसी की हएत- यएह ने जे छब्बू बेइज्जत कएल जाएत आ झूरी ढोलाक संबंध सभ दिन लेल खत्म भऽ जाएत। मुदा ई तँ छब्बूक दुश्मन सेहो नै जानै छल जे एहन हएत। ओ ई कहैत घुमैत रहल जे ई एकटा ठाकुरक हत्या नै, पूरा दियादक समर्थाइकेँ चुनौती अछि, ओकरा ललकारा देल गेल अछि- मुदा ऐ घटनाकेँ बिसरब आ एकर चर्चा नै करब नीक बुझलक सभ। कनी काल लागल ठाकुर टोलाकेँ बदलैत समएकेँ बुझबामे आ ओकर हिसाबसँ अपनाकेँ ढालबामे। कतेक दिन धरि दुआर कूड़ा आ कचराक ढेर बनल रहल, कतेक दिन धरि लादिक लग गोबर बजबजाइत रहल, कतेक दिन धरि बड़द खुट्टासँ बान्हल उठैत-बैसैत रहल, गाइ-महीस डिरियाइ छल आ पगुराइत रहल। पटायल-पटायल खटिया तौड़ैबला ठाकुर कखनो कोन भरे पड़ल कोदारि दिस ताकितिऐ, कखनो फरसा दिस, कखनो बाढ़नि दिस आ थाकि कऽ अंतमे ओइ छाउर दिस जिम्हरसँ हरवाह आबैत छल। मुदा हरवाहा जे चमटोलसँ भागल, से नै घुरल। एक हफ्ता बीतल। फेर दोसर हफ्ता बीतल। फेर तेसर हफ्ता बीतल। ओकर जेबाक बाद ठाकुर जतेक परेशान छल, दशरथ यादव ततेक खुश। ओकर बेटा जसवंत ऐ कालमे ठाकुरकेँ सम्हारि लेने छल। ओ हुनका सभकेँ हरवाहाक कमी नै हुअए देलक। ओ सबहक खेत भाड़ापर जोतलक। एक्को दिन ओकर ट्रैक्टर नै बैसल। सभक हर कामै रहि गेल। ओ सभकेँ बुझा देलक जे बड़द मथदुक्खी आ बोझ अछि, फालतू अछि। दुआर गंदा करैत अछि, ओकरा हटाउ। ओकर गोबर कोन काजक? ओकरासँ उपजाउ तँ यूरिया अछि। किछु गप बादमे पता चलल, ओइ काल नै। जेना ओ जइ तरहेँ ठाकुरकेँ सम्हारलक, तहिना ओ चमटोलकेँ सेहो सम्हारलक। किछु हरवाहा तँ शहर चलि गेल- रिक्शा चलेबा लेल सोचिए कऽ बा बोनिपर काज करै लेल मुदा बर रास लोक कोरबा गेल- जसवंतक छोट भाइ बलवंत लग, जे बोनि मजूरक ठिकेदार छल। ओ सभकेँ खदानमे काज दिएलक। आर ईहो जे गामक घर होइसँ ओ दोसरासँ जतेक लै छल, ओइसँ कम लेलक। एतबे टा नै, जसवंत ओकरो मदद केलक जे चमटोलमे रहि गेल छल, खास कऽ मौगी सबहक। राशन-पाइनक गरजसँ अनाजक लेल ओ ठकुरटोलीमे जाएब बंद कऽ देलक आ सूदपर जसवंतसँ या अहिरटोलीसँ टका लिअए लागल। ओ आब सोझे गज्जन साव केर दोकानपर जाइ छल। नगद पाइ दै छल आ किराना समान लै छल। गाम कनी-कनी पहिलुक्के जकाँ घुरए लागल छल- नव बदलाव आ नव व्यवस्थाक संग। अन्तर एतबे टा आएल जे हरवाहा बाहर नोकरी करै छल। आ ओ जखन गाम घुरै छल तँ ठकुरटोलीमे नै जा कऽ अहिरटोलीमे जाएब, उठब-बैसब बेसी पसीन करै छल। शाइत हुनका ओतऽ बराबरीक अनुभव होइ छल। रिटायरमेंटक बाद लोकक देखा-देखी रघुनाथ सेहो अप्पन खेत-बारीक दोसर व्यवस्था केलक। ओ अप्पन खेत सनेहीकेँ अधियापर दऽ देलक। सनेही हुनकर कॉलेजक चपरासी छल आ सात मील दूर अप्पन गामसँ कॉलेज आबै जाइ छल। जाइतक कोइरी। ओकर समस्या ओकर औरत आ बाल-बच्चा छल। रघुनाथ ओकर परिवारक लेल ओसारक एकटा हिस्सा आ बाहरक खोपड़ी दऽ देलक। ऐ तरहेँ ओ खेतीक झंझटसँ निश्चिन्त भऽ कऽ कत्तौ आबै जाइ जोग भऽ गेल। आर कत्तऽ आएत-जाएत, मैनेजर आ प्रिंसिपल पेंशन लटकेने छल आ ओ अहीमे लागल छल। ओ ओइ चक्करमे दू-तीन दिन लेल नग्र गेल छल तखने हुनकर भातिज नरेश घरक पछुआरक जमीन दोबारा घेर लेलक- ऐ बेर काँट बला तारसँ। एतबे टा नै, नरेश पुरना लादि ओइ जमीनपर गाड़लक आ महीस बान्हि देलक। चारू दिस गोबर आ गोइठा फेकबा देलक, जतऽ-ततऽ सण्ठी आ पुआरक बोझ रखबा कऽ ई सिद्ध करैक प्रयास केलक जे पछिला कएक बरखसँ ई ओकरे कब्जामे अछि। गाममे घुसैत रघुनाथ एकरा देखलक आ सोझे ओतऽ पहुँचल जतऽ नरेश महीसकेँ सानी दऽ रहल छल। ओ हाथ पोछि कऽ कक्काक पएर छूलक। ई सभ की छै? नरेश हुनका आश्चर्यसँ देखलक- किछु तँ नै, की अछि? तामस मे थरथरा उठल रघुनाथ- बदमाशी करै छी आ सेहो अप्पन कक्कासँ। -कनियो टा लाज नै एलौ तोरा? हटा ई सभ खुट्टा-तुट्टा, तार-फार। नरेशक तीन भाइ सेहो घरक भीतरसँ बाहर आबि गेल। पड़ोसीमे कियो नै आएल। सभ अप्पन-अप्पन दरबज्जापर बैसल सुनि रहल छल। -ई तँ नै हटत कक्का। हमर घर-दुआरिक आगूक जमीन साबिकक अछि आम जमीन आ फालतूमे अहाँ फँसेने छी। अहाँक ई छेबे नै करी, ई तँ गाम-समाजक अछि। एतबै सुनैक छल आकि रघुनाथक देहमे जना आगि लागि गेल। ओ फनफना उठल आ एक लात मारलक लादिपर। तोहर साती कऽ, आ गाम समाजक। अखन माटि काँच छल लाइदक, ओ एक दिस भसकि गेल। ऐ बीच तामससँ आगि-पानि होइत आ गारि पढ़ैत नरेशक छोट भाइ देवेश दौगल आ धक्का दऽ कऽ रघुनाथकेँ खसा देलक। ओ सम्हरितिऐ, तइसँ पहिले ओ हुनकर छातीपर बैस कऽ गरजल- साढ़ बुढ़बा, गरदनि पकड़ि कऽ अखने दबा दिऐ तँ मरिए जाएत। हम जतेक नीक लोक जकाँ गप कऽ रहल छी, ओतेक शेर बनि रहल अछि। जा, जे करैक अछि, कऽ लिअ। उठैत ओ हुनकर डाँरपर एड़ी मारलक- साढ़ बुढ़बा हरमजदा। रघुनाथ उठबाक प्रयास केलक मुदा उठि नै सकल। लाइदक कातमे पड़ल-पड़ल ओ चारू दिस ताकलक। दियाद-बाद देखि रहल छलै आ अप्पन-अप्पन दरबज्जापर बैसल छलै। कनी कालक बाद नरेश ओकरा ठाढ़ केलक आ घर दिस ठेल देलक। पीस कऽ लगाबै लेल हरदि-पियाज नै हुअए तँ पठबा देब।- देवेश चिकड़ल। -की भऽ गेल अछि गाम केँ? -एतऽ जनम लेलौं, पोसेलौं, बढ़लौं, पढ़ेलौं, सबहक मदति केलौं- कखनो किताब-कॉपीसँ, कखनो फीस माफीसँ, कखनो टका-पैसासँ, कतेक सर-संबंधी अछि आ रहत। आइ-काल्हि की भऽ गेल अछि गामकेँ? की अहीसँ जे ओ दियाद-बादक ऐ बा ओइ पार्टीमे नै अछि? की अहीसँ जे ओ रिटायर भऽ गेल आ कोनो काजक नै रहल? की अहीसँ जे ओ कहियो कोनो झगड़ा बा झमेलामे नै पड़ल? की अहीसँ जे ओ बेटा जातिक बियाह बाहर केलक? की अहीसँ जे ओकर बेटा अमेरिका मे डॉलर कमा रहल अछि? की अहीसँ जे ओकर दोसर बेटा सेहो नोएडामे एम.बी.ए. कऽ रहल अछि? की अहीसँ जे ओ बटाइपर खेती सनेहीकेँ देलक- बाहरी लोककेँ, हिनका सभकेँ नै? की भऽ गेल अप्पन दियाद-बादकेँ? रघुनाथ बुझबामे असमर्थ रहल। * रघुनाथ दलानपर करट भऽ कऽ पटायल छल। नै, नै करैक बादो शीला डाँड़पर फुलल हड्डी लग हरैद, पियाउज आ चूनक घोर लगा रहल छलि। आ मुँहक भितरे-भीतर किछु बड़बड़ कऽ रहल छलि, नाककेँ सुड़कैत। दू-दू टा मुस्टंड बेटा मुदा दुनू परदेशमे। एक्को टा एतऽ नै जे बापक बगलमे ठाढ़ हेतिऐ। रघुनाथ जइ अंडाकेँ पैघ केलक, ओ कोइलीक नै कौआक छल। आ ओ अपने कौआ छल, नै तँ ई गप बुझिये गेल हेतिऐ। ओ आइ धरि घरमे रहैत आएल छल, जे खपरैलक छल, माइटक मोट-मोट देवारक। साबिकी घर। पाछाँबला जमीन जानि-बूझि कऽ बँटवारामे लेने छल ओ, कि जखन पाइ आ समए हएत तँ पक्काक घर बनाएब-छोट सन। ई जरूरी छल- हुनका लेल नै, बेटा लेल। घरे नै रहत तँ ओ आएत किए? आएत तँ रहत कतऽ? आ जखन एबे नै करत, रहबे नै करत तँ गाम-घरकेँ बूझत-गमत की? फेर बाप-दादाक जमीन-जत्थाक की हएत? के देखत जा कऽ? खपरैलक घर तँ ढहि रहल अछि। कखन बैसि जाएत, कियो नै जानैत अछि? तेँ किछु दिन पहिने जखन प्राविडेण्ट फंडक पाइ भेटल तखने नव घरमे हाथ लगाबैक फैसला कऽ लेने छल। आब ई नव आफत। हुनका छब्बूक कमीक अनुभव भऽ रहल छल- लगातार। ई नव खाढ़ी पैदा भेल छल गाममे- तहियासँ जखनसँ गाममे बिजलीक खाम, केबुल, ट्यूबवेल, पम्पिंग सेट आ दवाइ दोकान आएल छल। जातिक पार्टी आएल छल, हराहरी तेसर घरसँ फौजमे कियो ने कियो भर्ती भेल छल। सवर्णमे एकटा वर्ग रिसर्च आ कोचिंग करैबला छौड़ा सबहक छल, जे शहरसँ बा कोनो फौजीक घरसँ बोतल लै छल आ राति पम्पिंग सेटपर बिताबैत छल। दोसर वर्ग नरेश आ ओकर भाइक छल। नरेश बिजली मैकेनिक छल। सरकारी कर्मचारी छल। मुदा खुट्टासँ तार खीच कऽ घरमे अवैध कनेक्शन दै छल आ चिक्कन कमाइ छलै। ओकर तीनू भाँइकेँ पॉलिटिक्समे मोन लागै छलै। देवेश सपा केर कार्यकर्ता छल, रमेश बसपा केर आ महेश भाजपा केर। ई पार्टी पछिला बीस बरखसँ सत्तामे आबि-जा रहल छल आ क्षेत्रक विधायक आ सांसद सेहो अही पार्टीक भऽ रहल छल। तीनू बड़ बुधियारीसँ कोनो ने कोनो नेताकेँ पकड़ने छल। ओ अप्पन-अप्पन नेताक संग रहितिऐ, घुमितिऐ, खेतिऐ-पितिऐ आ जनताक सेवा करैतिऐ- माने ट्रांसफर करबाबैक आ रोकबाबैक काज। छोट-मोट नोकरीसँ ई पैघ आ सम्मानजनक धंधा छल। लोकपर रोबदाब सेहो रहै छलै आ रुआब सेहो। हुनकर सभक मंत्री संग उठबाक-बैसबाक आ खाइ-पीयैक खिस्सा रहै छल। ओ जहिया कहियो चारि-पाँच दिनक लेल गामसँ निपत्ता रहतिऐ तँ सोझे लखनऊसँ या कोनो महारैलीसँ या हल्ला-बोलसँ आबैत छल। ई भाइ सबहक पहुँच आ पाइ केर तागतिक बोध रघुनाथकेँ तहिया भेलै जहिया हुनका दस-बारह दिन दौड़ऽ पड़लै- कखनो लेखपाल लग, कखनो थानापर, कखनो एस.डी.एम.क ऑफिसमे। कुर्सी सभ देलक, सम्मान सभ केलक, ध्यानसँ सुनलक हुनकर गप आ अंतमे बाजल- मास्साब। अहाँ विद्वान छी, शरीफ छी, अहाँक सभटा गप सत्य अछि मुदा कोन झमेलामे अपनाकेँ दऽ रहल छी? ओ सभ नीक लोक अछि की? मुँह फोड़ि कऽ किछु नै कहलक, इशारासँ जरूर बुझा देलक जे कऽ सकैत अछि तँ किछु नै, मुदा खाली गपे कऽ सकैत अछि। ओइ काल हुनका ईहो पता चलल जे दियाद-बादक आठो परिवारमे सँ सभ परिवारकेँ चुप रहै लेल नरेश दू-दू हजार टका देने छल। रघुनाथ दौड़ैत-दौड़ैत थाकि गेल। ई उमर सेहो एहन काज लेल नै रहि गेल छल। आब पहिलुक जेहन शक्ति सेहो नै रहि गेल छलै। ठेहुनमे दर्द रहै छलै आ गरदनिमे सेहो। शीला अलगे मरीज छल दमाक आ गैसक। जखैन रघुनाथ लग आबैत छल, डकार लेने आबैत छल। आ पछिला दिनक घटना आ पतिक परेशानी ओकरा आरो नर्वस आ निराश कऽ देने छल। रघुनाथ दुपहरियाक खेनाइक बाद नीमक नीचाँ पटायल छल आ सोचिये रहल छल जे आब की करी। एकमात्र रस्ता हुनका लखाह दऽ रहल छल- कचहरी। मुदा ओ रस्ता बड़ नम्हर छल। ओ जानै छलि जे तारीखपर तारीख पड़ैत जाएत। ऐ तरहेँ एक दिन आइत-जाइत मरि जाएब आ फैसला नै हएत। ऐ बीच शीला आएल। ओ बाजल- अजीब लोक छी अहाँ। असगरे चिंतामे मरल जा रहल छी, जकरा ई सभटा सम्हारैक अछि, ओकरासँ सलाह किए नै लऽ रहल छी? पुछियौ तँ ओकरासँ। -ककरासँ- बेटासँ। -हँ, मानलौं जे एकटा दूर अछि, मुदा दोसर तँ लग अछि। -एकदम सत्य कहि रहल छी अहाँ। ओ निसाँस लेलक- कहू तँ! ऐ दिस तँ हमर ध्यान गेबे नै कएल। ओ उठल आ शीलाक संग फोनमे भिड़ि गेल। शीला हुनका बेर-बेर बुझबैत रहल जे बल-धकेलक, पटकैक, मारि-पीटक गपक चर्च नै करबाक अछि नै तँ ओ परेशान भऽ जाएत आ पढ़ब छोड़ि कऽ बीचेमे चलि देत। लाइन भेटल रातिक दस बजेक बाद। स्वरपर संयम राखैत रघुनाथ विस्तारसँ सभटा गप कहैत हुनकासँ विचार पुछलक। ईहो बाजल जे एतऽसँ कैलिफोर्नियाक लाइन नै लागै छै, संजूसँ सेहो सलाह लऽ कऽ बताएब। राजू बीचमे टोकलक- किए मरल जा रहल छी जमीन लऽ कऽ। छोड़ू ओकरा आ सुनू, भौजी बनारस आबि गेल अछि अशोक विहारमे। ज्वाइन कऽ लेने अछि यूनिवर्सिटीमे। अहाँ माँकेँ लऽ कऽ चलि जाउ आ ओत्ते रहू आ सुनू। सुनैसँ पहिने फोन राखि देलक रघुनाथ। ओ माथ पकड़ि कऽ बैसि गेल। -की-की भेल? -शीला पुछलक। -भेल की? आब सम्हारू ओकरा। उड़ि कऽ आबि रहल अछि हवाइ-जहाजसँ। आबैते गोली मारि देत नरेशकेँ। ओ सभ बर्दाश्त कऽ लेत, बापक बेइज्जती बर्दाश्त नै करत। -अरे रोकू, रोकू ओकरा। -ओकरा तँ रोकि देब, संजयकेँ कोना रोकब? ओ तँ ओतऽसँ मिसाइलसँ सोझे घरमे आएत। शीलाकेँ संदेह भेलै अप्पन बुधिपर आ ओ चुप भऽ कऽ हुनका देखऽ लागल। -साढ़। कहैत-कहैत ओ माथ उठा कऽ शीलाकेँ देखलक। -हमरा डर छल ताइसँ हम गप नै कऽ रहल रही, मुदा अहाँक कहलासँ केलौं। हम एत्ते बुरबक नै छी जे हमर दिमाग मे नै आएल। मुदा अहाँक जिदपर केलौं। नै जानि कतऽसँ एहेन बेकाजक आ कोढ़िया छौड़ा जनम लऽ लेलक- साढ़। पछिला जन्मक पाप। हम तीस-पैंतीस बरख नोकरी केलौं, लाखक लाख कमाइ केलौं आ हाथमे एकटा पाइ नै। ऐ हाथ आएल, ओइ हाथ गेल। पुछू तँ कतऽ गेल, से बता नै सकब। आ ई जमीन। आइयो ओतै कऽ ओतै छी। मिसियो भरि टससँ मस नै भेल अप्पन ठामसँ। ई अहाँक दादा-परदादा-बापकेँ खुएलक, अहाँकेँ खुएलक, एतबे टा नै बेटा आ नाती-पोताकेँ खुआएत। अहाँ करोड़ो कमाएब मुदा टका आ डॉलर नै खाएब। भगवान ने करए जे ओ दिन आबए जखन बैंक चाउर-दालिक दाना बाँटत। ओ जांघपर मुक्का मारलक आ शीला दिस ताकैत बाजल- साढ़, तूँ सभ पैघ भलहि भेल हुँअए अप्पन माँक दूध पी कऽ, मुदा तोहर माँक माए अछि ई जमीन। चाउर, दालि, गहूम, तेल, पानि, नून यएह जमीन देने अछि। आ बाजै छी जे हटाबू ओकरा। -छोड़ू ओकरा। तामसमे रघुनाथ की सभ बाजैत रहल, हुनका अपनो नै पता। कोन तरहे शीला हुनका सम्हारैत पकड़ि कऽ आंगनमे लऽ गेल- जाउ, सूति जाउ। सोचू नै। * ऐ काल रघुनाथकेँ एकटा बोध भेलै। ई जे नीक लोकक मतलब अछि निरर्थक लोक, आ भला आदमीक अर्थ अछि डरपोक लोक। जखन कियो अहाँकेँ विद्वान कहए तँ ओकर अर्थ मूर्ख बुझू आ जखन कियो सम्मानित कहए तँ तकर अर्थ दयनीय बुझू। हुनका सभ ठाम यएह कहल गेल आ हुनकर कोनो काज नै कएल गेल। हुनका सभ ठाम हट-हट आ दुर-दुर कएल गेल। ओ ओइ बकरी आ गाए जेना अछि जे में-में आ बाँ-बाँ कऽ सकैत अछि, मारि नै सकैत अछि। यएह ओकर छवि, सबहक आगू मिमियाबै आ घिसियारी काटैबला मास्टरक। ई हुनकर छवि नै अछि, यएह छथिन ओ। ओ ओइ छविकेँ तोड़ै लेल सोचि रहल छल, बब्बन सिंह ओ अवसर दऽ देलक। ओइ काल रघुनाथ अपन खेतमे छल। ओ मचियापर बैसल छल आ आगू सनेही अप्पन आ हुनकर हिस्साक गहूम नपबा रहल छल। बगलसँ जा रहल बब्बन ठाढ़ भऽ गेल। गामक सभसँ बूढ़-पुरान आ मर्जादबला। गामे टा नै, पास-पड़ोसमे कत्तौ विवाद होइ छल तँ एक पंचक रूपमे कोनो ने कोनो पार्टी दिससँ ओ सेहो रहै छल। ई अलग गप अछि जे ओ मामला सुलझाबैक बदला आर ओझरा दै छल। ई हुनका नीक नै लागै छल जे रघुनाथ नै जानि कतऽ–कतऽ दौड़ल, हुनका लग नै आएल। रघुनाथ हुनका देखलक मुदा कोनो भाव नै देलक। -मास्टर।- ओ शोर पाड़लक। रघुनाथ लग गेल आ गोर लागलक। -जमीन अहाँक अछि, गाम-समाज या नरेशकेँ ओकरासँ की लेब-देब? दोसर कियो कोना कब्जा कऽ लेत? -एतबे टा हमहूँ जानै छी। -जानै छी तँ विधायकजी सँ किए ने भेँट करै छी? -कोन विधायकसँ? -अरे वएह, अप्पन कॉलेजक मैनेजर। माथ ठनकलै रघुनाथक। एकर मतलब जे ऐ पूरा मामिलाक तार ओत्तेसँ जुड़ल अछि। संजयक बियाहसँ। ओकरा हुनका रिटायर करबेलेसँ आ पेंशन रोकबेलेटा सँ संतोष नै भेलै- आ ई अछि दियाद-बादक सभसँ बूढ़-पुरान आ मर्जादबला लोक, जे नरेशकेँ नै बुझा कऽ हमरा बुझा रहल छल। आ बुझा की रहल छल, ओइमे रस लऽ रहल छल। ओइ काल रघुनाथक दिमागमे एकटा खुराफाती विचार आएल। -कक्का।- ओ बब्बनक हाथ पकड़ि कऽ कनी फराक लऽ गेल। अहाँसँ एकटा विचार लैक चाहैत रही, कतेक दिनसँ। जखन अहाँ भेटिये गेलिऐ तँ कहू तँ एत्ते पूछि लै छी। -बाजू, बाजू। मन तँ नै बनेने छी मुदा कखनो-कखनो सोचै छी जे ओइ जमीनकेँ बेच दी। बब्बन हुनका आश्चर्यसँ देखैत रहल। -अहाँकेँ पता अछि, कतेक महंग अछि ओ जमीन। आबादीक भीतर। कतेक काजक अछि। ओकरा बेचब सोना बेचै सन अछि। आ बेचब किए? -मथदुक्खी राखैसँ की फाएदा? -यएह तँ चाहै अछि नरेश। मुदा ओकरा नै बेचबाक अछि। ओ जे केलक, तकरा कोना बिसरि सकै छी? -तँ फेर? -फेर की? अखन तँ यएह सोचने छी जे ओकरा नै देबाक अछि, बाकी तँ घर अछि, गाम अछि, अहाँ चाहब तँ अहीं छी। देखल जाएत, कोनो जल्दी थोड़े अछि। बब्बन कनी गंभीर भेल- आ ओकर कब्जाक की करब? -कब्जाक की, खुट्टा अछि। आर किछु नै तँ जे उखाड़ि कऽ फेक देत ओकरो दऽ सकै छी। मैनेजर साहब सेहो खोलऽ चाहैए बच्चा सबहक अंग्रेजी स्कूल ऐ इलाकामे कत्तौ। एतऽ खोलि लिअए। -अरे गामक लोक मरि गेल अछि जे बाहरी लोककेँ देब? -नै, एकटा गप कहि रहल छी। अखन किछु तय-तफसिला थोड़े अछि। रघुनाथ धीरेसँ बाजल- हम दान तँ नै दऽ रहल छी ककरो। जखन वाजिब आ सही भेटत तखने ने। -अहाँ तँ गाममे फौजदारी करा देब मास्टर।- चिंतित भेल बब्बन बाजल। -हम की करब? जखन ओ अपने करैपर बिर्त अछि तँ कियो की कऽ सकैत अछि। रघुनाथ हुनकर कान लग मुँह लऽ जा कऽ बाजल- मुदा ई गप अपने धरि राखब। दुनिया भरिक लोक आबैत रहैत अछि अहाँ लग। की फाएदा कहएसँ? छै कि नै? तँ चली। रघुनाथ खेत दिस घुरि गेल। सनेही दोसर बेर पुछने छल जे गहूमकेँ बखारीमे आइये राखि दिऐ या काल्हि लेल छोड़ि दिऐ। शीलाक कहब छल जे राहैर आ तोड़ी सेहो बँटि जाए तँ सभकेँ बेरा-बेरी राखि देल जाए। रघुनाथ ई निर्णय शीलापर छोड़लक आ ओसारपर आबि कऽ बैसि गेल। शीला सेहो पाछाँ-पाछाँ आएल। -किए भरि-ठेहुन भरि-छाबा कऽ रहल रही हुनकासँ? सभटा खुराफातक जड़ि तँ वएह छथि। -अहाँ चुप रहि कऽ तमाशा देखू। हम बड़ रास मसाला दಽ देलौं हुनका। आब काल्हिसँ एतऽ बैसकी लगाएब शुरू कऽ देत लोक। रघुनाथक चेहरापर राहत आ संतोषक चमक छल। शीला उखड़ल मनसँ पुछलक- अहाँ जमीन बेचैक गप कऽ रहल रही हुनकासँ? रघुनाथ हँसल- गपे तँ कऽ रहल रही, बेच नै रहल रही। बेचबाक नै अछि हमरा। हमर अप्पन कमाएल चीज छेबो नै करए जे हम बेची। बाप-दादा लग हुनकर पुरखासँ कोना आएल हएत, वएह जानैत हएत। मुदा ई लोक नहिये अपने चैनसँ रहत, नहिये रहऽ चाहैए, नहिये रहैले देत। आब यएह देखू, हमर दोष कतऽ अछि? संजय बियाह केलक। ओतऽ केलक जतऽ चाहलक, जतऽ ओकरा अप्पन हित देखा पड़लै। भविष्य देखलक। हमरो नीक नै लागल मुदा ओकर अप्पन पसीन आ जिनगी रहै। हम की कऽ सकैत रही? मुदा तकर सजा मैनेजर हमरा देलक। फालतूमे। हमहूँ कहलौं- ठीक अछि। गामपर रहब- सुख आ शांतिसँ। नहिये ऊधोक लेब, नहिये माधोकेँ देब। एक समए छल जखन खेत-पथारक अतिरिक्त किछु नै छल एतऽ- नहिये अखबार छल, नहिये बिजली छल, नहिये फोन, नहिये टीवी छल। आइ सभटा अछि आ फसिल एतेक जे हम दूटा लोक लेल ककरो आगू हाथ नै पसारै जरूरति। रहल गप्प दोसर जरूरतक लेल तँ आइ ने काल्हि पेंशन भेटबे करत। फेर कोन गप्पक चिन्ता। की। रघुनाथ मुसकुराबैत शीला दिस देखलक। आ सभ सुख-दुखमे सदिखन संग दैबाली स्त्री अखन जीवित छलि। ओ हुनका खिचलक आ अपना लग बैसा लेलक। ओ लजाइत हुनका लग बैसल रहलि आ ओ हुनका एकटकसँ देखैत रहल। -शील, ऐ सभ चीजक सहारे जिनगी तँ काटल जा सकैत अछि, जिअल नै जा सकैत अछि। एकाएक हुनकर आवाज भारी आ उदास भऽ गेल। -शीला। अप्पन तीनटा बच्चा अछि, मुदा पता नै किए, कखनो-कखनो हमर भीतर एहन हूक उठैत अछि जेना लागैत अछि- हमर स्त्री बाँझ अछि आ हम निपुत्तर छी। माँ आ बाप होइक सुख नै जानलौं हम। हम सभ नहिये बेटाक बियाह देखलौं, नहिये बेटीक। नहिये पुतोहु देखलौं, नहिये होएबला जमाएकेँ। हम एहन अभागल माँ-बाप छी जकरा ओकर बेटा अप्पन बियाहक सूचना दैत अछि आ बेटी कहैत अछि जे जँ अनुमति नै देब तँ नोत नै देब। आ आब अहाँक नजरि अछि राजूपर जे ओ सभ साध पूर कऽ देत। -नेहाल कऽ देत अहाँकेँ, एहन भ्रम हुअए तँ निकालि दियौ अप्पन दिमागसँ। हमरा पता अछि जे ओ एकरोसँ आगू जा रहल छै। ओ एकटा एहन विधवा लड़कीकेँ ताकि लेने अछि जकरा दू बरखाक बच्चा छै। एतबे नै, ओ कोनो नीक सर्विस सेहो करै छै। ओकर पाइसँ ओ दिल्लीमे मौज कऽ रहल अछि। मोटरबाइक लऽ गेल अछि मस्ती करबाक लेल। बच्चा पोसब आ मौज करब दू टा काज अछि ओकर। गेल छल डोनेशनक पाइ लऽ कऽ, आइ धरि पता नै चलल जे एडमिशन लेलक आकि नै। -अहाँ एतेक गप जानैत रही तँ कहियो बतौलिऐ किए नै। -की कऽ लेती अहाँ? की करितिऐ बता कऽ। शीला, हम जानै छी ओकरा। पढ़ैमे कहियो रुचि नै रहलै ओकरा। अप्पन बापसँ कोन स्वरमे गप करैत अछि। एकरा अहाँ देखने छी। ओ शॉर्टकर्टसँ पैघ लोक बनैले चाहैत अछि। ओकरा लेल पैघ लोकक मतलब अछि धनी लोक। आ सेहो खून-पसीन बहा, बिन मेहनतिक। ओ महत्वाकांक्षी लड़का अछि मुदा लालच आ महत्वाकांक्षा बुझैत अछि। ओ बड़ रास चीज हासिल करए चाहैत अछि- अनचोक्के बिना पढ़ले-लिखले, बिना नीक नंबर आनले डिवीजन आनलक, बिन प्रतियोगिता देले, बिना खटले आ नौकरी करले। हमरा नै पता जे ओ लड़की ओकरा कोना भेटल। कतऽसँ भेटल। भऽ सकैत अछि जे ओकरा कोनो मर्दक खोज हुअए। एतबै जरूर अछि जे डेढ़ बरख पहिने कोनो सड़क दुर्घटनामे ओकर पति मरि गेल। ओइ लड़कीक अप्पन फ्लैट अछि, कार अछि, ऑफिसक काजसँ सिंगापुर, बैंकाक आबैत-जाइत रहैत अछि आ ई ओकर बच्चा सम्हारैत अछि आ घर जोगैत अछि। जेना हम नै जानै छी, तहिना ओ नै जानै छै जे ओकर मनमे की छै, की विचार छै। -अहाँ ई सभ कोना जानलिऐ। -ई नै पुछू। नोएडामे हमरो लोक अछि, जे आबैत-जाइत रहैत अछि। शीला चिंतित भऽ उठल- सभटा दुख अही बुढ़ापामे देखब लिखल छल की? एकटा बेटा परदेसमे, पता नै कहिया आएत। दोसर एतऽ मुदा ओकरो वएह हाल। मुदा ओकरोसँ खराप। आ इम्हर बापक दोसर मुसीबत। गाम छोड़ब तँ जानि जाएत, नै तँ मारल जाएब। नहिये कियो देखएबला अछि, नहिये सुनएबला, नै जानि ककर नजरि लागि गेल अछि घरकेँ। रघुनाथकेँ ओतಽ असगरे छोड़ि कऽ चुपचाप ओ अंदर गेल आ पटा रहल। * घरमे फोन आब जीक जंजाल भऽ गेल छल। जखन रघुनाथ कनेक्शन लेने छल तँ राजूक जिदपर जे संजू अमेरिकासँ जखन गप करऽ चाहत तँ केना करत। कोनो संदेश देबाक हुअए तँ। भौजीकेँ जौं मम्मीसँ किछु बाजबाक बा पुछबाक हुअए तखन। हमरे कोनो सलाह लेबाक हुअए तखन। चिट्ठी-पत्री आब के लिखैत अछि, ककरा लग एत्ते समए अछि। आ सरला दीदी सेहो तँ अछि शहरमे, हुनकासँ गप नै करबाक अछि की अहाँकेँ आ मम्मीकेँ। तँ कोनो हालमे जरूरी अछि ई। गाममे सेहो बेमतलब थोड़ लेने अछि लोक। फोन लागल तँ राजूक लेल। जखन कखनो घरमे रहैत छल, लागल रहैत छल ओइपर, कखनो ऐ दोस्तक, कखनो ओइ दोस्तक। संजूकेँ तँ लाइने नै भेटै छलै। हँ, कखनो-कखनो सरला जरूर भेट जाइ छल। आब जखन राजू बाहर अछि तँ फोन ओहिना बेकार पड़ल रहै छै जना नादि आ खुट्टा बा हर आ ठेंगा। तइसँ रातिमे जखन फोनक घंटी बाजल तँ रघुनाथ आ शीला डरि कऽ एक-दोसराकेँ ताकलक। घंटी बजब तँ बन्न भऽ गेल, ओइमे सँ कियो उत्साह नै देखेलक। जखन दोसर बेर बाजल तँ रघुनाथ उठल आ रिसीवर उठेलक। -हैलो। दोसर दिससँ आवाज आएल। चिन्हलक ओकरा। देर धरि सुनैत रहल, फेर शीलाकेँ रिसीवर पकड़ा देलक। आ माथपर हाथ राखि चुपचाप बैस गेल। कनी काल बाद दोसरದೊ दिससँ कानैक आवाज सुना पड़ल। ओ उठल आ अप्पन बिछौनपर आबि गेल। रिसीवर राखि कऽ शीला सेहो आएल आ अप्पन बिछौनपर बैसि गेल। ओ काल्हि आबि रहल छथि अपना सभकेँ लऽ जाइ लेल। -अहाँकेँ जेबाक अछि तँ जाउ, हमरा नै जेबाक अछि। बड़ कानि रहल छल। पुछि रहल छल जे हमर कोन एहन गलती अछि जे देखै लेल तँ दूर, अहाँ सभ फोन धरि नै केलौं। ओ केलक कहियो फोन। हम सपना देखि रहल रही जे महारानी घुरि आएल अछि अप्पन देश। आकाशवाणी भेल छल हुनकर आगमनक लेल। -ई तँ नै बाजू। राजू बतौले छल। -हम कोनो राजू-ताजूकेँ नै जानै छी। ओ किए नै कहलक। बापकेँ कऽ सकैत छल ससुरक संगे। ओकरा बजौलक, ज्वाइन करौलक, अशोक विहार आएल। एत्ते दिनसँ रहि रहल छथि, बीचमे पापा-मम्मी मोन नै पड़लै, आइ मोन पड़लै। ओहिना तँ मोन नै पड़ल हेतै, आएल हएत, कोनो गप हएत जरूर। कानि-कानि कऽ कहि रहल छल जे हम मम्मी-पापाक बिना नै रहि सकैत छी। -झूठ बाजैए। बहटरा रहल छल अहाँकेँ। जानैए कत्ते अपना सभकेँ। नहिये कहियो देखने अछि, नहिये भेंट अछि तँ ओ किजाने गेलए पापा-मम्मीकेँ। हम तँ जानै नै छी जे हमरो कोनो पुतोहु अछि। -पूतोहु नै सही, बेटा तँ अछि। नै जानि की सोचत। -कोन मतलब अछि बेटा-बेटी बहु दुनिया। सबहक चिंता करै लेल हमहीं छी। रघुनाथ तमसा गेल। ओकरा तँ चिंता छै जे लोक की कहतै। सासु-ससुर गाममे पड़ल अछि आ पुतोहु नग्रमे मजा कऽ रहल छै। -ई अहाँ कहि रहल छी, अप्पन मोनसँ। बुझलिऐ। किछु बजाउ नै हमरासँ। रघुनाथ उठल आ आंगनमे टहलऽ लागल। नीन भागि गेल छल हुनकर। ओ कोनो निर्णय नै कऽ पाबि रहल छल। ओ गामसँ सेहो तंग भऽ गेल छल मुदा ओकरा छोड़ऽ नै चाहै छल। मन नग्र आ कॉलोनी दिस लागल छलै- जीवनक नव दिस, नव जिनगी दिस, साफ-सुन्दर पक्का मकान आ अलकतरा छारल सड़क दिस, गंगाक घाट दिस, अनचिन्हार नव संबंध दिस। ई आकर्षण छल मनक मुदा उम्हर जाइमे भऽ रहल छलै जे कत्तौ एना नै हुअए जे पछुआरक जमीन हाथसँ निकलि जाए, बिन देख-रेखक मकान ढहि जाए, सनेही चोरी आ बेइमानी शुरू नै कऽ दिऐ, कत्तौ लोक सदा लेल गामसँ गेल नै मानि लिअए। आ एहन कहएबला तँ कम नै हएत जे गाम छोड़ि कऽ भागि गेल। एकरासँ पैघ जगहंसाइ आर की भऽ सकैत अछि। ओ आंगनक चक्कर काटैत ओतऽसँ ठाढ़ भऽ गेल जतऽसँ खपरैलसँ ऊपर उठैत चन्द्रमा लखाह दऽ रहल छल। ओ ओकरा देखऽ लागल जेना गाम छोड़लापर फेर नै लखाह देत- बा ओकरेसँ पुछि रहल अछि- आ तखन की करबाक चाही। ई चैत मासक राति छल। दशरथ यादव अप्पन दरवाजाक आगू नव शिव मंदिर बनौने छल। पछिला दस घंटासँ ओतऽ अखंड हरिकीर्तन चलि रहल छल। कीर्तनिया मंदिरक बगलमे ठाढ़ नीमक गाछपर लाउडस्पीकर बान्हि देने छल आ समूचा गाम हरे राम, हरे राम सँ दलमलित छल। ई एकरस गूंज ओकर मनकेँ भारी कऽ रहल छलै। -अहाँ जाउ, हम एतऽ रहब, अप्पन घरमे। सुनलिऐ। ओ ऊँच आवाजमे शीलासँ बाजल। -अहाँकेँ असगरे छोड़ि कऽ। नै बाबा नै, पता नै की भऽ जइतए। शीला ओतऽसँ बाजल- आ ऊ घर तँ सेहो अहाँक छी। संजू की कहैत छल। हम चाहैत छी जे मम्मी-पापाक अंतिम दिन काशीमे बितए। चैनसँ बितए। जखन समए आएल अछि तँ ना-नुकुर कऽ रहल छी। सोनल दोसर नै अछि, पुतोहु अछि अपन। -अहाँ, बुझै किए नै छी। सोनल पुतोहु अछि, घर पुतोहुक अछि, अपन नै। कोन औकातिसँ जाएब हम। पाहुन बनि कऽ। किराएदार बनि कऽ। कोन औकातिसँ। ओइ दिस ध्यान नै गेलै शीलाक। ओ कनी काल अचकचाएल, फेर बाजल- ठीक अछि, हुनकर घर तँ अछि मुदा संजू तँ अछि नै। ओ हम्मर बेटा अछि। देर-सबेर तँ आबए पड़त ओकरा। राजूकेँ वएह नै कहै छल जे पापा-मम्मीकेँ पठा दियौ। आ सोचू जे पुतोहुक घर की हमर नै अछि? रघुनाथ चुप रहल। किछु नै बाजल। -देखू, अपना सभ चलू। एहन नै जे घरकेँ छोड़ि कऽ जा रहल छी। कहियो घुरि आएब ऐमे। जखन परेशानी हएत तँ आबि जाएब। खेतीक जिम्मा तँ स्नेहीकेँ देने छी। रहि गेल घर तँ दस बिस्सा खेत आर दऽ दै छी गनपतकेँ। कमरा बंद कऽ दरवाजाक ताला ओकरा दऽ दियौ। साफ-सफैयत आ देखभाल करैत रहत। शीलाक गपमे दम लखाह देलक रघुनाथकेँ। हुनका चारि दिन बाद जेबाक छल पेंशनक काजसँ। दिक्कत केवल ई छल जे गनपत मिर्जापुर गेल छल अपन बेटा लग। तँ एहन करू शीला, अहाँ तँ सोनल लग काल्हि चलि जाउ। हम एतुक्का व्यवस्था कऽ पाँचम दिन पहुँचब। पेंशन ऑफिसमे अप्पन काज निंघटा कऽ सोझे अशोक नगर आबि जाएत। कोनो जरूरी गप हुअए तँ फोनपर खबर कऽ देब। अरे हँ, फोनक कनेक्शन सेहो तँ कटाबए पड़त। छोड़ू, अहाँ अपन तैयार करू, गहूम, चाउर, दालि, घी, अचार। कनी-बेसी जे लऽ जा सकब, लऽ लेब। * रघुनाथ बाजल पाँच दिन मुदा लागि गेल पचास दिन। ओइमे ओकर कोनो दोष नै छल। सोचने छल जे जखैन जेबाके अछि तँ एतुक्का सभटा समस्या सुनझा कऽ गेल जाए, ई नै हुअए जे रही ओतऽ आ मन लागल रहए एतए। बड़ रास सोचि-विचार कऽ ओ फैसला लेलक जे रूकल पेंशन हुअए बा आबादीक जमीन, जखन अही दुनूक जड़िमे मैनेजर अछि तँ हुनकासँ एक बेर भेँट कऽ लैमे की हर्ज अछि। जौँ एतबे टा सँ हुनकर ईगो तुष्ट हएत तँ कहएमे की खरापी अछि। आइ जे किछु छी, अहींक कारण छी, नोकरी नै देने हेतिऐ तँ जानि कतऽ हेतिऐ। जखन बनैले छिऐ तँ बिगाड़ि नै करियौ। आब स्थिति सेहो बदलि गेल छल। मैनेजरक बेटाक बियाह भऽ गेल छल वनमंत्रीक ठिकेदारक बेटासँ। ओ पड़़ोसी जिलाक छल। मैनेजरसँ ऊँच स्टेटसबला। आब रघुनाथसँ शिकाइतक कोनो कारण सेहो नै रहि गेल छल। ओ मिठाइक पैकेट आ सेब, संतोला आ अंगूरक संग पहुँचल तँ मैनेजर, जकरा लोक सरकार बाजैत छल, नीक मूडमे छल। रघुनाथकेँ देखैत ओ चुहुल करैत बाजल- मास्टर। अहाँक स्वास्थ्य देखि कऽ लागैत अछि, जे शुरूसँ दरमाहा नै लऽ कऽ पेंशन लेबाक चाही छल। जवानी तँ आब आएल अछि अहाँपर। -सरकार।- रघुनाथक मुँहसँ निकलल आ ओ कानऽ लागलखिन। -की। की भेल? आइ धरि नो-ड्यूज क्लियर तक नै भेल की? मैनेजर चौंकि कऽ पुछलक आ प्रिंसिपलकेँ फोन केलक। फेर बाजल- जाउ, चिंता नै करू। भऽ जाएत। आर किछु? रघुनाथ नरेश आ बब्बन सिंहक सभटा किस्सा बतौलक। ओ चुपचाप सुनैत रहल। कनी काल बाद ओ बाजल- जखन ई अहाँक घरक छल तँ बटाइ किए देलिऐ। गलती तँ अहूँक अछि। रघुनाथ किछु नै बाजल। हुनका ई बताएब ठीक नै लागल जे बाहरक लोककेँ तँ कखनो हटाएल बा भगाएल जा सकैत अछि मुदा हुनका मुश्किल हएत। ओ एतबे टा बाजल- हँ, गलती तँ भऽ गेल। आब किछु केलो नै जा सकैत अछि। -अहाँ समस्या ठाढ़ करैत रहू आ हम निपटारा करैत रही, यएह ने। मैनेजर एस.डी.एम.केँ फोन केलक आ इशारासँ किछु बुझेलक। रघुनाथ ओइ काल माथ झुकेने बैसल रहल। -आब कोन सोचमे छी। जाउ आ बब्बन सिंहकेँ पठा देब। ओ उठल आ बाथरूममे चलि गेल। जाइत-जाइत कहलक- भऽ सकैत अछि एस.डी.एम. ऑफिस दौड़ए पड़ए एकाध बेर। दौड़ाएब आ अहाँसँ किछु बाजए तँ हुनका आगू बड़ सिद्धांतवादी बनैक जरूरत नै अछि। सबहक किछु ने किछु मजबूरी होइत अछि। ठीक। बीस-पच्चीस दिनक दौड़-धूपक बाद एक दिन एस.डी.एम. दूटा सिपाही आ लेखपालक संग आएल- जरीब आ गामक नक्शा लऽ कऽ आ सबहक आगू जमीनक पैमाइश केलक। ऐबेर जमीनक ओ हिस्सा सेहो रघुनाथक हकमे निकलल जे नरेशक घर-दुआर छल। एकर मतलब ई भेल जे रघुनाथ चाहए तँ नरेशक घर-दुआर गिरा दिअए बा रहए दिअए आ ओत्ते जमीनक दाम वसूलि लिअ। ओकरा रघुनाथक भलमनसाहत पर छोड़ि देल गेल। ई हुनकर बड़ पैघ सफलता छल- निश्चिंती सेहो। पापड़ तँ बड़ बेलने छल मुदा सम्मान घुरि एलै। आब ओ बनारस जा सकैत छल मास- दू मासक लेल। मुदा जौँ मन लागि गेलै तँ संदेश आ फोना-फोनीसँ काज चलि जेतै। ओ जाइक तैयारी शुरू कऽ देलक आ तैयारी की करबाक छल। राशन लेलक। दू टा छोट-छोट बोरामे अलग-अलग अल्लू आ पियाजु छलै। चारि बजेक बस लेल तैयारी कऽ रहल छल जखन बाहरमे डाँट डपटिक आवाज सुनाइ देलकै। निकलल तँ देखलक- जयनारायण माने जग्गन। बड़ उखड़ल छल आ रूसल। हुनकर एक हाथमे कल्लूक कान छल आ दोसरमे दू टा अधपक्कू आम। डरल कल्लूकेँ पकड़ि कऽ सनेहीक झोपड़ाक आगू ठाढ़ छल- सनेही, सनेहिया रे। भीतरसँ सनेहीक स्त्री निकलल- की अछि मालिक? ओ झपटि कऽ कल्लूकेँ खिंचलक, दू थापड़ फेर मुक्का मारैत आ धकियाबैत भीतर ठेल देलक। ओ कानैत भीतर चलि गेल। मामला बुझैत देर नै लगलै रघुनाथकेँ। घरेनमे सबहक दरवाजाक आगू नीमक गाछ अछि, असगरे वएह टा अछि जकर दरवाजाक आगू आमक गाछ अछि। टिकुला लागैसँ लऽ कऽ ओकरा पाकै धरि, जकर नौबति शाइते कहियो आबैत छल। घरानाक छौड़ा सभ हाथमे ढेला नुका ओकर चरू दिस घुमैत रहै छल आ जग्गन ताधरि ओकर नीचाँ खाट राखि कऽ पड़ल रहैत छल जाधरि गर्मी बर्दाश्त होइ जोग रहैत छल। दर-दियाद भरि केँ कऽ चटनी, अचारक काज हुनकर लाख प्रयासक बादो ओकरेसँ चलैत छल। इन्हरसँ ढेला चलैत छल, उम्हर जग्गन पकड़ैक घातमे रहैत छल। एक कऽ पकड़ैत अछि, तीन टाक मौका भेट जाइत अछि। हुनकर आ छौड़ा सबहक व्यस्तता कहियो-कहियो डेढ़-दू मास धरि चलि जाइ छल। -आउ, आउ जगन। हमरासँ कहू की गप अछि। -काकी अछि आकि नै, आबए तँ आबी अहाँ कतए। -आउ, बैसू तँ सही। ओ जग्गनक आगू खटियापर बैसै लेल इशारा केलक आ शोर पाड़लक झोपड़ीक आगू ठाढ़ सनेहीक स्त्रीकेँ। -जग्गनकेँ सतुए घोरि कऽ पियाबियौ। सुराहीक पानिमे बनाएब। जग्गन कनी स्थिर भेल आ बैसि गेल। फेर अप्पन लुंगीक फाँड़सँ तमाकुलक डिब्बा बहार केलक आ मिड़ए लागल। बाजल- मास्टर कक्का, अहाँ ई बड़ पैघ गलती कऽ देलौं। कोइरी-कहारकेँ अप्पन बीचमे बसा कऽ अहाँ बड़ पैघ गलती केलौं। -ऐमे गलती की अछि? -अरे, अहाँकेँ लखाह नै दैत अछि। अही बाट देने हम दिन-राति आबै-जाइ छी। ई बैसल तँ बैसल अछि, पटायल अछि तँ पटायल अछि। पैघ लोगक बीच रहैक सउर नै छै। आ हिनकर बेटा। बीचे मे रघुनाथ टोकि देलक- देखू जग्गन, फालतूक गप अछि ई। समै-काल बड़ बदलि गेल अछि। आइ मानसिक रूपसँ विकलांगे एहन गप करैत अछि। कोन गपक पैघ छी अहाँ। पुरखा, जमीन आ जातिक भरोस। छब्बूक हत्याक बादो ई भ्रम अछि तँ राखने रहू। पछिला दिन अहूँ अप्पन खेत बेचलिऐ। ठाकुरमे सँ कियो किए नै किनलक। किनलक तँ आखिर जसवंते। आइयो हम्मर अहाँक खेती ओकरे भरोसे होइत अछि, ट्रैक्टर ओकरे लग अछि, टका ओकरे लग अछि। विधायक ओकरे अछि, सांसद ओकरे अछि, सरकार ओकरे अछि, ओकाइतो ओकरे लग अछि, कोनो काजक लेल पैरवी करबाक होइत अछि तँ अहाँ ओकरे लग जाइ छी, तकर बादो पैघ लोक छी अहाँ। एहन गलतफहमी पोसबाक अछि तँ पोसने रहू। हँ, ई जरूर अछि जे ओ दोसर गामक अछि, पराया अछि, अधिया देबाके अछि तँ ओकर बदला कोनो अप्पनकेँ देबाक चाही छल। आब अहीं बताबियौ, के अप्पन अछि जकरा दैतिऐ। जग्गन गुम्म रहि गेल। रघुनाथ सभसँ लगक पड़ोसी छल। नरेश ओकरे भाइक बेटा, जकर नजरि बराबर पछुआरबला जमीनपर छलै। कनी काल इंतजारीक बाद रघुनाथ बाजल- देखू जगन, परायामे अप्पन भेट जाइत अछि मुदा अप्पनमे अप्पन नै भेटैए। एहन नै छल जे अप्पन नै छल। छल मुदा तखैन जखैन समाज छल, परिवार छल, सर-समाज छल, जखन भावना छल। भावना यएह छल जे ई भाइ छी, ई भातिज छी, भतीजी छी, ई कक्का छी, ई काकी छी, ई पीसी छी, भौजी छी। भावनामे कमी होइ छल तँ ओकरा पूरा कऽ दैत छल लोक लाजक कारणे। नै तँ एनामे लोक की कहत। मात्र भावना छल, गणित नै, लेन-देन नै। ऐबीच सत्तूक घोर दऽ कऽ गेल सनेहीक स्त्री, रघुनाथ चुप भऽ गेल। ओकर गेलाक बाद फेर शुरू केलक- आब अहीं कहू, नरेशसँ बेसी के अप्पन छल। सोचने छल, ओकरा दऽ कऽ निश्चिंत भऽ जाएब। मुदा ओकर नेतपर शक छल, बड़ी काल पहिनेसँ। आ ओकरा नै दऽ कऽ नीक करलिऐ। नै तँ से दिन सेहो अइतिऐ जखन अप्पन खेत की, गाममे ओ घुसै नै दैतिऐ। आ कहैक जरूरत नै जे ओइ काल अहूँ हमर नै, ओकर संग दैतिऐ। हँ, सनेहीकेँ हम जानै छी। ओ अप्पन काजसँ काज राखएबला लोक अछि। अहाँ आर ककरो शिकाइत हुअए तँ बताएब। मौके नै देत, बताएब की? * ओ घर, जकरा राँचीक प्रोफेसर राजीव सक्सेना रिटायर भेलाक बाद अपना रहै लेल बनारसमे बनबैने छल आ जकरा अप्पन बेटी सोनलक नाम कऽ देने छल, ओ अशोक विहारमे छल। बनारसमे मोहल्ला छल, विहार आ कॉलोनी नै। एकर निर्माण शुरू भेल १९८०-९० क आसपास जखैन पूर्वांचल आ बिहारक भू-माफिया आ बाहुबलीक उदय भेल। ओ नग्रक दक्खिन, पच्छिम आ उत्तर दिस बसल गामकेँ किनलक आ ओकर प्लाटिंग कऽ बेचब शुरू कऽ देलक। देखैत-देखैत १५-२० बरखक भीतर गामक अस्तित्व खतम भऽ गेल आ ओइ ठाम नव-नव नामक संग नगर, कॉलोनी आ विहार बसि गेल। ई नव बनारस छल- महानगर सन। मोहल्लामे रहएबला मोहल्लेमे रहल। अप्पन पुरखाक काज-धंधा, दोकान, रोजगार आ घाटक संग। मुदा ऐ कॉलोनीमे बसऽबला बेसी लोक नव नागरिक छल। ओ बाहरसँ आएल छल। अगल-बगलक जिलासँ। सौ-पचास कि.मी. दूरसँ। हुनकर लगेमे गाम छल, थोड़-बेस जमीन छल, खेती-बारी छल। हुनका समए-समएपर बनारस आबऽ पड़ैत छल-कहियो कोर्ट कचहरीक काजसँ, कहियो अस्पतालक काजसँ, कहियो तीर्थ-बर्त लेल, कहियो शादी-बियाहक खरीदारी लेल, कहियो नेना सबहक एडमिशन आ पढ़ाइ करैक लेल। बेर-बेर आबि कऽ घुरएसँ नीक छल जे एतऽ ठहरैक आ रुकैक एकटा स्थाई ठाम हुअए, एकटा डेरा हुअए। मुदा ई ओकरा सभ लेल संभव छल जकरा लग अप्पन कोनो छोट-मोट नोकरी अछि, आ ओकरा लेल जकर बेटा सभमे सँ कमसँ कम एकटा बाहर कमा रहल हुअए। जकर नेना सभ गाममे बोर होइत हुअए आ ओतऽ नै रहए चाहैत हुअए, नग्रक आदति लागि गेल होइ आ अप्पन हित उम्हरे देखऽ चाहैत हुअए। मुदा गाममे ओइमे सँ किछु पहुँचि रहल छल कनी-कनी, जे नग्रमे छल- बिजली सेहो, नल सेहो, फ्रिज सेहो, फोन सेहो, टीवी सेहो, अखबार सेहो। मुदा ओ मजा नै छल जे नग्रमे छल। मजा छल तँ ओकरा लेल जकरा लग ट्रैक्टर छल, थ्रेशर छल, पंपिंग सेट छल, बोलेरो आ सफारी छल, जे खेतीक पेटक लेल नै, व्यवसाय लेल कऽ रहल छल, जे एक नै, एक्के संग सभ राजनीतिक पार्टीक हितैशी आ मदति केनहार छल। एहन लोकक कॉलोनी सेहो दोसर छल- नम्हर-चौड़गर प्लाटबला। मुदा अशोक विहार हुनकर कॉलोनी छल जे अध्यापक छल, बाबू छल, दोसर श्रेणीक सरकारी, गैर-सरकारी कर्मचारी छल आ एकरोसँ खास गप ई छलै जे या तँ रिटायर भऽ चुकल छल या निकट भविष्यमे रिटायर होइबला छल। नै तँ अखबारमे कोनो विज्ञापन, नै कोनो चौकपर ऐ लऽ कऽ कोनो होर्डिंग जे ऐ कॉलोनीक प्लाट हुनके बेचल जाएत जे पचास-पचपनक ऊपर हएत आ जल्दिये रिटायर हएत। मुदा जानि ने कोना भेल जे जखन कॉलोनी तैयार भेल तँ भेल जे ई बूढ़क कॉलोनी छी। एहन बूढ़-बूढ़ीक जिनकर बेटा-बेटी अप्पन स्त्री आ नेना सबहक संग परदेसमे नोकरी कऽ रहल अछि-कियो कोलकातामे अछि, तँ कियो दिल्ली, कियो मुंबई तँ कियो बेंगलौर तँ कतेक रास तँ विदेशमे। हुनकर दुख अपरम्पार छल। ओ बेटा-बेटी लेल अप्पन गाम छोड़ि देने छल, अप्पन जन्मभूमिकेँ। ई अपना लेल तँ ठीक, चाहे जना रहि लिअए, मुदा हुनका लेल नै। नहिये बिजली, नहिये पानि, नहिये लिखाइ-पढ़ाइ, नहिये आबै-जाइक सुविधा। घर हुअए तँ एहन ठाम जतऽसँ खेती-बारीपर सेहो नजरि राखल जा सकए आ बेटा-बेटीकेँ सेहो असुविधा नै हुअए। ओ अप्पन ठाम जमीन, संबंध, संगी-साथी, बाग-बगेचा, ड्बरा-पोखरि छोड़ि कऽ जइ संतान लेल आएल, वएह बाहर अछि। एतऽ धरि तँ ठीक छल, मुदा आब हलात ई अछि जे जतऽ सर्विस कऽ रहल अछि, ओ ओइ नग्रमे रमि गेल अछि आ ओतऽसँ घुरि कऽ एतऽ नै आबऽ चाहैत अछि। जौं ओ आबए चाहैत छल तँ हुनकर बच्चा सभ नै आबए चाहैत अछि। लिअ, ई नव आफत। जकरा लेल घर छोड़लौं ओकरे अप्पन अलग घर। ई नव आफत हुनका जिअ नै दऽ रहल अछि, नहिये मरैये दऽ रहल अछि। गामपर दादा-पुरखाक जमीन-जेदाद। बाप-दादाक धरोहर नै देखू तँ कखैन दोसर कब्जा कऽ लेत कहब मुश्किल। पुरखा सभ तँ एक-एक कौड़ी बचा कऽ, पेट काटि कऽ, जोड़ि-जोड़ि कऽ जेना-तेना जमीन बढ़ेने छल। चारि कऽ पाँच केने छल, तीन नै हुअए देलक आ तँए ई हाल अछि। कनीटा इम्हर-उम्हर भेल तँ आड़ि गाएब। महीना-दू महीनामे कमसँ कम एक बेर गामक चक्कर लगाबैत छल। देख लिअ लोक, जे नै अछि। ध्यान राखए। हाल चाल लैत छेम-कुशल-मंगल पुछैत। दुख-सुखमे जाइत, सभसँ बना कऽ राखू। अधिया या बँटाइपर खेती तखने करू। दियाबाती बा घर दुआरक देख-रेख लेल कोनो नौकर-चाकर राखू तखनो। हुनकर बेटाक नेनपन गाममे बीतल छल। नग्रमे पढ़ैत काल सेहो ओ आइत-जाइत रहल छल गाममे। ओ खेती भले नै केले हुअए मुदा हुनका ई पता छल जे हुनकर खेत-पथार कोन छै, धानक, गहूमक, दलिहनक। हुनका थोड़-बहुत जानकारी छल। खेला-धूपी बा कौतुहुलमे बाप-कक्का संग रहि कऽ ओ अगोर केने छल, रोपनी-कटौनी सेहो देखने छल। लोक सेहो जानैत छल जे ई फलानाक बेटा या भातिज अछि। गाम घरसँ माया-मोह लेल एतबे कम नै छल मुदा हुनकर बच्चा। ओ तँ दादा-दादीकेँ छोड़ि कऽ चिन्है ककरा छल? आ दादा-दादीकेँ सेहो चिन्है कतऽ छल। चिंता ओकरा होइ छै जकरासँ मोह होइ छै, प्रेम होइ छै। परिचए आ संबंध नै तकर की चिंता। खेत सेहो ओकरे चिन्हैत अछि जे ओकरा संग जियैत-मरैत अछि। ओ खेतकेँ की चिन्हत, खेते हुनका चिन्हएसँ मना कऽ दैत अछि। ई सभटा गप बेटा सबहक नजरिमे बूढ़क भाँसब छल। अहाँ माटिमे पैदा भेलौं आ एक दिन ओइ माटिमे मिलि जाएब। कहियो ओइसँ छूटैक बा ऊपर उठैक बा आगू बढ़ैक गप अहाँक दिमागमे नै आएल, किएकि ओइमे गोबर नै माटि छल। की कऽ लेलौं खेती कऽ कए अहाँ। कोन युद्ध जीत लेलौं। खाद महग, बीज महग, नहरमे पानि नै, मौसमक भरोस नै, बड़द नै रहल, भाड़ापर ट्रैक्टर समएपर भेटए नै। हरवाह आ मजूर रहल नै। ककर भरोसे खेती करू आ खेती सेहो तखन करू जखन हाथमे बाहरसँ चारि पइसा आबए। की फाएदा एहन खेतीसँ। असल चीज पइसा अछि। जौँ हाथमे पइसा हुअए तँ ओ सभटा जिन्स बिना किछु केने बजारमे भेट जाइत अछि, जकरा लेल अहाँ राति-दिन खून-पसीना एक करैत छी। बिना किछु केले, बिना किछु करेले। सभटा गप आ सभटा झगड़ा बेटासँ चलि रहल छल, गामकेँ लऽ कऽ। मुदा आब नव आफत। अशोक विहारक मकानक की हएत। ओ जतऽ अछि, ओतऽसँ आबऽ नै चाहैत अछि। अछि तँ ई जे हुनकासँ गाम तँ छूटिये रहल अछि, अशोक विहार सेहो ने छूटि जाए। * अशोक विहारक लेन नंबर ४ क डी.१ मे अमेरिकासँ आएल सोनल सक्सेना रघुवंशी, तीन बरख बाद। हुनकर डैडी आएल छल सोनलकेँ सैंट्रोसँ पहुँचाबै आ विश्वविद्यालय ज्वाइन कराबै लेल। एतबे टा नै, हफ्ता भरि रहि कऽ सभ चीज ठीक-ठाक केलक, ओकरा सजेलक-धजेलक, भोर-साँझ बेटीकेँ चाह पिएलक, ओकर दिनचर्या निर्धारित केलक आ विदा होइसँ पहिने ओकरा सलाह देलक। संजूक मम्मी-पापाकेँ बजा लिअ, ओ काज आएत। घर सेहो देखत आ अहाँकेँ मदति सेहो करत। यएह बाजल छल संजय सेहो अमेरिकासँ विदा करैत काल। -हम दुनू भाँय बाहरे छी, मम्मी-पापा गाममे असगरे अछि। ऐ उमेरमे हुनका सहाराक जरूरत अछि, हुनका संगे राखब। ई पहिलुक राति छल जखन ओ घरमे असगरे छल। देर राति धरि घर आ अप्पन बेडरूममे संगीत सुनैत रहल। एक कैसेटक बाद दोसर कैसेट। शास्त्रीयसँ मोन भरितिऐ तँ अर्धशास्त्रीय, ओइसँ मोन भरितिऐ तँ फिल्मी गाना। पढ़ैत रहितिऐ, सुनैत रहतिऐ। बत्ती मिझा कऽ सुतबाक आदति छलै। बेडरूमकेँ छोड़ि कऽ आन कोठलीक बत्ती बरैत छोड़ि देलक आ पटा गेल। सुन-सन्नाटाक सेहो आवाज होइत अछि आ से नीक कम, भयौन बेसी होइत अछि। एतबे टा नै। ई आवाज सुनाइये टा नै, लखाह सेहो दऽ रहल छल। हुनकर घरक आगू पार्क छल- बड़ पैघ। पूरा मोहल्ला या कहियौ कॉलोनीक। जखनसँ आएल छल, तखनेसँ भोर-साँझ देखि रहल छल। ओ तीन बरखसँ एहन दुनियामे रहि कऽ आएल छल जतऽ अन्हार नै होइ छल। जतऽ बूढ़ नै रहै छल। जतऽ सभटा चीज दौड़ैत-भागैत उछलैत-कूदैत नजरि आबैत छल। जइमे पानि छलै, तेजी छलै। जतऽ जवान आ जवानी आ तरह-तरहक रंग छलै। जतऽ कोनो चीज अप्पन ठाम ठाढ़ आ स्थिर नै लखाह दै छल- आ आब ई पार्क आ ई कॉलोनी। बूढ़, अपंग आ विकलांग ई विहार। फरवरीक ऐ मासमे खिड़की आ दरवाजापर थाप दैत बसंती हवा आ पार्कमे घिसियाइत, उड़ैत सूखल, झड़ल मृत सन पातक चरमर शब्द। मानि लियौ ककरो घरमे कोनो चोर पैसि जाए। ककरो की, हमरे घरमे चोर पैसि आबए आ सेहो असगरे। बिना कोनो संगीक, औजारक, डाकू पैसि आबए बिना राइफल-बंदूकक असगरे। राति-बिराति तँ छोड़ू, बीच दुपहरियामे। कोनो बलात्कारी पैसि आबए दिनेमे आ हमरा उठा कऽ चलि जाए पार्कमे, आ हम चिकड़ी जे बचाउ-बचाउ तँ के सुनत (बेसी बूढ़ या तँ बहीर अछि या ऊँच सुनैत अछि)। के दौड़त (बेसी बूढ़ ठेहुन या जोड़क दर्दसँ परेशान अछि)। के देखत (बेसी बूढ़ तँ मोतियाबंदक आपरेशन करा कऽ आँखिपर हरियर पट्टी बान्हले छल), ई सभ नै कऽ सकए तँ ठाढ़ भऽ कऽ चिकरए तँ सही (बेसी कऽ डाँड़ झुकल अछि आ मुँहमे दाँत नै, ओ घिघिआ तँ सकैत अछि, मुदा चिकड़ि नै सकैत अछि)। ऐ सोचसँ सोनलक भोँआ ठाढ़ भऽ गेलै। ओ कोनो अनजान डरसँ सिहरि उठल। फेर एकाएक ध्यान गेलै कुक्कुर दिस। कुक्कुर बड़ रास छल कॉलोनीमे- सभ सड़कपर, सभ गेटक बाहर बैसल या घुमैत लखाह दैत छल मुदा एतऽ एक्के टा ‘मुदा’ छल। एत्ते दिनसँ ओ ककरो भूकैत नै सुनले छल। ओकरे मकान डी-१ क गेटपर एकटा भूरा बैसल रहैत छल मुदा जखन जाउ, कत्तौसँ जाउ- गेटसँ चुपचाप हटि जाइ छल आ दोसर ठाम कनी हटि कऽ बैसि जाइ छल। कॉलोनीक बशिंदाक अलाबे किराएदार सेहो अछि- सभ घरमे। नीचाँ मालिक, ऊपर किराएदार। किछुमे देसी, किछुमे विदेशी- ओइमे बेसी जापानी, कोरियाई बा थाई। विद्यार्थी बा टूरिस्ट अप्पन काजसँ काज राखैत छल। ओकर अलाबे ओ कर्मचारी अछि जकर कोनो समए बदली भऽ सकैत अछि। यानी ओ जिनकर दिमागमे मकान कब्जा करबाक गप नै आबए। एहन लोकक मोहल्ला, लोकसँ की लेब-देब, हुनका सभकेँ अपनेसँ फुर्सत नै छनि। एहन तरहक जे ओकरे घर की, कॉलोनीक कोनो घर- एतए धरि जे कॉलोनीक कॉलोनी दिनमे लूटि कऽ लऽ जाए, रोकै-टोकैबला कियो नै भेटत। सोचैत-सोचैत लागल जे ई खाली एकटा सोच नै अछि- एकटा हॉरर फिल्म अछि, जे ओकर आँखि देखि रहल अछि। ओ पार्कमे फाटैत, चिर्री-चोथ होइत जा रहल साड़ी-ब्लाउजमे इम्हर-उम्हर भागि रहल रहए- जोरसँ गरजि रहल रहए, मुदा कियो अप्पन घरसँ निकलिये नै रहल अछि। ककरो सुनाइ नै दऽ रहल अछि तँ निकलत कतऽसँ। उठि कऽ झटकि कऽ ओ बत्ती जरेलक आ फिल्म खत्म। साँसमे साँस एलै। कैसेट लगेलक। दुर्भाग्यसँ कैसेट तेहेन निकललै जकरा ओ नै सुनऽ चाहैत छल, नै सुनने रहऽ चाहैत छल- वक्त ने किया, क्या हँसी सितम, तुम रहे न तुम, हम रहे न हम। ई कैसेट सोनलकेँ समीर देने छल- तीन बरख पहिने, बियाहक रिसेप्शनक दिन। तखैन ओकरा नै तँ एकरा देखैक खगता भेलै आ नहिये सुनैक। ओकरा सदिखन अपना लग राखलक मुदा कहियो नै सुनलक। आइ ई सुनैत ओकरा लागि रहल छलै जे कत्ते बदलि गेल ओइ गीतक अर्थ आइ। ओ संजयक कोनो चर्चा नै केलक अप्पन डैडीसँ, जानि-बूझि कऽ। ओ हृदएक मरीज अछि, हुनका ठेस लागितिऐ। जौँ विश्वविद्यालयक सर्विस नै भेटल हेतिऐ आ ओ अमेरिकामे रहि गेल हेतिऐ तँ की हेतिऐ। गलती कतऽ भेल आ ककरासँ भेल- ओ बुझि नै सकल। आरती गुर्जर ओकर लैंडलार्डक बेटी। ओइ कॉल सेंटरमे काज करैत छल जइमे संजय करैत छल। संग आएब-जाएब ओकरे कारसँ होइ छलै। दिन-रातिक संग। आश्चर्य ई छल जे आरतीक माए-बाप हुनका एक-दोसराक करीब आबैत देखि रहल छल, तकर बादो चुपचाप छल। आश्चर्य ई छल जे ओकर सभक आँखिक आगू ओ हँसी करैत छल- निर्लज्जताक सीमा धरि आ टोकलापर हँसऽ लागैत छल। आ एकरोसँ पैघ आश्चर्य ई छल जे आरतीक पति जखन कहियो न्यूयार्कसँ आबै छल तँ ओ अप्पन पतिसँ ओकर ब्वायफ्रेंडकेँ लऽ कऽ गप करैत छल आ ओकरा डिनरपर लऽ जाइ छल। जाए तँ संगमे ओ सेहो, मुदा ओकरा सदिखन लागैत छलै जे नै जइतिऐ तँ बेसी नीक रहतिऐ। ओ एकटा एहन समाजमे आबि गेल छल जइमे डॉलरकेँ छोड़ि कऽ कोनो आन चीज जना प्रेमक लेल ईर्ष्या करब पछुएबाक निशानी छल। ओ जखन संजयसँ ओकर किरदानीक शिकाइत करै छल, ओ तमसा जाइ छल। -अहाँ देश आ कालक हिसाबसँ अपनाकेँ बदलैलऽ सीखू, चलैलऽ सीखू। नै चलि सकी तँ चुपचाप बैसल रहू बा घुरि जाउ। -घुरब तँ असगरे किए? अहाँकेँ संग लऽ कऽ। -हम तँ डिअर परदेसकेँ अप्पन देस बनाबैक सोचि रहल छी। मुस्कुराइत ओ आँखि मारि कऽ बाजल- अहाँ किए नै खोजि लै छी एकटा ब्वायफ्रेंड। -नीक लागैत अहाँकेँ? ओ सीधा संजयक आँखिमे देखलक। -नीक, की कहै छी। निश्चित भऽ जाएब सर्वदा लेल। हा, हा, हा। सोनल संजयक आँखिमे गौरसँ देखलक। ओ आँखि छल या दिल। ई गप ओ जबानसँ बाजल छल या दिलसँ। ओ कत्तौ सच्चेमे सोनलसँ मुक्ति तँ नै चाहैत छल। ओ देखि रहल छल जे अमेरिका एलाक बाद हुनकामे तेजीसँ अन्तर आएल छल। एक-दू बरखक भीतर। ई ओकर तेसर नौकरी छल। ओ एकटा शुरू करैत अछि, दोसराक खोजमे लागि जाइत अछि। पहिनेसँ नीक, पाइकेँ लऽ कऽ। हुनकामे इन्तजारी नामक चीज नै अछि। ओ जल्दीसँ जल्दी ऊँचसँ ऊँच स्थान छुअ चाहैत छल। जहिना एकटा ऊँच स्थानपर पहुँचै छल, कनी दिनमे से नीचाँ लागऽ लागै छल। एकरा ओ महत्वाकांक्षा कहै छल। जँ ई महत्वाकांक्षा अछि तँ फेर लालच की अछि। लालच। आरती गुर्जरक संग संजयक दोस्तीक पाछाँ खाली आरती गुर्जर अछि बा ओकर एन.आर.आइ. माए-बाप, जकर गुजराती हस्तशिल्पक चमकैत व्यवसाय अछि। जकर ओ एकमात्र संतान अछि। आरतीसँ संजयक सम्बन्ध ओकरा बुधिसँ बाहर छल। एतऽ रहि कऽ सोनल सेहो कमा सकैत छल। कोना विश्वविद्यालयमे, कॉलेजमे, लाइब्रेरीमे, कत्तौ सेहो। कंप्यूटरमे सेहो नीक गति छल। मुदा संजय जखैन सोचलक, अपना लऽ कऽ सोचलक। सोनलकेँ लऽ कऽ सोचैक फुरसति नै छलै। ओ सोनलकेँ हाउस वाइफसँ बेसी हइले नै देलक आ ओ सेहो बनारसक इंतजारीमे आइ-काल्हि-परसू करैत रहि गेल। सोनलक आँखि भरि गेलै। ओइ काल ओ निर्णय लेलक जे ओ आब एतऽ नै रूकत। ओ बहन्ना ताकि रहल छल जे राँचीसँ पापाक ई-मेल आएल जे तुरंत आबि जाउ। १५ केँ अहाँक इंटरव्यू अछि। ओकर खुशीक सीमा नै रहलै। ई ओकर आत्माक पुकार छल जे विश्वविद्यालय धरि पहुंचल छल। आइ भोरक प्रकाशमे खिड़कीसँ फेर गरजि रहल छल सोनलक आत्मा। -संजयकेँ नै, समीरकेँ सुनू आ चलि आउ। * बेसी नै, हफ्ता-दस दिन लगलै सोनलकेँ ऐ घरक एकांत आ सुन-सन्नाटक हिसाबसँ अपनाकेँ उतारऽ मे। आ जखन उतरि गेल तखन मजा आबऽ लगलै। अप्पन ‘असगरे’ केँ इंज्वाय करऽ लागल। ओ डेढ़-दू बिसवाक रियासतक रानी छल- मालकिन। जखन चाहे सुतु, जखन चाहे उठू, जतऽ चाहे बैसू, जना चाहे ओहिना घरमे रहू। ब्रा बा गंजीमे, लुंगीमे, गाउनमे। नंगटे नहाबी, कूदी-फांगी। नै कियो देखैबला नै कियो सुनएबला। जखन चाही, जेहन चाही खेनाइ रान्ही। नै रान्ही, उपास करी, ओकर मोन। जौं संगमे ई सासु-ससुर हुअए तँ ई करू, ऊ करू, एना करू, ओना नै करू। दुनिया भरिक झमेला, टोका-टाकी। टेपरेकॉर्डर छै, टी.वी. छै, कंप्यूटर छै, मोबाइल छै, फोन छै जइसँ अपनाकेँ व्यस्त रखबाक चाही। एकर अलाबे किताब छै, क्लासक तैयारी छै, कार छै। बेसी नै, साँझकेँ फ्रेश भेलाक बाद आध घंटाक ड्राइवपर बहरा जाउ आ घुरि कऽ बीअरक एकटा पैग आ सिगरेट (ई कैलिफोर्नियाक आदति छल जकरा देर-सबेर छोड़ैये पड़तै, ऐ सड़ल-गलल नग्रमे से ओ जानैत छल)। -मुदा समीर कतऽ अछि। ओ पापाकेँ फोन केलक। कोनो खास गप लेल नै, बस ओहिने। जखन ओ रिसर्च कऽ रहल छल इतिहासमे, तखने समीरसँ परिचए भेल छलै। एकटा तेज आकर्षक युवक छल। नीक खाइत-पिबैत घरक। ओकरासँ दू बरख सीनियर आ राजनीतिमे पी.एच.डी.। नौकरी भेटि रहल छल मुदा ओ अप्पन हितकेँ नै देखि कऽ किसान-मजदूरक हितकेँ देखलक। ओकरामे देश आ दुनिया आ समाजक सभटा मुद्दापर नम्हर बहस करबाक आ विश्लेषण करबाक दक्षता छलै। ओकरा राजनीतिक ऐक्टिविस्ट हएब पसीन छल। ओइ समएमे बिहारमे एहन कतेक ग्रुप छल आ ओ ओइमे सँ एकटा ग्रुपसँ जुड़ि गेल आ सक्रिय भऽ गेल। ओ हफ्तामे एक बेर पटना आबैत छल आ पूरा दिन सोनल संग बिताबै छल। ओकर सपना छल जे बियाह करब आ अप्पन जीवन किसानक खुशहालीक लेल समर्पित कऽ देब संगे-संग। सोनल जखन डैडीकेँ बतौलक तँ ओ बुझाबैत बाजल जे ई आतुर दिमागक सोच अछि। कनियाँक कमाइ आ नोकरिहाराक चंदापर क्रांति करऽबला एहन युवकक कमी नै अछि बिहारमे। ओ जल्दीसँ जलखै आ चाह-पानिक लेल दोसराकेँ ताकैत सड़कपर लखाह पड़ैत रहैत अछि। एहन सनकीमे नै आबू। आ हुनके समझेला-बुझेलापर ओ संजयसँ बियाह तँ कऽ लेलक मुदा समीरकेँ हृदएसँ नै निकालि सकल। एतऽ धरि जे अमेरिकामे जखन संजय ओकरासँ ब्वायफ्रेंडक गप केलक तँ ओ डरि गेल जे कत्तौ ओकरा समीरक दोस्तीक खबरि तँ नै अछि। हुनका समीरक बड़ सोच लागल छन्हि, ओकरा एतऽ एलाक बादसँ। ओ भोर कऽ छतपर टहलि रहल छल जे डी-४ क आगू सड़कपर पुलिस वैन लखाह देलकै। ओकर नजरि जाइसँ पहिनेसँ ठाढ़ छलै ओ वैन। किछु लोक छल जे भीतर-बाहर आबि जा रहल छल। लेनक एकटा कोनपर ओकर डी-१ आ दोसर कोनपर डी-४। ओकर दुइये मकानक बाद। बरतन माँजै आ झाडू पोछा करैबाली दाइ ओइ कॉलोनीक छल। जहिना ओ आएल, ओ पुछलक। दाइ गीता जे किछु बतौलक से भयौन छल। ई ओइ कॉलोनीक तेसर घटना छल। ऐ बरखक तेसर। डी-४ राय साहबक बंगला छल। राय साहब बागवानीक खूब शौकीन। हुनकर लॉनमे मखमल सन घास छल, जेना हरियर रंगक गद्दा। ओइमे जुत्ता-चप्पल पहीर कऽ ने ओ अपने जाइ छल, नहिये दोसराकेँ जाए दै छल। घासक गद्दाक चारू दिस फूल आ रंग-बिरंगक पातबला गमला छल। ओ दिन भरि कैंची संग लॉनमे नजरि आबैत छल- काटैत-छाँटैत। हरियर रंगक पाछाँ एहन बताह जे बंगलापर सेहो हरके डिस्टेंपर। एतऽ हरियरी हुनकर झुर्रीबला मुँहपर रहै छलै सदिखन। एक दिन एकटा फोन एलै राय साहेबक नामे। -एत्ते जल्दी की अछि मकान बेचबाक। कनी रुकि जैतिऐ। राय साहेब हेलो, हेलो करैत रहि गेल, मुदा फोन कटि गेल छलै। ओइ दिन हुनका आश्चर्य भेलै, हँसी सेहो एलै। फेर सभ तेसर-चारिम दिन रोज या तँ कोनो ने कोन फोन आबै छलै या कियो ने कियो मकानकेँ लऽ कऽ जानकारी करैक लेल आबै छलै। फोन करऽबला की अछि, कतऽसँ कऽ रहल अछि, मकान बिकेबाक गप के बतौलक, राय साहेबकेँ किछु पता नै चलि सकलै। आबऽबला केँ ओ बिगड़ि कऽ भगा दै छला, फाटकक भीतर पैसऽ लेल नै दै छला। ओ कहैत-कहैत थाकि गेला जे ई खबर गलत अछि, हुनका बेचबाक नै अछि। तकर बादो ई खेरहा खतम नै भेल। ओ परेशान भऽ गेल। लागैत रहए जे ओ पागल भऽ जाएत। ओ सुतै लेल छटपटा कऽ रहि जाइ छल आ नीन नै आबैत छलै। दोस्त मित्रक सलाहपर ओ पुलिसकेँ रिपोर्ट केलक जे हुनका लग केहन-केहन फोन आबैत अछि, केहन-केहन लफंगा आबैत अछि, आ केहन-केहन गप करैत अछि। चारिम दिन जे लोक मकानकेँ लऽ कऽ पुछैले एलै, तकर गपसँ राय साहेबकेँ लागि गेलै जे पुलिस रिपोर्टक जानकारी हुनका अछि मुदा एकर नहिये डर छै, नहिये आदंक। जइ मानसिक तनाव आ बेचैनीसँ ओ जीबि रहल छल, ओइसँ हुनका ओइ दिन मुक्ति भेटल जइ दिन एकाएक हुनकर नेनाक मित्र राजराम पांडे उर्फ भुटले गुरु आएल। भुटले गुरु आब तँ नगरक प्रसिद्ध रईस छल मुदा छल हुनकर पड़ोसी गामक। हाईस्कूल धरि हुनकर संग गाममे पढ़ि चुकल छल। कतेक मोहल्लामे कतेक रास मकान छलै। ओ इम्हरसँ जा रहल छल तँ हुनका राय साहेब मोन पड़ल आ पुछैत-पाछैत डी-४ मे चलि आएल। -भजार। बड़ नीक घर अछि सुरेश। ओ गेटमे पैसैत बाजल। राय साहब बड़ उत्साहसँ हुनका घर देखेलक। ओ पहिल बेर आएल छल। ओ घर-आंगनक प्रशंसा करैत बतेलक जे ओइ समएमे भले ने भेंट भेल हुअए, दुनू बेटीक बियाह आ भाभीक स्वर्गवासक खबरि हुनका भेटल छल। ड्राइंग रूममे पैसैत हुनका पुछलक। -सुरेश। अहाँक बेटा कतऽ अछि आइ-काल्हि जकर इलाज करा रहल छलौं। भुटले गुरु सोफापर बैसल, राय साहेब हुनका आगू बैसि कऽ कूही भऽ कानऽ लागल। भुटले गुरु सेहो सोफासँ नीचाँ आबि गेल आ सुरेश रायकेँ बाँहिमे भरि आगू दीवान दिस ताकैत रहल। दीवानपर मोटरी जकाँ एकटा छौड़ा पटायल छल। ओ टुकुर-टुकुर उत्सुक भऽ हुनका ताकि रहल छल। दाढ़ी-मोंछ बेहिसाब बढ़ल छलै। खाली मुँह खुजल छलै। देह झाँपल छलै। एकटा सुखाएल लकड़ी सन बिछौनपर पड़ल छल। लागै नै छलै जे डाँड़क नीचाँ किछु छै। ई बाजैत तँ तहियो नै छल। मुदा ई ख्याल नै जे किछु बुझैत अछि बा नै। भुटले गुरु पुछलक। राय साहेब बिना किछु बाजले हिचकी लिअए लागल। भुटले गुरु सांत्वना दैत हुनका उठैलक आ सोफापर अप्पन बगलमे बैसेलक। कनी काल बाद राय साहेब आएल आ अंदर चलि गेल। जखन ओ चाहक संग घुरल तँ सामान्य छल। चाह पीयैत ओ बतौलखिन जे कोना पेट काटि कऽ, गामक जमीन बेचि कऽ, बैंकसँ कर्ज लऽ कऽ कोन तरहेँ ई घर ठाढ़ केलक, दू बरख पहिने रिटायर भेलाक बाद ओइमे आएल। हम कहियो नै सोचलौं जे केकरा लेल घर। बस ई छल जे अपना लेल एकटा घर हुअए। एकरा ठाढ़ हेते-हेते स्त्री सेहो चलि गेल। मुदा लागल रहलौं बिना सोचले-बुझले जे घर हुअए तँ केकरा लेल। देखि रहल छी ऐ बेटाकेँ। नै चलि सकैत अछि, नहिये सुनि सकैत अछि, नहिये बाजि सकैत अछि। की हएत एकर जखन हम नै रहब। नै जानि कोन जन्मक पापक सजा दऽ रहल अछि भगवान। -हम छी ने, चिंता किए करै छी? -भुटले गुरु हुनकर कान्हपर हाथ राखलक। -चिंता तँ ई अछि भुटले गुरु जे छऽ-सात माससँ सुतल नै छी। नै जानि कतऽसँ केहन-केहन लोकक राति-बिराति फोन आबैत रहैत अछि, धमकी दैत। पता नै के उड़ा देलक जे सुरेश राय अप्पन घर बेचि रहल अछि। परिणाम र्ई अछि जे गुंडा-बदमाश धरि घरक भीतर घुसल चलि आबैत अछि आ सलाह दऽ रहल अछि, जे जतेकमे बेचब ओतबेमे दू टा कमराक फ्लैट आबि सकैत अछि आ बाकी सूदसँ बीस-पच्चीस बरख निश्चिन्तीसँ काटि लेब। पुछलौं जे अहाँ के? तँ बाजैत अछि- प्रापर्टी डीलर, प्रापर्टी डील अहाँ कऽ रहल छी, बिना पुछले जे अहाँ बेच रहल छी आकि नै? दलाल साढ़। हिम्मत तँ देखू ओकर। जौँ आइ नरेश नीक रहितिऐ तँ ई नौबति नै ऐतिऐ। भुटले गुरु गंभीरतासँ ई सभ किछु सुनैत रहल आ सोचै-विचारैक बाद बाजल। -एना अछि सुरेश। हम दू-तीन दिनमे एकटा दरबान बा लोककेँ भेज देब। बड़ भरोसक लोक। ओ अहाँक सभटा समस्या दूर कऽ देत। ठीक। तेसर दिन सत्तेमे एक लोक आएल आ राय साहेबक फिकिर खतम भऽ गेल। नहिये कहियो फोन आएल, नहिये गुंडा-बदमाश सभकेँ साहस भेलै जे लगमे कत्तौ लखाह दैतिऐ। मुदा जे हेबाक छल, भऽ कऽ रहल। तीन मास बाद। राति दिन पूरा घरक देखभाल करैबला दरबान राति भरक छुट्टी लऽ कऽ भतीजीक बियाहमे अप्पन गाम गेल छल आ इम्हर ओइ राति ई दुर्घटना भऽ गेल। ओइ पलंगपर पटायल राय साहेबक बेटा टुकुर-टुकुर ताकैत रहल आ ओकर हत्या भऽ गेलै। भुटले गुरु ऐ दुर्घटनाक दू दिन पहिनेसँ अस्पतालमे छल। रूटीन चेकअप लेल। दरबान हुनका ई खबरि देलक। ओ अस्पतालसँ सोझे अप्पन गाड़ीमे आएल। दरबज्जापर ठाढ़ भीड़केँ ओतऽसँ हटैलक, बढ़ैलक, डाँटलक, डपटलक आ भीतर जा कऽ पुलिससँ जनतब लेलक। फेर ओइ कमरामे गेल जतऽ बिछौनपर राय साहेब पटायल छल। ओतऽ बगलमे एकटा तख्तापर हुनकर बेटा सेहो छल, जे निश्चल पड़ल छल। मूकदर्शक। दुर्घटनाकेँ आँखिसँ देखैबला गवाह। ओ पुलिसक संग भीतर गेल, ओकरे संग घुरि आएल। बाहर अंदाजी गप आ कनफुसकी चलि रहल छल- या तँ मुँह या नाकपर गेरुआ दबा कऽ मारल गेल या गला दबा कऽ। देहपर कत्तौ चोटक चिन्हासी नै छल। हाथ उठेबाक कोनो चिन्हासी नै। बिछौन मोचड़ाएल नै। गेरुआपर शोनितक छोट-मोट चिन्हासी छल जेना ओ मुँहसँ निकलल हुअए। लहाश जखन पोस्टमार्टम लेल आनल जा रहल छल, सोनल अप्पन गेटपर ठाढ छल। सोनल अप्पन गेठपर ठाढ़ ओकरा जाइत देखि रहल छल। कॉलोनीमे मकान कब्जा करैक तेसर घटना छल। घरमे ओ सेहो असगरे छल। विश्वविद्यालय आबै-जाइक समए अनिश्चित। कोनो दिन दुपहरियासँ पहिने क्लास, कोनो दिन दुपहरियाक बाद। घरमे कियो नै। दिनमे तँ चोरी भऽ सकैत अछि मुदा रातिमे तँ हत्या धरि संभव अछि। ऐ कल्पनासँ ओकरा थरथरी छूटि गेलै। आँखिमे उतरैबला सिहरी सगरे देहमे पसरि गेलै। ओ ऐ गुनधुनीमे पूरा दिन पड़ल रहल। नोकर नै भेटि रहल छलै, नहिये नोकर राखब मुनासिब छल। नोकरनी झाड़ू-पोछासँ आगू लेल तैयार नै छल। बेर-बेर ओकर ध्यान जा रहल छल सासुरपर। रातिमे ओ पहाड़पुरक कोड खोजलक आ फोन केलक- पापा, हम सोनल। आबि रहल छी काल्हि, अहाँ दुनूकेँ लैक लेल। तैयार रहऽ। नै, किछु नै सुनब। मम्मीकेँ फोन दियौ..। * शीलाकेँ सोनल ओ मान-सम्मान देलक जे कोनो पुतोहु की देत अप्पन सासुकेँ। भोर-साँझ मम्मी, बीच राति मम्मी, घरमे मम्मी, बाहर मम्मी- बस सभ दिस मम्मीये मम्मी। जखन कि शीला सोनलक संग आएल लोक लाजक कारण, तइसँ जे नै जाएब तँ बेटा की सोचत हुनका लऽ कऽ। की जे बेटाक सहारा बुढ़ापा काटै लेल अछि तँ ओकर स्त्रीक कोना नै सुनी? ओ नै सुनत तँ ओ हुनकर किए सुनत? लोक अप्पन बच्चाक भविष्य किए सिटैत अछि। तइसँ किएकि हुनकर भविष्यमे हुनका अप्पन भविष्य लखाह दैत अछि। काएदासँ देखल जाए तँ ओ हुनकर नै, अप्पन भविष्य सिटैत अछि। ऐ सीटल भविष्यमे डेग राखने छल शीला आ प्रसन्न छल। जइ लड़कीसँ कोनो पूर्व परिचय नै, कोनो सम्बन्ध नै, एतऽ धरि जे नहिये अप्पन जातिक, नहिये अप्पन कुलक। नहिये संस्कार। ओ शीलाक पाछाँ मरल जा रहल छल- मम्मी, चाह पीब। मम्मी जलखै करब, मम्मी नहा लेलखिन। मम्मी खाना खा लेलखिन, मम्मी कोनो जरूरति। एत्ते खयाल तँ हुनकर बेटी सरला सेहो नै राखैत छल। सोनल पहिने हुनका घर देखैलक- ड्राइंग रूम, ओइसँ सटल कोठली, आंगन, फेर ओ कोठली जइमे मम्मी-पापा रहत, फेर किचेन आ स्टोर, फेर पछुआरक हीस जइमे नोकर-चाकर लेल टीनक खुजल शेडबला कोठली। फेर ओ ऊपर लऽ गेल, छतपर आ देर धरि मम्मीकेँ टहलाबैत रहल जे लोक देखए आ जानए जे ओ घरमे असगरे नै रहैत अछि। ऐ घरमे ओ सभ किछु छल जकरा लऽ कऽ शीला सोचलो नै छल। हुनका राति भरि नीन नै आएल- कारण जे हुअए। कारण नव ठाम सेहो भऽ सकैत अछि, चौड़गर डबल बेड सेहो, गदगर बिछौन सेहो। आ सुख छल जे अनचोक्के हुनकर जीवनमे आबि गेल छल। ओ घरमे आएल नै छल, गृह प्रवेश केने छल। यएह कहने छल सोनल आ नीकसँ नीक डिश बना कऽ खुएले छल। शीलाक खुशी बेर-बेर ओकर आँखिमे नोरा रहल छल। आ ई नोर आर किछु नै, पहाड़पुरक खपरैलबला घर छल, हुनकर बेटा-बेटी छल आ दुख छल जे ओ अप्पन जीवनक भरि सहल छल। एकाएक हुनका मोन पड़ल संजयकेँ लऽ कऽ, नहिये ओ किछु पुछलक, नहिये सोनल अपनासँ किछु बतौलक। दोसर-दोसर गप होइत रहल आइ धरि। अगला दू-तीन दिनसँ शीला अप्पन दिनचर्या निश्चित कऽ देने छल। खाना बनाबैवाली महाराजिन आइ धरि नै भेटल छल आ ओ बैसल-बैसल की करितिऐ दिन भरि। भोर कऽ चाह, आ बीच रातिक खेनाइ ओ अप्पन जिम्मा लऽ लेलक। कष्ट मात्र एतबे छलै जे गप करैबला अखन धरि कियो नै भेटल छलै। डी-पॉकेटक घटनासँ सभ कॉलोनीबला अपनाकेँ घरमे रोकि राखने छल। ओ सभ डरल छल जे कत्तौ एहन नै हुअए जे ओ मकान छोड़ए आ घरमे घुसब मुश्किल भऽ जाए। ऐसँ पार्क सेहो खाली पड़ल छल- नहिये कोनो औरत, नहिये कोनो मर्द। तीन-चारि दिन धरि कियो अप्पन घरसँ बाहर नै निकलल- सर्विस करैबलाकेँ छोड़ि कऽ। शीला झाड़ू-पोछा करैवालीक पाछाँ-पाछाँ घुमैत रहैत छल आ गप करैत रहैत छल जे कएटा छौड़ा छै, कएटा छौड़ी छै। कतऽ बियाह भेलै। जमाए की करैत अछि। कएटा पुतोहु अछि। ककरा संग रहै छी। स्वभाव केहन अछि। सेवा करैत अछि आकि नै। बेटा ध्यान दैत अछि कि नै। अखन कोनो पोता-पोती अछि कि नै। किछु सुनैत, किछु अप्पन सुनाबैत छलि। ओइ काल सोनल अप्पन काज करितिऐ, पढ़ितिऐ, लिखितिऐ आ नै तँ कंप्यूटर माउससँ खेलैतिऐ या टाइप करितिऐ। ऐ बीच शीला दू बेर पुतोहुसँ दुखी भेल छल। ओ भोरमे चारि बजे जागि जाइ छल आ सोनल सुतल रहै छल आठ बजे भोर धरि। ओ ओकरा जगबैक एकटा तरीका निकालक। ओ भोर चारि बजे चाह तैयार करलक आ हुनका जगेलक। सोनल सुतल रहल आ उठलापर चाह सिंकमे फेंक देलक। फेर अप्पन अलगसँ नेबोक चाह बनेलक। शीला देखैत रहल। दोसर दिन ओ नेबोक चाह बनेलक कनी देरीसँ। माने सात बजे। ओइ दिन सेहो यएह भेल। सोनल बाजल- मम्मी, हमर चाह रहऽ देल करथिन अहाँ। जखन उठब, तखन बना लेब। हुनका नीक नै लागल। अप्पन आदतिक अलग ओ कोनो तरहे चुप रहि गेल। एतऽ धरि तँ चलि जैतिऐ मुदा एक दोसर प्रसंगमे तँ जेना हुनकर मन उचटि गेल। होइत ई छल जे शीला भोरमे रातिक बचल रोटी बा परोठा आ सब्जी जलखै कऽ लैत रहथिन। सोनल देखलक तँ बिगड़ल- नै मम्मी, ई नै चलत। अहाँ ऊ खायब जे हम खाएब। टोस्ट बटर, दलिया, दूध, फल। ऊ सभ नै। ठीक। शीलाक दिमागमे सवाल उठल जे रोज-रोज जे बैसका रोटी या परोठा बचि जाइत अछि, ओकर की हएत। ओकरा दाइ गीताक ख्याल आएल। ओ सेहो आबैत शीलाकेँ माताजी-माताजी कहैत छलि। काज-धंधा खतम कऽ जखन गीता जाइ छल तँ ओकरा रोकि कऽ खुआ दैत छल। तरकारी नै रहलै मुदा नै रहलापर कखनो चाह दैत छल, कखनो अचार। सोनलकेँ पता चलल। पता की चलल ओ गीताकेँ एक कोनमे बैसल खाइत देखि लेलक। -मम्मी। -गीताकेँ जाइक बाद सोनल बाजल। -अहाँ किए ओकर आदति बिगाड़ि रहल छी मम्मी। शीला बुझैक ख्यालसँ पुतोहु दिस ताकलक। -ओकर नोकरीक शर्तमे चाह-नाश्ता नै छल। पाँच सौ महीना आ सालमे दू बेर साड़ी, बस। -मुदा, हम चाह-नाश्ता कतऽ दै छी। जे किछु बचल-खुचल रहै छै, सधा दै छी। -फेकैसँ बा कुक्कुर-बिलाइकेँ खुआबैसँ नीक अछि जे ककरो स्वार्थ सिद्ध होइ। -यएह तँ। कुक्कुर-बिलाइकेँ भले खुआ देथिन, ओकरा नै देथिन- यएह कहब अछि हमर। -आँए। ई केहन गप कऽ रहल छी अहाँ। फाटल आँखिसँ पुतोहु दिस ताकलक शीला। -नै, खराप नै मानब। एकरा एना बुझथिन। मानि लिअ काल्हि अहाँ कत्तौ चलि जाइ छी बा एतऽ नै रहब। ओ हमरोसँ आशा करत आ हम नै दऽ सकब तँ खराप लागत, ठीकसँ काज नै करत। छै कि नै। -सभ ठीक। मुदा ई गप हमर गरामे नै उतरि रहल अछि जे कुक्कुर-बिलाइकेँ खुआ देब, मुदा ओकरा नै खुआएब। -मम्मी, ओ अहाँक परजा नै अछि, नोकरनी अछि- प्रोफेशनल। ओकर पेट रोटी-परोठासँ नै, पैसासँ भरत। एतबेटा नै, अहाँ ओकरासँ गप करब आ ओ अहाँक माथ चढ़ि जाएत। -काल्हि जखन कोनो गपपर ओकरा टोकब तँ ओ लड़ऽ लागत। ओकरा अहाँ वएह रहए दियौ जे ओ छी। आबए, अपन काज करए आ बाट नापए। शीला माथ झुका कऽ चुपचाप सुनैत रहल आ ठाढ़ भऽ गेल। -मुदा हम अन्नक अपमान नै हुअए देब। ओकरा नै खुआएब तँ अपने खाएब। -अहाँ अधला मानि गेलौं। नै बुझलौं हमर गप। -बुझि गेलौं, कोनो अनपढ़ नै छी। हमहूँ बी.ए. छी अप्पन कालक। -ठीक अछि। मुदा हम तँ हिनका बैस कऽ खाए लेल नै देब। काल्हि ई कहथिन जे हमरा बैसा कऽ खुआबए छल। -तँ हमरो सुनि लिअ, हम अन्नकेँ एना फेकै लेल नै देब। ई बहस तखने खतम भऽ सकैत छल जखन ओइ दुनूमे सँ कियो चुप भऽ जाए आ ओतऽ सँ हटि जाए। आखिरीमे सोनल कोनो काजक बहन्ने ओतऽसँ चलि गेल। शीला किछु काल धरि बैसल रहल। ओकरा लागल जे बहू नकचढ़ीये टा नै, मथचढ़ी सेहो अछि। पैदा करितिऐ तखन ने अनाजक मोल पता चलितिऐ। माँ-बापक एकेटा औलादि, जातिक लाला- खेत-पथारसँ मतलब नै, ओकरा की बुझल छै अप्पन फसलक सुख-दुख। ओ घरक पछुआरमे गेल जतऽ रघुनाथ बाहरसँ घुमि कऽ आएल छल आ नहाइ लेल जा रहल छल। ओ जहिना शुरू केलक तहिना रघुनाथ टोकलक- सही बाजलक ओ। पुतोहुकेँ सुनै आ हुनका संग रहैक आदत डालू। -की? अहाँक ई सभ कहब अछि। -नै। हमर ई कहब नै अछि। हमरा ई कहब अछि जे जकर घरमे रहै छी, खाइ छी, पहिरै छी, ओकर गपपर कान-बात दियौ। वएह करू, जे ओ चाहैत अछि। -राशन हम आनलौं, चाह-नाश्ता हम बनबै छी, खाना हम पकाबै छी। जे कियो आबैत अछि, हुनका उठाबैत-बैसाबैत छी- आ हमर कोनो पूछि नै। -अच्छा जाउ अहाँ एतऽसँ। जे करबाक अछि करू। खिसिया कऽ रघुनाथ बाजल आ बाथरूममे चलि गेल। -हम नै रहब एतऽ। हमरा गाम पहुँचा दिअ आ नै पहुँचाएब तँ अपने चलि जाएब। बाथरूमक भीतर रघुनाथ हँसैत बाजल- अरे। पुतोहुसँ तँ पुछि लियौ। अपने सँ नै एलौं अछि अहाँ, वएह आनले अछि। कोना अछि ओ गीत। ओ नल खोलि देलक आ गाएब शुरू केलक- अभी न जाओ छोड़ कर, कि दिल अभी भरा नहीं। अभी अभी तो आई हो, बहार बन के छाई हो अभी जरा नहा तो लूँ, अभी जरा ... न... नम... न... नू... साँझक चारि बजेक आसपास सरलाक फोन आएल- बड़ दिन बाद। बड़ दुखी आ शिकाइतक स्वरमे। उठैलक शीला। सोनल कॉलेज गेल छल, घरपर वएह छल। एकरासँ पहिने दू-तीन बेर ओ गामपर फोन केने छल। ओकर खराप भाग्य जे रिसीवर उठैने छल रघुनाथ आ ओकर नाम बिन सुनले, बिन पुछले आ बिन बाजले फोन राखि देने छल। एकर चर्चा सेहो शीलासँ नै केले छल। -माँ आब तँ आबि सकैत छी हमरा कतए। -एना किए बाजि रहल छी सरला। शीला कननमुँह भऽ उठल। -हम बियाह नै केने छी माँ, पापाकेँ कहि देब। चाहे तँ उहो आबि सकैत अछि। -हुनकर हम नै जानैत छी मुदा हम तँ तैयारे छी। जखन कही तखन आबि जाएब। -ठीक अछि, अगला पंद्रह दिनक भीतर कोनो व्यवस्था करैत छी। -मुदा अहाँ बियाह किए नै करलौं। हम तँ मानि लेने छलौं जे भऽ गेल हएत। -माँ, हम सोचि लेने छी। भगवान आ बियाहक बिना जिअल जा सकैत अछि, रहल जा सकैत अछि। कोनो गपक फिकिर नै करब। ठीक। सरला रिसीवर राखि देने छल। शीला जतऽ छल तत्तै ठाढ़ रहल। ओकरा बुझैमे नै एलै जे ई नीक भेल कि अधला। ओ रघुनाथकेँ बतौलक। रघुनाथ मात्र एतबे टा कहलक जे ऐसँ नीक हेतिऐ जे ओ बियाह कऽ लेतिऐ। * शीला सोनलक आग्रहपर ताधरि रुकल रहल जाधरि खेनाइ बनाबैवाली दाइक व्यवस्था नै भऽ गेलै। जइ दिन शीला गेल, ओइ दिन सोनल गेट आ घरक चाबीक डुप्लिेकेट बनबैलक आ ओकरा रघुनाथकेँ दऽ देलक। दुपहरियाक एक-डेढ़ घंटा छोड़ि कऽ ओ जखैन चाहे तखन, जतऽ चाहे ओतऽ आ-जा सकैत छल, घूमि सकैत छल, भेँट-घाँट कऽ सकैत छल, कियो पूछै-ताकैबला नै छलै। ओहिनो रघुनाथ घरमे रहैत एक तरहेँ घरक बाहर छल। पछुआरक बाउंडरीवालसँ लागल एक ईंटाक दूटा देवाल छल, जइपर अस्बस्टर पड़ल छल। सोचल गेल छल जे जौँ नोकर-चाकर बा ड्राइवर भेल तँ ओइमे रहत। रघुनाथक व्यवस्था शीलाक संग ओइ कोठलीमे छलै। ऐसँ बेसी ओ अपन कनियाँ संग सुतलो नै छल। आबै कऽ दिनसँ हुनका ई ठाम जँचि गेल छल। ओकर बगलमे नल सेहो छल आ शौचालय सेहो। आर की चाही। नाश्ता-खाना घरमे, बाकी सभ बाहर। शीला संग रघुनाथक संबंध दाम्पत्यक रहलै मुदा प्रेमक नै भऽ सकलै। ईहो कहि सकै छी जे ओ शीला संग सुति जाइ छल मुदा प्रेम नै करै छल। आ मानै छल जे ऐलेल शीला जिम्मेदार छथि। ओ एहन स्त्री छल जकरा सभ दिन प्रेमक प्रमाण चाही। एतबे टा नै, एक बेर या दू बेर या तीन बेर अहाँ हुनका आश्वस्त कऽ देलौं जे अहूँ ककरो आनसँ नै हुनकेसँ प्रेम करै छी तँ ओ मानि जाएत। फेर ओ अगिला दिन परीक्षा लैले चाहत जे ओ कोनो ओहिना तँ नै छल। एतबे टा नै, ओ अप्पन प्रेमकेँ लऽ कऽ मात्र शिकाइत कऽ सकै छल। एकर अतिरिक्त ओकरा लग कोनो आन भाषा नै छलै। ई सभ स्थिति रघुनाथमे मात्र खिसियैनी टा नै आनलक, ओकरा दिससँ अवहेलना सेहो आनलक। शीला कहियो हुनकर रुचि आ पसीनक हिसाबसँ अपनाकेँ बदलैक प्रयत्न नै केलक। जेना शीला चाहै छलि जे घरमे कोनो गप हुअए जइसँ ओ खुश हुअए, उल्लसित हुअए, ओकरामे उत्साह आ जोश लखाह दिअए, हँसए, गाबए, आर किछु करए। मुदा तैयो हुनकर चेहरापर कोनो तरहक कोमल भाव नै आबै छल। एतऽ धरि जे रघुनाथ जखन खुशीसँ मारे कूद-फान करए आ बेचैन हुअए लागैत छल तखनो ओ हुनकर उपहास करैत निर्विकार ठाढ़ रहैत छलि। खुशी हुनकर चेहरापर अबैत छल तँ जबरदस्तीक दाग सन फेर गाएब भऽ जाइ छल। एकर अलाबे हुनकामे खूबीये खूबी छल। ओ अपन पति आ बेटाक पद आ प्रतिष्ठाकेँ हरदम फराक राखै छलि। दोसरा लग बड़ रास एहन बौस्तु होइ छल जे हुनका लग नै छल मुदा हुनकामे कखनो ईर्ष्या नै होइ छल। समभाव हुनकर स्वभाव छल। ओ तखने विचलित होइ छल जखन ओ कोनो गरीब गुरबाकेँ लल्ल आ विवश देखै छलि। ओ सभ किछु सहि सकैत छलि मुदा ककरो जबर्दस्ती नै। शीलाक गेलाक बाद रघुनाथ निसाँस लेलक। ओ हुनकासँ पुतोहु लऽ कऽ किछु नै बाजै छलि, मुदा एकर बादो ओ तनावमे रहैत छल। ऐ तनावसँ ओ आब मुक्त भऽ गेल छलि। शुरू-शुरूमे रघुनाथकेँ अशोक विहार पसीन नै एलै। ओ ततबे उजाड़ आ उदास इलाका देखने नै छल। देखब तँ दूर, सोचलो नै छल। हुनका कियो बतौने छल जे ई पूरा इलाका कहियो पूरा श्मशान होइ छल। यएह ओजह भऽ सकैए जे हुनका सभ गली आ सभ मकानक सभटा खिड़कीसँ आबैबला हवा मृत्युगंध फेंटल लागै छल। मने इम्हरसँ जाउ या उम्हरसँ जाउ नाक दबा कऽ या फेर ओइपर रुमाल राखि कऽ। आँखि बन्द कऽ देखू तँ पूरा बस्ती ओइ बंदरगाहक सन छल जतऽ सभटा यात्री महाप्रयाण पर निकलै या ओइ पार जाइक तैयारीमे लागल छल। मुदा एक भोर- एहन भोर रोज आबै छल- आ ऐ आँखिसँ रघुनाथ देखै छल। ओइ भोर ध्यान गेलै पार्क दिसनसँ आबैत एकटा बुढ़ दिस- लकवा मारल, मुँह टेढ़, गरदनि झुलैत, वाम हाथ झुलैत, घिसिआइत असक्क पएर, दोसर गलीसँ निकलल एकटा दोसर बूढ जकर एकटा आँखि खुजल छलै आ दोसरपर हरियरका पट्टी छलै, आ तकर पाछाँ एकटा दोसर बूढ़ जकर गरमे कालर माने स्पांडिलाइटिसक पट्टा छलै। तेसर गलीसँ सेहो एकटा बूढ़ आबि रहल छल, पार्कक गेटक दिस आस्ते-आस्ते। हुनकर एकटा हाथमे बोतल छल आ ट्यूब लुंगीक भीतर। सूर्य जना-जना ऊपर उठल जाइ छल, ओना-ओना सभटा कोनासँ खराम खटखटबैत आबैबला एहन बूढ़क संख्या बढ़ैत जाइत छल। रघुनाथकेँ लागल जे ई बूढ़ नै अछि- जिनगीक भूख अछि, जीवनक प्यास अछि, स्वयं जीवन अछि- जे ठोपे-ठोपे एकटा खधाइमे जमा भऽ रहल अछि ओहिना जेना कोनो पहाड़ीक कतेक रास दरारिसँ पानिक एकटा डरीड़ चलैत अछि आ कोनो आन स्रोतसँ मिलिकऽ कहियो नै सूखैबला, मील धरि फूही उड़ाबै बला, शोर मचाबै बला अजस्र धार बनि जाइत अछि। जीवनक झरना सभ भोर रघुनाथकेँ अपना दिस खीचैत अछि- रग्घू, आबू, सुनू, भीजू। मुदा रघुनाथ फुहीमे भीजैसँ बराबर बचैत अछि। किए बचैत अछि रघुनाथ- ओकरा ओ बुझि नै सकल छल। जखन सभ बूढ़ अप्पन मुत्युक विरोधमे बड़ मन आ जतनसँ बाबा रामदेव बनैत अछि, रघुनाथ मूड़ी निहुरेने चुपचाप पार्कसँ बहरा जाइत अछि। हुनकर पसीनक ठाम ई नै, नहरि छल। अशोक विहारसँ डेढ़ किलोमीटर दूर। नहरक पार ओकरासँ सटल बगेचा छल आ तकर आगू संजय कॉलोनी। ई कहियो घनगर छल, जइमे छल-धातरीम, बेल आ लतामक गाछ। रघुनाथ नहरक पुलपर ताधरि बैसल रहैत छल जाधरि रौद सहि सकै जोग रहै छल ओकर गाछीमे। ऐ पुलपर हुनकर भेँट भेल छल एल. एन. बापटसँ। बापट बनारसक महाराष्ट्रीयन छल। एतऽ पढ़लक लिखलक, एतैसँ नोकरी शुरू केलक आ जौनपुरसँ डिप्टी जेलर भऽ रिटायर भेल। बड़ मस्तमौला आदमी छल- पुरना फिल्मी गानाक शौकीन। हुनकर दूटा शौक छल- पीअब आ गीत गायब। गाबै तखने टा छल जखन पीबै लेल बैसै छल। हुनका कोनो संतान नै छलन्हि- नहिये बेटा, नहिये बेटी। स्त्री छल जकरा सभ बुढ़िया कहै जाइ छल। ओ संजयनगरमे एकटा छोट सन फ्लैट लेने छल आ जइमे कहियो-कहियो जबर्दस्ती रघुनाथकेँ लऽ जाइ छल। आ जखैन लऽ जाइ छल, किताबी कीड़ा ऐ मास्टरकेँ गरियाबैत कनी टा चिखा दै छल। सूर्य हुनकर शत्रु छल। ओ निअमसँ पाँच बजे साँझ कऽ पुलापर आबि जाइ छल आ हुनका गारि देब शुरू करैत छल- रघुनाथ, कनी देखू साढ़केँ। जानि-बूझि कऽ अबेर कऽ रहल अछि। ओ साँझ हैक संग बेचैन हुअए लागैत छल आ घर दिस एना भागैत छल जेना पुलिसक चांगुरसँ छुटैत चोर। हफ्तासँ ऊपर भऽ गेल छल जखन बापट रघुनाथसँ भेंट नै केने छल- नहिये पुलपर, नहिये ओइ गाछीमे। ओ सभ दिन जाइ छल आ घुरि आबै छल। ओ ओइ दिन जल्दी घुरि आएल छल किएकि गुमार बड़ छल आ पानि बरसैक आस छल। कालोनीक मुहथरिपर मकान छल मन्ना सरदारक। बिन पलस्तरक, ईंटाक। पैघ दरबज्जा, जइमे एक दिस नम्हर सन खटाल, ओतऽ बान्हल चारिटा महीस, तीनटा गाए। एतऽ भोर आ साँझ दूधक बर्तनक क्यू लगाबै छल बूढ़। ई कारोबार मन्ना सरदारक नैत देखै छल, हुनकासँ एकर कोनो मतलब नै छल। कहैत अछि जे ई कालोनी हुनकर जमीनपर बसल अछि। पचहत्तर-अस्सी बरखक मन्ना सरदार अप्पन जमानाक पहलमान। कारि, मोट, गस्सल शरीर। पेट कनी निकलल। आइयो लाल लंगोट आ छीटबला गमछामे उघार देह रहैत अछि आ निअमसँ पच्छिम मुँह कऽ कए पचास डंड-बैसकी करैत अछि। हुनका बस एक्केटा शौक अछि आ एक्के टा रोग। शौक अपन हाथसँ भांग घोटब, गोला जमाएब, ऊपरसँ मलाइ-रबड़ी खाएब आ रोग- गठिया। हुनकासँ डॉक्टर बाजल छल जे जौं चाहै छी गठिया ठीक हुअए तँ भांग छोड़ि दिअ। ओ जवाब देने छल- औ डॉक्टर साहेब, अहाँ कहब तँ दुनिया छोड़ि देब, बाकी भांग नै। ओ जवानी धरि शहर जाइ छल आ जे कियो पकड़िमे आबि जाइ छल ओकरा ओइ दिनक खिस्सा सुनाबै छल। रघुनाथ हुनकर पहुँचिमे आबि गेल छल ओइ दिन। ओ जहिना मुड़ल, तहिना सरदार पुछलक- जै रामजी मास्टर साहेब। कुम्हर कऽ रहै बला छी अहाँ। की बतौने छलौं ओइ दिन। -धानापुर साइडक। -अरे, अहाँ बतैलिऐ किए नै, ओइ साइडक तँ गुरु छल। -गुरु के? -छक्कन गुरु। अहाँ केना नै हुनका चिन्है छी? ई तँ आश्चर्यक गप अछि। आबू, बैसू तँ। पानि नै बरसत, चिन्ता नै करू। देखू पुरबा शुरू भऽ गेल अछि। पीताम्बरी आ खड़ाम- बस यएह धुआ-धजा छल हुनकर, चाहे जतऽ रहए। की नम्हर छलथि, की छुरी सन देह। परबा पोसने छल ओ। बस एकटा परबा- सेहो सोन सन। ओ अप्पन हाथसँ किसमिस, बदाम, छोहाड़ा खुआबै छल। एक बेर ओ गाएब भेल छल, हफ्ता भरि लेल। गुरु चिंतित। साढ़ बिना बतेले कतऽ चलि गेल। आठम दिन घुरल तँ लोल एकदम लाल। हाँफि रहल छल। गुरु बाजल- सूर्य देवताकेँ ठोर मारि कऽ आएल अछि, जीह आ लोल जरि रहल अछि ओकर, लखाह नै दैत अछि। पहिने पानि पिआ। तँ एहन छल गुरु। एक बेर साँझ कऽ भांग घोटि कऽ ओइ पार गेल, साफा पानि देलक, चंदनक तिलकपर ठोप लगैलक, गट्टापर गजरा लपेटलक आ दालिक मंडी दालमंडीमे पैसल। मुन्नी बाइ अप्पन घरसँ देखि रहल छल जे गुरु आबि रहल अछि। जहिना गुरु ओकर कोठा लग पहुँचल ओ अपनाकेँ सम्हारि नै सकल। वाह रे गुरु। गुरु ओकरा अपन कन्हा आ कोहनीक बीचक ठामपर रोकि लेलक। गुरु बाजल- मुन्नी, आइ ऐपर मुजरा होइतए मुदा ऐ गलीमे नै, चौकपर। असगरे हम टा नै, सगर नग्र देखत। आ गुरु ओकरा ठीके चौकपर आनि लेलक। आ फेर जे मुजरा भेल से नै पूछू तँ सएह नीक। आ अहाँकेँ पते नै जे गुरु के छल? जखन ओ उठल तँ अकास साफ भऽ गेल छल आ जतऽ–ततऽ छिरिआएल तारा लखाह पड़ि रहल छल। * रघुनाथ जखैन साँझमे घूमै, टहलै लऽ या मिलै-जुलैलऽ बाहर जाइ छल, तँ कोशिश करै छल जे नौ बजे धरि घुरि आबए। रातिक खाना ओ सदिखन सोनल संग खाइ छल। ई सोनलक जिद छल। दुपहरियाकऽ एना तखने संभव भऽ सकै छल जहिया ओकर छुट्टी रहए। नै तँ दाइ खाना पका कऽ चलि जाइ छलि आ ओ अपनेसँ खाना निकालि कऽ खा लै छल। नाश्ता हिनकर अलग छल आ सोनलक अलग। हिनका अँखुआएल बदाम आ दूधसँ खाली मतलब छल। शीलाक गलतीसँ ओ बड़ रास गप सिखने छल। ओ अप्पन हिसाबसँ हुनका नै चलबै छल, हुनकर हिसाबसँ ओ अपने चलैत छल। हुनका ससुर बनैक बदला बाप बनि कऽ चलब बेसी सुविधाजनक लागै छल। आ तामसक कोनो गप नै हुऐलऽ दियौ आ हेबो करए तँ बर्दास्त कऽ लिअ आ टारि दियौ। दुनू साँझक खेनाइ आ सुतबासँ मतलब छल- बाकी अहाँ जानू, अहाँक काज जानए। खर्ची गामसँ, तर-तरकारी पेंशनसँ। आ पेंशन एतबे भेट जाइ छल जे अपनेटा नै, दोसरोक छोट-मोट जरूरत पूरा भऽ जाए। बेटा पुतोहुक संग जीयैक यएह तरीका हेबाक चाही जे सभकेँ एक-दोसराक दोस्त बना देले छल। भऽ सकैए जे एकर पाछाँ कत्तौ ने कत्तौ हुनकर अप्पन असगरुआ प्रवृत्ति हुअए बा हुनकर अकछाएब। जखन सोनलक आग्रहपर पहिल बेर सरला आएल छल अशोक विहार तँ ओ सोनलक दीदीक संग ननदि सेहो छल। विदा करै काल ओ सोनाक चेन आ अउँठी संग दूटा साड़ी हुनका लेल आ दूटा मम्मी लेल देने छल। तकरा बादो सरला कतेक बेर आएल आ सभ घड़ी सोनल जे कऽ सकै छल, करैत रहल- माने घरक जे चीज सरलाकेँ पसिन्न आबै ओ सरलाक। ई कहियो नै सोचने छल जे सरला पैघ अछि- दैक कर्तव्य ओकर छै। शीलाकेँ सेहो अप्पन गलतीक अनुभव भऽ गेल छलै जे ओ अप्पन पुतोहुकेँ बुझैयेमे गलती केने छल। एतबे टा नै, सोनल अपना दिससँ बाप आ बेटा- रघुनाथ आ धनंजय- क बीचक दूरी सेहो कम करैक कोशिश केलक। ई अलग गप अछि जे दूरी घटैक बदला बढ़ैत गेल- मुदा ऐमे ओकर दोष कतऽ छल। ओ धनंजयकेँ फोन कऽ कहलक जे भैया, अहाँ तँ जुलुम करै छी। अमेरिकासँ पैसा मंगाबैक होइ छल तँ की-की नै बाजै छलौं। कतेक रास गप करै छलौं जे ई जरूरत अछि, ऊ जरूरत अछि। आ एतऽ एतेक दिनसँ हम आएल छी आ एक बेर देखैले नै एलौं जे भौजी कोना अछि। पापाकेँ सेहो ठीकसँ नै मालूम अछि जे अहाँ एम.बी.ए. केलौं कि नै आ कऽ लेलौं तँ आब की कऽ रहल छी। अहाँक बियाह लेल लोक आबि रहल अछि। पापा मम्मी परेशान अछि। की चाहै छी, बताउ तँ? एक दू दिनक लेले सही, आबि तँ जाउ। ऐ फोनक नतीजा छल जे ओ आएल मुदा रूकल घरमे नै, डायमंड होटलमे। तइसँ जे ओ असगरे नै छल, संगमे एकटा महिला छल अप्पन टिटहरबीक संग। सोनल हुनका सभकेँ रातिमे खेनाइक नोत देने छल। जखन रघुनाथकेँ ई खबर भेटल छल तँ ओ उठल आ चुप्पे पहाड़पुर चलि गेल। धनंजयकेँ आबैमे कनी देर भऽ गेल छल। ओ टैक्सीसँ आएल छल। संगमे आबैवाली स्त्री नै, लड़की छल- के. विजया। सोनलक उमेर की छल। नाकमे हीराक चमकैत कील, कानमे झूलैत रिंग, जूड़ामे बेलक फूल। एकदम दक्षिण भारतीय मुदा गोर आ सुन्नर। गपसँ पता चलल जे ओ दक्खिन दिल्लीमे कोनो कारपोरेट कंपनीमे नोकरी करैत अछि। ओइ कंपनीमे ओकर पति सेहो काज करैत छल, पहिनेसँ। ओकरासँ नीक पद आ वेतन छल। ओ बिन-बियाहल छल। दुनू बियाह केलक आ नोएडामे डूप्लेक्स फ्लैट लेने छल। बच्चीक पैदा हैक किछु दिन बाद एकटा सड़क दुर्घटनामे हुनकर मृत्यु भऽ गेल छल। घर, गाड़ी, नोकरी, बचिया, सभ किछु मुदा छल बेसहारा। भावनात्मक रूपसँ टूटि चुकल छल ओ। एनामे धनंजयसँ भेंट भेल छलै। बच्चीक नाम रत्ना डी. छल। ओ धनंजयकेँ पापा कहैत छल। सोनल सुनि कऽ असमंजसमे पड़ल रहल, किछु काल धरि। फेर एतबे बाजल- अहाँ सभकेँ सोझे घर एबाक चाही। धनंजय बहन्ना केलक जे विजयकेँ समए नै छलै। ओकरा बाबा विश्वनाथक दर्शन करैक छल, गंगा नहाबैक छलै, घाट देखबाक छलै, सारनाथ जेबाक छलै- समए कतऽ अछि। जइ काल अमेरिकाक अलबम देखै-देखाबैक कार्यक्रम चलि रहल छल, ओइ काल डिनरक तैयारीक बहन्ने सोनल किचेनमे आएल आ सहायता लेल धनंजयकेँ बजेलक। -राजू, एतेक पैघ गप। ने अहाँ पापाकेँ बतेलिऐ, ने मम्मीकेँ आ नहिये हमरा। ई की देखि रहल छी? -कोन गप? -ऐँ, यएह जे अहाँ बियाह कऽ लेलौं आ ककरो खबरि धरि नै देलौं। -के बाजल जे हम बियाह कऽ लेलौं। सोनल आश्चर्यसँ धनंजय दिस ताकलक- अहाँ दुनू एक्के छतक नीचाँ रहि रहल छी नै जानि कहियासँ, आ बच्ची पापा कहि रहल छी अहाँकेँ आ बियाह सेहो नै? मामिला की अछि? धनंजय मुस्किएलक- भौजी, मामिला किछु नै अछि। गप एतबे टा अछि जे ओकरा हमर जरूरत अछि आ हमरा ओकर- जाधरि जॉब नै भेट जाइत अछि। -की ओकरा ऐ गपक आभास अछि जे ओ ओकरा संग ताधरि अछि जाधरि जॉब नै भेट जाइत अछि। -ई हम नै जानैत छी। -अहाँ ओकरा संग रहि रहल छी, ओकर खा रहल छी, पी रहल छी, पहीर रहल छी, ओकर गाड़़ी आ पेट्रोलसँ घूमि रहल छी, ओकर बचिया अहाँकेँ पापा मानैत अछि, अहाँक भरोसे घर आ बच्चीकेँ छोड़ि़ नोकरी करैत अछि। अहाँ ओकर संबंधी बा नोकर सेहो नै छी- फेर कोन संबंध अछि अहाँ आ ओकर बीच। अपरतीब भऽ धनंजय बाजल- भौजी, छोड़ियौ ई सभ। चलू खाइ छी। -ऐँ, एना कोना छोड़ि देब। अहाँ ओकरा धोखा दऽ रहल छी आ बेवकूफ बना रहल छी। आकि फेर हमरासँ झूठि बाजि रहल छी बा नुका रहल छी। -दिल्लीक लड़कीकेँ नै जानै छी अहाँ। भऽ सकैत अछि, काल्हि बच्ची स्कूल जाए लागए तँ कान पकड़ि कऽ बाहर कऽ दिअए। -एकदम कऽ देबाक चाही, अहाँक चालि देखि कऽ। सोनल ओकर टोह लैत पुछलक- एकटा गप कहू, अहाँक नजरि ओकर घर-घरारी आ सुख-सुविधा पर तँ नै अछि? -अच्छा, रहऽ दियौ। अहूँ हद करै छी। -हम ऐ द्वारे कहि रहल छी, जौं हुअए, अहाँकेँ कऽ लेबाक चाही। सुन्दर अछि, बुझनुक अछि, जॉबमे अछि, अहाँकेँ जॉब नै भेटए तखनो कोनो हर्ज नै। हम संग छी अहाँक। बुझलौं। चलू आब। सोनल विजयकेँ आवाज देलक। सभटा किचेनसँ कटोरी, प्लेट आ थाड़ी डाइनिंग रूममे लऽ गेल, एक-एक कऽ कए। सोनल रत्ना डी. केँ कोरामे बैसेलक, खैलक आ खुअएलक आ साढ़े एगारह बजे विदा केलक। विदा होइसँ पहिने धनंजय भौजीकेँ असगरे लऽ गेल। -भौजी, की ई सत्य अछि जे भैया ओतऽ बियाह केले अछि? सोनल ओकर मुँह देखऽ लागल। -आरती कऽ कए कोनो छौड़ी अछि की ओतऽ? सोनल बिना हुनका सभकेँ विदा केने घर भागि गेल। * रघुनाथ गामसँ घुरल मुदा स्वार्थी आ कृतघ्न बेटाक जाइक बाद। ई हुनकर विचार छल, अप्पन छोट बेटा धनंजयकेँ लऽ कऽ। ओकरा पता छलै जे ऐ नगरक अशोक विहारमे ओकर भौजीक संग बाप सेहो रहैत अछि, मुदा ठहरल होटलमे। मानलिऐ जे औरत संग छलै- काशी दर्शन लेल आएल छल जे ई लड़काक घर अछि, आसान हएत। करबाक ई चाही जे हुनका होटलमे ठहरा कऽ अहाँ अप्पन घर आबि जैतिऐ, एतऽ रुकतिऐ मुदा नै। रघुनाथ नाराज हुअए, हुनका दुख सेहो भेल। ई गप ओ पुतोहुसँ नै कहि सकैत छल। दोसर गप छल बापक ईगो। देखऽ चाहै छल जे जे बेटा दिल्लीसँ बनारस आबि सकैत अछि, ओ बापसँ भेँट करै लेल बनारस आबि सकैत अछि, ओ बापसँ भेंट करै लेल बनारससँ डेढ़ दू घंटा दूर पहाड़पुर आबि सकैत अछि बा नै। शिकाइत तँ हुनका अप्पन बड़ बेटा संजयसँ सेहो छल मुदा परदेसक दूरी आ ओकर असगरे पड़ि जाइक कल्पना हुनकर कड़ापनकेँ कम कऽ कए राखने छल। ओ एहन देशमे छल जतऽ माँ नै, बाप नै, स्त्री नै। ओकर ओतऽ की हालत होइत हेतै, एनामे जखन ओकरा लेल हुक उठैत छल। ओ बिसुरल नै छल जे अप्पन बियाह करबाक बादो ओ अप्पन पिताक जरूरतक ध्यान राखलक। एतबे टा नै, ओ जे डी-१ अशोक विहारमे एत्ते दिनसँ निस्फिकिर अछि आ खाट तोड़ि रहल अछि- ओकरे चलते। हुनका ओकर एक आ एकमात्र इच्छाक जानकारी अछि- एक तरहे पिताक अंतिम इच्छा जे ओ अप्पन अन्तिम साँस पहाड़पुरमे बनल नव घरमे छोड़ए। ओ गामक पी.सी.ओ. सँ शुरूमे दू-चारि फोन कऽ मोन सेहो पाड़ने छल जे किछु भेजू, जतबे बनि सकए ओतबिये टा, कमसँ कम ढाँचा तँ अपना रहिते ठाढ़ कऽ दैतिऐ। ओ शुरूमे उत्साह देखेबो केलक मुदा आखिरीमे ओ खौंझा कऽ कहलक जे टका किए बरबाद करैपर लागल छी, ओकर सदुपयोग करबा लेल सोचू। एकर बादसँ रघुनाथ रूसि गेल छल। नहिये ओ फेर फोन केलक, नहिये ओ गप्पे केलक। सोनल जरूर गप करैत छल-कंप्यूटरक आगू बैसि कऽ, कानमे ईयर फोन लगा कऽ। मासमे कहियो एक बेर, कहियो दू बेर। रघुनाथसँ कहैत छल जे पापा, आबि जैतिऐ। अहाँ गप कऽ लियौ। मुदा संजय नै कहैत छल तेँ सोनलकेँ कहै आ चाहैसँ की। ऐ तरहेँ हुनकर रूसब चलैत रहल- वएह बापक ईगो। एतबै जरूर छल जे जखन कखनो फोन आबैत छल, ओ अपनाकेँ बजाबैक इंतजार करैत छल, जे कहियो नै भेल। संजय एक बेर बाजि गेल- अनचोक्के। तखन ओकर भाइ ओकरा संग छल। ओ राँचीमे पढ़ि रहल छल ओइ काल। रघुनाथ मास्टर- आदमी कोनो प्रसंगमे कृतज्ञताक मतलब बुझि रहल छल जे कियो अहाँ लेल कनियो टा किछु करैत अछि तँ ओकरा बिसुरी नै, मोन राखू आ मौका भेटए तँ जे किछु कऽ सकैत छी, करू। ऐ जन्ममे उऋण भऽ जाउ। एकरासँ पैघ सुख दोसर नै। जखन रघुनाथ चुप भऽ गेल तँ संजय बाजल- पापा, एकर मतलब तँ अहाँ जतऽ रहू, ओतै ठाढ़ रहू। बेर-बेर घुरि कऽ देखब तँ आगू कहिया बढ़ब। अहाँ कृतज्ञ हइ लेल कहि रहल छी आकि पएरमे बेड़ी पहिरै लेल। ई गप ऐल-गेल मुदा रघुनाथक दिमागसँ गेल नै छल। रघुनाथ सेहो चाहै छल जे बेटा आगू बढ़ए। ओ खेत आ मकान नै अछि जे अप्पन ठाम नै छोड़ए। मुदा ईहो चाहै छल जे एहनो मौका आबए जखन सभ कियो एक संग हुअए, एक ठाम हुअए। अपनामे हँसैए, गाबैए, लड़ैए, झगड़ा करैए, हा-हा खी-खी करैए, खाइए पिबैए, घरक सुन-सन्नाटा टूटैए। मुदा कतेक बरख भऽ रहल अछि- कियो कत्तौ अछि, कियो कत्तौ। आ बेटा आगू बढ़ैत एत्ते आगू बढ़ि गेल छल जे ओतऽ सँ पाछाँ देखए तँ नहिये बाप नजरि आबै नहिये माँ। कखनो कखनो हुनका लागै छल जे ओ बापट जना बिनु सन्तान हेतिऐ तँ बेसी नीक होइतए। ओ सेहो हुनके सन दारू छानि कऽ गओतिऐ आ मस्त रहतिऐ। गामसँ घुरलाक बाद ओ अप्पन पुतोहुसँ घनंजयकेँ लऽ कऽ किछु नै पुछलक। पुतोहु अपने उदास आ बेमार लागि रहल छल। ई सोचि कऽ जे औरतकेँ बहुत रास एहन बीमारी होइत अछि जइ लऽ कऽ पूछब ठीक नै। ओ चुप्पा लगा गेल। हुनकर बीच गप होइत छल रातिमे, खेनाइक टेबलपर। रघुनाथ गामक सोचमे जीयैत रहैत छल, ओ वएह गप करैत छल, पुतोहुक विश्वविद्यालयक, अप्पन विभागक, लड़का-लड़कीक, प्रशासनक। हुनका अनमुनाह सन देखि कऽ रघुनाथ शुरू केलक, पहाड़पुरमे हइबला ग्रामसभा चुनाव कऽ लऽ कऽ- बुझू, एहन कालपर गेल छी जखन चुनावक माहौल छै। पहाड़पुरक ग्रामसभा अछि आरक्षित कोटाक। लड़ैत अछि दलित आ निर्णायक होइत अछि ठाकुर वोट, जकर संख्या अछि साठि। ई साठि वोट जकरा चाहे सभापति बना दिअए आ जकरा चाहे प्रधान बना दिअए। ठाढ़ अछि सोमारू राम आ मगरू राम- हम जइ दिन पहुँचलौं, ओइ दिन साँझकेँ ठाकुरक सभक बैठकी छल बब्बन काका कतय। तय भेल जे यएह मौका अछि जखन ओ पकड़िमे आएल आ यएह मौका अछि बदला लेबाक। जेतबा ऐंठैक अछि, ऐंठ लिअ, नै तँ फेर हाथ नै आबएबला। विचार भेल जे दुनिया आ देश एक्कैसम शताब्दीमे चलि गेल अछि आ पहाड़पुरमे मंदिर नै, जल चढ़ाबै लेल खाली महादेव स्थान अछि। कहल जाए तँ जे एक लाख देत, वोट ओकरे देल जाएत। जौं एकरा लेल दुनू तैयार भऽ जाए, तखन? कियो बीचेमे टोकलक। ऐपर दू टा विचार आगू आएल। एक ग्रुपक कहब छल जे एहन हालतमे बोली बढ़ाबैत रहू। एक कऽ डेढ़, डेढ़ कऽ दू- एना। जे बेसी दिअए, वोट ओकरे देल जाए। दोसर ग्रुपक कहब छल जे नै, ई मोल भाव अछि, नीलामी सन चीज अछि, अप्पन जबानसँ पलटब अप्पन प्रतिष्ठाक आ मर्यादाक अनुकूल नै अछि। दुनूसँ एक-एक लाख लऽ लेल जाए आ वोट आध-आध बाँटि लेल जाए। तीस एक कऽ, तीस दोसर कऽ। बताएल दुनूकेँ नै जाए। ओ मानि कऽ चलए जे साठियो हमरे जा रहल अछि। नव पीढ़ी ऐ दुनूसँ असहमत छल। हुनकर कहब छल जे अहाँ सभ अप्पन मंदिर आ महादेवकेँ लऽ कऽ चाटू, हमरा हमर दारू आ मुर्गा चाही। रघुनाथकेँ ई सभ सुनाबैत मजा आबि रहल छलै मुदा ओ देखि रहल छल जे सोनल नहिये सुनि रहल छल आ नहिये रस लऽ रहल छल। हुनकर मन कत्तौ आन ठाम छल। खाना खाइ लेलाक बाद जखन ओ हाथ धोइले आएल तँ देखलक जे सोनल अप्पन बिछौनपर चितांग पड़ल छल आ कानि रहल छल। रघुनाथ हुनकर कोठलीमे ठाढ़ भऽ कऽ किछु काल धरि बुझाबैक कोशिश करैत रहल- बेटा सोनल, की गप अछि? सोनल आर कानऽ लागल। -बेटा, बाज तँ की गप अछि। रघुनाथ अपनाकेँ सम्हारैत पुछलक। -संजय दोसर बियाह कऽ लेलक। सोनल हिचकीक संग बाजल- हम काल्हि फोनपर गप केलौं। तखन बाजल- कमसँ कम हमरासँ पूछि तँ लैतिऐ। * भ्रम आ भरोस- यएह अछि जिनगीक स्रोत। ऐ स्रोतसँ फूटैत अछि जिनगी आ फेर बहैत निकलैत अछि- निर्मल-कलकल। कखनो-कखनो लागैत छल जे ई अलग-अलग चीज होइत अछि। स्रोत एक्के होइत अछि-ओकरा भ्रम कहू आकि भरोस। ई नै हुअए तँ जीअब सेहो नै हुअए। यएह स्रोत रघुनाथक जिनगी छल। जखन अमेरिकासँ घुरलाक बाद सोनल बाजल छल जे पापा, हमरा लागि रहल अछि जे संजय ओतऽ बसि जाए चाहैत अछि। इंडिया आएत जरूर मुदा रहै लेल नै, विजिट करै लेल। तँ रघुनाथ हुनकापर व्यंग्यसँ मुस्की देने छल- कतेक जानै छी संजयकेँ। बाप एतऽ, माँ एतऽ, भाए एतऽ, बहिन एतऽ। आर तँ आर स्त्री सेहो एतऽ। ओ कहलक किछु नै, खाली मुस्की देने छल जे ओ अप्पन बापक दीनता आ दरिद्रता देखने अछि। ओ दुखी आ परेशान भऽ कऽ कहियो-कहियो बाजै छल जे चिंता नै करू, एतबे कमाएब-एतबे कमाएब जे घरमे राखैक जगह नै हएत। मुदा कमाबैक ई रहस्य नहिये ओ बुझि सकल आ नहिये सक्सेना। आइ हुनका लागै छल जे ओ सोनलसँ बियाह सोनल लेल नै, अमेरिका जाइ लेल केने छल। रघुनाथ, तँ जिनगी अहाँकेँ जे जियैक छल, ओ जी चुकलौं। आब अहाँ अप्पन बेइज्जती लेल जीबि रहल छी। ई कियो नै कहि रहल छल मुदा हुनकर कान सुनि रहल छल आ ई मूक स्वर हुनकर हृदए धरि पहुँचि रहल छल। ओइ साँझ ओ भोजन केलाक बाद घरक पछुआरमे अप्पन डेरा नै गेल। ड्राइंग रूममे बैसल रहि गेल। ओ पूरा राति ओहिना काटि देलक- बैसल-बैसल। नीन नै एलै। तरह-तरहक आशंका आबि-जा रहल छलै जइमे सभसँ प्रबल छल जे कत्तौ ई लड़की आवेशमे आबि कऽ किछु कऽ नै लिअए। ई कहैक जरूरत नै आ एकरामे दू राय नै जे ऐ समाचारसँ हुनका एक तरहे खाली सुख भेटल छल जे ओकरासँ बियाह करैक पहिने की ओ हमरासँ पुछने छल। अहाँक बाप तँ गप करबाक जरूरतो नै बुझलक। एतऽ धरि जे नोत सेहो ऊपर मोने देने छल। आब बुझू। जे केलौं तकर दंड भेटल। आब कानि किए रहल छी। हम आकि कियो आन की करत। मुदा ई सुख कनी काल धरिक छल। एना सोचब ओकर निष्ठुरता आ अमानवीयता हेतिऐ। ओइ हालतमे तँ आरो जखन ओ अप्पन व्यवहारसँ हुनकर हृदए जीत लेने छल। एहन विचार अपनामे निचताइ अछि। एहन कालमे सहृदएता आ प्रेम चाही। बिजली ड्राइंग रूम सेहो जरि रहल छल आ सोनलक कमरा सेहो। रघुनाथकेँ कनियो टा आहटि भेटै तँ आस्तेसँ जाइ छल आ ओकर कोठलीमे हुलकी दै छल जे सभ किछु ठीक-ठाक तँ अछि। रातिक डेढ़-दू बजेक आसपास सोनल हँसैत ड्राइंग रूममे आएल- पापा, आत्महत्या नै करब, निश्चिंत रहू। जाउ, सुति जाउ। मम्मीक कोठलीमे बा डेरामे। रघुनाथ लजा गेलथि। हम ऐ डरसँ थोड़े बैसल छी भाइ। हमरा नीन नै आबि रहल अछि। सोनलक ध्यान ड्राइंग रूमक ओइ पैघ फोटोपर गेल जे ओकर बियाहक छल। शाइत रिसेप्शनक छल। संजय-सोनल दूटा ऊँच मखमलक फूलसँ सजल कुर्सीपर बैसल छल आ दुनूक माथपर हाथ राखने सक्सेना साहेब पाछाँ ठाढ़ छल। -पापा एकटा प्रार्थना अहाँसँ। -कहू। -ई गप घरमे रहए। अहाँ, मम्मी आ सरला दीदीक बीच। हमर पापाकेँ नै पता चलए। -किए? -ओ बर्दाश्त नै कऽ सकथिन। दू बेर अटैक भऽ चुकल छन्हि। रघुनाथ किछु कहऽ चाहैत छल मुदा चुप भऽ गेल। ओ सोनलकेँ बाजऽ दै चाहै छल जइसँ जे ओकर मनमे अछि, निकालि कऽ हल्लुक भऽ जाए। ई नीक अछि जे ओ खाली सुनए। -पापा हम चाही तँ हुनका कोर्टमे नमाड़ि सकै छी, पेमाल होइत रहता। हम भागि कऽ नै आएल छी, हुनक छोड़ि कऽ नै आएल छी। आएल छी लियौन भऽ कऽ। हमही टा नै, ओ सेहो चाहैत रहथिन जे हम हाउस वाइफ बनि कऽ नै रही। नोकरी करी आ सेहो अप्पन देशमे। आर एतऽ एलाक बादो अहाँ मीठ-मीठ गप करैत रही। एक बेर नै बतौलखिन जे हुनकर मनमे की अछि? एहनो नै जे हमरा बजौलखिन नै आ हम आबऽ सँ मना कऽ देने होइ। -जुलुम अछि। सोनल बिख-सबिख होइत बाजल। -अहां की बुझै छी हमरा। ऐँ, अहाँ डायवोर्सक लेल पुछले तँ रहितिऐ हमरा, हँ कऽ दैतिऐ। अहाँ नै दैतिऐ, कहतिऐ तँ हम दऽ दैतिऐ। पुछबो टा नै केलक, इशारा सेहो नै केलक। बिना डाइवोर्स बियाह कऽ रहल छी। अपमानित कऽ कए। बिना कोनो गलतीक, कसूरक। आ निर्लज्जता ई अछि जे पुछलापर मुस्कुराबैत कहै छी जे हँ भाइ, कऽ लेलौं। करऽ पड़ल। मूर्ख बुझै छी हमरा। जेना हम अहाँकेँ जानिते नै छी। जेना हमरा अहाँक किरदानी नै बुझल अछि। हम तँ बाबू अहाँक खाट ठाढ़ कऽ दैतौं, मुदा की बताबी। लोक यएह बुझत जे हम ई सभ गुजार लेल कऽ रहल छी, जखैन कि हम थूक फेकै छी अहाँक कमाइपर। की समय भऽ रहल अछि पापा। चारि, साढ़े चारि। रूकू, अहाँकेँ चाह पियाबै छी। ओ उठल आ किचेनमे चलि गेल। ठंडी बेसी छल। रघुनाथ पएरकेँ सीरकमे लपेट कऽ सोफापर पड़ल छल। हुनका नीक लागि रहल छलनि जे सोनलक मूड बदलि गेल छै। मुदा ई नीक नै लागि रहल छलनि जे ओ हुनकासँ ओना गप करए जेना ओ संजय अछि। गलती हुनकर बेटा केने छल मुदा अपराधबोधसँ ग्रस्त ओ छल। ओ भीतरसँ डरल आ घबराएल छल। ओ कहै तँ ककरोसँ नै छल मुदा गाम हुनका लेल सुरक्षित नै रहि गेल छलनि। बेटा सभकेँ गाम गेना कतेक बरख भऽ गेल छल। हुनका कोनो सरोकार नै रहि गेल छलनि गामसँ। घरेनक लोक सनेहीकेँ ठीकसँ काज नै करऽ दै छल। तारीक पहिने बुक करलाक बादो जसवंत हुनकर खेत तखैन जोतै छल जखन सबहक जोताइ भऽ जाइ छल आ रोकलाक बादो हुनकर नाली बंद कऽ पानि पहिने अप्पन खेतमे लऽ जाइ छल लोक सभ। बाहरी लोक सभसँ झगड़ा मोल लऽ कऽ एक दिन टिकब मुश्किल छल। रघुनाथ अपने कहै छल- सभ बेर चुप भऽ जाउ, सहि लिअ, मुदा झंझटि नै करू। दियादक नजरि हुनकर खेतपर लागल रहैत छल- ई गप ककरोसँ नुकाएल नै अछि। गाम गेलापर हुनकर सम्मान सभ कियो करै छल मुदा ई सम्मान हुनका रहस्यपूर्ण लागैत छल। नरेश अप्पन घरक आगू हुनकर जमीनपर खुट्टा गाड़ि कऽ महींस बान्हब फेर शुरू कऽ देने छल। रघुनाथ देखियो कऽ अनठा कऽ चलि दै छल। के रोज-रोज किचकिच करए। ऐ बेर तँ सनेही जे सूचना देने छल, ओइसँ ओ आरो हदैस गेल रहथिन। एक दिन हुनकर गाम जाइसँ तीन दिन पहिलुका गप अछि जे मोटरसाइकिलसँ दूटा छौड़ा आएल छल हुनकर दरबज्जापर। पैंट-शर्टमे। ओ उतरल आ बरण्डापर पड़ल खाटपर पटा रहल। सनेहीकेँ बजौलक, पुछलक जे मास्टर साहबक यएह घर छिऐ? फेर पुछलक जे ओ कहिया-कहिया आबै छथिन। कतेक दिन रहै छथिन। कहिया जाइ छथिन। शहरमे कतऽ बसोबास छनि- तरह तरहक प्रश्न। जाइत-जाइत ईहो बाजल जे हुनकर दिमाग ठेकानमे तँ अछि आकि नै। सनेही बाजल जे ओ नीक छौड़ा सभ नै अछि। कोनो भरोस नै अछि एहन छौड़ा सबहक। जखन दिनोमे एतऽ आबि सकैत अछि तँ नग्र बनारस कते दूरे अछि। एकरासँ पहिने कहियो देखने नै छल ओकरा। जे चुपचाप पटायल छल ओकर शर्टक नीचाँ पेस्तौल बा रिवाल्वर जेहन चीज छल। सनेहीक रिपोर्टक असर ई भेल जे ओ झलफल होइते घरसँ बाहर निकलब बन्न कऽ देने छल। ओ कारण बुझैक कोशिश करै छल मुदा किछु बुझि नै सकल। शीले सन रघुनाथक सेहो अजीब स्थिति छल। ओ एतऽ रहितिऐ तँ गामक लेल चिंतित रहै छल, ओतुक्का गप करै छल आ घुरैक बहन्ना खोजैत रहै छल मुदा ऐबेर जेहन संकेत भेट रहल छलै से ओतऽ घुरैक सोचेमे डर लागै छलै। ऐबेर ओ तय कऽ लेने छल जे बेसी जरूरी हुअए तँ दोसर गप अछि, मुदा अशोक विहारक डेरा अछिये। ओ बनल रहए, हुनका आर किछु नै चाही। मुदा एतऽ? एतऽ संजय हुनका आगू दोसर समस्या ठाढ़ कऽ देने छल। आब ओ पूर्ण रूपसँ सोनलक मर्जीपर छल। ओ चाहे तँ रहऽ दिअए, चाहे तँ निकालि कऽ बाहर कऽ दिअए। भाइ, अहाँ ताधरि हमर ससुर छी जाधरि अहाँक बेटा हमर साँए छल। जखन ओ पति नै, तँ अहाँ ससुर केहन, कोन गपक? ई कोनो सराय आ धर्मशाला अछि नै जे पड़ल-पड़ल रोटी तोड़ि रहल छी, मुफ्तियाक। चलू एतऽसँ, अप्पन बाट नापू। हुनका नीक गप यएह लागि रहल छलनि जे ओ किछु कहए, ओइसँ पहिने ओ कहि दिअए, बेटी, बड्ड भऽ गेल, आब आज्ञा दिअ। (ई ओ बुझै छल जे ई कहैसँ लाभ हुनका भेटत। भऽ सकैए ओ पघिल जाए आ मना कऽ दिअए।) सोनल चाह लऽ कऽ आबि गेल- दूटा पैघ मगमे। एकटा मग हुनकर आगू राखैत बाजल-पापा, अहाँ एहन बेटा किए जनमेलौं। जे ओ नै देखै छल जे ओकरा लग छै, सदिखन उम्हरे देखैए, जे दोसराक लग छै- लेर चुअबैत। पता अछि, ओ आरती गुर्जरसँ बियाह केने अछि। रघुनाथ चाह सुड़कलक। ओ कोनो सोचमे डूमल छल। -ऐ दुआरे जे ओ असगर संतान अछि- करोड़पति एन.आर.आइ. व्यवसायीक। एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंपनी आरती इंटरप्राइजेजक मालिकक। -बेटा, हम सभ ई नै सुनऽ चाहै छी। हम खाली एतबे चाहै छी जे अप्पन पापाकेँ जा कहियौ आ आब हमर छुट्टी करू। -की। की कहलौं अहाँ? कनी फेर तँ सुनी। सोनलक अबाज अनचोक्के ऊँच भऽ गेलै। रघुनाथ बिना ओकरा दिस ताकने चाह सुड़कैत रहल। सोनल हुनकर हाथसँ मग छीन लेलक। -एकदम्म नै। कान पकड़ू आ कहू जे एहन गप फेर नै करब। रघुनाथ असहाय आ निराश आँखिसँ हुनका ताकलक। ओ कानैत रघुनाथक कोरामे गुरकि गेल- पापा, संजय छोड़ि देलक, कोनो गप नै, अहाँ तँ हमरा नै छोड़ू। * रघुनाथ अप्पन जिनगीक समए नापैत छल, अप्पन पएरसँ, ओकर चालि आ तागतिसँ, फेफड़ासँ आबैत जाइत साँससँ। एक समए छल जखन ओ पंद्रह सोलह मील जाइ छल मामागाम। रौदमे। बिन थाकल, बिन कत्तौ बैसल- आ प्रसन्न रहै छल। फेर ई समए घटब शुरू भेल- आठ मील, फेर छऽ मील, फेर चारि मील, फेर एक मील। आ ओ आब डेरामे आबि कऽ घोकचि गेल छल। जौँ कत्तौ निकलबाक होइत अछि तँ आब दूटा पएर बेसी नै होइ छै, एकटा तेसर पएर सेहो लगाबऽ पड़ैत अछि आ ओ तेसर पएर छल- छड़ी। आब ओ तिपहिया मनुख छल। संतोष ई छलै जे हुनकर सन चौपाया मनुखसँ कॉलोनी भरल छल। जीयैक आस यएह छलै जे ओ असगरे नै अछि। हुनकर सन बड़ रास लोक अछि। कतेक लोक तँ हुनकोसँ खराप स्थितिमे अछि। जे हिस्सा ओ किरायापर देने अछि आ अपना रहै लेल एकमहला चुनने अछि, ओ ओतै अटकल रहैत अछि। कोनो तरहे बालकनीमे आबैत अछि आ ओतऽ बैसल-बैसल पूरा दिन लोककेँ आबैत-जाइत देखि कऽ अप्पन जीवित होइक अहसास करैत अछि। रघुनाथ कोनो तरहेँ पार्क आ नहर तक आबि जाइ छल, गाम नै जा सकै छल। एतऽसँ थ्री-व्हीलर बा टेम्पो लेब, बस अड्डा जाएब, बसमे धक्का-मुक्कीक बीच चारि घंटा बैसल रहब, नहरपर उतरब, फेर ओतऽसँ पाँव-पैदल डेढ़-दू किलोमीटर गाम जाएब मुश्किल भऽ जाइ छल। जोड़मे दर्द सेहो रहऽ लागल छल। मुदा जेना-जेना गाम जाएब कम होइत गेल, तेना-तेना ओतुक्का जमीन-जालक चिंता बढ़ल गेल। सोनल हुनका डेरासँ हटा कऽ घरक गेस्ट-रूममे राखि देने छल। ओ ठंडीसँ बचि गेल छल मुदा खिड़की लग बैस कऽ राति भरि अप्पन गाम आ खेतमे घुमैत रहैत छल आ सलाह दैत रहै छल। थाकि जाइ छल तँ बाकी समए ऐ सोचमे लगाबै छल जे सोनल हुनकर के अछि। ने पुतोहु, ने बेटी- की ओ ओकर घरमे बैसल अछि? जे हुनकर अछि, ओ नै जानि कतऽ–कतऽ अछि। हुनका तँ फिकिरे नै छनि। पूरा दियाद-बाद- जकर एक-एकटा पजेबा ओ जोड़ने छल- छिड़िया गेल छल। एतऽ धरि जे शीलाकेँ सेहो अप्पन बेटीक घर बैस कऽ बाढ़नि लगाएब आ खेनाइ बनाएब स्वीकार छल, मुदा पुतोहु कतऽ रहब स्वीकार नै। आ आब तँ पुतोहु सेहो कहाँ रहि गेल अछि। शीला या जकरा ककरो पता चलत, दस बात हुनके सुनाएत, उन्टे जे कोन सरोकारसँ ओतऽ छी अहाँ। ई हलदली एक भोर हुनका कॉलोनीक शर्मा पी.सी.ओ. धरि लऽ गेल। हुनका सर्दी-बोखार छलनि। कतेक दिनसँ बाहर नै निकलि रहल छल। सोनल नै निकलऽ दै छल। मुदा अप्पन दुनू बेटासँ फाइनल गप करैक उद्देश्यसँ ससरि आएल- चुपचाप। सभसँ पहिने संजयकेँ फोन केलक- यएह साढ़े आठ बजेक समए होइत अछि, जखन सोनल कंप्यूटरपर बैसै छल। -हलो, हम बनारससँ रघुनाथ। -संजय। अपना लग राखू ई चरण-स्पर्श। लाज आबैए अपनाकेँ अहाँक बाप कहैत हमरा। जे नीचता अहाँ देखेने छी अहाँ, ओइसँ हमरा गप नै करबाक चाही, मुदा... -अनर्गल गप बंद करू। -सुनू, हम अशक्त भऽ गेल छी। जिनगीक कोनो ठेकान नै, कखैन की हुअए। आब खेती नै हएत हमरासँ। या तँ आबि कऽ सम्हारू या बताउ की करी। गामक जमीन-जालक। संजय। धनंजयसँ तँ पुछबे करब, मुदा अहाँ पैघ छी। मालिक छी। अहाँ की कहै छी? संजय-०००० -नै, नै, हम वएह सभ करब जे अहाँ कहब। कहियौ तँ। विचार दिअ अपन। -संजय-०००० -हँ। तँ सभ बेचि दिऐ। ओइ पाइसँ एक-डेढ़ कोठलीक बनारसमे फ्लैट लऽ लिऐ। बाकी जमा कऽ दिऐ आ ओकर सूदसँ दुनू परानी जीबी-खाइ। -संजय-०००० -हँ, हँ। पेंशन तँ रहबे करत। मुदा सुनू, ई काज अप्पन माँ-बापक लेल अहीं करू। ई हमरासँ नै हएत। -संजय-०००० -ऐ दुआरे जे ई पाप अपना हाथसँ नै करब। ऐ दुआरे जे ओ पुरखा सबहक चीज छी, हुनकर धरोहर छी। दोसराक चीज बेचबाक अधिकार हमरा नै अछि। -संजय-०००० -नै, हम एकदम्मे भावुक नै छी। मुदा हमर खेत नै छी। एकरा हम जिन्स आकि माल मानै लेल तैयार नै छी। आ सुनू, अप्पन सलाह अपना लग राखू। साढ़। नमकहराम। ओ फोन राखि देलक। किछु काल धरि सोचैत रहल जे फोन करी आकि नै करी। आखिरमे लगा देलक नंबर। -हलो, धनंजय अछि की? -महिला स्वर-०००० -हम रघुनाथ। हुनकर पिता। -धनंजय-०००० -हलो राजू। अहाँ बनारस एलौं मुदा गाम नै एलौं। हम इंतजार करैत रहि गेलौं। -धनंजय-०००० मौका नै भेटल तँ नै भेटल। जाए दियौ। एहन अछि बेटा जे हम आब कोनो काजक लेल नै रहलौं। काज-धाज नै होइए। समस्या अछि खेतक। ओकर की करी? -धनंजय-०००० -नै, ओ तँ ठीक अछि मुदा सनेही कहिया धरि देखत। ओकरा लोक करैएले नै दैत अछि। ओकर सबहक आँखि लागल अछि अप्पन खेतपर। -धनंजय-०००० -तँ अखैन रूकि जाइ छी। मानि लिअ रूकि जाइ। मुदा ओकरासँ पहिने हम चलि जाइ तँ। संजय सेहो बाहर, अहूँ बाहर। फेर के? -धनंजय-०००० -ठीक अछि, बेच दै छी मुदा ओतबे पाइक किछु करए पड़त ने। की करी ओकर? -धनंजय-०००० -आध-आध बाँटि देब अहाँ दुनू भाइमे। फेर हमर आ अहाँक माँक की हएत? हम की खाएब? अच्छा सुनू, ई बताउ जे अहाँ की कऽ रहल छी आइ-काल्हि। -धनंजय-०००० -आइ धरि नै भेटल अछि नोकरी। कतेक दिन लागत अखन। अहीं किए नै आबि जाइ छी। मैनेजमेंटक ज्ञानक उपयोग खेतीक बिजनेसमे नै भऽ सकैत अछि? धनंजय फोन काटि देलक। -हरामखोर। रघुनाथ पी.सी.ओ.सँ बाहर आबि गेल। साढ़, डोनेशनसँ पढ़ब तँ पूछत के? ने काबिलती अछि नहिये पैरवी- चलल अछि मैनेजर बनै लऽ। ओ घर नै जा कऽ सोझे पार्क गेल आ लकड़ीक बैंचपर बैसि गेल। पार्कक बगलबला लेनमे घर छल पारसनाथ शर्माक आ तीन-चारिटा दाइ हुनकासँ झगड़ा कऽ रहल छल। हफ्तामे एक-दू बेर कालोनीक कोनो ने कोनो घरक आगू एहन सीन भऽ जाइ छल। किए होइ छल एहन सीन, एकरा सभ कियो जानै छल तइसँ महत्व नै दै छल। -छल ई जे सभ घरमे बांग्लादेशी दाइ छल। सोलह-सत्रहक उमेरसँ पैंतीस-चालीस सालक। बूढ़मे सँ ककरो ने ककरो बुढ़िया अप्पन बेटा-पुतोहु लग बाहर चलि जाइ छल किछु मासक लेल। रहै छल तँ राग-द्वेषसँ मुक्त भऽ आ बुढ़बाकेँ एतबे छूट देने। बूढ़मे शाइते कोनो बूढ़ छल जकरा अप्पन जवान हेबाक भ्रम नै हएत आ ओ समए-समएपर परीक्षण नै करऽ चाहैत जे हुनकामे किछु बचल अछि आकि नै। तृष्णाक मारल सभ बूढ़ प्रेम, दुलारक नामपर एहन छूट लऽ लै छल आ दाइ सभ सेहो साबुन, तेल, नेलपॉलिश, लिपिस्टिक बा पंद्रह-बीस टका बख्शीस पाबि संतोष कऽ लै छल। ओ हुनका कतऽ काज करैत सुरक्षित अनुभव करैत छल। समस्या ओतऽ ठाढ़ होइ छल जतऽ बूढ़ अप्पन दाइकेँ सेवाक मुताबिक बख्शीस दैमे ना-नुकुड़ करै छल। ई प्रणय कलह जेहन मामला होइत छल जइमे तेसराक दखल दैक जरूरत नै पड़ैत छल। (बेसी जानकारी लेल पत्रकार सुशील त्रिपाठीक स्टोरी पढ़ू- आखिर अशोक विहारक प्रवेश-द्वारपर मर्दाना कमजोरी आ सिसनोत्थानक समस्याक निवारणक जड़ी-बूटी वनौषधिसँ शर्तिया इलाजक पीअर तम्बू साल भरि किए तनल रहैत अछि।) ऐ कलह-कोलाहलसँ निरपेक्ष रघुनाथ बेंचपर धूप सेवन कऽ रहल छल तखने हुनका ताकैत पुरना मित्र जीवनाथ वर्मा पहुँचल। ओ हुनके संग रिटायर भेल छल आ रसायन शास्त्रक अध्यापक छल। नग्रमे बेटा-पुतोहुक संग साकेत विहारमे रहैत छल। कार्यकालक दिनमे किछु लोक हुनका पागल बुझै छल आ किछु जीनियस। चना-चबेनापर जीवित रहैवाली भारतक अस्सी प्रतिशत जनता हुनकर चिंताक विषय छल। ओ सेहो शौकीन छल भूजाक (भुजनाठीसँ भुजल चना, मटर, लाइ, चूड़ा, बालि) क। भारी मोश्किल छल सामान्य लोकक। कड़ाही जुटाउ, बालु आ नीमकक बंदोबस्त करू, चुल्हा जराउ, ओकर गरम होइक आ धधकैक इंतजार करू, तखन जा कऽ भुज्जा तैयार होइत अछि। एहन नै भऽ सकैत अछि जे ई सभ झंझटि नै पोसऽ पड़ए। कतेक रास बरखक चिंतन मननक बाद ओ एकटा प्रयोग केने छल। किएक तँ ई राष्ट्रीय स्तरक समस्या छल जकर समाधान खोजि कऽ निकालने छल तइसँ हुनकर हार्दिक इच्छा छल जे एकर उद्घाटन वैज्ञानिक ए.पी.जे. अब्दुल कलाम करथि। मुदा झिटुकी लगेने छल रघुनाथे। ओ कहने छल जे प्रयोग अखन प्रक्रियामे अछि तइसँ आयोजन स्थानीय स्तरपर हुअए। बड़ खर्च केने छल वर्मा। घरक आगू तम्बू लगेलक, तीस अध्यापक लेल कुर्सी मंगबैले छल, कैटररसँ चालीसटा थारी मंगबैलक, माइक लगबैलक। सभ अध्यापकक थारीमे चारिटा चना राखलक आ प्रिंसिपल, जकरा उद्घाटन करबाक छलै, हुनकर थारीमे पाँचटा। थपड़ीक गड़गड़ाहटिक बीच प्रिंसिपल मुँहमे पाँचो दाना खसेलक आ दकड़ैत थुकड़ि देलक। माइकपर एक वाक्य बाजल- ई चना लोहाक अछि आ जहर अछि। सभ अध्यापक चिखने बिना प्लेट फेक देलक आ चलि गेल। हुनका मोताबिक वर्मा हुनकर अपमान केलक आ वर्माक मोताबिक ओ वर्माक। प्रयोग ओना तँ गोपनीय छल, ओकरा लऽ कऽ बताओल सेहो नै जा सकै छल मुदा रघुनाथकेँ जे जानकारी छलै से ई जे वर्मा झाड़ि पोछि कऽ जमीनपर एक किलो चना पसारलक, ओइपर स्पिरिट छिड़कलक,काठी जरैलक, धधरा उठल आ चना भुजा गेल। (खोंइचा जड़ि गेल, गुद्दा ओहिना काँचे रहि गेल।) यएह भुज्जा फेमबला वर्मा किछु काल हुनका देखैत रहल आ आस्तेसँ कहलक- रघुनाथ। रघुनाथ जखन माथ उठेलक तँ ओ लपकल-ऐँ। ई सत्ये अहीं छिऐ। भजार, की भऽ गेल अहाँकेँ। कल्ला बैसि गेल छै, गाल धँसि गेल छै, दाँत झड़ि गेल छै, आँखि भीतर चलि गेल छै- एना केना भऽ गेल। चिन्हैमे नै आबि रहल छी अहाँ। रघुनाथ हँसल, ठाढ़ भेल, हुनका बाँहिमे लेलक आ अपना संग बैसाबैत बाजल- कनी इम्हर। किछु नै भजार, गेल छलौं काल्हि पेंशन ऑफिस। जखन घुरऽ लगलौं तँ बड़ा बाबू पुछलक- रघुनाथ जिबिते अछि आकि गुजरि गेल। हम पुछलौं- एना केना बाजि रहल छी। ओ कहलक- फाइल बंद पड़ल अछि हुनकर। मइसँ पेंशन नै चढ़ल अछि। किए? ओ बाजल जे लाइव सर्टिफिकेट नै देने अछि। तँ हम यदि देखैये लेल एलौं जे मामिला की अछि? -बड़ नीक केलौं, ऐ बहन्ने अहाँसँ भेंट भऽ गेल। ओकरामे किछु करबाक तँ अछि नै। फारम भरि कऽ रजिस्ट्रारकेँ देबाक अछि। ओ दस टका लेत आ प्रमाणित कऽ देत। फेर बरख भरिक चिन्ता खत्म। रघुनाथ बड़ मिझाएल मोनसँ बाजल- जीवनाथ। हमरा चौअनिया जीवनमे कोनो रुचि नै अछि। वर्मा बड़ दुखी भऽ कऽ रघुनाथकेँ देखलक- भजार, की बात अछि। अहाँ एहन तँ नै रहिऐ। चलू घर। जाइक हुअए तँ साँझकेँ जाएब। रघुनाथ एकटा हाथमे लाठी आ दोसरमे वर्माक कन्हा धेने घुरल। * जीवनाथ वर्मा जाइत-जाइत एकटा नव आफत ठाढ़ कऽ कए गेल छल, ई कहैत जे अपना सबहक लेल बडु जीलौं रग्घू मुदा अपना लेल जीबू। यएह ओ गप छल जे कहियो हुनका अप्पन दिमागमे नै आएल। अपनासँ अलग सेहो किछु होइत अछि की? की बेटा अप्पन नै छल? बेटी अप्पन नै छल। स्त्री अप्पन नै छल। खेत-खलिहान अप्पन नै छल। ई जरूर अछि जे सभ कियो अपना लेल जीवन चाहै छल। ककरो ऐ गपक चिन्ता नै छलै जे ओ जी रहल अछि आकि मरि रहल अछि। ओकर अप्पन खगता सभसँ बेसी रहै छलै आ ओ नै चाहै छल जे कियो ओकरापर कोनो सवाल उठाबै। अहाँ ओकरा अप्पन बाट जाए दियौ आ जाए दइमे मदति करू तँ अहाँसँ नीक कियो नै। मुदा की हुनकर जिनगी रघुनाथक जिनगी छल। नै, हेबाक चाही छलै अप्पन अलगसँ। जे भेलै नै। आ जीवनाथ वर्मा ई सभ तखैन कहि रहल छल जखन कान सुनि नै सकैत छल, आँखि देखि नै सकैत छल। कल्ला चबा नै सकै छलै, डाँड़ सोझ नै भऽ सकै छलै। आ ई सभ किछो अपन प्रति आ पतिक कर्तव्यक भेँट चढ़ि गेलै। ओ ई मानै लेल एकदम्मे तैयार नै छल जे अप्पनक भेषमे ओ दोसर छल। ओ कत्तौसँ खसल नै छल, अनेरुआ नै छल। रघुनाथ स्वयं कृतज्ञ भावसँ शीलाकेँ दोसराक घरसँ आनले छल, यएह हुनकर हुनका सभपर उपकार छल जे हुनका नै जानैत-पहचानैत हुनका संग आएल छल आ एक नव दुनिया रचएमे हुनकर संग देने छल। आखिर कोन उम्मेदसँ रघुनाथ शीलासँ मिलि कऽ रचने छल ई दुनियाँ। ओ एतबे नि:स्पृह आ निस्वार्थ तँ नै छल आ हुनकर आशा सेहो हुनकासँ अलग नै छल, जे गाम-घरक छल। की जे ओ अशक्त भऽ जाए तँ बच्चे हुनकर आँखि बनत, हुनकर हाथ-पएर बनत। ओ दुखित हएत तँ यएह बच्चा हुनकर सेवा करत, दवा-दारू करत, अस्पतालमे भर्ती कराएत। मरऽ लागत तँ मुँहमे गंगाजल-तुलसी देत, अर्थी सजाएत, श्मशान लऽ जाएत, क्रिया-कर्म करत। मुदा देखू तँ एकरासँ बेसी मूर्खता की भऽ सकैत अछि। अरे, मरलाक बाद सड़य-गलय, कौआ-चील खाए बा कुकुर- की फर्क पड़ै छै। मुदा यदि दुनियाक आ दुनियाक चलैत रहैक कायदा ई रहैत अछि कि की पैदा हुअए बा जिअए। जीअब अहाँक कर्तव्य अछि। कर्तव्य माने की? अशक्क। कियो ई नै पुछलक अपनासँ- ककरा लेल जी रहल छी? ओ जन्मैक बाद जाधरि जी रहल अछि, जी रहल अछि। मरय कऽ दिन धरि। मरय कऽ दिन बाप-बेटाक हाथ ओ सभ किछु सौंपि कऽ जाइत अछि जे ओकरा संग रहैत अछि। लिअ, सम्हारू आब। हम चललौं। रघुनाथ लग गामक जमीनक अलाबे किछु नै छल आ ओइ जमीनकेँ ओ अनमोल बुझैत छल। बेटा हुनका कैशमे भजोखा देखैत छल आ कहि रहल छल जे एकरासँ बेसी तँ हमर एक मासक इनकम अछि। संजयक टिप्पणी रघुनाथक भीतरक सभटा जीवनक रस चूसि लेने छल। ओ अप्पन कोठलीक खिड़की लग बैसल कदम्बक पातक पार आसमान देखि रहल छल जे सूर्यास्तक बाद मलिछौंह छल। ओतऽ हुनकर आँखिक आगू एकटा मद्धिम तारा छल जे हिलैत पातक अढ़मे कखनो नुका जाइ छल, कखनो हुलकऽ लागै छल। ई तारा नै छल। हुनकर पिता छल जे हुनकापर हँसैत छल आ नुका जाइ छल। -हौ जीवनाथ सुनह। अप्पन दिन तँ बचल नै जीबाक लेल मुदा जीअल छी अपना लेल। ओ अचानके चिकड़ि उठल जेना जीवनाथ सद्यः गेटक बाहर ठाढ़ अछि। ताराक तुकमिलानी लारा। तारा हुनका लाराक मोन पाड़ि देने छल, ओइ लाराक जे हुनकर नितांत अप्पन जिनगीक गुप्त हीस छल। जइ दिन रघुनाथ अप्पन किशोरावस्था पार कऽ रहल छल ओइ काल हुनकासँ टक्कर लेने छल लारा चड्ढा। एकटा अल्हड़ आ सोझ सन लड़की। अंडाकार मुँहवाली सुन्दर लड़की। सपनाएल आँखि। नाकक नोकपर बदमासी। ठोढ़क कोनपर हँसी। छड़ीसन देह जना हवामे थरथराइत बुलबुल्ला। कमी छल तँ बस दूटा पाँखिक, जकर सहायतासँ ओ जखैन चाहए तखन उड़ि सकए। रघुनाथ मामक घर रहि कऽ पढ़ाइ केने छल आ ओ आगू रहै छल बंगलामे। पैघ बहिन हॉस्टलमे छल आ ओ माँ-बापक संग। रघुनाथसँ एक क्लास ऊपर छल। ओ जखैन-तखैन साँझक बल्बक रोशनीमे पापाक संग बैडमिंटन खेलाइ छल तँ रघुनाथ अप्पन दरवाजापर ठाढ़ भऽ कऽ देखैत छल। एक दिन जखन लाराक माए-बाप कोनो समारोहमे बाहर गेल छल, ओ इशारासँ रघुनाथकेँ बजैले छल। ओ घरक ड्रेसमे छल- स्कर्ट आ ब्लाउजमे। ओ रघुनाथक संग कैरम खेलाइ लेल बैस गेल आ किछु काल धरि खेलाइत रहल। फेर अचानके उठल, दौड़ कऽ लॉनमे गेल, पीअर गुलाबक फूल संग घुरल आ केसमे लगा कऽ ठाढ़ भऽ गेल- आब कहू, केहन लागै छी। अपरतीब भऽ रघुनाथ देखैत रहल आ आस्तेसँ बाजल- नीक। -ऐँ, खाली नीके? लाराक आँखि फाटल रहि गेलै। रघुनाथकेँ बुझैमे नै एलै जे आगू की बाजी। लारा पएरसँ ठेल कऽ बोर्डकेँ एक दिस केलक आ हाथ पकड़ि कऽ ठाढ़ कऽ देलक रघुनाथकेँ। ओकर आँखि नोरा गेलै, बाजल- गोबर। मोनेमोन चाहै छी जे नीके-नीक बाजी, अहाँक आँखि ठोढ़, आंगुर, बाँहि, आ पूरा देह नीक बाजी। आ... ओ एक-एक कऽ ओकर अंगा आ पैंट खोलैत गेल। -अप्पन सेहो हम खोली आकि अहूँ किछु करब। ओ लजाइत कनफुसकी केलक। जना-जना वस्त्र ओकर देहसँ अलग होइत गेल, ओना-ओना एकटा अज्ञात, अनदेखल, अकल्पित दुनियाँ खुजैत गेलै ओकर आगाँ कनी-कनी। मुदा ई कनी-कनी असह्य भऽ गेलै रघुनाथ लेल। ओ बेसब्र आ जंगली भऽ उठल। ओ लाराक संयमपर चकित सेहो छल आ मुग्ध सेहो। ओ हुनका आस्तेसँ बैसैलक आ हुनकेपर नमड़ि गेल- फूलसँ बनल गाछ सन। हुनका भीतर लैसँ पहिने हुनकर कानमे फुसफुसैलक- बुद्धूराम। कहियो मेटाएब नै। आ हुनकर झाँपल जीहक नोकसँ दहिना दिस लिखलक- एल.ए.। जखन बाम छातीपर आर. लिख रहल छल ओइ काल कॉलबेल बाजल। ओ तरपि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। बाजल- पहिरू आ भागू पाछाँसँ। फेर तँ मास भरिक बादे चड्ढा साहेबक बदली भऽ गेल आ ओ चलि गेल। ऐ गपकेँ या तँ रघुनाथ जानैत छल या लारा- तेसर कियो नै। एहन बहुत रास गप अछि हुनकर जिनगीमे जे वएह टा जानैत अछि। की ई नै छल अपना लेल जिअब। ककरो नै पता जे शुरूसँ रघुनाथ एकटा चोरक जिनगी जिअल अछि जे हुनका नजरि आबैबला जिनगीसँ बेसी असली आ अप्पन रहल अछि। नहिये माँ-बापकेँ पता, नहिये स्त्रीकेँ, नहिये बेटा-बेटीकेँ। ऐ जिनगीक भीतर एकटा दोसर जिनगी। जकरा लोक देखैत छल आ बुझैत छल ओ दोसराक लेल आ दोसराक काजक लेल भले रहल हुअए- हुनकर अप्पन जिनगी नै छल। मजा आ झमेला ऐ जिनगीमे छलै जे हुनकर निजी छल आ जे प्रेमक खोजमे गुजरि गेल। जमानासँ बचा कऽ, लोकक आँखिसँ चोरा कऽ, अपना आँखिमे गर्दा झोंकि कऽ, हुनका धोखा दऽ कऽ। जे हुनकर अलाबे, ओकरा पता छलै, ऐ गपक भनक भले भेटल होइ ककरो, पूर्ण जानकारी ककरो नै। पूरा जानकारी तँ अहाँक बदमाशीक सेहो नै अछि ककरो रघुनाथ। ओहो चोरीक जीवन छल अहाँक। अहाँ हॉस्टलमे छलौं ओइ काल। अहाँक भजार श्रीराम तिवारी, भेँट करए लेल आएल छल अहाँसँ। आएल छल तँ अस्पताल अप्पन माँकेँ लऽ कऽ, हुनकर हालत सीरियस छल। माँकेँ अप्पन भाइक जिम्मा छोड़ि कऽ अहाँसँ भेँट करऽ लेल आएल छल। जखन ओ जाए लागल तँ ओकर जेबीसँ खसल तागसँ बान्हल नोट अहाँ देखने छलौं आ चुप रहलौं। बादमे गानलौं तँ एक सए तीन टका छल। माँकेँ देखा कऽ घंटा भरि बाद फेर आएल- चिन्तित, परेशान आ घबड़ाएल। अइते ओ जतऽ बैसल छल ओतऽ फेर चौकीक नीचाँ टेबुलपर आ ओकर नीचाँ कोठलीमे चारू दिस देखैत रहल। बुझलाक बादो अहाँ ओकरा पुछले छलौं- की गप अछि? किछु टका छलै दवाइ लेल, भेट नै रहल अछि। आन ठाम कत्तौ तँ गेलौं नै। अहाँ देखलौं तँ नै। आ अहाँ उत्तर की देलौं- अस्पतालक भीड़-भाड़मे कनी सम्हरि कऽ रहबाक छल। ओतऽ जतेक पेशेण्ट आबैत अछि ओत्ते चोर आ पाकिटमार सेहो। ई सभक शिकाइत अछि। नै भजार। आर कत्तौ गेले नै छी। खसल हएत तँ एत्ते कत्तौ, जेबी कटबाक तँ सवाले नै अछि। -तँ देखू ने, कतऽ अछि एतऽ। अछि कत्तौ? -तँ रघुनाथ ईहो अहीं छलौं। वएह अहाँक निजी जिनगी। जौं ई जिनगी लोककेँ पता चलल हेतिऐ तँ अहाँ की एतेक आदरणीय आ गण्यमान रहि गेल हेतिऐ या नै, अपने सोचू। रघुनाथ सोचलक आ वर्माकेँ अपना लेल जिबूबला सलाहपर अविचलित रहल। ऐ दगाबाज आदर आ प्रतिष्ठाक बदला आत्माक ई नंगटपनी बेसी नीक छल। अपना लेल सेहो आ समाज लेल सेहो। ई आदमी टाक नै समाजक विसंगतिक सेहो चेहरा अछि, जे झाँपल-मुनाएल अछि। समाज जानए जे जँ हम बदमाश छी तँ ऐ बदमाशीक कारण असगरे हम नै छी, ओ सेहो अछि। आ सही कहियौ तँ ओकरे कारण हम एहन छी। -पापा। सोनल दरवाजासँ आवाज देलक। -अहाँ अखैन धरि अन्हारमे पटायल छी। ओ स्विच ऑन केलक आ कमरामे रोशनी भऽ गेल। रघुनाथक आँखि चोन्हैल, फेर पसरि गेल। पहिल बेर सोनलक संग एकटा युवा। नम्हर, सुन्दर, आँखिपर नै माथपर चश्मा, कन्हापर झोरा, खादीक कुर्ता आ जीन्सक पैंट। एक हाथमे लपेटल अखबार। रघुनाथ उठि कऽ बिछौनपर आएल। -पापा। यएह अछि समीर। दैनिक भारतक उप-संपादक। रघुनाथक पएर छुलक समीर। -हमर कजिन अछि। हम बतौले रही। ई बिसरि गेल हेथिन। जइ काल हम पटनामे रिसर्च कऽ रहल रही, ओइ काल ई सेहो ओत्तै छल। आइ अचानक सेमिनारमे भेट गेल। लऽ कऽ आबि गेलौं अपना संग। -कतऽ रहै छी बेटा। -एत्तै, लगेमे। संजय नगरमे। -ऐँ। ओतऽ तँ हम गेल छी। अप्पन दोस्त बापट कतय। -हम हुनके फ्लैटक नीचाँ रहै छी। आब तँ हुनकर फ्लैटमे हुनकर बेटा आबि गेल अछि, स्त्री बच्चाक संग। चौंकल रघुनाथ- हुनकर बेटा? बेटा कहाँ छल हुनका। समीर सोनलकेँ ताकलक। सोनल बतैलक जे ओइ काल अहाँ गाम गेल छलौं। हुनका किछु नै पता। समीर बाजल- पापा। की अहाँकेँ खबर अछि जे बापटक मर्डर भऽ गेल अछि पछिला दिन। नहरमे हुनकर लाश भेटल छल। आ अहाँ आश्चर्य करब जे एफ.आइ.आर. अही बेटाक नामे अछि। पेपरमे आएल छल ई समाचार। अही बेटाकेँ ओ अनाथालयसँ अडाप्ट केने छल, जखन ओ बच्चा छल। पढ़ैलक, लिखैलक, कोनो नोकरी सेहो दिआ देने छल ओकरा। चालि-चलन नीक नै छलै तइसँ निकालि देने छल ओकरा घरसँ। ई चाहै छल जे अपना रहिते फ्लैट ओकर नाम लिखि दिअए। शायद लिखबाइओ लेने छल ओ, ऐ शर्तपर जे ओ ऐमे तहिये आएत जखन ओ नै रहत। कहब मुश्किल अछि जे की कोना भेल। रघुनाथ काठ सन बैसल रहल- बिना हिल-डुल। कनी कालमे चश्मा उतारलक, गरमे लपेटल मफलरसँ पोछलक, फेर लगा लेलक। जना ओ बापटकेँ देखऽ चाहै छल। ऐ नगरमे एलाक बाद जे लोक असगरे हुनकर दोस्त हैत छल हुनकर ओ बापट छल। हुनकर मुँहसँ आश्चर्य सन नै, एकटा आह सन निकलल ई वाक्य- ई की हैत जा रहल अछि लोककेँ। ई केहन हैत जा रहल अछि दुनियाँ। हम बड़ नीक नै रही मुदा एत्ते खराब सेहो नै छलौं। -पापा, समीरसँ कहि रहल छी जे ऐ नगरमे जखन अप्पन घर अछि तँ ओत्तऽ किए। उपरो तँ एकटा कमरा खाली पड़ल अछि। रघुनाथ कातर भऽ कऽ हाथ जोड़लक- जे करबाक अछि करू, हमरा असगरे छोड़ि दिअ। प्लीज। रघुनाथ बिना खेले-पिले राति गुजारि देलक। नीन नै एलै। ओ कोठलीमे बत्ती मिझा कऽ सुतैत छल मुदा आइ जड़ैत छोड़ि देलक। एक बजे राति हुनकर आँखिक आगू बापटक चेहरा घुमैत रहल आ कानमे ओकर गीत- हाए हाए ये जालिम जमाना। मुदा एकर बाद हुनकर हृदएक अबाज कानमे धक-धकक बदला मारलक-मारलक कहि धड़कब शुरू कऽ देलक। रोशनीक रंग पीअरसँ लाल हुअए लागल। फेर तँ ओ जिम्हर नजरि घुमाबै छल, उम्हरसँ कोदारि, कुड़हरि, हाँसू, चक्कू, पघरिया, ईंटा, पाथर, पेस्तौल कूदैत-फांगैत ललकारा दैत लखाह दै छल। कनी कालमे रोशनी नै, जना शोनितक फूही उड़ए लागल आ चारू दिस दीवार लाल भऽ गेल। ओ उठि कऽ बैस गेल आ अपनासँ बाजल- ऐ दुनियाँमे कहियो हरियरका रंग होइत छलै भाइ, ओ कतऽ गेलै? * जनवरीक ओ साँझ कहियो नै बिसरब। साँझ तँ मौसम कऽ देने छल मुदा छल दुपहरिया। कनी काल पहिने रौद छल। ओ खाना खैले छल आ खा कऽ अखन अपना कोठलीमे पटायल छल, आकि अन्हर-बिहाड़ि। घरक सभटा खिड़की दरबज्जा भड़-भड़ करैत अपने-आप बन्द-खुलय लागल। छिटकिन्ने छिड़िया कऽ कत्तौ खसल, सभ बौस्त उघड़ा-भाँड़ हुअए लागल, जेना धरती हिलि गेल हुअए। देवार थरथराए लागल। अकास कारी भऽ गेल आ चारू दिस घोर अन्हार। ओ उठि कऽ बैसि गेल। आंगन आ लॉन पैघ-पैघ बर्फक पाथरक पथार लागि गेल आ रेलिंग टूटि कऽ खसल-धड़ाम। ओकर बाद जे मूसलाधार बर्खा शुरू भेल तँ ओ पानिक ठोप नै छल, लागल जेना ओ पानिक रस्सी हुअए जकरा पकड़ि कऽ कियो चाहे तँ ओतऽ धरि चलि जाए जतएसँ ई छोड़ल बा खसाएल जा रहल अछि। मेघ लगातार गड़गड़ा रहल छल- दूर नै, माथपर बिजली कड़कि रहल छल, दूर नै खिड़कीसँ भीतर आँखिमे। एकहत्तरि बरखक बूढ़ रघुनाथ आश्चर्यचकित। ई अचानके की भऽ गेल। किए भऽ रहल अछि। ओ मुँहपरसँ बनरटोपी हटेलक, शरीरसँ सीरक अलग केलक आ खिड़की लग ठाढ़ भऽ गेल। खिड़कीक दुनू पल्ला गिट्टीक मदतिसँ खुजल छल आ ओ बाहर देखि रहल छल। घरक बाहर कदम्बक बड़ पैघ गाछ छल मुदा ओकरा पता नै चलि रहल छलै ऐ अन्हारक कारण, घनघोर बर्खाक कारण। छतक डाउन पाइपसँ जलधारा खसि रहल छल आ ओकर अबाज अलगसँ सुनाइ पड़ि रहल छल। एहन मौसम, एहन बर्खा आ एहन हवा ओ देखने नै छल। दिमागपर जोर देलाक बाद मोन पड़लै-साठि-बासठि बरख पहिने। ओ स्कूल जाए लागल छल- गामसँ दू मील दूर। मौसम खराब देखि कऽ मास्टर साहेब समएसँ पहिने छुट्टी देने छल। ओ सभटा बच्चा संग गाछीमे पहुँचले छल आकि बिहारि, बर्खा आ अन्हार। सभ आमक गाछक अढ़ लैले चाहलक मुदा बिर्रो हुनका घास सन उड़ेलक आ गाछीसँ बाहर धानक खेतमे जा कऽ पटकि देलक। ककरो झोरा-झपटा आ किताब-कापीक पता नै। बर्खाक बुन्नी हुनकर देहपर गोलीक छर्रा सन लागि रहल छल, ओ कानऽ बाजऽ लागल। बिर्रो थमलाक बाद जखन बर्खा कनी कम भेल तँ गामक लोक लालटेन आ टॉर्च लऽ कऽ निकलल छल खोज लेल। ई एकटा दुर्घटना छल आ दुर्घटना नै हुअए तँ जिनगी की? आ ईहो एकटा दुर्घटने छल जे बाहर एहन मौसम अछि आ ओ कोठलीमे अछि। कतेक दिन भऽ गेलै बर्खामे भिजला। कतेक दिन भऽ गेलै लू केर झोकसी झोकेला। कतेक दिन भऽ गेलै जेठक घाममे डुमना। कतेक दिन भऽ गेल इजोरिया रातिमे घुमना। कतेक दिन भऽ गेलै जाड़मे ठिठुरना, दाँत कटकटेना। की ई तइसँ होइए जे हम एकरासँ बचल रही। बचि कऽ चली। या तइसँ जे एकरा भोगी, एकरा जीबी, एकरासँ दोस्ती करी, गप करी, माथपर बैसाबी। हम एकरासँ ओना व्यवहार करै छी जेना ई हमर शत्रु अछि। किए करै छी एना। इम्हर कतेक दिनसँ रघुनाथकेँ लागै छल जे ओ दिन दूर नै जखन ओ नै रहत आ ई धरती रहि जाएत। ओ चलि जाएत आ ऐ धरतीक वैभव, ऐश्वर्य, सौंदर्य- ई मेघ, रौद, गाछ-बृच्छ, फसिल, धार-नाला, कछार, जंगल-पहाड़ आ ई सभ किछु एत्तै छूटि जाएत। ओ सभ किछु अप्पन आँखिमे बसा लैलऽ चाहै छल जेना ओ भले चलि जाएत, आँखि रहि जेतै, चामपर सभ चीजक थाप सोखऽ चाहैए जेना चाम केचुली सन एतऽ छूटि जाएत आ ओकर स्पर्श हुनका धरि पहुँचैत रहत। हुनका लागै छल जे बेसी दिन नै बचल अछि हुनका जाइमे। सम्भव अछि जे ओ दिन काल्हि हुअए जखन हुनका लेल सूर्य नै उगए। उगत जरूर, मुदा ओकरा दोसर देखत- ओ नै। की ई संभव अछि जे ओ सूरजकेँ बान्हि कऽ अपना संग लेने जाए- नहिये ओ रहए, नहिये उगए आ नहिये देखए। मुदा एकटा सूरज पूरा धरती तँ नै, ओ कोन-कोन चीजकेँ बान्हत आ ककरा-ककरा देखैसँ रोकत। हुनकर बाँहि एतेक नम्हर भऽ जाइए जे ओ ओइमे पूरा धरती समेट लिअए आ मरए बा जिअए तँ सभक संग। मुदा एकटा कचोट आर छलै रघुनाथकेँ जे ओकरा कचोटि रहल छलै, काल्हि धरि कतऽ छल ई प्रेम। धरतीसँ प्रेमक। ई व्यग्रता। काल्हि सेहो ई धरती छल। ई मेघ, अकास, तारा, सूर्य आ चन्द्रमा। धार, झरना, सागर, जंगल, पहाड़। ई गली, मकान, चौबटिया। कतऽ छल ई उद्वेग। फुर्सति नै छलै एकरा सभकेँ देखबाक। आइ जखन मृत्यु बिलाइ जना आस्तेसँ कोठलीमे आबि रहल अछि तँ बाहरक जिनगी सुनाइ दऽ रहल अछि। -सत सत बताउ रघुनाथ, अहाँकेँ भेटल जकरा लऽ कऽ कहियो सोचने छलौं। कहियो सोचने छलौं जे एकटा छोट गामसँ लऽ कऽ अमेरिका धरि पसरि जाएब। पीढ्चीपर बैसि कऽ रोटी-पियाजु-नीमक खाइबला अहाँ अशोक विहारमे बैस कऽ लंच आ डिनर करब। मुदा रघुनाथ ई सभ नै सुनि रहल छल। ई अवाज बाहरक गड़गड़ाहटि आ बर्खाक अबाजमे दबि गेल छल। ओ अपना वशमे नै छल। हुनकर नजरि गेल कोनमे ठाढ़ लाठी आ छत्ता दिस। जाड़क ठंढी ओहिनो भयानक छल ऊपरसँ पाथर आ बर्खा। हिम्मत जवाब दऽ रहल छलै, तकर बादो ओ दरबज्जा खोललक। खोललक की, ओ ओत्तै ठाढ़ छल आ अपने-आप खुजि गेलै। भीजल हवा सनसनाइत अंदर आएल आ ओ डरि कऽ पाछाँ हटि गेल। फेर साहस केलक आ बाहर निकलैक तैयारी शुरू केलक। पूरा बाँहिमे थर्मोकोट पहिरलक, ओइपर सूती अंगा, फेर ओइपर स्वेटर, ऊपरसँ कोट। ऊनी पैंट पहिने पहीर लेने छल। ई जाड़क भोरमे पहिर कऽ टहलैक कपड़ा छलै। छलै तँ मफलर सेहो मुदा ओकरासँ बेसी जरूरी छलै- गमछा। बर्खाकेँ देखैत। जना-जना कपड़ा भिजतै, ओ एक-एक कऽ उतारैत आ फेकैत जाएत आ अंतमे रहि जेतै ई गमछा। ओ अप्पन साज-बाजक संग अखनो पूरा आश्वस्त नै छल। उघार, बिना केसक माथकेँ लऽ कऽ ओ दुविधामे छल- कनटोप ठीक रहत बा गमछा बान्हि लिअए। पाथर जे खसबाक छल, शुरूहेमे खसि गेल छल आ आब ओकरा कोनो अंदेशा सेहो नै छलै। ओ गमछाकेँ गरमे चारू दिससँ लपेटलक आ उघारे माथे बाहर आबि गेल। आब नहिये कियो रोकैबला आ नहिये टोकैबला। ओ बाजल- हे मन। चलू। घुरि कऽ एलौं तँ वाह-वाह। नै एलौं तँ वाह-वाह। पाथरबला बर्खाक अन्हार सुरंगमे उतरैसँ पहिने ओ ई नै सोचने छल जे भीजल कपड़ाक भारक संग एक ठेग बढ़ब हुनका लेल मुश्किल हएत। ओ अप्पन कमरासँ निकलि आएल मुदा गेटक बाहर नै जा सकल। छत्त खुजैसँ पहिने जे पहिलुक ठोप ओकर उघार, खल्वाट माथपर खसल, ओ एतेक पलखति नै देलक जे ओ बुझि सकए जे ई बिजली कड़कल अछि आकि लोहाक किल्ली अछि जे माथमे भूर करैत भीतरे-भीतरे तड़बा धरि पैसि गेल अछि। ओकर पूरा शरीर झनझना उठल। ओ निराउ बर्खामे बैस गेल मुदा भीजैसँ नै बचि सकल। जखन धरि छत्ता खुजल, ताधरि ओ पूरा भीज गेल छल। आब ओ फँसि गेल छल- बर्फबला हवा आ बर्खाक बीच। हवा घास सन ओकरा ऊपर उड़ा रहल छलै आ बर्खा जमीनपर पटकि रहल छलै। भीजल कपड़ाक भार उड़ऽ नै दऽ रहल छलै आ हवा घिसियेने जा रहल छलै। हुनका एतबे टा मोन छलनि जे लोहाक गेटपर ओ कतेक बेर भहरा कऽ खसल आ ई तखन धरि चलल जखन छत्ताक कमानी टूटि गेल आ ओ उड़ैत गेटक बाहर गाएब भऽ गेल। आब हुनका एहन लागि रहल छल जे हवा ठाम-ठामसँ नोचि रहल अछि आ पानि दागि रहल अछि- जरैत छोलनीसँ। अचेत हैकऽ खसैसँ पहिने हुनकर दिमागमे ज्ञानदत्त चौबे आएल- हुनकर मित्र। ओ दू बेर आत्महत्या करैक प्रयास केने छल- पहिलुक बेर लोहता स्टेशनक लग रेल पटरीपर नग्रसँ दूर निर्जन स्थलपर, जतऽ ककरो आएब-जाएब नै छल। समय ओ पैसेंजर बा मालगाड़ीक नै, एक्सप्रेस आकि मेलक चुनने छल। जे हैक अछि खटसँ हुअए, जइसँ तकलीफ नै होइ। ओ पटरीपर सुतले छल जे मेल आबैत देखलक। जाने की, ओहि सं जीवनक मोह पैदा भेल आ उठि केर भागहि मे भेल जे घुटनाक लग पइर खचाक। ई मरहि से बेसी खराब भेल। बैसाखीक सहारा आ घर बला केर गाइर अ दुत्कार। एक बेर फेर आत्महत्याक जुनून सवार भेल ओहि पर। अहि बेर सिवानक इनार। ओ बैसाखी फेंक छलांग लगैलक आ पइन मे छपाक कि बरोह पकड़ि मे आबि गेल। तीन दिन बिना खायल पियल भूखल चिल्लाबैत रहल इनार मे-आओर निकलल ते दोसर टूटल पइरक संग। आइ वएह ज्ञानदत्त बिना पएरक ज्ञानदत्त चौराहापर भीख मांगैए। मरैक आस ओकरा कतौकऽ नै छोड़लकै। मुदा ई साढ़ ज्ञानदत्त ओकर दिमागमे किए नै आएल। ओ मरै लेल निकलल नै छल। निकलल छल बुन्नी लेल, पाथर लेल, हवा लेल। ओ परिणाम निकाललक जे जीवनक अनुभवसँ जीवन पैघ अछि। जखन जीवने नै, तँ अनुभव ककरा लेल। * रघुनाथकेँ किछु पता नै जे ओ अप्पन कोठलीमे केना पहुँचल। के लऽ गेल। कखैन लऽ गेल। केना लऽ गेल। कपड़ा के उतारलक? देह के पोछलक आ तीस बरखक पुरना खादी आश्रमबला ओ गाउन आ ओवरकोट के पहिरलक जकर रोइयाँ झड़ि गेल छल आ जे जलफाँफीटा रहि गेल छल। ओ नीचाँसँ उघार छल आ गर्भमे पड़ल नेना सन बुक्की मारने बिछौनपर पड़ल छल। हुनका ऊपर कंबलक संग सीरक पड़ल छल जकर नीचाँ ओ दबल छल। हीटरसँ कमराकेँ गर्म कऽ देल गेल छल। हुनकर पएरक तरबामे समीर तेल रगड़ि रहल छल आ दोसर तरबामे सोनल। गरम तेलसँ अजमाइनक गंध आबि रहल छल। रघुनाथक गरसँ निकलैबला फोंफ बता रहल छल जे चिंताक कोनो गप नै अछि। ओ बेहोशीमे लागि रहल छल- नीनमे बेसी, जागलमे कम। परिस्थितिकेँ बुझबाक लेल सोनल हुनका दू-तीन बेर अवाज देलक। देहमे कनी हिलडोल भेल मुदा आँखि नै खोललक। राति आधसँ बेसी बीत गेल छल। बत्ती मिझा दिअ?- समीर पुछलक। सोनल बाजल- मिझा दियौ। रघुनाथक मनमे भेल जे मना कऽ दिऐ। तरबा लग बैसैत समीर पुछलक- काल्हि कए बजे अछि अहाँक क्लास। -काल्हि नै, आइ कहू। नऽ बजेसँ। मुदा छुट्टी लिअ पड़ि सकैत अछि। -अरे नै, नीक भऽ जाएत भोर धरि। टनाटन। ठार लागि गेल अछि। ओ तँ कहू जे हम समएसँ पहुँचि गेलौं। जेना गेट लग किछु खसैक आवाज भेल, हम दौड़लौं आ देखलौं तँ पापा। (देखू ई झुट्ठाकेँ। कत्तौ नै दौड़ल। पोर्टिकोसँ डंटा कोंचि-कोंचि कऽ देखलक। अपने डरल छल जे नै जानि की भेल। कुकुड़, बिलाइ जानि कऽ।) ओइ दुनूक अवाज रतजग्गी सन छल- खस-खस आ फुस-फुस। ओ आस्तेसँ फुसफुसा रहल छल, तइसँ रघुनाथक नीन उचटै नै। ओ अपन नीचाँ कंबल ओछा कऽ राखने छल आ शाल ओढ़ने छल। -एक गप कहू जे पापा शुरूसँ एहन लोक छल? झक्की आ जिद्दी। अपना मोनक।- समीर बाजल। -पहने ई हाथ हटाउ। -केहन हाथ। -यार, सेंसेशन भऽ रहल अछि। गुदगुदी। बुझै नै छी की? -बगलमे बैसै छी तँ कखनो सुनै छी हमर। (रघुनाथकेँ बत्ती मिझाबैक रहस्य आब बुझैमे आएल। ओ सीरकक भीतर घोकचि बंद आँखिये सभ किछु देखि-सुनि रहल छल आ मारे लाजक नहिये करौट लिअ सकैत छल, नहिये हिलि रहल छल।) -सोचै छी मम्मी आ दीदीकेँ खबर दऽ दी। -जेहन अहाँ चाही, ओना जरूरत नै अछि एकर। -सोचू जौँ अहाँ नै हेतिऐ तँ की हेतिऐ? असगरे की करतिऐ हम? एइयू! अनचोक्के चिहुँकि उठल ओ। की करै छी ई? धैर्य नै अछि? -केना हएत? ठंढी तँ देखू। समीर ओकरा आर लग-आरो लग आबैत कानमे बाजल-रोकबाक अछि तँ मौसमकेँ रोकू। सुनि रहल छी- फेर टिप टिप। ई बुन्नी किछु कहि रहल छल। की कहि रहल छल? आवाज समीरक गरमे कत्तौ फँसि गेल छल आ टूटि रहल छल। -सम्मी। प्लीज।- सोनल बेचैनीमे अप्पन माथ रघुनाथक ओइ पएरपर राखलक जकर तरबा ओकर तरहत्थीपर छलै। ओकर गर्म साँस हुनकर आंगुरपर हवा कऽ रहल छल। -दोस। उठू तँ। पापा सुति गेल अछि, हुनका सुतऽ दियौ। समीर जना गिड़गिड़ाइत बाजल। सोनल ठेहुन भरे बैसल रहल आ रघुनाथक तरबापर माथ रखने सोनल बीच-बीचमे सिहरि उठए। ओ भारी टूटैत अबाजमे कहलक- बुझै किए नै छी? ऐ हालमे कोना छोड़ि दिअ हिनका? कखैन केकर जरूरत पड़ि जाए। मुदा ओकर एक नै सुनलक समीर। ओ बैसल सोनलकेँ लगभग अप्पन कोरामे उठैलक आ लेने-देने कोठलीसँ बाहर भऽ गेल। रघुनाथकेँ खराप नै लगलै। ओकर तरबामे पड़ल ओकर माथ जेना पहिने क्षमा मांगि लेने छल। अखन उमेर छेबे की करए। रघुनाथ मन बनैलक जे जौं ओ समीरकेँ प्रेम करैए आ ओकरा संग घर बसाबऽ चाहैए तँ ओ पापाक हैसियतसँ कन्यादान करबामे पाछू नै हटत। रघुनाथकेँ पूरा तरहे स्वस्थ हेबामे एक सप्ताह लागि गेलै। ओ सीरक ओछा कऽ लॉनमे पटा कऽ रौद सेकि रहल छल- दुपहरियामे। सोनल आ समीर अप्पन काजपर चलि गेल छल। सभ दिन सन अपनामे हँसी मजाक करैत। गाड़ीमे सोनलक बगलमे बैसैत समीर हाथ हिलेलक-बाइ-बाइ पापा, हैव अ गुड डे। जवाबमे रघुनाथ सेहो हाथ हिलैलक- पटायल-पटायल। के जानए, हाथ हिलल बा नै। घंटा भरि बाद हुनकर आँखि मिचमिचाएल, आकास दिस देखलक आ उठि बैसल। बैसल एहन लागि रहल छल जना लॉनमे कोनो सुखाएल बोन्साइ हुअए। आब खाली देवार छल आ ओ छल आ रौद छल। कनी काल लागल हुनका सामान्य होइमे। -गुड डे।- ओ आस्तेसँ बाजल। -गुड डे।- ओ मुस्की देलक। -गुड्डे।- हुनकर आँखि नोरा गेल। ओ चौंकि कऽ झटपट आँखि पोछलक आ खुशीसँ हँसल। आब ओ पूर्ण रूपेँ सुस्थिर चित्त छल। मुदा के कहए पूरा तरहेँ। किएकि मास भऽ गेल छल आ कत्तौसँ कोनो खबरि नै छल- नहिये मिर्जापुरसँ, नहिये नोएडासँ, नहिये अमेरिकासँ, नहिये पहाड़पुरसँ। शाइत सभकेँ बूझल भऽ गेल छलै जे रघुनाथ हुनका सदा लेल बिसुरि गेल अछि, बिसुरि नै गेल, मरल मानि लेने अछि। माया-मोह त्यागि कऽ। कॉलोनी ओहिना निर्जन आ उदास अप्पन घरमे पैसल छल। अहिनामे हुनकर दरवाजापर एकटा बोलेरो जीप ठाढ़ भऽ गेल आ ओइसँ दूटा युवा बहार भेल। ओ वएह छल जकर चर्चा केने छल गामक सनेही। अखने किछु दिन पहिने। ओ पएर छूबि कऽ हुनकर अगल-बगलमे बैस गेल। रघुनाथ ध्यानसँ देखलक- ओ विश्वविद्यालयक लड़का सन जीन्स आ स्वेटर पहिरने छल। एकदम टीप-टॉप। भला आ सभ्य घरक। पुछलापर नाम नै बतौलक ओ। ओ सभ चौकन्ना छल आ हड़बड़ीमे लागि रहल छल। रघुनाथ चाह पानि लेल पुछलक मुदा ओकरा सभकेँ एत्ते फुर्सति नै छलै। -सर, ऐपर सिग्नेचर कऽ दियौ। एक गोटे एकटा कागज बढ़ौलक जइपर पहिनेसँ किछु लिखल छल। रघुनाथ चश्मा लगा कऽ पढ़ब शुरू केने छल जे दोसर छीन लेलक- हमरासँ पूछू ने। हम बता दै छी। पहिने सिग्नेचर करू। रघुनाथ ओकरा नीक जकाँ देखलक। ओ रिवाल्वर निकालि कऽ दरीपर हुनकर आगू राखि देलक। -कतेक देने अछि नरेश। अस्सी हजार। एक लाख। ऐसँ बेसी दाम तँ नै अछि जमीनक।- पुछलक रघुनाथ। -सिग्नेचर करै छी आकि नै। -ओ तँ कऽ देब मुदा हम दू लाख दिआए दी तँ? -दू लाख? कतऽसँ दिआएब? -एकरासँ अहाँकेँ मतलब। दिआए दी तँ? दुनू एक-दोसरा दिस ताकलक- तँ जे कही से कऽ देब। -मारि देब नरेशकेँ? -सेहो कऽ देब। -मुदा हम ओकरा मारै लेल नै कहब। काज वएह करी जइमे खतरा कम हुअए, पाइ भेटए। जतेक मामूली रकम लेल अहाँ दौड़ल आएल छी ओतेपर तँ लगही करैत अछि हमर एकटा बेटा। -तइसँ एतेक गन्ध मारि रहल छी, ओइमे नहाबै छी की। नम्हरबला लड़का हँसी केलक। -की कहलौं? रघुनाथ अप्पन हाथ कानपर लऽ गेल-कनी ऊँच बाजू। -किछु नै, बताउ तँ की करबाक अछि? पहिने पेस्तौल जेबीमे राखू आ ओ कागज हमरा दिअ बा फाड़ि दिअ। -हँ, कहू।- रिवाल्वर जेबीमे राखैत दोसर बाजल। -हमरा लेने चलू। अपहरण करू हमर आ मांगू दू लाख। -के देत अहाँ सन सड़ल-गलल बुढ़बाकेँ दू लाख। -खाली दू लाख, तइसँ जे ई पाइ दैमे कनियो नै अखरतै। भेट जाएत आ हत्यासँ सेहो बचि जाएब। -अरे के देत ऐ सड़ल-गलल केर। -सड़ल गलल छी अहाँ लेल, बेटा लेल तँ नै, बेटी लेल तँ नै। -मानि लिअ एकरामे सँ किओ पाइ दै लेल नै आएत, तखन? -से देखबाक अछि जे कियो आबैए की नै? -हमहूँ तँ सैह कहि रहल छी जे कियो नै आबए तखन? रघुनाथ क्षण भरि सोचलक- तैयो चिंता नै। एतेक गेल-गुजरल हम नै छी। एतेक तँ हमरा लग अछि जे अपनाकेँ छोड़ा लेब। -बैसल रहू हिलब नै। दुनू उठल, कनी दूर जा कऽ आपसमे खुसुर-फुसुर केलक, फेर ओत्तैसँ आवाज देलक- ठीक अछि चलू। -तँ आउ, समेटू सीरक। रघुनाथ ठेहुनपर हाथ राखि कऽ उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। दुनू चकित भऽ देखलक- सीरकक की करब? -ओढ़ब, ओछाएब, सिरमा बनाएब- जरूरत पड़त तँ लुंगी बना लेब आर की? रिवाल्वरबला लड़का सीरक समेटैत पुछलक- किछु खास अछि ऐ सीरकमे? -अछि ने। बेटा पठेने अछि कैलिफोर्नियासँ। मुदा ई सीरक सन तँ नै लागैए।- दोसर संदेह केलक। -लागए नै लागए, हम तँ से कहै छी।- कहैत रघुनाथ बिदा भेल। -रौ बूढ़, जाए कतऽ छी? कमसँ कम पैसा तँ राखि लिअ। दस दिनक फोन-फान, राशन-पानी, पेट्रोल सभक। खाएब की? -सभ हमहीं करब तँ अहाँ सभ की करब? बैस कऽ नोट गानब की? रघुनाथक भौंह तनि गेलै। हुनकर भीतरक मास्टर फनफना उठल- आ सुनू, अहाँ सन लौंडाकेँ पढ़ाबैत उमर गुजरल अछि हमर, तइसँ आदरसँ गप करू। हमर जरूरत अहाँकेँ अछि, हमरा कोनो जरूरत नै अछि अहाँक। बुझलौं। रिवाल्वरबला लड़का आस्तेसँ बाजल- आस्तेसँ-चलू तँ पहिने। ओत्तै बतबै छी जे ककरा ककर जरूरत छै। -किछु कहलौं?- रघुनाथ थकमका गेल। -किछु नै, चलू। रघुनाथ जखन डंटाक सहारे बाहर आएल तखन ओकर मुँह बानरटोपीक भीतर छल आ सीरक लड़काक कन्हापर। ओ आगू जा रहल छल, दूनू अपहर्ता लड़का पाछाँ-पाछाँ- जेना ओ बेटाक संग मगन तीर्थपर जा रहल छल। केदार कानन मधुपक रचना-व्यक्तित्व (आलेख- मधुप अभिनंदन ग्रंथसँ साभार) प्रकृतिक विराटता आ ओकर गह-गहमे भरल सौन्दर्यक रूपराशि, मानवीय करुणा आ ओकर पोर-पोरमे भरल हृद्यस्पर्शी तरलता, श्रृंगार आ ओकर अंग-अंगमे भरल चमक-दमकक कवि काशी कान्त मिश्र "मधुप" मैथिली काव्य-साहित्यिक अद्वितीय आ अपना ढ़ंगक एकसर कविक रूपमे स्थापित छथि। जहिना मेथिली गद्य-साहित्यकेँ लोकप्रिय बनयबामे प्रो. हरिमोहन झाक अन्यतम स्थान छनि, ठीक तहिना महाकवि विद्यापतिक बाद मधुपे जीक गीतकेँ ई महत्व प्राप्त छैक जे अपन लोकप्रियता आ अपन गेयधर्मिताक बलें संपूर्ण मिथिलांचलक लोककंठमे रचि-पचि आ बसि गेल। ई मधुपजीक अद्वितीय प्रतिभाक परिचायक थिक जे ओ प्रायः एखन धरि पद्येमे सभ किछु लिखलनि, एतए धरि जे आन-आन साहित्यिक बंधु-बांधव लोकनिकेँ ओ पत्रो पद्यबद्धे लिखलनि। एकरा कम महत्वक बात नै बूझक चाही। मधुपजीक कविताक विषय-वस्तु आ शिल्प-शैली आ काव्यगत विशिष्टता शुरुहेसँ व्यापक आ अनेक धारामे प्रभावित रहलनि, इएह कारण थिक जे हुनक काव्य-संपदामे अनेक ढ़ंगक नव-नव प्रयोग आ विभिन्न धारा आ दिशाक कविता सभ भेटैत अछि। मैथिलीक आलोचक लोकनि (?)केँ मैथिलीमे लिकल मधुपजीक फिल्मी पैरोडी अथवा ओहि प्रकारक हुनक अनेक गीतमे भने विशुद्ध साहित्यिक तत्व नै भेटैत होनि मुदा ओदा ओहि प्रकारक अनेक गीत सभक लोकप्रियता आ लोकानुरंजकताकेँ अनठाओल अथवा बिसराओल नै जा सकैत अछि। अपना ढ़ंगक ओ गीत सभ मैथिलीमे एकदमसँ फराक भऽ अपन स्थान सुरक्षित बनौने अछि। मधुपजीक महत्व एहू लेल अछि जे ओ संपूर्ण मैथिली साहित्यमे प्रथम आ एकसर ओहन कवि छथि जे तमाम हेय, तिरस्कृत आ काव्यसंसारक अछोप-अजाति विषय-वस्तुकेँ अपन कविताक विषय सेहो बनौलनि आ हुनक ओ सभ कविता वस्तुतः मानवीय करूणा आ वेदनासँ ओत-प्रोत अछि। एहि प्रसंगमे मुकन पतित पीक, छुतहर आ सारा परक तुलसी आदि कविताकेँ देखल जा सकैत अछि। दोसराक दुखसँ उत्पन्न करूणाक भावनाक अभिव्यक्ति हिनक काव्यमे बहुत भेल अछि। इएह करुणाक भावनाक अभिव्यक्ति हिनक काव्यमे बहुत भेल अछि। इएह करूणाक बावना समाजिक क्षेत्रमे मानवतावादी विचारकेँ जन्म दैत अछि। व्यावहारिक जीवनमे सेहो जीवनक विषमता आ असारताक अनुभूतिसँ करूणाक भावना उत्पन्न होइत अछि। आ एहू पृष्ठभूमिमे हिनक अनेक रचनाक जन्म भेल अछि। बहुआयामी प्रतिभाक अद्भुत रूपें धनी मधुपजी एक दिस अत्यन्त सहज आ सरस आ लोकग्राह्य गीत लिखने छथि तँ दोसर दिस जटिल आ दुहूह छंदमे तत्सम शब्दक प्रयोग कऽ सेहो अनेक गीतक रचना केने छथि। भने मधुपजीक एहन अनेक रचना लोकप्रियताकेँ नहि प्राप्त कयलक मुदा एहि प्रसंगे दू मत नहि जे एहन हुनक सभटा रचना विद्वन्मंडलीक बीच बेस चर्चित आ प्रशंसित रहल अछि। प्रकृतिक विराटताक कवि मधुप अपन अनेक गीतमे प्रकृति-सौन्दर्यक चित्रकेँ चित्रित केने छथि। प्रकृति संबंधी हुनक गीतकेँ पढ़िकेँ कतहुँ ई नहि बुझाइत अछि जे आयातित भाव-बोधसँ हुनक गीत दबल अछि अपितु प्रकृतिक उन्मुक्तता आ व्यापकताक बोध हुनक गीत सभमे अनायासे दबल प्रकट होइत अछि। हिनक प्रकृतिसँ संबंध गीत सभ अपन स्वाभाविक रूपमे विकसित होइत अछि। प्रकृति मधुपजीक कविता संसारमे मात्र प्रकृति-ए नहि रहैत अछिअपितु प्रकृतिक अनेक-अनेक स्रोत, अनेक-अनेक अर्थ आ अनेक अनेक संदर्भ प्रकट होइत अछि। मधुपक काव्य-संसारमे श्रृंगारिकता भरल पड़ल अछि किन्तु ओहिमे एकटा सहज स्वाभाविकता आ निश्छलता भेटैत अछि आ तें ओकर रसानुभूति पाठककेँ आह्लादित करैत अछि। ई श्रृंगारिकता पाठकक भीतर कोनो तरहक विकार आ पापकेँ जन्म नहि दैत अछि अपितु काव्यमय श्रृंगारिकता पाठककेँ मुग्ध आ मोहने रहैत अछि। हिनक अनेक गीत रचना पारंपरिक ढ़ंगक अछि तँ अनेक प्रगतिशील रचना सेहो अछि। छोट-छोट। रमनगर। बहुत सहज। बहुत लोकप्रिय आ सरस। संस्कृतक पंडित रहितो हिनक पांडित्य हिनक प्रगतिशीलतामे कतहुँ अवरोध बनि ठाढ़ नहि भेल। हिनक अनेक कथाकाव्यमे सभसँ बेसी चर्चित आ प्रशंसित भेल हिनक "घसल अठन्नी"। समाजिक जीवनक विद्रूपता आ कुरूपता, सामंत आ सर्वहाराक असमानता आ विशाल खाधि, गाम-घरमे जन-हरबाहक दुःस्थिति, ओकर सभहँक जीवनक नारकीयता, मजूरक पोर-पोरमे गस्सल दुख आ व्यथा आ करूणाक चित्रण घसल अठन्नीमे अपन स्वाभावितक संग व्यंजित भेल अछि।कविताक अंतिम पाँति पाठकक मोनकेँ भयंकर अवसाद आ गंभीर करुणासँ भरि दैत अछि, जखन मधुपजी ओहि घसल अठन्नीक निराश्रायता आ निर्थकताक चित्रण करैत कहै छथि— सविषाद हासमे चन्द्रमाक ओ घसल अठन्नी बाजि उठल: हम कत’ जाउ अवलम्ब पाउ के शरण? घसल जनिकर अदृष्टि! एहि सभहँक अतिरिक्त मधुपजी महाकाव्य सेहो लिखलनि आ हुनक एहि महाकाव्य "राधा-विरह"केँ १९७० ई.क साहित्य अकादमीक पुरस्कारसँ पुरस्कृतो कएल गेल। मधुपजी साहित्यकारक एकटा विशिष्ट वर्गकेँ अपन प्रेरणा, अपन सेजन्यता आ अपन व्यवहार-कुशलतासँ प्रेरित-उत्साहित केलनि आ तकर परिणाम थिक मैथिली साहित्यिक अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व यथा मणिपद्म, किसुन, बहरड़ आ अणु आदि। अंतमे हम भीमनाथ झाक निम्नलिखित पाँति हमरा मधुपजीक काव्य-संसारक विषयमे बहुत सटीक आ संगत लगैत अछि--"मधुपक काव्य-समुद्र थिक-- मधुपक काव्य आ समुद्र- अत्यंत विशाल भंडार थिक, जाहिमे जएह ताकब सएह टालक टाल भेटत"। कर्नल (डाक्टर ) कीर्तिनाथ झा मधुपजी हमरा किएक मन पडैत छथि मधुपजी मैथिली साहित्यक विभूति छलाह से के नहिं मानत. मधुपजी मैथिलीक प्रचार-प्रसारक हेतु बेहाल, प्रथम पीढ़ीक सिपाही छलाह सेहो निर्विवाद. ओ अपन रचना सं मैथिली साहित्यकें ततेक समृद्ध केने छथि जे हुनक प्रशंसा में बहुतो किछु कहल गेल अछि आ बहुतो कहब बांकी अछि. मधुपजीकें हम किरणजीक ओतय देखने अवश्य छियनि मुदा हुनका सं हमरा व्यक्तिगत परिचय तं नहिएँ छल. मधुप जीक कविता सं परिचित हेबा सं पूर्व हम मधुपजीक नाम सं परिचित भेलहुँ . कारण साठिक दशकमें ओ सुपरिचित कविक रूपमें प्रतिष्ठित भ चुकल छलाह, आ मैथिली कवि लोकनिक जं कतहु चर्चा होइक तं मधुपजी अग्रगण्य होथि . पछाति, हाइ स्कूलक मैथिली पाठ्य-पुस्तक में मधुपजी कविता 'घसल अठन्नी' पढ़लहुं. ओ कविता ततेक सुपरिचित छैक जे कतेको गोटे ओहि कविताक पक्ष -विपक्षमें अपन अभिमत देने होथि से संभव. मुदा, राजनैतिक विचारधाराक बखेड़ा सं दूर कविताक भाषा आ मर्मस्पर्शी चरित्र-चित्रणक गप्प हो तं 'घसल अठन्नी' कविता पढ़ि सहृदय मनुक्खक आंखिमें नोर अवश्य आबि जयतैक. मुदा, हम सोचै छी , मधुप जी हमरा किएक मन पड़ैत छथि ? सत्य पूछी तं मधुपजी हमरा 'घसल अठन्नी'क कारण नहिं मन पडैत छथि. मधुपजीक स्मरणक असली कारण अछि हुनकर लिखल मैथिली लोकगीत, जे स्वतः हरबाह- चरबाह सं ल कय विदेश्वर-कुशेश्वर स्थान जेबाबाली किशोरी धरिक कंठ सं अनायास प्रवाहित होमय लगैत छल . तें मैथिली गीतकें लोकप्रिय बनेबाले मधुपजी हिंदी सिनेमाक लोकप्रिय गीत सबहक तर्ज पर सेहो गीत सब बनौलनि. ओ संस्कृतक विद्वान छलाह, हुनका महाकाव्य लिखबाक कल्पना आ सामर्थ्य छलनि . तथापि मधुपजी मैथिली लोकगीत दिस किएक प्रवृत भेलाह . हमरा जनैत, मधुपजी विद्यापतिएक परम्पराक कवि छलाह. हुनका बूझल छलनि, जन-बोनिहार, आइ-माइ लोकनि ने विद्यापति पुरुष-परीक्षा पढ़इत छथि आ ने हुनका लोकनिकें कीर्तिलता वा कीर्तिपताका सं कोनो सरोकार छनि. मुदा, महिस पर बैसल महिसबार बिदेश्वरक बाट में 'कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ ' ओही तन्मयतासं गबैत अछि जेना कोनो चानन-तिलक धारी पण्डित गबैत छथि. तें लोकभाषाक प्रचारक हेतु मधुपजी लोकगीतक लोकप्रिय विधा कें सेहो संपोषित केलनि. आजुक मिथिलांचल में दुर्गापूजा-दसमीमें जखन ' मुंह खोल' मुंहबे में डाल दी' सन-सन वीभत्स गीतक अनवरत अष्टयाम चलैछ, नेपालक मैथिली टीवी चैनल सब पर पंजाबी गीतक तर्जपरक विकट गीत सब सुनैत छी आ मैथिली लोकगीतक दुर्दशा देखैत छी तं 'राधा-विरह' महाकाव्य क प्रणेता महाकवि क संग-संग, 'पंचमेर' आ 'टटका जिलेबी' सन गुटका गीतमाला लिखनिहार लोककवि मधुपजी सहजहिं मन पड़ैत छथि. जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ मधुपक गीत अमर,मिथिलामे ‘मधुप’जीक नाम सुनिते मोन पडि अबैत अछि हुनका द्वारा लिखल कतेक पांती सभ : ‘ओ घसल अठन्नी बाजि उठल हम कत’ जाउ....’ ‘सुरुज डुबैत भैया केर ताकि बटिया बहि गेल कमला बलान हे...’ ‘हम जेबै कुसेसर भोर, रंगि क’ ठोर....’ ‘कलबल कें भोरे-भोरे ई कोमलांगी औंघेले एली चौंकि चुप्पे...’ मधुपजीक साहित्य-संसारक एक अवयव गीत मात्रपर एखन चर्च क’रहल छी । सिनेमाक गीतक भासपर मधुपजीक गीत सभ ‘टटका जिलेबी’ आ ‘अपूर्व रसगुल्ला’नामक पुस्तिका मे प्रकाशित होइत छल । बादमे ‘चौंकि चुप्पे’ नामकसंकलन-पोथीमे बहुत रास गीत सभ आएल। ई गीत सभ बहुत लोकप्रिय भेल । पढल-लिखल लोक आ अनपढो लोक सभ गायक लोकनिसं फरमाइस क’क’मधुपजीक गीत सुनैत छलाह आ आनन्दित होइत छलाह । मधुपजीक श्रृंगारोक गीत सभ स्तरीय रहैत छलनि । मैथिल युवा-युवतीवर्गमे सिनेमाक गीतक प्रभावक विरुद्ध मधुपजीक गीत सभ एकटा सशक्त हस्तक्षेप छल । सिनेमाक गीतक धुन केहनो हो ओकर भासपर मैथिलीमे गीत लीखि देब मधुपजी लेल सहज आ स्वाभाविक होइत छलनि। मधुपजी एहि तरहक गीतक रचना कए मैथिलीक लोकप्रियता बढौलनि। गीतमे बिम्ब मौलिक रहबाक कारण गीतक अपन आकर्षण होइत छलैक जे जन-सामान्यक कण्ठमे स्थापित भ’ जाइत छल। एकर अतिरिक्त सोहर,समदाउन, लगनी, उदासी आदिक भासपर सेहो नव गीत लीखि ओहि भास सभमे नवजीवन,नव उर्जा भरलनि । मधुपजी डेढ हजारसं बेसी विविध गीतक रचना केने छथि । ई गीत सभ निम्नलिखित छोट-पैघ आठ टा पुस्तकमे प्रकाशित भेल अछि : 1.अपूर्व रसगुल्ला 2.टटका जिलेबी 3.पचमेर 4.गीत मंजरी 5.चौंकि चुप्पे 6.बटसावित्री 7.बिदा गीत 8.बोल बम गीतक अप्रकाशित पोथी सभ निम्नलिखित अछि : 1.विनयांजलि 2.दुलहा रे नंगटे नाचय 3.गंगा गीतामृत एकर अतिरिक्त दुर्गा सप्तसतीक अनुवादक पोथी ‘दुर्गा सप्तसती मैथिली सुधा’मे तेरहो अघ्यायक आरम्भमे एक-एकटा घ्यान गीत छनि। मधुपजी अपन आत्मगीतक शीर्षक रखलनि ‘मधुचक्र’जाहिमे करुणाक प्रवाह अनुपम अछि । गीत सबहक वर्गीकरण मुख्यतः 4 भागमे क’ सकैत छी : 1.श्रृंगार 2.करुणा 3.भक्ति 4.अन्य-सामाजिक सरोकारक गीत । मधुपजी सभ देवी-देवता पर गीतक रचना केने छथि जकर संख्या 500 सं कम नहि छनि । सभसं बेसी गीत शिव पर छनि । 26 टा गीत राम पर छनि । सामाजिक विषमता पर लिखल गीतक संख्या सेहो बहुत छनि । मधुपजीक गीतक सम्बन्धमे किछु समीक्षक लोकनिक मत एहि प्रकारें व्यक्त कएल गेल अछि : प्रो. रमानाथ झाक अनुसार : ‘मधुपजीकें गीत रचनामे प्रकृष्टता प्राप्त छैन्हि,किन्तु हिनक गीतक लोकप्रियता भाव-भाषाक सरलता ओ स्वाभाविकतापर आधारित नहि अछि, लोकप्रियताक कारण थिक ओकर संगीतात्मकता एवं िचत्रात्मक होएब। ई नव-नव लय, नव-नव तर्ज पर रचना करैत रहैत छथि जे हिनक रचनामे अन्तर्भूत कृत्रिम भाव-विन्यासक आवरणक कार्य करैत अछि,दोषकें झांपि दैत अछि।’ रमानाथ बाबू आगां लिखैत छथि : ‘लोकगीतक पहिल धर्म थिक सहजता ओ स्वाभाविकता। से रहनहि साधारण जनताक बीच ओकर प्रवेश भ’ सकैछ। आ ई तत्व मधुप प्रणीत लोकगीतमे प्रचुरतासं प्राप्त अछि।’ मधुपजीक शिव विषयक लोकगीतक प्रसंगमे शैव साहित्यक समर्थ समीक्षक डा.श्री रामदेव झा कहैत छथि : ‘मधुपजी नवीन-नवीन लय, छन्द ओ भावखण्डकें आधार बनाय शिवगीतक रचना करैत रहलाह अछि ।.....कीर्तनक हेतु उपयुक्त ढोल-झालिपर गेय धुनि सभक पद्धतिपर बहुतो शिवगीतक रचना कयलनि अछि। महिला कण्ठमे, गाम-गामक कीर्तन मण्डलीमे, गायक ओ नटुआ सभमे, ग्रामीण नाटकक रंगमंचपर, स्कूल कालेजक छात्रगण द्वारा आयोजित सांस्कृतिक समारोहमे मधुपजीक शिवगीत सुनल जा सकैत अछि ।’ मैथिली साहित्यक इतिहास लेखक डा.दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’क अनुसार: ‘शिल्पक क्षेत्रमे मधुपजी लोकगीत काव्यक सरल भाषा शैलीक अतिरिक्त चमत्कारपूर्ण आलंकारिक भाषा शैलीक सेहो प्रयोग कएल जाहिमे मुख्यतःचमत्कारपूर्ण अनुप्रास ओ यमकक पाण्डित्यपूर्ण शब्द विन्यासक छटा दिस कविक विशेष ध्यान अछि। किन्तु मधुपक सर्वश्रेष्ठ ओएह रचना थिक जे सरल सहज भाषामे लिखल गेल अछि ।’ डा. व्रज किशोर वर्मा ‘मणिपद्म’ लिखैत छथि : ‘मधुपजीक अन्तर-वीणा मने कोनो नीक धुन सुनितहि झंकृत भ’ उठैत छनि्। ओइ झंकारकें ओ तखनहि मैथिलीक गीतपंक्तिमे बान्हि दैत छथिन ।.....ओना धुन जे अरबधि क’ मांगल-चांगल होइ, किन्तु गीतक बिम्ब रहैत छैक मौलिक। ई लोक जीवनक क्षणकें साकार क’ दैत छैक आ नटुआ-सुलभ छैक। एहेन गीत सभमे जेना मधुपजी पुरान धारक मैथिली-चिन्तनक तटपर साधना कयने होथि।’ डा.प्रेम शंकर सिंहक अनुसार : ‘कविचूडामणि मधुप नवगीतकारक आदि गुरु कहल जा सकैत छथि। आधुनिक तर्जपर लिखल मधुपजीक गीत विद्यापतिक उपरान्त सर्वाधिक लोकरंजन कयलक।’ श्री कुलानन्द मिश्रक मत छनि : ‘निश्चित रुपसं गीतकारक रुपमे मधुपजी सभसं अधिक सफल भेल छथि। मधुपजीक गीतकार हुनक कविक स्थापनामे सहायक भेलनि ।.....ई स्पष्ट थीक जे जं हुनक गीत रचना सभ लोकप्रिय नहि भेल रहितनि तं हुनक कवि व्यक्तित्वो एतेक आदरणीय किंवा व्यापक नहि भेल रहितनि।’ युवा वर्गक बीच मैथिलीक आकर्षणमे निरन्तर वृद्धि करैत रहबाक लेल मधुपजी फिल्मी गीतक धुनपर गीत लीखि क’ छोट-छोट संकलनमे कम पाइमे गायक,पाठक आ मैथिली प्रेमी लोकनिक बीच उपलब्ध करयबाक प्रयासमे लागल रहलाह। ओ एकर चिन्ता नहि केलनि जे एहि लेल विद्वान लोकनिक प्रतिक्रिया केहेन हेतनि । मधुपजी गीतक अतिरिक्त मुक्तक काव्य, कथा काव्य, प्रबन्ध काव्य, संस्मरणात्मक काव्य, प्रशस्ति काव्य, शोक काव्य,अनुवाद आदिसं मैथिली साहित्यक भण्डार भरलनि जाहि लेल विभिन्न संस्था द्वारा प्रशंसित आ पुरस्कृत सेहो कएल गेलाह । मुदा जं मात्र गीते लिखने रहितथि तइयो मिथिलाक जनमानसमे आ जन सामान्यक कण्ठमे अमर रहितथि । हमरा आदरणीय श्री ‘अमर’जीक निम्नलिखित कथन नीक लगैत अछि ‘ ‘.....यद्यपि गोविन्द दास झा तथा चन्दा झाक गीत सेहो जनकण्ठमे प्रचुरतासं प्रचार पौलकनि, किन्तु विद्यापति जकां जनसामान्यक कण्ठहार नहि बनि सकलनि । ताहि दृष्टिएं मधुपजीक पदकें जे लोकप्रियता प्राप्त भेलनि से हिनका ‘अभिनव विद्यापति ’ कहयबाक उपयुक्त सिद्ध करैत छनि । मधुपजीक मुहें हुनक गीत ‘बातरससं छी तबाह, नहि बातक रस अछि...’ सुनबाक सुअवसर प्राप्त भेल अछि कोइलखमे विद्यापति स्मृति पर्वक अवसरपर । ओहि अवसरपर हुनक मैथिली-प्रेमक अनुभवक स्मृति एखनहु हुनका प्रति असीम श्रद्धासं भरि दैत अछि । हृदयसं निकलैत अछि : ‘ कत तोर करब बडाई..’ सन्दर्भ पोथी : श्री काशीकान्त मिश्र ‘मधुप ’ पर श्री चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ द्वारा लिखित आ साहित्य अकादमी द्वारा 1994 मे प्रकाशित पोथी । डॉ. अरुण कुमार सिंह, एल. डी. सी. आई. एल., सी. आई. आई. एल., मैसूर-6 मधुपजीक ‘घसल अठन्नी’मे दलित चेतना परिचय ‘निरंकुशाः कवयः’ केँ सार्थक करैत संसारक कोनो बाधाकेँ बिनु अंगीकार कएने, अपन इच्छानुसार काव्यक सृष्टि-सर्जन करयवला युगद्रष्टा एवं युगस्रष्टा कवि चूड़ामणि काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ स्वभावत: जन्मजात सारस्वत प्रतिभा-सम्पन्न संस्कारेसँ आशुकवि छलाह। जाहि वस्तु पर नजरि गेलनि, भाव उमड़लनि, बस्स, तकरा अपन लेखनीसँ भव्यता प्रदान कए देलनि। पं॰ सुरेन्द्र झा ‘सुमन’सँ प्रभावित भए मैथिलीमे लेखन कार्य प्रारंभ करयवला कलमक जादूगर मधुपजीक गीत विद्यापतिए जकाँ मिथिलाक सभ अंगनामे सभ अवसर पर सुनल जाइत छल। एहि ठाम छलसँ अभिप्राय अछि वर्त्तमान समयमे मैथिलीक वस्तुस्थिति। प्रकाशित कृति मधुपजीक प्रकाशित रचनाकेँ सुविधाक लेल निम्न भागमे विभाजित कएल जाए सकैत अछि- 1. महाकाव्य- राधाविरह(1969); मुक्त मधुप(2006)। 2. गीतकाव्य- अपूर्व रसगुल्ला(1941); टटका जिलेबी(1945); पचमेर(1949); गीत मंजरी(1963); चौंकि-चुप्पे(1968); विदागीत(1973); बटसावित्री(1975); बोल-बम(1981)। 3. मुक्तक काव्य- झंकार(1942); शतदल(1944); ताण्डव(1959); गंगातरंगावली(1974); मधुप-सप्तशती(1982); परिचय-शतक(1988)। 4. कथाकाव्य- त्रिवेणी(1945); त्रिकुशा(1958); द्वादशी(1979)। 5. संस्मरणात्मक आ आत्मकथात्मक काव्य- प्रेरणापुंज(1980)। 6. प्रशस्तिकाव्य- कोबर गीत(1945)। 7. अनुवादकाव्य- दुर्गासप्तशती, मैथिली-सुधा(1977)। दलित चेतना : एक परिचय धर्मसूत्र तथा दोसर ब्राह्मण पुस्तकमे ब्राह्मण, क्षत्रिय आओर वैश्यकेँ छोड़ि सभ श्रमजीवी जातिकेँ शूद्र घोषित कए देल गेल छल। महाभारतक अनुशासन पर्वमे कहल गेल अछि जे शूद्र मजदूर अछि। शूद्र नहि रहत तँ परिश्रमक काज के करत? नृसिंह पुराणमे कहल गेल अछि जे खेती-बारी शूद्रक काज थिक। ई निर्विवाद जे सबटा औद्योगिक उत्पादन करयवला लोककेँ भारतीय समाजमे हजारक हजार वर्षसँ शूद्र कहिकेँ दुर्दशाग्रस्त जीवन बितैबाक लेल बाध्य कएल गेल अछि। एहि स्थितिक विरोध अठारहवीं सदीसँ शुरु भेल जे अन्ततः बीसवीं सदीमे एकटा पैघ सामाजिक आन्दोलनमे परिवर्त्तित भए गेल। पंजाबसँ दक्षिण भारत धरि, पूर्वमे बंगालसँ महाराष्ट्र धरि जातीयता आओर वर्णव्यवस्थाक कारणेँ उत्पीड़ित समाजमे सामाजिक, राजनैतिक आओर सांस्कृतिक मुक्ति आन्दोलन होएब प्रारंभ भेल। एहि सामाजिक क्रांतिमे महाराष्ट्रमे ज्योतिबा फुले, केरलमे नारायण गुरु, तमिलनाडुमे रामास्वामी पेरियार, उत्तरप्रदेशमे झण्डुदास, बंगालमे चाँद गुरु ओ मध्यप्रदेशमे घासी दास आओर सम्पूर्ण राष्ट्रीय रुपमे बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकरक भूमिका एहि अर्थमे बहुत पैध छल जे ओ लोकनि समाजक उपेक्षित वर्गक मुक्ति आंदोलनकेँ तार्किक, वैचारिक आओर सैद्धांतिक आधार देलन्हि। भारतीय इतिहासक ई एकटा दुर्भाग्यपूर्ण पृष्ठ अछि जे लगभग तीन हजार वर्षसँ बेसी अवधि धरि शूद्र घोषित जनसमुदायकेँ अन्तहीन दासता आओर दुर्दशा भोगए पड़ल। एहिमे संदेह नहि जे भारतक जे संस्कृति ब्राह्मणधर्मक प्रभावसँ मुक्त छल ओ एहि दुर्दशासँ बचल रहल, उदाहरणस्वरुप शिल्पी समाजकेँ देखल जाए सकैछ। बौद्ध, जैन आओर लोकायतक जीवन दर्शनमे शूद्र व्यवस्थाक सबसँ तीखगर तार्किक विरोध बुद्ध कएने छलाह। संभवतः इएह कारण अछि जे आइ भारतक सवर्णेत्तर समाजमे सबसँ बेसी आदर बौद्ध धर्मकेँ देल जाइछ। बौद्ध विचारक समाजकेँ अंधविश्वाससँ बाहर निकालि तार्किक बौद्धिक संस्कृतिक विकास कएने छलाह। समाजक निम्न वर्गक आन्दोलनक इएह बुनियादी ताकत रहल अछि। अम्बेदकर प्रेरित दलित पैन्थर आन्दोलन मराठी कविता एवं कथासाहित्यमे सहसा एकटा चमत्कार आनि देने छल, जकर आबाज मैथिलीमे सेहो सुनल गेल। तकरे परिणाम थिक मधुप विरचित कथा काव्य ‘द्वादशी’क अन्तर्गत समाहित ‘घसल अठन्नी’, जकरा मध्य दलित चेतनाकेँ देखब हमर ध्येय अछि। घसल अठन्नीमे दलित चेतना घसल अठन्नी ‘मधुप’क सर्वाधिक प्रख्यात, सर्वाधिक प्रशंसित कथाकाव्य थिक। एहिमे दलित वर्गक एकटा विधवा स्त्री बुचनीक चित्रण कएल गेल अछि। ओ जेठक विकराल समयमे खेतमे बिनु जलखै-कलोक काज करबाक लेल विवश छल, अपन आ अपन बच्चाक जीवन रक्षार्थ। एहि काजक बदला ओकरा भेटतैक मात्र आठ आना। ओकर पति मरि गेल छैक। ओकरा एकटा छौ मासक नेना छैक। साँझमे ओकरा भुटकुन बाबू दिससँ बोनिमे भेटैत छैक अठन्नी, जे कोनो दोकानमे नहि चलैत छैक कियैकतँ ओ घसल छैक। बुचनी ओहि अठन्नी लएकेँ परेसान अछि आ ओ भुटकुन बाबू लग पहुँचि बदलि देबाक आग्रह करैत छैक। ताहि पर भुटकुन बाबू औरतक त्रियाचरित्रकेँ व्याख्यायित करैत उचित बोनि देलासँ अपन कुलमे दाग नहि लगोताह सन बात कहैत ओकरा पिटैत छथिन्ह आ एहि दुहू माय-बेटाक प्राणांत भए जाइत छैक। ई तँ भेल कविताक संक्षिप्तसार। द्वादशीक आमुखकक अनुसारेँ- ‘‘प्रस्तुत द्वादशी संकलन एहने करुणाक निर्झरिणी थिक जाहिमे अवगाहन कयलासँ करुणाक एहि आवरणमे क्रांतिक ज्वालामुखी पाठककेँ दृष्टिगोचर होयतनि। एहि संकलनमे 1940सँ 50 ई.क मध्य रचित 12 गोट करुण रसात्मक कथाकाव्य संकलित अछि। ई संकलन सामाजिक वैषम्य, शोषण ओ अत्याचारक जीवन्त चित्र समक्षमे उपस्थित करैत अछि।’’- आमुख, पृ.- ख उपरोक्त परिप्रेक्षमे आलेखक मूल उद्देश्य बुचनीक मुँहसँ निःसृत पाँति- ‘‘मालिक! हम कर्ज नहि छी मँगैत अथवा नहि अएलहुँ भीख हेतु उपजले बोनि टा देल जाए’’ सँ अछि। जाहि मध्य दलित चेतनाक अवगाहन होइत अछि। बुचनीक वाणीमे दृढ़ता छैक जे भुटकुन बाबूक अहंकार अत्याचरक समक्ष टूटि भनहि गेल अछि, मुदा झुकल नहि। बहुत रास आलोचकक कहब छन्हि जे मधुपजीक कविताक पात्र विद्रोहक स्वर मुखरित नहि कऽ परिस्थितिक आगू आत्मसमर्पण कए दैत छनि। मुदा एहि ठाम हम कहए चाहब जे एकाएक बिद्रोहक स्वर नहि उठैछ अर्थात् बिनु चेतनाक बिद्रोह कोना संभव भए सकैछ? स्वतंत्रतासँ पूर्व दलित वर्ग अपन हकक प्रति सावधान भए उचित मांग करब प्रारंभ कए देलनि सैह तँ भेल दलित चेतना। जेकि ‘घसल अठन्नी’क बुचनी अपन पारिश्रमिक मांगैत सिद्ध कए देलनि। एक हिसाबेँ बात बड्ड छोट छैक, अदौसँ सामर्थ्यवान असहायकेँ कष्ट पहुँचबैत आएल छथि, जनिका लग शक्ति छनि, ओ ओकर उपयोग निरीह पर करैत अएलाह अछि, मुदा ‘घसल अठन्नी’ अपन प्रकाशनक संग सभक ध्यान अपना दिस आकृष्ट करबाक हेतु वाध्य कएलक, जे एकर सबसँ पैघ उपलब्धि मानल जाए सकैछ। शक्तिशाली होथि वा शक्तिहीन, सभ केओ एहि दिशामे किछुओ काल अवश्य मनन कएलनि, जाहिसँ एहि साहित्यक उद्देश्य सोलहो आना सफलता प्राप्त कएलक, जे चिकड़ि-चिकड़ि ओहि साहित्यकारक गुणगान अदौसँ आइ धरि कए रहल अछि, एहिसँ बेसी एकटा साहित्यकारसँ एहि समाजकेँ अपेक्षा की? निष्कर्षतः कहल जा सकैत अछि जे समाजक दलित-पीड़ित वर्गक वेदनाकेँ मुखर करब, ओकरा समाजक सहानुभूति अर्जित करैब हिनक कथाकाव्यक उद्देश्य रहल अछि। हिनक कथाकाव्यक नायक दलित वर्गक प्रतिनिधित्व करैत अछि तथा खलनायक सामन्त वर्गक। शोषित वर्गक अमानुषिक अत्याचारक चक्कीमे दलित वर्गकेँ पिसाइत देखाएब एवं ओकरामे अपन हकक प्रति चेतनाकेँ जागृत करब हिनक ध्येय छन्हि। आशीष अनचिन्हार नियंत्रित पूँजी आ मधुपजीक मार्क्सवाद आधुनिक समयमे जतेक बेसी गंजन "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" नामधारी विचार सभहँक भेलै ततेक आन कोनो विचारक नै। आ ऐ गंजन लेल मात्र आ मात्र ओ तथाकथित "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" सभ जिम्मेदार छथि जे छद्म रूपें एकरा मात्र कैरियर वा फैशन लेल अपनेलथि। जँ उपरलिखित विचार सभहँक अर्थ पूछल जाए तँ वस्तुतः सभहँ अर्थ एकै आएत आ तकरा सरल शब्दमे एना कहि सकैत छी--"जे मनुख धन संचयक प्रवृति छोड़थि आ आनो लोकेँ ऐ लेल प्रोत्साहित करथि संगे-संग ओइ धनक उपयोग सामूहिक हितमे हो से "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" कहेता। आब ऐ प्रवृति लेल नास्तिक भेनाइ जरूरी छै की नै से कहब मोश्किल कारण बंगालक करोड़पति "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" सभ हरेक बर्ख धूमधामसँ दुर्गापूजा मनबै छथि। ओना प्राचीन कालमे वाममार्गी ओहन लोककेँ कहल जाइत छलै जे की संसारक प्रचलित परंपरासँ हटि कऽ काज करथि। मुदा ऐठाम हम ऐ सोचमे छी जे प्राचीन भारतक तंत्र-वाममार्गी आ आधुनिक भारतक राजनैतिक वाममार्गीमे की संबंध छै तँ हमर नजरि अनायासे "पंच-मकार" दिस चलि जाइत अछि आ अद्भुत साम्य भेटि जाइए। तँए हम "आधुनिक भारतक राजनैतिक वाममार्गी" सभकेँ साम्यवादी सेहो बुझैत छी। ओना कतबो ताकै छी तँ धन-संचयक प्रवृतिकेँ छोड़बाक आदति "आधुनिक भारतक राजनैतिक वाममार्गी" सभमे नै भेटैए। स्वतंत्रता समयमे जखन जमिंदारी प्रथा समाप्त भेलै आ जमिंदार सभ कांग्रेसक सदस्यता लऽ कऽ अप्रत्यक्ष रूपें अपन जमिंदारी बचेलक तेनाहिते किछु अति-महत्वाकंक्षी लोक सभ "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक चोंगा पहीरि कऽ सामजाक सभ क्षेत्रमे प्रवेश केलक। आ, "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" नामक ऐ विचारक सभहँ छद्म रूपसँ साहित्यकेँ सभसँ बेसी नोकसान भेलै। ओना हमरा ई स्वीकार करबामे कोनो हर्जा नै जे किछु लाभ सेहो भेलै मुदा ओकरा एना बुझू जेना कोनो लोक दस रूपैयाक उगाही लेल पचास रूपैया खर्चा करथि। 2 जँ नास्तिकताकेँ "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक तत्व बूझल जाए चार्वाक आ हुनक अनुयायी बड़का "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" निकलत। प्रस्तुत अछि हुनक किछु विलक्षण विचार— १) मानं त्वक्षजमेव हि' हिशब्दोऽत्र विशेषणार्थो वर्तते। विशेष: पुनश्चार्वाकैर्लोकयात्रानिर्वहणप्रवणं धूमाद्यनुमानमिष्यते क्वचन न पुन: स्वर्गादृष्टादिप्रसाधकमलौकिकमनुमानमिति।–षड्दर्शनसमुच्चय- पृ0 457 २) केचित्तु चार्वाकैकदेशीया आकाशं पंचमं भूतमभिमन्यमाना: पंचभूतात्मकं जगदिति निगदन्ति। षड्दर्शन समुच्चय- पृ0 450 ३) लोकसिद्धो भवेद् राजा परेशो नाऽपर: स्मृत:। देहस्य नाशो मुक्तिस्तु न ज्ञानान्मुक्तिरिष्यते॥ सर्वदर्शन संग्रह- पृ0 9 ४) अंगनाऽऽलिंगनाजन्यसुखमेव पुमर्थता। कण्टकादिव्यथाजन्यं दु:खं निरय उच्यते॥ सर्वदर्शन संग्रह- पृ0 9 जँ प्राचीन मतकेँ खंडन करब "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक तत्व बूझल जाए तखन तँ सभ उपनिषद्कार गीता संग हुनक अनुयायी बड़का "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" निकलत। कारण उपनिषद् सभमे कर्मकांडक ओ वेदक यज्ञकेँ विरोध भेल अछि। जँ समानताकेँ प्रतिपादित करब "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" थिक तखन याज्ञवल्क्यक विचार सर्वाधिक महान अछि। याज्ञवल्क्यस्मृतिक गृहस्थधर्मप्रकरणमे लिखल ई श्लोक देखू-- बालस्ववासिनीवृद्ध- गर्भिण्यातुरकन्यकाः । संभोज्यातिथिभृत्यांश् च दंपत्योः शेषभोजनम् ॥ यास्मृ१.१०५ ॥ मने बाल बच्चा बूढ़ ओ संगमे रहए बला लोक (नौकर-चाकर सहित), आतुर, गर्भिणी, कन्या अतिथिक आदि भोजन पहिने हेबाक चाही तकर बादे गृह मालिक अपने करथि। निश्चित रूपसँ नौकर चाकरकेँ ऐ सूचीमे आनि याज्ञवल्क्य अपन महानताक परिचय देने छथि। आ निश्चित रूपसँ आजुक "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील"सँ बेसी महान छथि। जँ दया ओ करुणा "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक लक्षण थिक तखन बौद्ध आ जैन धर्मक पालन करऽ बला सभ सेहो महान बड़का "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" छलाह ओ छथि। जँ अखिल विश्वक नारा देलासँ "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" बुझल जाए तखन वैदिक ऋषि सभहँक ओ ऋचा बेसी जोरगर अछि जैमे कहल गेलै जे-- वसुधैव कुटुम्बकम्। जँ वस्तुतः देखल जाए तँ संसारमे "नियंत्रित पूँजी" वा "नियंत्रित पूँजीवाद" केर बहुत महत्व छै। मने एहन पूँजीवाद जैमे शोषणक दर कम होइ ( जी ठीक पढ़लिऐ अपने "जैमे शोषणक दर कम होइ )। आब बहुत लोक एकरा काल्पनिक कहता मुदा वर्तमान समयमे स्वंय सोवियत रूसक विघटन आ चीनक आर्थिक प्रसार देखि ई निश्चित होइत अछि जे पूँजीवाद बहुत जरूरी छै। आब ई हमरा अहाँक हाथमे अछि जे ओकरा नियंत्रित करी वा अनियंत्रित छोड़ि दी। बहुत लोक एकरा एखनो काल्पनिक मानता। एकटा उदाहरण लिअ- "जँ सभहँक पेट भरि जाएत तँ ई संसार कतेक समय टिकतै। हमरा हिसाबें मात्र एक घंटा कारण सभहँक पेट भरले छै तखन एक दोसरक मोजर की? तँए हमरा हिसाबें जा धरि पेट खाली छै ता धरि लोक एक दोसरक गप्प मानऽ लेल मजबूर छै। हँ, कमसँ कम चारि घंटासँ बेसी पेट खाली नै हेबाक चाही आ ऐ लेल जै पूँजीवादक अवधारणा देलहुँ से भेल "नियंत्रित पूँजीवाद"। 3 साफ शब्दमे कही तँ मधुपजी भारतीय परंपराक मार्क्सवादी छथि। ई अलग गप्प जे ओ अपन साहित्यमे लाल झंडा कहियो नै उघला। मुदा की जेना सभ लोक जानै छथि जे साहित्यमे लाल झंडा उघनिहार छद्म मार्क्सवादी छला वा छथि। आब हम मधुपजीक किछु साहित्यक उदहारण दैत ई सिद्ध करब जे मधुपजी नियंत्रित पूँजीवादक समर्थक छला। मधुपजीक सर्वाधिक लोकप्रिय कविता थिक "घसल अठन्नी" एकर अंतिम भागमे पात्र बाजि उठैत अछि --- हम कर्ज न छी मँगैत अथवा नहि अएलहुँ भीख हेतु उपजले बोनि टा देल जाए हम थिकहुँ अहीं केर प्रजा पूत कै बेरि एलउँ टुटि गेल टाँग अन्नक मारल अछि हमर आँग.... सप्ष्टतः मधुपजीक विचार अछि जे सुप्पत उपजल बोनि देल जाए। आ इएह तँ नियंत्रित पूँजीवाद छै। हम फेर कहब जे आब ई हमरा अहाँक हाथमे अछि जे ओकरा नियंत्रित करी वा अनियंत्रित छोड़ि दी। तेनाहिते मधुपजी अपन आन दोसर प्रसिद्ध कविता "पीक" केर माध्यमें कहै छथि-- नहि पतन एक दिन ककर हैत ? पृथ्वीक कोरमे के न जैत ? तें सकल वस्तुमे एक भाव निश्चित रूपसँ ई साधारण भारतीय जन-मानस केर अभिव्यक्ति अछि मुदा एकर मूल "नियंत्रित पूँजी"मे नुकाएल छै। जैठाँ नियंत्रित पूँजी छै ताही ठाम सुव्यवस्थित ढ़ंगसँ उत्थान-पतन संभव छै। मधुपजीक बहुत रास कविता गीत हमर तथ्यक गवाही दैए मुदा ऐठाम सभकेँ राखब हमर अभीष्ट नै। कारण ऐ लेखकेँ हम मात्र प्रारंभिक मानै छी। की कारण छै आन आलोचक सभ मधुपजीकेँ प्रगतिशील तँ मानै छथि मुदा मार्क्सवादी नै जखन की मधुपजी आन कथित मार्क्सवादीसँ बेसी प्रमाणिक मार्क्सवादी छथि। हम ऐ लेखकेँ आर आगू बढ़ाएब आ ओत्तहि ई बुझना जाएत जे मैथिलीक आलोचक सभ कोना " कथित मार्क्सवादी" सभ मात्र पार्टी ज्वाइन करैत छल राजैनितिक ओ पुरस्कारक स्वार्थ लेल ऐ फेरमे मधुपजी सन सुच्चा मार्क्सवादी कोन कतिया गेला। 21 दिसम्बर 2014केँ गाम कोर्थुमे स्व. काशी कान्त मिश्र "मधुप"जीक प्रतिमा हुनक पत्नीक प्रतिमा संग स्थापित भेल। ऐ कार्यक्रमक विवरण एना अछि-- कविचूड़ामणि मधुपजी 27म बरखीपर हुनक गाम कोर्थुमे मधुप स्मृति मनाओल गेल अहि अवसर पर मधुप जीक स्मारकक स्थापना सेहो कएल गेल। राम जी ठाकुर दीप जरा कऽ कार्यक्रमक शुरुआत केलनि आ मंचक अध्यक्षता जीतेन्द्र नारायण झा " जीतू" आ संचालन डॉ जयप्रकाश चौधरी "जनक" जी केलनि। मुख्य अतिथि श्रीमती नीरजा रेनु, किशोर नाथ झा आ विशिष्ठ अतिथि चंद्रभानु सिंह आ बैजनाथ मिश्र "बैजू" छलाह। ऐ संगे आरो प्रबुद्ध लोक छला- शंभु नाथ मिश्र, सारदा सिंह, दिनेश चन्द्र झा, बैधनाथ झा, उमेश झा, कृष्ण कुमार झा, रामचंद्र झा शिवशंकर श्रीनिवास, चंद्रदेव झा, जटाशंकर मिश्र, रमन जी ठाकुर, प्रो. महेश झा, त्रिपुरारी ठाकुर, सुरेन्द्र झा, चंद्रकिशोर राय सरस जी, मदन झा, वरुण चौधरी, सरवन झा, सहयात्री जी, फूलचंद्र मिश्र"रमण", उदय चन्द्र झा "विनोद", मिथिलेश झा, सुमन सौरभ, उमानाथ झा ,कमल पाठक जी, चंद्रकिशोर झा, राघवेन्द्र चौधरी, आ राजीव मिश्र। प्रस्तुत अछि किछु फोटो (स्रोत- राजीव मिश्र, कोर्थु ग्रुप)— मेक इन मिथिला (व्यंग्य) मेक इन मिथिला भाग-१ बहु-धंधी, बहुभाषी, बहुमुखी, आदि कतौ नै पराजित होइत अछि कारण ऐ शब्दक आगुएमे "बहु" लागल छै आ मैथिल हरेक काजमे पाछू रहि "बहु"केँ आगू कऽ दैत छथि। आब अहाँ सभ खिसिआउ नै। उपरका शब्द सभ बहुप्रचलित अछि मैथिलीमे। लिअ प्रचलितमे सेहो "बहु" मिथिलाक सभ चीजमे "बहु" भेटत। बहुदेव-वाद सेहो। ई "बहु" विशुद्ध मिथिलाक बनल अछि आ तँए खाँटी मैथिल सभ लग बहुयात रूपें भेटत। विश्वक आन कोनो भागमे एहन "बहु" नै भेटत। मिथिलामे बहु देववाद बहुत दिनसँ अछि। बेटा लेल राना माइसँ कबुला तँ बेटी लेल चौरचन्ना। नाती लेल मंगल केर उपास तँ साँए लेल किछु। मने एक एकटा लोक लेल एक एकटा देवता। मैथिल चतुर होइ छथि हुनका बुझाइ छनि जे एकै देवतासँ सभहँक लेल मँगबै तँ कनी-कनी हिस्सा भेटत तँए अलग-अलग देवतासँ अलग-अलग कबुला। मुदा ई तँ सभ जनिते हएब जे बेसी बुधियार तीन ठाँ माँखै छै। ई मैथिल सभ देवताकेँ जते बेकूफ बुझै छथिन तते बेसी बेकूफ ओ अपने छथि। भाइ देवता सभहँक आपसी लड़ाइ संपादके सनक होइ छै। जेना संपादक सभ कोहि निकालै छथि जे ओकरासँ जे दोस्ती राखत तकरा अपन पत्रिकामे नै छपबै तेनाहिते देवता सभकेँ सेहो छै। शंकर देवताकेँ विष्णुसँ दुश्मनी। आब विष्णुसँ जे वरदान मँगलक से शंकर देवता लेल अछूत। लक्ष्मी आ सरस्वतीक सौतिया डाहसँ के नै परेशान भेल। .... करैत रहू बहुदेव पूजा। तँए देखैत हेबै जे मैथिलक कोनो कबुला फलदायी नै होइ छै। भाइ, सभ देवताकेँ अपनामे झगड़ा छै। किनकोसँ सटब तँ हुनका दुख हेतनि।तँइ मैथिल सभ गरीब बनि ऐ कातसँ ओइ कात छिछिआएल फिरै छथि। आ कतौ सुख नै भेटै छनि। बहुउद्येशीय सेहो खाँटी मैथिल अछि। हरेक मैथिल लग कमसँ कम 100 उद्येश्य रहैत छनि। मंचपर जेता दू शब्द लेल मुदा आँखि बेटीक बियाह लेल वरक संधानमे। मँगता मिथिला विकास केर नामपर आ बनै छै अपन दूमहला-तिमहला। एहन बहुउदेसी जे हाट बजार जाइ छथि तँ मोने मोन सोचै छथि जे माए-बहिनिकेँ बेचि कऽ कोन समान लेल जाए। बहुराष्ट्रियता। ई शब्दे अपना-आपमे मैथिलमय अछि। एकटा आँगन मने चारि टा राष्ट्र। आ चारू राष्ट्रमे मूँहा-फुल्ली।ऐ शब्दक आर उपयोग छै। पोथीमे दम होइ की नै मुदा पोथीक पाछू लेखक बहु राष्ट्रिय कम्पनीमे काज करै छै से सूचना जरूर भेटत। मने ऐ सूचनासँ पोथीक ओजन बढ़ि जाइत छै। बहुरंगी ऐ मिथिलाक ठेठ शब्द अछि आ भाव अनुरूप अछि। एकर सूत्र अछि "तोरा लग तोरा सन, मोरा लग मोरा सन"। आ ऐ सूत्रक बलपर वैदिक मिथिलासँ एखनुक मिथिला धरि चलि रहल अछि। ओना ऐ सूत्रक अपवाद सेहो अछि। मिथिलाक लोक पीठ पाछू छूरा घोपैत अछि घोपबबैत अछि। आ सभ "बहु"मेसँ ई "बहु" मैथिलक मूल अछि। आब एतेक बहुलता देखि कनछी नै काटऽ लागब। वर्तमान समयमे मिथिलामे एकटा नव "बहु" केर जन्म भेल अछि जकर पूरा नाम छै "बहु भाषी लेखक"। ई विशुद्धोमे विशुद्ध मिथिलाक अछि। जेना आइसँ 100 बर्ख पहिने बिकौआ सभ बहु वियाह करैत छल तेनाहिते आजुक लेखक सेहो बहु-भाषी लेखन करै छथि। जे जते भाषामे लीखि सकता तिनका ततेक सामर्थ्वान बूझल जाइत अछि। ओना सभकेँ बूझल छै जे बिकौआ सभहँक "बहु"केँ गामक लोक टेबै छलै मुदा "बहु भाषी लेखक" केर लेखनकेँ कियो नै टेबै छै। एक बातमे बिकौआ आ बहुभाषी लेखक एक अछि जे बिकौआ केर संतान अवैध होइत छलै आ बहु भाषी लेखक केर रचना वर्णसंकर होइत अछि। ऐ प्रकारक लेखक सभमे "बहु छपास" रोग सेहो भेटत। ई रोग संक्रामक होइत छै। देखा-देखी पसरै छै। जिनका ई बेमारी नै लागल तिनकर जीबन बेकार। किछु गोटे तँ एहन स्टेजपर पँहुचि जाइ छथि जाइ ठाम हुनका अपना छपासक बेमारी ठीक करबाक लेल हिन्दी अखबारक कोनटा पकड़ऽ पड़ै छनि। ओना सच पूछू तँ पूरा हिन्दी अखबारमे दू शब्द मैथिलीक ओहने लागै छै जेना पूरा सरदर पैन्ट आगूमे कनी फाटि गेल हो। मुदा नोचनी बेमारी होइ छै मुदा ओकरा नोचलापर आनंद भेटै छै तेनाहिते हिन्दी अखबारक कोनटा पकड़ब सेहो बेमारी छै मुदा ओ बेमार लोक ओहीमे आनंदित रहै छथि। की करबै बेमारीक अवस्थे सएह रहै छै। आ अंतमे बहु प्रचारित ......................................... अरे ई रोग तँ हमरोमे अछि। तँए कहै छी ने जे ई व्यंग बहु प्रचारित हएत। मेक इन मिथिला भाग-२ अपना महान मिथिलामे समर्थन खुलल भेटत। नामक साथ। नै जरूरति रहत तैयो भेटत, शुभकमाना आ बधाइ तँ ओकरा संग फ्रीमे छै। ओहो शुद्ध, आसटीक तारजूपर तौलल। मुदा एहन गप्प विरोध लेल नै छै। आन देशमे जँ समर्थन खुलल भेटत तँ विरोध सेहो। मुदा जा हे महान मिथिला------ अपन मिथिलामे विरोध मूँहपर नूआ धऽ कऽ होइत छै। ओका नूआ तँ जनानीक पहिचान थिक मुदा विरोधक कालमे मैथिलकेँ जनानीसँ कम नै बुझू। एकटाउदाहरण लिअ। एकटा फेसबुकिया क्रांतिवीर अपन विरोध केना व्यक्त करै छथि-- "ओकरा सनक लोक मिथिलामे बिहारक एजेंट छै आ मैथिलीमें हिन्दीक। अहाँ जेना 'बिहारी'कें जीयबै छियै, जेना हिन्दीकें जीयबै छियै, जे सभ बनाबटीअछि। कनेक दिन मिथिला-मैथिलीकें जीबिक' देखियौ। एहि सभ ढोंगसँ तत्काल भने किछु वाहवाही भेटि जाएत। मुदा ई समाधान नै छै। बिहार आबिहारीक पक्षमे फोकला तर्क नै चलत। कनेक तैयारी करू एहि विषयक" आब देखू ऐ भाषाकेँ। ई भाषा अपना आपमे दोगला भाषा अछि जे लिखनिहारक मानसिकताकेँ देखार कऽ रहल अछि। ऐ भाषामे केकरो नाम नै छै मने"तेसर पुरुष" के अवधारणा। आ मैथिल तँ ने मर्द होइत छथि ने माउग। ओ तँ बस तेसर "पुरुष" होइ छथि। ने चुप्पे रहता ने खुलि कऽ बजता। ई देखावटीक्रांतिक संग वास्तविक रूपमे खाली इंटरनेटपर भेटता। ई गुण मैथिलक अपन गुण छै। जँ विश्वक आन कोनो ठाम ई गुण भेटऽ तँ बुझू जे ई मिथिलेसँ एक्सपोर्ट कएल गेल छै। फर्क (व्यंग्य निबंध) 1 दूटा कुक्कुर लड़ैत रहै। बड़ लड़लै। खूने-खुनाम। दूनूक भुकनाइसँ टोला-पड़ोसा परेसान। बहुतों लाठी लऽ कऽ दौड़ल। दूनू कुक्कुर हटि गेल आ कनेदेरमे फेर लड़ाइ शुरु कऽ देलक। फेर वएह रंग फेर वएह ताल। ता ओम्हरसँ तेसर कुक्कुर एलै आ हालति बुझि पहिलुक दूनू कुक्कुरकेँ कहलकै--- "एना जे लड़ै छह तँए तँ कुक्कुर छह" एते सुनिते पहिलुक दूनू कुक्कुर पुछलकै-- "तखन तों आदमी किए नै छह?" 2 हमरा इंटरनेटपर बड़ मोन लागैए। सभ किछु नेटेपर। कहियो काल क बियाहक बात चलैए तँ मोन होइए जे इंटरनेटेपर बियाह कऽ ली। एक दिनएनाहिते हम दूनू आँखि समधानि नेटपर लागल रही की ओम्हरसँ भ्राता श्री पुछला की करै छही? हम कहिलिअन्हि किछु नै बस कने इंटरनेटपर कुश्ती लड़ै छिऐ। भ्राता श्री खिसिआ कऽ कहला जे लोक अखाड़ामे कुश्ती लड़ै छै आ तों इंटरनेटपर.... हम कने कम जोरसँ कहलिअन्हि जे हमहूँ तँ कगजिये पहलवान छी ने ---- 3 एकटा छला मनभौक महराज। सदिखन बाप बलें फौदारी करऽ बला। लोकक रचनापर हँसब, दूसब आ खाली अपने बापकेँ सर्वश्रेष्ठ मानब हुनक हिस्सक छलनि। हुनकर धारणा छलनि जे आलोचना करब हमर सभहँक परम कर्तव्य अछि। नित रचि-रचि कऽ अपन बापक प्रतिद्वंदी सभहँक आलोचना करथि। ओ बेर-बेर कहल करथि--- "आलोचनासँ रचना स्वस्थ होइत छै। गलती सुधरै छै..आदि-आदि" एक दिन एहन भेलै जे एकटा आर महान आलोचकक पदार्पण भेलै आ हुनकर बापक आलोचना होमए लागल। आब ओ नित कटकटाथि। खौंझाथि। भूकथि ... आ अंतमे ओ बेर-बेर कहऽ लगला-- "लेखककें अपन रचना संतान सन प्रिय होइत छैक। संतानक निन्दा माय-बापकें कनियों नै सोहाइ छै। तँइ ककरो बच्चाकें दूसब उचित नै। दुसबाक बदला साहित्यिक रचना रूपी संतानकें अधिकाधिक नीक बनेबाक सुझाव आ सहयोग कएल जेबाक चाही" 4 आइ-काल्हि साहित्यकारो सभकेँ आगू-पाछू लटकनमा चाही। कियो प्रगतिशील छथि तँ कियो जन चतनासँ भरल तँ कियो ............ मतलब साहित्यकार बादमे बनता मुदा लटकनमा पहिने चाही। आ जँ कोनो काजसँ हिनकर नामक आगू ई लटकनमा नै लगाउ तँ खिसिया कऽ फुच्च। आ ठीक ओहने मुद्रामे आबि जेता जेना कुक्कुर सभकेँ कुक्कुर कहलापर काटऽ लेल दोड़ै छै आ "डागी" कहलापर चाटऽ लागै छै।किछु साहित्यकारक संस्कार ओहने तेज भऽ जाइत छनि जेना "पैखाना" कहलासँ भाषा महकि जाइत छै आ "पोटी" कहलासँ हुनक जीह संस्कारित। व्यंग निबंध- लिटरेचर फेस्टीभल हिन्दु धर्म पाबनि प्रिय अछि। आ ई कोनो नव तथ्य नै अछि। मिथिला तँ हिंदु धर्मक गढ़ मने पाबनिक गढ़। पाबनि बहुत तरहँक होइत छै पारवारिक, समाजिक,धार्मिक, आफिसियल..................। आ ऐ भेद उपभेदक हिसाबें एकर उद्येश्य सेहो भिन्न प्रकारक होइत अछि। आन विकसित चीज जकाँ पाबनिमे सेहो नव प्रारुप जुड़ैत-हटैत रहल अछि। हेमनिमे पाबनिक नाम भिन्न रूपें सेहो आएल अछि आ लोक एकरा फेस्टीभल कहए लागल अछि। ऐ फेस्टीभल शब्दक बड़का विशेषता अछि जकरा पाछू ई लागि जाइत छै तकरा उद्धार कऽ दैत छै आ ऐ फेस्टीभल शब्दसँ आन जीच जते उद्धार भेल हो मुदा अपना मैथिलीमे "लिटरेचर" बड़ उद्धार भेलै। की कहलियै उद्धार भेलै? उद्धार तँ ओकर होइ छै जे पतित भऽ जाइत छै, नीच भऽ जाइत छै। तँ की मैथिली साहित्य..................। हँ सरकार ठीक बुझलियै अपने मैथिली साहित्य.................। आ नहुँ-नहुँ आब उद्धार भऽ रहल छै। ओना फेस्टीभल केर संग-संग आन बहुत रास चीजसँ उद्धार होइए। उदाहरण लेल पूरा जनममे जकर एकटा पोथी छपै छै तकरा अकादेमी पुरस्कार मने एकपोथिया साहित्यकारक उद्धार। जे कहियो मैथिली साहित्य केर मूँह नै देखलक से जूरी बनि जाइए मने जूरीक उद्धार। जे कहियो सर्च नै कऽ सकल तकर "रिसर्च" छपैए मने रिसर्चक संग गाइडक उद्धार। आ जिनका कोनो परि नै लगैए से कुरता पैजामापर बंडी पहीरि कविता पाठ करऽ पहुँचि जाइत अछि मने कविता संगे कुरता-पैजामा-बंडीक उद्धार।। जे कहियो मैथिली साहित्य केर मूँह नै देखलक से जूरी बनि जाइए मने जूरीक उद्धार। जे कहियो सर्च नै कऽ सकल तकर "रिसर्च" छपैए मने रिसर्चक संग गाइडक उद्धार। आ जिनका कोनो परि नै लगैए से कुरता पैजामापर बंडी पहीरि कविता पाठ करऽ पहुँचि जाइत अछि मने कविता संगे कुरता-पैजामा-बंडीक उद्धार। उद्धार आरो तरीकासँ होइत छै। ससुर अपन जामएक चेलाकेँ बजबै छथि तँ जमाए अपन ससुरक चेलाकेँ। मने ससुर-जमाएक संगे चेलाक उद्धार। बड़ महीन तरीका छै। सभ अपन-अपन गुट बना अध्यक्ष बनबाक फिराकमे। ओना गौर कऽ कऽ देखि लिअ जे जकर बेटी कुमारि छै वा जकरा खाली बेटिए छै से बेसी गुट बनेबाक फिराकमे रहै छै कारण ओकरा दहेज-मुक्त वियाह करेबाक छै। ई हमर अपन रिसर्च अछि गौरसँ देखि लिअ चारू कात। जकरा माथपर बेटा छै से कम गुट बनबै छै। आ एकर परिणाम जे गुट संगे बेटीक उद्धार। उद्धारे-उद्धार। ऐ उद्धार प्रकरणकेँ देखैत किछु गोटा उद्धारक कोचिंग सेन्टर खोलि लेला आ क्रैश कोर्सक आफर दऽ रहल छथि। किछु सेन्टर किश्तीपर उद्धार करबा रहल छथि। मने कैरियरक संगे समाज सेवाक सेहो उद्धार। ओना हम बहकि गेल छलहुँ हमरा फेस्टीभल द्वारा जे लिटरेचरक उद्धार होइ छै तैपर कहबाक छल। तऽ आब कहै छी। लिटरेचर फेस्टीभल ओहने लोक करबा सकैए जे अपना-आपकेँ अकादमी पुरस्कारक मजगूत दावेदार मानैत होथि मुदा हुनक दावेदारी हरेक बेर पाछू घुसकि जाइत अछि। ओना हमर कथनक जाँच आमंत्रण पत्रसँ सेहो कएल जा सकैए। आमंत्रण पत्रमे ओहने साहित्यकारक नाम भेटत जे अपने नाङरि रहितो ओइ आयोजन कर्ताक सोंगर बनि जाइत छथि। ओना गौर करबै तँ पता चलत जे असली बेरमे ई सोंगर सभ लाइन तोड़ि अकादमी लग पहिने पहुँचि जाइत छथि । आ आयोजकक हाथमे कठरी बाबाजीक ठुल्लू बचि जाइत छनि। खैर आगू बढ़ी। आयोजनक प्रारूप एहने होइत छै जे हम तोरा देबौ तों हमरा दे आ मामिला फिफ्टी-फिफ्टीपर निपटि जाइत छै। आ ई 50-50 सभ ठाम लागू होइत छै। ऐ बेर तों अकादमीक जूरी छह तँ हमरा दे आ अगिला बेर हम सकादमीक जूरी रहबौ तँ तोरा देबौ। जेना खेती आब बटैयापर होइत छै तेनाहिते साहित्योमे बटैया लागल छै...। हालेमे अकदमीमे पुरस्कार लेल एहन पोथीकेँ आमंत्रित कएल गेलै जकरापर आरोप छै जे ओ दोसरसँ लिखबाओल गेल छै मने पाइ दऽ कऽ..। जे किछु हो फेस्टीभलसँ जेबीक उद्धार सेहो होइत छै। आब ई नै पूछब जे कोना? ईहो नै कहब जे घाटे होइ छै। सरकार ई तँ बिजनेस छिऐ लाभ आ नोकसान तँ होइते रहतै। ऐ फेस्टीभलमे घाटा तँ ओइमे नफा। ई सभ चलिते रहै छै। जेना मोबाइल कम्पनी सभहँक हिडेन चार्ज रहै छै तेनाहिते फेस्टीभल आयोजक सभहँक हिडेन लाभ छै। किनको बेटा तँ किनको बेटीक बियाह भऽ जाइत छनि। किनको बच्चाक एडमीशन तँ किनको कनियाकेँ नौकरी। ई सभ हिडेन लाभ छै। दहेजमे 10लाख दबऽ पड़तनि आ ऐ आयोजनक मार्फत 8 लाखमे भऽ गेलै आ तै लेल जँ 50 हजार घाटे भेलै तँ कोन दिक्कत। 1.50 लाख रुपैया तैयो नफा छै। हिडेन लाभ जकाँ हिडेन एजेंडा सेहो रहैत छै। परुका बेर हम पत्ता गोल केने छल आब तँ हमरे हाथमे आयोजन अछि, हमहूँ गोल कऽ देबै एकरा। किनको एजेंडा छनि जे ऐ ग्रुपमे हमरा मोजर नै अछि तँए ओइ ग्रुपमे चलि जाइ। ऐ लिट.फेस्टमे बड़का बड़का नमूना सभ व्याख्यान दै छथि। एकटा महान लोक जे खाली फतवा देबऽमे बहादुर छथि ओ अपन जन्मसँ पहिनेसँ घोषैत आबि रहल छथि जे --"आब मैथिली मरि जाएत.."--"आब मैथिली मरि जाएत.."--"आब मैथिली मरि जाएत.."। से ऐ लिट.फेस्टमे बजला जे --"आब मैथिली नै मरत.."। ओना ई नुकाएल नै छै जे मंच भेटलापर लोक सापेक्षी कोना होइत छै। ओना दुनियाँमे बदमाशक कमी नै छै। फेसबुकपर एकटा बदमाश लिखलकै छै आब अमुक स्थानपर सेहो फेस्टी हेबाक चाही की उपरोक्त फतवा देनिहारक फतवा आबि गेल जे---"एक दिस मैथिली मरबा लेल अछि, आ दोसर दिस महोत्सव पर महोत्सव।" तकर बाद ओ बदमाश हुनकासँ पूछि बैसल जे --" अपने जखन ओइ फेस्टीमे रहिऐ तखन मैथिली जिंदा छलै की? फतवा देनिहारक गोल छला..... । आ एहने-एहने व्याख्यान सभहँक संग लिट.फेस्ट खत्म भऽ जाइत अछि मुदा जेना बाढ़ि गेलाक बाद कादो, गंध आ नष्टप्राय जीवनकेँ आगू बढ़ेबामे लागि जाइए तेनाहिते ऐ बेरुक चुकल आगिला बेर शामिल हेबाक चक्करमे लागि जाइत छथि आ जनिका ऐ बेर हाथ लगलनि सेहो अगिला बेर कंटीन्यू करबाक जोगाड़मे लागि जाइत छथि। मुदा फेस्टीभलक ऐ भागम-भगमे लिटरेचर हरेक बेर थकुचाइत रहल अछि। व्यंग निबंध- “प्र.म” जेना जीव-जंतुक अनेक योनि होइत छै। तेनाहिते मंत्री-संत्रीक सेहो अनेक योनि होइत छै। मनुख सेहो जन्म आ मरणक चक्रमे फँसैत अछि तँ मंत्री सभज्वाइन आ रिजाइन केर चक्रमे। जेना मनुखक बहुत रास नाम होइत छै तेनाहिते मंत्रीक सेहो बहुत्ते नाम होइत छै। किछु नाम काजक अधारपर होइत छै तँकिछु शारीरिक लक्षणपर तँ किछु नाम किछुपर। प्राचीन कालमे जेना-जेना संस्कृत पसरैत गेल तेनाहिते-तेनाहिते ओकरा सम्हारब कठिन भऽ गेल। ठीक तेहनेहालति मंत्री-संत्रीक नामावलीक भऽ गेल अछि। प्राचीन कालमे पाणिनी सूत्र रूपमे संस्कृतकेँ बान्हि देला तेनहिते आधुनकि कालमे हम अपनाकेँ नव पाणिनी मानि आइ-काल्हि मंत्री-संत्रीक नामावली प्रस्तुतकेलहुँ। आब चूँकि एखनुक समयमे केकरो लग फुरसति नै छै जे ओ सूत्रक टीका-भाष्य करत। तँए ऐठाम हम अपने टीका ओ भाष्य प्रस्तुत कऽ रहल छी(ओना सूत्र भाष्यमे बहुत रास केटेगरी छूटि जाएत जेना प्रमेह मंत्री, प्रसिद्ध मंत्री, प्रबंध मंत्री आदि तँइ आब हम अति महत्वपूर्ण नामावली सभहँक दर्शनकराबी....) --- 1) दिनक गरीब आ रातुक धनिक जकर असीमित प्रवचनसँ तृप्त होइत छथि, अथवा खाली पेट जकर परम पवित्र शब्द, धातु, अलंकार आदिसँ भरि जाएअथवा, जकर मूँहक शब्देसँ सभ समस्याक समाधान भऽ जाए से प्रवचन मंत्री भेल। 2) जे लोक समाजक नामपर अपन ओ अपन गोंतिया आदिक विकास करए, अथवा जकर शासन कालमे समाजक विकास ओ प्रगति रुकि जाए अथवादुराचारी सभहँक प्रगति हुअए से प्रगति मंत्री छथि। 3) ओहन लोक जे अपन प्रतिमा मू्र्तिकेँ बाग-बगैचा, चौराहा, आदिपर लगाबथि। अथवा, ओहन लोक जे समाजक विकासकेँ नकारि प्रतिमा आदिक निर्माणपरव्यय करए से प्रतिमा मंत्री भेल। 4) प्रति शब्दसँ सजल आन शब्दक मालिक सेहो मंत्रीक काबिल होइत छथि जेना जे लोक छाँह जकाँ मुख्यमंत्री पदक मर्यादा तेयागि कोनो युवा लड़कीक छाँहजकाँ जासूसी कराबथि से प्रतिछाया मंत्री छथि। जे लोक सदिखन प्रतिवादे टा कऽ अपन वा अपन लोकक विकास करथि से प्रतिवाद मंत्री छथि, प्रतिरोधमंत्री सेहो कहि सकै छिऐ कहबाक लेल प्रतिक्रिया मंत्री सेहो कहि सकै छिऐ। जे लोक खाली प्रतिशोध लेल बैसल रहथि से प्रतिशोध मंत्री छथि, अथवापहिलुक सोधल पद ओ खजानाकेँ फेरसँ सोधि लेथि से प्रतिशोध मंत्री छथि। ऐ खंडमे बहुत रास संभावना छै जेना प्रतिदेह मंत्री, प्रतिदान मंत्री, प्रतिदिन मंत्री,प्रतिरास मंत्री आदि-आदि। ऐठाम सभहँक भाष्य संभव नै। ओना ऐ खंडक सभसँ शक्तिशाली "प्रतिफल मंत्री" छथि। भोटक रिज्लटक बाद जनताकेँ सेहो आसत्ता-विपक्षीकेँ सेहो सभकेँ अपन-अपन कर्मक प्रतिफल भेटि जाइत छै। कियो ऐ मंत्रीक प्रकोपसँ बचि नै पाबैए आ जे बचि जाइए तकरा लेल तँ भगवान 5बर्ख देने छथिन। ऐ खंडमे प्रतिबिंब नामक मंत्री पद सेहो महत्वपूर्ण अछि। जे लोक चुनावसँ पहिने आ चुनावक बाद बिंब निर्धारणमे निपुण छथि से ऐ मंत्रीपदक अधिकारी छथि। 6) जे लोक विदेश भ्रमण कऽ खाली प्रपोज करथि आ देशकेँ रिज्लट सुन्ना भेटै से प्रपोज मंत्री बनि सकै छथि। एकरा प्रस्ताव मंत्री कहि कऽ भारतीयकरणकऽ सकै छी। 7) लोक सभा ओ विधान सभामे जे उत्तर देबाक बदला जे जनतासँ प्रश्न पूछथि आ जनताक मूँह बंध कऽ देथि से प्रश्न मंत्री छथि। 8) जे लोक जनताक बीच योजना सभहँक लाभ प्रसाद रूपें बाँटि सकथि आ अंतमे अपने ओकर पूर्ण भोग करथि से प्रसाद मंत्री छथि। 9) जे खाली प्रथम-प्रथम मने इतिहासमे अपना-आपकेँ पहिल घोषित करऽ से प्रथम मंत्री बनि सकैए। ओना ऐ मंत्री पद लेल कम्पीटीशन बहुत कड़गर छै आऐ लेल बहुत रास कोंचिग सेन्टर सेहो खुलल छै। बहुत रास लोक ऐमे सफल होइए मुदा जे पहिनेसँ साहित्यकार अछि से ऐ मंत्री पदककेँ एकै बेरक परीक्षामेपाबि लैए। तँइ सभ क्षेत्रक अलावे साहित्यमे ऐ मंत्री पदक बहुत डिमांड छै। एकटा खिस्सा लिअ-- एकटा गाम रहै जैमे सभ साहित्यकारे रहै। मर्दसँ जनानी धरि सभसाहित्यकार। बच्चासँ बुढ़बा धरि सभ कियो साहित्यकार। ओइ गाममे सभ कम्पीटीशन लेल मरै। ओइ गाममे कियो कोनो कहियो 3 बजे भोरसँ पहिने दिसामैदान नै गेल रहै... बस एकटा बुढ़बा चारि दिन उपास कऽ कऽ पाँचम दिन भुज्जा फाँकि लेलक। आ दू बजे लोटा लऽ कऽ विदा भऽ गेल। भोरे-भोर सौंसेहल्ला भऽ गेलै जे ऐ गामक इतिहासमे फल्लाँ महाकवि पहिल बेर दू बजे दिसा-मैदान गेला। हाले-फिलहालमे एकटा संगोष्ठी भेल जकरा कहल गेल जे मैथिलीक इतिहासमे पहिल बेर "सेब संगोष्ठी" भेल अछि। हुनके मोताबिक ऐ संगोष्ठीमे भाग लेनिहारसभ प्रतिभागी कहियो सेब नै देखने रहथिन। सभकेँ सेब देखाओल गेलै। बताएल गेलै जे सेबपर छूरी कोना चलाओल जाइत छै। कोना फाँक काँटल जाइतछै। फेर हुनके मोताबिक प्रतिभागी लोकनि पहिल-पहिल बेर सेब खेलथि। एहन- एहन बहुत उदाहरण अछि। एकटा लोकक ई बेमारी तँ बहुत उपर चलि गेलछनि। हुनका इंटरनेटपर पहिल हेबाक बेमारी छनि। आँखिक सोंझा देल सभ सबूतकेँ ओ इग्नोर कऽ दै छथि। हुनका मोताबिक ओइ समयमे हम ई नै देखनेरहिऐ तँए ई पहिल नै हएत। आब हुनका के कहतनि जे सरकार ई अहाँक आँखि आ दिमागक कमजोरी अछि। अस्तु किछु गोटेक ईहो दाबी करै छथि जेराजकमल चौधरीकेँ पहिले-पहिल हमहीं दारू पिएलियै। कियो ईहो कहै छथि जे प्रो. हरिमोहन झाकेँ पहिले-पहिल हमहीं पेशाब करैत देखलिऐ आ तखने पहिलबेर कहिलिऐ जे ई बच्चा आगू बढ़त। ई पहिल हेबाक चक्करे तेहन छै जे एकटा बालक 2009मे बनाएल ब्लागकेँ डी-एक्टिभेट कऽ कऽ घोषणा केला जे हम2007मे ब्लाग बनेने रही। औ महराज जँ बनेने रही तँ कमसँ कम लोककेँ देखबाक लेल लिंक तँ छोड़ि दितिऐ ने। कतेक कहू ओना टटका-टटकी एखनेपता चलल अछि जे एकटा युवा साहित्यकार घोषणा केला अछि जे मैथिली साहित्यमे पहिले-पहिल हमहीं अंडा देलिऐ। हेबाक लेल तँ आरो भऽ सकै छथि मुदा जे ऐ सभहँक जे प्रधान होथि से................. ईहो लिखनाइ जरूरी छै की? डॉ. अजीत मिश्र अर्पण-तर्पण-समर्पण कविचूड़ामणि काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’क “हम जेबै कुसेस्सर भोर, रंगि कै ठोर, पहिरि कै काड़ा, झनकाय झनाझन छाड़ा”सन-सन कतेको मनोरम पद मिथिलाक रग-रगमे बसल अछि, बसल अछि हुनक नाना नाम साहित्य, बसल अछि जनिक मनमोहक काया-छाया मैथिल जन-जनकेर हृदयमे- ओहि पुण्यात्माकेँ शत-शत नमन करैत सादर समर्पित ई शब्द-पुष्प... प ण्डित केर जे पण्डित बनि-बनि, कएल मैथिली श्रृङ्गार, का मना जनिकर सदा, मैथिलीक हो जय-जयकार। शी तलता जे पसारल सबतरि, मधुपक कएल झंकार, का रीगर तँ रहथि तेहन जे, साधल साहित्य भरमार। न् यासी बनि जे ललित गीतकेर, बनि गेला कण्ठहार, त एँ तँ आइओ पूजित छथि ओ, सभ घरकेर चिनबार। मि सरीसन राधा-विरह, मधुप सप्तशती आ द्वादशी पचमेर, श्र द्धा भाव जनिका प्रति सबतरि, झंकार टटका जिलेबीकेर। म ङ्गल गीत सुनाओल जखने, श्रोता तखने धएल पछोड़, धु नी रमाकेँ साधल धुन जे, सभहिँ जना भेला चकबिदोर। प टु छलाहे अपन कलामे, कएलनि एहन सुन्दर सङ्गोर, जी वन सदा साहित्य समर्पित, सदा माँ मैथिलीकेर कोर। केँ ड़ा बनि गेल जनिक रचनासभ, रचल साहित्य पूरजोर। श ब्द जनिक घर कएलक जन-जन, मोहि लेलक छुतहर, त गमा जनिका चाही ने कोनो, छथि मात्र मैथिल खेतहर। श ब्द-शब्दमे मैथिली सिरजथि, मात्र बोल बम हर-हर, त रा-उपरी जनिक रचनासभ, तेँ तँ सजथि ओ घर-घर। न ख-शिख रूप सिरजल जे मैथिली, कएलनि चहुदिस चमत्कार। म करन्द जकर चहुदिस पसरल अछि, छिड़िआएल सौसेँ कचनार। न मन करी ओहि पुण्य धराकेँ, जतए मधुपकेर सबतरि झंकार।। नोट : रेखाङ्कित शब्द हुनक अमूल्य रचना आ साहित्यिक-कृति थिक, तँ ‘केँड़ा’ (plumb-rule of mason)कहल जाइत छैक साहुलमे लागल काठीकेँ। फागुलाल साहु मानव जीवनमे नारी स्वरूपक गरिमा ई हमर माइयक सानिध्यक बात छी। हे माइ अहाँक सानिध्य पाबि हम जानि सकलौं जे नारी व्रह्मविद्या छी। श्रधा छी। कला, ममता, शान्ति, दया संगे पवित्रता सेहो छी। अहाँ सभटा छी जे संसारमे सर्वश्रेष्ठक दृष्टिगोचर होइत अछि। एतबे नै नारी कामधेनु अनुर्पर्णा सिद्धी-रिद्धी सेहो छी। नारी मानव प्राणीक समस्त अभाव कष्ट आ संकटसँ बाहर रखैक समयानुसार अपन स्वरूप बदलि-बदलि कऽ निष्ठापूर्वक सामर्थ्यवाण होइत अछि। जौं हुनक श्रद्धा-शक्ति आ क्षमताकेँ चिन्हल जाए, मानल जाए तँ समस्त विश्व भरिक कण-कणमे स्वर्गीय स्वरूप बहाल कऽ सकैत छथि। माए अहाँक सिनेह पाबि कऽ हमरा ई बोध भेल जे नारी सनातन शक्ति छी। आदिकालसँ समाजिक दायित्वकेँ अपन कान्हपर उठौने आबि रहली अछि। जौं ई भार पुरुखक कन्हापर दऽ देल रहैत तँ कहिया ने डगमगा गेल रहैत। किन्तु विशाल भवनक नीब जकाँ ओतबे कर्तव्यनिष्ठ मनोयोग, संतोष, संगमकेँ प्रसन्नतापूर्वक अखनो घर चलबैत चलि आबि रहली अछि। ई तँ मानवीय मूलक साकार प्रतिमा छी। हे जगत जननी अहाँक कृपासँ हम निम्न ऋृषि वाणीकेँ अन्त:करणमे बसौने रहै छी। कहल गेल अछि- विद्या समस्तातव देवी भेदा:। स्त्रिया: समस्ता सकला जगत्स।। त्वयैकया पूरितमम्बएतत् काते। स्तुति: स्तब्यपरा परोक्त्िा।। हे देवी समस्त संसारक सभ विद्या अहींसँ निकलल अछि। सभ स्त्री अहींक स्वरूप छी। समस्त विश्व एक अहींसँ पुरित अछि। अहाँक स्तुती कोन रूपे कएल जाए, अन्त:करणमे ऐ भावक घनीभूत अनुभूतिसँ प्रेरित भऽ हम सभ अहाँक सन्तान...। नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गति:। नास्ति मातृसमा त्राणं: नास्ति मातृसमा प्रिया। माएक समान कोनो छाया नै अछि। माएक समान कोनो सहारा नै अछि। माएक सदृश कोनो रक्षक नै अछि। माएक सदृश कोनो प्रिय वस्तु नस्तु सहारा नै अछि। माएक समान ै अछि। सृष्टिक रचना आ ओकर पालन सेहो अहाँक कार्य रहल अछि। सन्तानो निर्माणमे माएक जे भूमिका रहैत रहल से पितासँ हजारो गुणा अधिक होइत देखल जाइत अछि। देवी अशिज पुत्र कादिवानकेँ अपना संरक्षण सान्धियमे रखि कऽ शिक्षा देलखिन। हुनका विद्वान बनेबाक अतिरिक्तो योग्य विद्यामे प्रकाण्ड विद्वता सेहो हाँसिल भेल। मर्मज्ञ ऋृषि पंचशिख विषयपर अनेको गंथ लिखलनि तइमे स्वयं स्वीकार केने छथि जे ई ज्ञान माइ सुलभासँ भेटल अछि। वनवासी शकुन्तला अपन पुत्र भरत जिनका नाओंपर ऐ देशक नाअों भारतवर्ष पड़ल अछि। हुनक पालन-पाेषण संगे प्रक्रमी बनेबाक श्रेय माएक अविरल अछि। भरत माइक सिनेह पाबि बचपनेसँ शेरक बच्चाक संग खेलैमे मस्त रहल। निष्ठा आ लगनक प्रतिक ध्रुवक पालन-पोषण हुनक माइ सुनीति तपश्वनी वनमे रहि कऽ केने छेली। अपन शिक्षण द्वारा संस्कारित कऽ बचपनेमे जीवनक रहस्यक बोध करा देलखिहिन। तइसँ ध्रुव प्रमात्माक अनुभूितकेँ साक्षात् दिग्दर्शन प्राप्त कऽ लेला। सत्यनिष्ठ सीता वनवासिनी अपन जीवनोपरान्त सातित्वक व्रर्त धारण करैत पतिव्रताक निर्वाहण करैत अभावग्रस्त स्थितिमे रहितो लव-कुशक पालन-पोषण वालमिकी आश्रम रहि केलनि आ लव-कुशकेँ एहेन योग्य सामर्थ पुरुषार्थ बनौलनि जे अजय हनुमान, तथा लक्ष्मण जैसन वीर महापुरुषकेँ लव-कुशक सोझहामे पराजित हुअ पड़लनि। ज्ञान विज्ञान आ आध्यात्मिक प्रतिभावक क्षेत्रमे देखल गेल कि ढेर रास उदाहरणक पात्र सोझामे आबि जाइए। जेना महर्षि पुलोत्माक पुत्री शची, महर्षि वशिष्ठक आश्रममे रहि कऽ ज्ञान-विज्ञानक प्रवीणता हाँसिल केने छेली। शचीकेँ साधनाक प्रतिभासँ प्रभावित भऽ कऽ देवराज इन्द्र हुनका मंगबैले पुलोत्माक दुआरपर स्वयं पहुँचला। तथा शची इन्द्रानी भऽ इन्द्रपुरीक मर्यादाकेँ बढ़ौलखिन। मनु एकबेर बजपेय यज्ञ केला। तँ कोनो योग्य पुरोहित नै मिल सकलनि। तखनि मनु अपन पुत्री इलाकेँ योग्य समझि यज्ञाचार्य नियुक्त केलनि आ अनुष्ठान सम्पन्न करौल गेल। इला अपन पिताक मर्यादाकेँ आगू बढ़ौलनि। आदि शंकराचार्य आ मण्डन मिश्रक शास्त्रार्थमे धर्मपत्नी भारती अपन विद्वतासँ प्रभावित करि कऽ सरस्वतीक उपमा प्राप्त कऽ चुकल छथि। तथा पति मण्डन मिश्रक विजयी हेबाक गौरव प्राप्त करा चुकल छथि। भारतक प्रसिद्ध जोतिष विद्वन भास्कराचार्य दुआरा रचित सिद्धान्त सिरोमणि पुस्तकेँ उत्तार्ध हुनक लड़की लिला दुआरा लिखल गेल छल। लिला अपन पिताक मर्यादाकेँ बढ़बैमे सदिखन तत्पर रहैत छेली। महराजा जनकक दरबारमे महाविदुषी गांग्रीकेँ आ महर्षि याज्ञवल्यकायक शास्त्रार्थ प्रसिद्ध अछि। ओही शास्तार्थमे याज्ञवक्कयकेँ गार्गीक पण्डित आ वैदुष्यकेँ लोहा मानए पड़ल अछि। एहेन बहुतो समतुल्य नारी छथि जेना उदलिंका, विध्यगाथा, अनुसुइया, गौतमीयमी, विहुला आदि अनेक विदुषीगण प्रख्यात अछि। ज्ञान, विज्ञानक क्षेत्रमे विश्वक अतिरिक्त शौर्य, साहस एवं पराक्रमीमे भारतीय नारीकेँ बढ़ल-चढ़ल देखल गेल अछि। अत: अवला कहबामे हास्यपद बुझना जा रहल अछि। उदाहरण स्वरूप तँ अनेको अछि जेना शिवक धनुषक शर्त राजा जनककेँ सीता स्वयंवरमे राखए पड़ि गेल जे ऐ धनुषक तोड़िनिहारेसँ सीताक बिआह करब। ई तँ सीताक पराक्रमक झलक छल। दशरथक युद्धमे केकयी सार्थिक भार निर्वाह करैत अपना पतिकेँ संकटसँ प्राण बँचौने छेली। कृष्णार्जुन युद्धमे अर्जुनक संग रथ संचालन द्रोपदी बड़ी कुशलताक संग निर्वाह केने छेलखिन। अर्थशास्त्रमे सेहो धनुषधारी महिलाक उल्लेख आबि रहल अछि। संगे ईहो वर्णन आबि रहल अछि जे बेटी-बेटीकेँ समान शिक्षा देल जाइत छल। ई जागरूकता आब समाजमे आबि रहल अछि। धर्म और समाज संस्कृतिक सेवामे नारी जाति बढ़ि-चढ़ि कऽ बलिदान प्रस्तुतक उदाहरण अछि। आचार्य वृहस्पतिक पुत्री देवीहूति और भावभव्यक कन्या रोमशा अपन पिता तथा पतिसँ आज्ञा प्राप्त कऽ विभिन्न क्षेत्रमे धर्म प्रचार केने छेली। तथा समाज कल्याणक कार्यमे दक्षता प्राप्त केने छेली। अभ्रण ऋृषिक कन्या एकटा गुरुकुल खोलि छात्र-छात्राक समान रूपे प्रवेशक अधिकार दऽ शिक्षा दान करबाक बेवस्था केने छेली। आइक जुगमे नारी रूपमे मदर टेरेसा भारतीय नारीकेँ गौरवान्ति सेहो केली अछि। नेतृत्वक क्षेत्रमे सेहो महिलाक भूमिका अग्रसर रहल अछि। इन्द्रकेँ दिशा निर्देश इन्द्रानीसँ प्राप्त होइत रहल छल। धृतराष्ट तँ राज्य संचालनमे अस्मर्थ छला। अही कार्मकेँ हुनक पत्नी गंधारी कऽ रहल छेली। ऐतिहासिक तथ्यकेँ देखलासँ स्पष्ट होइत अछि जे आइ धरि राजश्री रानी पद्मावती, लक्ष्मी वाइ, अहेल्या, सरोजनी नाइडू तथा कस्तुरवा गाँधी जकाँ अनगिनित उदाहरण अछि। बात प्रतिभा प्रमाणित करबाक तथा स्वयं विकसित हेबाक तक सीमित नै अछि। प्रतिभासँ कहीं अधिक हुनक तियागक अछि जे असीमित अछि। जेतए स्वयं पर्दामे रहि कऽ अपन पतिक समाज निर्माण आ आत्म निर्णाणमे सहायता प्रदान करैत रहल अछि। एतेबे नै, धर्मपत्नीक रूपमे योगदान प्रस्तुत करबामे सेहो मर्यादाक निर्वाह करैत रहल अछि। जेना महान विदुषी विधोतमाक बिआह अशिक्षित काली दाससँ भेल। विधोतमा एतेक विद्वान छेली जे बिआहक लेल शास्त्रार्थमे शर्त राखल गेल। अनेको विद्वान ओइठामसँ हारि मानैत आपस भऽ गेल। अन्तमे, क्षलसँ मूढ़ काली दासक संग हुनक बिआह करौल गेल। विधोतमाकेँ जब ऐ बातक पता चललनि तँ पति काली दासकेँ उत्तेजित करि कऽ ज्ञानक प्रति लगन पैदा केलनि आ हुनका अध्ययनक रूचि जगेलनि। फलस्वरूप मूढ़ मति काली दास अखनि महा कवि कालीदासक रूपमे विख्यात छथि। ऐ तरहेँ तुलसी दासक पत्नी रत्नावली अपन सुख-सुविधाकेँ तिलांजलि दैत अपन पतिकेँ कामुक्तासँ इश्वरभक्तिक ओर मोड़ैत रामभक्त महा लेखक बनौलखिन। ई सत् साहस रत्नावलीकेँ छल जे छुद्र मानवसँ तुलसी दास जकाँ संत आ रामचरित मानस महा ग्रंथक रचियेता बनौलनि। स्वयं रत्नावली उच्च कोटिक साहित्यकार सेहो छेली। मैत्रेयी महर्षि जाज्ञवल्कयक पत्नी छेली। ओ कोनो संसारिक सुखक वास्ते बिआह नै केने छेली। आपितु विशुद्ध आत्माक साधाना लेल हुनक सहधर्मीनी बनली। संसारिक सुखक इच्छाक विषयमे पुछलापर ओ साफ इन्कार कऽ गेली। ऐ तरहेँ राजकुमारी सुकन्या आन्हर वृद्ध चमन महर्षि केवल ऐ खातिर बिआह केलखिन जे हुनक तपस्या आ शोधकार्य हेतु आवश्यक साधन जुटबैमे सहायता प्रदान कऽ सकनि। राजा अश्वपतिक पुत्री विदुषी, अतिरूपनी राजकुमारी सावित्री एक वनबासी आ निर्धन सत्यवानसँ मात्र ऐ उदेशसँ बिआह केलनि जे हुनक बनौषधि शोधमे सहायक भऽ कऽ मानव मंगल हेतु महतपूर्ण योगदान करि सकनि। ऐ तरहेँ असंख्य प्रमाण अछि जइसँ सिद्ध होइए जे प्राचिने कालसँ आदर्शवादी नारीमे अपन प्रतिभा, क्षमता आ योग्यताक लाभ समाजकेँ देबामे अपन योगदान दैत मानव विकासमे मुख्य भूमिका निभाबैत रहल अछि। जरूरतो तँ बुझाइते अछि। नारी नर केर शक्ती अछि सृष्टि केर अभिव्यक्ति नारी बिना शिव सदृश कण-कणक शक्ति केर भक्ति। हमर समाजिक जीवन दाम्पति जीवनसँ आरम्भ होइत अछि। पति-पतिक बीच जेतेक प्रेम, सौजन्य, आत्म भाव, आत्म समर्पण आकि बफादारीक भाव रहत ओतबे मानवीय वा गृहस्ती जीवनमे आनन्दक प्राप्ति हएत। ओतबे अनुपातमे श्री समृद्ध एवं सुख-शान्ति भेटत। माएक स्वरूप धानण करैत गंगा सदृश भऽ जाइत अछि। माइक डाँट बात बचपनक छी। हमर माए सदिखन हमरा नजरि चढ़ौने रहै छेली। पढ़ाइ खातिर सदिखन समझबैत रहै छेली, स्कूलक समैमे खिया-पिया कऽ सहियारैत-पुचकारैत विद्यालय पठबैत छेली। मुदा हम तँ बेसी दिन अदहे बाटमे संगतुरियाक संग खेलैत रहि जाइत रही। जखनि विद्यालयक छुट्टीक समए होइ छल तखनि झटदनि घर आपस आबि जाइ छेलौं। हमर माए नीक-निकुत खाइले दऽ दइ छेली। मुदा हम तँ विद्यालयक चौकैठो तक ने जाइ छेलौं। तँए, मन तँ गुदगुदाइत रहै छल। माए जखनि आन छात्र सभसँ पुछै छेलखिन हमर हाल-चाल तँ सभटा पोल खुलि जाइ छल। नै पढ़बा खातिर बहुतो टाँट-फटकार करैत लुलुआबैत छेली। हम मुँह लटकौने चुप्पी साधने सज्जनक स्वरूप बनौने लिबिर-लिबिर तकैत माइक ममता जगबैत अप्पन दोख छुपबैत सफाइ वचन बजैत रहै छेलौं। तेतबे नै! पीटाइओ तँ खाइए पड़ै छल। पिताजीक सेहो आ गुरुजीक तँ अलगे। मुदा हमरा तँ माइक डाँट बड़ अधला जकाँ लगै छल। हमरा ऐ बातक भान थोड़े छल जे माए पढ़ाइक महत जनै छथिन तँए डँटै छथिन। जेना-तेना मैट्रिक धरि तँ आबि गेलौं मुदा पढ़ाइमे हम केहेन छेलौं से तँ बुझिए गेल हएब। पिताजी सेहो हमर पढ़ाइ-लिखाइ खातिर चिन्तिते रहै छला। पिताजी सदिखन चिन्तामे डुमल रहै छला। एक दिन दिलक दौड़ा पड़ि गेलासँ स्वर्गधाम चलि बसला। आब हमरा विद्यालय जेबाक संग घर परहक पढ़ाइ सेहो बन्न भऽ गेल। चूकि घरोक काज-भार हमरेपर पड़ि गेल। बोर्ड परीक्षामे सेहो फेल भऽ गेलौं। मैट्रिक परीक्षामे फेल भेने लागल कि सम्पूर्ण जीवन दुखे-दुखमे बितल। संगी-साथीक सेझहा लज्जित सेहो रहए पड़त, ई सोचैत मन पड़ल माइक डाँट-फटकार। जखनि ओ हमरा पढ़ाइ खातिर डँटै छेली तखनि हमर अन्तर आत्मासँ अवाज आएल- “अखनि बेर नै भेल अछि, समए बँचल अछि शेष।” आब हमरा पढ़ाइक जुनुन सवार भऽ गेल। हम पुन: मैट्रिकक फार्म दुबारा भरैत पढ़ाइ शुरू केलौं। मैट्रिक परीक्षामे प्रथम स्थान केलौं। प्रथम स्थान पाबि आगूक पढ़ाइ जारी रखलौं। माइक कृपा भेल, संगे आसिरवाद भेटए लगल। आजूक दिन सरकारी सेवामे पदाधिकारीक पदपर रहि सेवा दऽ रहल छी। माइक डाँट, असिरवादमे बदलि गेल। हमर कामयावीक सभटा श्रेय माइक छी। संगे हमरा ई अनुभव भेल जे माता-पिताक डाँट-फटकार बेजा नै होइत अछि। किएक तँ माइक डाँटमे बच्चाक भलाइक कामना नुकाएल रहैत अछि। आत्म निर्भरता लेल कोनो उमेर नै- पछिला महिना हम अपन मित्रसँ मिलबाक खाितर राजस्थान गेल छेलौं। मित्रक घरक बगलमे एकटा साइठ बर्खक महिला छल। जिनकर माथ अँचरसँ झाँपल छल आ पल्थी मारि जमीनपर बैसल छेली। सहायता समूह जीविका प्रशिक्षण प्राप्त करि कऽ पापड़ बनबैत जीवनक आत्म निर्भर भऽ अपन सहायता समूहक माध्यमसँ गाममे एकटा परियोजना चला रहल छेली। परियोजनाक माध्यमसँ गामक बहुतो महिला सभ आत्म निर्भर प्रतिभावी प्राप्त केने कम्प्यूटर, सौर ऊर्जाक क्षेत्रमे समपन्न खुशहाली पकड़ि कऽ रखने छेली। संगे गामक बालक-बालिका सेहो सभ कुड़ा-कड़कट अथबा लकड़ीसँ खेलौना बनेनाइ सीख कऽ काबिलेतारिफ छल। हुनका सबहक प्रतिभा आ जीबठ देखैत बनै छल। देखैमे आएल जे ढलैत उमेरक औरत सभ जे कम्प्यूटरपर बैस अपन-अपन कारोबारक लेखा-जोखा तैयार करबामे सेहो काबिलेतारिफ छल। हमरा झाँकैत देखि ओ औरत मुस्कुराइत कहली- “अन्दर आबि जाउ ने।” हम अन्दर चलि गेलौं। पुछलियनि- “अहाँ की कऽ रहल छी?” बजली- “कम्प्यूटरपर नोटिश बना रहल छी। हमर काज अछि गाममे जा लोक सभसँ मिलि कऽ हुनकर सबहक तकलिफ आ सुझाव इकट्ठा करि कऽ कम्प्यूटरपर टाइप कऽ जीविका अधिकारीकेँ पठा देनाइ।” हम आगू पुछलियनि- “ई काज अपने केतेक दिनसँ करै छी?” ओ बजली- “किछुए सालसँ कऽ रहल छी। हम अनपढ़ छेलौं। ई काज करैले पढ़नाइ-लिखनाइ सीखलौं। आब हम ई-मेल करब।” ई कहैत हमरा धियानकेँ अपना तरफ खिंचैत टाइप करबामे लगि गेली। टाइप बिलकुल देवनागरी लिपिमे सुसज्जित छल, सजौल छल। ई साइठ बर्खक महिलाक तजुरबा देखि हम चकित भऽ गेलौं। आब हमर उत्सुकता आगू बढ़ल लगल। बढ़ैत उत्सुकताक क्रममे फेर पुछलियनि- “आर की सभ करै छी?” ओ बजली- “दू सए पचास लड़कीकेँ कम्प्यूटरक ज्ञान जेतेक हमरा अछि ओ सीखा चुकल छी।” हम ई सुनि आरो चकित भेलौं। नजरि बगलक कोठरीमे गेल। देखलौं एकटा नवयुवती कम्प्यूटरपर अपन आँगूर दौगा रहल अछि। ओइ नवयुवती दिस हमर नजरिकेँ देखैत पुन: बजली- “ओ नवयुवती जिनका अहाँ देखै छी, अनेक नव-नव लोककेँ आब हमरे जकाँ कम्प्यूटरक जानकारी दैत रोजगार योग्य बना रहल अछि।” हम एकबेर फेर चकित भऽ गेलौं। लागल जे किछु करबाक हेतु उमेर कोनो बाधा नै होइत सिरिफ जिज्ञासा चाही। मर्दानी नारी मर्दानीक मतलब होइत अछि, निडर, साहसी, स्वतंत्रता व आत्मनिर्भरता। नारी जेतेक अछि सबहक अन्दर ई तागत अछि, परन्तु खगता ऐ बातक अछि जे नारी सभ ई बातकेँ समझौ आ समझि कऽ बाहर निकालौ। ई कथा छी एकटा अब्बल-दुब्बर गरीब नारीक। बर्ख २०१३ तिथि स्वतंत्रता दिवसक दिन हरिपुर डीह टोलक रूपनी देवी, मधुबनीसँ कलुआही जाइवाली पक्की सड़कक कातमे एकटा छोट-छीन चाहक दोकान खोलि अपन रोजगारक शुरू केलक। रूपनीकेँ ई दोकान खोलैक प्रयोजन ऐ लेल पड़ल जे एक दिन अन्नक अभावमे बाले-बच्चे भूखले सूतए पड़लै। विहान भने रूपनीक पति भोला रोजी वास्ते गामक मालिक टुनटुन ठाकुरक हबेलीमे पहुँच मजदुरी करए लगल। दोकान खोलैसँ पनरह दिन पहिनेक बात छी। रूपनी अपन पतिक कमाएल बोइन लबैले टुनटुन ठाकुर हबेलीपर गेल। भिनसरक आठ बजैत रहै। रूपनीकेँ देखिते ठाकुर साहैब पुछि बैसल- “केतए एलेँ रूपनी?” बाजलि- “मालिक, बोइन लइले।” एतबे बात सुनैत टुनटुन बाबू भड़कि उठला। रूपनीकेँ फटकारैत बजला- “अखनि तँ भोलबा खेतमे पहुँचबे कएल आ तूँ बोइन ले चलि एलेँ।” रूपनी सकदम भऽ ठाढ़े छल। आकि पुन: टुनटुन बजला- “खुरपी ले, दरबज्जाक सभटा घास उखार तखने बोइन देबौ।” ई बात सुनिते रूपनीक आगू रातिक तरेगन सोझहामे आबि गेल। माथपर हाथ दऽ सोचए लगल। की करूँ, रातिमे तँ सब परानी भूखले सुति रहलौं। अखनि की खाएत आ खाएब। मालिकक बात तँ निठुर होइते अछि। कमाएलो बोइनपर लुलकार सुनैए पड़ै छै। आब की करब! पेटमे अन्न नै, गामपर बच्चा बाटे तकैत हएत जे मालिक ऐठामसँ किछु आनत माए तँ खाएब। मुदा ई कोन भगवानक चक्र छी। नै आब छूछ हाथे घर नै जाएब। सोचैत रूपनी चटे हबेलीसँ धुरियाएले पएरे घूमि बजार पहुँचल। बजारक एकटा किराना दोकानपर आबि दोकनदारकेँ कहलक- “मालिक, ई हमर नाकक छौंक रखि लिअ आ चाउर-आँटा दिअ।” दोकनदार बाजल- “भोला हमर दू दिन काज केने छल, जे बोइनो पछुआएल छै। अहाँ जे समान लेब से बाजू दऽ दइ छी।” रूपनी सोचैत बाजलि- “एक दिनक बोइनक चाउर-आँटा दऽ दिअ आ एक दिनककेँ चाहपती-चीनी आैर बिस्कुट आैरो पलाष्टिकक पचासटा गिलास दऽ दिअ।” दोकानदार बाजल- “पाहुन अबै छथि की?” रूपनी- “नै, चाहक दोकान खोलब।” दोकानदार चाहक दोकान खोलै जोकर सभ समान दैत समझबैत-बुझबैत दोकान चलबैक सभ तरीका बुझा रूपनीकेँ विदा केलक। रूपनी घर अबिते पहिने खेनाइ बना बाल-बच्चाकेँ खिआ पति लेल खेनाइ लऽ ठाकुर साहैबक खेत जा भोलोकेँ खिएलक। पछाति ओतएसँ घर आपस विदा भेल। बाटमे अबैत रूपनीकेँ ठाकुर साहैबक मलिकाना बात झुड़झुड़ाइत माथकेँ घुड़ियबैत, पछाति बरहम स्थानमे बैसि दोकानक जगह टोहिया लेलक। टोहियबिते ओतए घर आबि पहिने खेनाइ खेलक। दोसरे दिन रूपनी स्वतंत्रता दिवसक अवसरिपर चाहक दोकान खोलि अपन मधुर भाषाक सहयोगसँ चाह-बिस्कुट बेचए लगली। अपन हूनर संग साहसकेँ बटोरि पतिकेँ मजदूरी करैसँ मना करैत दोकानेपर काज करैक बोध देबए लगली। भोला सेहो मालिक ठाकुरक झझकारकेँ मोन पड़ैत दोकानक काजमे जतनसँ लागि गेल। रूपनी साले भरिमे काफी उन्नति करैत दोकानक रंग-ढंग बदलि देलक और अपन पति भोलाकेँ मालिक कहि सम्बोधित करैत चाहक दोकानसँ मिठाइ, जलपान आ भोजनक दोकान बना रूपनी अपन साहस आ मर्दानीक संग आत्म निर्भरताक परिचए दैत स्वतंत्रताक जिनगी जीवि रहल अछि। आत्म निर्भरता लेल कोनो उमेर नै पछिला महिना हम अपन मित्रसँ मिलबाक खाितर राजस्थान गेल छेलौं। मित्रक घरक बगलमे एकटा साइठ बर्खक महिला छल। जिनकर माथ अँचरसँ झाँपल छल आ पल्थी मारि जमीनपर बैसल छेली। सहायता समूह जीविका प्रशिक्षण प्राप्त करि कऽ पापड़ बनबैत जीवनक आत्म निर्भर भऽ अपन सहायता समूहक माध्यमसँ गाममे एकटा परियोजना चला रहल छेली। परियोजनाक माध्यमसँ गामक बहुतो महिला सभ आत्म निर्भर प्रतिभावी प्राप्त केने कम्प्यूटर, सौर ऊर्जाक क्षेत्रमे समपन्न खुशहाली पकड़ि कऽ रखने छेली। संगे गामक बालक-बालिका सेहो सभ कुड़ा-कड़कट अथबा लकड़ीसँ खेलौना बनेनाइ सीख कऽ काबिलेतारिफ छल। हुनका सबहक प्रतिभा आ जीबठ देखैत बनै छल। देखैमे आएल जे ढलैत उमेरक औरत सभ जे कम्प्यूटरपर बैस अपन-अपन कारोबारक लेखा-जोखा तैयार करबामे सेहो काबिलेतारिफ छल। हमरा झाँकैत देखि ओ औरत मुस्कुराइत कहली- “अन्दर आबि जाउ ने।” हम अन्दर चलि गेलौं। पुछलियनि- “अहाँ की कऽ रहल छी?” बजली- “कम्प्यूटरपर नोटिश बना रहल छी। हमर काज अछि गाममे जा लोक सभसँ मिलि कऽ हुनकर सबहक तकलिफ आ सुझाव इकट्ठा करि कऽ कम्प्यूटरपर टाइप कऽ जीविका अधिकारीकेँ पठा देनाइ।” हम आगू पुछलियनि- “ई काज अपने केतेक दिनसँ करै छी?” ओ बजली- “किछुए सालसँ कऽ रहल छी। हम अनपढ़ छेलौं। ई काज करैले पढ़नाइ-लिखनाइ सीखलौं। आब हम ई-मेल करब।” ई कहैत हमरा धियानकेँ अपना तरफ खिंचैत टाइप करबामे लगि गेली। टाइप बिलकुल देवनागरी लिपिमे सुसज्जित छल, सजौल छल। ई साइठ बर्खक महिलाक तजुरबा देखि हम चकित भऽ गेलौं। आब हमर उत्सुकता आगू बढ़ल लगल। बढ़ैत उत्सुकताक क्रममे फेर पुछलियनि- “आर की सभ करै छी?” ओ बजली- “दू सए पचास लड़कीकेँ कम्प्यूटरक ज्ञान जेतेक हमरा अछि ओ सीखा चुकल छी।” हम ई सुनि आरो चकित भेलौं। नजरि बगलक कोठरीमे गेल। देखलौं एकटा नवयुवती कम्प्यूटरपर अपन आँगूर दौगा रहल अछि। ओइ नवयुवती दिस हमर नजरिकेँ देखैत पुन: बजली- “ओ नवयुवती जिनका अहाँ देखै छी, अनेक नव-नव लोककेँ आब हमरे जकाँ कम्प्यूटरक जानकारी दैत रोजगार योग्य बना रहल अछि।” हम एकबेर फेर चकित भऽ गेलौं। लागल जे किछु करबाक हेतु उमेर कोनो बाधा नै होइत सिरिफ जिज्ञासा चाही। चतुर बालक ई कथा सोनू नामक एकटा दस बर्खक बालकक छी। सोनू गरीब परिवारमे जनम भेने गामक-घरक लड़का सभसँ कतराइते रहै छल जे, हमर माए-बाबू गरीबीक जिनगी जीब रहल अछि। एक दिन सोनू अपना गामसँ बजार चलि देलक। बाटमे सोचैत रहल जे गरीबसँ धनीक केना हएब। ई सोचैत सोनू एकटा होटलक सोझहा सड़कपर ठाढ़ भऽ गेल। सोचैत-सोचैत सोनू होटल दिस डेग बढ़ेलक। तखने होटलक मालिक मनेजरकेँ कहलक- “हम ऊपरका रूपमे सुतैले जाइ छी, बेसी खगता हुअए तखने हमरा उठाएब।” सोनू ऐ बखतकेँ मोनासीब बूझि दस मिनट रूकि कऽ मनेजरकेँ कहलक- “होटलक मािलक- बौधू बाबू हमर पिताक दोस्त छथिन। हुनकासँ भेँट करबाक अछि।” मनेजर एकटा बेड़ा दियए सोनूक समाद मालिक लग पठेलक। मािलक अधकचुआ नीनमे रहैक कारणे बेड़ाक बातकेँ ठीकसँ नै बूझि कहलनि- “जाउ, जे मगैत होइ से दऽ देबै।” निच्चाँ आबि बेड़ा मालिकक कहब मनेजरकेँ सुना देलक। आ अपन काजमे लगि गेल। मनेजर सोनूकेँ पुछलक- “बौआ, की लेबह?” सोनू उत्तर दैत कहलक- “खेनाइ खिआ दीअ आ जे बढ़ियाँ मिठाइ हुअए से दूटा डिब्बामे दऽ दीअ।” मनेजर सोनूकेँ खेनाइ खिआ दू डिब्बा बढ़ियाँ मिठाइ सजा कऽ दऽ देलक। सोनू होटलसँ दुनू डिब्बा मिठाइ लऽ विदा भऽ गेल। हाथमे दुनू डिब्बा लेने चतुराइ करबाक तजूरबा करबाक लेल दोसर शहर चलि गेल। ओतए सोना-चानीक दोकानमे पहुँचल। दोकानक मालिक लोभी छल। ई बात सोनूकेँ मालूम भऽ गेल छेलै। सोनू ओइ लोभी मालिककेँ चिन्ह, प्रेम-भाव देखबैत मिठाइक सुन्दर साजौल दुनू डिब्बा दैत बाबूजी शब्दसँ सम्बोधित करैत हाथमे थम्हा दैत अछि। लोभी मालिक मिठाइक डिब्बा अपन पत्नी निरूकेँ बजा दऽ दैत अछि। किछुए कालक बाद, जखनि दोकानमे गहिंकी सबहक भीड़ लगल, तखने बाजल- “बाबूजी, डिब्बा महक मिठाइ रखि लिअ आ डिब्बा हमरा दऽ दिअ।” मािलक बिनु सोचने सोनूकेँ कहलक- “जा भीतर, चाचीसँ डिब्बा मांगि लिहऽ।” सोनू भीतर गेल आ मालिकिनकेँ कहलक- “चाची, बाबूजी दूटा सोनाक सिक्का दइले कहलनि।” सुनिते मलिकिनी विचारए लगली। देबाक मन नै देखि सोनू जोरसँ बाजल- “बाबूजी, जाबए अपनेसँ नै कहबै ताबए चाची थोड़े देती, अपनेसँ कहियौ ने।” मालिक दोकानपर भीड़क कारणे गद्दीएपर सँ पत्नीकेँ कहलखिन- “दऽ दिऔ ने।” पतिक आदेश पाबि मलिकिनी सोनाक दूटा सिक्का सोनूकेँ दऽ देली। लऽ कऽ साेनू ओतएसँ ससरि गेल। आब सोनू ओतएसँ तेसर बजार गेल आ ओतए ओ दुनू सोनाक सिक्का बेचि धन इकट्ठा करए लगल। ऐ बातक जानकारी गामक मालिक नवीन बाबूकेँ सेहो भेलनि। नवीन बाबू दरबारक सिपाहीकेँ कहि सोनूकेँ बजा पूछ-ताछ केलनि। सभटा बात साँचे-साँच बतबैत कहलक- “अपन गरीबीसँ छुटकारा पबैले हम एना कऽ रहल छी।” ई बात कहैत सोनू मालिककेँ प्रणाम कऽ सोझहेमे ठाढ़ भेल रहल। किछुए कालक बाद सोनू फेर बाजल- “जाबे हमहूँ धनीक नै हएब ताबे कोनो ने कोनो चतुराइ तँ करिते टा रहब ने।” मालिक नवीन बाबू सोनूक चतुराइ संग धनीक हेबाक दृढ़ सोचकेँ देखैत गुम्म भऽ गेला। डण्डित करब सेहो मनमे एलनि मुदा ओ सोचलनि जे से नइ तँ एकरा निअमित काजमे लगा दिऐ जइसँ ऐ तरहक ठकपानासँ दूर भऽ जाएत। यएह सोचि अपना दरबारमे रखि लेलक। राम विलास साहु स्कूलक खिचड़ी एकटा अभिभावक तमसा कऽ स्कूल पहुँचला। हेड मास्टरकेँ उपराग दैत बजला- “पढ़ाइ-लिखाइ तँ जएह-सएह होइए। खाली खिचड़ीयेमे बेहाल रहै छी। जखनि धिया-पुता पढ़बे नै करतै तखनि तँ हाकिम-हुकुमक तँ बाते छोड़ू चपरासियो नै बनतै। एसँ नीक तँ प्राइवेटे स्कूल ने जइमे दूटा पाइये ने लगै छै, पढ़ाइ तँ नीक होइ छै। आइ तक ऐ स्कूलक बच्चा पढ़ि कऽ कोन नाम कमेलकै।” मास्टर सहाएब शान्त भावसँ अभिभावककेँ समझबैत बजला- “देखू, तमसाउ नै कोनो हम खिबै छी खिचरी। ई तँ सरकारक योजना छी। ऐ योजनासँ लाभो बहुत छै। निच्चासँ ऊपर धरि सभ माले-माल होइ छै।” अभिभावक बजला- “से केना?” मास्टर सहाएब कहलखिन- “सहीमे प्राइवेट स्कूलक बच्चा सभ पढ़ि-लिखि हाकिम-हुकुम बनै छै। आ ईहो देखैत हेबै जे ओ सभ माए-बाप, गाम-समाजकेँ छोड़ि एवं मातृभूमिकेँ बिसरि जाइए, बूझू बौर जाइए। से तँ ऐ स्कूलक बच्चामे नै हाेइए।”चोर-सिपाही माघ मास अन्हरिया राति। ओस-कुहेससँ हाथो-हाथ ने सुझैत। एकटा चोर चारि कऽ भागल जाइ छल। तखने एकटा सिपाही गस्तीमे आबि रहल छल। चोर सिपाहीकेँ देखिते भागल। चोर बूढ़ छल मुदा सिपाही बलंठ छलै। भागैत चोरकेँ रपटि कऽ पकड़लक सिपाही। पकड़ि हाजति लेने जाइ छल। चोरकेँ डंढ़ासँ देह थरथराइ छल। मने-मन ईहो सोचै छल जे केना ऐ यमराजक हाथसँ बचब। थोड़े आगू चलि कऽ देखल जे सड़कसँ हटि एकटा घूर रहै। आगि देखिते चोर बाजल- “सर, अहाँ एत्तै रहू आ हम ओइ धूरासँ कनी बिड़ी नेसने अबै छी?” सिपाही कने सोचि कऽ बाजल- “अरे, तूँ हमरा मूर्ख बुझै छेँ रे! आ जे तूँ भागि जेमे तँ हम तोरा पतालमे खोजबौ? चूपचाप एतए बैस हम अपनेसँ बीड़ी सुनगेने अबै छी।” इमानदारीक पाठ ननुआँ पुछलक कनुआँसँ- “भैया आइ-काल्हि तँ गामोक स्कूलमे बड़ सुविधा भेटै छै आ पढ़ाइओ होइ छै तैयो विद्याथी सभ शहरक स्कलमे किए पढ़ै छै?” कनुआँ जबाब देलक- “गामक इस्कूलमे इमनदारीक पाठ आ शहरक इस्कूलमे रोजगारक पाठ पढ़बै छै।” “से केना?” -ननुआँ पुन: पुछलक। कनुआँ उत्तर देलक- “गामक इस्कूलमे एहेन पाठ पढ़बै छै जे कहुना साक्षर भऽ जाए, गाए-भौंस चराबए आ नमहर भेलापर हर-फार जोतए, खेती करए। अन्न उपजा कऽ अपनो खाए आ आनोकेँ खियाबए। ई छिऐ ने इमानदारीक पाठ मुदा शहरक इस्कूलमे विद्यार्थी सभकेँ रोजगारक पाठ पढ़बै छै। ओ सभ पढ़ि-िलखि रोजगार लेल आन-आन शहर चलि जाइ छै। अपन घर-परिवार आ समाज सेहो छुटि जाइ छै। समाजसँ बेमुख भऽ जाइ छै। आब तोहीं कह जे इमानदारीक पाठ के पढ़तै?” बौआ बाजल पढ़ल-लिखल बेरोजगार छी मुदा दिन केना कटै छल तकर कोनो सुधि-बुधि नै छल। ऊपरसँ परिवारक बोझ, आगू पढ़बाक इच्छा रहितो किछु नै कऽ सकलौं। एक दिन मनमे फुराएल जे किछु नेना-भुटकाकेँ पढ़ाएल जाए। अहुना तँ हम बुड़िआएले छी औरो बुड़िया जाएब। एक दिन भोरमे बौआ-बुच्चीकेँ ओसारपर पढ़बै छलौं। दुनू बेरा-बेरी प्रश्न पुछए आ हम उत्तर दइ छेलिऐ। अहिना स्थितिमे बौआ पुछलक- “लोक एत्ते मेहनतसँ किए पढ़ैए, जे पढ़ैए सेहो आ जे नै पढ़ैए ओहो तँ एक ने एक दिन मरिऐ जाइए?” बौआकेँ हम समझबैत कहलिऐ- “जीवन-मरण तँ प्रकृतिक निअम छी। ओ निरंतर होइत रहैत अछि।” बौआ फेर पुछलक- “तखनो लोक किए पढ़ैए?” “मनुख पढ़ि-लिख ज्ञान अर्जित करैए आ ओइ ज्ञानसँ अपन जिनगीकेँ सुलभ बना असली जिनगी जीबैए। लोक पढ़ि-लिखि डाक्टर-इंजिनियर, औफिसर, कवि लेखक आ उपदेशक इत्यादि बनैए। अच्छा ई कहह जे तूँ की बनबऽ?” बौआ बाजल- “हम पढ़ि-लिख कोनो काज कऽ सकै छी मुदा कवि-लेखक नै बनब। सभ कमा कऽ सुख-मौजसँ जिनगी बितबै छथि मुदा कवि-लेखककेँ कोनो कमाइ नै होइत छन्हि। अखबारमे पढ़लिऐ जे मरला बाद पुरस्कार भेटै छै।” घूसहा घर मुखियाजी पंचायतक गामे-गाम आम सभाक बैसार लेल डोल्हो दियौलनि। गामक लोक सभ एकजुट भऽ आम सभामे पहुँचला। सभाकेँ संवोधित करैत मुखियाजी बजला- “ऐ बैसारमे सभ कियो मिल िनर्णए लिअए जे पंचायतक गरीब आ मसोमात, जिनकर घर टुटल-फाटल होइ वा रहबा योग नै होइ छै। ओइ व्यक्तिक सूची बनाएल जाउ। हुनका सभकेँ सरकार तरफसँ घर बनबैले इन्दिरा-आवास योजनासँ रूपैया भेटतनि।” वार्ड सदस्यक सहयोगसँ मुखियाजी लग इन्दिरा आवासबला सूची पहुँचल। बिहानेसँ मुखियाजीक दलाल सभ सूचीमे नामांकित व्यक्तिसँ भेँट कऽ एक-एकटा फार्म दऽ कहि देलक जे फार्म भरि कऽ मुखियाजी लग जमा करै जाउ आ बैंकमे खाता सेहो खोलबा लइ जाउ। संगे संग पाँच हजार रूपैआ सेहो दिअए पड़त। तखनि इन्दिरा आवास भेटै जाएत। बहुत गोटे तँ अपन गाए-महिंस-बकरी-छकरी-गहना-जेबर जेकरा जे गर लगलै बेचि कऽ रूपैआ दऽ रूपैआ उठेलक। किछु आदमी एहनो छल जेकरा सकर्ता नै भेलै ओ वंचित रहि गेल। बदलामे पाइबला लोक अपना नामे उठा लेलक। किछु दिनक बाद रघिया मसौमात इन्दिरा-आवास ले फार्म भरि मुखिया जी लग पहुँचलीह। मुखियाजी फार्म पढ़ि बजला- “पहिले इन्दिरा आवासमे पचीस हजार भेटै छलै आब चालिस हजार भेटै छै मुदा आगू भेटैबला साइठ हजार भेटतै। जइमे पच्चीसमे पाँच हजार आ अखनि चालिसमे दस हजार खर्चा लगै छै मुदा आगू साइठमे पनरह हजार लगतै।” रधिया सुनिते कानि-कलपि कऽ अपन मजबूरी सुनौलकनि। मुखियाजी मुड़ी डोलबैत बजला- “यइ काकी, हमरे केनेे नै ने होइ छै, डेगे-डेग हाकिम-हुकुम बैसल छै। ओहो तँ कटिया सोन्हा कऽ रखने रहै छै तेकरा की हेतै। आ हमरो कोनो दरमाहा भेटै छै हमहूँ तँ ओहीमे निमहै छिऐ। तँ ई हेतौ जे हम अपनबला नै लेबो।” सुनि रधिया सभ बात सुनि परिस्थिति बूझि आपस आबि गेलीह। बुधनी बुढ़िया गाममे सभसँ उमेरगर। जुआनियेमे घरबला बाढ़िमे डुमि मरि गेलखिन। दूटा बेटाक संग बुधनी कहियो हिम्मत नै हारलि। संघर्ष करैत आत्म-िनर्भरतापर धियो-पुतोकेँ सक्कत बनौने छथि। हलाँकि आर्थिक रूपे कमजोरे छथि। एक दिन मुखियाजीक नजरि बुधनी बुढ़ियापर पड़लनि आ देखिते पुछलखिन- “गामक बहुतो लोक सभ लाभ लेलक मुदा तूँ कोनो फारमो नै भरलीही? तोरा तँ दूटा लाभ भेटतौं। एकटा वृद्धा-पेंसन ओ दोसर इन्दिरा आवासक।” बधनी बजलीह- “ऐमे कोनो खर्चो-वर्चो लगैए?” मुखियाजी- “हँ, वृद्धा-पेंसनमे पाँच सए आ इन्दिरा-आवासमे पनरह हजार।” बुधनी- “हम ई लाभ नै लेब।” मुखियाजी- “किए नै लेब?” बुधनी- “घूस दऽ कऽ घर बनाएब तँ ओइ घूसहा घरमे रहैबला केहेन हेतै?” मुखियाजी आ बुधनी बुढ़ियाक गप अपना घरक कोनचर लगसँ रधिया मसोमात सुनैत छलीह अपना मनकेँ बुझबैत बजलीह- “इन्दिरा आवास किए घूसहा घर कहियो ने।” जातिक भोज आइ फूलबाबूक बेटाक बिआहक भोज अछि। गौआँ सबहककेँ आशा छेलनि जे ई भोज हमरो सभकेँ खेबाक अवसरि भेटत। किएक तँ ऐ भोजकेँ सफल बनेबाक लेल बहुतो जाति-वर्गक लोकक सहयोग छेलनि। कियो जारनि फारए तँ कियो साफ-सुथरा करए। कियो बर्तन-बासन माजै छल। गामक डोम बाँससँ बनल छिट्टा-पथिया, ढकैस, डाल-दौरा, चङेरा बना देलक। मालि फूल आ फूलक माला, कुमहार वर्तन-वासन, महला पोखरिसँ माछ मारि मनक मन ढेर लगौलक। कतेको करीगर आ हलुआइ सभ भोजक समग्री बनबैमे भिरल छल। भोजमे सहयोग तँ सभ जातिक लोक द्वारा भेल। मुदा खाइक अवसर सभकेँ नै भेटलनि। ओतबे नै, किनको नगद टाका देल गेल तँ किनको उधार रहलै आ किनको सीदहा भेटलै। मुदा भोज खाइक नोत सभकेँ नै भेटलै। भोजक आयोजक भलहिं फूलबाबू छला मुदा करबारी तँ सभ जातिक लोक छेलखिन। किछु लोकक मनमे, जिनका सभकेँ नोत नै देल गेलनि। हुनका सबहक मनमे ईहो होन्हि जे काज जखनि नै छुआइ छै तँ पाँतिमे बैस खेलापर पाँति केना छुबा जेतै। ई छी हमर मजबूरी जमुना बाबाक दुआरिपर सतसंग-प्रवचन होइ छेलै। भीड़ देखि हमहूँ ससरि कऽ गेलौं आ बैस सुनए लगलौं। प्रवचनकर्ता सेहो ज्ञानी आ विद्वान बूझि पड़ला। ओ मनुखक जिनगीक समरूपता बतबै छला। कहब रहनि जे सभ मनुख एक समान छी। सभ एके ईश्वरक संतान छी आ सबहक अत्मामे एके परमात्माक अंश रमि रहल-ए। मुदा हम तँ बड़ अंतर देखै छी। सबहक क्रिया-कलाप, रहन-सहन आ खानो-पानमे बड़ पैघ भिन्नता अछि। केकरो बोरे-बोरे नून आ केकरो रोटीओपर ने नून। कोइ खाइते-खाइते मरैए आ कोइ खाइए बिनु मरैए। केकरो बीघा-बीघे कोठा-सोफा केकरो खोपड़ीओपर आफत। कोइ रौदे-वसाते जरि-मरि काज करैए तँ कोइ ए.सी.मे मौजु करैए। कियो उड़न जहाजसँ देश-विदेशक यात्रा करैए तँ कियो पएरे चलि-चलि सड़केपर पराण तियागैए। किनको बिमारीक इलाज करोड़ो रूपैआसँ विदेशमे होइए तँ किनको पराण साधारण इलाज बिनु चलि जाइए। ऐ सभ मुद्दापर सोच-विचार करैत जखनि प्रवचन खतम भेल तखनि हम हुनका लग जा कहलिऐ- “महराज, अपने प्रवचनमे सभ मनुखकेँ समरूप बतौलियनि। मुदा हम तँ बड़ अन्तर देखै छी। से कनी फड़िछा कऽ कहियौ।” प्रवचनकर्ता मधुर स्वरमे बजला- “से तँ ठीके अहूँ कहै छी। हम जे प्रवचनमे कहलौं सेहो ठीक आ अहाँ जे कहै छी सेहो ठीक। सत् ई छै प्राकृति द्वारा जे सुविधा मनुखक लेल उपलब्ध छै ओ समरूप छै। मुदा मनुखक बीचमे जे अन्तर छै से अन्तर बेवस्थामे कमीक कारणे छै। मनुखे मनुखक दुश्मन छिऐ। जे जेते सवल छै ओ ओते दोसराक हक मारि बेवस्थाकेँ दुरूपयोग करै छै। जहिना हाथीकेँ दूटा दाँत होइ छै एकटा खाइबला आ दोसर देखबैबला तहिना बेवस्था करैबलाकेँ दू नजरि होइ छै। कथनी आ करनीमे अन्तर रखने छै। ऐ सभ बातक विचार-अनुभव मनुखकेँ अपने करए पड़तै। ओकर समाधान लेल सघर्ष करए पड़तै। बिनु मांगने तँ भीखो नै मिलै छै। ई तँ अहाँ अधिकारक बात करै छी। जौं हम प्रवचनमे समरूपताक बात नै कहबै तँ बेवस्था हमरा नै ने जीबए देत। अहाँ जकाँ जौं हमहूँ प्रवचनमे बाजब तँ कहिया ने हमरा जमपुरी पहुँचा देने रहितए। यहए छी हमर मजबूरी।” अबिसवास काल्हिए नूनू बाबूक बेटीकेँ बिआह छी। नूनू बाबू बिआहक सरमजान सबहक ओरियानमे लगल छला। गिरहत आ सम्पन्न परिवार रहितो रूपैआक अभाव छेलनि। चारि लाख टाका, पाँच भरि सोना आ एकटा मोटर साइकिल देहेजपर बिआह फाइलन भेल छल। दुलहा इंजीनियरिंग कौलेजक छात्र। सुखी सम्पन्न परिवार। दुलहाक पिता मोहन बाबू एस.डी.ओ. औफिसक बाड़ाबाबू। नीक कमेने-खटेने छथि। तँए नूनू बाबू अपन बेटी सुचिताकेँ हुनके घरमे कुटमैती करैक निर्णए नेने छथि। नूनू बाबू बहुत परियास करैत तीन लाख रूपैआ मोटर साइकिल, दू भरि सोना तिलकक समैमे चुकता कऽ देलनि। शेष तीन भरि सोना बेटीक गहना स्वरूप बिआहे दिन देब आ एक लाख रूपैआ जे बँकियौता रहि गेल ओ बेटीक नामे एल.आइ.सी. बीमामे जमा अछि। जे दू तीन मास पछाति मिलत सेहो चुकता कऽ देब। तिलक भेला पछाति बिआहक दिन ठेकल गेल। मुदा दुलहाक पिता मोहन बाबू बड़ लोभी। ओ मोने-मोन सोचलनि, पुतोहु जखनि हमर हएत तँ एल.आइ.सी.क रूपैआ आइ ने काल्हि हमरे हएत। बँकियौता रूपैआ बिआहसँ पहिने लऽ लेब तँ लाभमे रहब। मोहन बाबू बिआहसँ एक दिन पहिने समाद नूनू बाबूक घर पठौलनि जे हमर एक लाख टाका बँकियाहा अछि ओ रूपैआ चुकता करि दिअ तखने बरियाती जाएत नै तँ अहाँ जानू। नूनू बाबू समाद सुनिते जेना देहपर बज्ज्र खसि पड़ल। ओ सेचमे पड़ि गेला। होश सम्हारि मोहन बाबूसँ भेँट कऽ बड़ विनती केलनि। अखनि ऐ लेल माफी दिअ। हम बेटीबला छी। बहुत चीज-बौसक ओरियान करए पड़त। तैपर सँ बरियातीक सुआगतमे सेहो बहुत खरच हएत। मुदा मोहन बाबू नूनू बाबूकेँ एकोटा बात नै सुनलकनि, आ ने आँखिक नोर पोछलकनि। तखने नूनू बाबू बजला- “खैर, नै मानब तँ अहाँ बरियाती लऽ कऽ आउ, हम दरबज्जेपर बिअाहसँ पहिने रूपैआ बरियातीए घरमे चुकता करि देब तखनि बिआह करब।” नूनू बाबू खेत भरना रखि रूपैआक ओरियान केलनि। बरियाती समैपर आएल। सबहक सुआगत भेल। दरबज्जेपर सबहक सोझहेमे एक लाख टाका दुलहाक पिता- मोहन बाबूकेँ चुकता कऽ देलनि। दुलहाक परिछन भेल, वरमालाक काज शुरू हएत तखने एकटा नव बातक चर्चा भेल जे दुलहा पहिने दुलहिनकेँ देखता। पसिन भेला पछाति ने बरमाला आ सेनूरदान हएत। ऐ बातसँ कन्याँ पक्षमे खलबली मचि गेल आ आक्रोश सेहो बढ़ि गेल। अन्तमे निर्णए भेल जे ठीक छै पहिने कन्याँ देख लेल जाउ। तखने आगूक काज हएत। दुलहिन चित्रा तँ पहिनेसँ वरमाला लेल सजले छलि। एकटा कोठलीमे दुलहाकेँ लोकनियाँ संगे बजौल गेल। ओही कोठलीमे दुलहिन चित्रा सहेलीक संगे आएल। चित्रा इण्टर पास पूर्णिमाक चान सन सुन्नरि। दुलहा देखि कऽ मोने-मोन खुश भेला। किछु गप-सप्प सेहो भेलै। तखने चित्रा बजली- “की यौ दुलहाजी, हम अपनेकेँ पसीन भेलौं?” दुलहा मुस्की मारि पीठे लागल बजला- “हँ, की हमहूँ अहाँकेँ...।” चित्रा तुरन्ते जवाब देलक- “नै अहाँ हमरा पसीन नै छी। तँए आब ई बिआह हम किन्नौं ने करब। चित्राक ई निर्णए सुनि सखी-बहिनपा, माए-बाप, समाजक बुजुर्ग इत्यादि बहुतो गोटे समझेलकनि मुदा एकेठाम चित्रा जिद्द धेने रहलि जे ऐ वरसँ हम बिआह नै करब।” दरबज्जा बरियाती-सरियातीसँ भरल छल। ई बात सुनिते लगले सनसना कऽ अगिलग्गी जकाँ चारू दिस सौंसे गाम पसरि गेल। बहुतो बुजुर्ग लोकनि दुलहिनक पिताकेँ बुझा-समझा कऽ कहलकनि मुदा चित्रा अपन दृढ़पर अरल रहलि। चित्रासँ कारण पूछल गेल। कहलक- “जखनि दुल्हाकेँ अपन माए-बाप आ सर-समाज किनकोपर बिसवास नै छन्हि तँ ओ हमरापर बिसवास केना करता आ हम केना हुनकापर बिसवास करब। दोसर बात जे हिनकर पिताजी दहेजक खातिर जमीन आइज्जत बेचबा सकै छथि तखनि ओ हमरो बेचि सकैत छथि किने। तँए हम बीख पीब मरि जाएब मुदा एहेन अविसवासी आ दहेज रूपी दानवक बेटा संगे बिआह नै करब। ऐसँ नीक तँ हम ओहेन दुल्हा जे गरीबे किएक ने हएत, तिनकासँ करब, जे अपन इज्जतक संगे दोसरोक इज्जत करत।” चित्रा सहेली संगे कोठलीसँ निकलि गेलि। दुल्हा आ लोकनियाँ सभकेँ ओही कोठलीमे बन्न कऽ ताला लगा आँगन आबि गेलि। बिआह नै भेल। ई खबरि रातिए भरिमे चौतरफा पसरि गेल। पंचैतीक बैसार भेल। पंच लोकनि बिआह हेबाक बहुत परियास केलनि मुदा चित्रा अपन संकल्पपर अडिग रहलि। अन्तमे जे दहेजक लेन-देन आ सुआगतक खर्च भेल रहै ओ सभटा आपस भऽ जाए। दुलहिनक पिता नूनू बाबू बजला- “चारि लाख टाका, दू भरि सोना, मोटर साइकिल संगे सुआगतमे दू लाख टाका खर्च भेल अछि से सभटा आपस कऽ दिअ तखने हिनका सभकेँ छुट्टी भेटतनि। नै तँ हम कानूनक शरण लेब आ दुनू बापूतकेँ जहल कटेबनि।” सभ पंचक विचार भेलनि। बात तँ उचिते ने नूनू बाबू कहै छथि। कोनो जबरन जुर्माना तँ नै...। दुल्हाक पिता मोहनबाबू छह लाख टाका, सोना, मोटर साइकिल घरसँ मंगबा नूनू बाबूकेँ पंचक बिच्चेमे आपस कऽ देलकनि। तखनि हुनक बेटाकेँ कोठलीसँ बाहर निकालि देल गेल। जहिना आन गामक चोटाएल कुकुर नांगरि दबौने दुलकी दैत अपन गामक बाट पकड़ि सोझहे-सोझ जाइत रहैए तहिना सभ कियो विदा भेला। चित्रा पिताक मुरझाएल मुँह देखि बाजलि- “बाबूजी, अहाँ एक्को पाइ चिन्ता नै करू। हम मनुख संगे बिआह करब। पढ़ल-लिखल कम्मो रहत तइले एको पाइ चिन्ता नै। एही खातिर ने एते झमेल होइए। एक्को पाइ चिन्ता नै करू।” गंगा नहाएब कातिक मासक पुर्णिमा लगिचाएल। सालक तेरहम मास, बेसी पावनि-तिहार भेने हाथो खालीए, मुदा गाममे दलमलित होइए- गंगा नहाइले सिमरिया घाट जाएब। ऐबेर पुरुखसँ बेसी जनानीए सभ गंगा नहाइ जाइले छाल छीलने। तीनू टोलक जनानी सभ गुदुर-फुसुर करैमे भरि-भरि दिन लगल। चनरदेव भोरे उठि गाए-बरदकेँ कुट्टी-सानी लगा धनखेती दिस विदा भेल कि बड़की भौजी आ सावित्री माए डेढ़ियापर आबि गेली। बड़की भौजी मुस्की मारि बजली- “बौआ चनरदेव, सुनै छी गामक लोक सभ गंगा नहाइले जा रहल अछि। अहाँ नइ जाएब। कहिया पुर्णिमा छिऐ।” चनरदेव दिन-तिथि गीनैत बाजल- “पुरसुए पुर्णिमा छी। हमर तँ हाथे खाली अछि, तहन छुच्छे हाथ जाएब केना। ऐबेर नइ जाएब। गंगा मैया जँ ऐ साल निके-सुखे रखलनि तँ पौरुकॉं अबस्स जाएब।” सावित्री माए बजली- “चनरदेव, एहनो बात लोक बजैए! गंगा नहाइले तँ बिना जतरो-के-जतरा बनबैए, अहाँ किए मुँह मोड़ै छी।” गंगा नहाइक चर्च सुनि एक्के-दुइए जनिजाति सभ ससरि-ससरि बहुतो आबि चनरदेवकेँ घेरि लेली। बड़की भौजी चौल करैत कहलखिन- “यौ अहॉं सभ दिनक बहन्नाबाज छी, से बहन्ना छोड़ू जे हाथ छुच्छे अछि। अपनो चलू आ हमरो सभकेँ नेने चलू। रहल खर्चाक बात, हम तँ खर्चा देखबे ने करै छी। घरेसँ खेनाइ-पीनाइक समान बना लऽ लेब। रेलगाड़ीमे मेलाक भीड़ रहबे करत, टिकट कोनो लगबे ने करत। एक गड़ीसँ रातिए-राति जाएब आ दोसर दिन घर घूमि चलि आएब। ने कोनो घरक काज पछुआएल आ मंगनीमे गंगा नहा लेब। जखन मेलामे कोनो चीज-वौस कीनबे ने करब तखन खर्च बेसी किए हएत। अहूँ तँ सियार गुँहकेँ परबत बनबै छी।” बड़की भौजी गपक बखाड़ी खोलि चारू दिससँ चनरदेवकेँ गछारि लेली। चनरदेव सकदम भऽ गेल। किछु उत्तर नइ देलक। जनिजाति सभ समझि गेली जे चलैले तैयार भऽ गेल। चनरदेव मने-मन सोचए लगल जे वेद-पुराणसँ लऽ कऽ साइयो पोथीमे गंगा स्नानक बड़ पैघ महत बतौने अछि। सतयुगसँ लऽ कऽ अखनि धरि अपन देशक लोक आ आनो देशक लोक गंगा नहाइए तँ चनरदेव किए पाछू रहत। हमहूँ किए ने लगले सूरमे बेड़ा पार भऽ जाइ। एमहर भरिए दिनमे जनिजाति सभ खेनाइ-पीनाइक ओरियानमे लगि गेली। कियो अरबा चारक रोटी, अल्लूक भुजिया बनौलक तँ कियो परोठा-भुजिया, तँ कियो चूड़ा-मुरही, सतुआ-नोन आ मिरचाइक मोटरी बान्हि चलैले तैयार भऽ गेल। पचीस-तीस गोटे सँझुके गड़ी पकड़ैले टिशन दिस विदा भेल। निरमलीसँ सकरी जाइत-जाइत भीड़क कारणे बुझू देहक मोलि छुटि गेल। मुदा कोनो धरानी भोरे-भोर सिमरिया टीशन पहुँच गेल। किछुकाल टिशनेपर अँटकै गेल आ अन्हरोखे गंगा घाट दिस सभ कियो विदा भेल। टिशनसँ घाट धरि चुटी जकॉं सत्तरि लगल लोक। केतौ कनीयोँ जगहे नइ जे ठाढ़ो भऽ लोक जीड़ाएत। ससरैत-ससरैत कहुना गंगा घाट पहुँच गेल। दिसा-मैदानसँ आबि चनरदेव दतमनि करए लगल। गामेसँ साहोरक दतमनि अनने छेलए। मुँह-हाथ धोय बेरा-बेरी गंगामे नहाइ गेल। चोर उचक्काक कोनो कमी नइ, जँ एकेबेर सभ कियो नहाइले जेइतए तँ झोड़ा-झंटी लऽ पार भऽ जइतए। लोक तँ गंगाइ नहाइत अछि पुन्य समझि कऽ मुदा पापो करैबला ओतइ बेसी होइए। सभ कोय नहा एक-एक डिब्बा गंगाजल भरि आनि ऊपर रखलक। पानि तेते घोर-मट्ठा भेल घिनाएल छेलै जे मुहोँमे नइ लइके मन होइत। घाटसँ हटि ऊपरमे एकटा मन्दिर छल। ओतइ एकटा चापाकल सेहो छल। सभ कियो धक्कम-धुक्का करैत कल लग पहुँचल। भूख-पियास सभकेँ लगल छेलै अपन-अपन खाएक निकाइल खा-खा पानि पीब, मोटरी-चोंटरी बान्हि लेलक। सबहक विचार भेल जे गड़ीमे बड़ देरी छै तँए हम सभ ताबे मेला घूमि देखब। घूमि-घूमि गंगा घाटक मनोरम छबिक आनन्द लेब। सभ कियो घुमैत दछिन-पूब दिस गेल। जेतए खाली मुरदे जरै छेलै। लाश अधजरू होइ कि पानिमे धफारि-धफारि कऽ भँसा दइ छेलै। तइ बगलेमे एतेक घिनाएल छेलै जे थुको फेकनाइ अपराधे बुझै छल। नाक-मुँह मुनि सभ कियो पड़ाएल। गंगा कातमे किछु दूर तक घाट बनल। नहाइक भीड़ ओरेबे नइ करैबला। तखन घुमैत सभ कियो राजेन्द्र पुल लग आबि गेल। जेना पुल कियो देखने नइ छल तहिना ऑंखि फारि-फारि पुलकेँ देखऽ लगल। घुमैत-फिड़ैत सभ थाकि-हारि गेल। कातिकक दुपहरियाक तिखर रौद भेने गरमी बढ़ि गेल। छाहरिक कोनो असे नइ। भिजलाहा वस्त्र माथपर राखि हाथसँ पकड़ि झॉंह बना-बना हाथसँ पकड़ि सभ घुरिया कऽ बैसल। बैसले-बैसल लोक सभ गंगा महात्मक चर्च करए लगल। जेकरा जे बुझल-सुनल आकि मनमे फुराइ से बजै छल। तखने बड़की भौजी आ कुपहावाली काकीकेँ रहि-रहि कऽ मन हौंरऽ लगलनि। बोकरि-बोकरि भरली। गंगामे कखनो मरलाहा जीव-जन्तुकेँ भँसैत जाइत देखै तँ कखनो मुरदाकेँ, तहिना चारूकात जे घिनाएल देखै से परपंचे ने होइ। चनरदेवक मनमे गंगाक प्रति श्रद्धा-भक्ति आ आस्था छल ओहो कमए लगलै। कथा-पुराण आ साधु-संतक प्रवचनमे गंगा-महात्म पढ़ने-सुनने रहए ओ सॉंच छी की झूठ तइ ओझरीमे ओझरा गेल। तैयो चनरदेव मनमे सवुर बान्हि सोचए- जेतए चारू जुगमे लोक गंगा-महात्मकेँ मानैत आएल छथि, तेतए हमरा मानने वा नइ मानने की हएत। एतेक लोक जे गंगा नहाइए, की ओइ पुण्य-प्रतापे सभ स्वर्ग जाइए? आ जे गंगा नइ नहा पबैए ओ की नरक जाइए? तखन तँ केहनो कुकर्म करि लिअ आ गंगा नहा स्वर्ग चलि जाउ, सुकर्मक कोनो जरूरते नइ! तही बिचमे सुगापट्टीवालीकेँ बड़बड़ैनी धेलकै। अकचकाइत वीरपुरवालीकेँ कहलक- “दीदी, एगो बात फरिछा कऽ बुझा दथु। जखन गंगा अपने एते घिनाएल अछि आ लोक सभ नहा कऽ अपन पाप धोइए तँ एतेक गंदकी आ पापकेँ गंगा मैया केतए जमा करैए?” वीरपुरवाली काकी सुगापट्टीवालीकेँ समझबैत कहलखिन- “देखै नइ छहक गंगा मैयाकेँ कोनो बखारी आकि गोदाम छै जे ओइमे जमा राखत।” सुगापट्टीवाली- “तखन गंगाजी अपना पेटमे सोन्हि–मोइन बना रखैत हेती।” तैपर वीरपुरवाली बजली- “हे हइ, एना अनरगल किए बजै छहक! गंगा मैया एहेन नइ छथि जे एतेक रास पाप आ गंदकीकेँ जमा करत। कथीले करत आ किए जमा करत। पाप आ गंदा तँ लोक करैए। जे करत से ने भोगत। ओ अपने ने पाप करैए आ ने गंदा। सभटा लोककेँ बॉंटि दइए।” सुगापट्टीवाली- “से केना दीदी। एतेकालसँ छी, कहॉं किछु बँटैत देखै छी गंगाजीकेँ।” वीरपुरवाली काकी बजली- “हइ सुगापट्टीवाली, तोरा सनक सोझमतिया जनानी अहू जुगमे अछि से हम नइ बुझने छेलौं। एक गाममे जनमलह आ दोसर गाममे गिरथाइन बनल छहक से ओहिना। देखहक गंगा केना पाप आ गंदगीकेँ बँटै छथिन। जेते लोक गंगा नहा कऽ पाप धोइए ओ अपना-अपना मनक भरम दूर करैए। जखनि ओ डुबकी मारि डिब्बामे जल घरक खातिर भरैए, जइ जलसँ लोक तन-मन शुद्ध करैए तखने जेकर जे पाप केलहा रहै छै, तेकरा गंगा बॉंटि दइ छै।” बिच्चेमे कुपहावाली काकी आ बड़की भौजीकेँ विषयसँ भँसियाइत देखि सावित्री माए बजली- “बौआ चनरदेव, हम तँ कान पकड़ै छी एहेन करम जिनगीमे फेर कहियो ने करब। ई तँ देखौंस केलौं। असल गंगा तँ सबहक मनेमे बसैए। जे कियो देखबे ने करैए। कहबीओ छै, मन चंगा तँ कठौतीमे गंगा। रहल गंगा नहा कऽ पाप धोअब आ पुण्य लूटब। तँ जखन पाप करबै ने करब तँ पुण्यक कोन काज अछि। जखन करमकेँ धरम बूझि करब तखन अधरम किए हएत। जे जेहेन करत तेकर फलो तँ तेहने ओकरा भोगए पड़त। हमरा बुझने ई सभटा मनक भरम छिऐ।” गप-सप्पक बीच दुपहरिया बितल कि तखने घर जाइए गड़ी धुधुआइत आबि गेल। सभ कियो गड़ीपर चढ़ि विदा भेल। टिशनसँ चलि जखन गामक सीमा कात आएल तखने सभ कियो तीन-तीन बेर गंगाजी केँ गोड़ लागि बाजल जे एहेन दिन नइ करिहह जे दोसर बेर आब कहियो गंगा नहाइले जाए पड़ए। कान पकड़ि-पकड़ि जिनगी भरिक लेल गंगाजी सँ माफी मांगि लेकक। डोमक आगि जेठरति कक्काक मृत्यु सए बर्खक ऊपरे उमेरमे भेलनि। सौंसे गाममे सोग पसरि गेल। गाममे दलमलित हुअ लगलै जे आइ गामक मालिकक अन्त भेने एकटा युगक अन्त भऽ गेल। जेठरति कक्काक धाक जहिना गामक मानैत तहिना आदरो करैत। मुइला पछाति समुच्चा गामक लोक दाह संस्कारमे पँचकठिया दइले पहुँचल छल। भीड़ बहुत मुदा अखनि धरि अछियामे अागि ने पड़ल छल। लोक सभ थाहा-थाही ठाढ़, कियो बैसल कनफुसकी करैत आ किछु लोक निगुन भजन गबैत रहए- “हंसा उड़ि गेलै भम्हरा बनि हे...।” “सभ दिन होत ने एक समाना...।” कियो ई गबैत- “आया है सो जाएगा राजा रंक फकीर...।” भिनसरसँ दुपहर भेल जाइत रहै। अखनि धरि लोक काेन आशामे समए बीतबै छल, तेकर कोनो था-पता नहि छल। जखन बैसल-बैसल लोकक मन अगुताए लगलै, भूखसँ पेटमे बिलाइ कुदऽ लगलै। तखनि जा कऽ विलमक कारणक पता लगबऽ लगल। मलिकपनाबला बात, के हिम्मत करत जे आगू भऽ पुछैले जाएत। अपनामे गुदुर-फुसुर करैत रहए। कियो आगू जेबे ने करैत रहए। तखने रौदी बाबा पहुँचला। पहुँचिते बजला- “अखनि तक अछियामे आगियो ने पड़ल। किए एते अबेर भेल। धिया-पुता सभ भूखे लहालोठ होइए!” सभ कियो रौदी बाबाकेँ कहलकनि- “अहाँ बुढ़ो-पुरान छी आ गामक अनुभवी सेहो छी, से कनी झबदे पता करियनु जे...।” अगुताएल रौदी बाबा लोकक बीचे-बीच टाटीपर राखल मुर्दा लग पहुँचला। ओइ ठाम जेठरति कक्काक परिवारक सभ लोकक संग पहुँचल कुटुम सभ अपनामे कहा-सुनी करै छल...। लगमे जा रौदी बाबा जोरसँ पुछलखिन- “यौ, अहाँ सभ लाशकेँ जरबैले एलौं हेन आकि गंगा सेबैले?” जेठरति कक्काक जेठका बेटा- रूपचन्द- कहलकनि- “दादा, सभ किछु तैयार अए, मुदा बौकू डोमक इन्तजारमे छी।” रौदी बाबा पुछलखिन- “से किए?” रूपचन्द- “लोक सभ कहैए जे असमसान घाटपर डोमक हाथक आगि कीनि लाशकेँ जरौलासँ मौक्षक प्राप्ति होइ छै तँए कनी बौकू डोमक बाट तकै छी।” रौदी बाबा बजला- “अहीले एते अबैर होइए आकि आरो कोनो बात छह? गाममे डोम, सभ कियो भोरसँ आएल अछि ओकरा कानमे खबरियो ने छै।” रूपचन्द- “नइ हौ काका, काल्हिए बौकू समधियौना गेल रहए, खबरि भऽ गेल छै। ओ जखने-ने-तखने पहुँचैएबला अछि।” रूपचन्दक बात सुनिते लगमे बैसल शिवलाल काकाकेँ अनरगल लगलनि। तड़बाक लहरि मगज धरि पहुँच गेलनि। जोरसँ बाजए लगला- “गामक एतेक बड़-बुजुर्ग जे आएल छथि ओ बुड़िबके छथि की! जखनि एते बुझै छहक जे डोमक हाथक आगि कीनिके ओइ आगिसँ मुखागिनी करब तँ पहिने डोमकेँ बजा लइतह। पछाति लोक सभकेँ बजैबतह। भिनसरसँ दुपहर भऽ गेल, सभ लोक भूखे-पियासे लहालोठ भऽ रहल अछि आ बौकू डोमक अखनेा कोनो था-पता नइ छह!” कनीकाल रहि फेर बजला- “आइ-काल्हिक नव-नौतार सबहक नव-नव कानून। जखनि जे मनमे फुड़ैए सहए करऽ लगैए! नव-नव जोगीकेँ भरि देह टीक्का!” शिवलाल कक्काक तमसाइत बोल सुनिते लग अबऽ लगल। सभकेँ होइ कखनि झबदे आगि पड़ै जे लोक पँचकठिया फेकि नहा-सोनाइले चलि जाएत। मुदा अखनो धरि बौकू डोम नहि पहुँचल। सीताराम दास लग आबि बाजल- “हौ रूपचन्द मालिक, कनीले एते लेट भऽ रहल छै हौ?” बाजि सीताराम मने-मन सोचए लगल। जखनि बुझै छिऐ जे डोम समाजक लेल एते पैघ लोक छै, बिना डोमक आगिसँ लोककेँ मरलोमे मुक्ति नइ भेटै छै, तखन डोमकेँ एते निच्चा किए बुझै छिऐ...। जखनि कि जीबैतमे सभ डोमसँ छूबाइ छी, आ मुइलापर पैघ बुझै छी...। डोमो तँ अही समाजक लोक छी, मुदा गामसँ हटि कऽ वेचारा सभ गाममे बसैए। सभ कियो ओकरा अछोप बूझि आइ धरि लग बैसि खेनाइ तँ दूर जे बातो ने करैए। एक लग्गा फटिकेसँ पुछ-पाछ करैए...। ऐबेरमे कोन असोगरज लगि जाइए...। रंग-बिरंगक बात सीताराम कक्काक मनमे नचऽ लगलनि। मिथिलाक सामाजिक पद्धतिक बनाबटपर धियान गेलनि। जाइते मन जेना आरो चौरफ वौअए लगलनि। बेवस्थाक जलियाएल रूप सभ सोझा अबऽ लगलनि। किछु बाजि नइ रहल छला। तखने बौकू डोम हहाएल-फुहाएल आएल। बौकू डोमसँ कीनल जाएत तेकर मोल-जोल हुअ लगल। पुछलापर बौकू बाजल- “जेठरति काका गामेक मालिक छला तँ हमरो मालिक। हमरा कोनो लोभ-लालच नइ अछि मुदा दान-दछिनामे जे देब से खुशी-शुखी दऽ दिअ।” रूपचन्द एकटा चानीक सिक्का दऽ आगि कीनऽ आगू बढ़ला। तखने शिवलाल काका, रौदी बाबा आ सीताराम दास अपनामे विचार बजला- “ई उचित नइ भेलऽ रूपचन्द। जेकरा खातिर भोरसँ दुपहर भऽ गेल, असमसान घाटपर लाश पड़ल अछि, तेकरा अहाँ एगो चानीक सिक्का...! जेठरति काका गामक मालिक छला, ओ एते अरजि देने छथि जे तीनो पीढ़ीमे नइ सधत। अपनो समांग बूझि बौकूकेँ जे देबै से दियौ, तखन ने बौकूओ अप्पन बूझत।” सएह भेल। मुखागिनी भेला पछाति सभ काजक अन्त करैत सभ कियो आगूए तकैत विदा भेल। निगुन गौनिहारकेँ जेना बिसवास आरो बढ़ि गेलनि। पुन: गाबए लगला- “सभ दिन होत ने एक समाना....।” स्वर्गक सुख कोसी नदीक छीटपर बौकू सदाय खोपड़ी बना रहै छल। अगल-बगलमे मुसहर सभ सेहो काश-पटेरक खोपड़ी बना रहै छल। कोसीक कटनियाँ भेने मुसहरी टोल उजरि गेल। माघ मासक समए। वस्त्रक अभावसँ जाड़क मारल बौकू ठिठुरैत घूर तपै छल। जखने घूरमे आगि जरेलक आकि बौकूक बेटा-बेटा सटि कऽ बैसि आगि खोरि-खोरि तापए लगल। पत्नी बलबावाली खोपड़ीसँ बकड़ी निकालैत जोरिसँ बजली- “रातियोँ सिदहाक अभावमे सभ कोइ भुखले सुति रहलौं, आब दिनोमे बाल-बच्चा की खाएत। भूखसँ तरपि की बाल-बच्चाक संगे कोसीमे डुमि मरब।” बौकू सदाय बाजल- “भोरे-भोर एहेन अशुभ बात नइ बाजू। शीतलहरी भरि कोनो तरहेँ परान बँचाउ। परान बँचत तँ लाखो उपए करब। कनीको समए फरिच हेतै तँ खाइ-पीबैक जोगाड़ करब। एक तँ कोसी मैयाक मारल छी दोसर भगवानो बेमुख अछि।” शीतलहरीक कोनो ठेकान नइ अछि मुदा भूख तँ समैपर लगिए जाइए। बेटा-बेटी रातिमे किछु ने खेलक। भिनसर होइते जोर-जोरसँ खाइले मॉंगए लगल। बलबावाली पड़ोसीसँ दू सेर पँचि आनि घूरक आगिमे पका-पका बेटा-बेटीकेँ देलक। अपनो दुनू परानी खेलक। ऊपरसँ पानि पीब-पीब भूख मेटेलक। कुहेस कमिते रौदक दर्शन भेल। बलबावाली पतिकेँ कहलकनि- “दू दिनसँ सुखल रोटी आ अल्हुआ खा कऽ कोनो तरहेँ दिन कटलौं मुदा आइ भातक कोनो जोगाड़ करू।” बौकू जाड़क कोनो परवाह नइ करैत धोतीक तर-ऊपरा ओढ़ैत बाजल- “सब मिलि चलू परसा चौरीमे धानो लोढ़ब आ घोंघी-डोका सेहो बीछि आनब।” साबीकेसँ परसा चौरी सिंगरा-बेलौड़ आ सतराज धानक नामी अछि। चौरी पहुँचिते बौकू बेटा-बेटीकेँ कहलक- “तूँ सभ घोंघी-डोका बीछि-बीछि छिट्टामे राख आ हम दुनू गोरे धान बीछै छी।” दुनू गोरे मिलि करीब पसेरी भरि धान लोढ़लक। बेटा-बेटी घोंघी-डोका छिट्टामे उठौलक। जखन घर चलैले तैयार भेल तँ बौकूक पत्नी बजली- “सुतैले एकेटा गोनरि अछि। किछ नार सेहो नेने चलू। बिछौना मोटसँ देबै। ” नार बीछैकाल बौकू एकटा अढ़ैया भरिक काछुकेँ देखलक। देखिते बौकू काछुकेँ उनटौलक। काछुकेँ उनटा देने भागल नइ होइ छै। उठा कऽ तौनीमे बान्हलक। धान आ नार पत्नीक माथपर देलक आ अपने बौकू घोंघी-काछु लऽ बेटा-बेटीकेँ संग केने विदा भेल। घर पहुँचिते धान रौदमे पसारक। पड़ासीसँ उखरि-समाठ आनि धान-कुटि कऽ चाउर तैयार केलक। कौछक मासु बना रान्हलक। दोसर बर्तनमे भात रान्हलक। सभ कोइ संगे खेनाइ खाइले बैसल। जाड़क समैमे सिंगरा-बेलौड़ आ देसहरिया धानक चाउरक लाल-लाल भात तेलगर आ स्वादिष्ट होइते अछि। तैपर सँ कौछक मासु अपने तेलसँ ऐंठल-ऐंठल, भातपर पड़िते भातो तेलसँ तर-बतर भऽ गेल। बौकू बमरोटिया हाथसँ भात-मासु बँटबो करैत आ खेबो करए। खेनाइ अधपेटा भेल तँ पानि पीब पियास मिझा नहमर सॉंस लैत बाजल- “एहेन खेनाइ भागशालीए लोक खाइए। राजा-महराजाकेँ नशीव नइ होइ छै। ई खेनाइ देखिते केहेन-केहेन साधु-बबाजीकेँ सेहो मन ललिचा जेतइ।” भोजन केलापर बौकू घूर पजारि देह टनकौलक। बलबावाली अरामसँ सुतैले ठेहुन भरि नार बिछौलक आ बाल-बच्चाक संग ओइपर सुतल। आ ऊपरसँ गोनरि ओढ़ि लेलक। कनीकालक पछाति सबहक देह गरमा गेलै। बलबावाली हाफी करैत पतिकेँ कहली- “औझका मेहनत साफल भेल। एहेन बिकट समैमे एहेन खेनाइ आ एहेन ओढ़ना बिछौना मिलल।” नीक अवसर देख बौकू बाजल- “ई छी स्वर्ग सुख। एहेन सुख रजो-रजवारकेँ सुन्दर महल आ सजल पलंगपर नइ भेटैए। अपना देखियो तर नारायण आ ऊपर गोविन्द छै आ बीचमे बौकूक परिवार अरामसँ सुतल छै। नइ कोनो डर-भर छै आ बगलेमे कासी मैयाक दिन-राति पहरा पड़ै छै।” मिथिलाक माटिमे पसरल कहबी (संकलनकर्ता- राम विलास साहु) एक तँ राकस दोसर नोतल। कुमहरपर सितुआ चोख। चट मंगनी पट बिआह। मंगनी बरदक दाँत नै देखल जाइत। खेत खाए गदहा मारि खाए जोलहा। मुँह दुबराक कनियाँ सबहक भौजाइ। बाबाजीक बेल हाथे-हाथे गेल। पढ़ल सुग्गा बौक बनल। हगबा मानए बघबाक डर। डूमि कऽ पानि पीबी तँ एकादशीक माइओ ने जानए। चोर-चोर मसिऔत भाय। सड़लो भुन्ना तँ रेहुक दुना। सखुआ सड़ै तँ खैर घमै। पिआस ने जानए धोबी घाट, प्रीत ने जानए ओछी जाति। नीन ने जानए टुटल खाट, चोर ने जानए गंगा घाट। धर्मक सोरि पताल तक। लोठगर देह सिलौटी लेने जाए, दलकल-दलकल नैहरा जाए। बनियाँ काटे चिन्हारकेँ, कुकुर काटे अनचिन्हारकेँ। खाइले लाइ नै, मुँह पोछैले मिठाइ। छोट खिखिरकेँ मोट नांगरि। भोज भारी दालि खेसारी। हाकीम छोट इजलाश भारी। ऊपरसँ फीट-फाट निच्चाँसँ सिमरिया घाट। मारि कम बपहारि बेसी। अपने खाए दोसरकेँ लजाए। कोढ़िया बरदक फूंफकार भारी। हँसि कऽ बजै नारी तीनू कूल बिगाड़ी। भाए-भैयारी भैंसी सींग जखने जनमल तखने भीन। छोट गहबरमे नमहर पूजा। भादवक ओल किछु खाए राजा किछु खाए चोर। कान तँ सोन नै सोन तँ कान नै। आन्हर गुरु बहीर चेला मांगे गुड़ दैत ढेला। पाप नै पापी लजाए आँखि मुनि गंगा नहाए। भजन कम हरिबोल बेसी। चालि चली सादा निमहए बाप-दादा। अण्डी-बघण्डी गाछ भेल सभ पाखण्डी महन्थ भेल। निच्चाँसँ झर ऊपरसँ भर तेकरा नै कोनो डर। माल केकरो कमाल करए कोइ। बकरी करए पाैज तँ महत्तमानि कहै हमरे गड़ियबैए। जुन्ना जरि गेल मुदा ऐंठन नै जरल। आँखि बन्न डिब्बा गाइब। भरिदिन मलहा पानिमे नहाइक फुर्सते नै। जनमल बेटा मरल जाइ दोसर ले ओझाइ करए जाइ। मालिककेँ लेबाने नै चोर करए दौनी। छुतहर कहीं घरहर होइ। अरजै काशी भोगए बिसनाथ। देहातक दालि-भात शहरक सीता-राम। बहिरा नाचए अपने ताल। गज भरि नै फाड़ै थान भरि हारै। तेल घटैत गेल नाच बढ़ैत गेल। जे रोगीकेँ भाबए से वेदा फरमाबए। डाक्टर लग गेने दुख ओझहा लग भूत। नंगटे नहाएब तँ गारब कथी। चोरबा कमाएल सभ खाए असगर चोरबा जहल जाए। अनकर दालि-चाउर अनकर घी हमरा परसैमे लगैए की। चाउर-दालि केकरो घी परसै दलाल। जड़, जमीन, जोरू जोरकेँ नै तँ केकरो औरकेँ। चोरक आगू ताला की बेइमानक आगू केबाला की। घसटन विद्या लपटन जोर नै किछु तँ थोड़बो थोड़। कनफूकासँ चुल्हिफूका नीक। गाए बिकाएल चरवाहि तरे। पानिमे मछरी नौ-नौ कुटिया बखरा। बैलक बैल गेल नौ हाथक पगहा संगे गेल। धनि छी अहाँ धनि छी हम चलै छी अहाँ निहारै छी हम। दस सेरे नै अगराइ दस समांगे अगराइ। लगमे कचहरी घूस दऽ बेगार। धूर्त्तसँ मूर्ख नीक। मन हर्षित तँ गाबी गीत। सौ चोट सोनारक एक चोट लोहारक। खाइक मन अपना तँ गोसाइ देलक सपना। बारह बापूतमे तेरह हुक्का तइमे उठै धक्कम-धुक्का। पसेरी भरि नै खाए सेर भरिले रूसल जाए। अनेर गाएक धरम रखबार। केकर खेती केकर गाए कोन पापी रोमए जाए। नमरी जाए तँ जाए मुदा दमरी नै जाए। अपने करनी भेलौं बतरनी। उ दिन कहिया एतै जे पुतोहु कहत बौंग्मरना। गै मौगी तोहर अँगने केत्तेटा। अपन कनही चल गै खोनही। कनही गाएक भिन्ने बथान। अन्हरा दुसए डिठराकेँ। अपना ले लल साग तोड़ए चल। घरमे भात तँ पड़ोसनी पकड़ए हाथ। ऐ बेटबासँ नै पोताक आश। हरबरी बिआह कनपट्टी सेनुर। बड़-बड़ जन भाँसल जाए गदहा कहए केते पानि। अपन हारल बहुक मारल कियो केतौ नै बाजैत। झगड़ा ने दंग चुन-तमाकुल बन्न। सत्तरि मूस खा बिलाइ हज करए जाइ। दूधगरि गाएक लथार सहए पड़ै छै। नदीकातक चास बैरनी लगक बासक कोन ठीक। वर भेल बुड़िबक तँ जैतुक के लेत। सात रार सात पेट सात बाभन एक पेट। मनुख एक रंगा, जाति बहुरंगा। मिथिला मैथिलीक झगड़ामे मैथिली डूमि गेल सवर्ण आबि सुरूज भेल। बुड़िबक केर धन भेल तँ कबिलाहा कहीं उपास पड़ए। रूसल कनियाँ दूध दूध-भात नै खाए डोका तिमल ले घुसकल जाए। हालमे भेल बबाजी तँ दालिकेँ कहलक बैकुण्ठी। लब लौकार बूढ़ बौकार। 100. आपे पुत्ता बापे खाए एक्को हिस्सा बाहर ने जाए। 101. सौ रत्ती सोना नै नीक एक रत्ती तकदीर नीक। ललन कुमार कामत- ललमनियाँ, सुपौल। गोल इंग्लिश गार्डेन निर्मली। भगवाने भरोसे कोसीक कछेरमे एकटा छोट-छीन गाम- छोटपुर अछि। छोटपुरमे अटकुदास नामक एगो मध्यमवर्गीय किसान छथि। कोसीक बिकराल रूपसँ ग्रामीण लोकनि रेहल-खेहल छथिये। सभ साल कोसीकेँ झेलैत आएल छथि। अटकुदास धार्मिक प्रवृतिक लोक छथि। प्रकृतिक विपतिकेँ झेलैतो भगवानपर हिनका अनन्त आस्था छन्हि। अखार मास आएल। कोसीक मिजाज बिकराल हुअ लगल। लोकसभ आन साल जहाँति तैयारीमे रहथि। मुदा ऐबेर कोसी अपन बाढ़िक अनहोनी-घण्टी शुरूहेसँ बजबऽ लगल। लोक सभकेँ भनक लागल जे कुसहा-बान्ह टुटि गेल! सौंसे दिगारिमे आतंक जकॉं मचि गेल! गाम-घरमे बाढ़िक पानि पसरए लगल। सभठाम हाहाकार मिच गेल! सभ कियो अपन-अपन जानमाल लेने ऊँचका स्थान दिस भागऽ लगल। जगह-जगहपर फँसल लोककेँ बँचबै खातिर नाह चलए लागल। सभ कियो घर-बार छोड़ि देलक मुदा अटकुदास अपन घरक छतपर चढ़ि कऽ भगवान-भगवान करए लगला। भीषण बाढ़िक चपेटमे आबि सौंसे गामक घर-मकान डुमऽ लगल। जइ घरक छतपर अटकुदास ठाढ़ छला सेहो नकसकाइत-नकसकाइत डुमि गेल। मुदा अटकुदासकेँ अखनो अपन मालिकपर अटुट भरोष छनिहें, ओ अपन घर नै छोड़लनि। गामक एकगोटे भसाठीबला लकड़ीकेँ जोड़ि डोंगा-नाव बना अटकुदासकेँ बँचबैले आएल। घर लग आबि सोर पाड़ैत कहलखिन- “भागऽ हौ अटकुदास! तूँ किए एतए अँटकल छहक? भागऽ नै तँ जान नै बँचतऽ।” अटकुदास घरेपर सँ बजला- “तूँ सभ भागि जा, हमरा किछु नै भऽ सकत। हमरा भगवानपर भरोस अछि। वएह हमरा बँचेथिन।” नाहबला अपन जान बँचबैत आगू बढ़ि गेल। बाढ़िक स्तरमे आरो वृद्धि होएत गेल। अटकुदासक घरक छतपरसँ आब पानि बहए लगल। एकटा सरकारी आदमी मोटर नाव नेने फँसल लोक सभकेँ ताकि रहल छल। अकटुदासकेँ अझप्पे देखि चकरि कऽ सोर केलक- “के छहक! आबऽ हमरा नावपर बैठ जा, भीषन बाढ़ि आबि रहल छै, जान बँचाब।” अटकुदास हिनको वएह उतर देलखिन- “तूँ सभ भागि जा, हमरा किछु नै भऽ सकत। हमरा भगवानेपर भरोस अछि वएह हमरा बँचेथिन।” नावपर आरो किछु लोकसभ बैसल छल, नावबला आगू बढ़ि गेल। बाढ़िक पानि आरो बढ़ैत गेल। कनीकालक पछाति फेर, एकटा हेलीकेप्टरबला आएल। हिनका देखिते ऊपरसँ रस्सा खसबैत चिकरि कऽ अबाज देलकनि- “आब! रस्सी जोरसँ पकड़! हम खींचै छियौ। हम तोरा सुरक्षित जगहपर पहुँचेबौ।” अटकुदास हिनको नकारि देलखिन- “तूँ सभ भागि जा, हमरा किछु नै भऽ सकत। हमरा भगवानेपर भरोस अछि, उवेह हमरा बँचेथिन।” हेलीओकेप्टरबालकेँ हारि कऽ जाए पड़ल। अन्तमे अटकुदासकेँ स्वर्गक रस्ता देखए पड़ल। जब भगवानक दरबारमे हाजरीक समए आएल। अटकुदासक मनमे भगवानसँ जे उल्हन-उपराग रहनि से कहऽ लगलनि- “हे नाथ! हमरा अहॉंक प्रति अटुट बिसवास छल, अटुट भरोष छल जे अहॉं हमरा बँचबै खातिर निश्तुकी आएब। मुदा एना केना भऽ गेल, अपने हमरा किए नै बँचेलौं?” भगवान जबाव देलखिन- “तोरा आब केते मदति हमरासँ चाही? दूटा नावबलाकेँ हमहीं भेजलौं तूँ नै एलँ, एकटा हेलीकेप्टर बलाकेँ सेहो भेजलौं, तूँ नै एलँ। बाजऽ, आब आरो केते तोहर सहायता हम करब।” दहेजक मारि एकटा समए छल जब शिवचरणकेँ चारि बिगहा खेत, जोड़ भरि बरद, कटही गाड़ी आ माल-भैंस सँ दुआरि भरल-पूरल रहै छल। हिनकर जिनगीओ खेितएमे, खेती करैत बीतल अछि। खेतक उपयोगी सभ समान, जेना हर, पालो, चौकी, कोदारि, खुरपी, हँसुआ, इत्यादि, एखैनो दुआरिपर पसरल अछि, मुदा शिवचरणकेँ आब खेत नै बँचल। खेतक बिनु सभ ओजार झाम बुरैए आ बीज खेने जाइए। एगो बुड़बा नेङरा बरद टुटलाहा लाधिपर टकटकी लगौने ताकैत रहैए। कटही गाड़ीक तक्था सरैककेँ ख्ास्सल जाईए। एकटा चक्का माटिमे धसल आ दोसरक डेना सभ छुटि-झरिकेँ बिखरल जाइत अछि। शिवचरणकेँ तीनटा बेटी रामेशरी, कालो, पारो आ तैपरसँ बिरजू, पनरह सालक सभसँ छोट बेटा अछि। शिवचरण आए बिना जथा-पथाक लोकमे गिनल जाइत अछि। एकर कारण अछि तीनटा बेटीक बिआह। सभटा बेटीयो तरे-उपरे छेलनि तँए बिआहाे आ दहेजो तिलकक बोझतर दबाएकेँ लकीर सँ फकीर बनि गेल अछि। दहेज! ई केहन प्रतिरोधी प्रथा छी जेकर शिकार शिवचरणेटा नहि कतेक आरो लोक भेल अछि। मोल-भाव तँ माल-जाल आकि चीज-बीतक काएल जाइये। आऽ जाहि बस्तुक दाम प्राप्त होइत अछि, ऊ चीज कीननिहारकेॅं सौंप देल जाइत अछि। मुदा ई केहन प्रथा छी, जेकर मोल-भाव केलहा रकमो, आ कन्या रूपी बस्तुओ, एके आदमी नेने जाइए? परिवारमे एकटा आबनिहारि बहूक माने होइत अछि, काम-काजमे आ परिबारीक उपार्जनक बास्ते एकटा अतिरिक्त श्रमिक। दोसर दिश, कनियॉंक पिताक परिबारमे एकटा कमाऊ सदस्यक खगता भऽ जाइत अछि। छति तँ कनियॉंक पिताकेँ होइत अछि, मुदा छतिपूर्ति बड़क बाप आकि बड़केँ प्राप्त होइत अछि। दहेज! कोनो सहेजकेँ राखैक प्रथा छी? शिवचरण पचपन बरिखक आ हिनक पत्नि पार्वती पचासक अबस्थामे छथि। हिनका एके बिगहा जमीन बचल अछि। पनरह बरिखक एकलोता बेटा बिरजू बृद्ध माए बापक बृद्धा-वस्थाक पहिया खीचैले पनपिते रहिन की असहनीय कर्जाक बोझ तरमे तेहेनकेँ दबाए गेल, जेना उनार भेल कटही गाड़ीक पाछॉं असगर बहलवान दबिकेँ फर-फराए उठैए। तीन महिना पहिले छोटकी बेटी पा़रोकेँ बिआह सम्पन्न केलखिन, जैमे कर्जा-बर्जा भऽ गेल रहिन। तैपरसँ, एे बेरूक गहुँमक खेती तेहेनकेँ धोखा देने छल जे गफाे भरि फसल घर नै आएल छलनि। माध फागुनमे, जब फसल नीककेँ पकल जाइत छल, पछुआ झँाटि, बिहारि आ पत्थरक बज्रपात तेहेनकेँ भेल छल, जे सभ किसानक फसल माटिया माटि भऽ गेल रहिन आ काइल-धाइल खेती नोकसान भऽ गेल छल। ओहुना शिवचरणक घरमे अन्न पानिक दिक्कत चलिते रहैत छल। मुदा एहि साल सनक दिक्कत, साइते कहियो भेल रहिन। ओनातँ, बहुतो लोक गाममे ओहने गरीबीकेँ झेल रहल अछि। सभक अपन जीबैक तरीका अछि। शिवचरणक घर छ मास चाउर आ छ मास गहुमक सहारे कटैए। कहलो जाइए, गरीब लोक भगवाने भरोसे जीबैए। मुदा भगवानक ऑंखि कख्खैन केकरा पर टेंड़ भऽ जाइत अछि, ई कोइ बुझि सकैए। ऐ बेरि धान महराज तँ अप्पन पारि पुरेलखिन, मुदा गहुम महराज खिसिया गेलखिन। जन मजदूर सभ परदेश आकि शहर खटैले चलिगेल। मुदा शिवचरण ऐ बुड़हारीमे कते जाएत आ की करत? सोचएपर मजबूर अछि। बिकना, नन्हीया आ चौठिया ढेरबे सँ पंजाब खटैत अछि। तीनुटा गामक सभसँ गरीब घरक रहिन मुदा जहियासँ परदेश खटै लागल, गरीबी हिनका सभक घरसँ भागि गेल। हिनका सभक जथा, पुजी आ नीक लता-कपराकेँ देखि कते लोकनिक मुॅंह ललिया जाईए। बिकना आइये काल्हमे पंजाबसँ एल अछि, जे बेदरामे शिवचरणकेॅं चरवाही कैरकेँ आ अन्न-पानि खाएकेँ पोसल-पालल गेल रहिन। मांगि-चांगि केँ आकि केकरो देलहा, अंगा पेन्ट पहिरैत छेलिन। कतेक-कतेक दिन तकि, फाटल-चिटल अंगा, पेन्टक बिचला सिलाई टूटि जाइत रहिन आ भालरि सन डॉंरमे फर-फर करैत रहिन। ततबे नै, डॉंरसँ मटिया-माटि भेलहा कच्छा, बिस्टी जँका झूलैत रहै छल। मुदा पहिनुक बिकना, आ आजुकमे अन्तर भऽ गेल अछि। हिनकर रोनक आ चालि-चलन देखिते बनैए। जब गाम आबैए तँ लक्स सुजुकिकेँ लबका जँघिया, लबका गंजी आ लबे लुँगी पहिरकेँ, कांखमे तीन बैण्डक फिलिप्स रेडियो लऽकेँ फुल भाइसमे, दहिना हाथे लुंगी उठाएकेँ तेना पकरैए, जेनाकी तरका सुजूकिक जँघिया ओहिना देखाइत रहैए। इ पहिराबा देखिकेँ कतेकोक ऑंखि पथराइत रहैत अछि। जब जब बिकना गाम आबैए, शिवचरण-पार्वती दुनु बेक्तिक भेंट जरूर करैए। एहि बेरूक शिवचरणक लचारी के नै जानैत अछि? बिकना अपन सलाह आ सहानुभूतिकेँ प्रकट करैले आएल आ कहै छैन्ह- “ददागौ, बिरजू कक्काकेँ ऐबेर हमरा संगे पंजाब कमाईले जाए दहक।” पार्वतीकेॅं ई बात पसिन नै परलनि। ओ बजली- “एखैन! ऐ अजोह बेदराकेँ? नै रौ बौआ, जो तुँहें कमैहँ गामे मऽ छै तँ कनु बैठल रहै छै? खेती-बाड़ी, हर-फार तँ कैैरते छै। असगर तँ बड़हसपतियो झूठे होयत छै। एकरा बाबू जीसँ आब नै सम्हरै छै।” मुदा शिवचरणक बिचार अलग रहिन। ओ अपन लचारीक जानैत रहथि जँ दु पाएक आमदनीक जोगार नै हेत तऽ आब इज्जत नै बचत। बजलखिन- “कमौत नै तऽ ऐ खेतके ओगरनेसँ किछु नै हाएत। उबजा-बारि साड़हे बाइस अछि। एकर भरोसे काज नै चलबला अछि।” हँमे हँ भरैत फेरि शिवचरण बाजे छथि- “हँ रो बिकना हमर मन छौ नने जाहि तू अपने संगे। नीक काम धराए दियहनि।” टालमटोल हैत बिरजूकेॅं पंजाब जाइले सहमति बैनिए गेल। पार्वतीकेॅं बेटा मोह मे मन घबराइत रहेन मुदा मानए परल। भड़ा खर्चा बिकने गछलक। जाएक दिन एल। पार्वती दू किलो खेड़हि बेचकेॅं बिरजू बास्ते बटखरचा बनेलखिन। दरभंगा सॅं अमृतसर के तीन बजे दुपहर मे ट्रेन अछि। निर्मली सॅं छ बजिया भोरका गाड़ी पकरैले पाचे बजे सभगोटे बिदाह भेलनि। बिरजूकेॅं स्टेश््रन छोरैले पार्वती माथ पर बेग आ हाथमे बटखरचाकेॅं पन्नी नेने बिदाह भेली। बिरजूओ गोंसाइकेॅं गोर लागि, मोहल्लाकेॅं बूढ पूरानकॅं पाएर छुबैत आगा बढल। शिवचरणो संग लागल बिदाह भेलनि। बाट भरि बिरजूकेॅं समझाबैत बुझाबैत, “असगर कतौ नै निकलिहन। मन लगाएकेॅं काम करिहेन। केकरोसॅं झगड़ा झटि नै करिहेन। टेलिफोन करैत रहिन।” इत्यादि तरहसॅं सिखाबैत स्टेशन पर पहुॅंचल। ओमहर पार्वतीकेॅं मन बेथित छैन, ऑंखि डबडबाएल अछि मुदा नोर भितरे भितरे पिबैत रही। साड़ीसॅं मुॅंहकेॅं झॉंपने, मनक बेदनाकेॅं मनेमे दबेने, बिरजूकेॅं स्नेहक दृष्टिसॅं देखैत, गाड़ी खुलैकेॅं इन्तजार कैर रहली हेन। कनीए कालकेॅं पछाति गाड़ी स्टेशनसॅं ससरे लागल, पार्वतीेकेॅं मन आउर बिहल होयत गेल। जेना दुधारू गायकेॅं लेरू दुध पिलाकेॅं पछाति नंगरी ऊठाएकेॅं मल्लेछा मारैत जब नजरिसॅं ओझल भऽ जाइए आ ओम्हर गाए कान खड़ा कैर बोमि दिए लागै अछि। तहिना पार्वतीकेॅं मन होइय कानी, मुदा सोचै छथिन्ह जे बेटाकेॅं सामने कानब त बेटाकेॅं मन दुखी भऽ जाएत। गाड़ी रेस पकरै लागल, एकबरि फेरि बिरजू अंतिम झलकले माए पिताकेॅं तरफ ताकलक। गाड़ी आगा बढैत गेल आ पार्वतीकेॅं धैरजकेॅं बान्ह टुटैत गेल। अदृश्य होयत गाड़ी परसॅं नजरि घुमि आएल आ पार्वती भोकारि पारि केॅं काने लागली। जेठक महिना आएल। समएसॅं बरखा हुए लागल, आ किसान सभ रोपनीमे भिर गेल। शिवचरणो एकटा बरदक भजैती हरसॅं काम चलाबे लागल। एक दिन छौड़ि एक दिन हरकेॅं पार होयत रहेन ओयसॅं कतए सम्हरत? मुदा रहथि असगरे। अवस्थो हिनकर किनारे पकरने जाएत रहेन। चिन्ता फिकिर, तैपरसॅं खान पान मे कमि, देखैमे सत्तर सालक लागैत रहेन। सरीर सुखिके जेना जिमहरके सट्टा सन भऽ गेल रहेन। एक एकटा नस देह परहसॅं ऊपर अलैग गेल रहेन। पजराकेॅं, पीठकेॅं आ आनो हार परकेॅं मांस जेना बिलाए गेल रहेन। सचमे, अन्हरिया रातिमे कोय अनचिन्हार हिनका देखता त असलि भूत समैझ बेहोश भ जेता। ई तऽ जबानीकेॅं खाएल पीयल काया छैन्ह जे चिमठि आ करगर छैन। आय पनरह दिनसॅं भरि भरि दिन खेतमे काम करैत झूल झूल भऽ गेल अछि। जेना अन्न पानिसॅं भेंटे नै। सॉंझ होयत घर आबैये आ बोखार सॅं हुहुवाए लागैए। गामक बैद्य सॅं ईलाज करेलक मुदा कोनो फर्क नै परल। एक तऽ खेतिकेॅं तरक आ दोसर हाथ मुॅंठी खली। नीक डाक्टरसॅं ईलाज कतए सॅं कराएत? अहु हालत में, जाबे धरि देहमे शक् लागल शिवचरण खेतमे खून पसीना बहाबैत रहल। जेना तेना खेति सम्पन भेल। खेति सम्पन होयते, शिवचरण नीक जेका बीमार भऽ बिछान धरि लेलक। बिनु पायकेॅं ईलाज कतए सॅं हाएत? ओहुना भादो मासमे किसानकेॅं घर खगले रहैए। कर्जा केॅं नाम पर लोकसभ ठाड़हो नै हुए दैए। सेठ साहुकार आ पुजी पघा बला लोक बिनु गहना जेबरकेॅं बातो नै करैए। पारोकेॅं दुरागमन नै भेल रहेन तॉंय नैहरे मे रही। पिताकेॅं हालति देखि पारोकेॅं नै रहल गेली, ओ अपन बुट्ट आ हॅंसुली निकाएलकेॅं माए पार्वतीकेॅं दैत कहली “माए! इ ले, एकरा बन्हकी लगाकेॅं बाबू जीकेॅं ईलाज कर।” पार्वत़ीक मन एकर स्वीकृति नै दैत रहेन मुदा पतीकेॅं जर्जर अवस्थाक देखि बेझक स्वीकार कऽ सेठ लूचाय ठाकुर लङ रखि पनरह सए टका उठाए शिवचरणकेॅं तमुरियाक डा. डी. एस. प्रसाद सॅं देखाए दबाई चलाबे लगली। भोर सॉझ आ दुपहर पनरह दिनक दबाई केॅं डोज रहेन। दस दिन भरि दबाई चलल, मुदा हिनका स्वाश्थमे कोनो उतार चढाव नै भेल। उल्टे कमजोरि तेहेनकेॅं बढि गेल कि बिछान परसॅं उठब बैसबमे समस्या भऽ गेलनि, खोराकि सेहो साफके कमि गेल। चेहरा उसठ भऽ गेल, पेट साफे बैठके पीठमे सटि गेल। बरहिया लैग गेल। आय शिवचरण भोरे सुति उठिकेॅं बाध दिश बिदाह भऽ गेला। पार्वतीकेॅं बुझना परल, साईत हिनकर मन नीक भऽ गेल अछि। टोकैत पुछलखिन- ”कतए बिदाह भऽ गेलिय भोरे भोर?“ शिवचरण सूखले मने बाजल- ”बाध दिश जायछी, बहुते दिना भऽ गेल हेन खेतकेॅं देखला।“ श्विचरणकेॅं पाछुलागल पार्वती पीठे पर बिदाह भेली। दुनु बेक्ति सभटा खेतक आरि पर जाऽ धान लागल फसलकेॅं लहलहाएत हरियालि देखि हर्खित होयत बात करै छथि। शिवचरणश् ”देखु! ऐ बेरि सभटा गाछ जेना हलैशकेॅं उगलै हेन।“ पार्वतीश् ”एहन रहत तखने ने? के जनैए मोसमक मियाद? कहि रौदी नै भऽ जा!“ श्विचरण उझटिकेॅं बाजलश् ”छोरूने! काल्हि कि हाएत कै जनैए? एख्नि नीक अछि तऽ बुझिलियन आगुवो निके रहत।“ उपर आसमान मे कड़िया मेघ आ सुरूजकेॅं बीच नुका छिपिक खेल भोरेसॅं चलैत रहेन। ऐ खेलमे कड़िया मेघक जीत पक्का बुझना गेल रहेन। दक्षिणश्पूबक कोणसॅं कड़िया मेघक एकटा खूब तरगर अछाड़ अन्हार केने रमकल आएल। जे हरहराएत आ फटकार लगाबैत, ‘जे जते कतौ छिही अपन अपन घर जाए जो, आय हम्मर दिन छौ हेन।’ शिवचरण आ पार्वती मेघक उनटल मियादकेॅं भॉंप, घर दिश बिदाह भेलनि। मुदा घर पहुॅंचैत धरि दुनु बेक्ति नीक जॅंका भीज गेलनि। गायक दूध आ रोटी खेनाइक पछाति दबाई लेलक आ शिवचरण दरबजा पऽ जा बैसल। पार्वती बिछान नने एली आ भिंए मे बिछा लेट जाएले कहलनि। शिवचरण लेट तऽ गेल मुदा छटश्पट कछश्मछ करैत पेटमे दर्द कहि कहरे लागल। दर्द बढैत गेल, घंटे भरिक पछाति शिवचरण असहाय होयत, सुधि बुधि सभ चैल गेल। सौसे आंगनमे कना रोहटि शुरू भऽ गेल। अरोसि परोसि सभ जमा भेलनि। शिवचरणक भातिज मुंगालाल ई हाल देखि कहैए ”काकी! कि देखै छिऐ! उठाव! डाक्टर ले लऽ चलु।“ मुंगालाल हष्ठ पुष्ट जबान रहथि। हंाय हंायकेॅं कन्हाप उठेलक आ निर्मलीकेॅं डा. के. एन. गुप्ता लंग लऽ गेल। पार्वती आ पारो दुनु माय बेटी पाछुसॅं हायश्बाप करैत दौरल एली। डाक्टर मरीजकेॅं परीक्षण केलाक पछाति इमरजेन्सी दबाई लाबैक आदेश देलखिन आ पुछैएश् ”कोन डाक्टरसॅं इलाज कराबैत रहियनि?“ पार्वती मॅंुहप नुआ लऽ सभटा बात बतेलखिन। फेरि डाक्टरसाहेब बाजैएश् ”सभटा उल्टा पुल्टा दबाई दऽके पेसेन्टकेॅं जान मारि देलक हेन। खराबी किड़नीमे अछि आ दबाई खाली ब्लड प्रसर के दकलक हेन।“ नसमे पानिक बोतल आ तीनटा सूई आरो दबाई देलाक पछाति डाक्टर साहेब एकटा डिलेवरी पेसेन्टकेॅं होमकॉंल पर चैल गेलखिन। कनीए कालक पछाति शिवचरणकेॅं मुॅंहसॅं गौंज पोटा चलए लागल। हिचकी जोर जोरसॅं उठि गेल, देह हाथ तनाए गेल आ ठण्ढा भऽ गेल। फेरि एकबेर कना रोहटि पसरि गेल। भोला आम तरहसँ देखल जाइए जे सतमाइक खिधांश जोर-साेरसँ लोग करैए। अगर कोनो बच्चाकेँ सतमाए रहैए तँ ओकरा लोकक सहानुभुति रहैत अछि। मुदा कोनो सोतेला बापक जिकिर केतौ होइत नै देखल जाइए। जखनि कि भेद-भाव दुनूठाम होइत अछि। भाेला अपन माए दुखनीक दोसर बिआहमे पछिलगुआ बनि आएल रहए। करम बुड़ल छेलनि दुखनीकेँ जे बिआहक दसे दिनक पछाति बिअहुआ घरबलाक देहान्त हेजाक बेमारीसँ भऽ गेल छल। पतिक गुजरलासँ दुखनीक नाता ओइ घरसँ टुटि गेल। मुदा आशाक किरण नअ मास अनहरिया बीतला पछाति भोलाक जनम भेलासँ फेरि चमकि उठल। दुखनीकेँ लागल जेना बेटाक जनमसँ बिअहुआ घर चिकरि कऽ सोर पाड़लकनि मुदा ईहो इजोत गहनलगुआ भऽ गेल, चानपर दाग लगि गेल। सोसराक लोक दुखनीकेँ स्वीकार नै केलक, कियो कुलच्छनी तँ कियो कुलनासनी कहैत सदाक लेल ठाेकर मारि देलक। तइ दिनमे समाज आकि विज्ञान ओते प्रगति नै केने छल जे डी.एन.ए आकि आरो जाँचसँ साबित करितै जे भोला दुखनीक जाइज सन्तान छी। समैक पहिया नाचैत गेल। दुखनी एकटा बेटा रूपी धनसँ सवुर केने जीनगीक सुख-दुखसँ तालमेल बैसबैत पाँच बरख काटि लेली। आब टोला-मोहल्ला आ समाजक लोक सभ दुखनीकेँ दोसर बिआहक गप-सप करए लगल। होइत-होइत खुर्शेला गामक मोहन दाससँ चुमौन सम्पन्न भेल, जेकर एकटा बेटी सोसरा बसै छेली आ एगो बेटा-पुतोहु भीन भऽ कऽ रहै छल। मोहनाक थोर-बहुत खेत आ चारिटा भैंस रहनि जेकर दूध बेचि गुजर-बसर करै छला। चुमौन भेलासँ दुखनी-मोहनाक जीवन हरिअरी तँ घुमि आएल मुदा भोला जे पिताक खातिर जनमसँ बेलल्ला छल, ओकरा पिताक सुख नसीब नै भऽ रहल छेलै जे मोहनासँ भेटबाक चाही। भोलाकेँ बालपनमे पिता भेटल, मुदा ऐ अबोध नेनाक जरूरतसँ हिनकर सतबाप साफ कऽ अनभिग छथिन। मोहनाक चुमौन करैत धरि दूटा कमौआ प्राणी घर आएल, दुखनी पत्नी बनि घर-आँगनक काम-काज सम्हारली आ भोला पोसल-पालल बेटा रूपमे भैंसक चरबाहि आ घासो भूसामे लगाैल गेल। दुखनीक इच्छा छेलनि जे भोलाकेँ पढाबी-लिखाबी, तइ बास्ते गामक स्कूलमे नाओं लिखा देली। मुदा मोहनाक इच्छा नै छेलनि जे भोलाकेँ पढाबी। हिनक खिसियाएल रबैया भोलाक प्रति देखि दुखनीक सस-बस नै चलि सकल। ऐ खातिर बेर-बेर भोलाकेँ डाँट-फटकार मोहनासँ पड़ैत रहै। दुखनीकेँ तरे-तर टुसकेलापर भोला कहियो-काल नुका-छिपा कऽ स्कूल जाइत छल मुदा र्इ बेसी दिन नै चलि सकल। भोला एकदिन स्कूलसँ अबिते धरि मोहनाक तामसपर चढ़ि गेल। मोहना तमसाएल दाँत पिसैत हूरकैत बजला- “बड़ नबाबक नाति छिही! केतौ बैस कऽ बाप-संगे कौड़ी खेलैत हेबही आ कहै छीही पढ़ैले गेल छेलिएे! मरि किए नै गेलेँ ओतै? जब घास-ले जाइ छिही तँ तोरा घासे नै मिलै छौ। कहबी खुरपी भोँथ भऽ गेलै तँ बेँटे ढील्ला भऽ गेलै। पचासटा बहन्ना बनबै छँह। हट नजरिपर सँ झलमुहाँ!” पाइरक चप्पल निकालि कऽ झट-झट सिन पीठपर बरसाए देलखिन। भोला धम्म सिन ओतै बैसि गेल आ छट-पटाइत बोमी पाड़ि कानए लगल। मोहनाक अपन बेटा नै रहनि तँए ममत नै, मुदा माता कुमाता नै भऽ सकैए, दुखनी दौगल एली आ भोलाकेँ उठा-पुठा कऽ पजिऔने अँगना लऽ गेली। पुरुष प्रधान समाजमे स्त्री शब्द केतेक असुरक्षित होइत अछि से दुखनीक हालतसँ बूझल जाए सकैए। स्त्रीकेँ अपन अर्धाग्नी बनेलोपर हुनकर मति मोहि कऽ पुरुख अपना अनुकूल बना लैत अछि। रसे-रसे धरक वातावरण बदलैत गेल आ मोहनाक आकर्षन दुखनीपरसँ घटैत गेल। धरक काम-कजक अलाबे माल-जाल आ खेतीओ-पथारी दुखनीक माथपर बजरि गेल। मोहना भिनसरे भैंस दूहि, दूधक डोल बजार लेने जाइए, अनुमण्डलक पजरेमे दुर्गा दासक होटल अछि, जइमे दूधक उठौना लगल अछि, एतए एला पछाति गप-सरक्का संगे गाजाक लत सेहो पुड़बैत एक्केबेर दुपरियामे होइत घर अबै छथि। होटलक मालिक दुर्गा दास बेदरूकिया नाेकरक खोजमे रहथि जेकर जिकिर ओ मोहनासँ केलखिन- “आठ-दस बर्खक बेदरा काज करैबला गाममे जँ भेटत तँ नने अबिहऽ। तों तँ जानिते छहक होटलमे खेनाइ-पीनाइक कोनो कमी नहियेँ रहै छै। लूइरो-बूइध सीखतै आ पोसलो-पाललो तँ जेबे करतै?” मोहनो भरोस दैत कहलखिन- “अच्छा दैखै छिऐ, नजरिपर एतै तँ नेने एबऽ।” घर एलापर बेरमे मोहनक खियाल बेदरूकिया नोकरपर गेल, मने-मन सोचैत एला जे केकरा कहक चाही ऐ वास्ते? एकाएक मोहनाक धियान भोलपर गेल आ सोचए लगल। अन्तमे ई विचार केलनि जे भोलाकेँ होटलमे लगा देब सएह नीक रहत। घर अबिते दुखनीकेँ गप-सप्पक झाँसा दैत कहलखिन- “भोलाकँ बजारमे नोकरी लगा दइ छिऐ। घरमे खाइ-पिबैक दिक्कत भऽ रहल छै। बजारमे रहतै तँ दूटा लूइरो-बुइध सिखतै, गाममे देखै छिऐ ने बौनाएल जाइए?” दुखनी ऐ बातसँ राजी नै छेली मुदा मोहनक जिद्दक आगू हारए पड़लनि। अगिले दिनसँ भोला दुर्गा दासक होटलमे काम करए लगल। ऐ अबोध बेदराक वोनबाससँ एकटा आरो नेनाक मौलिक अधिकारसँ रोकि देल गेल। सोतेला माइक खिद्धांश तँ होइत अछि मुदा सोतला बापोक हेबक चाही जेकर हकदार मोहन भेलखिन। स्कूली शिक्षा तँ बाल-बोधक मौलिक अधिकार होइत अछि जे आम लोककेँ समझमे नै आबि रहल अछि। परिणाम स्वरूप, अखनो बाल-श्रम अपना देशमे चरमपर अछि। गरीब घरक नेना-भुटका सभसँ बलपूर्वक आकि जोर-जबरदस्ती भारी-भरकम काज जेना स्टोर उत्पादनमे जूताक पाैलिश, दोकानमे साफ-सफाइ, भोजनक ढाबा आ होटलमे जबरन बरतन-बासनक माजैक काज, चाह दोकानपर गिलास धोइक अलाबे आनो अनोपचारिक क्षेत्रमे काज कराएल जाइत अछि। घरेलु काज करैले सेठ-साहुकार सभ काम-काजी बेदराकेँ घरमे नुका कऽ राखैए, जइसँ सरकारी श्रम निरीक्षक आकि मीडिआक नजरिसँ बँचि सकए। ई सभटा काज न्यूनतम मजदूरीपर बेदरा सभसँ कराएल जाइए, बुझितो जे ई कानूनी जुलुम अछि। एकरा अनुचित आ शोषित मानल जाइए तैयो बहुत गरीब परिवार अछि जे अपन अबोध बेदराक मजुरीक सहारे भरन-पोषन करैए। कानूनो बनल अछि जे अठारह बर्खसँ कम उमेरक बालक मजूरी नै कऽ सकैए। मुदा कानूनक अनदेखी कएल जाइए आ भोला सनक नअ बर्खक बेदरासँ सतरह-सँ-बीस घण्टा काज कराएल जाइत अछि। दुर्गादासक होटलमे अनुमण्डल आ बेंकोक स्टाफ जेना हाकिम, किरानी, चपरासी आ आनो भी.आइ.पी सबहक चाह, नस्ता, कल्लौ बनैए। किछु महानुभावक डेरापर चाह, नस्ता, खेनाइ पठाएल जाइए। दुर्गा दास सोभावसँ एक नमरक पोल्टिसबाज छथिन जहिसँ कामकाजी बेदरा सभसँ गप मारि काज करबै छथि। जरूरी पड़लापर डाँट-फटकार आ लप्पर-थप्परसँ सभकेँ सकपकेने रहै छथि। होटलमे छहसँ दस बर्खक आराे चारिटा बाल-मजदूर काज करैत छल। भिनसरबाक चारि बजैत धरि सभटाकेँ हुरपेट कऽ जगाएल जाइए आ बरतन-बासन, चुल्हा-चौकीक माँज-मजबैल, निपा-पोतीसँ झार-पोछक काजमे लगाएल जाइए। कोइ चाह लऽ डेरे-डेरा पहुँचाबैए तँ कोइ जलखै, खेनाइ बनाबैमे लगि जाइए। कखनो-काल सभ बेदरामे कोनो-कोनो बातपर टोना-मानीसँ झगड़ा-झाँटी भऽ जाइत अछि, तइ घड़ीमे दुर्गाकेँ अपन सकत मियादि देखबऽ पड़ै छै, जारनि लऽ कऽ झँटियेबो करैए। खेनाइमे सभटाकेँ बसिया भात, टटाएल रोटी, महकौआ तीमन आ बँचल-खूचल तरकारी दैत बजै छथिन— “रै छौड़ा सभ अते नीक चीज तँ तोहर बापो-ददा नै खेने हेतौ। खाइ जाइ जो मन लगा कऽ।” दुर्गा दासक एकलौता बेटा- अमर- दरभंगामे पढ़ैत अछि। जहिया कहियो ओ गाम अबैत अछि तँ जाइ घड़ीमे टीसनपर पहुचबैक जिम्मा भोलेकेँ रहैत अछि। आइ अमर दरभंगा विदा भेल। दस-दस किलोक गहुम आ चाउरक मोटा भोलाक माथपर आ कन्हापर बैग लटकेने टीसन मुहेँ विदा भेल जे करीब कोस भरि हटि कऽ अछि। रस्तामे भारीसँ भोलक कन्हा-पजरा ऐंठने जाइत रहै मुदा गाड़ी छुटैक डरे केतौ जिराइओ नै सकल। टीसन पहुँचिते रेलगाड़ी ससरऽ लगलै। अमर लपैक कऽ पौदान पकड़ि चढ़ल। भोला नीचासँ सभटा मोटा-चोटा आ बैगो जेना-तेना अमरकेँ पकड़ा आ अपन भाड़ उतारलक। भोलाक माथक बोझ उतरिते मन हल्लुक हुअ लगलै, मुदा घुरन्ती-डेग नै उठि रहल छै भोलाकेँ। मन भेलै किछुकाल जिरा ली। कन्हा आ गरदनि सेहो ऐंठने जाइत रहै। गाछक चबुतरापर धम्म दऽ बैस कऽ हाँफए लगल। किछुकाल बैसला पछाति आलस आबि गेलै आ ओतइ ओंघरा कऽ सुति रहल। साइत एते निचेनक नीन कहियो नै सुतल छल। ओ नीनक महासागरमे हेला मारऽ लगल। चारि घण्टाक कड़गर नीन खींचला पछाति जखनि गाछक छाहरि घुसकि कऽ दूर हटि गेल आ देहपर दुपहरियाक रौद लागए लगलै तखनि जा कऽ आँखि खुजलै। भूखो जोरसँ लगि गेल रहै, आँखि मिरैत होटल दिस विदा भेल। ओमहर दुर्गा दास तामससँ आगि अंगोरा होइ छला। भोलाकेँ देखिते मातर तरबामे लहरि दिअ लगल, गारि-बात दैत घौलाइत हूरकैत भोलाकेँ कहलखिन- “रे सार! गेलही तँ मरि गेल रही? की बाप पकड़ि लेने छेलौ? भुख लगलौ तँ दौगल एलही। नमक हरामी कहीं कऽ! मुलुर-मुलुर केना तकैए सार!” बगलसँ करमीलक छड़ी उठा आ भोलाक पीठपर सटाक-सटाक खिंचए लगलखिन। भोला ओतै तिलमिलाइत लूद सिन बैसि रहल आ बाप-माए चिचियाए लगल- “गै माएऽऽ... हौ बापऽऽ... मरि गेलियौ गैऽऽ... माए गै माएऽऽ...” खिसियाले मुहेँ दुर्गा दास फेरि बजला- “सार तूँ हमरा होटलमे टपि नै सकै छेँ। जो जइ बाप लग जेमे। देखै छियौ तोरा के रखै छौ आ के खेनाइ दइ छौ।” घण्टा भरि भोला ओतै कनैत रहल। रहि-रहि कऽ दुर्गा दास हूरैक-हूरैक मारैले छुटैत रहथिन आ बजैत रहथिन- “भगलेँ कि नै सरबा? एने की टक-टकी देने छीही? आब खाले? टपऽ तँ देबौ नै आ खेनाइ के देतौ? चलि जाइत रह जतए जेबाक छौ।” भोलाकेँ बुझना गेल आब निश्तुकी नै रहए देता आ ने खेनाइए भेटत। उठि-पुठि कऽ काेसी प्रोजेक्टबला खरंजा पकड़ने एस.डी.ओ साहैबक अवास दिस विदा भऽ गेल। मन्हुआलए-सन्हुआलए आँखिक नोर पोछैत भोला एस.डी.ओ.क अवासक आगूसँ जाइत छल तखने भीम बहादुरक नजरि भोलापर गेलनि। भीमबहादुर एस.डी.आे साहैबक भनसिया, जे दयालु प्रवृतिक नेपाली पहाड़ी जातिक छथि। बहादुर भोलकेँ जानिते रहथि पुछलखिन जे की भेलौ, किए कनै छीही, केतए जाइ छेँ? भोला हिचैक-हिचैक कऽ सभटा बात बतेलक- “हमरा नै रखतै। मालिक कहलखिन भागि जो, नै रहए देबौ।” भीमबहादुरक उमेर पचास-पचपनसँ कम नै हेतनि मुदा खुश मिजाज आ दयालु प्रवृतिक लोक छथि। भोलाकेँ केम्पसक भितर लऽ गेलखिन आ खाइले दूटा रोटी संग कनी तरकारी देलखिन जे बँचल छेलनि। भोला भोरुके खेलहा, भूखसँ लहालोट हरबे करए। मुदा ऐ रोटीक पैनठेगहासँ देहमे हूबा एलै। किछुकाल धरि ओतए बैसल रहल। एस.डी.ओ पाठक जीक दुनू सन्तान नन्दन सात बर्खक आ नेहा चारि बर्खक अछि जे केम्पसमे बैट-बौल खेलाइत रहए। भोलो दौग-दौग कऽ संग दिअ लगल। साँझ होइत धरि पाठक जीक जीप केम्पसमे प्रवेश केलक संग लगल किछु गाम-घरक नेता लोकनिक हुजुम सोहो जुटए लगल। गप-सरक्काक बीच सभ नेतागण अपन-अपन काज करा विदा होइत गेला। बीच-बीचमे पाठक जीक नजरि तीनु नेनापर सेहो जाइत रहनि जे प्रसन्नचित मुद्रामे खेलैमे मग्न अछि। भोला एस.डी.ओ साहैबक कार्यालयमे चाह पहुँचबैले जाइत रहनि तँए चिन्हतो रहथिन। मुदा भोलाकेँ एतए देख पाठकजी दुविधामे छला। पाठकजी बहादुरसँ पुछलखिन- “बहादुर, ई लड़का तँ दुर्गादास-होटलक लगैए, ई एतए केना आएल?” भीमबहादुर सभटा बातक जानकरी दैत आग्रह केलखिन- “साहैब, धिया-पुता जाइत छिऐ, भगा देने छै, राति-विराति केतए जेतै, आइ भरि एतै रहे दैतिऐ तँ नीक होइतै।” पाठकोजी नेक विचारक लोक, हँ भरैत बजलखिन- “रहऽ दहक की हेतै? धिये-पुता तँ िछऐ।” बहादुर गरीबीक दिन देखने। तँए मनमे गरीब लाेकक प्रति दजा आ सहानुभूति भरल छन्हि। बहादुरमे दूटा नीक गुण अछि, पहिल ई जे जब केतौ भूखलकेँ देखैत तँ खेनाइक आग्रह जरूर करैत, दोसर ई जे दोसरक बाल-बोधकेँ अपना जकाँ सिनेह दैत छथिन। एस.डी.ओ- पाठकोजी- तहिना मिलनसार आ दयालु प्रवृतिक लोक छथिन, तँए दुनू गोटेमे नीक जकाँ बनै छन्हि। भिनसर भने बहादुरक दैनिक काजमे भोला संग दिअ लगल। दस बजैत पाठकजी ऑफिस विदा भेला। बहादुर अपने संगे भोलोकेँ जलखै करबैत गप-सप्पमे पुछलखिन- “होटल धुमि कऽ जेमे की गाम? भोला सकपका गेल, किछु नै बाजल, मुदा बहादुर ऐ चुप्पीकेँ बुझै खातिर फेर पुछलखिन- “होटल जेबाक मन नै होइ छौ?” भोला मुँह लटकेने बाजल- “नै जेबै, दुर्गा मालिक बड़ मारै छै। खेनाइओ भरि पेट नै दइ छै आ भगाइओ देलक, कहलक आब तोरा नै रखबौ।” बहादुर- “तूँ अपना बापकेँ किए नै कहै छी?” भोला- “हमर बाबा एक बरखसँ दूध लऽ कऽ नै अबै छथिन। दुर्गा मालिक कहलखिन, बाबू सबटा भैंस बेचि लेलकौ।” बहादुर- “माइअो भेँट-घाँट करैले नै अबै छौ?” भोला- “भेँट नै केलकै। एकबेर खजुरी कका दिअए समाद पठेने रहै भेँट करि जाइले। मुदा दुर्गा मालिक नै जाए देलखिन आ हमरा गाम देखलो नै छै।” एकबेर फेरि बहादुरकेँ भोलापर दया लगलनि, जे कि मनुखक मूल सोभावो छी। ओना तँ सभ धर्मक पोथीमे बताैल गेल अछि, जे लोकनि कनैत-कल्पैत नेना-भुटका, भूखल, बेमार आ बूढ़-पुरानपर दया-दरेज नै करि सकैए, ओकर ई मनुखक जीनगी बेकार होइत अछि। मनुखक पुनरावृतिक लक्षण अछि, जनम भेनाइ, खेनाइ-पिनाइ, पलनाइ-बढ़नाइ, बिआह-दानसँ बंश-बृद्धि करैत परिवारकेँ आगू बरहेनाइ आ फेर मरि जेनाइ। ई जीवन तँ पशु आ पक्षीओ जीबैए। तखनि मनुख आ जानवरमे की फरक रहत? दया मनुखक सभ गुणमे श्रेष्ठ अछि जे मनुखमे रहबाक चाही। भीमबहादुरक मनमे विचार उठल, साहैबसँ गप करि भोलाकेँ अहीठामक काजमे रखि लेब तँ एकटा बेदराक उपकार भऽ जाइत! साँझ पड़ैत पाठकजी एलखिन। काजसँ फूर्सत भेला पछाति बहादुर पाठकजी सँ बिनती करैत भोलाक खातिर गप कहलखिन जेकरा पाठकजी स्वीकार केलकिन। भोला घरक काजमे संग-साथ दिअ लगल। मौका भेटलापर नन्दन-नेहा संगे पढ़ैओले बैसि जाइत रहए। कनी दिन बीतला पछाति बहादुर भोलाक माए-बाबूकेँ समाद पठेलखिन, भेँट करैले। डेढ सालसँ दुखनी बेटाक सोगमे चिन्तीत छेली। मुदा ई खबरि जे भोला एस.डी.ओ साहैबक घरमे काज करैत अछि, सुनि सुप सन कलेजा भेलै। अगिले दिन दुखनी दौगल एली। दू बरिख्ापर भोलाकेँ देखिते दुखनीकेँ खुशीक ठेकाना नै रहलै। गप-सपसँ पता लागल जे भोलाक सतबाप, मोहना भैंसपर सँ खसि पड़ल आ डाँर टुटि गेल। पछाति सभटा भैंसकेँ बेचए पड़लै। तहियासँ आइ तक माेहना बेमारे रहै छथि, कोनाे काज-राज हिनकासँ नै भऽ रहल छन्हि। भेँट-घाँट भेला पछाति दुखनी गाम दिस विदा हुअ लगल मुदा एस.डी.ओ साहैबसँ भेँट करैत निहोरा केली- “हूजूर, आइसँ अहीं ऐ निभोगाक माइ-बाप छिऐ। अहींक नून खा कऽ एकर भाग चमकतै।” पाठकजी भरोस दैत कहलखिन- “भोलासँ अहाँ निफिकिर रहू। खर्चा-पानीक दिक्कत हएत तँ हमरा खबरि करब।” पाठकजी भोलाक हाथे पाँच सए टका आ एक सेट कपड़ा दुखनीकेँ विदागरीमे देलखिन। दुखनी हँसी-खुशीसँ गाम दिस विदा भऽ गेली। अप्पन माए-बाप सुनील जीकेँ दूटा सन्तान। सौरभ दस सालक जे पाँचमा कक्षामे आ छोटका सुमन छह सालक जे पहलामे मेडोना स्कूल, कटहल वाड़ी दरभंगामे पढ़ैए। स्कूल घरेक बगलमे छै। सुनीलजी अकाशवाणी दरभंगामे नौकरी करै छथि। हम सुनील जीक दुनू बच्चाकेँ घरपर जा ट्यूशन पढ़बै छी। हुनकर कनियाँ मंजू हरिदम बच्चाक कपड़ा-लत्ता, वर्तन-बासन आ आनो-आन घरक काम-काजमे ओझराएल रहै छथिन। सुनीलजी नौ बजे भोरे निकलै छथि अपना काजपर। दू बजे खेनाइ खाइले अबै छथि। फेर रातिमे दस बजे घर अबै छथि। चारि बजे बेरू पहरमे हम पढ़बैले सभ दिन जाइ छी। आइओ गेलौं। कनीए काल पछाति मंजू चाह लऽ कऽ हमरा लग एली। चाहक कप पकड़ा बच्चाक बदमाशीक उपराग कम मुदा काजक बेस्तताक पोथी खोलि छनेमे संसारक परेशानीक पाठ पढ़ि गेली। फेर काजमे एना लागि गेली जेना टाँग-पर-टाँग नै पड़ैए। छुट्टीक समैमे सुनीलजी सेहो घरक काम-काजमे बेस्त रहै छथि। दुनू गोटेक परिवारक प्रति समरपन देखि हमरा बुझाइत रहैए जे ऐ छोट परिवारक अलाबे हिनका सभकेँ ऐ संसारमे किछु ने छन्हि। अचानक गामसँ हुनका फोन एलनि जे हुनकर पिताजी सिरियस छथिन। सुनीलजी आॅफिसमे छुट्टी लेल दरखास दऽ गाम बिदा भेला। गाम जा पिता जीक संग माएकेँ सेहो संगे दरभंगा आनि लेलनि। बाबूजीकेँ असपतालमे डाक्टरसँ जँचबौलनि। डाक्टर कहलकनि- “अहाँक पिताजी केँ टी.बी. भऽ गेलनि हेन।” “आब की उपए अछि डाक्टर साहैब?” सुनीलजी पुछलखिन। “नौ मासक दबाइक कोर्स अछि। देख-रेखमे समैपर दबाइ चलबए पड़त।” सुनीलजी, आॅफिस जा अदहा दिनक छुट्टी छह मासक लेल दरखास लगा माए-बापक सेवामे लीन भऽ गेला। कटहल वाड़ी स्थित नीज अवासपर माए-बाबू रहए लगला। मुदा सप्ताहमे दू दिन असपतालमे जाए-आबए पड़नि। आब मंजू पहिनेसँ बेसी परेशान रहए लगली। एक दिन मंजूक वार्ता हमरासँ भेल। बजली- “की कहूँ सर, एक्को-रती मन नै होइए जे ऐ घरमे रही।” हम पुछलियनि- “किए, की भेल?” “तेतबे घरक काज तेतबे धिया-पुताक काज आ तैपरसँ माए-बाबूजी माथक बोझ बनि गेल छथि। अपने जे छथि ओ एकाेटा काज नै सम्हारै छथि।” हम कहलियनि- “अहिना होइ छै, काम-धाम तँ सभ दिन लगले रहै छै। मुदा माए-बापक सेवा सेहो ऐ जीवनमे जरूरी छै।” मंजूकेँ जेना हमर उपदेश एक्को-रत्ती नै सोहेलनि। तमतमाइत बजली- “मास्टरजी, हमरा अहाँ नै सिखाउ। अहाँकेँ दुनियाँ-दारीक थाह नै चलल अछि अखनि। सासु-ससुर हमर ओहेन अदरगर नै छथि।” मंजूक ई बात सुनि हम स्तब्ध रहि गेलौं। मुँहक बात मुहेँमे रहि गेल। संच-मंच बच्चा सभकेँ पढ़बए लगलौं। मुदा मंजू बड़बड़ाइत रहली- “चौबीस घंटा काजे-काज। सभ अढ़बैए बला। ऐ घरमे रहैक मन एकोरती नै होइत अछि। जेतबे घरक काम-काजसँ माथा दुखाइत रहैए आ तैपर सँ बुढ़बा-बुढ़िया माथ भुकबैत रहै छथि।” तही बीच बुढ़हाक खौंखी जोर-जोरसँ सुनि पड़ल। खौंखी करैत-करैत बदहाल भऽ कहरि-कहरि कऽ बाजए लगला- “कनहौलीवाली, सुनीलक माए, केतए छी? ओहू बुढ़ियाकेँ जेना हमरा लग नीक नै लगै छै। जेना हम काटैले दौड़ै छिऐ।” बुढ़हाक हफनीक अवाज फेर सुनि पड़ल- “कनियाँ छी हे, लहानवाली, ऐ सौरभक माइ? बाप रे बाप! कोइ ने सुनैए।” मंजू बड़बड़ाइत घुमली- “मरबो ने करैए बुढ़ा जे हमर सिरक बोझ हटैत। जानि ने कोन पापक फल छी।” सुनील जीक घरक ई कथा रोजक भऽ गेल। एक दिन अनायास हुनकर घरक हवा एकदम शान्त बुझना गेल। छतक चौकीपर जाजीम बिछौल छल। दुनू बच्चा ओइपर आबि पढ़ैले बैसल। हम पलास्टिकक कुरसी खिंच बैसलौं। कनीए काल पछाति मंजू पलेटमे जलपान आ कपमे चाह लऽ मीठ-मीठ चालिमे मुस्कीआइत एली। हमरा बुझाएल जे आइ मंजूजी तिरपित छथि। इच्छा भेल जे ऐ खुशीक कारण जानी। पुछलियनि- “भाभीजी, आइ अपने बड़ खुश नजरि अबै छी, की बात छिऐ?” “हँ, खुशी किए ने हएब। आइ हमर अपन माए-बाबू गामसँ एला अछि। खुशी तँ सोभाविक छै।” मंजुक ई बात सुनि खुश तँ भेबे केलौं जे माए-बापक दर्शनसँ सोभाविक खुशी जे हेबक चाही से हिनको भेलनि। मुदा दुख सेहो भेल। दुख ई भेल जे आखिर सासु-ससुरक विषयमे जे मिथिलाक दर्शनमे नारी लेल बतौल गेल छै जे अपन माए-बापसँ बढ़ि कऽ सासु-ससुर होइ छै से हिनकामे किए नै छन्हि। दस हजरिया नोट (लोक कथाक पुनर्लेखन) हम अपन इलाकामे जानल पहचानल पेन्टर छेलौं। पेन्टिंगमे बेदरेसँ लगाव रखैक कारण, भाड़ी-सँ-भाड़ी चित्र पल भरिमे बनेनाइ हमरा लेल असान छल। एकटा लङोटिया दोस्त छल धीरेन्द्र, किराना दुकानदार आ जातिक भूमिहार। बखत-कु-बखतपर हम एक दोसरकेँ मदति निस्वार्थ भावसँ करै छेलौं। एक दोसरकेँ विशुद्ध दोस्त मानै छेलौं। लोक सभ हमरा ऐ दोस्तीकेँ देखि हैरत रहै छल। हैरत ऐ खातिर रहै छल जे हमर दोस्त धीरेन्द्र भुमिहार जातिक छल। केते लोग कहैतो छल- “की रौ, भुमिहारसँ दोस्ती केलँह..., ठीकसँ रहिहेँ. कहीं भुमिहारी दाउमे फँसलँह तँ बुझियैहनि!” मुदा ऐ बातपर हम कोनो कान-बात नै दइ छेलौं। एकदिन जहिना हम रंग-ब्रशक झोरा लऽ कऽ केतौ काजपर विदा भेल छेलौं आकि जनक काका दलानपर सँ चिकड़ि कऽ बजा कहलथि- “रौ, सुन कहै छियौ तूँ जौं भुमिहारसँ दोस्ती केलँह तँ भुमिहारी दाउ एकोटा सिखलेँ आकि नै?” हमरा जिज्ञासा भेल आ पुछलियनि- “काका, भुमिहारी दाउ केकरा कहै छै हौ?” “हम जँ बुझितौं तँ हमहीं ने तोरा सिखा दैतिऔ? लोक बाजै छै जे भुमिहारी दाउ बड़ पेंचिदा होइ छै।” हम भरि बाट गुन-धुन करैत एलौं ‘मुदा ई कोन दाउ छी? जे लोक सभ दोसक संग देखि पुछैत रहैए? से नै तँ, आइ हम दोसेसँ ऐ बिषयमे पुछि कऽ रहब। दुपहरियाक रौदामे हम कोसी प्रोजेक्टक देवालपर एकटा विज्ञापन लिखैत रही संयोगसँ तखने पाछूसँ मोटर साइकिलक सीटीक अवाज पिपियाएल! हम रंगक डिजाइन बनबैमे मगन रही। मने-मन तामससँ देह बहिर भऽ गेल! ‘के एहेन दुष्ट छी जे डिस्टर्ब करैए?’ मुदा ताकब केना? जौं ताकब तँ डिजाइन खराप भऽ जाएत। लगल हाथ छोड़ि,़ ताकलौं। अवाक् रहि गेलौं! वएह भुमिहार दोस धीरेन्द्र छल। दोस्तीमे कनी-मनी शैतानी तँ चलिते रहैत छल। मन्द मुस्कान चेहरासँ सेहो छुटल। तैबीच धीरेन्द्रक नजरि पेन्टिंगपर पड़ल आ प्रशंसा करए लगल। मुदा हमर प्रशंसा, जे हमरे मुँहपर बाजल जाइत अछि! नीक नै लगल, अंग्रेजीक एकटा मुहावरा मन पड़ि गेल, ‘रेस्ट ऑन वन्स लॉरेल्स’ अर्थ अछि, ‘अप्पन ख्यातिसँ संतुष्ट नै रहक चाही,’ हम विनम्रतासँ कहलियनि- “दोस, अहाँक ऐ प्रशंसासँ हम खुश नै छी। हम मात्र एकटा छोटका कलाकार छी, खरचा-पानि चलेबा लेल ई काज करै छी।” तैबीच हमरा मन पड़ल ‘भुमिहारी दाउ’ पुछलियनि- “दोस, लोक कहैए जे भुमिहारी दाउ बड़ नीक होइ छै, हमरो सिखा दिअ।” धीरेन्द्र पहिले तँ हमरा बातपर धियान नै देलक मुदा बेर-बेर जिद्द केलापर सोचए लगल, कनीकाल सोचि कऽ बाजल- “दाउ तँ अहाँकेँ सिखा देब मुदा बदलामे किछु दिअ पड़त।” हम पुछलियहन- “कथी देबए पड़त? बाजू।” धीरेन्द्र फेर बजला- “अहाँकेँ एकटा दस-हजरिया नोटक पेन्टिंग बना कऽ हमरा दिअ पड़त।” हम बजलौं- “रूपैआक नोट! दस-हजरिया आ पँच-हजरिया की, जौं पेन्टिंगेसँ बनाएब तँ किए नै? जरूर बना देब। कनीए दिन रूकू फुरसति हुअ दिअ तँ छापि देब।” पेन्टिंग हमर ईश्वरीय देन छल, बेदरेसँ अनेक प्रकारक चित्र पाड़ै छेलौं, स्कूलमे सरजीकेँ यार-दोस्तक आ संग पढ़ैत लड़कीओ सबहक। बाबूजी सधारण किसान छल, हमर पढाइ लेल पर्याप्त खर्चा नै रहैक कारण अध्ययनक संग उपार्जनक मार्ग अपनौने रहौं। अखनि हम निर्मली आ आसपासक क्षेत्रमे जानल-पहचानल चित्रकार छी। कामक व्यस्तता हरिदम रहैए। ऐ व्यस्ततामे दोसक लेल दस-हजरिया नोट बनेनाइ हम साफे बिसरि गेलौं। एकदिन हम नगर सेठक दोकानक बगलमे साइन बोर्ड बनबैत रही, तखने धीरेन्द्रक अवाज सुनि पड़ल। काम रोकि गद्दी लग हम ससरि कऽ एलौं, तही समैमे आउरो किछु जानल-पहचानल बेपारी सभ पहँुचल छल। धीरेन्द्र जोरसँ सभकेँ सुना कऽ हमरा कहैए- “की दोस, हमर काम नै हेतै?” हम चौंकि गेलौं जे हमरा कोन काम कहने छथि! पुछलियनि, “कोन काज?” “वएह दस हजारबला!” हमरा मन पड़ि गेल दस-हजरिया नोट! मुड़ी हिला स्वीकृति दैत कहलियनि- “ओऽ हाँ, हेतै, हेतै, किछुए दिन और रूकू।” सेठजी नोटक गड्डी गीनैत-गीनैत, चेश्माक भीतरे-भीतर, रूपैआक बात सुनि हमरा दिस ताकए लगल। हम चुपचाप, काम करए लगलौं। हमरा एला पछाति़, धीरेन्द्र सभ लग बाजल, जे ‘ई पेन्टर हमर दोस छी, हमरासँ दस हजार टाका लेने अछि, केतेक महिना भऽ गेल, मुदा टाका मांगलापर, आइ-काल्हि करैत, समए काटैए।’ समए बीतैत गेल, छह महिना-साल भरिक बाद, फेरि दोसर बेपारीक दोकानपर दस हजारक तकेजा केलक। हम दस-हजरिया पेन्टिंगक नोट समझि टाड़ि देलौं। मुदा हमरा गेलाक पछाति धीरेन्द्र सभ लग बाजल फिरै छल जे साँचेमे ई हमर रूपैआ लेने अछि। ऐ बातक दू बरख भऽ गेल। जेतए-तेतए लोक सभ हमरा कहए लागल- “धीरेन्द्रक रूपैआ किए ने फड़िया दइ छिही! दोस-बोनक पैसा एते-एते दिन रखनाइ नीक बात नै छै।” पहिले तँ हम असमंजसमे रहौं मुदा, जखनि पता चलल जे धीरेन्द्र दस-हजरिया पेन्टींगक बदलामे दस हजार टाका लोक सभ लग बाजल फिड़ैए, हम अवाक् रहि गेलौ! केतेक गोटेकेँ समझेबाक परियासो केलौं ई बात, मुदा जेकरे कहिऐ वएह, बुड़िबक बनबए लगल- ‘कलाकार भऽ कऽ एहेन नीयत तोहर नै हेबा चाही।’ हम चिंतित भऽ सोचए लगलौं, ‘ई दोस्त नै छी, दुश्मन छी, एते भाड़ी फेरामे पड़ा देलक! केतएसँ एते टाकाक ओरियान करब!’ हमर ओकाति हजार टाका जेना लाख टाकाक के बराबरि छल। बिना जमीन-जथा बेचने दोसर उपए नै छल। कनीए दिनक पछाति, पंचैती भेल, पंचक फैसला भेल, कटि-मारि कऽ दू हजार सुइदकक संग बारह हजारक देनदारी ठहरौल गेलौं। लोक सभ बाजए नै दैत छल। जीवनमे एहेन बेज्जती कहियो नै भेल रहए। दस दिनक समए देल गेल। टाकाक ओरियान नै भऽ रहल छल। कोनो गुंजाइश नै देखि, एकटा उपए सूझल, जमीन बेचु नै तँ, भरना लगाउ। एक बीघा जमीन भैयारीक फाँट पड़ल छल। बेचब तँ फेर कीनल नै हएत, से नै तँ भरने लगा देबाक चाही। हजार टाकाक दरसँ बारह कठ्ठा खेत भरना लगेलौं, रूपैआ लऽ कऽ दोसक घर पहुँचलौं। दलानपर कियो नै छल असगरे बैस गेलौं, दोस्तीनीकेँ खबरि गेल। कनीकालक पछाति, दोस्तीनी एक हाथमे पानिक लोटा आ दोसर हाथसँ घोघ तानि, अदहा मुँह झाँपल अदहा देखाइत, आगूमे पानि बढ़ा देली। तामससँ तँ हमर देह बहिर छल, सोचने छेलौं जे दोसकेँ किछु कहबनि, मुदा की करब! चोटपर दोस्तीनी पड़ि गेली। भाड़ीए मनसँ कहलियनि- “दोसकेँ बजाउ आ कहियन जे अपन टाका लेता।” कनी काल पछाति धीरेन्द्र हँसैत-हँसैत दलानपर एला। ई हँॅसी, हमरा हरियाएल घापर, नूनक लहरि जकॅंा लागल। चुप चाप रूपैआक गड्डी देलियनि,गिनला पछाति फेरसँ हमरे हाथमे धराऽ देलनि। हम चुपे छेलौं मुदा धीरेन्द्र बाजल- “दोस, याद करू। अहाँ हमरा कहने छलिएे ने भुमिहारी दाउ सिखबैले? यएह छिऐ भूमिहारी दाउ।” एकबेर फेर दोसक ऐ बर्तावसँ हम चकित रहि गेलौं। लगन गोनर बेदरेसँ संगीतक प्रेमी अछि। दिवाली, दशहारा, सरोसती पूजा आ आनो-आन अवसरिपर गाममे नाटक होइक परचलन अछि। मुदा गोनरकेँ ओइ सभमे मौका कमे मिलैए। मौका ओकरे पहिल बेर मिलैए जे ओइमे चन्दा दइए। गोनरक पिता साधारण किसान छथि। गोनरक पिताक दोस्त देबन पंडित गाममे कीर्तनियाँमण्डली चलबै छथि, तँए लोकसभ गबैया कहै छन्हि। गोनरकेँ संगीतसँ लगाउ देखि पिताजी केतेक बेर कहै छन्हि- “गोनर, दोसक ऐठाम जा कऽ घड़ी-घंटा हैरमुनियाँ किए ने सीख अबै छँह?” आइ स्कूलमे शनिचराक पछाति सरजी गोनरसँ गीत गबौलनि आ खुश भऽ खुब प्रसंशो केलनि। स्कूलसँ अबैतकाल बाट भरि गोनर सोचैत आएल जे आइ देबन काकाक घर जा हैरमुनियाँ सीखनाइ शुरू करब। दुपहरियाक टहटहाइत रौदमे, सभ लोक घरे-घर सूतल-पड़ल, अराम करैत रहए मुदा गोनर, देबन पंडितक घर बिदा भेल। देबन सभ दिन बेरूपहरमे अप्पन एकलौता पुत्र हरियाकेँ संग कऽ साज-बाजक संग रियाज करैत रहथि। आब गोनरो संग दिअ लगलनि। सप्ताहे दिनमे गोनर हरिमुनियाँक रीढ़ आ पटरीकेँ नीक जकाँ परखि लेलक आ सा रे गा मा पा पहिलुक धुन बजबए लगल। ई आकस्मिक आ तेज शुरूआत देखि देबन सोचमे पड़ि गेल, ‘हमर हरिया बेदरेसँ साज-बाजक संग खेलैत आएल तैयो अखनि धरि एतेक नै सीख सकल! देबनके डाहक संग पक्षपातक भावना सक्कत भऽ आ अगिले दिनसँ गोनरकेँ दुआरि पहुँचिते, साज-बाज समेटि रखि दैत रहए। एक-दू दिन गोनर जाइते रहल मुदा ओहिना घुमि कऽ आबि जाइत रहए। गोनर उदास तँ होइते रहए मुदा हताष आ निरास नै भेल, तँए संगीत सिखैक जीद्द मनसँ नै गेल। साँझ पड़ैत सभ दिन, देबन चाह-पान करैले बजार जाइ छल। ई बात गोनर जनैत रहए, तँए साँझ होइते देबनक घर पहँुच कऽ, हरियाकेँ फुसला कऽ साज-बाज पसारि सीखए लगल। मुदा ईहो सीखनाइ तीने-चारि दिनक पछाति स्थाइ रूपे बन्न भऽ गेल। जइ दिन देबन पण्डित दुनू छौड़ाकेँ साज-बाज निकालि सिखैत देखि गेला। कड़गर फटकारो दुनूटाकेँ लगेलखिन आ सभटा साज-बाज समेटि कऽ संदूकमे बन्न कऽ देलखिन। कहल जाइए जे समए आ लहरि केकरो इंतजार नै करैए। ई बात साँच भेल। गोनर ऐ दसे दिनमे जे किछु सिखने रहए वएह रामवाण भऽ गेल आ सक्कत अधार बनि, तारक गाछ सन बढ़ए लगल। कहल जाइए जे कोनो तरहक बुधि आ हूनर सिखैले निर्धारित समए नै होइए। जेतै-तेतै, चलैत-फिरैत गोनर सुर आ तानकेँ साधैत, गुनगुनाइत धूनमे रमल रहै छल। मुदा साँझ-भोर संगीतक अभ्यास केनाइ अप्पन दिनचर्या सेहो बना लेलक। टोल-टपड़ा आ गाममे जखनि केतौ भजन-कीर्तन आकि नाच-गानक आयोजन होइत रहए तइमे गोनर बड़ी तत्परतासँ भाग लैत रहए। तइसँ गाम भरिमे लोकसभ गोनरकेँ गबैया कहए लगल। गामक सटले शहर अछि। शहर छोटे सन अछि सुखी सम्पन्न लोक आ पैग-पैग बेपारीसँ लक हाकिमो-अफसर सभ एतए रहै छथि। गोनरकेँ शहरमे केकरोसँ जान-पहिचान नै अछि। एकटा डाक्टर सुरेन्द्र नारायण नामक गण्यमान बेकती छथिन जे महिला काैलेजमे हिन्दीक सरकारी प्रोफेसर आ संगै-संग महिला कल्याण संस्थानक अध्यक्ष सेहो छथिन। संगीतक प्रेमी रहैक कारण साले-साल सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन करबैत रहै छथि। प्रोफेसर साहैबक एगो बेदरूकिया संगी जे दिल्लीमे नाट्य आ कला विभागक प्रोफेसर छथि ओ रिटायर भऽ अपन पैतृक शहर पहिल बेर एला, तइसँ ऐबेरक आयोजन बड़ जोर सोरसँ भऽ रहल अछि। शहरक गण्यमान लोकसभ जे ऊँच-ऊँ पदपर कार्यरत छथि, सभकेँ कार्यक्रममे शामील होइक बास्ते न्योँत पठाएल गेल। तइमे ऐबेर टी.वी सीरियलक जानल-मानल कलाकार जीतुराज जोहर सेहो हिस्सा लऽ रहल छथिन। कार्यक्रमक दिन लगिचाइत गेल। शहरमे जगह-जगह बैनर-पोस्टर लगाएल गेल जे अमुख तिथिकेँ सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन जानल-मानल संगीत प्रेमी सबहक सहयोगसँ भऽ रहल अछि। मुदा गोनरकेँ ऐ बातक कोनो खबरि नै भेल छेलै। शहरमे स्टेशन चौकपर बबाजी पानबला अछि। हिनका दोकानपर गामक बेसी लोक पान खाइले साँझ-बिहान जाइत-अबैत रहैए। बबाजीकेँ बूझल छन्हि जे गाम भरिमे गोनर सेहो नीक गबैया छी। मात्र दू दिन बँचल रहए, जब गोनर अनायास बबाजीक पानक दोकानपर गेल, बबाजीकेँ मनमे ठहकलनि आ जनैक जिज्ञासा भेलनि जे गोनर ऐ कार्यक्रममे भाग लेने अछि की नै। पुछलखिन- “की रौ तूँ ऐ कार्यक्रममे हिस्सा लेने छेँ किने?” गोनर जिज्ञासु भऽ विनम्रतासँ पुछलक- “भैया हौ, के ई कार्यक्रम करबै छै हौ?” बबाजी बूझि गेला जे गोनर भाग नै लेने अछि तैयो आस्वासन दैत बजला- “अच्छा रूक, हम परोफेसर साहैबसँ बात करै छी।” बबाजी मोबाइल लऽ कऽ नम्बर मिलौलनि आ बात करए लगला- “हेल्लो सरजी, परनाम! हम बबाजी पानबला बजै छी।” ओमहरसँ जे जबाव पुछने होन्हि, मुदा बबाजी फेर बजला- “एकटा नवजुबक बड़ नीक गबैया छथि।” कनीए कालक पछाति फेरि बजला- “लड़का तँ लोकले छथि मुदा एक नम्मर गबैया छथि!” कनीए काल रूकि कऽ फेर आग्रहक स्वरमे बबाजी बजला- “सर! देखियौ कनीए, मौका देल जेबक चाही।” कनीकाल पछाति फोन डिसकनेक्ट भेल। गोनरकेँ बबाजी कहलखिन- संस्थापर चलि जो, ओतए बजेलकौ हेँ। पहिने गीत गबबेतौ तब चुनाव हेतौ। अखने चलि जो।” गोनरकेँ बसंती साइकिल रहबे करए, मुदा बूझल नै छल जे संस्थान छै केतए! तैयो पुछैत-पुछैत बिदा भेल। शहरक दच्छिन, बान्हक कछेरमे उजरा रंगक मकान, अगुआरे-पछुआरे नाना परकारक रंग-बिरंगक फूलक गाछसँ सजल-धजल फुलबाड़ी अछि। सड़कक कातमे साइनबोडपर लिखल अछि ‘महिला कल्याण संस्थान’। गोनर साइकिल नीचाँ धँसा संस्थानक प्राङगनमे पहुँचल, जैठाम दुचक्किया आ चरिचक्किया गाड़ीक पार्किंग लगल छल। बुझना गेल, एते सभकेँ-सभ भी.आई.पी. पहुँचल अछि। कातमे साइकिल लगा, एकटा हॉलमे लोक सबहक सुनगाम देखि भीतर घूसल। प्रोफेसर साहैबक नाओं पूछि गोनर लग गेल आ परिचए देलकनि। परिचए दइते बैसैक आदेश भेटलै। गीत गोनहार, नाच केनहार आ आनो आन कलाक प्रदर्शन केनहार सभ रहए आ रिहलसल होइत रहए। कनीए कालक पछाति गोनरसँ गीत गबबौल गेल, गोनरक सेलेक्सन नै हेबाक तँ कोनो सवाले नै रहए, आश्वासन भेट गेलै जे एकटा गीत गोनरो गाैत। गीतक आयोजन शुरू भेल। एक-सँ-एक भी.आइ.पी. सभ पहँुचल छला। विशिष्ठ अतिथि सभकेँ बैसैक बेवस्था मंचपर आ मंचक अगल-बगलमे कएल गेल रहए। ई आयोजन सार्वजनिक चंदा चिठ्ठासँ होइत रहए जइमे बड़का-सँ-बड़का पुजीबला लोकक धिया-पुता सभ भाग लेने रहए। सिवनाथ सहाय, जीतुराज जौहर आ स्थानीय सिविल अधिकारी सभ मुख अतिथिक रूपमे मंचपर आसीन भेल रहथि। गायन, वादन आ नृत्य ई तीनु संगीत छी एकर प्रस्तुति रसे-रसे हुअ लगल। हर-एक आदमी जे बाजि सकैए ओ गाइबो सकैए किएक तँ गायन बोलीएक एकटा उन्नत रूप छी। मुदा नव-सिखुआ गाबैया लेल समान रूपसँ निर्देशन आ निअमित रूपसँ अभ्यास जरूरी होइत अछि, जे बेसी-सँ-बेसी बच्चा सभमे ओतेक नै छन्हि। गायन एकटा एहेन काज छी जइमे स्वरक सहायतासँ संगीतमय ध्वनि निकालल जाइत अछि। सुवेवस्थित ध्वनि जे रस दैत अछि आ रसक अनुभूति करबैत अछि वएह संगीत कहबैत अछि। ऐ कलाक प्रदर्शन युद्ध, उत्सव, प्रार्थना आ भजनक समए मनुखक द्वारा गावन आ बजावनक माध्यमसँ कएल जाइत अछि। जे गाबैए ओकरा गबैया, जे नाचै ओकरा नचनियाँ आ जे बजबैए ओकरा बजनियाँ कहल जाइए। प्रोग्राम होइत-होइत अदहा राति बीति गेल मुदा अखनि धरि गोनरकेँ मौका नै भेटल। बखत केर पहिया बढ़ैत गेल आ राति दू बाजि गेल। विशिष्ठ अतिथि सभ घर दिस बिदा भेला, दर्शको सभ रसे-रसे जाए लगल, तब जा कऽ गोनरक नाओं एलोन्स कएल गेल। गोनर स्टेजपर आएल। गोनरक मुँहसँ राग लयात्मक रूपसँ बेवस्थित भऽ संगीतरूपी लहरि समुद्रक ज्वारि जकाँ पसरए लगल। जइ प्रस्तुतिमे कलाक प्रदर्शन हुअए आ जइ कलाकेँ संगीत या मनोरंजन कहल जाए, गोनरके कंठसँ वएह सुरीली कंठाध्वनि, ओहिना उत्पन्न हुट लगल जेना वाद्ययंत्रसँ सुसज्जित घ्वनि निकलैए। जे सभ प्रोग्राम छोड़ि,़ घर दिस बिदा भेल रहए, ऊहो ओतै ठमकि गेल, डेग पाछू खींचए लगलै, सभ आपस आबए लगल आ जेकरा घरपर अबाज जाइत रहए, ओकराे जिज्ञासा हुअ लगल जे के एहेन गवैया छी आ केतक छी? किछु विशिष्ठ मेहमान सभ सेहो घूमि आएल छला। गोनरक गाैला पछाति सभ हिनका लग बजा परिचए-पात पुछए लगल आ प्रसंशा सेहो करए लगल। गोनरकेँ आशा जगल जे कियो हिनका मदति करथि। जौं शुद्ध मनसँ भगवानकेँ यादि कएल जाए तँ भगवानो कोनो रूपमे दर्शन देबे करै छथिन। वएह भेल, जीतुराज जौहर टी.वी कलाकार, गोनरकेँ आश्वासन देलकनि- “दू महिना बाद अहाँ दिल्ली आउ, ओतए संगीतक ऑडिसन छै।” गोनर हर्षित भऽ गेल आ जोर-सोरसँ ऑडिसनक तैयारीमे लगि गेल। डॉ. श्रीमोहन झा, अध्यक्ष- मैथिली विभाग, हरि प्रसाद साह महाविद्यालय, निर्मली (सुपौल) मिथिलाक इतिहास इतिहास साक्षी अछि जे वैदिक कालहिसँ जाहि मिथिलाक प्रतिष्ठा ब्रह्मज्ञानक विकास-केन्द्रक रूपमे भेल, जतय खेलहुमे ब्रह्मविद्या सिखाओल जाइत छल, जकर अनुशासन द्वारा स्मार्त कालहुमे देश-देशान्तरक आचार-विचारक क्षेत्रमे प्रेरणाक श्रोत रहल, जे जनपद अपन दर्शनक विचार-धारासँ सम्पूर्ण भारतकेँ आलोकित कयलक ओ जकर काव्य-कल्पना भारतीय साहित्यक रस-प्रवाहकेँ निरन्तर समृद्धि कयलक ओहि मिथिलाक पावन भूमि जनक, याज्ञवल्क्य, गौतम, कपिल, कणाद, गंगेश, चिन्तामणि, मण्डन, उदयन, वाचस्पति, पक्षधर, विद्यापति, गोकुलनाथ, अयाची, शंकर ओ ज्योतिरीश्वरक मिथिला न्याय, तत्वमीमांसा एवं सांख्यक जन्मभूमि मिथिला कृतिसँ भारते नहि अपितु समस्त विश्व आलोकित अछि। मिथिलाक सीमा प्रसंग वृहद् विष्णु पुराणमे कहल गेल अछि जे मिथिलाक उत्तरमे नागाधिराज हिमालय एकर प्रहरीक रूपमे ठाढ़ छथि। दक्षिणमे पतित पावनी गंगा अपन कलकल-ध्वनिसँ एकर चरण स्पर्श करैत छथि। पूरबमे नृत्य करैत चिर-चंचला कौशिकी एकर सम्यता आ संस्कृतिक संवाहिका तथा विध्वंशिका दुनू मानल जाइत छथि तँ पश्चिममे धीरगमिनी गण्डकी स्वर्णक समान चकमक करैत एकर श्रृंगार करैत छथि। कवीश्वर चन्दा झा सेहो अपन रामायणमे उपर्युक्त आधारकेँ स्वीकार करैत मिथिलाक सीमाक प्रसंग कहने छथि- “गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि पूर्व कौशिकाधारा। पश्चिम बहथि गण्डकी उत्तर हिमवत वल विस्तारा।। कमला त्रियुगा अमृता धमुरा वागमती कृतसारा। मध्य बहथि लक्ष्मणा प्रभृति से मिथिला विद्यागारा...।” वर्तमान समयमे मिथिलाक पूर्ण विस्तार भऽ गेलाक कारणें एकर सीमा दरभंगा, मधुबनी, चम्पारण, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, सहरसा, पूर्णियाँ, अररिया, किशनगंज, भागलपुर एवं हिमालय केर तराइ धरि पसरि गेल अछि। एहि प्रकारेँ गंगा-प्रवाहसँ लऽ कऽ उत्तर हिमालय धरि सए मील तथा पूरबमे महानन्दासँ पश्चिम गण्डकी धरि २५० मीलमे मिथिला देश अछि। अति प्राचीन कालसँ मिथिला तीरभुक्ति नामसँ प्रचलित छल। एहिठाम नदीक बाहुल्य अछि एवं ओहि सभक तीरमे लोक सभ बसैत गेलाह तेँ मिथिलाक पर्याय तीरभुक्ति नाम प्रचलित छल जे वर्तमान समयमे तिरहुत नामसँ प्रसिद्ध अछि। मिथिला नामकरणक प्रसंग अनेक पौराणिक आधार अछि। भविष्य पुराणक अनुसार मिथिलाक नामकरण राजा ‘निमिक’क पुत्र मिथिक नामपर राखल गेल अछि। अयोध्याक राजा निमि एहि पूण्य भूमिपर अयलाह तेँ निमिक पुत्र मिथिक नामपर एहि प्रदेशक नाम मिथिला पड़ल। मुदा पाणिनिक कथन छनि जे जतय शत्रुक उन्मूलन कयल जाय ताहि भू-खण्डक नाम मिथिला अछि। महाभारतक युद्धमे मिथिलाक राजा पाण्डवक संग युद्ध कयने छलाह। एहिसँ स्पष्ट अछि जे मैथिल लोकनि योद्धा सेहो होइत छलाह। बाल्मीकि रामायणमे सेहो मिथिला नरेशक वीरताक वर्णन भेल अछि। विश्व वाङ्गमयमे संस्कृतक साहित्य-सरिता अत्यन्तव्यापक, दीर्घकालिक ओ निरन्तर प्रवहमान रहल अछि। एहि अमृत सिन्धुसँ बिन्दु-बिन्दु ग्रहण कय भारतक समस्त लोक भाषा-साहित्य समृद्ध ओ संबलित भय युग-युगसँ समस्त विश्वकेँ प्रेरणा-पुंज आलोक प्रदान करैत आबि रहल अछि। संस्कृतक अक्ष्य-भण्डारसँ भाव राशि ग्रहण कय भाषा-साहित्यक परती-पाँतर पर्यन्त सुरभित ओ सुवासित होइत रहल अछि। भारतीय इतिहासक ओ सांस्कृतिक मर्मज्ञ मनीषी लोकनि जनैत छथि जे भारत वर्षक राष्ट्रीय अखण्डतामे संस्कृत भाषाक अद्वितीय स्थान रहल अछि। प्राचीनकालसँ लय आसेतु हिमालय सांस्कृतिक, धार्मिक ओ दार्शनिक विचारक आदान-प्रदानक माध्यमे संस्कृते भाषा रहल अछि। काव्यक कोनो विधाक सर्जना एहिमे भेल अछि। इतिहासकार लोकनि भारत वर्षक ओहि भू-भागकेँ मिथिला कहल अछि जे कतेको दृष्टिसँ अपन अप्रतिम विशिष्टताक महत्वकेँ अद्यावधि सुरक्षित रखने अछि। मिथिलाक ओ पावन-भूमि अपन सभ्यता-संस्कृति, जप-तप, ध्यान-धारणा-समाधि आदि उन्नत मानवताक साधक गुणक कारणेँ आइ संसार मध्य शीर्षस्थ स्थान रखने अछि। मिथिलाक माटि-पानिमे किछु एहन विलक्षण शक्ति सर्वदासँ सन्निहित रहलैक अछि जाहिसँ एहिठामक लोक शिष्ट, सज्जन, प्रतिभाशाली, विद्या-व्यवसायी एवं तत्व चिन्तनक होइत रहल अछि। यज्ञ-स्थलक केन्द्र मिथिला जे अपन यज्ञक धूआँसँ समस्त वातावरणकेँ पावनमय बनौने रहल अछि। वैदिक कालसँ लय अद्यावधि मिथिलामे उत्पन्न भय अपन दिव्य अवदानसँ समस्त-विश्वकेँ चकित-स्तम्भित कयनिहार ऋृषि-मुनि, योगी-साधक, दर्शनिक विद्वानक जँ सूची बनाओल जाय तँ ओहिसँ केओ आश्चर्यचकित भय जायत। दर्शनक क्षेत्रमे मिथिलाक नाम अग्रगण्य रहल अछि।न्याय सूत्रक प्रणेता गौतम, वैशेषिक दर्शनक प्रणेता कणाद एवं नव्य-न्यायक जनक गंगेश उपाध्यायक कारणें मिथिला दर्शन क्षेत्रमे पूर्ण ख्याित प्राप्त कयने छल। हिनक अतिरिक्त उद्योतकर, मण्डन, वाचस्पति आदिक नाम उल्लेखनीय अछि। वेदान्त सूत्रक शंकरक व्याख्या वाचस्पति द्वारा भामती नामसँ लिखल गेल अछि। मण्डन एवं शंकराचार्यक शास्तार्थ तँ जगत प्रसिद्ध अछि। जैमिनिक मीमांसा तथा कपिल मुनिक सांख्य दर्शनक निर्माण सेहो एहि पवित्र भूमिपर भेल। मिथिलाक महान नगरी तथा बौद्ध एवं जैन धर्मक मुख्य प्रभाव क्षेत्र लिच्छवी वंशक राजधानी वैशाली प्राचीन इतिहासमे महत्वपूर्ण स्थान रखने अछि। मिथिलाक इतिहास एकर साक्षी अछि जे वैदिक युगहिसँ मिथिला संस्कृति, न्याय, तर्कशास्त्र, विज्ञान, गणित, कामशास्त्र, मीमांसा, व्याकरण, धर्मशास्त्र तथा दर्शनक अध्ययन-अध्यापनक केन्द्र दीर्घकाल धरि बनल रहल। सम्बद्ध युगहिमे विभिन्न प्रकारक विशाल साहित्य अस्तित्वमे आयल, जाहिमे वौद्धिक विकास तथा आध्यात्मिक प्रगतिक पराकाष्ठाक रूपमे स्थित विभिन्न उपनिषद सभ सम्मिलित अछि। विश्वास देवीक समयमे मिथिलामे चौदह सय मीमांसकक एक वैसक भेल छल। अत: उक्त युगहिमे गार्गी, मैत्रेयी तथा सुलभा सनक प्रतिभाशाली नारीक उदाहरण भेटैत अछि। एहि प्रकारेँ तद्युगीन राजा सबहक संरक्षणमे उच्च शिक्षाक अनेक नियमित संस्था छल। एहन संस्था सभ सामान्यत: ‘चरण’क नामसँ ज्ञात छल। अत: एही वैदिक युगहिमे जनक ओ याज्ञवल्क्य सन श्रेष्ठओ अग्रणी दार्शनिक छलाह। ओहि समयमे अन्य प्रान्तहुसँ दार्शनिक लोकनि जनक ओ याज्ञवल्क्यसँ अध्यात्म सम्बन्धी शिक्षाक ज्ञानोपार्जन हेतु अबैत छलाह। याज्ञवल्क्यक जीवनवृत्त वस्तुत: हुनक मातृभूमिक तत्कालीन सांस्कृतिक इतिहास थिक। याज्ञवल्क्यक अतिरिक्त गौतम, कपिल, विमाण्डक, शतानन्द तथा श्रृंग-ऋृषि ततेक विख्यात छलाह जे राजा दशरथ सेहो हिनका पुत्रेष्टि-यज्ञक सम्पादन हेतु कौशिकी घाटामे आमंत्रित कयने छलथिन। ओ काश्यप शाखासँ सम्बद्ध छलाह। अत: जाहि मिथिलाक पावन भूमिपर ब्रह्मज्ञानक सर्वश्रेष्ठ महर्षि याज्ञवल्क्यक सिद्धता आदि मिथिलाक आध्यात्मिकताकेँ सिद्ध-प्रसिद्ध करैत अछि। स्मृतिकार याज्ञवल्क्य परम धर्मकेँ िनरूपित करैत कहने छथि- “अयं तु मरमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम्।” मिथिलाक सभ्यता आ संस्कृतिक प्रसंग महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ऋृग्वेदकेँ ‘प्राचीन ऋृर्षि’ शीर्षक लेखमे कहने छथि जे गौतम, रहुगण, दीर्घतमा, कुक्षिवन्त, विश्वामित्र आदि पूर्वोत्तर बिहारक सभ्यता आ संस्कृति आदिक जनक छलाह। विश्वामित्र ‘कौशिक’ नामसँ प्रख्यात भेलाह तथा कौशिकी हिनकर शापभ्रष्टा सहोदरा छलथिन। एही कौशिकी क्षेत्रमे विश्वामित्र ब्राह्मणत्व प्राप्त कयने छलाह। आ ई कौशिकी क्षेत्र नि:सन्देह मिथिलाक भू-भाग रहल अछि। मिथिलाक सामाजिक तथा सांस्कृतिक अवस्थाक सम्बन्धमे ज्योतिरीश्वर अपन ‘धूर्तसमागम’ तथा ‘वर्णरत्नाकर’ मे पूर्ण सामग्री प्रस्तुत कयने छथि। वर्णरत्नाकर महत्व ऐतिहासिक दृष्टिसँ भारतीय पुरातत्वक एकटा कोष अछि तथा मध्यकालीन पूर्वोत्तर भारतक एवं विशेषतया मिथिलाक जनजीवन एवं संस्कृतिक जीवन्त चित्रण प्रस्तुत करैत अछि। समाजमे संस्कृतक एतेक अधिक प्रभाव एवं प्रचार छल जकर उदाहरण स्वयं विद्यापति देने छथि। राजा हरि सिंहदेवक आदेश तथा प्रेरणासँ बनाओल पंजी-प्रबन्ध, जे तत्कालीन समाजमे अत्यधिक प्रचलित भेल, संस्कृतहिमे लिखल गेल। एहिसँ स्पष्ट होइत अछि जे तत्कालीन समाजक रीति-नीति, आचार-विचार, धर्म-कर्म सामाजिक बन्धन, क्रिया-कलाप, दर्शन, स्मृति आदि सम्बन्धी विषय-वस्तुक रचनाक माध्यम संस्कृते छल। तकर मूल कारण जे मिथिलाक राजन्य वर्ग संस्कृति, साहित्य, दर्शन, ललित कलामे रूचि रखैत छलाह ओ कतोक राजा संस्कृतक विद्वान सेहो छलाह। एहिठामक राजा लोकनि संस्कृत रचनाक अध्यापन तथा वद्वान लोकनिक आश्रयदाता रहैत अयलाह। महाराज महेश ठाकुर तँ अपन विद्वताक कारणेँ मिथिलाक राज्य प्राप्त कयने छलाह। विद्यापतिक रचनापर दृष्टिपात कयलासँ स्पष्ट होइत अछि जे तत्कालीन रचनाक माध्यम कोन भाषा छल तथा राज दरबारमे कोन-कोन विषय सबहक रचना होइत छल विद्यापति राज पण्डित छलाह। पण्डित वर्गक भाषा संस्कृत छल। अत: अपन पाण्डित्य प्रदर्शन करबाक हेतु संस्कृतेमे रचना करब अनिवार्य बूझि पड़लनि। मिथिला तंत्र विद्याक प्रधान केन्द्र छल एवं कतेको तांत्रिक एवं वैज्ञानिक सेहो छलाह। मिथिलामे नवीन भक्ति मार्गक रूपमे तंत्र मार्गक बेस प्रचार भेल। फलत: जाहि वंशमे सिद्ध तांत्रिक रहथि, ओहि वंशमे सिद्ध तांत्रिकक उपास्य देवीक मंत्र ग्रहण कय ओही देवीक उपासना करबाक प्रथा मिथिलामे अद्यपर्यन्त प्रचलित अछि। वस्तुत: प्राचीन धर्मशास्त्र आदिक मनन ओ चिन्तनकय युगक आवश्यकतानुसार आचार सूत्रक अन्वेषणक संगहि ओकरा नव व्याख्या देबाक आवश्यकता छल। ई ओहि समयक समाजक हेतु जीवन-मरण ओ अस्तित्वक प्रश्न छल। मिथिलाक पण्डित लोकनि एहि उत्तरदायित्वकेँ निष्ठापूर्वक विर्वाह कयलनि। अतएव महाकवि विद्यापति सेहो एही परम्पराक आश्रय ग्रहण कयलनि। प्राचीन कालहिसँ मिथिलाक ई विशेषता रहल अछि जे एहिठामक राजा लोकनि जनक वंश, कर्णाट क्षत्रिय अथवा ओइनवार शासक होयबाक संग-संग धर्म-कर्म एवं सामाजिक आचार-विचारक नियामक सेहो होइत छलाह। एही कारणेँ स्मृति ग्रन्थक रचना एतेक सुदृढ़ भय गेल छल। अपन आचार रक्षाक हेतु संस्कृतक ज्ञान आवश्यक छलैक तेँ समाजक जनमानसमे सेहो संस्कृतक प्रचार-प्रसार छलैक। एवं प्रकारेँ भारतक धर्म, संस्कृति-साहित्य, संगीत ओ कलाक क्षेत्रमे कर्णाट शासक लोकनि जे प्रेरणा-पुंज लय अवतीर्ण भेलाह से ओइनवार कालमे गतिमान नहि रहल अपितु ओकर व्यापक प्रभावक समता परवर्ती कोनो शताब्दीमे नहि भय सकल। कर्णाट आ ओइनवार वंशक पतन मिथिलाक हेतु कष्टकर सिद्ध भेल। राजनीतिक अद्य:पतनक संग-संग परवर्ती कालमे मिथिला सांस्कृतिक क्षेत्रमे सेहो अवनतिक दशामे आबि गेल। किन्तु आलोच्य कालमे साहित्य आ कलाक क्षेत्रमे मिथिलाक उल्लेखनीय अवदान रहलैक। एहि स्तरपर कर्णाट-ओइनवार-युगीन मिथिला जनक-याज्ञवल्क्य कालीन मिथिलासँ तुलनीय अछि। ओइनवार काल भारतीय साहित्येतिहासमे वस्तुत: ‘स्वर्णयुग’क रूपमे गनल जाइत अछि, कारण उक्त काल पर्ववर्ती युगसँ एहि दृष्टिसँ भिन्न अछि जे एहिमे संस्कृत-विद्याक क्रमिक प्रचार-प्रसारक संग-संग लोक भाषा साहित्योक विकासक मार्ग प्रशस्त भेल। मिथिलाक विदेह राजा जनकक समयमे जाहि संस्कृतिक सूत्रपात भेल छल ओकर पूर्णोत्कर्ष महाकवि विद्यापतिक युगमे भेल। ज्योतिरीश्वरक पश्चात् महाकवि विद्यापतिक कोमलकांत पदावलीक रसास्वादन कय सम्पूर्ण पूर्वोत्तर भारतवर्षक साहित्य-प्रेमी भाव-विभाेर भय गेलाह। मिथिलाक संग घनिष्ट सम्पर्क रहबाक कारणेँ एहिठामक चिन्तन, साहित्य तथा संस्कृति बंगाल, आसाम एवं उड़ीसाक प्रेरणा श्रोत बनि गेल। हिनक गीतक अनुकरणपर एकटा नवीन भाषा ब्रजबुलि साहित्यक जन्मभेल। आसामक प्रमुख वैष्णव भक्त शंकरदेव तथा बंगालक महा प्रभु चैतन्यदेव तँ सहजहि विद्यापतिक गीत गबैत-गबैत मूर्छित भय जाइत छलाह। एगारहम ई.मे भारतमे मुसलमान सबहक आगमन भेलासँ हिन्दु समाजक अस्तित्व वस्तुत: संकटापन्न भय गेलैक। हिन्दू लोकनिक राजनीतिक स्वतंत्रता समाप्त भय गेल। एहि जातिक समाजिक श्रृंखला तथा पारस्परिक सौमन्स्यक अन्त भय रहल छलैक। एहि संकटसँ बचबा लेल ब्राह्मणवर्ग निबन्ध लिखि ओहि सामाजिक मन्दिरकेँ ध्वस्त होयबासँ बचयबाक प्रयास कयलक। राजनीति तथा अर्थ व्यवस्थापर कोनो अधिकार नहि रहि जयबाक कारणेँ उक्त ब्रह्मण लोकनि अपन ध्यानकेँ मुख्यत: सामाजिक तथा पारिवारिक जीवनपर केन्द्रित कयलनि। ओकर परिणति जीवनक विभिन्न क्षेत्रक नियमनक हेतु आचार संहिता तथा विधि-व्यवस्थाक सम्बन्धी निबन्धक ओ नियम-परिनियम निर्माण भेल। उक्त स्मृति विषयक रचना अपन आन्तरिक मूल्य, सार्थकता आ सबलताक कारणेँ अनेक शतकक दुर्दशा ग्रस्त स्थितिओमे हिन्दू समाजक स्वतंत्र व्यक्तित्वक रक्षा कय सकल। हिन्दू विद्याक एकटा प्रमुख केन्द्र रहबाक कारणेँ मिथिलामे निबन्ध लेखनक स्वतंत्र परम्पराक अस्तित्व आश्चर्यजनक अछि। ओइनवार कालहुमे प्रशासनिक स्वरूप ओहिना रहल जे कर्णाट कालमे छल। मैथिल लोकनि वर्णाश्रम-व्यवस्थाक कट्टर अनुयायी रहलाह अछि। सम्बद्धकालक मैथिल समाजमे सनातन धर्मक पालनुक प्रति पर्ण निष्ठा परिलक्षित होइत अछि। विदेशी सभसँ आक्रान्त भेलहुँ मैथिल समाज अपन स्वतंत्र व्यक्तित्वकेँ सुरक्षित रखबामे पूर्ण सफल रहल। महाकवि विद्यापति सेहो तत्कालीन समाजक विशद वर्णन कयलनि अछि। हुनक कीर्तिलताक विभिन्न स्थलसँ ज्ञात होइत अछि जे मुसलमानी आक्रमणक फलस्वरूप तिरहुतमे बहुत दिन धरि अराजकता तथा अव्यवस्था व्याप्त रहल। हिन्दू समाज उत्पीड़ित तथा अपमानित जीवन व्यतीत करबाक हेतु विवश छल। मुसलमान आक्रमकक आतंककारी प्रशासनसँ साहित्य साधना ओ परम्परा सेहो क्षत-वक्षत भय गेल छल। भारत पर मुसलमानी प्रभाव जाहि निर्मम ओ नृशंस रूपमे बढ़ि रहल छल ताहिसँ समस्त भारतीय जन-मानस आलोड़ित भय उठल छल। विद्यापति तत्कालीन समाजक विशद वर्णन ‘कीर्तिलता’ मे कयने छथि जे दृष्टव्य अछि- “धरि आनए बाभन बड़ुआ।” मथाँ चढ़ाबए गाइक चुड़ुआ।। फोर चाट जनउ तोड़ ऊपर चढ़ाबए चाह घोड़।।” एहि प्रकारेँ ईसाक तेरहम-चौदहम शतकमे एहि ब्राह्मण धर्म प्रधान प्रदेशकेँ एकटा सर्वथा भिन्न आ प्रतिकुल धर्मक सामना करय पड़लैक। ओ धर्म छल इसलाम जे मुसलमान विजेता सबहक संग एहि प्रदेशमे प्रवेश पओलक। निबन्धकार तथा धर्मिक नेता लोकनि बहुत दिन धरि एहि धर्मक प्रभावकेँ रोकबाक प्रयास कयलनि। किन्तु समयक प्रवाहक संग-संग इसलाम सेहो हिन्दू धर्म आ समाजपर अपन प्रभावक प्रसार करए लागल। मैथिलीमे व्यवहृत अनेक फारसी तथा अरबी शब्द, मिथिलाक आदालतिमे पारम्परिक हिन्दू विधिक अनुसार न्यायिक क्रिया-कलापक सम्पादन, तजिया, दाहा आदि मुसलमानी पर्व-त्योहारक प्रति हिन्दूक सम्मान तथा छठि, घड़ी आदि हिन्दू पर्व आ धार्मिक अनुष्ठानमे मुसलमान सबहक आस्था, अकबर द्वारा चलाओल गेल फसलीसालक राष्ट्रीय संवतक रूपमे मिथिलामे प्रचलन, अनेक मुसलमान सन्त द्वारा अपन राग तरंगिणीमे इमाम तथा फिरदासी नामक मुसलमानी रागक समावेश आदि कतिपय तत्व हिन्दू आ मुसलमान जन समुदायमे सांस्कृतिक तत्वक आदान-प्रदान तथा सम्मिश्रणक सूचक थिक। ओइनवार काल तुर्क आक्रमणक युग छल। जखन मुसलमानी आक्रमणक पहिल बाढ़ि बिहार धरि पहुँचि गेल छल, मुदा तखनहुँ मिथिला ओहिसँ बचल रहल आ मैथिल राज सभामे संस्कृत काव्य साहित्य आदर पबैत रहल। यद्यपि उक्त युग-पूर्ववर्ती युग जकाँ प्रकाण्ड विद्वान सभकेँ जन्म नहि दय पओलक। एहि राजवंशक शासनकालमे जगधर, विद्यापति, शंकर मिश्र तथा वाचस्पति मिश्र ई चारिटा मिथिला विभूति भेलाह। विद्यापतिक समयमे इसलाम एवं हिन्दू धर्मक बीच सेहो एक प्रकारक आदान-प्रदान प्रारम्भ भय चुकल छल। उत्तर बिहार ओहि समयमे सूफी लोकनिक एक प्रधान केन्द्र बनि चुकल छल। महाराज शिवसिंह मुसलमान सन्त एवं फकीरकेँ जे दान देने छलाह ओकर प्रमाण सेहो प्राप्त भेल अछि। ज्योतिरीश्वरक ‘वर्णरत्नाकर’मे जे विदेशी अरबी-फारसी- शब्द भेटैत अछि जाहिसँ ई स्पष्ट होइत अछि जे राजनीतिक आधिपत्यक बहुत पूर्बहि मिथिलामे अरबी-फारसी भाषासँ सम्पर्क भय गेल छल। सूफी सन्त एवं फकीरक माध्यमसँ एहि प्रकारक सम्पर्क सम्भव भेल होयत। तिब्वती यात्री धर्म स्वामी जखन १२३६ ई.मे हिरहुतक राजा रामसिंह देवक ओतय आयल छलाह ओही समयमे एहि क्षेत्रमे मुसलमानक प्रकोप बढ़ि रहल छल। दुनू धर्मक समन्वय एवं समागमसँ नवीन दृष्ट्रिकोणक बीजारोपण भय रहल छल एवं विद्यापति युग धरि अबैत-अबैत एकर आओरो विकास भेल। उन्नैसम शताब्दीक मध्यमे अबैत-अबैत मिथिलाक सामाजिक जीवनमे परिवर्तनक प्रक्रिया प्रारम्भ भेल। अंगेज लोकनिक राज्य तावतधरि नीक जकाँ प्रतिष्ठित भय गेल छल। एहि क्रममे ओलोकनि अपन धार्मिक तथा सांस्कृतिक प्रचार जोर-शोरसँ प्रारम्भ कयल। अपन धर्मग्रन्थक भारतक विभिन्न भाषामे अनुवाद कराय जनतामे प्रचार प्रारम्भ कयल। भारतक अनेक भागमे लोक सभ इसाई बनय लागल। एकरे प्रतिक्रियाक रूपमे प्राय:एतय ब्रह्म समाज एवं आर्य समाजक आन्दोलन आरम्भ भेल। राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानन्द ओ स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि धर्मिक एवं सामाजिक नेता लोकनिक आन्दोलनक फलस्वरूप जन साधारणमे एक नवीन चेतनाक संचार भेल। फलत: पाश्चात्य साहित्यसँ प्रेरित भय अपन क्षेत्रिय आन्दोलनसँ उद्वोधित भय एहिठामक लोक अपन-अपन मातृभाषा साहित्यकेँ नवीन भाव-शिल्पसँ सम्न्वित करबाक हेतु अग्रसर भेल।१८५४ ई.मे चार्ल्स उड जाहि प्रणालीक शिक्षाक आधारशिला राखल ताहिमे मातृभाषाकेँ शिक्षाक माध्यमक रूपमे स्वीकार कयल गेलैक। अंग्रेजी प्रशासनक समय मैथिली साहित्यक साधक लोकनि पुन: अपन प्रशस्त मार्गपर अग्रसित भेलाह जे स्वतंत्रता संग्रामक पृष्ठ भूमिमे पुन: नव चेतना ओ नव स्फूर्ति बीजरूपमे मैथिली भाषा ओ साहित्यक बहुमुखी उत्थानक प्रेरक होइत आबि रहल अछि। विद्यापतिक पश्चात् गोविन्ददास, मनबोध, हर्षनाथ, चन्दा झा आदि कविगण भेलाह। अत: मिथिला अपन वैभवपूर्ण साहित्यिक परम्पराक कारणेँ भारतवर्षमे अद्वितीय स्थान रखने अछि। (१) बी.सी. ला ग्रन्थ भाग-१ १२८-१३९ तृ. सरकार, क्रीएटिव इण्डिया पृ. ४ (२) वृह. उप. ६, २-१-७ ऐ. पृ- ८५-८८ (३) मुखर्जी, मेल एण्ड थाट इन एनशिएन्ट इण्डिया- पृ- ५५ (४) दु. झा अभिनन्दन ग्रन्थ, पृ- २१६, महा. वनपर्व- ११० (५) विद्यापति लिखनावली (६) पंजी प्रबन्ध- श्लोक- १-२, मि. त.- पृ- १३६ (७) ज. ए. सी. ब. १९१५/ न. स./ पृ- ४३२ (८) ज. वि. ओ. रि. सो.- १३/ सर्च फॉर संस्कृत एण्ड प्राकृत मैन्यूस्क्रिप्ट्स इन ऐण्ड ओड़ीया/ ३-४ (९) वाचस्पति मिश्र- विवाद चिन्तामणि/ डॉ. गंगानाथ झाक अनुवाद/ भूमिका-९-२४ (१०) ज्योतिरीश्वर, वर्णरत्नाकर, सम्पादक डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी एवं बबुआ जी मिश्र, एसिएटिक सोसायटी आॅफ बंगाल, कलकत्ता, प्रथम संस्करण, १९४० (११) रोयरिक द्वारा सम्पादित, वायोग्राफी ऑफ धर्मस्वामी, १९५९ डाॅ. शिव कुमार प्रसाद, अध्यक्ष हिन्दी विभाग, हरि प्रसाद साह महाविद्यालय- िनर्मली (सुपौल) , जनम- 12/11/1956. गाम+पोस्ट- सिमरा, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, (बिहार) बनमानुष एकटा भयंकर जंगल छल। ओइ जंगलमे भाँति-भाँतिक गाछ-विरिछ आ जानवर रहै छल। लोभी मनुख जंगलक जारनि, लकड़ी आ पशु-पक्षीकेँ व्यापार करैले ओइ जंगलमे जाइ छल। एकटा जंगल जाइक खूब चाकर रस्ता बनि गेल छल। ट्रक-ट्रेक्टरक अवाज सुनिते जानवर सभ लंक लऽ भागि जाइ छल। ओही जंगलमे किछु बनमानुख सेहो रहै छल। एक दिन एकटा मनुख ओइ जंगलक कातमे एकटा बनमानुखकेँ देखलक। मनुख सन बुधियार जीव केतए भेटत। बनमानुखकेँ देखि कऽ ओ सोचए लगल। हे भगवान! ई केहेन जीव अछि। ने नुआँ ने लत्ता। भक्ष-अभक्ष किछु ने बुझैत अछि। सौंसे देह केश केना झबड़ल छै। देह गन्ह तोड़ैत छै। बनमानुख सेहो मनुखकेँ देखलक। ओ चुप्प! गुमशुम बैसल छल। मनुखकेँ मन भेलै जे ईहो तँ हमरे जकाँ अछि, मुदा कोन किसिमक जीव अछि। छी: छी: एहनो जीव होइ छै। बनमानुखकेँ मने-मन धिक्कारैत मनुख पुछलक- “हौ बनमानुख, पूर्व जन्ममे कोन-कर्म केलह जे भगवान बनमानुख बना देलकह?” बनमानुख सुनि कऽ चुप्पे रहल। मनुख वएह बात फेर दोहरेलक। आब बनमानुख मनुख दिस बिनु देखनहि बाजल- “हौ मनुख, भगवान जे करै छथिन से नीके करै छथिन। हम पूर्व जन्ममे बड़ नीक कर्म केने रही तँए भगवान हमरा बनमानुख बनौलनि। हमरासँ तों कथीमे नीक छह से बता सकै छह की?” मनुख ई बात सुनिते कूदि उठल। बाजल- “हौ बनमानुख, सौंसे संसारमे तोहीं सभसँ काबिल? अँइ हौ, ने देहपर कपड़ा, आ ने अन्न-पानिक ठेकान! ने घरक ठेकान। बिमारी होइते पट्ट दनि मरि जेबो से कोनो ठेकाने ने। पेटक खातिर सौंसे जंगल ढहनाइत फिरै छह। आ...।” जाबत् मनुख किछु आर बजैत तइसँ पहिने बनमानुख बाजल- “हौ मनुख, थम्हऽ-थम्हऽ दम लऽ लैह, अपसियाँत भऽ गेल हेबऽ। कनी हमरो सुनि लैह, हौ, चालनि दुसलक सूपकेँ जइमे बहत्तरि गो भूर, ईह!” तैपर मनुख बाजल- “हौ, ई बात ठीके कहलह, ने देहपर कपड़ा-लत्ता! एकटा बात कहऽ तँ, तों सभ केते कपड़ा पहिरै छह। हमरा तँ ओतेकेँ नामो ने बूझल अछि। मुदा किछु हमहूँ कहऽ चाहै छिअ। हौ, कोट-पेंट, पतलून, धोती-साड़ी, सलवार-फराक की-की नै तों सभ बनेलह। मुदा सभटा बुधियारी तँ घोंसरल जाइ छह। मौगी-मुनसा सभ कियो आइ एकटा छोटका पेंट गंजी पहिरने हाट-बजारमे बौआएत फिरै छह। अछैते कपड़ा दिन-दिन देह परहक कपड़ा घटले जाइ छह। हौ, तोरा सबहक बहुरुपिया भेषसँ तँ हमहीं ने नीक। विधाता जे वस्त्र देलक ओहीसँ अपन देह झँपने छी। सर्दी-गर्मी आ बरखोसँ अपन सुरक्षा करैत रहै छी। हौ मनुख, तों घरक बात कहै छह। चुप रहऽ तों सभ की बजबह। एक-एक इंच जमीन लेल कियो केकरो छोड़लहक हौ? जमीन लेल भाएकेँ भाए, बापकेँ बेटा, बेटाकेँ बाप, भायकेँ बहिन, काकाकेँ भतीजा, सारकेँ बहनोइ, माएकेँ बेटा-बेटी कोनो नतीजो बाँकी रखने छहक। राम-राम। हौ ईंटा-खपड़ा कि फूसि-फटकसँ बनल घर घर नै होइ छै। जेतए जीव शान्तिसँ साँस लऽ सकए, जेतए सभकेँ सभसँ प्रेम होइ ओ घर घर होइ छै। हौ, हमसब खेत-पथार, घर-दुआर आ धन-सम्पति लेल कहियो केकरो खून नै करै छिऐ, आ ने केलिऐ। आर सुनह, दादा-परदादाक लगौल गाछ-विरिछ, परती-पराँत सभटा तँ चटने जाइ छह, आब की चटबह। बिहाड़ि-सुखार, भुमकम-सुनामी जीबह देतह। हो लाखक लाख सभ िदन मरै छह से नै बुझै छहक।” कनीकाल रूकि पुन: बाजल- “आब चलऽ अन्नक बातपर। हौ, जंगल-खेत-खरिहाँनमे जे अन्न, फल, कन्द-मूल छेलह तइमे केतेक बँचल छह? किछु रहऽ देबहक तब ने। हौ, केतेक बड़का पेट बना लइ गेलह? तोरो तँ हमरे जकाँ फेंफिएे पड़ै छह। अमेरिका, रूस, चीन, जपाने नै सौंसे संसारमे सभ कोइ फेंफिऐ रहल छल। हौ, तोरे सबहक मारने सभ मरल जाइत अछि। पहाड़, जंगल, नदी, समुद्र, धरती, सुरूज, सभटा धीरे-धीरे खतम भेल जाइत अछि। हौ, पहाड़, जंगल, नदी सभ जँ मरि जेतह तँ तोहूँ सभ नै बँचबह, मरबऽ मरबे करबह। हम तँ ठीके पएरे-पएर बौआइ छी। मुदा तोरा जकाँ पाँचे डेग चललापर थुसुकुनियाँ नै पाड़ै छी। परमात्माक देल फल खाइ छी। कन्द-मूल खाइ छी। नदी, पोखरिक पानि पीबै छी। पहाड़क खोहमे हमर घर अछि। केशे हमर नुआँ अछि। तोरा सभसँ अधिक तागतिओ अछि अधिक उमेर धरि जीवितो छी। तों दवाइ खाह, सुइया भोंकाबह। टी.बी. तोरा होइ छह। कैंसर तोरा होइ छह। एड्स आ नवका-नवका बेमारी तोरा हेतह। हमरा नै। दैवक डाँगसँ बँचब बहुत कठिन होइ छै। जा-जाह अपन रस्ता देखऽ गऽ।” एतबा कहि ओ चुप भऽ गेल। मनुख सन्न छल। किछु नै जवाब दैत देखि बनमानुख फेर बाजब शुरू केलक- “बापकेँ बेटा खून करै छह। बहिनक गरदनिपर लात दऽ कऽ हिस्सा लेल घरसँ निकालैत छहक। तँए तों बड़ नीक आ हम बड़ अधला। हौ, तोरासँ हम लाख गुणा नीक। भगवानसँ हम कहै छिऐ जे हे भगवान, कहियो हमरा मनुख नै बनाएब। जाह, हम जे कहलिअ तैपर सभ मनुख मिलि कऽ विचार करिहऽ।” मनुख अपने सन मुँह बनौने बनमानुखकेँ तकिते रहि गेल। बनमानुख जंगल दिस विदा भऽ गेल। (81म सगर राति दीप जरय’ देवघरमे पठित...।) जमीला १ अगियाएल मन कन घमले छेलै कि कनियाँ बिअनि नेने ठाढ़। सुमनजी तम-तमा गेला। अबते जँ पत्नी बिअनि नेने ठाढ़ भेली कि बुझू जे हुनक चरखा शुरू। शुरू भाइए गेली- “अँए यौं! आर कियो नोकरी करै छै कि नहि। हमरा तँ लगैत अछि जेतेक दरमाहा अहाँक औपिसमे अबै छै सभटा अहींकेँ भेटि जाइत अछि... ...हे कियो काज नइ देत।” सुमनजी की बजता। सभ दिन एके खिस्सा। ऑफिसमे सभ काज करै छै मुदा सुमनजीक कुशल, कर्मठ आ दृढ़ व्यक्तित्वक सोझा सबहक माथ झूकले रहै छै। चामक पूजासँ कामक पूजा पैघ होइ छै। ऐ बातक प्रत्यक्ष प्रमाण सुमनजी छथि। हुनक सहकर्मी संगे-संग हुनक पदाधिकारीओ सुमनजीकेँ सम्मान दइ छथिन। मुदा पत्नी लेल धैनसन। सुमनजी बजला- “हे यै, एक गिलास जलो तँ नेने अबितौं! के काज देत। यै, जिनगी भरि तँ अहाँ आ अहाँक बाल-बच्चा लेल कमा-कमा कऽ देलौं से तँ एक गिलास पानियोँ नदारत अछि। फेर आनसँ हम की आशा करब।” पत्नी मुँह फुलौने घरसँ निकलि बेटीपर फुफकार छोड़ऽ लगली कि तावत रस्तापर हो-हल्ला हुअ लगलै। सुमनजी कपड़ो ने बदलने रहथि। ओ ओहिना दरबज्जा दिस विदा भऽ गेला। पत्नी सेहो पाछू-पाछू दरबज्जापर एलखिन। बीच सड़कपर सौंसे टोलक जनानी-पुरुखक करमान लागल छल। बीचमे कोनो जनानी कानि-कानि कऽ नगरक लोककेँ बिखैन-बिखैन गारिसँ असिरवाद दैत अल्ला निसाफ करतौ, अल्ला निसाफ करतौ...। कहैत बीच सड़कपर पड़ल छल। सुमनजी चकित। ई अल्लावाली स्त्री केतएसँ टोलपर आबि गेल। कोनो चाेरनी ने तँ छी...। ...ई सोचिते छला कि पत्नी हाथ पकड़ि कहलखिन- “चलू-चलू, कथीले गारि सुनब। ई छुतराही केकरो ने छोड़तै। जे जेहने करम करत ओकरा ओहने ने फल भेटतै।” सुमनजीकेँ किछु भाँज नै लगलनि। परंच ई अबस्स बुझना गेलनि जे कोनो विशेष बात अबस्स छइ। ओ चुप-चाप पत्नी संग अँगना आबि गेला। अाँगन अबिते बेटी माएपर बाजलि- “एतेकाल फुफकार कटै छेलेँ जे एक लोटा पानियोँ ने बाबूकेँ देल होइ छौ, हम पानि लऽ कऽ ठाढ़ छी आ दुनू गोरे तमाशा देखऽ चलि गेलेँ।” सुमनजी बेटीक बात सुनि झमा कऽ खसला। कियो कम नहि। जल की पीता। बेटी दिस तकैत हतास् भेल अपन कोठरी दिस विदा भऽ गेला। मन तँ भेलनि जे बेटीक हाथसँ लोटा लऽ जुमा कऽ बाड़ीमे फेकि दी, मुदा फेर अपनाकेँ रोकला आ ओहिना बिछौनपर निढ़ाल भऽ पड़ि रहला। बेटी टेबुलपर लोटा रखि चलि गेलनि। पत्नी पतिक मुँहक भाव देख नेने छेलखिन। भयसँ हुनका लग नहि एलखिन। हुनका बुझबामे कनिको भाँगठ नै रहलनि जँ अखन अगर लगमे जेबनि तँ निश्चित लोटा पानि समेत बाड़ीमे चलि जेतै। सुमनजी बहुत सोझ आ शान्त बेकती। किनको किछु अधला नै करता। किनको श्राद्ध आकि बिआहमे मदति करैले सदिखन तत्पर। हुनका लेल कियो आन नहि। बाल-बच्चा तँ हुनक प्राण। मुदा जखन क्रोध अबै छन्हि तँ कियो हुनका सामने जाइक साहस नइ कऽ सकैत अछि। एकटा माए आ बाबूएजी एहेन छथिन जिनका सोझा सुमनजीकेँ कोनो वश नइ चलै छन्हि। अपन जनमदाताक प्रति हुनका अगाध श्रद्धा छन्हि। सुमनजीक भाव-धारा पुन: रस्ता दिस बहऽ लगल। की बात छिऐ...? ओ जनानी के...? किए सौंसे टोलक लोक जमा भऽ ओइ अवलाकेँ मारि रहल अछि...? ओ कोन कारणे ‘अल्ला’केँ गवाही रखि सैंसे टोलसँ लड़ैले तैयार अछि...? जरूर कोनो असाधारण बात अछि। पुन: सभ बातसँ अलग सिरमापर माथ देने छतकेँ निहारऽ लगला। पत्नी चुप-चाप तावत् टेबुलपर चाह आनि कऽ रखि देने छेलखिन। हुनकर मुँहक भाव सेहो बदलि गेल छेलनि। सुमनजीकेँ कहलखिन- “कपड़ो ने बदललौं। चाह पीब लिअ, फेर कपड़ा बदलि लेब। अलगनीपर सभटा कपड़ा राखल अछि।” पुन: अलगनी दिस तकलथि तँ ओइपर गमछा नइ छेलै। ओ पुन: घरसँ बाहर निकलि गमछा नेने घरमे एलखिन। तावत् सुमनजी बिछानसँ उठि चाह पीबै छला। पत्नी गमछा बिछानपर राखि पान लगबऽ लगलखिन। सुमनजी बिछानसँ उतरि कपड़ा बदलैमे व्यस्त भऽ गेला। पत्नी पानो लगबै छेलखिन आ कनडेरीए आँखिए पतिपर तकितो रहथिन। पति चुप-चाप कपड़ा बदलैत रहला। पत्नी पतिकेँ किछु बतबैले उताहुल छली मुदा साहसे ने होइ छेलनि। ओ सोचि-विचारि कऽ पतिक हाथमे पान दैत बजबाक असफल प्रयास केली मुदा पति केर भाव नै पाबि चुप-चाप घरसँ निकलि गेली। सुमनजी कपड़ा बदलि पुन: अपनेसँ पान लगा खा लेला आ चुप-चाप आँगनसँ बाहर निकलि गेला। रस्तापर तमाशा समाप्त भऽ गेल छेल। ओ टहलैत खेत दिस निकलि गेला। २ बाधमे दोसर गामक एकटा किसानसँ भेँट भऽ गेलनि। हिनका देखिते ओ प्रणाम करैत पुछलखिन- “की यौ सुमनजी, अहाँ तँ खेत-पथार बिसरिये गेलौं। कहियो देखबो ने करै छी। आ लोक खेत दिस एबो किए करत। दू सालसँ एकटा अन्न केकरो खेतमे नै उपजि रहल अछि।” सुमनजी ओइ किसानकेँ थाहैत लगमे जा बजला- “कहू-कहू की हाल अछि खुशी भाइ। खेती-पथारीक की हाल अछि?” खुशीलाल बाजल- “की हाल रहत। कहुना अहुबेर चिचोरि-मिचोरि कऽ धान रोपि देलिऐ। आशा तँ नहियेँ अछि। तैयो रोपि देलिऐ...। हम सभ आब नोकरीओ तँ कऽ नइ सकै छी।” पुन: फुसफुसा कऽ बाजल- “सुमनजी, एकटा बात पूछी?” खुशी भाइक फुसफुसाहटिपर सुमनजीक कान ठाढ़ भेलनि। सहटि कऽ खुशीलालक लग आबि पुछलखिन- “की बात यौ!” खुशीलाल ओहिना फुसफुसाइत बाजल- “अहाँ टोलमे सुनलौं जे मुसहरवाक बेटा एकटा जोलाहिनसँ बिआह कऽ गामपर अनलक अछि।” सुमनजीकेँ धक् दऽ मोन पड़लनि। ओ... जनु एकरे झगड़ा होइ छेलै...। खुशीलालकेँ कहलखिन- “अँए यौ, अहाँकेँ ई बात बूझल अछि? हमरा तँ किछु ने बूझल अछि! अखनो रस्तापर हल्ला-गुल्ला होइ छेलै। वएह-वएह ओकरे झगड़ा होइत हेतैक।” खुशीलाल बातकेँ आगू बढ़बऽ लागल। सुमनजीकेँ असली बात बुझबामे आबि गेलनि। अपन गामक निन्दाक बात सोचैत सुमनजी खुशीलालकेँ कहलनि- “छोड़ू ऐ बात सभकेँ। केकरा की कहबै। और सुनाउ बाल-बच्चा केना अछि। की कऽ रहल अछि। यौ सुनलौं अहाँ-कनियाँकेँ मन खराप भऽ गेल छल। ठीक भेली किने।” खुशीलाल अपन घरवालीक बात सुनिते बाजल- “यौ सुमनजी, ओ पूर्वजन्मक पुनेक कारण बँचि गेली। नइ तँ मरबामे कोनो भाँगठ नहि रहि गेल छेलनि। काल्हि आऊ ने, देखियो लेबनि।” सुमनजी ‘हूँ-हूँ’ करैत घर दिस घूमि गेला। गाम-घरक कोनो बात छपित रहि केना सकैत अछि...। दोसर दिन सुमनजीकेँ छुट्टीए रहनि। घरसँ चाह पी कऽ एकटा मित्रक घरपर विदा भेला। रस्तेमे एकटा दरबज्जापर परचित-अपरचित सबहक अड्डा जमल छल। सुमनजी सेहो धरा गेला। एकटा नेताजी सेहो हुनका सबहक बीच विराजमान रहथिन। बैसला बाद पुन: चर्चा शुरू भेल। मुसहरबा गामक एकटा किसान छल। विधाता ओकरापर दहिन छेलखिन। मात्र आठे-गोट बेटा देलखिन। आरो होइतै तैयो ओकरा खुशीए होइतै। जर-जमीन तँ मुसकिलसँ दू बीगहा छै। दोसर-तेसर गिरहतक जमीनमे बटाइ करि कऽ गूजर-बसर करैत अाबि रहल अछि। एक जोड़ा बरद, दूटा भैंस, गाए, बकरी सभटा आमदनीए। जखनि समरथ छल, केहनो काजकेँ किछु ने बुझै छल। घरवाली सेहो विधाता दहिन भऽ कऽ देलखिन। हऽर-कोदारि छोड़ि एहेन कोनो काज नै अछि जे ओ नहि कऽ सकैए। तेहने काया, तेहने रंग आ तेहने रूप। जखन मुसहरबाकेँ दुरागमन भेल रहै ओही समए ओकर पत्नीकेँ देखबा लेल ओकरा अँगनाक टाटमे केतेक भूर भेल से गनब कठिन छल। मुसहरबाक माए सभ दिन दसटा गारि दऽ टाटक खरही सभकेँ ठीक कऽ दैत रहए, मुदा दोसर दिन फेर ओहिना-क-ओहिना। गेल जवानी फेर ने लौटए। अठ-अठटा बेटाक जनम दइवाली जनाना आ पुरुखक धीरे-धीरे परिवारक लगाम ढील होइत गेलै। एकटा, दोसर, तेसर पुतोहु तक तँ कहुना मुसहरबाक कनियाँ बेटा-पुतोहुकेँ बान्हि कऽ रखलक मुदा चारिम पुतोहुकेँ अबिते वेचारी हाफऽ लगली। जखन छोटकीक मुहसँ लुत्ती-उड़ए लगै, तँ मात्र मुसहरबे दुनू परानी नहि समुच्चा परिवारक लोक तेना ने दगैत छल जे सभटा मलहमो जरि जाइ छेलै। एक दिनक बात छी। सुमनजी मुसहरबाक पड़ोसीक ओइठाम कोनो काजे गेल छला। बैसले छला कि मुसहरबाकेँ अँगनासँ वएह लुत्ती उड़ब शुरू भेल। लुत्तीक जवाब आगि-अँगोरासँ देल जाइत रहै। आब लुत्ती आ अँगोरामे अपन घरकेँ के कहए जे पास-पड़ोसक संगे संग एक-एकटा जाति-अजातिक संग कोन-कोन सम्बन्ध ने उजागर होमए लगल। मुसहरबाक अँगनामे तिल रखैक जगह नहि। अचानक कुट्टा-कुट्टी शुरू भेल। तीन दियादिनी एक तरफ, छोटीक असगरे एक तरफ। अँगनामे ठाढ़ पुरुख-पात्र लाजे ओतएसँ भागल। धरहरिया करैवाली सभ थाकि कऽ कात भऽ गेल। गइ सँइकटनी, गइ बपडाही, गइ सौतिन, आर की की नहि...। आइ मुसहरबाक परिवारक गाड़ीक कनैल, पालोक संग-संग चक्का, धूरी सभटा टुटि-फुटि कऽ नाश भऽ गेलै। मुसहरबा जीविते अछि। पत्नीओं जीविते छै। बेरा-बेरी बेटा-पुतोहु भीन होइत गेलै। आइ सभसँ बुरबक बेटा-पुतोहुक संग कहुना जिनगी काटि रहल अछि। मुसहरबाकेँ बेटाक विषयमे सोच छेलै जे भगवान बेटा दइ छथिन तँ हम रोकैबला के। जीतै तँ बोइन कऽ कऽ खेतै। सभटा बेटा ठीके बाेइन कऽ कऽ जीब रहल छै। कियो पंजाब, तँ कियो दिल्ली आ कियो गामेमे। मुदा पुछैबला कियो ने। एकटा बेटा परसाल गामेमे रहि एकटा भट्ठापर ईंटा बनबऽ गेल। ओतै एकटा जनानी जमीला सेहो रेजाक काम करैत छेलै। छौड़ा देखऽमे सुन्दर, लम्बा आ मजगूत देहक छेलै। धीरे-धीरे दुनूक बीच पेंच फँसि गेलै। ओकर नाओं रखि दियौ ‘पंचा’। तँ पंचा आ जमीलाक बीच शारीरिक सम्बन्ध भेलाक कारणे ओकरा गर्भ भऽ गेलै। जखन मामला उजागर हुअक स्थिति भेलै तँ दुनू परा कऽ बाहर भागि गेल। ओतै गर्भपात करबा कऽ दुनू फेर कामो-काज करए लगल। पंचाकेँ दूटा बाल-बच्चा भऽ चुकल छेलै। जमीलाकेँ सेहो तीनटाबाल-बच्चा। जमीलाक घरबला एक-दू बर्ख पहिने छोड़ि कऽ भागि गेल छेलै। ओअपन माइक संगे रहैत छल। आब दुनू बेक्ती भट्ठापर कमाइत छल। दुनू अपन-अपन घरपर बाल-बच्चा लेल रूपैआ-पैसा सेहो पठबैत छल। ऐ क्रमे एक-डेढ़ बर्ख भऽ गेल। दुनूकेँ अपन-अपन बाल-बच्चाकेँ देखना बहुत दिन भऽ गेल छेलै।दोसर जमीला जेतेक पाइ कमाइ छल ओ बैंक वा पोस्ट-आॅफिससँ भेजैले पंचाकेँ दइ छेलै। फोनपर जमीला जखन पाइ दऽ पुछै छेलै तँ बड़की बेटी कोनो बेर सही कोनो बेर कम बतबैत छेलै। धीरे-धीरे जमीला बूझि गेल जे ई मुनसा हमर पाइ अपन घरपर पठा दइए, या रखि लइए। आब ओ पंचापर गाम जेबा लेल जोर देमए लगल। पंचा कहुना-कहुना ओकरा पोल्हबै छल मुदा जनानीओं कम खेलल नहि छल। अन्तमे दुनू गाम लेल विदा भेल। दुनूमे शर्त भेलै जे हम ने तोरा ओइठाम जेबो आ ने तों हमरा ऐठाम जेमे। दुनू गोटे अपन-अपन बाल-बच्चाक संगे दस दिन-मास दिन रहि फेर घूमि जाएब। गाम एलापर बात बिगरि गेलै। जमीला गामपर आबि कऽ जे पाइ-कौड़ीक हिसाव केलक तँ पता चललै जे ओकर कमेलहा ५५-६० हजार रूपैआ पंचा बेइमानी कऽ लेलकै। ओ जनानी पहुँचल पंचा गामपर आ एमहर पंचा घरसँ फरार। टोलपर मेला लगि गेल। जमीला पहिने तँ पाइक बात कहलकै। फेर पंचाकेँ अपन घरवला घोषित कऽ देलकै। पंचाक अँगनामे ढुकि एकटा घरक ओसरापर जा कऽ बैसि रहल। पंचाक भौजाइ संगे-संग सौंसे गामक जनानी एक दिस आ पंचाक तथाकथित मुसलमानि पत्नी एक दिस। आब जमीला कहै- “जाबत मुनसा गामपर नहि औत ताबत हम ऐ ओसरापरसँ नहि उतरब।” पंचाक घरवाली आ बाल-बच्चा संगे-संग आन भाए-भौजाइकेँ पहपटि भऽ गेल। की करी की नै। भरि दिन जमीला ओसारपर बैसल रहल आ अँगनामे रहनिहार सभटा धीरे-धीरे अँगनासँ बाहर भऽ गेल। पंचाकेँ सेहो खबरि कएल गेल मुदा ओ किए औत। साँझ भेलापर जमीला जे से बजैत अपन घरपर चलि आएल। गामक लोक सेहो निसाँस छोड़लक। रातिमे मुसहरबापर पंचायत बैसल। “तोहर बेटा मियनि संग बिआह केलकौ तँए नै एलौ। बेटाकेँ बजा। कोनो बात अबस्स छै।” मुसहरबा कहलकै- “हौ पंच सभ। तों सभ हमरा किए कहै छह। पंचाकेँ भीन भेना सात बरख भऽ गेलै। आब ओ हमरा बसमे अछि? ओही छौड़ाकेँ पुछहक। हम तँ नचार छी। कहुना जीबै छी। ओकर घरवाली छै। कहक पुछतै।” पंचाक घरवाली एतेक लोकमे की बजतै। गुड़क मारि धोकरे जनै छै। ओकरा छाती अपने हहरै छै। तीनिटा धिया-पुता। तहूमे एकटा बेटी। सौतिन मुसलमानि। ओकरा आँखिक नोर नइ सुखा रहल छै। जे से बाल-बच्चाकेँ ताना मारै छै। नवकी माए एलौ रौ? की सभ अनलकौ? पंचैतीमे सभ मुसहरबाकेँ दोमैत रहल। ओ सभ बात सुनि कऽ चुप्पे रहल। पंचाक घरवाली अपना माए-बापकेँ फोन करैलक। सभटा बात कहलकै। भाए सभ ओकर पीट्ठा-पहलवान। बहिनकेँ ढाढ़स देलकै। भोरे दूटा भाए एलै। सभटा बात सुनलकै। गौआँकेँ फेर बैसार भेल। बैसार शुरूए भेल छेलै कि पंचाकेँ ओ नवकी कनियाँ फेर दरबज्जापर पहुँचगेलै। पंचाक सार संगे-संग सभटा नवतुरिया पंचैती छोड़ि जमीलाकेँ घेर लेलक। ओकरा एक आदमी पुछलकै- “तों हिन्दू बनबीही तँ पंचा राखि लेतौ।” ओ जनानी कहलकै- “एनुका चान ओनए किए ने चलि जेतै मुदा हम हिनू नइ बनबै।” एतबा बात निकलिते पंचाक सार चटाक् दऽ जमीलाकेँ मुँहपर थापड़ मारि देलकै। थापड़ लगिते जनानी जमीनपर बैसैत-बैसैत ओंघरा गेल। किछु आदमी पंचाक सारकेँ अलग केलक। ताबत् लोक देखलकै जे जनानी बेहोश छै। पंचाक घरवाली दौग कऽ पानि अनलक आ ओकरा मुँहपर हाथसँ छिच्चा देबए लगलै। थोड़ेकालमे ओइ जनानीकेँ होश एलै। साड़ी खुलि गेल रहै ओकरा देहमे लटपटबैत गारि दैत ओ थाना जाइक बात कहैत विदा भऽ गेल। थानाक नाओं सुनिते टोलबैया अपन-अपन अँगना दिस विदा भऽ गेल। मुसहरबा अँगनाक जर-जनानी सभटा अपन-अपन नहिरा दिस विदा भेल। पंचाक सार सेहो अपन बहिन आ भगिनीकेँ लऽ विदा भऽ गेल। एकटा बेटा जे बारह-तेरह बर्खक रहए ओकरा माल-जाल देखैले छोड़ि देलकै। मुसहरबा दुनू परानी टुकुर-टुकुर देखि रहल अछि। सुनि रहल अछि। ओइ मादे बलु सोचितो हएत। अँगनामे मात्र दूटा पोता छै। बेटो सभ किछ-मिछ खा कऽ बाध-बोन दिस टरि गेल। ३ कथा अनसोहाँत तँ ने लगैए? चलू कथा तँ बड़ ओझराएल अछि मुदा ओ ओझरीसँ निकालि कऽ हमहूँ निस्तार पाबए चाहै छी। जमीला ठोकले थाना पहुँचल। संगमे माए आ एकटा छोटका बेटा सेहो रहै। सभटा खिस्सा कहैत ओ दरोगाजीकेँ पंचाक गामपर जेबाक जिद्द करऽ लगलै। जनानीबला बात। दरोगा ओइ जनानीकेँ टोलक चौकीदारकेँ बजबेलक। पंचाक गामक चौकीदारकेँ बजा पंचाक घरसँ बजबैले पठेलक। जखन जमीलाक बारेमे चौकीदारसँ दरोगा जिज्ञासा केलक तँ ओ साफ-साफ दरोगाजीकेँ बता देलकै जे ई जनानी ओही लाइक अछि।एकरा संगे जे भेलै से उचिते भेलै। ऐ जनानीक इहए धंधे छै। दरोगाक सामने अपन चरित्रपर चौकीदार द्वारा देल गवाही ओकरा उत्तेजित कऽ देलकै। ओ दरोगाकेँ सोझहेमे गारि दैत चौकीदार दिस झपटल। मुदा ओकर माए आ बेटा कहुना ओकरा रोकलक। तावत पंचा गामक चौकीदार सेहो घूमल। पंचाकेँ भागब आ गामक खिस्सा कहैत ओ सेहो अपन विचार दरोगाजी लग रखलक। सभ बात सुनि दरोगाजी जमीलाकेँ दोसर दिन थानापर एबाक बात कहि डाॅटि-डपैट कऽ कहुना घर पठेलक। दरोगाजीकेँ बुझैमे बहुत किछु आबि गेलनि। मुदा पंचोकेँ दोख तँ छइहे। दोसर दिन जमीला भिनसरे थानापर पहुँचल। दरोगाजीकेँ पंचा ओइठाम चलऽ लेल जोर देमए लगलै। ऐ बीचमे पंचाक तरफसँ कियो दरोगाजीकेँ दुआ-सलाम कऽ कऽ सम्हारि गेल छल। दरोगाजी एमहर-ओमहर करैत जखन एक घण्टा बिता देलखिन तँ जनानी अचानक थानाक ओसरापर चढि ओइठाम राखल दू-तीनटा प्लाष्टिकक कुर्सीकेँ उल्टैत दरोगेजीकेँ धमकी दैत कहलकै- “अगर अहाँ नइ जाएब तँ हम अखने डी.एस.पी. पुलिस लग जाएब। अहाँ हिन्दू छी तँए हिन्दूक पक्ष लइ छिऐ।” एकटा सिपाही ठेंगा लऽ ओकरा दिस हूरकल मुदा दरोगाजी रोकि देलखिन। फेर किछु सोचैत सिपाही सभकेँ संग लगा जनानीकेँ गाड़ीमे बैठा पंचाक घरपर विदा भेला। पंचा नइ छल। टोल-पड़ोसक धिया-पुता संग पुरुख-जनानीक भीड़ लागि गेल। दरोगाजी दू-चारि आदमीसँ पूछ-ताछ केलखिन। कियो जनानीक पक्षमे नइ ठाढ़ छेलै। सबहक सोझामे दरोगाजी अल्लावाली जनानीकेँ पुछलखिन- “तों की चाहै छेँ?” ओ कहलकै- “पंचाकेँ हमरा अपना घरमे बौह बना कऽ राखऽ पड़तै।” बिच्चेमे एक आदमी बाजल- “हँ रखतौ मुदा तोरा हिन्दू बनऽ पड़तौ, दोसर बात तों अपन बाल-बच्चाकेँ एतए नहि आनि सकै छें। तेसर बात जँ तोरा पंचा घरवाली बनेतौ तँ तों जिनगीमे कहियो जोलहटोली नहि जा सकै छेँ। छौ मंजूर तँ दरोगाजीकेँ सामने कागज बना। हम सभ तोरा पंचा संग रखैले तैयार छियौ।” सुमनजी ऐ कार्यक्रमक दर्शक छला ने सलाहकार। मुदा समाजमे ऐ तरहक घटनासँ अत्यन्त चिन्तित छला। दस आदमी। दस तरहक बात। मुदा ऐ तरहक घटना समाजक संस्कृतिक लेल स्वास्थ्यप्रद नहि। दरोगाजी जमीलाकेँ पुछलखिन- “जब तों दुनू समाजकेँ बन्हनकेँ तोड़ि ऐ तरहक कर्म केलहिन तखन दुनू गाेरे सजाक भागी छेँ। तों धर्म नहि छोड़बिही, बाल-बच्चाकेँ नइ छोरबिही।जखन तों जोलहटोली जेबे करबिही तखन बिआह सम्बन्ध केना भऽ सकै छौ?” समाजक लोककेँ दरोगाजी कहलखिन- “अहींक समाजक पंचा छी। अहाँ ओकरा बजा समाधान करू। जावत् ओ नहि अबैत अछि तावत् एकर समाधान नहि होएत।” फेर जमीला दिस घूमि कऽ कहलखिन- “जे तोरा संग रहतौ ओ भागल छौ। तों ओकर पता कर। दुनू गाेरेक कारणे अगर समाज परेशान हेतौ तँ तोरा दुनूकेँ समाजो दण्डित करतौ। आ सरकारो समक्ष दण्डित हेमेँ।” जमीला बाजल- “हमरा पंचासँ मतलब अछि। हम पंचाकेँ कारणे बौआइ छी। समाज हमरा किए मारत? समाज निर्णए करऽ पड़तौ।” दरोगाजी दू दिनक समए दऽ चलि गेला। गेला बाद जमीलाकेँ कहल गेल, जे काल्हि भिनसरमे तूँ आ। अपना संग जेकरा आनबाक हउ सेहो नेने आ। पंचैती हेतौ। पंचा जेतए नुकाएल छल ओकरा समाद दऽ बजाएल गेल। आइ दुनू समाजक बीच पंचा आ जमीला दुनू बैसल अछि। पंचा समाजक सामने जमीलाक कथनकेँ स्वीकार केलक। समाजक एकटा आदमी ओकरा दू-चािर थापड़ मारबो केलकनि। मुदा आर लोक बीच-बँचाउ केलक। बादमे पंचाकेँ पूछल गेल जे ओ की चाहैए।पंचा चुप। जमीला चुप। अन्तमे पंच निर्णए देलक- “दुनू जे काज केलेँ से अनुचित अछि। तीन-तीनटा बाल-बच्चा रहैत तोरा सबहक कर्म नींदनीय छौ। तों दुनू धर्म समाज, जाति आ परिवारक विध्वंसक छेँ। पति-पत्नीक रूपमे तोरा दुनूकेँ रहब सम्भव नहि।” पंचाक पत्नी आ बाल-बच्चा जमीला आ ओकर तीनटा बाल-बच्चाकेँ स्वीकार नहि कऽ सकैत अछि। धर्म आ जातिपर सेहो एकर प्रभाव पड़तै। तँए अगर पंचा मुसलमान भऽ जमीलाक संग चलि गेल तँ ओकर बाल-बच्चाक भार के लेतै? तोरा दुनूक ऐ सम्बन्धसँ धार्मिक विवाद भऽ सकैत अछि। मुदा हम सभ से नै होमए देलिऐक। समाजक निर्णए भेलै जे तों दुनू काल्हि भोर होइसँ पहिने गाम छोड़ि दे। जमीला पंचाक घर भविसमे कहियो ने आबि सकैत अछि। पंचा कहियो जमीलाक घर नइ जा सकैत अछि। गामक बाहर तों भलहिं पति-पत्नी बनि रह मुदा गाममे दुनू संग-संग पएर नहि राखि सकै छेँ। अगर समाजक बात नहि मानमें तँ आगू तों सभ अपन बाल-बच्चाक संग अपनकेँ जातिसँ बहिस्कृत बूझ। कागतपर हिन्दू आ मुसलमान दुनू तरफसँ पाँच-पाँच आदमी चारि फर्द कागत बनेलक। चारू फर्दपर पाँचो पंचक संग जमीला आ पंचासँ निशानक संग संग सही कएल गेल। दूटा फर्द पंचा आ जमीलाकेँ देल गेलै। एकटा पंचाक गामक पंच रखलक। पंचा आ जमीला चुपचाप कागत लऽ ओतएसँ विदा भऽ गेल। आइ धरि पंचा गाम नहि आएल। ओकर बाल-बच्चाक संग पत्नी पंचाकेँ भेजल पाइ अथवा अपने बुतापर जीब रहल अछि। जमीला आइ धरि गाम नहि घूमल। जमीलाक बाल-बच्चा सेहो जमीला अथवा अपन नाना-नानीक संग जीब रहल अछि। प्रणव झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, एन ए एम एस भवन, अंसारी नगर नई दिल्ली - 110029 अंबर “Mr. Jha, your leave has been sanctioned. You can proceed for leave. Have a great journey.” ई ई-मेल पढैते सुमनजी के मोन खुशी से मयुर सन नाच लागल । सुमनजी नोयडा क एकटा इंजिनियरिंग कालेज मे बीटेक(ईसीई) प्रथम सेमेस्टर के छात्र छलाह । दुइए मास पहिने त हिनकर एडमिशन एत भेल छलैन, किंतु ओ अपन क्षेत्र सं पहिल बेर बाहर आयल छलैथ आ इंजिनियरिंग मे प्रवेश के बाद इ पहिल दूर्गापूजा ! गाम कोना नै जायब ! आ गामों मे त मां-बाबू-बहिन, दोस्त-महिम सेहो सब त आंखि पाथने अछि हिनका देख लेल । ई सब सोचैत-सोचैत सुमनजी के पुरना गप्प सब मोन पर लगलैन । बचपने सं ओ एकटा औशत मेधा के छात्र छलाह । साधारण परिवार के बालक, आ घर मे पढ मे सभसं बेस होसगर । स्वाइत परिवार आ सर-कुटुमैति मे लोक सब हिनका मे बाबू-इंजिनियर आदि बन के आश लगाब लागल । जखन इ मैट्रीक क परीक्षा प्रथम श्रेणी मे निक नंबर सं उत्तीर्ण केलैथ त ओ आश के बल भेटल आ हिनका सीएम साईंस कालेज मे इंटर(गाणित) संकाय मे प्रवेश भेट गेलैन । इंटर क पढाई के दौरान हिनका मे इंजिनियरिंग कर के महत्वाकांक्षा बलवंत होइत गेल । ओ दरिभंगा मे एकटा कोचिंग सेहो पकैर लेलैथ आ १२वी के परीक्षा संगे जेईई(मेन) के परीक्षा मे सेहो बैसलाह । किंतु औशत छात्र के विडंबना होई अछि कि ओ नै आरे होइ अछि आ नै पारे ! जेईई(मेन) मे ठीक ठाक कहल जाइ बला रैंक भेटक छलैन्ह किन्तु एतेको निक नै जे जेईई(एड्वांस) के लेल उत्तीर्ण कहल जाय अथवा एन.आई.टी अथवा कोनो अन्य टाप इंजिनियरिंग कालेज मे प्रवेश भेटैन्ह । अत: हिनको लग वैह विकल्प छल जे बहुत पाछां रैंक बला सब के लेल सेहो खुजल छल, अर्थात अन्य प्राईवेट इंजिनियरिंग कालेज । यद्यपि हिनका इहो देखना गेलैन जे हिनका सं बहुत पाछु रह बला एसी/एसटी कोटा के क्षात्र सब के एन.आईटी मे प्रवेश भेट रहल छल। इ बात हिनका दूध मे मांछी सन बुझना गेल छल । हिनकर मोन कुंठित होमय लागल छल । ताहिपर सं परिवार-समाज क प्रश्नवाचक द×ष्टी हिनका आर बेसी विचलित करय लगलैन । किछु गोटे राय देलखिन जे एहि बेर छोड़ आ पटना/दिल्ली जा क तैयारी कर ग, अगिला बेर आईआईटी/एन.आईटी मे एडमिशन भैये जेत । सुमनजी के मोन एहि उहापोह मे छल ताहि बीच हुनका यार कक्का सं भेट भ गेलैन जे छुट्टी मे गाम आयल छलैथ । ओ हिनका बुझेलखिन जे हौ, तोहर जे स्थिति छ: ताहि मे कोन गारंटी जे अगिला बेर तोरा आईआईटी/एन.आईटी मे एडमिशन भैये जेत ? आ जौं नै भेटल त इंजिनियरिंग कर के सपनो पर कुठाराघात भ सकै छ: । ताहि सं निक अछि जे तोहर रैंक निक छ: आ कोनो नीक प्राईवेट इंजिनियरिंग कालेज मे ईसीई/सीएस आदि संकाय मे प्रवेश भेट जेत। आ एहन ठाम प्रवेश भेला पर एजुकेशन लोन भेटबा मे कोनो भांगट नै रहत। आ ओहि सलाह के परिणामस्वरूप आई सुमनजी एत बीटेक क रहल छैथ । इ सब सोचैत सोचैत सुमनजी के पता नै कखन आंखि लागि गेलैन । नियत समय पर सुमनजी गाम पहूंचला । गाम मे यार-दोस्त, मां-बाबू-बहिन-पितियाइन सभ सं भेंट कय क मोन हर्षित भेलैन । यार दोस्त मे कनि हवा-पाईन सेहो छोड़लैथ किंतु एन.आई.टी मे प्रवेश नै भेटै के कुंठा अखनों धरि कहीं हिनका मोन मे अटकल छल जे कखनो क हिनका मोन के विचलित क देइत छलैन । सतमी के सांझ मे ओ दुर्गास्थान मेला मे गेलैथ त अचानक हिनकर नजैर एकटा श्यामवर्णीय ६ फ़िट के छौंरा पर गेल जे फ़ुकना-पिपही बेच रहल छल । ’अंबर’ यैह नाम छल ओकर । अचानक ओकरा एहि अवस्था मे देख सुमनजी के ह×दय द्रवित आ ग्लानित होमय लागल । ओ ओकरा सं नजैर चोरा क एम्हर आम्हर घुमय लगला किन्तु ध्यान हिनकर ओकरे पर टांगल छल । पुन: किछु पुरान गप्प मोन पड़ लगलैन । ओ स्कूल मे हिनके संगे पढै छल, किन्तु १०वी के बाद कहियो भेंट नै भेल छल । भगवान जनैथ मैट्रीक पासो केने छल कि नै ! ओ बचपने सं लंबा छल, पैघ-पैघ केस राखै छल, श्यामवर्णीय छल आ देख मे खास नै छल, किन्तु तैयो स्कूल मे ओ अपना के अमिताभ बच्चन कहै छल, आ स्वाईत आनो बच्चा सब ओकरा व्यंगात्मक रूप सं या डरे अमिताभ बच्चन कहै छल । ओहो Schedule Cast छल आ पढै मे बज्र भुसकौल (शायद अपन परिवेश के कारण अथवा शायद भगवान ओकरा ओहने बनेने छलखिन) । तथापि ओकरा stipend भेटनाई ओहि समय मे हिनका समझ मे नै आबै छल । आइ ओकरा ऐ स्थिति मे देख क सुमनजी के मोन मे होमय लागल जे कदाचित एकर कोनो मजबूरिए हेतै जे इ पढ के बयस मे इ छोट छिन धंधा क क जीविका कमेबाक प्रयास क रहल अछि ! दू-चारि दिन बाद बाजार जैबा क क्रम मे ओ फ़ेर सुमनजी सं टकरा गेल । सुमनजी कन्नी काटि क निकैल जाय चाहय छलखिन किन्तु अंबरे हिनका टोकलक : - “की दोस कि हाल चाल?” फ़ेर कुशल-क्षेम के बाद गप्प क क्रम मे ओ बतेलक जे “कि बताबियौ दोस, पढ मे त हम कहियो ठीक छलियौ नै। कहुना थर्ड डीविजन से मैट्रीक पास केलौं तै के बाद बाबू सुशील डाक्टर साहब लग काज पर लगा देलकौ ओत्तै साफ़-सफ़ाई के काज करै छी आ कंपाउंडरी सेहो सीख रहल छी । तों त आब मस्त इंजीनियरिंग क रहल छैं, आ करौ किए नै, बचपने सं पढै बला बच्चा छलैं” इत्यादि । गप्पक क्रम मे सुमनजी के मन:स्थिति सामान्य होइत गेलैन आ अंतत: ओ ओकरा सं फ़ुकना बेचै बाली बात पुछिए लेलैथ। ओ उत्तर देलक: “देखही दोस, हम भेलौं मुर्ख गरीबहा लोक, ई मेले-ठेले मे त दू टा उपरी आमदनी कमाय के मौका होई अछि से मौका कोना क गंवाबी । आ बात जहां धरि इन्जोय कर के अछी त मेला मे उपस्थितिए इन्जोय के गवाही बनि जाय अछि । किछु लोक मेला मे खरीद क इन्जोय करै अछि, हमरा सन लोक बेच क । अंबर सं बात केला उत्तर आ ओकर खुशगवार मिजाज देख के पश्चात सुमनजी के आत्मग्लानी समाप्त भ गेल छल । ओ सोचै लागल जे अंबरा के परिस्थिति जे भी देलकै अछि ओकरा ओ अपन मौका बुझि सहर्ष स्वीकार केलक अछि आ आनंदपूर्वक अपन कर्म क रहल अछि । त परिस्थिति हमरा त एकरा सं बड्ड निक मौका देने अछि अपन कर्म कर लेल आ अपना आ समाज के बहुत किछु देब लेल । आब सुमनजी के आत्मा सं आईआईटी/एन.आई.टी मे प्रवेश नै भेट के बोझ सेहो उतरि गेल छल । ओ प्रण केलैथ जे ओ बीटेक के पढाई परम लगन सं करता आ अपना के पैघ सं पैघ मुकाम पर स्थापित कर के प्रयत्न मे कोनो भांगट नै रह देथिन । संगहि एससी/एसटी के प्रति वैमनस्य के भावनों समाप्त भ गेल छल । सुमनजी के आब इ एहसास भ गेल छल जे ’अंबर’ सन कतेको अछि जे परिवेश के मारल अछि आ एहन लोक के किछु विशेष सुविधा भेट मे कोनो अतिस्योक्ति नै अछि । आब हिनकर मोन ओहिना शांत आ ताजा भ गेल छल जेना बवंडर के बाद मेघ पड़ला उत्तर सब साफ़ आ ताजा भ जाई अछि । ०४.०५.२०१५ तेसर प्रण (लघुकथा) आइ राघव के सिविल सेवा के फ़ाइनल रिजल्ट आब बला छैन एहि लेल काल्हि रातिये सं हुनकर मोन अकसक्क भेल छैन. एक क्षण के लेल भी निन्द हुनकर आंखि में नहि आबि पेलैन. किये नै होयन, कैयेक बरष सं जे हुनकर आंखि में स्वप्न छल से आब हुनका सं मात्र एक क्लिक के दूरी पर छल. कांपैत हाथ सं ओ रिजल्ट के लेल क्लिक केला आ…. Raghav Jha: All India Rank 24 : Got Selected for Indian Administrative Service. इ देख हुनकर मन:स्थिति जे भेलैन तेकर व्याख्या नै कैल जा सकै अछि. हुनका भेलैन जेना हुनका पंख लाइग गेल होइन आ ओ उडल जाइ छैथ. परंच स्वयं के बिट्ठू काटि क ओ स्वयं के सचेत केला. फ़ेर बरबस हुनका नौ बरष पुराण ओ घटना मोन पैर गेलैन, आजुक स्थिति के जेकर प्रतिफ़ल कहल जा सकै अछि. तखन राघव दसवीं में गेल छलाह. बाबूजी एकटा सामान्य सरकारी कर्मचारी छलाह. घर में सबटा मौलिक सुविधा उपलब्ध छल किंतु भोग-विलासिता सं दूरी बनल छल. राघव के दू टा बाल सखा छलाह – बंटी आ मोंटी. बंटी के पिताजी सेहो सरकारी कर्मचारिये छलाह, आ मोंटी के पिताजी व्यापारी छलैथ. मोंटी के पिताजी ओकरा एकटा बढिया विडियो गेम खरीद के देलखिन जकरा देखा देखी बंटी सेहो अपन पापा सं कहि क ओहने विडियो गेम खरीदबा लेलक. आब दुनू दोस्त राघव के खिसियाब लागलैन जे हमरा सब लग एत्ते निक विडियो गेम अछि आ अहां लग नै अछि. इ सुनि-सुनि राघव बहुत दुखी भ गेल छला. ओ बाबूजी लग जिद्द क देलखिन जे बाबूजी हमरो लेल अहां ओहने विडियोगेम मंगा दिय. बाबूजी हुनका समझेला जे बौआ ओ विडियोगेम बहुत महग अछि आ एखन किननाइ गैर-आवश्याक अछि, एखन दीदी के इंजिनियरिंग मे एडमिशन कराब के अछि ताहि में खर्च हेतै,आर काज सब अछि. किन्तु राघव कहां मान बला छला. ओ कहला जे मोंटी आ बंटी के पापा भी त दियेलखिन कि नै. एहि पर बाबूजी बाजला जे मोंटी के पापा अमीर व्यापारी छैथ आ बंटी के पापा घुसखोर. हुनका सं आंहा अपन परितर किये करै छी. एही पर राघव तुनैक क बजला जे एहेन इमानदारी के ल क कि करब जे बेटा के सौख-मौज नै करा सकि. एते बाजि ओ मुंह फ़ुला क ओत से चैल गेला. किंतु हुनका आंखि में अखनो विडियो गेमे नाचि रहल छल. राति में ओ तामसे खानो नै खेने छला. सुतलि राति में हुनका विचार एलैन जे किये नै बाबूजी के पर्स चोरा ली आ ओहि में जे पैसा हेतै तहि से विडियो गेम खरीद लेब दोस्त संगे जा क. इ सोचिते ओ उठला आ चुप चाप सं बाबूजी के कुर्ता सं हुनकर पर्स निकाइल लेलैथ. भोरे बाबूजी के इलेक्शन ड्यूटी में जेबा के छलैन. एहि लेल ओ भोरे अन्हौरके पहर निकैल गेलखिन. हरबरी में ओ अपन कुर्ता के जेबीयो नै चेक केलखिन जै में हुनकर पर्स छलैन आ पर्स में पाई-कौरी के संग संग हुनकर आई-कार्ड बस पास आदि भी छलैन. बस में बैसल बाबूजी जाय छला कि तखने टिकट चेकर सब पहूंचल. बाबूजी सं टिकट मांगला पर ओ जेखने पास निकाल लेल जेब में हाथ दै छैथ त आहि रे बा पर्स त अछिये नै. आब हुनका भेलैन जे कि करी नै करी. ओ टिकट चेकर के बात बुझाब के प्रयत्न कर लगला पर ओ मान लेल तैयार नै. हिनका लग जुर्माना भर के लेल भी पाई नै छल. ताहि समय में मोबाईल फ़ोन के ओहन चलन सेहो नै छल. टीसी हुनका बस सं उतारि क जिरह कर लागल. खैर इ मामला के कहुना सल्टिया क कहुना कहुना बाबूजी ड्यूटी पर पहूंचला. किंतु समय पर इलेक्शन ड्यूटी पर नहीं पहूंच के कारण अधिकारी हुनका पर काज में लापरवाही के चार्ज लगा हुनका सस्पेंड क देलकैन. दुखी मन सं बाबूजी घर पहूचला आ मां के सबटा बात बता क पुक्कि पारि क कानय लगला. एहि बीच राघव सेहो कत सं खेलैत-कुदैत घर पहूचलैथ. पहिने त हुनका माजरा किछु बुझना में नै एलैन, किन्तु बात बुझला उत्तर त जेना हुनका काटु त खून नै. आत्मग्लानी सं ओ डूबल जा रहल छला. होय छलैन जे धरती फ़ाईट जै आ हम ऐ में समा जाय. सोचय लगला जे आइ हमरा कारण बाबूजी के सस्पेंड होब परलैन आ बदनामी से अलग. किछु क्षण त हुनका अपना आप सं,जिनगी सं घ्रिणा होमय लगलैन, रंग रंग के नाकारात्मक खयाल आब लागलैन, किंतु फ़ेर ओ अपना आप के सम्हारलैथ आ अपना आप सं कहलखिन जे हमरा सं आई बड्ड पैघ अपराध भेल अछि आ हम डरपोक नै छी,हम एहि अपराध के प्रायश्चित करब. किन्तु राघव के इ हिम्मत नै भेलैन जे ओ सबटा सच्चाई बाबूजी के जा क बता दी. तथापि राघव तत्क्षण तीन टा प्रण लेलैन: १. जिनगी में कखनो कोनो प्रकार के चोरी नै करब २. कखनो कोनो गैरजरूरी मांग नै करब ३. बाबूजी के आई.ए.एस बनि क देखायब आ तखन एहि अपराध के लेले क्षमा मांगब. तखन फ़ेर राघव बाबूजी के पर्स के अति गोपनिय रूप सं राखि देलैथ. ओ दिन अछि आ आइ के दिन अछि,राघव सदिखन अपन दोनो प्रण के पालन केलैथ आ प्रतिपल अपन तेसर प्रण के पालन करै के लेल प्रयत्नशील रहलैथ. आ आई ओ दिन आबिये गेल. इ सब सोचैत सोचैत राघव के आंखि सं खुशी के नोर बह लागलैन. ओ ओत स सीधे बाबूजी के पर्स निकाल गेलैथ, आ फ़ेर गेला बाबूजी के इ खबर सुनाब. आइ-काल्हि इंटरनेट के जमाना अछि आ कोनो न्यूज फ़ैलबा में मिनटो कहां लागै अछी. बाबूजी के आन लोक सब सं खबर भेट गेलैन जे हुनकर बेटा गाम-समाज के नाक उपर केलैथ आ मिथिला के नाम और रौशन. बाबूजी खुशी में झुमैत राघव के सामने एलैथ. आब राघव के अपना आप के रोकनाइ नामुमकिन भ गेल छल. ओ बाबूजी सं लिपैट क जोर जोर सं कान लागलैथ. हुनका आंखि सं गंगा-यमुना बह लागलैन. बाबूजी कहलखिन दुर बताह तों गाम-समाज के एते नाम केलैं आ एना बताह जेकां कानि किये रहल छैं! आब राघव कानैत कानैत नौ बरष पहिने के सबटा घटना सुनाब लगला आ अंत में बाबूजी के ओ पर्स निकालि क देलखिन. आब सभटा ग्लानि सभटा अपराध बोध समाप्त भ गेल छल. नोरक बसात में सब साफ़ भ गेल छल. जेना लागै छल जे घनघोर घटाटोप के बाद फ़रिच्छ भ गेल छल. अपन अपन धर्म (संस्मरण) ई वाकया अछि १५ जनवरी २०१३ के जखन हम अपन माँ-पप्पा संगे गंगा सागर (सागर आइलैंड) सेतिलासंक्रान्ति के बाद घुरै छलौं| जखन हम सब मिनीबस में बैसल जेटी घाट दिस जाइत रही तखने किछुनवतुरिया छौरा-छौरी सब हमर सब के गाडी के रोकलक | एतय हम ई बता देब चाहे छी के मकर संक्रांति मेलाके समय पर सागर द्वीप पर यातायात आ व्यवस्था के असुविधे देखय के लेल भेंटल छल | तीर्थयात्री सब केरेलमपेल पड़ल छल | एहन में अचानक ई एक झुण्ड नवतुरिया के अचानक गाडी रोकैत देख मोन आशंकित भेलजे की बात अच्छी ! इन्तु हमारा ई देख आश्चर्य भेल जे एहन बीहड़ में एतेक असुविधा के बीच ऐ हिन्दू तीर्थस्थलपर ई नवतुरिया छौरा-छौरी के झुण्ड क्रिस्चैनिटी के प्रचार करै लेल आयल छल | पहिने त हमारा आश्चर्य भेलकिन्तु पाछाँ हम अंदाज केलौं जे एहेन शायद ऐ लेल अछि किएक त एहि दुर्गम अनमार्केटाइज्ड आ अनब्रांडेडतीर्थस्थल पर अधिकांशत: मध्यमवर्गीय एवं निम्नवर्गीय तीर्थयात्री सब आबैत जाइ अछि जे एकर सब के मुख्यटारगेटेट वर्ग होइ अछि कन्वर्जन के लेल | खैर, हम ई कहै छलहुँ जे ई छौरा-छौरी सब एकटा डायरीनुमा किताबबाँटै छल ओहो फ्री में जे हिंदी अंग्रेजी आ बांगला में उपलब्ध छल | हमर माँ के बुझना गेलै जे कोनो धार्मिककिताब बैंट रहल अछि तहि सं ओहो एकटा ल लेलक| अपना देश में यदि कोनो वस्तु फ्री भेंटै त ओकरा प्राप्तकर से केयौ चूक नै चाहै अछि स्वाइत पप्पो एकटा ल लेलैथ | आगा बढ़ला पर माँ के पुछला पर हम हुनकाबतेलिएन जे ई क्रिस्चैनिटी (दोसर धर्म) के धर्म ग्रन्थ अछि आ ई छौंड़ा-छौंरी सब एहि किताब के मार्फ़त अपनधर्म के प्रचार करै छल | एहि पर पप्पा कहलैथ जे तखन त ई किताब के फेंक देब के चाहि | ऐ पर हमर माँ जेपढ़ल-लिखल नै अछि आ एकटा धार्मिक मैथिल ब्राम्हण महिला अछि ओ कहलक जे "नै ई एकटा धार्मिक ग्रन्थअछि (भले आने धर्म के किए नै होय) ताहि लेल एकरा एम्हर-आम्हार फेँकनाई उचित नै अछि , आ ताहि लेलएकरा अपना सब रास्ता में गंगाजी में भँसा देब (जेना की अपने सब अपन धार्मिक अवशेष संग सेहो करै छी ) |"आ आगा हम सब ओहि किताब के गंगाजी में भँसा देने छलिये | उपरोक्त घटना के बाद हम सोचै लागलौ जे हमर माँओ के एकटा धर्म अछि जे सनातन अछि जे अपना में आपके सास्वत राखैतो सब धर्म के सम्मान केनाइ सिखबै अछि (जेना की गीता में स्वयं गोविन्द सेहो कहै छैथ ) दोसर तरफ ओ नवतुरिया छौंड़ा-छौंरी के भी अपन धर्म अछि जे ओकरा सब के अपन मेहनत आ ढौआ खर्च कक अपन धर्म के प्रचार कर के लेल प्रेरित करै अछि | आ देश-दुनिया में किछु एहनो समूह अछि जे धर्म के नामपर अलगाववाद आ आतंकवाद सं घृणित काज के अंजाम दैत अछि आ अपने धर्म आ कौम के बदनाम करै अछि| त किछु लोक एहनो अछि जे जबरदस्ती अपन अपन धर्म के ठेकेदार बैन जाइ अछि जिनका लेल धर्म केएकमात्र अर्थ दोसर धर्म के लोक सब के निंदा केनाइ आ ओकरा सब के प्रति घृणा फैलेनाइ अछि | एहन लोकसब या त धर्म के ठेकेदारी क एकर धंधा करै अछि या एहन गोरखधंधा करै बला सब के चंगुल में फँसलदिक्भ्रमित लोक सब होइ अछि | हम इहो सोचै लागलौं जे अपने सब के ओइ नवतुरिया सब से प्रेरणो लेबै केचाहि की अपने सब के धर्म, समाज, भाषा आदि के निक बात सब के अपन मेहनत आ व्यवहार द्वारा देशदुनिया के सामने राखै के चाहि | प्रेरणा त एट हमर माँओ के अवधारणा आ व्यवहार सं भेटै अछि ...फिलहाल तबस एतबे ...फेर भेंटइ छी बाद मे.....नमस्कार नन्द विलास राय दिव्या निर्मली टीशनक पाछू, रेलबे परिसरेमे गुरु-चेलाक खेल भऽ रहल छल। गुरू लूंगी आ झोलंगा जकाँ कुरता पहिरि हाथमे डमरू नेने छला। लगभग दस बर्खक बालक चेला छल। ओकर समुच्चा देह कपड़ासँ झाँपल छल। चारू दिससँ लोक ठाढ़ भऽ खेलक मजा लेबए लेल तैयार छल। गुरु डमरू बजा चेलासँ पुछलखिन- “बोल चेला की हाल-चाल छौ?” चेला जवाब देलक- “गुरुजी, हमर हाल-चाल एकदम टनाटन अछि। अहाँ अपन कहू।” गुरु कहलखिन- “हमहूँ ठीक छी। अच्छा ई बता अखनि तों छेँ केतए।” चेला बाजल- “अखनि हम बरही गाममे छी।” गुरु- “ई बरही गाम केतए छै?” चेला- “बरही गाम नेपाल अधिराज्यक सप्तरी जिलामे पड़ै छै। राजविराजसँ लगधग तीन किलोमीटर दछिन। बरही गामसँ उत्तर पछिमी कोसी नहर छै।” गुरु- “अच्छा ई बता ओतए की कऽ रहल छेँ।” चेला- “विदेह इन्टरनेट पत्रिकामे खबरि जुटाबक समदियाक काज करए लगलौं हेन। नेपालक दौरापर छी।” गुरु- “तँ बरही गाममे एहेन काेन घटना भेलै जे तों बरही गाममे छेँ।” चेला- “घटना अथवा दुघर्टना तँ नै भेलै मुदा एकटा नव चीज जरूर भेलै।” गुरु- “काेन नव चीज भेलै हेन, कनी फरिछा कऽ बाज।” चेला- “बरही गाम सप्तरी जिलाक सदरमुकाम राजविराज बजारक लग रहितो मुख्य रूपसँ किसानक गाम छी। पश्चिमी कोसी नहरिसँ दछिन छै। सिचाईक भरपुर साधन रहैक कारण गरमा धान आ अगहनी धानक उपज बड़ नीक होइ छै।” गुरु- “कोन खेती गिरहस्तीक गप शुरू कऽ देलँह। नव बात जे भेलै से बाज ने।” चेला- “हम सभ गप फरिछा कऽ कहै छी। अहाँ धैर्यसँ सुनू। बरही गाममे रूपलाल नामक एकटा किसान छथि। हुनका एकटा बेटा आ एकटा बेटी छन्हि। बेटाक नाओं विवेक अछि। आे विराटनगर अस्पतालमे पेथोलौजिष्ट छथि। अपन प्राइवेट जाँच-घर सेहो रखने छथि। रूपलालक बेटी दिव्या बी.ए. पास कऽ राजेविराजमे बी.एड. कऽ रहली हेन।” गुरु- “कोन आहे-माहेक कथा पसारि देलँह से नै जानि। हम कहै छियौ नव बात बता।” चेला- “एतएसँ शुरू होइत अछि नव बात। अखनि हम नव बात जे भेल तेकर पृष्ठभूमिमे चलि रहल छी। अहाँ कनी धैर्यसँ सुनियौ।” गुरु- “अच्छा बता। आब हम बीचमे नै टोकबौ।” चेला- “हँ तँ हम कहैत रही जे रूपलालक बेटी जेकर नाओं दिव्या छी, राजेविराजमे बी.एड. कऽ रहली हेन। साल भरि पहिने दिव्याक बिआहक बात-चीज ठील्ला गामक रामअवतारक बेटाक संग चलल। रामअवतारक बेटा अनिल भोपालमे इंजीनियरिंग कऽ पढ़ाइ कऽ रहल छला। दस लाख नेपाली टकामे बात पक्का भऽ गेल छल। दुनू दिससँ छेका-छुकी सेहो भऽ गेलै। छह महिना पहिने अनिल इंजीनियरिंगक डिग्री लऽ भोपालसँ नेपाल आएल। दूर संचार विभागमे भैकेन्सी भेल। ओहो आवेदन देलक। अनिलक पिताजी रामअवतार तेज आदमी अछि। ओ दौग-धूप केलक। चारि लाख टका घूस मांगलकै। रामअवतार दौगल बरही आएल। रूपलालकेँ कहलखिन- अहाँ जमाएकेँ नौकरी भऽ रहल अछि। चारि लाख टका घूस लगै छै। अहाँ दस लाख टका जे बिआहमे देब तइमे सँ चारि लाख टका अखनि दऽ दिअ। बाँकी छह लाख टका बिआहसँ दस दिन पहिने दऽ देब। जमाएकेँ नोकरी भऽ जाएत तँ बेटी रानी भऽ कऽ रहत। रूपलाल विवेककेँ फोनपर सभ बात बतौलखिन। विवेक कहलकनि, ठीक छै, अहाँ रामअवतार बाबूकेँ विराटनगर भेज दियौ। हम चारि लाख टका दऽ देबनि। रामअवतार विराटनगर जा विवेकसँ चालि लाख टका आनि बेटाकेँ संग कऽ काठमाडू गेला। घूस दऽ बेटाकेँ नोकरी लगौलनि। गुरु बजला- “अच्छा, ई बता दिव्याक बिआह रामअवतारक बेटा अनिलसँ भऽ गेल ने।” चेला- “असलका गप तँ आब सुनाबै छी। कनी धियानसँ सुनियौ ने। आइसँ दस दिन पहिने रूपलाल अपना भातीजकेँ संग कऽ ठील्ला पहुँचला। रामअवतारकेँ बिआहक दिन पक्का करैले कहलखिन। ओ तीनटा दिनक प्रस्ताव रामअवतार लग रखलनि। आ कहलखिन अही तीनू दिनमे जे दिन अहाँकेँ सहुलियत हुअए से दिन तँइ करि लिअ। ढौआ जे बाँकी अछि ओ नगद लेब आकि चेक, सेहो कहि दिअ।” रामअवतार कहलखिन- “यौ रूपलाल बाबू, हमरा बेटाक भठियन गामबला पनरह लाख टका नगद, एकटा पल्शर मोटर साइकिल आ पाँच भरि सुन दऽ रहल अछि। अहाँक बेटीसँ हमरा बेटाक बिआहक गप पक्का अछि। अहाँ अनिलक नोकरी लेल चािर टका देने छी। तँए अहाँसँ मात्र पनरह लाख टकेटा लेब। गाड़ी आ सुन छोड़ि देब। जँ अहाँ पनरह लाख टकापर बिआह करैले तैयार छी, तँ फागुन दस गतेक दिन पक्का भेल। हमरा नगद टका दी अथवा चेक दी, हम सभमे तैयार छी। अहांकेँ जइमे सुविधा हुअए से करब।” तैपर रूपलाल बजला- “अहाँसँ तँ हमरा दसे लाखपर बात भेल अछि। आब अहाँ मन नै बढ़ाउ। हम बँकियौता छह लाख टकाक चेक भातीज मार्फत भेज देब।” रूपलालक गप सुनि रामअवतार तैशमे बजला- “जँ हमरा बेटाक संग अहाँकेँ अपना बेटीक बिआह करबाक अछि तँ मोल-मोलाइ छोड़ू आ पनरह लाख टकामे बात पक्का करि तीन दिनक भीतर बाँकी एबारह लाख टका पहुँचाउ। नै तँ कुटुमैती नै हएत। अहाँ चारि लाख टका हम अगिला महिनामे आपस कऽ देब।” आब तँ रूपलाल झमा गेला। आँखिक आगू अन्हार पसरि गेलनि। किछु फुड़बे ने करनि। गुरु फेर टोकलखिन- “अँइ रौ चेला, ई रामअवतार तँ बड़ नीच आदमी बुझाइत अछि।” चेला बाजल- “आगू सुनियौ ने।” गुरु- “अच्छा कह, आगू की भेलै।” चेला कहए लगल- “कनीकालक बाद रूपलाल अपनाकेँ सम्हारैत बजला, ठीक छै हम गाम जाइ छी। बेटासँ विचार करब। ओ जे कहत सएह करब।” रूपलाल आपस गाम आबि गेला। मुँहक उदासी देखि हुनकर पत्नी बूझि गेली जे शाइत दिन पक्का नै भेल। कोनो झंझट लगि गेल। दिव्या राजविराजसँ पढ़ि कऽ आपस नै आएल छेली। रूपलाल सभ बात पत्नीकेँ बतौलखिन। पत्नी कहलकनि, विवेकसँ फोनपर गप करू। तैपर रूपलाल बजला, अखनि तँ ओ क्लिनिकपर हएत रातिमे निचेनसँ गप करब। रूपलाल दुनू परानी रातिमे खेबो ने केलनि। रातिमे रूपलाल मोबाइलपर विवेकसँ गप करए लगला। गप करिते-करिते ओ कानए लगला। जखनि ओ बेटासँ मोबाइलपर गप करै छला, तखनि दिव्या अपना कोठरीमे पढ़ै छेली। कोनो गपक पता नै छेलनि। जखनि पिताजीकेँ कानब सुनली तखिन कान पाथि कऽ सभ गप सुनए लगली। सभ गपक थाह लगि गेलनि जे पिताजी फोनपर किए कनै छथि। दिव्याकेँ भरि राति नीन नै भेलै। ओ भरि राति सोचिते रहली। रामअवतार केते नीच आ कमीना अछि। चारि लाख टका हमरे बाबूजी सँ लऽ घूस दऽ बेटाकेँ नोकरी दियौलक। आइ बेटा नौकरी करए लगलनि तँ मन बढ़ि गेलनि। पाँच लाख टका बेसी कऽ हमरा बाबूजी सँ मंगै छथिन। एहेन नीच आ लोभी मनुखक बेटासँ हम अपन बिआह किन्नौं ने करब, चाहे जिनगी भरि कुमारिए किए ने रहि जाइ। गुरु फेर बजला- “वाह! वाह! दिव्या बड़ नीक बात सोचलक।” चेला बाजल- “आगू सुनियौ ने।” गुरु- “अच्छा सुना।” चेला कहए लगल- “विवेक फोनपर पिताजीकेँ कहलकनि, बाबू अहाँ जुनि कानू। हमरा एकेटा बहिन अछि दिव्या। अहाँक पएरक कृपासँ हम चारि-पाँच हजार टका डेली कमाइ छी। की करबै रामअवतार बाबूकेँ लोभ भऽ गेलनि। हम पाँच लाख टका आरो देबै। अहाँ शुक्र दिन रामअवतार बाबूकेँ बरही बजा लियौ। हम नगद एगारह लाख गिन देबै। चारि लाख तँ देनैहिए छियनि। शुक्र दिन साँझ धरि हमहूँ गाम पहुँच जाएब।” शुक्र दिन साँझमे रामअवतार बरही पहुँचला। सोचने रहथि जे नगद ढौआ देता तँ राजेविराज नेपाल बैंक लिमिटेडमे ड्राफ्ट बनबा लेब। नगद ढौआ लऽ जाइमे खतरा अछि। साँझमे विवेको गाम पहुँचला। खेनाइमे रामअवतारकेँ खूब सुआगत भेलनि। तरूआ, भुजुआक अलाबे खस्सीक मासु सेहो रहए। मुदा दिव्या एकदम गुमशुम। शनि दिन दस बजे रामअवतारकेँ पराठा आ अल्लुक भुजिया, हलुआ, सेबैक खीर आ रसगुल्लाक जलखै खुआएल गेल। जलखै करा एकटा कोठरीमे विवेक, रामअवतार आ रूपलाल बैसला। विवेक पुछलकनि- “ढौआ केना लऽ जेबै?” तैपर रामअवतार कहलखिन- “ढौआ दऽ दिअ आ अहाँ चलू राजविराज, नेपाल बैंकमे ड्राफ बनबा देब।” तैपर विवेक बजला- “आइ तँ शनि छी। छुट्टीक दिन छी। बैंक बन्न हएत।” रामअवतार बजला- “अच्छा अहाँ टका गिन कऽ दिअ। हम समधीकेँ संग कऽ ठील्ला चल जाएब। दू गोटे रहब तँ डर कम रहत।” विवेक आलमारी खोलि रूपैआ निकालि गिन कऽ रामअवतारकेँ देबए लगला आकि हहाएल-फुहाएल दिव्या पहुँच कऽ बजली- “रूकू भैया, रूकू। रूपैआ राखू। हम एहेन लोभी आ कमीना आदमीक बेटासँ अपन बिआह किन्नौं नै करब। चाहे जिनगी भरि कुमारि किएक ने रहि जाइ।” दिव्याक गप सुनि, सभ कियो अवाक् भऽ गेल। विवेक आ रूपलाल समझाबैक परियास केलनि तँ दिव्या अपना हाथमे एकटा शीशी देखबैत कहलकनि- “ऐ शीशीमे जहर छी। जँ अहाँ सभ जिद्द करब तँ हम जहर पीब लेब।” रामअवतार बाबू दिस घूमि बजली- “सुनू रामअवतार बाबू, अहाँ हमरा बाबूजीसँ चारि लाख टका लऽ गेल छी। जाबे धरि चारि लाख टका आपस नै करब अहाँ बरहीसँ आपस ठील्ला नै जा सकै छी।” गुरु डमरू बजबैत नाचए लगला। थोड़े काल नाचि बजला- “बड़ नीक बड़ सुन्नर। दिव्याकेँ बहुत-बहुत धैनवाद।” सभसँ बड़का भीआइपी गेस्ट हम आँगनमे चाह पीबैत रही। तखने पत्नी आबि टोकली- “यै, सुनै छिऐ?” हम कहलियनि- “हँ, कहू ने की कहै छी।” पुछलनि- “बम्बइ आम लऽ कऽ जीतू बौआ ओतए कहिया जेबै?” अकचकाइत हमरा मुँहसँ बहराएल- “हँ। ठीके मोन पाड़लौं। परसू रबि दिन भोरुका बस पकड़ि लेब। बारहे बजे तक पटना पहुँच जाएब। बम्बइ आमो खूब पाकए लगल अछि। चारि आना आम गाछेमे पाकि कऽ खसि पड़ल। काल्हि केकरो बजा कऽ आम तोरा कऽ रखि लेब आ परसू छह-बजिया बस पकड़ि लेब।” पत्नी कहलनि- “दस-बीस गो गछपकुओ लऽ लेबै।” हँ-मे-हँ मिलबैत कहलियनि- “हँ-हँ अबस्से लऽ लेबै।” हम आ जीतू दू भाँइ। हमर नाओं भोगेन्द्र आ हमर छोट भाए जीतेन्द्र। माए-बाबू हमरा भोगी आ जीतेन्द्रकेँ जीतू कहै छला। माए-बाबूक देखा-देखी आनो-आन लोक हमरा भोगी आ ओकरा जीतूए कहैत अछि। हम गाममे रहि कऽ खेती-गिरहस्ती करै छी। खेती की करब। अपना तँ मात्र एक्के बीघा खेत अछि। दू बीघा खेत लालबाबूसँ मनकूतपर नेने छी। जीतू पटनामे पंजाब नेशनल बैंकमे पी.ओ अछि। दोसर दिन हम एकटा गछचढ़ा लड़िकाकेँ बजा आम तोड़ेलौं। लगधग पाँच सए आम भेल। जइमे सए-सबा-सए पकले रहए। सभटा आम एकटा बोरामे लऽ मुँह बान्हि कऽ रखि लेलौं। एकटा झोरामे पचासटा गछपकू आम सेहो ओरिया कऽ रखि लेलौं। अगिला दिन साइकिलपर आम लऽ नवटोली चौकपर गेलौं। चौकेपर एकटा चिन्हारए ऐठाम साइकिल रखि सतबजिया बसपर चढ़लौं। लगधग डेढ़ बजे दूपहरमे पटना पहुँचलौं। जीतू डेरेपर छल। हमरा देखिते आबि कऽ गोर लगलक आ गामक समाचार पुछलक। हम असिरवाद दैत कहलिऐ- “गामकसभ समाचार ठीके अछि। तों अपन समाचार कहह, सभ कियो नीके-ना छह किने?” जीतू कहलक- “अहाँक असिरवादसँ हम दुनू गोटे कुशल छी।” हम कहलिऐ- “भगवानक किरपा।” जीतू बाजल- “केकरो मोबाइलसँ फोन केने रहितिऐ तँ खाना बनल रहितए।” हम कहलिऐ- “केकरा मोबाइलसँ फोन करितौं।” जीतू फेर बाजल- “एमकी गाम जाएब तँ एकटा मोबाइल नेने आएब। मोबाइल रहत तँ दुनू भाँइक बीच गप-सप्प होइत रहत। भौजीओसँ गप हाएत। अहाँ फ्रेश भऽ कऽ चाह पीबू। चाह पी कऽ जाबे स्नान करब ताबेमे खेनाइ बनि जाएत।” हम बाथरू जा फ्रेश भेलौं। फ्रेश भऽ ड्राइंगरूममे आबि बैसलौं। जीतूक कनियाँ एकटा प्लेटमे दालमोट आ छह-सात गोट बिस्कुट रखि हमरा गोर लगली। हम कहलियनि- “नीके रहू।” जीतू एक जग पानिआ एकटा गिलास नेने आएल आ कहलक- “ताबे पानि पी कऽ चाह पीब लिअ।” हम दालमोट आ बिस्कुट खाए लगलौं। पाँचे मिनटक पछाति कनियाँ दू कप चाह दऽ गेली। हम दुनू भाँइ चाहो पीबी आ गाम-घरक गपो-सप्पो करी। करीब पनरह-बीस मिनटक पछातिकनियााँ आबि कऽ बजली- “भात-दालि बनि गेल अछि। जाबे भायजी स्नान करथिन, तरकारीओ बनि जाएत।” हम बजलौं- “एते जल्दी केना बनि गेल।” जीतू कहलक- “भैया, गैसपर प्रेशर कुकरमे भात-दालि बनबैमे देरी नै लगै छै। आब अहाँ जल्दी-जल्दी नहा लिअ।” हम बाथरूमे जा कऽ स्नान कऽ कपड़ा बदलि ड्राइंगरूममे आबि कऽ बैसलौं। हमरा बसिते देरी जीतू एक जग पानि आ गिलास टेबूलपर रखि भीतर चलि गेल। कनियाँ एकटा थारीमे भात, कटोरीमे दालि आ एकटा प्लेटमे तीमन आ दोसर प्लेटमे भुजियाआ पापड़ दऽ गेली। जीतू एकटा कटोरीमे घीउ नेने आएल। किछु घीउ भातमे ढारि बाँकी दालिमे ढारि बाजल- “आब भोजन करू।” हम भोजन करए लगलौं। जाबे धरि हम खेनाइ खेलौं जीतू हमरा लग ठाढ़ रहल। कनियाँ परसनपर परसन आबि कऽ दैत रहली। भोजन केलाबादहम हाथ-मुँह धोइ कुरसीपर बैसलौं। जीतू लगमे आबि बाजल- “आब अपने अराम करू।” कहलिऐ- “जा तहूँ अराम करए गऽ” हम ओछाइनपर अराम करए लगलौं। हमरा पछिला सभ गप मोन पड़ि गेल। इण्टरमे पढ़ैत रही। जीतू सेहो अठमामे पढ़ैत रहए। जीतू पढ़ैमे चन्सगर रहए। ओ अपना किलासमे फस्ट करए। हमर बिआह भऽ गेल रहए। बाबूजी हमरा बिआहेमे धुर-बहुर करा दुरागमनो करा देने रहथि। मुदा हमर कनियाँ तैयो नैहरेमे रहै छेली। बाबूजी दिल्लीमे दालि मीलमे मोटियाक काज करै छला। हुनका ओतए बोखार लगि गेलनि। ठीकसँइलाज नै करा सकला। तेकर नतीजा भेलनि जे बड़ कमजोर भऽ गेला। डाक्टर कहलकनि- “कालाजार हो गया है।” तखनि हमरे एकटा गौआँ बहादूर काका हुनका नेने निर्मली टीशनपर उतरला। ओइ समैमे सवारीक सुविधा नै छेलै। हमर बाबूजी तेतेक कमजोर भऽ गेल छला जे पएरे गाम नै आबि सकला। तखनि बहादूर काका बाबू जीकेँ मोसाफिर खानामे बैसा अपने गाम आबि हमरा माएकेँ सभ बात कहलखिन। हम खेनाइ खा कऽ निर्मली कौलेज जाइले साइकिल निकालने छेलौं। माए हमरा लग आबि कहलक- “भोगी, केकरो टायरगाड़ी लऽ कऽ निर्मली टीशन चलि जा। गाड़ीपर बैसा कऽ बाबूकेँ आनए पड़तह। बाबूजी मोसाफिर खानामे छथुन। बड़ दुखित छथिन। चललो ने होइ छन्हि। कहाँदिन कालाजार भऽ गेलनि। बहादूर बौआ दिल्लीसँ संगे नेने एलनि। वएह आबि कऽ कहि गेला हेन।” हम साइकिल रखि मने-मन हियासए लगलौं जे केकर टायर गाड़ी लऽ जाइ। हमर नजरि बेचन काकापर गेल। हम बेचन काका ओइठाम विदा भेलौं। बेचन काका सोकबामे बैसि कऽ बाँसक पातक कुट्टी कटै छला। हमरा देखिते बजला- “आबह-आबह भोगी। कहऽ की हाल-चाल छह। आइ कौलेज नै गेलह की?” कहलियनि- “काका हमर हाल-चाल नीक नै अछि। बाबूजी बड़ दुखित छथि। कहाँदुन कालाजार भऽ गेलनि हेँ। चललो-फिरल नै होइ छन्हि। दिल्लीसँ आबि निर्मली निर्मली टिशनपर बैसल छथिन। बहादूर काका संगे एला हेन। वएह अखनि कहि गेला।” बेचन काका बजला- “तँ टायरगाड़ी लऽ जेबहक बाबूकेँ आनैले?” कहलियनि- “हँ, काका। तँए एलौं हेन।” कहलनि- “ठीक छै कनी जलखै कऽ लइ छी। ताबे बरदो खाइ छै।” हम कहलियनि- “हमहूँ गामपर सँ भेल अबै छी। अहाँ जलखै करि कऽ तैयार रहब।” “ठीक छै।” ओ बजला। हम गामपर आबि माएकेँ कहलिऐ- “बेचन काका जलखै करै छथिन। जलखै कऽ टायर जोति देथिन। किछु पाइ-कौड़ी छौ तँ दे। हएत तँ बाबूकेँ लऽ रामानन्द डाक्टरसँ देखा देबनि।” माए घर गेली। घरसँ एकटा फुच्ची निकालि अनली। फुच्चीकेँ उनटि दसटकही, पँचटकही, दू-टकही, एकटकही सभटा सिक्का सभ निकालि गिनलनि। सभटा मिला कऽ पाँच सए पचपन रूपैआ भेल। सभटा पाइ दैत माए कहली- “बाबूकेँ डाक्टरसँ जँचा दबाइ कीनि लिहेँ।” पाइ लऽ बेचन काका ओतए विदा भेलौं। बेचन काका टायरपर पुआर दऽ एकटा सतरंजी बिछा हमरे बाट तकैत रहथि। हमरा देखिते बजला- “गाड़ीपर बैसह। जोइत दइ छिऐ।” हम टायरपर बैसलौं। बेचन काका टायर जोइत विदा भऽ गेला। साढ़े बारह बजे हम सभ निर्मली टीशन पहुँचलौं। हम मोसाफिर खाना गेलौं। हमर बाबूजी मोसाफिर खानामे तौनी ओछा पड़ल छला। एकदम नरकंकाल जकाँ हुनकर शरीर भऽ गेल रहनि। हम लगमे जा टोकलियनि- “बाबू, बाबू?” ओ उठि कऽ बैसला आ बजला- “के भोगी! गाड़ी अनलह की?” बाबू जीक पएर छूबि गोर लागि कहलियनि- “हँ बाबू। बेचन कक्काक टायर अनलिऐ हेन। अहाँ किछु पानि-तानि पीलिऐ किने?” बाबूजी बजला- “हँ। एक गिलास बदामक सतुआ पी कऽ एक कप चाह पीने रहिऐ। “अच्छा उठू चलू टायरपर बैसू गऽ। डाक्टर रमानन्द बाबू लग चलै छी। हुनकासँ देखा दइ छी। तेकर पछाति खेनाइ खाएब।” -हम कहलियनि। बाबूजी बजला- “मुदा हमरा लग ढौआ कहाँ छह। दू महिनासँ बैसिले छेलौं। जेहो ढौआ छल, सभ दबाइमे खरच भऽ गेल।” हम कहलियनि- “अहाँ ढौआक चिन्ता जुनि करू। हमरा माए किछु ढौआ देलक हेन। आेइसँ ताबे इलाज करा दइ छी। डाक्टर साहैब की कहै छथि, तेकर बाद आगूक बात आगू सोचब।” बाबू जीकेँ लऽ कऽ हम डाक्टर रामानन्द बाबूक क्लिनिकपर एलौं। जाँचि कऽ डाक्टर साहैब कहलखिन- “हम दबाइ लिखि दइ छी। दबाइ लऽ कऽ हमरासँ देखा कऽ शुरू कऽ दियौ। मुदा हिनकर इलाज नीकसँ करबए पड़त। दरभंगा लऽ जा कऽ होसपीटलमे भर्ती करा दियौ।” डाक्टर साहैबक फीस दऽ दबाइ कीनिलौं। किशन होटलमे खेनाइ खेलौं। खेनाइ खा तीनू गोटे टायरपर बैसि विदा भेलौं। गोसाँइ डुमैसँ पहिने गाम पहुँचलौं। माए बाबूक हालति देखि बोम फाड़ि कऽ कानए लगली। माएकेँ कनैत देखि जीतूओ कानए लगल। हमरो आँखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगल छल। बेचन काका हमरा हमरा सभकेँ चुप करबैत बजल छला- “कनने, खीजनेसँ किछ ने होइ जेतह। पाँच-सात हजार टाकाक ओरियान कऽ दरभंगा लऽ जाहुन आ नीकसँ इलाज कराबहुन।” पाँच कट्ठा खेत सात हजारमे भरना रखि चारिम दिन हम, माएकेँ संग कऽ बाबूकेँ लऽ दरभंगा गेलौं। बाबू जीकेँ दरभंगा अस्पतालमे भर्ती करेलौं डाक्टर साहैबसँ पुछने रहिऐ- “सर, बाबूजी केतेक दिनमे ठीक भऽ जेथिन।” डाक्टर साहैब बजल रहथिन- “रोगीकेँ रोग गरसि नेने अछि। लीवर सेहो ठीकसँ काज नै करै छै। तँए किछु कहब मोसकिल।” दरभंगा जाइसँ पहिने माए बेचन काका आ जीतूकेँ हमरा सासुर भेज हमरा कनियाँकेँ विदागरी करा अनने रहथिन। दिल्लीसँ एलाक मासे दिनक भीतर बाबूजी हमरा सभकेँ छोड़ि दुनियाँसँ चलि गेला। जीतू बाबू जीक पएरपर माथा पटकि-पटकि कनैत रहए।बेचन काका जीतूकेँ समझबैत कहने रहथिन- “तोरा तँ बाप तुल जेठ भाए भोगी छेबे करथुन। चुप भऽ जा। भोगी तोरा सभ किछु करतऽ। पढ़ेतह-लिखेतह, बिआह-शादी करतऽ।” जीतू हमर पएर पकड़ि कानए लगल रहए। हम जीतूकेँ भरि पाँजमे लऽ कनैत कहने रहिऐ- “तों चिन्ता जुनि कर। हम तोहर जेठ भाय छियौ। तोहर सभ जवाबदेही हमरापर दऽ बाबूजी चल गेला। हम अपन फर्ज पूरा करब।” बाबू जीक मरला बाद हम पढ़ाइ छोड़ि खेती-गिरहस्ती करए लगलौं। बाबू जीक सोगे माए जे सोगेली से ओहो छबे मासक भीतर हमरा सभकेँ छोड़ि बाबूएजी लग स्वर्ग चल गेली। जीतूक दुनू आँखि कनैत-कनैत फूलि गेल छल। ओ माइक पएरपर माथ पटैक-पटैक कानै छल। हमर कनियाँ जीतूकेँ सम्हारने छली। मरैसँ पहिने माए हमरा कहने छेली- “बौआ भोगी, जीतूकेँ पढ़ा-लिखा हाकिम बनाबिहऽ।” हम माएसकेँ कहने छेछिऐ- “माए चिन्ता जुनि कर। जीतूकेँ पढ़बैमे हमरा डीहो बेचए पड़त तँ बेचि लेब।” जीतू पढ़ैमे तँ चन्सगर रहबे रहए। ओ मैट्रिससँ लऽ कऽ एम.काँम. धरि फर्स्ट डिविजनसँ पास केलक। एम.काँम. केला बाद जीतू पटनामे रहि प्रतियोगिता परीछाक तैयारी करए लगल। जीतूकेँ पढ़बैमे हमरा एक बीघा खेत बेचए पड़ल। एम.काँम. केलाक बाद साले भरिक भीतर जीतू पंजाब नेशनल बैंकमे पी.ओ, पदपर बहाल भऽ गेल। जइ बैंकमे ओकरा नौकरी भेटल ओ पटने शहरमे अछि। हाजीपुरक स्टेट बैंक मैनेजरक बेटी संग जीतूक बिआह भेल। जीतूक एकटा जेठका सार पी.एम.सी.एच.मे डाक्टर छथिन। ई सभ सोचैत-साेचैत हम नीन पड़ि गेलौं। नीन टुटल तँ सुनलिऐ, जीतू अपना कनियाँकेँ कहैत रहनि- “भैया रबि दिनकेँ माछ-मासु नै खाइ छथिन। तीमन तरकारीमे की सभ आनए पड़त।” कनियाँ बजली- “अल्लू-पीऔज तँ अछिए। परोर, रामझुनी, करैला आ सजमनि लऽ लेब।” जीतू बाजल- “अच्छा झोरा दऽ दिअ। हम जक्सन जाइ छी ओम्हरेसँ तरकारी कीनने आएब। हँ, भैया सुति कऽ उठथिन तँ चाह बना कऽ दऽ देबनि।” कनियाँ बजली- “अहाँ कहबै तब हम भायजी केँ चाह बना कऽ दऽ एबनि। हमरा एतबो विवेक नै अछि की।” जीतू बाजल- “नै से नै। सएह कहलौं। ठीक छै हम जाइ छी।” कनियाँ बजली- “कनी सबेरे आएब। आन दिन जकाँ आठ राति नै बजा देबै।” “हमरो धियान रहतै जे भैया आएल छथिन।” - ई कहि जीतू झोरा लऽ कऽ चलि गेल। जीतूकेँ गेलाक पनरह-बीस मिनटक पछाति हम ओछाइनपर सँ उठि गेलौं बाथरूमे जा हाथ-मुँह धोइ कऽ कुरसीपर आबि बैसिले रही आबि कनियाँ एक गिलास पानि आ एक कप चाह दऽ गेली। चाह पीब हम कनियाँकेँ कहलियनि- “हम टहलि अबै छी।” कहि हम कपड़ा बदलि डेरासँ निकलि गेलौं सात-सबा-सात बजे आपस डेरापर एलौं। जीतूओ जक्सनसँ आबि गेल रहए। ओ कनियाँकेँ कहैत रहए- “दुधक पैकेट आ सेबैक पैकेट नेने आएल छी। चीनी सेहो नेने एलौं हेन। तरकारीमे परोर, रामझुमनी, करैला आ सजमनि अछि। सोल्हन्नी घीउमे पुरी छानि दियौ। अल्लू-परोरक तरकारी आ रामझुमनीक भुजिआ बना दियौ। सेबैक खीर सेहो बना दियौ।” कनियाँ बजली- “कनीए देशी घी घर-वेद रखने छी। जौं अखनि खरच करि लेब तँ कोनो भी.आई.पी. गेस्ट औत तँ केतएसँ आनब।” “कोन भी.आई.पी. गेस्ट?” - जीतू पुछलकनि। “अहाँक बैंक मैनेजर आ हमर डाक्टर भैया।” - कनियाँ बजली। “हमरा लेल सभसँ बड़का भी.आई.पी.गेस्ट हमर भैया छथि। जे माए-बाबूक मुइला बादो हमरा पढ़बैमे कहियो ढौआक कमी नै हुअए देलनि। हमरा पढ़बै खातिर एक बीघा खेत बेचि देलनि। हुनके कृपासँ आइ हम बैंकमे पी.ओ. छी।” जीतूक बात सुनि हमर छाती सूप सन भऽ गेल। अब्दुर रज्जाक- ( धनुषाधाम ६ हरिपुर ) गामक चौबटिया पर सोचलौ की हमरा गामक बीचमे अखैन धूमगजर मचौने बिकासक काजपर किछु चर्चा करी, पढ़ूई बात हमर जे किछु ख़ास नै मुदा खास लगत~ बिचगाममे अखैन सड़क के तोरफार जोरजार संगे धनुषा जिल्ला क भ्रष्टाचार सेहो किछ नेता किछ कर्मचारी सभक टिकी पर चढ़ि अर्राहैट कएने अछि। राशि अछि ११ करोड़ के जेकर लीपा पोता तऽ की खन जोत सेहो धीरे धीरे भऽ रहल अछि। जेना लोकल मुर्गी बजारक भरम रखने अछि ओनही गाम घरक बिकास भरम चाहे जेना बुझू येहे लोकल चालूपुर्जा नेता सब रखने अछि। गामक अबस्था बिकासक बिहाड़िसं उधियाइल अछि। कतौ टेक्टर धरधराउने अछि तऽ कतौ डोज़र मरमरौने अछि, कतौ स्काइभेटर भरभराउने अछि जेना गामक सब काज अहिबेर झाइर झपैट कऽ कैएटा देता/ ककरो किछ ककरो किछ ढहैत अछि। लोको भल होइ तब तऽ सब किछ माईन सऽ लऽ कऽ पदाऐंन तक सड़के पर छोड़ै छथि। जब बिकास-बात भेल तऽछिग्रो तान भेल रहल काज आ होहल्ला करबे टा करत जे मधेश कऽ एगो सांस्कृतिक के रूपमे जेना रहल अछि। जौ गाममे जाउ निक बात वा बिकाशक बात पर लोहा लड़ाई छिन्न झपट कुर्ता के बाहि समेटा-समेटी हेबे टा करै अछि। एहन कुसस्कारक बात हमरा सबहक़ गामो के नै छूट ता? गामक सड़क अखैन मानू जे पहलमानक अखड़ा रहल अछि जेना। जै पर नै अखनै बस, जीप,मोटरसाइकल, साइकल आरो एहन किछ साधन सब चलऽ मे असमर्थ अछि। बिकाशक योजना अपना सबहक़ देशमे ख़ास कऽ अखारक मॉस के सुरुबातमे शुरु कैल जाइ अछि एना कैला ? जे केनाहु कऽआरो सड़क बैह जाइ पाइन संग फेन जेहने के तेहने रहिए जाइ की ? ई बात किछ घुमाइल फिराइल जेखा ऐछ किए नै कार्तिक अगहनमे बिकाश काज शुरु कैल जाइ अछि ? बिकासक पलान बिन पूर्ब सूचना के संगे ठोस ढंग सऽ बिकास के किछो काज नै होइत रहै अछि। अगर धनुषा जिल्ला बिकासक बात करी तऽ हरेक साल समाजक ढीला सुस्ती सऽ बजेटक पाइ फ्रिज भऽ जाइ अछि। लोग कहलक से सरकारक ढीला सुस्ती अछि मुदा अपना सबहक जे कमजोरी अछि तेकर कहियो चर्चा परिचर्चा नै किए? अंतमे कहऽ चाहबै जे अपन गाम समाज सबहक़ बिकास के जिम्मेदार सब गोरे छी, अपना जगह सऽ सब गोरे किछ नै किछ पहल सहयोग करबाक जरूरी अछि। ख़ास कऽ कृषि प्रधान देशमे कृषक सब पीडितो भऽ कऽ अपना खेतके सिचाई के लेल किछ सामाजिक मेलमिलाप केनाइ बहुत आवश्यक अछि। अगर अपना सब किछो निक काज अपना गाम ठाम के लेल करबै तऽ फाएदा अपने और के हेतै, दोसर के नै। तब फेन अपनामे एकता किए नै ? रौदी परल अछि विदेह नेपाल भारतक मैथिली भाषाक क्षेत्र मे एकटा नब आधुनिक साझा चौराहा के काज करै अछि/ भाषा संस्कृतिक प्रचार हेतु एकटा ससक्त गामक दलान वा चाइके दोकान हटिया कऽ समाद बारी पर जोर दऽ कऽ आधुनिक युगक पैघ काज करै अछि विदेह नेट पत्रिका। मिथिलाक भाषा पर पाठक लोकैन के भावनामे उभरल बिचारकें समैट के समाजक समाद बारी के सेतु पुल अछि। रौदी परल अछि भाषाक बिकास मे। संगे जेहो किछ किसान लोकैन भाषाक खेतीकरै अछि उनको बजार अगर नै मिलतै तऽ कोना उनका सबहक गुजर गुज्राउन हेतै, सम्स्या हेतै,तैं जे विदेह ओइ भाषाक किसान सबहक पैघ बजार दीयाबैत अछि। खास कऽ मिथिलाक गाम घरमे चुल्ही पछा मे जे किछ राजनैतिक घोंहाउज सब जे दलान कऽ कुर्सी चौकी सोफा पिढ़िया सऽ छुटैत घुसकुन कटैत हलुक-बुलुक दैत देखाउत तेकरो किछ कहियो काल अहि पत्रिका माध्येम सऽ प्रकाशन हेतु किछ पाठक लोकैन के इच्छा जरुर हेतै, मुदा येहन लेख रचना पठाबी सेहो निक हेतै की केना ? से प्रकाशन समुह सऽ आग्रह करबैन। ओना मिथिलाक राजनैतिक चाहे नेपाल हुअए वा भारतक, ओहाने अछि जेना सौना मेशमा सन,कहियो बहुत मिठ लागत तऽ कहियो नुनगर रहत तऽ कहियो तेलगर तऽ कहियो नुनछड़ाइन तऽकहियो अनुने/ तै हेतु १४ कोष अलगे लोग रहबाक प्रयासमे बहुत रहबेटा करता। किछ कारण सब तऽहमरा मिथिलाक सब कुछ के पछा करऽ मे अगा अछि जेना हम महसूस करबेटा करै छी मुदा अपने सबके केना महसुस होइते हैत से अपने कहबै। (१) खास क किछ निक कहाबऽ बाला नेता लोकैन अछिउनका सबहक अहमता बिशेष अछि (२) बुधियार होइतो समाजक दिलमे नै अछि ई नेता लोकैन(३)राज्य द्वारा मूर्ख लोकैन के शासनमे लाउल गेल अछि (४) समाजक सोझापन अति आ अज्ञानता सेहो अति अछि (५) मिथिलामे खास क आपसी भाइचारा के कमी कलह सऽ भारल समाज (६) राज्यद्वारा मिथिलाञ्चल के हेय नजर सेहो (७) शिक्षा-बेबहरतामे अति कमजोरी (८) अशिक्षा भौ-सागरमे मिथिलाक डुबल समाज/ विन्देश्वर ठाकुर बेलहाबालीके जितिया (विहनि कथा) आइ आसिन महिना, कृष्ण पक्षक अष्टमी तिथि । सब मिथिलानीसब जितिया पावनिमे अस्त-व्यस्त । जमुनिया गाम सेहो जितियासँ जगमगा' उठल । करिब २ दिन पहिनेसँ जितिया पावनिके ल'क देखल उत्साह आइ सार्थक भ' रहल अछि हुनकासबके । पहिल दिन माछ-मरुवा बारल, तकरा बाद नहा-खाएल आ आइ निराहार व्रत रहि जितबाहनके पूजा करबाक परम्परा अछि । एहि क्रममे आइए भिन्सरमे उठली परबत्ताबाली काकी,तेजनगरबाली भौजी,कारो बुढीया, सबैलाबाली दाइ आदि-आदि । सबहक घरमे नेना-बुटका काहु-किक्चर क' रहल छै । चुरा-दही पहिने हम खैबौ त हम खैबौ कहिक सब बच्चासब आपसमे लडि रहल छै । सब माए-दाएसब अपना-अपना बौवा-बुचीसबके चुरा-दही खिया' रहल छै आ भीतरी मोनसँ संतुष्ट भ' रहल छै । मुदा सबैलेबाली दाइके ठीक बगलमे घर छै -" बेल्हाबाली काकीके ।" ओकरा घरमे तेहन किछु उत्साह नै छै । ओ बस निन्न्सँ सुत्बाक प्रयत्न करैछै मुदा असम्भव । ओकरा निन्न भेलै कहाँ ? होएबो करतै कोना ? दुखक पहाड जे खसल छै जिनगीमे । एक त कनैत -कनैत आँखिक नोर सुखा' गेल छलै पहिनहि । आओर जे बाँकियो छलै से बुझाय आइए सुखि जेतै । सबगोटेके घरमे बौवा-बुचीसबके चुरा-दही खाइत देखि ओकर छाति फा'ट लगलैए । आँखिसँ नोरक धार ब' ह लगलैए । कारण पछिला सालक जितियामे ओकरो घरे अहिना धुमधाम भेल रहै ।मुदा दैवा कसैया एहिबेर सब सुख छीन लेलकै । बेलहाबाली काकी आ बुझौना कक्काके एक मात्र सुपुत्र छलै-"निकु यादव " मुदा दूर्भाग्य ज्र ओहो मारल गेलै अहि बेरक मधेश आन्दोलनमे । आब के खैतै ओकर चुरा-दही आ ककरा लेल करती काकी जितिया ? कोना उठेतै ओ अपन निन्नसँ सूतल बौवाके -" आऊ बाबू चुरा-दही खाउ? इएह सोचि-सोचि काकि हक्कनलोरे कानि रहल छै । बस यादक तौरप' सिरमामे राखल निकुके तस्बीर देखि-देखि काकी छाति पिटि रहल छै, श्रवण नोर झहरा' रहल छै आ अपन निकुके आत्माक शान्ति लेल जितमहान् भगवानसंग कामना क' रहल छै । आसे आसमे जिनगी (विहनि कथा) ठन्डाके मौसम्, ताइ परसँ रातिक समै। चारु दिस धोनही लागल। कान कान नै सुझय। तेँ सब गोटे सबेरे खाना खा कऽ अपना अपना बेडपर ओङ्गठल। सन्तोषबा सेहो तुरन्ते अपना बेडपर ओङगठले रहए कि फोनक घन्टी बजलै- टिङ टिङ्…. सन्तोष समै देखलक रातिक ९ माने नेपालमे १२ बजे राति। कि भेलै? अते राति कऽ मिसकल किए? सन्तोष असमन्जसमे पड़ि गेल। आ कि फेर बजलै घन्टी- टिङ टिङ । सन्तोष तुरन्त फोन केलक। फोन उठलै। कोनो कनिया बाजल। - हेल्लो केना छी ? ठीक छी ने ? हमरा तँ बिसरिए गेलिऐ, नै? सन्तोष बुझि गेल, ओ आरो कियो नै ओकरे अर्धाङ्गनी बबिता छली। ओ बाजल- हँ, हम तँ ठीके छी। अहाँ कोना छी, कहू ने? नै-नै, कोना बिसरि जाएब। केहन बात करै छी, अच्छा कहू ने की भेल? अते राति कऽ किए फोन केलौं? एके साँसमे सन्तोषो पुछलक। बबिता: अहाँकेँ तँ हमरा पर कनियो मए- स्नेह नै अछि। जँ से रहितै तँ अते दिन भऽ गेल घर नै अबितौं?देखियौ तँ लालगरबाली दिदिकेँ, ताबत भाइजी आबि कऽ फेर चलि गेलथि आ फेरो देहमे एगो बौआ छै। मुदा हमरा हमरा तँ टोलोमे सब कोइ ताना मारैए आ भगवानो हमरे पर लागल अछि। ओइ जनममे कोन धार बिगार केने रहिऐ,से नै जानि। ठीक छै ठीक छै बबिता हे सुनु न - आब कनिए ऋण तिरकेऽ के बाकी रहि गेल अछि, बुचिके बियाहक। अहाँ धिरज धरु ने, हम जल्दिए लौट आएब,एह सब कहिते रहै कि फोन बजलै टु टु,,, माने पैसा सठि गेलै मोबाइलके, मुदा बातो पुरा नहित भेलै । तखन सन्तोष सोचैए - "३ साल पहिने सादीके ६ महिना बाद जे कतार आएल रहे से गप। साच्चे देखिते- देखिते कते दिन भऽ गेलै। तखन सम्झना एलै जे बबिता गर्भवती रहै से बच्चा गर्भेमे नोकसान भऽ गेलै आ तहियासँ ने सन्तोष घरे गेलैए आ ने बबिताकेँ दोसर बौआ भेलैए। अपन कर्जा, घरक कर्जा, बहिनक बियाहमे लेल गेल कर्जा। एहसबके ऋण तिरैत तिरैत एखन धरि बित गेलै आ नै जानि आरो कते दिन बित जेतै - एम्हर आसे-आसमे सन्तोषके जिनगी आ ओम्हर ओकर धर्मपत्नी बबिताके जिनगी। राजदेव मण्डल जनम : १५ मार्च १९६० ईं.मे। पिता : स्व. सोनेलाल मण्डल उर्फ सोनाइ मण्डल। माता : स्व. फूलवती देवी। पत्नी : श्रीमती चन्द्रप्रभा देवी। पुत्र : निशान्त मण्डल, कृष्णकान्त मण्डल, विप्रकान्त मण्डल। पुत्री : रश्मि कुमारी। मातृक : बेलहा (फुलपरास, मधुबनी) मूलगाम : मुसहरनियाँ, पोस्ट- रतनसारा, भाया- िनर्मली, जिला- मधुबनी। बिहार- ८४७४५२ मोबाइल : ९१९९५९२९२० शिक्षा : एम.ए. द्वय (मैथिली, हिन्दी, एल.एल.बी) ्सम्मान : अम्बरा कविता संग्रह लेल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार वर्ष २०१२क मूल पुरस्कार तथा समग्र योगदान लेल वैदेह सम्मान-२०१३ प्राप्त। डरक नदी सरिताकेँ निन्न नै होइ छेलै। आ निन्न पड़लै तँ सपनामे डूमि गेल। सपनामे देखैत अछि जे- ऊँचगर जगहपर एकटा नमहर मूसक बिल अछि। चारूभर झौंकड़ा-झौकड़ी आ बिच्चेमे बिल। बिलसँ कनी हटि कऽ मूसक पूरा पलिवार घुरिया रहल अछि। सभ डेराएल, आपसी कनफूसकी करैत। ओइमे बेटा-पुतोहु, पोता-पोती, काका-भतीजा सभ गोटे। बाबाक प्रतीछा कऽ रहल अछि। संकटकालमे बूढ़ बुजुर्गसँ सलाह-विचार केनाइ बड़ जरूरी होइ छै। ओहन बूढ़ जे अपन काज-वेपारसँ पलिवारमे धाक जमौने रहै छै। ओकरासँ काजक पहिने पूछि लेब आरो आवश्यक। कनीओं खड़-पात खड़खड़ाइते मुसक धिया-पुता डेरा जाइत अछि। डेराएल तँ सभ अछि किन्तु किछु गोटे अपना डरकेँ झँपने अछि आ ऊ सभ रहि-रहि कऽ अपनासँ छोट डेराएल धिया-पुताकेँ रपटि दैत अछि। “रौ, कनै छेँ किए। चुप रह। डेरा नै हम छियौ ने।” “हौ काका जमराज आबि जेतै तँ तोरा सभ पहिने भागि जेबहक। तब की करबै? तूँ सभ तँ नांगरि ठाढ़ कऽ बड़ी रेशमे भगै छहक, हमरा सभकेँ तँ एके झपटमे पकड़ि लेतै।” “धू बुड़बक, बड़ डेरबुक छेँ, एनए एतै तब ने रौ।” बुढ़बा मूस जखैत-तपैत आबि रहल अछि। ओकरा देखिते मूसक धिया-पुता सभ चारूभरसँ घेरि लेलक- “हौ बाबा, जुलुम भऽ गेलै हौ, आब केतए रहबहक?” “की भेलै रौ?” “हौ, अपना बिलक मुँहपर बड़का साँप बैसल छै। चलह दोसरे ठाम रहबै। ऐठिनासँ भागह जल्दी।” “रौ केतए जेबही। मनकेँ थिर कर बौआ। संसारक कोनो कोणमे नुकेबही डर ओतौ पाछूसँ पहुँच जेतौ। केतौ खतरासँ खाली जगह नै छै। रौ नूनू, जीबैले संघर्ष करए पड़तौ।” बूढ़ मूसक जेठका पोता फनकि कऽ बाजल- “हे यौ बाबा, गप तँ खौब हँकै छी। तँ जा कऽ देखियौ। एकबेर संघर्ष करियौ।” मूसक दोसर पोता बाजल- “ठीके यौ बाबा, अहाँ तँ खिस्सा सुनबै छेलिऐ जे जुआनीमे जमराजकेँ पछाड़ि देने रहिऐ, एकबेर वएह चितरसेना दाउ-पेंच लगाउ बुढ़ाड़ीमे।” बुढ़बा मूस मने-मन सोचलक, छौड़ा सभ गरपर चढ़ा देलक। बँचबाक उपए ताकए पड़त। बुझबैत बाजल- “हे रौ ई सभ जवान-जुआनक काज छिऐ। जवान जँ लड़तै तँ किछ देर लड़ाइमे ठठबो करतै। हमरा सबहक उमेर आब संघरषक जोग छै? ठीकसँ सुझबो ने करैए। की कहबो-सभटा दुख चढ़ल बुढ़ाड़ी, नैन बिनु पंथ भारी।” बुढ़बा मूसक जेठका पोताकेँ नै रहल गेल तँ फेर बाजल- “हे, माए-बाबू, काकी-काका सबहक विचार इहए भेल छै जे बिल लग सभसँ पहिने तोरे जाए पड़तह। सभ कहै छेलै जे बुढ़बा आब बेसी जीिव कऽ की करतै। पलिवारोपर तँ भारे बनल छै।” बुढ़बा चौंक कऽ बाजल- “अँए, तँ आब हम भार बनि गेलियौ रौ। तेकर मतलब हमर कएल-धएल पानिमे चलि गेलै। आरौ तोरीकेँ ठीके कहै छै...।” बूढ़ मूसक जेठकी पुतोहु मुँह दाबि कऽ बजली- “एकटा गप पुछै छी बाबू। अपना सोझहामे बेटा-पोताकेँ मरैत देखबै से नीक लागत? एकरा सभकेँ तँ देश-दुनियाँ देखबाक आ भोगबाक समए छै- अखनी।” मूसक जेठका बेटा मुँह फेड़ दोसर दिस तकैत बाजल- “हम तँ तखैने जाइ छेलिऐ। देखबै एक धक्का। ऐपार आकि ओइपार। की करबै। सभ गोटे टाँग छानि कऽ कानए लगलै आ कहलकै- सौंसे पलिवारक भार अहीं उठौने छिऐ। अहाँकेँ किछो भऽ जाएत तँ पलिवारक देख-भाल केना हेतै।” पोता चट दऽ टपकि उठल- “काका, कहै छेलै जे बुढ़बा तँ भरिदिन बिछौना धेने रहै छै। ओकरा रहने की आ नै रहने की। आबए दही, काल लग पहिने वएह जेतै।” गप सुनि बुढ़बाकेँ सभसँ मन टूटि गेलै। जेना चारू पाजासँ हारल लोक। केकरोसँ कोनो मोह ममता नै। बुझेलै आब ऐ दुनियाँसँ चलि जाइ, सएह नीक। तैयो प्राणक मोह सभसँ बड़का मोह। दुनियाँसँ केतबो विराग भऽ जाए। सभसँ नाताक डोरि टूटि जाए। तैयो साक्षात कालक मुँहमे जाइ बखत डर समेनाइ सोभाविके छै। बुढ़बा मूस जोशमे किछु कदम तँ खौब लफड़ि कऽ चलल तेकर बाद टाँग नै उठै। खुच-खुच लगही लगै। जखनि बिलक निकट चलि गेलै आ साँपक आकृति देखाइ पड़ए लगलै, तखनि मल-मूत्रपर सँ नियंत्रन हटि गेलै। दड़बड़ मारि बिलक लगमे जे झौंकड़ा रहै तइमे ढूकि गेलै। किछु देर तक कोनो तरहक आक्रमण नै भेलै, तब झाँकुरसँ नांगरि िनकालि साँपक आँखि दिस डोलोलकै। तैयो कोनो प्रतक्रिया नै भेलै। बुढ़बाकेँ भारी अचरज भेलै, ओकर पकल दिमाग दौगए लगलै। “कहीं मुइल साँप तँ ने छै?” मनमे प्रश्न उठलै डर किछु छँटि गेलै। देव-पितरकेँ सुमरैत देह-हाथ सम्हारि बाहर निकलल। पूरा सतर्क भेल। टक-टक तकैत साँप दिस बढ़ल। भागैले तैयारो अछि। घुसकैत-घुसकैत लग जा कऽ देखलक, ठीकसँ देखिते ठिठिया कऽ हँसल आ हँसैत बाजल- “रौ तोरी! साँप कहाँ छै ई तँ साँप खोल छिऐ। केचुआ।” जोरसँ सोर पाड़लक- “रौ आबै जो, आब डेराइक कोनो गप नै।” धिया-पुता दौग कऽ लग आएल आ पुछलक- “बाबा, जीअत छै की मुइल हौ?” बुझबैत बुढ़बा बाजल- “हे रौ, ई तँ खोल छिऐ ओकर। ऊ तँ ऐ मे सँ निकलि गेल छै।” “निकलि कऽ केतए गेलै हौ?” “हेतौ तँ अही आसे-पासेमे। जँ मुइलाक बादो जीव खोल छोड़ैले तैयार नै रहै छै, तँ जीअत की करतै...।” फेर डर सबहक मनमे नाचए लगलै। मूसक जेठका पोता बाजल- “अच्छा, हटि जा बिलक मुँहपर सँ। एेते बात किए बनबै छहक।” बुढ़बा कऽ जल्दीसँ नै हटल भेलै। सभटा मूस एकेबेर बिल दिस रेड़ देलक। बुढ़बाक देह-कपारपर चढ़ैत। ठेलैत-धकियबैत। बुढ़बा केंकिआइत ओंघरा कऽ खसल। मूसक जेठका बेटा अपना पत्नीक मुँहपर दाँत गड़ा देलक। दुनू एकेबेर खेंखियाइत बिलमे ढुकि गेल। सरिताकेँ सपनामे बुझेलै जे कियो ओकरो गालपर किछु गड़ा देलक आ जेना मूस सभ देहपर दौगए लगल। ओकर देह चमकि उठलै। सौंसे देह सिहरि कऽ काँटो-काँट भऽ गेलै। सपना भंग भऽ गेलै। बुझेलै देहपर एगो हाथ चलि रहल अछि। अन्हारमे टेबलक। ई हाथ ओकर पतिक छेलै। फेर मन पड़लै, अपना धिया-पुताक फौज। जे निरंतर बढ़ले जा रहल छेलै। अनन्त आवश्यकताक संग। किछु चलैत-चलैत जेना ठाढ़ भऽ गेलै। मनमे जे डरक नदी बहै छेलै ओइमे अकस्मात बाढ़ि आबि गेलै। पंचैती- (लघु पटकथा) पुरुष पात्र- धनेसर रमुआ- ललिताक बाप चारिटा ग्रामीण सहदेव- किशनक पिता मास्टर साहैब पंच प्रमुख तीनटा पंच जमादार किशन किछु पंच, ग्रामीण, धीया-पुता, पुलिस।) स्त्री पात्र- धनेसरक पत्नी गीता- धनेसरक बेटी किशनक माए पहिल दृश्य- स्थान- धनेसरक आँगन समए- दिन पात्र- धनेसर आ धनेसरक पत्नी। (धनेसर अँगनामे प्रवेश करैत अछि। ओकरा चेहरापर परेशानीक भाव अछि। एनए-ओनए ताकैत पत्नीसँ पुछैए) धनेसर- गीताक माए, एक गिलास पानि लाउ। बड़ी जोरसँ पियास लगल अछि। गीताक माए- आब हम भात पसेबै आकि अहाँकेँ पानि देब? धनेसर- किए? गीता केतए गेल अछि? गीताक माए- बेटी परीक्षा दइले गेल अछि आ अहाँकेँ पतो नै अछि। धनेसर- (मुँहपर तामसक भाव) की हेतै पढ़ि-लिखि कऽ किछो सुनबो केलिऐ? गीताक माए- की सुनबै? धनेसर- अहाँकेँ बुझले नै अछि जे गाममे की भेलै। गीताक माए- हमरा काज धंधासँ फुरसति भेटतै तब ने। धनेसर- रमुआक बेटी कोनो छौड़ा संगे उड़ि गेलै। फुर्रऽऽऽ। गीताक माए- अँए! (अचरज भरल आँखिसँ पति दिस देखैत अछि।) धनेसर- हँ...! बेसी पढ़ि-लिखि कऽ एहए सभ होइ छै। गीताक माए- अहाँ तँ कोनो गपकेँ पकड़ि लइ छिऐ। ई सभ कहिया नै होइ छेलै। हँ, पहिने कम होइ छेलै आब बेसी होइ छै। (समए बिहरौन (बिहरन) सन भऽ जाइ छै।) कट टू. दोसर दृश्य- समए- दुपहरिया स्थान- रमुआक दुआरि (रमुआ माथपर हाथ देने चिन्तामे डुमल अछि। तखने गामक किछु लोक पहुँचैए। लड़कीकेँ भागि गेलाक कारणे अपन-अपन तामस परगट कऽ रहल अछि।) ग्रामीण एक- (क्रोधमे) देखियौ ने, हम सभ परेशान छी आ ई घरमे मुँह घोंसिया कऽ पड़ल अछि।) ग्रामीण दू- लाज-शरम तँ होइते नै छै। एनए जाति सबहक नाक कटि गेलै। ग्रामीण तीन- धुर! गामक लोक तँ थू-थू कऽ रहल छै। ग्रामीण चारि- नै पूछू काका, गामक लफंगा छौड़ा सभ कहै छेलै, जँ छौड़ीक अभाव छौ तँ चलि जो ओइ टोलपर। फीरीमे मिलि जेतौ। हमरा तँ तामसे देह बहीर भऽ गेल। काटि देबै सारकेँ। ग्रामीण एक- नै नै, एनामे तँ जाति-जातिमे झग्गड़ बझि जेतौ। आ दूटा जातिमे झगड़ा हेतौ तँ तेसर जातिकेँ फैदा हेतै। ग्रामीण तीन- मन तँ होइत अछि जे रमुआकेँ खुंडी-खुंडी कऽ दी। ग्रामीण दू- पहिने चल पंच सबहक पास। ग्रामीण एक- नै, पहिने अपना जातिमे फैसला कऽ लेबै। ग्रामीण चारि- (रमुआ तरफ इशारा करैत) ओकरा कही, छौड़ीकेँ ताकि लाबतौ। नै तँ...। (हाथसँ इशारा करैत अछि।) कट टू. तेसर दृश्य- समए- राति स्थान- सहदेवक घर। पात्र- किशन, सहदेव, किशनक माए, ललिता। (किशन आ ललिता नुकाइत अँगनामे प्रवेश करैत अछि। ओकर पदचाप सुनि सहदेव लालटेन नेने घरसँ बाहर निकलैत अछि। लालटेनक इजोत किशन आ ललिताक मुँहपर पड़ैत अछि। सहदेव डरा जाइत अछि। झपटि कऽ किशनकेँ पकड़ैत अछि आ घरक भीतर लऽ जाइत अछि।) सहदेव- रमुआबेटीकेँ ऐठाम किए लाबलीही? बुझै छीही, रमुआ आ ओकर जाति सभ केते तमसाएल छै। अपन भला चाहै छीही तँ एकरा आपस घर पहुँचा दही नै तँ ई सभ जीनाइ मोसकिल कऽ देतौ। (किशन किच्छौ नै बजैए।) तूँ बजै किए नै छँह रौ? किशन- की बजबै? अहाँ तँ देखिते छिऐ जे हम दुनू गोटे एक-दोसरकेँ केते चाहै छिऐ। सहदेव- तोरा चाहने आ नै चाहनेसँ की हेतौ? किशन- हमरा चाहनेसँ की नै हेतै। हम दुनू गोटे बालिग छिऐ। हमरा कानून द्वारा बिआह करैक अधिकार छै। सहदेव- कानून अपना जगहपर छै आ पिछड़ल समाज अपना जगहपर अड़ल छै। ऐठाम ई सभ नै चलतौ। कहै छियौ, मारल जेमेँ। किशन- पता नै, अहाँ सभ पुरना गपकेँ कहिया तक लाधने रहबै। केतेक लोक कुरवान हैत रहतै। ठीक छै, हमरा फैसलासँ अहाँ डरै छिऐ तँ हम जा रहल छी। (ललिताक हाथ पकड़ि किशन जेबाक लेल तैयार होइत अछि। किशनक माए आबि कऽ आगूसँ रोकैत अछि।) किशनक माए- बौआ एते रातिकेँ केतए जेबहक? बातकेँ बुझहक। हमरा सभ एतेक तगतगर नै छी जे समाजसँ लड़ि सकब। (किशन ललिताक संगे चलि जाइत अछि। ओकरा माए चिचियाइत हल्ला करैत अछि।) रौ बौआ, रूकि जो रौऽऽऽ। की हेतै की नै। (कानए लगैत अछि।) कट टू. चारिम दृश्य- समए- दिन स्थान- गीताक घर। पात्र- गीता, धनेसर, गीताक माए, एवं किछु धिया-पुता। (घरक बाहरी भाग। गीता कुरसीपर बैसल अछि। आगूमे बैसल किछु धिया-पुता पढ़ि रहल अछि। दस बर्खक एकटा छौड़ा दौग कऽ अबैत अछि आ एकटा चिट्ठी गीताक हाथमे दैत अछि। फेर ओ शीघ्रतासँ आपस भऽ जाइत अछि। चिट्ठी खोलि गीता पढ़ए लगैत अछि।) गीता- ओह! ललिता मोसीबतमे फँसि गेलै। एकरा मदति केनाइ बड़ जरूरी छै। (चिट्ठीकेँ फाड़ि ओहीठाँ फेकि दैत अछि आ बगलमे ठाढ़ साइकिल लऽ कऽ विदा होइत अछि।) अँगना दिस घूमि) माएऽऽ हम कनीकालक बाद आपस एबौ। (साइकिल तेजीसँ बढ़बैत अछि। धिया-पुता हल्ला करैत पड़ा जाइत अछि।) कट टू. पाँचम दृश्य- समए- दिन। स्थान- सड़क। पात्र- गीता। (गीता परेशान मुद्रामे साइकिलसँ जा रहल अछि। अपन प्रेमक बीतल कथामे डुमल अछि। सड़कपर चलि रहल। निर्देशानुसार...।) कट टू. छअम दृश्य- स्थान- मास्टर साहैबक घर। पात्र- गीता, मास्टर साहैब। (सेवा निवृत्त मास्टर साहैब अपना नीजी पुस्तकालमे पढ़ि रहल छथि।) गीता- (प्रवेश करैत) परनाम सर। मास्टर सहैब- (असीरवाद दैत) आबह, बैसह। बहुत दिनक बाद देखलियौ। कोनो विशेष गप छै की? गीता- हम अहाँसँ मदति लइले आएल छी। मास्टर साहैब- केहेन मदति? गीता- अहाँ तँ ललिता आ किशनक बारेमे सभ किछु जनिते हेबै। एहेन स्थितिमे...। मास्टर साहैब- सभ किछु बुझै छिऐ अपन समाज रूढ़िवादी छै। हमर तँ सभ दिनसँ कोशिश रहल अछि जे ई जातिक बंधन टुटै। समाजकेँ बदलैले पूरा जिनगी लगा देलिऐ। किन्तु सिन्तु ी छै। हमर तँ सभ दिनसॅ माज नै बदलल। खैर, एतेक दिनक पछाति तूँ कमसँ कम ऐ बातक लेल ठाढ़ तँ भेलेँ। हमरा बुते जेते संभव हेतौ तेते मदति जरूर करबौ। कट टू. सातम दृश्य- समए- दिन। स्थान- गीताक घर। पात्र- गीता आ धनेसर दुनू परानी। (धनेसर चिट्ठीबला कागतक टुकड़ी हाथमे नेने पत्नी दिस बढ़ैत अछि। ओही समैमे गीता साइकिल नेने प्रवेश करैत अछि। ओकरापर नजरि पड़िते धनेसर तमसा जाइत अछि।) धनेसर- (सक्रोध) गीता! एनऽ आ। (कागत देखबैत) ई की छिऐ? गीता- (चुपचाप ठाढ़ अछि।) धनेसर- तूँ जबाव किए ने दइ छेँ? पत्नी- (बिच्चेमे आबि) अहाँ किए हमरा बेटीपर तमसा रहल छिऐ। धनेसर- अहीं एकरा कपारपर चढ़ा नेने छिऐ। देखियौ, ई ललिताक चिट्ठी। (गीता दिस घूमि कऽ) तोरासँ एहेन आशा नै छल। गीता- ऐमे ओकरा सबहक कोनो गलती नै छै। धनेसर- (तामस बढ़ि जाइत अछि।) लगैए, तोराे दिमाग खराप भऽ गेलौ। अखनिसँ तूँ केतौ नै जा सकै छेँ। चल घरक अन्दर। (हाथ पकड़ि धकिया कऽ घरक अन्दरमे दऽ कऽ बाहरसँ केबाड़ लगा दैत अछि।) पत्नी- अहाँ बताह जकाँ किए करै छिऐ। धनेसर- हमरा एलासँ पहिने जँ घर खोलबै तँ हमरा जीअत नै देखबै। (झपटि कऽ झोरा लैत अछि आ तेजीसँ बाहर निकलि जाइत अछि।) पत्नी- आब हम की करबै। (कानए लगैत अछि।) कट टू. आठम दृश्य- समए- दिन। स्थान- धनेसरक घर। पात्र- गीता आ धिया-पुता, किछु लोक। (गीता घरक भीतरीमे टहलि-बुलि रहल अछि। मुँहपर बेचैनीक भाव छै। खिड़की खोलैत अछि।) किछु लोक सड़कपर जा रहल अछि। एकटा आठ बर्खक छौड़ाकेँ गीता सोर पाड़ैत अछि। आ ओकरा इशारासँ केबाड़ खोलैले कहैत अछि। जे बाहरसँ बन्न अछि। छौड़ा टेबुलपर चढ़ि केबाड़ खोलि दैत अछि।) कट टू. नअम दृश्य- समए- दिन। स्थान- गामक पंचायत स्थल। गामक बाहर गाछतर चबुतरापर पंच-प्रमुख आ पंचगण बैसल अछि। चबुतराक निच्चाँमे गौआँ-घरूआ सभ जमा भेल अछि। किछु युवक सभ लाठी नेने किशन आ ललिताकेँ घेरने अछि। ग्रामीण सभ आपसमे घोलफच्चका कऽ रहल अछि। पंच प्रमुख- सभटा गप सुनलौं। वास्तबमे, अपना गाम आ समाजक लेल ई घिनौना घटना छी अइले ओहने भरिगर डण्ड हेबाक चाही। पंच एक- हँ... हँ... अहाँ ठीके कहै छिऐ। जँ ऐ तरहेँ हैत रहतै तँ केकरो इज्जति-परतिष्ठा नै बँचतै। पंच दू- ने जातिक बन्धन आ ने बड़ छोटक खियाल। हमरा सबहक जमानामे कहियो एना भेल छेलै। पंच एक- (किशन दिस हाथ चमकबैत) ई सभ पढ़ि-लिखि कऽ गामक नाओं की करतै। उनटे समाज आ जातिकेँ दाग लगा देलकै। (भीड़सँ गीता निकलैत अछि। ओकर नजरि अपना बाबूसँ मिलैत अछि आ पिताक नजरि झूकि जाइत अछि।) पंच प्रमुख- (क्रोधमे) एकरा केश कटा कऽ कारिख-चुन लगा आ गदहापर बैसा दही। पंच एक- हे रौ, कारिख-चुन एनए ला। लगा, मुँह-कानमे। (लाबैत अछि।) पंच दू- ऐ छौड़ीकेँ पीठपर कोड़ा लगबाक चाही। (भीड़केँ ठेलैत गीता आगू अबैत अछि।) पंच एक- घोड़ाक कोड़ा कहाँ छौ? ला हमरा हाथमे। (लाबैत अछि।) गीता- यौ पंच मरमेसर, कानूनक हिसाबसँ अहाँक फैसला गलत अछि। देश-दुनियाँ केते आगू बढ़ि गेलै आ अहाँ सभ ओही पुरना गपमे लटपटाएल छी। परेम कएल नै जाइ छै, भऽ जाइ छै। आ परेम जाति, धरम नै देखै छै। आब तँ सरकारो एकर मान्यता दऽ देने छै। कानून बनि गेल छै। अहाँ सभ तँ कानूनक रखबार छी। कनी सोचियौ, अहाँ सबहक फैसलासँ दूटा जिनगी बेरबाद भऽ जेतै। अपन वर्चस्व देखबैले ई अन्याय कऽ रहल छिऐ। दुनू बालिग छै, तँए बिआह करबाक लेल स्वतंत्र छै। पंच दू- धनेसरजी, अहाँ अपना बेटीकेँ एहने बात सभ सिखौने छिऐ? अहाँ तँ समझदार छी। एतेक लोकक बीचमे अहिना बजल जाइ छै? एहेन गप बजैत लाज हेबाक चाही। (पुलिसक गाड़ी धड़धड़ा कऽ अबैत अछि। जमादारक संग मास्टर साहेब उतरैत अछि। सभ ताकए लगैत अछि।) मास्टर साहैब- लाज तँ अहाँ सभकेँ हेबाक चाही। ऐ दुनूकेँ कानूनी शादी भऽ गेल छै। एकर पछातिओ अहाँ अतियाचार कऽ रहल छिऐ। जमादार- (तामससँ लोककेँ हटबैत) जे पंच छी, से सभ सुनि लिअ। ऐ दुनूकेँ बिआहक कानूनी कागत थानामे जमा छै। अहाँ सभ अतियाचार कऽ रहल छिऐ। कानूनक हिसाबसँ अहाँ सभ गिरफ्तार भऽ जाएब। (जमादारक बात सुनि सभ पंचक माथा झूकि जाइत अछि। जमादार भीड़मे ढुकि किशन आ ललिताकेँ बाहर निकालैत अछि। किशन आ ललिता मास्टर साहैबक पएर छुबैत अछि। पाछूसँ गीता निकलैत अछि आ मास्टर साहैबकेँ प्रणाम करैत अछि।) मास्टर साहैब- (असिरबाद दैत) गीता, तोरा काजसँ हम बड्ड खुशी छी। (धनेसर दिस ताकि।) यौ धनेसरजी, अहाँक बेटी समाजक लेल बड़का काज केलक। अहाँक गौरव हेबाक चाही। असिरबाद दियौ। (धनेसर गीताकेँ असिरबाद दैत अछि।) शब्द संख्या- १५३५ कट टू. समाप्त। लाज (एकांकी) पात्र परिचए :: लाज (एकांकी) पुरुष पात्र- १. हरिचरण- गामक किसान २. धिरबा- हरिचरणक बेटा ३. कुलानन्द— गामक सम्पन्न जमीनदार ४. भोगेन्दर- कुलानन्दक बेटा ५. बिसेखी- गामक एकटा मजदूर ६. श्यामबाबू- शिक्षक स्त्री पात्र- १. चनपटीवाली- हरिचरणक पत्नी २. सबिता- हरिचरणक बेटी (दू-तीनटा शिक्षक, चारिटा ग्रामीण, डाक्टर, नर्स, दस-बारहटा छात्र एवं छात्रा।) दृश्य- १ समए- दिन। स्थान- हरिचरणक घर। (चनपटीवाली भानस-भात कऽ बैसल अछि। हरिचरण अबैत अछि।) चनपटीवाली- केतए गेल छेलिऐ? खेबै की नै? हरिचरण- हँ... हँ। कनी हाथ-मुँह धोइ छी। धिरबा स्कूल गेल की नै? चनपटीवाली- हँ। ऊ तँ दसे बजे खा-पी कऽ चलि गेल। हरिचरण- ऊ छौड़ी, सवितियाकेँ नै देखै छी। चनपटीवाली- सबितिया तँ गाए-बकरी चरबैले बाध दिस गेल। की भेलै से? हरिचरण- हेतै की। बेटी-चाटीकेँ कनी दाबि-चापि कऽ राखी। देखै नै छिऐ गामक हवा। चनपटीवाली- हे, हमर कुल-खनदान ओहन नै अछि। जाउ अहाँ हाथ धोने आउ। (हरिचरण चलि पड़ैत अछि।) पटाक्षेप। दृश्य- २ स्थान- गामक विद्यालय। समए- दिन। (स्कूलक आगूमे तीन-चारि शिक्षक कुरसीपर बैसल अछि। आपसी गप-सप्प कऽ रहल अछि। किछु धिया-पुता पढ़ि रहल अछि आ किछु बाहरी भागमे खेल रहल अछि) श्याम बाबू- यौ हीरा बाबू, अहाँ जे अपना बचियाक बिआहक गप करै छेलिऐ, तइमे लेन-देन फाइनल भेल? शिक्षक दू- धुर की कहब। वरक माँग अलग आ वरक बापक माँग अलग। टका-पैसा लाउ। मोटर साइकिल लाउ, सोना लाउ, लैपटॉप लाउ। की कहूँ, हथियाक सूढ़ जकाँ डिमान्ड बढ़ले जा रहल अछि। हे यौ, जे बेटीक बिआह करैत अछि से बूझू जे जमपुरीसँ घूमि कऽ अबैत अछि। (एकटा छात्र लगमे अबैत अछि) छात्र एक- यौ मास्टर साहैब, ई छौड़ा हमरा गारि पढ़ै छै। श्याम बाबू- तूँ सभ गारि पढ़ैले एलही आकि पढ़ैले? (छौंकी देखबैत) हमरा सभ गप्प करै छी। ऐठामसँ जो जल्दी। छात्र दू- माहटर साहैब, पाँच मिनट। (जोरदार अवाजमे कहैत विदा होइत अछि।) शिक्षक दू- (छौंकी देखबैत) बैस चुपचाप नै तँ देखै छीही छौंकी। छात्र दू- नै जाए देबै तँ हम अहीठाम लगही करि देब। शिक्षक दू- पढ़ै छीही कथीले। जो ने लघीए करैत रहिहेँ। (शिक्षक सभ पुन: गप-सप्प करए लगै छथि। एकटा हरबाहा कान्हपर हर लेने ओही बाटसँ जा रहल अछि।) हरबाह- यौ माहटर साहैब, अहाँ सभ गप्प कटाबलि करैत रहू। बाहरमे छौड़ा सभ मारापीटी करैत अछि। अहिना चलै छै स्कूल यौ...? शिक्षक तीन- हे, अहाँ जा कऽ हर जोतू। (क्रोधमे) अहाँ स्कूलक भाँज की बुझबै यौ। हरबाह- हँ हँ छौड़ा सभ तँ भैंसवार बनबे करतै। अहाँ फोकटमे रूपैआ लैत रहू। कियो कहैबला तँ अछि नै। शिक्षक तीन- (छौंकी लऽ कऽ ठाढ़ होइत) कहै छी चल जाउ ऐठामसँ। हरबाह- यौ अहाँ छौंकी देखबै छी। हमरो हाथमे हरबाही पेना अछि। श्यामबाबू- हे यौ की लगल छी। जाउ ऐठामसँ। हरबाह- हमरा थोड़े ओते फुरसत अछि। हम अपना काजकेँ भगवान बुझै छी। अहूँ सभ अपना काजकेँ भगवान बुझियौ। बेमतलबमे अबेर भऽ गेल। जाइ छी। (हरबाहा भनभनाइत चलि जाइत अछि।) (शिक्षक एकटा बोर्डपर लिखैत अछि संगे पढ़बैत अछि। सबिता बकरीकेँ एकटा गाछमे बान्हि स्कूलक खिड़कीसँ सभ देखि-सुनि रहल अछि।) श्यामबाबू- ई सभटा पढ़ेलहा काल्हि मुँह-जबानी सुनबौ। (शिक्षक सबिताकेँ देखि लैत अछि। जोरसँ सोर पाड़ैत अछि) एमहर सोझहामे आ। के हुलकी मारै छँह? (सबिता डेराइत सोझहामे अबैत अछि) श्यामबाबू- तोहर नाम की छियौ? केकर बेटी छँह? सबिता- हम सबिता छी। हमरा बाबूक नाम श्री हरिचरण अछि। श्यामबाबू- ऐठाम कथीले एलही? सबिता- यौ मास्टर साहैब। हमरो पढ़ऽ दिअ। श्यामबाबू- पढ़बें, ई तँ नीक गप। अच्छा कह, पाँच जोड़ पाँच केतेक भेलै। सबिता- दस भेलै माहटर साहैब। श्यामबाबू- दिमाग तेज छौ। तोराले परियास करबाक चाही। घरपर जेबौ, तोरा बापकेँ समझबैले। अखनी तूँ जो। (सबिता चलि दैत अछि। बर्खाक छोट-छोट बून गिरए लगैत अछि। छात्र सभ भागए लगैत अछि।) एकटा छात्र- यौ माहटर साहैब। बरखा शुरू भऽ गेल। हम भागै छी। अहूँ भागू। (कहैत पड़ाइत अछि।) छुट्टी... छुट्टी...। पटाक्षेप। दृश्य- ३ स्थान- हरिचरणक घर। (शिक्षक-एक जे श्यामबाबूक नामसँ जानल जाइत अछि, प्रवेश करैत अछि) श्यामबाबू- हरिचरणजी छी यौ। (जोरसँ चिकरैत अछि।) हरिचरण- (अँगनासँ बाहर निकलैत) मास्टर साहैब, प्रणाम-प्रणाम। आउ बैसू। कहू, हमर छौड़ा ठीकसँ पढ़ैत अछि किने? श्यामबाबू- हँ हँ, नीकसँ पढ़ैत अछि। हम दोसरो काजसँ आएल छी। हरिचरण- कहू ने, आओर की बात छै। (अँगना दिस तकैत जोरसँ बजैत अछि।) सुनै छिऐ सबितियाक माए। चाह बनौने आउ। (श्यामबाबू दिस तकैत) कहू मास्टर साहैब, की कहै छी? श्यामबाबू- अहाँक बेटी बड्ड संस्कारी अछि। बुद्धियोमे तेज। पढ़त-लिखत तँ जरूर नाम रोशन करत। काल्हिसँ अोकरा स्कूल भेजू। हरिचरण- यौ मास्टर साहैब, बेटी की पढ़तै। ओकरा घर-अँगनाक काजसँ फुरसत कहाँ होइ छै। श्यामबाबू- फुरसत देबै तब ने पढ़तै। हे यौ, ऐ देशक बेटी तँ देशसँ विदेश धरि अपन नाम चमका रहल अछि। हरिचरण- हे यौ, ओहन पलिवारो रहै छै तब ने होइ छै। हमर तँ समाजो तेहेन अछि जे बेटीकेँ घरसँ निकलैत देखि खाली दोखे लगौत। श्यामबाबू- दोख लगौलासँ की हेतै। अपन-अपन चरित्र होइ छै। लोकक कहलासँ नीक बेकती अधला भ जेतै। हे यौ आब तँ सरकार, कानून सभटा ऐ दिशामे सहयोग कऽ रहल अछि। हरिचरण- बेटाकेँ पढ़बैमे तँ जुमबै ने करैए छी आ बेटीकेँ...। श्यामबाबू- देखियो, बेटा-बेटीमे कोनो अन्तर नै होइ छै। गाछ रोपबै तब ने फल भेटत। (हरिचरणक स्त्री चाह लेने आबि जाइत अछि।) हरिचरण- अँगनामे रहै छै तँ माइयोकेँ थोड़-बहुत काज सम्हारि दइ छै। असगरे तँ...। श्यामबाबू- यौ काजो करतै अा पढ़बोकरतै। खरचो बेसी नै छै। सरकारी सहयोग भेटै छै। चनपटीवाली- बात मानि लियौ। माहटर साहैब अधला नै कहैत हेथिन। हरिचरण- ठीके छै। जँ सभ कहै छी तँ स्कूल जेतै। श्यामबाबू- खुशी भेल। काल्हिसँ समैपर स्कूल भेजू। (एक-दोसराकेँ प्रणाम करैत श्यामबाबू विदा भऽ जाइ छथि।) पटाक्षेप। दृश्य- ४ स्थान- स्कूल। समए- दिन। (शिक्षक पढ़ा रहल छथि। छात्र आ छात्रा सभ पोथी, कौपी, लेने पाँतिमे बैसल अछि।) शिक्षक दू- जे सवाल बनबैले देने छियो, जल्दी बना कऽ ला, जे सभसँ पहिने लाबबेँ से तेजगर कहेमेँ आ जे सभसँ पाछू देखेमेँ तेकरा छौंकी लगतौं। सबिता- माहटर साहैब, हम सवालकेँ हल कऽ लेलौं। (ठाढ़ भऽ कऽ कौपी देखबैत अछि।) शिक्षक दू- देखही रौ छौड़ा सभ। मेहनतक फल। किछे दिनमे सबितिया सभसँ आगू भऽ गेलौ। एकरे कहै छै कादोमे कमल फुलेनाइ। धिरबा- माहटर साहैब हमहूँ हिसाब बना लेलौं। शिक्षक दू- बनेलेँ तँ किन्तु पाछूसँ। तोरा तँ पहिने एबाक चाही, तोहर बहिन तँ किछे दिन पहिनेसँ स्कूल आबए लगलौ। तूँ तँ कहियासँ ऐठाम पढ़ै छेँ। छात्र दू- माहटर साहैब, भोगेन्दर हमरा बिठुआ काटि लेलक। शिक्षक दू- हँ-हँ बिठुआ काटतौ। आर की करतौ। एकर बाप कुलानन्द बाबू तँ कहैत रहै छै जे हमरा किछोक कमी नै अछि। बेटाकेँ चारि-चारिटा टीसन धरौने छी। आ बेटा तेहेन भुसकोल छै जे पाछूमे बैसि कऽ बिठुआ कटै छै। (मुड़ी उठा कऽ देखैत) हे रौ भोगेन्दरा, ला कौपी। हिसाब बनौलेँ? भोगेन्दर- यौ माहटर साहैब, अहाँक सवाल गलत अछि। शिक्षक दू- आँइ! सबाले गलत अछि। सबिता- यौ माहटर साहैब, ई तँ भरि दिन लोकक बाड़ीक लताम तोड़ैत अछि नै तँ परतीपर क्रिकेट खेलैत रहै छै। एकरा बुते कहूँ सवाल बनै। तँए सवालेकेँ गलत कहै छै। शिक्षक दू- ठीके, ई छौड़ा खचरपनी करै छै। रौ ला तँ कौपी। की गलत छै। भोगेन्दर- हिसाब बनतै तेकर बाद देखाएब। कोनो की हम बनरनी छी जे चट दऽ कूदि कऽ देखा देब। सबिता- माहटर साहैब, सुनै छिऐ। हमरा बनरनी कहै छै। भोगेन्दर- लगै छी बनरनी सन। तँ कहबौ बनरनी। देखही रौ बनरनीकेँ। शिक्षक दू- (उठि कऽ चारि-पाँच छौंकी भोगेन्दरक पीठ आ बाँहिपर लगबैत) गामोपर बदमासी आ स्कूलोमे खचरपनी। ऐठाम बिठुआ कटैले अबै छेँ आकि पढ़ैले? हमरो सोझहामे लुचपनी। भोगेन्दर- हे माहटर साहैब, हम कहि दइ छी। ई छौड़ी हमरा मारि खुआ रहल अछि। एकरो ठीक करि देबै। जाइ छी, बाबूकेँ सभटा गप्प कहबै। शिक्षक दू- (छौंकी उठबैत) जो, पहिने बाबूकेँ कहि आबही। भोगेन्दर- (विदा होइत अछि) कहि दइ छी, हम सभकेँ ठीक कऽ देब। हमरो नाम भोगेन्दरा छिऐ। (चलि दैत अछि) (घण्टी टुनटुनाइत अछि।) शिक्षक दू- जाइ जो। टिफिन भऽ गेलौ। (छात्र सभ बाहर दिस चलि दैत अछि।) पटाक्षेप। दृश्य- ५ स्थान- स्कूलक बाहरी भाग। समए- दिन। (शिक्षक सभ स्कूलसँ बाहर सड़क दिस जा रहल अछि। हरिचरण अपना बेटी सबिताक संगे दोसर दिससँ अबैत रहैए। ओकरा पाछू एकटा ग्रामीण बिसेखी अछि। सबिताक कपड़ा-लत्ता फटल अछि।) हरिचरण- प्रणाम, मास्टर साहैब। (सबिता कानि रहल अछि।) श्यामबाबू- प्रणाम, हरिचरणजी। सबिता किए कानि रहल अछि? की भेल? हरिचरण- हम तँ ओही दिन कहने छेलौं जे अपना बेटीकेँ नै पढ़ाएब। अहाँ हमरापर बड्ड जोर देलिऐ। तेकर फल देखि लियौ। श्यामबाबू- गप कहबै तखनि ने बुझबै। भेलै की? हरिचरण- हेतै की। गरीबक धिया-पुताकेँ पढ़बाक एहेन अधिकार छै। जे देखि लियौ। कुलानन्द बाबूक बेटाक किरदानी। ओ हमरा बेटीकेँ मारैत-मारैत बाटमे खसा देने छेलै। श्यामबाबू- कोन गपक झगड़ा भेलै? हरिचरण- सुनै छी, जे कुलानन्द बाबूक बेटाक बारेमे सबितिया किछो बजल रहै। तही कारणे अहाँ ओकरा मारने रहिऐ। श्यामबाबू- कम्पलेन केने रहै। सबितियाक बातो साँचे छेलै। ऊ छौड़ा ठीके बदमाश अछि। हरिचरण- बदमाशी केनाइ तँ धनिकक धिया-पुताक सिंगार छिऐ। श्यामबाबू- ई कोन गप भेलै। अधला गपक तँ विरोध हेबाक चाही। हरिचरण- देखै नै छिऐ। हमर बेटी विरोधमे बजलै तँ केहेन दशा भेलै। मास्टर साहैब, नीक होइतै जे हम अपना बेटीकेँ नै पढ़बितौं एकरा कपड़ा-लत्ताक हालत देखियौ। (आँखिमे नोर भरि जाइत अछि।) की हेतै पढ़ा कऽ? श्यामबाबू- एहेन गप नै बाजू। नीक काजमे अहिना अड़चन होइ छै। अहाँ अपना बेटीकेँ पढ़ाउ। हम कहै छी- अहाँक बेटी नाम रोशन करत। हरिचरण- केना पढ़ेबै यौ मास्टर साहैब? श्यामबाबू- अहाँ िचन्ता नै करब। हम कुलानन्द बाबूसँ भेँट करैले जाइ छी। चलू यौ बिसेखीजी, हमरा संगे। बिसेखी- हँ-हँ चलू। (सभ कियो विदा भऽ जाइ छथि।) पटाक्षेप। दृश्य- ६ स्थान- कुलानन्दक घर। समए- दिन। (कुलानन्द अपन दरबज्जापर असगरे कुरसीपर बैसल छथि। कनेक हटि कऽ दूटा हथटुट्टा, पुरान कुरसी रखल अछि। शिक्षक श्यामबाबूक संग बिसेखी प्रवेश...। श्यामबाबू- प्रणाम यौ कुलानन्द बाबू। कुलानन्द- (मुड़ी उठा कऽ देखैत) प्रणाम मास्टर साहैब। प्रणाम-प्रणाम!! (व्यंग्य करैत) वाह! बिसेखीओकेँ देखै छी। हे रौ बिसेखी! कनी कुरसी ला ओमहरसँ। मास्टर साहैब बैसता। (बिसेखी कुरसी आनि कातमे ठाढ़ भऽ जाइत अछि।) श्यामबाबू- हमरा सभ एकटा विशेष काजे आएल छी। कुलानन्द- बिना कारणे टिटही थोड़े लगै छै। हम बुझै छी। रौ बिसेखिया मुँह किए तकै छेँ, बाज ने की बात छिऐ? बिसेखी- की कहब मािलक। अहाँक भोगेन्दर बदमाशी केलक। ओ हरिचरणक बेटीकेँ बड्ड मारि मारलखिन। कुलानन्द- हे रौ हमर बेटा कोनो बताह छै। जे बिना कारणे केकरो पीटतै। ओकरो बेटी खचरपन्नी केने हेतै। श्यामबाबू- ओ तँ सिरिफ भोगेन्दरक कम्पलेन केने रहै। बिसेखी- धिया-पुताकेँ हाँटि-दबाड़ि देबाक चाही। एनामे धिया-पुता मनबढ़ू भऽ जाइत अछि। कुलानन्द- तू हमरा सिखबै छेँ। ऊ स्कूल हमरा जमीनपर ठाढ़ छौ। हम मदति केलियौ तँ स्कूल बनलौं। आइ हम अपने धिया-पुताकेँ मारि-पीट कऽभगा देबै!!! श्यामबाबू- भगबैले कहाँ कहै छी। कनी समझा-बुझा देबै तँ नीक रहतै। कुलानन्द- हमर गाम छी। हम नीक-अधला बुझै छिऐ। हरिचरणा बेटाकेँ तँ पढ़ाइए ने सकैए आ बेटीकेँ केतएसँ पढ़ाएत। ओकरा कारणे हम भोगेन्दरकेँ मारबै? ईह! बड़ छोट से उनचास हाथ!! बिसेखी- कनी बेसी गलती भऽ गेलै मालिक। मारैत-मारैत सबितियाकेँ सभटा कपड़ा-लत्ता फाड़ि देने छै। कुलानन्द- ओ, आब बुझलौं। कपड़ा-लत्ताकेँ हमरा दाम लगत! सएह ने रौ? बिसेखी- से हम कहाँ कहै छी। कुलानन्द- तूँ की कहै छेँ से हम बुझै छिऐ। दुआरिपर आबि कऽ उपराग देलेँ। मास्टर साहैबक सोझहामे की कहबौ। यौ मास्टर साहैब हमर गाम छी। हम सभ गप बूझि-समझि लेबै। अहाँ सभ ऐठामसँ अखनि चलि जाउ। (मास्टर साहैबक संग बिसेखी चलि जाइत अछि।) पटाक्षेप। दृश्य- ७ स्थान- हरिचरणक घर। (हरिचरण अपना साढ़ू संगे दुआरिपर बैसल अछि। साढ़ू रघुवीर घड़ीमे समए देखैत अछि।) रघुवीर- साढू! हम तँ किछुकालक बाद चलि जाएब। एकटा गप कहबाक छल। हरिचरण- हँ-हँ- कहू की बात? रघुवीर- हमर पत्नी तँ बेमार रहैत अछि। आ अखनि गर्भवती अछि। असगरे बेचारीकेँ बड्ड दिक्कत होइ छै। हम सरकारी सेवामे छी। कखनि घरपर आएब तेकर कोनो ठेकान नै। एहेन परिस्थितिमे...। हरिचरण- अहाँ की कहए चाहै छी? रघुवीर- अहाँ छोटकी बचियाकेँ हमरा घरपर जाए दैतिऐ तँ पत्नीकेँ सहारा भऽ जइतै। हरिचरण- ओ तँ पढ़ै छै। (निसाँस छोड़ैत) ओना लड़कीकेँ पढ़ौनाइ बड्ड कठिन छे। मुदा सबिताकेँ पढ़बए पड़तै। किए तँ ओ तेजगर छै। रघुवीर- तेकर चिन्ता अहाँ नै करू। हमहूँ सर्विस करै छी। शहरमे पढ़ौनाइ असान छै। टाइमपर पढ़बो करतै आ अपना मौसीकेँ देख-भालो करतै। पत्नीआंे असगर नै रहतै। अनमना लगल रहतै। हरिचरण- कहै तँ छी ठीके किन्तु अपन धिया-पुता अपने लग ठीक रहै छै। पढ़ाइमे खरचो तँ लगै छै। रघुवीर- खर्चाक िचन्ता नै करू साढ़ू। हमरो किछोक अभाव नै अछि। सबिता जेते धरि पढ़तै सभ खर्च-वर्च हमर। (हरिचरणक पत्नी चाह लेने अबैत अछि। ठमकि कऽ सभ सुनि लैत अछि।) पत्नी- आब एतेक जिद्द करै छथिन तँ जाए दियौ सबितियाकेँ। सुनने नै छिऐ जे माए मरे आ मौसी जिऐ। (सबिता ओनएसँ दौगल अबैत अछि। हरिचरण ओकरा रोकैत अछि।) हरिचरण- सबिता एमहर सुन! मौसा संगे गाम जेबही? (सबिता किछु ने बजैत अछि।) तोहर मौसा ओहीठाम स्कूलमे पढ़ैक बेवस्था लगा देतौ। सबिता- हँ जेबै। मौसी संगे रहबै आ ओहीठाम पढ़बै। हरिचरण- लिअ साढ़ू। अहाँक समस्याक समाधान भऽ गेल। रघुवीर- ठीक छै। तैयार होउ। दू घण्टा बाद गाड़ीसँ चलब। पटाक्षेप। दृश्य- ८ स्थान- गामक चौक। (तीन-चारिटा ग्रामीण सड़कक कातमे गाछतर बैसल अछि। चबूतरापर गप-सप्प कऽ रहल अछि।) ग्रामीण एक- (गाछ दिस इशारा करैत) देखियौ, ई गाछ केतनेटा रहै। देखिते-देखिते केतेक विशाल भऽ गेलै। ग्रामीण दू- एकरा रोपनिहार तँ जुआन भऽ गेलै। समए बितैत कोनो देरी होइ छै। ग्रामीण तीन- हँ यौ, ऐ स्कूलक धिया-पुता सभ एकरा रोपने रहै। ग्रामीण चारि- देखै नै छिऐ, धिरबा, सबितिया, भोगेन्दर सभ धिया-पुता आब जुआन भऽ गेलै। ग्रामीण एक- सुनै छिऐ, सबितिया शहरक स्कूलमे पढ़ि कऽ बड़का डागदरनी भऽ गेलै। हरिचरणकेँ नाम रोशन कऽ देलकै। ग्रामीण चारि- धुर हरिचरण बुते थोड़े होइतै। ई तँ ओकर साढ़ू पढ़ाइक खरचा देलकै तब भेलै। ग्रामीण तीन- हँ यौ ऊ बगलक शहरमे अस्पताल चलबैत अछि। हमर काकी तेतेक बीमार रहै जे नै जीबितै। सबितेक दवाइसँ बँचि गेलै। ग्रामीण दू- तब तँ नामी डाक्टर अछि यौ। ग्रामीण एक- अच्छा गामकेँ ऊँच केलक। (कुलानन्दक बेटा भोगेन्दर दारू पीने आ अड़-बड़ बजैत, गारि पढ़ैत, लड़खड़ाइत जा रहल अछि।) भोगेन्दर- ओऽऽऽ सा... ले... तेरी... माँ... के... छोड़बौ नै। (लड़खड़ाइत अछि।) ग्रामीण एक- के छी यौ? एना गारि पढ़ैत किए जाइ छी? ग्रामीण दू- पियक्कड़ छथि। भोगेन्दरा। माए-बापक नाम रोशन कऽ रहल छथि। (भोगेन्दर उनटि कऽ ग्रामीण-दू केँ पकड़ि लैत अछि।) भोगेन्दर- रे सार तूँ हमरा गारि देलही। तोरा हम आइ बापसँ मोलाकात करबा देबौ। (ग्रामीण तीन दुनूकेँ बीच होइत झगड़ाकेँ छोड़बैत अछि।) ग्रामीण तीन- एना नै करू। ई किछु नै बजला। अहाँ बेकारमे झगड़ा नै करू। जाउ, ऐठामसँ। भोगेन्दर- ई तोरा बापक जगह छियौ जे चलि जेबौ, ऐठामसँ। (भोगेन्दर गारि पढ़ैत-पढ़ैत बोकरए लगैए।) ग्रामीण एक- बाप रे बाप! ई तँ खून बोकरै छै। की भऽ गेलै यौ। सोर पाड़ू कुलानन्द बाबूकेँ। एकर हालत बड़ खराप छे! (ग्रामीण चारि कुलानन्दकेँ सोर पाड़ए जाइत अछि। भोगेन्दर बेहोश भऽ गिर पड़ैत अछि।) ग्रामीण तीन- एकरा जल्दी शहरक अस्पताल नै लऽ कऽ जेतै तँ परान बँचाएब मोशकिल भऽ जेतै। ग्रामीण दू- एकरे कहै छै- कर्मक फल। दुनू बापुत समाजमे कुकरम करैत रहै छेलै। डरसँ के बजतै? सभ किच्छो बरबाद कऽ देलकै। आइ देख लियौ फल। ग्रामीण एक- एकरे डरसँ हरिचरण अपना बेटीकेँ साढ़ू संगे भेजि शहरमे पढ़ौलकै। आ शहरक नामी-गिरामी डाक्टर बनल छै। (कुलानन्द अबै छथि। अपना बेटाक हालत देखिते आँखिसँ नोर खसए लगै छन्हि।) कुलानन्द- आब कोन उपाय करबै हौ। केना परान बँचतै हौ। हौ भाय, हमरा एकेटा बेटा अछि हौ। ग्रामीण एक- यौ कुलानन्द बाबू, एकरा शहरक अस्पताल लऽ कऽ चलू। अपने गामक बढ़ियाँ डाक्टर अछि ओइठाम। कुलानन्द बाबू- के हौ? ग्रामीण एक- हरिचरण बेटी डा. सबिता कुमारी। केहेन-केहेन बीमारीकेँ ठीक कऽ देलकै। एकरो ठीक करतै। कुलानन्द बाबू- (मुड़ी झूका लैत अछि।) हौ सुनने तँ छिऐ, मुदा की कहबै? अपने कएल किरदानी। सोझहामे केना जेबै? ग्रामीण तीन- अहाँ कोनो चिन्ता नै करू। लऽ कऽ चलू। हमहूँ सभ संगे चलै छी। सभ ठीक भऽ जेतै। एकरा उठाउ। चलै चलू। (भोगेन्दरकेँ उठाबए लगैत अछि।) पटाक्षेप। दृश्य- ९ स्थान- अस्पतालक बरामदा। (तीन-चारिटा ग्रामीण बेंचपर बैसल अछि। डाक्टर सबिता आ नर्स सभ एमहरसँ ओहमर आबि रहल अछि आ जा रहल अछि। कुलानन्द भीतरसँ निकलैत अछि।) ग्रामीण एक- यौ कुलानन्द बाबू! आब तँ अपना सभकेँ गाम दिस चलबाक चाही। कोनो तरहेँ भोगेन्दरक जान बँचि गेल। कुलानन्द- कोनो तरहेँ की कहै छी। ई कहियौ जे डाक्टरनी सबिताक कृपासँ परान बँचि गेल। ग्रामीण दू- से तँ ठीके। मुदा डागदरनीकँ धैनवाद देलिऐ? कुलानन्द- की कहब यौ। हमरा तँ सबिताक सोझहोमे जाइत लाज होइत अछि। हमर बेटा ओकरा मारि-पीट कऽ सकूलसँ भगा देने रहै। तइ कारणे ओकरा गामसँ बाहर रहि पढ़ए पड़लै। वएह आइ हमरा बेटाक जान बँचौलकै। ओइ दिन मास्टर साहैब हमरा उपराग देबाक लेल गेल रहै। मुदा हमहूँ किछो नै केलिऐ। उनटे मास्टर साहैबकेँ डपटि कऽ भगा देलिऐ। हम दुष्ट लोक छी। (आँखिमे नोर आबि जाइत अछि।) ग्रामीण दू- दुखित नै होउ। अपसोच नै करू। कुलानन्द- अपसोच तँ हेबाक चाही। गलतीकेँ स्वीकार करबाक चाही। अहूँ सुनि लिअ- समाजक धिया-पुता पढ़ैत-लिखैत हो वा कोनो नीक काज करैत हो तँ ओकरा सभकेँ सहयोग करबाक चाही। कोनो सुआरथक गप नै सोचबाक चाही। ग्रामीण एक- सबिता हरिचरणक बेटी नै अछि। समूचा समाजक बेटी अछि। अपना गामक डंका शहरमे बजा रहल अछि। (सबिताक संगे भोगेन्दर प्रवेश करैत अछि। भोगेन्दर मुड़ी झूकौने अछि।) सबिता- आब अहाँसभ गाम जा सकै छी। (भोगेन्दर दिस इशारा करैत) हिनकर स्थिति गाम जेबाक योग्य भऽ गेल छन्हि। बीमारी कन्ट्रोलमे अछि। मुदा ठीक समैपर दवाइ दैत रहबनि आ पुन: आबि कऽ चेक करबा लेब। ग्रामीण एक- (हाथ जोड़ैत) अहाँ धन्य छी- सबिताजी। सबिता- (ग्रामीणकेँ प्रणाम करैत) अहाँ सभ हमरा असीरवाद दिअ जे अहिना हम अहाँ सबहक सेवा करैत रही। ग्रामीण एक- चलै चलू। (कुलानन्द संगे ग्रामीण सभ हाथ जोड़ने विदा भऽ जाइत अछि। भोगेन्दर ठाढ़े रहि जाइत अछि। सबिता लगमे अबैत अछि।) सबिता- हमर देल किरिया-सप्पत मन राखब। कहियो दारू-शराब नै पीअब आ ने हाथसँ छूअब। दवाइ टेमपर खाइत रहब। (भोगेन्दरक आँखि नोरा जाइत अछि। नोराएल आँखिकेँ पोछए लगैत अछि।) भोगेन्दर- हम अपराधी छी। हमरा गलतीकेँ माफ कऽ दिअ। (हाथ जोड़ैत विदा भऽ जाइत अछि।) पटाक्षेप। डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”, ग्राम – रुचौल, पो॰ – मकरमपुर, जिला – दरभंगा, पिन – ८४७२३४ गामक शकल सूरत – पोथी समीक्षा “गामक जिनगीक” बाद “गामक शकल सूरत” .......... नञि ....... नञि ....... तकर बाद नञि, तकर बहुते बाद । पर जे हो, गामक परिवेश आ गामक विषय वस्तु तँऽ अछिए। बदलल की ? ....... बदलल बस कथावस्तु वा सम्पुर्ण कथा । हमरासभक लेल जे एक गोट मामूली दैनन्दिनक घटना थिक से एक गोट सुविज्ञ लेखकक लेल कथा - पिहानीक विषय वस्तु । आ सएह योग्यता श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक लेखनी मे छन्हि । लेखकक एहि लघुकथा संग्रहमे हुनिका द्वारा रचित ८ गोट लघुकथा संकलित अछि । कथासभक परिवेश पोथीक नामानुरूपेँ अवश्य ग्रामिण अछि पर पढ़बाक लाभ हरेक पाठकवर्गक लोक उठाए सकैत छथि । परिवेश ग्रामिण रहितहुँ कथावस्तु अत्यन्त सम-सामयिक अछि । जे पाठकवृन्द गामहिमे रहैत छथि हुनिका लेल तँऽ ई रोजक गप्प पर जे बाहरो रहैत छथि आ कहियो-कहियो गाम अबैत छथि हुनिका सेहो एहि कथाक प्रसंगसभसँ जिनगीमे जरूर साक्षात्कार भेल होएतन्हि । साहित्यमे कएक बेर जिनगीक कटु सत्यक चित्रण प्रत्यक्ष व्यक्ति विशेषकेँ पात्र बना कऽ नञि कएल जाइत अछि अपितु ओहि पात्र विशेषसँ मिलैत जुलैत गुणबला आन सांसारिक वस्तुसभकेँ पात्र बना कहाओल जाइत अछि । साहित्यमे ई विधा बहुत पुराण अछि पर मैथिलीमे एहि विधाक उपयोग अत्यल्प भेल अछि । एहि विधाक उपयोगसँ कथाक विषय वस्तुक रोचकता बढ़ैत अछि, कथामे उल्लिखित कोनहु अप्रिय प्रसंग कोनहु विशेष पाठकवर्ग दिशि प्रक्षेपित नञि बुझाइत अछि आ कथा सुग्राह्य भऽ जाइत अछि । एतबहि नञि तखनि कथाक विषय बस्तु हर-पाठकवर्गकेँ अपनासँ मिलैत-जुलैत बुझना पड़ैत छन्हि आ तेँ कृति सर्वपाठकग्राह्य बनि जाइत अछि । वास्तवमे एहि तरहक प्रस्तुति एकटा कला थिक जे हर लेखकमे नञि विकसित होइछ । वास्तवमे, एहि तरहक प्रस्तुति अप्पन सभ बात पाठकक सोझाँ राखि जाइत अछि आ साहित्यक मर्यादा सेहो बनल रहैत अछि । एहने प्रयोग एहि बेर पाठकलोकनिकेँ श्री मण्डलजीक कलमसँ देखबाक लेल भेंटत; यथा :- रीशसँ रीशिया ठकुआ बाजल - “केतबो बानर जकाँ नांगरि पटैक कऽ रहि गेलेँ, कहाँ एको धूर जमीन-जत्था अपनो पएर रोपैले भेलौ; जहिना बाप-दादा गुड़कैत एलौ तहिना गुड़कैत रहमेँ।” ....................... फेर ठोर पटपटबैत भुसवा बाजल - “कहू ! जे आगूक जनमल ठकुआ छी, तखन केहेन कड़ुआएल बात छै जे जहिना सभ दिन गुड़कैत रहलेँ तहिना गुड़कैत रहमेँ । हमरा जेकाँ की तोरा आसन बासन हेतौ ?” छठि पावनिक डालाक विभिन्न बस्तु सभकेँ पात्र बना बहुत सुन्नर रूपसँ अपना समाजक एहि तरहक प्रसंगकेँ चित्रित कएल गेल अछि । एहि तरहक प्रसंग कोनहु वर्गविशेषक नञि अपितु अपना समाजक हरेक वर्गक पिहानी अछि । किछ-किछु एहने प्रयोग संस्कृत साहित्यक पञ्चतन्त्र, हितोपदेश, सिंहासन बत्तिसी आ वैताल पच्चीसी आदिमे देखबामे आबैछ; हलाँकि ई बात अलग जे ओ सभ प्रायः बाल साहित्यक रूपमे लीखल गेल अछि । कतहु शिवचरण बाबू आ कालीचरण बाबूक यारी भेटत तँऽ कतहु भैयारी हक फरिछबैत सदानन कक्काक संग मनमोही काकी भेटतीह । कहुखन पोताक संग जितिया पावनिक करैत जीतलाल बाबा भेटताह तँऽ कहुखन अपन पुर्वकृत्य पर पश्चाताप करैत देवानन्द भेटताह । आ बीचमे चटकार लैत भेटताह सोने कक्का आ सुचितलाल। “काका, अहाँ ते तेहेन शिकारी जेकाँ बजलौं जे बुइझे ने पेलौं जे खिखिरक बोली देलिऐ कि हरिणक आकि कोइलीक। …………….. बौआ, तोहूँ कोनो आन थोड़े छह, समाजेक ने बेटा-भातिज छिअ । जेहने अपन बेटा-भातिज तेहने समाजक। बतीस दाँतक तरमे पड़ल छी, तँए जी-जाँति कऽ रखने छी । मुड़ी सुढ़िया कऽ बजैमे उकड़ू होइए । मुदा ऐठाम दुइए गोरे छह तँए जी खोलि बाजब ।” “गाम” - ई शब्द प्रायः हर नऽव पीढ़ीक लेल एकटा सुन्नर, शान्त आ उन्मुक्त सनि स्थान होइत अछि । हर पुरान पीढ़ी किछु बयस बीतलाक बात कहैत अछि जे गाम आब ओहेन नञि रहल (जेहेन ओ अपन नेनपनमे देखने रहथि) - गाम बदलि गेल अछि। एहि तरहक विचारभिन्नताक प्रक्रिया निरन्तर चलैत रहल अछि आ चलैत रहत; पर गाम तँऽ गामहि थिक । अन्तर अछि मात्र दृष्टिकोण (VIEW / ANGLE OF PERCEPTION / REFERENCE FRAME) केर - गाम तँऽ गामहि अछि । कतबहु बदलैत अछि तइयो हर पीढ़ीविशेषक लेल गाम ओ शहरक अन्तर ओतबहि अछि, हर व्यक्तिविशेषक नेनपन ओ वयस्क वा वृद्धावस्थाक लेल गामक परिवर्तन ओतबहि अछि आ से नियत (CONSTANT) अछि । नेना - भुटकाक आँखिमे बसल गामक चित्र अनुभवक आगिमे पाकल वयस्कक चित्रसँ प्रायः हमेशा भिन्न होइत अछि आ होइत रहत । ओकर बनाओल चित्रकेँ बुझबाक हेतु ओकरहि भावक संसारमे डुम्मी काटए पड़त । तेँ मास्टर साहेब (मास्सैव - श्यामलाल) गिरधरक बनाओल समाजक चित्रकेँ नञि बुझि पाबैत छथि जखनिकि सुबललाल ओकर अर्थ पढ़ि लैत छथि । मास्टर साहेब अनुभवक चश्मासँ चित्रकेँ देखबाक प्रयत्न करैत छथि। जखनिकि सुबललाल पोताक (गिरधरक) बालस्वभावमे उतरि चित्रक अर्थ पढ़ैत छथि - “मास्सैव, केहेन बढ़ियाँ तँ सचित्र बनले अछि तखनि विचित्र की ? ……………… पहाड़, समुद्र धरती, पताल, अकास सभ मिलि जे एकटा विराट सूरत बनल अछि, सएह तँऽ अछि। …………………. ई समुद्र भेल, समाजरुपी समुद्र । अथाह जलराशिक भण्डार । अहूमे जुआर उठै छै, जे हवा, पानिकेँ अपना पेटसँ निकालि अकासमे पसारैए, बर्खाक संग तूफानो उठै छै । जइसँ पानि, हवासँ धरती भरि जाइ छै । आगूक बात सुबललालक पेटमे रहनि आकि बिच्चेमे श्यामलाल बाबू दोसर रेखा पर आँगुर रखैत बजलाह - ई ? ई धार भेल । जेकरा जीवनो-धार कहि सकै छिऐ, जे वैदिक धार कहियो कल-कल हँसैत, प्रवाहित होइ छल ओ आब मरण भऽ गेल । तँए पानिक जगह बालु उड़ैए ।” हर प्रसंगक प्रायः एकाधिक पक्ष होइत अछि । किछु पक्ष नीको होइत अछि आ किछु अधलाहो । कएक बेर कोनहु प्रसंगक पक्ष व्यक्तिगत दृष्टिकोण पर निर्भर करैत अछि । जे जाहि दृष्टिकोणसँ देखैत अछि ओहि प्रसंगक पक्ष ओकरा ओहने नीक वा अधलाह बुझि पड़ैत अछि । प्रवास एकटा एहने प्रसंग थिक । प्रवास जे कि एक समय मिथिलासँ बाहर जायब आ तकर बाद देशसँ बाहर जायब केर अर्थ रखैत अछि । प्रवासकेँ — खास कऽ विदेशमे रहबाक प्रवासकेँ — मैथिली साहित्य हमेशा किछु तेसरे दृष्टि वा अधलाहे दृष्टिसँ देखलक अछि । किछु एहने सनि पिहानीक मजा भेटत मनोहर कक्का आ श्यामक संग । हाँ, संगमे सजमनि, कदीमा, रामझिमनी, झिमनी, करैल, पालक, ठरिया — आ पता नञि आओर की-की भेटत । आ अन्तमे भेटत “बौआ, कियो केतौ रहह मुदा रहत एही दुनियाँमे । जीब-मरब, अही दू शब्दमे दुनियाँ रचल-बसल अछि । .............................. बड़ बढ़ियाँ बड़ीटा दुनियाँ छै, जेतए मन फूड़ऽ तेतए रहऽ । धारक बीच जिनगी अछि तँए ओतए जा अपन धाराकेँ नञि तोड़ब । विदेशक चर्च भेल तँऽ किछु बात हमरहु याद आयल। इङ्गलैण्डक अंग्रेजीमे (BRITISH ENGLISH) मुंगेर, रंग, बाघ, श्वेत रक्त कोशिका / कण, रक्त वर्णक आदिक लेल प्रयुक्त शब्दक स्पेलिङ्ग क्रमशः MONGHYER, COLOUR, TIGRE, LEUCOCYTE, HAEMOGLOBIN लिखल जाइत छल आ एखनहु लीखल जाइत अछि । ई सामान्य अंग्रेजी जननिहारक लेल किछु कठिनाह छल । तेँ अमेरिकामे एकर सरलीकरणक प्रयास कएल गेल । उपरोक्त शब्दसभ अमेरिकी अंग्रेजीमे (AMERICAN / SAM ENGLISH) क्रमशः - MUNGER, COLOR, TIGER, LEUKOCYTE , HEMOGLOBIN - एहि प्रकारेँ लिखल जाए लागल । एहि प्रकारक स्पेलिङ्ग सर्वसामान्य द्वारा कएल जा रहल उच्चारणक बेस नजदीक छल आ तेँ सुग्राह्य सेहो । प्रारम्भमे अंग्रेजीक विद्वान ओ साहित्यकार लोकनिक दिशिसँ एहि प्रयासकेँ अतिशय दमण ओ असहयोगक सामना करए पड़ल । एहि नऽव लेखनशैलीकेँ साहित्यिक मञ्चसभ पर हीन दृष्टिसँ देखल जाइत छल । बादमे दुहु देशक सरकार दिशिसँ समन्वयक प्रयास भेल । अंग्रेजी साहित्यक विभिन्न देशक नियामक संस्थासभक बैसार भेल आ निर्णय लेल गेल जे दुहु प्रकारक अंग्रेजी लेखनशैलीक मान्यता एक समान होयत तथा कोनहु लेखन शैलीकेँ आगाँसँ उत्कृष्ट वा कनिष्ठ नञि कहल जाएत । आइ दुहु लेखनशैली समान रूपेँ प्रतिष्ठित अछि । दुहु लेखन-पद्धति प्रचलनमे अछि पर नऽव शैली उच्चारणानुरूप होयबाक कारण बेसी सुविधाजनक अछि आ ग्रेट-ब्रिटेन छाड़ि विश्व भरिमे तेजीसँ पसरि चुकल अछि । मुख्य विषयसँ थोड़ेक कात-करओट भागि गेलहुँ, पर भोतिआएल नञि छी, कात-करओट भागब सर्वथा आवश्यक बुझना गेल तेँ गेलहुँ । जहिना अंग्रेजीक नऽव शैली छल तहिना मैथिलीमे सेहो नऽव शैली स्वतः आयल जे उच्चारणानुरूप लीखल जाइत अछि। मैथिलीक एहि नऽव शैलीक अन्तर्गत बहुत रास नऽव रचनाकार (अपन रचनाकालक अनुसार नऽव नञि कि वयसक अनुसार) आबैत छथि, जाहिमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी सेहो छथि । अंग्रेजी जेकाँ मैथिलीमे कोनहु उच्च सर्वमान्य नियामक संस्था नञि होयबाक कारणेँ बहुधा एहि नऽव लेखन-शैलीकेँ हीन बुझल जाइत अछि जे कि हमरा नजरिमे सर्वथा अनर्गल थिक । मैथिली साहित्यिक संस्थासभकेँ अंग्रेजी जेकाँ समन्वयात्मक रस्ता अपनेबाक चाही । मैथिलीक प्राचीन आ नऽव दुनु शैली समान रूपेँ प्रतिष्ठित होयबाक चाही । रचनाक स्तरीयता देखल जयबाक चाही नञि कि शैलीक आधार पर स्तर गढ़ल जयबाक चाही । मैथिलीक नऽव लेखन पद्धति - जे कि उच्चारणानुरूप अछि - ताहिमे रचना होयबाक कारणेँ सामान्य वा सामान्यसँ कम मैथिलि जननिहारकेँ सेहो कोनहु असुविधा नञि होयतन्हि । “गामक शकल सूरत” नामक एहि लघुकथा संग्रहमे सर्वत्र सरल मैथिलीक प्रयोग भेल अछि । यथा - पावनि केर बदला पावैन, पएने केर बदला पेने, कहलन्हि केर बदला कहलैन, बजलहुँ केर स्थान पर बजलौं,फोलब केर स्थान पर खोलब, जिउब केर स्थान पर जीब, आदि । एहि प्रकारेँ ई लघुकथा संग्रह अपन कथावस्तु आ लेखनशैलीक बल पर पाठकलोकनिक बीच अपन उत्कृष्ट स्थान सुनिश्चित करत से आशा , बाकी पाठकवृन्द पढ़लाक बादे बतओताह। पोथीक नाँव – गामक शकल सूरत, लेखक – श्री जगदीश प्रसाद मण्डल प्रकाशक – श्रीमति प्रेमकला देवी, ग्राम व पो॰-बेरमा (मधुबनी) प्राप्ति स्थान - पल्लवी डिस्ट्रिब्युटर, वार्ड नं॰-06, निर्मली (सुपौल), पिन कोड - 847452 दाम (अजिल्द / साधारण संस्करण) - भारतीय रु॰ 151/ मात्र राजदेव मण्डल ‘रमण’ दियादी डाह कातिक मासक साँझक समए। जाड़क पहिल दस्तक, पछवा हवाक संग भेल। बटेसर बाबू अस्सी बर्खक उमेरक अनुभवक हिसावसँ बजला- “हौ चलितर, घूर लगलह?” चलितर हँ-मे-हँ मिलबैत बाजल- “मालिक! घूर तँ भरिगर भेल।” चलितरक बाजक वीराम लगिते मलिकाइन एकटा स्टीलक थाड़ीमे दू गिलास चाह धमकली- “लिअ, चाह पीबू।” मालिक चाहक गिलास दिस ठेकनबैत हाथो बढ़बथि आ गामवालीक मुहोँ दिस तकबो करथि। भेलनि जे जेना किछु अरहौती अरहेतनि। अनदाजैत बुदबुदेलथि- “पहिने असथिर मने चाह पीब तखनि किछु गपो हेतै।” चाहक चिस्की लैत चलितर दिस ताकि बजला- “चाह पीब लएह चलितर।” “थम्हू, पहिले हाथ-पएर धूअ दिअ गोंत-गोबर लागल अछि।” कहि चलितर दुआरिपर गारल कल दिस बढ़ल। इमहर पत्नी दिस तकैत बटेसर हाथक इशारा दैत पुछलखिन- “बाजू की कहऽ चाहै छी?” “की कहब कनियाँके अपन जान नै छन्हि। कहुना-कहुना कऽ अपनो निमरजाना करै छथि। नहि जानि कखनि की हेतै। तेहेन-तेहेन आब धानो रोपाइत अछि जे अगहन तँ अाब कातिके भऽ जाइए। अगहनसँ पहिने धनकटनी भऽ जाइए, मनसम्फे उबजबो करैए! गरीब की गरीब रहल! तकनौं ने कियो एकटा खढ़ो हटबैले भेटैए...!” बटेसर बाबू बिच्चेमे टोकलखिन- “की कहक अछि से खोलि कऽ कहू।” “की कहब राति-विराति जँ किछु भऽ जेतै तँ की करब? अन्हराठाढ़ीक होसपिटलमे सुनै छिऐ नीक बेवस्था छै।” कहि मलिकाइन आँगन दिस विदा भेली। “चलितर, कनी लगमे आबह। सन्तोसो हएत आ किछु विचारबो करब। लग आबह।” चलितर लग आबि चौकीक पौआ लग बैसि गेल। बटेसर बाबू बजला- “अँइ हौ चलितर, कोन जुग भऽ गेल जे बिना डागडरसँ देखौने कोनो काजे ने चलत! चारिटा बेटा आ चारिटा बेटी भगवान देलनि। कहियो पाइयो भरिक दवाइ आनैक जरूरत नै पड़ल। पल्हनिकेँ बजाबै छेलौं आ ओ असगरे आबि घरवारीकेँ निश्चिन्त कऽ दइ छल। सिदहा, परसौतीक फेड़ल साड़ी आ छठिहार दिन एकटा नव नुआँ देने पल्हैनीसँ फारकतियो भऽ जाइ छेलौं। पल्हैनीआंे अपन काज बूझि महिना भरि नेनाक तेल लगबैसँ दूध पिअबैमे लगल रहै छलि...।” बटेसर बाबू बाजैत-बजैत बिच्चेमे जेना ठमैक गेला। ठमकल देखि चलितर बूझलक जे मािलक बड़ चिन्तित छथि, बाजल- “से की करबै मािलक। जेना-जेना जुग बददलै तेहने-तेहने परियोजनि एलै। आबक समैमे की देवतो-गोसाँइकेँ सतिया रहल। मखना भायकेँ देखियौ, वेचाराकेँ जौआँ बेटा भगवान देलखिन। जनमक समए अहिना धड़फड़ी भेल। गामेक डाकटर बजौल गेल मुदा कोनो जोगाड़े ने धरै, आकि तखने किम्हरौसँ खराम खटखटबैत बुधनबाबा पहुँचला, परसौतीक कुहरब सुनिते एकटा जड़ी देलखिन आ लगले दसे-पाँच मिनटेमे फलित भऽ गेल।” “से तँ हमरा अपने बितल अछि। जेठ बौआक जन्म-समए कि कम फिदरति भेल। मलिकाइनकेँ लूक-झूक साँझ पड़िते दरद उखड़लनि, तहिया तोहर हमरा ऐठाम आएब-जाएब कम रहऽ, हथिया-झटक चलि रहल छेलै। मोतीलाल, रामकिसुन, गढ़बा तीनू गोटे मेघडम्बर, फराठी आ चोरबत्ती नेने मधु डाक्टरकेँ बजा अनलक। डाक्टर उपचारमे लगि गेला। भोरबामे मिहिरक जनम भेल।” बटेसर बजबो करथि आ आँगनो दिस देखि-देखि साकांचो रहथि। तखने मलिकाइन डेढ़ियापर आबि टोकलकनि- “गपक खण्ड नै लागल? अखनि तक फदकिते छी। कोनो फिकिरो अछि की नै से नइ जान्हि।” “की हालत छन्हि कनियाँक? बाजू ने डाक्टर मंगाबी आकि होसपिटल चलबाक ओरियौन करी।” “हम की बाजब। हम सभ तँ मौगी-मेहरि छी जेना जे नीक होइ से करू, अनेरे अनठाएब ठीक नै।” कहैत मलिकाइन आँगन गेली। “चलितर, कनी जा झट दे राजिन्दरकेँ बजा लाबह। कहियनु मालिक बजौलनि, संगे लागल औता।” चलितरकेँ कहि बटेसर आँगनक सुढ़ि-पता बुझैले हवाइ चप्पल सोझराबए लगला। चप्पल पहिरिते छला आकि आँगनसँ कुहरब आ पल्हनिक बाजब संगे बुझि पड़लनि, अकानए लगला। तखने पल्हनि बाजलि- “हमर शक जेते छल ओ केलौं, आब असपतालक आश करू, आ घरोक गोसाँइ-पितरक अरदास लगाउ।” “डीहवार बाबा की जाय! हे कलिया महरानी ओझरी छोड़ाउ। जोड़ा भरि छागरोक बलि चढ़ाएब।” मलिकाइन मने-मन जेते देवता जेहेन सहजोर स्मृतिक हिसावे कबुला करैत बजली। ताबए चलितर संग लागल राजिन्दर हथबत्ती बाड़ैत पहुँचल। “बड़का कका, बड़का काका। की बात बाजू?” “राजिन्दर...। मिहिर गाम नै एला लगैए कोनो अपनासँ पैघ हाकिमक अढ़ौतीमे बाझल छथि। नोकरी तँ नोकरीए छी किने। ‘परअधिन सपनो सुख नाही’ तुलसीदास कोनो बेजा थोड़े कहने छथिन।” “कनियाँके मास पुरल छन्हि आ अखन दरदसँ हाल बेहाल छन्हि। बजौलियऽ की करक चाही, डाक्टर बजाबी आकि होसपिटल चल?” “काका, थम्हूँ पहिले चारिचक्का बोलेरो गाममे गामेमे सोमन भाइकेँ छन्हि बजा लइ छी, होसपिटले गेनाइ नीक रहत। ओइठाम सभ इन्तजामो-बात आ परसौतीले टको-पैसा भेटत।” राजिन्दर बजबो करए आ फौनो मिलबए। लगैए फौन मिल गेलै बाजल- “हँ! कनी फुर्तीमे।” फोन काटि कऽ पुन: बाजल- “काका, चीस-वौस दरबज्जापर आनैक उपक्रम करू।” मालिक-बटेसर लगले सूरे बजला- “गामवाली आब फुरती करू, ओछाैन-बिछौन, ओढ़ना, खेबा-खर्चा, सिदहा-समर सभ किछु ठेकना लिअ। गाड़ी आबि गेल।” बटेसर घरवाली दिस बजथि आ मलिकाइन बटेसरक दिस चाहक जिज्ञासा केलखिन। मुदा बटेसर मना करैत बजला- “नै। आब जे किछु करब से अन्धरेमे करब।” एमहर राजिन्दर आ चलितर चीज-वौसकेँ सम्हारि-सम्हारि आँगनसँ आनि-आनि दरबज्जापर रखैत रहए। गाड़ीओ आबि गेल। सभ समान डिक्कीमे लदलक। ताबे पल्हनि आ पड़ोसिनी सभ कनियाँकेँ गाड़ीक सीटपर आनि सुतौलनि। डरेवर सेहो अपन सीट पकड़ि गाड़ी खोलकक। सिटी बजा सभकेँ तैयार हेबाक आग्रह केलक। मौगी-मरद, ढेरबा- धिया-पुताक भीड़ दू दिस भेल। बीचसँ गाड़ी निकलैत रहै कि अगिला सीटसँ बटेसर मुड़ी निकालि इशारासँ चलितरकेँ किछु कहलखिन। चलितरो बसाहा जकाँ मुड़ी हिला मालिककेँ भरोस दैत बाजल- “जय दाहो-लछन बाबा, जय रकतमाला माए, जनिहऽ तूँ मालिककेँ मदति करिहनु...।” बोलेरो गर्दा उड़बैत अन्धराठाढ़ीक असपतालक डगर पकड़लक। बेलेरोक छोड़ल धुआँ आ गर्दाक मिलल गन्ध धिया-पुताक संग ढेरबोकेँ सोहनगर लगलै। बिहान भने अन्हरगरे साइकिल घण्टी टनटनबैत दुआरे-दुआर अखबार बँटैत गामक चौकपर पहुँचल। चाहो पीबैत आ चौक परहक दोकानदारकेँ अखबारो दैत अखबारबला। एकटा अखबार लऽ प्रमोद मधुबनीबला पन्ना उनटौलक। “प्रखण्ड विकास पदाधिकारी मिहिर कुमार गिरफ्तार।” कनी ऊँचे स्वरमे पढ़लक। ई खबर पढ़ि एकबेर अपन चकित आँखिए दोकानपर बैसल सभ दिस तकैत बाजल। चाह पीनिहार सबहक जिज्ञासा बढ़ल। सबहक नजरि प्रमोदक चेहराक बनैत-बिगड़ैत आकृति जकाँ बनए-बिगड़ए लगल। चाहबला श्रीप्रसादक धियान अखनि धरि सरपोख अखबारक खबरि दिस नै रहनि। ओ तँ सदिखन एतबे रामा-खटोलबा देखैत अपन जिनगी काटए। गहिंकीओ रंग-बिरंगक अछि। के केमहर जाएत चाह पीब-पीब तेकर कोनो ठीक नै तँए तइपर धियान देने। मुदा तैयो ठेकनबैत श्रीप्रसाद पुछलक- “की भेलै परमोद? कनी बुझा कऽ कहू। एना किए अखबार देखिते सभ गुम भऽ गेलौं।” “श्रीप्रसाद भाय, बटेसर बाबूक बेटा मिहिर पकड़ा गेला।” “आहिरेबा! हौ प्रमोद, मालिकक दिने गड़बड़ाएल छन्हि। एमहर पुतोहुकेँ लऽ दुनू परानी होसपिटलमे छथि आ ओमहर बेटा जहल गेलनि। गोसाैंया सभटा फेड़ीए-पर-फेड़ी दइ छन्हि।” नमहर साँस छोड़ैत श्रीप्रसाद बाजल। बिच्चेमे एकगोरे टिपलक- “जमानाक खियाल नै करब तँ अहिना ने हएत। आब कि कोनो ओ जमाना रहल कंगरेशियाक आब तँ बदलल।” राजेन्द्र कुमार प्रधान, जन्म- 03/09/1970, पिता स्व. बैद्यनाथ प्रधान, गाम- मरूकिया, पोस्ट अन्धड़ाठाढ़ी, जिला-मधुबनी।पिन- 847401 योग्यता- एम.ए. पटना विश्वविद्यालय, पटनाशोधरत्त (पीएच.डी) ल.ना.मि.वि.वि. दरभंगा, अन्य योग्यता- संगीत गायणमे जेड.एल. कम्युनिकेशन द्वारा आयोजित ऑल बिहार फिल्म संगीत प्रतियोगितामे प्रथम स्थान प्राप्त। रिसर्च स्कॉलर (शोध प्रज्ञ), ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय- दरभंगा। जगदीश प्रसाद मण्डलक उपन्यासमे समकालीन चेतना मैथिली साहित्यक पहिल तथा एकमात्र पुरस्कार “टैगौर साहित्य पुरस्कार”सँ पुरस्कृत एवं विदेह भाषा सम्मानसँ सम्मानित श्री जगदीश प्रसाद मण्डल अपना सबहक बीच एक ओहन साहित्यकार छथि, जिनकर किछुए दिनमे बहुत रास रचना मैथिली साहित्याकाशमे अपन स्थान बना लेलक अछि। प्राय: २००४ इस्वीक बाद लिखब शुरू केलनि आ प्रकाशित हुअ लगलनि २००७ इस्वीक पछातिसँ। २००९ इस्वीमे आठ गोट पोथी प्रकाशित भेलनि। यथा- गामक जिनगी- कथा संग्रह, तरेगन- विहनि कथा संग्रह, मिथिलाक बेटी- नाटक तथा पाँच गोट उपन्यास यथा- मौलाइल गाछक फूल, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत, जीवन-मरण आ जीवन-संघर्ष। पछाति २०१२-सँ-२०१४ इस्वीक मध्य विभिन्न विधाक दू दर्जनसँ ऊपर पोथी प्रकाशमे एलनि। यथा- अर्द्धांगिनी, सतभैंया पोखरि, उलबा चाउर, भकमोड़, पतझार, अप्पन-बीरान, बाल गोपाल, रटनी खढ़, लजबिजी, गामक शकल-सूरत, शंभुदास आ बजन्ता-बुझन्ता, कथा संग्रह। सतमाए, कल्याणी, समझौता, तामक तमघैल, बीरांगना, कम्प्रोमाइज, झमेलिया बिआह, रत्नाकर डकैत तथा स्वयंवर- नाटक एवं एकांकी। इंद्रधनुषी अकास, राति-दिन, सतबेध, गीतांजलि, तीन जेठ एगारहम माघ, सरिता आ सुखाएल पोखरिक जाइठ गीत एवं कविता संग्रह। तहिना, सधबा-विधवा, भादवक आठ अन्हार, नै धाड़ैए तथा बड़की बहिन नामक उपन्यास सेहो लिखिलनि अछि। आ अनवरत लिखिओ रहल छथि। हमरा एतए मण्डलजी केर “साहित्यमे समकालीन बोध” विषयक आलेख प्रस्तुत करब अछि। एहि प्रसंग हम ई छूट लेमए चाहै छी जे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक तँ अनेक उपन्यास छन्हि, कथा छन्हि, नाटक छन्हि, कविता छन्हि, गीत छन्हि...। मुदा हम “बड़की बहिन” उपन्यासपर केन्द्रित एहि आलेखक इतिश्री करब। अर्थात् “जगदीश प्रसाद मण्डलक बड़की बहिन उपन्यासमे समकालीन चेतना”,पर ई आलेख अपने सबहक सोझा प्रस्तुत कए रहल छी। समकालीन शब्दक बेस व्यापक अर्थ-परिधि अछि। एहि शब्दक प्रयोग प्राय: तात्कालिक वर्तमान लेल कएल जाइत अछि। एक तरहक निश्चित समए-खण्डक लेल सेहो कएल जाइत अछि। से बितलोहो आ चलितो परिपेक्ष्यमे। बितलाहासँ तात्पर्य ई जे विद्यापतिक समकालीन फल्लाँ...। आ एकटा भेल आइ माने औझुका वर्तमान। औझको-वर्तमानमे सभ चीज लेल एक्के नजरिसँ समकालीक निर्णए करब कठिनाहे जकाँ अछि। बहुत एहनो व्यवहार अछि जे ज्योतिरीश्वरकालीन मिथिलामे व्याप्त छल जे आइयो यथावते अछि, खाली परिपेक्ष्यमे फेर-बदल भेल अछि। खैर जे से...। नारी-समस्यापर, नारी विमर्श करैत एक ओहन उपन्यासक नाओं बड़की बहिन छी जे हमरा सभकेँ एकर कथा वस्तु चौंका दइए, आत्म मण्थन हेतु विवश कऽ दइए, संगे ओहन चेतनामुलक अछि जे कोनो काज करैसँ पूर्व आकि कोनो काजक लेल डेग उठबैसँ पहिने ओइ काजक दिशापर सोचैले प्रेरित करैए। कारण एहि भाग-दौड़क आपा-धापीमे हम सभ बहुत ओहन परिपेक्ष्यकेँ बुझिओ ने पबै छी जे एकर काल्हि की हेतै...। हलाँकी तइ पाछू कएटा ओहन बिन्दु अछि जइ दिससँ हम सभ मुँह घुमा लेने छी। उपन्यासकार हमरा सभ लेल किछु एहने परिपेक्ष्यकेँ बड़की बहिन उपन्यासक मध्यमसँ सुलोचना बहिनक जिनगीक कथा परोसलनि अछि, जे समकालीक अछि, यथार्थ अछि आ समकालीन समस्यासँ एवं बोधसँ ओतप्रोत् अछि। मिथिलाक एकटा ओहन गाम जे कोसी आ कमलाक बीचक अछि, जइ गामक सुलोचना बहिन छथि। माने ओ गाम सुलोचना बहिनक जन्मभूमि छियनि। चौदह बर्खक अवस्थामे सुलोचनाक बिआह भेलनि। जहिना पिताक साधारण किसान परिवार रहनि तेहने परिवारमे बिआहो भेलनि। समाजमे अखन धरि धन नहि कुले-मूलक महत अधिक रहल मुदा लेनो-देन तँ चलिते छल। नीक-मूलक कन्याक मांगो बेसी। ओना अपन-पिताक कुल-मूलसँ दब परिवारमे बिआह भेलनि, मुदा कोनो हिनके टा नै, समाजमे कतेको गोटेकेँ भेल छन्हि आ होइतो अछि। तँए कोनो प्रश्ने नहि उठल। सरस्वतीक आगमनसँ नैहरक परिवारक विचारमे किछु नवीनता तँ आबिए गेल छल। बिआहक तीन साल पछाति सुलोचनाक दुरागमन भेल, सासुर गेली। बरख-पाँचे-छबेक पछाति सासुरसँ सुलाचनाकेँ भगा देलकनि। भगबैक कारण रहै जे सन्तान नहि भेलनि। ओना ने कहियो डाक्टरी जाँच करौल गेलनि आ ने सन्तान नहि हेबाक दोष किनकामे छन्हि, से फड़िछौल गेल। सासुरसँ भगौल सुलोचनाकेँ परिवार सहर्ष अपना लेलनि। अपनबैक कारण भेल जे परिवारक सभ अपने गल्ती मानि लेलनि जे ओहन कुल-मूलमे डेगे नहि उठबैक चाही। ओहनसँ मुहोँ लगाएब नीक नहि हएत। सरस्वतीक रूप परिवारमे बदलल। संस्कृत पद्धतिक जगह नव-नव पद्धति शुरू भेल। संस्कृतोक पद्धति रहबे कएल। मुदा शिक्षाकेँ बुनियादी पद्धतिसँ उछालि देलक। सुलोचनाक पीठ परहक जेठ भाय जुगेसर मैट्रिक पास तमुरिया स्कूलसँ केलनि। गरीबी-बेकारीसँ त्रस्त परिवार। पछाति जुगेसर टीचर्स ट्रेनिंग केलनि। लोअर प्राइमरीक शिक्षक बनला। तहिना जुगेसरसँ छोट मुनेसर सेहो मैट्रिक पास तमुरिया स्कूलसँ केलनि। आगू पढ़ैक गर लगबए लगला, खगड़ियाक गर लगलनि। ओइ ठामक संस्कृत विद्यालयमे विद्यार्थीकेँ भोजन-डेराक व्यवस्था सेहो करैए। कोसी कौलेज सेहो छइहे। साइंसक विद्यार्थी मुनेसर, नीक जकाँ बीएस-सी केलनि तैबीच बिआहो अफसरक परिवारमे भऽ गेलनि। दुरागमनक किछुए-दिन पछाति मुनेसरक पत्नी साधना नैहर एली। अखन धरि पिता-श्यामानन्द बेटी-जमाएक घर-दुआर नहि देखने। बीएस-सी लड़का, शरीरसँ स्वस्थ सुनि बेटीक बिआह केलनि। नैहर आपसीक पछाति साधना जखन सासुरक सभ हाल माए-पिताकेँ कहलनि तखन पिताक मनमे जमाएक नोकरीक प्रश्न उठलनि। मुनेसरकेँ राँचीए बजा लेलनि। आ संगी-साथीक सहयोग लऽ मुनेसरकेँ स्कूलमे नौकरी धरा देलखिन। मुनेसरो नोकरी करए लगला। समए बितैत गेल। जुगेसर आठ कट्ठा जमीन कीनैक विचार केलनि। ओना दुनू परानीक विचार जे मुनेसरकेँ एहि जमीनमे संग नहि करब। मुदा परिवारक तँ विधिवत् बँटबारा भेल नहि छेलनि। तखन जेठ भाय छिऐ, छोट भाएक हिस्सा तँ भइए जाएत। तँए कहि देब जरूरी अछि। जँ अदहा खर्च देत तँ ठीके छै नहि तँ अपन दोख तँ मेटा लेब। विचारक पाछू पेटमे रहनि जे मुनेसरक आमदनी ततबे छै जे कहुना कऽ परिवार चलै छै। तखन रूपैआ केतए सँ आनत? तैबीच मनमे ईहो होन्हि जे गुप-चुप दाम भेल अछि किने, बढ़ा देबै। कहुना (अधिया दाम भेने) चारि कट्ठा तेफैसला (तीन फसिला) खेतक भैलू कम नहि भेल। पोस्ट कार्डक माध्यमसँ जुगेसर मुनेसरकेँ जनतब देलखिन। स्कूलक दरमाहा तँ जुगेसरकेँ बूझल, मुदा ट्यूशनक आमदनी तँ नहि बूझल। तैसंग पत्नीओ (मुनेसरक) विचार देलखिन जे नैहरमे देल बरतन-बासन जे अछि ओ अनेरे घरमे ढनमनाइत रहैए, ओकरा बेचि कऽ जमीन कीनि लिअ। अखन धरि दुनू भाँइ -जुगेसर-मुनेसरक- बीच पहिलुके सम्बन्ध जीवित छल। मुनेसर अदहा खर्च दइले तैयार भऽ गेला। अपन कमजोर पाशा देखि जुगेसर दुनू परानी विचार केलनि जे नीक हएत बेटा नाओंसँ जमीन लिखौल जाए। मुनेसरकेँ कोनो पता नहि। अनुकूल विचार बूझि जुगेसर अपना बेटाक नाओंसँ आठो कट्ठा जमीन लिखा लेलनि। जे पछाति दुनू भाँइक बीच विस्फोटक भऽ गेल। गामक समस्या (भाइक व्यवहार) दुनू परानी मुनेसरक सम्बन्धमे खाधि बनैत गेल। दुनू भाँइक भिनौजी सुलोचनाकेँ सेहो बाँटि देलकनि। मुदा झगड़ाक बीआ पहिने सुलोचना बहिन रोपि लेलनि। रोपि ई लेलनि जे खेत कीनला पछाति मुनेसर दिससँ बाजि देलखिन जे जखन दुनू भाँइ अदहा-अदहा खर्च दऽ खेत कीनलक तखन हिस्सा किए ने हेतै? अपना मुहेँ वेचारी एक भाँइसँ दूर आ दोसरसँ लग चलि एली! दुनू भाँइ-जुगेसर-मुनेसरक विवाद समाजक मंचपर सेहो आएल। जुगेसरक जे बेटा मारिमे केस केलनि ओ घटना कर्ताक संग समाजोक लोककेँ भँसा देलनि। केसकेँ ओइ गतिए बढ़ौलनि जे घटनाक परात भने चारि थाना गाममे आबि गेल। हरबिर्ड़ो गाममे भऽ गेल। दौड़ा-दौड़ी खेहारा-खेहारी जमि कऽ भेल। दू गोटे जहलो गेल। लगले बाँकी मुद्दालहक जब्ती-कुर्की भऽ गेल। जकर प्रतिक्रिया समाजमे जमि कऽ भेल। आगू चलि मुनेसर बेमार पड़ि गेला। छह मास आराम करैले डाक्टर सलाह देलकनि। जीवन-मुत्युक बीच पड़ल मुनेसरक मन छँहोछित भऽ गेलनि। एक दिस अपन अगिला जिनगी हरिअर बूझि पड़नि, अपन कमाइक संग दुनू बेटाक कमाइ देखि तँ दोसर दिस अपन स्थिति देखथि जे अपन सेवा केना हएत? पत्नीओ पत्नीए छथि। अकास उड़ैत चिड़ै जकाँ। कमा कऽ हाथमे दियनु, हुकुम पुरबियनु तँ बड़बढ़ियाँ नहि तँ अपनाकेँ कपरजरूआक पत्नी कहि डाकनि देती। अपन शेष नोकरी आ पेन्शनक आशा पत्नीकेँ देखथि, तँ बेटाकेँ कमासुत बूझि संतोष होन्हि, मुदा बड़की बहिनक की हएत? वेचारीकेँ अछैते भाइए ने भाए रहलनि, आ ने अछैते पतिए ने पति रहलनि! घरपर ओते सम्पति नै, तहूमे जँ बेचैओक अधिकार रहितनि तँ किछु बेसीओ दिनक आशा होइतनि, सेहो नहि। समए रौदियाहे अछि। अपने ओछाइन धेने छी, पाइक कोनो आमदनी नहि। बेटासँ मांगि केना सकै छी, ओकरो ई बात (बहिनक खर्च) बूझल नहि छै तैपर जँ मंगबै आ ओ माएकेँ कहत तँ जेहो किछु दिन जीवैक आशा अछि सेहो चलि जाएत। आइने-अवगरानिसँ लोक जहर-माहूर खाइए। अपन विचारकेँ अपने मनमे दाबि मुनेसर बहिनकेँ बिसरि देलनि। महिना-दू महिना तँ सुलोचना आशा धेने रहली मुदा पेटक आगि तँ ओहन आगि होइ छै जेकरा मिझबैले लोक आचार-विचार कुल-खनदान सभ बिसरि जाइए। ततबे नै, सुलोचना ओहन परिवारमे जनम नेने छथि जइ परिवारक औरतकेँ भूमि छेदनसँ बर्जित कएल गेल छन्हि, ओ अपन श्रम बेचि केना सकै छथि। अपन ओहन वाड़ी-झाड़ी खेत नहि जे अपनो जोकर सागो उपजा सकै छी। बाधक खेत। बेवस सुलोचना गाममे टुटली मरैआमे बैस गाबए लगली- “हे भोलादानी कहिया हरब दुख मोर।” चारू दिसक अपन बन्न रस्ता देखि सुलोचना बहिन चारूकात तकली तँ एकटा घर लगमे बूझि पड़लनि। ओ घर अपन दीदी-पीसाक। गामसँ सटले, करीब कोस भरिपर दीदीक घर। बेरू पहरमे सुलोचना बहिन दीदी गामक रस्ता पकड़लनि...। सुलोचनाक पिसियौत भाए, हाइ स्कूलमे शिक्षक छथि। प्रतिष्ठित शिक्षक। जिनगीमे डेरापर कहियो कोनो विद्यार्थीकेँ ट्यूशन फीस नहि लनि। मास्सैबक परियाससँ सुलोचना बहिन सासुर गेली। दोहरा कऽ साठि बर्खक उमेरक पछाति जहिना जिनगी हारल-थाकल तहिना अपन जिनगी पाँच कौर अन्न आ पाँच हाथ वस्त्रपर अँटका लेलनि...। उपरोक्त कथा-वस्तु सद्य: यर्थाथक परिचए अपनामे समेटने अछि। औझका पढ़ाइ-लिखाइक मात्र एक लक्ष्य नोकरी करब अछि। परिवारक अर्थ सिकुड़ि रहल अछि। समाजक बीच रंग-रंगक कलह केर भावना बढ़ि रहल अछि। भाए-भैयारीमे प्रेमक भावना कमि रहल अछि। पूजीवादी विचार मनुखमे एहि तरहेँ अपन जगह बना रहल अछि जे बैमानी भावना एते प्रवल भेल जा रहल अछि जे समाजक बात तँ दूर जे भैयारीओमे बैमानी शुरू भऽ गेल अछि। जइ परिवारक औरतकेँ भूमि छेदनसँ बर्जित कएल गेल छन्हि, ओ अपन श्रम बेचि कोना सकै छथि। अपना ऐठाम आइयो विधवा बिआहक सामाजिक मान्यता सभ समाजमे नहि देल गेल अछि। जकर जरूरत सजहे उपरोक्त कथा-वस्तुमे उपन्यासक माध्यमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डल सुलोचना नामक पात्रक अवतारणा कऽ देखार केलनि अछि। जखन कि एहन मात्र सुलोचने बहिनटा नहि अपितु बहुत बहिन छथि...। ऐ तरहेँ ऐ उपन्यासमे समकालीन चेतना वृहद पात्रक समस्त चरित्र-चित्रणसँ लऽ अन्त आएल अछि। २१म शताब्दीक पहिल दशकक मैथिली उपन्यासमे राजनीतिक चेतना उपरोक्त शीर्षक 21म शताब्दीक पहिल दशकक उपन्यासमे राजनीतिक चेतना- कोनाे सामाजिक उपन्यासमे प्रस्तुत विषय-वस्तुक हएब प्राय: स्वभाविक अछि। उपन्यास एक एहन विधा थिक जइमे सम्पूर्ण जिनगीक वर्णन रहैत छैक। जिनगीक एकटा अहम अंग राजनीति होइछ। जाहिसँ उपन्यासमे मोड़ आनल जाइत अछि आ दिशाकेँ बदलि दैत छैक। व्यक्ति भलहिं व्यक्तिगत स्थितिकेँ द्योतक हुअए मुदा जिनगी एकटा एहन विशाल परिक्षेत्रक नाओं थिक जे समाजक बीच पसरि जाइत अछि। मनुख जखने समाजसँ जुड़त तँ ओइमे राजनीति स्वत: एक अंग बनि जाएब स्वभाविक अछि। पहिल दशकमे प्रकाशित उपन्यास तँ बहुतो होएत मुदा हम जेतबा पढ़ि वा देखि सकल छी मात्र तेकरे वर्णन एे आलेखमे कऽ रहलौं अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल- जीक उपन्यासकेँ मैथिली साहित्यमे सार्थक राजनैतिक चेतना जगेबाक प्रारम्भक रूपमे देखि सकै छी, मौलाइल गाछक फूल उपन्यासमे राजनीतिक चेतना ओत-प्रोत अछि। जाहिमे ग्रामीण जीवनमे पसरल समस्याक यर्थाथ चित्रण केलनि अछि। प्रस्तुत उपन्यासमे सुबुध नामक एकटा पात्र जे शिक्षक छथि ओ अध्यापन कार्यमे लागल रहैत छलाह। गाम-समाजक चिन्तासँ मुक्त छलाह। जखन रमाकान्त बाबू मद्राससँ घुरि अपन गाम एलाह आ हुनकामे ई चेतना भेलनि जे अनेरे जमीन हम किअए रखने छी तखन अपन 2 सए बीघा जमीन समुच्चा ग्रामीणमे बाॅटि समाजकेँ परिवार रूपमे देखए केर नजरिक पता शिखक सुबुधकेँ लगलनि तखन हुनकामे सेहो चेतना एलनि आ अपन नौकरीसँ तियाग पत्र द’ पुन: आपस आबि जाइ छथि। गाम-समाजक बीच ऐबाक लक्षण एकटा राजनीतिक चेतनाक अपूर्व कृतिमान उपस्थित करैत अछि। तहिना जिनगीक जीत उपन्यामे समाज दशा-दिशाक यर्थाथ चित्रण करैत अर्थनीति केर मूल रहस्यकेँ उद्घाटित करबाक जे प्रयास मंडलजी केलनि अछि ओ एक अद्भुत राजनीतिक प्रमाण उपलब्ध करबैत अछि। जगदीश प्रसाद मंडलक अगिला उपन्यास उत्थान-पतन एहि उपन्यासक माध्यमे सामंती सोचकबला समाज आ समाजिक सोचक समाज बीच आधुनिक वैज्ञानिक समन्वयवादी सोचक यर्थाथ चित्रण तेहन मार्मिक आ इमानदारीसँ मंडलजी केलनि अछि जे एक तेहन राजनीतिक चेतनाक संवाहक बनैए जे प्रत्येक मनुखकेँ उत्थान आ पतनक मार्ग दर्शन रूपमे सिद्ध करैत अछि। ‘जीबन-मरन’ उपन्यासक लेखक जगदीश प्रसाद मंडल जी छथि- एहि उपन्यासक मूल पात्र छथि रघुनंदन। रघुनंदनक मृत्यु जइ दिन भेलनि ओही दिनसँ उपन्यासक प्रारम्भ होइत अछि। मिथिलाक समस्यामे बाढ़ि, रौदी आदि प्राकृतक समस्या केर अलाबे आर बहुत रास समस्या छैक जे मानव द्वारा अक्तियार क’ समाजकेँ जकरने छैक। प्रस्तुत विषय केर चित्रण ताहि रूपे मंडलजी अपन जीबन-मरन उपन्यासमे केलनि अछि जे एक खास राजनीतिक चेतनाक जन्म दैत अछि। हिनक अगिला उपन्यास अछि ‘जीवन-संघर्ष’ अध्यात्मक मूल उद्देश्य थिक मानव-मानवक बीच अगाध प्रेमक जन्म देनाइ जइसँ सभ कियो सहमत छी। प्रस्तुत उपन्यास जीवन-संघर्ष केर माध्यमसँ मंडलजी सम्प्रदाय आ धर्म कोना व्यक्तिसँ समाज धरिकेँ तोड़ैए आ कोना लोक अपनाकेँ महामानवक वाटपर चलि सकैए ताहि परिपेक्ष्यमे चित्रण भेल अछि ओ एक अद्भुत राजनीतिक चेतनाक द्योतक अछि। निष्कर्षत: ऐ सभ उपन्यासमे जीवन आ राजनैतिक चेतना समाहित अछि। लोकक कार्यक प्रति मण्डल जीक विश्वास जिनगीक प्रति विश्वास बिनु राजनैतिक चेतनाक सम्भव नै। श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक उपन्यास- सहस्रबाढ़नि ढेर रास रजनैतिक आ ब्यूरियोक्रेटिक उथाल-पुथलक गबाह अछि, तँ हुनकर सहस्रशीर्षा दलित गबैय्या मोहनक भारतक स्वतंत्रतासँ सूचनाक अधिकार धरि गीतक माध्यमसँ राजनैतिक चेतना पसारबाक अद्भुत सफल प्रयास अछि, तँ एकर बीचमे सन्हिआएल गामक आ बाढ़िक राजनीति गामसँ दिल्ली धरि पसरल अछि। राजदेव मण्डल जीक ‘हमर टोल’ धारावाहिक रूपेँ विदेहमे ई-प्रकाशित भऽ रहल अछि आ ई मैथिलीक सभसँ बेसी पठित उपन्यासक रूपमे उभरि रहल अछि। ओना तँ ई उपन्यास अखन छपिये रहल अछि मुदा घृणा आ प्रेम दुनूसँ सराबोर राजनैतिक घटनाक्रमक लेखक द्वारा जे प्रस्तुतीकरण भऽ रहल अछि से अतुलनीय अछि। केदारनाथ चौधरी- जीक चमेलीरानी आ एकर सेक्वेल माहुर वर्तमान राजनैतिक स्थितिक सुन्दर प्रस्तुतिकरण अछि आ अपराधीक राजनीतिमे प्रवेशक सुन्दर विवरण अछि, जतए पाठक चमेलीरानीसँ प्रेम करए लगैए आ ओकर अपराधकेँ स्वीकृति करबा लेल विवश भऽ जाइए। आशा मिश्रक- उचाट आ अशोक कुमार ठाकुरक निशांत आ वसुधाक संसार सेहो ठाम-ठीम एकर विवरण करैत अछि। श्याम चन्द्रक "रूपा दीदी" लेखकक कलाक प्रति उदासीनतासँ ओतेक निस्सन प्रभाव उत्पन्न नै करैए मुदा विषय-वस्तुक दृष्टिए ई राजनैतिक चेतनाकेँ आधार लऽ लिखल गेल अछि। साकेतानन्दक सर्वस्वान्त बाढ़ि आ राहतक राजनीतिक डोक्यूमेन्ट्री फिक्शन अछि। अनिलचन्द्र ठाकुरक “आब मानि जाउ” उपन्यासमे एक एहन युवतीक संघर्ष-गाथा अंकित अछि जे अपन लगनसँ जीवन बदलैत अछि। असंख्य गामक ई कथा कुलीनताक अधःपतनक कथा, संस्कार विहीनताक उद्घाटन आ भविष्यक पीढ़ीकेँ बचएबाक चुतौनी छी। वीणा ठाकुरक ‘भारती’ उपन्यासमे सेहो राजनीतिक चेतना झलकैत अछि। पंकज कुमार प्रभाकर, शोध छात्र, ललित नारायण मिथिला विश्व-विद्यालय, कामेश्वरनगर- दरभंगा। ग्राम+पोस्ट- भपटियाही-कदमपुरा, भाया- नरहिया (मधुबनी) समकालीन चेतनाक सम्वाहक :: अर्द्धांगिनी जीवनमे होइत नित्य नूतन परिवर्त्तनक खण्ड चित्रकेँ यथावत् प्रस्तुत करब श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक अपन एक फराक शैली छन्हि। मण्डलजी वहुआयामी रचनाकार छथि। गद्य हो आकि पद्य विभिन्न विधामे जगदीश प्रसाद मण्डलजी अपन स्थान सुरक्षित कऽ लेने छथि। विभिन्न विद्वानक मत सेहो ऐ सन्दर्भमे आएल अछि। अर्द्धांगिनी कथा संग्रहक आमुखकार डॉ. योगानन्द झा लिखलनि अछि- “युगीन समस्या ओ समस्याक कारण एवं तेकर समाधानक प्रति चिन्तनशीलता हिनक वस्तु-विन्यासकेँ प्रेरक-प्रभावकारी बनौने रहलनि अछि जइमे परम्परित कथाधाराक आदर्शोन्मुख यथार्थवादी दृष्टिकोण स्पष्ट रूपेँ प्रस्फुटित देखि पड़ैछ। मिथिलाक लोकजीवनक उत्थानक प्रति सम्वेदनात्मक अभिव्यक्ति कौशलक कारणे मण्डलजीक कथा सभ हिनका आधुनिक कथाकार लोकनिक अग्रिम पंक्तिमे ठाढ़ कऽ देलकनि अछि।” मण्डलजीक कथा सभ मिथिलाक माटि-पानिक कथा छी। हिनक कथा सभमे मिथिलाक ग्राम्य जीवनक आशा-निराशा, सुख-दु:ख, हर्ष-उल्लास आ जीवन-संघर्षक व्याख्या भेटैत अछि। मिथिलाक सामाजिक-आर्थिक ओ राजनीतिक जीवनमे होइत परिवर्त्तन सभकेँ सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण द्वारा ई अपन कथा सभकेँ प्रवाहमयता, रोचकता ओ विश्वसनीयताक संग प्रस्तुत करबामे सिद्धहस्त कलाकारक रूपमे प्रतिष्ठित छथि। दर्जन भरि उपन्यास, दर्जनसँ बेसी कथा संग्रह, करीब दर्जन भरि नाटको तथा पद्यक (गीत, काव्य) पोथी सेहो आधा दर्जनसँ ऊपर प्रकाशमे आबि चुकल अछि, संगे-संग आलोचनात्मक आलेख सेहो पत्रिकादिमे पढ़बाक अवसरि भेटल अछि यथा- अवतारवाद, सगर राति दीप जरय :: एकटा यात्रा, मिथिलाक लोक बेवहार गीत एवं संस्कार गीत, उपन्यासमे ग्रामीण चित्रण, कामरूप आ मिथिला इत्यादि। तइ संग कएक गोट साक्षात्कार सेहो हिनकर आएल अछि। ओना तँ हिनक विभिन्न कथा संग्रह अछि जेना, गामक जिनगी, सतभैंया पोखरि, उलबा चाउर, भकमोड़, पतझार, अप्पन-बीरान, बाल गोपाल, रटनी खढ़, लजबिजी, गामक शकल-सूरत, बजन्ता-बुझन्ता, तरेगन, शंभुदास तथा अर्द्धा्ंगिनी। मुदा अखन हम अर्द्धांगिनी कथा संग्रहमे संग्रहित कथा सबहक अध्ययन कऽ समकालीन बोधकेँ ऐ आलेखमे निरूपण करब। ‘अर्द्धांगिनी’ कथा संग्रहमे बीस गोट कथाक समावेश कएल गेल अछि। जइमे संग्रहक पहिल कथाक नाओं- ‘दोहरी मारि’ छी। दोहरी मारि कथा केर पुरुख पात्र गुलाब छथि। गुलाबक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भेल अछि। अवकाश प्राप्त प्रोफेसर गुलाब केतेको वर्षसँ डाइबीटीज ओ ब्लड-प्रेसर सदृश बिमारी सभसँ ग्रस्त छथि। गामक घर-घराड़ी पर्यन्त बेचि शहरमे बनौल मकानमे पति-पत्नी एकाकी रहै छथि। बेटा-पुतोहु परदेशमे रहै छन्हि तँए हिनकालोकनिक सुधि लेनिहार कियो नै छन्हि। हद तँ तखनि भऽ जाइत अछि जखनि पुत्र द्वारा ई समाद भेटै छन्हि जे पौत्रक मूड़न घरपर नै भऽ कऽ वैष्णो देवीमे हेतनि, जइ लेल हुनकोलोकनिकेँ ओहीठाम एबाक आमंत्रण भेटै छन्हि आ ओ अपनाकेँ अशक्य बूझै छथि। दोसर कथा- ‘केना जीब’ सेहो अवकाशप्राप्त प्रोफेसरेक कथा अछि। प्रोफेसर साहैब बेटाकेँ पढ़ा-लिखा कऽ विदेश पठयबामे सफल तँ होइ छथि मुदा बेटा विदेशी सभ्यता ओ संस्कृतिक रंगमे रमि जाइ छन्हि आ हिनकालोकनिक खोजो-पुछारि नै कऽ पबै छन्हि। परिणामत: दुनू परानी एकाकी जीवन बितेबाक हेतु बाध्य होइ छथि। तेसर कथाक नाओं- ‘नवान’ छी। ऐ कथामे मिथिलाक लोक जीवनक विभिन्न खण्डचित्र उपस्थित कएल गेल अछि यथा वृक्ष-लतादिक पहिल फड़ देवताकेँ चढ़ाएब, गाए बिआएलापर महादेवकेँ दूधसँ अभिषेक करब आदि ऐ कथाक विषय-वस्तु अछि। चारिम कथा- ‘तिलासंक्रान्तिक लाइ’ पर लिखल गेल अछि। ऐ कथामे गामक जिनगीमे पसरल अन्धविश्वासपर प्रहार कएल गेल अछि। पाँचम कथा- ‘भाइक सिनेह’ भाए-भैयारीक आपसी कलहपर केन्द्रित एक प्रकारक प्रेमक कथा छी। छठम कथा- ‘प्रेमी’ वस्तुत: प्रेमकथाक रूपमे लिखल गेल अछि। मुदा ऐ कथामे रचनाकारक उद्देश्य समाजिक जीवनमे व्याप्त दहेज प्रथाक कुरीतिकेँ समाप्त करबाक संदेश अभिव्यक्त भेल अछि। संग्रहक सातम कथा- ‘बपौती सम्पति’ कृषक जीवनमे जातीय बेवसायक महत्तवक अवधारणापर आधारित अछि। सम्प्रति कृषक-मजदूरक पलायनसँ जे गामक अर्थ-बेवस्था चरमरा गेल अछि तेकरा सुधारबाक हेतु ऐ कथामे चिन्तनक एकटा दिशा भेटैत अछि। आठम कथा- ‘डंका’ लोकजीवनक अवमूल्यनकेँ रेखांकित करैत अछि। नवम कथा- ‘संगी’ शिक्षा जगतमे भेल अद्य:पतनक कथा छी जइमे स्कूल-कौलेजमे शिक्षाक बेवसायीकरणक फलस्वरूप सामान्य जनसँ छीनल जाइत शिक्षाक समस्यापर विमर्श भेल अछि। संग्रहक केन्द्रिय कथा “अर्द्धांगिनी”मे ऐ अवकाशप्राप्त शिक्षकक अत्यन्त सूक्ष्म मनोविश्लेषण भेल अछि। अपन कमाइक बलेँ ओ आजीवन अपन पत्नीकेँ दासीसँ आगू बुझबाक हेतु तैयार नै होइ छथि मुदा जखन नोकरी समाप्त भऽ जाइ छन्हि तखन पत्नीक आवयकतापर धियान जाइ छन्हि आ अर्द्धांगिनीक महत बूझि पबै छथि। लेखक नारीक सेविका स्वरूपकेँ मर्यादित कऽ ओकरा पुरुखक समानान्तर मूल्य प्रदान करैक पक्षपाती छथि, जेकर अभिव्यक्ति ऐ कथाक लक्ष्य रूपमे प्रदर्शित होइत अछि। अतिरिक्त आरो कथा सभ अछि जेना- “ठकहरबा”, “अतहतह”, “ऑपरेशन”, “धर्मनाथ”, “सरोजनी”, “सुभद्रा”, “सोनमाकाका”, “दोती बिआह”, “पड़ाइन” तथा अन्तिम कथा “केतौ नै”। कथा सबहक विषयमे आमुखकार अपन विचार व्यक्त केने छथि- “मण्डलजी कथाक भाषामे मैथिलीक गमैया बोली-वाणीक सहज स्वरूप अभिव्यक्त भेल अछि। ई पात्रानुरूप भाषाक प्रयोग केलनि अछि जइसँ प्रत्येक पात्रक बौद्धिक ओ सामाजिक स्थिति स्पष्ट होइत चलि जाइत अछि। हिनक कथा सभमे कथाकारक भाषा सेहो मैथिलीक लोकजगतक भाषाहिक अनुगमन करैत अछि जइमे सहजता अछि। कनेको कृत्रिम प्रयोगसँ ई बँचैत रहल छथि। हिनक भाषामे तद्भव ओ देशज शब्दक प्रचुर प्रयोग भेल अछि। युग्म शब्दक प्रयोग हिनक भाषाकेँ लालित्य प्रदान करबामे आ ओकर प्रवाहमयतामे सहायक रहलनि अछि। उदाहरणक हेतु माल-जाल, लेब-देब, दोकान-दौरी, चट्टी-बट्टी, ताड़ी-दारू, छहर-महर, चोरी-डकैती, बाल-बोध, बेटा-पुतोहु, भोज-काज, अन्हर-बिहाड़ि, दार-मदार, सुक-पाक, भूखल-दुखल, चीज-बौस, घुसका-फुसका आदिकेँ देखल जा सकैछ। मण्डलजी कथा भाषाक ई अन्यतम विशिष्टता छी जे ई कोनो स्थितिकेँ पाठकक समक्ष अभिव्यक्त करैक हेतु चमत्कारिक उपमानक प्रयोग करै छथि जइसँ वस्तुस्थितिक स्पष्ट चित्र पाठकक सोझाँ आबि जाइत अछि यथा- “जहिना खढ़ाएल खेतमे हरबाहकेँ हर जोतब भरिगर बूझि पड़ै छै तहिना सुशीलक मन समस्याक वोनाएल रूप देखलक। जहिना पहाड़सँ निकलि अनवरत गतिसँ चलि नदी समुद्रमे जा मिलैए तहिना ने टटघरक ज्ञान उड़ि कऽ सर्वोच्च ज्ञानक समुद्रमे मिलत।” आदि। एतावता कहल जा सकैछ जे मण्डलजीक कथा वर्णनक दृष्टिएँ मिथिलाक ग्रामजीवनक यथार्थवादी चित्र, घटनाक दृष्टिएँ आदर्शक प्रति अभिभूत, सूक्ष्म मनोविश्लेषणक प्रति प्रतिबद्ध तथा उदेसक दृष्टिएँ लोक मंगलकारी अछि।” युग्म शब्दक प्रयोग कथाकारक विशेषता होइत अछि संगे समकालीनताक द्योतक सेहो। कारण, भाषाक अनन्तकालिन यात्रामे शब्द अपन रूपमे परिवर्त्तन सेहो करैए। जहू दिसि ऐ संग्रहक कथाकारक कलम चललनि अछि। जइपर दृष्टिपात केला पछाति समकालीन रचनाक हँ-निहँस सेहो सहज भऽ सकैए। सत्य आकि यर्थाथ एक ओहन शब्दावलीक नाओं छी जेकर परिधिमे सहज स्वरूप, सामाजक खाँटी स्थिति, स्वत: स्फुट पात्रक चरित्र, सहिष्णुता, समकालीनता आदिक समावेश सवत: रहैत अछि। मिथिलामे रहएबला सभ स्तरक समाजक पात्र ऐ संग्रहक विभिन्न कथा सभमे आएल अछि। विभिन्न समस्यासँ ग्रसत मनुख जे जगदीश प्रसाद मण्डलक साहित्यक पात्र अछि, हिनका सभ लग एकमात्र अवलम्ब बँचि जाइ छन्हि- जिजीविषा ओ संघर्ष। यएह जिजीविषा ओ संघर्ष करबाक मानसिकता ऐ कथाक युग जीवनक अनुकूल संदेश दैत अछि। जे सद्य: समकालीन अछि। पल्लवी चोरविद्या सुति कऽ उठले रही कि रधिया दादी मुहेँ सुनलौं- “रज विद्यासँ चोर विद्या भारी होइ छै।” रातियेमे आकि भोरमे कियो हुनकर टाट परहक सजमनि चोरा कऽ तोड़ि नेने रहनि, तँए गारियो पढ़ैत रहथिन आ बजबो केली जे ‘रज विद्यासँ चोर विद्या भारी।’ शनि दिन रहने भिनसुरके स्कूल रहए। मास्टर साहैबसँ पुछलियनि- “सरजी, चोर विद्या केकरा कहै छै?” सरजी कहलनि- “जइ विद्यासँ चोर चोइर करैए सएह भेल चोर विद्या।” फ्रेण्ड हमरा अँगनाक ऐंठारपर एकटा पौरकी आ एकटा मेना चरौर करए आएल। से कोनो आइए नै आएल, अबिते रहैए। लगेक बँसबीटमे रहबो करैए। भोर होइते पहिने पौरकी उठैए। पछाति मेना। मेनाकेँ संग करैत घरसँ दुनूटा निकलैए। एकठाम रहने दुनूमे बेवहारिक सरोकार तँ छै मुदा ने जाति छी, जे एक टाइटिल रहितै आ ने एक रंगक अछि, जे जातियो रहितए। ओना जातियोमे रंग-रंगक टाइटिल तँ चलिते छै। भिनसुरका तोरक भोजन केला पछाति मेना पौरकीकेँ कहलक- “गौऑं, दुनू गोरे फ्रेण्ड लगा लिअ।” मेनाक बात सुनि पौरकी कनीकाल मने-मन हिसाव जोड़लक। तँ बूझि पड़लै जे भलें एके ढेरीपर दुनू गोरेक गुजर किए ने चलैत हुअए मुदा दुनू गोरेक खान-पान तँ एक नइ अछि। ओ साकठ अछि आ अपने वैष्णव छी। पौरकी असमंजसमे पड़ि गेल। मेना पुछलकै- “गौआँ, सोझहे फ्रेण्ड लगेबह आकि ओकर नीको-बेजाए फरिछा लेबह?” पौरकीक विचार मेनाकेँ जँचलै। बाजल- “गौआ, अहॉंकेँ दुश्मन बेसी अछि, हमरा कम अछि। लाभ बेसी अहींकेँ अछि, जे जखन दुश्मन औत तँ हम अढ़ कऽ लेब।” पौरकी बाजल- “दछिनमुहेँ-गंगाजी दिस घुमि दुनू गोरे पहिने सप्पत खाउ, तखन फ्रेण्ड लगाउ।” नोट- ऐ कथाकेँ लिखैमे हमर बाबा- श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक सहयोग भेटल अछि। हुनका प्रणाम्। संगे अहूँ सभकेँ प्रणाम्। पूनम मण्डल रिपोर्ट-- सगर राति दीप जरल निर्मली, दिनांक 19 सितम्बर 2015 : सगर राति दीप जरय समिति- निर्मलीक प्रस्तुतिमे शहरक विशालकाय विवाह भवन- श्यामा रेसिडेन्सी- सभागार-मे सगर राति दीप जरय केर 87म गोष्ठी ‘कथा तिलजुगा’क शुभारम्भ 6:30 बजे भेल। जेकर उद्घाटन सम्मिलित रूपे केलैन, नेतरहाट उच्चतर माध्यमिक विद्यालयक पूर्व प्राचार्य डॉ. दुर्गा प्रसाद साहू, हरि प्रसाद साह महाविद्यालयक पूर्व एवं वर्तमान प्राचार्य द्वय डॉ राम अशीष सिंह, डॉ. विमल कुमार राय, प्रखण्ड विकास पदाधिकारी श्री सुशील कुमार, जिला पार्षदक पूर्व सदस्या श्रीमती आशा देवी, श्यामा रेसिडेन्सीक निर्माणकर्ता श्री सत्य नारायण प्रसाद साहु तथा सी.एम.बी. कॉलेजक हिन्दी विभागाध्यक्ष सह मैथिली साहित्यक चर्चित साहित्यकार प्रो. धीरेन्द्र कुमार। अवसरपर श्री रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ स्व रचित गीत- “करू स्वागत स्वीकार हे प्रियवर, हम नै अपनेक योग्य...।”सँ स्वागत केलैन, तथा धन्यवाद ज्ञापनक संग स्वागत-भाषण केलैन, प्रोफेसर द्वय डॉ. शिव कुमार प्रसाद, डॉ. श्रीमोहन झा। ऐ तरहें उद्घाटन सत्रसँ पोथी लोकार्पण सत्रमे प्रवेश भेल। सत्रक मुख्य अतिथि, बिहार अति पिछड़ा प्रकोष्ठक सदस्य मो. शरफराज अहमद संगे विशिष्ठ अतिथि रहैथ- डॉ श्यामानन्द चौधरी, डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद सिंह, श्री अशोक कुमार मिश्र, श्री शंभु सौरभ, श्री दुर्गानन्द मण्डल, श्री उमेश नारायण कर्ण, श्री श्रीकृष्ण राम, श्री अजय कुमार दास, श्री नागेश्वर कामत, श्रीमती विभा कुमारी, श्रीमती अनुपम कुमारी, श्री मनोज कुमार साह उर्फ चन्दनजी, श्री जे. के. आनन्द, श्री रतन कुमार रवि, श्री विनोद कुमार गोप, श्री राम प्रवेश मण्डल तथा श्री रामलखन भण्डारी, तथा सत्रक अध्यक्षता केलैन- समर्पणक चेअरमेन श्री दुर्गानन्द मण्डल, मध्य विद्यालयक शिक्षक मो. ए.के. मंजूर, सामाजिक कार्यकर्ता श्री सुरेन्द्र प्रसाद यादव, श्री विनोद कुमार तथा मध्य विद्यालयक प्राचार्य श्री नारायण प्रसाद सिंह। पॉंच गोट पोथीक लोकार्पण भेल। जइमे टैगोर साहित्य पुरस्कारसँ पुरस्कृत एवं विदेह भाषा सम्मानसँ सम्मानित साहित्यकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल रचित चारि गोट पोथी- ‘गुड़ा-खुद्दीक रोटी’, ‘फलहार’, ‘लजबिजी’ आ ‘गामक शकल-सूरत’ लघुकथा संग्रहक छल आ पॉंचम- ‘विदेह’ आ ‘वैदेह’ द्वय सम्मानसँ सम्मानित साहित्यकार श्री राजदेव मण्डल रचित पोथी- ‘जाल’ (पटकथा) रहए। पाँचू पोथी भरि सभागारमे वितरणो भेल। भाड़ी संख्यामे विद्वत-श्रोतागणक उपस्थिति सेहो छल। जेना- इतिहासक विभागाध्यक्ष प्रो. जय प्रकाश साहु, अधिवक्ता सह पत्रकार श्री रौशन कुमार गुप्ता, श्री सागर कुमार साहु, श्री विष्णु कुमार गुप्ता, श्री टुनटुन कामत, श्री राम नरेश यादव, श्री अजय कुमार गुप्ता, श्री आलोक कुमार ‘नाहर’, श्री राम विलास सिंह, श्री बिहारी मण्डल, श्री राज कुमार यादव, श्री बद्रीलाल यादव, श्री राम नारायण कामत, श्री रामकृष्ण ठाकुर, श्री राजदेव मण्डल, श्री अरविन्द कुमार मण्डल, श्री राजेश पासवान, श्री संजीव कुमार, ई. आशुतोष कुमार, श्रीमती आराधना मिस्टी, श्री चन्द्र भूषण झा ‘राधव’, श्री मनोज कुमार झा, श्री राजकुमार मिश्र, श्री अरविन्द यादव, श्री विनय कुमार रूद्र, श्री बिलट मण्डल, श्री रामबाबू कामत, श्री दशरथ प्रसाद यादव, श्री राम अशीष मण्डल, श्री लक्ष्मी मण्डल, डॉ. विष्णुदेव ठाकुर, श्री गोपाल गिरि, श्री राजाराम यादव, संतोष कुमार पाण्डेय, श्री सत्य नारायण महतो, सुश्री काजोक कुमारी, श्री मदन महतो, श्री शम्भु कमार साह, श्री योगीलाल कामत, श्री हजारी प्रसाद साहु, तथा अवकाश प्राप्त शिक्षक श्री अशर्फी साहु इत्यादि-इत्यादि। क्रमश: आगू बढ़ैत कथा सत्रमे प्रवेश कएल...। ऐ सत्रक अध्यक्षता केलैन ‘सखारी-पेटारी’ कथा संग्रहक कथाकार श्री नन्द विलास राय, ‘रथक चक्का उलैट चलै बाट’क कवि श्री राम विलास साहु, ‘उलहन’ कथा संग्रहक कथाकार श्री कपिलेश्वर राउत तथा अशर्फी दास साहु समाज इण्टर महिला महाविद्यालय- निर्मली केर मैथिली विभागाध्यक्ष प्रो. हेम नारायण साहु। सात पालीमे विभक्त पच्चीस गोट कथा पाठ भेल, समीक्षा भेल। ऐ तरहें तीनू सत्रक समापन भेल। जेकर संचालक छला- श्री संजीव कुमार ‘शमा’, श्री भारत भूषण झा, श्री दुर्गानन्द मण्डल तथा श्री उमेश मण्डल। अन्तिम सत्र ‘अगिला गोष्ठी केतए’मे प्रवेश भेल। चारि गोट प्रस्ताव आएल, पहिल- श्री रोहित कुमार सिंहक दरभंगा लेल मार्च 2016. श्री दुखन प्रसाद यादवक ‘धबही’ लेल जून 2016 तथा दिसम्बर 2015क गोष्ठी लेल दूटा, प्रथम- श्री कमलेश झाक ‘डखराम’ लेल तथा श्री राजदेव मण्डलक ‘रतनसारा-मुसहरनियॉं’ लेल। सभामे बैसल समस्तक विचारपर अध्यक्ष मण्डल द्वारा निर्णय भेलैन- डखराम। अत: अगिला गोष्ठी श्री कमलेश झाक संजोजकत्वमे दरभंगा जिलाक बेनीपुर अनुमण्डल अन्तर्गत ‘डखराम’ गाममे होएत। भावी संयोजक श्री कमलेश झाकेँ वर्तमान संयोजक श्री उमेश मण्डल दीप तथा पंजी समर्पित केलैन। अन्तमे, धन्यवाद ज्ञापनमे, बाहरसँ आएल साहित्यकार, स्थानीय साहित्यकार एंव सहयोगी तथा विशेष सहयोगीकेँ संयोजक धन्यवाद-नमन केलैन। ऐ तरहें सगर रातिक कथा शेष भेल। निम्न अछि- क्रमानुसार पठित कथाक नओं, कथाकारक नाओं, तथा समीक्षकक सुची, संगे सगर राति दीप जरय समिति- निर्मली केर सक्रिय कार्यकर्ता, संचालक तथा विशेष सहयोगीक सेहो। कथा पाठ एवं समीक्षा : पहिल पाली- १. फ्रेण्ड : पल्लवी कुमारी २. सभसँ कठिन जातिक अपमान : रतन कुमार ‘रवि’ ३. अवाक् : राजदेव मण्डल समीक्षा : डॉ. विमल कुमार राय, डॉ. श्यामानन्द चौधरी, डॉ. राम अशीष सिंह। दोसर पाली- ४. अवसरवाद : अजय कुमार दास ५. ऊपर फरकी मामीक सराध : लक्ष्मी दास ६. हाथी आ मूस : जगदीश प्रसाद मण्डल समीक्षा : श्री कमलेश झा, श्री दुर्गानन्द मण्डल (बनरझूला) श्री दुर्गानन्द मण्डल। तेसर पाली- ७. बबाजीक मकड़जाल : संजीव कुमार ‘शमा’ ८. शैतान आ भगवान : दुर्गानन्द मण्डल ९. सहोदरा नै बना पेलौं : उमेश मण्डल समीक्षा : डॉ. शिव कुमार प्रसाद, डॉ. विमल कुमार राय, डॉ. श्यामानन्द चौधरी, डॉ. राम अशीष सिंह। चारिम पाली- १०. समाजक हाल : रोहित कुमार सिंह ११. इज्जतक सवाल : राम विलास साहु १२. हैवानक संग सधमुहोँ : दुखन प्रसाद यादव १३. बाल बोध : शम्भु सौरभ १४. एक दिन हमरो : शारदा नन्द सिंह समीक्षा : श्री फागु लाल साहु, श्री सुशील कुमार साह, श्री राजदेव मण्डल ‘रमण’। पॉंचिम पाली- १५. सिद्धि साध्ये : उमेश नारायण कर्ण ‘कल्पकवि’ १६. श्रोता : अशोक कुमार मिश्र १७. फ्रॉडिज्म : शिव कुमार मिश्र १८. कर्मक फल : फागु लाल साहु समीक्षा : श्री राजदेव मण्डल, श्री रतन कुमार ‘रवि’, श्री कमलेश झा। छठम पाली- १९. आब कहू : नन्द विलास राय २०. हमर समाज : कौशल झा २१. खुशी : पंकज कुमार ‘प्रभाकर’ २२. मौखिक : राधाकान्त मण्डल २३. मनुखक मोल : सुशील कुमार समीक्षा : श्री राम विलास साहु, श्री संजीव कुमार ‘शमा’, श्री उमेश मण्डल। सातम पाली- २४. एकटा आर : शारदानन्द सिंह २५. बरियातीमे गारि : लक्ष्मी दास समीक्षा : डॉ श्यामानन्द चौधरी, श्री कमलेश झा। ....................... श्री संजय कुमार मण्डल, श्री सत्रुघ्न कुमार मण्डल, श्री विनोद ठाकुर, श्री सुजीत कुमार साहु, श्री अखिलेश कुमार मण्डल, श्री शशि भूषण कुमार, श्री संतोष कुमार राय आदि। श्री सुरेश महतो, श्री मुकुल प्रसाद साहु, श्री सुरेन्द्र प्रसाद यादव, श्री विनोद कुमार तथा उमेश मण्डल। श्री सत्य नारायण प्रसाद साहु, श्री नारायण प्रसाद सिंह, श्री पिंकु पंसारी, श्री राम प्रकाश साहु, श्री देवेश कुमार सिंह, श्री प्रभाष कुमार कामत, श्री मनोज कुमार शर्मा, श्री देवेश कुमार सिंह, श्री रामनाथ गुप्ता, श्री राम लखन भण्डारी, श्री अखिलेश चौधरी, श्री राम सुन्द्रर साहु, प्रो. धीरेन्द्र कुमार तथा डॉ. विमल कुमार राय...। 86म दीप सरग राति जरल मधुबनी जिलाक फुलपरास अनुमण्डलक ‘लकसेना’ गाममे 20 जून 2015 केँ 86म ‘सगर राति दीप जरय’ (कथा-साहित्य गोष्ठी) क आयोजन ‘उन्मुक्त’क सौजन्यसँ श्री राजदेव मण्डल ‘रमण’क संयोजकत्वमे आयोजित भऽ सफल भेल। ऐ अवसरिपर श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक दूटा पोथी क्रमश: ‘पसेनाक धरम’ आ ‘मधुमाछी’ (लघु कथा संग्रह)क लोकार्पणक संग वितरण भेल। संगे हालहिमे प्रकाशित डॉ. रंगनाथ दिवाकार (मूल नाम- रंगनाथ चौधरी)क लधु कथा संग्रह ''भखरैत नील रंग'' किछु कथाकारकेँ देल गेलनि। अगिला गोष्ठी सुपौल जिला अन्तर्गत ‘निर्मली’मे हएत से सर्वसम्मतिसँ निर्णए भेल। फोटोक संग ब्रेकिंग न्यूज निम्न अछि- संयोजक- श्री राजदेव मण्डल ‘रमण’ आयोजक- उन्मुक्त उद्घाटन- डॉ. खुशीलाल मण्डल, डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’, श्री भोगेन्द्र यादव ‘भाष्कर’, श्री कमलेश झा, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री राजदेव मण्डल, डॉ. शिव कुमार प्रसाद। दू शब्द- श्री कमलेश झा, श्री नन्द विलास राय, श्री बाल गोविन्द यादव ‘गोविन्दाचार्य’ अध्यक्ष मण्डल- श्री दुर्गानन्द मण्डल (बनरझूला), श्री भोगेन्द्र यादव ‘भाष्कर’ (अवकाश प्राप्त शिक्षक), डॉ. शिव कुमार प्रसाद, डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’,श्री जगदीश प्रसाद मण्डल आ श्री कमलेश झा। संचालन समिति- श्री दुर्गानन्द मण्डल आ उमेश मण्डल पोथी लोकार्पण- श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक दूटा लघु कथा संग्रह क्रमश: (1) पसेनाक धरम, (2) मधुमाछी। पहिल पोथीक लोकार्पण कर्ता- प्रो. खुशीलाल मण्डल, प्रो. राम विलास राय आ डॉ.योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’। दोसर पोथीक लोकार्पण कर्ता- श्री भोगेन्द्र यादव ‘भाष्कर’, श्री रतन कुमार ‘रवि’ आ श्री कमलेश झा। कथा पाठ- पहिल सत्र- (1) चोरविद्या- पल्लवी कुमारी (2) केतौ किछु होउ- लक्ष्मी दास (3) टोन- दीन बन्धु झा समीक्षा- श्री कमलेश झा, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, श्री राजदवे मण्डल, बाल गोविन्द यादव ‘गोविन्दाचार्य’ दोसर सत्र- (4) भगवनान भरोष- ललन कुमार कामत (5) सपनेमे बीति गेल जिनगी- संजीव कुमार ‘शमा’ (6) शबनम- उमेश नारायण कर्ण (7) मुड़नक मुर- उमेश मण्डल समीक्षा- श्री राम विलास साहु, डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’, श्री शम्भु ‘सौरभ’, दुर्गा नन्द मण्डल (बनरझूला) तेसर सत्र- (8) सस्ता रोबे वार-वार- डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ (9) गंगा सुखा गेल- डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ (10) गंगा नहाएब- राम विलास साहु (11) टुटैसँ बँचि गेल- दुर्गानन्द मण्डल समीक्षा- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री भोगेन्द्र यादव ‘भाष्कर’, श्री संजीव कुमार ‘शमा’, श्री राजदेव मण्डल आ उमेश मण्डल। चारिम सत्र- (12) शिक्षाक अन्तिम उद्देश्य- नन्द विलास राय (13) वेस्तता- बेचन ठाकुर (14) छोटू- शम्भु सौरभ समीक्षा- श्री शारदा नन्द सिंह, श्री कमलेश झा, श्री अजय कुमार ‘पिण्टू’ पाँचम सत्र- (15) तितल बिलाड़ि- शिवकुमार मिश्र (16) आब कहिया चेतब- कपिलेश्वर राउत (17) लाचारी- गौड़ी शंकर साह समीक्षा- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’, श्री नन्द विलास राय। छठम सत्र- (18) पहपटि- जगदीश प्रसाद मण्डल (19) इजोरिया राति- जगदीश प्रसाद मण्डल (20) खलिया बन्दूक भटाभटि- शारदा नन्द सिंह समीक्षा- श्री कमलेश झा, डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’, डॉ. शिवकुमार प्रसाद, श्री बाल गोविन्द ‘गोविन्दाचार्य’, श्री दुर्गा नन्द मण्डल (बनरझूला) मुन्नाजी जन-चेतनाक स्वर वाहक मधुप "हेड़ा गेलै, तकनो नै भेटत आब"। ई कोनो मूल्यवान वस्तु नै लोकक चेतना शून्य संस्कार दिस संकेत करैत मधुपजी मैथिली साहित्य परिषद्क सम्मेलन (बहेड़ा)मे देने रहथि। तात्कालीन वा समकालीन साहित्यकारक भीड़ मध्य ओ एकसर कवि, गीतकार छलाह जनिक स्वर लो चेतनाक स्वर बनि सोंझा अबैत छल। ओ अपन बौद्धिक वा मानसिक सोचसँ लोकक खसैत संस्कार, घटैत मानवीय संवेदनापर सतत चिंतित रहि लोककेँ उठेबाक आ झकझोरबाक काज करैत रहलाह। हुनक कविताक केंद्र-बिंदुमे रहैत छल गाम समाजक वंचित-उपेक्षित वर्ग आ ओकर मानसिक पीड़ा। तहिया सामंती विचारसँ पनघैत अत्याचार आ मूँहसँ लाचार बोनिहारक दुख-दर्दकेँ अपन कविता माध्यमे चित्रित कऽ मधुपजी जगजियार भेला। सभ रस-अलंकारसँ सुशोभित रचना सब मार्मिक आ हृद्यस्पर्शी बनि कऽ सोंझा अबैत रहल। एकटा रोटीक कतेको बखरा आ ओइपर छुच्छ नूनसँ गुजर करै बलाक मर्मान्तक पीड़ा। दोसर दिस नव-धनिकक छल-छद्म-घमंड। एक दिस भरि दिन बैसि कऽ ताश ओ तमाशा आ दोसर दिस भरि दिन खटियो कऽ घसल अठन्नी लेल मरैत जन बोनिहार। एक दिस भभा-भभा कऽ हँसैत चेहरा आ दोसर दिस जाबल मूँह। एक दिस डाक-निलामी बला जमिंदारक प्रशंसामे रचल साहित्य आ दोसर दिस......................................................खाली शून्य। मुदा मधुपजी ऐ दोसर दिसकेँ बेसी दिन खाली नै रहऽ देला। ओहन भीषण सामंती व्यवस्था रहितों ओ शब्दकेँ अपन हथियार बना लेला। भने ओ शब्द कहियो प्रगतिवादी कविता बनि गेल तँ कहियो नचारी तँ कहियो किछु मुदा मधुपजी केंन्द्रमे सभ दिन वंचित वर्गेके रखलखिन। जन-मनक पीड़ासँ पीड़ित कविक स्वर जँ केकरो रचनासँ बहराएल तँ ओ स्वर छल मधुपजीक जे खेत-खरिहान, जमीन-असमानके अपन आंतरिक विद्रोह वा समाजिक विसंगतिकेँ कागजपर आनि सभहँक सोंझा देखार कऽ कऽ रूकै छला। मधुपजी कविते लेल नै बल्कि अत्यंत लोकप्रिय गीताकरक रूपमे सेहो स्थापित छथि। हुनक गीतक एक-एक पाँति अनमोल अछि। कविते जकाँ समाजिक उत्पीड़न। जीवनक आन विसंगतिकेँ गीतोमे अनलाह आ ई सिद्ध केला जे राग-लय-ताल प्रगतिशील ओ बौद्धिक हेबाकमे रुकावट नै छै। मैथिलीक किछु आलोचकक मत जँ छोड़ि देल जाए तँ ई स्पष्ट रूपें ध्वनित होइए जे ओइ समयमे मधुपजी एकमात्र ओहन साहित्यकार छला जिनकर गह-गह लोक-चेतनासँ भरल छल। कहबा लेल तँ कविवर सीताराम झाजी सेहो छथि मुदा हमर मतानुसार ओ भाषामे लोक-चेतनाक पक्षधर छला। विचारमे सीताराम झा प्रगतिशील रहितों मधुपजीक आगू कमजोर सिद्ध होइत छथि। आ तँए हम मधुपजीकेँ तात्कालीन मैथिलीक पहिल जन-कवि मानै छी। ओना किछु आलोचक जनिका वैचारिक दरिद्रता छनि ओ वैद्यनाथ मिश्र "यात्री"केँ जन-कवि मानै छथि मुदा ऐ संबधमे 2 टा गप्प मोन राखब जरूरी— 1) यात्रीजी लेल जे जन-कवि प्रयोग होइत अछि से हिंदीसँ आयातति अछि। भऽ सकैए जे ओ हिंदीमे जन-कवि होथि मुदा मैथिली लेल अनफिट छथि। मैथिलीक अपन समस्या छै आ तकर समाधान मात्र मैथिलीए साहित्यकार कऽ सकैए। ई आयातित साहित्यकार ओ आयातित पदवीसँ मैथिलीक कल्याण नै हेतै। प्रायः मधुपजी कुल 23गोट प्रकाशित आ 12-13 टा अप्रकाशित पोथी छनि जैमे ओ कुल 1टा हिंदी रचना केला (भऽ सकैए कोनो आत्मीय संपादकक बलजोरी केलापर) तँए हमरा हिसाबें यात्रीजी नै मधुपजी जन-कवि छथि। 2) यात्री जीक जीवन चरित्र देखलासँ ई स्पष्ट अछि जे हुनका अपना-आपपर विश्वास नै छलनि। कहियो ओ हिंदू बनि जाइत छथि तँ कहियो बौद्ध। खन ओ अपनाकेँ प्रतिमा-भंजक कहै छला तँ खन पतिया करबाबै छला। कहियो अपनाकेँ निरपेक्ष कहै छला तँ कहियो वामपंथमे प्रतिबद्ध रहबाक लेल फाँड़ बन्हैत छला। कुल मिला कऽ यात्रीजीकेँ अपना उपर विश्वास नै छलनि आ जकरा अपना उपर विश्वास नै से अपन समाजक उपर विश्वास कोना करत। आ तँए हमरा हिसाबें मधुपजी जन-कवि छथि । गाम समाजमे चेतनाक निर्माण करऽ बला मधुपजी, अपन उर्जासँ समाजक कटु सत्यकेँ हटबऽ बला मधुपजी जे की जन-कविक सुच्चा हकदार छथि से किछु हिंदी बला सभहँक कारणें कतिया देल गेला। मुदा कतिएलासँ कियो कतिया नै जाइ छै। मधुपजी मोन पड़ैत रहता बेर-बेर, पुश्त-दर-पुश्त। परती टूटि गेलै सनातनी रचना प्रकियामे आबि रमि गेला। अगिला पाँतिक पछिला सेवक जकाँ नै। अपन लूरि-बुद्धिसँ बनाओल लीख धऽ लेलनि। आगाँ बढ़ि संगोरभेटलनि। मुदा ओइ संगोरसँ उत्साहित रहितो चौबटिया तकैत रहलाह। जतै गर लगलनि अपनाकेँ कतिया अपन सोच-विचारसँ अड्डा जमा लैत छलाह।संगबैया सभकेँ लागनि कठाइन। तखन ओ सभ शुरू कऽ दै छलाह हुनक अदगोइ-बदगोइ। अपन आन-बान-शानक रक्षार्थ सोचि आगाँ बढ़बाक चेष्टाकरैत रहैत छलाह। मुदा फेर वएह रामा वएह कठोलबा। किएक तऽ अपनाकेँ कतिया कऽ रखबामे हानि होइन। कियो अहंकारी तँ कियो निरंकारी कहनि।मुदा हम हुनकर सोचें हुनका चमत्कारी बुझै छी। अपन नव आँखि-पाँखिसँ ओ उत्कृष्ट रचनाकारक रूपें देखार भेला। अरविन्दजी जखन कविता लिखब शुरू केलनि तखन ओ खेत उपजाउ नै छलै। उस्सरछलै, परती पड़ल छलै। अपने नित नव रचनासँ ओकरा जोति कोड़ि दूनू पक्षकेँ चित्रित करबाक सफल-असफल प्रयास करैत रहलाह। एक दिस वंशानुगतवा परंपरानुगत अपन सनातनी सोचकेँ रखलनि तँ दोसर दिस सामंती सोचसँ पीड़ित समाजक ओइ वर्गकेँ चिन्हित कऽ रचनात्मक रूपें चरियबैत रहलाह।हुनक रचनामे उच्च वर्गक संग निम्न वर्गक समाजिक दशा-दिशा एकै संग अभरि कऽ सोंझा अबैत रहल।कतौ अहंकारक समावेश नै। सगरो अपन सोचकचिरहारा खेलैत सब रचना समाजक सब वर्गसँ उखड़ि सोंझा आएल अछि। एक कविक मानसिकता जे झाँपल चीजकेँ उघारि सोंझा आनए तकर माँजलकलाकार छथि अरविन्द जी। एखनो अपन उत्कृष्ट समाजिक आ गमैया परिवेशकेँ सहेजि कऽ रखने छथि। समाजक सब पक्ष जाहिमे अपन समवेत स्वरउभारबाक प्रयासमे सफल देखाइ छथि। गाममे रहि कऽ अरविन्दजी गमैया सोचकेँ उभारबाक पूर्ण प्रयास करैत रहलाह। ओ जमींदार मात्र नै एकटा गिरहथक भूमिकाक निर्वाह करैत रहलाहअछि। तें हिनकर रचनामे गमैया जीवन आ गामक आचार-विचार संस्कार प्रस्फुटित भऽ सकलनि। किछु गोटे अपनाकेँ गाममे रहि गमैया रचनाकारकदंभ भरैत छथि मुदा अरविन्दजी गामसँ शहर, महानगरक जीवनक सुख-दुख भोगियो कऽ गमैया जीवनक उत्कृष्टता अपन रचनामे देखबै छथि। गमैयाशब्दक ठाम-ठीम प्रयोग जगदीश प्रसाद मंडलजीक पछाति हिनक रचनामे सहजहिं अभरत। 2011 मे विहनि कथापर किछु गोटे जहन झौहरि शुरू केलथितखन अरविन्दजी ओहि शब्दक पुरान प्रयोगी रहथि। बात विहनि शब्द दऽ उठलै तँ अरविन्दजी कहलखिन जे झौहरि करऽ बला सभ गिरहत नै हेता।बटैयापर खेती करबैत हेता। हम अपने खेतपर रहि सभ दिनसँ "विहनि" केर उपभोगी छी। आगाँ कहलनि जे हमर कविता आ गजलमे विहनि शब्द आओकर अभिप्राय बहुत पहिने अभरि सोझा आबि चुकल अछि। हमरा कहबाक जे अरविन्दजी गमैया शब्दवलीपर सेहो मजगूत पकड़ बनौने छथि। कविताक पछाति अपन कथामे सेहो ई गमैया परिवेशकेँ देखौने छथि। गामक समाजिक रूपरेखाके उजागर करैत रहलाह अछि। हिनक कथा समाजक सभवर्गक प्रतिनिधित्व करैए। कविते जकाँ उच्चा आ निम्न वर्गीय सोचक बीच पुल जकाँ काज करैए हिनक रचना। कविता संग्रह "परती टूटि रहल अछि" केरहिन्दी (अनुवाद अजित अजाद)सँ हिंदी जगतमे सेहो हिनक रचना पसरल। ऐ सभहँक पछाति आएल "बहुरुपिया प्रदेशमे"। ई गजल संग्रह हिनकारचनात्मक रूपें आरो सक्कत केलक अछि। ओना तँ ऐमे प्रकाशित गजल सनातनी गजल वा संगोर जकाँ बहरहीन, छंद मुक्त अछि। मुदा बहरनुक्तोहोइत हिनक गजल सभमे गमैया सोच, गमैया शब्दक समावेश अछि जै कारणसँ हिनक गजलमे प्रवाह जकाँ आबि गेल अछि। ऐ तरहें अरविन्दजीरचनारत रहि गमैया शब्द आ एकर चित्रणसँ परती पड़ल रचनाक जमीनकेँ तोड़बाक सफल प्रयास केलनि। तँइ हिनका गामक कथाकार वा कवि कहबामेहमरा कोनो संकोच नै। विशेष कऽ गाम-समाजक आ ओकर शब्दक कोनो घटनाकेँ देखार करबाक नीयत हिनका अपन समकालीन रचनाकार सभसँ बेसीआगू बढ़ा दैत अछि। अरविन्द ठाकुरजी संग साक्षात्कार आन-लाइन # 1 # वर्तमान गज़ल कोन दिशा मे अछि ? वर्तमान गज़लक दिशा हमरा बहुत स्पष्ट आ सोझराएल नहि बुझाइत अछि। कने भुतलाएल आ भ्रमित जकाँ अछि। हमर अपन गज़ल ( जेकरा किछु गोटे आजाद गज़ल वा गज़लनुमा कहए छथि ) मे जोर विचार आ विषय पर रहल अछि, बात कहबा पर रहल अछि आ एहिमे कनेक हद तक व्याकरणक सभ अंगक खेयाल नहि राखल गेल अछि। ई व्याकरणक अनदेखी सप्रयास नहि, संशयसँ त्रान पएबाक लेल अछि। “संशयात्मा विनश्यति” हमर ध्यानमे रहए आ जखनि व्याकरण बाधा बनि संशय उत्पन्न करए, हमर अवचेतनक अनायास प्रयासक परिणामस्वरुप कात होइत चलि गेल अछि। व्याकरणक बन्धनसँ भागब आ ओकर समझक कमी सेहो हमर सीमा भए सकैत अछि किन्तु ओ बात अलग। एक बातमे हमरा कनिकहु संशय नहि अछि जे मुकुट पहिर लेब मथदुख्खीक उपचार नहि अछि आ अपन घड़ीसँ संसारभरिक घड़ी मिलाएब उचित नहि अछि। अन्य बहुतरास गजलगोसभक जोर गज़लक व्याकरणपर छनि किन्तु हुनकासभक नाराजगीक संभावनाक बादो हमरा ई कहएमे संकोच नहि जे एहि बेसीतर गज़लसभमे “ क्या बात है !” बला बात नहि आबए छै , कहनमे डंक नहि बुझाइ छै। एतय हमरा महर्षि अरविन्दक कथन “ मात्र ब्रेन-माइण्डसँ जुनि लिखू। भावना आ विजनक आत्माक भीतर पहुँचिकए लिखब कविता लिखबाक सही ढंग अछि…“ आ दिनकरक कथन “ किछु कवि एहनहु अवश्य होइ छथि जे मात्र काफ़िआ आ अन्त्यानुप्रासक संकेतपर अनुकूल भाव जुटाकए पूरा गज़लक-गज़ल लिखि जाइ छथि, किन्तु काव्य-रचनाक सामान्य पद्धति ई नहि अछि। कविता त प्राय: एहि लेल रचल जाइत अछि जे कविक हृदयमे पहिने भाव आबैत अछि आ तखनि ओ ओकर अनुकूल छंद, रीति आ तुकक चयन करैत अछि अथवा आवश्यकता पड़लापर छंदोबद्धहिकें तोड़ि दैत अछि……“ उद्धृत करबाक बेगरता बुझाइत अछि। कतओ हम पहिने लिखि वा कहि चुकल छी जे मैथिलीक मिजाज गज़लक बहुत नजदीक नहि छै। ई अलग बात जे मैथिलीमे गज़ल लिखब असंभव नहि छै किन्तु कठिन त छैहे। जखनि साहित्य अकादमीसँ विधिवत स-राशि प्रमाणपत्र प्राप्त माया बाबू सन दिग्गज एहि मामलामे थस मारि सकए छथि आ एहि थस मारएकेँ सकारि सकए छथि त किछु ने किछु गड़बड़ त कतहु छै ! तेँ हमरा लागैए जे साहित्यकार लोकनि गज़ल कहैत रहबाक दुस्साहस त करिते रहता किन्तु गज़लक स्थान मैथिलीमे बहुत सम्मानप्रद रहत आ एकरा महत्वक विधा मानल जएतैक ,से संभावना कम जकाँ छै। # 2 # अहाँसभ हिन्दीक दुष्यन्त कुमार, अदम गोंडवी आदिकेँ अपन आदर्श मानै छिऐ मुदा हुनकर सभहक गज़ल पूरा-पूरी बहर-ओ-व्याकरण मे अछि, तखन मैथिली गज़ल मे अहाँ व्याकरण नै मानै छिऐ तकर की कारण ? साहित्य लेखन कोनो आइसँ प्रारम्भ भेल काज नहि छै। ई आदिकालसँ अनवरत चलि रहल अछि आ एकदमसँ विभिन्न आ विरोधाभाषी दौरसभसँ गुजरल अछि। कहिओ वन आ ओतय निर्मित आश्रमक एकान्तमे एकर साधना होइ छल आ कहिओ महल-राजमहलक प्रश्रयमे एकरा बुनल-गुनल जाइत रहल अछि। आश्रमक लिखल साहित्य प्रकृतिक बुनल सांसारिक संरचना आ स्वयंकें बुझबाक प्रयासक प्रतिफल छलै जखनिकि राज्याश्रयक साहित्य अपन मालिक-मलिकारक आमोद-प्रमोद आ हुनक कृपा प्राप्त करबाक लेल होइत छलै। अजुका युग ताहिसभसँ बेलगट अलग युग अछि आ एकर साहित्यक उद्देश्य बदलि गेल अछि आ तें वर्तमान साहित्यक ओजन आ तरजू-बटिखरा वएह नहि भए सकैत अछि जे पहिनुका युगक छल। जखनि मम्मटक कहब छनि जे काव्यक लेल सम्मितत्रयीक कान्तासम्मितक उपयोग हएबाक चाही त एकर पाछू ई उद्देश्य आ अभिप्राय रहल हएत जे काव्यमे भावक अभिव्यक्ति पत्नीक लेल निर्धारित हाव-भावसँ कएल जाय जाहिसँ पति-परमेश्वर,राज-राजेश्वर आदि सत्ता-प्रतिष्ठान कें नीक लागनि, रोष नहि होइनि। आइ लोकतंत्र अछि आ साहित्यकारकें अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता प्राप्त अछि, पत्नीक भुमिका सेहो बदलल अछि आ साहित्यकार कोनो प्रजापालकक अधीनक पेटपोसुआ नहि अछि। ओकरा लग चुनौती छै जे ओ वाजिब बात कहए, ठोकिकए कहए आ लोकक रोष-निन्दाक परवाह नहि करए। तखनि कोनो कवि अपन अभिव्यक्ति लेल कान्तासम्मितक ठामपर प्रभुसम्मित या सुहृदसम्मित विधिसँ कविता करत त ओकरा शास्त्रविरोधी कहब उचित हेतए की ? रामधारी सिंह दिनकर कहै छथि जे हुनका समयमे कविता करएसँ पहिने पिंगल पढब अनिवार्य छल। आब कतेक कविकें पिंगलक परिभाषाहु बुझल छनि, पढबाक गप जाए दिअ। पिंगलक अवहेलनाक संग प्रस्तार साधबाक काज आ गण, मगण, भगण, नगण आदिक ग्रंथक आदि छंदक प्रथम गण अशुभ नहि शुभ राखबाक परिपाटीसभ सेहो भूतकालक वस्तु भए गेल अछि। अनेक प्रतिष्ठित आधुनिक कवि अपन कविताकें छंदक बंधनसँ मुक्त कए लेलनि अछि। एहिना गद्यलेखनक लेल सेहो मारिते रास नियमसभ बनल छल। साहित्य दर्पणमे कहल गेल अछि जे “ कथामे सरस वस्तु गद्यमे कहल जाएत आ ओहिमे कतहु आर्या छंद सेहो हएत, कतहु वक्त्र आ अपवक्त्र सेहो हएत। प्रारम्भमे पद्यबद्ध नमस्कार हएत आ फेर साधु-प्रशंसा आ दुर्जन-निन्दा हएत।“ आब कतेक कथाकार एकरा जानए छथि,मानि दए छथि आ ओकर पालन करए छथि ? आब एकर कोनो आवश्यकता-उपयोगिता नहि रहल आ तें कोनो कथाकार एकर पालन नहि करए छथि आ जँ केओ करता त पुरातनपंथी आ परम-बुड़ि मानल जएता। हजारी प्रसाद द्विवेदी पुरना युगक चर्चा करैत कहए छथि जे “ परवर्ती गद्य-काव्यमे नाना-भांतिसँ अलंकृत कए सुललित गद्यमे कथा लिखबहि प्रधान भए गेल छल। एहिमे कविकें कथा कहबाक धड़फड़ी नहि अछि। ओ रूपक आ दीपक आ श्लेष आदिकें अपन प्रधान कृतित्व मानि लैत अछि………ओ कोनो एहन अवसरक उपेक्षा नहि करत जतय ओकरा एकटा उत्प्रेक्षा, दीपक या रूपक या विरोधाभाष या श्लेष करैक अवसर भेटि जाए।“ दण्डी, सुबंधु आ बाणभट्ट एहि देशक तीन नमहर गद्यकार मानल जाइ छथि। सुबंधु त अपन ग्रन्थक आरम्भहिमे प्रतिज्ञा कए लेने छला जे आदिसँ अंत तक श्लेषक निर्वाह करता। बाणभट्टक कथन छनि – “ सुस्पष्ट मधुरालापसँ आ हाव-भावसँ नितान्त मनोहर तथा अनुरागवश स्वयमेव शय्यापर उपस्थित अभिनवा वधु जकाँ सुगम कलाविद्या संबंधी वाक्य-विन्यासक कारण सुश्राव्य आ रसक अनुकरणक कारण बिन प्रयास शब्द गुंफकें प्राप्त करएबला कथा केकर हृदयमे कौतुका-युक्त प्रेम नहि जनमाबैछ ? सहजबोध्य दीपक आ उपमा-अलंकारसँ सम्पन्न अपुर्व पदार्थक समावेशसँ विरचित आ अनवरत श्लेषालंकारसँ किंचित दुर्बोध्य कथा-काव्य, उज्ज्वल प्रदीप जकाँ उपादेय चंपक-पुष्पक कलीसँ गूथल आ बीच-बीचमे चमेलीक पुष्पसँ अलंकृत घन-सन्निविष्ट मोहनमालाक भाँति केकरा आकृष्ट नहि करैछ ?” उपरोक्त तीनू श्रेष्ट गद्यकार जाहि गुणाढ्य पण्डितक वृहत्कथा ( वस्तुत: ‘ बड्डकहा’ ) के ॠणी मानल जाइ छथि ताहि गुणाढ्य पण्डितक कथासभमे भाषागत अलंकरणक दिस ओतेक ध्यान नहि अछि जतेक कथाक वक्तव्य वस्तु दिस। हिनकर कथासभमे ‘कहानीपन’ ततेक प्रचूर मात्रामे अछि जे आन कोनो अलंकरणक बेगरते नहि बुझाइत अछि आ तें ई ग्रन्थ प्राय: दू हजार वर्षसँ भारतीय कल्पना्कें अभिभूत कएने रहल अछि। ई मूलरूपसँ प्राकृतमे लिखल गेल छल आ प्राकृतहु की त जार्ज ग्रियर्सनक अनुसार पैशाची प्राकृतमे। नियम-कानून, सिद्धान्त आ व्याकरणक दुरूहता त संस्कृत भाषाक उत्पत्ति अछि आ संस्कृत साहित्यमे विद्रोहक परम्परा नहि रहल अछि। एहि देशमे विद्रोहक पहिल बीया गौतम बुद्ध खसैलनि, ओ अंकुरित चाहे जहिआ भेल हुअए, पल्लवित आ पुष्पित ओ तखनि भेल, जखनि सिद्ध-संतसभक समय आएल। विद्रोहक तेवरहिक संग सिद्ध लोकनिक प्राकृतमे लिखल साहित्य आधुनिकताक वाहक बनल आ एतहिसँ परम्परासभकें चुनौती भेटए लागल। पुरान परम्परासभक टुटलाक बाद जे नव परम्परासभ काएम भेल ओहि मे सभसँ प्रमुख परम्परा ई अछि जे साहित्यिक अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता कोनो नियमकें नहि मानैत अछि। साहित्य आ समाजक एहि स्वतंत्रता, आधुनिकताक युगमे सेहो अनावश्यक बंधनसभकें यथावत मानल जाय से आग्रह-दुराग्रह किऐ राखल जाय ? एहिना नाटकक लेल आचार्य भरतमुनि सन-सन विद्वानक बनाएल कतेको विधान अछि जे समयक संग अनुपयुक्त होइत प्रचलनसँ बहराए गेल अछि। जयशंकर प्रसादक पहिल चारिटा नाटक पुरनका रुढिक अनुसार नांदी, सूत्रधार, स्वगत, विष्कंभक आदि नाटक शास्त्रक नियमसँ जकड़ल अछि किन्तु बादक नाटकसभमे एहि प्राचीनताक बहिष्कार देखाइ पड़ैत अछि। तें ओहिमे मंगलाचरण, आकाशभासित नांदी, सूत्रधार आ भरतवाक्य नहि अछि। एतेक तक जे हत्या, युद्ध आदि जे बात नाट्यशास्त्रक अनुसार वर्जित अछि, नाटकमे ओकरहु बेरोक-टोक प्रयोग भेल अछि। नाटककारक कवि हएब अनिवार्य नहि रहल आ परम्परागत नौ अंकक वाध्यता टुटि पांच अंकसँ उतरैत एकांकी पर पहुँचि गेल। एहिसभ उद्धरणक परिपेक्ष्यमे ई बेधड़क कहल जाए सकैत अछि जे सभक सभ प्राचीनहि अर्वाचीन आ शाश्वत नहि भए सकैछ आ तें व्याकरण आ विधान अपन ठामपर रहओ, जिनका अरघए छनि से एकर उपयोग-प्रयोग करथु किन्तु एकर अनुकरणक कोनो वाध्यता वर्तमान आधुनिक युगक साहित्यकारपर लागू करब बहुत समयानुकूल नहि बुझाइछ। पाछू घुरि जएबाक प्रयत्नमे बहादुरी आ उद्भटता जतेक हुअए बुद्धिमानी एकदम्मे नहि अछि। अजुका वर्तमान संघर्षमय, संकटमय अछि। सौंसे पृथ्वी जेना ब्रह्माण्डक कड़ाहीक अदृश्य तप्त-रसमे खौल रहल अछि। प्रतिक्षण दुनियाक बाहरी आ भीतरी नक्शा बदलि रहल अछि। कालि तक जे ध्रुव-सत्य छल, आइ ओ अस्थिर आ डमाडोल प्रमाणित भए रहल अछि। आइ जखनि हमरासभक सोझाँ नव-नव ओझराएल समस्यासभ सुरसा जकाँ मुँह बउने उपस्थित अछि तखनि पुरनका कलासभक लेल हाय-हाय करब फिजूल अछि। पुरनका ग्रन्थसभक संस्कृतमे जतए व्याकरणक विरोध भेटैछ ओतय पाठककें मन राखबाक लेल कहल जाइत अछि - ‘ आर्षवाक्यं प्रमाणम ‘ अर्थात जुनि देखू व्याकरण, देखू जे ॠषिक वाक्यक आत्मा की अछि। अहाँ त बस ओहि आत्मस्फुर्तिकें लए लिअ, शेषकें ओकरहि चिन्तापर छोड़ि दिअ। मम्मट, भामह, राजशेखर, आनन्दवर्धन, कुन्तक आदि अनेक आचार्यक प्रदत्त शास्त्रीय नियमक बावजूद शास्त्र स्वयं साहित्यक स्वायत्तताक पैरोकारी करैत अछि। कहल गेल अछि जे कविता स्वत:प्रमाण अछि, ओकरा अपन प्रमाणीकरणक लेल अपनासँ इतर कोनो प्रमाणक अपेक्षा नहि। अनुभववैशिष्ट्यक कारणें कविताक उपकरण लौकिक उपकरणसँ भिन्न भए जाइत अछि, ओकर भाषा सेहो लौकिक सामान्य भाषासँ अलग भए सकैत अछि। अज्ञेय कतहु लिखलनि अछि जे लेखक अग्निगर्भा होइत अछि – लीक तोड़ैत अछि, नव-नव प्रयोग करैत अछि आ प्रयोगसँ नव जीवन-सत्य पाबैत अछि। अपन गज़ल-संग्रह “बहुरूपिया प्रदेशमे” के अपन बातमे हम एहि दिआ थोड़ेक-किछु कहने छी। आन बहुत गोटे जकाँ हमरो लग बहुत रास अवगुणसभ अछि, धैर्य-धनक कमी सेहो अछि। विश्वविख्यात शायर सभ सम्पुर्ण जीवनमे जतेक रचलनि तेकर बराबरी हमसभ कम समयमे ओतबे लिखिकए करए चाहए छी त ओकर परिणाम इएह होनाइ छै। परिमाण(quantity) त पुरि गेल एकर स्तर (quality) केहन भेल से फैसला त आब भविष्यहिक हाथमे अछि। दुष्यंत कुमार आ अदम गोंडवी प्रिय छथि किन्तु हम हुनकासभक पासंगहुमे नहि छी से हमरा बुझल ए। हम “समान-विद्या-वयोऽलंकारै: अखिल-कला-कलापालोचन-कठोरमतिभि:, अतिप्रगल्भै: अग्राम्य-परिहास-कुशलै:, काव्य-नाटकाख्यानकाख्यायिका-लेख्य-व्याख्यानादि-क्रिया-निपुणै:, विनय-व्यवहाराभि:, आत्मन:प्रतिविम्बैरिव राजकुमारै:सह रममाण “ नहि छी, अरविन्द ठाकुर छी आ अपन सीमासभक संग अभिन्न जकाँ अरविन्द ठाकुरहि रहए चाहए छी। # 3 # ओना पुरस्कार त प्रोत्साहन लेल होइछै मुदा मैथिलीमे पुरस्कार भेटिते साहित्यकारक गति रुकि जाइ छै। एना किऐक ? पुरस्कार जँ प्रोत्साहन लेल देल जाइछै त ई आन कोनो भाषा आ संसारक गप भेल। सएह जँ मैथिलीओमे होइतए त से मैथिली केना भेल। मैथिलीक पुरस्कारक सूचीसभ अपन व्यथा-कथा अपनहि कहि रहल अछि , सुनएबला कान चाही ,देखएबला आँखि चाही , सिहरएबला आत्मा चाही। बाल गंगाधर तिलक केर गप मन पड़ैत अछि जे कहने छला जे महान उप्लब्धि सरलतासँ नहि भेटैत अछि आ सरलतासँ भेटल उप्लब्धि महान नहि होइत अछि। एहि कथनक परिपेक्ष्यमे मैथिली पुरस्कार आ पुरस्कृत लोकक मुल्यांकन सरलतासँ कएल जाए सकैत अछि। ओना पुरस्कार भेटलाक बाद साहित्यकारक गति रुकि जेबाक प्रश्न बहुआयामी अछि। ई बहुत बातपर निर्भर अछि – साहित्यकारक व्यक्तित्वपर, हुनक कृतित्व पर , पुरस्कारक प्रति हुनक दृष्टिकोणपर , पुरस्कारक राशिपर ,पुरस्कार-विशेषक विधान आ वितरण-प्रणालीपर आदि-आदि। जीवकान्तक खिस्सा मन पड़ैए। अनेक वर्षसँ कतारमे लागल रहथि आ नम्बर अएबे नहि करनि। जाहि बेर पुरस्कार भेटबाक पुर्वाभास आ संभावना रहए, ताहि बेर हुनक पोथीकेँ फेरसँ नवका गत्ता पहिराएल गेल आ हुनका एलन गिन्सबर्ग आ राजकमल चौधरीक मिलल-जुलल अवतारबला कवि घोषित करएबला अग्निपुष्पक भंगिआएल टिप्पणिक संग पुनर्प्रस्तुतिकरण भेल छल। ओहि पुरस्कारसँ किन्तु जीवकान्तक मन नही अघएलनि आ शिशु-काव्यपर पुरस्कारक घोषणा होइतहि ओ शिशु-काव्यक पथार लगाबएमे भिड़ि गेला आ अन्तत: ओहो पुरस्कार ओ लैए लेलनि। युवा पुरस्कार लेल ओ घुरिकए युवा भैए नहि सकैत छला आ जीवन जँ दगा नहि देने रहतिअनि त अनुवादहुक पुरस्कार ओ लैए कए मानितथि। मैथिलीक अधिकतर पुरस्कार प्रोत्साहन लेल नहि अपन लोककेँ उपकृत करबाक लेल देल गेल अछि। जँ वाध्यतावश कोनो सुपात्रकेँ भेटलहु अछि त से हुनक प्रतिनिधि आ श्रेष्ट संग्रहपर नहि, बेरपर भेटि गेल जएह-सएहपर। भीमनाथ झाकेँ जहि पोथीपर अकादमी पुरस्कार भेटल ताहिसँ बेसी श्रेष्ट आ उत्तम पोथीसभ हुनका हाथें आकार लेने अछि आ एकबेर की, चारि बेर पुरस्कार लेबाक पात्रता ओहि पोथीसभक अछि। ई त एक तरहे भीमनाथ झाक संग अन्याय भए गेल। हुनक पुरस्कृत पोथीकें हुनक प्रतिनिधि रचना मानि आन भाषाक पाठक हुनका प्रति तेहने धारणा बनाएत जे वस्तुत: हुनक छनि नहि। भगत सिंह कहने छला जे “ कोनो समाज अथवा देशकें चिन्हबा लेल ओहि समाज अथवा देशक साहित्यसँ परिचित हएबाक परम आवश्यकता होइत अछि किएक त समाजक प्राणक चेतना ओहि समाजक साहित्यमे विद्यमान रहैत अछि।“ अखनि जे हालत अछि ताहिमे पुरस्कृत अधिकांश मैथिली पोथीसँ एहि क्षेत्रक जे पहिचान बनैत अछि से अत्यन्त पिछड़ल, अतीतजीवी आ आधुनिकताविरोधीक अछि। पुरस्कार भेटएसँ पहिने राजमोहन झाक ‘भनहि विद्यापति’ आ ‘टिप्पणित्यादि’ छपल रहनि त ओ मजाकमे कहैत छला जे कहीं एहि दुनूमेसँ कोनो पोथीपर ने अकादमी हमरा पुरस्कार दए दिअए आ हम लाजे मरि ने जाइ। ओना गति रुकबाक मामला विशेषतया ओहने लोकक संग भेल अछि जिनका पुरस्कार देबाकहि लेल साहित्यकार बनाएल गेल वा मानल गेल। पुरस्कार-केन्द्रित लेखन छुतहर-लेखन अछि। ई ओहेन लोकक काज अछि जेकरा लेल सफलता प्रमुख छै आ सार्थकता गौण। एहन मानसिकताबला लेखक भस्मासुर अछि आ पहिने अपनहि निजताक हत्या करैत अछि। एहन लेखकक लेखन निरर्थक अछि, साहित्यक दृष्टिकोणसँ निकृष्ट आ समाज लेल अहितकर अछि। एहन लेखन दीर्घजीवी नहि भए सकैछ आ अधिकतर मामलामे एहन लेखन पुरस्कारक खैरात भेटितहि विस्मृत भए जाइत अछि, मरि जाइत अछि। अपन लेखक आ लेखनक सार्थकताक पवित्र उद्देश्य आ कामनासँ लिखनिहार जे शुद्ध साहित्यकार छथि से पुरस्कार भेटलाक बादो लिखैत रहला अछि , लिखबाक गति भनहि कने कम भए गेल हुअए। # 4 # वर्तमान समयमे मैथिलीक पत्र-पत्रिकाक की हाल छै ? वर्तमान समयमे मैथिली पत्र-पत्रिकाक हालपर हिन्दीक प्रसिद्ध जुमला कहल जाए सकैत अछि – “वही चाल बेढंगी !” बहुत दिनसँ नियमित प्रकाशित होइत तीन टा मैथिली पत्रिका हमरा देखाइत अछि – ‘मिथिला दर्शन’ , ‘घर बाहर’ आ ‘समय साल’। एकटा ‘पुर्वोत्तर मैथिल’ सेहो एमहर निरन्तर उप्लब्ध भए रहल अछि। एहि सभमे ‘पुर्वोत्तर मैथिल’ मे कखनिओ कए सम्पादकक ओरिआओन आ विवाद मोल लेबाक साहस देखाइ दैत अछि किन्तु एकरा छोड़ि दोसर कोनो पत्रिका लग सम्पादकीय दृष्टि ( vision ) के अभाव जकाँ बुझाइत अछि। जे अलाए-बकच भेटल से छापने गलहुँ। अपन दृष्टिकोणक अनुसार कोनो योजना नहि, कोनो परिकल्पना नहि, कोनो मापदण्ड नहि, कोनो स्तर नहि। मिथिला दर्शन पहिने रचनाकारसभसँ विशेष रचनाक लेल आग्रह करैत छल, से बेगरता आब प्राय: हुनकासभकेँ नहि बुझाइ छनि। ‘घर बाहर’ त ओहि चेतना समितिक प्रकाशन अछि जे राजनीतिक थाल-कादोमे आपादमस्तक लेपित आ ताहिमे मुदित अछि। संस्थाकेँ येन-केन-प्रकारेन अपन चांगुरमे बकोटिकए राखब आ अपन फोटोक संग अपन विज्ञापन आ अभिनन्दन कराएब, एतबे उद्देश्यसँ ओकर मालिक-मलिकारसभ ओहि पत्रिकाकेँ नियमित कए कए राखने छथि। कहबाक लेल एमहर ओहिमे साहित्यिक सामग्री बढल अछि किन्तु छापता ओ सभ ओएह जे हुनक अनुकूल छनि , प्रतिकूल नहि। स्थिति ई अछि जे समीक्षाक नामपर सेहो कोनो आलोचना अपेक्षित नहि , मात्र मुँह पोछबाक लेल प्रशंसा लिखू वा बातकें गोलिआकए निष्कर्षहीन बतकुट्टन कए ससरि जाउ। ‘समय साल’ त बुझू जे ‘सिंगल मैन प्रोडक्ट’ अछि। एकहि व्यक्ति द्वारा विभिन्न नामसँ सौंसे पत्रिकाक सभटा आर्टिकिल आ पत्रिका पुर्ण। ई पत्रिका प्रमाणित करैत अछि जे मैथिली बिकट, प्रचण्ड आ धुरन्धर लिक्खाड़सभसँ परिपूरित आ मातबर अछि। ओना ई अपन संपुर्ण कलेवरमे राजनीतीक पत्रिका अछि आ एहिमे साहित्यिक रचना मात्र विध पुरैबाक लेल अचार-चटनी जकाँ देल जाइत अछि आ तें एकरासँ एहिसँ बेसी अपेक्षा करब उव्हितहु नहि। आब अनियतकालीन भेल ‘अंतिका’ एहन एकमात्र शुद्ध साहित्यिक पत्रिका अछि जेकरा लग एकटा फरिच्छ आ स्पष्ट सम्पादकीय दृष्टि छै आ जे योजनाबद्ध तरीकासँ काज करैत रहल अछि। अपवादस्वरूप पुर्वप्रकाशित रचनासभक माध्यमसँ खानापुरीक रूपमे बहराएल एकर किरण-प्रसंग सन अंक सेहो अछि किन्तु एकरा हम सम्पादकक असफलता नहि, हुनक भरोसाक असफलता मानए छी। एहि पत्रिकाक निरन्तरतामे आएल बाधा जे कोनो कारणसँ हुअए, दुखी करैत अछि। # 5 # चेतना समितीमे अखनो दलितवर्गक प्रवेश निषेध छै। एकरा अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ ? मिथिला, मैथिलीक नामपर संकीर्णता, पाखण्ड, प्रपंच आ विभिन्न प्रकारक धुर्ततासभ संस्थाबद्ध भेल अछि। सार्वजनिनता - सामाजिक-एकताक नारा पर बनल आन अनेक संस्था-संगठन जकाँ चेतना समिति सेहो स्वयंकें मैथिल-महासभाक क्षुद्र-संकीर्णताक खतियानी उत्तराधिकारी प्रमाणित करबाक लेल जान-परान अरोपने अछि आ एकरा लेल निरन्तर एकटा मुर्दा-संस्कृतिक गौरवगानक अष्टयाम आयोजित करैत रहैत अछि। एकर कर्ता-धर्तालोकनि कें एतबहु ज्ञान नहि छनि जे मुर्दा-संस्कृतिक गौरवगान प्राय: शत-प्रतिशत अवस्थामे जिन्दा-संस्कृतिक उपेक्षा-अवहेलनाक बुद्धि-विहीन प्रयासक क्रममे होइत अछि। क्षुद्र व्यक्तिगत राजनीतीक-आर्थिक लाभक आकांक्षासँ करिआएल-गन्हाएल हाथक उपकरण भए चेतना समिति अपन संपुर्ण संरचनामे साहित्य-संस्कृतिक कब्रिस्तान बनि गेल अछि। एतय जीवन्त लोकक हृदय कलपैत अछि आ दिवंगत यात्री जीक आत्मा हबोढकार कानैत अछि जे एकर स्थापनाक गप भाषा, साहित्य आ संस्कृतिक विकासक पवित्र उद्देश्यसँ सोचने छला। चेतना समितिक हम सपत्नीक आजीवन सदस्य छी किन्तु तेकर प्रमाण लेल हमरा लग मात्र एकटा रसीद अछि जे हमर कोनो फाइलमे कतहु घोसिआएल हएत। सदस्यता-प्राप्तिक बादहिसँ एकर कोनो गतिविधि दिआ कहिओ हमरा विधिवत कोनो सूचना नहि भेटल अछि आ तेँ एकर संगठन आ संचालनमे हमर कोनो भागीदारी नहि रहल अछि। एकर कर्ता-धर्तासभक अगुऐत-पछुऐत धरनिहारसभकेँ छोड़ि आनसभक हाल हमरहि सन हएत, से अनुमान करब कठिन नहि अछि। एकमात्र इएह तथ्यसँ एहि संस्थाक सार्वजनिकता आ दशा-दिशाक स्थितिक थाह लगले भेटि जाएत। एहि संस्थामे दलित वर्गक प्रवेश-निषेधक गप छोड़ू, गैर मैथिलहिक कोनो मानि नहि छै। गैर मैथिलसँ हमर आशय गैर मैथिल ब्राह्मणसँ अछि आ जँ केओ दलित विधायक सह साहित्यकार विलट पासवान विहंगम सन सन किछु उदाहरण दए कए हमर बातकेँ काटबाक ब्योंत करता त तेकरो लेल हमरा लग यथेष्ट तर्क अछि। अंगुरीपर गिनाइत जे गैर-मैथिल अगड़ा, दलित वा पिछड़ा-अतिपिछड़ा कोनो ब्रह्मबाबाक धरिया-ढेका पकड़ि असगरहि पुरस्कार-सम्मान-निमंत्रणक भवसागर तरि गेल त तरि गेल किन्तु से सभ लोक अपन समाजक प्रतिनिधि किन्नहु नहि अछि , किन्नहु नहि अछि। लटकनियां-कीटसभक एकटा अलगे नसल होइ छै। एकरा कोनो वर्ग आ जातिमे नहि गिनल जएबाक चाही। उदाहरणक रूपमे सांख्यिकीक एकटा अंकमात्र बनल ई लोकसभ केकर धरिया आ केकर ढेका पकड़ि अपन उद्धार कएलनि अछि से नुकाएल गप नहि अछि। ओना दोष मात्र लोहारहिटाक नहि अछि, लोहाक सेहो अछि। आरक्षण, सामाजिक न्याय आ सुशासनक दू दशकक बादहु जँ चेतनाक हनुमान चेतना समितिक लंकामे घुसि ओकर दहन नहि कए सकल त एहि अचेतावस्थाक दोष केकरापर ? चेतना समिति आर्थिक रूपसँ संपन्न अछि आ एतयसँ सत्ताक डगर सेहो बनैत अछि आ तें एहिपर कोनो राजनीतीक व्यक्तिक गिद्ध-दृष्टि लागल रहए से स्वाभाविक, सत्तालिप्सासँ बेचैन आत्मा एकरापर अपन आधिपत्य चाहए-करए सेहो स्वाभाविक। स्थिति विकट आ चिन्ताजनक तखनि भए जाइत अछि जखनि एकरासभकें मखमली बुद्धिजीवी, अचूक अवसरपरस्त, यथार्थ-विरहित यथार्थ स्रष्टा आ साहित्यक सत्ताखोरसभक खलीफ़ावादी गिरोहक स्वार्थपरक सहयोग सेहो भेटि जाइत अछि। किन्तु इहो सत्य अपन ठामपर अछि जे कायर त ओहो अछि जे अपन अधिकार स्थापित नहि कए पाबए। भरि जिनगी ब्रह्म-बाबाक वर्तनीपर चलि अंतिम चला-चलीक बेरामे पचपनियां वर्तनी सूझए, एहन चेतनाक कोन काज ? कोनो नीक आ हितकर बात जँ व्यक्तिगत विज्ञापनक उद्देश्यसँ हएत त ओ निरर्थक अछि। भीख, दछिना आ भाभटक चलनसँ प्रवेशाधिकार नहि भेटै छै, ई भेटै छै संघर्षसँ, ई भेटै छै क्रियात्मक आन्दोलनसँ, जेकर दीप्त उदाहरण महाराष्ट्र प्रस्तुत कएने अछि। # 6 # दरभंगे पीठ जकाँ आब सहरसा पीठ बनि रहल छै। ई मैथिली लेल नीक की खराप ? मैथिलीमे छातीबला मरद कम छै तेँ एतय ठामहि ठाम पीठहि-पीठ देखाइ पड़त, पीठक बलें अगराइत लोक देखाइ पड़त। सहवासक क्रममे जँ विपरीत-रति नहि हुअए त स्त्री पीठभरें सुतैत अछि, रोगी आ कमजोर लोक सहारा लेल पीठभरें सूतल या ओंगठल रहैत अछि, युद्ध आ संघर्षसँ भागनिहार पीठ देखबैत अछि आ पीठाधीश-मठाधीश अगिला जनममे कुकुर बनैत अछि से कथा वाल्मिकी रामायणमे वर्णित अछिए। हम व्यक्तिगतरूपसँ ‘एकला चलो’ आ ‘चरैवेति-चरैवेति’माननिहार छी आ पीठबला एहि मौगियाही, नपुंसक खेलमे हमरा कोनो अभिरुचि नहि अछि। दरभंगहि जकाँ सहरसामे कोनो पीठ बनल छै वा बनि रहल छै तेकर कोनो जानकारी हमरा नहि अछि। हम लेखक छी आ लेखनकेँ अपन कर्तव्य मानए छी। मन पड़ै छथि मराठी साहित्यकार कुसुमाग्रज। नासिकमे हुनक आवासपर हुनकासँ भेंटक क्रममे दीर्घवार्ता भेल छल। चलएकाल हम हुनकासँ लिखित-संदेश मांगलियनि त ओ अपन हस्तलिपिमे हिन्दीमे लिखलनि – “लिखो, लिखते रहो, लिखने से ही कोई भाषा समृद्ध होती है।“ हुनक ई संदेश हमरा लेल पाथेय बनल अछि। साहित्यक सहकर्मासभ यदा-कदा कतहु एकत्रित भए एक-दोसराक हाल-चाल ली , एक-दोसराक रचना सुनि ओहिसँ ऊर्जस्वित आ आनन्दित होइ ,से मनोकामना रहैत अछि। किन्तु नकार-भावसँ स्वार्थवश कोनो गुट-गिरोह बनैत अछि त ताहिसँ हमरा घिन आबए ए आ एकरा हम कोनो क्षेत्रक क्रियाकलाप लेल अहितकर मानए छी ,साहित्यक लेल त आओर बेसी। पीठ-मठ के किछु लघु-रूप हमरा देखल-भोगल अछि। जेकरा पीठ आ मठ बनैबाक औकाति नहि छै से संपुर्ण भोजनक अनुप्लब्धताक स्थितिमे जुट्ठा खाइए या थूक चाटैए आ एहि क्रममे ‘तू हमर प्रशंसा करह, हम तोहर प्रशंसा करबह’ बला क्षुद्रता करैए। एकर परिणामस्वरूप छोटका-छोटका गुट-गिरोह बनैए आ ई पीठ आ मठक तुलनामे कोनो कम खतरनाक आ हानिकारक किरदानी नहि अछि। ई सिलसिला, ई तौर तरीका छोट-नम्हर साहित्यिक माफ़िआ बनबैत अछि, पाठककें भ्रमित करैत अछि। एहन गिरोहसभसँ धोखाधड़ीक चलन बढैत अछि, केकरो निकृष्ट रचनाकें गुम्बद चढाए अप्रत्यक्ष रूपसँ नीक रचनाक संग अनदेखी आ अन्याय करैत अछि। छोट हुअए कि नमहर, एहि पीठ-मठक स्थापनसँ कठगुरु आ झोलटंगबाक क्षुद्र परिपाटी बनैत अछि आ एकर दुष्परिणामस्वरूप अनेक एकलव्यक अऊंठा कटैत अछि आ कतेको शम्बूक मारल जाइत अछि। दू टा डेनिश कहावत मन पड़ैत अछि। पहिल कहैत अछि जे दरबार(एतय एकर अर्थ मठ या पीठ लए सकै छी) शरीफ आ मशहूर भिखमंगा सभक जमात होइत अछि। दोसर कहैत अछि जे कोनो ईमानदार आदमी हड्डीक लेल स्वयंकें कुकुर नहि बनबैछ। एहि दुनू कहावतक पूरक बनैत अछि एकटा पुर्तगाली कहावत जेकर भाव अछि जे कुकुर अहाँक लेल नहि, रोटीक लेल नांगड़ि हिलबैत अछि। बुझनुक लेल एहि तीनू कहावतक विश्लेषण करब या ओकर आशय बताएब एतय आवश्यक नहि अछि। दुर्भाग्य जे मठ-पीठक छ्द्मक चकचोनहीसँ चोन्हाएल महंथ आ चटिया – दुनूमेसँ केकरहु ई ज्ञान नहि अछि जे जखनि पंडुकी आ कौआक संयोग होइत अछि त ओकर पाँखि त श्वेतहि रहैत अछि किन्तु ओकर कलेजी कारी भए जाइत अछि। ओना जँ ज्ञान रहितए त ई काजहि किए करैत। खच्चरसभकें गुमान रहै छै जे ओकर पुरखा घोड़ा रहै। एकर कोन इलाज ? केओ सोंगर लगाकए पछिलका दरबज्जा वा खिड़कीसँ भनहि स्वर्गमे पैसि जाइ, मानल त जाएत ओ चोरहि। साहित्य तत्कालिक लाभक वस्तु नहि , दूरगामी प्रभावबला शक्ति अछि। जेकरा लग छाती हेतए, छातीमे दम हेतए तेकरे सन्तति (रचना) दीर्घायु हेतए। साहित्य सहितक भाव अछि। एहि सहितसँ रहित कोनो स्वार्थ वा नकार भाव सुपात्रक अहित करैत अछि आ तेँ ई कतहु बनओ, अस्वीकार्य अछि। साहित्यक पावन क्षेत्रमे कोनो अपावन विचार या क्रियाक कोनो स्थान नहि हएबाक चाही। # 7 # अंतिका आब मृतप्राय पत्रिका अछि मुदा ओकर हरेक अंकमे अधिकांशत: सहरसाबला लेखक रहैत अछि। ई कतेक उचित ? ई प्रश्न हमरा कनेक विरोधाभाषी लागैत अछि। जखनि अंक बहराए रहल छै त ई मृतप्राय केना भेल ? ई अवश्य जे ई नियमित नहि रहि सकल अछि। तखनि मैथिलीमे एहन अभागल कोनो पहिल पत्रिका त नहि अछि अंतिका। रहल बात एहिमे अधिकांशत: सहरसाबला लेखकक छपब त हम एकरा एहि दृष्टिसँ नहि देखि पाबि रहल छी। हम सुपौलक छी आ अंतिकामे हमरहु रचना छपैत रहल अछि आ मधुबनीअहु-दरभंगा आ अन्य ठामक लेखकसभक रचना हम एहिमे देखैत-पढैत रहल छी। गौरीनाथ पहिनेक तुलनामे बहुत बदललाह अछि – व्यक्ति, साहित्यकार आ सम्पादकक रूपमे, जे समय-काल, परिस्थिति आ माहौलक प्रभावमे स्वाभाविक अछि किन्तु हुनक संघर्ष, क्षमता, योग्यता आदिकेँ नकारब कठिन अछि। अपन अनेक सीमाक बादो गौरीनाथ/अनलकान्त मठ-मठाधीशक प्रति विद्रोह आ आक्रोशक स्वरकेँ अक्ष्क्षूण्ण राखने रहल छथि आ अपन लेखन आ अंतिकाक माध्यमसँ ओ एकरा निरन्तर प्रकट करैत रहल छथि। ई विद्रोह आ आक्रोशक स्वर अलग-अलग लोकक लेल प्रिय-अप्रिय भए सकैत अछि किन्तु एकरा नहि सकारब कठिन अछि। क्षेपकमे एकटा गप कहबाक मन होइए। से ई जे सुपौल-सहरसा आ दरभंगा-मधुबनीमे प्रकृतिगत अन्तर अछि। एकटा कोशी नदीक उद्द्याम तेवरक क्रीड़ाक्षेत्र आ दोसर कमलाक लचगर खेलौरक क्षेत्र अछि। कोशी संघर्ष आ पुरुषार्थ सिखबैत अछि त कमला कोमल सुविधाक पाठ दैत अछि। संभव अछि जे अनलकान्त/गौरीनाथकें कोशीक लेखन बेसी धरगर आ समकालीन बुझाबैत होइनि। # 8 # बहुत दिनधरि मैथिलीमे दलित लेखक केर प्रवेश नै छल। एकरा अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ ? एखनुक केहन अवस्था छै ? साहित्यकें दलित-लेखन, स्त्री-लेखन आदिक कूड़ीमे बाँटिकए देखब हमरा कनेक अनसोहांत जकाँ लागैत अछि किन्तु यथार्थ त अपन ठामपर अछि आ एकरा नकारब सेहो ने संभव अछि आ ने उचित। ई स्थिति आन अनेक भाषामे सेहो रहल अछि। मैथिलीपर पुरोहितवर्गक वर्चस्व मलिकाना-अधिकारक सीमा तक रहल अछि तेँ एतए ई कनेक बेसीए मात्रामे रहल अछि आ एतए मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक किछु चुनिन्दा घराना छोड़ि आन सभगोटेक हालत दलितहि जकाँ अछि, से बात अलग। प्रोत्साहनक बदौलत संभव छल जे बहुतो गोटे प्रकाशमे अबितथि आ इहो संभव जे एकर अभावमे अनेक गोटे दुखीभए मोहभंगक अवस्थामे लेखनसँ विरत भए गेल होथि किन्तु कोनो प्रतिभाकें आगू आबएसँ बलात रोकल जाए सकैत अछि से बात सकारब कनेक कठिन अछि। संख्याबल कनेक कमजोर भए सकैत अछि किन्तु आन-आन क्षेत्र आ भाषासँ बाबा साहेब अम्बेदकर, डा तुलसीराम, शरण कुमार लिंबाले, नामदेव ढसाल, दया पवार, आदि अनेक नाम उदाहरणक रूपमे देले जाए सकैत अछि। इहो बात अपन जगह जे दलित साहित्यक पोषण दलित आन्दोलनसँ भेल जेकर अभाव मैथिली-भाषी क्षेत्रमे रहल अछि। मैथिल महासभाक माध्यमसँ भाषा-संस्कृतिपर आधिपत्यक जे षडयंत्र खुल्लमखुल्ला भेल तेकर आशय आ नीयत बुझि ओकर विरोधमे दलित की, दू जातिसँ इतर आनो आन जाति दिससँ विरोधक कोनो स्वर नहि बहराएल त एकर कुफल त एहि सकल आ शेष समाजकें भोगहि पड़तए। अलबत्ता एतए एहन मरौसीबला वातावरण रहल अछि आ जतिआरेसँ दियाद-बाद होइत भाय-भतीजावाद आ परिवारवादक तेहन घिनाओन कठखेल होइत रहल अछि जे अगड़ा वर्गक अनेक लोक सेहो कुंठित भए लेखन-विरत होइत रहलाह अछि। संघर्ष करैत आगाँ बढी, एहि किलर-ईंस्टिंक्टक अभाव त रहले अछि जे हजारो वर्षक मानसिक गुलामीक परिणाम अछि। संघर्ष आ विद्रोहक कठिन डगर छोड़ि, नकल आ देखांओसमे एहि समाजक विभिन्नवर्ग सुविधाभोगक डगर चुनैत रहलाह अछि आ मंचादिपर कनेक जगह पाबि तिरपित होइत रहलाह अछि त एकर दोष कनिके सही, हुनकहुसभपर त आबितहि छै। ओना अनेक गोटे एहि विपरीत परिस्थितिसँ लड़ि अपन व्यक्तिगत क्षमतासँ आगू आएल छथि। जे तीव्रता आ गति वांछित अछि से भनहि नहि हो किन्तु विदेहक माध्यमसँ प्रतिकारक एकटा मजबूत वातावरण बनल अछि आ अनेक गंभीर लेखकलोकनि प्रकाशमे अएलाह अछि आ से वर्तमानक प्रति संतुष्ट आ भविष्यक प्रति आश्वस्त आ आशान्वित करैत अछि। साहित्यमे संख्याँबल महत्वपुर्ण नहि होइत अछि, महत्वपुर्ण होइत अछि बौद्धिक आ रचनात्मक क्षमता। चुट्टीक घर लेल एक बूंद ओसहि तूफान आ सैकड़ो कौआक लेल एकहि टा ढेला यथेष्ट होइत अछि। ओना उचित ई होइतए आ समयक मांग सेहो अछि जे एक हाथ दोसर हाथकें धोअए, अन्यथा दुनू मैलहि रहि जाएत। # 9 # अहाँक साहित्यिक यात्रामे कोन तत्व प्रेरक आ कोन तत्व बाधक रहल ? हमर पुर्वजलोकनि शुद्धरूपसँ खेतिहर रहथि। खाता-खतियान आ केवाला आदि छोड़ि आन कोनो चीज पढबामे हुनकासभक कोनो अभिरुचि नहि रहनि। एहि किसानी-वंशमे एकटा अवतारी-पुरुषजकाँ हमर पिता बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ केर आविर्भाव भेल आ ओ खेती-किसानीसँ अविछिन्न प्रेम राखितहु स्वतंत्रता-संग्रामक अग्रिम-पंक्तिक योद्धा भेला आ बादमे समाज-सेवा, साहित्य, पत्रकारिता आदिक विविध क्षेत्रमे अपन हस्ताक्षर दर्ज कएलनि। पुत्र हएबाक कारणें कम-बेसी मात्रामे हुनक प्राय: सभटा गुण हमरहुमे आएल। राजनीतिमे अपन प्रतिभाक समुचित सदुपयोगक संभावना नहि देखि हम साहित्य-लेखनक अपन पुर्व-प्रेमकें गति देल आ तेकरहि परिणामस्वरूप हम आइ एतए छी। एहिमे उत्प्रेरकक काज कएलक 90-92क आसपास डा नवीन कुमार दास, केदार कानन, डा शिवेन्द्र दास आदिक संगति। हमर एकटा मैथिली कथा बहुत पहिने ‘मिथिला मिहिर’मे छपि चुकल छल किन्तु हमर छिटपुट लेखन हिन्दीमे होइत रहए। हम हिन्दी जगतमे एक सुपरिचित नाम भए गेल रही आ हिन्दीक अनेक पत्र-पत्रिकामे हमर रचनासभ छपितहु रहए। सुपौलक एहि त्रिमुर्तिक संगतमे अएलहुँ त एकर द्विपक्षीय लाभ भेल। हमरासभक नियमित बैसार हुअए लागल आ एकर सकारात्मक प्रभाव प्राय: सभगोटेक लेखन पर पड़ल। सभगोटे किछु ने किछु लिखिकए आनी आ ताहिपर घमर्थन हुअए आ तहिसँ रचनासभ परिष्कृत हुअए। एहि बैसारमे कहिओ काल महाप्रकाश, सुभाषचन्द्र यादव आबथि। मायानन्द मिश्र, जीवकान्तहुक आबरजात रहनि आ एकाध बेर राजमोहन झाक आगमन सेहो मोन अछि। एहि दौरान बंग्लाक कवि कालीपद कोनार सेहो अएलाह आ मैथिलीक लेल ऐतिहासिक काज कए गेला। सुपौलक अनियतकालीन पत्रिका ‘संकल्प’क एक अंकक प्रकाशन आ आन अनेक साहित्यिक-सांस्कृतिक घटनासभ भेल। हम रसे-रसे मैथिलीमे लिखए लागल छलहुँ आ ओ सभ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे छपि हमरा चिन्हार करए लागल छल आ जखनि हमर प्रथम संग्रह ( परती टुटि रहल अछि ) मैथिलीएमे आबि गेल आ ताहिपर अनेकानेक उत्साहवर्धक टिप्पणीसभ आएल त हम जेना मैथिलीएक भए कए रहि गेलहुँ। ई सभटा गतिविधि तीनहि-चारि वर्षक अन्तरालमे भेल। प्रथम संग्रहक बाद प्राय: दस वर्षक अन्तराल तक हम एकदमसँ गुम्मी लाधि लेल। किछु गोटेकें हमर ई अनुपस्थिति हमर मोहभंगसँ उपजल बुझाइ छनि त एहिमे आंशिक सत्य अछि। सुपौलक साहित्यिक वातावरणमे आएल एकटा अप्रियसन खतियानवाद एकर जड़िमे छल किन्तु हम कहिओ कोनो बाधाकें गुदानल नहि त ओकरासँ हारबाक त कल्पनहि नहि कएल जाए सकैत अछि। एहि ‘बाधा’ पर हमरा भर्तृहरि मन पड़ि गेला। ओ कहलनि अछि – “ संसारमे तीन प्रकारक मनुष्य अछि- नीच, मध्यम आ उत्तम। नीच मनुष्य बाधाक डरसँ काम शुरुए नहि करैछ ; मध्यम मनुष्य काम शुरु त कए लैछ, किन्तु बाधा पड़लापर ओकरा बीचहिमे छोड़ि दैछ ; मात्र उत्तम मनुष्य जाहि काजकें शुरु करैछ, हजार बाधा पड़लहु पर ओकरा पूरा कए कए छोड़ैत अछि”। हमरा उत्तम मनुष्य हएबाक कोनो भ्रम वा गुमान नहि अछि, किन्तु हम अपन नाम मध्यम मनुष्यमे नहि देखए चाहए छी आ नीचमे त किन्नहु नहि। तें हम सदति ई बात मन राखए छी जे जँ अहाँ चाहए छी जे मरितहि आ चितामे सुड्डाह होइतहि अहाँ बिसराए नहि देल जाइ त या त पढबा योग्य चीज लिखू या लिखबा योग्य काज करू। हमर लेखनमे ई अन्तराल कोनो बाधा वा बाधाजनित मोहभंगसँ नहि, एहि कारण आएल जे ओहि कालविशेषमे हमर पुत्रसभक शिक्षा अपन निर्णायककालमे छल आ तें साहित्यिक चुनौतीकें तात्कालिक रूपसँ विश्राम दए हम अपन समग्र चेतना-क्षमता-समयकें अपन सन्ततिक भविष्य-निर्माणक प्रयास दिस मोड़ि देल। हमरा दुबारा सक्रिय करबाक श्रेय हिन्दीक साहित्यकार-सम्पादक महेन्द्र नारायण पंकज आ मैथिलीक ओजस्वी-युवा अजित आजादकें छनि। पंकज जी हमरा प्रगतिशील लेखक संघक सुपौल जिलाक अध्यक्ष बनाए साहित्य-समाजसँ हमर संपर्ककें पुनर्जीवित कएलनि आ अजित आजादक चहेटब हमर कलमक गतिकें प्रवाह देलक। अजित आजाद आ गौरीनाथक सहयोगसँ हमर दोसर संग्रह ( अन्हारक विरोधमे ) सोझाँ आएल आ हम पुन: मैथिलीक मुख्यधारासँ जुड़ि सकलहुँ। हिनकहिसभक उर्जा पाबि हमरा लग ई सत्य उद्घाटित भेल जे प्रत्येक मनुष्य एक नन्दनकानन-च्युत परमात्मा अछि। ओहि कालमे हिन्दीक पत्रकार महाशंकरसँ सुपौलहिमे सुसंयोगसँ भेंट भए गेल आ ओ हमरा अपन पत्रिका लेल कालम लिखबाक वचन लए लेलनि। तखनि ओ विकास कुमार झाक सम्पादनमे बहराइत ‘राष्ट्रीय प्रसंग’ पत्रिकासँ जुड़ल छला। कोनो अपरिहार्य कारणवश महाशंकर ओहि पत्रिकासँ अलग भए गेला आ हमर आलेख ओहि पत्रिकामे नहि छपि सकल। एन अवसरपर महाशंकर श्यामाकान्त झाक सम्पादनमे नवप्रकाशित ‘लोक प्रसंग’ मासिक पत्रिकासँ जुड़ि गेला आ ओकर प्रथम अंकमे हमर कालम छापि ओ हमरा खबर कएलनि आ ओतहिसँ हमर कालम-लेखनक सिलसिला चलि निकलल। ‘ठाकुर का ठाँव’ नामसँ हमर ई कालम बहुत लोकप्रिय भेल आ “मिथिला आवाज”क सम्पादनक जिम्मेवारी लेबासँ पहिने लगातार तीन वर्ष तक हम ई लिखैत रहलहुँ। बादमे जँ हम “ मिथिला आवाज “क सम्पादक पद लेल अजित आजाद आ डा0 चन्द्रमोहन झाक पहिल पसन्द भेलहुँ त हमर मानब अछि जे तेकर आधारमे हमर ओ कालम-लेखन महत्वपुर्ण कारक रहल अछि। तें कहि सकए छी जे अपन साहित्यिक यात्रामे प्रेरक तत्व त हमरा बहुत भेटल आ बाधा सन कोनो चीजकें हम अपन आगू आबि टिकैए नहि देलिअए। कनेक दम धरबाक लेल, कनेक पाथेय जुटएबाक लेल, कनेक अगिलका बाटकें चिक्कन-चुनमुन करबाक लेल कतहु कनेक ठहरि गेल होइ, से बात अलग। # 10 # अहाँ अपनाकें मैथिली गज़लक ‘अमीर खुसरो’ कहै छिऐ आ सरस जी अपनाकें ‘साहिर’ कहै छथि। ई आत्मविश्वास छै या आर किछु ? हमर काँइत एकदम अलग अछि तें सरस जीसँ हमर कोनो तुलना नहि अछि। ओ अपनाकें साहिर केना आ किऐ कहए छथि से ओएह जानथु। हम अपन एकटा गज़लक मकतामे ‘अमीर खुसरो’क नाम लेल अछि,से बहुत सायास नहि अछि। ई प्रयोग हमर अवचेतनक प्रतिफलन भए सकैत अछि। अहाँक प्रश्नक बाद एहिपर हमर ध्यान गेल अछि। आब सोचलापर लागैए जे हमर जे जीवनानुभव अछि से मैथिलीक प्राय: आनसभ लेखकलोकनिसँ एकदम अलग अछि आ एकरा हम बहुत गंभीरतासँ रेखांकित कएने छी। अपन एकदम (Exclusive) हएब (स्तर एकर जे हुअए) आ तेकरा साहित्य-समाजक बीच प्रकट करबाक हमर अवचेतनक ई प्रयास भए सकैत अछि। मिल्टन कहने छथि जे “ यशैषणा श्रेष्ट मनुष्यक आखिरी कमजोरी अछि” आ युनानी दार्शनिक सिसरोक कहब छनि जे “ जाहि ग्रंथसभमे दर्शनाचार्य यशैषणासँ बचबाक उपदेश दए छथि, ओही ग्रंथमे ओसभ अपन नाम छोड़ि जाइ छथि; जाहि पृष्टसभपर ओ बतबए छथि जे यशैषणा बेजाय चीज अछि, ओही पृष्टसभपर हुनक कीर्ति-वैजयन्ती फहराबए लागैत अछि”। भवभूति त चुनौतीक स्वरमे घोषणा करए छथि – “ उत्पत्स्यते च मम कोऽपि समानधर्मा”। गज़लक जे परम्परा रहल अछि ताहिमे एहि तरहक अत्युक्तिक अनेक रास उदाहरण सेहो अछि। “कहते हैं कि गालिब का है अन्दाज-ए-बयां और” त प्रसिद्ध रहल अछि आ एकरहुसभक प्रभाव हमर अवचेतन ग्रहण कएने हुअए, सेहो संभव। समाजक क्षुद्रता कलाकारक स्वाभिमानपर आगि राखि दैत अछि, तेँ ई कोनो संचित आक्रोशक परिणाम सेहो भए सकैत अछि। अज्ञेय कहैत छला – ‘ अजुका साहित्य अधिकांशमे अतृप्तिक, या कही, लालसाक, इच्छित विश्वास (Wishful Thinking) केर साहित्य अछि। ‘अमीर खुसरो’ मामलामे इहो कथन सत्य भए सकैत अछि। प्रभाकर माचवेसँ पैंच लएत कहए चाहए छी – ‘ केना कही जे लिखैत काल हम वर्ण्य विषयक संग तन्मय-तल्लीन अवश्य होइ छी, किन्तु मनपर अन्यान्य रचनासभकें पढलासँ जे शैलीगत संस्कार अछि, ओकरसभक अप्रत्यक्ष प्रभावसँ अपनाकें विलग नहि राखि पाबए छी। ई दुर्गुण हुअए कि सद्गुण, तथ्य अवश्य अछि।‘ # 11 # वर्तमान साहित्यकारक मुल्यांकन अहाँ कोना करबै ? ओकर लेखन आत्मरतिसँ बाहर आबि समष्टिक चेतनासँ कतेक तादात्म्य स्थापित करए छै, ताहिसँ। ओकर लेखनमे कलाक वैयक्तिक पक्षक संग-संग सामाजिक पक्षक संतुलित तालमेल छै कि नहि, ताहिसँ। अपन समयक पहिचान करैत अपन युगक मूल्यक रक्षा आ वांछित परिवर्तनक लेल प्रयास करएमे ओकर लेखक आ लेखन कतेक प्रयत्नशील रहल अछि, ताहिसँ। ओना वर्तमानक निर्वैयक्तिक आ पुर्वाग्रहरहित मुल्यांकन वर्तमानक बुत्ते असंभव केर हद तक कठिन छै आ तें एकरा भविष्य लेल छोड़ि देबाक चाही। # 12 # अहाँक प्रिय साहित्यकार के छथि ? स्वाभाविक अछि जे प्रश्न मैथिलीएक सन्दर्भमे अछि। एकर स्पष्ट उत्तर उकटा-पैंचीक वाहक बनि सकैत अछि। संक्षिप्तमे एतबे जे हमर बादक पीढीक सभ साहित्यकार हमर प्रिय छथि। ओना अप्रिय साहित्यकारक एकटा नमहर सूची अछि हमरा लग ! # 13 # साहित्यकारक लेखकीय विचार आ वास्तविक जीवनक विचार एक हेबाक चाही की अलग-अलग ? जँ एक हेबाक चाही तँ बैद्यनाथ मिश्र यात्री जीक वैचारिक विचलनकें अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ ? आ जँ अलग-अलग हेबाक चाही तँ ओहन साहित्य ओ साहित्यकारक मूल्य की ? मैथिलीकें तोड़बामे दरभंगा मठाधीश सभहंक कतेक योगदान छै ? साहित्यकार कोनो आन ग्रहसँ आएल जीव नहि होइत अछि। प्रथमत: ओ मनुष्य अछि आ ओकरासँ मनुष्यक लेल तै सभटा आचार-संहिताक पालन हमरा बुझने अनिवार्य अछि। मनुष्य एकटा इकाइ अछि आ रसे-रसे अपनासँ बढि परिवार, समाज, राज्य, देश, विश्व आ ब्रह्माण्डक गतिशील हिस्सा बनैत अछि आ एहि क्रममे अपना लेल विविध क्षेत्रक चयन कए ओहिमे सक्रिय होइत अछि। हमर माननाइ अछि जे जे मनुष्य स्वयं अपना लेल, अपन परिवार आ समाज लेल ईमानदार नहि अछि से अपन गतिविधिक कोनो क्षेत्रमे ईमानदार नहि भए सकैत अछि। तें कोनो सामान्य व्यक्तिसँ अपेक्षित व्यक्तिगत या समाजगत ईमानदारीक अपेक्षा साहित्यकारहुसँ कएल जाएब सर्वथा उचित अछि। लेखकीय विचार आ वास्तविक जीवनक विचारमे जँ एकरुपता या साम्य नहि अछि त ई ओहि व्यक्तित्वक छद्मक द्योतक अछि। एहि सर्वकालिक सिद्धान्तक कसबट्टीपर बैद्यनाथ मिश्र यात्रीएटा किए सभकें कसल जएबाक चाही। किन्तु एतय एकटा ‘किन्तु’ सेहो अछि। एहि ‘किन्तु’क व्याख्या लेल हमरा गोस्वामी तुलसीदासक शरणमे जाए पड़त। ओ भगवान रामसँ कहबएलनि अछि जे जीव जाहि क्षण हमर सम्मुख होइत अछि त हम ओहि क्षण ओकर कोटि-कोटि जनमक पाप नष्ट कए दए छी – सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जनम कोटि अघ नासौं तबहीं॥ जे केओ अपन समस्त कमजोरी आ त्रुटिक संग महा अज्ञात अन्तर्यामीक सम्मुख उपस्थित भए जाइत अछि, ओकर समस्त त्रुटि विच्युतिसभ समाप्त भए जाइत अछि, फेर त्रुटि त्रुटि नहि रहि जाइछ, ओ पूजाक नैवेद्य बनि जाइत अछि। तुलसीदास एकठाम आओर तीर्थवादिक माहात्म्य वर्णन करैत लिखैत छथि जे एहिमे स्नान कए काक पिक भए जाइत अछि आ बक मयूर भए जाइत अछि। एहि परिपेक्ष्यमे जँ साहित्यकें अन्तर्यामी तत्व आ तीर्थस्नान मानि ली आ से ओ छहिओ त बैद्यनाथ मिश्र यात्रीकें एहि कथनक लाभ दैत बा-इज्जत बरी कएल जाए सकैत अछि। ओना साहित्यकारक रूपमे यात्री जी जतेक कतबहु सम्मान पाबि लेथि, एकटा मनुष्यक रूपमे त ओ अपन पारिवारिक-सामाजिक कर्तव्यसँ च्युत मानलहि जएता। (प्रश्नक अंतिम भागक उत्तर सायास की अनायास छोड़लगेल अछि- संपादक) # 14 # मैथिल साहित्यकार बहुविधावादी होइत छथि। मुदा जँ अहाँ एके विधामे रहितहुँ तँ ओ कोन विधा होइतै ? नि:सन्देह गद्य मे। “गद्यं कविनां निकषं वदन्ति” हमरा लेल मात्र एकटा उक्ति नहि, साहित्यिक मंत्र जकाँ अछि। ई हमर प्रिय विधा अछि आ एहिपर हम अपन पकड़ सेहो नीक मानए छी। देखौंस वा शार्टकटक परिणामस्वरूप हम अखनि धरि जे कएने होइ, हमरापर गद्यक कर्जा बांकी अछि। अखनि हमर साहित्यिक पेटारीमे बहुत माल बचल आ संचित अछि आ से आब पाठकक सोझाँ अएबाक लेल व्यग्र भेल अछि। # 15 # अहाँ अपन साहित्यिक यात्राक पड़ाव कतऽ आ कोन रुपें देखै छिऐ ? कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुरक “एकला चलो” आ शास्त्रीय वचन “चरैवेति-चरैवेति” स्मरणमे रहैत अछि आ तत्काल कोनो अवरोधहु नहि बुझाइत अछि, तें ई यात्रा अनवरत चलत से आशा आ भरोस अछि। # 16 # पारिवारिक परिचय जानबाक इच्छा अछि। हम अपन पारिवारिक परिचय छिटपुट रूपमे अपन आत्मकथ्य आ आन ठाम देने छी। संक्षेपमे ई जे हमर पिता ( हमसभ हुनका ‘बाबूजी’ कहि सम्बोधित करैत रहिअनि ) बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ स्वतंत्रता-सेनानी, साहित्यकार, पत्रकार आ समाजसेवी छला। हुनकर प्रथम विवाह अकबरनगर, भागलपुरक सुभद्रा देवीसँ भेलनि जिनका हमसभ भाय-बहिन ‘बड़की मा’ कहैत रहियनि। हुनकासँ कोनो सन्तान नहि भेने बाबूजी शेरपुर, मुजफ्फरपुरक गायत्री देवीसँ विवाह कएलनि जिनकासँ हमसभ पांच भाय-बहिन भएलहुँ – तीन बहिन आ दू भाय। एक बहिन हमरासँ जेठ, हमरा बाद दू बहिन आ सभसँ छोट भाय। हमरासभकें दुनू माक ममतामे कहिओ कोनो अन्तर नहि बुझाएल। सभदिन दुनू माकें एकहि थारीमे संग-संग खाइत देखलिअयनि जेकर सिलसिला बड़की माक मृत्युक उपरान्तहि भंग भेल। हमर विवाह 21 जून, 1972 ईं0 ( अद्भुत संयोग अछि जे इएह तिथिकें अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनैबाक निर्णय संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 2016 ईं0मे लेल गेल अछि) मे मानदा, बेगुसराय ( आब समस्तीपुर ) के बीना देवीसँ भेल जिनकासँ हमरा त्रिदेवक प्राप्ति भेल अछि – तीन पुत्र – अभिनय, किसलय आ अनुनय। घरक नाम बाबू, मिट्ठू आ राजा। ज्येष्ट पुत्र दवाक स्टाकिस्टशिपक काज करए छथि, मांझिल पुत्र चार्टर्ड अकाउण्टेन्ट छथि आ कनिष्ट पुत्र वकालतक पेशामे छथि। ज्येष्ट आ कनिष्ट सुपौलमे हमरा संगहि रहए छथि आ मांझिल मुम्बईमे। वर्तमान तिथि तक तीनू पुत्र- पुत्रवधुसँ संयुक्त उपहारक रूपमे तेसर पीढीक जे चारिटा पुष्प हमरा प्राप्त भेल अछि ताहिमे तीन पौत्री आ एक पौत्र अछि। अपन इलाकाक जे चलन अछि ताहिमे परिचय पुछबाक आशय जाति आ गोत्र जानबसँ बेसी रहैत अछि। त सामाजिक संरचनाक आधारपर हम ब्राह्मण छी – भुमिहार ब्राह्मण। गोत्र अछि – पराशर आ गोत्र-प्रवर छथि – वशिष्ठ, शक्ति आ पराशर। गोत्र-प्रवरक संख्याँ तीन अछि तें जनेउमे तीन गाँठ लागैत अछि। पुर्वजलोकनि कर्णाटकक मैसूरसँ आएल छला आ तें कर्णाटवंशी कहाइ छी आ मूल अछि मैसूरिया। दुसाध आ मियांसभक संगति आ ओकरसभक छुअल खएबाक-पीबाक चलते देशक स्वतंत्रतासँ पुर्व बाबूजीपर कतेको बेर समाजक पंचैती बैसल किन्तु ओ अपन सामाजिक समताक स्वभाव नहि तजलनि। हमर नानाक घरमे पीर-बाबाक मजार बनल रहय आ ओ नियमित रूपसँ नमाज पढैत छला। ई सभटा संस्कार हमर जीनमे अछि आ हम मोटा-मोटी जाति-सम्प्रदायक पुर्वाग्रहसँ मुक्त रहल छी। एहि बातक चर्चा कए देब एहि कारणसँ आवश्यक बुझाएल जे पारिवारिक परिचयक क्रममे देल हमर विवरणसँ हमरा प्रति कोनो गलत धारणा नहि बनए। हम जे छी, जाहि जाति-गोत्र-सम्प्रदायसँ छी से हमर चुनल नहि अछि, तखनिओ हमरा एहिपर गर्व अछि आ एहिसँ आन जाति-गोत्र-सम्प्रदायक लोकक प्रति हमर सम्मान-भावनापर कोनो फर्क नहि पड़ैत अछि। अरविन्द ठाकुरजीक नामसँ किछु पत्र परती टूटि रहल अछि (कविता संग्रहपर पत्रक माध्यमसँ प्राप्त प्रारंभिक तीनटा टिप्पणी) प्रथम : श्री चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ स्वस्ति आदित्य सदन, मिश्र टोला, दरभंगा, 20-1-95 आयुष्मान श्री अरविन्द ठाकुर, शतश: शुभाशी: । अहाँ द्वारा रचित आ प्रेषित “ परती टूटि रहल अछि “ कविता संग्रह परसू भेटल। आइ पढि कऽ सम्पन्न कयल। ई जानि हर्ष भेल जे अहाँ विप्लव जीक आत्मज थिकिएनि। पहिने किशुन जीक स्नेह सँ हम सुपौल बराबरि जाइत छलहुँ तेँ विप्लव जीक संग पूर्ण परिचय छल। अहाँ आ श्री केदार अपन अपन पिताक मैत्री भाव केँ संयोगि रखने छी तदर्थ साधुवाद। अहाँ केँ ज्ञात होयत जे हम कने मने जे पढलहुँ से संस्कृत। आब 75 वर्षक भेलहुँ आब हमर मान्यता बदलत तकर संभावना नहि। छन्द, अलंकार, अन्त्यानुप्रास नहिओ रहौक, यति अर्थात लयात्मकता केँ हम कविताक हेतु अनिवार्य तत्त्व बुझैत आयल छिऐक जे गद्य सँ एकरा फराक करैत छैक। सम्प्रति जे कविता लिखाइत छैक ताहि मे रसात्मकताक अभाव बहुत खटकैत अछि। पोथीक नाम सँ जतेक प्रभावित भेलहुँ, श्री केदारक भुमिका पढला सँ जे धारणा बनल, तदनुरूप वस्तु सन्तुष्ट नहि कऽ सकल। सामान्यत: सम्मति मे लोक प्रशंसात्मक वाक्य लिखि दैत छैक। उदीयमान प्रतिभाक हेतु हम तकरा श्रेयस्कर नहि मानैत छिऐक। एही कारणेँ बहुतो गोटे हमरा सँ क्षुब्ध आ क्रुद्ध रहैत छथि। जेना ‘गूंथल गेल आटा’ सदृश प्रयोग सँ बाँचक चाही। उदारताक नाम पर हम ओहन शब्द सँ परहेजक पक्षधर छी जे शब्द हमरा अपने भाषा मे प्राप्त अछि। भावभूमि अहाँक विस्तृत अछि दृष्टि मे कविक सूक्ष्मता अछि। आब युग अहीं सभक थिक, मैथिलीक भविष्य अहीं सब पर निर्भर छैक। हमर शत शत शुभकामना स्वीकार करी। इति शुभम्। स्नेहाधीन – श्री अमर # द्वितीय : श्री नारायण जी प्रति, श्री केदार कानन, किशुन कुटीर, सुपौल Ghoghardiha, 15-11-93 प्रियवर, ‘परती टूटि रहल अछि’ काल्हि भेटल। हमरासभक बीच बहुआयामी चेतना-सम्पन्न कवि (साहित्यकार) भाइ अरविन्द ठाकुरक उदय हमरासभ लेल आ समकालीन मैथिली साहित्य लेल अनेक संभावनाक अनेक दुआरि फोलैत अछि। एहि संग्रहक कवितासभक अहलटटका शब्द आ कथ्य आ चेतना जतऽ समकालीन मैथिली कविताक क्षितिजकेँ अपेक्षित विस्तार दैत अछि, ओतहि ‘सामा-चकेबा खेलाइत स्त्रीगण’ हमरा लोक-परम्पराकेँ बचबैत अछि। अद्भुत उर्वर-समर्थ कवि भाइ अरविन्द जी केँ हमरा दिस सँ हमर आत्मीय शुभकामना, संग्रह लेल। नारायण जी # तृतीय : प्रमोद कुमार झा, कार्यक्रम अधिशाषी, दूरदर्शन केन्द्र, पटना - 800001 अरविन्द ठाकुर जाहि परिवेश मे रहि कऽ अपन रचना कऽ रहलाह अछि ई अति प्रशंसनीय अछि। जेनाकि मैथिलीक सामान्य रचनाकार ई दावा करैत छथि जे ओ माटि-पानि सँ जुड़ल छथि तऽ ई कहल जा सकैछ जे अरविन्दक कविता सँ ई बात स्थापित होइछ। मैथिली साहित्य मे व्याप्त प्रचंड गर्मी आ चिपचिपाएल पसीना आ कष्टप्रद भादोक बाद जे एकदम प्रात: दुबिक ऊपर खाली पएर चलबाक आनन्द कातिक मे भेटैत छैक [ तकरा अहाँ एहन संवेदनशील रचनाकार खूब नीक जकाँ ‘फील’ केने होएब ] अरविन्दक कविता सभ हमरा उएह आनन्द देलक। नब-नब स्वाभाविक भोगल बिंब सब एहि संग्रहक विशेष उप्लब्धि मानल जाएत ई ‘तारीख’ सँ हमरा उमेद अछि। बहुत दिन बाद हम पूरा संग्रह पढि सकलहुँ एक सिटींग मे। दू चारिटा कविता एहि संग्रह केँ आन संग्रह सब सँ अलग ठाढ कऽ दैछ। जौं अरविन्द जी आत्मसंतुष्टि आ आचार्यत्वबोध सँ ग्रसित भेने बिना अपन इन्द्रिय सब केँ एहिना सक्रिय राखथि तऽ काल्हुक मैथिली साहित्य केँ आशावान हेबाक चाही एहन-एहन प्रतिभा सब सँ। (केदार काननक नामेँ प्रेषित दिनांक-4 दिसम्बर, 1993क पत्रक अंश) शैलेन्द्र आनंद हाली-हाली बहथु कोसी 14 दिसम्बर 2012 ई- । वागमतीक जबकल साहित्यिक-सांस्कृतिक जल वेगमयी भऽ बहय लागल । ओहि समय लागल छल जेना मोनक कल्पना साकार भऽ उठल अछि । मैथिलीमे ढंगक समाचार पत्रक शुभारंभ मोनकेँ आन्दोलित कऽ देने छल । आब मैथिलीक बढ़ैत डेगकेँ क्यो छेकि नहि सकत । नव ऊर्जा सम्पन्न ओहि टीमकेँ देखि, अनेरो विश्वाससँ भरि गेल छलहुँ । टीम लीडर अजित कुमार ‘आजाद’ प्रभारी सम्पादक- अरविंद ठाकुर, फीचर सम्पादक- नरेन्द्र एवं नगर सम्पादक- कुमार शैलेन्द्र । पहिल दिन जखन ‘मिथिला आवाज’ कार्यालय पहुँचलौं, तऽ आँखि सम्पादकक केबिन दिस छल । कारण प्रभारी सम्पादकक कुर्सी पर ओ छथि जिनका सँ पत्र-व्यवहारक अतिरिक्त साक्षात्कार नहि भेल छल । एक तरहेँ हमरा लेल ई अजगुत गप्प छल । पूर्व परिचित रहलो उत्तर, ने हम हुनका देखने छियनि आने ओ हमरा देखने छथि । रचनाकारक एहेन मैत्री, वस्तुतः बहुत उत्सुकतासँ भरल रहैत छैक । हमरो लग वएह उत्साह छल । अरविंद ठाकुर अर्थात ‘परती टुटि रहल अछि’ केर कवि । जनिक प्रतिभा सँ एहि पोथीक माध्यमे पूर्वहि परिचित रही । ‘अन्हारक विरोधमे’ कथा-संग्रह पढ़ि चुकल रही । मुदा परिचितो रहैत, अपरिचित रही सदेह । गौरांग, दोहारा शरीरक ई नवयुवक, हमरा देखि मुस्कियाएल । लागल जेना ई हमरा पूर्व देखि चुकल अछि । हम आगू बढ़ि बजलहुँ- शैलेन्द्र आनंद । कुर्सीसँ उठि, ओ हाथ बढ़बैत कहलनि- ‘मिथिला दर्शनमे फोटो देखि चुकल छी, तेँ पहिने अनुमान लगा चुकल रही । दर्शन देबाक लेल कोटिशः धन्यवाद । कुर्सी पर बैसौलनि, चाहक आदेश देलखिन आ साहित्यिक गति-विधिक चर्चा होमय लागल । गप्पमे आठ बाजि गेल । हम हड़बड़ेलहुँ, मुदा ओ निश्चिन्त । एकटा संक्षिप्त वाक्य- अरे जेबे करब । अखन कोन हड़बड़ी छैक । पन्द्रह दिनुक बादहि अखबार निकलबाक संभावना, तावत एतेक दिनुका बाँकी-बकियौता पूरा कऽ लेबाक छै । मुद्रा ओहिना सौम्य । सौम्य मुद्रामे ठाँहि-पठाँहि बजबाक अद्भुत सामर्थ्य छनि हिनकामे । साहित्यकारक असली फकराना अंदाज । ‘परती टूटि रहल अछि’ केदार कानन पठौने रहथि । कानन हिनके जकाँ परिचित छथि । हुनकोसँ सदेह भेंट नहि अछि । मुदा लगैए जेना हमरा लोकनि पुरान परिचित रही । एहने भेंट कुणालसँ भेल छल । कुणाल, लोहना आएल रहय, राज आ शैल सँ भेंट करबाक लेल । रस्तामे एकाएक रोकलक आ कहलक- की हमरा समक्ष शैल ठाढ़ अछि ? हम सकपकाएल ‘हँ’ कहने रही कि कहैत अछि- हम कुणाल । हम छातीसँ ओकरा साटि लेने रहियै, आइयो हमरा ओहिना मोन अछि । से अरविंद ठाकुरक ओहि दिनुका भेंट ओहिना मनमोहक लागल छल । एहि आत्मीयताक तारकेँ मात्र साहित्य जोड़ने अछि । कोसिकाक पानिमे जेना प्रतिभाक वरदान छै । उग्रताराक आशीष जेना ओतुक्का एक-एक साहित्यकारकेँ प्राप्त होइक । सुभाष भाइ होथि कि कानन, नवीन होथि कि अरविंद सभ चर्चित, सभ कलमक तेज । साहित्यसर्जक लोकनिक गाम, कत्तौ ने कत्तौ अपनत्वसँ भरि दैत अछि । महिषी आ उग्रताराक नाम मात्रहिसँ हमर हृततंत्री झंकृत भऽ उठैत अछि । कारण स्पष्ट अछि- महिषी हमर पुरखाक गाम थिक, हमर मूल ग्राम । महिषी, सहरसा आ सुपौलक लोक भरिसक अही कारणसँ अपन समाघ सन लगैत छथि । जाह, हमहूँ की-की कहऽ लगलहुँ ? हम अरविंद ठाकुर पर केन्द्रित छी आ बोहियाइत पहुँच गेलौं सहरसा । ओना सहरसा आ अरविंदक अटूट सम्बंध अछि, जेना हमर आ अरविंदक मैत्रीक प्रगाढ़ता । कहबाक लेल ओ अनुज रचनाकार किएक ने होथि, मुदा मैत्री सभ छान-पगहाकेँ तोड़ि दैत छैक । अरविंदजी खूजल लोक छथि । ठाँहि-पठाँहि गप्प लिखताह आ बजताह । नीक लागय तऽ बेस, नहि नीक लागय तँ बेस । हुनक मोनमे जे उपचरतनि ओ प्रकट कऽ देताह । छल-छद्मसँ दूर, निर्विकार भावसँ । तेँ वर्तमान समयमे जे स्थान हिनका भेटबाक चाही, से अखनि धरि क्यो नहि दऽ सकल अछि । एहेन रचनाकारक प्रति, आलोचक लोकनिक दृष्टि नहि जाएब, कोनो प्रतिभा सम्पन्न रचनाकारक अवहेलना थिक । अरविंदजी बहुत जिदियाह लोक । जे सोचताह ओकर कार्यान्वयन कोना हएत से संगहि सोचि लैत छथि । एक दिनुक गप्प सुना रहल छी । हम डेरापर पएर रोपनहि हएब कि फोन रिंग देलक । फोन उठौलहुँ । अरविंदजी छलाह । कहलनि- भाइ, महाप्रकाश नहि रहलाह । हुनक निधनसँ मर्माहत छी । तेँ अहाँसँ विशेष आग्रह जे 6 बजे धरि एक संस्मरण लिखि पठाबी । मात्र डेढ़ घंटाक समय । हम अपन विवशता कहितियनि, मुदा ओ एकर बिना अवसर देने कहलनि- लियऽ अजितजी बात करऽ चाहैत छथि । हम तखनहि बूझि गेलहुँ जे आब बिना लिखने कोनो उपाय नहि । आजाद, अपन पुरान अंदाजमे बजलाह- हँ सर ! कल्हुका अखबारक एक पृष्ठ महाप्रकाशक लेल रहतनि । संस्मरण अपनेक हिस्सामे छै । 6 बजे आबि जैयौ । प्रणाम आ फोन डिस्कनेक्ट भऽ गेल । भारी आफत । एतेक जल्दीमे केहने संस्मरण लीखि सकबै । मुदा नै लिखबै तऽ आजाद आ अरविंद दुनूक मोन टूटि जेतै । जेना-तेना हुनका लोकनिक फरमाइश पूरा कऽ, मिथिला आवाज कार्यालय पहुँच गेल रही । अरविंदजी दूरहिसँ स्वागत कएने रहथि- आएल जाउ, आएल जाउ । हम बुझैत छलियै जे एहि कठिन समयमे हमर आवश्यकताक पूर्ति के कए सकैत छथि आ पुनः हिन्दीमे- आज की शाम महाप्रकाश के नाम । अरविंदजी अपन कर्मचारीसँ अत्यधिक स्नेह करैत छलाह । ककरो आवश्यकता पड़ि गेला पर, हुनक बटुवा तुरत्त खुजि जाइत छल । कनिएँ दिनमे ओ सम्पूर्ण स्टाफकेँ अपना दिस मोड़ि लेलनि । ई हुनक मिलनसार स्वभावक परिणाम छल । आ हुनक इएह लोकप्रियता हुनक मार्गक काँट भऽ गेल । पत्रकारिताक लौल केनिहार एकटा ईर्ष्यालु व्यक्तिक आँखिमे ओ गड़य लगलाह । शकुनी स्वरूप ओ व्यक्ति पाशा पर पाशा फेकय लागल । अरविंदजीक लेल धैन सन । मुदा सिंह, सिंह होइत छैक ओ गीदर कथमपि नहि भऽ सकैछ । परिणामतः एक दिन मनोवेगमे ओ इस्तीफा दऽ डेरा चल अयलाह । बहुतो मनयबाक प्रक्रिया भेल, मुदा पुनः घूरि नहि तकलनि । एहिसँ पूर्व आजादकेँ उछन्नर दऽ हटयबामे ओ सफल भऽ गेल छल आ ओकर ई दोसरो दाव सुतरि गेलै । अरविंदजी संवेदनशील लोक छथि । ओ संवेदनेक कारण अपन पदसँ इस्तीफा देलनि । मुदा देखा गेलाह अपन अस्तित्व, अपन ऊर्जा, अपन लोकप्रियता ओहि नीच व्यक्तिकेँ जे कुकूर सदृश अइँठ खयबा लेल सदरि काल मालिकक आगू नाघरि डोलबैत छल । प्रपंच करैत छल, मैथिलीक संग, स्टाफसँ गारि-फज्जति सुनैत रहैत छल, मुदा जाहि आशासँ ओ एहेन कुकर्म कएलक, से पूरा नहि भऽ सकलै । अजित आजाद सन तेज-तर्रार, कर्मठ मैथिलीक समर्पित कार्यकर्त्ताक संग प्रपंच- सी-ओ-पद पएबाक लेल, अरविंद ठाकुर सन प्रतिभाशाली रचनाकार संग प्रपंच प्रभारी संपादक पद पएबाक लेल । कुमार शैलेन्द्र आ नरेन्द्रक संग प्रपंच-फीचर सम्पादक बनबाक लेल, मुदा ‘मिथिला आवाज’क मालिक लग कोनो दालि नहि गलि सकल । कुकूर, अँइठ खयबाक लेल नाघरि डोलबैत रहि गेल । अरविंद ठाकुरक सम्पादकक पदसँ इस्तीफा देलाक बाद किवा आजादक त्याग पत्रसँ मैथिलक सपना टूटि गेलैक । भहरि गेलैक समर्पित कार्यकर्त्ताक आसाक देबाल । कियो गेलै हाँजीपुर, कियो गेलै पटना । अंततः ‘मिथिला आवाज’ बंद भऽ गेल । मैथिलीक आकाशमे उद्दीप्त आसाक तरेगन, धूमकेतु बनि विलीन भऽ गेल । मुदा विलीन नहि भेलाह- अरविंद । ओ तऽ आओर भकरार भऽ फुलएलाह । मकरंदक संग, महमहाइत, मैथिली वाङ्मय सुरभित करैत, अपन कलामधुसँ आकर्षित करैत, कहियो नहि बिसरयवला भाषा स्नेहक लेल दू-आखर नित्तो लिखैत छथि । ‘अन्हारक विरोधमे’ लड़ैत छथि जड़ताक परती तोड़ैत छथि । ओ लड़ैत रहताह, अन्हारक विरोध करितै रहताह । परती टूटत, फसिल लहलहाएत, सर्वजन हिताय, बहुजन सुखाय । हमर अनुज थिकाह, मुदा मित्रवत् छथि । हाली-हाली बहैत रहथु कोसी, अपन वेगमे घृणा अहंकार, तिरस्कार, चापलूसी सभेँ बहाकए ल’ चल जाथु । साहित्यक धरती शस्य-श्यामला होइत रहथु । वागमतीक वेग पुनः अवरुद्ध भऽ गेल अछि । ओकर किन्हेर बोन-झांखुरसँ भरल जा रहल अछि । मऽर खएबा लेल नढ़ियाक जमाति, हुलुक-बुलुक कऽ रहल अछि । कुकूर दोसर मालिकक दरबारमे नाघरि डोला रहल अछि । मालिककेँ भड़का रहल अछि, विभिन्न लोकक मादेँ । कोनो-कोनो दाव सुतरि जाइत छै ओकरा एक कौर बेसी भेटि जाइत छै । भरिसक एहने स्थितिकेँ देखैत, भाइ उदयचन्द्र झा ‘विनोद’ लिखलनि अछि- ‘‘सत्य कथा उपराग भऽ गेलै झूठक माथा पाग भऽ गेलै पक्षीराजा काग भऽ गेलै धाजा पर तऽ दाग भऽ गेलै । मौलिक लक्ष्य विवाद भऽ गेलै दुष्टक परिसवांद भऽ गेलै खास लोक आबाद भऽ गेलै आम लोक बर्बाद भऽ गेलै ।।’’ (अमलतास, प्रवेशांक 2013) शाइत मैथिली भाषाक इएह परिणति लिखल छैक । दोयम दर्जाक लोक, गोटी सुतारबाक लेल, मातृभाषाक अनुरागके बिसरि, ओकर मानमर्दन करबा पर तुलल अछि आ दोसरा दिस मातृभाषा अनुरागी विभिन्न प्रताड़ना सहैत, मातृमंदिरमे रचनाक फूल समर्पित कऽ आत्मसंतोष कऽ रहल अछि । बरु कोसी हाली-हाली बहथु, मुदा ओ नहि, नहि-नहि कथमपि नहि । अरविंद भकरार हएताह, हुनक सुरभिसँ सुरभित सम्पूर्ण मैथिली वाघ्मय एक दिन महमहा उठत । मिथिलेश कुमार राय अरविन्द ठाकुरः अन्हारक विरोधी व्यक्तित्व आइ-काल्हि फेसबुकपर व्यक्तित्व नहमर की कृतित्व तैपर विचार पोस्ट कएल जाइत अछि। सभहँक अपन-अपन विचार छनि मुदा हम ओहन लोककविचारसँ बेसी प्रभावित होइत छी जे व्यक्तित्वसँ बेसी कृतित्वकेँ मानै छथि। हमर अपन मानब अछि जे व्यक्तित्व समाजक बड़का वर्गकेँ प्रभावित करै छैआ कृतित्वपर सेहो ओकर छाप पड़ैत छै। एकर पाछू हमर हमर अपन अनुभव अछि। खराप समयमे एक आदमी हमरा अन्हारसँ लड़बाक तागति देला। हम ओना दिल्लीमे छलहुँ मुदा कुसहा त्रादसीमे सभ जकाँ हमहूँ पिसाएल छलहुँ आ ओही पिसाएल समयमे अरविंद ठाकुरजीसँ हमर पहिल भेंट भेल।गामसँ माए-बाबू जान बचा कऽ भागल छला तँ दिल्ली विश्वविद्यालय पढ़ाइ छोड़ि हम भागि आएल रही। फरवरी २०१०केँ शुरूआतमे जा धरि हम प्रभातखबर, सहरसा नै ज्वाइन केलहुँ ता धरि अरविंदजी हमर दुर्दिनकेँ सम्हारबामे नीक योगदान केला। कोसी बाढिक बाद बेरोजगारीक दिनमे हमरा एकटाआइडिया आएल छल जे हम कोसीपर लिखल गेल पद्य रचना सभहँक संकलन करी। आ ऐ लेल हम सूची बनेबाक क्रममे अरविंदजीसँ भेंट भेल। हमताहि समयसँ हिनकर दृष्टिकोणक प्रशंसक छी। ओना ओहि समयमे हम जौंडिससँ ग्रस्त रही मुदा स्थिति ओहन छल जे ओहू समयमे हम काज ताकिरहल रही। आ ऐ सभहँक अछैत हम रचनाकरक सूची बनाबैत रही। अरविंदजीकेँ भेंटक क्रमेमे पता लागि गेलनि जे हमर तबीयत खराप अछि तँ जौंडिसआ एकर बचावपर बहुत रास चर्चा भेल आ तै संग कोसी क्षेत्र, क्षेत्रक पानिपर चर्चा भेल संगे संग बेरोजगारीक भयावहतापर सेहो। कनी-मनी साहित्यपरसेहो चर्चा भेलै। खेला-पीलाक बाद चलबा कालमे बाढ़िपर लिखल हिनक दूटा गजल भेटल। हिनक सुलेख देखि नीक लागल। हिनक चेहरे जकाँ उज्जरकागजपर मोति जकाँ अलगसँ चमकैत। भेंट स्वरूप हिनक कथा संग्रह "अन्हारक विरोधमे" सेहो भेटल। पूरा रस्ता हम ऐ शीर्षकेँपर सोचैत रहि गेलहुँ,रातिमे निंद नै भेल। आ भोरे लागए लागल जे हम ठीक भेल जा रहल छी...... अन्हारक विरुद्ध बडढ़ल डेग आब किछु आतेज भऽ गेल छल। बहुत आत्मविश्वासक संग प्रभात खबरमे पएर रोपबाक जमीन भेटल तँ हमर बेरोजगारीकपरती टूटि गेल छल। कनी-मनी हरियरी आबि गेल छल हमरा उपर। जहिया कहियो पात पीयर होबऽ लागैत छल "अन्हारक विरोधमे" फूँही जकाँ बरसऽलागैत छल। फोनपर तँ बात-चीत होइते रहल। सगर राति दीप जरए कार्यक्रमक दौरान हिनक बजबाक क्षमता आ समीक्षीय दृष्टिकोणक हमरा फेरसँ चकित केलक। हमरा सभहँक सामने बाजऽमेदिक्कत होइत छल मुदा सुनबाक धैर्य छल हम अरविंदजीकेँ पूरा धेआनसँ सनलहुँ। तेसर भेंट लिच्ची पकबाक समयमे भेल छल। एकटा फरेबी अफसरसँभेंट कऽ कऽ आएल रही आ दुनियाँसँ आक्रांत रही मुदा अरविंदजीक घर "विपल्व भवन"मे पएर रखिते मोन शांत होमए लागल। कनी दुनियाँदारीक गप्पभेल, स्वास्थ्यक गप्प भेल। गप्प भेलाक बाद ओ बाहर गेला आ भीतर अबैत काल हुनका हाथमे लिच्ची भरल पथिया छल। लिच्ची तँ मिट्ठ होइते छैताहूमे हुनक आग्रह एहन जे हम मना नै कऽ सकलहुँ। आबऽसँ पहिने हम किछु कविताक जन्म-कथाक संबंधमे गप्प भेल आ ओहन लोकक गप्प भेल जेरचना प्रक्रिया लेल जमीन तैयार करै छै। हम ई मानलहुँ जे अन्हारक विरोधमे संघर्ष कऽ रहल लोके हमरा भाव ओ शक्ति दै छथि, हम तँ खाली शब्दकेँक्रम राखब जानै छी। अजित आजाद अरविंद ठाकुरः हमरामे अहाँ, अहाँमे हम वर्ख २०१२। "मिथिला आवाज" दैनिकक प्रकाशनक हेतु हम टीम तैयार कऽ रहल रही। मूल संकट छल संपादकक। मैथिली अखबारक लेल जेहन संपादकहम चाहैत रही, चारू भर नजरि खिरओलाबक बादो कियो सक्षम आ समर्पित पत्रकार एहि लेल अभरि नै रहल छल। किछु मैथिली भाषी संपादक अवश्यरहथि सोंझामे जिनक हिंदी अखबारक संपादकक रूपमे ख्याति रहनि मुदा हुनका सभ लग असमंजसक स्थिति रहनि। एहनमे एक दिन हम अनचोकेमेअरविंद ठाकुरजीकेँ फोनेपर आधिकारिक मुद्रामे कहि बैसलियनि- "सर अहाँकेँ मिथिला आवाजक संपादनक दायित्व लेबाक अछि। कोनो अगर-मगर नै"। ठाकुरजी हतप्रभ रहि गेल रहथि मुदा हमर जिद कहू अथवा हमरा प्रति हुनक विशेष अनुराग ओ तात्काल गछि लेने रहथि। किछुए दिनक उपरांत ओ हमरपटना आवासपर अएलाह, प्रायः चारि-पाँच दिन रहलाह। एहि क्रममे ओ अपन गजल संग्रह "बहुरुपिया प्रदेशमे" केर मादे मारिते रास बात विचार केलनिमुदा रहि-रहि कऽ मैथिलि अभबार निकालबाक आ ओकर संपादन-पक्षपर विमर्श करब ओ नै बिसरथि। किछु दिनक उपरांत हम हुनका डा. चंद्रमोहनझाजीसँ मधुबनीमे भेंट करबेलियनि। डा. चंद्रमोहन झा मिथिला आवाजक मालिक रहथि। अखबार निकालबाक बाद ओ एहि अखबारक प्रधान संपादकसेहो बनलाह। अरविन्दजी प्रभारी संपादकक काज करब शुरू केलनि। प्रायः जुलाइ २०१२सँ। हुनक कुंडलीमे नौकरी करब नै छलनि। ओ ऐसँ पहिने कहियोव्यावहारिक रूपें चाकरी नै केने रहथि. पत्रकारिता जरूर करथि। ई गुण ओ अपन पितासँ अर्जित केने रहथि। हुनक पिता प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी आकुशल पत्रकार रहथिन। शुरुआतमे ठाकुरजीकेँ मिथिला आवाजक कार्यालयमे किछु-किछु दिक्कत होइन मुदा लगले ओ आदती भऽ गेला। अखबारकपहिल अंक १४ दिसम्बर २०१२केँ बहरेलै मुदा डमी अंक जुलाइयेसँ तैयार होइत रहैक। एहि क्रममे हमर दायित्व छलकेँ सभकेँ तकनीकी रूपसँ नीकबनाएब। ठाकुरजीक तत्परताक संग कमप्यूटर ओ अखबारी साफ्टवेयरमे दक्षता प्राप्त केलनि। अखबारक तनाव भरल वातावरणकेँ ओ अपना तरहेंतनावरहित बनेबामे कोनो कोर-कसरि नै छोड़थि। हमर चारू कात ईर्ष्या-द्वेषक एकटा नमहर आ मजगूत छहर देवाली बनए लागल छल। एहि छहरदेवालीकेँ अपन हास्य बोध अथवा एना कही जे भाष्यबोधसँ तोड़ि देबाक ओ चेष्टा करथि। बहुत दूर धरि ओ सफलो भेला मुदा पूर्णतः नै। परिणामतः हम३० जनवरी २०१३केँ अखबार छोड़ि देल। ठाकुरजी मुदा जमल रहलाह। बदमे पता लागल जे जाहि छहर देवालीमे हम घेराएल रही, सएह छहरदेवालीहुनका घेरि लेलकनि अछि। फोनपर ओ अपन पीड़ा कहथि मुदा हमर एकैटा तर्क रहए- "जा धरि अहाँ छी ता धरि अखबार अछि। अहाँ निकलबै अखबारबंद भऽ जेतै"। आ लगभग सएह भेलै। ठाकुरजी एक दिन जय मैथिली कहि निकलि गेला। तकर बाद किछु दिन नरेंद्र सर प्रभारी संपादकक रूपमे अखबारसम्हारबाक चेष्टा कयलनि आ किचु दिन कुमार शैलेन्द्रजी, बादमे अमलेंदु शेखर पाठकजी सेहो मुदा अखबार नै चलि सकलै आ २२ अप्रैल २०१४केँ बंदभऽ गेलै। एतेक दिन अखबार जे चलल तकर एकटा मजगूत पाया रहथि अरविंद ठाकुरजी। हुनक संपादकीय चार्चामे आबि गेल छल। हमरा बहुत गोटेप्रत्यक्ष अथवा फोनपर एकर प्रशंसा करथि। ओहि समय हिंदी अखबारक संपादकीय आ ठाकुरजीक मैथिलीमे लिखल संपादकीय केर जव तुलना करबैक तँठाकुरजी बीस नै एक्कैस पड़ताह। हमर तँ इच्छा अछि जे हुनक संपादकीय केर पोथी भऽ जाइक। मिथिला आवाजमे एक समय एहनो छल जाहिमे किछु दिनक लेल हमरा आ ठाकुरजी बीच मतांतर भऽ गेल छल। बाजा-भुक्की सेहो बंद। हम अपना तरहेंस्थितिकेँ सम्हारबाक बहुत यत्न करी मुदा सफल नै भऽ पबैत रही। एक दिन नरेन्द्र सर एकर फरिछौट कएलनि ताहूमे ठाकुरेजीकेँ धन्यवाद जे ओ हमराप्रति सभटा कटुताकेँ एकहि क्षणमे बिसरि गेल रहथि। अरविंद ठाकुरजीसँ पहिल भेंट कहिया आ कोन स्थितिमे भेल से ठीक-ठीक नै कहि सकैत छी मुदा१९९३ केर गप्प थिक प्रायः। हुनक पहिल पोथी "परती टूटि रहल अछि" कविता संग्रह आबि गेल रहनि। हम केदार काननजीसँ भेंट करबा लेल मासे-माससुपौल जाइत रही ओहि समयमे। हमर गाम हटनी सँ सुपौल मात्र १८ कीलोमीटर दूर छै। बीचमे मुदा कोसीक धार। नाहपर चढ़ी आ ओइ पार सुपौल।लगभग चारि घंटाक रस्ता आ खर्च पड़ैक अधिकतम दस टका। तहिया मैथिली साहित्यमक एकटा प्रमुख केंद्र रहैक सुपौल। एहि केंद्रक धुरी रहथि केदारकाननजी। हुनक मित्र मंडलीमे डा. शिवेन्द्र दास, डा. नवीन कुमार दास, अरविन्द ठाकुरजी सभ रहथिन। ओही गोष्ठी सभमे कहियो हिनक विद्वता आठहक्कासँ प्रभावित भेल हएब हम। ठाकुरजीक जिंदादिली आ उन्मुक्त भाव हमरा विशेष प्रभावित केलक जे हम एकक्हि श्वासमे उक्त संग्रहक हिंदीअनुवाद कऽ गेल रही। मुदा अनुमति तँ लेने नै रही आ डर सेहो रहए मोनमे जे यदि आनुवाद पसिन्न नै पड़लनि तँ अपन अयोग्यता सेहो देखार होयत।अनुवाद केलाक बहुत दिन धरि हम एही गुन-धुनमे रही जे अनुवादक ई काँपी दियन कि नै। अंततः राजविराजमे सगर राति कता गोष्ठीमे हम हुनका ईकाँपी देखेबाक साहस जुटा लेलहुँ। ओ मुग्धभावसँ हमर अनुवाद कार्यकेँ देखलनि आ प्रशंसा केलनि। गोष्ठीमे उपस्थित अनेको साहित्यकारकेँ ओ एहिसंदर्भमे कहलखिन्ह। मैथिलीमे लेखकसँ बेसी प्रकाशक छथि एकर अछैत पोथी प्रकाशनक स्थिति बहुत बेसी दयनीय अछि। बिक्री व्यवस्था एहिस्थितिकेँ आर संकटमय बनबैत अछि। एहनमे अनुवाद कएल एहि कृतिकेँ छपबामे दिक्कत आएल जे की स्वाभाविक छल। बहुत बर्ख धरि ई अनुवादअन्हारेंमे रहल। लगभग १७-१८ बर्ख। बर्ख २००८मे हम "नवारंभ" नामक प्रकाशनक स्थापन केलहुँ। पोथी छपबाक किछु हुनर सेहो अर्जित केलहुँ।प्रकाशित पोथी सभहँक चर्चा होमय लागल। तँ एक दिन हम ठाकुर सरकेँ उक्त अनुवाद संदर्भमे जिज्ञासा केलियनि। ओ छपेबाक लेल तैयार भेला। एहिबेर ओ अपने गंभीर छला छपेबाक लेल। हमर काज असान भऽ गेल। "परती टूट रही है" सोंझा आबि गेल। खूबे चर्चा भेल। मैथिली कविताक किसानीसंस्कृति आ प्रतिरोधक आभाकेँ हिंदी जगतमे प्रशंसा भेटलैक। हमरामे कतबा अरविंद ठाकुर छथि आ हुनकामे कते हम छी एकर पड़ताल या प्रमाणदेबाक खगता नै अछि मुदा ई बात पूरा सत्य अछि। हमरामे जतबा ओज, जतबामे , जतबा जिद अछि से हुनके थिक। अरविंद ठाकुरजी कतबा हमर मित्र,कता जेठ भाए अथवा हथवा हमर अभिवाभक छथि सेहो एखन प्रमाण देब उचित नै मुदा ईहो बात शत-प्रतिशत सत्य अछि। हुनक कथा संग्रह "अन्हारकविरोधमे" यद्यपि हमर प्रकाशनसँ नै छपल मुदा एकर सभटा काज-ब्योंत हमरे धराओल अछि। भूमिका सेहो हमरेसँ लिखबेलनि। हद तँ ई जे लोकार्पणसेहो हमहीं सेहो कएल सुपौल कथा गोष्ठीमे। हुनक जिद जे नव लोक आगू आबए। नवतुरिया लेखककेँ आगू बढ़ेबामे सभ तरहँक मदति करबामेठाकुरजीक जोड़ नै अछि। प्रायः इएह कारण अछि जे मैथिलीमे सर्वाधिक नवतुरिया लेखक हुनकेसँ जुड़ल अछि। नवतुरियाकेँ अपन संगतुरिया बनेबाककला कियो हुनकेसँ सीखि सकैत अछि। संघर्ष आ दरिद्रा हमर संगी रहल अछि। एक समय तँ एहनो छल जे हम "मिस्ड काल" केर मास्टर रही।आ एकरशिकार मैथिलीक अनेक साहित्यकार भेल हेता मुदा सर्वाधिक "मिस्ड काल" हम ठाकुरजिकेँ कएल करी। ओ तात्काल "काल-बैक" करथि आ बड़ी देर धरिबतियाइथ। आब ओना हमर ई आदति बंद भऽ गेल अछि मुदा बड़ देर धरि बात करबाक ठाकुरजीक आदतिमे कोनो बदलाव नै भेलनि अछि।भरि पोखगप ओ जा धरि नै करताह ता धरि हुनका संतोष नै होइत छनि। हमरा तँ केखनो कऽ होइत अछि जे ई अपन छह मासक मोबाइल बिलकेँ बचा लेथि तँहिनक दू पोथी अरामसँ छपि सकैत अछि मुदा बात कहबाक अर्थ भेल हुनक संतोषक मार्गकेँ अवरुद्ध करब।हमर मिस्ड कालक चर्च ओ अपन गजलसंग्रह "बहुरुपिया प्रदेशमे" केर भूमिकामे विस्तारसँ केने छथि सेहो सार्थक अर्थमे। एहि संग्रह दूटा शेर हमरे लेल लिखने छथि। उक्त दूनू शेरमे हम कतबाफिट छी कतबा अनफिट से हमरा जानए बला कहताह मुदा हमरा लेल ओ एकटा मार्क अछि जतऽसँ हम निच्चा नै जाए चाहब।हमरा ऐ बातक गौरब अछिजे ओ हमरा आग्रहपर गजल दिस प्रवृत भेला आ मैथिलीक श्रेष्ठ गजलगो प्रमाणित भेला। हुनक गजल संग्रह मैथिलीक एकटा माडल गजल संग्रह थिकई बात समीक्षक लोकनि सेहो मानैत छथि। हिनक किछु आर गजल संग्रहक अपेक्षा अछि। मैथिलीमे गजल विधा आइ स्थापित भऽ गेल अछि मुदा एकरगाड़ आर गँहीर हेबाक खगता छै। ताहि संदर्भमे ठाकुरजीक भूमिका महत्वपूर्ण भऽ जाइत अछि।अरविन्द ठाकुरजी आइ-काल्हि गद्य लेखनमे अपनाकेँरमौने छथि। समीक्षा आ निबंध हिनका बेस रुचि रहल छनि। कालमनिष्ट रूपमे ओ अपन झंडा ई फहिनहि गाड़ि चुकल छथि। हिंदी पाक्षिक "लोकप्रसंग"मे हिनक काम बस चर्चित भेल।आक्रमाकता हिनक लेखनक मूल पूँजी थिक। विचारमे धार आनब आ सही जगहपर एकर उपयोग करब हिनक नैसर्गिक गुण थिकनि। बर्ख २००९मे नवारम्भ पत्रिका निकालबा पाछू हिनके उत्प्रेरण काज केलक। पत्रिका कोना लोक धरि पहुँचैक तकर ब्योंत धरेबाकचिन्तामे सदिखन ओ लागल रहथि।ओही क्रममे हमरा ईहो लागल जे हिनकामे श्रेय लेबाक प्रवृति नाममात्रक लेल छनि। अपनाकेँ पाछू राखि लोकेँ आगूबढ़ेबाक उद्दाम लिलसा हिनक एकटा खास विशेषता थिक। मैथिली लेखक संघक स्थापना २००८मे भेलापर ओ एकर आजीवन सदस्य बनला मुदा एहिसंस्थाक क्रियाकलापसँ असंतुष्ट भेलापर ओ एकर विरोध करब नै छोड़लनि। अध्यक्ष आ महासचिवसँ हुनक तकरारक चर्च हमरा लोकनि मींटिग धरिमेकरी। प्रायः एहि सभहँक कारणें संस्थामे किछु गुणात्मक सुधार सेहो भेलै। मैथिली लिटरेचर फेस्टिभल २०१४मे कविक रूपमे ओ पटना आमंत्रित रहथिमुदा आयोजक संस्था मैथिली लेखक संघसँ किछु मुद्दापर हुनक नाराजगी बनले रहल। प्रतिरोधमे ओ कविता पाठ नै केलनि। हमरा हुनक प्रतिरोधीस्वभाव प्रभावित करैत रहल अछि। हमरा भीतर जे किछु आगि अछि से असलमे हुनक अगिन ताप थिक जे हमरा सिमसिमाह हेबासँ बचबैत अछि। हमराअसगर नै होबए दैत अछि ठाकुरजी। एही बर्ख हमर कंपनीसँ संदर्भित एकटा मामिलामे हमरा जहल जाए पड़ल छल। जहलमे बहुत रास बात सभ जानल-सीखल। ओतऽ एकटा चर्चा बहुत होइक-- "अस्पतालक बेडपर आ जेलक गेटपर जे भेंट करऽ आबए सएह भेल अपन"। अरविन्द ठाकुरजीक एक दिनअनचोके जेलक गेटपर भेटलाह। हमरा बल भेटल। हमरा प्रति हिनक विश्वास एक बेर आर परिलक्ज़ित भेल। असलमे जहलक गेटपर हुनक आगमनहमरा लेल क्लीन चिट सेहो छल। ओ हमर रिहाइ केर दिन सेहो आबऽ बला रहथि मुदा हमहीं मना कऽ देने रहियनि। आइ सुपौलमे केदार भाइ सक्रिय नैछथि मुदा सुपौलकेँ एकटा साहित्यिक केंद्र बना कऽ ठाकुरजी रखने छथि। आइ सुपौलक अर्थ अरविन्द ठाकुर होइत छै। सुपौलक आपस-पासक क्षेत्र यथात्रिवेणीगंज, मधेपुरा, पूर्णिया आदिकेँ सेहो साहित्यिक रूपें सक्रिय बनेबामे हिनक योगदानकेँ नकारल नै जा सकैए। प्रलेसकेँ कोसीमे विस्तार आ अर्थदेबामे सेहो हिनक महती भूमिका रहलनि अछि। पुरस्कार आ चाटूकारसँ कोसो दूर अरविन्द ठाकुरजीक संपूर्ण प्रतिभाक सार्थक उपयोग यद्यपि आइ धरिनै भऽ सकल अछि मुदा जतबा ओ देलनि अछि ताहिसँ आर किछु भेल होइक की नै मुदा प्रतिरोधी तेवरकेँ धार अवश्य भेटलैक अछि।हिनक उर्जा आआगि, दृष्टि आ सृष्टि, कथनी आ करनी एवं जीवन आ लेखनमे कतहुँ विसंगति नै भेटत। सभ ठाम एक रूप एक रंग। लेखककेँ जँ अपन रीढ़ नै तँ फेर ओकेहन लेखक? अरविन्द ठाकुर ने सिर्फ अपन रीढ़पर छथि अपितु मैथिली साहित्यिक रीढ़ बनल छथि तँ एहिमे हुनक मेहनति आ जीबटपनक योगदानछनि।आ "विदेह" जँ हुनकापर केंद्रित अंक निकालि रहल अछि तँ हमरा लगैए जे किछुए लोक सही मुदा छथि तँ जे अरविन्द ठाकुरजी सन समकालीनसाहित्यकारक परिवर्तनकामी लेखकन "नोटिस" लैत छथि। एतऽ तँ ई हाल अछि जे जिबैतमे के कहए मरलोपर लेखकक नोटिस लेनिहार कियो नै।धन्यवाद विदेह। लक्ष्मण झा सागर जेहने खोजलऽ हौ कुटुम्ब डा वीरेन्द्र मल्लिक हमर कविता संग्रहक भूमिका लिखबाक क्रम मे हमरा फोन केलनि जे हमर समकालीन साहित्यकार के सभ छथि ? हम अवग्रहमे पड़िगेल रही। तत्क्षण हुनका कहलियनि जे जहन हम मैथिली मे लिखनाइ शुरु केने रही तहन हमरा संगे सर्वश्री हितनाथ झा ‘हितेश’, विनोद भारती,कालीकान्त झा ‘बुच’ आ स्व फुलेश्वर सिंह ‘नौशाद’ छपैत छलाह। ‘बुच’ जीक कोनो रचना किछु बर्ख पूर्व कत्तहु अभरल छल। बांकी गोटेक कोनो किछुकहां भेटइए पढबाक लेल। साहित्य मे हमरा बैच केँ ग्रहण लागि गेलैक। हम टुग्गर भऽ गेल छी। हमरा लोकनिक बाद जे लोकनि लिखय लगलाह से आइ कतय सं कहां पहुंचि गेलाह अछि। हुनका लोकनिक नाम लेब अप्रासंगिक नहि हैत।ओ लोकनि छथि सर्वश्री प्रदीप बिहारी, विभूति आनन्द, रमेश, नारायण जी, नवीन चौधरी, कुणाल, शिवशंकर श्रीनिवास, मधुकान्त झा, विभा रानी,शरदिन्दु चौधरी प्रभृति। व्यक्तिगत हम जिनका लोकनि कें अपन साहित्यिक गुरु मानैत छियनि। हमरा एहि बात कें स्वीकार करबा मे ने कोनो संकोचआ ने ग्लानिबोध भऽ रहल अछि। सत्य यैह छैक। आदरणीय वीरेन्द्र मल्लिक जी कें हमर बात नीक लगलनि। हमरा लोकनिक बहुत बाद सर्वश्री केदारकानन, तारानन्द वियोगी, श्याम दरिहरे, अजित आजाद आ अरविन्द ठाकुर सभ लिखय लगलाह। हम हिनको लोकनिक लेखनक लोहा मानैत छी।हिनका सभक रचना जखन कत्तहु पढैत छी तं अपन लिखलाहा झूस लगैत अछि। साहित्य समीक्षक किंवा पाठक जहन कोनो रचना पढैत छथि तं ओ ईकिएक विचार करताह जे अमुक गोटे निठल्ला बैसल छथि किंवा सरकारी सेवा मे छथि वा निजी कंपनी मे बहुत व्यस्त जिनगी सं पलखति निकालि केंलिखैत छथि। हुनका पढबा मे नीक लगैत छनि। यैह ओहि साहित्यकारक लेखनक सार्थकता भेल। हमरो मन्तव्य एही दृष्टिकोण सं प्रभावित अछि। यैह ईमानदारी भेल। हमर विषय आइ ‘अरविन्द ठाकुर’ छथि। एहि सं पूर्व हम ज्योतिरीश्वर ठाकुर,विद्यापति ठाकुर, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, रुपकान्त ठाकुर, रामलोचन ठाकुर, लुटन ठाकुर, बच्चा ठाकुर, केष्कर ठाकुर, श्यामानन्द ठाकुर, विवेकानन्दठाकुर, जगदीशचन्द्र ठाकुर ‘अनिल’, गजेन्द्र ठाकुर, वीणा ठाकुर आ विनयभूषण ठाकुरक नाम सं परिचित रही। मैथिलीक कोनो पत्रिका मे अरविन्दठाकुरक गजल पढबाक सुयोग भेटल छल। अन्तिम पांतीक ‘अरबिन’ हमरा मोन कें मोहि लेलक। हम स्व कलानन्द भट्ट, गंगेश गुंजन, जगदीशचन्द्रठाकुर ‘अनिल’ आ विभूति आनन्दक गजल पढने रही। ई अरविन्द ठाकुर के ? हित-अपेक्षित सं हिनक खोज-खबरि लेनाइ शुरु कऽ देलहुं। सुपौल घरछनि। जमींदार परिवारक वंशज छथि। पटना में दबाईक कारोबार छनि। बाल-बच्चा सैंतल सम्पन्न छनि। बड़का लोक छथि। मैथिली सं प्रेम छनि। बड़बेसी प्रभावित भेल रही। लऽग सं देखबाक उत्कंठा जागल। श्री मधुकान्त झा जीक अमल मे चेतना समिति, पटनाक ‘विद्यापति पर्व समारोह’ मे काव्य-गोष्ठीक लेल कोलकाता सं डा वीरेन्द्र मल्लिक, श्री रामलोचन ठाकुर जीक संग हमहूं आमंत्रित रही। मंच पर अरविन्द ठाकुर सेहो रहथि से तखनबुझलियैक जहन ओ अपन कविता पाठ कऽ कें पुन: मंचासीन भेलाह। लग जाए कें परिचय करबाक साधंस नहि भेल। स्वभाव सं कने घमण्डी सनबुझेलाह। मुदा, हुनक कविता हमरा बेस प्रभावित केलक। हम हुनका प्रति यैह धारणा बनेने रही जे ओ भीड़ सं अलग हटि स्वतंत्र व्यक्तित्वक लोक छथि।बहिर कें बहिरा कहनिहार आ बौक कें बौका कहनिहार श्रेणीक लोक छथि। तकरा बाद एहन भेलैक जे अपन पहिल काव्यसंग्रह श्री केदार कानन कें पठेबाकक्रम मे एक प्रति डा सुभाषचन्द्र यादव आ श्री अरविन्द ठाकुरक लेल सेहो पठा देने रहियनि। किछुए दिनका बाद मोती सन आखर मे श्री अरविन्द ठाकुरकपोस्टकार्ड आयल। पोथी पूरा पढि गेल छलाह। पत्र पाबि कने हूबा भेल। फोन केलियनि। लागल जेना दुनूं गोटे कतेक दिन सं परिचित रही। हुनका प्रतिधारणा आइ नीक बनि गेल। मुदा, लऽग मे बैसि कें भरि पोख गप करबाक लालसा लागले रहल। से पूर भेल अगस्त, 2013 मे। भोजपुरी-मैथिलीअकादमी, दिल्ली सब साल जेकां ओहू साल राजधानी दिल्ली मे काव्य-संध्याक आयोजन केने छल। ओहिमे अरविन्द ठाकुर, अजित आजाद, सदरे आलम गौहर आ स्वातिशाकम्भरीक संग हमहूं बाहर सं गेल रही। ‘बाबा बादशाह होटल’ मे सभक जुटान भेल। अरविन्द ठाकुर अजित आजादक संग एक्के कोठली मे ठहरलछलाह। दुनूं गोटे मे खूब अपेक्षितारय देखलियनि। ‘मिथिला आबाज’, दरभंगा मे अजिते, अरविन्द ठाकुरकें संपादक बना कें अनने छलाह से बूझल छल।हमरा लोकनि सभ गोटे ( जे जुटल रही ) अरविन्दे जी वला कोठलीमे बैसल करी। ‘मिथिला आबाज’क अवसानक खेरहा सुनैत रही। गौहर आ स्वातिओंघाय जाथि आ अपना-अपना कोठली मे सुतऽ चलि जाथि। मुदा, हम अजित आ अरविन्द जीक संग रातिजगा कऽ व्यक्तिगत, सामाजिक, राजनीतिकआ साहित्यिक परिचर्चा करी। नीक लागय। बहुत रास जानकारी भेटल। बहुत किछु सीखलहुं। अरविन्द ठाकुरकें, हुनक स्वभाव कें आ हुनक साहित्यिकप्रतिभा कें लऽग सं जानबाक,चिन्हबाक आ परखबाक अवसर भेटल। दुनूं गोटे भजार बनि गेलहुं। शर्बती सम्बन्ध बनि गेल। जिनगी जीबाक लेल एकटाएहन मीता चाही जकरा सं सुख-दुख बांटि सकी से हमरा लेल आइ ‘अरविन्द ठाकुर’ छथि। दिल्ली सं बिछुरबाक काल उपहार स्वरूप अरविन्द ठाकुर हमरा अपन प्रकाशित दू टा पोथी देलनि– अन्हारक विरोध मे (कथा-संग्रह) आ बहुरुपिया प्रदेश मे (गजल-संग्रह)। दुनूं पोथी पढलाक बाद अरविन्द ठाकुरक प्रति मोन मे कए तरहक चित्र उभरैतअछि। गजल-संग्रह पढबा काल ई अनुभूति भेल जे ओ उर्दू साहित्यक गहन अध्ययन केलाक बादे मैथिली मे गजल लिखलनि अछि। ई ईमानदारीक काजभेल। ‘अन्हारक विरोध मे’ मे जे कथा सभ ओ गढलनि अछि से पढलाक बाद लागल जेना ओ एकटा मुखर समाजवादी आ प्रखर राजनीतिक चिंतकहोथि। हमर अभीष्ट एखन हुनक पोथी सभक समीक्षा करब नहि अछि। जाहि अरविन्द ठाकुर सं पटना मे परिचय करबाक साहस नहि भेल छल ताहिअरविन्द ठाकुर सं दिल्ली मे ठेहुन-छावा वला सम्बन्ध बनि गेल। जहिना कोनो साहित्यिक रचना पढलाक बाद ओहि साहित्यकारक प्रति लोक कें धारणाबनैत छैक तहिना कोनो व्यक्ति सं भरि पोख गप केलाक बादे ओहि व्यक्ति सं लगाव बढैत छैक। सम्बन्धमे मीठास अबैत छैक। प्रयोजन छैक ईमानदारी सं प्रयास करबाक। मैथिली साहित्यक जगत मे आइ एकर घोर अभाव भऽ गेल अछि जे एकटा चिंतनीयविषय थीक। रजनीश कुमार तिवारी (मुन्ना) अद्वितीय छथि हमर अरविन्द बाबा बाबा (अरविन्द ठाकुर) सँ हमर पारिवारिक रिश्ता त छलैहे, आब ई बहुत रास सीमा सँ पार भए गेल अछि। नेना रही त हिनक आ हिनक माता-पिता-परिवारक चर्चा हमर घर ( गाम-फेंट, मधुबनी ) मे उठौना जकाँ होइत रहै। कनेक चेतन भेलाक बाद जखन-तखन सुपौल अबैत रहलहुँ त साक्षाते हिनकर गतिविधिसभकेँ देखल आ तकरा बाद निरन्तरता मे ई हमर ध्यान अपना दिस खिंचैत रहला। हिनक राजनीतिक, पारिवारिक गतिविधिक चर्चा सुनी, देखी आ मुग्ध होइ। हिनक बोलब, चलब, पहिरब सभटा एकदम विलक्षण लागै आ हमरा प्रभावित करै। आइ कहि सकै छी जे हमर घरपर होइत हिनक घनघोर चर्चा हिनक व्यक्तित्व-क्षमताक तृणांशहु नहि रहए। हमर अपन बाबा रामप्रताप तिवारी सुपौलक भगिनमान छला आ अरविन्द बाबा हुनक भैयारीक सम्बन्धमे अबै छथिन तेँ हिनको हम ‘बाबा’ कहि सम्बोधित करैत छियनि। हमर अपन बाबाक सम्बन्ध एहि परिवार सँ एकदम सीधा नहि, बहुत घुमाकए अछि। प्रेम किन्तु एहन वस्तु छै जे केकरा केकर लगीच आ प्रिय कए देतए से पुर्वानुमान करब कठिन। हमर अपन बाबा सुपौल अबैत-जाइत छला आ अरविन्द बाबाक पिता स्व बलेन्द्र नारायण ठाकुरक संग अभिन्न होइत चलि गेला। बलेन्द्र बाबाक विराट-प्रभुताक खिस्सासभ हमर परिवार मे किंवदन्ति जकाँ चलैत छल। हमर अपन बाबाक समय बनल ई प्रेमिल सम्बन्ध रसे-रसे एहन प्रगाढ होइत चलि गेल जे हमर पिता आ हमर पीढी तक एकर उष्मता काएम अछि। हमर परिवारक किनकहु कहिओ ई आभास नहि भेल जे दुनू एकहि परिवार नहि अछि। जँ हम स्वयं अपन गप करी तँ अरविन्द बाबाक संग हमर ई सम्बन्ध हमर छ्ब्बीस वर्षक वयस धरि मात्र पारिवारिक रहल। हम हिनकासँ ततेक धखाइत रही जे ता धरि साइते हम कहिओ हिनक पएर छूलाक बाद ई पुछबाक साहस कए सकल हएब – ‘केहन छी बाबा’। अपन उच्च-शिक्षाक पुर्णता आ निरन्तरताक क्रममे हम रसे-रसे बाबासँ हिलैत-मिलैत गेलहुँ आ कखन हुनकर प्रियपात्र भए गेलहुँ से समय आ तेकर प्रविधि एकदम ठेकानि कए कहब आब कठिन अछि। दुनू बाबा-पोताक सम्बन्ध मे एकटा दिलचस्प मोड़ एबाक एक महत्वपुर्ण अवसर आ घटना मन पड़ैत अछि। हिनक ज्येष्ट पुत्र अभिनयक विवाह तै भए गेल रहनि। बराती कें सुपौल सँ शिवहर लए जेबाक दायित्व हमरा भेटल। एकटा बड़का बस आ एकटा जीप सँ चलि बराती विवाहक दिन पुर्वान्ह दस बजे शिवहर पहुँचि गेल। लड़की पक्ष शिवहर-दरबार कहल जाइत रहै आ ओ सभ अपन प्रतिष्ठानुकूल स्वागत केलक। शेष भरिदिन विश्राम केलाक उपरान्त सात बजे सांझ मे बराती विवाह-स्थल दिस चलल आ एकरे संग शुरू भेल धमाल। आतिशबाजीक आकाशी चकमक आ बीच-बीचमे कानफाड़ू धमाकाक संग हम सभ गोटे डांस करब शुरू केलहुँ। हमर सभक जुआन पार्टीक नाचब शुरू होइते सब नाचब शुरू कए देलक – की सयान, की बूढ। बाबाक पहिल संतानक विवाह रहै आ ओ अतीव प्रसन्न छला। हुनक उल्लास हमरा सभ केँ शह देलक आ हमरा सभक साहस एतेक बढि गेल जे जिनका आगाँ हमरसभक ठाढ हेबाक साहस नहि छल तिनको हाथ पकड़ि हम सभ नाचबाक लेल बाध्य कए देलियनि। मन अछि जे बाद मे अपन मित्रलोकनिक संग दैत बाबा सेहो एहि मे सम्मिलित भेला आ हुनक डांस-स्टेप देखि हमरासभ केँ चकबिदोर लागि गेल छल। ओहि दिन ई भान भेल जे लिहाज चलए, हुनक मान-सम्मान मे कमी नहि राखी किन्तु बाबा सँ डरबाक आ धकैबाक कोनो टा औचित्य नहि अछि। वर्ष 2006 मे जखन हम एक तरहे स्थायी रुप सँ सुपौल रहए लागलहुँ त बाबाक बेसी निकट एबाक आ हुनका आओर नीक जकाँ बुझबाक अवसर भेटल। ओ ताधरि दलीय राजनीति सँ कात भए गेल छला किन्तु रेड क्रासक मानद सचिवक रुपमे हुनक सक्रियता बनल छल। कुसहा तटबन्ध टुटलाक बाद कोसी नदी द्वारा मचाएल हाहाकारक बीच बाबाक प्रबन्धन-क्षमताक जे विस्तार हम देखलहुँ से अद्भुत अछि। जिलाधिकारी सँ लए कए जिला, अनुमण्डल आ प्रखण्डक विभिन्न पदाधिकारीसभ सँ बाढिपीड़ितसभक समस्याक निदान वा ओकरा रिलीफ पहुँचएबामे ओकरासभ सँ मनोनुकूल काज लेबाक हुनक तौर-तरीका एतेक प्रभावकारी छल जे कोनो मामलमे कोनो असफलताक कोनो गुंजाइश नहि बचैत छल। ओही बेर हम जिला भरि मे पसरल बाबाक विशाल व्यक्तिगत संपर्कक साक्षी सेहो भेलहुँ। बाबा हमरो रेड क्रासक सदस्य बना देने छला आ ओहि अभियान मे ओ हमरा निरन्तर संग राखने रहथि। हमरा हुनक निर्देश छल जे सहायता लेल आएल कोनो वस्तु गलत हाथ मे नहि जाय से हम ध्यान राखी। ओहि क्रम मे बाबाक प्रभुत्व, सार्वजनिक जीवनक इमानदारी आ हमरा प्रति हुनक विश्वास तीनू चीजक अनुभूति हमरा भेल। किन्तु सुपौल एलाक बाद ओहि बेर जे सभ सँ महत्वपुर्ण चीज दिस हमर ध्यान गेल, ओ ई जे बाबा किताब-कागज मे डूबल जकाँ रहथि। हुनक लिखब-पढब गति पकड़ने छल। युपीएससीक तैयारी करैबला विद्यार्थिओ की ओतेक मनोयोग सँ पढत ! हुअए जे हमसभ जँ एतेक मनोयोग सँ पढने रहितहुँ त आइ कतहु कलक्टर त अवश्य रहितहुँ। प्राय: ओहि काल बाबाक संयोजकत्व मे सुपौल मे ‘सगर राति दीप जरय’ के आयोजन ‘कथा-विप्लव’ नामे भेल। बाबा हमरा कहलनि जे एहि गोष्ठी लेल कथा लिखि पढबाको अछि, आनक कथा सुनबाको अछि आ ओहिसभ पर अपन टिप्पणिओ देबाक अछि। साहित्यक एकटा अनुरागी पाठक कें बाबा दिस सँ एक नव भुमिका भेटल। हमरा पहिने लागल जे कतय फँसि गेलौं किन्तु हुनका दिस सँ ततेक तगादा आ उत्साहवर्द्धन भेटल जे हमहुँ लिखि बैसलहुँ। ओहि गोष्ठी मे अपन भुमिकाक यथासंभव निर्वहनक उपरान्त हमर साहस आ दिलचस्पी दुनू बढल आ ई बाबाक आशीष अछि जे किछु गोटे आब हमरा साहित्यकारो मानैत छथि। एकरे परिणाम छल जे पछाति सहरसाक गोष्ठीमे प्राय: प्रत्येक सत्रक प्रत्येक कथा पर हम निधोख भए अपन विचार राखि सकलौं आ ताहि पर सराहना सेहो भेटल। बाबा तहिया मात्र सत्ताइस वर्षक छला जहिया हुनक पिता ( बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ ) के दीर्घ बीमारी सँ मृत्यु भेल छलनि। बाबा पटना मे सात-आठ मास तक रहि हुनक चिकित्सा करबैलनि किन्तु एक सुपुत्रक कएल अथक प्रयास आ सेवा काज नहि आएल आ पिता असमय संग छोड़ि गेलथिन। ता धरि बाबाक छवि एकटा राजकुमारक छल जेकरा पर कोनो जिम्मेदारी नहि, कोनो बंधन नहि। बाबाक दियाद-बाद आ हमरो परिवार मे ई आशंका व्यक्त कएल जाइत छल जे अनायास माथपर आबि गेल जिम्मेदारी सँ ओ लड़खड़ा जेता। किन्तु समस्त आशंका केँ ध्वस्त करैत अरविन्द बाबा अपन पिताक श्राद्धकर्म पिताक प्रतिष्ठाक अनुकूल केलनि। अपन एकटा अविवाहित बहिनक विवाह एकटा संभ्रांत आ सुखी परिवार मे केलनि। फेर छोट भाइक विवाह आ अपन पुत्र सभक शिक्षा-दीक्षा सफलतापुर्वक सम्पन्न केलनि। ई सभ करैत अपन सामाजिक-राजनीतिक दायित्व केँ सेहो नहि बिसरला आ इहो क्षेत्र मे स्वयं कें अपन पिताक सुयोग्य उत्तराधिकारी साबित केलनि। अचरजक गप जे एतेक दवाबक बादो हुनक निर्भयता आ जनपक्षधरता पर कनिको आँच नहि आएल। सुपौल सँ पटना होइत दिल्ली तक हिनक व्यक्तित्वक दबदबा रहनि किन्तु जातिगत समीकरण विपरीत रहने बाबा केँ दलीय राजनीति मे ओ हक नहि भेटि सकल जेकर ओ सही माने मे हकदार छला। बाबा अपन राजनीतिक जीवनक चर्चा नहिए जकाँ करै छथि। कहिओ कोनो जिज्ञासा कएलहुँ त एकदम निर्पेक्ष जकाँ मात्र तथ्यात्मक सूचना दए देता, जेना ओहि जीवन सँ कोनो मोह नहि, कोनो संलिप्तता नहि। हुनक सामाजिक-राजनीतिक जीवनक समकालीन सहयोगी सभ सँ जखन हुनकर अतीतक ओहि अध्याय दिआ सुनै छी त रोमांच सँ भरि उठै छी आ छाती गर्व सँ फुलि जाइत अछि। अपन जीवनक कर्म-विस्तारक क्रम मे हम जे जे नव द्वार खोलै छी ताहि मे कतहु ने कतहु बाबा पहिने सँ उपस्थित भेटै छथि – हमरा चकित-विस्मित करैत। विधि-स्नातक भेलाक बाद जखन हम सुपौल बार-एसोशिएसन ज्वाइन कएलहुँ त ओतहु हमरा बाबाक सम्बन्धक नाते तुरत परिचिति भेटल। अनेको वरिष्ट अधिवक्ता एहन भेटला जे बाबाक चर्चा करिते कहलनि – अरे! अरबिन बाबू त हमर मित्र छथि। कतेको एहन अधिवक्ता भेटला जे अपन अधिवक्ता हेबाक श्रेय बाबा केँ देलखिन। तखन जा कए ई खिस्सा ज्ञात भेल जे 90 के दशक मे बाबा अपन स्वर्गीय पिताक स्मृति मे ‘बलेन्द्र नारायण ठाकुर मेमोरियल ला कालेज’ के स्थापना केने रहथि। ओकर नियमित वर्ग चलय आ सुपौलक प्रतिष्ठित अधिवक्ता सभ ओहि मे शिक्षक छला। विश्वविद्यालय आ कुलपति स्तर पर बाबा अपन व्यक्तिगत क्षमता आ दम पर ओकरा अग्रगामी बनैने रहला। बाद मे सचिवालयक घूस-पैरबीक कुसंस्कृति सँ आजिज आबि ओ ओकरा तीन वर्षक बाद बंद कए देलथिन किन्तु ता तक प्राय: पचास सँ बेसी छात्र केँ ओ अधिवक्ता बनबाक डगर पर आगू बढाए चुकल छला। आब ई घटना इतिहास बनल अछि आ बेर-बेर मन पाड़ल जाइत अछि। सुपौल मे अनेको एहन लोक हमरा भेटलनि जे बाबा केँ “वन मैन आर्मी” कहै छथि आ स्वयं हमरो ई अनुभव बेर-बेर भेल अछि। ई अतिशयोक्ति लागि सकैत अछि किन्तु सत्य अछि जे एहि टोल आ शहर मे बाबाक संपर्क मे रहल अनेको एहन व्यक्ति हमरा भेटला जे बाबाक विविध खासियतसभ मे सँ कोनो एक या दू या अनेक चीजक नकल करैत देखाइ छथि। केओ हुनकर परिधानक, केओ हुनकर वक्तृत्व कलाक आ एतेक धरि जे केओ-केओ हुनका सन चलबाक नकल सेहो करै छथि। ओ सभ प्रत्यक्षत: भने एकरा स्वीकार नहि करथु किन्तु हुनक अन्तरात्मा एकरा अवश्य बुझैत अछि। ओना एहि मे हुनका सभक कोनो दोष सेहो नहि छनि। बाबाक व्यक्तित्वे एहन सुदर्शन आ प्रभावशाली अछि जे केकरो मन मे हुनका सन बनबाक, देखाइ देबाक लोभ आबि सकैत अछि। बाबा कुर्ता-पैजामा पहिरथि, कुर्ता-धोती पहिरथि, पैन्ट-शर्ट पहिरथि वा जाढक बेर मे बण्डी, प्रिंस सूट, स्वेटर, इंगलिश सूट पहिरथि, सब मे दिव्य लगै छथि। कपड़ा पहिरैक समझ आ तहजीब केओ हुनका सँ सीखय। अमिताभ बच्चनक ड्रेस-डिजाइन आ मिलिन्द सोमनक रैम्प पर ड्रेसिंग – बाबाक आगू सब फेल। ई हमर अनुभव अछि जे बाबा जखन अपन घर सँ बहराइत छथि त की आंटी, की भौजी, हमरा सन पोताक सारिअहु सभ हुनक बजार जेबाक आ ओमहर सँ घुरबाक प्रतीक्षा करैत अछि – हुनका भरि पोख देखबाक लेल। एक बेर हमर पीढीक एकटा बौद्धिक हिनक “लार्ड बायरन” नामकरण केने छल किन्तु हमरा लगैत अछि जे बाबा “सिंगल-विमेन मजनू” छथि। हिनक किशोरावस्थहि मे माता-पिता द्वारा चुनल हिनक धर्मपत्नी बीणा ठाकुरहि हिनक गोपिका छथि, राधा छथि आ रुक्मिणी सेहो। बाबाक एकटा आओर रुप हमरा सोझाँ आएल जखन हुनक मा केँ कैन्सरग्रस्त घोषित कएल गेल। माक उपचार मे हुनक समर्पण-भाव हमर शब्द-सामर्थ्य सँ बाहर अछि। जेबा लेल हमहु मुम्बई गेलहुँ, टाटा मेमोरियल मे अपन ब्लड डोनेट सेहो कएलहुँ किन्तु अपन प्रौढावस्था मे जाहि युवकोचित सक्रियता आ तत्परताक संग ओ अपन माक समर्पित सेवा कएलन्हि से संसारक सब पुत्रक लेल अनुकरणीय अछि। तीन-तीन पुत्र आ हमरा सन पौत्रक रहितहु ओ ओहिकाज केँ एकदम व्यक्तिगत जिम्मेदारीक रुप मे लेलनि आ मुम्बई सँ पटना तक ताहि लेल सदति मुस्तैद रहला। माक मृत्योपरान्त हुनक शिशु जकाँ कानबाक स्मृति हमरा अखनो दलमलित कए दैत अछि। बाबा दिआ एक पंक्ति मे कहल जा सकैत अछि जे ओ प्रबल व्यक्तित्वक असीम प्रतिभाशाली पुरुष छथि। हुनकर स्वभाव तेजस्वी आ दोसर पर हावी भए जाइबला अछि। एहन जेकरा पश्चिमी मोहावरा मे “डायनैमिक पर्सनैलिटी” कहल जाइत अछि आ भारतीय भाषामे प्राय: “राजसिक वृत्ति” कहल जा सकैत अछि। एहन हमर अरविन्द बाबा जखन ‘मिथिला आवाज’ के सम्पादक बनि दरभंगाक डगर धएलनि त हमर असहजता शीर्ष धए लेलक। हुनक योग्यता-क्षमता कोनो प्रश्नक दायरा सँ बाहरक चीज अछि किन्तु हुनक जे लाइफ-स्टाइल छल से हमरा मन मे अनेको प्रश्न आनि ठाढ कए देलक। अपन सुख-सुविधाक दुनिया छोड़ि बाबा दरभंगाक अनभुआर वातावरण मे कोना रहि सकता? अपन सुतय-जागैक, खेबा-पीबाक क्रमबद्ध जीवन मे कोनो व्यतिक्रम कोना सहि सकता? कहिओ केकरो अधीनस्थ नहि रहनिहार बाबा अपन भुमिकाक स्वतंत्र आ निर्बाध निर्वहन कोना करता? स्वान्त: सुखाय लिखनिहार बाबा दवाब मे कोना लिखता? अपन स्टडी-रुमक रैक आ टेबुलक चारू कात पसरल पोथी सभक विशाल भण्डारक बिना सून-बिसून जकाँ नहि लगतनि? महादेवक गण सभ सन अपन मित्रमण्डलीक बीच रहबाक उन्मुक्तता नहि खगतनि? किन्तु दू-तीन बेर दरभंगा गेला पर बाबा केँ जाहि स्फुर्ति आ आनन्द सँ अपन काज मे समर्पित देखलियनि से हमरा आह्लाद सँ भरि देलक। संपुर्ण मिथिला आवाज परिवार आ परिसर हुनके आभा सँ दपदप करैत जकाँ लागल। ओ स्वयं कोनो आन प्रभाव वा छाँह सँ मुक्त आ निर्भार। एकटा पुरान कहावत मन पड़ि गेल – “ शहंशाह जहाँ बैठ जाते हैं, दरबार वहीं लग जाता है।“ अपन जीवन-संघर्षक व्यापार सँ फुरसत निकालि हम बाबा ओहिठाम जाइत रहै छी आ हुनका संग बैसि बेसीकाल भोरका चाहक चुस्की लैत साहित्य आ आन-आन विषय सभ पर बतियाइ छी। पछिला अनेक वर्ष सँ बाबा हमर सभसँ नीक मित्र छथि, अभिभावक आ मनोचिकित्सक सेहो। हमरा सभक गपक कोनो निर्धारित विषय नहि रहैत अछि। बात पसरैत अछि त साहित्यक सीमा पार करैत लालू-नीतिश, मोदी-अडवाणी, मोहम्मद रफ़ी-बलराज साहनी, शाहरुख-अक्षय कुमार, धोनी-गावस्कर, फेडरर-अमृतराज आ केदन-कीदन-कहाँदन-कोनदन तक चलि जाइत अछि। बाबाक विविध विषयक अध्ययन आ सूचना हमरा आश्चर्यमिश्रित आनन्द मे डुबबैत रहैत अछि आ हम हुनका लग सँ बहुत-बहुत मातबर भए कए घुरए छी। हमरा लगैत अछि जे बाबाक लेल डिक्शनरी, एनसाइक्लोपीडिया वा गुग्गल सन नामकरणहु यथेष्ट नहि अछि। लागैए जे बाबाक लेल कोनो जानकारी दुर्लभ नही छनि, बाबा लेल कोनो चीज असंभव नहि छनि आ बाबाक संगति कोनो माटिओ केँ सोना बना सकैत अछि। अरविन्द ठाकुर बुल्लियाँ की जाणां मैं कौन (अपनाकें खोजैत किछु अप्पन बात) एकबेर एकटा जिज्ञासु एकटा दार्शनिकसँ चारिटा प्रश्न पुछलक। एहि संसारमे सभसँ नमहर के अछि ? उत्तर भेटल – आकाश। संसारमे सभसँ हल्लुक काज की अछि ? उत्तर भेटल – बिन मांगल सलाह देब। दुनियाँमे सभसँ कठिन काज की अछि ? उत्तर भेटल – स्वयंकें चिन्हब। आ अन्तिम प्रश्न छल – दुनियाँमे सभसँ गतिशील की अछि ? उत्तर भेटल – विचार। अखनि हमरा आगू-पाछू जीवनक आकाशक नमहर पसार पसरल अछि आ स्वयंकें चिन्हबाक सभसँ कठिन काजक लेल स्वयंहिकें बिन मांगल सलाह दैत सभसँ गतिशील विचारक शरणमे छी। अखनि जिज्ञासु हमहि छी आ दार्शनिकक भुमिकाक निर्वाह सेहो हमरहि करबाक अछि। जिज्ञासु लग विचारल प्रश्न रहए आ दार्शनिक त प्रत्येक क्षण मनन-चिन्तनमे रहैत जीवन आ प्रकृतिक अन्वेषण-अनुसंधानहि करैत रहैत अछि। हमरा लग ने ई दुनू स्थिति अछि आ ने सुविधा। एकहिटा रस्ता अछि जे अपन जीवनक पछिलका किछु अध्यायसभकें उनटाबी आ देखी जे ओहिसँ किछु बहराएत अछि कि नहि ! आठ वर्ष तक सुपौल जिला रेड क्रास सोसायटीक मानद सचिवक रूप मे एकर विधिवत स्थापना आ लोकोपकारक अनेक रास काज कएलाक बाद जेना एकरसतासँ उबिया गेल रही। हमर मान्यता रहल अछि जे एकरसता जीवनक धर्म नहि अछि आ तें हम एहि पदक जिम्मेदारीसँ मुक्त हुअए चाहैत रही किन्तु कोनो जिलाधिकारी (जिला रेड क्रास सोसायटीक पदेन अध्यक्ष) हमरा छोड़ए नहि चाहैत छला। हमरा होइत रहए जे एहि पद पर रहि हम अपन हिस्साक काज कए चुकल छी आ आब हमरा अपन साहित्यिक काज दिस बेसी समर्पणक संग लागैक चाही। अन्तत: हमरा एकटा अवसर भेटल। अकस्मात डा एन0 सरवण कुमार , भाप्रसेक स्थानान्तरणक आदेश आबि गेल रहए आ हम झट द अपन त्यागपत्र लिखि हुनका हाथमे थमा देने रहियनि आ हुनका ठामपर पदस्थापित भेल जिलाधिकारी कुमार रवि पर दबाव बनाए रेड क्रास, सुपौलक नव कमिटीक चयन हेतु चुनावक आयोजन सुनिश्चित करबाए लेने रही। एकटा सम्मानित पदसँ स्वेच्छापुर्वक एना भागब बहुतो गोटेकें अजगुत जकाँ लागल छलनि। हमर अनुजतुल्य आ रेड क्रासमे हमर संयुक्त सचिव रहल मिथिलेश दत्त तहिया लोकक जिज्ञासाक उत्तर दैत कहने रहथिन — “ भैया वैरागी लोक छथि। कोनो पद-सम्मानकें पकड़िकए अपन चांगुरमे राखब हुनकर फ़ितरतमे नहि छनि।“ एहिसँ कुछेक वर्ष पहिने तत्कालीन जिलाधिकारी संजीव हंस द्वारा हमरा मादे जिज्ञासाक उत्तरमे एकटा एडवोकेट मित्र बच्चन जी हुनका कहने रहथिन— “अरविन्द ठाकुर क्षमतावान लोक छथि , सर्वगुणसम्पन्न छथि किन्तु मिजाजमे कनेक टेढी छनि, घमण्डी लोक छथि।“ एहिना मन पड़ैए जे एकबेर हमर एक राजनीतिक प्रतिद्वन्दी खिसिआकए हमरा पर टिप्पणी कएने छला— “ई अरबिन ठाकुर अपनाकें बड्ड काबिल बुझए छथिन। ओ केकरो पोस माननिहार नहि छथि आ तें परम अविश्वसनीय छथि।“ बिहार केमिस्ट एण्ड ड्रगिस्ट एसोशिएसनसँ सोलह वर्ष तक जुड़ल रहलाक बाद हमरा लागल जे एतय हमर योग्यता-क्षमताक सही-सही उपयोग नहि भए पाबि रहल अछि आ हम जतेक पात्रता राखए छी तेकर प्रतिदान हमरा नहि भेटि रहल अछि। एहि संगठनक सर्वेसर्वा परसन कुमार सिंह( जे बादमे एहि संगठनक अखिल भारतीय महासचिव सेहो भेला) हमर बहुत घनिष्ट छला किन्तु हम अपन पक्षक प्रदर्शन लेल हुनक विरोधमे झण्डा उठाए लेने रही। परसन जी ओहि चुनावमे विजयी भेला त हम हुनका बधाइ देबए लेल मंचपर गेलहुँ। ओहि विजयोल्लासक वातावरणहुमे हमर बधाइ स्वीकार करैत परसन जीक आँखि नोराए गेलनि आ ओ बाजल छला – ‘ हम त संगठनक राजनीति करै छी आ हमरा संख्याबलक ध्यान राखए पड़ैत अछि तें हम अहाँक योग्यता संग न्याय नहि कए सकलहुँ। किन्तु इहो तथ्य अपन ठामपर अछि जे ई जगह(व्यावसायिक संगठन) अहाँसन बौद्धिक लोकक लायक नहि अछि।‘ सामाजिक सक्रियताक क्रममे कोनो चुनौती भेटितहि हम जिम्मेवारी सम्हारि लैत रही आ एहि क्रममे अनेक संगठनक हम संस्थापना कएल आ ओकर संचालन सेहो खूब सफलतापुर्वक कएलहुँ किन्तु ई सभ हमरा आत्मिक संतुष्टि नहि दए सकल। लागए जे एतय ठमकल जकाँ छी, बेसी पसारक कोनो गुंजाइश नहि। डा नवीन कुमार दास कखनिओकए कहथि जे हम एहिसभ लेल नहि बनल छी। जखनिकि ठीक एकर विपरीत एकबेर सुपौलक विधायक( वर्तमानमे बिहार सरकारक मंत्री) वीजेन्द्र प्रसाद यादवक हमरापर ई मन्तव्य अएलनि जे हमरासन लोक राजनीति लेल एसेट/पुजी होइत अछि। हमर पत्नीक त उठौनापर ई नियमित आ शाश्वत टिप्पणी होइत रहै छनि — “हमर भायसभ केना नौकरी करै छै आ अपन परिवार कें केना सुखसँ राखए छै, से अहाँ बुत्ते कहिओ भेल! कीदन-कहांदन करैत रहलौं अहाँ……अहाँसँ हमरा कहिओ सुख नहि भेल !!!” ओ की चाहए छथि आ हुनक सुखक की परिभाषा छै , से आइ धरि हम नहि बुझि सकलहुँ। हँ, एतेक बुझएमे आबै ए जे ओ प्रकारान्तरसँ हमर कमौआ आ पत्नीभक्त नहि हएबाक ओलहन दए रहल होइत छथि। विषयान्तर नहि हएत जँ ई चर्चा करैत चली जे ओ सभसँ बेसी प्रसन्न आ गौरवान्वित रहलीह ओहि दस मासमे, जखनि हम “मिथिला आवाज”क सम्पादक पदपर काज करए लेल दरभंगामे रही आ हमर पारिश्रमिकक राशि व्यय करएमे ओ स्वच्छन्द छली। हमर मा आ बाबुजी (माता-पिता) हमर युवावस्थाक कुछेक कुटैब आ अल्हड़पनाक जानकार होइतहु सभदिन हमरा प्रति आश्वस्त रहलथि आ हुनका दुनूगोटेक नजरिमे हम सपूत छलहुँ। हमर तीनू पुत्र हमरा प्रति अत्यन्त आदर आ भक्तिक भाव राखए छथि आ हिनकासभक दिससँ कहिओ कोनो नकारात्मक टिप्पणीक जानकारी हमरा नहि अछि। हमर एकटा वरिष्ट मित्र सुखाय साहु किताबी शिक्षासँ त दूर छथि किन्तु दुनियाबी अनुभव आ ज्ञानसँ खूब भरल-पूरल आ समृद्ध छथि। हुनकासँ हमरा अपन लेखन लेल मारितेरास अमुल्य खोराकसभ भेटल अछि। बेसीकाल ओ हमर विचार आ किरदानीक छिलके उतारएमे लागल रहै छथि किन्तु जखनि हुनकर भाओ जागए छनि त ओ कहता—“ हओ अरबिन बाबू , तोरा सन राजा कोय नै। जे करबहक से अपन मर्जी आ मूड सए। कहियो केकरो पाछू जाइत, केकरो नकल करैत आकि धन-परतिष्ठापर भागैत तोरा नै देखलियह। तू वैह करबह जे तोरा रुचतह, चाहे बहिन्चो… ई दुनिया एन्ने सए ओन्ने किए नै चलि जाय।“ एकदिन एकटा पुत्रवत युवा रणधीर बाजल छल —“काल्हि अपन मीटींगमे तोहर चर्चा करलियह , चचा। ओतए सभगोटे मुंहदेखौंसी गप करैत रहै। हमरा तामस उठल आ हम कहलिअए जे एहि गोल-गोल गपसभसँ पार्टी संगठनक कल्याण नै हेतै। फ़ेर तोहर उदाहरण दैत कहलिअए जे हुनके सन ठाहिं-पठाहिं आ राफ़-साफ़ बाजनिहारक बेगरता छै जे स्पष्टरूपसँ रोगक जड़िकें देखार करए आ तखनिए ओकर उपचार सम्भव छै। तैपर जे ताली पड़लह से की कहियह।“ एकर ठीक विपरीत , हमर बुढिया भौजीसभक उपराग रहैत रहनि—“ एह! एहन मौनी बाबा नै देखलौं। मुंहमे बोल नै आ हाथ-गोरक खचरपनीक सीमा नै। गओ माय !” मैथिली लेखक संघक छठम स्थापना दिवस(12 जुलाइ,2013,पटना) के अवसरपर ललितक लेखनदृष्टिपर धाराप्रवाह 65(पैंसठ) मिनट, जवाहर नवोदय विद्यालय, सुपौलक छात्रसभक बीच रचनात्मक लेखनपर 75(पचहत्तर) मिनट आ राष्ट्रीय नाट्य अकादमीक प्रशिक्षण कार्यशालाक समापन समारोहमे 90(नब्बे) मिनटक हमर अभिभाषणक चर्चा विभिन्न महफ़िलसभमे होइत रहल अछि। आनहु अवसरपर हमर दीर्घ, मध्यम वा लघु आकारक भाषण बहुत पसन्द कएल जाइत रहल अछि। जखनिकि पत्नी कहैत रहए छथिन— “अहाँ लग मुँह भुकाबएसँ कोनो फ़ैदा नहि। कुच्छो आ केतबो पुछैत जाउ , अहाँ कुछ बाजबे नै करबै !” मैथिलीक योद्धा-युवा रचनाकार कुमार शैलेन्द्र कहैत छला—“ अहाँ सन सनेही लोकसँ हमरा आइ धरि जीवन मे भेंट नहि भेल छल। निरन्तर कलुषतासँ दहाबोर होइत एहि विकाल-काल मे अपन हृदयमे प्रेमक एतेक अथाह सागर अटाए कए अहाँ कोना राखने छी , सर !” लगातार तीन वर्ष तक ‘लोक प्रसंग’(हिन्दी मासिक पत्रिका) मे हम ‘ठाकुर का ठाँव’ कालम लिखने रही जे बहुत लोकप्रिय भेल छल। ओ पत्रिका आइओ बहराइत अछि आ ओकर सम्पादक आइओ आग्रह करै छथि जे हम ओहि कालम कें फ़ेरसँ कन्टीन्यू करी किन्तु समयाभावमे हम चाहिओकए हुनकासभक आग्रहक मान नहि राखि पाबि रहल छी। ओहि कालमक एकटा नियमित पाठक एक बेर दूरभाषपर कहलनि जे हम ओहि कालममे नकारात्मक दृष्टिकोण राखए छी आ हमर शब्दसभ घृणाक प्रचार करैत अछि। हमर साहित्यिक लेखनकें विक्षोभ, असन्तोष आ आक्रोशक साहित्य कहनिहारलोकनिक कमी सेहो मैथिली साहित्य-जगतमे कम नहि अछि। तें जखनि हम अपना प्रति लोकसभक टिप्पणी आ नजरियाक ध्यान राखैत स्वयं अपनहिसँ अपन आत्मावलोकन, आत्मनिरीक्षण करै छी त सन्त बुल्लेशाहक ई शब्द बेर-बेर उभरिकए हमर चेतनासँ टकराबैत अछि —“ बुल्लिआ, की जाणां मैं कौन ?” बुल्लेशाह त प्राय: अपना-आपकें चिन्ह गेल छला, हम अपना-आपकें चिन्हि सकलहुँ कि नहि, चिन्हि सकब कि नहि, कहब कठिन अछि। अलबत्ता हम एहि प्रश्नक उत्तर लेल निरन्तर अपनासँ जवाबतलबी करैत रहब, ताहिमे हमरा कोनो संशय नहि अछि। हमर ई मानब अछि जे साहित्यकार सृष्टि-संरचना आ जन-जीवनक गंभीर पर्यवेक्षक त होइते अछि, ओकरा अपनहु अन्तसमे बेर-बेर हुलकी मारि अपन थाह सेहो लैत रहबाक चाही। एहिसँ ओकरा अपन मुल्यांकन करएमे सहुलियत होइ छै आ ओ बेसी सन्तुलन साधि पबैत अछि , आत्मानुशासनक तमीज जागए छै , से अलग। स्वयंकें अन्डरस्टीमेट करब जं ओकरा अपना लेल घातक छै त ओवरस्टीमेट करब ओकर लेखन आ पाठक-समाज लेल घातक छै आ आत्मानुशासन नहि रहने त सभटा खेले चौपट। जे अपनाकें सही-सही नहि तौललक से अपन लेखन वा आन कोनो सामाजिक गतिविधि लेल इमानदार नहि रहि पबैत अछि। तें हम समाजक विभिन्न क्षेत्र आ ओकर क्रियाकलापकें जं अपन पर्यवेक्षणक दायरामे राखए छी त स्वयं अपनहु कें एहिसं नहि बकसए छी। ई आत्मावलोकनक प्रक्रिया आ ओकर फ़लाफ़ल ततेक जटिल छै जे कएक बेर हम एहिमे ओझराए जाइ छी , कखनिओ स्पष्ट इजोत देखाइत अछि आ कखनिओकए एहि ओझरीक बीचसँ कोनो महीन सन एकपेरिआ डगर सेहो देखाइ पड़ैत अछि। जँ भारतीय पंचांग केँ मानी त हमर जन्म फ़ागुनक दुआर चढि ओकर दरबज्जा खटखटाबैत माघक पुर्णिमा केँ भेल जाहि दिन देशभरिमे संत रविदासक जयन्ती आ उड़ीसा मे अग्नि उत्सव मनाएल जाइत अछि। ओहिदिन स्नान-दान-व्रतक महिमा सेहो मानल गेल अछि। अंगरेजी कैलेन्डरक अनुसार हमर जन्मतिथि 14(चौदह) फ़रवरी केँ पड़ैत अछि जहिया विश्वभरिमे प्रेमक मसीहा मानल जाइत संत वेलेन्टाइनकेँ स्मरण करैत वेलेन्टाइन-डे मनाएल जाइत अछि आ इएह ओ तिथि अछि जहिआ स्वामी दयानंद सरस्वतीक जयन्ती सेहो पड़ैत अछि। तेँ प्राय: संत रविदासक फ़कीरी मौज, स्वामी दयानंद सरस्वतीक मूर्तिपूजा आ कर्मकाण्डक प्रति विरोधी तेवर आ संत वेलेन्टाइनक प्रेममयता हमर मन-मिजाजमे रचल-बसल अछि। स्नानक शुचिता, दानक पवित्र उदारता आ कोनो काजकेँ व्रत जकाँ मानि ओकरा मिशन बनाए लेब हमरा सोहाइत अछि। जाति भारतीय समाज-संरचनाक एकटा अप्रिय किन्तु अपरिहार्य(अखनि तक) वास्तविकता अछि आ ताहि तल पर हम ब्राह्मण छी – भुमिहार ब्राह्मण-कर्णाटवंशी। पुर्वजसभ कोनो जमानामे मैसूरसँ आएल रहथि, तेँ मूल अछि-मैसूरिया , गोत्र – पराशर आ गोत्र प्रवर छथि – वशिष्ठ,शक्ति आ पराशर। नवका सर्वेसँ पहिनुका पुरनका खतियान देखए छी त ओहिमे एक-एक खतियानमे सैकड़ाक- सैकड़ा बीघा जमीन पुर्वजसभक नामपर देखाइत अछि। बटाइत-बटाइत हमर हिस्सा कट्ठापर चलि अबितए जँ पिताजीक कीनल-अरजल कुछ बीघा नहि रहितए। खेतिहर कहाएब गौरवक गप बुझाइ ए। ई अलग बात जे समयान्तरसँ “उत्तम खेती” आब निषिद्धक कोटिमे आबि गेल अछि। किन्तु रौदी-दाहीसँ अप्रभावित रहि श्रमक मान राखैत दाताक पवित्र-भावसँ अन्न उपजाबैत रहबाक जनहितैषी किसानी संस्कार हमर रग-रगमे, गत्र-गत्रमे घाम जकाँ बसल अछि, देहक धमनी आ मनक गह्वरमे खून आ विचार जकाँ दौगैत अछि। केकरो कुछ दएमे सुख आ आत्मिक संतोष भेटैत अछि। से अपन जीवनक प्रत्येक गतिविधिक प्राय: हर क्षेत्रमे हम अपन एहि प्रवृतिकेँ सदैव उत्साहित कएल अछि आ विपरीतहु परिणाम अएलापर तेकर कोनो अफ़सोच कहिओ नहि भेल। केकरोसँ कुछ लएमे सदैव संकोच भेल अछि आ एहि संकोचकेँ हम जिदियाह इनकार तक पहुँचाएल अछि। हमरा ओतबे चाही जेकर आ जतेक हम पात्रता राखए छी। से नही भेटए ए त दुख होइए, से सकारैओमे हमरा कोनो संकोच नहि अछि। बेदरेसँ दुआरिपर विभिन्न क्षेत्रक विशिष्ट व्यक्तित्वसभक आगमनक साक्षी रहल छी आ अपन मानस आ व्यक्तित्व निर्माणमे हम ओहि व्यक्तित्वसभक योगदान मानए छी। ललित नारायण मिश्रसँ फ़णीश्वरनाथ ‘रेणु’ आ रामधारी सिंह ‘दिनकर’सँ ललितेश्वर प्रसाद शाही सन विलक्षण अतिथिसभक अपनत्वमय उपस्थिति आ हुनकासभक स्वागतमे माला पहिराबए लेल बड़की दीदीक संग ‘पहिने हम त पहिने हम’बला नोंक-झोंक कल्हुका घटना जकाँ स्मृतिपटलपर अंकित अछि। हुनकासभसँ प्राप्त प्रेम आ स्नेह पकठोस भेल एहि वयसहुमे हमरा ललायित करैत अछि आ हमर अमुल्य धन जकाँ अछि। एहि विभिन्न क्षेत्रक व्यक्तित्वसभक परस्पर विरोधाभासी वैविध्य आ समन्वय दुनू हमर व्यक्तित्वमे साफ़-साफ़ देखल जाए सकैत अछि। हिनकासभक व्यक्तित्वक तेजोमय आभाक प्रभावसँ जे औत्सुक्य आ जिज्ञासाक प्रादुर्भाव हमरामे भेल से निरंतर अपन चरम दिस अग्रसर रहल अछि। हमर ई जिज्ञासा ता तक हमरा चैनसँ नहि बैसए दैत अछि जा तक कि हम कोनो ‘किए’क ‘किए’क आखरी ‘किए’ नहि जानि लए छी। दोसर दिस ई हाल रहैत अछि जे जेकरा जानए-बुझएक जरुरत वा जिज्ञासा नहि बुझाबए त ओ आनक लेल केतबो महत्वपुर्ण हुअए, हम ओकरा दिस हुलकी तक नहि दए छी। पढनाइ हमरा लेल सांस लेनाइ जकाँ अछि। लेखनक विविध विधाक पोथीसभ धुरझार पढए छी आ विभिन्न पोथीसभक पथार हमर स्टडी-रूममे अलमारीसँ टेबुल आ रैकसँ चौकी तक देखल जाए सकैत अछि। स्वाद-परिवर्तन लेल धार्मिक पोथीसभ त पढिते छी, सिनेमा आदि आन-आन कोनो विधाक कोनो पोथी-पत्रिका सेहो बिना कोनो पुर्वाग्रहक ओतबे रुचिसँ पढए छी जेतेक रुचिसँ साहित्यक कोनो विधाक कोनो पोथी-पत्रिका। माथाकेँ विश्राम देबाक लेल पढनाइ बंद नहि करए छी, विषय बदलि दए छी। जीवनक शुरुआती दौरमे आचार्य चतुरसेन , कृश्न चन्दर , बच्चन , शरतचन्द्र , बंकिमचन्द्र , टैगोर आदिकेँ हिन्द पाकेट बुक्सक माध्यमसँ पढलहुँ-चिन्हलहुँ त दोसर दिस गुलशन नंदा, प्रेम वाजपेयी, प्यारेलाल आवारा आ कुशवाहा कान्त आदि सेहो हमर पढबाक परिधिसँ नहि छिटकि सकला। जासूसी आ थ्रिलर सेहो हमर पाठान्तर्गत रहल आ ताहि क्रममे ओमप्रकाश शर्मासँ शुरु सूची कर्नल रंजीत , वेदप्रकाश काम्बोज, इब्ने शफ़ी बीए, एस एन कंवल आदि तक गेल।बादमे एहि सूचीमे सुरेन्द्र मोहन पाठक, चन्दर आ राजहंस सन-सन नाम जुड़ल आ अनुवादक माध्यमसँ जेम्स हेडली चेज आ डान पेन्डलटोन(जैक द बास्टर्ड बोलन सीरिज) आदि सेहो। तेकर बाद स्वाद परिवर्तन लेल सीधे मूल अंगरेजी दिस गेलापर मामला अगाथा क्रिस्टी, चार्ल्स डिकेन्स, इ एम फ़ोस्टर सँ होइत हेराल्ड राबिन्स, इर्विंग वैलेस, सिडनी सेल्डन, राबिन कुक, खुशवन्त सिंह, आर के नारायण , मनोहर मालगोंकार, डिक फ़्रांसिस, जेफ़री आर्चर, डी एच लारेन्स, विल्बर स्मिथ, आर्थर हेली, डान ब्राउन, राब कीन, एलिस्टेयर मैक्लीन आ मारियाना कोल सन-सन नाम आ चेतन भगत तक पहुँचल अछि। हिन्दीक कोनो विधाक कोनो साहित्यकार एहन नहि छथि जिनकर कोनो ने कोनो पोथी वा अंश हमर पढनाइक बतहपनीसँ वंचित रहि गेल हुअए। सुपौलक पब्लिक लाइब्रेरीक ध्वंस होइसँ पहिने अंगरेजीक अनेक अमुल्य पोथी पढैक सौभाग्य भेटल जाहिमे एडगर राइस बरोक टारजन सीरिजक दुर्लभ पोथी सेहो छल। कृषि, समाज-सेवा आ साहित्यक त्रिमुर्ति-संस्कार हमरा अपन पितासँ भेटल अछि। हमर पितासँ उपरका अर्थात बाबा, परबाबा बला पीढी शुद्धरूपसँ खेतिहर छल। हमर सम्पुर्ण गोतिया-दायादीमे खेतीएक प्राधान्य, पढब-लिखब प्राथमिकतामे नहि। विशाल आकारक दायादीमे हमर पिता एकटा विलक्षण व्यक्तित्वक रूपमे उदित भेला आ अनेक विघ्न-बाधाकेँ पार करैत अटूट लगन आ साहसक संग शिक्षा प्राप्त कए साहित्य, पत्रकारिता आ समाजसेवाक क्षेत्रमे अपन पएर दए एकटा अलग डगर बनएलनि – शायर, सिंह आ सपूत जकाँ। स्वतंत्रता संग्राममे पड़ि अपन राष्ट्रीय जिम्मेवारीक निर्वहन सेहो कएलनि। जीवनक विभिन्न गतिविधिमे अपन योगदान देबाक क्रमहुमे ओ सभदिन खेती-किसानीक प्रति अपन जातीय-पारिवारिक परम्परागत संस्कारकेँ अंगेजने रहला। सैकड़ाक सैकड़ा जन-मजूर आ अनगिनत बोझाक बोझा धान, गहुम, मकै, मूंगक टाल हम अपन खरिहानमे देखने छी। दू दर्जनसँ बेसी बड़द, महींस आ गाय अपन गोहालमे देखने छी। खेती-किसानीक प्रति हुनक समर्पण आ दीवानगी बिहार सरकारकेँ हुनका ‘कृषि-पंडित’ के उपाधि-सम्मान देबाक लेल वाध्य कए देने छलनि। कृषि विभागक पदाधिकारी लोकनि हमर दुआर आ खेतकेँ धंगने रहैत छला। हमर खेतक धत्तापर तत्कालीन कतेको मंत्री, सांसद आ विधायकलोकनि खेतीक सौंदर्य-संस्कृतिसँ मुग्ध आ आनन्दित हएबाक लेल आबैत रहैत छला। सुतरीक सीधमे होइत रोपनी आ पिताजीक उत्साहवर्द्धन (मुट्ठाक मुट्ठा बीड़ी एहिमे उत्प्रेरकक काज करैत छल) सँ बहराएल बोनिहारिनसभक समवेत गानक आनन्ददायक अनुभूतिक स्मृतिसभ हमरा लग अछि। हरित-भरित खेतसभक बीच बनल दू कोठरीक फार्महाउस आ ओतय लागल बाबूजीक लम्ब्रेटा मोटरसाइकिल हमर स्मृतिक आँखिमे सजीव आ स्थायी चित्र जकाँ अखनिओ उपस्थित अछि। अनेक बेर काँग्रेस कमिटीक बैठक तक ओहि धत्ता पर भेल। हाँड़ीमे बनल चाह पीबैत आ मकैक भुट्टा खाइत पार्टी आ चुनावक गपबला अभिनव बैठक। ई सभटा पैतृक संस्कार हमर जीनमे अवतरित भेल अछि। एकतरहें हम डेनियल बेब्स्टरक ओहि प्रसिद्ध उक्तिक सत्यता-शास्वतताक साक्षात प्रमाण छी जाहिमे ओ कहने छला जे जखनि खेती होइत अछि, तखनिए आन-आन कलासभ पुनकैत अछि आ तें खेतिहरहि लोकनि मानव-सभ्यताक निर्माता छथि। बाबूजीक असीम सामर्थ्य आ पुरुषार्थक शतांशहु हमरामे नहि अछि आ ने ओहिसभक लेल सकारात्मक समय-समाजहि रहि गेल किन्तु हम ओहिसभक आभासीए प्रतिरूप सही , छी। समाज-सेवा हमरा आनन्द दैए, साहित्य त ब्रह्मानन्द-सहोदरहि अछि , किन्तु परमानन्दक अनुभूति हमरा माटिएक संगतिमे होइए। पहिने घंटाक घंटा कोदारि पारि लैत रही, से आब हाड़मे बोन-मैरोक कमीक चलते पार नहि लागैए। खेतिओ-बाड़ी आब बहुत हद तक समटाइए गेल अछि। तेँ एकर विकल्प आब हमरा लेल हमर घरक(विप्लव भवन) आगूक फुलबाड़ी अछि। एकरा चिक्कन-चुनमुन आ सुन्दर बनाए कए राखएमे हमर शारीरिक बर्जिशहु होइत अछि आ ओहि दौरान हम कोनो अव्यक्त, अदृश्य परमात्माक सानिध्यमे सेहो रहए छी। साहित्यक बेसीतर रा मैटेरियल हमर मनो-मस्तिष्कमे ओहि दौरान आबैत रहल अछि। हमर फ़ितरत विपक्षी अछि। भावनात्मक वा क्रियात्मक स्तरपर जेकरा संग दए छी, अपन पुर्ण क्षमताक संग दए छी। किन्तु जखनिए ओ सत्तात्मक रूप धारण करैत अछि, हमर मन रसे-रसे ओकरा प्रति वितृष्णा आ आक्रोशसँ भरए लागैत अछि आ ओकरासँ हमरा अरुचि हुअए लागैत अछि। सत्ता-प्रतिष्ठान यथास्थितिक पोषक होइत अछि, ओहिमे गत्यात्मकता नहि रहि जाइ छै। केतबो प्रगतिशील विद्रोह हुअए, सत्तामे आबितहि लकीरक फकीर भए जाइत अछि, नव प्रयोगसँ हड़कए लागैत अछि, अपन जीवन्तताकेँ समेटि काछु-चरित्र ओढि लएत अछि। तेँ सत्ता-प्रतिष्ठानसभ हमरा कब्रिस्तान जकाँ लागैत अछि – मरल मुर्दासभक विश्रामस्थली। आ तेँ सदैव हमर समर्थन विपक्षकेँ भेटि जाइत अछि – भाव आ क्रिया दुनू रूपमे। हमर एहि फ़ितरती नियमक एकमात्र अपवाद लालू-राबड़ी आन्दोलनहि टा रहल अछि। राजसी, तामसी आ सात्विकमेसँ हम कोन वृतिक लोक छी, से हम आइ तक नहि तै कए सकलहुँ। समय-समय आ ठाम-कुठाम तीनू गुण जोर मारैत रहल अछि हमर जीवनमे। एकर अलग-अलग मात्राकेँ फरिआएब जहिना असंभव लागैत अछि तहिना एकर क्रमबद्धताक विवरण देब सेहो। एकटा विराट चण्डी-यज्ञक यजमान बनि अग्नि, आहुति, मंत्र पाठ आदि-आदिक पवित्र आध्यात्मिक वातावरणक साक्षी बनि अनेक दिन तक सौंसे दुनियां केँ बिसरि तपस्वी जकाँ रहल छी। अनेक सतसंग आ रामकथाक आयोजक बनि ओकर समर्पित श्रोताक रूपमे आनन्दविभोर भेल आकण्ठ डूबल रहल छी आ उच्चस्तरीय गायक-कथावाचक संग ओकर भजन-कीर्तनमे सहभागीए टा नहि बनल छी बरन स्वयं भजन गाबि हुनकासभक संग-संग अपनहु मित्रमण्डलीकेँ भौचक्क कए देने छी। धार्मिक ग्रंथ पढबाक सूर चढल त रामचरितमानस, रामायण, महाभारत, भागवत-पुराण, दैवी-पुराण आदिक संग-संग अनेक उप्लब्ध उपनिषद आ संहिताक हजारो हजार पन्ना चाटि गेल छी। एतबे किए, पवित्र बाइबिल आ कुरान सेहो हमर पढैक जनूनसँ नहि बचि सकल अछि। अवसर अएलापर अपन धार्मिक मित्रमण्डली आ परिवारीजनक बीचमे प्रवचन सेहो कैए चुकल छी आ मानसक सस्वर पाठ त कतेक बेर। किन्तु एकरा अपन जीवनक अनिवार्यतामे हम कहिओ सम्मिलित नहि कए सकलहुँ आ ई जीवनक एकटा पुरान अध्याय मात्र बनिकए रहि गेल अछि। अल्पावधिएक लेल सही, एकटा अलग टाइपक मित्रमण्डलीक संग सुरा-पानक महफ़िलसभकेँ सेहो गुलजार कएने छी आ से खूब धमगज्जर रूपमे। बोलबम-यात्राक क्रममे भांगक सेवन आ गांजाक सोंटक स्वाद सेहो बुझल अछि। एकबेर एकटा गरीब मित्रक जन्मदिनपर देसी दारू पीबि हुल्लड़बाजी सेहो कएल अछि। युवावस्थामे होली आ बरातीक अवसरकेँ एहि काजक लेल नियामति मानैत रही आ एकर अनेक रास खिस्सासभ हमर स्मरणमे संचित अछि। ई अलग बात जे प्राय: पछिला 30-35 वर्षसँ एकदम हम विशुद्ध टी-टोटलर बनल छी आ पीबैक नामपर पानि, चाह आ यदा-कदा कोनो शरबत मात्र लएत रहल छी। सांख्यिकीमे जेबाक प्रयोजन एतय नहि अछि किन्तु यथेष्ट मात्रामे प्रेम आ भोगक सुखद-दुखद अनुभवसँ मातवर सेहो भेल छी। स्वकीया-परकीयाक विवरणमे जएबाक प्रयोजन सेहो अखनि नहि अछि आ ने वांछित। खेतीक प्रति अपन प्रेमक चर्चा हम पुर्वहुमे कए चुकल छी। एहिमे जे श्रम अपेक्षित अछि से दान करब आनन्द दए ए। एहि क्रममे खुरपी, कोदारि ,दबिया, कचिया आदि औजारक प्रयोग यथेष्ट आ निरन्तरतामे करए छी आ एहिमे आत्मिक-अध्यात्मिक सुख भेटए ए, किछु मित्र(?) द्वारा एकरा सोल्हकनक काज नामकरण कएलाक बादहु। एहि मामलामे भगवान परशुराम हमर इष्ट छथि जिनका लग शास्त्र आ शर दुनूक अद्भुत समन्वित वितान भेटैत अछि। शास्त्रक अर्थ वा व्याख्या जेना सभ करैत अछि तहिना हमहु एकर माने पुस्तक-पोथीएक रूपमे लए छी किन्तु शर वा शस्त्रक हमर अर्थ वा व्याख्या खेती-बागबानी आ लेखनक लेल उपादेय औजारसभ अछि। पारम्परिक अर्थमे हम कतहुसँ धार्मिक नहि छी। पुर्वमे वर्णित हमर धार्मिक गतिविधिसभकेँ हमर जीवनक एकटा अस्थायी फेज कहल जाए सकैत अछि। पूजाक पांच प्रकार (अभिगमन, उपादान, योग, इन्या आ स्वाध्याय) मे हम मात्र स्वाध्यायकेँ स्वीकार कएने छी। संयमक चारि प्रकार (इन्द्रिय,समय,ध्यान आ विचार) मे सँ कोनो प्रकारसँ हम स्वयंकेँ नहि बान्हि सकल छी। कोनो प्रतिबंध जे हमर आत्माकेँ रुचैत नहि हुअए, हमरा स्वीकार्य नहि रहल अछि। एहि संयमकेँ हम अपन विवेकपर छोड़ने छी आ ओ अपन काज अवसर अएलापर खूब नीक जकाँ कएलक अछि। संसारक तीन गति (उत्पत्ति, स्थिति आ प्रलय) मे हम स्वयंकेँ मात्र स्थितिमे स्थित कएने-राखने छी आ बकिया दूटापर सोचब, चिन्तन करब हमरा फिजूल आ मुर्खतापुर्ण लागैत अछि। ई अवश्य ध्यान राखैक प्रयास कएल अछि, करए छी जे हमर अजुका कोनो कर्मसँ अगिला पीढी वा अगिला दिनपर कोनो नकारात्मक प्रभाव नहि पड़ए। भावी पीढीक चिन्ता कएने बिना सभकिछु भोगि ली वा भोगैक चक्करमे नाश कए दी, एहिसँ बढिकए आन कोनो पापकर्म हमरा नहि बुझाइत अछि। हमर ई मानब अछि जे एकटा इकाइक रूपमे हमर जन्म, जन्मसँ प्राप्त काया आ एहि कायामे स्थित मन-प्राण, बुद्धि-विवेक, श्रमशक्ति आदि निरुद्देश्य नहि भए सकैत अछि। प्रकृतिमे कोनो काज अनावश्यक नहि छै, ने भेल छै। एहि मेदिनीपर हमर उपस्थितिक मूल उद्देश्य की अछि, तेकर अण्वेषण हमरा कोनो एक काजपर स्थिर नहि रहए, हुअए देलक अछि। जतय कतहु हमर आवश्यकता वा प्रयोजन जकाँ हमरा बुझाएल, ओतय-ओतय हम अपन योगदान लेल बढैत आएल छी आ ताहिमे सदैव हमर सहयात्री रहल अछि हमर विवेक जेकरा हम यत्नपुर्वक सदति जगएने राखए छी। बहुतो लोककेँ हमर ई विविध गतिविधि हमर निरर्थक भटकाव जकाँ लागि सकैत अछि, लागलहु अछि किन्तु अपन गतिशीलताक ई विविधता हमरा पुर्ण अर्थवान आ औचित्यपुर्ण बुझाइत अछि। अपन निजता आ सार्थकताक मोलपर केतबहु बेशकीमती सफलता हमरा स्वीकार्य नहि रहल अछि। ला ब्रुयेरक मान्यता अछि जे संसारमे सफलता प्राप्त करबाक आ उन्नत हएबाक मात्र दूटा मार्ग अछि। एक त स्वयं अपन श्रम द्वारा आ दोसर दोसराक मुर्खतासँ लाभ उठाकए। अपन श्रम पर हमरा भरोस अछि, अपन प्रवृति आ बुद्धिक अनुकूल मार्गपर हम प्रशस्त छी आ अपन कर्मसँ संतुष्ट छी, स्वयंकें मानसिकतामे उन्नत पाबए छी। एहिसँ इतर सफलताक कोनो परिभाषा हम नहि जानए चाहए छी। ब्रुयेरक बताएल दोसर मार्ग धड़ब ने हमर आत्माकें कबूल अछि आ ने तेकर लुरि अछि। संगठित आ परस्पर सहयोगी समाज हमर प्रिय कामना रहल अछि आ एहि कामनाकेँ मात्र वैचारिक स्तर तक सीमित नहि राखि एकरा लेल अपना बुत्ते जतेक पार लागि सकल, से कएलहुँ अछि। हमर विभिन्न सांगठनिक गतिविधिसभ हमर अपन एहि स्वप्न आ कामनाकेँ धरातलपर उतारैत रहबाक प्रयासक प्रतिफलन अछि। एहिमे कतेको बेर किछु गोटेक क्षुद्र-क्षणिक स्वार्थक कारण भेल क्षतिसँ हमर आशा-आकांक्षापर तुषारापात सेहो भेल अछि, ताहिसँ दुखी आ क्षुब्ध सेहो भेल छी किन्तु एहिसँ हमर गति कखनिओ-कखनिओ कने कम भने भेल हुअए, बाधित नहि भेल अछि। अपन एहि फ़ितरतक चलते तेँ कतेक बेर अपना लेल ‘जिदियाह’ शब्दक प्रयोग सेहो सुनने छी आ सुनि-सुनि अनठिअएने छी। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यमे अपन उपयोग करबाक लोभपर हम आइओ कोनो तरहेँ नियंत्रण नहि राखि सकल छी। आलस्य हमर एकटा अभिन्न अवगुण अछि आ एहिसभक समवेत कारणक चलते हम स्वयंसँ साहित्य-सृजन लेल जे अपेक्षा राखने रही तेकर बहुलांश अखनिओ लिखल जाएब बचलहि अछि। साहित्यकेँ अपन सर्वस्व देनिहारसभसँ तेँ डाह सेहो होइत अछि। मैथिलीक एकटा प्रबल संभावनायुक्त कथाकारक ओलहन रहनि जे सम्पादक गौरीनाथ हुनकर कथाकेँ कपचिकए ‘अंतिका’ मे छापलनि। ई चर्चा गौरीनाथसँ कएलिअनि त एहि मादे वार्तालापक क्रममे गौरीनाथ कहलनि जे मैथिलीमे जे चारि अच्छर लिखि लेलक से अपनाकेँ वेदव्यास बुझए लागैत अछि। गौरीनाथक ई टिप्पणी ओहि कथाकारक मादे भनहि उचित नहि हुअए किन्तु हमर अपन अनुभव कहैत अछि जे गौरीनाथ अपन ठामपर वाजिब कहए छथि आ एकर प्रमाण सेहो हमरा कएक बेर भेटि चुकल अछि। एक त जातीय श्रेष्टताबोध आ ताहिपर साहित्यकार हएबाक गुमान – मैथिलीमे सक्रिय अधिकतर लेखककेँ हम एहि मनोविकारसँ पीड़ित-सीदित देखने छी। एहन अनेक खटमिट्ठी अनुभवबला खिस्सासभ हमरा लग अछि किन्तु तेकर चर्चा फेर कहिओ। एकर आलोकमे जखनि हम स्वयं केँ देखए छी त हमरा संतोषपुर्ण गौरव होइए जे ई व्यास-विकार हमरामे नहि अछि। हम अपन सभसँ बड़का खासियत कि खूबी ई बुझए छी जे हमरा अपन औकाति बुझल अछि। “औकाति” शब्दक प्रयोग हम एतय जानि-बुझिकए कएने छी। एहि शब्दक ध्वनि ‘सीमा’, ‘हैसीयत’, ‘बिसात’, ‘बुत्ता’, ‘हद’ आदिक तुलनामे हमरा बेसी संप्रेषणीय आ भावानुकूल बुझाइत अछि, भद्रताक दुराग्रह तक जाएबला लोकसभकेँ ई भने नहि अघरए। तें हम निष्कपटतासँ इ बात कहि सकए छी जे कविता हमरा अपनेटा लिखल नीकसँ बुझाइ ए। दोसर कविक कविता पढैत कतेक ठाम कतेको बात हमर माथपरसँ ससरि जाइ ए।(ओना एकर अपवाद सेहो अछि) तेँ अभिधा, व्यंजना, लक्षणा आदिक व्याकरण वा भामह, मम्मट, राजशेखर आदि आचार्यलोकनिक सैद्धान्तिकीक परवाहि हम कहिओ नहि कएल। एकरा हमर आत्मरक्षाक तर्क बुझल जाए सकैत अछि किन्तु तखनि जखनि हम अपन रचनाक श्रेष्टता, महानता वा विलक्षणताक दाबी करी आ तेकर एवजमे स्वयंकेँ पुरस्कार-सम्मान-पारितोषिकादि लेल सर्वोत्तम प्रत्याशी मानी। हमरा लेखे ईसभ धनि सन ! ई निर्लिप्तता कतहु ने कतहु हमरा सत्याग्रही आ दुस्साहसी बनएलक अछि। एकर प्रदर्शन हम साहित्यसँ इतर आनहु क्षेत्रसभमे अनेकानेक बेर कए चुकल छी आ तेकर परिणामस्वरूप अपना लेल ‘अभिमानी’, ‘घमण्डी’ आदिक अतिपवित्र सम्बोधनसभसँ धन्य भए चुकल छी। हमरा किन्तु एहि लेल कोनो पश्चाताप अखनि तक त नहि अछि। हम एकरा आत्मसम्मान आ अभिव्यक्ति-अधिकार-सम्पन्नता मानए छी आ एकरा अपन व्यक्तित्वक आभा आ सौन्दर्य मानि गौरवान्वित होइ छी आ तेँ दुनियांदारीक आकांक्षा वा दबावक गरजे स्वयंमे कोनो संशोधन-परिवर्तनक बेगरता नहि बुझए छी। हमरा एहि बातक गुमान अछि जे हमर आँखि शुद्धरूपसँ आँखि अछि , मैथिल आँखि नहि। एहि पुर्वाग्रहमुक्त आँखिसँ हम दुनियाँकेँ, दुनियाँक कोनो वस्तुकेँ ठीक ओहि रूपमे देखए छी जाहि रूपमे ओ वास्तवमे छै। दक्षिणा, लाभ, पुरस्कारक सम्मोहिनी गागल्स चढल आँखि हमर आँखि नहि अछि आ तेँ हमरा सत्य आ यथार्थकेँ साफ-साफ देखि सकएमे कहिओ कोनो दिक नहि लागल अछि। एहि आँखिसँ हम स्रृष्टिक असीम विस्तार देखए छी त आरि-धूर आ चौहद्दी सेहो खूब नीक जकाँ अकानल पार लागल अछि। कोनो व्यक्तिक प्रति प्रेम, स्नेह वा आन मानवोचित वा संबंधगत कमजोरीक चलते भनहि ओकरा अनेरो उघार वा देखार-चिन्हार नहि करैत होइ किन्तु केओ केतबो बहुरूप धरिकए, विविध मुखओटा लगाकए आबओ, देर-सवेर ओकर वस्तुगत मूल्यांकनमे हमरा कहिओ कोनो भांगठ नहि भेल। एकरा हम कोनो अदृश्य शक्तिक वरदान बुझए छी जे जीवनानुभवक क्रममे यदा-कदा शाप सेहो साबित भेल अछि। किन्तु ताहि लेल की ? हम जे छी से छी। हमरामे जे ए से ए। या अल्लाह ! हमरा महसूद बनाबह, हासिद नहि बनाबह !!! [ “ ई केना संभव अछि जे केओ अपन रस्ता चुनए, आ ओहिपर असगरहु नहि हुअए ? राजमार्गपर चलनिहारसभ रस्ता नहि चुनैछ ; रस्ता ओकरा चुनैत अछि।“ – अज्ञेय ] (निरन्तर जारी………………………) बात निकलल, कुठाम तक पहुँचल- एकटा बहु-अर्थी निरर्थक चलभाष–वार्ता सुकांत सोमजीक संग “ मैथिली समाज कृतघ्न समाज अछि। एतय काज सभक मोजर के दै छै यौ। हमर प्रयास सँ कतेको हिन्दी समाचारपत्र मे मैथिलीक रचना आ आलेखादि छपल किन्तु मैथिली पत्रकारिताक इतिहास मे एकर कतौ कोनो चर्चा नहि। ‘जनशक्ति’ मे यात्री जीक मैथिली कविता छपल रहै, ‘पाटलिपुत्र टाइम्स’ मे मैथिलीक पहिल पेज निकलल रहै …………… …… …………” – सुकांत सोम बाजैत चलि जाइत छला। [ नदीक एक किनारा नि:श्वास लए कए कहैत अछि – ‘सम्पूर्ण सुख सोझाक किनारा पर अछि!” नदीक दोसर किनारा आह भरिकए कहैत अछि – ‘दुनियाँ मे जतेक सुख अछि ओ सब पहिलुके किनारा पर अछि!’ -: रवीन्द्रनाथ ठाकुर :- ] दिन रहै सोम, तिथि रहै 13 जुलाइ, 2015 आ हम “प्रभात खबर” मे सुकांत भाइक लिखल मैथिली कालम ‘मैथिली माटी के हाल’ देखि-पढि हुनका बधाइ देबा लेल फोन केने रहियनि। हम कहने रहियनि जे एहि आलेख मे प्रुफक अनेकानेक गलती अछि आ ताहि सँ अर्थबाधित होइत अछि, तखनहुँ ई महत्वपुर्ण शुरुआत अछि आ स्वागतयोग्य अछि। ओ कहलनि जे ओ एकर शीर्षक ‘खोद-बेद’ वा ‘देसकोस’ प्रस्तावित केने रहथिन, किन्तु अखबारबला एकरा ठीक सँ बुझि नहि सकल आ कीदन ने कए देलक। हम कहलियनि जे ई सभ त आगू ठीक भए सकैत अछि आ अखनि एहि लेल हमरा दिस सँ बधाइ अछि। हमर बधाइक उपरांत हुनक व्यथा प्रकट करैत ई हताश-निराश सन लागैत टिप्पणी हमरा भेटल। “ से ई मैथिलीक लेल कोनो नव बात त नै छै, सुकांत भाइ। एतय त कोनो तरहक अवदान केँ अनठिऐबाक आ क्षणे मे बिसारि देबाक दीर्घ इतिहास आ परिपाटी रहल छै। ई कोनो हमरे-अहाँ लग सँ त शुरु नै भेल अछि। हमर-अहाँक काज अछि लिखब आ तेँ लिखैत जाउ आ बस। अहाँ लग एहि सँ संबंधित अपन अनुभव आ एकर डाटा ए त अहाँ एकरा लिपिबद्ध किऐ नै करै छी ?” – हम कहलियनि। “ हम अपने अवदानक चर्चा अपने करी? हमरा आत्म-विज्ञापनक सख नै ए। ततेक बेर हमर नाम छपि चुकल अछि जे एहन सौभाग्य मैथिलीक कमे गोटे केँ भेटल हेतनि जाहि मे एकटा हमर बाप सेहो छला। अहाँ पत्रकारिताक क्षेत्र सँ जुड़ल छी, ‘मिथिला आवाज’क सम्पादक रहि चुकल छी। ई अहाँ केँ लिखना चाही। अहाँ लिखू। ई कोनो विभुति आनन्द कि तारानन वियोगी सँ त नै हेतनि।“ “ हमरा लग एहि सँ संबंधित जानकारी रहितय तखन ने हम लिखतहुँ। बहुतो गोटे जकाँ हमरो एकर विस्तृत जानकारी नहि अछि। ई नीक भेल जे अहाँ सँ एहि विषय पर चरचा भेल आ हमर संज्ञान मे ई बात आएल। एकर दस्तावेजीकरण हमरा भविष्यक लेल आवश्यक बुझाइ ए। फोन पर त एतेक गप संभव नहि अछि, अगिला बेर हम पटना आएब त अहाँ संग बैसि एकर डाटा लेब आ ओकरा एकटा आलेखक रुप देबाक प्रयास हम करब।“- सुकांत भाइक गप मे कने क्षोभ, कने व्यंग्य आदिक विरोधाभासी-मिश्रणक आभास जकाँ हमरा बुझाएल किन्तु तेकरा अनठिआबैत हम ईमानदारी सँ अपन एहि विषयगत अज्ञानता केँ सकारैत कहलियनि। कने काल तक एहि विषय पर गप होइत ओकर प्रवाह दोसर दिस मुड़ि गेल। सुकांत भाइ आन्तरिक उद्वेलन सँ उधिआएल जकाँ छला आ हुनका लग कहबाक लेल मारिते रास गप रहनि, से बुझाएल। कहलनि – “ एमहर सुभाष (सुभाष चन्द्र यादव) केँ पचपनियाँ मैथिलीक खप्त सवार भेलनि अछि। की माने अछि एकर? ई त जाति-पाति पर उतरब भेल। एकरा हम प्रतिक्रियावादी काज मानै छिऐ।“ [ ई जाति-पाति त ब्राह्मणे संस्कृतिक उत्पादन अछि। वएहसभ एकर बीजारोपण केलनि, एकर खेती केँ सिंचित-संवर्धित केलनि, एकर फसिल काटि अपन भंडार भरैत रहला आ समाजक एकक्षत्र नियन्ता बनल रहला। अजुका समय मे आब जँ गैर-ब्राह्मण लार-पुआरक आँटी आ खुद्दी-खखरी के खैरात पर असंतोष प्रकट करैत अपन हक-हिस्सा-अधिकार मांगैत अछि त एकरा भंडारणक क्रियाक अस्वीकार मानल जेबाक चाही, लोकतंत्रीकरण, सम-वितरण आ समता-सम्मानक आकांक्षाक द्योतक मानल जेबाक चाही। भंडारण अपना-आप मे एकाधिकारवादक प्रतीक अछि आ इएह अपन रुप बदलि-बदलि पुरोहितवाद, अधिनायकवाद, साम्राज्यवाद आ पुंजीवाद आदिक वेश मे प्रकट होइत रहैत अछि। जँ कोय एहि वर्चस्वक विधान केँ चुनौती दए रहल छै, सड़ल-गलल व्यवस्थाक प्रति विद्रोह कए रहल छै त एकर स्वागत हेबाक चाही। ई त पुर्वक क्रिया-अतिक्रिया-कुक्रियाक स्वाभाविक प्रतिक्रिया अछि। प्रत्येक प्रगतिशील-चेतना संपन्न लोक केँ एहि परिवर्तनकामी चेतनाक पैरोकारी करबाक चाही। परिवर्तनक कामना प्रतिक्रियावाद नहि होइछ, वर्तमान मे परिवर्तनक एहि स्वर केँ नकारब प्रतिक्रियावाद अछि। -: स्वगत :- ] “ सुभाष भाइ त अहींक मित्र-मण्डलीक लोक छथि त अहाँ हुनके सँ ई प्रश्न किए नै करै छियनि? ओना पचपनियाँ-काण्डक एहि मामला मे हमर आपत्ति दोसर विन्दु पर अछि। हमर प्रश्न ई अछि जे सुभाष भाई भरि जिनगी बाभनबला मैथिली लिखलनि त आब चला-चलीक बेरा मे हुनका पचपनियाँ मैथिली किऐ सुझि रहल छनि? आ जँ ओ पात्रानुकूल भाषा चुनि अपन रचना केलनि त ओकर पैरोकारी-एडवोकेसी हुनका स्वयं किऐ करए पड़ि रहल छनि। ई गप त पाठक आ समीक्षक लोकनिक विवेक-विचार पर छोड़ल जेबाक चाही छल। हमरा बुझने सुभाष भाइ एकटा विवाद ठाढ कए अपन आ अपन रचनाक विज्ञापन कए रहल छथि।“ – हम बाजलहुँ। “ हँ, से दोसर गप। हमर कहब अछि जे सुभाषक ‘घरदेखिया’ कि ‘बनैत-बिगड़ैत’ केँ लोक स्वीकार केलक की नै। केलक। तखन ई गप उखारबाक कोन प्रयोजन? ओ एकरा पुरबी मैथिली कहने रहितथि त एकटा गप होइतए। सहरसा-सुपौलक मैथिली कने अलग छै। ओमहर कहै छै – ‘बाबू हओ’ आ से ब्राह्मण आ गैर-ब्राह्मण दुनू कहै छै। दरभंगा-मधुबनी मे कहै छै – ‘बाबू यौ’ आ से गैर-ब्राह्मणो कहै छै। ई त बोली भेल, एहि मे जाति-पाति कतय सँ एलै? ई त कुंठा भेल। हम मानै छी जे जखन लेखकक लेखन-क्षमता चुकि जाइ छै तखन ओ ई सब गप करए लागै ए। एहन प्रतिक्रियावादी गप नै हेबाक चाही।“ – सुकांत भाइ बजला। हम कहलियनि जे एहि पर दू-चारि पांतिक टिप्पणी हम विदेहक लेल लिखल एकटा आलेख/प्रश्नोत्तरी मे कए चुकल छी आ अहूँ अपन विचार कतौ लिखि कए व्यक्त करिऔ। लेखक केँ अपन भावनाक प्रकटीकरण लिखिए कए करबाक चाही – प्रिय-अप्रिय जेहन हुअए। एहि पर सुकांत भाइ किछु नहि बाजला। तेकर बाद अपन विशिष्ट आ अलग दृष्टिकोणक उल्लेख करबाक निमित्त सुकांत भाइ एक-दू दिन पहिने संपन्न भेल मैथिली लेखक संघक वार्षिकीक अवसर पर धूमकेतु-केन्द्रित आयोजनक चर्चा पर चलि गेला। कहलनि – “ मैथिली मे त बनले लीक पर हु-ले-ले-ले चलैत रहै छै। हमर सोच आ दृष्टि आन सभ सं कनेक अलग रहै ए। धुमकेतु पर चर्चा करैत हम कहलिऐ जे ओ अपन कथा मे जे बात कहै छथि से बहुत पहिने ‘सुरमा सगुन विचारै नै’ मे आबि चुकल अछि, बल्कि ओहि मे धुमकेतु सँ आगूक बात कहि देल गेल अछि।“ धूमकेतु व्यक्ति आ रचनाकार दुनू रुप मे हमरा लेल श्रद्धेय रहल छथि आ ई श्रद्धा हमरा हुनक डीह तक लए कए गेल अछि। मैथिलीक ओ एकदम एक्सक्लुसिव आ अमुल्य निधि छथि। संपुर्ण आधुनिक विश्व-साहित्य पर मार्क्स आ फ्रायडक अत्यधिक प्रभाव रहल अछि आ हमरा बुझने जतय एहि दुनू मे सँ कोनो एक व्यक्तिक प्रभाव नहि अछि से आधुनिक कहैबाक योग्यता नहि राखैत अछि। मैथिली मे मार्क्सक हुलकी कतहु-कतहु अपन नगण्यता मे अन्चोक्के अपन आभास जकाँ दैत लगैत अछि किन्तु छथि ओ प्राय: निपत्ते जकाँ। फ्रायड अएला अछि आ एकदम सहज आ स्वाभाविक रुप मे ओ धूमकेतु लग उपस्थित छथि। राजकमल लग ओ पहुँचै छथि किन्तु विकृत रुप मे। धूमकेतु केँ जे कथा-सम्मान भेटल छल तेकर ओ सर्वथा योग्य छला। हमरा गुमान आ हर्ष अछि जे हुनका भेटल एहि सम्मानक प्रक्रियाक केन्द्रीय सूत्र नचिकेता छला किन्तु एहि मे हमर महत्वपूर्ण आ निर्णायक योगदान रहल छल। एहन धूमकेतुक प्रति सुकांत भाइक टिप्पणी मे नुकाएल उपहास आ अवमुल्यनक भाव सँ हमरा कचोट भेल। हमरा ई सुकांत भाईक आदत जकाँ लागैत अछि जे ओ एहन अवसर सभ पर अखबार मे कोट करबाक लेल एकटा कोनो मारूक टिप्पणी कए दैत छथि किन्तु ओकर विवरण मे जाएब आ तर्क सँ ओकरा पुष्ट करबाक बेगरता नहि बुझै छथि। ललित पर केन्द्रित मैलेसं के एकटा आयोजन मे एहिना ओ बिना कोनो समुचित तर्क देने राधाकृष्ण झा ‘बहेड़’ कें ललित सँ बेसी आधुनिक आ आगू हेबाक टिप्पणी कए चुकल छला आ तहिओ हुनक बात हमरा नहि पचल छल, आइओ नहि पचल। किन्तु ई विगत भेल एकटा आयोजनक गप छल, एहि पर कोनो प्रतिक्रियाक अपेक्षा नहि छल आ ने तेकर ई अवसरे रहै। तेँ हम एहिपर चुपे रहि गेलहुँ। [ ‘अपना सँ भिन्न एक व्यक्तिक व्यक्तित्वक क्रमिक शोध आ अनुसंधान – एहि सँ बेसी सुन्दर, प्रीतिकर आ तृप्तिदायक अनुभूति की भए सकैत अछि? ई शोध अत्यंत कठिन अछि, तेँ ओ एतेक तृप्ति दैत अछि। किन्तु ई शोध अहेर नहि अछि, ‘पाबए’ सँ ओकर कोनो संबंध नहि अछि। अहेरीक भावना लए कए पुरुष अथवा स्त्रीक ‘पाछाँ’ धरब ओहि अनुसंधान आ शोध केँ शुरुए सँ दूषित कए देब अछि, किऐक त ओ वास्तव मे खोज नहि अछि, ओ त मात्र पुर्वग्रह अछि किऐक त ओ उपलब्धिक रुप पहिने सँ निर्धारित कए कए चलैत अछि।‘ –: अज्ञेय :- ] मैथिली लेखक संघक चर्चा चलल त हुनका हम ततसंबंधी अपन टिप्पणी सँ अवगत करैलियनि जे हम ओकर गतिविधि दिआ चारि-पांच दिन पहिने एसएमएस के माध्यम सँ संगठनक महासचिव विनोद कुमार झाजी केँ पठैने रहियनि। एहि संगठन द्वारा पूर्व मे आयोजित मैथिली लिटरेचर फेस्टिवलक हमर अनुभव बहुत खराब रहल छल। महासचिव आ संयोजक दुनू दिस सँ एकदम पूर्वनियोजित ढंग सँ प्रयासपूर्वक हमरा कात-करोट राखल गेल छल, छलपूर्वक हमरा सँ आयोजनक सबटा प्रस्तावित-संभावित सूचना नुकाएल गेल छल, बदनीयति सँ सदस्य रहितो सबटा बैसार मे हमरा अनामंत्रित राखल गेल छल, फोनक माध्यम सँ हमरा बेर-बेर पत्र द्वारा सूचना पठैबाक ठकैती-गप कहल जाइत रहल छल, प्रतिरोधक आशंका वा कोनो आन मजबूरीबश हमर नाम पचास सँ बेसी कवि सभक सूची मे बिना हमर सहमतिक घोसिआए देल गेल छल आ इएह आयोजन मे हम पहिल बेर जातिक सोइत एकटा तथाकथित महान सहकारी लेखकक मुँह सँ ‘छोटबभना’ शब्दक क्षुद्र प्रयोग सुनने रही आ ई संपुर्ण आयोजन हमरा ब्राह्मणक एहि दुनू वर्गक बीचक वर्चस्वक घिसटा-घिसटी जकाँ बुझाएल रहय। हमर एहि गपक चर्चा करितहि सुकांत भाईक टोन जेना बदलि गेल – “ एकरा अहाँ बाभनक आयोजन कोना कहि देलिऐ? ई त एकदम गलत बात भेल।“ “ हम एकरा बाभनक आयोजन नै, बाभनक दू वर्गक बीचक घिच्चातिरी कहलिऐ। ओना एहि पर कहिओ बैसि कए गप हेतै त हम सबटा खेरहा कहब। ई दीर्घ कथा छै, बहसक विषय भए सकै छै आ से फोन पर करब संभव नहि छै। ओहुना दुनू गोटेक बीच भरि पोख गप भइए गेल अछि आ फोन सटैने-सटैने हमर कानो गरम भए गेल ए। त शेष कोनो दोसर दिन……………“ – गप करैत प्राय: बीस मिनट सँ बेसी भए गेल रहए आ हम गपक समापन चाहैत रही। फोनक बिलक चिन्ता सेहो हुअए लागल रहए। “ नै, से कोना हेतै। अहाँ आरोप लगा कए भागि जेबै त से त नै हएत।“ “ कहलौं जे ई गप नमहर छै, फोन पर……………………………” हमर गप केँ बिच्चे मे काटैत सुकांत भाइक रोषयुक्त स्वर आएल – “ नै यौ अरबिन्द जी। हम अहाँ केँ आरोप लगाकए भागए नै देब। अहाँ केँ बतबए पड़त जे ई गलत आरोप अहाँ कोन आधार पर लगैलिऐ।“ सुकांत भाइक ई जिद हमरा अनावश्यक आ अवांछित जकाँ लागल। ‘बेगाने शादी में अब्दुल्ला दीवाना’ जकाँ। हुनका द्वारा गप सुनै सँ पहिने हमर अनुभव केँ आरोप कहब, ओकरा दिआ कोनो तथ्य सुनै सँ पहिने ‘गलत’ घोषित कए देबाक जजमेन्टी-मुद्रा मे आएब आ ताहि पर आक्रामक तेवरक प्रदर्शन – हमरा अप्रिय-अनसोहाँत बुझाएल। सामान्यतया एहन आक्रामक तेवर हमरा बर्दाश्त नहि होइए आ एहन स्थिति मे हम अपन अवचेतनक निर्देश पर सभटा शालीनता केँ भाँड़ मे झोंकि सामनेबलाक धज्जी-धज्जी उड़ाबैत आएल छी चाहे ओ केतबो बड़का तोप कि पोप किऐ ने हुअए। किन्तु ‘सहितस्य भाव साहित्यम्’ बला साहित्य जगत मे आबि हम प्रयासपुर्वक अपन एहि स्वभावगत प्रवृति पर अंकुश लगैने छी आ एहि मान्यताक पक्षधर भेल छी जे साहित्यक कोनो विषयक मामला पर लेखक केँ अपन कोनो टिप्पणी लिखित रुप मे करबाक चाही। हमर दृढ मान्यता रहल अछि जे सियासती-सियार जकाँ कखनिओ-कत्तहु किछु बाजि देब, बोकरि देब आ फेर क्षणे मे पलटि जाएब रचनाधर्मी सभक लेल एकदम अनुचित आ अनैतिक अछि। जे किछु लिखित रहत वएह दस्तावेजक काज करत आ एहि सँ पलटि जेबाक गुँजाइशो नहि रहत। अकादमी पुरस्कार भेटलाक बाद गोविन्द झा जीक ‘देसकोस’ बला साक्षात्कार आ भीम भाइकेँ लिखल हुनक पत्र एकर गबाही दैत अछि। किन्तु सुकांत भाइ गप केँ एहन मोकाम पर लए आनने छला जे आब पाछू हटब संभव नहि छल। हुनक एटिच्यूड जे होइनि किन्तु हमरा बातक सौहार्द बिगाड़ए सँ परहेज करैत किन्तु सत्य केँ संग राखि समुचित उत्तर त देबाके छल। तेँ हम हुनका किछु प्रारंभिक गप सब कहलियनि आ संगे इहो कहलियनि जे सभा-संगठनक क्षुद्रता दिआ बाबा (यात्री-नागार्जुन) लिखित रुप सँ उन्नैस सय बत्तीसे-छत्तीस मे मैथिल समाज केँ चेतौनी दए चुकल छलाह आ हुनक चेतौनीबला एहि आलेखक पुनर्प्रकाशन सेहो मिथिला दर्शन हालहि मे केने छल, किन्तु हुनका सन प्रगतिशील विचारबला लोकक गप कोय नै सुनलक आ आब जे कोनो सभा-संगठन बनि रहल अछि ओसभ अपना केँ मैथिल-महासभाक मिनिएचर-कापी बनैबाक लेल अपस्यांत रहैत अछि। “ जातरी जीक गप छोड़ू, अरविन्द ठाकुर जी। ई बताउ जे अहाँ केँ सूचना उप्लब्ध नै कराओल गेल कि बैसार मे नै बजाओल गेल तै सँ ई बाभनक आयोजन कोना भए गेलै? हम ओहिठाँ रहिए नै सकै छी जतय ब्राह्मणवाद हुअए। तखन अहाँ केँ बुझल नै ए जे एहि आयोजनक पाछू हमर कतेक हाथ रहल। “- सुकांत भाइ बाजला। हुनक ‘अरविद जी’ सँ ‘अरविन्द ठाकुर जी’ पर आएब खूब धरगर जकाँ हमर संज्ञान मे आएल। अकस्मात हमरा दिव्य-ज्ञान भेल। जँ लिटरेचर फेस्टिवलक आयोजन मे हिनकर एतेक महत्वपूर्ण योगदान रहल अछि जेकर दाबी ओ अखनि कए रहल छथि तखनि निश्चित रुप सँ बिनोद जी केँ प्रेषित हमर समाद सुकांत भाइ केँ पहिने सँ संज्ञान मे छनि, ताहि पर हुनक मण्डली मे बहस-घमर्थन भए चुकल अछि आ ओहि एसएमएस-बाण सँ ओ बिद्ध सेहो छथि। [ धैर्य ! धैर्य ! –: स्वगत :- ] “ हम त जाहि संगठनक आयोजन रहै तेकर महासचिव-अध्यक्ष आ आयोजनक संयोजक केँ जिम्मेदार मानै छी। एहि मे अहुँक कोनो सलाह वा सहमति रहै सेहो हमरा जानकारी मे नै ए आ ओहुना तै सँ सदस्यक हैसीयत सँ हमरा कोन मतलब। हँ, ई बात अवश्य हमरा कहल गेल छल जे सुभाष भाईक कथा संग्रह पर चर्चाक सत्रक निर्धारणक पाछू अहाँक व्यक्तिगत आग्रह रहै।“ – हम बिच्चे मे टोकलियनि। “ नै, से नै चलत। ई बिनोद झा-नरेन्दर झाक गप छोड़ू, हमर योगदान ओहि फेस्टिवल मे कहबा लेल संयोजक अशोक छला किन्तु हुनकहु सँ बेसी रहल अछि। असल बात ई छै जे मैथिलीक अछरकट्टू साहित्यकार सभ केँ अहम् बहुत होइ छै।“ [ अछरकट्टू ! ई सुकांत भाइ केकरा लेल कहि रहल छथि ! हमरा लेल त नहि ? अकस्मात स्मृति मे कौंध गेला मुक्तिबोध। ‘ब्रह्मराक्षस’ आ ‘ओ काव्यात्मन् फणिधर’ लिखनिहार कवि मुक्तिबोध। कवि मुक्तिबोध जन्मना ॠग्वेदी कुलकर्णी ब्राह्मण छला किन्तु विचार सँ अत्यंत आधुनिक आ प्रगतिशील। जातिकुल आ सामाजिक वैषम्यक अवरोध केँ एक कात ठेलि कए ओ प्रेम विवाह कएलनि। अपन जीवन आ लेखन दुनू मे परम-साहसिकताक पर्याय बनल आ मानव सँ इतर कोनो अदृश्य-शक्तिक अस्तित्व केँ नकारनिहार मुक्तिबोध अपन बीमारीक क्रम मे कोमा मे चलि गेल रहथि आ ताहि काल अवचेतन मे ओ कखनो चिकरथि आ कखनो बुदबुदाबथि …… राम राम राम राम……राधे-कृष्ण………। की जन्मना संस्कार एतेक गहींर धसल रहै छै मनुष्यक अन्तस मे जे अपन संपुर्ण चेतना मे ओ जाहि वस्तुक बहिष्कार करैत अछि, त्याज्य मानैत अछि से ओकर अचेतन-अवचेतन पर तक्षक जकाँ फण काढि कए बैसल रहैत अछि ? सुकांत भाइक सुवचन(!), मुक्तिबोधक स्मृति आ ई लह-लह करैत प्रश्न एक-दोसराक पीठियाठोक आएल आ हमरा सन्न कए देलक। एक बेर फेर सँ मन पड़ला बाबा यात्री। युवावस्था-प्रौढावस्था मे सौंसे जग के तिरपेच्छन करनिहार बाबा वृद्धावस्था मे घर घुरि गेल रहथि – सदा सर्वदाक लेल। बैद्यनाथ मिश्र सनातन धर्मक पुरोहितवादक विरुद्ध ठाढ भेल बौद्ध धर्म ग्रहण कए मैथिली तजि हिन्दी मे गेला, नागार्जुन भेला, मैथिली मे यात्रीक रुप मे मैथिले रहि गेला आ अथबल होइते ठक्कन बनि घर-वापसी कएलनि। किए? जरावस्था सभटा क्रांतिकारिता केँ धुरखेल खेलाए दैत अछि की? सुकांत भाइक मामला मे इतिहास फेर सँ अपना केँ दोहराए रहल अछि की? हमरा बुझने मैथिली दू तरहक लोक सँ समृद्ध अछि। एक त व्यास-स्तरीय सकल-ज्ञान-विद्या-विशारद सह परम-गुण-निधान लोकनि सँ आ दोसर एहिसभ उच्चस्तरीय महानताक विभुषण सँ बारल शेष-श्रेणीक संघर्षरत जन सँ। हम अपन भ्रम मे अपना केँ परम-अभागल बीच-बीचबला लोक अर्थात मीडियोकर मानैत आएल छी – ने एहन परम सौभाग्यशाली जे पहिल श्रेणी मे स्थान पाबि सकी आ ने एहन सामान्य सौभाग्यशाली जे दोसर श्रेणी मे अंटि सकी। मैथिलीक एकटा स्वयंभू विद्वत-समुदाय एकरा अदौं सँ दू श्रेणी मे बाँटने अछि – एकटा मैथिल महासभाक पंजी सँ संरक्षित जातिक भद्र आ सुसंस्कारी वर्ग आ दोसर पंजीक संरक्षण सँ वंचित शेष-समाजक सोल्हकन वर्ग। सुकांत भाइ प्राय: दोसर श्रेणीक लेल ‘अछरकट्टू’ शब्दक प्रयोग कए रहल छला आ प्राय: हमरो ओहि मे ठेलि कए घोसिआए रहल छला – मैथिल महासभा द्वारा निर्धारित मानदण्डक आधार पर। ईहो संभव जे संपूर्ण मैथिली लेखक समाज मे असगरे हमरे टा अछरकट्टू मानि ओ एहि शब्दक प्रयोग केने होथि। ‘ब्राह्मणे मुखे अमृतो अमृतम्’। हुनक ब्राह्मणत्व आ वरीयताक संज्ञान लैत हम एकरो हुनक कृपा आ अपन सौभाग्य मानि लेल – चलह, अछरकट्टूओ कहि साहित्यकार त मानलनि। -: स्वगत :- ] “ अहाँ, सुकांत भाइ, स्वयं अपना केँ कठघरा मे ठाढ कए रहल छी त एहि पर हमरा किछु कहबाक नै ए। आ जँ अहाँ एहि आयोजनक पाछू रही आ एकरो सूचना हमरा नै छल त ई त आओर आपत्तिजनक छै।“ “ अहाँ पटना अबै छिऐ त केकरा-कहाँ संग रहै छिऐ, हमरा संग रहितौं तखन ने अहाँ केँ सभटा सूचना रहितए।“ सुकांत भाइक कोनो गुट छनि आ हुनका मे श्रेष्टताबोधक व्यास-विकार सेहो छनि से कल्पना हमरा कहिओ सपनो मे नहि आएल छल। किन्तु अखनि किए ने किए हमरा लागल जे सुकांत भाइ प्रकारांतर सँ ई त नै कहि रहल छथि जे हम हुनक गुट मे रहबनि तखने हमरा कोनो स्थान कि सूचनादि भेटत। ई विचार आबिते जेना हमरा एकटा शाक जकाँ लागल। मन तिलमिलाए कए तिताइन जकाँ भए गेल। [ हम सब उपदेश सुनै छी मन-भरि, दै छी टन-भरि ; किन्तु ग्रहण करै छी कन-भरि। :- अलजर -: ] “ हम अहाँ केँ पहिने कहने रही सुकांत भाई जे ई गप फोन पर फरिआबए बला नै छै। अहाँक जिद पर हम जतेक बात कहलौं से त मात्र ट्रेलर रहै, फिलिम त पूरा बाँकिए छै। आब कहिओ पटना आबै छी त नीक जकाँ बैसिकए एहि विषयपर गप हेतै आ अहाँ सँ पूर्व मे भेल गपक विषयगत विवरणी सेहो अहाँ सँ लेब। अपन जजमेन्ट बचा कए राखू आ अखनि हमरा डेट दिअ।“- हम मजाकक पुट दैत बात केँ खतम करबाक आभास हुनका देबाक प्रयास केलौं। “ ठीक छै, पटना आउ त आब एहि पर गप हेतै किन्तु अहाँ गलत आरोप लगा कए भागि नै…………………………” गप खतम करबाक प्रति हुनक अनिच्छा आ बहस केँ आगू बढैबाक ललकार साफ-साफ हमर कान तक सम्प्रेषित होइत रहय। हमरा लागल जे बात फेर ने पसरि जाइ आ जँ पसरल त अखनि तक हमरा दिस सँ प्रयासपूर्वक बचा कए राखल सौहार्दक महीन कपड़ाक चेथरी ने उड़ि जाइ। ओहुना जखन सुकांत भाइ स्वयं आबि कठघरा मे ठाढ भए गेल छला त आब हुनका दिस सँ पूर्वाग्रह-मुक्त तर्क-वितर्क आ निष्पक्ष सुनबाइक कोनो गुंजाइस कहाँ रहि गेल रहै। आब गप केँ आगू बढाएब कोनो दिशा सँ अनुचिते-अनर्गले जकाँ लागल आ हम सुकांत भाइ केँ नमस्कार कहि फोन काटि देल। मोबाइलक डिटेल देखलौं – हमरा दुनू गोटेक गपक अवधि चौआलिस मिनट आ उन्चास सेकेण्ड रहल छल। आ से गप केहन? त एकदम फलहीन नग्न गाछ !!! अपन एकटा शेर मन पड़ल – “ खास सँ चलि कए आम तक पहुँचल / बात निकलल, कुठाम तक पहुँचल “। फरक एतबे जे एतय बात आम सँ चलि कए खास तक पहुँचल छल किन्तु पहुँचल छल कुठामे पर। [ जँ कोय मात्र अनुभवहि सँ बुद्धिमान भए जइतै त लंदनक अजायबघरक पत्थरसभ एतेक समयक बाद संसारक बड़का सँ बड़का बुद्धिमानहुँ सँ बेसी बुद्धिमान होइतै। :- जार्ज बर्नार्ड शा -: ] संस्मरण- बाबा सँ पहिल आ अंतिम भेंट:बाबाक विराट स्मृति-पटल बाबा यात्री-नागार्जुन सं हुनक रचनाक माध्यमे हजारो बेर भेंट भेल छल,मुदा साक्षात भेलहुं दुनू गोटे मात्र एक बेर-रांटी,मधुबनी मे|अवसर छल-साहित्य अकादमी,दिल्ली आ लीलावती तंत्र भवन,रांटी,मधुबनीक संयुक्त तत्वावधान मे आयोजित त्रिदिवसीय अखिल भारतीय मैथिली कवि सम्मेलन|वर्ष छल-1995|2 दिसम्बर सँ 4 दिसम्बर धरि भेल ओ आयोजन हमरा बुझने मैथिली साहित्यकारक महाकुंभ छल-न भूतो,न भविष्यति|तहिया साहित्य अकादमी मे मैथिलीक प्रतिनिधि छलाह-सुरेश्वर झा|जबर्दस्त जमावड़ा भेल छलय-वरिष्टतम सं युवतम पीढीक साहित्यकार लोकनिक|सम्पुर्ण कार्यक्रम कविता,गीत ,गजल आदि विधानुसार प्रायः छह सत्र मे बांटल| हम ओहि काल सामाजिक-राजनीतीक गतिविधि मे बहुत सक्रिय छलहुं| लिखैत त छलहुं पचीस वर्ष पहिने सं,मुदा साहित्यकार-समाज आ विशेषतया मैथिली साहित्यकार- समाज सँ बेसी परिचिति नहि छल|स्वांतःसुखाय लेखन सँ सक्रिय लेखन मे हमर एनाइ दूए-चारि वर्ष भेल छल| दू वर्ष पहिने 1993 मे हमर मैथिली कविताक संग्रह “परती टूटि रहल अछि” प्रकाशित भए चुकल छल आ तकर खूब स्वागत आ प्रशंसा भेल छल-मैथिली जगत मे|मैथिली कथा गोष्ठी’सगर राति दीप जरय’केर पटना, सुपौल आ राजबिराजक आयोजन मे सहभागी भए कथा-पाठ कए चुकल छलहुं|साहित्य अकादमी,दिल्ली द्वारा पटना मे आयोजित अनुवाद कार्यशालाक सहभागी 18 अनुवादक साहित्यकार मे एकटा नाम हमरो छल|साहित्य अकादमीक ‘ट्रेवल ग्रांट टू आथर’योजनान्तर्गत हमरा महाराष्ट्र भ्रमणक स्वीकृति सेहो भेटि चुकल छल|चेतना समिति,पटना द्वारा माहेश्वरी सिंह’महेश’ ग्रंथ पुरस्कार सेहो भेट गेल छल आ ओहि संस्था द्वारा आयोजित विद्यापति पर्व समारोह मे कविता –पाठ सेहो कए चुकल छलहुं|जतय धरि हमरा मोन पड़ैत अछि,रांटी कवि सम्मेलन सँ पुर्व हमर एतबेटा परिचय छल-मैथिली साहित्यकार-समाजक बीच| हम एक दिन पहिनहि पहुंच गेल छलहुं|पहिल दिनका सम्पुर्ण सत्रक समर्पित श्रोता आ दर्शक रहलहुं|एहि दिनक दुनू सत्र छल-वरिष्टतम आ वरिष्ट कवि लोकनिक|सत्र समापनोपरान्त एकटा कमरा में हम सभ गोलिआकए बैसल छलहुं-महाप्रकाश,सुकान्त सोम,अग्निपुष्प,विभुति आनन्द,तारानन्द वियोगी आदि|ज्योत्सना चन्द्रम एक कात में बैसल छलि|गोल मे प्रायः किशोर केशव सेहो छलाह|हम अग्निपुष्प द्वारा ओहि दिन पठित एकटा कविताक पैरोडी बनयने छलहुं आ तकर पाठ कए रहल छलहुं|पैरोडीक केन्द्र में छलाह-विभुति आनन्द दुनू परानी|हमर पाठ आ श्रोता सभक समवेत ठहक्का-महो महो भए रहल छल|आकि तखने बाहर मे खूब जोर सँ हल्ला भेलय|हम सभ उत्सुक भेलहुं त ज्ञात भेल जे बाबा एलाहे|महाप्रकाश सुकान्त भाइ कें केहुनी मारैत बजलाह-‘जाही ने,फ़टकार सुनिकए चलि आबिहें’|ओहि हुलिमाल मे के जयतए,हम सभ अपन महफ़िल सजयने रहलहुं|कनिके काल बाद देखय छी जे बाबा हमरे सभक कमरा मे उपस्थित छथि आ संग मे छथि शोभा भाइ|सभ गोटे अकचकाए कए ठाढ भेलहुं,प्रणाम-पाती भेल|संग एनिहार मे सँ केओ बाबा कें कहलकनि-‘ताबत एतहि आराम करिअओ’| बाबा हमरे सभक बीच बैसि गेलाह|जखन सभ गोटे सरियाकए बैसलाह,तखन हम अपन दुनू हाथ जोरि बाबाक अभिवादन केलियनि|केओ हमर परिचय दैत बाजल-‘बाबा!ई अरविन्द ठाकुर छथि,सुपौल सँ|’बाबा अपन आंखि गोलियाबैत कने काल हमरा दिस ताकलनि आ बिहुंसैत बजलाह-‘परती तोड़निहार अरविन्द ठाकुर’!हम चुप|हमर त जेना बाके हरण भए गेल छल|एत्ते बड़का कवि!बाबा हमरे दिस ताकि रहल छलाह,फेर बजलाह-‘एहि संग्रहक कविता सभ मे अहाँ एकदम एक्सक्लुसिभ तौर पर अपन विशुद्ध भाव मे छी|धंधेबाज साहित्यकारक शब्दीय बाजीगरी सँ अहाँक कविता सभ एखन धरि बाँचल अछि|आगाँ जे होअय|’एकर बाद बाबाक आँखि हमरा पर सँ हटि गेल आ जेना हमरा सँ कोनो मतलबे नहि होअय,तेना ओ सभ कें हियासलनि आ बजलाह-‘आर अहाँ सभक की हाल-चाल?बाजय जाउ|’ तकर बाद विभिन्न गपक डलना(मिक्स्ड भेजिटेबुल)परसल जाय लागल आ सभ गोटे तकरा सुआदए लगलाह|हम मुदा सातम आसमान पर छलहुँ,हमरा सुनाइ त सभ गप पड़ैत रहय मुदा एकहुटा मगज मे नहि घुसैत छल|ओहि त्रिदिवसीय आयोजनक तीनो दिन हम बाबाक टिप्पणीक निसा मे मातल रहलहुँ|अनेक प्रश्न मोन मे आबय-‘बाबा कखन हमर पोथी पढने हेताह,सभ दिन त बौआबिते रहैत छथि|पढलनि त मोन कोना राखलनि,एतेक रास चीज पढैत हेताह|आदि-आदि|’मुदा कोनोटा प्रश्न हमर निसा नहि तोड़ि सकल छल|आब ई बात सोच मेअबैत अछि जे अनेक रास नदी कें स्वयं मे समाहित कईयेकए केओ समुद्र बनि सकैत अछि| जीवकान्त : किछु स्मृति, किछु टिप्पणी जीवकान्त जीक ज्येष्ट पुत्र अरुण झा सुपौल स्टेट बैंक मे पोस्टेड रहथि। डा नवीन कुमार दासक क्लिनीक सह निवास पर हमरा सभक प्रतिदिनक बैसार मे ओ यदा-कदा आबैत छला तेँ परिचय छल। संयोगवश अरुण जीक डेरा सेहो हमरे मोहल्ला मे छल। एकदिन नवीन जीक ओहिठाम पहुँलहुँ त ज्ञात भेल जे जीवकान्त सुपौल आएल छथि आ अपन पुत्रक डेरा पर छथि। ओ प्राय: 1992 क कोनो मास छल। हम, केदार आ नवीन जी दू टा स्कूटर पर सवार भए अरुण जीक डेरा पर अएलहुँ। स्कूटर रोकैत-रोकैत ओकर हेडलाइट मे एकटा प्रौढ व्यक्ति केँ बाहरे मे कुर्सी पर बैसल देखलिअनि। अन्दाज कयलहुँ जे जीवकान्ते हेताह। स्कूटर सँ उतरि कए प्रणाम-पाती भेल, अतिरिक्त कुर्सी आएल आ हमहुँ सभ अपन-अपन स्थान धएलहुँ। केदार हमर परिचय दैत बजला – ‘” ई अरविन्द भाइ छथि, साहित्यानुरागी त छथिए , लिखबा सँ सेहो प्रेम छनि।“ “ अच्छा ! अरविन्द बाबू ! की हाल-चाल छै अओ? वकालत केहन चलैए?”- जीवकान्त हमरा दिस तकैत पुछलनि। हम अकचकयलहुँ। हमरा व्यवहारिक वकालत सँ कोन वास्ता ? एलएलबी त हम सख सँ कएलहुँ आ सेहो डिग्रीए मात्र लेल। कचहरी जाए कए प्रैक्टिस करैक अभिलाषा कहिओ नहि भेल आ ने कएल। हम विधि स्नातक छी से मात्र हमर जीवन-वृतक शोभाक वस्तु अछि। ओहि दिन केदारे स्थिति केँ स्पष्ट कएलनि – “ वकील त दोसर अरविन्द छथि – अरविन्द कुमार दास। ई छथि अरविन्द ठाकुर।“ ओ हमरा दुनू गोटेक पहिल भेंट छल। तेकर बाद ओहि दिन वार्तालापक नमहर दौर चलल आ हमरा सभक बीच विभिन्न विषयपर वार्ता भेल। एहि बीच की लिखलहुँ? की सभ पढलहुँ? फल्लाँ पोथी अवश्य पढू, आदि-आदि सेहो। 1972 ई मे हम इन्टरमीडिएट कएने रही आ ताहि मे मैथिलीओ हमर एकटा विषय रहय। शिक्षक छला – बालगोविन्द झा व्यथित। किन्तु हमरा ओहि क्लास मे मन नहि लागय आ बेसी हम फाँकीबाजीए करी। परीक्षा भेल, पास कएलहुँ आ तेकर बाद मैथिली सँ बहुत काल तक कोनो वास्ता नहि रहल छल। बीच मे एकटा कथा लिखि केदारकेँ देने रहिअनि आ तेकरा ओ मिथिला मिहिर मे पठा देने रहथि आ ओ छपिओ गेल छल, किन्तु पारिवारिक आ सामाजिक गतिविधिक गहमागहमीक बीच ई हमरा लेल धनि सन। केदार-नवीन-शिवेन्द्रक संगतिमे आबिओ कए कोनो बाहरी मैथिली साहित्यकारक कोनो पुर्वनिर्धारित छवि नहि छल। जँ कोनो रहबो करल हएत तँ जीवकान्त सँ भेल प्रथम भेंट ओकरा खण्डित-विखण्डित जँ नहिओ कएने रहए तँ कोनो नव या आकर्षक छविओ नहि बनैलक। प्रथम दृष्टि मे ने ओ हमरा कतहु सँ साहित्यकार जकाँ लागला आ ने कोनो शिक्षक जकाँ। जँ हुनक कोनो छवि हमर मन मे बनल त ओ छल एक सामान्य गृहस्थक जे कनी-मनी किताबक आ पढै-लिखैक गप करैत हुअए। 7 अक्टूबर,1992 केँ पटना मे भाइ साहेबक संयोजकत्व मे ‘भरि राति भोर’ कथा-गोष्ठीक आयोजन छल। भाइ साहेबो सँ हमरा कोनो पूर्व परिचय नहि छल किन्तु ओहि गोष्ठीक लेल हमरा निमंत्रण (प्राय: केदारक कारणे) भेटल छल आ अपन पहिल प्रस्तुतिकरणक लेल हम बहुत उत्साहित रही। मैथिली मे हम सर्वथा एक अन्चिन्हार लोक रही आ प्राय: तेँ ओहि गोष्ठी मे एकदम नवतूरसभक संगे प्रथमहि सत्र मे हमरा सँ कथा पाठ कराएल गेल। ओहि सत्रक समीक्षा लेल निर्धारित समीक्षक छला – प्रभास कुमार चौधरी, उपेन्द्र नाथ झा व्यास, मोहन भारद्वाज, रामदेव झा आ जीवकान्त। हम अपन ‘मूस’ कथा पढने रही आ ओहिपर विद्वान लोकनिक विचार आ प्रतिक्रिया जानबाक लेल समीक्षा काल भारी उत्कंठा सँ अपन कान पाथने रही। प्रभास भाइ आ मोहन भारद्वाज ओहि कथाक भुरि-भुरि प्रशंसा कएलनि आ व्यास जी सहित रामदेव झाक प्रतिक्रिया सेहो सकारात्मक आ स्वागतात्मक रहै। एहि पांचू गोटे मे मात्र जीवकान्ते सँ हम पूर्व परिचित रही आ तें हमरा भरोस छल जे ओ पुर्ण गंभीरता सँ हमर कथाक नीक-बेजाय दिआ कहता। किन्तु हमरा भयंकर निराशा भेल। जीवकान्तक बेर अएलनि त ओ बाजला जे ध्वनियंत्रक गड़बड़ीक कारणे ओ हमर कथा ठीक सँ नहि सुनि सकला। गोष्ठीक समापन पर मोहन भारद्वाज आ भाइ साहेब हमर कथाक उत्तम हएबाक गप कहैत हमरा बधाइ देलनि। जीवकान्त किन्तु बादहु मे किछु टिप्पणी नहि कएलनि। हमरा दुख भेल रहै। 1993 क प्रारंभिक कोनो मास। जीवकान्त सुपौल आएल छला। डा शिवेन्द्र ओहिठाम बैसार भेल – संध्या काल मे। पहिने जीवकान्त अपन किछु कविताक पाठ कएलनि आ हुनक शुभचिन्तक लोकनिक ई चिन्ता जे जीवकान्त अपन पाठ करबाक स्टाइल सँ अपन कविताक संपुर्ण संप्रेषण केँ नष्ट कए दैत छथि, हमरा बाजिब लागल। हुनका बाद हम, केदार, नवीन जी आ शिवेन्द्र जी सेहो कविता पाठ कएलहुँ। दोसर दिन हुनक भोजन हमरा एहिठाम आयोजित छल। सभ गोटे छला – डा नवीन, केदार, अरुण झा। भोजन आ गप। गप आ भोजन। बीच मे जीवकान्त बजला – ‘ हमरा अहाँक आत्म-परिचयात्मक पत्र भेटल छल। अपन चेहरा-मोहरा आ शारीरिक गठन सँ अहाँ नवीन जी वा केदार सँ जेठ नहि बुझाइ छी।“ आ फेर हमर जीवनक आन-आन पक्षक जानकारी लेलनि। जीवकान्त ओहि बेर दू-चारि दिन सुपौल रहला आ हुनका संगे खूब नीक कटल। पत्राचार त चलिते रहय। देसकोस पत्रिकाक फरवरी ’94 अंक आएल। ओहि मे जीवकान्तक साक्षात्कार छपल रहै जे हमरे नाम पर जा कए समाप्त भेल छल। हुनका सँ संभावना सँ भरल मैथिलीक किछु नवका कविसभक नाम पुछल गेल रहनि आ ओ अन्य किछु कविक संग हमरो नाम लेने रहथि। हमरा कनी विस्मय जकाँ भेल छल। कोनो भेंट वा कोनो पत्र मे ओ एहि तरहक कोनो संकेत नहि देने छला जे ओ हमरा रचनाकारो मानैत छथि, संभावना सँ भरल हएबाक बात त दूर। ओना तावत हमर प्रथम कविता संग्रह ‘परती टूटि रहल अछि’ प्रकाशित भए चुकल छल आ मैथिलीक नव-पुरान दुनू पीढीक प्रशंसा प्राप्त कए रहल छल। किन्तु जीवकान्तक प्रतिक्रिया पुरान पीढी द्वारा सार्वजनिक रुप सँ घोषित प्रथम प्रतिक्रिया छल आ ताहि काल हमरा बहुत बहुमूल्य लागल छल। पत्र लेखनक क्षेत्र मे जँ मैथिली मे कोनो प्रतियोगिता हुअए त ओकर निर्विवाद विजेता हएता – पुरान पीढी सँ जीवकान्त आ तेकर बादक पीढी मे केदार कानन। जीवकान्त सँ पत्र व्यवहार निरन्तर जारी छल। साहित्य अकादमीक पुरस्कार घोषित भए चुकल छल। जीवकान्त फेर पछड़ि गेल छला। ओहि बेरक पुरस्कार गोविन्द झा केँ भेटल छलनि जेकर श्रेय ओ अपन पुस्तक केँ नहि दए ओकरा उग्रवादक परिणाम कहने छला। देसकोस पत्रिकाक विभिन्न अंक मे एहि अवसर पर गोविन्द झाक विवादित साक्षात्कारक परिणामस्वरुप खुब्बे साहित्यिक गारा-गारी भेल आ एहि क्रम मे जीवकान्तक पत्र-टिप्पणी सेहो आएल छल। प्राय: ई पुरस्कारे जनित निराशा आ कुण्ठा छल जे हुनक पत्र सभ मे यदा-कदा तल्खी झलकी दैत छल आ जून मास मे जखनि सुपौल आगमन पर हुनका सँ भेंट भेल त लागल जे तल्खी हुनक व्यक्तित्वे केँ परिवर्तित कए देने रहनि। अंतरंगता एकटा सामान्य शिष्टाचार मे बदलि गेल छल आ हुनक बात-व्यवहार मे जेना एकटा यांत्रिकता आबि गेल छल। ओहिबेर ओ पुरनका जे जे घटना सुनैलनि से बेसी तल्खीए सँ जुड़ल। अगिला खेप। संयोग वा दुर्योगहि हुनका सँ ई भेंट भेल। जीवकान्त अपन कोनो दायादक कन्या लेल मैथिली साहित्यकार आ ‘कथ्य रुप’ क मैथिली अंकक सम्पादक गौरीनाथ केँ तिलक चढैबाक लेल लछमिनियां आएल छला। ओतय सँ फुरसत पाबि ओ सुपौल अएला आ तेकर लाभ लैत केदार हुनका सँ मंत्रेश्वर झाक पाइ सँ छपल आ मंत्रेश्वरे झा पर केन्द्रित ‘धार’ पत्रिकाक चारिजना विमोचन करबैलनि। केदार केँ प्राय: हमर स्वभाव बुझल रहनि वा हमरा ओहि विमोचनक पात्र नहि बुझने हएता तेँ हम ओहिमे बजाएल नहि गेल रही। हम प्राय: कोनो चिकित्सकीय सलाह लेल डा नवीन ओहिठाम पहुँचलहुँ त ओ अपन चैम्बर मे नहि छला। स्टाफसभ बाजल जे ओ छत पर छथि। अपन अभिन्नताक बल पर हम धड़धड़ाएल डा नवीनक घरक सीढी चढैत छत पर चढि गेलहुँ। ओतय सभगोटेक बीच जीवकान्तहु केँ देखि हम अचंभित त भेबे कएलहुँ, स्वयं कें एतय आनबाक लेल पश्चातापहु मे पड़ि प्रवेशहि पर ठमकि गेलहुँ। प्राय: इएह स्थिति दोसरो पक्षक भेल छल आ तेकर परिणामस्वरुप ओतय अकस्मात एकटा निस्तब्धता पसरि गेल रहै। पहिने हमरे अपन कर्तव्यक चेत आएल आ हम सामान्य शिष्टाचारक पालन करैत सभ केँ टोका-नमस्कार कएलिअनि आ कनी काल ओतय रहि चिकित्सकीय परामर्श प्राप्त कए घुरि आएल रही। डा नवीनक सीढी उतरैत काल ओहि दिन हमरा मन मे जीवकान्तक पुरनका स्मृतिसभ घुरिआ-घुरिआकए आबए आ कतेको जिज्ञासाक बिड़रो हमरा घेरए। सीढीक अंतिम पौदान पर पएर राखिते हमरा सभक समाधान भेट गेल। हमरा बुझाए गेल जे जीवकान्तक लेल अपन लेखनक सार्थकताक तुलना मे सफलता आ प्रसिद्धिक भौतिकता बेसी महत्वपुर्ण छनि। या त एकर वासना हुनका बदलि देलकनि अछि या ओ मौलिकता मे सएह छथि। ( वर्ष 1995 मे लिखल लेख यथावत रुप मे ) मिथिलाक संस्कृति:किछु अप्रिय बिन्दु मिथिला वर्तमान मे एकटा मिथक मात्र अछि|आइ ने एकर कोनो भुगोल अछि आ ने कोनो संवैधानिक अस्तित्व|अत्योक्ति नहि होयत,जँ कही जे मिथिले जकाँ मिथिलाक संस्कृति सेहो एकटा मिथके अछि|राज्याश्रयी विद्वतजन द्वारा लिखल आ शिक्षा-व्यवसाय सँ जुड़ल पंडितजन द्वारा बेर-बेर दोहरायल गेल ओहि तथाकथित स्वर्णिमकालक गौरवशाली अध्याय सभक वर्तमान मे कोनो अवशेष-प्रमाण नहि देखाइत अछि|एकांगीए सही,भूत मे जँ आगि रहय त वर्तमान मे छाउर देखाइ पड़बाक चाही ने? विदेह माधवक आगमन आ हुनक पुरोहित गोतम रहुगण द्वारा अग्नि प्रज्ज्वलित कए भूमिक पवित्रीकरण सँ एहि आलोच्य क्षेत्र मे आर्यसंस्कृतिक सूत्रपात मानल जाइत अछि|एहि सँ पूर्व एकरा द्रविड़-किरातक मिश्रित संस्कृतिक स्थल अथवा व्रात्यलोकनिक निवास-स्थल मानल जाइत रहल अछि|व्रात्यलोकनिकेँ आर्य मानबाक आग्रह सेहो किछु इतिहासकारक छनि|एहि आर्यीकरणक पश्चात वर्ण-व्यवस्थासँ जाति-व्यवस्था,समाजसत्ताक प्रभुत्वसँ व्यक्तिसत्ताक प्रभुत्व,परिवर्तनशीलतासँ जड़ता आ उदारतासँ कट्टरता धरि पहुँचैत एहि क्षेत्रक समाज इतिहासक कोन-कोन अन्हार-इजोतक खोह सभमे ढुकैत-बहराइत वर्तमान धरि पहुँचल अछि,ताहिपरसँ एखनो बहुत रास आवरण सभ हटब बांकिए अछि|इतिहास जँ रस्ता देखबैत अछि तँ रस्ता भोतियाबितो अछि|ओहुना इतिहास पर शासक-समाजक वर्चस्व रहल अछि आ कोनो कालमे आम-अवामक की स्थिति छलय ताहिपर इतिहास सभ आन्हरे सदृश्य रहल अछि|राज्याश्रयी विद्वतजन केँ जनसमाजक स्थिति-चित्रणक ने बेगरता रहनि आ ने पलखति|तेँ इतिहासक भूल-भुलैयामे घुसलाक बादो आ बेर-बेर ‘खुल जा सिमसिम’कहलाक बादो कएकटा चोरदरबज्जा अदृश्य आ कएकटा दरबज्जा बन्द भेटैत अछि आ तेँ हमरासभक सोच-विचार एकटा अनिश्चितताक बिरड़ोमे पताबय लागैत अछि,स्थिर नहि भए पबैत अछि|जनसमाजक दुख-सुखक महासागरमे जा डुबकी नहि मारल जाएत,संस्कृतिक मोती कि पाथर कोना भेटत?ओम्हर हमर सभक शिक्षातन्त्र सेहो इतिहासक पाठ्य-पुस्तक आ अपन बनायल विचार-परिधिसँ बाहर जयबाक अनुमति नहि दैत अछि|सृजनात्मक लेखन यथास्थितिक बैरी मानल जाइत अछि आ तेँ जखन-जखन एहन प्रयास होइत अछि त विरोधीक रुपमे शिक्षातंत्रक संग-संग लाठी-फ़रसा लएकए तैयार मिथिलाक रुढिवादी आ यथास्थितिवादी तत्व ठाड़ भेटाइत अछि|किन्तु सृजनात्मक लेखनक प्रतिनिधि सुच्चा साहित्यकार प्रतिरोध आ असहमतिक संस्कृतिक संवाहक होइत अछि आ तेँ ओकरा शिक्षाव्यवसायी-पन्डितलोकनिक बिरादरीसँ फ़राक अपन सोच आ लेखन दुनूमे रचनात्मक दुस्साहस करैए पड़तै आ मिथिलाकेँ आइ एहने दुस्साहसी सभक बेगरता छै| बेगरता छै जे परम्परा आ लीकसँ हटि इतिहास आ संस्कृतिक अज्ञात-अबूझ पक्षसभक ईमानदार उत्खनन कएल जाय|बेगरता छै जे यथास्थितिक बिषायल सस्सरफ़ानीमे फ़ँसल संस्कृतिक व्यापकताकेँ बाहर आनल जाय आ अभिव्यक्तिक सभटा खतरा मोल लेल जाय|जँ कोशीक रत्न साहित्य-संस्कृतिक अग्रदूत संतकवि लक्ष्मीनाथ गोसाइकेँ राज्याश्रयजीवी सम्पादक-संकलक मैथिली कवि नहि मानैत छथि त बेगरता छै जे एकर विरोधमे बगावत हेबाक चाही-मठ,मठाधीश आ मठसैन्यकेँ धराशायी करबाक हद धरि|बेगरता छै जे संस्कृतिक नव इतिहास लिखल जाय|मिथिलाक महान विभूति राष्ट्रकवि दिनकरक कहब छनि-“साहित्यक ताजगी आ बेधकता जतेक शौखिया लेखकमे होइत अछि,ओतेक पेशेवरमे नहि|कृतिमे प्राण ढारैक दृष्टान्त बरोबरि शौखिया लेखके दैत छथि|थरथराहटि,पुलक आ प्रकम्प,ई गुण शौखिएक रचनामे होइछ|पेशेवर लेखक अपन पेशाक चक्करमे एना महो रहैत छथि जे क्रान्तिकारी विचारकेँ ओ खुलिकए खेलय नहि दैत छथि|मतभेद भेलहु पर ओ हुकुम,अंतत:,परम्परेक मानैत छथि|संस्कृतिक इतिहास शौकिये शैलीमे लिखल जाए सकैत अछि|इतिहासकार,अक्सर,एक वा दू शाखाक प्रमाणिक विद्वान होइत छथि|एहन अनेक रास विद्वानक कृति सभमे पैसिकए घटना आ विचार सभक बीच सम्बन्ध बैसयबाक काज वएह कए सकैत अछि ,जे विशेषज्ञ नहि अछि,जे सिक्का,ठीकरा आ ईंटाक गवाहीक बिना नहि बाजबाक आदतक कारणें मौन नहि रहैछ|सांस्कृतिक इतिहास लिखबाक, हमरा बुझने दूएटा मार्ग अछि|या त वएह बात धरि महदूद रही,जे बीसो बेर कहल जाए चुकल अछि आ,एना,अपनो बोर होउ आ आनोकें बोर करू;अथवा आगामी सत्यक पुर्वाभास दिअओ,ओकर खुलिकए घोषणा करू आ समाजमे नीम-हकीम कहाउ,मूर्ख आ अधकपारीक उपाधि प्राप्त करु|” ई दू-टूक कहल जयबाक चाही जे कोनो क्षेत्रक संस्कृति ओहि क्षेत्रक राजा अथवा शासकक बपौती नहि होइछ|संस्कृति होइछै समाजक,जाहिमे शासक-शासित,राजा-प्रजा सभ सन्निहित छै|दोसर शब्दमे संस्कृतिक मात्र आ एकमात्र श्रोत वा केन्द्र मनुष्य आ ओकर जीवन अछि| मनुष्यक समाज ,ओकर सामाजिक संरचना,ओकर खान-पान,रीति-रिवाज आदिक सम्मिलित स्वरूप एहि संस्कृतिक निर्माण करैत अछि|एकरे पसारसँ एकटा क्षेत्र-विशेष अपन एकटा अलग पहचान विकसित करैत अछि जे ओहि क्षेत्र-विशेषक संस्कृति कहल जाइछ|तेँ कोनो क्षेत्रक संस्कृतिक उत्स ओहि क्षेत्रमे रहनिहार मनुष्य,ओकर समाज आ ओकर सामाजिक संरचनामे खोजल जयबाक चाही| देशक अन्य भूभाग जकाँ एतहु आर्यलोकनि आर्येतर जाति संग मिलि जाहि समाजक रचना कयलनि सएह आर्य अथवा हिन्दूलोकनिक बुनियादी समाज भेल आ आर्य-आर्येतर संस्कृतिक मिलनसँ जे संस्कृति जनमल से एतहुका बुनियादी संस्कृति भेल|ई जे बुनियादी समाज भेल,तकर सुसंचालन लेल वर्णाश्रम-व्यवस्था बनल जे कालान्तरमे जाति-व्यवस्थामे परिणत भेल|तेँ मिथिलाक संस्कृतिक यथार्थकेँ बुझबाक लेल देवालय,पोखरि,माछ,मखान,पान आ पाग आदि-इत्यादिक बाइस्कोप देखयसँ पहिने एहि वर्ण-वर्ग-जाति व्यवस्थाक व्रणकेँ फ़ोड़ब आ निर्ममतासँ एकर खैंटी उतारब बहुत आवश्यक अछि|ई पीड़ा देत,दुर्गन्ध पसारत,मुदा एकरा निर्मूल करबाक लेल अथवा वर्त्तमान सामाजिक-आर्थिक परिस्थितिक आवश्यकतानुसार नवीकृत (renewal)करबाक लेल ई जोखिम लेबहि पड़त|मिथिलाक संस्कृतिक प्राचीन निरन्तरताक खूबी-खामीकेँ बुझबाक लेल आ वर्तमान चुनौती सभसँ जुझैत भावी उत्कर्ष पर लए जएबाक लेल एहि व्यवस्थाक संकल्पना,एकर बीजारोपण व सिंचन सँ लएकए एकर पुष्पित-पल्लवित होइत,मौलाइत,क्षरण दिस जाइत आ रोग-दोषसँ ग्रसित भए वर्त्तमानक निकृष्टतम रूप धरि पहुँचैक सम्पुर्ण प्रक्रियाक वैचारिक शल्य-चिकित्सा(चीड़-फाड़) बहुत अनिवार्य भए गेल अछि|एहि समुद्रमन्थनसँ विष बहरयबाक संभावना सेहो अछि किन्तु सामाजिक सत्यक अमृत प्राप्त करबाक लेल ई जोखिम लेबए पड़त|जाधरि एहि सामाजिक संरचनाक रोग-दोषकेँ नीकसँ बूझल नहि जेतैक ताधरि ने एकर कायाक सम्मानजनक नाश सम्भव छै आ ने एकर कायाकल्पक कोनो सम्भावना छै|मिथिले नहि,सम्पूर्ण भारतीय समाजक सांस्कृतिक उत्थान-पतनक जड़िआठमे इएह वर्ण सँ रुपान्तरित जाति-व्यवस्था अछि| विदेह माधव एलाह,हुनक पुरोहित गोतम रहुगण अग्नि प्रज्ज्वलित कएलनि,आवश्यकतानुसार जंगल-झाड़ जराओल गेल,खेती योग्य समतल भूमि बनाओल गेल,समाज सभ्यता आ विकास दिस अग्रसर भेल|आर्य-अनार्यक सम्मिलन सँ बनल मिनजुमला संस्कृति विकसित भेल|कालक्रममे एकीकृत आ व्यवस्थित समाजक रचनाक्रममे परिवर्तनीय वर्णाश्रम-व्यवस्था विकसित भेल|ई वर्णव्यवस्था अपन समयक सर्वाधिक वैज्ञानिक आ व्यावहारिक समाजव्यवस्था छल जखनकि विश्वक अनेकानेक भूभाग तखनो अविकसित आदिम अवस्थामे पड़ल छल|ई व्यवस्था सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक चारि खाम्हबला सशक्त अधिरचना छल|एहि वर्णसमाजमे सामाजिक श्रम,सामाजिक रक्त-सम्बन्ध एवम सामाजिक विचारक नियम परिवर्तनीय छल|सामाजिक व्यक्ति अपन योग्यता,क्षमता आ अभिरुचिक अनुसार सामाजिक श्रमकेँ अंगीकार कए अपन जीवनयापन लेल ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शुद्रक रोजगारमूलक चक्रसँ अपन वर्ण आ श्रम-प्रकार चुनि ओहिमे अपन प्रतिभा आ सामर्थ्यक सदुपयोग आ प्रदर्शन करबाक लेल स्वतन्त्र छल|ओ अपन रागात्मक आकर्षणक आधार पर रक्त-सम्बन्ध स्थापित कए सामाजिक व्यक्ति बनबाक लेल स्वतन्त्र छल|ओ प्रत्येक सामाजिक पहलू पर निर्भीकतापुर्वक अपन विचार व्यक्त करबाक लेल स्वतन्त्र छल|अपन प्रकृतिमे पूर्ण समाजवादी वर्ण-समाज प्राकृतिक सन्साधन पर बेसी आ सामाजिक श्रमसँ अर्जित साधन पर कम निर्भर छल|प्रत्येक व्यक्तिक रोटी आ आजादीक गारन्टी छल|सृजनात्मक संस्कृतिसँ आलोकित ओ काल ताधरि रहल जाधरि ओहि व्यवस्थामे परिवर्तनशीलता रहलै|जँ देखल जाय त सामासिक संस्कृतिक बीजारोपण आ ओकर तीव्र विकासक ओएह कालावधि छल|एहिकालमे सामाजिक श्रम-संस्कृतिक महत्ता त स्थापित भेबे कएल;महासागर,वनप्रदेश,गिरिप्रदेश,मरुप्रदेश,हिमप्रदेश,आकाश आदि पर विजय प्राप्त कए ओकरा अपन अधीन करबाक घातक प्रवृतिक जगह पर ओकरा अपन मित्र बनाए ओकर संरक्षण करबाक संस्कार सेहो जन-जनमे विकसित भेल|देहक नश्वरता आ आत्माक अमरताक सिद्धान्त मनुष्यकेँ अपन भावी पीढीक भविष्यसँ जोड़लक|ई ओ समय छलै जखन विद्यानुरागी आ विद्वानकेँ ब्राह्मणत्व भेटैत छलै,अजुका जँका नहि जे ब्राह्मण वन्शमे जन्म लेलहु त विद्वान होयबे करब|ई ओ समय छलै जखन रणकौशलमे निपुणता क्षत्रियत्वक पैमाना होइत रहय,अजुका जकाँ नहि जे ओहि कुलमे जनमलहुँ त वीर होयबे करब| एकरा जनसंख्याक दबाव कही,वा तत्कालीन समाजक समयगत बाध्यता जे वर्णाश्रम अधिरचनाक परिवर्तनशीलता अपन निरन्तरता कयम नहि राखि सकल आ तकर परिणामस्वरूप अपरिवर्तनीय जन्मना जाति-व्यवस्था अस्तित्व मे आयल|समाज-सत्ताक क्षरणस्वरूप व्यक्ति-सत्ताक बढैत वर्चस्व सेहो एकटा कारण भए सकैत अछि|इएह जन्मना जातीय समाज हमरा सभक वैभवशाली मानवीय संस्कृतिक क्षरणक महत्वपूर्ण कारक भए गेल अछि| जाहि मिथिक नाम पर मिथिला बनल आ जनक वंशक स्थापना भेल,जाहि विदेहकेँ मनु महराज ‘वैश्य द्वारा ब्राह्मणीक गर्भसँ उत्पन्न सन्तान ‘ कहय छथि आ जेकर वर्गीकरण व्रात्यक रुपमे सेहो होइत अछि,ताहि वंशक सीरध्वज जनकक सभामे ‘जनक(वैदेह)वस्तुतः जनक(पिता)छथि’कहैत आ’जनक-जनक‘ उच्चरित करैत ब्रह्मविद्याक ज्ञान लेबाक लेल विद्वतजन सभ दौगैत छलाह|विश्वामित्रक श्रेणी क्षत्रियक छलनि मुदा हुनक प्रबल विद्यालोलुपता अंततः हुनका ब्रह्मर्षिपद उपलब्ध करबैलकनि|अऊँठा कटबाइओकए एकलव्य प्रमाणित कयलनि जे धनुर्विद्यामे पारंगत होएबाक लेल क्षत्रिय होयब त कात जाय दिअ,गुरू आ ब्राह्मणक सदेह उपस्थिति अथवा शिक्षा कतहुसँ आवश्यक वा अनिवार्य नहि अछि|शंबूक अपन घेंट कटबयसँ पहिने विद्वान होएबाक लेल ब्राह्मण होएबाक अनिवार्यताकेँ आधारहीन प्रमाणित कए चुकल छलाह| अपरिवर्तनीय जन्मना जाति-व्यवस्था धरि अबैत-अबैत हमरा सभक समाज कवचमे बन्द घोंघा सदृश्य भए गेल|ई कवच छल पुर्वाग्रहक|जाति-प्रथासँ उपजल एहि स्थितिक मादे समाजविज्ञानी जवाहरलाल नेहरूक कहब छनि जे’भारतमे दुनू बात एके संग बढल|एकदिस त विचार आ सिद्धान्त मे हम सभ बेसी सँ बेसी उदार आ सहिष्णु होएबाक दाबी कएलहुँ|दोसरदिस,हमरसभक सामाजिक आचार अत्यंत संकीर्ण होइत गेल|ई फाटल व्यक्तित्व,सिद्धांत आ आचरणक ई विरोध,आइधरि हमरासभक संग अछि आ आइओ हमसभ ओकर विरुद्ध संघर्ष कए रहल छी|कतेक विचित्र बात अछि जे अपन दृष्टिक संकीर्णता,आदत आ रिवाज आदिक कमजोरीकेँ हमसभ ई कहि अनठिआए देबए चाहैत छी जे हमरासभक पुरखा बड़का लोग छलाह आ हुनकर बड़का-बड़का विचार हमरासभकेँ विरासतमे भेटल अछि|किन्तु,पुरखासभसँ भेटल ज्ञान आ हमरासभक आचरणमे भारी विरोध अछि आ जाधरि हमसभ एहि विरोधक स्थितिकेँ दूर नहि करब,हमरासभक व्यक्तित्व फाटल के फाटले रहि जाएत|’नेहरूक ई कथन मिथिलो पर अक्षरसः लागू होइत अछि|अपरिवर्तनीयता आ जन्मना-एहि दुनू सुरक्षा-कवचसँ संरक्षित मिथिलाक मार्गदर्शक वर्ग आत्ममुग्धता,आलस्य आ मुफ्तखोरीकेँ अपन हक मानि लेलक|श्रेष्टताबोधक पाखंड मिथिलाक ग्रहणशक्तिकेँ गीलि गेल|’जे हम छी,हमरा लग अछि,सएह सर्वश्रेष्ट अछि’क डपोड़शंखी मानसिकता बाहरसँ उत्कृष्टतम चीजहुँकेँ लेब अस्वीकार करए लागल|विदेशी आक्रांतासभक शासनाधीन नहि रहितय त अनेकरास कला,शिल्प,तकनीक,विधा जे विदेशीसभक संग आयल छल,मिथिला समाज तकरोसँ वंचित रहि जैतय|ई मजबूरीमे ग्रहण कएल गुणसभ छल जे हमरासभक गंग-जमुनी संस्कृतिकेँ समृद्ध कयलक,जकरापर आइ हमसभ गर्व करय छी| कोशी नदी मिथिलाक नम्हर भूभागक भाग्यनियंता रहल अछि|एकदिस ई हमरासभक धार्मिक-सांस्कृतिक भौतिक धरोहरसभकेँ नष्ट-भ्रष्ट कयलक अछि त दोसरदिस एकरे चलतबे अपरिग्रह आ संघर्षक संस्कृति निर्मित आ विकसित भेल जेकर सीधा लाभ सामान्य जन-समाजकेँ भेटल|विशिष्ट जन-समाज एहि संस्कृतिसँ अलगे-थलग रहबामे कुशल मानलनि|जँ संघर्ष-संस्कृतिकेँ सर्वस्वीकृति भेटल रहितय त क्षत-विक्षत लोकजीवनक जीजीविषाक परिणामस्वरूप शासनमे आयल खेतिहरसमाजक प्रतिनिधि गोपाल आ सत्ताक निरंकुशताक विरुद्ध जनांदोलन कए शासनमे आयल भीम केवट निर्विवाद नायकक सूचीमे होयतथि| हमसभ जाहि आर्य-आर्येतर सभ्यता-संस्कृतिक संवाहक मानल जाइत छी ओ समन्वयवादी,सामासिक,समावेशी संस्कृति छल|आर्य मनीषी लोकनि हमरासभकेँ ’वसुधैव-कुटुम्बकम’क मंत्रसँ सिक्त कएने छलाह|इएह संस्कृति छल जे सनातन धर्मकेँ एतेक विस्तार देलक|एहि सनातन-सागरमे आबि विदेशी आक्रांतासभक सैकड़ो रक्त-समूह भारतीय भए गेल|सनातन धर्मक विस्तार हमरसभक संस्कृतिओकेँ निरन्तर समृद्ध कयने गेल|सम्पूर्ण मिथिलाकेँ प्रमुखतः सनातनी मानल जाइत अछि|किन्तु,आइ हमसभ ई स्वीकार करी जे हमसभ अपन पूर्वजक नीक,इमानदार आ सुयोग्य उत्तराधिकारी प्रमाणित नहि भए सकलहुँ आ ओहि सनातन-सामासिक संस्कृतिकेँ अक्ष्क्षुण्ण नहि राखि सकलहुँ|जे समाज अपन धूर विरोधी बुद्धकेँ अपन अवतार घोषित करबाक उदारता देखयलक,वएह समाज मैथिल-महासभाक आयोजक भेल|जाहि बौद्धिक वर्ग पर वर्ण-जाति संरचना-संरक्षणक भार छलय सएह वर्ग परम स्वार्थी बनि अपन रक्त-शुद्धताकेँ रेकर्डेड करयबाक उताहुलतामे पंजी-प्रवन्धक व्यवस्था कए लेल|वेदव्यास एतेक ध्यान राखलनि जे’चातुर्वर्ण्य मया सृज्यते’कृष्णावतार-मुखसँ कहबएलनि,मुदा सत्ता-संरक्षणक आत्ममुग्धतामे पंजी-प्रवन्धक औचित्य लेल कोनो लोकलाजक पालन नहि कएल गेल|”मिथिला”आ”मैथिल”शब्दक प्रयोगकेँ हमसभ जतेक विराट आ व्यापक अर्थवत्ता प्रदान करिऔक,एहि दुनू शब्दक अर्थ आम-अवाममे की लगाओल जाइ छै,से ककरोसँ नुकायल नहि अछि|एतय मिथिलाक सामाजिक बुनावटक रग-रग चिन्हयबला साधु-जनकवि वैद्यनाथ मिश्र यात्री जीक एकटा लेखक अंश देब समीचीन बुझाइत अछि-“मैथिल महासभाक सिद्धान्तानुसार मैथिल ब्राह्मण तथा कर्ण कायस्थ(!)मात्र सुच्चा मैथिल थिकाह|मिथिलाक सीमाक भीतर बसैत,मिथिलाक अन्न-जलसँ निर्वाह करैत,विशुद्ध मैथिली बजैत भूमिहार-क्षत्रिय आदि अन्य जातीय यदि क्यो अपनाकें मैथिल कहताह तँ जातीय महासभा नांगरि ठाढ क क हुनका दिस बधुआएत,मुँह विजकौत|परिणामस्वरूप हुनका लोकनि अपना घर-आंगनमे व्यवहृत भाषा-ठेठ मैथिलीकें मैथिली कहबामे अपन हेठी बुझै लागल छथि|’हम मैथिल नहि,बिहारी थिकहुँ’-ई भावना हमरा लोकनिमे जाहि तेजीसँ पसरि रहल अछि,से देखि एहन कोन मैथिल हृदय हैत जे आहत नहि भ रहल हो?मिथिलेश-सुधारक मिथिलेश(?)जाहि संस्थाक कर्णधार होथि,तकर एहि प्रकारक संकुचित सिद्धांत देखि मिथिलाक लाख-लाख अधिवासी-जे मैथिल होइतहुँ मैथिल नहि,क्षुब्ध अछि|चिरकालसँ अपनहि घरमे,अपनहि बन्धु-वर्गक द्वारा ठोंठिऔल गेल मिथिलाक सन्तान आइ यदि आजिज आबि अपनाकें बिहारी कहब आरंभ कैलक अछि तँ एहिमे केकर दोष?’महासभा’क कतोक सदस्यक मनमे घुरि-फिरि ई बात अबैत हेतैन्हि जे मिथिलाक सकल अधिवासीकें मैथिल मानि लेला सँ मैथिलत्वक अग्रगण्य अंगमे धार्मिक वा समाजिक धक्का लगवाक सम्भव|” यात्री जीक ई विचार आइ सँ 73वर्ष पहिने विभूति,फरवरी 1938 अंकमे छपल छल|एहि स्थितिमे आइओ कोनो सकारात्मक परिवर्तन नहि भेल अछि,उन्टे बिगड़ले अछि| वर्ण-व्यवस्थाक बिगड़ल निकृष्ट रूप जाति-व्यवस्थाक औचित्य-अनौचित्य पर घमर्थन होइत रहल छै,होइत रहतै,मुदा एहि यथार्थसँ मुँह नहि मोड़ल जाय सकैत अछि जे मिथिलाक सांस्कृतिक उत्थान-पतनमे ई व्यवस्था अनिवार्य आ महत्वपूर्ण कारक रहल अछि आ रहत|आल्हा-रुदल,नैका-बनिजारा,लोरिकायण,भगैत आदिक जे लोकगायनक संस्कृतिक परम्परा रहय अथवा छै,तकर निर्वहनमे आइ धरि केओ द्विज किऐक नहि एलाह?ई ठेकेदारी की मात्र सोल्हकनक छिअय?मैथिली मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक भाषा छै आ एहिसँ सम्बन्धित सभटा संस्था-पुरस्कार पर इएह दुनू जातिक आधिपत्य छै-एहि आरोपक कोनो प्रायोगिक खण्डन आइ धरि किऐक नहि भए सकल?भाषा सेहो संस्कृतिक आवश्यक आ अविभाज्य अंग छै|जँ भाषा समावेशी नहि हएत त समावेशी संस्कृति कोना विकसित हएत? ई प्रसन्नताक गप अछि जे जँ राजनीतीक क्षेत्रकेँ छोड़ि दी त सामाजिक जीवनमे जाति-पातिक महत्ता समाप्त प्रायः छै|एकर कारण खुलल अर्थव्यवस्थाक नीती होअय,भौतिकवादी होड़ होअय वा एहि दुनूक चलतबे बढल जीवन-संघर्ष,किन्तु जाति-पाति अजुका लोकक विचार-सूचीमे बहुत नीचाँ छै आ मात्र चुनावेक बेरमे शीर्ष पर आबय छै|तेँ समरसताक संस्कृतिकेँ फिलबक्त सतह पर कोनो खतरा नहि देखाइत अछि|एहि क्षेत्रक ऊर्वर माटि-पानिमे सामासिक संस्कृतिक बीआ तेहन सघन छीटल छै जे बेमुरव्वत मौसम आ लापरवाह किसानक अछैतहुँ ई पनुकैत रहय छै,फसिल दैत रहय छै आ एतहुका वासीकेँ जीवित आ गतिवान बनेने रहैत छै|किन्तु कतहु गहींरमे आगि भए सकैत छै|तेँ समयक तगादा छै जे वर्त्तमानमे जातीय-व्यवस्थाकेँ कोनो तार्किक आ वैज्ञानिक निष्कर्ष धरि आनल जाय,अन्यथा सांस्कृतिक उत्कर्षक लक्ष्य पायब सन्देहास्पद अछि|जवाहरलाल नेहरु कहने छलाह-“आइ हमरासभक समक्ष जे प्रश्न अछि,ओ मात्र सैद्धांतिक नहि अछि,ओकर सम्बन्ध हमरसभक जीवनक सम्पूर्ण प्रक्रियासँ अछि आ ओकर समुचित समाधान आ निदाने पर हमरसभक भविष्य निर्भर करैत अछि|साधारणतः,एहन समस्यासभकेँ सोझराबयमे नेतृत्व देबाक काज मनीषी लोकनि करैत छथि|किन्तु ओसभ काज नहि एलाह| ओहिमे सँ किछु त एहन छथि,जे एहि समस्याक स्वरुपहिकेँ नहि बूझि पाबि रहल छथि|बकियासभ हारि मानि लेने छथि|ओ सभ बिफलता-बोधसँ पीड़ित आ आत्माक संकटसँ ग्रस्त छथि आ बुझिए नहि पाबि रहल छथि जे जीवनकेँ कोन दिशा दिस मोड़ब उचित होयत|”नेहरुक एहि निराश टिप्पणीक बाद वैश्विक समाजवादी चिन्तक एंजेल्सक ई वक्तव्य विचारणीय अछि-“कोनो खास आर्थिक संरचनाक समस्याक समाधान ओही संरचनाक नियम के अनुसार कएल जायब अनिवार्य अछि,जँ कोनो दोसर संरचनाक नियमसँ ओकर समस्याक समाधान कएल जायत त ओ बेजाय ढंगसँ विद्रूप भए जायत|”एंजेल्सक एहि कथनमे हमरासभक जातीय(आर्थिक)संरचनाक समस्याक समाधानक कुंजी नुकायल अछि|मिथिला आ भारतक लेल सांस्कृतिक संकटक कारण बनल जातिप्रथाक वर्त्तमान संकटक समाधान एहि जातिप्रथाक संरचनाक भीतरे अछि|एकरे नियमसँ एकरा युगानुरूप उपयोगी बनायल जाए सकैत अछि आ ई काज हमरेसभकेँ करए पड़त|मिथिलाक संस्कृतिक इएह तगादा अछि|मिथिला आ एकर संस्कृतिक उत्कर्षक इएह टा मार्ग अछि| मिथिला मे सांस्कृतिक आन्दोलनक भविष्य एक बेर मैथिलीक एकटा नामी-गिरामी चर्चित कवि मित्रा अपन नवप्रकाशित कविता पोथी पठएलनि आ ओहि पर किछु लिखबाक आग्रह सेहो कएलनि। आलोचक-समालोचक हेबाक लूरि नहि रहितो हम हुनक आग्रहक सम्मान करैत पोथीक पाठ कएलाक उपरान्त एकटा पत्राक माध्यम सँ ओहि पोथी पर हुनका किछु टिप्पणी लिखि पठएलियनि। ओहि पत्रा मे अनेक रास बातक संग हम इहो लिखलियनि जे ‘‘मैथिल समाजक कहियो कोनो आन्दोलनी चरित्र नहि रहलैक अछि तथापि अहाँक आक्रोश अहाँक कविता सभ मे खूब नीक जकाँ खपि जाइत अछि आ सर्वाधिक विलक्षण बात ई जे कविता मे जतय कतौ आन्दोलनी तेवर आएल अछि से कतौ सँ ओढ़ल नहि लगैत अछि।’’ हमर एहि तात्कालिक पाठकीय टिप्पणीक ओहि अंश पर कवि मित्रा दिस सँ प्रतिवाद आएल जाहि मे मैथिल समाजक आन्दोलनी चरित्रा नहि रहबाक बात कहल गेल छल। हमरा दुनू गोटे मे दीर्घ-वार्ता भेल, दुनू गोटे बहसा-बहसी कएलहुँ आ दुनू गोटे अपन-अपन गप पर अटल रहि गेलहुँ। हुनक अपन तर्क छलनि आ हमर अपन। ओ अपन तर्क पर अखनिओ अटल छथि की नहि से हमरा नहि बुझल अछि। किन्तु हम आइयो अपन विचार, पक्ष आ तत्सम्बन्धी तर्क पर दृढ़ छी, बल्कि बाद मे भेटल प्रमाण आ अनुभव सभ सँ ओ विचार आओरो दृढ़तर भेल जाइत गेल अछि। तेँ हम आइयो एहि बातकेँ मानय छी आ तेकरा व्यक्त करए मे हमरा कोनो संकोच नहि अछि जे मैथिल समाजक आन्दोलनी चरित्र नहि अछि, नहि रहल अछि आ जाहि प्रपंची आ कपटी जीवन शैलीकेँ ई समाज आइयो अपनैने अछि, तेकरा देखैत भविष्यो मे एकर आन्दोलनी होइक कोनो संभावना हमरा कतहुँ सँ नजरि नहि आबैत अछि। जहिया राजतंत्रा रहै, राजा-महाराजा-नबाब-जमीन्दारक युग रहै, तहियो आ आइ लोकतंत्र छै, सांसद-विधायक-मुखिया आदि जनप्रतिनिधिक युग छै, आइयो, मैथिल समाज सत्तामुखी, सत्तापेक्षी आ सत्तापोषित रहल अछि। जहिया राजतंत्रा रहै, राजा-महाराजा-नबाब-जमीन्दारक युग रहै, तहिया वर्ण वा जाति व्यवस्थाक आधर पर ई समाज राज-संपोषित बनल रहल। आइ जखनि लोकतंत्र छै, सांसद-विधायक-मुखिया आदि जनप्रतिनिधिक युग छै, तखनि अपनावेफँ बुद्धिजीवी वर्ग कहि ई समाज राजपोषणक विशेषाधिकारक आकांक्षी बनल अछि। ई भिन्न बात जे पछिला दू-तीन दशक सँ जे सामाजिक-न्यायक दौर चलल अछि ताहि मे एहि समाजकेँ राजपोषण सुतरि नहि रहल अछि। किन्तु अहू सँ ई समाज कोनो शिक्षा वा सीख हासिल केने हुअए, से देखाइत नहि अछि। दिग्भ्रमित भेल ई समाज आब एहि पोषण-प्राप्तिक लेल नव औजार सभ खोजि रहल अछि। एहि खोजक प्रथम चरण मे ई भेल अछि जे जेना भुखल रहला पर शरीर अपन पोषण लेल शरीर मे संचित वसाक उपयोग करैत अछि, तहिना ई समाज, जेकरा वर्ग कहब बेसी उपयुक्त बुझाइत अछि, पोषण लेल बाह्य उपकरणक अभाव मे अपन भाषा रूपी वसाक भक्षण कए अपन दिन काटब शुरू केलक आ ताहि सँ संतुष्ट नहि भेला पर आब मिथिला राज्यक डुगडुग्गी पीट कए अपन पोषणक नव खोराककेँ आनबाक जोगार मे लागि गेल अछि। भाषाक महंथ आ घरानाक संग संग मिथिला राज आन्दोलनक अघक्की छुटभैया कर्त्ता-धर्ता सभक नामावली, कार्यावली देखू, महीनी सँ देखू आ अहाँकेँ सभटा कठखेल अयना जकाँ झलकए लागत। अनेक रास विरोधभास, पूर्वाग्रह-दुराग्रह सँ ग्रसित एहि वर्गकेँ अखनि भनहि ई लागओ जे ओ कोनो आन्दोलन कए रहल अछि, किन्तु जँ एहिना चलैत रहल तँ भविष्य मे ई प्रमाणित हएब सुनिश्चित मानू जे एहि हु-ले-ले-ले सँ ऊर्वरताक संभावना सँ भरल एहि धरतीकेँ उसट्ठ करबाक ई एकटा भूल मात्रा अछि। तर्क-वितर्क आ शास्त्रार्थक निरर्थक आ परिणामहीन उद्योगक ई क्षेत्र रहल अछि आ तेँ शास्त्रार्थ लेल उताहुल बहुत गोटे तर्कस्वरूप मारिते रास आन्दोलन आ आन्दोलनकारी लोकनिक नाम गिनबाए दए सकै छथि। किन्तु ई आवरण आ मुखौटाकेँ वास्तविकताक रूप मे प्रस्तुत करबाक प्रयास मात्रा रहै, छै आ रहतै। आन्दोलन कोनो शारीरिक बाहरी प्रक्रिया नहि छै जेकरा कोनो नामकरण कए आ मुक्का देखबैत फोटो खिचबा कए हुलेलेले कएल जाए। ई चरित्रा, मन आ आन्तरिक व्यक्तित्व सँ नाभि-नाल जकाँ जुड़ल प्रक्रिया अछि आ तरे-तर निरन्तर प्रवहमान रहैबला परिवर्तनकामी प्रवृति अछि। मैथिल समाज मे एहि प्रवृतिक प्रवाहक गप जाए दिअ, एकर उत्पत्तिक श्रोतेकेँ भोथल गेल अछि आ भोथबाक ओ प्रक्रिया निरन्तर जारी अछि आ एकर प्रमुख कारक रहल अछि एहि क्षेत्राक बौद्धिक नियन्ता वर्गक द्वैध आ द्वैधीकरण। अपन एहि व्यक्त भावना आ मान्यताक पुष्टि लेल हम किछु उदाहरणक खोज मे पुनः घुरि कए ओहि कवि मित्रा आ हुनक काव्य संग्रह पर आबए चाहए छी जिनकर उल्लेख हम एहि आलेखक प्रारंभ मे कएने छी। एहि पोथीक प्रारंभ होइत अछि कवि द्वारा व्यक्त आभार सँ। एहि मे कवि प्रायः एक दर्जन गोटेक नामक चर्चा कएने छथि जे सभ पोथीक सामग्री जुटयबा मे सहयोग आ पांडुलिपि अवलोकन एवं परिमार्जन मे मूल्यवान परामर्श कवि मित्राकेँ देलथिन। दोसर दिस हमरा पठाएल पोथीक प्रति मे कवि मित्रा अपन हस्तलिपि मे जे लिखने छथि, से अविकल रूप मे एना अछि - ‘मैथिलीक समर्थ रचनाकार प्रिय भाइ अरविन्द जीक लेल जे सभ सँ पहिने एहि पोथीकेँ छापबाक प्रस्ताव कयने रहथि।’ ई कवि मित्रा स्वयं आ जाहि एक दर्जन लोकक अपन पोथी मे मुद्रित रूप सँ आभार प्रकट कएने छथि से सभ मैथिल महासभा सँ संरक्षित आ पंजीकृत जाति सँ छथि आ जिनकर स्मरण अपन हस्तलिपि मे ;अमुद्रित रूप मे कवि करै छथि अर्थात् हम, तेकरा मैथिल महासभा गैर-मैथिल घोषित कए पंजीयनक महापुण्य सँ वंचित कएने अछि। एकर की माने ? ई स्थिति तखनि आओर विचारणीय छै जखनि कि कवि मित्र स्वयंकेँ वामपंथी मानय छथि, गर्व सँ एहि बातक घोषणा करय छथि, कएकटा वामपंथी आन्दोलन सँ जुड़ल रहबाक दाबी करय छथि आ कतिपय लोक एकरा सकारितो छथि। दुनियाक सम्पूर्ण तर्कशास्त्राक कोनो टा तर्क सँ की ई प्रमाणित कएल जाए सकैत अछि जे सभ सँ पहिने पोथी छापबाक प्रस्ताव देनिहार व्यक्तिक महत्व पोथीक लेल सामग्री जुटएबाक सहयोगी वा पांडुलिपि अवलोकन-परिमार्जन मे मूल्यवान परामर्श देनिहार सँ कम होइ छै। मूल्यांकनक ई विभेदी बटिखरा राजनीति वा कूटनीतिक अहितभाव सँ दूषित माहौल मे त चलिओ सकैत अछि, किन्तु साहित्य त सहित-भावक द्योतक अछि। एहि उदाहरणकेँ हमर व्यक्तिगत मामला मानि टारल वा अनठिआएल जाए सकैत अछि किन्तु एकरा हमरा सभक द्वैध भावनाक उदाहरण त मानले जाए सकैत अछि। भौतिक आ मानसिक द्वैध। व्यक्तित्वक द्वैध। आ, ई द्वैध मैथिल समाज मे अदौं सँ रहल अछि। मैथिल महासभाक विघटनकारी आ आत्मघाती आयोजनक काल घरि आबैत-आबैत ई द्वैध अपन चरम परिणति पर, पराकाष्ठा पर, पारावार पर पहुँचैत अछि आ एतहि सँ द्वैधीकरणक प्रक्रियाक दस्तावेजी अध्यायक प्रारंभ भए जाइत अछि। एतय सँ शुरू भेल विध्वंशक पंजीकृत खेल आइयो मैथिल समाजकेँ भुतलहरी खेलाए रहल अछि। कर्मकाण्ड, पाखण्ड आ आडम्बर सन-सन रोग सँ मैथिल समाज पहिनो ग्रसित छल, मैथिल महासभाक जहरी मदिराक प्रभाव सँ ओहि मे श्रेष्ठताबोध सँ भरल छल, छद्म आ छुआछुतक महामारी सेहो पसरि गेल। मिथिला-मैथिली सँ अखण्ड रूप सँ जुडि़ एकर पर्याय बनल समुदाय एहि मैथिल महासभाक माध्यम सँ स्वयंकेँ समाज सँ काटि लेलक, अपनाकेँ मैथिल घोषित कए देलक आ आन सभ समुदायकेँ दस्तावेजी रूप सँ गैर-मैथिलक श्रेणी मे पेफकि देलक। एहि प्रयासमे ई समुदाय एकटा समन्वयवादी समाजकेँवर्ग, वर्ण, जातिक टुकड़ी-टुकड़ी मे, कूड़ी-कूड़ी मे, खल-खलमे पेफर सँ बांटि देलक आ सेहो एकटा केन्द्रीय सत्ताक दलाल शासकक छत्राछाया मे एक तरहे विध्वित रूप मे। एकर भयंकर दुष्परिणाम सभ आइ नग्न आ निर्लज्ज रूप मे एहि भूभागक कण-कण मे अपन उपस्थिति दर्ज कए रहल अछि। भाषा आ संस्कृतिक नाभि-नाल सम्बन्ध अछि। आइ एहि भूभागक भाषा मैथिली पर मैथिल महासभाइ सभक वर्चस्व बनल अछि। साहित्य अकादमीक मैथिली पुरस्कार 44 मे सँ 42 बेर मैथिल महासभाइकेँ देल गेल अछि त वर्चस्वक आओर कोने प्रमाण देब आवश्यक नहि रहि जाइत अछि। साहित्य अकादमीक अनुवाद आदि अन्य पुरस्कारोक इएह स्थिति अछि। मिथिला-मैथिलीक नाम पर बनल पंजीकृत वा गैर-पंजीकृत सभटा संस्था मैथिल महासभा द्वारा पंजीकृत जातिक लोक सभक अधिकार मे छै आ मिथिला-मैथिलीक नाम पर आयोजित अधिकांश आयोजन मे सम्मानित, प्रशंसित, पुरस्कृत भेनिहार सभ मे महासभाइए सभक वर्चस्व छै। द्वैधीकरणक एहि प्रक्रियाक चलते गैर-मैथिल घोषित भेल आन सभ समुदाय एहि भाषाकेँ अपन बुझिते नहि अछि त एकरा संग ओ अपन तादात्म्य कोना स्थापित करत आ जखनि तादात्म्य स्थापिते नहि हएत त एकरा लेल लड़बाक, संघर्ष करबाक, आन्दोलित हेबाक प्रश्न कहाँ उठै छै ? मैथिल महासभाक आयोजनक अनेक दुष्परिणाम मे सँ एकटा इहो अछि जे किछु खास जातिक रिवाजकेँ सम्पूर्ण समाजक संस्कृतिक रूप मे परिभाषित आ क्रियान्वित करबाक प्रयास भए रहल अछि आ एहि प्रयास सँ शेष समाजक आक्रोशक आगि मे घी पडि़ रहल अछि। पाग-दोपटाकेँएकर उदाहरणक रूप मे देखल जाए सकैत अछि। द्वैधीकरणक चरम स्थिति ई अछि जे मिथिला राज्यक तथाकथित आन्दोलनी सभ दरभंगा जिला सँ बाहर अपन कार्यक्षेत्र मानिते नहि छथि। बहुत भेल त कनी मधुबनीक पीठ हँसोथि देलौं । कोशी नदी सँ पूरब दिशाक भूभाग हुनका अपन नहि लागय छनि । ई प्रायः एहि कारण अछि जे हुनका सभक परिकल्पना मे मिथिला राज्य ने जनक के मिथिला अछि आ ने लोकतंत्रात्मक मिथिला । ओ सभ मैथिल महासभाक आयोजक दरभंगा महराजक राजक परिकल्पना आ कामना सँ क्रियाशीलताक छद्म ओढ़ने छथि । ओ सभ जनक वंशक श्रम आ कृषि-संस्कृतिक नहि, वर्त्तमानक लोकतंत्री संस्कृतिक नहि, दरभंगा महराजक बिचौलिया आ खैराती संस्कृतिक अभिलाषी छथि । मैथिली भाषाक स्थिति सेहो एहि द्वैधीकरण सँ सुरक्षित नहि रहल अछि। गैर मैथिलक गप जाए दिअ, दरभंगा-मधुबनीक मैथिली घराना, मठ आ महंथक नजरिमे कोशी जनपदक मैथिल सभ सेहो मैथिली लेखक नहि छथि, अछोप छथि । द्वैधीकरणक एहि विस्तार सँ जातिवाद, कुटुम्ब-गोधियावाद, गुट-गिरोहवादक झाड़-झंखाड़ उगायल जाए सकैत अछि, समतावादी समाजक पफसिल नहि उपजाएल जाए सकैत अछि । आ कोनो आन्दोलनक प्रथम आ अनिवार्य शर्त्त होइ छै जे ओहिमे सम्पूर्ण समाजक अखण्ड सहभागिता हुअए । कोनो आन्दोलन तखनिएँ आन्दोलनक श्रेणी मे आबि अपन लक्ष्यकेँ प्राप्त करए मे सफल भए सकैत अछि जखनि ओहि मे जाति-सम्प्रदाय, गुट-गिरोह सँ अलग हटि सर्वहाराक भागीदारी हुअए। आन्दोलन ओहि अखण्ड समाजक औजार होइ छै जे भविष्य दिस देखैत अछि आ जेकर सोच आधुनिक आ वैज्ञानिक होइ छै। एकर विपरीत हम सभ मानसिकताक बहुमत मे अतीतजीवी, पुरातनपंथी आ जड़ समाजक उत्तराधिकारी छी । आन्दोलन ओहि समाजक औजार होइ छै जे परिवर्त्तनकामी होइ छै। एकर विपरीत हम सभ यथास्थितिवादक पोषक बनल छी । आन्दोलन ओहि समाजक औजार होइ छै जे अपन समूल संसाधन पर समग्र समाजक अधिकार मानै छै । एकर विपरीत हम सभ जमाखोरीक मानसिकता बला लोक बनल छी । आन्दोलन ओहि समाजक औजार होइ छै जे समतामूलक विचार सँ सम्पन्न आ आत्मविश्वासी होइ छै । एकर विपरीत हम सभ विभेदकारी श्रेष्ठताबोध सँ ग्रसित आ परमुखापेक्षी चरित्र राखय छी । आन्दोलन ओहि समाजक औजार होइ छै जे जोड़बाक नीति पर चलैत समन्वयवादी दृष्टिकोण राखैत अछि । एकर विपरीत हम सभ मैथिल महासभाक विखण्डनवादी नीति आ क्षेत्राीयतावादक रोगाणुक वाहक बनल छी । आइ ई अत्यन्त दुखद स्थिति अछि जे जाहि मिथिलाक हम सभ बेर-बेर दोहाइ दै छी से भूगोलहीन मिथकीय क्षेत्रा मात्रा अछि आ हमर सभक भाषा मैथिली किछु खास घरानाक खतियानी वस्तु बनल अछि । डीह अछिए नहि आ भाषा-संस्कृति पर धूल-धुसरित भेल एकटा राजतंत्राक प्रेत-छाया चकभाउर दए रहल अछि । एहि भाषा आ संस्कृतिकेँ व्यापकता आ सर्वस्वीकार्यता देबाक बदला किछु सीमित लोक द्वारा अपन भरण-पोषण आ अहं-पोषणक लेल दुरूपयोग कएल जेबाक परम्परा जकाँ बनि गेल अछि । मैथिल महासभाक पंजी सँ बहरूका आन बड़का जाति, छोटका जाति, दलित, आदिवासी आदि जेकरा राड़-रोहिया, सोल्हकन, वर्णसंकर आदिक कलंकित उपमासँ घिनाएल जाए रहल अछि,केँमिथिला, मैथिलीक मुख्य धरा सँ काटि-बारि देल गेल अछि । जखनि समाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तानी-भरनीकेँदस्तावेजी रूप सँ राइछित्ती कए देल गेल हुअए, तखनि एतय कोनो सांस्कृतिक आन्दोलनक कोनो भविष्य कोना भए सकैछ ? जाघरि हम सभ भूतक ऐतिहासिक भूलकेँ चिन्हित कए सकारब नहि, ओहि भूल सभक परिमार्जन कए वर्त्तमानकेँ पवित्र आ उदार मानसिकताक संग निष्कंटक नहि करब, त्रुटिकेँ किन्नहु नहि दोहरयबाक सप्पथ नहि लेब, सप्पथ पर दृढ़ नहि रहब, नीक आ सकारात्मक भविष्यक कामना पफलीभूत नहि हएत । लक्ष्मीनाथ गोसांई: परम्परा, भाषा आ निर्गुण भाव १ भक्ति आन्दोलनक साहित्य आ गोसांइजी जाहि काल एहि देशक भक्ति साहित्य बनब शुरू भेल ओ काल एकटा युग संधिक काल छल। प्रथम बेर भारतीय समाज केँ एकटा एहन परिस्थितिक सामना करए पडि़ रहल छल जे ओकर चिन्हल बुझल नहि छल। अखनि तक वर्णाश्रम व्यवस्थाक कोनो प्रतिद्वन्द्वी नहि छल। आचार भ्रष्ट लोक समाज सेँ अलग कए देल जाइत छला आ ओ सभ एकटा नव जातिक रचना कए लैत जाइत छला। एहि तरहेँ यद्यपि सैकड़ों जाति या उपजाति सभ बनैत जाए रहल छल, तथापि वर्णाश्रम व्यवस्था कोनो ने कोनो तरहेँ चलैत जाए रहल छल। आब एकर मुकाबला मे एकटा एहन सुसंगठित समाज छल जे प्रत्येक व्यक्ति आ प्रत्येक जाति केँ अपना भीतर समान आसन देबाक प्रतिज्ञा कए चुकल छल। एक बेर कोनो व्यक्ति ओकर विशेष धर्म-मत केँ जँ स्वीकार कए लेलक तँ इस्लाम समस्त भेद-भाव केँ बिसरि जाइत छल। ओ राजा सँ रंक आ ब्राह्मण सँ चाण्डाल तक सभ केँ धर्मोपासनाक समान अधिकार देबाक लेल राजी छल। एहने समय मे दक्षिण सँ भक्तिक आगमन भेल जे बिजलीक चमक जकाँ एहि विशाल देशक एहि कोना सँ ओहि कोना तक पसरि गेल। भारतक जातीय तथा धर्मजीवनक एक महान संधिक्षण मे शंकराचार्यक अभ्युदय भेल। ता तक बौद्ध धर्म भारत मे लगभग 1200 वर्ष तक उन्नति-अवनतिक विविध स्तरक अतिक्रमण कए एक एहन परिस्थिति मे पहुँचि गेल छल जे भारतीय धर्म आ संस्कृतिक लेल मात्र अप्रयोजनीय नहि, हानिकारक दबाव सँ सनातन हिन्दू धर्म बलहीन, विध्वस्त आ विछिन्न भए गेल छल। एकदम अस्त-व्यस्त भेल एहि भारतीय समाज मे एक दिश चिल्लरक चउ निकालनिहार कट्टर कर्मकाण्डी सभ छला जे शास्त्रादिक अन्तर्निहित भावक उपेक्षा कए एक-एक शब्द पर कपार पफोड़बाक लेल उताहुल रहैत छलाह त दोसर दिश शून्यवादी, नास्तिक आ रूढि़भंजक लोक छला जे ओहि सभ केँ जडि़-मूल सँ उखाडि़ पफेकबाक लेल पफांड़ा बान्हने छला जे किछो पूज्य, पवित्र आ प्राचीन छल। दार्शनिक मत-मतान्तरक बीच प्रचण्ड संघर्ष छिड़ल छल आ विभिन्न धर्मिक सम्प्रदायक बीच शत्रुता विद्यमान छल। एहने विकाल मे शंकराचार्यक उद्भव भेल। शंकराचार्यक उद्भव केँ प्रचलित शब्द या अर्थ मे व्यक्त करब असंभव अछि। एकटा श्लोक मे हुनका दिआ कहल गेल अछि जे आठ वर्षक अवस्था मे ओ चारू वेदक अध्ययन कए लेलनि, बारह वर्षक अवस्था मे ओ सकल शास्त्र मे पारंगत भए गेला, सोलह वर्षक अवस्था मे ओ अपन भाष्य लिखिकए पूर्ण कए देने छला आ बत्तीस वर्षक अवस्था मे एहि संसार सँ विदा भए गेला। इएह बात शंकराचार्यक जीवन आ कर्म केँ ईश्वरीय अर्थात अलौकिक स्वरूप प्रदान कए देने अछि। शंकराचार्य सम्पूर्ण विश्वक इतिहास मे एहन एकमात्रा विजेता छथि जे ज्ञानबल केँ युद्धक औजार बनैलनि आ एकटा विशाल साम्राज्य स्थापित कए लेलनि। हुनक चलायल भक्तिक धरा दू रूप मे स्वयं केँ प्रकाशित केलक। इएह ओ दू धरा अछि जेकरा निर्गुण धरा आ सगुण धरा नाम दए देल गेल अछि आ जेकर प्रभाव भक्ति साहित्य पर हजारो वर्ष सँ पडि़ रहल अछि आ आगुओ पड़ैत रहत। साहित्यक इतिहास मे जाहि कालावधिकेँ भक्तिकालक संज्ञा देल गेल अछि ओ एहि देशक समाज आ साहित्य दुनूक लेल महान परिवर्तनकारी युग रहल अछि। कर्मकाण्ड आ जाति पातिक भ्रमजाल मे फंसल सनातन धर्मक विरूद्ध परिवर्तनवादी स्वर दएबला बौद्ध धर्म वामाचारादि घृणित कर्म सँ स्वयं पथभ्रष्ट भए गेल छल आ ओकर उच्छिष्ट सँ भारतीय चिन्तनधरा केँ परिशुद्ध करैत मुस्लिम धर्मक आक्रामक प्रभाव सँ सफलतापूर्वक लड़ैत शंकराचार्यक बनाएल पथ निरन्तर प्रशस्त भेल गेल आ ओहि पर चलनिहारक संख्या मे निरन्तर वृद्धि होइत गेल। ई अद्भुत संयोग अछि जे आसाम मे शंकरदेव, बंगाल मे जयदेव आ चण्डीदास, बिहारक तिरहुत मे विद्यापति, मध्यदेश मे कबीर, सूर, तुलसी आ जायसी, राजस्थान मे मीरा, गुजरात मे नरसी मेहता, महाराष्ट्र मे तुकाराम आदि अनेक सन्त भक्तक आविर्भाव किछुए दिनक अभ्यन्तर भेल। भक्तिसाहित्यक ई परम्परा अनेक धरा मे विभाजित होइतो अग्रगामी रहल। कबीर, रैदास, नानक, दादू, मलूकदास आदि सँ निर्गुण परम्पराक ज्ञानाश्रयी शाखा समृद्ध भेल त मुसलमान कवि कुतबन, मंझन, जायसी, शेख नबी आदि सँ निर्गुणक प्रेममार्गी सूफी धरा प्रवाहित भेल। रामानुज आ तुलसी आदि सँ राममार्गी सगुण परम्परा आ वल्लभाचार्य आ सूरदास आदि सँ कृष्णमार्गी सगुण परम्परा केँ बल भेटैत गेल। एहि भक्तिकालक समापन आ रीतिकालक प्रारंभक सन्धिस्थल पर कोशी नदीक लीला क्षेत्रा मे सन्त लक्ष्मीनाथ गोसांईक आविर्भाव होइत अछि। गोसांई जीक जन्म आ रचनाकाल केँ दुनू कालक सन्धिस्थल नहि कहि रीतिकालक परिपक्वताक काल कहब बेसी उपयुक्त कहि सकै छी आ एकर असर केँ गोसांई जीक रचनासभ मे बहुत स्पष्ट रूप सँ देखल जाए सकैत अछि जाहिमे सिद्ध साहित्य, नाथपंथी साहित्य, भक्तिक ज्ञानाश्रयी आ प्रेममार्गी सूपफीधरा, सगुण परम्पराक राममार्गी आ कृष्णमार्गी धराक संग-संग कोशी-कमला-बलान अंचलक व्रात्य-किरात संस्कृति सँ प्राप्त शिव आ दुर्गा अराध्ना परम्पराक मिश्रित प्रभाव अछि। एतय काल-विभाजनक आधर भारतीय भाषा साहित्य, विशेषतया हिन्दी केँ मानि ई बात कहल जा रहल अछि। तिरहुता वा मैथिली मे एहि भक्ति आन्दोलनक कोनो विशेष प्रभाव दृष्टिगोचर नहि होइत अछि। मैथिलीक तथाकथित इतिहासकार लोकनि प्राकृत केँ अपन पुर्वज भाषा कहि यत्रा-तत्रा ओहि सँ लाभ लेबाक अवसरवादिता त देखबै छथि किन्तु प्राकृत मे लिखल सिद्ध लोकनिक भक्ति साहित्य केँ अपन कहबा मे हुनका सभ केँ असोकर्य होई छनि किएक त ओ निम्न जातिक लोक द्वारा लिखल गेल अछि आ पुरोहितवादक विरूद्ध जाइत अछि। एकटा विद्यापति जिनकर चर्चा विभिन्न भारतीय भाषा साहित्य मे होइत अछि, हुनकरो रचना मे भक्ति आन्दोलन सन कोनो तत्व नहि अछि। ओ मूलतः दरबारी कवि छला आ हुनक रचनासभ जनमुखापेक्षी नहि शासक मुखापेक्षी अछि आ ओहि मे अपन पालनकर्ताक मनोरंजनार्थ श्रृंगार-राग भरल अछि। लक्ष्मीनाथ गोसांई एहि मामला मे बेछप एहि रूप मे छथि जे भक्तिकालक समापन आ रीतिकालक यौवनकाल मे ओ एला आ अपन रचना सभ केँ लोक हितार्थ, लोक मनोरंजनार्थ लिखलनि, संगीत सँ बान्हलनि आ ओकरा गाबि-गाबि आमजन धरि पहुँचलाह। एतय ई कहबा मे कनिको संदेह नहि अछि जे गोसांई जी पर तिरहुता भाषाक रचनासभक प्रभाव नगण्य आ हिन्दीक साहित्य संसारक प्रभाव तीव्र आ प्रचूर मात्रा मे पड़ल अछि। गोसांई जीक शिक्षा संस्कृतक माध्यम सँ भेल छल आ ओ अपन संस्कृत ज्ञानक उपयोग शंकराचार्यक रचनाक अनुवाद लेल सेहो केलनि। भाषा तत्व बोध नाम सँ शंकराचार्य विरचित तत्व बोधक भाषानुवाद आ शंकराचार्येक विवेक रत्नावलीक भाषानुवाद अद्वैतवाद आ वेदान्तदर्शनक प्रति गोसांईजीक आस्था केँ प्रगट करैत अछि। ई आस्था भाव गोसांईजीक अपन रचना सभ मे बहुत मुखर नहि भए सकल अछि त एकर पाछाँ ओ समाज अछि जेकर ओ एक इकाइ छला आ साध्ुकर्म अपनएलाक बादो जेकर बन्धन सँ ओ स्वयं केँ मुक्त नहि कए सकला। ‘गंगा को नहाये कहो को नर तरिगे, मछरी न तरी जाको पानी में घर है’ - एक निर्गुणपंथी संतक ई बात गोसांई जी पर नीक जकाँ लागू होइत अछि। तिरहुता आकि मैथिलीक गंगा मे के के महासभाइ नहि तरि गेल, किन्तु माछ जकाँ गोसांईए जी तरे सँ वंचित रहि गेला। आब गोसांई जी केँ मैथिलीक रचनाकार मानि हुनका पर परिसंवाद आदिक आयोजन भए रहल अछि से स्वागत योग्य किन्तु एहि मे जे आपराधिक बिलम्ब भेल अछि तेकर दोषी केँ चिन्हित करब सेहो अपेक्षित अछि। २ गोसांईजीक रचना भाषा आ मैथिली हिन्दी साहित्यक इतिहास लेखन एहि मामला मे इमानदार कहल जाए सकैत अछि जे ओ स्वीकार करैत अछि जे प्राकृतक अंतिम अपभ्रंश अवस्थे सँ हिन्दी साहित्यक आविर्भाव मानल जा सकैत अछि। मैथिली केँ एहन स्पष्ट धरणा निर्धरित करबाक सौभाग्य अखनि धरि प्राप्त नहि भेल अछि। मिथिला आ मैथिलीक अखनि धरि लिखल इतिहास पोथी सभ फूसि, भ्रम आ विरोधभासक पुलिन्दा ;गठरीबद्ध बनि कए रहि गेल अछि। हमरा सभ केँ बंगाल बतबैत अछि जे विद्यापति हमर छला आ तखनि हम सभ धड़फड़ा कए अपन भंगिआएल निन्न तोड़ैत विद्यापति केँ भरि-भरि पांज पकड़ै छी। ई त भेल क्षेपक, एतेक धरि जे हमर सभक भाषाक की नाम अछि सेहो हमरा सभकेँ अंग्रेजीक तथाकथित विद्वान/भाषाविज्ञानी कोलबु्रक आ जार्ज ग्रियर्सन सन लोक बतबैत अछि। किछु पाश्चात्य विद्वान एहि भाषाक लेल तिरहुतिया शब्दक प्रयोग केलनि। 1771 ई0 मे वेलिगत्तीक लिखल पोथी मे एकर एहि रूपेँ उल्लेख भेटैत अछि। हाल-हाल तक एहि भाषाक लेल तिरहुतिया आ एकर लिपिक लेल तिरहुता शब्दक उपयोग होइत रहल अछि आ अखनिओ जनसाधरणक बीच ई शब्द लोकप्रिय अछि। ठाम-ठाम एकरा लेल विदेह भाषाक प्रयोग सेहो भेल अछि। एहि भाषाक लेल मैथिली शब्दक प्रयोग 1801 ई0 मे कोलबू्रक केलनि। एहि भाषाक प्रथम उपयोग वा उल्लेख वर्णरत्नाकर आ विद्यापतिक कीर्तिलताक प्रारंभिक पद मे भेटैत अछि जेकरा विद्यापति देसिल वयना एवं अवहट्ट कहने छथि। ई देसिल वयना वा अवहट्ट मैथिलीक ओ रूप नहि अछि जेकर प्रयोग हमसभ आइ वर्तमान मे कए रहल छी। सुभद्र झाक अनुसार अवहट्ट कहला सँ ताहि जमाना मे भद्रलोकक भाषा बुझल जएबाक चाही। ई भद्रलोकक भाषा आ आम लोकक भाषा दू तरहक छल की ? सुभद्रे झाक कहब छनि जे मैथिली अपन निजी क्षेत्रा मे मुंडा आ संथाली एहि दू अनार्य भाषा सँ मिलैत अछि। दोसर शब्द मे एकरा मुंडा आ संथाली सँ बहरायल आ विकसित भेल किऐक नहि मानल जाए ? भाषाविद पंडित गोविन्द झा एकर विकासक क्रम अवहट्ट सँ प्राचीन मैथिली, मध्य मैथिली, नवीन मैथिली आ समसामयिक मैथिली क संज्ञा दैत बतबै छथि। आधुनिक काल तक आबिओ कए मैथिलीक कोनो सर्वमान्य वर्तनीक निर्धरण नहि भए सकल अछि। एहि भाषा पर सभसँ बड़का एहसान जार्ज गियर्सन केने छथि आ हुनके सँ मैथिली शब्द केँ व्यापकता भेटल। 1910 ई0 मे जखनि मिथिलेश महाराज कामेश्वर सिंहक आजीवन सभापतित्व मे मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक जातीय संस्था ‘मैथिल महासभा’ के स्थापना भेल त एहि भाषाक लेल मैथिली शब्दक आग्रह बढ़ल। एकर आर जे कोनो अन्य परिणाम भेल हुअय किन्तु एकर बादे सँ मिथिला, मैथिल आ मैथिली शब्द भ्रम सँ आप्लावित भए व्यापकता सँ दूर हटि गेल आ ‘तिरहुता’ सँ ‘मैथिली’ होइते ई भाषा सर्वहाराक खाता सँ खारिज भए मैथिल महासभाक खतिआन मे दाखिल भए मात्रा दू जातिक जमाबन्दीक वस्तु भए गेल। एकर परिपेक्ष्य मे जखनि लक्ष्मीनाथ गोसांईक रचना भाषाक अवलोकन करै छी त अत्यन्त असन्तोषजनक आ दुखद तथ्य सभ सोझाँ आबैत अछि आ ई समझ आ बुद्धि मे नहि आबैत अछि जे ओ मैथिली मे स्वीकार्य किऐ नहि छथि। सिद्ध साहित्यक किछु उदाहरण द्रष्टव्य अछि। सरहपा कहै छथि - ‘पंडिअ सअल सत्त बक्खाणइ। देहहि रू( बसंत न जाणई। अमणागमण ण तेन विखंडिअ। तोवि णिलज्ज भणई हउँ पंडिअ।।’ विरूपा कहै छथि - ‘सहजे थिर करि वारूणी साध। अजरामर होइ दिट काँध। दशमि दुआरत चिह्न देखइया। आइल गराहक अपणे बहिआ। चउशठि घडि़ए देट पसारा। पइठल गराहक नाहि निसारा।’ तहिना कण्हपाक ई पांति - ‘एक्क पा किज्जइ मंत्रा ण तंत। णिअ धरणी लइ केलि करंत। णिअ घर घरणी जाब ण मज्जइ। ताब कि पंचवर्ण बिहरिज्जइ।’ कुक्कुरिपा - ‘ससुरी निंद गेल, बहुड़ी जागअ। कानेट चोर निलका गइ मागअ। दिवसइ बहुणी काढ़इ डरे भाअ। रति भइले कामरू जाअ।’ लुहिपा कहै छथि - ‘भाव न होइ, अभाव ण जाई। अइस संबोहे को पतिआइ ?’ बौद्ध सिद्ध सभक एहि उदाहरण सभक भाषाक तुलना विद्यापतिक कीर्तिलताक पांति ‘बालचंद बिज्जावइ भासा, दुहुहु न लग्गइ दुज्जन हासा। सो परमेसर सेहर सोहइ, इ णिच्चउ णाअर मन मोहइ।।’ सँ करी त दुनू मे कोनो बहुत अन्तर नहि अछि। तखनि प्रश्न ई अवश्य उठबाक चाही जे हम सभ स्तरचयनक कोन दोहरापन राखने छी जे विद्यापति मैथिली लेखक मानल जाई छथि आ सिद्ध सभ एहि सौभाग्य सँ बारल जाइ छथि। सिद्ध सभक एहि रचना सभक भाषा देशभाषामिश्रित अपभ्रंश अछि। ओ सभ भरिसक ओहि सर्वमान्य व्यापक काव्यभाषा मे लिखलनि जे ओहि काल गुजरात, राजपुताना आ ब्रजमंडल सँ लए कए बिहार तक लिखै - पढ़ैक शिष्ट भाषा छल। ओहि सभ मे स्थान विशेषक भेदक कारण किछु स्थानीय प्रयोग आ शब्द सभ आबि गेल अछि। एहि सिद्ध लोकनिक साहित्य जेकरा चर्या पद कहल जाइत अछि तेकरा मैथिली मे सम्मिलित करबाक डा0 जयकान्त मिश्र विरोधी छला, जखनि कि डा0 दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ एकरा सम्मिलित करबाक पक्ष मे छला। तार्किकता सँ एकदम अलग भए कए एहने आग्रह-दुराग्रह मैथिलीक भाग्य तै करैत रहल अछि। मैथिली अकादमी, पटना द्वारा प्रकाशित कविता संग्रह ;प्रथम संस्करण 1977द्ध मे सरहपा ;690 ई0 केँ सम्मिलित करबाक साहस देखाएल गेल अछि आ एकरा आगाँ बढ़बैत चैरासियो सिद्ध केँ मैथिलीक रचनाकार मानल जेबाक चाही। एतबे किए, कतिपय जैन आचार्य आ नागपंथी सभक अनेक रचनाक एहने भाषा अछि आ हुनको सभक स्वागत एहि टोल मे हेबाक चाही। हँ, जातिगत रूढि़ सँ ग्रसित एहि समाज केँ ई बात अखरि सकैत अछि जे अधिकांश सिद्ध लोकनि निचलका जाति अर्थात सोल्हन वर्ग सँ आबैत छथि। किन्तु मैथिली केँ पुरोहिती संस्कार आ मैथिल महासभाक समाजतोड़क व्यवस्था सँ बाहर निकालि विस्तृत आ विराट आकास देबाक समय नहि आबि गेल अछि की ? अमीर खुसरोक एकटा प्रसिद्ध गजलक किछु पांति द्रष्टव्य अछि - ‘जे हाल मिसकी मकुन तगापफुल दुराय नैना, बनाय बतियाँ। कि ताबे हिज्राँ न दारम, ऐ जाँ! न लेहु काहे लगाय छतियाँ।। शबाने हिज्राँ दराज चूँ जुल्पफ व रोजे वसलत चूँ उम्र कोतह। सखी! पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ।। एहि गजल मे फारसी आ ठेठ खड़ी बोलीक समिश्रणक ठाठ अछि आ एकर बादो खुसरो हिन्दीक लेल तहिना स्वीकार्य छथि जेना विद्यापति। एहि सभ उदाहरणक परिप्रेक्ष्य मे जखनि लक्ष्मीनाथ गोसांई क रचना भाषा पर दृष्टि जाइत अछि, तखनि मैथिलीक पुरोध-महंथ सभक असमंजस बुधिमे घुसिआबय सँ परहेज करए लगैत अछि। तखनि त आओर जखनि मैथिली आ हिन्दी दुनू केँ सजातीय मानै मे कोनो भाषाविद्, कोनो पंडित केँ कोनो उजूर नहि छनि। पंडित छेदी झा ‘द्विजवर’ गोसांई जीक रचना भाषा केँ बिकृत ब्रजभाषा कहै छथि अर्थात मैथिली मिश्रित ब्रजभाषा। किन्तु ई बात बहुत गंभीरता सँ कहल गेल नहि बुझाइत अछि। ई सत्य अछि जे भारतीय साहित्य मे एकटा दीर्घ अवधि तक काव्य-लेखन लेल ब्रजभाषा मात्रा केँ उत्तम मानल जाइत रहल। किन्तु गोसांई जीक रचना भाषा केँ कोनो स्थापित श्रेणी वा व्याकरण मे बान्हब कठिन अछि। एकरा बबजिया वा सधुक्कड़ी भाषा कहब बेसी उपयुक्त बुझाइत अछि। घुमक्कड़ीक चक्कर मे बाबाजी सभ विभिन्न पंथक, विभिन्न क्षेत्राक, विभिन्न संस्कारक साधु समाज आ जन समाजक संपर्क मे आबैत अछि आ ओकर भाषा एहि सभक मिश्रणक प्रभाव सँ एकदम विलक्षण भए जाइत अछि। एहि विलक्षण आ अपरिभाषेय तत्वक असरि गोसांई जीक भाषे टा पर नहि हुनक रचना संसारक अंतर्वस्तु मे सेहो देखाइत अछि। सुभद्र झा Journal of the Bihar University मे प्रकाशित अपन एकटा आलेख मे कबीर केँ मैथिल सिद्ध करबाक प्रयास कएने छथि। कबीरक तुलना मे गोसांई जीक रचना-भाषा केँ मैथिलीक बेसी करीब त दाबी सँ कहले जाए सकैत अछि। बनगाँवक संत लक्ष्मीनाथ परमहंस राष्ट्रीय समिति द्वारा प्रकाशित ‘भजनावली’ केँ गोसांई जीक सर्वाधिक विश्वसनीय संग्रह एहि कारणें मानल जेबाक चाही जे ई हुनक भक्त सभक निष्कलुष आ समर्पित प्रयासक फल अछि आ एहि पर मैथिली साहित्यक राजनीति, पुर्वाग्रह आ निहित स्वार्थी षड्यंत्राक कोनो प्रभाव दृष्टिगोचर नहि होइत अछि। एहि संग्रह मे मात्रा पांच-छह टा नचारी एहन अछि जेकर भाषा केँ वर्तमान प्रचलित मानकक अनुसार मैथिलीक कहि सकै छी। अन्य सात-सवा सात सय रचनासभ मे ओएह मिश्रित बबजिया भाषा अछि, जाहि मे सँ किछु मे मैथिलीक कम-बेसी पुट उपस्थित अछि। एतय ई चर्चा कए देव समीचीन बुझाइत अछि जे कबीरदासक हिन्दू होइ मे सन्देह छलै, रैदास चमार छला, नानक केँ क्षत्री आ दादू केँ मोची वा धुनिया मानल गेलै आ हिनका सभक रचना भाषा मे सेहो कोनो भाषिक व वैयाकरणीक साम्य नहि छलै तखनिओ हिनका लोकनिक रचना केँ पंजाबी समुदाय गुरूग्रंथ साहिब सन पूज्य ग्रंथ मे श्रद्धापूर्वक सम्मिलित केलक। तेँ लक्ष्मीनाथ गोसांईक रचना सभक मैथिलीकरण करबाक अनैतिक आ आपराधिक कृत्य करबाक बदला ओकरा अपन मौलिकता मे मैथिली साहित्यक सम्पत्ति मानल जएबाक चाही। कहल गेल अछि- ‘यत्रापि कुत्रापि भवति हंसाः, हंसा महीमंडलमण्डनानि। हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां येषां मरालैः सह विप्रयोगः।।’ अर्थात हंस जतए कतओ रहए, ओतहि पृथ्वीक भूषण भए कए रहत, हानि त ओहि सरोवर सभक हेतै जेकर ओकरा सँ वियोग भए जेतै। गोसांई जीक रचना मे निर्गुण भाव देश मे सगुण आ निर्गुण नामक भक्तिकाव्यक दू धरा विक्रम पन्द्रहम शताब्दीक अंतिम भाग सेँ लए कए सतरहम शताब्दीक अंत तक समानान्तर चलैत रहल। ई कालावधि भक्तिकाल केँ इंगित करैत अछि किन्तु एकर बादो भक्ति काव्य रचल जाइत रहल, रचल जाइत रहल अछि। एहि मे निर्गुणधराक तत्परता आ व्यवस्थित रूप मे प्रवर्तन केलनि कबीरदास जिनका लेल नाथपंथी जोगीसभ आ वज्रयानी सिद्ध सभ अर्थशून्य बाहरी विधि विधान, तीर्थाटन, पर्वस्नान आदिक निस्सारताक संस्कार पसारबाक काज कए बहुत किछु मार्ग प्रशस्त कए चुकल छला। कबीरदास स्वामी रामानन्द जीक शिष्य बनि भारतीय अद्वैतवादक किछु स्थूल तत्व ग्रहण केलनि आ दोसर दिस नाथपंथी जोगी आ सूफी फकीर सभक संस्कार सेहो ग्रहण केलनि। वैष्णव लोकनि सँ ओ अहिंसावाद आ प्रपत्तिवाद लेलनि। तेँ हुनकर तथा निगुर्णवादी अन्य दोसर संत सभक वचन मे कतओ शंकराचार्यक अद्वैतवादक झलक भेटैत अछि, कतओ नाथपंथी सभक नाड़ीचक्रक, कतओ सूफी सभक प्रेमतत्वक, कतओ पैगम्बरी कट्टर खुदावादक आ कतओ अहिंसावादक। एहि परिप्रेक्ष्य मे जँ देखी त लक्ष्मीनाथ गोसांई केँ शुद्ध निर्गुणपंथी कहब त कठिन अछि किन्तु ओ कने प्रकारान्तर सँ कबीरपंथी कहल जाए सकैत छथि। प्रकारान्तर ई जे गोसांई जीक साहित्य साधना आ भक्ति भावना पर हुनक अपन समाजक पुरोहिती संस्कार सेहो हावी रहल अछि आ से हुनक रचनासभ मे खूब देखार अछि। गोसांईजीक एकटा भजन ‘कौन कहे प्रभु कैसा मुरति, कदही कोउ न देखा है’ सँ शुरू होइत अछि आ ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आदि त्रिदेवक चर्चा करैत ‘कर्ता, कर्म सबनि से न्यारा, साक्षी होके देखता है। ‘लक्ष्मीनाथ’ अनाथ के स्वामी, पवन रूप मन भाता है।’ पर समाप्त होइत अछि। निर्गुण भावक सर्वाधिक स्पष्ट अभिव्यक्ति एहि भजन मे भेटैत अछि। गोसांई जी एहि भजन मे सगुण साकार केँ नकारैत निर्गुण-निराकारक पैरोकारी करैत देखाइ छथि। हुनका सरूप नहि ब्रह्मक पवन रूप भाबए छनि। पवन रूप अर्थात जेकरा अनुभव कएल जाए सकैत अछि किन्तु जे दृष्टिक परिधिसँ बाहर अछि। सगुणोपासनाक मजाक उड़बैत गोसांई जी एहि भजन मे सगुणोपासक केँ आन्हरक संज्ञा दै छथि - ‘अन्धे के पुर हाथी जैसे अकिल सरूप बताता है’। एहि भजन मे शंकराचार्यक पंक्ति उपालभ्यते हि मायाहस्ती हस्तीव, हस्तिनमिवमात्र समाचरन्ति बन्धनारोहणादि हस्ति संबंधिभिर्धर्मै:, हस्तीति चोच्यते असन्नपि यथा ....’ क प्रभाव स्पष्ट देखाइत अछि। एहिना ‘है तो स्वामी सबके भीतर लेकिन लखा न होता है। जैसे रंग रहे मेहदी में वैसे मालूम होता है’’ सँ प्रारंभ भेल एकटा भजन ‘जैसे बुद-बुद जल से होता, जलही माह समाता है। ‘लक्ष्मीपति’ झूठी यह माया, ब्रहम सत्य मन भाता है।’ पर समाप्त होइत अछि। एहि मे गोसांई कहै छथि जे जेना मेहदी मे रंग नुकाएल रहैत अछि तहिना अदृश्य स्वामी अर्थात ब्रह्म सभक भीतर अछि। एहि भजन मे ‘ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या’ क भावना आएल अछि। एकर बीचक पद मे गोसांई संसारक तुलना मकड़ाक जाल सँ करै छथि जेकर भीतर खोजला पर कोनो सूत नहि भेटैत अछि। फेर ओ कहै छथि जे जगत इन्द्रजाल अछि आ मानवरूपी पुतली केँ ओकर भीतर बैसल कोनो दोसर अर्थात ब्रह्म नाच नचबैत अछि। अंतिम पद मे ओ जल सँ बनल बुलबुलाक पुनः जलहिक भीतर समाए जेबाक गप कहैत ब्रह्महिटा केँ सत्य मानैत ओकरे भावैक गप कहै छथि। लक्ष्मीनाथ गोसांई पर विभिन्न संत कविक संग-संग शंकराचार्यक प्रभाव सेहो यथेष्ट मात्रा मे छनि। एकर एकटा प्रमाण इहो अछि जे ओ शंकराचार्यक तत्व बोध् आ विवेक रत्नावलीक भाषानुवाद सेहो कएलनि। ई प्रभाव कतओ-कतओ हुनक अपन रचना मे तेना कए आएल अछि जे ओ प्रायः अनुवादहि जकाँ लागैत अछि। आचार्य शंकरक माण्डूक्यकारिकाभाष्यम् क एकटा श्लोक अछि -‘यथा च प्रसारित पण्यापण गृहप्रसाद श्रीपुंजनपदव्यवहाराकीर्णमिव गन्धर्वनगरं दृश्य मानमेव सत् अकस्मादभावतां गतं दृष्टम्, यथा च स्वप्नमाये दृष्टे असदु्रपे, तथा विश्वमिदं द्वैतमसद् दृष्टम्।’ गोसांई जीक एकटा भजन मे एहि भावना केँ ‘खामिन्द खासे शहर बसाये’ सँ शुरू कए ‘नगर, बाजार, दुकान विचारे, सौदा नाना हाट लगायेः तीन चैदवीं, चार महाजन, दश बनियां व्यापार चलाये’ आदिक रूप में व्यक्त कएल गेल अछि। गोसांई जी एकटा भजनमे ‘निर्गुण महिमा सुनो रे कोई’ क माध्यम सँ निर्गुणक महिमा बतबैत कहै छथि जे निर्गुणहि अपन नानारूप धरि सगुण बनि आबैत अछि। अनेक विध सँ विविध होइत ई स्वयंहि मे समाहित भए जाइत अछि। ब्रह्म भुइयां, हवा, आगि, पानि आ आकाश मे परिणत अछि, वएह चित्त आ बुद्धि अछि आ वएह विषय-विहार सेहो करैत अदि। वएह जीव, वएह देवता अछि आ भोगनिहारो वएह अछि। वएह बन्धनो अछि, वएह मोक्षो अछि आ अनहद नाद सेहो वएह अछि आ जे कोय ब्रह्मक निर्गुण तत्व केँ जानि जाइत अछि वएह सभ चीजक रसास्वादन कए सकैत अछि। निर्गुणक एहन स्पष्ट अभिव्यक्तिबला गोसांई जीक भजन मात्राक दृष्टिकोण सँ कमे अछि। किछु भजन मे त भावक तीव्र विरोधभास सेहो अछि। ई मानल जाइत अछि जे वज्रयानक अनुयायीसभ अधिकत निम्नजातिक छला आ तेँ जाति-पातिक व्यवस्थासँ हुनक सभक असंतोष स्वाभाविक छल। नाथ सम्प्रदाय मे सेहो शास्त्राज्ञ विद्वान सभ नहि छलाह। तेँ एहि दुनूक बनाएल लीक पर अग्रसर भेल निर्गुण पंथ दिस जाइबला जे पहिल प्रवृति लक्षित भेल से ऊंच-नीच आ जाति-पातिक भावक त्याग आ ईश्वरक भक्ति लेल मनुष्यमात्राक समान अधिकारक स्वीकार छल। किन्तु गोसांई जी अनेक जगह एहि व्यवस्थाक पोषक वा पैरोकारक रूप मे देखाई पड़ै छथि। ‘सदा एक रामनाम सत सार... ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, शुद्र के कर्म किन्ह परचार’, ‘ब्रह्मा वेद चारि के मालिक जाति, वरन बिलगाया है’ आदि पंक्ति एहि दिश संकेत करैत अछि। तेँ ई कहै मे कोनो संकोच नहि जे गोसांई जीक रचना मे जतय जतय निर्गुण भाव अछि से सप्रयास वा हुनक आस्थाक प्रतिपफल नहि, कबीर आ हुनक निर्गुणपंथक देखाउंस मे आएल अछि। एकर एकटा महत्वपूर्ण कारण अछि गोसांई जीक समाज, हुनक जाति आ ओ जाहि भूभागक निवासी छला तेकर संस्कार। कोशीक ई भूभाग अनेक मामला मे कमला बलानक भूभागक राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक परम्परा सँ एकदम अलग रहल अछि। इतिहासक एकटा विराट कालावधिमे ई भूभाग बड़का-बड़का साम्राज्यक अधीनता सँ मुक्त अपन स्वतंत्राताक आनन्द लैत रहल अछि। मिथिलाक नक्शा बनबैत काल पुरातन आ आधुनिक दुनू आधर पर मनमाना सीमा रेखा खींचल जेबाक हास्यास्पद प्रयास निरन्तर भए रहल अछि किन्तु कोशी अंचलक एहि सुपौलक राजधानी कहियो जनकपुर, दरभंगा वा पाटलिपुत्र नहि रहल। एतहुका शासन कर्णाटवंशी गन्हवरिया, गढ़बनौली स्टेटक द्रोणवार आ स्थानीय निचलका जातिक विभिन्न मानिजन शासकक हाथ मे समय-समय पर रहल अछि आ तखनो एकर राष्ट्रीय चेतना विकसित रहल अछि। गोसांई जीक रचना भाषा एकरे प्रतिपफल अछि। किन्तु धर्मिक आधर पर ई भूभाग कर्मकाण्डी पुरोहित समाजक प्रभाव मे रहल अछि। ई पुरोहित वर्ग प्रायः वैदिक संस्कृति सेँ च्युत व्रात्य आ विदेह छला जे एहि क्षेत्राक पुरान बासिन्दा किरात, कोल-भील-मछुआरा आदि आ विभिन्न वनवासी जाति समाजक संगतिक प्रभाव मे आबि मूर्ति पूजाक पालक, भूत-प्रेत-डाइन-जोगिनक अस्तित्व माननिहार, टोना-टोटका, झाड़-फूक मे विश्वास राखनिहार आ माछ माउसक भक्षक भए गेला। निर्गुणधराक कवि सुंदरदास भिन्न-भिन्न प्रदेशक आचार पर अत्यन्त विनोदपुर्ण उक्तिसभ कहने छथि। कोशी-कमला-बलानक क्षेत्रा पर हुनक उक्ति छनि ‘ब्राह्मण क्षत्रिय बैसरू सूदर चारोइ बर्न के मच्छ बधरत’। एहि पुरोहित वर्ग द्वारा एहि भूभागक बहुजन समाजक संस्कार ग्रहण कए लेब बहुमतक प्रभाव सँ त भेबे कएल, अपन भरण-पोषणहुक लेल एना करब हुनका सभ केँ लाभकारी बुझैलनि। मिथिला-मैथिलीक विद्वान इतिहासकार लोकनि एहि समाजक सनातनी हेबाक बात केँ बेर-बेर घोसलनि अछि किन्तु ई सत्य नहि अछि आ जँ सत्य अछि त एकर बहुलांश केँ जानि बुझि कए झांपल गेल अछि। सनातनी समाज अपन सर्वांग मे उदारचेता होइत अछि जे ई नहि अछि। एतय कर्मकांडक कट्टरता अछि, मूर्ति-पूजा, भूत-प्रेत-डाइन-जोगिनक उपचार हेतु टोना-टोटका-झाड़-पफूंकक अंधविश्वास अछि, श्राद्धक नाम पर प्रेत-मुक्तिक भ्रमजाल अछि, वर्णाश्रम-व्यवस्थाक पतित रूप जाति व्यवस्थाक अढ़ मे श्रेष्ठता बोधक पाखण्ड अछि। एहि सभक वाहक जे पुरोहित वर्ग अछि तेकरे एकटा अंश लक्ष्मीनाथ गोसांई छला आ तेँ हुनक जे जातिगत आ जन्मजात संस्कार छल से हुनक ज्ञान, बुद्धि, विवेक आ ताहि सँ प्रसूत हुनक साहित्य पर तात्विक रूप सँ हावी रहल। ई मानल तथ्य अछि जे सगुणोपासक भक्त भगवानक सगुण आ निर्गुण दुनू रूप केँ मानैत अछि किन्तु भक्ति आ उपासनाक लेल सगुणहि रूप केँ स्वीकार करैत अछि आ निर्गुण रूप ज्ञानमार्गी सभक लेल छोडि़ दैत अछि। खास तौर सँ उपासनाक क्षेत्रा मे ब्रह्म निर्गुण नहि बनल रहि सकैछ। तेँ सभ सगुणमार्गी भक्त भगवानक व्यक्त रूपक संग-संग हुनक अव्यक्त आ निर्विशेष रूपक सेहो निर्देश करैत आएल छथि जे बोध्गम्य नहि अछि। ओ अव्यक्त दिस संकेत मात्रा करै छथि, ओकर विवरण मे प्रवृत नहि होइ छथि। ओहुना निर्गुणपंथक प्रभाव शिष्ट आ शिक्षित वर्गक लोक पर नहि पड़ल, किऐक त ओकरा सभक लेल ने त एहि पंथ मे कोनो नव बात छल आ ने नव आकर्षण। किन्तु अशिक्षित आ निम्न श्रेणीक लोक पर निर्गुणपंथक एकटा बड़का उपकार अछि। एहि पंथक संतलोकनि अपन रचना मे किछु उच्च विषयक अबूझ सन आभास दए, आचरणक शुद्धता पर जोर दए, पाखण्ड, आडम्बर आ कर्मकाण्डक तिरस्कार कए एहि अशिक्षित निम्नवर्ग मे आत्मगौरवक भाव उत्पन्न कएलनि आ एकरा सभ केँ उपर उठएबाक स्तुत्य प्रयास कएलनि। लक्ष्मीनाथ गोसांईक संकट ई छलनि जे ओ जाहि पुरोहित वर्गक जन्मजात अंश छला तेकरा ई चीज नहि रूचैत छल आ ने रूचैत अछि। एहि दुनू पंथ पर चर्चा करैत आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहै छथि जे सगुण भावक भक्त सभक महिमा हुनक असीम धैर्य आ अध्यवसाय मे अछि किन्तु निर्गुण श्रेणीक भक्त सभक महिमा हुनक उत्कट साहस मे अछि। एकरा ध्यान मे राखैत ई बात निस्संकोच कहल जा सकैत अछि जे यथास्थितिवादक खिलापफत मे कबीर दुस्साहसक जाहि सीमा धरि गेला से हुनक बादक निर्गुणपंथक अनेक भक्त मे दुर्लभ अछि। निर्गुण भावक कतिपय भजनक रचनाक बादो तहिना लक्ष्मीनाथ गोसांई सेहो एकरा अपन मुख्य स्वर बनैबाक साहस नहि देखाए सकला। गोसांई जीक संपुर्ण रचना-साहित्यक अवलोकन सँ जे बात अभरिकए सोझाँ आबैत अछि से ई जे हुनका पर भक्तिक विभिन्न मार्ग, विभिन्न पंथ आ विभिन्न धरासभक मिश्रित प्रभाव अछि। संख्याक दृष्टिकोण सँ राम आ कृष्णक भजन सभ पर भारी अछि। प्रभावक प्रकार सँ हुनका कर्मकाण्डी-कबीरपंथी कहि सकै छी किन्तु जँ हुनका शुद्ध कीर्तनियां आ भक्त मानल जाए तखनिए हुनक रचना संसारक वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन भए सकैत अछि। हरिशंकर श्रीवास्तव शलभ कोशी अंचलक अन्वेषक साहित्यकार छथि आ ओ लक्ष्मीनाथ गोसांई केँ वाग्येकार भक्त कवि कहै छथि। वाग्येकार अर्थात् एहन कवि जे स्वयं पद के रचना करैत अछि आ ओकरा संगीत मे आबद्ध कए विभिन्न राग-रागिनी मे गाबैत अछि। जेना कोनो कीर्तनियाँ सँ मौलिकताक अपेक्षा करब ओकरा संग न्याय नहि अछि, तहिना गोसांईजीक रचना-संसार सँ सेहो ई अपेक्षा नहि कएल जएबाक चाही। हुनक अलौकिकताक कल्पित-प्रचलित कथा, गोरखनाथ सँ भेल काल-विरोधभासी तथ्य, नौ तरहक सिद्धिक प्राप्ति सन-सन गप हुनक भक्त सभ पर छोडि़ देबाक चाही। हुनक रचना-संसारक रसास्वादन करबाक लेल एतबे यथेष्ठ अछि जे हुनका भक्त आ हुनक रचना केँ शुद्ध भजन-कीर्तन मानि लेल जाए। एकटा खिच्चा सपनाक डिभिआएब (सन्दर्भ: हीरेन्द्र कुमार झाक कथा-संग्रह “ ट्रान्सफर्मर “) ई मानल जाइत अछि जे साहित्य मे कोनो चीज बेमतलब नहि होइत अछि, शब्द त शब्द, अर्धविराम, विराम वा विस्मयाधिबोधक चिन्ह तक, आ तेँ जखनि कोनो कथाकार अपन संग्रहक प्रस्तुतिकरण करबा लेल कथा-क्रम सँ पहिने कोनो वरिष्ट लेखकक लिखल भुमिका संग-संग अपनहुँ दिस सँ किछु बात कहैत अछि त ई मानल जएबाक चाही जे ई साभिप्राय अछि आ ओ एहि दुनूक संग अपन कथा-जगत केँ बुझबाक लेल पाठक लोकनिक सहायता हेतु कुंजी प्रदान कए रहल अछि, एकटा औजार दए रहल अछि जे एकरे माध्यम सँ हुनकर रचना-भंडारक ताला खोलल जाय, ओकर कपाट खोलल जाय। ई परम्परा वेद-काल सँ आबि रहल अछि, जेकर वाचिक परम्परा मे अंगुरीक माध्यम सँ उदात्त, अनुदात्त आ त्वरितक संकेत कएल जाइत रहै आ तेकरे अनुसार बाजल गेल शब्द वा वाक्यक अर्थ ग्रहण कएल जाइत रहै। आजुक लिखित वा मुद्रित परम्परा मे ई काज भुमिका आ लेखकीय वक्तव्यक माध्यम सँ होइत अछि। एहि प्रक्रिया मे किन्तु कएकटा खतरा अछि। कोनो रचनाकार लग ओकर जन्म सँ अद्यावधि तक के अनेक अनुभव संचित रहैत अछि जे ओकर चेतनाक अर्ध वा अव अवस्था मे रहल भए सकैत अछि। ई आवश्यक नहि जे रचनाकार सचेतन रुप मे स्वयं अपन रचना केँ आपादमस्तक बुझि लिअए। तखनि भुमिका लेखक वा प्रस्तुतकर्ता ओकर गत्र-गत्र केँ ओकरहु सँ नीक जकाँ बुझि लेता से मानब त आओर कठिन अछि। आ जँ हुनक ( प्रस्तोताक ) उदात्त, अनुदात्त वा त्वरितक संकेत मे कनिओ एने-ओने भेल कि अर्थक अनर्थ निकलए लागत, प्रस्तुत रचनाक अन्तर्वस्तुक माने ओझराबए लागत। आधुनिक युग तक आबैत-आबैत साहित्य विकासक विभिन्न सोपान सँ गुजरल अछि आ तेँ अजुका साहित्यक नाप-तौलक लेल आदिकालीन बटिखरा उपयोगी हएत कि नहि से विचारणीय। कविता आ कथाक विधाक जे अंतर अछि से अलग, आ अजुका साहित्य वेद सेहो नहि अछि से त आओर अलग। हीरेन्द्र कुमार झाक कथा-संग्रह “ट्रान्सफर्मर“ के प्रस्तुतिकरण लेल दू-दू टा अकादमी-पुरस्कृत साहित्यकारक टिप्पणी, भुमिका आ स्वयं कथाकारक अपन पक्ष राखबाक काज कएल गेल अछि। तेँ पारम्परिक मान्यतानुसार हिनक संग्रहक कथा सभ मे पैसबाक लेल ई तीनू वस्तु प्रमुख उपकरण भए जाइत अछि। एतय एकरहि आधार मानि एहि संग्रहक अन्तर्वस्तु दिआ किछु कहबाक प्रयास कएल जाए रहल अछि। एहि संग्रह मे तेरह टा कथा संग्रहित अछि जाहि मे पाँच कथा विध्यार्थी जीवन मे लिखल बासी आ आठ कथा साहित्यकार जीवनक लिखल टटका बताएल गेल अछि। टटका कथा मे पहिल “परिचिति” नैहर मे सुधाक विवाहपूर्व आ विवाहोपरांत बदलल स्थिति दिआ अछि। कथाक लेल ने ई विषय नव अछि आ ने एकर प्रस्तुतिकरण मे कोनो नवीनता अछि। अपना सभक जे समाज अछि ताहि मे ई एकदम सामान्य गप अछि आ प्राय: सभ संबंधित पक्ष एकर अभ्यस्त अछि। दोसर कथा “सोन त कान नहि” सामाजिक-साम्प्रदायिक सौहार्द्य पर एक नीक कथाक संभावना तक सिमटि कए रहि गेल अछि। कथावाचकक ममिऔत द्वारा हुनका घर नहि लए जाए कए गामक पीपरक गाछ लग छोड़ि झाड़ा फिरए चलि जाएब व्यवहारिक शिष्टाचारक विरुद्ध त अछिए, अतार्किक आ असहज सेहो अछि। कथा केँ आगू बढैबाक लेल एहन बेतुक प्रयोग कथाकारक विश्वसनीयता कम करैत अछि। कोनो केन्द्र नहि बनला सँ ई कथा अपेक्षित प्रभाव नहि छोड़ैत अछि। “आत्मा वा अरे द्रष्टव्य:” सोल्हकन आ द्विज पात्रक तुलनात्मक कथा कहैत अछि। आदर्शवादिताक छौंक संग समताक संदेश देबाक कथाकारक प्रयास बनावटीपनाक चलते कारगर नहि भए सकल अछि। “धनात धर्मम्” वनक्षेत्रक जनवास मे बदलब, कंक्रीटक जंगल सँ प्रकृतिक पलायन आ धर्मक नाम पर क्षुद्र स्वार्थी तत्वसभक कठखेल सन महत्वपूर्ण विषय पर लिखल कथा अछि। कथाकारक चेतनाक विभिन्न स्तर पर बहुत रास स्मृतिसभ छनि आ से एहि कथा मे प्रचूर मात्रा मे आएल अछि किन्तु तारतम्य आ मात्रा-संतुलनक अभाव मे बनल मिश्रण पाठकोचित वांछित स्वाद सँ वंचित रहि गेल अछि। ”उभयचर” दीर्घ-कथा बला विस्तार लेने ग्रामीण आ शहरी मानसिकताक विरोधाभास आ द्वन्द्वक कथा अछि। एहि कथाक अनावश्यक विस्तार अपन औचित्य सिद्ध करबा मे विफल भेल अछि आ अंत मे नायक द्वारा अनिताक कन्हा पर हाथ राखि ठंढा पीबाक प्रस्ताव देब त एकदम फिल्मी भए जाइत अछि। “ट्रान्सफर्मर” राजनीतिक लम्पटपना आ प्रशासनिक लरगुजपना पर एकटा उत्तम कथा बनैत-बनैत रहि गेल अछि। एहि कथा मे किन्तु पठनीयता छै आ एहि कथा तक आबैत-आबैत कथाकार अपन विस्तारणक फार्मूला पर नियंत्रण साधैत परिपक्व होइत देखाइ छथि। “कम्प्रोमाइज” मे एकटा स्त्रीक भावना व्यक्त करबाक प्रयास भेल अछि जेकर विवाह लेल ओकर इच्छा-अनिच्छा नहि पुछल गेल अछि। ई कथा पुरुष लेखक द्वारा नारी-मनोविज्ञानक गलत आ असफल विश्लेषणक साक्ष्य अछि। कथाक असफलताक मूल कारण अछि नायिका पुतुलक चरित्रक विकास मे कथाकारक अक्षमता। ओकर चरित्र एकदम लरगुज सन लगैत अछि, संघर्षक लेशमात्र नहि अछि एहि पात्र मे। एहि कथा मे एकटा अपचनीय गप ई छै जे कालेज मे पुतुलक एगारह बजे घुरबाक बात ओकर भाइ केँ कहल गेलनि, तखनि पुतुल मार्निंग शो सिनेमा देखए केना गेलीह? “भीआरएस” मे गज्जू बाबूक रहन-सहन, हुनक सम्पत्ति, नौकर-चाकरक विस्तारित विवरण औपन्यासिक संरचना जकाँ आ कथा लेल अनावश्यक बुझाइत अछि किन्तु ओकर युक्तिसंगतता बाद मे बुझाइत अछि। मशीनीकरण सँ मानव आ ओकर श्रमक घटैत महत्व पर ई बहुत योजनाबद्ध, सुविचारित आ सोंटल कथा अछि। बासी आ खिच्चा घोषित कएल गेल एहि संग्रहक अन्य पाँच टा कथा अपन कथ्य आ संरचनाक दृष्टि सँ कथा-तत्व आ विषय-वैविध्य सँ बेसी भरल-पूरल रचना अछि। “रोगही” नैतिकता-अनैतिकताक झमेल सँ मुक्त एकटा अतिनिम्नवर्गीय परिवारक कथा अछि जे बहुत नापल-जोखल आ पठनीय अछि। “असमंजसक अंत” एकटा हास्य कथा अछि आ एहि मे हास्य छै। “डाइरीक एक पन्ना सँ” एकटा घटनाक विवरण अछि जे कथा नहि बनि सकल अछि किन्तु एहि मे जे भावनात्मक तत्व छै से पाठक केँ छुबै छै। एहि कथा मे ई बात नहि पचैत अछि जे घर मे पीसी छथिन आ ओ नायक केँ राखी बान्हि लेबाक लेल कहै छथिन, तखनि नायक कोठरी मे ताला लगाए कए होटल मे खाइ लेल किऐ जाइत अछि। “भोट” चोराकए आनल गेल लीची आ लुटिकए आनल गेल जिलेबी खाइत बेदरा सभक खेलौरक बीच वोटक गपक विवरण अछि जाहि मे ओ सभ वोटक खरीद-बिक्री आ दलबदलक चर्चा करैत अछि। राजनीतिक चरित्रहीन दोगलपनी आ लोकक विरोधाभासी चेतनाक झलक संकेत रुप मे, किन्तु बहुत स्पष्टताक संग एहि कथा मे आएल अछि। एहि कथा पर ललितक “प्रतिनिधि” कथा के विषय आ शैलीक प्रभाव देखाइ दैत अछि। “भसान” एकटा मानव शरीर आ पूजाक निमित्त बनल प्रतिमाक माध्यम सँ अनश्वरताक कथा कहैत अछि। आलोच्य संग्रहक कथाकार हीरेन्द्र कुमार झा घोषित करै छथि जे ओ पाठक छथि, पाठके रहै चाहै छथि आ इहो जे ओ वस्तुत: जीवन केँ पढै छथि। हुनक ई घोषणा महत्वपूर्ण अछि। मैथिलीक बेसी लेखक केँ पढै सँ परहेज रहै छनि। बेसी लेखक मैथिली मे चारि पंक्ति लिखलाक बादे स्वयं केँ वेदव्यास मानै लागै छथि। एतय पाठक लेल कम गुरू-आचार्य-महंथ-पीठाधीश आदि-इत्यादि सँ परिचिति, प्रमाण-पत्र, सम्मान आ पुरस्कारक आकांक्षा-लिलसाक वशीभूत भए बेसी लेखन भेल अछि। आ से स्तरीय लेखन सँ नहि साहित्य लेल वर्जित आन-आन तरीका सँ भेटि जाएब मैथिलीक दस्तावेज मे दर्ज अछि आ तेँ मैथिली साहित्यक बहुलांश पोखरि-माछ-मखान, भांग, सामा-पौती, अरिपन, तिलकौर, अरिकंचन आदि मे घुरिआइत रहैत अछि। तेँ हीरेन्द्र जीक पाठक हएबाक घोषणा स्वागत योग्य। आलोच्य संग्रह एकर लेखकक पाठक हएबाक संकेत दैत अछि किन्तु कने दोसर तरहेँ। ओ पाठक छथि किन्तु मैथिलीक प्राय: किछु खास अंशक। अन्तर्राष्ट्रीय वा अन्य भारतीय भाषा साहित्यक गप अलग, मैथिलिओ मे हुनका प्राय: शैलेन्द्र कुमार झा, रमेश, नारायण जी, अरविन्द अक्कू, शैलेन्द्र आनन्द, कुमार पवन, श्याम दरिहरे, अजित आजाद, विभा रानी आ आशीष चमन सन-सन अनेको नीक किस्सागो सभक कथा साहित्य नहि पढल बुझाइ छनि। सुभाष चन्द्र यादव आ जगदीश मंडलक कथा त ………। जँ पढल छनि त हुनक ई संग्रह तेकर प्रमाण नहि दैत अछि। एहि लेल किन्तु हीरेन्द्र जी केँ असगरे दोषी नहि ठहराएल जाए सकैत अछि। मैथिली मे लेखक त लेखक, कथा साहित्य पर समीक्षा लिखनिहार, सम्पादक-संग्रहकर्ता मे अनेक एहेन नामवर विद्वान सभ छथि जिनकर दृष्टि अपन टोल, गाम, आ लगपासक कथाकारक कथा सँ बाहर नहि जाए पाबैत अछि। किछु ज्ञानी महानुभाव एकरे प्राय: “मैथिल आँखि” कहै छथि। एहि तथाकथित विद्वान आलोचक-प्रवर सभक आलोचना पोथी सभ मे घुमाए-फिराए कए ओतबे कथा आ कथाकारक चर्चा भेटैत अछि जेकरा संग हुनक ऊठ-बैठ छनि वा जे सभ हुनक लगुआ-भिरुआ छथि, अनचोक्के कोनो आन नाम चलि आएल त से अलग बात। मैथिलीक इएह चलनक प्रताप अछि जे ललित केँ हुनक मृत्यूक बाद चिन्हल गेलनि आ शैलेन्द्र कुमार झा (आरोह-अवरोह) सन महत्वपूर्ण कथाकार अपरिचित रहि मुख्यधारा सँ कटि गेला। पुस्तक प्रकाशन आ वितरणक संग-संग पाठक तक पहुँचबाक समस्या सेहो मैथिली लेल कोंढ जकाँ भए गेल अछि किन्तु कोनो समीक्षक एकरा बहाना बनाए अपन अज्ञानक लेल एकरा अपन अढ बनाबथि, सेहो स्वीकार्य आ क्षम्य नहि अछि। “ट्रान्सफर्मर” के उदाहरण लिअ जे अखनि तक हमरा अप्राप्य छल आ कमल मोहन चुन्नू जीक माध्यम सँ समीक्षार्थ हमरा उप्लब्ध कराएल गेल। हमर अपन व्यक्तिगत पुस्तकालय मे पोथीसभक प्रचूरताक अछैतहु जँ हमरा मैथिलीक समग्र कथा-साहित्य पर लिखबाक रहितए त की हमर कर्तव्य नहि बनैत छल जे हम अपन प्रयास सँ ई आ अपना लग अनुप्लब्ध आन-आन कथा-संग्रह एकठ्ठा करितहुँ आ तखनिए ओहि विषय पर अपन कलम चलैतहुँ? आलोच्य पोथीक अध्ययन सँ हीरेन्द्र कुमार झाक पाठक होएबाक घोषणाक पुष्टि हएब कने कठिनाह बुझाइत अछि। खबर केँ अखबार बुझि लेब एकटा अलग गप अछि। ओना “ट्रान्सफर्मर”क कथा-जगत सँ गुजरैत ई कहल जाए सकैत अछि जे एहि संग्रहक माध्यम सँ हीरेन्द्र कुमार झा मैथिलीक बहुत रास प्रायोजित कथाकार सभ सँ बहुत आगू गेल छथि। हीरेन्द्र जीक आग्रह छनि जे हुनक कथासभ केँ मैथिली कथा-साहित्यक धारा केँ ध्यान मे नहि राखि, सामाजिक परिवेश आ ओहि मे जीबैत उपभोक्तावादी मनुष्य केँ ध्यान मे राखि पढल जाय। हुनक एहि आग्रह मे जँ किनको गर्वोक्ति जकाँ बुझाबए त हमरा कोनो अचरज नहि हएत। ओ एकर माध्यम सँ अपन कथाक विराट फ़लक दिआ संकेत करैत बुझाइ छथि किन्तु हुनक पोथीक अन्तर्वस्तु एहि बातक कनिको टा समर्थन करैत नहि देखाइत अछि। हुनक कथासभ निस्सन्देह सामान्य सँ उपर अछि किन्तु मैथिलीक वायवीय आलोचना-समीक्षाक पटल पर अखनि तक अचर्चित आ अनठिआएल अनेक रास प्रतिभावान कथाकार जाहि मे किछु गोटेक चर्चा उपर कएल गेल अछि, तक पहुँचबा मे अखनि हुनका समय लगतनि, अपन घोषणाक प्रवृत्ति पर नियंत्रण राखि प्रयासरत रहए पड़तनि। ई ध्यान राखल जएबाक प्रयोजन अछि जे सामान्य पाठक आ रचनाकार पाठक मे मौलिक अंतर होइत छै। सामान्य पाठक जे पढैत अछि तेकरा ओ स्थूल रूप मे ग्रहण करबा लेल, स्मरण राखबा लेल स्वतंत्र अछि, स्वच्छन्द अछि। रचनाकार पाठक जँ एना करत त ओकरा मे भटकाव एतै। रचनाकार पाठक कोनो पोथी पढओ कि जीवन केँ पढओ, ओकरा लेल ओ सभ कच्चा माल जकाँ अछि आ ओकरा सँ ई अपेक्षा रहैत अछि जे ओ एकरा सभ केँ शुद्धता सँ ग्रहण कए अपना भीतर मथि कए, पचा कए अपन काज जोगर सूक्ष्म-तत्व केँ निकालि लिअए। आलोच्य संग्रह ई संकेत दैत अछि जे हीरेन्द्र जी एहि प्रक्रिया केँ अखनि तक साधि नहि सकल छथि आ तेँ ओ अखनि भटकावक शिकार होइ छथि। ई भटकाव हुनक कथा सभ मे विभिन्न रूप मे आबैत अछि जाहि मे अनावश्यक आ अनौचित्यपूर्ण विस्तार एकटा कारक अछि। साहित्यक कोनो विधा मे कोनो वाक्य, कोनो शब्द फाजिल नहि होइ छै आ जँ भेलै त ओ पाठक केँ वा त भ्रमित करैत अछि वा बोर। रचनाकारक काज पाठकक धैर्य वा समझदारीक परीक्षा लेब नहि होइ छै, से ध्यान राखल जएबाक चाही। पाठक हएबाक घोषणाक बाद त हीरेन्द्र जी सँ किछु बेसीए अपेक्षा हएबाक चाही। “सोन त कान नहि”, “धनात धर्मम्”, “उभयचर”, “भीआरएस”, आदि एहि संग्रहक कथा सभ एहि विस्तारजनित भटकावक शिकार भेल अछि। एहि संग्रहक अनेक कथा एहि महत्वपूर्ण तथ्य दिस सेहो संकेत करैत अछि जे कथाकार शीर्षकक महत्व केँ गंभीरता सँ नहि लेलनि अछि। ई ध्यान राखल जएबाक चाही जे कथाक शीर्षक कथाक ताला केँ खोलबाक सटीक कुंजी होइत अछि, संग्रहक भुमिका नहि। एकटा सटीक शीर्षकक उपयोग कोनो कथाक अर्थ केँ व्यापकता, रूप केँ वास्तविकता आ अन्तर्वस्तु केँ समग्रता सँ भरि दैत अछि। कखनिओ-कखनिओ त जे बात संपूर्ण कथा मे प्रत्यक्षत: कतहु नहि देखाइत अछि से ओकर शीर्षक जगजियार कए दैत अछि। उदाहरण लेल शैलेन्द्र कुमार झाक “आरोह-अवरोह”, शैलेन्द्र आनन्दक “घरमुहाँ”, अरविन्द ठाकुरक “अन्हारक विरोध मे” (अपन पोथीक चर्चा लेल क्षमासहित), श्याम दरिहरेक “बड़की काकी एट हाटमेल डाट काम”, विभा रानीक “खोह सँ निकसैत”, रमेशक “दखल” आ “समानान्तर” आदि संग्रहक कथा आ नारायण जी, अरविन्द अक्कू, कुमार पवन, अजित आजाद, आशीष चमन आदिक विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित कथा सभ केँ देखल जएबाक चाही। पुरनका पीढी मे ई खासियत आ सजगता ललित, धूमकेतु, राजकमल चौधरी, बलराम, प्रभास कुमार चौधरी आदिक कथा मे देखाइ पड़ैत अछि। हीरेन्द्र जीक “सोन त कान नहि”, “कम्प्रोमाइज” सन कथा सटीक शीर्षकक अभाव सँ ग्रसित भेल अछि। “कम्प्रोमाइज” शीर्षक केँ जस्टिफाइ (न्यायोचित सिद्ध) करबाक लेल त कथाकार एहि कथाक दशे-दिशा बिगाड़ि देने छथि। एना लागैत अछि जे शीर्षक पहिने देल गेल आ कथा बाद मे लिखल गेल अछि। एहि मे कथाकार पुतुलक मानसिक उहापोहक (जेकर कोनो तर्कसंगत औचित्य नहि बुझाइत अछि) वर्णन करैत-करैत, नारीवादक अनेरुआ पैरोकार बनैत-बनैत एकदम सँ पुरुषक पक्ष मे चलि जाइ छथि। बिगड़ल केँ सम्हारए आ स्वयं केँ आधुनिक आ नारीवादी देखैबाक चक्कर मे कथाकार एकटा प्रेम-मनुहारक कथा केँ गलत शीर्षक दए आ फेर ओहि शीर्षक केँ जस्टिफाइ करबाक लेल कथाक अंत मे पुतुल सँ कम्प्रोमाइज बला गप कहबा कए अनेरे भ्रमित होइतहु छथि, करितहु छथि। कथाक समापन जाहि भावनात्मक ढंग सँ होइत अछि ताहि मे कम्प्रोमाइज सन गप कतय सँ अएलै से पाठक सोचितहि रहि जाइत अछि। कथाकारे जँ अपन कथाक कथ्यक प्रति भ्रमित रहत त ओ मूल रूप मे पाठक केँ केना पचतै? हीरेन्द्र जीक दुराग्रहक हद तक जाइत एकटा आओर आग्रह अंगरेजी शीर्षकक प्रति एहि संग्रह मे देखाइत अछि। जँ एकरासभ केँ लोक-वेदक बीच प्रचलित हएबाक तर्क केँ सोझाँ राखिओ ली त एकर भ्रष्ट प्रयोगक की औचित्य? ट्रान्सफार्मर, वोट, क्वार्टर, रिजर्वेशन,वीआरएस शुद्ध प्रयोग हेतै, ट्रान्सफर्मर, भोट, क्वाटर, रिजर्भेशन, भीआरएस नहि, जेनाकि लेखक कएने छथि। ओना त मैथिली मे प्रचण्ड-शुद्ध रामराज छै। जेकरा जेना मन होइ छै तहिना लिखै ए, अपन वर्तनी अपने बनबै ए। मैथिलीक पुरोधा साहित्यकार-व्याकरणाचार्य लोकनि वर्तनीक एकरूपताक नाम पर फाइव-स्टारी मौज लैत लाखक-लाख यात्रा-भत्ता उठाए रहल छथि आ फेर अपन कबीला मे घुरि अपनहि धुन-ताल पर गाबले गीत गाबि रहल छथि। तेँ असगरे हीरेन्द्र जी पर दोष किऐ देल जाए? हीरेन्द्र कुमार झा जन-जीवनक नीक पर्यवेक्षक छथि आ से बात हुनक घोषणाक अनुसार हुनक एहि संग्रह मे परिलक्षित सेहो होइत अछि। किन्तु एतहि हुनक एकटा कमजोरी सेहो अभरि कए सोझाँ आबैत अछि। रचनाकारक चहुतरफ बहुत रास चीज अपन बहुआयामी रूप मे उपस्थित अछि आ बहुत रास उथल-पुथलक संग अनेक रास घटना घटैत रहैत अछि। स्रृष्टिक ई विविधता आ व्यापकता जे छै से रचनाकारक लेल रा-मैटेरियल अछि आ तेकरा मे सँ रचनाकार अपन रचनात्मक बुद्धि-विवेक सँ अपन काजक वस्तु चुनि समुचित मात्रा मे रचनाक विभिन्न विधाक बेगरतानुसार ओकर उपयोग करैत अछि। क्वालिटी आ क्वान्टिटी (गुण आ मात्रा) के सटीक समिश्रणे सँ कोनो नीक आ अमोल रचना बनि कए बहराइत अछि। से नहि भेने रचना धड़ाम! रचनाकारक आब्जर्वेशन (पर्यवेक्षण) के क्रम मे जे किछु पकड़ाएल ताहिसभ केँ एकहि ठाम जेना-तेना ठुसने जाइ त ओ साहित्य नहि भए कए किदन-कहाँदन त भैए जाएत, रचनाकारक चयन-ग्रहण-विवेक पर प्रश्न सेहो ठाढ करत। कथाकार हीरेन्द्र जीक पर्यवेक्षण क्षमताक गवाही त आलोच्य संग्रह दैत अछि किन्तु गुण आ मात्राक तालमेलक समझ अखनि तक हुनक सम्हार मे आएल नहि बुझाइत अछि। एकर नतीजा ई भेल अछि जे ओ कथा कहबाक सत्ती कथा बनबै मे लागल बुझाइ छथि आ ओकर विश्लेषण आ निष्कर्षक काज सेहो संगे-संग करैत चलै छथि। संभव अछि जे ई प्रयासपूर्वक नहि, अपन अवचेतनक निर्देश पर करैत होथि, किन्तु एहि प्रवृत्ति पर नियंत्रण साधबाक लुरि त हुनका अपने विकसित करै पड़तनि। किऐक त एहि सँ कथाक रोचकता आ पठनीयता पर नकारात्मक असर पड़ैत अछि। हीरेन्द्र कहै छथि जे हुनक कथा मे “एकटा ढंगक चरित्र निर्माण नहि भए पबैत अछि”। जँ ओ अपन एहि कमजोरी केँ चिन्है छथि त हुनका “कम्प्रोमाइज” सन कथा लिखए सँ परहेज करबाक चाही। शीर्षक आ कथाकारक मंशाक अनुसार एहि कथा मे नायिकाक सक्कत आ संघर्षशील चरित्र अभरि कए अएबाक चाही छल किन्तु तेकर विपरीत ओ एकदम सँ लरगुज भए गेल अछि। तखनि, संग्रहक भुमिका मे भीमनाथ झा लिखै छथि जे हीरेन्द्र जी केँ विकासक आर आवश्यकता छनि, कथा केँ कसब सीखथु, मर्म केँ स्पर्श त करैत अछि मुदा प्रभाव केँ आर तीव्र बनयबाक चेष्टा करथु, भाषा केँ आर माजथु ; आ ओतहि विभुति आनन्दक मन मे ओ एकटा खिच्चा सपना बनि कए डिभिआएल छथि ; आ आओर त आओर स्वयं कथाकार अपन एहि संग्रह केँ कथा-संग्रह नहि कहि, कथाक मोटरी वा बोझ सनक कोनो वस्तु कहब केँ बेसी उपयुक्त बुझै छथि ; तखनि कोनो पाठक वा समीक्षक लेल आओर किछु विशेष कहबाक जोगर बचैत की अछि – शुभकामनाक अतिरिक्त। 1995 मे मराठीक सुप्रसिद्ध साहित्यकार कुसुमाग्रज (वि वा शिरवाडकर) सँ नासिक(महाराष्ट्र) मे भेंट आ दीर्घवार्ताक सौभाग्य भेटल छल। ओ एकटा मंत्रवाक्य कहने छला – “ लिखू, खूब लिखू, लिखले सँ भाषा समृद्ध होइत अछि”। कुसुमाग्रजक ओहि मंत्रवाक्यक परिपेक्ष्य मे ई त कहले जाए सकैत अछि जे हीरेन्द्र कुमार झाक “ट्रान्सफर्मर” सँ मैथिली साहित्य समृद्ध भेल अछि – श्रीवृद्धि करओ नहि करओ, मात्रावृद्धि त भेबे कएल। विहनि कथा - सत्ता-चरित अत्याधुनिक तकनीकबला एहि युग मे ई मकान कनी अजीब सन रहय। एकदम गोलाकार। एनमेन त नहि, किन्तु कनी-मनी संसद भवनहि जकाँ पुरान स्थापत्यक नमूना। अही मकानक एकटा भाग मे भाड़ा पर रहैत छला हमर मित्र। हम सभ मित्रक कोठली मे रही। जेना-तेना बहुत भाँजक बाद ई अवसर भेटल रहय। कोठली भीतर सँ बन्द रहय आ हम सभ प्रतिबन्धित फिल्म देखैत रही। गैरकानूनी आ असामाजिक करतूतक अपन एकटा अलगहि रोमांचक आनन्द होइ छै। सम्पूर्ण कोठली हमर सभक अभद्र-कामुक टिप्पणी, उत्तेजक सिसकारी आ गरम-गरम उसांस सँ भरल रहय। हँ , हम सभ अहि लेल अवश्य अतिरिक्त रूप सँ चौकस रही जे स्वर कनी दबले रहय आ हमर सभक किरदानीक भनक कोठली सँ बाहर नहि जाय, सार्वजनिक नहि हुअय। पहिलका सीडी मे देशी पात्र सभ रहय। ओकर बाद दोसर सीडी लगाएल गेलय जाहि मे विदेशी पात्र सभ रहय। एह ! जिनगीक खुलस्ता मजा बहि ई विदेशीए सभ लैए ! सीडी खतम भेल त हम सभ निर्वाक भेल रही – इस्स ! एहन एहन खेल !! खट ! खट ! खट ! केबाड़ी पर चोट पड़ल। चोटक प्रभाव कोठलीक निस्तब्धता कें आतंकवादी विस्फोट जकाँ चिर्रिचोथ कएने चलि गेल। हम सभ गोटे आतंक सं भरि गेलहुं। केकरहु बकार नहि फुटलय। कनी देर तक अपन-अपन आँखि मे बड़का-बड़का प्रश्नवाचक चिन्ह लेने एक-दोसराक दिस बकर-बकर ताकैत रहि गेल रही – बस। टीवी बन्द कएल गेल। सीडी कें बिछौना तर नुकाएल गेल। सभ गोटे अपन-अपन चेहरा पर भद्रताक आवरण ओढि जन-प्रतिनिधि जकाँ अपन-अपन आसन पर संच-मंच बैसि गेलहुं। आ तखनि जाए कए हमर मित्र आगू बढि केबाड़ी खोललक। बाहर मे मकान मालिकक समदाही (दोसर पत्नी) ठाढ रहय। केश छिड़िआएल, आँखि लाल टेस, अंचरा जेना-तेना देह पर फेकल आ लाल भेल चेहरा आगि सँ लह-लह करैत। ओकर अवस्था कें क्रोधाधिक्यक परिणाम बुझि हमर सभक प्राण सुखि गेल। ओ मित्र कें धकिआबैत कोठली मे घुसि अएलीह। फेर पलटि कए खुललाहा केबाड़ी कें भिड़यलनि, छिटकी लगयलनि आ हमरा सभक दिस घुरि कए बोलीक गोली दागलनि –‘इएह सभ करय छी अहाँ सभ बन्द कोठली मे ?’ हम सभ गोटे समवेत स्वर मे “ कहाँ किछु…कहाँ किछु “ कहैत लटपटाइत बोली मे सफाइ दिअय चाहलियनि। ओ फनफनाइत बाजलीह – “ झूठ नहि बाजय जाउ। अहाँ सभक सभटा किरदानी, सभटा देशी-विदेशी खेला हम देखलहुं। अप्पन आँखि सँ – ओहि भुरकी दके।“ हम सभ गोटे अपराधी मुद्रा मे एकदम सँ सकदम। हुनक स्वर मे आवेश रहनि। स्वर पहिनहुं मद्धिम रहय, जेकरा ओ और मद्धिम कयलनि आ फुसफुसाइत जकाँ बाजलीह – “ तेसरो ए की ?” विहनि कथा- स्वयंभू जेना कोय अपन बापक जमीन्दारी मे टहलान मारय लेल बहरायल हुअय, तहिना ओ बहुत अगरायल-मगरायल जकाँ हमर कैम्पस मे घुसल। हम कनडेरिए ओकरा दिस ताकलहुं। ओकर सुडौल देहयष्टि पर मलमलक गेरुआ वस्त्र छलमलाइत रहय। माथ पर घटाटोप रक्त-चन्दनक लेप। ओकर अवलोकनक क्रम मे हमर दृष्टि ओकर चरण दिस गेल। एह ! बेस दामी ब्रैण्डेड चप्पल। वयस प्राय: तीस-पैंतीसक लपेट मे। गोर दपदप मुखड़ा पर कारी-कारी दाढी-मोंछ – एकदम मान-मनोहर। अकस्मात मन पड़ि गेला जीवनेश्वर बाबू। कहैत रहथिन जे दाढी चारि तरहक होइ छै –चिलम-चूतिया, लहसून-गांड़ी, मान-मनोहर आ दालम-दाला। एकरा ओ ततेक तेज गति सँ बाजैत रहथिन जे सभटा प्रकार एक-दोसरा मे ओझराए-मिझराए कए एकमएक भए जाइत रहय – चिलम चूतिया लहसून गांड़ी मान मनोहर दालम दाला। से खिस्सा अलग। जखनि ई मान-मनोहर दाढी-मोंछबला मलमलक गेरुआ-वस्त्रधारीक शुभागमन हमर कैम्पस मे भेल रहय तखनि हम अपन हाथ मे खुरपी लेने दूटा छोटकी करोटनक पौधा रोपैक नियार मे कियारी लग बैसल रही। एहन नौटंकीबाज पुरहितिया समुदायक प्रति हमरा मन मे कोमलता लेशमात्रहु नहि रहैत अछि। आ आब त अहि बिना पूजीक करगर मोनाफाबला धंधा मे विभिन्न जातिक लोक सेहो खुबे आबि रहल अछि। आब अहि मे पुरहित-वर्गक एकाधिकार नहि रहलय। से अहि देशक विभिन्न प्रदेश मे ठाम-ठाम उगल छोट-नमहर मंदिर आ आश्रमसभ अपन कथा अपनहि कहय ए। तखनि, दुआरि पर आयल मांगनिहार कें किछु भेट जाय, ओ खाली हाथ नहि जाय, तहि पारिवारिक परम्पराक अनुपालन त भरिसक करिते छी। ओ कोनो शहंशाह जकाँ हमर निवास-भवन आ फुलबाड़ी कें हियासैत हमरा दिस ताकैत बाजल – “ मकान आ फुलबाड़ी त राधा बाबूक सेहो बड़ भव्य अछि किन्तु ओ अहाँक पासंगहु मे नहि। अहा हा, अतिसुन्दर, अतिरमणीक।“ खड़ी बोली मे बाजल ओकर गप सुनि हमर कान ठाढ भेल। हमरा लागल जेना ओ कोनो रेफरी जकाँ हमरा राधा बाबूक प्रतिद्वन्द्विता मे सोझा-सोझी ठाढ करबाक प्रयास मे हमर चापलूसी करैत हुअय। ओना हमरा लेल ई कोनो नव बात नहि रहय। हमर शहर मे हमर आ राधा बाबूक राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता जगजाहिर छैआ कखनिओ काल हमरा चिढाबैक लेल या हमर चापलूसी करबाक लेल अनेक लोकसभ एहन टिप्पणी करैत रहैत छथि। अखनि किन्तु एकटा साधुवेशधारीक मुँह सँ एहन वचन सुनि अचरज भेल, अनकठ्ठल सन लागल। अहि सँ और किछु हुअय ने हुअय, हमरा अहि अनामंत्रित आगन्तुकक औकाति आ चरित्र बुझाए गेल। हम अपना दिस सँ एकहु टा शब्द नहि बाजलिअय। हम अपन काज करैत बीच-बीच मे ओकरा दिस ताकि टा लैत रहिअय, बस। हमर चुप्पी सँ असहज भेल ओकर मुँह सँ ओकर अभीष्ट बहरयलय – “ किछु भेट जाय अहि दरबार सँ।“ ता हम दुनू करोटन रोपि चुकल रही। उठिकए बरण्डा लग आबि, खुरपी राखि बाड़ीबला नल पर आराम आ सहजता सँ अपन हाथ धोलहुं। बरण्डा पर चढि घरक भीतर अएलहुं। ओ बाहरहि मे ठाढ रहल। खुट्टी पर टांगल अपन कपड़ाक जेबी मे हाथ देलिअय त दू टा सिक्का हाथ मे आएल – एकटा पँचटकिया आ एकटा दूटकिया। क्षण भरिक असमंजसक बाद पँचटकिया कें जेबी मे वापस राखि दूटकिया लेने बाहर अएलहुं आ ओकरा दिस ओ सिक्का बढाए देलिअय। ओ एक बेर सिक्का दिस आ फेर हमरा दिस ताकलक। ओकर आँखि मे हमरा प्रति सौंसे सृष्टिक घृणा लपलप करैत धधरा मारैत रहय। हम ओहि धधरा सँ एकदम अप्रभावित भेल दोबारा ओकरा सिक्का लए लेबाक इशारा केलिअय। “ ई की दए छिअय ! एतेक बड़का दरबार……” – ओ ठोढ टेढ करैत बाजल। हम मौन त रहबे करी, ओकर औकाति तौललाक बाद दृढ सेहो रही आ बिना एक शब्द बाजने फेर ओकरा दिस सिक्का बढैलिअय। “ ई त भिखमंगाक रेट छिअय। हम त संत छी। “- कहैत ओ घृणा आ धिक्कारक दृष्टिए हमरा दिस ताकलक आ हमरा दिस अपन पीठ कयने बरण्डा सँ नीचां उतरि गेल। हम अहि अध्याय कें समाप्त मानी कि नहि मानी से सोचैत कोठली दिस घुरबाक उपक्रम करितहि रही कि ओ बरण्डा सँ उतरलाक बाद अकस्मात फेर हमरा दिस घुरल। “लाउ, दए दिअ। अहाँक एतबेक श्रद्धा अछि त…” अहि बेर ओ खड़ी बोली बिसरि गेल आ शुद्ध मैथिली मे बाजल । हम बरण्डाक कोर पर आबि ओकर पसरल हाथ पर दूटकियाक सिक्का राखि देलिअय। सिक्का ग्रहण करितहि ओ पलटि कए कैम्पसक गेट दिस बढि गेल। जाइ बेर किन्तु ओकर पएर हल्लुक आ तेज रहय, जेना देह पर सँ जमीन्दारीक बड़का भारी बोझ उतरि गेल हुअय। एक बेर फेर मन पड़लाह जीवनेश्वर बाबू आ हुनक कहल दाढीक प्रकार। किऐ ने किऐ, हमरा भक भेल जे जाइत काल साधुवेशधारीक दाढीक प्रकार सेहो प्रथमबला भए गेल हुअय। विहनि कथा- दुर्गन्ध ई हमर सौभाग्य जे देवनारायण बाबू हमरा अहिठाम आबैत रहैत छथि। हुनक व्यक्तित्वक आभा सँ हम सदैव चोन्हिआयल रहल छी। मोटका खादीक बिन कलफक धोती-कुर्ता-बण्डी, मुँह पर खुटिआयल खिचड़ी दाढी आ कन्हा पर सदैव लटकल सर्वोदयी झोरा हुनक समाजवादी कलेवर कें जगजियार कयने रहैत अछि। तीस वर्ष सँ बेसीक हुनक राजनीतिक जीवन घोर संघर्षमय रहल अछि। अछुतोद्धार सँ प्रारम्भ हुनक सामाजिक जीवन धर्म-निर्पेक्षता, सम्पूर्ण क्रान्ति आ सामाजिक न्याय सन-सन अनेको सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता सँ लैस रहल अछि। लोहियाक आह्वान पर एक जमाना मे ओ अपन जनेउ तोड़ि फेकि देने छलाह जेकरा चलते बभनटोली हुनका बारि देने छलनि आ कोनो यज्ञ-प्रयोजन मे हुनका निमंत्रणादि देब प्रतिबन्धित भए गेल छल। देवनारायण बाबूक लेल किन्तु धनि सन। ओ अपन घर सँ लागले जकाँ बसल धनुकटोली, चमरटोली आ दुसधटोली कें अपन समाज बनाए लेने छलाह आ ओकरे सभक जागरण मे रमि गेल छला। मंच सँ नेहरू-गांधी कें ट्रेटर, कांग्रेसीसभ कें अंग्रेजक उत्तराधिकारी आ पुरहित-वर्ग कें सामाजिक विखण्डनक जिम्मेदार कहब हुनक ट्रेडमार्क जकाँ बनि गेल छल। किछु दिन पहिने कोय कहने छल जे एम्हर देवनारायण बाबूक सम्पर्क सरकारी खेमा सँ खूब बढल अछि। फेर सुनय मे आयल जे ओ सत्ता-पार्टी ज्वाइन सेहो कए लेलनि। बीच-बीच मे आनो-आन नीक-बेजाय बातसभ हुनका दिआ सुनय मे आबैत रहैत रहय आ हम ओकरा एक कान सँ सुनि दोसर सँ बाहर कए दैत रही। सार्वजनिक जीवन मे रहनिहार लोक चर्चा मे रहितहि अछि आ लोकसभ अपन सुविधानुसार ओकरा दिआ खिस्सासभ बनबैत रहैत अछि। तें सत्ता-प्रतिष्ठानक विरुद्ध सतत ठाढ रहल देवनारायण बाबू दिआ कहल गेल ईहो टटका गप हमरा कोनो अफवाहे जकाँ बुझायल रहय – राजनीतिक विद्वेष सँ भरल गपैती जेकर कोनो गोड़-मूड़ी नहि होइ छै। पछिला बेर आएल रहथि तखनिओ एकटा सनसनीखेज खबर वातावरण मे पसरल रहय हुनका दिआ। की त हुनक बेटी एकटा हरिजन संग भागि गेलनि। किन्तु चाय पिबैत काल हुनके मुँह सँ यथार्थ गपक जनतब भेल रहय। हुनकर गाछ छाप समाजवादी पार्टीक एकटा मित्र रहथिन महावीर राम जे कालान्तर मे कांग्रेस पार्टी मे सम्मिलित भए विधायक भेला आ बाद मे मंत्री सेहो। पार्टी बदललाक बादहु दुनू गोटेक मैत्री बनल रहल छलनि। देवनारायण बाबू जाति-पाति मानितहि नहि छलाह आ महावीर राम सेहो हुनके विचारधाराक लोक। देवनारायण बाबूएक अनुसार दुनू मित्र अपन आपुसी सहमति सँ परस्पर मैत्री कें विधिवत सम्बन्ध मे बदलबाक निर्णय कयलनि आ महावीर बाबू हुनक पुत्री कें अपन पुत्रवधू स्वीकार कए मित्र सँ समधि भए गेलाह। लोकक मुंह कें के रोकत। कहैत रहओ लोक अंट-बंट। तें हम लोकक गप मे नहि पड़ैत रही। देवनारायण बाबू हमरा अहिठाम आबय छथि हमरा अपन लोक बुझिए कए ने आ से हमरा लेल यथेष्ट रहय। देवनारायण बाबू हमरा अहिठाम आबथि, चाय पीबथि आ अपन गपक क्रम मे एकदम स्वाभाविक तौर पर अपना दिआ पसरल कुप्रचारक खण्डन कए जाथि। हमरा कोनो अतिरिक्त जिज्ञासा हुअय त से हम पुछि लैत रहियनि आ ओ बिना लाग-लपेट के तेकर उत्तर दए हमरा संतुष्ट कए देथि। दू-तीन मासक अन्तराल पर अहि बेर ओ अएलाह त स्वाभाविक तौर पर हमर मन अनेक रास जिज्ञासु प्रश्नसभ सँ भरल छल। किन्तु अहि बेर किछु एहन सन भेल जे सभटा प्रश्न मनहि मे रहि गेल, पुछबाक अवसरहि नहि भेटल। आन बेर असगर आबैत छलाह आ केतबो देर बैसथि त चायक अलावा कोनो चीज नहि लेथि। एकाध बेर जलखैक कोनो सामग्री मंगैलियनि त ओ बिगड़ि गेल छलाह – ‘ई सभ सामन्तवादी ढकोसला छै। समाजक हाशिया पर बौक भेल ठाढ अन्तिम आदमी जा तक भुखल छै हम सभ ई अय्यासी केना कए सकय छी !’ अहि बेर हुनका संग चारि गोटेक जमात रहनि। सभ गोटे कें बैसाबिते रही कि ओ खूब अधिकार भाव सँ किछु चाय-जलखै के फरमाइस ठोकि देलनि। हुनकर बदलल बग्गय-बानी हमरा चकित कए देने रहय। चेहरा एकदम क्लीन-शेव्ड आ नील-टिनोपाल सँ चकचक कलफदार धोती-कुर्ता मे ओ जेना ओ नहि छलाह। सदति बेमाय फाटल पैरक सहोदर बनल ओ हवाइ चप्पल अहि बेर अलोपित भए गेल छल आ ओतय चढल छल चेरी ब्लासम सँ चमचमाइत काफ लेदरक दामी हाफ शू। हमर बाहरी कमरा हुनक आबितहि आन बेर जकाँ घामक फोकराइन गंध सँ नहि हुनक देह सँ आबैत रजनीगंधाक अत्तर सँ सुगंधित भए गमगमाए उठल। हम हुनक हाल-चाल पुछबाक नियार करितहि रही कि हुनक तुरछल टिप्पणी आयल -‘ एह ! अहाँ दिस अएबाक डगर बड़ घिनायल अछि।‘ टिप्पणी यथार्थ होइतहु अप्रत्याशित रहय तें हमरा धक्का जकाँ लागल आ हमर अकबकी टुटि गेल। हुनक दिव्यताक आभा सँ घकुचल-थकुचल हमर बाह्याभ्यंतर अपराधबोध आ हीनताबोध सँ एकहि संग ग्रसित होइत हमर थरथराइत ठोढ सँ अपन स्पष्टीकरण देबय लागल – ‘ अहाँ कें त बुझलहि ए जे बगलहि मे दलित सभक टोल छै। ओकरासभ कें कतय शौचालय आ सेफ्टी टैंकक सुविधा-सुभीता ! वर्षा-बुन्नीक समय से छै। खेत कि बंसबारि कि गाछी सभठाम पनिए-पानि। कतय जएतै ? तें डगरेक कात मे निबटैत अछि। तें।‘ ओ तमतमायल बाजलाह- ‘ ईह दलित ! टोलक छौड़ा सभ जिन्स ढांठने रहय ए, मौगीसभ रंग-बिरंगक साड़ी आ तर मे ब्रा-पैन्टी पहिरने रहय ए आ हगत लोकक कपार पर ! एह ! दुर्गन्ध सँ नाक फाटि गेल। ‘ देवनारायण बाबू भनभनाइतहि रहथि ता अंगना सँ चाय-बिस्कुट-निमकी आबि गेल रहय। सभ गोटेक ध्यान ओनहि चलि गेलय। देवनारायण बाबू आ हम एकहि संग चायक कप उठैलहुं। देवनारायण बाबू निमकी-बिस्कुट संग चायक चुस्की लैत आगू की-की बाजलाह से ग्रहण करय सँ हमर श्रवणेन्द्रीय मुकरि गेल। हमर घ्राणेन्द्रीय संवेदनशीलताक हद पार कए एकटा असहनीय दुर्गन्धक अनुभूति करय लागल। हम शिष्टाचारवश चाय पीबय मे देवनारायण बाबूक संग दिअय चाहैत छलहुं किन्तु ओ अज्ञात दुर्गन्ध हमरा सहल नहि गेल आ हम चायक भरल कप नीचा राखि देल। हमर एहि अशिष्टता दिस देवनारायण बाबूक दृष्टि गेल रहनि कि नहि से हमरा नहि बुझल अछि। विहनि कथा- यूटोपिया राजनीति सँ मोहभंग की भेलनि, शंकरदेव सौंसे दुनियाँ सँ अपना केँ काटि लेलनि। विध करय लेल कखनिओ केँ कोनो गैरराजनीतिक स्वयंसेवी संगठनक कोनो-कोनो आयोजन मे चलि जाथि, कहिओ काल अपनहि कोनो साहित्यिक गोष्ठी-तोष्ठीक आयोजन कए लेथि, बस। हुनक सार्वजनिक जीवन एतबेटा रहि गेल छलनि। अहिसभ सँ जे अफरात समय भेटलनि, तेकर प्रतिफल छल हुनक घरक आगूक फुलबाड़ी। एक सँ एक दुर्लभ प्रजातिक फूल,सजावटी पौधा आ औषधीय वनस्पति सँ सजल ओहि फुलबाड़ीक सौंसे परोपट्टा मे प्रशंसा होइ। शंकरदेव प्राय: भरिदिन ओही मे लागल रहैत छलाह। कियारी मे खुरपी आ खाली जगह पर झाड़ू – सभ अपने सँ। एकर नियमितता सँ कोनो समझौता नहि। सौंसे दुआरि आ फुलबाड़ी विलक्षण रूप सँ चिक्कन-चुनमुन रहैत छल। राजनीतिक जीवन मे जेहेन दुनियाँ-जहानक कामना आ परिकल्पना ओ करैत छलाह से प्रकारान्तर सँ हुनक फुलबाड़ी मे सजीव भेल छल। एम्हर चारि-पाँच दिन सँ शंकरदेवक दिनचर्या मे ठमकी लागि गेल छलनि। अहि बीच ओ जेना अपनहि आप सँ गप्प करथि आ निष्क्रिय ओझरी मे ओझरायल बुझाथि। गुमशुम रहथि। कत्तय खुरपी, कत्तय झाड़ू ! सौंसे फुलबाड़ी आ कैम्पस मे खढ-पातक पथार लागल। कत्तहु सँ उड़िया कए आयल एकटा पोलिथिनक झोड़ा मुस्टण्डाक गाछ मे लटकल। गुटखाक दू-तीन टा खलिया पाउच से इसरगतक जड़ि लग फेकल। पीयरका गुलाब पर पान वा गुटखाक पिरकी आ कामिनी लग सिगरेटक दू टा जरलहा टोंटी। लिलीक कतार लतमर्दन सँ रायछित्ती भेल। पुत्र केँ चिन्ता भेलनि – बाबूजी ई सभ त बर्दास्त नहि करय छथि ? पाँचम दिन ओ गप्प करबाक नियार कएने अपन हाथ मे दू कप चाय लेने आयल। शंकरदेव अपन स्टडी-रूम मे अनमना भेल, देबाल पर टहलान मारैत गिरगिट दिस ताकि रहल छलाह। पुत्र एकटा कप हुनक आ एक कप अपन आगू राखि हुनक सोझाँबला कुर्सी पर बैसि गेल। पुछलकनि - ‘बाबूजी, मन नीक ए ने ?’ ‘हँ, ठीके-ठाक अछि। से की ?’ ‘ नै, बड़ गुमसुम देखय छी।‘ ‘से कोनो तेहेन बात नै।‘ ‘ चारि-पाँच दिन सँ अहाँ फुलबाड़ी सँ विमुख जकाँ भेल छी। ओ त अहाँ लेल काज नै, अहाँक सख अछि। आ फुलबाड़िए किऐ, पोतो-पोती सँ अहाँक टोक-चाल बन्द अछि। हमरासभ केँ केनादन ने लागि रहल अछि।‘ शंकरदेव बड़ी काल तक चुप रहलाह। चाय केँ रसे-रसे घोंटे-घोंट पीलनि। तमाकुल लटयलनि। पुत्र हुनक मुँह दिस ताकैत रहल। तामाकुल झाड़ि, ठोर तर राखि शंकरदेव पुत्र दिस उन्मुख भेलाह – ‘हओ ! मंत्री भेल अपन अहिठामक विधायक राजनीति मे हमरा सँ बहुत कनिष्ट छल। प्राय: पन्द्रह वर्ष पर अपना अहिठाम आयल। फेर चुनाव छै आ अहि बेर स्थिति डगमग छै तेँ आयल, किन्तु आयल। खूब तरक्की कयलक ए पट्ठा। ओकर गाड़ी देखलहक ? दस-एगारह लाख सँ कम के नै हेतय। सौंसे दुआरि पर ओहि गाड़ीक चक्का के चेन्ह पड़ल छै। झाड़ू दए कए ओहि चेन्हसभ केँ मेटयबाक मने नै होइ ए।‘ एतेक कहि शंकरदेव बड़ी जोर सँ निसास छोड़लनि आ फेर भनभनाइत जकाँ बाजलाह – ‘अजीब बेहुदा बात छै ! एकदम बेहुदा बात ! तखनि मन के की .………’ अपन गप केँ आधा-छिधा छोड़ि ओ एक बेर फेर दीर्घ निसास छोड़लनि आ असुरता मे सठि गेल चायबला कप फेर सँ उठाकए पीबाक उपक्रम करय लगलाह। विहनि कथा- आदान-प्रदान “ हे रओ, माय करय कुटाओन-पिसाओन आ बेटाक नाओं दुर्गादत्त रओ !” “ हँ रे, बाप पढय पतरा आ बेटा जेबकतरा, तें ने रे ! “ “ ठहरह, सार ! “ “ आबह, सार ! “ विहनि कथा- अहिंसा “ हमरो दे। “ “ ………………” “ कनी दे। “ “………………” “ रे ! कनिए दे ने। “ “………………” “ ठीक छै ! आइ सँ कट्टिस। “ पद्य खण्ड मधुपजीक किछु कविता, गजल गीत आ दोहा... कविता खंड 1 पतित पीक नहि घृणा करू बुझि पतित पीक। ताम्बूल तेज-तरूआरि-दशन- सँ चिरा हृदय, रस-लाल अपन- शोभाक हेतु जे कैल दान, तकरे पवित्र हम छी प्रतीक।। मुख-निधिमे उठल तरंग तरल, नहि रहि सकलहुँ चुपचाप पड़ल। आननमे पावन, भूमिलग्न होइतहि अपूत, की उचित थीक। हम दशन बसन केर अनुरंजक जे रसिकक पूर्ण मनोरंजक। जधरस्थ हमर बुध करथि पान, अधरस्थ देखि पुनि हँटब ठीक।। नन्दनवन-विहरणशील सुरक पितरक अथवा नृप भूमिसुरक नैवेद्यक रस छी हमहि मुख्य; तें ई अपमान न करब नीक।। स्वार्थी संसारक केहन नियम, उपकृतो उपद्रव करै न कम भूषित भै भूशित कैल अहाँ, ई रीति नीति नहिएँ सुधीक।। नहि पतन एक दिन ककर हैत ? पृथ्वीक कोरमे के न जैत ? तें सकल वस्तुमे एक भाव राखक थिक, गीता पढु सटीक।। 2 छुतहर अस्पृश्य भेलहुँ कै कोन पाप ? मृत्तिका एक एके कुम्हार, ओ दण्ड चक्र चीवर सम्हार। आकार एक क्यों मंगल घट, गौबरौड़ बनल हम सही ताप।। जाहि मृगनयनिक कटि माथ उपर, घुमलहुँ कतेक दिन रसनिर्झर। से देखि दूर कहि दूर जाथि, नहि जानि देल के एहन शाप ? जे कुकुरौं कैं सुतधि पलंग, पी मद्य विलोचन करथि रंग। से देखि हमर मुख करथि घृणा; दुर्भाग्यक पड़ि गेल केहन छाप ? चढ़ि चाक प्रदक्षिण हरिक कएल, आवामे तनकें हवन कएल। फल तकर केहन विपरीत भेल, झूठे थिक सबटा योग-जाप।। घट-घटमे वासी ब्रह्म एक, हो भान अविद्यासँ अनेक। बुझितहुँ वेदान्ती हमर वारि। अपवित्र कहथि क’ क’ प्रलाप।। हो सदिखन संसारक सुधार, पतितौक बनथि क्यो कर्णधार। उद्धार सुधारकसँ न हमर, ई सभ्य समाजक थिक प्रताप।। 3 घसल अठन्नी जेठक दुपहरि बारहो कलासँ उगिलि उगिलि भीषण ज्वाला आकाश चढ़ल दिनकर त्रिभुवन डाहथि जरि जरि पछबा प्रचण्ड बिरड़ो उदण्ड सन सन सन सन छन छन छन छन आगिक कण सन सन्तप्त धूलि अछि उड़ा रहल। खोंतामे पक्षी संच मंच हिलबए न पाँखि खोलए न आँखि तरुतर पशु हाँफै सजल नयन चरबाह भागि घर गेल विमन इनहोर बनल पोखरीक पानि जलचर-थलचर काँपए थर थर टाटी, फड़की, खिड़की, केवाड़ लागल घर-घर ई अग्निवृष्टि! नहि कतउ बाटमे बटोहीक हो एखन दृष्टि संहार करत की प्रकृति सृष्टि- ई अग्निवृष्टि! श्री मान लोकनि जे तुन्दिल बनि मसलंगमे ओंगठल शरबत छनि-मिसरी बदाम बरफें घोरल नर्तित बिजुली पंखा तर छथि सेहो अशान्त बाजथि हरि! हरि!! की कथा सजीवक छाहरियो अभिलाष करए भेटए छाहरि जेठक दुपहरि! ई समय यदपि बुचनी घर आँगन छोड़ि तदपि गिरहस्थक कोड़ए खेत एखन की करति बेचारी! आठ पहर दुर्दैवक डाँगें अछि पीटलि विधवा परिवारहीन बिलटलि छौ मासक एके टा बच्चा भाविक सम्बल जे कानि रहल छै धूर उपर परिबोध कोना क’ करति तकर? शोणितोक आब नहि छैक शेष पुनि दूधक हएत कोना सम्भव? सहि तीनि सांँझ ई आइ आएल बनि मजदुरनी अठ अन्नी पर सूर्योदयसँ सूर्यास्त तक्क करतैक काज नहि पनिपिआइयो पाबि सकति! सन्ध्याक समय संसार अभय उगि चान सदय शीतल ज्योत्सनासँ कएल मुदित ब्रह्माण्ड सकल नेरूक हित दौड़लि हुँकरि गाय टुन-टुन-टुन-टुन टन-टन-टन-टन घण्टीक शब्द घर-घरसँ बाहर भेल धूम तैयो भूखलि-प्यासलि बुचनी आँचल तर झपने पुत्रा अपन कुट्टी-कुट्टी परिधान मलिन हड्डी जागल सौन्दर्य गरीबीसँ दागल भूखक ज्वालासँ जरक डरें तारुण्य जकर अबितहिं भागल पाकल पानहुँसँ बढ़ल-चढ़ल पीयर ओ दूबर-पातर तन फाटल ओ फुफड़ी पड़ल ठोर आमक फाड़ा सन नयन खाधिमे धएल जकर दुर्दैव चोर चिन्ता-चुड़ैल केर चढ़ल कोर झरकाइ रहल छै आंग जकर प्रतिपल हा! आशा बनि अंगोर दे कने अन्न-जल प्राण जकर अछि बाजि रहल छलसँ नोरक, से बनि कातरि कहुना क’ डरि कर जोरि कहल: ओ घसल अठन्नी चलि न सकल हम सब दोकानसँ घूमि-फीरि छी आबि रहलि करु कृपा अठन्नी द’ दोसर एसकरुआ हम भ’ गेल राति गिरहत, न आब देरी लगाउ भूखें-प्यासें हम छी मरैत लेबै बेसाह कूटब-पीसब बच्चा भोरेसँ कानि-कानि छट-पट करैत अछि जान लैत। ई फेर आएल भुकब’ कपार कहुँ असल अठन्नी अदलि-बदलि क’ रहलि चलाकी साफ-साफ रौ! ठोंठ पकड़ि क’ कर न कात ई डाइनि अछि देखही न आँखि अछि गुड़रि रहलि अबिताहिं बुधना सन स्वामीकें चट चिबा गेलि लक्ष्मीक बेरिमे महाजनी अछि चुका रहल क्यो अछि नहि ? एहन अलच्छीकें क’ देत कात ? मालिक! हम कर्ज न छी मँगैत अथवा नहि अएलहुँ भीख हेतु उपजले बोनि टा देल जाए हम थिकहुँ अहीं केर प्रजा पूत कै बेरि एलउँ टुटि गेल टाँग अन्नक मारल अछि हमर आँग जरलहा दैव मरनो न दैछ की समय भेल हा! देह तोड़ि क’ कएल काज सुपथो न बोनि अछि भेटि रहल तें जगमे ई पड़लै अकाल उठबितहिं डेग लागए अन्हार मरि जाएब एतइ ककरा कहबै? हित क्यो ने हमर अनुचितो पैघ जनकें शोभा भगवान! आह! गै छौक न डर? कै खून पचैलनि ई बण्डा रोइयों न भंग युग-युग दारोगाजी जीबथु क’ देबौ खून गै भाग भाग बनिहारकें द’ क’ उचित बोनि कुलमे लगाएब की हमहिं दाग? ई अपन भभटपन आनक लग तों देखा थिकहुँ हम काल नाग ई ओना जाएत? यम माथ उपर छै नाचि रहल रौ, की तकैत छें मूँह हमर छोटका लोकौक एते ठेसी? चट-चट-चट-चट कुलिशहँुसँ कर्कश भीमकाय मखनाक चाटसँ निस्सहाय भू-लुण्ठित दुनू माइ-पूत भ’ गेलि बेहोश तैयो सरोष क’ बज्रनाद भुटकुनबाबू उठलाह गरजि: मखना! मखना! केलकौक भगल ला बेंत हमर नारिक चरित्रा तों की बुझबें? जीवने बितौलहुँ ऐ सबमे। दन-दन-दन-दन मूचर््िछतो देह पर बेंत वृष्टि बस एक बेर अस्फुट क्रन्दन शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि! सविषाद हासमे चन्द्रमाक ओ घसल अठन्नी बाजि उठल: हम कत’ जाउ अवलम्ब पाउ के शरण? घसल जनिकर अदृष्टि! 4 लोटन सोंटन वार्तालाप सोंटन हयतै आब स्वराजकाज, ह किच्छु करब नहि करब चोरि सभ छोड़ि, पूर्वजक बात मान्य नहि जे बजताह बताह हुनक मुँह दूसि लेब हम खायब घीउ मलाइ बाइकँ देखब हरदम दऽ डाका टाका हरब काका तकसँ भिन्न रहि द्वारि द्वारि सौं नरिपर, आनब घूमब समस्त महि लोटन हो अनर्थ तों व्यर्थ स्वराजक अर्थ करैत छह फूसि फटक गप चटक घटक सन व्यर्थ गढ़ै छह लूरि शून्य की बूढ़ि तोर सन दूरि न जायत चोरक ठोरक कठोर न की इनहोर समायत खल नाशन शासन हयत, अर्गासन कोहाक सन मूह करह जनि, बनि सगुन चालि चलह पौर्बिक अपन सोंटन गद्य-पद्य गढ़ताह पढ़ताह लोक ई जे शक्तिहीन धनहीन दीन सहताह शोक से जे प्रचंड पुन दण्ड खेलि गप अन्ड-वण्ड कै सबल रहत, से सदल पूज्य होयत मक्खन खै कारण राजक काज सभ रहत समाजक बीच कर अपना घरमे डर ककर? जकर लट्ठ महीसो तकर लोटन हौ स्वराजसँ मान सदा विद्वानक होयत नीच कीचमे जैत खैत बहुदण्ड भूमगत विद्या बुद्धि विवेक अनेक गुणक आलोचन सौं हयता भूपाल पालता प्रजा सदच्छन धरम करम म सभ रहत "मधुप" न पावत कष्ट जन मानह आनह छाग वा कुड़हरिसँ नाथह अपन 1931मे मैथिली सुधाकरमे प्रकाशित गजल खंड (गजल) मिथिलाक पूर्व गौरव नहि ध्यान टा धरै छी सुनि मैथिली सुभाषा बिनु आगियें जड़ै छी सूगो जहाँक दर्शन-सुनबैत छल तहीँ ठाँ हा आइ "आइ गो" टा पढ़ि उच्चता करै छी हम कालिदास विद्या-पति-नामछाड़ि मुँहमे बाड़ीक तीत पटुआ सभ बंकिमे धरै छी भाषा तथा विभूषा अछि ठीक अन्यदेशी देशीक गेल ठेसी की पाँकमे पड़ै छी? औ यत्र-तत्र देखू अछि पत्र सैकड़ो टा अछि पत्र मैथिलीमे एको न तैं डरै छी (2212-122-2212-122) १९३२मे मैथिली साहित्य समिति, द्वारा काशीसँ "मैथिली-संदेश" नामक पत्रिकामे प्रकाशित गीत खंड(गीत) 1 जनम अवधि हम अहींक चरण धय शरण अनत नहि जाइत छी आन देव सेवन तजि शिव भजि भाङक गोला खाइत छी गाल बजाय नेहाल बनै सब सुनि सुनि वेद पुरान विभो जप तप तीर्थ बर्थ नहि कयलहुँ, भसम रमा अगराइत छी आब नाव भव निधिमे उबडुब, कर्णधार क्यो नै भोला क्रन्दन कै रहलहुँ विमन, नाथ किए अलसाइत छी की करुणा कमि गेल , हमर वा पाप पहाड़क हो शंका आशा भंग दोष बुझितहुँ, जै भंगक विवश ओंघाइत छी तरब नरक वा पड़ब मधुपकेँ नहि परबाहि तकर कनियों उठत अहिंक विश्वास जगतसँ सैह सुमिरि घबड़ाइत छी ।। 2 बनलीह गंगा जैं ईश शीस माला अचल सोहागवाली तैं शैलवाला नहि तँ सुनैत देरी सती देह दाहे वियोग वेदन वश बनल बताहे सम्मत न होइतथि कदापि बैलवाला कहाँसँ प्रीति प्याला और कण्ठ बीच कालकूट केर धाहे धह-धह दृग जैसँ भेल मदन सुड्डाहे तदपि कुशल छथि भूतेश निराला बसि प्रेतशाला मसानी बनैत विष व्याल मालधारी कोटियो धथुर भाङो संखियो अहारी पुनि मृत्युंजये शिव धन्य जह्नुवाला मधुप नेहाला ।। 3 फाँकै झोरी भरि भरि भाँग, साँपो सोहरै सौंसे आङ जेबै परिछै कोना कै जैतहुँ होइए डर नङटे मसानी चकमक चानी सन चमकै छै उज्जर चानी माथामे सोभै छै गाङ, आगू हो कथमपि नहि टाङ घर ने घराड़ी, बयस बुढ़ारी, धनमे धन छै बड़द सवारी गौरी हेती गलि के राङ, जखने सिनुरौथिन ई माङ मधुप न बाजी उमा छथि राजी थिक उचित व्याहक विधि साजी हेतौ ओझरौने की बाङ, मानि सकै नहि कर्मक डाङ ।। 4 अशरण शरण तोहर गुनि नामे जपिअ निरंतर आठो यामे सेवय वय भरि क्यो श्री नाथे क्यो काली पद सेवि सनाथे भाल बाल विधु के जे राखै गति मति सैह हमर हिय भाखै दोष हमर की गुणबह स्वामी दोषाकर तुअ भूषण नामी सत्त अशुचि हम यद्यपि जानी तदपि मुदित बुझि तोहि मसानी तुअ पद पंकज मधु अभिलाषे घुमय मधुप चौरासी लाखे 5 मन लागि गेल जौं कने भुजगेन्द्रहारमे चिन्ताक काज कोन ऐ संसार धारमे जप तप उपास तीर्थवास केर आश की कनियों विभूति छूति जौं कय ली कपारमे यमराज श्वास पाश छोड़ि पाससँ जेता कैलास वास दास ई बुझि पड़ि विचारमे बम बाजि बजा गाल मधुप चंद्रभालकेँ जौं ली रिझा बझा न क्यो सकताह जालमे 6 हम तोरे पथ अनुगामी हे हर कहबह नाथ हमहुँ तँ छी हेहरमे नामी।। तों भव नर्तक हम भव नर्तक युग युगसँ विख्यात नाचि नाचि चौरासी लाखो धऽ कत भूषा गात तुअ प्रिय झाड़ी सब तरि झाड़ी हमहुँ लैत बदनामी।। अंग भुजंग विभूषित तोहर कत भुजंग मम अंग वामा चरण सेवके तों मम वामा चरण उमंग तों भंगक प्रिय ककरो भ्रू भंगक हमहूँ प्रिय स्वामी।। अशुचि मसानी अहाँ नाथ अछि अशुचि सतत मम काय रहितहुँ तोर अभिन्न भिन्न की छह रखने प्रभु हाय मालिक मने बनल रहु मधुपो आब न रहत असामी।। 7 देव पितर कत पूजल कए व्रत निर्जल रे पाओल जीवन संबल दुइ सुत केवल रे किन्तु न सासु ननदि घर, पति छथि औघर रे लालन पालन के कर काँपिअ थर थर रे भेटय तेल न उबटन गरिबक जीवन रे की लय पूत उङारब, अछि मन उन्मन रे गजमुख षटमुख बालक के परिपालक रे छोटि तेहन हम भालक दबलि जंजालक रे सदिखन उछलथि सुरसरि, अहि आङग भरि रे कोन परि राखु सम्हारि, उपद्रव सब तरि रे हो मन चलि दी नैहर भवथि नै हर रे पाग खसनु गिरिराजक जैं देल ई घर रे मधुप उमा जगदीश्वरि चाकर विधि हरि रे पति भवनेश तदपि दुख कर्म सभक जड़ि रे 8 ऐला मैनाक गेह बुरहा दुलहा हुनि लयला उठाय नारद छुलहा केश सभ तँ श्वेत छनि मुँहमे ने एको दाँत छनि तीन नयन विशाल छनि अहिकेर गर मे माल छनि संगे नाङट खोड़ तथा लुलहा।। भूत प्रेत बेताल बनि बरियात ताल ठोकैत छै ताल तकर देखैत डरसँ क्यो कने न टोकैत छै लेपि लेने विभूति यथा चुलहा।। जैत परिछऽ के उछलि रहलै गंगाधर रे आँखिमे धधकैत अनलि जैत जरि सब छार रे मैना कानै छै भेल बिआकुल हा।। गाबि गीत चुमाउ चटपट छथि उमा केर प्राण ई तीन भुनक नाथ करता व्याह होइते त्राण ई काशी कान्त समान के जग दुलहा।। 9 हहरय हिय झहरय नयन नोर दारुण दुखनिधिक न ओर छोर बाल बयस खेलेमे गेले यौवन युवती संग गमेले कैल न कहियो भजन तोर।। आब करब की पाबि बुढ़ारी साधन योग न तव त्रिपुरारी आधि व्याधि वाधित अथोड़।। घर्घर कंठ बात पीड़ित तन तैयो तृष्णामे सीदित मन हमर हमर रट हो न थोड़ अथ मधुपक तोंही टा दानी करु करुणा अथवा जे जानी तों औढ़र हमहूँ अघोर।। 10 छी हम अनाथे तों दीनानाथे कऽ दे सनाथे दयाक कोशे के आशुतोषे जौं गति देबै ने अपकीर्तिक दोषे नैना कने दी तँ हम भने छी हे छोड़ू अपेक्षा आशे वैद्यनाथे।। से तोर माया सुत वित्त जाया हित जान देले बनि कऽ बेहाया आबो सम्हारी शिशु चंद्रधारी ने नीच कैले रहि नीच साथे।। सदिकाल कानी अपने से जानी रहितो मशानी विख्यात दानी से तँ अहींटा मधुपक भरोसे तें प्रार्थना ई युग जोड़ि हाथे।। 11 अविनय हम किछु विनय सुनाबी जे जे विविध विषय ललचाबै जगकेँ जकरे राग लचाबै लोलुप इन्द्रिय गणहुँ नचाबै जकर वश्य युग युग मुँह बाबी।। ताहि सकल वस्तुक न सकल हर चिरस्थायि बुझितहुँ हम हे हर राग तड़ागहिँ उबडुब तोहर ध्यान तेजि पुनि पुनि भव आबी।। राग लब्ध विषयक अवसाने निश्चित जे लखि हो न मलाने रुचि परिणाम शोक जानथि बुध तै हित तोर भक्ति टा जाबी।। तेँ सुन्दर शिव सत्य सरूपे निज छविमे अनुराग अनूपे दैह मधुपकेँ जे रुचि उद्भव दुखकेँ दृष्ट न ई हम गाबी।। 12 जाउ कहाँ तजि तोहि पुरारी केवल एक रहल तोहर बल दोसर देवक देखल न द्वारी।। बाल बयस हम खेलि बिताओल यौवन युवतिक संग गमाओल तुअ गुण गौरव गाबि न पाओल आब करब की पाबि बुढ़ारी।। मदमातल मानस नहि मानै बिनु लगाम घोटक सम फानै तें भऽ पतित पतित हम कानी तों कठोर नहि करह पुछारी।। आशुतोष कहबह तों नामी मधुपक बेर हेतउ बदनामी आबहुँ करबह पार न जँ हर के विश्वास करत संसारी।। 13 नागनाथक आसानेथित फणिफणालंकरणमणिकृत हारशोभिशरीरलतिका, रविनिभोल्लसिता। कमल कुम्भ कपाल माला कलित कर निकराद्रि वाला अर्धचन्द्रोद्भासि चूड़ा त्रिलोचन सहिता। सकल सर्वज्ञक अधीश्वर भैरवांक निवास जनिकर से मधुप सुर-सेविता पद्मावती विदिता। 14 जरि रहलै हमर उदर घर हे सातो निधिमे जल न तते जे जलन मेटाय सकत हर हे।। की करू तों करुणा तहि देलह आशुतोष फुसिये भऽ गेलह आबहु औढ़र ढ़र ढ़र हे।। मरब न हम, अमरे छी मृत्युक बादो कण कणमे छी पाँचो तत्व हमर घर हे।। केवल एखन कलेश मात्र हो ज्ञान ध्यानसँ हीन गात्र हो शंकर मधुपक धरु कर हे।। आब महाअभियाने इच्छित बिनु कलेश जे रहइछ लक्षित दैह दया से शशिधर हे।। 15 पाग बिनु जाइ न बहार हे दुलरुआ दुलहा सासुरक ई बेबहार हे दुलरुआ दुलहा सासु देल मणिमय हार हे दुलरुआ दुलहा तेजू माल नाग मणिआर हे दुलरुआ दुलहा धथूर तेजि भाङ आहार हे दुलरुआ दुलहा जिमि लिअ छप्पन प्रकार हे दुलरुआ दुलहा एकेटा मैनाक सनसार हे दुलरुआ दुलहा भागै सुनि फणि-फुफकार हे दुलरुआ दुलहा सहज सिनेहक सार हे दुलरुआ दुलहा सरहोजि वचन उचार हे दुलरुआ दुलहा करू शिव ई स्वीकार हे दुलरुआ दुलहा हो मधुपक गुंजार हे दुलरुआ दुलहा।। दोहा खंड १ की न प्रिया हित पति करै, मधुप लुटा मति कोष पद तर पशुपति पड़ल छथि करिते कालिक रोष २ गुण अवगुण बुझि नायिका करै मान अपमान गंगा हरि पदपर शिवक शिरपर मधुप प्रमाण ३ किछु अपात्रकेँ दान दय मधुप न हो कल्याण शंकर आ भष्मासुरक अछि इतिहास प्रमाण ४ कर्मक फल भेटबे करत, केहनो बनब महान नीलकण्ठ नङटे रहथि सर्पशयन भगवान ५ मधुप उकाही शिशुक हित विवुध सतर्क रहैछ गंग चुभुकि जड़ गजमुखहि शिव दृगाग्नि तपबैछ ऐमेसँ किछु गीत अप्रकाशित छै आ ऐठाम जयप्रकाश चौधरी "जनक"जीक शोधग्रंथसँ साभार लेल गेल अछि। आशीष अनचिन्हार बाल गजल नीपल पोतल चिक्कन चुनमुन बेटी हम्मर गुनगुन गुनगुन ता थइ ता थइ थैया थैया पायल बाजै रुनझुन रुनझुन कानै खीजै रूसै फूलै फेरो नाचै छुनछुन छुनछुन दौड़ै सदिखन अँगने आँगन खसितो रहलै ढ़ुनमुन ढ़ुनमुन पढ़तै लिखतै करतै काज ऐमे नै किछु गुनधुन गुनधुन सभ पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। अंतिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु संस्कृत परंपरानुसार दीर्घ मानल गेल अछि बाल गजल छै ईसू बीसू जीसू मीसू हम्मर बौआकेँ बड़का बूझू जीबू जाबू आ ढनढन पादू खिलखिल झिलमिल चुनमुन सन लागू बौआकेँ नानी सुंदर सुंदर हुनकर गालेपर हरदी पीसू उपटन पिसतै बौआकेँ मौसी हुनकर नाम कनी जल्दी बाजू बाबाकेँ धोती कुरता गमछा नानाकेँ ढेका जल्दी घीचू सभ पाँतिमे 222+222+222 मात्राक्रम अछि। दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। संबंध बदलिते संबंधवाची शब्दकेँ बदलल जा सकैए। उदाहरण लेल तेसर शेरमे नानी बदला दादी, बाबी, पीसी, मौसी काकी सेहो आबि सकैए। तेनाहिते चारिम आ पाँचम शेरमे सेहो बदलल जा सकैए। बाल गजल चिन्नी खेलहुँ चोरा चोरा आरो धेलहुँ चोरा चोरा भैया छै बड़का तँइ हमहूँ बड़का भेलहुँ चोरा चोरा हमरो जे कनियाँ रहितै से खुब्बे गेलहुँ चोरा चोरा गेल छलहुँ गाछी पिकनिक लेल आँगन एलहुँ चोरा चोरा जे भेटल जत्ते भेटल से सभटा लेलहुँ चोरा चोरा सभ पाँतिमे 22+22+22+22मात्राक्रम अछि चारिम शेरक पहिल पाँतिमे अलग-अलग लघुकेँ मिला कऽ दीर्घ मानल गेल अछि। एही पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त अछि। बाल गजल मोजा दे जुत्ता दे सीड़क दे सुइटर दे बड़ ठंडा लागै बस चद्दरि दे मफलर दे सुनि ले हमहूँ करबै खूब तमाशा सौंसे तंतर दे अंतर दे जंतर दे मंतर दे बड़ भूकै छै करिया कुक्कुर जोरे जोर टुटतै एक्कर हड्डी बस लाठी नमहर दे कफ जमि गेलै छातीमे खोंखीपर खोंखी तँइ तरकारी बेसी कड़ुगर दे झँसगर दे चिन्नी दे गूड़ो दे कुच्चा संगे दूधो खट्टा खेबौ कम हमरा बेसी मिठगर दे सभ पाँतिमे बारहटा दीर्घ अछि। दू टा अलग-अलग लघुकँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृतक हिसाबें दीर्घ मानल गेल अछि। बाल गजल खेने रहियै आमक कुच्चा चिनियो लागै खट्टे खट्टा हमरा नामे कोड़ो बाती हमरे नामे खुट्टा खुट्टा हमरा सन के छै उकपाती सभके मारी घुस्से घुस्सा छै झिल्ली कचरी आलूचप मुरही फाँकी फक्के फक्का नै नीक लगैए मस्टरबा नीक लगैए अट्टा पट्टा सभ पाँतिमे 22+22+22+22 मात्राक्रम अछि। अंतिम शेरक दूनू पाँतिमे अलग- अलग लगूकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि भक्ति गजल शारदे शारदे शारदे नीक बनबाक आधार दे जय विजय केर संगे कनी बेबहारक सुखद हार दे नै महल नै अटारी मुदा एकटा नीक सन चार दे दूर बैसल हमर लोक वेद नीक छै से समाचार दे लोक छै आब अनचिन्हरबा किछु दे की नै दे चिन्हार दे सभ पाँतिमे 212+212+212 मात्राक्रम अछि। मक्ताक अंतिम पाँतिमे दू ठाम दीर्घकेँ लघु मानल गेल अछि चारिम शेरक पहिल पाँतिमे अंतिम लघु छूटक तौरपर अछि। गजल जंगलराज दंगाबाज जी महराज जै महराज छै बेकूफ देशक लोक नेता लग ने कनियों लाज फरसा आनि गरजै खूब मंतर कटि मरै नेमाज नेता नीक बेटा नीक जनता सभकेँ अतबे काज अनचिन्हार गाबै खूब कुर्सी गीत सत्ता साज सभ पाँतिमे 2221+2221 मात्राक्रम अछि दोसर आ चारिम शेरक दोसर पाँतिमे एक-एकटा दीर्घकेँ लघु मानल गेल अछि गजल बहुत बेर हमरा देखने हेतै बहुत बेर हमरा चाहने हेतै अलोपित सगर दुख केकरो अबिते बहुत बाट ओकर जोहने हेतै इयादक रमनगर फील्डमे धीरे सँ गुड़कैत मुस्की रोकने हेतै छलै रौद बड़ कड़गर सिनेहक आइ अदौड़ी हँसीकेँ खोटने हेतै बहुत कानि अनचिन्हार बनलै ओ करेजा कियो बड़ तोड़ने हेतै चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर अछि सभ पाँतिमे 122-1222-1222 मात्रक्रम अछि गजल हम बड़का वामपंथी छी जोगाड़ी दामपंथी छी किछु चिखना चीखि बोतल संग नालीकेँ जामपंथी छी नित हमरा स्त्री प्रसंगक चाह हम असली कामपंथी छी गाँधीकेँ मारि बैसल जे से हमहीं रामपंथी छी करतै ओ काज भरि भरि दिन हम खाली नामपंथी छी सभ पाँतिमे 222+2122+2 मात्राक्रम अछि दोसर आ तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि। गजल देश दशा नीके हेतै देह दशा ठीके हेतै जनताके खूनक कीमत बस पानक पीके हेतै जी कहने हाँ जी कहने लोको सभ जीके हेतै ऐठाँ मरबा काल सखी टोपी ने टीके हेतै अनचिन्हारक डेग कनी बढ़ि गेने लीके हेतै सभ पाँतिमे 22+22+22+2 मात्राक्रम अछि। दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल गजल आइ फेरो एलै अनचिन्हार हमर सारापर आइ फेरो जरतै अनचिन्हार हमर सारापर ताग सन झटपट टुटि गेलहुँ लोभमे पड़ि से ऐठाँ आइ फेरो कहतै अनचिन्हार हमर सारापर कमला कोशी गंगा जमुना बागमती छै तैयो आइ फेरो डुबतै अनचिन्हार हमर सारापर असगरें बड़ जड़लै जरिते रहलै मुदा हमरा संग आइ फेरो जरतै अनचिन्हार हमर सारापर हाथपर लिखने छल कहियो नाम सिनेहक नेहक आइ फेरो लिखतै अनचिन्हार हमर सारापर सभ पाँतिमे 2122+22+2221+12222 मात्राक्रम अछि। दोसर, तेसर आ चारिम शेरमे लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। संगे-संग चारिम शेरक पहिल पाँतिमे एकटा अतिरिक्त लघु अछि। गजल हमरो मोन पियासले रहि गेलै हुनको मोन पियासले रहि गेलै चुप्पेचाप बहुत पिया देलक ओ तैयो मोन पियासले रहि गेलै तोरा देखि कऽ धन्य बुझलक जे जे तकरो मोन पियासले रहि गेलै अप्पन लोक तँ सहजें अगियासल छै अनको मोन पियासले रहि गेलै ठोपे ठोप चुबै छलै रस तैयो सगरो मोन पियासले रहि गेलै चारिम शेरमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। सभ पाँतिमे 2221+12+12222 मात्राक्रम अछि जगदानन्द झा 'मनु' बाल गजल नानी गेलै देखै लेए बारीमे आलू लाइ उठा क' ओकर भगलै लालू आँखि मुनि चारमे बेंग नुकाबै छै कालू कौआ बनल कतेक छै चालू केहेन होइ छै ई भोटक नाटक बनि गेलै राज मंत्री चोरबा कालू झट पट नेना सभ दौड़ क' आबै देखही देखही कते नचै छै भालू द' दे नानी आब 'मनु'केँ दू रुपैया नै सोचै मनमे कोना एकरा टालू (सरल वार्णिक बहर, वर्ण १३) गजल सपना हमर हम वीर बनी करतब करी आ धीर बनी
जे देशकेँ अपमान करै ओकर करेजक तीर बनी
सबहक सिनेहक मीत रही ककरो मनक नै पीर बनी
आबी समाजक काज सदति धरतीक नै हम भीर बनी
किछु काज ‘मनु’ एहन तँ करी मरियो कऽ आँखिक नीर बनी मात्रा क्रम : २२१२-२२१-१२ उमेश मण्डल अछि मुदा सबहक एक गामक देश भारत बेस अपना-अपना आँखिए देख गामक देश भारत बेस भाय देखि-देखि, भाय देखि-देखि...। नदी अनेक नाला अनेक उद्गम अछि मुदा सबहक एक धार अनेक धारा अनेक लक्ष्य अछि मुदा सबहक एक गामक देश भारत बेस भाय...। काज अनेक बेवहार अनेक विधि अछि मुदा सबहक एक बाट अनेक बटोही अनेक मंजिल अछि मुदा सबहक एक गामक देश भारत बेस भाय...। चुल्हि अनेक व्यंजन अनेक स्वस्थ रहब अछि मुदा सबहक उदेस रोग अनेक औषधि अनेक वैद्य अनेक वैदशाला अनेक पथ्य-परहेज अछि मुदा सबहक एक गामक देश भारत बेस भाय...। कर्म अनेक धर्म अनेक मर्म अछि मुदा सबहक एक गाम अनेक राज्य अनेक राष्ट्र अछि मुदा सबहक एक गामक देश भारत बेस भाय...। भारत हमर पहिचान छी
हम नै कियो आन छी भारत हमर पहिचान छी...। विश्वक महान देश भारत जेतए अछि भरल विचारक आध्यात्म दर्शन एकर प्रमाण छी श्रद्धा-प्रेम आपसी भायचारा भारतक अनुपम गान छी-२ हम नै कियो...। गाम-गाममे अछि विहार जेतए भरल अन्नक भण्डार माटि-पानि एकर प्रमाण छी आत्म निर्भर किसानी जिनगी स्वतंत्र भारतक ई गान छी हम नै कियो...। फलक चिन्ता छोड़ि काज जेतए करैत अछि एक-एक लाल कृषि-कर्म एकर प्रमाण छी श्रमिक, तपस्वी आे तियागी सम्पूर्ण भारतक पहिचान छी हम नै कियो...। खण्डन-मण्डन केर उदेस कल्याण जेतए बसैत अछि ई जायगान जन-गन-मन एकर प्रमाण छी दया-करूणा-श्रद्धा-सिनेह मानवता भारतक शान छी हम नै कियो आन छी भारत हमर पहिचान छी। बिनीत कुमार ठाकुर, शिक्षा-एम. ए. इंग्लिश, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, पी. जी. डिप्लोमा इन जर्नलिज्म एण्ड मास कम्यूनिकेसन, नालंदा खुला विश्वविद्यालय, पटना, वृत्ति- प्रखंड शिक्षक, अंग्रेजी मध्य विद्यालय बिस्फी, मधुबनी, पता- ग्राम-पोस्ट- कमतौल, जिला- दरभंगा (बिहार) - 847304 कवि बनाम नेता कवि छी हम तें भुखे मरै छी जौं रहिती कोनो नेता सुखल सुखल गप्प हमहुॅं हाॅंकिती के हमरा सॅं टक्कर लेता ।। सम्मेलन मे केओ नहि आवे मंच बैस सब कवि पछतावे आयोजक के एहनि हाल जेना केओ हुनका चूना लगावे विक्रेता के रहने की हैत जौं नहि रहत क्रेता ।। आब सुनू नेता के बात सभा मे नहि धर के लात झर-झर गिरै मुस्की जेना कोनो जलप्रपात भूलोक मे एतेक लोकप्रिय की हैत जौं स्वर्ग मे जैता ।। कवि छी हम तें भुखे मरै छी जौं रहिती कोनो नेता सुखल सुखल गप्प हमहुॅं हाॅंकिती के हमरा सॅं टक्कर लेता ।। पार लगाउ असरा अहीं के लागल अछि, पार लगाऊ ।। टूटि टूटि बिखरल हमर संसार सजाऊ ।। अगर बिना पुजली भगवन्, नहि फूल चढ़ैली चोरी के । दीप जलैली हम प्रेम के, फेरली मनका बिन डोरी के ।। फेरली मनका बिन डोरी के ।। पीड़ा अछि एहन बड़का, ककरा अनका हम ध्यान करू । कोन ताल के जल निर्मल, कोन सरोवर स्नान करू ।। कोन सरोवर स्नान करू ।। असरा अहीं के लागल अछि, पार लगाऊ । टूटि टूटि बिखरल हमर संसार सजाऊ ।। कखन ई ठंडी जाय खोंखि रहल छी राति सॅं, कखन ई ठंडी जाय, लागि रहल अछि ठंडी ऐ बेर, बनि गेल घर जमाय । बड दिक्कत हमरा सॅं पूछू, कोना नहायब अपने बूझू, हाथ-गोर अछि ठिठुरल, देह नै ई गरमाय । रौद लगै या उगत, हवा मुदा नै रुकत, घर सामान अछि पसरल, गेस्ट नै कोनो आय । एक तँ ओहिना नै बुझाय या, कारियो कनिया गोर बुझाय या, ओहि पर सॅं ई धुंध-कुहासा, स्पीड पर ब्रेक लगाय । अपनेमे किए लड़ै छी़? साँच अछि सेंट परसेंट, ई घर नै अछि परमानेंट । एना किए करै छी ? अपनेमे किए लड़ै छी़? अपनेमे किए लड़ै छी़?
बसय ईमानक दुनियाँ । सुरीली तानक दुनियाँ । एहन सजाउ ई धरती, जेना पान आर बुनियाँ । मनमे किए धरै छी? अपनेमे किए लड़ै छी़? अपनेमे किए लड़ै छी़?
केओ दुखमे पड़ि जाए, सभक आँखि भरि जाए । कागजक टुकड़ासँ, केओ धन्निक नै बूझल जाए । ककरो सँ किए जरै छी? अपनेमे किए लड़ै छी़? अपनेमे किए लड़ै छी़?
अंतिम टाइम जे आ जाएत, तखन किछु नै फुराएत। अप्पन सोचि कऽ कथनी-करनी, आँखि डबडबाएत । अखने सँ किए नै सोचै छी? अपनेमे किए लड़ै छी़? अपनेमे किए लड़ै छी़? गौरीशंकर साह क्षणिका काइल फेरो दिवाली हेत, चारु दिस जरत दीपँ, घर घर मे खुशहाली हेत,अंगना अंगना घुमती मइया दूर सभक कंगाली हेत,काइल फेर दिवाली हेत। दिल सँ लिखने रही हम गीत,मुदा गाइब कियो आउर देलक,कपार जरल छल तइ न ,दिल सँ चाहने हम रही,मुदा पाइब कियो आउर लेलक। - (आजुक बियाह) -आब बियाह नइ बिबाद होइ छै,माछक मूड़ा पर सलाद होइ छै,समियाना नइ पंडाल होइ छै,डेग डेग पर बबाल होइ छै,खर्च करैत कन्यागत कंगाल होइ छै,समटैत समटैत बड़क बाप मालामाल होइ छै,पंडितो -ठाकूर जजमान सँ झोइर नेहाल होइ छै,बरातियो सब खाइत-खाइत बेहाल होइ छै,खस्सी बकरी संगे मुर्गो हलाल होइ छै,मनुख रहितो मनुख चंडाल होइ छै,बरक मुँह पर एकटा रुमाल होइ छै,ओकरो रुसनाइ कमाल होइ छै,इहो अपने आप मे एकटा सबाल होइ छै ,कि ,बियाह कियाक एतेक बदहाल होइ छै । उ भोज, भोज नइ जइह मे दही नइ पोरेल,उ आँइख आँइख नइ जइह मे कहियो पाइन नइ नोरेल,उ शरबत, शरबत नइ जइह मे चीनी नइ घोरेल,आ उ बियाह बियाह नइ जइह मे नीक जकाँ सम्बंध नइ जोरेल। - (पियाक) - दुनिया मे के नइ पियाक अछि,कियो गाजा पिबैत अछि,कियो गम पिबैत अछि,कियो पलोथिन त कियो रम पिबैत अछि,मुदा फर्क एतबे ,कियो कखनो कखनो त कियो हरदम पिबैत अछि। राइतक चान छि अहाँ,मधुर मुस्कान छी अहाँ,हँसैत रही सदखैन जिनगी में,केकरो जान छी अहाँ, अहाँके देख कतेको के बड कीछ फुड़ाइत अछि,कतेक के नैन त कतेक के आत्मा जुड़ाइत अछि,चंडाल सन गर्मी मे पवनक तुफान छी अहाँ, गौरी शंकरप शान छी अहाँ। (हमर मन) कोन टोना केलौ अहाँ,हमर गप हमरे मन नइ मानैत अछि,कहलौ जखैन मन के, वो अहाँक नइ ककरो आउर छि,केकरो आउर लेल एल अइछ वो दुनिया मे, बेचारा तखने सँ कानैत अइछ। बताह अइछ, बुरबक अइछ हमर मन, तइ न अनकरो चीज के वो अपन मानैत अइछ, मेंहदी जकाँ हाथ में लगा के राखब अहाँ के, सुरमा जकाँ आखिं मे लगा के राखब अहाँ के,एक बेर कइह त दिअ हमर छी अहाँ,भइर जिनगी करेजा सँ लगा के राखब अहाँ के। डॉ॰ शशिधर कुमर“विदेह”, ग्राम – रुचौल (दुलारपुर रुचौल), पो॰- मकरमपुर, जि॰ दरभंगा, पिन – ८४७२३४ मैथिली वर्णमाला (कविता) अ सँ अल्हुआ, आ सँ आलू, इ सँ भेलै इजोत । ई ईनार आ उ सँ उल्लू, ऊ केर ऊन छै मोट ।। ए सँ एक आ ऐ सँ ऐहब, ओ सँ भेलै ओसारा । औ प्रायः “अओ” लीखल जाइए, मैथिलीमे बेचारा ।। अं अंगूर आ अः विसर्ग केर चिन्हमात्र भऽ सूतल । ऋ सँ ऋषि आ ऋक्ष भालु छै, ऋचा वेदकेर बूझल ।। ऋ केर दीर्घ रूप बिनु मैथिली, कऽ लैतछि संतोष । क कनैल, ख - खाट आ ग सँ गदहा छै निर्दोष ।। घ सँ घोड़ा घास आ घोड़न, ङ छै खाली हाथ ।१ च सँ चौकी, छ सँ छौंकी, ज सँ भेलै जहाज ।। झ सँ झब्बा या झाबा कहू, ञ प्रारम्भ ने शब्द । ट सँ टमाटर, ठ सँ ठेला, ड डम्फा केर शब्द ।। ढ सँ ढाकी – ढौआ – ढैंचा, ढ़ फराक उच्चार । तहिना ड आ ड़ मैथिलीमे, अलग - अलग उच्चार ।। ढोलक केँ ढ़ोलक जुनि लीखू आ पढ़ुआ केँ पढुआ । ड सँ डमरू, ड़ रब्बड़ मे, हिन्दी नञि छी बौआ ।। ढोढ़ी मे दुहु संग - संग, तहिना ढाढ़स मे देखियौ । पढ़ै छी मैथिली मैथिली बाजू, हिन्दी सनि ने बजियौ ।। ण सेहो निःशब्द मुदा उपयोग बहुत अछि एकरो ।२ हण्डा - हण्डी, ठण्ढा - ठण्ढी, अण्डा - अण्डी सगरो ।। त सँ तौला - तबला - तरुआ, थ सँ थौका फूलक । थऽन गाए बकरी आ महीषक, थाल पएर मे लागल ।। द सँ दीप दूध आ दऽही, दूरा - दरबज्जा ओ दलान । ध सँ धरती धाप धरोहरि, धऽनी धोती धार आ धान ।। न पाँचम व्यञ्जन छै दुलारू, बहुत जकर बेबहार छै । नदी नाह नढ़िआ आ नेबो, नारिकेर ओ नाक छै ।। प सँ पानि आ फ सँ फूल - फर, ब सँ बकरी बुझले । भ सँ भारत देश अपन छी, म केर महिमा सुनि ले ।। न सनि म केर हिस्सामे सेहो, शब्दक बहुत पथार । म सँ मड़ुआ माछ मखान आ माए मैथिलीक प्यार ।। य सँ यमुना कहबै जमुना, र – रस्सी मजगूत । ल सँ लावा चन् – चन् बाजय, लाबा तकरे रूप ।। संस्कृतक जे मूल शब्द, ओहिमे व केर बेबहार । मिथिलाभाषा व केर बदला, ब केर बड़ उच्चार ।। श सँ शंख - शरीफा - शलगम, ष केर मान छै अल्प । ष बहुधा मैथिली भाषामे, ख केर कायाकल्प ।। भाषाकेँ “भाषा” पढ़ैछ केओ, आन कहैतछि “भाखा” । उच्चारण दुहु छी प्रशस्त, पर लिखना जाइछ “भाषा”।। ष केँ बहुधा ख बजैत छी, भाषा कहलहुँ भाखा । षष्ठी – खष्ठी सुनने होएब, अभिलाषा – अभिलाखा ।। स सँ सिन्दूर सिउँथ आ सपरी, साबुन सेब सेमार । ह सँ हाथी - हाथ - हृदय आ ह सँ होइछ हजार ।। क्ष – त्र – ज्ञ संयुक्ताक्षर, मानैत अछि पुरना भाषा । पर स्वतन्त्र सनि आखर तीनू, विचरए नवका भाषा ।। क्षत्रिय – रक्षक – भक्षक - रक्षा मे क्ष हुलकी मारए । त्र – त्रिशूल, त्रिभुवन, त्रिवेणी; त्रि तँऽ तीन कहाबए ।। ज्ञ सँ ज्ञान, आ ज्ञान सँ ज्ञानी, संज्ञा नाँओ कहाबए । विज्ञानक ई युग छी बौआ, जिनगी सरल बनाबए ।। भेटत मजूर कतऽ - मिथिलाकेर बच्चा चुनावक बोखार छै, सभ केओ बेहाल छै, तकनहु भेटैछ केओ, नेता ने सुच्चा ।। मिथिलाक आँच पर, रोटी अछि सेकि रहल, मिथिलेकेँ बेचि रहल, लबड़ा आ लुच्चा ।। भाषणमे मिथिला छै, भाषणमे मैथिली, घऽर ओकर – मैथिली बूझय ने बच्चा ।। मिथिलाक जनगण छै, दिल्ली आ पटना लए, भोटक जोगार बस, जीत बुझू पक्का ।। योजनाक बात भेल, देशक बिकाश लेल, भेटत मजूर कतऽ - मिथिला केर बच्चा ।। देशक अजादी केर, सत्तरि अछि लागि रहल, पर ने उद्योग एतए, नहिञे छी धन्धा ।। सरकारक नीति ई, नञि जानि केहेन छी, भोगि रहल कुहरि रहल, मिथिलाक बच्चा ।। प्रदेशक जबार भल, मिथिलाक पात पर, मड़ुआक रोटी अछि, माँगू ने कुच्चा ।। आन भाग देशक, जोगार करए पेटक, पोल्हाबए कुटुमे छऽ, देशे समुच्चा ।। हर भाग देशक, जँ बनतै उत्पादक, तँऽ तोँही कहह, के हेतै उपभोक्ता ।। हम आ मैथिली (कविता) लोक कहैतछि, छी ब्राह्मण अहाँ, तेँ लीखि सकलहुँ मैथिली । जएह बजैत छी, सएह लीखैत छी, तेँ लीखैत छी मैथिली ।। सुनू यौ बाबू, ब्राह्मण भेने, लीखि ने सकितहुँ मैथिली । संस्कृत पढ़ितहुँ, हिन्दी छँटितहुँ, कोना कऽ लीखितहुँ मैथिली ।। घऽर अहाँ केर दरिभंगा अछि, तेँ लीखैत छी मैथिली । दरिभंगा रहितहुँ छी प्रवासी, बूझए ने जाहि ठाँ मैथिली ।। माए - बाप घुमितहि रहलाह, भारत सरकारक नौकरी । बदली भऽ जाहि ठाँ रहलाह, पर बजलन्हि घरमे मैथिली ।। पटनासँ मैट्रिक कएलहुँ, लड़ि - झगड़ि कऽ लेलहुँ मैथिली । नओमामे नहिञे भेंटल, दसमामे पढ़लहुँ मैथिली ।। दसमोमे ईस्कूल प्रशासन, कहलक राख ने मैथिली । रखबेँ तँऽ नञि केओ पढ़एतौ, अपने पढ़िहें मैथिली ।। माए मैथिलीक इच्छा, हमसभ राखल तइयो मैथिली । माए मैथिली बनि अध्यापिका,* शिक्षा देलन्हि मैथिली ।। अहाँ कहब दरभंगिया बाभन, शुद्ध लीखी तेँ मैथिली । हम जनैत छी, जेँ पढ़लहुँ, तेँ लीखि पाबैत छी मैथिली ।। लीखबामे मिथिलाभाषा आ लीखलकेँ पढ़बामे । ओहने हमरो लेल कठिन छल, डेग पहिल चलबामे ।। मैथिली जे हम बजैत रही आ छल साहित्यक अलगे । पढ़ल - गुनल - लीखब सीखल, की होयत रहि दरिभंगे ।। मोनमे ई भ्रम् जुनि राखू, ई कपटी सभक प्रपञ्च । अपन माएसँ दूर करक छी, दुष्टक ई षडयण्त्र ।। जोधा अकबर केर पुत्र सलीमक, कथा सकल छी बूझले । डाहेँ सलीमकेँ हफीम खोआए, कएलक की रूकैया बूझले ।। जे ब्राह्मण दरिभंगे रहि कऽ, पढ़ल ने कहियो मैथिली । लीखि ने सकत, बाँचत की लीखल, सीखू बौआ मैथिली ।। जाति धर्म ओ डेग - डेग पर, जे किछु अलग लगैए । से बूझू, ओहि ठामक बोलीक, मधुर सुगन्धि आनैए ।। जहिना हिन्दी अछि एक्के, पर सभ ठाँ भिन्न लगैए । बंगाली - बिहारी - मराठी - दिल्ली अलग बजैए ।। तहिना मैथिली अछि एक्के, बेतियासँ लऽ कऽ बनैली । एक्के तिरहुत, तीरभुक्ति, मिथिला, विदेह आ बज्जी ।। नञि अनुचित जँ केओ व्यक्ति, भाषा दू-चारि जनैए । पर अनुचित ओ मैथिल जे, मैथिलीसँ मूँह फेरैए ।। दोसरोक माए अपनहि छी माए, यौ हमहूँ सएह बूझै छी । पर अनुचित निज माएक बलि दऽ, अनका जँ जुड़बै छी ।। हम नञि छी भगवान - भगवती, सांसारिक छी प्राणी । मैथिली हम्मर माएक भाषा, बस एतबहि टा जानी ।। विश्वक सभ भाषा प्रिय हमरा, पर निज भाषा नेह । एकर अहित जे केओ करैछ, तकरासँ हमरा द्वेष ।। * हमर विद्यालयमे २ सत्रमे (शिफ्टमे) पढ़ौनी छल । हम जाहि सेक्शनमे रही से प्रातः कालीन सत्रमे छल । ओहि विद्यालयमे मैट्रिकमे मैथिलीक लेल कोनहु शिक्षक/शिक्षिका नियुक्त नञि छलाह/छलीह । भरि नओमा संघर्ष कएलहुँ पर मैथिली नञि राखए देल गेल । दसमामे अएलाक बाद किछु सूत्रसभसँ पता चलल जे ओही विद्यालयमे अपरान्हकालीन सत्रमे +2 मे मैथिलीक पढ़ौनी लेल एक गोट शिक्षिका नियुक्त छथि, पर ओ भारतीय प्रशासनिक सेवाक परीक्षाक तैय्यारी लेल छुट्टी पर छथि । बहुत प्रयत्न कएलाक बाद हुनिकासँ भेंट भऽ सकल । ई भेंट आशातीत नञि अपितु आशासँ बेसी नीक रहल । मैथिलीक पढ़ौनी हेतु हुनक पुर्ण सहयोग भेटल, तत्कालीन विद्यालय प्रशासनक विरुद्ध जा ओ सहयोग कएलन्हि । ओहि सालक विभिन्न सेक्शनक आठ गोट विद्यार्थी (हमरा सहित) मैथिली रखलहुँ । हुनिक नाँव छलन्हि श्रीमति उषा ठाकुर (चौधरी) । बादमे ज्ञात भेल जे ओ भारतीय प्रशासनिक सेवामे चयनित भेलीह । बहुत बादमे ईहो पता चलल जे हुनिक सासुर “दुलारपुर” (हमरहि पञ्चायत) छलन्हि । पुनः भेंट करबाक इच्छा छल पर दुर्भाग्यवश से पूरा नञि भऽ सकल । हालहि मे जानकारी भेंटल जे कैन्सरक कारण अल्प वयसहिमे हुनिक देहावसान भऽ गेलन्हि । हुनिका सादर नमण । मैथिलीक सम्बन्धमे सम्पुर्ण विद्यालय यथाशक्ति असयोग कएलक । मात्र दू गोटे सहयोग कएलन्हि जनिक नाँव लेब उचित - पहिल श्रीमति गौरी गुप्ताजी (अर्थशास्त्रक शिक्षिका) आ दोसर श्रीमति वीणापानि“सुधांशु”जी (दसमाक अन्तिम किछु महिनाक समयमे हमर विद्यालयक प्रधानाध्यापिका) । हमर एहि विद्यालयक नाँव छल “शहीद दवीपद चौधरी स्मारक ईण्टर स्तरीय विद्यालय, अदालतगञ्ज, पटना” अथवा “मिलर हाई स्कूल, पटना” । खैनी पहिलुक अलाप खोआए देलक, हम खाइत कहाँ छी । बस चीखए छी, अभ्यस्त कहाँ छी । सबसबात छल दाँत, तेँ धएलहुँ, एतबामे किछु गलत कहाँ छी ?? बिचला प्रलाप एतेक बरख धरि केर आदति छी । छूटत नञि, छोड़ए चाहैत छी । ओ तँऽ कहियो नहिञे खएलक, तइयो काँकोड़ * केर आफत छी ।। अन्तिम विलाप हओ बौआ ! नहिञे छुटलै ई । चचरी पर संगहि जड़तै ई । जँऽ पहिने से सब बुझितियै, ठोर कहाँ धरितहुँ हम खैनी !! हम्मर सलाह अस्सी चुटकी आ नब्बे ताल । ठोर पर खैनी करैछ कमाल । गीत - गीत छै, बात ने मानू; नञि तँऽ होयत जान - जपाल ।। संकल्पक उसास छोड़ू बीड़ी - हुक्का - पीनी । हर स्वरूपमे नाशक खैनी । संकल्पक सम्बल जँऽ ढीठगर, के कहैछ - नञि छूटए खैनी ।। * काँकोड़ = कैन्सर नामक बेमारीक पर्याय (CANCER-DISEASE) = खैनी खएनिहार बहुत लोक सभ केर दलील रहैत छन्हि कि फलना तँऽ खैनी - बीड़ी - पीनी किछु सेवन नञि करैत छल पर तइयो ओकरा कैन्सर भऽ गेलै = मतलब कि ओ लोकनि किन्नहु खैनी नञि छोड़ताह । लेखन कमजोर नञि जँ मैथिली लिखैत छी हऽम ! हँऽ यौ बाबू - हऽम !! मैथिली बजैत छी, मैथिली लिखैत छी । मैथिली पढ़ैत छी, मैथिली बुझैत छी । मैथिली गबैत छी, मैथिली नचैत छी । मैथिली सुनैत छी, मैथिली गुनैत छी । ककरा सनि भूकए छी, से नञि जनैत छी । मैथिली बजैत छी, मैथिली लिखैत छी ।। नीक बोल लागइए, तेँ हम बजैत छी । कर्णप्रिय जेँ हमरा, तेँ हम सुनैत छी । माएक सुबोल बोल, तेँ हम गबैत छी । सुन्नर सुगन्धि एकर, जग भरि बँटैत छी । लेखन कमजोर नञि, जँ मैथिली लिखैत छी । सोच एहेन जनिकर, से गलती करैत छी ।। कोन - कोन खेमा छै, कोन - कोन वाद छै । की - की नियम छै, आ की अपवाद छै । ककर कोन की प्रपञ्च, ककर की विवाद छै । हम तँऽ बुझैत छी, मैथिलीक नाद छै । एतबे बस बूझै छी, मैथिली बजैत छी । मैथिली बजैत छी, मैथिली लिखैत छी ।। ककर छी हकार, आ ककर छी निमण्त्रण । के उड़बए गुड्डी, आ ककर छी नियण्त्रण । हमरा लए सभटा बस, मैथिलीक गर्जन । मैथिलीक तर्जन, ओ मैथिलीक वर्षण ।। प्यासल छी मैथिलीक, घाट ने देखैत छी । मैथिलीक अमृतसँ, प्यास मेटबैत छी ।। हम नञि जनैत छी, की अहँ सोचैत छी । कोन पक्ष-संघ-गुटमे, हमरा रखैत छी । कोन बाद – पन्थसँ, हमरा जोड़ैत छी । हमर लिखल शब्द, कोन धारेँ बहबैत छी । अर्थ अहाँ की बूझल, अँहीं जनैत छी । हम तँऽ बस बूझल जे, मैथिली लिखैत छी ।। लिखबाक मोन अछि, तेँ हम लिखैत छी । मैथिलीक रंग प्रिय, ताहिमे रंगैत छी । हिन्दी आ अंग्रेजी, सेहो प्रशस्त छी । मोन मुदा मैथिलीक, नेहेँ आशक्त छी । हाथ हमर लेखनी, मैथिली लिखैत छी । सभकिछु पढ़ैत छी, मैथिली लिखैत छी ।। समाज आ विरोधाभास (कविता) अप्पन बेटी डान्स करैए, ई छी गर्वक बात । अनकर बेटी गीत गबैए, धुर पीटता ओ माथ !! अप्पन बेटी मॉडेल छी तँऽ, मिथिलानी केर भाग । पढ़बा लए हॉस्टल दोसर जँऽ, उचित ने कनिञो बात ।। अप्पन बौआ उड़बए कौआ, शार्प माइण्ड अछि रखने । दोसर पोथी बाँचि रहल जञो, सुग्गा सनि की रटने ?? टू-पीस, थ्री-पीस अपना घरमे, बड़-बड़ नबका फैशन । ओकर पुतोहु केर पहिरन देखल, मुशहरीक किछु कतड़न ।।१ इएह समाज छी कमोबेश, आ इएह एकर छी ढर्रा । अपने ओकैजनल कहियो कऽ, आन पिबैत’छि ठर्रा ।।२ अपना घर जेकिछु ऊकड़ू अछि, परिवर्तन छी बौआ । अनका घर किछु नऽव भेल तँऽ, बाजि रहल अछि ढौआ ।। अपन बेढब जँ चालि – चलन, नव क्रान्तिक शंख बजैए । आनक गति जँ रुचल-पचल नञि, संस्कृति नाश करैए ।। अपने कनिञा धिया-पुता लग, आने बोल बजै छी । तखन कोना मिथिलाभाषामे, अनका बाध्य करै छी ।। अप्पन टल्हा, सोना सिक्का, अनकर हीरा - सीसा । अनकर कएल कर्मसभ अनुचित, जीबितहि अपन चलीसा ।।३ अपने तालेँ नाचि रहल सभ, अपनहि–अपनहि बात । ककरो आन केओ नञि सूनए, ई छी केहेन समाज ।। १. मुशहरी = सुपर नेट या नेट बला साड़ी लेल गामक किछु वृद्ध वा वृद्धालोकनि द्वारा प्रयुक्त कटाक्ष भरल शब्द । २. हम व्यक्तिगत रूपेण मदिरापानक प्रचारक नञि छी आ नहिञे स्वयं पिबैत छी । पर जे करैत छथि तनिकहि शब्द अक्षरशः अछि । ३. चलीसा = अप्पन सवयं केर प्रशंसाक अतिशय प्रचारार्थ कएल गेल कोनहु प्रकारक कृत्य । ४. हम व्यक्तिगत रूपेण ऊपर वर्णित कोनहु फैशन वा जीवनशैलीक विरोध नञि करैत छी पर समाजमे पसरल किछु विरोधाभाषकेँ उजागर करबाक लेल ओकर चर्च एहि कवितामे कएल गेल अछि । हे दैव ! किछु तोँहीं कहह (कविता) हे दैव किछु तोँहीं कहह, छह भाग्य की लीखने हमर । कहियो रौदी, कहियो दाही, बीच भूकम्पक भँवर ।। एकसँ उबरल रही नञि, दोसरक पछड़ा पड़ल । साँस लेबा केर ने पलखति, ई केहेन लफड़ा पड़ल ।। हे विदेहक पुत्र तोँ, विचलित किए छऽ भऽ रहल । आँखि फोलह आओर देखह, विश्वमे की भऽ रहल ।। तोरे सनि सब लग समस्या, मूँह बओने अछि विकट । एहि धरा पर कतहुटा नञि, शान्त सनि भेटत विवर ।। कतहु तापक छै समस्या, शीत वा धीपल मरू । कतहु सागर केर लहरि, बनबए सुनामी - की कहू ।। कतहु बिर्रो आ छै अन्हर, काल केर प्रतिरूपमे । कतहु धरती - हिम धँसए, पतालभैरव कूपमे ।। जँ समस्या तँऽ तकर, समाधान हम देने छियह । अपन बुद्धि विवेक ताकह, निदान हम देने छियह ।। बनल मधेश मसान छै (गीत) मारल गेलै लोक कतेको, बनल मधेश मसान छै । केहेन छै ई प्रजातन्त्र आ केहेन संविधान छै !! राजतन्त्रमे भेदभाव - ओहि ठामक लोक कहए छल । सम अधिकारक लेल प्रजातन्त्रक ओ बाट ताकए छल । आइ दिवस ओ एलै मुदा, बखड़ा नञि एक समान छै । केहेन छै ई प्रजातन्त्र आ केहेन संविधान छै !! अधिकारक जे माँग कएलक, से गोलीक भेल शिकार । शोणितमय शुरुआत जकर, तक्कर भविष्य की आश ? दूमेसँ हर एक व्यक्ति, जक्कर दहीन नञि - बाम छै । केहेन छै ई प्रजातन्त्र आ केहेन संविधान छै !! देश स्वतन्त्र ओ भिन्न मुदा भारतक सहोदर भाए । सएह सोचि भारत कहलक, करू संकट केर उपाए । भारत केर हित वचनकेँ उनटे, बूझए ओ अपमान छै । केहेन छै ई प्रजातन्त्र आ केहेन संविधान छै !! एक देशमे दू - नागरिकता, जखन - जतए भेलैए । साक्षी अछि इतिहासे - ओक्कर अप्पन अहित भेलैए । देश माए आ माएक लेल तँऽ सुन्नर सभ सन्तान छै । केहेन छै ई प्रजातन्त्र आ केहेन संविधान छै !! उठाऊ लेखनी लीखू अहाँ उठाऊ लेखनी, लीखू अहाँ, जे किछु नञि लीखल गेल । नञि लीखब तँऽ ढोल ने पीटू - किछु नञि लीखल गेल ।। गीत - गजल, सभ किछु लीखू । नञि लीखलन्हि ओ, अपने लीखू । गीता - गुरुग्रण्थ - कुरान लीखू । बाइबल - जातक वा आन लीखू । ओ सभ लीखू, जे अछि इच्छा, लीखल - ने लीखल गेल । नञि लीखब तँऽ ढोल ने पीटू - किछु नञि लीखल गेल ।। इतिहास लीखू, भूगोल लीखू । विज्ञान लीखू, खगोल लीखू । अनुवाद लीखू वा मूल लीखू । अपना भाषा लए खूब लीखू । अहँक हाथ के अछि धएने - नञि हुनिका लीखल भेल । नञि लीखब तँऽ ढोल ने पीटू - किछु नञि लीखल गेल ।। अहँ नञि लीखबै आ नञि पढ़बै । अनका फेर दोष किएक मढ़बै । पोथी आ पत्रिका नञि कीनबै । तँऽ अपने मूँह कोना बजबै । की भेल ? अहाँ की सोचै छी ? ई दुविधा केहेन भेल ? नञि लीखब तँऽ ढोल ने पीटू - किछु नञि लीखल गेल ।। ओतबहि करियौ सामर्थ्य जतेक । जुनि सोचू अहँ कऽ सकब कतेक । घएला भरबा लए बुन्न जतेक । हर एक प्रयास केर मोल ओतेक । जुनि किछु सोचू, झट लऽ बैसू, लीखू जे मनमे भेल । नञि लीखब तँऽ ढोल ने पीटू - किछु नञि लीखल गेल ।। अहँक कथा केओ नञि लीखत । अहँक व्यथा केओ नञि लीखत । जञो लीखत तँऽ तुक्का लीखत । अपनहि लीखब, पक्का लीखब । अहँकेर अधिकार अहँक लीखब, से छीनि कोना केओ लेत । नञि लीखब तँऽ ढोल ने पीटू - किछु नञि लीखल गेल ।। साहित्य - मैथिली सभकेर अछि । हर जाति - धरमसँ ऊपर अछि । आनहु भाषी केर स्वागत अछि । हमरहु साहित्यमे सागर अछि । हम अहँक पढ़ी, अहँ हमर पढ़ी, इएह सुसम्बन्ध आ मेल । नञि लीखब तँऽ ढोल ने पीटू - किछु नञि लीखल गेल ।। ८ ओ अहाँ लिखू जे नञि लिखलन्हि ई नञि लिखलन्हि । ओ नञि लिखलन्हि । की नञि लिखलन्हि ? के नञि लिखलन्हि ? एहि पर विचार तखनहि सार्थक, ओ अहाँ लिखू जे नञि लिखलन्हि ।। ई बड़ अनुचित । अतिशय अनुचित । ई उचित रहैत । ओ उचित रहैत । एहि पर मण्थन तखनहि फलप्रद, ओ अहाँ करू जे नञि कएलन्हि ।। मैथिलीक साहित्य एना । मैथिलीक साहित्य ओना । ओहि भाषामे एना - ओना । एहि भाषामे किदन - कहाँ । ई वक्तव्य कोना हुनिकर, जे मैथिली ने पढ़लन्हि - लिखलन्हि ।। मैथिलीमे ई बात रहैत । मैथिलीमे ओ बात रहैत । विज्ञान खगोल भूगोल रहैत । मैथिलीमे इतिहास रहैत । की एहेन हो इच्छा रखने जँ, अपने ओ किछु नञि लिखलन्हि ।। बुन्न - बुन्नसँ घैल भरैछ । बेसी नञि किछुओ मँगैछ । जतबा होइए ततबा लीखू । अपना संगहि आनोकेँ पढ़ू । बकथोथी - पाण्डित्य सफल जञो, कागत पर लीखि देल ।। माघ सिहकैत बसात, ठिठुरैत माघ । ओसक टप् - टप्, कानए अकास ।। सभ आढ़ि - धूर पर उगल घास । ओसेँ भीजल, पिछड़ैत लात ।। ओसेँ भीजल अछि गाछ - पात । टप् - टप् भू पर पानिक प्रपात ।। पर ओस चाटि की मेटए प्यास ? एकटा अछार एखनो छै आश ।। पछता गहूम केर हो ने नाश । तेँ दमकलसँ अछि पटैत चास ।। नाला - पौती अछि बितल बात । प्लास्टिकक पाइप संबल उसास ।। अजगर सनि पसरल बीच बाध । फक् फक् करैत दमकलक साथ ।। गमछा - मफलर बन्हने गाँती । चद्दरि – सोएटर झँपने छाती ।। निकलल – जकरा भोरे छै काज । काजक बदलामे नञि छै लाथ ।। शीतलहरी पूसहु केर बाद । नञि जानि कते दिन रहत आब ।। कनकनी एहेन कँपबैछ हाड़ । तइयो धड़फड़मे घटकराज ।। एहनोमे धोएबा लेल पाप । जा रहल लोक दौगल प्रयाग ।। फागुनक पानि फागुनक पानि, अकालक पानि । तइयो लाभ आ किछु छी हानि ।। गहूम पुष्ट, मज्जर मजगूत । मसुरीक छी सद्यः यमदूत ।। धियापुता लए मजगर बात । इस्कूल बन्दी छै बरसात ।। पुरिबा - पछबा बहए बसात । ठिठुराबै - कँपबै छै गात ।। बीतल ठण्ढी पुनि घुरि गेल । सोएटर - कम्मल बाहर भेल ।। मुरही कचड़ी झिल्ली चौप । चाहक चुस्की चौके - चौक ।। गरम जिलेबी, लिट्टी बेस । गरम सिंघारा खेपे - खेप ।। नहिञे गरजय - तरजय मेघ । टिप्-टिप्-टिप्-टिप् बरिसय मेघ ।। बरसाती, छत्ता की भेल ? छोड़ू ! एक दिनक छी खेल ।। ओ कहलन्हि ओ कहलन्हि, धुर की लिखै छी, बाउ ई सभ मैथिलीमे । छी किए एते माथ धुनइत, अहँ अनेरो मैथिलीमे ।। ज्ञान ओ विज्ञान केर छी, बात ऊकरू मैथिलीमे । अहँ कलमकेँ क्लेश दै छी, लीखि ई सभ मैथिलीमे ।। के बूझत आ की बूझत, के पढ़त ई सभ मैथिलीमे ? जँ अपन कल्याण चाही, जुनि लिखू अहँ मैथिलीमे ।। मान ओ सम्मान बिरलेकेँ, भेटैतछि मैथिलीमे । बजनिहारो नञि बुझैतछि, ओ बजैतछि मैथिलीमे ।। राष्ट्रभाषामे लिखब तँऽ, नाम होयत देश भरिमे । आङ्ग्लभाषा जँ लिखी, चर्चा होयत सगरो जगतमे ।। हाथ आओत बेस कैंचा, की भेटैतछि मैथिलीमे ? मैथिली केर क्षेत्र सीमीत, के पढ़ैतछि मैथिलीमे ?? एक साँसेँ कहि सुनेला, बेस सभटा मैथिलीमे । हम कहल - संतुष्ट छी हम, लीखि सभटा मैथिलीमे ।। राष्ट्रभाषा – आङ्ग्लभाषा - नीक सभ भाषा लगैए । मातृभाषा केर बिना पर, सुन्न सभ भाषा लगैए ।। जे कहल से भल कहल, छी बेस ओ अपनेक नजरिमे । डऽर जञो रहितए समाठक, माथ ने रखितहुँ ऊखरिमे ।। छी जनैत संस्कृत हम, अंग्रेजी आ हिन्दी मराठी । द्वेष नञि, पर मैथिलीक छी बात अलगे, अलग ठाठी ।। याद करू नेनपन अपन, कहियो जखन थाकल रही । पाबि माएक कोर तत्क्षण, केहेन सुख भासल रही ।। सएह सुख हमरा भेटैतछि, लीखि कऽ किछु मैथिलीमे । मानसिक सुख बड़ भेटैतछि, लीखि हमरा मैथिलीमे ।। बात जँ मानी हमर तँऽ, आउ एक बेर मैथिलीमे । मान - पैसा - मोह सभटा, बिसरि जाएब मैथिलीमे ।। मैट्रिकक तैय्यारी जीत – हारि (उच्चा॰ – हाइर) दुनु खूब मनेलियै पएर तर बगरा, बाप रौ बाप !*१ आब की करियै, आहि रौ बाप ! ! नओमाकेँ हम किछु ने बुझलियै । भरि नओमा हम खेलि गमेलियै । कहुना नओमा पास भऽ गेलियै । छओ महिना फेर खुशी मनेलियै । मैट्रिकमे दसमेक पुछै छै, नओमामे तेँ बेपरवाह ।*२ पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! ! दूर्गापूजा खूब घुमलियै । नाटक, थेटर, नाच देखलियै । दियाबाती छठि*३ मनेलियै । फॉर्म बोर्ड केर, सेहो भरलियै । दसमा केर सिलेबस एतबे, चारि मासमे दस – दस चास । पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! ! ठण्ढी आ शीतलहरी एलै । साटा पर कत’ मैच खेललियै । कतहु खेललियै, कतहु देखलियै । जीत – हारि दुनु खूब मनेलियै । पढ़बा कालमे ठण्ढी लागय, ट्वेण्टी – ट्वेण्टी केर उछाह । पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! ! नऽव बरख, बनभोजो केलियै । मंगलमयक सनेश पठेलियै । लाई, चुड़लाई आ तिलबा खेलियै । खिच्चरि – दऽही संगे देलियै । प्रात भने बुझना गेलै, छै मास एक मैट्रिक केर – आह ! पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! ! “एटम बम” कण्ठस्थ रटलियै ।*४ “गेस पेपर” केँ खूब चटलियै ।*५ महाबीरजीकेँ गोहरेलियै ।*६ जोड़ा - छागर कबुला केलियै ।*७ हाथ परीक्षाफल आयल तँऽ, जेना सूँघि नेने हो साँप ! पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! ! *१ - पएर तर बगरा, बाप रौ बाप – ई एकटा बुझौअलि अछि जकर मतलब होइत अछि “आगि” । *२ – आइ काल्हि बहुत रास धियापुता मोनमे ई विचार बहुत दृढ़तासँ पोषने रहैत छथि कि मैट्रिक केर पाठ्यक्रममे मात्र दशमे वर्गक पाठ्यक्रमसँ पूछल जाइत अछि । ई विचार अत्यन्त भ्रामक अछि । उदाहरणार्थ जँ नओमाक रसायनशास्त्रमे परमाणु संरचना, संयोजकता आदि नञि पढ़ने छथि तँऽ हुनिकालोकनिकेँ दशमाक रासायनिक बन्धन, रासायनिक समीकरण संतुलन आदि कोना कऽ बुझबामे अओतन्हि । *३ - उच्चारण भेल “छइठ” । *४ – “एटम बम” – एक प्रकारक अति सम्भावित प्रश्न सभक पुस्तिका थिक, जकर नाँव सँ मिथिलाक बच्चा – बच्चा (आ तेँ पैघलोकनि सेहो) चिर – परिचित छथि । ई कोनो “बम” वा “बम बनएबाक पुस्तिका” नञि अछि । *५ – “गेस पेपर” – एहि नाम सँ तँऽ पूरा देशे सुपरिचित अछि । *६ आ *७ – महाबीरजी वा अप्पन – अप्पन आन आराध्य देवी – देवता सभक परिचायक । चन्दाक धन्धा धियापुता सभ दूइर भऽ रहल, अपने ठोकि रहल छी पीठ । पढ़बा - लिखबा केर उमेरमे, चन्दा माँगि रहल अछि ढीठ ।। सरस्वतीपूजा केर अवसरि, हाथमे कलम आ पोथी नीक । पढ़बा - लिखबा छाड़ि कऽ देखू, चन्दा माँगि रहल निर्भीक ।। नान्हि – नान्हि टा छौंड़ा – छौंड़ी, बाँस आ बत्ती हाथ नेने । सड़क जाम कऽ चन्दा माँगए, अपन भविष्यकेँ कात केने ।। ई घटना दृष्टान्त मात्र छी, बैसल छी हम माथ धेने । पूजा हो वा ईद – मोहर्रम, चन्दा केर सभ साथ धेने ।। पूजा – पाठ आ धर्म – संस्कृति, हमरा नञि तकरासँ विरोध । उचित हरेक संस्कार – संस्कृति, जाधरि ने करइछ गतिरोध ।। उत्सव – पाबनि – परब – तिहार, जिनगी केर छी रंग हजार । बिनु एकरा एकरस जिनगी, से हमहूँ मानै छी सरकार !! पर स्वरूप ई कतेक उचित छी, अपनहिसभ कने करू विचार । धियापुता देशक भविष्य छी, कतेक उचित एहेन बेबहार ।। ककरा नीक लागए की, पूछू ओकरा सँ ककरा नीक लागए की, पूछू ओकरा सँ । किए पुछै छी भाइ, अहाँ ई हमरा सँ ।। नीक बेजाए सापेक्ष चीज छी, से बूझू । एक्कर पड़तर किए करै छी, ओकरा सँ ।। कखनो छल जे प्रिय, आइ अप्रिय बनल । समयक सभटा खेल, कहू ई ककरा सँ ।। सोझ बाट चलबै तँऽ, लक्ष्य भेटबे करतै । जाल बुनब – की होयत, पूछू मकड़ा सँ ।। बातक अर्थ जँ नञि भेटए, पोथी तकने । बूझू दादीक, गाम – घरैय्या फकड़ा सँ ।। बलिदानक ने मोल, जगत् मे छी बौआ । फूसि लागए तँ, पूछू खस्सी – बकड़ा सँ ।। शांति शांति जिनगीभरि रटिते रहि जायब । छीनि लेत अधिकार अहँक, ओ झगड़ा सँ ।। नटवरलाल मिथिला केर धरती पर देखलौं, बड़ – बड़ नटवरलाल । बड़ – बड़ नटवरलाल यौ भैय्या, बड़ – बड़ नटवरलाल ।। एकक सोझाँ दोसर काहिल, दोसर सम्मुख पहिलुक जाहिल । सभहक हाथमे कुड़हरि – खुरपी, एकक दोसर लऽग ने चलती । सऽभ स्वयंभू अपनहि – अपनहि, सभहक अलगे ताल । मिथिला केर धरती पर देखलौं, बड़ – बड़ नटवरलाल ।। एक - सँ - एक महारथ ज्ञानी, सभ बेजोड़, ककरो नञि सानी । सभहक धूरा सोना – चानी, पर अभाव केर कननी कानी । खिस्से मे भेटताह अयाची, शंकर जनिकर लाल । मिथिला केर धरती पर देखलौं, बड़ – बड़ नटवरलाल ।। आनक संग दऽहीक प्रभाव, अपना लग माछक अछि ताव । सभहक जिह्वा बास शारदा, कानक नञि तेँ कोनहु बेगरता । सभ केओ कानमे तूरे रखने, बेस बजाबथि गाल । मिथिला केर धरती पर देखलौं, बड़ – बड़ नटवरलाल ।। विजयनाथ झा, पटना नव वर्षक एहि मधुर पहरमे नव वर्षक एहि मधुर पहरमे समुपस्थित सब बंधु-प्रवरमे अभिनंदन वंदन प्रतिवेदित हास होइ उल्लास नवोदित। भाव-स्वभाव भरल हो समता सुरभि-स्नेह पसरय घर-घरमे। बाटि रहल छी हर्ष समुज्वल- सभक लेल हम गाम-शहरमे। हमर नाम परिचय सादर सुरत हम हमर नाम परिचय सादर सुरत हम नमन कोटिश: देश भारत भरत हम। ललित रूप वैविध्य अछि गाम घर-घर नगर सब समुन्नत क्रिया, कर्म, व्रत हम। हमर सभ्यता अछि पुरातन, सनातन प्रगतिशील तैयो विनयशील नत हम। समर मे शौर्य सिद्धांत संबल तिरंगा हमर प्राण प्रिय प्राणवत हम। सदाचार, सुविचार, संयम, सुरक्षा बहुरूपता लौह, पारद, रजत हम। वैविध्य व्यंजक विविध रूप आखर लालित्य- लावण्य उल्लासरत हम। हमर स्वाभिमानक कथा लोमहर्षक कएल त्याग उत्सर्ग वाणीवरद हम। विविधता हमर धर्म परिचय सुरुचिगर हमर लोक परिवार संयुक्त शत हम। हमर आंकलन क' रहल आय दुनिया समादृत सभक बीच संसारवत हम। चेतना केर नव सृजनमे चेतना केर नव सृजनमे भाव नूतन खास भरिऔ, व्यंजना चमकम मनोहर भू-भवन आकास भरिऔ। संग पुरबामे अहां केर अछि युवा पीढ़ी सबल, मार्गदर्शन हो सुपथगर मिथक नव इतिहास भरिऔ। शब्द श्रद्धांजलि समर्पण ओ करू जे प्रेरणा प्रद, गूढ़ नहि गुण ग्राह्य सब लए भ्रम रहित विश्वास भरिऔ। ज्ञानकेर देखल अनादर वेदना ई कष्ट भारी, नहि उचित अवहेलना ई द्वेष नहि आवेश भरिऔ। शक्तिपीठक मूल थाती ऋषि मुनिक ई यज्ञशाला, शैव विद्यापति प्रकाशक चहुमुखी विन्यास भरिऔ। शब्द बीथी मे नुकाएल कांट-कुश सब कात केने, शरद सायं भोर फागुन लोक मे उल्लास भरिऔ। पर्व ई गणतंत्र सम्मुख सांस्कृतिक अवदान धएने पुरिऔ संबंध-दृढ़ता लोक हिट सायास भरिऔ। चेतना केर नव सृजन में भाव नूतन खास भरिऔ। व्यंजना चकमक मनोहर भू-भवन आकास भरिऔ। पर्व ई गणतंत्र सम्मुख सांस्कृतिक अवदान धएने, पूरिऔ संबंध-दृढ़ता लोक हित सायास भरिऔ. चेतना केर नन सृजनमे भाव नूतन खास भरिऔ, व्यंजना चकमक मनोहर भू-भवन आकास भरिऔ. रमेश महा-विस्फोटक महा-प्रयोग- (दीर्घ गद्य कविता) जहिया विद्या अविद्या भऽ कऽ/ चूकल-चेतना-सृजनमे, कोनो महामहोपाध्याय स्व-मूत्र-पानक आ कोनो संत शिरोमणि गो-मूत्र-पानक महत्व बुझौलनि, अपना तरहेँ। गाम, परम्परामे बोरऽ चाहलक, आ नगर आधुनिक बनबैत-बनबैत/ बनौलक वर्त्तमाने केँ विकृत! प्राचीनता भेलो नै छल। नेपथ्यगामी, आधुनिक मूल्य। लेनहुँ नै छल स्थापना, कि बथा गेल। माथपर उत्तर-आधुनिकता! इतिहासक लोप आ सभ्यता विलोपक/ होमऽ लागल फूकोयामा-भविष्यवाणी, नगरमे पहुँचल नीलवर्णी सियार द्वारा! फेर देरिदाक विखण्डनवाद/ नढ़ियाक ’हुआ-हुआ’सँ घोंसिया गेल व्यक्ति-परिवारमे! हम, असहज खिच्चड़िकेँ घी-पापड़-अंचारमे मथि देल! आ तीनूक सड़ल-गलल मूल्यसँ इनार बनल पेटकेँ भथि देल! तीनूक नीक मूल्य, गैस ढेकार जकाँ निकलैत रहल/ आ हम सभ पेटमे मसल्लाक गाछ/ जनमलाक बावजूदो ’छाहरिए’मे/ रहलौं हेहर बनल! सरकार गुटखा-सिकरेट आ कनियाँ तमाकुल मना केलनि तँ डाक्टर तेल-मसल्ला परहेज आ सन्तगण शाकाहारक महत्व बुझौलनि- उत्तर-आधुनिक समयमे! कोनो खट्टर-कका, साकठ बना देल! तँ जगन्नाथपुरी-यात्रा वैष्णव बना देल! अवसरवादक कृपासँ शास्त्रमे तकैत रहलौं- संकल्पक विकल्प! ने कंठी निमहल- ने बेमारी गेल! ने तामस गेल, ने स्वास्थ्ये भेल! भाग्यक महिमा-मण्डनमे कर्मे हेरा गेल! दोष कोनो बुझौनिहारक नै छल! स्व– विवेक- शयनक छल! हरि-शयनी एकादशीसँ – घाट परहक एकादशा- संपिडन धरि, जठराग्निमे होइत रहल, माँछ- विवेकक हवन/ हरिमोहनी द्वादशी धरि, ’वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति’ क/ इष्टमंत्र देलनि विख्यात तांत्रिक कामाख्या- सिद्ध बाबा, दर्जन भरि भागवत-शिरोमणि कथावाचकक / नारायणी– मंत्र सेहो बनि कऽ रहि गेल / आस्था- विहीन यांत्रिकता! ’महाजनो येन गतः सः पंथाः’ केर अनुसरण करैत/ पहिने मोहक पलाश-वनमे / भटकाव भेल –लक्ष्यहीन! फेर वासंती फुलवारीक विभ्रम पोसने/ मरुभूमिए-मरुभूमि लागल रहल- छिछियौनी! अति-भोगवादक धर्म-विधान/ सँ संगमक महा-प्रयोगक उपरान्त वाणप्रस्थक आहटि पाबि/ संतुलनक बेगरताक भेले छल अनुभूति, कि गार्हस्थ्य-गाड़ीक मादा पहिया लसकि गेल! दोष कोनो बुझौनिहारक नै छल! विवेक- सम्मत रटैत-रटैत/ विवेकहीन निर्णयक लागि गेल पथाड़! विवेक, तहिया चेतन भेल। जहिया विवेकहीनतासँ सभतरि अराजकता पसरि गेल! गौतमक न्याय तकैत रहल/ टुकुर-टुकुर आ नव्य –न्याय- प्रवाह, हकन्नन भऽ गेल/ नवधा-भक्तिक दुविधामे! समस्त जीवन उड़ैत चिड़ैक/ आँखि चिन्हबाक होइत रहल दाबी- पर- दाबी / मुदा नै भेल- अंतिम साँस धरि- व्यक्ति- परिचय! शब्द- ब्रह्मक चलैत रहल अनुसंधान! अर्थ, विलुप्त होइत रहल शब्दसँ! अर्थ, भऽ गेल शब्दक अर्थ! काम, भऽ गेल जीवनक अर्थ! धर्म, भऽ गेल ’अर्थक’ अर्थ! मोक्ष, भऽ गेल पाप- आवरण! पुण्य, भऽ गेल गौरवे आन्हर! कर्म, भऽ गेल कपार आ श्राद्ध! रुढ़ भऽ गेल शास्त्र आ जड़ भऽ गेल जीवन! पंथक पथाड़ लागि गेल! भौतिकता, धर्म बनि गेल! कन्या-दान, भेल ’धन-दान’! वरक दान, ’महा-कल्याण’! शब्द-ब्रह्मक चलैत रहल अनुसंधान- एकादशी- यज्ञ- उद्यापनमे! उप-नयनक मड़बापर/ वरुआक कानमे आचार्यक कनफुसकी- मंत्र द्वारा! वेदी तर, बीसलखिया वर द्वारा/ तरंगल कनियाँक हृदय-स्पर्श द्वारा! नवग्रह- शान्तिक हवनक टीकामे! ब्रह्मक चलैत रहल अनुसंधान! मुदा आत्म-परिचय सम्पूर्ण ब्रह्म- परिचय थिक/ कोनो एक मनुक्खकेँ/ सम्पूर्णतामे जानब/ जानब थिक सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकेँ/ तकर अभिज्ञान विरले/ भेल कहियो-ककरो! ज्ञान-ज्ञान। -होइत रहल अनघोल! भक्ति-भक्ति! –कीर्त्तनमे गर्दम गोल! अष्टयाम-सँ नवाह धरिक यांत्रिकतामे सपना भेल निष्काम भक्तिक आनन्द! कर्म! कर्म –रटैत –रटैत बना देल कर्मकेँ भाग्यक पर्याय! योग! योग –रटैत –रटैत ब्रह्मसँ वियोग/ शरीरसँ संयोग! अमाशयक असमर्थतासँ माँछ-मासु/ बनल तामसी- भोजन, तँ ’राधे-राधे’ कर्मकाण्डक जड़ि जड़िया गेल! सहह- भावक अभावमे दूरे रहल ब्रह्म, सभठाँ। सभसँ! ब्रह्म, -शब्द- ब्रह्मसँ दूर! ब्रह्म, -नाद- ब्रह्मसँ दूर! ब्रह्म, -बुद्धि- विलासीक मोट, -मोट पोथीसँ दूर! ब्रह्म, -धर्म, पंथ, अध्यात्मक/ संस्थानीकरणसँ दूर! ब्रह्म, भोगेन्द्र- वर्गक/ ज्ञानेन्द्रिय- कर्मेन्द्रियसँ दूर! ब्रह्म- सभ धर्मक शास्त्र-पुराण पुजेगरीसँ दूर! रुद्राक्ष- तुलसी –कंठी- गोमुखीसँ दूर! ब्रह्म-सभठाँ, सभसँ दूर! अनुसंधानेमे हेरायल! अनुसंधानक वस्तु बनल! अंशक खोजमे ब्रह्म/ ढहनाइत रने- वने! …. आ अंश निश्चिन्त/ भौतिक सुख- शयनमे! ब्रह्म- बौआइत, अंशक/ भक्ति- जागरणक प्रत्याशामे, जंगलसँ मरुभूमि धरि! सौर-मंडलसँ आकाश-गंगा धरि! ’ईश्वरीय-कण’ स्वयं छिछियाइत/ निहारिकासँ ध्रुवतारा धरि! अनुसंधानकर्त्ताक हृदय आ/ भक्ति-भावक खोजमे! परमाणु संरचनासँ, परमाणु-विस्फोट धरि! ’भू-तलक महा-विस्फोट’ सँ/ कृत्रिम गर्भाधान-केन्द्र धरि! परखनलीक सृष्टि-निर्माणसँ/ केदार-घाटीक महा-विनाश धरि! होइत रहल महा-प्रयोग! ’ईश्वरीय कण’ छिछियाइत/ नासाक प्रयोगशालासँ जेनेवाक/ भूतल-हाइड्रा-मशीन धरि, चन्द्र-अभियानसँ मंगल-अभियान-धरि, परिवारसँ व्यक्ति धरि/ मे होइत रहल अहं आ भोगवादक महा-विस्फोट! सरयूमे ठाढ़ लक्ष्मणक/ फटैत माथ जकाँ! विज्ञानसँ अध्यात्म धरिक झोड़ी भरि गेल, महा-उपलब्धिक पद्म-विभूषणसँ! दाबी-पर-दाबी होइत/ रहल एवरेस्ट –विषयक! अंशक खोजमे रने-वने/ बौआइत रहल ब्रह्म! …. आ अर्द्ध- निद्राक मध्यान्तर/ आकस्मिक चेतनामे, वेदनाइत रहल अंश! चमकी बेमारीसँ/ चमकबैत आँखि, मुँह, भौंह! मुदा, मनुक्खकेँ मनुक्खक/ व्यक्ति- परिचय नै भेल! आइंस्टीन नै चीन्हि सकलाह, अपन परमाणु बमकेँ! जापान नै चीन्हि/ सकल, अपन सूर्यकेँ! जर्मनी नै चीन्हि/ सकल, मानव-रक्तकेँ! धर्म, राजनीति, व्यक्ति आ समाज- एक-दोसरकेँ चिन्हिते रहि गेल! सहस्राब्दी-सहस्राब्दी धरि! सभ्यताक होइत रहल- विकास आ विनाश! कुरुक्षेत्र आ विश्व-युद्ध, लड़ल/ जाइत रहल- मानवक छातीमे! मस्तिष्क बनि गेल- कुटिलताक/ प्रयोग-स्थली आ हृदय/ बनि गेल हड़प्पा, मोहन –जो- दाड़ो! पेटमे होइत रहल गैसक/ महा-विस्फोट आ मच्छड़दानीमे/ होइत रहल निचैनसँ महा-दंशक/ मच्छड़- महा- प्रयोग! इतिहासी बनैत रहल आ प्रेरणो/ लेल जाइत रहल- विध्वंशक! संस्कृति, सभ्यता, विज्ञान, अध्यात्म, ककरो प्रकृतिक बदौलत/ कोनो व्यक्तिक सम्पूर्ण व्यक्ति-परिचय-नहिएँ ट्टा भेल! समयपर नै उतरल क्यो/ अपन छविक अनुकूल! व्यवहार-शास्त्र आ मनोविज्ञान/ अपन व्याख्या प्रस्तुत करबाक लेल आइयो/ कऽ रहल अछि, अनुसंधान-पर-अनुसंधान! जे, जे छल, समयपर, से नै रहल! बहाना बना-बना लोक कालकेँ/ दैत रहल- दोहाइ आ धिक्कार! कएटा दुस्साहसी- कालोसँ/ लैत रहल- होड़- पर- होड़! कएटा शास्त्रार्थी- ’कालो गच्छति धीमताम्’- पर चलैत, कखनो पराजित, कखनो अपराजित/ काल-कवलित भेलाह! कएटा ’भोगेन्द्र’ ’निद्रया- कलहेन वा’- मे खपि गेलाह! काल होइत रहल अपना गतिए- उत्तरायणसँ दक्षिणायन! दक्षिणायनसँ उत्तरायण! पंचाङ्ग छपैत रहल- शताब्दी-सँ-शताब्दी धरि! ज्योतिष- शास्त्र होइत रहल- नेहाल-सँ- सनाथ! ब्रह्मक होइत रहल अनुसंधान! ब्रह्म, अपन अंशक खोजमे/ ढहनाइत रहल रने-वने, … आ भूतल- महाप्रयोगक गुफामे! सभ्यताक थुड़ाइ/ करैत रहल असभ्यता! तीन सय सरकारक संगठन, शब्दकोषमे खोजैत रहल- आतंकवादक परिभाषा! व्यक्ति चिन्हैत रहल/ आन व्यक्ति- आ स्वयंकेँ/ सोइरी घरसँ शमशान धरि! सनातन अवतारवादसँ/ गौतम बुद्धक पुनर्जन्म, … आ कर्म-चक्र प्रवर्तिनी धरि! मनुक्खक बनैत रहल वंशावली, … आ इतिहासक चट्टानक तहमे, दबाइत रहल- जीवाश्म बनि कऽ! अंश, ब्रह्म-खोजमे भटकैत/ रहल- चारु धाम, सातो पुरी! अमरनाथसँ- कैलास- मानसरोवर धरि- झोड़ी टङने- लाठीक हाथें! ’मृग ढ़ँढ़े वन-माँहि’/ अर्द्ध-कुमोरीसँ वैष्णो-देवी गुफा/ आ भैरोनाथ धरि… बेदम- बेदम! ब्रह्म-खोजमे अंश बेदम! कहियो चट्टान तर, कहियो/ बर्फक शिला तरमे- ब्रह्मलीन अंश! शिलाजीत- सेवनक बावजूदो/ पिचड़ा भेल, जीवाश्म बनैत रहल अंश! शताब्दी- सहस्राब्दीक युगीन सन्दर्भक/ मरुभूमिमे भटकैत, समाजक आत्मा- ’परमात्मा! परमात्मा!’ – चिचियाइत रहल! आत्माक चिचियौनी आ छिछियौनी/ जारी अछि- मस्तिष्कसँ हृदय/ आ हृदयसँ मस्तिष्क धरिक/ विषाक्त रक्त-परिसंचरणमे सराबोर! अमाशयसँ छाती धरिमे/ जारी अछि- गैसक महा-विस्फोट! व्यक्ति आ परिवारक अस्तित्वमे/ जारी अछि, महा-विस्फोटक महा-प्रयोग! सौर-सुनामी चलि रहल अछि- माथ, हृदय आ पेटमे! वस्तुतः हजारो वैज्ञानिक, जेनेवाक/ भू-गर्भीय टनेलमे/ ’ईश्वर-कण’केँ/ मुट्ठीमे पकड़बाक/ कऽ रहल छथि प्रयास/ हकोप्रत्याश! … आ ’ईश्वर कण’ – हाइड्रा- मशीन/ सँ दूर… ब्रह्माण्डमे … उतफाल विध्वंश लेल, संत कबीरक हृदयमे… उतफाल सृजन लेल, … उपला रहल अछि, आनन्द-विभोर! मुदा, सम्प्रति, ब्रह्म-खोज/ जारी अछि! मुदा, सम्प्रति, अंशक आत्म-खोज/ जारी अछि! मुदा, सम्प्रति, व्यक्तिक सम्पूर्ण/ परिचयक प्रयास जारी अछि! वस्तुतः, जीवनमे/ महा-विस्फोटक महा-प्रयोग/ अनवरत, जारी अछि! सुकोसुत शिशिर शिक्षा- स्नातक (गणित), लखनऊ वि वि. गाम- बाउर, दड़िभंगा. सम्प्रति धनबाद, झारखण्ड मे रेल मे कार्यरत मोन विकल एहि जग मे अछि ज्ञान भरल, जे किछु संभव,धरि आइ पढ़ल, ताहु मे बहुते कम बुझल, गुणल कर्म मे न ओतबो ढालि सकल। माँ,अछि सुत अहाँ के आइ विकल दिअ आशीष जे , हो जीवन सफल। कण्ठ मे हरदम बसै छी ने कियैक, पथभ्रष्ट होइतहि डँटै छी ने कियैक, विमुख भʼ, हे माँ , अहाँ सँ के साधना अछि कʼ सकल। माँ, अछि सुत अहाँके आइ विकल दिअ आशीष जे, हो जीवन सफल। ज्ञान-गौरव, अहमक वहम बाट रोकैछ भʼ ठाढ़ जखन, हे माँ, करु तखनहि कृपा जे भʼ सकए मोन, विमल-निर्मल। माँ, अछि सुत अहाँके आइ विकल दिअ आशीष जे, हो जीवन सफल। एक नहिं, गुरू छथि अनेक, कोना उतारब ऋण ओतेक, कर्मक बाती सँ ज्ञान-दीप बरल तव कृपा हरत मम दोष सकल। माँ, अछि सुत अहाँके आइ विकल दिअ आशीष जे, हो जीवन सफल। २३-०८-२०१५. पड़िकल जम काठक पाटी, करची केर कलम गाबिशे लिखल ओनामासी धं. बाँसक झोझरि बीछल कोपरि दीयाबाती खेलल उकापाती हम....१ पान-मखान बिनु मुख मलान हेराएल सोन्हगर कुट्टीक गंध. चान उतरल, इजोरिया पसरल अष्टदल अरिपन करए छल चमचम..२ कतए गेल दौनी, कथी ओसाएब जाबी लागल बरद ने घंटीक टन. मड़ुआ के पुत्ती जनेर,चिन,कण उसनल अल्हुआ लागए अमृत सन....३ सुआदे ठोकुरा कुरकुर चूरा उखड़ि-समाठ जखनि करए धम. दहीक मटकुरी, सींक लटकल चार पिच्छर घैलची, पायल बाजए छम......४ पोखरिक जाइठ, धारक मोइन सभठाम खेलल सोनाडुबकी हम. साओन-भादो पानि बरखै झमाझम भरि छाबा हेंक परखै डेगक दम..........५ धार उधिआएल,बाट-घाट भुतलाएल चानी पीटल च'र चमकए चमचम. गुन घीचति नाह, लग्गी, करुआरि झिझरि खेलल कमला-कोसीक अंक........६ रोकल न जाए, फेरो घुरिआए, मुनलो देखाए कोना करी बन्न. लागए न मोन, उरिआए बाध-बोन अछि पड़िकल जेना गाछीक जम. ..........७ प्रणव झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, एन ए एम एस भवन, अंसारी नगर नई दिल्ली - 110029 हे 'मिथिलानी' आब जागु अहूँ हे 'मिथिलानी' आब जागु अहूँ बढ़ू जग के संग आब आगू अहूँ तोरि कुंठित समाज क कुंठित बंधन प्रगति मार्ग पर चालू दन-दन अहूँ क सकै छि दुष्ट क मर्दन पर लेबय परत संकल्प एकर दहेज़-उत्पीडन के विरोध करू एहि दानव के निषेध करू नहीं आवश्यक विवाहक बंधन बस अपन पैर पर ठाढ़ रहू हे 'मिथिलानी' आब जागु अहूँ आब हटा दियौ लाज क पर्दा आ आँखिक नोर अंहा पोछि लिय नहीं दुर्बल बनी रहू जग में युग के बदल के ठानि लिय आब राजनीति में अहूँ उतरु पायलट, आफिसर अंहा सेहो बनु हे 'मिथिलानी' आब जागु अहूँ आई.ए.एस या आई.पि.एस या एहि देश क अंहा भविष्य बनु अछि गौरवशाली मिथिला क इतिहास अंहा मिथिलानी क इतिहास गढ़ु हे 'मिथिलानी' आब जागु अहूँ अकांड तांडव हे महादेव इ केहन अन्हेर ! अकांड तांडव प्रत्यक्ष भेल भूमि डोलल अछि बेर बेर दुखिया सब के आब लियौ टेर अछि हाहाकर उठल चंहुओर भ अनाथ, बालक मारे किल्कोर अछि भवन मंदिर सब खाक भेल जनै कतेक के प्राण गेल ? अभिनव मानव हम ब्रह्मा क कृति हारि मानव नै अछि अपन वृत्ति बढा क सकल हाथ आब त्राण करब मिल-जुलि क नव निर्माण करब छि मनुज, मनुजता जानै छी मानवता के मूल्य पहचानै छी बस एतेक गुहार सुनु बाबा आब और प्रहार नै चुनु बाबा पीडीत सब के कनटेर लियौ दु:ख काटि सकै ओ धैर्य दियौ दु:ख क पहाड के पार करैथ नवद्वीप प्रशन्नता में पहूंचैथ क सकैथ फ़ेर आनंदघोष हर हर महादेव के उद्घोष - ०४.०५.२०१५ बोर्ड परीक्षा (बाल कविता) बौआ के काज छै पढ़ाई आ नै की घुमैया पढ़ाई काल में नहीं बाबू ने भैया एक्जाम नजदीक एलौ रे पढ़ाई के घडी छौ सब एतबे कहतो रे पढ़ाई सब से पैघ छै परीक्षा में बोर्ड परीक्षा बाँकी अपन इक्षा... आबै एहि बात पर करै छी पढ़ैया बौआ के काज छै पढ़ाई आ नै की घुमैया पढ़ाई काल में नहीं बाबू ने भैया महावीर गोहरैला से आब काज नै चलतौ कबुलो केला से नै मार्ग सुधरतौ परीक्षा में नक़ल के आस, सेहो हेतौ बलैया पढ़ाई काल में नहीं बाबू ने भैया ... बौआ के काज छै पढ़ाई आ नै की घुमैया पढ़ाई काल में नहीं बाबू ने भैया एटम बम सेहो बस पासे करेतौ गेस पेपर सब सेहो बस नम्बरे दिएतौ ज्ञानक लेल करही टेक्स्ट बुक के पढ़ैया... पढ़ाई काल में नहीं बाबू ने भैया ... बौआ के काज छै पढ़ाई आ नै की घुमैया पढ़ाई काल में नहीं बाबू ने भैया राजदेव मण्डल ‘रमण’, गाम- लकसेना, पोस्ट- महिन्दवाड़, नवटोली, भाया- तुलापत गंज, जिला- मधुबनी, (बिहार) पिन नं- ८४७१०९ जुरमाना करैए... बुड़हा सभ मिलि पंचैती करैए होइ छै मन जुरमाना करैए। पनमा मखनाक सुनू झगड़ा झगड़ा नइ बुझू ई रगड़ा पनमा भागल पंच तकैले मखना गौआँकेँ जमा करैले होइ छै मन जुरमाना करैए...। भेल पंचैती एहेन सोझगर छेँ दुनू दोखी एक केर दोसर भेला जमा पंचैती की करता दुनूसँ किछु-किछु कैंचा टनैए होइ छै मन जुरमाना करैए...। बाजल एकटा नवका पंच अइमे केतए क्षल-प्रपंच? सरपंचे छी हमहूँ जीतल बौआ अहिना गाम चलैए होइ छै मन जुरमाना करैए...। किशन कारीगर गजल सन किछु प्रेमक बरसै फुहार जेना हम भीजैत छी अहाँक चौअनियाँ मुस्की देखी केहेन मगन सँ हम जीबैत छी अहाँक कारी-कारी नैन किएक हमरा करै बेचैन अहिं हमरदम मोन परि हमरा की भेल ने जानि? अहाँक सोलहो सिंगार देखी केहेन मगन सँ हम जीबैत छी तकैत छी केना, जेना चंदा-चकोर हमरा करेजा मे, उठल हिलकोर आस्ते-आस्ते बाजू, जुनि करू अहाँ शोर लोक कनफुसकी करत, भ गेलै भोर आब कतेक कहू अहाँ के प्रेम अहिं सँ हम करैत छी हमरा प्रेम के बुझहब कहिया? अहिं लेल हम जीबैत छी अशरफ राईन गजल सब तँ लूटि लेलही बदला मे तूँ देलही की ? बनि गेलही कठोर मनक असरा पुरेलही की ?
तोरा अपन बुझि कऽ बिश्वास कि केलियौ चढ़ा कऽ बृक्ष पर निचे सँ जरि काटि लेलही की ?
बदलि गेल्ही समयक चक्र संग - संगे तूँ साथ जिअब मरब किरिया बिसरि गेलही की ?
जीवन भरि साथ कहि बिच बाटमे छोड़ले धेले आन के हाथ हमरा बिरान बुझि लेलही की ? डॉ. उमा शंकर चौधरी, एसोसिएट प्रोफेसर, भौतिकी विभाग, हरि प्रसाद साह महाविद्यालय, निर्मली (सुपौल) दू आखर कने अहूँ सुनू कने हमहूँ सुनी कने अहूँ बुझू कने हमहूँ बुझी...। ई छी मिथिलाक मान अछि मिथिला महान्...। जेकर दू फाँड़ भऽ गेल छल जान भाषाक संग टुटि रहल छल एकर पहचान किन्तु ईहो बुझू जे ओ केहेन होएत स्थान जेतए आवागमनसँ मिथिलाक हृदए जुड़ल भाषाक केर बँचल प्राण। ओ थिक स्थान, ओ थिक संस्थान, ओ थिक महान्, उद्घोषणाक स्थान, महाविद्यालयक कान, आब बुझू जे ई कोन अछि संस्थान, जे देशमे सेहो बनेलक अपन उचित स्थान। चित्रा अंशु अस्तित्वकेँ चिन्हू स्त्री चाहे कोनो देश के, ओकर व्यथा-कथा सब एक एक रंग सब बोली-भाषा लेकिन सबहक रूप अनेक चाहे पूरब होइछ या पश्चिम, अपन उत्तर या कि दक्षिण सबहक कर्म अछि निस्तेज शोषण दमनक रूप अनेक के मिटाएत नारी उत्पीड़न केँ मिटाएत शोषण अतिरेक भीषण हाल जगतमे हिनकर देखि मोन अछि व्याकुल भेल ई शोषणक जङि सँ मिटाऊ नारी केँ सब खूब पढ़ाउ शोषणकेँ हिनका चिन्हबाउ अपना पैर पर ठाढ़ कराउ नारी सभ आवाज उठाउ पितृसत्ता केँ मारि भगाउ समानताक दियौ सन्देश ईटा काज करू सभ नेक अपन अधिकारक मांग करू सब मिल प्रतिरोध करु ककरो पर निर्भर नै रहू अपन अस्तित्वकेँ चिन्हू बीणा प्रसाद, शोधप्रज्ञ, ल.ना.मि.वि. विद्यालय, दरभंगा। ग्राम+पोस्ट- रखवारी निर्मलीक गीत गर्व करू ‘निर्मली’पर ई मिथिलाक शान। जतए हरि शाह महाविद्यालय एहि क्षेत्रक पहचान।। बीचो-बीच हृदयस्थलसँ जाइत राज मार्ग महान। ‘निर्मली’क निर्मलतासँ आब कियो नहि अन्जान।। जेकरा हृदयमे बास करैत अछि मानवताक केर ज्ञान। जेकर आँगनमे बसथि हिन्दू संग मुसलमान।। हिलमिल देखबैत अखण्ड एकताक अभियान। सिनेहमयी आँचरसँ झँपने, कोसी, भुतही आैर बलान।। खेते-खेत उपजैत अछि मुंग, मरूआ आ धान। गहुम, खेसरी, दलहन तेलहन खुब फड़ैत अछि आम।। वाड़ी-झाड़ी भेटत पान पोखरिमे माछ-मखान। भोजन वस्त्रक त्रुटि रहितो करथि अतिथि सम्मान।। पशु-पक्षी संग पाएब घरे-घर जेतए विद्वान। भारतीक पोसल सुग्गा करथि श्लोकक गान।। एतै भेला आयाची लेलनि ने कहियो दान भोर-साँझ होइत अछि जेतए लोक गाथा केर गान।। राम विलास साहु किछु टनका भोरक तारा उगल भुरुकबा गमकै फूल भोरु पहर घुमू रहत चित्त खूश माटिक घैला पानि निर्मल करै सोना नै शुद्ध मन्दिर मन शुद्ध ज्ञानी वाणि अमृत आगि नै मुझै हवासँ, मुझै दीप प्यास नै मुझै भरल सागरसँ कूप मुझबै प्यास पढ़ब नै वेद भेद जानब केना भूखल पेट नै सूतब बिछौना खेत उपजै सोना मठ मस्जिद नै मिलै भगवान वन घुमैत नै मिलै कोनो देव मन बसै भगवान रोगीक रोग दवासँ छुटैत छै मन रोग नै छुटै छै दवाइसँ प्रेमसँ छुटै रोग नेत्र दानसँ जग इजोत होइ जीवन दान रक्तदान भूदान सँ होइए भुदान सफलताक करू नीक तैयारी राति अपन जागि करू तैयारी प्रयास राखू जारी देशक खातिर करब बलिदान रक्षा करब देशक छै कल्याण काज छै ई महान स्वर्गक सुख नै चाही हमरा दुखसँ मिलै हरि दर्शन सुख सभ सुखक खान मेहनतिसँ मिलै धन अपार आलस अछि दुखक पैघ राह करू नीक विचार तीन बातसँ राखक परहेज मिठ बोलिया चटगर भोजन झूठसँ रहू कात कन्याँदानसँ जगमे करू नाम काम महान बड़ पैघ छै काम होइ जग कल्याण पंचतत्वसँ बनल छै शरीर अनमोल छै ई जिनगीक गाड़ी अन्त किए होइ छै धानक बीज उखाड़ै बोनिहार गीत गबैत करै धनरोपनी सबहक खातिर बच्चा कनैत स्कूल जाइ खातिर जरूरी अछि कौपी-कलम-पोथी शिक्षाक छै जरूरी दूध पीब कऽ बच्चा पलै बढ़ैए भविस बनै उपकारी बनैत देशक रक्षा करै माटिक मुर्ति हिलै-डोलै नै बोलै श्रद्धा जगाबै पान-फूल प्रसाद सँ भक्तकेँ मनाबै मानव तन खातिर तप करै छै ऋृषि-मुनी दर्लभ छै देवोकेँ नै भेटै छै ई तन हाड़-मासुसँ बनल छै शरीर नाश्वर अछि की भेटै छै तनसँ मायामे फँसल छै राजा सेवक छै जनता मालिक लोक बुझैत छै उलटे सेवककेँ अछि राजा मािलक गरीब लेल जेल जुर्माना अछि नेताक लेल कालाधन खजाना जनता छै दिवाला सभ अपन नहि कोइ पराया दुखक साथी निभाबै जे दोस्ताना अनमोल खजाना मोती मालासँ शोभा बढ़ैत अछि कंठी मालासँ हरि भजन होइ कोन उपयोगी छै मजदूरक श्रमसँ बनै टुटै घर-मकान मालिक छै महान श्रमिककेँ नै नाम चान-सुरूज अकासमे चमकै लोक चमकै छै अपने कर्मसँ जग इजोत होइ आगि जरैत सभ देखैत अछि दिल जरैत नै देखैत कोइ किए अन्तर होइ पानिक बून मिलि सागर बनै सींचै धरती प्यास मुझै सभकेँ नै दाम दइ कोइ मोट रोटीसँ पेट भरैत अछि नीक पोथीसँ ज्ञान बढ़ैत अछि दुनूकेँ छै मान जरैत दीप सभकेँ रोशनी दइ मुदा अपने अन्हारेमे रहै छै उपकार करै छै सेना देशक रक्षा करैत मरैत उपकारी छै अपन रक्षा नै देश गर्वीत करैत चोरक माल सभ मिलि कऽ खाए उलटे चाेर फाँसीपर चढ़ैए संगे नै कोइ जाइ नाचए बानर भात खाए मदारी बानल कहै माल अछि केकरो कमाल करै कोइ पढ़ल सुगा बोली छै अनमोल बन्न पिंजरा कैद रहि कहै छै अजादी केना होइ गाछक फल सभ खाइ जुराइ गाछ नै खाए कहियो आन फल धर्म पालन करै धान-पानसँ मिथिलामे सम्मान धोती-कुर्तासँ गौरव पहिचान स्वागत करै मखान पकै फसल कटनी दौनी होइ कुटि पीस बनै मधुर भोज सभकेँ पेट भरै बिना खेने नै पेट भरैत अछि नै देखने नयन जुराइ छै नै ज्ञान मुर्ख होइत प्रेमक राह जे चलै सुख पाबै स्वर्ग पाबैत सफल जीवनक उत्तम फल पाबै हरीन देत सियारक गवाही दुनू भागि कऽ जंगल चलि गेल सजामे प्राण गेल सौनक साग भादवक दहीसँ बँचल रही आसिन-कातिकक ओससँ बँचल रही चंचल मन चित्त घबराइ छै जान जोखिम पैर लड़खड़ाइत राह नै देखाइ छै चोर चोर छै मसिऔत बनल अधिकारी छै पिसिऔत बनल प्रजा साधू किए छै राधा नचैत वृन्दावन-गोकुल कृष्णक बंशी बजैत मथुरामे मक्खन चोर कहैत आमक डारि झुलुआ झुलै छेलै कोइली बोली सुनि गीत गबैत बौका हँसैत छेलै बाग-वगिचा लगबैत सिंचैत आम-लताम खाइत जीवैत छेलै चैनसँ सुतै छेलै रंगक धार बहैत छै होलीमे खूनक धार बहै छै दुर्गापूजा दीप सजै दीवाली मोतीक माला खरिदै धनवाला हलुआ-पुड़ी खाइ छै दिलवाला दूध बेचै छै ग्वाला खीरा छै हीरा भोर पहर खाइ नूनू लगा कऽ साँझ पहर खाइ खीरा तँ होइ पीड़ा गंगाक पानि छै अमृत समान सागर मिलि बनैए नोनगर पानि करै छै हािन नार-पुआर घास-पात भूसीकेँ चिबा-खा गाए बदलामे दै दूध पी कऽ जीबै मनुख देश अजाद मुदा हम गुलाम भूखल पेट केना खुशी मनेबै स्वतंत्रा दिवस हमर माए गंगा सन पवित्र नौ मास धरि गर्भ पालन करै मनक बात बुझै पुरान अन्न रोगीकेँ पथ्य पड़ै पुरान लोक समाजकेँ बँचाबै पाबै छै ऊँच स्थान दुभि घास छै अमर शुभ सभ पूजामे शुभ काज करै छै सम आँखि देखै छै सभ महग कोनो नै अछि सस्त मुदा देशमे खून-चून-बेचैनी अछि सभसँ सस्त खोजलासँ नै भेटै छै भगवान मन मन्दिर बसै छै भगवान जे पूजै छै महान आँखि रहितो अन्हर बनल छै केना खोजत ज्ञानक आँखि मानि करै जगमे हािन पानि फलसँ जिनगी बँचैत छै बिनु काज नै आगू चलै जिनगी रूकिते अन्त होइ विद्वानक छै मिथिलामे खान बढ़बै शान करै ज्ञानक काम पबै मान-समान गरीबकेँ नै मान अमीर करै अमीर कहै से गरीब करै छै दुखे दुख सहै छै मोह-मायामे सभ फँसल अछि उबरि नहि सकै जगम कोइ कर्म अधूरा होइ धनक चिन्ता मौतक कारण छी चीतासँ चीता चढ़ि भष्म बनि कऽ माटिमे मिलैत छै विद्याधन छै अनमोल रतन खर्चसँ बढ़ै नहि छीनै छै राजा नै चोरबै छै चोर फूलक मांग देखैत खेतिहर फूल लगबै हाट-बजार बेचि धन-कमबैत छै आत्मा अमर अविनाषी होइ छै चोला बदलि रूप रंग देखबै रहस्य नै जनै छै आगि जरैत सभ देखैत अछि मन जरैत नहि देखै छै कोइ बिनु प्रेम नै बुझै फूलक रक्षा काँट-पात करै छै संगे रहै छै सुखक संग फूल काँट दुख दइ छै कोइली बजै अधरतिया उठि प्रेमक बोल प्रेमी छै बिछुड़ल पिया नै भेल भोर चिट्ठी-पतरी केना लिखब पिया भेजै नहि छी खबरि ने सनेस अहाँ छी परदेश खेलसँ राखू सभ लोकनि मेल स्वस्थ्य रहब तन रहत चुस्त मन रहत खुश देशक लेल खेलब सभ दिन कठिन खेल नाओंक लेल नहि देशक गौरव ले राजदेव मण्डल व्यथित तरू चारूभर तरू ताकि रहल जनकल्याणक भाव भरल निच्चाँमे कुरहड़ि चमकि रहल रहि-रहि कऽ ओ बमकि रहल। नि:सृत होइत मन्द-मन्द धेरि रहल अछि मृत्युक गंध डरे थरथराइत भेल लाचार मने-मन करैत विचार। कोन पापक वा अभिशापक भेटि रहल अछि ई फल नइ अछि हमरा विरोधक बल छोड़त नहि ई निर्दय खल। भेल छी सर्द हृदैमे दर्द आँखिमे भरल नोर केकरा लगबै गोड़ काटत हमरा खण्ड–खण्ड कोन दोषक अछि ई दण्ड। केतेकोकेँ प्रेमक इतिहास हमरे संगे होएत विनाश। कटत हमर गात होएत सभपर आघात छेलौं संग-साथ दुसमनो छल कात अपने कर्ममे रहलौं तल्लीन पल-पल आ राति-दिन नइ चाहै छी कोनो प्रतिदान सेवामे लगौने जी-जान समता भाव रखि मन-मान कहाँ बुझै छी केकरो आन। केहेन कठिन अछि ई पल हमरा लेखे कियो ने खल दुसमनोपर बरिस रहल शीतल छाँह आ अमरीत फल। बुद्धिहीन सभ बनलौं मीत नइ जानै छी हित-अहित जनशत्रुकेँ मान-सम्मान उपकारी केर लैत प्राण। हेरा गेल सुखक सागर कल-कल करैत जल डुमकी लगबैक मन करै छल। बाटमे छेलै बाधा केतेक एक नै अनेक केना पहुँचब ओइठाम जँ कियो पूछत- अछि कोन काम किए एलौं ऐठाम? किन्तु उत्कट भेल इच्छा एकरा रोकब केना जाएब जेना-तेना यादि पड़ल मनक गड़ल मुँह झाँपियो करैए लोक केतेक काज हमरो लगबए पड़त एहने कोनो भाँज मुखौटाक अछि हजारो रंग एकटा रखलौं मुँहपर आर रखलौं संग अनचिन्हारकेँ नै करत तंग। नीक-अधला, बाट-कुबाट सभकेँ करैत पार पहुँच गेलौं निकट आगूमे छल किनार। ठमैक छुबै छी मुँहकेँ हाथसँ अकचका उठलौं ऐ बातसँ। हेरा गेल हमर मुख तब भेटल ई सुख केहेन भेल चूक ई सुख छी आकि दुख? डाॅ. शिव कुमार प्रसाद, अध्यक्ष हिन्दी विभाग, हरि प्रसाद साह महाविद्यालय- िनर्मली (सुपौल) , जनम- 12/11/1956. गाम+पोस्ट- सिमरा, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, (बिहार) िनर्मलीक िनर्मलतामे मनक मलाल सभ मेटा रहल अछि। शिक्षाक ऐ महापंकमे गामक जिनगी लेटा रहल अछि। कैंचा-पैसा जोरि-जोरि कऽ माए-बाप सभ पठा रहल अछि। कोचिंग, विद्यालय, काओलेजमे एक-एक जन आइ लुटा रहल अछि। गामक जिनगी..............। के पठाओत ककरा लग जा कऽ नेना भुटका पढ़ि रहल अछि। नै दू सुधि बुइध केकरो छैक अपने झंझट ओझराएल अछि। गामक जिनगी....। दौगैत-दौगैत चटिया सभटा पढ़बैत-पढ़बैत बड़का सर सभ अपन-अपन भाॅजमे सभकोइ डॉरहि छुबए लेल अपसियाँत अछि। गामक जिनगी लेटा रहल अछि। मनक मलाल सभ मेटा रहल अछि। तैं किछु ने किछु लिखैत जाउ लिखैत-लिखैत लिखिये देबै मैथिलीक उपकारी हेबै तैं किछु-ने-किछु नित लिखैत जउ। छपैत-छपैत छैपिये जेबै एकदिन लेखक बनिए जेबै मंच आर इनामो भेटत तैं किछु-ने-किछु लिखते जाउ। मौलिकता ककरा कहैत छी किनकामे मौलिकता देखल सभ कियो एक्के बात लिखैत छथि सबहक नीयत साफ देखैत अछि तैं किछु-ने-किछु लिखते जाउ। नीर-क्षीर विवेक किनका छन्हि लिखिनिहारमे हंस के छथि पूर्जा-पूर्जी जोड़ि-तोड़ि कऽ किछु-ने-किछु अहाँ घसैत जाउ तैं किछु-ने-किछु लिखैत जाउ। बौआ केर उबटन कजरौटी केर काजर संगे बौआ केर उबटन बिला गेल। सोइरी केर अशौचक संगे भारतीय संस्कार हरा गेल। बौआ केर......। नव युगक नव संस्कारमे जॉनसन बेबीक पाउडर मिलि गेल माइक स्तन छोड़ि कऽ नेना बोतल संगे माए भुला गेल। बौआ केर......। सिनेहक डोरि तोड़ि कऽ ममता सुन्दरता केर मोल बिका गेल दाइ नौरिनक संग पाबि कऽ नेना माइक शोक भुला गेल बौआ केर......। अपन आन सभ पाइपर बिक गेल सम्बन्धक सभ आँच बुता गेल धन लक्ष्मीक चकाचौंधमे तन मन रागक रंग मेटा गेल कजरौटी केर काजर संगे बौआ केर......। सोहर जन्म बधैया संगे मूड़न उपनैनक महत मेटा गेल लकदक गाड़ी वस्त्राभूषणमे बरूआ केर आचार्य भुला गेल कजरौटी केर काजर संगे बौआ केर......। शहर ओ गेल...... शहर ओ गेल मनुक्ख बनै लेल गाममे रहि बन-मानुख छल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। गाममे सभ छल भाए-बहिन सभ कियो बाबू कियो काका छल भैया-भौजी बेटी-भतीजी नै कियो बिनु नाता छल। शहरमे जाइते रिश्ता-नाता सभटा मटिया-मेट भऽ गेल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। पथराएल शहरी पाथरमे कन्निको मानवता नै बाँचल चारि बरखसँ चालीस बर्ख केर नेना-युवती बलि चढ़ि गेल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। बाट-बटोही देखतो आन्हर सनितो रूदन बहिर भऽ गेल पशुतो एहेन कुकर्म सुनि-सुनि चुड़ुक पानिमे डूमि मरि गेल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। खेबैया सबहक नाॅकेँ भेटल खेबैया बिनु खेबैया हमरे नाॅ अछि देखू पार आब केना लगैत अछि बिनु खेबैया हमरे नाॅ अछि। किनको टाका पार लगौतन्हि किनको नेता पार लगौतन्हि अपन-अपन बाँस भिरौने बहुतो पार उतरलौ जाइ छथि बिनु खेबैया हमरे नाॅ अछि। दूर-दूर धरि नजरि खिरौने ताकि रहल छी आँकि रहल छी किनका पछुऔने पार लगत नाॅ कियो संगी नै भेटि रहल अछि बिनु खेबैया हमरे नाॅ अछि। किनको बड़का पैघ हबेली किनको बड़का पागक डौड़ही किनको सार किनको मामा धोती जिनक अकास सुखाइत अछि बिनु खेबैया हमरे नाॅ अछि। माय हमर नव कुम्भ नहेली माय हमर नव कुम्भ नहेली नै हुनका मन पापक गेठरी नै हुनका मन बाँझक धोकरी नैना-भुटुकाक साँस हास सन जिनगी भरि ओ खूब नहेली माय हमर नव कुम्भ नहेली। नै कहियो ओ चानन केली नै कहियो संन्यासिन भेली गिरहस्थीकेँ स्वर्ग बूझि ओ कर्मक संग प्रभु गुण गेली माय हमर नव कुम्भ नहेली। नै ओ िवदुषी नै ओ सुन्नरि नै आडम्वरी नै कनसोही बाट-बटोही सभ जन हिनका मनुक्ख रूपमे भेटल सिनेही माय हमर नव कुम्भ नहेली। मन प्रयागमे त्रिविध तापकेँ कर्मक हूलासमे अपन गर्वकेँ अपन मनोरथ परक दुखमे आजीवन ओ डुमौने रहली माय हमर नव कुम्भ नहेली। देख एलौं हम पटना हलसल-फुलसल बसमे बैस कऽ पहुँचि गेलौं हम पटना देख एलौं हम पटना। भरि रस्ता हम उड़िते गेलौं रातिक नीन भेल सपना केतबो गुहारि देव-गोसाओनकेँ मन पड़ैत छल फेकना देख एलौं हम पटना। बाप जनम नै देखने छलौं एहेन मनुक्ख जंगल भोजे बेरमे पहुँचि गेल ओ पपिआहा घर-घुसना देख एलौं हम पटना। चोर-उच्चका डेग-डेगपर भीड़ देखि कऽ जी उड़ैत छल बाहर-भीतर जाएब कठीन छल बेथाक नाओं अछि पटना देख एलौं हम पटना। हुनकर बात काटि हम एलौं बाल-बोधकेँ छोड़ि कऽ एलौं नेताजी कि बात बनौता मोन रहत ई घटना देख एलौं हम पटना। मन होइत अछि उड़ि कऽ पहुँचि जाइ अपन सोहागक अंगना। मेटा रहल अछि झँपा रहल अछि अपन परिचिति देख एलौं हम पटना। संजय कुमार झा "नागदह"् नाम : संजय कुमार झा, पिताक नाम : श्री हेम चन्द्र झा (थल सेना सँ सेवा निवृत )/ ग्राम : नागदह / जिला : मधुबनी, शैक्षणिक योग्यता : बी. कॉम (प्रतिष्ठा), एम. कॉम, सी. ए. इंटर (फाइनल), कार्यरत : लेखा प्रबंधक खैर, छोड़ू पूजा, पाठ, विवाह, जनेऊ जनम - मरण सब में होइत छैक कुशक प्रयोजन एखनो होइत छैक खैर, छोरु पहिले बेसी काल लोक गरिया दैत छल तोरा कुश उखाडय बाला कियो नहि रहतौ मुदा आब त' रहितो नै उखाडय छै खैर, छोरु एखनो पुरना लोक नहि जाए चाहैत छथि मिथिला के छोइर क' कोनो देश आ विदेश कियाक ? सब दिन सेबलहुँ मिथिला आब जाउ परदेश जौं धोखाधड़ी में छुटि जायत प्राण गंगा स्नान त' कात बिजली पर जरायत कि बबूर आ अक्कट सँ से कहि नहि खैर, छोड़ू सब गोटा के याद होएत पावनि - तिहार निपल आँगन आ घर आँगन अविते सुन्दर सुगंध बुझाइत छल आई कोनो खास दिन नवका चूल्हा आ दाय - माय व्यस्त आजुक दिन बुझा रहल मस्त आबो बुझाइया ? खैर, छोड़ू गामक दुर्गा पूजा में दू मॉस पहिने सँ नाटकक तैयारी सब साल उभरि रहल नवका - नवका कलाकार कि, एखनो होइया ? पहिल पूजा सँ यात्राक दिन तक बच्चा जवान स मरवा लेल व्यग्र तक मंदिर के प्रांगण में क ' रहलाह पूजा आ पाठ साँझ परिते बच्चा आ जवान के कहियो काल भ' जाइत छल दू - दू हाथ हमहू एकरे कारन छी एखन धरि पिताजीक आज्ञाक पालन में पूजा में गाम जाय सँ निष्काषित कि एखनो होइया ? खैर , छोड़ू एकसर विद्यापति मिथिलाक पताका विश्व में फहरा देलाह कतेको व्यक्ति के विद्वत बना देलाह मिथिलिका झंडा वीना डंडे फहरा देलाह नहि कोनो विधायक नहि संसद में ठाढ़ भेलाह नहि कहियो अनसन नहि रैली में भाग लेलाह लोकक त बात छोड़ू महादेव स्वयं उगना बनि विद्यापति के पैर धेलाह कि मिथिला के आब दुर्दिन नहि ? खैर, छोड़ू भेटल ? धुमसुरिक चोट सन आखर लिखल मनुक्ख, कुक्कुड़, बेंग, भाषा ओ संस्कृति समेटल आंदोलनकारी पर कए प्रहाड़ बाजू अपने की सब भेटल ? जेहने बुझू तेहने उगल भलें स्वार्थ सँ हो डूबल विद्वत् जनक आभाव कहियो नहि की तैयो सब मैथिल मिलि क' अष्टम सूची लेल एक भ' जुटल ? भने भोजन कए बैसल अनशन पर ध्यान दियौ मात्र ओकर कर्म पर नहि अपने सन पड़ल घर मे कनिया संग अछि पलंग पर सुतल घर सुतल सपनहि घुमि आबथि दिल्ली,मुंबई ओ कलकत्ता नहि जाएब हम कोनो दल संग भलें लोक हो कतबो जुटल अछि जौं दाबा अपना के बड्ड हम छी सब सँ होशगर सिद्ध करू मैथिल जन मे हम छी सब सँ बुद्धिगर मन क्रम वचन सँ टांग नहि खिचु जोड़ लागू पाछा सँ नहि त' कहियो अपनों सोचब एहि अदखोई - बदखोई सँ की भेटल ? छी कोन अपने जाति विशेष ? सब सँ पहिने हम मन्नुख छी त'हन कोनो जाति भने मन्नुखक गुण हो वा नहि किन्चिद् नहि परजाति। एक मनुष्य में सब जाति समाहित तखनहि जीवन धन्य एक जाति के मात्र जौं गुण अछि जीवन भ' जाएत शून्य। ब्राम्हण सँ पांडित्यक गुण ली शूद्र सँ सिखु सेवा भाव क्षत्रिय बनि करू निज रक्षा वैश्यक गुण सँ हाट - बाजार। स्वह्रिदय झाँकि क' देखु कोन गुण अछि अपनेक विशेष मोने - मोने अपने सोचि लेब, छी कोन अपने जाति विशेष ? ओम प्रकाश झा गजल अप्पन गाम बिसरल छी गाछक आम बिसरल छी नित नब खेलमे बाझल माटिक दाम बिसरल छी ठीकेदार हम धर्मक रामक नाम बिसरल छी गाँधी हम उचारै छी हुनकर राम बिसरल छी छाहरि "ओम" बाजल किछु ककरो घाम बिसरल छी गजल हमर करेजक जान तिरंगा भारत-भूमिक शान तिरंगा शोषित लोकक आस बनल छै आमजनक अरमान तिरंगा नजरि उठेतै दुश्मन जखने बनत हमर ई बाण तिरंगा मोल मनुक्खक होइत की छै गाबि कहै छै गान तिरंगा राम-रहीमक बातसँ आगू "ओम"क अछि सम्मान तिरंगा मात्राक्रम दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ दू बेर प्रत्येक पाँतिमे। गजल हमर बात कियो बुझलक कहाँ हमर मोन कियो तकलक कहाँ चमकि गेल छलै बिजुरी कतौ हमर अन्हार कियो हरलक कहाँ बात सुनल सभक नमहर सदति हमर छोट कियो सुनलक कहाँ राखि हाथ मे बम आ पिस्तौल हमर नाच कियो नचलक कहाँ ओम जपि हरक नाम सदिखन हमर नाम कियो जपलक कहाँ महेश डखरामी कोनादइन पीयर ऑचर पीयर पात , पियरे वसन तन पीत गात । पित्ते आमिल प्रतिपद प्रपंच, ठामे मुश्की मन संच मंच । मोनक मान ककरा कहबै , कान तूर हम चुप्पे रहबै । बाटे बाट लागल टाट , घर बेसाहक देखू ठाठ । जेब नै ढौउआ बातक काट , बाहर फुटानी बापे खाट । मोनक मान ककरा कहबै , कान तूर हम चुप्पे रहबै । महेश मञ्जरी ☆ कारी बादर घन अम्बर पसरल, पवन गमन बरजोर । पुहुप सर मन उर वेधन , दर्शन मन विभोर । ☆ आध नयन पुनि आधे आनन , आधे लोचन लाज । आधे ऑचर कमलमुख झाँपल , आधे पुष्पक साज । ☆ आधे चानक पुनि पुनि दर्शन , उदिप्त ताप तरंग । दामिनि दमकि उर दल अर्पण , ललना ललित लवंग । ☆ भाव भुजंग सिर ऊपर धारण , कण्ठे सुकपिक वास । युगल कदलि पर केहरि नाचय , दर्शन समन पियास । ☆ राधा माधव छवि अनादि अनूपा, दास चरण अनुराग । कृपा दयानिधि दर्शन पुनि पुनि , जागल महेशक भाग । गणेश मैथिल हे ! हे!! हे!!! हे ! हे!! हे!!! एहन की पाप करै छी जीबते जी बेटा बेचै छी दुर...छीं ! छीं !! छीं !!! पुतहुओ चाही लिखल-पढल ताहु पर छी कैंचा लेल अड़ल दुर...छीं ! छीं !! छीं !!! जँ अपन कमाइ सँ नहि घर बनल त की बेटा बेच पीटब कोठा ?? दुर...छीं ! छीं !! छीं !!! यौ महाशय एक गप कहु की आहाँक बेटा घी मे नहाएल हमर बेटी पानिए पर पोशल ?? दुर...छीं ! छीं !! छीं !!! यौ जँ हमरा बेटीक लेल चाही वर त अहूँ बेटाक लेल चाही कनिञां तोड़ि विधाताक बनाएल विधी बेटा बेच किएक बनै छी बनियां ?? दुर...छीं ! छीं !! छीं !!! संतोष कुमार झा, वरिष्ठ संकाय, चर्म वस्तु एवं उपवस्तु विद्यालय, फूटवियर डिज़ाइन एवं डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट, नोएडा, (उद्योग एवं वाणिज्य मंत्रालय, भारत सरकार) सिक्की शिल्प-कला आउ कथा करि एहि शिल्प-कलाभूमि कें आई, आउ कथा करि पावन मिथिला भूमि केंआई! एहि मिथिला कें धरा-भूमि पर जनमलजे शिल्प-कला, नाम भेल तकर ‘सिक्की’शिल्प-कला। जे नारी जनमली-सिंचली मानव-संसार, सेहजनमली-सिंचली ‘सिक्की’शिल्प-कला। जे अखिल विश्व मे मिथिला कें नाम उजागर केलक, देलक मिथिला कें विशिष्ठपहचान। आउ कथा करि एहि शिल्प-कलाभूमि कें आई, आउ कथा करि पावन मिथिला भूमि केंआई! ‘सिक्की’ एकटा, घास होइछ जे बरखा ऋतु कें बाद नदी,पोखरि, खत्ता कें कात भेटइछ। एहि काल होइछ ई सर्वोत्तम रूप-यौवन संपन्न, तखनहि काटि आनय नारी-संकाय। पातर-पातर काटि फेर एकरा आँगन-चार पर सुखाओल जाय, एहि बिधिए बारहो मास काज ई आय। आउ कथा करि एहि शिल्प-कलाभूमि कें आई, आउ कथा करि पावन मिथिला भूमि केंआई! माँ प्रकृति भरलीचमकौआ स्वर्ण रंग एहिमे, जाहिमे लाल, पीयर सब रंग भरई छथि शिल्प-कार्य केनिहारि। टकुआ सौं ताना-बाना एहेन बनय जे, शृजित करय नूतन वस्तु-संसार। सुंदरता सौं ओत-प्रोतमौनी,सूप, कोनिया आदि… घर-गृहस्थी कें नित्य सामान। आउ कथा करि एहि शिल्प-कलाभूमि कें आई, आउ कथा करि पावन मिथिला भूमि केंआई! आदि-काल कें शिल्प-कला ई, मैथिल-सभ्यता कें शुभ-श्रेष्ठ उत्कृष्ट पहिचान बनि गेल। विवाह,द्विरागमन, मधु:श्रावणी जे किछु पावन कर्म हुए, एहि शिल्प कें बिना ओ मिथिला मे अधूरा-अपूर्ण रहय। मिथिला कें घर-घर मे बुच्ची कें ई शिल्प सिखाओल जाइत छै, अपन विवाह कें लेल स्वयं कला-कल्पना मिश्रित ई शिल्प बनाओल जाइत छै। आउ कथा करि एहि शिल्प-कलाभूमि कें आई, आउ कथा करि पावन मिथिला भूमि केंआई! अरविन्द ठाकुर सुनू जयद्रथ ! (कविता-1) एकरा काठी जुनि देखायब कि हमर कविताक अनगिनत पृष्टक बीच अखनि सुतल पड़ल अछि बारूद एकर मुँहथरि पर जुनि आयब कि हमरा भीतर मथल जाए रहल विचार घुटैत-धधकैत बेचैनी सुख-दुख के पानि-आगि किछु और-और वस्तु सँ मिलि लए रहल अछि रूप तरहि-तर खौलैत ज्वालामुखी के अहि सँ भ्रमित जुनि हएब कि आइ बृहन्नला बनय पड़ल अछि अर्जुन कें ई भावी समर के पूर्व तैयारी थिक ओ जखनि आएत धनुर्धारी जकाँ आएत देखैत-बेधैत चिड़ैक आँखिक अपन लक्ष्य सुनू जयद्रथ ! अहि बेर कृष्णक मायाक मुँह नहि जोहल जाएत शुरू करब अहाँ जँ समर सूर्यास्त तक प्रतीक्षा नहि करब हम दू मित्र (कविता-2) ओ छलाह ओ सेहो छलाह एक सँ एक मुमताज हस्तीसभ मंच पर मौजूद छल उड़ि रहल छल भाषणक दूधिया उज्जर हंस भीड़ सँ दलमलित छल शहरक मैदान नारा…………लफ्फाजी………किदन-कहाँ अहिसभ सँ अलग अपन घरक एकान्त मे देर तक उजास सँ दुलार करैत रहल ओ फेर कलम राखि अपन अंगुरी सोहरएलक कोठली सँ बहराकए एकटा नेना कें चुमलक अपन नील आँखि सँ आकाश कें पीलक सुरुज दिस ताकि ओ मुसुकायल – हओ मित्र ! तों असगर हमहुं असगर तोरा लग प्रकाश हमरा लग कविता हम हत्या करए चाहए छी ( कविता-3) ओकर झोरा मे बहुत रास वस्तु अछि जेकर ओ बेर-बेगरते अप्पन आ मात्र अप्पन हक मे इस्तेमाल करैत अछि नीक लोकक आँखि लेल गरदा अछि ओकरा लग टेढसभक लेल चमचै कायरसभक लेल धमकी सत्तासीन आ सत्तातुर लेल वोटक ठेका अफसर लेल रैजकी आ विशिष्ट लोकक विशिष्ट अंग लेल पुष्ट मात्रा मे तेल अछि ओकरा लग ओ सभदिन भोरहि उठि महादेव नामक कोनो भगवानक लिंग पुजैत अछि आ अहि तरहें अपन सौभाग्यक लेल दिनक प्रारम्भ करैत अछि ओकर लोल नहि देखाइछ ओ कठफोड़बा जकाँ समाजक काठ कें खोधैत-फोड़ैत रहैत अछि ओकर ठकठकी सुनि नहि पाबैछ लोक ओ हँसैत अछि हरमजदगी के हँसी जेना कैक्टस मे फड़ल हो फूल आ कानैत अछि हबोढकार गरा मे कण्ठी बान्हने सोंसि जकाँ ओ नियमित रूप सँ नित्तह ईसा, गांधी आ लूथर किंग केर नाम जपैत अछि आ अहि तरहें स्वयं कें विज्ञापित करबाक खर्चा बचाए लैत अछि ओ नियत तिथि कें प्रति वर्ष गांधीक समाधि पर जाइत अछि भिजायल आँखिए फूल चढबैत काल थर्र-थर्र काँपैत अछि बापूक पुनर्जीवित भए जएबाक आशंका सँ सलाइ जकाँ अपन एकहि टा काठी सँ हम जराबए चाहय छी ओकर मायामहल हमर कामना अछि जे हम पढी ओकर बदहवाश चेहराक भूगोल डगर पर अकस्मात आएल सांप जकाँ हम डंसय चाहय छी ओकरा हमर कामना अछि जे हम सुनी ओकर निरन्तर नील पड़ैत चेहराक आर्त्तनाद हम कोनो दिन ओकर हत्या कए घुरए चाहय छी अपन घर अपन प्रियाक वक्ष पर हाथ राखि ओकर ठोर पर उष्म चुंबन अंकित कए कहए चाहय छी – अहाँ सुरक्षित छी,प्रिये आब अहाँ सुरक्षित छी हलफनामा ( कविता-4) हँ हम राजनीति करए छी कविताक राजनीति आ से करब आवश्यक बुझय छी कान्तासम्मितयोपदेशयुजे – कहए छथि मम्मट काव्यप्रयोजनक विषय मे हम हुनका नकारए नहि छी ओहि सँ आगू बढय चाहए छी अजुका विकाल मे जखनि प्रजा नपुंसक आ शासक निरंकुश भेल छै भेलहि चलि जाय रहल छै के सुनत कान्तासम्मित उपदेश केकरा परवाह छै हम कवि छी असीम छी हमर कविता प्रभुसम्मित आदेश बनत सत्ताक भाल पर कील ठोकबाक लेल राजकविक जीह मे तीर भोंकबाक लेल हम सत्ताक नहि प्रवक्ता बनब कोनो ठप्पामार विचारधारा-विशेषक नहि अधिवक्ता बनब सत्ता आ विचारधारा-विशेषक विरोध मे चलाएब कविताक निर्णायक हथौड़ी हम प्रभुसम्मित कविता करब हम कविताक राजनीति करए छी करब मानवताक ऐतिहासिक संघर्ष मे ओकर संग देब मनुष्यक हेरायल जाइत पहचान कें धुमिल होइ सँ बचयबा मे ओकर मदति करब आश्रम, कुटी, मठ, अखाड़ा, गुट-गिरोहक विरोध मे कविता कें हथियार बनैने कवितेक सैन्यदलक संग युद्धोन्मुख हम कविताक राजनीति करए छी करब करिते रहब स्मृति मित्र अछि (कविता-5) कोनो शापित मनुष्य जकाँ पाथर भए जएबाक भय सँ घुरि कए नहि ताकबाक किरिया-सप्पथ सँ स्वयं कें मुक्त करू, वन्धु स्मृति मे हमसभ बीतल घड़ी कें फेर सँ जीबैत छी बेर-बेर जीबैत छी जतय सुख-दुखक गप नहि अनुभूतिसभ अछि, बस समयक अनेक रंग अछि, बस अनुभूति सँ डरिकए कट्टिस नहि कएल जाइत अछि स्मृति सँ बढाएल जाइत अछि हाथ स्मृति सँ मैत्रीक लेल स्मृति मे हमसभ बीतल घड़ी कें फेर सँ जीबैत छी बेर-बेर जीबैत छी आजाद गजल छाती तँ तानल छल शस्त्र उठयबाक बेर कोंढ़ किए काँपि रहल लास उठयबाक बेर पात बिछयबाक बे लोकक करमान छल यार सभ अलोपित भेल ऐंठ उठयबाक बेर आयातित महारानी फाहा बुझाइत छल घोल किए परमाणुक भार उठयबाक बेर दाउन बेर धानक तँ मारिते महाजन छल एक्को टा जन नहि नार उठयबाक बेर प्रवचन मे घौसय छथि धैरज केर महिमा ओ सभ टा बिसरि जाइ छथि कष्ट उठयबाक बेर अरबिन उतारा किछु विध्वंसक होइत अछि नीक जकाँ सोचै छल प्रश्न उठयबाक बेर आजाद गजल जनपथ छोड़ि राजपथ जायब से हमरा की नीक लगैए उखरि मे मूड़ी घोसिआयब से हमरा की नीक लगैए बक सँ कौआ बनल ठाढ़ छी काजर घर मे तहि पर चानन ठोप लगायब से हमरा की नीक लगैए चोरि करब हम मुदा शान सँ चौकीदारक संग रहब लाज-शरम ताखा पर राखब से हमरा की नीक लगैए भ्रष्ट दुपहरा केर एहन बहसल बसात मे लंक-दहन लेल आगि पजारब से हमरा की नीक लगैए छमा करू अरबिन उचित किन्नहुँ नहि बाजब सुधिजन आगाँ गाल बजायब से हमरा की नीक लगैए आजाद गजल छिछिआइछ उत्कंठा हमर खन आर लग, खन पार लग हमर लिखल उजास सभक मोल की संसार लग जाल मुँहमे बोल नञि, छपय बहेलिया के बयान चिड़ैक बोली बुझत से नञि लूरि छै अखबार लग रंगबिरही जिनीससँ ठाँसल रहै सभटा दोकान किन्तु जन-बेचैनी के औषधि नञि रहै बजार लग एक समझौता सँ शासन वामनक सरकस बनल नञि छलै पट्ठा कोनो दमगर बचल दरबार लग बुन्न मे सागर भरल, अणु मे भरल ऊर्जा अपार बिन्दु सरिपहुँ लम्बवत भए ठाढ़ होइछ आधार लग लोक-लादल नाह बाढ़िक पानि मे अब-तब मे छै ओ घिंचाबय छथि फोटो बान्ह पर पतवार लग नफा के वनतंत्र मे पग-पग बिचौलिया रक्तबीज अकिल गुम्म अछि, केकर मारफत अर्जी दी सरकार लग उपरचन्ती माल के चस्का चढ़ल “अरबिन” एतेक बनल छी लगुआ कि भिरुआ, जायब नञि अधिकार लग आजाद गजल क्लस्टर बम,प्रक्षेपास्त्र टामहाक हमरे छल जीवित लहास बनल जे इराक हमरे छल भारत,सोनार बंग आकि पाक हमरे छल “एकोहंबहुस्याम”-ई मजाक हमरे छल एखन भने परमाणु कचरा केर याचक छी ‘विश्वगुरु हम छी’-से वेदवाक् हमरे छल गांधी छलहुँ जखन हमरे सुराज छल दागी पर खादी केर झक पोशाक हमरे छल हमरे ओ मुण्ड छल कटि गेल जे रैजकी सँ बाजारक बीच पड़ल कान-नाक हमरे छल हमरे छल डिडिर जे बाँटलक सहोदर केँ अधरतिया आजादीक ढोल-ढाक हमरे छल ‘अबिरन’रहबैया छी रोगहा समाजक हम लसनि जेकर लागल अछि से सुजाक हमरे छल आजाद गजल जीवनक जे अगिन-पथ के पार एताह जीजिविषा मे से अजित,आजाद हेताह बूड़ि,जे निष्ठाकेँ सदिखन मोन रखताह ओ सियासी खेल मे बरबाद हेताह माथ अछि जिनकर सिंहासन के चरण पर आम-जन के माटि मे ओ खाद हेताह ओ वैधानिक अनुकम्पा के प्रावधानसँ मूल भए सकलाह नहि,अनुवाद हेताह अछि हुनक निर्माण मे कोनो खराबी उच्छिष्ट छथि ओ,तेँ कोना उत्पाद हेताह धन्य!’अरबिन’ तों एलह मैथिल गजलमे फेर केओ खुसरो की तोहर बाद हेताह आजाद गजल संसद केर फोटो मे किछुओ नहि हेर-फेर नागनाथ,साँपनाथ,इएह दुनू बेर-बेर लागैत अछि अजुका ई दिनो अन्हार रहत सुरूज मलान छथि एखनहुं उबेर बेर एकबाली लोक सभक दागल सभ साँढ छै तोड़ि रहल जहिपतार करचीक सभ घेर-बेर मातल आर्केस्ट्रा मे आजुक सभ गोपिका राधिकोक टेर नहि मुरली के टेर बेर घामक टघार बहैछ श्रीमंतक माथ पर उमकल सीमान पर जन-गण के जेर-बेर गाम भेल नन्दिग्राम,घर-घर सिंगूर भेल "अरबिन"सभ संग रहू एहन अन्हेर बेर टिमटिम टिमटिम ! टिमटिम ! माने एकटा अनवरत प्रकाश टिमटिम ! टिमटिम ! माने एकटा अनवरत संघर्ष टिमटिम ! टिमटिम ! माने एकटा अपराजेय जिजीविषा एक-एक क्षणक हजारक हजार टिमटिम सँ जरैत रहैत अछि दीप टिमटिमाइत रहैत अछि सावधान –सतर्क रहैत अछि दीप लड़ैत रहैत अछि दीप तेज हवा आ अन्हर सँ बुताइतहु अछि त शहीद जकाँ असावधान-आश्वस्त रहैत अछि दीप सुविधा, षडयंत्र आ ईर्ष्या भरल फूंक सँ आ बेमौत मारल जाइत अछि 1220 || विदेह सदेह:१७ विदेह सदेह:१७|| 1219
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